Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Karm Kand Ratnakar
Front matter
ग्रन्धकत्ता
पं. देवानन्द शर्मा बदरिकाश्रमस्थः
Murari Krt Press Delhi
, * भूमिका * विदितचरमेयास्तीदम् तत्रभवतां निगमागमाववोधोत्फुल्ल- सूक्ष्मेन्द्रियविषय विभागानां विदुपाम् । यदिह परब्रह्मपरमा- त्मनो मायाशक्तिविजृम्भिते, ब्रह्माण्डखण्डाभ्यन्तराले । अनादि कालकर्मवासनासंस्त्रियमाण जीवजातोपभोगनिमित्तं, स्थावरजङ्ग मात्मक सृष्टिचक्रं वर्तते । तन्त्र स्थावरसृष्ट्यपेक्षया जङ्गमस्यो- स्कृष्ठलया, तत्रापि कृमि कीट पक्षि मृग पशु मनुष्याणा मुत्तरो त्तरं प्रवोधाधिक्येन, सकलजीव जात निकायानां मध्ये, मनुष्य जातेरे च प्राधान्य मस्तीति सुस्पष्टमेव । तस्याश्चातुर्वरायन विभागं कुर्वता भगवता गुणकर्मोपाधिस्तद्धेतु त्वेननिर्दिष्टः । तत्रच कर्मणां नित्यनैमित्तिककाम्यरूपाणां त्रैविध्यम्-तेपांच नित्यानां संध्यावन्दनादीनां । नैमित्तिकानाम्-जातकर्मादीनां, काम्यानाम्- ब्रतोपवासयज्ञादीनां, अवयवावयवि भावेनानेकविधस्वम् धर्म प्रमाणोनिभिः स्वकीयासु संहितासु वाहुल्येनोपवर्णनंकृतम् । अथच गुणकर्मोपाधिगतानां, ब्राह्मण क्षत्रिय विट् शूद्राणां चतुर्णा वर्षानामाद्यानां त्रैवर्णिकानां द्विजत्वसंपादको वीजगर्भसमुद् भवनोनिर्वहणार्थकः संस्कारो विहितः । तथा व्रतोपवास शालादि कर्मसु, आराध्यदेवतानां, पूजाविधाननियमोनियनितः । तत्र, वर्तमान कलिकालपिहित कर्मकाण्डविषये, प्रतिकूल क्रियाकला- पक्रमसरणिमनुरुध्य, प्रवृत्तासु सतीष्वपि नानादिग्देशब्यवस्थानु सारिणीषु विकलाटासु व्यतिक्रम क्रियार्थासु पद्धतिषु, सकृत्स मष्ठिक्रिया क्रमविधानानुवर्तमानेन मया पूर्वाचार्य विचारपद्धति मनुक्रम्य कर्मकाण्डरत्नाकरनाम्नाऽयंग्रन्थः संगृहीतः अत्र च पूजा खण्डसंस्कारग्वण्ड दानवेड-शान्तिखण्डभेदेन चतुर्धायिभज्य, विषय विभागोपवर्णनमकारि, प्रत्येकस्य विषयस्य प्रथमेतत्तदामु- खेसप्रमाणां विषयसिद्धिं विधाय तदनुसारेण कर्मपद्धतिश्चोक्ता। तत्रसहजात प्रमादधशेन अक्षरयोजकाद्यनवधानवशेन वा, दिस्युः काश्चन त्रुटयस्ताः क्षन्तव्याः, तथा तत्सूचनानुग्रहेणा नुग्रहीतव्योऽयमनुचरो विदुषामितिशम् । मार्थक- अन्यकर्ता। - ॥ प्रस्तावना ॥ श्री परब्रह्म जगदाधार ईश्वर की मानुप सृषि अनादिकाल से ब्राहाण, क्षत्रिय वेश्य, शुद्ध चातुपर्णात्मक है। इन वणा में से ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इनकी द्विजत्व सना संपादन ह । जिन तीन घणों के परम्परा से जन्म संस्कारादि कर्म होते प्राय हैं उन्हें द्विज कहते हैं। इनके जन्म और संस्कार के विषय में अस्मदादि के पूर्वज व्यास वसिष्णादि महर्पियों ने मनादि वेदों के अनुसार कर्मकांड विषय को श्रुति स्मृति गृह्यसूत्र पुराणादिकों में यथेष्ट राति से विवरण किया है। पर चकलिकाल के प्रभाव से तथा नाना मत मतान्तरो के कारण प्राथुनिक पद्धतियां पूर्वाचार्यों को निर्माण को हुई पद्धतियों के प्रतिकूल भिन्न २ प्रकार की हैं। उपी हुई पद्धतियों जो लब्ध होरही हैं उन में भी, सूत्रकारों के मतानुसार, समयो- पयोगी कर्मो की यथेष्ट ज्ञानप्रद पद्धति के प्राप्त न होने के कारण मेंने भाजतक । वर्ष के अन्दर वेद उपनिषद, धर्मशास्त्र, गृह्यसूत्र पुराण तन्त्रशालादिवों का यथेष्टावलोकन करके यथासम्भव अाधुनिक कर्मोपयोगितानुसार पद्धतियों का यह पन्थ कर्माण्डरनाकर नाम का रचा है, जिसमें प्रत्येक पद्धति के पूर्व नाना 'ग्रन्थों के प्रमाणों को एकत्रित करके अमुक में परिभाषा नाम से सग्रह किया है और तदनन्तर, अमुक फर्मपद्धति की रचना की है। इस पुस्तक को चार खएडों में विभाजित किया है। म पूजाखण्ड में गणेशादि पञ्चाङ्ग पूजा, ग्रहयागादि कोटि होमान्त अङ्ग प्रत्यादि समस्त वर्णन, तथा ग्रहयागादि ६ भद्दी के चित्र सहित पूजादि विषय और सामयिक एकादश्यादि शान्तिपतियां तथा नवरात्रादि विधान सप्तसती चडी आदि के समस्त अनुष्ठान, और स्यादि समस्त महामहा रुद्रान्त, पद्धतियों की रचना की है, इस प्रकार पूजाखण्ड में १५० से अधिक परिभाषा मीर पद्धतियां हैं। दूसरा संस्कार खगह है। उसमें भी प्रथम विवाद सस्कार पार. कर सूत्राऽनुसार जो भी विवाहोपयोग्य विषय सूत्रधारया व धर्मशास्त्रादिको से निर्णय परके परिभाषा लिपी गई है। तदनन्तर विवाह पद्धति की रचना हुई है। इसी तरह पोडश संस्कारों को परिमाया व पद्धतियों के अतिरिक्त प्रतिमा विवाद मर्म विहादि जिगर रत्यों को पुगतन प्रयानुमार यिना पतियों पे किया परत घे उनी भी परतियां शाखानुफल निर्माण की गई है। - प्रस्तावना तीसरा धानसण्ड है .1. इसके भादि में भी सर्वदान परिमाया विशेष प्रमाणों से सविस्तार रची गईहै । तदनन्तर गोदानादि तुलादानान्त जितने भी दान साम्प्रति समयानुकूल किये जाते हैं परिभाषा के मनुक्ल पद्धतियां निर्माण की गई है। चतुर्थ शान्तिखएड है- इसमें रजोदर्शन शांति में ग्रहशारान्त जितनी भी जातक शांति हैं सप्रमाण निर्मित है । छपने के पूर्व गतवर्ष कार्तिक मास में मैने यह अन्य पं० वासवानन्द शास्त्री जी को समालोचनार्थ दिखाया श्रीमान ने बड़े परि. श्रम से इस अन्य को भानुपूर्य देखकर, प्रमाण पत्र को चंश वर्णन रूप से देकर कृतार्थ किया। तदनन्तर माधके महीने काशी जाकर राजकीय क्वीन्स विद्यालय के भूतपूर्व अध्यापक पं० विश्वनाथ जी सर्वतन्त्र स्वतन्त्र सर्वशास्त्र पारंगत महा- राज व मीमांसादि पारंगत क्वीन्स विद्यालय के महाध्यापक पं० बालबोध मिथजी व हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रधान महा महाध्यापक प्रोफेसर पं० बालकृष्ण जी, तथा चिन्न स्वामी जी, तथा तफेरत्न तर्कचूडामणि महामहोपाध्याय ६० अ नदा- चरण, विद्वन्मंडली की सेवामें उपस्थित हुमा। तदनन्तर महामहोपाध्याय पं.हरना रायण विद्यासागर जी व पं० परमानन्द जी शास्त्री ज्योतिर्विद श्रीनगर निवासी ने यही उदारता पूर्वक इस अन्य के प्रादि पृष्ट से अन्त्यतक जैसे २ छपते गया अवलोकन करने का कष्ट किया । उपरोक्त श्रीमन्तोंने इम ग्रन्थ की समालोचना की और प्रमाण पत्र प्रदान कर, जिनको प्रतिलिपि ग्रन्थ में मुद्रित हैं, मुझे कृतार्थ किया । श्रीमान पं हरिप्रसाद जी डिमरी शास्त्री तथा ५ व-शीधरजी डिमरी शास्त्रीजी का भी मैं कृतज्ञ हूँ जिन्होंने इस कार्य में सहायता दी। समस्त विद्यमण्डी से तथा कमठ पुरोहितों से नम्र निवेदन है कि पहिले पद्धतियों की परिभाषाओं की विचार पूर्वक समालोचना करके पद्धतियों का अवलोकन करें। इस अन्य के छपने का यह प्रथम अवसर है यदि कोई त्रुटियां रह गई हो तो विद्वान जन कृपा पुर: सर मुझे सूचना देने की कृपा करें जो कि पुनः संस्करण में ठीक कर दो जायगी । प्रर्थना है कि अशुद्धियाँ विशेषतः ह्रस्व इकार की मात्राओं के छपते समय हट जाने से तथा कम्पोजिटरों को ३ मेरी प्रमावधानी से रह गई हैं शुद्धि पानुसार संशोधन करने को कश करें जिससे कि मन्त्रोच्चारण में किसी प्रकार 4 जुटि न रहे। भवदीय- সুন্দরী श्रीमान् प० चासवानन्द शास्त्रिणां ग्रन्थकतपरिचयरूपात्मक प्रमाणपत्रम्। अनेकधातृपलवृन्दवित्त हिरणमये राजतरत्नहै। अत्यध्युदीचिनिदशनमाप्तो हिमालयोनाम नगाधिराज ॥१॥ वर्वतितस्मि विविध विचित्र छायाप्रधान स्तरमि फलाढय.। समन्नितं चालकनन्दया वा पविनितं तहदरीवनाग्यम् ॥२॥ यत्राद्य योगीवदीश्वरोऽसी संरुद्धवाद्येन्द्रिय चित्तवृत्ति, । मात्मानमध्यात्ममयात्मनन निरीक्ष्यमाणो भजते तपस्याम् ॥३॥ तस्मिनदेशे किल काश्यपानां वहीशागदाचर्क सददिजानाम् । अहर्निशं जाह्मणवेदानादा ह्यास्ते पुरी डिम्मरसामनेया । वभूवतस्यां गुणरूपविद्या विचार विज्ञान विधानदक्ष । कुलाग्य पुत्रोऽन्वय मात्रमुख्य श्रीवद्विदत्त मिलभूमिदेव ॥५॥ अवापतस्माननि मात्मजोऽपि श्रीकृष्ण यात्रोत्सव पुगयकाले । अध्यात्मविज्ञान विधेयकृष्ण श्रीकृष्णदत्त सुकृते सतण ॥६॥ अभूदथैतस्यच सूनुरेको योजीवमानानु गृहीतचित्तः। जीया नन्देतिनाम्ना प्रथितोदयालु ॥७॥ विष्णो भक्ति परायणस्य सुतरी सत्यप्रवृत्ते सदा- नानायत्तविधान सरणि प्रारसिद्धाथिन । तस्याग्यात्म समांशभाय विभवस्यासन्सुता सन्ततम् पु सोऽश्वये ऽनुरूप गुणगाश्चत्वार एवामपन् ॥२॥ तेपांड्येष्ठतमो गृहीतपिनयो वृद्धानुयायीनयी- सत्सेवाधि गतार्थ शास्त्र विभवो प्रज्ञाप्रधानेन्द्रिय । दीर्घोदार विचार चित्रचरितो नव्यार्थ संस्काररत् देवानन्द इति प्रसिधिमगमान्नाम्ना गुरूणां प्रिय ॥ तेनेयं विदुषा गभीरधिषणा धेर्यान्वितेनाधुना- पूर्वाचार्य विचार पद्धतिमनु सृत्यैव संयत्नत । सपीक्ष्याशुनिकासु कर्मसरणिप्वाकस्मिक व्यत्ययम् युद्धया संमथितो द्विजन्म विधिzत् रत्नाकरोऽयं मुदा ॥१०॥ परिचायक वासवानन्द शास्त्री परार्थसंधानपश्च
विदित मिदमस्त प्रेक्षा वराम्
चरिकानातनिवासिना परिसर दिना
डिमरी उपनामा देवाजमहापाशिर मग
सातिभा भनिर्मितो वनामा कर्म
कारउन्ना कशेश्य जन्म अचिन दिया
ताश्चतस्तेन भुतमात्रतः कर्मवानामी सम्भा
आत-इति काशीथ काशीनामशितोदिक्षा
पती ति शम्
द. सर्व
ব্ধতার • গিৰনিশ্বাযথ প্রানাঘালাম মুন্না ঘর
श्रीमा पनि परेण देलानन्दनिरिमाणा
बहन पासीनान तनाव स्मृतिमा मातीन गलान्या
तिबाचनमान सम्यगनलोय परिशील्चम
सीताय कामालाकामा गाशित
स्मृतिषु कर्म जमनेशाशिलता विपरित
तारागाणाजमहानामुपनारमारणात
नरिषयी टिम प्रति कुछ
निकसित
चिस्नागिरी
प
37-1
र सभी
Wiadix समता मी मनामको मर्म को नाश iary, पा सम्मति Allamमामा JAIRurat MARAO Ayमा मनाकर नागमोपatan intainmIArun Rituangh मामालियानमारचमन बिरसा antmमान च AA AMITRan Manoder . म. लीगन्नामेन नारा मीमालसमा नाकरणयामग्नि .. श्री. महामहाराध्याय विधा मागरादिविपिन धी पगिटारनारायण शास्त्रियां सम्मनि:. डिमरीत्युपाव्हेन पण्डित देवानन्द शर्मगगा विरनित : कर्मकाण्डरनाकरराज्यो प्रन्योमया सम्पमवलोकित :। अस्मिन् परिमारा प्रदान पुर . मा प्रत्येक कर्म पद्धति संग्रहरे शयन शत: शनि सिज प्रान्तीय गत्यनुरोध प्ररगोप्यर्य मन्यो ऽ संशय महना प्रयत्नेन सम्मानित । सफली भूतश्चास्मिन घिपरेनन्ध करी श्रम । पूजा दान मंस्कार शान्ति विधान घगनात्मक सगडचतुष्टय भूपितोऽय निवन्ध कर्म काग विपजिमामना महापकाराय भविष्यनीति मदीया सम्मति । हरनारायण शारखी ता०१७प्रक्टूबर २६३२ प्रोफेसर हिन्दू कालिज दिल्ली। कपिराज पण्डित परमानंद ज्योतिर्विद शास्त्री रसायनाचार्य ता०१७ अक्टूबर ६३० श्रीनगर गढ़वाल) देवानन्दाभिधानहिजधररचित कर्मकाण्ड प्रधान, प्रन्थं वीक्ष्योपकार क्षममति रुचिरं जायते पूणहर्ष । कुर्यन व्याख्यां पहनामति विशदमति कर्मणां अन्यकर्ता, प्राप्त साफल्य मस्मिन्निति चदति भिषक् टेहरी प्रान्तवानी ।। परमानंदपाण्डेय इन्द्रप्रस्थीय म्युनिसिपलटीय प्रधान वैध देहली कर्मकार डरताकरस्य, विषयानुक्रमणिका (१) * विषयसूची *. ३६५ मध्यद्रव्याणि १२८ अष्टाङ्गार्यम् ४ विषयः पृष्ठ विषयः पृष्ठ अर्कविवाहपरिभाषा मन्यादिपंकहोमः ४१० अर्घसूत्रव्याख्या ३५६ अकालवृधि: भमाहासमिधः ২= { অন্নাহু মায়া ३७१ अग्निजिलानामानि १२८ / अश्मारोहणेगावागानम् ३७१ मशिपूजनम् १२४ अश्वदानपद्धतिः ५८३ मग्निस्थापनम् १२४ अश्वदानविधिः ५३ अग्निसंस्काराः १२६ असुरादिविवाह विषयाः मोक्षपस्थानम् अजिनधारण सूत्रव्याख्या ५१३ (आ) अतिचारगतगुरुफलम आचमन प्रकार: अतिरुद्रस्वरूपम् ३४६ माचमनीयम অনুময়ি मात्रमनेजलप्रमाणम् अन्धशुकः ५५ आचमवय॑जलम् মহাবিদ্বাম ४ आचार्यशुश्रूषादि सूत्रव्याख्या মম্বাসনাবি: ४८३ / प्राचार्यायभिज्ञानिवेदनम् श्रन्नप्राशनसूत्रव्याख्या ४८२ / भाचार्यायवरदानसूत्रन्यारया ३७४ अधिदेव प्रत्यधिदेवानां स्थापनेक्रमः १४३ । श्राज्यस्थाली अनाश्रमीप्रायश्चित्तम् ३५४ श्राज्योडासनादि सत्रन्योरया अन्यारधम्मूत्रव्याख्या ५१४ श्रादित्यशान्ति. ६८३ अन्वारब्धादि सूत्रव्याख्या १२८ प्राभ्यातानहोमः मभिपेकादिमंत्रसंग्रहः ५३ / मामाचाश्याजननशांतिपतिः ६१३ | सामावास्यामनन शान्तिपरिभाषा ६५६ ४३७ भायुज्यकरण सूत्र याख्या १२३ ममुक्तमललक्षणम् मर्कविवाहपद्धतिः (२) कर्मकायहरत्नाकरस्य, विषयानुक्रमणिका पृष्ठ ४ २५ १४५ १४६ ११ २६७ विषयः पृष्ठे विपयः पार्षछन्दोदैवत निर्वचनम् ११ भरलेषा शान्तिपद्धतिः ६३६ | ऊर्ध्वपु तिलकधारणम् प्रश्लेपाजनन शान्तिपरिभाषा (ऋ) आश्विन्य शुक्रनवरात्र निर्णयः ऋग्वेदोक्तशान्तिपाठः माशीचेदेवीपूजा निणयः २४३ ऋत्विग्वरणम् प्रामनप्रमाणम् ऋत्यिगादीनांदक्षिणादिनियमः मासनम् ३ (उ) ऋतुगामिन स्नानम् उत्तरीयम् ४ऋतुस्नानेदिनशुद्धि: उपनयन नक्षत्राणि ५११ ध्यादीनामुच्चारणम उपनयनपध्दतिः पू२८ (ए) उपनयनसूत्र व्याख्या ५१० एकादश्यांकपालवेधः उपनयनाचार्य लक्षणम् ५११ एकादशीनिर्णयः उपनयनकोलान्द सूत्रव्याख्या ५१० एकादशीव्रतोद्यापनपध्दतिः उपनयने उत्प्रतादिविचार. ५११ एकादशीवतोद्यापनविधि. उपनयने गुरुविचारः ५११ एकाहुतिप्रमाणम् उपनयने गुरुशुद्धिः ५१० एकोत्तरवृद्धिचंहीपाठविधिः उपनयनेतिथयः ५१९ एकोनविंशतिरेखात्मकभद्रोदार: उपनयनेनसहचौलसंस्कारपद्धतिः ५२६ एकोनविंशतिरेखात्मकभद्रपमाणम् उपनयनेप्रदोपरय॑म् (क) उपनयनेमासपक्षादिविचारः ५१० / कन्यागुरु शुद्धि विचारः उपनयनेलग्नशुद्धिः ५११ कन्यागृहे भोजन बज्यम् उपनयनेवस्त्रपरिधानसूत्रव्याख्या ५१२ | कन्यादानसंकरः उपनयनेवाः ५११ कन्या रजस्वलां प्रति विशेपः उपनयनेहृदयालम्भनसूत्रन्याख्या ५१३ | किन्यारजोदर्शन शांतिपद्धतिः उभयम्मीधेनुदानादतिः कन्या रजोदर्शन शांनि परिभाषा उभयमुखीधेनुदानविधिः ५७३ | कन्यालक्षणानि उपदफस्नानवर्यम् ३कयावस्त्रपरिधानसूत्रन्यारया २६६ १४५ २५३ ६४ ४२६ ६०६ ६०५ ३५४ कर्मकाण्डरलाकरस्य, विषयानुक्रमणिका (३) पृष्ठ कर्णवेव- १४१ १४५ १२२ १४. १४५ १२३ ४३० २५० २४२ विपयः पृष्ठ विपयः फन्याविवाहकालः ३६२ कीलाटयलिलक्षणम् -पद्धतिः ५०३ । कुराडकराठलक्षणम् कोपरत्वेनहोमकुण्डविधानम् १२२, कुहनाभिलक्षणम् कर्मभूमिः १ कुनिर्माणाथभूमिसोधनम् फर्मभेदेनाग्निनामानि १२४ कुडयोनिलक्षणम् फर्मविशेषेणवेदीमानम् ५४ कुडाभावे स्थडिलम् कर्माङ्गदेवतानामानि १४ वडेनाललक्षणम् कर्माचार्यलक्षणम् ५६३ / कुण्डेमेस्खलादिमानम् कर्मार्थभूमिविचारः ३ फुण्हेपुमेषलामानम् कर्मादौतिलकविचार: १. कुम्भविवाहपद्धतिः धांसनायांदिग्विचारः ४ कुम्भविवाहपरिभाषा कलशप्रमाणम् ७ कुमारीपूजापद्धतिः कलशस्थापन पुण्याहवाचनपरिमापा १५ कुमारी लक्षणम् फलोगवालमनवज्यम् ३६० कुमागेपद्वेजपनीयमंत्र काश्मैथुनदर्शनशान्तिविधि, ६६८ कुशकंडिकासूत्रव्यारया काविष्टपतनशान्तिपद्धतिः ६६८ कुशमयोब्रह्मा काकविष्ठापतनशांतिविधिः ६६७ / कुशपरिस्तरणम काम्यकुमारीपूजनम् २४३ / कुशपवित्रममाणम् कार्तिकदंष्ट्राजननेसौरममाणम् ६६३ कटस्थमारस्यगणना कार्तिकचाराहदंष्ट्राजननशांतिपद्धति.६६४ फैशधिवासनविधिः कार्तिकयाराहदंष्टाजननशांति कोटिहोमकुटमानम् परिभाषा ६६३ पट्यारोहणम् कार्यपरत्वननान्दी श्राद्धविचार १० / खातेनिस्तवस्तुफलम् कार्यपरत्वेन होममुद्राविचारः (ग) कालिकाप्रयोगविधिः २६७ गराडूधप्रमाणम् कालिफायंत्रपूजापद्धतिः २६६ থমথ্য कालिकायंत्रोद्धारविधिः २६७ गणेशपूजापतिः १२२ १२५ १२५ ४६५ Mr (४) कमकाएंडरत्नाकरस्य, विषयानुक्रमणिका पृप्टे ३५५ ३५६ ६८८ विषयः गणेशपूजापरिभाषा गन्धानुलेपनम् गर्ते वायुपरीक्षा गर्भधारणोपायसूत्रव्यारया गर्भाधानपध्दतिः गर्भाधानसूत्रव्यारया गर्भिणीधर्मपरिभाषा गर्भिणीपतिधर्माः ময়মনমুগাথা गायत्रीनिर्णयविशेषः गुरुपूजाविधि. गुर्यादित्यादिफलम गुर्वर्कप्रतिकूलशान्तिपरिभाषा गृहनिर्माणेदिक साधनम् गृहनिर्माणवेधपटलम् गृहप्रवेशपध्दतिः गृहमातरः गृहशस्तुदेवतानामानि गृडयास्तुपूजापतिः गृहबास्तुभद्रोदार. गृदयास्तुर्भद्रग्सानामानि गृहयास्तुयागपध्दति. गृहवास्तुपलिदानम् गृहयास्तुदोमनामावलि गृहयाम्तुहोमपध्दतिः गृहांगवास्तुपरिभाषा शादिस्त्रारभविधिः पृष्टे विषय. १५ | गोकर्णप्रमाणम् ७ गोदानपध्दतिः १८१ गोदानपरिभाषा ४४६ गोदानेयोग्यताह्मणः ४४४ | गोदानस्थानानि ४४४ | गोदानसमयोक्तविषया. ४५४ | गोमुखप्रसयशान्तिपध्दतिः ४.४ गोमुखप्रसवशान्तिपरिभाषा ३६० गोरगदेवताः ५१५ / गोत्रगणना ६८० गोत्रप्रवरेक्येविवाहनिर्णयः ३६३ / ग्रन्थसमाप्तिवर्णनम् ६८० ग्रहगोत्राणि १८३१ ग्रहएजननशान्तिविधिः १८४ ग्रहभन्यम् २२६ ) ग्रहयागपध्दति. १७ ग्रयागपरिभाषा १८८ | ग्रयागभद्रोध्दार: २०८ प्रहवर्णनि १६५ ग्रहसमिध. १८% ग्रहहोमपध्दति. २०८ ! ग्रहाफाराणि २१३ प्रहागामग्नय २११ । प्रहाणांजन्मभूमय. २१० ग्रहाणंदानपदति. ११ , ग्रहाणांद्रव्याहुतिप्रमाणम् १६०, यहाणयापनदिधनियम. १४७ १४३ १६२ १४३ ५६८ कर्मकाण्डरत्नाकरस्य, विषयानुक्रमणिका (५) १७ १७७ ३१८ . विपयः पृष्ठे विषयः पृष्ट प्रहाणांप्रतिमाः १४३ जातकर्मपद्धतिः ग्रहाणांचलिदानपध्दतिः १४ जातकर्मसूत्रव्याख्या ग्रहाणामधिदेवाः १४३ जातस्यदुग्धपानम् ४८१ ग्रहानाहमात्स्ये जीवमातरः [घ] (त) घृतच्छायादर्शनम तिलधेनुदानपद्धतिः ५७८ तिलधेनुदानविधिः घृतमातरः तिलपात्रदानम् चण्डीदीपदानपद्धतिः तिमीग्राह्मणस्यवर्णानुपूर्येणविवाघा ३६७ चतुर्थास्थालीपाकप्राशनसूत्रव्या० ३७५ तुलसीविवाहेधूर्घिपध्दतिः ३१७ चतुरिथालीपाकहोमव्यारया । तुलसीविवाहेवाग्दानपतिः ३७५ ३१६ चतुर्थीकर्मपरति सुलसीविवाहपतिः मुलसी विवाहेपूर्वाङ्गकर्मपदतिः चतुर्थीकर्मसूत्रव्याप्या ३१३ ३७४ मुलसीविवाहविधिः ३१२ ६८७ तुलादानदेवताः चरुस्यालीलक्षणम् १२६ चूडाकर्मकेशान्तपति. तुलादानपध्दति. ५६२ नुलादानपरिभाषा चूडाकर्मकेशान्तसूत्रव्याप्या तुलादानादीमंडपमानम् (छ) मुलादाने-तुलाप्रमाणम् छन्दोलक्षणम् तुलादानेवारणपडलभद्रप्रमाणम्. ५८१ छागयलिविधिः तुलादानेवारुणमंडलभद्रोदारः ५८२ छोलिकाभरणम ३८६ तृणवृक्षादिपरीक्षागृहनिर्माणे १६२ (ज) सोरणनिर्माणम् जन्मोन्सर कर्माद्धति. ree तोरणपूजाध्वजारोपणपध्दतिः जयहोमः ০৩ { ম্যাথ जलशीचा २.सोरणोपरिफलककीलनम् अलमातरः १७ तोरणोपरिफलकेप्रायुधचिन्हानि जलाभावेमाचमनम् ५ तोरणोपरिफकेचिन्हमानम् चन्द्रग्रह शांति. ५६० 25 220 ट (६) कर्मकाण्डरनाकरस्य, विषयानुक्रमणिका ६ द ६ ६ E विषयः पृष्ठे विपयः पृष्टे (द) दीक्षांगसर्वतोभद्रपूजनम् दत्तककन्योद्वाहेनान्दीश्राध्दविचार. १. दीक्षांगसर्वतोभद्रोद्धार. दत्तकपुत्रस्यसापिएडयम् ३५६ दुर्ददन्तजननशान्तिपद्धति. दधितिलादिसूत्रच्यारया ५२४ दुर्दन्तजननशान्तिपरिभाषा ६५५ दन्तधावनकाष्टम् २ दूर्वा तुलस्योश्वेदनविचार: दन्तधावनंवर्यम् २ देवपूजाय प्रतिमाविचार. दशम्यांदेवा विसर्जनपध्दति. २५३ देवपूजायांसवर्णाधिकार: दशम्पदिवी विसर्जन विधि ११. देवानामपिनान्दीविशेषणम् दक्षिणाकालिकायन्त्रीदारः २६६ देवार्चनेवज्ये पुष्पाणि दक्षिणतीयह्मासनम् देवार्थचन्दनम १२५ दक्षिणेमातुलकन्यापरिणायनम् ३५७ देवार्थ-भूपणम् दानकाल: देवार्थयज्ञोपवातम् दानखंडप्रारम्भः ५६३ देवीमियपुष्पाणि ६ दानपात्रलक्षणम् ५५३ देवीपुराणेहोमेसमन्त्रकोविधि. १२४ दानप्रतिग्रहविधि. ५६४ देवीभागवतेयश रात्रसंस्करणम् १२८ दानधि द्रव्याणांहामेप्रतिनिधय. दानसमयेप्रतिग्रहस्थानानि ५६३ द्वादशलिहतोभद्रपरिभाषा ३२१ दानेद्रव्यपरत्वेनदेवताः ५६५ द्वारनिर्माणादिसूत्रव्याख्या दिकपालयलिदानपध्दति द्वारमातर दिकज्ञानर्थ-शंकुरोपणम् ५८ द्विरागमनादिपरिभापा ४२७ दिग्विभागेन ग्रहाण मुखानि दीक्षाङ्कवास्तुभद्रपरिभाषा १०२ धनिकदरिद्रादिभिदक्षिणादेयमानम् १४६ दीक्षालयास्तुभद्रोद्वार. १०४ । धर्मशालादानपद्धतिः ५-३ दीक्षांगवास्तुभद्रपूजापद्धति १०५ । धर्मशालादानपरिभाषा दीक्षांगवास्तुबलिदानपद्धति. ११६ | धुल्यधमधुपर्कपद्धतिः दीक्षांगवास्तुदीमपद्धतिः १२१ ध्रुवदर्शनस्थव्यारया ३७४ दीक्षागसर्वतोभद्रपरिभाषा २६जादिमायादयः ७४ ककागरत्नाकरस्य, विषयानुप्रामणिका (७) का पृष्ट ६०० ६०० ६ २० २० विपयः पृष्ठे विषयः (न) निधरजोदर्शनशान्तिपद्धतिः नक्तकाल: २८ निधरजोदर्शनशान्तिपरिभाषा नन्दादिशिलाप्रमाणम् १८७ निर्माल्यलक्षणम् नरकचतुर्दशीकर्म पद्धतिः २६०/ निष्क्रमणसूत्रन्यास्या नरकचतुर्दशीपरिभाषा २८६ निषिद्धभूमिः नवयहपूजापद्धतिः ४७ न्यूनहोमेमूत्रप्रमाणम् नवग्रहपूजापरिभाषा (प) লৰাষানবি: २४३ । पंचगव्यकरणम् नवरात्रपरिभाषा २४१ पंचगव्यवलिलक्षणम् नवरात्रदेवीपूजापद्धतिः २४४ पंचगव्यद्रव्यलक्षणम् मान्दीमुखविधिश्चायश्यकेविशेपः ३६७ / पंचगव्यामिमन्त्रणम् नान्दीश्राद्धपद्धतिः ४३ ' पंचगं:डयलिलक्षणम् नान्दीश्राद्धपरिभाषा १७ पंचपल्लवानि नान्दोश्राद्धकाल: १७ , पंचमावलिलक्षणम् नांदीश्राद्धतिलस्वधापदस्थाने विचार: १८ , पंचरत्नानि नादीवाचदक्षिणजानुनिपातरम् १८ पंचरसलक्षणम् नांदीश्राद्धपितरा. १८ पंचसुगन्धलक्षणम् नादीधा पित्रादिवर्गजीवितेविशेषः १८ पल्युपवेशनेविचार: नांदीश्राद्धव्राह्मणसंख्या १८ पतितसावित्रोषसूत्रघ्याख्या मांदीश्रावसंकल्पादाविरोप: १७ परकीयकन्योताहेनान्दोविचार: नान्दीश्राटोत्तरधर्माः ४० पल्लीपतनशरटारोहणशांतिः সাগান্তীস্বৰবিলবনি १६ पवित्रधारणम् नान्दीथाद्धोत्तरविदानवयम् १६ पाणिग्रहणसूत्रध्यारया नान्दीश्राद्धोत्तरीडादिविधानम् १६ पारिखमतपनाङ्गसूत्रव्याख्या नानाविधिचण्डीपाठक्राम्यप्रयोगा. २५७ पादुकाधारणविचारः नामकरणसूत्रव्याख्या ४७१ / पाद्यपानप्रक्षेरणीयम, नामकरणपद्धति ४७२ } पायसूत्रव्याख्या १४ १५ १० १८ ६६६ C कर्मकाण्डरत्नाकरस्य, विषयानुक्रमणिका पृष्ठे ६८५ ६५५ १ ४५५ २ + १ ७ ३६६ ३ विषय. पृष्टं विषय पार्थिवलिङ्ग निर्माणप्रकार ३३५ प्रतिशुक्रशान्तिपदति पित्राधेकनक्षत्रजननशान्तिपद्धति ६५३ प्रतिशुक्रशांतिपरिभाषा पित्रायकनत्रजननपरिभाषा ६५३ प्रतिशुक्रापवाद पुण्याहवाचनपति ३३ प्रतिक्षादिसूत्रव्याख्या पुनरपनयन विधि ५२१ प्रत्युवाहादिनिर्णय पुंसवनकर्मपदति ४४७ प्रतिकरदर्शनम् पुंसवनमूलव्याख्या ८४६ प्रसरवतीअभ्युक्षणम् पुत्रजन्मनिनान्दीविचार ६५५ प्रात शकुनाति पुत्रोत्पत्तीपितु स्नानम ४५५ प्रातरयोग्यदर्शनीया पूजाधिकारिण प्रातस्थानकाल पूजानिर्माल्योद्वासनम् प्रायश्चित्तसूत्रव्याख्या पूजापात्रस्थापनक्रमम प्रोढ़पादादिपडोशनानि पूजायांप्रतिनिधिविचार. प्रोक्षणीपात्रम् पूजार्थ जलम् (फ) पूजाविषया फलविशेपेण रुद्रीसंख्या पूजालमयेगादित्राणां धनि पूर्णपात्र लक्षणम् १३० (ब) पूर्णाहुति १३० बलिराजत्यम् पूर्णदिदिक्षुधजावस्थानम् ५४ विग्मत्रोत्सर्गविचार এছাতমুৈনিরা १८१ | बुधग्रहाति प्रतिकूलगुरशान्ति प्रतिकूलनिनायकशान्तिपमति ६७२ भदरंजनद्रव्याणि प्रतिकुलादिनिर्णय ३६५ भस्मधारणम् प्रतिफ्लाकशान्तिपद्धति ६८३ भस्मधारणविधि प्रतिमान्युत्तारणम् ८१ मिशाचर्याचरणसूजन्याय्या प्रतिमापिनाहपध्दति ४३३ भमिपचकपरिभाषा प्रतिशुकदोपा. ६४ भीमपंचपूजापद्धति २ ६८७ ६८१ | गृहस्पति ग्रहशांति ७ ४ १२३ ३०७ कर्मकाण्डरनाकरस्य, विषयानुक्रमणिका (१) ३४७ विषयः भूगन्यज्ञानम् भूमिदानपद्धतिः भूमिदानपरिभाषा भूमिसुप्तादिपरीक्षा भूमिरसज्ञानम् भूमिसमोन्नतपरीक्षा भौमग्रहशान्तिः (म) मंगलद्रव्याणि मंगलस्नानम् मंगलाचरणम् मंगलेमातरजोदर्शनम् मणिहेमादिरचितपुष्पाणि मंडपदिग्विचार. मंडपद्वारप्रमाणम् मंडपनिर्माणविवाहे मंटपप्रतिष्टाविधिः मंडरवेधविचारः मंडपाच्छादनम् मंडपादिस्तम्भपरिभाषा मंडपार्थंभूबननविचारः मंडपार्थभूपरीक्षा मंडपार्थभूमिपूजनम् मंडपार्थमिपूजापद्धतिः मंडपार्थसबीकरणमंडपमानम् मंडपेवेदीनांदिकारत्वेनस्थापन मदपेवेदीनिर्माणम् पृष्ठे विषयः पृष्ठे १८५ मधुपर्वम् ५८४ मन्यस्यदेवतालक्षणम् १४ मन्त्रस्यविनियोगलक्षणम् १२ महामृत्युञ्जपजपविधिः १६१ महारुद्रस्वरूपम् ३४६ १८१ महिपपूजापद्धतिः २८३ ६८७ महिपोदानपद्धतिः ५८१ महिपीदानविधिः ७ मांगल्येवयतिलकम १० माणवकायमनुशासनम ५१४ १ माणवकशिक्षासूत्रव्याख्या ५१८ ३६६ मातृकापुजापरिभाषा १६ ६ मातृकायंत्रोद्धारः १४३ मातृकापूजाप्रकारः ५८ मात्ऋणामुपरिघृतेनवसोस.. पातनम् ३६२ / मानसिकसंध्याविचार: Y८ मार्जनविचार: ५६ मार्जनसंबंधिनः केचिदुसर्गा; ५८ मासपरत्वेनमूलनिवास:- mp.-- ६१३ ५८ मूलवृक्षविभागः ५८ मूलशान्तिपद्धतिः ५८) मूलशान्तिपरिभाषा ६१३ ६० मूलशान्तिविधिः ५ मेखलालक्षणम् १४५ 'पू मेखलाबंधनसूत्रव्याख्या ५ मेधाजननसत्रव्याख्या पू१२ ४५५ कर्मकाण्डरत्नाकरस्य, विषयानुक्रमणिका विषयः (य) यजमानस्यनीराजनम् यथोक्ताभावेयवकरणेदोप. यमलजननशांतिपरिभाषा यमलजननादिशांतिपद्धतिः यात्रादिवर्णनम् यज्ञोपवीततन्तुदेवताः यज्ञोपवीतनिर्माणप्रकारः यझोपवीतादिमंत्रणविधिः युगपरत्वेनदानादिधर्माः योगिनीनामानि ३७० ७६ पृष्ठ विषय. पृष्ठ लक्ष्मीपूजापद्धतिः २६३ ३८ लक्ष्मीपूजापरिभापो २६१ १४६ | लक्ष्मीपूजामायांग्रहणादिनिर्णयः २६२ ६४४ | लक्षहोमेकुराष्डमानम् १४४ ६४४ | लाजाहोम १०६ लाजाहोमसूत्रव्याख्या १३ / लेखनप्रमाणम् ५१२ | लोकमातर ५१३ ५६३ | वधूजलाशयपूजा ४२६ २६८ | वधूप्रवेशपद्धतिः ४२४ খুগলিক ३ | वादोपाः ४४२ वरणानन्तरं ऋत्विजिमृते १०६ ४४३ | वरवध्योर्गमने मार्गरक्षाविधिः ४२२ ४४३ वरवध्योहागमन परिमापा ૨૬ ५० वरुणपूजापद्धतिः ४०५ | वर्णपरत्वेनकुण्डाकृतिमानम् १२३ ३६० वर्णपरत्वेनदाटसूत्रव्याख्या ३२४ वर्णपरत्वेनमेखला सूत्रन्याख्या ३४५ वर्णपरत्वेनसावित्रीपदानसूत्रग्याख्या ५१५ ३४५ / वर्णपरत्वेनाजिनसूत्रग्याख्या ३४५ वर्णपरत्वेलम्धमामानादिद्रव्यविचारः १८ ३४५ वर्णन्यवस्थया शिलामानम् १ ५६० वर्णानामुपनयनकालातीतम्याल्पा वर्धापनपूजाविधिः ४४६ | यसोधगपूजनम् रजस्वलास्नानविशेष रजोदर्शनादिपरिभाषा रजोदर्शनेमासपक्षादिफलम् रजोवतीनीधर्माः रक्षाविधानम् राष्ट्रभृतोमः राष्ट्रभृद्धोमसूत्रव्याख्या रुद्राक्षधारणविधिः रुद्री, एकादशिनीविधिः रुद्री, एकातिविधिः द्रीपंचमेदाः रुटीरूपकस्वरूपम् रोगपरत्वेनतुलादानानि (ल) लघुगद्रस्वरूपम् ५१% ५२. ४52 कर्मकाण्डरत्नाकरस्य, वियानुक्रमणिका (14) । विषयः पृष्ठ विषय: বস্তথগ্রিনথিন্তা १० विधाहार्थमधुपर्कसूत्रव्याख्या वनपरिधानादि सूत्रव्याख्या ५२५ विवाहावसर. वलम् ८ विवाहेमाशौचनिर्णयः घोणा गात्र परिमार्जनम् विवाहे कुलपरीक्षा ३५४ वाग्दानधूल्यपद्धतिः ३७६ विवाहेग्रामववनसूत्रव्याख्या वाग्दानपद्धतिः ३७७ / विवाहे जन्ममासादिवज्य: वाग्दानार्थकन्यादातारः ३५७ / विवाहे दशदोप विचार वाग्दानोसरवरमरणे विशेष ३५७ विवाहे नान्दीथादविचार: वालकस्य जीविकापरीक्षाज्ञानम् ४८३ विवाहे परिक्रमणसूत्रव्याख्या चालकस्यनिष्क्रमण सूत्रव्याख्या ४७८ विवाहेप्रवरैक्ये विशेष विचार. ३५५ वास्तुपूजने दिक्पालवलिः २२५ विवाहेमू मिशेष व्याख्या ३७२ वास्तुपूजाविधानम् १८८ विवाहेविरुद्ध संवन्धा. ३५६ वास्तुभद्रोद्धार १८८ विवाहेसंक्रान्तिदोष ३६५ वास्तुस्थापनविधिः १२२ । विवाहेसप्तपदीव्याख्या ३७२ विद्यारम्भपद्धति ५०५ | विवाहेसुमंगली व्याख्या विद्यारम्भपरिभाषा ५.०५ विवाहेसूर्यदर्शनव्याख्या ३७३ विनायक शान्तिपरिभाषा ६६६ विवाहेस्कन्दकलराप्रमाणम् ३७२ विनायक शान्ति विधिः ६७० (विवाहेहदयालमन व्याख्या विवाहकालेकन्यामातुमती ३६७ / विवाहोत्तरवज्यं विषयाणि विवाहन सूत्रव्याख्या ३६४ विवाहोत्ससंगकर्मपद्धतिः ४२१ विवाहपद्धति. ३८७ विष्णुप्रियपुष्पाणि विवाहभेदाः ३५४ विप्टरप्रमाणम् ३५७ विवाहमासा ३६४ विष्ठरसूत्रग्याख्या विवाहलक्षणानि ३५४ } वृद्ध्यभावप्रपादोषः विवाहस्थमाथम्यम् ३५३ / वृषभदानपरिभाषा ५८६ विध हसूत्रधारया १५३ | वृषभदानपद्धतिः ५१ विवादसत्रयामा ३६१ वेदक्षः 2 - M कर्मकाण्डरनाकरस्य, विषयानुक्रमणिका पृष्ठे १ 1. १८१ ३६७ २ २ : विपयः पृष्ट- विषयः बेदारम्भपततिः ५४१ शुचित्वविचारः वेदारम्भ सूत्रभ्याख्या ५२२ शुद्धभूमिविचारः वेदीप्रमाणम् १४३ शुदविवाहे विशेषः वेद्युपवेशने सूत्रव्याख्या ३६८ शौचस्थलम वेदोक्तशिवाचनपद्धतिः ३३६ | शोचेजलम धैकुण्ठचतुर्दशीदीपदानपद्धतिः ३४८ शौच दिनमाणम् धैकुण्ठचतुर्दशी परिभाषा ३४८ शौचेमुखम् प्रतबन्धादी पूर्णाहुतिनिषेधः १३० शौचेमृत्तिकामहणम् (श) शौचेमृत्तिकामानम् शतचंडीपरिभाषा- २५५ शौचेमृदालेपनम् शतचंडीप्रयोगपद्धतिः २५८ | शौचेयज्ञोपवीतधारणम् शतमूलनामानि ६१३ । शौचशेपजलम् शतचंडीहोमविधिः २५६ शौचेहस्तविचारः शनिश्चरादिशांतिः (प) शांतिखंड प्रारभ्यते ६०० पष्ठीमहोत्सवपद्धतिः शांतिपाठमंत्राः २३ | पष्ठीमहोत्सवपरिभाषा शान्तिपाठविधिः २३ | पोडशमातृकानामानि शालाकर्मसूत्रव्याख्या - १५२ घोडशमातृकापूजा पद्धतिः शिखामुक्तिविचार पोडशसंस्काराः शिवप्रियपुष्पाणि (स) शिलानामानि १८८ | सत्यनारायणपूजापद्धतिः शिलान्यासविधिः २१४ | सत्यनागयणपरिभाषा शिलास्थापनार्थखननम् १८ संकटचतुर्थीयतपूजापद्धति. शिवलक्षतिपद्धतिः ३५१ | संकल्पविचार शिवानुष्ठानादिपरिभाषा, ३४५ / संध्याकालनिर्णयः शुकशांतिः ६७ संध्याधिकारिणः फास्तेऽपिदेवीपूजनम् २४३ / संध्यासेवनम् .. ४६४ ४६३ ४ H है २३१ २३१ का कर्मकाण्डेरलाकरस्य, विषयानुक्रमणिका पृष्ठ ७ ६५७ । २६३ ३५६ ३५४ ३६३ विषयः पृष्ठे विपयः संस्कारकर्मयोधिनीपरिभाषा १० सापध्यः संस्कार्यमातरजसिथीशान्तिः - ६४ सध्योपवीतेननांदीश्राद्धः संस्कार्यमातरजपरिभाषा ६०४ सहजनन शांतिपरिभापा संस्कारक्षौरनिर्णयः १० सहजननशांतिपद्धतिः संस्कार्योपवेशनम् - १० सहसूचंडीपरिभाषा सप्तधान्यधलिप्रमाणम् १४ सापत्नमातृकुलेसापिंड्य निर्णयः सप्तधान्यानि ७ सापिंड्यलक्षणम् समानापंगोत्र विवाहेदोपः ३५५ सापिंड्यविवरणम् समावर्तनपद्धतिः ५४७ सार्धनपचंडीप्रयोगपद्धतिः समावर्तनसूत्रव्याख्या •५२३ / सार्धनवचंडीपरिभाषा समावर्तनस्नानव्याख्यो ५२४ सावित्महणेकालातीतेनिर्णयः समायतनेक्लशामिषेकसूत्रन्याख्या ५२४ साविञ्युपदेशसूत्रव्याख्या समावर्तनेपितृमवनेजनम् ५२५ सिंहगवादिप्रसवव्याख्या समावर्तनोद्वर्तनव्याख्या ५२५ सिंहमकरस्थगुरुनिर्णयः समिधाधानम् ५१६ { सीतामृतसर्पशांतिविधि: মদিনেজামু १२७सीमन्तसत्रन्यारया समीक्षणसूत्रव्याख्या ३६६ । सीमन्तोनयनपद्धतिः संमंजनसूप्रव्याख्या ३६८ । सूतिकाग्निस्थापनसूत्रन्याख्या सर्पयुग्मदर्शनशांति ३६७ / सूतिकाजलपूजापद्धतिः । सर्वाधिविधि. २१ सूर्यप्रियपुष्पाणि सर्वकर्मादौदेवपूजाविचारः ११ सूर्यावलोकननिष्कमणम् सर्वकर्मादौ प्राणायामः ५। सूर्योदीक्षण सूत्रव्याख्या सर्वकर्मादीसंध्योपासनम् सूत्रपातविधानम् सर्पकर्मापयोगीमुद्रा. ७ सौभाग्यवतीनांस्नाने विशेषः सर्वगन्धलक्षणम् ७. स्तंभानांसख्या সনারি ६१ / स्तम्भपूजापद्धतिः सर्वोत्तमाभूमिः १८२ स्नानकाल. ५१४ ६६७ ६६३ ६६७ ४४ ४४३ ४६० 2 ४७६ प्रम ६१ २ (१४) कर्मकारतरत्नाकरस्य, विषयानुक्रमणिका पृष्ठे १२३ १३० १२६ १४४ १२३ १४६ १४६ १४६ विषय. पृष्टे विपय. स्तानद्रव्याणि + होमानुसारेणकुण्डमानम् स्नानादीवज्यंजलम ३ होमान्तेपवित्रप्रतिपत्ति स्नानार्थजलम् २ होमान्तेस्वाहादेवी स्नानोत्तरं वय॑वस्त्रम् ३ | होमकुराहमानं नवयहमखे नुवधारणविधानम् १२७ होमेउत्तानहस्तप्रमाणम् स्वगोत्रप्रवराज्ञानेनिर्णय. ३५६ | होममंउपरचना स्वाहादेव्या पूजनम् १२८ होमेमृग्यादिमुद्राः (ह) होमेमृग्यादिमुद्रालक्षणम् हरिहरमंडलभद्रपूजापद्धतिः १२४ / होमोत्तर कृत्यम् हरिहर मंडलमदोद्धार हरितालिकापूजनम् (त्र) हरितालिकानतपरिभाषा २३७ त्रिकप्रसवशान्तिपद्धति हस्तघृतोत्थितापंडदीपदानपक्षति ३४६ विकासवशांतिपरिभाषा होमकुण्डोत्तरपूर्वदेवतास्थापनार्थवेदी १४४ निगन्यम् होमद्रव्याभावप्रतिनिधय. १३० निषत्र लक्षणम् होमपद्धति १३१ त्रिपुण्डूलक्षणम् होमादौद्रव्यदेवताध्यानम् १४६ त्रिमंगल विचार होमाग्ने प्रमाणम् १३१ । निरसलक्षणम् होमादीपञ्चभूसंस्कारा १०३ | त्रिसुगन्धलक्षणम् होमाद्यभावेकायावरान्तरायदेया ३५७ । न्यायुपकरणम् ६४७ १४ १४ ४२६ १२१ - इति अकारादि विषयानुक्रमणिका - 5 पूजाखंडस्य शुद्धिपत्रम् . पृष्ठे,.. - पंक्ती २० ३ अशुद्धिः नित्य, पिणीम, 'माल, यान, २० २० २३ स्पनियश, २० वान्य, : भास्म, ३८ 'इदातट, शुद्धिः नित्य, पिणीम् मसि, 'यानि, इति, स्पतियज्ञ, वाप प्रस्मि इहतिष्ठ, पातयि, इहागच्छे, यदिवा दक्षिणे, पुष्पाणि, कूर्मा, रथाधि, सिनी. हतिष्ठ, वलिस०, ४० २४ पाताय, ४१ २२ इहगच्छे, ५७ . यादवा, दाक्षणे, पुष्पााण, कर्ममा, स्थाध, सनी, हातष्ठ, चालस०, अस्मन्स, महावष्णु मात, ईशाने, तितसु०, मित्राय, नापर्गा, १३ २० ७४ ऽस्तिस, ५ २५ महाविष्णु मृति माग्नये, तिष्ठसु. मित्राय, ५६ ८६ ११ ११ १०६ २२ नृपि. पति, १०७ पात, (१६) पूजाखंडस्य शुद्धिपत्रम् पृष्ठे पंक्तो शुद्धिः सीपिशं ११० १७ "अशुद्धिः सीतापशं, पषषन, तजमानस्य, पूषन्, यजमानस्य, १२० २६ ऋष १३६ ३ १६ पिः आधातु रक्षासूत्र सूर्याभि १५० सुरपतिः २७ १४ १६३ १६५ १७१ प्राधातु रक्षामूत्र सर्याभि सुरपतिः शुपादयो सभ्यो भूर्भुवः विदथे सन्तुपो मपरि० यतो 'याचि मीशानााद पूजयमि आहरिव नधातन १७४ ૧૭ ३ १६४ ७ १९८ भूपाढ्यो सर्वेभ्यो भूर्भुवःस्वः विदथे सन्तुयो सपरि० ततो यतिचि मीशोनादि पूजयामि अहिरिव दरातन यस्यारते में प्रतिष्ठ पुराणोक्त मधुवाताऋता, पुत्रंमस्यै विश मन्देत्याम वरुणस्येत्यस्य २७ १६६ २०२ २०५ ~ + २०७ १० २०६ २१५ यस्यस्ते माप्रतिष्ठ पुणोक मधुवामृता, पुत्रमस्यीयश २१५ १० २६ २६ नन्दत्व, २२१ ५ घरस्येत्यस्य पूजायस्य शुद्धिपत्रम् अशुद्धिः पृष्ठेपत्तो २० २२२ २२२ . - २८ १६ 9 38 २५ २० शुद्धिः स्वति स्योनाधिविनो त्वदनि नवग्रहाणा ध्यनमोनम ममन्चनम् पजास्थानम् पाधम मुखश्यनम' मंचालनान्ते देधाविसृष्य नवमीतिथि चडीपाठ लता, पश्चिमद्वार स्योना उद्गात नवग्रहणा স্বামীৰম समनिन्वितम् । पूजास्थनम् पायाम् मुखायानमः सश्चालनान्ते देवाविमुख्य नषमीमिथि चांडीपाठ २४४ २६ २४६ M १३ २५३ २५३ ५ द २५४ २५८ ५ पश्चिपद्वार, २५८ लि, वाल, .पत्रागे, १२ पत्राने, १० . इतिमंत्र इतिसमध्य श्रीमहाक्षण, भदाभयम् स्थापयाम, २७० २७० २७३ २७७ इतिमंत्र इतिसप्रार्थ গামছুদ্ধি, महाभयम्, स्थापयामि, नोटस्यैनम, शंभुरूपोऽसि, श्चशिलोच्चय, महिपशिरसि, दुर्गतिं बोटक्यनम, २४ २८५ ७ शंभुरूपोस, श्वाशलोचय, মহিবায়ারি, दुर्गात, २८६ (१८) ক্লাব থি पृष्ठे, पंक्तो २८ ५।६ १६ ३०४ ३१३ ૧૨ शुद्धिः बनभिन्धि, मार्गादी, लदम्यैनम, रुक्मिण्यै पोडशहस्त वृणुयात् पौत्री त्वंसुखी स्थापयित्वा प्रतिगृहाताम् वृन्दारण्ये विष्णुरित्यत्य पश्चिमलिंग १ ३१७ अशुद्धिः र नभिधि, मार्गदर्गा, लदमनमः, कायमण्यै पोडपहस्त Jणुयात पात्री वसुबा स्थापोयत्वा पातयताम् वृन्दारये विणारत्यस्य पश्चिमालग वसायममः मंयक मृत धूर्वोक मह AR ७ २३ ३१७ ३१९ ६ २८ घनायनम: श्यवक १२ भृतात् पूर्वोक्त सद ३४७ ३४८ ३४६ २५२ ३५२ २३ रजतती रजतदो नवा भयाश्व १ मिमां বীমা আEী वगेषु मत.पर संस्कारस्परिपत्रम् । मिमा पोमा ३८१ पाहो देणेपु 12 १४ संस्कारखण्डस्य शुदिपत्रम् । (१९) पृष्टे पंक्ती अशुद्धिः सन्यायाश्चव ३१ ३११ २२ १६ ३६६ ४०. १३ ४०५ ६ शुद्धिः कपाश्चेव स्पष्ट अंमुकक বানিলিযো ददति पड्वोशं द्विजोत्तम् चहास्यमानी दक्षिणांदाश पितर. देवया ७ ब्रायस्मिन् प्रायश्चित যমুখ पुजा वरणदत्या मार्थत् तारानुकुले करिप्य ४०७ अमुक नातिचरितम्या ददाति पड्वाश द्विजोत्तम वहास्ययानो दक्षिणाँदत्यो पिता देवहत्या ब्रह्मण्यस्मिन् प्रायश्चित्त वरवधूभ्यां पूजा घरण्दावा प्रार्थयत् तारानुकूले करिष्ये ४०० १३ २३ ४१ १५ ૪૨૧ ४२७ ५३८ ३ ५७६ य विधिना प्रवेश विधाना प्रवेश, प्राणायात्रत्रय राधााथ पे० न. ५०२ प्राणायामत्रयं ४६६ . ४६७ पे० नं० ५०१ যথাযথ पे० न००१ पे० न० पू०२ मोक्षणीपात्रे मोक्षत्रीयाने (१०)" दानखेडस्य, शान्तिखंडत्य शुद्धिपत्रम् अशुद्धिः पृष्ठे पंक्तो ५०७ शुद्धिः वये पद्धितः वरजिन सुगान्ध निधियो रमको क्षणात सूरकारेणणु ५४४ २६ Ja ५६८ भक्षात्य कृशक्षत ससर्वत पद्धति પૂરક वारजित ५२८ सुगन्धि निधिपो रमुकोई दक्षिणत ५४८ सूत्रकारणनु मत पर दानखएडस्य शुद्धिपत्रम दानखण्ड प्रारभ्यते भक्षसेनित्य कुशाक्षत सर्वत ५७३ सवितु ममुक ५६२ भूपणे पित १८७ मत पर शातिपस्य, शुद्धिपत्रम् । भोजयित्वा ६०५ जनन रुष्ठाया दधीन ६२४ क्षयदीराय १४ १० मक स्त्रयभुजीर भूपर्णभूषित स्वयंभु जीत २८ 2 २१ १० द मंजसेवा जजन रघधष्ठा वर्षी क्षयद्वीय पुष्प रसषमम पुष्पाजाल भुवोस खजघरो पुरीयाम ६५२ ६५८ तरसन्नमम पुष्पाजलि भुवोऽसि खधरो पुरीप्यामि धरण इति ६७३ अथ कर्मकांड रत्नाकरस्य पूजाखंड प्रारम्भः॥ SCHUT श्रीगणेशायनमः, श्रीसरस्वत्यैनमः, श्रीगुरुचरण कमलेभ्योनमः । - श्रीगणेशगुचव शारदां भुवनेश्वरीम् । सर्वाभीष्ट प्रदातारं चदरीशंच नौम्यहम् ।। डिमरीत्युपनाम्नाच वदरीनाथ वासिना । देवानन्देन विदुपा क्रियते ग्रन्थ संग्रहः ।। श्रादौ संगृहां शास्त्रेभ्यो देवपूजा विधायकम् । सप्रमाणं विवक्ष्येऽहं पूजाखडयथेष्ठदम् ।। भथ कर्मयोधनी-परिभाषां वक्ष्ये,, तत्रादौ कर्मभूमि माह विष्णुपुराणे-नापि भारत घेष्ट जंबूद्वीप महामुन । यतोहि कर्मभूरेघा ततान्या भोग भूमयः॥ कदाचिल्लभते जन्तुर्मनुष्यं पुण्य संचयात ॥ गायन्ति देवा. विलगीतकानि धन्यास्तुयेभारतभूमिभागे। स्वर्गा पवर्गस्य च हेतुभूते भवन्ति भूय पुरुपा मुरत्वात । तत्र शुचित्व विचारः सदा कुर्याद्धर्म कार्य मापद्यापि शुचिर्नरः । श्रुतिस्मृत्युदितंकर्म नकुर्या दशुचिः क्वचिदि तिभृगुः । माघारे यार वल्क्यः। सुतिस्मृतिः सदाचारः स्वस्यच श्रियमात्मनः। वशिष्ठ:-श्राचारः परमोधर्मः सर्व- पामिति निश्चयः । हीनाचारी परीतात्मा प्रेसचेह विनश्यति । चतुर्णामपि वर्णाना माचारो धर्म- पालनम् । श्राचार भ्रष्टदेहानां भवेद्धर्म परांमुखः । प्रातरत्थान काला, मेनु:-माझे मुहूर्त युध्येत धर्मार्था यनुचिन्तयेत् । बाहामुहर्तः विष्णुपुराणे-रात्रेः पश्चिम यामस्य मुहूत्तीय स्तृतीयकः । सम्राह्म इति विजेयो विहितः मःप्रयोधने । पंच पंचउपः- काल: सप्तपंचायणोदय:- पष्टपंचभवेत्प्रात-स्ततःसूर्योदयः स्मृतः । तदभावेदोपः रलावल्याम्:--ा मुहूर्त यानिद्रा सापुग्य आयकारिणी। तांकरोतिद्विजोमाहात्पाद कृच्छ्रेणेशुध्यति । अंगिरा:-उत्यायपश्रियमेराने तताचम्य चोदकम् । प्रभाते करदर्शनम्-करायसते लक्ष्मीः करमध्येसरस्वती । करमूले स्थितो ब्रह्मा .:. . ! स्तनमंटले।
कर्मकाण्ड ग्ताकरे, फर्मयोधिनी परिभाषा श्रोत्रियंशुभगां गांच अग्निमग्नि चितंतथा । प्रातरस्थाय य पश्येदापद्भ्य. सप्रमुच्यते । प्रातः शकुनानिः-भारद्वाज मयूराणां चाषस्य नकुलस्य च । प्रभातेदर्शन श्रेष्ठ वामपृष्ठे विशेषतः । प्रातरयोग्यदर्शनीयाः-पापिष्ठंदुभंगचान्धं नग्न मुत्कृत्त नासिकम् । भल्लातकं कर्षफलं काक मा- र्जार भूपकान् । क्लीवंचगधभंचैव नपश्येत्प्रातरेवहि । घिएमूत्रोत्सर्गः पारस्करमूत्रो ॥ तिष्ठन भूत्र पुरीपे कुर्यात् । स्वयंप्रशान काटेनगुदं प्रेमजीत । विकृतवासी नाच्छादयीत । भूपुरीपे. ष्टीवनं चातप नकुर्यात् । दक्षः-शौचेयत्नः सदाकार्यः शौचमूलो यतोद्विजः । शौचाचार विहीनस्य समस्ता निष्फला: क्रियाः । शौचेदिक प्रमाणं पाराशरः-ततः प्रातः समुत्थाय कुयाद्विरमूत्रमेवच, नत्या मिघुविक्षेपा दतीत्याभ्यधिकभुपः । शौचमुखंयमः-प्रत्यमुखस्तु पूर्वाणै ऽपरारहे प्रामुखस्तथा । उदड्मुखस्तु मध्यान्हे निशायो दक्षिणामुखः मनुः-छायायामन्धकारच रात्रावहनि वाद्विजः। यथासुखं मुसंकुर्या प्राणवाधा भयेषुच । शौचेयज्ञोपवीतधारणम्-अमरे-उपवीतं ब्रह्मसूत्रं प्रोटतेदक्षिणेकरे । प्राचीना धोतमन्यस्मिन्नीवीतं कंठलंवितम् । कारिकासु-मूत्रेतु दक्षिणे कणे पुरीपेवामकर्णके उप- पीतंसदाधार्य मैथुनेतूप वीतिवत् । सायणीये-मलमूत्रं त्यजेद्विप्रो विस्मृत्येवोपयोतधृक् । उपपोतं तदुत्सृज्य धार्यमन्यं नवंतदा। शोचस्थलमाह अंगिरा:-अयज्ञियर नाश्च तृणै. संकाय मेदिनीम् । कुर्यान्मूत्र पुरीपेतु शुचौदेशे समाहितः । वौधान:-दशहस्तान्परित्यज्य मूनं पुर्या जलाशयेशतहस्ता पुरीषार्थताधनद्या चतुर्गुणम् । जलशौचमाह-धाराशौचं नकुर्षांत शौचशुद्धिमभीप्सिता। चुलकैरेवकत्र्तव्यं हस्तशुद्धि विधानतः । तीर्थेशीचं कुपोत कुर्वीतो हत- वारिणा । शौचशेष जलम्-गृहीत्वाजल पात्रंतु बिरमून पुस्तेयदि । तज्जलं मूत्रसदृशमतचा- न्द्रायणं चरेत् शौचात्तर मितिशेष । शौचेहस्तविचार आश्वलायन:--लिंगशौचं पुराकृत्वा गुदशौचं ततः परम् । धर्मविद्दक्षिण हस्तमध शौचेन्योजयेत् । तथाच पामहस्तेन नाभेहध्वं नशोधयेत् । शीवेमृत्तिकाग्रहणम् शातातपः-अंतर्जलाद्देवगृहाद्वल्मीकान्मूषकप्रहात् । कृत- शौचस्थलाच्चैव नग्राह्या पंचमृत्तिका. । शौचेमृदालेपन क्षालनम् भृगुः-द्वेलिंगे मृत्तिके देयेगुदेपंच करेदश । उभयोः सप्तदातव्या विटांचे मृत्तिका. स्मृता। एकं शौच गृहस्थ स्य- द्विगुणं ब्रह्मचारिण । पाणप्रस्थस्य त्रिगुणंयतीनाच चतुर्गरम् । यद्दिया विहितं शौचंतदर्धे- निशिकीर्तितम् । तदर्धमातुरे प्रोक्त मातुरस्यार्धमध्यनि । स्त्रीशूद्रयोः-सीशहयोर मान्शीचे प्रोक्तमनीपिमिः । शौचेमृत्तिकामानं शौनकः-प्राामलक मात्रास्तु मूत्रशौचेहि मृत्तिकाः । पादक्षालनम्--चंद्रिकायाम् पादतले तिस्रोमृतिका गुल्फयोचतसः । गंडू पप्रमाणं आश्व- लायनः । कुर्याद्वादश गंडपान्पुरीपोत्सर्जने तत' । मूत्रोत्सगैच चतुरोभोजनान्तच पोटश भयभीच्या पसानेषु गंडपाष्टकमाचरेत । गंडूपप्रक्षेपणे विचारः प्रयोग पारिजाते-- पुरतःसर्पदेयाश्चदक्षिणे पितरः स्तथा । पयः पृष्टतः सर्वचामे गडप प्रक्षिपेत् । दंतधावन- काप्टम्पारस्करः--श्रोदुम्परेण दन्तान्धावत् | धन्वंतरि:-निम्बधतिक्तवे धेर कपाये खादिर- स्तथा । तत्रादौ दंतपपनं द्वादशांगुलमायतम् । दंतवायनवज्यं ध्यास... प्रतिपदर्श पटीमु नयम्या रविवासरे। दन्ताना काठ संयोगी दहत्या सप्तमं कुलम् ।। स्नानकालः,हेमाद्री अरुणकिरण युक्ता प्राचौदिश मपलाक्यसायादिति, स्नानार्थ जलममरीचिः-गांगपयः पुनात्येय पापमा मरणात्कृतम् । यमः-प्रापापय मदापता स्तामारन्हि 1 कैमकाण्ड रताकरे, कमबोधिनी परिभाषा (4) विशाधक | तस्मात्सर्यपु कालघु उप्णाभ पावनस्मृतम् । उपणेदक स्नानपज्यम् मनु:- संकान्सा रविवारच सप्तम्याराहुदर्शन । श्राराम्ये पुत्रमित्रार्थ नमनायादुरणवारिणा ॥ मृतेज- न्मनि समान्तौ प्राध्दै जन्नदिनतथा अरपृष्ठ स्पर्शदनचैव नस्नाया दुष्णवारिणा | जापालि.- अशिरस्क भवस्नान स्नानाशक्ता तुकमिणा । श्राण वाससावापि मार्जन दैहिक विदु । रजस्सला स्नानविशेष,-ज्यरामिभूता यानारी रजसाच परिप्लुता। क्थतस्या भवच्छौचशुद्धि स्या- नर्मणा । चतुर्थऽहनिसप्राप्तेस्पृशे दन्यातुता स्त्रियम् । सासर्चलाउजगावाप स्नात्वा स्नात्या पुन स्पृरीत् । दशद्वादश कृत्वाया श्राचमच पुन पुन | अन्तेच वाससात्यागस्तथाशुद्धाभवतुसा। स्नानादौ वायंजलमाह धन्वंतरि - तृणपणतिरयुत क्लुप विपसयुतम् । यावगहत वर्षामु पिनद्वापि नवजलम् । सवाहा भ्यतरारागान्प्राप्नुयाक्षिप्रमवहि । वाचस्पति-स्नानमाचमन दान देवतापितृतर्पणम्। शदादयुर्वीत तथामघाद्विनि सूत कात्यायना~यचद्वय प्रापणादि सानद्यारज स्वला -तासुस्नान कुर्योत बर्जयित्वा मुरापगाम् । (पनि समुद्रगा) उपाकर्मणि चात्सर्ग प्रेतस्नानेतर्यवच । चन्द्रसूर्य ग्रहचैयर जादापो नदिद्यते । कात्यायन्सूडेजस्लिरय शिरारा गिराध कठ मजनस्नारम् । सौभाग्यवती स्त्राणा विशेष स्नान-सभर्तृर यापितांच प्रहरणादि निमित्तगगादितायपु समान्त्यादि पर्वनिमित्तकच कठस्ना-पलप्रदम् । पाराशर -~-शिर- स्नान तपाजलेनैव सौभाग्यवतीना प्रशस्त । शत्येन्त्वमा लम् । नित्यमेव स्रोगदाणा सर्वत्र तूष्णीस्नानम् । नानोत्तर वयंवस्त्रम्-दक्ष ईपध्दीत स्त्रियाधौत शद्रधौत तथैवच । प्रसा रित यमदिशि गहिंत सर्वकर्मसु । आपस्तव --आद्रवासातुय कुर्या जपहोम परिग्रहान्स तद्राक्षस विद्यम जातच यत्कृतम् । यजलेशुल्कवस्त्रेण स्थलेचैवावससा । जपोहामस्तथा- दान तत्सर्वं निप्पलभवेत् । वर्मार्थभूमि विचार याज्ञवल्क्य -सर्वत्र वसुधापूतायत्रलेपोन विद्यदे । सभालेपो भवत्तत्र पुनलपेनशुद्ध्यति । आसन्माझ्यास -~-कौशयं कपलचैवजिन पर मेवचा दारुज तालपत्रंवाासन परिकरुपयेत् । आसन गुणा-कृष्णाजिने ज्ञानसिद्धिक्षिी-- ध्रचर्मणि । पशाजिने व्याधिनाश कम्वले दु समोचनम् ॥ कार्यपरत्वेनासन विचार ~अमि- चारनीलपणे रक्त पश्यादि कर्मणि । शान्तिपेरम्बल प्राक्त सर्पष्टं चित्रकम्बलम् । बुशासन सर्वसिद्धि कथिता मुनिमि पुरा । वरण्यादु खसम्भृति पापाणे व्यघिसम्भव । आसन परिमाणं कालिका पुराणे---चतुर्विशत्यगुलैरतुदीर्घ काष्टासन मत्म् । पाडशागुलविस्तीर्ण मुत्सेधे चतु- रगुलम् । वस्त्रं द्विहस्तान्न दीर्घ सार्द हस्तानविस्तृतम् । अगुतु तयेन्द्रायें कुर्या-पूजामुमानय पादुकाधारण विचार -- अग्न्यागार गयागाछैटेच ब्राह्मण सन्निधौ श्राहरे भएकालच पादुकानां विसर्जनम् । अथच कर्म वशेपे शरीरावयव सकोच विवसन भेटेन शरीर साध्यानि पडा सनान्याह तत्रादौ प्रेढपाद मासन माचार मयूखे-दानमाचमनं होम भोजन देवतार्च- न्म् । प्रादपादन कुर्वीत स्वाध्यायं पितृतर्परम् । प्रौद्धपादासन लक्षणम् ~~शासनादपादस्तु जानुनाथजघया । कृतावसस्थिकोयश्च प्रौढपाद सरच्यते । देवीभागवते पंचासनानि- पझामनं स्वस्तिरच भद्रग्रजासनंतथा । वीरासनमितिप्राक्त प्रमादामन पञ्चकम् । पद्मासनम्-- उरिपरि विन्यस्य सम्यक्पादतले शुभे । श्रगुतीर निवनीया दस्ताभ्यां व्युत्कमात्तत । स्वस्त. कासनम्-~ऋजुमायाविशद्य गी स्वस्ति तत्प्रचक्षते । भद्रासनम् ~~ सोयन्या पार्श्वयोन्यस्य गुल्फ्युग्मे मुनिश्चितम् । वृपयाध पादपाणि पाणिभ्या परिव धयेत् । भद्रासन मितिमोक्तयोगिभिः (५). कर्मकाण्डरनाकरे, कर्मघोधिनी परिभाषा - परिपूजितम् । वज्रासनम्-उर्वोः पादौ क्रमान्यस्य जान्योः प्रत्यरमुखांगुलि.। करौविदध्या दारव्यात वज्रासन मनुत्तमम् । वीरासनम्-एकंपादमध. कृत्या विन्यस्यैकं तथोत्तरे । ऋजु- कायो विशेद्योगी वोरासन मितीरितम् । सर्वोपासने दिग्विचारमाह-वृहत्पाराशरः ईशा- न्यामि मुखीभूत्वा द्विजः पूर्वमुसोऽपिवा । सन्ध्या मुपासयेनित्ययथा वत्तनिवोधत । परिभाषा फर्मप्रदीपे-यदिनि यमानस्या नपहोमादि कर्मसु । तिलस्त प्रदिश. प्रीता एद्रोसौम्याऽपरा- जिता । गौतमाः-रात्रावुदमुखः कुर्या देवकार्य सदैवहि । शिवार्चनं सदाप्येवं शुचि. कुर्यादुदं- मुखः । कर्मादो उर्ध्वपुंडतिलकधारणं, बृहन्नारदीये-स्नान दानॅजपोहोमः सन्ध्यात्वघ्याय कर्मसु । ऊर्ध्वपुंडू विहीनाश्चै त्तत्सर्वं निष्फल भवत् । प्रयोगपारिजातके.- ललाटे तिलक कृपया सन्ध्याकर्म समाचरेत् । अकृत्वा भालतिलकत्तस्यकम निरर्थकम् । भस्मधारणं भविष्ये- सितेनभरमना कुर्यात् त्रिसंध्यंच त्रिपुण्ड्रकम् सर्वपाप विनिर्मुक्ताशिवनसह मोदते याह्यभस्म-अग्निहोत्राग्निर्जभस्म विरजाहोमर्ज तथा औपासन समुत्पन्न समिदग्निसमुद्भवम् । समिदमि समुद्भूतँधायचे ब्रह्मचारिणा । अन्ये—अन्येपामपिसर्वेषां धार्यदायानलोद्भवम् । त्रिपुण्डलक्षण काशीखंडे-भुवोर्मध्यसमा- रभ्य यावदन्ती भवद्भयो । मध्यमानामिकागुल्यों मध्येतुप्रतिलोमतः । अगुप्टेनकृतारेखाधिपंड सोभिधीयते । प्रात.ससलिलभस्म मध्यान्हे गंधमिश्रितम् । सायान्हे निजलंभस्म, एवंभस्मविल. पर्यत् । रुद्राक्षधारणम्-रदाक्षायस्य गात्रेपुललाटेच त्रिपुंड्रकम् । सचाडाल पि संपूज्यः सर्व- पत्तिमोभत्रैत । अभक्तोवारिभक्तीवानीचौनीचतरोऽपिवा। रुद्राक्षान्धारयेद्यस्तुमुच्यतेसर्वपातकैः । पवित्रधारणम् मार्कडेय:-सपवित्रेणहस्तेन कुर्यादाचमन क्रियाम् । नोच्छिछ तत्पवित्रंतु भुक्ता च्छि,तुवर्जयेत् । कुशपवित्रप्रमाणम्-व्यंगुलमूलवलयं ग्रंथिर कागुलिमयेत् । चतुरंगुलम- प्रस्यापवित्रस्यप्रमाणफम् । प्रयोगपारिजातवे-स्नानेहीमेज पेदानेस्वाध्यायपितृकर्मणि। करी- सदीकुर्वीत तथासन्ध्याभिवादने अन्यपवित्रधारणम्कातीयसूत्रमाप्य:-मुशा.काशा शरा- दूर्यायवगोधूमवल्कला । मुर्वर्णराजतेंतानंदशदर्भा प्रकीर्तिता ।सुवर्णदिपवित्रंशारदायाम्- साम्रतारसुवर्णानामकपोडशखेन्दुभिः । कृतात्रिशक्तिमुद्रेयंतीवदारिद्यनाशिनी । इर्दैपविधतर्जन्या धारययंतिसदाद्विजा । उत्तरीय योगपारिजातके.-उत्तरीययोगहन्तजन्यारजÓतथा। नजीव- पितृकार्य ज्येष्टीयाविद्यतेयदि । शियापंधनम् नागदेव-स्मृत्वाकारचगायत्री नियनीया- च्छिसातत. ! मानातोकेनमत्रेण शिसा तुकारयेत् । कोशीशिखाधारणं संस्कारभारफरे- सल्याटत्यादिदोषण विशिसश्नरीभवेत । कौशीतदाधारयोत ब्रह्मप्रन्थियुताशिसाम् । प्रन्यांतरे- स्नानदानजपहोम संध्यायादेचमार्चनं । शियाधिविनाम्म म्फुयाँकदाचन ॥ शिपामुक्तिरित चार:-शीचेऽथमयनमंग (मधुन) भोजनंदन्तधायने । शिसामुक्तिमदा कुर्यादाशचिमनुरमवीत ॥ आचमनप्रकार: विश्वामित्रफल-शुन्देस्मातथाचय पौराणपंदितथा । तत्रिबंधीत स्मारपबिधश्रुतिनादित।शुध्याचमनम-विष्णमूत्रादिरशीचेपुशुध्दनपरिकोसितम्॥ स्मा- ताचमनम-शपाय निभि पीत्याद्वाभ्याप्रचालयेवरी ॥ द्वाभ्यामोयीनुगंगृज्यद्वाभ्यामम्मान ws हस्ती प्रचाल्यपादागिनवर || संघीयांनादानंततः सम्पणादिभि. । पाम्पना.
कर्मकाएर रक्षाकरे, कर्मयोधिमी परिभाषा (५) नम्-प्रणयपूर्वमुच्चार्यसावित्रीतश्नॅतरम् । तथैपव्याहतोस्तिषः प्रीताचमनमुच्यते । वैदिका चमनम्- कमांगतुधिराचम्य, प्राणायामात्रयस्मृतम् । प्रामुखोयापिकर्तव्यं कर्मकुर्यात्प्रयमतः। जलाभावेनाचमनंपाराशर:-प्रभासादीनितीर्थानि, गंगाया:सरितस्तथा । विनस्पदक्षिणेकणे वसन्तिमुनिरपवीत् । गंगाचदक्षिणेौने, नासिकायां हुताशनः, उभयो: स्पर्शनचैव तत्क्षणादेवशु- ध्यति । प्राचार मयूखे-दुनिष्टोवनचैव जम्भमाणेतथाऽनृते,, पतितानांचसभापे दक्षिणंभव- स्पृशेत् । प्राचमनेजलप्रमाणं नागदेवः-संहतांगुलिनातीय, गृहीत्वांपाणिनाद्विजः । मुका. गुष्ठंकनिष्ठेनशेषेणाचमन चरेत् । माषामानमुवर्णस्य यत्रमजतिवैमणिः । एतदाचमनप्रोक्त, पवि- कायशोधनम् । आचमनेवर्य जलमाहव्यास:-अपः पाणिनस्पृट्वा, आचमेवस्तुयाद्विजः मुरापानेनतत्तुल्यमित्येवमृपिरप्रवीत्। सर्पकर्मादीसंध्योपासननित्यंकात्ययन:--स्नानसध्या त्यजन्विप्र, सप्ताहाच्छूदतांत्रजेत् । तस्मात्स्नानसंध्यांच, सूत केपिनसत्यजेत् । सन्ध्योपासने केचिदपवादापत्रिः--उन्मत्तदोषयुक्तस्य, व्याधितस्यचनित्यशः । पितामातातथान्यावा; सं- ध्यावंदनमाचरेत् । देवाग्निद्विजाविद्यानां, कार्यमहतिसंस्थिते । संध्याहानी नदोषोऽस्तियतस्तत्पुण्य साधनम् । मानसिकसन्ध्या-अशक्तीनिर्जलेदेशे, मृतौजातीयसूतके । जपेच्चमानसीसंध्या, कुशयारिविवर्जिताम् । संध्याकालमाह देयीपुराणे-उत्तमातारको पेतामध्यमालुप्ततारका अधमाभास्करोपेता, प्रातः संध्याभिधोच्यते । उत्तमाभास्करोपेता, मध्यमालुप्तभास्करा । अधमा- तारकोयता सायसंध्यात्रिधामता। अध्यर्धयामादासायं संध्यामाध्यान्हिकीप्यते । सन्ध्याधिरिणः धर्मसिन्धुसारे--उपनीताद्विजाएवा प्राधिकारिणः । स्त्रीशहाणामनधिकारित्वम् । तेषामुपनय- नाभावा द्वेदमनेषु अधिकारोनास्ति । सर्वकर्मादौ प्राणायामः कर्तव्यः-अगस्त्य सहितायाम् प्रणायामविनाययत्कृतं कर्मनिरर्थकम् । श्रतोयलनकर्तव्य :, प्राणायामः शुभार्थिनां प्राणायाम लक्षण:-प्राणोवायुरितिप्रोक्त आयामस्तनिरोधनम् । प्राणायामइतिप्रोतोयोगिनायोगसाधनम् । कात्यायन:-प्राणायामखिभिःपूत स्तत्क्षणावजनेमिवत् । यथापर्वतधातूला दोषान्हरतिपावकः एवमंतर्गतंपापं प्राणायामेन दयते । . - मार्जनविश्वामित्र कल्पे-भूमौशिरशिचाकाशे, आकाशेभुविमंडले । भडलेचतथा. काशे, एवंचनयधाक्षिपेत् । सेमधत्रयमाकाशे, वयरवयंमस्तके । नकाराणांत्रयभूमौ नान्यथापावित भवेत । एवमापोहिष्टेति तृपेनमार्जनकुयांत । याज्ञवल्क्य:--अर्दयाक्षिपेदूषं, मर्धारिप- दधः अधोभागे विसृष्टाभि, रसुरायान्तिसंक्षयम् । शिरसोमार्जनकुर्यात्कुशैःसोदकविन्दुभिः। मन्त्र- विधिसंयंधिनकेचिदुत्सर्गावक्ष्यामि-(१)यत्रयनाचमनभषेत्तपत्रिवारंजलंपिवेत् । चतुर्थेवारं जलंभूमोक्षिपेत् । (२) यभयत्रऋष्यादिकं विनियोगोभवेत्तत्रतत्रजलंकरे गृहीत्वाकर्मोपचारान्ते भूमो क्षिपेत् । (३) यत्रयत्रमार्जनभवेसत्रतत्र कुशोदकविन्दुभिःशिरःश्चेित् । (४) यत्रयनभ्यानभवेत्त- प्रतत्रनमस्कार मुद्रयाकार्यम् । (५) यत्रयत्रोपस्थान स्यात्तत्रकरौ स्वतिकाकारौ कुर्यात् । (६) यत्रयनावाहन तत्रतांजलिमुद्राकार्या। (अपवादस्तु तत्रतत्रभिन्नभिन्न प्रकारणेपुदर्शिता) संध्यामायान्यं विश्वामित्रकल्पे विप्रोवृतस्तस्यमूलंचमंध्या, घेदः शाखाधर्मकर्माणिपत्रे । तस्मान्मूलयनतोरक्षणीय, छिन्नमूलेनैप शाखानपत्रे । वेदवृक्ष.- कारःप्रौढमूल: क्रमपदस हितमहन्द विस्तीर्णशाखो प्रपत्रः- सामपुप्योयजुरधिकफलोऽ थपैगंधंदधानः । यहारच्छायासमे -arrier कर्मकाण्ड रनाकरे, कर्मयोधिनी परिभाषा तोद्विजमधुपगणैः सेव्यमानः प्रभातमध्येसायनिकालंसुचरितचरितः पातुविदवृक्षः सिंध्यासेव- नम् खकालेसेवता नित्यंसन्ध्याकामदुधा भवेत ! अकालेसवितासाच सन्ध्यावन्ध्यावधूरिव । सन्ध्या- होनोऽ शुचिनित्यमनह' सर्वकर्मसु ! यदन्यत्करतेकम नतस्यफलमश्नुते । संकल्प विचारोभ- विदे-संकल्पेवविनाविप्रयत्किंचित्करतेनरः । फलंचस्याल्पकं तस्यधर्मस्यार्धक्षयोमवेत । अत्रसंक- ल्प विषेयशास्राकारैर्नानाविध देशविशेपभेदादि दिवामहूर्ता दिनानाप्रकाराण्युक्तानि परंचानप्रथधि- स्तारभयानसंग्रहीतानि, संकल्पवावयन्तुहेमाद्रौ श्राध्दखडेप्रदर्शितम् । ॐ इहपृथिा जम्बूद्वीपे भारतवर्ष कुमारिकाखंड प्राजापत्यादि, अमुकप्रदेशे एवंदेशादिकंसमनुकीयं ब्रह्मणेद्वि- तीयपराध्द,श्रीश्वेतवाराहकल्पे, वैवखतमन्वन्तरे, अष्टाविंशतितमस्य कलियुगस्य प्रथमंचरणे, पष्ठिसम्वत्सराणामध्ये, वत्तमानसम्वत्सरायन मासपक्षतिथिवार नक्षनयोगकरण दियारानीमहरी नामानि चैतानि सप्तम्यता न्नुचारयेत, विशेपः प्रयोगेपुस्पष्ठ । + अथच पूजाविषयोपयोग्य विषयान्वये- तत्र पूजानाम देवतोद्देशेन द्रव्य त्यागात्मक त्वाद्यागएव । ता पद्यापिरेपाचिदावाहना दीनामबागात्मकत्वात्पूजात्वं नस्यात् । नचतेषां पूजात्य नास्त्येवेतिवाच्यम् । पोडशेष्यप्युप- चारेषु शास्त्रकाराणा पूजाशब्द प्रयोगात । तथापि यागायागसमुदाये, पूजाशब्दो-गौरवित- प्रीति हतुक्रियात्वेनोपाधिनारूढएव, यथा इप्टिपशु सोमसमुदाये राजसूय शब्द', यद्यपि ईश्वरे यागायागसमुदाय कियया जीववन्दतः करण, वृत्तिरूपा प्रीतित्पद्यते, अन्त करणाभावात् । तथापि मायात्ति विशेष एवप्रीति शिक्षादिवत । साच यद्यपि उत्पन्नत्वानश्यति, तथापि फल यावत्तिष्टतीति दिक् ॥ पृजाधिकारिण' नृसिंहपुराणे-अनामित्वं गृहभङ्ग कारण मतो- गृहाणाश्रम मुत्तमं मुने । अनाश्रमस्थै द्विजवेदपारगे, रपित्वह नानुगृण्हामि चार्चनम् । श्रना- श्रमि कृतपूजांतु नगृहामीत्यर्थ ॥ स्कन्दपुराणे. --पाखण्डिनश्च पतिता येचनास्तिका- द्विजाः पूजाकर्मणितेपांवै, सन्निधि प्यतेक्वचित ॥ देवपूजायां सर्ववर्णाधिकारमाह विपण:- आगमोक्तेन मार्गण स्त्रीशतैरपिपूंजनम् । स्मृत्यर्थ सारे बौधायनः । शद्राणां चैवभवति नाम्नावैदेवतार्चनम्। चतुय तेनदेवतानाम्ने त्यर्थः,,तथा-दोक्षामन्प्रविहीनीपि कुर्याद्देवार्चनंयुध.। देवीपुराणे- पूजाविधी भवेत् श्रेष्टो, नापटुनकुश लव । नानैष्टिकोदाम्भिकोया, पूजकः प्रा. प्यते शुभ', कुशीलवोनट ॥ पूजाप्रतिनिधयः मंत्रराजानुष्टुम्विधाने:-गुरय पूजका- श्चैव, विद्वांसीयेऽग्निहोत्रिण । अधिकारित्व महंति, यद्वा याझिक्दीक्षिताः । पदपदार्थ यत्ताच, स्मात्तंकर्मज्ञ एववा ॥ पूजाकाल नृसिंहपुराणे -देवकार्यस्य सर्पस्य, पूरिह- स्तुविधीयते । नारदीये विशेषः-प्रातमध्यदिनसायं, देयपूजा समाचरेत् । नमित्तिय पु- संयु, तत्तकाला विशेपत ॥ देवपूजायां प्रतिमादिस्थान विशेषान्वये:--- गृयपरिशिष्ठ- तानप्मुवानी सूर्यवास्थंडिले ,प्रति माग थापाहन पिगभपतः । सानिपु शस्तामु देवता समिहितति । मनुः-प्ररपानांचय हदये, धिंडिल प्रतिमामुच । विप्रेयुनहगः मम्यगन, मुगुनास्मृतम् ॥ अग्नीक्रियापता देवी, दिपियो मनिपिणाम् । प्रतिमारपल्पना, योगिना ईदयेहरिः ॥ स्फान्दे:-पूनार्थ मुत्तमस्थानं, शालमानतदुच्यते । ऋगिहपूजगप्रेटा, शालमामी- -- कर्मकाण्ड रखाकरे, फर्मबोधिनी परिभाषा याशिला । द्वारकाजात चाका शिलाठात धैवच । धात्रोफल प्रगाणाया, करमपिहितांगमा शालग्रामोद्भयाशस्ता, जातायाचक्रतीर्थंके । प्रतिमास्तत्रीवः रत्नजाहेमजार्चष, राजतो तानजतथा रतिकोषातथालौहो, शैलजादुमजातथा । रेतिकीपित्तलशा-धमाधमाविज्ञेया मन्मयोप्रतिमाचया । सर्पकामप्रदाचैप, रमजाचोत्तमोत्तमा ॥ लिंगपुराणे:~-यंत्रमन्त्रमयंत्रोक्त मन्नात्माटेपतेतिच ! यन्नपिनासत्तापूजा देवतानप्रसीदति ॥ ब्रह्मपुराणे:-जलेस्थलेम्परेमूत्ती, कुम्भेचाकमलोपरि । पूजानिर्माल्योद्वासनं हलायुधः~~-प्रातःकाले सदाका निमांत्योद्वासनं बुधः ॥ वाराहपुराणे:~-उपलेपनंच स्थानस्य प्रातरेपहिशस्यते । पूजार्थजलमाह भारद्वाज:- स्वन्,सुशोतलंस्वादुलघुसत्पात्रपूरितम् ॥ आनौतसज्जनयत्तत्सलिलं तीर्थजशुभम् । गंधानुलेपनं नृसिंह पुराणे-फुकुमागुरु श्रीराण्टकपूरैणाच्युताकृति । श्रातिप्यभवन्या राजेन्द्रकल्पकोटिवसेद्दियि । पद्मपुराणे:-गन्धेभ्यश्चन्दनपुण्येचन्दनगदगुरुर्वरः । कृष्णागुरुस्ततः श्रेष्टः फुकुमतुततोवरम् ॥ कालेचतुरुष्कचरहं चन्दनमेचच । नृणाभवतिदत्तानिपुण्यानिदेयपूजने । सर्व गंधगारुडे-कस्तूरिकायाभागोवाचत्वारश्चन्दनस्यतु । कंकमस्य प्रयश्चैवशशिनःस्याश्चतुः समम् ॥ अन्यचकपूरचन्दनंदपैः कुंकुमञ्चचतुःसमम् । सर्पगन्धमितिप्रोक्तसमम्तमुरवातमम् ॥ मङ्गलद्रव्याणिमदनरत्नेस्कान्दे- हरिद्राककुमञ्चैव सिन्दूरंकज्जलतथा । कूपासकश्यताम्बूलं मांगल्याभरणशुभम् ॥ भद्ररंजन द्रव्याणि.--रसामिपञ्चवणानिमण्डलार्थन्तुकारयेत । शालि- तण्डलवर्णनशुक्लवायवमम्भवम् । रकुसम्भ-मिन्दूर गैरिकादिसमुद्भवं । हरितालोद्भपात हरिद्रासम्भवन्तुया ॥ कृष्णदग्धययैश्चय हरितं दिव्यपत्रजः ।। कलशप्रमाणं विष्णुधर्मोत्तरे- हेमराजतताम्रश्वमृण्मयालरणाविता । यानीद्वाप्रतिष्ठासुकुम्भा स्युरभिषेचने । धातुजंमृण्मयं. पापिकलशंयत्र तिष्ठित । तद्वत्प्रादेशदीर्घच चतुरंगुलमु न्द्रितम् ॥ ससमृदः --अश्वस्थानाद्गज- स्थानाद्वल्मीकात्मङ्गमा द्रदातराजद्वाराच गोष्टाचदमानीयनिक्षिपेत् ॥पञ्चरत्नानिस्मृत्यंतरे:- कनकंकलिशनीलपद्मरागंचमौलिकम् । एतानिपञ्चरत्नानिकलशाभ्यंतरेक्षिपेत् ॥ पञ्चपल्लवा- ब्राह्म-~अश्वस्थोदवर, प्लक्षचूतन्यग्रोधपटवा. । पञ्चभगाइतिप्रोता.सर्वकर्ममुशोभनाः ।। सापध्य--ष्टमासीहरिद्वैमुर शैलेयचन्दनम् । पचाचम्पक मुस्ताचसायध्योदशस्मृताः ।। सप्तधान्यानिपटत्रिंशन्मते- ययगांधूमधान्यानितिला. कश्चमुद्गकाः । श्यामा काथणका श्चैवमतान्यमुदाहृतम् ॥ अथसर्व फाँपयोगी, मुद्रालक्षणानिवदये--उक्तश्चस्मृति- संग्रह-अर्चनंजपकालेतुभ्यानकाम्येचकर्मणी । तत्तन्मुद्राप्रयोहाव्यादेयतागनिधापकाः ॥ श्रावा- हनी हस्तायामालिकृत्वाऽनामिकामूलपर्वणोः । अंगुष्ठीनिक्षिपेत्सेय मुद्रात्याचाहनीस्मृताः ॥१॥ स्थापनी-अधोमुखी पियंस्था स्थापनी मुद्रिकास्मृताः ॥ २॥ सन्निवापनी उत्थिता. गुटमुल्योस्तुसंयोगात्सन्निधापनी || 3 || संरोधिनी--अन्तः प्रवेशितांगुष्टा सैयसरोधिनीमता ॥ ४॥ प्रसादिनी उत्तानातुकरौकृत्या प्रसार्यहदयस्थिताः । प्रमादमुद्रापिटेया सर्पदेव प्रसा- दिनी ॥ ५ ॥ अवगुण्टनमुद्रा हस्तीतुसम्मुखीकृत्या : मुष्टीकृत्यायिकुंचयेत् । तयोरुपरिचा- शुष्टी निक्षिपेद्वितंतथा । अयगुगठनमुद्रेयं सर्पकामफलप्रदा ॥ ६॥सम्मुखमुद्रिका--मष्टिद्वय स्थितांगुष्टौ सम्मुसोचपरस्परम् । संविधायुहितोकुर्यात्सेयं सम्मुसमुद्रिका ॥ ७ ॥ प्रार्थनी- अमृतागुलिसौहम्ती, मिलिटौच सम्मुसौ । कुर्यात्स्यहदये ग्रंमुद्राप्रार्धनसंज्ञिका ।। ६॥ शङ्ख- +- (4) कर्मकाराष्ट्र रक्षाकरे, कर्मयोधिनी परिभाषा मुंद्रा-समस्तानांदेवतानामेताः शस्तातुपूजनेवामांगुष्टन्तुसंगृह्य दक्षिणेनतुमुष्टि। कृत्योत्तान तमामुष्टिमंगुष्टतुप्रसारयेत्, वामांगुल्यस्तस्थाभिधाः संयुक्तां सुप्रसारिताः । दक्षिणांगुष्ठसंस्पृष्टा मुद्रा शंखस्यचोदिता ॥ ६ ॥ नाराच मुद्रा-अंगुष्ठतजन्यमाभ्यां सज्येनाराचमुद्रिका ॥ १० ॥ योनिमुद्राः-मिथ:-कनिटकेवध्यातर्जनीभ्यामनामिके अनामिकोर्ध्वगश्लिष्टदीमध्यमयोरधः अंगुष्ठाप्रद्वयंन्यस्येद्यौनिमुद्रेय मोरिता ॥ ११ ॥ गरुड़मुद्रा-हस्तीतुमम्मुखौकृत्वा, प्रथपित्वा कनिष्टके । मियस्तर्जनि फेश्लिष्टे, निष्ठावंगूष्टकौतथा । मध्यमांनामिद्वैतुद्वीपक्षाविवकुश्चयेत् । एषागामुद्रास्या, दशेषविपनाशिनी ॥ धेनुमुद्रा-हस्तद्वयेत्वोचके सम्मुखेचपरस्परम् । घामांगुली दक्षिणस्यचांगुलीनाहि सन्धिषु । प्रदयमध्यमाभ्यान्तुतजन्यौद्वेप्रयोजयेत् । कनिष्टेट्वे- ऽनाभिकाभ्यां युभयात्साधेनु मुद्रिका ॥ विसर्जनीमुद्राः-आवाहने तुयामुद्रासैवोकातुविस- जने । लक्ष्मी मुद्रा-पद्माकारौकरीकुर्गा दूध्वांप्रोकर्णसम्मिती, ध्यायेद्देवीवदात्मानं लक्ष्मी मुद्रेयमुच्यते । एतादेव्याः प्रयत्नेन मुद्राराशीः प्रदर्शयेत ।, सप्तजिवाण्यमुद्रा-मणिपंध स्थितौकृत्वा प्रसृतागुलिको करौ] कनिष्ठागुष्टयुगलेमिलित्वान्तः प्रसारयेत् । सप्तजिहाल्यमुद्रेय वैश्वानर वंशकरी ॥ दुर्गामुद्रा-मुष्टिकरपाकराभ्यांच बामस्योपरिदक्षिणम् । कृत्याशिरसि- सायुज्यादुर्गामुद्रेय मीरिता ॥ नमस्कारमुद्रा-स्पर्शयेद्वाम हस्तायाम हस्तस्यमूलतः । दक्षिणेननमस्कारमुद्रा येषाप्रकीर्तिता ॥ इति कर्ममुदा लक्षणानि ॥ पूजापाप्रस्थापनक्रमःपुष्पसारसुधानिधी-अपात्रंतुषायव्येनग्रीयोपाधपात्रकम् । आग्नेयांनानकलश मेशेवाचमनीयकम् । मध्येतुमधुपर्कस्या दित्येतत्पात्रलक्षणम् ॥ मैपासम्मु- खेच तहतेगंधपात्रकम् । कर्मपात्रस्य वामेतुस्थापये भादटिकाम् ॥ कर्मपात्राप्रप्तः शखेत्रिपाप- रिस्थापयेत् ॥ पत्रपुष्पोपकरणं यधास्थानेतु स्थापयेत । धूपदीपेच द्वैपात्र फर्मपात्रस्यदक्षिणे, नैवे- यक्रमशश्चैवदेवता दक्षिणेन्यसैत् । पाचपाप्रक्षेपणीय द्रव्याणि रत्नप्रकाशे-पग्रेचवि- पशुपाँच दूर्वाश्यामाकमेवच, । चत्वारि पाछद्रव्याणि लब्धवापि समाचरेत् । अर्घ्यद्रव्यारिण तत्रध-कुशाक्षततिलत्रीहि यवमाष प्रियंगुभिः । सिध्यार्थक समायुक्तमयस्यात्तु विशेषत :॥ सामान्याध्यः--रक्तविल्वक्षतैः पुष्पैर्दधिदूर्वाशस्तिले । सामान्यःसर्वदेवानामयिंपरिकीर्तितः । अलाभेदधिर्यादेमनसापि विचिंतयेत् । अष्टांगाय॑म्-श्राप.क्षौरंकुशाप्राणि, दधिसपिंधतंडला। यवसिध्दार्थकाश्चैवप्रधागोपः प्रकीर्तितः॥ आगमेतु-शंकृत्यातुपानीयंगपुष्पाहतान्यितम् । अर्धददातिदेवस्यससागर धराफलम् ॥ मधुपर्कम्...इक्षुर्मधुघृतंचंप पयोदधिसईयतु । प्रस्थप्र- माणवामामधुपर्कमिहोच्यते ॥ आचमनीयम्- एलालवंगौशीरंच कयकोलंच चतुर्भयम् । आचमनीयंविशयययालाभप्रगृह्यया ॥ स्नानद्रव्याणि नृसिंहपुराणे--तोरणपूर्वोतदना- पघातनच । मधुनाचायखंडेन (शर्करया) कमोझेयाविचक्षणः ॥ प्रत्येकद्रव्यस्नानन्तेजलेनैश्तु स्नापयेत् ॥ सर्व स्नानांते शंखतोयेनस्नानस्कान्दे-शखेकत्यातुपानीयंशाक्षतं कुसुमान्धितं ।। स्नापये देवपेराजीवन्मुक्तोमपेदिसः ॥ पूजासमये धादित्राणांचनिः स्कांदे-पदित्राणा- मभाषेतु पूजाकालेचसर्पदा । घंटाराब्दीनर. कार्यः सर्वपाध्मयोयतः॥ पण आर्द्रगान मार्जनम-विष्णुमादिगारन्तु पत्रणपरिमार्जयेत् ॥ यसमाह भारद्वाज:-नेप्रप्रियाणि- सूक्ष्माणि नूतनानि धनानि । न्यायागतानि पस्त्राणि प्रशसानि भवन्तिहि । अदेयवत्राणि १ समकाएरताककमयाविना पारभाषा चौधायन:-आसुदष्टानिदग्धानि जोणान्यन्यैधृतानिच । कृमिदष्टानिशीणानि स्थूलान्युपहता-' निच । दुष्कर्मसुप्रयुतानिदेवायनयचापयेत् । 'यज्ञोपवीतम-निच्छुपलंचपीता पसूत्रादि निर्मितम् । गज्ञोपवीत देयेचदत्यायेदान्तगोभवेत् । भूपणानि नन्दिपुराणो-खशरसादेम- देपेशं भूपर्णभूपयन्तिये । स्वर्गतियांतितेभता यापदिन्द्राश्चतुर्दशः ॥ चन्दनवामनपुराणो--- सुगन्धेश्चमुरामांसिकर्पूरागुरुचन्दनः । तथान्यश्वशुभद्रव्यरचयेदेयताद्विजः । तत्रादी विष्णुप्रिय पुष्पाधिक्ष्ये---पा -तुलसीकृष्णगौराच तयाभ्यच्यंजनार्दनम् । नरीयातित त्ययत्वां वैष्णवी शाश्वतोगतिम् । अनात्यातुलसाहित्यासोपन कस्तथैवच । सयातिनरफेघोरे यापदाभूतसम्प्लवम् ।। दुर्घा तुलस्योश्च्छेदनवर्जितं विष्णुधर्मोत्तरे-रविवारंविनादूयौ तुलसीद्वादशीबिना । जीवितस्याविनाशाय प्रविचिन्वीरधर्मपित् । संफ्रान्तायपक्षान्त द्वादश्यांनिशिसन्धयोः । वैश्च्छिन्तुलसीपत्रंतैश्छिन्नोहरिमस्तकः । पाद्मे विशेष:-देवाथैतुलसीछेदो होमासमिध- स्तथा । इन्दुक्षयेनदुष्येत गयार्धेतुतृणस्यच ॥ वलिप्रतिप्रह्लादोक्त पुष्पाणियामनपुराणे- तान्येवचप्रशस्तानिकुशुमानिमहासुर । यानिस्युर्वर्णयुक्तानिरसगन्धयुतानिच ॥ भग्निपुराणे- बिल्वपनं शमोपन पत्रं झारजस्यच } पत्रं दमन घृक्षक्ष्य हरेस्तुष्टिकरंपरम् ॥ मणिहेमादि- निर्मितपुष्पाणि तत्त्वमागरे नारदोत्वानि-मणिरनसुवादि निर्मितं कुसुमौतमम् । तत्परं कुसुमं प्रोक्त मपरं चित्रवस्त्रजम् ॥ उत्तम वृक्ष पुष्प मधमं फलरूपकम् । अधर्म कुसुमं प्रोक्तं पत्रिका जातमेववा । पराणा मपराणांच निर्माल्यत्वं नविद्यते । स्वर्णपुष्पेण चैवेन पूज्य- मुक्तिमवाप्नुयात् । किंपुनर्र नमुक्तादि खचितं खर्ण पुष्पकम् । श्रारोग्यप्रतिमा मूनिपूजायाः सिद्धिभाग्भपेत् ॥ निर्माल्यलक्षणम् -- नारद उवाच -निर्माल्यं द्विविधं प्रोक्तमुत्सृष्टंध्रातमेवच । मन्त्रेणविधिनादत्तं देवायोत्सृष्टमेवतत् ॥ न मियान्तरयोग्य तत्सर्पया त्याज्यभेषच । प्रातपुष्प फलंसिध्ये दपंतन्मनसान्यथा ॥ देवार्चने वयंपुष्पाणि-स्वयपतित पुष्पाणि कालातीतानि चैवहि । कुपात्रान्तर संस्थानि, कुत्सित स्थान जानिच । पन्हिकीटानिचान्यानि विशोभान्य- शुभानि ॥ एवंविधानि पुष्पाणि त्याज्यान्येव विचक्षण । विष्णु धर्म-शुष्कैः पूजयेद्देवं कुसुम महीगते । नार्कनोन्मत्तककांची तथैवगिरिकणिका ॥ नकण्टकारिका पुष्पमच्युताय निषेदयेत् । करानीतं पटानीत मानीतं चाकपत्रवे, एरण्डपत्रेप्यानीतं तत्पुप्पपरिवजयेत् । देवोपरि धृतंयश्चवामहस्तेच यद्धृतम् । अधोवस्त्रधृतंयच तत्पुप्पं परिवर्जयेत् ॥ अथदेवी प्रियपुष्पाणि देवीपुराणे---उक्तानुक्तस्तथापुष्पैजलजस्थल सम्भवैः । पत्र पुष्पैर्यथालाभम् सोपधिसमन्वितैः । धान्यानां सर्वपत्रव पुष्पश्चय प्रपूजयेत् । शुभवाप्यशुभंवापि फलपुष्पं निषेदयेत् ॥ भक्त्यानिषेदयेत्सर्वनाशुभंकिंचिदाप्नुयात् ॥ क्वचित्~मार्चयेद्वयादुर्गाम् ॥ पद्मपुराणे गृह्णातितुलसी शुष्कामपि पर्युपितां प्रभुः । पश्येपर्युषितपत्रे वयपर्युपितंजलम् । नवय॒जान्हवीतीयं नवयं तुलसीदलम् ॥ करवीराकपुप्पैश्च शांशपेश्चापराजितः। सितपीतै- स्तयारः कृष्णश्चैव चतुर्विधैः । लतामित्रोवृक्षस्य, दूर्वोकुरै सकोमलै । मरीमि कुशा- नांच बिल्वपत्रैः सुशोभनैः ॥ श्रथ सूर्यप्रियपुष्पाणि भविष्यपुराणे-पुष्पैररण्यसम्भूतैः पौधोगिरि- सम्भवैः । अपर्युषित निश्छिदैः प्रोक्षितजन्नुवर्जित. ॥ शात्मारामोद्भवपि भक्रया सम्पूजयेद्रषिम् । अथ शिवप्रियपुष्पाणि-नारदः-विष्णोयानीह चोक्तानि । २ चरेत् । सौषधीगन्धचूर्णयुक्त कृष्णतिलामले ॥ उद्वयङ्गिानितैलेन चम्पकादि सुगन्धिना । वस्त्रपरिधानमाहमनु-खण्ड वस्त्रावृतश्चैव वस्त्राओलम्वितस्तथा। उत्तरीय व्य पेतब तकृत पत्रव शिवसायुज्य माप्नुयात् । विशेषस्तनतन प्रमाणपन्थेपुदृष्टव्य धूपदीपनैवेद्यादि विषय अथ संस्कार कडिवोधिनी परिभापा माह-तत्रादौनातस्यैव कमांधिकार । स्यचयत्नत । मगलस्नान परशुराम रद्रपद्धत-तत खगृहमागत्य मङ्गलनानमा मार्कण्डेयपुराणे-प्रामुसाददमुखोवापिश्मनु कर्मचकारयेत् । व्रतवन्धे विवाहेच सस्कार्य मागल्ये मङ्गलस्नान कुर्वीत ब्राह्मण सह । ( यजमानस्य नतु ब्राह्मणस्य ) नियसियों दिष्यते ॥ वशिष्टसहितायाम्-कादौमन्न सयुक्त मङ्गलस्नानमाचरेत । दिव्याभरण वासो भिरलकृत्यतत शुचि । विवाहादि दिनेपाप्ते तत्काभार्ययासह । कुलदेवादिसम्प्रीत्यै ब्राह्मणाच सुवासिनी स्लापयित्वासकन्येन स्नातव्य ससुतेनच । परिधायाऽहत वस्त्र द्विपटोश्च स्त्र्यापिद्वयम् । निष्फलमवेत । गौतम --एकवस्त्रोनभुनीतश्रौतेस्मातेच कर्मणी । नकुयादवकार्याणि दान होमजप तथा । विधान पारिजातवे-एक वस्त्रातुयारी मुक्तपेशा व्यवस्थिता । नसाधिकार णीज्ञेया श्रौतेस्मातच मणि । प्रयोगपारिजातके-सस्कार्य' पुरषोवापि स्त्रीवादक्षिरात सदा । सस्कारकर्ता सवत्र तिछे दुत्तरत सदा । पत्न्युपवेशने विचार धर्मध्वृत- जातके नामवेचैव ह्यन्नप्राशन कमणि । तथानिष्कमणेचैव पत्नीपुनच दक्षिणे । गर्भाधाने पुसवने सीमन्तो नयनेतथा । वधूप्रवेशनेचव पुन सन्धान एवच । प्रदानेमधुपर्कस्य बन्या- दाने तथैवच । कर्मस्वेतेघुवैभाया दक्षिणे तूपवेशयेत् ॥ स्मतिसग्रहे-~-प्रतवधे विवाह चनुांसहभोजने । व्रतेदानेमखे श्राद्ध-पत्नी तिष्ठति दक्षिणे । धर्मप्रवृत्ती-पारावर ऽभिपेवेच पादप्रक्षालने तथा । शयने भोजनेचव पत्नीतूत्तरतोभवेत् । पदितिला विचार: मदनपारिजातके-मगल तिलक कुर्यात्सि दूरादेविचक्षण । रसाम (कपर कस्तूरीभ्या) शान्तिकर प्रोक्त रक्त वश्यकरस्तथा ॥ श्रीकर पीतमित्याहु खेत मौर प्रदायकम् ॥ इतिकामानामेदेनकुर्यात् ॥ मांगत्ये वयतिलकमाह श्राचार रत्ने-म सूतफेचैव विवाहे पुत्रजन्मनि । मांगल्येपुच सर्वपुनधाय गोपिचन्दनम् । सर्वकर्मादी देव (१०) कर्मकाण्ड रताकरे, कर्मयोधिनी परिभाषा पुष्पाण्यपिचपत्रिका । येतकीपुष्पमेयन्तु पिनातान्यसिलान्यपि । शस्तान्येवसुरश्रेष्ट शहर राधनेपिहि । धत्तूरपेणयोलिंग सकृत्पूजयतेनर । सगोलक्षफलप्राप्य शिवलापे महीयते । विल्वपत्रसहस्रेभ्यो द्रोणपुपं विशिष्यते । सांसोंपुप्पजातीनां प्रवरनीलमुत्तमम् । ( नीलकमल कैलासर्ज) स्कन्दपुराणे-चतुराणापुष्पजातीनां गन्धमाघ्रातिशक्कर । अर्कस्य करवीरय विल्वस्यचयकस्यच । लिङ्गपूरन्तय कुयान्ममदेवि दृढत । शतवर्ष सहस्राणि दिव्यान दिविमोदते । वृहन्नारदीये-तुलसौदलमालाभि फुयात्पूजाशिवस्यय । गांकाटिप्रदानेन यरफलतल्लमेन्नर । ॐ नम शिवायतिमन्प्रेणा यौनर पूजयेच्छिवम् ॥ अखण्ड विल प्रधानत्वानसग्रहीत ॥ इति पूगि कर्मबोधिनी परिभाषा ॥ पाखण्डस्पर्शवजित ॥ जितेन्द्रिय सत्यवादी सर्वकर्मसुशस्यते ॥ - तत्रादौतौर विचार ।
कर्मकाराष्ट्र रताकरे, फर्मयोधिनी परिभाषा 'पूजन विचारः, रुद्रकल्पद्रुमे गणेशः सर्वदेवाना मादीपूयः सदैवहि । समरपि महा- विघ्न नाशकोन्य) नविद्यते ।। विशेपस्तत्रतत्र फर्मपरिभाषासुप्रन्यः ॥ अथचद्विजानी वेदाध्यनमाह याज्ञवल्ययः-यज्ञानां तपसचिव शुभानचिय कर्मणा । पैदएव द्विजातीना निःश्रेयसकरं परम् ॥ व्यास:--ध्रुतिस्मृतिश्च विप्राणां नयन द्वे विनिर्मित , एकेन निकलः काणों द्वाभ्यामॅधः प्रकीर्तितः ॥ अतिः-वेदा: प्रमाणं स्मृतयः प्रमाणं, धर्मियुर वचनं प्रमाणं । श्रतः प्रययनभवेत्प्रमाणं तद्वाश्ययुक्तं कुरुतत्प्रमाणम् । वेदज्ञापिसाह्मणं पिल छन्दादोनिस्मरेत् ॥ मदनरत्ने याशवरक्या-~-प्रापंछन्दवदेवत्यं विनियोगस्तथैवच वेदितव्यं प्रयत्नन, ब्राह्मणेन विशेपतः ॥ अविदित्यानुयःकुर्यात्त यजनाध्ययनंजपम् । होममन्तजेलादीनि तस्यचाल्प फलं भवेत् ॥ ऋप्यादीना मुच्चारणे फलम्-यश्वजानाति तत्वेनमार्य चन्दच दैवतं । विनियोग ब्राहाणंच मन्त्रार्थ ज्ञानमेवच । एकैकस्य ऋपे: सोपिवन्योह्य तिथिषद भवेत् । देयतायाथ सायुज्यं गच्छत्यननशंसयः । पूर्योक्तिनप्रकारेण ऋष्यादोन्वेत्तियोद्विज । अधिकारी भवेत्तस्य रहस्यादिषु कर्मसु ॥ श्रापछन्दांदैवत निवचनम्-~येनयपिणादृष्टं सिद्धिः प्राप्ताचयेनवै । मन्त्रेण तस्यतत्प्रोक्तमृर्भावस्तदार्पकम् । छन्दोलक्षणम्-~~-बादना- च्छन्द उद्दिष्टं वाससी इवचाकृतेः । आत्मासंघादितो देवेभृत्योभतिस्तुवैपुरा ॥ आदित्यैर्वसुभी रुद्रेस्तेनधन्दासितानि ।। देवता लक्षणं मन्त्रस्य यस्ययस्यतुमन्त्रस्य उद्दिष्टा देवतातुया तदाकारं भवेत्तस्य देवत्वं देवतांच्यते । मन्त्रस्य विनियोग लक्षणम्-पुराकल्पे समुत्पना मन्त्रा: कथि मेवच । अननचेदं कर्तव्यं विनियोग. सउच्यते । तैरुक्तं यचमन्त्रस्य विनि- योगः प्रयोजनम् । ब्राह्मणम्-प्रतिष्टानंस्तुतिश्चैव ब्राह्मणं तदिहोच्यते । एवं पञ्चविधंयोगं जपकालेह्यनुस्मरेत् । होमेचान्तर्जलेयोग खाध्याय योजनेतथा । एवं सर्वानुक्रम सूरी कात्यायन --ऋषिदेवतच्छन्दांस्य नुक्रमिघ्याम ।। इतिप्रकृत्याह-एतान्यविदित्वा योधोतेनबूते जपति जुहोति यजते याजसेवा तस्य ब्रह्म निर्वाय यातयाममवत्यथान्तराश्व गर्तवाऽऽपयते वृच्छति प्रमीयतेचा पापीयान्भवत्यथ विज्ञायैतानि, योधीते-तस्य वीर्यवत्तरम्भवति । जपति- हुत्वेष्ट्या तत्फलेन युज्यते । अन्यत्रापि यत्रैकस्याक्रियायान्यनेक मन्त्राणां विनियोगस्तत्रा- प्येवमेव, यथा स्दजपाभिषेकादी,, एवं पञ्चविधयोगमिति ब्राह्माणान्तर्भावेन पंचविधत्वं प्रकारान्तरमधिक फलार्थवा ॥ श्राचारादर्श वाचस्पतिः-इदंचऋप्यादिस्मरणं यन्त्रमन्थे प्रामाणिकं तत. प्राकप्रयोगएव कर्तव्यम् । श्रादिविकल्पम्---इदंचयादि ज्ञानं वैकल्पि- कम् । एतान्य विदित्वेत्युपकम्य तस्य ब्रह्मनिवार्ययातयाम भवतीत्युक्तत्वात् । अमविज्ञायै- तानियोधीत तस्य वीर्यवदित्युक्तेः सर्वमैतच्छन्दो देवताच विज्ञाय यत्किचिजाहोमादिकरोति सतस्यफलमश्नुते । इति वैद्यनाथ:, कृष्णभट्टीयतु चस्मरे दृषिश्छन्दः श्रादेवैतानिके- मखे। अमिहोने वैश्वदेवे विवाहादि विधौतथा । अथच प्रसङ्गचसाद्वैदिक मन्त्राणां मुच्चारणार्थ संक्षेपेण प्रतिक्षासूत्रादिक शिक्षाच व्यारयायते-प्रथमतिकार अथश्रौतस्मात सूत्रकथनानंतरं प्रातिशास्यसूत्रकपना- नन्तरंच, प्रतिशाध्यपहारजन्यज्ञानविषयोर्थः, विधास्यते । स्वरसंस्कारयोश्छन्दसिनियमाता- नार्थलक्षणमाह ।। (मंत्रचाहण्योद नामधेयम् )२ मन्त्रश्चइपेत्वादिः,ब्राह्मणंचनतमध्य- (१२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, कर्मयोधिनी परिभाषा मित्यादि । तयोर्वेदसं त्यर्थः। (तस्मिंछुपलेयाजुपाम्नायेमाध्यंदिनीयके मन्त्रेस्वर- 'प्रक्रिया)३ तस्मिनेतावन्मानोको अन्यशाखायामतिप्रसङ्ग स्यादताह-शुवलेइत्यादिकृष्णय जुषोव्यावृत्त्यर्थशुक्लग्रहणम् । यजु वेदोक्ताना मृचामपिवक्ष्यमाण स्वरसंस्कारसिघ्यर्थ माम्नाय- पदोपादानम् । अन्यथा यजुर्लक्षणाक्रान्ता नामनियत परिमाणानामेव । इपेत्यादिमन्त्राणां महर्णस्यात् । नतुपादसंव्वद्वानामग्निमूद्वैत्यादिनाम् ॥ फरवशाखाव्याधृत्यर्थमाह-शुक्लेमान्य- दिनीयके इति ॥ करवशाखा हिनमाध्यंदिनप्रोक्तति नतत्रातिप्रसङ्गः । ब्राह्मणेतू दातानुदाती भाषिकखारौ । इत्यनेन ब्राह्मणे विशेषरूपेणखरस्यवक्ष्यमाणत्वात् माध्यंदिनीयवमन्त्रेइति ॥ खरप्रकृया खराणामुदात्तादीनां प्रकृयाप्रयोग: कथ्यतेइतिशेष. । उच्चैल्दात्तः–इत्यादिभिरा- रम्भ. ॥ याज्ञवल्क्य.-समुच्चारयेद्वर्णान्हस्तेनचमखेनच । खरश्चैवतुहस्तश्च द्वावेतौयुगपर- स्थितौ ॥ हस्तभनष्ट.खरोन्नष्टो नवेद फलमश्नुते ॥ यथावाणी तथापाणी रिकंतु परिवर्जयेत् । यत्रयन स्थितावाणी पाणीस्तवतिष्ठति । उत्तानेसोग्नत किचित्सुव्यक्तांगुलिरजितम् ॥ खर- विद्धं करंकुत्प्रिादेशोद्देशगामिनम् ॥ खरिते त्र्यं गुलंबिंद्यान्निपान्तुषडंगुलं । उत्थानेतु नवांगुल्य मेतत्वारस्यलक्षणम् । ( हृद्य नुदात्तः ) ४ सामीप्येसप्तमी हृदयसमीपेहस्तेनानुदाप्तः प्रदर्शनीयः । अनुदात्तोच्चारणवेलायां हृदयसमीपे हस्तस्थापनं कर्त्तव्यम् इतियावत् ॥ यद्यपि प्रातिशास्ये हस्तेनते, इति सामान्येनोचम् तथापिदक्षिण एवहरतोप्रायः ॥ कात्यायन:-- यत्रीपदिश्यतेतिपूर्वोक्तः ॥ ( मयुक्त.) ५ मूर्णिमखप्रदेशेउदात्तः प्रदर्शनीय' । मस- स्यापिमस्तका वयवत्वप्रसिद्धे., निकृष्टार्थ पूर्ववत् । ( श्रुतिमलेरवन्तिः) ६ दक्षिण पर्ण मूले खरितः प्रदर्शनीयइत्यर्थ.। क्रमेणैपामुदाहरणानि वायवस्थेत्यभपूर्ववकारोत्तराऽऽकारो ऽनुदात्तः यकारोत्तराकारउदात्त.। उत्तरकारोत्तराकार स्वरितः। एवंजात्यादयोऽभिहिता)७ यथाप्रचयस्यस्वरितभेदस्य प्रातिशारयेऽभिधानम् । एवं जात्यादयोपिस्वरितभेदास्तत्रैवाभिहिताः (माह्मणेतूदात्तानुदात्तौ भाषिकस्वारी) = ग्रामणेपूर्वोक्त व्रतमुपैष्यनित्यादिभागेनु- उदात्तानुदात्तौभाषिक लक्षणलक्षितौ स्वरावेवस्वारी, खायण । तेनस्वरितस्यव्यावृतिः। हदिमूनिचभवते, इति अनुसत्यालभ्यते । (तानिस्वराणि छन्दोवत्सूत्राणि) ६ सूत्राणि, कल्पा:, अथातोऽधिकार इत्यादयः श्रृंगग्राहिकन्यायेन अन्यान्यपि शिक्षादीनि दाहानि छन्दोवच्छन्दसातुल्यानि भवन्तिखर संस्कारनियमेइति शेष.-उदात्तादिस्वर पाधनाथतानस्वरा- गीति । तान एकश्रुतिः स्वरोयेपांतानितधाच तमनोदात्तादिप्रवृत्तिरितिभावः ॥ इति प्रथमा कटिका ॥ (अथान्तस्थानामाद्यस्य, पदादिस्थस्यान्यहलसंयुक्तस्य, संयुतस्याः पिरेफोप्मान्त्याभ्यामृफारेणचा विशेषेणादिमध्यावसानेपूच्चारर जकारोधारणम् ) १ अथ स्वरनिरूपणानन्तरसंस्कार प्रकृयाउच्यते। इतिशेषः। अन्तस्थानो, य, र, स, भ, पांनो आधस्य यफारस्य पदादी विद्यमानस्य जकारोच्चारणम् इन्युत्तरेणान्वयः पातम्य इति शेपः । यथा -युजानः प्रथमम् । इत्यादी पदादिस्थस्येत्युभ्या, धिय. इत्यादी नातिसरः॥ तस्मायज्ञादित्यादापतिप्रसा यारणायाह । अन्येइति-अन्येनहसामसंयुजस संयोगमात- स्पत्यर्थः ॥ पृताचार्यन्नुहयरेन्यादौपदारथाभाया पारोचारणं मरयादरापतापुनर्विशिनष्ट हलमंत्तस्यापीति । रेफोरफारः जमणामन्योहपारः, साभ्या युपरयाप यशरस्य सरो- कर्मकाण्ड रखाकरे, कर्मबोधिनी परिभाषा (१३) - चारणम्भवति ॥ तथाच पूर्वोदाहरणेपितसिद्धिः । अत्रापि विशेषणादिमध्यावसानेषु इति सम्बध्यते । तेन-घृताचौर्यन्तुहर्यत । सूर्यचडा, इत्यादिधुसर्वत्रजकारोच्चारणंभवति । कृणुय- ध्वरम् । गेवायच, महांधेदाभूया । इत्यादीनिहकारयोगो दाहरणानि शेयानि , अन्य हलसंयुक स्यतिकाकादिगोलकन्यायेन । अवापिसम्वभ्यते, तेन-~~-अग्नियोतिरित्यादौनातिप्रसाः । ऋकारेणसंयुकत्यापि जकारोच्चारण भविशेषेण । अत्रभन्यहलसंयुक्तस्येति, नसम्बध्यते । रफोमात्याभ्यां पृथपाठसामात् । तेन-सदोऽस्यतस्येत्यत्र राकारयोगेपि जकारोच्चारणं सिध्यते । (द्विविप्येवम् )२ धाय्याइत्यादौजकारोच्चारणसिद्धये इदम् । अथापरांतस्थ. स्यायुक्तान्यहलः संयुक्तस्योम ऋकार रेफारसहिती च्चारणम् ।) ३ अथ-~ प्राधान्तस्थादेशकथनान्तरं अपरान्तस्थस्यरेफस्य प्रयुक्तः, योगमप्राप्तः, अन्यहलयस्मिन्ताह- शत्यऊप्मभिः सकारेण वायुक्तस्य, एकारसहितोच्चारणं कर्त्तव्यमितिशेषः पूर्ववत, यथादर्शत मित्यत्र, दरेशत मितिपाठः, नतुरेफमानघटित., एवं, वर्षा, वायसि, बहिरमि ॥ इत्यादावपि चोध्यम् । वायच, यज्ञपतिापत् । इत्यादावन्यहलः यकारस्य मकारस्य वासंयोगान एकार सहितोचारणम् । (एवं तृतीयान्तस्थस्यस्यचित्)४। तृतीयान्तस्थस्य लकारस्थापि क्वचिलक्ष्यानुरोधेन एकारसहितोच्चारणम् । यथा--रातल्शा विरोहतात् ॥ इत्यादौ शतवले. शा इतिपाठः (ऋकारस्यतु संयुक्ता संयुक्तरया विशेपेण सर्घषेवम् ) ५) एकारससितो चारणा देश प्रसंगादिदम् । संयुक्ता संयुक्तस्य अविशेपेण सर्वत्र मादिमध्यावसाने एकार सहितोधारणम् । ऋतापाड्, सृजप्रशस्त, कृणुहि, सामान्य॒ग्भिरित्या दीन्युदाहरणानिवोध्यानि (अथान्त्य स्यान्तस्थानां पदादि मध्यान्तस्थस्य त्रिविधम् गुरुमप्यमं लघु वृत्तिभिरुचारणम् ) ६। अथ तृतीयान्तस्थादेश कथनानन्तरं, अंतस्थानामन्त्यस्य चकारस्यत्रिविधं, विप्रकार गुरुमध्यम लघुवृत्तिभिरुचारणं कर्तव्य मित्युच्यते । एतच्चपदादिक मेणशेयम् । तदुक्तमन्यत्र- धकारस्त्रिविधोयो गुरुलधुर्लघुतरः । श्रादिगुरुः, मध्येलघुः, पदान्तेचलघुतरः ॥ इति, यथा व्यायषस्य, सविता, देवोवः । इत्यादि ॥ (अथो-मईन्योप्मणोऽ संयुक्तस्य च खफा: रोचारणम् ) ७॥ अथो-अन्तस्थादेश कयनान्तरं मूर्धन्योमणः, पकारस्य असंयुक्तत्पर्यु, टवर्ग योग बिना संयुक्तस्यच खकारोचारण कर्तव्यमित्युपदिष्यते, यथा-सहनशीपो,, सहल शोसा, पुरुषः, विभयस्तचे, शप्प्यायचेत्यादौ खकारीचारणं कत्तव्यम् । टवर्गयोगेतु-प्रत्युष्ट, कृष्णोसि, श्रेष्टतमायेसादौतुखकारोचारणं नभवति । ( अध्ययनादि फर्मस्वथदेलायां प्रक्रिया) ॥ एतैपूर्वोक्ता: स्वराः संस्काराच अध्ययनादि कर्मस्वेवेति नियम्यते । अध्ययना- दीति आदिना यजनयाजनाध्यापनादि परिग्रहः । मन्त्रार्थ वेलायान्तु प्रकृत्या रूपेणेबोचारणम् ॥ इति द्वितीयकण्डिका २॥ (मथानुस्वारस्य र्ट० इत्यादेशः श, ष, स, ह, रेफेषु तस्यधिध्यमाख्यातं हस्व दीर्घ गुरुमेदैः ॥ दीर्घत्परो हस्वो हस्वात्परो दीर्घा गुरौपरेगुरुः परसवर्णेषत्प्रकृत्याचान्यत्र ) १॥ अथ अमावेशोपदेशानन्तरं श, ष, स, ह, रेफे परेषु वर्णधुपरेषु, अनुखारस्यस्थाने ० इस्यादेशः । तस्य ?. कारस्य अयिभ्यं हस दीर्घ गुरुभेदैः । हस्वादेकमातृकात्परोदीघः । दीर्घाद्विद्वमातृकापरी हस्व: । गुरी संयुक्ताक्षरेपरेगुरुवाध्यः । यद्यपि दीघोपि गुरुर्भवति तथापि संयोगपरे - (१४) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, कर्मयोधिनी परिभाषा हखस्यापि गुरुसंहाविधानात् 1 हखात्परस्यापि संयोगेपरे गुस्त्व विधानात्ततोविशेषः। यथा-त्रि ट० शदामेत्यादौ हवात्परोदीघ: । पृथिव्या शतेनपाशै रित्यादौ दीर्घारपरी हस्व । कल्पन्ता श्रोत्रम् । सौमान ट• स्वरणम् । इत्यादौ संयोगेपरे हस्वाद्दोघांचपरो गुरु । अन्यत्रशषसहरेफपरत्वाभावे, परा अनुस्वारात्परा तत्सवाया ईपरप्रकृतिः, तया उच्चारणम् । अर्थात्परत्र विद्यमान वर्ण वर्गीय पश्चमवर्ण सदृशमुचारणम् कर्त्तव्यमिति फलति (विसर्गेधीपद्विरामः)। विसर्गेषु नः, इत्यादिषु ईपद्विरामः, किंचिद्विरभ्यते,, विसर्गस्य स्पष्टोच्चारणार्थ ॥ (पदाद्यस्या संयुताकारस्यपदीर्घताच भवतीपदीर्घताच भवति) ३ । पदादौ विद्यमानस्या संयुक्तस्य व्यानरहितस्य अकारस्येपदीर्घताच भवति । अश्मन्नूर्ज- मित्या शकारात्पूर्वः, अकारः । इषद्दीघानभवति संयुक्तत्वात् । पदादौ विद्यमानस्येत्यु- क्यागोपतावित्यादौ, पकारोत्तकारस्य न दीर्घता। अकारस्येत्युक्त्याच विधाडित्यादा विकार- स्य नदीर्घता । किन्तुव्वसोः पवित्रमित्यादौ वकाराकारस्य पकारा कारस्यच दोषता। तथाच तयोः ईपदीघोचारणं यथा भवति तथापठनीयम् ॥ एवमन्यनापियाध्यम् । अन्तेद्विरभ्यास. परिसमाप्त्यर्थः । इति तृतीयाकण्डिका पर्यन्ता प्रतिज्ञासूबव्याख्या समाप्ता ॥ कर्माग देवता नामानि छन्दीगं परिशिष्ठे--तेन विवाहाङ्ग भूत स्वस्तिवाचनादि पश्चाङ्ग देवता पूजनान्ते, यथाविवाहस्थाग्निदेवता भवति,, तत्रादौ पञ्चाङ्क पूजाने-30 विवाह काग देवतामि. प्रीयताम्-१ इत्युचारणं भवति,, एवं सर्वत्रवक्ष्यमाण कर्माण देवोच्चारणं कमान्ते कुर्यात् ॥ श्रीपासने--अग्नि सूर्य प्रजापतय । स्थालीपाके-अग्निः। गर्भाधाने-~~ ब्रह्मा । सबने प्रजापतिः । सीमन्त-धाता । जातकर्मणि-~-मृत्यु: । नामकर्म निष्क्रमणान्न प्राशनेषु-सविता । वास्तुहोमे–वास्तोप्पति रम्ते प्रजापतिः । चूड़ायाम्- पेशिनः । उपनयने-इन्द्रः श्रद्धामेधा । केशान्ते-सुश्रवा । पुनरुपनयने-अग्नि. । संमावत्तंने-इन्द्रः । उपाकमणि व्रतेषुच-सविता। तडागादि प्रतिष्टासु-वरुणः । पहहोमे-नग्रहाः । कुष्मांडहोम चान्द्रायण अन्याधानेपु- अग्न्यादय सर्वं । अन्यपिटिफर्मसु-प्रजापतिः । पंचगव्यलक्षणम्:-गोमूत्रं गोमयं क्षौर दधिसपि. कुशोदकम् ॥ पञ्चगव्यमिदं सानं कथितं पापनाशनम् ॥ विगव्यम्--दधिक्षीरं घृतंचैव निगव्यं परिकीर्तितम् ॥ त्रिरस लक्षणम्- घृत तैलं तथा क्षोई निरसं परिकीर्तितम् । पंचरस लक्षणम्-घृतं तैलं तथा सौदं दधिःक्षीरं चपंचमम् ॥ सप्तधान्य वलिलक्षणम्- मुद्गमाप मसूराश्च गोधूमवणकानिच ) मष्टक. पालय सप्तसस्योवरिस्मृतः । मष्टको बनमुद्गः कपालः अलायुः। पंचमासवलि लक्षणम्-फुल्मान्दिरिकासूपवटकैः सांडवा- नितः। पक्षमापोवलि: प्रोत: सदामासभुजा प्रियः। पचगव्य बलि लक्षणम्-कोलाठ दधिकाग्यश्च क्षारतकैमनोरम. । पचगव्यो मलिः प्रोक्तः सततंपेशवः प्रियः । कीलाट लक्षणम्-बहुतकोऽल्प दुग्धीयः पापेन पनतोगतः ॥ कोलाटो सतुपातन पुंस्वनिद्रा बलप्रदः ॥ पंचगोड वलि लक्षणम्-मोदकरच तथा पूर्वः पायसेन तयश्च गुडीदमैन म तथा पाचन गुरेनय ॥ पशगौड पतिः प्रोक्त परः सौभाग्यवर्धनः ॥ प्रिपत्र लक्षणम्-- निस्वंय तुलसीपनं जातीपत्रं तयच । त्रिसुगन्ध लक्षणम्-कर्पूरगुगुलं चंय प्रियंगु च .. A জামায নাক, মঘলা মােথা (१५) विगंधकम् ।। पंचसुगन्ध लक्षणम्- चन्दनंच प्रियगुंच तथा कपूरकान्पितम् । कुंकुम मृग- दर्पच पञ्चगन्धं प्रकीतितम् ॥ इतिकर्मयोधिनी परिभाषा ॥ विशेषस्तत्र पदति परि- भाषा सूत्र व्याख्यासुंच दृष्टव्यः ।। अध गणेशपूजा परिभाषा 1-उप- , स्कन्दपुराणे-ऋपयऊचुः-~-निविनिमतुकार्याणि कमिध्यन्तिसूतज । कविता नमस्कृत्य कार्य मिद्धिर्भवेन्नृणाम् । पूजयित्वा महाभाग गणेशं सिद्धिदायकम् । सिध्यन्ति सर्वकार्याणि मनसाचिन्तितान्यपि । विवाहादी क्रियमाणे पूजनीयोगणाधिपः॥ लिंगपुराणे--सर्वकामसमृध्यर्थ मादीपूज्योविनायकः ॥ रुद्रकल्पे---गणेशः सर्वदेवाना मादी- पूज्य सदैवहि । "रकान्दे"-चन्दनेनलिखेत्पदाकणिका केशरान्वितम् । श्रासनायर्यपायंच दत्या- पश्चात्प्रयत्नतः । रुद्रपद्धती-गणेशपूजयेदादौ निर्विघ्नार्थस्वकर्मणः । पटटेवामृण्मयेपीठे रक- वस्त्रेऽरुणाक्षतैः । कार्यमष्टदलंपनं तस्योपरिगणेश्वरम् ॥ पञ्चोपचार पूजनमात्स्ये- चारैः ससिन्दूरश्चन्दनरक्तचन्दन , पुप्पै पैस्तथादीपै राच्छादनसुशोभनैः । मृतिप्रमाणरकांदे- साशवत्यागनाथस्यस्वर्णरौप्यमयाकृति । अथवामृण्मयोकायांवित्तशाट्यनकायेत् ॥ पोडशो- पचारम्---पूर्वमावाह प्रोक्तमासनंतदनंतरम् । ततश्चपाद्यमध्येचततस्त्वाचमनीयकम् । स्नान- वस्त्रचोपवीतं तत्तोगन्धादिचन्दनम् ॥ पुष्पधूपश्चदीपञ्च नैवैद्य तदनन्तरम् । ततीवेयाप्रणामध्ध ततो देयाप्रदक्षिणा ॥ विसर्जनंततीदद्यादुपचारास्तुषोडश ॥ अत्र गणेशपूजनादिविषये, कतिचित्प्रमाण गादिमिः, निर्णयग्रन्थे पुलिखितम् । श्रादौ नवग्रहानय॑ततः कर्मसमारभेत । पादौप्रधानसझल्प- स्तत: पुण्याहवाचनम् । मातृपूजाततः कार्यादिश्राद्ध्ततः स्मृतमिति . परश्च । उत्तंचपदम- पुराग-नाचिंतोहिंगणाध्यक्षो यज्ञादीयत्सुरोत्तम । तस्माद्विप्नंसमुत्पन्न माकस्मिक मिदन्तक । पारस्करगृह्यसूत्रेगदाधरभाप्ये पि, पुण्याहवाचनप्रयोगे कृत्ताचमनःप्रीडमुखोयजमान.पीठेउपविष्य पत्नींच रवदक्षिणात प्रामुखीमुपवेश्य संस्कार्यचतवोपवेश्य, 1 सुमुखश्चैकदन्तश्च० इत्यादि सर्वेष्वारम्भकार्येषु इत्यन्तं, गणेशपूजाविधानमा दौकृत्वा कलशस्थापनान्ते पुण्याहवाचनप्रयोगो. दर्शितः । श्रत.सर्वेषामपिपक्षाणां स्वगृह्योक्तविधीयते । तथापि स्मेतिसंग्रह-नगृह्येषु स्मृति- यंपा श्राद्धादाघुपलभ्यते कर्त्तमर्हन्तिते सर्वे,पारस्करमुनीरितमितिदिक् ।। इत्यादिनिर्णयेनादीगणेश स्यैवपूजनं भवतीति शास्त्रसम्मतिः ॥ इति गणेशपूजा परिभाषा पाथ कलशस्थापन पुण्याहवाचन परिभाषा-अथनित्यनैमित्तिककाम्यैषु त्रिविधेषु- कर्मसु । तत्पूर्वागतया भ्युदमिक नान्दी श्राद्धस्यावश्याविरुद्ध कर्तव्यताविहितत्वेन सतोऽपिपूर्व मातृकापूजनस्य कर्तव्यत्यात तदुपरि यसुधाराणामपिविधानात् । मातृकापूजनाप्राक्पुण्याह- पाचनस्यनिरिंगततया उत्तच श्रादीप्रधानसङ्कल्पस्ततः पुण्याहवाचनम् ॥ मातृपूजाततः कार्यावृद्धिश्राद्धतत परम् ॥ इति वाचस्पति मिश्रीरलेखात--मातृपूजनात्प्रागेवपुण्याह- नाचनप्रतीयते । यथाच-पारस्करसूत्रे गदाधरभाष्ये सौनक:-पुण्याहयाचनविधियदामो भरथाविधि ॥ प्रयोवतुः कर्मणामादायन्तेयोदयसिद्धये । तच्चकर्मप्रयोगान्तर्गत मिविकषित ।। A कर्मकाण्ड रताकरे, मातृकापूजन परिभाषा - - आद्यपक्षकर्मप्रयोगसझल्पकृत्वाकार्यम् il द्वितीयेतुतत्कृत्वाकर्मसकल्प' । हेमाद्रौदानखण्डेव च- गृहपरिशिष्ठत्पेनोक्त.-सक्लसाधारणशिष्ठाचारप्राप्तश्च पुण्याहवाचनप्रयोग'। इतिप्रमाणैरादी पुण्याहवाचनं प्रतीयते ।। तस्यच-पारस्करसूने गदाधरभाष्य कर्मप्रयोगे, अवनिकृतजानुमंडल कमलमुकुलसदृशमालिशिरस्याधाय, दक्षिणेनपाणिनासुवर्णपूर्णकलशं, धारयित्वामाशिप. प्रार्थ- येत् इतिसकलश विधानेनतत्पूर्वक्लशस्थापन पूजनस्यविधानत्वासस्मादादौ शान्धिपाठस्यस्ति- पाचन, गणेशपूजनंचलभ्यते । तच्चादौनितिं तत्रैवद्रष्टव्यम् । तथाचार्यक्रमः-गणेशपूजनान्ते पुण्याहयाचनात्वेनकलशस्थापनमेवलभ्यते-चवाऽयंपारंपर्य शिष्टाचारोपि, अत्रप्रसिद्ध अस. आदी कलशपूजनं कृत्वा तत.पुण्याहयाचयेत् ॥ इति कलशस्थापनपुण्याहवाचन- परिभाषा-नीराजनम्-ततोऽभिषेकान्ते, यजमानस्य नीराजनं फुयादिति गदाधर ॥ इति नीराजनविधिः ||- अधच-- अथ मातृकापूजन परिभाषा वैदिवेघुर्मसुमातृयागस्यावश्यकीयत्वेन, विहितत्वादकरणेप्रत्यवायश्रवणाच्च । नान्दीश्राद्धापूर्व मातृकापूजनलभ्यते, तच्चकदाकार्यमिति विचार्यते-उक्तञ्च विप्णुपुराणे- अकृत्वाातृयागेन्तु पदिकंय समाचरेत् । तस्यक्रोधसमायुक्ता हिंसामिच्छन्तिमातर ।। गणेश- नाधिकायेता धौपुज्यास्तुषोडश। इति वचनैर्गणेशपूजनान्तमातृकापूजालभ्यते । परश्चयाचस्पति मिश्रादय पुण्याहवाचनान्ते घोडशमातृकापूजनवदन्ति ।। तच्चादीप्रधान सङ्कल्पस्वत पुण्याह- वाचनम् । मातृपूजातत कार्यावृद्धिथाद्धतत स्मृतम् ॥ परिशिष्ठे-यत्रयत्रभवेच्छ्राद्धतत्रतत्र चमातर इतिप्रमाणे पुण्याहवाचनानन्तरं मातृपूजनंनिश्चितमेव । इयमेवचपरम्परापूजनानुक्रम- रणस्य सर्वत्र विधिपुलभ्यते ॥ इहगढ़वालदेशैचप्रसिद्ध ॥ एषएवक्रम पारस्करीय गृह्य गदाधरीय भाष्येणाप्यनुदर्शित । सच-तत्राद्यश्वोषाकरिष्यमाणकर्माणतया श्रादौपुण्याहवाचनानन्तरं कर्म• निमित्तकनान्दोश्राद्धस्यचिहित्वात् यद्यपिकूमाचलीयपद्धतिषु दानखण्डमदनरसग्रहयज्ञमहारुद्र, पंखतिपदानुसरणेनकुमारिलभट्टोक्तः-पादावन्तेप्रयोक्तव्यम् । इतिवचनेनचनान्दीश्राद्धानन्तर पुण्याहवाचनम् निर्णीतं । तथापिपूर्वोक्तप्रकारेणपुण्याहवाचनस्य मातृपूजनात्प्रागेवप्रयोगसिद्धौ मातृपूजनानन्तरविधीयमान नान्दीधाद्धन्तुसुतरामेवप्रारसिद्धत्वात्पुण्याहवाचनान्ते मातृकापूजा विधिवक्ष्ये ॥ तत्रादौ मातृका यंत्रोद्धार:-विष्णुपुराणे--पञ्गोवा पञ्चतीर्यक्चरेखा कार्या प्रयत्लत । कुलदेवीगणेशच गौरीपातथैवच । पूजयेन्मध्यमेकोप्टे शेषावाहिकोष्टषे ॥ मध्यकोष्टेचतुष्केतु स्थापयेञ्चपृथक्पृथक् । गणशवायुकोणचशिवकोरणफुलेश्वरीम् ।। गौरीचनाते पूज्यापनापावककोणवे । शशीचपश्चिमेस्थाप्यामंधाचंवद्वितीयके । सावित्रीदक्षिणेपूज्याविजयाच द्वितीयये । जयोत्तरेच सस्थाप्यादेवसेनाद्वितीयके । स्वाहामग्नौसमभ्यच्यपानवेचस्वधातथा ।। पूर्वतुमातर पूज्यास्तदगेलोकमातर । धृति पुष्टिवायुकोणेतुष्टिनैऋत्य तया । एवहिमातर स्थाप्या स्वस्वस्थाने पृथक् पृथक् ॥ षोडशमातृकानामानि छन्दोगपरिविष्टे-गौरीपप्राशचीमेधा सावित्रीविजयाजया।' देवसेनास्वधास्वाहा मातरोलोकमातरः । धृति पुष्टिस्तधातुष्टि', तथा'म- कुलदेसुना...|| गणेशेनाधिकारयेटा वृद्धापूज्यास्तुषोडश. ॥ मन्त्राप्यादीगणपतिपूजनम् - - कमकाण्ड रताकरे, नान्दीभाद्ध परिभाषा (१७) . - आदौ विनायकः पूज्योान्तेच कुलदेवताः अन्न चिन्मतेन. चतुर्दशीपादानात् , मातरो लोक- मातरः इति सांसां विशेषण मुक्तम् । अथ गृहमातरः-कोतिर्लक्ष्मीकृतिमेधा, पुष्टिः श्रद्धा- क्रियामतिः । युद्धिर्लज्जावपुः शान्तिस्तुष्टिः कांतिस्तुमातरः ॥ अत्रलोकमातर:--ब्राह्मी माहेश्वरीचैव कौमारी वैष्णवी तथा । याराहीच तथेन्द्राणी यांमुडा सप्तमातरः । अौव प्रसङ्गवसात् द्वार मातृतमातृर्जीवमातृर्जलमात श्ववक्ष्ये-द्वारमातरः--कुमारीधन- दानन्दा विपुला मालाचला। पद्माचैव समाल्याताः सप्तता द्वारमातरः । श्रथघृतमातरः- श्रीवलक्ष्मीधृतिर्मधा पुष्टिः प्रज्ञा सरसती । मांगल्येषु प्रपूज्यन्तै सप्तताघृतमातरः । अयजीव- मातर:-कल्याणी मालाभद्रा पुण्यापुण्यमुखीतथा । जयाचविजयाचव, सप्तैता जीवमातरः। जलमातर:-मात्सीकूर्मीच वाराहीकुयफुटी दर्दुरोतया ॥ जलूकीचैव सोमाच सप्तैताजल- मातरः । मातृपूजा प्रकार:-प्रतिमासुच शुभ्रासुलिखित्वाचा पटादिषु । अपिवाक्षत पुजेषु नैवैयैश्च पृथक् विधौ ॥मातणामुपरिघृतेनवसोर्धारपातनम्-कुड्यस्तंभमुसलमा मातृणामुपरिस्थिताः । कारयेत्पश्चतिस्रीवासप्तवोदड्मुखस्थिता: अत्रययः प्रथा दृश्यन्ते यभादेशाचार मनुष्टेयम् ॥ ॥ इति मातृकापूजा परिभाषा ॥ अथ नान्दी श्राद्ध परिभाषा अखिलकर्मणा भाभ्युदयिक पूर्वकत्वात्तस्यच विधान प्राचुयात्तन्निर्णयः क्रियते ॥ उक्तंच कात्यायनसूत्रा-श्रभ्भुदयिके प्रदक्षिणमुपचारः । पूर्वाहेपित्र्य मन्त्र वयंजपः । ऋजवीदर्भाः। यवैस्तिलार्थाः । सम्पन्नमिति तृप्ति प्रश्नः । सुसम्पन्नमितरेयुः। दधिवदराक्षत मिश्राः पिण्डाः । नान्दोमुखान्पितनावाहयिष्ये । इतिपृच्छति ।' आवाहयेत्यनुज्ञातो। नान्दी. मुखान्पित्तन्वाचयिष्ये । इतिपृच्छति । वाच्यतामित्यनुज्ञातो, नान्दोमुखाः पितरः, पितामहाः प्रपितामहा: मातामहाः प्रमातामहाः वृद्धप्रमातामहाश्च प्रीयन्ताम् । इति । नखांप्रयुजीत युग्मानाशयेदन । विष्णुपुराणे-कन्यापुत्र विवाहेषु प्रवेशे नववेश्मनः । 'शुभकर्मणि बालानां चूमाक्रमादिके तथा । सीमन्तोनयनेचैव पुत्रादि मुखदर्शने । नान्दोमुखान्पितनादी तर्पयेत्प्रयतोगृही। तक्रममाह आश्वलायन:--माता पितामहीचैव सम्पूज्या प्रपितामही। पित्रादयत्रयश्चैव मातुः पिप्रादयत्रयः । एतेन वैवार्चनीया:--पितरोभ्युदयेद्विजः । वृध्दपा- गशरमतेतु देवानामपि नान्दी विशेषण मुक्तम्-नान्दी मुखेभ्यो देवेभ्यो प्रदक्षिण फुशासनम् ॥ फालमाहशातातपः-मातृभाद्वन्तु पूर्वयुः कर्मानितु पैतृकम् । मातामह चौतरे युद्धौनाद त्रयस्मृतम् ॥ कालालाभे--पूर्वयुरेव पूर्वागहेमातृकं मध्यान्ह पैतृकम् । अपरारहे माता महानाम् । अस्याप्यसंभवे वृद्धमनुराह-अलामे श्राद्धकालाना नान्दो श्राद्ध प्रयंयुधः। पूर्वयुरेन कुर्वीत पूर्वारहे मातृपूर्वकम् । अत्रसंकल्पादौ विशेषः संग्रहे-शुभायप्रथमान्तेन पृद्धी संकल्पमाचरेत् । नषष्टया यदिवाकुन्मिहादोषोभिजायते । नपष्टपा नचतुभ्यांया सम्मुध्याचा कदाचन । अनस्मदृद्धशब्दानामरूपाणाम गोषिणाम् ॥ अनाम्नामतिलायैव नान्दी श्राद्धं च सव्यवत् । हेमाद्रौशातातपः-कर्तव्यं चाभ्युदयिक ३ (१८) फर्मकाण्ड रनाकरे, नान्दीश्राद परिभाषा प्राद्धमभ्युदयाधिना। सध्येनोपवीतेन राजुदर्भय धीमता।.पितृणास्पमात्यायचा अन्नं समरते । तस्मात्सय्येनदातम्यं पृद्विकालतुनित्यदा। कात्यायन:--दविणं पातयेजानु देपा- परिचरनादा। पातयेरितरं जानु पिपरि चरमपि । निपातो नहिसव्यस्य जानुनो विद्यते कचित् । सदापरिचोदक्त्या स्तिनप्यत्र पयत् । श्राश्यलायन:--तिलासीति पदस्थाने ययोमीति पदंचदेर । स्वधेतिच पदस्थाने पुटपा शब्दवदेदिह । पितृनिति पदारपूर्व पदेषान्दी मुसानिति । अप्रखधाशब्दस्थाने पैदिक मन्प्रेपि साहा इति शब्दो पाच्यः, पुराणसमु. च्चये-नकर्म पितृतीयन नक्शाद्विणीकृताः । भृगुः-गोप्रसंपन्ध नमानि पितृकर्मणि कीर्तयेत् - व्यास:--एककस्यतुवित्रस्य अर्घपात्रंविनिक्षिपेत । अप्रसत्यवस्तुसंज्ञकाः पश्यदेयाः, नान्दोधारे सत्यवसूइतिपचनान नान्दीधा पाहणसंरयामाहकात्यायन:--प्रातरामंत्रितापिप्रान् युग्माउभयतस्थितान् । उपपैश्यपुशान्दद्यात माजुनयहिपाणिना। निमित्तानान्दीश्राउंमार्क- स्य पुराणे-निमित्तवमधीपक्ष्य प्रादमभ्युदयात्मकम् । पुनजन्मनित कार्य जातर्मसमनरः गृद्धमनु:--पुत्रजन्मनितुदिनपारात्रीका मुक्तपतोपवासिनावापुनजन्मनानन्तरं नालछेदनादयो- मेवकार्य ॥ कात्यायन:--- -खपितृभ्यःपितादद्यारसुतसंस्कारकर्मसु । पिंडानोद्वहनातेषां तस्या- भाषेतुतत्क्रमान । उद्वाहोऽनपूर्वाभिप्रेतः। द्वितीयेपितरिजीयत्यपि स्वकर्तृफ्त्यम् । तथाच- स्मृति: नान्दीश्राद्धपिताकुर्यादाधे पाणिमहपुनः श्रतऊर्वप्रकुर्वीतखयमेषतुनान्दिकम् । प्रयोग पारिजेतेतु-तमाऽजीवपितृकः पिनादीनुदिश्याधिवाहेपियरः खयमाभ्युदयिक कुर्यात । पापितुरभाये- पितृव्याचार्यमातुलादियः संस्कारंकुर्यात्मतत्कमात्तंपितरमारभ्यसंस्का- यस्ययः पितृणाक्रमस्तेनक्रमेणदद्यादित्यर्थः । पित्रादिवर्गजीवितैविशेष -मातृवर्ग पितृ- वर्ग तथामातामहस्यच ॥ जीयेत्तुर्यादयविस्तवगैतुपरित्यजेत् । विशेषश्छन्दोगपरिशिष्ट- कात्यायन:---वृद्धीतीर्थचसन्यस्ते तातेचपतितेसति । येभ्यएवपितादया तेभ्योदयात्स्वयंसुतः तेनजीवत्पितृक. स्वपितु पित्रादीन्मातामहादीश्चादिश्याभ्युदयिकंध्राद्धकुर्यात् । कल्पतरोहला युधमाप्य-पितापितामहश्चैयतथैवप्रपितामह । प्रयोह्यभ्रमुखा|ते पितर संप्रकीर्तिता, । : तेभ्य.पूर्वतरायेयप्रजायन्तःसुखैपिणः । तेतुनान्दोमुखानान्दो समृद्धिरितिकथ्यते। परकीय- कन्योद्वाहे नान्दीश्रादविचार:-यात्मीकृत्यसुवर्णन परकीयांतुकन्यकाम् | धर्मेणविधिना- दातुः समगोनोपियुज्यते । येनकेनापिप्रकारेणपरकीयांकन्यादातुमिच्छति । सोपिसंस्कार्यकन्याया. पित्रादीन्नुद्दिश्यपूर्ववत्यथासम्भवनान्दोश्राद्धसमाचरेत् ॥ दत्तककन्योद्वाहेविशेषः-गणश. क्रियमाणानामेकंस्यामातृपूजनं । वृश्रिाद्धंचतन्त्रस्याद्धोमस्तुस्त्याध्यक्पृथगतिस्मृत्यर्थसारद चनात् ॥ सुवर्णेननांदीश्राद्धमाहायास-द्रव्याभावेद्विजाभावेप्रवासेपुत्रजन्मनि । हेमश्राद्ध प्रकुतियस्यभारजस्वला | पशिन्मतेतु- हेमभ्राधप्रकुवातवर्जयित्वा क्षयेऽहनि ॥ 'संवत्त:--पुत्रजन्मनिकुर्वीतश्राद्ध हेम्नवयुद्धिमान् । नपश्वेननचामेनक्ल्याणान्यभिकामयन् । त्रिस्थलीमेतीकात्यायन ~-श्रापद्यनग्नीता|च प्रवासेपुत्रजन्मनि । श्रामभाद्धप्रकुर्वीतभार्या रजसिसंक्रमे ।। वाराहपुराणे पागशरस्मृतौच-असमयोंमदानस्य धान्यमामस्वशफितः । प्रदद्यात्तुद्विजातिभ्य.स्यल्पामपिचदक्षिणाम् ॥ अथच ब्राह्मणेनवर्णपरत्वे लब्धमामानादि- द्रव्यस्य विनियोगविचारमाहव्यास.-हिरण्यमामंश्राद्धयं लब्धंयत्क्षत्रियादितः । यये;
कर्मकाण्ड रनाकरे, नवयहपूजा परिभाषा विनियोज्यस्याद् भुंजोयाब्राहाणःस्पयम् । हेमाद्रौपत्रिंशन्मत:--श्रामशहस्ययत्किचि- च्याधिकंप्रतिगृह्यते । तत्सर्वभाजनायालं नित्यनैमित्तिषेनच । नान्दीश्राध्दानन्तरं पिंडदा- नादिनिपे पासतिग्नावल्याम्-विवामींजीवन्धोध्यवधियर्षमेवया पिण्डान्सपिंडानीदद्युः सपिण्डीकरणबिना । विवाहयत चूडासुवर्पमतदर्धकम् । पिण्टदाननकर्तव्यं ज्ञातीनामृद्धि मृच्छता । अत्रसपिण्डोकरणग्रहणं तत्पूर्वभाविनातिनादानामुपलक्षणार्थम् ॥ विटादिकरणे. निन्दामाहव्यासः--वृद्धिमाःकृतेपश्चात्पुनः पिण्डान्ददातियः । गोत्रद्धिविधातास्यानरक प्रतिपद्यते ॥ क्वचित्प्रकारान्तरेण नादीश्राध्दानंतरं पिंडादिविधानमा स्मृतिरत्ना- वल्याम्---पित्रोःक्षयाहेयज्ञेच पितृयज्ञेमहालये ॥ गयायांपिण्डदानस्य नकदाचिग्निराकिया। बृहस्पतिः-महालयेगयाश्राद्धे मातापित्रोक्षयेऽहनि । कृतोद्वाहोपिकुर्वीत पिण्डनियंपणं- सुतः ।। तिलतपण निषेधमाह मरीचि:-विवाहचोपनयने चौलेसतियथाक्रमम् । वर्पमधे तदर्धेचनेत्याहुस्तिलतर्पणम् ॥ स्मृत्यर्थसारे--मृद्धीसत्याश्चतन्मासि मैत्याहुस्तिलतर्पणम् ॥ मरीचिः---कठा करावाश्चजायालायेचवाजसनेयिनः । सतिलंतपणंकयु निपिधेपिदिनप्पपि ॥ : त्रिस्थलीसेतो-तोतिथिविशेपेच गयायां प्रेतपक्षके । निपिधेऽपि दिनकुर्यात्तपतिलमि- श्रितम् ॥ निषिद्धेपुवजितेपुदिनेवपि ।। ॥ इति नान्दी श्राध्दपरिभापा ॥ ॥अथ सामान्य नवग्रह पूजा परिभाषा ।। अभच नवग्रह पूजाप्रमाणं तच्चद्विविधं, यागसहितं तद्रहितंच, सयागन्तु वृहत्कार्यपु- भवति । यागरहितंच नित्यनैमित्तक उत्सवसंस्कार शान्ति पौष्टिकादि कर्मपु, यत्रयत्र गणेश कलश-पुण्याहवाचन मातृकादि पूजा भवति तत्र सामान्य कर्मसु ग्रहयागस्य अशम्य कर्तृक- त्यापश्चाङ्गान्तर्गततया सामान्येनापि, ग्रहपूजा भवति । इति पूर्वसूरिभिः । खशाखीयपद्धतो. लिखितं । असीगणेशादि प्रहपूजान्तप्रयोगविविध कार्येषु भवति । यथायोवियुवोपरागादि पर्वदिनेषु विहितः । अवश्यमेव कर्तव्यः सनित्यः । गर्भाधानादिसंस्कार कर्मणि नैमित्तिफः । शान्त्यादिषु काम्य विषयेषु काम्यः । अस्य विस्तारपूर्वक परिभाषा ग्रहयाग प्रकरणे वक्ष्यामि। अत्र अन्धविस्तारमियानदर्शितावितद्भिस्तत्रैव दृष्टव्या । इति नवग्रह परिभाषा- .
(२०) कर्मकाण्ड रताकरे, पञ्चगव्य परिभाषा अथ पञ्चगव्यकरणम् अथ पञ्चगव्यविधिः, उक्तञ्चपराशरस्मृतौ-अतः परंप्रवक्षामिपञ्चगव्यमनु तमम् । पायनाथं द्विजातीना मिहलोफेपरप्रच१ गोमूत्रंगोमयंक्षीरंदधिसर्पि.कुशो- दकम् । निर्दिष्टंपञ्चगव्यन्तुपवित्रंमुनिपुङ्गवैः ॥ गोमूत्रवरुणोदेयो हव्यवाहस्तुगोमये क्षीरेशशधरोदेवोवायुर्दनिसमाश्रितः ॥ भानु सर्पिपिसंदिष्ठः कुशेब्रह्मादिदेवताः॥ जलेसाक्षाध्दरिःसंस्थः पवित्रतेननित्यश. ॥ मूत्रंतुनीलवर्णायाः कृष्णायागोमयं- स्मृतम् ॥ क्षीरंतुताम्रपर्णायाः श्वेतायाउच्यतेदधि ॥ सर्पिस्तुकपिलायावै ग्राह्यं पातकनाशमम् ॥ अभावेसर्ववर्णानां कपिलायाः प्रगृह्यते ॥ अथ पश्चगव्यद्रव्य प्रमाणं-पलमात्रंतुगोमूत्र मंडष्ठाईन्तुगोमयम्। क्षीरंसप्तपलेंग्राांदधित्रिपल मोरितम् ॥ सर्पिस्त्वेकपलदेय मुदकंपलमात्रकम् । सर्वमेतत्ताम्रपानस्थितंकुर्या- •द्यथाविधिः ॥ सर्वेषामला सर्पि:कुशोदकंपय इतिनिर्णय. गायत्र्यादायगोमूत्रंगन्ध- द्वारतिगोमम् । आप्यायस्वेतिवैक्षीरं दधिक्राणेतिवैदधि ॥ तेजोसिशुक्रसपिस्तु देवस्यत्वाकुशोदकम् । मन्त्रयित्वाप्रोक्षणन्तु आपोहिष्टेतिमन्त्रत. ॥ अथ पञ्चगव्याभिमन्त्रणम् ॐ भूर्भुवःस्वः० इति गायत्र्यापलमात्रं गोमूत्रमभिमन्य ताम्रपाने वा पलाशपत्रपुटेवरुणदेवंध्यायन्स्थापयेत् । गोमयम्- ॐ गन्धद्वारांदुराधर्षा नित्यपुष्ठांकरीषिणीम् । ईश्वरीसर्वभूतानां 'तामिहोपह्वयेश्रियम् । इत्यंगुष्ठार्धमानं गोमयमभिमन्त्र्य अग्निदेवं ध्यायंस्तत्रैवस्थापयेत् ॥ दुग्धम्-ॐ आप्यायस्वसमेतुतेविश्वतः सोमवृष्ण्यम् । भवाब्वाजस्यसङ्गथे॥ इति सप्तपलदुग्धमभिमन्त्र्य सोमदेवंध्यायँस्तत्रैवस्थापयेत् ॥ दधि-ॐ दधिक्राव्णोऽअकारिष जिष्णोरश्वस्यवाजिनः।सुरभिनोमुखाकरत्मणऽआयूषितारिपत् इतित्रिपलन्दध्यभिमन्त्र्य वायुदेवंध्यायँस्तत्रैवस्थापयेत् ॥ घृतम्- ॐ तेजोऽसिशुक्रमस्यमृतमसिधामनामासि प्रियंदेवानामनाधृष्ठं देवयजनमास ॥ इत्येकपलंघृतमभिमन्त्र्य सूर्यदेवंध्यायँस्तत्रैव स्थापयेत् ॥ कुशोदकम्-ॐ देवस्यत्वासवितुः प्रसवेश्विनोर्वाहुभ्यां पूष्पोहस्ताभ्याम् । इतिपलमात्रंकुशोदकमभिमन्त्र्य हरिंदेवंध्याय स्तत्रैवस्थापयेत् ॥ ततः कुशर्वादुभिर्व क्ष्यमाणतिसृभिरालो कर्मकाएडारक्षाकरे, सर्वकर्माधिविधि (२१) डयेत् ॥ ॐ आपोहिष्ठामयोभुवस्तानऽऊर्जेवधातुनः महेरणाय चक्षषेयोवः शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेहनः । उशतीरिवमातर स्तस्माऽअरङ्गमामवो यस्यक्षयायजिन्वथ, आपोजनयथाचनः इति सप्रमाण पञ्चगव्यम् ।। सर्व कर्माधिविधिः। श्रीगणेशायनमः॥श्रीसरस्वत्यैनमः । श्रीगुरुचरण कमलेभ्यो नमः । ॐ नारायणं नमस्कृत्य नरं चैव नरोत्तमम् । देवीं सर- स्वतीं व्यासं ततोजयमुदीरयेत् ॥१॥ तत्रादौ सर्वकर्मादि कणीय विधिवक्ष्ये ॥ तत्रकर्ता शुभदिने सुस्नातः शुध्देवाससी परिधाय शुभासने प्राङ्मुखोवोदङ्मुखः सन्नुपविश्य । ॐ सिध्दम् ३ इति धारत्रयं पठित्वा, प्राचमनं कुर्यात् । ॐ अच्युतायनमः । ॐ केशवायनमः । ॐ माधवायनमः । बिराचम्य । गायच्याशिखा वंधनं कृत्वा, कुशपवित्रे धृत्वा । दीपं पूर्वाभिमुखंप्रज्वाल्य । ॐ अस्यश्री प्रासनमंत्रस्य मेरुपृष्ट ऋपिः, सुतलं, छन्दः कुम्मौदेवता कमसिनो पवेशने विनियोगः। हस्ते अक्षतानगृहीत्वा ॐ हिरण्यवर्णासुभगा हिरण्यकशिपुर्मही तस्या हिरण्यं दापये सत्या अकरं नमः ॥ इत्यक्षतान्भूमौ क्षिप्त्वा । ॐ भूर्भुवः स्वः पृथ्वि इहागच्छेहतिष्ट । ॐ पृथिव्यै नमः । इतिमंत्रेण पाचादिभिः संपूज्य प्रार्थयेत्--ॐ पृथ्वित्वया धृतालोका देवित्वं विष्णुना धृता त्वं च धारय मां भद्रे पवित्रं कुरुचासनम् ॥ तत--जलं वामहस्ते धृत्वा दक्षिण हस्तेन कुशैरभिषेकं कुर्यात् । आपो हिष्टा भयोभुव स्तानऽऊर्जेदधातुनः। महेरणाय चक्षपे योव: शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेहनः, उशती रिघमातर स्तस्माऽअरंग मामयो यस्य श्याय जिन्वय आपोजन यथाचनः ॥ ॐ पुण्ड- रीकाक्षाय नमः पुनातु ॥ गौरसर्षपानादाय-भूतोत्सादनं कुर्यात् । 30 अपाक्रामन्तु भूतानि पिशाचाः सर्वतोदिशः। सर्वेषा मविरोधेन ब्रह्मकर्मसमारभे । अपसर्प न्तुतेभूता पेभूता भुषि (२२) फर्मकाएर रक्षाकरे, सर्वकर्माधिविधि " संस्थिताः । येभूता विघ्न कर्तार स्तेनश्यन्तु शिवाजया । ततः- निर्गछ तांच भूतानां चम॑दद्यात्म्बवामतः । वामभागे हस्ताभ्यां तालत्रयं दत्वा सर्वान्विघ्नानुत्सार्यततः, 30 सर्व वाद्यमयी घंटायै नमः । इतिमंत्रेण घंटासंपूज्य, अागमार्थच देवानां निर्गमार्थं च रक्षसाम् । सर्वभूत हितार्थाय घण्टानादं करोम्यहम् ॥ इतिवादयित्वा सवामभागे कुशेषु घंटांस्थापयेन् । अगंधर्व देवाय धूपपात्रायनमः, इतिसंपूज्य, स्वदक्षिणभागे निदध्यात् । 30 वन्हि देवत्याय दीपपात्राय नमः ।। संपूज्य तत्रैवस्थापयेत् ॥ ततो ब्राह्मण द्वारा स्वमंगल तिलकं कारयेत् । मंत्रः-30 भद्र- मस्तु शिवंचास्तु महालक्ष्मीः प्रसीदतु। रक्षन्तु त्वां सुराः सर्वे संपदः सन्तुसुस्थिराः ॥ ततः पूर्वप्रज्वालितं दीपं, 30 दीपनाथ भैरवाय नमः। इतिमंत्रेण पंचोपचारैः संपूज्य पुष्पंगृहीत्वा प्रार्थयेत् । 0 करकलित कपालः कुण्डली दंडपाणिस्तरुण तिमिर नीलो च्यालयज्ञो पर्वाती ॥ ऋतु समय सपर्या विघ्न विच्छेदहेतुर्जयति वटुकनाथः सिद्धिदः साधकानाम् ॥ इति संमार्य । अर्घस्थापनं कुर्यात्-रक्तपीतगंधेन चन्दनेनवा भूमी त्रिकोणं वृत्तं चतुरस्रमंडलं च लिखित्वा तत्र त्रिपादिकां संस्थाप्य तदुपरि शंखचा ताम्रमया संस्थाप्य-संपूज्यच ।। 30 शन्नोदेवी रभिष्टयऽआपो भवन्तु पीतये । शय्योरभिस्रवन्तुनः । इतिजलेनापूर्य 30 गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धो कावेरिजलेऽस्मिन्सनिधि कुरु ॥ इत्यंकुशमुद्रया तीर्था एया वाह्य । तत्रगंधाक्षत पुष्पाणि निक्षिप्य; सम्पूज्य च, तेना घोंदकेन कुशः पूजोपकरण सामग्री समोक्ष्य, आत्मानंचाभिषिंच्य- अर्घ तत्रैव स्थापयेत् । ततः प्राणायाम कृत्वा प्रधानदेवतार्चनं कुर्यात् ॥ ॥ इति कर्मादि विधिः॥ है . .
कर्मकाण्ड ग्ताकरे, शान्तिपाठ पद्धतिः (२३) अथ सर्वकर्मादौशान्तिपाठविधिः श्रस्यात्रपर्वतीयदेशेपु स्वस्तिवाचनेनापिव्यवहारः । यथार्थ श्वायम् । बहनांमन्त्राणांस्वस्तिशन्दघटितत्वेन देहलीदीपन्यायेन सर्वमन्त्राणांतदभिधानस्ययोग्यत्वात् ॥ गृहाभाष्येगदाधरेणगर्भा धानशान्तिप्रकरणे, यानोभद्रा इतिशुक्लयजुर्वेदस्य पञ्चविंशति तमेऽध्याये, पानोभद्रेत्यारभ्य कादशेऽनुवाके दशमन्त्राउक्ताः । कचित्पध्दती, स्वस्तिनोमिमीता मिति पंचमंत्रा अपिउक्ताः, परश्च विशेषतः, गढवालदेशे पुरातनपध्दनौगना पंचमंत्रान्हित्या, यजु चैदस्यैव पत्रिंशदध्यायस्यमयभानुचाकस्य, दधीचित्रपिदर्शिताः पंचदशमंत्राः शान्तिपाठे सम्मिलिताः सन्ति ,अत: पंचविंशतिम त्रायजुः शाविनां सर्वकर्मारम्भे मंगलप्रदा भवन्तीति शान्तिपाठे तदर्शनाच्चेति ॥ ॥ अथ यजुर्वेदीनांशान्तिपाठ मन्त्राः॥ हरिः-30 आनोभद्राः ऋतधोय्यन्तुन्विश्वतोदब्धासोई अपरीतास उद्भिदः । देवानोव्यथा सदमृद्वृधेऽ असन्नप्पायुवो रक्षितारो दिवेदिवे ॥१॥ देवानांमद्रासुमतिजूयतां देवाना ॐ रातिरभिनोनिवर्त्तताम् । देवाना ॐ सख्यमुपसे दिमावयंदेवानs श्रायुःप्रतिरन्तु जीवसे ॥२॥ तानपूर्वयानि विदाहमहेव्वयं भग. म्मित्रमदितिन्दक्षमस्त्रिधम् । अर्यमणंव्वमण ई० लोममश्विना सरखतीनः सुभगा मयस्करत् ॥ ३॥ तन्नोंव्वातोमयोंमुव्वातु भेषजन्तन्माता पृथिवीतत्पिताद्यौः। तद्ग्रावाणः सोमसुतोमयो' भुवस्तदश्विनां शृणुतंधिष्ण्याय्युवम् ॥ ४॥ तमीशानंजगस्तस्थुष' स्पतिंधियंजिन्वमवसे हमहेव्वयम् । पूपानोप्यधाब्वेद सामस वृधेक्षितापायुरदब्धः खस्तये ॥५॥ स्वस्तिनऽ इन्द्रोवृद्धश्रवाः स्वस्तिनः पूंपाविश्ववेदाः। स्वस्तिनस्तायोऽ अरिष्टनेमिः स्वस्ति नोबृहस्पतिर्दधात ।। ६ ।। पृषदश्यामस्तः पृश्निमातरः शुभंव्याव्वा (२४) कर्मकाण्ड रताकरे, शांतिपाठ पद्धति नोविदथेषुजग्मयः ॥ अग्निजिहा मनवः सूरचक्षसो विश्वेनो देवा अवसागमनिह ॥७॥ भद्रकरणेभिः श्रृणुयामदेवा भद्रम्प- श्येमाक्षभिर्यजत्राः ॥ स्त्थिरैरंगैस्तुष्टुवा ॐ सस्तनूभियंसे महिदेवहितंय्यदायुः॥८॥ शतमिन्नुशरदोऽअंतिदेवा यत्रानश्चका जरसन्तनूनाम् ॥ पुत्रासोयत्रपितरो भवन्तिमानो मध्दयारी रिष तायुर्गन्तोः ॥ ॥ अदितिचौरदिति रन्तरिक्षमदितिर्मातासपि तासपुत्रः ॥ विश्श्वेदेवाऽअदितिः पञ्चजनाऽअदितिर्जात मदिति जनित्वम् ॥ १०॥ ऋचव्याचप्रपये मनोयजुः प्रपद्यसामप्माणं प्रपद्येचक्षुःश्श्रोत्रप्रपद्ये ॥ व्यागोजः सहौजोमयिप्राणापानौ ॥११॥ यन्मेच्छिद्रचक्षुषो हृदयस्य मनसो व्वाति तृणम्बृहस्पतिम्र्मेतद्दधातु शन्नोभवतुभुवनस्ययस्पतिः ॥१२॥ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्य म्भग्र्गोदेवस्यधीमहि । धियोयोनः प्पचोदयात् ॥१॥ कयानश्चि- त्राभुवदतीसदावृधः सखा॥कयाशचिष्टयावृता॥१४॥ कस्त्वा- सत्यो मदानाम हैं हिष्टो मत्संदधसः ॥ दृढाचि दारुजे व्वसु ॥१॥ अभीषुणः सखीनाम विता जरित्राणाम् ॥ शतम्भवा स्यू- तिभिः ॥१६॥ कयात्त्वन्न 5 उत्याभिप्रमन्दसेवृषन् कयास्तोतृभ्यः आभर ॥१७॥ इन्द्रोब्विश्वस्यराजति । शन्नो प्रस्तुद्विपदेशचतु- पदे ॥१८॥ शन्नोमित्रः शंम्वरुणः शन्नोभवत्त्वर्यमा ॥ शन्नs इन्द्रो बृहस्पतिः शन्नो विष्णुरुरुक्रमः ॥१६॥ शन्नोन्वातः पवता ॐ शन्नस्तपतु सूर्यः ॥ शन्नः कनिकदद्देवः पर्जन्यो ऽ अभिवर्षतु ॥२०॥ अहानि शम्भवन्तुनः शर्ट० रात्रीः प्रतिधीयताम् ॥ शन्न s इन्द्राग्नीभवतामवोभिः शन्न : इन्द्राव्वरुणा रातहव्या । शन 5 इन्द्रा पूषणाव्वाजसातौ शमिन्द्रासोमा सुविताय शय्योः ॥२१॥ शन्नोदेवी रभिष्टय ऽश्रापोभवन्तु पीतये । शय्योरभिश्रवन्तुनः ॥२॥ स्योना प्रधियिनोभवानवृक्षणनिवेशनी ॥ यच्छानः शर्म सप्रथाः ॥२३॥ द्यौःशान्तिरन्तरिक्ष ! शान्तिःपृथिवी शान्तिरापः शान्तिरोषधयः शान्तिः॥ वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्ति ब्रह्म शान्तिः सर्व शान्तिः शान्ति रेव शान्तिः सामा शान्ति कर्मकाण्ड रखाकरे, गणेशपूजा पद्धतिः (२५) , रेधि ॥२४॥ विश्वानिदेव सवितरितानि परासुव ।। यदद्रतन्न ऽासुव ।।२५॥ ॥ इति यजुः शान्ति पाठः ।। ॥ अथ ऋग्वेदोक्त शान्ति पाठमंत्राः ॥ ऋ० अष्टक ४ अध्याय ३ कं०७ हरिः ॐ ॥ स्वस्तिनोमिमीतामश्विनाभगः स्वस्तिदेव्यदिति रनर्वणः । स्वस्तिपूपाअसुरोदधातुनः स्वस्तिद्यावापृथिवी सुचेतुना ॥११॥ स्वस्तयेवायुमुपद्रवामहै सोमंस्वस्तिभुवनस्ययस्पतिः । बृहस्प- तिं सर्वगणस्वस्तये स्वस्तययादित्यासो भवन्तुनः ॥२॥ विश्वेदेवा- नोअद्यास्वस्तये वैश्वानरोवसुरग्निः स्वस्तये । देवा अवन्त्वृभवः स्वस्तयेस्वस्तिनोन्द्रः पात्वहसः ॥३॥ स्वस्तिमित्रावरुणा स्वस्ति पथ्येरेवति । स्वस्ति न इन्द्रश्चाग्निश्च स्वस्तिनोअदितेकृधि ॥४॥ स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविव ॥ पुनर्ददता 5 घ्नता जानतासङ्गमेमहि ॥५॥ स्वस्त्ययनंताय॑मरिष्ट नेमिमद्भुतं वायसंदेवतानाम् ।। असुरघ्नमिन्द्रसखंसमत्सबृहन्यशोनावमिवा महेम ॥६॥ अंहोमुंचमांगिरसंगपंचस्वस्त्यात्रेयंमनसाचताद प्रयतपाणिः शरणं पदोस्वस्तिसम्यायेष्वभयन्नो अस्तु ॥ ७ ॥ इति ऋग्वेदोक्त स्वस्तिवाचनम् ॥ . ।। अथगणेशपूजापध्दतिः॥ श्रीगणेशायनमः ॥ कर्ताकर्मदिनेमातमत्थायशुध्देवाससी परिधाय, सामग्रीसपाद्यपूवोंदितेनविधिना प्राचमनदीपपूजन अर्धस्थापनादिकंकृत्वा नित्यकर्मचसमाप्य सर्वविघ्ननिवारणार्थ गणपतिपूजनंकुर्यात् ॥ स्तेपुष्पंगृहीत्वा-32 सुमुखश्चैकदंतश्च कपिलोगजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटो विघ्ननाशोगणाधिपः ॥
' (२६) कर्मफागड रताकरे, गणेशपूजा पद्धति धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । द्वादशैतानिनामानियः पटेच्छृणुयादपि, । विद्यारम्भविवाहेच प्रवेशेनिर्गमे, तथा। संग्रा- मेसंकटेचैव विघ्नस्तस्यनजायते । विनवल्लीकुठारायगणाधिपत येनमः । वक्रतुंढमहाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ । अविघ्नंकुरुमेदेव सर्वकार्यपुसर्वदा,, पुष्पांजलिंगणेशसन्निधौ क्षिपेत् ॥ ततोविणं ध्यायेत्- ॐ शुक्लाम्बरधरंदेवं शशिवर्णचतुर्भुजम् ॥ प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नोपशान्तये । लाभस्तेपांजयस्तेषां कुतस्तेषांपरा- जयः॥ येषामिंदीवरश्यामो हृदयस्थोजनार्दनः। तेषांनित्याभियु- कानां योगक्षेमवहाम्यहम् । स्मृतेसकल कल्याणंभाजनंयत्र. जायते । पुरुपस्तमजंनित्यं, ब्रजामिशरणंहरिम् ॥ सर्वेष्वारम्भ कार्यपुत्रयस्त्रिभुवनेश्वराः । देवादिशंतुनः सिध्दि ब्रह्मविष्णु महेश्वराः ॥ सर्वदासर्वकार्येषु नास्तितेपाममंगलम् ॥ येषांहृदिस्थो भगवान्मंगलायतनोहरिः ॥ तदेवलग्नंसुदिनं तदेवतारावलं चन्द्रवलंतदेव । विद्यावलंदेववलंतदेव लक्ष्मीपतेतेधि युगंस्मरामि तत्रैवसमर्पयेत् ॥ ततोगौरी-ॐ सर्वमंगलमांगल्ये शिवेसर्वार्थ साधिके । शरण्येयवकेगौरि नारायणिनमोस्तुते ॥ इ० पु०स०॥ तिलकुशजलान्यादाय सँकल्पंकुर्यात- ॐ नमः परमात्मने श्री पुराणपुरुषोत्तमाय, श्रीश्वेतवाराहकल्पे वैवश्वतमन्वंतरे, श्रष्टा विंशतिसंख्यके कलियुगेप्रथमचरणे द्वितीयेयामे तृतीये- दिवसे यूद्वीपे भरतग्वण्डेभारतवर्षे आर्यावर्तान्तर्गत पुण्यक्षेत्रेअनेक नदीसुशोभिते अनन्तशिवलिंगायनेक ॥ शक्ति विष्णुपतिमादिविराजिते, बदरिकारण्यांतर्गत उर्वशीक्षेत्रे केदारखंडान्तर्गत सुमेरोदक्षिणपावें, अलकनन्दा भागीरथीपिंडर कालीनदीनां (दक्षिणकूले वा वामकृलेऽथवामध्ये शुध्देऽमुक क्षेत्रे वाप्रदेशेऽथवास्वगृहे) पष्टिसंवत्सराणां मध्ये, अमुकनाम संवत्स रेअमुकायने, अमुकत्तौं, अमुकमासे, शुक्लेऽथवा कृष्णपक्षे, अमुक निथौ, अमुकवासरे, अमुकनक्षत्रे, अमुकयोगयोः, अमुककरणे, सुमहत्ते, अमकराशिस्थितेसर्य, अमराशिस्थितेचन्द्रे, भौमे, घुधे , कर्मकाराष्ट्र रलाकरे, गणेशपूजा पद्धति, (२७ ) , गुरौ, भार्गवे, शनौ, रादौ, केतो, यथाराशिस्थानस्थितेपु ग्रहेषु सत्सु, श्रुतिस्मृतिपुराणोक्त चतुर्वर्गफलप्राप्तये, अमुकगोत्रोऽमुक राशि रमुक शर्मा धर्मा गुप्तो दासो वाहं करिष्यमाणामुक कर्मणो निर्विघ्नतासिद्धये, तत्रादौभगवतोगणेशस्य, तथाकलशस्थापन वरुणपूजन पुण्याहवाचन, मातृकापूजनवसो रानिपातन, नान्दी श्राद्ध, नवग्रहादीनां पंचोपचारेणवापोडशोपचारेण पूजनंकरिष्ये। तत्रादौलिखितपपीठे, रक्ताक्षतर्वक्ष्यमाण मंत्ररक्षतान्विकीर्य पंचोपचारविधिना, नवशक्तिपूजनकुर्यात्-30 तीवायनमःतीवा मावाहयामिस्थापयामि पूजयामि, एवंसर्वत्र ॥ ज्वालिन्यैनमः ज्वालिनी । ॐ नन्दायैनमः, नन्दाम्० । 0 भोगदायैनमः, भोगदाम्० ।। 30 कामरूपिण्यैनमः । कामरूपिणीम्। 30 सत्या यैनमः, सत्यां० । 30 उग्रायैनमः, उग्रां० । तेजोवत्यैनमः तेजोवतीम्० मध्येविघ्नविनाशिन्यैनमः विघ्नविनाशिनीम् । 0 सर्वशक्तिकमलासनायनमः ॥ इति पीटशक्ति पूजनं विधाय । हस्तेसरक्ताक्षत पुष्पंनिधाय, गणपत्यावाहनं कुर्यात् ।। 30 एहि हेरम्वत्वमेहोहि अविकान्यचकात्मज । सिद्धि बुद्धि पतेच्यक्षलक्ष- लाभपितः पितः । नागस्य नागहारत्वं गणराजचतुर्भुज । भूपितः स्वायुधैर्दिव्यैः पाशांकुशपरश्वधैः । आवाहयामि पूजार्थरक्षार्थच ममक्रतोः । इहागत्य गृहाणत्वं गजाकर्तुश्चरक्षमे । श्राचाहोवं गणेशपूजाद्रव्यैः प्रपूजयेत् ॥ प्रतिष्ठांकुर्यात्-30 एतन्तदेव सविनयशं प्राहहस्पतये ब्रह्मणे । तेनयज्ञमवतेन यज्ञपतितेनमा- मव । मनोजूतिर्जुपता माज्यस्य वृहस्पतिर्यज्ञ मिमंतनो त्वरिष्टं यज्ञ र्ट समिमंदधातु । विश्वेदेवासऽहमा दयंतामोंप्रतिष्ट । हात प्रनिष्टाप्य । स्थापनम्-30 गणानान्त्वेति प्रजापति ऋषिर्यजुश्छन्दो गणपतिर्देवता गणपतिस्थापनेविनियोगः। 30 गणानान्त्वागणपति ई० हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति र्ट हवामहे । निधीनान्त्वानिधि- पनि १० हवामहेव्वसोमम श्राहमजानिगर्भध मात्वमजा सिगर्भ- धम् ॥ भर्भुवः स्वः गणपतिस्थापयामि, गणपतइहसुप्रतिष्टि (२८) फर्मकाग रत्नाकर, गणेशपूजा पद्धति तोवरदोभव ॥ 80 गणपतयेनमः । इति मूलमंत्रणवापुरुपसूक्तेन पंचोपचारपूजनकुर्यात् ॥ इति पंचोपचारपूजनम् ॥ (वक्ष्यमाण पूजाप्रकारः स्मृतिकौस्तुभेपोडशोपचार विधिस्तुविष्णुपुराणोक्तः सश्चायम् ॥) ध्यानम्-एकदंतंशूर्पकर्णगजवत्कंचतुर्भजम् । पाशां कुशधरंदेवं ध्यायेत्सिद्धिविनायकम् ॥ यावाहनम्-विनायक नम. स्तेस्तुउमामलसमुद्भव । इमांमयाकृतां पूजांगृहाण सुरसत्तम ॥ श्रासनम्-अनेकरत्नसंयुक्तं मुक्तादामविराजितम् । स्वर्णसिंहासनं चाम्पीत्यर्थ प्रतिगृहाताम् । पाद्यम्-पाचंगृहाणभगवन् दिव्यचन्दन मुत्तमम् । करणाफरहेरम्ब गणाध्यक्षायतेनमः ॥ श्रयम्--गौरी प्रियनमस्तेस्तु शंकरप्रियसिद्धिद । गृहाणार्घ्य मयादत्तं सर्वसिद्धि- प्रदायक ॥ आचमनीयम्-गंगादितीर्थसलिलस्वर्णभेसमाहृतम् । उमापुत्र नमस्तेस्तुराणाचमनीयकम् ॥ मधुपर्कम्-विघ्नेश्वर विशालान सप्तार्णव विनोदन ॥ मधुपर्कगृहाणेदमयासंपादित विभो ॥ पंचामृतस्नाम्-स्नानपंचामृतं दिव्यंगृहाणद्विरदानन । श्रनाथनाथदेवेश सुरासुर सपूजित ॥ शुद्धोदकस्नान-सर्वतीर्था त्समध्दृत्य गंधतोयैः कुशोदकैः ॥ फलतोयैर्जलेर्गन्धैः स्नापयामि गणेश्वरं ॥ वस्त्रयुग्मम्-रक्तवस्त्रद्वयंदिव्यं देवताह सुमंगलम् ।। सर्वमदं गृहाणेदं लम्बोदर हरात्मज ॥ यज्ञोपवीलम्--राजतं ब्रह्म सूत्रंचकांचनस्योत्तरीयकम् । विनायकनमस्तेस्तुरहाण सुरसत्तम ।। गंधम्-गंधगृहाण भगवन्दिव्य चंदनमुत्तमम् । कर्पूरामलसंयुक्तं लंबोदरहरात्मज ॥ अक्षताः-अक्षतान्धवलान्देवगृहाणद्विरदानन । अमराणामतिश्रेष्ट, पद्मवासमतिप्रिय ॥ पुष्पाणि-सुगन्धितानि पुष्पाणि नवदाकुराणिच । मयानीतानि पूजार्थगृहाण भक्त वत्सल ॥ धूपम्-दशांगंगुग्गुलंधूपंसुगधि सुमनोहरम् । उमापुत्र नमस्तेस्तगृहाणवरदोभव ॥ दीपम्-गृहाणमंगलंदीपं घृतवत्तिस- मन्वितम् । दीपं ज्ञानप्रददेवरुद्रप्रियनमोस्तुते ॥ नैवैद्यम्-पकानं टि० प्रणवादि नमोन्तच चतुयन्तच सत्तम । देवताया स्वकनाम मूलमत्र प्रकीर्तित । -- कर्मकाण्ड रखाकरे, गणेशपूजा पद्धतिः (२८) मोदकंचैव दधिकृतसमन्वितं ॥ नैवैद्यसफलंदयां गृहातां विघ्न नाशिने || कराननशुध्यर्थजलम्-विघ्नेश्वर गणाध्यक्ष भालचन्द्र नमोस्तुते ॥ कराननविशुध्यर्थं जलमेनद्गृहाणमे ॥ उपायनम्- हिरण्यगर्भगर्भस्थं हेमवीज वीभावसोः । अनन्तपुण्यं फलदमतः शान्ति प्रयच्छमे ॥ ततोनारिकेलयुतं सफलमयं वामहस्ते धृत्वा तदुपर्युत्तानं दक्षिण हस्त निधाय निवेदयत् ॥ ॐ रक्षरक्षगणाध्यक्ष रक्षत्रैलोक्यरक्षक, भक्तानामभयंकृत्वा बाताभवभवार्णवात् ।। द्वैमातुरकृपासिन्धो पाएमातुरग्रजप्रभो ॥ वरदत्वंवरंदेहि वांछितवांछितार्थद । अनेनफलदानेनफलदोस्तु सदामम । इदंफलंमयादेव स्थापितंपुरतस्तव । तेनमेसफलावाप्ति र्भवेज्जन्मनिजन्मनि ॥ फलमनतोनिधायार्घ्य वारिणागणपतिस्ना. पयेत् ॥ ततोद्वादशनाममंत्रैर्दूाकुरयुग्म गंधलिप्तंगृहीत्वा, प्रति. मंत्रान्तेसमर्पयेत्-ॐ गणाधिपतयेनमः दूाकुरयुग्मंसमर्पयामि (एवंसर्वत्र) ॐ उमापुत्रायनमः। ॐ अघनाशिनेनमः ॐ एकद. न्तायनमः ॐ इभवकायनमः ॐ मूषकवाहनायनमः ॐ विना- यकायनमः ॐ ईशपुत्रायनमः ॐ सर्वसिध्दिप्रदायकायनमः ॐ कुमारगुरवेनमः ॐ चतुर्थीशायनमः ॐ सर्वविधहरायनमः ॥ ततोनीराजनम्- ॐ अन्तस्तेजोवहिस्तेज एकीकृत्यामितप्रभम् । नीराजनमिदंदेव गृहाणमदनुग्रहात् ।। पुष्पांजलिम्-विघ्नेश्वरा- यवरदाय सुरप्रियायलम्बोदराय सकलायजगद्धिताय । नागान- नाय श्रुतियज्ञविभूपिनायगौरीसुताय गणनाथनमोनमस्ते। भक्च्यातिनाशनपराय गणेश्वराय । सर्वेश्वरायशुभदायसुरेश्वराय विद्याधरायविकटायच वामनाय । भक्तप्रसन्नवरदाय नमोनमस्ते। नमस्तेव्रह्मरूपाय विष्णुरूपायतेनमः । नमस्तेमद्ररूपाय करिरूपा- यतेनमः । विश्वरूपस्वरूपाय नमस्ते ब्रह्मचारिणे । भक्तप्रियाय- देवाय नमस्तुभ्यविनायक । त्वांचिशत्रुदलनेतिच सुन्दरेति । भक्तिप्रदेतिमुखदेति फलप्रदेति । विद्याप्रदेत्यघहरेतिच येस्तुवंति नेभ्योगणेशवरदो भवनित्यमेव । लम्बोदरनमस्तुभ्यं सततंमोदक (३०) फर्मकाण्ड रताकरे, वरणपूजा पद्धति प्रिय । अविनंकुरुमेदेव सर्वकार्येपुसर्वदा ॥ इतिसमयं प्रदक्षि. गा१ त्रयं कुर्यात्-ॐ श्राखुवाहनदेवेश विश्वव्यापिन्सनातन । प्रदक्षिणां गृहाणेश ? ममत्वं सन्निधौभव । ततःप्रणामर कुर्यात्- ॐबाहुभ्यांच सजानुभ्यां शिरसावचसाहशा। अविनार्थममापुत्रं प्रणमामिमहुर्महः ॥ इति गणेशपूजापद्धति अथ वरुणपूजा पद्धतिः। तत्रादौ भूमिस्पर्श मन्त्रमाह-महीधौः पृथिवीच न इमं यज्ञं मिमिक्षतां पिपृतान्नो भरीमभिः ॥ अथयवप्रक्षेपः-- 0 ओषधयः समवदन्त सोमेन सहराज्ञा यस्मैकृणोति ब्राह्मणस्त ० राजन्पारयामसि ॥ नतः कलशस्थापनं-30 याजिकलशं मह्यात्वा विशन्त्विन्दवः पुनरूर्जा निवर्तवसानः सहस्रंधुक्षोस धारापयस्वतीपुनर्मा विशतायिः ॥ ततो जलेनापूरणम्-30 ब्वरुणस्योत्तम्मनमसि वरुणस्यस्कम्भसर्जनीस्थो वरुणस्य ऋतसद- न्यसि वरुणस्य ऋत सदनमसि वरुणस्य ऋत सदन मासीद । ततो गन्धक्षेपणम्-30 गन्धद्वारा दुराधर्षा नित्य पुष्टां करीषी- पीम् । ईश्वरी सर्व भूतानां तामिहोपह्वयेश्रियम् ॥ ततः सौं- षधिक्षेपणम्-30 यात्रोषधीः पूर्वाजाता देवेभ्यस्त्रियुगंपुरा मननु वभूणामह र्ट० शतं धामानि सप्तच ॥ ततः सप्तमृत्तिका-30 स्योनापृथिविनो भवान्नृक्षरा निवेशनी यच्छानः शर्मसप्रथाः॥ ततो दर्वाक्षेपणम्-30 कांडाकांडात्प्ररोहन्ती पम्पः परुषस्परि । १ टि-एक चड्यां रवौसप्त त्रीणिदद्याद्विनायके। चत्वारिविष्णवेदधान शिवस्या प्रदक्षिणम् । २ विपणुकरप लतायाम्-~-पदभ्या कराभ्यां जानुभ्या उरसा शिरसादृशा ॥ वचसामनसा चेति प्रणामोऽटांगईग्ति ।।
कर्मकाण्ड रताकरे, पक्षणपूजा पद्धति (३१) एवानो दृ प्रतनु सहस्रेण शतेनच ॥ पञ्चपल्लवम्-30 अश्व- त्येवो निपदनं परयो वसतिष्कृताः॥ गोभाज इकिलासथ-- यत्स नवथपूरुषम् ॥ ततः पूगीफलक्षेपणम्-30 याफली नीर्या अफला अपुष्पायाश्च पुप्पिणी । बृहस्पति प्रसूता स्तानोमंचंत्व टै० हसः ॥ ततः पञ्चरत्नक्षेपणम्-परिवाजपतिः कविरग्निहव्या न्यक्रमीत् ॥ दधद्रत्नानिदाशुपे ॥ हिरण्यक्षेपणम्-30 हिरण्य- गर्भः समवर्तताग्रे भूतस्यजातः पतिरेकऽपासीत् । सदाधार पृथिवी द्यामुतेमां कस्मै देवाय हविपाविधेम ॥ वस्त्रम्-यद श्वायव्वासऽउपस्तुणंत्यधीवासं-याहिरण्यान्यस्मै ॥ सन्दानम- वन्तं पड्वीशं प्रियादेवेष्वायामयन्ति । ततो धान्यपूर्ण पुटकं कलशोपरिस्थापनम्-30 पूर्णा दवि परापत सुपूर्णा पुनरापत । वस्नेव विक्रीणावहाऽइषमूर्ज ई० शतक्रतो तदुपरिश्रीफलम्-- ३ श्रीश्चते लक्ष्मीश्च पत्ल्या वहोरात्रे पाश्चनक्षत्राणि रूपमश्वि नौव्यात्तम् । इष्यनिषाणा मुम्मइपाण सर्वलोकम्मइपाण ॥ ततो वरुणमावा हयेत्-30 तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमान' स्तदाशास्ते यजमानो हविभिः । अहेड मानो पोहयो ध्युरुश ! समानायुः प्रमोपीः ॥ ततः प्रतिष्टापयेत्-- ॐ एतन्तेदेव सवितर्यज्ञं प्राहुवृहस्पतयेव्रह्मणे तेनयज्ञमवत्तेनयज्ञपतितेनमामव | मनोजूतिर्जुपतामाजस्य वृह- स्पतियज्ञमिमं तनोत्वरिष्टंयजर्ट समिमंदधातुन्विश्वेदेवासऽइहमा दयंतामोप्रतिष्ट ॥ ॐ भूर्भुवःखः वरुणेहागच्छेहतिष्टप्रसुतिष्टितो. भव ।। श्रासन-पासनंचमहद्दिव्यं रञ्जितंचमनोहरम् । अपांपति गृहाणत्वं ममसौख्यंविवर्धय ॥ पाद्यम्-कवोष्णमुदकंदिव्य मष्ट. गन्धसमन्वितम् । पाद्यंगृहाणदेवेश, वरुणायनमोनमः ।। अर्घ्यम्- गन्धपुष्पाक्षतर्युक्तं दृदधिसमन्वितम् । अर्घ्यगृहाणवरुण सर्व. सिद्धिपदोभव ॥ पञ्चामृतम-सशर्करंदधिक्षौद्रं पयोघृतसमन्वितम् पञ्चामृतंगृहाणेश जलाधिपतयेनमः ॥ स्नानम् सुशीतलंनिर्मलंच श्रीगङ्गालकनन्दयो । बारिगन्धसमायुक्तं स्नानार्थप्रतिगृहाताम् ।।
(३२) कर्मकाण्ड ग्ताकरे, वरुणपूजा पद्धतिः गन्धम्-श्रीखण्डचन्दनंदिव्यं केशरेणसुरञ्जितम् । ददामिभाल- शोभार्थं वरुणायनमोनमः॥ अक्षतम्-अक्षताश्वेतवर्णाभांस्ताडु- लान्सुमनोहरान् ॥ वरुणत्वंगृहाणौ तान्मम शान्तिकरोभव ॥ पुष्पाणि-ऋतुजानिसुपुष्पाणि यथालब्धानिवैप्रभो। निवेदयामि जलपसर्वसौख्यंविवर्धय ॥ धूपम्-वनस्पतिरसोत्पन्नं गन्धाढ्यम् , सुमनोहरम् । धूपंगृहाणवरुणसर्वसम्पत्करोभव ॥ दीपम्-घृता. क्तवर्तिकायुक्तं वन्हिनादीपितंप्रभो। गृहाणमङ्गलंदीपं रत्नाकर- गृहाधिप।। नैवैद्यम्-अन्नंचतुर्विधं खादुनानाव्यञ्जनसंयुतम्। निवे. दयामिनैवैद्यं स्वात्मकल्याणहेतवे ॥ नैवैद्यान्तेजलम्-कराननविशु ध्यर्थ नैवैद्यान्तेजलंप्रभो। गृहाणपरयाभक्त्याजलेशायनमोनमः॥ उपायनम्---हिरण्यंताम्रखण्डवा राजतंयन्मयार्पितम्। उपायनं गृहाणेश सर्वसम्पत्करोभव ।। ततःपुण्याहवाचनार्थं कलशेदेवता. आवाहयेत्॥ ॐ कलशस्यमुखेविष्णुः कण्ठेरुद्रःसमाश्रितः। मूले तस्यस्थितोब्रह्मा मध्येमातृगणाःस्मृताः॥ कुक्षौतुसागराः सप्त सप्त- द्वीपावसुन्धरा । ऋग्वेदोधयजुर्वेदः सामवेदोह्यथर्वणः । अंगश्च सहिताः सर्वेकलशन्तुसमाश्रिताः ॥ अवगायत्रीसावित्रीशान्ति- पुष्टिकरीतथा ॥ श्रायान्तुममशान्त्यर्थं दुरितक्षयकारकाः ॥ सर्वे. समुद्राःसरितस्तीर्थानिजलदानदाः ॥ आयान्तुममशान्त्यर्थं दुरित क्षयकारकाः ॥ ततोहस्तौसम्बाह्य कलशंप्रार्थयेत्-देवदानवसंवादे मथ्यमानेमहोदधौ ॥ उत्पन्नोसितदाकुम्भ विधुतोविष्णुनास्वयम् त्वत्तोयेसर्वतीर्थानिदेवाः सर्वत्वयिस्थिताः॥ त्वयितिष्टन्तिभूतानि त्वयिप्राणा:प्रतिष्ठिताः॥ शिवःस्वयंत्वमेवासि विष्णुस्त्वञ्चप्रजा- पतिः। आदित्यावसवोरुद्रा विश्वेदेवाःसपैतृकाः॥ त्वयितिष्ठन्ति सर्वेपियतःकामफलप्रदः । त्वत्प्रसादादिमंयज्ञं कर्तुमीहेजलोद्भव ॥ सान्निध्यंकुरुदेवेश प्रसन्नोभवसर्वदा ॥ नमोनमस्तेस्फटिकमभाय सुश्वेतहाराय सुमङ्गलाय। सुपाशहस्तायझपासनाय जलाधिनाथाय नमोनमस्ते ॥ पाशपाणेनमस्तुभ्यं पद्मिनीजीवनायक । पुण्याह- वाचनंयावत्तावत्वंसन्निधोभव ।। इतिवरण कलमपूजा पद्धतिः।
कर्मकाण्ड रताकरे, पुरायाहवाचन पद्धतिः (३३) अथ पुण्याहवाचन पद्धतिः। तत्रादौस्मार्त्ताचमनंकृत्वा पूर्वोक्तविधिनायऱ्या संस्थाप्य ब्राह्मणानपिसंस्थाप्य, सङ्कल्पंकुर्यात् ॐ श्रोत्यादिदेशकालौ संकीर्त्य, अमुकगोत्रोऽमुकराशिरमुकशर्माऽहं, अमुककर्मणि सर्वा भ्युदयप्राप्तये ब्राह्मणद्वारापुण्याहवाचयिष्ये, तदङ्गतयात्राह्मणानां पूजनंवरणाचकरिष्ये ॥ वरणद्रव्यसम्पूज्य, ब्राह्मणेभ्योऽर्घदद्यात्- भूमिदेवाग्रजन्मासि त्वविप्रपुरुपोत्तम । प्रत्यक्षोयज्ञपुरुषो? ऽयं प्रतिगृहाताम् ॥ इतिमन्त्रेण प्रथमथक् ब्राह्मणहस्तेपुदत्वा पूजयेत् ।। अगन्धद्वारेतिगन्धम्, अनमोस्त्वनन्ताय० ॥ अक्षत पुष्पादिभिःसम्पूज्य वरणंकुर्यात्-अद्यपूर्वाचारितः अमुकोहम. मुककर्मणिएभिर्गन्धाक्षत, पुष्प, पूगीफलद्रव्यः सर्वाभ्युदयप्राप्तये पुण्याहवाचनार्थ, अमुकगोत्रंत्रमुकशर्माणं ब्राह्मणत्वामहंवृणे वृतोऽस्मीतिव्राह्मणोचूयात् ।। एवंसर्वान्वृत्वा अञ्जलिंवध्वामार्थयेत् ॐ ब्रमजज्ञानं प्रथमपुरस्ताद्विसीमतः सुरुचोव्वेनश्रावः । सवु. धन्याऽउपमाऽस्यविष्ठाःसतस्य योनिमसतश्चविवः। ततोयज मानोऽवनिकृतजानुमण्डलः कमलमुकुलसदृश मञ्जलिंसिरस्याधा. य दक्षिणेनपाणिना सुवर्णपूर्णकलशं धारयित्वाङ्गानिस्पृशेत् । शिरसिमेसौभाग्यमस्तु, मस्तकेश्रीकान्तिरस्तुचक्षुषोः सुतेजोऽस्तु श्रोत्रयोःश्रवणेन्द्रियमस्तु याहोमवलमस्तु। ततश्राशिषःप्रार्थयेत्॥ प्रार्थनामाह-यजमानोवारत्रयंबूयात्-एताःसत्याअाशिषःसन्तु । ब्राह्मणाः, वारत्रयायुः ।। सत्याः सन्तु ॥३॥ ०दीर्घानागा नद्योगिरयस्त्रीणिविष्णुपदानिच । आध्रीणिपदाविचक्रमेविष्णुर्गोपा ऽअदाभ्यः । अतोधर्माणिधारयन् ॥ तेनायुष्यमाणेन पुण्यपुण्याहं दीर्घमायुरस्तु । इतिभवन्तोवृवन्तु, इति यजमानो वारत्रयं ब्राम- पानबूयात् ब्रामणाः-30 पुण्यं पुण्याहं दीर्घमायुरस्तु। इतिवारनयं वन्तु (एवंसर्वत्र यजमान ब्राह्मणोक्तिः ) यज-ब्राह्मणानां हस्तेषु सुप्रोचिनमस्नु, ब्राह्म-अस्तुसुप्रोनितम् । 30 अपां A ५ (३४) कमकाण्ड रत्नाकरे, पुण्याहवाचन पद्धतिः मध्येस्थितादेवाः सर्वमप्सुप्रतिष्टितम् । ब्राह्मणानां करेन्यस्ताः शिवा श्रापो भवन्तुते ॥ यज-30 शिवा आपः सन्तु । ब्रा० 30 सन्तु शिवा आपः। यज०-सौमनस्यमस्तु । ब्रा०-अस्तुसौम- नस्यम् ॥ य०-अक्षतं चारिष्टंचास्तु । ब्रा०-अस्त्वक्षतमरिष्टंच । य०-गन्धापान्तु सौमङ्गल्यं चास्त्विति भवन्तो बुवन्तु । ब्रा०- गन्धापान्तु सौमङ्गल्यंचास्तु । य०-अक्षतापान्तु आयुष्यमस्तु । ब्रा०-अक्षताः पान्तु आयुष्यमस्तु । य०-पुष्पाणि पान्तसौश्रि- यमस्तु । ब्रा०-पुष्पाणिपान्तु सौश्रियमस्तु । य०–ताम्बूलानि पान्तऐश्वर्यमस्तु ।वा-ताम्बूलानि पान्त ऐश्वर्यमस्त। य०-दक्षिणा पान्त बहुदेयंचास्तु । ब्रा-दक्षिणापान्तु बहुदेयंचास्तु । य०- दीर्घमायुः श्रेयः शान्तिः पुष्टि स्तष्टिः श्रीर्यशीविद्या चिनयोवित्तं बहुपुत्रत्वं चायुष्यंचास्तु । ब्रा०-30 तथास्तु ॥ [ अत्र सर्वत्र ब्राह्मणैरस्त्विति प्रत्युत्तरं देयमितिगदाधरः ] यजमानः-यंकृ त्वा सर्ववेदयज्ञ क्रियाकरण कर्मारम्भाः शुभाः शोभनाः प्रवर्त. न्तेतमह मोंकारमादि कृत्वा ऋग्यजु सामा थर्वाशीर्वचनं बहुऋ पिसम्मतं सम्विज्ञातं भवद्भिरनुज्ञातः पुण्यं पुण्याहं वाचयिष्ये । ब्रा-वाच्यताम् ॥ यजुः-30 भद्रं कर्णेभिःशृणुयामदेवाभद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः॥ स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा ॐ सस्तनूभिर्व्यशे महि- देवहितं यदायुः ॥१॥ देवानांभद्रा समतिर्थजूयतां देवाना ॐ रातिरभिनो निवर्तनाम् । देवाना ॐ सख्यमुपसेदिमा व्ययं देवानऽप्रायः प्रतिरन्तजीवसे ॥२॥ नतद्रता ॐ सि नपिशाचा स्तरन्ति देवाना मोजः प्रथमज ॐ ह्येतत् । योविभर्ति दाक्षायण ० हिरण्य ई० सदेवेषु कृणुते दीर्घमायुः समनुप्येपु कृणुते दीर्घ- मायः ॥३॥ दीर्घा युस्तऽयोपये खनितायस्मैचत्वा ग्वनाम्यहम् ।। अथोत्वंदीर्घायुर्भूत्वा शतव्वल्शाविरोहतात् ॥४॥ द्रविणोदाः पिपीपति जुहोत प्रचतिष्ठत । नेताहतुभिरिष्यत ॥ ५॥ ऋक- - द्रविणोदा द्रविणसस्तुरस्य द्रविणोदाः सनरस्य प्रयंसत ।
कर्मकाण्ड रलाकरे, पुण्याहवाचन पद्धतिः द्रविणोदाबीरवती मिपन्नोद्रविणोदारासते दीर्घमायुः ।। १॥ सवितापश्चात् सवितापुरस्तात् सवितोत्तरात्तात् सविताऽधरा. त्तात् । सवितानासुवनुसर्चतानिंसवितानोरासतां दीर्घमायुः॥२॥ नवोनवोभवति जायमानोऽहांकेतम्पसामेत्यग्रम् । भागदेवेभ्यो विदधात्यायं प्रचन्द्रमास्तिरतेदीर्घमायुः ॥ ३॥ उच्चादिविदक्षि- पावन्तोऽअस्थुर्येऽअश्वदाः सहतेसूर्येण । हिरण्यदाऽअमृतत्वम्भजते चासोदाः सोमप्रतिरन्तायुः।। साम-आपउन्दन्तुजीवसे दीर्घा यत्वायवर्चसे । यस्त्वाहृदाकीरिणा मन्यमानोमत्यंमत्याजोह- चीमि! जातवेदोयशोअस्मासुधेहिप्रजाभिरग्ने ऽयमृतत्वमश्या। यस्मत्वंसकृतेजातवेदउलोकमग्नेऽकृणवस्योनम् ।। अश्विनंसपुत्रिणं वीरवन्तंगोमन्तरयिन्नुशतेस्वस्ति ॥ यजमानोक्ति-व्रतजपनियम तपःस्वाध्यायक्रतशमदमदयादान विशिष्टानांसर्वेषांनात्मणानांमनः समाधीयताम् ।। ब्राह्मणाबूयः-प्रसन्नाःस्मः ॥ य०-३०शान्तिरस्तु । ब्रा०-30 अस्तु । य०-०पुष्ठिरस्तु। ब्रा०-3अस्तु । अतुष्ठिरस्तु । [ ब्राह्मणाएवंसत्रोत्तरत्रों, अस्तरितिव्यः ] य०-30 वृद्धिरस्तु। ३० अविनमस्त। अायुष्यमस्तु । प्रारोग्यमस्त। शिवमस्त! शिवकर्मास्तु । कर्मसमृद्धिरस्तु । २०वेदसमृद्धिरस्तु । ॐ शास्त्रसमृद्धिरस्तु । ७०पुत्रपौत्रसमृद्धिरस्तु । धनधान्य समृद्धि रस्त । इष्टसम्पदस्त । ततोऽक्षतान् वक्ष्यमाणमन्त्रोचारणान्ते वहिःक्षिपेत्-२०अरिष्ठनिरसनमस्तु । यत्पापंरोगंशोकमकल्याएं नदरेप्रतिहतमस्तु ।। अत्रोदकस्पर्शः। ततोऽन्तदेशेऽक्षतानक्षिपेत्] अध्यच्छ्यस्तदस्तु । ७० उत्तरेकर्मण्यविघ्नमस्तु । अउत्तरोत्तरम हरहरभिवृद्धिरस्तु । उत्तरोत्तराःक्रियाःशुभाःशोभनाः सम्प- द्यन्ताम् । तिथिकरणमुहर्तनक्षत्रग्रहलग्नसम्पदस्तु ।। ॐ तिथि करणमुहर्तनक्षत्र ग्रहलग्नाधिदेवताःप्रीयन्ताम् । ॐ तिथिकरणे सुमुहुर्तेसनक्षत्रेसग्रहे सलग्ने सदैवते प्रीयताम् । ॐ दुर्गापांचा- ल्यौपीयेताम् । ॐ अग्निपुरोगाविश्वेदेवाःप्रीयन्तां | 30 इन्द्र- कर्मकाण्ड रत्नाकरे, पुण्याहवाचन पद्धति पुरोगा मरुद्गणाम्पीयन्ताम् । ॐ वशिष्टपुरोगाः ऋषिगणाः प्रीय न्ताम् ॥ ॐ माहेश्वरीपुरोगाः उमामातरःप्रीयन्ताम् । ॐ अरु- न्धतीपुरोगाएकपत्न्यः प्रीयन्ताम् ॥ 30 ब्रह्मपुरोगाः सर्ववेदाः- प्रीयन्ताम् । 30 विष्णुपुरोगाः सर्वेदेवाः प्रीयन्ताम् | 30 ब्रह्मच ब्राह्मणाचप्रीयन्ताम् । ॐ श्रीसरस्वत्यौप्रीयताम् । ॐ श्रद्धामेधे प्रीयताम् । ॐ भगवतीकात्यायनीमीयतां । ॐ भगवतीमाहे श्वरीप्रीयताम् । ॐ भगवतीऋद्धिकरीमीयताम् । ॐ भगवती पुष्टिकरीप्रीयतां । ॐ भगवतीतुष्टिकरीप्रीयताम् । ॐ भगवन्तौ विघ्नविनायकौ प्रीयेताम् । ॐ सर्वाःकुलदेवताःप्रीयन्ताम् । ॐ0 सर्वाग्रामदेवताः प्रीयन्तां ॥ पुनरक्षतावहिःक्षिपेत्-30 हताश्च ब्रह्मविद्विषः । ॐ हताश्चपरिपन्थिन:-30 हताअस्यकर्मणोविन्न कर्तारः। शत्रवः पराभवयान्त । 30 शाम्यन्तघोराणि। ॐ शाम्यंतपापानि । 30 शाम्यन्त्वीतयः। पुनरपःस्पर्शः । पुनरक्षता नन्तर्दशैक्षिपेत् । 0 शुभानिवद्धन्तां । 30 शिवा श्राप-शन्तु । शिवाःऋतुवःसन्तु । ॐ शिवाअग्नयःसन्तु । 0 शिवाग्राहु- तयःसन्तु । 30 शिवाऔषधयःसन्त । ॐ शिवावनस्पतयःसन्त । शिवाप्रतिथयःसन्त । अहोरात्रेशिवेस्याताम् । ॐ निकामे निकामेनः पर्जन्योवर्षतु फलवत्योनऽऔपधयापच्यन्तांयोगक्षे. मोनः कल्पंताम् ॥ १॥ ॐ निकामेनिकामेनः प्रजन्योवर्षत्विति निकामेनिकामेवै तत्रपर्जन्यो वर्षतियतेन यज्ञेनयजन्तेफलवत्योन ऽओपधयःपच्यन्तामितिफलवत्यौवै तत्रौषधयः पच्यन्तेयतेन यजेनयजन्नयोगक्षमोनः कल्पतामितियोगक्षेमोवै तन्त्रकल्पते यते यजेनयजन्तेतस्माद्यतेनल्कृप्तः प्रजानांयोगक्षेमोभवति ॥ 30 शुप्राङ्गारकबुधबृहस्पतिशनैश्चर राहुकेत सामसहिता श्रादित्य पुरोगाः सर्वग्रहाःप्रीयन्ताम् । 30 भगवान्यर्जन्याप्रीयताम् । 30 भगवन्नारायण:मीयताम् ॐ भगवान्स्वामी महासेनामीयतां । यजमानः--30 पुण्यं पुण्याहकालान्वाचयिष्ये । व्रात्मणायुः- कर्मकाण्ड रखाकरे, पुण्याहवाचन गतिः (३७) वाच्यतां। 30 ब्रामंपुण्यमयंच सष्टयुत्पादनकारक। वेदवृक्षोद्भवं नित्यं तत्पुण्याहंनुवन्तुनः ॥ यजमानोक्तिः-भोत्राधणाममगृहे ऽद्यकरिष्यमाणामुककर्मणि । ॐ पुण्याईभवन्तोहवन्तु । ततो ब्राह्मणाः-30 पुण्याहम् । मन्दस्वरेण १३० पुण्याहम् । मध्यमस्वरेण पुण्याहम् । उच्चस्वरेणवारत्रयं वृयुरेचमग्रेऽपि ॥ ॐ पुनन्तु- मादेवजनापुनन्तुमनसाधियः । पुनन्तुविश्वाभूतानिजातवेदः- पुनीहिमा || 30 उद्गातेवशकुने सामगायसि ब्रह्मपुत्रइयसवनेषु शंससि । वृपेवचाजीशिशुमतीरपीत्यासर्वतोनासकुने । भद्रमावद विश्वतोनःशकुनेपुण्यमावद ॥ ब्रा०-ॐ पुण्याहसमृद्धिरस्तु ।।३।। यजमानोक्तिः-पृथिव्यामुद्धृतायान्तु यत्कल्याणंपुराकृतम् । ऋपि भिसिद्धगन्ध वैस्तत्कल्याणंवुवन्तुनः॥ भो०-ब्रामणाः श्रक० कल्याणं भवन्तोवन्तु ३ । ब्रा०-30 कल्याणम् ॥ ३ ॥ 0 यथे. मांवाचंकल्याणी भावदानिजनेभ्यः ब्रामराजन्याभ्या ॐ शूद्राय. चार्यायच स्वायचारणायच ।। प्रियोदेवानांदक्षिणायैदातुरिहभूया समयम्मेकामासमृद्ध्यताम्॥त्रा०-कल्याणसमृद्धिरस्तु। यज मान:- सागरस्यतयाऋद्धि महालक्ष्म्यादिभिःकृता । सम्पूर्णा सुप्रभावाचतांचऋद्धिंवुवन्तुनः । भोव्राह्मणाममगृहेऽमुककर्मणि. ऋद्धिंभवन्तोक्न्तु १३ ब्रा630 ऋभ्यताम् ॥ ३॥ सत्रस्य ऋद्धिरस्य॑गन्मज्योतिरमृताऽअभूम । दिवंपृथिव्याऽ अध्यामहामा विदामदेवान्त्स्वज्योतिः !! 0 ऋध्यामस्तोमं सनुयामवाजमानो मंत्रंसरथेहोपयातम् । यशोनपक्वंमधुगोप्वन्तरा भूतांशोअश्विनोः काममप्राः ॥ ब्रा०-30 ऋद्धिसमृद्धिरस्तु ॥३॥ ॐ स्वस्ति. स्नुयाऽविनाशाख्या पुण्यकल्याणवृद्धिदा । विनायकप्रियानित्य, तांचस्वस्तिवन्नुनः। भो ब्रामणाममगृहे. स्वस्तिभवन्तोवृयन्तु १३। ब्रा० अपायुप्मतेस्वस्ति ।। ३' 0 स्वस्तिन इन्द्रोवृद्धश्रवाः स्वस्तिनापूपाविश्ववेदाः । स्वस्तिनस्ताक्ष्योऽअरिष्टनेमिः स्वस्तिनो वृहस्पतिर्दधातु ॥ ॐ स्वस्तिनोमिभीतामश्विनाभगः स्वस्ति- देव्यदितिरनर्वणः । स्वस्तिप्पाअसुरोदधातुनः स्वस्तिद्यावा (३८) कर्मकाण्ड रताकरे, पुण्याहवाचन पद्धतिः पृथिवीसुचेतुना ॥ ब्राo-30 आयुष्मतेस्वस्तिरस्तु ।। 0 समुद्र- मथनोत्पनों जगदानन्ददायिनी। हरिमियाचमाङ्गल्यातांश्रियञ्च वन्ततुनः ॥ भो ब्राह्मणाः, ममगृहेऽमुककर्मणिसकुटम्वस्य सपरि वारस्यश्रियं भवन्तोब्रुवन्तु ३ ब्राह्मणाः ॐ श्रीरस्तु ।। ३ ।। ७० श्रीश्चतेलक्ष्मीश्चपल्या वहोरात्रे पावनक्षत्राणिरूपमश्विनौव्या त्तम् । इष्णनिषाणामुम्मऽइषाणसवलोकम्मऽइषाण ॥ श्रिये जातः श्रियमा निरियायश्रियंवोजरितभ्योदधाति । श्रियंव्वसा- नाऽअमृतत्वमायनभवन्तिसत्यासमिथामितद्रौ।। ब्रा०-30 श्रीरस्तु ततः सुवर्णपूर्ण कलशं भूमौस्थापयित्वा तजलेन सपनिपुत्रसहितं यजमान ब्राह्मणा अाम्रादि पल्लवैरभिषेक मन्त्रै रभिषिचयेयुः॥ अभिषेक विधिरग्रेवयते ॥ ततोयजमानः सदक्षिणामान्नानि प्रोक्षयित्वा, पूर्वपूजित ब्राह्मणेभ्योनमः सम्पूज्यच । संकल्पः कार्य:-अद्येत्यादि देशकालौसंकीर्त्य, अमुकराशिरमुकोहं ममामुक कर्मणि कारितस्य ब्राह्मण द्वारा पुण्याहवाचन कर्मणः सांगफला वाप्तयेइमानिसोपस्कराणि सदक्षिणान्यामानानि प्रजापति देव. तानि यथानामगोत्रेभ्यः पुण्याहवाचकेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्य- दातुमहमुत्सृजे ॥ इतिदत्वाप्रार्थयेत्-प्रास्मन्पुण्याहवाचने न्यूना तिरिक्तोयोविधिः सउपविष्ट ब्राह्मणानां वचनात्परिपूर्णास्त्विति भवन्तोन्वन्तु। परिपूर्णोऽस्तुविधिः॥ ॥ इति पुण्याहवाचनम् ॥
कर्मकाण्ड रक्षाकरे, पोइश मातृकापूजापद्धतिः (३८ अथ यजमानस्य नीराजनम् ।। कचित्तजसेपात्रे घृताभ्यक्तां ज्वलन्तींवत्तिका संस्थाप्य, तत्रपात्रे गन्धाश्तदधिहरिद्रासहितं पूगीफलंच संस्थाप्य, ब्राह्म- पोयजमान नीराजयेत्-30 अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहाः सूर्यो ज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा । अग्निवर्वों ज्योनिवर्चः स्वाहा । सुय्यॉव) ज्योतिर्वर्चः स्वाहा । ज्योतिः सूर्यः सूर्योज्योतिः स्वाहा ॥ ततो तिलकं कुर्यात्-३० भद्रमस्तु शिवंचास्तु महालक्ष्मीः प्रसीदतु ॥ रक्षन्तुत्वांसुराः सर्वेसम्पदः सन्तु सुस्थिराः॥ तत आशिषं दद्यात्-30 पूर्णमदः पूर्णमिदं पूर्णत्पूर्णमदुच्यते पूर्णस्य पूर्णमादाय पूर्णमेवावशिष्यते ॥ पुण्याहवाचनात्सर्व कल्याण- मस्तुतेगृहे । कीर्तिवीर्यान्वित्वोभूत्वा जीवत्वं शरदांशतम् ।। ततो ब्राह्मणाय दक्षिणां दद्यात् ।। इति नीराजनम्- अथ षोडश मातृका पूजापतिः । अधच प्रोक्तमातृका पूजा परिभाषा प्रकारेण (पंचोदी: पंचतिर्यक् च रेखा कार्याः प्रयन्तः ) षोडशमातृकायंत्रं सिन्दूर कंकुमादिना, पहेलिखित्वा दूर्वाभिर्विभूष्यवक्ष्यमाण विधिनास्था पयेत्पूजयेच ॥ संकल्पं कुर्यात्-प्रद्यपूर्वोचारित, अमुक गोत्रो. ऽसुकराशिरमकोऽहं अमुककर्मणः पूर्वागत्वेन सर्वाभ्युदय प्रासये पीटे- लिखितास प्रतिमासु गणपतिसहितगौर्यादि पोडशमा- तऋणां पूजनं करिष्ये ॥ तत्रादौ मध्य चतुष्कवायव्य कोणेगणेश मावाहयेत् । अक्षतपुष्पैः-मध्येतु मातृवर्गस्य सर्वविमिहरंसदा। त्रैलोक्यपूजितं देवं गणेशस्थापयाम्यहम् ॥ भूर्भवः स्वः गणे शेहागच्छेहतिष्ट । मध्य नैऋत्ये गौरीम्-हिमाद्रितनयादेवींवरदा शङ्कर मियाम् ॥ लम्बोदरस्थजननीं गौरीमावा हयाम्यहम् || ॐ (१०) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, पोडशमातृकापूजा पद्धति भू० गौरीहागच्छेहतिष्ट । मध्याग्नेयाम् पद्माम्-सुवर्णाभांपद्म हस्तां विष्णोर्वक्षस्थलस्थिताम् ॥ त्रैलोक्यपूजितां देवीं पद्मामावा हयाम्यहम् ।। 30 भू. पद्मेइहागच्छेहतिष्ट ॥ ततो वायव्यसन्नि- हित पश्चिमे प्रथमकोप्टे वाह्येशचीम् दिव्यरूपां विशालाक्षीशुचिं कुण्डलधारिणीम् । देवराजप्रियां भद्रांशचीमावाहयाम्यहम् ॥ 30 भू० शचीहागच्छेहतिष्ट । पश्चिमे द्वितीयकोष्ट मेधां- वैवस्व त्कृतफुल्लाजतुल्याभापद्मवासिनीम् । बुद्धिप्रसादिनीसौम्यां मेधामा वाहयाम्यहम् ॥ ॐ भू० मेधे इहा० ॥ ततोनैर्ऋत्यसनिहितदक्षिणे प्रथमकोप्टेसावित्रीम्-जगत्सृष्टिकरींधात्री रूपेणचव्यवस्थितां । ॐ काराख्यां भगवतींसावित्रीमाह्वयाम्यहम् ॥ ॐ भू० सावित्रि॥ ततो द्वितीयकोष्टे दक्षिणे विजयाम-विष्णुरुद्रार्क देवानांसर्वदाविजयप्रदाम् ॥ त्रैलोक्यवासिनीदेवीं विजयामाया म्यहम् ॥ ॐ भूर्भवःस्वः विजये, इहागच्छेहतिष्ट ॥ तत ईशान सन्निहिते प्रथमकोष्टेउत्तरेजयाम्-दैत्यरक्षःक्षयकरी देवानामभय प्रदां । त्रैलोक्यवन्दितादेवीं जयामावाहयाम्यहम् ॥ 0 भू० जये उत्तरेद्वितीयकोप्टेदेवसेनाम् मयूरवाहनादेवीं शक्तिखड्गधनुर्ध- राम् ॥ श्रावाहयेदेवसेनां तारकासुरमर्दिनीम् ॥ ॐ भू० देवसेने ईशानेस्वधाम्-कव्यमादायसततं पितृभ्योयाप्रयच्छति । पितृ- लोकार्चितादेवीं स्वधामावाहयाम्यहम् ॥ ॐ भ० स्व घे० ॥ श्राग्नेयांस्वाहाम्-हविर्गृहीत्वासततंदेवेभ्योवामयच्छति । षन्हि' प्रियाचयादेवी स्वाहांतामाह्वयाम्यहम् ॥ भूस्वाहे हागच्छेह तिष्ठ ॥ ततईशान सन्निहितेप्रथमकोप्टेमातः-भूतग्राममिमंकृल्सं याभित्पादितपुरा ॥ त्रैलोक्याजितादेवी तिरावाहयाम्यहम्।। भू० भोकीादित्रयोदशगृहमातरः, इहागच्छुत, इहातष्ठत ।। पूर्वेद्वितीयकोप्टेलोकमातृः-आवाहयेलोकमातृर्जगत्पालनसंस्थिताः शकाद्यैरचितादेवीः स्तोत्रैराराधनेस्तथा ॥ ॐभु० भोजाइम्यादि सप्तलोकमातरः, इहागच्छत,इहनिष्ठत ॥ ततोवायव्येधृतिपुष्टिंच- नमस्तुष्टि करीं देवीं लोकानुग्रह कर्मणि । सर्वकार्य समृ.
कर्मकाण्ड रताकरे, पोडश मातृकापूजापद्धतिः ध्यर्थं धृतिमावाहयाम्यहम् ॥ ॐ भू० धृते । तत्रैव पुष्टिंम्-- आवाहयाम्यहं पुष्टिं जगद्विघ्न विनाशिनीम् कार्यपुष्टि करी देवी रक्षणायाध्वरस्यच || ॐ भू० पुष्टि । ततो नैत्येतुष्टिम्-श्रा- वाहयाम्यहं तुष्टिं विद्युदुज्वल कुण्डलाम् ॥ धर्मतुष्टिकरी देवी यज्ञरक्षणहेतवे ।।तत प्राभ्यन्तरईशानकोटे कुलदेवी-श्रावाहयामि त्वांमातर्वशरक्षार्थमध्वरे। सर्वसिध्दि प्रदांमायांकुलदेवी प्रपूजये। ॐ भू० अमुकिकुलदेवि, इहागच्छेहतिष्ठ । एतन्तेति प्रति- टाप्य,, भूर्भुवःखः गणेशसहिताः गौर्यादि मातरः, लोक मातरः, गृहमातरः, सुप्रतिष्ठिता भवन्तु, चिरमिहतिष्ठन्तु वरदा भवन्तुच ॥- गणपति सहित गौर्यादि मातृभ्योनमः इति मन्त्रेण,, पायं समर्पयामिवोनमः ॥ स्नानीयंजलम् । वस्त्रे चन्दनम् पुष्पाणि | धूपं० । दीपं० । नैवैद्यम् । दक्षिणाम् ।। पूजनंविधाय, वसोर्धारा संकल्पंकुर्यात्-अद्य० अमुकोहं, अमुक कर्मणि, सर्वाभ्युदय प्राप्नये गणपति सहित गौर्यादि-मात्ऋणा मुपरि गुडघृताभ्यां वसोर्धाराः पातयिष्ये ॥ ततः पात्रे सगुड़- घृतं द्रवीभूतं कृत्वा-पट्टलिखित मात्ऋणामुपरि पञ्चसप्तवा वसोर्धाराः पातयेत्-3 व्वसोः पवित्रमसि शतधारं व्यसोः पवित्रमसि सहस्रधारम् । देवस्त्वा सवितापुनातु व्वसोः पवित्रण शतधारेणसुप्वाः कामधुक्षः ॥ ॐ श्राज्यं यतोस्तिदेवानामशनं मङ्गालात्मकम् । ततो मात्ऋः समुद्दिश्यवृतधारा ददाम्यहम् ।। इतिमन्त्राभ्यां ( कुड्यस्तम्भसुसंलग्ना मात्णामुपारस्थिताः ।। फारयेत्पञ्चतिनोवा सप्तवोदङ्मुखस्थिताः) इतिधाराः पाताय त्वा तच्छेपकृतं यजमानः स्वशिरसि लिम्पेत् ॥ [ केचिदत्रघृत मात्ऋणामपि पूजनंकुर्वन्ति तद्यथाध्यायेत्-- श्रीश्चलक्ष्मी). तिर्मेधापुष्टिः प्रज्ञा सरस्वती। मांगल्येषु प्रपूज्यन्तेसप्तैता धृत मातरः। ॐ श्रियैनमः । ॐ लक्ष्म्यनमः। आधृत्यैनमः । ॐ मेधायैनमः । ॐ पुष्ट्यैनमः । प्रज्ञायैनमः । ॐ सरस्वत्यै नमः ॥ इति नाममन्त्रैः पाद्यादिभिः सम्पूज्य ॥ बसोर्धारा ६ ( ४२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, वसोर्धारापूजा पद्धतिः पूजनंकुर्यात् ॥ ॐ चसोर्धारादेवताभ्योनमः ॥ इति मूल- मन्त्रेण सम्पूज्य-ततो नीराजनम्-करंनिर्मलं दिव्यं चन्हि- नादीपितंमया । नीराजनं प्रगृहीतय्यं सर्वाश्चमातृकाः ॥ ] ततः क्रमशः पुष्पांजाल दद्यादादौ गणपतिम्-मध्येतुमातृवर्गस्य सर्वविघहरंसदा । त्रैलोक्यपूजितं देवं गणेशं प्रणमाम्यहम् ॥ ततो गौर्यादी:-30 गौरी पद्मां शची मेधां सावित्री विजयांजयाम् । देवसेनांस्वधांस्वाहां मात्श्च लोकमातृकाः ॥ धृतिं पुष्टिं तथा तुष्टिं श्रात्मनः कुलदेवतास् । प्रार्थयामिसदाभक्त्या वृध्दिश्राध्द समृध्दये ॥-ततो गृहमात्यः-कीतिःकीर्तिकरी समृध्दिकरणी लक्ष्मीधृतिधैर्यदा, मेधाधीकरणीच पुष्टिरमला श्रध्दाक्रियावामतिः। लज्जाविग्रहणीच शान्तिशरणी तुष्टिश्च कान्तिस्तथा, वन्देहं गृह मातृकार्गहपतेः सौभाग्य सौख्याप्तये ॥ ततोलोकमात्:- ॐ ब्राह्मींमाहेश्वरीचव कौमारीवैष्णवींतथा॥ वाराहींच तथे- न्द्राणींचांमुडां प्रणमाम्यहम् ॥ वसून्--30 वसवोऽष्टौमहा- भागाः पूजिताविधिमार्गतः ॥ कुर्वन्नुकार्य मखिलं निर्विघ्नेन ऋतृद्भवम् ॥ सांगागौर्यादि षोडशमातरः प्रसन्नाभवन्त । ॥ इति पोडश मातृकापूजा पद्धतिः ॥ अथ देशप्रथा नुकूलवसोर्धारा पूजनम् ॥ तत्रादौपूर्वोत्तरक्रमेणभित्तौ पञ्चसप्तवावृतधारा वक्ष्यमाण मन्त्रेणकुर्यात्-30 व्यसो पवित्रमसिशतधारं व्वसो पवित्रमसि- सहस्रधारंदेवस्त्वासवितापुनातु॥ वसो पवित्रेणशतधारेण सुप्वा कामधुतः ॥ इतिकृत्वा, 3 एतन्तेदेव इतिप्रतिष्ठाप्य, 30 वसुः धारादेवताभ्योनमः, इतिपाद्यादिभिःसम्पूज्य प्रार्थयेत्-30 वसवो टौमहाभागाः पूजिताविधिमार्गतः ।। कुर्वन्तुकार्यमखिलं निर्वि- घ्नेनऋतृद्भवम् ॥ वा-शान्ताकारं० ॥ इति वसुधारा पृजाम् ॥
कर्मकाण्ड रताकरे, नान्दीश्राद्ध पद्धतिः अथ नान्दीश्राद्धपद्धतिः अधा ऽभ्युदयिक श्राद्धम्-धौश्वेितवस्रंपरिधाय त्रिराचम्य पुष्पान्तहस्तः, 30 यंब्रह्मवेदान्तचिदोचदन्ति परंप्रधानंपुरुपंतथा- ऽन्ये । विश्वोद्गतेकारणमीश्वरम्बा तस्मैनमोचिनविनाशनाय, ॥ विष्णुंध्यायेत्-30 शुक्लांबरधरंदेवं शशिवर्णचतुर्भुजम् । प्रसन्न वदनध्याये द्विष्णुंविघ्नोपशान्तये ॥ दूर्वायवान्गृहीत्वा दिग्बन्धनं कुर्यात् ॥ यवारक्षन्तुदितिजारक्षन्तुराक्षसात् , पंक्तिवैश्रो- त्रियोरचे दतिधिःसर्वरक्षकः ॥ ततोदृर्चाभिवीवन्धनम्-30 सोमस्यनीविरसिविष्णोः शर्मासिशर्मयजमानस्य योनिरसि सुसस्यास्कृषीस्कृधिः ॥ इति दक्षिणकट्यांधारयेत् ॥ ततोभृमौ चन्दनेन शङ्खचक्रेलिखित्वातदुपरिर्वात्रयमासनंतदुपरि, अर्घपात्रं तत्रदपवित्रंक्षिपेत्-मन्त्रा-30 पवित्रेस्थोवैष्णव्यौसवितर्वः प्रसवऽउत्पुनाम्यच्छिद्रेण पवित्रेणसूर्यस्यरश्मिभिः। तत्पात्रेजलम् मन्त्रः-30 शन्नोदेवीरभिष्टयऽयापोभवन्तुपीतये शय्योरभिश्रयः न्तुनः || यवान्-30 यवोऽसियवया स्मदद्वेपोयवयारातिदिवेत्वा न्तरिचायत्वा पृथिव्यत्वा शुध्दन्ताल्लोकाःपितृपदनापितृपदन मसि ॥ चन्दनाक्षतपुष्पाणि तृष्णीनिक्षिप्यतेनजलेनदूर्वांकुरैरा त्मानं नान्दीमुखश्राध्दसामग्रींचसम्प्रोक्ष्य, प्राणायामंकृत्वा, पित्तनु द्दिश्यावाहयेत 3 देवताभ्यःपितृभ्यश्चमहायोगिभ्याएवच । नमास्वाहायस्वाहायै नित्यमेवनमोनमः ॥ इतिवारत्रयंपठेत् ॥ ततः पुनर्गायत्रीमत्रेणकर्मपात्रस्थजलमभिमन्न्य, 0 शूद्रादि- दृष्टिनिपातदोपादामान्नादीनां पवित्रतास्तु ।। इत्यामानादीन्योक्ष्य प्रतिज्ञासंकल्पंकुर्यात्-30 अद्यत्यादिदेशकालौ संकीर्यमुक गोत्राणां अस्मन्मातृपितामही प्रपितामहीनाम् अमुकदेवीनांवसु. रादित्यस्वरूपाणांनान्दीमुखीनां, तथा अमुकगोत्राणां अस्मित्पि. तृपितामह प्रपितामहानां, अमुकदेवानांवसुमद्रादित्यस्वरूपाणां * टि० अप्रवृद्धि श्राद्धे-वैदिक मंत्रेऽपिराधाशब्दप्रयोगे स्वाहा, इतिवाच्यः ।।
(४४) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, नान्दीश्राद्ध पद्धतिः नान्दीमुरवीनां, तथा अमकगोत्राणां, अस्मन्मातामहप्रमातामह वृध्दप्रमातामहानां, अमुकदेवानांसपत्निकानां वसुरुद्रादित्यस्वरू- पाणां नान्दीमखाना, प्रीतयेमककर्मणिसत्यवसुसंज्ञक विश्वेदेव पूर्वकं नान्दीमखश्राध्दमहंकरिष्ये ॥ कुरुष्वेतिब्राह्मणोवदेत् ॥ ततोब्राह्मणक्रमेणा आसनानिदद्यात् ॥ दूर्वात्रययवजलंच गृहीत्वा. अद्येह नान्दीमुग्वाऽमुकगोत्रास्मन्मात्रादि जयश्राद्ध सम्बन्धिनां, तथामुकगोत्रास्मत्पित्रादित्रयश्राद्ध सम्वन्धिनां, तथाऽमुकगोत्रा स्मन्मातामहादि त्रयश्राद्ध सम्वन्धिनां सत्यवसु संज्ञकानां वि- श्वेषां देवानां, इदमासनंवो नमो वृद्धि २ श्रिय,, 30 विश्वेदेवाः शृणुतेम ! हवम्मे येऽअन्तरिक्षयउपद्यविष्ट ॥ येऽअग्निजिह्वा ऽउतवायजत्राऽत्रासद्यास्मिन्वर्हिषि मादयध्वम् ॥ ॐ सत्यव सुसंज्ञकेभ्यो विश्वेभ्यो देवेभ्योनमः,, ततो मात्रादित्रयस्थंडिले श्रासनदानम्-तथा अमुकगोत्रा अस्मन्मातृपितामही, प्रपिता मह्या, अमुकदेव्यः वसुरादित्य स्वरूपानान्दीमुख्यः, इदमासनं वो नमो वृद्धि २ श्रियै,, तथामुकगोत्रा अस्यपितृपितामह प्रपितामहा अमुकदेवाः, वसुरुद्रादित्यस्वरूपाः नान्दीमुखाः, इद मासनंवो नमोवृद्धि २ श्रियै,, तथामुकगोत्रा अस्मन्मातामह, प्रमातामह वृद्ध प्रमातामहाः सपत्नीकाः वसुरादित्यस्वरूपाः नान्दीमुखाः इदमासनं वो नमो वृध्दि २ श्रियै,, इतिध्यात्वा ।। नतासनक्रमेणपूजनं,तत्रादौविश्वेषांदेवानाम्-30 विश्वेदेवासऽवागतशृणुतामइमर्ट०वम् ॥ एदम्वहिनिपीदत ॥ ॐ सत्यवसुसंज्ञकेभ्योविश्वेभ्यो देवेभ्योनमः ॥ गन्धाक्षतपुष्प धूप दीपनैवैद्यादिकंदत्वा पितृपूजनम्- मातृ पितामहीप्रपिता महीभ्योनमः । ॐ पितृपितामहप्रपितामहेभ्योनमः ॐ मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहेभ्यः सपत्निकेभ्योनमः सम्पूज्य ॥ सङ्कल्पः अद्येहयमुफगोत्रास्मन्मात्रादि जयश्राद्धसम्बन्धिनः,तथा मुफगोत्रास्मत्पित्रादित्रयश्राद्धसम्बन्धिनः, तथाऽमुफगोत्रास्मन्मा नामहादित्रयश्राद्धसम्बन्धिनः सत्यवसुसंजकाः विश्वेदेवाःअर्चन- .
कर्मकाराड रनाकर, नान्दीश्राद्ध पद्धति विधौइमानि गन्धाक्षतपुष्पधूपदीपनैवैद्य वासोदत्तिणादीनिथामा नानिच, यथाविभागंवोनमोवृध्दि २ श्रियै ।। ततोमातृस्थण्डिले अद्येत्यादि० अमुकगोनाग्रस्मन्मातृपितामही प्रपितामहाः श्रमक देव्यः, नान्दी मुख्यः ॥ नथाऽमुक गोत्रास्मपितृ पितामह प्रपि- तामहाः, अमुकदेवाः धसुरुद्रादित्य स्वरूपाः नान्दीमुग्वाः,, तथा मुफगोत्रा यस्मन्मातामह प्रमातामह वृद्धप्रमातामहा अमुकदेवाः सपत्नीका चसुरुद्रादित्य स्वरूपा नान्दीमुखा अर्चनविधी, इमानि गन्धाक्षत पुष्प धूप दीप नैवैद्य बासो दक्षिणा दीनि-यथा विभागवो नमो वृद्धि २ श्रिय,, पुनः पूजनम् ॐ मातृपितामही प्रपितामहीभ्योनमः ॥ ॐ पितृपितामह प्रपितामहेभ्योनमः ॥ ॐ मातामह प्रमातामह वृद्ध प्रमातामहेभ्यः सपत्नीकेभ्योनमः ।। इति गन्धाक्षतादिभिः सम्पूज्य,, ॥ यजमानोवदेत्-अर्चन विधिः परिपूर्णोऽस्तु ॥ ब्राह्मण:-अस्तुपरिपूर्णः ॥ पाचमनंकृत्वा, ततो सफल दधिकृत मिष्ठान्नसहितानि सदक्षिणानि .ामान्नानि चतु. स्थण्डिलेपुचतुर्धाविभज्य, पानेपु स्थापयेत् ,, संकल्प:-अद्येह, अमुक गोत्रास्मन्मात्रादित्रय नान्दीश्राध्द सम्बन्धिभ्यः,, तथा, अमुक गोत्रास्मत्पित्रादित्रय, नान्दीश्राद्ध सम्बन्धिभ्यः,, तथा- अमुक गोत्रास्मन्मातामहादित्रय नान्दीश्राद्ध सम्बन्धिभ्यः सत्य वसुसंजकेभ्यो विश्वेभ्योदेवेभ्यः इदमामान्न सदक्षिणं यथाशंवो नमो वृद्धि २ श्रियै,, तथा अमुकगोत्राभ्योऽस्मन्मात पिता- मही प्रपितामहीभ्यः, अमुक देवीभ्यो वसुरुद्रादित्य स्वरूपाभ्यो नान्दीमुखीभ्य इदमामानं सदक्षिणं दधिकृत जल सहितं यथा- विभागवो नमो वृध्दि २ श्रियै,, तथा-अमुक गोत्रेभ्योऽस्मत्पि तृपितामह प्रपितामहेभ्यो ऽअमकदेवेभ्यो वसुन्द्रादित्य स्वरूपे भ्योनान्दीमुखेभ्य इदमामान्नं सदक्षिण-सजल दधिघृतादियुतं यथाविभागंयो नमो वृध्दि २ श्रियै,, तथा श्रमकगोत्रेभ्योऽस्म- न्मातामह प्रमातामह वृध्द प्रमातामहेभ्योऽमुकदेवेभ्यः सपत्नीके. भ्यो बसम्द्रादित्य म्वरूपेभ्यो नान्दीमखेभ्य इदमामान्नं सजल , कर्मकाण्ड ग्नाकर, नान्दीश्राद्ध पद्धतिः दधिघृतादिसहितं, सदक्षिणं-यथा विभागंचो नमो वृध्दि २ श्रिय,, इति समर्प्य ॥ तत श्रामान्नपूजनम्-ॐ अन्न पतेन्नस्य नोदेहानमीवस्य शुष्मिणः प्रप्रदातारन्तारिप ऽऊर्जन्नोधेहिद्विपदे चतुष्पदे,, इतिमन्त्रेण गन्धाक्षतादिभिः सम्पूज्य, ब्राह्मणंच सम्पूज्य,, सङ्कल्प:--अधेहेत्यादिदेशकालौ संकीर्त्या ऽमकोई मात्रादि त्रयाणां पित्रादि त्रयाणां, सपत्नीकानां मातामहादि- बयाणां वसुरुद्रादित्य स्वरूपाणां नान्दी मखानां प्रीतये अमक कर्मनिमित्तक सत्य वसु संज्ञक विश्वेदेव पूर्वक नान्दीमुख श्राध्द कर्मणः सांगफल प्राप्तये समस्त पित्णां-विश्वेषां देवानांच पीतये इमान्यामानानि प्रजापति देवत्यानि सदक्षिणानि, अमक शर्मणे ब्राह्मणाय समस्त पित्शृणा मक्षय्य तृप्त्यर्थं वो नमो वृध्दि २ श्रिय, ततो यजमानो वक्ष्यमाणमन्त्रेण खतिलकंकुर्यात्- ॐ सत्यानुष्ठानसम्पन्नाः सर्वदायज्ञबुध्दयः । पितृ मातृ पराश्चैव सन्त्वस्मत्कुलजानराः ॥ ततो-ॐ देवताभ्यः इति निःपठेत्- ततो यजमानो वदेत्-विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम् ॥ ब्राह्मणोक्ति:- ॐ विश्वेदेवाः प्रीयन्ताम् ।। य० स्वस्तिभवन्तो वृवन्तु,, ब्रा० ॐ स्वस्ति । य० इदंवृध्दि श्राध्दं देशकाल अन्नदक्षिणादि वाक्य हीनं यत्कृतं तत्सुकृतमस्तु ॥ यत्कृतं श्रीनारायणप्रसादाबामण वचनात्परिपूर्णमस्तु ॥ ब्रा० अस्तुपरिपूर्णम् ॥ ततः श्राध्दं विस र्जयेत्-तत्रादौ विश्वेदेवान्विसर्जयेत्-ॐ व्वाजेवाजेवत व्याजि नोनो धनेषुविप्राऽमृताऋतज्ञाः॥ अस्यमध्वः पिबतमादयध्द तृप्तायात पथिभिर्देवयानः ॥-ततो नीवींविसृज्य अर्घपात्रनाम यित्वा विसृज्य आचम्य,, पितृप्रसादं गृहीयात् ॥ ॥ इत्याभ्युदयक श्राद्धपद्धति ॥
फर्मकाराष्ट्र रक्षाकर, नवग्रहपजापद्धति (४७) अथ नवग्रहपूजापद्धति। अथच कर्ता श्राचमनादिभूतोत्सादनंकृत्वा प्राणायाम विधाय, सङ्कल्पः-अद्यत्यादिदेशकालौसंकीर्त्य अमुकगोत्रोऽमक शहिममककर्मणि पंचोपचारेणवापोडशोपचारेण सूर्यादिनव- ग्रहाणांएजनकरिष्ये,, तत्रादौसूर्यमध्येध्यायेत्-पद्मासनपद्मकरो द्विवाहुः पद्मद्युतिःसप्ततुरङ्गवाहनः ॥ दिवाकरोलोकगुरुःकिरीटी मयिप्रसादविदधातुदेवः ॥ श्रावाहयेत्-प्राकृष्णेतिहिरण्यस्तृप ऋपित्रिष्टुप्छन्दः सवितादेवतासूर्यावाहनेविनियोगः ॥ ऋक्-30 आकृष्णेनरजसावर्त्तमानोनिवेशन्नमृतं मर्यश्चहिरण्ययेनसवितार- थेनदेवोयातिभुवनानिपश्यन् ॥ ॐ भूर्भुवःस्वः कलिंगदेशोगव काश्यपसगोत्रसूर्यहागच्छेहतिष्ट। सोमन्ध्यायेत्-श्वेताम्वर श्वेत विभूषणश्च श्वेतद्युतिर्दण्डधरोद्विवाहुः ॥ चन्द्रोऽमृतात्मावरदः किरीटी मयिप्रसादंविदधातुदेवः ॥ इमंदेवेतिगौतमऋषिर्द्विपदा विराट्छन्दः सोमोदेवतासोमावाहने वि०॥ ऋक्-30 इमन्देवाs असपत्नर्ट० सुयध्वदमहतेक्षत्रायमहते ज्यैष्टयायमहतेजानराज्या येन्द्रस्येन्द्रियाय । इयममुष्यपुत्र ममुष्यपुत्रमस्यै, विशएपवो मीराजासोमोऽस्माकं ब्राह्मणाना राजा ।। 30 भू० यमुनातीरो- द्भवात्रेयसगोत्र, सोमेहागच्छेहतिष्ट ॥ भौमंध्यायेत्-रक्ताम्वरो रक्तवपुःकिरीटी चतुर्भजोमेपगमोगदाधरः ।। धरासुत शक्तिधरश्च शूली सदाममस्याद्वरदःप्रशान्तः।। आवाहयेत् अग्निदेतिविरू पाक्ष ऋषिर्गायत्रीछन्दोऽङ्गारकोदेवताभौमाचाहने वि०॥ ऋक्- ॐ अग्निर्मू दिवाककुत्पतिःपृथिव्याऽअयम् ।। अपारेता सिजिन्वति ॥ ॐ भू० अवन्तिदेशोद्भव भारद्वाजगोत्रभौमेहाग च्छेहतिष्ट।। बुधंध्यायेत्-पीताम्बरःपीतवपुःकिरीटीचतुर्भुजोदण्ड धरश्चसौम्यः॥ सिंहस्थितश्चन्द्रसुतोहरिप्रियः सदाममस्याहरदो- स्तुसौम्यः॥ आवाहयेत्-उद्बुध्यस्वेतिपरेमेष्टीपिस्त्रिष्टुप्छन्दो बुधोदेवनावुधावाहने वि० ॥ ऋक-30 उद्बुद्धयस्वाग्ने प्रनिजागृ- (४८) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, नवग्रहपूजा पद्धात' , हित्व मिष्टापूर्तसर्ट० सृजेथामयश्च ॥ अस्मिन्त्सधस्थेअध्युतरस्मि विश्वेदेवा यजमानश्चसीदत ॥ ॐ भृ० मगधदेशोद्भवात्रेयस गोत्रवुधेहागच्छेहतिष्ट ।गुरूंध्यायेत्-पीताम्बरः पीतवपुःकिरीटी चतुर्भुजो देवगुरु प्रशान्तः ॥ तथाक्षसूत्रञ्च कमण्डलुञ्चदंडंच विभ्रद रदोस्तुमह्यम् ॥आवाहयेत्-वृहस्पतइति गृत्समदऋषित्रिष्टुप्छन्दो गुरुर्देवता, बृहस्पत्यावाहने वि०॥ऋक-ॐ बृहस्पतेऽअतियदर्यो श्रोद्यमद्विभातिक्रतुमज्जनेपु । यहीदयच्छवसऽऋतप्रजा ततदस्मा सुद्रविणंधेहिचित्रम् ॥ ॐ भूर्भुवःस्वः, सिन्धुदेशोद्भवाङ्गिरसगोत्र वृहस्पते, इहागच्छेहतिष्ट ॥ भृगुन्ध्यायेत्-श्वेताम्बरःश्वेतवपुः किरीटी चर्तुभुजोदैत्यगुरुः प्रशान्तः। तथाक्षसूत्रश्चकमण्डलुश्च दण्डञ्चविभ्रहरदोंस्तुमह्यम् ॥ श्रावाहयेत्-अन्नात्परिश्रुतइतिप्रजा पत्यश्वीसरस्वतीन्द्रादयऋषयस्त्रिजगतीछन्दः शुक्रोदेवताशुक्रा वाहने विनियोगः ॥ ऋक्-ॐ अन्नात्परिनुतोरसंब्रह्मणाव्यपि यत्क्षत्रंपयः सोमप्रजापतिः। ऋतेनसत्यमिन्द्रियं विपानर्ट शुक्र मन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोमृतमधु ॥ 0 भू० भोजकटदेशोद्भ वभार्गवगोत्रशुक्रेहागच्छेहतिष्ट ॥ शनिध्यायेत् नीलाम्वरःशूल धरःकिरीटी गृध्रस्थितस्त्रासकरोधनुष्मान । चतुर्भुजःसूर्यसुतः प्रशान्तः सदास्तुमहांवरदोल्पगामी ॥ आवाहयेत् शन्नोदेवीति दध्द्यङ्ङाथर्वण ऋषिर्गायत्रीछन्दः शनिश्चरोदेवता शनिश्चरा वाहने वि०॥ ऋक्-ॐशन्नोदेवीरभिष्ठयऽप्रापोभवन्तुपीतये । शंय्योरभिश्रवन्तुनः ॥ ॐ भू० सौराष्ट्रदेशोद्भवकाश्यपगोत्रशने, इहागच्छेहतिष्ठ॥राहुँध्यायेत्-नीलाम्बरोनीलवपुःकिरीटी, कराल वक्त्रःकरतालशूली, चतुर्भुजरचक्रधरश्चराहुः सिंहासनस्थोवरदो- स्तुमह्यम्,, आवाहयेत्-कयानइतिवामदेवऋपिर्गायत्रीछन्दो राहु देवताराहावाहने वि० । ऋक्-0 कयानश्चित्रऽयाभुवदतीसदा वृधःसग्वा । कयाशचिष्ठयावृता । . भृ० राठीनापुरोवपैठिनस गोत्र राहोइहागच्छेहनिष्ठ ॥ केतुंध्यायेत् -धूम्रोद्विवाहुर्चरदोगदा धरोगृध्द्रासनस्थोविकृताननश्च । किरीटकेयरविभूपितरच सदास्तु कमकाएड रताकरे, नवपदपूजा पद्धतिः (४६) में केतुगण:प्रशान्त्यै ।। धावाहयेत्-केतुंकृण्वन्नितिमधुरछन्दऋषि र्गायत्रीछन्दः केनुर्देवताकेत्वाचाहने वि० । 30 केतुंकृण्वन्नकेतवे पेशोमर्याऽअपेशसे । समुपद्भिरजायथा, ॐ भू० अन्तर्वेदीसमुः ड्रच जैमिनसगोत्र केतो इहागच्छेहतिष्ट, ततः प्रतिष्ठायेत्-ॐ एतन्ते देवसवितर्यज्ञं माहुहस्पतये ब्रह्मणे । तेनयज्ञ मवतेन यज्ञपतिं तेनमामव । मनोयूतिर्युपता माज्यस्य वृहस्पतिर्यज्ञ मिमंत्वनोत्वरिष्ठंयज्ञर्ट समिमन्दधातु। विश्वेदेवासऽइहमादयन्ता मोम्प्रतिष्ट ॥ ॐ भास्कराद्यानग्रहाः सुप्रतिष्ठिता भवन्तु ॥ श्रा सनम्-दिव्यांवरं निर्मलंच कौशेय निर्मितंपरम् ॥ श्रासनंच मयदात्तं प्रगृहीत नवग्नहाः । स्नानीयंजलम्-पवित्रं निर्मलवारि सर्वगन्धसमन्वितम् ॥ स्नानीयं परमंदिव्यं प्रगृहीत नवग्रहाः।। वस्त्रम्-ग्रहवानिवस्त्राणि पवित्राणि शुभानिच । मयादत्तानि गृहन्तु भास्कराद्या नवग्रहाः ॥ चन्दनम्-मलयागिरिसम्भूत केशरेणसमन्वितम् । प्रगृहन्तुमयादत्तचन्दनंग्रहदेवताः॥ॐ नवग्रह देवताभ्योनम अक्षतान्समर्पयामि॥ऋतुजानिसुपुष्पाणि दुर्वाकुर- युतानिच । समानीतानि पूजार्थं गृह्णन्तु ग्रहदेवताः ।। धूपम्-वन- स्पतिरसोत्पन्नं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ॥ धूपमायकं दिव्यं प्रगृहीत नवग्रहाः ॥ दीपम-साऽयंसद्धति संयुक्तं वन्हिना दीपितं मया ॥ श्रारार्तिक्यं प्रगृहीत भास्कराधा नवग्रहाः ॥ नैवैधम्-अन्नचतुर्विधवादु-वृतदुग्ध समन्वितम् ॥ भक्त्यार्पितंच नैवैद्य प्रगृहीत नवग्रहाः॥ ॐ ग्रहदेवताभ्योनमः, उपायनीभत द्रव्यं समर्पयामि । पुष्पान्तहस्तः प्रार्थयेत्-ॐ ब्रह्मामुरारि त्रिपुरान्तकारी भानुः शशी भूमिसुतोवुधश्च ॥ गुरुश्चशुक्र: शनि- राहुकेतवः सर्चग्रहाः शान्तिकराभवन्तु ॥ ॐ मन्त्रहीनं प्रियाहीनं भक्तिहीनंच यत्कृतम् । पूजनंतन्मयाचारक्षमध्वं ग्रहदेवताः॥ ।। इति नवग्रहपूजा पद्धतिः॥
(५०) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, रक्षांविधान पतिः - अथ रक्षाविधानम्॥ यवान्कुशास्तों दूर्वां सर्वपान्गन्धमक्षतान् । गोमयंदधि संयुक्तंकारयेत्ता भाजने ॥ तत्रैव स्थापयेत्सूत्रं रक्षार्थ रक्तपीत कम् ॥ हस्तेनमन्त्रये द्विद्वान्यक्ष्यमाणैः सुमन्त्रकैः ॥ मन्त्रा-ॐ गणाधिपं नमस्कृत्यं नमस्कृत्य पितामहम् । विष्णरुद्रश्रियदेवीं वन्दे भक्त्यासरखतीम् । प्राचार्या मुनयश्चैव भास्करद्यिा नव ग्रहाः तेसर्वेममयज्ञस्य रक्षां कुर्वन्तु विघ्नतः । प्राचीरक्षतुगोविंद धांग्नेयीं गरुड़ध्वजः । यामीरक्षतुंवाराहों नारसिंहस्तूंनैर्ऋतीम् । केशवो वारुणीरक्षे द्वायवीं मधुसूदनः। उदीचीं श्रीधरोरवें देशानीतुं गदाधर-ॐवं गोवर्धनधरोह्यधस्ताद्धरणीधरः' एवं दश दिशोराद्वासुदेवो जनार्दनः । शखोगदा तथर्चिक्रः पा द्वाराणिरक्षयेत् । उपेन्द्रः पातु'ब्रह्माणमाचार्यपातुवामनः । यज मानं सपत्नीक पुण्डरीक विलोचनः । रक्षाहीन' यत्स्थान तत्सर्व- रक्षताद्धरिः । वेदमन्त्रैश्च कर्तव्याराशुनश्चसपैः । कृत्वापोटलीका पूर्ववनीयाइक्षिणेकरें ॥ वेदमन्त्री श्रादौं गायत्री ॐगणनान्त्वा०३ ॐ जातवेदसें सुनवामसों- ममरीती यतोनिंदहाँतिवेदः । सेनः पर्षदति"दुर्गाणि विश्वानावेव सिन्धु दुरिताऽत्येग्निः ॐ सप्तऋषयः प्रतिहिताः शरीर सप्तरक्षन्ति संदमप्रमादम् ॥ सप्तापः स्वपतों लोकायु स्तंत्र जागृतोऽअस्वजो संत्रसदौच देवौं । नतद्रक्षा ॐ सिनपिशाचास्तरन्तिदेवानामोजः प्रथमंज'ॐ ह्येतत् । योविभर्ति दाक्षायणर्ट० समनुष्येषु कृणुतेदीर्घमायुः यदानन्दा क्षायणा हिरण्यशतानीकाय सुमनस्यमानाः। तन्मध्यावना मिशतशारदायायुष्मान् जरदष्टियधासम् । रक्षोहएंब्यलगहने वैष्णवीमिदमहं तम्ब्बलगमुत्किरामि यम्मेनिष्टयोयममात्योनिच रखाने दमहंतम्व्वलगमत्किरामि यम्मेसमानो यमसमानो निचग्वाने दमहतम्बलगमुत्किरामियम्मे सयन्धुर्यमसवन्धुर्निचवाने दम " कर्मकाण्ड रताफर, घृतछाया दर्शनम् (५१ तेव्वलगमुत्किरामि यम्मेसजातोयमसजातो निचखानोत्कृत्यां- किरामि ॥ रक्षोहणोव्योव्वलगहनः प्रोक्षामिव्वैष्णवान रत्तोहणो वोव्वलगहनो ऽवनयामि वैष्णवान रक्षोहणो वोव्वलगहनो ऽव- स्तृणामिवैष्णवान् रक्षोहणौवांव्वलगहना उपदधामिवैष्णवी रक्षोरणौवांव्वलगहनो पहामिवैष्णवी वैष्णवमसि वैष्णवास्थः प्रत्युष्टई० रक्षः प्रत्युष्ठाऽअरातयो निष्ठप्सर्ट० रक्षोनिष्टप्साऽअरा- तयः । उर्वन्तरिक्षमन्वेमि । रक्षोहा विश्वचर्षणि रभियोनिमयो हते द्रोणेसघस्तमासदत् ।। इतिमंत्रः पीतकौशेयवम्ने पोठलिका मभिमंत्र्य पुषस्यदक्षिणकरे स्त्रियोवामकरेवनीयात् ।। चन्धन मंन्त्रौ ॐ येनवदो वलीराजा दानवेन्द्रोमहाबलः । तेनत्वामभि वध्नामि रक्षेमाचलमाचल || ॐ त्वंयविष्ठदाशुषोल्पाहि शृणु धीगिरः । रक्षातोकमुतत्मना । इति रक्षाविधानम् । अथ घृतच्छायादर्शनम्। श्रथच द्रवीभूतमाज्य ताम्रपत्रिकांस्यपात्रेवा पूरयित्वा तत्र सुवर्ण रजनद्रव्यवाप्रक्षिप्यचन्दनाक्षतः सम्पूज्यवक्ष्यमाणमन्त्रैः कुशैर्दूर्वाभिरालोड्याभिमन्त्रयेत्-मन्त्रा:-30 प्राज्यपरमयज्ञी यमाज्यतेजोमयोनिधिः। श्राज्यहिदेवदेवानां प्रियमाज्ये स्थित जगत् ।। तदाज्यवीक्षणेभक्त्या कृतेमगलमाप्नुयात् ।। दुःस्वप्नो दुनिमित्तंच विघ्नौधोनत्यतिध्रुवम् । तेजः प्रज्ञाचशौर्यच वलंचापि प्रवर्धते । पुण्यंसप्ताङ्गराज्यंच भवेदन्यमभीप्सितम्।। ज्ञात्वावा ज्ञानतोवापि मनोवाकायकर्मभिः । कृतंयत्पातकतन्मे घृतस्पर्शा विनश्यतु ।। श्राज्येचैवमुखदृष्ट्वा सर्वपापैःप्रमुच्यते । इत्यभिमध्य सङ्कल्पः श्रोत्यादि० श्रमकगोत्रो ऽमुकराशिरमकोहं सर्वारिष्ट निवृत्तये श्राज्यावेक्षणकरिष्ये । ॐ तेजोसीति परमेष्टीऋषिन्त्रि (५२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, तिलपात्र दानमंत्र ष्टुप्छन्दः, श्राज्यंदेवता आज्यावेक्षणे विनियोगः। तेजोसि शुक्रमस्यमृतमसिधामनामासि प्रियंदेवाना मनाधृष्टदेवयजनमसि वोसिधवोयं यजमानेस्मिन्नायतने प्रजया पशुभिर्भूर्यात् । घृतेनद्यावापृथिवी पूयेथामिंद्रस्यच्छदिरसिविश्वजनस्यच्छाया। इतिघृतेशरीरछाया दर्शनंकृत्वा प्राज्यहस्तेनस्पृष्ट्वा,, ब्राह्मणं सम्पूज्य श्रोत्यादि० अमुकराशिरमुकशर्माहं इदंछायादर्शितमाज्यं सपानं सद्रव्यंच मृत्युञ्जयप्रीतयेसर्वारिष्टपरिहारार्थ अमुकगोत्राया मुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहंसम्प्रददे ॥ ॐ तत्सन्नमम,इतिदत्वा दानवाक्यं पठेत्-30 कामधेनोः समुद्भूतंदेवाना मुत्तमंहविः । श्रायुर्वृद्धिकरंदोतु राज्यपातुसदैवमाम् । ततो मृत्युजयंप्रार्थयेत् ॥ ० त्र्यम्बकंव्यजामहे सुगन्धिपुष्टिवर्दनम् ॥ उर्वारुकमिववन्धना- न्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् ॥ब्राह्मणोद्र्यात्-मृत्युंजय प्रसादादीर्घायु षोऽस्तु ॥ ततः कर्ताहस्तौपादौप्रक्षालयेत् ॥ इति घतच्छायादर्शनम् । अथ तिलपात्र दानमन्त्रः ॥ ॐ त्र्यम्बक मिति यशिष्ठऋषि स्न्यम्बक रुद्रो देवता सरजित तिल ताम्र दाने आवाहने विनियोगः ।ध्यानम्-त्र्यम्बकं वृषभा- रुढं प्रतिवर्क त्रिलोचनम् ॥ कपाल शूल खट्वांगं चन्द्र मौलि सदा शिवम् ॥१॥ ऋचा-ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिम्पुष्ठियर्धनम् । उर्वारुक मिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥ त्र्यम्बकंग्यजामहे सुगन्धिम्पति वेदनम् उर्वारुकमिव बन्धनादितो मुतीय मामुतः। ॐ भूर्भुवःस्वः त्र्यस्वक इहगच्छेटतिष्ट सुप्रतिष्टितो परदो भव ॥ त्रयम्वक प्रीतिकारक स ताम्र तिलान्ने भ्योनमः सम्पूज्य कर्मकाएर रक्षाकरे, मंत्राभिषेक पतिः (५३) सतो ब्राह्मणायनमः सम्पूज्य ॥ भवेत्यादि अमुकगोत्रोऽमुकश- हिं ममसमस्त दुष्टारिष्ट निवृत्ति पूर्वक सखसौभाग्य पद्धये अमक कर्मणि न्यूनातिरक्तजन्म दोषापनुत्तये अपूर्णपूर्णार्थ मिदं हिरण्यमूल्योपल्पितं रजितसहितसताम्र तिलान्नं चन्द्रार्क मजा- पति देवतममकगोत्राय, अमुक शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहसम्प्रददे अद्य कृतैतत् सताम्र तिलानदान प्रतिष्ठा) किंचिद्धिरण्य मल्योप कल्पितं रजतंचन्द्र देवतममुक गोत्राय अमुक शर्मणे मात्मणाय तुभ्यमहं सम्भददे ॥ प्रार्थना || तिलापुण्याः पवित्राश्च सर्वकाम कराशुभा ॥ शुक्लाचायादवा कृष्णा विष्णुगात्र समद्भवाः॥१॥ यानि कानिच पापानि जन्मान्तर कृतानिच ।। तिलपात्र प्रदानेन तानि नश्यन्तु मे सदा ॥२॥ ब्रमामुरारित्रिपुरान्तकारी भानुः शशिः भूमिसुतोवुधश्च ।। गुरुश्चशुक्रः शनिराहुकेतवः सर्वग्रहाः शान्तिकराभवन्तु ॥ १ ॥ इति तिलपात्र दानम् । अथाभिषेकाशीर्वादादि मन्त्रसंग्रहः ॥ श्रथ यजमानस्य, अभिषेक मन्त्रतिलकाशीर्वादादि कार्यान्त कर्तव्य वक्ष्ये ॥ ततः सपरिवारो यजमानः मण्डपस्येशानोत्तर मध्यभागे,वा होमकुण्ड देवता सन्निधौच, पत्नी वामभागेकृत्वा तस्यावामतः पुत्रादीन्दाक्षणे भातृवर्गाश्यकृत्वा भद्रासने पूर्वाभि- मुखः सनतित् ।। प्राचार्यादय उत्तराभिमुखा उधायकलशो- दकेन वैदिक पौराणिकैश्च मन्त्रैर्यजमानमभिषिक्तकुयः ॥ नवादी वैदिक मंत्राः हरिः ॐ देवस्थत्वा सचितुः प्रसवेश्विनोहु. भ्यां पूष्णोहस्ताभ्याम् ।। सरस्वत्यैव्याचो यन्तुर्यन्त्रेणाग्नेः साम्रा- ज्येनामिपिंचामि ॥१॥ 0 देवस्यस्वासवितु: प्रसवेऽश्विनोर्या हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्याम् ॥ अश्विनोभैषज्येनतेजसेव्रह्मवर्चसा w कर्मकाण्ड रत्नाकरे, मंत्राभिषेक पद्धतिः याभिषिचामि ॥२॥ ॐ स्वस्तिनऽइन्द्रोब्बृद्धश्रवाः स्वस्तिनः पूषाविश्व वेदाः। स्वस्तिनस्तायोऽअरिष्टनेमिः स्वस्तिनो वृह- स्पतिर्दधातु ॥३॥ ॐ पयः पृथिव्यां पय औषधीषुपयोदिव्यन्त रिक्षेपयोधाः । पयः स्वतीः प्रदिशः सन्तुमह्यम् ॥४|| 30 अग्निहवता व्वातोदेवता सूर्योदेवता चन्द्रमा देवता व्वसवोदेवता रुद्रा देवताऽऽदित्यादेवता मरुतो देवता विश्वेदेवा देवता वृहस्प- तिर्देवतेन्द्रोदेवता वरुणो देवता ॥ ॐ मूर्धासिरार्धवासि- धरणी धर्यसिधरणी । श्रायुषेत्वा वर्चसेत्या कृष्यत्वाक्षेमाय कल्पन्ताम् ॥६॥ ॐ विष्णोरराटमसि विष्णोश्नप्त्रेस्थीविष्णोः स्थरसिव्विष्णोर्बुवोऽसि वैष्णवमसिव्विष्णवेत्वा ॥७॥ ॐ द्यौः शान्तिरन्तरिक्ष ई० शान्तिः पृथिवीशान्तिरापः शान्तिरौपधयः शान्ति वनस्पतयःशांति विश्वेदेवाः शांति ब्रह्मशांतिः सर्वर्ट. शांतिः शांतिरेवशांतिः सामाशांति रेधि,, ॥८॥ ॐ सुशांतिर्भवतु ॐ विश्वानिदेव सवितर्दुरितानिपरासुव । यद्भद्रतन्नऽऽासुव ॥६॥ ॐ आपोहिष्ठा मयोभुवस्तान 5 जज्जेंदधातन । महेरणाय चक्षसे ॥ योवः शिवतमोरस स्तस्यभाजयतेहनः । उशतीरिव मातरः । 30 तस्मा अरङ्गमामवोयस्य क्षयायजिन्वध | आपो. जन यथाचनः ॥ पौगणिक मंत्रा-उक्तश्चमात्स्ये-30 सर्वसमुद्राः सरित स्तीर्थानिजलदानदाः । श्रायान्नुयजमानस्य दुरितक्षयकार- काः ।। ॐ सुरास्त्वामभिपिंचन्तु ब्रामविष्णुमहेश्वराः । वासुदेवो जगन्नाथ स्तथासङ्कपणोविभुः। प्रद्युम्नश्चानिरुद्धश्च भवन्तु यायते ॥अखण्डलोग्निर्भगवान्यमोवै नितिस्तथा । वरुप पवन स्चैव धनाध्यक्षस्तथाशिवः। ब्राह्मणासहितः शेषोदिक्पाला-पान्तुते सदा ॥ कीर्तिर्लदमी तिमंधापुष्ठिःश्रद्धाफियामतिः। बुद्धिलजावपुः शांतिस्तुष्टिकान्तिश्चमातरःपतास्त्वामभिर्पिचन्तुधर्मपल्यासमा गताः। मादित्यश्चन्द्रमाभौमो बुधोजीवः सितोऽर्कजः। ग्रहा स्वामभिषिचन्त राहु-केतुश्च तपिताः ॥ देयदानघगर्या पच राक्षसपन्नगाः। ऋषयोमनयोगायो देवमातरएपण । देवपल्यो विज- कर्मकाण्ड रताकरे, मंत्राभिषेक पतिः हमानागा दैत्याश्चाप्सरसांगणाः । अत्राणि सर्वशस्त्राणि राजा वाहनानिच । थोपधानिच रत्नानि कालस्यावयवाश्चये । सरि सागराः शैला स्तीर्थानिजलदानदाः ॥ एतेत्वामभिपिंचंतु स कामार्थ सिद्धये ॥ ॐ गणाधिपोभानु शशीधरासुतोवुघोगुरुम गवसूर्यनन्दनः । राहुश्चकेतुः प्रभृतिम्रहानवकुर्वन्तुवः पूर्वमनो सदा । उपेन्द्रइन्द्रो वरुणोहुताशनो धम्मोयमोवायु हो श्चतुर्भुजः गन्धर्वयक्षो रगसिध्द चारणा कुर्वन्तु० । न पधिचिः सगरः पुरूरवा सकौन्तलेयो भरतोधनमयः । रार वयं वेनवली युधिष्ठिरः कुर्वन्तुवः । मनुमरीचि गुदक्ष नारद पराशरो व्यासवशिष्ठ भार्गवाः । वाल्मीकि कुम्भोद्भवग गौतमाः कुर्वन्तुका । रम्भासती सत्यवतीच देवकी गौरी लक्ष्मीश्च दितिश्च रुक्मिणी। कूमोंगजेन्द्रोप्यचराचरा घरा कुर्वन्तुव: । गङ्गा लकावा यमुना सरस्वती गोदावरी वेत्रवत च नर्मदा । साचन्द्रभागा वरुणा अशीनदी कुर्वन्तुवः पूर्ण मनो रथं सदा ।। तुङ्गप्रभासो गुरुचक्र पुष्करो गया च काशी बदरीश्वरो नरः ।। केदारनाथस्त्वथमार्गदायिनी कुर्व। प्रयागराजो यथ देवराजो रुद्रप्रयागोप्यथ कर्णतीर्थः। करवाश्रमोविष्णुमयागराज कुर्व० पूर्णमनोरथंसदा ॥ (केचिदाचार्या इदानीमभिषेकान्त यजमानस्य सपत्निकस्य, तैल हरिद्रोद्वर्तनपूर्वकम् सचैल मङ्गल स्नानमाचरन्ति, स्नान वस्त्राणि श्राचार्यायदत्वा, नुतनवस्त्राण परिधाप्य पत्नी चामतः कृत्वा पुत्रादिभ्यो तथाकृत्वा श्रासनेपूप वेशयित्वा, प्राचार्यों मन्नतिलकं कुर्यात् ) मन्त्रः- भद्रमस्तु शिवचास्तु महालक्ष्मीः प्रसीदतु । रक्षन्तुत्वां सुराःसर्व सम्पदः सात सर्वदा ॥ अक्षतारोपणम्-30 युञ्जन्तिबध्नमरुषं घरन्तं परितस्थुषः । रोचन्ते रोचनादिवि ॥ रक्षाबंधनम्-मन्त्रः-30 पेनचदो बलीराजा दानवेन्द्रो महाबलः । तेन त्वाममि वनामि रक्षेमाचल माचल ॥ त्वंयविाष्ठच.शुषोः नँपाहि शृणुधीगिरः रक्षातोक मुत्मना ॥ रक्षा सरचा भूयात् ॥ धाभ्यां पुंसा (५६) कर्मकाण्ड रताफर, मनाभिपेफ पद्धप्ति दक्षिणहस्ते, स्त्रीणां वामहस्ते रक्षासूत्रं वध्नीयात् ॥ अथाशीर्वाद मन्नाः-श्राचार्यादयो ब्राह्मणाः सफलपुष्पमालादिकं हस्तेषु गृहीत्वा उत्तराभिमुखा उत्थाय मन्त्रोचारणं कुर्यः-मन्त्राः-30 गणानान्त्वा याकृष्णेन इत्यादि नवग्रहणां मन्त्रान्पठित्वाऽ॥ ॐ भद्रंकर्णेभिः शृणुयाम देवाः भद्रपश्येमाक्षभिर्यजत्राः। स्थिरे रंगैस्तुष्टुवा सस्तनूभियंशे महिदेवहितं यदायुः ॥ शतमिन्नु शरदोऽअन्तिदेवा यत्रानश्वका जरसंतनूनाम् । पुत्रासो यत्रपितरो भवन्तिमानो मध्यारीरिपतायुर्गन्तोः ॥ ॐ ब्राह्मणा सहपितरः सोम्यासः शिवेनो द्यावा पृथिवीऽनेहसा। पूपातः पातुदुरिता हतावृधो रक्षामाकिन्नोऽनघशर्ट सईशतः। ॐ एताऽउच सुभ- गाविश्वरूपाविपक्षोभिः श्रयमाणाऽउदातैः । अष्वाः सती: कवषारम्भमाना द्वारोदेवीः सुप्रायणा भवन्तु ।। ॐ ब्रह्मणस्पते त्वमस्ययन्ता सूक्तस्ययोधि तनयश्चजिन्व । विश्वंतद्रं यदवन्ति देवा बृहद्वदेमविदथे सुवीराः। यऽइमाविश्वा विश्वकर्मायोनः पितानपतेन्नस्यनोदेहि ॥ ॐ पुनन्त्वादित्या रुद्रावसवः समि धतां पुनर्ब्रह्माणो व्वसुनीथयज्ञैः । धृतेनत्वन्तन्व्वं वर्धयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्यकामा: ॥ ॐ श्राब्रह्मन्बामणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्र राजन्यः शुरऽइपब्योति व्याधीमहारथो जायतां दोग्नी धेनुवोंढाऽनड़वानाशुः शप्तिः पुरन्धिर्योषा जिष्णूरथेष्ठाः ॥ सभेयोयुवास्य यजमानस्य वीरो जायतां निकामे निकामेन: पर्जन्यो वर्षतुफलवत्योनश्रोषधयः पच्यन्तां योगक्षेमोनः कल्प न्ताम् ॥ पै.राणिक मंत्रा- येनोत्थाय समूल मन्दरगिरिश्च्छत्री कृतो गोकुले, राहुर्यन महावलो सुररिपुः कार्यादशेतीकृतः । कृत्वा श्रीणि पदानियेन वसुधा, वध्दोवलिलीलयायोयं पातुयुगे युगे युगपति स्त्रैलोक्यनाथोहरिः ॐ यौतौ शतकपाल भूपित करौ मालास्थिमालाधरौ देवौद्वारवती श्मशान निलयौ नागारि गोवाहनौ ॥ द्विश्यक्षौ वलिदक्षयज्ञमथनो श्रीशैलजावल्लभौ दुःख वो हररतां सदा हरिहरौ श्री वत्स गडाधरौ ॥ 30 कमलासन कर्मकाण्ड रताकरे, मंत्राभिषेक पतिः (५७) कमलेक्षणकमलारि किरीटकमलभृद्वाहैः ॥ नुतपदकमलाकरधृत कमला करोतुतेमंगलम् ।। ॐ लक्ष्मीस्तेपंकजाक्षी निवसतुगृहेभा-' रतीकंठदेशे, वदन्तांवन्धुवर्गाः स्वजनरिपुगणायान्तुपातालमूले। देशेदेशेच कीतिः प्रभवतुभवतां देवतानांमसादात् ॥ जेजीव्या. त्पुत्रपौत्रैः सुजनप्रियजनैः पत्नियुक्तस्त्वमेव,, ततोयजमानपल्य. चले- ॐ गन्धाः पान्तुसुमंगलंचास्तु । 30 अक्षताः पान्तु, आयुष्यंचास्तु, ७ पुष्पाणिपान्तु, वहुदेयंचनोऽस्तु,, इतिक्षिप्त्वा । ॐ श्रीश्चते. इतिमंत्रेणादौ फलादिकंकान्ताभ्योक्त्या,, सौभा. ग्यवली पुत्रवतीयआयुष्मती धनवतीभव । ततः पुरुषेभ्यः, मंत्रार्थाः सुफलाःसन्तुपूर्णाः सन्तुमनोरथाः ॥ शत्रूणांबुध्दिमाशोऽस्तु मित्रा. पामुदयस्तव । एवमाशिपंदत्वा देवंविरज्य यथासुख विहरेयुः । इत्यभिषेकादि मत्रसंग्रहविधि.॥
फर्मकाण्ड ग्ताकरे मंडप परिभाषा + प्रथमराठपादिस्तम्भ परिभाषां वक्ष्ये--अथन यज्ञादीपा चौलोपनयन कन्यादान राज्याभिषेक सुलादानादिपुर मण्डपस्यापश्यक तयामगरपमिर्माणार्य मण्डपरिभापसिंगृत्य- पक्ष्यति-मगडपनिर्माणार्थ विचार:-मात्स्ये- गृहम्योत्तरपूर्वण मण्डपंकारयेदयुधः ॥ मङ्गलहत्येपुविशेषो महतचितामणी-दस्तीन्यायावेदहस्तः समन्तात्तन्यापैदौरागनी चामभागे । युग्मे पसे पटहीनचपा गप्तास्यान्मण्डपीद्वागनंगा । विवाहपटलेप्ययम्- प्रतवन्धेसंस्कार्यत्या दृटुहस्तेनपेदीनिमितिः यिवाहतुकन्यागृह एवयरम्ययजनांकरवा एहस्था श्रमस्य , तदायत्तत्याभ कन्याहस्ते य पेदिमगढपयोनिमाणम् । मण्डपार्थ भूपरिक्षा- शारदातिलके नक्षत्र राशिवाराणा मनुकूलेशुभेऽहनि । ततोभूमितलेशुद्ध तुपारागार बजिते । पुण्याहवाचयित्यातु मण्डपंरचन्छभम् ॥ तत्रभृपूजनमात्स्य-वाराहंकूमशेषौच क्षितिचैवविधानतः । पूजयेद्वास्तुकार्यपु विधिनासाधकोत्तमः ॥ दिग्शानाथ शंकुरोपणम्- कुण्डरनावल्याम्-देशेसंभाषिते प्राविधियदिहमा सम्विधायाधभूमि, सम्पूग्यात्रैवमध्ये विरचितयलये रोपयेत्माप्रशंकुम् ॥ तन्छायायंचयस्मिन्विशतिचवलये यातियस्माश्चदेशा, तोप्रत्यपूर्वदेशी तदनुगतगुणः प्राग्गुणोऽगौप्रदिष्टः ॥ दिग्शानानंतरं सूत्रीकरणं मण्डप मानंचाह-रेमाद्रौशांतिहे-ततस्तुराहिताविप्रैः सप्रयेन्मण्डपंशुभम् । उत्तमंशतहस्तन्त तदनतुमध्यमम् । जघन्यगतदन शकिकालाद्यपेक्षया। पञ्चगवादी-कनीयान्दशहस्तः स्यान्मध्यमाद्वादशोन्मित. 1 तयाषोडशभिहस्त मण्डप: स्यादिहोत्तमः ॥ गौतमीयतंत्रे- चवद्वारसमायुक्तं चतुरस्त्रंममन्तत ॥ व्रतबंधविवाहयोविशेष:-कार्यः पोडशहस्तोवा द्विपस्तोदशावधिः ॥ पाग-मण्डपाः कर्मसुप्रोक्ता अल्पामध्यास्तथोत्तमाः । यथावेश यथाकाले प्रयोज्यस्ते विचक्षण ॥ वेधमाहविवाहपटले- द्वारविद्धा वलीविद्धा कूपवृक्षव्यधा तथा ॥ न कार्यायेदिकातज्नै शुभामङ्गलर्मसु । तुलादानादौलैंगे-विंशद्धस्तप्रमाणेन मण्डप कुण्डमेवया । प्राथाष्टादशहस्तेन कलाहस्तेनवापुनः । विश्वकर्म प्रकाशे-सर्ववासर्ववाना कायो. कार्यानुसारतः । भूपननपिचार , मुहतचिंतामणौ-सूर्यङ्गनासिंह घटेपुशवे स्तंभो लिकोदण्डमृगेपुवायौ । मौनाजकुम्भनितौविवाहे स्थाप्योऽग्निकोणे वृपयुग्मककै । स्तम्भाना- संख्यारत्नावल्याम्-- -स्तम्भाः पोडशयज्ञ दारूजढावेदै विदिक्ष्वायता, श्चत्वारोटकरावहिः शरकरास्तेसण्डकोगेप्विना ॥ चूडाभि सहिताश्च तग्निखननंसर्वत्रपश्चाशनम् । द्वात्रिंशद्वलिकाः समाश्चसविलाः कार्यास्ततोऽतये ॥ वास्तुशास्त्रे-पश्चमांसंन्यसेद्भूमौ सर्वसाधारणोविधिः मध्यस्तम्भानां निवेशनमाह-मण्डपेमध्यमास्तम्भा मण्डपार्दप्रमाणत । समन्ततत्रिभा- गेन परितोद्वादशापरा ॥ द्वारप्रमाणमंत्रमुक्तावल्याम्-दिक्षद्वाराणिचत्वारि विदध्यात्पश्च- मांशतः ॥ विशेष:---मण्डपंतुदशधाविभज्यवै यत्रयत्रचभवेद्गुणसन्धिः । तत्रतत्रविनिवेसये दश, हस्तकानपिवहि शरहस्तान् । द्वाराणिदिक्षुद्विकराणिचाल्पे मध्येतुषेदांगुलवद्धितानि । श्रेष्टन्तुनागाट गुलवृद्धिरुक्ता तंछादयेत्तानितुवर्जयित्वा । स्पष्टम्-कनिष्टमण्डपे द्विहस्तोन्मितानि मध्यमेवेदागुलेवद्धितानि । उत्तमेविंशतिहस्तोपरिमण्डपे शतहस्तपर्यन्तेच द्विहस्ताष्टालद्वारमध्य प्रदेशकुयादिसर्थ ॥ मएडपाच्छादनक्रियासारे-पाछाद्यमण्डपाः सर्वेद्वारवय॑न्तुसर्वतः ।। वनशैस्ततश्चसरलैः सुकटैरथापितंनारिवलदलै रथयापिपनै ॥ स्थूणा. सुचामरदर्पण- कमकाण्ड रताकरे, मण्डप परिभाषा - ---प्राच्या कैरथापि सम्भूपयेत्तु सुपदैरयपरिटकाभि वास्तुशास्त्रेप्येवम् तोरण शब्दा- थमाह--तोरशानिवहिद्वाराणि ॥ तोरणोऽस्त्रीयहिद्वारमित्यमर ॥ तोरणनिर्माणमाह- तस्मारकरेवाद्विकरऽपिहस्तैदी रिणवाहां ५ ग ६ शरैस्तुकाष्ठ । अश्वत्थयज्ञांग जटोपटाना श्रेष्टादिपुस्यु खलुतोरणानि । स्पष्टम्-तस्मान्मडपात्करे हस्तमान वारयेद्वारा चतुपुद्वारेषु तोरणानिपुर्यात् ॥ पिंगलमनतु हस्तद्वययहिस्स्यक्वा तोरणानि निवेशयत् ॥ तोरणार्थ- वृक्षा-अश्मयोदुवर लक्षपदशास्राकृतानिच । मदपस्यप्रतिदिशं द्वारागयतानिकारयेत् ॥ द्वाराणि तोरणानिवहिवाराणीत्यर्थ । तोरणोपरिफलक कीलनम्रताराम्--- दिदिसूपरितोमनोज्ञ चूडासुदेयफलक हितेपाम् ॥ तदर्धमानतु निवेशनीयामध्ये सजातीयकदारू कोल ॥ कपिलपचरात्र-देवास्तोरणरूपेण सस्थितायज्ञ मडपे । सर्वविघ्नविनाशार्थ रक्षार्थ चावरस्यच ॥ फनकानांमामाह-अपादिवे दि १०ग्रवि १२ शक १४ पर दस्तिता सांप्रिमितामनोज्ञा । 'फनकोपरिचिन्हान्याह -धिष्ण्वायुधाभा अव विष्णुयागे शैवनिराला श्चधरागुलोना । ट्रम्--विष्णुयागे फलकोपरि विष्ण्वायुधानि शसय रुगदा कमलाना माकाराणिचिन्हानिकुर्यात् ॥ शैशि पानुष्टानादिषु, त्रिशलाकारचिन्हानि विष्णमायुध पक्षया, एकागुलोनानिकुर्यात् ॥ वास्तुशास्त्रे -मस्तवेद्वादशाशेन शखचक्रगदाम्बुन ॥ तोरणाना प्रकुर्याद्वपुर्वादिषुक्रमाद्बुध ॥ पिंगलमते--शूलेनचिन्हिता कार्याद्वारशासास्तुमस्तके । शूले ननागुलदेध्यंतरीयांशेन विस्तृत ॥ स्तभतारणादी ना पूजनवि नानपूजाप्रयोगे वदामि ।। मडपेवेदीना निर्माण रत्नावल्याम्--अथ प्रधानादपियनपूर्व महाधिवासश्चतदाप्रधानम् । ईशानदेशच ततस्त्ववाच्या श्रीखेटवेदि करविस्तृताचा । फर्मविशेषेवामानम्--रुद्रादौ हवनेयवैदिरथवा पैदा ४ ग ६ नागै ८ करैरैकद्विनिमि रगुलैश्चकविता रानादपुन्यूनता । पादोचायतुलाविधौतनाभि : नांगै खरैवापिसा द्वाभ्यासार्ध करेणहस्त १ विमिता प्युचाथ वाप्या दिषु ॥ क्रियासार--हस्तमानतदुत्सेधचतुरस समतत । हस्तनितानविस्ती चतुर्दस्तै समन्तत । मिदातशेखरे---वेदीचतुविधाप्राक्का चतुरस्राचपद्मिनी । श्रीधरी सर्वतो भद्रा दीक्षासुस्थापनादिषु । चतुरस्त्राचतु कोणा वैदोसर्यफलप्रदा । तडागादि प्रतिष्टाया पधिनी पसभिभा ॥ राज्ञास्यात्सर्वतोभद्रा चतुभद्राऽभिपचने । विवाहे श्रौधरीवेदीविंशत्यस समन्विता । मडपेवेदोनादिक्परत्वेनस्थापनक्रम मथानभैरवत। शेषवेद्यातत त्यात हस्तमक तुवि स्तरे । उच्छायोऽकांगुल प्रोक्त स्नानवेदोद्विहस्तका { आग्नेयां मातृकावदी पास्तुवेदोचनेत क्षेत्रपालस्य वायव्या मोशान्यांच नवग्रहा ॥ अथपूर्वादिदितुमडपाद वहिध्वजावस्था- नमाह--पूर्वस्यादिशि पीतवर्णरुचिरा नागांकितेन्द्रस्यवै प्राग्नेग्यात्वथवन्हिवर्णसदृशा मेषा किलाग्नवजा। स्यात्कृष्णायमवाहनाकितध्वजा ऽ वाघ्यायमस्यैवच ॥ पचास्याडित श्यामवरण रुचिरानैत्यगानिम्रते (१। स्वेतास्पटाटिकवत्तथा जलपतेर्मत्स्याकितापश्चिम वायन्याच सधूम्र वर्णसहशा वायो कुरजाविता ।। औदीच्याच तुरग चिन्हसहिता पीतांकुपेरस्यवै। ईशाने पृषभे श्वरस्यचसिता, गोवाहनेनांकिता ॥२॥ दिगोशानांच पूर्वोक्ताध्वजावशपु पैक्रमात् ॥ मडपस्य चरक्षा सस्थाप्यायलतोवुधै ॥३] ८ (६०) कर्मकाण्ड रताकरे, भूमिपूजा पद्धति मण्डपार्थ भूमिपूजा पद्धतिः। शारदा तिलके-ततो भूमितले शुध्दे तुपारांगार वर्जिते पुण्याह वाचयित्वा त मण्डपं रचयेच्छुभम्, भूम्यादि पूजनं मात्स्ये-वाराहं कूर्मशेपौच क्षितिचैव विधानतः,, पूजयेद्वास्तु कार्येषु विधिना साधकौत्तमः,, अथच कुण्डमण्डपादिविधानकर्ता वास्तुशास्त्रानुसारेण भूमि परीक्ष्य, तत्र शुभेदिनेगत्वामध्यभागे काष्टपीठोपरि गणेशंस्थापयित्वा स्वस्ति वाचनं पठित्वा तत्रैव भूमौ वाराह यंत्रं तिग्वित्वा। तदुपरिपार्थिवंश्वेतवस्त्रं प्रसार्य पूजनं कुर्यात्-प्राचम्य प्राणायामादिकं कृत्वा सङ्कल्पः-अधे- त्यादि० अमुकोहं कर्तव्यामुककुण्डमण्डपादि रचनकर्मणि पृथि- वी वराह कूर्मशेषाणां पूजनं करिष्ये-तत्रादौ पृथिवीं-30 भूर्भुव: स्व पृथ्वी मावाहयामि-30 पृथिव्यैनमः इतिमंत्रेण पांद्यादिभिः सम्पूज्य प्रार्थयेत्-वराह-0 भू० . दष्ट्रोध्दृत वसुंधराय वराहाय नमः, इति वराहं पूजयित्वा,, कूर्मम्-30 भूर्भुवः स्वः कूर्ममा० ॐ पृष्ठोध्दृत वसुन्धराय कूर्मायनमः,, इात सम्पूज्य, शेषपू०-ॐ भू० ॐ सहस्रफण विराजमानाय फणोपरिपृथ्वी धरायनमः,, इति सम्पूज्य,, यजमानमभिषिच्य,, मध्यशकुंस्था- पयित्वापूर्वोक्त परिभाषानुसारेण मण्डपंयथाविभवं विरच्य मण्डपविस्तारात्स्तंभानुलित्याछाद्य तोरणानि चतुर्धराणि कल्प यित्वा वक्ष्यमाण पद्धत्या पूजनादिकं कुर्यात् । इति भूमिपूजा पद्धति । " कर्मकाण्ड रक्षाकरे, स्तम्भपूजा पतिः अथ स्तम्भ पूजापद्धतिः॥ तसाकर्ता हस्तौपादौप्रक्षाल्याचम्य प्राणायामप्रयंकृत्या ईशानस्थरक्षादीप प्रज्वाल्य सम्पूज्यच । प्रतिज्ञासङ्कल्पं कुर्यात् । अधेत्यादिदेशकालौ संकीर्त्यामुकगोत्रो ऽमुकशर्माऽहं करिष्यमाणा ऽमुककर्मणि तदुपयोग्य युतात्मकअमुककर्मसंरक्षणाय पूर्वाहतया सदीपपोडशयमणकलश पूजनपूर्वकब्रह्मादिपोडशसरल कदलीमय सस्थूणशक्तिसहितान्स्तंभान्पूजयिष्ये ॥ तत्रादावाभ्यन्तरोशाने पृथि- व्यां स्तम्भमूले पुटकंसंस्थाप्य, यवान्गृहीत्वा-30 औषधयः समवदन्तसोमेन सहराज्ञायस्मैकृणोति ब्राह्मणस्त • राजन्पार- यामसि ॥ इतियवांस्तत्रक्षिप्त्या,, कलशंतदुपरि । ॐ आजिघ्र कलशं मह्यात्वाविशन्त्विन्दवः पुनरूर्जानिवर्तस्वसानः सहस्रं धुलोधारा पयस्वती पुनर्माविशताद्रयः।। संस्थाप्य ।। 3 व्वरुप स्योत्तम्भनमसि वरुणस्यस्कम्भ सर्जनीस्थो व्वरुणस्य ऋतसद न्यसि व्यरुणस्य ऋतसदनमसिव्वरुणस्य ऋतसदनमासीद ॥ हात जलेनापूर्य,, ततस्तदुपरिधान्यपूर्णपात्रं-30 पूर्णादविपरापत । मुपूर्णापुनरापत । व्वस्नेव विक्रीणावहाऽहषमूर्ज ई० शतक्रतो॥ ततः 30 वरूपायनमः,, इतिमंत्रेण कलशंसम्पूज्य, एवंरीत्या स्तम्भपूजनादौ संचत्रकलशस्थापनंकृत्वा) ईशानस्तम्भपूजयत् साक्षत पुष्पः ब्रहाणध्यायत्-एखहिविप्रेन्द्रपितामहेश हंसादिरूढ़ स्त्रिदशैक बंद्यः । श्वेतोत्पलाभासकुशाम्बुहस्त गृहाणपूजांभगवन्नमस्ते ॥ ब्रह्मयज्ञानमिति गौतमऋषिस्रिष्टुप्छन्दो ब्रह्मादेवता मण्डपसर- क्षणार्थस्तम्भेब्रह्मास्थापने विनियोगः-ऋक् ब्रह्मयज्ञानं प्रथमपु. रस्ता द्विसीमनः सुरुचोव्वेनऽभावः। सत्रुध्न्याऽअस्यविष्टाः उपमा सतश्चयोनिमसतश्चचिवः । ॐ भूर्भुवः स्वः, भोनमनिहागचछे हतिष्ट,, सुप्रतिष्टितोवरदोभव ।। ॐ नमस्तम्भायनमः, इति सम्प्रज्यमार्थयेत्-30 कृष्णाम्बराजिनधर, पद्मासनचतुर्मख, माला कमण्डलुधर प्रसीदकमलासन ॥ इति संप्रार्य स्तम्भेशक्ति पूजन (६२) कर्मकाण्ड रहाय रे. स्तम्भपूजा पद्धतिः कुर्यात्- असावित्र्यैनमः, ॐ ब्राह्मयैनमः, ॐ गङ्गायैनमः, संपूज्यस्तम्भमालभ्य,, ॐ ऊर्ध्वपुणऽऊतयेतिष्टा देवोनसविता ऊवाव्वाजस्यसनिया यदञ्जिभिर्वाधद्विबिह्वयामहे ॥ स्तम्भ- शिरसि, . नागमात्रेनमः । सम्पृज्य, शाखावन्धनकुर्यात्-30 आयंगोः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरंपुरः पितरश्च प्रयन्त्स्वः,, ततः क्ष्मापयेत्-यतोयतः समीहसे ततोनोऽअभयकुरु । शन्नः कुरु- प्रजाभ्योभयनः पशुभ्यः ॥ ॐ भोब्रह्मन् स्तम्भरूपेणपूजितोड स्मिन्मखेमया। स्थिरोभवानरक्षार्थ यावत्कार्यसमाप्यते ॥ भो ब्रह्मदैवतस्तम्भ पूजितोसिक्षमस्व एवंसर्वत्र ॥ तत श्राभ्यन्तरा- ग्नेये-विष्णुमावायेत्-- एोहिनारायणदिव्यरूप सर्वामरै- रचितपादपद्म । शुभा शुभानन्दशुचामधीश गृहाणपूजांभगवन्न- मस्ते ॥ 30 इईविष्णुरितिमेधातिथि ऋपियत्रीछन्दो विष्णुर्दे- वता विष्णुस्थापने विनियोगः ॥ ॥ इदंविष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिद- धेपदम् । समूढमस्यपा सुरेखाहा ॥ ॐ भू० भोविष्णो इहा गच्छेहतिष्ट,, विष्णुरूपिणे स्तम्भायनमः सम्पूज्य,प्रार्थयेत्- ॐ महाविष्णो नमस्तेऽस्तुदेवदेवजगत्पते,, यज्ञंपाहि, सुरेशस्त्वं श्रीनाथभक्तवत्सल ॥ स्तम्भे शक्तिपू० ॐ लक्ष्म्यैनमः, 30 नन्दा यैनमः, ॐ वैष्णव्यैनमः,, सम्पूज्य स्तम्भमालमनम् ॐ ऊर्ध्व- अषुण: स्तम्भशिरसि 0 नागमात्र्यैनमः सं० । शाग्वावन्धनम्- ॐ आयंगौः ॥ ७० भोविष्णो स्तम्भरूपेण पूजितोऽस्मिन्मखे- मया ॥ स्थिरोभवात्ररक्षार्थ यावत्कार्यसमाप्यते ॥ भो विष्णुदेव- तस्तम्भ पू० ॥२॥ ततोनैर्ऋत्ये-रुद्र-एहोहिगौरीशपिनाक पाणे शशाङ्कमौले वृपभाधिरूढ़ । गणाधिदेवेशचन्द्रदेव गृहाए पूजांभगवन्नमस्ते ॥ २० नमस्त इतिवामदेव ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो रुद्रोदेवता मण्डपसंरक्षणार्थ स्तम्भे रुद्रस्थापने विनियोगः । ॐ नमस्तेरुद्रमन्यवऽउतोतइपवेनमः। वाहुभ्यामुततेनमः ॥ ॐ भू० भोरुद्र इहागच्छेहतिष्ठ, ॐ रुद्रायनमः सम्पूज्य ॥ स्तम्भे--30 माहेश्वर्यैनमः, ॐ गौर्यैनमः, ॐ शोभनायैनमः ॥ सम्पूज्य,, , फर्मकाण्ड रताफरे, स्तम्भ पूजा पद्धतिः (६३) शेषपूर्ववत् ॥३॥ ततोवायव्ये, इन्द्रं प्राचाहयेत् - एरोहिदेवेन्द्र सुरेशवन्द्य शचीपतेवज्रधरामरेश,, संस्तृयमानोप्सरसांगणेन गृहाणपूजां भगवन्नमस्ते ।। अत्रातारमिति गर्गऋपित्रिष्टुप्छन्द इन्द्रोदेवता मण्डपसंरक्षार्थस्तम्भे, इन्द्रस्थापने वि० ॥ त्रातार मिन्द्र मवितारमिन्द्र ट हवेहवे सुहब ० शूरमिन्द्रम् । हृयामि. शक्रं पुरहतमिन्द्र ० स्वस्तिनोमघवाधात्विन्द्रः ।। . भू० भो इन्द्रे हागच्छेहतिष्ट, ॐ इन्द्रायनमः सं० स्तम्भेशक्ति पू० ॐ इन्द्राण्यैनमः, ॐ श्रानन्दायैनमः,, 30 विभूत्यैनमः । स्तम्भ- स्पर्शनादिकंपूर्ववत् प्रार्थयेत्-ॐ भोइन्द्र स्तम्भरूपेण पूजितो ऽस्मिन्मखेमया, स्थिरोभवात्ररक्षार्थ यावत्कार्यसमाप्यते ॥४॥ ततो याहोशाने-सूर्यमावाहयेत्-30 एहो हिसप्ताश्वरथाधरूढ़ सह- सरश्मिन्करुणेशभानो। श्रीकाश्यपेयारुण वर्ण सूर्यगृहाणपूजा भगवन्नमस्ते ॥ चित्रं देवानामिति कुत्सऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः सविता देवतास्तम्भे मण्डप संरक्षणार्थ सूर्यस्थापने वि० ॥ ॐ चित्रं देवाना मुदगादनीकं चक्षुमित्रस्य वरुणस्याग्नेः । श्रापा- द्यावा पृथिवीऽअन्तरिक्ष ई. सूर्यऽअात्मा जगतस्तस्तुषश्च ॥ 30 भू. भोसूर्यहागच्छेहतिष्ठ 0 सूर्यायनमः, सम्पूज्य स्तम्भे शक्तिपू०-30 सावित्र्यैनमः, 3 छायायैनमः, ॐ संज्ञायैनमः, सम्पूज्यस्तम्भालंभनादिकं पूर्ववत् ।। प्रार्थयेत्-भोसूर्यस्तम्भ रूपेण पूजितोस्मिन्मखेमया ।। स्थिरोभवान्त्र रक्षार्थं यावत्कार्य समाप्यते ॥शा ततईशान पूर्वयोरन्तराले गणेशमावाहयेत्-एलो- हि लम्बोदर नागवक्त्र गणेशगौरी सुतदेवदेव ॥ सन्मङ्गलेत्वं मथमप्रधान गृहाणपूजां भगवन्नमस्ते ॥ ॐ गणानान्त्वेति प्रजा- पतिषिर्यजुश्छन्दो गणपतिर्देवता मण्डप संरक्षणार्थस्तम्भे गण पतिस्थापने वि०॥ ॐ गणनान्त्वा गणपति !० हवामहे प्रिया- पांत्वा प्रियपति र्ट० हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति ० हवा महे व्यसोमम ॥ श्राहमजा निगर्भधमात्वमजासिगर्भधम्, ॐ भूर्भुवः स्वः, भोगणेशेहागच्छेहतिष्ठ,, 30 गणेशायनमः (६४) फर्मकाण्ड रताकरे, स्तम्भपूजा पद्धतिः , , सम्पूज्यस्तम्भे शक्तिपूजनं कुर्यात-ॐ विघ्नहारिण्यैनमः, 30 ऋध्यनमः, सिध्यैनमः, शेषं पूर्ववत् सम्पूज्य प्रार्थयेत्-30 गणेशस्तम्भ रूपेण पृजितोऽस्मिन्मखेमया, स्थिरोभवात्ररक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥६॥ ततः पूर्वाग्नेययोरंतराले यममावाह पेत्- एथेहिसूर्यात्मज धर्मराज लोकेशनैय्यायिकधर्मशील । विशाल वक्षस्थल दण्डधारिन्गृहाणपजां-भगवन्नमस्ते ॥ 30 यमायत्वेति दध्यड्डाधर्वण ऋषियजुश्छन्दो यमोदेवता मण्डप- संरक्षणार्थस्तम्भे यमस्थापने वि० । ॐ यमायत्वा माखायत्वा सूर्यस्यत्वा तपसेदेवस्त्वा सविता मध्वानक्तुपृथिव्याःसस्पृश- स्पाहि, 0 भू० भोयम इहागच्छेहतिष्ठ, 30 यमायनमः सम्पूज्य स्तम्भे शक्ति पू०॥ ॐ पूर्वसन्ध्यायैनमः, ॐ क्रूरायैनमः, ॐ नियन्त्र्यैनमः, शेषं पूर्ववत्-सम्पूज्य प्रार्थयेत्- भायमस्तम्भ रूपेण पूजितोऽस्मिन्मखेमया, स्थिरोभवावरक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥॥ ततो वाह्याग्नेयकोणे नागराजमावाहयेत्-30 एत्येहि नागेन्द्र सहस्रमूर्दन्पातालवासिन वहुक्रोधधारिम् ,नागां गनाभिः स्तुतिगीयमान गृहाण पूजां भगवन्नमस्ते ॥ ॐ नमोस्तु सर्पेभ्यऽइति देवाश्रवाऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो नागराजो देवतामण्डप रक्षणार्थस्तम्भे नागराजस्थापने विनियोगः॥ ॐ नमोस्तु सर्प- भ्यो येकेच पृथिवी मनुयेअन्तरिक्षेदिवितेभ्यः सर्पेभ्योनमः ॥ ॐ भू. नागराजेहागच्छेहतिष्ठ, नागराजायनमः सम्पूज्य स्तम्भेशक्तिपूजनं कुर्यात्-30 अधरायैनमः, ॐ पद्मायैनमः, ॐ महापद्मायैनमः ॥ शेषं पूर्ववत्सम्पूज्य प्रार्थयेत्-30 भोनागस्त म्भरूपेण पूजितोस्मिन्मखेमया ॥ स्थिरोभवानरक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥८॥ तत आग्नेयदक्षिणयोरंतराले स्कन्दमा याहयेत्- एसोहि गौरीसुत देव देव, पट्कृत्तिकानन्दन सिद्धवन्ध, मयूर वाह प्रणतातिहारिन्गृहाणपूजां भगवन्नमस्ते ॥ ॐ यदकन्द इति भार्गव जमदग्नि दीर्घ तमसा ऋषय त्रिष्टुप्छन्दः स्कन्दो देवता मण्डप रक्षणार्थस्तम्भेस्कन्दस्थापने वि०॥ ॐ यदक्रन्दा * कर्मकाएट रलाकरे, स्तम्भपूजा पद्धतिः . मधमंजायमानऽउद्यन्त्समुद्रा दुतवापुरीपात् ।। श्येनस्यपक्षा हरि. णस्यवाह उपस्तुत्त्यंमहिजातन्ते अर्वन् । ॐ भू० भोस्कन्द इहा गच्छेहतिष्ठ ॐ स्कन्द.यनमः सम्पज्यस्तम्भे-शक्ति प०। ॐ जयायैनमः, ॐ विजयायैनमः । ॐ परियमसन्ध्यायनमः । शेषं पूर्ववत् ॥ प्रार्थयेत्-ॐ सेनानिस्तम्भरूपेण पजितोऽस्मिन्मखे मया ।। स्थिरो भवात्र रक्षार्थ यावत्कार्यसमाप्यते ।।६।। ततो दक्षिणनैऋत्ययोरंतराले वायुमावाहोत्-ॐ एलोहिवायो मग्बर क्षणाय कुरङ्गवाह जगदाभिवंद्य, सर्वप्रिय प्राण शरीरधारिणां गृहाणपजां भगवन्नमस्ते। ॐ वायुरिति वशिष्टऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो वायुर्देवता मंडप संरक्षणार्थ स्तम्भे वायुस्थापने वि०॥ ॐ वायु रग्नेरग्नेगायज्ञमीः साकंगन्मनसायज्ञं शिवोनियुद्भिः शिवाभिः, 0 भू. वायो इहागच्छेहतिष्ठ, वायवेनमा सम्पज्य शक्ति १०॥ अतीवायैनमः । ॐ गायत्र्यनमः । ॐ वायव्यैनमः, शेष पर्ववत्-ततः पार्थयेत-30 चायोस्त्वंस्तम्भरूपेण पजितोऽस्मि न्मखेमया। स्थिरोभवात्ररक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते॥१०॥ ततो नेत्ये सोममावाहयेत्.--एहोहिराशीश शशांकरूप विधत्स्वरक्षा स्वगणेनसादम् ॥ द्विजाधिदेवेश सुधामयेश गृहाणपजां भगव. नमस्ते ॥ ॐ सोममिति वन्धुऋषिर्गावीन्दः-सामोदेवता मण्डप संरक्षणार्थ स्तम्भे सोमस्थापने वि० ॥ ॐ सोम ० राजानं साग्निमन्वारभामहे । श्रादित्यान्विष्णु दै० सूर ब्रह्माणं च वृहस्पति ट० स्वाहा || - भूर्भधः खः भोसोम इहागच्छे- तिष्ठ, ॐ सोमायनमः, सम्पूज्य स्तम्भे शक्ति पू० ॥ ॐ सावि- त्र्यै नमः। ॐ अमृतकलायैनमः । ॐ विजयायैनमः ॥ शेष पूछ। ततः प्रार्थयेत्-भोसोमस्तम्भरूपेण पूजितोमिन्मखेमया। स्थिरोभवात्र रक्षार्थं यावत्कार्य समाप्यते ॥१॥ ततः पश्चिम नात्ययोरंतराले 'वरुण माथायेत् ॥ ॐ एवहिपाशिन्सरिता मधीशलोकेश देवेश समुद्रनाथ,, केयरवान्कुण्डल हारधारिन्य है कर्मकाण्ड रक्षाकरे, स्तम्भपूजा पद्धति - , , हाणपूजां भगवन्नमस्ते ॥ ॐ इमम्मेयरुणेति वत्सऋषिय॒हती छन्दो वरुणो देवता मण्डपरक्षणार्थ स्तम्भे वरुणस्थापने वि० ॥ 30 इमम्मेव्वरणश्रुधी, बमद्याचमृडय, त्वामवस्युराचके ॥ ॐ भू० भोवरुणेहागच्छतेहतिष्ठ, ॐ वरुणायनमः,, स्तम्भे शक्ति पू० । ॐ वामण्यैनमः । ॐ पार्हस्पत्यै नमः । ॐ पाशधारि एयैनमः । सम्पूज्य शेष १० । प्रार्थयेत्-30 वरुणस्तम्भरूपेण पूजितोऽस्मिन्मखेमया। स्थिरो भवात्ररक्षार्थ यावत्कार्य समा. प्यते ॥१२॥ ततः पश्चिम वायव्ययोरंतराले वसूनावाहयेत्-30 इतेतदेवा वसवो सुरूपाः सौन्दर्यमुख्यागुण शीलवन्तः। सुपुष्प मालाभिरलंकृताश्च गृहीध्वमत्रार्चन मानतोऽस्मि ॥ ॐ सुगाव इति वसिष्ठ ऋषिर्गायत्री छन्दो वसवो देवता मण्डप संरक्षणार्थ स्तम्भेवसूनां स्थापने वि०॥ ॐ सुगावो देवाः सदनाऽत्रकर्मयऽ- आजग्मेद र्ट० सवनंजुपाणाः । भरमाणा वहमानाहवीष्य स्मेधत्त वसवो व्वसूनि वाहा ॥ ॐ भू० भोवसव इहागच्छ तेह तिष्ठत, वसुभ्योनमः,, सम्पूज्य शक्ति पू० ॥ ॐ विन- तायैनमः । ॐ गरिमायैनमः । ॐ सम्भूत्यैनमः संम्पूज्य प्रार्थयेत्-30 वसवोऽष्टौ महाभागाः स्तम्भेऽस्मिन्पूजितामयाता वत्तिष्ठन्तु रक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥१॥ ततो वायव्ये धन दमावाहयेत्-30 एहियः परिसेव्यमान विशालयानेश्वर किन्नरेश ॥ ममाध्वरंरक्ष कुवेरदेव गृहाणपूजां भगवन्नमस्ते ॥ ॐ सोमोधेनुमिति गोतमऋषिस्त्रिष्टुन्छन्दो धनदो देवता मण्डप संरक्षणार्थस्तम्भे कुवेरस्थापने वि०॥ सोमोधेनु र्ट० सोमोड- अर्वन्तमाशु ई० सोमोवीरं कर्मण्यं ददाति ॥ सादन्यं विदथ्य र्ट० सभेयं पितृ श्रवणं यो ददाशदस्मै ॥ ॐ भू० भोकुवेरेहा- गच्छेहतिष्ठ 30 कुवेरायनमः,, सम्पूज्य शक्ति पू०। अदि त्यैनमः । ॐ सनीवाल्यैनमः । ॐ लधिन्यैनमः सम्पूज्य प्रार्थयेत्-धनाध्यक्ष महावाहोस्तम्भेऽस्मिन्पूजितोमया ॥ स्थि. रोभवात्ररक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥१४॥ नत उत्तर वायव्या कर्मकाण्ड रताफरे, स्तम्भ पूजा पद्धति (६७) न्तराले बृहस्पति मावाहयेत्-30. एकोहिविप्रेन्द्र सुरेश मन्त्रिन्थ- हस्पतेदेवगुरो प्रशान्त ॥ पीताम्बरा लंकृत देववन्ध गृहाणपूजां भगवन्नमस्ते ॥ वृहस्पत इति गृत्समदऋपिस्त्रिष्टुप्छदो बृह स्पतिर्देवता मण्डपसंरक्षणार्थस्तम्भे बृहस्पतिस्थापने विनियोगः॥ 0 बृहस्पतेऽप्रतियदयों अर्हामद्विभातिऋतुमजनेषु । यद्दीदय- च्छवसऽऋत प्रजा तत दस्मासुद्रविणंधेहि चित्रम् ॥ ॐ भूर्भवः खः, भोबृहस्पते, इहागच्छेहतिष्ठ,, . वृहस्पतयेनमा सम्पूज्य स्तम्भे शक्ति पू०,, पौर्णमास्यैनमः, ॐ वेदमान्यैनमः । ॐ0 सन्नत्त्यैनमः, सम्पूज्यशेष पूर्ववत-ततः प्रार्थयेत्.30 भोगुरो स्तम्भरूपेणपूजिनोस्मिन्मखेमया। स्थिरोभवात्र रक्षार्थ याच- कार्य समाप्यते ॥२॥ तत उत्तरेशानान्तराले विश्वकर्माणमावा हयेत्-30 एसोहि शिल्पज्ञ विशालबुध्दे, माकारनिर्माण कलाग्र- गण्य ॥ दोर्दण्ड संसाधित सर्वकार्यगृहाणपूजां भगवन्नस्ते,. 30 विश्वकर्मन्नितिमन्त्रस्य शासऋषित्रिष्टुप्छन्दो विश्वकर्मा देवता मण्डप संरक्षणार्थ स्तम्भे विश्वकर्म स्थापने वि०॥ ॐ विश्व कर्मन्हविषावर्दने नत्रातारमिन्द्रमकृपोरयध्यं तस्मैविशः । सम- नमन्तपूर्वीरयमुग्रोविहव्यो यथासत् ॥ ॐ भू० विश्वकर्मनिहा- गच्छेहतिष्ठ ॥ ३० विश्वकर्मणेनम', सम्पूज्य, स्तम्भ शक्ति पृ०,, वास्तुदेवतायैनमः, ॐ वैश्वकर्मिण्यैनमः, ॐ शारदायै नमः, सम्पूज्य शेषं पूर्ववत-ततः प्रार्थयेत-30 विश्वकर्मन्मयाचात्र स्तम्भे सम्पूजितोनघ,, स्थिरो भवत्व रक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते॥ इति पोडशस्तम्भ पूजापदति ॥ (यद्यपिस्तम्भ पूजा शास्त्र कारैर्नदर्शितान च तत्पूजायां प्रमाण वाक्या न्युप लभ्यन्ते तथापि देशाचारत स्तस्या मावश्यकत्वान्मयापिदर्शिता ) ॥ , . SKKe कर्मकाण्ड रत्नाकरे, तोरणपूजा पद्धतिः . अथ तोरण पूजापद्धतिः ध्वजारोपण सहिता ॥ अथच पूर्वपरिभाषोक्तरीत्या मण्डपाद्धस्त मात्रंबहिश्चतुर्दा राणि तोरणानि प्रकल्प्य सुसज्यच. वक्ष्यमाण प्रकारेण पूजन कुर्यात् ।। तत्रादौ पूर्वद्वार तोरणं पूजयत्-अक्षत पुष्पादिभिः,, तोरणो प्रभागे-30 श्रियैनमः,, स्थापयामि पूजयामि,, अधः-३० देहल्यैनमः,, स्थाप० । पज०॥ तत उत्तर दक्षिण स्थम्भमूले द्वेकलशेविन्यस्य,, कलश स्थापन पूजन, विधिना संस्थाप्य सम्पू- ज्यच,, उत्तरस्तम्भे स्वदक्षिणभागे-30 स्कन्दायनमः स्कन्दमावा हयामि स्थापयामि,, स्ववामे-30 गणेशायनमः,, गणेशमावा हयामि स्थापयामि, द्वारकलशद्वये, ॐ गङ्गायैनमः, ॐ यमुना यैनमः,, इति नाममन्त्रैः सम्पूज्य,, ततः शङ्खांकित तोरण पूर्वद्वारं हस्तेन स्पृष्ट्या मन्त्रः-30 अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्यदेव हत मम् ।। होतारं रत्नधातमम् ॥ एतन्तेतिः पठित्वा,, भूर्भुवः स्वः सुदृढतोरण, इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितो वरदोभव,, इत्येवं प्रतिष्ठाप्य,, ॐ सुदृढतोरणायनमः,, इति मन्त्रेण सम्पूज्य ।। तत्र ॐ राहवेनमः,, राहुमावाहयामि, ॐ बृहस्पतयेनमः,, बृहस्पति मावाहयामि, स्था० पू० ॥ तत्रद्वारावाहिः ॥ एरावत दिग्गजा यनमः, स्थापयामि, पूजयामि, प्रार्थयेत् एरावतं स्थापयामि रक्षार्थद्वारदिग्गजम् ॥ यावत्कार्य समाप्तिश्च चतुर्दन्त स्थिरोभव, तत ऋग्वेदिनों द्वारपालो ऋग्वेद शांतिपाठको, बाहय गन्धादिना सम्पूज्य,, ऋग्वेदः पद्मपत्राक्षो गायत्रः सोमदैवतः ॥ अघि गोत्रस्तु विप्रेन्द्र शांतिपाठमखेकुरु ॥ एवं द्वितीयश्च सम्मार्थ्य, तत, इन्द्रमावाहयेत्- एढेहि सर्वामरसिद्धसाध्यै, रभिष्टुतोवन धरामरेश । सवीज्यमानो ऽप्सरसाहणेन रक्षाध्वरंनो भगवन्न मस्ते ॥ तत एरावतां कितां वज्रांकितांच पताकामानीय गन्धादि भिः श्राशुः शिशानो वृपभोनभीमो घनाघनः क्षोभणश्चर्षणी. ॥ संक्रंदनोऽनिमिपाएकवीरः शत र्ट सेनाऽअजयत्ताक , , कमकाण्ड रताकरे, तोरणपूजा पचतिः . मिन्द्रः, इतिमन्त्रेण सम्पूज्यच ध्वजमुच्छ्रित्यतत्रध्वजे- इन्द्राय नमः, सम्पूज्य,, पार्थयेत् ३. देवराजनमस्तुभ्यं ध्वजेऽस्मिन्स्था पितोमया || स्थिरोभवात्र रक्षार्थ यावत्कार्यसमाप्यते ॥ तत श्राग्नेये रक्तवर्णां मेपाङ्किता मग्निदेवतकांध्वजामानीय-तत्र कलशंसंस्थाप्य, 30 पुण्डरीकामृतायनमः इति मन्त्रेण तत्र पुण्ड- रीकामृतंसम्पूज्य, अग्निध्यायेत् ॐ एहोहि सर्वामरहव्यवाह मुनि प्रवीरैरभितो ऽभिजुष्ट । तेजोवता लोकगणेनसाध, ममाध्य रम्पाहिकवे नमस्ते । ॐ भू० भो अग्नेइहागच्छेहतिष्ट ॥ ॐ अग्नेयेनमः कलशेअग्नि सम्पूज्य,, ध्वजां हस्तेकृत्वा, अग्नि न्दुतपुरोदधे हव्यब्बाहमुपलवे ।। देवा २७ श्रासादयादिह, इति यजमुच्छ्रित्य, अग्नयेनमः, सम्पूज्य प्रार्थयेत् ॥ अग्निदेव नमस्तुभ्यं ध्वजेऽस्मिन्स्थापितोमया ॥ स्थिरोभवात्र रक्षार्थ याच स्कार्यसमाप्यते ।। नतो दक्षिणद्वार तोरण पूजनम् ॥ ततो द्वार ऊर्ध्व-30 श्रियैनमः, अधः-30 देहल्यैनमः पूर्ववत्कलश द्वयंपूर्व पश्चिम शाखयोर्मूले स्थापयित्वा पूजयित्वाच तेनैवक्रमेण-- 30 पुष्पदन्तायनमः स्थापयामि पू० । ॐ कपर्दिनेनमः स्था० पू० कलशद्वये:-30 गोदायैनमः, ॐ कृष्णायनमः । सम्पू० । ततरच फ्रांकिततोरण दक्षिणद्वारं हस्तेनस्पृष्ट्रवा वक्ष्यमाणमंत्रण-30 इपे त्योर्जेत्वा व्यायवस्थदेवोवः सविता प्रार्पयतु श्रेष्ठतमाय कम्र्मण आप्यायध्वमन्या ऽ इन्द्रायभागं प्रजावतीरनमीवा अयक्ष्मा मावस्तेन 5 ईशतमाघश र्ट• सोद्वधा ऽ अस्मिन्गोपतौ स्यात वहीर्यजमानस्य पशून्पाहि ॥ ३. समुद्रतोरणायनमः ॥ इति सम्पूज्य प्रतिष्ठाप्यच द्वारशाग्ययोः- सूर्यायनमः, ॐ भौमा- यनमा,, स्था० पू० ॥ ततोवामनाख्य दिग्गजमावाहयेत्-30 वामनाख्यदिग्गजायनमः स्थापयामि पूजयामि, प्रार्थयेत्---वाम- नख्यं स्थापयामि रक्षार्थ द्वारदिग्गजम् ॥ यावत्कार्य समाप्तिश्च तावत्वं रक्षकोभव ॥ ततो यजुर्वेदिनौ द्वारपालौ यजुः शान्ति पाठको, बाहय गन्धादिभिः सम्पूज्य - कातरातो यजुवेंट (७०) कर्मकाण्ड रताकरे, तोरणपूजा पद्धति. - स्त्रैष्टुभो विष्णुदैवतः । काश्यपेयस्तुविप्रेन्द्र शान्तिपाठं मखेकुरु॥ एवंद्वितीयमपिसंप्रार्थ्य,, ततो दण्डमहिषांकितांध्वजा हस्तेनिधायें गन्धादिभिः सम्पूज्य यममावाहयेत्-30 एोहि वैवश्वत धर्मराज सर्वामरैरचित धर्ममूत्त ॥ शुभाशुभानन्द शुचामधीश शिवायनः पाहिमग्यनमस्ते ॥ इत्यावाह्य सम्पूज्य प्रतिष्ठाप्यच । आयंगौः पृश्निरक्रमीद सदन्मातरंपुरः पितरश्च प्रत्यंस्वः,, इतिमंत्रेण ध्वज मुच्छ्रित्य,, अ यमायनमः । इति सम्पूज्य संस्थाप्यच, प्रार्थयेत्- ॐ धर्मराज नमस्तुभ्यंध्वजेऽस्मिन्स्थापितोमया । स्थिरो भवात्र रक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥ ततो.नैर्ऋत्य कोणेकलशं संस्थाप्य, तत्रकालशे, ॐ कुमुद दुर्जयाभ्यांनमः, स्थापयामि पूजयामि, इति सम्पूज्य-नितिध्यायेत् ॐ एहोहिरक्षो गणनायकस्त्वं विशालवेतालपिशाच संधैः॥ ममाध्वरंपाहि पिशाचनाथ लोके श्वरस्त्वं भगन्नमस्ते, ॐ भू० भोनिर्ऋते इहागच्छेहातष्ठ । ॐ निर्ऋतयेनमः इति कलशे नितिं सम्पज्य ॥ ध्वजहस्तेकृत्वा- ॐ मोपूणऽइन्द्रात्रपृत्सु देवैरस्तिहिष्मातेशुष्मिन्नवयाः। महश्चि- द्यस्य मीदुषो यव्याहविष्मतो मरुतो वन्दतेगीः॥ इति ध्वज- मुच्छ्रित्य,, ॐ निव॑तयेनमः ध्वजे निर्ऋतिं सम्पूज्य, प्रार्थयेत्- ॐ नमस्तुभ्यं निर्ऋतेऽस्तु ध्वजेऽस्मिन्स्थापितोमया, स्थिरोभवान रक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥ ततः पश्चिम द्वार तोरण पूजनम्- अर्ध्व-ॐ श्रियैनमः, संपू० अधः-ॐ देहल्यैनमः, ततः स्तम्भमृले पूर्ववद्वेकलशे संस्थाप्य सम्पूज्यच, दक्षिणस्तम्भे-ॐ चण्डायनमः सं० वामे-ॐ नन्दिनेनमः संपूज्य, कलशद्वये- ॐ रेवायैनमः, ॐ नर्मदायैनमः सम्पूज्य, ततो गदांकित तोरणं पश्चिमद्वारं हस्तेन स्पृष्ट्वा-ॐ अग्नऽश्रायाहि वीतये, गृणानो हव्यदातये। निहोतासत्सिवहिपि, एतन्ते इति प्रतिष्ठाप्य, ॐ भू० सुकर्मतोरण इहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिष्ठितोवरदोभव, ॐ मुकर्मतोरणायनमः,, इतिसंपूज्य,, दक्षिएस्तंभे-ॐ शुझायनमः । वामे-ॐ वुधायनमः स्था० पृ०॥ नत्र द्वारवहिः- - कर्मकाण्ड रत्नाकरे, नोग्णपूजा पद्धतिः (७१) ॐ श्रञ्जनाख्यं स्थापयामि रक्षार्थ द्वारदिग्गजम् ॥ यावत्कार्य समाप्तिश्च तावत्वरक्षकोभव, ततः सामवेदिनौ द्वारपालौ शांति- पाठ वाचकौ, ग्राहयगन्धादिना सम्पुज्य, प्रार्थयेत्-~30 साम- वेदस्तु पिंगाक्षो जागतः शकदेवतः॥ भारद्वाजस्तु विप्रेन्द्र शांति- पाठं मखेकुरू, गवंद्वितीयमपि, ततो वरुणमावाहयेत्-~-30 एहि यादोगण वारिधीनां गणेन पर्जन्य सहाप्सरोभिः। विद्या- धरेन्द्रामरगीयमान पाहित्वमस्मान्भगवन्नमस्ते ॥ ततो स्वेत मत्स्यांकित पाशचिन्हितं स्वेतध्वज हस्तनिधाय, ॐ इमम्मेव्च- रुण श्रुधीहवमयाचमृडयत्वामवस्युराचके । इतिध्वजमुद्रित्य-, ॐ व्वरुणायनमः, इतिसम्पूज्य, प्रार्थये--ॐ वरुणायनमः स्तुभ्यं ध्वजेऽस्मिन्स्थापितोमया । स्थिरो भवात्र रतार्थ यावत्कार्य समाप्यते, ततो वायव्ये-पूर्ववत्कलशं संस्थाप्य सम्पूज्यच नत्र ---ॐ पुष्पदन्तायनमः स्था० पू० ॐ सिद्धार्थायनमः स्था० पू०॥ उभौ सम्पूज्य चायुध्यायेत्-ॐ एोहियजे ममरक्षणायमृगा- -दिरूदः सहसिद्धसंधैः॥ प्राणाधिपः कालकवे सहाय गृहाणपूजा भगवन्नमस्ते । भू० भोवायो इहागच्छेहतिष्ठ, 30 चायवे नमः सम्पूज्य धूम्रवर्णमंकुश मृगांकितं ध्वज हस्तेनिधाय गन्धादिभिः--सम्पूज्य, ॐ वातोवा मनोवा गधः, सप्तवि ट. शति: १ तेऽअग्नेश्व, मयुजस्तेऽ अस्मिञ्जवमादधुः ॥ इति ध्वजमुच्छ्रित्य; ॐ वायवेनमः ध्वजे चाएंसम्पूज्य, प्रार्थयेत्- ॐ वायु राजनमस्तुभ्यं ध्वजेऽस्मिन्स्थापितोमया। स्थिरोभवात्र रक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते ॥ तत उत्तरद्वारतोरण पूजनम्- अर्ध्वम्-ॐ श्रियेनमः,, अधः-ॐ देहल्यैनमः संपू०॥ ततःस्तम्भ योर्मूले इकलशे संस्थाप्य सम्पूज्यच स्तिम्भद्ये~ॐरौद्रायनमः ॐ प्रचण्डायनमः सम्ए० ॥ कलशद्वये-ॐ चारुण्यैनमः,, . वेण्यनमः सम्पज्य-ततः पद्माङ्कित तोरणमुत्तरद्वारंहस्तेन स्पृष्ट्वा शन्नो देवी रभिष्टय 5 श्रापो भवन्तु पीतये । शय्योरभिः श्रवन्तुनः ॥ ॐ भ० सुहोत्र नोरणडहागच्छे - (७२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, तोरणपूजा पद्धति हतिष्ठ ॐ शुहोत्र तोरणायनमः सम्पूज्य,, प्रतिष्ठाप्य च ॥ दक्षिणस्तम्भे-ॐ सोमायनमः, वामे-30 केतवेनमः मध्ये ॐ शनिश्चरायनमः, स्था० ए०॥ तत्रद्वारवहिः-ॐ सार्वभौम दिग्गजायनमः ॥ स्था० पू० ॥ इति सम्पूज्य प्रार्थयेत्- ॐ सार्वभौम स्थापयामि रक्षार्थद्वारदिग्गजम् ॥ यावत्कार्य समाप्तिश्च तावत्त्वं सुस्थिरोभव,, तत अथर्ववेदिनौ द्वारपालो शान्तिपाठवाचकौ, बाहय गन्धादिभिः सम्पज्य प्रार्थयेत्-ॐ बृहन्नेत्रो ऽथर्ववेदो ऽ नुष्टुभोरुद्रदेवतः। वैशम्पायन विप्रेन्द्र शान्तिपाठं मखेकुरु ॥ एवं द्वितीयमपि, ततः कुवेरमावाहयेत्- ॐ एढेहि यज्ञेश्वरयज्ञरतां विधत्स्व नक्षत्र गणेनसार्दम् ॥ सौषधीभिः पितृभिः सहैव गृहाणपूजां भगवन्नमस्ते,, ॐ भू० भोकुवेर, इहागच्छेहतिष्ठ प्रतिष्ठाप्यच,, ततो हरिद्वर्ण गदाश्चां- कितं ध्वज हस्तेकृत्वा ॥ आप्यायख समेतुते विश्वतः सोम- घृष्ण्यम् । भवाब्वाजस्यसगथे ॥ इति ध्वजमुच्छ्रित्य,, 3 कुवे- रायनमः इति मन्त्रेणध्वजे, कुवेरंसम्पूज्य,, प्रार्थयेत्-ॐ धना- ध्यक्षनमस्तुभ्यं ध्वजेऽस्मिन्स्थापितोमया ॥ स्थिरोभवात्ररक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते,, तत ईशाने-तत्रपूर्ववद् कलशंसम्पूज्य, तत्र-ॐ सुप्रतीकायनमः, ॐ भौमायनमः सम्पूज्य,, ईशानं ध्यायेत्-ॐ ए हियजेश्वर नत्रिशूल कपालखट्वाङ्ग घरेण सार्दम् ॥ लोकेन यज्ञेश्वर यज्ञसिध्यै गृहाणपूजां भगवन्नमस्ते । ॐ भू० भोईशाने हागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितो वरदोभव, 30 ईशानायनमः सम्पज्य,, ततस्त्रिशूलाद्वितश्वेतध्वज, वृषभचिन्ह युतहस्तेधृत्वा सम्पज्य-तमीशानं जगतस्तस्थुपस्पतिं घियं जिन्व मबसे हमहेव्वयम् ॥ पूषानो यथा ब्वेदसाम सङ्घधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये,, इति ध्वजमुच्छ्रित्य, ॐ ईशानायनमः ध्वजे ईशानं सम्पज्य, प्रार्थयेत्-ईशानेश नमस्तुभ्यं ध्वजेऽस्मिन्स्था पितोमया स्थिरोभवात्र रक्षार्य यावत्कार्यसमाप्यते, तत ईशान- पर्वयोरंतराले ब्रमाणं भ्यायेत-ॐ महोहि सर्वाधिपते मुरेन्द्र कर्मकाण्ड रलाफरे, तोरणपूजा पतिः लोकेन साध पितृदेवताभिः ।। सर्वस्यधालाऽस्यमित प्रभाषणे विशाध्वरंनः सततंशिवाय,, ॐ भू० भोव्रह्मनिहागच्छेहनिष्ठ । ततो रक्तध्वजहंसकमंडल्वो चिन्हाङ्कितं हस्तेनिधाय,, ॐ ब्रह्मजज्ञानम्प्रथम पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचोव्वेनावः स. ध्द्रयाऽउपमाऽअस्यविष्ठाः सतश्चयोनिमसतश्चब्धिवः ॥ इतिमंत्र- पध्वजमुच्छ्रित्य,, ब्रह्मणेनमः, इतिध्वजेत्रमाणंसंपूज्य मार्थयेत ॐ आदिदेवनमस्तुभ्यं ध्वजेस्मिन्स्थापितोमया,, स्थिरोभवात्र रक्षार्थ यावत्कार्यसमाप्यते,, ततः पश्चिमनैर्ऋत्ययोरन्नरले, अन- न्तमावाहयेत-30 एहोहिपातालधरामरेन्द्र नागाहुनाकिन्नरगी- यमान,, यक्षोरगेन्द्रामरलोकसंधै रनन्तरक्षाध्वरमस्मदीयम, 300 भू० भो, अनन्तेहागच्छेहतिष्ठ,, ततोमेघवर्ण चक्राङ्कितं ध्वजह- स्तेनिधाय,,-30 नमोस्तुसर्पेभ्योयेकेच पृथिवीमनु । येऽअन्तरि क्षेयेदिवितेभ्यः सर्पेभ्योनमः, इतिमंन्त्रेणध्वजमुद्रित्य,, 30 अनन्नायनमः संपूज्य प्रार्थयेत्-30 नमस्तुभ्यमनंताय, ध्वजेड- स्मिन्स्थापितोमया,, स्थिरोभवात्ररक्षार्थ यावत्कार्य समाप्यते,, नतोमंडपमध्ये वृहद्ध्वक्षुद्रघंटिका चामरयुतं हस्तकृत्वा-32 द्रस्यवृष्णो ब्वगास्यराज्ञऽादित्यानां ममता ॐ शर्धऽउग्रम् । महामनसां भुवनच्यवानां धोषोदेवानां जयतामुदस्थान---इत्युष्ट्रि- त्य,, - मंडपस्थदेवताभ्योनमः,, संपज्य प्रार्थयेत,, अनमोम- डपदेवेभ्यो ध्वजेऽस्मिन्स्थापितामया, स्थिराभवन्तुरत्नार्थ, यावत्कार्यसमाप्यत|| स्तंभादिसर्वेभ्योदेवेभ्योनमः ।। इति ध्वजारोपण तोरण पूजा पद्धतिः ॥ Ke (७४) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, वलिदान पद्धति . ॥ अथ दिक्पाल, वलिदान पद्धतिः ॥ ततोमंडपाद्वहि रिन्द्रादि दशदिक्पालेभ्यः पूर्वादिक्रमण,, संदीपसदक्षिण दधिमाषान्नोदन वलीन्दद्यात्-तत्रादौपूर्वद्वारे इन्द्राय-सदीपसदक्षिण दधिभक्तवलिं पात्रेकृत्वा, इन्द्रमावा हये। प्रातारेमितिगर्ग ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्द इन्द्रोदेवता इन्द्रा- वाहने वलिदाने च विनियोगः-30 वातारमिन्द्र मवितार ! हवे हवे सुहव र्ट० शूरमिद्रयामिशनं पुरुहतमिन्द्र ई० स्वस्तिनो मघवाधात्विन्द्रः ॐ इन्द्रसांगं सपरिवारंस शक्तिकमैभिर्गन्धाधु- पचार स्त्वामहं पूजयामि, इतिवलिं संपृज्य-ॐ इन्द्राय सांगाय सपरिवाराय' सायुधायसशक्तिकाय इमं सदीपमापभक्तवलि समर्पयामि, हस्तेजलं गृहीत्वा-भोइन्द्रदिशंरक्ष यलिंभक्षममसकु- ९ वस्यायुः कर्ताक्षेमकर्ता शान्तिकर्ता पुष्टिकर्ता निर्विघ्नकर्ता वरदोभव,, मंडलेसंप्रवक्ष्यामि मयाभक्त्या निवेदितम्,, इंद- मध्यमिदं पायंदीपोयं प्रतिगृह्यताम, इतिवल्युपरि जलविमजेत् । ततं आग्नेये-ॐ त्वन्नोऽअग्नहति हिरण्यम्प ऋषि मिश्छन्दो ऽग्निर्देवता ग्न्यावाहने बलिदाने च वि०॥ त्वन्नोऽअग्ने व्वर- णस्य विद्वान्देवस्यहेडो ऽअवयासिसीष्टाः || यजिष्टो वन्हितमः ।। शोशुचानो विश्वाद्वेषा ॐ सि प्रमुमुग्ध्यस्मत्वाar ॥ ॐ भू भोभो अग्ने इहागच्छेहांतष्ट, . अग्नयेनमः वलिंसम्पूज्य, जलैगृ 30 अग्नये सांगाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्तिका यैनं दधिमाष भक्तवोल स०॥ भो भो, अग्नेदिशंरक्षनवाल मनं भक्ष मम सकुटुम्बस्य आयुःकर्ता क्षेम० शान्ति पुष्टि निर्विन वरदोभव ॥ ॐ मण्डले सम्प्रवक्ष्यामि ॥ इति जलविसृजेत् ।। ततो दक्षिणे- असीति जमदग्निपि त्रिष्टुप्छन्द यमोदेवता यमावाहने वलिदानेच वि०॥ ॐ श्रसियमोऽअस्यादित्योऽअर्व- नसि नितोगुह्येन व्रतेन असिसोमेन समयाविरक्त । श्राहुरते. त्रीणिदिविवन्धनानि म्वाहा ॥ ॐ भृ० भोयमेहागच्छेहतिष्ठ, कर्मफाएट रक्षाफर, वलिदान पक्षति (७) 34 यमायनमः वलिंसम्पूज्य, जल०-30 यमाय साङ्गायसपरि वाराय, सायुधाय. सशक्तिकार्यनं दधिमाप भक्तवलिंसम० भो २ यम दिशेरचनं वलिं भन्न २ भमसकुटुम्वस्य , आयुःकर्ता, क्षेम० शान्ति पुष्टि तुष्टि निर्विन चरदोभव ]] ॐ. भण्डले सम्प्रवक्ष्यामि० । इतिजलविजेत् ॥३॥ ततो नैर्ऋत्ये, असा न्वन्त मिनिविवम्बानृपिनिष्टुप्छन्दो नि तिर्देवता नित्या- वाहने वलिदानेच विनियोगः। ॐ असुन्धन्तम यजमानमिच्छ- स्लेन स्यन्यास्तस्करम्यान्वेषि । अन्यमम्मदिच्छसान ऽ नत्या जमो. देवि नितेतुभ्यमस्तु ।। ॐ भूर्भुवम्बः भो २ निर्जनहहागच्छे हतिष्ठ ॐ निलयेनमः वलिंसम्पूज्य, जलं-ॐ निव॑तये सांगा य सपरिचाराय सायुध्याय सशक्ति कायैनं दधिमाप भक्तवलि समः ॥ भो २ निते दिशरन वलिं भक्ष २ ममसकुटुस्वस्य आयुःकर्ता, जेमा शान्ति पुष्टि० तुष्टि निर्षिाकर्ता वरदोभव, मण्डले सम्प्रवक्ष्यामि मयाभल्या निवेदितम् ॥ उदमध्ये मिदंपाय दीपो ऽ प्रतिगृह्यताम् । जलविसृजेत् ॥४॥ ततः पश्चि मे-ॐ तत्वायामीति शुनः शेफऋषि त्रिष्टुप्छन्दो यमणोदेवना वणाचाहने वलिदानेच विनियोगः-ॐ तत्वायामि ब्रह्मणावन्द्र मानस्तदाशास्ते यजमानो हविभिः । अहेडमानो व्वरूपो ध्युस्स टै समान 5 श्रायुः प्रमोपीः, ॐ भू० भोवरुणे हागच्छेहतिष्ठ आ वरुणायनमः वलिं सम्पज्य ॥ जलंगृ•~ ॐ वरुणायसाङ्गस्य सशक्तिकायैनं दधिमाप भक्तवलिं समर्पयामि ॥ भो २ भए दिश रक्षन चलि भन २ मम सकुटुम्बस्य आयुःकर्ता, नेमा शान्निः पुष्टि, तुष्टि. निर्विघ्नकर्ता वरदोभव ।। ॐ मण्डलेसं जलवि०॥५॥ ततोवायव्ये- पानोनियुद्भिरिति वसिष्ठ ऋषि त्रिष्टुप्छन्दो वायुदेवता वाग्वावाने वलिदानेच वि०॥30 भानोनियुद्भिः शतनीभिरध्वर ई० सहस्रिणीभि रूपयाहि यज्ञम् । व्यायो इ मन्त्सदने मादयस्खयूयंपातः, स्वस्तिभिःसदानः ॥ ॐ भू० भोवायो इहागच्छेहतिष्ठ, ॐ वायवेनमः बलि सम्पूज्य (७६) कर्मकाण्ड रताकरे, वलिदान पद्धति जलं गृ०-ॐ वायवे सानाय सपरिवाराय सशक्तिकाय, सायु- धायैनं दधिमाष भक्तवलिं समर्पयामि, भो २ वायो दिशरन पलिं भक्ष २ ममसकुटुम्बस्य आयुःकर्ता क्षेम० शांति पुष्टि तुष्टि निर्विन० वरदोभव, ॐ मण्डलेसं० जलम्विसृजेत् ॥३॥ मत उत्तरे-ॐ वयमिति वन्धु ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः सोमो देवता सोमावाहने वलिदानेच वि०॥ ॐ व्वयर्ट० सोमव्रते तवमनस्तन- बुविभ्रतः॥ प्रजावन्तःसचेमहि ॥ ॐ भृ० भोसोमेडागच्छेहतिष्ठ, ॐ सोमायनमः, वलि संपज्य, जलं गृ-30 सोमाय साहाय सराप्तिकाय सपरिवारोय सायुधायैनं दधिमाष भक्तवलि समर्प- यामि, भो २ सोम दिशंरक्षन वलि भक्ष २ ममसकुटुम्बस्यायुः कर्ता क्षेम शांति पुष्टि तुष्टि निर्विघ्नकर्ता वरदोभव ॥ ॐ मण्डले सं० । इति थल्यपरिजलं विसृजेत् ॥७॥ तत ईशाने-ॐ समीशानमित्यस्य गौतमऋषिर्जगतीछन्दः ईशानो देवतेशाना- वाहने वलिदानेच वि० ॥ ॐ नमीशानं जगतस्तस्थुषस्पति घियं- जिन्वमवसेहमहेव्वयम् ॥ पानो यथावेदसाम सवृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥ ॐ भू० भोईशानेहागच्छेहतिष्ट, 30 ईशा- नायनमः वलिं सम्पूज्य, ॐ ईशानाय साहायसपरिवाराय सायु धाय सशक्तिकायैनं दधिमाष भक्तवलि समर्पयामि, भो२ ईशान दिशंरक्षनवलि भक्ष २ ममसकुटुम्बस्य आयुःकर्ता क्षेम शान्तिः पुष्टि तुष्टि, निर्विघ्नकर्ता वरदोभव, ॐ मण्डले सं०, वल्युपरिजलंक्षिपेत ॥८॥ तत ईशान पर्वयोरंतराले-(संग्रहशि- रोमणी-ईशानान्तेच ब्रह्माणं पूर्वैशान्योस्तु मध्यमे, प्रतीचीनैर्मती मध्ये, अनन्तं स्थापयेदिति ॥ ) ॐ ब्रह्मयज्ञानमिति गोतम ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो ब्रह्मादेवता ब्रमावाहने वलिदानेच वि०॥ . ब्रह्मयज्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विशीमतः सुरुचोब्वेनऽआवः । सबुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः सतश्चयोनिम सतश्चब्वियः, भू भो- जयनिहागच्छरतिष्ठ, ॐ ब्रह्मणेनमः यलि सम्पृज्य, जलं गृ । ॐब्रह्मणे साङ्गाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्तिकायैनं दधि .
कर्मकाण्ड रखाकरे, बलिदान पतिः । ७) . माषभक्तवलिं समर्पयामि, भो २ ब्रह्मन्दिश रदैनंवलिं भन २ ममसकुटुम्बस्य आयुःकर्ता ओम शान्ति पुष्टि तुष्टि" निविप्न- कर्ताधरवोभव, अ मण्डले सं० ॥६ततो नैति पश्चिमयो- रन्तराले-30 नमोस्त्विति देवश्रवाऋपित्रिष्टुप्छन्दः, अनन्तो देवता अनन्नावाहने वलिदानेच वि० ।। 30 नमोस्तु सभ्यो येकेच पृथिवी मनु। येऽअन्तरिक्षे येदिवितेभ्यः सर्प योनमः । भृ० भो, अनन्नेहागच्छेहतिष्ट ॐ अनन्तायनमः वलिं सं0 जलं गृ0 | 0 अनन्ताय साङ्गाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्ति- कायैनं दधिमाषभक्तवलिं समर्पयामि, भोर अनन्त दिशेरचन वलिंभन२ ममसकुटुम्वस्य आयुः कर्ता क्षमा शान्ति पुछि तुष्ठि० निर्विघ्नकर्तावरदोभव, 0 मंडलेसं० वल्युपरिजलंक्षिपेत् मय दोषपाल लिदानम्., ततो मण्डपावहिर्वायत्र्यांदिशि दुळमणं ॐ निमल्य तत्राहय-सङ्कल्पं कुर्यात् अद्यत्यादि देशकालो संकीर्त्या मुकोऽहंकृतस्यामुक कर्मण उत्तरांगत्वेन सर्वारिष्ट निर्व- त्पर्य क्षेत्रपालाय बलिदानं करिष्ये तदंगत्वेन पूजनंच करिष्ये, ततो ब्राह्मणं पूजयेत्-ध्यानम्-सिन्दूर कजलाकारं शुलहस्तं त्रिलोचनम् , ध्यायामि मनसाभक्त्या क्षेत्रपालं सुरक्षकम् ॥ ततः पाच सिन्दर कजलादिभिः, क्षेत्रपाल स्वरूपिणं ब्राह्मणं सम्पूज्य रक्तपुष्प मालाभिरलंकृत्य, रक्तवस्त्रेणा छायच, ततः सदक्षिण सिन्दर कजल कृसरान्नापूपान्न पक्कान्नवलिं सुसज्य तदुपरि-चतु- वैत्तिसंयुक्तं दीप प्रज्वलय्य वलिं जलेन संमोक्ष्य रक्तचन्दनादिभिः सम्पूज्यच-तत्र क्षेत्रपालं ध्यायेत् ॐ भ्राजद्वक्त्र जदाधरं त्रिन- यनं नीलांजनादिप्रभं, दोर्दण्डान्त गदाकपोलमाणसग्गन्ध वस्त्रावृतम् ॥ घण्टाघुर्धरमेखलाध्वनि मिलध्दकारभीमं विभु, वन्दे संहित सर्पकुण्डलधर श्रीक्षेत्रपालंसदा, ॐ भू भोक्षेत्र- पालेहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिष्ठितो वरदोभव, ॐक्षा क्षेत्रपालाय * टिपणी-यस्य वेदश्च वेदीच विन्द्येिते विरूपम् । सबटुह्मिणोनाम सर्व कर्ममुहित॥
(७) कर्मकाण्ड रताकरे, पलिदान पद्धति , भूत प्रेत पिशाच टाकिनी शाकिनी वेतालादि परिवार युताय गष सदीपः सताम्बूलः सदक्षिणः कृसरान्नबलिनमः, इति समर्पा, इस्तेजलंगृहीत्वा-भोभोक्षेत्रपाल दिशंरक्ष २ वलि भक्ष भक्ष, ममसकुटुम्बस्य आयुष्कर्ता क्षेमकर्ता शांतिका तुष्टिकर्ता पुष्टिकर्ता वरदोभव, ॐ मण्डले सम्प्रवक्ष्यामि०, इतिजलं वल्युपरिक्षिप्ता, ॐ दधिमापोटनैर्युक्तं सदीपं वलिमुत्तमम् । क्षेत्र पाल गृहाणत्वं रक्षोविघ्नं प्रणाशय, इतिमन्त्रेणवलि ब्राह्मण हस्तेदत्वा, हस्ते गन्धाक्षत जलंगृहीत्वा वक्ष्यमाणेननिः सारण कुर्यात्--ॐ य य य योगिराज सकल गुणमयं नीलवर्णघनाभं॥ रौं शॉ शूल स्तं करधृत डम डि डिम वादयन्तं, में में मण्डपस्यो परिगमन भयाद्विघ्नकान्द्रावयन्नम् । क्षो ना नौ नेत्रपालं भुवनभयहरं, पजयामीभक्त्या, इतिनजलं वहिर्गत ब्राह्मणोपरिक्षिपेत, सब्राह्मणः स्वयंभुंजीत वाचपुष्पथे प्रक्षिपेत॥ तंत आचम्य ॐ भद्रंकर्णेभिः, इति मन्त्रं पठित्वा यथावकाश कुर्यात् ।। इति क्षेत्रपाल वलिदानम् ॥
कर्मकाण्ड रत्नाकरे, शप्तदशरेखारमक परिभाषा (७६) सप्तदश रेखात्मक दीक्षांग-सर्वतो भद्रपरिभाषा . अथ शारंदा तिलकोक्त सप्तदशरसात्मक सर्वतोभद्र परिभाषां वक्ष तथा दोघेदीमान मुक्तकुण्ड रखावरयाम्-~-पैदे: ४ साथ शरं स्तथाप्यय इयै हंस्तमि तावा ययामध्ये मडप रन्ध्रभाग : विमिताध्यमापि हस्तोचका ॥ भूपाना प्रवरामिपचन विधौ स्यात्सर्वती भद्रिकाया पधिनीभा जलाशय विधौपाणिग्रहे श्रीधरी । फ्रियासारपि-- हस्तमात्रं तदुरसे, चतुरनं समन्तत । हस्तीमताच विस्तीणां चतुईस्तैः समंतप्तः ।। शारदातिल के सूत्रपातविधानमुत्तम् चतुस्ने चतुष्कोटे कर्णसूत्रसमन्विते । चतुर्ण- पिचकोष्टेपु कोणसूत्र चतुष्टयम् ।। मध्येमध्ये यथामत्स्याभवेयु. पातयत्तथा । पूर्वापरायते द्वेवे मन्त्रीयाम्योत्तरायते १२१ पातयेत्तषुमत्स्येषु समंसूत्र चतुष्टयम् । पूर्ववत्कोण कोष्टेषु कर्ण सूत्राणिपातयेत । ३ । ततुभूतेषु मत्स्येषु दद्यात्सूनचतुष्टयम् । तत कोणेषु मत्स्याःस्युक्तेषु सूत्राणि पातयेत । ४ । यावच्छत द्वयंमन्त्री हट्पश्चाशत्पदान्यपि । तावत्तेनैव विधिनाकर्ण- सूत्राणि पातयेत । ५ । अथ लेख प्रमाणम--पत्रिंशतापदमध्ये लिखेत्पनं सुलक्षणम् । वहि पंक्त्याभवत्पीठं पंक्तियुग्मेनवीथिका । १ द्वारशोभोपशीभासा शिष्टाभ्यो परिकल्पयेत । शास्त्रोक्त विधिनामन्नीतत. प समालिखेत।२। पद्मक्षेत्रस्य सन्त्यज्य द्वादशा शंवहिः सुधी ! तन्मध्यं विभजे वृत्त स्लिभि समविभागत । : । श्राद्यस्यात्कणि कास्थानं वेशराणां द्वितीयकम् तृतीयतनपात्राणां मुक्ताशनदलाग्रकम् । ४ । बाह्यवृत्तान्तरालस्य मानन विधिनामुधी । निधायकेशराप्रेषु परितो ऽर्द्धनिशाकरान् । ५ । लिखित्वा सनधिर्मस्थानि ततसूत्राणिपातयेत । दलाग्राणां चयन्मानं तन्मानादवृत्तमालिखेत । ६ । तदन्तराल तन्मध्य सूत्रस्या भयत सुधीः । श्रालिखेद्वाधहस्तन दलामाणि समन्ततः । ७ । दशमूले पुयुगश वे शराणि प्रकल्पयेत । एस- त्माधारणप्रोक्त पङ्कजं तन्नवेदिभि ।। पदान्त्रिीणिपादार्थ पाठकोणेषु मायेत । श्रयशिः पदविद्वान्पोठगात्राणि कल्पयेत् । ६ । पदानि वीथिसंस्थानि माजयेत्पंक्त्यमेदत । दिक्षुद्वाराणि रचयेहिचतुष्कोटकैस्तत ।१० । पदैखिभि रथकेन शोमा स्युद्वारपाश्वत । उपशोभारस्युरेवेन त्रिभि, कोहरनंतरम् । ११ अवशिष्टे. पदैः परित्र कोणानां स्याश्चतुष्टयम् । रसकरपना- रक्षयेत्पर्धामण मण्डलंतन्मनोहरम् । १२ । पीतं हरिद्रा चूर्णस्पासितं तण्डुलससम्भय । कुसुम्भचूर्ण मरुणंकृष्णदग्ध पुलाकजम् । १३ । विल्यादिपत्रज श्याममित्युक्तं वर्णपञ्चकम् ।। अंगुलात्सेधविस्तारा सीमारेखा सिताशुभा । १ । कणिकापीतवर्णन वेशराण्यरुणेनच । शुक्ल. वर्णन पाणि तत्सन्धी श्यामलेनतु । २। रजसारसयेन्मन्त्री यद्वापीतयफणिका (पेशरा: पोतरफा: स्यूरतानिछदनानिच { ३ । सन्धय' कृरणवणा स्यु सितेनाप्यसितेनबा । रजयेस्पीठ
(८०)
कर्मकाण्ड रत्नाकर शप्तदश रेस्त्रात्मक परिभाषा
गर्भाणि पादा स्युररुणप्रभा । ४ । गात्राणितस्य शुक्लानि वीथोप्वपिचतसषु । श्रालिखेक
ल्पलतिको सर्पदृष्टि मनोहराम् । ५ । वर्णनानाविधैश्चित्रां दलपुष्प फलान्निनाम् । द्वाराणि
श्वेतपखानि कोणान्य सितमानिन । ६ । रकाशोना समुदिछो पसोभातु पिशशिला । तिलो,
रेखा रहि कुर्यात्सितरफा. सिता ममात । ७१ मण्डल सर्वतोभद्र मेतत्साधारणस्मृतम् ।
पृषिम्यादिचतुराशीतिपेवता स्थापनायच ।।
अत परं समन्त्रक देवता स्थापन प्रमोऽस्ति परत्वत्र प्रत्यविस्तार भयान
दर्शित ॥
दीनांग सर्वतो भद्रोद्धारः॥
३
कल्प
रक्तः
पीत्त.
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एक:
मीन: L
पीतः
रस्ती:
'श्वेत:
कर्मकाण्ड रताको, दीक्षांग सर्वतोभद्र पतिः - अथ प्रतिमाग्न्यु त्तारणम्, अथ लोहकार स्वर्णकारादि घटित प्रतिमाग्न्यु त्तागण विधिः ॥ आचम्य देशकालौसंकीर्त्य अस्यामूत्तौ स्वर्णकार लोहकारकृत घेट्टनटंका- द्यवधातादि समस्तदोष परिहारार्थ देवत्वप्राप्त्यर्थमग्न्युत्तारण कर्मकरिष्ये,, प्रतिमापात्रे निधायवक्ष्यमाणाष्टकेनप्रथमावृत्ती दुग्धधारां द्वितीयावृत्ती जलधारां प्रतिमोपरिदद्यात् ॥ तंत्रमंत्राः ॐ समुद्र स्यत्वावकयाग्ने परिव्ययामसि । पावकोऽअस्मभ्य ई. शिवोभव । १। ॐ हिमस्यत्वा जरायणाग्ने परिव्ययामसि । पावकोऽअस्मभ्य है. शिवोभव । २ ॐ उपज्मन्नुपवेतसे वतर नदीष्वा । अग्ने पित्तमपामसिं मण्डूकिताभिरागहि सेमन्नो यजम्पावक वर्ण १० शिवकृधि । ३ | ॐ अपामिदंन्ययन है। समुद्रस्य निवेशनम । अन्यांस्तेऽअस्मत्तुपन्तुहेतयः पावकोऽअस्म- भ्य शिवोभव ॥४॥ ॐ अग्नेपावकरोचिषा मन्द्रयादेव- जिह्वया। श्रादेवान्वक्षियति च ॥५॥ ॐ सनः पावक दीदिवोग्ने देवा दहावह । उपयज्ञ ० हविश्वनः ॥ ३ ॥ ॐ पावकया यश्चितयन्त्या कृपाक्षामान्नुरुत्व उपसोभानुना । तूर्वन्नयामन्नेत- शस्य नूरण आयोघृणेन ततृपाणोऽयजरः ॥ ७॥ ॐ नमस्तेहरसे शोचिपे नमस्ते ऽयस्त्वचिपे अन्यांस्तेऽअस्मत्तपन्तु हेतयः। पावकोऽअस्मभ्य र्ट• शिवोभव । इतिमंत्रैः प्रतिमांसंस्नाप्य गंधा- दिभिरालोज्यच यथास्थाने स्थापयेत् ॥ ॥ इति प्रतिमाग्न्यु तारणम् ॥ अथदीक्षांग सर्वतोभद्र देवता स्थापनम्पूजनंच। अथ कर्ता सर्वतोभद्र वेदीसन्निधिभागत्याचम्य,भूतो- त्सादनादिकं, कृत्वा वेदीशानकोणेरक्षादीप प्रज्वलय्य,, संकल्प कुर्यात-श्रयेहेत्यादि देशकालौ संकीर्त्यामुकोऽहं ममास्यकुमारस्य वीजगर्भसमुद्भवैनो निवर्हणाय श्रीपरमेश्वर प्रीतये, द्विजत्व (२) कर्मकाण्ड रताकरे, दीक्षांग सर्वतोभद्र पति - संपादकौतस्मारकर्मानुष्ठानासद्धिद्वारापोडपसंस्कारान्तर्गतकरि ष्यमाणामुकसंस्कारकर्मणितदुपयोग्ययुतात्मकनवग्रहमंडपेमखसंर क्षणाय दीक्षाङ्ग सर्वतो भद्रवेचाएथिव्यादि चतुरशीति, देवतानां तत्तत्मति मास्थापन पूर्वकमावाहनादि षोडशो पचारविधिना पूजनंकरिष्ये,, नतोभद्रमध्ये कलशस्थापन विधिना कलशंसंस्था- प्य सम्पज्य च, चतुरशीति सुवर्ण रजतादि प्रतिमाः संस्थाप्य, भद्रस्थदेवता पूजामारभेत् तत्रादौकर्णिकायाम्-पृथिवीमावा- येत्--साक्षतपुष्प:--- स्योना पृथ्वीतिमेधातिथि षिर्गा- 'यत्री छन्दः पृथ्वी देवता पृथिव्यावाहने विनियोगः, ॐ स्योना पृथिविनो भवान्नृक्षरानिवेशनी । यच्छानः शर्मसप्रथाः ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः भो, पृथ्वीहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिष्ठिता वरदा- भव, हस्ते पुष्पं गृहीत्वा स्थापनी मुद्रादर्शयित्वा, ॐ पृथिव्या धार्यतेविश्वं दुर्वाहं सागरैनंगैः। अतस्त्वां स्थापयामीह मण्डले ब्रह्मणःपदे, ॐ पृथिव्यैनमः संस्थाप्य प्रतिष्ठां कुर्यात्, ॐ एतन्तेदेव सवितर्यजं प्राहुहस्पतये ब्राह्मणे । तेन यज्ञमवतेन यजपतिं तेन मामव ॥ मनोजूतिर्जुषतामाज्यस्य वृहस्पतिर्यज्ञ- मिमं तनोत्वरिष्टं यज र्ट० समिमंदधातु विश्वेदेवासइहमा- दयंतामों प्रतिष्ठ,, इति प्रतिष्ठाप्य, ॐ पृथिव्यैनमः सम्पूज्य, प्रार्थयेत्, एवं सर्वत्र, ततः केशराख्यपदेमेम्म्-ॐ प्रपर्वतस्यै- ति देवरातऋापत्रिप्छन्दो मेरुर्देवता मेवाहनेविनियोगः। ॐ अपर्वतस्य वृषभस्य प्रधानापश्चरन्ति स्वसिषडयानाः। नाऽाव- धृनन्नधरागुदक्ताऽअहिर्बुध्न्य मनुरीयमाणाः । विष्णोविक्रमण A * टि० मत्स्य पुराणे-आवाहयेय्यातिभिः, सिद्धान्तसारे- पुष्पांजलि समादाय मुद्रयाच विजया । योक्ती देवतांध्यात्या मूलमा समुच्चरन् ॥ सम्युभ्यम्तदेवनामा बागच्छागच्छधेत्यपि, देवस्य सेजस्तम्मत्तों आवाहिन्याख्यमुद्रया । तत संस्थापनं कुर्यादिहतिष्ठतिष्ठच ॥ संस्थापनीयां मुद्रांच दर्शयिरवा विभावयेत् ॥ बात स्थिरीदेव शनि पश्चामस्थापयदिति । मुद्रालक्षणं सर्धकर्म परिभाशयां द्रनयम ।।
कर्मकाण्ड लाकरे, दीक्षांग सर्वतोभद्र पद्धति. मसि विष्णोविकान्तमसि विष्णोः कान्तमसि ॥ पुष्पं-ॐ पर्व- तेश दिव्यवर्ण देवगन्धर्ष सेवितं । सर्वकल्याण सिध्यर्थ मे संस्थापयाम्यहम् । ॐ भू. मेरो इहागच्छेहतिष्ठः। ॐ मेरवे नमः, सम्पूज्य, पत्रस्थाने ब्रमाणं-ॐ ब्रह्मयज्ञानमिति गोतम अषित्रिष्टुप्छन्दो ब्रह्मा देवता यावाहने वि०॥ ॐ ब्रह्मय- जानं प्रथम पुरस्ताद्विसीमतः सुमचोवेन पावः । सवुध्न्याs उपमाऽअस्यविष्टाः सतश्चयोनि मसतमग्वियः ॥ पु०-ॐ चतुर्मुग्वं दिव्यरूपं हंसयान समन्वितं । मण्डले स्थापयाम्यत्र- ब्रह्माणं कमलासनम् ।। ॐ भू० भो ब्रह्मन्निहागच्छेहनिष्ट, ॐ ब्रह्मणेनमः ।। ततो वहिरीशाने-ईशम्- ॐ तमीशानमिति गोतम ऋषिर्जगतीच्छन्द ईशानो देवतेशानावाहने वि० ॥ ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हमहेव्वयम् ॥ पुषानो यथाव्वेद सामसद्वृधे रक्षितापायुरदब्धः स्वस्नये, पु-. ॐ ईशानी पालकं देवं सर्वलोकाभयंकरम् । मण्डलेस्थापयाम्य- स्मिन्नीशान्यां सर्वसिद्धये, ॐ भू० भोइशेहागच्छेहतिष्ठ, 30 -ईशायनमः, सं०, नतः पूर्वे, इन्द्रम्-त्रातारमिन्द्रमिति गर्ग पित्रिष्टुप्छन्द इन्द्रो देवतेन्द्रावाहने वि० । ॐ त्रातारमिन्द्र "मवितार मिद्र ई. हवे हवे सुहव , शूरमिन्द्रं हृयामि शत्रं पुरुहतमिन्द्र । स्वस्तिनो मघवाधात्विन्द्रः ॥ पु-0 सर्वलो- काधिपं श्रेष्ठं देवर्षीणांच पालकम् ।। पूर्वदिक्पालकं देवराज वैस्था- पयाम्यहम् । ॐ भूर्भुवः स्वः भो इन्द्रेहागच्छेहतिष्ठ, ॐ इन्द्रायनमः सं० ।। तत आग्नेय्यामग्निम्-~ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्यहेडो ऽ अवयासि सीप्टाः ॥ यजिष्टोवन्हि- तमः शोशुचानो विश्वाटेपासि प्रमुमुग्धस्मत् । पुल-त्रिपाद मेषवाहच त्रिशिग्वंच त्रिलोचनम् । आग्नेयां स्थापयाम्यत्र वन्हि पुरुपमुत्तमम् ॥ ॐ भू० भो, अग्ने, इहागच्छेहनिष्ट सुप्र- तिष्ठितो वरदोभवः ॥ 30 अग्नेये नमः, समाज्य ॥ ततो अक्षिणे धर्मराजम्-30 यमायत्वेनि दधीची ऋषि मणि- , (४) कर्मकाण्ड रखाकरे, दीक्षांग सर्वतोभद्र पद्धतिः , क्छन्दो धर्मराजो देवता धर्मराजावाहने वि० ॥ 0 यमा- यत्वाङ्गिरस्वते पितृमते स्वाहा। स्वाहा धर्माघस्वाहा धर्मः पित्रे॥ पु०-अन्तकः सर्वलोकानां धर्मराज इतिश्रुतः। अतस्त्वां स्थाप- याम्यत्र रक्षोदिनक्षिण प्रभुम् ॥. 30. भोधर्मराजेहागच्छते हतिष्ठ सु० । ॐ धर्मराजायनमः, सम्पूज्य ॥ ततो नैऋत्येनिर्म- तिम्-ॐ असुन्वन्तमिति मधुश्छंदा ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो निर्ऋति- देवता नित्यावाहने विनियोगः-असुन्वन्तम यजमानमिच्छस्ते नस्येमन्विहि तस्करस्य । अन्यमस्मदिच्छसात ऽ इत्यानमोदेवि निर्ऋतेतुभ्यमस्तु । पु०-नैर्ऋत्यां वसतिर्यस्य घोररूपीसदादियः । नियंति स्थापयाम्यत्र नैर्ऋत्यां मण्डलेशुभे॥ ॐ भू० भोनित इहागच्छेहतिष्ठ सु० । निर्ऋतयेनमः पू० ॥ ततः पश्चिमेवरु- णम्-ॐ इमम्म इत्यस्य शुनशेफ़ ऋषिर्गायत्रीछन्दो व्वरुणो देवता ब्वरूणावाहने विनियोगः। 30 इमम्मे ब्वरूण श्रधी हब- मद्याच मृडय । त्वामवस्युराचके । पु०-30 अपांपतिं पाशधरं यादसांचपतिं शुभम् । वरुणं स्थापयाम्यत्र वारुण्यां मग्वरक्षणे । ॐ भू० वरण इहागच्छेह तिष्ट सुप्र०॥ ॐ वरुणायनमः, पू०॥ ततो वायव्ये वायुम्-30 वातोवामन इति बृहस्पतिऋषि मणि: क्छन्दो घायुर्देवता वाय्वावाहने वि०॥ ॐ वातोवामनोवा- गन्धर्वाः सप्तविर्ट शतिः। ते ऽ अग्रेश्वमयुजस्ते अस्मिञ्जवमा- वधुः। पुष्पम् गृ°---30 अाशुगं सर्ववोधञ्च गन्धवाई मनोरमम् । मण्डलेस्थापयामीह वायव्यां दिशिरक्षकम् ।। ॐ भू० भोवायो, इहागच्छेहातष्ठ सुप्र ॥ ॐ वायव्येनमः। पूछ । तत उत्तरे सोमम्-30 सोममिति तापसऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दः सोमोदेवता सोमावाहने वि। 30 सोम ० राजान भवसग्नि गीभिहवामहे आदित्यान्विष्णु र्ट० सूर्य ब्राह्माणंच बृहस्पनिम् ॥पु-क्षीरोदा- वसम्भूतं लक्ष्मीबंधुंनिशाकरम् । मण्डले स्थापयाम्यत्र सोमं सर्वार्थ सिद्धये ॥ भ्र. भोसोमहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितोवरदो- भव ॥ ॐ सोमायनमः, पु०॥ नतो वहिरीशानवामे एकादशम्दान- फर्मकाण्ड रताकरे, दीक्षांग सर्वतोभद्र हद्धतिः (८५) 30 अ मद्रास र्ट मृज्य इति सिन्धुद्वीपऋपिरनुष्टुप्छन्दो न्द्रादेवना मद्रावाहने वि०॥ मद्रास द सृज्य पृथिवीं वृ. ज्योतिः समीधिरे। तेषां भानुरजस्र इच्छुक्रो देवेपुरोचते । पु०-30 एका: दशाधिकारुद्रानजपादेकपूर्वकान् । मरवसंरक्षणार्थाय स्थापयामि सुरोत्तमान | रुद्रनामानि-अजैकपादहिर्बुधन्यो विरूपाक्षोथरै-- वतः। दरश्चवहुरूपश्च त्र्यंवकरचसुरेश्वरः ॥ सावित्रश्चयन्तश्चं पिनाकी मुद्रसंज्ञकाः ॥ इति संस्थाप्य-30 भूर्भुवःस्वः, भो एका- दशरुद्राः, इहागच्छतेहतिष्ठत सुप्रतिष्टिता वरदाभवन्तु, , एकादश रुद्रभ्यो नमः पू०॥ तत इन्द्रदक्षमागेवसून--2.ज्मया इति वसिष्ठऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दो वसवो देवता वस्खावाहने वि०॥ ॐ ज्मया अन्नवसवो रन्तदेवाउरावन्तरिक्षे, मजयन्त शुभ्राः॥ अर्वाक्यथउरुज्रयः कृणुध्वं श्चोतादृतस्य जग्मुपोनो ऽ अस्य ॥ पु०-ॐ प्रबंधरतथासोमं प्रापश्चैवानिलंबलं । प्रत्यूपंचभभासंच क्रमशः स्थापयाम्यहम् ॥ ॐ भू० भोबसवेहागच्छते तिष्ठत- सुप्रतिष्ठिना धरदाभवन्तु ॐ अष्टवसुभ्योनमः, पू० । ता इन्द्र- बामेश्रादित्यान्-~ॐ यज्ञोदेवानामित्यस्य कुत्सऋषिन्नि टुप्छन्द श्रादित्यादेवता आदित्यानामावाहने वि०॥ ॐ यशोदेवानां प्रत्येतिसुम्नमादित्यासो भवतामृडयन्तः ॥ अवोर्याचीरमतिर्व वृत्याद र्ट. होश्चिद्यावरिवो बित्तरासदादित्येभ्यस्त्वा ।। पु०- ॐ धातारंवरूद्रंच, अर्यम्ण मित्र संज्ञकं । सूर्यभगंधिवम्वन्तं पूषणंसवितारकम् ॥ त्वाष्ट्रमच्युतनामानमादित्यान्द्वादशांश्च- त्तान् । स्थापयाम्यत्ररक्षार्थ द्वादशादित्यसंज्ञकान् ।। ॐ भू० भो द्वादशादित्या इहागच्छतेहतिष्टत सुप्रतिष्ठितावरदाभवन्तु ।। ॐ द्वादशादित्येभ्योनमः, पु०॥ ततोदक्षिणेअश्विनौ~ॐ यावां- कशा इत्यस्य मेधातिथि षिर्गायत्री छन्द अश्विनौदेवते अश्वि- नौरावाहने वि०। . याचाङ्कशामधुमत्यश्विना सूनृतावती। तयायजंमिमिक्षतम् । ॐ अश्विनौदेव वैद्यौच दिव्य रूपधरी शुभौ । मण्डले स्थापयित्वातौ पूजयामि सुसिद्धये ।। ॐ भू० कर्मकाण्ड रत्नाकरे, दीक्षांग सर्वतोमट पद्धति भो अश्विनाविहागच्छतमिहनिष्टतम ॥ वरदाभवेनाम् । ॐ अश्विभ्यांनमः ॥ ततोऽग्निवामे विष्णुम् विष्णोरराट मितिउनत्थ्य ऋपिर्यजुश्छन्दो विष्णुदेवता विष्ण्वा वाहने वि० । विष्णोरराट मसि विष्णोरन प्वेस्थो विष्णोःस्थरसि विष्णो धुवोसि वैष्णवमसि विष्णवेत्त्वा । 0 नारायणं महावष्णु संसारार्णवतारकम्, मग्य संरक्षणार्थत्वां स्थापयाम्पत्र भक्तिनः अभृ.विष्णो, इहागच्छेह निष्ट सुप्र० । ॐ विष्णवेनमः पूजयेत ।। नतोयम दक्षेदुर्गा-30 तामग्निवर्णामिति सौभऋपि त्रिष्टुप्छन्दो दुर्गादेवता दुर्गावाहने वि० ॥ तामग्निवर्णा तपसाज्वलन्ती वैरोचनी कर्मलेफपुजुष्टाम् ॥ दुर्गादेवीं शरणमहं प्रपयेसुतर सितरसेनमः॥ अग्निवर्णज्वलन्तींच महसा सर्वदाशुभाम् । भक्तानां वरदां देवींदुर्गा संस्थापयाम्यहम् ॥ ॐ भूर्भुवःस्वः भोदुर्ग, दहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिक्षिता वरदाभव ॥ दुर्गायनमा, पू०॥ नतोयमवामे स्वधाम्- 0 उदीरितामिति शंग्व ऋषि त्रिष्टुप्छन्दः, स्वधा देवता स्वधावाहने विनियोगः-0 उदीरिता- मवरऽउत्परासऽउन्मध्यमापितरः सौम्यासः॥ असुपऽईयुरयका ऋतजा स्तेनोवन्तु पितरोहवेषु ॥ पु०-३॥ त्वंस्वाहा त्वंस्वधात्यं हिवपट्कार स्वरात्मिका ॥ अतःस्त्यांमंडलेप्यस्मिन्स्थापयामि- स्थिराभव ॥ ॐ भ्र. भोस्वधेडागच्छेहनिष्ट सुप्रतिष्ठिना घर- दाभव, २. स्वधायनमः, T० ॥ तनोनितिदक्षेमृतिम-20 परंमृत्योरिति संकुशुक ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो मृतिर्देवता मतेरा- वाहने विनियोगः, ॐ परमत्योऽधनुपरेहि पंचायस्तेऽअन्याइनरो देवयानात । चक्षप्मतेशृण्वतेतेव्रवीमिमानः प्रजारियोमोन चीरान, go-ॐ अनेकविधयाध्यादि रोग दोष समन्विनाम् । मात संस्थापयामीहदुष्टारिष्ट प्रशान्तये ॥ भ. भोमते, दहा- गच्छेहतिष्ठ, स्मतिष्टिता वरदाभव, ॐ मृत्पयनमः, ?" ॥ मतो नितिवामेद--0 अदिनिरिनि वृहस्पति अपिग्नुष्टुप्न्दो चोदेवता दहावाहने वि. ॥ अदिनिहार সবা कर्मकाण्ड ग्लाकरे, दीनांग सर्वतोभद्र पतिः {७) -2 देवा A5 अन्वजायन्नभद्राऽ अमुनवंधवः ।। पु७-30 दक्षोऽसि सर्वकार्यपु महान्यज्ञकर प्रियः। ऋषीणां सर्वदादक्षो मण्डले ऽस्मिस्थिरोमेव ।। 3. भृदक्षेहागच्छतिष्ठ सुप्रः ॥ 30 दक्षाय नमः ॥ १॥ ततो वगणदक्षेगणेशम्-~30 गणनान्त्वेति प्रजापति पिर्यजुश्छन्दो गणपतिर्देवता गणपत्यावाहने वि० । गणा- नान्त्वा गणपति ! हवामहे, प्रियाणान्त्वा प्रियपनि । हवा- महे ॥ निधीनान्त्वा निधिपनि र्ट हवामहे व्यसोममऽग्राहमजा निगर्भध मात्वमजासिर्गम्भधम् । पु°-30 सिद्धिबुद्धीश्वरंदेवंगणेशं यजनायकम् । अतस्त्वांस्थापयाम्यत्र मनालार्थ विनायकं ।। भू० गणेशेहागच्छेहतिष्ठसुप्र०॥ गणेशायनमः।पू, ततोकार्तिकेयम्- ॐ यत्रवाणाइति, अप्रतिरथ ऋापापंक्तिश्छन्दः कार्तिकेयोदेवता कार्तिकेया वाहने वि० । ॐ यत्रवाणासम्पतन्ति कुमाराश्चिशि- ग्वाऽइव । तन्नऽइन्द्रोबृहस्पतिरदितिः शर्मयच्छतु ।। पु०-ॐ पाएमातुरंकार्तिकेयं मयूरवरवाहनम् । मण्डलेस्थापयाम्यत्र मख- संररक्षणायच । ॐ भू० भोकार्तिकेयहागच्छेहतिष्ठसुप्र०॥ ॐ कार्तिकेयायनमः । पूजयेत ॥ ततो वायुदक्षेगन्धर्चम्-30 गंधर्व- स्त्वेतिप्रजापतिपिर्यजुश्छन्दो गन्धर्वोदेवना गन्धवाहनेवि० । ॐगन्धर्वस्त्वाविश्वावसुः परिदधातुविश्वस्यारिष्ट्य यजमा- नस्य परिधिरस्थाग्निरिडऽईडितः॥ पु०-ॐ स्थापयाम्यत्रगन्धर्व- मासरोगणसेवितं । विश्वावसुंसुरागज, ताललावण्यकोविदम् ।। ॐ भू० भोविश्वापसो, इहागच्छेहतिष्टसुप्र० । ॐ विश्वावसवे- नमः । पू०॥ ततोवायुवामपभम्--ॐ ऋपभमितिवैराजऋषि रनुष्टुप्छन्दो ऋपभोदेवता ऋषभावाहने वि० । ॐ ऋपभमास- मानानां सपत्नानांविषासहिम् । हतारंशभूणांकृधि विराजगोपतिं. गवाम् ।। 30 पु०-योगाचार्ययोगिाभानगम्य, प्रज्ञापारंगोपति- श्रीनिकेतम् । संस्थाप्यैवंसर्वसौभाग्यहेतुं भनेचास्मिन्योगिराज नतोऽस्मि || भू अपभेहागच्छेहतिष्ठसुम० ॐ ऋषभायनमः पू० । ततः सोमदक्षप्रजापतिम्-ॐ प्रजापतेतिहिरण्यगर्भऋषि- फर्मकारट रसाकरे, दीक्षांग सर्वतोभद्र पद्धति. . त्रिष्टुप्छन्दः प्रजापतिर्देवताप्रजापत्यावाहनेवि। . प्रजापते नत्वदेतानन्यो विश्वारूपाणिपरितावभवयत्कामास्ते जुहुमस्तन्नो ऽस्तुक्य र्ट० स्यामपतयोरयीणाम् । ॐ चतुर्थासौम्यरूपं जगन्म गलकारणम् । प्रजापतिस्थापयामि सर्वविघ्नप्रशान्तये । ॐ भूर्भुवःया भोप्रजापते, इहागच्छेहतिष्ठ, सुप्रतिष्ठितोवरदोभव, ॐ प्रजापतयेनमः, पूजयेत् ॥ ततः सोमवामे अदितिम्-30 अदितिवारितिगौतमऋपि त्रिष्टुप्छन्दोऽ दितिर्देवता, अदित्या- वाहने विनियोग:-32 अदितिचौरदितिरन्तरिक्षमदितिर्माता सपितासपुत्रः। विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना ऽ अदितिर्जात मदितिजनित्वम् । पु०-ॐ सर्वसौभाग्यसंयुक्तां कश्यपप्राण- वल्लभां। देवानांमातरंदेवी मदितिस्थापयाम्यहम् ॥ ॐ भू भो अदिते, इहागच्छेहोतष्ठसुप्र० ॥ ॐ अदित्येनमः । पू० ॥ तत ईशानदध्रुवम्-30 वासीतिप्रजापति पिर्गायत्रीछन्दो ध्रुवो देवतावनावाहने वि०। ॐ धृवोसिचवोयंयजमानोऽ स्मिन्नाय. तनेप्रजयापशुभिर्भूयात् ॥ ए०-२० औत्तानपादरणदुर्जयंचनारा- यणाल्लब्धपदंदुरंतरम् ॥ तंराजपुत्रंमुनिवर्यदीक्षितं संस्थापयाम्यत्र सुमङ्गलार्थम् ॥ 0 भू० भोवइहागच्छेहतिष्ठएप्र० । ॐ ध्रुवाय नमः पूः ॥ ततोऽन्तरेशानमारभ्य नाममन्त्रैहस्ताभ्यामावाहनी स्थापनी मुद्राश्चप्रदर्यपाद्यादिभिः पूजनंकुर्यात्-ईशाने-30 वैना- यक्यैनमः ॐ भूर्भुवः स्वः वैनायकीमावाहयामि स्थापयामि पूजियामि ॥ एवंसर्वत्र-पूर्व-ॐ ऐंद्रधनमः ॐ भूर्भुवः स्वः एन्द्री आ० । स्था० । पू० | आग्नेये-ॐ कौमार्यैनमः ॐ भू० कौमारी आ० स्था० पू०॥ दक्षिणे-30 ब्राह्म्यैनमः ॐ भू० ब्राह्मीं श्रा० र स्था० पूछ। नैर्ऋत्येॐ वाराहीनमः ॐ भू० वाराही श्रा० स्था० पू० । पश्चिमे-ॐ चामुण्डायैनमः । ॐ भू० चामुण्डाम् । श्रा स्था० पू०। वायव्ये-30वैष्णव्यैनमः ॐ भृ० वैष्णधीम्, श्रा० स्था पू० । उत्तरे-ॐ ऐश्वर्यैनमः ॐ भू° ईश्वरीं श्रा स्था पू० । ततईशानवामे-तेनैवविधना-ॐ गौतमायनमः, ॐ कर्मकाण्ड रनाकरे, दीक्षांग सर्वतोभद्र पतिः (८९) भूर्भुवःस्वः गौतममावाहयामिस्थापयामिपूजयामि। पूर्ववामे-- 0 भरद्वाजायनः, ॐ भूत भरद्वाजमावाइयमि स्था० पू० । अग्निवामे-30 विश्वामित्रायनमः। 30 भू० विश्वामित्रम्-श्राo स्था० पू० दक्षिणवामे 0 कश्यपायनमः, 30 भू० कश्यपम्-श्रा० स्था०प०। नैर्ऋत्यवामे 1-30 जमदग्नयेनमः। भू० जमदग्निम् श्रा० स्था० प० । पश्चिमवामे-ॐ वसिष्ठायनमः, ॐ भू० वसिष्टम् श्रा० स्था० पू० । वायव्यवामे-30 अत्रयेनमः, ॐ भू० अत्रिम प्रा० स्था० प० । उत्तरबामे-30 अरुन्धत्यैनमः ० अन्ध- तीम् श्रा० स्था० पू० ! ततोवीथीशाने-30 त्रिशूलोयनमः, ॐ भ० त्रिशूलम्, श्रा० स्था० प० । पूर्वे शनयेनमः, ॐ भू० अशनिम् श्रा० स्था० ० ईशाने- शक्तयेनमः, 30 भू० शक्तिम् प्रा० स्था० पू० । दक्षिणे- दंडायनमः, 30 भू० दंडं श्रा० स्थाo प० । नैऋत्ये-30 ग्वगायनमः। 30 भू० खड्गम्, प्रा० स्था० पू० । पश्चिमे- 30 पाशायनमः, ॐ भू० पाशम् प्रा० स्था० पू० । वातव्ये- 30 अंकुशायनमः, ॐ भृ० अंकुशम्, प्रा० स्था० १० उत्तरे- ॐ गदायैनमः, 30 भू० गदाम्- प्रा० स्था० पू० । ततो- चौथीपु पूर्वादिदिक्षु-30 श्रोमास इति मधुरछन्द ऋषिर्गायत्री- छन्दो विश्वेदेवादेवता विश्वेदेवावाहने चि० । ॐ श्रोमासश्चर्ष- णीधृतोविश्वेदेवासऽागत । दारवा ॐ सोदासुपःसुतम् । पु०- ॐ विश्वे देवान्पित गुरू व्रक्षकान्मंडपेश्वरान् । स्थापयामीह भक्त्यातापितृ यज्ञपरायणान् । ॐ भू०भोविश्वेदेवा इहागच्छु तेहतिष्टत सुप्रतिष्टिता वरदा भवन्तु ॥ ॐ विश्वेभ्योदेवेभ्योनमः पूजयेत् । ततोवीथी दक्षिणेपित्यान-ॐ पायन्त्विति शंखऋषि त्रिष्टुप्छन्दः पितरोदेवताः पित्रावाहने वि० । ॐ प्रायन्तुनः पितरः सोम्यासोऽग्निष्वात्ता:-पथिभिर्देवयानः । अस्मिन्यजे स्वधया मदन्तोऽधिवृवन्तुते चन्त्वस्मान् । पु०-~ -अग्निध्वात्ता दिकान्पित्वान्स्रगलंकार भूपितान् । देवयानानुगान्सर्वान्मंडलेस्था पयाम्यहम् । ॐ भू० भोपितरः, इहागच्छत, इहतिष्टत, सुमति- , । 201 कर्मकाराष्ट्र रताकरे, दीक्षांग सर्वतोभद्र पद्धति छितावरदा भवन्तु । ॐ पितृभ्योनमः । प्र० । ततोवीथी पश्चिमे सागरान्---ॐ धाम्नइनि गौतमऋषिर्गायत्रीछन्दःसागरादेवताः सागरा वाहने वि०। ॐ धाम्नोधाम्नो राजनितो वरुणो नुमुन्न यदापोऽअघ्न्या ऽहतिव्वरूणेति शयामहेततो वरुणोनुमुन्न । पु० ॐ लवणेतुसुरा सर्पिर्दधिदुग्ध जलाभिधान् । सागरान्सप्तक्रम- शोमंडपे स्थापयाम्यहम् । ॐ भ० भोसप्तसागरा इहागच्छत इहतिष्ठत सुप्रतिष्ठिता वरदाभवन्तु । ॐ सप्त सागरेभ्योनमः पू० । ततोवीभ्युत्तरे सरितः-ॐ इमम्मे इति सिन्धुक्षित्प्रेयमेध ऋषिर्जगतीछन्दः सरितोदेवताः सरिता मावाहने विनियेगः। 30 इमम्मे गंगेयमुने सरस्वति शतद्रूस्तोमं स्वचतापरुष्ट्या । असिक्- न्यामरुद्वृधे वितस्तयाज कीये शृणुया सुषोमया । पु०-30 गंगांचैव सरस्वतींचयमुनांगोदावरी नर्वदांकावेरी सरयूं महेन्द तनयां चर्मण्वती चालकाम् । क्षिप्रांवेत्रवती महासुरनदी, ख्या- तांवुधैगंडकी मैनापूर्णजला समुद्रसहिताः संस्थापयामिक्रमात् ॥ ॐ भू० गंगादिसरित इहागच्छते इतिष्ठत, सुप्रतिष्ठिता वरदा भवन्तु । 30 सरिद्भ्योनमः । पू० ॥ ॥ इति मतदश रखात्मक सर्वतोभद्रे, रेवता स्थापन कम ॥
कर्मकाएट रखाकरे, सर्वतोभद्र सहपूजा पचत्तिः ॥अथ सर्वतो भद्र संघपूजायां वैदिक पूजापद्धति॥ एवं पूर्वोक्त पद्धत्या सर्वतोभद्रेदेवताः संस्थाप्य, एतन्तेति प्रतिष्ठाप्यच ध्यायत्-हरिः 30 सहस्रशीर्षा पुस्पा-सहस्राक्षः सहस्रपात सभूमि ई० सर्वतस्मृत्वा त्यतिष्टदशाङ्गुलम् ॥ श्रास- नम्-30 पुरुषवेद ० सर्व यद्भूतं यच्चभाव्यम् । उतामृत स्वस्ये शानो यदन्नेनातिरोहति,, आसनसमर्पयामि, पाद्यम्-30 एतावानस्य महिमातो ज्यायांश्चपूरुषः । पादोस्य विश्वा भूना- निधिपादस्या मृतंदिवि, पा०स० । अयं गन्धाक्षत सुगन्धिद्रव्य युतंच-30 त्रिपा दृर्ध्वऽउदैत्पुरुषः पादोस्येहा भवत्पुनः । ततो विष्वंव्यका मत्साशनानशनेऽभि । अ०स०॥आचमनीयम्-ॐ ततोब्बिराडजायत विराजोऽअधिपूरुषः । सजातोऽअत्यरि च्यत पश्चाद्भूमि मधोपुरः । श्रा०स० स्नानीयंजलम्-~-30 तस्माद्यज्ञा सर्वहुतः सम्भृतं पृषदाज्यम् ॥ पशूस्तांश्चक्रे व्यायव्या नारण्या ग्राम्याश्चये स्नाज०स०॥ पयःस्नानम्-30 पयः पृथिव्यां पय ऽऔषधीषु पयो दिव्यन्तरिक्षे पयोधाः । पयास्वतीः प्रदिशः सन्तु मह्यम् । प०स्ना०स० । दधिस्नानम्-30 दधिक्राणोऽधकारिष जिष्णो रश्वस्य व्याजिनः । सुरभिना मुग्वा करत्मणऽआयूॐ पितारिपत् द स्नास धृतस्नानम्-30 घृतं मिमिक्षे घृतमस्य योनितेश्रितो घृलम्बस्यधाम ।। अनुष्वधमा वहमादयस्व स्वाहा कृतं वृषभ यक्षिहव्यम् । घृत स्ना० स० । मधुस्नानम्-30 मधु व्वाताऽऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः । माध्वीनः सन्त्वोषधीर्म धुनक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिव र्ट० रजः । मधुद्यौरस्तुनः पिता मधुमान्नो ब्वनस्पतिर्मधुमा २॥अस्तुसूर्यः । माध्वीर्गाचो भव- न्तुनः ! मास्नास । शर्करास्नानम् -30 अपा ॐ रसस्ययोरस स्तंगोंगृल्लाम्येषते योनिरिन्द्रा यत्वा जुष्टतमम् । श० स्ना० स०। गन्धोदकस्नानम्-30 गन्धद्वारां दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषि- णीम् । ईश्वरी सर्वभूतानां तामिहो पहुयेश्रियम् (गस्नासण (१२) पर्मकाण्ड रताकरे, सर्वतोभद्र सह पूजा पश्चात .. ततःशंग्वोदकेन-पुरुपसूक्तेनाऽभिषेकं कुर्यात् , अमृताऽभिषे- कोऽस्तु, स्नानान्ते श्राचमनीयम्-30 ततोब्विराड जायतब्धि राजोऽधिपूरूपः, सजातोऽअत्यरिच्यत पश्चाद्भुमिमथोपुरः ।स्ना नं स० । वस्त्रम्-30 तस्माद्यज्ञात्सर्वहुतऽऋचःसामानि जजिरे छन्दासिजजिरे तस्माबजुस्तस्मादजायत, वस्त्रं सम वस्त्रा न्ते आचमनीयं स यज्ञोपवीतम्-30 तस्मादश्वा 5 अजायन्त येकेचो भयादतः । गावोह जजिरे तस्मात्तस्मा ज्जाताऽयजावयः यज्ञोपवीतं स । श्राचमनीयं स० । चन्दनम्-30 तंयजवहिपि प्रोक्षन्पापं जातमग्रतः । तेनदेवाऽअयजन्त साध्याऽपयश्चये । चन्दनं स० । भूपणम्-30 स्वर्णधर्मः स्वाहा स्वर्णाः स्वाहा स्वर्ण शुक्रः स्वाहा स्वर्ण ज्योतिः स्वाहा स्वर्ण सूर्यः स्वाहा । भूषण,समर्पयामि । अक्षतान्-30 अक्षन्नमीमद त हायप्रिया 5 धूपत । अस्तोपत स्वभानवो विमान विष्टया मती योजान्विन्द्रते हरी ॥ अस। कंकुमादि सौभाग्य द्रव्यम्- ॐ अहिरिव भौगैः पय्येति या ज्यायाहेति परिवाधमानः । हस्तघ्नो विश्वा व्वयुनानि विद्वान्पुमान्पुमा ॐ सम्परिपातु विश्वतः। सौभाग्यद्रव्यं स । पुष्पाणि-ॐ यत्पुरुषं व्यदधुः कतिधाव्यकल्पयन् । मुखंकिमस्यासीत्किवाह किमूरूपादा उच्यते । पुष्पाणि स। तुलसीदलम्-ॐ इद विष्णुर्विचरमे त्रेधानिदधेपदम् । समृढमस्यपा ॐ सुरे वाहा, तुलसी स० ॥ विल्वपत्रम्-ॐ नमो विल्मिने च कवचिने च नमो वमिणे च वरूथिने च नमः श्रुताय च श्रुतसेनाय च नमो दुन्दुभ्यायच हनन्याय च । विल्वपत्र स० ॥ दृर्वांकुरान-ॐ काण्डात्काण्डा त्यरोहन्ती परुषः परस्परि। ण्वानो दर्वे प्रतनुसहस्रेण शतेन च दूर्वांकुरान्समर्पयामि। धूपम्-ॐधूरसिधूर्वधर्वन्त धूर्वत योस्मा न्धूर्व तितं धूर्वयंवयं धूमिः । देवानामसि वन्हितम ई० सलि- तमं पमितमं जुष्टतमं देवन्तमम् । धूपं स । श्रारार्तिक्यदीपम्- ॐ अग्निज्योतिज्योतिरग्निः स्वाहा सृथ्यों ज्योतिज्योतिः सूर्यः कर्मकाण्ड ग्लाकरे, मर्वतोभद्र साहपूजा पातिः - स्वाहा ॥ अग्निर्वों ज्योतिर्वः स्वाहा सूर्योवों ज्योतिर्वः स्वाहाः । ज्योतिः सूर्यः सूटयों ज्योतिः स्वाहा ।। श्रा' स.॥ नैवेद्यम्-30 नाभ्याऽासीदन्तरिक्ष र्ट• शीपणांद्यौः समव- तन पद्यां भूमिर्दिशः श्रोत्रात्तथालोका us अकलायन् ॥ पूर्वापोशनम् ॐ प्राणाय स्वाहा, ॐ अपानाय स्वाहा । ॐ उदानाय स्वाहा । ॐ समानाय स्वाहा । नैवैद्यान्ते जलं समर्प- यामि ॥ ततः पूगीफलम्-पूगीफलं महदिव्यं नागवल्ली दलै- मुत्तम् । सर्वतोभद्र देवानां प्रीतये कल्पयाम्यहम् । ० स० । उपायनम्--ॐ हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्यजातः पतिरेक ऽआसीत् । सदाधार पृथिवींद्यामुतेमां कस्मै देवाय हविपा- विधेम। उपायनं स । ततः सफलार्धदद्यात--ॐ याफली नीर्याऽअफलाऽअपुष्पायाश्च पुष्पिणी । बृहस्पति प्रमृतास्तानो मुंचत्व ई० हसः ।। अर्घजलेन देवस्नापयित्वा फलमग्रेस्थापयेत् ॥ ततः पूर्वोक्त मन्त्रेण कर्पूरार्तिक्यंकृत्या-पुष्पाञ्जलिर्दद्यान्---ॐ यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवास्तानि धर्माणि प्रथमान्यासन् । तेहनाक महिमानः सचन्त यन्त्रपूर्व साध्णः सन्तिदेवाः । ॐ ब्रमादक्षः कुवेरो यमवरुण ममद्वन्हिचन्द्रेन्द्र रुद्राः। शैलानद्यः समुद्रा ग्रह- गणमनुजा दैत्यगन्धर्व नागाः । सिद्धानक्षत्र तारा रविवसुमुन- योव्योमभूरश्विनौच, प्रोक्तानुक्ताश्च वेद्यां विहित सुरगणाः पान्तुनः सर्वदेवाः, ॐ चतुर्भिश्च चतुभिश्चद्वाभ्यां पञ्चभिरेव च । हृयते च पुनाभ्यां समेविष्णुः प्रसीदतु ॥ मन्त्रहीनं क्रियाहीनं विधिहीनं च यड्चेत् । क्षम्यन्तु सर्वतद्देवाः प्रसीदन्तु सदामयि।। ततः कार्यान्ते उत्तराङ्ग पूजनंविधाय, पुनर्भत्र पुष्पाञ्जलिंदत्वा । देवताविसर्जनार्थ हस्ताभ्याम क्षतान्भद्रो परिक्षिप्त्वा, मन्त्रमुच्च- रेत्-ॐ यान्तुदेवगणाः सर्वे, पूजामादाय मामकीम् । इष्टकाम समृध्यर्थ, पुनरागमनाय च, सर्वे गच्छन्तु भोदेवाः, सर्वतो भद्रदेवताः स्वस्वस्थानेपुतिष्ठंतु मम कल्याण हेतवे ।। ॥ इति सवतोभद्र वैदिकपूजा पद्धतिः ।। , । ६४ ) मकाराउ रतापरे, एकोनशितिरंखात्मक मर्वतोभद्र सहपूजा पद्धति अर्थको नरिशनि ग्यान्मक सर्वतोभद्रप्रमाणम्-उक्त च देवी पुराणे- समसूनहत क्षने प्रागुदक्प्ररणभुवि । मण्डल लक्षणापत कायतप्रमहामुने । प्रागुत्तरच मध्यवा यथा लाभ मनाविल । सनणरसा शुद्धता न्यस्यावादिशिनिगतम् । हस्तमान प्रमाणेनत नस्थ सुपरीक्षितम् । उक्त च भटकारिकायाम् प्रागुदीन्याय तारेखा पुर्या-कान विशतिम् । सन्दुत्रिपद काण शन्सलापचभि पद | एकादश पदावल्लीभद्रतु नवभि पदै । मध्य पोडपमि कोष्ट पद्ममष्टदल स्मृतम् । श्यते दु श्रखला कृष्णा वल्ली नौलनपुरयत । भद्रारुणा सितापापि परिधि पोतवण । वात्यातर दल श्वेता कणिसपीत वणिका । परिध्यावष्ठित पा वायमस्वरजस्तम । तन्मध्यस्थापयद्देवा ब्रह्माद्याश्चसुस्वरान् । कुर्या मण्डप विस्तार स्तम्भ पूजाकमानत । ॥ एकोनविंशति रेखात्मक सर्वतोभद्रोद्धारः ॥ को भर :५ो ven श्वतः वेत जीता " रक्तः श्वेत: रक्त अथ दीक्षेतरकर्मस्वेकोनविशति रेखात्मक सर्वतो भद्र- देवता स्थापनं पूजनंचवक्ष्ये-तत्रादौकर्ता प्रातर्नित्यक्रियांकृत्वा पूजास्थलमागत्य गणेशादीन्सम्पृज्य, प्रतिज्ञासङ्कल्पं च कुर्यात्- अद्यत्यादिदेशकालौ सकीामुकराशिरमुकगोत्रो ऽ मुको 5 है कर्मकाण्ड रनाफर, एकोनविंशति यात्मक सर्वतोभद्रपूजा पतिः (१५ ) कर्तव्यामुक कर्माङ्गत्वेन ब्रह्मादि सर्वतोभद्रस्थ देवानामावाहन स्थापन क्रमेणपूजनं करिष्ये-श्राचार्यमपिच वृणुयात् । तत्रादौ मध्येकाणिकायाम्-अक्षतपुष्पै रावाहनीमुद्रां प्रदर्य ब्रह्माणमावा येत् । 3. आवाहयामिदेवेशं ब्रह्माणंकमलासनम् । चतुर्भुजं मृष्ठिकरंधारयन्त कमण्डलुम् । ॐ ब्रह्मजज्ञानमितिमन्त्रस्य प्रजा पतिऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो ब्रह्मादेवता ब्रह्मस्थापने विनियोग । . ब्रह्मजज्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विसीमन सुरुचोब्वेन ऽ धावः । सुवुध्न्या ऽ उपमाऽ अस्यविष्ठाः सतश्चयोनि मसतश्चचिवः। 3. भूर्भ- वः स्वः, ब्रह्मनिहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितो बरदोभवः। 30 ब्रह्मणेनमः । एवंसर्वत्र ॥ तत उदीचीमारभ्य वायव्यान्तं कुवेरादी न्वायुपर्यन्तानष्ठौ लोकपान्स्थापयेत् ।। उत्तरेवाप्यांसोमम्-श्राचा याम्यहंसोमं रोहिणीशंसुधामयम् । ज्योतिर्मण्डलसंकीर्ण सर्व कल्याणहेतवे । ॐ वय र्ट० सोमेत्यस्य वन्धुऋपिर्गायत्रीछन्दः सोमोदेवता सोमस्थापने विनियोगः1 30 वय ० सोमवतेतव मनस्तनूपुविभ्रतःप्रजावंतःसचेमहि । भू० सोमः ॥ ईशान्यांग्व एडेन्दायीशानम्-श्रावाहयाम्यहं देवमीशानं घृपवाहनम् । पञ्चवर्क त्रिनेत्रंच शुलहस्तं कपालिनम् । ॐ तमीशानमित्यस्य गौतम- ऋषिर्जगतीछन्द ईशानोदेवता ईशानस्थापने विनियोगः। ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुपस्पतिं धियं जिन्वमवसे हमहेव्ययम् । पूषानोयथाव्वेदसाम सबृधे रक्षितापायुरदब्धः वस्तये । ॐ भू० ईशानः ॥ पूर्वेवाप्यामिन्द्रम्--ॐ आवाहयामिदेवेशं देवराज सुरार्चितम् । एरावतसमारूढं वृत्रघ्नं कुलिशायुधम् । ॐ वातार मितिमन्त्रस्य गर्गऋपिस्त्रिष्टुप्छन्द इन्द्रोदेवता-इन्द्रस्थापने विनि- योगः। ॐ त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्र ई. हवेहवे सुहब ई० सूरमिन्द्रम् । हयामिशक्रं पुराहतमिन्द्र ई. स्वस्तिनोमघवा धात्विन्द्रः । ॐ भू. ६० । श्राग्नेयां खण्डेन्दावग्निम्---दिव्यरूपं त्रिनयनंदेवानां हव्यवाहकम् । सप्तजिहं वायुसग्वमाह्वयेहुडवाह- नम् । त्वन्नो ऽ अग्न दतिमन्त्रस्यांगिरस हिरण्यस्तृप ऋषि (१६) कर्मकाण्ड रताकरे, एकानविंशति रेखात्मा सर्वतोभद्रपूजा पद्धतिः जंगतीछन्दोऽ निर्देवताग्निस्थापने विनियोगः । त्वन्नोऽ अग्ने तवदेवपायुभिर्मघोनोरक्षनन्वश्चवंद्यः। त्रातातोकस्यतनये गवामरयनिमेष : रक्षमास्तवव्रते। ॐ भू० अग्ने । दक्षिणे "वाप्यांवमम् ।-आवाहयाम्यहंदेवं परेतेशंभयङ्करम् । दण्डहस्तं रक्तने यममहिषवाहनम् । . यमायत्वेतिमन्त्रस्य - दध्यङ्गाथ- वणऋषि स्त्रीणियजूंषि श्राद्यस्य यमनामा चालोंत्ययोधर्मोदेवता यमस्थापने विनियोगः। ॐ यमायत्वांगिरस्वते पितृमतेस्वाहा। वहाधर्मायस्वाहा धर्म:पित्रे | ॐ भू० यम० ॥ नैऋत्यांखण्डेन्दौ -निर्गतिम् ! ॐ श्रावाहयामिरक्षार्थ नितिनैर्धताधिपम् । खड्ग हस्तंकरालास्यं लिहन्तंमृकिणीद्वयम् । ॐ असुन्वन्तमित्यस्य प्रजापतिऋषित्रिष्टुप्छन्दो निऋतिर्देवता नियंतिस्थापने विनि- योगः । 30 असुन्वन्तम यजमानमिच्छस्तेनस्येत्या मन्विहितस्क- रस्य । अन्यमस्मदिच्छसातऽइत्या नमोदेविनितेतुभ्यमस्तु । ॐ भू० निर्ऋते० । पश्चिमेवाप्यांवरुणं आवाहयामिदेवेश वरुणं सागराधिपम् । मखसंरक्षणार्थंच मुक्ताहारविराजितम् । इमम्म इत्यस्यशुनः शेफ ऋषिर्गायत्रीछन्दो वरुणोदेवता वरुणस्थापने विनियंगः । ॐ इमम्मे वरुणश्रुधी हवमद्या चमृडय त्वामवस्यु राचके । ॐ भूत वरुण ॥ खण्डेन्दौ वायव्यांवायुम् । ॐ आवा हयामि देवेशं वायुंचायव्यरक्षकम् । मृगारूढंचण्डवेगं सर्वमाणे- श्वरंप्रभुम् 1 30 आनोनियुद्भिरितिमन्त्रस्य वसिष्ठपिस्त्रिष्टुप्छ- न्दो वायुदेवता वायुस्थापने विनियोगः | 0 आनोनियुद्भिः शतनीभिरध्वर र्ट सहस्त्रिणीभिरुपयाहियजम् । वायोऽयस्मि न्सवनेमादयस्वयूयंपातः खस्तिभिः सदानः | ॐ भु० वायो० ॥ ततो चायु सोममध्ये भद्रे वसून् । ॐ आगच्छन्तु महाभागा वसवोठौ महावलाः। अस्ययागस्यसिद्धयर्थं यूयमत्रसुतिष्टतः। ॐ सुगावो देवा इति मन्त्रस्य प्रजापतिर्मपिनियन्दो वसवो देवताऽवसुस्थापने विनियोगः । 30 सुगावोदेवाः सदनात अकर्मज आजम्मेद र्ट सवनं जुपाणाः । भरमाा वहमाना- कर्मकाण्ड रताकरे, एकोनविंशति रेखात्मक सर्वतोभद्रपूजा पद्धतिः (१७) हवी ॐप्यस्मैधत्त व्यसवोव्वसूनि । ॐ भूर्भुवः स्वः 30 ध्रुवं धरं च सोमं च तथैवापोनिलानलौ। प्रत्यूपं च प्रभासं च भद्रे संस्थापयाम्यहम् । ॐ अष्टवसुभ्योनमः । वसव इहागच्छते- हतिष्ठतः। सोमेशानमध्ये भद्रे एकादश रुद्रान् । ॐ आवाह- यामि लोकेशान् रुद्रान्नैकादशान् क्रमात् । त्रिशूलधारिणो नीलान् चराभयकरांच्छुभान् । ॐ मद्राः स ई० सृज्येत्यस्य प्रजापतिपिरनुष्टुप्छन्दो रुद्रा देवता एकादश रुद्रस्थापने विनि- योगः। ॐ रुद्राः स र्ट० सृज्य पृथिवीं वृहज्योतिः समीधिरे। तेषां भानुरजस्र इच्छुको देवेपुरोचते। ॐ अजैकपादहिर्वधन्यौ विरूपाक्षं च रैवतम् । हरंच चहुरूपं च त्र्यम्बकं च सुरेश्वरम् ॥ सावित्रं च जयन्तं च पिनाकिनमतः परम् । स्थापयामि क्रमादे- तान् रुद्रान्मण्डल पूजने । 30 भू एकादश रुद्रा इहागच्छते- हतिष्ठत सु०॥ अबोदक स्पर्शः-ईशानेन्द्रमध्येभद्रे द्वादशादित्यान, ॐ आवाहयामि देवेशानंधकारविनाशकान् । तीक्ष्णरश्मीन्मा- सभेदाद द्वादशादित्य संजकान । ॐ यज्ञो देवानामित्यस्य कुत्स ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्द प्रादित्यो देवता आदित्य स्थापने विनियोगः । ॐ यज्ञोदेवाना प्रत्येति सुम्नमादित्या सो भवता मृडयन्तः। प्रायोर्वाची सुमतिर्ववृत्याद र्ट. होश्चिद्या व्यरिचोवित्तरा सदादित्येभ्यस्त्वा । ॐ भू० धातारमथमद्रंच ततश्चार्य ममित्र- को । वझणाख्यं च सूर्यच विवस्वन्तं भगं तथा । प्रष्णंच सवि- तारं च त्वाष्ट्रं चैव क्रमादिह । मखसंरक्षणार्थाय भद्रेऽस्मिन्स्था- पयाम्यहम् । भो द्वादशादित्या इहागच्छतेह० ॥ ॐ द्वादशादि- त्येभ्यो नमः । इन्द्राग्निमध्ये भद्रेऽश्विनौ। 30 आवाहयाम्यहं देवा वाश्विनेयौभिषग्वरौ। सूर्यपुत्रौयुग्मदेहौ सौम्यरूप धरावुभौ ॥ यावांकरोत्यस्य मेधातिथिषिर्गायत्रीछन्दोऽश्विनौ देवतेड- शिवनोः स्थापने विनियोगः । ॐ यावांकशामधुमत्यश्विना सन्तावती । तया यज्ञमिमिक्षतम् । ॐ भूः अश्विनौ । अग्नियममध्ये भद्रे विश्वेदेवान---गावाहयामि देवेशान विश्वे (8) कर्मकाण्ड रनाकरे, एकानविंशति रेखात्मक सरंतोभद्रपूजा पद्धति देवान्विचक्षणान् । पितृध्यान परान्सौम्यान्स्मेराननविभूषितान् ॥ ॐ विश्वेदेवासऽ इत्यस्य गृत्समद् ऋपिर्गायत्री छन्दो विश्वेदेवा देवताविश्वेदेव स्थापने विनियोगः। ॐ विश्वेदेवास 5 अागत शृणुतामऽइम टै० हवम् । एदम्वहिनिपीदत। ॐ भू० विश्वे- देवा० ॥ यमनिऋतिमध्ये भद्रेयक्षान्-ॐ श्राबाहयाम्यहं यक्षान्विकदास्या भयापहान् । यमनितयोर्मध्येभद्ररक्षणहेतवे ॐ अभित्यं देवमित्यस्यवत्स ऋषिर्जगतीछन्दो यक्षादेवता यन स्थापने विनियोगः। ॐ अभियंदेव ० सवितारमोण्योः कवि- ऋतुमर्चामि सत्यसव . रत्नधामभिः मियंमतिकविम् । ऊर्ध्वा- यस्यामतिर्भा अदिद्युतत्सवी मनिहिरण्यपाणि रमिमीत शुक्रतुः कृपास्वः । ॐ भू० यक्षाहहागच्छतेहति तसु० । निति वरुण- मध्येभद्रे सर्पान्-ॐ काद्रवेयान्महाभागानाशीविषधराम्परान् । पन्नगारीन्महासन्भिद्रेऽस्मिन्नाह्वयाम्यहम् । ॐ नमोऽस्तु सभ्य इत्यस्य प्रजापतिषिर्ऋरनुष्टुप्छन्दः सर्गदेवताः सर्पस्था पने विनयोगः । ॐ नमोऽस्तु सर्पेभ्यो ये केच पृथिवीमनु । येऽ- अन्तरिक्ष येदिवितेभ्य-सभ्योनमः। 3. भू० स० । तत्रैव भूतान्-30 भतेभ्योनमः । भूतानाव स्यामि स्थापयामि । वरु- वायुमध्येभद्रे-गन्धर्वाप्सरसः-30 गन्धर्वाप्सरसश्चैव शका- दित्रिदशमियान् । अस्ययागस्य सिद्धयर्थं भद्रेऽस्मिन्नाहयाम्य- हम् ॥ २० ऋतापाडित्योभयो लुंशोधानाक ऋपिपिणक्छन्दो गन्धर्वाप्सरसो देवता गन्धर्वाप्सरसः स्थापने विनियोगः। ॐ ऋतापाप्त धामाग्निर्गन्धर्वस्तस्यौषधयोऽप्सरसो मुदोनाम । सनइदं व्रत्यक्षत्रं पातुतस्मै स्वाहा वाट्ताभ्यः स्वाहा । 0 भू० गन्धर्वाप्सरस० ॥ उतरे वाप्यां ब्रह्मसोममध्ये स्कंदादीन्-30 आगच्छन्तुमहाभागा स्कन्दाद्या देवतागणाः । अस्ययागस्य शान्त्यर्थ भद्रेऽस्मिन्नाहयाम्यहम् । ॐ यदप्रादेत्यस्य जमदग्नि दीर्घतमावृधी त्रिष्टुप्छन्दः स्कन्दो देवता स्कन्द स्थापने विनियोगः ॐ यदक्रन्दः प्रथमं जायमान उद्यत्समुद्रा दुतवापुरीपान् । - कर्मकाराष्ट रक्षाकरे, एकोनविंशति रेसात्मक सर्वतोभद्र सह पूजा पतिः ( ६ ) श्येनस्यपक्षा हरिणस्य चाहऽ उपस्तुत्यमहि जातंतेऽपर्यन् । 36 भू० स्कन्द० तत्रैवनाम मंत्र 3 भू० नन्दिने नमः । मन्दिनमा- वाह्यामि स्था० । ॐ भू० ईश्वरायनमः । ईश्वरमावा० ॐ भू० शूलायनमः । शूलं० । ॐ भू० महाकालायनमः। महाकालं० । ब्रह्मशानमध्ये वल्लीषु दक्षादिसप्तकम् । ॐ नमस्ते देवदेवेसंसत्य- लोक निवासिनम् । श्राव्हयामि मखेहास्मिन्कुशलं दक्षस- प्सकम् । ॐ तानित्यस्य गौतम ऋषि जगतीछन्दो दक्षादयो देवता दक्षसप्तक स्थापने विनियोगः ॥ ॐ तान्पुर्वयानि विदाहमहे व्ययं भगमित्रमदितिं दक्षमस्त्रिधम् । अर्य्यम वरुण ई० सोममश्विना रस्वतीनः सुभगामयस्करत् ।। . भू० दक्षादिसप्तकेहागच्छ० । ब्रह्मेन्द्रमध्येवाप्यांदुर्गाम् । आवाहयामिदेवेशि दुगाँटुर्गातिनाशिनीम् । सर्वसौग्यपदात्रींच जगन्मङ्गलकारणीम् । अम्बेअम्विकइत्यस्य प्रजापतिपिरनु- ष्टुप्छन्दो दुर्गादेवता दुर्गास्थापने विनियोगः अम्वे अम्बिके- म्वालिके नमानयतिकश्चन । ससत्यः श्चकः सुभद्रिकां काम्पील वासनीम् । भू० दुर्गे० । तत्रैवविष्णुम्-श्राव्यामिमहाविष्णं शाईचक्रधरंप्रभूम् । गदाजलजविभ्राणंशरण्यं कमलाप्रियम् । ॐ . इदंविष्णुरित्यस्य मेधातिथिपिर्गायत्रीछन्दो विष्णुर्देवताविष्णु- स्थापमे विनियोगः । ॐ उदंविष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिदधेपदम् । समूढमस्थपा ॐ सुरे। 30 भू० विष्णो। ब्रह्माग्निमध्ये वल्ली- पुपित्मानम्वधयासह-श्रावाहयामिसोष्णीषान पित्न्यमदिशि- स्थितान् । अग्निष्वातादिकांश्चैव भद्रे ऽ स्मिन्स्वधयासह ॥ ॐ पितृभ्यइत्यस्य प्रजापत्यश्वि सरस्वत्यऋषयः सप्तयजूंपिछन्दांसि मन्त्रलिंगोक्तादेवताः स्वधयासहपितृस्थापने वि०। ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः । प्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः । अक्षन्नपितरो मीमदन्त- पितरो तीतपन्तः पितरः शुन्धध्वम् । 30 भू० स्वधयासह पितृ- गणा इहागच्छतेह । ब्रह्मयममध्येवाप्यांमृत्युम् । 0 कालशक्ति .
. ३ । १०० ) कमकाण्ड रत्नाकरे, एकोनविंशत्ति रखत्मक सर्वतोभद्र सहपूजा पद्धति धरंदेवं मृत्युप्राणापहारकम् । अाह्वयामिकरालास्यं यजरक्षण- हेतवे । ॐ परंमृत्यो इत्यस्यसङ्कासुकर्षिस्त्रिष्टुप्छन्दो मृत्युर्देवता- मृत्युस्थापने विनियोगः । ॐ परंमृत्यो ऽअनुपरेहिपन्यां यस्ते ऽ अन्य इतरोदेवयानात् । चक्षुष्मतेशृण्वते तेव्रवीमिमानः प्रजा रीरिषोमोतव्वीरान् । २. भूमृत्यो। अत्रोदकः स्पर्शः। ब्रह्मनितिमध्ये वल्लीगणेशम् । ॐ श्रावाहयामिदेवेश गजा. स्यमेकदन्तकम् । जगन्मङ्गलकर्तारं गणेशविघ्ननाशकम् । ॐ गणनान्त्वेत्यस्य प्रजापतिऋषिश्चत्वारि यजूंपिछन्दांसि गण- पतिर्देवता गणपतिस्था० ॐ गणानान्त्वा० सिगर्भधम् । 30 भू० गणेश० । ब्रह्मवरुणमध्येवाप्यामप:-प्रागच्छन्तुमहाभागा अपः शुभ्रामलापहाः। जगतां प्रलयेवापिनारायण समाश्रिताः। 30 शन्नोदेवीरित्यस्यदध्यगाथर्वण ऋषिर्गायत्रीछन्द ऽभापोदेवता अपांस्थापने वि० । ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपोभवन्तुपीतये । शंयोरभिश्रयन्तुनः । भू० अपडहागच्छतेह० । ब्रह्मवायुमध्ये वल्लीषुमरुतः-30 आगच्छन्तुमहाभागा मारुताश्चण्डविक्रमाः इन्द्रानुजाः सौम्यरूपास्त्रैलोक्यप्राणरक्षकाः । - मरुतोयस्येतस्य गौतमऋषिर्गायत्रीछन्दो मरुद्देवता मस्तास्थापने विनियोगः। ॐ मरुतोयस्यहिक्षयेपाथादिवोचिमहसः ससुगोपातमोजनः भू० एकोनपश्चाशन्मस्तहहा०मध्येब्रह्मणःपादमृलेकर्णिकाधः पृथिवीम् आवाहयामि वसुधा सर्वेपांस्थितिम्पिणीम् । वराहस्थापितां देवीं सर्वाकर निभांपराम् । ॐ स्योनापृथिवीत्यस्य मेधातिथि- ऋपिर्गायत्री छन्दः पृथ्वी देवता पृथ्वी स्था०। ॐ स्योना पृथिवि नो भयाक्षरानिवेशनी । यच्छानः शर्म सपथाः। ॐ भू० पृथिवी । तत्रैवमेम्म् ॥.यावाहयाम्यहं मे दिव्यलोक समाश्रितम् । यज्ञविघ्नोपशान्त्यर्थ पर्वताधिपति प्रभुम् । ॐ प्रवर्ततेत्यस्य देववात अपित्रिष्टुप्छन्दो मेग्देवता मेरु स्था। ॐ प्रवर्ततस्य वृपभस्य पृष्टानावश्चरन्ति स्वसि च 5 इयानाः । ना ( श्राव चवन्नधरागुदक्ता अहि बुध्न्य मनुरीयमाणाः। ॐ कर्मकाण्ड रखाकर, कानचिशत्ति रेखात्मक सर्वतोभद पूजा पद्धतिः ( १०१) भू. मेरो। तत्रैवगंगादि नदीः। गंगाद्याः सरितः श्रेया जग- दाचौधधस्मराः । पुण्यापो निर्मलाः सर्वाः भद्रेऽस्मिन्नाहया- म्यहम् । ॐ इमम्मे-इति सिन्धुक्षित्प्रेयमेधऋषिर्जगती छन्दो वरुणो देवता सरित्स्था० । ॐ इमम्मे गंगे यमुने सरस्वति शतद्रूस्तोमंस्व च तापमठया । असिकन्या मरुवृधेवितस्तया - कीये शृणुह्याशुषो मया ॥ ॐ भू० गङ्गादि सप्तसरितः । तत्रैव पृथिव्यां सप्तसागारान्-ॐ आवाहयामि देवेशान्-सागरात्र- नभिनान् । जलाधिपाश्रितान्सर्वान्यज्ञरक्षाकरानहम् ॥ ॐ समुद्रोसीत्यस्य लुपोधानाकऋषिर्गायत्रीछन्दो वरुणो देवला समुद्रावा० । 30 समुद्रोसि नभस्वानादानुः शम्भूरभिमावाहि स्वाहा । 30 भृ० सप्तसागरा: । ततो वायोत्तरपरिधौ सोमादि समीपे भूर्भुव स्वः, गदायै नमः, गदामावाहयामि स्थापया- मि पूजयामि च । एवं सर्वत्र ।। ईशानान्तिके 30 भू० त्रिशू- लायनमः । त्रिशूलं ! पू० इन्द्रान्तिके-30 भू० वज्रायनमः । वज्रमा0 1 0 ° अग्रिसमीपे-30 भू० शक्तयेनमः शक्तिमा । द० यमान्तिके 30 भू० दण्डायनमः, दण्डमावा । नै० निर्भ- तिसमीपे 1-30 भू० ग्वगायनमः खड्गमावा० । प०,वरुणांतिके- ॐ भू० पाशायनमः पाशमा० । वा चायुसमीपे-~-30 अंकुशा- यनमोऽकुशमा गदावायोतरे--30 भू० गौतमायनमः । गौतम मावा० । ईशाने-30 भू" भरद्वाजायनमः, भरद्वाजमावा । आग्नेय्यां- --30 भू० कश्यपायनमः कश्यपं० । दक्षिणे- 3. भू० जमदग्नयेनमः, जमदग्निमा० | नैर्ऋत्यां-ॐ भू० वसिष्ठाय नमः वसिष्ठमावाहयामि पश्चिमे-ॐ भू० अत्रये अत्रिमावा० । वायव्याम्- -30 भू० अरुंधत्यैनमः असंधतीमा । तद्वाहीपूर्वादितोऽष्टौ शक्तिः स्थापयेत् । ॐ ऐं न्यू नमः। ऐन्द्रीमा | आग्नये-30 कौं कौमार्यैनमः कौमारीमा । दतिमो-नं ब्रायनमः, ब्राह्मीमा । नैर्ऋत्याम् वं वरानमः, वराहीं । पश्चिमे 30 चां चामुण्डायैनमः । चामुण्डामा । नमः, J । १०२ कर्मकाण्ड रताकरे, वास्तुभद्र परिभाषा - वायव्ये-0 वैष्णव्यैनमः। वैष्णवीं । उत्तरे-कौं कौवेयैनमः कौवेरीमा० । एवं सर्वतोभद्रदेवता अावाहा' पूजनं तु पूर्व दीक्षाङ्ग सर्वतोभद्रोक्त प्रकारेण वा पुरुषसूक्तेन सङ्घपूजनादिकं विधायतेनैव प्रकारेण दिग्पालादि क्षेत्रपालान्तां वलिंदत्वा प्रधान होमान्ते-स्थापनक्रमेणैव तत्तन्मन्त्रैर्वा नाममन्त्रैः प्रत्येक दशदश- यवतिलाज्याहुतिभिरेकैकाज्याहुत्या वा जुहुयात् । ग्रन्थ विस्तार - भयान्नान दर्शितः। ॥ इत्यकोनविंशति रेखात्मक सर्वतोभद्रपूजा पद्धतिः ॥ AAK श्री गणेशाय नमः । उत्त. च शाग्दातिलके । ततोर तामिदक्षागवास्तुयागपुरस्गरम् । कृतेनयेनमंत्रज्ञोदीक्षाया. फलमश्नुते ॥१॥ राक्षसंवास्तुनामान ल्याग्विायतत्तनुम् । स्थितानिप चाशदंव्यास्तेभ्य: पूर्ववलिहरेत ॥२॥ वलिमण्डलमंतेपायथावदभिधीयते । पूर्वापरायतंसूत्रंविन्य- मैदुक्तमानतः ॥३॥ तन्मध्यकिंचिदालव्य मस्यौद्वोपरिकल्पयत । तयोमध्यस्थितसूत्र यिन्य से दक्षिणोत्तरम् ॥४॥ द्वाभ्यांद्वाभ्यांततोग्राभ्या कोणेघुमकरा लिम्वेत । मत्स्यमध्यस्थिताप्राणि रात्र सूत्राणिपातयेत् ॥५॥ चतुरस्त्रभवत्तत्र चतुफौष्ठसमन्वितम् । नमुनविभजेन्मत्रो चतुःपठिपदं यथा ॥६॥ ईशानादक्षसोयावद्यापदग्रेप्रभंजन । एवं सूत्रद्वयं दद्यान्करी सूत्रं समाहितः ।।।। ब्रह्माण पूजये दादीमध्ये काष्ट चतुष्टये । दिकचतुष्वेषुपादियजेदायमणोन्तरम् ॥८॥ वियस्यन्तं ततीमित्रं महीधरमत परम् । कोणाकोटद्वन्द्वेषुपन्ह्यादि परितः पुन ॥६॥ मायिनं सवितारं च शक्रमिन्दं जयं पुनः । रदैजयन्तं चयजेदपश्चैवापपत्मकम् ॥ ॥ करणं सूत्रांभयत कोट द्वन्दे घुदेपिकः शर्वगुहंचार्यमणं जम्भकं यजेत्ततः ॥ ॥ चरका च विदारी च पूतना पाप- राक्षसीम् । अर्चये दिक्षपूर्वादिसार्धाद्यन्त पदेश्विमान् ॥१२॥ अष्टावष्टौ विभागेनवान् शिक. सत्तम । क्रमादोशानपजन्य शिसियोभन्मसमकान् ॥१३॥ पिल्लिपिन्छ गत्यभृशौचान्तरिक्षन्नु पूर्वयं । अग्निपूष्णं चवितथंयम चगृहरक्षरम् ॥३॥ गन्धर्च गृगराज चमृगंदक्षिणनस्तथा । दौवारिकं च सुग्रीवंवरुणं पुष्पदन्तकम् ॥१५॥ असुर च तथापा रोगपिन्नश्चपश्निम । पाय नागं च मोमंचमुख्यं भालाट यच ।।१॥ शेपंदिति चादिनिनुकुवर दिशि पूजयत । उफागा मपिदेयाना पदान्यापूर्व पचभ ॥१७॥ रजाभिरतप्यथरतेभ्य: पायागान लिाग । अथवा स्वस्व यलिभिवास्तु मण्डलमयेर ॥१८॥ इति पास्तुमण्डल यानास्थापनम् ।। अत्र च पास्तु भद्रस्थामराणां सवर्ण मंन्नवर्णनमस्त्यग्रे । ब्रहाण हरनं मानहानामतगंयो । जिलगन्तं पीतवर्ण विवस्वमिति संयत ॥१॥ मित्रं चतानि मित्ररमण गंगा। महीधरं नोलवर्णसग्राम इनिमयजेन् । साविध कपिलमार गुपयामि । मलारंग
कर्मका साकरे, गास्तुभमगिता
पापिनं पिशानी नाया शारदा पेन्द्रागन्नति गया। इन्द्रय कपिला का.
मायाविन्द्रति गमगाय TOTार गांगभिद मप्रतोयगा। दरवनियान रह
मंत्रण प्रयगा । जयन शुभागवगतरगतिगया। प्रा शुभागमेशा यामागा
सरया मापान पापण यानि गगा। रामनार मानमहाग मिति
गंगगे मन शुभगार मनण गयगंता । रलवणं नायमणारा मनाया
भर पोनाणा नगर्दमिति गयी! चरको न सोपान गरजा॥
रिवारों परिवार मतराजायनो गजा । पतग पौनमा पटुप्रिया गवार
पापरावगिोषण यम्गागमतीयगा । शाननुभयगर गगौशामनिगमः
নাহযান নানয়ন। হিসি ম মাহম।
सामग्मंगभ्रवर्गयो नम्नयोगमतीया ) पिपिपिप गामिनिममनोगत 12
শথিলমামলমনিষটা। সহৰ গাখীৰ
शुभ्रवगतमंत्रणयगा। अग्निरमा ति पन्नोअनेमनगरांयगे 91 पणश्यामलवणे
च स्क्य भूरमितीयगेन। निथपीतपणा तरगयस्येनिमगजेर १८ यगश्यामनन गमाय
যানালা । সাদা গামারী | বাণ ৰননি
गया। माराजनीलपण गौरी मलाक्तीयजेत 11 मृगनुरक्षा पग मृगौमतियातन ।
दोपारिभयवर्ण विरूपेलितोयजेर ११) सुप्रोपीनगंग नोनौतिगयन । यरगनुदिना-
कार साम्यतिगया. पुष्पदन्त पीतपणनगोगगतिगत । अगुरंगरमलासलम
शिवातिगंगा पापपणा निचतरवाइतिगयन । रोगराएति गदेव मनि
गयजा पितृशुभानागान्त मानादिनि । पायुरारतियायोगेनगंमाणगया।
1. नाग पनि गहिरिवेति गमचया । गोमशुप्रागनि गोमराजानमितिगयनी ।
मुख्यशुधानिमार म्तोमनमगराजी । भागटनीला भिमादायतोयना प
चन यानीमनगाचगमलया। दितिरतानि दिरणयपतिमगगजी १२६॥ अदिति कृrm.
जगार तानितितोरा नेन । गानागामरशुभ, धातोगशिलोग जेर २५ प्रतिमांस
विधानरी म. पायत रिम्नारनोरा याम्नीमनीषिभि । यत्प्यन्तुप्रयत्नेन चतुरम
गभारपि ॥ १ ॥ पाम्नभद्रेन्यसेटवमशुभ्रवणगमन्ततः । कीलयेरमादिरै कालधतुमणिपु
पये 10 बापरिनिग्मेद्भः पूर्व विधिनागधी । "पानापर्णगशरंग यानानिपूरया ॥३॥
वास्त्वातिखणामयी नामाकारांमुशाभनाम् । प्रतिमा स्थापया मध्ये ग्राण पमितटे ॥४॥
काया मुप्रतिमा गर्वाधनिर्वस्तृशुर्गत । गामान्यभ्यकिमि कायोराजता प्रतिमाशुभा ॥५॥
अान्युत्तारणटवा पूतिविधनामधी । मगढलेशानकोणेतु सदीपासशन्यस7 पाणी
अविधानेन यलशपूनयेत्तत्त । रापचनत कुर्यात्तत पांगमारभेग || प्रतिमा स्थापये
सन म्यानगुनधर पृथर । परभावातविमिनावता म्धापयेत्तमा बघागय पिच
दयानिवर्णतुल्यानिनामत 1 शाभार्थपदकानांन न्यसेत्पूगीफ्लान्यपि ॥ पक्ष्यमाणविधानमा
मरगद्रदयना। पाधारगेनविधानेन प्रयोगधाजनम् ॥१०॥
(१०४ ) कर्मकारहट रक्षाकर, दीक्षांग वास्तु भद्रम् दीक्षांग वास्तु भद्रम् । पूर्वः शु ०६ अन्तरिक्षःसुरु ईशानः रंव०२४ पर्जन्यः श्रादितिः मृशः २६ x शिरवो २५ अग्निर का कजलाकारः पिलिपिच्छ:२७ वोमत्मः शुत्रः कृपः सत्यः कपिलवर्णः २८ शुन्नः पृषा रक:५३ दितिः कृ० पा) .श.१५ अयमारक्तः श्यामः :P रा माकर अर्यमा २ स्वतः क. स्वेत वितथः३ पतिः मविना रक नील: यमः ३४ कृष्णाः 3:21 महीधरः । नाल ब्रह्मा १ हरितः पास्तुपुरुषायनमः नागाकृतिः पोतः विवस्वन् । गृहरक्षाकरः श्वेन: ३५ मुख्यः 10 ११ शुभः सामः ४६ रुद्रा:नील: गन्धर्ष ६ श्वतः स्वतः मित्रः जयःकपि इन्द्रः कपि यत गु १० १२ मृगराजः नील: ७ कृष्ण नाग:४८ विदारों का पौत २१ पापः कृष्णः कश्मल असुर: ४३ चाकी कृ० पीतः जमक पोतः पुष्पदन्त: ४२ श्वेत: घरुण ४१ ३६ मगः रक्त पित्तर थे. राथुःरक्तः मुग्रीवः पेतः ४० रोगः ४५ दोबा धू पच्छिमः कर्मकार रक्षाकरे, दीक्षांग यास्तपूजा पति. (१०५) दीक्षांग वास्तुमण्डल देवता पूजा पध्दतिः कर्ता प्रातः कृत्यकृत्वा गणपत्यादि पंचागपूजा विधाय वास्तुमण्डपमागत्य-हरिः ॐ अच्युतायनमः । ॐ केशवाय- नमः । ॐ माधवायनमः । त्रिराचम्य पृथ्वी सम्पूज्याक्षतै भूतो- स्सादनं रक्षाविधानानुसारेण कृत्वादीप प्रज्वाल्य सम्पूज्य च प्राणायामवयं विधायप्रधान संकल्पं कुर्यात् । हरिः ॐ श्रोत्यादि देशकालौ संकीर्त्यामुकोऽहं मेऽस्याकस्यामुकशर्मणो वर्मणोगुप्त- स्थवा वैजिकगाभिकैनो निवर्हण पूर्वक ब्रह्मवलायु वृद्धये, श्रौत- स्मात कर्मानुष्ठान सिद्धिद्वारा, करिष्यमाण चूडोपनयन वेदारंभ समावर्तनाख्य कर्मसु तदुपयोग्य युतात्मक ग्रहमखमंडपरक्षणाय वास्त्वर्चन विधौ, ब्रह्मादि वास्तुपुरुषपर्यन्तानां देवतानां प्रीतये तत्तद्देवताना मन्त्रैरावाहनाधर्चनं करिष्ये ॥ इति ॥ तदंगतया वास्तुपूजन वलिदानं च करिष्ये तत्पूर्वागतयावरुणपूजनंचकरिष्ये, तत्रादावाचार्य वृणुयात् । ॐ नमोस्त्वन्तायेति पायंसमर्पयामि । गंधद्वारामितिगन्धम् । पुष्पादिभिराचार्य ब्राह्मणं संपूज्य सधौ- त्तोतरीयांगुलीयं यथावित्तद्रव्यहस्तेनिधाय ॐ अद्येत्या धमु- कोऽहममुकनान्मो मत्पुत्रस्य करिष्यमाणामुक कर्मणि वास्त्वर्चन विधावाचार्य कर्मकर्तमनेन वासोंगुलीयकासनद्रव्येणामुक गोत्र ममुकशर्माणं ब्राह्मणमाचार्य कर्म कर्तृत्वेनाई घृणे । इति वरणद्रव्य ब्राह्मणायदत्वा, सोऽपि वृतोऽम्मीतिब्रूयात् । प्रार्थयेत् । ॐ श्राचार्यत्वे यथास्वर्गदेवानां च बृहस्पतिः । तथात्वंममयज्ञेऽस्मि नाचार्योभवसुव्रतः।१। अहंभवानि । ततईशानकोणे वरणविधानेन कलशंसम्पूज्य । अथ चाचार्यों वेद्याश्चतुर्दिक्षु चतुरोखादिर शंकून तदभावेलोह शंकून, समत्रं कीलयेत् । 30 विश्वन्तुभूतले नागा लोकपालाश्च सर्वतः । अस्मिन्गृहेऽवतिष्ठन्त्वायुर्वलकराः सदा । इति मंत्रमुच्चारयन्नाचार्य ईशानादि चतुर्दितु कीलयेत् ततस्तद्देव-' ताभ्योमापभक्तवलि चतुष्टयं सदीपंसंपूज्यानेनैव फ्रमणेदद्यात् ।।
( १०६) कर्मकाग रताकरे, दीपांग नास्तुपूजा पमति . , तत्रावावीशाने जलंगृहीत्वामंत्रान्ते वलौक्षिपेत । सर्वत्र मंत्रः । 30 मद्रेभ्यश्चैव सर्पेभ्योयेचान्ये नत्समाश्रिताः । वलि तेभ्यः प्रयच्छामि, पुण्यमोदनमुतमम् ।। श्राग्नेये-- ॐ अग्निभ्योऽप्यथ सर्पेभ्योये चान्येतत्स माश्रिताः । तेभ्योवलिप्रयच्छामि पुण्यमो- अवमुत्तमम् ।२। नैर्ऋत्ये नैर्ऋत्या धिपतिश्चैव नेत्यांये च राक्षसाः। तेभ्योवलिप्रयच्छामि पुण्यमोदनमुत्तमम् ।३। वायव्ये- वायव्याधिपतिश्चैव वायव्यां ये च राक्षसाः। तेभ्योवलि प्रय- ञ्छामि पुण्यमोदनमुत्तमम् ।४॥ अथ पूर्वनिर्मितवास्तुभद्रे वास्तु प्रद्र देवता स्थापनम् । ॐ ब्रह्मजज्ञामिति गौतमर्पित्रिष्टुप्छन्दो ब्रह्मादेवता ब्रह्मावाहने स्थापनेपजने च विनियोगः। ऋक् ॐ ब्रह्म- ज़ज्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचोवेनश्राव. । सबुध्न्याउपमा अस्यविष्ठाः सतश्चयोनिमसतश्चविचः । ॐ भूर्भवः स्वः, ब्रह्मन्नि- हागच्छेहतिष्ठ, ॐ ब्रह्मणेनमः । संस्थाप्य च पूजयेत् । ततः पीतं विवस्ततं विवस्वन्निति कुत्सऋषिरनुष्टुप्छन्दो विवस्वान्देवता विवस्त्रदावाहने विनियोः । ऋक् . विवस्वन्नादित्यैपतेसोमपी यस्तस्मिन्मत्स्व श्रदस्मै नरो वर्चसैदधातनयदाशीर्दा दम्पती वाममश्नुतः। पुमान पुत्रो जायते विन्दतेवस्पधा विश्वाहारपs एधतेगृहे । ॐ भूर्भुवः स्वः विवस्वनिहागच्छेहतिष्ठ 30 विवस्व- तेनमः स्थापयामि प्रजयामि । ततः श्वेतंमित्रम् | मित्रस्य विश्वामित्रऋषि र्गायत्रीछन्दो मित्रोदेवता मित्रावारने विनि- योगः । ऋक् - मित्रस्यचर्षणी धृतोवोदेवस्य सानसिद्युम्नचित्र श्रवस्तमम् । ॐ भूर्भुवः स्वः मित्रहहागच्छेहतिष्ठ । ॐ मित्राय नमः स्थापयमि प्रजयामि । ततो नीलमहीधरम् । यद्नाम प्रति प्रजापति ऋषिरनुष्ठप्छन्दो महीधरो देवता महीधरावाहने विनि- योगः । ऋक्-0 यद्नामे यदरण्णेयत्सभायां यदिन्द्रियेयदेनश्च कृमावयमिदं तदव यजामहेस्वाहा ॥ ॐ भूः स्वः महीधर इहा- गच्छेहतिष्ठ, ॐ महीधरायनमः । स्थाप० प्रज० । ततः कपिलं सावित्रम् । ॐ उपयामगृहीतोसीति विवस्वानापर्गायत्रीछन्दः कर्मकाण्ड रखाकरे, दीक्षांग पास्तुपूजा पद्धतिः (१७) सावित्रोदेवता सावित्रावाहने विनियोगः | ॐ उपयामगृहीतोसि सावित्रीसिचनोधा असिचनोमयिधेहिजिन्वयनं जिन्वयजपात भगायदेवायत्वासवित्रे । 0 भू० स्वः भोसावित्र इहागच्छेहतिष्ठ सावित्रायनमः स्थाप. पूजः । ततः कपिलसवितारं । . विश्वानीति श्यावाश्वऋषि गायत्रीछन्दः सवितादेवता सवित्रा- वाहने विनियोगः । ऋक् ॐ विश्वानिदेव सवितुर्दुरितानि परा- सुवयद्भद्रं तन्नग्रासुवः । 30 भू०स्वः सवित इहागच्छेहतिष्ठ, . सवित्रेनमः । स्थाप० पुज० । शुभ्रंशक्रम् । इन्द्र इति अप्रतिरथ ऋषि त्रिष्टुप्छन्छः शक्रोदेवता शकावाहने विनियोगः । ऋक्- ॐ इन्द्र आसन्नेता वृहस्पति दक्षिणायज्ञः पुरएतुसोमः देवसेनानामभिभंजतीनां जयन्तीनाममतो यन्त्वग्रम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः शक्रेहागच्छेहतिष्ठ, 30शकायनमः स्थाप० पूज. कपिलमिन्द्रम | ॐ श्रआयात्विनि वामदेव ऋषित्रिष्टुप्छप्द इन्द्रो देवता इन्द्रावाहने विनियोगः । ऋक्--. आयान्त्विन्दोवस उपनइहस्तुतः सधमादस्तुशूरः वातधानस्तविषीर्यस्य पूर्वीचौर्न- क्षत्रमभिभूमिपुष्यात् । भूर्भुवः स्वः इन्द्रइहागच्छेहतिष्ठ, 30 इन्द्रायनमःस्थापयामिपूज. कपिलंजयम् । गोत्रभिदिति श्रप्रतिरथऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो जयोदेवता जयाबादने विनियोग। ॐ गोत्रभिदंगोविदं बज्रवाहं जयन्तमज्मप्रमृणं तमोजसा । इम टे० सजाता 5 अनुवीरयध्वमिन्द्र ॐ सग्यायो ऽ अनुस छ रमध्वम् । ॐ भूर्भुवः स्वः जयडहागच्छेहतिष्ठ ॐ जयायनमः स्थापयामिपू०। नीलभद्रम् । 3. यातेरुद्रेतिपरमेधीऋषिरनुष्टु- प्छन्दो मद्रोदेवता रुद्रावाहने विनियोगः । ऋ- याने मद्र शिवातनू रघोरापापकाशिनी नयानस्तन्वाशन्नमयागिरिशन्ना- भिचाकशीहि । ओ भूर्भुवः स्वः द इहागच्छेहतिष्ठ, 30 मद्राय- नमः स्था० पू० । शुभ्रवर्णजयन्तम् । ॐ जीमूतस्येनि. भरद्वाज- ऋषि त्रिष्टुप्छन्दो जयन्तोदेवता जयन्तावाहनेविनियोगः । अक्-. जीमूतस्येवभवतिप्रतीकं यदीयातिसमुदामुपस्थे ।
I foc कर्मकाण्ड रहाकरे, दीप्तांग यास्तुपूजा पद्धति अनाविद्धयातन्त्वा जयन्त र्टसत्वा वर्मणोमहिमापिपर्तु। ॐ भूर्भुवः स्वः जयन्तइहागच्छेहतिष्ठ 0 जयन्तायनमः स्थाप० पूज० । शुभ्रामापः । ॐ श्रापोप्रमानिति देवश्रवाऋपिरनुष्टुप्छ- न्दायांपोदेवताप्रपामावाहनेवि०। ऋक्-ॐ आपोऽस्मान्मातरः शुन्धयन्तुसृतेननोवृतयः पुनन्तुविश्व ई० हिरिमंप्रवहन्तिदेवी रदिदाभ्यः शुचिरापूतएमि । ॐ भूः स्वः आपइहागच्छन्त्विह- तिष्ठन्तु ॥ ॐ अद्भ्योनमः स्था. पुज० ॥ कृष्णवर्णमापवत्सम् ॥ आतेवत्सइति कण्वऋपिर्गायत्रीछन्द प्रापवत्सोदेवताप्राप- वत्सावाहने विनियोगः । ऋक्-34 अातेवत्सोमनोयमत्परामा चित्सधस्थात् अग्नत्वांकामयागिरा । ॐ भूर्भुवः स्वः भो श्राप- वत्स इहागच्छेहतिष्ठ अ श्रापवत्सायनमः स्थाप० पू० । श्वेतवर्ण शर्वम् । ॐ मानोमहान्तमितिकुत्सऋपिर्जगतीछन्दः शदेिवता शर्वावाहने विनियोगः । ऋक्-30 मानोमहान्तमुतमानोऽअर्भ कंम्मानउक्षन्तमुतमान ऽ उक्षितम् । मानोवधीः पितरंमोतमात- रंमानः प्रियास्तन्योरुद्ररीरिपः । 30 भृ० स्वः शर्वइहागच्छेहतिष्ठ ॐ शर्वायनमः स्था० पू०।शुभ्रस्कन्दम् । ॐ यदक्रन्दइतिदीर्घतमा ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः स्कन्दोदेवता स्कन्दावाहने विनियोगः । ऋक्- ॐयदकन्दप्रथमंजायमानमुद्यत्समुद्राइतवापुरीपात्। शेनस्यपक्षा- हरिणयस्यवाहु उपस्तुत्यमहिजायन्तेर्वन । ॐ भूर्भुवःस्वः स्कन्द इहागच्छेहतिष्ठ स्कन्दायनमः आवा० पूज० । रक्तवर्ण- मर्यमणम् । ॐ अर्यमणमितिपडग्नि ऋषिरनुष्टुप्छन्दो ऽ र्यमा- देवता ऽर्यमावाहने विनियोगः । ऋक्० अर्यमणंबृहस्पति- मिन्द्रं दानायचोदयवाचविष्णु ई० सरस्वती ॐ सवितारंच वाजिन ॐ स्वाहा । 30 भू० स्वः अर्यमनिहागच्छेहतिष्ट . अर्यम्णेनमः स्थाप० पूज० । पीतवर्णजृम्भकम् । ॐयदेपमितिवत्स ऋषिर्गायत्रीछन्दो जृम्भकोदेवता जृम्भकावाहने विनियोगः। क्-ॐ यदेपंपृषतिरथैः प्रष्टिर्वहतिरोहितः यान्तिशुभ्राणिन्नपः ॐ भूः स्वः जम्भकइहागच्छेहतिष्ठ, जम्भकायनमः स्थाप० कर्मकाए रखाकरे, दीक्षांग पास्तुपूजा पद्धतिः (१०८) पूज० ॥ कृष्णवर्णाश्चरकीम्॥ ॐ यन्तेदेवीतिमधुश्छन्दऋषिपंक्ति रछन्दः चरकीदेवता चरक्यावाहने विनियोगः ॥ ॐ यन्तेदेवी- निऋतिरावबंध पाशग्रीवास्वविचूतम् । तन्तेविष्याम्यायुपोनम- ध्यादथैतंपितुमध्यप्रसूतः नमोभूत्यैयेदंचकार ।। ॐ भूः स्वः चरकीहागच्छेहतिष्ठ, ॐ चरक्यैनमः स्थाप० पूज० ॥ ततोकपि- लांविदारीम् ।। ॐ अक्षराजायेतिनारायण ऋपिः प्रकृतिश्छन्दो विदारीदेवता विदार्यावाहने विनियोगः।। ऋक् ॐ अन्नराजाया कितवः कृतायादिनवदर्श त्रेतायैकल्पिनं द्वापरायाधिकल्पिन मास्कन्दायसभास्थाएंमृत्यवेगोव्यछमन्तकाय ॥ गोघातंतुधेयो- गांविकृतंतंभिक्षमाण उपतिष्ठतिदुष्कृतायचरकाचार्य पापमनेशैल- गम् ।। ॐ भूः स्वः विदारीहागच्छेहतिष्ठ ॐ विदायेनमः स्था- प० पूजियामि ।। १६ । पीतवर्णापूतनाम् ॥ ॐ कटुप्रियायेति आत्रेयऋषिजगतीछन्दः पतनादेवता पूतनावाहनेविनियोगः॥ ॐ कटुप्रियायधाम्नेमनामहे स्वक्षत्राय स्वयशेममहेवयम् ।। श्रामेन्यस्य रजसोदयभ्रां अपोवणाना वितनोतिमायिनी ।। ॐ भूर्भुवःखः, पूतने इहागच्छेहनिष्ठ । ॐ पूतनायै नमः स्थाप पूज० ॥ कृष्णां पापराक्षसिम् ॥ ॐ यस्यास्त इति मधुश्छन्द ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः पाप राक्षसिका देवता पाप राक्षस्या वाहने विनियोगः ॥ प्रक-ॐ यस्यास्ते घोर आसं जुहोम्येपाम्व- न्धानामवसर्जनाय यांत्वाजनोभूमिरिति प्रमंदन्तेनितित्वाई परि घेदविश्वतः ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः पाप राक्षसि इहागच्छेह तिष्ठ॥ ॐ पाप राक्षस्यै नमः स्थाप० पूज० ॥ शुभ्रवर्ण मीशा- नम् ॥ ॐ तमीशानमिति गौतम ऋपिर्जगती छन्दः ईशानो देवता ईशाना चाहने विनियोगः ।। ऋक्-ॐ तमीशानं जगत- स्तस्थुपस्पतिं धियं जिन्वमवसेहमहेवयम् । पुषानो यथावेदसाम सङ्घधे रक्षिता पायुरदब्धः खस्तये ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः भो ईशान इहागच्छेहतिष्ठ, ॐ ईशानाय नमः स्था° पूजयामि ।। श्वेत पूर्जन्यम् ॥ शन्नोवात इति दध्यङ्डाण ऋपिरनुष्टुप्छन्दः , (११०) कमकापड रलाकरे, दीपांग वास्तुपूजा पद्धति: ~ पर्जन्यो देवता पर्जन्या वाहने विनियोगः ॥ ॐ शन्नोवातः पवता ॐ शनस्नपतु सूर्यः शन्नः कनिकददेवः पर्जन्योऽअभिव- पतु ॥ भूर्भुवः स्वः पर्जन्य इहागच्छेहतिष्ठः, पर्जन्याय नमः आवाहयामि स्थापयामि ॥ कजलाकारं शिखिनम् , नमः शम्भवायेति वामदेव ऋपित्रिष्टुप्छन्दः शिवी देवता शिख्याचाहने विनियोगः ॐ नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः शङ्कराय च मयस्कराय च नमः शिवाय च शिवतरायच ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः शिग्विनिहागच्छेहतिष्ठ, ॐ शिखिने नमः स्थाप० पूज" शुभ्रवर्ण वीभत्सम् । 30 उदस्तम्भीति विश्वामित्र ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो वीभत्सो देवता वीभत्सावाहने विनियोगः । ॐ उदस्तम्भीत्समिधानाक मृप्यो अग्निमवन्तुतमो रोचना- नाम् । यदीभृगुभ्यः परिमातरिश्वा गुहासन्तहव्यवाहसमीधे ॥ भू० स्वः वीभत्स इहागच्छेहतिष्ठ वीभत्साय नमः स्थाप. पूज"}} कृष्ण वर्ण पिल्लिपिच्छम् । कास्विदितिप्रजा पतिऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः पिल्लिपिच्छो देवताः पिल्लिपिच्छावाहने विनियोगः । ऋक्-30 कास्विदासीत्पूर्वचित्तिः किस्विदासी- बृहद्वयः। कास्विदासीपिलिप्पिला कास्विदासीतापशंगिला। 30 भू. स्वः पिल्लिपिच्छ इहागच्छेहतिष्ट ॐ पिल्लिपिच्छाय नमः स्थाप० पूजयामि । कपिलं सत्यम् ।। ॐ सत्यंच मेति देवा ऋषयो विराट् शक्करीछन्दः सत्यो देवता सत्यावाहने वि- नियोगः ॥ ऋक्-30 सत्यंचमे श्रद्धाचमे जगञ्चमे धनंचमे मह- समे क्रीडाचमे मोदश्चमे जातंचमे जनिष्यमाणंचमे सूक्तंचमे सुकृतंचमे यजेन कल्पन्ताम् । ॐ भूः स्वः भो सत्य इहागच्छे- हतिष्ठ 30 सत्यायनमः स्था० पू० । कपिलवर्ण भृशम् ॥ 0 प्रा. त्वाहार्पमिति धवऋपिरनुष्टुप्छन्दो भृशो देवता भृशावाहने विनि- योगः ऋक् ॐ आत्वाहार्पमन्नरभू‘वस्तिष्ठा विचाचलिः । विश- स्त्वा सर्वावांच्छतु मात्वद्राष्ट्र मधिभ्रशत्। 3. भू स्वः भृश इहागच्छेहतिष्ठ भृशायनमः स्था० पू० । शुभ्रवर्ण मन्तरि- कर्मकाण्ड रत्नाकर, दीनांग वास्तुपमा पतिः (११) नम् । ॐ घृतमिति दीर्घतमा ऋपिः पंक्तिश्छन्दोऽन्तरिक्षो देवता अन्तरिक्षा चाहने विनियोगः । ॐ घृतं घृतपावानः पिवतवसां वसापावानः पिवतान्तरिक्षस्यहविरसिस्वाहादिशःप्रदिशऽयादि- यो विदिश उद्दिशों दिग्भ्यः स्वाहा । ॐ भृ० स्वः अन्तरित्र इहाग हतिष्ट 30 अन्तरिक्षायनमः स्था० पू० । ततो रक्तमग्निम् स्वन्नो अग्नइति हिरण्यस्तृप ऋाषस्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवता अग्न्या वाहने विनियोगः । ऋक्-30 त्वन्नोऽअग्ने तवदेव पायुभिर्म- धोनोरचतन्वश्चवन्ध । प्राता तोकस्यतनयेगवामस्थनिमेष ० रक्षमाणस्नवव्रते । भू० स्वः अग्ने इहागच्छेहतिष्ट अग्नये नमः स्थाप, पूज० ॥३०॥ श्यामलं पूषणम् । ॐ स्वयम्भूरसीति सूर्य ऋपिर्याजुषीछन्दः पूषा देवता पूषावाहने विनियोगः ऋक् ॐ स्वयम्भूरसि श्रेष्ठोरश्मिवादाऽअसि बर्चामे देहिसृर्यस्या धृतमन्वायतें। 30 भू० स्वः पूषषन् इहागच्छेहतिष्ट ॐ पूष्णे नमः स्थापयामि पू. । वितथं पीतवर्णम् ॥ ॐ तत्सूर्यस्येति- कुत्स ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो वितथो देवता वितथावाहने विनियोगः ऋक्-ॐ तत्सूर्यस्य देवत्वं तन्महित्वं मध्याकोर्षितत हैं। संजभारः यदेदयुक्तहरितः सधस्थादादात्रीवासस्तनुतेसिमस्मै ॐ भू० स्वः यितथ इहागच्छेहतिष्ठ ॐ वितथायनमः स्था० पू। श्यामलं यमम् । ॐ यमायत्वेति दध्यड्डाणऋषिर्यजुश्छन्दो यमो देवता यमावाहने विनियोगः । अक्--ॐ यमायत्वा मंग्वायत्वा सूर्यस्यत्वातपसे देवस्त्वा सवितामध्वानक्तु पृथिव्या सस्पृशस्पाहि । अचिरसिशोचिरसि तपोसि | 0 भू० स्वः यमइहागच्छेहतिष्ठ ॐ यमायनमः स्था० पू० । स्वतंगृहरक्षाकरम् ॐ गृहामाविभीतमिति आसुरी ऋषिः पंक्तिरछन्दो गृहरक्षाकरो देवता गृहरक्षाकरावाहने विनियोगः । ऋक् गृहामाविभीतमा वेपध्वमूर्ज विभ्रतऽएमसि ऊर्जविभ्रवः सुमनाः सुमेधाः गृहानैमि- मनसा मोदमान:। ॐ भु. स्वः भोगृहरक्षाकर इहागच्छेहतिष्ठ ॐ गृहरक्षाकरायनमः । स्था० पू० ततो श्वेतवर्णं गंधर्वम् ।
कर्मकाण्ड रलाकरे, दीक्षांग वास्तुपूजा पति गन्धर्वस्त्वेति प्रजापति ॠषि यजुश्छन्दो गन्धर्वोदेवता गन्धर्वा- वाहने विनियोगः । ऋक् ॐ गन्धर्वस्त्वा विश्वावसुः परिदधातु विश्वस्यारिष्ठय यजमानस्य परिधिरस्यग्निरिडईडितः । इन्द्रस्य वाहुरसि दक्षिणो विश्वस्यारिष्ठयै यजमानस्यपरिधिरस्यग्नि रिडईडितः । ॐ भु० खः भोविश्वावसो इहागच्छेहतिष्ट । ॐ विश्वावसवेनमःस्था०पू०।नीलयर्ण,गराजम् । ॐ सौरीवलागेति भुरिग्ऋषिर्जगतीछन्दोश्रृंगराजोदेवता भंगराजावाहनेविनियोगः। ऋक् ॐ सौरीवलाकाशार्गः सृजयः शयाण्डकस्ते मैत्राः सरख- त्यैशारिः पुरुषवाक् श्वाविभौमी शार्दलोवृकः पृदाकुस्ते मन्यवे सरखतेशुकः पुरुषवाक्- ॐ भूः स्वः शृंगराज इहागच्छेहतिष्ठ भृगराजायनमः स्था० पू० । रक्तवर्णमृगम् । 0 मृगोनेतिजय- ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो मृगोदेवता मृगावाहने विनियोगः ऋक्-ॐ मृगोनभीमः कुचरोगिरिष्ठाः परावतश्राजगन्थापरस्याः सूक ट स , शायपविमिन्द्र तिग्मविशन्ताड्ढि विमृदोनुदख । ॐ भू० स्वः मृगइहागच्छेहतिष्ठ ॐ मृगायनमः स्था० पू० । धूम्रवर्ण दौवारिकम् ॐ द्वेरूपे इति कुत्सऋषिविष्टप्छन्दो दौवारिको देवता दौवारिकावाहने विनियोगः। भूक-ॐ द्वेविरूपेचरतः स्वर्थेअन्यान्यावत्समुपधापयेते हरिरन्यस्यां भवतिस्वधावान् शुक्रोअन्यस्यांददृशेसुवर्चाः । ॐ भूः स्वः दौवारिक इहागच्छे- हतिष्ठ ॐ दौवारिकायनमः स्था० पू० पीतवर्णसुग्रीवम् । ॐ नीलग्रीवेतिपरमेष्टि ऋपिरनुष्टुप्छन्दः सुग्रीवोदेवता सुग्रीवावाहने विनियोगः । ऋक्-ॐ नीलग्रीवाः शितिकण्ठादिवर्ट रुद्राऽउप श्रिताः। तेषा सहस्रयोजनेयधन्वानितन्मसि । ॐ भू० स्यामुग्री बइहागच्छेहतिष्ठ ॐ सुग्रीवायनमः स्था० पू० तुहिनाकारंवरुणम् । ॐ वरुणस्येति शुनः शेफऋषिर्गायत्रीछन्द्रो वरुणोदेवता वरुणा चाहने विनियोगः ऋक् . वरुणस्योत्तम्भनमसि वरुणस्यस्कम्भ सर्जनीस्थो वरुणस्यऽऋत सदन्यसि घरणस्यऽऋत सदनमसि वरुणस्यऋत सदनमासीद । ॐ भूर्भुवःस्वः परुण इहागच्छेहतिष्ठ कर्मकाण्ड रक्षाकरे, दीक्षांग वास्तुपूजा पद्धतिः ( ११५ ) श्रुतवन्ध ऋषिर्गायत्री छन्दो ऽ दितिर्देवता. अदित्यावाहने विनियोगः। ऋक्-३० एडपादिताहिकाम्याडातमयिवः काम- धरणं भूयात् । ३. भू. स्वः अदित्ते इदागच्छेहतिष्ठ अदितयेनमः स्था०पू० । ततोभद्रमध्येब्रह्मणोऽन्तिके शुभ्रवर्ण नागाकृतिं वास्तु पुरुषम् । ध्यानम् नागाकृतिं चतुर्वालुब्रह्मण्यं च गृहाधिपम् । भद्रस्थदेवसहितध्यायाम्यावाहनार्थकम् ॥११ ७७ वास्तोष्पत इति शिष्ठ ऋपित्रिष्टुप्छन्दो चास्तुदेवता वास्त्वा वाहने विनियोगः । ऋक् . वास्तोपते प्रतिजानी हास्मान्त्स्वावेशो ऽ अनमीयोभ- वानः। यत्वेमहे प्रतितन्नो जुपस्व शन्नोभव द्विपेदेश चतुप्पदे । ॐ भूर्भवः स्वः भो वास्तो इहागच्छेहनिष्ठ ब्रह्मादि त्रिपञ्चा शद्देवसहितः सांगोपाङ्गः सन्मेपूजागृहाण मग्वसंरक्षण कुमकुम । सांगोपाङ्ग वास्तु पुरुषायनमः । एतन्तते देवसवितर्यज्ञ माहुवृहस्पतये ब्रह्मणे । तेनयज्ञमवतेन यज्ञपतिं तेनमामय । . मनोयूतिर्युपनामाज्यस्य वृहस्पति यज्ञमिम ननोत्वरिष्ठं यज्ञ टे० समिमं दधातु विश्वेदेवासऽइहमा दयन्तामोंप्रतिष्ठ । 34 भूर्भुवः स्वः वास्तु सहितनमादि चतुःपंचाशद्देवाः सुप्रतिष्ठिना भवन्तु । ततः प्राणप्रतिष्ठां कृत्वा श्रावास्येत् ध्यानम् | नागाकृतिं चतुर्यु ब्रह्मपुत्रं सुवर्चसम् ॥ ग्राम गृहाधिपं वास्तुंध्यायाम्यावास हेनवे पायाहन-पादित्यान् दितिजांश्चैव वास्तु मण्टल मध्यगान ।। गृहसौख्य समृध्यर्थ देवानावायाम्यहम् ॥यासनम्।। अनेक यन्त्र संयुक्तं भद्राकृतिमनो हरम् ।। आसनं प्रतिगृहन्तु वास्तु भद्रस्थ देवताः॥पाद्यम्।। सुपात्रे निर्मलं दिव्यं भक्त्यार्पित शुभ जलम् ।। पाचंगृह्णन्तु यूयं वास्तु भद्रस्थ देवताः ॥श्रयम्।। सदध्यक्षत दर्यायं जलंपरमसुन्दरम् ।। गृहन्त्वर्घ च संप्रीत्या वास्तु भद्रस्थ देवताः ॥स्नानीय।। नानागन्ध समायुक्तं स्नानीयकमनुनमम् । गृहन्तु संघपूजायां वास्तु भद्रस्थदेवताः॥पंचामृतस्नानम्॥पयो- दधिकृतं क्षौद्रं शर्कराभिर्विमिश्रितम् । पंचामृतं प्रगृह्णन्तु वास्तु भद्रस्थदेवताः । शुद्धोदक स्नानम् । शुद्धोदकं मयादतं पवित्र ( १९६) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, दीक्षांग वास्तुपूजा पद्धतिः - निर्मलं शुभम् । पुनः स्नानाय गृह्णन्तु वास्तुभद्रस्थ देवताः । वस्त्राणि-कौशेयानि सुवस्त्राणि नानावात्मकानिचमयादत्ता- नि गृह्णन्तु वास्तु भद्रस्थदेवताः। यज्ञोपवीतम्-गृह्णन्तु चोपवी- तानियेच यज्ञोपवीतिनः कर्पासतन्तुमूलानि वास्तु भद्रस्थ देवताः चन्दनम्-मलयाचल संभूतंसकर्पूरं सकेशरम् । चन्दनं प्रतिगृह्ण- न्तु वास्तुभद्रस्थ देवताः । अक्षताः-अक्षतांस्तण्डुलांच्छुभ्रान्भा- लशोभाकरान्परान् । शोभार्थ प्रतिगृह्णन्तु वास्तु भद्रस्थ देवताः । पुष्पाणि-नानाविधानि पुष्पाणि देशकालोद्भवानि च । महतानि प्रगृह्णन्तु वास्तु भद्रस्थ देवताः। धूपम्-वनस्पतिसमुद्भूतं दिव्य गंधमनोहरम् । धूपं गृह्णन्तु चाधेयं वास्तु भद्रस्थ देवताः । श्रारा- र्तिक्यम्-घृताक्त घर्तिकायुक्तमारार्तिक्यं प्रकाशितम् । सन्मङ्ग- लार्थंगृह्णन्तु वास्तुभद्रस्थ देवताः। नैवेद्यम्-भक्ष्यभोज्यंचपक्का न्नं मधुरं घृतपायसम् । नैवेद्य प्रतिगृह्णन्तु वास्तुभद्रस्थ देवताः। नैवेद्यान्ते जलम्-कराननविशुद्ध्यर्थं गन्धद्रव्य सुसंस्कृतम् । जलं च प्रति गृह्णन्तु वास्तुभद्रस्थ देवताः । उपायनद्रव्यम्- उपायनी भूतमिदं वित्तशाट्यविवर्जितम् । द्रव्यं गृह्णन्तु मद्दत वास्तु भद्रस्थ देवताः। फलम्-पूगी फलं लवंगं च भूतुजानि फलान्यपि । भक्त्यार्पितानि गृह्णन्तु वास्तुभद्रस्थ देवताः। इति पूगीफलैर्वास्तु भद्रं सुसज्य होमवेद्युपरि वक्ष्यमाण प्रकारेण मम्व कुर्यात् । तच्च वास्तुमण्डल देवताः संपूज्य होमवेदी समीप मागग्य संस्कारादिपु वक्ष्यमाण प्रकारेण हवनं कुर्यात् । तत्रादौ संकल्पं कुर्यात्-अद्यत्यादि देशकालौ संकीर्त्यामुक कमणि वा- स्तुमण्डलार्चित देवतानां पूर्वोक्त पूजा प्रकारेण प्रति देवताप्रीत्य र्थ तिलाज्य द्रव्येणपायसेनवा-अष्ठाभिराहुतिभिः प्रत्येकंयक्ष्ये । वास्तुपुरुषप्रति जपदशमांशेन पायसेन विल्वफलसंयुक्तेन जुहुया त् । होम संख्या न्यूनताया मष्टोत्तर शताहुतिभिर्जुहुयात् । नतो वास्तुमंडपमागत्य वक्ष्यमाण प्रकारेण चलीन्दद्यात्। तत्प्रकारस्तु- मांसमद्य यलिंहित्वा विप्रेण घृतपायसम् ।। देयं क्षत्रिय मुग्ध्यैस्तु कर्मकाण्ड रखाकरे, दीक्षांग वास्तुपूजा पद्धतिः ॐ वरुणायनमा स्था० पू० } पीतवर्णं पुष्पदन्तम् । ॐ नमोगणे- भ्य इनि कुत्सऋषिः शकरी छन्दः पुष्प दन्तो देवतापुष्पदन्ता वाहने विनियोगः । ऋक् ॐ नमोगणेभ्यो गणपतिभ्यश्चयो नमो नमो बातेभ्योबात पतिभ्यश्चवो नमोनमो गृत्सेभ्यो गृत्सपति- भ्यश्श्चवो नमोनमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्चयो नमोनमः . भू० स्वः पुष्पदन्तइहागच्छेहतिष्ठ। ॐ पुष्पदन्तायनमः स्था० पू० कश्मलाकारमसुरम् । ॐ यमश्विनेति वक्षिवपिस्त्रिष्टुपछन्दोs सुरोदेवता असुरावाहने विनियोगः ऋक् ॐ यमश्विना नमुचेरा- सुरा दधि सरखत्य सुनोदिन्द्रियाय । इमन्त ई० शुक्र मधुमन्त मिन्दु ई० सोम ० राजान मिह भक्षयामि । ॐ भू० स्वः असुर इहागच्छेहतिष्ठ ॐ असुरायनमः स्था० पू० । कृष्णपापम् । ॐ एतत्ते सदा इति वशिष्ठ ऋषिः पंक्तिश्छन्दः पापो देवता पापावाहने विनियोगः । ऋक्-~ॐ एतत्ते रुद्रावसन्तेन परो- मूजवतोतीहि अवततधन्वा पिनाकावसः कृतिवासाऽ अहि । शन्नः शिवोतीहि । ॐ भूर्भुवः स्वः पाप इहागच्छेहतिष्ट अ पापाय नमः स्था० पू० ॥ रक्तं रोगम् । ॐ यद्देवाऽइति प्रजापति ऋपिरनुष्टुप्छन्दो रोगो देवता रोगाचाहने विनियोगः । ऋक्-- ॐ यद्देवा देवहेडनं देवासश्चक्रमावयम् । अग्निर्मातस्मादेनसो विश्वान्मुंचत्व ई० हसः। 30 भू० स्वः रोग इहागच्छेतिष्ठ 3 रोगायनमः स्था० पू० । शुभ्रानपिन् । 30 आयन्तुनः इति शखऋपिन्त्रिप्टुप्छन्दः पितरो देवता पित्ऋणामाचाहने विनि- योगः । ऋक्श्रायन्तुनः पितरः सोम्यासोग्निष्वात्ताः पथिभिर्देवयानः । अस्मिन्यने स्वधयामदन्तोऽ अधिन्नुवन्तुतेs वंत्वस्मान् । 30 भूत स्वः पितर इहागच्छतइहतिष्ठतः पित्- भ्योनमः स्था० पू० । रक्तं वायुम् । वायो येते इति गृत्स- मदवाषिर्गायत्री छन्दो वायुर्देवता वाय्याचाहने विनियोगः । ऋक्-30 वायो येते सहन्त्रिणो रथासस्तेभिरागहि । नियुत्वा- सोमपीतये। भू० स्वः वायो इहागच्छेहतिष्ट ॐ वायवे कमकाण्ड रत्नाकरे, दीक्षांग बास्तुपूजा पद्धतिः नमः स्था० पू० । कृष्णं नागम् । ॐ अहिरिवेति पायुऋषिस्त्रि- ष्टुप्छन्दो नागो देवता नागावाहने विनियोगः । ऋक्-30 अहिरिवभोगैः पय्येतिवाई ज्याया हेतिं परिवाधमानः । हस्त- घ्नो विश्वावयुनानि विद्वान्पुमान्पुमा ॐ सम्परिपातु विश्वतः । ॐ भू० स्वः नाग इहागच्छेहतिष्ट 0 नागायनमः स्था० पू० । शुभ्रं सोमम् । ॐ सोम ० राजानमिति तापस ऋषिरनुष्टुप्छ- न्दः सोमो देवता सोमावाहने विनियोगः । ऋक्-30 सोम ० राजानमवसेऽग्निमन्वारभामहे । अदित्यां विष्णु र्ट० सूर्य ब्रह्मा- णं च वृहस्पतिम् । ॐ मृ० स्वः सोम इहागच्छेहतिष्ठ 3 सोमायनः स्था० पू० । शुभ्रं मुख्यम् । 30 मानस्तोक इति कुत्स ऋषिर्जगती छन्दो मुख्यो देवता मुख्यावाहने विनियोगः। ऋक् ॐ मानस्तोके तनयेमानऽआयुषिमानो गोपुमानो अश्वेपुरीरिषः मानोवीराद्रभामिनो वधीहविष्मन्तः सदमित्वाहवामहे ३० भू० स्वः मुख्य इहागच्छेहतिष्ट अ मुख्यायनमः स्था० पू०। नीलवर्ण भल्लाटम् । इमान्द्रायेति कुत्स ऋषिर्जगती छन्दो भल्लाटो देवता भल्लाटाचाहने विनियोगः। ऋक्-ॐ इमान्द्रायतवसे कपर्दिनेक्षय द्वीरायप्रभरामहेमतिः। यथा समसद्विपदे चतुष्पदे विश्वं पुष्टंग्रामे अस्मिन्ननातुरम् । ॐ भृ० स्वः भो भल्लाट इहा गच्छेहतिष्ट ॐ भल्लाटायनमः स्था० पू० । श्वेतं शेषम् । ॐ याइपव इति देवश्रवा ऋषिरनुष्टुप्छन्दः शेपो देवता शेपावाहने विनियोगः। ऋक्-30 याइपवोयातु धानानां येवावनस्पत्ती- शरनु । येवाचटेपु शेरतेतेभ्यः सर्पेभ्योनमः । ॐ भृ स्वः शेष इद्दागच्छेहतिष्ट शेपायनमः स्था० पू० । दितिं रक्ताम् । 3.0 हिरण्यरूपा इति वझए ऋपित्रिष्टुप्छन्दो दितिर्देवतादित्यावाहने विनियोगः । अक् हिरण्यरूपाऽउपशो विरोकउभाविन्द्राउ- दियः सूर्यश्च । आरोहतं वमणमित्रगर्त्तन्ततश्चक्षायामपिनि दितिं च मित्नोसि वरुणोसि। 3 भूस्वः दिते इहागच्छेह- तिष्ट दितयेनमः स्था. पू । कृष्णामदितिम् । इटहीति भा कर्मकाण्ड रत्ताकरे, दीमांग वास्तुपूजा पद्धतिः (११) ॐ मण्डलेशम् ॥२शा पिल्लिपिच्छायमापभाज्यं सलवणपायस म् ॐ पिल्लिपिच्छायनमः बालसम्पूज्य भोभोपिल्लिपिच्छममयज मानस्य मण्डलेशम् ॥२६॥ सक्तुसमन्वितं बहुप्रकारानवलिं सत्याय । 30 सत्यायनमः चलिंसम्पूज्यगेभो सत्यममयजमान- स्य ३० मण्डलेशम् ॥२७॥ भृशायमुद्गान्नपूरितापूपं सलवण पायसंभक्तसहितम् । ॐ भृशायनमः वलिंसम्पूज्यभोभोभृश ममयजमानस्य० ॐ मण्डलेशम् ॥२॥ अन्तरिक्षायशर्करामिश्रित सवल्कलधान्यंदुग्धंच । 30 आकाशायनमः सम्पूज्यभो २ श्राका- शममयजमानस्य ॐ मण्डलेशम् ॥२६॥ शर्करामध्वाज्यपफान्न चलिमग्नये ॐ अग्नयेनमः वलिंसम्पूज्यभो अग्ने ममयजमानस्य मण्डलेशम् ॥३०॥ पृष्णेसशर्कर गोधमपिष्टदुग्धसाधितम् . पृष्णेनमः सं.) भो २ पूपन ममयजमानस्य ॐ मंडलेशम्। ॥३१॥ हरिद्रासहितंदधिवितधाय। 30 वितथायनमः वलिंसंक भो २दितथममयजमास्य ॐ मण्डलेशम् ॥३२॥ यमायमधु- भक्तवलिम् । ॐ यमायनमो वलिंसं भो २ यमममयजमानस्य ॐ मण्डलेशम० ॥३॥ गृहरक्षकाय नवनीतौदनम् । ॐ गृहरक्ष- कायनमः सं० भो २ गृहरक्षक ममयजमानस्य 30 मण्डले शम् १३४॥ गन्धर्वायसफल घृतपक्वान्नम् ॐ गन्धर्वायनमः सम्पूज्य भो २ गन्धर्व ममयजमानस्य 30 मण्डलेशम् ॥३५॥ भृगराजायमेपजिदयाकृति पूरिकांपड्रषचर्चितं भक्तम् । भृङ्गराजायनमो बलिं सम्पूज्य भोभोभृगराज ममयजमानस्य० मण्डलेशम् ॥३६॥ मृगाय तिलाज्यगन्धम् ॐ मृगायनमः स० भाभा मृग यजमानस्य अ मण्डलेशम् ॥३७॥ दौवारि- काय सचन्दनागरुपिष्ठम् । ॐ दौवारिकायनमो वलिं स० भो दौवारिकममयजमानस्य 30 मण्डलेशम् ॥३८॥ सुग्रीवाय अपूपाज्य सितादुग्धं दन्तकाष्ट समन्विम् । मुग्रीवाय नमो वलिं स० भो सुग्रीव मम यजमानस्य 30 मण्डलेशम् ||३४|| वरु- पाय सपद्मपुष्प कुशपकान्नम्। 30 वरुणायनमः स० भो वरुण ( १२०) कर्मकाण्ड रताकरे, दीक्षांग घास्तुपूजा पद्धति मम यजमानस्य० 30 मण्डलेशम् ॥४०॥ पुष्पदन्तायपायसान्नं सपुष्पगन्धाज्यम् । ॐ पुष्पदन्तायनमो वलिं स० भो पुष्पदन्त मम यजमानस्य° 0 मण्डलेशम् ॥४१॥ असुराय यव सक्तुकं- सलवण दुग्धं भक्तम् । 30 असुरायनमो वलिं स० भो असुर मम यजमानस्य० ॐ मण्डले० ॥४२॥ पापाययवचूर्णाज्यदुग्ध बलिम् । ॐ पापायनमः स भी पाप मम यजमानस्य० 30 मण्डले० ॥४३॥ रोगाय घृतमोदकयुतं लाजावलिम् । ॐ रोगाय नमो बलिं स० भो रोग मम यजमानस्य० मण्डलेश ॥४४॥ पितृभ्यो मधुसर्पिः पायसान्नम् । ॐ पितृभ्योनमो वलिं स० भो पितरोममयजमानस्य० मण्डलेशम्॥४॥वायवे घृत पायस म् । ॐ वायवे नमो वलिं स० वायो मम यजमानस्य० मण्डलेशम् ॥४६॥ मधुघृतदुग्धयुतं शालि पिष्टं नागाय ॐ ना- गाय नमः वलिं स० नाग मम यजमानस्य० मण्डलेशम्० ॥४७॥ सोमायमधुयुतंदुग्धं दध्यौदनं च । 30 सोमायनमो वलिं यजमानस्य० मण्डलेशम ॥४८॥ मुख्याय पायसौदनम् । ॐ मुख्याय नमो वलिं स० मुख्य मम यजमानस्य 30 मण्डलेशम् ॥४६॥ भल्लाटायसपायसं मुद्गसू- पौदनम् । ॐ भल्लाटायनमः स० भल्लाटमम यजमानस्य० ॐ मण्डलेशम् ॥५०॥ शेषाय कपूरैलाविमिश्रितघृतौदनम् ॥ 30 शेपाय नमो वलि सम्पूज्य शेष मम यजमानस्य अम० ॥५१॥ वित्तये क्षीराज्ययुतां पोलिकाम् ॐ दितये नमः स० दिते मम यजमानस्य 30 मण्डलेशम् ॥५२॥ अदितये घृताक्त शर्करापोलि- काम 30 अदितये नमो वलिं स० अदिते मम यजमानस्य° 0 मण्डलेशम् ततोवास्तु पुस्पाय नानापक्वानन्न सहितं छागाकृति पोलिकाम् आ वास्तवे नमः वलिं स० पुरग्रामप्रसादाधिप भग- बम् वास्तोर्मम तजमानस्य सकुटुम्वस्यायुः कर्ताक्षेमकर्ता नुष्टिदः पुष्टिदोभव ७ मण्डलेशं प्रयत्नामि तुभ्यं भक्त्या निवेदितम् ॥ एमं वलिंसदीपंच गृहाणपरमेश्वर ॥ ततो वास्तुपुम्पाय सफला- 3. स० सोम सम 'फर्मफाएड रसाकर, दीक्षांग यास्तुपूजापतिः (११७ ) द्रव्यं यत्कपिलोवितम् ।। सर्वं विधिवद्देयः कुशपुष्पफलानतः। दधि तण्डुलमापान्नैर्यद्वादेयो वलिवुधैः ।। अथ वलिदान प्रकार ब्राह्मणस्तु पूर्वोक्त कथनानुसारेण वास्तु भद्रस्थ देवताभ्यो घृत पायसवलिं दद्यात् । आचम्य-~~-30 नमः परमात्मने इत्यादि देश कालो संकीर्त्यामुकोऽहम्ममयजमानस्य चा सपुत्र परिवारस्या युरारोग्याभिवृद्धिपूर्वकं सर्वोपद्रवशान्त्यर्थ निर्विघ्नतया मुकपुत्र- स्यदीक्षा सम्पादनार्थ ब्रह्मादि वास्तुपर्यन्त चतुःपंचा शद्देवानां प्रीतये तेभ्यः पायसेनमापान्नेन वा बलिदान करिष्ये । तत्रादौ ब्रह्मणेपायसम् । बलि सम्पूज्य नदुपरि दी प्रज्वाल्य ब्रह्मणे नमः इति मंत्रमुचार्य हस्तेजलं गृहीत्वा भी ब्रह्मन् ममयजमानस्य सकुटम्बस्यायुः कर्ता क्षेम कर्ता तुष्ठिदः पुष्टिदोभय ॥ . भण्डलेशंप्रवक्षामितुभ्यंभक्त्यानिवेदितम् । एनंवलिंसदीपंचगृहाण परमेश्वरः । इतिवल्युपरिजलं क्षिसावे द्यपरि ब्रह्मणः पदेन्यसेत् । एवं सर्वत्रवोध्यम् । ततोकर्पूरचन्दनयुतं पायसंविवस्वते . विवस्वतेनमः सम्पूज्यभो भोविवस्वन् ममयजमानस्यसपरिवा- रस्य. 30 मण्डलेशं ॥२॥ महीधरायमापौदनम् ||३|| 30 मही- धरायनमः सम्पूज्यभोभोमहीधरममयजमानस्य सकुटुम्बस्य० । ॐ मण्डलेशं । ततोमित्रायपुष्पसहितंपायसम् । 30 मित्रायनमः सम्पूज्यभोभोमित्रममयज. सकुटुम्बस्य० 301 30 मण्डलेश ॥४॥ सावित्रायकपूरपुष्पकुशयुतजलम् । ॐ सावित्रायनमः सम्पूज्य भोभोसावित्र ! ममयजमानस्य । ॐ मण्डलेशं ॥शा सवित्रेसगन्धरक्तभक्तं रक्तपुष्पयुत्तम् । ॐ सवित्रेनमः सं० भोभोसवितोममयजमानस्य मण्डलेशं० ॥६॥ इन्द्रायपुष्पकुंकु- मसंयुक्तंपायसम् । ॐ इन्द्रायनमः वलिंसम्पू० भोभोइन्द्रमम- यजमानस्थ० मण्डलेशं ॥७॥ शक्रायसवृतमाषभक्तं सवस्त्रम् ॐ शक्रायनमः सम्पू० ॐ भोभो शक्रममयजमानस्यमण्डलेशं ।।। जयायपिटवस्त्रयुतंसगन्धम् । जयायनमः सं० भोभो जयमम- यजमानस्य० मण्डलेशं । ततोरुद्रायसलवणपायसं वस्त्रंच ॐ ११८ कर्मकाण्ड रनाकर, दीक्षांग वास्तुपूजा पद्धतिः मद्रायनमः । वलिंसम्पूज्य भोभोम्द्रममयजमानस्य० मण्डलेशं ॥१०॥ जयन्तायवृतौदनम् । ॐ जयन्तायनमः सम्पू॥ भोभो जयन्तममयजमानस्थ० मण्डलेश ॥१॥ श्रद्भ्योमधुपुष्पयुतक्षीरम् ॐ अद्भ्योनमः सम्पू० भोभोप्रापमम यजमानस्य० मण्डलेशं ॥१२॥ मापवत्सायगुटदध्योदनम् । ३॥ आपवत्साय नमः सम्पू- ज्यभोभोप्रापयत्सममयजमान मण्डलेश ॥१. शर्वायदध्योदन सरक्तपुष्पम् । ॐ शर्वायनमः सम्पूज्यभोभो शर्वममयजमानस्य मण्डलेशं ॥१४॥ सलवणक्षीरंभापान्नंस्कन्दाय । स्कन्दायनमः सम्पूज्यभोभोस्कन्दममयजमानस्य मण्डलेश ॥१॥ अर्यम्णे- सलवणपायसापकं कृसरान्नम् । ॐ अर्यम्णेनमः वलिंसम्पू- ज्यभोभो अर्यमन्ममयजमानस्य० ॐ मण्डलेशं ॥१॥ जम्भ- कायमत्स्याकृति पोलिकांसलवणपायसाम् ॐ जम्भकायनमः सम्पूज्य भोभोजृम्भक ममयजमानस्य 30 मण्डलेशं ॥१७॥ चरफ्यैसघृतलवणपायसम् । ॐ चरक्यैनमः वलिसम्पूज्य भोभो चरके ममयजमानम्य० ॐ मण्डलेशं ॥१०॥ विदाय्यसलवण पायसंसिन्दरयुक्तम् । ॐ विदायनमः सम्पूज्य० भोभोविदारि ममयजमानस्य ॐ मण्डलेशं ॥१६॥ पूतनायैसलमाषान्नदधि- भक्त चलिम् । ॐ पूतनायैनमः वलिंसम्पूज्य भोभोपूतनेममयज मानस्य० ॐ मण्डलेशं० ॥२०॥ पापराक्षसिकायै सलवणपायसो परिमत्स्याकृति पोलिकांसलवणदुग्धञ्च । पापराक्षिकायनमः चलिंसम्पूज्य भोभोपापरानसिकेममयजमानस्य ॐ मण्डलेशं० १२१॥ईशानायसदुग्धभक्तवलिम् । ॐ ईशानायनमः सम्पज्य भोभोईशानममयजमानस्य. ॐ मण्डलेशं० ॥२३॥ पर्जन्याय तण्डुललाजासहितंघृतपक्कानम् । ॐ पर्जन्यायनमः वलिंसम्पूज्य भोभोपर्जन्यममयजमानस्य० 0 मण्टलेशम् ॥२६॥ शिग्विने- तपक्कानवलिम् । शिखिनेनमः सम्पूज्यभोभोशिग्विन् ममयजमा- नस्य. ॐ मण्डलेशम्णा२४॥ वीभत्सायछागकर्णाकृतिपोलिकाम ॐ वीभत्सायनमः वलिंसम्पूज्यभोभोवीभत्स ममयजमानस्य कर्मकाराष्ट्र रताकरे, दीमांग वास्तुपूजा पद्धतिः ( १२१ ) र्घदानम् । 3. इदंफलंगयादत्तस्थापितं पुरतस्तवतेनमेसफलावाप्ति मवेजन्मनिजन्मनि । क्षेत्रपालपूजाविधानम् स्तम्भपूजामयोगे लिखितम् । तदनुसारेण क्षेत्रपालाय वलिंदद्यात् । तत उत्तराङ्ग पूजनंविधायप्रार्थयेत् । पुष्पंगृहीत्या मंत्रहीनंक्रियाहीनं श्रद्रा- भक्तिविवर्जितम् । तत्सर्वपरिपूर्णस्यात् वास्तोतवप्रसादतः । नमस्तेवास्तुपुरुपनमस्ते देवसम्मव । पुत्रपौत्रं धनंदेहि सर्वाङ्कामा श्वदेहिमे । ततो हस्तेपुष्पाक्षतान्गृहीत्वादिसर्जयेत् ।। 3. उत्तिष्ट ब्रह्मणस्पतेदेवयन्तस्त्वे महेउपप्रयन्तु सस्तासुदानव इन्द्रप्राशूभवा सुचा । ततः कलशाभिषेकादिकंयजमानस्यकृत्वादेव निर्माल्यं ब्राह्मणोदद्यात् ॥ इति दीक्षाङ्ग वास्तुभद्रपूजापद्धतिर्वलिदान प्रयोगसहिता। --:SSSSSSS:-~- अथ दीक्षांग वास्तु होमे नाममंत्र पध्दतिः । ॐ ब्रह्मणेनमः स्वाहा । ॐ विवस्वतेनमः स्वाहा । ॐ मित्रा यनमः स्वाहा । ॐ महीधरायनमः स्वा० { 30 सावित्रायनमः । ॐ सवित्रेनमः . ॐ शकायनमः 01 30 इन्द्रायनमः स्वाहा । ॐ जयायनमः । ॐ रुद्रायनमः । ॐ जयन्तायः । ॐ अभ्योनमः । ॐ आपवत्सायनमः । ॐ शायनमः स्वाहा । आस्कंदायनमः । ॐ अयम्णेनमः । ॐ जूंभकायनमः । ॐचरक्यनमः 01 विदायनमः । ॐ पूतनायैनमः स्वाहा । ॐ पापराक्षसिकायै नमः। ॐ ईशानायनमः । ॐ पर्जन्या- 'यनमः । ॐ शिखिनेनमः । ॐ वीभत्सायनमः स्वाहा । पिलिपिच्छायनमः । ॐ सत्यायनमः । ॐ भृशायनमः । अन्तरिक्षायनमः । ॐ अग्नयेनम: । ॐ पूष्णेनमः स्वाहा । ॐ वित्तथायनमः। ॐ यमायनम:01 ॐ गृहरक्षाकरायनमः । ॐ गंधर्वायनमः । ॐ भृङ्गराजायनमः स्वाहा । ॐ मृगाय- (१२२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, फुशफागिएका सत्र व्याख्या नमः । ॐ दौवारिकायनमः। 30 सुग्रीवायनमः म्वाहा । 30 वरुणायनमा | ॐ पुष्पदन्नायनमः । ॐ असुरायनमः । ॐ पापायनमः। 30 रोगायनमः । ॐ पितृभ्योनमः स्वाहा । ॐ वायवेनमः । ॐ नागायनमः स्वाहा । ॐ सोमायनमः । ॐ मुख्यायनम: 00भल्लाटायनमः स्वाहा । ॐ शेषायनमः। *दित्यनमः। ॐ अदित्यैनमः स्वाहा । ॐ वास्तुपुरुषायनमः स्वाहा ॥ (वास्तोष्पते होम गृहवास्तु पध्दत्युक्त प्रकारेण बिल्वपंचक होमं च कुर्यात् ॥) इति दीक्षांगवास्तु होम पध्दतिः। 然 कुश कंडिका सूत्रव्याख्या। अथ कुशकंडिका सूत्रव्याख्यां वक्ष्ये-(अथातो गृह्यस्थालोपाकानां कर्म !११) अप धौतकर्म विधानानन्तरंयत श्रौतानिक्माणि विहितानि स्मातानितु विधेयानि, श्रतोदेवी गये प्रायसम्यग्नी येस्थालीपाका तैयौगृहस्थालम्पाकानाकर्म क्रियानुष्ठानमितियावत पदयते, इति सूत्रेशेष । तत्रादायाधानादि सर्वकर्मसाधारणोविधि , प्रथमकडियोच्यते । तत्रयो भावमयाधानादिषु सर्वकर्मसुयजमान एवकता । नान्यऋत्वितस्या नुक्तत्वात् । अथयजमान सुस्लात' सुप्रक्षालित पाणिपाद स्वाचान्त कर्मस्थानमागत्य यारणादि यशियवृक्षो भवासमें प्रागमा नुदगमान्यात्रीकुशानपसार्य, प्रामुखउपविश्य याग्यत शुभ्यायोभूमी सप्तविशत्यंगुलं मरलंपरिलिख्य, इतिहरिहर ॥ अत्रकुंडमान सूत्रकारेण नोकम्, मयानधान्तरेभ्य समहौतम वशिष्ट सहितायाम-अनेकदोषद कुंडमत्रन्यूनाधिकयदि । तस्मात्सम्यक्परीक्ष्यैय कर्तव्य शुभमिच्छता । क्रियासार-न्यूनाधिक प्रमाणय स्कुईकुर्युरमेखलम् । श्रृंगाररहितंयच्च यज- मान विनाशकृत् ॥ कुडमंडप निर्माणार्थ भूमि शोधनं बास्तुशास्त्रे-देशसंभावितेप्रारिष धिवदिहसा संविधायाभूमि । संपूज्यात्रैवमध्ये विरचितवलये रोपयेत्साग्रशकुम् ॥ तच्छाया पंचयस्मि न्विशतिचक्लये यांतियस्माच्च देशात् । तौप्रसपूर्वदेशौ तदनुगतगुण प्राग्गुण ऽसौप्रदिष्ठ । कर्मपर स्खेनैककु डस्य विधानम्-एककुंडशुभदं मध्येशान्तौअपांग हवनेषु भारभ्पकादशिनी लधुमहदति रुद्रवविधौ ॥ शान्तिस्तम्भन सिध्दिभद्रयशसा कृत्येतुपैदासक, कर्मकाण्ड रक्षाकरे, कुशकरिडका सूत्र व्याण्या (१२५) भौगाकर्षणपुत्रकृद्भगमयी वश्येचशान्तीमतौ ॥ अर्धन्दाममधारिनाशान निधौद्वेषतथाकर्षण, व्यग्निस्यादय वश्यपुष्टिकरणे सम्पतिशान्योतिः ॥ शत्रुच्चाटनमारणादिविषयस्यात्स्तंभमेगा- सर्फ पपुष्टिधनागमा गदद्वश्यार्थ मानप्रदम् । साप्तीच तथागजसमपितधोगार्थमुशि- - प्रदं, सम्पद्कृदगुरुकुण्ड मत्रतुशराप्तिस्याश्च भूतादिहत ।। वर्णपरत्वेन कुराकतिमान शारदातिलफे---विप्राणांचतुरसंस्था द्राज्ञवर्तुलमिष्यते । वैश्यानामर्धचन्द्राभं राहाणांश्यसमी- रितम् । नारदपञ्चरा-चतुरसंतुसपा केचिदिच्छन्ति सूरयः सनमारसंहितायाम् -- स्रोणाकुण्डानिविप्रेन्द्र योन्याकाराणिकारयेदिति । येदिकायांमेखलात्याज्या-वशिष्ठसंहिता याम-नयादांगुलत्यक्त्या वेदिकायाश्चतुर्दिशं । क्रियासारे त्यक्त्यावेदिचतुर्भाग कुराहानि नवपश्चना । हामानुसारण कुण्डमा शारदातिलके-एकहस्तमितंकुगट लदहोमविधीयते लक्षागादशकंयावत्ता बदस्तनवद्धयेत । भविष्य विशेष.-मुष्टिमात्रंशताद्धस्याच्छतेचारनि- मानकम् । महत्वथहीतव्ये कुण्डं कुर्यात्करात्मकम् । द्विहस्तमयुतंत पालनहोमचतुःकरम् । दशलक्षमितहोमे पटकरंसम्प्रचक्षते । अष्टहस्तात्मकंकुराई कोटिहोमतुनाधिकम् । कुण्डरताव- ल्याम्यन्मण्डपेयत्करकुण्डमिष्ठं ज्ञात्वेचकुण्डादिकमारभत । न्यूनथकुराईप्यधिकोविधयां न्यूनोनह मिस्त्वधिकप्रशस्त । अत्रकुण्डस्थंडिलव्यवस्थातु होमद्रव्यस्याधिकसूचममानासुधीभिः स्वबुध्यैवकायांविशेषः कुगडनिमाणपन्धेपुद्रष्टच्य. ॥ मंडपरचनामाह नारदपञ्चरात्रे शुद्धाभित्तिकाभिश्च बालुभिधमिते शुमे । सपादहस्तमानन स्थंडिलंपरिकल्पयम् ॥ चतुरस्त्रं समन्ताच चतुरंगुलमुछितम् सभेखलंटिलन्तु प्रशस्तहोमकर्मणि !! कण्ठन्तुवर्जयेशनरवाते कराठः प्रकीर्तितः । अन्यायतनधर्माहि यतस्तमेखलादयाः । चौधायन-कुराइवन्मेखला कृत्या योनिकृत्वातत परम् । मेखलारहितहोम. शोक प्रद. श्रुतीरितः मेखलाकण्ठयोन्यादीनी व्यवस्थागृह्मागप्रकरणेवक्ष्यामि ॥ एवंविधिनाकुण्डं स्थण्डिलबनिमाय । ( परिसमुन्ध । २) त्रिभिद: पासनपसार्य. सच्चसामात्पस्विपसारणयोग्य दर्भादिभियावस्चिपसारणेभवति तारकार्य ॥ एकनदर्भणवारनयमितिकारिकाकारः अनन्तः-~~तत्साधनान्तरानुक्त बास्त नवपरिममूहनकुर्यात ॥ ( उपलिप्य । ३ 1 ) उपलेपनं भूमरुद्वर्त्तनंतचगोमयेन, स्थण्डिलवाकु- महंगीमगनीपलिप्यते ॥ मंत्रायणिगृह्या दिदमपिवारत्रयंभवतीतिर्वचित् । ( उलिस्य । ४) त्रि. सादिरणहस्तमात्रेण खताकृतिनास्पयनहित्य, प्रागप्रा. उदक्मंस्था. स्थण्डिलपरिमाणा स्तिखोरेखा कृत्वा, बर्द्धमानमतेन-पश्चवारेखा.~ स्थगडिलोल्लखनं कुर्यात्लुवंगचकुसनच ॥ (उदृत्य । ५.) अनामिकागुष्ठाभ्या यथोलिखितोलखाभ्यः पांशनुध्दृत्य, (श्रभ्युदय ।) मणिकाद्भिरभिषिच्य । गङ्गादितीर्थभूतेन वार्यपात्रणबारिणा । मणिकासंचनान्युजहस्ता पुनः युन. ॥ वद्धमान -~-उत्ताननतुहस्तेन प्रोक्षणंगमुदाहतम् । तिरश्चानोक्षणीक नीचेना , (१२४ . कर्मकाण्ड रताकरे, कुशकण्डिका सूत्र व्याख्या .. 'भ्युक्षणस्मृतम् । दैवेपरिसमूहनादित्रिनि: पित्र्येसकृत्सकृत-इति कोपाध्यायः ॥ एतेपञ्चभूसं स्काराः, इतिभर्तृयज्ञः अग्न्याः इतिकर्कः तेनयत्रयत्राग्ने: स्थापनंतत्रतत्रैतेकत्तव्याः एषएवविधि यंत्रक्वचिद्धोमः इतिहरिहरः । (अग्निमुपसमाधाय । ७।) कर्मसाधनभूतं लौकिकस्मात श्रोतवाग्नि आत्माभिमुखंस्थापयित्वा ॥ मेरुतंत्रे-पात्रान्तरेणपिहिते ताम्रपानादिकेशुभे । अग्निप्रणयनं कुर्योच्छरावे वाथनूतने ॥ इतिपारस्कगचार्य मतेनाग्निस्थापननिधिः ॥ देवीपुराणादिपुतु समन्त्रको विधि:-नारायणउवाच-ततः कुण्डस्यसंस्कार स्थण्डिलस्य चवामुने । प्रवक्ष्यामिसमासेन यथाविधिविधानतः । वेदोक्तनविधानेन कुर्याद्भपञ्चसं- स्कृतिम् । समूहनंकुशः कुर्या त्यदेवादेवहेडनात् । मानस्तोकेनमन्त्रेण गोमयेनोपलेपयेत् ।। त्यांवृत्रेष्विन्द्रमन्त्रेण त्रिसोरेखाविलेखयेत् । पांसूनुध्दृत्यलेखानां व्रजङ्गच्छेतिमन्त्रतः। अद्भिर भ्युक्षणकुर्याद्देवस्यत्वेतिमन्त्रतः । त्रिकोणवृत्तपट्कोणं साष्टपत्रं सुभूपुरम् । यंत्रम्विभावयेद्वन्हे: कुण्डेवास्थंडिलेशुभे । तत. संस्थापये द्वन्हि अग्निर्मूध्दति मन्त्रतः । संस्थाप्यवन्हिवीज मुच्चार्यतदनंतरम् । समिधाग्निदुमन्त्रेण समिदा-धानमाचरेत , अग्निसन्धुक्षणकर्यात्मयिगृहामि मन्यत: । वा-चित्पिङ्गलहनदहपचयुग्मंततः परमस्वाहा । या सर्वज्ञाज्ञापयस्वाहा, इति मन्त्रेणवा कर्मभेदेनाग्निनामान्याह वाचस्पति:- लौकिकेपावकोयन्हिः प्रथमःप्रकीतित: अग्निस्तुमा रुतोनामा गर्भाधानेप्रकीर्तितः पुन्सवेचमसोनाम शोमनःशुभकर्मसु । सीमन्तेमालोनाम प्रगल्भो जातकर्मणि ॥ पार्थिवोनामकरणे प्राशनेऽनस्यवैशुचिः । सभ्यनामातुचूड़ायां व्रतादेशे समुद्भवः । पुरातनपद्धतिपु प्रक्षिप्तोऽर्द्ध:-व्रतमध्ये हरिनाम व्रतान्तराजपुत्रकः ॥ गोदाने सूर्यना- मास्या द्विवाहे योजकःस्मृतः॥ वाचस्पति मतंतु-- गौदाने सूर्यनामास्या केशान्तेयाजकः स्मृतः। पैश्वानरोविसर्गस्या द्विवाहे बलदस्मृतः । चतुर्थीकर्मणिशिसीधृति रग्निस्तथापरे । श्रावसभ्यस्तथा धाने वैश्वदेवेतुपावकः । ब्रह्माग्निगाहपत्येस्या दक्षिणाग्निस्तथे श्यरः । विष्णुराहवनीयेस्या दग्निहोत्रयोमताः । लक्षहामेऽमीठदस्या कोटिहोंमें महाशनः । एकेघृताचि प्राहुरग्निव्यानप्ररायणाः । रुद्रादौतुमडोनाम शान्ति शुभकृत्तथा । कचित्-शान्तिके वरदः प्रोक्तः पौष्टिके वल यर्द्धनः । पूर्णाहुत्यां मृडोनाम झोधाग्निधा- मिचारक । प्रायश्चित्ते विटश्चैव पाकयनेषु पायकः । दयानां हव्यवाहश्च पित्त्राणां कान्य पाहनः । वश्यार्थकामदोनाम पनदाहंतु दूषकः । कुक्षौतु जाठरोनाम मन्यादो शपदाहगे। पन्हिनामा लतहोमे कोटि होम हुताशनः । वृपोत्सर्गऽध्यरोनाम शुचये ब्राह्मणस्मृतः। गमुदवाइया. निचक्षयसम्पत्तकस्वमा । विष्णुराहनीयः स्यादमिहान प्रयोऽमयः । शायरममिनामानि ततः पूजन मारभत ॥ (सूत्रकारसामिपूजनं नसत्रितं परमपद्धतिकार, गर्पन यमादिए पूजनं जिद्वानाच पूजन मुक्तम् । कस्मिचिन्म पुरातन पद्धति साहनिहोगान्न पन्दिपूजन कर्मकाण्डरलायरे, कुशकण्डिका सूत्र व्याख्या मुक्त क्वचिन्नवाहुति होमान्ते लिखितं, परथ सर्व कर्मादौ ध्यान पूजनादिकंभवति अग्निध्यान---- अनि प्रज्वलितंपन्देति, ध्यागादग्ने पूजन समित्प्रक्षेपानी समीचीनमतम् ॥ ) अनाचार्य परणत्यवायश्यकतास्ति, प्रनयु मंगु वैदयोगादिति, सर्व कर्मम अप्पयों कतरयम् । पादशौचार्घ पनाये राचार्यादीरामया । परथ हरिहरादिभिर्यजमानस्यैव कत्तत्व मुर परथ यजमानस्य कत्तत्वपि पुस्तकाचार्यस्य चरण करणे कापिततिनास्तीति शास्त्र सम्मतिः । (दक्षिणती ब्रहामनमास्तीर्य ८ ) सस्याऽग्ने सन्मुखस्थापितम्याग्नेर्दक्षिणस्या दिशि ब्रह्मणे श्रासनं वारणादि यक्षियदार निर्मितं पीठमास्तोर्ग कुशैराडाद्य, तत्र परणाभरणाभ्यां पूर्वसम्पादित कर्मसु तत्व ब्राह्मण तदभाव-कुशमयो ब्रह्मा इतिकर्क -- पचाशता भद्ब्रह्मा तदर्धनतुधि घर: । इति पञ्चाशत्कुशनिमित ब्रह्माणमग्नेरत्तरत प्रामुसमागीन स्वयमुदंमुस यागीमोऽनु- लंपन पुष्पमाल्य परालकारादिभि मम्पूज्य, अमुक्शमाह करिथ्य । तत्रामुक गोत्रामुक प्रवरत्वं ब्रह्माभवतिवृत्या, भवानि इत्युक्तवन्तमुपरश्य, अग्निहा- यमा वैवश्यतां राजा दक्षिणस्या निरस्यते । तस्मात्सरक्षणार्थाय ब्रह्मातिराति दक्षिणे ।। (अगोयड) अप इतिगेय । अग्निध-ब्रह्माचार्य प्रणीतानामाशन च निभि कुश ॥ नद्वाभ्यामकदर्भण प्रवन्ति भाषीश्वरा ॥ पात्राणा स्थापन क्या दुत्तरे यज्ञ कर्मणि । तद्यथा- 'अग्नरुत्तरत यागम- स्त्रिभि कुशैरासनद्वय कल्पयित्वा धारण द्वादशागुलदोघं चतुरंगुल विस्तार चतुरंगुलमध्यखातं चमस सव्यहस्तकृत्वा दक्षिणरस्तावृत पानस्थोदकेन-पूरयित्वा पश्चिमासने निधायऽऽलभ्य पूर्वासने स्थापयित्या कारिकागा पश्चादुत्तरतो वास्यात्पात्रासादन मग्नित । उत्तरचेदु- दरस्थ प्राममाया, पश्चिममवत, । एलजपिएलम्यान सम्भव शसम्भवतः-कात्यायन- प्रचिंपांच मुदगग्नेर दगग्र समापन । (परिस्तीय, १० ) अग्नि बहिर्मुष्ठिमादाय, ईशानादि प्रागवहिभिरुदक्सस्थमग्ने परिस्तरण कृत्वा ] अग्निगृहो-वन्हित स्तुपरित्यज्य द्वादशा- गुलतोयहि । परिस्तरण दर्भास्तु पाडशा द्वादशापिवा । ( अर्थवदासाय,.११) यावद्धि पदाथरथ. प्रयोजन तापत पदार्यान् द्वद्व प्राक्सस्थानुदगग्रानग्नेरुत्तरत पश्चाद्वा आसाद्य,, क्रुशाभाचे कार्तीयम्भून भाषे मुशाभावतुमाशा स्यु काशा कुशसमारता । काशाभाये गृहीतव्या अन्यदा यथाचिता । कुशाफाशा शरादुर्वायवगोधूमवल्याजा । सुवर्णराजलतामे दशदर्भा प्रकीर्तिता ! कारिकायाम-श्रामादयतिपात्राणि प्रदेशेवरवेयुध । व्यगुलान्तरमानन पानापानान्तरस्थिति । तद्यथा-पवित्र उदनानि नोणिकुशतरुणानि । पविनेसाने अनन्त- गर्भ द्वेशतरुणे । (प्राक्षणीपात्र वारण द्वादशांगुलदीर्घ करतल सम्भितसात पद्मपत्राकृति कमलमुसलाकृति वा । श्राज्यस्थालो तैजसो मृगमयोपा द्वादशांगुल विशाला प्रादेशोचा, तथैव चरुस्थालो, सम्मागे शास्रय, उपयमनक्शानिप्रभृतय पञ्चमप्तवा । समिस्तिस्त्र - - (१२६) फर्मकाण्ड रत्नाकरे, कुशकरिडका सूत्र व्याख्या . पालाश्य प्रादेशमात्र्य , सुव' खादिरोहस्तमोगुष्ट पर्वमात्रखात परिणाह वर्तुल पुष्करः । श्राज्यंगव्यम् चरुश्चेबोहि तण्डुलाः । पटपश्चाशदधिक मुठिशतद्वयपरिमितं पराय॑ पहु- भोवतृपुरुषाहार परिमितमपराय तण्डलायन्न पूर्णपात्रं दक्षिणावरोया यथाशक्ति हिरण्यादि दव्यम् । (पवित्रेकृत्वा १२) प्रथमं विभि. कुशतरुणैरप्रत. प्रादेशमात्रं विहाय, द्वेकुशत- रुणे प्रछिद्य, कुशपवित्र प्रमाणं कुशकण्डिाका भाष्ये-ब्रह्मयज्ञे गोकर्ण प्रमाणौता दर्भो, तर्यले- हस्त प्रमाणास्त्रयांदर्भा | गोकर्णप्रमाणम्---प्रादेशतालगोकर्णास्तर्जन्या- दियुतेतते । अंगुष्ठे मकनिष्ठस्या द्विस्तिद्वादशांगुल इत्यमरः ॥ मार्कण्डेयः-चतुभिदर्भ पिंजूलैाह्मणस्य पवित्रकम् । एकैकन्यूनमुद्दिष्टं वणे वर्ण यथाक्रमम् ॥ सपवित्रेण हस्तेन कुर्यादाचमन क्रियाम ॥ नोच्छिन तत्पवित्रंतु भुक्तांच्छितु यजयंत ॥ बौधायन:--हस्तयोरु- भयो द्वौंद्वावासनेऽपि तथैवच । शेष कर्मयोधिनी परिभाषायां द्रष्टव्य ॥ प्रयोगपारिजाते- • उत्तरीयं योगपटं तर्जन्याच पवित्रकम् ।। नजीविपितृकार्य ज्येष्ठोवाविद्यतयादि । (प्रोक्षणी: संस्कृत्य । १३ ) प्रोक्षणीपानं वारणं वारण काठ निर्मितं द्वादशागुल दीर्घ करतल समित खातं कमल मुकुलाकृतिर्भवति, इतिहरिर ॥ यज्ञश्व संग्रह कारिकायाम्-कंकतं पाणिमात्रं प्रोक्षणी पात्रमुच्यते । हंसमुस प्रसेकं च त्वग्विलं चतुरंगुलं ॥ कंकतानि निद- तीनि वारणानिभवन्तिहि ॥ प्रणीतोदकमासिच्य पवित्राभ्यामुत्पूय पवित्रे प्रोक्षणी पात्र निधाय दक्षिण हस्तेन प्रोक्षणी पान मुथाप्य सव्यंकृत्वा तदुदकंदक्षिणा नामिकागुष्ठाभ्यां सविनाभ्यामुञ्चाल्य प्रणीतोदयेन सम्प्रोक्ष्य ( अर्थवत्माक्ष्य, १४ ) अर्थवन्ति प्रयोजनयन्ति, आज्यस्थाल्यादीनि पूर्णपात्र पर्यन्तानि प्रोक्षण्य द्भिरासादनक्रमणककश प्रोक्ष्य,, असश्चरे प्रणीतान्योरन्तराल प्रोक्षणीपात्र निदध्यात् । अग्निगृह्मऽपि-निदध्यात्यक्षिणी पात्रं सप- विनमसश्चरे । यदन्तरं प्रणीतान्योरमञ्चरस्तु सस्मृत ॥ (निरूप्याग्य. १५) प्रासादित मान्यं आज्यस्थाल्या पश्चादग्ने निहितायां प्रक्षिप्य । श्राज्यंगव्यमिति हरिहरादयः । कात्यायन:-- घृतमाय लिंगादिति, तच्च गमिति । महीनागयो पयाऽगि इतिमन्त्र लिंगात ॥ गव्य वृताऽमा प्रतिनिधिमाह मण्डनमिश्र. :-गवाज्या भावतश्छगी महिण्यादघृतंक्रमात । तदभाव गयादीनो क्रमाद्दुग्धं विधीयते । तदभार दधिग्राह्य मलामत लमिप्यते । योधाय नः--घृताभावतु तलस्यात्तदभावंतु जातिलम् । तदभात्र च कौमुभन्तदभार च सापपम् ॥ प्राज्यस्थाली लक्षणम्--भाज्यस्थालीतु कर्तव्या तजमद्रव्य सम्भवा । माहेयीयापिकतम्या नित्यं सर्वाग्निकर्मसु । आज्यस्थाल्या प्रमाणं च यथावामन्तु कारयंत । द्वादशांगुल विम्तीण) भादशीच्याच्या शुभा ॥ चरस्थाली लक्षणम् श्राग्यस्थालो समाना चरस्थालो प्रशस्यते । यशपाय-मृगमयोदुम्ररीयापी चरस्थाली प्रशस्यते । तीयगुपं गमिन्माप्रा दातान कर्मकाण्ड रताकर, युशकगिडका सत्र व्याख्या (१२७) बृहन्मुखी। तक्ष्य हस्तघटित स्थाल्यादि रालुदघकम चरचरस्थाल्यो नणीतादक मासिंच्य आसादितान्ताण्डुलान्प्रक्षिप्य II( अधिश्रित्य च १६) तनाज्य ब्रह्माधियति, तदुत्तरत स्वयमाचार्यश्वरमम युगपदमावाराप्य (पर्यग्गियुर्यात् १७) ग्यलदुल्मुक समान्ता दाज्य चारपर्यत्रिी प्रदक्षिणक्रमण भ्रामया । (मुच प्रताय मम्रज्याभ्युदय पुन प्रतप्य निध्यात् । १८) दक्षिणहस्तेन भुयमादाय प्राऽनमधामुसमग्नौ तापयित्या सव्यपाणी- कृरया दक्षिणेन मम्माप्रैि बुशैर्मूलतोऽमपर्यन्त मृलरममारभ्य मूलपर्यन्त मधवान्मूलपर्यन्तं समृश्य, प्रणीतोदषे नामिपिच्य, पुन पूर्वयत्प्रतम्य । आश्वलायन -~-तान्यशान्तसम्मार्गा स्थापिताग्नौतिपेदिति । व्यास... कार्य दक्षिणे भाग प्राचाय स्थापयतौनुरूलपारिति । म वलक्षणरेणु --अगुठपर्यवृत्त म्यातरत्निमान सुवाभवत । कातीय- पादिरा बाहु मानस्तु जुहसुन् सज्ञक स्रुय । अरनि मानो हसास्यो वर्तलोंगुष्ठ परवत । अधपत्रणा- ल्याच युक्तोनासाकृतिर्भवेत । वायवीये-सुक्खयौ तेजसौपायौ नकास्यायस ससफो । यशदायमयौदामि तात्रिको शिल्पि सम्मितौ । न्यूनहोमे चमिष्ट -पालाशपत्रे निश्छिद्दे रुचिरेक्वौमती । प्रकुर्याद्वाश्वधपत्रे मक्षिप्त होमकमणि ॥ त्रु बधारणविधानं मास्य---मूल हानिकर प्रावत मध्यशोककरतथा। अग्रे व्याधि कर प्रोवत स्त्रवधारयते कथम् । तद्धारण प्रकार ~~चतुरगुल परित्यज्य अग्रेचच द्विरठकम् । चतुरगुल च तन्मध्य धारयन्छखमुद्रया। हीयते यजमानो पैस्वयमूलस्य दशनात । तस्मात्सगोपयरमूल होमकाले रवस्यतु । ( माज्यमुद्रास्य १६ ) श्राज्यमुत्थाप्यचर। पूर्वणनीत्या, अपनेरुत्तरस स्थापयित्वा चरुमुत्थाप्य राज्यस्य पश्चिमतानोत्वा याज्यस्योत्तरत्त स्थापयेत् । श्राज्य সল হল স্পীকালিন্ত বিক্ষিপ্ত ইবি ৪ उवासय, दधिश्रिताना पूर्वणोद्वासिताना पश्चिमला हविपउद्वास्या नयनमिति याज्ञिकसम्प्रदा- यात । ( उत्पूय २०) पूर्वपत्पविनाभ्या माज्यमुरिक्षप्य पवित्रै प्रणीतासु निधाय । ( अवेक्ष्य १) अवलोक्याज्य तस्मादपद्रव्य निरसनम् । (प्रोक्षणीश्च पूर्ववत् २२) पूर्ववत्पवित्राभ्या माध्यमुत्क्षिप्य पवित्रे प्रणोताया निधाय ( उपयमनान्शानादाय २३) दक्षिणपाणिना गृहीत्या सव्यनिधाय ( समिधोऽभ्याधाय २४ ) उत्तिष्ठन्ति सौसमिध अग्नी शक्षिप्य ममिल्लक्षणमाह समिधो देयस्ताव योगेषु पातिता शान्त्यर्थ प्रशस्तार्दा विपरीता जिघांसति ॥ होतव्यामधु- मयिभ्यांदनाक्षीरणरायुता । प्रापशमात्रा समिधा ग्राह्य सर्वत्रचैवया ॥ स्मृत्यथमारे पाला- शरमदिराश्वत्थ शभ्युदुम्यरजासमित । अपामागोऽर्काम कुशाश्वेतपरेविदु । सस्यम ममिध कायां ऋजुश्लक्ष्णा ममास्तथा । शस्तादांगुल्लास्तास्तुद्वादशांगुस्तिकास्तथा ॥ आदी कात्यायन-प्रागप्रा ( १२८) कमकाण्ड रत्नाकरे, कुशफण्डिका सूत्र व्याख्या पक्वा समन्छेदा स्तजन्यंगुलिवर्तला । अपाटिताश्चाद्विशासा कृमिदोपविवजिता ईदृशाहोम- येत्प्राज्ञ प्राप्नोतिविपुलाश्रियम् । अनाद्यसमिधोनायुपुराणो विशीणांविदलाहस्वा वकाच सुशिरा कशा दोघांस्थूलाघुणौर्दष्ठा ममिद्धिविनाशका ॥ प्रमाद्यवृक्षास्तत्रेव-निवासा- येचकीटानालताभिवष्टिताश्चये । अयज्ञियाग हिताश्च पल्मीकश्चसमावृता । शकुनीनानिवासाश्च ससानेयमहीरुहा । अन्याश्चैवविधान्सर्वा न्यज्ञियांश्च विवर्जयेत ॥ ( पर्युच्यजुहुयात् २४) प्रोक्षण्युदवेनसपवित्रेण दक्षिणचुलकेनगृहीतेन, अग्निमीशानादि उदगपवर्गपरिषिच्यजुहुयात । श्रापारादीन्सस्रवबधारणार्थ पात्रप्रणीतान्योर्मध्यनिदध्यात । अग्नेर पस्थानम्--अग्निप्रश्य- लितवन्दे ॥ पाद्यगन्धादिभिश्चैव कुण्डमध्येप्रपूजयत् । अग्नयेजातवेदसेनम , इतिमन्त्रण। देवीपुराणे-इदानोमेवतत्रेय स्वाहाशक्तिश्चपूजयेत् । मध्येषट्स्वपिकाणेषु हिरण्यागगना तथा । रक्ताकृश्णासुप्रभाच वहुस्पातिरक्तिका । पूजयेत्सप्तजिह्वास्ता वेशरेष्वङ्गपूजनम् । दले पुपूजयेन्मूर्ती शक्तिस्वस्तिक वारिणी जातवेदा सप्तजिह्वो हव्यवाहनएवच । अश्वोदरज मनोन्य पुनर्वैश्वानराहय । ताराग्नययदाद्या स्युनत्यन्तावन्हिमूर्तय । ॐ अग्नयजातवेदसे- नम । इत्यादि प्रयोगऊह्य । अग्निजिह्वानामानिपरशुरामकारिकायाम्-हिरण्याकनकार का कृष्णातदनुसुप्रभा । बहुरूपातिरिक्ताचदन्हि जिह्वाश्चसप्तवै ॥ शाग्दातिलके--कालीकराली च मनाजवाच सुलोहिताचैवसुधूम्रवर्णा । स्फुलिङ्गिनीविश्वरचिस्तथैवलालायमाना सलुसप्त- निद्राः । दक्षिगान्तुचतुनिंदन्त्रिजिह्वमुत्तरमुरा । गृह्यसंग्रहे--सप्तजिह्वाभवन्त्यता हुताशनमुखी द्गता । याभिहव्यसदानन्ति हुतसम्यकद्विजोत्तमै । पावकस्यमुसम्यक्ष्य युदुत्त पद्मयानिना । सप्तजिवाप्रमाणान्तु प्रादेशंपरिकात्तितम् । प्रमाणचतुरस्रञ्च वर्तुलमुसमण्डलम् ॥ पुरातनपद्ध तो-करालोधूमिनीश्चेता लोहिताचातिलाहिता ! मुवर्णापद्मरागाच सप्तैता परिकीर्तिता । करालौराक्षसानन्ति धूमिनीमसुरास्तथा । श्वेतानागा ममन्ति पिशाचालाहितांतथा । अलो- हितागन्धयां सुवर्णाश्चयमास्तथा। पद्मरागातथादवा स्याताजिहाहुताशने । तस्यांतुहामये- नित्य मुसमिद्धे हुताशने । पताश्चोक्ता समासन पातव्यास्तुद्विजात्तमै ॥ दवामागवत- तत स्वखुपसंस्कारा वाज्यसस्वाररावच । कत्लाहोमतत कुर्यात्सुवरणदायवैपृतम् । ब्रह्मासन दक्षिणेतुहिरण्यगर्भमन्नत ॥ प्रपोतास्थापन कुयांदापोहिष्टेतिमत्रत । क्यानश्चित्रमन्त्रण प्रणीताद्रि प्रधूरयत । प्रणीतान्योरन्तराल स्थापयत्प्रोक्षणीयुध पविस्थावणव्या वितिच छिन्देत्पवित्र । गव्यमान्यचसस्कुयो दिपेत्येतेनमन्त्रत । त्रातारमिन्द्रमन्त्रण प्रयो सुयता पनम् । मचितुर्व प्रसवनकुर्यादुत्पवनमुन । अग्निपर्युक्षणकुर्या दरसीनिमन्त । दक्षिणाद्- घृतभागात्तुयन्हदक्षिणलाचने । जुहुयादग्नयस्याहत्य यन्यवामतान्यत गामायस्पाइतिमप्यातु तमादायसत्तम् अग्नोयामाभ्यास्याइति मध्यनहुनतत । मताराभिप्यार निभिर्नुहुयादध फर्मकाण्ड रनाकरे, कुशकण्डिका सूत्र व्याख्या (१२६ ) । साधकः । जुहुयादग्निमन्त्रेण त्रिवारंतुतत परम् । ततस्तुप्रगनिया प्यायष्टौघृताहुतिः । गभा धानादिसम्कार कृतेतुजुहुयान्मुने । अग्निसंस्थाग:- गर्भाधानंपुन्मयनं गौमन्तोनयनंततः । जातकर्मनामकर्मा प्युपनिफमणतथा । अग्नाशनंतधाच्या प्रतवन्धस्तथैवच । महानाम्न्यमंत पश्चात्तथैवोपनिषदंपतम्। गौदानोद्वाहकोप्रोकाः संस्काराः श्रुतिचोदिताः (पपपवविधर्यप्रक्ष- चिद्धोमः २६) परिसमूहनादिपयुक्षणपर्यन्तो विधिरेवनमन्त्रा , इतिसूत्रकारः यनयत्रक्यचन- लोके स्मातयाग्नौहोमस्तत्रवेदितव्यः । परशुराम कारिकायाम् -- सान्याच्यदक्षिणंहोम सुर्वणजुहुयाद्धृतम् । स्वाहान्ते जुहुयादोता स्याहयासहवाहवि. । देवीभागवते स्याहादेवी हविदाने प्रशस्तासर्वकर्मसु । दग्धुनशक्त.प्रकृतिहुंताशश्चत्क्यापिना । स्वनामोच्चार्य मन्त्रान्ते योदा- म्यतिहविनरः र: । सुरेभ्यस्तत्प्राप्नुवन्तिसुरा; सानन्दपूर्वकम् । दक्षिणाग्निगार्हपत्या हवनीयान्कमे- रणच । ऋषयोमुनयश्चैवब्राह्मणाः क्षत्रियादयः । खाहामन्त्रंसमुच्चार्य हविदानंचचक्रिरे । स्वाहा- देव्या:पूजनमप्युक्ततत्रैव मर्ययज्ञारम्भकाले शालग्रामेघटेथवा । स्वाहासम्पुण्ययत्नेन यज्ञं कुर्यात्फलाप्तये । प्यानश्चसामवेदोक्तं स्तोत्रंपुजाविधानकम् । स्वाहां मन्त्राशयुक्तांच मन्त्रसिद्धि खरूपिणीम् । सिद्धांचसिद्धिदाणा कर्मणफिलदांशुभाम् । इतिध्यात्याचमूलेन दत्वापाद्यादिकंनरः होश्रीवन्हिजायायै देव्यैस्वाहान्त्यनेनच । मन्त्रेणोंकारपूतेन वाहान्तेनविचक्षण. स्वाहावसाने जुहुयाद्धपायन्वैमन्त्रदेवताम् । मन्त्रोचार नाम याज्ञवल्क्य:--पर्ण स्पष्टतर कार्यानासा श्वासायधीतिया । मुखश्यामापधिण्याभिषेकाचने च । अतपरमाचार्यण द्वितीयकण्डिकायां श्राधाननिरूपशंकृतं परचमर्वत्रहोमपद्धती अन्धारव्यहोमविधानापत्ते प्रथमकागड़पञ्चमीकण्डि- कायारपरुपहरिहरादेरुक्तप्रमाणेनकरोमितध- अनवैवाहिकहोमप्रमंगेन सर्वकर्मयाधारणीपरि- भाषां करोत्याचार्य । (अन्वारन्धाघाग वास्यभागो मह व्याहतय सर्वप्रायश्चित्तं, प्राजापत्य स्विटकच्च ॥३॥ एतग्निन्य ट० सर्वत्र ॥४॥) ब्रह्मणादक्षिणेवाही दक्षिणहस्तेन धन्वारब्धे कर्तरिाधारसंज्ञकेाज्यातीयथामनमाप्रजापतयखाहा---इदंप्रजापत- थे, मनसात्यागमपि-इतिहरिहर । होमेत्यागस्याङ्ग त्यात्सकृत,, यथासहस्रादिलक्षादि अनेक- कर्तकोंमे, प्रत्याहुतियागस्य कर्तुमशक्यत्वा दितिजैमिनि ॥ दानचन्द्रिकायान्तु-दानोत्तरं नममेति कोर्तयेत ॥ इतिप्रमाणाभ्यांसाधारणहोमे प्रायश्चित्तसंज्ञके प्रतिस्वाहान्तेनममेत्युचारणे कर्तव्येकिमपितिनास्तीतिदिक् । २० इन्द्रायसाहा, इदमिन्द्राय,, प्राज्यभागसंज्ञको होमौयथा अग्नयेखाहा इदभग्नये,, मौमायस्वाहा, इदंसोमाय । महाव्याहृतयोभूराधोतिस्रोयथा । भूः खाही इदमग्नये-इदंभूषा । भुवः स्वाहा-इदंवायवेभुधिया, व स्वाहाइदंसूर्याय-सइतिवा ! सर्व प्रायश्चित्तसंज्ञका पश्चातय यथा-त्वनौ ऽ अग्नइत्यादिप्रमुमुण्यस्भत्साहा. सत्त्वनोऽअग्ने- मुहान एबिसाहा । इदमग्नीचरणा-या द्वाभ्यात्यागः । इति पश्चानाह मम मापा प्रजापति- (१३० ) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, कुशकण्डिका सूत्र ब्याख्या देवताकोहोम' प्राजापत्यशब्देनोच्यते । खिष्टकृच्छब्देनस्विष्टकृद्धोमउच्यते । अयंचहोंमः उत्तरा: भवति, यथाअग्नये खिष्टकृते, चकारात्समुच्चयः एतदाधारादिखिष्टकृदवसानं, सर्वत्रयझेड. होमात्मकेषु कर्मसुनित्यं ॥ यत्रहोमाभावस्तत्रनास्ति, अन्तेविहितस्यस्विष्ठकृद्धोमस्य कर्मविशेष स्थानान्तरमाह । प्राङमहाव्याहृतिभ्यः स्विष्टकमन्यच्चेदाज्याविः ॥ यत्राग्याति- रिक्तं हविरस्तितत्रमहाव्याहृति हीमात्पूर्वमनुष्ठेय' । होमेउत्तानहस्तप्रमाणम्- उत्तानेनतु: हस्तेन, अंगुष्ठा ग्रेण पीडितम् । संहितांगुलि पाणिस्तु वाग्यतो जुहुयादविः ॥ होमात.. पवित्र प्रतिपत्ति:--सर्वकर्मसु होमान्त पवित्राभ्यां मार्जनंकृत्या तत अग्नी . स्वाहा, इति प्रक्षिपयेत ॥ परिस्तरण बहींणामपि होमोविधीयते । प्रणीताश्च विसोकः पश्चिमे विहितः । एतेपदार्थाः भाष्यकारमते गृह्यस्थाली पाक कर्मसु नभवति । परंच पद्धति काराणां पद्धत्युक्तत्वा दनुष्ठीयन्ते। अमन्त्रत्वाच्छन्दोगपरिशिष्ठे----श्राज्यव्य भनादेशे जुहोतिपु. विधीयते । मन्त्रस्य देवतायाश्च प्रजापतिरितिस्थितिः । होमद्रव्याभावे-घृतंप्राय ॥ मन्त्रानुक्तौ प्रजापति देवताकस्य मन्त्री महाव्याहृति मन्त्री ग्राह्योभवति । देवतायाऽनुक्ती प्रजापतिग्राह्यः। यथा यत्रमन्ना न विद्यन्ते व्याहतीस्तत्रयो जयेत । मन्त्राणामेषचोद्देशमन्त्रैः कमसमारमैत् ।। भूरादयो व्याहतयो वेदेभ्योनि सतापुरा। महत्वं व्याहतोनां च प्राप्तास्ते भैवकर्मणा । कारजननात्तासां महत्त्वं प्रतिभाष्यते । व्याप्ताच व्याहृतित्वं च तेननैविधता ययुः ततः प्रणीता विमोकानन्तरम् ॥ पूर्ण पात्रलक्षण मेरुतन्त्र-द्वात्रिंशत्पलमानेन निर्मितं ताम्रपात्रकम् । तण्डुलैस्तत्समापूर्य सहिरण्यं सक्षिदम् । पूर्ण पात्र दानमा: कात्यायन'–ब्रह्मणेदक्षिणा देया यायत्र परिकीर्तिता | कमान्तेऽनुच्यमानायां पूर्णपानादिका भवेत् । विदध्यादौत्रमन्यश्चेद्दक्षिणार्ध हरोभवेत् । स्वयंचेदुभयं कुर्यादन्यस्मै प्रतिपादयेत् । मूर्ख ब्राह्मणाय दाननिषेधः-श्रहमस्मै ददानीति एरमाभाष्य दीयते । नैनारपृष्टता ददतः पात्रेऽपिफलमस्तिहि। दूरस्थानपिद्वाभ्यां च प्रदायमन साधनम् । इतरेभ्यस्ततोदया देषदान विधिस्मृत । सनिकृष्ठ मधीयानं ब्राह्मणं यो व्यति क्रमेत् । यद्ददाति तमुल्लय ततः स्तेयेन युज्यते ॥ यस्यत्येकगृहे मूखों दूरस्थश्च गुणान्वितः । गुणान्विताय दातव्यं. नास्ति मूर्ख व्यतिक्रमः । ब्राह्मणाति क्रमोनास्ति विप्रे वेदविरजिते । ततः पूर्णाहुतिः-- ततः पूर्णाहुति कृत्या सर्व तन्त्र समन्विता । गांदघाल्या पास्वन्ते ब्रह्मणेवासगी तथा। सौनक:-अयपणाहुतिं दद्याद्गन्धपुष्प फलान्विताम् । साक्षतामूकायश्च समपारपदि- मुखः । गोभिल गृहो-पूर्णाहुतिं च मूदान दिव इत्यभिपातयेत् । तीय-प्रतबन्ध निमाहे च शालायां चौल कर्मणि । गभाधानादि संस्कारे पूर्णाहुति न कारयेत् ॥ पाहुत्यन्तरं अग्नी अविच्छिन्नतिधारामाचरन्ति--ततो होमारशिष्टेन पृतनापूर्यने सुषम् । निधाय पु - कर्मकार रक्षाकरे, फुशकरिष्का पतिः संसाप्रेणाधोमुखेनताम् । सदर्भण समाच्छाद्य मूलना जलिनास्थित । चौपईन्लन मुहूयाद्वारा जयरामन्विताम् । चित-- यसुभ्य स्वाहा, इति मन्नेगा पसोधारा मान- पन्ति ॥ध्यायुप करण गृहामाहे-तताऽनामिकया कुयो द्विन्दु सप्तभस्मना । यम- योलमाटे च न्यायुपैति पदै ममात होमाग्ने प्रमाण ब्रह्मपुराणे-नुत्तडभ्या क्रोध संयुक्ता हीन मन्त्री जुहोतिय.। अप्राध्दै सधूमेवासोऽस्या दन्य जन्मनि । स्वल्पेरूक्षेरास्फुलिंग मामात्र भयानके । आकाप्टैश्च सम्पूर्ण फरकारयतिपावके । कृष्णाचिपि सदुर्गन्ध तथा- लिहति मंदिनीम् । श्रातिर्जुहुयाधस्तु तस्य नाशो भयम् । विशेषो प्रहयाग परि- भाषायां इधव्य ॥ ॥ इति कुशकरिडका सूत्र व्यारया ।। ॥ अथ होम पद्धतिः॥ अथातोऽग्नि स्थापन पद्धतिसूत्रोक्तविधानेन वक्ष्ये--तत्रा दौकर्ता शुद्धेधौते वाससीपरिधाय, दीपंप्रज्वाल्यसंपूज्यचाचम्य प्राणायाम विधाय, पूर्वोक्त परिभापानुसारेण स्थंडिल कंडंचा यथासंभवं विस्तारपूर्वकं प्रादेशमात्रादारभ्य चतुर्हस्तायतात्मक होमानुसारंनिर्माय । वेद्याः पश्चिमतः पूर्वाभिमुखासनग्नि स्थापन कर्मसमारभेत् । तत्रादौ गणेशस्मृत्वा होमेशानभागे अष्टदल कमलोपरि वरुणपूजाविधिना कलश संस्थाप्यसंपूज्यच । तंत्रपंचाशत्कुशनिर्मितं ब्रह्माणं दक्षिणाभिमुम्ब, ब्रह्मजज्ञान मिति मंत्रेण संस्थाप्य प्रतिष्ठाप्य संपूज्यच, होमसामग्री संपाद्य संकल्पं कुर्यात्--अद्येत्यादि संकीर्त्या मुकगोत्रप्रवरोऽहं करिष्य "माणामुक कर्मणिस्वशाखोक्त पद्धत्यानुसारेणाग्निस्थापन कर्म ऋरिष्ये-तत्रादौत्रिभिः कुरीः स्थंडिलंकुण्डवावारत्रयं परिसमुहान टि० अग्निगृहा-कृमिकीट पतंगामा भ्रमन्ति वसुधातले । तयां संरक्षरणार्थी य कुर्यात्परि समूहनम् ॥
(१३२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, कृशकण्डिका पद्धति , , गोमयोदकेन त्रिरुपलिप्य, ततः ग्वादिरेण ग्बगाकृतिनास्फेनतद भावे सुवमूलेनवा, पागना उदक्संस्थाः स्थंडिलप्रमाणा स्तिस्रो रेखांकृत्वा, अनामिकांगुष्ठाभ्यो यथोल्लिखिताभ्यो लेखाभ्यः पां सूनुद्धृत्येशानकोणे क्षिप्त्वा*, मणिकाद्भिस्तदभावे कमंडलु जलेनाभ्युदय, इतिपंचभूसंस्कारान्कृत्वा, पीठंपूजयेत्-पुष्पाक्षतैः- 30 रत्नमंदिरायनमः, ॐ चतुर्दारमंडलायनमः, ॐ रत्नवेदिका- यैनमः, ॐ श्वेतछत्रायनमः, 30 रत्नसिहासनायनमः, ॐ धर्मा यनमः, ॐ ज्ञानायनमः, ॐ वैराग्यायनमः, ॐ ऐश्वर्यायनमः, अधर्मायनमः, ॐ अज्ञानायनमः, ॐ अवैराग्यायनमः, 30 अनैश्वर्यायनमः, (गृह्यसूत्रातिरिक्तोयविधिः ) ततस्ताम्रादिपात्रे कर्मसाधनभूतं पात्रान्तरेणपिहितं लौकिकस्मात श्रौतयाग्नि स्वा भिमुखं स्थायित्वा, अग्नि संस्कारंकुर्यात्-मयिगृह्णाम्यग्नेति मंत्रस्यावत्सारऋषिः ककुप्छन्दोऽग्निर्देवताग्निग्रहणे विनियोगः मयिगृह्णाम्यग्नेऽअग्नि ई० रायस्पोपाय सुप्रजास्त्याय सुवीर्या य । मामुदेवताः सचन्ताम् ॥ इतिग्रहणम् ॥ गर्भइति विरूपा क्षऋषि रुणिक्छन्दोऽग्निर्देवता गर्भाधाने वि० अ गर्भोऽअस्यों पधीनां गर्भो वनस्पतीनां गौविश्वस्य भूतस्याग्निर्गोऽअपा मसि । ॐ विवस्वन्निति गृत्समद ऋपिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता पुंसवने वि० । अविवस्वन्नादित्यैपते सोमपीय स्तस्मिन्मत्स्व अदस्मै नरोवर्चसे दधातन । यदाशीर्दा दम्पतीवाममश्नुतः। पुमा न्पुत्रो जायते विन्दते धस्वधाविश्वाहा रपडाधते गृहे । ॐ कस्त्वा सत्येति वामदेव ऋषिर्गायत्रीछन्दोऽग्निदेवतासीमन्तोन्न- यने वि० । 30 कस्त्वासत्यो मदानाम र्ट हिष्ठोमत्सदंधसः । - 8 टि० पुरा इन्द्रण वजूण हतो वृत्रीमहासुर ! देवी भागवत-मधुरट भयोमेद संयोगान्मदिनीस्मृता। तन्मदमा गधपती तदर्थ मुपलेपनम् ॥ *टि साफाश गामिनो येच राक्षसा यशघातपातम्य संरक्षणार्थाय उाहत चैव काग्यत् ॥
कर्मकाण्ड रक्षाकरे, कुशकरिडफा पद्धति ( १३३) हदाचि दारुजेवसुः ।। 30 अजीजन इति अरुणत्रसु दस्यु=पिरनु- टुप्छन्दोऽग्निर्दयता जातकर्मणि विनियोगः ॥ अजीजनोहि पवमानस्य सूर्य विधारेशक्मनापयः । गोजीरयार , हमाणा पुरन्ध्या ॥ 30 यदापीति भृगुपिस्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवता नाम करणे विनियोगः । ॐ यदापिपेप मातरं पुत्रः प्रमुदितोधयन् । एतत्तदग्नेऽप्रणोभवाम्यहं तौपितरौमया संपृचस्थसम्माभद्रेण पृक्त विपृचस्थ विमा पाप्मना पृतः ।। 30 एपेति तापसऋषि निवृत्साम्नी पंक्तिश्छन्दो लिंगोतादेवता निकमणो विनियोगः । ॐ पूषापंचाचरेण पंचदिशउदजयत्ता 5 उज्जेपर्ट सवितापटल रेणषड्तनुदजयत्तानुज्जेममतःसप्ताक्षरेणगायत्री मुदजयत्तामुज्जे पम् । अन्नपत इतिनाभानेदिष्ट ऋषिहतीन्दोऽग्निर्देवताऽन्नप्रा शनेविनियोगः अन्नपतेऽन्नस्यनोदेहयनमीवस्यशुष्मिणः प्रप्रदातारं तारिषऽऊर्जन्नोधेहि द्विपदेचतुष्पदे ॥ 30 अग्नहतिभरद्वाजऋपि- र्गायत्रीन्दोऽग्निर्देवता चौलकरणे वि० । ॐ अग्नऽआयाहि वीतयेगृणानो हव्यदातये । निहोतासत्सिवाहिर्षि । ॐ भद्रकणे- भिरिति गौतमऋषि त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवता कर्णवेधेविनियोगः । ॐ भद्रंकणेभिः शृणुयामदेवाः भद्रंपश्येमाक्षभिर्जजत्राः। स्थिरैरङ्गै स्तुष्टुवा ॐ सस्तनूभियंसे महिदेवहितंयदायुः30 अग्निरेकाक्षरे- णेति तापसऋषि निदा|गायत्रीछन्दो लिगोक्तादेवताः उपनयने वि० ॐ अग्निरेकाक्षरण प्राणमुदजत्त भुज्जेषमश्विनौ । ध्यक्षरेण द्विपदोमनुष्या नुदजयतांता नुज्जेविष्णुस्त्यक्षरेण श्रील्लोका नुदजयत्ता नुज्जेप हैं. सोमश्चतुरक्षरेण चतुष्पदे पशूनुदजयत्ता नुज्जेषम् । ॐ अश्वस्येति गर्गऋपि रनुष्टप्छन्दोs- ग्निर्देवता वेदारम्भे विनियोगः । ॐ अश्वस्थान्नस्यसम्पतिः पुत्राणामभिसंपदे । अायुर्यलश्रिया ददन्त्यासानऽपहिरुन्धति ।30 व्रतमिति अागिरसऋषि रनुष्टुप्छन्दोऽग्देिवता समावर्तने चिनि- योगः। 30 व्रतं कृणुताग्निव्रमाग्निर्यज्ञो व्यनस्पति पंजियः । देवीन्धियं मनामहेसुमृडी कामभिष्टये वक़धायजवाहस ४० कर्मकाण्ड रत्नाकरे, कुशकरिडका पद्धतिः १३४ । सुतीर्थानोऽप्रसवसे । येदेवामनोजाता मनोयुजोदक्ष कृतवस्तेनो वन्तुतेनः पान्तुतेभ्यः । 30 गावमितिपुरमीढा अजमीढाऋषि र्गायत्रीछन्दोः गावोदेवता गोदाने विनियोगः। 30 गावऽउपा- वतावतम्मही यज्ञस्यरप्सुदा । उभाको हिरण्यया । ॐ भग- 'इति वसिष्ठऋपि त्रिष्टुप्छन्दो ऽग्निर्देवता परिणये विनियोगः। भगएवभगवां ॥ अस्तुदेवा स्तेनवयं भगवन्तः स्याम।। तत्त्वाभगसर्वइज्जो हवीतिसनोभग पुरएतामवेह । 0 ऋतावा- 'नमिति प्रजापतिषिः पंक्तिश्छदोऽग्नि देवता चतुर्थीकरणे वि० ॐ ऋतावानं वैश्वानरमृतस्य ज्योतिष्मति अमृवममीमहे । 'श्रावाहनम्-ॐ उपयाम गृहीतोसीति वैखानसऋषिः सर्वेषां मंत्राणांजगती भुरिगार्षी गायत्रीछन्दांसि सोमाग्नीदेवते 'अग्न्यावाहने विनियोगः। ॐ उपायमगृहीतोस्यग्नयेत्वा वर्चस एषतेयोनि रग्नयेत्यावर्चसेड अग्नेवर्चस्विन्वर्चस्वांस्त्वं देवेष्वसि वर्चस्वानहं मनुष्येपुभूयासम् ॥ अग्निदृतमिति भारद्वाज 'ऋषि र्गायत्रीछन्दोऽग्निर्देवता स्थापने विनियोगः । ॐ अग्नि- 'दूतंपुरोदधे हव्यवाह मुपवे । देवां ॥ प्रासादयादिह, इति संस्कार्यमग्नि वेद्यांकडे स्थापयेत, तत्पात्रेऽक्षत पुष्पाणिक्षिप्त्वा, ॐ भूर्भुवः स्वः भो अग्नेइहागच्छेहतिष्ठ इत्यावाह्य-30 एतन्ते देव मवितर्यज्ञं प्राहुहस्पतये ब्रह्मणे । तेनयज्ञमवतेन यज्ञपति तेनमामव । मनोजूतिर्जुपता माज्यस्य बृहस्पति यज्ञमिमंत्वनो त्वरिष्ठंयज्ञ ई० समिमंदधातु। विश्वेदेवासऽ इहमादयन्तामोंप्रतिष्ठ इंति प्रतिष्ठाप्य, तत अग्नेरुत्तरत आचार्य ब्रहणणे धरणार्थ मास- नद्वयं कुशैः कल्पयित्वा तत्रादौ प्राचार्य माहयवृहद्यजादौ पाया चमनीयविष्ठरमधुमके पूर्वकमाचार्य ब्रह्माणंच सम्पूज्य, वरण- सामग्री संपूज्य हस्तेधृत्वा संकल्पं कुर्यात् अद्येत्यादि संकीर्त्या मुकोऽहं करिष्यमाणा ऽमुकहोम कर्मणि एभिर्वरण द्रव्यैरमुक शर्माण ब्राह्मणमाचार्य कर्मकर्तृत्वां घृणे,, वरणद्रव्यं तस्मैदत्वा वृतोऽस्मि, प्रार्थयेत्-श्राचार्यस्तुयथास्वर्गे शक्रादीनां वृहस्पतिः कर्मकाण्ड रनावरे, फुशकण्डिका पद्धतिः (१३५ ) तया. त्वंममयजेस्मिन्नाचार्यों भवसुव्रत । कर्मकुरु करवणीति. प्रत्युक्तिः,ततो ब्रह्माणमपि सम्पूज्यासनेउपवेशयित्वा संकल्प:- अद्येत्यादि० अमुकोहं करिष्यमाणा मुकहोमकर्मणि कृताकृतावे. क्षणादि ब्रह्मकर्मकर्नु मेभिर्वरण द्रव्यैरमुक शर्माणं ब्राह्मणं. ब्रह्मत्येनत्वां वृणे, वृतोऽस्मि । प्रार्थयेत् यथा चतुर्मग्यो ब्रह्मासर्व वेदधरोविभुः । तथात्वं ममयजेऽस्मि न्ब्रह्माभव द्विजोत्तम, कर्म कुरु करवारणीति प्रत्युक्तिः । इति चरणं कृत्वाऽग्नेदक्षिणतो मोपवेशनार्थ वारणपीटं कुशराछाद्य, अग्नेः प्रदक्षिणक्रमेण , घृतं ब्रह्माणं तत्रोपवेशयित्वा, प्राचार्यासनमग्नेमत्तरतः पश्चिम- दिशि. कुशैराछाद्य तत्राचार्य मुपविशेत् । ततो ऽग्नेरुत्तरः पश्चि- मभागे एकासनं पूर्वभागे द्वितीयासनं प्रागस्त्रिमिस्त्रिभिःकुशैः- कल्पयित्वा प्रणीतापात्रं दक्षिण हस्तेनादाय सव्यहस्ते धृत्वा,. पक्षिण हस्तस्थ पात्रजलेनापूर्य कुशैराछाद्य ब्रह्मणो मुग्बमवलोक्य पश्चिमासने निधायदक्षिण हस्तेनालभ्य पूर्वासने निदध्यात् । ततः पूर्वादिदिक्षु प्रागौरुद गौश्चकुरीः परिस्तरणं कुर्यात दक्षिणहस्तेकुशानादाय भाग्नेयादीशानान्तं प्रागग्रैरुद गश्च, ब्रह्मणोऽग्निपर्यन्त मुदगः, परचाद्दक्षिणत उत्तरपर्यन्तोदगग्रैः कुशराछाद्य, ततोचन्तिवस्तृनि अंगुलत्रयविस्तारणासादनीयानि, पश्चिमतउत्तरस्यां-पवित्रछेदनानित्रीणि कुशतरुणानि, द्वेपवित्रे- साग्रे.अनन्तगर्भ, प्रोक्षणीपात्रं, भाज्यस्थाली, चमश्चेत् चरुस्थाली, सम्मार्जनकुशाः पंच, उपयमनकुशास्त्रिप्रभृतयः त्रयोदशपर्यन्ता ग्राह्याः समिधस्तिस्त्रः पालाश्यः प्रादेशमात्र्यः मुवः गव्यमाज्यम्, चाश्चेद्बीहितंडुलाः, पूर्णपात्रं पटपंचाशदधिक मुष्टिशतद्वय परिमित, चाबहुभोक्तः पुम्पस्याहार परिमितंया, कर्मोपयोगिनी दिस्मयन्तरे-~~ यशवास्तुनि मुष्ठौच. स्तम्भेदर्भ यटोस्तथा दर्भसंण्यान. विहिता विष्ठग स्नरणेपुच, अग्निग्रहो-चन्हितन्तु परित्यज्य द्वादशांगुल- तोत्रादिः परिस्तरण दर्भास्तु पोडशा द्वादशापिस ।
(१३६) कमकाण्ड रताकरे, कुशकरिएका पद्धतिः । A दक्षिणा, वरोवा,, गोर्तामणस्यवरः एतानिवस्तृनि अग्नेः प- त्पाक्संस्थानि स्थापयेत् । तत्रपात्राणि प्राग्विलान्युद गग्र स्थापयेत् । तत्रादौ, त्रिभिर्दभै द्वैपवित्रे प्रादेशमात्रे प्रच्छि प्रोक्षणीपात्रं प्रणीता सन्निधौ संस्थाप्य, तत्रपात्रान्तरेण वारि- पूर्य पवित्राभ्यामुत्पय पवित्रे प्रोक्षणीषु निधाय, दक्षिणहस प्रोक्षणीपात्रमुत्थाप्य सव्येहस्तेधृत्वा, उत्तानेन दक्षिणहस्ते मध्यमानामिकांगुल्यो मध्यपर्वाभ्यां तज्जलमुच्छाल्य पवित्रा प्रणीतोदकेनप्रोटेदितिमोक्षणीं संस्कृत्य, ततः पवित्राभ्यां प्रय जनवन्ति भाज्यस्थाल्यादीनि पूर्णपात्र पर्यन्तान्यासादित वस्तू प्रोक्षण्युदकेनैकैकशः संप्रोक्ष्य, प्रोक्षणीपात्र मसंचरे प्रणीतान्य रंतरालेस्थापयेत्, तत प्राज्यस्थाल्यामाज्यक्षिप्त्वा ऽग्नावारोपये तत्राज्यं ब्रह्माधिश्रयति, चरुश्चेच्चरुस्थाल्या चरुंघृततंडुलदुग्धा दिकं प्रक्षिप्य भाज्यस्योत्तरतः स्वयमा चार्यावा नावारोपयेत अध्र्दश्रित चरावाज्येच ज्वलदुल्मुकंच ब्रह्माचायौँ प्राज्यचर्वोरुप- रितः समंताभ्रामयित्वातदुल्मुकम्वन्ही प्रक्षिपेत, दक्षणिहस्तेन परिभाषोक्त प्रकारेण शंग्वमुद्रया स्वमादायाधो मुखं प्रांचं प्रतप्य सव्येपाणौकृत्वा पंचभिः सम्मार्जन कुशाग्नै संलतोऽनपर्यन्तं कुश- मूलरधस्ता भागे अग्रमारभ्य मूलपर्यन्तं सम्माय, तान्कुशानग्नौ प्रक्षिपेत् , ततः पवित्राभ्यां प्रणीतोदकेन सुवमभ्युच्यपुनः प्रतप्य हस्ताभ्यां सम्माय॑ खदक्षिणभागे कुशोपरि निदध्यात् । श्राज्य मग्नित उत्तार्योत्तरतः स्थापयित्वा, अग्नेः पश्चा दानयेत् । (चरुसत्वे प्रथममाज्य मुत्थाप्य चरोः पूर्वेणनीत्वा 5 ग्नेरुत्तरतः स्थापयित्वा, चम्मुत्थाप्या ज्यस्यपश्चिमतोनीत्वा, भाज्यस्योत्तर तः स्थापयित्वा ऽऽज्यमग्नेः पश्चादानीय चरुंचानीय, प्राज्यस्यो त्तरतो निदध्यात् ) ततोऽगुष्टानामिकाभ्यां पवित्रे गृहीत्वा ss ज्यमुत्प्रय, अवेक्ष्यच, अपद्रव्य निरसनं कृत्वा पुनः पवित्राभ्यां प्रोक्षण्युदकमुत्पूय तत्रैवपवित्रे निदध्यात् ॥ उपयमन कुशान्दक्षि- पहस्तेनादाय वाम हस्तकृत्या, उत्तिष्ठनघृताक्तास्तिस्रः समिधः, कर्मकाण्ड रतावरे, कुशकण्डिका पद्धति. । १३७ ) श्रादाय तृणीमग्नौ प्रतिपेद्वानच्च-30 समिधाग्निमिनिमंत्राणी पांगिरस ऋपिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता समिद्धोमे विनियोगः 0 समिधाग्निन्दु वस्यत तवधियतातिथिम, श्रास्मिन्हव्याजु- होतन १११ सुसमिदाय शोचिपे नंतीव्र जुहोतन । अग्नये जातवेदसे ।। नन्त्वा समिरिंगिरोयतेन बर्द्धयामसि । बृहच्छो च यविट्य । उपत्वाग्ने हविष्मनी ताचीर्यन्तुहर्यतः|जुशस्व समिधोमम-स्वाहा । नतोपविश्य प्रोक्षण्युदकेन सपवित्रेण दक्षिणचुलकगृहीतेन, ईशानादि उत्तर पर्यन्त मग्नि संप्रोक्ष्य, पचित्रे प्रणीतायां निदध्यात 18 ग्राज्य होमे संस्त्रवधारणार्थ प्रोक्षणीपात्रं प्रणीतारन्योर्मध्ये निदध्यात् - ततोयजमानः संकल्प पर्वकं द्रव्यदेवता मिध्यानं कुर्यात-अद्येत्यादि संकीामुकोह- ममुक होमकर्मणि, प्रजापनि, इन्द्र, अग्नि, सोम, अग्नि, वायु, सूर्य, अग्नीवरुणौ, अग्नीयमणौ, अग्नि, वरुणं, सचितारं, विष्णु, विस्वान्मानस्वर्कान, यमणमदितिं, अग्निमजापति, अग्निस्विष्ट कृतंच, आज्येनाहयक्ष्ये, एतध्दोमद्रव्यं तत्तद्देवताभ्यो मयापरित्य तं तत्सद्यथा दैवतमस्तु नममेत्येवं त्यागः कार्यः॥ एतन्तेनि पुनः प्रतिष्ठाप्य अमुकनामाग्ने सुप्रतिष्टितोवरदोभव ॥ ततोऽग्नि ध्यायेत्-30 देवाग्निस्तदा दित्यस्तद्वायुस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तबामताऽआपः सप्रजापतिः । एपोहदेवः प्रदिशोनुसर्याः पूर्वोहजातासऽउगर्भेऽअन्तः । स एवजातः सजनिष्यमाण:प्रत्यङ् जनास्तिष्टति सर्वतोमुग्वः । ॐ अग्नि प्रज्वलितं वन्दे जातवेद हुताशनम् । सुवर्णवर्ण ममलं समिद्ध सर्वतोमुग्वम् ।। सर्वतःपाणि पादश्च सर्वतोतिशिरोमुग्वः । विश्वरूपोमहानग्निः प्रणीतःसर्व , " टि० पर्युच्याम्नि प्रणीतासु निक्षिपे त्तत्पवित्रकम् । इनि परशुराम कारिकायां ॥ +टिO प्रोक्षणीपुत्यजेच्छेप संस्त्रचन्तु त्रुवाहुतेः । हस्ताहुते छविर्यस्य संतत्तस्य प्रकल्पयेत् ॥ एतच्चाज्यहोम प्राज्यातिरिक्त होम द्रव्येतु पात्रान्तरे शेष प्रक्षेगः । यथा चतुर्थी कर्मादि विपयेपु॥ - ११३८) फमफागष्ट गनाफरे, शरिटका पद्धतिः कर्मसु । इतिध्यात्वा, परिभापोक्त प्रमाणेन कार्यपरत्वेन-30 अमुक नामाग्नयेनमः, पाद्यादिभिः संपज्य, रेग्वाः पूजयेत्- पूर्वरेग्वायाम्-30 ब्राह्मणेनमः,मध्यरेग्वायाम्विष्णवेनमः। तृती यरेखायां-शिवायनमः॥ इतिनाममंत्रः संपूज्य, अग्निजिव्हा पूजनं कुर्यात्-30 करात्यैनमः। ॐधृमिन्यैनमः । ॐ श्वेतायै- नमः । 0 लोलितायैनमः । ॐ महालोहितायैनमः॥ ॐ सुवर्णा यैनमः । ॐ पद्मरागायनमः । इतिसप्तजिह्याः संपूज्य, अहीश्रीं वन्हि जायायैदेव्यैस्वाहा इति मन्त्रेण पाद्यादिभिः स्वाहा शक्ति च संपूज्य ॥ होम कुंटस्य चतुर्दितु गोमय प्रतिमासु चतुर्वेदान्पू जयेत्-पूर्वे-30 अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्यदेव मृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ ॐ ऋग्वेदायनमः, इतिपाद्यादिभिः संपूज्यदक्षि- णे-30 इपेत्वोजत्वा व्यायवस्थदेवोवः सविता प्रार्पयतः श्रेष्ठत माय कर्मणऽयाप्यायध्वमग्न्या ऽ इन्द्रायभाग प्रजावतीरनमीवा ऽ अयक्ष्मा मावस्तेन 5 ईशत माघशर्ट सोधृवाऽअस्मिन्गोपनौ स्यातवहीर्यजमानस्य पशून्पाहि । ॐ यजुर्वेदायनमः पूजयेत् ॥ पश्चिमे-30 अग्नऽआयाहि वीतये गृणानो हव्यदातये । निहोता सत्सिाहिपि ॥ ॐ सामवेदायनमः, पूजयेत् । उत्तरे-30 शन्नो देवी रभिष्टयऽआणेभवन्तु पीतये शंयोरभिश्रवन्तुनः॥ 30 अथ- र्ववेदायनमः संपूज्य ॥ ततो दक्षिण जान्वाच्य भूमौनिपातयित्वा ब्रह्मणान्वारब्धः ( दक्षिणेनयाहौ कुशेन दक्षिणेनहस्तेन स्पृष्ठः) आधाराबाज्य भागौच समिद्धतमेग्नौ जुहुयात् ॥ 0 प्रजापतये स्वाहा, मनसा प्रजापतिध्यात्वा । इदं प्रजापतयेनमम ॥ (हुतशेष घृतं प्रणीतारन्योर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रे क्षिपेदिति गदाधरः) एव मुत्त रत्र सर्वत्रवोध्यम्, इंद्रायस्वाहा-इदमिन्द्रायनमम ॥ . अग्नयेस्वाहा-इदमग्नयेनमम । ॐ सोमायस्वाहा-इदं सोमाय नमम ॥ इति हुत्वा ततः-(ब्रह्मणाऽनन्वारब्धः प्रकृतहोमविधाय ब्रह्मणान्वारब्धो भूरादिहोमकुर्यात् ) 0 भूरादिव्याहृतीनां प्रजापति ऋपिर्गायत्र्युष्णिगनुप्छन्दांसि अग्निवायुसूर्यादेवताः कर्मकाण्ड ग्ताकरे, फुशकरिडका पद्धतिः - प्रायश्चित्त होमे विनियोगः । ॐ भूः म्वाहा इदमग्नये नमम । ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवेनमम । ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्यायनमम, ॐ त्वन्नो अग्ने इति वामदेव ऋोपरित्रष्टुप्छन्दः अग्नी वरणौ देवते प्रायश्चित्त होमे विनियोगः-ॐ त्वन्नोऽ अग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोऽयवयासिसीष्ठाः। यजिष्टो वन्दितमः शोशु- चानो विश्वादेपा ॐ सि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा । इदमग्नीवरुणा- भ्यां नमम । ॐ सत्वन्नोऽअग्ने इति वामदेव ऋपित्रिष्टुप्छन्दः अग्नी वरुणो देवते प्रायश्चित्त होमे विनियोगः । ॐ सत्वन्नोऽ अग्नेऽवमो भवोतीनेदिष्टोऽअस्याऽ उपसोव्युष्टौ । अवयवनो व्वरुप र्ट० रराणोव्वीहि मृडीक है. सुहयोनऽपधि-स्वाहा- इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम । ॐ श्रयाश्चाग्ने इति प्रजापतिऋपि- विराट्छन्दोऽअग्निर्देयता प्रायश्चित्त होमे विनियोगः ।। ॐ अयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्ति पाश्च सत्यमित्वमयाऽयसि। प्रायानो यज्ञ वहास्पयानो धेहिमेपज ॐ स्वाहा । इदमग्नयेनमम || ॐ येते शतमिति शुनः शेफ ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो व्यरुणः सविता वि- पणुर्विश्वे देवा मरुतः स्वांश्च देवता प्रायश्चित्त होमे विनि- योग:---ॐ येतेशतं व्यरुणं येसहस्रं यजियाः पाशाः विवताम- हान्तः तेभिन्नोऽद्य सवितोत विष्णुर्विश्वेमुंचन्तुमरुतः स्वर्काः स्वाहा---इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मम्ड्यः स्वर्केभ्यश्च नमम ॥ ॐ उदुत्तममिति शुनः शेफ पित्रिष्ट- प्छन्दो यम्णो देवता प्रायश्चित्त होमे विनियोगः । ॐ उदु- तम व्वरूण पाश मस्मदवाधम विमध्यम अथाय । अथाव्व- यमादित्य व्रते तवानागसोऽ अदितये स्याम-स्वाहा-~~-इदं वरु- पायादित्याय नमम ||मनसा-~~ॐ प्रजापतये स्वाहा-इद प्रजापतये नमम । ॐ अग्नये स्विष्टकृते-स्याहा--दमग्नये स्विष्टकृते नमम । ( श्राज्यातिरिक्त होमद्रव्य सत्वे, स्विष्टकृद्धो- मो महा व्याहत्यादि होमात्प्रागेव कर्त्तव्यस्ततो व्याहृत्यादि माजापत्यान्तश्च ) ततो वर्हिामः-ॐ स्वाहा--इदं प्रजापतये (१४०) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, सुशकरितका पतिः नममः । ततः संस्रव प्राशनमवघ्राणं च कृत्वा द्विराचम्य, ब्रह्मणे पूर्णपात्र दानम्-अधेत्यादि मयाकारितस्य ब्राह्मणद्वारा अमुक होम कर्मणः सांगफल प्राप्तये अपूर्ण पूरणार्थ च इदंसद्रव्य पूर्णपात्रं ब्रह्मणेतुभ्य महंसम्प्रददे-ॐ तत्सन्नमम ॥ दानवाक्यं पठेत्-ॐ अक्रन्कर्म कर्मकृतः सहयाचा मयोभुवा । देवेभ्यः कर्मकृत्वाऽस्तंप्रेत सचाभुवः । ततः सुक्नुवयोः सम्मार्जनं पूर्वोक्त प्रकारेणकृत्वा--ततो होमावशिष्टं घृतं सुवेणद्वादशवारं गृहीत्वा घृतपूर्णयाचा पूर्णाहुतिंजुहुयात । तदभावेसुवेणैव पूर्णाहुतिंजुहु- यात्-ततो ब्रमणा आज्यस्थाल्याः सुवेण मुचिद्वादशवारमाज्यं देयम् । तिष्ठन्नाचार्या यजमानोवा अन्वारम्भ होमं कुर्यात् ॥ नतः सुचनुवंवा घृताभिधारितनारिकेल पूगीफलान्यतम फल- पूरितंकृत्वा यक्ष्यमाणमन्त्रेण गन्धाक्षनादिभिस्तम्पूजयेत्---30 चश्चम चमसाचश्चमे वायव्यानित्रमे द्रोणकलशश्चमे ग्रावाणश्च- मे धिषवणेचमे पूलभृचमऽाधवनीयश्चमे व्वेदिश्चमे बहिश्चमे ऽवभृथश्चमे स्वगाकारश्चमे यजनकल्पन्ताम् ॥ इतिसम्पूज्य- सङ्कल्पंकुर्यात् अद्यत्यादिदेशकालो संकीर्त्यामुकोहं अमुककाम नयामुकहोमकर्मणः साङ्गफलाप्तये न्यूनातिरिक्तदोष परिहारार्थ श्रीपरमेश्वर यजपुरपप्रीत्यर्थच मृडनामाग्नौपूर्णाहुतिहोमंकरि- ध्ये ॥ 30 मूर्छानन्दिव इति भारद्वाजऋषिपन्त्रिप्टुप्छन्दो महा वैश्वानरोदेवता मृडाग्नौपूर्णाहुति होमेविनियोगः- मूर्धानं- दिवो ऽ अरिनिं पृथिव्यावैश्वानरमृत ऽ श्राजातमग्निम् । कवि ० सम्राजमतिथिंजनाना मासन्नापात्रं जनयन्तदेवाः स्वाहा- ॐ पूर्णादर्वीति हिरण्यगर्भपि त्रिष्टुप्छन्दो 5 ग्निर्देवता मृडाग्नौ पूर्णाहुति होमेविनियोग:-30 पूर्णादर्विपरापत सुपू- पुनरापत वस्नेवविक्रीणावहा ऽ इषमूर्ज ई० शतक्रतोस्वाहा- इतिश्रीफलंबन्हौ प्रक्षिप्त्वाचक्ष्यमाणमन्त्रै रविच्छिन्न घृतधाराभि- वैन्हिप्रार्थयेत्-सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्यकाम्यम् । सनि- म्भधामयासिप स्वाहा । याम्मेधांदेवगणाः पितरश्चो. - খায় যা, যা অবি: (१४१) - पासते। तयामामयमेधया 5 ग्नेमेधाविनं कुरुस्वाहा ।। मेधाम्मेवरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः । मेधामिंद्रश्चन्यायु श्चमेधान्धाताददातुमेस्वाहा ।। ततोवायव्यकोणेगत्वा अग्ने मत्तरागपूजनंकुर्यात्--ॐ अग्नेनयेत्यस्यअगस्त्यऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो ऽग्निर्देवता, उत्तराङ्गपूजने विनियोगः ।। 30 अग्नेनयसुपधाराये ऽ अस्मान्चिश्वानिदेव चयुनानिविद्वान । युयोध्यस्मन्जुहुराण मेनो भूयिष्ठान्तेनमउक्तिविधेम । इलिगन्धादिभीः सम्पूज्य: प्रार्थयेत-श्राद्धांमधांयशः प्रज्ञां विद्यांपुष्टिवलंश्रियम् । अायुष्यं द्रव्यमारोग्यं देहिमेहव्यवाहन ॥ तनः सुवहस्तः प्रदक्षिणाचतु- प्रयंकुर्यात्-30 यानिकानिचपापानि । मयाजन्मसहस्रपु यो- जितः पापसमयः । प्रदक्षिणपदेनैव विलयंयात्वसंशयम ॥ ततो यजमानस्याग्न्यालम्भनम्-ॐ ननूपाइत्यस्यायत्सारऋपिस्त्रिष्टु प्छन्दो ग्निर्देवता अग्न्यालम्भने विनियोगः-0ननूपा अग्ने ऽ सिनन्मेपाहि ॐ आयुर्दाऽअग्नेस्यायुर्मेदेहि 34 वर्चीदाs अग्ने सिवच्चोंमेदेहि। . अग्नेयन्मेतन्या ऽ अनंतन्म ऽआपण ॐ मेधाम्मेदेवः सविताप्राधातु । ॐ मेधाम्मेदेवीसरस्वती प्रादधातु । 30 मेधामश्विनौदेवा वाधत्ताम्पुष्करस्रजौ । इति मन्त्रैरएनौपाणिप्रतपनपूर्वकं मुग्वंप्रोच्छयेत् । ततो ऽङ्गानिस्पृशेत्- अङ्गानिचम 5 आप्यायताम् । सर्वाङ्गान्युपस्पृशेत् । ॐ चाक् चम ऽ आप्यायताम्--मुखे ।। ॐ प्राणचश्चम, आप्यायताम्- नासिकायाम् । ॐ चतुश्चम 5 प्राप्यायताम्-नेत्रयोः । श्रो नंचम 5 प्राप्यायताम् । कर्णयोः। ॐ यशोवलंचम ऽ आप्याय- ताम् । वाहोः । ॐ सुमित्रियान इतिदध्यङ्डायवर्णऋषि रापो- देवता प्रणीताद्भिः शिरः प्रोक्षणे विनियोगः-30 सुमित्रियान 5 प्रापऽ औषधयःसन्तु ॥ इतिसपवित्राभ्यां हस्ताभ्यां प्रणी- लाजलेनशिरःसम्पोक्ष्य ॥ ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुयोप्मान - प्टियनवयंद्विष्मः इति प्रणीतापात्रमग्नेः पश्चिमेवा ईशानेन्युजी कुर्यात् ।। ततः परिस्तरणादिकुशान्ता कानुत्थाप्य- देवा- ..
(१४२ । कर्मकाण्ड रलाकर, कुशकण्डिका पद्धतिः गात्विति, अत्रिऋपिष्णिक्छन्दोमनसस्पतिर्देवतावर्हिोंमे वि- नियोगः ॥ ३. देवागातुविदोगांतु विवागातुमितमनसस्पत। इमदेव यज्ञ ॐ स्वाहाव्यातेधाः । इति वन्दौप्रक्षिपेत् ।। ततस्त्या युषकरणम्-ततः सुवमूलेघृतंलिंपयित्वा तेनेशानकोण भस्ममा हृत्य कांस्यपात्रेस्थापयित्वा तबगव्यमाज्यंक्षिप्त्वा 5 नामिकया एकीकृत्यतेनैवधारयेच-30 त्र्यायुपमितिनारायणऋषि मष्णिक छन्दः शिवोदेवता न्यायुपकरणे विनियोग:-30 घ्यायुषंजम- दग्नेः-इतिललाटे । ॐ कश्यपस्यन्यायुपमितिग्रीवायाम् । 30 यद्देवेषुत्र्यायुपमितिदत्रिणांशे । ॐ तन्नोऽस्तुत्र्यायुषमितिहृदि ततोहवनदशांशंदुग्धमिश्रितजन तन्मन्त्रैस्तपर्णकृत्वा, तदशा- शेनमार्जयेत् । नत प्राचार्यादिभ्यो दक्षिणांदद्यात् । ततः पूर्वोक्त पद्धत्यनुसारेणाभिषेकादिकंकृत्वा शीर्वादंदत्वोभाभ्या हस्ताभ्या मक्षतपुष्पान्गृहीत्वा 5 ग्नौमक्षिपेत् । ॐ गच्छगच्छसुरश्रेष्ठ स्वस्थानेपरमेश्वर । यत्रब्रह्मादयोदेवास्तत्रगच्छहुताशन । भोभो अग्नेमहाशक्ते सर्वकर्मार्थसाधक । कर्मान्तरे ऽ पिसम्माप्ते सा- निध्यकुरुसादरम् 30 यान्तुदेवगणाःसर्वे पूजामादायमामिकाम् । इष्टकामसमृध्यर्थ पुनरागमनायच । इत्यग्निविसर्जयित्वा ब्राह्म- णांश्चभोजयेत॥ ॥ इति कुशकण्डिका पद्धति ॥
वर्मकाण्ड रताकर ग्रयाग परिभाषा ॥ अथ ग्रहयाग परिभाषा ॥ मथ ग्रहयाग परिमापारच्य-तयाचशानक ---ग्रहशान्ति प्रचक्षामिशौनकोऽहद्विनम नाम् । पुण्यहनि शुभधारे कुर्याद्वाथ निजन्ममु । श्रयने पिपुवैचच मामसूर्यापरागयो ॥ ग्रहाणा मुप्रचेष्ठाना मतांशाति समारत । श्रादौ बिनायक पूज्यग्रहाश्चैव विधानत । कर्मणा सिद्धिमा प्नोतिश्रेयश्चाप्नोत्यनुत्तमम् । फर्मतत्व दीपिकायाम्-~-गांधानादि सस्कार कर्मस्वपि विशपत । कार्यारम्भेषु सर्वषुनववेश्मप्रवेशन । चियाहात्सय यतेपुप्रतिष्ठादिपुक्मसु । निर्विघ्ना थं मुनिभेटतोद्वेगभिवपुच । वश्यकाभिचारेषु तथगो चाटनादिपु । नवग्रह मसकृत्या तत काम्य समाचरेत । मंटपदिग्विचारम्-गृहस्योत्तरपूर्वण मडपकारयबुध । रुद्रायतन मौवा चतरसमुदलवम् । दशहस्तमथाष्टौवा हस्तान्कुयां षोडशान् । तस्यद्वाराणि चत्वारि कर्तव्यानिविचक्षणै । वेदीप्रमाणमात्स्य-ग्रहस्योत्तरप्रवण वितस्तिद्वय विस्तृताम् । वप्रद्वय वृतविदी वितस्त्युच्छ्यसम्मिताम् ॥ सस्थापनाय देवानां चतुरस्रामुदटमुसाम् ।सामने येवम्- त्रिवा चतुरस्रचस्थ डिल हस्तमानम् । ग्रहानाहमात्स्ये---सूय सोमस्तथाभौमो बुधजीय मितार्कना । राहु केतु रितिप्रोक्ता ग्रहालोक हितााहा । ग्रहाणादिक स्थापनम्--मध्येतु भास्कर विद्यालोहित दक्षिणेनतु । उत्तरेण गुरु विद्यायुधपूर्वोत्तरेणतु । पूपण भागय पियात्मा म दक्षिण पूजये । पश्चिमन शनिविद्याद्राहु पश्चिम दक्षिण पश्चिमोत्तरत केतु स्थापयेच्छु लतद्धले ॥ ग्रहाकारागयाहस्कान्दे-भास्करस्यत वृत्तस्याबद्रस्य चतुरस्रकम् ॥ कुजस्यतु प्रिकोपास्या द्वाणाकार वधुस्यर । गुरोर्दीधचतप्कोण पचकोरा सितस्यच । चापाकार शने राहो शर्षकेतोयजाकृति । ग्रहाधिवागाह भास्करस्येश्वर विद्या दुमाच शशिनस्तथा । स्कन्द मगारकस्यापि बुधस्य च तथा हरिम् ।। ब्रह्माण च गुरोविद्या छुक्रस्यापिशचीपतिम् ।। शनैश्चरस्यतु यम राहो कार तथवर । वेताश्च चित्र गुप्त व सवषा मधि देवता । प्रहाणा प्रत्यधिवानाह-अग्निराप निति विष्णु रिद्ररेंद्रीचदेवता । प्रजापतिश्च सपा श्व ब्रह्मा प्रयधिदेवता । विनायक तथा दुगा वायुमाकाशमेवच ॥ आवाहयेद्व्याहृतिमिस्त धैवाश्षि कुमारको ॥ अधिदेव प्रत्यधिग्वागस्थापने विचार ~ अधिदेवा दक्षिण तो वाम प्रत्यधि देवता । प्रवर्णा सस्मरद्रतमादित्यमोंकारेण समन्वित । सामशुको तथा तो मुधनौमौच पिङ्गलौ । मन्दराह तथा कृष्णो धूम्रकेतु गणबिदु । ग्रहाणा प्रतिमानाह याज्ञवल्क्य ---ताम्रकारस्फाटिका द्रक्त चदनात्स्वणकालुभौ । रक्ता दयस सोसात्कास्यात्या योनहा मात ॥ सवर्णवांपटे लेटयागधमडलवे पुवा। पत्राणि-~-ग्रह पर्णानिदेयानि पासासि कुसुमानिच । धूपामोदोत्र सुरभिरु परिष्टाद्वितानाम् । शाभाथस्थापयेत्प्राज फलपुष्पसमन्वितम्।
कर्मकाण्ड रत्नाकरे, प्रयाग परिभाषा ग्रहभक्ष्यमाहः- गुडौदनं वर्दद्यात्सोमाय घृतपायसम् । अंगारकाय संयाव बुधाय क्षीर पष्टि कम् । दध्योदनंच जीवाय शुक्रायर गुडौदनम् शनेश्चराय कृशर मज्जामामंच राहवे । चित्री- दनं च केतुभ्यः सर्व भक्ष्य रथात्रयेत । संस्कार भास्कर स्कान्दे:--जन्म भूर्गोत्र -मग्निश्च वर्ण स्थानं मुखानि च । यो ज्ञात्वा कुरुते शान्ति ग्रहास्तेना 5 वमानिताः ॥ ग्रहाणां जन्मभूमय:---उत्पनोऽर्क कलिंगेषु यमुनायांचचन्द्रमा। अंगारकस्त्ववन्त्यां च मगधायाहिमाशुजः । मैन्धवेपुगुरुजांतः शुक्रोभोजकटेतथा । शनैश्चरस्तुसौराष्ट्रेराहुवैराटिनपुरे । अन्तर्वातथाकेतु. इत्येताग्रहभूमयः । संस्कारभास्थरे ग्रहगोत्राणि --~-श्रादित्य काश्यप गोत्रे अत्रिजश्चंद्रमाभवेत् । भारद्वाजो भवेभौमस्तथाऽत्रेयश्चचन्दजः । शक्रपूज्योऽङ्गिरोगोत्रः शुकोवैभार्गवस्तथा ॥ शनि काश्यपगोत्रोऽथराहु पैठीनसिस्तथा । क्तवोजैमिनेयाश्च ग्रहगो- त्राणिकीर्तवेत् । दिग्विभागेनग्रहाणां मुखानि स्कान्डे-शुक्राप्राङ्मुखौ ज्ञेयौ गुरुसौम्या बुदड्मुखौ । प्रत्यड्स: शनि सोम. शेषादक्षिणतोमुखा. । श्रादित्याभिमुखा. सर्व साधिप्रत्यधि देयता । स्थापनीया मुनिश्रेष्टा नान्तरेण परामुखा प्रामुरात्वम् । ऊघछिन्च । उट्मुस- स्नम्-यामदृष्टित्वम् । दक्षिणमुखत्वम- दक्षिणदृष्ठित्वम् । ग्रहामयः संस्कारगणपतौ-- आदित्ये कपिलोनाम पिंगलः सौमउच्यते । धूम्रकेतुस्तथाभौम जाठरोऽग्निबंधस्मृतः । गुरौचैम शिस्तीनाम शुक्रभवति हायक । शनैश्चरेमहातेजाराहुकत्यो ताशन । ततोयजमामाभिषेकार्थ कलशस्थापन कान्दे-~-प्रागुत्तरेण कलश दध्यक्षत विभूपितम् 1 पचपल्लबसंयुक्त भूमी संस्थापयेवुध । वरुणेन विधानेन पृज येत्सु प्रयत्नत । होमार्थकुडमानमाह स्कान्दे.- श्रत परं प्रवक्षामि हामार्थ टमानकम् । नवग्रहमखेकंड हस्तामा समभवत । चतुरयमधी- हस्तं योनिनक समंपलम् । चतुरंगुल विस्तार मंखलास्तद्वदुच्छिना । भानहीनदिक पुंडमनक भगदंभधेत ! यस्मात्तस्मात्युगंपूर्ण शान्तिकुंड विधीयते । लतहोमे कु डमन--- अस्माइश गुण प्रोको लतहोम स्वयंभुवा । श्राहुतीभि प्रयलन दक्षिणाभिस्तथैवन । द्विहस्त विस्तृ- संतद्वच तुरखंसमतत' । लतहोमभमकुंडे योनिवर्क भिमसलम् । विशेषो होमपध्दती द्रव्य । होमकु डोत्तर गर्वेऽपि देवता स्थापनार्थ वेदीनिर्माणस्त व. 'व-तस्यात्तर पूण चितस्ति त्रयसंस्थितम् प्रादुदप्पपन तथचतुरसं समंतस । विभादहितं प्रतिस्थाटिल विश्वकर्मणा । संस्थापनाय देयाना वमत्रयसमावृतम् । ब्यगुलं इयुद्वितोपत्र प्रथम समुदाहतः अंगुलोच्य संयुफबप्रद्वय भयोपरि यंगुलस्यच विस्तार सिर्वेषांकरभ्यतेबुधैः । दशांगुली द्रिताभित्ति स्थंडिलेस्यात्तथोपरि । तस्मिन्नारहर्य देवान्पूर्वपत्पुष्पतंडुलै आदित्याभिमुखा सर्ने साधिप्रत्याधि देवता । स्थापनीया मुनिश्रेष्ठ नोत्तरेण पराङ्मुखाः गरुत्मानधिक स्ता संम्पूरयः धियमिच्छता । शामध्वनि शरीरस्सं नाहनः परमशिन. 1 कोटि दोम कर्मकाण्ड रताकरे, ग्रहयाग परिभाषा (१४५) कुइमानम्-अस्माच्छत गुणा: प्रोतः कोटिहोमः स्वयंभुवा । आहुतीभिः प्रय लेन दक्षिणाभिः फलेनच । पूर्ववद्महदेवा नामायाहन विसर्जने । होममंत्रास्त एयोकाः स्नाने दाने तथैवच । कुंडमंडप दोनों विशेषोऽयंनियोधर्म । कोटिहोम चतुर्हस्तं चतुरसं समन्ततः । यौनिषकद्वयोपेतं तदप्याहुत्रिमेखलम् ॥ सर्व कुण्डेपुमेखलामानम् --व्यंगुला भ्युच्छ्रिता कार्या प्रथमामेखलाचुधैः व्यंगुलाभ्युच्छ्रितातद्वद्वितीया परिकोत्तिता । उच्द्राय विस्तरपशा तृतीया चतुरंगुला साता देकांगुलं त्यवत्या मेखलानां स्पितिर्भवेत् । कुएडा मेखलालक्षणम्-- स्युवेहिमखालास्तानंदां ६ ग ६ व्यु ३ श्ववेद ४ नि ३ करविततय इति । कंठावहि मैसला भपन्ति, तत्राधामेखला नयांगुलोन्नता चतुरंगुलविस्तृताभवति । कंठलक्षणम्-~-सातारकुंडग- तत् व्यंगुलेन, एकांगुलेनवहिः कंठोभवति । कंठस्यक्त्वा भेसलाकार्या । नाभिलक्षणं कुडर- लावल्याम्-तेषां कुंडानांमध्ये पेदांगुलेश्चतुभिरंगुर्लविस्तृतः द्विरंगुलैरुचः कुंडाकारवन्नभिभवति सनामिः पाकंडे नभवति, रात्रकणिकायाः सत्यात । शारदा तिलकेकुंडाना कल्पयंदन्तना भिमंबुज सन्निभाम । तत्कुंडायनुरूपया मानमस्य निगद्यते । मुध्यरल्यंकहस्कनांना भिरुत्सेधती मता । नेत्रवेदो गुलीयापिपाझे नाभिचपर्जयेत । योनिलेक्षणं-दोधारसशैिस्तु तथैवचोचास्थ लात्तथावेद लवैस्तताच । एकाधिभागैर्यदि मेखलास्यात्तदाच योनिर्भवतीय मेव । साचाश्वत्थ दलाकृतिः पुनरियंसाकुंड सिद्धियुक्तबच्चाध्यमाद्भपतीह हस्त्यधर पद्विस्तार दैव्योभवत् ।। वसिष्टः-योनिश्च पश्चिमेभागे प्रांड्मुखीमध्यसंस्थिता पडंगुलैश्च विस्तीर्णचायता द्वादशं गुलैः ॥ मेखलोपरि सर्वत्र अश्वत्थदल सन्निभा ॥ शारदातिलके-स्थलादारभ्य नालस्यायो न्यारं प्रेसरंध्रकम् । कल्पलेतायायामले-जालमेखलयोर्मध्ये परिधि स्थापनायचरंधं कुर्यात्त- था विद्वाद्वितीय मेखलोपरि । योनिकुंडे तथायोनि पाझेनाभिच वर्जयेत ॥ विशेषः कंडमंडप ग्रंथेषु द्रष्ट होमं स्थंडिले बास माचरेत् । हार्यो ब्रह्मापश्चान्मुखे स्थितः । संस्नाप्यस्थापित. कुंभ चतुर्बाहुश्चतुर्मुसः । ब्रह्मयज्ञान मितिवा गायत्र्यावा प्रपूजयेत् ।। ग्रहसमिध-अर्क पलाश खदिर अपामार्गो थपिप्पल. । श्रौदुम्बर शमीदूर्वा कुशाश्च समिधः क्रमात ११ समिधामानम् प्रादेशमात्रा अशिफा अशाखा अपलाशिनी । समिधः कल्पयेत्प्राज्ञः सर्व कर्मसुसर्वदा । एकाति प्रमाणं परशुरामकांरिकांसुकर्षमात्रं घृतं होम शुक्तिमानं पय स्मृतमुक्तानि पंचगव्यानि शुक्तिमात्राणिसाधुमि. । तत्समंमधुदुग्धानमक्षमा- प्रमुदाहृतम् । दधि प्रसूति मात्रस्यालाजा, स्युर्मुष्टि संमिताः । पृथुकास्तत्प्रमाणांस्युः सक्तयोड पि तथाविधाः ॥ पला? गुडमानंच शर्करापितथाविधा । प्रासाई मानमन्नानामिनुः पर्वावधिः स्मृतः । एकैकं पत्रपुष्पादि तथाऽपूपादि कल्पयेत् । कदलीफल नारिंग फलान्यैक कशीविदुः । अष्ठधानारि वेलानिखंडितानि विदुयुधाः । ब्रोहयो मुष्टिमात्रा.स्यु मुंद्गा माषायवास्तथा ।.. चन्द्र चन्दन कश्मीर कस्तूरी यक्षकदमान् । कलयासम्मितानेता गुग्गुलंवदरास्थिवत । चतु, पष्ठितिलैः प्रोक्ता तिलानामाहुतिर्बुधैः । श्रोहीणां च यवानांच शतमाहुति रिष्यते । द्रव्यागों प्रतिनिधयः-विष्णु धर्मोत्तरेध्य लाभे पयोपाहा मध्वलामे तथागुड.। घृत प्रतिनिधि कुमा- उपयोवा दधियानृप । घृतस्यप्रतिनिध फुशर्कडिका व्याख्या द्रष्टव्याः ॥ ऋत्विग्धरण . - १६ (१४६) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, ग्रह्याग परिभाषा स्कन्द पुराणे-नवग्रह मखेकुर्यादिविजश्चतुरः शुभान् । अथवा चैकमभ्यर्च्य विधिना ब्रह्म- णासह । ग्रहदीपिकायाम्-ऋत्विजोऽष्ठौ चचत्वारौ द्वाषप्येकस्तथैवच । एतच्चोपलदणं बहवोऽपि कर्तव्या: । होम संख्यकान् ऋत्विजो वृणीत । आचार्य ब्रह्माणो विनावरणं सर्वत्र होतृत्वा नुपपत्तेः । उक्तं चानन्तभाप्ये-होतृत्व प्रापणायैतद्वरणं दृष्टसाधनम् । यजमानेनक कर्तव्य मानन्त्यार्थ मिहापितत् । वरानन्तरं ऋत्विजि मृते रोगपीडितेवा तत्स्थाने यजमानो, ऽ न्यं द्विजं वृत्वा कर्मणि योजयेत्-यावन योज्यतेऽज्यस्तु परणेन स्वकर्मणि । नतावन्तत्समाख्यानं लभते कर्म हेतुकम् । होमेमूद्राः-होमे मुद्रा स्मृ- तास्तिस्रो मृगौहंसीचसूकरी । मुद्रांविनाकृतोहोमः सर्वोभवति निष्फलः । मुद्रालणमाह- सूकरी करसंकोची हंसीमुक्त कनिष्ठिका ॥ मुक्तकनिष्ठा तर्जनी, मृगौमुद्रा प्रकीर्तिता। कार्यपरत्वेनहोमेमुद्रा-शान्तिकेतु मृगौ या हंसीपौष्टिक कर्मणि । सूकरीमारणोधाते काया तंत्रविदुतमैः । मृगीमोक्षेप्रकर्त्तव्या आहुतिः सर्वकामिका । हुतंयमुद्याहीनं तत्सर्वनिष्फलं भवेत् ॥ यथोक्ताभावेयज्ञकरण दोपमाह-अनहीनः कृतोयस्माद्दुभिंत फलदोभवेत । अन्नहीनोदहेद्राष्ट्र मंत्रहोनस्तु ऋत्विजः । यष्टारं दक्षिणाहोनीनास्तियज्ञसमोरिपू: नावाप्याल्पधनः कोल्लक्षहोमनरः कचिन् । यस्मातपीडाकरोनित्यं यज्ञेभवतिविग्रह. । यस्तुपीडाका नित्यम ल्पवित्तस्यवैग्रहः । तमेव पूजेयद्भक्तया द्वौबात्रीनवां यथाविधी एकमभ्यर्चयेभलपा ब्राह्मण वेदपारंग। दक्षिणाभिःप्रयत्मनेन वहूनल्पवित्तवान् । लक्षहोमस्तुकर्तव्यो यथावित यथाविधिः। यतः सर्वानवाप्नोतिकुर्वनकामान्विधानतः। सतंकाम मवाप्नोति पदमानत्यमश्नुते॥ अनेन विधिनायस्तु कोटिहोमं समाचरेत् । सर्वान्कामानवाप्नोति ततोविष्णुपदंब्रजेत् । अन्यथा फलंदपुसांनकाम्यं जायते कचित् । तस्मादयतु होमस्य विधांनं पूर्वमाचरेत् ॥ होगसमये द्रव्यदेवतानां ध्यानम्-देवतानाममिध्याननकरोत्यत्रमूढधीः। तस्यकर्मवृधनस्या दितिवेद- विदोविदुः ॥ द्रव्य तृतीययांभ्यांये देवतांच दुतियया ॥ द्रव्यदेवत रूपत्वात्कर्मणोऽतस्तदुच्यते ॥ प्रहाणं द्रव्य न्यूनवाहुल्ये अहुती संख्याप्रमाणं प्रयोगपारिजाते-ततोयजमानस्य द्रव्यत्यागन्त-समिदादि द्रव्येण प्रतिग्रहं प्रतिद्रव्यं दश दशाहुती त्या अधिदेवतादीनुदिश्य प्रत्येक तिस्रः तित्र: एकैकांवा पाहुतिहुत्याचतसभि व्याहतीभिश्चतस पाहुती जुहुयात- होमवाहुल्ये,यदा नपग्रहाणामष्टोत्तर शताहुति होमसंख्यासु, अधिदेवताप्रत्याधि देवताना तृतीयाँ सेन जुहुयात् दशमांशेन । होमोत्तर कृत्यमाह-पूजांकृत्या ग्रहाणाच हुवैरिस्वष्ट कृदाहुतिः। नवाहुतीस्ततोहुत्वा वलिदान ममाचरेत ॥ मूनिमितिमंत्रेण दद्यात्पूर्णाहुतिततः । होमरोपं समाप्याथ आचार्योऽधद्विजैःसह अथाभिषेक मंत्रेण वाद्यमंगलगीतकैः । पूर्गकुम्भेनतेनैन होमान्ते प्रागुदगुखैः। अव्याजा बयवै ब्रह्मन हेमन्नाग्दास भूपित. । यजमामस्य कर्कव्यं चतुभिः स्नपनं ॥ द्विजा ऋत्विगादीनां दक्षिणदि-भक्ष्यान्दद्यान्मुनिश्रेष्ठ भूपणान्यपिशफितः। शयनानिसवाणि हेमानिकटकानिच । स्वर्णगुलिपवित्राणि कंठसूत्राणिशक्तिमान् । नकुर्याद्दक्षिणाहीनं वित्तसाढयन- मानवः । अददल्लोभतोमोहात्कुलक्ष्य मवाप्नुयात । अग्नदानंयथाशक्तथा कर्तव्यं भूतिमिच्छता।। धनिक दरिद्रादिभिर्दक्षिणादेयप्रमाणे कार्यानुसारं-वाराह पुराण- म्याहताना. सह सत्य । होमेशुल्वं द्विजेऽर्पयेत् । मापमानं सुवर्णन्तु लक्षहोमेरातंयना । धनिको द्विगुणंदया- कर्मकाण्ड रनावरे, पतिः ग्रहयाग भ्रद्रम् । (९४७ निगुणंतुमहाधनः । यार्द्रतुदरिदेण दातव्यं पुण्यलब्धये । दद्यान्महा दरिद्रस्तु तदर्धशुल्क- मेत । महाभारते--पंदोपनिषदेचेच सर्वकर्मसुदक्षिणा | सर्वनैयतु चोद्दिया भूमिगांवोधका- चनम् ॥ शेषः पूजाविधीस्पष्ठः । इतिग्रहयाग-परिभाषा । ॥ नवग्रह स्थापने वेदी ॥ ॥ ग्रहयाग भद्रम् ॥ ईशाने आग्नेये चतुरस्रः श्वेतश्चन्द्रः वाणाकारः पीत. दुधः दक्षिणे। वाम- अ००। प्र० दे० हरिः । विष्णुः पूर्वे पञ्चकोणत्मकः श्वेतः शुक्रः दक्षिणे। वामे- अ० देवः। प्र०वः } ऐंद्री: दक्षिणे। घाम- अ० देवः। ३० देवः उमा प्रापः मध्ये वर्तु लाकार. रक्तवर्णः उत्तरे दीर्घचतुरस्त्रः पीतवर्णो गुरुः दक्षिण। वामे- अधि-२०॥ ३० दे० ब्रह्मा । इन्द्र. स्कन्द.। पृथवी म० दे० प्र० दे० दनि । वाम- भौमः त्रिकोणात्मकोरक्तः दक्षिणे दक्षिणे। वामे. अधिदेव.। प्रत्यधिदेव. ईश्वरः। अग्निः th : | Base ०३०. 10000 - ME ००० }०३० " ३ ० ० ० - Me eya histinent hchaei MLates pethi । १४%) कमकाण्ड रत्नाकर, पहयाग पद्धतिः , अथ ग्रहयाग पद्धतिः अथपूर्वोक्तविधानेन वेद्यांनवग्रहस्थापनार्थ नवकोटाकारा- णिकृत्वा, तत्राग्न्युत्तारणपूर्वकंपूर्वोक्ताः प्रतिमाः सर्वेसूर्याभि- मुखाः संस्थाप्य, पूजासामग्रीवरणद्रव्यंच सम्पाद्य स्वासनउप- विश्य पत्नीस्वदक्षिणतउपवेशयित्वा, श्राचम्यभूतोत्सादनंकृत्वा रक्षादीप प्रज्वाल्यसम्पूज्यच, गणेशादीन्सम्पूज्य, संस्मृत्वाच,- प्रधानसङ्कल्पंकुर्यात-30 अद्येत्यादिदेशकालौ संकीर्त्यामुकोई 1 तथाचामुकराशेरमुकशर्मणो ऽस्यकुमारस्य वटोवीजगर्भ समु- वैनो निवर्हणद्वारा आयुर्व!भेधाभिवृद्धये श्रौतस्मातकर्मानु-: छानसिद्धिद्वारा अद्य,श्वो, वाकरिष्यमाण (चूडोपनयन वेदारंभ समावर्तन कन्योद्वाह, तथा दशाविदशान्तर्दशास्थितादित्यादिग्रह सूचितदुष्टफलोपशान्तिपूर्वकशुभफलप्राप्तये ) अमुक कर्मणिसर्वो- पद्रव शान्तिपूर्वक दीर्घायुरारोग्य हर्षविजयमाप्तये श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थच तदुपयोग्य युतात्मकग्रहमखमण्डपे मखसंरक्षणायवरु- : गपूजनपूर्वकं ग्रहयाग मण्डलस्थ सूर्यादिनवग्रह साधिप्रत्यधि देवताष्ठलोकपालादीनांचपूजनं करिष्ये तथाच तत्पूर्वागत्वेना । चार्यादीनां वरणश्चकरिष्ये ॥श्राचार्यत्राह्मणं पाद्य मधुपर्कादिभिः सम्पूज्य, वरणासामग्रींच, करेकृत्वा-सकल्प:-अयेत्यादि० श्रमकोहं करिष्यमाणा मुककर्मणि, एभिर्गन्धाक्षतपुष्प पूगीफल करांगुलीयक द्रव्यधौतवस्त्रोत्तरीय यज्ञोपवीतपुष्पमालादिभिः, अस्मिनग्रहयागकर्मणि श्राचार्यकर्मकर्तुममुकगोत्रममुकशर्माणं अमुकवेदाध्यायिनं आचार्यत्वेनत्वांवृणे, वरणद्रव्यंतस्मैदत्वा, वृतो 5 स्मीत्याचार्योक्तिः। प्रार्थयेत्-30 प्राचार्यस्तुयधास्वर्गे० 'संप्रार्थ्य-यजमानोक्तिः-अस्यग्रह यागकर्मणः प्रतिष्ठापनार्थ त्वम्मेयाचार्योभव । अहंभवानीतिप्रत्युतिः॥ तथैव ब्रामणं- 'सम्पूज्य-अयेत्यादि० एभिर्वासांगुलीयक धौतवस्त्रादिभिः अस्मि न्ग्रहमखेकृताकृतावेक्षणादि ब्रह्मकर्मकर्तृतमत्वेनैभिर्वरणद्रव्ये + +-- कर्मकाण्ड रताकरे, ययाग पद्धति (१४६) रमुकगोत्र पयरममुकशर्माएं ब्राह्मणत्वामहंवृणे । वृतोऽ स्मीति ब्रूयात, प्रा०-यधाचतुमखो० । अस्मिन्ग्रहयागकर्मणि, त्वमे ब्रह्मा- भय । अहंभवानीति प्र० एवंहोमसंख्यानुसारेणऋत्विजोड पि वृणुयात् ॥ शान्तिपाठार्थ यथाविस्तारतश्चतुरो ब्राह्मणान्द्वार- पालानपिवृणुयात् ॥वा होमवेलायांहोमकुण्टसन्निधौ, वृणुयात् । इदानींतु, जापक ब्राह्मणान्वृणुयात् ।। 30 अयेत्यादि० अमुकोऽहं अमुककर्मनिमित्तकग्रहयाग कर्मणिनिर्विघ्नार्थमादौ, गणेश्वरस्य जपंक अमुक ब्राह्मणत्वामहंवृणे || एवं सूर्यादीनामपि जापकां- श्च वृणुयात् ॥ यजमानोक्तिः-यथाविहितकर्मकुरुत । तेपा प्रत्युक्ति:-करवामः ॥ इति वरणविधिः॥ , अथ ग्रह स्थापन पूजनम् । ततः शुक्लाम्बरधरः शुक्लमाल्यानुलेपनःसपत्नीकः साचा- यात्विक्सदस्य सहितोयजमानः। जलपूर्णकलशहस्तो मगल- ध्वनि पुरःसरोभद्रं कर्णेभिरित्यादि मन्त्रान्पठन् मण्डपंप्रदक्षिणी कृत्य, पश्चिमद्वारेणपविशेत्-तत्रग्रहवेदी सन्निधौ, पूर्वाभिमुखो पविश्य, पत्नीस्वदक्षिणत रुपवेशयेत् प्राचम्यार्घसंस्थाप्य भूतो- त्सादनंविधाय पंचगव्येनमण्डपं सम्मोक्ष्य, पूर्वस्यांपूर्वाभिमुग्वं दीपंसम्पूज्य, ( इदानींकचित्पद्धतिपुकुण्डे अग्निस्थापनविधि राचार्यद्वारा लिग्वितोदेशाचारमनकर्त्तव्यम् ) पूजासङ्कल्पंकुर्यात अद्यत्यादि संकीर्त्यामकोहं ग्रहयागकर्मणः श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फलावाप्तये सुवर्णताम्रादि प्रतिमासु आदित्यादिनवग्रहाणां, अधिदेवता प्रत्यधिदेवतासहितानां पद्धयुक्तदेवतानां वा सर्वेषां आवाहन स्थापन पूजनंचकरिष्ये, ततो ग्रहभद्रेशानकोणे अष्टदल कमलविलिख्य, कलशंसंस्थाप्य महीयोरितमंत्र मारभ्यप्रसन्नो भव सर्वदेतिपर्यन्तवरूणंयागरक्षार्थ तत्रसम्पूज्य ॥ तत्रैवकलशे पंचाशत्कुशनिर्मितं चतुर्भुज चतुर्मुखंब्रह्माणंच रक्षार्थस्थापयेत् ।। रक्षासूत्रमामन्यच स्थापयेत् । ततो वेद्यांग्रहानावादयेत् तत्रादौ कमकाण्ड रताकरे, ग्रहयाग पद्धतिः , मध्ये कर्णिकायां द्वादशांगुलबर्नुले रक्तमण्डलेप्राङ्मुखं सूर्यरक्त पुष्पाक्षतायेत्--30 पद्मासनः पद्मकरोद्विवाहुः पद्मद्युतिः सप्त तुरङ्गवाहनः । दिवाकरो लोक गुरुः किरीटी मयि- प्रसादं विदधातु देवः ॥ आवाहनम्-ॐ आकृष्णोक्ति हिरण्यस्तूप ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः सवितादेवता सूर्यावाहने विनि- योगः-ऋक् ॐ आकृष्णेनरजसा वर्तमानो निवेशयन्नमृतं मर्त्यच । हिरण्ययेन सवितारथेन देवोयातिभुवनानिपश्यन,, ॐ भूर्भुवः स्वः कलिंगदेशोद्भव काश्यपस गोत्र रक्तवर्णपूर्वाभिमुग्व सूर्य, इहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिष्ठितो वरदोभव, ततः सूर्यदक्षिण पार्वे, सुर्याधिदेवं-ईश्वरम्-शुक्लपुष्पैर्ध्यायेत्-ॐ पंचवक्रोवृ- पारुढः प्रतिवर्क त्रिलोचनम् । कपाल शूलखट्वाङ्गी चन्द्रमौली सदाशिवः। ॐ त्र्यवकमितिवशिष्ठऋपिरनुष्टप्छन्द स्त्र्यवकोदेवता त्र्यंबकावाहने वि०॥ ॐ श्यवकं यजामहेसुगान्ध पुष्टिवर्दनम् । उर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् ॥ ॐ भू० त्र्यंबक सूर्यदक्षिणे, इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रति । ततो वामपार्चेसूर्यप्रत्यधि देवतामग्निम्-ध्या० ॐ पिंगलः श्मश्रुकेशाक्षः पीनांगजठरोड- रुणः । छागस्थः साक्षसूत्रोऽग्निः सप्ताचिः शक्तिधारकः ॥ ॐ अग्नि दूतमितिमंत्रस्य विरूपाक्षऋपिर्गायत्रीछन्दो ऽग्निर्देवता , ऽग्न्यावाहने वि० । ॐ अग्निदृतंपुरोदधे हव्यवाह मुपवेदेवा ३॥ प्रासादयादिह । ॐ भू० अग्ने सूर्यवमि इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रति तत आग्नेयदले चतुरस्र सोमश्वेतपुष्पैः ॐ श्वेता- म्बरः श्वेतः विभूपणश्च श्वेतातिर्दडधरोद्विवाहुः । चन्द्रोऽमृता- त्मावरदः किरीटी श्रेयांसिमद्यं विदधातुदेवः । ॐ इमंदेवा इति गौतमऋपि विपदा विराट्छन्दः सोमोदेवता सोमावाहने वि० । ॐ इमंदेवाऽअसपत्न र्ट • मुवद्धंभहतेक्षत्राय महतेज्यैष्ट चाय महते जानराजायेन्द्रस्येन्द्रियाय । इमममुष्य पुत्रममुप्प पुनमस्यै น विशऽएपवोमी राजा सोमोऽस्माकं ब्रामणा ना भू० यमुनातीरोद्भव, आत्रेयसगोत्र शुक्लयर्णा धोदृष्टे साभि- राजा, ॐ कर्मकाण्ड रखाकर, ग्रहयांग पद्धतिः 'मुखसोमेहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिः । ततः सोमदनिणे सोमाधि देवतामुमा सूर्याभिमुग्वहमुष्ठिं, ध्यायेत्-ॐ अक्षसूत्रंच कमल दर्पणचैव कन्दुकम् । उमा विभत्तिहस्तेपु पूजिताच सुरासुरैः। प्राo---ॐ श्रीश्चत इति नारायणऋषि स्त्रिटुप्छन्द उमादेवता, उमाचाहने वि० । ॐ श्रीश्चते लक्ष्मीश्चपत्न्या वहोराने पारर्वेन- क्षत्राणि रूपमश्विनौव्यात्तम् । इष्णन्निपाण मुम्मइपाण सर्व- लोक म्मईपाण। ॐ भू. सूर्याभिमुग्वदृष्टे उमे इहागच्छेहतिष्ट, सुप्रति । ततः सोमवामे प्रत्यधिदेवतामपः सूर्याभिमुखदृष्टिं ध्यायेत् ॐ अपःस्त्रीरूप धारिण्यः श्वेतामकर वाहनाः। दधानाः पाशकलशौ मुक्ताभरणभूपिताः । ॐ अप्स्वितिमेधातिथि ऋषिरनुष्टुप्छन्दः, श्रापोदेवता अपामावाहने वि० । ॐ अस्व- न्तर मृतमप्सु भेषजमपामुतप्रशस्तिष्व श्वाभवतवाजिनः । देवी राप्पो योवऽर्मिः प्रतृतिः ककुन्मान्याजसा स्तेनायवाज । सेत् । ॐ भू० श्राप इहगच्छतेहतिष्ठत सुप्रतिष्ठिता वरदाभवेयुः ।। ततो दक्षिण त्रिकोणमंडले रक्तपुष्माक्षत्तभौमम् ध्यायेत्-ॐ रक्ताम्बरो रक्तवपुः किरीटीचतुर्भुजो मेषगमो गदाधरः। धरासुतः शक्ति- धरश्चशूली सदाममस्या दूरदः प्रशान्तः । श्रा० अग्निभूति विरूपाक्षऋषिर्गात्रीछन्दो मौमोदेवता भौमावाहने वि० ॐ अग्नि- { दिवः ककुत्पतिः पृथिव्याऽअयम् अपारेता सिजिन्वति। ॐ भू० । अवन्तिदेशोङ्गव भारद्वाज गोत्र रक्तवर्ण दक्षिणदृष्टे भौम सूर्याभिमुग्व इहागच्छेतिष्ठ सुप्रति ॥ ततो भौम दक्षिण पावें मौभाधिदेवं सूर्याभिमुखष्टिं, स्कन्दं ध्यायेत्-ॐ कुमारः पण्मुग्वः कार्यः शिखण्डी कविभूषणः। रक्तांवर धरो देवो मयूर वरवाहनः ॥ ॐ यदक्रन्द इति दीर्घतमा ऋषिस्त्रि- टुप्छन्दः स्कन्दो देवता स्कन्दावाहने विनियोगः। ॐ यदकन्दः प्रथमं जायमानऽ उद्यन्तसमुद्रा दुतवा पुरीपात् । श्येनस्यपक्षा हरिणस्य बाह उपस्तुत्यं महिजातन्ते ऽ अर्वन ॥ ॐ भू० स्कन्दे हागच्छेहतिष्ठ सुप्रति । ततो भौमवामपार्वे सूर्याभिमुखदृष्टि ( १५२ कर्मकाण्ड रताकरे, ग्रहयाग पद्धतिः भीमप्रत्यधि देवता पृथ्वी ध्यायेत् - ॐ शुक्लवर्णा महीकार्या सर्वाभरण भूषिता । चतुर्भुजा सौम्यवपुश्चण्डांसु सदृशाम्वरा ॥ श्रा०-ॐ स्योना पृथ्वीति मेधातिथिषिर्गायत्री छन्दः पृथ्वी देवता पृथ्व्या वाहने वि०॥ ॐ स्योना पृथिविनो भवानृक्षरा निवेशनी यच्छानः शर्मसप्रथाः ॐ भू० पृथ्वि, इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्टिता वरदाभव ॥३॥ तत ईशाने वाणाकारमण्डले पीतं बुधं ध्यायेत् ॥ ॐ पीताम्बरः पीत : वपुः किरीटी चतुर्भुजो दण्डधरश्वहारी । चर्मासिभृत्सोमसुतः सदामे सिंहाधि रूढो वरदो वुधोऽस्तु ॥ श्रा-ॐ उद्बुध्यखेति परमेष्ठी ऋषि त्रिष्टु- प्छन्दो बुधो देवता वुधावाहने विनियोगः। ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहित्व मिष्टापूर्तस र्ट० सृजेथा मयंच । अस्मिन्त्सधस्थे अध्युतरसस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत ॥ ॐ भू० मगध देशोद्भव आत्रेयस गोत्र पीतवर्ण वामदृष्टे बुध सूर्याभिमुखे इहा गच्छेहतिष्ट, सुप्रति ॥ ततो बुध दक्षिण पार्वे वुधाधिदेवं विष्णु मावाहयेत्-ॐ विष्णुः कौमोदकी पद्म शङ्ख चक्रधरः क्रमात् । प्रदक्षिणं दक्षिणाधः करादारभ्य नित्यशः॥ आo-ॐ विष्णो- रराट मितिदीर्घतमा ऋषि रुष्णिक्छन्दो विष्णुर्देवता विष्णवा वाहने विनियोगः ॐ विष्णो रराटमसि विष्णोः नाप्नेस्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णोईवोसि वैष्णवमसि विष्णवेत्वा । ॐ भू० विष्णोऽइहागच्छेहतिष्ठ सुप्र० ॥ बुधवामपार्ये नारायणं ध्यायेत्,-ॐ नारायणश्चतुर्याहुः शङ्ख चक्रधरः प्रभुः । गदा पन घररचैव नीलजीमूतसन्निभः । श्रा०-ॐ इदं विष्णु रिनिमेधा- तिथिपिर्गायत्री छन्दो नारायणो देवता विष्ण्या वाहने वि०॥ ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे त्रेधानिनधेपदम् । समूदमस्यपाऊँ सुरेस्वाहा ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः विष्णो इहागच्छेहतिष्ट सुप्रति पमा तत उत्तरे चतुरस्र पीत मण्डले गुमंध्यायेत्-ॐ पीतवर्णः पीतवासा अक्षसूत्र कमण्डलुम् । दण्डंखकीय हस्तेपु दधानो गुरुरीश्वरः। श्रा०-ॐ बृहस्पत इति गृत्समद प्रापित्रिष्टुप्छन्दो फर्मकाण्ड रताकरे, ग्रहयाग पक्षति ( १५३) बृहस्पतिर्देवता बृहस्पत्या वाहने विनियोगः। ॐ बृहस्पते । अतियदयों 5 अर्गामद्विभातिक्रतुमननेषु । यहीदयच्छवस ऋतप्रजा ततस्मार द्रविणं धेहिचित्रम् ।। ॐ भूर्भुवः स्वः सिन्धु देशोद्भव शांगिरसगोत्र पीलवर्ण वामदृष्टे सूर्याभिमुख, गुरो इहागच्छेहतिष्ट, सुप्रतिष्टितो घरदोभव ॥ ततो गुरु दक्षिणपार्वे गुरोरधि देवं ब्रह्माणं ध्यायेत-चतुर्मुखः पद्मसंस्थो ब्रह्माकार्य- श्चतुर्भजः । अक्षमाला श्रुवं विभ्रत्पुस्तकंच कमण्डलुम् ।। श्रा- ॐ ब्रमजज्ञानमिनि प्रजापति ऋपित्रिष्टुप्छन्दः ब्रामा देवता -ब्रह्मावाहने वि० ॥ ॐ ब्रह्मजजानं प्रथम पुरस्ता द्विसीमतः सुरु- चोब्वेनऽयावः । सबुध्न्या 5 उपमा ऽ अस्यविष्ठाः सतश्योनि- मसतश्चव्विवः । ॐ भ० ब्रहा निहागच्छेहनिष्ट ॥ ततो गुरुवा- मपार्वे गुरोः प्रत्यधि देवमिन्द्रं ध्यायेत्-~-ॐ चतुर्दन्न गजारूढो वनीकुलिशभूत्करः । शचीपतिः प्रकर्तव्यो नानाभरण भ्रपितः ।। ॐ सजोपा इति विश्वामित्र पिस्थिष्टप्छन्दः, इन्द्रो देवता इन्द्रावाहने वि० । ॐ सजोषा इन्द्रसगणो मरुद्भिः सोमंपिव वृत्रहाशूरविद्वान् । जहिशबू | रपमृधोनुदस्वाथा भयंकृणहि विश्वतोनः । ॐ भृ इन्द्रेहागच्छेपतिष्टः सप्रतिष्टिनो ॥ ततः एवं पञ्जकोयो श्वेत मण्डले शक्रंध्यायेत-श्वेताम्वरः श्वेतवपुः किरीटी चतुर्भुजो दैत्यगुरुः प्रशान्तः। तथा क्षसूत्रं च कमण्डलच दण्टंच विभहरदोस्तु, मलाम् ॥ आ.---300 अन्नादिति प्रजापतिपि रतिजगतीछन्दः शुक्रोदेवता शकावाहने वि०। 30 अन्त्रात्परित्तोरस हाणाव्यपिवत्तपयः सोमप्रजा- पतिः। ऋतेनसत्य मिन्द्रियं विपान टी शुक्रमंधस ऽहन्द्रस्येन्द्रिय मिदं पयोमृतमधु । ॐ भूर्भुवः म्बः, भोजकददेशोद्भवः भार्गवस गोत्र शुक्लवर्ण ऊर्चछे मूर्याभिमुग्व शुहागच्छेहतिष्ट सुप्रति- ठितो वरदोभव । ततोदक्षिणपारवें भृगोरधिदेवमिन्द्रं ध्यायेत्- ॐ इन्द्रः सुरपांतः श्रेष्ठो बज्रहस्तोमहाबलः। सहस्रनेत्रा पीनाङ्गः शतयाकरः प्रभुः। श्राo -30 त्रातारमिन्द्रमिति गर्गऋषिस्त्रिष्टु- .. २० (१५४) कर्मकाण्ड रक्षाफरे, प्रयाग पद्धति प्छन्दः, इन्द्रोदेवता, इन्द्रा वाहने वि० । अत्रातार मिन्द्र मवि- तारमिन्द्र ई० हवेहवे सुहव ई० शृरमिन्द्रम् ॥ हयामिशनं पुरूहत मिन्द्र टे० स्वस्तिनो मघवाधात्विन्द्रः ॥ 30 भृ० इन्द्रेहागच्छेह तिष्टसुप्रति । भृगुवामपाश्र्चे इन्द्राणी भृगोः प्रत्यधिदेवतां ध्या- येत्-30 इन्द्राणी सर्वसिद्धार्था सर्वाभरण भूपिता । वरदा मंडिता कार्या सर्वसौभाग्य दागिनी ॥ प्रा० आदित्यै राष्णा सीति दभ्यंगा थर्वणपियंजुश्छन्द इन्द्राणीदेवते न्द्राण्या वाहने वि०॥ ॐ आदित्यै राष्णासीन्द्राण्याऽ उष्णीयः पूपासि धर्माय दीप्य । ॐ भृ० इंद्राणीहागच्छेह तिष्टसुप्र०॥६॥ ततः पश्चिमे धनुपाकारे कृष्णमंडले कृष्णशनि तिलाक्षत पुष्पैर्ध्यायेत्-ॐ नीलगुतिः शूलधरः किरीटीगृध्रस्थित स्त्रासकरो धनुष्मान् । च तुर्भुजः सूर्यसुतःप्रशान्तःसदास्तुमा वरदोऽल्पगामी । ॐ शन्नो देवीति दध्यगाथर्वण ऋपिर्गायत्रीछन्दः शनिदेवना शन्यावाहने- वि० । ॐ शन्नोदेवी रभिष्टय ऽश्रापोभवन्तु पीतये शय्योरभि स्रवन्तुनः । ॐ भू० सौराष्ट्रदेशोड़व काश्यपसगोत्र कृष्णवर्ण सूर्याभिमुग्व, अधोदृष्टे शने इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रति ॥ ततः शने दक्षिणपाश्वें यममधिदेवतामावाहयेत्-ॐ महामहिषमारूढो धर्मराजश्चतुर्मजः । दंडग्वद्गौऽभयकरौयमराजोऽभयप्रद । श्रा० ॐ यमायत्वेति दध्यहाथर्वण पिर्यजुश्छन्दो धर्मराजो देवता यमावाहने वि० । ॐ यमायत्वागिरस्वते पितृमतेस्वाहा घा- यस्वाहा धर्म:पित्रे ॥ ॐ भू० यमेहागच्छेहतिष्ट सुप्र० । शने मपाश्र्वे प्रजापति प्रत्यधिदेवं ध्यायेत्-ॐ यज्ञोपवीती सिहस्थ एकवक्रश्चतुर्भुजः । अक्षस्रज नुवंविभ्रत्पुस्तकंच प्रजापतिः॥ प्रा० ॐ प्रजापत इति हिरण्यगर्भ ऋषित्रिष्टुप्छन्दः प्रजापतिर्देवता प्रजापत्याचाहने विनियोगः।-ॐ प्रजापते नत्वदेतान्यन्यो वि- श्वारूपाणि परितावभूव । यत्कामास्ते जुहमस्तन्नो ऽ अस्तुव्यय है० स्यामपतयो रयीणाम् । ॐ भूर्भुवः स्वःप्रजापते, इहागच्छेह तिष्टसु० ॥७॥ ततोनैऋत्ये सूफारे कृष्णमंडले राहृतिलाक्षत कर्मकाण्ड रजायरे, ग्रहयाग पद्धति १५५ ) पुष्पायेत्-30 नीलाम्बरो नीलवपुः किरीटी कराल वक्रः कर वाल शूली । चतुर्भुजश्चर्मधरश्चराहुः सिंहाधिरूढो वरदोस्तुम- हाम् । श्रा0-30 कयानश्चित्र इति वामदेव ऋपिर्गायत्रीछन्दो राहुर्देवता राहावाहने वि० । ॐ कयानश्चित्र 5 आभुववृती सदा वृधः । सरखाकयासचिष्टया वृता ।। ॐ भू० वैराटिनपुरोद्भव पैठी नसगोत्र कृष्णवर्ण दक्षिणदृष्टे सूर्याभिमुग्य राहो, इहागच्छेहति- ट सुप्रति ॥ राहोदक्षिणपार्वे कालंध्यायेत्-ॐ जन्तुप्राणहरो कालो लेलिहानश्चरषिणीम् । यमदृताग्रणी स्त्वंवैमाविघ्नं कुरुमे मखे । श्रा-30 काीरसिसमुद्रस्यत्वा क्षित्त्याऽउन्नयामि समा- पोऽअगिरग्मत समोपधीभिरोषधीः ॥ ॐ भू" कालेहागच्छेहति प्ट सुप्र० । राहोमपाश्र्वे राहोः प्रत्यधिदेवा सन्ध्या येत् ॐ अक्षसूत्रधराः सर्पाः कुंडिकाविप देट्रिणः । एक भोगा स्त्रि भोगावा सर्वकार्याश्चभीपणाः ॥ श्रा-30 नमोस्त्विति देव- श्रवाऋपि त्रिष्टुप्छन्दः सर्गदेवताः सर्गवाहने वि० । ॐ नमो ऽस्तु सभ्यो येकेच पृधिवीमनु । येऽअन्तरिक्षे येदिवितेभ्यः सर्पेभ्यो नमः ॥ 0 भृ० सर्पा इहागच्छतेह लिष्टत सुप्र० ॥८॥ ततोवायव्ये ध्वजाकारे धूम्रमंडले केतुं ध्यायेत् ॐ धूम्रोद्विबाहुर्व रदोगदाभृद्गृध्रासनस्थो विकृताननश्च । किरीटकेयूर विभूषिता ङ्गः सदास्तुमेकेतु गणः प्रशान्तः। श्रा०-केतुकृण्वन्निति मधुश्छन्द ऋषिर्गायत्री छन्दः केतुर्देवता केत्यावाहने वि०। 30 केतुंकृण्वन्न केतवे पेशोमाऽअपेशसे । समुपद्भिरजायथा ।। ॐ भू० अन्तर्वे दीय समुद्भवजैमिनिसगोत्र धूम्रवर्ण दक्षिणदृष्टे सूर्याभिमुख केत्तो, इहागच्छेहतिष्ट, सुप्रति । केतोदक्षिण पार्श्व केत्वधिदेवं चित्रगुप्तध्यायेत्---30 विवेकवांश्च जन्तूनां कर्मणां गुप्तरूपतः सुकृताना मनिष्टानां चित्रगुप्तः सुवेषवान् । श्रा0-ॐ चित्राव सो इति प्रजापतिपिर्यजुश्छदश्चित्र गुप्तोदेवता चित्रगुप्तावा- हने वि० 1 30 चित्राव्यसो स्वस्तिते पारमशीय । ॐ भूर्भुवःस्वः चित्रगुप्त इहागच्छेदतिष्ट, सुप्रति ।। केतुवामपार केतुप्रत्यधि { १५६) कमकाण्ड रताफरे, प्रयाग पद्धतिः देवं प्रामाणध्यायेत्--ॐ हंसपृष्ठसमामहः सिन्दराभश्चतुर्मखः । प्रसन्नवदनः सौम्यो ब्रह्मालोक पितामहः॥ ग्रा-ब्रह्मजज्ञा नमिति गोतमपि स्त्रिष्टुप्छन्दो ब्रह्मादेवता ब्रह्मावाहने वि०॥ ॐ ब्रह्माजज्ञानं प्रथमपुरस्ताद्विसीमतः सुरुयोव्वेनऽभावः। सयु- धन्याऽउपमाऽयस्यविष्टासतश्चयोनिमसतश्चविच । ॐ भूब्रह्मनि हागच्छेहतिष्ठ सु०॥६॥ ततोगणपत्यादिपश्चलोकपालानावाहयेत्।। राहारुतरे गणपतिं घ्यायेत्-30 सिन्दूरवर्णः शुभदा गणेशो राहुसौम्यगः । नागयज्ञो पर्वातीच त्रिनेत्रश्च चतुर्भजः । ॐ गणानान्त्वेति प्रजापतिपि यजुश्छन्दा गणपतिर्देवता गणपत्या वाहने वि० । 30 गणनान्त्या गणपति हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपति र्ट० हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति ० हवामहे व्व- सोमम । श्राहमजानिगर्भधभात्वमजा सिगर्भधम् ।।-30 भू० गणपते, इहागच्छेततिष्ट सु० । शनेरुत्तरे दुर्गाम्-ध्या-30 दुर्गा चतुर्भजासौम्या सर्वाभरण भूपिता। कालानसन्निभादेवीसर्वलोक भयापहा । अम्बेइतिप्रजापतिपिरनुष्टुप्छन्दो दुर्गादेवतादुर्गा- वाहनेदि० ॐ अम्बेऽम्बिकेऽयम्बालिकेनमानयतिकश्चन। ससस्त्य स्वकः सुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् । ॐ भू० दुर्गेइहागच्छेह- तिष्ठ । सु० रवेरुत्तरतोवायुम्-ॐ सर्वमाणेश्वरः सोम्यः सर्वगंध वहः शुची। प्रचण्डवेगगामीच वलवांश्चसमीरणाः॥ ॐ वातो वामनहति वृहस्पतिर्मपिरुपिणछन्दो वायुदेवता वाय्वाचाहने वि० । ॐ व्बातोवामनोवा गन्धर्वाः सप्तवि र्ट सतिः । ते 5 ग्रेश्वमयुजस्ते 5 अस्मिञ्जवमादधुः ॥ ॐ भू० वायोइहागच्छेहति ठ सुराहोदक्षिणे आकाशम्-ॐ नीलोत्पलाभडगन तद्वर्णा- म्वरधारकः । चन्द्राऽहस्तंकर्त्तव्यं द्विभुजंसौम्यदण्डवत् ॥ 30 अग्निश्चेतिविवश्यावृषिर्गायत्रीछन्दो अन्तरिक्षोदेवताकाशस्था- पने वि० ॐ अग्निश्च पृथिवीच सन्नतेतेमेसनमतामवो वायुश्चा-. न्तरिक्षंच सन्नतेनेमेसन्नमतामदः॥ ॐ भू० थाकेशहागच्छेहतिष्ठ सु० । केतोदक्षिणे, अश्विनौ, ध्यायेत्--द्विभूजौदेवभिपजों कर्त फर्मकाण्ड रखापरे, यहयाग पद्धतिः (१९५७) . व्यौदेत्संयुतौ । तयोरोपधयः कार्यादिव्यादक्षिणहस्तयोः। ॐ. यावासेति मेधातिथिञपिर्गायत्रीछन्दः, अश्विनौदेवते अश्वि- नोरावाहने वि० ! 30 यावासामधुमत्यश्विना सून्तावतीतया यज्ञमिमिक्षताम् ॥ ॐ भू अश्विनौ, इहागच्छतमिहतिष्ठतम् सुप्रतिष्ठितोवरदोभवेताम् ॥ (संग्रहशिरोमणौ-वास्तोष्पतिक्षेत्र पालस्थापयेत्तु गुरूत्तरे) गुरोफत्तरे-वास्तुपुमपम्-ॐ क्षेत्रेशो चोस्तुपुरुषः सर्वसौख्यप्रदोविभुः। नागरूपीगतशायी गृहरक्षण तत्परः ॥ ॐ वास्तोष्पतीति वसिष्ठऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो चास्तोष्प- तिर्देवता वास्तोपतिस्थापने वि० } 30 वास्तोपते प्रतिजानी ह्यस्मानन्त्स्वावेशो ऽ अनमीवोभवानः । यत्वेमहेप्रतितन्नोजुपस्व शन्नोभव द्विपदेशचतुष्पदे ।। 0 भू वास्तोष्पते,इहागछेहतिष्ठ । ततवास्तोत्तर क्षेत्राधिपतिध्यायेत्-ॐ क्षेत्राधिपः क्षेत्रपालः क्षेत्ररक्षणतत्परः । सर्वसौख्यप्रदोदेवः सर्वशक्तिधरोविभुः ॥ ॐ क्षेत्राधिपतयेनमः । ॐ भू० क्षेत्राधिपते, इहागच्छेहतिष्ठ, सुम- ति॥ ततः ऋतुसंरक्षकानिन्द्रादि दिक्पालानाचाहयेत् ।। पूर्वेन्द्र ध्या-ॐ परायतगजारूढो बज्रपाणिःशचीपतिः । पुरन्दर: सहस्राक्षोनानाभरणभूपितः । ॐ त्रातारमितिगर्गऋषि स्त्रिष्टु- प्छन्द इन्द्रोदेवना, इन्द्रावाहने वि० । ॐ नारमिन्द्र सवितारमिन्द्र टै हवेहवेसुहवर्ट शूरमिन्द्रम् । हयामिश–पुरुहृतमिन्द्र र्ट स्वस्तिनोमधयाधाविन्द्रः ॥ ॐ भू इन्द्रेहागच्छेहतिष्ठा । अग्नेये अग्निध्या-ॐ छागारूढः शक्तिधरः पिंगाक्षोहव्यवाहकः ।। सताजिटिलोचन्हि रक्तांगोसप्तजिह्वकः । ॐ त्वन्नो अग्नइति हिरण्यस्तृपपि त्रिष्टुप्छन्दोs निर्देवताग्न्यावाहने वि० । ॐ त्वन्नो ऽ अग्नेतवदेवपायुभिर्मघोनोरक्षतन्यश्चवन्ध । त्रातातोक स्थानचेगवामस्यनिमेष र्ट० रक्षमाणस्तवव्रते । 30 भू० अग्नेइहा- गच्छेहतिष्ठ सुप्र० दक्षिणेयमम्-ध्या-30 महिपस्थोमहाबाहुः श्यामांगोरक्तलोचनः। यमराजोदण्डहस्तः खड्गहस्तोभयङ्करः । यम इतिप्रजापतिपिस्त्रिष्टुप्छन्दोयमोदेवतायमाचाहने वि।
( १५% ) कमकाण्डे रताकरे, ग्रहयाग पद्धतिः , ॐ यमश्विनासरस्वती हविपेन्द्रमवर्धयत् । सविमेदवशंभवन्न- मुचानासुरेसचा । 30 भू० यमेहागच्छेहतिष्ठसु० । नैऋत्येनितिं ध्या०-30 रक्तक्पाशभृत्युद्धो नितिर्विकृताननः। प्रेतस्थः ग्वद्गहस्तश्च ध्यातव्यः सर्वदैवतु ॥ ॐ नमःसुतइत्यस्य मधुच्छन्दा ऋपि:पंक्तिश्छन्दो नियंतिर्देवता नियंत्यावाहने वि० । 0 नमः सुतेनिर्ऋतेतिग्मतेजोयस्मयं विवृत्तावन्धमेतम् । यमेनत्वंयम्या- सम्चिदानोत्तमे नाके ऽअधिरोहयैनम् ।। 30 भूनियंते, इहा- गच्छेहतिष्ठ सुप्र० । पश्चिमेवरुणंध्या-30 वरुणःपाशभृत्सौम्यः प्रतीच्यांमकराश्रयः, पाशहस्तात्मकोदेवो जलराश्यधिपोमहान । 30 इमम्म इत्यस्यशुनः शेफऋपिर्गायत्रीछन्दोवरुणोदेवतावरुणा वाहने विनियोगः। ॐ इमम्मेव्वमणधी हवमधाचमृडय । त्वामवस्युराचके ॥ ॐ भू० वरुणेहागच्छेहतिष्ट सुप्र० । वायव्ये वायुम्-ॐ धावद्धरिणपृष्टस्थोखड्गधारीमहाबलः । सर्याभरण शूषाढयोदिव्यमाल्यानुलेपनः । 30 आनोनियुद्भिरिति वशिष्ठ ऋषिन्त्रिष्टुप्छन्दो वायुर्देवता वाय्वावाहने वि० । 0 श्रानोनियु- द्भिः शतनीभिरध्वर र्ट सहस्रिणीभिरुपयाहियज्ञम् । वायो 5 अस्मिन्त्सवनेमादयस्वयूयंपातः स्वस्तिभिः सदानः । ॐ भू० वायो इहागच्छे हतिष्ट सुप्रतिष्टिता। उत्तरे सोमम्- ध्या०-- दशाश्वरथगः सोमो गदापाणिवर प्रदः । नक्षत्राणां च सर्वेषां सोमोराजा प्रकीर्तितः ॥ ॐ वयमिति यन्धु ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः कुवेरो देवता कवेरा वाहने वि०॥ ॐ व्वय ट० सोमवृते तवमनस्तनूषु बिम्रतः । प्रजावन्तः सचेमहि । ॐ भू० कुवेर इहागच्छेहतिष्ट सु०। ईशाने ईशंध्या पूर्वोत्तरे त्रिनेत्रश्च वृषभस्थस्त्रिशूल धक । कपालपाणिश्चन्द्रार्दभूषसः परमेश्वरः॥ ॐ तमीशानमिति गौतम ऋषिर्जगती छन्दः, ईशो देवता, ईशावाहने वि० । ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियं जिन्वमवसे हमहे व्वयम्। पूपानो यथाव्वेद सामसद्वृधे रक्षिता पायुरदब्धः-लस्तये । ॐ भूर्भुवः स्वः, ईशेहागच्छेहतिष्ठ 30 , फर्मका लाफरे, ग्राहयाग पद्धतिः - सुप्रतिष्ठितो वरदोभव ॥ ऊर्ध्व-पूर्वशानयोर्मध्ये-प्रमाणम्- ॐ ब्रह्मयोनिश्चतुर्मूर्तिर्वेदव्यासः पितामहः हमपृष्ठ समासीनः सुवहस्तो महावलः । ॐ ब्रह्मणस्पत इत्यस्य याज्ञवल्क्य ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः ब्रह्मा देवता ब्रह्माषाहने. ॐ ब्रह्मणस्पते त्वमस्य यन्ता सूक्तस्य योधितनयञ्च- जिन्व ॥ विश्यंतद्रं य्यदवन्तिदेवा बृहतदेम व्यिवथे- सुवीराः ॥ ॐ भू० भो ब्रह्मनिहागच्छेहतिष्ट सु०। ततो भूमे रधः पश्चिम नैत्ययोरंतराले, अनन्तं ध्यायेत् ॥ ॐ फरयां- गाधिपतिर्देवो ऽनन्तनामा महाबलः । पातालवासी रुचिरमणि भूषण भूषितः ॥ ॐ याइपवइत्यस्य देवश्रवा ऋषि रनुष्टुप्छन्दा, अनन्तो देवता अनन्ता चाहने वि०। ॐ या ऽ इपयो यातुधा- नानां य्येवा व्यनस्पति ३१ रनु । येवाव्घटेपुशेरते तेभ्यः सप्- भ्योनमः ॥ ॐ भूः अनन्त, इहागच्छेहतिष्ट ॥ इति दिक्पाल स्थापननम् ॥ (कचित्पुस्तकेषु वदयमाए शेषादि देवतानामनपू. जनं नास्तिपरंचात्र गढवाल देश निवासिभिराचार्य वय्यः पुरातन पद्धतिप्वेतेषां स्थापनं पूजनं चोक्तम् प्रमाण रहितत्वादपि, महा- जनोयेन गतः सपन्थेतिन्यायेन साम्प्रदायित्वा त्तत्पूजनंवक्ष्ये सप्रणव चतुर्थ्यन्तेन नाममन्त्रेण पूजनं कुर्यात-यथारवेः पूर्वे- ॐ शेपायनमः, ॐ भू० स्वः-मोशेष इहागच्छेहतिष्ठ, एवंसर्वत्र सोमागे-ॐ वासुकयेनमः । वासुके इ० । भौमाने-ॐ तक्ष- कायनमः, तक्षक इहा। चुधस्याग्ने -कर्कोटकायनमः। कॉ01 गुरोरग्रे-~~-30 पद्मायनमः । पद्म इ० । शुक्रोत्तरे-ॐ महा पद्मा- यनमः। महापण इ० । शनेः पश्चिमे-शङ्खपालाय नमः । शङ्खपाल, इ० । राहोरग्रे-30 कम्वलायनमः । कम्बल, इहाग- च्छेहतिष्ठ। केतोरने-~-30 कम्वलायनमः, कम्बल ३० । ततो यहि मौ-पूर्व-30. अश्थिन्यादि सप्सनक्षत्रेभ्योनमः । ॐ. विष्कुम्भादि सप्तयोगेभ्योनमः । श्रावाहयामि स्थापयामिति सर्वत्र ॥ ॐ यव वालथ कर्णाभ्यां नमः श्रा स्था० । २. सक्ष- , , (१६०। फर्मकाण्ड रसाकरे, प्रयाग पद्धतिः .. -द्वीपेभ्योनमः । श्रा० स्था॥ 30 ऋग्वेदाय नमः, श्रा० स्था। ततो दक्षिणे-30 पुष्यादि सप्तनक्षत्रेभ्योनमः श्रा० स्था। ॐ धृत्यादि सम योगेभ्यो नमः। ग्रा० स्था० । 30 कौलवतैतिल कर्णाभ्यां नमः श्रा० स्था० ॥ सप्तसागरेभ्यो नमः आ. स्था० । 30 यजुर्वेदायनमः प्रा० स्था० । पश्चिमे--30 स्वा- त्यादि सप्तनक्षत्रेभ्यो नमः । श्रा० स्था० । ॐ वज्रादि सप्तयोगे भ्योनमः श्रा० स्था० । ॐ गरवणिजकर्णाभ्यां नमः । श्रा० स्था। यतलादि सप्तविवरेभ्यो नमः। ग्रा० स्था० । . सामवेदाय नमः। प्रा० स्था० । ततउत्तरे, . अभिजितादि सप्त नक्षत्रेभ्यो नमः श्रावाहयामि स्थापयामि । 30 साध्यादि षड्योगेभ्यो नमः आ० स्था० । ॐ विष्टिकर्णाय नमः था० स्था०। भृरादि सप्तो लोकेभ्यो नमः । श्रा० ॥ 30 अथर्ववेदाय नमः श्रा० । ईशाने 1-30 ध्रुवावाय नम । ग्रा० ) 30 सप्तर्षिभ्यो नमः। 30 गङ्गादि सप्तसरिङ्गयो नमः। 30 सप्त कुलाचलेभ्यो नमः । ॐ अष्ट वसुभ्यो नमः । 30 द्वादशादित्ये- भ्यो नमः । ॐ एकादश रुद्रेभ्यो नमः । ॐ एकोनपञ्चाशन्मरु- योनमः । पोडशमातृभ्यानमः । ॐ पडतुभ्योनमः । ३० द्वादश मासेभ्यानमः। ॐ उभाभ्यामयनाभ्यां नमः । ॐ पञ्चदश तिथिभ्योनमः । ॐ पष्टिसम्बत्सरेभ्योनमः । ॐ सुपर्णायनमः। आवाहयामि स्थापयामि ॥ इति ग्रयाग भद्रस्थ देवताः संस्था- प्य-प्राण प्रतिष्ठां कुर्यात्- एतन्तेदेव सवितर्यज्ञं प्राहु बृहस्प- तये ब्रह्मणे । तेनयज्ञ मवतेन यज्ञपति तेनमामव । मनोयूतिर्ज- षता माज्यस्य वृहस्पतिर्यज्ञमिमं तना त्वरिष्टं यज र्ट० समिम दधातु। विश्वेदेवासऽइहमादयन्तामों प्रतिष्ठ । ॐ भूभुवः स्वः ग्रहभद्रस्थ देवताः, इहागच्छतेहतिष्टत सुप्रतिष्टिता वरदाभवत । इतिप्रतिष्ठाप्य सङ्घ-पूजनं कुर्यात्-श्रासनम्-ॐ नानावर्णमयंदिव्यं पवित्रंशुद्धमासनम । प्रगृह्णन्तुमयादत्तंग्रहभद्रस्थदेवताः । आवा- हनम्-पूर्वमावाहितादेवा ग्रह्यागार्थकर्मणि करोम्यावाहनन्तेपां कर्मकाण्ड रताकरे, प्रयाग पतिः सर्वेषां सङ्घपूजने ॥ पाद्यम्--जलमेतत्तुपायार्थ पात्रस्थंगन्धसंयु- तम् । प्रगृह्णन्तुसयादत्तं ग्रहभद्रस्थदेवताः । अयम्-कुशाक्षतः समायुक्तं ताम्रपानस्थ मुत्तमं । अर्घ्य गृहन्तुतेसर्वे ग्रहभद्रस्थ देवताः । पञ्चामृतम् पयोदधि घृतक्षौद्र शर्करा मिश्रितं परम् । पश्चामृतं प्रगृह्णन्तु ग्रहभद्रस्थ देवताः । स्नानीयम्-यथालब्ध परंद्रव्यं गन्धौषधि विमिश्रितम् । जलं गृह्णन्तु स्नानीयं ग्रह भद्रस्थ देवताः। यज्ञोपवीतम-वेदोक्त विधिना शुद्धकास निमितानि च । उपवीतानि गृह्णन्तु ग्रहभद्रस्थ देवताः । वस्त्राणि -दिव्य रंग: सुरक्तानि ग्रहाणां भिन्नरूपिणाम् । वासांसि प्रति गृह्णन्तु ग्रहभद्रस्थ देवताः। भूपणानि-भूषणार्थमिदं द्रव्यं भूपणानिचवा यथा । देशकालानुकूलतलब्धं गृहन्तुमेग्रहाः । चन्दनम्-कस्तृरी कुंकुमयुतं निमी केशर कल्पितं | चन्दनं प्रति- गृहन्तु ग्रहभद्रस्थ देवताः । अक्षतान-चन्दनोपरिशोभार्थ मक्ष- तान्निर्मलाञ्छुभान् । प्रगृहन्तु मयादत्तान ग्र० भद्र० देवताः । पुष्पाणि-ऋतुजानिच पुष्पाणि कुन्द जातिजपानिच । पत्र दृर्वाः प्रगृहन्तु ग्रहभद्रस्थ देवताः । धूपम्-मासी चन्दन संयुक्तं गुरगु- लेन समन्तिम् । धूपं गृह्णन्तुते सर्वे ग्रहभद्रस्थ देवताः। दीपम्- साल्य सद्वत्तिकाभिश्च योजितं तिमिरापहम् ॥ दीपं गृहन्तुते सर्वे ग्रह मद्रस्थ देवनाः । नैवैद्यम्-घृनपक्वं पयः पक्वं नैवैद्यं स्वादु चूर्णकम् । गृह्णन्तु परयाप्रीत्या ग्रहभद्रस्थ देवताः । आचम- नम्-नैवेद्यांगाचमं दिव्य शीतलं निर्मलं जलम् । करानन विशु- ध्ययं गृह्णन्तु सर्वदेवताः।उपायनम-उपायन मिदं द्रव्यं यथावि- त्तोग्लब्धकम् । प्रगृह्णन्तु मयादत्तं ग्रहभद्रस्थ देवताः । फलम्- पूीफलं श्रीफलंच लवंगं कदलीफलम् । प्रगृह्णन्तु यथालब्ध ग्रहभद्रस्थ देवताः ॥ पुष्पाञ्जलिः--ॐ ब्रह्मा मुरारित्रिपुरान्त- कारी भानुः शशी भूमिसुतो चुधश्च ।। गुरुश्च शुक्र: शनि राहु केतयः सर्वग्रहाः शान्तिकरा भवन्तु ।। सूर्यः सौर्यमयेन्दुरुष पदवी सन्मङ्गलं मङ्गलः सद्बुद्धिं च बुधो गुरुश्च गुरुतां शुकर : .
कर्मकाण्ड रताकरे, ग्रहयाग होम पद्धति शुभशंशनिः ॥ राहुहुवलं करोतु सततं केतुः कुलस्योन्नति नित्यं प्रीति कराभवन्तु ममते सर्वेऽनुकूलाग्रहाः ।। इति ग्रहयाग कर्मणि ग्रहस्थापन पूजन पद्धति । अथ ग्रहयाग विधौ ग्रहहोम पद्धतिः॥ अथचाचार्या यजमानेन सपनिनासह होमकुण्ड सन्निधिमा- गत्यो पविश्य यजमानः पत्नी१ स्वदक्षिणतोपवेशयित्वा होम कुण्डोत्तरभागे निर्मित २ ग्रहवेद्यां, पर्वोक्त प्रकारेण ग्रहाना वाह्य सम्पूज्य च ॥ तत्रेशानप्रदेशे कलशंच संस्थाप्य, तस्मिन्क- लशे पश्चाशत्क्रुश निर्मितं चतुर्हस्तं चतुर्मग्वं, ब्रह्माणं च संस्थाप्य, कलशपूजोक्त विधिना, महीद्यौरित्यादि प्रसन्नोभव सर्वदेत्यन्तं कर्मकृत्या, कृता कृता वेक्षणरूप ब्रह्माणं च सम्पज्य, गणेश पुष्पा जलिं निवेद्य, होमपद्धत्यनुसारेण, अग्निस्थापनादि कर्मकृत्वा एवोक्त प्रकारेण प्राचार्यादीन्वृत्वा, तत आचार्यों ब्रह्मोपवेशनादि पर्यक्षणान्तं कर्मकृत्वा संस्रव धारणार्थ प्रोक्षणी पावं अग्निप्रणीतयोर्मध्ये संस्थाप्य, द्रव्य देवताभिध्यानं कुर्यात्॥ संकल्पः-अधेत्यादि देशकालौ संकीर्त्य अमुकोऽहं, अमुककर्मणि नवग्रह मखे, प्रजापति, इद्रं, अग्नि, सोम, प्राज्येन, प्रधानानि , टि-स्मृति सग्रहे-व्रतवो विवाटे च चतुर्थ्या सहभोजन ॥ व्रतेदान मछे 'श्राद्ध पत्नी तिष्ठति दक्षिणे ॥ टि-तस्य चोत्तर पूर्वेण पितस्ति त्रय संस्थितम् ॥ इत्यादि पहयाग परि. भोपोक्त प्रमाणेन चेदी निर्मापयन् ॥
कर्मकाण्ड रखापरे, प्रयाग होम पतिः , , . , सूर्यः सोमं भौम, बुध, गुरुं भृगु, शनि, राहुँ, केतुं, चा प्रत्येक मष्टाहुतिभिः, समिच्चज्य यवतिल द्रव्यैः ईश्वरं, उमां, स्कद, विष्णु, ब्रह्माणं इन्द्रं, यम, काल चित्रगुप्तं, अग्निं, अपः, भूमि, विष्णु, इन्द्रं, इद्राणी, प्रजापति, सर्पानः, ब्रह्माणं च तैरेव द्रव्यैः, प्रत्येक चतुः संख्यकाहुतिभिः ।. विनायकं.. दुर्गा बाएं आकाश, अश्विनौ, इन्द्र, अग्नि, यम, निर्गति, वरुणं, वारं, कुवेरं, ईशानं, ब्रह्माणं, अनन्तं च, तैरेव द्रव्यैः, प्रत्येक द्विसंख्या हुतिभिः। शेपेण विष्टकृतं अग्निं, चाय, सूर्य, अग्नीवरूणी, अग्निं, वरुणं, सवितारं, विष्णु, विश्वान्देवान्मतः स्वान् वरुणं, प्रजापति, चाज्येनाह-यक्ष्ये, अथच यजमानः प्राचार्या दीनां होम कर्तृत्वे यजमानस्य प्रत्याहुति यथोक्त ल्यायस्या सम्भवात् संकल्प विधिना इदानीमेव सर्पेभ्यो देवेभ्यो त्यागं कुर्यात्-अद्येत्यादि देशकालौ संकीर्त्या मुकोऽहं अमुक कर्मणि नवग्रहमग्वे, एतत्सम्पादित मिदं समिद्यव तिलाज्य द्रनये, आदित्याय, सोमाय, भौमाय, बुधाय, गुरवे, शुक्राय शनये, राहवे, केतवे, ईशाय, उमाय, स्कन्दाय, विष्णवे, ब्रह्मणे, इन्द्राय, यमाय, कालाय, चित्रगुप्ताय, अग्नये, अद्भया, पृथिव्यै, विष्णधे, इन्द्राय, इन्द्राण्यै, प्रजापतये, सभ्यः, ब्रह्मणे, विनायकाय, दुर्गायै, वायवे, आकाशाय, अश्विभ्यां, इन्द्राय, अग्नये, यमाय, निर्ऋतये, वरुणाय, वायवे, कुवेराय, सोमाय, ईशानाय, ब्रह्मणे, अनन्तायच, मयापरित्यक्तंतत्तद्देवताकमस्तुनमम । इतिद्रव्यत्यागं कृत्वा वरदनामाग्निंसम्पूज्य प्रतिष्ठाप्यच ब्रह्मणान्वारब्धः कुश- कण्डिकोक्तप्रकारेण प्राक्संस्थौअाधारौहुत्वा समिद्धत मेग्नोंत्राज्य- भागौचहुत्वा, अनन्वारब्धः ऋत्विक्सहिताचार्यः यथोक्तघृता- क्तसमिदादिहोम मृगीमुद्रया १-कुर्यात्-२ अथहोममन्त्रा:- , , , - टि०१-परशुगम कारिकासु-मुक्तकनिष्ठातर्जनी मृगीमुद्राप्रकीर्तिता ॥ भृगी- मोक्षप्रकर्तच्या आहुतिः सर्वकामिका ॥ शान्तिरतुझिया ॥ इति ।
(१६४) कर्मकाण्ड रताको ग्रयाग होम पद्धतिः तत्रादौकुराडेकपिलाग्नि श्रावायेद्रक्तपुष्पाक्षतैः-ॐ भूर्भुवःस्वः कपिलाग्ने इहसन्निधोभव ॐ कपिलाग्नयेनमः, कुण्डेतस्मिन्ने- बाग्नौ पाद्यगन्धाक्षतादिभिः सम्पूज्य-विनियोगः-ॐ प्राकृ- ष्णेति हिरण्यस्तूपऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः सवितादेवता सूर्यप्रीतये कपिलाग्नौ अर्कसमिद्धोमे यथोक्तद्रव्यहोचविनियोगः ॥ ॐ भाकृष्णानरजसा व्वर्तमानोनिवेशयन्नमृतमय॑श्च । हिरण्ययेन सवितारथेना देवोयातिभुवनानिपश्यन्-स्वाहा ३-ततःसूर्याधि- देवस्य-30 त्र्यम्बकमिति वशिष्टऋषिरनुष्टुप्छन्दो रुद्रोदेवता रुद्धीतये पलाशसमिद्धोमे (यथोक्तद्रव्य) होमे चिनियोगः-ॐ ज्यवक्रयजामहेसुगन्धिपुष्ठिवर्द्धनम् । उर्वारुकमिववन्धनान्मृत्यो मुंक्षी यमाऽमृतात्स्वाहा ॥ ततः सूर्यपत्यांध देवस्य-ॐ अग्निंदूत- मिति विरूपाक्षऋषिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता, अग्निप्रीतये पलाश समिद्धोमे बायवतिलाज्य होमे विनियोगः-30 अग्निदृतं पुरो- दधे हव्यवाह मुपवे। देवा।ऽआसादयादिहस्वाहा। इदमग्नये॥ टि०२-अत्रग्रहाणांसाधिदेव प्रत्यधिदवानांच होमानुसारेणापुतिमानमाह संस्कारभास्करादी अन द्रव्यांचना भिधानेस्वलग्रहयागे अष्टाभिः सख्याभिः नवग्रहागांसमिद्धाम, इष्यत । ग्रहहोमसंरयामाधांचाईच अधिदेवाघसस्याहोमप्रत्यधिदेवानांन । श्रयतुतक्षकोटि होमादिपतु,, क्रमेणग्रहाणा, अष्टाविंशत्यष्ठात्तर सहस्सरयाभवन्ति ।। ग्रहाविम्यप्रत्य- विदेयानान्तु अष्ठाटाविंशति,अष्टात्तररातसख्या भवन्ति, विनायकादीना सर्वेशान्तु-चतुरशादिशति सख्याश्चमवन्ति ॥ सिहपुराणे-अयु- तादिसरयाश्च व्याहृतिभि स्तिलाल्यहोमेनपूरणीयाइति । वि०३~-मत्रनवग्रहात्मकेमखे प्रधानानां सूयादिग्रहाणांप्रथक, २ अग्निनिदेशेन तत्तदग्नापवाहताना मॉनित्याप तदधि प्रत्यविश्वाना प्रथगाग्मनिर्देशा- भावन स्वकीयप्रधानाम्नायव तपामपिसाहचर्यन्यायन हामाविध प्राप्त- ( योहियम्य प्रधान तद्विधेस्तदंगेप्यात निर्दिष्टत्वात् ) इति ।
कर्मकाण्ड रतारे, पाहयाग होम पद्धतिः ( १६५ इतिसूर्य सागहोमः ॥१॥ चन्द्रस्य-तत्रकुण्डे-पिंगलनामाग्नि श्वेत पुष्पाक्षतरावाहयेत् ॥ ॐ भूर्भुःस्वः पिंगलाग्ने, इहागच्छेहतिष्ट,, - पिंगलाग्नयेनमः ॥ गन्धादिभिासम्पूज्य । ॐ इदंदेवा 5 इति गौतमऋषिर्द्विपदाविराट्छन्दः सोमोदेवता सोमपीतये पिंगला- ग्नौ पलाशसमिद्धोमे तिलयवाज्यहोमेवा विनियोगः---ॐ इम- देवाऽ असपत्न र्ट० सुवध्वदमहतेक्षत्राय महतेज्यैष्ठायमहते जान राजायेन्द्रसेन्द्रियाय।इमममुष्यपुत्रममुष्यपुत्रमस्यैविशऽएपयोमी राजा सोमो ऽ स्माकं ब्राह्मणाना ॐ राजास्वाहा-इदंसोमाय ॥ ततः सोमाधिदेवताउमाय-ॐ श्रीश्चतेडत्युत्तर नारायणपि त्रिष्टुप्छन्दः उमादेवता उमाप्रीतयेपलाशसमिद्धोमे तिलयवाज्य होमेवा निनियोगः-ॐ श्रीश्चतेलक्ष्मीश्चपल्या वहोरात्रेपार नक्षत्राणिरूपमश्विनौव्यात्तम् । इष्णन्निपाणमुम्म 5 इमाणसर्व- लोकम्मS इपाणस्वाहा । इदमुमायै ।। ततःसोमप्रत्यधिदेवता भ्यः-ॐ अप्स्वन्तरितिबृहस्पति पिरुष्पिक्छन्दः, यापो देवता, अपांप्रीतयेपलाशसमिद्धोमे, तिलयवाज्यहोमेवा विनि० । ॐ अप्स्वन्तरमृतमप्सु भेषजमपामुतप्रशस्ति प्वश्वाभवतव्या- -जिनः । देवीरापोयोच 5 काम प्रतूतिः ककुन्मान्वाजसा स्तेना- 5 यं व्वाज दै० सेत्-स्वाहा, इदमद्भ्यः ॥२॥ इतिचन्द्रसागहोमः ततोभौमस्य ततः कुण्डेरक्तपुष्पाक्षतधूम्रकेत्वग्निमावाहयेत्-30 भूर्भुवःस्वः धूम्रकेत्वग्ने, इहागच्छेहतिष्ठ, ॐ धूम्रकेत्यग्नयेनमः, सम्पूज्य-ॐ अग्नि इति विरूपाक्षऋपियत्रीछन्दः भौमो देवता भौमप्रीतये धूम्रकेत्वग्नौखदिरममिदोमे, तिलयवाज्य होमेवा, विनियोगः। ॐ अग्निसुद्धादिवः ककुत्पतिः पृथिव्या अयम् । अपा ॐ रेता ॐ सिजिन्वति-स्वाहा ॥ इदंभौमाय ॥ ततोभौमाधिदेवस्कन्दाय ॐ यदक्रन्द इति भार्गव जमदग्नि, दीर्घतमसषय सिष्टुप्छन्दः स्कन्दो देवता स्कन्दप्रीतये पलाशसमिध्दोमे तिलययाज्य होमेवा विनियोगः ।। , , ३० कर्मकाण्ड रताकरे, ग्रहयाग होम पद्धति , यदक्रन्द: प्रथमंजायमानऽ उद्यन्त्समुद्रा इतवापुरीपात् । श्येनस्यपक्षा हरिणस्यवाह ऽउपस्तुत्यं महिजातन्तेऽ अर्वन्तस्वाहा। इदंस्कन्दाय, ततो भौम प्रत्यधिदेवतायै पृथिव्यै-ॐ स्योना- थिचीति मेधातिथिपिर्गायत्रीछन्दः पृथिवीदेवता पृथिवी प्रीतये पलाशसमिध्दोमे तिलयवाज्यहोमेचा विनियोगः ॥ 30 स्योनापृथिविनो भवान्नृक्षरानिवेशनी । यच्छानः शर्मसमथाः स्वाहा । इदंपृथिव्यै । इतिभौमसागहोमः ॥3॥ अथवुधस्य-ततः कुंडेपीतपुप्याक्षतैः जाठराग्निमावायत्-ॐ भूर्भुवः स्वः जाठ- राग्ने, इहागच्छेहतिष्ठ, ॐ जाठराग्नयेनमः । संपूज्य 0 उद्बु- ध्यस्वेति परमेष्ठी ऋषित्रिष्टुप्छन्दो बुधोदेवता बुधप्रीतये जाठरा- ग्नौ, अपामार्ग समिध्दोमे तिलयवाज्यहोमेवा विनियोगः । ॐ उद्बुध्यस्वाग्ने प्रतिजागृहित्व मिष्ठापस र्ट० मृजेथामयश्च । अस्मिन्त्सधम्थे ऽ अध्युतरस्मिन्विश्वेदेवा यजमानश्चसीदत स्वाहा इदंवुधाय । ततो बुधाधिदेवाय विष्णवे ॐ विष्णोरराट मिति दीर्घतमा अपि मष्णिक्छन्दो विष्णुर्देवता विष्णुप्रीतये पलाशस- मिदोमे तिलयवाज्यहोमेवा यिनियोगः । ॐ विष्णोरराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्थो विष्णोः स्यूरसि विष्णो वो ऽसिवैष्णव- मसि विष्णवेत्वा स्वाहा । इदंविष्णवे । ततोवुधप्रत्यधिदेवाय विष्णवे-ॐ इदंविष्णुरिति मेधातिथिर्कापिगायत्रीछन्दो नाराय- णोदेवता, विष्णुप्रीतये पलाशसमिध्दोमे तिलयवाज्यहोमेवा विनियोगः । ॐ इदंविष्णुर्विचक्रमेत्रेधानिदधेपदम् । समूढमस्थपा ॐ सुरेस्वाहा-इदंविष्णवे । इति वुध साङ्गहोमः ॥४॥ अथगुरोः ततः शिखिनामाग्नि पीतपुष्पाक्षतरावाहयेत्-ॐ भूर्भवः स्वः शिग्विनामाग्ने इहागच्छेहतिष्ट, ॐ शिखिनामाग्नयेनमः संपूज्य, ॐ बृहस्पति इति गृत्समद ऋषि ख्रिष्टप्छन्दः बृहस्पतिर्देवता बृहस्पति प्रीतयेशिख्यग्नौ अश्वत्थसमिध्दोमे तिलयवाज्यहोमेवा विनियोगः । ॐ वृहस्पते । अतियदयों 5 अर्हाद्युमद्विभाति कर्मकाण्ड रक्षाकरे, प्रयाग होम पद्धति , ऋतुमज्जनेषु । यद्दीदयच्छवसऽ ऋतप्रजा ततस्मासु द्रविणेधेहि- चित्रम्-स्वाहा, इदंवृहस्पनये । ततोगुरोरधिदेवाय ब्राह्मणे-ॐ ब्रह्मयज्ञानमिति प्रजापतिपि स्त्रिष्टुप्छन्दः ब्रह्मादेवता ब्रह्मपीतये पलाशसमिध्दोमे तिलययाज्यहोमेचा विनियोगः । 30 ब्रह्मज- ज्ञानं प्रथमपुरस्ता द्विसीमतः सुरुचोब्वेनऽयावः सवुध्न्याऽउपमा ऽअस्यविष्टाः सतश्चयोनि मसतश्चबिवः स्वाहा । ततः प्रत्यधि- देवायइन्द्राय-ॐ त्रातारमिति गर्गऋपि स्त्रिष्टप्छन्दः इन्द्रोदेवता इन्द्रप्रीतये पलाशसमिध्दोमे, निलयवाज्यहोमेवा विनियोगः ॐ प्रतारमिन्द्र मवितारमिन्द्र र्ट. हवेहवेसुहव ई० शूरमिन्द्रम् । हयामिशनं पुरुइतमिन्द्र र्ट. स्वस्तिनोमघवाधाविन्द्रः स्वाहा । इदमिंद्राय, इतिगुरोः साङ्गहोमः ॥शा अथशुक्रस्य-ततः कुंडेहा- टकनामाग्नि श्वेतपुष्पाक्षतरावाहयेत्-30भूर्भवः स्वः हाटकाग्ने इहागच्छेहतिष्ट, ॐ हाटकाग्नयेनमः इति संपूज्य ॐ अनाप- रिश्रुत इति प्रजापत्यश्वि सरस्वतीन्द्राऋपया, जगतीछन्दः शुक्रो देवता शुक्रमीतये हाटकाग्नौ उदुम्बर समिध्दोमे तिलयवाज्यहो- मेवा विनियोगः । ॐ अन्नात्परिस्रुतोरसंब्रह्मणाव्यपिवत्क्षत्रपयः- सोमप्रजातिः । ऋतेनसत्यमिन्द्रियं विपान र्ट शुक्रमंधसऽइन्द्र- स्पेन्द्रियमिदंपयो मृतमधु स्वाहा । ततः शुमाधिदेवायेन्द्राय- सजोपाइन्द्र इति विश्वामित्र ऋषि त्रिष्टप्छन्दः इन्द्रोदेवता इन्द्रप्रीतये पलाशसमिदोमे, तिलयवाज्यहोमेवा विनियोगः । ॐ सजोषाऽइन्द्रसगयो मरुद्भिः सोमंपिव वृत्रहा शूरचिद्वान् । जहिशन्नू ३|| 5 रपमृधो नुदस्वाथा भयंकृणुहिदिवश्व तोन:- स्वाहा । इदमिन्द्राय । ततःप्रत्यधिदेवते ट्राएग-30 अदित्यैरास्ना सीतिदध्या थर्वण अपिर्यजुश्छन्दः, इन्द्राणीदेवता इन्द्राणी प्रीतये पलाशसमिद्धोमे तिलयवाज्य होमेवा विनियोगः ॥ ॐ अदित्यै रास्नासीद्राण्याऽउपणीपः पूषाऽसिधर्माय दीष्व-स्वाहा। इवमिन्द्राण्यै ।। इति शुक्रस्यसाङ्ग होमः ॥ अथशनेः-कुंडेमहाते- कर्मकागड रताकरे, ग्रहयाग होम पद्धति: जोग्नि कृष्णाजत पुष्पैरावाहयेत्-30 भू० महातेजोग्ने इहाग- च्छेहतिष्ट, 3 महातेजोग्नये नमः सम्पूज्य ॥ ॐ शन्नोदेवी रि तिदध्याथर्वण ऋपिर्गायत्रीछन्दः शनिदेवता शनिप्रीतये महाते जोऽग्नौ शमीसमिद्धोमे वायवतिलाज्य होमे विनियोगः ॥ 30. शन्नोदेवीरभिष्टय ऽ आपो भवन्तु पीतये । संय्योरभिम्रयन्तुन:- स्वाहा-इदंशनये, ततः शनेरधिदेवाययमाय-30 असियम इति भार्गव जमदग्नि दीर्घतमस पयन्त्रिष्टप्छन्दः यमोदेवता- यमप्रीतये पलाशसमिद्धोंमे तिलयवाज्य होमेवा वि०। 30 असि- यमोऽअस्यादित्योऽअर्वन्नसि त्रितोगुयेनब्बतेन | असिसोमेन स मया बिपक्त 5 पाहुस्ते त्रीणि दिविवन्धनानि-स्वाहा । इदंय माय । अत्रोदक स्पर्शः ॥ ततः प्रत्यधिदेवायकालाय-ॐ कार्षि- रसीति प्रजापतिपिः, अनुष्टुप्छन्दः कालोदेवताकालपीतये पलाश समिद्धो मे यवति लाज्य होमेवा विनियोगः॥ ॐ कार्पिरसि समुदायत्वा 5 अक्षित्या ऽ उन्नयामि । समापोऽ श्रदिरग्मतसमोपधीभिरोषधी: स्वाहा । इदंकालाय- पुनरुदक स्पर्शः ।। इतिशनेः साङ्गहोमः ॥७॥ अथराहोः-तताकुण्डेहुताशना ग्नि कृष्णाक्षतपुष्पैरावाहयेत्-ॐ भूर्भवःस्वः हुताशनाग्ने इहा- गच्छेहतिष्ठ, ॐ हुताशनारनयेनमः सम्पूज्य ॥ ॐ कयानचित्र इति वामदेव ऋषिर्गायत्रीछन्दः, राहुर्देवताहुताशनाग्नौ राहु-- प्रीतये दुर्वा समिद्धोमेवातिलाज्यहोमे विनियोगः। ॐ कयान- श्चित्र ऽ आभुववृत्तीसदावृधः । सखाकयास चिष्टयावृतास्वाहा ॥ इदंराहवे ॥ ततोराहोरधिदेवाय कालाय-ॐ कार्पिरसीति प्रजा पतिऋषि रनुष्टुप्छन्दः कालोदेवता कालप्रीतयेपलाशसमिद्धोमे निलयवाज्य होमेवा विनियोगः। ॐ कार्पिरसिसमुद्रस्यत्वा । क्षित्या 5 उन्नयामि । समापो ऽ अद्भिरग्मत समोषधीभिरोषधीः स्वाहा । इदंकालाय । ततःप्रत्यधिदेवेभ्यः सर्पेभ्यः-30 नमोस्तुस- भ्य इति प्रजापतिषिरनुष्टुप्छन्दः सविताः सर्पाणांप्रीतये कर्मकाराष्ट्र रताकरे, प्रयाग होम पद्धति पलाशसमिद्धोमे तिलयवाज्यहोमेवा विनियोगः। 30 नमोस्तु. सर्पेभ्योयेकेच पृथिवीमन । ये ऽ अन्तरिक्षयेदिवितेभ्यः सर्पेभ्यो नमः स्वाहा । इदंसर्पेभ्यः । इतिराहाःसाझहोमः ॥८॥ अथकेतोः (क्वचित्पुस्तके केतारोहिताग्निदर्शनात्) तताकुण्डेधूम्रपुष्पाहत रोहितनामाग्निमायाहयेत्-30 भूर्भवः स्वः रोहिताग्ने इहागच्छे इतिष्ठ, ॐ रोहिताग्नये नमः सम्पूज्य, ॐ केतुकृण्वप्निति मधु- स्छन्दा ऋपिर्गायत्रीछन्दः केतुर्देवता केतुमीतये रोहिताग्नौ कुरा- समिद्धोमे तिलयवाय होमेवा विनियोगः|| ॐकेतुं कृण्वन्नकेतचे पेशो माऽअपेशसे । समुपदिरजायथा स्वाहा । इदं केनचे- ततः केतोरधिदेवाय चित्रगुताय-ॐ चित्रावसोरिति राषि देवत्य ऋषिः, जगतीछन्दः चित्रगुप्तो देवता चित्रगुप्त प्रीतये पलाशसमिद्धोमेतिलयबाज्यहोमे वि०॥ॐ चित्रावसो स्वस्तिते पारमशीय-स्वाहा । इदं चित्रगुप्ताय । ततः केतोः प्रत्याधि देवाय ब्रह्मणे-ॐ ब्रह्मजजानमिति प्रजापतिषिस्त्रिष्टुप्छन्दोवस्मादेवाता ब्रह्मप्रीतयेपलाशसमिद्धोमेवातिलययाज्यहोमेषि.ॐ ब्रह्मजज्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचोब्बेन आवः । सवुघ्न्या ऽ उपमा अस्यविष्टाः सतश्चयोनिमसतश्चब्वियः स्वाहा-इदं ब्रह्मणे ॥ इति फेतोः सांगहोमः ॥९॥ अथ चिनायकादि पञ्चलोकपाला- नाम्-ॐ गणानान्त्वेति प्रजापतिऋपिर्यजुश्छन्दो गणपतिर्देवता गणपति प्रीतये पलाश समिद्धोमे तिलयवाज्य होमेवा विनि० ॥ ॐ गणानात्वा गणपति ट. हवामहे प्रियाणान्त्वा प्रियपतिटक हवामहे निधीनान्त्वा निधिपति हवामहे व्वसोमम । श्राहमजा. निगर्भधमात्य मजा सिगर्भधम्-स्वाहा । इदंगणपतये ॥१॥ ॐ अम्वेअम्बिके इतिप्रजापतिपिरनुष्टुप्छन्दः दुर्गादेवता दुर्गा प्रीतये पलाशसमिढोमे यवतिलाज्य होमेवाविनियोगः11ॐ अम्बे अम्बिके अस्यालिके नमानयनिकश्चन | ससस्त्यश्वकः सुभद्रि कां काम्पीलवासिनीम् स्वाहा ॥ इदं दुर्गायै ॥ ॐ वातोरेति वृहस्पति ऋषिः, उष्णिकछन्दः चातो देयता वायु प्रीतये पलाश - (१७०) कर्मकाण्ड रसाकरे प्रत्याग होम पद्धति समिढोमेवा तिलयवाज्य होमे वि० । अव्यातोवा मनोवा गन्ध- ः सप्तवि !० शतिः। ते ऽ यग्रेऽश्व मयुन्जेस्तेऽअस्मिनजव- मादधुः-स्वाहा, इदंवायवे ॥ ॐ अग्रिस्येति प्रजापतिपि: उपिणक्छन्दः अाकाशो देवता अाफाश प्रीतये पलाश समिद्धोमे वायवनिलाज्यहोमे वि०। ॐ अर्धा ऽ अस्यासमिधो भवन्त्य- • शुमाशोचीप्यग्नेः । गुमत्तमा सुप्रतीकस्य सूनोः-स्वाहा। इदमाकाशाय ! ॐ यावाङ्कशेति मेधातिथि पिः गायत्रीछन्दः, अश्विनौदेचते अश्विनोः प्रीतये पलाश समिडोमेवायवनिलाज्य होमे वि०। ॐ यावाशामधुमत्यश्विना सन्तावती । तया यज्ञामिमि-क्षतम् स्वाहा ॥ इदमश्विभ्याम ॥ ॐ वास्तोष्पतीति वशिष्ठ ऋपित्रिष्टुप्छन्दो वास्तोप्पतिर्देवता वास्तोप्पति प्रीतये पलाशसमिद्धोमे, वायवतिलाज्यहोमे वि० । ॐ वास्तोष्पते प्रतिजांनी ह्यस्मान्त्स्वावेशोऽअनमीवो भवानः। यत्वेमहे प्रति- तन्नो जुपस्व शन्नोभव द्विपदे शश्चतुष्पढे-स्वाहा ॥ इदं वास्तो- प्पतये | ॐ क्षेत्राधिपतये स्वा० । अथेन्द्रादिलोकपालानाम् ॐ त्रातारमितिगर्गमपिस्त्रिष्टुप्छन्द इन्द्रोदेवता इन्द्रप्रीतयेपालाश- समिद्धोमे वा तिलयवाज्य होमे वि० । ॐत्रातारमिन्द्र मवितार मिन्द्र ई० हवेहवे सुहव र्ट० शूरमिन्द्रम् । हयामि शक्रं पुरहत मिन्द्र र्ट. स्वस्तिनो मघवाधात्विन्द्रः-स्वाहा । इदमिन्द्राय । ॐ अनिंदूतमिति विरूपाक्ष ऋपिः गायत्री छन्दः, अग्निर्देवता अग्नि प्रतिये पलाश समिद्धोमेवा यवतिलाज्य होमे विनियोगः। ॐ अग्निदृतं पुरोदधे हव्यवाह मुपवे । देवा ॥ श्रासादया दिह-स्वाहा । इदमग्नये । ॐ यमइति प्रजापतिर्गपिस्त्रिष्टुप्छदो यमोदेपता यमप्रीतये पलाश समिद्धोमेवा तिलवाज्यहोमे वि०॥ 3. यमश्विना सरस्वती हविषेन्द्र मवर्धयन् । सविभेदवा भवनमुचाना सुरेसचा-स्वाहा । उदयमाय ॥ अत्रोदक स्पर्शः ॥ ॐ नमः सुत इत्यस्य मधुश्छन्दा ऋपिः पंक्तिश्छन्दो नितिर्द- यता निर्मति प्रीतये पलाश समिद्धोमेवा तिलयवाज्य होमे फर्मकाण्ड रक्षाकरे, प्रयाग होम पद्धतिः वि० । २० नमः सुतेनितेतिग्मतेजो यस्मयं विवृत्तावन्धमेतम् स्वाहा ।। इदं नियंतये ।। 30 इमम्म इत्यस्य शुनः शेफ प्रापि, र्गायत्रीछन्दो वरुणो देवता वरुण प्रीतये पलाशसमिद्धोमे.वातिल यवाज्यहोमे वि० ० इमम्मे व्याण श्रुधी हवमद्याचमृडयत्वामव- स्युराचके स्वा०३दं वझणाय। अयानोनियुद्भिरितिवशिष्ट ऋपिस्त्रि छुप्छन्दाचायुदेवतवागुनीतये पलाशसमिद्धोमेवा तिलयवाज्यहोमें वि० सानोनियुद्धिः शतनीभिरध्वर ई. सहरिणीभिरुष- याहि यजम् । व्यायो ऽ यस्मिन्त्सवने मादयस्व यूयंपातः स्व- स्तिभिः सदान: स्वाहा इदंवायवे । . वयमिति वन्धुऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः कुवेरो देवना कुवेर प्रीतये पलाश समिन्दोमेवा नि- लयवाज्य होमे वि०। ७० व्वय ई० सोमवते तवमनस्तनृपु विभ्रतः प्रजावन्तः सचेमहि-स्वाहा । इदं कुवेराय । तमी- शानमिति गौतम ऋपिर्जगती छन्दः ईशाना देवना, ईशानमीतये पलाशसमिद्धोमेघा तिलयवाज्य होमे वि०॥ 30 तमीशानजग- तस्तस्थुपस्पति धियं जिन्व मबसेहलव्ययम् । पूपानो यथावेद साम सवृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये-स्वाहा, इदमीशानाय ब्रह्मणम्पन इत्यस्य याज्ञवल्क्य ऋपित्रिष्टुप्छन्दः, ब्रह्मादेवता ब्रह्म प्रीतये पलाशसमिद्धोमेवा निलयचाज्य होमे वि० ब्रह्मणस्पतेत्यमस्य यन्ना सुक्तस्य बोधितनयंच जिन्य । विश्व तद्रं य्यदवन्तिदेवा वृहदेम विदथेसुवीरा-स्वाहा । इदं ब्रह्मणे || 0 यापच इत्यस्य देवश्रवा ऋषि रनुष्टुप्छन्दः, अन- न्तो देवना अनन्त प्रीतये पलाश समिद्धोमेवातिलववाज्य होमे वि०॥ अ याऽऽपवो यातुधानानां य्येवाव्यनस्पती॥ रनु ।येया व्यटेपुशेरतेतेभ्यः सभ्योनमः स्वाहा इदमनन्ताय ।। २.विश्वक- मन्निति भरद्वाजः शाशमापि स्त्रिष्टुप्छन्दो विश्वकर्मा देवता विश्वकर्म प्रीतये पलाश समिन्डोमेवा तिलयवाज्य होमे विश्वकर्मन्हयिपा व्यर्दनेनत्रातारमिन्द्र मकृणोरबध्यम् । तस्मैधिशः समनमन्तपूरियमुग्नोबिहव्यो (१७२) फर्मकाएउ रताकरे, प्रयाग होम पद्धतिः यधासत्-स्वाहा । इदं विश्यकम्र्मणे श्रतः परं शेषा दीनां होमनाम मंत्रैर्जुहुयात्--ॐ शेयाय स्वाहा, इदं शेषाय । ॐ वासुकये स्वाहा, इदंवासुकये । ॐ तक्षकाय स्वाहा इदं तनकाय । कर्कोटकाय स्वाहा, इंद कोटकाय | . पभाय स्वाहा, इदंपद्माय । आशंग्यपालाय स्वाहा, इदं शंग्वपा- लाय । 3 महापद्मायस्वाहा, इदंमहापद्माय । ॐ कंवलायस्वाहा इदं कंवलाय । 30 अश्विन्यादि सप्तकेभ्यः स्वाहा । इदमश्विन्या विभ्यः। ॐ विष्कंभादि सप्तकेभ्यः स्वाहा, इदंविष्कुंभादिभ्यः 30 घववालव कर्णाभ्यां स्वाहा, इदंववादिभ्याम् । ॐ सप्त द्वीपेभ्यः स्वाहा, इदंसप्तद्वीपेभ्यः । ॐ ऋग्वेदायस्वाहा । उदं ऋग्वेदाय । 30 पुप्यादि सप्नकेभ्यः स्वाहा, इदं पुष्यादिभ्यः । धृत्यादि सप्नकेभ्याम्वाहा, इर्दधृत्यादिभ्यः । ॐ कौलवनैति लाभ्यां स्वाहा, इदंकौलवादिभ्याम् । ॐ लवणादि सप्तसागरे- भ्पास्वाहा, इदलवणादिभ्यः । ॐ यजुर्वेदाय स्वाहा, इदंयजुषे । ॐ स्वात्यादि सप्लकेभ्यः स्वाहा इदस्वात्यादिभ्यः। 30 वज्रादि सप्तकेभ्यः स्वाहा । इदं वज्रादिभ्यः। 30 गरवणिजकर्णाभ्यां स्वाहा, इदंगरादिभ्याम् । 30 अनलादि सप्नविवरेभ्यः स्वाहा । इदमतलादि सप्नकेभ्यः । ॐ सामवेदायस्वाहा । इदंसामवेदाय । 30 अभिजिनादि सप्तकेभ्यः स्वाहा, इदमभिजितादिभ्यः। 30 साध्यादि षड्भ्यः स्वाहा, इदंसाध्यादिभ्यः। विष्टिकरणाय- स्वाहा, उदं विष्ट्यै । ॐ भूरादिसप्तोललोकेभ्यःस्वाहा, इदंभ्वा दिभ्यः । ॐ अथर्ववेदायस्वाहा, उदमथर्वाय । ॐ ध्रुवायस्वाहा इदंधुवाय । 30 सप्तर्षिभ्यःस्वाहा, इदंसप्तर्षिभ्यः । ३० गंगादि सरिद्भ्यः स्वाहा । इदं० । सनकुलाचलेभ्यः स्वाहा, इदं० । ॐ अष्टवसुभ्यःस्वाहा, इदं० । द्वादशादित्येभ्यःस्वाहा, इर्दछ । ॐ एकादशरुद्रेभ्यः स्वाहा । इदं० मद्रेभ्यः। ॐ एकोनचाशन्म- सभ्यः स्वाहा, इर्दः । ॐ पोडशमातृभ्यःस्वाहा,'इदं । ॐ षड् ऋतुभ्यः स्वाहा, इदं । ॐ मासेभ्यः स्वाहा, इदं० 1 30 अयना- , कर्मकाण्ड रतावरे, ग्रहयाग होम पतिः ( १७३) भ्यां स्वाहा, इदं । 30 तिथिभ्यःस्वाहा, इद। 30 पष्टिसंवत्सरे भ्यः स्वाहा, इर्द० 30 सुपर्णाय स्वाहा, इदं सुपर्णाय,,-एवंवि- धिना ग्रहयागस्थ देवान्हुत्वा ततः स्वेष्टहोम कुर्यात् ॥ स्वेष्ठ हो- मावसाने- अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नये स्विछकृतेन मम ॥ अथ भूरादि नवाहुति होमः- पृतेन-पातित बामजानुः ब्रह्मणान्वारन्धो भूरादि नवाहुतयःकुर्यात्-30 व्याहृतीनांप्रजा पतिषिर्गायत्र्युरिगगनुष्टुप्छन्दांसि अग्निवायुसूर्यादेवताः, प्राय श्चित्त होमेविनियोगः ! 30 भू० स्वाहा, इदमग्नयेनमम । ३. भुवः स्वाहा, इदवायवे नमम । 30 स्वः स्वाहा, इद ई० सूर्यायन मम । ॐ त्वन्नो अग्ने इतिवामदेव ऋपित्रिष्टुप्छन्दः, अग्नी वरुणोदेवते सर्वप्रायश्चित्त होमे पि० । 30 स्वन्नो अग्ने व्वर- णस्यविद्वान्देवस्यहेडो ऽ अवयासि सीटाः। यजिष्टोवन्हितमः शोशुचानोविश्वाषा ॐ सिपमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा । इदमग्नी वर गाभ्यानमम ॥ ॥ सत्वन्नो अग्ने इति वामदेवऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः अपनीवरूणोदेवते सर्वप्रायश्चित्तहोमे वि०॥ . सत्वन्नोऽअग्ने ऽअवमो भयोतीने दिष्टो ऽ अस्या 5 उपसोव्युष्टो। अवयवनो व्वमण ० रराणो वीहिमुडीक ई० सुवोन 5 एधिस्वाहा । इद मग्नीवरूणाम्यांनमम ॥ 30 अयाश्चाग्ने इनि प्रजापति पिविरा छन्दो अग्निदेवना सर्व प्रायश्चित्त होमे वि० 1 30 अयाश्चाग्ने हानभिशस्तिपाश्च सत्यमित्व मयाऽअसि । अयानो यजवहास्य यानोधेहि भेषज ॐ स्वाहा । इदमग्नये नमम । 30 येतेशनमिति शुनाशेफ ऋपित्रिष्टुप्छन्दो वरुणः सचिता विष्णुविश्वे देवा मनः स्वाश्चदेवताः सर्वप्रायश्चित्त होमे वि० । आयेतेशतंव्यमणं ये सहसं यजियाः पाशाव्यिनना महान्तः । तेभिन्नों 5 अद्यसवितो त ब्धिष्णुविश्वे मुंचन्तु मम्तः स्वः स्वाहा-इदं वक्षणायसविने विष्णवे विश्वेभ्योदेवेम्यो मम्म्यः स्वभ्यश्च नमम ॥ 30 उदुत्तममिति शुन:-शेफ ऋपित्रिष्टुछन्दो वरुणोदेवता सर्व प्रायश्चित्त होमे वि. ॐ उदुत्तमं ब्वमणपाशमस्मदवाधर्म बि- (१७३) कर्मकाण्ड रताकरे, प्रयाग बलिदान पद्धतिः मध्यम श्रधाय, अथाव्ययमा दित्यव्रतेतवा नागसो ऽ अदितये स्याम-स्वाहा, इदंवमायसवित्रे (प्राज्यातिरिक्त द्रव्यहोम-स्त्रि टकृध्दोमो व्याहृत्यादि होमात्मागेवाचरे दिति हरिहरः ) केवला ज्यहोमे त्विदांनी स्विष्टकृद्भवति, नतोवहिहोमः, ॐ स्वाहा, प्रजापतयेनमम, ततः संस्रवंप्राश्यहिराचम्य, पवित्राम्यां प्रणीता जलेन, ॐ सुमित्रियान ऽ आप ऽ अोपधयः सन्तु, इतिमार्जनं कृत्वा, 30 स्वाहा, वन्हौनक्षिपेत, ॐ दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुषोऽ स्मान्द्वेष्टियं च वयं द्विप्मः, इत्यग्नेः पश्चात्मणीता विमोकंकृत्वा ब्रह्मणे पूर्णपात्रदानम् ॥ अद्येत्यादिदेशकालौसंकीर्त्य, अमुकोहंग्रह यागोक्त होमानुष्ठान विधिना, अमुकहोमकर्मणःसांगफलाप्तये,- अपूर्णपूर्णतार्थच इदंपूर्णपात्रं सदक्षिणंब्रह्मणे, अमुकशर्मणे ब्राह्म- गायतुभ्यमहंसम्प्रददे ॥ ७॥ तत्सन्नमम, इतिदत्वा, यजमानोवा प्राचार्योपटेत--30 अक्रान्कर्मकर्मकृतः सहवाचामयोभुवा । देवे- भ्याकर्मकृत्वा ऽ स्तं प्रेतसचाभुवः। ततः पूर्वोक्तप्रकारेण स्नुक् सवयोर्मार्जनकृत्वा, ग्रहेभ्योवेयुत्तरभागे वापूर्वभागे परिभाषोक्त ग्रहभक्ष्यद्रव्यैः, यथा गुडौदनरवेर्दद्याद्वा, पायसेन, धामापदधि भक्तनवलिदानंकुर्यात् ॥ सश्चायंक्रमः-ततोग्रहाणांवलीन ज्यल द्वतिकानत्रिभिः पुटकै पृथक्पृथक् साधिप्रत्यधि देवताभ्यश्च नव- त्रिंकसंस्थापनं सदक्षिणञ्चकुर्यात् ॥ अथसूर्यादित्रिकस्य, वलिदा- नम्-ततःपुटकत्रिकसम्मुखेकृत्वाचम्य, हस्तेजलंगृहीत्वा-30 सूर्यायसाझाय सपरिवाराय सायुधायसशक्तिकायैवं दक्षिणभागे ध्यम्बकाय सूर्याधिदेवाय साहायसपरिवाराय सायुधायसशक्ति- काय, वामे-अग्नये प्रत्यधिदेवाय, सां० स० सशक्तिसायु. एता न्सीपान्पायसान्न गुडौदनवलीन्समर्पयामि ॥ वलिंसमर्यसम्पू- ज्यच ॥ हस्तेजलंगृहीत्वा, भोभोसूर्य साधिदेवप्रत्यधिदेवाभ्यां सहतानवलीन्प्रगृहीत ॥ भवन्तोममयजमानस्य वाममसकुटुम्ब- स्प, आयुष्कारः क्षेमकर्तारः, शान्निकर्तारः, पुष्टिकर्तारः, तुष्टिकर्तारोभवन्तु ॥ वा-मण्डलेशांश्वबोज्ञात्वा यूयंसम्यक , - -- कर्मकाण्ड रताकरे, ग्रहयाग बलिदान पद्धतिः (१७) निवेदितान् । रक्षार्धयजमानस्यप्रगृहीत शुभान्वलीन् ॥ एवंसर्वत्र ननश्चन्द्रादीनां-हस्तेजलंगृहीत्वा-ॐ चन्द्रायसाङ्गाय सपरि- याराय सायुधायसशक्तिकाय दक्षिणपाश्र्वे-पार्वत्यै चन्द्राधिदेव तायै सा० । वामपार्वे-अभ्यश्चन्द्रप्रत्यधि देवेभ्यश्चसांगेभ्यः एतान्स दीपान् बलीन्स मर्पयामिवोनमः, मो मो सोमसाधिदेव प्रत्यधिदेवसहतान्वलीन्प्रगृहीन ! भवन्तो ममयजमानस्यममवा सकुटुम्बस्य आयुष्कर्तारः क्षे० शा० तु पु० भवन्तु । मण्डले शांश्च० इति वल्युपरिजलंक्षिपेत् ॥ ततो भौमादीनाम्---ॐ भौमायसा दक्षिणपा-स्कन्दाय भौमाधिदेवायसाङ्गाय० वाम पाश्र्वेपृथिव्य भौममत्यधिदेवताय, साङ्गायै० एतान्वलीन्सदीपा- न्समर्पयामिवोनमः । भोभोभौम साधिदेवः प्रत्यधिदेवैः सहता न्वलीन्गृहाण भवन्तो ममयजमानस्य ममवासकुटुम्बस्य सपरि- वारस्य आयुष्कारः क्षे० शा तु° पु० भवन्तु | मण्डलेशांश्च० १॥ ततोवुधादीनाम्-ॐ बुधायसाङ्गाय, सपरिचारायः । दक्षि एपार्वे-विष्णवेवुधाधिदेवाय साङ्गाय। वामपाश्र्चे-विष्णवे प्रत्यधिदेवाय साङ्गाय एतान्सदीपावलीन्समर्पयामियोनमः । भोभोबुधसाधिदेवैः प्रत्यधिदेवैः सहनान्वलीनगृहाण । भवन्तो ममयजमानस्य ममवा सकु सपरि० आयुष्कर्तारः क्षे० शा० तु पु. भवन्त ।। मण्डलेशांश्च ॥४॥ नतोगुर्वादीनां-गुरवेसांगाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्तिकाय, दक्षिणपायें ब्रह्मणे गुर्वधि देवाय साङ्गाय । वामे इन्द्रायगुरूप्रत्यधिदेवाय सांगाय० । एता- न्सदीपावलीन्समर्पयामि योनमः । भोभोगुरोसाधिदेवैः सहता न्चलीगृहाण । भवन्तः, ममय ममवास कु० मपरि० आयुष्कारः ले० शा० तु. पुष्ठिक रोभवन्तु । मण्डलेशांश्चयोज्ञात्वा यूयं सम्यक् निवेदितान् । रक्षार्थयजमानस्य प्रगृहीतसुभान्वलीन् । इ० जलं वि० ||शा ततः शुकादीनां-ॐ शुक्राय साङ्गाय, सपरिक सायु सशक्तिा दक्षिणेइन्द्रायशुक्रमत्यधि देवायसांगाय ‘वामे इन्द्राण्यै शुक्रप्रत्यधिदेवतायै सायुधायै, सशक्तिः सपरिवारायै (१७६१ फर्मकार रताको, प्रयाग बलिवान पद्धतिः . गतान्सदीपावलीन्समर्पयामिवोनमः । भोभो भृगोसाधिदेवैः प्रत्यधिदेवैः सहेतान्वली गृहाण ॥ ममयजमानस्य ममवा सकृ० सपरि० श्रायुष्कर्तारः हे शा तु पुष्टिकर्त्तारोभयन्तु । मण्डले शांश्च० ॥३॥ ततः शनिश्चरादीनां-ॐ शनिश्चराय सां० सप० सा सशक्तिकाय, दक्षिणे यमायाधिदेवाय सां० स० सश० सायु धाय । चामे-प्रजापतये प्रत्यधिदेवाय सां सप० सा० सशक्ति- काय, पतान्सदीपावलीन्समर्पयामिवोनमः, भोभो शनेसाधि- देवैः सहैतान्वलीन्गृहाण ॥ ममयजमानस्य ममवा सकु० सपरि- वा० श्रायुष्कर्तारः चे शा तु पु० भवत । मण्डलेशांश्चवो ॥ ततोराहादीनाम्-30 राहवे सां० सप० सा° स° दक्षिणे कालाय सां० स० सा सक्ति० वामे सायप्रत्यधिदेवायसां० स०. साल सशक्तिकाय एतान्सदीपावलीन्समर्पयामिवोनमः । भोमो राहोसाधिदेव प्रत्यधिदेवैः सहतान्वलीन्गृहाण ॥ भवन्तः मम- यजमानस्य ममवासपरि० सकु० श्रायुष्कारः क्षे० शा० तु. पुष्टिकर्तारोभवन्तु, मण्डलेशांश्चर |८|| ततः केत्वादीनाम्-ततः केतवेसांगाय सपरिवाराय साधुधायसशक्तिकाय दक्षिणे-चित्र: गुप्तायसांगाय सपरिवाराय सायुधाय सशक्तिकाय-वामेत्रह्मणे प्रत्यधिदेवाय सां० स० सा० सशक्ति । एतान्सदीपावलोन्सम- पयामिवोनमः ॥ भोभो केतोसाधिदेवैः सहतान्वलीन्गृहाण- भवन्तः, ममयजमानस्य ममबासपरिवारस्य सकुटुम्बस्य प्रायु- कारः क्षेमकर्तारः शान्तिकारः तुष्ठिकार पुष्ठिकारो भवंतु । मंडलेशांश्चवोजत्वा यूयंसम्यक् निवेदितान् । रक्षार्थ यजमानस्य प्रगृहीत शुभान्वलीन् ॥६॥ अथ विनायकादीनाम्- 30विनायका सां० एपसदीप वलिनमः भोभो विनायक एस- दीपं वलिंगृहाण सम सपरिवारस्य आयु०२० शा० तु.पु. भव, मंडलेसंम्रवक्षीमि मया भक्त्यानिवेदितम् । यजमानस्य रक्षार्थ गृहाणवलिमुत्तमम् । नतोदुर्गायै- दुर्गायै सांगायै कर्मकाण्ड रता, प्रहयाग होम पद्धतिः ( १७७ ) "सपरिवारायै० एपसदीपवलिनमः । भो भो दुर्गे एतंसदीपंवलि 'गृहाण ममसकुटुम्बस्य सपरिवारस्य आयुष्की क्षेमकी तु, पू० भव, मण्डले सं० ॥२॥ तत अाकाशाय-30 श्राकाशाय 'साँगाय स. सा. सश० एपसदीप वलिनमः । भो आकाश, एतं सदीपं बलिं गृहाण । ममयज० ममवासकु० सप० आयुष्कर्ता शा० पु० तु० भव, मण्डलेसं० ||शा चायचे-वायवे सांo षसदीपवलिनमः। भो वायो एतं सदीपं वलिं गृहाण । मम- यज समवा आयुष्का क्षे० शा तु पुष्टिकर्ताभव, मण्डले 'सं०॥॥ ततो अश्विभ्याम्-30 अश्विभ्यां सांगाय सपरिचा- राय सायुधाय सशक्तिकाय एपसदीपयलिनमः। भो अश्विनी एतं सदीपं पाय सवलिं गृहीतम् , सपरि ममयज' श्रायुष्क- रौ क्षेमकर्तारौ शा० पु० तु भवेवम् , ततो लोकपालेभ्यो लोकपाल बलिदान पद्धत्युक्त प्रकारेण वलीनदद्यात् ।। क्षेत्रपालाय वायव्ये क्षेत्रपाल वेदीसन्निधौदद्यात् । तत्रैवोक्तम् ।। चास्तुभन्द्रो परि दीक्षादि विधौ दीक्षांग वास्तु वल्युक्त प्रकारेण दद्यात । 'प्रतिष्ठादौ प्रतिष्ठा वास्तु वल्युक्त प्रकारेण दद्यात् । तत प्राचम्य, छौशान्तिरितिपठित्वा श्रात्मानं माय॑यित्वा, ततो होमकुण्ड सन्निधावागत्य, भार्यादक्षिणत उपवेशयित्वाचम्य, सङ्कल्पः- अधेत्यादि० अमुकोई ममामुकस्य चातुर्वर्गसिद्धये, ग्रहयागोरस प्रकारेणा मुकनिमित्तकामुकहोमकर्मणो न्यूनातिरिक्त दोपपरिहा- 'राध मृडाग्नी अपूर्ण पूर्णता सिद्धये पूर्णाहुति होमं करिष्ये, ततः कुण्डे, ॐ मृडाग्नये नमः, मन्त्रेण गन्धादिभिर्मडनामाग्नि सम्पूज्य ॥ पुत्रादि वन्धुवर्गान्याम भागे कृत्वा भार्या दक्षिणतः सर्व उत्तिष्ठन्तः सन्तः ॥ धृताभिधारित पीतपटाच्छादितं श्रीफ- लंच सशाकल्यं हस्ते निधाय, भार्यापि स्वदक्षिणहस्तं पतिहस्त 'सलमं कृत्वा सर्वेप्येव हवन द्रव्यंवा तद्वच्छ्रीफलादिकानि स्व स्व निधाय। ॐ पूर्णादीति मन्त्रस्योर्णनाभ ऋपि रनुष्टुप्छन्दः - - - . - ( १७०) धर्मवाएर रमाकरे, ग्रहयाग बलिदान पद्धतिः रात क्रतुदंघता पूर्णाहुति होमे विनियोगः ॥ ॐ पूर्णादवि परा- पत सुपूर्णा धुनरापत वस्नेव विक्रीणावहा इपमूर्ज ट० शतक्रतो। ॐ पुनस्त्वामद्रावसवः समिन्धतां पुनर्ब्रमाणे वसुनीध यः। घृतेनत्वं तन्वं वर्दयस्व सत्याः सन्तु यजमानस्य कामाः- स्वाहा ॥ इति मन्त्राभ्यां श्रीफलं कुण्डे प्रक्षित्वा ॥ वक्ष्यमाण मन्त्रेण सुवेणाविच्छिन्न घृतधाराभिर्जुहुयात् ॥ ॐ सतत इत्यस्य सप्तपिपिः विष्टप्छन्दः अग्निर्देयता अग्नितृप्तये घृताव- च्छिन्नधारा पूर्णाहुन्त्यन्ते होमेच विनियोगः-ॐ सप्तते अग्ने समिधः सप्तजिहाः सप्तऋपयः सप्तधाम प्रियाणि । सप्तहोत्राः सप्तधात्वा यजन्ति सप्तयोनीरायणस्व घृतेन स्वाहा, इति द्वापश- धा स्रवेणहत्वा, ततः प्रदक्षिणा चतुष्टयं कृत्वा । वक्ष्यमाणमंत्रैः अग्निप्रतपन पूर्वक पाणिभ्यां सर्वाङ्गान्युपस्टशेयुः। मन्त्रा-ॐ अगानिचम ऽ प्राप्यायताम-दति सर्वागस्पृशेत ॥ ॐ वाक्चम प्राप्यायताम् । इतिमुग्वस्पृशेत । ॐ प्राणश्चम 5 आप्याय- ताम्-नासिकांस्पृशेत् ॥ ॐ चक्षुश्चमाप्यायताम् --इनि नेत्रे, स्पृशेत् ॥ ॐ श्रोत्रंचम ऽ आप्यायताम्--कास्पृशेत् ।। ॐ यशोवलंचम प्राप्यायताम्-चाहोः स्पृशेत् । तत हस्तौप्रक्षाल्य, ततः सर्वेऋत्विजः कस्मिश्चित्पात्रेसदुग्ध जलकुशैः होमसंख्या- याः दशमांसानि तर्पणानि कृत्या, तर्पण संख्या दशमांशंमार्जन मप्या चरन्तु ।। ततः न्यायुषकरणं-ॐ न्यायुषमिति जमदग्नि ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः शिवो देवता न्यायुपकरणे विनियोगः । ॐ व्यायुपं जमदग्नेः । ललाटे धारयेत् । काश्यपस्य व्यायुषम्- ग्रीवायाम् । ॐ यद्देवेषुयायपम्-दक्षिणांसे, 30 तन्नो अस्तु व्यायुषम् हृदये ॥ ततः पुनरावाहित देवानग्नि च सम्पूज्य ।। सूर्यादि ग्रहाणां शान्त्यर्थ, दानानि कुर्यात-सूर्याय कपिलांगाम्। चन्द्रायशङ्खम । भौमाय रक्तवृषभम् । बुध गुरुभ्यां सुवर्ण । शुक्रायश्वेताश्वंवारजिताश्वं । शनये कृष्णांगाम् । राहवे खड़। केतवे कर्वरछागम् । यथोक्तालाभे पित्तानुसारेण दानानिकृत्वा ।
कर्मकाण्ड रत्नाकरे, ग्रहयाग बलिदान पद्धतिः (१७६) - . । प्राचार्यादीनां दक्षिणादानं--चैशंपायन:--सर्वेपामथवा- वो दातव्या हेम भूषिताः । शय्यादानम्-शय्यादानं ततः दाचार्याय निवेदयेत् । यतो दक्षिणा सङ्कल्प:-अधेत्यादि कालौ संकीर्त्य, अमुक राशिरमुक गोत्र प्रवरो ऽ मुकोहम् । मुक कर्मनिमित्तकस्थामुक कामनया कृतस्य ग्रहयाग कर्मणोऽ चातुर्वर्गार्थसिद्धये, श्रीपरमेश्वर यज्ञपुरुष प्रीतये, साद्गुण्या- च, वामुकदेवतायास्तुष्टयर्थं, इदं सुवर्ण मुद्रां, वा सुवर्णमुद्रा- क्रियी भूताः रजतादि मुद्राः, इमां दक्षिणां च, प्राचार्याय, रणे, ऋत्विगभ्यो, जापकेभ्यो द्वारपालेभ्यः सदस्या- पर्याय च यथाशेन विभज्य दास्ये, ॐ तत्सन्नमम ॥ इति वा, प्राचार्याय मण्डपदानम वायवीये-मण्डपं गुरवेदद्याद्या. पकरणःसह ॥ अशक्तरवेशनिष्क्रयीभूतं द्रव्यंगांचवा दद्यात् ॥ था कर्मान्ते गोदानंकृत्या ततो भूयसीसंकल्प:-अयेत्यादि० मुकोऽहं नयागकर्मणः सांगफलाप्नये न्यूनातिरिक्त दोषपरि- रार्थ इमांभूयसी दक्षिणांच, नाना नामगोत्रेभ्यो ब्रामणेभ्यो भिज्यदास्ये । ॐतत्सन्नमम । ततोत्राह्मण भोजनसंकल्पः- येत्यादि. मयाकृततद् ग्रयाग कर्मणः साद्गुण्यार्थ, पकान्नेन चासंघकान्नाभणान्मोजयिष्ये, ननो घृतच्छायादर्शनं पध्दत्युक्त कारेणकृत्वा । तत उत्तरेशानांतरालेस्नानवेद्यां, सपरिचार सप- नीकंयजमान होमकुंडस्थेशान बृहत्कलश जलेनाचार्यादयः, त्थाय पूर्वोक्तवैदिकपौराणिकमंत्ररभिषिक्तंकुर्यः । ततोमंत्रा- भषेकानन्तरं संभवेसति, उद्वर्तनपूर्वकं यज्ञान्तं स्नानंकृत्या इदनीगंगाप्रदेश निवासिनो वादित्रादिपुरसरंजलयात्रा मनिवासिभिःसहगंगास्नानं कुर्वन्तितत्रैवोद्वर्त्तनेन स्नास्तीति (शसमाचारः) नृतने वाससीपरिधाय, सचैलस्नान वत्राण्या- पार्यादद्यात् । होमकुंड सन्निधावागत्य, तिलककरणं 30 भद्रमस्तु इत्यादि पूर्वोक्त पध्दत्या नुसारा दाशीर्वादं गृहीत्वा, ततोमड- स्थ देवतानामुत्तराङ्ग, पूजनंविधाय--प्रदक्षिणा चतुष्टयंकृत्या, - , (१८० वर्मकार उरताकरे, प्रयाग बलिदान पद्धतिः मंडपेसमागत्य, हस्तेपुष्पाक्षतागृहीत्वा वक्ष्यमाण मंत्रैस्तत्रतत्र विकिरेत्-विसर्जनभंत्रा:--ॐ गच्छगच्छगणेशत्वं, विसंघ- निवारण, इष्ठकामसमृध्यर्थं पुनरागमनंकुरु । ॐ ब्रह्मस्त्वंगच्छ, वैकंटे सर्व कर्मप्रसाधक | विष्णो त्वंगच्छगोलोके कैलासेत्वं महेश्वर । लक्ष्मीत्वं विष्णुपारचंच स्वभारमनुव्रज । रवेगच्छ- कलिंगत्वं चन्द्रत्वंयमुनातटे | अवन्तिगच्छभौमत्वं वुधत्वं मग-, धेवन । गुरोबासिन्धुदेशे भृगोभोजकटेवज । मंदत्वंगच्छ सौर राहोपैढीनकंबन । केनोन्तर्वदींगच्छत्वं स्वस्वस्थान नव- ग्रहाः । इन्द्रामरावतींगच्छ तथाग्नेयींचपावक । यमसंयमनींगच्छ नैर्मतीव्रज निर्गते । घरुणांभोनिधौगच्छ सर्वत्रव्रजमारुतः गच्छा लकाकुवेरत्वमीशेशानी दिशंब्रज । 30 यान्तुदेवगणाः सर्वे पूजामादाय मामिकाम् । इष्ठकामसमृध्यर्थ पुनरागमनायच । ततो होमकुण्डे-३० भोभोवन्हे महाशक्त सर्वकर्म प्रसाधक । कर्मान्त रेपिसंप्राप्ते सानिध्यं कुरुसादरम् । गच्छत्वं भगवन्वन्द कुंडम- ध्यात्सुरेश्वर ॥ यत्रब्रह्मादयो देवास्वत्रगच्छ हुताशन ॥ 30 चतुभिश्चचतुभिश्चद्वाभ्यांपंचभिरेवच । हयतेचपुनभ्यांसमे विष्णुः प्रसीदितु । हस्तेजलंगृहीत्वा ॐ कायेनवाचामनसेन्द्रियैर्वा... बुध्यात्मनावा प्रकृतिः स्वभावात् । करोमियद्यत्सकलं परस्मै_ नारायणायेति समर्पयामि । अनेन ग्रत्यागकर्मणा श्रीयज्ञपुरुषो महाविष्णुः प्रीयताम् । 30 तत्सद्ब्रह्मार्पणमस्तुततो ब्राह्मण भोजन कारयेत् । इति ग्रहयाग होम पद्धति ।
काण्ड रनापार, गृहाग वास्तु परिभाषा (१८९) ॥ अथ भूमि परीक्षा पूजनं ॥ श्री गणेशायनमः !! अध च वास्तुभद्र गृह प्रवेश मन्दिर वापोकूर जलाशयाना प्रतिहार कभरगावश्यकत्वात्तत्रादी निर्माणार्थ भूमिपरीक्षामाह-~- उक्तंचगृह्यसूत्र--(अधात: शालाकम) १॥ सरा भावस्थ्याधानादीनि शालाग्नौसाध्यानि, अनुनिहितानि, शालाकर चनौकम्, अतोह- सोशालाकर्मशालाया:, गृहस्य क्रिया व्यागास्यते, (पुण्याहे शाला कारयेत) ॥ २ पुण्यं शुभ मलमास साहास्तमित गुवादित्य सिंहस्थ गुरुक्षयमाम दिनव्यह क्रूरमहा ऽ क्रान्त युक्तनक्ष मादि दोषरहित ज्योतिः शास्त्रोक्त गृहारम्भविहित मामपक्ष तिथियारनक्षत्र योगकर्णमूहत चन्द्रतारा वललग्नादि गुणान्वितमहः पुण्याहम् । तस्मिन् पुण्याहै शालाग्रहं कारयेत, निमाय मंत्र । यनाम्ना तस्य शापाया पारवयमविरोधियत । विद्वद्भिस्तदनुष्टंय मग्निहोनादि कर्म पत. ॥१॥ इति वचनात पारस्क राचार्यणा नामपि मौभिलगृह्यसूत्रोक्त (४-५) देश विशेष मविरोधात अपेक्षितत्वाधान लिखामः ॥ तद्यथा--कोहरो देशेशाला गृहकारयंत, समेऽतामरी ऽविशिनि प्राचीन प्रणने उदया श्रधारा । कंटका काटकोपधिवति भूमौतत्रैव गोमिल (गो रपामुद्राह्मणस्य ५.) गौरा.श्वेतयणा. पासपोरेएवी यस्मिनवसाने तद्गौरपांगु श्रयमार्ग गृहम् तब्राह्मणस्य भवति । उत्तरसूत्रयोरप्येवमेव विग्रह. (लोहित पामुक्षत्रियस्य) ६-रक मृत्तिका क्षत्रियस्य (कृष्ण पामुपैश्यस्य ७) कृष्णवणवैश्यस्य-वास्तुशास्त्रमतेतु-वैश्यस्य पीतपांसी ~शदस्य कृष्णपासो-अथभूमोसमोन्नत परीक्षा-(स्थिराघात मकवणमशुष्क मनूषर ममरुपरिहित मकिलिनम् ) मुद्गरादिभिरपि यदाहन्यमानं नविदार्यतेतास्थिराघाताम् एकवर्णम्, अभिनवर्णम्, यत्रोपन माना एवौषधयो नशुध्येयुस्तदशुभम् । ऊपरम् इरिणम्, यत्रीप्तंन प्ररोहति । न ऊपरम्, अनूपरम् । मरु शब्देनोदक रहितः प्रदेश उच्यते । यत्रदुर मपि वनद्भिः किंचिदेवोदक मुपलभ्यते । उक्तंच.gोपमुन्नतमात्यात शादाचवीष्टकारस्मृताः किलिनं सजलं प्रोक्त दूरखातीदकोमरुः ॥ शुद्ध भूमिविचार:-- मूहर्त मार्तण्डेश्वेता रकफपीत वसुधा स्वादु. कटुस्तिकका. कापाया घृतशोणितान मदिरागंधाशुमा विमतः ॥ भूगन्धवानम् --मुगन्धा माहाणी भूमौ रक्तगंधान क्षत्रिया । मधुगंधा भवेद्वैश्या मद्यगन्धा - चद्रिका | भूमेरस पानं मृतिका भक्षणात्-~-मधुरा ब्राह्मणी भूमि, काया क्षत्रियामता अम्ला नैश्याभवेद् भूमिस्तिता शा प्रकोर्तिता ॥ प्रकारान्तरेणभूमिपरीक्षामाह-~-विश्व कर्मप्रकारो-नियर्मद् हस्तमात्रेण पुनस्तेनैव पूरयेत् ॥ पाशुनाधिक गध्याना श्रेष्ठा मध्याधमा अमात्र ॥ पुन स्तव गसँवायुपरीक्षांकुर्यात् सातमध्ये गतं मध्यपति दीप प्रज्वाल्य (१२) फर्मकाण्ड रनाकरे, गृहाट्स वास्तु परिभाषा " वायुतो दीप शिखांदक्षिण दिशिगता भूमि परित्यजेत् ॥ पुनः-फालकृष्टे 5 थवा देशेसर्ववी- जानिवापयेत, त्रिपंच सप्तरात्रेण याराहन्ति तान्यपि, ज्येष्टोत्तमाफनिष्ठाभूयाह्या वयाचसामता अरनिमात्रंगत अनुलिप्तेतुसर्वशः ॥ धृतमाम शरावस्थंकृत्वा वर्तिचतुष्टयम् ॥ ज्यलयेइभूमि परीक्षार्थ मंपूर्ण सर्वदिमुखम् ॥ दिप्त्या पूर्वादि गृह्णीयात्, वर्णानामनुपूर्वश. ॥ सर्वतो दीप्तो सनैषां शुभदेति पूर्तममला करे मात्स्ये पुनस्तत्रैव ॥ श्वभ्रमणवायु पूर्णपद शनमिया गतस्य यदिनोनम् वदन्यं यच्चभनेत् पलान्यपा माडकं चतु पष्टिः ॥ भूमि सुप्तादि परीक्षा वास्तु शास्नेक ग्राम दिशश्चैव स्वरयुक्तंतुकारयेत् ॥ वन्हिभिस्तु हरेद्धाग शेपाके फल मादिरी ।। एक जागति भूमिश्च द्वितीये समता भवेत् ॥ तृतीये राक्षमी भूमिस्तस्या मृत्युनशंमयः ।। स्तरक्षादि परीक्षामाह-उक्तंच पारस्कर गृहमने-- (दर्भगमितं ब्रह्मवचंगका- मस्य)-दर्भसंयुक्त भूब्रह्मवर्चगच्या याने तत्कामस्य (यह तृणैर्नलकामस्य १० ) मृदुसृणे. पशुकामस्य १०) स्पष्टम् ॥ उक्तं चमत्स्यपुराण-कंटक तौरक्षश्वासन सफलोद्रुमः ।। धनहामि प्रजाहानि कुर्वन्ति क्रमशस्तथा ॥१॥ ब्रह्मवैवर्तपुराणेद्वारिका निम्मणि-शान्म- लीना तितिडीना हिन्तालाना तयैश्च । निम्बानां गिन्खुवराणां उम्बूरीणामभद्रकम् ||१|| घत्तूराणा घटाना च एरण्डाना मवाटिनम् ॥ एतेषामतिरिक्तानां शिपिरकाष्ठ गुत्तमम् ।।२।। वृखंच रजहतकं दूर तोपरिवर्जरोत ।। पुनदार धनं हन्यादित्याह कमलाद्भवः ॥३॥ उक्तंच मात्स्ये-पुनगा शोक वालशमा निला चम्पान् । दारिगोपिपलोदाक्षा तथा मुममंट पम् ॥१॥ जम्भीर पूगपनमद्रुममंजरीमिजाना सरोज शतपत्रिक महिनाभि. ॥ यमारिकेत कदलोढल पाटलाभियुक्त तदा भवनं श्रियमाननीति ॥२॥धास्तुप्रदीपे--गादाणी भू उशी. पेता क्षत्रियास्गाहरा कुत्ला । शिक्षाशालानरमा गहायवनृणाकुला 11 वादोग' स मुपदा क्षनिया राज्यदा मंत्र ॥ धन धाग करी नैश्या शबानु निदिता युध, ॥२॥ निषिभूमिमाह वास्तुपदीये-- स्फटिताचगशल्यान वन्मीमारी हो या | रा. परि. मध्ययं कर्तुरायुर्धनापहा ॥९॥ म्युदितामरणंम्यादपराबननाशिनी ॥ मशगाशिदानिय निपमारानुबधिनी ॥२॥ सर्वोत्तमां भूमिमाहपारकर गृहसूत्रं--(शारासम्मिता) (मण्डलेद्वौपसम्मितंघा १३) यमपाश्वनाः स्वयंसाता गर्वतो ऽभिमुगायु. ४) शादेइष्टकारेशान्तरप्रसिद्ध । चतुरसमित्यर्थ । मण्डलंपरिमण्डलंयतुल मिलः द्वापरानं.परा मभिधीयते, मण्डलय तद्वीपंच मरासदीपंत'सम्मितंया तदाकृतिया, फर्धनाम,उगतमसतः परितिः परिमण्डलाकाय ॥ चतुरसायति । पनपायस्मिन् स्याम स्वभ्रा. अपटा ससाना: यमुत्पन्ना. मर्मत, मर्यामुदिव अभिमुरादिनरेतराभिमुसमापधातु - १ (मा कर्मकाण्ड रक्षाकरे, गृहांग वास्तु परिभाषा (१३) 17 पसानं प्रागद्वारं यशस्कामो क्लकामः मुन्यातः १५)तप्रतस्मिन्नपं गुणपिशिष्टस्याने भमसाने गृह । यसमवसानशब्दो गृहक्चनः । पुतः पुनरपसानग्रहणार । अगुद्वारंचगृहद्वार मिति एद - शब्दश्रुतेश्च । प्रागद्वारं प्राइमुखद्वारं यशस्कामोवलकामः कुर्यात. । कामशब्दाभ्यासादन्य तर सामी नोभयकामः । यद्युभयमभिप्रेतम्या तथामत्तियशोवल काम इत्यपक्ष्यात् । तस्मायशका मोपलकामावतिद्रष्टव्यम् । ( उदग्द्वारंपुत्रपशुकामः १६) अवमानकातितिपसते । (दक्षिणा द्वार टे. सर्पकामः १५) दक्षिणाद्वारे पास्तुनियद्य-कामयते तत्तद्भवतीतिदर्शयति । (नाम ग्द्वारंकुचीत ॥१८॥ अतुद्वारंच ॥१६॥ गृहद्वारम् ॥२०॥ नयुतितिपनी , अनुपश्चाद्वार मनुद्वारम् । तादृशंगृहहार नपुतिति । द्विद्वार मित्यर्थः । प्रथया द्वारमनद्वारनकुषीत । नाम, अन्यमुरादाराभिमुसं गृहवारंनकुतित्यर्थः । उक्तंचवास्तुशाखेद्वारगवाहस्तमैः कर्दमभित्यन्तकोणधश्च नेवास्तुद्वारं विद्धमनीकांतमार्याच । गृहद्वारंन कुपातत्यक्षः।। (यधानसतोकोस्यात. ॥२१॥) यथायेन प्रकारेणायं वास्तुनि साध्योपागन होमार्चनभोजनादि कियाप्रवृत्तीयसित्तिनां चाहालपतितादीनां संलोको, पालांकन गभ्यानस्थानभवा । सातनि- स्त वस्तुप्राह वास्तुशाने-खातयदिश्मालभते हिरण्यंतष्टकायच समृद्भिरन्न । द्रव्यच रम्याणिमुग्णानिधत्ते, ताम्रादिधातुर्यदि तत्रवृद्धिः । पिपीलिका ददुरिकाहचेस्या द्वसंनतनासित कार्यहानिः । तुपास्थिचौराणि तथैवभस्माद्यगटानिमामरणप्रदास्युः ॥ परराटिका दुःखदरिद्र दात्री कामिएपातिददातिरोगम् । काष्टंप्रदग्धंदिरोगवृद्धि कलिभवेत्सपरगनित्यम् लोहन कर्तुमरणप्रदिबिचार्य पास्तुप्रयदन्तितज्ज्ञा । दिसाधनसिद्धान्तरहस्ये--इत्तेगमगत्तेतु अन्त:स्थितिशंका: क्रमशाविशत्यति । छायाग्रमिहाच पूर्वा ताभ्यांसिध्यतिमेर दिक्चयाम्या । भूमिसुप्तमाह-प्रद्योतनापञ्चनगाइ सूर्य नन्दुपतिविंशतितेपुषु । शेतमहीनेषगृहविधेयं तांगमापी खनननशस्तं । अथ गृह निर्माणवेध-पहलमाह--प्रणम्यपारपतीपुत्रध्यात्मा नारायणगुरुम् । लोकानामुपकाराय क्रियतेवधराग्रहः ॥१॥ शिवउवाच-वर्धक्षयालय यान्ति देवमानुपराक्षसाः । धनहन्यतनित्यं नास्तिवेधममोरिपुः ॥२॥ वैधनकलहीनित्यं वर्धनचकुखनमः अंधेन हियतेस तस्मानिरीक्षयेत् ॥३॥ विष्णु.पृष्टैशिवाष्टौ चण्डिकाय दक्षिणे । तत्रवेध निजानीयाद गर्गस्यवचनंयथा !४!! कोण १ दृक् २ छिद्र २ छायाश्च ४ ऋजु ५ चंशा ६ न ५ भूमय: ८ संघात ६ दन्तको १० । चेतिवेधास्तुदशधास्मृताः । ५ कोणावेधेमवेमृत्यु दृग्वैशेतुधनक्षयः। पशुहानिभवच्छिद्रे छायावधेचराक्षसाः ॥६॥ अवैधेमहानागी पन्शनाथस्तु पराजे। अक्ष पशुहानिःस्यादिग्भूमौचधनक्षयः 10) संपातेनिधनंशीघ्र दन्तशोकमादिशेत् । कोणासिकोरापर्यन्त प्रमाणकोणवेषजम् । कोणाचनिधनंशीधं गृहेन्दोनिरर्थकम् । तथानीच A
(१४)
कर्मकाण्ड रत्नाकरे गृहांग वास्तु परिभाषा
स्थितकोणे कोणवेचानजायते ११ समछिदेछिद्रवधो ( गुफावध ) भूवधोनाधिकातरे । उपा
दृष्टिपातस्या च्छायासूर्योनदृश्यते ।१० यामादूर्वन्तुयाछाया छायाप्रहरादध साठायादोषदा ऋणा
वृक्षप्रसादगेहजा ॥११॥ सवपामपिवृक्षाणा छायारोगफलप्रदा। सध्यन्तिसदावृक्षा किरोग
राक्षसा ॥१२॥ नकुर्याद्याम्यनैऋत्यामाग्नये प्वपियाटिकाम् । अन्यधार लहाटेगो कटवालभते
नर ॥१३॥ वृक्षवेधमाह-वर्जयत्पूर्वतो श्वत्थ प्तक्षदक्षिणतस्तथा। न्योधमपरादेशा
दुत्तराचाप्युदुम्बरम् ॥१४॥ अश्वत्थादग्निभयचिद्यात् प्लक्षाव्या प्रमायुकान् । यगोधात
(पवृक्षात् ) शस्त्रसम्पीडामक्षामय मुदुम्बरात ॥१५॥ आदित्यदैवतो व्यथा प्लचस्व
यमदैयम । न्यग्रोधावारणावृक्ष प्रजापत्यउदुम्बर ॥१॥ कृपादिवेधानाह-कृय कोश
मतरूस्तम्भीदेवीद्वारम्ववमंच । जलधाराश्चवहिश्य दशवैधारहस्मृता ॥१७॥ कूपवेधैभवेन्मृत्यु
कोरावधेदरिद्रता । ज्वरपोदातरोर्वधै मृत्युस्तम्भस्यवेवत ॥१॥ देववध पुनस्य द्वारवधदरि.
द्रता । मार्गवेधाद्भवव्याधि मृतिस्तु जलवेवत ॥१६॥ धारावध प्यपुत्र व्याधि स्यादग्नि
वैधत । गृहाणा समिकृष्टत्वा दारावेध. प्रजायते ॥२०॥ कोणावभ्रमकूपकर्दमते द्वस्तिम्भ
विक्षितम् । समोद्विगुणाधिकिान्तरभवनधन दोय क्लि ॥२१॥ एश्वर्यपुनहानिश्च स्लोनाशी
भरणभवे । सम्प छनुभयसौरय पुष्टि पुर्यादित क्रभात ॥२२॥ गृहमन्यभषेकूपो धनहानि
प्रजायते । तस्मात्सर्यप्रयत्नेन नकुर्यातगृहमध्यगम् ॥२३॥ पुष्करिणीदवपुलंचैत्य प्रामादोनदी
चेति । अशुभाचिदिनुकथिता पूर्वात्तरयो शुभाएष ॥२६॥ प्रा यादिस्थेमलिले सुनहानि शिखि
भयरिपुभयश्च । स्त्रीपादोष कलहाने स्पवित्तमुतप्राप्तिश्च ॥२५पापाणादिवेधाना-
पापाणस्तरुवेवश्च सम्भवेयस्तथैवच , चलभृमिर्जलाकारा लिंगछर निशलकम् ॥२६॥ पूर्व
पाषाणजावैध स्तरवेधो ऽग्निकोणक । स्तम्भपेषस्तु याम्या चलमिस्तुनमात Pl
जलाकारधारया लिंगयेधस्तुमास्ते छन्नयेधस्तुसौम्यायां त्रिशल छम्भुकाएक २८ आति
गितीपगूढाश्च शिलालाष्ट्राकृतिस्तथा । उपविष्टोपगाहीच घुपवेधा स्मृतायुधै २८ निरपरदि
मागेयाम्येच मटमादर । पश्चिमनादरी कुरिपात नैवतयातरे 11 मदिर पदिग्भाग
याम्यवार्यश्मयान् । पश्चिम मध्यच श्मशार चौतरे यजेत .11 याम्यादिपशुभपत
जातात्तरप प्रदक्षिणनैप । उदगादि पुप्रशस्ता प्लपटो दुम्पराश्रया ११ मयान्यरस्परीन
गृहाणां धारापो जायते समिकृष्ठे ।३३, वृक्षारोपणकार माह विश्वकर्म प्रकाश।
नगर यिन्यस दादी पाट्याश्च पियसा ! पोलने पर्व त्यभानप दापदा ॥३॥
आग्नग्यो सोर वृक्षच नया व फरक । पायव्य कटावा नेश यो पदति यमन
पुहिमवान वृतं चरितर दक्षिण । पश्चिम पुणिमा उत्तरे गमन तरम् ॥३॥
कर्मकाण्ट रताकर, वेध शान्या रगापन शानियामापाटयां स्टा वायगशागात त्या ॥३८}} ठिकपरत्वेन वृक्षारोपणे शुभफलमाह तत्रैव पिञ्चय शाल्मले पारव्ये तिमिणा तथा । उत्तरे शरन च ईशान शाम ||३! पृचांदिपु प्राय: पादपावसारताः। व्यम्ना शुभफला नाफाधनवान्य फायदा १६ घट पुरस्नादरम्या दक्षिणेचाप्यु दुम्वरः । अश्वाय. पश्चिमभागेप्लतरतृत्तरत शुभ 16011 केशवपडतो-होशाक शमकंवा याम्यादिगृहमं पान । अश्व चौदुम्परसम्तायस्तागरालया. १४१॥ पिस्तनतुरियो पाम दक्षिणगमुगः । थामहानिस्तपार्षम्य दक्षिणेरंगशोष मार ॥४०॥ ममुग्यमृत्युमा'नोनि नदोषोऽस्लिनतोन्नत । मत्स्यपुराणे-बगदाधाराव पास म. सफलद्रम. । धनहानि प्रजाहानिकुन्तिनगशस्तथा ॥४३॥ नयिदि तान-यानन्तरे रचाप भार । पुनागाशीय पकुलशमीतिलकचम्पान् || दाटिमोदिपपलोद हा तथामुममग पग ४ ll अम्बार पुगपनमह मनमरी भजाती सरोजशतपनियमलिकाभि । यतारिवेलादलोद लाटलाभियुक्त तदनमान नियमातनाति | पूर्वपश्चिन्योर्वेश निर्णय -- यह भवत्पूर्व द्वारा मुनिगम्मत । पश्चिमनिहन्यो रगत्यवतन्य या ॥ - - पर्वधनमायुः क्लहनियनिय श । अपुन चंचजायते पाहण्यामिनिकालिनम ॥४८॥ या यूपतगंग प्रामादगृहमन्दिर । एनधाभव यन पारगमापसम्भया ॥४॥ वृक्षवधेभर मृत्यु, गृहधेधन क्षय वीपुत्रस्य मुनिभि परिवर्तितम ॥५॥ द्वारधम मयु परमानारणातदा । स्त्रीणाचवहुपीडाच मात्यवचनं यथा ।।३.१६१ १३मारतानध श्रानियाय गेलया । देवगणेनरशदेच नैऋत्येयारण पानमा रिमन्दिर निर्मन ना पहननरदेवा गर्गस्वप वा। ११५३॥ अग्नेयवायव्यवेध निर्णय. तुरस्तुयदाग्नेयं निम्नवायव्यमेपन । यहवेधाभनेतत्र मावागायचस्मृतम 14 ITरटान्पितम्भौरद डिमन । क्लेरंचा क्षच श्रग्नेया दिशिवनयर 14.!! आग्नेयातुयदा , श्रापिच्यामियभवा । रागपंहुविधयंका पायव्यस्था श्यमानपा, ५ नीचभवतिचा नया मुन्चनायव्यमंपच । नाजायतेतत्र व्यासस्यवचनं तथा ॥५॥ प्रहरादित्या वृक्षवाद गहजा । तिमविजानीया दग्नेयायध्यमपच । ॥८॥ आग्नेयामन्दिरस्या द्वायच्याद्वारपच । असिनेवाभवेता गगनपर्नयभा १५६|| वंशानु सानि वयोजाय तातिवैधत । यतापरययान्ति मनुष्याणांतुनारया ॥६॥ भानयजाय वधस्तवमिहातिनियार। तदातनीध स्यादर्गम्यपचनं यथा ॥६॥ श्रथ दक्षिणोत्तरदेध निर्णय दक्षिणभ्याभवनच नीचंचोत्तरदिकस्बिरम। वेतप्रविजानीया मायुरोग मयाधिदम् ॥ दक्षिणेमन्दिरस्तम्भउत्तपापाए मेवर 1 लिगजलकूप मेपामय - (१६) कर्मकाराष्टु रत्नाकर, वेवपट्टल: तमनतु ।।६३॥ उत्तरस्यागृहपति. पंच्यतेनात्र संशय. प्लक्षचम्पफसजूरमालत चीजपुरकान । 1६४॥ एताक्षमयान्बेधान्दक्षिस्योपरित्यजेत् ॥६५॥ आनंनियंचसजरं दाडिमंधीजपूरयम् । एतान्दैफलधास्तु दक्षिणस्याविषजयेन् ||६६॥ पुनहानिहानि स्थापशुनाशनम् । दारिदयूंजायतेतन नुनोनावचनंयथा ॥६५॥ संस्थाप्यपूजयेत्तत्र हनुमन्तगृहोपरि ॥ पंधत्तत्र नजायेत दक्षिणोत्तरयोमिथ. ॥६॥ अथनऋत्येशानयोवध निर्णय.-नमन्यांमन्दिरंतच्चे पोच्यन्ते त्योशदिपस्थिताः जनापर्मतियतम पालाशोभयंसदा ॥६६॥ गृहंप्रासादरश्चैत्र तारणोऽहालमंचच नेत्येयदिश्यतत्वीशानेवैध तिदा ॥७६|| रतपुष्पागदाटिया साटु- श्चागोवटस्तथा ॥ एतफलमयाक्षानेन्नत्यादिशिवर्जिता ॥१॥ दरोगदिश्चैव विन्दन रटरक्षक. एतवंधविजानीया दीशानेनैतत्वच ॥७२ स्त्रीणांनीशिविवाद. त्याहन्धूना सिह स्यापितापुत्रार मितिवेधाचनते ॥७॥ गड़पनियतेम्वामिगतश्री पधर्मन्दथे । चतुर्धपुनहानिः स्या मर्वनश्यन्तिचाप्टमे ॥७पक्षेचमासेच प्रातुद्वयंचमम्पन्मर पापिफ्लंबिभा शुभाशुभंज्ञेयमिदंयुधैश्चनात परंपालपिचिंतनीयम् ।। ५॥ अथहस्तादिमानम्-चतुरवि गुलविंशति मित. करोयुगकरोदण्डः । तद्विमहामोश क्रांशचतुयोजनांतम् ॥ ३६॥ मथ युगानुसारेणदूरीव्यवस्था-मतेतुयोजनाद्वेपत्रेतायागेशमात्रन द्वापरंनरशब्दापक्लागार मपातनात् ॥७॥ देशविभागेनवेधानम्-जातघरेहस्तमरयापर्यतेदण्डया ग्गुनाः माया जोशमाच्याद्वोपालंयोजन स्मता ॥२॥ पंध स्पादनुपशशिरपातंचवतोयाम्प तम्या पारगी नम्बाईचीत्तरपूछ । मोशमाउंपारिनघायोजनमानन· गृहस्यशरश परमांकाच्या ८०॥वर्णव्यवस्थयावेधमानम्--पाधादशदंड स्याद्याम्यगोशस्तुपश्चिमे । शिनिय मौम्येगवेदा ४, पिपमानाम् ।। पान्या शनयंदा याम्यविधीहिदर्शनात । सुशा पश्चिमाया मुग्नश नृपाशयात | राजगहपस्यम्या पंचवाम्बुगमनाम् । धना यस्यापि धौनीरजातित ।। उच्चनीच समभूमियेध ~ नीपिसरे पृष तुंगस्था परदक्षिणे तीर्यम्भ राचं दिग्भाग पंलन्ते पुरवामिन की दशददानि पन्तं लोग नीचकम् । उत्तरे द्वादश नीचखस्थानस्थितितः गदा ।५। पश्मि साग्नि . मंदानि यदि दुचभुमिपु । दूरस्थं पाम्मोपस्य पयाम्य गृहन्यजेश ६ एग्राम विशेष माह नगरेया पुरेपाऽपि एक्ग्राम ग्रहस्थिती 1 तदनरमितहम्तः संस्थायानु दिगष्ट । पूर्वस्या माग्नेग्योपोदशावधि । शिषु याम्यायो पम गृहपागग रािम नमन्या निगडपु पश्चिम । प्रष्ट पायच्या मष्टादशम पंगा शंभुरोग तजमिनरत्त परं ग गृहन्यो ।. शिवोतिः रात कर्मकाराष्ट्र रतावरे, येधपट्टलः - मग गदिशुमहेश्वरि नगरेवापुरचय दशयन विश्वन १ वेध्यवधानमाह.याण- धात्परं चापि भवेय सर्पगम्मती व्या रानस्थिपास्ता नप परिकीतित ६२ गमभनी यदाधोदान्तरं परिव पर अस नी तरगत प्रयसी ६३ प्रत्युन्न मनदहा नामोत्तर १० स्परम् । द्वियमित टंडा मध्ययाति नीचगम ६६ धनु. NI+यंतर नीचे गरमी ला मनिषि सौतथा पश्चिमदिग्विभागे निमान : नगृह शिपाय / भरनपुर ग्रामासयकोश रहेपुनिरगना दीपा । पचास्यो य जाध पाविदगागान्ति - बंधपरिहार माह ~~-तपसाली ताय गौतुषे गयमरपे । गगी. यागम्ममानव धानर प्रजामत १७ श्राग्राम गृगारगामिज मतिम । यास्विरमा थाम गनारिन । पम्नदागृह । ६ अयुगमानिनीचेवा प्यक्ष मध्यग । जलाशयश्वमा 1 मन नजायन बापीर पर डागानां पागा सम्भोगना गित्तारिनन । ग्याानमा मग १.. म्यानमारनामा नाचर बोनभदौ नमातरम १०१ तथा नायिनेमण करानमाया मायतनं मा शिलागि शर ना या नदीगासा: पवन पर्व पर भिनतिन ने 3 समभूमी द्विगुणाभूमि त्याचा पीडान-गाते गृहग्यायो विगुणिनां लाया शानजायते । तद्यालय वृक्षावध पुरामिनाम वास्तुन मध्यगामि म्याद्वधरोमदा ५ गद्य-नरें पर्वतराजमागा तरेनवधोनरतस्विनाऽपि । नामान्तराजमहानरेवा गृहस्यमानाहिगुणोनदोष 11 इति पाहा निर्णय अथगृह निर्माण द्वारादिवधानाह द्वारगवाक्षस्तम्भ पर्दमभियान कोणधेच मधास्तुद्वार विदमना मतमायाय । एकभित्तीद्वारयुग्म सयौन परा मुसम । धन विजान पाम य पीडा प्रजायने ।। दुनिदार नातव्यं प्रवद्वार तथा । कुक्षीहानिश्चया च्यापि विनिदिशा । स्तमहीन नबत्तन्य प्रागाईल मरगृहम । माक्षी तर श्चय तम्मात तमाश्च तारय । १०४ उद्घाटन विधानेच गशन्दर शोभिना चार मभार न पिटद्वार विजयत ।। इति वेध पल । अधध्वजादि भायादय:विस्तारण हतटैध्य विभजेदछ भन्तत ! यसमवेदाय! चनाद्यास्तेपुरिष्ट पामोदर मागी सरभोपायमोहम श्रिीपति - गृहे पुचाया रिपमा भशस्ता । वशिष्ट ---विषमाय शुभायैघरमाग शारद गद अथ नन्दादि शिलाप्रमा- सम-विश्वकर्म प्रकारे शिलाप्रमाण प्रमश गदिश वर्णानुपूषण तथागुल नाम । अधेर विशद्धनविश्वनन्दा पिस्तारये व्याममित्त तदर्धम् । तधिकानों वििडकास्या दू मां- - फर्मकाण्ड रताकरे नेत्रपहल परिमापा धिमा न्यूनतरानायां । वर्णन्यरस्थया शिलामानम् एपिंश द्विजाग्याणा क्षत्राणादश सातच । त्रयोदशन्तुरैश्याना शहाणानु नवा गलमा प्रासादाद तुविशेप विश्वकर्मशास्त्र- प्रासादग्दी विधानेन न्यरत व्या मुमनाहरा । चनुरसा समा का गमन्ता दस्त मम्मिता । शिलानामानि सचिन्हानि-गन्दा भद्रानया रिकापासुनशिलामुन । पदमसिंहासनचर तोरणा छनमवन । कूम्मचतुर्भुज टिन नमशालिया। टंकादि दोपपरिहारार्थ- सपन विधानमग्निपुराणे--सयामामविक्षपण तनुणाय गुगटुनम् । मृदिगामयगामृन कारयिगन्धवारिणा विधिनापञ्चग यन ग्नानपचामोनच गन्धत।शान्तरकुया नितनामाक्तिा रगुना फ्लरत्नमुनाना गा रहसनिन्तित ॥ चन्दननमम ल-यखरान्छादयन्छिला स्नपन पृजनमत -प्रय गागानि शिलास्थापनार्थ सनननमवास्तुशाने-इति वास्तुविधानन्तु कृ वा रनान् मग उपाा समान्यगिय तामगारागान्वित तनदिक्माधनकुर्यात गृहमध्य सुगाधिते इशानादिक्मणा वणकुछ लन्तु । यन्तिामाणभागा मध्यपश्पित । नाभि मातिवागत्त शिल नाम्यापन शुभम् । शान्तानि नामानियनविन्यमा ॥ स्थापन मन्त्रादिशिययंप्रयागपचामि ॥ सन्मादिशिलानास्थापनाय, प्रतिशिलायाआधाराव पापशिला क.पा ॥ तेषामुपशिलानामध्य पाटियम्मा ताममयामृग्मय वाविप्रादिवर्गक्रमण पश्चागुला मा दद्यगुा सपादागुला पथकुम्भा कापा ॥ वशिल पास्तुनन सनि सकुम्भम्न तिछ ग्यशरागलोयम । विप्रादिपणानगा पसस्त स्तनामानन्तुनद मानम् । वास्तुपुजाविधा नम्-तर- निभागमण्डपक वा म यभागनिक। निमाणेन्दिराणाय प्राशनी पिता । स्नुजातुरत जातस्मात्तास्थयाम्यत । गृहम यहस्तमान मनमाडलारि । एकाशीतिपय रतुमनकार्यम् । तिवशिष्ट ॥ सूत्रपाततया य तयास्तम्भात्यपुन । द्वारपन्ना च्येतद्वत्प्रवशममत्रत मा । वास्तृपशमनेनद्रास्तु यनस्तुपश्चया ॥ वास्तुभद्रोद्धार --एका. शीतिपदकुयाँदेणुभि कनाना । पम्यापिटेनानुले मे सोपाल ड्यमयत ।१३ दशपवापरारंगा दशातरग्यता । सवास्तुविभापु नियानयकाना । रेवान मानि-शान्तायशोबती काना विशालाप्राण वाहिनी। मती मुमनान दा मुभद्रामुन्थिनानधा । पूवापरागतायेत्ता उटग्या म्याधनाम्तथा । हिरण्य सुनतालक्ष्मी गिभतिविमल प्रिया । क्यामान शिकार तथेद्रादशमी स्मृता । अपसव्यम्मरमव्य सम्पन्मानिशा। याग्निस सपनार्थ भक्तमयमगृतम् । युग दुििद्वपाग या यासारपिन । स्थगि राप्रयुवा प्रतिमामान्य । पदरसान्पू नयहवार निंग पञ्चदशवच । ईशानादि मंगना-प्रारतिगयनम्य पया । शमिन्रम गन प्रापर- मान ! पर्न यपीतपणे निरनिरपनन । पाता तद्विपस्तामृतम्याम नतः। पता कर्मयाण्ड रताकरे, गृहांग वास्तु परिभाषा (१८६) मिट्रिपरमा पानितिमगाद् । सूर्यरचट्रिपरे प्राणमनिसय गा। रायपत पदनातन दीनेनियT | गुणद्विपदा भायदा तिमत्रत गरनोलचरपदघाघननिमता यायुमन पदधम मानायुमानत । पृपणयनिम ए रसमाधिपणम् । निविपत रिश्य दोनिमनन । गृहामावीतिमन्नेगा पोत द्यावर सतग । यमरणदिरण यमाय इतिगन्धन गन्धयद्विपटरत ग-यय निमनत व्यशियारान गामरा निमत्रत मृगानमीममप्रग पोतमेम्पद मृगगम । तापिरमपद पित यस्रवतिनिती । द्वार यापरतत वारिपतत मुभावद्विपदश्वा मापाननिमान रस प्रिंडप तग पायतिम मत पापनपत म्ममवरुणनि । पागोनिदप गुरपीन गर्गमम । नमास्यति पा निगम पीतमपटपमाभमन्यानि त । पर य पसगा रार समाधिमम् । यहि रिसी मन्त्रणरत्तगमगरम। मुयसन अधिगन मुससम्स्यात । व्यावसाट भन किणीम प्रत । ० र गम (गामाम पन्या गम । ग17 दुपदगयधामारामा वपदाननितिपोता प्रदिनिया र तिनभाT ! तिमापदापीता कायम्वाह निम 77 । अमभूया पोशमादिनीयम सट अप माशीपापा सम्मानमन्त्रत । परमात चमारिर मान यमनमापगा। यामय पदगार मदिति नाता। शायपरमेश।। ग्रारदातरम का ततगतका वादामना । प्रायमहरा व्यापमगमगामात । गति। पसमिनार घरायम् । 24 पनि पत्र तापपश्यानिरिक्षण । शकरक ए-मुदि ग्रानानम त । मन अपर मत्रा पार [ राजयचगाणममाप्रिं माय बम नराम् । पतिमह परत पूतिगत्तर । मापनय बनियन ममानि रापत्रमा म अनपढे पीन नलागतराननम । जन्मयज्ञ नमिनितमान तनायगा ॥ मगइलमध्यत प्रमा प्रपया युत्या प्रश्न किया स्नाना प्रविधा त म प्रत । तन्धो चाम्न पुरम तना व हादि लग्न उयदिधदान शुभम् । "शानादि प्रम पर परक्या घेरा। शान पर 'धूमचि पारिशीमनागत्त रक्ताधिदरकामागी ततो पराडनाया । सय पूतापीता हप दिवमनत 1 वाग अ पायर क्षमा धुमारजसाभागामि । ता प्रयदना रक्त पदच म्पापया दक्षिणे कृष्ण मय मग मननगरस्पन म नर वृrt 4.4 गीति मनन पिली पिपीतवण नविता यत्त । अयपाहिर - प्रातार मिनि मनन ति नाग्ने नितत श्रागय ग्नि यामधी । यमायत्तति मन्त्रणा यमदक्षिरनामा या तंतत्य अमातति मनत त बायोमो तिमरण प ग य ना ! यानातियुनिकिता पायपाय यमाणो । गोममुत्तर S न त पनान नन , (१६० कर्मकाण्ड रखाकरे, गृहादि सूत्रारम्भ विधि: भागेतु वय • माममंत्रत अयशभागे चशान तमशानति मंनत । शस्मरति ब्रह्माणं मध्यचेशान पूर्वयो । स्थानीयो त्यनन्तच मध्यपश्चिम निता । वास्तु भद्र पूजादि प्रमाणमाह शौनक -शिखादि पंच लिरिश देवारता जगदमंत्रनाममने प्रणा च्याही मिस्तथा । होमति मेचलायां । हल प्रमाणः । यवेकृष्णनिले स्तटू समिद्धि. कोरपना । पलागेः मादिराप्यपामागाउघर संभये । पुश भयापि मधुमपि समा निननं सार्यस्तु पेनभिषि लियोन रभापिमा लामाले भक्ष्य भोग्यध पारश व नारा । नमस्कारान्तु युक्तं न प्रगमन मग । तताय मिहान खिष्ट कृ'दाम मपत्र । प्रालि न जुनामसप पागने तन शेष प्रयोग यामि । इति गृह गास्तु परिभाषा । गृहादि सूत्रारम्भ विधिः ॥ अथ तूत्रारम्न विधान वक्ष्ये शुभे ज्योतिः शास्त्रोक्त सत्रा- रम्भ मुहत्ते पुण्येऽहनि नृतन गृहं कर्नमुन्सुको गृहानमङ्गल ध्वनि वादिनादिपुर: सरं स्नानः सुवासाः सानार्यः शान्निपाटादि मगलसूक्तानि पठित्वा पूर्वोक्त कथनानुकल परीक्षितं चतुरन्नगृत निर्माणस्थानमागत्य पञ्चगव्येनाभियेक विधानेन कुशपिंजुलिना वा दुर्वाभिस्तभूमिमभिषिच्येशान कोणैकदेशे गोमयेनोपलिप्य दीपं प्रज्वाल्य सल्पज्य च भूतोत्सादनादिकं विधाय गणेशादि पञ्चांग पूजनं कृन्या-ईशानकोणे धान्यपुन्जोपरि धृहत्कलशं वरुण विधिना सम्पूज्य शमीवट विल्यायन्यतमवृक्ष सम्भृतान् वणादि रहितान्यथोक्त लक्षणान् चतुरः शंकन कौशेय कार्यात शणनि- मिनं मध्यग्रन्धिरहित मर्धागल विशाल सत्रं तत्र सामयिकान्य- न्यानि वस्तृन्यपि च नकलशपारचे संस्थाप्यवक्ष्यमाण मन्त्रेण विश्वकर्माण मावास्येत् ॥ ॐ विश्वकर्मनित्यस्य शासपिग्नि- एप्छन्दः विश्वकर्मा देवना विश्वकर्मा चाहने विनियोगः। ॐ फर्मकाए रखाहरे, सूत्रारमा पतिः (१६९) विश्वकर्मनहविपाबर्धनेन त्रातारमिन्द्रम कृपोरवध्यम् । तस्मै पिशः समनमन्तपूरियमुनोव्यिहयोयथा ऽसत इलि पंचोप- चारादिभिविश्वकर्माएं सम्पूज्य ॐ विश्वकर्मणे नमः सम्माय शान शंकुम् । ॐ तमीशान मिलास्य गौतम ऋपिर्जगनीछन्द ईशानो देवना ईशान कोण शंकु पूजने विनियोगः ॥ ऋक् ॥ ॐ तमीशानं जगतस्तस्थुपस्पनिं धियं जिन्व मवसे हमहेव्ययम् ।। पूपानो यथा वेदसामसयुधे । रक्षिना पायुरधः स्वस्तये ।। ॐ ईशानाय नमः सम्पूज्य प्रथक स्थापयेन्द्र-तत आग्नेय शंकुम्।। ॐ अग्नेनयेत्यस्थागस्त्य ऋपि त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवता अाग्नेय कोण शंकु पूजने विनियोगः---ऋ--ॐ अग्नेनय सुपथारायेऽ अस्मान विश्वानिदेव व्वयुनानि विद्वान ।। युयोध्यस्म उजुहरा- एमेनो भूमिछान्ते नम उक्ति विधेम ॐ अग्नये नमः सम्पज्य प्रथमस्थापयेत ॥ ततो नैतियशंकुम ।। ॐ पपते इत्यस्य वरुण ऋषि रनुष्टुप्ठन्दः नितिर्दयता निर्म तिकोण शंकुतने विनि ---ॐगपते निऋने मागस्जुपहन स्वाता ॐ नितिनमः सम्पूज्य च १० ॥ ननो नायव्य शंकुस् ॥ ॐ वातोवेन्यस्य वृष्- स्पनि अपि स्त्रिष्टुप्छन्दो वायुदेवना वायुकोण शंकु बजने वि०॥ ॐवानोवामनोवा गन्धर्वा सप्त वि० शतिः ॥ ते ऽग्रने श्वम्युजस्ते ऽ अस्मिञ्जवमादधुः।। ॐ वायनमः सम्पृज्य प्रथक स्थापयेत् । ततः प्रधान शिल्पिनमाय ने सम्बोध्यात्र त्वं मम गृह निर्माण कर्मणि प्रधान शिल्पी भवितुमर्हसि ॥ अस्मीति प्रत्युत्तिः ॥ त्वं भव भवानीति शिल्पी वृयात् ॥ शिल्पिनं पारि- तोषिकं यथाशक्त्या द्रव्य परियेय वस्त्रादिकं दत्वा तत्र शोधि- तार्या भूमौ चतुरस्ने भण्डले शिल्पी अन्यदुपसूत्रं गृहीत्वा गृहभूमेतुनायत यथोक्त रीत्यानिरीच्य चतुर्प कोणेपु उपशंकृन् स्थापयित्वा शंकसूत्रेण द्विर्वेष्टयित्वा भादत्तिण्यानेयादि क्रमेणे शान शंकृपरि दृढीकृत्येशानान्नैर्मत्य शंकृयावन् कर्णमत्रं पातयेत्।
( १६२) कर्मकाण्ड रसाकरे,सूत्रारम्प पद्धति तद्वदग्नेियाद्वायव्य शंकूपरिकर्णशून्नपातयेत् । थेन प्रकारेण द्वयोः सूत्रयोद॑ध्यक्यता भवेत् । एवं विधिना त्रिकोण रहितं कुर्यात्॥ ततो ज्योनिः शास्त्रोक्त मृहत पदानुसारेणानुक्त स्थानस्थ ग्रहा- गांदानानि कृत्वा सूत्रपातं कुर्यात् । अत्र सूत्रपातविधि केचि- दाचार्या आग्नेयकोएतो चदन्ति ॥ अपरेईशानतः॥ शनोदेश प्रधानुसारात् पूर्व पूजित प्रथमशंकोपरि सूत्रं दृढीकृत्य शंकोरनं तीक्ष्णमुग्वं घृतदुग्धादिभिर्विलिंप्याचार्यों लोहमुष्टिं (हतोड़ी) गृहीत्वा तत्र स्तम्भ निर्माणार्थ गर्न विधाय पूर्व शंकधिष्ठित भूम्यामवनं दृढं पूजितमीशान शंकु धृत्वा मन्त्रमुच्चरेत् ॥ ॐ विशन्तु भूतले नागा लोकपालाश्च सर्वतः । अस्मिन् स्थानेतु तिष्ठन्तु आयुर्वल कराः सदा ॥ इति मन्त्रं पठन् शंक लोहमुष्ठिना अष्टदारं ताड़येत् ॥ ॐ भद्रं कर्णभिः शृणुयामदेवाः भद्रं पश्ये- माक्षभिर्जजत्राः॥ स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा सस्तनूभियंसे महिदेव- हितं यदायुः ॥ शंकोभेद भंगेचानिष्टफलम् ॥ पूर्वोत्तरेशानेपु शंकु शिरस्निरश्चीनंचेच्छुभम् अन्यथाशुभम् ॥ ईशान स्थूणस्तम्भमपि सान्निध्ये दृढीकृत्य ॐ ब्रह्मणे नमः- इति मन्त्रेण पाचादिभिः सम्पूज्य बलिं दद्यात् ॥ माप भत्तयलिं सम्पूज्य ॐ मद्रेभ्यश्चैव सर्प यो येचान्येतत्समा- श्रिताः । वलिंतेभ्यः प्रयच्छामि गृहन्तुसतनोत्सुकाः स्वाहा, एवं सर्वत्र तत आग्नेये ॐ विशन्तुभूतलेनागा लोकपालाश्वसर्वतः । अस्मिनस्थानेतुतिष्ठन्तु आयुर्वलकराः सदा । अनेनमंत्रेण सुष्टुतरं शकुंकीलयेत् । स्थूणस्तम्भं विष्णवेनमः पाद्यादिभिः सम्पू- ज्याग्नेयशकुं सूत्रेण प्रदक्षिणकमेण द्विद्विष्टायित्वा वलिंदावत् । यलिंसंपूज्य 30 अग्निभ्योऽप्यथसर्पगो येचान्ये तत्समाश्रिताः। वलिंतेभ्यः प्रयच्छामिपुष्पमोदन मुतमम् स्वाहा । ततोनत्य । नैर्ऋत्य शकुंसूत्रेण द्विष्टयित्वा । ॐ विशन्तुभृतलेनागा लोक- पालाश्चसर्वतः । अस्मिन स्थानेतु तिष्ठन्तु श्रायुधलकगः सदा!
कर्मकाएद रताकगे, सूनारंभ पद्धतिः (१४३) इनि शकुंर्ववत्कीलगत् । रतम्भम् ॥ ३ महेश्वरायनमः पाधा- दिभिः समाज्य वलिंच | ॐ नेत्याधिपतिश्चैव नैऋत्यां येचराक्षसाः । वलिंतेभ्यः प्रयच्छामि सर्व गृह्णन्तु साम्प्रन स्वाहा। वायव्यकोणशंकं द्विवष्टयित्वा-२० विशन्तुभूतलेनागा लोकपाला श्वसर्वतः । अस्मिन् स्थानेतु तिष्ठन्तुआयुर्वतकराः सदा । पूर्वव- स्कीलयेत् इन्द्रायनमः स्तम्भ सम्पूज्य वलिंच । ॐ वायव्य बासिनोयेच येचान्येतत्समाश्रिताः। तेभ्योवलिं प्रयच्छामि गृह्णन्तु पुण्यमोदनम् स्वाहा । इति चतुष्कोणेषु शंकुकीलनादनन्तरं ततः ईशान कोणस्थ शकौनत्कृढी कुर्यात् । तत प्राचम्य (अत्रके- चिदाचार्या ग्रहयाग पर्वकवास्तुयागंचं तन्मध्यभूमौ वास्तु वेदीमेकाशीति पदां निर्माय चारतुमद् पूजा पद्धत्यंनुसारेण पूजावलि टोमादिकमपि प्रवदन्ति ।। उक्तं च शब्द कल्पद्रुमे, मात्स्ये सूत्रपातादौ । सूत्रपाने तथा कार्य तथा स्तम्भोदयेपुनः । द्वारवन्धोच्छये तत्प्रवेश समये तथा ॥ वास्तूपशमने तद्वद्वास्तु यज्ञस्तु पञ्चधा ।। इति प्रमाणवचनैः सूत्रपाता दारभ्यो गृहप्रवेशा- तोक्त समयानुकुलो वास्तु यज्ञः पञ्चधा भवतीति)क्षेत्रमध्ये ऽ अष्टदल कमल लिखित्वा तत्र पृथ्वी पूजयेत् ।। ध्यानम्- सुरूपा प्रमदारूपां सर्थ लोक घरामहीम् । ध्यायामिमनसा देवी दिव्या भरण भूपिनाम् ॥ ॐ स्योना पृथ्वीति मेधातिथिषि- र्गायत्री छन्दः पृथ्वी देवता पृश्याचाहने पूजने विनियोगः ॥ ऋक् ॐ स्योना पृथिवीनो भना नृक्षरा निवेशनी। यच्छान: शर्म सप्रथाः || ॐ भूर्भुवः स्वः भो पृथ्वीहागच्छेहतिष्ट सुप्र- तिष्ठिता वरदाभव || ॐ पृथियनमः ॥ इति पाचगन्धादिभिः सम्पूज्य प्रार्ययेत ॥ पृथ्वि त्वं सर्वलोकानामाश्रयायाचितासुरैः। अतोमेगृत निर्माण क्षमस्थान प्रकल्पय । नत्रैव मयपदे वास्तु पुरूपं ध्यायेत् ।। ध्यानम् ॥ ॐ पतेहि भगवन वास्तो गृहेश सर्व सौख्यद । एजां गृहाण देवेश सर्वसम्पत्करोभव ॥ ॐ वास्तो. पत इति वशिष्ट ऋपिस्निप्छन्दो वास्तुदेवता वास्त्वावाने २५ कर्मकाण्ड रत्नाकरे, सूत्रारंभ पद्धतिः विनियोगः । ऋअवास्तोष्पते प्रतिजानिहास्मान्तस्वावेशोऽ अनमीवोभवानः । यत्वेमहे प्रतितन्नोजुपस्वशन्नो भवद्विपदेश चतुष्पदे । 30 वास्तु पुम्पायनमः ॥ पाद्यादिभिः सम्पूज्य प्रार्थयेत्-वास्तो स्वामिन् शक्तिरूप सर्व सौभाग्यसंयुत । गृहं- रक्ष ममाभिष्टप्रसाधय मुदाप्रभो । ततः ईशानमागत्य वृहत्कलश मादयाचार्यः स्वस्तिवाचन पूर्वकंकलशजलेनेशानादि प्रादक्षिण्यन सूत्रमार्गेणधारांदत्वा ईशान एव पुनस्तं कलशयताकचिज्जल सहितं संस्थाप्य तेनैव क्रमेण यवान् वापयेत् ॥ तत स्तस्मिन्नेव सल्लग्ने प्राचार्यः (अत्रखातंशिलान्यासमपि भाग्नेयतो वदन्ति- केचिन् । देशप्रधानुकूल कुर्यात् ) शान्तिसूक्तादिपुरः सरशिल्पिना सहघृतमधुमुखेन कुद्दालेन उदङ्मुखेनभित्तिनिर्माणार्थशिलास्थान खातयेन- तनोमृदंनवेनवेएव पिटकेन नैऋत्यां प्रक्षिपेत् । एवं चतुर्प कोणेपु खातंकृत्वैशान्यांदिशि तखोतगतयवगन्धपंच- रत्न सुवर्ण रजतादि मुद्रां स्वनांमांकिते स्वर्णपत्रेतद्दिनस्यसूर्याश संवत्सरगणानांकादिकंसुलेख्य शिलाधः स्थापयेत् । उपरित उत्तर पूर्वाभिमुखेनाचार्य:-ईशानशिलानन्दानाम्नीमुत्थाप्य ॐ स्थिरो भववीचग 5 अाशुर्भववायर्वन् । पृथुर्भवसुग्बदस्त्यम , अग्नेः पुरीपवाहणः इति ईशाने स्थापयेत् । 30 नन्दायनमः । गन्धादिभिः संपूजयेत् तत आग्नेये खनितगत पूर्वपनन्यस्याग्ने- यशिला भद्रानाम्नीमुत्थाप्य 30 भद्रंकणेभिः शृणुयामदेवाः भद्रपश्येमाक्षभिर्जजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा ॐ सस्तनूभिर्व्यसे- महिदेवहितं यदायुः । ॐ भद्रायैनमः सम्पूज्य ततो निर्गतिकोणे जयानाम्नी शिलामुत्थाप्य 30 स्थिरोभववीड्बङ्गऽ पाशुर्भवव्या- ज्यर्वन् । पृथुर्भवसुखद स्त्वमग्नेः पुरीपवाहणः इति संस्थाप्य ॐ जयायैनमः इति सम्पज्य । ततो वायव्य कोणेरिक्तानाम्नी शिलामुत्थाप्य 30 अम्बकं यजामहे सुगंधिपुष्टि वर्धनम् । उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्यो मनीयमामतान् ॐ रिक्तायनमः संस्थाप्य सम्पज्यच तत प्राचार्यः शान्तिकलशोदकेन शिलाभ- ( १६५) फर्मकाण्ड रताय.रे, स्त्रारंभ पद्धतिः मिंच संप्रोक्ष्यकुद्दालादिकमपि जले प्राप्लान्यगन्धादिना पूजयेत् ततो सपत्नीकंयजमानं अभिषेक मंत्रैराषिच्य ॐ भद्रमस्तु शिवंचास्तु महालक्ष्मीः प्रसीदतु । रक्षन्तुत्वां सुराः सर्वसम्पदः सुस्थिराभव ॥ इति देवोपभुक्त निर्माल्यंदत्वा प्राचार्यादीन् । शिल्पकारादींश्च दक्षिणाभिः पारितोपिकादिना तोपयेत् । सूत्रारम्भ विधिः। .. गृहवास्तुभद्रम् स्टायनम1०रक चरवयेन्म रक्त पर्जन्याय शिन्निन ! पीत १ २ द्विपदे जयताय नमः पेत हप्प द्विषः रासाय नम मुशाय नम द्विपद कुत्तशायुधाय नम ४ पीत द्विपदे साय नम ६ दिय॑नम श्रापाय पीत. ६० P याप SE वत्सायनम, निपट श्रमणे नम पण पिटायनमरत आमाशाय धुम्र नम याययनम नी०८ मावित्राय पणनम १० . रावित्रनम द्विपद रित्याय नम रत हिप गृहक्षताय नम १२ पीत द्विपद यमाय नम कृष्ण द्विपद गंपर्नय नम १० चल ४४० 02. नरपद h पिलिपिलायनम ५३ पोतः by p ब्रह्मणे न्म त्रिपरे पृथीधराय नम त्रिपद पियस्वते नम २६ अत ४५ पीत Ima काय धास्तुपुरपाय नम الاباح 62 इन्द्राय नम । HE H hi ४० रस b M भृगराजाय नम वृण जयायनम मृगाय मन १ पीत दीवारी- पितर सायनम.नम १८ रक्त अयनम रुद्रायनम रागाय पापायनम, पीत जृम्भकाय नम .. फर्ममा रक्षाकरे वास्याग पद्धति अथ वास्तुयाग पद्धतिः। तत्रादौ, नृतन गृहपतिज्योतिविनिरूपिते शुभे मुहते पाचा. योक्त्यनुसारेण शिल्पकार द्वारा पञ्चशिलाः पूर्वोक्त विधिना यथा ब्राह्मण एक विशवंगुल दीर्घा क्षत्रिः सप्तदशांगुलदीर्धाः। वैश्यस्त्रयोदशांगुल.दीर्घाः। शूद्रो नांगुल दीर्घाः । देध्याई विशालाः। विशालताई प्रमाणोन्नताः समाः मनोदरा घाट- येत ॥ तासु क्रमश: नन्दायां पन्नम । भद्रायाम् सिंहासनम् । जयायां तोरण छन्ने । रिक्तायां कृमर्मम् । र्णयां चतुर्भुज विष्णुम् । शिल्पीटंकेन लिखेत॥ नासा शिलानां च स्थापनार्थ शिलामयावाधारशिला । वितस्तिमात्रायनाष्टांगुलोलिताः पडा गुलायताः ॥ विंशतिशिलाः । अन्या अपिकारयेत्, यथागर्नमध्ये चतमणामुपशिलानां मध्ये पद्मादि निधि कुम्भस्थापनार्य प्रादेश मात्रं चतुरस्रं कुण्ट भवेत् । पद्मादिनिधि कुम्भाश्च ताम्रका मृण्मया वा वर्णादीनां क्रमेण पञ्चांगुलाश्चतुरमाः सार्स द्वयंगुलाः सपदांगुलाः पञ्चकार्याः शूद्राणामपि लपादांगलाण्व । तेषां पञ्च कुम्भानां पिधानानि च कार्याणि ॥ अथ कर्म प्रयोगः ॥ तत्र पूर्वेऽहानि कृतकभुक्तो यजमानः सपत्नीकः प्रामुग्योपविश्यदीपं मावाल्याचम्य स्वस्ति वाचन पठित्वा ॐ सुमुग्वेत्यादिना गणे- शाय पुष्पांजलि निवेद्य स्वेष्ट देवनांस्कृत्वा अर्घ संस्थाग्य प्राणा- याम त्रयं विधाय गौरसर्षपातर्भतोत्सादनं विधाय कुशनिल जलान्यादाय संकल्पं कुर्यात ॥ अद्येत्यादि संकीर्त्यामुकोऽई वास्तु शान्तिपूर्वक शिलान्यास गृह प्रवेश कर्मणि च निधिनता सिद्धये आदी श्री गणपत्यादि पंचांग देवतानां जन पूर्वकं नांदीश्राद्ध पुण्याहवाचनादि कर्म करिष्ये ॥ पचात विधानेनेतान्सम्पज्य प्रधान सङ्कल्प कुर्यान् ॥ अद्यत्यादि संकीर्यामुमोऽनननगृहे शिलान्यासपूर्वकं करिष्यमाणगृत प्रवेश कर्मणि सर्वपिढ्य शान्नि पूर्वकमायुरारोग्यश्वर्याभिवृछ ये पुत्रपौत्र धन धान्यादहिए गतु- फर्मकाण्ड रनाकर, गृहयाग पततिः (१९७) --- पदादि वृद्धये श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ ग्रहमात्र सहिता सर्वनो भद्र ग्रहभद्र वास्तु भद्र पृजनयुतां वास्तु शान्ति करिष्ये-- तथाचगणेशनवग्रहादि साधकाना माचार्यत्रमर्विग्सदस्यद्वारपाल कानानयथाक्रमंवरणकरिष्ये । वासांगुलीयकासन पंचपात्रौत्तो तरीय वनादिसामग्री सम्पाद्यजलनाभ्युदय गन्धाक्षतादिभिः सम्पूज्याचार्यव्राह्मणमाह्वयार्थ्यदत्वा गन्धादिभिः सम्पूज्यायेत्या दि संकीर्त्यामुको ऽ हमेभिर्गधाक्षत यज्ञोपवील पुष्पमाला वासो लङ्करणद्रव्यैः सवास्तुशान्तिशिलान्यासगृहप्रवेशकर्मण्याचार्यत्वेना मुक शमीणं ब्राह्मणंवृणे । वरणंतस्मैदत्वा-वृतोऽ स्मीत्याचार्यो व्यात् । प्रार्थयेत-प्राचार्यस्तुयथास्वर्ग शनादीनांवृहस्पतिः । तथात्वं ममयो 5 स्मिन्नाचार्याभवसुन्नत ।। तथा गणेशमन्त्र जापर्क नवग्रहमन्त्रजापकान । संहिनापाटकंशात्यध्याय पाट- कान द्वारपालान यथाशत्तिनोवृणुयात् । ततश्राचार्यसहितो यज- मानः । धूपदीपादीनि सापकरणवस्तृनि ब्राह्मणैाहयित्यावादि त्रादिमङ्गलध्वनिंपुरस्कृत्य मण्डपंप्रदक्षिणीकृत्य पश्चिमद्वारेण प्रवेशंकुर्यात् । नत्रसुलिप्तायांभूमौ मण्डपमध्यभागे यजमानहस्ता चतुर्हस्तांचतुरस्रां सर्वतोभद्रवेदिकांहस्तोच्छूिनां वासपादहस्तां चतुरमा शिल्पकारद्वारा निर्मायतबाधारं श्वेतवस्त्रप्रसार्याचार्यः पूर्वोक्तप्रकारेण रेग्वानिर्माणं रचनादिकंचकृत्वा स्तम्भपूजोक्त विधिनापोडश स्तम्भान सम्पृज्यमध्ये यथेष्ठंदेवं वेदोक्तविधिना सम्पूज्य यदिशिवशक्तिविषण्वादि मन्दिराणवापीक़प तड़ागा- दीनां प्रनिष्ठाचेत् ॥ अष्टलिंगतोभद्रादीनां रकनयातत्तद्देवतानां स्थापनपूजनंचकुर्यात् ॥ ततईशानेग्रहभद्रोत्तरीत्या विषयांवेदी निर्मायपद्धत्यनुसारेण पूजनं कुर्यात् ॥ तनयाग्नेये यजमानहस्तेन हस्लमिनायामविस्तारां चतुरंगुलोच्छितां वास्तुवेदींनिर्माय वेशु- परिश्वेतवप्रसार्य ततोईशानादिकोण चतुकेषु ॐ विशन्त भनलेनागा लोकपालरचसर्वनः । अस्मिमगृहेतुतिष्ठन्तु आयुर्वल- करा:सदा ॥ इनिमन्त्रंए मादक्षिण्यनग्यादरादि कीलिकानारो- कर्मकाण्ड रलाकरे, गृहयाग पद्धति पयेत् ॥ तत्रैवपाचे मापभक्तवलिंदद्यात् ॥ ॐ अग्निभ्यो ऽ प्यथसर्पेभ्योयेचान्ये तत्समाश्रिताः। तेभ्योवलिंप्रयच्छामिपुण्य- मोदनमुत्तमम् ॥ ततोवास्तुवेद्युपरिवस्ने स्वर्णशलाकयाद्यंगुला- न्तराला समादश रेखानाम मन्त्रैः कुंकुम हरिद्रादिभिर्मत्र मुच्चार्य कुर्यात् । श्रादौ पश्चादारब्धाः प्रागन्ताः । ॐ शान्तायैनमः ॐ यशोवत्यै नमः ॐ कान्तायनमः । ॐ ॐ विशालायैनमः । 30 प्राणवाहिन्यैनमः । ॐ सत्यैनमः । ॐ सुमनायैनमः। 30 नन्दायेनमः । 30 सुभद्रायैनमः । 0 सुर- थायनमः ॥१०॥ अतो दनिपारम्भाउदंगताः प्रासंस्थाव्यंगुला- न्तरालाः समादशरेग्याः कृत्वा हिरण्यायैनमः ॥ सुबतायैनमः . लक्ष्म्यैनमः । ॐ विभूत्यैनमः ॐ विमलायैनमः 30 प्रिया- यैनमः । ॐ जयायेनमः ।। कलायनमः । विशोकायैनमः ॐ इडायैनमः ॥१०॥ एवं एकाशीतिपदं वास्तुमण्टलं विधाय पूर्वोक्तानुसारेण रक्तपीतादितणे वर्णयित्वा वदयमाण प्रकारेण पदेपु देवना स्थापन पूजनादिकं च कुर्यात् ततो वास्तुवेद्याः पश्चिमेवोनरे सयोनिमेखलं हस्तमात्रायत विस्तारकंद चतुरंगुलो च्निंस्थांडिलंवाकृत्वा चतुर्दारयुक्तांशालावैदिकाश्चध्वजादिभिः- सुसज्य यजमान प्राचार्यो वा वक्ष्यमाणपध्दत्या वस्तुवेद्यामी- शानादि क्रमेण शिख्यादि देवानाबाहयेन् । अथातो वास्तुभद्र पूजन विधिः। असिध्दम् : त्रिराचम्यसंकल्पंकुर्यात्- अद्ये- त्यादि देशकालो सकीामुकोऽ हममुककर्मणि शिख्यादि वास्तु भद्रस्थदेवतानां सुवर्णरजतादि प्रतिमा स्थापन पूर्वकमीशानाद प्रादक्षिस्य क्रमेण तत्तदेवतानामावाहनादि प्रकारेण पूजनंकरिष्ये । ततः सुवर्ण मयींनागाकृतिं वास्तुप्रतिमामान्याश्च प्रतिमास्ता म्रपानेसंस्थाप्यारन्युत्तारण विधिना न्युत्तारणं कृत्वा लिखित वास्तुभद्रानुसारेण तत्तत्स्थानेषु प्रतिमास्थापयित्वा कर्मारंभ कुर्यात्- पंचशिलाश्च वास्तुवैद्याः परितः स्थापयेत् । तत्रादौ चाहाईशान एकपदेरक्त शिग्विनम् । ॐ सनः पावक इत्यस्य कर्मयाएट रखाकरे, गृत्याग पद्धतिः मेधातिधि पिर्गायत्रीछन्दो ऽग्नि देवता शिख्यावाढ्ने विनि- योगः। 30 सन पाचक दीदिवोग्नेदेवा । ॥ इहावह । उपयज्ञ र्ट० इविश्चन - भूभवः स्वः शिखिनेनमः स्थापयामि पूजय- मि । तदग्रतः प्रादक्षिण्य अमेणैकपदेपर्जन्यं पीतम् ॥ ॐ शन्नो वात इत्यस्य दध्यंगाथर्वण ऋपिरनुष्टुप्छन्दः पर्जन्यो देवता पर्जन्य स्थापने विनियोगः ॥ ॐ शन्नो वातः पवता शन्नस्तएतु सूर्यः शानः कनिक्रदद्देवः पर्जन्योऽभिवर्पतु ।। . भू० स्वः पर्जन्यायनमः स्था० पू० ॥ तदग्रतो जयंतं द्विपदे पीतं । ॐ गोत्रभिदमित्यस्याप्रतिरथ ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः इन्द्रो देवता जय- न्तस्थापने विनियोगः ॥ ॐ गोत्रभिदं गोविंदं वज्रवाहुँ जयन्त मज्मप्रमृणं तमोजसा || मर्ट. सजाता ऽ अनुवीर यध्वमिन्द्र ० सग्वायो ऽ अनुसर्ट० रभद्रम् ॥ ॐ भूः स्वः जयन्तायनमः जयन्त स्था. पृ०॥ ततो द्विपदे पीनं कुलिशायुधम् ॥ ॐ मरत्या ३॥ इत्यस्य विश्वामित्र ऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दः इन्द्रो देवता कुलि- शायुध स्थापने वि० ॥ ॐ मरत्वा ॥ इन्द्रवपभोरणायपिया- सोम-मनुष्यधम्मदाय। यासिंचस्वजठरे मन्द अमित्व ई० राजासि प्रतिपत्सुतानाम् ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः कुलिशायुधायनमः स्था० पृ०॥ तदने रक्तं द्विपदं सूर्यम् ॥ ॐ आकृष्णेनेत्यस्य हिर- एयस्तुप ऋपिस्त्रिष्टप्छन्दः सविता देवता सूर्य स्थापने० ॥ ॐ श्राकृरणेन रजसा वर्तमानो निवेशनमृतं मर्त्य च हिरण्य येन सविता रथेन देवोयाति भुवनानि पश्यन् ॥ ॐ भूः स्वः-सूर्याय नमः स्था० पू० ॥ तदने पदये शुक्लं सत्यं ॥ ॐव्रतेन दीक्षेत्य- स्य प्रजापति ऋषि रनटुन्छन्दः सत्यो देवता सत्य स्थापने वि० || 30 व्रतेन दीक्षामाप्नोति, दीक्षयानोनि दक्षिणाम् । दक्षिणा श्राद्धा माप्नोति श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥ 30 भृ० सत्याय नमः स्था० पू० तदने पदद्वये भृश कृष्णं । ॐ भायै दार्वाहारमित्यस्य नारायण ऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दो नारायणो देवता भृश । स्थापने विनियोगः ॥ ॐ भायै दार्वा- स्वः उ (२००) कर्मकाण्ड रताकरे, गृहयाग पद्धति 5 हारं प्रभाया ऽ अग्न्येधं व्रध्नस्य बिष्टपानाभिपेक्तारं वर्षिष्टाय नाकाय परिवेष्टारं देवलोकायपेशितारं मनुष्यलोकाय प्रकरितार ॐ सभ्यो.लोकेभ्यऽ उपसेकार मवत्यैवधायोपमन्धितारं मेधायव्यासः पल्लं प्रकामायरजयित्रीम् ॥ ॐ भृ० स्वः भृशाय नमः स्था० पू०॥ भूशाग्रत एकपदे अाकाशं-ॐ घृतकृत पावानइत्यस्य प्रजापतिर्मपिर्यजश्छन्दो विश्वेदेवा देवता आकाश स्थापने विनियोगः नंतपायानः पिचतवसांवसापावाना पिवतान्तरिक्षस्यविरसि स्वाहा दिशः प्रदिशादिशोव्यिदिश उदिशोदिग्भ्यः स्वाहा । ॐ भूर्भुवः स्वः अाकाशायनमः भाकाशं स्थाः पूतन थाग्नेये एकपदे शुभ्रवर्ण यायुम् । ॐ वायोः एतइत्यस्यामूर्ति पिर्गायत्रीछन्दः सोमोदेवता वायु- स्थापने विनियोगः यायोः पूतः पवित्रेण प्रत्यङ्ग सोमो. अतिदृतः । इन्द्रस्य पूज्यः सम्वा ॐ भूर्भुवः म्यावायं स्था०पू० नत एकपदे रक्तं पाणम् । ३० पूपणंवनिष्ठुना इत्यस्य प्रजापति पिः पूपादेवता पृष्णः स्थापने विनियोगः 30 पूपणं व्यनिष्टुनां धाहीन्स्थल गुदयासान्गुदाभिविम्ति प्रान्त्ररपोवस्थिना और एमांडाभ्यां वाजिन. शेपेनप्रजा रेनसाचापान पित्तेन प्रदरान्पायुनाकृष्मांडांच्छकपिण्टैः भृ० म्या पार्ण स्था० पृ० ततो द्विपदेशुक्लं विनम् ॐ विभद्यदीत्यस्य कुशिक ऋपित्रि- टुप्छन्दः इन्द्रो देवता वितथ स्थापने विनियोगः विदद्यादी सरमारूग्णमद्रे महिपाथः पूर्ण र्ट सध्यफः अग्रंनयत्सु पद्यरा- णाम धारवं प्रथमा जानतीगात् ॥ ॐ भूः स्वः वि० स्था०पू० ॥११॥ ततः पदद्वये पीनं गृहक्षतम् ॥ ॐ गृहमाइत्यस्य शंकु ऋपि स्त्रिप्टुप्छन्दः वास्तुदेवता गृहक्षत स्थापने वि०॥ 30 गृहामा विभीतमा वेपध्वमूर्ज विभृत ऽ एमसि । अर्ज विभ्रवः सुमनाः सुमेधा गृहानैमि मनसा मोदमानः ॥ ॥ भू म्वः । गृह क्षतायनमः स्था० ए० ॥ ततो दक्षिणे पदद्वये कृपणं यमम् ॥ आ समायेल्यस्य दध्यंगाथर्वण ऋपिस्त्रिस्त्रियपि अाबस्य यम 1.
फमकाण्ड रताकार, गृहयाग पत्रातः (२०१ ) नामा चातोदेवता अन्त्ययोधमांदेवता यमस्थापने वि० । 30 यमा यत्वांगिरस्वते पितमतेस्वाहा ! धर्मायस्वाहा । धर्मः पित्रे ।। ॐ भृ० स्वः यमायनमः स्था० पूजयामि । ततो रक्तवर्णपदद्वयेगन्ध. र्वम् । ३० गन्धर्वस्त्वेत्यस्य परमेष्टीवापिर्यजु श्छन्दःपरिधयोदेवता गन्धर्वस्थापने विनियोगः। ॐ गन्धर्वस्त्वाविश्वावसुः परिदधा तु विश्वस्यारिष्टय यजमानस्यपरिधिरस्यग्निरिडईडितः ॐ भू० स्वः ॐ गन्धर्वाय स्था० पू० । ततोभृङ्गराजद्विपदंकृष्णम् || ॐ सोम ० राजानमितितापसपिरनुष्ट्रपच्छन्दः सोमारन्यादिदेवता भृङ्गराजस्थापने विनियोगः ।। 30 सोम ० राजानमयसेग्निमन्वा रभामहे । आदित्यान्विष्णु टै० सूर्यत्रमाणंचबृहस्पति ॐ स्वाहा ॐ भू० स्वः भृङ्गराजायनमः स्था० पू० ततएकपदे पीतंमृगम् ।. ॐ मृगोन भीमइत्यस्यजयार्षिः त्रिष्टुप्छन्दः इन्द्रोदेवतामृगस्थापने विनियोगः। ॐ मृगोनभीमः कुचरोगिरिष्टाः परावताजगंथा परस्याः । सुक . स है. शायपविमिन्द्रनिग्मं विशताढिवि- मृधोनुदस्व ॥ ॐ भू० स्व० मृगायनमःस्था० पूजयामि । ततोन त्यएकपदेरक्तापित्मान् । ॐ पितृभ्यइत्यस्यप्रजापतिऋषिःसप्तय जूपिछदासिपितरोदेवतापितृस्थापनेविनियोगः । पितृभ्यास्वधा यिभ्यः स्वधानमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः प्रपिता महेभ्यः स्वधायिभ्य: स्वधानमः ।। अक्षन्नपितरो मीमदन्तपितरो तीतृपन्तः पितरः पितरःशुन्धध्वदम् ।। 3. भू० स्वः पितृभ्योनमः स्था० पू० ॥ ततएकपदेरक्तंदौवारिकम् । ॐ द्वेविरूपेतिमन्त्रस्य कुत्सपिस्त्रिष्टुप्छन्दः अग्निर्दयता दौवारिकस्थापने विनि० । द्वेविरूपेचरतः स्वर्थे ऽ न्यान्यावत्समुपधापयेते । हरिरन्यस्यां' भवतिस्वधावांश्च्छुको ऽ अन्यस्यांददृशेसुवर्चाः ॥ ॐ भूर्भुवः स्वः दौवारिकायनमः स्था० पू० । ततो द्विपदेशुक्लंसुग्रीवम् । तन्नोवातमित्यस्य गौतमपिर्जगतीछन्दः विश्वेदेवादेवताः सुग्रीवस्थापने विनियोगः । ॐ0 तन्नोवातोमयोभुचातुभेपर्ज, तन्माताएथिवी तलपिताद्यौस्तग्रावाणः सोमसुतोमयोभुवस्तद-~- (२०२ ) पया साकरे, गृहयाग पहात रिचनाणुतं धिप्रयायुवम ।। ३ भर्भवः स्वः मुग्रीवायनमःस्था० P० नबग्रेद्विपदंरक्तंपुष्पदन्तम नमः पायायेत्यस्य परमेष्ठीमाथि यजंपिछन्दासिरुद्रादेवनापुष्पदन्त स्थापने विनियोगः1 30 नमः पार्यायचाचार्यायच नमः प्रतरणायचोत्तरणाय च नमस्तीर्थ्याय च कल्यायच नमः शप्यायच फैन्यायच ॥ ॐ भूर्भवः स्वः पुष्प- दन्तायनमः स्था० ५0 1 ततः पश्चिमे श्वेतं द्विपदेवरणम् । इमम्मेनिशुनः ओफनापिर्गायत्रीछन्दो चरणोदेवता चरणस्थापने विनियोगः। 30 टमम्मे वरणधीवमन्या च मुडय । त्वाम वस्युराचके । ॐ भू० स्वः वरणायनमः स्था० पू० । ततो द्विपदे पीतमसुरम् । २० येरूपाणि-त्यस्य प्रजापतिर्मपि त्रिष्टुप्छ- न्दः भाग्निदेवताऽ सुरम्यापने वि० 30 येरूपाणिप्रतिमुञ्चमानाऽअसु रासन्तः स्वधयाचरन्ति । परापुरोनिपुरोये भरन्त्यनिष्टां लोका- कात्मणुदात्यस्मात् । 30 भूर्भुवःस्वाअसुरायनमः स्था० पू० । ततो द्विपदेकृपएंशोपम । 0 नमोस्तुसभ्यदत्यस्य प्रजापतिपिरन- प्टुप्वन्दः सर्गदेवताः गोपस्थापने विनियोगः। ॐ नमोस्तु सभ्योयेकेचपृथिवीमनु । येऽ अन्तरिक्षदिवितेभ्यः सभ्योनमः भृ. स्वः शोपायनमः स्था० पृ० । तत एकपदेपीतंपापम् || 30 भामेर्माइत्यस्य प्रजापति पिर्यजुश्छन्दः पापोदेवतोपापस्थापने विनियोगः। ॐ मार्मासम्बिस्था 5 अर्जधवधिपणेबीची सतीवीडयेया मूर्जदेधाथाम् ॥ पाप्माहतोनसोमः ॐ भू° ख: पापायनमः स्था० ए० ततोवायव्येएकपदे रक्तंरोगम् । परंमृत्यो रिलास्यसङ्कल्पपित्रिष्टुप्छन्दामृत्युर्देवतारोगस्थापने विनियोगः 30 परं मृत्योऽयनुपरेहिपन्याग्यस्ते ऽ अन्य ऽ इतरो देवयानात । चष्मतेशृण्वते नवीमिमानः प्रजा ॐरीरिपोमोनथ्वीरान् ।। ॐ भूर्भुवः स्वः । रोगायनमः स्था०पू० । तत एकपदेरक्तमहिम् । ॐ अहिरिव भोगेरित्यस्य प्रजापति पि बिष्टुप्छन्दः स्तघ्नो देवता अहिस्थापने विनियोगः ।। 30 आररिव भोगैः पय्येतिवा हुँज्यायाहेति परिवाधमानः ॥रस्तनो विश्वावयुनानि बिदा कर्मकाण्ड रखाकरे, गृहयाग पद्धतिः (२०३) "पुमान्पुमा ॐ संपरिपातुविश्वतः ॥ ॐ भूर्भवः स्वः अहये नमः स्था० पू० ततो द्विपदे मुग्न्यं रक्तं-30 मुग्न टै० सदस्य इत्यस्य मजापत्यश्चि सरम्पत्य ऋषयोजगनीछन्दः अश्विसरस्वतीन्द्रा देवता मुख्य स्था०वि०॥ 30 मुग्व ई. सदस्य शिर ऽ इत्सतेन जिला पवित्र मश्विनासन्सरस्वती । चप्पनपायु भिषगस्य व्या- लोवस्तिन शेपो हरसातरस्वी! ॐ भूर्भुवः स्वः मुख्यायनमः । स्था० पू०। ततःपदये कृष्ण मल्लाटम् । ॐ भद्रं कर्णेभिरित्यस्य गौतम ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः विश्वेदेवा देवताभलाट स्था० वि० ॥ 30 भद्रं कर्णभिाशृणुयामदेवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरै रंगैस्तुष्टुवा ॐ सस्तनृभियंसे महिदेवहितं यदायुः ॥ ॐ भूर्भवः स्वः भल्लाटायनमः स्था० १०॥ ततो द्विपदेशुक्लंसोममुत्तरे। अवयर्ट० सोमेत्यस्य वन्धु ऋपिर्गायत्रीछन्दः सोमोदेवता सोम स्थापने वि० ॥ ७० वय ई० सोमव्रतेतवमन स्तनृपु विभ्रतः॥ प्रजावन्तः सचेमहि ।। ॐ भू० स्वः सोमायनमः । स्था० ० ततो द्विपदे कृष्णं सर्पम् । ॐ येवामीत्यस्य प्रजापनि पिरनुष्टुप्छन्दः सर्पादेवता सर्पस्था० वि० । ॐ येवामीरोचने दिवोयेचा सूर्यस्य रश्मिपु । येपामप्सुसदस्कृतं तेभ्यः सर्पेभ्योनमः । ॐ भूर्भव: स्व: सायनमः स्था0 10 | नतः पदद्वये पीतामदितिम् ॥ ॐ अदिति धारित्यस्य गौतम ऋपित्रिष्टुप्छन्दः विश्वेदेवाधिदेवता अदिति स्थापनेवि०॥ 30 अदितिचौरदितिरन्तरिक्ष मदितिर्मातासपिता सपुत्रः। विश्वेदेवा अदितिः पंचजना ऽ अदितिर्जात मदिति जनित्वम् ॥ ॐ भृ स्वः अदित्यैनमः स्था० ० ॥ नत एकपदे पीतवर्णादितिम् ।। 30 कायस्वाहेत्यस्य प्रजापतिपिदैवीवृहत्या दिछन्दांसि लिंगोक्ता देवताऽदितिस्थापने वि० ॥ ॐ कायस्वाहा कस्मैस्वाहा कलमस्मैस्वाहा स्वाहाधिमाधीलाय स्वाहा मनःप्रजा पतये स्वाहा चित्तविज्ञातायादित्य म्वाहा दित्यमही स्थाहा दित्य सुमडीकार्य स्वाहा सरस्वत्यै स्वाहा सरस्वत्यैपायकाय स्वाहासर- स्वत्यै वृहन्यै स्वाहा पुष्णेस्थाहा प्रपश्यायस्वाहा पूष्णेनाधिपाय (२०१। वर्मकाण्ड रक्षाकरे, गृहवास्तुयाग पद्धति खाहा त्वष्ट्रेस्वाहा त्यष्टेतुरीपाय स्वाहा त्वष्टेपुरुरूपाय स्वाहा व्यिपणवेस्वाहा व्यिप्णवेविभृपायस्वाहा विष्णवेशिपिविष्टायस्वाहा ॐ भृ० मा दित्यनमः स्था० पू० ॥ इति चाहापरिधौहाशत्रिद्दे वतास्थापनक्रमः ॥ अथान्तरीशानादिचतुर्प विदित अवादि देवता स्थापनक्रमः॥ ततो चाह्मपरिधौ ईशानाभ्यन्तर कपदे श्वेता अपः॥ 30 अपोयस्मानित्यस्य प्रजापति पिरत्यष्ठीछन्दः पापो देवता अपांस्थापने विनियोगः । ॐ आपो अस्मान् मातरः शुध- यन्तुष्टनेननोहतप्वः एनन्तु । ॐ विश्व ! हिरिप्रवहन्तीदेवी कदिदाभ्यः शुचिराप्त ऽ गमि || ॐ भूर्भवःस्वः अझ्योनमास्था० ॥ तत प्राग्नय ग्राभ्यन्तरेकपदे शुक्ल सावित्रं ॥ वरमहा नित्यस्य जमदग्निपिटलीछन्दः सविताटेवता सवितस्थापने वि० ॥ ॥ वरमहा २॥ असिसूर्यवटादित्यसहा॥ यसिमरस्ते सतोमहिमा पनस्यतेद्धादेवमहां असि ॥ ॐ भृ० स्वः सविनमः स्पा० पू० ॥ तनो नैनात्य याभ्यन्तरीयैकपदेशुक्लं जयन्तम् ॥ ३॥ गोत्रभिद मित्यस्याप्रतिरयपिस्त्रिष्टुप्छन्दः इन्द्रोदेवताजयन्ता बाहने विनियोगः ॥ 30 गोत्रभिदं गोविदं व्यज्रवाएंजयन्तमज्म अमृण तमोजसा । हम ई सजाता 5 अनुवीरयड मिन्द्र र्ट० स- वायो अनुस ६० रभारम् ॥ 30 भू० स्व: जयन्ताय नमः स्था० पू० । ततो वायव्ये ग्राभ्यन्तरीयेकपदे शुक्लरद्रं ॐ यातेरद्रेत्यस्य परमेष्टी पिरनुष्ठाछन्दः एपरुद्रादेवता रुद्रा- वाहने विनियोगः ॐ यानेन्द्रशियातन रघोरापापकाशिनी । तयानस्तन्वा शंतमया गिरिशन्ताभिचारशीहि ॥ ॐ भूः स्वः स्द्रायनमः स्था० पू० ॥३॥ ततः पूर्वपदनये कृष्णमर्यमणम् । अर्यमणमित्यस्य तापसऋषि रनप्छन्दः अर्यमादेवता अर्यम- स्थापने वि० ॐ अर्यमणं वृहस्पति मिन्द्रटानाय चोदयव्याचं विष्णु ४० सरस्वती ॐ सवितारंचञ्चाजिन ॐ स्वाहा । 30 भू० स्वः अर्यम्णेनमः स्था० ० ॥ तत आग्नेयेकपदेरक्तं सवि. तारम । ७. सवितात्वेत्यस्य चरण मपि रतिजगतीछन्दः फर्मकाएट रताकरे, गृवास्तुयाग पतिः (२०) .. यजमानोदेवता सवितुः स्थापने वि० . सवितात्यासवाना सुक्तामग्नि गुहपतीना , सोमोव्वनस्पतीनाम् ! बृहस्पति चिमिद्रो ज्येष्ठयायन्द्रः पशुभ्यो मित्रः सत्यो यमणो धर्म- पतीनांम् ।। ॐ भूः स्वः सवित्रेनमः स्था० पू०॥ ततोदक्षिणे पदनये शुक्लं विवस्वन्तम् ॥ ॐ विवस्यन्नित्यस्य प्रजापति ऋषि जगती छन्दः आशीर्देवना विवस्वत्स्थापने विनियोगः । ० विधस्वन्नादित्यैपते सोमपीथस्तस्मिन्यत्स । श्रदस्मैनरोवचसे नधालन यदाशीर्दादंपती व्याममश्नुतः॥भू० स्वः विवस्तेनमः स्था०पू०॥ ततो नैऋत्यैकपदे रक्तं विवुधाधिपम् । ॐ उदित्य मित्यस्य प्रस्कण्व ऋपिः सौरी गायत्री छन्दः सविता देवता विधुधाधिप स्था०वि० ॥ 34 उदुयं जातवेदसं देवं बहन्तिकेतवः होविश्वायसूर्यम् । ॐ भूः स्वः विवुधाधिपाय नमः स्था० पू०॥ ततः पश्चिमे पदत्रयेशुक्लवर्णमित्रम् । ॐ नमो मित्रस्येत्यस्य सूर्य ऋषिः सौरी जगती छन्दः मित्रो देवता मित्र स्था० वि०|| ॐ नमो मित्रस्य व्यमणस्य चक्षसे महोदेवायतदृतः सपर्यन । दूरे दृशेदेव जाताय केनये दिवस्पुत्राय सूर्यायशर्ट शत ।। ॐ भू० स्व. मित्रायानमः । स्था० पु० । ततो वायव्यैकपदे रक्तं राजय- दमाणम् । ॐ साकंयत्मेत्यस्यार्थर्वणोभिपगृपिरनुष्टुप्छन्दः प्रौपधिदेवता राजरक्षमए: स्थापने वि० । ॐ सायम प्रपत- चाण किनिदीविना। साकं व्वात्तस्यप्राज्यासाकंन्नस्यनिहाकया। ॐ स्वः राजयक्ष्मणे नमः। तत उत्तरे त्रिपदे रक्तं पृथ्वीधरम् । ॐ पृथिवी देवयजनीत्यस्य परमेष्टी ऋपि यजुश्च्छन्दः सविता- देवना पृथ्वीधर स्थापने वि० । ॐ पृथिवीदेवयजन्योपध्या स्ते- मृतं माहिर्ट सिपव्रजंगच्छगोप्टानं व्वर्पतु तेद्यौर्वधानदेव सवि- तः परम्पस्यां पृथिव्या ॐ शतेन पाशैयास्मान् देष्टियं चवयं द्वि- मस्तपत्तो मामौकभृ स्वः पृथ्वीधरायनमः स्था० पू० । तत ईशान एकपदे शुक्ल मापवत्सम् ॥ ॐ आपनये स्वेत्यस्य प्रजापति पिर्यजुरच्छन्दः वायुदेयता प्रापयत्सस्थापने विनियोगः है ( २०६) फर्मकाण्ड रताकरे गृहवास्तुयाग पद्धति ॐ श्रापतयेत्वा परिपतयेगृह्णामि तननन्न शाकराय शक्कन मोजिष्ठाय । अनाधृष्ठ मस्यना धृष्यंदेवाना मोजोनभि शस्त्य- भिरास्तिपाऽअनभिशस्ते न्यमंजसा सत्यमुपगेप स्थितेमाधाः। भृ० स्वः श्रापवत्सायनमः स्था० पू० ॥ ४४ ॥ नतो मध्येवेद्यां नवपदेहृदये ब्रह्माणं पीतवर्णमावाहयेत् ॥ ॐ नामजज्ञानमिनि गौतम ऋपि त्रिष्टुप्छन्दो ब्रह्मादेवनाब्रह्म स्थापने वि० 30 ब्रह्म- जज्ञानं प्रथम पुरस्ता द्विसीमतः सुरुचोब्वेन प्रायः सबुध्न्याs उपमाऽस्यविष्ठाः सनश्चयोनिमसनश्चवियः। 3. भूस्व:- ब्रह्मणेनमः स्था० पू० । भोब्रह्मन् सु० २० । तनस्तस्मिन्नेवपदे तदुत्तरत्तः स्त्रीरूपा पृथिवीम् ॥ ॐ स्योनापृथ्वीति मेधातिथि पिर्गायत्री छन्दः पृथ्वीदेवता पृथ्वीस्थापने बिनियोगः। 30 स्योनापृथिवी नो भवा नृतरानिवेशनी । यच्छानः शर्मसप्रथाः ॥ भू० स्वः पृथिव्यैनमः स्था० पू० ॥ ततस्तस्न्नेिव तदुत्तरतो सुवर्णप्रतिमायां वृपयास्तं सर्पाकारं विलिख्यस्थापयेत् ॥ अावा- हनम्-श्रावायाम्यहंवास्न बृपम्पधरं शुभम् | नागाकृति गृहेश- त्वं पूजार्थमन्त्रमण्डले ॥ 0 वास्तोपत इतिवपिष्ठ ऋषिस्त्रिष्ट- प्छन्दो वास्तुदेवता वास्तुस्थापने विनियोगः ॥ ॥ वास्तोष्पते प्रतिजानिहास्मन्बावेशोऽअनमीवोभवानः ॥ यत्त्वेमहे प्रतितन्नो जुषस्वशन्नो भवद्विपदेश चतुष्पदे ॥ 30 भू० स्वः वास्तवेनमः स्था० पू० । भोवास्तो सु० व०॥ ततो वास्तु मंडप संलग्नेऽष्टदल कमले चरक्यादिवाहादेवतानामीशानादिपु स्थापन क्रमः। ततः ईशानकोणे धूम्रवर्ण चरकीम् ॥ ॐ यन्ते देवीति मधुश्च्छन्द ऋपिः पंक्तिश्च्छन्दः चरकीदेवता चरकीस्थापने वि० । क्-30 यन्ते देवि निति रायवन्धपाशंग्नीवा म्ब विचत्यम् । तन्ते विष्याम्यायुषो नमध्यादयतं पितुमद्धिप्रसत नमोभृत्यैयेदंचकार भृत्वः चरक्यैनमःस्था०प० आग्नेयेततोविदारीम् कृष्णपिगलाम् अमराजायेति नारायण ऋपिः प्रकृतिश्छन्दो विदारीदेवता विदारीस्थापने विनियोगः ॥ ॥ अत्तराजाय किनव कृनाया कर्मकाण्ड रताकरे, गृहबास्तुयाग पद्धतिः दिनवदर्श त्रेतायैकल्पिन द्वापरायाधिकल्पिन मास्कन्दाय सभी स्थाणु मृत्यचे गोव्यच्छमंतकाय गोघातं क्षुधेयोगां विकृतनाभन माणउपनिष्टति दुष्कृतायचरका चार्य पाप्मने शैलगम् ।। भू० स्वः विदायनमः स्था पूजयामि । तनोनत्ये पीतयणां पूतनाम् । ॐ कटुप्रियायेति प्रात्रेयऋपिर्जगतीछन्दः पूतनादेवता पूतनास्थापने वि० । 30 कटुप्रियाय धाम्नेमनामहे स्वक्षत्रायस्यय शसे महेवयम् । आमेन्यस्यरजसोयदभ्राँ ३॥ अपोवृणानावित- नोतिमायिनी । ॐ भू० स्वः पृतनायैनमः स्था० पृ। ततोवाय- व्येकृष्णांपापराक्षसीम् । 0 यस्यास्तइतिमधुश्छन्द ऋपित्रिष्ट प्छन्दः पापराक्षसीदेवता पापराक्षसीस्थापने वि० । ॐ यस्यस्ते घोरासैजुहोम्येपां वन्धनामवसर्जनाय यांत्वाजनोभूमिरितिप्रम दन्ते नितित्वाई परिवेदविश्वतः 1, ॐ भू, म्यः पापराक्षस्यै नमः स्था० पू० ततः पूर्वादिदितु । पूर्वस्कन्दरक्तम् । ३० यदक्रन्दे त्यस्पदीर्घतमापि स्त्रिष्टुप्पछन्दः स्कन्दोदेवना स्कन्दस्थापने वि. 30 यदक्रन्दः प्रथमं जायमानउद्यन्त्समुद्रा दुतवापुरीपात् । शेनस्यपक्षा हरिण्यस्यवाह 5 उपस्तुत्यंमहिजातन्ते ऽ अर्वन् । ॐ भूः स्वः ॐ स्कन्दानमः स्था० पू० । ततोदक्षिणे 5 र्यमणम् कृष्णम् ॥ ॐ अर्यमणमित्यस्य तापसऋपित्रिष्टुप्छन्दोऽर्यमा देवतार्यमणःस्थापने वि०० अर्यमणंबृहस्पतिभिन्द्रंदानायचोदय च्याचं विष्णु सरखती ॐ सवितारंच वाजिन ॐ स्वाहा ॐ भू० स्व. श्रर्यम्णेनमा स्था० पू० ततःपरिचमेज़म्मकम् रक्तम् येरूपाणि-इत्यस्य प्रजापतिऋषिस्त्रिष्टुप्छदो ऽग्निर्देवता जम्मक स्थापने वि० 1 30 ये रूपाणि प्रतिमंचमाना ऽ असुराः सन्तः स्वधयाचरन्ति । परापुरो निपुरोये 'मरन्त्यग्निष्टांल्लोका त्प्रणुदात्यस्मात् ॥ ॐ भू० स्वः जम्भकायनमः, स्था० पू० ततो वाहोत्तरे पीतपिलिपित्सम् ।। नतं विदाधइत्यस्य विश्वकर्मा भौवन ऋपिस्त्रि विश्वकर्मादेवता पिलिपित्स स्थापने वि० 130 नतं विदाधय 5 इमाजनानान्ययुष्माकमन्तरं वभूव । नीहारेण कामकाएर रतापरे, गृहयास्तुयाग पतिः । २०%) प्रावृताजल्प्या चासुतृप उक्थशाशश्चरन्ति || 30 भू० स्वः पिलि- पित्सायनमः स्था० पू० ॥ ततोवेदिसल्लग्न कमलाग्रभागे पूर्वा दिदिनु नाममंत्रैरष्टदिक्पालान स्थापयेत् ॥ पूर्वकमलाग्रभागे इन्द्रम् । ॐ इन्द्रायनमः इन्द्रस्थापयामि पूजयामि । याग्नेयको कोणे ऽग्निम् ॥ ॐथग्नयेनमः । अग्नि स्था० पू० । ततो दक्षिणे- यमम् ।। 30 यमायनमः। यमं स्था० पू० ततो नेतिकोणे निर्ग- तिम् । ॐ निर्धतयेनमनिर्भतिस्था०प० । ततःपश्चिमेवरुणम । 30 चम्पायनमः । वरुणंस्था० पू० नतो वायव्ये वायुम् । ॐ वायवे- नमः । वायुं स्था० पृ० तत उत्तरे कुवेरस् । 30 कुवेरायनमः । कुवेरं स्था० पृ० तत ईशानेईशं 30 ईशानाय नमः । ईशं स्था० पू० । तत उर्धम् । 30 ब्रह्मणे नमः । ब्रामाणं स्था० पृ. । ततोऽधः । ॐ अनन्तायनमः । अनन्तं स्था० पू० । इतिवास्तु, भद्रस्थ देवता स्थापन क्रमः ॥ अथवास्तु भद्रसंघ पूजा पद्धतिः अावाहनम्-ब्रह्मादी लोकपालान्तानवास्तुभद्रप्रतिष्ठितान् । देवा. नावाड्यामीहसङ्घपूजन कर्मणि । अय॑म् ॥ गङ्गाजलं परंदिव्यं ताम्रपात्रस्थमुत्तमम् । देयाग्रहन्तुसौख्याय प्रतिष्ठावास्तुकर्मणि ॥ श्रासनम्-सर्वरङ्गविचित्राट्य मासनंदिव्यमुत्तमम् । देवागृह्णन्तु सौख्याय संस्थितावास्तुमण्डले । तत्रप्राणप्रतिष्ठाम् । 30 एतन्ते- देव सवितर्यजप्रवृहस्पतये ब्रह्मणेतेनयजमवतेनयज्ञ पतितेनमा- मव । 0 मनोजूति—पतामाज्यस्य बृहस्पतिर्यजमिमंतनोत्वरिष्टं यज्ञर्ट समिमंदधातुविश्वेदेवासऽइहमादयन्तामाप्रतिष्ट भूर्भु वास्वब्रह्मादिलोकपालान्तदेवताविग्रहसांगप्रनिष्ठावास्तोइहतिष्टेह सुवरदोभय । इतिप्राणप्रतिष्ठांकृत्या-पंचामृतम् । दधिदुग्धधृतक्षौ- दशर्करा मिश्रितंपरम् । देवा गृह्णन्तु सौख्याय वास्तुमंडप संस्थि- ताः स्नानीयम्-पवित्रंतीर्थदिव्यं मानीयं मंगलप्रदम् । देवा गृहन्तु सौख्याय प्रतिष्ठा वास्तुमंडले । यज्ञोपवीतम् नवतन्तु समायुक्तामुपवीतांश्चपीतकान देवागृह्णन्तुसौख्यायसंस्थितावास्तु मंडले वस्त्रम् वस्त्रसंघंसमानीतं नानावात्मकंपरम् देवा गृहन्तु कर्मकाण्ड रताकरे, वास्तुयाग पतिः (२०१) सौख्याय वास्तुमंडलसस्थिताः । चन्दनम् । भालशोभाकरंदिव्यं चन्दनं सुमनोहरम् । देवा गृहन्तु सौख्याय प्रतिष्टावास्तुमंडले । अक्षताः । शुद्धमुक्ताफलाभांस्ता नक्षतां च्छशिसन्निभान् । देवा गृहन्तु सौख्याय वास्तु मंडल संस्थिताः । पुष्पणि-जातीचम्पक पुष्पाणिपत्रादिकानिच । देवा गृह्णन्तु सौख्याय वास्तु मंडल संस्थिताः । धूपम्-धूपं नागरकंदिव्यं गुग्गुलेन समन्वितम् देवागृह्णन्तु सौख्यायवास्तुपूजाविधौमुदा। श्रारार्तिक्यम्-गवा. ज्यं वनिसंदीप्न मारातिक्यं सुमंगलम् । देवाः पश्यन्तु सौख्याय वास्तुपूजनकर्मणि । नैवेद्यम्-~अन्नं चतुर्विधदिव्यं घृतमिष्ठान्न संयुतम् । देवागृह्णन्तुसौख्याय संस्थितावास्तुमंडले। नैवेद्यान्तेजलम् नैवेद्यान्तेजलंचैव कराननविशुद्धिदम् । देवागृहन्तु सौख्याय तितो वास्तुभद्रके । उपायनम्-2 हिरण्यंराजतंद्रव्य मुपायन- निमित्तकम् । देवा गृहन्तु सौग्याय वास्तुपूजनकर्मणि । क्षमाप- नम्---विधि हीनद्रव्यहीनं श्रद्धाहीनंच यद्भवेत् । देवाः चाम्यन्तु नत्सर्व संस्थिता वास्तुमंडले । इति संघपूजनम्-ततः प्रदक्षिणा चतुष्टयंकुर्यात् । यानिकानीत्यादिना । मन्त्रपुष्पांजलिः । ॐ पानमन्त्राह्मणो ब्रह्मवर्चसी जायतामाराष्ट्राजन्यः शूर 5 इप- व्योतिव्याधी महारयो जायादोग्ध्रीधेनु चोदानडवानाशुःससिः पुरंधियोपा जिष्णू रथेष्ठाः सभेयोयुवास्थ यजमानस्य वीरोजा- यतां निकामे निकामेनः पर्जन्यो वर्षतु फलवत्योन 5 औपधयः पच्यन्तां योगक्षेमोनः कल्पन्ताम् । ततोऽष्टदलकमलाद्वहि उत्तर- स्यादिशि त्रिशूलचिन्हं कृत्वा तस्मिन् क्षेत्रपाल पूजयेत् । प्रा०- -नमोभगवते क्षेत्रपालाय सर्वदेवताधिनिजिनाय भावद्भासुर किंकिणीज्वालामुखाय भैरवरूपाय । क्षों मुरु २तुम २ लल पप हरुहम फेंफेकाररूपायहूँफट क्षेत्रपाल इहागच्छेहतिष्ठ पूजागृहाण चत्रस्ययोनिरसि क्षत्रस्य नाभिरसि मात्वाहि र्ट सीन्मा- माहि र्ट सीः॥ इतिपाद्यादिभिः सम्पूज्यततोवास्तुवेद्यां वास्तु पदेनाम्रकलशं पूर्वोक्तानां पंचानांकलशानांमध्ये गपंचरत्न तीर्थ- (२१० कर्मकाएट रक्षाकरे, गृहवास्तुयाग होम पद्धतिः जल तीर्थमृत्तिकादि सर्वोपधियुतस्थापयेत् । तत्रैववास्तुप्रतिमा पंचपल्लवसहितां स्थापयेत् । एवंविधिनाचतुर्पकोणेषु स्थापित नन्दादिशिलासन्निधियुचतुर कलशांस्थापयेत् । तेनैव विधिनायनमा- लादिपंचपल्लवसंल्लग्नां गृवर्गायुतांत्रिसूत्रींचाभिव्यतत्रैव स्थापयेत ॥ ॥ अथ गृहवास्तु होमः॥ अथगृहयास्तुहोमः-ततः सर्वपूर्वोक्ताग्राचार्या होम वेदी वा कुण्डसन्निधिमागत्य शिलानामभिपेकार्थ संस्रवधारणार्थ जलकुम्भमग्नेरुत्तरतो यथा विधिकलशपूजाविधिना सम्पूज्य स्थापयेत् । सकलाचार्योयजमानो या कुशकण्डिकाविधानेन प्रजा पतिमग्निंवा वरदनामानं संस्थाप्यसम्पूज्यच ( वास्तुयोगेप्रजा- पतिः) ततो यजमानोद्रव्यदेवता भिध्यानंकृत्वा द्रव्यत्याग कुर्यात् ॥ सङ्कल्पः 10 अद्यत्यादिसंकीामुकोऽहवाममयज- मानस्यन्ननग्रहेवा देवालयेगृहप्रवेशनिमित्तकमृति स्थापनकर्मणि शिलान्यासविधानपूर्वक वास्तुस्थापनकर्मण: सागफलावाप्तये ग्रहयागमखेनयक्ष्ये ॥नत्रमजापत्यादीनाज्येन जुहुयात् ॥ श्रादि- त्यादिग्रहान् साधिदेवप्रत्यधिदेवसहितान् ग्रहयागहोमरीत्या ग्रह- यागाचार्याजुहुयान् ॥ सर्वतोभद्राचार्यः सर्वतोभद्दैवताप- द्धत्युक्तप्रकारेणजुहुयात् ॥ इदानींप्रतिष्ठांगत्वाद्वास्तुयागविधि यथोक्तविधिनावक्ष्ये ॥ ततो वास्तुकाचार्यः यजमानोवासङ्कल्प कुर्यात् ॥ श्रोत्यादिसंकीर्त्यसशिलान्यासगृहप्रवेशदेवालय पनि ठामूर्तिस्थापनादि वास्तुस्थापनकर्मणि प्रजापत्यादीनाज्येनादित्या दिग्रहानसमिद्भिः प्रत्येकमष्टाहुतिभिः। अधिदेवता प्रत्यधिदेवता श्चचतुः संख्याहुतिभिविनायकादीनिंद्रादीश्च द्विसंग्ख्याहुतिभिः शिख्यादीन् पञ्चचत्वारिंशद्देवान् शर्करामधुघृताक्त समिदोदुम्वर
कर्मकाएदं रताकरे, गृहयांस्तुयाग होम पद्धतिः
(२१)
पालाशसमीखादिरापामार्गाद्यन्यतमाज्य तिलयवादिभिर्दश
संख्याकाहुतिभिः पृथ्वींचाष्ठाहुनि भिस्तोप्पनिंचाष्टोत्तरशता-
हुतिभिः पञ्चभिविल्य फलैश्चान्यादीन् प्रजापत्यन्तानन्दाद्या
शिलाश्चाज्येनाहयक्ष्ये । एतत्सम्पादितमाज्यादिद्रव्यम् । पूर्वति
देवताभ्यश्च मयापरित्यक्तं यथादैवतमस्तुनमम । इति द्रव्यम्
त्यक्त्वा ततप्राचार्य:-अग्निस्थापन विधना आधाराज्यभागयाव
दग्नौहुत्वाऋत्विजोवृणुयात् । अयेत्यादिनामुकशर्माणं ब्राह्मणं
ब्रह्मत्वेनामुकामुकशर्मा ब्राह्मणात्विक्त्वेन युप्मानचुणे । तन
ऋत्विग्भिः सहाचार्य:-अनन्यारब्धस्तिलाज्य यवतण्डुलमधु-
शर्करापायसादिभिः प्रत्येकमष्ठसंग्यया ग्रहहोमंचतु: संख्ययाधि-
देवना प्रत्यधिदेवता होमंद्विसंख्यालोकपाल दिक्पालहोमंचकृत्या
प्रधानहोम सङ्कल्पोक्त समिद्भिर्वा तिलाज्यादिभिर्दश संरयया
कुर्यात् ॥
॥ अथ होम नामावलिः ॥
ॐ शिखिनेस्वाहा ॐ पर्जन्यायस्वाहा 30 जयन्तायस्वाहा
ॐ कुलिशायुधायसहा 3. सूर्यायस्वाहा ३० सत्यायस्वहा .
भृशायस्वाहा ॐ आकाशायस्वाहा ॐ वायवेस्वाहा ॐ पूष्णे-
स्वाहा - वितथायस्वाहा 30 गृहक्षनायस्वाहा . यमायस्वाहा
जी गन्धर्यायस्वा. ॐ भृगराजायस्वा० ॐ मृगायस्वा०
ॐ पितृगणायस्ता० ॐ दौवारिकायस्वा० ॐ सुग्रीवायस्वा०
ॐ पुष्पदन्तायस्वा० ४ वरुपायस्वा० असुरायस्वा० ॐ
शोषायस्वा ॐ पापायस्था ॐ रोगायस्वा० श्रयेस्था० .
मुख्यायस्वा० ॐ भलाटायस्वा० 30 सोमायस्था. ॐ सभ्यः
स्वा० अदितयेम्या० ॐ दितयेस्वा० ॐ आपायस्वा० .
सचित्रायस्वा जयायस्वा० ॐ रुद्रायस्वा० ॐ अर्यम्णेस्था०
» सविस्वा० ॐ विवस्वतेस्वा० ॐ विवुधाधिपायस्वा० ॥
(२१२) कर्मकाण्ड रताकरे गृहवास्तुयाग होम पद्धतिः मित्रायस्वा० राजयदणेस्वा० ॐ पृथ्वीधरायस्वा० ॐाप- वत्सायस्वा० ॐ ब्रह्मणस्वा० । प्राक्तनाममंत्रहोम प्रत्येक दश 'संख्यया कृत्वा पृथ्वीहोम स्योनापृथ्वीति मेधातिमपिर्याय त्रीछन्दः पृथ्वीदेवता होमेविनियोगः ॥ ऋक्-30 स्योनापृथि- विनोभवा नृतरानिवेशनीयच्छानः शर्मसप्रथाः ॥ इनिमंत्रणाष्ठ संख्ययाहुत्वावास्तोष्पतेः प्रधानत्वाध्दोमंवक्ष्यमाणेनकुर्यात्।। ॐ धास्तोप्पत इति वशिष्ठऋपि त्रिष्टुप्छन्दोवास्तुदेवता होमे विनि- योगः ॥ अक्-0पास्तोपते प्रतिजानीहास्मत्स्वावेशो ऽ अन- मीवोभवानः । यत्त्वेमहे प्रनितन्नो जुपस्व शन्नोभव द्विपदेश चतुष्पदे, इतिमंत्रेणाष्टोत्तर संख्ययानिलाज्येन होम कृत्वानतो विल्वफलेन घृतातेनवक्ष्यमाणमंत्रै हुयात् । (उक्तंचपारस्करसूत्रे कांक. ४) वास्तोपतेनिचतसृणां वशिष्ठऋपिठिप्याय- त्रीछन्दांसि वास्तोप्पतिदेवता हो० वि०॥ मृक्-30 वास्तोपते प्रतिजानीहास्मन्म्वावेशोऽअनमीवोभवानः। यत्तेमहेप्रतितन्नो जुपस्वशन्नोभव द्विपदेशचतुष्पदे स्वारा ॥२॥ वास्तोप्पते प्रतरणोन 5 एधि गयस्फानो गोभिरश्वेभिरिद्रो ऽ अजरासस्ते सख्येस्याम पितेव पुत्रान्प्रतिनो जुषस्वस्वाहा ॥ - वास्तोष्पते सग्मया स ई० सदातेसनीमहिरण्वया गातुमत्या । पारिनेम 5 उत्तयोगे वरंनोयूयंपातस्वस्तिभिः सदानः स्वाहा ॥॥ ॐ अमी 'चहा वास्तोप्पते विश्वारूपाण्या विशत् । सखासुशेवऽ पधिनः स्वा० ॥३॥ पुनः-ॐ वास्तोप्पते प्रति स्वा॥४॥ इति मत्रैवि- ल्वफल होमं कृत्वाततश्चरक्यादि वाहादेवताभ्यः प्रत्येकनाम मंरष्ठाहुतिभिर्जहुयात् ॥ ॐ वास्तयेम्बाह 30 चरक्यैस्वा० 30 विदायें स्वा० ॐ पूतनाय स्वा० 30 पापराक्षस्यै स्वा० ॐ स्कन्दाय स्वा० अर्यम्णेस्वा० आज़म्भकायस्वा० 30 पिली- पिच्छाय स्वाहा । अतः परं-अग्निस्थापनानुसारेण ब्रह्मा न्वारब्धेन स्विष्टकृन्दोमभरादिनवाहुत्यन्तं विधाय संश्रय प्राश- नानि पवित्र प्रतिपत्तिः प्रणीता विमोकश्चतज्जलमीशानावि कर्मकाण्ड रतापरे, गृहयास्तुयाग होम पद्धतिः (३१३) स्थापिते कुम्भेनिक्षिप्य चेशान्यां न्युजीकुर्यात ॥ ततो ब्रह्मणे पूर्णपात्रदानम् ॥ संकल्पः ॥ अग्रेहेत्यादि संकीामुको 5 है शिलान्यास यास्तृपशमनांग होमकर्मणो ऽ पूर्णपूर्णता सिध्यर्थ वेदंसद्रव्यं सुवर्ण सहितं पूर्णपात्रममुकशर्मणे ब्राह्मणाय ब्रह्मणे तुभ्यमहं संप्रददे । इनि ब्रह्मणे दद्यात् ॥ ब्रह्माबूयान्-30 प्रक कर्म कर्मकृतासहवाचामयोभुवा । देवेभ्यः कर्मकृत्वास्तंप्रेत सचा भुवा । परिपूर्णमस्तु । तत प्राचार्या वास्तुदेवताभ्यः पायसवलिं कृसरानवलिंदद्यात् ॥ संकल्प:- अद्यत्यादि संकीर्त्यामुको ऽ. मम यजमानस्य सकुटुम्ब सपरिवारस्थायुरा रोग्यादि वृद्धिपूर्वक सापद्रव शान्त्यर्थ नवग्रहादिभ्यो ग्रहयागपद्धत्य नुक्रमतः शिरयादि पंचपंचाशद्देवताभ्यश्च पायसेन कृसरान्नेनदध्यक्षतादि- मिश्च वलिदानकरिष्ये ॥ आदौ ग्रहयागोक्तद्धत्या ग्रहादिभ्यो होमकुंडसन्निधौ वलिंदरया तत्पश्चाद्वास्तु वेशुपरि यथास्थानस्था पित देवतासन्निधो वदयमांणरीत्या दद्यात् ॥ यथादौ-ॐ शिम्बिनेनमः, इति चनुर्वनि धलितां वलि संपूज्य हस्तेजल गृही त्वा भोभो शिस्त्रिनिहागच्छेहनिष्ट, एनं सदीपं सद्रव्यं पायस वलि (कृसरान्नमापौदन बलिम्) गृहाए ममयजमानस्यायुः कर्ता शान्तिका क्षेमकर्ता भव इतिवल्युपरिजले विसृजेत् एवंसर्वत्र- ॐ शिग्विनेनमः भोशिग्चि न०ॐ पर्जन्यायनमः मोपर्ज- न्यए० 0 जयन्नायनमः भोजयन्तए० ३० कुलिशायुधायनमः भो कुलिशायुधएनंॐ सूर्यानमः भो सूर्यएनं ७० सत्यायनमः भोसत्यएनं. ॐ भृशायनमः भो भृशएनवलिं. आकाशा नमः भो आकाश ए० 30 वायवेनमः भोवायोगनं ॐ पूष्णेनमः भो प्रपन एनं० ॐ वितधायनमः भो वितथ एमे 30 गृहक्षताय नमः भोगृहक्षन ए० 0 यमायनमः भो यम एनंवलिंग गन्धर्वायनमः भो गन्धर्व एनंवलिं० ॐ भृगराजायनमः भो गराज ए° 0 मृगायनमः भो मृगएन0 30 पितृगणायनमः भोपितृगए yon दौवारिकायनमः भो दौरिकएन 30 (२९४) कर्मकाण्ड रताकरे, गृहवास्तुयाग होम पद्धतिः सुग्रीवायनमः भो सुग्रीयएनं ॐ पुष्पदन्तायनमः भो पुष्पदन्त एनं. 30 वरुणायनमः भोवमएए० ॐ असुरायनमः भो, असुर एन. शोपायनमः भोशोप ए0 30 पापायनमः भोपाप एनं. पलिं० ॐ रोगोयनमः मोरोगएनं. ॐ अहयेनमः भोअहे एनं ॐ मुख्यायनमः भोमुख्य प. ॐ भल्लाटायनमः भो भल्लाट एनं० ॐ सोमायनमः भोसोम एनं 0 सम्योनमः भो सर्पा एनं 0 अदितयेनमः भोयदिते एनं0 30 वितेनमः भो दिते एनं आपायनमः भोआप एनं. 30 सावित्रायनमः भोसावित्र To 0 जयायनमः भोजयएनं0 30 मद्रायनमः भोन्द्र ए० ॐ भर्यम्णेनमः भो अर्यमन् एनं. ॐ सवित्रेनमाभोसवि० ॐ विव स्वतेनमःभोविवस्वानं० विवुधाधिपायनमःभोवियुधाधिपएनं० ॐ मित्रायनमः भोमित्र ग वलिं राजयदम्णेनमः भोराज- यदमन् प० 30 पृथ्वीधरायनमः भो पृथ्वीधर प, ॐापयत्सा, यनमः भोग्रापवत्स ० 0 ब्रह्मणेनमः भो ब्रह्मन् ए० ० पृथि- व्यैनमः भो पृथिवि एनं० ॐ वास्तवेनमः भोवास्तो ए० . चरक्यैनमः भोचरकि एनं विदार्यनमः भोविदारि एनं0 30 पूतानायैनमः भोपतने ए० . पापराक्षस्यैनमः भोपापराक्षसि एनं वति० स्कन्दायनमः भोस्कन्द एन. ॐ अर्यम्ऐनमः भोअर्यमन एनं जम्भकायनमः भोज़म्भक पन ॐ पिलि- पिच्छायनमः भोपिलिपिच्छ पन बलिंगृहाण । .. ॥ अथ शिलान्यास विधिः॥ अथ शिलान्यासविधिः। ब्रह्मणः पर्णपात्र दानान्तप्राचार्यों वास्तुवेदी समीपमागत्य पूर्वोक्त वर्णप्रमाणतोनिर्मिताः शिलाः क्रमशोनन्दा १ भद्रा र जया : रिक्ता ४ पूर्णा ५ इनिपंचशिलाः पद्मायंकिता उपशिलाः (आधारशिलाः) सहिताः कुशोपरि कर्मकाएद रसाकर, गृहवास्तुयाग होम पद्धतिः स्थापयित्वा नन्दादिशिलामु अग्निपुणोक्त १७ सप्नदशमरामय कलशेपु विहिनवस्तृनि संपाद्य यथाप्रथमे सप्तमृत्तिकोदकं १ पं. चकपायः २ गोमूत्र : गोमयं ४ पंचगव्यं ५ पंचामृतं सफल- जल ७ सरत्नजल ८ ससुवर्णजलं ' वृपशृंगजलं १० तीर्थजलं ११ गन्धोदकं १२ नन्दादिपु ब्रह्म विषाणु रुद्र ईशान सदाशिव कलशेपु देवान्नावारा प्रतिष्टाप्य वनादिभिराच्छादा सम्पूज्य चं मंत्र नन्दाद्याः शिलाः स्नापयेत् अदो सप्तमतिकोदकेन । ॐ अग्निसंर्दादिवः ककुत्पतिः पृथिव्या ऽ अयम् । श्रपा रेता सिजिन्वति । ततो गोमूत्रेण गोमयेन च गायत्री मंत्रेण ततो 'मधुनामंत्र:- ॐ मधुवा तायतेमधु चरन्ति सिन्धवः माध्वी- नः सन्त्वोषधीः । पयः स्नानम् । ॐ पयः पृथिव्यां पय श्रोष- धिषु पयोदिव्यन्नरिक्षे पयोधाः । पयः स्वंतीः प्रदिशः सन्तुमहम् दधिस्नानम् । ॐ दधिकारणो अकारिपंजिष्णो ऽ रश्वस्यवाजिनः सुरभिनो मुग्वाकरत्प्रण ऽायू ॐ पिनारिपत् । घृतस्नानम्-ॐ घृतयती भुवनानामभित्रियोर्वी पृथ्वी मधुदुघेसुपेशसा । वाया पृथिवी वरुणस्य धर्मणाविष्कभिते ऽ अतरे भृरिरेतसा । शर्करा स्नानम्-30 पायंगोः प्रश्मिरक्रमीद सदन्मातरंपुरः । पितरंच प्रयन्त्स्वः । तनोदकेन । सप्तधान्गोदकेन ॐ श्रोषधयः समवन्त सोमेनसहराज्ञा । यस्मैकृणोति ब्राह्मणस्त ० राजन्पारयामसिाह पशंगोदकेन ॐ हविष्मनीरिमाऽआपोहविष्मांशा अविवासतीह विष्मानदेवाऽअध्यरोहविष्मा। अस्तुसूर्य: पंचगव्येनतीर्थजलेन इसमेवरुण धीहवमद्याचमुटयत्वामवस्युराचके । सुवर्णादकेन हिरण्यगर्भः समवनंताग्रे भूतस्यजातः पतिरेक 5 आसीत् । सदाधारपृथिवींद्यामुतेमां कस्मैदवायहविषाविधेम ॥ गन्धोदकेन- गन्धद्वारांदुराधर्षा नित्यपुष्टांकरीपिणीम् । ईश्वरीसर्वभूतानां तामिहोपह्वयेश्रियम् ॥ ततः पूर्वलिग्वितपद्मादिषु अष्टगन्धयुक्त चन्दनेन लिखेत् । नन्दाशिनार्यापद्यम्-मद्रायांसिंहासनं । जया- यां तोरणछनच रिक्तार्याकूर्मपुर्णायां चतुर्भुजीवष्णुश्च लिग्वित्वा कर्मकाएर रखासरे, गृहयास्तुयाग होम पद्धति ( २१६) वस्त्रेणाच्छाच ॥ अथमन्वादिशिलानां मलेपुपूर्वस्थापित पंचकल- शोदेकनाभिर्फकुर्यात् ।। तत्रागै कलेशीदकेम नन्दाशिला मले ६ भिपिंचेत् ।। ॐ आवमन्त्रीमणों ब्रह्मवचसीजायतामा राष्ट्रराजन्यः शूर इपन्यो तिव्याधी महारथोजायतांदोग्धी धेनुढिा ऽ अनड्वानाशः सप्तिः पुरंधियपिाजिष्यूरधेष्ठाः ।। सभयोयुवास्य यजमानस्यवीरोजायतां निकामेनिकामेनः पर्जन्यो वर्षतुफलयत्योन 5 औषधयः पच्यन्तां योगक्षेमोनः कल्पन्नाम्- ततोयिष्णुफलशेन भद्राशिलामूले ऽ भिपिंचेत् । ॐ भद्रंकर्णभिः शृणुयामदेवाः भद्रपश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरंगैस्तुष्टुवा * सस्तनूभियंसे महिदेवहितं यदायुः ॥ ततो जयामूलेन्द्रकलशोद- केन। यातेन्द्रशिवातनरघोरापापकाशिनी तयानस्तन्वाशन्त मयागिरिशन्ताभिचार्कशीः॥ ततो रिक्तामूले ईशान कुम्भोदकेन ॐ यमायत्वाभग्वायत्वा सूर्यस्यत्वा तपसे देवस्त्वासवितामध्या इनक्तुपृथिव्याः स ॐ स्पशस्पाहाचिरसि शोचिरसितपोसि ॥ सतः पूर्णाशिलामले मदाशिवकलशोदकेन ॐ पूर्णदविपरापत सुपूर्णापुनरापत । व्वस्नेवविक्रीणावहा उपमर्ज ट० शतक्रतो। मध शिलानां मध्याभिषेकस्ते नवजलन कुर्यात् पादौनन्दाया मध्ये- ॐ नाभिर्मेचित्तं विज्ञानंपायुमै ऽ पचितिर्भसत् ।। प्रानन्दनन्दावांडो मेभगः सौभाग्यंपसः ।। भद्राशिलामध्ये- ॐ ब्रह्मजज्ञानं प्रथम पुरस्ता द्विसीमतः सुरुचोव्वेन 5 श्रावः सबुध्न्या' उपमा ऽ अस्यविष्टाः सतश्चयोनिमसतश्चश्विवः । जयाशिलामध्ये-ॐविषणोरराटममि विष्णोः श्नपनेस्थो वि- योः स्यूरसि बिष्णो धुवोसि । वैष्णवमसि बिएवेत्वा । रिक्तामध्ये ॐ नमस्तेरुद्रमन्यव ऽ उतोतइपवेनमः बाहुभ्यां मुत- तेनमः। पूर्णामध्ये 30 इमं देवा 5 असपत्न ई० सुवाईमहते क्षत्रायमहते ज्येष्टयाय महते जानराज्यायेन्द्रस्य द्रियाय । इमममुष्य पुत्रममुष्य पुत्रमस्यावश 5 एपवोमीराजासोमो स्माकं ब्राह्मणानाराजा तत स्तासांशिरसि अभिपकै कुर्यात् । - कर्मकाण्ड रत्नाकर, गृहवास्तुयागेशितास्थापनपद्धतिः . (२१७ -- प्रादौनन्दायाः-तद्विष्णोः परमपद ई० सदापश्यन्ति सूरयः दिवीय चक्षुराततम् ॥ भद्रायाः-30 इदं विष्णुविचक्रमे त्रेधानि- दधेपदम् । समूढमस्यपा ॐ सुरेस्वाहा || जयायाः 30 समरूपे देव्याधिया सन्दक्षिणयोरुचक्षसा। माम 5 आयुः प्रमोषीमो ऽ अहं तस्वीरं विदेयंतवदेवि संहशि ॥ रिक्तायाः-0ध्यवर्क यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम् । उर्वारुकमिववन्धनान्मृत्युर्मुक्षीय मामृतात् ॥ पूर्णशिलाया:--शिरसि भूभनन्दियो । अरतिं पृथिव्या वैश्वानरमृत ऽ आजातमग्निम् । कवि ० सम्राजमति- किं जनाना मासन्नापात्रं जनयन्तदेवाः ।। अथ शिलासुदेवतावाह- नम्-तत्रादौनन्दायाम् । ॐ ब्रह्मजज्ञानमित्यस्या वत्सार ऋषि लिष्टुप्छन्दः ब्रह्मादेवता नन्दाशिलायां ब्रह्मावाहने स्थापने वि०॥ ब्रह्मजज्ञानं प्रथम पुरस्ताद्विसीमतः सुरुचोवेन पावः । सवुध्न्या 5 उपमा अस्यविष्टा सतश्चयो।न मसतश्चचियः॥ ३. भूर्भुवः स्वः भोव्रह्मनिहा गच्छेहतिष्ठ ब्रह्मणेमः पाद्यादि नीराजनान्तं सम्पूज्य-भद्रायाम् (-ॐ इदं विष्णुरित्यस्य मेधा निथिपिर्गायत्रीछन्दोविष्णुर्देवता भद्राशिलायां विष्ण्वावाहने स्था विणा 0 इदंविष्णुविचक्रमे त्रेधानिदधेपदम् । समूढमस्यपा ॐ सुरेस्वाहा ॥ ॐ भू० स्वः भोविष्णो इहागच्छ० ० विष्णवे नगः सम्पूज्य । जयायाम्--30 नमस्ते इत्यस्य परमेष्टी ऋषिर्गा- यत्रीछन्दः रुद्रोदेवता जयाशिलायो रुद्रावाहनेस्था विनियोगः।। नमस्नेन्द्रमन्यय ऽ उतोत ऽ इषवेनमः । बाहुभ्यामुतते नमः॥ ॐ भू० स्वः भोन्द्र इहागच्छेह . मद्रायनमः सम्पूज्य ।। रिक्तायाम्--30 इमं देवैतिगोतमऋपि विराट्छन्द ईश्वरोदेवता रिक्ताशिलाया मीश्वरावाहने स्था० वि०॥ अइमन्देवा ऽ अस- पत्न र्ट सुवध्वं महते त्राय महते ज्यैष्ठयाय महतेजानराज्या येन्द्रस्यन्द्रियाय ॥ इमममुष्य पुत्रममुप्यै पुनमस्पै विश 5 एषवो मीराजासोमोऽस्माकं व्रात्मणाना राजा-30भू० स्वः भोईश्वर दहागच्छेह. ईश्वरायनमःसम्पूज्य-गृयाम्-ॐ मद्विष्पोरि- (-२२. कामकाए रवाफरे, गृहवास्तुयाग.गिलास्थापन पद्धतिः त्यस्य मेधातिथि पि विष्णुदैवता पूर्णाशिलायां सदाशियावाहने स्था० वि०॥ अतद्विष्णोः परमपद ई० सदापश्यन्ति सूरयः। दिवीय चक्षरानतम् . भृ स्वः मो सदाशिवविष्णेः ६० . सदाशिवरूपिण विष्णवेनमः॥ सम्पूज्य ॥ वनादिभिः सम्वेष्टय च तत श्राचायाँहोमवेदी समीपमागत्य 30 अोल्यादि संकीर्त्या मुको 5 ई ममयजमानस्य नृतनगृहे वास्तुस्थापनशिलान्यास कर्मणि नन्दादिशिलासु पूर्वोत्तविधानेन देवत्वसम्पादनार्थ शिला होमंकरिष्ये । नत्रशिलानाममन्त्र रथवाशिलास्थापनमन्त्रैर्यथा फ्रमेणादौ नन्दायाहोमकुर्यात् ॥ अष्टोत्तरशताहुतिभिरवायथा सम्भवंअन्यूनाष्टनम संख्ययावृतेनजुहुयात् ॥ 30 नन्दायै स्वा० 30 भद्रायै स्वा० ॐ जयायै स्वा० अ रिक्तायै स्वा०-30 पूर्णायै स्वा० । इतिप्रत्येकहुत्वा ॐ यातेरुदइत्यस्यपरमेष्टीऋपिरनुष्टुप्छदः एकन्द्रो देवता म्द्रमीतये अंघोरहोमे वि० । ॐ यातेन्द्रशिवाननू रघोरापापकाशिनी । तयानस्तन्वाशन्तमया गिरिशन्ताभिचाकशी हि स्वाहा ॥ इत्यघोरमन्त्रेणाष्टोत्तरशताहुतिभिर्जुहुयात्। एवं होम विधाय होमवेद्याईशान स्थापितकलशोदकेनकुशैः शिलाप्रापो हिटेत्यादिभिः सम्मार्जयेत् शिलास्थापनकर्मच कुर्यात् ॥ अथ क्रमः॥ ततः सुलग्नेसम्प्राप्ते पंचयाद्यानिवादयेत् ॥ इति वि० क्र० प्र०॥याचा यजमानेनसहवास्तुभूभौ (नृतनगृहे) गत्वा आदौईशानादि प्रादक्षिण्यक्रमेण पंचशिलानन्दादि वक्ष्यमाण विधानेन स्थापयेत् ।। अथ ईशानेनन्दाशिला स्थापनविधिः- लत श्राचार्य ईशानकोणमागत्यभूमि प्रार्थयेत । ॐ विश्वत्वं कमलेभूतेपृथिवीलोकधारिणि । यज्ञार्थेक्षोभितादेवि प्रसीदपर मेश्वरि ॥ तस्मात्यांखानयेदेवि सानुकलामखेभव ॥ सर्वदेवमयी भूमिः सर्वदेवरसान्विता ॥ इति सम्मायंशानकोणेशिलायतदै- यानुसारेण जानुप्रमाणंगर्तकुद्दालेनकृत्वा गोमयेनोपलिप्यपिप्टेन तण्डुलैर्वा सर्पाकारंवास्तुपुरुष वहिर्मसंलिखित्वा, आवाहयेत्- ॐ आवाहयाम्यहंदेवं भूमिष्टंचाप्पधोमुखम् । वास्तुनाथजग- :- कर्मकाण्ड रतावारे, गृहवास्तुयागे शिलास्थानानुतिः (२१६) त्माएं पूर्वस्यां प्रथमाश्रितम् ॥ ७॥ एतमित्यस्थप्रजापतिपिर्यजु श्छन्दः विश्वेदेवादेवता प्रतिष्ठापनेविनि०।। 30 एतन्तेदेव. सवित यज्ञप्राहस्पतये ब्रह्मणेतेनयज्ञमवत्तेन यज्ञपतितेनमामव ।। मनो यूतिर्जुपतामाज्यस्यवृहस्पतिर्यज्ञमिमन्तनोत्वरिष्ठंयज्ञ ई० समिम दधातु । विश्वेदेवास ऽ इहमादयन्तामो ३॥ मतिष्ट ॥ इति प्रति- छाप्य ।। 30 वास्तोपतेप्रतिजानीहा स्मान्त्स्वावेशो ऽ अनमीवो भवानः। यत्वेमहेप्रतितन्नोजुषस्व शन्नोभवद्विपदेशचतुष्पदे ।। इतिसम्पूज्यप्रार्थयेत् । वास्तोपतेनमस्तेस्तु भूमिशय्यारतः प्रभो मद्गृहंधनधान्यादि समृद्धंकुरसर्वदा । ततोदेवज्ञवोधिते सुलग्ने मङ्गलघोषवादिनादियुत आधारशिला पद्मकलशसहितां नन्दा- शिलांचानीयभूमौकुशोपरिन्यसेत् । तत आधारशिलामावाहयेत् । तेजोमयीलवरूपां सदाशिवस्वरूपिणीम् । ध्यायामिमनसादेवी शिलामाधाररूपकाम् ।। 30 एतन्ते० इतिप्रतिष्टाप्य भू० स्व० आधारशिले सु० ब० ॥ . आधारशिलायैनमः स्थापयामि इतिमा शिरस्कां स्थापयित्वा सम्पृज्यच समानान्मदादृढीकृत्य वामपाश्चगर्ने दीपप्रज्वाल्य, पाकलशाभ्यन्तरे सप्तमतिका तीर्थजलपारदनवरत्न सुवर्णरजतमुद्रादिनिक्षिप्यपिधानेन कलश मुग्नुद्रयित्वा आधारशिलोपरि यवतण्डलपुञ्ज पुन्यसेत् । पुनः पिहितकलशंमृदाढीकृत्य पद्मकलशोपरिमाक् शिरस्कानन्दाशिलां वक्ष्यमाणमन्त्रेण स्थापयेत् ॥ ॥ नाभिमइत्यस्य प्रजापतिषि जंगनीन्दः भगोदेवता नन्दाशिला स्था. विनियोगः ॥ 30 नाभिमचित्तविद्यानंपायुमपचनिर्भसन्न् ॥ श्रानन्दनन्दावाडौंमे भगः सौभाग्यपसः ॥ इति संस्थाप्य || - स्थिरोभवेत्यस्य त्रितऋपि रनुष्टुप्छन्दः रासभोवतास्थिरीकरणे विनि० ॥ 30 स्थिरोभव- वीड्वङ्ग प्राशुभवञ्चाऽयर्वन् । धुर्भवसुग्वदस्त्वमग्ने पुरीष वाहणः । इतिस्थिरीकृत्य-30 नन्दायनमः । गन्धादिभिसम्पू- ज्यमार्थयेत नन्दे त्वं नन्दिनींपुसा त्वामत्रस्थापयाम्यहम् । वेश्म- नित्विहसन्निष्ट यावच्चन्द्रदिवाकरौ । आयुरारोग्यमैश्वर्य नियं (२२०) कर्मकाण्ड रत्नाकर, गृहवास्तुयागशिलास्थापन पद्धति मेदेहिनन्दिनि । अस्मिनरक्षात्वयाकार्यासदावेश्मनियत्नतः। ततः समन्तान्मृदा दृढी कुर्यात् ॥ इति नन्दाशिला स्थापनम् ॥ अथ भद्राशिलास्थापनम्-तत आग्नेयकोणमागत्य अविश्वत्वं कमले, इति भूमिसम्मार्थ्य र्गतंविधायोपलिप्य पिष्टर्वास्तुंगतेवि लिख्य, आवाहयाम्यह मिस्यावाहा-एतन्तेति प्रतिष्ठाय . वास्तोष्पत इति संपूज्य । वास्तोष्पतेनमस्तेस्तुसम्पायुं । तदुपरि आधारशिलां विन्यस्यावाहयेत, तेजोमयीं लवरूपां सदाशिव स्व रूपिणीम् । भ्यायामि मनसादेवीं शिलामाधार रूपकाम् ॥ गन न्तइति प्रतिष्ठाप्य-30 भू० स्वः आधारशिले सुप्रक्तिव० ॥ पाद्य गन्धा-दिभिः संपज्य मृदादृढीकुर्यात् ॥ तस्या वामेदीपंप्रज्वाल्या धारशिलोपरि महापद्मनामकताम्र कलशेपूर्ववत्पारद नवरन्नादि कनिक्षिप्य पिधानेनमुग्वपिधायाधार शिलोपरिस्थापये--कलशं पुनर्भदादृढीकृत्य पाशिरस्कांभद्राशिला 30 भद्रमित्यस्य गौतम ऋषिस्प्छिन्दः विश्वेदेवादेवता भद्राशिलास्थापने विनि० 10 भद्रंकर्णेभिः शृणुयामदेवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरंगै स्तुष्टुवा ॐ सस्तनूभिर्व्यसेमहिदेवहित यदायुः ॥ इतिसंस्थाप्य- 30 वरणस्येत्यस्य वत्सऋषिविराटछन्दः वरुणोदेवता भद्राशिला स्थिरीकरणे चिनिः॥ ॐ वरुणस्योत्तभनमसि व्यरणस्य स्तम्भ सर्जनीस्थोव्वरुणस्य 5 ऋत सदन्यसि व्वरुणस्य 5 ऋतसदनमसि व्वरणस्य ऋतसदनमासीद ॥ स्थिरीकृत्यैतन्तेति प्रतिष्ठाप्य " भद्गायैनमः गन्धादिभिः सम्पूज्य 30 भृ० स्वः भद्रे सुप्रति घर दाभव ॥प्रार्थयेन्-भद्रेत्वं सर्वदा भद्रं लोकानांकुमकश्यपि । अ युर्दाकामदादेवि मुग्वदा च सदाभर ॥ वामन्त्र स्थापयाम्या गृहे ऽ म्मिन्भद्रदायिनि ॥ वेश्मनित्विह संनिष्टयावच्चन्द्र दिवा करौ॥ ॥ इति भहाशिला स्थापनम् ॥ अथ जयाशिलास्थापनम्-नैर्ऋत्यकोणे गत्वाविश्वेतं कमले इति सम्प्रार्थ्यगत विधायोपलिप्य च गतपिष्टेन वास्तुविलिग्गाय. ग्याम्पमित्थावानों-पतन्तेति मनिष्टाप्य अबास्तोष्णा दति कर्मकाण्ड रनाकरे, गृहवार यागे शिलास्थाग्न पद्धतिः संपूज्य वास्तोष्पते नमस्तेस्तु० सम्माक्षं तदुपर्याधारशिलां विन्य स्य तेजोमयीं लंवरूपां-इत्यावाहा तदुपरि यवनंडुलानिक्षिप्य तत्र शंखनामकलशं संस्थाप्य वामेदीप प्रज्वाल्यतन्त्रपूर्वोक्त पार- दादीनि निक्षिप्य पिधायमृदाढीकृत्य 30 भू० स्वः, आधारशिले सुप्र० ब० ॥ संपूज्य चमाक् शिरस्कां जयाशिलाम्-वस्येत्यस्य वत्सऋपिविराट्छन्दः वर्मणोदेवता जयाशिलास्थापनेविनियोगः ।। वरुणस्योतम्मनमसि वरुणस्यस्कंभसर्जनीस्थीचमणस्य ऽ ऋात सदयसि वरुणस्य ऽ ऋन सदनमसिवरुणस्य ऋतसदन- मासीद । इति संस्थाप्य-ॐ स्थिरोभवेत्यस्यत्रितऋपिरनुष्टु- प्छन्दः रासभोदेवता जयाशिला स्थिरीकरणे विनि। ॐ स्थिरो भववीड्वंगऽअाशुर्भवब्बाज्यर्वन् । पृथुर्भवसुखदस्त्वमग्ने--पुरीप वाहणः ॥ एतन्तेनि प्रनिष्टाप्य 0 भू० स्वः जये सुव० || 30 जयायैनमः सम्पूज्यप्रार्थयेत्-गर्गगोत्रसमुद्भूतां त्रिनेत्रांच चतु- भुजाम् । गृहे 5 स्मिन् स्थापयाम्यद्य जयांचामवि लोचनां ।। नित्यं जयाय भूत्यैच स्वामिनो भवभार्गवि ! वेश्मनिविह संनिष्ठ यावच्चन्द्र दिगकरौ ।। इनिजया शिला स्थापनम् ॥ अथ रिक्ताशिलास्थापनम्-ततो वायव्यकोणे ॐ विश्वेत्वंकमले इनि भूमि सम्मार्थ्यगर्न कृत्वोपलिप्यच वास्तुविलिग्थ्य, आवा- हयाम्यहम्० इ० या एनन्ते० प्र०। 30 वास्तोष्पते । सम्पूज्य । बास्तोष्पते नमस्तेतु संप्रार्थ । तदुपर्याधारशिला संस्थाप्य ॐ तेजोमयीलंवरूपां इनिध्यात्वा तस्यावामेदीपं संस्थाप्य शिलोपरियवतण्डुलेपु पूर्वोक्तपारदादीनि विजयनाम कुम्भेनि- क्षिप्य स्थापयेत्-एनन्ते, इति प्रतिष्ठाध्य सम्पूज्यच मृदाढी- कृत्य प्राक शिरस्कां रिक्ताशिलां 30 व्यम्बकमिनि वशिष्ठऋपि त्रिष्टुप्छन्दः म्द्रोदेवता रिक्ताशिलास्थापने वि० ॐ त्र्यम्बकं यजा संस्थाप्य० ॐ वरुणस्योत्तभनमसि इनि स्थिरीकृत्वा गतन्ते प्रति ॐ भूर्भयः स्वः रिक्त सु० ब० । ॐ रिक्तायनमः सम्पूज्य माधयेत् । रिक्तन्वं रिक्तदोषघ्ने सिध्दि भुक्तिप्रदेशुभे । , (२२) कर्मकाएड सताकरे गृहवास्तुयागे शिलास्थापन पद्धतः - वेश्मनित्विहसंतिष्ठयावचन्द्रदिवाकरौ । इतिरिक्ताशिलास्थापनम् । अथ पूर्णाशिलास्थापनम् ततोवास्तु मेमध्ये भागे, ॐ विश्वेश्वं कमले० इति भूमि संमार्यगर्न कृन्वोपलिप्य वास्तुविलिग्व्य । आवाहयाम्यहं० इत्यावाम एतन्ते इति प्रतिष्ठाप्य वास्तोपते इति संपूज्य । वास्तोपते नमस्तेस्तु० संप्रार्थ । तदुपर्याधार शिलांविन्यस्य । तेजोमयीं लम्वरूपां ध्यात्वा । तदुपरिपारदा- दिगभित सर्वतोभद्र नामकं कुम्भसंस्थाप्य वार्मदीप प्रज्वाल्य । पतन्ने० इति प्रतिष्ठाप्य गंधादिना संपूज्यच मृदासर्वतो दृढीकृत्य तदुपरिपूर्णाशिला प्राक् शिरस्कां ॐ पूर्णादात्यस्यौर्ण नामऋषि रनुष्टुप्छन्दः इन्द्रोदेवता पूर्णाशिला म्धापने विनिः । ॐ पूर्ण- दविपरापन सुपर्णा पुनरापन । वस्नेवविक्रीणावहा ऽ इधभूर्ज हैं। शतक्रतो । इति संस्थाप्य । पनन्ने० इति प्रतिष्ठाप्य - भू० स्वः । पूर्ण सुस्थिरा सुप्रति वरदाभव । 30 पूर्णायैनमः संपूज्य प्रार्थ- येत् पूर्णत्वं सर्वदापूर्णालोकानां पूर्णकामिनी । अयुर्दाकामदा देविधनदामुतदा तथा । गृहाधारा वास्तुमयी वास्तुदीपेनसंयुता। त्वामृतेनास्तिजगतो माधारश्चजगत्प्रिये । वेश्मनित्विहसतिष्ठ यावचन्द्र दिवाकरौ इति सम्प्रार्य ततः पंचशिलाभ्यो। पाय- सबलिं दध्यत्त्त, वलिंदद्यात् ॐ नन्दायनमः वलिंसंपूज्य भो नन्दे पनं पलिंगृहाण, एवंसर्वत्र ॐ भद्रायैनमः ॐ रिक्तायनमः ॐ पूर्णायनमः । हस्तौपादौपक्षाल्य पुरुषसूक्त पाठंवा स्वास्ति वाचनपठेत् । इति शिलान्यास विधिः । अथ वास्तुस्थापनविधिः-अथचाचार्यःशिलान्यासादिकर्मकृत्या यास्तुपुरुष संस्थापनार्थ वास्तुभूमेः (नूतनसमनः ) एकाशीति भागं विधायशानकोणादष्टमे आकाशपदे रौद्रभागे आग्नेयस्थ वायुस्थानत्यक्त्वा वास्तम्थापयेत् । तत्रपृथ्वीं प्रार्थयेत् । ३० वाराह स्थापितां देवीं सर्वलोकधरांमहीम् । ध्यायामिप्रमदारूपां दिव्याभरणभूपिताम् । ध्यात्वा 30 स्योनेत्यस्य मेघातिथि पि निष्टप्छन्दः पृथ्वी देवना पृथ्यावाहने पूजने वि० । ॐ स्योनी कर्मकाण्ड रताकरे, गृहयास्तुयाग शिलास्थापन पतिः भवानृक्षरा निवेशनी । पन्छानः शर्मसमथाः ॥ भूत स्वः पृश्य नमः संपूज्य भो पृश्चि सु० ब० । ॐ वास्तु पुरुषायनमः ध्यात्वा संपूज्य प्रार्थयेन् । तनो गृहत्रिसन्धा अश्वत्थाम्रपल्लवादिनि मिनव नमालया च वक्ष्यमाण रजोनमुक्तेन पवमानेन च- वेष्टयेत्-अथ रक्षोघ्नम्-~- कृणुप्वपाजः प्रसिनिनपृथ्वी याहिराजे वामवां । । इभेन त्रिप्वीमनुप्रसितिंदृणानो ऽस्ताऽसि विध्य रक्षसस्तापष्टः ॥२॥ तव भ्रमासऽग्राशया पतन्त्यनुस्पृश धूषनाशोशुचानः । तपूॐ प्यग्ने जुदापतंगान संदिशो व्विरज विष्वगुल्काः ।।२।। प्रतिस्मो विसृज तृणितमो भवापायुर्विशो अस्या 5 अदब्धः । योनोरे 5 अघश ई. सोयोअन्त्यग्नेमा किष्टेण्यधिरा दधर्मान् ॥३॥ उदरनेतिष्टप्रत्यातनुप्य न्यमित्रां ।। भोपनातिग्महेते । योनो ऽ अराति है। समिधानचके नीचा धक्ष्यतसन्नशुष्कम् ॥४॥ अध्याभव प्रतिविध्याध्यस्मदा विष्कृणुप्व देव्यान्ग्ने । अवस्थिरा तनुहियातजनां जामिमजामि प्रमृणीहि शन || अथ पवमानसूक्तम्-~अनेननूतन गृहस्यसूत्रमार्गद्वारासदु- ग्धजलेनपिचेन् । गृहस्य धुरातः अविच्छिन्नधाराध्य उभयोः पक्ष योर्दधात् ।। ॐ पुनन्तुमापितरः सोम्यासः पुनन्तुमापितामहाः ।। पुनन्तु प्रपितामहाः पवित्रेणशतायुषा ॥१॥ पुनन्तुमा पितामहाः पुनन्तुमाप्रपितामहाः ॥ पवित्रेणशतायुपाविश्वमायुर्व्यश्नवै ।।२।। अग्न आय ॐ पिपवस 5 पासुयोर्ज मिपंचनः॥ आरेवाधस्व दुच्छुनाम् ॥३॥ पुनन्तु मादेवजनाः पुनन्तु मनसाधियः ॥ पनन्तु विश्या भूतानि जानवेदः पुनीहिमा॥४|| पवित्रेण पुनीहिमा शुक्रेणदेवदीद्यत् ॥ अग्नेकृत्वा ऋतु ॥ रनु ॥५॥ पर्वमानः सोs अद्यनः पवित्रए विचर्षणिः ॥ यः पोतासपुनातुमा ॥ उभा- भ्यां देवसवितः पवित्रेण सवेनच । मांपुनीहिचिश्चतः ॥णा वैश्वदेवी पुनतिदेन्या गाम्यामिमाव हव्यानन्दो चीतपृष्ठाः॥ mmaraमाटेपवयस्यामपतयोरयीणाम || कर्मकार डरताकरे गृहवास्नुपा शिलास्थान पतिः कुंटस्येशान स्थापित कुम्भजल मिश्रितजल दुग्धेन गृहमविच्छिन्न धाराभिः समाय॑ सप्तधान्यवीजानि वेशानादिक्रमेण सूत्रमार्ग द्वारा वहिः सिक्त भूमौवापयेत् ॥ ततः पूर्वोक्त ईशानकोणमागत्य शिलास्थानात्पूर्वमाकाशपदै जानुमात्रंखानयित्वासप्तमृतिकागोमय तीर्थजलैम्पलिप्य पंचरत्नपारद श्वेत पुष्प सप्तधान्यादि दधि सु. वर्ण रजतादिभिरलंकृत्य प्रनिपेच ॥ होमवेदीशानस्थ संस्रवधार पार्थकलशजल मिश्रित नूतन वृहद्धटजलं गन्धादिभिः संपूज्यघट हस्ताभ्यां गृहीत्वा 5 वनिकृत जानुमण्डलः सन् ॥ वास्त्ववटं तेनजलेन आतत्वायामीति शुनः शेफऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः वरुणो देवता वास्त्ववट जलपरणे वि०॥ ॐ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमा नस्तदाशास्ते यजमानो हविभिः॥अहेडमानोव्वमणो हबोध्या- शई समान 5 आयुः प्रमोपीः ॥ इति पूरयेत् ॥ ततः सैवाल सप्तधान्यसप्तमत्तिका पुष्पाणि च प्रक्षिपेत् । ततो वास्तुवेदीमुपा- गत्यपूजितनागाकृति वास्तुप्रतिमां सकलशावाद्य ध्यनिपुरः सरं शान्तिसूक्तं पठन्त्रानीय तत्रसंस्थाप्य गन्धादिभिः सम्पूज्य कलशे शैवाल पारद पंचरत्नोप्टगन्धादीनि निक्षिप्य वास्तु प्रति- मां नागाकृतिं कलशेअधोमुखींकृत्या कलशमुखं पिधानेन दृढी कृत्य प्रार्थयेन्-प्रसीदपाहि विश्वेश देहिमेगृहजसुखम् । पूजितोऽ सि मयायास्तोहोमाद्यैरर्चनैः शुभैः । वास्तु पुरुष नमस्ते स्तु भूमिशय्यारत प्रभो । मद्गृहं धनधान्यादि समद्धंकुरुसर्वदा॥ ॐ वास्तोष्पत इति वसिष्टऋषिस्त्रिछुप्छन्दः वास्तु देवता नृतन गृहे वास्तुस्थापने विनियोगः। ॐ वास्तोष्पने प्रतिजानीहास्मा- नववेशो अनमीवोभवानः । यत्त्वेमहे प्रतितन्नो जुषखशन्नोभव द्विपदेश चतुष्पदे । इति सप्रतिम कलशं तत्रावटे स्थापयित्वा वामेदीप प्रज्वाल्य ॐ एतन्ते देवसवितर्यपाहु हस्पतये ब्रह्मणे तेनयज्ञमवतेन यज्ञपति तेनमामव । ॐ मनोजूतिर्जुपता माज्य- स्यवृहस्पति यज्ञमिमंतनो स्वरिष्टं यजर्ट समिमं दधातु विश्व देवासा इहमादयन्तामों प्रतिष्ट । ॐ भूर्भुव म्वः वास्तो इहाग- पर्गयाएर रताकरे, गृहवास्तुयागे दिग्पाल परिवार पद्धतिः , च्छेहतिष्ट । सुप्रतिष्टितोवरदोभव । ॐ वास्तु पुस्पायनमः । नाममंत्रेण पुनः सम्पूज्यप्रार्थयेत् ॥ यावद्भूमण्डलं धत्तेसीलवन सागरान् । तावदस्मिन् गृहेनिष्ट सर्वसंपत्करोभव ॥ भोगस्तो पूजितो ऽ सिक्षमस्व ॥ ततः पूर्वोत्खातमृदागर्तपूरयेत्, ततोवलिं दद्यात्--उपरितोगोमयादिनोपलिप्य वास्तुवेदी देवविसर्जनान्ते तत्र स्थापयेत् । अत्र देशाचार व्यवस्था वास्तुवेद्यपरि पालाश दण्डस्नापनस्यास्ति तमप्याचार्यः स्थापयेत् । तत प्राचार्योवास्तु- स्थापनं कृत्वागृहाइहिः पूर्वादिदिक्षुदशदिक्पालेभ्यो (दधि घृत मधु मिश्रित भक्तं) वामापान्नं सदीपंपताकोच्छितं वलिंदद्यात्- तत्रपूर्व इन्द्रमावाहयेत् ऐरावत समारूढं वज्रहस्तं महावलम् । आश्रितं दिशिपूर्वस्यामिंद्रमावाहयाम्यहम् ।। दधिमाप भक्त- वलिं सदीपंसंपूज्य हस्तेजलंनिधाय ॐ इन्द्रायसांगाय सशक्ति काय सपरिपरिवारायैनं बलिंसमर्पयामि, भो २ इन्द्रदिशंरच २ वलिंभक्ष २ यजमानस्यायुपकर्ता पुष्टिकर्ता क्षेमकर्ताभववलि- नासह पीतपताकांच गृहाण इनि चल्युपरि जलंक्षिपेत्-प्रार्थयेत्- इन्द्रः सुरपतिः श्रेष्ठो वज्रहस्तो महाबलः । शतयज्ञाधिपो देवस्त- स्मै नित्यं नमोनमः ।। एवं सर्वत्र।। तत आग्नेय्यामग्निमावा येत्-मार्थयेच्च-छागपृष्टं समारूढं शक्तिहस्तं महावलम् । श्राश्रितं दिशमाग्नेयीमग्निमावाहयाम्यहम् ॥ ॐ अग्नयेनमः, इति सरक्तपताकंवलिंसदीपसंपूज्य-30 अग्नयेनमः सासा०स० स० नमः एन० मा० समर्पयामि भो २ अग्नेदिशरक्षवलिं भक्ष २ यजमानस्यायुपकर्तामार्थयेत्-ग्राग्नेयः पुम्पोरक्तः सर्वदेवमयो व्ययः॥ धूम्रकेतुर्ध्वजोयस्यतस्मै नित्यं नमोनमः ॥ ततोदक्षिणे यममावास्येत्-महामहिप मारूढं दंडहस्तमहावलम् । आवाह- यामियजे स्मिन् पूजेयंप्रतिगृहाताम् ॥ कृष्णपताकायुतंवलिं संपूज्य यमायसांगाय. 'भो २ यमदिशरक्ष २ वलिंभक्ष २ यजमानस्यायुष्काभवैनंवलिंगृहाण । प्रार्थयेत् लुलायस्थो महाकायो दण्डहस्तो पराक्रमी । वृहत्पीनो महावाहुस्तस्मैनित्यं (२२६) फर्मकागड रताकरे, गृहयास्यागे दिवपाल बलिदान पद्धतिः नमोनमः ॥ नैऋत्ये नियंतिम्-नितिखङ्गहस्तं च सर्वलोक भयंकरम् । श्रावाह्यामि यज्ञेऽस्मिन् पूजेयंप्रतिगृह्यताम् ॥ नील पताकायुतंवलिंसंपूज्य 30 नियंतये सांगाय० भो निऋते दिश- रक्ष २ वलिं भक्ष २ यजमानस्यायुष्कर्ता० भव। एनंवलिंगृहाण ॥ प्रार्थयेत्-निऋतिः बङ्गहस्तश्च सर्वलोकैकपावनः । नागरूढो महाकायस्तस्मै नित्यं नमोनमः ॥ पश्चिमे वरणमावाहयत्-पाश हरतंववरणं यादसांपतिमीश्वरम् । आवाहयामि यजेऽस्मिन् पूजेयप्रतिगृहाताम् ॥ श्वेतपताकायुतंवलिंसंपूज्य-30 वरुणाय- सांगायसायुधाय सशक्तिकाय सपरिवारायैनं वलिं समर्पयामि । भो २ वरुणदिशंरक्ष २ वलिंभक्ष २ यजमानस्यायुष्कर्ता. एनं वलिंगृहाण ॥ प्रार्थयेत्-पाशहस्तात्मको देवोवरुणो यादसांपतिः। भूपितोमणिरत्नश्च तस्मैनित्यं नमोनमः॥ वायव्येवायुमावाह- येत्-वायुमाकाशगंचैव शीघ्रगंचमहावलम। आवाहयामियज्ञेस्मिन् प्रजेयप्रतिगृह्यताम् ॥ धूम्र पताकायुतं वलिं संपूज्यवायवेसांगायक भो २ वायो दिशंरक्ष २ वलिंभक्ष २ यजमानस्या युष्कर्ता एनंवलिं गृहाण । प्रार्थयेत् । त्रैलोक्यान्तश्चरोवायुःसर्वेषामीप्सित प्रदः । सर्वाभरणसंयुक्तस्तस्मै निम्यं नमोनमः ॥ कुवेरमुत्तरआवा हयेत्-आवाहयामिदेवेशं धनाध्यक्ष महाप्रभुम् । उत्तरस्यांदिगीशं तमलका वासिनं शुभम् ॥ हरित्पताकायुतं वलिं संपूज्य 30 कुचेरायसांगाय० । भो २ कुवेर दिशंरक्ष. चलिभक्ष २ यजमा- नस्यायुप्कर्ता० एनं बलिं गृहाण ॥ कुचेराय सुरेशाय धनाध्यक्षा- यतेनमः । उत्तरेशाय सौम्याय यक्षेशायनमोनमः। ईशाने ईशमा वाहयेत् । वृषभस्कन्ध मारूदंशूल हस्तं पिनाकिनम् । आवाहयामि- यजेऽस्मिन् पूजेयप्रतिगृह्यताम् ॥ श्वेत पताकायुतंवलिं संपूज्य- ईशानाय सांगाय० भोईशान दिशंरक्ष २ वलिंभक्ष २ यजमानस्या युष्कर्ता० 'भव ॥ एनंवलिं गृहाणप्रार्थयेत् । सर्वाधिपो महादेव ईशानः शुक्लईश्वरः ॥ शूलपाणिविरूपाक्षस्तस्मै नित्यं नमोनमः॥ पूर्वेशानयोर्मध्ये ब्रह्माण मावाहयेत्-हंस पृष्ट समारूढंस्मवहस्तं कर्मकाण्ड रखाकरे, गृहवास्तुयागषिपाल बलिदान पतिः (२२७ . महावलम् ॥ लंबोदरं चतुर्वकं ब्रह्माणमायाम्यहम् ॥ रक्तपताका युतंवलिं सम्पूज्य ब्रह्मणेसा० भो २ ब्रमन् दिशंरक्ष २ बलिभक्ष २ यजमानस्यायकर्ता एनंवलिगृ० प्रार्थयेन् । पद्मपाणिश्चतुमृति वंदावासः पितामहः । यज्ञाध्यक्षश्चतुर्वक्त्रस्तस्मैनित्यं नमोनमः । नैर्ऋत्य पश्चिमयोर्मध्ये 5 नन्तमावाहयेत्-नागपृष्ठ समारूढ़ पातालतलवासिनम् । आवायाम्यहं देव मनन्तं सर्पराजकम् ।। मेघवर्ण पताकायुतं चलि सं० अनन्ताय सांगाय० भो २ अनन्त दिशरक्ष २ वलिंभक्ष २ यजमानस्यायुष्कर्ता }} एनंवलिंगृ०प्रा०- अनन्त रूपिणा येन विष्णुना सचरा चरम् । पप्प वध्दारितं नित्य तस्मै तुभ्यं नमो एवं गृह्मवेशांगत्वेन दिक्पालेभ्यो बलीन्दत्या क्षेत्रपालायपुनः पूर्वोक्तानुसारेण मापवलिंदत्वा वलिशेषमासभक्तादिकमुभाभ्यां हस्ताभ्यांपुटके सम्पुटीकृत्य नूतनगृहस्यनैतिकोणे गत्वोत्तराभि मुग्यो भूत्वासन्ध्याकालनिमित्तक पलिमिदानीमपकृष्य वक्ष्यमाण मन्त्रैः-उक्तंचविश्वकर्मप्रकाशे-देश्योदेवामुनीन्द्राः सभुवनपत- योदानवाः सर्वसिद्धायक्षारक्षांसिनागा गरुड़मुग्वखगागुहाकादेव देवाः ॥ योगिन्योदेववेश्या हरिदधिपतयो मातरोविघ्ननाथाः । प्रेताभूताः पिशाचाः पितृवननगराद्याधिपाः क्षेत्रपालाः ||१|| गन्धर्वाः किन्नराः सर्वगुहाकाः पितरोग्रहाः। कूष्माण्डाः पूतना- रोगास्तथावतालकाः शिवाः ॥२॥ असूक्प्लुतारच शिशुनांमांस- भक्षणतत्पराः। लम्बक्रोडास्नथा हस्वादी_शुलास्तथैवच ॥३॥ सूर्यकोटिप्रतीकाशा विद्युत्सदृशवर्चसः । गृहन्तुचवलिंसवें तृप्ता यान्तुवलिनमः ॥ सर्वेभ्योभूतेभ्योनमः, इलिवलिंदत्वा हस्तौपादौ प्रक्षाल्य ततोहोमवेदीसमीपमागत्य सपुत्रकलत्रादि परिचारयुतो यजमानोहोमपद्धत्युक्तप्रकारेण पूर्णाहुतिंजुहुयात् । ततो गोदान विधिनाशान्त्यर्थमाचार्यायसवत्सा पयस्वनींगांचदद्यात् ।। तत प्राचार्यत्रमासदस्यपाठक जापकऋत्विद्वारपालादिभ्यो यथांशेन सुवर्णादिमुद्रां भूयसीदक्षिणांचदद्यात ॥ सङ्कल्पः-श्रयेत्यादि कर्मकाण्ड रत्नाकर, गृहवास्तुयागे उत्तरांग पूजन पद्धतिः ( २२८) सकी.मुकराशिः सपत्नीकः सपुत्रपौत्रवन्धुवर्ग परिवारसहितो हिं कृतेतन्नूतनगृहकर्मणि शिलान्यासवास्तुस्थापन गृहप्रवेशांग कर्मणः : सागफलप्राप्तये साद्गुण्यार्थच गांगोनिष्क्रयीभूतं द्रव्यवा आचार्यादि ब्राह्मणेभ्यो ब्रह्मादिभ्यश्च सुवर्णरजतादिमुद्रादक्षिण दास्ये तथाचन्यूनीतिरिक्त दोषपरिहारार्थमिमो भूयसींदक्षिणां नानानामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नटनर्तकादिभ्यो विभज्यदास्ये यथासंख्यकान् ब्राह्मणानभोजयिष्ये । इति सर्वेभ्योदक्षिणां या शेन विभज्यमण्डपे सर्वपांदेवानामुत्तरांगपूजनंविधायप्रार्थयेत् मन्त्रपुष्पाञ्जलिंदद्यात् ॥ . हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूतस्यजातः पतिरेकासीत् । सदाधार पृथ्वींद्यामुतेमां कस्मैदेवायहविपा विधेम ॥ ॐ यज्ञेनयज्ञमजयन्त देवास्तानिधर्माणि प्रथमान्यासन् तेहनाकमहिमानः सचन्तयत्रपुर्वसाध्याः सन्तिदेवाः ।। ३० राजा- धिराजाय प्रसहासाहिनेनमो वयंवैश्रयणायकर्महे ॥ समेकामान कामकामायमहां कामेश्वरौवैश्रवणोददातु कुयेरायवैश्रवणायमहा रोजाय नमः ॥अहं मूढोनजानामि नजानामिविसर्जनम् । पूजांच- वनजानामित्वकोतपरमेश्वर ॥ मन्त्रहीनंक्रियाहीनं विधिहीनचय- द्भवेत् । सत्सर्वक्षम्यतादेव प्रसीदपरमेश्यर ॥ गणेशादिपंचाद्ध देवताभ्योनमः । सर्वतोभद्रदेवताभ्योनः । गृहभद्रस्थदेवता वास्तु भद्रस्थ शिख्यादिदेवताभ्योनमः। ॐ यान्तुदेवगणाः सर्चपूजा मादायमामिकाम् । इष्टकामसमृध्यर्थ पुनरागमनायच । इति भद्रस्थदेवाविसृज्य सर्वमण्डपस्थ कलोभ्योजलमादाय होम संन्निधिमागत्य सर्वकलशजलं तर्पणमार्जनजल सहितमेकीकृत्य होमेशानकलशस्थ जलमपिचकीकृत्य न्यायुष्करणंकुर्यात् ॥ तत प्राचार्योवामस्थ पत्नीपुत्रादिपरिवारयुनं यजमानमाम्रादिपल्लवैः पूर्वोकाभिषेक (सुरास्त्वामभिपिंचन्तु) विधिनावेदोक्तमन्त्रैश्चा भिपेकाद्याशीर्वादान्तं कर्मविधायहोमकुएटस्थदेवानामुतरांग पूजननीराजनादिकंकृत्याऽग्निप्रार्थयेन-30 चतुभिश्नचतुभिश्यहा भ्यांपंचभिरेयच । हयतेचपुनर्वाभ्यांसमविष्णुःमीदतु ॥ गच्छत्य (२। कामकाएर रताकरे, गृहयास्तुयाग गृहमयेरा पतिः भगवनग्नकुण्डमध्यात्यधासुग्यम् । इष्टकामसमध्यर्थपुनरागम- नायच ॥ इति अग्निविमृजेन् । ततोत्रात्मणाम्भोजपेन् । इनि वास्तुस्थापनविधिः॥ ॥अथ गृहपूवेशः॥ पूर्वोदिनोविधिकृत्या नृतनगृहप्रवेशे ब्रामणानभोजयित्वा तस्मिन्नेवदिने दियारात्रौ चाज्योतिर्विदादिष्टे सहग्ने (उरा- चमात्स्ये ) कृत्वाग्रतोद्विजवरानथपूर्णकुभन्दध्यनताम्रदलपुष्पफलो पशोभम || मांगल्यशान्तिनिलयायगृहं विशेतु । शुक्लाम्बरःस्वभ- वनप्रविशत्सधूपम् ॥ कृत्वादौवास्तुपूजांजलभृतकलश ब्रामणांचा ग्रतो वामंकृत्वाथकार्यानवतरभवने सोरणादयेप्रवेशः । ब्रामणः कृन स्वस्त्ययनो मङ्गल तृर्यवादिनादिगीतशान्लिपाटेन सफल सजल पूर्ण पंचपल्लव युतकलशी ब्राह्मणपुरः सरः शुक्ल- माल्यानुलेपनस्तादृशकलन पुत्रपौत्रादि समेतः सशकुनः सूचिताभ्युदयस्तोरणाढयांशाला स्त्रिया अंचलग्रंथिवध्वा स्वेष्ट- देवता चेदपुस्तक यय श्रीकलादि मंगलवस्तृनिबंशनिर्मितन्तने पात्रे पत्नी शिरसिकृत्या शुभ्रवस्त्रेणाच्छाद्यतामनुगच्छन्सन गृह- स्यप्रदक्षिणां कृत्वाश्रेष्ठद्वार समीपमागत्य पूर्वोक्त गणेशपूजा विधिना देहलीगणेशं संपूज्य प्रतिष्ठाप्यचैक विशंतिमोदकानदी- कुरैः सह निवेद्यच मूहर्तसामयिक लग्नदानं कुर्यात् दानसामग्री संपाद्य-संकल्प:--अद्येत्यादि संकीर्णामुकशर्मा सपरिवारःसपत्नी को नृतुनगृह प्रवेशकर्मणि गृहप्रवेशसामयिक लग्नावत्र कुत्र- स्थानस्थिता दित्यादि नवग्रहणामपस्थानामनिष्टफलोपशान्त्यर्थ (२३० ) कर्मकाण्ड रताकरे गृहवास्तुयागे गृहप्रवेश द्धतिः शुभस्थानां शुभफलाधिक्य प्राप्तये एतद्रव्यममुकशर्मणेदैवज्ञाय संप्रददे-इतिदत्वाद्वारमातृपूजनं कुर्यात् ॥ अद्यत्यादि-अमुक शर्मा सपत्नीकोऽहंनूतनगृहप्रवेशकर्मणिद्वारमात्त्रणांपूजनंकरिष्ये भावा हनम्-आवाह्याम्यहं देवीर्धारमात्ऋःमुमंगलाः । नववेश्मप्रवेशार्थ पूजनंचकरोम्यहम् ॥ एतन्त इति प्र० कृत्वा ॐ भू० स्वः द्वार- मातरः इहागच्छन्तु-इहतिष्ठन्तु सुप्रति० वरदाभवन्तु इतिप्रतिष्ठा प्यध्यायेत्-30 कुमारी धनदानन्दा विपुलामंगलाचला। पद्माचैवेति नाम्नोक्ताः सप्तैताद्वारमातरः॥ नाम मंत्रैः पूजनं कुर्यात- 30 कुमार्यैनमः, 30 धनदायनमः, ॐ नन्दायैनमः, विपुलायैनमः, 3. मंगलायनमः, 30 अचलायैनमः, ॐ पद्मायनमः, इति गन्धाक्षतादिभिनैवेद्यदक्षिणांदत्वा संपूज्यचाचार्यः स्वस्तिवाचन पठन् गृहाभ्यन्तरं प्रविश्यस्वासन उपविश्यगणेशादि पंचांग पूजां कृत्वाजीवमात्ऋणांपुंजनं कुर्यात् ॥ पट्टेः गणेश समीपेवा सप्तद- ध्यक्षत पुंजोपरि श्रावाहयेत्-अद्यत्याद्यमुकोऽहं नृतन गृहप्रवेश कर्मणिकल्याण्यादिजीवमात्ऋणांपूजनंकरिष्ये। श्रावाहयेत्-श्रावाया म्यहं देवी मात्ः मुशोभनाः॥ नववेश्म प्रवेशाय आयुष्कामा र्थ सिद्धये ॥ एतन्तेमप्रतिॐ भूः स्वः कल्याण्यादि सप्तजीवमातर इहागच्छन्त्विहतिष्ठन्तु॥सुप्रतिष्टितावरदाभवन्तु।। इति प्रतिष्ठाप्य-कल्याणी मंगला भद्रापुण्या पुण्यमुखीतथा । जया चविजयाचैव वरदा भयपाणयः॥इतिध्यात्वा-ॐकल्यारायैनमः, ॐ मंगलायैनमः, ॐ भद्रायैनमः, ॐ पुण्यायैनमः, ॐ पुग्य- मुख्यैनमः, ॐ जयायैनमः, ॐ विजयायैनमः, 30 इतिनाम मंत्री रावाहनादि नीराजनान्तं संपूज्य गुडसपिभ्यां जीयमात्राणामुपरि चसोर्धाराः पातयेत्- 30 वसोः पवित्र मसीनिमंत्रण ततो प्राय. णादि भ्यो दक्षिणा दत्वा-श्राचार्य:-महानीराजनं निलकं ग कारयित्वाऽभिषेकादिकं कृत्वाऽऽशीर्दद्यात् ॥ ततः सुहृद्वन्धुयुनो भंजीत ततो यथासुग्वं गेहेपंचराप्रपर्यन्तं शयनासनादिकं सतनं कर्त्तव्यम् ॥ इति गृहप्रवेश विधिः ॥ ७ कर्मकाण्ड रनावरे, गृहयास्तुयागे सत्यनारायण पूजा पद्धतिः (२३१) 1 अथ सत्यनारायण पूजा परिभापा । श्री भगवानुवाच-प्रतमस्तिमहत्पुगय स्वर्गमत्यंच दुर्लभम् ॥११॥ तवरनहान्मया वत्स ! प्रकाशः क्रियतेऽधुना । सत्यनारायणस्यवंवत सभ्यमिधानतः ॥१२॥ कृपासवः सुख भुवन्याप्रमोक्षमाप्नुयात् । तच्याभगयद्वाक्यं नारदोमुनिर प्रवीत ॥१३॥ नारदउपाच । किंफसकिंविधान च कृतंकनैव तद्वतम् । तत्सर्व विस्ताराद् ब्रूहिकदाकार्यहि तद्वतम् ॥ १४॥ श्री भगवानुवाच । दु ख शोकाभिशननंधनधान्य प्रपार्दनम् । सौभाग्य सततिकरं सर्वनविजय प्रदम् ॥ १५॥ अमावास्यां च संक्रान्तौ पौर्यामाया पिरीपतः । यस्मिन्कस्मिन्दिने बाधभक्ति- द्वा समन्वितः ।। १६॥ सत्यनारायण देवं पूजयेन्निशामुन्छे । ब्रायणान्धपेश्चैव सहितोधर्म तत्परः ॥१४॥ नैवेद्य भक्तितो ददयासपादं भहिसंयुतम् । रंभाफलंघृतं चौरंगोधूमस्य च चूर्ण- कम् १८ अभायै शालिवूर्णपाशर्करां च गुदतथा । सपादं सर्वभक्ष्याणि चकीकृस्य निवेदयत् । ॥१६॥ विप्रायदक्षिणा दद्यात्का धुत्या जनैः सह । ततश्च बंधुभिःसाविप्राश्च प्रतिभोजयेत् । ॥२०॥ पगादंभक्षयद् भरत्या मृत्यगीतादिकं चरैत । ततश्चस्वगृहं गत्वात्सत्यनारायणं स्मरन । ॥२१॥ एवं कृतमनुष्याणा यांलासिद्धिर्भवे दुवम् । विशेषतः कलियुगे लघूपायो ऽस्तिभूतले । ॥२२॥ प्रकुर्याध ततीवेदी कदलास्तम्भमण्डिताम् । सपादहस्त विस्तीपी श्चतुरङ्गुलमुन- ताम ||२३॥ सर्वतो भगवद्दयानेखा. श्चैकोनविंशति. तेनैवच प्रकारेण भद्रतत्र प्रकल्पयेत ॥२४॥ रावतोभद्र विधिना स्थापयेत्तत्र देवता. २६) गणनाथं प्रपूज्यादौ कलश स्थापयेत्सुधीः । नान्दै मुख मातृपूजा पुण्याहं याचये त्तत ::२५ महाचन विधायैव तत: पूजा समारभत । वेद्या संस्थापयेत्तत्र फलशमुमनोहरम् ॥२८॥ वारुणेन विधानेन पूजनं कथितंशुभम् । तत्राधारे मन्यदेवं शालिग्राम च स्थापयेत ।२६। चतुर्भुजां स्वर्णमयोप्रतिमा याथ स्थापयेत (आचार्य परणं कृत्या ततः पूजा समारभेन् ॥ ३० पृजान्त च कारम्यां स्कान्दोक्ता धावयेत्सुधीः॥३१॥ धनवस्त्रादिभिर चैप माचायपरितोषयेत् । प्राचार्य परितुष्टेहि सृत्यदेयोऽपि तुष्यत्ति [1 ३२॥ रात्री जागरणं कृत्वा होम फुयादिधानतः । शान्त्यर्थं दक्षिणां श्चैवगां च दद्यात्पयस्विनीम ॥३३॥ - ॥अथ सत्यनारायण पूजा पद्धतिः॥ अथ च सत्यनारायण पूजाकधायांसपाद हस्तां चतुरस्रांचतुरंगु लोच्छ्रितां वेदी कृत्वासर्वतोभद्रविधिनासुलिख्य स्तम्भतोरणः समलं कृत्य त्रिसूत्र्यावेष्ठय गणेशादिपंचांग पूंजन पूर्वोदित २३२ कर्मकाण्ड रत्नाकरे, सत्यनारायण पूजा पद्वतिः विधायवेदीमध्ये पंचांगपूजिन वरुण कलशमन्यं वा संस्थाप्य तत्र शालिग्नाम शिलां वा सुवर्णप्रतिमामाधारोपरिसंस्थाप्य पूजन कुर्यात्-तत्र कर्ता पूर्वोक्तविध्यनुसारतः पौर्णिमायां वामावा- स्यागं संक्रान्तौ वा मनेक्षितेघने निशामुखेस्वासन उपविश्य दीप प्रज्वाल्य संपूज्य चाधारं पूजयेत् । प्राणायामत्रयं विधाय संकल्पं कुर्यात् । अयेत्यादि देशकालौ संकीर्त्यामुकगोत्रप्रवरोऽ मुकशर्माह सकल दुरितोपशमनसर्वापच्छान्तिपूर्वकं सकल मनोरथ सिद्धयर्थ यथासंपादित सामग्र्याऽ गणेश गौरी वरुणदेवता पञ्चलोकपाल दशदिग्पाल सूर्यादिग्रह देवता पूजन पूर्वक पूर्वांगी कृतं श्री. सत्यनारायण पूजनं कथा श्रवणं च करिष्ये । ततो गणेशादि देवता एकोन विशति रेग्वात्मकं सर्वतोभद्रं च संपूज्य कलशोपरि पाने पूर्वोक्तां प्रतिमां संस्थाप्य पुष्पाक्षत हस्तः श्री सत्यनारायणं ध्यायेत्-सत्येशं सत्यदेवेशं वरदं कामदं विभुम् । ध्यायामिमनसाभक्तया सत्यनाराधणं प्रभुम् ॥१॥ अयम्-॥ सत्यदेव नमस्तेऽस्तु संसारार्णवताराक। अर्घ्यगृहाण सत्येश सत्यनारायण प्रभो ? ॥१२॥ पाद्यम्- मंदोष्णं निर्मलं नीरं गन्धाक्षत समन्वितम् ॥ पायं गृहाणदेवेश सत्यनारायणप्रभो॥३॥ प्राचमनम्न्यथालब्धंपरंवारि सर्वगन्धसमन्वितम् । सम्यगार म्यतांदेवसत्यनारायणप्रभो ? ॥४॥ पंचामृतम्-दधिदुग्ध घृत- क्षौद्र शर्करामिश्रितपरम् । पंचामृतंगृहाणेशसत्यनारायणप्रभो॥२॥ स्नानम्-अष्टगन्धसमायुक्तं स्नानीयंजलमुत्तमम् । स्नानार्थगृह सर्वज्ञसत्यनारायणप्रभो ? ॥॥ स्नानान्ताचमनम्-स्नानान्ताच मनंदिव्यं गांगेयंजलमुत्तमम् । एनर्गहाणश्रीनाथसत्यनारायण- प्रभो ॥७॥ वस्त्रम्-ग्राङ्गशोभाकरंदिव्यं वर्णतन्तुसमन्वितम् । वस्त्रंगृहाणगोपीशसत्यनारायणप्रभो ? ॥८॥ यज्ञोपवीतम्-प्रामा द्यानर्मितं शुद्धमुपवीतंसुमङ्गलम् । गृहाणकमलाकान्त सत्यनारा- यणप्रभो ? ॥६॥ चन्दनम्-चन्दनंपरमंदिव्य कस्तूरी केशरान्वि- तम् । भालशोभाकरंदिव्यं चन्दनं प्रतिगृह्यताम् ॥१०॥ निला.
पर्मकाण्ड रनाकरे, सत्यनारायण पूजा पद्धतिः (२३३ ) क्षतम्--तिलालतान्सुसंस्निग्धान्विष्णुप्रियमनोहरान | गृहाणदेव देवेशसत्यनारायणप्रभो ?|११|| पुष्पाणि--जातीपुष्पाणि सुभ्राणि तुलसी च समञ्जरीम् । सत्यनारायण प्रभो ? गृहाण तुलसी प्रिय ॥१२॥ धूपम्--गंधद्रव्यसमुद्भुतं गुग्गुलेन युतप्रियम् । धूपं गृहाएलक्ष्मीश सत्यनारायणप्रभो ? ||१|| दीपम्--गवाज्य पनि संश्लिष्टं दीपितं छविदर्शकम् । श्रारार्तिक्यगृहाणेश सत्यनारायण प्रभो ? ॥१४॥ नैवेद्यम्--नानाव्यञ्जनसंयुतंच सरसंजम्भीररम्भा फलम्, चूर्णचैवसुचारूपेयमधुरंदुग्धं समिष्टंशुभम् । लाजाभ्राष्ट्र सुसंस्कृनाश्चमधुराश्चोप्यंचलेहांतथा, नैवेद्यचददामिस्वीकृमहरे ? श्रीसत्यनारायण ? ॥१॥ नैवेद्यान्ताचमनम्-- लवङ्गकरियुनिव- द्यान्तंजलपरम् । गृहाणाचमनंदेव सत्यनारायणप्रभो? ॥१॥ ताम्बूलम्---नादिरेणसुसंलिप्तं पूगीलवंगमिश्रितम् । ताम्बूलं गृहदेवेश सत्यनारायणप्रभो ? ॥१७॥ दक्षिणाम-उपायनीभूत- पिदवित्तशाव्यविवजितम् ॥ द्रव्यंगृहाणदेवेश सत्यनारायणप्रभो ? ॥१८॥ ततः सफलार्यम्--गन्धाक्षतजलमर्चे निधायोपरितः फलं संस्थाप्य वामहस्तेधृत्वोपरित उत्तानंदक्षिणहस्तंकृत्वा ॥ गन्ध- वारिसमायुक्तं फलंचाममनोहरम् । सफलायगृहाणेश सत्यनारा- याप्रभो ? ॥१६॥ फलमग्रेस्थापयित्वा वारिणादेवंस्नापयेत् ॥ करातिक्यम्-कपरंपरमंदिव्यं चन्हिनादीपितंमया । कराति- क्यमादत्स्व सत्यनारायणप्रभो ?॥२०॥ प्रदक्षिणाम्यानिकानि चपापानि जन्मान्तर ऋतानि च । तानितानि प्रणश्यन्ति प्रदक्षिण प्रदेपदे ॥२२॥ इति-सत्यनारायणं भक्त्यासम्पूज्य कथां श्राव- यितु माचार्य बृणुयात्-30 अद्यत्यादिदेशकालौ संकीर्णामुक राशिरमुक शर्माहं चातुर्वर्गफताप्ति कामनया श्री सत्यनारायण कथा परायणकर्तमेभिर्वरणद्रव्यै रमुकगोत्रप्रवरान्वितममुक शर्मा एंब्राह्मणं ज्यासत्वेनाहं वृणे, इनि-चरणद्रव्य माचार्यहस्तेदन्या प्रार्थयेत्-व्यासाय विष्णुरूपाय व्यासरूपाय विष्णवे । नमो वै ब्रामविधये वासिष्ठाय नमोनमः ॥२२॥ ततः पुस्तकं संपूज्य न्या- ( २३४) कर्मकागड रत्ताकरे, सत्यनाराण पूजा पद्धतिः -- सस्तवनं कुर्यात् । ततः सर्वे श्रोतारः समाहित मनस्काभवन्तु कथां च शृणुयुः । ततः कथावसाने चतुर्वतियु तमारार्तिक्यं सत्य- नारायणस्य कुर्यात् ॥ सर्वेश्रोतारोव्यास पूजां कृत्वोपायनं निवेद्य करे कुसुमानि गृहित्वा मंत्र पुष्पाञ्जलिं दद्युः । ॐ यन्म- या भक्तियुक्त न पत्रं पुष्पं फलं जलम् । निवेदितं चतत्सर्वं कृपया स्वीकुरुप्रभो ? ॥२०॥ सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं सत्यस्ययोनि निहितं च सत्ये । सत्यस्य सत्यभृत सत्यनेनं सत्यात्मकं त्वां शरणप्रपन्ना ॥२४॥ विभर्षिरूपाण्यववोध आत्मा क्षेमाय लोकस्य चराचरस्य ॥ सत्वोपपन्नानि सुखावहानि सतामभद्राणि मुहुः खलानाम् ॥२५॥ स्वयं समुत्तीर्य मुदुस्तरं द्युमुद्भवार्णवंभीमम- दनसौहृदाः। भवत्पदाम्भोरुहनावमत्रते निधाययाताः सदनु- ग्रहोभवान् ॥२६॥ सत्वविशुद्धं श्रयतेभवान्स्थितौ शरीरिणांश्रेय उपायनंवपुः । वेदक्रियायोग तपः समाधिभिस्तवाहण्येन जनः समीहते ॥२७॥ शृण्वन्गृणन्संस्मरयंश्च चिन्तय नामानि रूपाणि चमंगलानि ते । क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो राविष्टचेता नभवाय कल्पते ॥२८॥ नवांभोजनेत्रं नवंकेलिपात्रंचतुर्वाहुचामी करं चारु गात्रम् ॥ जगत्रोणहेतुंरिपौ धूम्रकेतुं सदासत्यनारायणं स्तौमिदेवम ॥२६॥ मंत्रहीन क्रियाहीनं भक्तिहीनं च यत्कृतम् । सर्व तत्पूर्णतांयांतु सत्यनारायणप्रभो ? ॥३०॥ तत रात्री जाग- रणं नृत्यगीतादिकं विदध्यात् । द्वितीयदिनोपसि पूर्ववद्देवं संपूज्य संस्तुत्य च होमादिकंकृत्वा गौदानं कुर्यात् । ततः पूजा स्थलमागत्य 0 गच्छगच्छ सुरश्रेष्ठ सत्यनारायणप्रभो ? । इष्ट कामसमृग्रंथं पुनरागमनं कुरु ॥३१॥ ततः कलश जलेनपूर्वोक्त विधिनाभिषेकं कृत्वायजमानाय सपरिवारायाशीर्दद्यात् । ततो ब्राह्मणान्भोजयित्वा स्वयमपि भुम्जीन । इति श्री सत्यनारायण पूजापति.।
कर्मकाण्ड रक्षाकरे, संकटचतुर्थी पूजा पद्धतिः (२३५) ॥ अथ सङ्कट चतुर्थीव्रतं ॥ श्रीगणेशायनमः ॥ अथ मङ्कट चतुर्थी प्रतपूजा तथा शान्तिपिधागा ॥ अन्यचतुर्थी गणेशनिमित्तकवतानाश ॥ चतुर्य पि- सर्वगतंगणेशमतातिरिकापरच । युग्मनायगन्नात एकादा तथाषष्टी आमानास्याचतुधिका । उपाध्याः परमयुकाः परापूनगोजिताः । इति माजीये-हवशिष्टोक्तश्च । नागचतुर्थातुमध्याहव्यापिनी पञ्चमीयुताचप्राधा । गणेशवतेतु मध्याहव्यापिनीमुन्याचतुर्थी गणनाथस्य मातृ विद्धानशस्यने ।। प्रातःशुवलतिले स्नाला मध्यान्हे पूजयेन्नृप । पस्तुतस्तुयत्रभाद्रशुक्ल चतुयादीगणेशनतविशेष मध्याहपूजाका तद्विपयामि प्रागुफवचनानि ।। नतुमार्वत्रिकाणि ॥ सकष्टचतुथ्यांदोपहनाकर्मकायानां पाधापत्तः ॥ तेन सर्वत्रगणेशनते पूर्ववेतिसिद्धम् ।। मकटचतुर्थीतुचन्द्रोदयव्यापिनीमाया ॥ दिनद्वयेगनेमातृयोग- स्य सत्वात्पूर्वतिकेचित् ॥ अन्येतुर्दिने मूहर्तत्रयादिरूपस्य तृतीयायोगस्याभायानपरि दिर्भ । माधवातमध्याहव्यापि सत्वात्सम्पूर्णत्वाच परेत्याचक्षने, दिनद्वयेतदभात्र 5 पिपरैव ।। निर्णयतत्वे-सकष्टहकिलयाचतुर्थी सेन्दूदयस्थायदिनोभयत ॥ पृर्वापरावारितदाविधया नवेद्युयुग्महिपरातदेव ॥ इत्यादि प्रमाथवाक्यैः समष्टापरामातयोग. त्यात्पूर्वविद्धाप्रकर्तच्या ॥ सङ्कटचतुर्थातुचन्द्रोदय कर्मकालव्यापिनोग्राह्या ॥ अथ पूजाविधानम्-प्रायस एतद्ब्रतं स्त्रियो भनुरारोग्य- श्वर्य निमित्तंकान्ति ॥ प्रातर्नद्यादौ स्नानं विधाय सायंकाले चन्द्रोदिते समये पट्टे गणेशं कृत्वा पूजनं कुर्यात् तत्र संकल्प:-- ॐ तत्सदितिदेशकालौ संकीर्त्यामुकी नाम्न्यहं यन्मयास्वभर्नु रायुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये प्रात्मनश्चजीवितावधिपत्यासह सर्व सौभाग्य प्राप्तये, इदानी संकष्ट चतुर्छा यथालब्धोपचारेण पोडशमातृकासहित सङ्कष्टमोचननामकगणेशपूजनंकरिष्ये-पुप्पा- क्षतहस्ता सन्ध्यायेत् लम्बोदरंचतुर्वाहुं रक्तवर्णत्रिनेत्रकम् । ध्यायामिमनसाभक्त्यासङ्कटहरणंप्रभुम् ॥ विघ्नविनाशिनेनमः आसनसमर्पयामि । लम्बोदरायनमः पाद्यं समर्पयामि || चन्द्रार्धधारिणेनमः, अर्यसमर्पयामि । विश्वप्रियायनमः, पाचमनसमर्पयामि । विनाशायममः स्नानं समर्पयामि । ब्रह्मचारिणेनमः यज्ञोपवीतं समर्प० ॥ गजकर्णायनमः वस्त्रं , ( २३६ ) कर्मकार डरताकरे संकटचतुर्थी पूजा पद्धति समः । ॐ चन्द्रमौलिसुतायनमः, चन्दनम् ॐ सुमुग्वायनमः पुष्पम् । 30 उमापुत्रायनमः धूपं० ऑहरप्रियायनमः दीपम् ॐ विघ्ननाशायनमा नैवेद्यम्० 30 सिद्धिदायनमः ताम्लम्० ॐ वरदायनमः इति फलम् । ॐ विन्याधरायनमः दक्षिण गणेश्वरायनमः नीराजनम्० . मृषकवाहनायनमः प्रदक्षिणां कुर्यात् ।। पुप्पाजलिः--विघ्नध्वान्तनिवारणैक तरणिविप्नाटवी हव्यवाविघ्नव्यालकुलाभिमानगम्टो विन्नेभपंचाननः॥ विघ्नो त्तुगगिरिप्रभेदनपवि विनाम्बुधौवाटवो विनाद्योघधनप्रचण्ड पवनो विग्नेश्वरः पातुवः ॥ ततः सूर्पपायसंवाएकविशनिमोदका- न वैकविशतिनिलरिनशाकुलीः संस्थाप्यसर्परक्तवनाच्छादितं कृत्वा गणेशायनिवेदयेत । ततश्चन्द्राय दुग्धाय॑दयात् । पाया- दिभिः सम्पूज्याजलौपानेवा-दधिदुग्धमुगन्धिमिश्रितं निधायो त्यायच ॥ चन्दनागरिदधिदुग्ध मुमिश्रितम् । भक्त्यापिनं मयादेवगृहाणाय॑निशाफर ॥ अर्यदत्वा गणपतिसमीपमागत्य दम्पत्युत्तरांगपजनं विधाय प्रसाटंगृहीयास्ताम् ॥ अथ व्रतशांति प्रकारंवक्ष्ये-कर्तावती, रात्रौचतुर्थ्या सर्वतो भद्रपूजा विधानेन सम्पृज्यमध्येकलशविधिना सम्पूज्य तत्र सुवर्णप्रतिमां गणेशं पृवातविधिनासम्ाज्य-द्वितीयेऽहि पंचम्यां-गणानान्तेनिमंत्रण घृताक्तपायसेन यायवतिलाज्येन वा मोदकैः॥ अष्टोत्तरसहस्र मष्टोत्तरशतमष्टोत्तर विशतिसंस्यकाहनिभिर्यक्ष्ये ॥ब्रह्मादिदेवता भ्यो एकैकामाहुतिदद्यात् । एवं पूर्णाहुत्यादिभिहोंमें समाप्यैक विशतिव्राह्मणान् सम्पूज्यगणेशस्यैक नामोच्चारणंकृत्या एक ब्राह्मणायक मोदकं सदक्षिणं रक्तवत्रवेष्टिनंदद्यात् ॥ एवं सर्वभ्यो दद्यात् ॥ तनमन्त्रः--30 गणेशायनमः, 30 संकटहरायनमः २ 30 लम्बोदरायनमः : 30 विघ्ननाशाय०४ गणाध्याय नमः ५ 30 वक्रतुण्डाय० । गजाननाय० ७ ॐ सर्पकर्णायक एकदन्ताय० ॥ ॐ भालचन्द्रायनमः ॐ उमापुत्रायनमः ११ ॐ हरप्रियाय०१७ 0 विकटायनम. १३ ३॥ वामनायनमः - कर्मकाण्ड रक्षाकरे, हरितालिका पूजा पद्धतिः १४ ॐविद्याधरायनमः १५ 30 ब्रह्मचारिणेनमः १६ ॐ चर- दायनमः १७ ॐ विनायकाय. १८ ॐ हेरम्बाय०१६ ॐ संकटमोचनायनमः२० ॐ विश्वरूपायनमः-तन प्राचार्यायक- विंशति सूर्पस्थानमोदकानदद्यात् ॥ सम्पूज्य-विप्रवर्यगृहाण- त्वं मोदकानेकविशति । श्रावयोदैहिसौभाग्यसंकटंचहरप्रभो। ततोगौदानंकृत्वा गणेशंप्रार्थयेत् ।। अन्नही क्रियाहीनं भक्तिहीन, च यद्भवेत् । तत्सर्वपूर्णतायातु विघ्नेश्वरनमोस्तुते ॥ आशिपो गृहीत्वा वन्धुवर्गजनैः सहभुजीत् ॥ इति साचतुर्थी व्रतम् ॥ ॥अथ हरितालिकावतं ॥ उक्तचयाद्रीभविष्ये कृपयान-शुर के भाद्रपद स्यैा तृतीयायां रागाचरत । रत्न धान्यः राय है कृत्या हरित शाल । राजनीरियलैश्चफले विविधैस्तथा ॥ मातुलिंग कुगु- रय धान्य के जीरिक स्तथा । गधे पुष्पफले दांपै गौ मांदकादिभिः । प्राणियि त्या समास्थाय पद्मरागंगा भासता। घंटागाद्यादिमिगात शुभदिव्या पानकै. पूजनीया महाभाग मंत्रणानेन भक्तित । हरेनाम्निसमुत्पने हरितालि हरिप्रिये । सर्वदा सस्य मूर्ति स्थे पणनाति हरेनम. । इयं मंय ता जी दद्य द्विप्राय दक्षिणाम् । कृत्वा जागरण रात्री प्रभाते किंचि दुद्गते । तदा मुयामिनी भिस्तु सानेयातु जल शये । ततो जलाशये रम्य मंत्रण पं विमर्जये । आँचतामि मया मक्तया गच्छ देवि मुरालयम् । मभ दी भाग्यनाशाय पुनरागमनाय च । एवंय पाइवश्रेष्ठ हरितालिनतंचरेत । प्रतिवपंविधानेन नारी याभक्तितत्वरा । नीस्वायत्फलमाप्नोति तदन्येननलभ्यते । देव्युवाच-नामेदंकरितदेय विधि बदममप्रभो । सिंपुण्यकिंफलंकास्य वैचाविधिनाचरेत । ईश्चरउपाय-गुदेविधिधिवक्ष्ये नारीणांनतमुत्तमम् । कर्तव्यन्तुप्रयन्नन यदि मौभाग्यमिच्छति । तोरणादिप्रकर्तव्यं कदली. स्तम्भमगिष्टतम । आच्छाद्याट्यस्त्रेस्तु नानापर्णपिचितिम । चन्दनादिमुगायन लपयेद्गृह- गगदपम । शंगभरीमृदगंध यादिनीवभिनर । गानामालगोगररा वर्तव्योममा मनि । स्थापन तत्रात्तव्यं पावन्या सहितम्य में । पूजय तुमि मुष्य गन्यधुमिनोहर । उसोप्य पूज - (२३८) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, हरितालिका पूजा पद्धतिः । भत्तन्या कुल्या जागरण निशि । नारिक लेश्चनबार रन्यैश्च विविध, फले. ॥ प्रातुशोभवैः सर्वे नवेद्यः कुमुमननैः । मुर्गन्यqषदोपैश्च मैत्रेणानेन पूजयेत् । नम. शिवाय शान्ताय पंच वकागशूलिने । नन्दि गि महाकाल गणयुक्ताय शंभवे । शिवाय शिवरूपायै मंगल.यै महेश्वरी । शिवेसर्वार्थदे देवि शिवरूपे नमोस्तुते । नमस्तै शिवपिराग जगध्दा यैनमोनमः । संमार भौति संत्रस्तं प्राहिमा सिंहवाहिनि । मयापि न कामेन यूजितामि महेश्वरि । राज्यं देहिनमौभाग्य प्रमनाभव पार्वति । मंत्रंणानेन तादेवि पुजये दुमयामह । ततः को समाकरय शक्तया दद्याचदक्षिणाम् । ब्राह्मणाय प्रदातन्यं वसधेनु हिरण्य कम् । तृतीयायान्तु गानारी फिलभोजन माचरेन । जन्मजन्मभवेदाध्या विधवा चपुन. पुन - याति सानरकं घोरमुपवासं नयाचरेत । भावनं रुक्मपात्रच ताम्रकवा तथैवच । वेणु मृन्मय पानाणी पूर्णानि विविधैः फले । एवंषोडश संख्यानि ब्राह्मणीन्यः प्रदापयेत । यद्वाबाह्मण योपिय पारणा तदनं तरम् । एतन्ते कथितं देवि व्रतानामुन्तभ व्रतम् तेन मात्र प्रपन्नामि ममदेहातांत था । अथोद्यापन विधि खत्रेव-- युधिष्ठिर उचाव- उद्यापननिधि बूहि तृतीयायाः सुरेश्वर ॥ भक्तिः श्रोतुमिच्छामि प्रतसपूर्ण हेतवे । श्री' कृष्ण उवाच-उद्यापनमहंवक्ष्ये सावधाने नवाश्टणु । त्रिंशद्दगड प्रमाणेन प्रमितं दक्षिणोत्तरे । प्रत्यरप्रागपिराजेन्द्र तद्गोवर्मममिष्यते ॥ गोवर्म मा लेप्यतद् गोमयनविचक्षण.। मंडलं कारयेत्तन नानावणं सुशोभनम् । ग्रहमंडल पार्वत पद्ममष्टदलं लिम्वेत । तन्मध्येस्थापये स्कुम्भमत्रणं मृन्मयं शुभम् । ताम्रपत्रं प्रकुर्वीत पले. शोडशभिस्तथा । तदर्धिनवाकुरी हिन्त शादय विवर्जयेत् । कर्षमान सुरणन प्रतिमा कारयेद्बुधः। तदर्धमध्यमंत्रोक्तं तदर्धेतु कनिष्टकम् । कृत्वारूपं प्रयत्नेन पावत्याश्च हरस्यच 1 अथताम्रमय पात्रे प्रतिमा तत्रविन्यसेन । नवस्त्र युगच्छन्ना शेत यज्ञोपवीतताम् । भाजनेय तिल. पूणे कराशस्योपरिन्यसेत् ॥ पार्यन्यास्तु युगंदद्यात्स्थ पयित्या विधानत । वेदोकन प्रतिष्ठाप्य कर्तव्या चधिसरिया । पञ्चामृतेन स्नरनं कृत्वा देवस्य चोतमम् । स्नानव कारयेत्पश्चात्ता पूजा समाचरेत् ॥ गोन नृत्यादि संयुक्त कथा पुस्तक वाचनै । उौर जागरंतन कर्तव्यं भक्तिभावत.। तत. प्रभात विमले करवा स्नानादि कर्मच। पूर्ववच्चार्चयेवं पावादोमंच कारयेत । प्रारभेच्च ततोहीम नवग्रह पुरः सरे। जुहुया दुधमंनेण गोरोमनेण वैविध । अठोत्तरशतापि अष्टाविंशति संख्यया । एवं समाप्य होमंतु तका कार्य प्रतये ॥ धनुंसुलक्षणा दद्या त्मपालंकार भूषितम् । प्रयत्नेनच कर्तव्यं पक्वान्नं पोडशोन्मितम् । पोडश प्रमितैर्युक्तं ब्राह्मणाय निवेदयत् । वंशपात्रं प्रयत्नंग पकानेफने शुभे । 'अन्य-विन वर्गको दक्षिणां च प्रयत्नतः। अमन परगा भाया प्रदद्यादनुमारन । बंधुभ मह जोननियतश्वपरहनि । एयरन भरपा परिपूर्ण कर्मकाण्ड रनावरे, हरतालिका पूजा पद्धति' (२३) प्रतीयतः। इति भविष्योत्तरेहरितालिका व्रतोद्यापन परिभाषा ॥ श्रन नतद्वयंऽपि तृतीया मुहर्तमात्रसीत्वपि परेवमाया । चतुर्थीमहितायातु सातृतीया शुभनदा । अवैधन्यवरी स्त्रोणा पुत्रपौत्र फलप्रदा। द्वितीयाशेषमंयुक्ता याकरोति विमोहिता सावधव्य ममाप्नोति प्रवदन्ति मनीषिण । इति मात्रयायेत्येवं,, इति हरितालिका त निर्णय. ॥ ॥ अथ हरतालिका पूजनम् ॥ अधच हरितालिकावतानारी, प्रातः स्नात्वा प्रदोष समये शिवालये वा स्वगृहे, परिभाषोक्त प्रकारेण गौचर्म परिमितां भूमिं गोमयोदके नोपलिप्य, नवाष्ठदलं कमलं विलिख्य मस्य खर्जुर पुष्पपत्रादिभि हरितालिका भूर्तिकृत्वा,, वा मृद्वालुकया- निर्मितं पार्वती सहितं शिवलिंग निर्माय तब वक्ष्यमाणविधिना शिवगौरी पूजामाचरेत् ,, पूजास्थलमागत्याचम्य, संकल्प:- अद्येत्यादि देशकालौसंकीर्त्य, अमुकीदेव्यह, करिष्यमाण हरि- तालिका व्रताचारण विधौभर्तुरारोग्यैश्वर्याभिवृद्धये श्रीपरमेश्वर हरगौरीप्रीत्यर्थ, निर्मितप्रतिमोपरि हरगौरी पूजनं करिष्ये, पुष्पाक्षतहस्ता ध्यायेत्-मंदारमालाकुलितालकायै कपालमाला कितशेखराय। दिव्यांवरायैच दिगंवराय नमः शिवायै नमः शिवाय । एतत्सहितेनैकैक वक्ष्यमाणमंत्रेण शिवयोः पूजनंका- र्यम् । आवाहनम्-30 सहस्रशीर्षापुरुषः । देवदेव जगन्नाथ प्रार्धयेहं जगत्पते । तावत्वं प्रीतिभावेन लिंगेऽस्मिन्सन्निधोभव । श्रासनम्---ॐ पुरुषऽावेद ई० सर्व०। कार्तरस्वरमयं दिव्यं नाना मणिगणान्वितं । अनेकशक्ति संयुक्तमासनं प्रतिगृहाताम् । पाद्यम् एतावानस्य गंगादिसर्वतीर्थेभ्यो मघाप्रार्थनयाहृतं । तोयमे- तत्सुखस्पर्श पांद्यार्थ प्रतिगृह्यताम् । अयम्-30 त्रिपाव वरेभ्ययज्ञपुरुषप्रजा पालनतत्पर । नमोमाहात्म्यदेवाय गृहाणा- चनमोनमः। आचमनीयम्-30 ततो विराडजायत पाटलो शीरकपुरसुरभिस्वादुनिर्मलम् | तोयमाचमनीयार्थ शीतल प्रतिगृहाताम् । पंचामृतस्नानन्-30 प्राप्या यस्व० पयोदधिकृत- (२४०। कामवाएड रताकरे, हरतालिका पूजा पद्धति - , न्क्षौद्र शर्करास्नानमुत्तमम् । तृप्त्यर्थ देवदेवेश गृहाता परमेश्वर, शुध्दोदकस्नानम्-30 यत्पुरुपेण । मंदाकिन्याः समानीतं हेमां भोरुहवासितम् । स्नानायतेमयादत्तं नीरस्वीक्रियतामिदम्, वस्त्रम्-ॐ यज्ञम् । सर्वभूषाधिके सौम्येलोकलज्जानिवारके मयोपपादितेतुभ्यंवाससी प्रति गृह्यताम् । गजोपदीतम्-ॐ तस्माद्यज्ञात्० महादेव नमस्तेस्तु त्राहिमांभवसागरात् । ब्रह्मस नं सोत्तरीयं गृहाएपुरुषोनम । चन्दनम्-ॐ तस्माद्यज्ञात्सर्व हुतऽऋचा,मलयाचलसंभूतंघनसारं मनोहरम् । हृदयानंदनं चार चन्दनं प्रतिवृहाताम् । अक्षताः--रंजिताः कुंकुमाथेन, अक्षतास्तु सुशोभनाः । गृहाणसर्वपापेभ्यस्त्राहिमांवृपभध्वज । पुष्पाणि -- 30 तस्मादश्वाः, माल्यादीनि सुगन्धीनि मालत्यादीनिवप्रभो । मयाहृतानिपूजार्थ पुष्पाणि प्रतिगृह्यताम् । धूपम्--ॐ यत्पुम्पं व्यदधुः०, वनस्पत्युद्भवो दिव्योगंधाद्योगंधउत्तमः । प्रायः सर्वदेवानांधूपोयं प्रतिगृहाताम् । दीप-30 ब्राह्मणोऽस्या श्राज्यंचवत्तिसंयुक्तं वन्हिनायोजिमण। दीपगृहाणदेवेश त्रैलो- क्यतिमिरापह। नैवेद्यम्-30 चन्द्रमामन । अन्नचतुर्विधंस्वादु रसै पद्भिभसम्मनिवितम् । भक्ष्यभोज्यसमायुक्त नैवेयं प्रति गृहाताम् । नैवेद्यान्ताचमयीयम्--कपरवामितंतोयं मंदाकिन्या: समाहृतम् । आचम्यता मुमानाथमयादत्तहि भक्तितः । फलम्- इदंफलं मयादेवस्थापितं पुरतस्तव । तेनमेसुफलावाप्तिर्भवेज्ज- न्मनि जन्मनि । ताम्बलम्-पूगीफलसकर्परं नागवल्लीदल- तम् । लवंगादि सपयुक्तं ताम्बूलं सणयुक्तं ताम्बूलं प्रति गृह्यताम् । दक्षिणा-हिरण्यगर्भ गर्भस्थं हेमवीजविभावसोः । अनन्त पुण्यफलदमतः शान्ति प्रयच्छमे । नमस्कारः-30 नाभ्या ऽ प्रा. सीद०, नमस्ते देवेदेवेश नमस्ते धरणीधर । नमस्ते विश्वरूपाय नमस्ते पुरषोत्तम । प्रदक्षिणा-30 सप्तास्यासन्०-संसारार्णव मग्नं च त्राहिमा चन्द्रशेग्वर ॥ हरायच नमस्तुभ्यं त्रैलोक्यच्या. पिनेनमः । प्रार्थना-30 नमः शिवायशान्ताय पंचयमाय लिने कर्मकाएई रक्षाफर, नरपर परिमांत (२५.) CE .. नंदिभूगिमहाकाल गणयुक्ताय शंभवे । शिवाय शिवरूपाय मंगला यैमहेश्वरि । शिवेसर्वार्थदेदेवि शिवरूपेनमोस्तुते । नमस्ते सर्व रूपिण्यै जगद्धात्र्यैनमोनमः । संसारभीति संत्रस्तं त्राहिमां सिंहवाहिनि । मयापियेनकामेन पूजितासि महेश्वरि । राज्य देहिच सौभाग्य हरितालि नमोस्तुते । ततः कथा श्रवणं रात्री सोपवास जागरणच कुर्यात्-ततः किंचिदुद्गते प्रभाते उत्तरांग पूजनंकृत्वा । सुवासिनीभिः, हरितालिकादेवी शिवेनसंहोत्थाप्य जलासयेगत्वा तत्रानेन मंत्रेणविसर्जयेत्-ॐ अचितासिमग्राभ पत्या गच्छदेवि सुरालयम् । ममदौर्भाग्यनाशायपुनरागमनाय च । इति देवीचिम्रज्य यथासुग्वभोजनंकुर्यात् । इति हरितालिका 'व्रत पूजापद्धतिः उद्यापनंतु परिभाषोक्त विधिनाकुर्यात् । तत्र स्पष्टत्वान्नात्रदर्शितम् ॥ इत्युद्यापनम् ॥ " नि हरतालिका पूजा ॥ अथ नवरात्र परिभाषा अथ नवरात्र परिभाषा-उक्तं च देशी भागरते-जनमेजय उवाच-गयरात्रे तुगम्प्रास्त किंकर्तव्यं द्विजोत्तम : विधानविवियद् बेहिशरकाले विपतः । व्यास उवाच- रणुराजन् प्रवक्ष्यामिनयराज नतं शुभम् । शरत्काले विशेषेरा कर्तव्यं विधिपूर्वकम् । बसन्ते च प्रतिव्यं तथैवप्रेमपूर्वकम् । श्राप दे देवमाधिच प्रकृयाचप्रयत्नतः । द्वावेमु महाघोरातरोग करीनृणाम । पसन्त शरदानव जननाश करावुभौ । तस्मात्तत्राकतव्यं चगिउका पूजन बुधैः। प्रमाणानां च गम्प्राप्य संभार कल्पयेच्छुभम् । हविष्यं चाशनं कार्यमेक भुकं तुतहिने । मंउप- 'स्तु प्रमनच्यः समैदेश शुभेगृहे । इस्तषोडशमानेन स्तंमध्वजसमन्वितः । गौरमृद् गोमचा- भ्यां व लेपनं कारणेत्ततः । तन्मध्ये वैदिवर शुभ्रा कर्तच्या च समास्थिरा । चतुर्हस्ता च ईस्तो च्या पोटार्थस्थानमुतमम् । तोरणानि विचित्राणि वितानंच प्रकल्पयेत् । रात्री द्विजानभामन्य देवीतत्व यशारदान् । आचारनिरतान्दान्तान्वेदवेदांगपारगान् । नवपंच प्रयश्चैको देव्या पाठे द्विजाः स्मृताः । वित्तशाइवं ने कर्तव्य विनयमति कहिचिन् । द्विजानां परणयदि भक्तियुक्त नामा || गणना च मम्पूज्य निर्विमा प्रयत्नतः । स्वस्ति पानन कार्यवेदमंत्र विधानतः (.२४२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, नवरात्र परिभाषा - वासिंहासन स्थाय होमवत्र समनितम् ॥ तत्र स्थान्यांशिकादेवाननुहरता 5 युधान्चिना । शंखचक्रगदापद्म धरासिंह स्थिता शिवा । अष्टादश भुजात्रापि प्रतिष्ठाप्या सनातनी । मार्कंडेये खिले-लिग्ने दष्टदलंपञ चंदनागुरु वंयुमैः । पद्ममध्ये लिविच पटकोण चण्डिसमयम् ॥ पट्कोण चकमध्यस्थ माययोजनयन्यसेव । विदिस्य यंत्रमंचं तुमभ्य गाराधनं च । अनेन विधिनापट कोणाष्टदल भूपुरात्मकं यंत्रं भवति । देवीभागवते-अ भा तथायंत्रनवार्ण मंत्रसंयुतम् । स्थापयत्पीठ पूजाथैकलशं तत्र पार्श्वन.। तदुक्तंरुष्ट्रयामहे--शुभाभिमृतिरा भिश्च पूर्वकृत्वा तु वैदिकाम् । यवान्य वापयेत्तत्र गोधूमैश्चममन्वितान् । उक्त चदेवीभाग वो-पंचपल्लर संयुक्तं वेदमा मुसंस्कृतम् । मुतीर्थजल सम्पूर्ण हेमरत्नै समन्वितम् । पाश्र्वपूर्थि संभारान् परिकल्प्य समंततः । गौतवादिन निर्धापाकारयेन्मंगलायये । तिथी हस्तान्त्रितायां च नन्दायां पूजनंवरम् । प्रथमंदिवले राजविधिवत्कामदंनृणाम् । नियमप्रथम कृत्या पश्यात्पूजां समारभेत् । लपयासेन नग्न चैकभुक्तेन वापुन. । करिष्यामि व्रतमानना रात्र मनुत्तमम् ॥ सहाय्यंकुरुमैदैवि जगदम्बममाखिलम् । यथा शक्तिप्रकर्तव्योनियनो ग्रत तिथे । चन्दनागरुकपूरैः कुमुमश्च सुगन्धिभिः । मालती ब्रह्मरापुप्पैस्नधा विन्यदले. शुभैः ॥ अनदानं प्रकर्तव्यं नाना व्यजन संयुतम् । “यदन्नं योनरो भक्ते तदन्नं तस्यदेवताः।" पूजये जगतां धात्री धूपी विधानतः । नारिवेलमातुलिंगै टिमी क्दलोफ्ले । नारंगै. पनसैश्ना तापूर्णफलः शुभै । उक्तंचमार्कण्डेये ऽखिले-मंपन्य विधियद्देशी चण्डियांकृनतर्पग्गाम् । फलरे पूजयेद्देवी यन्नेवा पूजयेत्ततः। समन्तात्पूजयेदितु दिशापालान्यधान मम् । चन्दनेनी लिप्तीग:सग्मीन्याम परायण. । नवाहं भूपएकैकं मौनीवद्धामनोज पेन । प्रणादिरहम्यानं चडिका चरितत्रयम् ॥ शतमादौ शनं चान्ते जपेन्मत्रं नवार्णवम् । नदी सप्तम- तो मध्ये संपुटो 5 यमुदाहतः । नय दुर्गति विरयातो पाप कुमारी लक्षणं देवी भागरते-एक वर्षा न कर्नच्या कन्या पूजाविधौ नृप । परमात भौगानी गंधादीनां च वालिका । कुमारिका तुमा मोक्ता द्विवानु भौदिह । निमूतिथ वियर च कल्याणी चतुर दिसा। रोहिणी पंच्याच पदयां कालिका म्मृता ॥ चन्द्रिका मन पास्या दष्ठ यां च सांभी नप पां भदुगा मुभद्रा दशवपिंका। मन अपन गर्नम्या मेरिकार्य विगहिंता । होनांगी पर्जयेकन्यां कुष्टयुक्तको प्रणारिताम् । गंधरपुरित होनागी रािन कुल मंभवाम् । जान्या केकराराणो रकपुष्पादिनविनाम् । समां गर्भ समुतागोतका पन्यकोप्रपाम् । वर्जनीया माता: मयंपूजादिसर्मगु । प्राया -मरोगिण! गुराग' मन्दरी नगाजिनाम् ॥ एर वंश गमुद्भुना कन्यो गम्बर प्रपया । मागअंग्रता पाया ताप प्रणाशिनी ।
कर्मकापड रताकरे, नवरात्र परिभाषा (२४३) 1 राजन्य ब्रह्मवंशजा: पश्यनिवगंजा. पृथ्याश्चतस.पादसंभवै । काम्यकुमारी पूजनम् -- ब्रह्माणी मनकायपु जायाय प वंशजाम् । लाभार्थ वैश्य वंशीथा मुताई शह यंशजाम् । दारण चान्त्य जातानां पूजय द्विधिनानर. । वेदपारायणमप्यु स्तं रुद्रयामले एवं चतुद रिदो विशन्सन्प्रियादयंत । तेषां च वरण कार्यवदपरायणायते ॥ सथा-एकोत्तराभिधातु नवमीयावदेवहि । चण्डीपाठं जपेञ्चय जापर्यद्वा विधानतः । उक्तंच वाराही तन्त्रे- आधारे स्थापनित्या पुस्तक प्रजपेत्सुधी. । हस्तरस्थापनादेव यस्मा विफलं भवन् । स्वयंच लिखितं यच्च शक्रेण लिखितं मरन् । प्रवाहापन लिसितं तच्चापि विफल भए । देवीभागवते-होमाय चैवकत्तव्यं कुगड चव त्रिकोणम् । स्थंडिलंगा सातव्यं निकोगी मानत शुभम् । त्रिकालं पृजन निये नानाद्रव्यमनोहरैः । गोतवादिन नृत्यश्व कातव्याय महीगर. निन्यं भृमीच शयनं कुमारीणां च पृजनम { भरिण-एक भलेन मन नपरात्री- पनामत । पृजनीया जनर्दवी स्थाने थामे पुरे पुरे। गृहे गृहे शक्तिपर ग्राम ग्राम वने वने । स्नान, प्रमुदिनहष्ट ब्राहाणे. क्षत्रिय पै । बेश्य गर्भनियुक्त म्लन्टरन्यश्चमानौ । बिना- मंत्रस्ताममोस्या किरातानां तुमम्मता ॥ वामसपूजापरम्-पन्नालंकरणदिव्य भोजन मुधामये । यिनस्यानुसारेए बनव्यं पृजनं मिल ! वित्तशाश्यं न कर्तव्यं राजकि मसुदा । इदं च देवी पूजनं शुभास्तादायपि कार्य तदुक्त धम्मदीपेनटे शुक्रे तथा जीत सिंहस्थ च वृहस्पती । कायांचेव म्वदेव्यचा प्रवदं कुल धर्मत । मरामामा पचनाभारान भवति । अत्राशी विशेषो निर्णयामृते विश्वरूप नियन्धने-- आश्विन शुक्लपक्ष नु पारध नवरात्रि में शाबासीचे समुपन क्रिया कार्या रथेवुधैः । सतवर्तमान च तत्रोप. भदायुधै । दैयाँपुजा प्रक्तध्या शुभयन विधानत [ मृत पूजनं प्रात्तं दानं चैव विशंपतः । दरमुद्देश्य कर्तव्यम् पत्र दोशों न विद्यते ॥ कालादर्श विरहस्ये ऽपि--पूर्व मंकल्पितं यचनतं मुनियत ऋते । तकर्तव्यं नरै.शुद्ध दानार्चन विजितम् 1 उक्त चगौडनिधन्धे-~- निधि नत्र । आश्विनकाए नरम्यादि शुकप्रदिपदादि पाट्यादि सप्तम्यादि चोकमतश्चमध्य प्राशीचपने पिनदाप गायोजनमत्रयारिति । कृपया होमादिक्यर्वनरदुगाँ विधानवत । पित्तशा परित्यज्य युयोदाचार्यतापगम ॥ घागुनीयभूयेनुयाजि होमप्रदानतः । अशक्तो निक्मेकंतु देयमस्मै प्रयत्नत विभान विधानेन य एना नयनगिटकाम् । सुणुप्पास्य प. भूपयोहिनश्चिदनन पै । ऐन्द्र बहादयो भागाम्तमायान्तिप्रशिनुम् । श्रपुत्रो लभतेपुत्रान पन, गवनीमध च्या स्य मयंयाग्नि शनाप सुदामगा । न सम्यास्ति भयं चिदाजचौराग्नि নিমিনি । গাহিব ! বিবৰি ৰাস্বাদন श्रमायुक्ता न तिच्या प्रति.
(२४४) कर्मकाण्ड रनाकर, नवरात्र पूजा पद्धतिः प पूजनमग । मुहर्तमात्रा क्रीच्या द्वितीया दिगुणान्विता । मायापाइश नाडिस्तु लम्वाय पुनर । कलश स्थापनं तत्र खरिएं जायध्रुवम् । उक्त च स्कान्दे- वर्जनोमा प्रयत्नन श्रमायुक्ता नुपाथिय द्वितीवादिगुणयुगा प्रतिपत्सर्वकामदा । तथा देवीपुराणे -यदि कुर्यादमा. युक्ता प्रतिपरस्थापनेमन | उम्पशापायुन दवाभस्मशेपं करोम्यहम् । भाग्रहास्करने यस्तु क्त शस्थापनमम । तस्यसंपत् विनाशः स्याज्यष्ट पुनोविनश्यति । धनाथिभिविशेषेण वशहानिश्न जायते । नदर्शकलयायुक्ताप्रनिपगिडवार्चन । ३ यादि शतस प्रमाणवाय नवरात्रारभे प्रति पद्विनिया युक्तागाच्या । उक्त च भागव वचन दीस्किायां देवीपुराणे-- बाष्ट्र वैधति युत्तचित्प्रनि प दिसाचन तयार-न विधात कलशारोपण र चिवति युक्तामिहिनी या युत्ताचे मागाये उनम् ॥ ॥7 (भाया। अथ नवरात्र पूजा पहतिः। चत्रेनथाश्चिनेमासि नामावास्यायां सामाग्रीसम्पाद्य शुभेसमे देशेगृहाभ्यन्नरेवा विशेषानुष्ठाने वक्तियोडश हस्नपारमित मनोहरंमंडपं विधायषोडशस्तंभ विभूषितं च कृत्वा श्वेतमद गोमयाग्यामुपलिप्यमध्ये चतुर्हस्नायनां हस्तोच्छ्रितामायतविस्तृ- तां वेदिकां विरच्य । श्री देवीतत्वविदान वैदिकांश्चद्विजान् नवसप्तपंच त्रीनेकंवा अमावास्यायां निमन्त्रयेत् । ततो गृहमा- गत्यैकवारं हविष्यान्नं भुक्त्वाभूमौ शुद्धासने शयीत । यदिपति- वार्षिकोत्सवपजनंचदेविप्र निमन्व्य स्वगृहे पूजास्थानं चोपलिप्य सम्मायंच वच्यमाण विधानेन प्रतिपदि नवदुर्गामारंभं कुर्यात गवममावैधति दोषरहितायां प्रतिपदि साधकोयजमानोवा नित्यकर्म कृत्वा पूजास्थानमागत्य स्वासन उपविश्याचम्यभृतो- त्सादनं कृत्वा दीपंप्रज्वाल्य संपज्य च कुशपुंजेन पंचगव्येन पूजास्थनं सम्मााचार्य वृणुयात् शाचार्य पायगंधादिना सम्प- ज्य वरणसामग्री सम्पाद अनेहेत्यादि संकीर्त्या मुको 5 ई करिष्य श्री दुर्गात्सव कर्मणि नवरात्र कर्मकाण्ड रताकरे, नवरात्र पूजा पद्धतिः (२४५) अमुकशर्माएंब्राह्मणं कर्मकतुं तथा मुकामुकविमान वेदपारायणा- दि देवीभागवत सप्तसतीपाठकानेभिवरणद्रव्यै स्त्वांयुवावः वृणे-तताचार्यों गणेशादिनवग्रहान्त पूजनंकारयित्वा कलश पूजाविधिना धरुएकलश सम्पूज्य बृहत्पूजायांपूर्वोक्त चतुर्हस्त- विस्तृतायांवेदिकायां यन्त्रं निर्मायतन्मध्ये सिंहासनसंस्थाप्य हस्तमात्रांवेदिकां शुष्कमृदानिर्माय शुष्कगोमयंच योज्यचतुत्रां कुर्यात् । तत्र स्वस्तिवाचनमन्त्रै र्यवान्वारत्रयंचापयेत् । तत्र मध्येवरुणोक्तविधिना जिनकलशं स्थापयेत् । तत्रदुगार्चन कुर्यात् । वेदिकायामपिपीठे यन्त्रेया वक्ष्यमाण विधिना देवी पूजयेत् । इदानींपौराणिकी पूजांवक्ष्ये संकल्पं कुर्यात-अयेहे- त्यादि देशकालौ संकीर्त्यममेह जन्मनि श्री भुवनेश्वरी प्रीतिद्वारा सर्वापच्छान्तिपूर्वक दीर्घायुविपुल धनपुत्रपौत्राचनवच्छिन्न संतनि वृद्धि स्थिरलक्ष्मी कीनिलाभ शनपराजय सदभीष्टसिध्यर्थ वसन्त शरदनवरात्रमतिपदि विहितकलश स्थापन पूर्वक श्री भुवनेश्वरी महाकाली त्यादीष्ट देवता पूजनमहं करिष्ये । नत्र भूमौ त्रिकोण चतुरस्त्रमण्डलं कृत्वा पूजयेत् । ३० अखण्ड मण्ड- लाकारंविश्वव्याप्य व्यवस्थितम् । त्रैलोक्यं मरिहतं येनमण्डल तत्सदाशिवम् । नवार्णव मन्त्रेण गन्धादिभिः सम्पूज्य तत्राधारां विपादिका संस्थाप्य 30 में दशकलाव्याप्त चन्हिमंडलाय नमः । संपूज्य तदुपरि पात्रसंस्थाप्य ॐ ण द्वादशकलात्मने सूर्य मण्ड- लायनमः। सम्पज्य जनार्य ॐ को गंगेच यमुनेचैव गोदावरि सरस्वति । नर्मदे सिन्धुकाबेरी जले ऽस्मिन्सन्निधिंकुरु । इत्यंकु कुश मुद्रया तीर्थमावाहा ॐ 1 पोटश कलात्मने सोममंडलाय नमः । सम्पूज्य मुलेनाष्टवारमभिमन्य धेनुमुद्रया व इत्यमनी कृत्यगरुइमुद्रया निर्विपीकृयात्रेण संधि हुँ इत्यवगुंठ्यप्र- एमेच । तेनायेजलेन पूजाद्रव्यमभिषिच्य देवींपुष्पं धुत्वाध्यायेत् मूलमन्त्रमुक्त्वा 30 श्रागच्छवरदेदेवि दैत्यदर्पनिपूदिनि । पूजा गृहाण सुमिति नमस्ते शंकरप्रिये ।। अस्मिन्घटे समागच्छतिष्ठ- कार्मकाण्ड रमाकरे, नपत्र पूजा पद्धतिः देवगणैः सह । भुवनेशिसमागच्छ सान्निध्यमिह कल्पय । वलि पूजांगृहाणत्वमष्टाभिः शक्तिभिः सह । पाद्याम्भुवनेशिसुरेशानि ज्ञानमार्गप्रदे शिवे । पाद्यगृहाणदेवेशि भद्रकालिनमोस्तुते । आसनम्--कात्यायनि स्मेरमुखि चामुण्डेशंकरप्रिये । आसनंदिव्य वस्त्रच गृहाणत्वं सुरेश्वरि । अयम्--जगद्वदिनिलोकेशि सर्वासुरविभंजनि । अष्टांगाय॑गृहाणत्वं तापत्रयनिवारिणि । आचमनम्-गांगेयंनिर्मलं वारिदिव्यपात्रस्थमुत्तमम् । गृहाणा- चमनंदवि शान्तिकुरु सुरेश्वरि । पंचामतम् । दधिदुग्धधुत क्षौद्र- शर्करामिश्रितपरम् । पंचामृतं प्रियंतुभ्यंददामि भुवनेश्वरि । स्नानीयम् । गन्धचन्दनसंमिश्रं तीथोंदक समन्वितम् । जलं गृहाण स्नानार्थ जगज्जननि सौहृदे। पुनराचमनस् । स्नानान्तेनिर्मलं दिव्यं लवंगेन समन्वितम् । गहाणाचमनं देवि सर्व सिद्धिप्रदायिनि वस्त्रम्- वस्त्रस्वच्छं महार्हच पटसृन्त्रेण निर्मितम् गृहाण भुरने- शित्वं दुकूलं च सुरेश्वरि । अलंकारान् । देवासुर शिरोरत्न निघृष्ट चरणाम्बुजे । अलंकारागृहाणत्वं नानाविधि विभूपितान् । चन्दनम् । कस्तुरी कुंकुमयुत्तं केशरेणसमन्वितम् । भालशोभाकरं दिव्यं चन्दनं प्रतिगृहाताम् । सिदरम् । नागभस्म परंदिव्यं मंजि- टारंजितंशुभम् । चन्द्रार्धापरि विन्द्वर्थ सिन्दरं गृहदेवित्वम् । अक्षतान्-अक्षतानि सुधौनानि सिन्दुरोपरि मंगले । गृहाणपरया प्रीत्याभद्रदायिनितेनमः पुष्पम्-मानापुप्प विचित्राठ्यांदिव्यमाला मनोहराम् । अर्थयामिचपुष्पाणि त्यगृहाण सुरेश्वरि । धूपम् गुग्गुलं तसंयुक्तं गन्धद्रव्यसमन्यितम् । धूपं दिव्यं समाप्रेय गृहाण भुवनेश्वरि । दीपम् गवाज्याभ्यक्तसहती वन्हिनादीपिन शुभम् । पारानिक्यंगृहाणत्वं देहिदेवि परंसुग्यम । कज्जलम- नेत्रांजन परंदिव्यंधूपकपर संयुतम् । पक्ष्मपंक्ति सुशोभार्थ गृहोए दिव्य चक्षुके । नैवेद्यमा दिव्यन्नं रससंयुक्तंनानाविधिमसंस्कृतम् । नैवेद्यगृहमातस्त्वं चोप्यपंयसमन्वितम् । बागमनम । कराननविशु द्धयर्थ नैवेद्यान्ते जलं शुभम् । अर्पयामिशिवे तुभ्यं देहि मविपुलं - पकाएर रक्षाकरें, नवरात्र पूजा पतिः (२४७) सुखम् । फलानि-जानाफलोनिदिव्यानि ऋतुदेशभवानि च । पूगीफ्लैश्चसहिनान्यंवत्वामर्पयाम्यहम् । ताम्बूलम् -गृहाण देवि ताम्बूलं लवंगेनसमन्वितम् । पूगीफल समायुक्तं ग्वादिरेण सम- न्धितम् । ततो वामहस्ते सफलजलयुतमय कृत्योत्तानं दत्तिहस्तं उपरितोनिधाय-मनोहरफलेनेवपूरितं शुद्ध बारिणा सफलार्ध्य गृहाणत्वं फलदातुसदाभा । देव्यग्रेनिधाय वारिणा देवी स्ना- पयेत् उपायनम् उपायनीभृतमिदंद्रव्यं देविसुरेश्वरिगृहाणपरया- प्रीत्या दयांकुरु सुरेश्वरी । मन्त्र पुष्पांजलिम्-भुवनेशिनमस्तुभ्यं चातुवर्धदायिनि । मन्त्रपुष्पांजलिंदेवि गृहाणत्वंसुराचिते । - नमस्कार:--विश्वेश्वरी विश्वरूपां विश्वपालानकारिणीम् । प्रणमामिसदाभक्त्या विश्वांत्यांभुवनेश्वरीम् । ईशानभानरदेवी- मीश्वरीमीश्वरप्रियाम् । प्रणतोऽस्मिसदादुर्गा संसारार्णवतारणीम् वालार्कमण्डलाभासां श्चतुर्बाहुत्रिलोचनाम् ॥ सर्वलोकमणेत्रींच प्रणमामिसदाशिवाम् । योगिनीयोगगभ्यानचण्डिकांसर्वमंगलास्।। प्रणमामीश्वरौं भक्त्याकालिकांमुण्डमालिनीम् । ॥ इनि॥ ॥अथ छागबलि विधिः ॥ पूर्वोक्त पूजनान्ते नवम्यां वा यथेष्ट दिने सुलक्षणछाग देवयानीय तनः पशुप्रोक्षणमारभेत् । ॐ अग्निः पशुरासीत्तेना जंतसऽपतल्लोक मजयद्यस्मि न्नग्निः सते लोको भविष्यति । तन्जेप्यसिपिवेनोऽअपः । इति छागं सम्प्रोक्ष्य प्रार्थयेत्-30 शृंगे- पृटे ललाटे च पादयोजघयोस्तथा। उदरे सर्व गात्राणि मुचन्तु पशुदेवताः । पशोः शंगंगृहीत्वा कुशैः सम्मार्जयेत् । ॐ कालि २ॐ ह्रीं हन२ ॐ हर. ॐ ॐ हों ॐः मदीयशवं स्तम्भय २ इति सम्मायं ततः पशोशृङ्गं गृहीत्वापठेत्-30 पशोः शृङ्ग गृहीनोसि पशुत्वं तिमहीयताम् । उपयोगमन्वया कायों (२४८) कर्मकार रताकर छागलि पूजा पद्धति देवी पूजाविधौसदा । त्रिपठेन् । ॐ पशुपोशाय विद्महे शिरच्छे- दाय धीमही । तन्नो पशु प्रचोदयात् । अनेनैव मंत्रेण पशुं पाद्य गंधादिना ॐ ऐं ह्रीं श्रीं सर्वदेवता स्वरूपिणे वलिरूपाय छाग- मेष, पशवे नमः सम्पज्य रक्तचन्दन सिंदूराक्षत रक्तमाल्यादि- भिः समलं कृत्य तंफट् इति सुसंरक्ष्य है इत्यवगुंठ्य धेनुमुद्रया मृतीकृत्य बलेरंगपूजन कुर्यात् । ब्रह्मरन्ध्र ॐ ब्रह्मणे नमः । नासायां 30 मेदिन्यै नमः : कर्णयोरों श्राकाशाया नमः । जिह्वा- याम् ॐ सर्वतोमुखाया नमः। नेत्रयोः ॐ ज्योतिया नमः । वदने 30 विष्णवे नमः । ललाटे चन्द्राय नमः। दक्षगण्डे 3. शक्रायनमः । वामगरहे 3 वन्हये नमः। ग्रीवायां 2 समवर्तिने नमः । रोमकृपेषु 30 धृत्यै नमः । भूमध्ये ॐ प्रचेतसे नमः । नासामूले ॐ स्वसनाय नमः । स्कन्धे ॐ महेश्वराय नमः हृदये ॐ सर्वराजेन्द्राय नमः । इत्यत्ततादिभिः सम्पूज्य तहत कर्णं पशुगायत्री मंत्रांश्चपठेन्-ॐ पशुपाशाय विद्महे शिरच्छे. दाय धीमहि तन्नः पशुः प्रचोदयात् ॐ ह्रीं हूँ फट् शिवस्वरूपं गच्छ स्वाह ॐ जुसः हसतमलवर! शिवरूपंगच्छ स्वाहा, इनि चारत्रयं प्रजप्य पुष्पं गृहीत्वा महातपोभि निश्च यझर्यत्सा. ध्यते नरैः। तन्मे देहि महाभाग सत्वरं चाप्नुहीश्रियं । बलि शिरसि क्षिपेत् । ततो वलि पशुं संगोधयेत् 30 यज्ञार्थपशवः स्कृष्टाः स्वयमेव स्वयंभुवा । अतस्त्वां घातयिष्यामि तस्मात् बजे वधोऽवधः। शिवायत्तमिदं पिण्डमनस्त्वं शिवतांगतः। उध्य स्व पशो त्वहि नाशिवस्त्वं शिवोऽसिहि। पशोत्वं जीव रूपेण मम भाग्यादुपस्थितः । चण्डिकाप्रतिदानेन दातुरापद्विनाशक, पुरतः खङ्गं संस्थाप्य पूजयेत् ग्वद्गमध्ये ही पीजलेरय ॐ हीं कालि कालिवनेश्वरि लोहदण्डायैनमः, इति खड्मभिमन्यध्या- येत्- कृष्णं पिनाकपाणिं च कालरात्रि स्वरूपिणम् । उग्रं रत्तास्य- नयनं रक्तमाल्यानुलेपनम् रक्तांवरधरं चैवपाशरस्त कुटुम्बिनम । पियमानंच मरिरं भुजानं प्रव्य सञ्चयं ।। रसनात्यंचारिटकायाः कर्मका' रसाको छागलि जा पदांत (२३८ ) सुरलोकप्रसाधकः । ३. कालि कालि वश्वरि लोहपूर्णायै नमः। इतिग्वगमभिमन्थ्य ॐ ह्रीं श्रीं फट् लौहदण्डाय तीक्ष्णधाराय ग्वगायनमः । इति गंधादिभिः सम्पृज्य प्रार्थयेन्-ॐ तीक्ष्ण धाराय खड्गाय तस्मै शुद्धायते नमः ! पुगदेवासुरे युद्ध निर्मितोऽ सि जयप्रदः। तेजो रूपायग्नद्गाय जयं देहिनमस्तुते। हस्ते खड्ग गृहीत्वा आँ आँ ह्रीं फट् इति मंत्रेण खड्गं छागस्कन्धे स्प्टशेत् । मन्त्रमुच्चरेन्-हौं कालि २ विकट दंष्ट्रे स्कं २ खादय २ छेदय २ सर्वदुष्टान्मारय २ छागं छिन्धि २ किलि २ चिकि २ रुधिरं किरि २ संकल्पं कुर्यात्- अथेहेत्यादि देशकालौ संकीामुक- गोत्रेऽमुकोऽहंदीर्घायुविपुल धनराज्य संपत्तिकामः सकलदुष्टा. रिष्ट ग्वएडनार्थ श्री अमुकदेवता प्रीत्यर्थममुकपशुं घातयिष्ये । इति तज्जलंपशु शिरसि क्षिपेत्-यावन्नचालयेद् गात्रं नावच्छेदन कारयेत् । गात्रसञ्चालनान्ते पशुं मण्डपाहिरानीय पूर्वाभिमुग्न कृत्वा तन्मुग्चे सैन्धवं दत्वा ग्वद्ग प्रहारक उत्तराभिमुग्बो भूत्वा ॐ आँ हैं ह्रीं फट् छिन्धिछिन्धि स्वाहा ॥ अनेन मन्त्रणकैव ग्वड्ग प्रहारेण छिन्दयात् । द्रोणे तदृधिरं पूगसैन्धवं गन्धाक्षत- युतं देव्या चामे स्थापयेत् । सरक्त पशु मुण्डंच देव्यग्रे स्थापयेत् । प्रतधिर वलिंग ह्रीं क्लीं निवेदयामि । ॐ कवोष्णं फेलिनं रक्तं छागकण्ठाद्विनिर्गतम् ( माध्वीकं पिवटेयित्वं परमानन्द हेतवे। ततो ज्वलद्वतिका वलिमुंडे निधाय हस्ते जलग्रहीत्वा- गृहदेवि माहामाये मस्तकं सप्रदीपकम् । कुरुष्व मम कल्याणं नमस्ते शङ्करपिये । यावद्दहन्ति लोमानि पशोस्ने शिरः खरिडते। तावहर्ष सहस्राणि देवीलोके च गच्छतु । इति वर्तिकोपरि हस्तस्थ जलं क्षिपेत् । ततो विल्वपत्रेण रक्तामालोडयेत् । ॐ प्रस्फुर २ चुल २ एल २ तल २ कुरु२ मारय २ युक २ अँगारय २ विद्रावय २ कंपय२ कर्मय २ पूरय २ श्रावेश्यॐ ह्रीं हाँ हो ॐ ल ह फट् मद मट ही हुः इत्यभिमन्व्य नैन्यां महापूननाये ફર (२५०) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, कुमारी पूजा पद्धति नमः ॥ ॐ वां छौं छी राक्षस्यै नमः । ऐशान्यां ए कालिकायै नमः । श्राग्नेयां ॐ विं विदागै नमः। नैर्ऋत्यां नैर्ऋत्यै नमः। ॐ ह्रीं श्रीं कौशिकि मधिरेणाप्यायताम् । ॐ अमृतोपस्मरण- मसि स्वाहा, इत्युत्तरापोशनं दत्वा नतो नीराजनपुप्पाञ्जलिं दत्वा योनिमुद्रयामणमेत् ॥ ॥ इति छागवलिदानप्रयोग ॥ ॥अथ कुमारी पूजा पद्धतिः ॥ उक्तंचदेवीपुराणे-पितरोवसवोन्द्रा श्रादित्यागणलोकपाः सर्वेतेपूलितास्तेन कुमार्योयेनपूजिताः । पूर्वोक्तलक्षणानुसारेण नव • कन्यानांनिमन्त्रणं कृत्वास्वगृहे आह्वयेत् । देवीपुराणे--प्रक्षाल्य *पादौसर्वासां कुमारीणांचवासव । सुलिप्तेभूतलेरम्ये तत्रता पासनेस्थिताः। पूजयेद्गन्धपुष्पैश्च स्रग्भिश्चापिमनोहरैः। पूज- यित्वाविधानेन भोजनंतासुदापयेत् । अथ कुमारीपूजनम् । ध्यायेत्-मन्त्राक्षरमयीलदमी मात्प्रणांरूपधारिणीम् । नवदुर्गा त्मिकांसाक्षा कन्यामावाहयाम्यहम् । जगत्पूज्ये जगद्वन्धेसर्व शक्तिस्वरूपिणि । पूजागृहाणकौमारि जगन्मातर्नमोस्तुते॥ अनेन मन्त्रेणावाहा, 3 कौं कौमायनमः । इति मन्त्रेणपाद्यादिनीरो- जनान्तां पूजयेत् । त्रिमूर्तिध्यायेत्-त्रिपुरांचिगुणाधारां त्रिवर्ग ज्ञानरूपिणीम् । त्रैलोक्यवन्दितादेवी त्रिमूर्तिपूजयाम्यहम् । ७० त्रिं त्रिमूत्यैनमः सम्पूज्य । कल्याणिपूजयेत्-कालात्मिका कलातीताम् कारुण्यहृदयाशिवाम । कल्याणजननींनियां कल्याणीपूजयाम्यहम् । 30 के कल्याण्यैनमः सम्पूज्य रोहिणी पूजयेत्-अणिमादिगुणाधारा मकाराद्यनरात्मिकाम् । अनन्न शक्तिकालदमीरोहिणीपूजयाम्यहम् । ॐ रों रोहिण्यनमः सं०। कालिकांपूजयेन्-कामचारीशुभांकान्तां कालयमस्वरूपिणीम् । कामदांकमणोदारां कालीसम्पृजयाम्यहम । । कालिकायैनमः ।
कर्मकाण्ड रक्षाकरे, देवी विसर्जन विधि ( २५१) सं० १ चण्डिकापूजयेन्चण्डवीरां चण्डमायां चण्डमुण्डमभज- नीम् । पूजयामिसदाभक्त्या चण्डिकांचण्डविक्रमाम् । चं चण्डिकायै नमः सम्पूज्य | शांभवीपूजयेत्-सदानन्दकरीशान्तां सर्वदेवनमस्कृताम् । सर्वभूतात्मिकालक्ष्मी शांभवीपूजयाम्यहम् । ॐ शां शाम्भव्यैनमः । सम्पूज्यदुर्गापूजयेद--दुर्गमेदुस्तरेकार्ये भवदुःग्वविनाशिनीम् । पूजयामिसदाभक्त्या दुर्गादुर्गार्तना- शिनीम् । ३0 हूँ दुर्गायैनमः सं०।सुभद्रांपूजयेत्-सुन्दरीस्वर्णभां देवींमुग्वसौभाग्यदायिनीम् । सुभद्रजनन देवीं सुभद्रांपूजयाम्य- दम् । स सुभद्रायैनमः सम्पूज्य । एवमभ्यर्चनंकुर्यात्कुमारी एप्रयत्नतः । कंगुकैश्चैव वस्त्रैश्च गन्धपुष्पाक्षतादिभिः । नाना- विधेभयभोज्येभाजपायशादिभिः। अर्धभोजनदानेनदातुः कार्यार्थनाशनम् । परिपूर्णनभोज्येन सर्वान्कामान्सवाप्नुयात् । उक्तंचनारदीये--प्रत्पई भोजयेद्विप्रान्कुमारीचोगिनीरपि । कामनाविशेपे एस्कान्दे-एकैकां पूजयेत्कन्यामेकवृद्ध बातथैवच । द्विगुणं वापि प्रत्येकनवनवकंतुवा । नवभिर्लभते भूमिमैश्वर्य द्विगनतु । एकद्धयालभेत्तेममेकेन श्रियलभेत् ।। इति कुमारी पूजनम् ॥ अथ च दशम्यां देवी विसर्जन विधिः । नच दशम्यो कार्यम । उक्त च कालिकापुराणे--निहन रावणे चोर नवभ्यां मक्ले. सुरै । विशेषपना दगायाश्चये लोकपितामह । मत गोपिना की दशम्या शरदी गौ. । स्यामले- दशम्यामभिः च कृत्वामृनि विपर्नयंत । दुर्गाभयसतरंगिरायां देवीपुराणे--तन प्रान पुनिया दशम्यविधि परकम् । संप्रेषण नकर्तव्यं गीतवादिन नि स्वनै । इयमेव च विजयादशमी- मार द्वितीयदिन श्ररणयोगामान पूर्वाग्राद्या ॥ नवमी गंप मंयुक्तो दशम्यामपराजिता । ददानि यि यंदेवोपजिता धिनी । हेमाद्री ब्रतकाण्ड कर पर --'उदो दशमी मिनिमम्पुरणकादशी यदि । धयणरं बदामगार सानिषिविजयाभिधा अत्र विगेपो धवलनिकने -अंयपादो दिवाभाग प्रवरणग्य यदाभा । सपण तदादेच्या पकाएइ रक्षाकरे, एकोत्तत्वृद्धि चंडीपाठ पद्धति. पाठ पद्धतिः- अथ च पूर्वोक्त पितृविसर्जनामायादेवी पूजा संभारं कृत्वाततः प्रभाते आश्विन शुक्लप्रतिपदि कृतनि- त्यक्रियः तोरणावलि मण्डितेशुभेस्थाने गृहेवा तत्र स्वासनेपाडू मुग्वः समुपविश्य दीप प्रज्वाल्य पूर्वोक्त पूजा पद्धत्यनुसारेणाच- मनं भूतोत्सादनमये स्थापनादिकं च कृत्वा तेनैव विधानेन वेदीमध्ये घट स्थापनादिकं देव्याःपूजनं च कुर्यात् । देवींयथावत् संपूज्य संकल्पं कुर्यात् । अयेहेत्यादि देशकालौ संकीामुकोऽह ममुक कामनयाधारभ्यनवमीपर्यन्तं श्री अमुकदेवता प्रीत्यर्थ मेकोत्तरवृद्धि चाण्डीपाठ साङ्गोपाङ्ग कर्मणितथा चैकोत्तर वृध्या कुमारीपूजन ब्राह्मण भोजनंच करिष्ये । स्वयंकर्तुमशक्त श्चेदाचार्य ब्राह्मण द्वारावरणद्रव्येण ब्राह्मणं वृणुयात्कारयेच्च । नतो दिग्द- वीभ्यो बलिं दद्यत् । तत्रादौ पूर्वस्यां ॐ कादम्बरि गजवाहने इहागच्छ २ इत्यावाहा कादम्वयनमः पाद्यादि नीराजनांत सम्पूज्य तदग्रेपत्रावल्यां घृतशर्करासहित पायसंवा दधिभक्तमाप वलिं च निधाय ॐ कादम्ययनमः एषने वलिं निवेदयामि वलि सम्पूज्य च ज्वलद्वर्तिकांवल्युपरि निधाय इस्तेजलं गृहीत्वा भोर कादम्वरि । एनं सदीपंपायसवलिं दध्यन्त वलिं वागृहाण ममबा मम यजमानस्य सपरिवारस्यायुष्की नेमकी शान्ति कत्त्री तुष्ठिदात्री पुष्टिदात्त्रीभव इति वल्युपरिजलंक्षिपेत् पयंसर्वत्र विधि कृत्वावलीन्दद्यात् । एवमानेयामुल्कामजवाहनांपूर्ववर्त्तम्पृज्यवलि दद्यान् एवंदक्षिणेमहिपारूढां करालीम् । नेत्ये प्रेतयातनारक्तानी पश्चिमे मकरवाहनां श्वेनाम् । वायव्ये मृगवाहनां हरिताम । उत्तरे सिंहवाहनां यक्षिणीम् । ईशाने-वृपवाहनां कंकालीम् । इन्द्रेशानयोर्मध्ये सुरज्येष्टां हंसवाहमाम् । निनियमणयोर्मध्ये- अहिचाहना सर्पराजीम् । स्वस्थानेपुप्रथक सम्पज्य वलिं- दत्वा प्राक्रस्थापित कुभोपरि महालक्ष्मी समावाद नानाविध रूपचार .रभ्यर्थ्य नदग्ने माग्वत्सरहस्य अयं श्रावन्तं नवार्णय मंत्राप्टोत्तरशतसहित मेगासनेन देवीमहात्म्यं चरितनयं पठित्वा कर्मफागए रखापरे, शक्षचंदी परिभाषा ( २५५) कुमारीमेकामेकं विप्रंचसम्पज्य भोजयित्वा ताम्बूलदक्षिणा नम- स्कारादिभिः संतोषयेत् । पर्वमतिपदा यामेकावृत्ति पाठं कृत्वका कुमारीमेकं ब्राह्मणं च भोजयेत् । पवंद्वितीयायामेकोत्तर वृध्द्या हिरावृति पाठकृत्वा द्वे, कुमारी द्वौ ब्राह्मणौ च भोजयेत् । एवं तृतीयायां त्रिगुणमिति समेण नवम्यां नवगुणं यथाभवतितापूजा चंटीपाठकुमारी ब्राह्मणभोजनादिकं च यथाविभवविस्तारं नव- म्यन्तं प्रतिपदपेच्या नवगुणं कुर्यात् । अत्राप्येकाहार व्रनिको नियमः कर्तव्यः । ततो नवमेदिने पूर्वोक्त होमपाहत्य नुसारेण कृतचण्डिका पाठदशांशेन प्रागुक्तद्रव्यहीम कृत्वा- सर्वविधिवत्कुर्यात् ॥ ततो दशम्यां पूर्णाहुतिंदत्वा देवीविसर्जन पद्धयुक्तप्रकारेणाशिपं गृहीत्वा देवीं संप्रायविसर्जयेत् । यद्या- चार्यद्वाराकारयति तदाचाचार्याय चित्त शायरहिता विपुला दक्षिणांगां दत्वाप्रणम्य संतोषयेत् । एवं विधिनाकृते सर्वेसमो- रथाः प्रपद्यन्ते। ।। इति नवरात्र महोत्सवैकोत्तरवृद्धि चंडी पाठ पद्धतिः ।। ॥ अथ शतचण्डी परिभाषा ।। उक्तं च रद्रयामले- शतचण्डी शिवान च प्रीयमानं गृणुप्पतर । सपिद्रप नाशाय शतचगडी समारभेत । मुघोरायामनावृध्या भूकम्पे च सुदाहणे । पर चक्रमये तीने क्षयरोग उपस्थिते । राजवादादिसायपु आपल्मु मुतजन्मनि । महोपघातनाशायपं च विशति योजन । देश सर्पन शा-त्या शतचण्डो मिमा जपेत । शिवाभ्याससमें देश चतुद्रौर मुतोरणम् । पतामात पुन्योन्मगडय वैदिभूषितम । तर कुगप्रवर्तव्यमुक्तलतणमयुतम् । सदाचार बुलीनाये हीमन्त. सत्यवादिन । अगिड़कापाट निपुणा दयावन्तो जितेन्द्रिया.। दशविप्रान्राम- •पच्यं महालक्ष्मी स्वपिण । मधुपर्क विधानेन ब्राह्मणाश्चैव पूजयेत । सप्तविशतिदमाणा विष्टरी ग्रन्धिभूपित । विहरे सत्रयनेषु लक्षणपरिकीर्तितम् । मुखोपादकमयुक्ती पाद्यार्थ तरमभागिडका. । शंखधा यंप्रदानाय गंधपुग्पफलान्यित । साचमनीयानि वैदद्यापंचपात्राणिय बत } मधुपकाय कास्यादि दधिम याज्य पूरिन । महाहाणिव रयाणि मुद्रिाभूपणानि च ।
(२१२) कर्मकाण्ड रक्षाकर, देवी विसर्जन विधि + दशभ्यां तुपुनर्दिवा । दिनद्वये दशमीसत्वे पूर्वदशम्यां श्रवणान्तर्भागयोगे तत्रैवविमर्जन कार्यम् । तत्र तोगा भावेतु परदशम्यामेव तत्-परदिने दशम्यभावे तुपूर्वदशम्यां नक्षत्रयं गेसति- असति वा कार्यम् ॥ गजमातण्डे-निर्माल्यं तु श्ररणदशमी पामरान्ते तु जप्त्या । इत्यनेन देवी विसर्जनं दशम्यामेवोपलक्ष्यते । सांच विजयादशमी श्ररणर्तयुता एकादशीसहिता परैन्हि तदैव देवी विसर्जनम् । श्रवणयोगा भावेतु प्रदोषकाल व्यापिनी नवमीयुता विजयादशमो प्रश- स्ता तत्रैवस्ती विसर्जन मुक्तामिति दिक। ॥अथ दशम्यां देवी विसर्जन पद्धतिः॥ नतो दशम्यांमानःस्नात्वा देवीपूजामण्डपमागत्यनित्यकर्म विधाय देवींपूर्ववत्सम्पूज्य-ततो होमकुण्डमागत्य होमाग्नि प्रज्वाल्यपूक्तिमकारेण पूर्णाहुतिहत्वामार्जन तर्पणानिविधाय वन्हिविज्यपूजास्थलमागत्य सपरिवारोयजमानोदेवी सम्पूज्य प्रणम्यचकृतांजलि देवीभक्त्येक्ष्यमाण दग्रतस्तिष्टनस्तवीत- ॐ दुर्गाशिवांशान्तिकरी ब्रह्माणीब्रह्मणः प्रियाम् । सर्वलोक प्रणेत्रींच प्रणमामिसदाशिवाम् । भुवनेशीजगद्धात्री सर्वरोग- भयापहाम् । ह्रीं काररूपिणीदेवी नमामिभुग्नेश्वरीम् । मुन्दरी लोकजननींसर्वकल्याणदायिनीम् । त्रिपुरासुन्दरीदेवी प्रणमामि मुहुर्महः । विन्ध्यस्थांविन्ध्यनिलयां दिगम्धाननिवासिनीम् । योगिनीयोगमायांच नएिटकांमणमाम्यहम् । रक्तास्यारक्तजिहां च मुण्टमालासुशोभिनीम । रक्तानीमभयानामा कालिकांमण- भ्याम्यहम् । महामायांमहादेपीशुम्भासुरविनाशिनीम् । लोक्य बुद्धिम्पांच प्रणमामिसरस्वतीम् । ईशानमातरंदेवी मीश्वरी मीश्वरप्रियाम् ॥ प्रणतो ऽ रिमसदादुर्गा संसाराणवतारिणीम् । इतिपुष्पांजलिंदन्या नीराजनानिग विधायस्थापनंपुर्या- विधिहीन क्रियाहीनं भक्तिहीनयजितम् । भवनुमत्स्यं त्वत्म सादात्सुरेगरि । मातः ? समस्येत्युक्त्पा.मनईशान्गां पनामा मन्घ्रकाशनान्नशान्गा मेकपुष्पनिनेपेयिसर्तपत 1 30 उत्तिादेगि कर्मकाण्ड रताकरे, कोत्तरवृद्धि चंडीपाट पद्धतिः (२५३ ) चण्डेशि शुभांपूजांप्रगृहाच । कुरुष्वममकल्याण मष्टाभिःशक्तिभिः सह । गच्छगच्छपरस्थानंस्वस्थानेदेविचण्डिके । व्रजस्रोतोजले वृध्यैतिष्टगेहे च भूमये । 30 दुर्गदेवि जगन्मातः स्वस्थानं गच्छ पूजिते । कल्याणाय यथाकाल पुनरागमनं कुरु । इति घण्टाबाद- यित्वा पुष्पमीशान्यां क्षिप्त्वादेवीं विमुज्य ततो ब्राह्मणाः स्था- पित कलशोदकेन पूर्वोक्तसुरारत्वामभिपिंचन्तु, इत्यादि पौराणिक वैदिकमन्त्रैरभिषिञ्चेयुः । ततस्तिलकं कृत्वादेव्युपभुक्तनिर्माल्ग यवांकुरादींश्च (हरियालीतिप्रसिद्धा ) फलान्यपिच च दत्वानव राम्यनुष्ठान सिद्धयर्थ ब्राह्मणेभ्यो दक्षिणां दत्वा प्रतिपदमारभ्य नियमान् विस्मृज्य विप्रान्भोजयित्वा स्वयमपि व्रतीवन्धुभिः सह भुञ्जीत । यहिनेविसर्जनं तत्रैवनियमत्यागस्योचितत्वाद विसर्जनोत्तरं तद्दिनगवपारगां कार्यम् । शुक्लप्रतिपदारथ याव. स्थानवमी तिथिः तावनतं प्रकुर्वीत दशम्यां पारगां चरेत् । इति विसर्जनान्त नवरात्रपद्धतिः । ॐ दुर्गायैनमः । ধন্ধীর মূরি নবান্ন বা বিঘি: -- खिल मार्कण्डेये--शरहताविषेमासि शुक्लपक्षे नृपोत्तम । प्रतियत्ति थिमारभ्य यावच्चनवमी तिथिः । तोरणाढयेशुभेस्थाने सुविता. नाद्यलंकृते । पूर्वादिक्रमयोगेन दिग्देवीभ्यो वलिं हरेत् । कलश पंचरत्नाढयं हेमवस्त्रादिकान्वितम् । संप्रतिष्ठाप्य संपूज्य पण्डि- काधनमारभेत् । कृत्वान्यत्पूर्ववत्सर्व जपेदेकाग्रमानसः । सकृद्र हस्य संयुक्तं चण्डिकाचरितत्रयम् । एकासनेन चरित सरहस्यत्र- यंपठेत् । यदाद्यदिवसे कुर्याच्चण्डिका पूजनादिकम् । द्विगुणं तद्वितीयेऽन्हि निगुएं नत्परेऽहनि । नवमीमिथि पर्यन्तं वृध्द्या पूजाजपादिकम् । अत्र जपग्रहणात्पाठस्यापि वृद्धिः एकवारं बनी कुर्यात्सत्यादिनियमैर्यतः । कृत्वा होमादिकं सर्व पाठस्य दशमांश कम् । अपनो खमतेपत्रानधनः सधनोभवेत् । व्याधयः संक्षयं यान्ति शत्रयश्च सुदारणाः । न तस्यास्तिभयं किंचिद्राजचोरानि वारिजम् । शेषप्रयोगे स्पेष्टम् अथैकोनरवृद्धि चंडी ( २५६) कर्मकाण्ड रताकरे, शनचंडो परिमापा मयूरपनछत्राणि विचित्रारयागनानिन | पादुका आहरेता तामभूपणभूषिता.। अन्यमा मधुपर्करय विप्रेन्योयत्प्रपूजनम् । तस्माद्विगुणितं दद्यादाचार्यायतुपूजनं । यजमान सपन्न मुतपन्धु समन्वितम् । उपवेश्यामनेपूयः कुशाग्ररुप भूषिते । वेदमंत्रावर पूर्ण कुटुंस्तै स्वनि- पाचनम् । कृतस्वस्त्ययनं वि वंदयादिवनिः स्वनैः । चगिडका मंडपंयाया परिपारविभूषित । पश्चिमद्वारमार्गण प्रविश्य कृतुमण्ड पम् । ददाति पृजनंऽनुज्ञा देशिकाय कृताम्नलि. । देशिक प्राचार्यः । देशिकः सर्व मंत्रज्ञो नपभि ब्राह्मणे.सह । घमण्ड दोपदव्याः प्रीतये पंचरावकम् । गगानाथं प्रहांश्चयदिग्दैवी लोकपालकान् । दिशापालांश्च सम्पूज्य घटं संस्थाप्य पूजया । मंडपस्म चतुर्दिन दत्वाभूत वलिं पहिः । मण्डपे क्लोद्वीच ॥ द्वारिद्वौच निवेशयेत् । गङ्गादि तोय सम्पूर्ण स्थापयेत्पलपन्तितौ ॥ कस्तुरी कुंकुमोपेतं सकर्पूरसचन्दनम् । पलद्वययुतंसर्वमनु- लेपनमाहरेत् । दिव्य वस्त्र भलंकारं हेमगद्यारणकत्रयम् । लक्षपुष्प चतुर्थाशंगुग्गुलं च पलद्वयम् । दीपानां विंशतिश्वाष्टीमण्डपे जपसाधनम् । फुडयो द्वौ हविष्यानं नवेद्यसरम शुचिः । नवचण्डि विधानोक्तं महालक्षमीप्रपूजनम् । नवमि ब्राह्मणैः साधं कृत्वाचायोंद्विजोत्तम । कार्य जप्या प्रसिद्धार्धमनुज्ञा मानपूर्वकम् । ततोऽनुज्ञा मनुप्राप्य घेद्यामाचार्य संनिधौ ॥ मृद्वासनेषु संतुष्टा उपविष्टाः मुनिश्चलाः । न्यासध्यानममायुक्ता नासाग्रस्यापनोकिन । मुगन्धि पुष्पा मालाढयाश्चण्टिका चरितत्रयम् । सरहस्यमृपिश्छन्दो देवता शक्ति संयुतं । वीजताव समोपेत मुपांशुगणमंयुतम जपे स्पिक मौन्निरत्यक्तमन्सरा. । पाठान्ते च नमुत्वायत्तत कुर्युः प्रदक्षिणाम् । चण्डिनांतु नमस्कार. परिताप्य पुनः पुन. । उपन्यासने पूक्तः श्लो सर्वार्थसाधन. । प्रार्थयेयुः प्राध्यफलं महालक्षमी घनता। कुमायाँ दशसंख्याता भाज्या विमा दशोत्तमा. । महाकाली महालक्ष्मी सरखला जप जपन् । ततो पन्धुसमायुक्तो भुंजोया त्याकृतपुमात् । सत्कथाभिः सुगतिश्च सर्वयादित्र निः स्वनै.। पूजनैः प्रेक्षणश्चयवंदपाठनिशा नयेत् । द्वितीये दियसे स्नात्या विधिवत्ते द्विजा दश। चण्डिका तर्पणं कुर्यु सम्पूर्ण ध्यान पूर्वकम् ! सर्वप्रथक्प्रथववृत्वा दिग्देवी पूजनादिकम् । वहि तवलिंदत्वा कृत्वाच्या प्रदक्षिणम् । पुष्पागारे मह रम्ये खखमासनमास्थिता । जयन्ती जयचराडीति यावद् गर्माप्रपूजनम् । पूर्वस्मालूजना कुहिगुणं जनं कमात् । आचार्य. मुस्थितः शान्त चण्डिकायाश्च तोपएम कृतेतुपूजने वित्रा जपेयुद्विर्गणं उपम् । द्विगुणतु प्रकर्तव्यं कुमारो हिजतोरणम् । कार्यश्च जागरो रात्रौयुक्त. सर्वमहोत्गौः । चण्डिकापूजनं जाप्यं कुमारीद्विजभोजनम् तृती हनि कर्नव्यं त्रिगुणंचमजागरम् । चदिवस मसम्यमार्य चतुर्गुणम् ! महासागरणपित होगा स्यात्पंचमेऽहनि होमविधिः--पायससपिरांयुक्तं तिलै. शुक्न मित्रितम् । जुहुयारिधिमा दशांशेननृपोतम् । सदा यायनथाहोमो गन्गणवनमायनेचगहोसप्तमीजा ये होममा नयागा - -- कर्मकाएर रक्षाकरे नाना का प्रयोग परिभाषा ( २५७) ---: वधिनः जनाध्याय नहोमोमोदि । नमो व्यस्मतां प्रथवाय भरद्धोमः स्लोस्ताननि. एपितः । जपहीमेतुसम्पृगोंदिग्देवानां शतं शतं । हीन व्यं नागमन्त्रश्न निपातनगादरम् । एक वृद्धिप्रयोगक्ति दिगंधीनांनाममन्त्रः, नहेम्योपैदिक मत्रैः फागुपंशतं शते । होमसम्पूर्णता प्राप्ने नमस्कृत्वेष्ट वताम । चगिढकादेवदेपाना मृणीविन्दितामपराम् । रतम्मद्वयचंकृत्या यज- मान: लंकृतः । घृतकुम्मदशासन दद्य पूर्णाहुनि स्वयम ।" गृधानमन्त्रपाटन नवाकरमयमय प्रामगंमार्जनंचयं नवदुर्गाविधाना । जपंहुतंमम येद्य चण्डिकायमनारथान । ब्रह्मनिष्कपटक च दद्याद्गीमिथुनद्वयम् । यम्या प्रभावमतुतश्लोकमुअत्याकृतांजलिः । दद्याद्गीमिथुनान्यष्टा पाचार्याय चभक्तिमान् । चतुर्विशतिसरयाकै हमनद्याणकै सह । एकैकमन्नयिप्रेभ्योदयाद् गॉमिथुनंसमम् । निष्कनयममायुक्तं वत्रालझारभूपितम् । मुस्थितस्वासनेशान्तं यजमानमही- नयम 1 कुंकुमाताननादूर्वामुगन्यचन्दनंदयि ॥ पादावादायतरित्रा प्राचार्याश्यमुपजिनः स्तोमाणयि चतुर्णान्तुमहालक्ष्मीपरायणाः । एफैकश्लोरममार्यददयुराशिषमुत्तमम् । मभायः गमुतः पूगीलयाशीनांदगालम । रत्नपुष्पांजलिंदयाचरित कार्यविमजनम । भूरिदानंनतोढद्या- पुगययादिनि खनप्रदिशेच्छान्तिपाठच तोरणाव्यस्तमालयम् । शतचगिढ़ विधानस्य कृतन मुकृतिनहि । महालक्ष्मीतदातम्मैत्रलोक्यमुगमुत्तमम । यद्य कार्यममुशिश्य क्रियतेशनशनचंटिका तपतस्य महालक्ष्मी सन्यमाशुप्रयच्छनि । इति शनचगडीविधिः । नानाधिषि चंडी पाठ काम्पप्रयोग विधयः । अतःपरंमार्कंडेयोक्त चण्डिपाठन मान्वय- चरितत्रायजा यस्य चगिडराया नृपोत्तम । मरहस्यम्बनामानि ब्रह्मातानिवदाम्यह्म । महाविद्यामहामनायगडीसप्तमतीनिच मृतगंजीवनीनामचतुर्थपरिक तिनम पश्चममंचमहाचा डी चतु.पष्ठीपदीपरा । पचगदीपरादुगा अपितांदपारगे । महाविद्यामप्तमन यतंत्रेपुगोपिना। अधनम यचरितं महामन्नमुदीरि- तम् । प्रादिमध्यान्तचरितकमाशर डीमहामनु । मध्यामाद्यन्त चरितकमान्मप्तशतीरमृता । मध्य- म.द्यन्तचरितं मृतसंजीवनीम्मना । अन्यादिमध्यचरितं महाचण्डीनिकथ्यते । योगिनीनांचतु: पटियोगासप्तशतीमनी । चतुपष्ठिप्रदीपीका योगगिद्धिप्रदायिनी स्पिदहीतियोगिन पचंटी- निसास्मृता । परापोजगमायोगात्परचगदोनिक यने । एतानियोविजानातिनामानिरपनन्दन ? जपिनाभन्चंडी परदाम्यानुगदा पाठभेदफलराजणुपक्षाम्यनुकमा । महाविद्यान शान्त्यर्थ पञ्चशततंनर । चंडीपाठानेद्र पुष्पचमदानपन । मोदनाथमतसतीपराभवति मिद्धिदम् । पिपगारूपमृत्युमपाठगंजीवनीकम 1 स्तंभनेचमहाचण्डीगततं सिद्धिदायिनी । नगमारणे यामहाचीन चंडिका । उमटनेचरिद्वे कृत्याशान्त्यादिमणि ! पचगौशुभ- (11) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, शनचंदी पद्धति करीपराचगदीचमोक्षदा । शतमाटीगतचान्त जपे-मन्त्रनाक्षरम् । चण्डोमप्तशनामध्य सम्पुटा 5 यमुदाहत । राराम सम्पुटोजाप्य निफाम मम्पुटचिना । एतद्गोग्यतरंतत्य चडिमानप विदिम। इति चदीवाभ्यप्रयोगविधि ॥ ॥ अथ शत चण्डी प्रयोग पद्धतिः ॥ तत्रानोवृष्ट्या द्यखिल विध्युक्त दुरितोपशान्त्यर्थराज्यावा प्त्यादि सकल कामना सिभ्यर्थं च पूर्वोक्त लक्षणसम्पन्नो यज- मानः शिवालय समीपेवा देवीमसिद्ध मन्दिर सन्निधौ समेभूतले यथोक्त लक्षणंषोडश हस्तात्मकं मण्डपं चतुर्दारयुतं सुतोरणाढय पताकालंकृतमध्ये चतुर्हस्तायत दैर्ध्यविस्तृतां यथोक्तलक्षणं वेदिं च निर्माय मध्येवेद्यां पट्कोणाष्टदलभूपुरात्मकंयंत्रं विलिख्य मध्ये ऐ ह्रीं क्लीं वीजान्यालिख्य तस्याईशानकोणेत्रिकोणं चतु- रनं यथोक्तलक्षणं सपादहस्तं कंडं वेदिं वानिर्मायविध्युक्त लक्ष णान्नवव्राह्मणान् दशममाचार्य दान्तशान्तं देवीतत्यज, एवंदश- व्रात्मणांपूर्वोक्त मधुपर्कादि विधानेनाचार्य व्रह्मविगष्टकेनवरण पूर्वकर्मचयित्वा इतरब्राह्मणापेक्षयाचाचार्याय द्विगुणां वरण सामग्रींचदत्वा तदनुजया सपत्नीको यजमानः शुभासनेसमुप- विष्टो ब्राह्मणैः कृतस्वस्त्ययनः सुतवन्धुसुहृद्वृतो वेदघोप नाना ध्वनि पृर्वक ब्राह्मणैः सह महालक्ष्मीमण्डपंगत्वापश्चिपद्वारमा- श्रित्य आसने समुपविश्य द्वारपूजां कुर्यात्-पाचम्य भूमौजलेन त्रिकोणवृत्तचतुरनमण्डलमालिव्य सम्पूज्य च ॐ ह्रीं द्वारा यमण्डलायनमः । इत्यर्घपात्रसंस्थाप्य सगन्धजलेनापूर्य तत्रा कुंशमुद्रयातीर्थमावाहा गंगेतिधेनुमुद्रांप्रदर्श्यमूलेनाष्टधाभिमन्य तज्जलेन तत्वत्रयेणाचमेन्-30 आत्मतत्वायस्वाहा १ W कर्मकार ई रखाकरे, शतचर डी प्रयोग पद्धति: विद्यातत्वायस्वाहा २ ॐ शिवतत्वायस्वाहा ६ इत्यानम्य द्वार- स्योर्ध्वशाग्यायांदः ॐ धानमः गन्धान्तपुष्पादिभिःसम्पूज्य एवंसर्वत्र । ततोवामे आविधानमः सं० । अधः शान्वायां दक्ष अगंगायनमः सं० चामे । ३. यमुनायैनमः सं०।उवादुम्बर 30 द्वारश्रियैनमः सं० अधः ॐ देहल्यैनमः सं० । वामांगसंकोचेना- न्तः प्रविश्य आग्नेयकोणे 30 वास्तुपुम्पायनमः, गन्धाक्षतः सम्ज्यासनभूमौ रक्तचन्दनेन चतुरस्र विलिख्य नत्र [ पृधि- व्यैनमः, इतिमण्डल सम्पूज्य तत्रासनमास्तीर्य पृथ्वीति मन्त्रेण सम्बायोपविश्य मूलमन्त्रेण शिग्वांवध्या तत्वत्रयेणाचमंकृत्वा महालक्ष्मीतत्वेन प्राणायाम विधायस्वदचे हारवामे ईश्वरं सप्र- एव नाममंत्रण सम्पूज्यप्राङमुग्वोपविशेत् । तत्र संकल्पं कुर्यात्- ॐ अद्यहेत्यादि० अमुको ऽहं शतचण्डीपाठ कर्मणि-अमुक कामनासिद्धये तबादौनिविघ्नता सिध्द्यर्थ गणेशादिपंचांगदेवता पूजननान्दीश्राद्धकलश स्थापन पुण्याद वाचनादि कर्मकरिष्ये । तत्र कचिन्मनोहरपीठं लिखित्वा गणेशपूजनं मातृका पूजनाभ्यु- दयिक कलशस्थापनं पुण्याहवाचनं नवग्रहादि पूजनं पूर्वोक्तानु सारेण कृत्वा स्तंभ पूजाप्रकारेण स्तंभान्सम्पूज्य दिक्पालवलि क्षेत्रपालवलिं च दत्वा वेद्या ईशाने अखंडित रक्षादीप प्रज्वाल्य सम्पूज्य च चतुर्पकोणेषु सर्वतोभद्र पूजोक्त प्रकारेण तोरणानि सम्पूज्य वक्ष्यमाण पूजासामग्री स्वसन्निधौ कुर्यात्माचेयम्- अस्सीति गुंजामिनाकस्तृरी, तावन्मानं कुकुम, केशरंच सकपुरं तावन्मानं एतच्चतुष्टयं पलमात्रं चन्दनेन सद्धर्षयित्वा संगृही- यात् । पलप्रमाणं तुविंशत्युतर त्रिंशतगुजामितम् । अनेन पलद्वय मनुलेपनं भवति । स्त्रीजन परिधानयोग्य कौशेयवत्र गद्याण कत्रय हेमनिर्मिनमलंकरणम् ( साईरौप्यकनौलकम् )पंचविंशति सहस्राणि पुष्पाणि विल्वदलसहितानि (प्रतिदिनपंचसहम नियमेन ) धूपार्थ पलद्वयं गुग्गुलुः । वेद्यांविंशतिर्दीपातपूरिता यावत्पाठप्रदीप्ताः । कुडवद्वयमात्रंहविष्यान्नं नैवेद्यम् (द्रोणमात्र . (२६०) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, शतचंडी पद्धति , तदभावप्रस्थद्वयम्) शतद्वयंनागवल्लीदलम् । पूगफलंखादिरसारंच तदनुयोग्यंग्राहाम् । इत्थंपूजासामग्री च सम्पाद्यतत्र वेद्यां प्रागुक्त कलशस्थापन विधिना प्रधानकुभं संस्थाप्य नवरात्रविधान पौराणिक पूजापद्धत्या घटे महालक्ष्मीमावाह्य सम्पूज्य च मण्ड- पस्य पूर्वादि द्वारचतुष्टये प्रतिद्वारं पूर्वोक्त कलश स्थापन विधिना द्वौ द्वौ कलशौ गालिनोदकपणी स्थापयेत् । दुर्गापूजा पद्धत्यनुसारेणाचार्या यजमानतो वेद्यांजनं कारयेत् । अशक्तश्चे- यजमान प्राचार्येण कारयेत् । नत्र ॐकारपीठायनमः इत्यारभ्य ॐ सिंसिंहायनमः, इत्यनंतां पूजां कृत्वा यथालाभोपचारः सम्पूज्यसती च यन्त्राग्रेवेद्यां सर्वोत्तमपीठं संस्थाप्य तत्ररक्त- वस्त्रं कौशेयमास्तीर्य तन्मध्ये श्रीयन्त्रंचा भुवनेश्वरी यन्त्रंवा सुवर्णप्रतिमांचा मृति संस्थाप्य हस्तेपुष्पंधत्वा योगमुद्रया श्री महालक्ष्मी मध्यवीजे ह्रीं इति चिरंध्यात्वा तया मण्डलस्थ सर्व शक्तिभिरैक्यं विभाव्य मण्डलात्पीटे समाह्वयेत् । विंशतिदीपा- प्रज्वाल्य तेनैव तत्रोक्त प्रकारेण पूर्वोक्त सामग्रीभि महालक्ष्मी श्रीं पूजयेत् । अत्रयावच्छीदेव्याः पूजनं भवति तायत्सर्व ब्राह्मणाः जय चण्डीति अवन्तस्तां ध्यायेयुः । नन प्राचार्यसहिताः सर्य ब्राह्मणाः आसनान्यास्तीर्य स्खम्वासनेपूपविश्य तत्वत्रयेणाचमनं कृत्वा भृतोत्सादनं विधाय ह्रीं महालक्ष्म्यै हृदयायनमः ॐ ही म० शिरसे स्वाहा । ॐ हीं म० शिग्वाय वपट 30 ही म० कवचाय हुँ ॐ ही म० नेत्रत्रयाय चौपट् ॐ ह्रींम० श्रमायफट एवं यदंगन्यासं कृत्या 0 अक्षम्रगिनिमन्त्रण महालक्ष्मी ध्यात्वा ही ल्की चामुण्डयै विच्चै श्री महालक्ष्मीरतृप्य- ताम् । इतिमन्त्रेण श्री महालक्ष्मी सुगन्धिजलेन दुग्धमिनिते नाष्टोत्तरशतंसंतW . महालक्ष्मीच विमहे विष्णुपत्नी न धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयान । इति गायत्री महाशगित जपित्वाप्राणायाम पर्वकं जपं श्री देग समर्पयुः । नन सामागों प्रामणेभ्यो नहमानपुर: सरसनशनी पाटामाज्ञां दशाण ।
कर्मकाए रखाकरे, शतचंही पद्धतिः (२६१) स्वयमप्याचार्या ब्राह्मणः सह श्री महालक्ष्म्या ध्यानपूर्वकंविधि- वच्चरितत्रयं सरहस्य जपित्वोत्थाय प्रदक्षिणा नमस्कारः पुनः पुनः परितोप्यासने समुपविश्य प्रार्थनाश्लोकापठित्वा यजमा- नस्याभिष्टानि फलानि पुनः पुनः प्रार्थयेयुः । ततो यजमानो मुलक्षणाः, दशकुमारीः पूर्वोक्त कुमारी पूजाविधिना सम्राज्य संभोज्यचान्यत्तमान्दशविप्रांश्च जापकान्यान् संभोजयेत् । ता- म्यूल दक्षिणादिभिः संतोपयेत् । ततः पश्चादाचार्यादि दशनाम- णां स्तथैव भोजयित्वा दक्षिणादिभिः परितोप्य वन्धुभिः सार्ध स्वयमपि भुक्त्यानृत्यावादित्रनिःस्वनैवेदधोपः सत्कधानिश्च रात्रिनयेत् । इति विधिना प्रथम दिवसेदशावति पाठं कुर्यात् । ततो द्वितीय दिवसे प्राचार्यादयः स्नात्यानित्यक्रिया निवर्त्यध्यान पूर्वकं दिग्देवीपूजन वहित चौल चदत्वा श्री देवी प्रदक्षिणी कृत्यप्रणम्य च पूजामण्डपे स्वे २ ग्रासने समुपविश्य जय महालक्ष्मीनि जपन्नोयावद्देव्याः पूजनं भवनि तावत्तिष्टेयुः तत प्राचार्योऽपि पूर्व पद्धत्यनुसारेण पूर्वदिवसापेक्ष्या यजमानेन संपादितर्द्विगुणवन्त्राभरणगन्धपुष्पादि समस्तपूजाद्रव्यै विशे- पनः पूजांकृत्वा द्विगुणं परितोषणं भगवत्याः कुर्यात् । ततः पूजान्तेपूर्वोक्त षडंगन्यासं कृत्वा तेनैव मंत्रेण विधिना द्विगुणं पूर्वापचया कृत्वा द्विगुणं गायत्रीमन्नं च जपित्वा पूर्वोक्त विधानेन पूर्वाप्रेक्षया द्विगण सप्तसनीपाठं कृत्वादेवीं प्रार्थयेयुः ततो यजमानो द्विगुणिनानां कुमारीणां ब्राह्मणनां च पूजाभोजनं च कारयित्वा पूर्ववत्स्वयमपि भुक्त्वा जागरणमपि कुर्यात् एवं तृतीये दिवसे त्रिगुणपूजा जपपाट कुम्गरीब्राह्मण भोजनादि विधेयम् । एवं चतुर्थ दिवसेऽपि चतुर्गुणां सर्व कुर्यात् एवं क्रमेण चतुर्थदिवसे शतावृत्तिश्चंडीपाठोभवति । ततः पंचमेदिने होम पंढत्यनुसारेण पूर्वनिर्मितकंडेवामण्डपे विधिनाग्निसंस्थाप्यतत्र घृनतिलपायसेनवायतिलाज्येन जपदांसेनसरहस्यचरितत्रयस्य प्रति श्लोकेनयानमोदेश्य महादेव्यतिश्लोकेनवाजाप्रकरणोक्न काकाएड रजाकरे, शनवडी चडीपाठ पद्धति नवार्णव मंत्रेण होमंकृत्वा दिग्देवीनां नाममन्त्रेण प्रत्येक तन्नाम मन्त्रेण शनं २ बंख्या तदद्रव्येणे व हुत्वा नवग्रहाणं वेदोक्तन न्मत्रेणतस्य तस्योक्त समिङ्घृितेश्चमभिश्च शतं शनमेकैकस्य ग्रहस्यहुत्वा इत्थंहोम सम्पाद्य श्री महालक्ष्मी प्रणम्य नतो यज मानास्तंभद्वयो परिस्रवंनिधाय घृतकंभदशांशेन घृतेन" ७० मुर्दा नमित्यस्य भारद्वाज ऋषिः त्रिष्टुन्छन्दो वैश्वानरोदेवतापूर्णाहुति होमेविनियोगः । 30 मृनिंदिवो ऽ अरनि पृथिव्या वैश्यानर मृत 5 श्राजातमग्निम् । कवि र्ट० सम्राजमतिथि जनानामासन्ना पात्रंजनयन्तदेवाः स्वाहा ॥ इत्यवछिन्नधारया पूर्णाहुतिजुहुयात। अगवा नवात्सरेण सन्त्रेण जुहुयात् । होमदशांशं नवानर मंत्रेण नर्पणं कृत्वा तपण दशमांशं तेनैवमार्जयेन् । शेर्प होमपद्धत्युक्त प्रकारेण कुर्यात् । ततः शान्त्यर्थ गौदानानि कृत्वा संस्रवप्राशनं प्रणीतामार्जनं च कृत्वा जपंटतं च श्रीमत लक्ष्म्यै निवेद्य मनोरथंप्रार्थयित्वा यजमानो ब्रह्मणेनिष्कपटक हेमसहित सर्वालकारयुक्तं गोलिथुनद्वयंदत्या ॐ यस्याः प्रभा मतुलमिति श्लोकंकृतांजलिः पठित्वा" प्राचार्याय द्विगुणनिष्क पटक हेमसरितं पूर्वोक्त लक्षणंगोमिथुनाष्टकं दद्यात् । अष्टवि. ग्भ्यश्चैकैक निष्कपटक हेमसहितकै गोमिथुनंदद्यात् । दरिद्रो ऽपि नस्विरभ्यो अष्टाविंशनि रजनमुद्रा कंगोमिधुन चावश्यमेक्दद्यात् । ब्रह्मणे द्विगुणम । याचार्यायचतुर्गणमिति । ततो यजमानं सपरिवार सुग्वासने समुपविण्याचायाँ ऋत्विजभ कलशजलेन पूर्वोत्ताभिकविधिमा सर्वानभिषिच्य निलकं कृत्वा,वैदिक पौराणिक मन्त्रैरागिपंदः। नतो लब्धाशीर्यजमानः श्रीमहालक्ष्मी परायणो रत्नपुष्पांजलिंदत्वा देवा विसर्जन पहन्य नुसारेण देवीविराज्य ब्राह्मणेभ्यो दानंदत्या वादिनवैदयनिपुरः सरस्वगृहं प्रविशेत । नतो ब्राह्मणान्भोजपन ॥नि शिरम॥ ।। इति शतनगडी यांग ।।
कर्मकाण्ड रनावरे, सहनचडी परिभाषा ( २६३) ॥ अथ सहस्र चण्डी परिभाषा ।। उक्त च दगाल गरस चगढी पिधिपाउणु पिणा महाम।। राज्य न महापात जनमारे महाभयं ॥ गजमारथमारेच परचा भय तथा। यादि विविध टुग आयरोगादि भये । गहन चगिडमा पाट पुर्याद्वापारयत्तथा । जापास्तु शतप्रोत शिस्तच मगडपम् । भोग्या महस्र निन्दा गो शत दक्षिण दिशेत । गुर उद्विगुगा देवशम्यादान तयार । गाधान्य र भूदान अताश्च च मनोहरम । पयनिमिता मृति निव्या पार्धमानत । अष्टादश भुनानो मांयुध विभूषिता । श्रमरिनागदातव्य गहमप्र यह भी ? | शनवानियताहारः पर पामेन पतयत । एवं यमागिइया पाद महस तुममाचरा तस्वस्या कार्यमिद्धिस्तु नानकायर्या विचारणा । श्रम महस गडी यज्ञस्यापि निधान शननगदी व ज्ञेयम । विशेषस्तावान, जपत्तारानामगा शतम । मगदपं त्रिशद्वनामकम् | उमरोग शन शेष शतनगडी यारयत ॥ ॥ इति सहन चादी विधी । ॥ अथ साई नव चण्डी परिभाषा ॥ उक्त च वाराही तन्त्र रुद्रयाम-ननसाधे जपेद्यस्तु मुक्त प्राणान्तकाद् भगात । राज्य प्रियच सम्पति सवान्कामानवाप्नुयात् । प्रयोगाऽय महागुग्ध देवानामपि दुर्लभ । तरोह सप्रवक्ष्यामि मावधानोऽप्रधारय । मधुरेटभनाश च महिप मुर घातनम् ॥ शकादिस्तुतिरेपाता बीसूक्तं पुनस्तथा । नारायणी स्तुतिम् पैप फलानु कौतन तथा। ततो परमदानव खपाठोड यमुन्यते। अधपाटस्य प्रात सर्वकाम फ्लाद | अर्धपाटेन गहित नपाटफ्लनहि । अधिपाटनमश्च मावणि सर्यतनय इसारभ्य शाादिस्तुति परमाध्यायो । देया चु नमो देव्यै, दयारभ्य प्रपिस्वातिपर्यन्त मिति नारायणी निगादशा याय द्वादश त्रयोदशा वण्यायो ! श्रयमरायपाट । ब्राह्मणा स्वप्रयागे एकादशा । तेघुनाब्राह्मणा गपूर्ण सप्तसतो पाट कतार पारपाटाना एकोयजुवदीय पद्धगद्राष्टाध्यायो पाता, मेकादश प्रामाणावृणुयाल 11 इति लाई नव चरटी परिभाषा कर्मकाण्ड रताकरे, सानचंडा पद्धतिः अथ सार्धनवचएटी अनुष्टानपद्धतिः ॥ तत्र कर्ताशुभमुहतं अथवा कृष्णाष्टमी नवमी चतुर्दशीनामन्यतमेदिवसे यथोक्तल- क्षणांकुमारीमानीय, यजमानः सपत्नीकस्नात्वाशुक्लः धौते वाससीपरिधायैकां कुमारीपूर्वोक्त विधिना सम्पूज्य संमोज्य चदक्षिणादिभिः परितोष्यानुष्टानार्थ कुमारी प्रार्थयेत् । भोमाते- श्वरि ! कुमारि ! महासार्धनवचण्टीमहोत्सवं कर्तुमाजांदेहि । कुमारीवदेत्-प्रसन्नतया कुरुतेयथेष्ठं भवतु" इत्यानां गृहीत्वा पूजास्थानमागत्य-गोमयोपलिप्तायां भूमौ स्वासने-उपविश्य स्वे- प्टदेवस्मृत्वा दीप प्रज्वाल्य आचम्य स्वस्तिवाचनान्ते गणेशादि पंचांगपूजनं कृत्वा संकल्पंकुर्यात् ॥ 30 तत्सदद्येहेत्यादि देशका- लौ संकीर्त्यामुकगोत्रो ऽ हममुकशर्मा श्री भवानीशंकरप्रसन्नता पूर्वक ज्ञाताज्ञात निग्निल पातकोपपातक निरसनपूर्वक कालिकरा जतो-व्यवहारपूर्वक श्री वृद्धिकामः सकुटुम्बसपरिवारस्थात्मनः शरीगरोग्यकामश्च वामुककार्य सिद्धयर्थमेकादश ब्राह्मणद्वारा यजुर्वेदीय पडंगैकपाठसहित चण्टी चरित्रस्य श्री महाकाली महालक्ष्मी महा सरस्वती दैवतस्य सार्धनवकरूप पुरश्चरणमहं कारयिष्ये-यतो ब्राह्मणान्वृणुयात् -पाद्यगंधादिभिः संपज्य वरणद्रव्यमुभाम्यां हस्ताभ्यामञ्जलौनिधाय संकल्पं कुर्यात् । ७० अद्यपूर्वोच्चारित, अमुकगोत्रो ऽमुक शर्माह पूर्वोक्तमिद्धिकामः पभिवैरण द्रव्य रेकपडेगसहित सार्द्धनवक चण्टींपाठानकमेका दशबाह्मणानमुकामुक गोत्रानमुकामुक शर्मणोऽवृणेततःप्रदक्षिण फ्रमेण प्रत्येकं ब्रामणंतद्रव्येणवृणुयात् । करवामइतिब्राह्मणाबू युः। तत प्राचार्योयथाविधि कचिन्मनोहरपीठे कलशंसंस्थाप्यतत्र भवानीसहितंशङ्करमावाहा पोडशोपचारेण सम्पृज्यदेवींध्यात्वा नमस्कृत्यपुस्तकं गन्धादिभिः पूजयेत् । तत्रादौपुस्तकोपरि पटंग पाठाधिष्टात्रिदेवतेभवानीशंकरौ नाममात्रेणपूजयेत् । यथापनानि पाद्यानिश्री भवानीशंकराभ्यांनमः। एवंगन्धादिनैवैद्यान्तं सम्पू. ज्यैवं सप्तसनीपुस्तकमपिपूजपेत् । सर्वव्रामाणाः म्यासनेप्पविश्य • कर्मकाण्ड रनाकरे, दीपदान पद्धतिः (२६५) प्रथक् प्रथक पाटसङ्कल्पंकुर्यः । ॐ तत्सद्देशकालोसंकीामुक गोत्रो ऽ हममुकशर्मामकुगोत्रस्यामकुनांम्नो यजमानस्यामुक कामनासिद्धयर्थ- जनाद्यताप्ठोत्तरशतनवार्णवजप पूर्वकचण्डी चरित्रस्यै कपोठमहंकरिष्यामि । एवंनवत्रामणः । दशमनच, अद्यपूर्वांचारितामुको 5 हं० चण्डीचरित्रस्यापाठमहंकरिष्यामि एकादशेन पडङ्गपाठंकरिष्यामि-अर्धचण्डीपाठकः पूर्वांकानु- सारेणार्धपाठकुर्यात् । एवंपाठान्तेअष्टोतरशतनवार्णवमन्त्रंजप्वा श्रीदेव्यैसमर्प्यपूर्वोक्तविधना वेद्यामग्निस्थापनंविधाय घृतपाय सनिलेरेकावृतिसप्तशतीपाठमन्त्रैीमंकृत्वानवार्णवमन्त्रेण पूर्णा हुतिंदत्वा ।। तेनैवतद्दशांशतर्पणमार्जनादिकं विधायकुमारीपूजनं कृत्वाचार्यादिब्राह्मणेभ्यो दक्षिणांदद्यात् । श्राचार्यायद्विगुणं, गौदानंचकृत्वा कलशजलेनसपत्नि पुत्रपरिवारं यजमानपूर्वोक्त मन्त्रैरभिषिच्याशीर्वादंदत्वा श्रीदेवींपूर्वोक्तप्रकारेण विमृज्य ब्रमाणाम्भोजयित्वा स्वयमपिभुजीत 0 शिवमिति, इतिसार्द्ध नवचण्डीप्रयोगविधिः। अथ चण्डीदीपदानप्रयोगपद्धतिः--अथचसाधकः कृतनित्य क्रियोयागमण्डपे गोमयोपलिप्ते समेशुद्धभूमौस्वासनमास्तीर्य तत्रोपविश्यमुपवित्रमृदाहस्तमात्रांचतुरस्रां चतुरंगुलोन्नतांवेदी निर्मायतद्वद्वितीयां वेदीमपिनिर्मापयेत् । प्रथमवेदिकार्याकलश स्थापनविधिना कलशस्थापयेदादौ गणेशादि पञ्चाङ्गपूजनंकृत्वा वेद्यपरिकलदो पूर्वोक्तविधिनादेवीमावाहयेत् । द्वितीयवेयां सिंदूररजसा त्रिकोणषट्कोणाष्टदलचतुरस्र यन्त्रनिर्माय यथा कामनयासङ्कल्पंकृत्वा स्वर्णरजतताम्राद्यन्यतमंपात्रं गोघृतादि यूरितरक्तवर्तिकायुतंकृत्वा यन्त्रपूजामारभेत् । भूपुरावहिःपूर्वादि वामावर्तन । ह्रीं ग्ला ग्लीं ग्लू गणपतयेनमः उत्तरे-हीं क्षांक्षी घ्र क्षेत्रपालाय नमः । पश्चिमे--ॐ हीं तीदणसिंहाय महिषायनमः । दक्षिणे-ही वनस्पतिपुत्राय सिंहायनमः इति पूर्वादिदक्षिणान् वामावर्तपूजनम् ॥ ॐ ह्रीं समस्तगुरुपादुका कर्मकाण्ड रताकरे, दीपदान पतिः भ्यो नमः । स्वापूजयेत्-त्रिकोणाग्रकोणे ॐ ह्रीं -विष्णु लक्ष्मीभ्यां नमः । दक्षकोणे ॐ हीं रुद्रगौरीभ्यांनमः । वाम- कोणे ॐ ब्रह्मवागीश्वरीभ्यांनमः । इति सम्पूज्य पट्कोणे प्रकोणमारभ्य दक्षावर्तेन ॐ हीं नन्दायैनमः ! ॐ हीं रक्तदंतिका पैनमः। ॐ ह्रीं शाकंभनमः । ॐ हीं भीमायैनमः । यही भ्रामयनमः ॐ हीं शिवदृत्यैनमः । इति पदकोणदेवीः सम्पूज्य अष्टदले 5 अदलमारभ्यदक्षावर्तन ॐ हींबामधनमः। ॐ हीं माहेश्वर्यैनमः । ॐ ही कौमायनमः । ॐ हीं वैष्णव्यैनमः । ॐ ही वारा_नमः । ॐ ह्रींनारसिंहनिमः । ॐ ह्रीं ऐन्ट्रनमः। 30 हीं चामुण्डायैनमः । इति पत्रमूले-अथ पत्रागे पूर्वादि प्राद- क्षिण्येन पूजयेत् । ॐ ह्रीं असितांग भैरवायनमः। ॐ हीं मा भैरवायनमः। ॐ हीं चण्डभैरवायनमः। ॐ ह्रीं क्रोधभैरवाय नमः । ॐ हीं उन्मत भैरवायनमः। 30 ह्रीं कपालीभैरवायनमः। ॐ हीं भीषणभैरवायनमः। ॐ ह्रीं संहार भैरवायनमः। इति सम्पूज्य ततो भूपुरान्तः पूर्वादिदिक्षु-~30 ही इन्द्रायनमः । 30 ही अग्नपेनमः। 30 ह्रीं यमायनमः ॐ ह्रीं निर्ऋतयेनमः। ही वरुणायनमः । ॐ ही वायवेनमः। ॐ हीं कुवेरायनमः । ही ईशानायनमः। पूर्वेशानमध्ये ही ब्रह्मणेनमः । नियंति पश्चिममध्ये ही अनन्तायनमः इति दिक्पालान्यथास्थानंसंपूज्य, भूपुरावहिरिन्द्रादि समीपे ॐ हीं वनायनमः । ॐ ह्रीं शक्तये- नमः । ॐ ह्रीं खगायनमः । ॐ ह्रीं पाशायनमः। 30 ही ध्वजा यनमः। 30 ही गदायैनमः । अहीं त्रिशूलायनमः । ॐ ही पभायनमः। ॐ हीं चक्रायनमः। इति सम्पूज्य रक्तचन्दन मिश्रिताक्षतान आएं ही क्लीं चामुण्डायै विच्चै, अनेन मन्त्रेण दीपप्रज्वाल्ययनमध्येस्थापयित्वातस्मिन्दीपेयथोक्तरूपांमहाकाली महालदमीमहासरस्वतीनांमध्येयथेष्ठां देवीमावाह्यपूर्वोक्तदेवी पूजा विधिना पोडशोपचारेण सम्पूज्य वक्ष्यमाणमन्त्रैः पुष्पांजलिंदद्या त। ॐ विश्वेश्वरी जगद्धात्री० १ सुरासुरेः पूर्वमभीष्ट०२ कर्मकाप रताकरे कालिका पूजा परिभाषा (१२६७ ) यासाम्प्रतं चोद्धत. माहेश्यरिमहामाये०४ याचस्मृता तत्क्षण मेव० ५. सर्वायाधाप्रसमनं०२ मृष्टिस्थिति विनाशानां०७ शर णागत दीनार्त०८ सर्वस्वरूपे सर्वशे०६ एभिनवमात्रैः पुष्पां जलिं दत्वा ऽथ तुनवार्णवमन्त्रं जप्त्वा तदशांश जुहुयात् । प्रयो गानन्तरं श्लोकः । कटुतैलयुतेनाथ रक्तचन्दन राजिकाः । सहस्ता हुतिमात्रेण राजानं वशमानयेत् । मधुचाशोक पुष्पं च रात्री हुत्वा च पूर्ववत् । चक्रवर्ती भवेदश्यश्चण्डी मन्त्र प्रभावतः । अन्ते शतं ब्राहमणांश्च सुवासिन्यश्च भोजयेत् । प्रयोगोऽयं महादेवि देवानामपिदुर्लभः । गुहां च मम सर्वस्वं कलाविष्टार्थ सिद्धिदम् । एवं विधिना प्रयोगानुसारेण हुत्वा देव्याः प्रसाद संगृहा ब्राह्मण मुवासिनि वटुक कुमार्यादिपूजां पूर्वोक्त विधिना कुर्यात् । ॐ शिवमस्तु । नि प्रयोगान्तरे चण्डी दीपदान पद्धमिः ॥ -::- ॥ अथ कालिका पूजा प्रयोग विधिः ॥ अथ दक्षिणकाली यन्त्रोद्धारादि प्रयोगविधि वक्ष्ये--तत्रादौ यन्त्रोधार:- शादी विकोणमालिख्य त्रिकोणतहिलिखेत् । ततोनेविलवेमन्त्री भिकोणत्रयमुसमम् । रानसिकोगमालिल्य लिखेदष्टदलंतत. । वृत्तंविलिस्यविधिवल्लिखेद्भपुरमेकम् । वर्तलत्रय गंयुक्त प्रकुर्यात्तत्रिकोणम् । ततः कुर्या प्रयत्नेन दलाष्टंकमलं शुभम् । सिन्दूरेणसुसंसग्य तद्व- हिमाललितेत् । तत व्यंगुलविस्तीर्ण पुनमण्डलमालिवेत् । रानमानेनवैकुचितु.पष्ठित्रिकोण कान् । वक्ष्यमाणेनविधिना योगिनीस्तवस्थापयेत् । तद्वाोयनतोमन्त्री चतुद्वाराणिकल्पयेत् । यभवादोधुकोणेषु त्रिशलानिमक पयेत् । दलाहिस्तुशोभार्थ स्वैच्छारंगप्रकल्पयेत् । एवंयंत्र विलिरयादविता. स्थापयेत्ततः । मध्येयोन्याकालिकांच सम्पृश्यस्थापयेत्सुधीः । तमप्रावरणा देसीवामावर्तनस्थापयेत । कालीबायनिकायस्य सम्मुखेस्थापयशतः । तत्रैवोलवामकोणे स्थाप येत्तुकालनीम् । तत्रदेव्यादतकोणेकुलादेवींचस्थापयेत् । तस्मादाभ्यन्तरेकोण कुरुकुलाच गम्मुखे । तत्रदेव्यावामकोणेस्थापयेतुविरोधिनीम् । तत्रदक्षेविप्रचित्ता द्वितीयेतुनिकोगा। तस्मादाभ्यन्तरे 5 उपासम्मुग्वेचत्रिकोणके । उग्रप्रभावामभागे त्रिकोणेतनस्थापयेत् । तत्रया (स) पगाराइ रत्नाकरे, पालिकापूजा परिभाषा दक्षमागे दौतातिरपुयानिपु || 'ला समन्ममेवाण तस्मादाय तरपि । पयामयलां दरातुर्थकति 1 घारपथमगाणे माना सम्पुग पामेदशेतमगा मुद्रामा चस्थापना मध्येद्याभ्य तरेको पारितास्थापितापुरा । तपश्च्यातमाग गहामालवस्थापया। त देयास्रेमध्ये दद्या तामिमांशुभाम् । ता पृदियागन रक्षावर्तनमा । अष्ठा पाठ शत नास्थापनक्थयाम्यहम् । पूयस्यादिगिनगा मग्नीनारायणपिरा। माइश्वरीदक्षिणा श्रो चामुगडाचन मते । पश्चिमी सीमारी रान ये परानिताम् । उत्तरस्यातबाराही मायन नारसिंहिकाम् । कमलानेनतामनी भरवानष्टमा भान् । मगरल न्यनस पूवादिनमता न्यसे। मिता गडी कोकीमती तिसरी । पानीगीपणन महारश्वाटभरवा ।। तनवेवाम मागण भैरवी पृा नमा। तमामागिर गयो स्थापनाथ ममगार श्री भैरवाच परम्मनीशा मगभैरवाम् । उत्तर मिहताम्नी राव्ये धूम्रभरतीम । पश्चिगे भीमरपाच हयुमत्ता चरते ॥ दक्षिणच पनिए मग्गामाहा भरतीम् । तत स्वसम्मुना 'मनी वामान यागिनी ॥ पूवात भट चवस्थापयक्तिभारत । की मनानुगारेण कथिता पशुघात ने । नान या का लायन नित्यपूना विधामया ॥ यागिनी नामानि हेमाद्री- दिव्यश्वरी महापा सिद्धेश्वरी तयच च । गणेश्वर च नहाती डारिनोव कालिका ॥ *कारी रुद्रवेतानी कालर नी निशाचरी होकारीभूनटाययध्वपशीरच हिणी ॥ शुष्पाती नरभीनीच भराड योरभादमा । र क्षमो घाररत्ताक्षो विरूपाच भयकरो ॥ भासुरी रगरताली श्रपर्णी पुराता । भराघमिनीचैव गोविनीमुखी तया। तपाही कटकी च नावी यमदूतको । कराल चैत्र चैवपट्याती दाबलम्वाठिशालथा । कालाग्नि गृहिणी चकी मालिनी मप्रयागनी । यूनाक्षी क्लाचन क काली भुवनेश्वरी स्पाराक्षांकार्मिकोचर लौकिकी काक दृष्टिंका भक्षगयधामुयीनय प्रेरणी चव व्याघ्रका । क्यो तमनोच पोर कामारिकातथा चाचैव वराही तथव मुट धारिणी कामाक्षीचैव उड्डाणी जानवरीच योगिनी । महालक्ष्मी रचतु पत्रीयोगिय काथत नवे । नाममनश्चनु य ते प्रणवनमा वनै । पूतनाया प्रयत्नन पायधूपादिभिस्तथा । नया 4 लोप ला निदादास्थापयत्ता । ततौवनादि . शस्त्राणि स्थापयवार रक्षा । पूवादित विन नन यत्रदेवांश्चम्धापयेत । तनप्रथेभ्य अकृधा पूजा पद्धतिरुत्तमा । दीक्षिताना योगाय देवान्न पौमता । कानीमनच सवये तताईश विधानत ॥ कालोवीत्रयोर या ल जावाजयतत । हकारीद्वी तत पश्चाद्दक्षिणेशा रिकाता । कालोवीन प्रयतस्मा ल नापीनद्यपठन् । दोरम्बाहा त कारा कालामत्र दाहन ॥ 117|| स्परम् ॥ ॥ इति शालिवायत्रीद्धारचिति । - कर्मकाण्ड रताकरे, कालिका यंत्र पूजापद्धतिः ॥ दक्षिण काळिका यंत्रोद्धारः॥ :ो. 4 . पीत: हारित: .. ॥ अथ कालिका यंत्रपूजापतिः॥ अध चोपासकः प्रातनित्यक्रियां कृत्वां ऽनुष्टोनविधी श्री देव्यामंदिरे ऽथवा यत्रकुत्र चियनं प्रोक्त विधिना शुद्धायां भूमौ गौमयमृदोपलिप्य ॥ तत्र यंत्रोद्धारानुसारेणाद्यायंत्रं निर्माय- पूजामारभेत्--ततोयंत्रसमीपं कीयदर मागत्य गुर्स प्रणम्याचान्नः कुशहस्तोमौनीभूत्वा पापप्रशमनार्थ देवींमार्थ- येत् । ॐ देवित्वत्प्रकृतचित्तं पापाक्रान्नमभून्मम | तनिस्सरतु चित्तान्मे पाप,फट्नतेनमः । सूर्यसोमोयमः कालोमहाभूतानि (२७०) कर्मकाएर रक्षाकरे, कालिका यंप्रपूजा परति पंचच । एते शुभाशु मस्येह कर्मणोनवसाक्षिणः । इति संप्रार्थ्य यंत्रसन्निधौगत्वा, ॐ श्री कालिकायैनमः, इनिमंत्रणाचम्य, 30 मणिधारिणि यघ्रिणि शिखरिणि सर्वलोक वशंकरि हूँ फट् स्वाहा इतिशिग्वांवध्या । ॐ वज्रेदके है फट् स्वाहा-इति जलंगृहीत्वा- ॐहूँ स्वाहा इति करेसादाय- 30हीं विशुद्धसर्वपापानिशमय, अशेप विकल्पमपनप , फस्वाहा-निपादोमनाल्य ॥ ॐ कालिकायनमः। ॐ कपालिन्यनमः । इतिदशकरांगुलिभिरोष्टी द्विरुन्मुन्य । 0 कुल्लायनमः । इतिहस्तौमक्षाल्य । क्री कालिकायैनमः टतिमंत्रण, संकुचिनांगुलिभिर्मग्वं-नर्जन्यंगुटा- भ्यांनासिका, अनामिकागुष्ठाभ्यांकणी, अंगुष्ठाकनिष्ठाभ्यांनाभिम् पाणितलेनहृदयम् । सर्वांगुलिभिर्मस्तकम । भुजौचस्पृशेन्, नतो ललाटाविद्वादशांगेपु रक्तचन्दनेन विट्राकृनिद्वादश निलकानि कुर्यात् नतः आ पवित्र वन भूमे ९ फट् स्वाहा इति भूमिमभिमंत्र्य, 3. ही आधारशक्तिकमलास- नायनमः, इलिजलेनाभ्युक्ष्य त्रिकोसंविलिख्य, आवासुरेखेवन- रेखे, इति मंटलंकृत्वा । तन्मध्येत्रिकोणेहसों, नवीजविलिख्य, ही आधारशक्ति कमलासनायनमः, इत्यासनं संपृज्य-30 अनन्तायनमः, ऊ विमलासनायनमः, ॐ पद्मासनायनमः, इतिमंत्रै कुशानास्तीर्य, तदुपरिव्याघ्राजिनं कम्बलासनवा प्रका- ल्प्यतनासने-ॐ क्रीं कालिकायैनमः, इत्युक्त्वा वामोरूपरि दक्षिणपादकृत्या पूर्वाभिमुखउत्तराभि मुखोवाभूत्वा, 0 आस- नमंत्रस्य मेरुपृष्टऋषिः मुतलछथः कुमोदेवता श्रासनपरिग्नहे विनियोगः-ॐ पृथ्वीत्वया धृता । ततोदेव्यावामे त्रिकोणं विलिख्य मध्येरमिति वन्हिवीज विलिग्ग्य तत्रदीपपानं संस्थान तैलेनापर्य रक्तचतुर्वतिकायुतं कृत्वा रमितिप्रज्वाल्यअवगंदन मुद्रघावगुंठ्य, सकलीकरण मुद्रयासकलीकृत्य, ॐदै दीपनाथ भरवायनमः इति पायादिभिः संपूज्य, ॐ तीक्ष्णदंष्ट्र महाकाय० इसिसमय । ततोयं स्थापयेत्--ततः स्ववामे त्रिकोण वृत्तभू- , कर्मकाण्ड रक्षाकरे, कालिक पत्र पूजा पद्धतिः (२७१) ५ पुरात्मक मण्डल चिलिख्य-ॐ श्रां प्राधारशक्तिभ्योनमः इति पुप्पोक्षतैरभ्यर्च्य, ॐ हः पूजाघस्थापयामि इतितत्र त्रिपादिकां निधाय, फट् इनिप्रक्षालितार्घ विपादिकोपरिनिधाय 30 की नमः इति जलेनापूर्य,, ॐ गंगेचयमुने चैव० । फ्री कालिकायनमः इति गंधाक्षतपुष्पकुशैरभ्यर्य, ततोऽर्धजलेन-ॐ क्री दक्षिणका- त्यनमः, इति पूजा सामग्रीमभिपिंच्य, 30 हूँफद-इति चतु- दिक्षुक्रोधदृष्ट्यानिरीक्ष्य गौरसर्पपानादाय ॐ अपसर्पन्नुतेभूता येभृताभूमि संस्थिताः । येचात्र विधक रस्तेनश्यन्तु शिवाजया, इत्युक्त्यासर्षपश्चितुर्दिक्षुतिपेत । ततोचामे ॐ सर्वेभ्योगुमभ्यो नमः-इतिप्रणमेन् , दक्षिणे 0 गणेशायनम:--पुरतः 30 दक्षिणकालिकायैनमः-प्रणमेत् । ततो रक्तचंदन पुष्पाक्षतानादाय हूँ इति मंत्रेण कराभ्यामर्दयित्वा उक्ली इति दक्षिणहस्तेन समृज्य-30 तत्सत-इनि यामहस्तेनाधाय । ॐ हौं-इत्यैशान्यां नाराच मुद्रयापरित्यक्त्वा पटेन्-ॐ तेसर्वेविलययान्तुयेमां हिंस- न्ति हिंसकाः । मृत्युरोगभयक्रोधाः पतन्तुरिपुमस्तके । अधात्मनि पडंगन्यासं कुर्यात्--ॐ क्रां हृदयापनमः। 30 श्री शिरसेस्वाहा D शिखायैवषट् । ३॥ * कवचायहुम् । ॐ को नेत्रत्रयाय चौपट् । का स्त्रायफत् । इति तालत्रयं दत्वा 30 क्रां अंग्रष्टाभ्यां 30 फ्री तर्जनीभ्यां नमः। . मध्यमाभ्यांनमः । ॐ अनामिकाभ्यांनमः। ॐ क्रीं कनिष्ठिकाभ्यांनमः। 30: करतलकरपृष्ठाभ्यां चौपट् । तत यंत्रोपरि हस्तंक्षिपेत्-30 श्राः सुरेखेवज्ररेखे हँफट् स्वाहा । इतिस्पृष्ट्या 30 नो फ्री क्री ही ही है है दक्षिणकालिकायैनमः इति पंचगव्येन संप्रोक्ष्य, ॐ अस्य श्रीदक्षिणकालिका यंत्र प्राणप्रतिष्टा मंत्रस्य ब्रह्माविष्णु रुद्राऋषयः ऋग्यजुः सामानिछन्दांसि अग्निवायुसूर्यस्तत्वानि प्राणप्रख्या पराशक्तिश्चतन्य रूपिणी देवताओं चीज ही शक्ति को कीलकं चातुर्वर्गफलाप्तये श्रीस्वेष्टदेवता दक्षिणकालिका यंत्रमाण प्रतिष्ठापने (२७२) वार्ममएड रक्षाकरे, कालिका यत्र पूजा पक्षति विनियोगःतत यंत्रोपरि हस्तनिधायन्यासं कुर्यात-30 प्रीब्रह्म विष्णु ऋपिभ्योनमः शिरसि ॐ नी ऋग्यजुः सामईन्दो भ्योनमः रुद्रमुखे । ॐ क्रीं चैतन्यरूपिणी प्राणाख्यापराशक्ति देवतायैनमः हृदये । ॐ वीजायनमः गुहो । ॐ हीं शक्तयेनमः पादयो । ॐ ल्की कीलकायनमःसर्वाङ्गे। एवंन्यास यंत्रेविधाय वक्ष्यमाण मूलमंत्रमष्टोत्तर शतं जपेत्-ॐ श्रां ह्रीं क्रीय रं लं वंशं पं सं हों ॐ शं सं हं सं ह्रीं ॐ हंसः श्रीमद्दक्षिणकालिकायाः पद् त्रिकोणाष्टदल भूपुरात्मक यंत्रस्य सजीव वाड्मनश्चक्षुः श्रोत्रघ्राण प्राणः सर्वेन्द्रियाणिचेहागत्य मुखंचिरं तिष्टंतुस्वाहा । ॐ यंत्र- राजायविद्महे महायंत्रायधीमहि । तन्नोयंत्रः प्रचोदयात् । इति दशवारं जप्त्वा । रक्त चन्दनालोडिनाक्षत पुष्पैराधार शक्त्यादि पूजनं कुर्यात-ॐ ह्रीं थाधारशक्तिभ्योनमः ॥ ततः पीठ शक्तीः पूजयेत्-ॐ जयायैनमः । ॐ विजयायनमः। 30 अजितायैनमः। ॐ अपराजितायैनमः। ॐ नित्यायैनमः । ॐ विलासिन्यैनमः। ॐ दोग्ध्यनमः । ॐ अघोरायनमः। ॐ मंगलायैनमः। ही कालिकायोग पीठात्मनेनमः। 30 हों सदाशिवमहाप्रेतपद्मासनायनमः । एवं यंत्रं प्रतिष्ठाप्य., आचार्य वृणुयात्-वरणद्रव्यमाचार्यच संपूज्य संकल्पं कुर्यात्- 30 अद्येत्यादि देशकालौ संकीर्त्या मुकराशिरमुकगोत्र प्रवरान्वि- तोऽमुकोऽहं चातुर्वर्ग फलाप्तये श्रीस्वेष्टदेव्या दक्षिण कालिकाया यंत्र पूजानार्थमाचार्यत्वेनत्वां वृणे वरणद्रव्यं दत्वा प्रार्थयेत् ।। आचार्यस्तु यथास्वर्ग० । तत श्राचार्यों यजमान द्वारा पूजनं कारयेहा स्वयं कुर्यात् । ततहस्ते रक्ताक्षत पुष्पाण्यादाय मध्य त्रिकोणे कालींध्यायेत्-30क्री कराल वदनां घोरां मुक्तकेशी चतुर्भुजां कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुंडमालाविभूषिताम् । शव- रूप महादेव हृदयोपरिसंस्थिताम् । शिवाभिॉर रूपाभि श्चदिनुसमन्विताम् । आवाहनम्-श्रात्मसंस्थामजांशुद्धा त्यामह परमेश्वरीम् । श्रारण्यमिव हव्यांशंयंत्र यावायाम्यहम् । ॐ फर्मकाण्ड रहाकरे, कालिकायंत्र पूजा पद्धतिः (२७३) । . क्री की फ्री ही ही है है-दक्षिणकालिकायैनमः । भगवति दक्षिण कालिके सावरण शक्तिसहिते. इहागच्छेहतिष्ट तिष्ठ । 30 देवेशि भक्ति सुलभे परिवारसमन्विते । यावत्वां पूजयिष्यामि तावत्त्वं सुस्थिराभव ॥ इति संस्थाप्य,, पुष्पासनम्-ॐ अस्मिन्वरासने देविसुखासीना s क्षरात्मिका । प्रतिष्टिता भवः सात्वं प्रसीद परमेश्वरि ॥ ॐ एहिभगवति दक्षिण कालिके इहमतिष्ठिताभव, इहसन्निधेहिच इहसन्निधस्व.॥ ॐ क्रीं भगवति दक्षिणकालि. के, इह सम्मुखीभव । ॐ हुँ भगवनि० इह अवगुंठिताभव 30 दापीयूष वपिण्या पूरयेयज्ञविष्टरम् । मृत्तीवा यज्ञसंपूत्तौस्थिरा भवमहेश्वरि ।। ॐ क्रीं क्रीं क्री ही ही है है दक्षिणकालिकायै नमः,, इत्यंजलिमुद्रया स्थिरी करणं कृत्वा देवतांगेवक्ष्यमाण पडंगन्यासेन सकलीकरणं कुर्यात्-तद्यथा-क्राँ हृदयायनमः, क्री शिरसेस्वाहा, शिवायैवपट् , मैं कवचायहुम, क्राँ नेत्रत्र- यायचौपद, क्रः अस्त्रायफत् ॥ ततोयंत्रे-वक्ष्यमाण लेलिहान मुद्रया प्राणस्थापनकुर्यात्-तद्यथा-(तर्जनी मध्यमानां समां कुर्यादधोमुखीम् । अनामायां क्षिपेद्वद्धांऋजुकृत्वाकनिष्टिकाम् । लेलिहानात्ममुद्रेयं जीवन्यासे प्रकीर्तिता) ॐ अस्यश्री दक्षिण कालिका प्राणस्थापन मंत्रस्य ब्रह्मविष्णुरुद्रापयः ऋग्यजुः सामानि छन्दांसिअग्निर्वायुः सूर्यस्तत्वानि प्राण प्रख्यापराशक्तिः चैतन्यरूपिणीदेवता याँ वीज ही शक्तिः क्रों कीलकं चातुर्वर्ग फलाप्तये श्री स्वेष्टदेवता दक्षिण काल्याः प्राणस्थापने विनि- योगः ॥ ततो यंत्रोपरि-लेलिहानां मुद्रांकृत्वा पटेत-ॐ आँ. ही को य र ल व शैं | सँ हों ॐ हंसंहंसः हीं ॐ हंसः श्री मद्दक्षिणकालिकायाः प्राणाः इह प्राणाः ॥ ॐ आँ ही क्रो र लं च शसँ हों ॐ सहसः हीं ॐ हँसः श्री मद्दक्षिण कालिकाया जीवइहस्थितः, ॐाँ ह्रीं क्रो गर ल व श प स हो 30 सहसः ह्रीं ॐ हँसा, श्रीमदक्षिणकालिकायाः, वार- ३५ (२७४) ६.मकाएर रक्षाकरे, कालिका यंत्र पूजा पद्धति. - मनश्चतुः श्रोत्रघाणप्राणाः सर्वेन्द्रियाणिइहागत्य सुग्वचिरं तिष्ट न्तुस्वाहा । ततोवारत्रयं मूलमंत्रेणा_दकेन मोक्षण कुर्यात्- ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ही हूँ है दक्षिणकालिकायैनमः, इति यंत्रं संमोक्ष्य,,-ॐ ऐ-इति मंत्रेण महायोनिमुद्रां दर्शयित्वा-खड्ग मुद्रांदर्शयेत् ततः पुष्पांजलिंदद्यात्-ऐ पादयोः, ऐ जानुनि, ऐं नाभौ, ऐं हृदये, ऐ शिरशि,, ततः पाद्यम्-ॐ यद्भक्ति लेश संपर्कात्परमानन्द संभवः । तस्मै ते चरणाजाय पाद्य शुद्धाय फरुपये ॥ (30 क्री ३ ही २ है २ दक्षिणकालिकायैनमः इदंपाय निवेदयामि ॥ इति मूल मंत्रान्ते सर्वत्रसपर्या निवेदन कुर्यात) आचमनम्-ॐ वेदानामपि वेदायदेवानां देवतात्मने आचम कल्पयामीशे शुद्धानां शुद्धिहेतवे ॥मू०॥ मधुपर्कम्--सर्वकालुष्य हीनायै परिपूर्णसुखात्मने । मधुपर्क मिवंदेवि कल्पयामिप्रसीदमे ॥०॥ पुनराचमनीयम् -30 उच्छिष्टोप्यशुचिर्वापियस्याः स्म- रणमात्रतः । शुद्धिमाप्नोति तस्यै तेपुनराचमनीयकम् ॥ अर्घ्यम्- ॐ तापत्रयहरं दिव्यं परमानन्द लक्षणम् । तापत्रयं विनिर्मक्तं तवाध्य कल्पयाम्यहम् । ततः सतैल हरिद्रायुद्वर्तनम्- गृहाण मातः स्नेहेन गात्रोद्वर्त्तन हेतुकम् । हरिद्रामिश्रितं तैलं ददामि स्नेहमुत्तमम् । स्नानीयम्-ॐ परमानन्द बोधाब्धि निमग्न निज मूर्तये । सांगोपांगमिदं स्नानं कल्पयाम्यहमीश्वरि । वस्त्रम्- ॐ मयाचित्र पटच्छन्न निजगुह्योरु तेजसे। नियारणाय विज्ञा न वासस्ते कल्पयाम्यहम् । भूषणानि--ॐ स्वभाव सुन्दरांगाये नाना शक्त्याश्रितेशुभे । भूपणानि विचित्राणि कल्पयाम्यमरा- चिते ॥ चन्दनम्-30 नानागंध समायुक्तं केशरेण सुरंजितम् । गृहाण चन्दनमातः सर्वशक्तिसमन्विते । सिन्दुरं-सिन्दरं परमं दिव्य भालशोभा करंपरम् । परमानन्द सौभाग्ये गृहाणत्वंच कालिके ।। अक्षतम्-ॐ अक्षतान्धवलांन्देवि सर्वसौभाग्यदा यिनि । चन्दनोपरिशोभार्थं गृहाण परमेश्वरि । पुष्पं--ॐ देवोपवन संभूतं नानावर्षमनोहरम् । अमंद सौरभ पुष्पं गृह्यतां जगदंविके कर्मकाण्ड रनाकरे, कालिका यंत्रपूजा पद्धतिः , धूपम्--ॐ वनस्पति रसोत्पन्न गन्धाढ्यं सुमनोहरम् । आधेय सर्व देवानां धूपोय प्रतिगृहाताम् ॥ दीपम्-सुप्रकाशो महाज्योति सर्वतस्तिमिरा पहः । सवाहाभ्यन्तर ज्योतिर्दापोऽयं प्रतिगृध- ताम् ॥ ततो नाना व्यंजनयुतं नैवेद्य सत्पात्रे निधाय, भूमौगधेन त्रिकोण चतुरस्रमण्डलं कृत्वा तदुपरि तन्नैवैयपूरितपात्रं नि- धाय,, 30 फद्, इति मंत्रेण द्वादशवारं जप्त्वाभिरचय,, ॐ य,, इतिवायुवीजेन संशोष्य, वामकरतलेदक्षिणहस्तपृष्टं कृत्वा,, ॐ ₹, इति वन्हि जेन द्वादशवार जप्तेन सन्दहा, दक्षिणह- स्ताग्रेण संस्पृश्य,, ॐ व,, इति सुधावीजेन धेनुमुद्रयाऽमृती- कृन्य, ॐ क्रीं क्रीं क्रीं ह्रीं ही हूँ हैं दक्षिणकालिकायैनमः ॥ इति मंत्रेणकराभ्यां संस्पृश्याट वारमभिमंत्र्य धेनुमुद्रां प्रदर्य गन्धपुष्पैः समभ्यर्चतत्वाख्य मुद्या देव्यै नैवेद्यं निवेदयेत । ततः सजलशंखहस्तेनिधाय तजलेन मूलमन्त्रेणाभिषिच्य, ॐ सत्पात्रसिद्धं सहविर्षिविधानेकभक्षणम् । निवेदयामिदेवेशि कृपयात्वंगृहाणतत् । ततो ग्रासमुद्रांप्रदय शंग्वोदकेननिवेदयेत् । 30 अत्रएडानन्दसम्पूर्ण गृहाएजलमुत्तमम् । समस्तदेवदेवेशि सवाप्तिकरंपरम् ॥ ततः पंचप्राणादिमुद्राभिः-30 प्राणाय स्वाहा, 30 पानायस्वाहा, 30 समानायस्वाहा, ३. उदानाय स्वाहा, 30 व्यानायस्वाहा, जलनिधाय-30 क्रीं क्रीं क्रीं हो ही है दक्षिणकालिकायैनमः, ईदनैवेद्यं निवेदयामिनमः, इदानीं मद्यपैः सुरादेया, नतुव्राह्मणैः, मन्त्र:- द्राक्षादिपरमंदिव्य मासवंतृप्तिकारकम् ॥ गृहाणपरयाप्रीत्या कालिकेयुद्धदुर्मदे ।। जलम्-नैवैद्यान्तेजलमातः करास्यपादशोधनम् ॥ प्राणतृप्तिकरं चव गृहाएजगदम्बिके ॥ ततो नैवैद्यवत्ताम्बूलमभिमन्त्र्यवामकर तल उत्तानदक्षिणहस्ते, पूगीफलमैलालवङ्गाखादिरयुतं नागवल्ली दलंचनिधाय,-30 एलालवङ्गकपूरनागवल्लीदलैर्युतम् । पूगभागे रितंदेवि ताम्यूलंगृहातांनमः, पूर्ववन्मूलमन्त्रेण निवेदयेत || उपा- यनम्--उपायनीभूतमिदंद्रव्यं देविददाम्यहम् । गृहाणकालिके , (२७६) कर्मकार हु रताकरे, कालिका यंत्रपूजा पद्धति: मातः सर्वारिठंनिवारय, ततो मुखप्रदेशेतत्वमुद्रांप्रदय॑हस्तेपुष्पं निधाय--30 सविन्मयेपरेशानि परामृतेचरुप्रिये, अनुजांकालि केदेहि परिवारार्चनायमे । तत श्रावरणपूजामारभत्-पुष्पंधृत्वा ध्यायेत- 30 सर्वाश्यामाग्रसिकरा मुण्डमालाविभूपिताः । तर्जनीवामहस्तेन धारयन्त्यश्चसम्मिताः ॥ ततोवाषष्टत्रिकोण स्याधःकोणे-ॐ क्री कालीस्थापयामिनमः, ततस्तत्रिकेव्यावाम कोणे-30 के कपालिन्यैनमः स्था० । तत्रदक्षिणभागे 30 . कुल्लायनमः स्था० । एवंसर्वत्र वामावर्तेनस्थापयेत्-ततोवाहा- द्वितीयाभ्यंतरत्रिकोणस्याधःप्रदेशे-ॐ ३ कुरुकुल्लायैनमः स्था० तत्रदेव्यावामे-ॐ विं विरोधिन्यनमः स्था० । नत्रदक्षे--ॐ विं विप्रचित्तायैनमः स्था। ततो वाहातृतीयत्रिकोणाधःप्रदेशे- ॐ ॐ उग्रायनमः स्थापयामि । तत्रदेव्यायामे-30 उग्रप्रभा- यैनमः स्था। तत्रदो-30 दी दीप्तायैनमः स्था० । ततो वाह्याचतुर्थत्रिकोणाधाप्रदेशे-30 नी नीलायैनमः स्थायामे- ॐ घनायैनमः स्था० । तत्रद-30 व वलाकायैनमः । स्था० ततोवाहातपंचम त्रिकोणस्याधः प्रदेशे-30 मां मानायैनमः । वा-ॐ मैं मुद्रायेनमः । दक्षे-30 मि मित्रायैनमः स्थाप- यामि ॥ ततो मध्यत्रिकोणेदेव्या दक्षिणभागेमहाकालंध्यायेत- पुष्पम्-ॐ अञ्जनाद्रिनिभदेवं पिगकेशंद्विवाहुकम् । अाशांवरं सर्पभूपा भूपितंप्रणमाम्यहम् , इति ध्यात्वा । ॐ ह्रीं ही है महाकालाय हौं महादेवाय क्री कालिकायै हौं । इति मन्त्रेण पाचादिभिःसम्पूज्य । २० कालिकादि पंचदशत्रिकोणस्थ शक्ति भ्योनमः, इति सम्प्रज्य, तनोजलंगृहीत्वा-ॐ अभीष्टसिद्धिं मेदेहिशरणागतपालिके । भक्त्यासमर्पयेतुभ्य मिदमावरणार्चनम् इति शंग्बोदकेनदेव्या वामहस्तेयावरणार्चनंसमर्पयेत् ॥ ततोऽ दिलकमलेपूर्वादि दक्षिणावर्तक्रमेणाप्टशक्तीरावाहयेत-पूर्वदले- दुप्पानतः-30 दण्डफमगरलं पश्चादनसृनभहाभयम् । विभ्रती फनाल्टायां नालीमावाह्याम्यहम् ॥ 0 यों ब्रामाण्यनमः ।
कर्मकाण्ड रताकरे कालिका यंत्रपूजा पद्धति (२७७) स्थापयामिपूजयामि ॥ अग्निकोणे-30 नारायणीमहामायां शंग्वं चर्कचविभ्रतीम् । चतुर्भुजांसौम्यरूपां देवीमावाहयाम्यहम् ।। ॐ ई श्रीनारायण्यैनमः स्था० पू० । दक्षिणे-30 महिपनी महामायां त्रिशूलचरधारिणीम् । आवाहयामिदेवेशीदेची माहे- श्वरीपराम् । माहेश्वयनमः स्था० पू० ।। नैर्ऋते-ॐ खग चक्र कपालंच दधतीश्यामलांशुभां। आवाहयामिदेवेशीचामुण्डां मुण्डघातिनीम् । ॐ श्रीचामुण्डायैनमः । पश्चिमे-30 पाश दण्डञ्चखण्डञ्च विभ्रतीपरमेश्वरीम् । आवाहयामिदेवेशी कौमारीकोमदायिनीम् ॥ 30 लकौमार्यैनमः ॥ वायव्ये-अपरा- जितामहामाया मपराणांनिपूदिनीम् । करालास्योरौद्गरूपां देवी मावाहयाम्यहम् ॐ ऐं अपराजितायैनमः ।। उत्तरे-~30 तुण्डप्रहार विध्वस्तांदंष्ट्रो तवसुन्धराम् । आवाहयामि वाराही घुर्घरां घोरनादिनीम् ॥ 30 वाराहै नमः । ईशाने-30 पंचास्यामुग्रवदनां शिवाशतनिनादिनीम् । आवाह- यामिदेवेशीनारसिंहीं महावलाम् । अः नारसिंहानमः । एवमष्टशक्तीः सम्पूज्य जलंगृहीत्वा--30 अभीष्ठ सिद्धिं मेदेहि शरणागतपालिके । भक्त्यासमर्पयेतुभ्यमिद मावरणार्चनम् । इति देव्यावामहस्तेनिवेदयेत् । ततो मंडलाभ्यंतरेकमलपत्रयो- रंतरालेषु पूर्वादिक्रमेणदक्षायतन भैरवांस्थापयेत्--पूर्व-30 य य य यक्षरूपं दशदिशिशुपितं भूमिमामोडयंत । स स सहार- मूर्ति शिरसिवरजटा शेखरंचन्द्रबिंवम् । = = = दीर्घकार्य प्रवि- कृतनयनमूर्ध्वरोम सहासम् । 4 पँ मैं पापनाशमसितवदन भैरवं स्थापयामि । ऐं ह्रीं अँ असितांगभैरवायनमः स्थापयाम पूजयामि, एवंसर्वत्र । आग्नेये--30 ₹ ₹ ₹ रक्तवर्ण कटितट , कठिनतीक्ष्णदंष्ट्रंकरालं, घे घे घोरघोपं घघघ च घटितं धर्धरा घोर नादम् । ऊँ ऊँ ऊँ कंकरूपंकरधृतकुलिशं भैरवंरूकसंजम् । द , दिव्यदेह बहुविधवरदमाग्नेके स्थापयामि । में ही रूर भरवायनमः स्था० पू० । दक्षिणे . च च च चण्डवेगं (२७८) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, कालिका यंत्रपूजा पद्धति प्रचुरभयकरांमृकुकिणी लेलिहतं, . के कृष्णदेहं कुटिलनग्न मुग्वं चंडसंजमहोग्रम् । ॐ ॐ ॐ मण्डमालं व्यपगतवसनं ताम्रने- बंकरालं, मैं मैं मैं कालदंट करधृतकवचं भैरवं स्थापयामि । हीं ॐ चण्डभैरवायनमः स्था० पू० । नैते-ॐ वं ग्व व ग्बगहस्तं खग्वग्व वदतक्रोधसंजंचलतं, है हैं हैं हस्तिहस्तं त्रिभु- वन निलयंकरमलंभीमरूपम् । यूँ भू भू भूतनाथं भवभयभवनं रक्तनेत्रंकराल, उ उ उ उग्रदंष्ट्र स्वजनभयहरं भैरवं स्थापयामि । में ही मैं क्रोधभैरवायनमः स्था० पू० । पश्चिमे-ॐ शैं श शंखहस्तं भूवनविजयिनं दीर्घजि विशाल, स स स स्वेदन्विन्नश- शधरधवलं भीममुन्मत्तसंजं । मैं मैं मैं भव्यभूतिकिलकिलकशिनं गेहगेहेललंतं, व व व वारणास्त्राकलितकरयुगं भैरवं स्थापयामि ऐ ही लू उन्मत्त भैरवायनमः स्थापयामि पूजयामि । वायव्ये छ छ छ छद्मदेहं विपविपममना कालकालंकरालं, व व व वायुवेगवहुविधगमनं, कोटिज्योतिः प्रकाशं । हुहुहुँ कारनादं भुवनभयहरंगर्जनं रौद्ररावं, कापालंधारयंतं निजकरयुगले भैरवं स्थापयामि । ऐं ही कपाली भरवायनमः स्था० पू० । उत्तरे ७० यो यों या योगिराज सकलगुणमयं भीषणारव्यंदयालं, शरों यूँ शुलहस्तं डमरचयुतं डिण्डिमं वादयंतम् । ॐ ॐ रुद्र रूपं भुवनभयहरं मुंडमालॅस्त्रिनेत्रं, ए ऐ ऐश्वर्यनाथं स्वभिमत वरदं भैरवं स्थापयामि । ही ओं भीषण भैरवायनमः स्था० पू० । ईशाने-- स स स हारूप मटतिवहुविधं द्वादशार्कप्रकशम्, भं में मैं भस्मदेहं कपिलवर जटाजूटविस्तीर्ण केशम्।ई ई ईशान रूपं त्रिभुवनदहनेकोप कोपाग्निरूपं वन्देहंभूतनाथं सकलभवहरं भरवं स्थापयामि से ही अँ संहार भैरवायनमः, स्था० पू० । पाद्यादिभिः संपूज्य जलं गृहीत्वा 30 अभीष्ट सिद्धिंमेदेहि शरणागतपालिके । मरुत्यासमर्पयेतुभ्य मिदमावरणा चनम् । तत्रैवपूर्यादितोवामावर्तनाष्ठौ भैरवी स्थापयेन्--ध्यायेत् ॐ भैग्योष्ठौ महामायाः किंकिणीजालमंडिताः । सायुधावरदास्सर्या कमकाण्ड रनावरे, कालिका यंत्रपूजा पात: स्थापयामीह भक्तितः । पूर्व ॐ श्री भैरव्यैनमः स्थापयामि पूजयामिः। एवंसर्वत्र ईशाने 3 महाभैरव्यैनमःउत्तरे- सिंहभैरव्यैनमः । वायव्यै- ॐ धूम्रभैरव्यैनमः । पश्चिमे--ॐ ॐ भीमभैरव्यैनमः । नैऋते ॐ उन्मभरव्यनमः । दक्षिणे-- ॐ वशीकरणभैरव्यैः। श्राग्नेये-ॐ मोहन भैरव्यै नमः । इति संम्पूज्य जलंगृहीत्वा अभीष्ट सिद्धिंमेदेहि शरणागतपालिके भक्त्या समर्पयेत्तुभ्य मिदमावरणाचनम् । इति जलदेव्यावाम- हस्ते समर्पयेत् (ततो महिपवलि प्रयोगेकैश्चिञ्चतुः पष्ठि योगि- नीनामपि स्थापनमुक्तम् नित्यपूजा प्रयोगादौतुनासौविधिः । तत्स्थापन क्रमस्तु पूर्वादितोवामावर्तेन मंडलावहिरूपमंडतचतुः पष्ठि त्रिकोणात्मकमाभ्यन्तर मंडल संलग्नं कृत्वा स्थापयेत् । तद्वहिरपालस्थापनमितिदिक् ) नाममंत्रै योगिनीनां पूजनंस्था- पनं च कुर्यात्-ध्यानम् ॐ युदोन्मत्ता महादेवी सर्व सौभा- ग्यदायिनीः । पूजार्थं च चतुःषष्ठीयोगिनीः स्थापयाम्यहम् ॥ ततो रक्ताक्षतपुष्पैः । दिव्येश्यैनमः स्थापयामि पूजयामि एवं सर्वत्र- ऐ महारूपायैनमा । सिध्यैश्वर्यैः । गणेश्वर्यै। प्रेतायै० में डाकिन्यै० कालिकायैओंकायनमः । रुद्रवे- ताल्य०। कालरात्र्यै० में निशाचर्चाहींका, भूतडांव/० अलकेशिन्यै। विरूपादयः । शुष्कांग्गै नरभो- जनायै०।६ भरोडयनमः । वीर भद्रायै० रातस्यै०। घोररक्तादौ०।२० विरूपायै० । भयंकय । -भासुर्यैः । १ रुद्रवेताल्य०।६ श्रीपराय० । त्रिपुरान्तकायै० } में भैरव्यै नमः। ध्वंसिन्यै। क्रोधिन्य० । दुर्मख्यै० में प्रेतवाहि- भ्य। कंटक्यनमः। एत्रोटक्यनमः। में यमदत्यनमः । करात्य० । पं. खट्वाग्य०।१० दीर्घलंबोष्टिकायै०। कालाग्नि गृहिण्यः । ऐ चक्रय ० मालिन्यः । में मंत्रयोगिन्य। धूम्रायः । ॥ कलह प्रियायै । ६ ककाल्य। ६ भुवनेश्वर्यै । नस्फारायै । ऐकावयैः । स लौपिवये । . काहये ।
(२८०) कर्मकाण्ड रताकरे, कालिका यंत्रपूजा पद्धतिः- भक्षिण्यै० । ६ अधोमुख्यै० । ए प्रेरण्यै । ६ व्याध्० । , कंकण्यै नमः । ६ प्रेतभक्षण्यैः । वीर कौमारिकायै। चण्डायैः। पारा०।६ मुंडधारिण्यै० । कामाक्ष्यैः । ५ उड्डाण्यै०। ऐ जालंधर्य। महालक्ष्म्यैनमः ॥ इति स्थापयित्वा-ॐ हीं क्ली दिव्येश्वरीमारभ्य महालक्ष्मी पर्यन्त चतुःहष्ठियोगिनिभ्यो नमः ॥ इति पाद्यादिभिः संपूज्य,, हस्तेजल गृहीत्वा-अभी- प्ट सिद्धिंमेदेहि शरणागत पालिके ॥ भक्त्यासमर्पयेतुभ्य मिदमा वरणार्चनम् ॥ ततोयंत्र वहिरष्टदिविन्द्रादि लोकपालानायोहयेत् पूर्वे-30 ल इन्द्रायनमः । श्राग्नये- वन्हयेनमः। दक्षिणे- 30 यमायनमः। नैऋते-ॐ नितयेनमः। पश्चिमे-30 व वरुणायनमः । वायव्ये--30य वायवेनमः । उत्तरे-30 कुवेरायनमः । ईशाने-ॐ हों ईशानायनमः । यंत्रोपर्याकाशे- ॐ हौं ब्रह्मणेनमः। यंत्राधोमुले-ॐ अनन्तायनमः ॥ 30 इन्द्रादि दशदिक्पालेभ्योनमः, इतिसंपूज्य, ततः पूर्वादि क्रमेणैवास्त्राणि स्थापयेत्-पूर्वे--30 वयज्राय नमः प्राग्नये-- ॐ शं शक्तयेनमः । द. ॐदै दण्डायनमः । नै0 31 ख खगायनमः। प० ॐ पंपाशायनमः । वायव्ये अँ अंकुशाय नमः । उ०-ॐ गंगदायैनमः ।ई.-0 शूलायनमः । यंत्रोप- र्याकाशे- ॐ पं पद्मायनमः । यंत्रमूले-ॐ चं चक्रायनमः । 32 वयादिशस्त्रेभ्योनमः । इनि सम्पूज्य जलंगृहित्वा 30 अभीष्ठ सिन्डिंमेदेहि शरणगतपालिके । भक्त्यासमर्पयेत्तुभ्यमिदमावरणा चनम् ततस्त्रिकोणमध्ये देण्याचमोर्ध्वहस्ते अ व खगनाथा- यनमः । सम्पूज्य, तदधः- मुं मुंटयनमः, सं० । दक्षोर्चहरते ॐ अं अभयायनमः । सं०। तदधः-30 व वरायनमः सम्पूज्य ॐ अभीष्ट सिद्धिंमेदेहि शरणागतपालिके भक्त्यांसमर्पयेत्तु भ्यमिदमावरणाचनम् । इति सर्यावरणाचनं देव्यावामकरे समयेत् ततः पाद्यादि नीराजनान्तां संघपूजां कृत्या, वदयमाण मंत्रपुष्पांजलिंदेव्याः पादयोनिवेदयेत्-30 नमंत्रनोत्रं तदपि , कर्मकाएर रताकरे कालिका पूजा पति (२५) च नजानेस्तुतिमहो । नचाहानध्यानं तदपिच नजानेस्तुतिकथाः ॥ नजानेमुद्रास्ते तदपि.चनजाने विलपनं । परंजानेमात स्त्वदनुशर- एं क्लेशहरणम् ॥१॥ द्वितीयाम--30 विधेरज्ञानेन द्रविणविरहे पालसतया । विधेया शक्यत्वा त्तवचरणयोर्याच्युतिरभूत् । तदेतत्क्षतव्यं जननिसकलोद्धारिणि शिवे. कुपुत्रोजायतकचिदपि कुमातानभवति ।। तृतीयाम्-30 जगन्मातर्मात स्तवचरण सेवानरचिता। नवादत्तं देविद्रविण मपिभूयस्तवमया। तथापित्वं स्नेहं मयिनिरुपम यत्प्रकुरुषे । कुपुत्रो जायतकचिदपि कुमाता न भवति ।। इतिवार जयं देव्याः पादयोः समर्य, ततोदेव्यगे षडंगन्यासं कुर्यात-30 फ्रॉ हृदयायनमः, ॐ क्रीं शिरसेस्वाहा, ॐ शिखायवौपट्, ॐ के कवचागहुम् । ॐ क्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् , क्रः अस्त्रायफ, एवंन्यासं विधाय पात्रेमधुकपर मिश्रित जल कृत्वादेवीं तर्पयेत्-~-30 फ्री क्रीं ह्रीं ही हूँ हूँ, श्री दक्षिण कालीदेवीं तर्पयामि,, नमः ॥ इति द्वादशवार-संत- ये घटां वादयित्वा जयकाली त्य-चै द्रूयात् ॥ अथवलिप्रयोगः ततोयंत्र वामे भृमौत्रिकोण चतुरस्र मंडल वृत्वा, तदुपरि पात्रं संस्थाप्य तस्मिन्मांस मापान शाकाज्य पायसापकाद्यन्यतम वलिं संस्थाप्य,, हूँ फट् ,, इतिजलेनसंमोदय, क्रीनमः, इति गंध पुष्पैरभ्यर्य, यं, इतिवायु वीजेनद्वादशवार जप्तेन संशोष्य घोसकरतलोपरि दक्षिण हस्तपृष्टं कृत्वा, रं, इति वन्हिवीजेन षोडशवार जप्तेन धेनुमुद्रयाऽमृतीकृत्य, है, इत्यवगुट्य योनिधे नुमुद्रे प्रदर्शयित्या तत्वमुद्रांच प्रदर्य, ॐ श्री श्री भगवति दक्षिणकालिकायै स्वाहा एपपलिनमः । इतिवल्युपरिजललिप्त्वा नैऋत्यां स्थापयेत् ॥ कालरात्री चलिप्रयोग: यदि कालरात्री पूंजाचेद्रात्रौ छागाधन्यतम काम्यवलियः, तत्र छागपूजापद्ध त्या छागसंपूज्यधातयित्या तेनैवमकारेण देव्यै निवेद्य, तत्रान्य तंगवलिं बलिप्रयोगोक्तप्रकारेण संरक्ष्य, तत्रमंत्र:- पो .
(२२) कर्मकाण्ड रताकरे, कालिका यंत्रपूजा पद्धरिः पद्मे महापद्म पद्मावति कालरात्रे महायाधिपेयोपनीतमिम वलिं गृह गृह गृह्णापय गृह्णापय, मम सर्वारिष्ठ शान्ति कुरुकुम डाकिनीशाकिनी भूतप्रेतादि कृत महाव्यथांमहामारीच निवारयं निवारय, परविद्यां चाकृष्या कृष्य छिन्धिछिन्धि, भिन्धिभिन्धि खड्नेन निरयंकृत निरयंकृत मम सर्वापराधान्नमस्व । ही हूँ स्वाहा । इतिमंत्रेण, वलिंचतुष्पथे वानर्ऋत्ये क्षिपेत् , महिषवलि प्रयोगे यंत्रादतिरिक्तं यंत्रदृष्टिगतस्थाने कीयदृरे महिषपूजनार्थ चतुरस्त्रं स्थानंकृत्वा तत्र महिषमानीय महिषपूजापद्धत्या सम्पू- ज्य तत्रैव, एकप्रहारेण महिपस्यशिरश्छित्वादेव्यग्रे दृष्टिपथेभूमी निधाय, पूजोक्तपद्धत्यनुसारतः समर्पणं कुर्यात् । विस्मृत्यापि यंत्रमध्येदेव्युपरिमहापशुछेदननकुर्यात् । उक्तं च देवीभागवते- देव्यग्रे निहतायान्ति पशवः स्वर्गमव्ययम् ।। नहिंसा पशुजातन्त्र निघ्नतां तत्कृते नघ ॥ मांसाशनं येकुर्वन्ति तैः कार्यपशुहिंसन म् । अहिंसा याज्ञिकीमोक्ता सर्वशास्त्र विनिर्णये,, अनाग्रशब्द स्यार्थः स्पष्टः देव्यग्रेपशुधातनं नतुयंत्रोपरि ॥ कालिकापुराणे- यंत्रंदेव्या शरीरंच नयंत्रेपशुधातनम् । दभात्कुर्वन्ति येमूदास्तेषां नाशो भवेटुवम् ॥ यंत्रं तु देव्याः शरीरं नतुपशुधातनार्थ माधा- रम् । एतत्पशुहिंसनन्तु ब्राह्मणेतर क्षत्रियादीनामुक्तम् ।। मांशा शनं येकुर्वन्तीति-बामणस्य कालिका पुराणादिपुसाक्षाद्वलिदा नस्य निषेधकथनात्क्षत्रियादि विषयक एवायंविधिरितियो ध्यम् ॥ उक्तं च शारदातिलके-घ्रामणो नियतः शुद्धः सात्यि कं वलिमाहरेत् , हिंसायुक्तो चलिस्त्वाद्य वर्षहित्वा प्रशस्यते । याचवणं ब्राह्मण वर्णत्यक्त्वे त्यर्थः।। कालिकापुराणे-सिंहव्या धादिकं दत्वा चात्मवध्यामवाप्नुयात् । मधदत्ग ब्राह्मणस्तु नापण्यादेवहीयते, अवश्यं विहितोयत्र वलिस्तत्र द्विजः पुनः । पिष्ठेनापि पृतेनापि निर्मितं तु सपर्पयेत् ॥ छान्दोग्य श्रुतिरपि- अहिंसन्सर्वभूतान्यन्यनतीर्थेभ्यः । नहिंस्यात्सर्वभूतानीत्यपि,, इत्यादियहनिप्रमाणानिशानेपुसन्ति, ततोदेव्यायामे इस्तमान कर्मकाण्ड रनावारे, महिप पूजा पद्धतिः (२८३) त्रिकोणं चतुरस्रवा स्थंडिलं निर्माय पूर्वोक्त होम पन्द्रत्यनु- सारतोऽग्नि स्थापनं कृत्वा मूलमंत्रेण होमंविधाय,, कुमारी पूजन विधिना कुमारीः संपूज्य गोदानादिकं कृत्वा प्राचार्यादि- भ्यो दक्षिणांदत्वा यंत्रपूजास्थल मागत्य कालिकायंत्रस्योत्तराङ्ग पूजनंकृत्वादेवी रक्ताक्षतपुष्पै विसृजेत्-30 गच्छगच्छमहमाये स्थाने मणिपुरे शुभे । इष्ट कामसमृध्यर्थ पुनरागमनं कुरु ॥ इति विसृज्याचार्यों यंत्रोपरितः पत्रपुष्पादिकंगृहीत्या पूर्वोक्ताभिषेक पद्धत्युक्त प्रकारेण यजमान मभिपिच्य मंत्रतिलकं कृत्वा शीर्द- द्यात्ततो ब्राह्मणान्भोजयित्वा यथासुखविहरेत् ॥ इति दक्षिण कालिका यंत्रपूजा पद्धतिः । ॥ अथ महिपपूजापतिः॥ n तत्रादौ कर्त्ता पूर्वोक्त विधिना यंत्रं संपूज्य यंत्र वामभागे कंचिवालणं दैत्यसंहार स्वराजपाठार्थ कृत्वा सच ब्राह्मणो वीररसेणौच स्वरेण दैत्यसंहार स्तवराज महिषछे दनावधि पठित्वा कालिकां प्रार्थयेन् ,, तनो महिपछेदनार्थ यंत्र दृष्टिगनपथे-कीयदुरे चतुरस्र स्थानं कृत्वा, तत्रमंडलोत्तरभा गे दृढं काप्टस्तम्भमुच्छृित्य स्वयं पूर्वाभिमुखः । तत श्राचम्य भूतोत्सादनादिकंकृत्वा स्वस्तिवाचनं पठित्वा महापशु महिपमान येन--30 स्वस्ति न 5 इन्द्रो वृद्धश्रवाः स्वस्तिनः पूपाविश्ववे दाः ॥ स्वस्तिनस्नादों अरिष्टनेमिः स्वस्तिनो बृहस्पतिर्दधातु । यौः शान्ति रन्तरिक्ष ई० शान्तिः पृथिवी शान्ति रापः शान्ति रोषधयः शांतिर्वनस्पतयः शान्तिविश्वेदेवाः शान्तिव्र- म शान्तिः सर्व.. शान्तिः शान्तिरेव शान्तिः सामाशान्तिरेधि, शान्तिः३सुशान्तिर्भवतु।ततो महिपायस्तंभसनिधानेकीयद्रे पाचार्याचमनीयं दद्यात् ॥ अर्घपात्रे गंधाक्षत पुष्प जलमेकी - , (२१) कर्मकागड रताकरे, महिष पूजा परति कृत्य, महिषायनमः, एतपायाा चमनीय जल समर्पयामि ॥ ततोमहिषं सर्वागस्नापयेत् , तत्रमन्त्रा:--30 श्रापोहिष्टामयो भुवस्तान 5 ऊर्जदधातनमहेरणायचक्षपे योवः शिवतमोरसस्त स्यभाजयतेहनः उशतीरिवमातर स्तस्मा ३ अरनमामवोयस्य च्याय जिन्वथ ऽश्रापोजनयधाचनः । महिपायनमः, इदंस्ना- नीयं जलंसमर्पयामि, ततोमहिपोपरि सहस्रधारताम्रपात्रंकृत्वा तत्सहस्रधाराभिःस्नापयेत्-30 व्यसो पवित्रमसिशतधारंचसोः पवित्रमसिसहस्रधारं । वसोः पवित्रेएशतधारेण सुप्वाकामधुवः ततःपंचसुगन्धमिश्रितजलेन-50 गन्धद्वारांदुराधर्षां नित्यपुष्ठां करीषिणीम् । ईश्वरीसर्वभूतानां तामिहोपह्वयेश्रियम् ॥ ततः पुष्पोदकेन--30 श्रीश्चतेलक्ष्मीश्चपत्न्यावहोरात्रे पार्वेनक्षत्रा- णिरूपमश्विनौव्यात्तम् । इपणंन्निपाणामुम्मईषाणः सर्वलोकम्म ईषाणः । पुनरनैनैवमन्त्रेणनदीजलेनस्नापयेत्--नदीजलाभावेघटे ॐ गंगेयमुनेचैव० इत्यभिमन्यस्नापयेत्-ततोहरिद्रा रंजितलम्व चीरेमहिषग्रीवायां विल्ववृक्षशाखांवन्नीयात् ततोललाटेकन्जलमि श्रितसिन्दरंगन्धपुष्पाणिचदद्यात् ततःकठेत्रिसूत्रंबध्नीयात्-मंत्र:- -अवभृथनिपुण निचेहरसि निचुम्पुणः । अवदेवैर्देव कृतमेनो याशिषमव मत्यैर्मत्यकृतं पुररावणो देवरिषस्पाहि ।। दृपदादिव मुमुचानः स्विन्न स्नातो मलादिव पूतं पवित्रेण वाज्यमाप: शुधन्तुमैनसः ॥ पुष्पमालाम्-0 अम्बे अंबिके अंबालिके नमा नयतिकश्चनः । सस्वत्य श्वकासुभद्रिकां काम्पीलवासिनीम् । ततो गंधद्वारेति मंत्रेण शृंगान्तरेअर्धचन्द्रकारं रक्तगन्धेन कुर्यात- रक्तवस्त्रम्- युवासुवासा परिवीत अागात्सउ श्रेयान्भवसि जायमानः । तन्धीरासः कवयऽउन्नयन्त स्वापोमनसादेवयन्तः ॥ ॐ श्रीरचनेति मंत्रेण रक्त वस्त्राच्छादित महिषोपरि पुष्पाणि- विकिरेत ।। श्वेतसर्पपानादाय रक्षाबन्धनं कुर्यात्-30 ह्रीं दुर्गे दुर्गे रक्षिणि स्वाहा ॥ इति महिपोपरि भ्रामयित्वा चतुर्दिक्षुक्षि- पेत , ततः पुष्पाक्षः प्रार्थयेत्-30 महिपायनमः., 30 यम- फर्मपाएट रखाकरे, महिप पूजा पद्धति. (२५) . चाहनायनमः, ततोमहिपस्य दक्षिण क% मंत्रराज दशवारं जपेत्- मंत्र:- ॐ ह्रीं दुर्गे दुर्गे रक्षिणि ऐ स्वाहा,, ततः पंचगव्येन प्रोक्षयेत्-हां नेत्रभ्यां चौपट , ततः स्तंभपूजयेत- 30 शिव- स्वरूपिणे महास्तंभायनमः ,, इति मंत्रेण पाद्यादि नीराजनान्तं संपूज्य सतैल सिन्दुरेणानुलिप्यचाक्षतपुष्पैः प्रार्थयेत-0 स्तं- भत्वं शंभुरूपोस ब्रह्मणा निर्मित:पुरा। अतस्त्वां पूजयिष्यामि पशुवन्धन हेतवे ॥ यथाचलोगिरिमा हिमयांश्चांशलोच्चयः ।। सर्वदासिद्धितत्वेनस्तंभराज नमोस्तुते ॥ ततः पासपूजामारभेत्- महापशुबन्धपाशायनमः।। इति मंत्रेण पाद्यादिभिः संपूज्य सतैल सिन्दरेण पाशमनुलिप्यच । प्रार्थयेत्-30 महिपोऽसि- महाकायो भीमरूपी महावलः। एतस्य बन्धनार्थाय पाशतुभ्यं नमोनमः ॥ ॐ वरुणस्य महास्त्राय जंतुवन्धन कारिणे ॥ तुभ्य- नमोस्तुपाशाय सारथ्यकठिनत्वचे। ततः कुशजुलिनाद्भिः पशु प्रोक्षणं कुर्यात्-30 अग्निः पशुरासीत्तेनायजन्तसऽपत ल्लोक मजयद्यस्मिन्नग्निः सतेलोको भविष्यति तंजेष्यसि पिवैताs अपः ।। 30 वायुः पशुरासीत्तेनाय जन्तसऽएतल्लोक मजयद्य स्मिन्वायुः सतेलोको भविष्यति तंजेष्यसि पिवेताऽअपः 1 30 सूर्य: पशुरासीत्तेनायजतसऽतल्लोक मजयस्मिन्सूर्यः सते लोको भविष्यनि तंजेष्यसिपिवैताऽअपः॥ वाचन्ते शुन्धामि अप्राणन्ते शुन्धामि, चक्षुस्ते शुन्धामि, ॐ श्रोते शुन्धामि, 30 प्राणते शुन्धामि, नाभिन्ते शुन्धामि, अभेद्रन्ते शंधामि, पायुते शुन्धामि, ॐ चरित्रांस्ते शुन्धामि, ततः पञ्चमंत्रैश्च- 30 शिरस्तऽप्राप्यायतां 30 वाक्नऽप्राप्यायताम्, 0 प्राणस्तऽ आप्यायतां, चक्षुस्तऽयाप्यायताम्, ॐ श्रोत्रन्तऽआप्यायताम्, ॐ यत्तेवर यदास्थितन्तत्तऽआप्यायता, ॐ निष्टयायतांतते. शुध्द्यतु, ॐ शमहोभ्यः शुध्यतु, ततोऽक्षतपुष्पैः पशुगात्रस्थदेवा- विजेत, शुंगेपृष्ट ललाटेच पादयो घयोस्तथा । उदरे सर्वगात्राणि मुन्नन्तुपाशुदेवताः ॥ पशोऽ शृंगंगृहीतोसि पशुत्वं .. , धर्मकाएर रत्नाकरे, महिष पूजा पद्धति हीयतां द्रुतम् ॥ उपयोगस्त्वयाकार्यों देवीपूजाविधीसदा ॥ एवं संप्रोक्ष्य, वस्त्रेणाछा पाशेन वध्वा विल्वफल मालया सुसज्य ललाटे सिंदरं दत्वा तद्वामकर्णजपेत्-मंत्र-लिहि लिहि बहु- रूप धारायै कालिकायै ह्रीं ही इमंप्रदर्शय, भक्ति नियोजय नियोजय स्वाहा, त्नोमहिनमस्कुर्यात्-ॐ नमस्ते बलिरूपाय सर्वपाप जयायच । सर्वशत्र विनाशाय पशुगज नमोस्तुते ॥ इति महिषं नमस्कृत्य पुनरनिरभ्युदय, ॐ महिपायनमः इति मन्त्रेण पंचोपचारेण संपज्यान्त्यमासं दद्यात्-ॐ पशोस्त्वं बलिरूपेण मम भाग्या दुपस्थितः ॥ अंत्ययासं मयादत्तं गृहा ए महिप प्रभो ॐ क्रीं, अन्त्यनासं निवेदयामि ॥ ततः स्तम्भसमीपमा नीय पुनःस्तम्भं पंचोपचारेण सम्पूज्य प्रार्थयेन--30 स्तंमत्वं शंभुरूपोऽसि पार्वत्यानन्द बधनः। भक्तितः पूजयामित्वां पशु वन्धनहेतवे ।। सर्वशत्रुविनाशार्थ सर्वाभीष्टार्थ सिद्धये । चंडिका प्रीतिहेत्वर्थ पशुवन्धयवन्धय ॥ स्तंभत्वं धर्मरूपोऽसि महिषं चोत्तमपशं ॥ वलिदान मुमामीतौ निर्विघ्नेनापियन्धय , ॐ हाँ हाँ फट् स्वाहा, इति महिषं संभेवन्नीयात् ॥ तनोवृहजलघटे हरिद्राचूर्ण निक्षिप्यतन्मंत्रैः पूजयेत्-30 श्री ब्रह्माण्यैनमः, 30 मां माहेश्वयनमः, ॐ को कौमार्यनमः, 300 वैष्णव्यैनमः, ॐ वां वायव्यैवमः। ॐ हैं इन्द्राण्यैनमः, घटयामे-ॐ ॐ उग्र- चण्डायैनमः, इति घठं पंचोपचारः सम्पूज्य, तेन जलेनवक्ष्यमाण मंत्रेण महिषं पुनास्नापयेत् ,-ॐ ऐ ऐ कालि कालि पापक्ष्याय ब्रह्म राजस्वपाय दिव्य भौमायनमः, इति सर्वांगं महिषं संस्नाप्य घटशेष जलं वक्ष्यमाणा मन्त्रेण नैऋत्ये क्षिपेत्--ॐ अमृतासवं विद्महेस्वधाकारायधीमहि ॐ संवर्तकः प्रचोदयात, ततः पीतवस्त्रं महिपस्य वामशंगेवेष्टयेत्-ॐ नरसिंहायनमः, इनि बन्धयित्वा पशोरगानिस्पे-ॐ शिं शिरसि, ॐ ख मुखे, ॐ इ नेत्रयोः अउ कर्णयोः ॐ अँ ई उ लूँ ऐ 30 दुर्गे दुर्ग रक्षिणिस्वाहा इति सर्वाङ्गं स्पृश्यापन न्यासं कुर्यात् , ॐ हाँ " , फोकार रक्षाफरे, महिप पूजा पतिः (२८७) हाँ वाहोः, अ अ पादयोः ओह मुखे, ही नेत्रयोः, ॐ हीं पुच्छे, इति स्पृट्वाऽक्षतर्मपिं प्रयोधयेत्-ॐ महिपस्त्वं पुरादेव्य बहुदुःखप्रदायकः । अतो निहत्य दातव्यस्तृप्तयेवरदोभय ॥ देवा- सुर रणेदेव्या बहुदुःम्ब प्रदोसियत् । त्वयानिस्सारिताः सर्वे श्रारखण्डल मुबासुराः । सूर्या चन्द्रमसोयो राधिपत्य वधेतय । न्याये नानेन रौद्रेण मातृके नानुलोमतः । हित्वापशुत्वदुर्गाया गणतांत्वंगमिष्यसि पशुगेनौप्रसृतोऽसि वलियज्ञस्य- सिद्धये । तुष्टाभवतु सादेवी ममां शै रुधिरैस्तव ॥ ततो दानणकणे -पशुगायत्री मुपदिशेन्----ॐ ऐ पशपाशाय विद्महेशिरश्छेदायधीमहि । तन्नः पशुः प्रचोदयात् । ततःकौशिक मन्त्रणकुशपुंजलिना 5 द्वि: पशुत्वं निःसारयेत् | 30 ही हां महा कौशिकायनमः, इतिसम्माज्यमहिपपृष्टेस्वदक्षिणकरतल संस्थाप्य वक्ष्यमाणमन्त्रैरमृतीकरणंकुर्यात्-0 प्रस्फुर २ 30 चर्वय २० भ्रामय २ मारय २३ कामय २ 30 कम्पय २ 30 प्रापय २ ॐ कर्मय २२0 आवेशय २० मोहय २ 30 हासय २ . हां ह्रीं ह्रीं हैं हौं 30 वचय २ 30 मद्वेष्टय २ हः स्त्रां ह्रीं महिपरुधिर मिदममृतंस्थाहा, इत्यमतीकरणकृत्वा पुनर्महिषप्रार्थ- येत्--30 महिपत्वं महावीरधर्मराजस्थवाहनः। भक्तिनः पूज- यामित्या सर्वकामार्थसिद्धये । 30 ही पशूनांपतये नमः ॥ इति पुष्पं समर्पयामि, 30 क्रीं धूपंनमः ॥ ॐ ह्रीं दीपनमः ॥ इति महिपंसम्पूज्य, पुरतार संस्थाप्यपूजयेत्-ततःखग मध्ये ऐ वीजविलिख्य, ही कालिवनेश्वर लोहखगाय नमः, इत्य भिमन्व्यध्यायेत्-30 कृष्णपिनाकपाणिंच कालरात्रिस्वरूपि- पम् । उमेरकास्यनयनं रक्तमाल्यानुलेपनं । रक्ताम्बरधरंचैव पाशहस्तंकुटुम्बिनम् ॥ पिवमानंचरुधिरं भुजानकाव्यसंचयं ॥ रसनात्कालिकायोः सुरलोकप्रसादक । कालि २ बजेश्चरि लोहपूर्णाचनमः, इत्यभिमन्त्र्य । अएं ह्रीं श्रीं फट् लोहदण्डाय तीदणधाराय ग्यगायनमः, इति मन्त्रेणग्वदम्पायगन्धधूपादिभिः १ (२८) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, महिप पूजा पद्धति -- सम्पृज्यमार्थयेत् । ॐ पुरादेवासुरेयुद्धे निर्मितो ऽ सिजयप्रदः । तेजोरूपाघखड्गायजयप्रदनमोस्तुते । प्रासेविशनसःखगस्तीक्ष्ण- धारोदुरासदः । श्रीगोंविजयश्चैव धर्मपालनमोस्तुते ।। पुनः खट्नमन्त्रयेत्- ऐ कालिबजेश्वरि लोहदण्डायनमः स्वाहा । ततोवक्ष्यमाणमन्त्रेणखड़महिषस्कन्धेस्पर्शयेत-- 30 ही कालि २ विकटदंष्ट्रोग्रे फ्रें फे कारिखादय २ सर्वान्दुष्ठान्मारय २ ग्वड्ने नछिन्धि २ किरि२ किलि २ रुधिरं पिव २ छों कालिकायैनमः, ततो महिपहननार्थमन्यपुरुषस्य वरणंकुर्यात्-ततस्तंक्रोधभैरव रूपिणं पुरुपमग्रतःकृत्वा, ॐ क्रोधभैरवस्वरूपिणे ऽ मुकायनमः पाद्यादिभिः सम्पूज्य तस्यदक्षिणहस्ते त्रिकोणयन्नलिखित्वा शिरसिसिन्दूरेणत्रिपुण्ड्रं विदुयुनंकृत्वा गन्धाक्षतपुष्पमालादिभिः सम्पूज्य सङ्कल्पंकुर्यात-अद्येत्यादि देशकालौसंकीर्त्यामुको ऽहं करिष्यमाणामुकदेवताप्रीत्यर्थ महिपलिकर्मणि महिपछेदनार्थ क्रोधभैरवरूपिणममुकगोत्रममुकवर्माणत्वामहंवृणेवृतो ऽस्मीति प्रतिवचनम्, ततःप्रार्थयेत् यथादेवासुरेयुद्धे मारितोमहिपासुरः। हे क्रोधभैरवत्वंहि महिपंजहिसत्वरम् ॥ ततः स्तम्भान्महिपमोच यित्वा सङ्कल्पकुर्यात्-अद्येत्यादिदेशकालो संकामुकगोत्रो 5 मुकराशिरमुकवर्माहं करिष्यमाणामुककामनासिद्धये तथाच सकृटुम्मस्य सपरिवारस्य सर्वापच्छान्तिदीर्घायुस्त्व धनधान्या- धविच्छिन्न चातुर्वर्गाधसिद्धये श्रीः१ अमुकीदेव्याः प्रीत्यर्थमि मंसुपूजितममृतीकृतमहिपं यमदैवतंवलिरूपंघातयिष्ये । इति महिपाशरसि तिवादेव्यग्रे पुनरच्चस्वरेणपार्थयेत्-ॐ जल- दसहशवर्णचामविस्तीर्णकर्ण । धरणिधरसमांगं दीर्घतीक्ष्णायता- क्षम् ॥ धलिमिममुपनीतं देविप्रीत्यागृहाण । भगवतिमयिनित्यं राजलरमीनिधेहि ॥१॥ कुरममरिपुनाशंव्याधिपीड़ादिदुःसं । हर सकलविकारं दुर्गनिशभीतिम् । भयभुवनवरेण्या महलन्त्वं विदि भगवनियरदात्वसर्वसिद्धिप्रदेहि॥ ततो महिपंघात- नधिमार्थपेन्-30 महिपत्वंमरावीर सर्याभीष्टप्रसाधकः ।
कर्मकार रमाकर नरक चतुर्दशी परिभाषा (२६६) दुगीतचयपापानि सर्वशत्रुक्षयंकुरु । यज्ञार्थपशवःसृष्टाः स्वयमेव स्वयंभुया । अतस्त्वांधातयिष्यामि तस्माद्यज्ञेवधो ऽ वधः । ततः क्रोधभरवंप्रचारयेत् रक्षाक्षतपुष्पैः-सचोत्थिताम्बहमुत्थाप्य ॐ में ह्रीं श्रीं हस ख] सो ह्रौं इसौं श्री क्रोधमार्तण्डभैरवाय इसों ही इस सफ्रें श्रीं ही ऐ, भोक्रोध भैरव, एनं महिपखड़े नभिान्ध २ छिन्धि २ निरयकुरु २ ततः क्रोधभैरवोदक्षिणहस्ते ग्वनमुत्थाप्यमहतातेजोमय क्रोधेन, ऍ छौं कालिकायैनमः, इत्यु- फ्त्वा, एकमहारेणमहिपशिरश्छेद कुर्यात् । यथा--हन्यादेक प्रहारेण महासिद्धिमव,प्नुयात् । अन्यथाविनमायाति कर्ता सम्यत्सरावधि । ततोमहिषमुण्डंयन्त्रात्कीयद्रे देव्यग्रेभूमौ त्रिकोणोपरिनिधाय--पुष्पंघृत्वा-२ कवोष्णंफेनिलरक्तं पशुकंठा द्विनिर्गतम् ॥ माध्वीकंपियदेवित्वं परमानन्दहेतवे ॥ घोरदंष्ट्र करालास्येमधुमांसवलिप्रिये । वलिं गृहाणभोदेवि विपक्षक्षय- कारणि । ततो महिपशिरसि ज्वलद्वतिका दीपयित्वाहस्तेजलं गृहीत्वा-~-0 यायद्दतिलोमानि वर्तिकाशिरसः पशोः । ताव द्वर्षसहस्राणिदेवीलोकेसगच्छतु । शेषपूजोक्तपद्धत्यनुसारेणकुर्यात ॐ कालिकायैनमः ॥ इति महिषचलिपद्धति ॥ अथ नरक चतुर्दशी परिभाषा। कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी नरकचतुर्दशी साचोघसिचन्द्रोदय व्यापिनीयाद्या च मदनरने मामिप्ये कानिय कृष्णपने चतुर्दश्यांविधृदये । तिलतैलेनातव्य स्नाननरकोहभिः 1१1 अन चन्द्रादयस्नानासमवेयूर्योदयऽपि चतुर्दश्यां प्रात काली गौणत्वेनाविधीयते । अत्र स्लानमध्येनुम्बी अपामाश्रमण क्तव्यम् । तन्मना । सीतालोटसमायुक्तसकटक्दल न्वित । हरपापमपामार्गधाम्यमाणः पुन पुन । ततीयमतर्पण कुयात अ यमायनम , इलादिमंत्रैः । जीपत्पितापिकुर्वीततर्पणं यमगोमयो ३॥ अत्र वचित्पर्वतप्रदेशे स्यांगयां पूजनादिकमपि कुर्वन्ति । तत्तु ममीचीनमस्ति । पूर्वरारिभिातु गोवत्सद्वादशीमारभ्यबलिरानपर्यन्तमेतदुतम उच हेमाद्रीभविष्य सनमान्यवणी च शालिनीगापयस्विनीम् । चन्दनादिभि रालिप्य (२६०) ६.मैकाएर रक्षाकरे, नरक चतुर्दशी पद्धतिः पुष्पमालाभिरचयेत् ।४। दीपावलिदानमुक्तस्कान्दे । तत. प्रदीपसमयेदोपान्दद्यान्मनोहरान् । 'ब्रह्मविष्णुशिवादीनां भवनेपुमठेपुच ।। अत्रैव रात्रौदोपारल्यनन्तरमुल्कादानं विहितम् । उक्तं च ज्योतिनिवन्थे । तुलासंस्थेसहस्रांशीप्रदोपेभूतिदर्शयोः । उल्काहस्तानरः कुर्युः पितृणांमार्गद- शनात् ।। अत्र चतुर्दश्यांखण्डतिथौ कदामकर्तव्यम् । अत्रप्रातः कालस्य गौणत्वप्रापक श्चन्द्रोदयकालोमुख्यः यत्त: कृष्ण चतुर्दश्यारात्रिशेपे चतुर्युघटिपुभवति । तन्मुग्यः काल । पूर्वत्रेय चतुर्दश्यां तयाप्तौ तत्रयाभ्यंगादि दोपदानांत निनिवादम् । तदंगकर्मकालेपु तिथि सत्यात् । परत्र तयाप्ती तत्रैवाभ्यंगादि । असत्यामपि चतुर्दश्यां वाले दीपदान कार्यम् । स्नानादिनप्रदोषे तिथ्यनपेक्ष्ये तद्विधानात । सूर्योदये तिथ्यनुवृतौ । यातिथि समनुप्राप्ययास- स्तंपद्मिनोपतिः । सातिथिस्तहिने प्रोक्ता त्रिमुहुतैवयाभवेत् ।। नरक च चतुर्दश्यामिन्दुक्षय- तिधावपि । उजादौस्वातिमयोगे तदादोपावलीभवेत् ।८) ज्योतिनिधोदाहत नारदवाक्येऽपि शब्देनचतुर्दशीस्थानेऽमाया अनुकल्यत्वेन विधेरोदश विषयएवप्रत्यो चिन्त्यात । स्वातियोगस्त प्राशस्त्यार्थः । दीपावलोशन्दोऽभ्यंग स्नानपरः। अमुनैवाशयेनसर्यज्ञनारायणेन चतुर्थयामे चतुर्दशी सन्यमभ्यंग प्रयोजकत्वेनोक्तम् । तथा कृष्ण चतुर्दश्यामाश्विनोऽकादयाम्पुरा यामिन्याः पश्चिमे यामतैलाभ्यगो विशिष्यते ।। इत्यादिप्रमाण वाक्यैस्त्रयोदशो युक्तायांनरक चतुदभ्यां कदापिदोपावलो बग्वाल , नभवतीति सर्वसम्मति । अथ नरक चतुर्दशी कर्म पद्धतिः॥ अथच उदयव्यापिन्यां चतुर्दश्यामुषः कालेसूर्योदयात्पूर्व नरक मीरुभिस्तिलतलेनस्नात्वा तदैव 30 यमायनमः, इत्यादि चतुर्दशनामभिस्तर्पणानिदत्वा पित्वानपि सम्पूज्य मध्यान्हात्पूर्व गोष्ठेगवां पूजनमारभेत् । अर्घ्यम्-रुद्राणीचैवयामाता वसूनां दुहिताचया । श्रादित्यानां च भगिनी सानाशान्तिप्रयच्छतु ।। गन्धाक्षत पूजनमंत्रः नमोगोमतीभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेयीभ्य एक्च । नमोधर्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्योनमोनमः ॥१॥ इति गंधाक्षतमालादिभिः सम्पूज्य गोग्रासंदद्यत्-सुरभी वैष्णवी मातानित्यं विष्णुपदेस्थिता । प्रतिगृहातु मेग्रासंमुरभीमे प्रसीदतु. 11 इति गोभ्योदेशरीत्यानुसारतोययेष्ठान्नं दत्या प्रार्थयेत् । गावोमेऽग्रतः सन्तुगावोमे सन्पष्टतः । गायोमेहृदये सन्तुगयां कर्मकाण्ड रनाकर, नएफ चतुदशी पद्धतिः (२११) मध्येवसाम्यहम् ।। मावियोगोऽस्तुमे पुत्रैर्भर्ना च सहवान्धवैः त्वत्प्रसादेनभक्तिः स्यान्निश्चलागौः सदात्वयि १४१ ततो गृहमार्ग- त्य ब्राह्मणैर्वान्धवैः सह जीत । ततः प्रद्रोप समयेदीपावलि दद्यात् । अथ दीपमंत्रः अग्निज्योतिरवियोतिश्चन्द्रोज्योतिस्तथैव च उत्तमो ज्योतियांज्योतिर्दीपोऽयं प्रति गृहाताम् शदीपान्दत्वा भोजनात्पूर्व मुल्कापूजनं विदध्यात् । गोमयोपलिझायांभूमावुल्का संस्थाप्य तत्र दीपप्रज्वाल्य सम्पूज्य च ॐ पितृमार्गप्रदर्शन्यु: ल्कायनमः गंधादिभिः सम्पूज्य ततो मंत्रेण दीपयेत् ॐ शस्त्रा- शस्त्रहतानां च भूतानांभूनदर्शयो। उज्वल ज्योतिपादेहं दहेयं व्योमयन्हिना । यमलोकागतानां च सर्वेपास्वर्गगामिनाम् । मार्गादशां पित्त्राणां च उत्कांसंदीपयाम्यहम् । उल्का दीपयि- त्वा दक्षिणाभिमुग्योभूत्वा भ्रामयेत् । अत्र देशप्रथा चाजित्रैः सह कीयद्रंसर्व ग्राम निवासिनः समारोहेणगच्छन्ति ततः समागत्यत्तदैव पाण्डवोत्सवमपि कुर्वन्ति । उक्तं च प्राच्यनिर्वधे ॐ अग्निदग्धाश्चयेजीवायेऽप्यदग्धाः कुलेमम | उज्वलज्योतिपा दग्धास्तेयान्तुपरमांगतिम् ।। यमलोकंपरिलज्य चागनायेमहा- पथे। उज्वलज्योतिपा वर्म प्रपश्यन्तो बज्रन्तुते ।।। इति उस्को शांतयित्वा ब्राह्मणैः सबान्धवैश्चभुञ्जीत । अत्र प्रभाते चन्द्रोदय- कालीन कर्म परिभापोक्त विधिना कुर्यात् । अथ लन्मी पूजा परिभाषा अय कार्तिक कृष्णामायां गी कोडनदीपदान लक्ष्मीपूजाविधि ववदये । उक्त च कालादर्श-प्रत्यूप प्रारवयुग्दर्श कृताभ्यंगादिमंगल । भवन्याप्रजयद्देवीमलक्ष्मीविनी. वृतये ॥१॥ उक्तचब्राह्म-इपेभूतै च दशं च कातिकप्रथमे दिने । यदास्वास्तिस्तदाभ्यंग स्नानकुयादिनीदरी ॥ ॥ मात्स्ये~-दीपनाराजनादन सैपाीपावलोस्मृता । मत्र विशेषो हेमाद्री भविष्ये-दिवानन न भोक्तव्यमृतवालातुराजनात । प्रदोष समयलक्ष्मी पूजयित्वा ततः क्रमात ॥३॥ दीपवृक्षारचदातव्याः शक्यादेवगृहेषुच ॥ तत्रैवाभ्यंगम मिधाय~~-एवं प्रमात समय त्यमावास्यांनराधिप । स्वातु पार्वणंभ्राद्ध दधिक्षीरघृतादिभिः ॥४॥ दीपान्दत्या प्रदापितु लक्ष्मीपूज्य यथाविधिः । स्वलेते नभोक्तव्य मितवस्त्रोप शोभिना ॥4॥ इयं प्रदीप - (२४२) कर्मकाण्ड रनाकर, लक्ष्मी पूजा परिभाषा तान्याह गापिनी ग्राह्या । तुलासंस्थे सहनांशी प्रदोभून दर्शयो.1 उल्काहस्ता नर कुर्यु पिरीणां मार्ग दर्शनम् ॥|| दिन द्वये सत्वपर । दगडैकरजनीयोगे दशस्यातुपरेऽहनि । तदा विहाय पृर्वगुपरेऽन्हि मुसरात्रि [[ll अपराहणेच कर्तव्यं श्रद्धं पितृपण्यणैः । प्रदोष समये राजन् ? कतव्या दीपमालिका ॥ इति क्रमः । ससम्पूर्णतियावेव प्राप्तेरगुवादो न विधि । तत्त. रकर्मक ल व्याप्ने वलवत्वात्सम्पूर्णतियो प्राप्त्या संड तिथावप्राप्त्या विध्यनुवाद विरोधाच्ने. त्युतम् ।। अत्रैव परात्री दशंऽलक्ष्मी. 'दरिद्रा' नि सारणमुक्तम्, मदन रत्ने भविष्ये- एवंगने निशीथेतु जमेनिद्रधि लोचने । तावनगर नारीभि रापडिडिगवादने । निफाप्यते प्रहष्टाभि दरिदास्य ग्राहांगणात । अत्रप्रति नयमे व श्रमायांग्रहण संप्राप्तिर्भवती त्याशक्यम् । तदोदय व्यापिन्याममायादिने अहण युताया गौरजनपि सार्चनं रानीच ग्राम्तास्ते एतानि मणिभवन्ति नबेतिद्वेधीभूने किकंकर्तव्यमितितदाह-यरेतामु तिथिप्येतानि कमाण्युक्तानि सक्तित्तै पूर्वस्मृत्तिनिर्णय कारस्तु ग्रन्थेषु पूर्वोक्तकम विषय किमपि नलिखितमस्ति, अनेनैव स्पष्ट मिति । तेस्नु ग्रहणेपितृ श्राद्धब्राह्मणभोजन होम दानादीनि नानाकारयुक्तानि । -अन भागमाह मप्यशृंग.। चन्द्र सूर्य ग्रहयस्तु श्राद्धं विधिवदाचरेत् । तेनैव सकला पृथ्वीदत्ताविप्रस्यवै कर १० पायवीयोक्ति । मैटिके योयदासरी मस्ते पर्व संधिधु । गजच्छा- यातु साप्नीला तस्यो श्राद्धप्रकरपयेत् ।११। घृतेन भोजयेद्विमा घृतभूमी ममुन्सजे। राहु दर्शन दत्तहि श्राद्धमाचन्द्र तारतम् 1901 प्रामथाद्धं प्रकुति हेम श्राद्धमथापिवा । भारते-राव नापि क्त्तव्यं श्राद्धं वे राहु दर्शने । अकुारणस्तु नास्तिक्या रपये गोरिव सीदति ।१३। विज्ञानेश्वरीप्याह- ग्रहणमा दे भो चतुर्दापोदातुस्त्व भ्युदय.। यो ब्राहाण. मृतक सृतके भुक्तो न तम्यारराग भाजन निपंधर कञ्चनविधि महाबाहारणत्वात् । यत्फलं मृतक सून काम भोजने तदेव ग्रहणेऽपि । उक्तं चापस्तंम्बेन-सूनकै मृतके भुक्त महीने शशिभारतरं । हायरया हस्तिनश्चय न भूयः पुस्पोभवेत् ।१४ गौदानादि विषयमाह-- सस्त च पृथ्व' चन्द्रोदये प्रभास स्वराडे- गावी नागास्तिलाधान्यं रत्नानि क्नक महीम् । यो ददाति ग्रह मध्ये नपुनर्जन्म मालमेत् ॥१५॥ गोपजने निर्णयामते लिखितमम्ति--- या पुरप्रतिपन्मिभा तगा जयं नृप। पृजना प्रोणि बदन्त प्रजागावो महीपति ।। प्रति पदश सयांगकोरनतु गोमतम् । परविध्दपुय, बुयो पुत्रदार धनक्षय. १४ प्रति देगल यास-इदानीमच महणस्य संगवोभवति । एपविपयस्तु वलि पूजा विधीनिरायने यत्र दीपाय यमायो ग्रह भपनि रोपप्रतिपदिदाभवति । उदयव्यापिन्यमाया रात्रौदीपायलि रसिकायो उनम पुगणमध्ये- प्रियामिकाशिनिधिभरमा प्रियामाप्रतिपशिदी। मग मुनिमि पनिटे प्रोन्ययापूर्वयुरोविस १८ गादिप्रमागाजिनरहित मर्म भागीहमदिने : शिपाती () माननिसायम गति | fru कर्मकोपष्ट रक्षाकरे, लक्ष्मी पूजा पद्धतिः (२६३) अथचकार्तिककृष्ण अमायां लक्ष्मीपूजा पद्धतिः। लक्ष्मीपूजायां कार्तिक कृष्णामावस्या सायङ्कालपदोप व्या- पिनी ग्राहा, उभयोर्मध्येद्वितीयदिने दण्डैकरजनी व्याप्ता ग्राहा नतुभूतविद्धा ! अन्येार्दण्डैकरजनी योगरहिता चेचतुर्दशी युता याममायां दीपावली लक्ष्मीपूजो कर्तव्या। अपरेऽन्हि सार्धत्रि यामव्यापिन्याममायामपि गौपूजनं रात्रौदीपावल्यादि कर्म करणे कापिक्षति स्ति, इति सर्वनिर्णयसम्मतिरस्तीति दिक् । विशेषः पूर्वमुक्तः । अथ पूजापद्धतिः । तत्रादौ स्वासने उपवि- श्याचम्याधारं पूजधित्वा रक्षाविधानं कृत्वाप्राणायामत्रयं विधाय श्रीगणेशप्रणमेत् । हस्तेपुष्पाक्षतनिधाय-30 सुमुखश्चैकदन्त- श्च कपिलोगजकर्णकः । लम्बोदरश्च विकटोविघ्ननाशो गणा धिपः॥१॥ धूम्रकेतुर्गणाध्यक्षो भालचन्द्रो गजाननः । शुलांचर धरंदेवं शशिवर्णं चतुर्भुजम् । प्रसन्नवदनं ध्यायेत्सर्वविघ्नो पशा न्तये | ||२|| सर्व मंगलमांगल्ये शिवेसर्वार्थ साधिके । शरण्ये ज्यम्बकेगौरी नारायणिनमोऽस्तुते ।। इति प्रणम्य । अथ च कृतोपवासः कर्ता स्वगृहे दीपावल्यादि दीपवृक्षारच निर्मायादौ वक्ष्यमाण मंत्रण दीपावलिं दीपयेत् । 30 अग्निज्योतिरवियों- ति श्चन्द्रोज्योतिस्तथैव च । उत्तमो ज्योनिषांज्योतिर्दीपोऽयं प्रतिगृहाताम् ॥४॥ पाद्यगंधादिभिःसम्पूज्य प्रार्थयेत-दीपावलिं गृहाणत्वं सर्वसौख्यप्रदाभव । प्रदोषरूपिणि शिवेमहालक्ष्मि नमो ऽस्तुते ॥२॥ ततः स्वासने पूजास्थलमेत्य पूर्वोक्तकलशस्थापन पूजाविधिना कलश संस्थाप्य सम्पूज्यच तत्रकचिन्मनोहरे पीटे सिंहासनेवा स्वेष्टदेवीयंत्रं प्रतिमांवा संस्थाप्य श्री महालक्ष्मी पूजनमारभेत् । तनो रक्तगंधा लोडितपुष्पैर्ध्यायेत् । यासा पद्मा सनस्था, विपुलकटि तटी पद्मपत्रायतानी। गंभीरावर्तनाभिस्त नभरनमिता शुभ्रवस्त्रोत्तरीया। या लक्ष्मीदिव्य रूपैर्मणिगण रचितः स्नापिता हेम कुम्भसानित्यं पद्महस्तामम वसतुगृहेसर्व 4 ..
(२६४) कर्मकाएइ रताकरे, लक्ष्मी पूजा पद्धति' मांगल्ययुक्ता॥वी इति ध्यात्वावाहयेत् । सर्वलोकस्य जननी पद्मस्थां चारुभूषणाम् । सर्वदेवमयीमीशां लक्ष्मीमावास्याम्य हम् ॥७॥ तत' पुष्पासनम्-अमलेकमले देविरक्ताम्बर विचित्र कम् । सपुष्पक परंदिव्य मासनंप्रतिगृह्यताम् ॥६॥ तत्पाद्यम्- लाजा कुंकुंमपुष्पैश्च तण्डुलौषधि भिर्युतम् । पाद्यगृहाण देवेशि मालक्ष्मि नमो ऽ स्तुते ॥६॥ अर्घ्यम्-नाना गंधसमायुक्तं दिव्यपात्रस्थकंपरम् । अयं गृहाण महतं महालक्ष्म्यै नमोनमः ॥१०॥ तत पाचमनम्-सर्वशक्ति स्वरूपायै संसारार्णवतारिके। ददाम्याचमनंतस्यै महातक्ष्म्यैमनोहरम् ।११। स्नानीयम्-पंचामृत समायुक्तं गंगाजलमनोहरम् । गृहाण विश्वलननि स्नानार्थ 'भक्तवत्सले ॥१॥ यन्त्रम्-दिव्याम्बरंनृतनंच कौशेयसुमनोहरम्। दीयमानं पयादेविगृहाण परमेश्वरि ॥१॥ मधुपर्फम् कापि- लंदधिकुन्देन्दुधवल मधुनायुतम् । गृराण मधुपर्कत्वं क्षीरसागर कन्यके ॥१४॥ भूषणार्थे पुष्पम्-सागरोद्भव रत्नानां भूषणानि त्वयाधृता । अतोदेवि महालक्ष्मि तुभ्यं पुष्पंददाम्यहम् ॥१५॥ ततश्चन्दनम्--चन्दनं चसकपूरं मृगनाभि समन्वितम् । गृहाण भाल शोभार्थ नमो ऽ स्तुभक्तवत्सले ॥१॥ सिन्दरम्--चन्दनो परि शोभार्थ सिन्दुरंतिलकप्रिये । भक्त्यादत्तं मयालक्ष्मि सिन्दरं प्रतिगृहाताम् ॥१७॥ सौभाग्य द्रव्यम्--स्वयं सोभाग्यदेदेवि ? महालक्ष्मि हरिप्रिये । चूर्णकंकमकं पीतददामिसुभगायते ॥१॥ ततः सुगन्धिद्रव्यम् । तैलानि च सुगन्धीनि पुष्पसारयुतानि च । मयादत्तानि कान्त्यर्थ गृहाणजगदम्बिके ॥१६॥ पुष्पाणि-ऋतु- जानि सुरम्याणि पुष्पपत्रादिकानि च । सुरभीणि विचित्राणि गृहराएपरमेश्वरि ॥२०॥ पुष्पमालाम्-नाना पप्प समायुक्तां ग्रथितां सुमनोरराम् । मालां गृहाणभोलक्ष्मिममसोग्य विवर्धय ॥२१॥ ततोशावरण पूजनं पुष्पाक्षतैः कुर्यात् । 3 चपलायनमः पादौ पूजयामि चंचलायैनमो जानुनीजयामि । ॐ कमलायै नमः कटि०। कात्यायनमो नाभिपृ०ॐजगन्मात्रे नमोजठरं पर्म कायर रक्षाकरे, लकमी पूजा पयत्तिः (२५) पू०॥ अविश्यवल्लभायैनमोवक्षस्थलग कमलवासिन्यनमो नेत्र त्रयं पू० । ॐ श्रियैनमः शिरः पू० । इत्यंग पूजनम् अथ पूर्वादि दक्षा वर्तनाष्टसिद्धीः पूजयेत् । तत्र पूर्व, अणिम्नेनमः। 30 महिम्नेनमः । गरिम्णेनमः । 30 लधिम्नेनमः । प्राप्त्य- नमः। 30 प्रकाम्यायनमः । ॐ ईशितायैनमः । ॐ वशितायै नमः । अथ चपूर्वादि क्रमेणाप्टलक्ष्मी पूजनम् । पूर्वे, आध लक्ष्म्यनमः । अविद्यलक्ष्म्यै नमः। 30 सौभाग्य लक्ष्म्यै नमः। ॐ अमृतलक्ष्म्यै नमः । ॐ कामलक्ष्म्यै नमः । सत्यलक्ष्म्यै नमः 3. मोगलक्ष्म्यै नमः ।.30 योग लक्ष्म्यै नमः । इति सम्पूज्य धूपंकुर्यात् । वनस्पति रसोत्पन्नो गंधाढ्यः सुमनोहरः। आधेयः सर्व देवानां धूपोऽयंप्रतिगृह्यता. सू ॥२२॥ दीपम्-चतुर्वतिसुसंपन्नं घृत युक्तं मनोहरम् । तमे नाशकरंदीपं गृहाणभुवनेश्वरि ॥२॥ नैवेद्यम्-नैवेद्य गृह्यतादेवि भक्ष्यभोज्य समन्वितम् । परसैरन्वित दिव्यं महालदिम तमो ऽस्तुते ॥२४॥ नैवेद्यान्तचमनीयम्-शीतलनिर्मिले तोयं कर्पूरेण सुवासितम् । आचम्यतां ममजलं प्रसीदत्वं महेश्वरि ॥२५॥ ताम्बूलम्-एलालवंगरवदिर नागवल्लि दलान्वितम् । पूगीफलेन संयुक्तं ताम्बूलं प्रतिगृहाताम् ॥२६॥ त्वत्फलात्फलितंसर्वत्रैलोक्य सचराचरम् । तस्मात्फल प्रदानेन पूर्णान्कुरु मनोरधान ॥२७॥ दक्षिणाम्-हिरण्य गर्भगर्भस्थं हेमवीज विभावसोः। अनन्त पुण्य फलदमतः शान्ति प्रयच्छमे ॥२८॥ कर्पूरनीराजनम्-कदली गर्भ संभृतं दीपितं सुमनोहरम् । श्रारार्तिक्यं गृहाणत्पंप्रशन्ना भवसर्वदा । ॥२६॥ प्रदक्षिणा-यानि यानि च पापानि जन्मान्तर कृतानि च । तानितानि प्रणष्यन्ति प्रदक्षिण पदेपदे ॥३॥ पुष्पां- जलिम्-गुलाब सिरताजैश्च कुसमै र्ऋतुजाशुभैः । पुष्पाञ्जलिर्मया दत्तातच प्रीत्यै नमोऽस्तुते ॥३॥ प्रार्थयेत-मुरा सुरेन्द्रादि किरीट मौक्तिकर्युक्तं सदायत्तवपाद पंकजम् । परावरं पातुवरं सुमंगल नमामि भक्त्या तव काम सिद्धये ततः ( २६६) कर्मकाण्ड रानाकरे, लक्ष्मी पूजा एद्धति । । ३२ । भुवनेश्वरि कल्याणि सर्व संपत्प्रदायिनि । सुपूजिता प्रशन्नास्यान्म हालदिम नमोऽस्तुते। ३३ प्रथमसीपात्र 'दवात' पूजनम् । तत्रादौ ध्यायेत् । सद्यश्छिन्नशिरः कृपाणमभयं हस्तै- वरंविनतीम् घोरास्या शिरसास्रजंसुरुचिरामुन्मुक्तकेशावलिम् । सकासक्प्रयहां श्मशान निलयां श्रुत्योः शवालकृतिश्यामांझी- कृतमेखलां शवकरदेवींभजेत्कालिकाम् ॥ ३४ ॥ ॐ महाकल्यै नमः, इति पाद्यगंधादि भिः सम्पूज्यावरण पूजनं विदध्यात् । ॐ काल्यै नमः । ॐ कपालिन्यैनमः । ॐ फुल्लायै नमः । ॐ कुरकुल्लायै नमः । ॐ विरोधिन्यै नमः । ॐ विप्रचिन्तायैनमः ॐ उग्रप्रदत्तायै नमः। ॐ दीव्यायै नमः । ॐ नीलायै नमः । ॐ घनायनमः ॐवलाकायै नमः। ॐ मात्रायै नमः। ॐ मुद्रा- यैनमः । ऐतै ममं गंधाक्षता दिभि सम्पूज्य लेखनी पूजयत् । कृष्णाननेद्विजिहेचचित्रगुप्तकरस्थिते। सदक्षराणांपत्रेत्वलख्यंकुर सदामम ॥३४॥ प्रणोदेवीसरस्वतीवाजेभिर्वाजिनीवती ।यज वष्ठुधियावसु ।। सरस्वतीस्वरूपायैलेखन्यैनमः । पाद्यादिभिः सम्पूज्यप्रार्थयेत-याकुन्देन्दुतुपारहारधवला याशुन्नवस्त्रावृता । यावीणावरदण्डमण्डितकरा याश्वेतपद्मानना । या ब्रह्माच्युत शङ्करप्रभृतिभिर्देवैः सदावन्दिता, सामांपातुसरस्वतीभगवती निकोपजारापहा ॥३६॥ ततोद्रव्यनिधिस्थाने धनाध्यकुवेरं पूजयेत् । 0 कुबेरायनमः कुवेरमावाहयामिस्थापयामि-इत्या- चाह्यगन्धपुप्पाक्षत धूपदीपनैवेद्यादिभिःसम्पूज्यप्रार्थयेत् । धनदाय नमस्तुभ्यं निधिपद्माधिपायच । भवन्तुत्वत्प्रसादान्मे धनधान्या- दिसम्पन्दः ततस्तुला (तराज.) पूजनम्-ध्यायेत्-नमस्तेसर्व देवानांशक्तित्वेसत्यमाश्रिता। सानीभूताजगद्धात्री निर्मिताविश्व योनिना ॥३७॥ तुलायनमः इतिपूर्ववत्सम्पूज्यनीराजनंकुर्यात अग्निज्योतीरविज्योतिश्चन्द्रोज्योतिस्तथैवच । उतमः सर्वतेजस्सु दीपोऽयं प्रतिगृहाताम् ॥३८॥ प्रार्थयेत-मातात्वंमाणिमात्राणां देवानांमृष्टिसम्भवे । पाल्पातामृतलेदेची महालचिमनमो ६ फर्मकाण्ड रखाकरे, कादशी निर्णय (२७) 4 स्तुते ॥३६॥ धनधान्यमहीहर्षमायुः कीर्तियशः श्रियम्। सर्वदा देहिमेद्रव्यं महालदिमनमोऽ स्तुते ॥४०॥ ततः प्रसादंगृहीत्वा पूर्वोक्तविधिना पित्त्राणां मार्गदर्शनायोल्कांदीपयित्वा तांग सन्दर्य विप्रान्भोजयित्वासवान्धवैः स्वयमपि जीत । ततो निशायांवादिन संगीतादिगायनर्जागरणंकुर्यात्-तत्रैवनिद्रार्ध मीलितलोचनेरात्रिचतुर्थयामेनार्यः सूपंडिंडिमवादनम्रहाद्ग्रहां- गणवाहिदरिद्रां निष्काशयेयुः । तत्रमंत्र:-ग्रहाद्ग्रहांगणाच्चैव दरिद्रेगच्छसत्वरम् । विस्मृत्यामपिदुष्टत्वमात्रपादार्पणंकुरु ।।४।। इतिदरिद्रांनिष्काश्य हस्तौपादौप्रक्षाल्यनिवसेयुः । इति दीपावली महालक्ष्मीपूजापतिः! ॥ बलिराजकृत्यम् ॥ अथ च चलिराजपतिपदमाविद्धामाहा, द्वितियाचन्द्रदर्शन विद्धान कदापिग्राह्या तत्रप्रतिपदिप्रातःकाले सर्वेतैलाभ्यगास्नानं कुर्युः । ततः स्त्रियोभित्तौद्वारेपुरझरञ्जित चित्राणिकुर्वन्तु । अत्र दिनेगोवर्दनपूजनंगौकीडनादिकमपिभवति । इतिशिवम् ।। अथैकादशी निर्णयः॥ तत्रकादश्युपवासोद्वै वा निर्ष परिपालनात्मको व्रतस्पश्च । तनाय. नशंखेनपिव. तोयंनसादेत्फूमसूरी। अग्निपुगणे---गृहस्थो ब्रह्मचारीवा श्राहिताग्निस्तथवर एकाद- श्यान अजीतपक्षयोरुभयोरपिं उक्त च शिसमाक्त ~पैष्णवोवाथ शेयोवादिकादशीवाम । उक्तंचकालादर्श विधवायाचनस्थस्य यतेश्यकादशीद्वये । उपवासोगृहस्यस्य शुक्लायामेव पुत्रिण, भुजे निषेध. कृष्णाया सिद्धिस्तस्य ततो व्रते । अत्रैकादश्यांदशमीवधाविया तच्चारणोदयवैध सर्यादयधश्च उक्तचाद्योवेधोगामडे-दशमोवेधसंयुक्तो यदिस्यादरणोदय, । नैवोपीय वैष्णन तद्विनैकादशीनतम् । उक्तं चत्रा वैवः--चनघाघटिका प्रातररुणोदयनिश्चयः (२१८) कर्मकाण्ड रताकरे, एकादशी निर्णय चतुष्टयविभागोत्रवेधादीनां किलोदितः । अरुणोदयधस्यात् साधतुघटिकानयम् । कतिधाद्वि- टिकः प्रभासदरीनावे: महावेधोऽपितत्रपदश्यतेकौनदृश्यते । तुरीयस्तत्र विहितोयोगः सूर्योदयेवुधैः । उक्तंच मदनरत्ने-अन्यस्तृदयवेधः अतिवैधादयः सर्वधास्तिथिपुस्मृताः सबैप्यवधायिज्ञेयावेधाः सूर्योदयेमतः । गृहस्थस्मातस्तुस सूर्यादया दशमीविद्धायश्या अन्याग्राह्या च वैष्णवैस्तुषट्पचाराइंडात्मिकायादशम्यो सत्यायाविद्धावया । एकादशीद्वादशीचेत्युभयं पर्धतेयदा । तदापूर्वदिनत्याज्यस्माताह्यपरंदिनम् अरुणोदयवेधोऽत्रवेधः सूर्यादयेतथा । उक्तौदीदशमोधो वैष्णवस्मतियोः ममात् । मह्मवैवर्तकपालघेवउक्त:--अर्धरात्रीतुकेपाचि- राम्यां वेधउच्यते । कपालवेधइत्याहु राचार्यायेहरिप्रिया. उक्तंच हेमाद्रिणा दशम्या.संगदोपेण अपरात्रात्परेणतु । वर्जयेचतुरीयामान संकल्पार्चनयोमदा ! एतन्तु वैष्णवर्ण्यम् उक्तंचमाधवेन एकादशी द्वादशी चेत्युभयंवर्धतेयदा । तदा पूर्वदिनं साध्यस्मातंग्राह्यपरंदिनम् उपवासा ऽ सामध्यतु मार्कंडेयकोमयो एकभक्तेननतेन तथैयायाचितेन च । उपपासेदानेन ननिद्वादशिको- भवेत् । नक्तकालमाह--दिवसस्याष्टमेभागे मन्दीभूते दिवारे । तत्रनक्तविजानीयाननक्तं निशिभोजनम् । उपवासेपारणमाह-संकटेविषमे प्राप्ते द्वादश्यां पारयेत्कथम् । अतिस्तु पारणकुयात्पुनर्भुक्तंन दोषकृत् । संक्टे प्रयोदशी श्रादप्रदीपादौ-द्वादश्या च प्रथमपाद- मतिकम्य पारणकार्यम् द्वादश्याः प्रथमपादोह रिवासर संज्ञितः तमतिकम्य कु तपारणं विष्णुतत्परः प्रन्पविस्तारभया दलम् विशेषो निर्णय ग्रन्थेषुद्रष्टव्यः । इत्येकादशी निर्णयः अधैकादशी व्रतोद्यापन विधि.--उक्तं ब्रह्मवैवर्ते नारद नारायण संबादे-- नारद उवाच -अधुना प्रोतु मिच्छामि सबैपांचेप्सितं मम | एकादशी व्रतस्यास्य विधानं बद निधितम् ॥ अहो श्रुत्तीधुतं किं चिन्मतभेदाननिश्चितम् ॥ श्रुतीनाकारण मुखाच्छीतुं कौतहमनः ॥ नारायण उवाच-एकादशी व्रत्तमिदं बताना दुर्लभंवरम् । श्रीकृष्ण प्रीतिजनकं तप. श्रेष्टं तपस्विनाम् ।। एकादशी व्रतमिदं व्रतानां च परं तथा । कर्तव्यं च चतुर्णां च वर्णाना नित्यमेवच । यतीनां वैष्णवाना च विप्राणां च विशेषतः । वृत्या हविष्य पूाहणेन च मुंक्त पुनर्जलम् । एकाको कुश शयायां नक्तंशयनमा चरेत । ब्राह्मे मुहर्त उत्थाय प्रातः कृत्य विधाय च । नित्यकृत्यं विधायाध तत. स्नानं समाचरेत् । व्रतोपयास संकल्प श्री कृष्ण प्रीति पूर्ववम् कृत्वा संध्यां तर्पणं च विद्यायान्हिक माचरेत् । नित्य पूजा दिने कृत्वा प्रतमन्मं समा हरंत । पोडशोचारं प्रकृ, विधि वोधितम् ॥ श्राचम्य भीहरिस्मृत्यास्वस्ति पाचन मारभेत् ॥ देवपटक समावाह्य पृथक्धानः समर्चयेत ॥ पूजा पंचोपचारेण प्रकृटेन विचक्षण ॥ गणेश्वरं दिनार पन्हि विष्णु शिवं शिवाम् ॥ सम्पूज्यताप्रणम्याथ व्रतंकुर्याद रिस्मरन । नाराध्य देयपदपंच यदि कर्मममाचरेत । नित्यनैमितिकं तस्य सबै तग्निप्फलंभवेत ॥
कर्मकाण्ड रमाकरे, एकादशी व्रतोद्यापन पूजा पद्धतिः ( २६६) भारोप्य मजलपट भद्रोपरि शुभेदणे ॥ घटाधः कणिकायां 7 वादि लोकां स्थापयेत् ।। घटोपरिन्यरीतन पात्रं तराइलपूरितम् ॥प्रतिमा स्थापयत्तत्रसुवर्णा विष्णु रूपिणीम् ॥ पूर्वदले मध्यभागे रुक्मिणी सखिसंयुत्ताम् । तथादक्षिणभागे च सत्य भामांन स्थापयेर । जाम्बवता पश्चिमं च कारिन्दो मुत्तरेकमात् । सहस्राणां चतुभिस्ता दासीनां स्थापगहती , दलाभ्यन्तर भागेगु क्रमेणैनाश्चस्थापयेत् ॥ शंर चक्र गदा पद्ममाग्नेया दिपुस्थापया ॥ पुरतः पक्षिराजच वाहनं सर्ग मालम् ॥ परितः स्थापयशोमा ल्लोकपालांश्च रक्षक न ॥ यांदाराधनं विष्णोः शयत्त्या भरत्या जगद्गुरोः । देवालये नदीतीर शुनौदंशेऽशवायहे । सम्पूज्य पिधिव स्तुन्वास्तौनः प्रसनधी: 1 रात्री जागरणंकुन्मिहात्म्य श्रवणादिगिः ॥ एकनिर्मन भाषन गोरा मृत्यादिभिःसह । प्रभातायान्तु शवयां कृत्वाचावश्यकं विधिम् ॥ अग्नि संस्थाप्य विधिवत्पयसि- अपयेच्चरम् । पौरुषेणथसूक्तेन प्रत्यूचं जुहुया इतम ततो होमाचसागर गामरोगांपयविनीम् । दया दोमस्य प्रत्यर्थ श्राचायाय सदक्षिणम् । शम्यादाम भूपणानि वार्मासि विविधानिय ॥ श्राचार्याय प्रदेयानि पदकानिच दक्षिणा । यदीच्छेदात्मनः श्रेयोव्रतस्या विफलंफलम् । तेमा. चार्ग, प्रयत्नेन सन्तोप्योऽथनशंसयः शुशायाश्चैव प्री त्यंध ब्राह्मण - द्वादशान्शुभाम् ॥ कृष्णायाश्चापि प्रीत्यर्थं तथा द्वादश ब्राह्मणान् ॥ सम्पूज्य विधिवत्तत्र देशवादिकनामभिः । वस्त्रोपचीन भूपाढ्यैरलं कृत्य प्रपूजयेत् ॥ पक्वान्न पूरितान् कुम्भान्सामानांच सदक्षिणान् ।। ततः सौपस्करपीट माचार्याय निवेदयत् ॥ भुंजीत तदनुज्ञातः स्वधन्धुजन:मह ॥ इत्याह भगवान् व्यास: पुराण ब्रहासतके ।। इत्येकादशी व्रत विधिः ॥ अथैकादशीव्रतोद्यापनपद्धतिः ॥ अथचैकादश्युद्यापनंतु प्रबोधिन्यावाभीष्मैकादश्यामथया माघेवैशाखेवित्तसमृद्धौवाकुर्यात्-तत्रादौ पूर्वदिनेदशभ्यांकृत नित्यक्रियएकवारं हविष्यभुक्त्वा रात्रौभूमौसुखेनोपदिशेत् । द्वितीयदिनएकादश्यां गङ्गादौगृहेवा स्नानंकृत्वा नित्यनैमित्तिकं विधायपित्वानसन्तयेच निराहारं व्रतंकुर्यात् । व्रतकर्तुमसत्तरचे व्राह्मणद्वारानिष्क्रयंदत्वाकारयेत् । ततःपूर्वोक्तविधानेनस्वेच्छा. नुसारतश्चतुर्हस्तायतविस्तृतं सपादहस्तविस्तृतं या सर्वतोभद्र (३००) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, एकादशीव्रतोद्यापन पद्धति. मण्डपंसमुच्छिनकदलीस्तम्भनिर्माय रेखादिभिर्विरच्यच नाना प्रकारेणवस्त्र मालादिभिरलंकृत्यपूजोपचारसामग्री सम्पाद्य हत्ती पादौप्रक्षाल्यच निशामुखेदीपंप्रज्वाल्यासनउपविश्याचम्य रक्षा विधायप्राणायामत्रयंकृत्या संकल्पंकुर्यात्-प्रोत्यादिदेशकालौ संकीर्त्यामुकगोत्रप्रवरो ऽ है करिप्यमाणकादशी व्रतोद्यापन शान्तिकर्मणि ममाग्विलपापत्तयपूर्वकं चातुर्वर्गफलप्राप्तये श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थ मद्यावध्याचरितैकादशीव्रतानामुद्यापनंच तश्रा- दौनिर्विघ्नतासिद्धयेगा पत्त्यादि नवग्रहात पूजनश्चकरिष्ये । तत प्राचार्यव्राह्मणंसम्पूज्य वरणद्रव्यहस्तकृत्वा सङ्कल्पंकुर्यात्-अद्य पूर्वोचारिते गुणविशिष्टायामेकादश्या मेकादशीव्रतोद्यापनकर्मण्य मुकगोत्र प्रवरामुकशर्माणं व्राह्मणमेभिवरणद्रव्य राचार्यकर्मकर्तु त्वामहंवृणे ॥ हस्तेदत्वाप्रार्थयेतू-30 आचार्यस्तुयथावगें देवानां चबृहस्पतिः। तथात्वंममयजे ऽस्मिनाचार्याभवसुव्रत ॥ प्रत्युक्तिः भवानीति-श्राचार्योचूयात् ॥ ततश्राचार्थः स्वस्तिवाचनपठि- स्वाचपूर्वोक्त विधिनागणेशादिदेवानां पूजनंकृत्वा सर्वतोभद्र पूजापद्धत्यनुसारेण सर्वतोभद्रमण्डले देवान्नावाहासम्पूज्यच ततः कच्चिन्मनोहरं ताम्रकलशपञ्चपल्लवयुत जलपूर्णवेद्यां संस्थाप्य वदयमाणेन विधिनापूजामारभेत् ॥ तत्रादौकर्णिकायां पुष्पं गृहीत्वा 55 चाहयेत् ।। ॐ भूः पुस्पमावाहयामि । 30 भुवः पुरुषमावाहयामि । ॐ स्वः पुरुषमावाहयामि ध्यायेत् । आग च्छदेवदेवेश जगद्योनेरमापते । शुद्धहास्मिन्नधिष्टाने सन्निधेहिकृपां कुरु ॥ 30 सहस्रशीर्षापुरुपः सहस्राक्षः सहस्रपात् ॥ सभूभिर्ट। सर्वतस्पृत्वाऽ त्यतिष्ठदशांगुलम् ॥ 30 भूर्भुवःस्वः श्रीयुतपुरुष मध्ये प्रतिमायामावाहयामि स्थापयामिपूजयामि । ततः प्रति- मायाः परितः 30 अग्नयेनमः प्रा० स्था. 30 इन्द्रायनमः श्रा० स्था 30 प्रजापतयेनमः श्रा० स्था० 30 विश्वेभ्योदेवेभ्योनमः श्रा० स्था० । 30 ब्रह्मणे नमः या० वसुदेवायनमः० 0 रामा पनमः श्रियैनमः । इत्यावाहावंसर्वत्र । ततःकमलपूर्वदलस्य 1- कर्मकाएट रदााकरे एकादशी व्रतीद्यापन पद्धति (३०१) 4 मध्यभागे रुक्मिणीमा०--श्रायातुरुक्मिणीदेवी श्रीकृष्णप्राण- वल्लभा । कमलेऽन्तःपूर्वदले ससखीगणमरिडना ॥ 30 रुक्मि- एयैनमः स्था। जामवन्तीम् ।-श्रागच्छागच्छकल्याणि जाम्च- वन्तिहरिप्रिये । कमले 5 न्तर्दक्षदले ससग्वीवृन्दवन्दिते ।। ॐ . अजाम्ववत्यैनमः श्रा० स्था०॥ प्रागच्छदेविकालिन्दि रासेश. भाणवल्लभे | पंकजे ऽन्तः परदलेससग्वीगणशोभिते ॥ कालि न्धनमः प्रो० स्था० । ततः सत्यभामामुत्तरे-अावाहयामिदेवेशी. सत्यभामाहरिप्रियाम् । उदपकजपत्रान्तः सग्वीगणसुमरिडते । सत्यभामायनमः आ० स्था० । तत आग्नेये 30 पांचजन्या- यनमः श्रा० स्था० । नैऋत्ये ७० सुदर्शनायनमः श्रा० स्था। वाव्ये-30 कौमोदक्यैनमः ईशाने-ॐ महापद्मायनमः श्रा० स्था. पू० । पुरतः ६० सामध्यनिशरीरस्त्वं वाहनंकेशवस्यच । विप- पापहरोनित्यमतः शान्तिप्रयच्छमे ॥ वैनतेयायनमः श्रा० स्था० । ततः पूर्वादिपुक्रमतो लोकपालानावाहयेत् । पूर्व-30 इन्द्रायनमः श्रा० स्था० एवंसर्वत्र ॐ अग्नयेनम: ॐ यमाय- नमः ॐ नितयेनमा अचमणायनम: 30 वायवेनम: ॐ 30 सोमायनमः ॐ ईशानायनमः एवं नाममन्त्रैरावाहा । ॐ एतन्तेदेवसवितर्यज्ञं प्राहुहस्पतयेन्ब्रह्मणे ॥ तेनयज्ञमयतेनयन- पतिन्तेनमामय ।। मनोजूतिर्जुपता माज्यस्यवृहस्पतिर्यज्ञमिमन्त- नो त्वरिष्टटयजर्ट समिमन्दधातु ॥ विश्वेदेवास ऽ इहमादयन्ता- मोर।।5 प्रतिष्ठ ॥ इतिप्रतिष्ठाप्यपूजयेत् पुष्पंधुत्वाध्यायेत्-ॐ नवीननीरदोल्लासश्यामसुन्दरविग्रहम् ॥ शरत्पार्वणचन्द्राभानव धास्यमधुत्तमम् ।। ध्यानगम्यंदुराराध्यं ब्रह्मादीनांचवन्दितम् ।। आवाहयामिदेवेश हरिमेकादशीमियम्-अय॑म् इदमय॑पवित्रं मेशजतोयसमन्वितम् । पुष्पचन्दनाक्तं गृहातांभक्तवत्सल || पाथम्-पादप्रक्षालनाईतत्सुवर्णपात्रसंस्थितम् । सुवासितशीतल : चगृह्यता राधिकापते ॥ श्रासनम्-आसनंपरमंदिव्यं रत्नसार परिच्छदम् । नानायर्ण विचित्राढ्यंगृहातांपरमेश्वर ।। पंचामृतम्- ( ३०२) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, एकादशी मतोयापन पद्धति दधिदुग्धघृतक्षौद्रशर्करामिश्रितपरम् ॥ पंचामृतंगृहाणत्वहरे चैका दशीमिय ॥ स्नानीयम्--पवित्रंतीर्थजंदिव्यं स्नानीयमगलात्म- कम् । गृहाणपरयाभक्त्या सत्यभामापतेप्रभो ॥ स्नानान्नाचम- नीयं समर्पयामि-यज्ञोपवीतम्--सावित्रीग्रन्थिसंयुक्तं स्वर्णतन्तु विनिर्मितम् । गृहातांदेवदेवेशरचितंचाम्कामणा । वनम्--वस्त्रं दौमविशुद्धाभंनिर्मिविश्वकर्मणा । कल्पितंपरयामीत्या गृहातां राधिकापते । चन्दनम्--प्रधानादरणीयश्च सर्वमंगलकमणि । प्रहायतांदीनवन्धो गन्धो ऽयं मंगलप्रदः ॥ पुष्पम्--जातीचम्प कपुष्पाणितुलसीमिश्रिनानिच । गृहाणदीनवन्धोत्वं सत्यभामा मियमभो॥ (अबकतिचित्पुराणेष्वंगपूजो कासेयम्) ॐ दामोदरा यनमःपादौपूजयामि। ॐ माधवायनमाजानुनीपूज। ॐ कामपत येनमःगुलांपू० वामनायनमःकटिंपू० ॐ पद्मनाभायनमानाभि पू०30 विश्वमूर्तयेनमःउदरंपू० ३० ज्ञानगम्यायनमःहृदयं पूजः । ॐ श्री कण्ठायनमः कण्ठं पू० 1 30 सहवाहवेनमः वाह पू० । ॐ ध्यानगम्यायनमः चक्षुषीपू० । 30 उरगायनमः ललाटं पू० । नाकसुरेश्वरायनमः नासां पू० ॥ श्रवणेशायनमः श्रवणे पू० । ॐ सर्वकामदायनमः शिखां पू० । 30 सहस्रशीणे नमः शिरः पू० । 30 सर्वस्वरूपिणेनमः सर्वागपूजयामि। धूपम्-रसोवृक्ष विशेषस्य नानाद्रव्य समन्वितः। सुगन्धयुक्तः सुखदोधूपो ऽयं प्रतिगृहाताम् ॥ दीपम्-दिवानिश सुप्रदीप्तो रत्नसार विनिर्मि तः। धनध्वान्त विनाशाय दीपो ऽयं गृहातांहरे ॥ मधुपर्कम् - सर्वेषां प्रीतिजनकं सघृतं मधुरंमधु, पात्रस्थंमधुपर्क यद्गृहाण मक्मिणी पते ॥ नैवेधम्-एकादश्युधापने चतुर्विशति संख्यकानि नैवेद्यानि दद्यात् ।-मोदकां लड्टुकांश्चापि घृतपूरकमंडकान् । सोहोलिकादिकंसार सेवासक्तुफलानि च । वटकानपायस दुग्धं शालिदध्योदनंतथा । हंडिरकाः पूरिकाश्चापूपान् गुड़मोदकान् । तिलपिष्टं खण्टपिष्टं लाजादुग्धं सशर्करम् । रम्भाफलंच सघृतंमुद्ग चूर्ण गुटौदनम् । नैवेद्यगृह, श्रीकृष्ण उद्यापनविधौ हरे॥ प्राच- कर्मकाण्ड रताकरे, एकादशी व्रतोद्यापन पद्धति ( ३०३) मनम्-निर्मल जान्हवीतोयं सपवित्रं सुवासितम् । पुनराचमनी यं च गृहाता मधुसूदन । ताम्बूलम्-एलाग्वादिर संयुक्तं करादि सुवासितम् ।। मया निवेदितनाथ ताम्बूलं प्रतिगृह्यताम् । उपाय- नम्-उपानीत मिदंद्रव्यं यावच्छक्ति प्रकल्पितम् । गृहाणानाथ नाथत्वं हरेचैकादशीमिय ॥ पुष्पमाला हस्ताभ्यां दर्शयित्या च । नानाप्रकार पुष्पैश्च ग्रथितंसूक्ष्मतन्तुनो || प्रवरं भूपणानांचमात्य मेप्रतिगृह्यताम् ।। मंत्रपुष्पांजलिम्-हे कृष्ण राधिकानाथ करुणा सागरप्रभो ! संसार सागरे घोरेमा समुद्धरमाधव । शत जन्म गतायाता दुद्विग्नस्य ममप्रभो ॥ स्वकर्मपाशनिगड़े बन्धस्य मो क्षणकुरु । प्रणतंपादपोते पश्यमां शरणागतम् ॥ मार्तडतनयाद भीतं पाहिमां भक्तवत्सल । भक्तिहीनंक्रियाहीनं विधिहीन वेदतः । वस्तुमंत्रं विहीनं यत्तत्सम्पूर्ण कुरुप्रभो। वेदोक्तविहिता ज्ञानात्स्वांग हीनेचकर्मणि ।। त्वन्नामोच्चारणेनैव सर्वपूर्ण भवेद्ध रे॥ ततः सफलायचामेकरे कृत्वोपरितोदनिणहस्तमुतानंन्यस्य हे कृष्ण द्वारिकावासिंलक्ष्मी कांतदयानिधे । गृहाणाऱ्या मयादत्तं व्रत संपूर्ति हेतवे ॥ फलं पुरतो निधायाऱ्या जलेनदेवं स्नापयेत् ॥ ततः कथाश्रवणार्थमाचार्य व्यासत्वेनवृणुयात । व्यास स्वरूपिणं ब्राह्मण संपूज्यवरण द्रव्यंकरेकृत्वा ॐ अद्येहेत्यादि देशकालो सकीधिकादश्यां शुभपुण्यतिथौ-अमुकगोत्र प्रवरोऽ हममुक शर्माकर्तव्यैकादश्युद्यापन कर्मणि देवपूजनानन्तरमद्यनिशायां । शल्चिशत्यैकादशी माहात्म्यपारायण श्रवणकर्तमेभिर्वासांगुलीय धौतवस्त्रादि वरणद्रव्यैरमुक शर्माणं ब्राह्मण कथावाचनार्थ व्या- सत्वेन त्वामहंवृणे । इति वरणद्रव्यंदत्वा करवाणीतिप्रत्युक्तिः ॥ ततेरात्रौ माहात्म्य श्रवणादिभिर्जागरण कृत्वाद्वितीयदिनेनित्य कर्मविधायाचार्यावाहितदेवताः । संपूज्यहोमार्थ मंडपंनि- याग्निस्थापनपद्धत्यनुसारेण पंचभूसंस्कारान्कृत्वा तेनैव पद्धत्या घृतोक्तद्वादशाहुत्यनंतरंप्रधानहोमपायसेनकुर्यादभावे यवनिल घृतादिभिः कुर्यात-ततः क्षीरमानीय तस्मात्पायसात ।
(३०४) कर्मकागद रसाकरे, एकादशीघ्रतोद्यापन पद्धतिः ॐ पवित्रतेविततम् । इति मंत्रेण किंचित्पृथगुध्दृत्यपात्रान्तरे 'स्थापयेत् । तदुक्तंत्रतराजेपायसादुट्टतं किंचित्प्रापणं तत्प्रकीति- तम् । एतदेवप्रापणमग्रे देवायच निवेदयेत् । तत्रादौघृतेन--0 सहस्रशीर्षा० १६ ऋक् ॐ अग्नये स्वाहा ॐ इन्द्राय स्वा० ॐ प्रजापतये स्वा० । विश्वेभ्योदेवेभ्यः स्वा. 30 ब्रह्मणे स्वाहा ततो घृताक्तपायसेन 3. वसुदेवाय स्वाहा 30 रामाय० 30 श्रियै० 30 विष्णवे. अविष्णोनुकमिति तिसूणांदीर्घतमा ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः विष्णुर्देवता होमे विनियोगः । ॐ विष्णोर्नकंवी- र्याणि प्रवोचयः पार्थिवानि विममेरजासि स्वाहा । तद- स्यप्रियं स्वा० 30 प्रतद्विष्णुस्तवतेवीर्येण मृगोनभीमः कुचरो गिरिष्टाः। यस्योरपु त्रिपुविक्रमणेष्वधिक्षियन्ति भुवनानिविश्वा स्वाहा । ॐ भूः स्वाहा 30 भुवःस्वा० ॐ स्वः स्वा० ॐ भूर्भुवः स्वास्या० केशवायनमास्वा० 30 नारायणायनमः आमाधवाय० ॐ गोविन्दोय. ॐ विष्णवेमधुसूदनाय. ॐ त्रिविक्रमाय० ॥ थामनाय० ॐ श्रीधराय ॐ हृषीकेशाय ॐ पद्मनाभाय ॐ दामोदराय ततो घुतेन-30 स्त्रीचतुः सहस्रपरिवृतायै शाक्मण्यै स्थाहा ॐ स्त्रीचतुः सहस्र० सत्यभामायै स्वाहा । स्त्रीचतुः सहस्र० जाम्बवत्यै स्वाहा ॐ स्त्रीचतुः सहस्र कालिन्यै स्वाहा । ॐ शंखाय ॐ चक्रायः ॐ गदायै० ॐ पद्माय ॐ वैनते- याय० ॐ इन्द्राय० 30 अग्नये ॐ यमाय० अनितये 30 वरुणाय 30 वायवे 30 सोमाय० 30 ईशानाय० । ततः सर्व- तोभद्रस्थ ब्रह्मादिमंडलदेवतास्तत्तन्मंत्रैर्वा नाममत्रैर्यवाज्य तिलेहींमयेत् । ततः स्विष्टकृद्धोमं कृत्वा पूर्णाहुत्यर्थयजमानः घृताक्तं श्रीफलं निधायोतिष्ठन्सन्--ॐ पूर्णादात्यस्यौर्णनाभ ऋषिरनुष्टुप्छन्दः इन्द्रोदेवता पूर्णाहुतिहोमे विनियोगः । ॐ पूर्णादविपरापत सुपूर्ण पुनरापत । वस्नेवविक्रीणावहा ऽ इषमूर्ज टै० शतक्रतोः स्वाहा । ततः पृथक्स्थापितपायसं घृताभ्यक्तंपाने धृत्वो वक्ष्यमाणमन्त्रेण निवेदयेत्-30 त्वामेकमायं पुरुपंपुराएं कर्मकाएर लाय.रे, एकादशी प्रतोद्यापन पद्धतिः (३०५) नारायण विश्वसृजयजामः । त्वयैपभागो विहितो विधेयो गृहा पहव्यंजगतामधीश । ततो ऽग्निचतुर्वारं प्रदक्षिणीकृत्य ॐ भिदि विश्वायपद्विपः । इतिमंन्त्रेण धरण्यां जानुनीनिपात्य. वसूक्तं पुरुषसूक्तंवापठित्वा अष्टौपदानि प्रतिदिश वद्यमाणमंत्र स्त्यक्त्वा गच्छेत् । मन्त्राः कृष्णाय वासुदेवाय हरयेपरमात्मने शरण्यायाममेधाय गोविन्दायनमोनमः । नमः स्थूलाय सूक्ष्माय व्यापकाव्यापकाय च । श्रनन्ताय जगद्धात्रे ब्रह्मणेऽनन्तमूर्तये । अव्यक्तायाखिलेशाय चिट्ठपायगुणात्मने । नमोमूर्तायसिद्धायपरा यपरमात्मने । देवदेवायचाय परायपरमेष्टिने । कर्ने विश्वस्य गोप्ने च तत्संहचतेनमः । ततो देवायनिवेदितं पायसमानीय शिरसिधृत्वा केवैष्णवा: केवैष्णयाः केवैष्णवाः । इत्युच्चै?षयेत् ततः समानाः प्रतिवदेयुः । वयं वैष्णवाः इति वारयंघोषयेयुः ततस्तेभ्योहविर्दत्या स्वयमनेन मंत्रेण प्राशयेत् ॐ नमोभगवते वासुदेवय, इदममृतमहं प्राभामि इतिप्राश्य-आचम्य-माणा- नायम्य यजमान प्राचार्योवापुन)म समीपमागत्य ॐ सिद्धये स्वाहा इत्यग्नावाज्यं जुहुयान्-तनः 30 यतइन्द्रभयामहेततोनोड अभयंकुरुशन्नः कुरुपजाभ्योभयंनः पशुभ्यः इत्यात्मानमभिमंत्र- येत् । ततो यजमानः सांगतासिध्यर्थ माचार्यादीन् विध्युक्तम- कारेण सम्पूज्य दक्षिणादिभिः प्रतीप्याचार्याय सालंकारां सव- त्सांगां च दद्यात् । ततश्चतुर्विंशदामान्नानि सयज्ञोपवीत पूगीफल दक्षिणानि सम्पूज्य संकल्पं कुर्यात्-अद्येहेत्यादि संकीामुको ऽहं कर्तव्यैकादशी व्रतोद्यापनकर्मणः सांगतासिद्धये शुक्लैकादशी निमितं केशवादि नाममंत्रोच्चारणेन तथा कृष्णकादशी निमित्त शंकर्षणादि नाममंत्रोचारणेन चतुर्विंशति ब्राधणेभ्यो नानागोत्रेभ्योदास्ये-ॐतत्सत्कृष्णार्पणमस्तु नममवदयमाएमत्रैः प्रत्येकायदद्यात्-ॐ केशवायनमः१ . नारायणायनमा२ॐ माधचायनमः ॐ गोविन्दायनमः ४ ॐ विष्णवेनमः ५ मधुसू- (३०६) कर्मकाण्ड रताकरे, एकादशीव्रतोद्यापन पद्धतिः दनायनमः ६ॐ त्रिविक्रमायनमः ७ ॐ वामनायनमः ८ श्रीधरायनमः ॐ हृषीकेशायनमः ०१७0 दामोदरोयनमः१२ इतिशु० ॐ संकर्षणायनमः १ ॐ वासुदेवायनमः २ प्रद्युम्ना. यनमः ३ ॐ अनिरुद्धायनमः ४ पुम्पोत्तमायनमः ५ ॐ अधो- क्षजायनमः . ॐ नारसिंहायनमः७ अच्युतायनमः ८ जनार्दनायनमः। ॐ उपेन्द्रायनमः १० ॐ हरयेनमः ११ ॥ श्री कृष्णायनमः। एवं नाममंत्रेण सम्पूज्य ब्राह्मणेभ्योदद्यात्- प्रार्थयेत्-हविष्यान्नंद्रोणपात्रे ससूनं च सदक्षिणम् । ददामि द्विजयर्याय केशवाप्रीयतामिति । इत्यत्रकेशवपदस्थने पूर्वोक्त देवनाम्ना मूहः कार्यः ततः सोपस्करदेव प्रतिमापीठादिकमुत्तरांग पूजनंविधायाचार्यायदेयं प्रार्थयेच्च 30 यस्यस्मृत्या च नामोक्त्या तपोयज्ञक्रियादिषु । न्यूनं सम्पूर्णतांयान्तु सद्योवंदेतमच्युतम् । कलशजल पात्रान्तरे कृत्वा यज्ञशालामागत्याचार्यः पूर्वोक्तविधिना सुरस्त्वामभिषिचन्तु० इत्यादिभिरभिपिंचेत् निलकंकृत्वादेवोपमुक्त निर्माल्यंदद्यात् अग्निविसृजेत् गच्छ- २ सुरश्रेष्ठ स्वस्थानं परमेश्वर यत्रत्रह्मादयो देवास्तत्रगच्छहुता- आ यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादायमामकीम् । इष्टकाम समृद्धयर्थं पुनरागमनंकुरु । अद्यत्यादि कृतस्यकर्मणः सांगता सिद्धयर्थ नाना नामगोत्रान्ब्राह्मणान्-अहं भोजयिष्येतेभ्यो दक्षिणांच दास्ये । ततो व्रतं सम्पूर्णतां वाचयेत । 30 जपछिद्रं तपरिच्छद्रं यश्च्छिद्रं व्रतकर्मणि। सर्व भवत्वछिद्रमे ब्राह्मणानां प्रसादतः ॥ ततो ब्राह्मणान्नमस्कृत्येष्टजनैःसह मुंजीत ॥ ततः ॥ इति एकादशी व्रतोद्यापन पद्धति ॥
कर्मकार रक्षाकरे भीम चक परिभापा (३०७ ) अथ भीष्मपंचक परिभाषा मथच कातिक शुक्लकादशीमारभ्य-प.णिधान्तं भीमपञ्चकवतन् -- अकादशी शब्देनप्रसिद्ध तदिन ग्रहणम् । प्रकारान्तरेण लक्षणायां प्रमाणाभावात् ।। तिथिश्च युग्मवाक्या द्वादशीविद्वैयप्रया ॥ दिकपञ्चदशभिस्तत्वत्त्युक्तधस्यैवदूपत्यम् । एवं च दशम्यविद्ध कादशीमारभ्यपंचदिनात्मकंवतं चतुर्दश्यविद्ध पूर्णमास्यां चतरसमाप्यते नैयात्रसन्देहः।। तिथिक्षयवशेन नवं घटते चेत् विद्धायामप्यारम्भ: प्रधानमना नुधिनांगति धिगुणस्य परविद्ध स्वाद रनादरणीयत्वात् ॥ एवमविद्धकादश्यामारभ्य । परसिद्ध पूर्णमास्यांसमापने यदि तिथि दिवशेन पड्दिनापत्तिस्तदा चतुर्दशीविज्ञापौर्णमास्यां समाप्तिः। उपकमसमाप्त्यो रजस्थान विशेषेऽपि मुख्यवेतिन्यायेनेनोपक्रम धर्मस्यैव पलपत्यान-विशेषो धर्मशास्त्रादिपुदष्टव्यः । उक्तंच भीष्मपथकरतं मदन रत्ने देवी पुराणे ॥ एकादश्यान्तु गृह्णीयाइत पञ्चदिनात्मरं । प्रातः स्नात्वा विधानेन मध्यान्हेच तथावती ॥ नद्यां निर्गगतचा समालभ्यच गोमयम् ॥ यवाहितिल सम्यकपितृन्सतपय कमान ॥ स्नात्वामीनं नरः कृत्वाधीत वासा दृढ व्रतः ॥ ततः सम्पूजय देवं सर्वपापहरं हरोम् ॥ स्नापयेचाच्युतंभवाया मधुक्षीरधृतेनच तथैव पचगव्येन गन्ध चन्दन यारिणा ॥ धूप दोपेन पुष्पेण नैवैद्य दक्षिणादिभिः ॥ पूजये द्वासुदेवंच ॐ नमी वासुदेवेति मंत्रतः ॥ दीपकंच दिवारात्रौदद्यात्संचदिनानिच ॥ नमोवासुदेवेति जपेदष्टोतरं शतं ॥ जुहुयाचघृताभ्यक्त तिलोहियवान्नती ॥ पडक्षरेण मन्त्रेण स्वाहाकारन्वितेनच । उपास्य पश्चिमा संध्या प्रणम्य गरुडधनं । जापत्या पूर्ववन्मत्रं क्षितिशायोभवेन्नरः ॥ सर्व मेत द्विधानंच कार्य पञ्चदिनेष्वपि ॥ विशेषोक्तं व्रतेचासीद्य दन्यून गुप्वतत् ।। प्रथमन्हिहरेः पादौ पूजयेत्कमलैनरः ।। द्वित्तीये विल्वपत्रेण जानुदेशं समर्चयेत् ।। पूजयेतु तृतीयेन्हि नाभि- भंगाररणतु ॥ वाणविल्वजपाभिश्चततः स्कन्धौसमार्चयेत. ॥ ततस्तु पूजयेच्छी मालया चक पाणिन. । पादमेतु-भीष्मायोदकदानंच अध्यचैव प्रयत्नतः। पूजाभीष्मस्य कर्तव्या दानं दद्यात्प्रयत्नतः ।। त्रि.प्राश्यगोमयं सम्यगेकादश्या मुपावसेत् ॥ गौमूत्र मंत्र पद्भ्यो द्वादस्या प्राशयगती ॥ क्षीरं चैव त्रयोदश्यां चतुर्दश्यां तथादधि ३ संप्राश्यकायशुध्यर्थ लंघनीयं चतुर्दिन। पश्चम दिवसे स्नात्या विधिवत्पूज्यकेशवं ॥ भोजयेद्दाह्मणान्मात्या ततो दद्याच दक्षिणाम् । ततो मक्त समश्नोयारपंच गव्य पुर:मरम् ॥ भविष्योत्तरे-स्त्रोभिवाक्येन कर्तव्यं स्वफ्न्युः पुण्यवर्धनम् ॥ विधवाभिस्तु कर्तव्यं पुत्राणा शुभद्धये ॥सर्वकामममध्यथै मौक्षार्थ चैवपांडव ।। पंधवस्तु कर्तव्यो विष्णुध्यानपरायणे । पापस्यप्रतिमा कार्या रोदत्वातिभीपणा खा हस्तासि विकृता लौहोद्रष्ट्राकरालिनी ॥ तिलप्रस्थोपरिस्थाप्या कृष्णवस्त्राभिवेष्टिता ॥ रक्त वस्त्रे कृता पीडा ज्वलन्कांचन कुंडला ॥ सभ्यूज्य परयाभवत्या धर्मराजस्थनमामिारोपंप्रयोगेष्ठम्।
(३०८) कर्मकारह रत्नाकरे, भौम पंचक प्रयोग पूजा पद्धतिः ॥ अथ भीष्म पंचक प्रयोग पूजापद्धतिः॥ अथ च भीष्मपंचकव्रतं कर्ताप्रातः स्नात्वासंध्यामुपास्य-पूक्ति कादश्यां मध्यान्हेवा प्रभाते गंगासमीपे वानडागे कृपेनिर्भरे वा यथालन्ध जलाशये समागम्य हस्तौपादौ प्रक्षाल्यताम्रपानमादा योदङ्मुखः पवित्रपाणिराचम्य संकल्पंकुर्यात अग्रेहेत्यादि देश कालोसंकीर्त्यामुकगोत्रप्रवरो ऽ मुकशाह,, अबैकादशीमार- भ्यपौर्णिमा पर्यन्त जन्मार्जित समस्नप्रायश्चित्त दरीकरणार्थ धातुर्वर्गफलावाप्तये श्रीकृष्णप्रीत्यर्थ भीमपंचक व्रतं करिष्ये । ततो गोमयस्नानम्,, गोमयमानीयमंत्रयेत-ॐ अग्रमग्रंचरन्ती नामौषधीनां वने वने ॥ तासामृपभपन्नीनां, पवित्रं काय शोधनम् ॥ तन्मेरोगांश्चशोकांश्चनुदगोमय सर्वदा । इत्यभिमन्य । ॐ मानस्तोक इतिमंत्रस्य कुत्सऋषिः । रुद्रोदेवता जगतीछन्दः अंगानुलेपने विनियोगः ।। ॐ मानस्नोकेननयमान ऽआयुपिमानो गोपुमानोऽश्वेपुरीरिपः मानोवीरान्द्रभामिनो चधी विद्यमन्तः सदामित्वाहवामहे । इतिसोदकंगोमयमुभाभ्यां हस्ताभ्यांसूर्याय- दर्शयित्वावारत्रयं ललाटादिपादतलपर्यन्तान्यंगान्यनुलिप्य प्रक्षा- लयेत् ॥ ततोवारत्रयं निमज्योन्मज्यस्नात्वा तीरमागत्य, तर्प- पोक्त विधिना पित्यान्संतl ॥ तदुपरिहरिपूजासमाप्तिपर्यतं मौनीभवेत् ॥ तर्पणान्ते पुनःस्नात्वा-धौतवासः परिधाय तिलकं कृत्वोदकोक्तमंत्रेण गंधपुष्पादि युतमर्थ्य भीष्माय दद्यात तन्मंत्रः॥ अध्यनिधाय-ॐ सत्यव्रतायशुचये गांगेयायमहा- रमने भीष्माय च ददाम्यय॑माजन्म ब्रह्मचारिणे ।। वसूनाम- बनाराय शंतनोरात्मजायच अर्घ्य ददामि भीष्माय सोमवंशो- भवाय चे। इति पंचधायदत्त्वा ॥ ततोजीयित्पितृकोपि अपस- व्येन पितृतीर्थ न दक्षिणजान्बाच्य-तिलोदकंदद्यात ॥ सतिलज लमजलौनिधाय मंत्रः-वैयाघ्पादगोत्राय सांकृत्यप्रवरा यच ॥ गंगापुत्राये भीष्माय प्रदास्येहंतिलोदकम् ॥ अपुत्रायददाम्य कर्मकाण्ड रखाकरे, भीम पक प्रयोग पूजा पद्धतिः (३०६) तत्सलिलं भीम वर्मणे ।। इति पंचधासलिलं दत्वा ।। ततो लक्ष्मी वासुदेव सहित भीमं । लक्ष्मीवासुदेवयुत भीग्माय नमः ॥ इतिमंत्रेण पंचोपचार-पाद्य स्नान गंध धूप दीप नैवेद्या दिभिर्जलसंपृज्य-पंचरत्नानि ब्राह्मणाय दद्यात् ।। अयेहेत्यादि अमुकोह भीष्मपंचक व्रतनिर्विघ्नता सिध्दये इदानीं सकलकिल्मि पदरीकरणार्थ श्री लक्ष्मी वासुदेव सहित भीष्म प्रीत्यर्थ पंचरत्न दानकरिष्ये ।। इतिव्राह्मणायदस्वा ॥ वारिपूर्णताम्रकलशंकृत्वा नग्न पादो वा काष्ट पादुकारूदो भूत्वा गृहमागत्य पाणिपादौ प्रक्षाल्य पूजास्थलमागत्य । आचम्य-भूतोत्सादनंकृत्वा दी दद्यात् ॥ सचदीपोऽवच्छिन्नतयायथा पंचसुदिवसेषु भवेत् तथैव .. रक्षयेत ॥ संपूज्य च-ततः प्राणायामान्ते आवाहनाद्युपचारान् जलेनाभ्युदय सुवर्ण प्रतिमां लक्ष्मीसहितां वा शालिगरामं पुरतः संस्थाप्य संकल्पं कुर्यात् ॥ देशकालौ संकाद्य कार्तिक शुक्लै कादश्यांभीष्मपंचक ब्रताप्तये-श्री लक्ष्मी सहितं हरिं यथा लब्धोपचारेणाहं पूजयिष्ये।पुप्पंगृहीत्वाध्यायेत् ।। ध्यानासाध्य दुराराध्यं ब्रह्मादीनां च वंदितम् ।। हरिंध्यायामि मनसा पंच भीष्म व्रताप्तये। पाद्यम्-पादप्रक्षालनार्थतदिवयंवारि मुनिर्मलम्।। हरेगृहाण-पाद्यं त्वं पंचभीप्मत्रताप्तये ।। आसनम्-आसनार्थमि- दंवस्त्रपुष्पंचाग्रहाताहरे । भक्तवत्सलहेकृष्ण पंच भीष्मत्रताप्तये ।। अयम् इदमयपवित्रंचशङ्खतोयमसमन्वितं । पुष्पचन्द- नातं गृहाणकमलामिय ॥ स्नानीयम्-गंगादि तीर्थदिव्य स्नानीय जलमुत्तममं ॥ हरेगृहाण-परम-पंचभीपम व्रताप्तये ।। चन्दनम्-चन्दनागम्कस्त्री-संयुतंनिर्मलंशुभम् ॥ हरेगृहाणगंध त्वपंचभीष्मत्रताप्तये ॥ धूपम्-रसोवृक्षविशेपस्य नानाद्रव्य- समन्वितः। सुगन्धयुक्तासुखदो धूपोयंप्रतिगृहाताम् । दीपम्--- दिवानिशंसप्रदीप्तो रत्नसारविनिर्मितः॥ उत्तमोज्योतिपांज्योति दीपोयंगृह्यताहरे ॥ नैवैद्यम्-नानाविधानिद्रव्याणिस्वादृनिमधु- राणिच || चोप्यादीनिपचित्राणि स्वात्मारामप्रगृह्यताम् ।। मधु- (३१०) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, भीम पञ्चकप्रयोग पूजा पद्धति पर्कम्-देवाना प्रीतिजनक सघृतंमधुरंमध ॥ हरे गृहाण सुप्रीत्या पंचभीष्मत्रताप्तये ॥ पंचामृतम्-सुस्वादु- मधुरंपेयं दुग्धंमिष्टान्नसंयुतम् ॥ पंचामृतंचगोविन्द गृहाणत्वंव्रता नये ॥ पुनराचमनम्-निर्मलंजान्हवीतोयं भोज्यान्तेतृप्निदाय- कम् ।। पुनराचमनीयंचगृखतांमधुसूदन ।। दक्षिणाम्-हिरण्यराजतं द्रव्यं वित्तशाट्यविवजिर्तितम् ॥ उपायनीभृतमिदंगृह्यतांकमला पते ॥ ततःपुष्पांजलिम्-जानाप्रकारपुष्पैश्चग्रन्धितं सूक्ष्मतंतुना। प्रवरंभृपणानांच माल्यंचगृहातांहरे ॥ चक्रिन्श्रीनाथभक्तेशभीष्म प्रणसुरक्षक ॥ संसारसागरेघोरे मामुद्धरभयानके ॥ शतजन्म- गतायातादुद्विग्नस्यममप्रभो॥ स्वकर्मपाशनिगर्वन्धस्य मोक्षणं कुरु । प्रणतंपादपद्मते पश्यमांशरणागतम् ॥मार्तण्डतनयाभीतं पाहिमांभक्तवत्सल । भक्तिहीनक्रियाहीनं विधिहीनंचवेदतः॥ वस्तुमन्त्रयिहीनंयत् तत्सम्पूर्णकुरुप्रभो ॥ वेदोक्तविहिताज्ञानात् स्वांगहीनेचकर्मणि ॥ त्वन्नामोच्चारणैनैव सर्वपूर्णभवेद्धरे । एभि मंत्रैः प्रथमेन्दिएकादश्यांकमलपुष्पंपादौनिधाय पादौगन्धाक्षता- दिभिः पूजयेत् ॥ तन्मन्त्रः। 30 हरयेनमः ॥ इति मन्त्रेपकमल पुष्पैस्तदभावे अन्यपुष्पैःपूजयेत् । ततो पक्ष्यमाणमन्त्रमष्टोत्तर शतंजपेत् ॥ 30 हरयेनमः १०८ वारंजप्त्वा । प्रादेशमानं चतुरस्त्र कुण्डवामण्डपंविधाय पूर्वोक्तहोमपद्धति प्रकारेणाग्निप्रतिष्ठा पनादिकंकृत्वा घृताभ्यक्ततिलबीहियवान 30 हरयेनमः स्वाहा, इति अष्टोत्तरशतंहुत्वा, सुवर्णदक्षिणांव्राह्मणायदद्यात् ॥ ततः कायशोधनार्थ गोमयंप्राशयेत् । तन्मन्त्रः--30 गन्धद्वारांदुरा- धा नित्यपुष्टांकरीषिणीम् ॥ ईश्वरीसर्वभूतानां तामिहोपह्वये- श्रियम् ॥ इनि चारवयंप्राशयेत् ॥ ततः पंचदिनात्मकोपावास कर्तमशक्तश्चे नीवारफलमृलशाकादिकं भक्षयेनत्वन्नम् ततः सायंकालेपूजास्थलमागत्यसायं सन्ध्यामुपास्यविष्णुप्रणम्य-धृपा- तिक्यादिकंकृत्वा ॥ 30 हरयेनमः । इति १०८ वारजप्त्वा-रानो भृमिशायीभवेत् ॥ एवंपंचस्वपिदिने कुर्यात् । इत्येकादशीदिन कर्मकाण्ड रताकरे, भीम पञ्चक प्रयोग पूजा पतिः कृत्यम् । एवंद्वादश्यामपिपूर्वोक्तविधिनासर्वकृत्यंकृत्वा । 30 पूर्वोक्तपुष्पांजलिमन्त्र बिल्वपत्रैर्जानुनी-पूजयेत् । ततो गौमूत्रं गायत्रीमन्त्रेणाभिमंत्र्य-वारत्रयंप्राशयेत् । ततस्तृतीयदिनेभृङ्ग-राज पत्रपुष्पाभ्यांनाभिपूजयेत् ॥ ततः 30 पयसाशुक्रममृतंजनित्र र्ट० सुरयामुन्त्रांजनयन्तरेतः । अपामतिंदुमतिवाधमानाउवध्य वात ई० सर्वन्तदारात् ॥ इति मन्त्रेण-चारत्रयंदुग्ध-प्राशयेत् । चतुर्थदिनेवाणविल्वजपाभिः । स्कन्धपूजयेत् । ततः 0 दधिका- व्णोऽनकारिपंजिष्णोरश्वस्यवाजिनः सुरभिनोमुखाकरत्मणवायू ॐ पितारिपत् ।। इतिमन्त्रेणवारत्रयंदधिप्राश्नीयात् ॥ ततः पंच मेन्हि-प्रथमदिनोक्तं सर्वकर्मकृत्वामालतीपुष्पेणशिरः पूजयेत् ।। उक्तलक्षणां-लोहीप्रतिमां पापपुरुपस्यकृत्वा एकपस्थतिलोपरि संस्थाप्यवक्ष्यमाणमन्त्रःपूजयेत् । 30 यमायनमः श्रावाहनं । 30 धर्मराजायनमः स्थापनं। 30 मृत्यनमः प्रतिष्ठापनं। 30 अन्त- कायनमः स्नानम् । 30 वैवस्वतायनमः चन्दनं । ७० कालायनमः तिलाक्षतान 30 सर्वभूतायनमः पुष्पं । 3. औदुम्बरायनमः धूपं । ॐ दध्नायनमः दीपं । 30 नीलायनमः नैवेद्यं । 30 परमे- ष्ठिनेनमः पुनराचमनम्-30 वृकोदरायनमः उपायनमं । 30 चित्रा नमः सफलाय॑म् | चित्रगुप्तायनमः मन्त्रपुष्पांजलिमादाय 30 यदन्यजन्मनिकृतमिहजन्मनिवापुनः । पापंप्रशममायातुतव- पादप्रसादतः। अद्यहेत्यादिदेशकालौ सकीामुकोई यन्मया भीमपंचकव्रतकर्मणि जन्मार्जितसमस्तपापदरीकरणार्थ श्रुतिस्मृ तिपुराणोतफलावाप्तये श्रीकृष्णप्रीत्यर्थमिमां पापप्रतिमांधमामे प्रीयतामिति निश्चलाभक्त्या मुकगोत्राया मुकशर्मणेविप्रायतुभ्य महसन्दास्ये भूमिदेवायदत्त्वा-अद्य० पापपुरुषप्रतिमादानप्रतिष्टार्थ सपादमासमात्रमुवर्णचाहंदास्ये। वियोव्यात-निश्चलोधर्मस्ते प्रीयताम् । ततः शायंकालेपूर्ववत्कर्मकृत्वा रात्रौपञ्चगव्योक्त मन्त्रैः पश्चगव्यमभिमन्यचगायत्र्यावारत्रयंप्राश्नीयात् । यदिपञ्च भीष्मव्रतोद्यापनदिदानीं श्रीसत्यनारायणपद्धत्युक्तप्रकारेणसर्व (३१२) कर्मकाण्ड रमाकरे, तुलसी विवाह परिभाषा । कर्मकृत्वा रात्रौकथाश्रवणादि नृत्यगानादिभि र्जागरणंकृत्वापरे ऽन्हि शान्त्यर्थगौदानहवनादिकं समाप्यविप्रांश्चभोजयेत् । तेभ्यो दक्षिणांश्चदद्यात् । उक्तदानाभावपक्षेब्रामणभोजनादि स्त्रीशुद्रा- णां पञ्चगव्यदानंतत्प्राशनंचामन्त्रकम् । जपहोमावमणवौ द्विती- योदिदिनेषुवस्त्रं गौघृतंपायसं श्वेतकृष्णतिलयुतं वस्त्रंचसुवर्णस्थाने क्रमेणदेयानि । ताम्बूलाभ्यंगजनसत्यवचनादिनियमयुक्तः पंच दिनेषुभवेत् । इति पश्चमीप्मव्रतोद्यापापद्धतिः ॥ अथ तुलसीविवाह विधिः ॥ अध तुलसी विवाह विधिः,-उफ्तंच विष्णु यामले-पादाववाथ तुलसी वनेवाखगृहेपिया। मासत्रसेण संवा ततोयजन मारभेत् । सौम्यायने प्रकर्तव्यं गुरु शुक्रोदये तथा ॥ अथवा कार्तिके मासि भीष्मपश्च दिने पुवा । वैवाहिकेपु ऋक्षेपु पूर्णिमायां विशेषतः । मण्डपं कारयेत्तत्र कुण्डवेदी पिपावत ।। ब्रह्मणाश्च शुचिन्नातान्वेदवेदांग पारगान् । ब्राह्मणं दैशिकंचैव चतुरश्च तथाविजः । ग्रह्यपुरःकृत्वा मातृणां यजनं तथा। कृत्या नान्दीसुखं श्राद्धं सौवर्ण स्थापयुद्धरिम् । कृत्वाच रौप्या तुलसी लग्नं त्यस्त मितैरवी ।। संपूज्या लंकृतां तांच प्रदद्याविधिना हरेः (पष्टी चतुर्थ्यर्थं ) वासः शतेनमन्त्रेण वस्त्रयुग्मेन वेष्टयेत । यदावनेति मैत्रेण कङ्कणं पाणिपल्लवे ॥ कोदादितिच मंत्रेण करग्रहो विधीयते । कर्तव्यश्च ततो होमो विशेषाद्विधि पूर्वकम् । श्राचायाँ चदिका कुगडे जुहुयाच्च तथाहुतीः । ॐ नमो भगवते पेशवायनमः स्वाहा, इत्यादि चतुर्विशति नामभिर्जुहुयात् । यजमानः सपत्नीकः सहामात्यैश्च गोत्रजैः । प्रदक्षिणाः प्रकुर्वीतचतस्रो विष्णुनासह । पठेयुः शान्तिका ध्यायस्तिथा वैष्णव संहिताम् गायन्ती मङ्गलं नाभिरी तूर्यादिभिः स्वरैः ॥ गांपदंच तथा शय्यामाचार्याय प्रदापयेत् ।। ऋत्विग्भ्यो दापयेद्वस्नाण्यन्येषां चैव दक्षिणाम् । ब्राह्मणान्मोजयेत्पश्चात्सपिः क्षीरः सशर्करैः । एवं प्रतिष्ठितदियों विष्णुनाचसमर्पयेत् श्राजन्मो पार्जितं पापं दर्शनेन प्रणश्यति ॥ ॥ इति तुलसी विवाहपरिभाषा ॥
कर्मकाएर रखापरे तुलसी विवाह पद्धति - म धर्म सिन्धुमारे काशीनाथ मततु- तुलसी विवाहस्य नवम्यादि दिनत्रये, एकादश्यादि पणिमान्ने यन छापिदिगे कार्तिक शुलिन्तर्गत वियाह नक्षत्रेपुषा विधाना दनेक कालय तथापि पारणा है प्रयोधोसम गर्मणामह प्रतयेव रायंत्रानुप्रोयो इतिसोपि पारमा पाराने कार्यः। पौधोसपापृथक चिकौपाया कालन्तरे पाकार्य । अथ तुलसी विवाह पद्धतिः J अथच तुलसी विवाहोविष्णुनासहानेकधा भवति तत्राटी सुवर्णगोपालमूत्तिनासह,, यथा मानुपीकन्यायाः पाणिग्रहणे वाग्दानमुहर्तपट्टाकरणोदि वरगृहात्कन्यागृहे, यथा विभय विस्तारेणमानुपाः समायान्ति, तद्वत्तुलसीविवाहकर्ता कस्य- चित्कुटुंवीविठ्ठाह्मणस्य, पूजा स्थापितंगोपालं वृत्वा तुलस्या विवाहं करोति,, तत्रतु वाग्दानं धूल्यर्घ विवाहकर्मच सर्वकृत्यं, लौकिकवद्भवति विवाहमण्डपे होमवेद्यां जयादिहोमोऽस्मा- रोहणादिकर्माणितु वक्ष्यमाणपद्धत्यानुसारेण भवन्ति, अत्रापि ग्रहयागः पूर्ववानुष्टीयः, यौतकादि सर्व लौकिकाचारेण वित्तानु- सारंदेयम्, द्वितीय विवाहस्तु विष्णुप्रतिमारूपाश्वत्थेन सह भवतिसचादौ, अश्वत्थवृत्त कतिचिट्ठपैरारोप्य पोषयित्वाच तदनंतरं पूर्वोक्त परिभाषानुसारेण गुरुशुक्रास्तवालवार्धक्यादि दोपरहिते विवाहोकचन्द्रतारानुकले सुमुहत, उत्तरायणेवा कार्तिक शुक्लनवमीतः पौर्णिमान्ततिथिषु, मध्ये भवोधोत्सवेच कार्य:, तस्मिन् स्वगृहे तुलस्याः वृक्षं आषाढहरिशयन्यावा शुभदिने काचिन्नृत्नायां वंशपेटिकायामारोप्य जलदानादिना वर्द्धयित्वा पूर्वोत्तमा परीक्षेत ॥ अथ कर्मपद्धतिः-तत्रानो, अश्वत्यतुलसीविवहफा, अश्वत्यसमी पोडपहस्तपरिमितं चतुस्र मंडपंकृत्वातत्र मंडपेशाने एकोनविंशति रेखात्मक सर्वतो (३१४) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, तुलसी विवाह पदतिः . भद्रं पूर्वे ग्रहयागभद्रं, अाग्नये मातृकाभद्रं, नैर्ऋते, वास्तुभद्रं, वायव्येक्षेत्रपालभद्रंचविरच्य, मध्येग्रहयागार्थ कुंडं वा हस्तमानं स्थंडिलंकृत्वा, शुभदिनचन्द्रतारानुकूले त्रिपएनवमितं विवाह दिनत्यत्क्त्वा प्रातनित्यक्रियांसमाप्य सुमूहः तोरणपूजोतपद्ध- त्यनुसारेण तोरणपूजांकृत्वा दिगीशध्वजानुच्छ्रित्य तोरणोवं लिखिनपटेशंखचक्रगदापद्मचिन्हानां पूजनंकृत्वा, पश्चिमद्वारे- णमंडपेगत्वा, ग्रहयागवेदीसन्निधौपट्टे लिखितगणेशादि पंचांगपू- जनं कृत्वा, ग्रहयागोक्त विधिना ग्रहान्संपूज्य, सर्वतोभद्रपद्धत्य नुसारेण भद्रं सम्पूज्य, तत्रमद्धे यथावितं सुवर्णप्रतिमां दामोदर रूपिणी, तुलसीरूपां सुवर्णप्रतिमांवारजतप्रतिमां च अग्न्युत्तारण पूर्विका तत्र संस्थाप्य पुरुषसूक्तेनसम्पूज्य, मातृकाभद्रं वास्तुभद्रं क्षेत्रपालभद्रं च सम्पूज्याचार्यगंधादिना सम्पूज्य वृणुयात्- अयेत्यादिसंकीर्त्यामुकोऽहं कर्तव्याश्वत्थतुलसी विवह कर्मणि ब्रह्मकर्म कर्तुमेभिर्वरणद्रव्यै रमुकगोत्रप्रवरान्वितममुकशर्माणं त्वामहंवृणे, तस्मैवरणद्रव्यदत्वा-30 प्राचार्यस्तुयथा० इति प्रार्थ्यभवानीति प्रत्युक्तिः ततो जपार्थचतुरोऽष्ठीवा ब्राह्मणा- न्विभवानुसारेणजपार्थवृणुयात्-सम्पूज्य-संकल्पः--अद्येत्यादि संकीर्त्यामुकोहं कर्त्तव्याश्वत्थतुलसीविवाहकर्मणो निर्विप्रतासि- द्धये गणेशादिनवग्रहनारायणाष्ठाक्षरादिमंत्राणां जपकर्तुमेभि- धरणद्रव्यै रमुकामुकगोत्रप्रवरान्वितानमुकामुकशमणो यथासंख्य कान्याह्मणान्वृणे द्रव्यंदत्वा, कमकुरु, करिष्यामः यथावित्ता- नुसारेण जपंकारयित्या, ततो प्रातर्विवाहदिने स्वगृहाभ्यंतरे, पट्टे गणेशादि पंचांगदेवतान्विरच्य स्नात्वा शुद्धेधौतेवाससीपरिधाय पूजास्थलमागत्य रक्षाबंधनादि कर्मकृत्या संकल्पं कुर्यात्- अद्येत्यादि संकीर्त्यामुकोई ममाखिलविविधपातक प्रशमनपूर्व काभीष्ट सिद्धिद्वारा श्रीपरेश्वरेण विष्णुरूपिणा, श्वत्थे नसह तुलसीविधाहकर्मणि सकलोपद्रवशांत्यर्थ स्वस्तिवाचन पूर्वफगणेशपूजनं कलशस्थापनं पुण्याहवाचनं नान्दीश्राद्धं मातृका कर्मकाण्ड रजाकरे, तुलसीविवाह पद्धतिः पूजन वसोर्धारानिपातनं नवग्रहाणांपूजनंच करिष्ये । ततस्तत्तत्प- त्यासम्पूज्य । गृहांगणेव जित्रैः सहसुवासिनीद्वारा सुरक्षितां तुलसीपेटिकायुतां काष्ठपीठेधृत्वा मंगलस्नानसमये गायन्त्यः सौभाग्यवत्यः हरिद्रादधितैलादि पिष्टकादिसुगन्धिद्रव्यामिश्रत चूर्णन तैलादिलापनं पञ्चसंख्याभिः, मंगलस्नानं संम्माजनरीत्या चकुर्युः॥ वस्त्रयुग्मेनतुलसींसम्बेष्ट्य, गणेशपूजास्थलेनीत्वातत्र तुलसीनिमित्तंगणेशपूजनं स्वयमेवयजमान:पुनः कृत्वा, भूपवि- भूष्य, 30 यदावनंदाक्षायणा हिरप्य . शतानीकायसुमनस्य मानाः तन्म 5 आवध्नामिशतशारदायोयुष्मान् जरदष्ठियथा ss सम्, इतिमन्नेए (रक्षावन्धन पोटलिका) करणंवामहस्ते (वाम भोगशाखायां) वध्नीयात् ।। तुलसींतत्रैवगणेशसन्निधौरक्षयेत, ततोवरपक्षिण्यासौभाग्यवत्यो घाजिनःसहगायन्त्यो ऽश्वत्थ वृक्ष्मंगलद्रव्येणानुलिप्योष्णोदकेनसंस्नाप्य, तत्राचार्यानत्प्रति- निधि वागणेशादिपूजनान्ते पूर्वोक्तमन्त्रेणपिप्पलदक्षिणशाखा- यांकङ्कणंवघ्नीयात् , ततस्तुलसीविचाहकर्ता, नदिनेविवाहापूर्व तत्रमण्डपमध्ये, होमपद्धत्यनुसारेण पञ्चभूसंस्कारपूर्वकमोग्न संस्थाप्याधारावाज्यभागौचहुत्या नवग्रहाणांनत्तत्समिद्भिस्तिल. ययाज्य जपदशमांशहोमंदुत्वा ततोनारायणाष्टाक्षरमन्त्रजपस्य दशमांशंतिलयवाज्यै त्वा ततःस्विष्टकृतहुत्गप्रायश्चित्तहोमकृत्या पूर्णाहुत्यन्तंकर्मविधाय, तदशांशमार्जनतर्पणञ्चकृत्वा गृहंमत्याग- च्छेत् ।। ततःसांयकालेगोधूल्यां श्राचार्यऋत्विगादयों न्येषि गोपालमूर्तिविवाहपते श्रीगोपालमूत्ति सिंहासनस्थांशिवकोपरि वोडयित्वावाजिनःसहसमारोहेण तुलसीविवाहकर्तगृहप्रत्यागच्छ न्त्वेवमश्वत्थेनसहविवाहेप्यागच्छन्तु कर्तासन्मानार्थगृहसमीपं गत्वा श्रीगोपालयानस्वजनाढयित्वास्वांगणेस्थापयित्वासिष्टा- चारपुरःसरेणसम्पूज्यतत्रागतानपिगन्धारोपणादिकंकृत्या (टीका भेटगन्धाक्षं ) उपाय स्वयित्तानुसारंदत्त्वा पूगीफलतांम्यूलादिकं दद्यात-( ततो गोपालविवाहपने वक्ष्यमाणेनैवविधिनावाक्- पनि कार रक्षाकरे, तुलनाविवार वागदान पद्धति दानंधूल्यर्घ विवाहंचकुर्यात् ) अश्वत्यविवाहपते, तदैवायसरे श्रीतुलसी सपेटिकां शिविकायांस्थापयित्वा शिविकारतवस्त्रेण सम्वेष्ट्य (डोलायां) स्ववन्धुवर्गः सहतवरपक्षीयाचार्यादिभि- श्चवाजिव शंखघंटाभेर्यादिध्वनिपुरः सरंकृत्वाश्वत्थसन्निधौमंडपं प्रत्यागच्छन्तु ॥ तत्रसर्वतोभद्रमण्डपे सपेटिकांक्षीतुलसीदेवीं संस्थाप्यचाचम्य भूतोत्सादनादिकंविधाय गणेशादीन्नमस्कृत्य, वाग्दानं कुर्यात् ॥ ॥ अथ तुलसीविवाहेवागदान पद्धतिः ॥ अत्राश्वत्थपक्षक याचार्य एवास्ति ततप्राचार्यः सर्वतो भद्रतःसुवर्णप्रतिमा विष्णुरूपिणीमुत्थाप्याश्वत्थवृक्षमूले नृतन काष्टपीठोपरिउत्तरमुखेनस्थापयेत् ततः तुलसीविवाहक पूर्वाभि मुखेनोपविश्याचम्यमाणायामंविधाय, वरपक्षीयाचार्यवृणुयात- ब्राह्मणमाचार्य वरणद्रव्यधोतोत्तरीयादिकंचसम्पूज्य-सङ्कल्प:- अर्थत्यादिसंकीर्त्या ऽ मुकोहंतुलसीविवाहांगभूतवागदानकर्मणि, कर्मकर्तुमेभिर्वरणद्रव्यै रमुकगोत्रप्रवरान्वितममुकशर्माएंवरपक्षी यंत्राह्मणत्वांवृणे-द्रव्यंदत्वा, कर्मकुम, करवाणीतिप्रत्युक्तिः ॐ माचार्यस्तु• इतिसंप्रार्थ्य,, ततोवाग्दानसामग्री पंचहरिद्राखण्ड युतांतण्डुलपूरितां श्रीफलयज्ञोपवीतदक्षिणादिपरियुतां स्थाल्यामि न्द्राणीपूजयेत्-30 इन्द्रण्यैनमः, इतिसम्पूज्य,, गोत्रोच्चारणं कुर्यात्--प्राचार्योव्यान्--पाणिग्रहेपर्वतराजपु-याः पादाम्बुज पाणिसरोरुहाभ्यां । अश्मानमारोपयतः स्मारेर्मन्दस्मितंमंगलमा तनोतु ॥ ननः कर्तावाग्दानपात्रंहस्तेगृहीत्वा--व्याघ्रपदगोत्री त्पन्नाय वैश्याघ्रपदगार्य वसिष्टेतित्रिप्रवराय, देवमीढवर्मणः प्रपौवाय, सरसेनयर्मणः पौत्राय, वसुदेववर्मणःपुत्राय, अनेक कोटिब्रह्मांडनायकाय, श्रीकृष्णाय. गोपालाय, श्रीधरायवराय पालम्पायनदेवलगौसमेति त्रिप्रवरांविश्वकर्मणः प्रपौत्रींप्रजापते: ..
कर्मकाण्ड रखाकरे, तुल सीविवाह,धूल्यर्घ पद्धति. (३७). - पात्रीईश्वरस्यपुत्री तुलसीकन्यांज्योतिर्विदादिष्टे मुहदास्ये,, इतिस्थालीस्थद्रव्यमाचार्यायदन्यात्-ततःप्रार्थयेत्-30 वाचावृन्दा मयादत्ता आत्मार्थस्वीकृतात्वया ॥ वृन्दावलोकनविधौ निश्चित- त्वंसुग्वाभव ॥ ततोब्राह्मणा:-30 भद्रंकर्णेभिरिनिपठेयुः ॥ ततो नीराजनादिदक्षिणादानंचकुर्यात् ।। अथ तुलसी विवाहे धूल्यर्घ पद्धतिः॥ ततः कर्ता तत्रवाश्वत्थ मूले-पूर्वाभिमुखीभूत्वा नूतन काष्ठपीठोपरि विष्णुप्रतिमा मुत्ताराभिमुखी स्थापायत्वा, प्राचम्य प्राणायामकृत्वा-संकल्पंकुर्यात-अद्येत्यादि संकीर्त्या- मुकोऽहं करिष्यमाण तुलसी विवाह कर्मणि तुलसीदान प्रति ग्रहार्थ मश्वत्थं विष्णुरूपिणं वरं (गोपालं) विष्टरादि मधुपर्कान्तै- रचयिष्ये-तत प्राचार्यवृत्या, ततः काष्ठपीठासने पुष्पै रावाहयेत- ॐ अश्वत्थ रूपिणं देवं श्रीकृष्णं तुलसी मियम् ॥ आवाहयामि पूजार्थ धरत्वेनार्चयाम्यहम् ॥ ॐ नमो भगवते केशवाय नमोऽ स्मिन्पीठे प्रास्तामर्चयिष्यामो भवन्तम् । इत्युक्त्वा सुवर्णप्रतिमा तत्रस्थापयेत, अर्चकः । ॐ विष्टरो विष्टरो विष्टरः इत्युक्त्वा- ॐ नारायणयनमः विष्टरः प्रतिगृह्यताम् । प्रतिगृहामीत्याचार्यो बदेत सर्वत्र ।। इति विष्टरसमठ, ॐ पाद्यम्३ ॐ माधवायनमः पायंसमर्पयामिप्रतिगृ० श्रा० का अर्घ्यम्-ततोऽर्थे दधिदुग्ध बदरीतंडुलगंध-मिश्रितंजलंकृत्वा ? s घों ऽर्घः पठित्वा-30 गोविन्दायनमः, अर्ध प्रतिगृलताम्, आ० प्रतिगृह्णामि ॥ आचमनीयम् ३ ॥ ॐ विष्णवेनमः, आचमनीयंसमर्पयामि । मा० प्रतिगृहामि ॥ मधुपर्कः ३। ॐ मधुसूदनायनमः, मधुपर्क पातगृहाताम् ।। प्रा० प्रतिगृहामि ॥ ततः पुरुषसूक्तनाश्वत्थ प्रांतमयोः पूजननीराजनान्तंकृत्वा, सय्या परिधेयवत्र भूषणा" सनादि भांडपरियुतं द्रव्यं पायादिभिा सस्पूज्य संकल्प:- भये- (३१%) कर्मकाण्ड रताकर, तुलसी विवाह पद्धतिः त्यादि संकीामुकोऽहं करिष्यमाण तुलसीविवाहाकर्मणि, व्याघ पदगोत्रस्य वैय्याघ्रपद गार्य वसिष्टेति त्रिप्रवरस्य देव- मीदवर्मणः प्रपौत्रं शूरसेन वर्मणः पुत्रं (गोपालं ) दामोदर मश्वत्थरूपिणं तुलस्यार्थिनं, एभिः कटकालंकरणादि शय्यासन भांडाविद्रव्य, स्त्वांवृणे । इतिहस्तस्थ जलं प्रतिमोपरिक्षिपेत- तत भाचार्यों भूपणादि वस्त्राणि परिधाप्य, वृणोमीतियात्- ततः पार्थयेत-अशुन्यं शयनं नित्यमशून्यामुन्नतिश्रियम् । सौभाग्यं देहिमेनित्यं शय्यादानेन केशव । योनिकानिचपापानि, अद्यावधि कृतानिच ताम्रादि पात्रदानेन तानिनश्यन्तु केशव ॥ ॥ इति धूल्यर्थ पद्धति.॥ अथ तुलसीविवाहपद्धतिः ॥ . ततयाचार्यस्तत्रैव प्रादेशमात्रां वेदी कृत्वा होमपद्धत्यनु- सारेण पञ्चभूसंस्कार पूर्वक भग्निसंस्थाप्य, ततः सर्वतो भद्र मण्डपात्सपेटिकां वस्त्रभूषणभूषितां तुलसींनीत्वा, प्रतिमा तुलस्पोरंतरालेऽन्तर्पटं कृत्वा, यजमानः पूर्वाभिमुखेनोपविश्य, स्वभार्या दक्षिणभागेकृत्वा भ्रातृपुत्रादीन्वामे, उपवेशयित्वा तुलसीपेटिकां क्रोड़े धारयित्वा, श्री सूक्तेनवा पुरुषसूक्तेन तुलसी सम्पूज्य ततश्राचार्यों यजमानदत्तवस्त्रेभ्यो वस्त्रद्वयं - तुलस्यै,-30 युवासुवासाः परिवीत अागात्सउश्रेयान्भवति . जायमानस्तं धीरासः । कवघऽउन्नयन्ति साध्योमनसादेवयंतः।। इति मन्त्रेण दत्वा सौभाग्य द्रव्यं, ॐ सौभाग्य जनकं दिव्यं रक्षामनेणवेष्ठितम् । सौभाग्यमस्तुतेदेवि जीवत्वं विष्णुवल्लभे ॥ इति मंत्रेण सौभाग्यपुटकमालवालेषु वध्नीयत् ॥ ततःप्रतिष्ठ। पपेन-30 मनोजूतिर्जुपता माज्यस्य बृहस्पनिर्यज्ञमिमं तनो त्वरिष्टं यज्ञर्ट० समिमंदधातु। विश्वेदेवासदहमा दयंतामों प्रतिष्ठ भूर्मयस्वस्तुलस्याइहजीवः इहप्राणाः सन्तु सुप्रतिष्टिता .
कर्मकाण्ड रत्नाकरे, तुलसी विवाह पति. (३१६) , वरदाभवन्तु ॥ ततो यजमानस्तुलस्यश्वत्थयोः (गोपालस्य) परस्परं समजति, समंजन्तु विश्वेदेवाः समापोहृदयानिनौ । सम्मातरिश्वा सन्धाता समुद्रष्टी दधातनौ ॥ इत्यंतपद पृथक् कृत्वा तुलस्यश्वत्ययोः सम्मुखीकरणंकृत्वा प्रार्थयेत्-शङ्काचूड़े हतेयेन तुलसी छलमोहिता, सत्वं निरीक्ष्य तुलसी प्रसन्नोऽस्तु सदाहरे, ततो मङ्गलाष्टकं पठित्वा गोत्रोच्चारणं कुर्यात्-वृन्दा एयेतपनतनया नीर वा नीर कुंजे,गुञ्जन्मजभ्रमर पटली काकली केलिभाजि ! आभीराणां मधुर मुरली नादसमोहितानां, मध्ये फ्रीडन्नयतु नियतं नन्दगोपालवाला, वरस्य-व्याघ्रपद्गोत्रस्य वैय्याघपदगार्य वसिष्टेति त्रिप्रवरस्य देवमीढ वर्मणः प्रपौत्राय, व्याघ्रपद गोत्र शूरसेन वर्मणः पौत्राय, ध्याघ्रपदगो वासुदेव वर्मणः पुत्राय, श्रीगोपालाय तुलस्यार्थिने वरायाश्वत्थायवा। एवं निरुच्चार्य, कन्या पक्षे-वृन्दा वृंदावनी देवी नन्दिनी विश्वपावनी, सदाऽवतु महा दिव्या तुलसी कृष्णजीवनी ॥ श्रालवायन गोत्रस्यालवायन दैवल गौतमेतित्रिप्रवरस्य विश्य- कर्मणः प्रपौत्री आलंवायन गो० प्रजापतेःपौत्री, बालवायन गोत्रस्य० ईश्वरस्यपुत्री तुलसीनाम्नी वरार्थिनी, संकल्प पठेत् ॥ ततः शंखे सुवर्ण पदरीपत्रं तिलादीश्च संक्षिप्य- देशकालौ स्मृत्वाऽमुकोहं मम जन्म प्रभृत्युपार्जितकायिक वाचिक मानसिक त्रिविध पापक्षयपूर्वक समस्त पिराणां निरतिशयानन्द ब्रह्मलोका वाप्त्यादि कन्यादान फलपुत्रपौत्राद्यनवच्छिन्नसंततिलदमीमाप्यादि तुलाकल्पोक्त फलसिद्धि चैकविंशति पुरुपोद्धरण वैकुंठभुवनगमन तत्रत्यविपुलभोगोपभुक्त्पनन्तरं विष्णुसायुज्यता प्राप्त्यर्थं श्री परमेश्वरप्रीतये व्याघ्रपदगोत्रस्य वैश्याघ्रपद गायवसिष्ठेति त्रिप्रवरस्य देवमीढवर्मणः प्रपौत्राय शूरसेनवर्मणः पौत्राय, वसुदेव वर्माणः पुत्राय, व्याघ्रपद् गोत्राय वैय्याघ्रपद् गाग्र्यवसिष्टेति त्रिप्रवराय, अनेककोटि ब्रह्मांडनायकायानन्तनाम्ने, गोपाल (३२०) कर्मकारह रानाकरे, तुलसी विवाह पतिः . 'कृष्णायअश्वत्थस्वरूपिणेवरायच, आलंवांयनदेयल गोतमेति :त्रिप्रवरां मयांकन्यात्वेन संवधितां इमांतुलसीनाम्नी कन्यां वरी- र्थिनी या शक्त्यलंकृतां यथाशक्त्युपकस्पितयौतफयुतांप्रजापति देवतां देवाग्निगुरुब्राह्मणसंनिधौ अग्न्यादि साक्षिकतयासहधर्मा चरणाय भार्यात्वेन तुभ्यमंहंसंप्रददे, प्रतिगृह्णातुभवान् इति सकुशजलं तुलस्या दक्षिणहस्तं (शाखां) सुवर्णप्रतिमायाः (वागो- लमतः) दक्षिणहस्ते दद्यात्, आचार्यः-30:द्यौस्वा ददातुष्ट- धिवीत्वा प्रतिगृह्णातु 30 कोऽदात्कस्माऽदात्कामोदात्कमायादात् कामोदाताकामाप्रतिग्रहीताकामैतत्ते इतिपठित्वा, ततोयजमानो वद्धांजलिः पठेत्--30 वृन्देममाग्रतोभूया वृन्देमेदेवि पार्श्वयोः वृन्देमपृष्ठतोभूयास्त्वदानान्मोक्षमाप्नुयाम् ॥ वृन्दांकनकसम्पन्नां कनकांभरणैर्युताम् । दास्यामिविष्णवेनुभ्यं ब्रह्मलोकजिगीषया ।। ममशुद्धगृहेजाता पालितावत्सरत्रयम् । तुभ्यंकृष्णमयादत्ताधर्म- ज्ञानर्विवर्धिनी ॥ इतिप्रार्थ्य.दानप्रतिष्ठांकुर्यात्-30 अयेत्यादि संकीर्खामुकोहं कन्यात्वेनतुलसीदानप्रतिष्ठार्थमिंदसुवर्णमग्नि- दैवतं श्रीगोपालायाश्वत्थरूपिणेवरायतुभ्यंसम्प्रददे नमम, इति प्रतिमादक्षिण हस्तेदत्वा, शिष्टाचारादंचलग्रंथिबंधनकुर्यात् ।। तत -स्तत्र विवाहवेद्यांब्रह्मोपवेशनाद्याज्यभागान्ते--30 नमोनारायणा यस्वाहा, इतिमन्त्रेणनवाहुतीर्जुहुयात् ।। ततोमहाव्याहृतयः, सर्व :प्रायश्चित्तं ॥ ततराष्टभृध्दोमंकुर्यात् ततआचार्य:-घृतेन--30 :नमोभगवतेकेशवायनमः स्वाहा । 30 नारायणायनमः ॐ माधवाग्रनमः । 30 गोविन्दाय० । 30 विष्णवे० । मधुसूद- नाय०.। 30 त्रिविक्रमायनमःस्वाहा । ॐ वामनाय० । 0 हृषी केशांय० । 30 पद्मनाभाय० 30 दामोदराय ॐ उपेन्द्रायनमा ॐ वासुदेवयः । ॐ अनिरुद्धाय० । ॐ अच्युनाय! अंन- ताय० । गदिने०. । चक्रिणे. विष्वक्सेनाय०। 30 वैकुंटीय० । 30 जनार्दनाय० 0 मुकुन्दाय०। 30 अधोक्षजायनमः - स्वाहा । इति चतुर्विशतिनाममंत्रर्हत्वो एवंजयाहोमम् आभ्यातान .
वर्मपाएहरताकरे, बादश सिंगांमा परिमाण होमंच लाजाहोमंच प्रत्येक चतविशतिनाममंत्रः कुर्यात् नारमा. रोहणादि सप्तपदीस्थाने यजमानेनशांतिकाध्याय पठित्वाचतस्त्र: प्रदक्षिणा कार्याः ततो होमपद्धत्युक्तविधिना प्राजापत्यहोमस्विष्ट कृद्धोम पूर्णाहुतिसंखवप्राशनप्रणीताविमोकान्तकृत्वा गौवाना- दीन्कृत्वा भूयसीदानंच कुर्यात् । नात्रचतुर्थीकर्म, इति तुलसी विवाहंकृत्वा, प्राचार्यऋत्विगंजापकेभ्यो दक्षिणांदत्वा माशी. दिंगृहीत्वा, ब्राह्मणान्भोजयित्वा स्वयमपिच भुजीयात, ततः शिष्टाचारादाचार्यः गोपालवासुवर्ण प्रनिमांतुलसींच शिविकादिषु संस्थाप्यत्रात्मण पुरंधीसहितं मंगलवायपुरः सरस्वयहनयेत् ततः स्वगृहे नृत्यगीतबायपुरःसरंयथाविभवषोडशोपचारेण सम्पूज्य नालणादीनपि गंधानतः संपूज्य यथाशक्ति प्रामवान्सभोज्य पाशीर्वादं गृहणीयात् । इति तुलमी विवाह पद्धति. द्वादश लिंगतो भद्र परिभाषा। मध दश लिंगतो भंद्र परिभाषा, उतंच हमाद्री कालावरों-निचाना रिशदेरवाश्च प्रागुदीची करी यध । संडे-दु विपद कोणे खलासप्तमि प.पचदशपदा बल्ली भद्रतुनचभि पदै । यालिशान्त रेवापि चतुर्विशतिभि पर्दै । लिङ्गस्यातनचेशस्य, मठा- विशतिभि पदे । लिंग स्यापार्वतोवापी वायलिंग तत परम् । एपचाप्य श्चतपस्युनिशाना मध्यतात्रि। मध्यस्यात्सर्वतोभद्रे सत्वरजस्तमोतं । हलापिलापापी जन पीतेन पूरयेत् । वापीपीता तरारे तु रकवर्णन पूरमेत् । कृष्णधा येन दाणां लिपि प्रपूरयेत । तेन्दु खलाकृष्ण वल्लो नीलेन पूरयेत् । गहाणा शिताव म परिधि पीतवर्णके । मध्ये फोदशभि कोट पामष्टदललिखेदा वाद्योत्तरदले स्वेताकपिका पीतवर्णका। परिध्यावेष्ठित पत्र पाये. सत्वरजस्तम ! सिताहणेन काणेन सावादीथ अपूरयो । लिंगक पान्तरालपुपीतरपरक पूरयेत् । रमैश्चपूरयेटेसा सण्डान्दिगुणपाडशान् ॥ मण्डल द्वादशलगत्यासतालिंगोझतथा॥ शिवनते ममुहि गसिद्विकर परम् ।। इति हरिहर मड़लात्मक धावश लिगना ( ३९२) कर्मकार रानाकरे, लिगतामद्रम् . . भद्रोद्धारः।। अथ पूजा विधि:-नव-श्राचायवरयेत्तत्र ऋत्विग्भिः सहितं शुचिः । शिय- रूपास्तथाविप्राः पूज्याश्चन्दन पुषकैः। अनुज्ञातश्चतै विप्रैः शिवपूजासमारभेत् । अवर्ण सजलं कुंभंतस्योपरितुविन्यसेन। सौवर्णराजतंतानं मृण्मयवापिकारयेत् । कुम्भोपरिन्यसेविं उमंगा सहित शिवम् । सौवर्णप्यथवारौप्ये वृषभे संस्थितं शुभे, रत्नालङ्करणहोमरलंकृत्यच पूजयेत् । वस्त्रयुग्मेन संवेष्टय विल्वपत्रः प्रपूजयेत् । पलेनवातदर्थेन तदर्धनाथवा पुनः ॥ उमामहेश्वरी मूर्ति पूजये वृषभस्थिताम् । अतः परजाविधानस्य पूजापद्धती स्पष्टत्वाग्रंथ विस्ताराभियोलम् । इतिद्वादश लिंगतोभद्र परिभापा अथ हरिहरमंडलात्मकद्वादशाळिंगतोभद्रोद्धारः :५LI H -- tual श्वेत: वेत.
कर्मकाएट रताकरे, भस्मधारणविधिः ॥ अथ भस्मधारणविधिः॥ भस्मधारणविधिः तत्रमन्त्रा:-30सद्योजातंपपद्यामिसद्योजा तायवैनमोनमः। भवे भवेनातिभवेभवस्वमांभवोद्भवायनमः। 30 वामदेवायनमोज्येष्ठायनमाश्रेष्टायनमोन्द्रायनमः । कालायनमाक लविकरणायनमोवलनिकरणायनमो चलायनमोवलप्रमधनायनमः सर्वभूतदमनायनमोमनोन्मनायनमः। ॐ अधोरेभ्योधघोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः । सभ्यः सर्वसर्वेभ्योनमस्ते ऽ अस्तुरुद्ररूपेभ्यः तत्पुरुषायविद्महेमहादेवायधीमहितन्नोरुद्रःप्रचोदयात् । 3 ईशानःसर्वविद्यानामीश्वरः सर्वभूतानाम् । ब्रह्माधिपति ब्रह्मणोधिपतिर्ब्रह्मा शिवोमे ऽ अस्तुसदाशिवोम् ॥ इति मन्त्रैर्भ- स्मगृहीत्वा,, मन्त्रयेत-30 अग्निरितिभस्म वायुरितिभस्म जल मितिभस्मव्योमेतिभस्म सर्व र्ट हवा इदभस्ममन इत्येता- निचपिभस्मानि, इति निरभिमन्त्र्य,, आपोज्योतिरसो ऽमृतंब्रह्मभूर्भुवस्वरोमिति तस्मिन्नपत्रासिच्य । ॐ मानस्तोके तनयेनान ऽ आयुषिमानोगोपुमानो अश्वेपुरीरिषः । मानोन्वी रानरुद्रभामिनो वधीहविष्मन्तः सदमित्वाहवामहे । इतिसक्षुभ्य ईशानः सर्वविद्यानाम् इति शिरउडल्य,, ॐ तत्पुरुषाय विद्महे इतिमुग्वंदर्शयित्वा । 30 अघोरेभ्यो० इति, हृदये | वामदेवाय गुो । ॐ सद्योजातं० पादयोः । ॐ त्र्यम्बकंयजा- महे सुगन्धिपुष्टिवर्दन । उर्वारुकमिववन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमा मृतात् ।। इत्यभिमन्य। 30 नमः शिवाय, इतिध्यायन--30 व्यायुपंजमदग्नेः कस्यपस्यव्यायुपम् । यद्देवेषुव्यायुषंतन्नोऽस्तु घ्यायुषम् ॥ इति मन्त्रेणद्वाभ्यामृरभ्यां मध्यमांगुलीभिरनुलोम कृत्वा शिरोललाटवक्षः स्कन्धेपुतियक्तिस्रोरेखाःप्रकुर्वीत । मध्य रेखांविलोमांगुष्टेनकृत्वा नलीमामनामातर्जनीभ्यां रेखाद्वयम्वा तिम्रोरेखाएवाकुर्वीत। नोदलनम् ॥ नेत्रयुग्मप्रमाणास्ताः । M - ३२१ +मकाण्ड रखाकरे, दादलिंगतोभद्र पूजापद्धति. रुद्रजपहोमार्चनेषु, अन्यचापिचेतन्नित्यम् ॥ शाम्भवंव्रतमेतत्सर्वेषु वेदेषुवेदयादिभिरुक्तम् । मुमुक्षुरपुनर्भवाय तत्समाचरेत् । इति भस्मधारण विधि. अथ रुद्राक्षधारणम-रुद्राक्षान्कंठदेशेदशनपरिमितान्मस्तके विंशतिद्वेषदषट्कर्णप्रदेशे करयुगलकृतेद्वादशद्वादशैव । वाहोरिंदो कलाभिर्नयनयुगकृतेएकमेकंशिवायां वक्षस्यष्टाधिकंयः कलयति शतकंसस्वयंनीलकण्ठः ॐ नमः, इतिप्रत्येकंरुद्राक्षं अष्टोत्तरशतं जपित्वा, ॐ नमः शिवाय, इतिरुद्राक्षान्प्रक्षाल्य पूर्वोक्तांगेषु धारयेत् ।। फलमाह-योधारयतिरुद्राक्षाद्रवत्सोपिपूज्यते ।रुद्र- लोकमवाप्नोति शिवेनसहमोदते ॥ अधृत्वाभस्ममुद्राक्षान्योशिवं पूजयेन्नरः ।न पूजाफलमाप्नोति नरकंयातिरौरवम् । तस्मान्मृदा- पिकर्त्तव्यं लपाटेतुत्रिपुण्ड्रकम् ।। इत्याग्नेयपुराणोक्तिः ॥ इति रुद्रावधारणम्। अथ हरिहरमण्डलात्मक, द्वादशलिंगतोभद्रा पूजा पद्धतिः॥ अथलिगतोभद्रदेवता स्थापनक्रमवदये--क उपसिनित्य कर्मविधाय, पूर्वोदितगणपत्यादिपूजनंकृत्वा, पश्चिमद्वारेणमंडपे समागत्यमण्डपदेवान्सम्पूज्य पूर्वोक्तमण्डपपरिभाषोक्त यथास्था नेषु ग्रहवेदीवास्तुवेदीमातृकावेदी नेपालवेदींचनिर्मायपूजयित्वा चाचम्य, प्राणायामकृत्वा, सङ्कल्पकुर्यात्--अयेत्यादिदेशकालौ संकीर्प, अमुकोई, अमुकशिवानुष्ठानकमणि त्रिचत्वारिंशद्रेखा- स्मक, हरिहरमण्डलात्मकद्वादशलिङ्गतोभद्रेलिंगेषु पूर्वादिक्रमेण द्वादशलिंगषु लिङ्गदेवतास्थापनावाहनपूजनंकरिष्ये-पुष्पाक्षतह- स्तः,, व्याहृत्यावानामन्त्रै रावाहनंस्थापनंच कुर्यान्-तत्रादौपूर्व लिंगेधु-३० वीरभद्रायनमः वीरभद्रमावाहयामिस्थापयामि,, अ मंकासाकरे द्वादशलिंगतोभद्रपूजापति (३५) . भूर्भुवःस्वः वीरभद्रहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्टितोवरवोभव । 30 पीरभद्रायनमः, सम्पूजयेदेवेसर्वत्रवोध्यम् || 30 शम्भषेनमः शम्भुमावाहयामि स्था० । ॐ भू० शम्भो इहा. सुप्र० । 30 शम्भवेनमः, सं० ॥२॥ 30 अजैकपावायनमः, मा० स्था। 30 भ० अजैकपादइहा० सुम। अजैकपादायनमः सं० ॥३॥ ततो दविणलिंगेपु-- अहिर्बुध्न्यायनमः आस्था | ॐ भू० महि. वुधन्येहाग० सुम। 0 अहिर्बुध्न्यायनमः सं० ॥१॥ 30 पिनाकि- नेनमः, प्रा० स्था० | ॐ भू० पिनाकिन्हहाग० सुप्र० 1 30 पिना किने नमः पू० ॥२॥ ॐ शूलपाणयेनमः,, आ० स्था० । ॐ भू० शुलपाणे, इहाग० सुप्र० 1 ॐ शूलपाणयेनमः । पू० ॥ पश्चिम लिंगे-ॐ भुवनाधीश्वरायनमः, प्रास्था० ॐ भू० भुषनाधी श्वर इहाग सुप्र० । ॐ भुवनाधीश्वरायनमः पूजयेत--॥१॥ कपिलायनमः आ० स्था| ॐ भू० कपिल, इहाग तिक सुप० । ॐ कपिलायनमः पू० १२। ॐ दिवस्पतयेनमः आ० स्था० ॐ भू० दिवस्पते इ० तिष्ठ सुप्र० । ॐ विषस्पतयेनमः पू०१३॥ उत्तरलिंगेपु-30 रुद्रायनमः आ० स्था० । ॐ भू° रुद्र, इ० सु० ब० ॥ २॥ रुद्रायनमः पू0 1 0 शिवायनमः प्रा० स्था० 130 ० शिव, १० सु०। 30 शिवायनमः । ॐ महेश्वरायनमः आ. स्था । 3. भू महेश्वर, इहा ति० सु०। महेश्वरायनमः पूजयेत ॥ ततः पूर्वाधष्ठदिवष्टौ भैरवान्स्थापयेत-पूर्व-30 असितांग भैरवायनमः स्थापयामि, पूजयामि । भाग्नये-ॐ मरूभरवायनमः। आ० स्था। दक्षिणे-ॐ चण्डभैरवायनमः। आ० स्था। नैऋत्ये-30 क्रोधभैरवायनमः । श्रा. स्था। पश्चिमे-ॐ उन्मत्तभैरवायनमः । स्था० पू०। वायव्ये-ॐ कपालभैरवायनमः। आ. स्था° उत्तरे-30 भीषणभैरवायनमः। प्रा. स्था। ईशाने- संहारभैरवायनमः। आ. स्थातता पूविक्रमेण चतुर्विंशतिदेवताःस्थापनीयाः । पूर्व-30 भवाय नमः। आस्था । ॐ सर्वागनमः प्रा० । ॐ मनायनमः (३२६) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, द्वादलिगनोभद्रपूजापद्धतिः प्रा० भाग्नये- पशुपतयेनमः श्रा । 30 महतेनमः प्रा०1 ॐ भीमायनमः श्रा दक्षिणे-ॐ ईशानायनमः 01 ॐ अनन्तायनमः । श्रा ॐ तक्षकायनमः श्रा। नैर्ऋत्ये-32 वासुकयेनमः श्रा० । ॐ कुलिशाय नमः आ. स्था० ॐ कौटकायनमः श्रापश्चिमे-ॐशंखपालायनमः आकरलायनमः । ॐ अश्वतरायनमः। श्रा' वायव्ये ॐ शूलिनेनमः श्रा० । चन्द्रमौलयेनमः श्रा० । चन्द्रमसेनमः आ० । उत्तरे-वृषभध्वजायनमः श्रा० । ॐ त्रिलोचनायनमः आ० । शक्तिधरायनमः श्रा० । ईशाने-30 महेश्वरायनमः आ. ॐ शूलधारिणेनमः श्रा०। ॐ स्थाणवेनमः श्रा० पू० । ।। इति लिंगदेवता स्थापनक्रपमः ।। ततो भद्रे ब्रह्मादिदेवता स्थापनक्रमवक्ष्ये-तत्रादौ मध्येक- पिंकायाम्-30 ब्रह्मयज्ञानमिति मंत्रस्य प्रजापतिौषि स्त्रिष्ट- प्छन्दः यादित्यो देवता ब्रह्मावाहने विनियोगः । ब्रह्मयज्ञान प्रथम पुरस्ता द्विसीमतः सुरुचोव्वेनावः । सबुध्न्याऽउपमा । अस्यचिष्ठाः सतश्चयोनिमसतश्चब्वियः ॐ भूर्भूयः स्वः ब्रह्माणमावाहयामि स्थापयामि, प्रति० 30 एतन्तेतिप्रतिष्ठाप्य, ॐ ब्रह्मणेनमः संप्रजयेत् । तत उदीचीमारभ्य वायुकोणपर्यन्तमष्ठ लोकपालान्स्थापयेत्-तत्रादौ उत्तरलिंगस्याधः-ॐ वय ई० सोममित्येतस्य वन्धु ऋपिर्गायत्रीछन्दः सोमोदेवता सोमावाहने स्थापने च वि०। 30 व्यय द सोमव्रते तवमनस्तनूपुविभृतः मजावन्तः सचेमरि । 30 सोमायनमः श्रा० स्था० । ईशाने-ॐ तमीशानमित्यस्य गोतममपिर्जगतीछन्दो विश्वेदेवादेवताः, ईशानावाहने स्थापने वि० । 30 तमीशानं जगतस्तस्थुपस्पति धियजिन्वमसेहमहेव्यम् । पूपानोयथाब्वेद सामसवृधेरक्षिता पायुरदब्धास्यस्तये । ईशानायनमः श्रा०पृ०। पूर्वलिगस्याध:- ॐघातारमिति मंत्रस्य गर्गऋपि बिछुप्छन्दः, इन्द्रोदेवता इन्द्रा वाहने स्था० यि । अवानारमिन्द्र मविनारमिन्द्र ट हवेहवें कर्मकार रत्नाकरे, हादशलिंगतोमद्रपूजापतिः (३२७) । सुहब ई० शूरमिन्द्रम् । हयामिश पुम्हनमिन्द्र ० स्वस्तिनो मघवाधाविन्द्रः ॐ इन्द्रायनमः । तत आग्नेय्याम्-ॐ त्वन्नो अग्ने इत्यस्य पांगिरस हिरण्यस्तृपऋपिर्जगतीछन्दः, अग्निर्देवता ग्न्यावाहने स्था० वि० ॐ त्वन्नोऽअग्ने व्यरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोऽ अवयासिशिष्ठा! यजिष्ठो पन्हितमः सोशुचानोविरवाद्वेषा ॐ सिप्रमुमुग्ध्यस्मत् । 30 अग्नयेनमः। ततो दत्तिणलिंगस्याधः ॐ , यमायत्वेत्यस्यदध्यड्डाण ऋपिर्धमंदेिवता यमावाहने स्था०वि० । ॐ यमायत्वादिरस्वते पितृमते स्वाहा स्वाहा धर्माय स्वाहा धर्मः पित्रे | ॐ यमायनमः श्रा० स्था० पू० । ततो नैऋत्यां-30 असुन्वन्त मित्यस्य प्रजापति ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो नितिर्देवता निर्ऋत्या वाहने स्था० वि° 30 असुन्वन्तमयज- मान मिच्चस्तेनस्ये त्यामन्विहि तस्करस्य । अन्यमस्मादिच्छसात 5 इत्या नमोदेवि निर्ऋते तुभ्यमस्तु । ॐ नियंतयेनमः। पश्चि- लिंगस्याधः--ॐ तत्वायामीत्यस्यशुनः शेफ ऋपिस्त्रिटुप्छन्दः, वरुणोदेवता घरुणावाहने स्था० वि. ॐ तत्वायामि ब्रह्मणा वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानोहविभिः अहेडमानो व्यरुणोहयोध्यु. शर्ट सामान ऽआयुः प्रमोषीः। ॐ वरुणायनमः ततोवायव्ये ॐ भानोनियुद्भिरित्यस्य प्राजातिपि स्त्रिष्टुप्छन्दो वायुदेवता वाय्वावाहने स्था वि० । श्रनोनियुद्भिः शतनीभिरध्वर सह- त्रिणीभिारुपयाहियज्ञम् । व्यायोऽअस्मिन्त्सदनमादयस्वयूयंपातः स्वस्तिभिः सदानः। 30 वायवेनमः । ततो वायुसोममध्ये भद्रे- ॐ सुगावो देवाइत्यस्य प्रजापतिऋपिस्त्रिष्टुप्छदो देवादेवताअष्ट यसुस्थापने वि० ॐ सुगावोदेवाः सदनाऽकर्मज ऽाजग्मेद र्ट। सवनंजुषाणाः । भरमारणा व्वहमानाहवीॐ व्यस्मेधत्तव्वसम्यो व्वसूनि स्वाहा,, नाममंत्रश्चस्थापयेत्-~30 ध्रुवायनमः पाo स्था० । ॐ श्रध्चरायनमा । 30 सोमायनमः । ॐ. अभ्यो नम: 1 30 अनिलायनमः० 1 ॐ धनलायनम: । 'प्रत्यू- पायनम:01 30 प्रभाषायनमः । ततःसोमेशानमध्ये मद्रे- कर्मकार रक्षाकरे, शवलिंगतोभद्रपूपापद्धति. । रुद्रान-ॐ रुद्राःस र्ट० सृजेत्यस्यप्रजापति–षिरनुष्टुप्छन्दः रुद्रोदेवना, एकादशरुद्रावाहने स्थापनेच वि०॥ ॐ रुद्रास है। मृज्य प्रथिवींवृहज्योतिः समीधरे । तेषांभानुरजहच्छुक्रोदेवेषु रोचते । नाम मंत्रैश्च-ॐ वीरभद्रायनमः मा० स्था०। ॐ गंभषेनमः। ॐ गिरीशायनमः। 30 अजैकपादायनमः। भहिर्बुध्न्यायनमः । ॐ पिनाकिनेनमः । ॐ भुवनाधी. श्वरायनमः। 30 कपालिनेनमः। ॐ दिक्पतयेनमः। 30 स्थाएनमः । ॐ रुद्रायनमः ॥ ततः पूर्वेशानमध्ये भद्रेद्वाद शापित्यान-ॐ यज्ञोदेवानामित्यस्य कुस्सऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः, मादित्योदेवता द्वादशादित्यावाहने स्थापने विनियोग । ॐ यशोदेवानांप्रत्येतिसुम्नमादित्यासोभवतामृडयन्तः। भावोर्वा- पी सुमतिवृत्याद र्ट. होश्चिद्याव्यरिवो वित्तरासदादित्येभ्य- स्स्था । नाममंत्रैश्च-ॐ भगायनमः आवाहयामि स्थापयामि । 0 परसायनमः । ॐ सूर्यायनमः । ॐ वेदांगायनमः । भाननमः । ॐ रवयेनमः। ॐ गभस्तयेनमः । ॐ 'हिरण्यरेतसेनमः । ॐ दिवाकरायनमः । ॐ मित्रायनमः । मादित्यायनमः । ॐ विष्णवेनमः । ततःइन्द्राग्निमध्ये मद्रे-अश्विनी-ॐ यावांकरोत्यस्य मेधातिथिऋषिर्गायत्री- छन्दः, मश्विनौदेवते अश्विनाव हने स्थापने विनियोग । यावांकशामधुमत्य रिषनासन्तायतीतयायझं मिमिक्षतम् । उप. पामगृहीतो स्परिषभ्यांत्वैषते योनिर्माध्वीभ्यान्त्वा। अश्वि. भ्यानमः मा० स्था। ततोऽग्नियममध्ये भद्रे ॐ मोमासरवर्ष- णी धृतइत्स्यमधुरछन्दा ऋषिर्गायत्रीछन्दः विश्वेदेवा देवता पिरवेदेवाचाहने स्थापने विनियोग । ॐ मोमासर्षणी धृतो पिरदेवासऽभागत । दारवा ॐ सोदाशुषः सुतम् । विश्वेभ्योदेवेभ्योनमः, आवाहयामि स्थापयामि । यमनिर्भ- तिमध्ये भद्रे-अमित्यं देवमित्यस्य प्रजापतीऋपिरष्टिछन्द: सवितादेवता सप्तयक्षावारने स्थापनेच विनियोगः। ॐमभित्प (३२६) कर्मफाएर लाकर, दशलिंगतोभद्रजापतिः देव र्ट सवितारमोण्योः कविक्रतु मर्चामिसत्यसव ई० रत्नधा- मभिः प्रियंमतिकविम् ॥ अर्वायस्या मतिर्भा अदितत्सवी मनिहिरण्य पाणीरमिमीत सुक्रतुः कृपास्वः ।। 30 सप्तयक्षे. भ्योनमः । निर्गतिवरणामध्ये भद्रे-30 नमोस्तुसभ्यइत्यस्य प्रजापतिऋषिरनुष्टुप्छन्दः सादेवताः सर्पाचाहने स्थापने च विनियोगः। 30 नमोस्तुसभ्योयेकेच पृथिवी मनु । ये ऽअन्त- रिक्षे येदिवितेभ्यः सर्प-योनमः ॥ ॐ सभ्योनमःतत्रैव- ॐ भूतेभ्योनमः श्रा० स्थाo 1 वरुणवायुमध्ये भद्रे-ॐ ऋतापा- डित्यस्य देवानपयोगायत्रीछन्दः गंधर्वाप्सरसोदेवता गन्धर्वा प्सरसामायाहने स्थापने च विनियोगः 30 घातापाडतधामा- 'ग्निर्गन्धर्वस्तस्यौपधयोऽसरसो मुदोनाम । सनऽइदं ब्रह्मक्ष पातुतस्मै स्वाहा वाट्नाभ्यः ।। ॐ गन्धर्वाप्सरोभ्योनमः । तत उत्तरलिंगस्याधः--30 यदक्रन्देत्यस्य जमदग्निदीर्घतमा वृषी त्रिष्टुप्छन्दः स्कन्दो देवता स्कंदावाहने स्थापनेच वि० । 0 यदकन्दः प्रथमंजायमानः उद्यन्त्समुद्रा दुतवा पुरीपात् । श्येन स्यपक्षाहरिणस्य बाहउपस्नुत्यं महिजातन्ते ऽअर्वन् । ॐ स्कन्दो यनमः । तत्रैवनालमत्रः ॐ नन्दिनेमः आवाहयामि । स्थापयामि 30 ईश्चरायनमः, ॐ शूलायनमः ॐमहाकालायनमः तितोबो- शानमध्ये शृंखलावल्लिपु--30 अदितिौरित्यस्य गौतमऋपि त्रिष्टुप्छन्दः विश्वेदेवादेवता: दनादिसप्तकावाहने स्थापने च वि. अदितिद्यौरदति रंतरिक्षमदितिर्मातासपितासपुत्रः 1 विश्वेदेवा अदितिः पंचजनाऽअदिनिर्जातमदितिर्जनित्वम् । ॐ दक्षादि. सप्तकेभ्योनमः । पूर्वलिङ्गस्याध:--ॐ अम्बे ऽ अम्बिके ऽम्बालिके त्यस्य प्रजापति@पिरनुष्टुप्छन्दः अश्वोदेवता दुर्गावाहने स्थापने च वि०] ॐ अम्बे 5 अम्बिके उपालिके नमानयनिकश्चनः । ससस्त्यश्वका सुभद्रिकांकाम्पीलवासिनीम् । ॐ दुर्गायैनमः । तत्रैव~30 ददिष्णारत्यस्य मेधातिथिर्गपियत्रीछन्दो ४२ कर्मकाराष्ट्र रत्नाकरे, हादश लिंगतोभद्र पूजा पद्धति. ( २३०) विष्णुर्देवता विष्रवावाहने स्थापनेच वि० । 30 इदंविष्णुर्विचक्रमे वेधानिदधेपदम् । समूढमस्यपा ॐ सुरेस्वाहा । ॐ विष्णवेनमः ततो ब्रह्माग्निमध्ये शृंखलावल्लिघु-30 पितृभ्यइत्यस्यप्रजापत्य शिवसरस्वत्यऋषयः सप्नयजूंपिछन्दांसिपितरो देवता स्वधा वाहने स्थापनेच वि०। ॐ पितृभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः पितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमःप्रपितामहेभ्यः स्वधायिभ्यः स्वधानमः । अक्षन्पितरोमीमदन्तपितरो तीतृपंतः पितरः पितरः शुन्धध्वम् । 30 स्वधायैनमः । ततोदक्षिणलिंगस्याध:-30 परंमृत्यो, इत्यस्यसकसुकऋपि त्रिष्टुप्छन्दो मृत्युर्देवता मृत्योरा वाहने स्थापने च वि० । 30 परंमृत्योऽअनुपरेहिपंथां यस्तेऽअन्य- ऽइतरोदेवयानात् । चक्षुष्मतेशृण्वते तेत्रवीमिमानः प्रजारीरि- पोमोतव्वीरान् । ॐ मृत्यवेनमः । ततो ब्रह्मनिऋतिमध्ये शुग्व- लावल्लिपु-30 गणोनान्त्वेत्यस्य प्रजापतिषि यजुश्छन्दो गणपतिर्देवता गणपत्यावाहने स्थापनेच वि० । ॐ गणानान्त्वा गणपति ट० हवामहे प्रियाणान्त्वा मियपति र्ट० हवामहे निधी- नान्त्वा निधिपति ट० हवामहे व्वसोमम । श्राहमजानिगर्भध- मात्वमजा सिगर्भधम् । ॐ गणपतयेनमः ततः पश्चिमोलग- स्याधः-शन्नोदेवीति मंत्रस्यदध्यड्डाणऋपि र्गायत्रीछन्दः आपोदेवताः अपामावाहने स्थापनेच वि० शन्नोदेवीरभिष्टय ऽप्रापोभयन्तुपीतयेशय्योरभिवंतुनः । 30 अद्भ्योनमः ॥ ब्रह्मवायुमध्ये शृंखलावल्लीपु-30मरुतोयस्य गौतम ऋपित्री छन्दः महतोदेवत ममनामाचाहनेस्थापनेच वि० महतोयस्यहि- सपाधादिवो चिमहसः । ससुगोपातमोजनः मरुभ्योनमः । पास्यकर्णिकाधः-30 स्योनापृथ्वीत्यस्य मेधातिथिपिर्गाय त्रीछन्दः पृथ्वीदेयता पृथिव्याचाहने स्थापनेच वि०। 30 स्योना पृषिविनो मावानृतरानिवेशनी । यच्छानः शर्मसप्रथाः । ॐ पृथिव्यनमः । तत्रैव-ॐ पंचनन्यइत्यस्य, श्रादित्ययाज्ञवल्क्या कृषी, अनुष्टुप्छन्दः सरस्वतीनदीदेवता गंगादिनद्यावाहने स्थापने (३) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, द्वादशलग तोभद्र पूजा पद्धतिः च वि०॥ ॐ पंचनद्यः सरस्वती मपियन्ति सस्रोतसामरस्वती तुपंचधासोदेवो भवत्सरिन् । 30 गंगादिसरि योनमः० नत्रैव ३० समुद्रायेत्यस्य प्रजापतिर्ऋषिः, बृहतीच्छंदः समुद्रोदेवताः सप्तसागरावाहने स्थापने च वि०! ॐ समुद्राय शिशुमारानाल. भते पर्जन्यायमण्डकानद्भ्यो मत्स्यान्मित्रायकुलीपयान्वरूणीय नाकान् 30 सप्तसागरेभ्योनमः ततः कपिकोपरि-पर्व- तस्येति देवरातऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दो मेरुदेवता मेर्यावाहने स्थापने वि०। ॐ प्रपर्वतस्य वृषभस्य पृष्टान्नावश्चरन्तिस्वसिचाइयान: ताऽभाववृत्रन्नधरागुदक्ताऽअहिर्बुध्न्यमनुरीयमाणाः । विष्णोवि. कामणमसि व्यिको विकान्तमसि विष्णोः प्रान्तमसि । ॐ मेरवेनमा ततउदीच्यांलिंगे ॐ सद्योजातइत्यस्य जमदग्निऋपि: त्रिष्टुप्छन्दः अग्निदेवता सद्योजातावाहने स्थापनेच वि०॥ ॐ सद्योजातो व्यमिमीतयज्ञमग्नि देवानामभवत्पुरोगाः कस्यहेतुः प्रददिस्कृतस्यव्वाचि स्वाहा कृत ६० हविरदन्तु देवाः ॐ सद्योजातायनमः पूजयेत् प्राच्यांलिंगे- 30 वाममित्यस्य 'भरद्वाज ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो वामदेवोदेवता वामदेवावाहने स्थापने वि०॥ ॐध्याममद्य सविताम मुश्यो दिवेदिवे व्याममस्मभ्य र्ट० सावीः । वामस्यहिक्षयस्य देवभूरे रयाधिया व्वामभाजास्याम।। दक्षिणस्यालिगे-ॐ अधोरहत्य- स्थ अघोरऋषिः, अनुष्टुप्छन्दः, रुद्रोदेवता अधोरावाहने स्थापनेच चि०।२० अघोरेभ्यो गधोरेभ्यो घोरघोरतरेभ्यः। सर्वेभ्यः सर्व वैसभ्यो नमस्तेऽस्मद्ररूपेभ्यः । . अयोरायनमः । ततः पतीच्यांलिंगे-30 तत्पुरुषायेत्यस्य तत्पुरुषप्रपिः, गायत्रीछन्दः भद्रोदेवता तत्पुम्पावाहने स्थापनेच वि० । तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय धीमहि । तन्नोन्द्रः प्रचोदयात। 30 तत्पुरुषायनमः । ततःकार्णिकायांमेरोम्परि-30 तमीशान मित्यस्य गौतम ऋषि- जगतीछन्द ईशानोदेवतेशानावाहनेस्थापने वि० 1 0 तमीशानं जगतस्तस्थुपस्पति धियंजिन्यमवसेहमहेब्ययन् । पूषानोयथाव्वेद , , मकाण्डरक्षाकरे द्वादशलिंगतोभद्रपूजापद्धतिः (३३२) साम सवृधेरक्षितापायुरदब्धास्वस्तये॥ ॐ ईशानायनमः। ततः परिधो -~30 त्वयाहिनइत्यस्य शङ्खऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः पितरोदेव. तापरिध्यावाहनेस्थापनेच वि०। ॐ त्वयाहिनःपितरः सोमपूर्व कर्माणिचक्रुः पवमानधीराः। वन्वन्वब्वातः परिधी १ रपोर्ण वीरेभिरश्वैर्मघवाभवानः ॥ ॐ परिध्यनमः ॥ ततोमेरोःपरिधि समन्तालिंगानांस्कन्धे विंशतिकोप्टेपुचतुःपुर्यः-30 चतुःपुरीभ्यो नमः। आवाहयामिस्थापयामि ॥ तत आग्नेयकोणेशृङ्खलाशिरसि पदनये--30 अग्निमीलइत्यस्यमधुश्छन्दा ऋषिर्गायत्रीछन्दो ग्निर्देवता ऋग्वेदावाहनेस्थापनेच वि० । 30 अग्निमीलेपुरोहित यज्ञस्यदेवमृत्विजम् । होतारंरत्नधातमम् । ॐ ऋग्वेदायनमः पूजयामि ॥ ततोनैऋत्ये-शृङ्खलाशिरसिपदत्रये- इपेत्वेत्य- स्थपरमेष्ठीऋपिर्दव्यनुप्छन्दः शाखादेवता यजुर्वेदाचाहनेस्थापने च वि० । 30 इषेत्वोर्जेत्यान्यायवस्थदेवोवः सविताप्रापयतुः श्रेष्ठतमायकर्मण आप्यायध्वमन्ध्या s इन्द्रायभागंप्रजायतीर नमीवा ऽ अयदमामावस्तेन ऽ ईशतमाघश ई० सोध्रुवा ऽ अस्मि गोपतौस्यातवीर्यजमानस्य पशून्पाहि । ॐ यजुर्वेदाचनमः ॥ ततो वायुकोणो शंखला शिरसि पदत्रये-ॐ अग्न बायाहीत्यस्य भरद्वाज ऋषिर्गायत्रीहन्दोऽग्निर्देवता सामवेदावाहने स्थापनेच विनियोगः । ॐ अग्नऽग्रायाहिवीतये गृणानो हव्यदातये । निहोता सत्सिवहिपि । 30 सामवेदायनमः । ततईशानेशृंखला शिरसि पदत्रये-ॐ शन्नोदेवीरित्यस्य दध्यझावणऋषिः, गायत्रीछन्दः, श्रापोदेवताः, अथर्ववेदावाहने स्थापने वि०। ॐ शन्नोदेवीरभिष्टय आपोभवन्तुपीतये। संयोरभिश्रवन्तुनः॥ ॐ अथर्ववेदायनमः । ततउत्तरमध्यलिङ्गस्य वामवाप्याम्- 30 मत्तेनमः । महान्नमावाल्यामिस्थापयामि, एवंसर्वत्र ॥ ततो दक्षिणवाप्याम्-30 भवायनमः-भवं०। पूर्वमध्य लिंगवाम- पाप्याम्-30 शायनमः-शर्व० । दक्षिणे--ॐ पशुपतयेनम:- पशुपनि । ततो दक्षिणेमध्यलिंगस्य वामवाप्यां-30 ईशानाय (३६३) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, द्वादशलिंगतोभद्र पूजापद्धतिः नमः--ईशानं० । दक्षिणवाप्यां-30 उग्रायनमः--उग्रं । ततः पश्चिमे मध्यलिंगस्य वामवाप्यां-स्द्रायनमः रुद्रं । दक्षिणवा- प्याम--30 भीमायनमः भीम ग्रा० स्था० ॥ तत उत्तरवायव्यान्तराल वाप्याम्-30 महत्यैनमा-महती या स्था। तत उत्तरेशानेन्तरालवाप्यम्-30 भवान्यनमः भवानी॥ ततः ईशानपूर्वान्तरालवाप्याम्-30 शर्वाण्यैनमः-शर्वाणी । ततः पूर्वाग्नेयान्तरालवाप्यां-30 पशुपत्यैनमः-पशुपती । तत आग्नेय दक्षिणाऽन्तराले-30 ईशान्यनमः-ईशानी ततो दक्षिणत्या न्तराल वान्याम्-30 उग्रायैनमः-उग्रां । ततो नैऋत्यपश्चिमा- न्तराल कोण वाप्याम्-30 मद्राण्यैनमः मद्राणीम् । ततः पश्चिमवायव्यान्तराल कोणवाप्यां-ॐ भीमायनमः-भीमा मावाहयामि स्थापयामि । ततो वाहपरिधौ दिगीशसनिधौ- तत्रादौ उत्तरे-सोमसन्निधौ-- ॐ गदयैनमः-गदा आवाहयामि स्थापयामि ॥ ईशाने-ईशसनिधौ-ॐ त्रिशूलाय नमः-त्रिशूलं। पूर्वेइन्द्र-30 वज्रायममः-वज्र०|| श्रानेये-अग्नि ॐ शक्तयेनम:-शक्ति । दक्षिणेयम० । दण्डायनमः-दंडं. नैऋत्येनितिक 30 ग्वगायनमः ग्वङ्गं । पश्चिमेवरुण पाशा यनमः-पाशं । वायव्येवायु। 30 अंकुशायनमः-अंकुशम् । श्रा स्थातद्वाहोउत्तरे-30 गौतमायनमः गौतम पा स्था ईशाने-30 भरद्वाजायनमः । भरद्वाज । पूर्व-30 विश्वामित्रा यनमः-विश्वामित्रं० आग्नेये-कश्यपायनमः कश्यपं० । दक्षिणे ॐ जमदग्नयेनमा-जमदग्नि नैत्ये-30 वशिष्ठायनमः--- वशिष्ट । पश्चिमे-30 श्रत्रयेनमः-अत्रि । वायव्ये-30 अरुन्ध त्यैनमः अरुन्धतीम् ॥ तद्वाहापूर्वाधष्टदिक्षु-30 ऐनम: ऐन्द्री० ॐकौमायनमा कौमारी। अब्राहलयैनमः ब्रामी0 3. वारा- सोनमः-वाराही। चामुण्डायैनमः-चामुण्डाम् । वैष्ण यैनमा-वैष्णवीं। 3 कौवयनमा-कौवेरी । ३ वैनायक्य नमः वैनायकीम्। इति हरिग्माइल द्वादशलिंगतोभद्देवता स्थापनक्रम ।
कर्मकाण्ड रत्नाकर, द्वादशलिंगतोभद्रपूजापद्धति , (३३४) अर्थतेषांसंलग्नपूजापद्धतिंवक्ष्ये--पुष्पाक्षतः-ध्यायेत-30 ब्रह्माद्यान्विनियुक्तांस्तान्वैनायक्यन्तगान्सुरान् । ध्यायाममनसा भक्त्यालिंगतोभद्रदेवतान् ॥ आवाहनम्-मन्दस्मेराननान्सौम्या न्ब्रह्मदीन्सगणायुधान । आवाहयाम्यहं भक्त्यालिंगतोभद्रदेव- तान् ॥ आसनम्-शुभ्रंवारंजितंवस्त्रं कासादिविनिर्मितम् । आसनप्रतिगृह्णन्तुलिंगतोभद्रदेवताः । स्थापनम्-श्राव्रजन्त्विहति- छन्तुब्राह्माद्यात्रिदिवौकसः । स्थापयामिचपूजार्थ लिङ्गतोभद्र- मण्डले ॥ पाद्यम्-सुनिर्मलंसुग्वोष्णंच पवित्रंतीर्थजजलम् । पायं गृह्णन्तुतेसर्वे लिङ्गतोभद्रदेवताः॥ अर्घ्यम्-ताम्रादिपात्रगंशुद्धंसुग न्धेनसुवासितम् । अय॑गृह्णन्तुतेसर्वे लिङ्गतोभद्रदेवताः॥ पंचामृ- तम्-पयोदधिघृतक्षौद्रशर्करामिश्रितंशुभम् । पंचामृतंप्रगृह्णन्तुलिङ्ग तोभद्रदेवताः॥ आचमनम्-पवित्रंनिर्मलनीरं कर्पूरादिसुवासितम् श्राचम्यंचप्रगृहन्तु लिंगतोभद्रदेवताः। स्नानीयम्-पवित्रंनिर्मल दिव्यं स्वर्णद्यादिगतंपरम् । जलंगृहन्तुस्नानार्थ लिंगतोभद्रदेवताः यज्ञोपवीतम्-नवतन्तुसमायुक्तं ब्रह्मग्रन्थिनियोजितम् । उप- वीतंप्रगृह्णन्तु लिङ्गत्तोभद्रदेवताः । वस्त्रम्-ऊोकार्पासकौशेय मनाच्छादनमाहृतम् । वस्त्रपुंजप्रगृह्णन्तु लिङ्गतोभद्रदेवताः । भूष- णम्-भूपणानिविचित्राणि कुण्डलादीनियानिवै । मयादत्तानि गृह्णन्तुलितोभद्रदेवताः। चन्दनम्-मलयाचलजंदिव्यंकेशरादि विमिश्रितम् । गृहन्तुभालशोभार्थ लिंगतोभद्रदेवताः। सौभा- ग्यद्रव्यम्-चन्दनोपरिशोभार्थ भृकुट्योरन्तरगतं । सिंन्दरादि प्रगहन्तुलितोभद्रदेवताः । अक्षता:-तंटुलांश्वेतवर्णाभानक्षता मंगलप्रदान । सगन्धान्प्रतिगृण्हन्तु लिङ्गतोभद्रदेवताः । पुष्पाणि ऋतुजानिसुगन्धीनि दृर्वापत्रादिकानिच । पुष्पाणिप्रतिगृहन्तु लिंगतोभद्रदेवताः। विल्वपत्राणि-येशवाशिवभक्ताश्च सशि वाश्चशिवप्रियाः । विल्वपत्राणिगृण्हन्तु लिंगतोभद्रदेवताः । नयनांजनम्-स्निग्धंदिव्यंपवित्रंच नयनानन्दनपरम् । ग्रंजनं प्रतिगृगहन्तु लिंगतोभद्रदेवताः । धूपः--गुग्गुलादिसमायुक्तं गंधा ..
कर्मकाण्ड रखाकरे, दशलिंग तोमपा पदतिः (३५) ढयंसुमनोहरम् । गृएहन्तु धूपमाप्रेयं लिंगतो भद्र देवताः । दीप:--साम्य सहतिकाभिश्च ज्वलितं सुप्रकाशकम् । प्राराति क्यंप्रगृह्णन्तु लिंगतोभद्रदेवताः । नैवैद्यम्--अन्नंफलं 'घृतं. दुग्धनैवैद्य तृप्तिदायकम् । यथालव्धप्रगृहन्तु लिंगतोभद्र देवताः नैवैद्यान्तेजालम्-कराननविशुध्यर्थमेलाचूर्ण समन्वितम् जलंगृहन्तु महालिंगतोभद्रदेवताः । ताम्बूल-सगन्धचूर्ण ताम्बूलं नागवल्ली दलान्वितम् । गृणन्तुपरयात्रीत्या लिंगतोभद्रदेवताः। ततः प्रार्थ- येत्-धावाहनंनजानामिनजानामिविसर्जनम् । पूजांचैवनजानमि त्वद्गतिपरमेश्वराः । न्यूनातिरिक्तं पूजायांयचत्पाद्यादिभिर्भवेत तत्सर्वक्षम्यतांदेवाः प्रसीदन्तु सुरेश्वराः । येयेलिंगे देवास्तदनुम. तिगतायेचयेदक्षवामे, नागाधीशाः सुरेशाविविधसुरगणा मातृका भैरवाश्च । ब्रह्मायालोकपाला ऋषिगणसहिताभास्कराद्याग्रहाश्च तेसर्वेपान्तुदेवासकलभयहालिंगतोभद्रदेवाः। ततापूजापद्धत्युक्त प्रकारेण लिंगतोभद्रदेवेभ्यस्तत्तन्मंत्र ममंत्रर्वादशदश, ययति लाहुतिभिरैकैकयाज्याहुत्यावाजुहुयात् । ततो नाममंत्र/वैदिक मंत्रः, पायसवलिंदद्यात् । कार्यान्तेदेवविसर्जनम्- यान्तुशैवगणा सर्वे यान्तुब्रह्मादिदेवताः । यान्तुभैरवभूतादि पुनरागमनायच । ततो यजमानममिपिंच्याशीर्दद्यात् । इति लिंगतोभद्र संघपूजा पद्धतिः एवंलिङ्गतो भद्रस्थ देवानसम्पूज्य कार्णिकायां वक्ष्यमाण विधानेन शिवपूजनं कुर्यात् अथचादौ पार्थिवलिङ्ग निर्माण प्रकारमाह- उक्तंच नन्दि पुराणे आयुष्मान्वलवान् श्रीमान् पुत्र बांधय- वान्सुखी। घरमिष्टलभेलिंग पार्थिवयः समर्चयेत् ॥ तस्मात्तु पाधिलिङ्गजेयं सर्वार्थ साधकम् । भविष्य पुराणे मृगस्मनोः सकृत्पिण्टं ताम्रकांस्यमयंतथा । कृत्वालिई सकृत्पूज्य वसे- कल्पायुपं दिवि । तिधितत्वे अक्षादल्प परिमाणां नलिङ्गं कुत्रचिन्नरः । कुर्वीतांगुष्टतो हस्वं नकदाचित्समाचरेत् । देवी- (३३६) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, बादश लिंगताभद्र पूजा पद्धतिः धृक् । उ. पुराणे-मृदाहरण संघद प्रतिष्ठा दानमेवन । स्नपनं पूजनचैव विसर्जनमतः परम् । हरोमहेश्वरश्चैव शूलपाणिः पिनाक पशुपतिः शिवश्चैव महादेव इति क्रामात् - ॥ पार्थिवलिंग निर्माणार्थ मंत्रः-30 ·हरोयनमः अनेनमृत्तिका ग्रहणं कुर्यात् । महेश्वरायनमः । इति लिंग निर्माणकु० । 30 शूलपाणयेनमः, इति प्रतिठांकु० । ध्यायेन्नित्यंमहेशं । इति ध्यान- पिनाकधृगेनमः । ॐ भूर्भुव स्वः पिनाकधुगिहागच्छेहतिष्ठ सुप्र० । 3. पशुपतये नमः, पाद्यम्-30 नमः शिवाय इति सामान्यपूजनम्--ततोवामावर्तन पूर्याद्याग्नेयान्तमष्ठमूर्ति स्थापनंपूजनंचकुर्यात्-पूर्वे-सर्वायक्षिति मूर्तयेनमः स्थापयामि पूजयामि । एवंसर्वत्रईशाने-30 भवाय जलमूर्तयेनमः स्था० पू० । उत्तरे-30 रुद्राय अग्निमृतयेनमः । स्था० पू० । वायव्ये-0 उग्रायवायुमृतयेनमः। पश्चिमे- भीमायाकाशमूर्तयेनमः स्था० । दक्षिणे-30 महादेवायसोम- मूर्तयेनमः स्था० । श्राग्नेये-30 ईशानायसूर्यमूर्तयेनमः स्थापू० नतउत्तरांगपूजान्ते-ॐ महादेवायनमः क्षमस्व इति संहारमुद्रया विसर्जयेत् ॥ इतिपार्थिव पूजापद्धतिः- वेदोक्त शिवार्चन पद्धतिः ॐ नमः शिवाय अधचकर्ता प्रातर्नित्यनियांकृत्वा शिवाल. पेवास्वगृहेवाद्वारा लिंगतोभद्रे यत्रानुमतिर्भवेत्तत्र हस्तौपादौ प्रक्षाल्पस्वासने, उपविश्याचम्य प्राणायामंविधाय, 30 नमः शियायेति विरुच्चार्य भस्मधारणोक्त विधिना भस्मत्रिपुट्रंधृत्वा ग्द्रामारंचसंघार्य, पूजा संकल्पं फुर्यात् श्रोत्यादि देशकाली संकीर्त्या मुफोऽहं करिष्यमाणामुक कर्मनिमित्तक समस्तदुष्टारिष्ठ कर्मकारह रत्नाकर, पातशिवार्चन पूजापतिः दूरीकरणा समस्तशुफलप्राप्त्यर्थया अमुककामना सिध्यर्थच अमुकशिवलिंगोपरिवेदोक्तविधिना यथालव्धोपचारद्रव्यैरगन्या. स पूर्वकंपोडशोपचारेण पूजनमहकरिष्ये । तत प्राचार्यवृणुयात्- ब्रामणवरणद्रव्यच सम्पूज्य संकल्पं कुर्यात्-यवेत्यादि संकी ामुकोहं करिष्यमाणामुककर्मनिमित्तक, शिवाराधनविधौ; अमुकशर्माणं ब्राह्मणमाचार्यत्वेनवृणे । चरणद्रव्यंतस्मैवत्या, आचार्यस्त्विति समाW,, भवानीतिप्रत्युक्तिः । ततः शान्तिपाठं कृत्वा पूजनमारभेत, तत्रादौनन्दीश्वरंपूजयेत-हस्ताक्षतपुष्पः ध्यायेत्-ॐ श्रायंगौः पृश्निरक्रमीदसदन्मातरंपुरः पितरंचप्रय- न्त्स्वः । ॐ भूर्भुवः स्वः, नन्दीश्वरेहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितो वरदोभव, नन्दीश्वरायनमः, पाद्यादिभिः संपून्य प्रार्थयेत् ॐ चत्वारिशृंगा त्रायोऽअस्यपादाद्वशीर्षे सप्तहस्तासोऽयस्य । विधावद्धो वृषभोरोरवीति महोदेवोमा / प्राविवेश । ततोवीरभद्रमावाहयेत्-30 भद्रंकर्णेभिः शृणुयामदेवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवा सस्तनूभिर्य महिदे- वहितं यदायुः। 30 भू. वीरभद्र, इहा० । वीरभद्रायनमः, सम्पूज्य प्रार्थयेत्-~30 भद्रोनोऽअग्निराहुतो भद्रारातिः सुभग- भद्रोऽयध्वरः । भद्राऽउतप्रशस्तयः । ततः कात्तिकेयमावा. 30 यदकंदः प्रथमंजायमान 5 उद्यत्समुद्रादुतवापुरीपात् । श्येनस्य पक्षाहरिणस्यबाह 5 उपस्तुत्यं महिजातन्ते ऽन् । ३० भू० कार्तिकेय० । ॐ कार्तिकेयायनमः सम्पूज्य प्रा०-30 गत्रवाणा: संपतन्तिकुमाराविशिवाऽइव । तन्नऽइन्द्रो बृहस्पतिरदितिः । शर्मयच्छतुविश्वाहा शर्मयच्छतु । ततः कुवेरमा व्वय ट० सोमव्रते तवमनस्तनपुविभ्रतः प्रजावन्तः सचेमहि । ॐ भू० कुवेरइ० । ॐ कुवेरायनमः सम्पूज्य प्रार्थयेन्-30 कुविदङ्ग यवमन्तोयवंचिवाधादात्यनु पूर्ववियूय । ईहेहेषांकृणुहि भोज नानियेवहिंपोनम उक्तियजन्ति । ततः कीर्तिमुग्यं० ॐ इप्कृति कर्मकाण्ड रत्नाकरे, वेदोक्त शिवार्चन पूजा पद्धतिः र्नामवोमाताथोयूय टै० स्स्थनिष्कृतीः सीराः पतत्रिणीस्थनयदा मयति निष्कृय । ॐ भू० कीर्तिमुखइ० । ॐ कीर्तिमुखायनमः सं०मा० 30 नमस्तऽआयुधायानातताय धृष्णवे, उभाभ्यामुत- तेनमः घोहुभ्यान्तवधन्वने । अथचार्चकः वक्ष्यमाण विधिना, अदौस्वात्मनि, अंगन्यास विधायपुनः शिवलिंगोपरि कुर्यात् हस्तेन अंगानिस्पृशेत् । शिवलिंगे-शिखायाम् ॐ यातेरुद्रशिया- तनू रघोरापापकाशिनी । तयानस्तन्वा शंतमयागिरिशन्ताभि- चाकाशीहि । शिरशि-ॐ अस्मिन्महत्यर्णवेन्तरिक्षेभवाऽअधि । तेषासहस्रयोजनेवधन्वानितन्मसि । ततो ललाटे-असंख्याता सहस्राणियेरुद्राऽअधिभूम्याम् । तेपासहस्रयोजनेवधन्वानि तन्मसि । भ्रुवोर्मध्ये- व्यय र्ट. सोमव्रतेतवमनस्तनू पुविभ्रतः प्रजावन्तः सचेमहि । नेत्रयोः 30 अंवकं यजामहेसुगन्धिपुष्ठिव- र्द्धनम् | उर्वारुकमिवबन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामृतात् । तृतीयनेत्रे ॐ अग्निज्योति ज्योतिरग्निःस्वाहा सूर्योज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा । अग्निवर्णोज्योतिवर्चः स्वाहा सूर्योवोंज्योतिवर्चः स्वाहा ज्योतिः सूर्यः सूर्योज्योतिः स्वाहा । कर्णयोः-30 नमः श्रुत्यायचपत्थ्यायच नमाकाय्यायचनीप्यायच नमाकुल्यायच सरस्यायच नमोनादेयायच पैशन्तायच । नासिकयोः-30मान- स्तोकेतनयेमानऽआयुपिमानो गोषुमानोऽअश्वेपुरीरिपः । मानो- व्वीराबुद्रभामिनोवधीहविष्मन्तः सदमित्वाहवामहे । मुखे-30 अवतत्यधनुश्व ट० सहिस्राक्षशतेषुधे । निशीय॑शल्यानां मुग्वा- शिवोनः सुमनाभव । ग्रीवायाम्-30 नमोवंचतेपरिवंचते स्तायूनांपतयेनमोनमो निषंगिण 5 इपुधिमते तस्कराणांपतये नमोनमः। कंठदेशे-ॐ नीलग्रीवाः शितिकंठादिव ट० रुद्राऽउप- श्रिताः। तेयांसहस्रयोजनेवधन्यानि तन्ममि । उभयो,हो:- ॐ नमस्तऽआयुधाया नाततोयधृष्णवे । उभाभ्यामुततेनमो पाहुभ्यान्तवधन्वने । हस्तयोः-30 येतीर्थानि प्रचरन्तिमृकाहस्ता ..
मंकापडरताकरे घेदोक्त शिवार्चन पूजापद्धतिः ( ३३६) निपंगिणः । तेपासहस्रयोजनेवधन्यानितन्मसि । अंगुलीपु आ नमोज्येष्ठायच कनिष्टायच नमापूर्वजायचापरजायच । नमोमध्य. मायच पगल्भायच नमोजघन्यायच वुध्न्यायच । हृदये-30 नमः पर्णायच पर्णशदायच नमऽउद्गुरमाणायचा भिघ्नतेचनम ऽआ- खिदतेच प्रखिंदतेच नमऽइपुकृयोधनुष्कृयश्चवोनमोनमोवः किरिकेभ्योदेवाना हृदयेभ्योनमो विचिन्वत्केभ्योनमो विक्षि- एत्केभ्योनम ऽानिहतेभ्यः। पृष्ठे-30 नमोगणेभ्यो गणपति भ्यश्चचोनमोनमो व्रातभ्योव्रातपतिभ्यश्चवोनमोनमो गृत्सेभ्यो गृत्सपतिभ्यश्चवोनमोनमो विरूपेभ्यो विश्वरूपेभ्यश्चवोनमः उदरे-30 विकिरिद्रबिलोहितनमस्तेऽप्रस्तुभगवः यास्तसहस्र ई० हेतयोन्यमस्मिन्निवपन्तुताः । दक्षिणकुक्षौ ॐ नमः शंभवा- यचमयोभवायचनमः शंकरायचमयस्करायचनमः शिवायच शिवतरायच । वामकुत्तौ ॐ द्रापेऽअन्धसस्पते दरिद्रनीललोहितः आसाम्प्रजानामेपाम्पशूनां मामेर्मारोङ्मोचनः किंचनाममत् । नाभौ--ॐ हिरण्यगर्भःसमवर्तताभूतस्पजातः पतिरेकडआसीत् सदाधारपृथिवीन्द्या मुतेमांकस्मैदेवाय हविपाविधेम । कट्याम् ॐ मीढुष्ठमशिवतमशिवोनः सुमनाभव परमेवृक्षायायुधनिधाय कृत्तिव्यसानऽआचरपिनाकं विघ्नदागहि-लिंगे ॐ शिवोनामासि स्वधितिस्ते पितानमस्तेऽस्तुमामा हिर्टसीः ॥ निवर्त- याम्यायुपेन्नाद्यायप्रजननाय रायस्पोपाय सुमजास्त्यायसुची- र्याय । गुहो-~30 इमारुद्रायतब-सेकपदिने क्षयद्वीरोयप्रभरामहे मतीः । यथासमसद्विपदे चतुष्पदेविश्वं पुष्टंग्रामे ऽ अस्मिन्ननातु- रम् ॥ वृपणयोः--30 इपेत्वोर्जेत्वान्यायवस्थदेवोवः सविता प्रार्पयतुः श्रेष्ठतमायकर्मण भोप्यायध्वमग्न्या 5 इन्द्रायभाग प्रजावतीरनमीवा 5 अयक्ष्मामावस्तेन 5 ईशतमाघश र्ट० सो धुवा ऽ अस्मिन्गोपतौस्थातवहीर्यजमानस्यपशून्पाहि ।। ऊर्वो:- आमानोमहान्तमुनमानो 5 'सर्भकम्मान 5 उक्षन्तमुतमान 5 (३४०) धर्मकाण्ड रखाकरे, वेदोक्त शिवार्चनपूजापद्धतिः उक्षितम् । मानोवधीः पितरंमोतमातरम्मानः प्रियास्तन्वोरुद्ररी रिपः ।। जान्योः-30 एपतेरुद्रभागः सहस्वस्राम्विकयातंजुषस्व स्वाईपते रुद्रभाग ऽयाखुस्तेपशुः ॥ जङ्घयोः-नमोज्येष्ठाय च कनिष्टायचनमः पूर्वजायचापरजायच । नमोमध्यमायचा पग ल्भायच नमो जघन्यायच युध्न्यायच । गुल्पयोः-30 नमोहस्वा यच व्वामनायच नमोवृद्धायच सवृधेच नमो ऽ ग्यायच प्रथमा- यच । पादयोः-30 येपथांपधिरच्यऐलवृदा ऽ श्रायुयुधः । तेषा ॐ सहस्रयोजनेवधन्वानितन्मसि । अस्त्रे-ध्यवोचद धिवक्ता प्रथमोदैयोभिपक् । अहीश्चसम्झिभयन्त सर्वाश्च यातुधान्योधराचीः परासुव कवचे-30 नमोविल्मिनेच कवचिनेय नमोव्वर्मिणेच व्वरूथिनेच नमः श्रुतायच श्रुतसेनायच । नमो दुन्दुभ्यायचाहनन्यायच । धनुपि-30 विज्यधनुःकपर्दिनो विशल्योवाणवा उत । अनेशन्नस्यया ऽ इपव ऽ श्राभुरस्यनिषं गधिः॥ वाणे-30 यत्रवाणाः सम्पतन्तिकुमाराविशिषाइव । तन्न : इन्द्रोवृहस्पतिरदितिः शर्मयच्छतु । विश्वाहाशर्मयच्छतु खड्ने-30 विकिरिद्रब्धिलोहितनमस्ते । अस्तुभगवः। यास्ते. सहस्र र्ट० हेतयोन्यमस्मिन्निवपन्तुताः। ततो इ क्षतदिग्वन्धन कुर्यात-30 यएतावन्तश्चभूया ॐ सश्चदिशोरुद्रावितस्थिरे । तेषां ॐ सहस्रयोजनेवधन्यानितन्मसि ॥ ( एवंन्यासविधि- कृस्वाशिवोहमितिभावयेत् ॥ ततःशिवलिंगोपर्यप्येवंन्यासविधि कृत्वा पूजासमारभेन्-) अक्षतपुष्पोध्यायेत्-ॐ ध्यायेन्नित्यं महेशरजतगिरिनिभं चारुचन्द्रावतंसंरत्नाकल्पोज्वलांगं परशुमृग वराभीतिहस्तंप्रसन्नम् । पद्मासीनंसमन्तात्स्तुतममरगणैर्व्याघ्र कृत्तिवसानं विश्वाद्यविश्ववंयं निखिलभयहरंपंचवक्रत्रिनेत्रम् । आवाहनम्- मानोमहान्तमुतमानो ऽ अर्भकमान 5 उक्षन्त मुतमान 5 उक्षितम् । मानोवधीः पितरंमोतमातरंमानः प्रिया- स्तन्वोन्द्ररीरिपः ॥ प्रत्युपचारम्-~30 यातेरुद्रशिवाननरोरा कर्मकाएर रक्षाकरे; वेदोक शिवार्चन पूजा पद्धतिः (३४१) पापकाशिनी । तयानस्तन्वाशन्तमयागिरिशन्ताभिचाकशीहि । पायम्-30 यामिघुगिरिशन्तहस्ते विभय॒स्तये। शिवांगिरित्र- तांकुरुमाहि टै० सीः पुरुषजगत् । श्रर्यम्-30 शिवेनव्वचसात्वा गिरिशाच्छाव्वदामसि । यथानः सर्चमिजगदयक्ष्म र्ट० सुमना असत् । आचमनम्-30 अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमोदैव्योभि- पक् । अहींश्चसजिम्भयन्त्सर्वाश्चयातुधान्योधराची:परासुव । स्नानम्-30 असौजस्ताम्रो ऽ अरुण 5 उतवमासुमङ्गलः येचैन टै० रुद्रा अभितोदिक्षुश्रिताः सहस्रशोवैषा ॐ हेडईमहे ।। पयः स्नानम्-30 पयः पृथिव्याम्पय 5 औपधीपुपयोदिव्यन्तरिक्ष पयोधाः । पयःस्वतीप्रदिशः सन्तुमाम् ॥ दधिस्नानम्-- ॐ दधिकारणोऽश्रकारिपंजिष्णोरश्वस्यवाजिनः । भिनोमुखा करत्मणप्राय- पितारिपत् ॥ घृतस्ना नम् घृतंवृतपावानः पिवतव्वसां व्वसापावानः पिवतान्त- रितस्य हविरसिस्गहा । दिशःप्रविश 5 आदिशोवि- दिश उद्दिशोदिभ्यःस्वाहा मधुस्नानम्-30 मधु- व्याता ऋतायतेमधुक्षरन्तिसिन्धवः । माध्वीनः सन्त्वोषधी। शर्करास्नानम्-~~-30 स्वादुःपवस्वदिव्याय जन्मनेस्वादुरिन्द्राय सुहवीतुनाम्ने स्वादुमित्रायव्वरुणायव्वायवे बृहस्पतयेमधुमाळ अदाभ्यः । ततः शुध्दोदकस्नानम्-30 असौजस्ताम्रो 5 अरुण उतयम्रः सुमङ्गलः । येचैन र्ट० रुद्रा ऽ भितोदिनुश्रिताः सहस्रशो वैषा हेडईमहे ।। ॐ देवस्यत्वासवितुः प्रसवेरियनोर्वाहुभ्यां पूष्णोहस्ताभ्याम् || पुनराचमनीयम्--30 अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमोदेव्योभिपक् ॥ अहीश्चसजिम्भयन्त्सर्वाश्चयातुधान्यो धराचीः परासुव । बस्त्रेणकटिबन्धनम्--30 श्रसौयोवसर्पति नीलग्रीयोविलोहितः । उतैनंगोपा 5 अद्दभन्नभन्नुदहार्यः सह- छोमृडयातिनः । यज्ञोपवीतम्-~30 नमोस्तुनीलग्रीवाय सहस्रा क्षायमीनुपे । अथोये अस्यसन्चानो हन्तेभ्योकरन्नमः ॥ चन्द- ( ३४२ )कर्मकाण्ड रत्नाकर, वेदोक्त शिवार्चन पूना पद्धति. नम्-30 प्रमुंचधन्वनस्त्वमुभयोरान्याया॑म् ॥ याश्चतेहस्त 5 इषवः पराताभगव्योव्यप । अक्षतान--30 अक्षन्नमीमदन्ताव प्रिया ऽ अधूषत । अस्तोपतस्वभानवोविमानविष्टयामतीयोजान्वि न्द्रतेहरिः। पुष्पाणि--विज्यन्धन कपर्दिनोविशल्योवाणवा ॥ उत । अनेशन्नस्यया 5 इषव 5 आभुरस्यनिषंगधिः। 30 याः फलीनी- 5 अफलाऽ अपुष्पा याश्चपुष्पिणीः वृहस्पतिप्रसूता स्तानोमुश्चन्त्व र्ट० हसः ॥ विल्वपत्राणि---30 नमोविल्मिनेच कवचिनेच नमोवमिणेचवरूथिनेच नमः श्रुतायचश्रुतसेनायच नमो दुंदुभ्यायच हनन्यायच । -गृहाण विल्वपत्राणिस- पुष्पाणिमहेश्वर । सुगन्धीनिनवानीश शिवत्वंकुसुमप्रिय । धूपम्-30 यातेहेतीर्मीदुष्टमहस्तेयभूवतेधनुः । तयास्मान्वि- श्वतस्त्वमयमयापरिभुज । 30 धरसिधूर्व धर्वन्तन्धूर्वत योस्मान्धर्वतित धृर्ववयं धूमः । देवानामसि वन्हितम र्ट। सस्नितमं पप्रितमं जुष्टतमन्देवहतमम् ॥ दीपम-30 परिते धन्वनो हेतिरस्मान्वृणक्तविश्वतः । अथोयऽइपुधिस्तवारेऽ अस्मन्निधेहितम् । 30 अग्निज्योति ज्योतिरग्निः स्वाहा सूर्यो ज्योतिज्योतिः सूर्यः स्वाहा । अग्निव!ज्योतिर्वर्चः स्वाहा सूर्योव्याज्योतिर्चः स्वाहा । ज्योतिःसूर्यःसू-ज्योतिः स्वाहा । नैवैद्यम्-0 30 अवतत्यधनिश्वर्ट सहस्राक्षशतेपुधे । टि.* नैवेद्य भक्षण विचार पाझे -द्रव्यमन्न फलं तोय शिस्पन स्पृशे क्वचित् ॥ लधये नेव निर्मात्य व्रो सर्य परित्यजेत् । शिवनारदराबाद- पाणलिंग तु चमाशानंच निर्भा यकरपना । सवं वाण स्तिनाथ शरत्वा भक्त श्च- मान्य धागासागहाधिकारी। - वाणलिंगन विद्यने अईनममनवय जलम् । शालग्राम शिलालग्न सर्व याति परिनताम् नद्यमेनोभुफ्त्या रानीवाड़ायण नरेत्। पपपुष्पफल कर्मकाण्ड रसाकरे, वेदोक शिवार्चगपूजा पद्धतिः (३४३) निशीर्यशल्यानां मुखाशिवोन: सुमनाभव ।। 30 अन्नपतेन्नस्यनो देशनमीवस्य शुष्मिणः । प्रप्रदातारंतारिप 5 अर्ज़न्नोधेहि द्विपदे चतुष्पदे । नैवेद्यान्तमाचमनीयम्- अध्यवोचदधिवक्ता प्रथमो दैव्योभिषक् । श्रीश्चसर्वाञ्जम्भयन्त्सर्वाश्चयातुधान्योधराची: परासुव । मुखवासम्-30 नमस्तऽप्रायुधायानातताय धृष्णेवे। उभाभ्यामुततेनमो वाहुभ्यान्तवधन्वने ॥ दक्षिणाम्-30 हिरण्य गर्भः समवर्त ताग्रेभूतस्य जातः पतिरेक 5 श्रासीत् । सदाधार पृथिवीन्या मुतेमां कस्मै देवाय हविपाविधेम ।। पुनायेत्-- सर्वव्यापिनमीशानंशिवं वैविश्वरूपिणम् . वंदे सदा शिवं देवं घरदाभयहस्तकम् । गौरीं चतुर्भुजांचण्डी त्रिनेत्रां मुकुटोज्वलाम्। प्रसन्नवदनां ध्यायेच्छिवोत्संगेतु वामतः ॥ ततोऽन्नाभिषेक कुर्यात्-अत्र शिवलिंगोपरि गव्यपायसं - शिवलिंगावहिः पुरुषसूक्तेन, वानीलसूक्तेनोपलिप्य, अन्नमयं 'लिहंविधायैवं पक्ष्यमाणविधिना पूजयेत् ॥ सनाभिषेकविधिमेनमकृत्वापि- वक्ष्यमाणेनैवच पूजयेत-तत्रादौ पुष्पोदकेनतर्पयेत्-30 भवं देवं तर्पयामि । ॐ शर्वदेवं तर्पयामि । ॐ ईशानंदेवं तर्पयामि | 30. पशुपतिदेवं तर्पयामि। 30 रुद्रंदेवं तर्पयामि । 30 उग्रंदेवं तर्प; यामि । ॐ भीमदेवं तर्पयामि । 0 महान्तदेवं तर्पयामि । ॐ देवदेवं तर्पयामि । ज्येष्ठायनमः पुनराचमनीयं सपर्पयामि नमः । 0 श्रेष्ठायनमः मधुपर्क सम० 130 कालायनमःगन्धसः ॐ कलविकरणायनमः पुष्पाणिस० । ॐ सर्वभूतदमनायनमः. धूपं० । ॐ मनोन्मनायनमः दीपम्० ॐ भवोद्भवायनमः ॥ ... नैवैद्यसमर्पयामि । ततोऽष्टौपुष्पांजलीन्दद्यात्- 30 भवायदेवा- यनमः पुष्पांजलिंसमर्पयामि । ॐ शर्वायदेवायनमः पु. 30 ईशानायदेवायनमः पु० । 0 पशुपतयेदेवायनमः पु०। ॐ रुद्रा- यदेवायनमः पु० । उग्रायदेवायनमः पुष्पां० । भीमाय देवायनमः पुष्पां० । ॐ महतेदेवायनमः पुष्पां ततः शक्तिपूज- (३४४) कर्मकाण्ड रताकरे, पदोक्त शिवाचनपूजापतिः नम्-ॐ भवस्यदेवस्यपत्न्यैनमः पूजयामि, इतिपाद्यादिभिः पूजयेत् । ॐ सर्वस्यदेवस्यपल्यैनमः पू० ॐ ईशानस्यदेवस्य पल्यैनमः पू । ॐ पशुपतेर्देवस्यपन्यैनमा प० । ॐ रुद्रस्यपल्यै नमः पृ० । 30 अघोरेभ्यो थघोरेभ्योघोरघोरतरेभ्यः सर्वेभ्यः सर्वसर्वेभ्यो नमस्तेऽस्तुरुद्ररूपेभ्यः ॐ तत्पुरुषायविद्महेमहादेवाय धीमहि । तन्नोरुद्रः प्रचोदयात् ,, ततः पुष्पाक्षतैः- ॐ शर्वाय क्षितिमूर्तयेनमः । ॐ भवायजलमूर्तयेनमः 30 ॐ रुद्रायाग्निमूर्तयेनमः । ॐ उग्रायवायुमूर्तयेनमः । ॐ भीमा याकाशमूर्तयेनमः। 30 पशुपतयेयजमानमूर्तयेनमः । ॐ महा- देवायसोममूर्तयेनमः । ॐ ईशानायसूर्यस्येनमः ॥ इतिदेवं सम्पूज्य, ततनिपादिकायां सछिद्रघटंसंस्थाप्य, सम्पूज्यच । तत्र सदुग्धजलंपपूर्यशिवोपरि जलधारांदद्यात् ॥ परिचर्यावसानेप्रद- क्षिणांकुर्यात, मन्त्रपुष्पांजलिंदद्यात्-30 हिरण्यगर्भः सम- वर्तताग्रेभूतस्यजतः पतिरेक 5 आसीत् । सदाधारपृथिवींद्यामुते- मांकस्मैदेवायहविपाविधेम । श्रारात्रिःपार्थिव ई० रजापितरः प्रायिधापभिः । दिवःसदा ॐ सि वृहती विनिष्ठस ऽ प्रात्वेषवर्त- तेतमः । यज्ञेनयज्ञमयजन्तदेवा स्तानिधर्माणिप्रथमान्यासन् । तेहनाकमहिमानः सचन्तयन्त्रपूर्वसाध्याः संतिदेवाः। 30 राजा- धिराजायप्रसह्यसाहिने नमोवयंवैश्रवणाय कुर्महेसमेकामान्काम कामायमचं कामेश्वरोवैश्रवणोददातु, कुवेरायवैश्रवणाय महा- राजायनमः,, शान्तिः। ॐ नमःशिवाय, तत प्राचार्यादयो यजमानायाशीदाः ।। इति वेदोक्तशिवार्चन पद्धतिः॥ टिo*-शिप स्याध प्रदक्षिणा-पत्रं पंचय सोमसूत्र पुनपम् । चार गोमसूत्रंच पुनश्चःपुनपम् ॥ अपमन्यं यतीनान्तु सम्यन्तु ब्रह्मचारिणाम् । सन्यापसन्यं गृहिण मेय गंमो प्रदक्षिणा कर्मकाण्ड रत्नाकरे, श्रेय शिवानुष्ठादि रिमापा। ro अथ शिवानुष्टादि परीभापा . अथ शिवानुष्ठादिपरिभाषां वदपे-तत्रादी रूवामिपेकादी राष्ट्रकादशिन्यादि प्रकारांश्च-उक्तंचमहाकरपेनंदिकेश्चर सतानन्द सम्वादे-भृणु नगीमहा प्राज्ञ दमदा पदामिते । रुद्रा.पंचविधाः प्रसादशिकस्तरोत्तरम् । गांगरत्यारोपपारयः राशपागद उच्यरी । एकादशगुणस्तदुद्री संतद्वितीयकः । एकादशभिरेनाभिस्तृतीयोलधुरुद्रकः । लप्कादशभिः प्रोक्तोमहारुद्रश्चतुर्धकः । पंचमस्यान्महारट्रैरेकादशभिरन्तिमः । श्रतिरदः समायातः सर्वभ्यो इयुत्तमोत्तमः । (रूप; १ रुद्री १ रुद्रः ३ महारुद्रः ४ अतिरुद्रः ५. एवं पंचभेदाभवन्तिः) तत्र सांगइत्युक्तीतदंगान्यपि तत्रैवोकानि, अथव-शिरगंकल्पं हदयंसूक्त स्थापीरुपंशिरः । प्राहुनारायणचैव शिखातस्योत्तराभिदाम् । आशु शिशानः कपर्चनेत्रं विनाहरस्मृतम । शतरुद्रद्रीयमस्स्यास्पटंग: क्रमईरितः । ततः शतरुद्रीयसंज्ञा रुद्राध्यायस्यपोडशचा नामिनि तिः संज्ञा । सांगरुद्रपाठ क्रमोपिमहारुल्पएवोक्तः पूर्वमंगानि संजप्यरुद्राध्यायंततोनपे । आदाप- तेच सौकार सौंकारंव्याहतित्रयम् । अष्ठत्रणसंयुक्त रद्राध्यायं स जपेत । तदन्तेसप्तमंत्रा वयर ई० सौशिरोजपेन् । उप्रश्चेति सप्तमंत्राजटामजाजपेत्तत. । ततोऽधानुवाकरूपांगच मका, ध्यायमाचरेत । जपेद्न्ने ऋचंयाचं संकल्पाध्यायमेवच तोचीशान्तिरिनि च कंडिकाजपमा चरेत । शान्तिः शान्तिः शान्तिरिति चान्त-युधारणंसदा । एवमुक्त क्रमणैपसकृदावत्तनं बुधैः सांगत्पाद्योपायः सशोषीद उन्यो । देः प्रथमाध्यायस्य पदमंनाहदयम। पौत्यरात शिरी द्वितीयाध्यायस्य पोडशमंत्रा । तत्रद्वितीयाध्यायस्योत्तरनारायणा नुकस्या,, इतिपरामंत्राः शिसा । आशु शिशानेत्यादि तृतीयाध्यायस्य सप्तदशमंगा कपचम् । विध्रात्यादि चतुर्धाध्यायस्य सप्तदशमंत्रा, नेयम् । रौद्राध्यायस्य पश्चमान्यायम्य, प्रथभानुबाकस्य पोडशमंत्राः, अत्रम् ॥ एवं प्रमेण अनान्तपठिस्या,, तत, २० भूः, - भुषः, स्वः इति प्रणवत्रयमुञ्चार्य, पुन. पञ्चमाध्यायस्यादिमंत्र, ( नमस्ते दाभन्यय.) तः, जम्भेदध्म., इत्यन्तापदपष्टिमंत्रापठिन्वा, ॐ भूः ॐ भुवः स्वः ॥ इत्यष्ठ प्रणमयुक्तः पचमाध्ययः शिरः । ततो रुःसप्तमाध्याये जटा । ततश्चमकाध्यायः शान्त्याध्यायः शान्तिागिडका: पठित्वान्ते वारत्रय शान्ति ३॥ इति रुपक स्वरूपम् ॥ एक मेकात्ति द्रौपाठस्यख्यकेति संज्ञा,, एकावृत्तिमात्रनेत्रं कुर्यादन्यथाभ्रष्टाभवन्तीति शास्त्रसम्मतिः ॥ इत्येकावृतिविधिः । मर्थकादशिनी-विधि बदये-उक्तच प्रयोग दर्पणे-एकादशोधष्पाणि त्वज्ञानिच: सकृअपेत् । अंगान्यादौशिरश्चान्ते स्ट्रैकादशिनीस्मृता ॥ शत्रानुक समुच्चयार्थन चकारण जटायापि, श्राक्षेपत्वात , तथाचादोपडलानि जप्त्या मध्ये गद्रुद्राध्याय मैकादशवारं जावा.
(३४६) फर्मकाएट रताकरे, मथ शिगनुष्ठादि परिभाषा । न्ते शिरोजटाच जप्यते यदातदासान्द्रोति भाति । इति प्रथम पक्ष ॥ अत्रचित्तु-- सागमाद्य जपेद्रुद्र पेचमानिनांतर । सांग सशोषक चयं निरत मितिवेचन इत्युक्त तन प्रधानभूत स्वस्यै मादशा यत्तनाभादय परपरा मूलतया नादर्तव्यम् । इतिपूर्व पक्षस्यैवसाधीय स्पम् । थन प्रमपक्ष- एकादशिनी प्रयोग- अटमाध्याय- चमकरूपस्याष्टानुवादमयस्यैकादश द्यावर्तनेषुपाठस्य प्रमद्वयम् । तनवाजधयतसँस्यु सत्यतिचतुष्टयम् । ऊचेतिनचतर स्युरश्मा तिप्रयंतत । अग्निश्चमधतिय स्यु रनुवाकाइमेमता । अनुवाकप्रयस्याय पडशश्चपठेयुध । तत्रा शुवतिस स्युरग्निश्चेति द्वयतत । एकाचर्मततश्चैकामथैकापचतस्रथमे । ततस्यविश्चमेद्वन्द्ववायस्वाहेतिद्वयम् । सदा न्येकादशैतानिकमादेकादशेषुच । रहस्यावर्तनेष्वेव पठेच्चयनययुध । इति ॥ अमचिद्वदन्ति रुद्रस्यैकादशावर्त्तने पनुवाकानामप्यरादशस्ययोचितत्वादष्टायतने प्वष्टानुपायाना मनुसृत्ती, शेपेप्वपिनयेपन्तिमानुवारस्य सामधेनी वृद्धीचान्तिममन्त्रानुवर्तवत् पाठस्योचितत्वमिति । सन्मते [----अ ट० शुश्चेनिपंचस्युस्ततश्चैाचतुष्टयम् । पाजायस्वाहेतिद्वयमप्टमायेषुयोजयेत् । इति विशेष । तत्रान्यतरफमेणावृत्तौ अन्यत्सर्यपूर्वाक्कसकृदावर्तनयत् । मत्सम्मत्यातुपूर्वपक्षण्य मुष्टुतरोस्ति-सच-श्रङ्गान्यादौशिरश्चान्तति दिक् । इति रोकादशिनीप्रयोगविधि ॥ अथलघुरद्रस्वरूपवदये-रद्रौादशिनोवपासर्वसामफ्लप्रदा । एकादशगुणासैवरुदइसमि यीयते । महारुद्रस्वरूपम्-रुद्रएकादशगुणोपहानित्यभिधीयते । अतिरदस्वरूपम्- महानैकादशगुणस्त्यतिरद्रइहोच्यते । रुद्रकल्पानुसारेण रद्रभेदानिरूपिता । देवानन्देन पदुपा तेनतुष्यतुशङ्कर । प्रतिऋरत बहोमस्याद्दशाशोमुग्यपक्षत । शतांशहोमोपि क्वचित्केचिदिच्छन्ति नापरे । तत्रफलविशेषेण रुद्रीसंख्यानामुपयोगमाहु --हदीस याफ्लदेपिरणुष्ववदता मम । एकावृत्यादिपाटाना यधावत्क्थयामिते ॥ सङ्कल्पपूर्वसन्यस्य ग्यासांगेपुमनून्स कृत् । स्नात्वापञ्चामृतेनैवध्यानपूर्वशिवस्मरेत् । बालग्रहोपशान्त्यर्थ मेकावृत्तिसमाचरेत् । उपसपिशा, न्यथै निरावृत्तिपठेन्नर । ग्रहोपशान्त्यैफर्तव्या पञ्चायत्तिर्वरानने । महाभयेसमुत्पने सप्तावृत्ति मुदौरयेत् ॥ नवाकृत्याभवेच्छात्तिा नपेयफ्ललभेत् । राजवश्येविभूत्यैच रुद्रावृत्तिमुदीरयेत् ॥ रुद्रोलघुरुद्र ---हस्त्रिभि काममिद्धिरिहानिश्चजायते । स्टै पञ्चभिशनुश्च तथास्त्रीवशतामियात् स्दै सप्तभि सौरयं स्याच्छ्रियमाप्नोतिमानय । नवरुदै पुत्रपौत्रधनवान्यसमन्वित । राजभीति विनाशायवैरस्योच्चाटनायच धर्मार्थकाममोक्षाणा साधनायत त परम् । अल्पमृत्युविनाशाय तथारज्ययश श्रियै ॥ रामवृद्धिप्रदेयाय महारुद्रैकसरयया । विभिश्चैवमहास्नैरसाध्यसाधन भवेत् । पञ्चभिश्चमहारुदै रातमाम प्रसाध्यते । सप्तभिश्चमहारुद्र सप्तलोकतयोभवेत् । नवभि धमहारदै पुनर्जन्मनजायते । अतिरुदैकसरयन देवत्वप्राप्नुयानर । इति रद्रातिरद्र परिभाषा। - - (३४७) पार्मकाण्ड स्नाकरे, शि महामृतुंजय जपविधिः अथ महामृत्युंजय जपविधिः । अथ महामृत्युंजय जपविधिः । संकल्प:-योत्यादि पूर्वी च्चारितएवंगुणविशेपेण विशिष्ठायांशुभपुण्यतिथौममयात्मनः श्रुतिस्मृति पुराणोक्तफलप्राप्त्यर्थं वायजमानस्य शरीरेऽमुकग्रहपीटा निरासद्वारासद्यः आरोग्यप्राप्त्यर्थ, अमुकसंख्यात्मकं श्रीमहा मृत्युंजयदेवताप्रीत्यर्थ श्रीमहामृत्युंजयमंत्रजपमहंकरिप्ये, विनि- योगः-30 अस्य श्रीमहामृत्युंजयमंत्रस्य वशिष्ठऋषिः श्रीमहा मृत्युंजयरुद्रो देवता अनुष्टुप्छन्दः हौं वीजजॅशक्तिः सः कीलकं सर्वाऋष्टनिवृत्यर्थ मृत्युंजयप्रीत्यर्थे जपेविनियोगः-न्यासाः- ॐ वशिष्ठऋषयेनमः शिरसि, . अनुष्टुप्छन्दसेनमः मुखे, 30 श्रीमहामृत्युंजयरुद्रदेवतायैनमः हृदये, ॐ हौं वीजायनमः गुलो, जूं शक्तयेनमः पादयोः 30 सः कीलकायनमः सर्वाङ्गेयु, करन्यासः-30 त्र्यंबकं अंगुष्ठाभ्यांनमः 30 यजामहेतर्जनीभ्यां नमः ॐ सुगन्धिपुष्ठिवर्द्धनमध्यमाभ्यांनमः, 30 उर्वारुकमिवव- न्धनात् । अनामिकाभ्यांनमः ॐ मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठिकाभ्यांनम 0 मामृतात्करतलकरपृष्ठाभ्यां, ध्यानम्-ॐ चन्द्रोद्भासित मूर्द्धसुरपति पीयूपपात्रंमद्धस्ताजेनदधन्सु दिव्यममलं हास्या- स्थपंकेरहम् । सूर्येन्द्रग्निविलोकनं करतलैः पाशाक्षसूत्रांकुशां भोज विभ्रतमक्षयंपशुपति मृत्युजयंतस्मरे । ततो मानसोपचारेण पूजयेत30 ल पृथिव्यात्मकं गंधसमर्पयामि 1 30 हँ आकाशा- त्मकं पुष्पं समर्पयामि | 30 य चायवात्मकंधूप स० 1 30₹ तैज- सात्मकं दीपं सव अमृतात्मकं नैवैद्यसमर्पयामि । अस सर्वात्मकं मंत्रपुष्पांजलिं समर्पयामि । मंत्रोद्धार-30 हौं जू 0 सः भूः . भुवः 0 स्वः अव्यम्बकंयजामहे सुगन्धिम्पुष्टिवर्द्धनम् । उर्वारुकमिववनन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमामू- तत् ॐ स्वः भुवः 30 भूः 30 सः ॐ ॐ हौं आ जपान्ते पूर्ववदुतरन्यासंकृत्या । ॐ गुह्यातिगुहागोप्तात्वं गृहाणास्म कर्मकाण्ड रक्षाकरे, महामृत्युजय जपविधि. (३४) त्कृतंजपम् सिद्धिर्भवतुमेदेवत्वत्प्रसादान्महेश्वर, मृत्युंजय महा- रुद्र त्राहिमां शरणागतम् । कर्मभोगजरोगैश्च पीडितंयजमानकम् । अनेनमहामृत्युंजयजपाव्येनकर्मण श्री सदाशिवो महामूएंजयः प्रीयतांनमम, इतिनिवेदयेत्-इत्यष्ठप्रणव संपुटितमहामृत्युंजय मंत्रः । अथ पड्मणवयुक्तो महामृत्युजयमंत्र:-पूर्ववत्संकल्पादिकं कृत्वा मंत्रराजंजपेत्-हीं जूं सः भूः भुवः स्वः त्र्यंवर्क यजामहे सुगन्धिपुष्ठिवर्द्धनम् । उर्वारुकमिववन्धनान्मृत्यो भक्षीयमामतात् ॐ स्वः भुवः भृः 30 सान हौं ७ अर्पणदिकं पूर्ववत् । एवं जपानन्तरं देवं सम्पूज्यमार्थयेत् । मृत्युंजय महादेव त्राहिमांशरणागतम् कामनाहोमद्रव्यंचवट्ये-पुत्रार्थशालि वीजे- नधनार्थे वित्धपत्रकैः । दुर्वाभिरायुष्कामस्तु पुष्ठिकामस्तुवेतसः विद्याकामस्तु पालाशैर्दशांशेनतुहोमयेत् ॥ तिलैरारोग्यकामस्तु ब्रीहिभिः सुग्वमश्नुते । धान्यकामोयवैश्चैव गुग्गुलेनरिपुक्षये । इति मृत्यु जय मंत्र सपुटीकरण विधि। वैकुंठ चतुर्दशी-परिभाषा प्रयच त्रेकुण्ठ चतुर्दशी कार्तिक शुङ्गा----मारात्रिव्यापिनो ग्राह्या दिनद्वयत दव्याप्ती निशीय प्रदोषोभयव्यापिनी ग्रन्या । उषतच सन्तकुमार संहितायाम्-शुक्ल पचितुदशा मरुणाभ्युदयं प्रतिमहा व तियो ना मूत्त मरिकणिके । स्नात्वाविश्वश्वरीदेव्या निस्वैपरम पुनवत । प्रदोपरामयेषुयादती प्रयतमानम पुजन दीपदानच शिवलिंगाचनविधौ। शतनय पतिकाला यो पछयुरारंचतत । स्थापयेहीपरे सर्व प्रत्यहत निवन्धना। । रद्भेदन विपिना दोपकानथवा यगर । सम्पूज्य निधिनादीपान्प्रदाप दीपयटनी। स्मृत्यन्तरे-रात्री जागरणं कुर्याद्गीतवाद्यादि मग । सुवर्णवति कां कृत्वा राजतं दीपक शुभम् । गव्यनचयुता मुतफुधामध्यवर्ति काम् । पुत्राधिनीच यागारो सोत्थाया शिवसन्निधौ । उभयाहस्तयोर्मव्य दीपं या प्रयतत निविप्ननगतारान शकुन मुमंगलम् ।। प्रभाने दोपतच ब्राह्मणाय निवेदयत् । ततोऽगोदये जाते स्नानम्यांद्वतीनर । संध्यासमाप्य विश्वेश मामभ्ययं यथाविधि मद्रशान्भातयित्वाच ब्राह्मणान्भोजयत्तत । मतिथौ सितमार्तिक्यायोनर, पूजयेश्चमा । ददाम्यह मनित्यारोकामांशतनरम् ॥ ॥ इनि ॥ १ कर्मकाण्ड रत्नाकरे, वैकुठ चतुर्दशी दीपदान पद्धतिः ॥ अथ वैकुंठ चतुर्दशी दीपदान पदतिः ॥ अथचवैकुंठ चतुर्दश्यां शिवभक्ति युतोनरः प्रातनद्यादौ वायस्निन्कस्मिन् जलाशये स्नात्वा नित्यकर्मकृत्वांइदमाचरेत् ।। सायंकाले शिवालये तदभावे नदीतीरेवा धूक्तिपाार्थिव लिंग- विधानेन पार्थिवलिंग निर्मायतेनैव विधिना-सम्पूज्यच दीपान्य- क्ष्यमाण विधानेन संदीपयेत् । स्वासने, उपविश्याचम्यभूतोत्सा. दनं कृत्वा प्रणम्पच ॐ नमः शिवायेति त्रिर्जप्य, सुमुखेत्यादि- ना गणेश-संप्रार्य-संकल्पं कुर्यात अद्येत्यादि देशकालौ संकीर्त्या मुकोऽहम्, प्रात्मनः सर्वपाप क्षय पूर्वकामुककामनया, अधवै. कुंठ चतुर्दश्याममुक शिवलिंगार्चन विधौ प्रतिसांवत्सरारन्य नियमानुकूलतया दीपदान विधौ संवत्सरप्रतिदिवसकैक वनिका नियमेन आशुतोष सदाशिवप्रीत्यर्थ, अमुकसरन्यकान्दीपानहं- दीपयिष्ये ॥ पूजनंचकरिष्ये ॥ ततः पूर्वोक्त विधानेनवा, धुम्पसू- तेनच, सर्वाभावे ॐनमः शिवाय, इतिमंत्रण पाद्यादि नीरा- जनान्तं शिवं संपूज्य दीपावलीमपिपूज्यच । पूर्ववत्संकल्पं कृत्वा दीपान्प्रज्वालयेत-मंत्र:-30 अग्नेनयसुपथारायेऽअस्मान्विश्वानि देव व्वयुनानि विद्वान् । युयो ध्यस्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्टान्ते- नमऽ उक्ति विधेम ।। इति पूज्यत्राह्मणाय व्रतपूर्त्यर्थमामा- न्न सदक्षिण दद्यात-अद्येत्यादि० अमुकोहमद्यवैकुंठ चतुर्दश्यां यन्मया शिव प्रीत्यर्थदीपदानं कृतं तत्प्रतिष्ठार्थ मिदमामान्नं सदक्षिणममुक शर्मणे बामणाय दास्ये, परिपूर्णमस्त्वचनम् ॥. अथ हस्त धृतोत्थिताखंडदीपकपद्धतिः- अथ सपत्निकः संतानकामः पुरुषो वैकंठचतुर्दश्यां-वा महाशिव- रात्रौ-मातनद्यादौ-स्नात्वा प्राचार्य मह शिवालये गत्वा स्वासने उपविश्य दीपप्रज्याल्य गणेशादिपंचांग पूजनं कृत्वा-नान्दीश्राद्धं चसंपाद्य, प्राचार्यवृणुयात् अधेत्यादि देशकालोसंकीर्त्या मुकर मकाएरकाको हस्त धृतोत्थिता दीपक पद्धतिः (३५०) शिः सपत्नीकोहं अधवैकुंठ चतुर्दश्यां वा महा शिवरात्रौ अमुक शिवलिंग सन्निधौ संततिकामोऽद्यनिशायां पत्नीदस्त धृत प्रज्वलित दीपविधि परिपूर्णतासिध्यर्थ,अमुकशर्माएंब्राह्मणंवेदोक्त विधानेन पूजाचतुष्टयसम्पादनार्थ तथापडंगरुद्रीपाठैकाशिन्यादि कर्मक ग्राचार्यत्वेन वा पाठकत्वेनत्वांवृणे ॥ चरणद्रव्यदत्वा प्रार्थयेत । आचार्यस्तु०॥ ततग्राचार्याशिवलिगंपूर्वीक्तवैदिकपूजा पद्धत्यापूजयित्वा । स्वयंचपाठकैः सहपडद्गरुद्रीपाठंमुत्यंजया दिजपञ्चकुर्यात् ॥ प्रदोपेपितेनैवविधिनापुनःसम्पूज्य,, रजतदीप ससुवर्णात्फुल्लकार्पासवत्तिकायुक्तं गवाज्यपूरितंच शिवसन्निधौ संस्थाप्य, सम्पूज्यच, ग्रार्थयेत्-30 परमार्थैरुरूपायनमस्तेपर- मात्मने । स्वेच्छाविभासितासत्य भेदभिन्नायशम्भवे । त्रिगुण- ग्रन्धिदुर्भदभवबन्धविभेदिने । भवभीतिपराभूनः सन्तानार्थी च त्यामिह । शरण्यंशरणंयातो व्रतभक्तिंगृहाणमे ॥ 30 अग्नेनये त्यस्यागस्त्यषित्रिष्टुप्ठन्दो ऽग्निर्देवता दीपप्रज्वालने विनि- योगः । ॐ अग्नेनयसुपधाराये ऽ अस्मान्विश्वानिदेवव्वयुनानि विद्वान् । युयोध्यस्मज्जुहुराणमेनो भूयष्टान्तेनम ऽ उक्तिविधेम। इति दीपप्रज्वाल्य ॥ विनियोगः :-30 अग्नेनतपाइत्यस्यागस्त्य ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवतादीपांजलिग्रहणेविनियोगः। 30 अग्ने व्रतपास्तेब्बतपायातव तनर्मजभूदेषा सात्वयिसामतनस्त्व य्यभूदिय र्ट० सामयि । यथायथन्नोवतपते व्रतान्यनुमेदीक्षान्दी क्षापतिरम टै० स्तानुतपस्तपस्पतिः ।। इति मन्त्रेण यजमानपत्नी मज्वलितंदीपमजलौनिधाय ॥ वि०-30 प्रानइत्यस्यप्रजापति ऋषिरुष्णिक्छन्दो 5 ग्निदेवताकर्मानुष्ठाने विनियोगः। 30 अग्नेवतपतेव्रतंचरिष्यामि तच्छकेयन्तन्मेराध्यताम् । इदमहमन- तात्सत्यमुपेमि । ॐ देवस्यत्वासवितुः प्रसवेश्विनोर्वाहुभ्यांपूष्णे हस्ताभ्याम् ॥ इति मन्त्रैर्दीपमंजलौगृहीत्वा यथावकाशमुत्तिष्ठेत्, विनियोगः-आभूरसित्यस्या त्रिशिरोपिः पंक्तिरछन्दः पृथि- वीदेताभूमिप्रार्थने विनियोगः । ॐ भरसिभूमिरस्य दितिरसि कर्मकाण्ड रत्नाकरे, शिलक्षयत्ति दीपदान रमतिः विश्वस्य भुवनस्यधी। पृथिवींयच्छथिवीं ० ह पृथिवी माहि ० सीः इति संमार्य } पृथिव्यैनमः सम्पूज्यतत्रैवो तिप्टेत् ॥ शक्तिश्चेत-30 नमः शिवाय, इति मन्त्रपुंयोजत्वा स्वयमपिस्थाणुबद्दीपरक्षांकुर्यात् ॥ ततश्योचार्योरात्रौपूजोचतुष्टयं स्वयंकुर्यात् ॥ ततः प्रभातेसंजाते-शिवसमीपेसमागत्य--30 अग्नेवनपतइत्यस्यप्रजापतिपि:पंक्तिश्छन्दोऽ ग्निर्देवताशियो पासनाव्रतविसर्जने विनियोगः ॥ ॐ अग्नेनतपतेवतमचारिपं तदशकंतन्मेराधीदमहंग्य 5 एवास्मिसोऽस्मि ॥ इति तूप्णींदीपं शिवसनिधौ संस्थाप्यसुरक्षयेत् ।। ततः स्नात्वानित्यकर्मसमाप्य 'पुनः शिवसम्पूज्य, पाठजपादि शान्त्यर्थकुशकण्डिकोक्तप्रकारेणा- ग्नि संस्थाप्यप्रज्वाल्यसम्पूज्यच । जपपाठ दशमासंचरुणाहुत्वा तद्दशांशतर्पणंमार्जनंच विधाय अग्नेनयसुपथा० ॥ इति पूर्वो तमन्त्रेणकृत्वा ! दीपदानं कुर्यात्-श्रोत्यादि संकीर्त्या मुक- राशिरमुकोहकरिष्यमाणपूर्वन्हि पुत्रकामनयाकृतस्य श्री सदा- शिवप्रीत्यर्थं वैकुण्ठचतुर्दश्यांरात्रौ अंजलिस्थदीपधारणकर्मणः शान्त्यर्थमिमंसुवर्णवत्तिकासहित दीप्तरजतदीपममुकशर्मणेतुभ्य मई प्रददे । प्रार्थयेन-प्रदीप्तरौप्यदीपंच हैमवत्तिसतन्वितम् । सदाशिवनिमित्तंच ददामिव्रतपूर्तये ॥ ततः शिवलिङ्गंपूर्वोक्तपूजा पद्धत्युक्तप्रकारेण,, . भवेदेवंतर्पयामीत्यादिमन्त्रैर्दुग्धजलेन तर्पयित्वा गोदानतिलपात्रंवाकृत्वा सपत्नीकंयजमानपूर्वोक्त विधिनाभिपिच्याशीर्दद्यात् । ततः शैवान्ब्राह्मणान्वाभोजयेत।। इति हस्तधृतोत्थिताखंडदीपदानपद्धतिः- अथ शिवलक्षवर्ति दीपदान पद्धतिः। अथ च व्रतीगणेशादि पंचांग पूजनकृत्वा शिवालयेगत्वा पूर्वोक्तविधानेन शिवार्चनंकृत्वा, चापूर्वोक्त प्रकारेणद्वादशलिंगतो भद्रं निर्माय पूजापद्धत्युक्त प्रकारेण भद्रस्थ देवान्सम्पूज्य, प्राचार्यवृत्या संकल्प:-अयेत्यादि तिथ्यादिकं संकीर्त्यममाखिल काकाण्ड रताकरे, शिवलक्षवर्ति दीपदान पद्धतिः (३५२) दुरितनाशाभीष्ठ सिद्धिपूर्वकं सांवसदाशिव प्रीत्यर्थ प्राचरित रुद्रलक्षवत्तिव्रतस्योद्यापनकरिष्ये, ततो लिंगतोभद्रे ताम्रकलशो- परिदमसाबरुद्र श्यवकमंत्रेण प्रतिष्ठाप्य शिवार्चन पद्धत्युक्त प्रकारेणसम्पूज्य भद्रस्यवाशिवलिंगस्य सन्निधौ, वार्तकान्संस्था- प्म, मध्ये रजततीपं हैमीवत्तिकोपेत संस्थाप्य गव्येनाज्येनापूर्य, ॐ शिवलक्षवर्तिकाभ्योनमः सम्पूरय शिवंध्यात्वा-ॐ अग्नेनय इत्यस्यागस्त्यऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवता लक्षवर्तिप्रदीपने विनि- योगः 30 अग्नेनयसुपथाराये 5 अस्मान्विश्वानि देवश्वयुनानि विद्वान् ॥ युयोध्यस्मज्जुहुराण मेनोभूयिष्टांतेनम 5 उक्तिविधेम इति वक्तिकान्संदीप्य, ततो होमपद्धत्युकप्रकारेण प्रायश्चिन्तान्तं होमकृत्वा । ॐ नमः शिवायेति मंत्रेण, घृतपायसं दशसहस्रा हुतिभिः लिंगतोभद्रदेवताश्चैकैकायाज्याहुत्याहुत्वा, ॐ अग्ने- नय० इतिमंत्रेण होमदशांसतणं तर्पणदशांशमाजनं सदुग्धजन कृत्वा उत्तराग पूर्णाहुतिंहुत्वा, गोदानंकृत्वा प्राचार्य ऋत्विरभ्यो दक्षिणांदत्वा प्राचार्यों यजमानं कलशजलेनाभिषिच्याशीर्द द्यात् । ततो ब्राह्मणान्भोजयेत् । इति शिवलक्षवत्ति तीपदान पद्धतिः नवाश्वनवभूव चैक्रमीयेदिनेशुभे । ज्येष्टेमासिसितपक्ष दशम्यां चन्द्रहस्तयोः॥१॥ आदित्यनामकेयंत्रे इन्द्रप्रस्थेशुभेपुरे । मुद्रितो- ऽसौशुभः कर्मकांडरत्नाकरोमया ॥शा देवानन्देन विदुपा डिम्मरग्रामवासिना | समाप्तिमगमत्तस्य पूजाखडोयथेष्ठदः॥३॥ इति कर्मकांड रत्नाकरस्य पूजाग्वंडः। - Ree .. श्री गणेशायनमः। अथ कर्मकांडरत्नाकरस्य, द्वितीयः संस्कारखंडः प्रारभ्यते। तत्रादौविवाहसूनव्याख्यां वक्ष्ये- प्पथ विवाहोपयोग्यविपयाणि । अथातः गंस्कारप्रकरसंव्यास्यास्थ तन संस्कारीनाम. श्रात्मशरीरायतरनिष्टो विहितक्रियाजन्यो तिशय विशेपः ॥ गर्भाधानादी लाक्षणिक च मक्कारपदम् ॥ मच गंस्कारोद्विविधा बाहोदेवथ ॥ गांधानादिः म्मानाबामः ॥ पाश्यना हवियज्ञाः सौम्यायदैवः । गौम्या: सोमयागाअग्निष्टोमादय: । म्मातीवादास्तु-उत्पादरिन माननाशकः । यथा-पोजगर्भगमुभयैनी निवई गोजातकर्मादिजन्य । राग पोऽशधा । तथाचजातकार्यः) शाधानपुंगगीमन्तजातनामाननीला ॥ मौजीवनानिगोदान समा- वर्तवियाहकाः ॥ अन्यचैतानिकमाणिप्रोन्यनेपदिशेयतु । शद्राणाचैवभातिनियादृशान्य कर्मच। याज्ञवल्क्य:-ब्रह्मक्षत्रिविश शद्रा परिवाद्यासयौद्विजाः ॥ निकाद्याः स्मशानान्तास्तेषां वैमन्त्रत:क्रिया ॥ भातुर्यदनेजायन्ते द्वितीयमौजीवन्धनात ॥ ब्राह्मणक्षत्रियपिशस्तम्मादी द्विजा:स्मृताः॥ याज्ञवल्क्य:-तगणीभता किया घोरणाविवाहम्तुगमन्त्रक || तृणीमन्त्र रहितं ॥ एता क्रियानिपेकादिक्रिया ॥ विपाहमानगंस्कारं शहापिलमतांसदा ॥ श्रतःस्त्रीशद्र- योविवाहएक्वरः, उपनयनस्थान विधानात ॥ मनु'-वाहिको विधिः स्त्रीणामोपनायनिक. स्मृतः। याचस्पति मिश्रादयस्तुवर्णिकपुष्पम्याप्याद्योविवाहमस्कारएवेलाहुः ॥ चिउप- नयनान्ते विवाहसंस्कारमाहुः गर्भाधानादिन्यायवान ॥ यद्यपिषोडशगंम्काराणांमध्ये गर्मा- धानस्यैवप्राथम्यमहुपुपाये पुदृश्यते । तथापिगभावानागुनयनान्तमम्काराचाणिकरयैपति विवाहसंस्कारस्तुगम्त्रोकथानुवर्णस्यन्यायात घेटत्यम ।। मृष्टयुपत्तापपिशतरुपा मोरियादएप मधममभदतीनगर्भाधानान्युनयनान्तानां गंम्मापारणगाथम्यम । यनोटारगपतिनागापा- - (३५४ ) कर्मकाण्ड रक्षाकरे, विवाह परिभाषा । नादरसंभवात् गृह्यस्थालोपाकानो चासम्भवात् ॥ पारस्कराचार्यणयनु: शारयोयानांगृह्यसूत्र विवाहएवपूर्वसुद्दिष्ट. ॥ श्रतोमयापिपत्रकमकाएदरत्नाकर ग्रंथे पोडशसंस्कारादौ विवाहसंस्कार एवमंगृहीतः । सच विवाहो धोभवति ।। उक्तंचमनुना-ब्राह्मोदैयस्तथैवार्षः प्राजापत्यस्त थासुरः । गान्धारातसश्चैव पैशाचश्चाटमाधम. ॥ तल्लक्षणानि याज्ञवल्क्योक्तानि-- प्रागीविवाहाहृय दीयतेशरत्यलंकृना ॥ तनः पुनात्युभयत.पुरुपानकविंशतिम् ॥ यज्ञस्थऋ- विजेदेय श्रादायार्पस्तुगीद्वयम् ॥ चतुर्दशःप्रथमज. पुनात्युत्तरजरंचपट ॥ इत्युक्त्वावरता धम्म सहयादीयतेर्धिमे ।। सफायः पावयेत्तन. षट्पट्वंश्यासमात्मना । आसुरोदविणादानाद गान्धर्वः समयामिन्थ. राक्षसीयुद्धहरणात्पैशाच कन्यकाछलात् ।। मादौमनाथमीप्रायश्चि. त्तम्-अनाथमीनतिन दिनमेकमपिद्विजः ॥ श्राश्रमेण विनातिष्ठ प्रायश्चित्तीयतेयतः ॥ उक्तवमिताक्षरायाम्-अनाश्रमीसम्वत्सरंप्राजापत्यं कृच्छंचरित्वा याश्रममुपेयात, द्वितीये । निकृन्द्रम्. तृतीयेकृच्छातिकृच्छम् ।। अतऊचचान्द्रायणम् ॥ अथ विवाहावसर:-गुरवैतु वरंदत्वा म्नायीततदनुज्ञया । वंदवतानिवापारनीत्यायुभयमववा ॥ अविप्लुतब्रह्मचयों लक्षणयांत्रियमुद्वहेत-अनन्यपूर्विकांकान्ता मसपिण्डायवायसीम् ॥ अरोगिणीभ्रातृमती मममानापगोत्रजाम् ॥ समावर्तनानन्तरंविवाहावसरः। श्रादौकुलपरीक्षाप्राश्वलायनसूत्रे- कुलमप्रेपरीक्षेतयेमातृतः पितृतश्चेतियथोक्तं पुरस्तादिति । गदाधरभाप्येयमः-~कुल वंशोलं च वपुर्ययश्ववित्तं च विद्योत्सनाथतांच । एतान्गुणान्सप्तपरोक्ष्यदेयाकन्यावुधैः शेषमचिन्तनीयम् मनुरपि-महान्यपिसमृद्धानिगौऽजाऽविधनधान्यतः । स्त्रीसंवन्धेदशैतानि कुलानिपरिवर्जयेत ही क्रियनिरुपं निश्छन्दारोमशाशसम् । तथ्यामयाव्यपस्मारि रियत्रिकुग्निकुलानिच । कुलानु- पाप्रजा. संभवंतीनिहारीतीति । अथ कत्यायनीकारदीपा --उन्मत्त. पतित' कुटीपंड- वैवस्वगोजः । चक्षु श्रीनविहीनध तयापस्मार दूषितः ! परदोषाः स्मृताश्चतकन्यादीपा' प्रकीर्तिताः । तत्रेवनारदोति -अपत्यार्थस्त्रिय, मया स्रीक्षेत्रवाजिनोनरा ।क्षेनयोजयतेदेय नाऽयोजीतनमहति । कन्याशुपतिक्षणान्याहमनुः- अय्यगाो सौम्यनाम्नीसवारणगामि- नौम् । तगुलामपंशदत्ता मृत मुद्वहेस्त्रियम् । अयोग्यकन्या लक्षणान्याह-नौदहे. सपिलो कन्पानाधिकांगी नरोगिमणीम, नालीमिरीनातिलोमानगावाटो नपिंगलाम् । पिंगला कंधुराक्षीम् । नवनदीनम्ना नान्यपर्यतनामिकाम् । नपक्ष्यहिरोयनाम्नीनच भीषणनामि. फाम् । मयच माविंडय लक्षणम्-धरोगियानानृमना गमानगोलापहीनोपयगापिहीनाम् । पिजनन्याय गपिंडतायामुक्तयः पुंस्वपरीक्षिनः मन् । उकंचधर्मनीकोयाम्-पुगः निय. शुभरजोरानीत्र रामनया यशपरम्पराम । गापिंडामा किलचिदन्यपिण्डान्ययिन्यं गलुदै.
कर्मकाए रखाकरे, विवाह परिभाषा (३५) वतेययात् । पितृव्यमानुलसहोदर मातुलान्यादौनास्ति चेतदितिमाभयतानुवाच्यम् । श्राद्धयतो भगवति देवगणेश्यमेपां स्त्रीणां तुपिठ्यकरणेपतिना सहेश्यात् । सापिञ्चमंतदिह सप्तमपूरपात नोध्यभवेत्तदपिमातृपुले पितुश्च । पुत्रादिषट्स्यथच तात पितामहादि पदीय नोपरि तथा हरिदत्तकस्तु ॥ फूटस्थमारभ्य वधूवरोचिंदष्टमस्तात मुलं तदानीम् ॥ पटोभन्मात्र मुले द्वितीया दिकां यधुम्मूलत उद्वहेत्सः ॥ तच्छिष्टा श्राद्रियन्ते ततोऽप्रमूलारपटो पाष्टमो गूलपटी 11 मूलान्तद्वघाटमों चौदहसः पक्ष: श्रेयामास्ति पूर्वी घरियान् ॥ मातृ यधुनयात्तान पन्धुत्रित यतः क्रमात ॥ पञ्चमी सप्तमी कन्या न विपाया द्विजैः सदा ॥ अथातो वन्धु. प्रयनिरूपणम्-मातुः पितृष्यमुः पुत्राः मातुर्मातृप्यमुः मुता: । मातुमातुन पुनाथ पिया मालपान्धवाः ॥ पितुः पितृ पितृप्नसु' पुत्राः पितुर्मानुष्यमः मुताः ॥ पितुर्मातुलपुत्राच विजयाः पितृवान्धवाः ॥ यावरषय:- पञ्चमात्सप्त माय मातृत: पितृतस्तथा मातृपने पक्षमा पितृपक्ष सप्तमादूर्व सापिंड्यं निवर्तते इति ॥ फूटस्थमारभ्य गणनाकार्या-गदाधर भाष्ये~ववायरस्य वातात कूटस्थाद्यदि सप्तमः ॥ पञ्चमी घेतयोमाता तत्सापिंड्यनिवर्तते ।। कूटस्थो मूलपुरुपोयतः संतानभेदः ॥ असमानार्प गोत्रजा परिद माप । गोत्रप्रवर्तकस्य मुनेन्यावर्तकप्रवरद यर्थः । गोत्रं वंश परंपरा प्रसिद्धम् । स्वसमाम आर्य गोत्रस्य तस्मा जाता नभवतिताम् । यास्क वाधूल मौनमूकानां भिम गोत्राणमपि भार्गव वैतहन्यसावतसति अपरैक्य मस्ति तत्र विवाहो माभूदिति असमानार्पजा मिन्युक्तम् । अगस्त्याटम सप्तय॑न्यत भापत्यं साक्षात्परंपराजातं गोत्रम् जमदनिभरद्वाजी विश्वामित्रानि गौतमाः । पशिष्ठ कश्यपा- गस्त्या मुनयो गोत्रकारिणः ॥ एतेषां यास्यपत्यानि तानि गोप्राणि मन्यते ॥ गोभकारिणी गोत्रप्रवर्तकाः । तनवीधायनः-गोत्राणान्तुसहस्राणि प्रयुतान्याबुदानिच । जनपथाश यैषां प्रवरा ऋषिदर्शनात् ॥ यथा-प्रथविधाकाश्यप जातवास्न नैध्रुवा सांडिलोभसंज्ञा:॥ गांप्रेक्यतो न्योन्यमनन्ययाः स्युः फुचन्तु समममुप्रभातम् । नैध्रुधाणत्रयः-कश्यपायासार सशांडिल्येति । काश्यपावसार देवलेतिया । काश्यप पावरसार भासितेतिया । काश्यप भासित देपलतियो.द्वी वा देवलासितति । रैभ्यात्रियः-कश्यपावत्सरारभ्येति नैध्रुवादि रैभ्यन्तान सर्व काश्यपानामविवाह एवं सर्वत्र योध्यम् ॥ प्रवरैक्य विशेषमाह बौधायन-पश्चानो त्रियु सामान्याद विवाह विपुद्वयोः । भृश्यंगिरोगणे व पिंधे कोपि पारयेत.॥ विवाह मिति शेषः ॥ अथ समानापजागीय विधाहे प्रायश्चितम्- समान प्रवर कन्या मैक गोत्रा मथापिया ।। विवाहयति यो मूढस्तस्य वक्ष्यामि निकृतिम् उमुज्यता ततो भायों मातृघरपरिपालयंत, इति शातातपस्मृतः ॥
(३५६) कर्मकाण्ड रत्नाकरे, विवाह परिभाषा। समान प्रवरस्वरूपचवौधायनेनोक्तम्-एक एक्प्रापिनियरध्वनुवर्तते । तावासमान गानित्व मृनेमृग्वनिरोगणार ॥ समानगोनत्वसमानप्रवरत्वामवर्थ ॥ स्वगोत्रप्रवगज्ञानेनि राय स्वगारप्रवराज्ञानविखुराणांतयेवच । ब्राह्मणानामथाचार्य प्रवराणामिनिस्मृति ॥ "पाचायगानप्रवरानभितस्तुद्विज स्वयम् । दत्वात्मानतुक्स्मेचित्तद्गाचप्रवरोभना । यद्वा गानप्रबर विज्ञानरहित पुमान् । जमदग्निगानप्रवर स्वशाहिसमाचरेत् । अथचसापत्न मातृकुले मारियनिणय ~यायनमातामहकुले ७ प्यातिदेशिका सापिंज्यादविवाह । तयाचमुमाउ.-पितृपत्न्य सामानरम्तदभ्रातरापातुलाम्यद्गगिन्यो मातृपसारस्तदुहित रशमगि यस्तदपसानिमागिनेयानि । अयथामसारकारिंग्य त्यु । अत्रयावदवचनचाचिकम् इति न्यायनपरिगाणत ववातिदैशिक माध्यिम नतुपञ्चमसप्तमपर्यन्तमितिलतरणया निपुरुष सापिंडय साहनि पधायाधीयते इति दिन ॥ श्रथदत्तासापिट्यम्-गापिंज्यमुक्तखलुदत्त पस्यस्वतातपिचमातृवण ॥ तत्तद्पलक्तातमातृनरेनमात्सप्तमपचमातम् ॥ विद्ध सम्बधोपिविवाहेवयं उक्त धर्मनोकायाम्-सान्याविरद्धापिच सर्वयत्ना सापनमातृ भागनोतनयाचतम्या पितृव्यपनि भगिनीतनयाच तस्या । उक्तञ्चगृह्यपरिशिष्टे-दम्पत्यो मिव पितृमामाभ्यपिर दसम्म वा यथ भायास्त्रमुहिताशालिस्पुती । पितृव्यपनीस्वमा- गति । चितु गुरोरचशि यम्यचकन्यकाात्याग्या तब ज्येष्टमहोदरस्य | भायामासामित्रमुता च म्यागायत्रिकापाउपवेरक ॥ धमण्यन्धादितागताये स्महेनवर वादिकतागताय ।। पन्यातपोनर दापि नायाविरुध्दगम्ब वामदवदन्ति । अयच साड्यविवरणम्- ववा बरस्य वातात पूरय याद सप्तम । पञ्चमीपतियोमाता तत्सापिंडयन्धितन । इति राखवारय मातृशन्दानस्वजननीम प्रवाचका पितु-तिम पूज्या पितुपये तिलोमातामहत्या । इत्यता भातर पूज्या सर्वशाम्रविनिर्णयात् । इति मातामत्यादिप्वपिमातृशब्दवाधकात् पितामह्यादि साधारण ॥ तथाचयूटस्यान्मातरिपचम्याचतुयापितामन्यो तृतीयायांप्रपितामन्यो द्वितीयायां 7 दापितामन्यमपिचकूटस्य सापियसामियतते ॥ एवगानाणिप्रवरारच सोपणनिदिस्यएनपी मंशपरम्परया अयातरमे देनवहुमुलानिजातानि | तपानवापिप्रदश गोमप्रवरैक्यपिनाम परपजातिमंदा गाउप्रयरया गराचारया परपरागयाधागि योन दियाभवति । तदुश' गविराग-रास्तुदशानुपएलमागणचाव्य हो । यसव्याहाय स्यादात प्र हीयते । यस्मिन्दरायणाचार पारम्पयरमागत । वानपिसम सदाचार उच्यते । त- भृगु - यस्मि शेपुरप्रामविवेनगरेऽपिया । योयत्रविहितीधर्मस्तधमनपिचालया । उक्त व भमसिची-उदया गप्तमा तदभानेनुसप्तमीम् । पचमीनदभाषतु पितृपक्षेभ्ययविधि कर्मकाण्ड रत्नाकर, विवाद परिभाषा। (३५७ ) राप्तमी च तथापीपंचमीच तथैच । एवमुद्वाहयेत्यन्यो नयाप शाकटागन । तृतीयारा तुध्यापक्षयोरुभयारपि । विवाहयन्मगु प्राहपारशियायमाहिरा । यस्तुदेशानुस्पतिकुला चारादाचरन्ति पा साव्यिसकान विवाहीनदापायभपतीनि पूमिम्मति । येनास्यपितरो- यातायनयामा पितामहा । येनयाया सतो मार्गतेनगन्छमनुष्यति । एवं दाक्षिणात्येपु मातुलकन्या परिणयनेऽपि-मातुलस्यमुतामूहया मातृगौनातथेवच । समानप्रवराय त्यस्त्वा चान्द्रायणचरेत । गोत्रान्मातु सरिंडाथ विवाहोगोषधस्तथा। उक्तं च मत्रलिङ्ग- तृप्ताज हुमातुलस्यैययापाभागरते पितृप्वसयीवपामिव । १ यादिमातुलकन्यापरिणयनस्य निषेधत्वादपियपाकुल मातुलान्यापरिणया गुगतस्लपा दापायनभवति । परपरारहितानातु दोषाय भवति । अथवाग्दानाय बन्यादातार:- -पिता पितामहा भ्राता सकुन्याजननी तथा! कन्याप्रद पूर्वनाशेप्रकृतिस्थ पर पर । अप्रयच्छ समानाति भ्रूणहत्यामृतामृता । गम्यत्वभावदातृणा याउया स्वयवरम् । नारदोऽपि- तस्यामप्रकृतिस्थायां कान्यादा स्वजातय । यदातुनव कश्चित्सा कन्या रानानमावजेत् । गन्धर्वादिप्यपिपतिभावान पधादामादि सप्तपदीपर्य-तकार्यम् । गांधर्वामुरपैशाचा विवाह। राक्षसञ्चय । पूर्वपरिग्रहस्तपु पश्चाद्धामा विधीयत । होमाद्यविवरान्तराय देयासेतिबाधा यनमाह-चलादपहता कन्यामत्रेयदिन सस्कृता । श्रन्यस्मविधिवद्देया यथान्यातवसा । इति गदाधरभाष्य परिशिष्ठात् अयवाक्दानविधि विवाहादि क्रियामाल तकिया सिद्धिकारणम् य प्रयन्यति वमन सोऽश्वमधफललभा । इति चोकत्वा-नव्यट्ग पतिन पल अशदोपविवर्जित । इमा यो प्रदास्यामि म्याग्निद्विजनिधी । चाचादतामयाकन्या पुनाथै स्वीकृतात्वया । कन्यावलोक नविधै निश्चितत्वमुखोमव । वरपिताच बृयाा याचादत्ता ॥ त्वया कन्या पुत्रार्य स्वीकृतामया । वरावलोकनधियी निश्चितत्व मुसीभर । श्रयच वाग्दनी त्तर वामरणे विशेष अभिवांचा च दत्ताया म्रियेतोवरोयदि । नवमीपनौतास्या स्कुमारी पितुरेवासा । वशिष्ठ - कुलशील वेहोस्य पडादिपतितस्य च । अपस्मारि विधर्मस्य रोगिण व धारिणाम् । दत्तामपिहरेपन्यास गोत्रोदातथरच । अथातो विवाहाथ मधुपर्क सूत्रव्याव्या-(पडा भरति १ ) परपुरपा अध्याभवन्ति अर्याहाँभवन्ती तिशेष । पूजनीयाइ यथ । त-~ - (आचार्य विग्देवाह्यो राजामिय स्नातक इति २) तानाह-प्राचार्य उपनयनपूर्यषवेदाध्यापक } मृत्विग धौतस्मातादिकमर्थितो ब्रह्मादि । वैचाबाजामाता। राजाअभिपेकादिगुणपान् प्रजापालनेऽधिकृत , क्षत्रिय. प्रिय उत्कृष्ट जा निको समानताति गावा! स्नानको मह्मचाया समाश्त । आचार्यस्यैवाध्याना यस्य । उक्त (३५८) ककाग दाकरे, वियाह परिभाषा। . च मनुना। संप्रतीत स्वधर्मण प्रादायहरं पितुः सगि नयागानमनगप्रथमंगना । (प्रति. संवत्मगनईयेयु.३) प्रतिमयमरागतानेतानाचायादीन अपंगापूजयेगुनाया । (यहम- मणास्त्वृत्विजः४) यच्यमाशायरियन्तीयजमानाः, पाराजीयाज मान्नुपुनः महमयु वजपंगानप्रति मंयन्सर नियमः । (मामनमाहाह माधुभवानास्तामचेयिप्यामी भवन्तमिति ५) थागर्नयारणादिदारमयपीटारि श्रादाय यनुनीरानाध्य थानोतिर किमिति । एवं । कथंगापूज्य. गाभुगुगंयधामपति तथास्तानिया पूजयि यानी भयन्तम नोर्ययावत अयिष्याम इति बहुपचन गरिपारापरम सत्रया अहंनागमति गर्न गृयाय पं तत्र चटयान्न Vi: ॥ ( माहरन्तियिटर पांच पादार्थ मुदकमर्धमाचमनीयं मधुपयर्फ दधिमधु घृतमपिहित कास्य का स्ये)-- पाहत पानया यजमान पुरुषाः विटादि मधुपर्क पर्यन्ताम्यहंगो पकरणानि ॥ तन विष्टरं पशिति दर्भनरुणमयं साममनन्तं पचंम् ।। पंच विंशति दाणा घेण्यमे ग्रंथिभूपिता ॥ पिटर राय यजपु लक्षणं परिकीर्तिताः । ति हरि मादश मानं निवृत्तं कौशवा बारानिर्मित मिनि रेगुरुः ॥ पंचाशद्धिर्भयद ब्रह्मा तदधनतु विष्टरः ॥ ति परि शिष्टात ॥ पायं पद यामाक्रमणीय मुक्तलक्षणं द्वितीयपिष्ठरम् ।। पादार्थमुदवं पादप्रक्षालनार्थ ताम्रादिपात्रस्य॑जलंमुखीप्यम् ॥ अगन्धपुष्पाक्षतपुरातिलशुन सर्पपदधिन्वितंमुवर्णादिपानस्थं तदभाशंग्यस्थवाजलम् । आचमन यमाचमनार्थ कमण्डलु सम्भृतं जलम् । मधुपकेदधिमधुघृतंकास्यपात्रेकृसम् । अपरंणाम्यपानेणाच्छादितम् । मधु पदध्यलाभ पयोजलंबाप्रतिनिधिमध्यलाभेघृतं गुडपिन्याश्वलायन. । (अन्य त्रिरित्रः प्राह विष्टरादीनि ७) अन्यो ऽ चंकादपरः । विष्टरी विष्टरी विष्टरः । इत्येवमेकानि त्रिस्त्रास्त्री न्वारान्यात । पिष्टरादीनिविष्टरप्रभृतीनिपद्यपादादिकाघांचमनीयमधुपान् ॥ (विष्टरंप्रति गृरहाति ८) प्रत्यदमुखेन यजमानेनतिष्टनादतं श्रागनारपश्चिममाटमुसम्निष्टमयः पूषाक्त लक्षणविष्ठरंतृष्णों पाणिभ्यामुदगग्रमादत्ते । (चोस्मिसमानाना मुद्यतामियसूर्यः । इमंतमभितिष्ठामियोमाफश्चाभिदासति । इत्येनमभ्युपविशति ।) वास्मिइति मन्त्रान्तएनविष्टरमुदगग्रमासन निधाया युपविशति ॥ (पादयोरन्यं विष्टरमासीनाय १०) श्रासीनायार्यायान्य विष्टरंय जसान. पूर्ववदानि, राचतंपूर्ववत्मनिगृद्यप्रक्षानियो पादयोरच. स्तात्वःमो 5 स्मीत्यनेनमन्त्रेणनिदधाति ॥ (सव्यं पादप्रक्षाल्यदक्षिणं प्रज्ञालयति ११) ततो न्येनपायमितिनिरुक्तयजमानापित पाद्योदक्मादाय वामंचरणं प्रक्षाल्यइतरं प्र- प्रक्षालयति, क्षत्रियादिरयं ॥ (बाह्मणश्चेद्दक्षिणं प्रथमम् १२) यदि ब्राह्मणोऽय:* ।
कमकाण्ड रखाकरे, विवाह परिमापा। (३५४) स्यात्तदा प्रथमं दक्षिणं प्रक्षाल्य वाम प्रक्षालयति ॥ (विराजोदोहोऽसि विराजो दोहो मशीय मयि पाचार्य विराजो दोह इति १३) बिराजी दोहोसि इत्यावृतेन मंत्रण ॥ (मघं पति गृहाति, श्रापस्थयुप्माभिः सर्वान्कामानवाप्तवानिति १४) तत्तोऽय इत्येतत्रिहत्तो यत्रमानदत्तमम् । पापस्थयुष्माभिरियनेन मैत्रेणप्रति गृहणाति । (निनयन- भिमप्रयतेसमुदयः प्रहिणोमि स्वायोनिमभिगच्छत । अरिष्टास्माविरामा परोसचिमत्पय इति । १५) प्रतिगृहीतमर्घ शिरसाभिवन्द्यनिनयनभूमौ प्रवाहया अभि- मंत्रयते समुद्रयः इति मंत्रेण । अभिमंत्रणं अनामिकाग्रेणस्पर्शनं अवलोकनंया ।। (आचामत्या मागन्यशसा स सृजवर्चसा। तमाकुरुप्रियंप्रजानामधिपतिं पशनामरिष्टिं तनू- नामिति । १६) तत्त आचमनीयमिति निरन्योत यजमानेनदत्तमाचमनीय प्रतिगृत्य, श्रामागन्यशसा इति मंत्रणाचामतिसक प्राश्नातिजलम् । ततः स्मातचिमनंकरोति । एवंस- यंत्र (मित्रस्यत्वा इति मधुपर्क प्रतीक्षते १७। ) ततोमधुपर्क इति निरस्येनोक्ते यजमान हस्तगतमुद्घाटितमधुपर्क मित्रस्यत्वेति मन्त्रेणप्रतीक्षतपश्यति । (देवस्यरवेति प्रतिगृहणाति १८) देवस्यत्या इति मैत्रेण यजमानदत्तं मधुपर्क दक्षिणहस्तेन प्रतिगृह्णाति । (सन्ये पापकृत्वा दक्षिणस्यानामिकयात्रिः प्रयोतिनमः श्यावास्यायानशने यत्त प्राविद तत्त निष्फ्रान्तमिति । १६) तंमधुपर्क वामहऽने निधायदक्षिणस्यपाणे: अनामिकागल्या त्रिपारमालोडयति । नमः । श्यावास्य इति मंत्रेण । (अनामिकागुष्ठेन च त्रिनिरुद- यति २० ) अनामिका च अगुष्टश्च इत्यनमिकागुप्ठौ, श्रनयोः समाहरः अनामिक गुप्टननत्रियार निरुक्षयति पानादयहि निगमयति प्रक्षिपति चकरा प्रतिसंगवर्ननिरुक्षणम् ॥ (तम्यत्रिः प्राश्नाति यन्मधुनौमधन्य परम ७ रूपमन्नाधम् । तेनाहं मधुनो मधयेन परमेणरूपेणानायेन परमो मधव्योन्नादोमानोति । २१) तस्यमधुपर्कस्य एकदेशमा- दाय "यन्मधुनोमधव्यम्., इत्यादिनामंत्रण सकृत्प्राश्य पुनरनेनैव मंत्रेणउच्छिष्ठ एवं द्वितीय प्राश्यतद्वन्मत्रं च्छिष्ठं तृतीयप्राश्नानि । उशिष्टस्यैप मंत्रोच्चारणम्--(ताम्बूले लुफलेचैय भुक्तस्नेहानुलेपने मधुपकंच सोमंच नाच्छिष्ट मनर प्रयोत् । (मधुपनीभिर्वा प्रतचम (२३) मधुवाता इत्यादि तिसृभि ग्भिः प्रत्यूचं प्रतिमनवा पूर्ववस्त्रि: प्राश्नाति ॥ (पुत्रायान्ते वासिनेवोत्तात पासीनायोच्छिएंदधात् ३) मधुपर्कस्य शेषः प्रतिपत्तिमाह-पुत्राय सूनअन्तवासिने उपनयनप्रभृति विद्यायित्वेन प्राचार्यकुलयांसिने शिष्याययाक, भूतायउत्तरत थामीनायउन्ष्टिं प्राशित रोपंमधुपर्कप्रयच्छेत. 1 ( सर्ववा प्राश्नीयात् । २४) अधवास अक्षयेत् (प्राग्बासंचरे निनयेत् । २५ ) यद्वाप्राक्र्वस्यादिशि अमची जनसंचारनजित (३६०) कर्मकाण्ड रत्नाकार, विवाह परिभाषा। देशत्यसैत् । अत्र पूर्वापूासंभपे उतरोतरा प्रतिपत्ति बुयात । प्राचम्य प्राणानसंमृशति 'वाङ्ममात्येनसोः प्राणोऽदोश्चत: कर्णयोः श्रोत्र याहर्षलमूर्यारोजोरिष्टानि मेकरनि तनूस्तन्नामेसहेति २६।) थाचम्यप्राणानिद्रियाणि गमृशतिसगलमालभते । तद्यथा याट्मास्ये इति मुसंकराप्रेण । नमोमप्राण स्तजन्यड गुष्ठाभ्यां युगपचनुपी। वर्णयोर्मधोत्रमस्तु याहोम बलमस्तु,ऊचौम प्रोजोस्त, अरियानिमेशानि, तनस्तन्याम सहसन्तु, इति शिरः प्रभृतीनि पादान्तानि सांगयं गानि उभान्या हस्ताभ्यामालभन अय गवालभनम् माचान्तोदकाय शासमादाय गौरितित्रिः प्राह २७) याचान्नमुदयनरा श्राचान्तोदयः रमरमध्याय शासंखड्ग गृहोन्या यजमान:-गोगामी: शालन्यतामिति माहह्मवाति । ( ततोऽयः प्रत्याह माता रुद्राणां दुहिता वसूना * स्वसादित्यानी ममृतस्प नामिः । प्रनुवोचं चिकितेपु जना मागमनागामदिति बधिष्ठ । ममचा मुप्यच पाप्मान हनो मीति यद्यालभेत ॥ २८ ॥) ततोऽन्यः-माता रुद्राणा मित्यादि वषिष्टेत्यन्तं मंत्रं पठिन्या, मम चामुक शम्भणी यजमानस्यच पाप्मानं होमोति परिति यदि गामालभेत ॥ (अथ यद्युत्सियतेन्मम चामुप्पच पास्मोहत, ४° उत्सृजत तृणान्यविति घूयात् ॥ २६ ॥) अथवा अन्यों यदि गामुन्धु मिच्छत् । तदा मम चामुक शर्मणो यजमानस्य च पाप्माहत! 3. समजत तृणान्यतु इति ब्रूयात इत्यन्त मुन्चै. पठेत् ॥ (नत्वेवामा छ सोधः स्यात् ॥ ३०॥) तु शन्द पतव्यावृतौ । अर्ध. श्रमास परवालम्भयजितो नैवभनेत् । अत्र यद्यालभेत-यद्युसिमक्षेत् इत्यनेन सूत्रेण गवालभस्य बिक्लप विधाय, नत्वेवामा सहः, इत्यनेन गवालंभनमर्घ पाने नियमन विधत्ते, तथाच सति द्वयोः स्मृत्यो विरोधे अप्रामागय प्राप्त व्यवस्था माह--(अधियज्ञमधि विवाहं कुरुतेत्येव ब्रूयात् ॥ ३१ ॥ ) अधियज्ञ यज्ञे थधि विवाह विवादे ।कुरुत विदधत गवालभ पाप्मानं नो मीत्यस्यान्ते इत्येयं वदेत् , अन्यत्र पाप्माहत इति पाप्मान हनीमि, ..इतिवा विकल्पो नान्यत्रेतिभाव । यद्यप्येयं मधुपर्क गवालम्भ श्राचार्य णोक्त स्तथापि अस्वयं- स्वाल्लोक विद्विष्टस्याञ्च कलौ न विधेयः । अस्वयं लोमविद्विष्टं धर्ममप्यारेनतु । इति याज्ञ- वल्क्यादि स्मृतिषु निषेध दर्शनात् ॥ इति हरिहर. ॥ यज्ञाधान गवानभं सन्यास पलपैतृकम् । देवराच मुतोत्पत्ति. कलौ पंच विवर्जयेत् ॥ इति पराशर स्टतेः॥ अतश्च गवालंभस्य कलौ निषिद्धत्या दुत्सर्गस्यच यज्ञ विवाहयो रप्राप्तत्वाद् गौरित्युच्चारणादि यज्ञ बिचायो कली न प्रवर्तते । यज्ञ विवाहयो रन्यत्र तन्सर्ग पक्ष एव कलौ इति गदाधरः । (यद्यप्य सत्सं पत्सरस्य सोमेन यजते कृतार्ष्या एयैनं याजयेयुर्ना कृतार्या इति श्रुतेः ॥ ३२ ॥)
फर्मकाण्ड रत्नाकरे विवादसूत्रव्यारया (३६) यद्यपि असत्पुन पुन: संपरारस्यसंवत्सरेसमिग ज्योतिष्टोमादिनायजेत । तथापिएन सोमयानित कृतमहत्तोऽधायपारी कृताध्यांएवंगन्त । याजगेगुरीशंकारयेयुः नातायां याजगेगुरित धुतानात इति मधुपर्क सूत्र व्याख्या समाता। अथ विवाहसूत्रव्याख्या। अथ विवाहसूत्रव्याख्या (चत्वारः पकया हुतोऽहुत: प्रहुत प्राशित इति 1 ) पच्यतेप्राप्यतेप्रौदनादिफ मस्मिन्नितिपाकोद्याग्नि स्तस्मिन्पा नान्यनेतिभाय' पारयज्ञा पाकयना । यत ---पैवाहियेऽग्नीपुर्यात गार्थकों यथामिभि । पंचयज्ञविधानं च पर्कि चान्वाहिकोग्रह) । इति मनुनादैनंदिनपाको मृत्यगौम्यते । तेचत्यारशतुविधाभवन्तिपथम् - हुतोऽहुत महत्त प्राशिन इनि । तबहुत होगमात्रम, यथासायंप्रातहीमः । बहुत होमय- लिरहितं कर्म, यथा सस्तरारोहणा, प्रहत यत्रहोमोपलिम महणंच, यथा पनातिकर्म । प्राशित यन्नप्राशनमानम्, नहामीपलि , मया-~ गर्यासांग पयसिपायसनपणानन्तरं ब्राहाणा भोजनम, इति चतुर्तिया ॥ (पंचसुवहि शालायां विव र चूडाकरण उपनयने केशाने सीमन्तोन्नयने इति 1) पंचगुसंस्कारसममु पहिः शालायागृहादहि मंडपावति तस्याम्मे भवति । यथा पिसाहे डापरणे उपनयने प्रत्तचंधवेशान्ते गोदानकर्मणि सोमन्तीमय ने गर्भनं. स्कार । एतेषुपचमुबह शालायामनुष्ठानम् । अन्यत्रगृहान्तरे मुराशालायामेय । मंटपश्च मुहर्तवितामण -हस्तो गयावेदहस्तै समन्तानल्गावेदो सद्मनोपामभागे । युग्मे घसेपाट- है नेच पंचरानाद स्यान्मंडपोद्वासनंसत । विवाहपटले--मंगलेपुच सर्वपुमंटपा गृर पामत कार्य पोटशहस्तोवा द्विपढहरतोदशामिति । स्तम्भधतुभिरेवाग्वेदी मध्ये प्रतिष्ठिना । शोभिता चिनिताकुम्भैरासमन्ताश्चतुर्दिशम । द्वारविद्धावली विद्याम्पक्षव्यधास्तथा न कार्यादिरात. शुभमंगला ममु । प्रतवन्ये संस्कार्यत्यादयटुक् हस्तेनवेदीनिमिति' । विवाहेतु कन्यागृहे एप घरपूजनस्योकत्वाद् गृहस्थाश्रमस्य तदायत्तत्याच कन्याहस्तेनैवेदीनिर्मिति. । उक्त च वशिप्टेन-~-घोडश रनिकाकुयाच्चतुद्वारोपशोभिताम् । मडपंतोरणैर्युक्तं तत्रवेदीप्रकल्पयेत् । अष्टहस्तंच रचयेन्मंडपंया द्विपदारम् । उत्तम. पोडशस्तो मध्यमोद्वादशहस्तो ऽ उत्तच नारदेन--समां तथा' चतुर्दिासोपाने रतिशोभिताम् । पाउदरप्रणा रम्भस्तंभहंसशुमादिभि । एवंविधामाररोन्मिने साग्निदिवाम । वेदोषमुस्लिाते च चतुविशाट गुल युता । वदीवाहिको मायर्या चतुरंगुलमुन्तिा । प्रमोड हस्त (३६२) कर्मकाण्ड रानाकरे, विवाहसूत्रव्यारया ताशदोनच लिप्यतनध्याविधवेत्रियो । पतिपुत्रपती नारोगवतामुपलेपयत । मंडप प्रतिष्ठानिधिः रेणुकारिफायाम-मंडपस्थापनं कुर्यात्स्यस्तिवाचनपूर्वकम् । चतुरी ब्राह्मण स्तन पूजयेद्दक्षिणादिभि. नंदिनीनलिनीमैनाउमा च पशुपतिनो । मंडपस्थापनेयोज्याः स्त. म्भेमात्रा. प्रकातिताः । विवाहोत्तरं मंडपोद्वासनं देवकोत्थापनं चाहनारद:-- -समंतुदिवस कुर्याद्देवकोत्थापनंयुधः । पठंचविषम नेमुवत्या पंचमसप्तमौ । समेषुषटंविषमेपुच पंचम राप्तमव्यतिरिकं दिन नेष्ठमित्यर्थः । ( उपलिप्त उद्धतापोलितेऽग्निमुपसमाधाय ।। उपलिप्ते गोमयोदवेन, उद्धतेस्पेनउल्लिखितेनेति तिमभिः रेखाभिः अयोक्षिते उदवेनाभ्युक्षिते पहि. शालाग्रहयो रन्यतरस्मिन्प्रदेशे अग्निमुपसमाधाय । अग्निलौकिकमावसथ्यं पा उपसमा- धाय स्थापयित्वा । अयंच लेपनादि विधिनापूर्व. अपितुपरिसमुह्य ( पा० गृ• कां० १ ० १ सू०२ ) इत्यादि पूर्वोत्तस्यैषानुपाद तत थानानुक्तमपि परिममूहनमुद्धरणश्च सर्वप्रभवति । (एप एव विधि र्यप्रक्वचिद्धोम.) (पा० गृ० यां० १ ० १ सू० ५ ) इति यच. नात् । (निर्मथ्यमेके विवाहे । विवाह इति दारपरिग्रह कर्मणोनामधेयम् । एकेश्राचार्या: मियाहे पाणिग्रहणे निर्मन्थ्यम् श्रारणेयाग्नि वैवाहिय होमाविकरणमिच्छन्ति, अन्येलौकिकमि- छन्ति । (उदगयतकापर्यमाण पक्षेपुण्याहे 11 ) ( कुमार्याः पाणिगृहणीयात् ॥६॥ उदगयनेमकरादिग्गशिषट्कस्थितेरवौ श्रापूर्य माणपपक्षे शुवलपुण्याहे ज्योतिः शास्त्रोक्तविष्ठ्या• दिदोषरहितकुमायाँ अनन्यपूर्विकायाः कन्याया• अक्षतयोन्या विवाहात्पूर्व अधपितायाः । नतु विवाहोत्तर पतिमरणापेक्षया' अक्षतयोन्याः विधवाया । वक्षमाणविधिना विवाहंकुयात् । विशतिप्रसूतास्त्रीप्युदासार्थ कुमारीग्रहणं स्मयतेहि तस्या पुनर्विवाह. पत्यासह भवतीति नत्यन्येनपुरर्पण सह पुनर्विवाह. । उदगयन श्रापूर्यमाणपक्षे पुण्याई इत्युक्तत्वात्कालप्रसंगाच्च स्मृत्यंतरीक्त संवत्सरादि पन्या विवाहकालोऽनिरूप्यते तत्र ज्योतिर्निवन्धे-पदन्दमध्ये नौदयाह्या कन्यावर्षद्वयंयत. । सोमोभुक्तततस्तदवद्गन्धर्यश्च तथानल । तथायम-सप्तस वत्सरादूलविवाह. सार्ववणिक. । कन्याया शस्यतेराजनान्यथाधर्मगर्हितः । तत्रयुग्मायुग्मवर्ष- विचारः राजमार्तण्डे-युग्मेदुभंगानारी युग्मेतु विधवा भवेत् । तस्माद् गभान्विते युग्मे विवाहेसा पतिव्रता । मासत्रयादूर्वमयुग्मवर्षे युग्मेऽपिमासत्रयमेवयावत् ! विवाहशुद्धिं प्रयद- न्तिसन्तो पारस्यादय स्त्री जनिजन्यमासीत् । न्याविवाहकालमाह-अष्टवाभवेद्गौरी नववर्षातुरोहिणी । दशावभवेत्स्न्या अत ऊर्वरजस्वला । दशमेनाग्निका चा स्याद्वादशे हपल स्मृता । अपरावृपलोइया कुमारीयारजस्वला । प्राप्तेतु द्वादशेवर्षेय. कन्यांनप्रयच्छति । मामिमासिरजस्तस्याः पितापियतिशोणितम् । तस्मादुद्याहयेत्कन्या यावतुमतीभवेत् । प्रदान कर्मकाण्ड रवाकरे, विवाह सूत्रन्याख्या ( ३६३) प्रागृतोरस्तस्या ऊधकुर्वन्सदाभार । चरिफगुणभायो मुद्वनिगुण स्वयम् निशदवा दशब्दाच भार्याविन्दतिनाग्निकाम् | यसोधाता पितामाता दृष्टवान्यारजालाम् । ह्मपतिय जयस्तेनरकयान्ति स्वयमिलनवोद्याम यस्ताविवाहयपन्या ग्राह्मणो मदमाहित समाग्यो सविप्रोवस्तापति गृपली सग्रहीतायो, हामणोमदमाहित सत्ततरातकतस्य ब्रह्माहत्यादिनदिने पिनुगृहे तुयाल्यारज पश्यत्ययस्थता । भ्रूणहतापि नुस्तास्या सामन्यापलीस्मृता दद्याद गुणरते कन्या नग्निा ब्रह्मचारिणीम् । अपिवा गुणहीनाय नोपरन्ध्याद सम्वलाम । च्छुभानराणामुभयोश्चदशिशुद्धितोषिकाह पटुकन्याजन्मराशे स्त्रिकोणायद्विसप्तग । श्रेष्ट गुरु सपदमायेपूनयान्य भनिदित ॥ यदाहगुर -मीगुरुवलनेय विवाह शोभनस्मृत परस्यायलमायणे दयन्तभयोरपि । देवल -~नया मजाधनपतीविधयाकुशीला, युनावित। हतधवासुभगाविपुत्रा । स्वामिप्रियाविगतपुत्रधयाधनामा भवरसुरगुरौक्रमशोभितम ॥ गर्ग. जामनिदशमारिस्थ पूजयाशुभतोगुर । विवाह 5 बचतुयापद्वादशस्थोमृतिप्रद ॥ अस्याप- बाद -सर्वनापिशुभदद्याद् द्वादशाव्दात्परगुर । पञ्चषष्ठान्दयोरप शुभगाचरतागता ॥ रजस्वल प्रतिविशेषमाह-रजस्वल या न्याया गुरुशुध्दिनचिन्तयत् । अष्टमऽपिक तव्यो वियाह स्त्रिगुणाचनात् ॥ अगुवक्लिंगौरया रोहिरयर्कयलास्मृता । कन्याचन्द्रपलाना कृपलीलग्नतोवला । वृषलीरजोरतीकन्या ॥ वृहस्पति ~पचापकुलोरस्थो जीतो ऽ प्य शुभगौचर । अतिशोभनतांदयाद्विवाहोपनयादिषु ॥ शय गुधादित्यादिफलमाह---गुया दिरयेव्यतीपात पक्रातीचारगेगुरौ । नटेशशिनिशचा बालकृष्देधवागुरौ ।। पौग्येचने थप सुशरधिकमासके । पतूदगमनिरशे 5 क सिंहस्थ ऽ मरमन्त्रिणि । विवाहमतयामादिपुनहऱ्या गृहादिकम् । क्षौरविद्यापविद्यांचयनत परिवर्जयेत् ॥ लह-अतिचारगतोगावस्तराशिनति येत्पुन । लुप्तसम्बत्सरोय सर्वकर्मवहिष्कृत ॥ मुहतचिन्तामणी- गोमात्यकुम्भेतरगा। चारगी नीपूर्वराशिगुरुरेतियफत । तदाविलुप्ताब्दइहातिनिन्दित शुभेपुरेवासुरनिम्नगातरे ॥ अतिचारगतेगुरौतुवयांदीन्याहवशिष्ठ ---अतिचारगसैनीववर्जयत्तदनन्तरम् । विवाहा- दिपुकार्यपु अष्टाविंशतिभासरान् । अयसिंहमकरस्थगुरुनिर्णय --मुहतचिन्तामणी- सिंहगुरौसिंहलोविराहामष्ट • 11 मद्यादि० ॥ मषे ऽ सद०॥ रेसापूर्व. ॥ उक्तंचज्योतिनि. चये राममार्तरापिच-~~-सिंहगौतुसिंहाशयदाभवतियापति । सर्वदेशेवयत्याग्यो दम्पायी निवननद ॥ निशेपमाहवशिष्ठ -सिंहेसिंहाशा नीव कलिंगेगाडगुणरे । कालमृत्युरययोगो दम्पत्यानिधनप्रद ॥ देशविभागमाहवशिष्ठ -विवाहोदक्षिणेकूले गोतम्यानेतरप्रतु । भागी रभ्युत्तरेकूले गौतम्यादसिणेतथा ॥ विवाहोनतवरपथ सिंहस्थेऽयनयति । मृगन्द्रसस्थिते कर्मकारंड रत्नाकर, विवाह सूत्रव्याख्या (३६४) - --प्रायः और मध्यदेशंकरप्रहः ।। मृत्युयोगोमृत्युदः रयाईपत्योः पञ्चवर्धतः । अत्रमागीरथीगौतभ्यो मध्यप्रदेशे, ज्योतिर्निवन्य-सिहगतेसुरमन्त्रिाणिकन्या मेंपगतेतपनेपरिणीता । भूपणरत्न युतायशुशीला, सत्यवती,सुतकीर्तिममता ॥ मकरस्थगुरुनिणय:-तदुक्तंतलन-नर्मदा पूर्वमागे तुशोरणस्योत्तरदक्षिणे । गण्डक्या पश्चिमभागे मकरस्थोनदोषभाय ।। अर्थादन्यदेशेषु निषिद्धः ।। उक्तञ्चदैवज्ञमनोहर- मागवेगौड़देशेच सिन्धुदेशेचकोकणे । तं चूडाविवाहंच वर्जयेन्मकरंगुरौ ॥ व्यवहारचण्डेश्वरेतुविशेपः--नीचराशिगतोजीवः प्रशस्तःसर्वकर्मम् । नौवांशकगतरत्याज्यो यस्मादशेपुनीचता । वामनपुराणे--यापीकूपतढागादिनिषिद सिंही गुरी । मकरस्थे ऽ पितत्कायनदीपः काललोपत. ॥ काललोपोकालनिगेषः महहनास्ति, निपेच पारयस्यदेशपरत्वादशपरत्वाच्चेतिभायः । सर्वत्रगुरुवलाभाशौनकोला: शान्ति:कायो, साचमया प्रयोगलेसनोया, दानशान्तिपरिशिछेदृष्टव्या ॥ श्रयविवाहमासाःमुहतचिन्तामणौ--मिथुन कुम्भमृगालिपाजगंमिथुनगे s पिरवौत्रिलवेशुचे: । अलिमृगाजगतेकरपोट भवति कातिकपोष मपुप्पपि ।। मिथुनेस्थितेसूर्य पिशुचेरापाढस्यनिलीत नितीयाशे यापाइशशापतिपदारभ्य दशमीपर्यन्तंकरपौडनविवाहोमपति तदुक्तंकरावाण पःसौरमानमिविवाहे तकियान्द्रमानमाहु भलेन । तस्मात्सम्यक्तत्फलाप्तिस्तदेश्ये सौरोमास केवल.किचिदूनः ॥ कश्यपादिभि.मौराएवमासारता' तपांचप्राशस्त्यमुविवाहादौस्भृतःसौरोयज्ञादीसावनोमत. । नारद.-- माघ-फाल्गुन, वैशाख, जेष्टमामाः शुभावहाः ॥ कातिकोमागशीपश्च माध्यमानिन्दि- ताप | पीप 5 पिकुर्यात्मकस्थिते ऽ के चैप्रेभन्मेपगतोयाम्यात । प्रशस्तमापादकृतं हिरावदन्तिगगा मिथुरस्थिते ऽ के ॥ मार्गमासितथायटेचौरंपरिणयंमत्तम् । ज्येष्ठपुत्रदुहित्रो स्तुयत्नेनपरिवर्जयेत् ॥ जन्मासजन्मदिनवयंमतप्रकाश-जन्मजन्मदिवसेजन्ममारी शुभन्यजन ॥ राजमार्तडे- जातदिनंदूपय नेवशिष्ठोष्टीचगगानियतंदशात्रि. । जातश्चपदं पिसभागुरिधशेपा प्रशस्ता: सलुजन्ममासि ॥ जन्ममामतिथौभेच विपरीतदलसति । कार्य गजमिन्याहुगर्गभार्गवशीयाः ॥ परोसरस्मृत विशेष:-ज्येहस्यज्येष्ठकन्याया: विवाह मरास्यते । तयोरन्यत्तरेग्मयप्पोमास.प्रशस्यते ॥ द्वौ श्येष्ठीमयमोप्रोक्ताशुभावहम् अयनयनयुबनिनियागपंगम्मतम ॥ (निपुरिपुतगदिपु ॥७॥ ) (स्वातीमृगशिरसि रोहिगार ) नक्षनियममाहमूत्रमार:- उत्तराप्रादिधपातान्युत्तरादानिने कतिपु Irfry । तथागि-~-उत्तराफाल्गुनीहस्तचिनाइतिनोणि । उत्तरापाड प्रयणनिधातियोगि। उत्तराभ पदारेवत्यस्चिन्यइतित्राएि । स्वातीमृगशिरसिरोहियाका । एघांनयनामन्यत में . उत्तानातचिन्तामणी- निबंध:शशिरमूलमैन्यपियनामया योत्सरपरमेशुभी कर्मकाण्ड रखाकरे, विवादसूत्रन्याया (३६५) विवाहः । रिक्तामपहिततिथौशुभद्विवैश्नप्रात्यांनिश्रुतितिथिभागती 5 भिजित्स्यात् ॥ तिथि पायमाहवशिष्टः--शुलद्वितीयादित एपकृष्णेपत्तेदशम्यन्तगताः प्रशस्ता:वारा:प्रशस्ता: शुभग्वे चराणा सूर्या किंवा खलुमध्यमौतौ ॥ त्याभ्यःसदाभूमिमुत्तस्यवारः कामातिथ्यौरपिता प्रदोषी । वेधमाइनारदः-तीयपयोगा: पचरेग्वेद्वेद्वेचकोणयोः । द्वितीयशम्भुकोणे । ग्निधिपायंचकेचविन्यमेत ॥ भान्यतः साभिजित्येकरेसाकाणेच विद्धभम् । परशलाकाचके एक रेगास्थितेनविद्धम् ॥ रविंदसर्यधिशायविवर्यसौम्यैर्थिदं नासिलदोषएप ।। कुराकान्तादि ननदोपमाहसापवादम--ऋक्षाणिकूरविदागिर मुक्तादिकानिच । भुक्त्वारचन्द्रेणमुक्तानि शुभाहणिप्रचक्षते । उक्तंचनारदेन-ग्रहणात्यात त्याज्यं मझलेपुनातुनयम । यापचर रिणा भुकवा भुक्ततद्दम्बकाप्टयन् ॥ लतादीपमाह-~-राहुपूणेन्दुमिता:स्वपृष्ठभंसप्तगोजातिशरै मितहि । संलत्यंते करानीयभीमा: स्याप्टसकाग्निमितंपुरस्तात् ॥ पातदोपमाह- हर्पण वैधति साव्य व्यतीपात गएउशूलयोगानाम् । श्रले यनक्षत्रं पातेन निपातितं स्यात् । राजमार्तण्डे-राहुग्रस्ते तथा युद्धे पितृणां प्राणमंशये । अतिप्रोदा च या कन्या चन्द्रलग्न- क्लेन ॥ यद्वा तदा सुरादि विवाह विषयम् । तथा च गृह्य परिशिष्ठे-धय॑षु विवाहेपु कालपरीक्षणम्, नाधर्मपु ] नारद... यात्राया शुभकार्यपु घातचन्द्र विवर्जयेत् ।। ज्योतिनियन्त्र--विवाह चौलग्रतवन्धयशे महाभिषेके च तथैव राज्ञाम् । सीमन्तयानामु तथैव जाते नचिन्तनीयः खलुघानचन्द्र. ॥ अकालवृष्टि लल्लेनोक्तम्-पोषादिचतुरोमा- सान् प्रोक्तावृष्टिरकालजा । निघनिक्षिति चलने ग्रहयुद्धेराहुदर्शने चैव ॥ पापंचदिनात्कन्या परिणीता नाशमुपयाति । उल्कापातेन्द्रचाप प्रवलधनरजोधूमनिर्धातविष्ठिप्रलदीपादिषु सकलयुधस्याज्यमकरानम् ॥ दुस्वप्ने दुनिमिते घशुभतरदशे दुर्मनीमान्तयुद्धौ, चौले- मोजोनिवनवे परिणयनविधौ सर्पदा त्याजमेव ॥ संक्रान्तिदीपमाह ज्योतिःप्रकाशे- अर्वाक शोडशनाप संकान्ते पुण्यदापरतः । उपनयन प्रतयात्रा परिणयनादाविवर्यास्ता:॥ गर्ग:--दिग्दाहे दिन में कंचगृहे सप्तदिनानि च । पजपाते चैकदिनं वर्जयेत्सर्वकर्मसु ॥ दर्श- नादर्शनादाहुवेत्वोः सप्तदिनं त्यजेन । यावत्केतद्गमस्तावदशुभः समयोभवेत् ॥ अद्भुत. सागरे अस्यारवादमाह-प्रथयदि दिवसमयमध्ये मृदुपानीयं यदा भवति। उत्पातदोप- शमनं तदैवंश प्रादुराचायाः सम्बन्धतत्वेच भूकम्पादेनदोषोऽस्ति दृद्विभाध्दे कृतमति ॥ श्रथातः प्रतिकूलादिनिए यमाह-मेवातिथि:-वधूवरा घटिते सुनिथिते वरस्यगेहे. प्यथान्य काया. । मृत्युर्यदिस्यान्मगुजत्यकस्यचिरादानकार्य सलुमंगलंबुधैः । मंगलविवाह हरिचन्द्रिकायाम् ---तुनिधोपचागृत्युभ ति स्थगिा। तदानी मंगल कार्यकारी (३६६) विधाकमकाएर रताकरे, सूत्र व्याया। - वैधव्यदं भुवम् ॥ भृगु -वाग्दानानन्तरं यत्र कुलया. कस्यनिन्मृतिः। तदोदाहीनवशायः सांशायदोपत ॥शीनर:-परमयोः पितामाता पितृभ्यश्च सहोदरः। एनेपां प्रति- कूलं हि महाविघ्नप्रद भयेत ॥ पितापितामहरचय माता पितामही । पितृन्य स्त्रीमुताधाता भगिनीचाविवाहिता ॥ एभिरनविपनश्च प्रतिकूलं युधै स्मृतम् । अन्यरपि विपन्नस्तु केचिदू- चुनत दूर्भत ॥ स्मृतिरतावल्याम्-पितुरन्दमशौचस्यात्तदर्धमातुरपय । मासनयंतु भाया- यास्तदध भातृपुषयोः ॥ अन्यपातु सपिडानामाशीचं मागमीरितम् । तदन्ने शान्ति कृपा ततोलग्नविधीयते ॥ ज्योति प्रकाशे प्रति लऽपि क्तव्यो विवाहोमागतः पर । शान्ति विधायगादत्वा वाग्दानादिचरेत्पुन ॥ शान्तिरत्नेधिनायवशान्ति । तथाचमेधातिथि.- संकटे समनुप्राप्ते याज्ञवल्वेन योगिना । शान्तिहत्ता गणेशस्य फरया तांशुभमाचरेत् ॥ ज्योति सागरेऽपि--दुभिक्षराष्ट्रभंग च पित्रोताप्राणसंसये । प्रोदायामपि कन्यायां नानुकूल्यं प्रतीक्ष्यते । मेधातिथि -पुरुषप्रयपर्यन्त प्रतिकूलं स्वगोनिमाम् । प्रयेशनिर्गमस्तद्वत्तथा मुन्डनमंडन । प्रेतकर्मागय निर्वर्य चरना युदयक्रियाम् । श्रावनुतत पुसि पचये शुभर्द- भवेत् ।। मासिकविषये शाट्यायनि-प्रेतश्राद्धानि सर्वाणि सपिंडापरणं तथा । अप- कृप्यापि कुर्वीत कर्तुनान्दोमुद्विज ॥ मामिक कुम्भदानानि चापकृष्येति कृरया ततो नान्दी- प्राध्दं कुर्यात् ॥ वृध्यभावे अपकपदोपमाहोशना:-वृद्धिश्राद्धविहीनस्तूप्रेतश्रादानियश्वरेत सभ्राद्धीनर घोरपितृनि सहमजति । अत्रविशेष-श्रथ माता पिता पितृव्यश्च सहोदरश्च पितामहरचय पितामहीच पितृव्यपत्नी मुतवान्धवश्च । अनूदित स्व सृतरोऽपि कश्चिन्मृती महाविघ्नकरोभवेत्स । संवत्सरानन्तरमंयकार्याजातवियाह प्रतिकूलवेतु । पितुर्जनन्या स्व- सस्यमातु धातु मुतस्येतरगोत्रजस्य । वर्षतदर्धमाधैक्माम क्रमशश्चमासम् । हिरवागणेस्यच शान्तिमादीकृत्वा विवाह प्रक्रो तयद्वा । ततापिष्ठे समुपस्थितेतु मासोत्तरशान्तिपुर सरंच । करोतुलग्नदयराष्ट्रभगे पिनोमते कालउपागतेच । कन्यातिकाले समुपस्थितैयासुतासपिण्डीकरणो तरंतत् । लग्नमितिशेष शान्तिस्तुसर्वत्र सगीनिणान्तु त्रिपृरुपान्तं प्रतिकूल मेत्तत । अथ मंग. लेमातरजसि -~-वधावरस्यवा मातूरजोदोसे झुपस्थित विवाहोनैवकर्तव्या प्रतवन्वेसमीति- तम् । प्रारम्भात्प्राविवाहस्य यदिमाता रजस्वला । निवृतिस्तस्यकर्तव्या सहत्वश्रुति चोदनात् । विवाहबत चूडासु माता यदि रजस्वला तदानमगतमायशुभेप्मुभि । मेधातिथि -चौलच व्रतवन्धेच विवाहेयज्ञकर्मणि भारिजस्वला यस्य प्रायस्तस्यनशोभनम् । गृहस्पति वैधव्यय वियाहेस्याज्जडत्वं व्रतवन्धने । चूदायाच शिशामृत्यु विध्नयानाप्रवेशयो श्राभ्युदयिक भादोत्तएतु कपर्दिकारिकासु विशेष - सूतिकोदयययो शुद्धय गादद्याम्दोमपूर्वक्म प्राप्ने मकारहरताकरे विवाहस्त्रध्यारण्या ( ३६७) ++ । - कमणि शुद्धिः स्यादितरस्मित्रशुद्धति ॥ बालभेमुमुहूर्तस्य रजोदपिग गंगी । प्रियंसम्पूण्य तत्वयां पाणिग्रहणमंगलम् । हैमीमापमितांपा श्रीशुफविधिनायेत. प्रात्युच पायसहुत्या अभिषफसमाचरेन । इति मथ कन्या विवाहकालेऋतुमतीचेत्तत्र यशपायें-पिपाहे विततेतंने होमकालेउपस्थिते । कन्यामृतुमती दृष्ट्राय कर्कुचन्तियाशिका: स्नापयिस्पातुर्ता कन्यामर्चयित्वा यथाविधिः । युंजानामाहुतिंदत्वा ततः कर्मणियोजियेत् । युंजानः प्रथमम् । इत्पनेनमंणाहुति हुत्वेत्यर्थः प्रथया-पिताप्रातःस्वपुत्र्यास्तुगणयेदादित: सुधीः । दद्यात- दृतुसंख्यागाः शत: कन्या पिता यदि । दातव्येकानिनिः स्वेनदानेतरयथा विधि ॥ अथ विवाहे श्राशौचनिर्णय:--विधिवत्कृतकन्यावरणे निरामादि मतसमाप्तिपर्यन्तम्, मध्ये श्राशीच प्राप्तीतदपोद्यराद्यः शौचचन्द्रिकाकार माह--दाने विवाहेयजेच संग्रामे देशविप्लये प्रापयपिच काहायोसद्यः शौचविधीयतेदातुरम्यन्यायाश्चसधः शौचमाहहस्पति:- विवाहीत्सवयज्ञेषु वन्तरामृतशतके । पूर्वसंकल्पितापुनदोषः परिकीर्तितः । पत्रिंशन्मते- व्रतयज्ञविवाहपुश्राध्दे होमेऽर्चनेजपे । पारस्येसूतकनस्यादनारव्येतुं सूतकम । प्रारम्भश्चते नेवोक्ता-प्रारम्भोवरणयज्ञे संकल्पो प्रतसनयो: नान्दोमुरा विवाहादौ भाद्धे पाकपरिक्रिया। परणमितिमधुपर्कपरम उक्त च ब्राहो-गृहीतमधुपर्कष्य यजमानाच्च प्रपिजः पश्चादशौच पति तेनभवेदिति निश्चयः मधुपकात्तु पूर्वभवत्येव । इति रामांडारभाप्ये नान्दीमुखरिधि श्चापश्यकत्वेअधिकउक्त: एकविंशत्यहयज्ञे निचाहेदशवासरा: विषट्चौलोपनयने नान्दीधाद विधीयते नान्दीभादमिदं चोद्वाहे पिता पर्यात् द्वितीयादौ एच तथा च स्मृतौ-~-नान्दीधाई पिता कुर्यादाये पाणिग्रहे पुनः अतऊन प्रकुरीत स्वयमेवतु नान्दिकम् ॥ पितुरभारेअसंस्कृतास्तु संस्कायर्या भ्रातृभिः पूर्वसंस्कृतः ।। कन्यागृहे-इत्थं वधूपिता कृत्योद्वाहारम्भनिमित्तकम् । नान्दीधाध्दं त्रयंकुया- तस्मिनहनिमयत. ॥ “तिस्त्रोवाहाणस्य वर्णानुपूर्येण ) (राजन्यस्य ॥१०॥ (एकावैश्यस्य ॥११॥) ब्राह्मणस्य द्विजाग्यस्य वर्णानुपूर्वण वर्णक्रमेण तिस्त्र:- ब्राह्मणी, क्षक्षिया, वैश्या, विचाद्या भवन्ति । ट्रेक्षत्रिय पैश्य राजनस्य वियाह्ये भवतः। एकावैश्यर विवाह्या भवति ॥ वर्णानुपूर्यग्रहणात् प्युत्कमोनिपिदः ॥ (सवें पाशुद्राध्येके मन्त्र वज्यम् ॥१२॥ ) ब्राह्मणक्षत्रियविशां शुद्राप्यके विवाद्यो मन्यन्न । तत्रविशेष: मन्त्रमय मंत्ररहितं यथा भवति तथा । अनविजातीनामपि शहापरिणयने प्राचार्यण मंत्र कया निषेधात् । श्रतः-शदस्य शदापरिणयने मंत्रवक्रियानास्ति किन्तु भंवरहितंक्रियामात्र- मितिगम्यते । ततश्च शब्दस्य शुद्रापरिणयने यन्मज्ञापन्दोमादि कर्मकुर्वन्ति तदशास्त्रीयम् । वर , (३६८) कर्मकाण्ड रत्नाकारे, विवाह सत्रधारया। एपेन मन्यन्ते शुदाविपारम् । युत-शद्रायाधर्मनायपाधिकारात । तोगापिकार इनिचे - रामारमणायौपयन्त न धर्माय, कृष्णजातीया । इतिनिरक्तवार यारराचार्यवचनान। तोरसणार्थ भद्रापरि रानपक्ष ॥ एगगति पगमागदीक्षागतम् । मिरित्याप्रमा नरामामुपेयार ॥ी निर उपपद्यों। प्रातहि प्रतिपेनिषेध । यदि रामागास्यादा अग्निचित कथ तत् प्रथमगमन प्रतिपिध्यते । तम्मा द्रापरिणयन भोगार्थमि दया दुर्गती न शास्त्रातिनम ॥ धर्मप्रजारवाहि रियाद । प्रत्युवाहादिनिर्णय -कन्याद्वग्नाचराय- दद्याद्वानो योश्चापि न कन्यये है । कार्य तथैवोदय हर्गमिथा नक्दा मु उगस्टूयस्या। यथा रामदत्त मुताहरिदत्त पुनाय दीय।। हरिदत्तमुता रामदत्पुनाय दीयते । पमिया विवाह सर्ववणानामशुभप्रदो भवति ॥ अथेनवास परिधापयति (जागछ परिध स्त्र यासोमवारुष्टीनामभिशस्ति प.चाशतंच जीवशरद सुपरिबिच पुनाननु- संव्यपस्वायुप्मतीदं परिधरस्वास इति ॥१३॥ ) अयाग्नि स्थापनान तर एनाकुमारी- वास अहत सदशयस्त परिधापयति परिहित कारयतिपर । जरांगन्ध इत्यादि मत्र पटित्या कुमारी च स्वय परिधत्ते ॥ (अथोत्तरीयमयातन वयया अत्न्यात, याश्च देवीस्तन्तनभितो ततन्थ । तारस्वादेवी जरसे सव्ययस्वायुप्मतं द परिधत्स्वास इति ॥ ९॥) अयच वस्त्रपरि मानान तर उत्तरीययाग " यात I,, इसादिमनमुनत्पा वर परिधापयति । परिधापयतीतिणिज-तस्य पारितार्थत्वात "परिप स्वयास इतिमत्र स्यापितदर्थत्वात्परिधापयितान्य इसयगम्यन, सचानपर एयनावयु । स्मातपु धर्मम श्व पया कर्तृत्वयोगाभावत् । अवरोपि समाचाराद्वासमी परिधत्ते, 'परिधास्ये,, "यशमामा, इतिमनायाम् ।। (अनौसमजयति मम विश्वेदेवा.ममा पोहृदयानिनी । संमा तरिश्वा सन्धाता समुदेप्टो धातुनी इति ॥१५॥) अन वस्त्रपरिधानानन्तर "पर सर समयधाम, इति गेपेण क्यापिता एनौंवबरी समजयति सम्मुसौपरोति । अनविशेषमाहऋप्यटगः-वरगोन समुच्चार्य प्रपितामह पूर्वरम् । नामसमोतयद्विद्वा सन्यायाश्चैवमवहि तर --समजन्तु विश्वदेवा , इत्यादि सम्मुखौभूत पठति । अनोत्तरत पिनाप्रतम्,ि इतिसूनदर्शनात् अत्रैव कन्यादानम्-तत्तुप द्धतीवक्ष्ये । पिनाप्रतामादाय गृहीत्वा निजामत्तिकरोत्वित्यसौ इति ।१६। ) पिना जनकेनतदभावे वक्ष्यमाणे प्रत्तासम्प्यदत्त ग्रादायप्रतिग्रहविधिता पतिगृह्यगृहोत्याहतीत्वा निष्कामति गृहमध्या मडपात्वाग्निसमोपग तम् यदैवैषिमनमा इलादिन मनण करोत्यमुनि देत्रि,, इत्यन्तेन मनपठा। कन्यादाने पितुरभाने अन्येपामप्यविकारभाह या स्य पिता ॥ कया कर्मकाण्डरनाकर विवाहसूत्रयाण्या (३६६) पितामही भ्रता सकुत्यो जननीतथा । कन्याप्रदः पूर्वनाश प्रकृतिस्य परः परः। नारदः-माता महो मातुलश्क्ष सकुल्यो पान्धवस्तथा । तस्याम प्रकृतिस्थायां कन्यादाः सनातयः विशेषः पूपैदृष्टव्योमाग्दानप्रयोगे । (प्रथैनौसमीक्षयति अघोरचक्षुरपतिध्येधि शियापशुभ्यः सुमनाः सुवर्चाः । वीरसूदेवकामा स्योनाशंनोभव दिपदेशचतुष्पदे । सोमः प्रथमोविविगंधर्वो यिविदउत्तरः । तृतीयोऽग्निष्ठ पतिस्तुरीयस्ते मनुपजाः ।। सोमोऽदददगंधर्वाय गंधवों ऽदददग्नये। रयिश्चपुत्राश्चादादग्नि महमयी इमाम् ।३ मानः पूपाशिवतमामरयसान करूउशतीविहर । यस्यामुशन्तःप्रहराम शेपं यस्यामुकामावहयो निविष्टयाऽइति । १७ अथ निष्क्रमणानन्तरंगनौमधूवरी गमोक्षायाम् प्रेपेणकन्या पिता रामोक्षयति समीक्षणकारयति । तत्र समीक्षमाणोयरः "अघोर जनु,, इत्यादश्चितुरो मंत्रापठति । इति चतुर्थ कंडिकासमाता! (प्रदक्षिणाग्नि पर्याणीमके ।।) एके श्राचाया, अग्ने. प्रदक्षिणं फारयित्वावास परिधान समंजनं समोक्षणं च मन्यन्ते । एके न मन्यन्ते ततो विकल्पः । ( पश्चादग्नेस्तेजनी कटवा दक्षिणपावन प्रात्योपविशति । समीक्षणानन्तरं अग्नि प्रदक्षिणोकृत्य अग्नेः पश्चिमतः प्रामुख उपविशति स्मृत्यन्तराद्वरस्य दक्षिणतः कन्या उपविशति । सावधू दक्षिणपादन तेजनी तृण- पूलिको कटं रणमयंखस्तरं (चटाई) या प्रत्यप्रकम्य उन्ध्यउभयोः संस्कार्यत्वात्सपरीया। (अन्वारन्ध प्राधारावाज्यमागौ महाव्यातय. सर्वप्रायश्चित प्रजापत्य स्वि- छाच्च ।३३) अन्नवाहिक होमप्रसंगेन सर्वकर्मसाधारणी परिभाषां करोत्याचार्यः, "अन्या- रूप इति पूर्ववत्कर्तव्यः । (पतरित्यर्ट० सर्वन ) एतदापारदिम्रिप्ट कृदवसानं सर्वत्रयनयत्र होमस्तत्रभवति । यत्रोमाभावत्तत्रनास्ति यथा सस्तरारोहणलागलयोजनं पायमब्राह्मणभोजनेषु । (प्राङमहाव्याहृतिभ्य स्विकृदन्यच्चेदान्यादविः ॥॥ महान्याह तभ्यः प्राक् पूर्व स्विष्टकृयागोभवति चेद्यदिनाच्यात्मकाशादन्यदपि स्मृति हषि- भवति । वेयलाग्यभागे साहुति शेष भवति । सर्वशायश्चित्त प्राजापत्यान्तरमेतदावा- पस्थान विवाहे ६१) "त्वन्नोअग्ने, सत्पन्नोअग्ने "थयाश्चाग्ने,, 'येतेशतम्,, "उदुत्तमम्, इत्याहुति पंचकं सर्वप्रायश्चित्तम् । प्राजापत्य. प्राजापत्याहुति एतयोरन्तरं विवाह प्रायापस्थान श्रापापश्च अन्यत्र विदितस्य होमस्यजपादे, कर्मणः कान्तर प्रलेपः भावापस्य श्रआगन्तुक तगअन्तेनिवेशोयुक्तः न्यायातनिवृत्यर्थ (राष्ट्रभृत इच्छंजयाभ्यातानांश्चजानन् ।) (येनकर्मणेसदितिवचनात् ।।1) विवाहे पैसाहिकहोमकर्मणि राष्ट्रभूत्संज्ञका । आहुती. - ( ३७०) कर्मकायहरत्नाकारे, विवादसूत्रम्यारया। ~ि भावपेदित्यध्याहार । जयाभ्यातानाश्च प्रापयेत् पिंकुर्वनइच्छन् राष्ट्रभृ जयाभ्यातानाना होम- फल कामायन् किंप्रमाणमितिचेद् । येनफर्मणा अस्मिन्कमणि श्रीप्यतेननयरफलं भवतीति जानविदन् तरर्मफलमिच्छन् तस्मिन्नमणि तत्पमं मायपेदिति पचनात श्रुतेरित्य तत्र राष्ट्रभृतो या तापाइतधामाग्निर्गन्धर्व इत्यादिद्वादशमंना राष्ट्रभृत्संशका ताप्रयोगपदये । (वित्तंचचित्तिश्चाकृतं चातिश्चविज्ञातंच शिशातिश्च मनश्चशक्करीश्च दर्शश्च पौर्णमासंच वृहच्चरथन्तरं च प्रजापतिर्जयानिन्द्राय वृष्णे प्रायच्छदुन. पृतनाजयेषु । तस्मैविश समनमतिसर्या स उग्र.स इहव्योवभूव स्वाहा इति । ऐतेत्रयोदशमंत्रा जयाइत्युच्यन्ते । चित्तचिरयेपमादीनांपदना चतुर्थ्यन्तानां पेचिदिच्छन्ति तदस- म्मतम् । कुत नयेतानि देयतापदानि किन्तु मत्राएतेमं नाश्चएते यथाम्नातएप प्रयुज्यन्ते (अग्निभूतानामधिपति समाऽवविन्द्रो ज्येष्ठानाम् । यम पृथिन्या वायुरन्तरिक्ष. स्य, सूर्यो दिव, चन्द्रमानक्षत्राणाम् , बृहस्पति घंह्मणोमिन सत्यानाम्, बरणोऽ पा साम्राज्यानामधिपतिस्तन्मानपतु सोमचोपधीना सविताप्रासवाना , रद्र , पशूनाम, त्वष्ट्रारूपाणाम् , विष्णु पर्वतानाम् मरतोगणानाम् मधिपतयस्ते मारन्तुपितर' पितामहा परेवरेततास्तमहाः इह मावन्त्वस्मिन्नह्मण्यस्मिन् क्षने ऽस्यामा शिष्यस्याम् पुरोगायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देहत्या स्वाहेति सर्वत्रानु पजति ।१०१ ) अग्निभूतानामित्यादिषुपितर पिता महा. इत्येतेष्वष्टादशसु मैत्रेपुप्रतिमंत्र यथालिंग यथावचन समावविलादि देवहत्या । स्वाहेत्यन्त वाक्यैक्देशं अनुषजति सयुनक्ति तम्चपद्धती प्रदर्शयिष्यामि । अग्निरैतुप्रथमोदेवताना ॐ सोऽरयैप्रजा मुंचतु मृत्युपशात तदय राजा वरुणोऽनुमन्यतायथेय स्त्री पौनमघनरोदात्स्वाहा ।। इमामग्निस्त्रा- यतां गार्हपत्य प्रजामस्यै नयतुदीर्घमायु अश-योपस्था जीवतामस्तु माता पौत्रमा- नन्दमभि विवुध्यतामिय स्वाहा २ सस्तिनो अग्नेदिव मापृथिव्या विश्वानि हथायजन। यदस्यांमहिदिविजातं प्रशस्ततदस्मासुद्रविण धेहिचित्र स्मा 1३। सुगन्नपन्यां प्रदिशनपछि ज्योतिष्मद्धेह्यजरनमायु अपैतुभृत्युरमतन्न प्रागाद्वै- वस्तोनोमभयं कृणोतु स्वाहा ।।। इति ।१९) परमृत्यावितिचैके प्राशनान्ते ॥३॥ १२) अग्निरैतु इत्यादिक परमृत्योरित्यन्ता पचमंना परमृत्यवितिच जुहुयात् । एथे श्राचायाँ परमृत्यविति एतामाहुति प्राशनान्ते सश्रय प्राशनान्ते जुहुयादितीन्छन्ति । अनोद- कस्पर्श इति पचमी कडिका ( कुमार्या भ्राता शमीपलाशमिथॉल्लाजान जलिनाजलावावपति ॥१॥ कुमायां कन्याया भ्रातःशमीपलाशमिश्रान् शमीपन- कर्मकाण्डरलाकरे, विवाहप्रव्याख्या (३७) युक्तान् लाजान भ्रष्टानि धान्यानि अंजलिना कृत्या कन्यायाः अंजली प्रायपति ॥रतानं जुहोति स ॐ हतेन तिप्रति ॥ अर्यमणं देवं कन्याग्निमयक्षत । सनो अर्यमादेयः प्रेतोमुचतु मापतेः स्वाहा ॥२॥ इयनायु पबूते लाजानावपन्तिका। आयुस्मानस्तुमेपतिरेधतां शातयो मम स्वाहा ॥२॥ इमल्लाजानापानी समृद्धिकरणं तव । ममतुभ्यंच संयननं तदग्निरनुमन्यता मिय स्वाहर ॥३॥ तान् अंजलिस्थान लाजान तिष्ठ तीऊर्या सहतेन मिलितेन अनलिनाजुहोति विधाहाग्नौ प्रक्षिपति, त कैकेन मंत्रण हस्तप्रक्षिप्तलाजानां तृतीयांशं तृतीयांश जुहोति । अमएं देवमित्यादि प्रथमम् इयं नायु पत्ते, इत्यादि द्विइमल्लाजानां इत्यादि तृ० (श्रयास्यै दक्षिण हस्तं गृहणाति सांगुष्ठम् । गृहणामिते सौभग- स्वाय हस्तमयापत्या जादष्टिर्यथाऽऽसः । भगोर्यमासविता पुरधिर्म या दुगा- हत्याय देवाः ॥ अमोहमस्मि सात्व सावमस्यमोऽहम् । समाहमस्मि ऋक् त्वं धौरह पृथिवीत्वम् ॥ तायेव विवहावह सहरतोदधाव है, प्रजाँ प्रजनयावह पुत्रान् विन्द्यावहै बहन तेसन्तु जरदष्टयः संप्रियो रोचिष्णू सुमनस्यमानौ पश्येम शरदः शतं जीवेमशरदःशत गृणुयाम शरदः शतमिति ॥३॥६॥) अथलाजाहीमा नन्तरम् अस्यै अस्याः (मार्यरवास्पष्ठय)चतुर्थी) कुमायो: दक्षिण सांगुष्ठसहित हस्तं गृहणाति परः स्वहस्तेनादत्ते । गृहणामिते इत्यादि शरदः शतमिति यावत पटिया (इति पाठी. फैडिका ) ॥ (मथैनामश्मानमारोहयत्पुरतोऽग्नेर्दक्षिणादेन मारोहेममश्मान मश्मेव त्वई० स्थिराभव। अभितिष्ठ पृतन्त्रतोऽवाधस्त्वपृतम्यतः इति ।।१॥) अथ पाणिग्रहणानन्तरं एनायधू अश्माने दुपदं उत्तरतोऽनिनियमाणं दक्षिणपादेन कृत्या प्रारोहयति, भारोहम इत्यादि पृतनायत इत्यादि मैत्रेणा गत्योभावुत्तरेणाग्नि तस्याः सध्यत्तर परम सत्येनादाय हस्तेन वधूपादंतु दक्षिण शिलामारोहयेत्यागायतो दक्षिणपाणिना । मंत्र. पाठश्च वरस्य न कुमायाः (अथ गायां गायति-सरस्थति प्रेदमर सुभगे पाजिनी. पती। यांत्वाविश्वस्य भूतस्य प्रजायामस्याग्रतः। यस्यांभूत समभवद्यस्या विश्वमिदं जगत् । तामद्य माथागास्यामि यास्त्रीणामुत्तमं यशः इति ॥२१) अरमारो- हणानन्तरं सरस्वति इत्यादि उत्तमयश: इस्यन्त गार्था गायति ।। (अथ परिकामत:--- तुभ्यमपरिवहन्सूर्यावहतुनासह । पुनः पतिभ्योंजार्या दाग्ने प्रजया सहति ॥३॥ चधूवरी अग्नेः परिक्रमणं कुरुतः । (पर्व द्विरपरं लाजादि nen) एबमुहप्रकारण द्विःयारद्वयमपरं पुनरपि लाजादि कुमायाँ भ्रातत्यारभ्य परिक्रमणान्तं कर्मभवति । एवं (३५२) कर्मकाएरनाकरे, विवाहसूत्रध्यायों तृतीयम् । (चतुर्थ / सूर्पकुष्टया सोल्लाजा नावपति भगाय स्वाहेति ॥५॥) ततस्तृतीय परिक्रमणानन्तरं कुमायो भ्राता शर्पकुटया शर्पस्य कोणेन सान् चावपापशि प्टान् लाजान् कुमायो अंजली श्रापवति निक्षिपति तान् खाजान् तिटंती कुमारी भगाय स्वाहा इति मंत्रेण चतुर्थ जुहोति ॥ तत.समाचारातूपणा चितुर्थ परिक्रमणं यधूपरौ कुरुतः ॥ "हरिः पारस्वामृत्विना पूर्वपूर्व मन्तरविजा च यथा पूर्वमिति परिभाषा सत्रात तेन परिक्रमण कुर्वन्तौ वधूवरी ब्रह्माग्न्योमध्ये न गच्छेताम् ॥ इति हरिहरः। दम्पत्योगच्छतो स्तन ब्रह्माग्नी अन्तरागतिः ॥ इति गदाधरः । प्राजमाह मुदनाहं तथा ब्रह्माण्मृत्विजम् । एतानि वाह्यतः कृत्वा रोपाणान्तु प्रदक्षिणम् ।। इति संग्रह वचनाा-दक्षिण दिशमाश्रित्ययमों मृत्युश्च तिष्ठतः । तयो, संरक्षणार्थाय तस्माद् ब्रह्मावहिर्भरत ॥ इति प्रमाणवाय गदाधर- स्यैवसुष्ठतरा वरवध्वो ब्रह्माग्निमध्यगमनस्य सम्मतिः ॥ (विपरिणीता प्राजापत्य / हुत्वा ॥६॥) पूर्व पदुपविश्य प्रजापतये स्वाहा इति ब्रह्मान्धारव्यो हुत्या इदं प्रजापतय इतिसागं विधाय ।। (इति सप्तमो कंडिका 11) मथैनामुदीची ॐ सप्तपदानि प्रमामय- स्येकमिपेढे ऊऊँ त्रीणिरायस्पोपाय चत्वारि मायोभवाय पचपशुभ्य. पड़ऋतुभ्य. सखेसप्तपदाभव सामामनुवताभय ॥१॥ (गुस्त्यानयत्यिति सर्वत्रानुप- अति ॥२॥) अथवर एना कन्या अग्ने स्त्तरत उदीचीमुदहमुखी मेकमिय इन्यतः सप्त- मंत्रः सप्तपदानि प्रकामयति परिक्रमणं कारयति । कारितत्वात्सप्तपदानि, प्रकमस्त्र, इत्य- धेषणा इति कुमायो दक्षिणपादं गृहीत्या अग्रे श्रो स्थापयती स्यन्ये । विष्णुस्त्वा नयविति सर्वर परसुमंप्रेष्वनुषंग- 1 न तु सप्तमें मंत्र तुल्ययोगित्वारसाकाक्षत्वाच पूर्वमंत्राणामिति ककांचाय: । अन्येषांभाष्यकाराणपिद्धतिकाराणा च मने सर्वमनेष्वनुपंग. (निष्क्रमण प्रभृत्युदकुम स्कन्धे कृत्या दक्षिणतोऽग्नेर्गग्यत. घियतो भवति ॥३॥)( उत्त- रत एकपाम् INT) निष्क्रमणप्रभृतिपिनापत्तामादाय निष्कामति, इत्यादिन पारस्य कश्चित्पुरुषो जलपूर्ण कलशं स्कन्धे निधाय वधूवरयो पृष्ठत मागत्य अग्नेर्दक्षिणस्या दिशि- मौनीस्थित प्रास्तै । चेपाचिन्मते उत्तरतस्तिष्ठति, अतषच विकल्प. 1 स्कन्धकलशस्थपुरुषों ब्राह्मण एबभवति नतुलनियादयः इति ।। (तत एनांमदनपभिपिचति-प्रार. शिवाः शिरतमा शान्ताः शान्तातमास्तास्ते कण्वन्तु पजमिति ।।1) (माहिष्टेति- च तितृभिः क्षा) ततस्तस्मात्स्कन्वयितादुदककुंभादाचारादाम्रादिपर लवसहिते न हस्तेन जलमादाय एलव मूर्धनि शिरस्यभिषिचति वर , आप. शिवा इत्यादिना, भेषज- मिस्र्थतनमनेण । पुनस्तथैवोदक मादाय आपाहिया, इत्यादिना श्रापोजनयथाचन , इत्यन्ता. , फार्मकाएरताको विवाहस्त्रव्याख्या (३७३) - " भिस्तिसभि, गिः अभिषिचति चकारादपज्यते । (अथैना सूर्य- मुदीक्षयति तच्चक्षुरिति ॥n) अभिपकादुपरि सूर्य मुदौलयस्यति पेण सूर्य एना वधू वरः उदोक्षयति, सूर्यस्य निरीक्षणं कारयतीत्यर्थः साचवरपिता सती-तमचरित्यादि मंत्रेण स्वयं पठिनेन सूर्य निरीक्षते दिवाविवाह पक्षे इति हरिहरः । सूर्याक्षणान्यथाऽनुपपत्या अस्तमिते ध्रुवं दर्शयति । इत्यभास्तमित महणाच पारस्करगृयानुसारिणां दिवैव विवाह इत्युच्यते ॥ (अथास्य दक्षिणां समविदयमालम्यते- ममयते हृदयं दधामि, मम चित्त मनुचित्तंते अस्तु, मम वाचमेकमना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुक्त माम इति ॥८॥) पा सूर्यो दीक्षणानन्तरं अस्यै इति पयर्थ चतुर्थी, यस्या बच्चा दक्षिणसमधि दक्षिणस्य स्कन्धोपरि हस्तमोत्या तस्था हृदयमालभतेवरः, स्पृशति ममा नेति मंत्रेण ॥ (अथैनामभिमंत्रयते--सुमझलीरियं वधूरिमा समेत पश्यत सौभाग्य- मस्यैदत्वा याथास्तं विपरेतन इति ॥l) अथ हदयालम्भनानन्तरं एनां वधू वरोऽभि मंत्रयते-मुमडलो रित्यादिना मंत्रेण ॥ अन शिष्टाचारात "उत्तरत अयतनाहि स्त्री" उत्तर शब्दो यामवचनः । इति श्रुतिलिंगाच वधूवरस्य वामभागे उपवेशयति । गदाधेर मतेतु- अनाचारः श्वतस्त्रः स्त्रियो मलं कुर्वन्ति । उक्तंच कारिकायाम्-पतिपुत्रान्विता भन्या थतसः मुमागाअपि । सौभाग्यमस्यै दास्तां मङ्गलाचार पूर्वकम् ॥ ( तां रद पुरुष उन्मथ्य प्राग्वोदग्वाऽनुगुप्त अगार भानु दुहेरोहिते चर्मण्युपवेशयति इह गावी निषीदति हास्वा इह पूरूपाः । इहो सहस्रदक्षिणो यश इह पूषानिषीदतु इति ॥१०॥) ततस्तो वधू दृढ़ पुरुष. बलवान् कश्चित्पुमानुन्मथ्य उत्थाप्य प्रवस्यां दिशि उदक् उदीच्या या दिशि पूर्वकल्पिने अनुगुप्ते सर्वत, परिहते आगारे ,गृहे तत्र च पूर्वमास्त श्रानुडहे प्रार्पभे रोहिते लोहितवणं चर्मणि, अजिनेप्राग्नीवे उत्तरलोम्नि उपवेशयति । इहगाव इत्यादिना निपीदन्त्यिति मंत्रस्य पाटान्ते केचन जामातैव दृढ़पुरुषमिसाहुः ॥ प्रामवचनंकुयुः ॥११॥ अत्र विवाहे ग्रामशब्द वाच्यार्ना स्वकुलद्रानां स्याणा शमशाने च पायं कुर्यः । भंवरार्पण हरिद्राक्षतचन्दनादि धर्मप्रतिपादकम् ॥ (विवाह श्मशानयो ग्राम प्राविशता. दिति वचनात् ॥ १२॥) ( तस्मात्तयोामः प्रमाणमिति श्रुतेः ॥१३॥ ) विवाहे शमशाने च स्वलद्धानां स्त्रीणां वचनं वाक्यं कुर्यु. । यथा सूत्रेऽनुपविद्यमपि वधूवरयो मंगल सूत्र ( ककणं) गले मालाधारणं परागमने नासिकाभूषण धारणम् । कन्यादामान्तर अंचलमन्थि बन्धनम । कतिचिद्देशे पु छोलिकाभरणम्, न्यानोधपुटिका, सौभाग्यपुटिकाधारणम् । पर हदयं दध्यादिलपनादि, ताश्चयन्स्मरन्ति तदपि कर्तध्यमित्यर्थः । च शब्दादेशाचारोऽपि, ( ३७४) कर्मकाण्डरक्षाकरे, चतुर्थीकर्मसूत्रम्याएया। प्रामशब्देन स्वकुलद्धा: स्त्रियोऽभिधीयन्ते । ताहि पूर्वपुरुपैरनुष्ठीयमानं सदाचारं स्मरन्ति । प्रामवचनं लोकवचनं इति भर्तृययाः। गृद्धानां स्त्रोणा वचनं कार्य मिति कुत इत्यत आह- प्राममिति श्रुतः प्रामं वृद्धानां स्त्रीणामाचार प्राविशतादिति स्मृति वचनात् ॥ श्राचार्यायवर ददाति ॥१४॥) (गौ ह्मणस्य वरः ॥१५५) (मामोराज्यन्यस्य ॥१६॥) (मश्यो वैश्यस्य ॥१७॥ ) ततो पर प्राचार्याय स्वकीयाय वरं ददाति । परशब्दार्थ व्याल्यानं करोति । माह्मणश्चत्परिणेता तदा गौ वरं ददाति, क्षनियश्चेद्वरस्तदा मामं वरं ददाति, वैश्यश्चैदर स्तदाचं वरं ददाति । एते परा विवाहे एव प्रकरणात् ॥ (मधिरधशतं दुहितमते ॥ १८ ॥) दुहिताश्च यस्य दुहितर एष न पुत्राः तस्मै दुहितृमते रथेनाधिक गोशतं दत्वा तस्यकन्यामुद्वहेत् । मनुः~यस्यास्तु नभद्रातान विज्ञायेत या पिता। नोपयच्चतता कन्यापुत्रिकधर्मशङ्कया ॥ (अस्तमिते ध्रुवं दर्शयति-ध्रुवमसि ध्रुवंचा पश्यामि ध्रुवेधि पीयेमयि । (महात्वदाद वृहस्पतिर्मया पत्या प्रजापती संजीव शरदः शतमिति ॥२६॥) (सायदिन पश्येत्पश्यामीत्येव ब्रूयात् ॥२०॥) अस्तमिते सूर्य वधूं ध्रुवसंज्ञक नक्षत्रं दर्शयति । ध्रुवमसि-इत्यादिना मंत्रेण । सावधूः यदिध्रुवनेक्षेत तथापि पश्यामीत्येवं वदेत् । नविपरीतम् । (विरामक्षारालवणाश्विनौस्यातामधः शायीयाता संवत्सरंनमिथुनमुपेयाताम्, द्वादशरात्र र्ट पड़ात्रं त्रिरात्रमन्ततः ॥२१॥) विवाह दिनमारभ्य बिरानं नोण्यहोरात्राणि अक्षार लपणाश्विनौस्याता भवेताम् । अधः अस्तृतःभूमौन खद्वायां शयीयाता स्वपेताम् । संवत्सरंच वर्षपर्यन्तम् । मिथुनं अभि. गमनं नोपयेताम्, नोपगच्छेयाताम् । अथवा द्वादशरानम्, अथवापानम्, यद्वानिराधमन्तत । संवत्सरादिपक्षादि शक्ती निरामपक्षाश्रयणेऽपि चतुर्दा कान्तरं पचम्मादि रामाभिगमनम् । चतुर्थी कर्मण" प्राक्तस्या भार्यत्वमेव न संवृत्तं विवाहैक देशत्वाचतुर्थीकर्मणः इति सूत्रार्थ ॥ ॥ इति विवाह सूत्रव्याख्या | अथ चतुर्थी कर्ममूत्रव्याख्या ॥ ((चतुर्थ्यामपरराऽभ्यन्तरतोऽग्निमुपसमाधाय । दक्षिणतोब्रह्माणमुपदेश्यो- तरतःउदपात्रप्रतिष्ठाप्य स्यालीपाकर्ट० श्रपयित्वा भाज्यभागाविष्ट्रयाऽऽज्याहुति जुहोति ॥९॥ ) (भग्मे प्रायश्चिते स्वं देवानां प्रायश्चिते रसि ब्राहाणस्त्वा नाथकामा कर्मकाण्डरनाकरे, विवाह सूत्रव्याख्या (३७५) - + उपधायामि याऽस्यैप्रजानी तनूस्तामस्यैनाशय स्वाहा ॥२॥) (सूर्य प्रायश्चित्त त्वं देवानां प्रायश्चित्तरसि मामणस्त्वा नायकाम उपधावामियाऽस्पे पशुधनी तनूस्ता म्यस्य नाशय स्वाहा ॥३॥) (चंद्र प्रायश्चितत्वं देवानांप्रायश्चित्तिरसि ग्रह्मणस्त्वा नाथकाम उपधायामियाऽस्यै गृहनी तनूस्तामस्यै नाशाय स्वाहा ॥ ४1) (गंधर्व प्रायश्चितत्वं देवानां प्रायश्चित्तरसि ब्राह्मणस्त्वा नाथकाम उपधाषामियाऽस्य यशोनी तनूस्तामस्यै नाशाय स्वाहा ॥५॥ ) ॥२॥) चा तिथी विवाहतिथिमारभ्य श्रापररात्रेः पश्चिमेयामेअभ्यन्तरत: गृहस्यमध्ये भग्नि पैवाहिक- मुपसमाधाय पंचभूसंस्कारान्कृत्वा स्थापयित्वा दक्षिणतो ब्रह्मासनमास्तोर्य तत्रपूर्वपद ब्रह्माणमुपविश्यउत्तरतउदपात्र प्रतिष्ठाप्यप्रणोतास्थानादुत्तरतो जलपूर्ण ताम्रादिपानं स्थाप. यित्वा, स्थालीपाकचरू थपयित्वा, थाग्यभागाविष्टावऽज्याहुति होति । श्राश्येन "अग्ने प्रायश्चित, इत्यादिभिः पंचभिमैत्रै :पंचाहुती जुहोति, चतुर्धाकर्मणो पियाहागरपावहिः शालया- माभूदित्याभ्यंतरग्रहणम् । स्थालीपाकस्यजुहोतिप्रजापतयेस्वाहा इति ।श स्थालीपाकस्य चरो. प्रजापतये स्वाहा, इत्यकामाहुति जुहोति । (हुत्वादुत्वैता सामाहुती मुदपास ₹० स्नान समयनीय अग्ने प्रायश्चित्त ~~-इत्यादीनां मंत्राणां प्रजापत्यन्तानापरणा माहुतीनांप्रत्येकंहुत्यासंत्रवान् हुतशेषान् उदपानेसमपनीय प्रक्षिप्य (ततएनों मूर्धन्य भिपिचति यातेपतिनी, प्रजापनी, पशुघ्नो गृहनी, यशोघ्नी, निदितातनू जारपनी ततएनकिरोतिसा जोयत्वमयासहासापिति !४! तत स्तस्मादुदपात्रात उदकमादाय एनौवधू वरोमूर्धन्यधिषिचति यातपतिनी इत्यादिनामंत्रेण । अनकतिचिद्देशेषु भायाः पति स्वनामसंबन्धनामकरोति । यथा यज्ञदत्तमुन्दरी, असावित्यत्रवधूनामग्रहणात् । (अथैना स्यालीपार्क प्राशयति प्राणैस्तेप्राणासंदधाम्यास्थिभिरस्थीनिमा सर्मा सानित्वचावचम् ॥५॥ अथाभि- पेकानन्तरंएनी वधूंस्थालोपाकंचरोपम् प्राणस्ते, इत्यादिनावर: प्राशयति । वधू संस्कारोंऽयं- नतुद्रव्यप्रतिपत्ति। श्रतोद्रव्यस्य नाशदोषादायन्यद्रव्येण प्राशनकामः। तदुर्फकारिकायाम्--- पधूसंस्कारएवायंप्रतिपत्तिरियनतु । श्रतोद्रव्यविनाशादी तुल्यन्ते प्रतिपत्तयः । अनसमाचारा द्वरोऽपि स्त्रियासह भोजनं करति । हेमाद्रीमालयः- एकयानसमारोह एकपानेच भोजनम् । विवाहेपथि यात्रायां कृत्वा विप्रोनदोषाभाक् । (तस्मादेवं विद्रोत्रियस्यदारेण नोपहासमिछदुत- होयत्परोभवति १६॥ यतोऽनेनवरशेषप्राशनकर्मणा भन्नासहवयंप्रातदारा स्तस्मातेपुवित्पुरुषः श्रोत्रियस्यपिदुप,दारणभार्ययामह उपहासमैथुननेच्छेत् नकामयेत हियस्मादेवं विदपि श्रोत्रियस्य परशत्रुर्भपति इति चतुर्थीकर्म परिभाषा
३७६) कमाएरक्षाकरे, वरवधीश्च गृहामनेमागरक्षापरिभाषा
* अथातो वरवध्वोहागमनपरिभापा *
वरवधो क्न्यागृहावरगृहयावत्प्रस्थानपरिभाषा । उफंचमानयगृह्यसूत्रेपुष्प १संड
१३ ( पुण्याहे युके ।११) युजतिमनमितिद्वाभ्यो युज्यमानमनुमंत्रयते दक्षिण मथोत्तरम् ।।
( महतेन वाससादर्भवारथंगमाठि ॥३॥) (अंकुन्यं गायभितोरथं यध्यान्ता पाता अग्नि-
मभियेसंचरति । दूरहति पतनी याजिनीवस्ति नोऽग्नय पप्रय पालयन्तु इति चकेऽभिमंत्र-
यते ॥४॥ वनस्पते बीड्वग इत्यविष्ठानम् ।।५। मुकिंशु विश्वपं हिरण्यवर्ण मुकृतं
सुचक्रम् । पारोह सूयं अमृतस्य लो स्याने पत्येवतुं कृणुप्प इत्यारोहयति ॥३॥ अनुमा-
यन्तुदेवता अगुब्रह्म मुयिम् । अनुक्षत्रंतु यदलमनुमामैतु यद्यश इति प्राइभिप्रयाय
प्रदक्षिणामावर्तयति ॥ प्रतिमायन्तुदेवताः प्रतिब्रह्ममुवीर्यम् । प्रतिक्षरन्तु यदपलं प्रतिमा-
मैतु यद्यश इति यथास्तंयन्तमनुमंत्रयते ॥८॥ श्रमंगल्यं चेदतिकामति । भद्रगभिरित्यादि
जपति ॥६॥ नमोरदायप्रामसद्, इतिप्रामे इमारुद्रायतिच ॥१०॥ नमोरुद्रायैक्तराद इत्या-
रखे । येवृक्षेषु शपिजरा इति ॥११॥ नमोरुद्राय श्मशान सद इति श्मशाने । ये भूतानाम-
धिपतय इतिच ॥१२॥ नमोरुद्राय चतुष्पथसद इति चतुप्पथे । येपर्चा पथिरक्षय इतिच ॥१३॥
नमोरुद्राय तीर्थमद इति तीर्थे । ये तीर्थानि प्रचरन्ति इतिच ॥१०॥ यत्रापस्त रितव्या
श्रासौदति । समुदाय वैष्णवेसिन्धूनां पतये नम । नमोनदोनों रावासापत्य । पिशाहा जुपता
विश्वकर्मणामिदहति स्व स्याहेत्यप्सूदकाउलीनिनयति । अमृतंबापास्यै जुद्दौम्यायु प्रायो-
ऽप्यमृत ब्रह्मणांसह मृत्युतरति । प्रामहादिति रिष्टिरिति मुक्तिरिति मुक्षीयमाण समय
नुदस्व स्वाहेति त्रिपरिमृज्याचामति ॥१५॥ यदिनापातरेत्सुनामाणमिति जपेत् ॥१६॥
यदिरथाक्ष शम्याणो वा रिप्येतान्यद्वारथागं तत्रैवाग्निमुपसमाधाय अपप्रभृतिभिहुंला मुम-
गली रियवधूरिति जपेत् । वध्यामह, वमभेत पश्यत ॥१७॥ व्युत्क्रामपंथा जरिता जवेन !
शिवेन वैश्वानर इडयास्याग्रत । श्राचाया येन येन प्रयाति तेन तेन सह । इत्युभानेय व्युत-
कामत 1911 गोभि सहास्तमिते प्रामं प्रविशति ब्राह्मणपचनाद्धा ॥१६॥ इति प्रयोदश.
खण्डम् श्रपरस्मिन्नन्द सन्धौगृहान्प्रपादयोत ॥१॥ प्रतिब्रह्मनिति प्रत्ययरोहति ॥
रोडम् । मंगलानि प्रादुर्भवति गोधात्मततामुलपराजि मृणाति
रसादध्योपासनात, येघध्येतिप्रसवन्येषु सौमनसंमहत् । तेनोपह्वयागहे तेनानानन्यागतम् ।
इतितया युपैति । गृहानइंसुमनस प्रपद्येवोरहि वीरपत सुशेगा । इरावहन्ती घृतमुक्षमाण
स्तेष्वहसुसना संवसाम । इत्यभ्याहिताग्नि सोदकमौषधमापसधप्रपद्ये रोहिण्यामूलेनमा यद्वापु
रायोक्तम् ।। इति वरवध्वीश्व गृहागमनेमार्गरतापरिभाषा।
|॥४॥
कर्मकाएरक्षाकरे, घागदान पद्धतिः ।। (३७७) अथ वाग्दानपद्धतिः॥ अथ ज्योतिः शास्त्रोक्त शुभे लग्ने द्वौ चत्वारः अष्टौ वा प्रशस्तवेपाः पुरुषाः वरपित्रादिना सहिताः शकुनदर्शन पूर्वक (अग्रतो दधियवपूरितपात्रसहितम् ) कन्यागृहमेत्य तत्र कन्या- पिता गृहससन्तोत् वाजिनादिमङ्गलध्वनिपूर्वकं तान्गृहमानाय्य गंधाक्षतादिभिः सत्कृत्य जनवासं दद्यात् ॥ ततः कन्यापिता ज्योतिर्विदादिष्टे सल्लग्ने गणेशादिपञ्चांग पूजनं कृत्वा परपितरं वाततस्नेहिपुरुपमाहय, सच वरपिता कन्यापितरं प्रति प्रार्थ- येत् ॥ तत्रमंत्र:-मत्पुन्नार्थ प्रयच्छ त्वं स्वकन्यां स्नेहपालिताम् । भार्याउनुमतिं कृत्श वाग्दानं देहि सत्वरम् ।। अथदाता ब्रूयात्- भार्यानुद्यमतिसहितोऽहं दास्यामीतिचोच्चे ब्रूयात् ॥ ततः कन्या दाता प्रमुख उपविश्याचभ्य देशकालौ स्मृत्वा करिष्यमाण विवाहांगभूतं धारदानमहं करिष्ये तदंगं गणपत्यादि पंचांग पूजनं च करिष्ये ।। एवं गणेशादि पंचांगपूजनं कृत्वा, तत्र वर- पितरं तत्प्रतिनिधिया प्रामुखं उपविश्य, तं गन्धाक्षतादिभिः संपूज्य, किंचिन्मनोहरं जलपात्रं जलेनापूर्य स्थाल्यां हरिद्राग्वंड पंचक हपूगीफलानि घज्ञोपवीतंच प्रस्थमान तंडलोपरिस्था- पयित्वा मनोहरवस्त्रेणाछाद्य अग्रतः संस्थाप्य तत्र इन्द्राणी सदासौभाग्यवती पूजयेत् ॥ ध्यानम्-इन्द्राणी मिन्द्रगृहिणी सदासौभाग्यवद्धिनीम्। ध्यायामि मनसादेवीं कन्या सौभाग्यहे- तवे ॥ याचाहनम्-आगच्छागच्छ कल्याणि देवेन्द्रप्राणवल्लभे । यावत्पूजां करिष्यामि तावत्वं सुस्थिराभव || ऋक्-30 आदि- स्यैराणा सीन्द्राण्याऽउपणीपः पूपासि धर्मायदीप्वः || भूर्भुवः स्वः, इन्द्राणीहागच्छेहतिष्ठ, पतन्तेति प्रतिष्ठाप्य, 30ई इन्द्राण्यैनमः इति मंत्रेण पाद्यादिभिः संपूज्य प्रार्थयेन-देवींद्राणि नमस्तुभ्यं देवेन्द्र प्रियभामिनि । सौभाग्यमायुरारोग्यं मत्कन्यायै , (३७) कर्मकाण्डरत्नाकारे, धूल्यर्यपद्धति । प्रयच्छवै ॥ धनधान्यं पशून्देहि जयन्तसमसन्ततिम् । यशोदेहि सुखंदेहि सर्वसिद्धि प्रदाभव ॥ इति संप्रार्थ्य प्राचार्यः मङ्गलपुरः - सरं वारत्रयं गोत्रोचारणं गुर्यात् । अत्र कन्यापक्षीयाचार्याय, “वरपिता दक्षिणां बहुमूल्यवस्त्रं (पर्वतीय देशेषु झगुलीति) तन्निष्क्रयीभूतं द्रव्यं स्वराक्तितो दद्यात् । ततः कन्यापिता पूर्वोक्तां स्थाली हस्ते निधाय-30 वाचा दत्ता मया 'कन्या पुत्रार्थ स्वीकृता त्वया। कन्यावलोकनविधौ निश्चितत्वं 'सुखीभव ॥ पंडो व्यंगः पंक्तिवया रोगी चेद्वित्तवर्जितः । दत्ता मिमां न दास्यामि तव पुत्राय कन्यकाम् ॥ अव्यंगे पतिते क्लीवे दशदोष विवजिते । इमां कन्यां प्रदास्यामि देवाग्नि द्विज सन्निधौ ॥ इति चोक्त्वा स्थालीजलपात्रसहितं द्रव्यं वरपित्रे दद्यात् । स्वस्तिइति प्रतिवचनम् ॥ वरपित्रोक्तिः-श्राविवाहाचते कन्यां रोगिणी च कुचारिणीम् । दत्तामपिच त्यक्ष्यामि कन्याते 'निश्चयादहम् । ततो यरगृहागतं कण्ठाभरणादिभूषणम् सौभा. ग्यवती द्वारा मङ्गलवाद्यवेदध्वनिपुरस्सरं कन्यायै परिधापयेत् ।। ततो भूयसी दक्षिणां दत्वा, मंत्रतिलकपुरस्सरं पाशीर्वाद गृहीयात् ॥ ॥ इति विवाहातिरिक्तसमयोक्त वाग्दानपद्धतिः॥ अथ गृहागतवरं प्रति वाग्दानधूल्यर्घपद्धतिः॥ अथ च कन्या पिता वरं मार्गागतं श्रुत्वा वाग्दान सामग्री संपाद्य मुलिप्तायां भूभौ उपविश्य बिराचम्य दीप प्रज्याल्य गणेशमातृकाश्च संपूज्य कलशमपि वरुणविधिना संस्थाप्य संपूज्यच वरागमनंप्रतीक्षेत ॥ ततः कन्यापिता कियहूरं समा- : जसहागतं वरं विलोक्य स्वगृहानग्नपादः सन् स्वजनैर्वधपुत्रादि T कर्मकाण्डरस्नाकरे, धूल्यपद्धतिः ।। (७६) भृत्यवगैसहः पंचघोष पूर्वकं कतिचित्पदानि गत्वा वरयानं स्व- जनोपरि वाहयित्वाद्वारमानाय्य द्वारसमीपे यथाशक्ति स्वयमपि चोड्यावरं यानादवतार्य घरो मंत्रं पठन् श्रीफलं हस्ते निधाय, ० भद्रमस्तु शिवंचास्तु महालक्षमीः प्रसीदतु । रक्षन्तुत्वांसुराः सर्व संपदः सुस्थिराभव ॥ इति मंत्रए कन्यापितृहस्ते दद्यात् ॥ सच तं सादरं हस्ताभ्यां गृहीयात् । ततो मनोहरे क्वचित्पीठे पूर्वाभिमुखं वरमाश्वासयेत् ॥ ततः कन्यापिता तत्र पूर्वोक्तस्थले उत्तराभिमुख श्राचम्य प्राणायामत्रयं विधाय रक्षावन्धनं कृत्वा श्राचार्यवरणार्थ वृहत्स्थालीपात्रं ताम्रादिघटं यथावित्तं कमंडलं वा धौतयत्रंच संपाद्य, वरपक्षीयं ब्राह्मणमाहृय पादप्रक्षालनं कुर्यात्-पापद्धनध्वान्तसहस्त्रभानवः समीहितार्पणकाम धेनवः । अपारसंसारसमुद्रसेतवः पुनन्तु मां ब्राह्मणपादपांसवः।। ततो गंधम्-"गन्धद्वारामित्यादि" अक्षनपुष्पमालादिभिः आचार्य सम्पूज्य प्रार्थयेन्-30 आर्चायस्तु यथास्वर्गेशकादीनां बृहस्पतिः। तथात्वं मम कार्यऽस्मिन्नाचाययों भव सुव्रत ॥ ततः पूर्वोक्तां वरणसामग्रीसम्मुखीकृत्य संकल्पं कुर्यात्-अद्येहेत्यादि देश कालौ संकीर्त्य अमुकराशिरमुकशर्माहं करिष्यमाण कन्यादानां- गत्वेन तत्रादौ वाग्दानकर्मणि एभिर्वरणद्रव्यैरमुकगोत्र प्रवरान्वितममुकशर्माएं ब्राह्मणं वाग्दानादि विवाहावधि कर्मकर्तमाचार्यत्वेनत्वामहं वृणे इति तद्व्यं प्राचार्य हस्ते दत्वा कर्म कुरु ब्रूयात्- करवाणीति प्राचार्यो बृयात् ॥ ततो यरस्य पाद प्रक्षालनं कुर्यात्-~30 नमोस्त्वनन्ताय सहस्रमूर्तये सहस्त्र पादाक्षिशिरोरुवायहे । सहस्रनाम्ने पुरुषाय शाश्वते संहस्रकोटी युगधारिणेनमः ॥ इति पादौ प्रक्षाल्य "गन्धद्वारेत्यादिना" तिलक कृत्वा अक्षतपुष्पमालादिभिरलं कृत्य, हरिद्रारंजिततडलैः स्थालीमापूर्य तदुपरिपञ्चपूगीफलानिश्रीफलं हरिद्रापञ्चबण्ड यज्ञोपवीतानि यथावित्तद्रव्यंच संस्थाप्य कौशेयपीतवस्त्रणा छाद्य सम्मुखीकृत्य इन्द्राणी पूजयेत् । आवाहनम्-आगच्छागच्छ (३८०) काकाहरत करे, धूल्यमधुपर्कपद्धतिः । कल्याणि शचीन्द्रमाणवल्लभे। यावत्पूजां करिप्यामि तावत्वं सुस्थिाभव ॥ ॐ आदित्यै राणासीन्द्राण्यै उपणीपः पूपासि धर्मायदीप्वः, इत्यावारण - एतन्तेति प्रतिष्ठाप्य 30 इन्द्राण्यै नमः इति मंत्रेण पंचोपचारादिभिः सम्पूज्य प्रार्थयेत्---शचीदेवि नमस्तुभ्यं त्रैलोक्यैश्वर्यवंदिते । सौभाग्यमायुरारोग्यं मत्कन्यार्थ प्रयच्छुत्वम् ॥ ततो वारत्रयं गोत्रोचारणं कृत्या संकल्पं कुर्यात् - अयेहेत्यादि देशकालौ संकीय-अमुजराशिरमुकशर्माहं कारिप्य माण कन्यादानांगत्वेन वाग्दानकर्मणि अमुकगोत्रस्यामुक- प्रवरस्थामुकशास्त्रिनोऽमुकदेदाध्यायिनोऽमुकशर्मण: प्रपौत्री, अमुकशर्मणः पौत्री, अमुकशर्मणः पुनी, अमुकनाम्नी श्री स्वरूपिणींवरार्थिनी कन्यांज्योतिर्विदादिष्टे सुमुहर्ततुभ्यंदास्ये इ तिवाचांसंप्रददे । ततः स्थालीद्रव्यसहितां वरहस्तेदद्यात् । स्व- स्तीतिवरोब्रूयात् । ततोवरः कंठाभरणादिकं सौभाग्यद्रव्यं सुवासिनीद्वारा मंगलवायवेदध्वनिपुरस्सरंकन्यायपरिधापयेत् । (कचिद्देशेषु इदानींकन्याहस्तेनइन्द्राणीपूजनभवति तदपिदेशाचा- रतः समीचीनम् ) इति गृहागतवरंपतिवाग्दानविधिः । अथ धूल्यघमधुपर्कपद्धतिः। ततः कन्यापिता धूल्यसामग्रीसम्पाद्याचम्य प्राणायामनयं विधाय भूतोत्सादनंकृत्वा संकल्पकुर्यात्-प्रयेहेत्यादि देशकालौ संकीर्त्यअमुकशाहममास्याः कन्यायावीजगर्भसवैनोनिवर्हण पूर्वककन्यादानप्रतिग्रहार्थ गृहागतं स्नातकंवरं विष्ठरादि मधुप- न्तैिरचयिष्ये । संलग्नवाग्दानोभावे प्राचार्यवृणुयात् । घरप- क्षीयमाचामार्यमाय पापद्धन० इत्यादिना पादप्रक्षालनम्, 'गन्धद्वारेतितिलकं अक्षतपुष्पमालादिभिरलंकृत्य वासांगु- लीयधौतवस्त्रादिवरणसामग्री हस्तेनिधाय येहेत्यादि सकीय अमुकराशिरमुकगोवपत्ररोऽहं करिष्यमाणकन्या- कर्मकर्तुमेभिर्वरणद्रव्य रमुकगोत्रममुक : दानकर्मणि फर्मकाण्डरत्नाकरे धूल्यमधुपर्फपद्धति ॥ (३१) शर्माणं ब्राह्मणनाचार्यत्वेनावृणे । घृतोऽस्मीति प्रत्युक्तिः श्राचार्यस्तु इति प्रार्थयेत् । यथ कन्या पिता वारणादि याज्ञीयकाष्टमयं हरिद्रादिरंजितं नूतनचतुष्पादमासनं (पीढ़ा) दर्भास्तीर्ण पीठासनमाहाह साधुभवानास्तामचयिष्यामो भवन्तमित्युक्त्या पूर्वाभिमुग्वं वरंकाप्टपीठोपरि स्थापयेत् । अर्चय इति परोचूयात् ततोऽर्चकादन्य प्राचार्यों विष्टरोविष्टरो विष्टर इति वारत्रयंवदेन , एवंसर्वत्र । तत उत्तराभिमुखोऽर्चको विष्टरमादयविष्टर: प्रतिगृयतामितिवदेत् । वरश्च 30 प्रतिगृह णामीतिवदेत् । उदगप्रविष्टरंतूष्णीमादाय-३० वर्मोऽस्मीत्यथ- घेणपिरनुष्टुप्छन्दो विष्टरोदेवता उपवेशने विनियोगः । ७० वोऽस्मि समानामुद्यतामिवसूर्यः । इमंतमभितिष्ठामियोमा कश्चाभिदासति । अनेनमंत्रेण विष्टरमुदग्रमासने निधायतदुपरि उपविशति । ततः तप्तोदकेन पाद्यपाद्यं पाद्यमित्यन्येनाविते, पाद्यप्रतिगृहातामिति यजमानोवदेत् 30 प्रतिगृणामीत्युक्त्वा तत्पानभूमौनिधाय, 30 विराजोदोहोसीति प्रजापतिपि यजुश्छन्दः यापोदेवताः दक्षिणपाद प्रक्षालने विनियोगः (क्षत्रि- यादेः सव्यंपादमादौ प्रक्षालयेत्) अंजलौजलमादाय उ0विराजो दोहोसि व्विराजोदोहमशीयमयि पाद्यायैव्विराजोदोहः । इति ब्राह्मएस्थादौ दक्षिणपादं प्रक्षाल्य,अनेनैव मन्त्रेण वामपादं प्रक्षा- लयेत् पुनद्वितीयविष्टरमादाय अन्येन आवितेविष्टरो विष्टरो विष्टरः, विष्टर प्रतिगृहातामिति यजमनोक्तिः । वर: ३० प्रतिगृहणामीतिवदेत् । ॐ वमोऽस्मीति अथर्वणऋषिः अनुष्ट- प्छन्दो विष्टरोदेवता चरणाधः स्थापनेविनियोगः । तन्मंत्रः 30 वोऽस्मि समानामुद्यतामिवसूर्यः इमंतमभितिष्ठामि योमा. कश्चाभिदासति । इति मंत्रणासने उदगग्नंपादयोरधस्तान्निद- धाति ॥ ततो ऽर्यकरणम् एवंसदर्भमष्टांगमर्थ्य हस्तेनिधाय * टि० जलदधि घृतंक्षारं वदी तडुलास्तिलाः । सिद्धार्थकास्तथादर्भा अध्योऽष्टांग प्रकोर्तित । नाभौहस्तेप्रदातव्य स्कम्नेशिरसिवकके । जानुनीश्ची- दरे दानाठाझायों पर पूजने ।
44 ( ३८२) कर्मकाण्डराकरे, धूल्यर्घमधुपर्कपद्धति ॥ . यजमानोवरस्य वक्ष्यमाणगंगेपुदद्यात् । ततोऽर्थोऽधः इत्यन्येन श्रावितेअर्घ्य प्रतिगृह्यतामिति यजमानोवदेत् ७० थागतोसिवर श्रेष्ठः सर्वकामार्थसिद्धये । प्रतिग्रहसमर्थोसि गृहाणाध्य नामोस्तुते 30 प्रतिगृह्णमीति वदेत् ततो चरः ॐ प्रापस्थ इति प्रजापति नपिर्यजस्छन्द प्रापो देवता अर्घ्य ग्रहणे विनियोगः। 30 प्रापःस्थ युष्माभिः सर्वान्कामानाप्न- वानि । इत्यर्घ पाणिभ्यां प्रतिगृहा मूर्दपर्यन्तमानीय । 30 समु द्व इत्यस्य प्रजापतिपिर्यजुश्छन्द यापोदेवता अर्धाभिमंत्रणे विनियोगः। ॐ समुद्रवः महिणोमि स्वायोनिमभिगच्छत । अरिष्टास्माकंवीरामापरा सेचिमत्पयः॥ इत्यनेन मंत्रण ऐशान्यां निनयन्नभिमंत्रयतेवरः ॥ यथान्येनाचमनीयम् याचमनीयं, आचमनीयमित्युक्त, आचमनीयं प्रतिगृह्यतामिति यजमानो बदेत, वरः 30 प्रतिगृहामीत्युक्त्वा यजमानदत्तामाचमनीयं प्रतिगृह्य, . अामागछन्निति परमेष्ठी ऋपित्तीछन्द आपो- देवता आचमने विनियोगः । ॐ श्रामागन्यशसामास वर्चसातमाकुरुप्रिय प्रजानामधिपतिं पशूनामरिष्ठि तन्नाम् । इतियरः सकृदाचम्य तृष्णी स्मार्तमाचमनीयं कुर्यात बारत्रयम् । (अत्रकतिचित्पुस्तकेपु "प्रसौजस्ताम्रो० असौपोवसर्पति." मंत्रयोरध्ययन लिखितं तत्सूत्रअनुक्तत्वादप्रमाणम् ) ततोदधि- मधुघृत कांस्यपात्रस्थापितं द्वितीयकांस्यपात्रेणपिहितमादाय ॐ मधुपामधुपकामधुपर्कः इत्यन्येनश्राविते यजमानः पति- गृहातामित्युक्त्वा, पररच-30 प्रतिगृह्णामीत्युक्त्वा, यजमान हस्तस्थितमुद्घाटितं मधुपर्क वक्ष्यमाणमंत्रण प्रतीक्षते-30 मित्रस्यत्वेति बृहस्पति ऋषियजुश्छन्दो मित्रोदेवतादातृ करस्थ- मधुपर्क प्रतीक्षणे विनियोगः 1 30 मित्रस्यत्वा चक्षुषा प्रतीक्षे, इतिप्रतीदय, 30 देवस्यत्वेति बृहस्पति संगिरसपियजश्छन्दः सविता देवता मधुपर्क ग्रहणे विनियोगः । 30 देवस्यत्वा सवितुः प्रसवैश्विनो हुभ्यां पूष्णो हस्ताभ्यां प्रतिगृहामि । ॐ सूज . .
कर्मकामनाकर धूमपरदति ॥ (३३) इति मधुपर्क दातृहस्तात्संगृह्य सत्र्यपाणौकृत्वा दक्षिणहस्ता- नामिकया निःप्रयोति मिश्रयति । ॐ नमाश्यावेति प्रजापति अंपियंजुश्छन्दः सवितादेवता स्वहस्तस्थमधुपविक्षणे विनि- योगः । ॐ नमाश्यावास्यायान्नशनेयत्त अविध्दं तत्तनिष्कतामि। इति मंत्रेण मधुपर्क सकृत्प्रदक्षिणमालोड्य, अंगुष्ठाऽनामिकाभ्यां सकृतूष्णीं मधुपर्क किंचिद्भूमौ क्षिपेत । एवं पुनावारमालो- टनं निरुक्षणंच कृत्वो, ॐ यन्मधुन इति कुत्सपि जंगतीछन्दो मधुपर्को देवता मधुपर्क प्राशने विनियोगः । ॐ यन्मधुनों मध- व्यं परम ॐ रूपमन्नाद्यं तेनाहं मधुनो मधव्येन परमेण रूपेणा- नाधेन परमोमधच्योऽन्नादोऽसानि । इति मंत्रेणानामिकया धार- अयंपुनः पुनमंत्रमक्त्या बरो प्राश्नीयान्, उच्छिष्टस्यैव पुनर्मत्रव- प्राशने कोऽपिदोपोनास्ति ॥ सर्वभुक्त्यावा प्राशितशेष पूर्वस्या- मसंचरे क्षिपेत् छातत याचमनम् 0 ऋग्वेदा स्वाहा। द्विस्मिार्ता- चमनं कृत्वाजलं स्पृष्ट्वा वक्ष्यमाण मंत्रणांगान्यालभेत, वरी सजलम्-मुग्ध कराग्रेण बाम प्रास्ये अस्तु, तर्जन्यंगुष्ठाभ्यां--- नसोमें प्राण प्रस्तु, युगपद्दक्षिणादिनासारंध्रयोः, अनामिका- गुष्ठाभ्यां युगपचक्षुपी अक्षणोम चक्षुरस्तु, मध्यमांगुष्टाभ्यां दक्षि- णकर्ण-30 कर्णयोर्मे श्रोत्रमस्तु, अनेनैव यामकर्णम् । करोग्रेण दक्षिणवाहुम्-30 बाहोमें बलमस्तु, एवं यामयाहुम् । युगपद्ध- स्तेनोरू-30 उचोंम ओजोऽस्तु || ततः शिरःप्रभृति पादान्तानि सर्वाङ्गानि उभाभ्यां हस्ताभ्यामालभते ! अरिष्ठानि मेऽहानि तनूस्तन्वामे सहसन्तु । ततो द्विराचमेत् ॥ (इदानी सूत्रकारणे गवालंभनविधिरुक्तः सचकलियुगे वय:-अस्वयं लोकवि- द्विष्टं धर्ममप्याचरेनतु ॥ इति याज्ञवल्क्यादिस्मृतिषु दर्शनात् । यजाधान गवालभं संन्यासं पलपैतृकम् । देवराञ्च सुतोत्पत्ति कलौपंचविवर्जयेत् ॥ इति पाराशरस्मतेः । अतश्च मयाप्यस्मि- * टिपणी-ताम्बूलेक्षुफलेचैव भुक्तस्नेहानु लेपने। मधुपर्कच सोमेन नोन्छिष्ठ मनुग्नयीत् ॥
( ३०३) कर्मकार रत्नाकरे, भूत्यर्थमधुपर्कपद्धतिः ॥ - पद्धतौ गवालभस्य कलौनिषिद्धत्वा दुसर्गस्यच यज्ञविवाह- योरभाप्तत्वाद् गौरित्युच्चारणादि यज्ञविवाहयोः कलौनप्रवर्तते- अतोगवाळभं न लिखितम् ) (गौरालभरच कलिवजितेकाले भवतीतिदिक्) ॥ ततः समाचारादाचार्यप्रमुग्वाः वरपक्षीया एतद्ब्राह्मणकटिकासप्तकमुच्चैःपटेयुः ॥ मंत्राः-30 अथवरं घृणीतेव्बलबद्ध_देवाऽएतस्य ग्रहस्य होम प्रेप्सतितेऽस्माऽएतंवर ॐ समयन्ति क्षिप्रेनइमंग्रहं जुहवदिति तस्माद्वरं वृणीते ॥१॥ अथवरं वृणीतेय ॐ हवकंच सुपुवाणोव्यरं वृणीते सोऽस्मैसर्वः समृध्द्यते तस्माद्वरं वृणीते ॥२॥ अथ चारासाऽउपानहाऽउपम चते । अग्नौहवैदेवा घृतकुम्भं प्रवेशयाचा स्ततोब्बराहः संव- भूव तस्माद्वरोहो मेदुरोघृताद्धि संभूतस्तस्माद्वराहेगावः संजा- नते। स्वमेवैतद्रसमभिसंजानते । तत्पशूनामेवैतद्रसे प्रतिति- ष्ठति । तस्माद्वाराहाऽउपानहाऽउपमुंचते ॥३॥ सऽआजगाम गौतमोयत्र प्रवाहणस्य जैवले रास । तस्माऽओसनमाहार्योदक- माहारयांचकाराथहास्माऽअर्घचकार ॥ ४ ॥ सहोवाच व्यरंभवतेगौनमायदद्मइति । सहोवाच प्रतिज्ञातोमऽएपवरोयांतु कुमारस्यान्ते व्वाचमभाषथास्तांमेञ्चहीति ॥ सहोवाचदैवेपुवै गौतमतQरेषमानुपाणां वृहीति 15। सहोवाचविज्ञायतेहास्ति हिरण्यस्यापा गोऽअश्यानांदासीनां प्रवाराणां परिधानानांमानो भवान् बहोरनन्तस्यापर्यन्तस्याभ्यवदान्योभूदिति । सवैगौतम- तीर्थनाच्छासाऽइति । उपैम्यहंभवन्तमिति । वाचाहस्मैव पूर्व ऽउपयन्ति ७ इति पठित्वासहस्रशीतिः पुरुषसूक्तेनवा 30 नमोस्त्वनन्तयसहस्रमूर्तये सहस्रपादाक्षिशिरोधरायते । सहस्र- नाम्ने पुरुपाय शाश्वते सहस्रकोटीयुगधारिणेनमः । इति गंधाक्षत पुष्पमालादिभिः चरं सम्पूज्य अद्येहेत्यादि० अमुकराशिरमुकोऽहं करिष्यमाण कन्यादानकर्मणिएभिः स्वागुलीयचासोभिरग्नि बृहस्पतिदैवतैः कन्यादानप्रतिग्रहार्थं अमुकगोत्रंत्रमुकप्रवरं प्रमु- कवेदाध्यायिनं, अमुकशाखिनं, अमुकशाणं विष्णुस्वरूपिण कर्मकाण्डरनाकर धूल्यमधुपर्कपनि ॥ (2) कन्यार्थिनं परत्वेनत्वामहंवृणे । चरणसामग्री वरोगृहीत्वा . वृतोऽस्मीतियात्- 30 कोदोत्कस्माऽादात्कामोऽप्रदात कामायादात् कामोदाताकामः प्रतिगृहीताकामैतत्ते । ततों । वस्त्रपरिधानंवक्ष्यमाणमंत्रैः कुर्यात् 10 जरांगच्छेति प्रजापति ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो चासोदेवतावासः परिधाने विनियोगः । ॐ जरांगच्छपरिधत्स्ववासो भवाकृष्टीनामभिशस्तिपावा । शतंय जीवशरदः सुवर्चारयिंच पुत्राननुसंव्ययस्वायुधमतीदं परिधत्स्व- वासः ॥ इत्यंगवस्त्रम् । 30 याअकृन्तन इति प्रजापतिषिस्त्रि- ष्टुप्च्छन्दो चासोदेवता उत्तरीयवस्त्र परिधाने विनियोगः । याप्रकृन्तनवयंय्याअवतन्वत । यश्चदेवीस्ततृनभितोततंथ तास्त्वा- देवीर्जरसे संव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्ववासः । इत्युत्तरीयम् । परिधास्यैहत्यथर्वणऋषिः पंक्तिश्छन्दो बासोदेवता अधोवस्त्रप- रिधाने विनियोगः . परिधास्यैयशोधास्यै दीर्घायुत्वायजरद- टिरस्मि शतंच जीवामिशरदः पुरुचीरायस्पोयमभिव्ययि प्ये इत्यधोवस्त्रम् । अथोष्णीपम् (पगड़ी) 30 युवासुवासा इति विश्वामित्रऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो यूपोदेवता उष्णीपपरिधानेविनि- योगः ।। 30 युवासुवासाः परिवीतयागात्सउश्रेयान्भवतिजाय मानस्तंधीरासः कवयउन्नयन्ति साध्योमनसादेवयंतः । इति शिरोवस्त्रंपरिधापयेत् । ततोवरायालंकरणानिदद्यात् । हिरण्यग- भसंभूतंपचित्रंचांगुलीयकम्।श्रेयस्करंपवित्रंचमीणातुकमलापतिः कुंडलादिकान्- कुंडलेकटकेदिव्येहारं च मणिसंयुतम् । प्रीत्या तुभ्यंप्रदास्यामि गृहाणविष्णुरूपिणे ततः। शय्यादानम्-30 खट्वास्थापित सवस्त्रायैसालंकारायैशय्यायैनमः पाद्यगंधादिभिः सम्पूज्य-अद्यहेत्यादि देशकालौ संकीर्त्यअमुकराशिगोत्रप्रवरोऽहं गृहागतवरार्चनविधौ इमांसालंकारां सवस्त्रांपरितः पानीयपाक ताम्रकांस्यलोहादि भांडयुतांसछत्रोपानहपादुकादिभिः परियुतां शय्यांअमुकगोत्रप्रवरान्विताय कन्याधिने ऽमुकशर्मणे वरायतु- भ्यसंप्रददे । इति शय्योपरिक्षिपेत् । अद्यपूर्वोच्चारि० अमुकोऽहं ४ कमाण्डरस्नाकरे, धूरमधमधुपपद्धति ॥ शय्यादान प्रतिष्ठार्थ हिरण्यरजतमुद्रांवा अमुकशर्मणेवरायसंप्रददे इति प्रतिष्टाद्रव्यं वरहस्तेदत्वाप्रार्थयेत् । अशून्यंशयनं नित्यमशू- न्यामुन्नतिश्रियम् । सौभाग्यदेहिमे नित्यं शय्यादानेनकेशव । यानिकानिचपापानि अद्यावधिकृतानि च । ताम्रादिपात्रदानेन तानिनश्यन्तुकेशव । ततश्राचार्यादिभ्यो दक्षिणांदत्वा वरान्म- नाशिपं गृहणीयात् । ततो यजमानस्यतिलकम्-0 भद्रमस्तु शिवंचास्तु महालक्ष्मीः प्रसीदतु । रक्षन्तुत्वांसुराः सर्वेसंपदः । सुस्थिराभव । इति कृत्वा सफलपुष्पवरोहस्तेधृत्वा प्राचार्योपठेत् मंत्राः-30 अग्नयेत्वामा वरुणोददातु सोऽमृतत्वमशीयायुर्दात्र ऽएधिमयोमाप्रनिग्रहीने ।। ॐ रुद्रायत्वामावरुणो ददातुसो ऽमृतत्वमशीयमाणोदात्र एधिव्ययोमहां प्रतिग्रहीने ॥२॥ 30 बृहस्पतयेत्वामांवरुणो ददातुसोऽमृतत्वमशीयत्वग्दान एधि भयोमहाप्रतिग्रहीत्रे ॥३॥ ॐ यमायत्वामह्यं वरुणोदातुसोऽमृत- त्वमशीययोदात्र एधि व्वयोमहाप्रतिग्रहीत्रे ॥४॥30 कोऽदात् कस्माऽअदात् कोमोऽदात् कामायादात् । कामोदाताकामः प्रतिग्र- हीताकामैतत्ते । इति मंत्राशि प्रतिगृह्यसमाचारादरस्य महानी- राजनं कुर्यात् । ( कतिचित्पर्वतीयप्रान्तेषु वरवरणविधि वराग- मनसमये कुर्वन्ति, अत्रप्रान्ते मधुपर्कान्तकुर्वनति, पारंपार्यत्वा न्मयापीदानी संगृहीतः) ततो वरपक्षीय प्राचार्या विवाहाग्नि सस्कारवेद्यांगत्वा तत्र वृहद्वेदीमध्ये हस्तमात्रां वेदींकुशैः परिस- मुहातान्कुशानशान्यां परित्यज्य गोमयोदकेनोपलिप्य जलेनाभ्यु- क्ष्य सुवमुलेन प्रागनास्तिस्रोरेखा विलिख्य उल्लेखनक्रमेणाना- मिकांगुष्ठाभ्यां मृदमुध्दृत्य पुनर्जलेनाभ्युक्ष्य तृष्णीं कांस्यपात्रोप नीतं अग्नि स्वाभिमुखवेद्यां स्थापयेत् ॐ नत्वेवामां इति बृर- स्पतिपि यजुश्छन्दोऽग्निर्देवता अग्न्यावारने विनियोगः । 30 नत्वेवामासोघः स्यादधियज्ञमधिविवाहं कुरुतेवैश्वानर मर माचारयिष्ये । ॐ भूः स्वः अग्ने इहागच्छेततिष्ठ। ॐ प्रसीदयहे समाकृशानोहव्यवाहन । अग्नेपावकमार्यनामाप्टकनमोस्तुते कर्मकाण्डरलाकार, विवाहपद्धतिः । (३८७) इति अग्निप्राय॑तद्रक्षणार्थ तत्र काठादिकं दत्वावदीशाने दीपं प्रज्वाल्य तंत्र कंचित्पुरुषरक्षार्थ नियुजेत् । इति धूल्यपद्धतिः ॥ अथ विवाहपद्धतिः ॥ - ::- अग्निमुपसमाधायपाणिं गृह्णीयात् । इति पारस्करसू- त्राट् धूल्यन्ते । कन्यापाणि ग्रहणात्पूर्वमेव । · शाला- यामग्नि स्थापनभवति । तच्च पूर्वोक्तविधिना अवश्यमेय कर्तव्यम् । कतिचिद्देशनिवासि ब्राह्मणाः पाणिग्रहणान्ते शाला गत्वाग्निस्थापनं कुर्वन्ति । तच्च सूक्रव्यत्ययंकर्म । अथकन्यापि- त्रादयः सुसजितां कन्यांगणेशादिपूजास्थानं नीत्वाकान्यादान सामग्रीसंपाद्य पश्चिमाभिमुखीकन्यांमातुः क्रोडे समुपवेशयित्वा उत्तराभिमुखोदाता स्वदक्षिणतः पत्नीपुत्रवांधवादिकान्कृत्वा । समुपदिशेत् । ततो विवाहलग्नात्पूर्व वरपक्षीया बान्धवादयः कन्यापरितोपिकार्थमानीतं वस्त्रभूपणादि वहुमूल्यहारवेशरादि सौभाग्यद्व्यं काश्मीरोद्भव द्राक्षाफलनारिकेलादि मिष्टान्नदार्थान् सौभाग्यपेटिकांच प्रथक् प्रथा कतिपयपात्रेपुसंस्थाप्य (वरडाही) ... इति स्वाग्रतः कृत्वा स्वस्तिवाचनादि पंचवाद्यघोषपुर: सरस्व मपिच परस्तस्मिन्कन्यादानगृहस्थलेगत्या स्वानीतं कन्यासम्मुग्वी कृत्यतत्रैवस्थापयेन् । कन्यापि प्रसन्नमनसातानिवस्तृनि हस्तेन स्पृष्ट्यास्वीकरोतु ततोवरःपूर्वाभिमुग्बो भूत्वा उपविशेलू ततः कन्यापिता तानवरेणसहागतान्पुरुपान्गंधाक्षतादिभिर. लंकृत्य संतोष्यचविसृजेत् । ततो वरकन्ययोरन्तराले-30 सम- उक्तं च प्रयोगदपणे सर्वत्रप्राइमुखोदाता प्रतिमाहोउदमुख. एष एवं विधिनित्यः कन्यादाने विर्ययः । उक्तं च स्मृतिसंग्नहे--प्रतवन्धे विवाहेच चतुर्थी सहभोजने । प्रनंदानेमखे श्राद्धपत्नीतिष्ठति दक्षिणे । प्रादाने मधुपर्कस्य पन्यादाने तथैवच । कर्मस्वेतेपु वैभार्या दक्षिणेतूपवेशयेत् । इति धर्म प्रवृत्ती।
(३८८) कर्मकाएटरताकरे, विवाह पद्धति ॥ जंत्विति भार्गवमृषि रनुष्टुप्छन्दः सृों देवनान्तर पट करणे विनियोगः । ॐ समंजन्तु विश्वेदेवाः समाणेहृदयानिनौ । समातरिश्वा संधाता समुदेष्ट्री दधातनौ ॥ इतिवरः पठित्वा अन्तर्पटं दद्यात् ॥ ततःकन्यापिता पुनर्वराय वस्त्रयुग्मं कन्यापरि धानार्थ वस्त्रयुग्मं वरपरिधानार्थ वनचतुष्टयं च दद्यात् । अये- हेत्यादि देशकालौ संकीय अमुकोऽहं कन्यादान कर्मणः पूर्वाद्ग- त्वेन अमुकशर्मणे वराय सद्रव्यं वनचतुष्टयं संप्रददे इति दयात् । घरश्च स्वस्तीत्युक्त्वा प्रतिगृहा तेपुवस्त्रद्वयं कन्याय परिपानार्थ प्रयच्छति । वस्त्रद्वयं स्वय परिधत्ते । वरः स्वानीत वस्त्राभ्यां कन्या परिधान कारयेत् । 30 जरांगच्छेति प्रजापति ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो वासोदेवता अधोवस्त्रपरिधाने विनियोगः । 30 जरांगच्छ परिधत्स्वव्यासो भवाकृष्टी नामभिशस्तिपावा । शतंच जीवशरदः सुवर्चारयि च पुत्राननुसंव्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्ववासः॥ इत्यधोवस्त्रपरिधत्ते । अथोत्तरीयं (शाटकाम्) 0 याऽअकृन्तन्निति प्रजापतिनपिस्त्रिष्टप्छन्दो वासो देवता उत्तरीयशाटकापरिधाने विनियोगः। 30 याऽअकृन्तन्नवयन्या- इतन्वत। याश्चदेवीस्तन्तृनभितो ततन्थ । तास्त्वादेवीर्जरसे संध्ययस्वायुष्मतीदं परिधत्स्व वासः॥ ततोयरः स्वानीताभूषणं दयात-हिरण्यगर्भसंभूतमाभूषणमनोहरम् । भद्रप्रदं प्रदा- स्यामि गृहाणप्रीतिवर्धकम् ॥ ततः कन्यापक्षीयाचार्यों चरानीत सौभाग्यद्रव्यसिन्दरादिभिः कन्यामलंकृत्य सौभाग्यपुटकं (सुरागपूड़ा) वक्ष्यमाणमन्त्रण कन्याशिरसि संधारयेत-30 सौभाग्यजनक द्रव्य रक्षासूत्रेण वेष्टितम् । सौभाग्यमस्तु ते कन्ये धारणाच्छरदाशतम् ॥ इतिमंत्रेण केपेषु वनीयात् ॥ अथवरः कन्यापित्रादत्तं वस्त्रद्वयं स्वयं परिधत्त-3 परिधास्यै इत्याधर्षणपिः पंक्तिश्छन्दो चोसो देवता यस्त्रपरिधाने विनि योगः परिधास्यै यशोधास्यै दीर्घायुत्वा जरदष्टिरस्मि । शतं- व जीवामि शरदः पुरूची रायस्पोप मभिसंव्ययिष्ये ॥ अयोत्तरी- कर्मकाण्डरताकरे विवाह पद्धति.॥ -- (३८६) यम्-अयशसामेत्या थर्वणपिः पंक्तिरछन्दो लिंगोक्ता देवता उत्तरीय परिधाने विनियोगः। 30 यशसामाद्यावापृथिवी यश- सेन्द्रा बृहस्पतिः । यशोभगश्च माऽविन्दद्यशोमा प्रतिपद्यताम्॥ अथ कन्यापिता एनौ परिहिताहतसदशवस्त्रौ कन्यावरौ समंज- यति । परस्परं समंजयेथामिति प्रेषेण । ततो चरः कन्यासम्मुखो- भूत्वा, 30 समंजन्वित्याथर्वण ऋपि रनुष्टुप्छन्दो लिंगोक्ता देवता परस्परसमंजने विनियोगः। ॐ समंजन्तु विश्वेदेवाः समापौ हृदयानिनौ । सम्मातरिश्वा सन्धाता समुदेष्ट्री दधा- तुनौ ।। इति सम्मुखी कृत्य, ततः कन्यावरयोहस्तेन देशाचाद्- गणेशादि पञ्चाङ्ग देवतानां पूजनं कारयितव्यम् । इदानीमेव वरः कन्यापक्षीयायाचार्याय कलशद्रव्यं बहुधनं वित्तशाव्यरहितं हस्तेधृत्या संकल्पं कुर्यात्-30 अद्यत्यादि देशकालौ संकीर्त्य अमुकराशिरमुकोऽहं श्रावयोर्वरकन्ययोः ज्योतिशास्त्रानुकूलाष्ट भुकटादिसंमेलने न्यूनातिरिक्तवैधव्यादिदाराहयोगाना 'मनिष्ठ निरसनाथ तथाच दशायामन्तर्दशायां गोचरेऽष्टकवर्गेनैर्याणे चर्पफलेऽपिवा यत्रकुत्र स्थानस्थितानां आदित्यादिनवग्रहाणां दुष्टानां दुष्टदोपो पशान्त्यर्थ शुभानां शुभफलाधिक्य प्राप्तये इदं- सुवर्ण सुवर्णनिष्क्रयी भूतं रजतद्रव्यं वा कन्यापक्षीय पुरोहि- ताय अमुकगोत्रायामुकरामणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे । ततो ब्राह्मण आशीर्वाद दद्यात् । अथच बंशगोत्रसापिंडयनिश्चयार्थ गोत्राचारस्कर्तव्यः (तत्रक्रममाह-ऋष्यशृङ्गः-घरगोत्रंस. मुच्चार्य प्रपितामह पूर्वकम् । नामसंकीर्तयेद्विद्वान्कयायाश्चैवमे यहि ॥ कारिकाकारश्च-उच्चारःप्रातिलोम्येनपित्रीणां सर्वकर्मसु । कन्यादाने यजवृत्तावानुलोम्येन सस्मृतः ॥) तत्रादौ कन्यापक्षी याचार्या मंगलाचरणपठनपूर्वकं वरस्य गोत्रप्रवरादिकं पृच्छेत- अविरलमदधाराधौतकुम्भः शरण्यः फणिवरवृत्तगात्रः सिद्धसा. ध्यादिवन्धः । त्रिभुवनजनविघ्नध्वान्तविध्वंसदक्षोवितरतुगज- वक्रः संततं मंगलवः ॥ किंगोत्रस्य किंमवरस्य किंशाखिनः किं - (३१०) कर्मकाण्डरताकरे, विवाह पद्वति ॥ 1 वेदाध्यायिनः किं शर्मणः प्रपौत्राय, किंशभणः पौत्राय, किं शर्मणः पुत्राय आयुष्मते कन्यार्थिने विष्णुस्वरूपिणे वराय । ततो वराचार्यो मङ्गलंपठित्वोत्तरयति-दोधातदन्तस्त्रंडः सकल- सुरगणाडम्बरेषुप्रचण्डः, सिन्दुराकीर्णगंडः प्रकटितविलसच्चारु- चान्द्रीयखंडः। गंडस्थानन्तघडः स्मर हरतनयः कुण्डलीभूत- शुंडो विघ्नानां कालदंडः सभवतुभवतां भूनये वक्रतुण्डः॥ अमुकगोत्रस्य अमुकप्रवरस्य अमुकशाग्विनः अमुक वेदाध्यायिनः अमुकशर्मणः प्रपौत्राय, अमुकगोत्रस्य अमुकप्रवरस्य अमुक- शाखिनः अमुकवेदाध्यायिनः अमुकशर्मणः पौत्राय, अमुक- गोत्रस्य अमुक प्रवरस्य अमुकशाखिनः अमुक वेठाध्यायिनः अमुकशर्मणः पुत्राय, शायुप्मने विष्णुस्वरूपिणे कन्यार्थिने अमुकनाम्नेवराय । पृच्छेत्-किंगोत्रस्य किप्रवरस्य किंशाखिनः किंवेदाध्यायिनः किंरामणः प्रपौत्री किंशर्मण पौठी किंशर्मणः पुत्रीं श्रायुप्मती श्रीस्वरूपिणीं वरार्थिनी किनारनी कन्याम् । अथ कन्यापक्षीयाचार्यो मंगलं पठित्वा प्रत्युत्तरं ददाति- शैवालश्रेणिशोभां दधतिहरजटायल्लयो रस्तयस्यास्तुद्धासोल्लास वेल्लहरशफरतुलां यत्रधत्तेकलावान् ॥ उन्मीलभोगिभोगावलि- सुभग सिताम्भोजसंभावितात्मा गद्गानंगारिसंगा महतितव- विधौमंगलान्यातनोतु ॥ अमुकगोत्रस्य अमुकप्रवरस्य अमुक शाखिनः अमुझवेदाध्यायिनः श्रमशर्मणः प्रपौत्रीम्, एवं अमुकशर्मणः पौत्रीम्, अमुकशर्मणः पुत्री श्रीयुप्मती श्रीस्व- रूपिणी वरार्थिनी अमुक नाम्नी कन्याम् ।। पृच्छेत्-किंगोत्रस्य किंमवरस्य किंशामिनः किंवेदाध्यायिनः किंशर्मणः प्रपौवाय, फिशर्मणः पौत्राय, किशर्माणः पुनाय प्रायुप्मते विष्णुस्वरू- पिणे कन्याधिने किंनाम्ने वराय ॥ अथ वराचार्या धुनः मङ्गलं “पठित्वा उत्तरपेत्पृच्छेच-सफलभुवनयन्धौरमिन्दोः सरोजर- नुचितमितिमत्या गावपादारविन्दम् । घटयितुमिवमायी यो जयत्याननेन्दो चटदलपटशायी मद्गल वो ददातु ॥ अमुकगोत्रस्य कर्मकाण्डरताकरे, विवाह पद्धतिः ॥ ( ३६१). अमुकप्रवरस्य अमुकशाखिनः अमुकवेदाध्यायिनः अमुकशर्मणः प्रपौत्राय, एवं पौत्राय, एवं पुत्राय प्रा० वि० कन्या० अमुक शर्मणे घराय। किंगो० किं. किंशा० किं वेदा० किंशाण: प्रपौत्री, पौत्री पुत्री मा. श्रीस्व० वरा० किनाम्नी कन्याम् । कन्यापक्षीयाचार्यः पठित्वोत्तरयेत्--कस्त्वं ब्रमनपूर्वः कचतव- वसतिर्याखिला ब्रामसृष्टिः कस्तेनाथोहानाथः कचतव जनको नैवतातं स्मरामि । किन्ते भीष्टं ददामि त्रिपदपरिमिताभूमि रत्पंकिमेतत्तत्रैलोक्यं भावगर्भ वलिमिदमवदद्वामनो वासपा- यात् ॥ अमुकगोत्रस्य अमुक प्रवरस्य अमुकशाखिनः अमुकवेदा- ध्यायिनः अमुकशर्मणः प्रपौत्री, पौत्री, पुत्री श्रायुष्मती श्री- स्वरूपिणी परार्थिनी अमुकनाम्नी कन्याम् । पृच्छेच्च-किंगो० किंप्र० किंशा किंवेदा० किंशर्मणः प्रपौत्राय, किंश० पौत्रायं, किंश पुत्राय श्रा०वि० कन्या० अमुकनाम्ने वराय ॥ वरप- क्षीय:०-उत्तुंगस्तनमंडलोपरिलसत्मालम्बमुक्तामणे रन्तविम्वि- तमिन्द्रनीलनिकरच्छायानुकारिद्युतिः। लज्जाव्याजमुपेत्यनम्रवदना- स्पष्ठमुरारेवपुः पश्यन्तीमुदितामुदेऽस्तुभवतां लक्ष्मीविवाहोत्सवे अमुक गोत्रस्य अमका परस्य अमुकशाखिनः अमुकशर्मणः प्रपौत्राय अमुकप्रवरस्य अमुकशाखिनःअमुकशमणः पौत्राय अमुकगोत्रस्य श्रमुफकसमषः पुत्रायायुष्मते विष्णुस्ररूपिणे कन्यार्थि- नेवराय । पृच्छेत् किं गोप्रि० किंशा किं वेदा० किंशमएः। प्रपौत्रीम् एवं किंगो० किंमत किंशा किंवेदा० किं शर्मणः पौत्रीम् एवंपुत्री आयुष्मती श्रीस्वरूपिणी वरार्थिनी किंनाम्नी कन्याम् । ततः कन्यापक्षीयाचार्यों ब्रूयात्-प्रत्यासन्नविवाहमंगलविधौ देवार्चनव्यग्रयादृष्ट्याग्रे परिणेतुरेवलिखितां गंगाधरस्याकृतिम् । उन्मादस्मितरोषलज्जितधिया गौर्याकथंचिचिचार वृद्धस्त्रीवच- नाप्रियेविनिहितः पुष्पांजलिः पातुवः । अमुकगोत्रस्य अमुक प्रवरस्य अमकशाम्विनः अमुकवेदाध्यायिनः अमुकशमणः प्रपौ. नीम एवं अमुकशम्र्मणः पौत्रीम्, अमुकशर्मणः पुत्रीं आयुष्मती ( ३४२) कर्मकाण्डरत्नाकर, विवहा पद्धतिः ॥ श्रीस्वरूपिणीं वरार्थिनी अमुकनाम्नीकन्याम् । एवंवारत्रयं गोत्रो च्चारं कृत्वा उभयपक्षीयौ श्राचाय्यौं आशीर्वादंपठेताम् । यशैवाः समुपासते शिव इति ब्रह्मेतिवेदान्तिनो वौद्धावुद्ध इति प्रमाणप. टवाकत तिनैय्यायिकाः । अहन्नित्यथ जैनशासनरताः कर्मतिमीमां- सकाःसोयंबोविदधातु वांच्छितफलं त्रैलोक्यनाथोहरिः। यादृग्जा. नासि जाम्बूनदगिरिशिग्वरे कान्तिमिन्दोः कलानामित्यौत्सुक्येन पत्यौस्मितमधुर मुखाम्भोरुहंभाषमाणे । लीलांदोलायमानश्रुति कमलमिलद् भुंगसंगीतसाक्षी पायादम्भोधिजायाः कुसुमशरकला नाटयनान्दीनकारः ततः कन्यापिता ददानि ददानिददानीति ब्रूयात | ततो गोत्रोच्चारणदक्षिणांदद्यात् ततो लग्ने समायाते ग्रहदानानिकुर्यात् । वरः अद्येहामकोऽहं विवाहकर्मणि इदानीं अमुकलग्नीवधिकानां यत्रकुत्रचित्स्थानस्थितानां दुष्टग्रहाणां दुष्ट फल निरासपूर्वक शुभग्रहाणां शुभफलप्राप्तये इदंसुवर्ण तन्निष्क्र- यीभूतं द्रव्यंवा अमुकगोनाय ब्राह्मणाय तुभ्यंदास्ये 0 तसन्नमम ततः सुलग्नेसमायाते इदानींकन्यां नासिकाभूपणाभ्यामलंकृतां कुर्यात् मंगः 0 भद्रकणेभिरित्यादि मंत्र भूपयित्वा पाद्यगंधा- क्षतपुष्पमालादिभिः वक्ष्यमाणमंत्र, श्रीसूक्तनतांपूजयेत् 30 श्रीश्चतेलक्ष्मीश्चपल्यावाहोरात्रे पाश्र्वनक्षनाणिरूप मश्विनौ व्यातम् इष्पन्निपाणामुम्मऽइपाण सर्वलोकंम्म ऽइपाण ॥१॥ ॐ सम्वे अश्विके अम्बालिके नमानयतिकश्चन । ससस्त्यश्वका सुभद्रिका कम्पीलवासिनीम् ॥२॥ ॐ समस्ये देव्याधिया सन्द. क्षिणयोरुचक्षसा । ममायुः प्रमोपीर्मोऽअहं तवव्वीरं विदेय तवदेविसन्डशि ॥३॥ इति मंत्रः कन्यां सम्पूजयेत् अथ कन्यादानसंकल्पः। अथ कन्यापिता सुवर्णजलतिलतुलसी कुशचन्दनाक्षत वरीपनर्वादिभिः पूरितंशंख स्वदक्षिणहस्ते निघाय तदुपरि कर्मकागरत्नाकारे, विवाहपद्धति । प्रत्यङमुखोपविष्टायाः कन्यायादक्षिणांगुष्टंगृहीत्वा कांस्यपात्रोपरि कृत्वो साच कन्यामाता स्वपतिदत्तिणस्थाऽविच्छिनां वारिधारा तत्र दयात्-~30 स्वस्ति, इनिवरोच्यात् ( 30 स्वस्तीतियरो याद्धमचेति वधुपितेति संस्कारगणपतौ)। श्री गणेशाय नमः,, श्रीस्वेष्टदेवतायैनमः, ॐ पितृभ्योनमः, 30 नमः श्रीपुराणपुरुषो तमाय, संकल्पः-30 नमः परमात्मने श्रीमुकुन्दप्तचिन्दानन्दस्य ब्रमणोऽनिर्वाच्यमायाशक्तिविजृम्भितामायायोगात् । कालकर्म स्वभावावि तमहत्तत्वोदिताऽहङ्कारोद्भूत वियदादिपंचमहा- भूतेन्द्रियदेवतानिर्मितेऽण्डकटाहेचतुर्दशलोकात्मके लोके लीलया तन्मध्यवर्तिमगवत' श्रीनारायणस्यब्रह्मणः स्मृष्टिंकुर्वतस्तदुद्धर- যায় प्रजापतिप्रार्थितस्याच्युतानन्नवीर्यस्य श्रीमद्भगवतो महापुरूपस्यमहाजलौघमध्ये, परिभ्रममाणानामनेककोटिब्रह्मा- ण्डानामेकनमे अव्यक्तमहदहङ्कारथिव्यप्तेजोवाय्वाकाशाचाव- रपरावृते, अस्मिन्मह निव्रह्मांडांबडे, श्राधारशक्तिश्रीमदादि वाराहदंष्ट्राग्रविराजिते, कर्माऽनन्तवासुकि तत्तककुलिकककोटक पंझमहापाशग्वाष्टमहानागध्रियमाणे, रावतटरीकवामन कुमुदांजनपुष्पदंत सार्वभौमसुप्रनीकाष्टदिग्गजप्रतिष्ठिनानामतल- वितलसुतलतलातलरसातलमहातलपाताललोकानामुपरिप्रतिष्टिते, भृलोकभुवलॉक स्वलीकमहलकि जनोलोकतपोलोकसत्य लोकाय सप्तलोकानामधोभागे, चक्रवालशैल महावलयनागमभ्यवत्तिनो महाकालमहाफणिराजशेषस्य, सहस्रफणानांमणिमंडलमंहिते, दिग्दन्तिशुटोत्तम्भिते, अमरावत्यशोकवती भोगवतीसिद्धवती गान्धर्ववती काञ्च्यवन्त्यलकावती यशोवतीतिपुण्यपुरीप्रतिष्टिते: इन्द्राग्नियमनितिवमणवायु कुवेरेशानाष्टदिक्पालप्रतिप्टिते, घरध्वाधरसोमयाप्रभंजनानल प्रत्यपप्रभासाख्याप्ठ वमुभिवि. राजिते, हरयकमद्र मृगव्याधापराजित कपाली भरव शम्भुक- पर्दिवृषाकपिवटुरूपायैकादशम्दैः संशोभिते, मद्रोपेन्द्रसवित धातृत्वष्ट्रयमेन्द्रेशानभगमित्रप्रपाम्य द्वादशादित्यप्रकाशिते,, ५० (३६५) कर्मकाएहरताकरे, विवाहपद्धतिः॥ , , यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहार धारणाध्यान समाध्यष्ठानयोग- निरतवशिष्ठवालखिल्य विश्वामित्र दक्षकात्यायनकौण्डिन्य गौत्तमादिरस पाराशर्यव्यासवाल्मीकिशुकशौनक भरद्वाजसनक सनन्दनसनातनसनत्कुमारनारदादि मुख्यमुनिभिः पवित्रिते, लोकालोकाचलवलयिते, लवणेञ्जरससुरासर्पिर्दधि क्षीरोदकयुक्त सप्तार्णवपरिवृते, जम्बूप्लच शाल्मलिकुशकोंच शाकपुष्करारव्य सप्तद्वीपयुते, इन्द्रकांस्यताम्रगभस्तिनागसौम्यगन्धर्वचारणभार तेति नवबंडमंडिते, सुवर्णगिरिकर्णिकोपेत महासरोरुहाकार पञ्चाशत्कोटियोजनविस्तीर्णेभूमंडले, अयोध्यामथुरामाया काशी काञ्च्यवन्तिकाद्वारावतीतिसप्तपुरीप्रतिष्ठिते, महामुक्तिपदस्थले,, शालग्रामशंभलनन्दिग्रामेतिग्रामत्रयविराजिते, चम्पकारण्यवदरि- कारण्यदंडकारण्याईदारण्यधर्मारण्य पझारण्यगुह्यारण्यजम्बुका- रण्य, विन्ध्यारण्यद्राक्षारण्यनहुवारण्यकाम्यारण्य द्वैतारण्यनैमि- पारण्यादीनांमध्ये, सुमेरुनिषधकृट शुभ्रकूट श्रीकूट हेमकूट रजत कूट चित्रकूट किष्किन्धाश्वेताद्रिकट हिमचिन्धाचलानां, हरिवर्ष किंपुरुपवर्षयोश्चदक्षिणे, नवसहस्रयोजनविस्तीर्णे भरतम्बंडे, । मलयाचलसमाचलविन्याचलानामुत्तरेण, स्वर्णप्रस्थचंडप्रस्थसू- क्तिक यावन्तकरमणक महारमणकपांचजन्य सिंहललङ्काऽशोकव- त्यलकावती सिद्धवती गांधर्ववत्यादि पुण्यपुरीविराजिते, नवग्व दोपद्वीपमंटिते दक्षिणावस्थितरेणुकाद्वयसूकर काशीकाची कालिकावटेश्वर कालञ्जर महाकालेनिनवोपरयुते, द्वादशज्योति- लिङ्ग भागीरथी गौमती तिप्रायमुना सरस्वती नर्मदा तापीपयो- पणीचन्द्रभागा कावेरी मन्दाकिनी प्रवराकृष्णावेण्याभीमरथी तुगभद्रामलापहा कृतमालाताम्रपर्णी विशालाक्षीवंचुला चर्मण्य- तीवेत्रवतीभोगवती विशोकाकौशिकीगंटकीसरयू सर्वपापहा- रिणी शोणाभवनाशिनीत्यनेक पुण्यनदीभिर्विलसिते ब्रह्मपुत्र सिन्धुनदादि परमपवित्रजलयिराजिते, हिमवन्मे गोवर्धनौ- धनित्रपट महेन्द्रमलय सहान्द्रकील पारिगामायनेक पर्वतसम , फर्मकाएरंसाकरे विवाहपद्धतिः ।। ( ३६५) न्विते, मतंगमाल्यकिष्किन्ध ऋष्यशृङ्गेति महानगसमन्विते,, । अंगवंगकलिंग कारमीरकांचोजसौवीर सौराष्ट्र महाराष्ट्रमगधने पालकेरल चोरलपांचालगौड मालवमलयसिंहलद्रविडकर्नाटक ललाटकरहाटवरहाटपानाट पाएट्यनिपधमागध आन्ध्रदशार्णव भोजकुम्गान्धारविदर्भ विदेहवाल्हीकवर्वरकैकेय कोशलचिराट शूरसेनकोङ्कणकैकट मत्स्यभद्रपारसिक खरियायनम्लेच्छजालंधरे- निसिद्धवत्यन्यदेश विशेपभापा भूमिपालविचित्रिते,इलायतकुमा भद्राश्चकेतुमाल किंपुरुपरमणक हिरण्मयादि नववर्षाणांमध्ये भरतखण्डे, कोकनहिरण्यशृङ्गकुजावुदमणिकर्णीवट शालग्राम सूकरमथुरागया निष्क्रमण लोहार्गलपोत्तस्वामि प्रभासवदरीति चतुर्दशंगुहाबिलसिते जम्बूद्वीले कुरुक्षेत्रादि समभूमध्यरेखायाः पूर्वदिग्विभागकुलमेरोदक्षिण दिग्यिभागे, विन्ध्यस्योत्तरभागे गंगाद्वारतोत्तरदिग्विभागे-कर्मभूमौ व्यासवसिष्टादि परमभा- गवतमुनिवराश्रमानुपचित्रिते हिमवत्पर्वतैकदेशे, (अलकनन्दा भागीरथी यमुनासरस्वती मंदाकिनी क्षीरगंगा स्वर्गारोहिणी ऋषिगंगा कांचनगंगा गाड़गंगा धवलापिंडरगंगा, तथाकेदारक्षे- त्रांतर्गत वासुकी मंदाकिनी कालीगंगा भिलंगनाद्यनेक सुरधुनी सहस्रपुण्यधाराप्रविलसिते,मायापुरीगंगाद्वारकु जाम्रतपोवनश्री क्षेत्रादि नानाक्षेत्रसंशोभिते, देवप्रयाग मद्रप्रयाग स्कन्दप्रयाग क- एवाश्रमप्रयागविष्णुप्रयोगगणेशप्रयागेति महाप्रयागनानानदीनद संगमजनितोपप्रयागसंवलितेकेदारबडे केदारनाथ गदमहेश्वर विः- श्यनायतुंगनाथरुद्रनाथ कल्पनाथकमलनाथ भिल्लेश्वराद्यनेकशिव- लिंगालंकृतउर्वशी नवदुर्गानन्दाराजराजेश्वरी, भुवनेश्वरी, याला- त्रिपुरसुन्दरी, चण्डिकाछिन्नमस्ता,मार्गदायी कालिकामहिषम- दिनीगौरीउमामाहेश्वर्यादि शकल्यावृते,श्रीनरनारायणक्षेत्रेवदरी, श्वर नरनारायण कुवेरोध्दव नारदगरुड़ घण्टाकर्ण कैलाससिंह योगेश्वर केदार ब्रह्मकपालशिला नारदशिला वाराहशिला सिंह शिला मार्कडेयशिला संगतदेवाग्निनारदीय प्रहलादर्भ बसो.
(६६) ककाररताकर, विव हपतिः॥ र्धारादि परमपावनतीर्थ विलसितेचदिरिकाश्रमे,, अलकनन्दाया वामकृले दक्षिणकले वा पिंडरनद्याश्चोत्तरकले दक्षिणकले चा अलकनन्दा भागीरथ्योरंतराले अमुक स्थाने (ग्रामे) मत्स्यकर्म वराहसिंह बामन परशुराम रामकृष्णबुध्दकल्कीतिदशावतारा- णांमध्ये बौध्दायतारे, नानादेवतीर्थसरिद्भिः पावितेनवसहस्र- योजनविस्तीर्णभारतवर्षे., निग्विलजन पावन परमभागवतोत्तम शौनकादि नियासिते नमिपारगये आर्यावर्तान्तर्गत ब्रह्मावतक- देशे, सूर्यान्वगभूभृत्प्रतिष्टिते श्रीमन्नारायण नाभिकमलोद्भूत- सकलजगत्म्रष्टः परायजीविनोब्रमणोद्वितीयपरादें, एक- पंचाशत्तमवर्व प्रथममासे प्रथमपत प्रथमदिसे अदनोद्वितीपयामे तृतीयेमुहतरथतरादि-द्वात्रिंशत्कल्पानांमध्येऽष्टमे श्रीश्वेतवाराह- कल्पे,, स्वायंभुयादि चतुर्दशमन्वन्तराणांमध्ये सप्तमेवैवस्वत- मन्यन्तरे,, कृनत्रेताद्वापरकल्किसंजकानांचतुर्णा युगानांमध्ये, वत्तमाने अष्टाविंशतितमेकलियुगे प्रथमचरणे, श्रीमन्नृपविक्रमा- विथ संख्यागमेन चांद्रसौग्नाक्षत्रादि प्रकारेणागतानांप्रभवा- - दिपष्टि सम्वत्सराणांमध्ये, अमुकनाम्निसम्बत्सरे,, उत्तर (वाद. क्षिण ) गोलावलं विनि श्रीमार्तडमंडले, अमुकत्तौं, अमुकमासे, अमुकपने, अमुकनिथौ, अमुकवासरे, अमुकनक्षत्रे, अमुकयोगे, अमुककरणे, अमुकराशिस्थेसूर्य, चन्द्रे, भौमे, बुधे, गुरौ, भृगौ, शनी, राहौ, केतो,, यथायथा स्थानस्थितेपुसत्सु, एवंगुणविशे पेण विशिष्टायां शुभपुण्यतिथी,, अमुकगोत्रप्रवरो ऽमुकराशिः सपत्नीयुत्रणैत्रादिपरिवारयुतोऽमुकशर्मा, (वा वर्मा, वा गुप्तोऽहम् ) मम-(महापापोपपायाभ्यां नानायोनिपुयत्कृतम् । बालभावेनयत्पापं चतुर्थच यत्कृतम् ॥ श्रात्मार्थचययत्पापंपरा- धेचैवयत्कृतम् ॥ तीर्थपुचैवयत्पापंगुर्ववज्ञांकृतंचयत् ॥ रागद्वे- पादिजनि कामक्रोधेनयत्कृतम् ॥ हिंसानिद्राविजपाएं भेददृष्टया- नयन्मया । देहाभिमानजपा सर्वदायन्मयाकृतम् । भूतभव्यं- चयत्पापं भविष्यंचवयत्कृतम् ॥ शुभकमानयत्पापं जानता. . , , , कर्मकाण्डरनाकर विवाहपनि ।। ( ३६७) जानताकृतम् ।। महल्लघुचयत्पापं तन्मेक्षिपंप्रष्यति ॥ ब्रह्महा- मद्यपस्तेयी तथैवगुरुतल्पगः । महापापानिचत्वारितत्संसर्गातु: पंचमः ।। अनाहिताग्नितापण्य विक्रयापरिवेदनम् । इन्धनार्थ- द्रुमच्छेदःस्त्रीहिंसौषधि जीवनम् ॥ कृमिकीटादिहन यत्किचि- स्पाणिहिंसनम् । मातापित्रोरशुश्रूषातद्वाक्याकरणतया । परका- र्यापहरणं परगन्योप जीविनम् । ततोऽज्ञानकृनवापि कायिकंवा. चिकनथा। मानसं त्रिविधपापंप्रायश्चित्तरनाशिनम् । तत्सर्वना- शयक्षिकन्यादानेन केशव ।। (स्त्रीणांविशेष:)-पाणिग्रहण- मारभ्य स्वकर्मापरिपालनम् ।। इन्द्रियाभिरतिःसु नानायोनि- पुयाभवेत् । कृमिकीटादिहननं पंक्तिभेदादिकं तथा । स्पृष्ठास्पृष्ट. मनाचारं मनसादोपकल्पनम् । तत्सर्वनाशयेः क्षिप्रंकन्यादाने न- केशव)। इत्यादि प्रकीर्णपातकानां तत्कालपर्यन्तं संचितानां- लघु स्थूलसूक्ष्माणां च निःशेपपरिहारार्थ,, तथाच-आध्यात्मि- काधिभौतिकाधिदैविकतापत्रयनिराकरणाय,, जाताजातमनोवा- कायकर्मजनिताग्विलपापापनोदनाय च कन्यारोमसमसंख्यक- शनसहस्रगुणितदिव्यवर्षनिरतिशयसानन्दगोलोकावाप्तयेऽनेन . रेणास्यांकन्यायामुत्पादयिष्यमाणसन्मत्या श्रात्मनोमातृपितृ- वंशजान्द्वादश पूर्वान्द्वादशपरान् आत्मनश्चपवित्रीकतुकामः कन्यादानकल्पोक्तज्योतिष्टोमातिरात्रसमफलावाप्निकामः श्रुति- स्मृतिपुराणोक्तफलावाप्नये श्रीधर्मस्वरूपीस्वेटदेवताप्रीतयेच,, अमुक गोत्रस्यत्र मुकप्रवरस्य अमुकशाग्विन:,अमुकवेदाध्यायिनो ऽमुकशर्मणःमपौत्राय ॥ अमुकगोत्रस्यअमुकप्रवरस्यममुकशा- विनोऽमुकवेदाध्यापिनो मुकशर्मणःपौत्राय । अमुकगोत्रस्या मुकप्रवरस्या मुकशाग्विनोऽमुकवेदाध्यायिनोऽमुकशर्मणापुत्राय आयुष्मते विष्णुस्वरूपिणे कन्यार्थिने, अमुकगोत्रायामुकप्रवराय अमुकवेदाध्यायिने अमुकशर्मणे वराय,,-अमुकगोत्रस्यअमुक- प्रवरस्थ,अमुकशाग्विनोऽमकवेदाध्यायिनोऽमुकशर्मणाप्रपौत्री । अमकगोत्रस्य मुकप्रवरस्य अमुकशाग्विनो ऽमुकवेदाध्यायिनः ।
(३५) व.माए रत्नाफर, विवाहपतिः ॥ अमुकशर्मणः पौत्रींम् । अमुकगोत्रस्य अमुकप्रवरस्य अमुकशा- खिनो ऽमुकवेदाध्यायिनो ऽमुकशर्माणः पुत्रीं श्रायुष्मती श्रीरू- पिणींवरार्थिनी, अमुकीनाम्नीमिमांकन्यां यथाशक्त्यलंकृतां । यथा शक्त्युपकल्पित यौतकयुतां प्रजापतिदेवतां, देवाग्निगुरु- ब्राह्मणसन्निधौ, अग्न्यादिसाक्षिकतयासहधर्माचरणायतुभ्यमई- संप्रददे,, प्रतिगृह्णातुभयान ॥ इतिदाताउत्थाय सकुशतुलसी- दलसुवर्णयुतशंखं कन्यादक्षिणांगुष्टं वरदक्षिणहस्तेसमर्पयेत्,, सचकन्यांगुष्टमंचलग्रंथिकरणात्पूर्यनमुञ्चेत,, दातोत्थायैवदान- वाक्यानिपठेत्-30 कन्यांकनकसंपन्नामनेकाभरणेताम् । दास्यामि विष्णवेतुभ्यं ब्रह्मलोक जिगीपया। विश्वम्भरःसर्थ- भूताःसाक्षिण्यासर्वदेवताः ॥ इमांकन्यांप्रदास्यामि पितृणांनार: गायच ॥ ततःप्रार्थयेत्-गौरी कन्या मिमांवित्रयथाशक्ति विभू- पिताम् ।। गोत्रायशर्मणे तुभ्यं दत्ताविप्रसमाश्रय । कन्यालक्ष्मीः समाख्याता वरोनारायणःस्मृतः । तस्मात्कन्या प्रदानेन कृष्णोमे- मीयतामिति ॥ ततोवरकन्ययोर्लक्ष्मीनारायणनिमित्तकं पूजन- मप्याचरन्ति केचित ॥ इनिसम्पूज्य प्रार्थये--२० नारायण महा वाही लक्ष्म्यासह दयानिधे, कन्यादानेन सुप्रीतःसदाशान्ति प्रयच्छमे, ततः कन्यां प्रार्थयेत्-कन्येममाग्रतो भूयाः कन्येमेदेबिपा र्घयोःकन्येमेपृष्टतोभूयास्त्वदानान्मोक्षामान्पुयाम्,ततोवरःपठेत् ॐ देवस्यत्वासवितुः प्रसवेश्विनोर्वाहुभ्यांपूरणोहस्ताभ्याम् 30 मजापनयेकन्यां प्रतिगृहामि-ॐ द्यौस्त्वाददातु पृथिवीत्या प्रति गृहातु 1 30 स्वस्तिइत्युक्त्वाकामस्तुतिपठेत्-ॐ कोऽदात्कस्मा ऽअदात्कामोऽदात्कामायादान , कामोदाताकामा प्रतिग्रहीताकामै तत्ते । ततो दातावद्धांजलिः पुनः पठेन्-कन्याममगृहेजातापालि : तावत्सराष्ठकम् । तुभ्यंधिप्रमयादत्तापुत्रपौत्रविधिनी । धर्मचार्थे , *टि.-विध नगरिजाते-गृहस्पति:-चतुष्पाद गृहं कन्या दामीचत्ररथं तरूम् तिमानाद्विजोदया भृग्यादीनुपविश्यच,, कमकासरत्नाकर विपद्वति : च कामेच नातिरितच्यात्ययेयम् ततोवर:-नातिचरामीति ब्रूयात् , ततः कन्यादाताउपविश्य कन्यादानप्रतिष्ठांकुर्यान् , ततः सुवर्ण यथावित्तहस्तेगृहीत्वा निलकशयवजलान्यादाय तत्स- दद्येत्यादि देशकालौसकीामुकोहं कन्यादानकर्मणः सांगफलावा- प्तये प्रतिष्ठार्थमिदंसुवर्णमग्निदैवतं अमुकगोत्रायामकशर्मणेवराय तुभ्यसंप्रददे इतिदत्वा वरश्च 30 स्वस्ति इतिवदेत् । अत्राचा रादन्यदपियोतकत्वेन सुवर्णरजतताम्रगोमहिप्यश्वग्रामादिकन्या पितायथासंभवंददति, अन्येऽपिवान्धवादयो यथाधियोतक प्रयच्छति केचनहोमान्तेगोदानसमयेप्रयच्छंति, अत्रदेशाचारतो व्यवस्था, ततः शिष्टाचारात्पुरोहितादिः द्रव्यपूगीफलसर्वपाक्षत हरिद्राभिः संमिलितमंगलपदायैर्वरकन्ययो वस्त्रांचलग्रन्थि 30 भद्रंकर्णेभिरितिपठित्वा, दृढ़वध्वा, पतन्तेदेव इतिप्रतिष्ठाष्य,0 भूर्भुवः स्वः अंचलग्रंथे सुप्रतिष्टितोभव, तंचचतुर्थीकर्मपर्यन्तं नमोचयेत् । ततोचरोयध्वाअंगुष्ठत्यजेत, तनाकन्यापिताकन्यादान, साद्गुण्यार्थभूयसीदानकुर्यात्-ततः स्ववित्तानुसारंद्रव्यहस्तेनि- धाय संकल्पः अद्येत्यादिदेशकलौ संकीर्त्यामुकराशिरमुकशर्मा सपत्निकोहं कन्यादानकर्मणः श्रुतिस्मृतिपुराणोक्तसांगफलावाप्तये श्रीलक्ष्मीनारायणप्रीतयेदमाभूयसींदक्षिणां नानानामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नटनर्तकेम्पोदीनानाथेभ्यश्च विभज्यदास्ये ॐ तत्सन्नमम, । अथ च देशाचाराच्छोलिकाभरणम् , जीवितपतिपुत्रवतीस्त्रियमाय एकस्मिन्कास्यपात्रे शुक्ल तन्डुललडकफलेनदंदद्रव्याणि कदलीफलद्राक्षापूगीफल जाती फल जम्भीरीफल वीजपूरफलनिम्बूफल थाम्रफल अक्षोटकफल - ८ टिO-न्यादानमारभ्य चतुर्थाकर्मपर्यन्त विवादशब्देनोच्यतेतन्मध्ये पन्यया स्थपित्रादि योगदन मानेन तकमिति जयगम दुग्गि।
(१००) कर्मकाएरनारे विपद्धति नारिकेलफलानि कास्यपानस्थितानि जातमात्र जीवितपत्रपति वती स्त्रीहस्तेन, (तदभावकन्याहस्तेन) ब्रामणायदद्यान् । तत्र मंत्रः-ॐ याः फलीनीर्याऽअफलाऽअपुष्पायाश्चपुष्पिणी। बृहस्प- तिमसृतास्तानोमुचन्वर्ट हसः । इतिप्रथमम् । अथद्वितीयम्-. कर्परैलासुवासितशर्कराघृतमिश्रितानि मोदकशष्कली सुहालिका फेणीसर्वपकानानि सुवर्णरौप्यकांस्यपात्रस्थितानिपतिपुत्रवती स्त्रीहस्तेन गृहीत्वा ब्राह्मणायप्रयच्छेन-मंत्रः-30 अन्नपतेन्नस्य नोदेशानमीवस्यशुप्मिणः । प्रप्रदातारं तारिपऽऊर्जन्नो धेहि द्विपदे शचतुष्पदे ॥२॥ ततस्तृतीयम् ततोवासांसि हरितपीतश्वेतरक्त नीलमंजिष्टकौसुम्भकाश्मीरादि नानादिग्देशजातानि वहुमुल्यानि दुकलोत्तरीयकंचुकादीनिकांस्यादिपात्रोपरिस्थापितानिकमारीहस्तेन सौभाग्यवत्यैदद्यात् मंत्र:-3“यदश्वोयबासऽउपस्तृणत्यधीवास या हिरण्यान्यस्मैसन्दानमवन्तं पीशंप्रियादेवे प्वायामयन्ति इतिदत्वा । ततश्चतुर्थम्-मणिमौक्तिक हीरक गारुत्मत मरकत' परागादि विविधोपशोभितस्वर्ण रचित कटककेयर पदांगुलीयक कांचीहार वेयक नासिकाभरणादि विविधाभरणानि सुवर्ण- रौप्य कांस्यादि पात्रस्थितानि कन्यायै प्रयच्छन्. हिरण्यगर्भः समवर्तता भृतस्य जातः पतिरेकऽासीत् । सदाधार पृथ्वीं ध्यामुतेमांकस्मै देवायहविपाविधेम ॥ 30 रूपेण वोरुपमन्या गांतुथोवोविश्ववेदाविभजतु । ऋतस्यपंथाःप्रेतचन्द्रदक्षिणाविश्यः पशव्यतरिक्ष यतस्वदस्यै । इतिछोलिकाभरणम् । अध्यरः पिया- प्रत्तामादाय स्वदत्तिणहस्तेनकन्यायाः वामहस्तं गृहीत्वातामग्रतः कृत्वादानगृहादवेद्यामग्निसमीपे गन्तुनिष्कामयेन् । यदषीत्या थर्वणऋपिरनुष्टुप्छन्दोलिंगोक्ता देवता निष्कमणे विनियोगः 30 यदैपिमनसादरंदिशोनुपवमानोवा हिरण्यपणविकर्णः सत्वा । मन्मनसांकरोतु हे ! श्रीअमुकदेविमयासहायतोगच्छ । ततोऽग्नता कश्चिद्घाह्मणे जलपूर्णकलशंस्कन्धेनिधायगच्छेत् । ततः कन्यावरौ अग्निसमीपं गच्छन्नौ कन्यापिनापरस्परं समीक्षेषामितिप्रेषेण कर्मकागरत्नाकर विनापति: (४०१) ॐ अघोरचक्षुरित्यादीनां चतुमित्राणांमजापति ऋपिराचन्तयो स्त्रिष्टुयमध्ययोरनुष्टुप्छन्दः कुमारीदेवता परस्परसमीक्षणे विनि- योगः । ॐ अघोरचक्षुरपतिघ्नेधि शिवापशुभ्यः सुमनाः सुवर्चा व्वीरसूर्देवकामास्योनाशन्नोभवद्विपदे शंचतुप्पदे ॥१॥ सोमः- प्रथमो विविदेगन्धर्वोधिविदऽउत्तरः । तृतीयोऽग्निष्टेपतिस्तु रीयस्तेमनुष्यजाः ॥२॥ सोमोऽददद्गंधर्वाय गंधर्वोऽदददग्नये रयिंचपुत्रांश्चादादग्निम्मामर्थोऽहम्माम् ॥शा सानः पूषाशिव तमामरयसान अरूऽउशतीविहर । यस्यामुशन्तः प्रहरामशेपं यस्यामुकामबहवोनिविष्ठयै ॥४॥ इतिमिथः समीक्षणकुमतः । सचस्कन्धकलशीयो ब्राह्मणामार्दाभिषेकात्तं जलपूर्णकुम्भस्कन्धे धृत्वावाग्यतो दक्षिणतस्तिष्ठेत् । अथच बरोवधूंअग्रतः कृत्वा अग्निप्रदक्षिणीकृत्य वधूस्वदक्षिणतः कृत्वा दक्षिणपादेनकटं (चटाई ) उल्लंध्य दक्षिणपादनमतः कृत्वा उपविशेत् । ततोवर स्त्रिराचम्य प्राणायामत्रयं विधायवधुंदक्षिणपारवें उपवेश्यअर्घ संस्थाप्य प्रधान संकल्पकर्यात्-अद्ये हेत्यादि देशकालौ संकीर्त्य अमुकगोत्रोऽमुकशहि चातुर्वर्गफलाप्तये श्री परमेश्वरप्रीतये पितृप्रत्तामिमांगौरी कन्यां नामविधिना विवाहयिष्ये । तत्पूर्वी- गतया विवाहहोमकमणि कृताकृतावेक्षणादि ब्रह्मक कर्तब्रह्मण: पूजनववरणकरिष्ये इलिदक्षिणतो ब्रह्मासनमास्तीर्थ ब्राह्मणं गंधाचतादिभिः सम्पूज्य चरण सामग्री सम्पूज्य च करेधुत्वा अद्यहेत्यादि संकीर्ण अमुकराशिरमुकशर्मा एभिर्गन्धाक्षतपुष्प पूगीफलद्रव्यवासोभिः विवाहहोमकर्मणि कृताकृतावेक्षणादि ब्रह्मकर्मकर्नु अमुकशर्माणं ब्रह्मत्वेनत्वामहंवृणे, घृतोस्मीति ब्रह्माच्यात् । यथा चतुर्मग्बो ब्रह्मा स्वर्गेयज्ञनिरीक्षक तिधात्वं मम यजेऽस्मिन् ब्रह्मोभव द्विजोत्तम् । इति प्रार्थ्य, अग्नेस्त्तरा- सने ब्रह्माणं वृत्वा, ततो ब्रह्माणमग्नि प्रदक्षिणक्रमेणानीय अग्ने दैक्षिणतः कल्पितासने उदड्मुग्वं ब्रमाणमुपवेशयेत् । तत प्राचा- र्यस्यासनं परकन्ययोश्चासनं अग्नेःपश्चात्मागग्रकुशैः संपाद्यतत्रो- (४०२) वर्मकार डरत्नाकर, विवाहपतिः ॥ .. पविश्य, प्रणीतापानंसव्ये पाणौर कृत्वा दक्षिणहस्तेन पात्रस्थजले. नापूर्य दभैराछाद्य ब्रह्ममुग्वमवलोक्य अग्नेस्त्तरतः कुशोपरिनिद द्यात् । ततः परिस्तरणम् । पहिर्मुष्टिमादाय ईशानादिमागमै वाह- भिमदक्संस्थमग्नेः परिस्तरणं कृत्वा अर्थवद्वस्तृन्यासाद्य पश्चि मदिशि पवित्रछेदनानि त्रीणिकुशानि, द्वेपवित्रे, प्रोक्षणीपात्रं, आज्यस्थाली, समाजनकुशा पंच, उपयमनकुशा स्त्रयोदश, समि- धस्तिस्रः । सुवः प्राज्य, पूर्ण पानं काँपयोगिनीदक्षिणा एतानि वस्तूनिअग्नेः पश्चात्स्थापयेत् तत्र पात्राणिप्राग्विलान्युदग्राणि स्थापयेत् । तत्रैवशमीपलाशमिधाः लाजाः पालाशपत्रद्वयम् अख- डाश्मा, कुमारीभ्राता, तदभावेसजातीयोवा, नवीनंशूर्प, दधिमा- पाभ्यक्ततंडुलाः कार्पासवर्तिकावृताक्ताः, दधिमोदकाः, कटुतैल, दर्पणः चूडिका, कज्जलं, सिन्दूर, विदिकादिसौभाग्यद्रव्याणि । ततः पवित्रछेदनाथै स्त्रिभिर्दभैः प्रादेशमात्रेद्वेपचित्रेछित्वा, प्रो- क्षणीपात्रंप्रणीतासन्निधौ पुरतः कृत्वा तस्मिन्प्रणीतौदक मासिच्य पवित्राभ्यां तज्जलमुत्क्षिप्य, पवित्रेप्रोक्षण्यांनिधाय, दक्षिणहस्ते- न प्रोक्षणीपात्रमुत्थाय वामहस्तेधृत्वा तदुदकस्य दक्षिणहस्तस्य मध्यमाऽनामिकांगुल्योर्मध्यपर्वाभ्यामुच्छालनंकृत्वा प्रणीतोद- केन तज्ललंपोक्षेत् । प्रोक्षण्युदकेन पवित्राभ्यांपाज्यस्थोल्यादीनि वस्तूनि प्रोक्षेत् । श्राज्यस्थाल्यामाज्यं निरूप्याधिश्रित्यज्वलन्त- णेन प्रदक्षिणक्रमेण हविर्वेष्टयित्वा तद्वहौप्रक्षिपेत् । दक्षिण हस्तेन श्रुवमधोमुखप्रतप्य, सव्येहस्तेकृत्वा सौजनपंचकुश मूलं, मध्य मध्यं अौरग्रंसंमाय॑तानकुशान् बनौ प्रक्षिपेत् । ततः प्रणीतो दकेन श्रुवमभ्युच्य पुनःप्रतप्यस्वदक्षिणतः कुशोपरि निदध्यात्, आज्यमग्नेरयतार्य अंगुष्ठानामिकाभ्यां गृहीतपवित्राभ्यां भोज्यमु क्षिप्य अवेदय अपद्रव्यनिरसनंकृत्वा प्रोक्षणीयत्पवित्राभ्यामु- क्षिप्य तत्रपवित्रेनिदध्यात् । उपयमनत्रयोदशकुशान् । दक्षिण हस्तेनादाय वामेकृत्वोत्तिष्टन् घृताक्तास्तिस्रस्समिधस्तूष्णीमग्नौ प्रक्षिपेत् । ततःपवित्रेण प्रोक्षणीजलेन ईशानादुत्तरपर्यन्तं सम्प्रो.
कर्मकाण्डरलाकारे, विवाहपति. ॥ (४०३) चय पवित्रेप्रणीतायां निदध्यात् । संस्रवधारणा प्रोक्षणीपात्रं प्रणीतारन्योर्मध्ये निदध्यात् । ततोऽग्नेः पूजनम् । अग्नि परिज्व लव्य-30 एतन्तेदेव सवितर्यजं प्राईहस्पतये ब्राह्मणेतेनयजमव' तेनयज्ञपतितेनमामय । मनोजूति जुषतामाज्यस्य बृहस्यतियज्ञ मिमन्तनोत्वरिष्ठयज्ञ समिमंदधातुविश्वेदेवासऽइहमादयन्ता मोप्रतिष्ठ। ॐ भूर्भुवः स्वः योजकनामाग्ने सुप्रतिष्ठितोवरदोभव इत्यग्निप्रतिष्ठाप्य, (विवाहेयोजकोवहिः ) अग्निप्रज्वलितं चंदेजातवेदहुताशनम् । सुवर्णवर्णमनघमनन्तं विश्वतोमुखमासर्वनः पाणिपादश्चसर्वतोक्षिशिरोमुखम् । विश्वरूपोमहानग्निः प्रणीत: सर्वकर्मसु । इति संप्रार्थं ॐ चत्वारिशृङ्गात्रयोऽस्यपादाद्वेशी सप्तहस्तासोऽयस्य । त्रिधावद्धो वृषभोरोरवीति महोदेवोमयों २७॥ प्राविवेश | इति ,मंत्रेणाग्नि पाद्यगन्धादिभिः नैवेद्यान्तं सम्पूज्य, ब्रह्मणेनम' प्रथमरेखां पूजयेत् ॐ विष्णवेनमः इति मध्यमरेखां. ॐ महेश्वरायनमः इति तु रे । आधाग्ने जिह्वा- नांपूजनम् कराल्यैनमः ॐ धूमिन्यैनमः ॐ श्वेतायैनमः . लोहितायैनमः 34 महालोहितायैनमः सुवर्णायनमः, ॐm पद्मरागायनमः । इति सप्तजिह्वाश्चसम्पूज्य । इनिकर्म श्राचार्य द्वारास्वयंवाकृत्वा वरःसंकल्पपूर्वकं देवताभिध्यानं करोति, अयेत्यादिसवधूकोऽहं विवाहकर्मणायक्ष्ये, तन्त्र प्रजापति इन्द्र, अग्नि, सोम, अग्नि, वायं, सूर्यम्, अग्नीवरुणौ, अग्नि, व्वरु- सवितारं विष्णुचिश्वान्देवान | मरुत. स्वर्कान, व्वरूणम् ॥१२॥ मतासाहम्, ऋतधामानम्, अन्निंगन्धर्वम् ओषधीरप्सरसोमुदः । सई हित विश्वसामानं, सूर्यगन्धर्व मरीचीरप्सरसायुया, सुषुम्ण ॐ सूर्यरश्मि, चन्द्रमसंगंधर्व अपोऽप्सर अजा, भुज्युः सुपर्ण, यज, गन्धर्व, दक्षिणऽसरसस्तायाः प्रजापनि विश्वकर्माण मनोगंधर्धम् ऋक्सामान्यप्सरसऽएशीः।१२। चित्तं चित्ति, प्राकृतं श्राकृति, विज्ञातः विज्ञातिं मनः शकरीः दर्श, पौर्णमास, बृहन् रथन्तरम् प्रजापतिम् ।।१३। अग्निंभूतानामधिपति, इन्द्रज्येष्ठाना- (८०४) कर्मकाण्डरनाकर विवहपद्धति मधिपति, यमपृथिव्याधिपतिं वायुमन्तरिक्षस्याधिपतिं सूर्य दिवोऽधिपति, चन्द्रमसंनक्षत्राणामधिपति, वृहस्पतिं ब्रह्मणो ऽधिपति, मित्र ट० सत्यानामधिपतिं चरणमपामधिपतिम् समुद्र ॐ स्रोत्यानामधिपति, अन्न साम्राज्यानामधिपतिंसोममोपधी नामधिपति,सवितारंप्रसवानामधिात रुद्रपशूनामधिपतित्वष्ठार र्ट रूपाणामधिपति, विष्णं पर्वतानामधिपति, मरूनोगणानामधिप- तीन पिन्, परान्, प्रवरान्- नतान ततामहान्। १८। अग्नि, अगीन, अग्निं वैवस्वतं मृत्यं ॥५॥ चाज्येना यदये दानी कन्या देवता भिव्यानं करोति, अर्थम अगनि, अनि यर्यमणं अग्नि, अग्ने अर्थमयां, अगनि, अनि भग, च लाजै रहयो पुनर्वरः। प्रजापति, अग्नि ॐ स्विष्ठ कृतं,चाज्येनाहंयत्त्ये,, (एवंद्रव्य देवतेमिध्यानमा कृन्वा, विगाह होमस्य यजमान एक कत्र्तक त्वेन विवाहसमे प्रत्याहुत्पन्न न समेत्यागकुर्यात) ततः पातितदक्षिणजानुः कुडोन ब्रह्मणान्वाराः समिद्धतमेऽग्नौ सुवेणाज्याहुतिर्दद्यात् ॥ तत्राघारादारभ्य द्वादशाहुतिपर्यन्तं मुवावशिष्टं हुनशेपं घृतंपात्रे प्राशनार्थ प्रक्षिपेत् ॥ होममंत्राः- 30 प्रजापत्यादि चतुर्णी मंत्राणां प्रजापति षिस्त्रिष्टुप्छन्दो मंत्रोक्ता देवता प्राज्यहोमे विनियोगः। ३० प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये नमम । इति प्रजापति मनसाध्यात्वा, 30 इन्द्राय स्वाहा इदमिन्द्राय नपम | इत्याधारौहुत्वा, 30 अग्नये स्वाहा इदमग्नये नमम, ॐ सोमाय स्वाहा इदं सोमाय नमम इत्या ज्यभागौ । ततो महाव्याहृतिहोमः । महाच्याहत्तीनां प्रजापति- पियन्युष्णिगनुष्टुप्छन्दां से अग्नि वायु सूर्या देवता व्याहतिहो मे विनियोगः । ॐ भूः स्वाहा इदमग्नये नमम, 3.0 भुवः स्वाहा इदंयायवे नमम, ॐ स्वःस्वाहा इदमूर्याय नमम ।- ॐ त्वन्नो अग्ने इति चामदेव मृपि विटुप्छन्दः अग्नीचरणौ देवते सर्वप्रायश्चित्तहोमे विनियोगः। ॐ त्वन्नोऽग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्यहेटोऽभययासिसीष्टाः। यजिष्ठो वहितमः शोशु- - - कर्मकाण्डरक्षाकरे विगहराई ति.॥ (४०) चानोविश्चाद्वेपासि प्रमुमुग्ध्यस्मत स्वाहा ॥ इदमग्नीवरुणा भ्यांनमम । ३. सत्वन्नऽअग्न इति वामदेवऋपिं त्रिष्टुप्छन्दोऽ ग्नीवरुणो देवते सर्वप्रायश्चित्तहोमे विनियोगः। ॐ सत्वन्नोऽ अग्नेऽवमोभवोतीनेदिष्टोऽअस्याऽउपसोव्युष्टौ । अवयवनोब.. रुणर्ट रराणोचीहिमृडीकर्ट० सुबोन एधि स्वाहा । इदमग्नी वरुणाभ्यां नमम ।। 30 यायाश्चाग्न इति वामदेव ऋपि स्त्रिष्टु- प्छन्दोऽग्निदेवता सर्वप्रायश्चित्त होमे विनियोगः। 30 अयाश्चा- ग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वमयाऽसि । श्रयानो यजं व्यहास्यमानोधेहि पज ॐ स्वाहा । इदमग्नयेनमम ॥ 30 येते शतमिनि वामदेव ऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दो वरुणः सविता विष्णुर्विश्वे देवाममनः स्वर्णाश्च देवनाः प्रायश्चित होमे विनियोगः। 3. येते शतंत्र्यमणं ये सहस्र यजियाः पाशाविततामहान्तः । तेभि- नॊऽअद्यसवितोनविष्णुर्विश्वेमगन्तुमरुतः स्वर्काः ॥ इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्यो देवभ्यो ममद्भ्यः स्वभ्यो नमम । उदुत्तममिति शुनः- शेफ ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो वरुणो देवता सर्वप्रायश्चित्त होमे विनियोगः । उदुत्तमं वरुणपाशमस्म दवाधम विमध्यम ॐ श्रथाय । अथा व्ययमादित्यव्रतेतवानाग सोऽअदितये स्पाम स्वाहा ॥ इदं वरुणाय नमम । इति सर्वप्राय- श्चित होमः । अत्र प्रणीतोदकं स्पृष्ट्वा प्रायश्चित्त होम शान्त्य; र्थ यथा वित्ततिलपात्रादि दक्षिणादानं कुर्यात ॥ अथ राष्ट्रमुद्धामः॥ 32 ऋतापाडिति प्रजापत्तिऋषियंजुश्छन्दः । ऋतापाड्ऋत- धामाग्निगंधर्वो देवता होमे विनियोगः। 30 ऋतापाड् ऋतधा: माग्निगन्धर्वः स न 5 इदं ब्रमक्षत्रं स्वाहा वाटू Jइद मतासाहे सतधामाग्नये गंधर्वाय न मम ॥ ॐ ऋतापाडिति, प्रजापतिर्थापिर्यजुश्छन्दः ओषधयोमुदोऽप्सरसो देवता होमे: विनियोगः। 30 ऋतापाद् ऋतधामाग्नि र्गन्धर्व स्तस्यौषधयोड पातु तस्मै (४०६) कर्मकाएकरताकरे, विवाह पद्धति ॥ प्सरसोमुदोनाम ताभ्यः स्वाहा । इदमोषधीभ्योऽप्सरोभ्यो मुद्- भ्यो न मम ॥ 30 स ० हित इति प्रजापतिपिर्यजुश्छन्दः स र्ट• हितो विश्वसामा सूर्यो गन्धर्वो देवता होमे विनियोगः । सर्ट हितो विश्वसामा सूय्यों गन्धर्षः सनऽ इदं ब्रह्मक्षन पातु तस्मै स्वाहा वाट् ॥ इदं र्ट० हिताया विश्वसाम्ने सूर्या य गन्धर्वाय न मम ॥ ॐ सर्ट• हित इति प्रजापति ऋषिर्यजु- रछन्दो मरीचयोऽप्सरस आयुवो देवताः होमे विनियोगः । ॐ सहितो विश्वसामा सूर्यो गन्धर्वस्तस्य मरीचयोऽप्सरसs आयुवो नाम ताभ्यः स्वाहा । इदमरीचिभ्योऽप्सरोभ्यऽआयुभ्यो न मम ॥ ॐ सुषुम्ण इति प्रजापतिर्मपिर्यजुश्छन्दः सुषुम्णः सुर्यरश्मिश्चन्द्रमाः गन्धर्वो देवता होमे विनियोगः 0 सुषुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमाः गन्धर्वः स न ऽ इदं ब्रह्मक्षयं पातु तस्मै स्वारा वाट् । इदंसुषुम्णाय सूर्यरस्मयेचन्द्रमसे गन्धवाय नमम॥ ॐ सुपुम्ण इति प्रजापतिर्मपिर्यजुश्छन्दो नक्षत्राण्यप्सरसोभे- कुरयो देवताः होमे विनियोगः। 30 सुपुम्णः सूर्यरश्मिश्चन्द्रमा गन्धर्वस्तस्य नक्षत्राण्यप्सरसो भेरियो नाम ताभ्यः स्वाहा ।। इदं नक्षत्रेभ्योऽप्सरसोभ्यो भेकुरिभ्यो न मम ॥ 30 इषिर इति प्रजापतिर्मपिर्यजुश्छन्दः इपिरो विश्वव्यचा मातो गयों देव ता होमे विनियोगः। 30 इपिरो विश्वयचा व्वातो गन्धर्वः सन ऽ इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा बाट् ॥ इदमिपिराय विश्वव्यचसे याताय गन्धर्वाय न मम || 0 इपिर इति प्रजा- पतिपिर्यजुश्छन्दायापोऽप्सरस ऊोदेवताःहोमे विनियोगः॥ इपिरो विश्वव्यचाव्यातो गन्धर्व स्तस्यापोऽप्सरसऊर्जा नाम ताभ्यः स्वाहा ॥ इदमभ्योऽप्सरोग्याग्भ्यो न मम ॥ ॐ भुज्युरिति प्रजापतिर्मपिर्यजुश्छन्दः भुज्युः सुपर्णी यज्ञो गन्धबंदियना होमे विनियोगः ॥ ॥ भुज्युः सुंपणों यज्ञो गन्धर्षः सन इदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा व्याट् ॥ इदं भुज्यवे सुप- पाय यज्ञाय गन्धर्याय न मम ॥ ॐ भुज्युरिनि प्रजापतिर्मपि- कर्मकाण्डरस्नाकरे विवाहपद्धमि ॥ (१०७) यजुश्छन्दो दक्षिणाऽप्सरसस्तावा देवता होमे विनियोगः ।। . भुज्युः सुपर्णो यज्ञो गन्धर्चस्तस्य दक्षिणाऽप्सरसस्तावा नाम ताभ्यः स्वाहा ॥ इदं दक्षिणाभ्योऽसरोभ्यस्तावाभ्यो न मम ।। प्रजापतिरिति प्रजापतिऋपियजुश्छन्दः प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनोगन्धर्वो देवता होमे विनियोगः ॥ ॐ प्रजापतिर्विश्वकर्मा मनोगन्धर्वः सनऽइदं ब्रह्मक्षत्रं पातु तस्मै स्वाहा व्वाट् ।। इदं प्रजापतये विश्वकर्मणे मनसे गन्धर्वाय न मम || प्रजापति रिति प्रजापतिऋषिर्यजुश्छन्दः ऋक् सामान्यप्सरस 5 एष्टयो देवता होमेविनियोगः ॥ ॥ प्रजापति विश्वकर्मा मनो गन्धर्व स्तस्यऽऋक्सामान्यप्सरस एष्टयो नाम ॥ ताभ्यः स्वाहा ॥ इद मृक्सामेभ्योऽप्सरोभ्यऽएप्टिभ्यो न मम ॥ १२ ॥ राष्ट्रभृद्धोम शान्त्यर्थं दक्षिणांदात्वा मंत्रं पठेत् ।। गन्धर्वाप्सरश्चैव प्रयच्छन्तु यशः श्रियम् । दीर्घायुर्धनमारोग्यमुभयोः स्त्री कुमारयोः ।। ।। इति राष्ट्रभृद्धोमः ॥ अथ जय होमः चित्तं चेत्यादीनां द्वादशमंत्राणां परमेष्ठी ऋषि@Mषि चित्तादयोमंत्र लिगोक्तादेवताः होमे विनियोगः । ॐ चित्तच स्वाहा, इदं चित्ताय न मम ॥ 30चित्तिश्च स्वाहा, इदं चित्त्यै न मम ॥ प्राकृतंच स्वाहा, इदं अकृताय नमम || 0 प्राकृति- श्च स्वाहा, इदमाकृत्यै नमम । ॐ विज्ञातंच स्वाहा, इदविज्ञा- तायनमम|| विज्ञातिश्च स्वाहा,इदंविज्ञातयेनममः। मनरव स्थाहा, इदं मनसे नमम । शकरीश्च स्वाहा, इदं शकरीभ्यो न० 1 0 दर्शश्च स्वाहा, इदं दर्शाय नमम || पौर्णमासंच स्वाहा, इदं पौर्णमासाय नमम ॥ ॐ बृहच्च स्वाहा एवं वृहते नमम ॥ ॐ रथन्तरंच स्वाहा, इद हैं. रथन्तराय न 30 प्रजापतिरिति मंत्रस्यपरमेष्ठी ऋषित्रि- ष्टुप्छन्दः प्रजापतिर्देवताजयहोमे विनियोगः। आमजा- (४०८) कर्मकाएटरताकरे, घियाहपतिः ॥ पंतिजयानिन्द्राय वृष्ण प्रायच्छदुग्रापृतनाजयेपु । तस्मैधिशासम- नमन्तसवाः सऽउग्रः सऽइहव्योवभूवस्वाहा । इदंप्रजापतयेनमम ॥१३॥ अत्रोदक स्पर्शः॥ जयहोमसान्त्यर्थ दक्षिणादानम् ॥ दीपायुपंप्रयच्छन्तु जय होमस्थ देवताः । शान्तिरस्तु शिवंचास्तु उभयोर्वरकन्ययोः ॥ ।। इति जयहोमः ॥ ॥ अथाभ्यातान होमः ॥ अग्निभूतानामधिपति रित्यादीनापतरः पितामहाः इत्यन्तानामष्टादशमंत्राणा प्रजापनि=पिः पंक्तिश्छन्दो मंत्र लिंगोक्ता अग्न्यादिदेवताः प्रतिमंत्रहोमे विनियोगः ॥ अग्नि भूतानामधिपतिः समाऽ त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन्क्षत्रे ऽ स्यामा शिष्यस्यां पुरोधार्यास्मिन् कर्मण्यस्यांदेवाहत्या ॐ स्वाह । इदम- ग्नयेभूतानामधिपतये नमम ॥ ३0 इन्द्रो ज्येष्ठानी मधिपतिः समाऽ वन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रे 5 स्यामा शिष्यस्योपुरोधा यामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहया स्वाहा ॥ इदमिन्द्रायज्येष्ठाना- मधिपतयेनमम । ॐ यमापृथिव्या 5 अधिपतिः समावन्त्वस्मिन् क्षत्रे ऽस्यांमांशिष्यस्या पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्या देवहत्या ॐ स्वाहां ॥ इदंवायवेअन्तरिक्षस्याधिपतयेनमम ॥ ॐ सूर्यो दिवोऽधिपतिःसमावन्त्वस्मिन्ब्रह्मण्यस्मिनक्षत्रे ऽस्यामाशिष्य- स्था पुरोधोयामस्मिनकर्मण्यस्यादेवहत्या ॐ स्याहो । इद ॐ सूर्यायदिवोऽधिपतयेनमम ॥ 30 चन्द्रमा नक्षत्राणामधिपतिः समावन्त्वस्मिन वनण्यस्मिन् क्षत्रेऽ स्यामा शिष्यस्या पुरोधाय- मस्मिनकर्मण्यस्या देवहूत्या ॐ स्वाहा । इदं चन्द्रमसेनक्षत्राणां अधिपतयेयनमम । 30 बृहस्पतिव्रत्मणोऽधिपतिःसमावन्त्व- स्मिन् ब्र रायस्मिन् क्षत्रे ऽ स्यामाशिष्यस्यांपुरोधायामस्मि- नर्भर यस्यांदेवत्या स्वाहा इदंवृहस्पतयेत ह्मणोऽधिपतयेनमम मिन्नः सत्यानामधिपतिः समावत्वस्मिन नारायस्मिन् क्षत्रेड कर्मकारहराकरे विवाहपतिः ॥ (10) स्पामा शिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्या ॐ स्वाहा । इदं मित्राय सत्यानामधिपतयेनमम अव्वरूपोऽनपा- मधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिप्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्या ॐ स्वाहा । इदंवरुणाया. पामधिपये नमम ॥ ॐ समुद्रः स्त्रोत्यानामधिपतिः समाव. त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यादेवहत्या ॐ स्वाहा । इदं समुद्रायस्रोत्यानामधिपतये नमम । अतसाम्राज्यानामधिपतिः तन्माऽवत्वस्मिन् ब्रह्म- रायस्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्या ॐ स्वाहा । इदमन्नायसाम्राज्यानामधिपतयेनमम । 3. सोमऽयोपधीनामधिपति.समावत्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्या माशिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्या ॐ स्याहा । इदं सोमायौपधीनामधिपतयेनमम । ॐ सवितामसवानामधि- पतिः समावत्वस्मिन् ब्रमण्यस्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यां पुरो. घायामस्मिन् कर्मरायस्यां देवहत्या स्वाहा । इदंसावत्रेप्रसवाना मधिपतयेनमम | 30 रुद्रः पशूनामधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्म एयस्मिन् क्षत्रेऽस्थामा शिष्यस्यांपुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्या देवहत्या ॐ स्वाहा इदं रुद्राय पशृनामधिपतयेनमम १४ प्रणी- तोदकः स्पर्शः । 30 त्वष्ट्रारूपाणामधिपतिः समावत्वस्मिन् ब्रह्म एयस्मिन् क्षत्रेऽस्यामा शिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मण्यस्यां देवहत्या ॐ स्वाहा । इदं विष्णवेपर्वतानामधिपतयेनमम । 30 मरुतोगणानामधिपतयस्तेमावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् क्षत्र स्थामा शिष्यस्यां पुरोधायामस्मिन् कर्मएपस्या देवत्या स्वाहा इदं मरुद्भ्यो गणानामधिपतिभ्योनमम | पितरः पितामहाः परेऽवरेततास्ततामहाःइएमावन्त्वस्मिन् ब्रह्मण्यस्मिन् चनेऽस्यामा शिष्यस्यां परोधायामस्मिन्कर्मण्यस्यां देवहत्या ॐ स्वाहा । इदं पितृभ्यः पितामहेभ्यः परेभ्योऽवरेभ्यरततेभ्यस्ततामहेभ्योनमम ५२ ४१) कर्मकाण्डरस्नाकरे, विवाहपद्धतिः॥ । . पौर अनोदकस्पर्शः । दक्षिणादानम् । अभ्यातानेचयेदेवाः प्रय- च्छतुशुभांमतिम् । धनंयशस्यं पुत्रांश्चएतयो वरकन्ययोः इत्यभ्यात्तानहोमः॥ अंथ अग्न्यादि पंचकहोमः। ॐ अग्निरैत्वित्यादीनांचनुमंत्राणां प्रजापतिऋषिः त्रिष्टुप्छन्दोलिंगोक्ता देवता प्राज्यहोमे विनियोगः । ॐ अग्नि- रैतुप्रथमोदेवताना ॐ सोऽस्यै मजांमुंचतुमृत्युपाशात् । तदय ई. राजावरुणोऽनुमन्यनां तथेय ॐ स्त्री पौत्रमघन्नरोदात्स्वाहा ॥ इदमग्नयेनमम । 30 इमामग्निस्त्रायतां गार्हपत्यः प्रजामस्यैनयतु दीर्घमायुः । अशृन्योपस्थाजीवतामस्तु माता पौत्रमानन्दमभि विवुध्द्यतामिय ॐ स्वाहा । इदमग्नयेनमम । स्वस्तिनोऽअग्नेदिव ऽआधिव्या विश्वानिधेहायथायजत्र । यदस्यांमहिदिविजातं प्रशस्तंतदस्मासुद्रविणंधेहिचित्र ॐ स्वाहा । इदमग्नयेनमम । ॐ सुगनुपंथां प्रदिशन्न एहि ज्योतिष्मध्येहाजरतऽयायुः । अतु मृत्यु रमृतन्नऽयागाद्वैवश्वतोनोऽभयंकृणोतु स्वाहा । इदं वैव- श्वतायनमम । (रौद्रींपैत्री तथामृत्योः इति कारिकोक्त दोषत्वात् संस्कार भास्करे दोपश्रवणात् । व, वस्त्रेणाच्छाद्य मंनं मनसिप- ठन् जुहुयात् । ) 30 परं मृत्यविति संकसुक ऋपित्रिष्टुप्छन्दो मुत्युर्देवता होमे विनियोगः । ॐ परं मृत्योऽग्रनुपरेहिपंथांपस्ते ऽअन्यऽइतरो देवयानात् । चक्षुष्मते शृण्वतेतेवीमिमानः प्रजा ॐ रीरिषीमोतव्वीरान् स्वाहा। इदंमृत्यवेनमम । अत्र प्रणीतोदकः स्पर्शः। अत्रापिदक्षिणादानम् । मंत्रः-अग्निवश्वतोदेवः कीर्ति- श्चायु प्रयच्छतांम् । नैरूज्यधनसंपत्तिरेतयोर्वरकन्ययोः । अथ लाजाहोम:- अथ च कुमार्या भ्राता ज्येष्ठः कनिष्ठो वोपकल्पितान शमी पत्रपलाशपत्र मिश्रितानलाजान् घृतेनाभिघार्य नूतनेसूचतुर्धा विभज्य ततस्त्वेक भागमादौ कुमार्याः (स्वभगिन्याः) अंजली (४१) केमकाण्डरपकरे विवाहपद्धति : दद्यात् । साच कुमारी ताल्लाजान अंजलौ गृहीत्वा प्राङ्मुखी तिष्ठन्ती वरश्चानुपृष्ठंपरिक्रम्योत्तराभिमुग्वोवध्यादक्षिणतस्तिष्टन वध्वा अंजलिंदेशप्रथानुसारतउभाभ्यां हस्तभ्यां पालभेत । साच- वधूमंत्रंपठन्तीलाजान् जुहुयात् । (अत्रकन्यायाएवहस्तेनहोम प्रा- धान्यतानतुवरहस्तेन । आयुष्मानस्तुमेपतिः इतिमंत्रप्रमाणातू.) 30 अर्यमणमित्यादिमंत्राणामथर्वणऋपिरनुष्टुप्छन्दो लिंगोक्ता देवता लाजाहोमेविनियोगः 0 अर्यमणंदेवंकन्याऽअग्निमयदंत सनोऽअर्यमादेवः प्रेतोमुंचतुमापतेः स्वाहा। 30 इदमर्यम्णेनमम इति वरोच्यात् (इत्यंजलिस्थलाजानांतृतीयांश अंजलिवामभागेन जुहोति, स्त्रीणांवामार्ग प्राधान्यात् ) 30 इयंनार्थपत्तेलाजानाव- पन्तिका ।। आयुष्मानस्तुमेपतिरेधन्तांज्ञातयोमम स्वाहा । ॐ इदमग्नयेनमम । इत्यर्धजुहोति । ॐ इमल्लाजानावपाम्यग्नौ समृद्धिकरणंतव । मम तुभ्यंच संवननं तदग्नि रनुमन्यतामिय ॐ स्वाहा । 30 इदमग्नयेनमम । इत्यजलिस्थान् सर्वान् जुहोति अथच वरोवध्वा सांगुष्टमुत्तानंदक्षिणहस्तंगृह्णाति । ॐ गृभ्णामी- ति चतुर्णांमंत्राणांयाज्ञवल्क भारद्वाजाथर्वण प्रजापतयऋषयः त्रिष्टुवुष्णिगनुष्टययपिछन्दांसि भगार्यमसवितृपरंध्रयोदेवताः वधूपाणिग्रहणे विनियोगः। ॐ गृभ्णमितेसौभगत्वायहस्तंमया- पत्याजरदष्टियथासः भगोऽअर्यमासविता पुरधिमान्त्वाऽदुर्गार्ह पत्यायदेवाः ॥१॥ अमोहमस्मिसात्व र्ट० सात्वमस्यमोऽहम् । सामाहमस्मि ऋक्त्वंद्यौरहपृथिवीत्वम् ॥२॥ तावैवविवहावहै सहरेतोदधाव है । प्रजांप्रजनयावहै पुत्रान्मजनयावह पुत्रान विन्दा- यहैयहन् ॥३॥ तेसन्तुजरदष्टयः संपियौरोचिष्णूसुमनस्यमानौ पश्येमशरदः शतंजीवेमशरदः शत र्ट० शृणुयाम शरदः शतम् ॥४ अथैनामश्मानमारोहयति अग्नेरुत्तरतः स्थापितेऽरमनियरोवध्वा दक्षिणपादं स्वदक्षिणहस्तेनगृहीत्वा वक्ष्यमाणमंत्रेणस्थापयेत् । कतिचिन् पुस्तके वरोस्ववामहस्तंवध्वा वामरकंधेधृत्वा दक्षिणह:. 'स्तेनवध्वादक्षिणपाद.स्पृशन् इति लिखितमस्ति देशाचारतः ।
(४२) कर्मकायानाकरे, विव इपयति. ॥ - { - कुर्यात् ॐ आरोहेममित्यस्याथर्वण ऋपिरनप्छन्दो वधूदेयता अरमारोहणेविनियोगः ॐ पारोहेममरमानमश्मेवत्व ॐ स्थि- राभव । अभितिष्टपृतन्यतोऽववाधस्वपृतनायतः । इति वधमरम "न्यारोप्यवरस्तस्याःशिरसिहस्तं धृत्यागाथांगायति । ॐसरस्वति प्रदमितिविश्यावसु ऋषि रनटुप्छन्दः सरस्वती देवता गायागाने विनियोगः । ॐ सरस्वतिप्रेदमवसुभगव्याजिनीवति । यांत्वा विरगस्यभूतस्य प्रजाया मस्यायः ॥१॥ यस्याभून ई० समभवद्यस्यां विश्वमिदंजगत् । तामद्य गाथांगास्यामियास्त्री- पामुतमंयाराः ॥२॥ ततोऽग्नेः परिक्रमणार्थ वधूवरौ गच्छेताम् । तुभ्यमग्रइत्यावण नापिरनुप्टुप्छन्दोऽग्निदेवता परिक्रमणे विनियोः ॥ 30 तुभ्यम्ने पर्यवहन्त्सूर्यावहतुनासह । पुनः पतिभ्योजायांदाग्ने प्रजयासह ।। (अग्रेतु शुभदापत्नीमांगल्ये सर्व कर्मणि ) इति प्रमाणतः ॥ एवं पुनरद्वयं पूर्ववल्लाजाहोम पाणि । ग्रहणाश्मारोहण गाथागान परिक्रमणानितेनैव विधिनाकर्तव्यम्।। सतस्तृतीय लाजाहोमादि परिक्रमणान्ते कुमर्या भ्राता सूर्पकोणेन साल्लाजान् कुमार्यजलौददाति ॥ सा च पूर्वयत्तिष्ठन्ती अंजलि- नैव जुहुयात)। कतिचित् पुस्तकेषु सूर्पकोणेनैवसर्वान जुहुयात्- इति लिखितमस्ति । स च सूत्रममाण रहितो विधिः)।। 30 भगा- येति मंत्रस्य प्रजापतियंपियंजुश्छन्दो भगोदेवता लाजाहोमे विनियोगः :10 भगायस्वाहा 30 इदं भगायनमम इति वरः ।। (ततश्चतुर्थ परिक्रमणं कुर्वन्तौवधूवरौ ब्रह्मारन्योर्मध्ये नगच्छेताम् किन्तु ब्रह्माणमपिमध्ये कृत्वा परिकामयेनाम् ) ॥ तूष्णीं चतुर्थ परिक्रमणकृत्वा पूर्वस्थान मागत्योपविश्यच 30 प्रजापतय इति प्रजापतिपिःस्त्रिष्टुप्छन्दः प्रजापतिर्देवता उत्तरांग होमे विनि- योगः ॥ ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये नमम ॥ इतिमनसा प्रजापर्तिध्यात्वात्वा (अत्रैय कतिचित् पुस्तकेषु पचभपष्टं परि- फ्रमणंच लिखितमस्ति सूत्रादतिरिक्तोऽयं विधिः) यथा समा पारस्तथा कर्तव्यः । अथससपदी-जतोवर एनां वधूमुदीची सप्त 4 । .
कर्मकाएररलाकार, विवाहपतिः । (४३) पदानि प्रकामयति, तथधासमाचारात्-(कचिदेशेषु शिलायां हस्तमात्रायतायामेव सप्तपदी भयति । स च विधिनिरर्थकः । सप्तपदी शब्दस्यार्थः सप्तपद,गमनमस्ति न तु शिलायाम् . हसत- मात्रायतायाम् ॥) श्वेततण्डुलान् दधिमिश्रितानकृत्वा कन्या सप्तपादायतांतराल भूमौ सप्त पुंजानि कृत्वा प्रत्येक पुंजोपरि एकैकां वर्तिकां प्रज्वलय्य वंधूस्तदुपरि दक्षिण पादधृत्वभिरेव मंत्रैः पवर्तिकानिर्वाप्य सप्तमी ज्वलन्तीमेव स्थापयेत् ।। सा व वधू वामपादेन दक्षिणपादं नाति प्रामति । परश्च तदनुगच्छेत् । एकैकं मंत्रं समुच्चार्य सप्तपदानि दापयेदुत्तरोत्तरं दक्षिणपादेन । 30 एकमिपे इत्यादीनां सप्तानां मंत्राणां प्रजापतिपिर्यजुश्छन्दः लिंगोक्तादेवताः सप्तपदीकरणे विनियोगः ।। 30 एकमिपे विष्णु रत्वानयतु, इति चरेणोक्तस्य मंत्रस्यान्ते चधूदक्षिणं पादमुदग्द- धाति । तदनन्तरं वाम पादम्। ॐ द्वेऽऊर्जे विष्णुस्त्वानयतु ।। ॐ त्रिणि रायस्पोपाय विष्णुस्त्वानयतु ॥ 30 चत्वारि मायो भवाय विष्णुस्त्वानयतु ॥ ॐ पञ्चपशुभ्यो विष्णुस्त्यानयतु ।। . षड्ऋतुभ्यो विष्णुस्त्वानयतु ॥ ॐ सखे सप्तपदाभवसामा- मनुव्रताभवविष्णुस्त्वानयतु ॥ ततःसदीपं तंडुल पुंजं ज्वलन्तमेव स्थापयेत् । ततः परिक्रमणकृत्वा पूर्वासने उपविश्य पुरुष स्कन्ध्र 'स्थित कुम्भोदकादाम्रपल्लवैर्वापिंजूलेनवा वरो वक्ष्यमाणमंत्र धूमूर्द्धन्यभिपिंचति ॥ 30 आपः शिया इति प्रजापतिषि:- यजुश्छन्द. पापोदेवताः वधूमूर्धन्यभिषेचने विनियोगः ॥ ॐ आपः शिवाः शिवतमाः शान्ताः शान्ततमास्तास्ते कृण्वन्तु भेषजम् ॥ श्रापो हिष्टेति तिस्ऋणां सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्री छन्दः श्रापोदेवताः वधू मूर्धन्यभिषेके विनियोगः ॥ ॐ आपो हिष्टा मयो भुव स्तानऽऊर्जेदातन । महेरणाय चक्षसे ॥१॥ योकः शियतमो रसस्तस्यभाजयते हनः । उशतीरिव मातरः।। तस्माऽमरंगमामवोयस्य क्षयाय जिन्वय | आपो जन यथा चन: ३) दिवाविवाहे । ततो वरो वधू सूर्यमुदीक्षपस्वेति वदेत- १ (४१४ कर्मकापरलारे विवाति ॥ तचक्षुरिति दध्यगावणपिाह्मी त्रिष्टुप्छन्दः स्याँदेवता सूर्योदीक्षणेविनियोगः । ३० तचनदेवहितं पुरस्ताच्छुफ्रमुच्चरत् । पश्येमशरदः शतं जीवेमशरदः शत ई० शृणुयाम शरदः शतं मनवाम शरदः शतमदीनाः स्यामशरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥ अथ वरो वध्वादक्षिांशोपरि सदक्षिणंकरंधृत्वा तस्याः हृदयं बालभेत ॥30 मम व्रत इति प्रजापतिपिःत्रिष्टुप्छन्द: प्रजापतिर्देवता व हृदयालंभने विनियोगः। 30 मम व्रतेते हृदयं दधामि मम चित्तमनुचित्तंतेऽग्रस्तु। ममन्याचमेक मना जुषस्व प्रजापतिष्ट्वा नियुनक्तुमहाम् ॥ अथवरो वधू शिरसिहस्तं नीत्वाभिमंत्र यते ॥ ॐ समझलीरिति प्रजापतिर्मपिरनुष्टुप्छन्दो लिंगोता देवता वध्वभिमंत्रणे विनियोगः। 30 सुमडलीरियं वधूरिमा ॐ समेत पश्यता सौभाग्यमस्यैदत्वा यथास्तं चिपरे- तन ॥ अत्र शिष्टाचारान् वधूवरम्य वामभागे उपवेशयन्ति । तस्याः सीमन्ते घोण सिन्दरंच दापयन्ति वृद्धाः। देशाचारतो वधूवरौ परस्परं तैलाभ्यंग केशसम्मार्जन चूटिका कज्जलधारण प्रादर्शादर्शनं दधिप्राशनान्तानिकर्माणि कुरतः थन्यदपि ग्राम- वृद्ध वचनानि देशरीत्याच,, विवाहश्मशानयोमियचन मिति प्रमाणात् ॥ अथाग्नेः प्रागुदग्वा गृहे ( कलावनडह चर्म वर्जित- त्यात् ) रक्तवस्त्रे दृढ़पुरपोवरएक्वा वधूमुत्थाप्यो पवेशयन्ति । ॐ इह गाव इति प्रजापतिर्मपिरनुष्टुप्छन्दो लिगोक्ता देवता वधूपवेशने विनियोगः ॥ 30 इह गावो निषीदन्त्विहारवा ऽ इह पूरुषाः। इहो सहस्रदक्षिणो यज्ञ ऽ इह पूपा निधीदतु ॥ ततो वरस्तस्मात्स्थानादागत्य यथास्थानमुपविश्य स्वयं चोपविशेत् ॥ कतिचित्सुदेशेविदानी ग्रामवचनं पूर्वोक्त कर्माणि स्वकुलवृद्ध स्त्रीणां वचनानि कुर्वन्ति ॥ ततो हम्तौ पादौ प्रक्षाल्याचमनं कृत्वा ब्रह्मणान्यारब्धः अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा । इदमग्नये स्विष्ठकृतेनमम ॥ इति स्विष्टकृन्दोमंकृत्वा, संस्रवधुतं प्राश्योयना पवा । जलेन पवित्राभ्यां मुम्ब समाऱ्या पवित्रप्रतिपतिः,-30 फर्मकापरसाकरें विगाहपतिः । (४१५) ---- , स्वाहां, इति वन्ही प्रक्षिपेत् । ततोऽग्नेः पश्चान प्रणीता विमोकं कुर्यात् ॥ ततो ब्रह्मणे पूर्णपात्रदानम्-श्रोत्यादि अमुकगोत्रोऽ- मुक शर्मा सवधूकोऽहं विवाह होमकर्मणः सांगता सिद्धये इंदं सदक्षिण पूर्णपात्रं प्रजापति दैवतं अमुक शर्मणो ब्रह्मणे तुभ्यमहं संपददे ॥ ॐ अकृन्कमकर्मकृतः सहवाचामयो भुवा । देवेभ्यः कर्म कृत्वास्त प्रेतसचाभुवः । इति पटेल (पूर्णाहुति रत्र न भेद तीति वक्ष्यमाणप्रमाणात ।। विवाहे व्रतवन्धे च शालायां चौल- कर्मणि 'गर्भाधानादिसंस्कारे पूर्णाहुतिं न कारयेत् ॥ इतिगोभि- लसूत्रे) अत्र स्वाचार्यायवरं विपुलं धनं ददाति । किं तद्धनमाह गौाह्मणस्थवरः, ग्रामोराजन्यस्य, अश्वोवैश्यस्य, यथोक्त वरी- भावे स्ववित्तानुसारेण सुर्वणरजतादिद्रव्यं दद्यात्-तत्र संकल्प अधेत्यादि संकीर्त्यामुकराशिरमुकशर्मा सवधूकोऽहं विवाहहोम- कर्मणः सांगता सिद्धये, इमां गां मद्रदेवतां वा इदं गो निष्कयी- भूतं सुवर्णादि द्रव्यममुकशर्मणे प्राचार्याय तुभ्यं संप्रददे ॥ ततो भूयसी दक्षिणादानम्-अवे. अमुक शर्मा सवधूकोऽहं विवाह कर्मणः सांगफलावाप्तये इमां भूयसी दक्षिणां नाना गोत्रवाहमा णेभ्यो नटनर्तकादिभ्यो या विभज्य दास्ये । ततःस्न्यायुपकरणम् अध्यायुपमिति नारायण ऋषिः उदिणक छन्दः शिवोदेवता ज्या- युपकरणे विनियोगः ॥ ॐ ज्यायुपं जमदग्नेः कश्यपस्य व्यायुपम् यद्देवेषुत्र्यायुपंतन्नोऽअस्तुव्यायुषम्। ततोभद्रमस्तुमंत्रेणयधूवर- योमगलतिलकंकृत्वाच्यायुपंदत्वापाशीर्दद्यात् चतुर्थीकर्महोमाथि माग्ने धरणार्थत्वादग्ने विसर्जनमत्रनकर्तव्यम्'रात्रौविवाहेऽ. भिपकानतरं चरो वधूं धृवं दर्शयति, भोयमुकि देविध्रुवमीक्षस्व ध्रुवमसीति प्रजापति ऋपिः पंक्तिश्छन्दो धृयो देवता वोदीक्ष- णे विनियोगः ॥ अवमसि भयंत्या पश्यामि ध्रुवधिपौष्येमपि । महात्वाऽदाद् बृहस्पतिर्मयापल्या प्रजापती संजीव शरदःशतात्॥ सा यदि भ्रमानपश्येत । तथापि पश्यामि, इति च ब्रूयात् (अंत्र तु विवाहादारभ्य त्रिरात्र मक्षारलवणाशिनौस्याताम्, जायापती (१६) कर्मकाएररताकरे, विवादग्दतिः॥ भधः खट्वा रहिते भूभागे प्रास्तृते शयीयातां त्रिरात्रमेव,, पत्र त्रिरात्रपक्षाश्रयणं चतुर्युत्तरकालः । हेतुस्तु पूर्वव्याख्याने विहितः। सूत्रोक्तिस्तु चतुर्थ्यामपररात्रेऽभ्यन्तरतोऽग्निमुपसमा- धायेति चतुर्थी कर्मणो विधिः । स च चतुर्थी तिथौ यिवार तिथिमारभ्यापररात्रेः रात्रेः पश्चिमे यामेऽभ्यन्तरतो गृहस्यमध्ये ऽग्नि वैवाहिकमुपसमाधाय पंचभूसंकारान् कृत्वा स्थापयित्वा च कुराकंडिकोक्त विधिना सर्वकर्म भवति । समीचीनोऽसौ प्रोक्त विधिः ॥ परंच कतिचिन पर्वतीयप्रान्तेपु विघ्नबाधा संको बेन-सूत्रे (ग्राम वचनं च कुर्यः) अन्न विवाहे ग्राम शब्दवाच्यानां स्यकुलवृद्धानामाचार्याणां वाक्यं पारं पर्यानुगतमर्यादानां पा- लनं च कुर्वन्ति । यथा अंकुरार्पण हरिद्राक्षतकंकणमुकुटधारणा- दिधर्मप्रतिपादकमस्ति ॥ तद्वद् चतुर्दिनानामपकपं कृत्वा विवाह वेद्यामपि चतुर्थीकर्म कुर्वन्ति-तदनुमयापि देशरीत्या विवाद वेद्यां चतुर्थीकमोविधिरुदाहृतः॥ अथ चतुर्थीकपद्धतिः॥ ततः पूर्वोक्तध्रुवदशर्नानन्तरं विवाह वेद्या उत्तर भागे हस्त- मायां वेदी कृत्वा सामनी संपाद्याचम्य प्राणायाम वयंविधाय वधू स्वदक्षिणतः कृत्वा संकल्पं कुर्यात्-अद्येत्यादि. अमुकशर्मा हं करिष्यमाण चतुर्थीकांगहोमकर्मणितत्रादौ निर्विघ्नतासिद्धये गणेशवरुणपूजनमहं करिष्ये । ततः पूर्वोक्तविधिना गणेशसंपूज्य होमवेदीशोनकोऐकलशंपरुणविधिना संस्थाप्य संपूज्य च पुण्याह वाचनं था गान्तिसूक्तपाठं कृत्वा कुशकंडिकाविधिनो वेदीसंस्कार कुर्यात् ॥ तद्यथा-कुशैहस्तमात्रमिनां वेदी परिसमूहा तान् पूर्व- स्यां क्षिपेत् । गोमयोदकेनोपलिप्य श्रवमूलकेन यधोत्तरं त्रिस्रो- रेखा विलिख्योपिलख्यक्रमेणानामिकांगुष्टकाभ्यां मृदमुद्धृत्य जलेनाभ्युदय तत्र विवाहाग्नि कांस्यपात्रे स्वाभिमुखीकृत्य स्था पेत् । ततो ब्रह्माणं गन्धाचतादिभिः संपूज्य, श्रोत्यादि० अमु.
कर्मफागडेरलाकरे चतुर्थाकर्मपद्धनि । (४७) कोऽहं कर्तव्यचतुर्थी होमकमींगकर्मणिकृताकृतावेक्षणरूप ब्रह्म कर्मकर्तुमैतै सोंगुलीये बृहस्पतिदैवतैरमुकगोत्रममुक शर्माण मानणं ब्राह्मत्वेनत्वामहंणे वृतोऽस्मीतिप्रत्युक्तिः यथा विहितं कर्मकुरु । करवाणीति प्रत्युक्तिः अग्नेर्दक्षिणतः कुशानारतीर्यासनं. दत्त्वा ब्रह्माणमग्निप्रदक्षिणं कारयित्वाकल्पितासनेउड्मुखमुप- वेशयेत् । अस्मिन्कर्मणित्वमेव्रामाभव, भवानीतिप्रत्युक्तिः। प्रणी तापापुरतः कृत्वाचारिणापूर्य दशैराच्छाध ब्रह्मणोमुखमयलो- फ्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरिनिदध्यात् । ततः पूर्वादारभ्य कुशास्तरणं कुर्यात् । ततोऽग्नेः पश्चात् पवित्रछेदनार्थ साग्रमनन्तंकुशपत्रत्रयं पवित्रार्थसाग्रमनन्तगर्भ कुशपत्रद्वयंस्थापयेत् । प्रोक्षणीपात्रं माज्यस्थाली चरस्थाली समार्जनकुशा:पंच वेणीरूपकुशासप्त पालाशसमिस्तिस्रः श्रवस्तण्डुलपूर्णपात्रमेनानिवस्तृनि पवित्रछे. दनकुशानां पूर्वपूर्व क्रमेणासादनीयानि । पवित्रछेदनकुशद्वैप चित्रे छित्वा प्रोक्षणीपात्रेजलंत्रिरुक्षिष्यप्रणीतोदकेन प्रोक्षणीप्रोक्षणं कृत्वा प्रोक्षणीजलेनासादितवस्तृनि, सिक्त्वा अग्निप्रणीतयोम- ध्येमोक्षणीपात्रंनिदध्यात् । आज्यस्थाल्यामाज्य चरस्थास्यां च चोग्नौयुगपदारोप्य यथाविधिपयित्वाज्वलत्तणेन हविवेष्टयित्वा वहौमक्षिपेत् । सुवमधोमुग्वप्रतप्य समाजनकुशानामग्रैरन्तरतो मूलतः संमृज्य प्रणीतोदकेनाभ्युदयपुनः प्रतप्य स्वदक्षिणतः - कुशोपरिनिदध्यात् । तत प्राज्यंचसञ्चाग्नेरवतायवेक्ष्यापद्रव्य निरस्योपयमन कुशानादाय वारत्रय तदाज्यमुत्पूयवामहस्तेकृत्वा' तनोवृताक्तास्तिस्रः समिधः उतिटन मनसाप्रजापतिध्यात्वात पणीमग्नौजुहुयात् । अग्नि पयंचयोपविश्य ततोऽग्नेः पूजनम्- (चतुर्थीतुशिखीनामेतिवचनान्) भूर्भुवः स्वः शिग्वीनामाग्ने . इदागच्छेहतिष्ठसुप्रतिष्ठितोवरदोभव एतन्तेतिप्रतिष्टाप्य 30 अग्निप्रज्वलितंवन्दे हुनाशंजातवेदसम्, सुवर्णवर्णमनलसमिद सर्वतोमुखम् । ॐ चत्वारिशृङ्गा.शिग्विनामाग्नयेनमः इति मॉममंत्रणपाद्यादि नीराजनान्तंसम्पूज्य 30 रेग्वाभ्योनमः। ॐ ५३ (४) कर्मकापरवाफरे, चतुर्थी कर्मपद्धतिः॥ सप्तजिहाभ्योनमः सम्पूज्यब्रह्मणान्वारब्धाधारादिजुहुयात ॐ प्रजापत्यादिचतुर्णीमंत्राणांमजापतिर्बपि स्त्रिष्टुप्छन्दो मंत्रो' कादेवता श्राज्यहोमे विनियोगः । मनसाप्रजापतिध्यात्वा, 30 प्रजापतये स्वाहा, इदंप्रजापतयेनमम । 30 इन्द्राय स्वाहा, इद मिन्द्रायनमम, इत्याघारौ, ३० सोमाय स्वाहा, इदंसोमायनमम अग्नये स्वाहा, इदमग्नयेनमम, इत्याज्यभागौ, (पारस्करगृह सूत्रानुसारात् श्राज्यभागानन्तरं अग्नेप्रायश्चित्ते, इत्यादिभिः पंचाहुतीः पंचभिर्मर्तुत्वा ततोऽग्नौ स्विष्टकृतेहुत्वाऽऽज्येन महा व्याहृत्यादि प्राजापत्यान्तानवाहुतीर्वाजुहोति । इतिप्रमाणादादौ अन्वारम्भंत्यक्त्वााज्येन प्रधानहोमकुर्यात्) अग्ने प्रायश्वित' इत्यादीनां पंचानांमंत्राणां परमेष्टी ऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दो लिंगोक्ता देवताः चतुर्थीकर्मागाज्यहोमे विनियोगः । 30 अग्ने प्रायश्चि- त्तेत्वं देवानांपायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वानाथकामऽउपधावामि यास्यैपतिघ्नी तनूस्तामस्यनाशयस्वाहा । इदमग्नयेनमम इत्यादि पडाहुतीनां संस्रवमुदपात्रे पृथक्मक्षेपः । ॐ वायोप्रायश्चित्तत्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्रामणस्त्वानाधकामउपधावामियास्यै प्र. जानीतनूस्तामस्यैनाशय स्वाहा । ॥२॥ इदंवायवेनमम 30 सूर्य प्रायश्चित्तेत्वं देवनांप्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वानाथकाम उपधा-' वामियास्यैपशुधनीतनस्तामस्यैनाशयस्वाहा इद ई० सूर्यायनमम ॥३॥ 30 चन्द्रप्रायश्चित्तत्वं देवानां प्रायश्चित्तिरसि ब्राह्मणस्त्वा- नाथकामऽउपधावामियास्य ग्रहघ्नीतनूस्तामस्यनाशय स्वाहा,इदं चन्द्रमसेनमम ॥४॥ गन्धर्वप्रायश्चित्तत्वंदेवानां प्रायश्चित्ति रसित्रामणस्त्वानाथकाम उपधावामियास्य यशोघ्नीतनूस्तामस्यै नाशयस्वाहा, इदं गन्धर्वायनमम ॥२॥ ततः स्थालीपाकमाज्येना भिघार्य सुवेणादाय प्रजापतिमनासाध्यात्वा । 30 प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतयेननम ॥६॥ इत्यन्तं उदपाने संस्नवप्रक्षेपः (ततश्चमणाअग्नये स्विष्ठकृतेहुत्वा पश्चादाज्येन महाव्याहृत्यादि प्राजापत्यान्तानवाहुती हुयान्,, इति प्रमाणात् ) अग्नये कमकाराडरताकर चतुथारमपद्धति.॥ . स्विष्ठकृतेस्वाहा इदमनयेस्विष्टकृतेनमम । ततो ब्रह्मणान्वारब्धः 30 महाव्याहृतीनां प्रजापतिर्बपि ईयन्युष्यिगनुष्टुप्छन्दांसि अग्निवायुसूर्यादेवताः प्रायश्चित्तहोमे विनियोगः । ॐ भूः स्वा. इदमग्नयेनमम । संवधोरणम् । भूवः स्वाहा इदंवायवेनमम 30 स्वः स्वाहा इद सूर्यायनमम । 30 त्वन्नोऽअग्न इत्यस्य वाम देवऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्नीवरुणोदेवते प्रायश्चित्तहोमेविनियोगः ॐ त्वन्नोऽअग्नेचरुणस्यविद्वान्देवस्यहेडोऽशवयासिसीप्ठाः । यजिष्टोवन्हितमः शोशुचानोविश्वाद्वेपासि प्रमुमुग्ध्यस्मन् स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम ॐ सत्वन्नइतिवामदेव ऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दः अग्नीवझणौदेवते प्रायश्चित्त होमेविनियोगः । 30 सत्वन्नोऽअग्नेवमोभवोतीनेदिष्ठोऽअस्याऽउपसोब्युष्टौ । अवय- वनोब्वरूण र्ट० ररपोब्धीहिमृडीक. सुहवोनऽधि । स्वाहा इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम 30 अयाश्चाग्न इति वामदेवऋषित्रिष्टु- न्छन्दो ऽअग्निर्देवता प्रायश्चित्त होमेविनियोगः । ॐ अयाश्चा. ग्नेऽस्यनभिशस्ति पाश्चसत्यमित्वमयाऽसि । अयानोयसँचहा- स्पयानोवेहिभेषज स्वाहा । इदमग्नयेनमम । ॐ येतेशतमिति वामदेवऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दोव्वरुणः सविता विष्णुर्विश्वेमरुतः स्व- श्चिदेवताः प्रायश्चित्त होमे विनियोगः 0 येतेशतंव्यरुणंये स- हायज्ञियाः पाशाविततामहान्तः तेभिन्नोऽयद्यसवितोत विष्णु विश्वमुचन्तुमरुतः स्वर्काः स्वाहा । इदंवरुणायसवित्रेविष्णवे विश्वेभ्यो मरुद्भ्यः स्वर्केभ्यश्चनमम । 3. उदुत्तममितिशुनः शेफऋषित्रिष्टुप्छन्दोब्धरुणोदेवता प्रायश्चित्तहोमे विनियोगः। , ॐ उदुत्तमम्वरुणपाशमस्मदवाधर्मब्विमध्यम ॐ श्रथाय । श्रथाव्वयमादित्यव्रते तवानागसोऽअदितये स्याम स्वाहा । इदंवरुणाय नमम ॥ मनसा-30 मजापतये स्वाहा, इदंप्रजापतये नमम । ततोवर्दिोमः । ततः संम्रवं प्राश्य पवित्रेऽग्नी प्रक्षिप्य पश्चिमतः प्रणीताविमोकं कृत्वा पूर्णपात्रदानं कुर्यात् । पूर्णपात्रं सम्पूज्य ब्रमणे नमः। अद्येत्यादि० अमुकोऽई ममास्या यध्वाः 2 (२०) कर्मकारलारे चनुयोधर्मपद्धति : सोमायुप भुक्ति परिहारार्थ चतुर्थी कर्माङ्ग होम कर्मणः सांगता सिद्धये इदंसद्रव्यं पूर्णपात्रं अमुकशर्मणे ब्राह्मणे तुभ्यमह संप्रददे । इति पूर्ण पात्रं ब्राह्मणे दद्यात् ।। ॐ अकृन् कर्म कर्मकृतः सहवा- चा मयो भुवा ॥ देवेभ्यः कर्मकृत्वारतं प्रेतसचा भुवः इत्याशिष पठित्वा स्थापितादुदपात्रादुदकमानीय घरो वक्ष्यमाए- मंत्रेण वधूमूर्धन्यभिपिंचति ॥ ॐ यातइति प्रजापतिपि स्त्रि- 'ष्टुप्छन्दोवर्देवता अभिपेचने विनियोगः॥ ॐ यातेपतिघ्नी प्रजाघ्नी पशुघ्नी गृहन्नी यशोघ्नी निन्दिता तनूः । जारघ्नी ततानांकरोमि। साजीर्यत्वं मयासह अमुकिदेवि ? (इत्यत्र कतिचित्सु प्रान्तेपु पनि नामाद्य वर्णाक्षरान्वितं सुन्दरीति पदा न्तं वध्वाः पुनर्नामकरणं कुर्वन्ति समाचारतः समीचीनासो विधिः) अथ चरो व, हुतशेपंस्थालीपाकं प्राशयति ॥ ॐ प्राण- स्त इति प्रजापतिपिर्यजुरछन्दो वधूर्दयता वध्वाः स्थालीपाक प्राशने विनियोगः ॥ ३॥ प्राणेस्ते प्राणान्संदधाम्यस्तिभिरस्थी निमा ॐ सर्मा ॐ सानि त्वचात्वचम् ॥ देशाचारादरः स्वहस्ते नैवग्रासपञ्चकं व_ माशयेत् ॥ अतः परंपत्नी शब्दः प्रयोक्तव्यः । अत्र देशाचारतो बरोऽपिकन्याहस्तेन भोजनं करोति ॥ इति ' गदाधरोक्तिः ॥ इदानीमेव घरः स्वपत्न्या दक्षिणस्कन्धो परि स्वदक्षिण करतल निधाय मंत्रं पठन् हृदयमालभेत ।। 30 यत्त इति प्रजापतिषि त्रिष्टुप्छन्दो हृदगं देवता हृदयालभने विनि- योगः ॥ ॐ यतसुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसि श्रितम् वेदाहं तन्मां तद्वियात्पश्येम शरदः शतंजीवेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतम् ॥ ततो वेद्याः कलश सहितं सपत्नीकोवरः पत्नी मग्रतः कृत्वा प्रदक्षिणा चतुष्ठयं कुर्यात् ॥ ततो देशाचारतो वरः स्वभार्यायाः अभिनव कंकतिकया सीमन्तोन्नयनं कृत्वा तन्मध्ये सिन्दूरं दापयित्वा भालमध्ये विन्दिकया अलंकरोति ततो यरो वाध्या, वधूश्च वरस्य अञ्चलग्रन्धि कङ्कण मोचनं परस्परं कुरुतः कङ्कण मोचन मंत्र:-30 कङ्कणं मोचयाम्यद्यरक्षोन रक्षणमम ।
7 कर्मकाण्डरनाकारे, विवाहोत्तरांग पद्धतिः (४२१) + मयि रक्षां स्थिरां कृत्वा स्वस्थानं गच्छ कङ्कण ॥ ततो दक्षिणा संकल्पं कुर्यात् । श्रोत्यादि देशकालौ संकीर्य सपत्नीकोऽमुकोड है कृतस्यास्य चतुर्थी कर्मणः सांगता सिध्यर्थमिमां दक्षिणामाचा- र्यायान्येभ्यो नाना नामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो विभज्यचदास्ये। एवं ब्राह्मण भोजनस्थापि संकल्पं कृत्वोत्तरांग भूतमग्निपूजनं विधाय (अत्रापि चतुर्थी कर्मणो विवाहांगत्वान्न पूर्णाहुतिः) वहिं विसृजेत् ॥ ॐ गच्छत्वं भवन्नग्नेः स्वस्थानं कुण्ड मध्यत: इष्टकाम समृध्यर्थ पुनरागमनंकुम । ततस्यायुपं कृत्वा वरवध्वो मंगलाभिषेक तिलकंच कृत्वाऽऽशीर्दद्यात् ॥ इति चतुर्थी कमपद्धतिः॥ विवहोत्तरांगकर्मपद्धतिः कतिपय प्रदेशेषु-अधुना कन्यापिता बान्धवेः सह पूर्व दिवसे स्थापितानां गणेशादि पंचांग- देवताना मुत्तरांग पूजनं विधाय,, ॐ यांतुदेवगणः सर्वे पूजामादायमामकीम् ॥ इष्टकाम समृध्यर्थ पुनरागमनकुरु इति विसृज्यकलशजलं वेद्यामानीय तदा- गोदान विधिना सवत्सां गां सम्पूज्य स्वपित्रान् पुच्छतोयेन संतप्यंच वरवधूयभ्यांदत्वा ताभ्यां कलशजलेनाभिषेकादि मंत्र तिलक पुरः सर माशीर्याचते ॥ तौ वरवध्वौ सकुटम्ब यजमान माशीदत्वा ततः पंच घोषपूर्वकं सपत्नीकोवर: विवाह मंडपात् • स्वसुरगृहाभ्यन्तरं गत्वा तत्रपट लिखित सप्तजीव मारणां पूजनं कुर्यात् ॥ तत्राभ्यन्तरे सपत्नीकोवरः स्वासन उपविश्या- चम्य भूतोत्सादनं कृत्वा प्राणायामवयंविधाय संकल्पकुर्यात् । अधेत्यादिसपत्नीकोऽहं सर्वसौभाग्यप्राप्तयेपलिखितानां कल्या एयादिजीवमारणांपूजनकरिष्ये । ॐ भूर्भुवः स्वः कल्याण्यादि जीवमातरः,इहागच्छन्तु, इहतिष्ठन्तुसुप्रतिष्ठितावरदा भवन्तु-इति प्रतिष्ठाप्य ध्यायेतू-ॐ कल्याणी मंगला भद्रा पुण्यापुण्यमुखी- तथा ।। जया च विजयाचय रक्षन्तु जीवमातरः ॥ इति ध्यात्वा 'नाममंत्रः पाद्यादि नीराजनान्तं पूजनं कुर्यात् ॥ तद्यथा-ॐ (४२२) कर्मकाएं डरत्नाकरे, विवाहोत्तपंगपद्धतिः ॥ कल्याएयै नमः, अमंगलायै नमः, ॐ भद्रायै नमः, ॐ पुण्याय नमः, ॐ पुण्यमुख्यै नमः, ॐ जयाये नमः, ॐ विजयायै नमः इतिमन्त्र नैवेद्यान्तं संपूज्योपायनं समर्प्य पुप्पांजलिं दद्यान् । ॐ कल्याणि देहि कल्याणं मंगल चैव मंगले ॥ भद्रे त्वं देहिनो भद्रं पुण्ये पुण्यप्रदाभय। पुण्योद्गमं पुण्यमुग्विजये देहि जयंचनः विजयं विजयेमातः शत्रभ्यः कुरु सर्वदा ॥ इति संप्रार्थ्य-ततः पुन्यन्वितंवरं चतुष्पाकाष्ठपीठे धृत्वाश्वशूनयोः पादौ पात्रेप्रक्षा- ल्य तिलकं कृत्वा सुवासिनी द्वारा स्वयंवा महानीराजनं कुर्यान् ततोवरः स्ववित्तानुसारंधनं श्वश्वचरणयो धृत्वा भो श्वश्रु ! श्र- मुकनामाहं तव जोमाता त्वामभिवादये। ततः श्वश्रोः प्रत्युक्तिः श्रायुष्मानस्तु सौम्य ! ततोऽन्यासामपि चरणाभिवन्दनं कृत्वा सुखनोपविशेत् । ततः श्वश्च यादौ पुत्रीजामातरौदधि प्राशनं का- रयित्वा ततः पिष्टापूपमोदकपदार्थानि दद्यात् । ततो भोज्यप- दार्थात् भुक्त्वा यथा सुग्वं विहरेत् । इति जीवमातृजनश्वश्रू सम्मेलन विधिः। वरवध्वोर्गमने मार्गरक्षाविधिः । "कतिचित्प्रदेशेषु वरवध्वो गमनतः पूर्वकन्यापिता उपवास विदधातीति देशाचारोऽयम्, ततो द्वितीयदिवसे तद्दि- नेवा श्वसुरदत्तयौतकमाप्तपुरुपद्वारा स्वगृहं प्रति संप्रेष्य सवधू- वरः श्वशू श्वसुरयोश्चरणौ-अभिवन्दनार्थ गृहाभ्यन्तरं ब्रजेन् । तत्रस्वास्तीर्ण कम्लादायुपविश्य कन्यापिता चरपक्षीयसंवन्धी- नप्याहयास्तीर्ण उपवेशयित्या वरवध्वासहतान् गन्धाक्षतादिभिः संपुज्य स्ववित्तानुसारतउपायनेन संतोप्य ममन्यूनातिरिक्त सप" यो स्वीकृत्य भवन्तो गृहप्रति प्रसन्नतया गच्छन्तु,इति विसृजेत् ततोऽग्रतः सयधूकोयर उत्थायतत्रस्थान्स्नेहिजनानभिवंद्य कन्या- माता तदुपरि सुमंगलार्थ लाजा तण्डुलादिमिश्रितसद्रव्पवृष्टिं कर्मफगहराकरे, विनादौनगंगादतिः॥ (१२३) विधाय बहिरागत्य श्रेष्ठद्वारदेहलीगणेशसन्निधौ वधूदेहलीगणेश- पूजनं कुर्यात् ॥ श्राचम्य पाद्यगन्धादिभिदेहलीम् देहल्यै नमः इतिमंत्रण संपूज्य प्रार्थयेन् ॥ ॐ आवयोदैहि सौभाग्यमा.. युरारोग्यतांचवै ॥ अवस्थाः सुखिनः सन्तु मातदेहलि तेनमः ॥ इति देहल्यां गन्धाक्षत पुष्पाणि संस्थाप्योभाभ्यां हस्ताभ्यां धार' त्रयमभिवादयेत् । अग देहली वन्दनानन्तरं शुभदिने वरः स्वभा- याँ स्वगृहमानयितुं शिवकां रथंचाऽऽनाय्य तदा शिविकावन्धने- वारथेऽश्चादि नियोजने,, वक्ष्यमाणमंत्रपठेद्वापाठयेत्-मंत्र-ॐ युजन्ति बनभरपरचरन्तम्परितस्थुपः। रोचन्ते रोचनादिव । ततः शिविकां चा रथं नृतनवस्त्रेणाच्छादयेत् । संमार्जयित्वा चाभि-. मंत्रयेत् ॐ अंकृन्यकाभितोरथये ध्वान्ता वाता अग्निमभि- येसचरन्ति दरेहेतिः पतत्रिीवाजिनीवां स्तेनोऽग्नयः प्रप्रयः पालयन्तु । तन बासनमभिमंत्रयेत्--34 वनस्पतेव्वीबहोड हिभूयाऽअस्मत्सखाप्रतरणः सुवीरः । गोभिः सन्नध्दोऽअसिच्ची- डयस्वास्थातातेजयतुजेत्वानि । शिविकारोहणमंत्र:-सुकिंशुकं शल्मलिविश्वरूप हिरण्यवर्णसुव्रतंसुचक्रम् । आरोहसूर्येऽमृतस्य लोकस्योनपत्येवतुंकृणुस्व । अतःपरमाचार्यः प्रतिमंत्रान्ते रक्षो. भद्रयं वरवध्वोरुपरिभ्रामयित्वा चतुर्दितुप्रक्षिपेत् । ततोवरोऽपि. शिविकाया मुपविश्या ग्रतोवर्धकृत्वा वादित्रवादकान्वोधयेत् । मंत्रः 30 उपश्वासयपृथिवीमुत्द्याम्पुरुवातमनुतां विष्टितंजगत् सदुंदुभेसजूरिन्द्रेणदेवदूरावीयोऽअपसेधशत्रून् । इतिमंत्रेण हुँदु. भ्यादिवाद्यध्वनि कारयेतो ततो रथंशिविकांवावक्ष्यमाणमंत्रपठन् पूर्वेवाहयित्वा प्रादक्षिण्येनग्राममार्गप्रत्यागच्छेत् नदामंत्रपटति, प्रतिमायन्तुदेवताः प्रतिब्रह्मसुवीर्यम् प्रतिक्षयद्वल प्रतिमा- मैतियद्यशः । यदिमार्गअमंगलवस्तुन्यालोकयति, तदामंत्र:-भद्रं कर्णेभिः शृणुयामदेवाः भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरङ्गै स्तुटूचा ॐ संस्तनृभियंसेमहिदेवहितंयदायुः ।मार्गग्रामश्चेत्तदामंत्रपठेन् इमान्द्रायतबसेकपर्दिनेक्षयद्वीरायप्रभरामहेमतीः । यथाशम .
(४२४) फर्मकोगरत्नाकरविय होत्तगंगपतिः' सद्विपदे चतुष्पदे विश्वम्पुष्टंग्रामेऽस्मिन्ननातुरम्। मार्गवृक्षसन्निधों जपनीयोमंत्रः30 नमोन्द्रायैकवृक्षसदे ३० येवृक्षेपुशपिजरानील- ग्रीवा विलोहिताः। तेपासहस्रयोजने बधन्यानितन्मसि ।मार्गे श्मशान श्चेत्तत्रजपनीयो मंत्र:-30 नमोन्द्राय श्मशान सदा।। ॐ ये भूतानामधिपतयो विशिम्यासः कपर्दिन : तेषा सहन योजने वधन्वानि तन्मसि ॥ मार्ग चतुष्पथे जपेत-30 नमोन्द्राय चतुःपथ सदे ॥ 30 ये पांपथिरक्षय एल वृदा ऽ आयुर्यधः । तेपा ॐ सहस्रयोजनेवधन्यानि तन्मसि । मार्ग तीर्थमापतति वेत्तत्र जपेत् । ॐ नमो रुद्रायतीर्थसदे। ये तीर्थानि प्रचरंति सकाहस्तानिपंगिणः । तेपासहस्रयोजने वधन्वानि तन्मसि । मार्गे सुप्रतरानदी समापततिचेत्-घरोंऽजलौजलमादायपठेत् 30 समुद्रायवैष्णवेसिंन्धूनांपतयेनमः नमोनदीनांसर्वासांपत्ये विश्वाहाजुपतांधिश्वकर्मणामिदंहविः स्वः स्वाहा । इत्यंजलिस्थं जलनयामवहुत्वा । वारत्रयमार्जनंकृत्वा, मंचंपठित्वा-30 अमृतं पाप्रास्येजुहोम्यायुः प्राणोऽप्यमृतं ब्रह्मणासहमृत्युत्तरात । इस हादितिरिटिरितिमुक्तिरिति मुक्षीयमाणः सर्वभयंनुदस्थ स्वाहा। इतिवारत्रयमाचमनंकुर्यात् । यदिसेतुनौभ्यांसप्रतरणीयांनधा. पततिसेतौनाविवागंनं जपेत् ॐ सुत्रामाणं पृथिवींद्यामनेहस सुशर्माणमदिति ई०सुप्रणीतिम् । दैवीनावस्वरित्रामनागस मस्रवन्ती मारुहेमास्वस्तये । ततोगोधूल्यांब्राह्मणाज्ञया समूहर्तेच स्वनगरे प्रविशेत् । ततो गृहागणे गत्वा बरो वधूमग्रतः कृत्वा तत्रस्थाभ्यां युग्मकलशाभ्यां जलमाम्रादिपलवैः शिरस्य- भिषिच्य कलशयोराग्यन्तरे चित्तानुसारं द्रव्यं क्षिप्त्वा स्वास्ती उपविश्याचम्य गणेशंसंपूज्यमंगलतिलकंचकृत्वा ब्राह्मणादाशी दिं गृहीत्वा ततो ज्योतिः शास्त्रोक्त सल्लग्ने समायाते सुमह तं सपत्नीको वरः गृहश्रेष्ठद्वारसंनिधौ गत्वा तन्त्र चबूं-स्यासने स्त्रयामभागे, उपवेशयित्वाऽऽचम्य प्राणायाम त्रयं विधाय संक' लं कुर्यात् अद्येत्यादि सं० अमुकराशिः सपत्नीकोऽहं करिष्यn জাৱাৰ ইয়ারি। (४२). , माण विवाहोत्तरांग नूतनयधूप्रवेशकर्मणापुर्वाङ्गत्वेनद्वारमात्ऋणां पूजनं करिष्ये ध्यायेन-ॐ कुमारी धनदानन्दा विपुला मंगला- चला ॥ पद्मा चैचेतु सप्तैता ध्यायामि द्वारमातरः। ॐ भूर्भुवःस्वः कुमार्यादि सप्तद्वारमातर इहागच्छन्त्विह तिष्ठन्तु सुप्रतिष्टिता वरदा भवन्तु ॥ एतंतेति प्रतिष्ठाप्याबाहयेत् ॐ श्रोवाहयामि देवेशीरमात्ःसुमंगला वधूवेशनार्थवः पूजयामीहभक्तितः ततोनाममंत्रः पाद्यादि नीराजनान्तं पूजयेत् । तत्रादौ दक्षिणद्वारे ॐ कुमार्चनमः ॐ धनदायैनमः अनन्दायैनमः, ततो चामहारे विपुलायनमः ॐ मंगलायैनमः ॐ अचलायैनमः, द्वारोध- प्रदेशे-30 पद्मायैनमः, अधः प्रदेशे 34 देहल्यैनमः, इति संपू, ज्य प्रार्थयेत् । ॐ धनंदेहियशोदेहिसौभाग्गशरदः शतम् । पुण्यं धुनांश्चमेदेहि मातदेहलितनमः इतिमंत्रेणाक्षत गन्धपुष्पान्वित पुंज देहल्यां निधायोभाभ्यां हस्ताभ्यांधारत्रयमभिवंद्य ततो लग्नसामयिकदानानि कुर्यात्-अवेहामुक राशिस्सपत्नीकोऽहै फरिष्यमाणस्वगृहेनतनपक्षासह गृहपूवेशकर्मणो लग्नसामयिका- छत्रफुत्र स्थानस्थानामादित्यादि नवग्रहाणांमध्ये शुभानां शुभफ- लाप्तयेऋरोणांदुष्टफलोपाशान्ति पूर्वकशुभफलाप्तये, इदंद्रव्य अमुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यंसंपूददे ।। ॐ नल्सनम । वा गणे- शादि पूजनसमये कुर्यात् । नतः स्वस्तिवाचनं वाचयित्वा पधू मनतोनिधायादौ घधूदेहल्यांयामपादं ततो दक्षिणपादं संचालयेत् ततः पूर्वपूजितगणेशपूजास्थलमागत्य स्वासनउपविश्य पत्नींव- वामभागे उपवेश्यगणेशादि पूजनंपुण्याह पाचनंकृत्वा कचित्फल- केसप्तकोठानिकृत्या रंगपल्यादिभिः सुसज्यसप्तजीयमात्ऋण पूजनं कुर्यात् । अद्यहेत्यादि० सपत्नीकोऽहं सर्वसौभाग्य प्राप्तये वधू प्रवेशसामयिकपलिखितानां जीनमात्मणां पूजनंकरिष्ये । ॐ भूर्भुवः स्वः कल्याण्यादिसप्तजीवमानर इहागच्छन्त्विहति- धन्तु सुप्रतिष्टितावरदाभवन्तु । 30 एतन्तेति मतिष्टाप्यध्यायेत्- र ५४ (४२६) कर्मकरणारलाकरे यधूप्रवेशपद्धतिः 30 कल्याणीमंगलाभद्रा पुण्या पुण्यमुखी तथा ।.जयाच विजया चैवरक्षन्तुजीमातरः । इति ध्यात्वा पाद्यादिनीराजनान्तं संपूज्य तद्यथा--30 कल्याण्यैनमः, 30 मंगलायैनमः ॐ भद्रायैनमः, ॐ पुण्यायनमः ॐ पुण्णमुख्यैनमः ॐजयायैनमः, विजया- यैनमः । इति नैवेद्यान्तं सम्पूज्य दक्षिणांसमर्थ पुप्पांजलिंदद्यात् कल्याणिदेहिकल्याण मगलंचैवमंगले । भद्रेत्वं देहिनोभद्रं पुण्येत्वं पुण्यदाभय । पुण्योद्म पुण्यमुखि जपेदेहिजयंचवः । विजयविजयेमातःशत्रुभ्यः कुरुतर्वदा ॥ इति संप्रार्थ तिलपात्र दानंकृत्वाऽऽशीर्वादंगृहीत्वा वधूश्वभुचरण प्रक्षालनं कृत्वा गन्धा- क्षतादिभिः सम्पूज्य स्वपितृदत्तधनं वक्ष्यमाणमंत्रण चरणयोनिद: ध्यान् । मत्पित्रातवपुत्राय भार्या संस्कृतास्म्यहम् | उपायनं : गृहाणेदश्वश्रुमारक्षपुत्रवत् । इत्युक्त्वा श्वश्वचरणयोः शिरसाभि वंद्यतद्व्यं चरणयोनिदध्यात्। ततः श्वशूर्वधूशिरसिहस्तंनीत्वा-; सर्वदीत्वंसुपोष्यामे मातृवट् विद्धिमांवधु । सर्वसौभाग्यसंपन्ने जीवत्वंशरदांशतम् । इदानीश्ववधूमुग्वदृष्ट्या स्ववित्तानुसार- भूपणंददाति । ततो वरपिता वा अन्योयेनगणेशादि पूजनंकृत स गणेशादीनामुत्तरांगपूजनंविधाय । अयान्तुदेवगणाः सर्वे पूजा- मादायमामकीम् । इष्टकामसमृध्यर्थंकुर्वन्तु पुनरागमम् । इति । विसृज्य तिलपात्रदानंकृत्या पूर्वस्थापित कलश जलेन पूर्वोक्त सुरा स्त्वाममिपिस्थिति मंत्राभ्यामभिषिच्य मंतिलकंकृत्वादेवोप- भुक्त निर्माल्यंदत्वा कंचिच्छीफलादिफल वधूंदत्वा यथासुग्वं विहरेत् । इतिवधूप्रवेशकर्म पद्धतिः । अथ बधूजलाशयपूजापद्धतिः । ततो वधूपवेशानन्तरं परमातो स्वयंनूतनेवाससीपरिधाय स्वाभरणानिसुसज्य परिवारस्त्रीभिः सहनानाविधिमिष्टान्नपिष्टा- पूपगंधाक्षतादिपूजासामग्रीसंपायाग्रतःसुवासिन्यो गीतगायनत्यो मंगलतर्यादिवाजित्रैः सहच मात्रिकाफलकं सौभाग्यवत्या शिर S ..
कर्मकाण्डरनाकरे, वधूजलाशयपूजापतिः । (४२७७ स्याग्रतः कृत्वा धृतमुकुटादि भूषणे वधूयरौवाप्यादिजलाशयं गमयित्वा नचरक्तगन्धेनाचार्यो जलमाधिलिख्यपूजयेन् । सक- ल्पा-प्रत्यादि० वधूसरितोऽमुकोई करिष्यमाण नूतनयध्यसिंह जलमात्त्राणांपूजनंकरिष्ये-आवाहनम् -श्रापाहयामिदेवेशीजल- मोत्यः सुमंगलाः । सदासौभाग्यदायिन्यः पूजार्थ स्थापयाम्यहम् एतन्तेतिप्रतिष्टाप्य चतुर्थ्यन्तै र्नाममंत्रः पंचोपचारादि पूज- नंकुर्यात् । तद्यथा-ॐ मात्स्यैनमः 30 कूम्यैनमः, ॐ वाराही नमः ॐ कुव कुटनमः मडक्यनमः ॐलूक्यैनमः असोमा पैनमः । इति सम्पूज्यनैवेद्यं निवेदयित्वा जलचरेभ्योजलेक्षिप्त्वा प्रार्थन्, मासीकौमांचवाराहीं कुक्कुटी मंडुकीतथा । जलूकींचेव सोमांच सौभाग्यार्थनमाम्यहम् । ततःसर्वे नैवैद्य जलचरजंतुभ्यो जलाशयेक्षिप्त्वा भक्षयित्वा च जलाशयान्मनोहरेपात्रेजलनीत्वा वधूशिरसितत्पूर्णकलशं निशाय समाचारतोग्रामदेवता स्थानपनि- गच्छेत, तत्रदेवतायाश्चतुर्थन्त नाममंत्रेण पाद्यादिनीराजनान्तां पूजांकृत्वोपायनंनिवेदयेन् । ततः प्रार्थयेन्-यत्रयोदेवस्तस्यध्यान नप्रार्थयेन (वा) ॐ ग्रामदेवनमस्तुभ्यं सर्वदामंगलकुम ! प्रसीद देवदेवेशशरणागतवत्सल । तलो प्रदक्षिणांकृत्वा तेनपूरितकलशेन सह वधूमग्रतः कृत्वा गृहमागच्छन् । कतिचिद्देशेविदानी गृहांग- श्यामादेवीपूजनपिभवति । देशाचारतो यस्यदेशस्ययनाचारः सः सर्वदाव्यो भवतीतिशास्त्रसम्मतिः। प्राचारःप्रथमोधर्मः, इति वयूजलाशयपुजा एवं विधिनाद्विरागमनमपिकुर्यान् संकल्पस्यैवपृथक्त्वं अन्यत्कसमानम् अथवधृप्रवेश द्विरागमनयोर्विशेप:---देवको- स्थापन मंडपोद्वासनविधिः-तत्रकाला-समेचदिवसे कुर्यादेवको स्थापनबुधःपटंचविपर्मनेटमुक्त्वासप्तमपंचमौ समेघुपटंविपमेपंच- मसप्तमानिरिक्त दिननारेष्टमित्यर्थः अथवध्वाःप्रथमगृहप्रवेशचि- चार-मृहत चिन्तामणौ-समाद्रिपंचांगदिने विवाहाद्वधूमधेशो- (४२%) कर्मकाण्डरसाकर द्विरागमनपद्धति ॥ टिदिनान्तराले । शुभः परस्ताद्विपमाब्दमासदिनेक्षिवर्गान् परतो यथेष्टम् । उक्तंब सारसंग्रह-विवाहमारभ्य वभूमवेशोयुग्मदिने पोडशवासरान्तः । अतः परंविवाहपटले-बधूपवेशः प्रथमेववर्वे तथोतृतीयेप्यथपंचमेवा । सूर्येन्दुदेवेज्यवलेनकुर्यात् पंसोमुनिगौ- तम ग्राहसत्यम् ! सममासवर्पयोदॉपमाहनारदः-समवसमे मासेयदिनारीवजेत् । आयुष्यहरतेभः सानारीमरणंब्रजेन् गुरुशुक्रयोर्विचारमाहलल्ल'-स्वमवनपुरप्रवेठोदेशानां विप्लवेय- थोद्वाहे । नववध्वागृहागमनेरतिशुक्र विचारणानास्ति । नित्यया- नेगृहेजीणें प्राशनान्तेपुसप्तसु । वप्रवेशमांगल्येनमौढयंगुस्शु भयो । गर्गः-व्यतीगते च संक्रान्तौग्नहणेवैधृतावपि । श्राद्धं विनाशुभनव प्राप्तकालेऽपिमानरः । मुहर्तमार्तण्डे-उद्वाहात्मथमे शुचौयदिवसेद्भर्तहेकन्यका हन्यात्तज्जनींक्षयेनिजतनुज्येप्टेपतिज्य टकम् । पौषेचश्वसुरंपतिच मलिनेचैन्नेस्वपित्रालये तिष्ठन्तीपितरं निहन्तिनभयंतेषामभावेभवेत् । अथ द्विरागमनेविशेपमाह- वादरायणः-अस्तंगतेभृगोः पत्रेतथासम्मुग्वमागते । नष्टेजीवे निरंशोवानवसंचालयेद्वधृम् । मूर्त चि०--'वरेदयोजहागने घटा- लिमेषगेरबौरवीज्यशुद्धियोगतः शुभग्रहस्यवासरे । नृयुग्ममीनक- न्यकानुलापेविलग्नकेद्विरागमंलघुटवेचरेस्रपेमृदडभिः (नबोढा- यास्तुवैधव्यंयदुक्तंसम्मुखेभृगौ । तदैवविवुधैर्जेयम्, केवलतनिव- रागमे। अावश्यकेविशेषमापराशरः-पोष्णादिवन्हिभाद्यघियाव तितिचन्द्रमाः । तावच्छुक्रोभवेदधः समुखेगमनहितम् । केचि- दीपोत्सव प्रतिपदिनक्षत्रादिनियमविनववधूप्रवेश द्विरागमंचयां छन्तिाअस्तंगतेगुरोंशुक्रेसिहस्थेवाबृहस्पतौ।दीपोत्सववलेनववधू- भगृहं विशेन् । कतिचित्सु प्रान्तेषुपारं पर्यत्नान्नक्षत्रादिनियमवि नैव (ग्रामवचनम् ) इति प्रमाणात्--नव दिवसान्तराले प्रावि- पाहाद्विरागमनं कुर्वन्तीति दिन् । इति द्विरागमन पद्धति विवाहोत्तरविपयाणि ( ४२६) - अथ विवाहोत्तर वय॑वज्यांविषयाणि-एकमातृजयारेक यसरे पुरपस्त्रियोः । नसनान कृयां कुर्यान्मातृभेदेविधीयते । नारदः-पुत्रोद्वाहासरं पुत्री विवाहोन ऋतुप्रये । नतयो तमुद्राहमण्डनादपि मुण्डनम् । वराह-विवाहस्त्वेक जातानां परमासा दन्तरे यदि । प्रशंसय त्रिभिर्वर्षस्तकाविधवा भवेत् । वसिष्ठः नविवाहोलमृतुत्रयेशी विवाह कार्य दुहितु: प्रकुर्यात् । नमण्डनाश्चापि हि मुण्डनंच. गोक्तायां यदिनाब्दभेद. ॥ अन्न गोत्र शब्दोसापड्यजनक:-- एक दरभ्रातृविवाह कृत्यं खमुनाणि प्रक्षणं विधे'म् । परापासमध्ये मुनयः समूचूनमुण्डनं मण्डनतो किर्यम् । एतदपयोदमाह-ऋतुम स्यध्ये चेदपादस्य प्रदेशनम् । साहकोदरस्यानि विवाहस्तुप्रास्यते । सारावल्याम्फालगुने चैन सास पुत्रोद्वारोपनयने । मेदारस्य कुर्यात नत्रय विलवनम् ॥ संदितानदीपे- विमहत्तस्यसनिक, कयोविवाहो दुहितुः समार्धम् । प्राप्यकया स्वसुगलयं च ३५ प्रवेश्या त्स्वगृहनचादौ । वशिष्ठः-द्विशोभनंस्वगृहेरिनेष्टं शुभं तुश्चानव भनिस्तु । भावश्यकं शोभनमुत्मयो वा द्वारेथाचार्य विभेन्तोका । त्रिमंगलं नेयमाह- एगोदर सूनका नाग्निकार्यनयंभवत् । भिन्नोदर सूनना नेतिशात तपोग्रवीत् । ज्योतिनिधेिमात्यायन.-- बुलेतुः यादवार मडनानतुमुण्डाम् । प्रदेशाभिगमोनेटो नामंगलकम् । पुत्रोद्वाहः प्रवेशारयः क योद्वाहस्तुनि: । मुण्डनंचौलमित्युक्तं व्रतोद्वाहौतुभंगलम् । चौलं मुण्डनमवोक्त पर्जयेन्मण्ड- नम् । मौजीचोभयतः कायां यतो मोजीनमुण्डनम् । संकटेविशेषः कादिकारिक मुद्व हापुत्री नरित विध्यारपुन्जस्योदर कति यावचतुर्थ दिनअपूर्व सन या योद्वरनंविर पात् । कश्या: - मौजीवधस्तथोद्वाह. परमामा परऽश्विा । पुरान कुति विभक्तानां न दोपकृत् । गाय: मातृगे स्वसूयुगे भ्र तृरूसृयुगे तथा । न कुर्या मंगलंकिंचिदेकसमराड पेऽ नि । ज्योतिर्विधरणेस- --एकोरयोयोत्कदिनोद्हनेभवेनाश पन्य त त्वेकदिनवै ऽपाहु संकोचशुभम् । विवाहा- शुभदोनरस्य नरीविवाहो न ऋत्रयेसात् । नारी विवाहात्त हे शिस्तं नस्पाणिग्रहमाहुरायाः मिनभ्रातृग्योस्तु एकासरे विवाहयामेध निथि. पृथड् मातृजयो कार्याविवाहस्त्वेक्तासरे एकस्मि- मंडपेकार्यः पृथक वेशियोस्तथा । पुटा टिकयो। कार्य दर्शनं न शिस्त्रयो भगिन भामुभामा व यावरसप्तपदीभवेत् । यमलयोस्तु विशेषो गाग्र्य ~~~एकस्मिन्यासरे प्राप्तेफुयाद्य मल जातयोः ॥ चौ चैव विवाहं च मौजीवन्धनमेव च । महकारिकायम् कर्तव्यंमंग ने स्वस्रो भ्रांत्रोर्य मलजातयोः अथ कन्या गृहे भोजननिषेधः आदित्यपुराणे:--विष्णुजामातरं मन्ये तरकोपनान्येत् । भप्रजापानु कथा नश्नीयात्तस्य वेगृहे । यदि मुनीनमोहाद्वापूयार्श नरकं ब्रजेत् । मदनरत्ने भवि. प्ये-दौहित्रस्य मुख दृश्या किमर्थमनुशोचति दौदिबरयान्यापुत्रस्य । अथ नादीश्राद्धोतरधर्माः निर्णयदगार्य नान्दीप्राद्धकृतश्चाद्य वन्मातृ विसर्जनम् । दर्शनगद क्षयत्राध्दस्ननं शीताइन च प्रामय स्वधाकार नित्यश्रध्द तथैवच । ब्रह्मश चध्यय । नदीमीमातिलंधनम् । उग्ध सततं चैत्र प्राद्धभोजनमेवच नवयु. सरिडारच मरण्पोद्वायनावधि: ज्योतिषे स्नानमच तिलनिकम प्रेतानु- यानं कनरामदनम् अपूर्वतीय मरदां च विनयेन्मंगलतोऽहमाम् । विशुद्देशक नराम् ॥ मासपकूट विवाहाद व्रतारंभणन च । जीर्णभाण्डादि न स्यान्यं गृहमंत्रार्जन तथा । ऊय विवादरम्य तथा चं व्रत कधनात । भत्तनो मुण्डनववर्ष वा दमेवच अभ्यंगेस्तये चैव विवाह पुत्र जन्मनि मांगल्येषु य सर्व नवार्य गोपिचरम् । वृहस्पतिः--तीर्थ विवाहे यात्रायोप्रामे देशवि.वे । नगरमामदाह च ( ४३०) कर्मकाण्डरलाकरे कुम्भविवाहपरिभाषा । -: स्पृास्पृश्नि:ष्यति । योगियाज्ञवल्क्या-नानाय दुलवे तीतेमंग विनिय च अनुव्रज्य सुहृद्वधू नाचरित्वे देवाम् । हेपादौर मृत्य तरे–चिपावत चूडामु वर्ष:ईतदर्धक पिण्डदागमदा ना न कुरिलतर्पणन् । स्तृतौहालये ग्याध्दे साताको तये हनि , कृतो होऽपि कुर्वीत पिण्डनि- वयात । ग्रन्यविस्तारभादलम्- अथ कुभविवाह परिभाषा। प्रयापरिहार्य कन्यावधव्ययोगेतूच्या माकण्डेयपुराणे-य लवैधव्ययोगेतु कुम्भ पुप्रति नादिभि । कृप लग्न तत ५श्यलयोद्व होतेच २ । तत्र पुनभू दोपाभार उक्तो विधानखएडे—स्वाम्बुमिन ना च प्रतिहाविष्णुहरिणी । तयासह विव हेतुपुनर्भूत्वनजायते । सूर्यारणस गडे-विन हात्पूमाले च चन्द्रतार व नन्विते । विवहाक्त चम्न्य या कुंभेनसहचोद हेत् सूण यष्टयतया हा नुविना । कुकुसतंद तयारेक मानिदरे । तन कुंभचनिः सर्यप्रभ- जिलाशये। ततोऽभिपवन कुमार का । कुभप्रायनारि तत्रयोक्ता--वरण स्वरूपाय जना साथ । । fी जायकन्या पाश्विर पु सुम्न कुरुं । देहिविष्ण वरदेव कन्यालय दु खः । ततो जयस्वादि व ।यतिमाये । नपरोविष्णु । तत्रैर मूर्तिदानमप्युक्तम् ब्राह्मण माधु नाम सम्पू"विविध ईणे । तस्मात्य द्विवान विष्णभू। चतुर्भजम् । शुवर्ण सुवरीमत्ता उपनिर्यातम् । निता चिज शय गा चरायुताम् । दधन याममापीतेकुमुदोलन- मालिन म् । सक्षिणा च यमेननुदीरयेत् । भन यात्रावि जनुषित रवा रतिनगरम् । विवोपवित्रास्त्र हतीच नबि क्त या । प्रा-मान महाघोरफा सौधनम् । वैधव्य गिदुः खोपन रायमुनिव्धये । बहुसोभाग्य लव्यौ च पक्षाशोरिमातनुम् । स कमिनिता त्या तु-सत्र- ददेद्विज । अनवाद्याहास्मी। किरनपनि । एन स्पिति तस्योफगृहीतगृहनिशत् । ततो वैदिक कुविध त मृगीहरा । ॥ अथ कुंभविवाहपद्धति ॥ प्रयच कन्यापिता ऽन्योवा-एकान्त स्थाने विष्णुमन्दिरादौ गत्वासनेप्रामुखमुपविश्याचम्यप्राणायामत्रयं विधाय भूतो- त्सादनं कृत्वा स्वदक्षिणतः कन्यामुपविश्य स्वस्तिवाचन पठित्वा संकल्पं कुर्यात् । अथेहेत्यादि देशकालसंकीर्तनान्ते ममास्याः कन्याया नक्षत्रादि योगेन नहयोगेनच पुनर्भू दोपाभावेन विपा- ख्य योगसंभव वैधव्यारिष्ट परिहारार्थ श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ कुंभ विवाहं करिष्ये,, तत्पूवींगत्येन नणेशादिपंचांगपूजनं नान्दीश्राद्धं चाहं करिव्ये,, ततो गणेशादि पूजनं कृत्वा । प्राचार्य घृणुयात् ।। ब्राह्मणं सम्पूज्य परण सामग्री हस्तेनीत्वा-यद्येत्यादि संका मुफोऽई ममास्याः कन्यायावैधव्य दोपपरिहारार्थ करिष्यमाण 1 (३२) कर्मवानाकरे, कुम्भविवाह पद्धति ॥ वघमाणमन्त्रेणान्तः पटं कुर्यात् । विवाहोक्तगोत्रोचारण विधौ मंगलपद्याष्टकं पठित्वा कन्याया वस्त्राणिपरिधाप्योत्तरतो वक्ष्य माणमत्त्रेणान्तः पटमपसार्य समीक्षणं कुर्यात् । मंत्रः 30 समं जन्तु विश्वेदेवाः समाणे हृदयानिनौ ॥ समातरिस्वा संधाता समुदेष्ट्री दधाननौ । इतिपरस्पर कुंभकन्ययोः समीक्षणं कृत्वा । कन्यां पाद्यगंधादिभिः संपूज्यसंकल्पं कुर्यात् । 3. विष्णुः ३ इति निराचम्यायेत्यादि देशकालौ संकीर्य ममास्याः कन्याया वैधव्य दोष परिहारद्वारा श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थ श्री विष्णुवरुण स्वरूपिणे कुम्भायैमा वराधनी श्रीस्वरूपिणी कन्यां संप्रददे । दान वाक्य पठेत्- गौरी कन्यामिमां लक्षणां यथाशक्ति विभूषितां । ददामि विष्णवे तुभ्यं सौभाग्यं देहि सर्वदा। इति दत्वा वक्ष्यमाण मन्त्रेण दशतन्तुकेन सूत्रेण कन्याकुंभंच मंत्रावृत्या दशधावेष्टयेत् । 30 परित्वेत्यस्य मधुश्छ दाऋषीरनुष्टुप्छन्दः कुंभविवाहे कन्या कुभेनसहवेष्टने विनियोगः। 30 परित्वागिर्वणोगिरऽइमामवन्तु विश्वतः वृद्धायु मनुवृद्धयो जुष्टाभवन्तुजुष्टयः । इति मंत्रेण दशावृत्या वेष्टयेत् । ततःकन्यांप्रार्थयेन् । 30 यन्मयाप्राचि जनुपि त्यक्त्वा पति समागमम् । रिपोपविपशस्त्रार्हतोयाति विर भाप्यमानं मराघोर यशःसौख्य धनापहम् । वैधव्यायति दुःखौ घ नाशाय प्रार्थयाम्यहम् । विष्पोस्त्व देहे सौभाग्य कुरु वैध- व्यनाशनम् । इति सम्प्रार्य ततोवेष्टितसूत्रात्कुंभं निःसार्य जला शयेप्रसारयेत् । ततः पञ्चपल्लवसहितेन पूजाप्रकरणोक्त समुद्रज्येष्ठा इत्यादि मन्नस्तत्रोक्तवैदिकैश्च कन्यामभिर्पिच्यान्यद्वासांसि परि धाप्यप्रतिमादानं कुर्यात । अयेहेत्यादि संकामुकराशे रमुक क- न्याया : करिष्यमाण वैधव्य दोपोपशमनार्थ कुंभ विवाह कर्मणि आजन्म शौभाग्य फलप्राप्तये इमेसुपूजिते विष्णु वरुणमतिमे वै- यावस्त्रसहिते चामुक शर्मणेयाचाथाय दास्ये तथा चान्येभ्यो ब्रामणेभ्यो भूयसी दत्तिणां विभज्य दास्ये तथा च ब्राह्मणान्भो জম্যান মনিরবিবাণৰবি । (४३३ ). , जयिध्ये इत्याचार्याय प्रतिमा दत्या प्रार्थयेत-बहुसौभाग्य लब्धौ च महाविष्णो रिमां तनुम् ।सौवर्षि निर्मितिं शक्त्यातुभ्यं संपददेद्विज ॐ अनघाहमस्मि, इति वारत्रयंकन्यामार्थयेत् एवम- स्तु, इति वारत्रयमाचार्यों चूयात् । ततो गणेशादीनामुत्तरांग पूजनंकृत्वा यान्तुदेवेति विरज्याभिषेकमन्त्रतिलकं कृत्वा यथा शक्तित्राह्मणान्मोजयित्वा ततः कन्याविवाहं कुर्यात् । एवंविधि कृते सतिशुभंभवेत् इति कुंभचिवाह पद्धतिः । अथ प्रतिमाविवाहपद्धतिः। अधच कन्याया जन्मकालीन ग्रहादिसूचितवैधव्य परिहारार्थ पूर्व विष्णुमति मया सह विवाहं कृत्वा तदन्तरं विवाहमाचरेत् । उक्तंच विधानखण्डे-स्वर्णाम्बुपिप्पलानां च प्रतिमाविष्णुरूपिणी तयासहविवाहेतुपुनर्भूत्वंनजायते । संस्कारप्रकाशेऽपि-विष्णु प्रतिमा विवाहप्रकारोऽऽप्यभिहितः । तत्र कर्ता स्नात्वास्वासनमु- पविश्य पामुग्वः पाचम्य भूतोत्सादनंकृत्वा दीपंपूज्वाल्यसंक- ल्पं कुर्यात् । अयेत्यादि. अमुकीकन्यायावैधव्यदोपपरिहारार्थ करिष्यमाण विष्णुप्रतिमयासह विवाहकर्मणि निर्विघ्नतासिद्धये तत्रादौ गणेशादि पंचाग देवतानां पूजन पुर्वक प्रतिमा विवाहेच करिष्ये । तत: कन्या संस्नाप्य शुद्धनूतने वाससी परिधाप्य स्व दक्षिणभागे समुपवेश्य स्वस्तिवाचनं पठित्वा गणेशादिपूर्जन कृत्वा प्रधानसंकल्पं कुर्यान् । अद्येत्यादि० इदानीममुकगोत्राया- मुकराशेरस्याः कन्याया अमुकस्थानस्थितदुष्टग्रहसचित वैधव्य दोपोपशांतिद्वारा श्री परमेश्वरप्रीत्यर्थ सौभाग्य प्राप्त्यर्थं च विष्णुप्रतिमयासहविवाहं शरिये ॥ कन्या हस्तेन प्रतिमा दानंच करिष्ये । तत श्राचार्यवरणं कृत्वा । संप्रार्थ्य च, ततः सपादपलस्वर्ण निर्मितां चतुर्भुजां विष्णुप्रतिमा शंखचक्रगदायुतां पूर्वोक्त विधिनाऽन्युत्तारण कृनां पञ्चामृतेन संस्नाप्य तण्डुलपरित (४३४) पर्मकार ढरलाको सिमाविवाहपतिः ताम्रपानोपरि संस्थाप्य 30 एतन्तैति पठित्वा मूर्भुवः स्वः भो विष्णोप्रतिमायामिहा गच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्टतो घरदोभव इति प्रतिष्टाप्य अंधेहेत्यादि० अमुकगोवायाममास्याः कन्याया जन्मलग्नावधिकैवैधव्य संभावनाजनितग्रहवैधव्यदीप निवृत्तये- आजन्म भविष्यत्पतिना सह सौभाग्य प्राप्तये श्रीपरमेश्वर प्रीतये सुवर्णप्रतिमायां श्री विष्णोः पोडशोपचार पूजनं करिष्ये ध्यानम्-30 निर्मिनां सचिरांशग्वगदाचक्राब्जसंयुताम् । दधानां वाससीपीतेध्यायामि विष्णुरूपिणीम् । इति ध्यात्वा पुरुष सूक्ते- नवा वक्ष्यमाणमन्त्रः पोडशोपचारेण प्रतिमापूजनं कुर्यात् । ॐ तद्विष्णरित्यादिमन्त्रत्रयाणां मेधातिथिर्याज्ञवल्क्यसपिर्गायत्री छन्दो विष्णुर्देवता प्रतिमाविवाहे प्रतिमा पूजने विनियोगः । 30 तद्विष्णोः परमं पद र्ट० सदापश्यन्ति सूरयः दिवीवचक्षुराततम् । ॐ त्रिणिपदाविचक्रमे विष्णुगोपाऽअदाभ्यः । श्रतो धर्माणि धारयन् । ७० तद्विप्रासो विपन्यवो जागृवा ॐ सः समिन्धते । विष्णोर्यत्परम्पदम् । इति मन्त्रैः सम्पूज्य 30 विष्णवे नमः । प्रा “धयेत् । श्री विष्णो जगतां नाथ जगन्मंगल कारक । वैधव्ययोग शान्ति त्वं मत्कन्यायाः कुरु प्रभो ॥ ॐ देहि विष्णो वरं देव कन्यां पालय दुःखतः । पतिं जीवय कन्यायाश्चिरं पुत्रसुखं कुरु । इति संप्रार्थ्य मधुपर्क दद्यात् । 30 प्रतिमारूपिणे तुभ्यं मधुपर्क ददाम्यहम् ॥ विष्णवे कुरु सौभाग्य कन्यायाश्चैव सर्वदा ॥ कल्याप्रतिमा ऽन्तरालेऽन्तः पटंकृत्वा मङ्गलपद्यं पठेत् । ब्रह्मादक्षः कुवेरोयमवरुण मरुद्वन्हि चन्द्रेन्द्ररुदाः शैलानद्यः समुद्राग्रहगण- मनुजादैत्यगंधर्वनागाः। सिद्धा नक्षत्रतारारविवसुमुनयो व्योम- भूरश्विनौच सलीनायस्यदेहे सहरतु भगवान्सर्ववैधव्यदोषान् ततोऽन्तः पटमपसार्य वक्ष्यमाणमन्त्रण समंजन कुर्यात् । ॐ कन्यावैधव्य योगाश्च तव दृष्टि निपातनात् ।। सर्वेनश्यन्तुविष्णोत्वं कन्यांपश्यहवत ॥ इति कन्यामतीक्षणं कृत्वा कन्यां गंधाक्षतादिभिः सम्पूज्यदानसंकल्पं कुर्यात् । अधे- कर्मकाण्डरत्नाकरे, प्रतिमाविवाहपद्धतिः॥ (४३५) त्यादि संकीामुकोहंममास्याः कन्यायाः जनुपिकूरग्रहजनित वैधव्यदोपपरिहारार्थ सौभाग्याप्तये इमाममुकीनाम्नी कन्यां वि. पणवेतुभ्यसमर्पयामि । इति कन्याहस्ते प्रतिमोपरिस्पर्शशारयित्वा दानप्रतिष्ठां कुर्यात् । अयेतद्वैधव्यदोपपरिहारार्थ कन्यादानक- मणः सांगतासिद्धये-इदंसुवर्ण विष्णवेतुभ्यं संप्रददे । इति दत्वा । दशतन्तुसंमिलितसुत्रेण कन्यांप्रतिमयासहवेष्टयेत् । ७० परित्वे- त्यस्यमधुश्च्छन्दा पिरनुष्टुप्छन्दो विष्णुप्रतिमा विवाहे कन्या- प्रतिमयासह वेष्टनेविनियोगः। ॐ0 परित्वागिर्वणोगिरऽहमाभवन्तु विश्वतः । वृद्धायुमनुवृद्धयो जुष्टाभवन्तुष्टयः । इति मन्त्रा- त्या परिवेष्ठयक्षणंविरमेत् । ततः कन्याविष्णुप्रार्थयेत् । जन्मार्जि- तानां पापानां फलाद्वैधव्ययोगजाम् । निः सरयत्वंवैधव्यान्मांच विद्धिस्वकिंकरीम् । यशोदेहिधनदेहिदेहिमे विपुलंसुग्बम् । पत्या च सहसौभाग्यंदेहित्वंशरदांशतम् । ततः प्रतिमा निः सार्यकन्या प्रतिमादानं कुर्यात् । गंधाक्षातादिभिरुत्तरांगपूजनंविधाय अद्य- त्यादि. अमुक्याहस्ववैधव्यदोष निवृति द्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थ कृतस्य विष्णुप्रतिमाविवाहकर्मणः सांगतासिद्धये इमांरि प्णुपतिमा जनुषि लग्नादौस्थित है। संसूचयिष्यमाणवैधव्यादि- दोपनिवृत्तयेसकलेश्वर्य सौभाग्यमापनये श्रीपरमेश्वरप्रीतये- इमां सुपूजितां सौवणीविष्णुप्रतिमांसोपस्करयुतामिदानीस्वगा- त्रपरिधेयवस्त्रांश्चामुकगोत्रायामुकशर्मगे ब्राह्मणाय श्राचार्याय तुभ्यमहं सम्प्रददे तत्सन्नममा दानवाक्यंपठेत् । यन्मयाप्राचि नुपिघ्नंत्या पतिसमागमम् । विपोपविषशस्त्रास्तोवाति विरक्त या।शप्राप्यमाणंमहाघोरयशासौख्यधनापहम् वैधव्यायतिदुःम्वौ घंतनाशयसुम्वाप्तयेोशवहुसौभाग्यलध्य व महाविष्णोरिमांतनुम् सौवर्णानिर्मिनां शक्त्यातुभ्यं सम्प्रददेद्विज.॥३॥ इति ब्राह्मण हस्ते. प्रतिमांदत्वा कन्यावदेत् । 30 अनघामस्मि, इति वारत्रयंबूयात् ब्राह्मणस्तु-30 द्यौस्त्वाददातु पृथिवीत्वाप्रतिगृह्णातु | ॐ स्वस्ति इति प्रतिगृह 30 कोदान्कस्मादात् इति पठित्वा 30 अनघा- (४३६) হযexাই যাবে৷ भव, इतिवारत्रयं नूयात् । ततः कृततत्मतिमादानप्रतिष्टार्थ मिदं सुवर्णवासुवर्षनिष्क्रयीभृतंद्रव्यमांचार्याय तुभ्यंसम्प्रददे । ततो ऽभिपेकतिलकं कृत्वा ब्रामणभोजनंदद्यात् । इति प्रतिमा विवाद पतिः अथाकविवाहपरिभाषा अथच रातोरमानुपाविनादस्य नितिकारिजातन्यरियाई पैधिः । कश्यपः-तृतीय मानुषी नवचतुर्थीयःद्धत् । पुत्र प्रादिनमः गुटु वसतिया: । दतिविषय तृतीर न कराच।। मौदनितोवाति यदिगधनु मानुषीम् । तर त्येव न संहोगर्गहरुपयनंस्था । संग्रहे- तृतीया परिचोदरेसा विधा भया । चतुवादिवियाहार्य तृतीयाममुहत् । प्रादित्य सिंगर हस्त गानेश्नरे । शुभदिनेवापूर्ण हो कुमार विवाघम् देशादिनिर्णगेत्रहापुराणे-प्र.मत्या- च्यामुदीच्या या स्पुर.फन संरम् । परीक्षार्क ततोऽयस्तारस्थरिटलादि स्थाविधिः व्यासः-- नात्यालंकृतकासास्तु रक्तगन्धाभूिपितम् । रपुर फारापैक.गुल्मसाभयेत् । सलवनसंयुका मफै संस्थाप्ययाः कन्यादानार्थमाचार्य रु.येत्पुरा । .प्रधिमा त्य त..स्त्यावर- घयेत् । मन्दीवादण्येन अन्त्रिपू. येत् । पूजये धुणारं दिसा: ॥ यज्ञोपवीतं- १स्वहस्तकणात रणम् । उष्णीपान्धरल्यायिस्मै दायेत् । सुशासोक्तप्रकारेणमधुपर्क समाचरेत् ॥ यथाविधीत्यस्यानरबहा राणे-मारो देवेश पायार्सा तं किम् । यस्माल्यैस्तथार्ग पैस्टन्मन्नेवपूरयेत् । तत्प्रेण कृनायनि । श्वेतवरणविष्ट्य तथाकपास- ततुभिः । पन्धपुष्पैःरामाच्या दिलगैरभिपिन्छच ।गुडन नैवेदाम्बूलंचमार्पयेत् । अर्कप्रदक्षिण- कुर्वन् जपे मरिमंयुधः । प्रयोगेम ग्रं शापि । तत्कयावरणत्रिपुरुपंकुरु मुञ्चरेत् । प्रपित्यः सवित.सूर्यः पुत्रीपौनीच नात्रिया । गोक सइयुक्तल.के ले.विक्रमाचं त् । सुमुतेऽनिरीक्ष्येन् स्वास्सूिक्तमुदोरन् । प्रशीभिः सहिनः कु. कचर्यप्रमुखद्विजैः । अयाच यसपाहूयविधिनात सुख:- च्चताम् । प्रतिगृह्यततोहोमंगृह्योक्त विधिनाचरेत् । व्यास:- लजतकणिकृत्वा कंकणपू:- पम् । यारपंच.वृत्तंसूत्रं तव प्रदर्शयेत् । सहारनाओणगावावा .पेत् । पंचीकृत पुत:सूत्रम् स्कन्वेचना तमनः । मिति: ग्रेग सूत्ररक्षा कायेत् । अर्कर पुतः एव दक्षिणो- त्त'तस्तथा । कुन्मांश्च नक्षिपेत्तश्च धाग्ने गदिन्तुष्टये । सवरनंगतिभंपत्रिसूत्रेणैव वेटयेन् । हरिद्रा- फमाण्डरनाकर मथाविवाहपतिः (४३१) गन्धसंयुकंपूरयेच्छोतजलम् । प्रतिकुम्भमहाविष्णु लम्पूज्य श्याम् । पराप्यादिनदेयान्तं कुर- माम्नैव मन्त्रविन ॥ अनहोमप्रकारः सौनकेनप्रदर्शित:-अर्कसनिधिमाश्य तस्पस्त्यादि कारयेत् । नान्दीलाईप्रति स्थण्डलंच न्यायेत् । अर्कनायस याच गन्धपुष्पाक्षतादिभिः । सायंचलातंतवद् वनपाल्यादिभिःशुभैः । अस्यिोत्तरदेशेतु समन्वारन्धएतया ।। एतयांकन्यया । उल्लेखनादिकं कुर्यादापारान्तमत: पाम् । अ.ज्याहुतिरजुहुयात संगोभिरन्यैश्या । यरमैत्व कम- कामायेत्येतच परमम् । व्यरत भिश्वपमस्ताभिस्त तस्विष्टकृद्धदेत् । परिपेक्नपर्यंत मयारचेत्या- दिक कपात् । अनपंचमदिनकर्तव्यमुक्तंग्रहापुराणे-पतू दिसेऽनीतेपूर्वदत्ता पूश्यचदिस्त्य हे.मग्निचविधिनानानुपीपरम् । उद्वहेदन्यथानेव पुत्रपौ-रिदृद्धिकान् । नपशुपवित्राणि मालं. नेगच्छति । ऐवमे द्वित: विधिनसम्पगुद्व हेत् । धनधान्यसमृद्धिश्च इच्छाशक्तिपरप्रच। ततो वैमातिसूक्तानिजप्त्वन्तविरजेत्पुनः । गोयुग्मंदक्षिणांदद्य दाचामाय र भक्ति तः । इतरेभ्योऽपवि. प्रेभ्योदक्षिण चाभिशक्षितः । तत्सर्वगु येन्यादा पुराहपाचरेत् । पंप्रयोगैससम् ॥ अथार्कविवाहपहतिः अथच क्रियमाणतृतीयविवाहात्माक् चतुष्टय दिनाधिक व्यवहिते। रविवारे शनिवारे या हस्त था चन्द्रतारानुकूलेड- न्यस्मिशुभनक्षत्रे शुभेदिनेग्रामात्माच्यां वा सुपुप्पफलान्वितस्यार्क वृक्षस्यसन्निधौगत्वातस्याधः प्रदेशेसमैनात्सपादहस्तवेदिकां चतु. रसांकृत्याऽस्यपश्चिमन उपविशेत् । तत्राविवाहसामग्रीस- म्पाद्याचम्यदीप प्रज्वाल्प भूतोत्सादनादिक कृत्वा आनोभद्रे- तिस्वस्तिवाचनं कृत्वासंकल्पं कुर्यात् । अग्रेत्यादि देशकालौसकी- ामुकराशिरमुकोऽहं करिष्यमाणाविवाहकर्मणिनिवित्रतासिं- छयेभगवतः श्रीगणेश्वरस्य पूजनं मातृकापूजनं नान्दीश्राद्धादि नवग्रहान्त पंचांगपूजनं च करिष्ये (तत्र नान्दीश्राद्धं सपाद माप- सुवर्णन कुर्यात् ) इतिगणेशादि पंचांगपूजन विधायाचार्यवृणुपात् पाद्यादिभिर्यात्मणं सम्पूज्य" चरणसामग्री हस्ते कृत्वा अधेत्या- द्यमुकोऽहं करिष्यमाणार्कविवाहकर्मणि कमीपदेशार्थमेभिव्यैर- (४३८) कर्मकाण्टरत्नाको प्रथाविवाहपद्धति मुकगोत्रममुक शर्माणं ब्राह्मणमाचार्यत्वेन त्वामहं वृणे,, यरणं दत्वा प्रार्थयेन् । प्राचार्यस्तु० कर्म० कर०॥ ततोऽर्ककन्यापूदा नार्थमन्यत्रामपंवृणुयात् । पाद्यादिभिस्तं सम्पूज्य वरण सामग्री करे कृत्वा, अये. अनुको हमेभिरणद्रव्यैर्गन्धा- क्षतादिभिरर्क कन्यादानार्थममुक शर्माणं त्वा महं वृणे । वरणदत्यापूर्थियेत् । कन्यापितायथा सूर्योदेवानां च पूजा- पतिः। तधात्वमर्कदाना मा वार्यवांकुरु द्विज ? यावत्व मस मायेत तावत्वंसन्निधौभव । ततो दानाचार्योवरं पाद्यादि मधु- पर्कान्तं कर्मकृत्वा यज्ञोपवीतालंकारादिभिः पूजयेत् । ॐ साधु भवानास्तां पूजयामि 30 अवय 3 विराजो दोह. पाद्यम् । विष्टरं च दत्वा मधुपर्कान्ते वात्रालंकरणादीनि वरणसामग्री करे कृत्वा । अद्य० एभिर्गन्धातन वरण-पैरमुकगोत्रमर्क कन्यापरि- ग्रहार्थं त्वामहंवृणे इतिवरंवृत्वा सचवरोऽकस्यपुरतस्तिष्ठन् । सूर्य प्रार्थयेत् । हस्तेगंधाक्षतपुष्पं निधाय-ॐ त्रिलोक यासिन् सप्ताश्व छाययासहितो रवे । तृतीयोद्वाह दोष निवारय सुखं कुरु । ततोऽर्काधः कलशं संस्थाप्य कलशपूजाविधिना सम्पूज्य नतः सौवणि सुवर्ण प्रतिमामग्रतः कृत्वान्युत्तारणादि पञ्चगव्य स्नानान्तं कृत्वा कल सोपरि गोधूमानपरितताम्रपानं निधाय तत्र- पूतिमा संस्थाप्य "आकृति विनियोगपुरः सरं मन्त्रेण पूतिमां फलशोपरिसंस्थाप्य "एतन्तेति प्रतिष्ठाप्य 0 विभ्राड् बृहत्पियतु सौम्य मित्याद्यष्टा दशमंत्र सूर्यमुक्तंन वा "प्राकृष्णेतिमन्त्रेणार्क छायासहितं सम्पूज्य श्वेतवस्त्र सूत्राभ्यामर्कमावेष्ट्य च " 0 आपोहिष्टेत्यादिभिस्त्रिभिर्मन्रमभिषिच्य नैवेद्यार्थ गुडौदनं ताम्बूलं च निवेद्य ततः पूदक्षिणां कुर्वन् पार्थत्-30 ममपूीति- करायेयंमयास्पृष्टापुरातनी । अजा ब्राह्मणा सृष्टा हास्माकं परि- रक्षतु । पुनरपि वक्ष्यमाणमंत्रजप्ताप्रदक्षिणां कुर्यात् । ॐ नमस्ते मंगले देवि नमःसवितुरात्मजे । त्राहिमां कृपया देविपत्नी त्वं म इरागता । अर्कत्वं ब्रह्मणा सृष्टः सर्वप्राणिहिताय च । वृक्षा.
फर्मकायरताकरे, मविवाहपद्धतिः ॥ (४३६) णामादिभूतस्त्वं देवानां प्रीति वर्द्धनः । तृतीयोद्वाहज दोपं मृत्यु चाशु विनाशय । ततोऽवेद्या उत्तरतो होमार्थ प्रादेशमात्रं स्थण्डिलं कृत्वा पंचभूसंस्कारपूर्वकं तैजसे पात्रे-अग्नि स्वाभि- मुखीकृत्यसंस्थाप्यप्रतिष्टाप्य च तद्रक्षार्थमिन्धननियुज्य, वरः प्राङ्मुखो भूत्वाऽर्कसमीपे तिष्टेत । ततो वरार्कयोरन्तरालेऽन्तः पटं धृत्वा वक्ष्यमाण मंगलपद्यं पठेत् । सिन्दूरं स्पृहया स्पृहन्ति करिणां कुंभस्थ माधोरण भिल्लीपल्लव शंकयाविचिनते सान्द्र द्रुमद्रोणिपु । कान्ताः कुंकुम शंकया करतलेमृद्गन्ति लग्नं चयंत् तत्तेजः प्रथमोद्भवं भ्रमकरं सौर चिरंपातु वः । अद्य हेत्यादि. काश्यपगोत्रः काश्यपावत्सार नैध्रुवेतित्रिप्रवरान्वितादित्यप्रपौत्री सवितुः पौत्री ममार्कस्यपुत्रीमिमां कन्यां "अमुकगोत्रायामुक- प्रवरायामुकम्पौत्रायामुकौत्रायामुकपुत्रायामुक नाम्ने पराय" इति गोत्रोचारं कृत्वान्तःपटमपसार्य ततः कन्यां निरीक्ष्य स्वस्ति- वाचनपठित्वा आशिपं दद्यात् । ततो दानाचार्य:-भक्तिः प्रहाय दातुं कुमुल पुट कुटी कोटरक्रोडलीनां, लक्ष्मीमाक्रष्टकामा इव कमल वनोद्धादनं कुर्वतेये कालाकारान्धकाराननपतितजगत्सा- ध्यसाध्वंसकल्पाः, कल्याणं : क्रियासुकिसलयरुचयस्तेकरा भास्करस्य । अग्रेत्यादि देशकालौ संकीर्य काश्यपगोत्रां काश्य- पावत्सार मैवत्रिप्रवरान्वितामादित्यस्यप्रपौत्री सवितुः पौत्री ममार्कस्यपुत्री "श्रार्की नाम्नीमिमां कन्यां अमुकप्रपौत्रायामुक- पौत्रायामुकपुत्रायामुकगोत्रायामुकप्रवरायामुकशाखिनेऽमुकवेदा- ध्यायिनेऽमुक नाम्ने वराय तुभ्यमहसंप्रददे” इति पर हस्ते जल दत्वा दान वाययं पटेत् । ॐ अर्ककन्यामिमां दिन यथाशक्ति विभूषिताम् । गोत्रीय शर्मणे तुभ्यं दत्तां विपू समाश्रय | अद्येत दानपूतिष्ठार्थ सुवर्ण तुभ्यमहं सम्पददे । स्वस्तीति वरो बृयात् । ततो वरः गंधाक्षत पुष्पयुतोदक पूर्णास्त्रींनजलीनर्कोपरि दद्यात्।। तत्रमंत्रा:-ॐ यज्ञो मे कामः समृध्यातां १ ॐ धर्मों में कामः समृद्धयतां २ ॐ यशो मे कामः समृदयताम् ३ इत्यंजलिन्नयं (४४०) कर्मकाण्यानाकरे, अर्कषिराहपमतिः॥ दत्वा ततो गायत्री मन्त्रेण वा ॐपरित्वागिर्वणोगिरऽहमा भवन्तुविश्वतः । वृद्धायु मनुवृद्धयो जुष्टाभवन्तु जुष्टयः । इति पंचवारमर्कवृक्षोपरिसूत्रमावेष्टय तत्सूत्रं पुनः पंचगुणं कृत्वाऽर्क- स्यदक्षिणस्कन्धे वध्वा वृहत्सामेतिरक्षांकुर्यात् । ॐ वृहत्सोम क्षत्र भृवृद्ध वृष्ण्यं त्रिष्टुभौजः सुभित मुग्रवीरम् । इन्द्रस्तो- मेनपंचदशेनमध्यमिदं चातेन सगरेण रक्ष । ततोऽर्कस्याष्टदिक्षु अष्टदलेपु अष्टौ के भान्संस्थाप्य वीराच्छाद्य त्रिसूत्र्या कंभ गलं संवेष्टय च हरिद्रागंधादिकं जलं पाभ्यन्तरे क्षिप्त्वा तेपु कलशेपु सुवर्ण प्रतिमासु महाविष्णुमावा पुरुष सूक्तेन वा इदं विष्णु- रितिमन्त्रेण पोडशोपचारैः पूजयेत् । ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमेत्रे- धानिदधेपदम् । समूढमस्यपा ॐ सुरे। ततः स्थण्डिले पंचभू संस्कारपूर्वकं (वरदः शान्तिकर्मणि) इतिवरद नामाग्निसंस्थाप्य एतन्तेतिपूतिष्ठाप्य ॐ वरदनामाग्नये नमः इतिमन्त्रेणावाहा- सस्पूज्य च ॥ अद्येत्यादि० अर्क विवाह कर्मणि कृताकृतावेक्षणार्थ धमुकशर्माणं ब्राह्मणं ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे ॥ वृतोऽस्मीति ।। ततः पूर्वोक्त कुशकण्डिका विधिना कर्मकृत्वा पर्युक्षणान्तेऽये- त्यादि-अमकोहं करिष्यमाणार्क विवाह कर्मणि-प्राज्येनाहं य ततोदक्षिण जान्वाकुंच्य ॐ पूजापतये स्वाहा, इदं पूजापतये नमम । एवंसर्वत्र ॐ इन्द्रायस्वाहा इदं० । 30 अग्नये स्वाहा. ॐ सोमाय स्वाहा० इत्याज्यभागान्ते ॐ संगोभिरित्यस्यांगिरा ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो वृहस्पतिर्देवता ऽऽ ज्य होमे विनियोगः। 30 संगोभि रागिरसो नक्षमाणो भगदवे दर्य मन्निनाय । जने मित्रो न दम्पती अनक्ति वृहस्पतये वाजयाशू रिवाजौ स्वाहा। इदं बृहस्पतये नमम । ॐ यस्मैत्वेति वामदेव ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो ऽग्निर्देवताऽज्यहोमे विनियोगः । ॐ यस्मैत्वाकामकामायवयं सम्राड्यजामहे । तमस्मभ्यं कामं दत्वाथेदंघृतंपिव स्वाहा । इद मग्नयेनमम । व्यस्तसमस्त व्याहृतीनांप्रजापतिपियन्यु दिणगनुष्टुप्छन्दांसि अग्निमुवायुसूर्य पूजापतयो देवता प्राज्य कर्मकाएरताकरे, श; पिवाहपद्धति. ॥ (४३१) होमेविनियोगः भूः स्वाहा इदमग्नयेनमम | 30 भुवः स्वाहा इदं वायवे नमम 30 स्वार वाहा इदॐ सूर्यायनमम । ३० भूर्भुवः स्वः स्वाहा इदै प्रजापतयेनमम ! 30 व्याहृतीनां प्रजापतिपि र्गायत्र्युष्णि गनुष्टुप्छन्दांसि अग्निवायुसूर्यादेवताः प्रायश्चित्त होमेविनियोगः। ॐ भूः स्वाहा इदमग्नयेन । 30 भुवः स्वाहा इर्द वायवे. 30 स्वः स्वाहा इदंसूर्याय० । त्वन्नो अग्नेऽइति घामदेवर्षिन्त्रिष्टप्छन्दोऽग्नि वरुणोदेवतेप्रायश्चित्त होमेविनियोगः ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोऽयवयासिसीष्टाः । यजिष्ठोवन्हितमः शोशुचानो विश्वाद्वैपाऊसिममुमुग्ध्यस्मत् स्वाहा । इदमग्नीवरुपाभ्यांनमम 3-0 सत्वन्नौ अग्ने इतिवामदेव मपिस्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निवरुणो देवते प्रायश्चित्तहोमेविनियोगः। 30 सत्वन्नोऽग्नेऽवमोभवोतीनेदिष्टोऽस्याऽउपसोव्युष्टौ अव- पक्ष्वनोब्वरुण ट० रराणोव्वीहिमडीक ० सुहवोन एधि स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम | 30 पायाश्चाग्ने इति प्रजापतिऋषि- विराड्छन्दोऽग्नि देवता प्रायश्चित्तहोमे विनियोगः । ॐ अया. श्चाग्नेऽस्यनभिशास्तिपाश्च सत्यमित्वमयाऽसि । अयानो यज्ञवहास्ययानोधेहिभेषज ॐ स्वाहा । इदमग्नयेनमम । ॐ येतेशतमितिशुनः कोपि स्त्रिष्टुप्छन्दो मंत्रलिंगोक्तादेवता। मायश्चित्तहोमेविनियोगः । ॐ येतेशतंचरुणयेसहस्र व्यजिया: पाशाविततामहान्तः । तेभिर्नोऽअद्यसवितोत विष्णुर्विश्वेमुंच- न्तुमरुतः स्वर्का स्वाहा । इदंवरुणाय सवित्रेविष्णवेविश्वेभ्योदेवे- भ्योमरुद्भ्यः स्वर्केभ्यश्चनमम । 30 उदुत्तममितिशुनः शेफऋ- पिस्त्रिष्टुप्छन्दो वरुणोदेवता प्रायश्चित्त होमेविनियोगः । 30 उदुत्तमव्वरुणपाशमस्म दवाघमंश्चिमध्यमश्रथाय । अथाच्च- यमादित्यव्रतेतवानागसोऽअदितयेश्याम स्वाहा । इदंवरुणाया दित्यायनममः । मनसा प्रजापतयेस्वाहा इद प्रजापतयेनमम ॐ अग्नयेस्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नयेस्विष्टकृतेनमम । ततो वहिहोमः। 30 स्वाहा प्रजापतयेनमम । ततः संम्रवनाशनंकृत्वा (१४२) कर्मकाए रत्नाकर रजोदर्शनादिपरिभाषा । ॐ स्वहा पवित्रप्रतिपत्तिंकुर्यात् । ततो ब्रह्मणेपूर्णपात्रदानम् । अद्येहेत्यादि अमुकोऽहं कर्तव्याविवाहहोमकर्मणि तत्सांगता सिद्धये ऽपूर्णपूर्णार्थमिदंपूर्णपात्रंसदक्षिण ब्रह्मणेतुभ्यमहं सम्प्रददे 'तत्सन्नमम, तत आचार्यः कुम्भोदकैः पूर्वोक्त विधिना वरमभि- पिंचयेत् । ततोवरः पुनरप्रदक्षिणी कृत्यप्रार्थयेत् । ॐ मयाकृ- तमिदं कर्मस्थावरेषुजरायुणा । अर्कापत्यानिमेदेहितत्सर्वं क्षन्तुम- हसि । इति संप्रार्थ्य सूर्यमुक्तंपठित्वा विभ्राडू वृह० इत्यादि सूर्यविसृज्यगौदानाविधिनाचार्याय सवत्सांगांदत्वान्येभ्योऽपि दक्षिणांदत्वा पूजासामग्री वरपरिधेयवस्त्राणि चप्राचार्याय दत्वा पुण्याहं वाचयेत् दिन चतुष्टयमर्कमग्नि कुम्भांश्चसंरक्ष्य पंचमे- हनिपूर्वोत्त प्रकारेण सम्पूज्यपूर्णाहुतिं कृत्वा व्यायुपकरणमन्त्र- पाठं कृत्वा ब्राह्मणैराशीर्वादं गृहीत्वा न्यदीविसृज्य ततो मानुपीविवाहं कुर्यात् । इति अर्कविवाह पद्धतिः अथ रजोदर्शनादि परिभाषा। अधरजोदर्शनादि विग्यानाह 'तामुदुह ययप्रदेशनम्'-प्रतिस्त्रोक्ति.। एषधा- कोनाक रेण ताव मुदुम्यादपि विषह वर्मण भ यात्वसंप धपधप्रशनं ऋतुकाल रजोदर्शष त प्रवानपभिगन निरेप ॥ याज्ञवल्क्य -पेपरातुन्शिा स्त्रीणां तासुयुग्नासुसविशेन ॥ प्रह्मचर्ययपर्पण्यायश्चतस्रथर्जियत । वयंतिथय -चतुर्दश्यश्मीचव प्रामावास्याचपूर्णिमा । सार्यतानिपणिविक्रि तिरवच ॥ मनु - ब्रह्मचरीभवेनित्यम्प्पृत स्नातक द्विज । तपामय यतस्पर तु भेदितै कदगीतथा । प्रयोदर्श च पा सु प्रशस्तादार त्रय । ऋतुस्नानदिनशुद्धि- माह-रक्षाभतधतऽनिस्न नस्त्रीपरपला । येकमणि न्येिपन्मेऽनिर द्वति । रजसो- इनानिषेधमाइमनु -रग्युरतैसा पोस्त नेन स्त्रीत यला ॥ इतित्न प्युत्तरोतरा -प्यास - रामचतुया पुत्र स्यादपयुधनावित । पजन्यापुत्रिण नारी पटरपुत्रस्तु- मायन । रउम्यमयज योपिष्टम्यमीवर पुमन् । सभामुभगा फायर गत । एका. दरमधास्त्री द्वादर पुरषोतम । प्रयोदशामुतपास यमकरणी । धर्मशधकृतशय मत मदोरमा । प्रजात्रचतुर्दशा पर पितिमता । अपर मयंभूत । पोडायरेपुमान् । प्रशता मकाण्डरलाकर रजोदर्शनादिपरिभाषा। (४४३) तच्चैकस्यांगत्रीसरुदैवमैथुनंकार्यम् । ऋतावगमनेदोषनाहरराशर:-प्रातौस्तता- तुयोभार्यो सनिधौनोपगच्छति । घोरायाभूणल्यायर्या युपितेनासंशयः । अस्यापवादमादमदन- रत्ने-ऋतुक लेमिनारीणभ्रूणहत्याप्रमुच्यते । वृद्धावन्त्यामसदृत्तामृत्ता पत्यामपुषिणम् । कन्यांच- व पुत्रांचवर्जयेन्मुच्यतेभयान् । ऋतुगामिनःस्नानमाह-शतौतुगर्भसंक्षिरस्नन मैथुनिन.स्मृ. तम् । अनृतौनुयदागच्छेन्द्रौचमू पुरीषवत् । मैथुनान्तेतुस्त्रीणानस्नानमुक्तम्-उभाव-पशुची स्यातादम्पतीशयनंगतौ । शरन दुत्थिता नारीशुचि.स्वादशुचि पुमान् । रोगजेतुपरिजातफे- गेणयद्रजात्रोणामन्यहहिप्रवर्तते । नासुचिस्तुभवेत्तेने सावकारिकंमतम् । भविष्यपुराणे-~- रजोदीनतापूर्वस्त्रो सर्गमाचरेत् । संसगैयविकुपीतनरारिपच्यते ।। ननु-कचिरजोदर्शनविनापि गर्भ- सम्भवोदृश्यते । व्यक्तिसत्परिसिमानुपलभ इति । नेपदोप:-गर्भधारणहिरजोदर्शनदिनान भर- तीत्येषाव्याप्तिः । तथक्वचिरप्रकटं चिदप्रकटजन्तरेवतिष्ठति । तत्राप्रकऽपिरजस्यतर्गतरजः रसा- गर्भधारणसम्भव: । अत'प्रगुक्तदोषाभावः--तदुक्तंकश्यपसंहितायाम्-~-पददशकार्य- या पुष्पंवर्निहि । अन्त.पुष्पंभवत्येव पनसोडुवर दिवा । यस्तुमारजसिगर्मधारण नदरसते त-पुष्प वीजक्षेत्रादिदोष द्रष्टव्याः॥अथरजोवतीधर्मानाहमदनपारिजातेचसिष्ठः-सानोज्यान भ्यं- ज्य. नासुस्नायावधः शयोतनदिवासुम्यानरज्जु सृजेत् नासमस्नीयान्नमहानिरिक्षेत नस्तेनकिचिदा- चोत् अखणात्रेण पिवदंजलिनावापात्रेण लोहितायसेन वैतिखावामहस्तः । स्तानविधिमाह- पराशर:- स्लानेनैमित्तिकप्रान्ते नारीयदिरजस्वला । परितनोयेनस्नानंकृत्यानतं चरेत् । सिक्का गाप्रभवद्भिः सौगोगाथंचन । न यसपोड पुर्यानन्यद्वारमधारयेत् । अथवज्योति शास्त्रोक्त प्रथमरजोदर्शनशुभाशु भफलसूचकपाह । स्मृतिचन्द्रिकायाम्-चत्रेस्यत्मयमसौतुन रो वैधर- भागिनी । वैशाखेधनपुत्र व्या ज्येष्ठेरोगामित्तातथा । शुचौमृतप्रजप्रोक्ता अयोधनधन्पदा । नभस्यैदुर्भगाशिधा-आशिनेच तपसिनी । ऊपायुप्मतीनारो मार्गशोषवप्रजा । पौषतुपुरसली. नारी माधेपुन साबिता । फाल्गुनेत्रीपतीमावी, ममा मासफ नर मृदम् । पक्षफलतत्रंबक. पक्षशीलास्यास कुलटाभवेत् । कृष्णस्यदशामायावन्मध्यमंफलमादिशेत् । चारमाहकश्यर:- रोगिणीरविकान्तु सोमवारंपतिव्रता । दु.सिताभ मबारेतु बुधसौभामसंयुता । श्रीसंयुत गुरोपित. भराभूगोदिनमलिना मंचारतुराबायमित्यवच । लग्नमाहनारद: - कुलोरएपचाप य ,कन्या- तुलाधरः । राशयाशुभदाशेया नरीणांमयमातवे । कालमाहस्मृत्य तरे-~-प्रत.क लेतुसंधना- सायान्हे सर्वभोगिनी । मध्यान्हेचद्वेरमा निशोथेविरकामौत् । नक्षत्राण्याहमुहुर्तचिंतामणी- हुतित्रय मृदुक्षिरध्रुवस्त्रातौमितरम्बो । मध्यंचमूलादितिमस्तूिनियरेश्वमन् ॥ वस्त्रपरिधान- माहवशिष्ठ:--सुभगा श्वेतवस्त्रास्यादा वापतित्रता क्षौमत्रत्र क्षितीशास्या नन्दस्वामुसाविता । दुभंगाजाणवस्त्रास्याद्रोगिणार फवासना । नीलाम्बरधगनारोपियव पुष्पितादि । अन्यच्च- - Tm (४४४) कर्मकाण्डरत्नाकर अथगर्भाधानपद्धति स पार्जनक'तृणाग्निसूपान् हस्ते दधाना कुलटा तदस्यात् । तरूपानमोगर सिस्थिताचेदृष्टं रजो. भारवती तदसात् । टरजसावि विष्यं तच्छातिच शान्ति प्रकरणे यामि । 'यथ कामीवांकामः भावि-नितो सम्भवमेति वचन स्त्रियां क् ममततिकम्यरशकामं तसास्तीति यथाकामीवा- भन्न मृतुकाल भिगमन नियमः । कामक्तेच्छया प्राविजानितो.आप्रसवात् सम्भवाम, भत्री- सहसम्भस्मेति स्त्रीणामिन्द्रद्वरप्रार्थनायनान् । प्रतापतेरितिकेचित् । अत्रयद्यपिश्यतुप्रवेनिमिति समन्यनोक तथापिस्मृत्यंतरोत्तपदि पिपलनंकुति । सचदै कथितः (अथास्यदक्षिण स्मधिहदयमालभतेयत्ते सुमीमे स्न्यदिविच द्रमसिधिम् । वेद हतमा तद्विद्यात्पश्येम शरद शतंजीम' शरद शतशृणुयामराग्द शत मतियाभिगमनानन्ताम्-प्रस्य अस्याभार्याया दक्षिणा दनिस्कन्धम'ध-परि दक्षिण इस्तं न त्या दयाल्भते, हृदयक्ष, अलभतेस्पृशति । यत्ते- भुगोमे, इत्यादि म नैण ( एवमतवम् =१०।११) एनेनैव प्रकारेणातोऽनंतरमृतावृती प्रवेशनं यथा मवेति हरिहर । गदाधरमते तिगर्भापासूत्रमा या॥ A -**--...- अथगर्भाधानपद्धतिः। नत्र रजोदर्शनाचतुर्थ दिने प्रातः पुरुषोऽभ्यंगपूर्वकं स्नात्वा ततः स्त्रियंसर्वोपधिपंचपल्लवयुतेन वारिणा संस्नाप्य-अह्ते वाससीपरिधाय गृहात्पूर्वप्रदेशे भूमौ गोमयेनोपलिप्य गंधाक्षत पुष्पदुग्ध धूप दीप नैवेद्य सामग्री संपाद्य-यासने उपविश्य वधू दक्षिणतो विधायाचश्य, श्रोत्यादि० अमुमोऽहं ममास्या भार्यायाः प्रथमरजोदर्शनेकरिष्यमाण गर्भाधान कर्मणि तत्रादौ कर्म साक्षिणं सूर्य सम्पूज्य पल्या सहदर्शयिप्ये-ॐ प्राकृष्णेन. पाद्यगंधादि नैवेद्यान्तमर्क सम्पूज्याय॑ च दत्वा ॥ वक्ष्यमाण- मंत्रेण सूर्यमुद्रयापश्येताम् । ॐ श्रादित्यमित्यस्य चिरूपपि स्त्रिष्टु- प्छन्दः सूर्योदेवता गर्भाधान कर्मणि मर्यावेक्षणे विनियोगः । ॐ श्रादित्यं गर्भ पयसा समंग्धि सहस्रस्य प्रतिमा विश्वरूपम् । परिधि हरसामाभिम ॐ स्त्धाः शतायुपं कृणुहि चीयमानः । इतिदर्शपित्याप्रणम्य ॥ यथा चिहरेत् । ततः सोयान्हे समूहले हस्तौ पादौप्रक्षाल्य शुद्ध वाससी परिभाय, श्रासने-उपविश्य कर्मकाण्डरत्नाकर, गर्भाधानपद्धतिः ॥ (४५) दीप प्रज्वाल्य गणेशमातृकाकलश नान्दीमुख पुण्याहवाचन नवग्रहादिपंचांगपूजनं कृत्वा 'नान्दी श्राद्धं स्वयं कुर्यात्-येभ्य एव पिता दद्यात्तेभ्यो दद्यात्स्वयं सुतः ॥ इति वचनात् , आशिप गृहीत्वा, ततो भर्ता वक्ष्यमाण मंत्रेण नारिकेल फल प्रदान करोति सा वधू वस्त्रे गृह्णाति । मंत्र:-ॐ याफली इत्यस्य भिषगृषिर- नुष्टुप्छन्दः फलदेवता गर्भाधान कर्मणि फलदाने विनियोगः । ॐ याः फली नीर्याऽअफलाऽअपुष्पायाश्चपुष्पिणीः । बृहस्पति- प्रसूता स्तानोमुंचन्त्व ० हसः। इति दत्वा, ततश्चन्द्रतारानुकूले- सम्लग्ने रात्रिपूर्वारहे शयनागारेगत्वाभर्ता प्राचम्य प्राणाना यम्य ॐ लम्बोदर नमस्तुभ्यं सततं मोदकप्रियः । अविघ्नं कुरुमे देव सर्वकार्येषुसर्वदा । इतिध्यात्वा संकल्पं कुर्यात्-देशकालो- स्मृत्वामुकोऽहं-अस्या मम भार्यायाः प्रतिगर्भसंस्कारातिशय- द्वारा अस्यां जनिष्यमाणसर्व गर्भाणां वीजगर्भसमुद्भवेनोनि- चहणद्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थ गर्भाधानाख्यं कर्म करिष्ये । ततोऽनुरागीभर्ता-अनुरागिणीभार्या शय्यायां प्रसार्य स्वदक्षिणे- नपाणिना भगं तृष्णीमभिस्पृश्यमंत्र जपेत्-ॐ पूपाभगमिति- मंत्रद्वययोः प्रजापनि पिरनुष्टुप्छन्दो भगो देवताभगाभिमंत्रणे विनियोगः। ॐ पूषाभग ० सविता मे ददातु रुद्रः कल्पयतु ललामणु विष्णुयॉनि कल्पयतु त्वष्टारूपाणिपि ० शतु । श्रासिं- चतु प्रजापतिर्धाता गर्भ दधातुते । ॐ गर्भ देहि सिनीवाली गर्भ देहिपृथुष्टुके । गर्भ ते अश्विनौ देवा वाधत्तां पुष्करस्रजी। ॐ ब्रमा गर्भ दधातुते । इत्यभिमंत्र्य । ततः प्राङ्मुखो वोवङ्- मुखो भूत्वा । उपस्थे प्रजनेन्द्रियप्रविश्य पठेत् । ॐ रेत इत्यस्य- प्रजापति ऋषित्रिष्टुप्छन्दो तो देवना वीर्याधाने विनियोगः । ॐ रेतो मून विजहाति योनिप्रविशदिन्द्रियंगों जरायुणात उल्वं जहाति जन्मना । ऋतेन सत्यमिन्द्रियध्यिपान ० शुक्रर्म- धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोमृतमधु । ततः संभोगानन्तरमुत्थाय स्नानं कृत्वा वक्ष्यमाणमन्त्रेए तिष्ठन्त्या वध्वादक्षिण स्कन्धस्योपरि (४४६) মক্কাবাজী মাথাযবিধি: दक्षिण हस्तं नीत्वा तदन करतलेन तस्या हृदयं स्पृशति । ॐ यत इतिप्रजापति ऋपिस्त्रिष्टप्छन्द श्चन्द्रमा देयता हृदयालम्भने विनियोगः। ॐ यत्ते मुसीमे हृदयं दिवि चन्द्रमसिभितम् । वेदोहन्तन्मां तद्विद्यात् पश्येम शरदः शतंजीवेम शरदः शत. शृणुयाम शरदः शतम् । ततो यथासुखं शयीत सकृदेवमैथुनं कुर्याप्ततु वारद्वयम् । इति याज्ञवल्क्यः। ततः प्रभाते संजाते स्नात्वा नित्यकर्म समाप्य रात्रि पूजित पश्चांगदेवताः संपूज्य यस्य स्मृत्येति पठित्वा० देवताविसृज्याशिर्वादं गृहीयात् । गर्भा- धान संस्कारोऽयं प्रथमती मलमास शुक्रास्तादावपि कार्यः । पारस्करेण तु हृदयालम्भनमात्रमुक्तमन्यत्कर्म-अमत्रकं परं च संस्कार भास्करादौ पारस्कर गृह सूत्रादतिरिक्त प्रक्षिप्तमंत्राणां प्रयोगदर्शनान्मयापि प्रत्यक्ष श्रुति मूलत्वात्प्रदर्शितः, अतो विद्वद्भि हा इतिदिक् । इति गर्भाधानम् ।। अथ पुंसवन सूत्रव्याख्या गर्भ धारणीपायमाह--'सायदिगर्भ न दधीति सि ई० था. श्वेत पुष्प्या उपोय पुष्येण मूलमुत्याप्य चतुर्थेऽहनि स्नातायां निशायामुदपेपं पिष्ट्वा दक्षि- रणस्यो नालिकाया मासिति ॥ ॐ इयमोपों प्रायमाण सहमाना सरस्वती। मस्या अहं इत्या पुत्र. पितुरिव नाम जनभमिति ॥६॥३) सिया कंठ कारि- काया. कथंभूतायाः श्वेत् पुग्यास्तर या पोध्यापवासं कृत्वा पुष्य नक्षत्रेण मूलंशिफ मुत्याप्य उहत्य जोशनाचतुर्थेऽनि स्नातायाभायर्यायां रात्रौ त मूलमुदोन प्ट्यिाद्रवीभावमाराध बधादक्षिण नासा पुढे-सिंचति प्रक्षिाति मतां । इरमोषधी पारमाणा, इतिसूत्रोत्तमंत्रेण अथ पुरवम (सूत्र व्याख्या प्रथपुरुसवनम्) अथादसाप्राप्तं घुसनारान्य गर्भसंरकरकं कर्मव्य स्मारयते । (पुराम्पदंत इतिमासे द्वितीय तृतीयवा 11) पुग-अप्रेम्वन्ते चलिष्यति (यावसुरानि- पातयोलंद ) इति पुरायोगे भविष्य वर्तमान प्रयोग इति हेती गर्भ धारण क लाद् द्वितीये तृतीय घा मा प्रधमे मामि चा गदार (यदहयुधमा नक्षत्रेणचन्द्रमा युज्यत तदह रूप- वास्याप्सच्याइसे चासती परिधाप्य न्यग्रोधा बरोहा जुङ्गाश्चनिशाया मुदपेयं- 1 कर्मकायरक्षाकरे, पुसघनकर्म पद्धतिः ॥ (४४७) पिष्ट्वापूर्वयदासेचन हिरण्यगर्भोऽद्भपः संभृत इत्येताभ्यां ३) यस्मिनहनिपुंसा पुमामनानेण पुष्यादिना नक्षत्रण चन्द्रमायुक्तोभवति । तदहरतस्मिन्दिने गर्भिणीमुशाय-पान शयित्वा भालाव्यस्नायित्पा-महते पामती परिधाप्य चम्पोधो क्टरतस्यांवरोहान्-अधोजायमानान्लुगान्त- दासवान्मुकुल काश्चि उभयं रात्रौ पूर्ववद्गर्भधारणोंच यत् क्षिा पूर्ववदेव सेचनमर्तुदक्षिण नाशारन्ने हिरण्यगर्भ -अभ्यः संशतः । इत्येत भ्याम्भ्याम् ॥ (कुशकंटक सीमा शु. चैके 181) एके-प्राचाया न्यग्रोधा बरोह शुगेऽपिरमाणेयु कुशस्त्र कंटक मूलं सोमासुंसोमलता- संडं च प्रक्षिपन्ति । तत्तले द्रव्य चतुष्टयपणम् ॥ (कूर्मपित्तम चोपस्थे करवा सयदि वामयेत वीर्यवान्स्यादिति विकृत्यैनमभिमंत्रयते सुपर्णोऽसीतिमाग्विष्णुक्रमेभ्य 1५) सभा यदि कामयेत-भयं गर्भावार्थव न्-शक्लिम न्याभारया परथे अमे मतिं जलपूर्ण शरावं निषाय विकृत्या विकृति छन्द स्काया सुपर्णीऽसि-इत्यनया-ऋचा स्व.पते इत्यन्तयन गर्भ- भिमंत्रयते हस्तेन गर्भाशय स्पृष्ट्यामंत्रं जपतीत्यर्थ. ।।- कात्यायन:- स्पृश पनामिकाग्रेरण धचिदालोकसत्रपि । मनुमंत्राणीयं सर्वत्र सदैव मनुमंत्रयेत् । अथ पुंसवनकर्मपद्धतिः। गर्भमास प्रभृतिद्वितीये तृतीयेयामासि रिक्तारहिततिथी यस्मिन्दिनेचन्द्रमाः पुन्नक्षत्रेषुपुनर्वसुपुष्यहस्त श्रवणमगसिरादिषु शुभचन्द्र घुधगुरु वासरेषु विष्टयादिदोषरहिते चन्द्रतारांनुकुले पर्वणियजिते दैवज्ञोक्त संलग्ने पुम्सवनं कुर्यात् । तदिनेगर्भिणी स्नापयित्वातद्भर्ता च स्नात्वाशुद्धवाससी परिधाप्य, भर्ता गभिण्या सह तदिन उपवासं कृत्वा अस्तमयेरात्रौ गणेशमात- काभ्युदयादि पंचागपूजनंविधायतेभ्यो मंत्रपुष्पांजलिं दत्वासंक- रूपंकुर्यात् । अयेत्यादिस्मृत्वा अमुकोहं ममास्यांभार्यायांउत्पत्स्य मानगर्भापत्यस्यवैजिक गाभिकदोपपरिहार सुरूपता ज्ञानोदय - प्रतिरोधिपरिहारद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ पुंसवनाख्यकर्मकरिष्ये तत धानीतवटवृक्षस्यावरोहान्नधोभागे जायमानान्नंकुराञ्छुगा नग्रपल्लवान्मुकुलाकरांश्च केचिन्मतानुसारात् कुशकंटकङ्कुशस्य- मूलंसोमलतागवण्डञ्च एकीकृत्यजनपिष्ट्वातदुककं सूक्ष्मवस्त्रेण पावितंकृत्वा तद्रसंगभिण्या दक्षिणनासापुटेदद्यात् । मंत्रः ॐ दिरएपगर्भ अभ्यः संभृत इत्यनयोहिरण्यगर्भनारायणौ ऋषी बिष्टुप्छन्दः प्रजापत्यादित्यौ देवतेपंसवने नासिकायांवटरोंगर- (६४) कर्माण्डरन.फर अयमयसीमन्तोनमन सूत्रव्याख्या। सासेके विनियोगः। 30 हिरण्यगर्भः समवर्तताग्रेभूनस्यजात: पतिरेक आसीत् । सदाधार पृथिवींद्यामुतेमांकस्मै देवायहविषावि घेमा। 30 अभ्यः संभृतः पृथिव्यैरसाचविश्वकर्मणासमवर्तताने. तस्यत्वष्टाविदधद्रूपमेति तन्मय॑स्यदेवत्वमाजानमग्रे। इति मंत्रा- भ्यारसं कंठादुदर प्राप्तिमात्रंक्षिपेत् । सयदिकामयेतवीर्यवान्स्या- दयंगर्भस्तदागाभण्याउत्संगे उदरेजलपूर्णशरावं निधाय दक्षिणा नामिकाग्रेण गर्भाशयंस्पृष्ट्वा ॐ सुपर्णोऽसीत्यस्य प्रजापति ऋपिधृतिश्छन्दो गरुत्मान्देवता गर्भाभिमंत्रणे विनियोगः 30 सुपर्णोऽसिगात्मा त्रिवृत्ते शिरोगायत्र्यं च वृहद्रथंतरेपक्षी । स्तोमात्माछन्दा स्यंगानियजू ॐषिनाम सामतेनतनूमि- देव्ययज्ञायज्ञियपुच्छधिष्ण्याः शफाः । सुपर्णोऽसिगरुत्मान्दिवं गन्छस्वःपतः। इति जता ततो दक्षिणा संकल्पं विधाय यथा शक्ति ब्राह्मणान्भोजयित्वा ततोमंत्राभिषेक तिलकादिकं कारयेत् । इति पंसवन पद्धतिः। अथसीमन्तोन्नयन सूत्रव्याख्या। (मध सीमन्तोन्नयनम् । १ । पु सबनयत् । २।) अथ पुंसवनानन्तरं प्रम- प्राप्त सीमन्तोनयनगर्भ सरकारकं कर्मव्याख्यास्यते ॥ तच पुंसवनवपुग्ननभवति ( तिलमुद्गमिश्र स्थालीपाक ययित्वा प्रजापते हुत्वा पश्चादग्ने भद्रपट उपविष्टायां युग्मेन सटालु अपसेनादुम्बरणत्रिभिश्चदर्भ पिस्तलेखण्यासलल्या धं.रतर शंकुना पूर्ण वात्रेण च सीमन्तमूवं विनयति भूर्भुवः स्वरिति ।।।) तत्र विशेषमाह-तिलैर्मुद्- मित्तलमु मिश्रस्त स्थाली पाकमोदन चरु अपयित्वा-माज्यभागान्ते प्रजापतये स्व.हा-इत्येका माहुति हुत्ला खिष्ठ कृदादि प्राशनान्न यात् । अग्ने पश्चिमतो भतु क्षिणतो मृद्वासने- अामीनाया गभिण्यां सरयाम् । ततो भर्ता- श्रौदुम्वरेणोलुम्वर वृतोद्भवेन युग्मेन यादिहुन पलवता सटालु- प्रप्सेन पश्चफले कस्खवकनिन त्रिवि दर्भजूलैत्रिभिदभ पवित्रश्च त्र्येण्या त्रिषुस्थ नेषु स्वेतानेण तया येण्या शलन्या सल्याख्यातवंटके न वीर तर शकुतारारेषाकया आश्वत्येनव। शकुना पूर्ण चाणच सूत्रेण पूर्ण चात्रं सूत्रकर्तन साधनं,,-नर्कुरितियावत्, तेन लोकीलोन च, प्रतऔदुम्बर युग्मादिभि. सर्वेः पुंजीनि. सोमन्त स्त्रिया- बिनयति, पृथवरोति, ललाटा तर माभ्य पेशा- फर्मराटराफर मीमन्तोनमासन याया। (५२९ - विधाकरोति, भूर्भुय. खनियामि । इत्येतावता मत्रेण रामदए । प्रतिमहाच्याहति वा ।५) पक्षान्त'माद-अया प्रतिमहाव्याहृतिभिरिनरतियथा--भूबिन्यामि, पविनयागि, सविनयानि । (प्रितमायध्य ति-(अयमूर्जावतो वृक्ष उज्जीव फलिनिभवेति ।६ ) त्रित बसीति- अब याति--पुजीकृतमीदुम्वगदि पचक गयां विनिगर्थिः । अयमूचन, इत्यनेन भत्रेण ।। (अथाह-वीणागाधिनौराजान संगायता योचाप्यन्यो चीरतर इति ॥७॥) अथोदुम्बर दि पचरस्य पैपी बनलनरमाइ-मपीति, विना । पीगगनी र.जान भूतिगायत समान नभुपादिपा दुसम्यगायनम् । यो यो राजहितरः प्रष्टचारः शरत गायेतारिनुगः ( निकारागाधा- मुपोदारन्त) सोमवगोमामानुपी.जा । अनिमुक्तक प्रा.रंस्तीरे ९. मम'- इति ६ ) एके-प्राचारनियुक्तांगन विहितांगथाबपोदाहरन्ति-दन्ति । अपिसमुच्चयतथि, ता. गजवीर ते यो यन्त्र नं गथान नंबसमुच्चितंभवति । पक्षन्तरे रजवीत योन्य- तरा नंग यागानंवा" गयानु, नोमऐतिसूत्रस्पष्टम् । ( यांनदीमुपावसिताभवति तस्यानाम गृहण ति ॥६॥ ततोगभिणी नदीमुमागीपे-श्र वासितास्मिताभयति तस्या था मासाविति गामुने त्येवं प्रथम नाम गृह ति । 'ततोब्रह्मणगोजनम्' १० स्पष्ट थम्' इत्रभोजेन वायधि- Fसुक्तं पराशरमानीयेध म्येन - ब्रह्मौ ने मोमेव सीम तोन्नयनेतथा । जातवर्मनवश्र द्ध भुत्तवा. द्रायणचत् । इदचांग ह्मणभोजनविष म् । नस्विटकुलभ्य दिभोजन विषयमिनिनुगनि ॥ अथ सीमन्तोन्नयनपद्धति: श्रयच प्रथमे गर्भगर्भधारण प्रभृतिपष्टे ऽहमे मासि पुंसवनयन्नक्षत्र तिथिवारादिपु,चन्द्रतारानुकूले दिवसे गाभणी मङ्गलद्रव्येण स्नातां परिहितप्रावृतानवासो युगलामले कृतां पत्नी स्वदक्षिणत उपवेश्या चम्य प्राणायामत्रयं विधाय, भूतो- त्सादनं विधाय रक्षादीपं प्रज्वलय्य संपूज्यच स्वस्तिवाचनं पटित्या प्रधान संकल्पं कुर्यात्-अद्यत्यादिदेशकालौ सकीत्यामुको ऽहं ममास्यां भार्यायां गर्भाभिवृद्धिपरिपन्धिपिशित, अलक्ष्मी भूतराक्षसीगण दूरनिरसन सम लकलसौभाग्य निदान भूत महालक्ष्मी समावेशन द्वारा प्रतिगर्भ बीजगर्भसमुद्भवनो (४५०) कर्मकाए रत्नाकर नीमन्तोन्नयनपदतिः । निवहण जनकातिशयद्वाग च श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थ स्त्री संस्का- ररूपं सीमन्तोन्नयनाख्यं कर्म करिष्ये तत्पूर्वागत्वेन गणपति सहित गौर्यादि षोडशमात्ऋणां पूजनं कलश स्थापनं नान्दीश्राद्धं पुण्याहवाचनं नवग्रह स्थापनपूजनं च करिष्ये एवं गणेशादि पंचाग देवतानां पूजन विधाय (जीवित मातृ पितृका ऽ पिना न्दी श्राद्धं स्वयं पितामहादिभ्यः कुर्यात् ) अत्र पुण्याह वाच: नान्ते धातापीयन्ता मित्यूह ॥ ततोवहिः शालायां हस्तमात्रां चतुरस्त्रां भूमि कुशत्रयेण परिसमूह्य गोमयोदकेनोपलिप्य व मूलेन त्तिस्रो रेखोदक संस्थाः स्थंडिल प्रमाणाः कृत्वा, अना- मिफागुष्ठाभ्यां लेखाभ्यः पशूनुत्य मणिकाद्भिरभिपिच्य कर्मसाधनभूतमग्नि तेजसेपात्रे स्वाभिमुख वेद्यां स्थापपित्वा, अग्नेर्दक्षिणतो ब्रह्मासनमास्तीर्य । ततो ब्रह्मवरणम्-अद्येत्यादि० अमुकोऽहं कर्तव्यसीमन्तोन्नयन कर्मणि ब्रह्मकर्मकर्तुमेभिर्वरण- द्रव्यैरमुकगोत्रममुकशर्माणं ब्राह्मणं ब्रह्मत्वेन त्वामहंवृणे । वृतोऽस्मीति ब्रह्मानूयात् । प्रार्थयेत्यधा चतुर्मखो व्रमा० कर्म- कुरु, करवाणीतिप्रत्युक्तिः। ततः कल्पितासनेऽग्नेरुत्तरतः प्रदक्षिणी कृत्योपवेशयेत् । प्रणीतापानं पुरतः कृत्यावारिणाप्रपूर्य कुशैराछाद्य ब्रह्मणोमुग्यमवलोक्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरिनिदध्यात् । ततः कुश- पिंजुलिकामादायाग्नेयोदीशानान्तं ब्रह्माणोऽग्निपर्यन्तं नैऋत्याद्वाय व्यान्तं, अग्नितः प्रणीतापर्यन्तं प्रसार्य । ततोऽग्नेमत्तरता पश्चिमदिशि पवित्रछेदनार्थ कुशवयं पवित्र करणार्थं सागमन- न्तगर्भ कुशद्वयं, उपयमनकुशाः सप्त, संमार्जनकुशाश्च प्रादेश मितपाला रासमिस्तिस्रः प्रोक्षणीपात्रं श्रुवः, प्राज्यस्थाली श्राज्यं परिमितपात्रं तिलमुद्गतण्डुलाश्चैतानि वस्तृनि क्रमण पूर्व पूर्व प्रासादनीयानि ॥ तदुत्तरतो वीणागाधिनौ विशेपो- पफल्पनीयानि-मृदुपीठमापक्वायदि फलवती-प्रौदुम्बर समित पवित्र लक्षणास्तिस्रो शललीत्रेणी थश्वत्थशंकुर्वा,शर- पीका दर्भपिंजुल्यः सूत्रपूर्ण सूचकर्तन साधनं चेति । ततः पवित्र कर्मकाण्डरलांकरे, सीमन्तोनयनपद्धतिः । छेदनार्थ त्रिभिकुरौद्वैपवित्रे प्रादेशमानेछित्वा दक्षिणहस्तेन पवित्राभ्यां त्रिः प्रणित्तोदकमासिच्य पवित्राभ्यामुत्पूय पवित्र प्रोक्षणीपात्रे निधाय प्रोक्षणीपात्रं दक्षिणेनहस्तेन वामेनिधाय मध्यमानामिकामध्यपर्वाभ्यां तज्जल मुच्छाल्य प्रणीतोदकेन पवित्राभ्यां तज्जल प्रोक्ष्य तेन जलेन प्रत्येकंद्रव्यं प्रोक्ष्य,, तिल तण्डुलमुद्गांश्च प्रत्येक वारत्रयं प्रक्षाल्य, प्राज्यस्थाल्यामाज्य- मग्नावधिश्रित्य चरुस्थल्यां प्रणीतोदकमासिंच्य तत्रादौ मुद्गान प्रक्षिप्याग्नौसंस्थाप्य, ईषत्पश्वेपु मुद्गेषु तिल तण्डुलांश्च प्रक्षि- प्य, अर्धाणेचरौ ज्वलदुल्मुकमाज्यस्योपरिचरोरचोपरिसम- न्ताद्मामयित्या वन्ही प्रक्षिपेत् । उदकं स्पृष्ट्वा प्राङ्मुखं सुर्व प्रतप्य संमार्जनदभैरुत्तानं अवमूलतोऽनपर्यन्तं सूलेरघोऽग्नतो संमााभ्युक्ष्य पुनः प्रतप्य सजलपाणितलेन संमाय दक्षिण- तो निधायान्य घरोः पूर्वेण नीत्वा-अग्नेरुत्तरतः संस्थाप्य चरु- माज्यस्य पश्चिमतोनीत्वा-भाज्यस्योत्तरतः संस्थाप्य । तत श्राज्यमग्नेः पश्चान्निधाय तदुत्तरतश्चकै निधायाज्यमुत्पूयावेक्ष्य प्रोक्षणीश्चोत्पूय पवित्रे तत्र निधाय, उपयमनकुशानादायो- त्थाय प्रजापति मनसाध्यात्या घुतात्तास्तिस्रः समिधोऽग्नौ- स्तृष्णी प्रक्षिप्योपविश्य च प्रोक्षणीजलेनेशानादुत्तरपर्यन्त. मभ्युक्ष्य पवित्रे प्रणीतायां निधाय प्रोक्षणीपात्रं संस्रवधारणार्थ मग्निप्रणीतयोर्मध्ये निदध्यात् । ब्राह्मणान्वारब्धः पातित दक्षिण जानुराज्येन जुहुयात् । ततः प्रत्याहुत्यनन्तरं सुधसंलग्नशेष घृतस्य संस्रवधारणार्थ प्रोक्षणीपात्रे प्रक्षेपः। 30 महल नामाग्नये नमः । इत्यग्नि संपूज्य ततः समिद्धतमेऽग्नौ 30 प्रजापत्यादि चतुणी मन्त्राणां प्रजापतिपिस्त्रिष्टुप्छन्दोमन्त्रोक्ता देवता प्राज्य होमे विनियोगः । प्रजापतये स्वाहा मनसेदं प्रजापतये नमम 0 इन्द्राय स्वाहा, इदमिन्द्राय नमम । इत्याघारौ . अग्नये स्वाहा इदमग्नये नमम । सोमाय स्वाहा इदं सोमाय नमम इत्याज्यभागौ। ततोऽन्वारब्धः स्थालीपाकेनाज्पमिश्रितेन .
(४५२) कर्मकाण्डरत्नाकर सीमन्तोनयनपद्धतिः। होमः। 30 प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतये नमम । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नये स्विष्टकृते ननम । ॐ भूरादिव्याह 'ति त्रयस्य प्रजापतिपिप्यन्युगिनुप्छन्दांसि अग्नि वायु- सूर्या देवता व्याहृतिहोमे विनियोगः । ॐ भूः स्वाहा इदम ग्नये. 1 ॐ भुवः स्वाहा इदं वायवे०। ॐ स्वः स्वाहा इदं सूर्याय नमम । ॐ त्वन्नो अग्ने मन्त्र द्वयस्य वामदेव ऋषि- स्त्रिष्टुप्छन्दोग्नि करुणौ देवते सर्व प्रायश्चित्त होमे विनियोगः । ॐ त्वन्नोऽअग्ने वरुणस्य विद्वान्देवस्यहेडोऽअषयांसिसीटाः । यजिष्ठो चन्हितमः । शोशुचानो विश्वाद्वेपासि प्रमुमुध्यस्मत स्वाहा । इदमग्नये नमम । 30 सत्वन्नोऽअग्नेयमोभवो तीने- ' दिष्टोऽअस्याऽउपसोप्युप्टौ। अवयव नोव्यरुणरराणो व्वीहिम-' डीक सुहवोन एधि स्वाहा इदं वरुणाय नमम ।। अयाश्चाग्ने मन्त्रस्य विराऋषिर्गायत्री छन्दोऽग्निर्देवता सर्वप्रायश्चित्त होमे विनियोगः। 30 अयाश्चाग्नेस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्य मयाऽअसि । अयानो यजं वहास्ययानाधेहि भेपज स्वाहा । इदमग्नये नमम । ॐ येतेशतमिति मंत्रस्य शुनःशेफ ऋपिस्त्रि- प्टुन्छन्दो ऽग्निर्देवता सर्वप्रायश्चित्त होमे विनियोगः ।. ॐ येतेशनं वरण ये सहस्रं जज्ञियाः पाशा चितता- महान्तः । तेभिर्नाऽअदा सवितोतविष्णुर्विश्वेमुंचन्तु ममतः स्वर्णाः स्वाहा । इहं वरुणाय सविन्ने विष्णवे विश्वेभ्योमरुभ्यः स्वभ्यश्चनमम । ॐ उदुत्तममिति मंत्रस्यशुनः शेफऋपिस्त्रि- पुग्छन्दो वरुणोदेवता सर्वप्रायश्चित होमे विनियोगः । उदुराम चरणपाशमस्मदवाघमंख्यिमध्यम धाय । अधाययमादित्यत्रते तवानागसोऽअदिनस्याम स्याहां। इदं वरुणायादितयेनमम | ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतयेनमम । ततः संस्रयंप्राशयित्वा भारभ्प, अय सीमान्तोनयन कर्मणि ब्रह्मकर्मणः प्रतिष्टार्थमिदं पूर्णपाश्रममुकगोत्राय ब्रामणाय ब्रह्मणे तुभ्यमहसंप्रददे। ॐस्वस्ति ब्राणान्यान्नको प्रामग्रंथि विमोकः । ॐ सुमित्रियानमंत्रस्य कर्मकाण्डरदाकरे, सीमन्तोन्नयनपद्धतिः ॥ (४५) दध्यंगाथर्वणपिराशे देवाताः शिरः प्रोक्षणे विनियोगः । ॐ सुमित्रियानऽआपऽऔपधयः सन्तु । इति पवित्राभ्यां प्रणीताज लेन शिरः संप्रोक्ष्य दुर्मित्रियास्तस्मै सन्तुयोस्मोन्टेष्ठियंचवयं द्विष्मः । इति प्रणीताविमोकं कृत्वा ॐ देवागात्वितिमंत्रस्यात्रि:- पिरुणिक् छन्दो मनसस्पति देवतावहिहोमे विनियोगः । ॐ देवागातु विदोगानुवित्वागातुमित मनसस्पत इमंदेवयज स्वाहा वातेधाः । इति वन्होप्रक्षिपेत् । ततोऽग्नेः पश्चाद् भर्तमतोभ- द्रपीठोपरि मृद्वासनेस्थितायाः स्त्रियाः सीतन्तेऽपक्वौदुम्बर फल- युग्मवत्यासमिधातिमभिर्दर्भपिंजलीभिस्त्रेण्या सलल्याशरपी- कया सूत्रपूर्ण लोहकीलेन व ललाटान्तरमारभ्यवक्ष्यमाण मंत्रेए भमिंत्रान्पठन सीमन्तं द्विधाकरोति । ॐभूरादिव्याहृति त्रयसं- युक्त मंत्राणां प्रजापतिषिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दांसि--अग्नि वायु सूर्या देवता विनयने विनियोगः ॥ ॐ भूविनयामि । ॐ भुवविनयामि ॐ स्वर्विनयामि । इति वार त्रयं विनयनं कृत्वा 'तत औदुम्बरादि पश्चकं पुञ्जीकृतं तस्यां घेण्यामायध्नाति । मंत्र:-ॐ श्रयमूर्जावत इत्यस्य प्रजापतिपिर्यजुश्छन्दः फलिनी देवता वेणीवन्धने चिनियोगः । ॐ अयमूर्जावतो वृक्षऽउर्जीव फलिनीभय । हति वेण्या निवृत्कृत्वा वध्नीयात् । अथ वीणा गाथिनौप्रेषयति (सोम ॐ राजानं गायताम्) इति तोच प्रेपितो वीणामादाय । ॐ सोममित्यस्य प्रजापतिऋषिर्गायत्री छन्दः सोमो देवता गाने विनियोगः । ॐ सोमऽएवनोराजेमाः मानुपी प्रजा । अवि मुक्त चक्रऽग्रासीरं स्तीरे तुभ्यम् । इतिगायतः, अथ च गाभणीग्रामसमीप वर्तिन्यावा देश प्रवाहिन्या नद्या नाम संयुद्धयन्तं गृह्णीयात् यथा 'गंगे' अलके, इत्यादि । इति हरिहर- भाष्यकारोक्तिः । गर्भाधानादित्वान्नपूर्णाहुतिः । ॐ व्यायुप- मिति नारायण ऋपिरुष्णिक छन्दः शिवो देवता घ्यायुष करणे विनियोगः । ॐ व्यायुपं जमदग्नेः, इति ललाटे । कस्यपस्य घ्यायुपं, ग्रीवायाम् । यद्देवेषु व्यायुपं, दक्षिणयोहुमूले । तन्नो (४५४) कर्मकाण्डरलाकरे अधगर्भिणिधर्मपरिभापा। प्रस्तुन्धायुपहदि । एवं गर्भिण्या अपि । ततो दक्षिणा संकल्पः । अद्येत्यादि, अमुकराडोरमुकोऽहंममास्याभार्यायाःसीमन्तोन्नयन- कर्मणः सांगतार्थ, इमां दक्षिणामाचार्यादिब्राह्मणेभ्यो विभज्य दास्ये दशवा वित्तानुसारतो ब्राह्मणान्भोजयिष्ये। ततो मंत्रा भिषेकतिलक रक्षासूत्र बंधनं कारयेत् । ब्राह्मणान्भोजयित्वा स्वयमपि च भुजीत ॥ इति सीमन्तोन्नयनसंस्कारपद्धतिः । ॥ अथच गर्भिणीधर्मपरिभाषा ॥ प्रसगवशादूगर्भिणीधर्मारतत्पतिधर्मा श्चाक्ष्य उक्तयकारिकायाम् –मारभसायिक प ललनीशूर दिवे यूप िशे नारी । मेलूसल वेपदादिकाम नतुपान्तथे पविष्टा । नोनी गोयम पिरा कदौ मूनपुरोप शयन च कुात् । नोमुक्त शीघ्रनिराथवास्य भुक्तनसन याबसन शेते । नामगल पाक्यमुदी येनसा शूयालय वृक्षनल न य यार । प्रयोगपारिजातके-भिणी कुतराशादि शनहम्यादिरहणम् । दायाम शीघ्रगमन शकार हेण यत् । शाकरक्त विमोक्ष च साधस कु कुटामम् । स्वग्याय दिवास्वपगन जागरणयजेत् । चराह -सामिपमशनयतात्म मा पनि यदनाप्रभृति । समांशभज म् । मटनरत्नेसेव्यविषयानाह-हरिहो कुकुचेव सिन्दूर वज्जल ।। पाक च ताम्बुल मागल्याभरण शुभम् । केरस कर कवरी कराऽ कर्ण विभूपणम् । गरायुप्यमिच्छन्ति नयेगण नहि । बृहस्पति --चतुथम सिपष्ठे या'य ठमे *गमिणो मत । य प्रानिय वियग्य रयादापादेतुविशफ्न् ।स्मृत्यन्तरे-उग्रौपा तथाक्षार मैथुन भा वाह म । कृतस्वनचा गरिरणी परिष्यत् । गर्भक्षासदाकाय नित्य शौचनिषवणात् । इति । प्रथगभिणापतिधर्मान्वक्ष्य-गर्भिणी पादतव्य तस्यददपादस्थापितम् । सूत परायुप पुनस्यारोपमहति । याशक्य -दादरगादननगी दोपमवप्नुयात् । पैस्यमरण वापि रहला स्यप्रियस्त्रिया।-मश्वलायत कान मैथुन तीर्थ यिमिणीपति । श्रध्दच. सप्तम मासादृप चा यनवित । पाहतो मिति--रत्नसंग्रहे-- दहन वपन चवचौल गि रिरोहणम् । नावमारोहणचव वयद्गमिणोपी । प्रयुक्त गभ परिहिया-मृतस्य्याह तुरकर्म रोगम् । शुद्धिदपणेदक्ष -ण्डिदान र प्रतवर्म त्वा । न पितृ-कुन्य द्गमिणी परि३ ॥ वपनप्रेतनिधानापवादमाहत-तौरनमित्तक यानिपगत्वपिध्रुवम् । पित्रो प्रतविधनय भिणपतिपच रातम मादर्भमपिभवति । कालविधाने-जोरशानुगमनन सनव युदपरशुरण सत्तिदूरयाम् । सहमोगाया जलवाहमायुनयोभवतिगर्भिणं का पतीनाम् दिन तिमीमतोमयनपनि ॥
कमकाण्टरत्नाकरे जातकर्मसूत्रच्यास्या ॥ (५५) ॥ अथजातकर्मसूत्रव्याख्या ॥ . 'सो पत्तीमद्भिरभ्युक्षति-एजतुदशमास्य, इतिप्राग्यस्यतइति ।।। सोष्टन्ती प्रगप- शूलवतीस्निगंभा दिर्जलगाभ्युक्षतिप्रचिति । एजतु दशमात्य इत्यतयाारस्येत इतिप्रामाटितयानाचा, अश्वसानयाविरान जगत्या ।। ( प्रवावधवपत्तनम् । चैतुश्विशेयलाचलशुने जरा. सन्तये । न मासेनपीनकस्मिश्चनायतन मवजरायुपद्यतामिति ।।) या युक्ष- रणानन्तरमपरावरतनम् । थवरमुल्यं जरायुवेतिगर्भरेष्ठां, पारचीनमध: पतन्येन जप्ते मेत्रवराव पत्तनोमन्मस्तम्बीसमीपे चोपविश्यभजपति । यथा- - अवैतभिशेवल इत्यादि-जरायुपद्यन्तामिस्य- स्तम्। भवरापानमन्त्रोभनांजामः ।२। व शेटः ताजातपितापुत्रं सचलस्नानमानरेत् । हेमाद्री- जन्मतोऽनन्तरंकार्यजातक यथाविधि । दैवादतीतकतंचेतीतसूत केभवेत् । कारिकायाम्-जातेपु. सर्वलस्यात्रनाने नैमित्तिकंपितु तिचीतनरान्याशयेयं जापालिरनचीत विवाहोन तोयेर स्वर्णयुग (स्नापयेत् । इतिसारयायनःप्रादः-रात्राथनिल संनिधौ। अन्छिननाया कर्तव्यं श्रास्नानादनन्तरम् । आमद्रव्येणतत्कार्यवचतातप्रजापते.हिरण्येन भवेच्छाच आमद्रव्यगृहे न चेत् । इति व्यासवचः प्रीत पक्वान्न सनिषेधति । पुन जन्मनियात्रा शर्वादत्मक्षयम् । जे मिनिः-यावनन्छिदर तेनाल तावनाप्नोतिसूतकम् । च्छिनेनाले ततः पश्चारसूतकन्तुविधीयते । व्यास:-नैमित्तिकातुर्शनानं दानं च रात्रिषु । प्ररणोद्वाह एक न्तियानादीप्रसवेषु च । आननमितकं शेयगनापपिनदुप्यति ॥ (जातस्थ कुमारस्याच्छिनायांनाडयां मेधाजननायुष्येकरोति ।३ ) ततो.जातस्योत्प- नस्य कुमारस्य पुत्रस्याच्छिनास नाड्याभरवरिइते गलेसतिमेधाजननादृष्येते क ोतितिता ।। (मना- रिकासुरालदिवसाधुहते प्राशयतिकृतंगा भूयिदधाति भुवस्त्वयिदधामि स्वस्त्वयित्रामि भूर्भुवः स्वः सई त्वयिंदधामि ||) मेधाजननेताददाह अनामिका यां- ल्यासुवर्णनाच्छादित्तयामधुचत चमधुपतेव समासमामय देकौन्तेतं पाये कुमारंसप्राशयति कुमारस्यजिव्हायो निमार्टि, भूरत्वयिश्याम त्या दिसा त्वयिधामिइत्य तेन नपकत्वादेक्मत्रत्वम् इति हरिहरीनतुचतरत्राः (प्रथास्यायुप्यंकरोति । अमेधाजनन नन्तरम् अर य वुमारस्यायुप्म मायुपे हितंजीवन्धनका रोति ॥ (नाभ्यांदक्षिणे वा परेंजपति अग्निरायुमारस वनस्पतिभिरण्युप्मस्तिनत्यायुपा युमंतंकरोमि देवा श्रायुग्मन्तरतेऽमृतेनायु- मन्तस्तेनत्याऽऽयुपा ऽऽयुप्मन्तं करोमि ऋपय मायुप्मन्तस्तेवरायुप्मन्तस्तेनत्या 5ऽयुपा पुमन्तं करोमि पितरायुप्मन्सस्ते स्वधाभिरायुषन्तस्तेनत्या युपार- युष्मन्तंकरोमि । यस आयुप्मा सदक्षिणाभि रायुप्मास्नेनत्वाऽऽयुपाऽऽयुमन्तंक- रोमि । समुद्र मायुष्मानसम्रवन्तीभिरायुमास्तेनत्या ऽयुषाऽऽयुष्मन्तंकरोमि ।
(४५६) कर्मकारदरताकरे जानकर्मसूत्रध्यारया - इतित्रिः ॥६॥ नद्यथा नाभिदेशेदक्षिणे वा श्रवणेनाभिसमीपे दक्षिण कर्णसमीया । अग्निरादृष्यामि- त्यादिकामष्टो मन्त्रास्त्रिजपति । त्रीन्गारानुपांसुपठित ! अनितोपब्रह्मदेव ऋषिपितृयज्ञ समुद्रश्यन्त न् व्यायुपमिनिय H॥ ज्यादुपं उमदत्यिादि तन्नोपरतुत्र्याटुषांमत्यन्तंच । स्वारस्यजपति । इद चाय करणकालातिकोऽक्रिप्ते। मेधाजन्तुमुख्यकोलातिकमानिवर्तते । तस्मात्कुमारं जान घृतवाऽग्रे प्रतिज्ञह पन्ति तन चनुधामयन्तीति । जातमात्रस्य कुमारस्पश्रुत्यामेधाजननोपदेशात् । (सयदि कामयेत सर्वमायुरियादिति वात्सप्रेणेनमभिस्मृशेत् 1 ) सस्तियदीच्छेत् अयंकुमार: सर्व सम्पूर्णमायुः जोविनामिय साप्नुयात् इत्येवंतदावात्सत्रेण वत्सरण भाल-देनछेनानुव.केन दिवस्परीत्यादि द्वादश कुमारमभिमन्ततः सर्वशरीरमाल भेत। तत्रावरेपनाह । (दिवस्परीत्य-, तस्वानुवा स्योत्तमामृचंपरिशिष्टि ॥३n) दियस्पररीत्यादिकंद्वादशोऽनुषाको वात्सप्रएस, स्पोत्तमामन्यांद्वादशी अस्ताव्यन्नित्येितामृचं रिशिनटिव्युदस्यतितां परित्यज्य कदश भभिरभिमृदि- रः । (प्रतिदिशं पंचवाह्मणानबस्थाप्य यादिमानुप्राणिनेतिः १०) पूर्वोचू यात्प्राणे- तिध्याननिदक्षिणः अपानेत्यपरः उदानेत्युत्तरः समानितिपंचमं उपरिष्टादवेक्ष्यमाणोब- यात् ।१३) स्वयं वाकुर्यादनुपरिकामगिद्यमानेषु १३२ ) फुमारस्यप्रतिदिशदिशं प्रति . चतसृघुदिछुमध्ये च यथाक पंचब्राह्मणान्नवस्थाण्य संनिवेश्यकुमाराभिमुखान तान्प्रति किम् इसमनुप्राणि तेतिइमंकु पारम् नुप्रणितानु लनी कृत्यमाणेत्यादि ब्रूतइति प्रेषः ततः प्रेषिताबाण': पूर्वाधिकरण प्राण इति कुमारं लक्षो कृत्यपूर्वो ब्रूयात्, अ.नेति दक्षिणो ब्राह्मणः,प्रातिश्विरः, दानेत्युत्तरः समानेति पंचनः, उपरिष्ट दूर्घमवेक्ष्यम णः । अविद्यामानपु---असत्सु ह्मणेषु । स्वयं वा स्वर.मे- पानुप्राणनं कुर्यात् । कथम् । अनुपरि कामपकिम्य, पक्रिम्य पूादियां दिशे प्रणेत्य दि-- अनु- परिकामैतिणमुलन्तमस्मिन्नते पैषाभाव: 13०1११।१२) ( सयरिमन्देशे जातो भवति तमभि- मंत्रयतपेद ते भूमि हृदयं दिवि चन्द्रमसि शितम् । वेदाह तामां तद्विद्यात्पश्यम' शरदः शतणु याम शरदः शतमिति १३) स कुमारो यस्मिन्देशे भूभागे उत्पन्नः पतति तं देशमभिमन्त्रयते । हस्तेन स्पृशति वेद ते भूमि इत्यादि शरदः शतमित्य- म्तेनमंत्रण १३ । ( अथैनमभिस्म त्यस्मा भयपरशुर्भवहिरण्यमस्तंभव । आरमेय पुत्रनामाति सजीव शरदः शतमिति । १४) अथ जन्मदेशाभिमंत्रण,नतमनं कुमार स्तिभिमशति समंन्तः सर्वशरीरेस्पृशति । अामा भव इत्यादिना सजीव शरदः शतभित्य देन- म.ण ॥ पत्मवाभिमशनादि, एतभिमर्शनांत कालव्यतिकरि मियते संस्कार धर्मत्वात. १४) (मथास्यमातरमभिमंत्रयते, इडासिमैत्रा घमणी वीरवारमजीजनथाः । सात्वं वीर- पती भवयाऽस्मान्धीमतोऽकरदिति १५) अथ कुमारराभिमर्शनान्तरमर ग युमारस्य जगनी. ..
কৰূিযংকে সনময়াবো (४५७) मभिमन्मयतेऽभि लतो फरय-सामि इत्यादिना योरपतोऽरिदित्यन्टेन" ।। (अथास्यै दक्षिण स्तन प्रतात्यप्रयन्तीम स्तनमिति १५) अयाभिमंत्रणं कृत्वा-रय-मरमा. मातुदक्षिण स्तनं प्रक्षाल्य धायित्वा मुमारायददाति, इमस्तनम्, इत्यतयर्धा ॥ यरत स्तन श्युटर मेनभ्याम् १५) तत उत्तरवाम स्तनं प्रक्षाल्यप्रयच्छति, यतस्तन, इमस्तनम्, त्यताभ्यागाभ्याम, ।१६।१५। (दपा शिरस्तोनिदधा त्यापो देधेपु जाप्रथ। एवमस्या सूतिकाया. सपुत्रिकायां जाप्रथेति १८) दपा जलपूर्णप मिरस्त. शिरः प्रदेशे पुमारस्य निदधाति . स्थापयति । भाषौदेवेवित्यादिना जाप्रथेत्यन्तनमत्रेण, ॥१८॥ (हारदेशेसूतिकाग्निमुपसमाधा- योत्थानासंधिवेलयोः फलीकरण मिधासर्पपानग्नावावपत्ति-शंडामर्श उपवार: #डिफेय उलूपलः । मलिम्लुचो द्रोणासश्चयपनोनश्यतादित. स्वाहा । प्रालिखन- निमिपः किम्बदन्न उपश्रुरिदयक्षः कुम्भीशत्रुः पाप्रपाणि मणिहन्तीमुखः सर्वया- रुपश्च्यवनोनश्यतादितः स्वाहा इति १६ ) ततः पंच भू संस्कार पूर्वकं द्वारदेवी सूतिक रहस्य सूतिकाग्निं स्थापयित्वा-~उत्थानादुत्थान यावत्-संघिदेलयो. सायंप्रान. फल करण- मिश्रामलीकरणैस्त लवणमिश्रा शुक्लान्सर्पपस्तिस्मि मनावावति होति द्वे, माहुती-शहामको, इति, मालिसननिमिप, इतिहासमन्त्राया-अवपनोपदेशाद- होमेति कर्तव्यता निर्वृति. ॥१६॥ ( यदि कुमार उपद्रवेजालेनच्छाद्योतरीरंण वा पिता आधाय जपति-कुकुरः सुकर कुरो वाल वाधन (चेच्चेच्छुनकराज नमरते अस्तु सीसगे लपेता. पव्हरः ।। तत्सत्यं यतेदेवा धरमददुः सत्वं कुमारमेव वा वृथा. ॥ चेन्वेच्छुन- फसृज नमस्ते अस्तु सीसरी लपेतापहारा तत्सत्यं यसरमा माता सीसरः पिताश्यामशवलीभातरौ। चेच्चेच्छुनपसृज नमस्ते अस्तु सीसगे लपेतापहर इति ॥२०॥ ) नैमिरवमह-यदि चेत्कुमारो वालप्रहस्तं वालमुपदवेत् - अभिभनेत्-तदा त बलं. जालेन मत्स्य प्रणमधनेन तदलामे-उत्तरीयेण वा ससा प्रछाया छादयित्वाव-उग निधाय धृत्वा कूर इत्यादिकं अपव्हरे इत्यन्त मंत्रत्रयं जपति 1२० (अभिमुशति-ननामयति-नरु- दति न हष्यति न ग्लायति यत्र वयं यदामी यत्र चामिपृशामसि, इति ।२१।१६ जपानने कुमार समिभिमृशति मनामयतीत्यादि यत्र चामि शामौत्यन्तैन भनेए 1१1) इति जात कर्म सून व्य एया।
(४५८) कर्मकाएरत्नाकरे जातवर्मपद्धतिः। अथ जातकर्मपद्धतिः। अथचसुखप्रसवार्थ सोष्यन्तीकर्म-वक्ष्ये-(सोप्यन्तीं प्रसूति वायुना शूलवतीप्रसवोन्मुखीम्) त्रियमद्भिरभ्युक्षति ! 30, एज- विति-अविर्भपिमहापंक्तिश्छन्दो गर्भोदेवतागर्भाभ्युक्षणेविनि- योगः । ॐ एजतु दशमास्योगों जरायुणासह । यथायं व्वायुरे ज़तियथासमुद्राएजति । एवायं दशमास्योऽ अस्रजरायुणासह । इत्यभ्युदय-ॐ अवैत्वितिप्रजापतिऋषि श्रुहतीछन्दोऽग्निर्देवताग- र्भावपाते विनियोगः। 30 अवैतु पृश्निशैवल ॐ शुनेजराय्व- त्तवे । नैनमा सेन पीवरी । न कस्मिंश्वनायतमव जहायुपद्य- ताम् । एतद् गर्भ विमोक्षणमात्र एव कार्यम् । अथच पितापुत्रे जातेपुत्रस्यमुखमवलोक्य स्वर्णयुक्तनगृहा- नीतेन जलेनाग्निसमीपे वानद्यादौ गत्वा रात्रावपि शीघ्र सवस्त्रं स्नानमाचरेत् । अथेहेत्यादि० अमुकोऽहंपुत्रजन्मनिमितकं सचैल स्नानमहं करिष्ये । स्नात्वा शुद्धधौते वाससी परिधाय प्राडू- मुखोपविश्याचम्य दीपं प्रज्यात्यशान्तिपाठं पठित्वा गणेशादि मातृका पूजनादिकं कुर्यात्-श्रोत्यादि देशकालौस्मृत्वामुकोऽहं ममास्य कुमारस्य गर्भावुपानजनित सकल दोप निवर्हणायुर्मेधा- भिवृद्धिवीजगर्भसमुद्भवैनोनिधहणद्वारा परमेश्वर प्रीत्यर्थ जात- कर्माहं करिष्ये । तदंगत्वेन-गणेश पूजनं गौर्यादि मातृकापूजन नान्दी श्राद्धं कलश स्थापनं पुण्याहवाचनं बसोर्धारापातनं नव- ग्रहपूजनं च करिष्ये--इति पूर्वोक्त प्रकारेण पूजनं विधायनान्दी श्राद्धं सुवर्णनवाद्विगुणामान्नेन विदध्यात् 'पुत्र जन्मनि कुर्वीत श्राद्धहेम्नैव बुद्धिमान्' ततः सुवर्णादि पाने मधुघृते चैकीकृत्य केवलं घृतं या सुवर्णान्तहितया अनामिकया प्रादाय जातं शिशु सकृत्माशयति । कुमारस्यजिह्वायां नुमाष्ठीत्यर्थः । ॐ भूरादि व्याहृति प्रयाणां पूजापति–पिर्गायत्र्युषिणगनुष्टुन्हतीछन्दांसि कंकाएरसाकरे, जातफर्मपद्धतिः ॥ (४५) अभिवायुसूर्यपूजापतयो देवताः पाशने विनियोगः । ॐ भूस्त्वयि दधामि ॐ भुवस्त्वयि दधामि ॐ स्वस्त्वयिदधामि ॐ भूर्भुवः स्वः सर्व त्वयि दधामि । इति मेधाजननम् । अथायुष्करणम्-- जातस्य पुत्रस्य नाभिसमीपे वा दक्षिण कर्ण समीपे मंत्रोपदेश- वजपेत् । ॐ अग्निरायुष्मानित्यादिनामष्ठानांमंत्राणां पूजापति- ऋपिर्गायत्रीछन्दो लिंगोक्तादेवता प्रायुष्करणे विनियोगः । ॐ अग्निरायुष्मान्त्स व्यनस्पतीभिरायुष्मास्तेनत्वाऽयुषाऽयुष्मन्तक- रोमि ॥२॥ ॐ सोमऽआयुष्मान्त्सोपधीभिरायुष्मांस्तेनत्वाऽऽयु- पाऽऽयुष्मन्तंकरोमि ॥२२॥ ॐ ब्रह्मायुष्मत्तद् ब्राह्मणैरायुष्मत्, तेनत्वाऽऽयुपाऽऽयुष्मन्तंकरोमि ||३|| ॐ देवाऽआयुष्मन्तस्तेऽमृते- नायुष्मन्त स्तेनत्वाऽऽयुपाऽऽयुष्मन्तंकरोमि ॥४|| ॐ ऋपयऽश्रायु मन्तस्ते व्रतैरायुष्मन्तस्तेनत्वाऽऽयुवाऽऽयुग्मन्तंकरोमि।शापित रऽआयुष्मन्तस्ते स्वधाभिरायुधमाँस्तेन त्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तंकरोमि १॥३॥ॐ याज्ञऽआयुष्मान्त्सदक्षिणाभिरायुष्मास्तेनत्वाऽऽयुपाऽऽयु- मन्तंकरोमि ॥णा असमुद्रायुष्मान्त्सस्रवन्तीभिरायुमाँ स्तेन- स्वाऽऽयुषाऽऽयुष्मन्तं करोमि ||८|| ॐ त्र्यायपमित्यस्य नारायण- पिष्णिक छन्दः शिवो देवता-व्यायुपकरणे विनियोगः। ॐ व्यायुषं जमदग्नेः कश्यपस्य श्यायुषम् । यद्देवेषु भ्यागुष तन्नोs- अस्तुयायुषम् । इतित्रिजपेत् । सकृद्वा । (गदिकुमारस्यपिताका. मयतेऽयकुमारः शतवर्षमायुज्जीवितमियातस्यात् तदा दिवस्परी- त्येकादशभिर्मत्रैः कुमारसर्वांगहस्तेनाभिमृशत् एतदप्यायुपकरणम् ॐदिवस्परि-इत्येकादशमंत्राणां वत्सप्रीऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दोऽष्टममं त्रस्यपंक्तिश्छन्द रुक्माग्निदेवते जाताभिमर्शने विनियोगः। ॐ दिवस्परि प्रथमं जज्ञेऽग्निराणद्वतीग परिजात वेदातृतीयंमप्सु तृम्पाऽअजस्रमिन्धान एन जरतेस्वाधीः ॥२॥ ॐविद्मालेऽअग्ने त्रेधा त्रयाणिविद्मातेधामविभृतापुमत्रा। विद्माते नाम परमंगुहा यद्विमांतमुत्सँयतऽाजगन्धः ॥२॥ ॐसमुद्रेत्वा नृम्णाऽअप्स्वन्त- नृचक्षाऽईधे दिवोऽअग्नऽधन् ।तृतीयेत्वारजसि तस्थिवा .
(४६०) कमकायरत्नाकर जातकर्मपद्धति । समपामुपस्थे महिपाऽप्रवर्द्धन ॥३॥ ॐ अनन्ददग्निस्तनयन्निव- द्यौः क्षामारेरिरद्वीरुधः समंजन् । सद्यो जज्ञानोब्वीहिमिद्धोऽअ- ख्यदा रोदसी भानुनाभात्यन्तः ॥४॥ ॐ श्रीणामुदारोध- रुपोरयीणां मनीषाणाम्पापणः सोमगोपाः। व्वसुः सूनुः सहसो अप्सुराजा त्रिभात्यग्नऽउषसामिधानः ॥५॥ ॐ विश्वस्यकेतुर्भुवनस्यगर्भऽारोदसीऽनपूणा ज्जायमानः बीडचिदद्रिमभिनत्परा यंजनावदग्निमयजन्तपञ्च ।।। 30 उशि- पावकोऽअरतिः सुमेधामर्तध्वग्निरमतोनिधायि इयर्तिधूममरि- पंभरिभ्रदुच्छुकेणशोचिपाद्यामिनत्तन् ॥७॥ 30 दृशानोरुक्मऽ उर्ध्याव्यद्यौदुर्मर्षमायुः श्रियरुचानः । अग्निरमृतोऽअभवद्वयोभि- यनिन्द्यौरजनयत्सुरेताः ।। 30 यस्तेऽप्रद्यकृणवद्भद्रशोचेपूप न्देवतयन्तमग्ने । प्रतन्नयप्रतरवस्योऽअच्छामिसुम्नं देवभक्तंय विष्ट आतंभजसौ श्रवसेश्वग्न उक्थ ऽउक्थ ग्राभजशस्यमाने प्रियः शूर्येप्रियोऽअग्नाभवात्युज्जातेनभिनददुज्जनित्वैः ।१० अत्यामग्नेयजमानाऽअनुगन्विश्वोव्वसुदधिरेव्वार्याणि । त्वया सहद्रविणमिच्छमानाव्रजंगोमन्तमुशिजोव्विवन्नु।११। ('दिवरूप रीत्येतस्यात्सानुवाकस्य अस्ताव्यग्निरित्येतामृचं परिशिनष्ठिव- जयेदित्यर्थः) अथ कुमारस्य पूर्गदिचतमपुदिक्षुचतुरो ब्राह्मणान्नेक मध्येचविस्थाप्य,इममनुपाणीत, तान्ब्राह्मणानितिप्रेष पिता यात् तत्रादौ पूर्वदिस्थितोब्राह्मणः कुमारलक्षीकृत्य प्राण.। दक्षिण स्थः ॐ व्यानः। पश्चिमस्थः 30 अपानः। उत्तरस्थः ॐ उदानः । पंचमोमध्यमस्थउपपिष्ठादवेक्ष्यमाणः सन् ॐ समानः ब्राह्मणाभावेपितास्वयमेव पूर्वादिकमनस्तानत्रगत्वा कुमारा- भिमुग्वस्थित्वा माणेत्यादिवृयात् । अस्मिन्पक्षपाभावः । ततोयस्मिदेशेकुमारोजातोभवति। तंदेशंदक्षिणहस्तानामिकयास्ट- शन वदयमाण मंत्रंपठति । ॐ वेदतेभूमि इति मंत्रस्यप्रजापति प्रपिरनुष्टुप्छन्दः पृथ्वीदेवता जन्ममृम्यभिमंत्रणे विनियोगः । येदतेभूमिहृदयंदिविचन्द्रमसिभितम् । व्वेदातन्मां तद्विद्या- फर्मकाएनाफरे जातवर्मपतिः । त्पश्येमशरदः शतंजीवेमशरदः शत t० शृणुयामशरदः शतम् । ततः कुमारंसर्वशरीरेस्टशतिमंनेए 30 अश्माभवेत्यस्यमंत्रस्य प्रजापतिमपिरनुष्टुप्छन्दोलिंगोतादेयता अभिमर्शणे विनियोगः ॐ अश्माभवपरशुर्भय हिरण्यमश्रुतंभव । यात्माचपुत्रनामासि सजीवशरदः शतम् । (वात्सप्रभिमर्शनादि एतदभिमर्शनान्तं कर्म कालव्यतिक्रमेऽपिक्रियते संस्कारकत्वाच्चतुर्दशसुत्रस्यव्याख्या- यास्पष्ठम् । मेधाजननंतुमुख्यकालतिक्रमानभवतीति सप्तमसूत्र व्याख्यानात्) ततः कुमारमानरंलक्ष्यीकृत्याभिमंत्रयेत् । ॐ इडा- सीत्यस्य प्रजापतिऋपिरनुष्टुप्छन्दाइडादेवता अभिमंत्रणे चिनि- योगः । ॐ इटासिमैत्राव्यरुणीव्धीरे वीरमजीजनथाः । सात्वं वीरवतीभवयास्मान्वीरवतोऽकरत् । अयमातुर्दक्षिणेस्तनप्रक्षाल्य कुमारायप्रच्छति । ३० इमस्तन मित्यस्य प्रजापतिपिस्त्रिष्टु- प्छन्दोऽग्निर्देवता दक्षस्तन प्रदाने विनियोगः । इमस्तन मूर्जस्वन्नधयापां प्रपीनमग्ने सरिरस्यमध्ये । उत्संजुपस्वमधु- मन्तमर्वन्समुद्रिय र्ट० सदनमाविशस्व । ततो वामस्तनमक्षाल्य च 30 यस्तेस्तन इति दीर्घतमाऋपिलिटुप्छन्दोवाग्देवता वाम- स्तनदाने विनियोगः ॐ यस्तेस्तनशशयोयोमयोभूयो रत्नधा- व्वसुविद्यः सुदन । येन विश्वापुष्यमिवार्याणि सरस्वति तमि- हधातवेकः । 0 इम स्तनमिनिच द्वाभ्यांवामप्रयच्छति । ततः सूतिकाया शिरप्रदेशेभूमौजलपूर्ण कुम्भ दशदिनपर्यन्तं निधाय संरक्षयेत् 30 आपोदेवेश्यित्यस्य प्रजापतिर्मपिरनष्टप्छन्दः पापो देवताः सतिकायाः शिरप्रदेशेरक्षानिमित्तमुदककुम्भ स्थापनेवि- नियोगः 30 पापो देवेपुजाग्रथयथादेवेषु जाग्रथ एवमस्यासूति- काया सपुत्रिकायऽ जाग्रथ । ततः सूनिकागृहस्यद्वारदेशे (कति- चिच्छीतत्र्याप्तदेशेषुसूतिका सन्निधावेवाग्निस्थापनं कुर्वन्ति) यथा देशप्रथानुकलेन कर्तव्यम्-तन्त्रवेदींकृत्यापंचभूसंस्कार पूर्वक मग्निंस्थापयित्वा एपण्वविधिर्यत्र कचिद्धोमः एततेतिप्रणीता प्रणयनादयोनभवन्ति ततः स्थापिताग्निं एततेनिमतिष्ठाप्य प्रग (४६२) कर्मकाण्डरत्नोकरे जातकर्मपद्धतिः । । ल्भोजातकर्मणि) इति वचनात् ॐ भूर्भुवः स्वः प्रगल्भनामाग्ने इहागच्छेतिष्ठ सुप्रतिष्ठितोवरदोभवः 30 प्रगल्भाग्नयेनमः । इति मंत्रेणपाद्यदिभिः संपूज्य तंडुलमिश्रितान्स्वेतसर्षपान्गृहीत्वा दशदिवसपर्यन्तं प्रतिदिवसंसाय मात वक्ष्यमाण मंत्राभ्यामाहुतिद्वयं होमं कुर्यात् । यावत्सूतिकोत्था- नम् । तत्रमंत्रः-ॐ शंडामर्का इति प्रजापतिऋषि रनुष्टुप्छन्दो ऽग्निर्देवता सूतिकाग्नौ तंडुल मिश्र सर्षपहोमे विनि योगः । ॐ शंडामर्काऽउपवीरः शौण्डिकेयऽउलूखलः मलिम्लु. चोद्रोणासश्च्यवनो नश्यतादितः स्वाहा । इदमग्नये नमम, ।। श्रालिखन्नितिप्रजापतिपिरनुष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवना सूतिकाग्नौ तण्डुलमिश्र सर्षपहोमे विनियोगः । ॐ यालिखन्ननिमिषः कि वदन्तऽउपश्रुतिः हर्यक्षः कुम्भीशत्रुः पात्रपाणिनुमणिः हनीमुखः सर्षपासणश्च्यवनो नश्यतादितः स्वाहा-इदमग्नये नमम । इत्युभयत्र त्यागः । अथ च कुमार नामको वालग्रहो वालकं प्रत्युपद्रवं रोदन मूर्छादिकं कुर्यात् । तदातदुपद्रव शान्तये तं जातं शिशु मत्स्य जाल खण्डेन वा उत्तरीयेण वस्त्रेणाच्छाद्य अंके गृहीत्वा पिता वक्ष्यमाण मंत्ररक्षां कुर्याजपेच्च । ॐ कूकूर इत्या दिनां मंत्राणांप्रजापतिर्ऋषिरनुष्टुप्छन्दः शुनको देवता ग्रह वाधा दूरी करणार्थ जपे विनियोगः । ॐ कृक्कर सुकृटुरः कृधैरो याल बंधनः । चेच्चेच्छनक सृज नमस्तेऽअस्तु सीसरो लपेता- पव्हर ।। ॐ तत्सत्यंयत्ते देवाव्वरमददुः कुमारमेयवाऽवृणीथाः। चेच्चेच्छनक सृज नमस्तेऽस्तु सीसरो लपेतो पव्हर ।२। 30 तत्सत्यं यत्तेसरमामाता सीसरः पिता श्यामसवलौ भ्रातरौ । चेच्चेच्छुनकमृजनमस्तेऽस्तु सीसरो लपेता पहर ।। इति जप्त्वा बालकमभिमृशति । ॐ ननामयतीत्यस्पप्रजापतिर्मपिर- नुष्टुप्ठन्दो वायुर्देवता ग्रहाधा दुरी करणार्य पुत्राभिमर्शने विनि- योगः । ॐन नामयति न मदति न हृपयति नग्लायति । यत्र व्ययंबदामो यत्रचाभिमृशामसि ॥ इति मंन्नेहाभिमृश्यततो कर्मकासरत्नाकरे पष्टीपूजामहोन्लयपरिमापा। (४६३) दक्षिणादिकं ब्राह्मणेभ्यो दत्वा ततो नालमष्टांगुलं नाभौशेष कृत्वाकर्तनेन चरेण वा छेदयेत् । ततो ब्राह्मण भोजनं सूतकान्ते कुर्यात् (पुत्र जन्मनि यात्रायां शर्वर्या दत्तमममम् । प्रथमेऽन्हि तथापष्टे दातानाप्नोतिसूतकम् । इति वचनात्-स्नानदान प्रति ग्रहेषु दोषो न भवति । इति जातकर्म पद्धतिः । ॥ अथषष्ठीपूजामहोत्सवपरिभाषा ॥ नवामौविधिःपारस्करगृधसूत्रोक्तः। परंचस्मृतिपुराणोदितत्तादवश्यमेव कर्तव्योऽयविधिः । मिता- क्षरायांमार्कण्डेय:-रक्षणीयातापठो निशातविरोपत. । रात्रौजागरणकार्य जन्पदानातथा- बलिः । पुरूपाश न हस्तारच नृत्यगीतश्चयोपितः । व्यासः~सूतिकावासनिलया जन्मदानाम- देवताः । तासांयागनिमित्त शुदिर्जन्मनिकात्तिता । प्रथमंदियसेपछे दशर्मचैपसर्वदा । त्रिवेतेपुन- कुचात सतकंपुननि । अपरा-कन्याश्चतस्रोशकाद्या वातघ्नीवपंचमी । कीटनाचया- लानां पष्टोशिशुरक्षिणी । सर्लोलुपूजनीया ग्राह्मणैश्चद्विजातिभिः । राकानुमितिःमिनीवाली - रितिचतन्त्र कन्यतः । श्रीकृष्णयुधिष्ठिरसंवादेभारते-युधिष्टि उवाच-पुनजन्मनिकन्याया उत्सव कोविधियते । किनकर यपृजाच तन्मे हिजनार्दन ? । श्रीकृष्णउवाच- णुपारउययरमैन- सुतोहात्तिमहो सवम् जन्मदिने कार्य पष्ठीनन्नीशिलिनी । पोठाराम्हममगोप-प्रतिमा- निवेत् । काका,प्रदातव्याश्यागे चागेविगेपतः । कर्णयो कुरा इलेदेये दूर्य पछवशोभिते । दिव्यशम्र. परीधानां तांदेवीपूजयेततः । अप्रेदी ठकदेयं नैवेद्य विविधै.शुभैः । नरिकैरातिद्वत्-देशफलो- द्भये.फल । क्लस्थापयेत्तत्र-अप्रत पल्लवादितम् । द्विजन्मानं समनीवमदाचारमान्वितम् । आय- कारयेत्तस्यास्तयोहम्तैनपूजनम् । नृत्य त विनोदैन वाद्येनचयुधिसिर १ । रात्रौजागरणकार्य देबज्ञेन. द्वि :सह । वटकष्टयमालाभियग्रीवम जासुतम् । पुनःपुनर्महाशन कारयेत्पर्णताडनात् । डाकिन्यो- यातुधानाश्च भूतप्रेतपिशाचका । पालमहाश्वनश्यन्ति तच्छन्दावर्णनाऽब्रुवम् । तरानानिदेयानि- ब्राह्मणेभ्योविशप्तःप्रथभेऽहनिपटेवादात्तानाप्नोतिसूतकम् । दानप्रतिमहं तत्रयाद्धयक्रियतेयतः ॥ प्रभातेदीयतेदान तटना कगायकान् । स्त्रिय.सभर्तृवा अन्या वस्त्रालंकरणादिभिः । अनेन विधिनायस्तु पष्टीदेवीप्रपूजयेत् । अयुर्वृद्धिभत्तस्यसंतते-रिपाण्डव ? पुजादेव्यतीपातेप्रणेचन्द्रसूर्ययोः पितुः- सम्बत्सरदिनेदानं कोटिगुणंभवेत् । श्रादुम्नस्क-दपदकृत्तिादीनां पूजनंगरंपर्य देश रीत्यादीध:- युषांपूजनंबुमारस्पदीर्घ युपनिमितवंपू:चार्य निरुपितं । वतिचित्सुखतिदेशाच रतोधनुगेन- राहुबेधनमस्ति । तददेशाचार । मनुविश्यम् । इतिषष्टीमहोत्सवविधिः ॥
(४६४) कर्मचाररत्नाकरे, पष्ठीपूजामहोत्सयपरिभाषापद्धतिः ॥ अथ पष्ठीमहोत्सवपूजापद्धतिः । अथ च जातकजन्मदिवसोत्पप्टेऽन्हि पिता प्रातरुत्थाय शुचिः स्त्रौतस्मातकियापरं सपत्नीकं ब्राह्मणं विनियेनोपमृत्य । अयपुत्रस्य कन्याया वापष्टीमहोत्सवाय युवामहं निमन्त्रये, इत्युक्त्वा तथास्त्विति तौ नूयास्ताम् । ततः स्वगृहमागच्छेत् । तहिने ब्राह्मणः सपत्नीकः श्चोपोषितस्तिष्टेत् । ताभ्यां षष्ठी महोत्सवं कारयेत् श्रथवोपवासपूर्वकः स्वयमेव पिता वा अन्य: कुर्यात्-ततोऽपरागह समये ब्राह्मणोगोमयेन सूतिकागारभित्तौ मध्ये पष्ठीदेव्याः पार्श्वयोः स्कन्ध प्रद्युम्नयोरेवंतिस्त्रः प्रतिमाः कृत्वो, वा काप्टपीठे पिप्टेन लिखित्वा तंदुलैर्यवै ; पूरयित्वा, पष्टीदेव्याः कर्णयोर्दापल्लवैः कुण्टले सर्वात पोडशकपर्दिकाः सुसज्जेत् । ततोऽन्यद्वस्त्रादिभिस्तिस्रः प्रतिमाः विदध्यात् । ततः प्रदोप समये जातकस्य पिता स्नात्वानित्यकर्म विधाय पूजा सामग्री संपाद्य सूतिका गृहद्वार समीपमागत्य द्वारमात पूजन फुर्यात् । याचम्यार्घ संस्थाप्य भूतोत्सादनं कृत्वा संकल्प:-- अटोत्यादि० अमुकराशिरमुकोऽहममुकराशेः पुत्रस्य कन्याया वा करिष्यमाण पष्टीमहोत्सव कमणि तत्रादौ द्वार मात्त्रणां पूजन करिष्ये । एतन्ते. इतिः ॐ भूर्भुवः स्वः द्वारमातर इहागच्छन्तु- इरतिष्ठन्तु सुप्रतिष्ठिता वरदा भवन्तु । इति प्रतिष्ठाप्य, ध्यानम्- ॐ कुमारीधनदोनदाविपुला मगलाचला। पद्माचैव तु नाम्नोक्ताः सप्तदा द्वारमातरः । इति ध्यात्वा नाममंत्रः पूजनं कुर्यात् । . फुमायनमः 0 धनदायै० 30 नन्दाय० 30 विपुलायै० 30 मंग- लाय. अचलाय. ॐ पद्मायै नमः इतिमंत्रः पाद्यगंधधूपा दिभिः संपूज्य दक्षिणां दत्वा स्वस्ति वाचनं कुर्वन्-याभ्यन्तरं- गच्छेत् । तत्रादौ सर्पपसैन्धवसर्पकचुलिका निम्वपत्रघृतमिश्रितः सूतिकासनिधी धृपदत्या । ततोगणेशादि पंचांग पूजनं कृत्वा ततः स्कन्दमागुम्न जन्मदापष्ठी देवीनां पूजनं कुर्यात् । श्राचम्याचं कर्मफागररक्षाकरे, पण पूजापतिः । (४६५ ) संस्थाप्य संकल्पः । अयेत्यादि देशकालौ स्मृत्वाऽमुकोऽहं जातस्य शिशोरायुरायोग्य सकलारिष्ट शान्ति द्वारा श्रीपरमेश्वर प्रीत्यर्थ गोमयप्रतिमोपरिस्कन्दप्रद्युम्नयोः पूजनं करिष्ये । (कतिचित्सु पुस्तकेप्यादौ प्रद्युम्न पूजाविधिक्ता-परश्च जन्मदापष्ठी देवी- भ्यामादौ स्कन्द एवरक्षितोऽनापि वालस्थ रक्षार्थ-पौराणका- चायैस्तेपां पूजाविधिक्तः प्रद्युम्नस्य जन्मनः पूर्वमेवस्कन्दस्य पूजायांमाथम्यतोमयापि यादौ स्कन्द पूजाविधिरुक्तः)तत्रादौ स्कन्दं ध्यायेत् । ॐ वराभयकरः साक्षाद्विभुजः शिग्विवाहनः । किरीटीकुण्डली देवो दिव्याभरण भूपितः । ॐ ध्यायामि वरदं देवं मयूर वर वाहनम् । स्कन्द सेनापति वीरं वालरक्षण हेतवे । ॐ स्कन्दाय नमः। ॐद्रप्सश्चेति मन्त्रस्य देवश्रयापिस्त्रि- टुप्छन्दः स्कन्दो देवता स्कन्दावाहने पूजने विनियोगः । ॐ द्रप्सश्चस्कन्दधिचीमनुद्यामिमं च योनिमनुयश्च पूर्वः । समान- योनि मनुसंचरन्तन्द्रप्स जुहोम्यनुसप्तहोत्राः । इति मंत्राभ्यां पाच गंधादिभिः सम्पूज्य प्रार्थयेत् । ॐ नमः कुमाराय महा प्रभायस्कन्दायते स्कन्दितदानयाय । नवार्कविम्वद्युतये नमोऽस्तु नमोस्त्वमोघोद्यतशक्तिपाणये । नमो विशालाय विचारिणेऽस्तु नमोऽस्तुते परामुग्व कामरूपिणे । गुहायगढाभरणायधर्त्रे नमोऽस्तुते दानव दारणाय । नमोऽस्तुतेऽर्क प्रतिमप्रभाय नमोऽस्तुगुडायगुहाय तुभ्यम् । नमोस्तु ते लोक भयापहाय । नमोऽस्तु ते वालपराम- माय ॥ नमो विशालायतलोचनाय नमो विशालायमहा व्रताय नमो नमस्तेऽस्तु मनोरमाय । नमो नमस्तेऽस्तुकरोत्कराय नमो मयूरज्ज्वल वाहनाय नमो धृतोदनपताकिनेऽस्तु । नमोऽस्तु केयूर धराय तुभ्यं । नमः प्रभावमएताय तुभ्यम् ॥ सेनानये पावकिने नमोऽस्तु । क्रियां परीतामयदिव्य मूर्तये । कृपामयो यज्ञ इचामल- स्त्वं नमोऽस्तु पष्ठीश नमो नमस्ते । इति द्वात्रिंशन्नामभिः पुप्पां- जलिनासंप्रार्य-ॐ काण्डात्काण्डात्प्ररोहन्तीपरुषः परपस्परि । एवानो दुर्वे मतनु सहस्रेण शतेन च । इतिमंन्त्रेणस्कन्दोपरि दुर्यों (४६६) कमकाण्डरत्नाकरे पष्टे पूज.पद्धति समर्पयेत् । ततः प्रद्युम्नध्यायेत्-ॐ प्रद्युम्नस्तु चतुर्वाहुः शंग्व चक्र गदाधरः। रतिनारक्षितो देवो वनमाला विभूषितः । ततः प्रद्युम्नमावाहयेत्-ॐ कामदेव धरं रूपं प्रद्युम्नरुक्मिणी सुतम् । आवाहयामिदेवेश शिशुकल्याणहेतवे । ॐ प्रद्युम्नाय नमः इतिमंत्रेणपाप्यादि नैवेद्यान्तं संपूज्यमार्थयेन-(ॐ कृष्णाय वासु- देवाय देवकीनन्दनाय च । प्रद्युम्नायानिरुद्धाय नमः शंकर्षणाय च । शंवरारे ? नमस्तेऽस्तु नमस्ते रतिवल्लभ ? नमस्ते रुक्मिणी पुत्र ? नमस्तेशिशु रक्षक ? । भोप्रद्युम्नमहावाहो लक्ष्मी हृदय- नन्दन । कुमारं रक्षमे भीतेः प्रद्युम्नाय नमोनमः । इति संप्रार्थ्य ततः पट् कृत्तिकाः पूजयेत्--अद्येत्यादि० देश कलौ स्मृत्वा ममास्य जातस्य षष्ठीमहोत्सव कर्मणिसर्वोपद्रवशान्त्यर्थं दध्य- क्षत पुंजेपु पट् कृत्तिकानां पूजनं करिष्ये-ध्यायेत् 0 स्कन्दमात्ऋ जगद्धात्रलरक्षण तत्पराः। ध्यायामिमनसा देवीः कृत्तिकाः शिशु पालिकाः एतन्ते इति प्रतिष्ठाप्य 3 भूर्भुवः स्वः स्कन्द- मातरः॥ इहागच्छन्त्विह तिष्ठतु | सुप्रतिष्ठिता घरदा भयन्तु ११॥ ॐभूसभूते इ०।२।भू० सन्निते इ०३। ॐभू०पीते इ०१४। ॐ भू० अनसूये० इ० ।। 0 भू० क्षमे इ०१६॥ इति प्रतिष्ठाप्य नाममंत्रैर्गन्धाक्षतादिभिः संपूजयेत् । 3. शिवायै नमः । ३० संभूत्यै नमः 130 सन्नत्यै नमः । ॐ प्रीत्यै नमः 30 अनसूयायै नमः । ॐ क्षमायै नमः । इतिसंपूज्य मार्थयेत् । 30 जगन्मातर्ज- गद्धानि जगदानन्दकारिणि ! नमस्ते देवि कल्याणि प्रसीद मपि कृत्तिके ॥ ॐ कार्तिकेयाय नमः ॐकार्तिकेय महावाहो गौरी हृदयनन्दन । कुमारं रक्षमे भीतेः कार्तिकेय नमोस्तु ते । ॐ महानाय नमः । ॐ कृष्णात्मज नमस्तेऽस्तु नमस्ते कामरूपिणे । सवालांसृतिकारक्ष प्रद्युम्नाय नमो नमः । ॐ ग्वद्गाय नमः । शंग्वाय नमः । ॐ मंधनाय नमः । वंशाग नमः । इति ग्वनाधायुधानि संपूज्य मध्येमहापष्ठी पूजयेत् । तत्रादायऱ्या संस्थाप्पापम्य प्राणायामवयंविधाय दीपाष्टकादि पूजा सामग्री कर्मकार डरत्नाकर पष्टोपूजापद्धतिः। (४६७) संपाद्य संकल्पः अद्येत्यादि. अमुकराशिरमुकशर्माहममुकराशे र्जातस्यपुत्रस्य कन्याया वा दीर्घायुरारोग्यावाप्तये सर्वोपद्रव शान्त्यर्थं श्रीपरमेश्वर प्रीतये गोमयप्रतिमायांपष्ठीदेव्याः पोडपो- पचारैः पूजने करिष्ये---30 एतन्ते. पठित्वा 30 भूर्भुवः स्वः गोमयप्रतिमायां पष्ठीदेवि ! इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितावरदा भव । आँ ह्रीं क्रौं य र ल व श प स हैं हंसः सोहं पाठी- देव्याः प्राणा इहागत्य सुखं चिरं तिष्ठन्तु जीवइहतिष्ठतु सधैं न्द्रियाणीह तिष्टंन्तु वरदा भवन्विति प्राण प्रतिष्टां कृत्वा- श्रात्मनि देवे च न्यासं कुर्यात् । पाँ हृदयाय नमः ॐ पी शिरसेस्वोहा 30 शिखायै वषट् अ . कवचाय हुम् । 30 पौं नेत्राभ्यां चौपट पः, अस्त्रायफट न्यासं कृत्वा ध्यायेत् । 30 चतुर्भुजां सौम्यरूपां पीन्नोन्नत पयोधराम् । रक्तवस्त्रां चारु हासां मयूर वर वाहनाम् । दिव्यरूपां दिव्यनेत्रां शिवाशिन संस्थिताम् । शक्तिशूलवराभीति हस्तां ध्यायेन्महेश्वरीम् दक्षिणे वेशमंथानं वामे नीलोत्पलं शुभम् । स्कन्दप्रद्युम्न मध्यस्थां महापष्ठी विचिन्तये । प्राचाहनम्--आयोहि वरदे देवि पष्टीदेवीति विश्रुते । शक्तिभिःसह मेपुत्रं रक्ष- जागर वासरे । ॐ अम्बेऽअम्बिके अम्बालिके नमानयतिकश्चन ससस्त्यश्वकः सुभद्रिका काम्पीलवासिनीम् । प्रासनम्-पासनं परमंदिव्यं कौशेयंचमनोहरम् । पष्ठीदेवि गृहाणत्वं सपुत्रास्त्रसू- त्तिकाम् । पाद्यम्-गंधाक्षतसमायुक्तं शीतलनिर्मलजलम् । पाद्य गृहाणसुमुखिषष्ठीदेव्यै नमोनमः । श्रयम्-गन्ध पुष्पाक्षताढय च गांगवारिसुनिर्मलम् । अर्घगृहाण देवेशिमहापष्म्यैनमोनमः । आचमनीयम्कपूरैलालवंगश्च वासितं जलमुतमम् । गृहाणा- चमनंदेवि महापष्ट नमोनमः । पंचामृतम्-पंचामृतं गृहाणेदं पयोदधिघृतमधु । शर्करासहितमातर्महाषष्ट्यैनमोनमास्नानीयम् गंगादि तीर्थसंभूतं दिव्यगंधयुतंजलम् । स्नानार्थतेप्रदाष्यामि महा पष्टयैनमोनमः । वस्त्रम् । कौशेयं मृदुलंदेविनानारंगैमनोरमम् ।
(४६) कर्मकाण्डरत्नाकरे पष्ठीपूजापद्धतिः । वस्त्रंगृहाण जननि महापटयैन । भूपणानि-नानारत्नमयं दिव्यं मुक्ताहारादिकंपरम् । गृहाणभूपणंशुद्धं महापष्टयैन । चन्दनम् कर्परागरूकस्तरी केशरेण समन्वितम् । गृहाणचन्दनंदेवि महाप- ष्टयैन । सिन्दरम्-चन्दनोपरि शौभार्थद्रव्यं सौभाग्यसूचकम् । सिन्दूरंगृहसुभगे महाप० । अक्षताः-सुक्षालितैरक्षितैश्चतण्डुलैः शशिसंनिभः । द्योतयामिजगन्मातर्महाप० । पुष्पाणि-ऋतुजानि सुपुष्पाणि तथा दर्वाड्कुराणि च । निवेदयामितेप्रीत्यामहापष्टय० धूपम्-वनस्पत्युद्भवं धूपं गंधाढयं सुमनोहरम् । गृहाणाधेयकंदि. व्यं महाषष्ट्य०दीपम्-श्राज्यं वर्तिकृतं देविवन्हिदीप्तंप्रभान्वितम् धारार्तिक्यंगृहाणेशिमहापष्टय० । नैवेद्यम् नानाविधंच नैवेद्य भक्तिभावसमन्वितम् । सग भयकल्याणि महापटय० याचम- नीयम् करास्यपादशुद्ध्यर्थपानार्थ च शुभंजलम् । गृहाणविश्व जननिमहापष्टयै० उपायनम्-सुवर्णराजतंद्रव्यं वित्तशाव्य विवर्जि- तम्। उपायनीभूतमिदं गृहाणजगदंविके । ततोदीपाष्टकंपष्ठीदेव्या अग्रतोदीपयेत् ३० घृतेनपूरितान्दीपानष्टवार्तिसमन्वितान् । दीप- यामि हितार्थतेमहापष्ठिनमोऽस्तुते । ततो गन्धाक्षतादिभिः पूज- यित्वा द्वारप्रदेशेवटकाष्टकमालां अजापुत्रस्यगलेवध्वा भूतादिवि- द्रावणार्थं कर्णताडनेन पुनः पुनः शब्दकारयेत् । ततोनीराजनं कुर्यात्-30 अन्तस्तेजोवहिस्तेजएकीकृत्यामितप्रभम् । आरातिक मिदंदेवि गृहाणपरमेश्वरी । नमस्कारः 30 जयदेवि जगन्मात जगदानन्दकारिणि । प्रसीदमम कल्याणि महापष्टिनमोऽस्तुते । ततः पुष्पान्गृहीत्वाप्रार्थन-देवानांचऋषीणांच मनुष्याणांच वत्स ले । असुममसुतरन पष्ठिदेविनमोऽस्तुते । पुरादेवैः पूजितासि ब्रह्मविष्णु शिवादिभिः । बायाभ्यामपि देवित्वं पूज्यसे भक्तिपूर्व- कम् ।देहास्यवालकस्यायुर्दीर्घतुभ्यंनमोऽस्तुते । ततः पिता वालक- स्थपष्टीदेव्याः पुरःस्थितः । वध्वांजलिर्भक्तिननवाक्यमुच्चारयेदि- दम् । त्वंदेवमातादितिरधिजात्वं गौरीत्वमेवासिधृतिः क्षमा त्यम् । कीर्तिः समृद्धिभुवनस्यधात्रीत्वमेवदेविप्रणतोऽस्मिनुभ्यम् कर्मकाण्डरलाकरे पंष्ठीपूजापद्धति (१६) त्वं मृष्टिराद्यामृजसिप्रजोत्वम् । स्थितिस्तताः सकलाविपि । त्वामेववाचामनसा च कर्मणा समर्चयाम्यस्तु शिशुश्चिरायुः स्वस्तिमेऽस्तु गृहनियंत्वत्प्रसादात्सुरेश्वरि । पुत्रोत्सवमहंनित्यं पश्येमत्वदनुग्रहात् । ततोऽर्भकस्यजननीप्रार्थयेत् । तवप्रसादात्तन- स्यवक्त्रंदृष्टं मयादेविनमोऽस्तुतुभ्यम् । सौभाग्यमारोग्यमभीष्टसि द्धिंदेहिप्रजात्वंचिरजीवितं च । गौर्याःपुत्रो यथास्कन्दःशिशुःसंर- चितस्त्वया । तधाममाप्ययं वालोरक्ष्यतांपष्ठिकनमः।पष्ठिदेवि नमस्तुभ्यसूतिका गृहवासिनि । पूजितासिमयाभक्त्या सवाला रचमूतिकाम् । अथ तद्वान्धयोः सर्वेस्वस्तिवाक्यपुरसरम् सवाला कामयंतोऽर्भकस्यायुः प्रार्थयन्तः सयोषितः सपुष्पाक्षतहस्ता सर्वे एकस्वरेण सू युस्त्रयं 30 स्वस्ति ॥॥ मन्त्र:-30 जननीसर्व सौख्यानांवद्धिनीकुलसम्पादाम् । साधनी सर्व सिद्धीनां जन्मदेवां नतावयम् । पुनः पिताप्रार्थयन-जननी सर्वभूतानां वालानांचविशे. पतः । नारायणि स्वरूपेण वालमेरक्षसर्वतः शक्तिस्त्वां सर्वदेवानां लोकानांहितकारिणि । मातृवद्रक्षमेघालं महापष्ठिनमोऽस्तुते। अमुं ममकुलोत्पन्नं रक्षत्वंदेवि पालकम् । पूजितासिमहाभागे चिरंजी चतुवालकी रक्षोभूतपिशाचेपु डाकिनीशाकिनीषु च ।मातेवरक्षमे वालंपन्नगश्वापदेषुच । त्वमेव वैष्णवीदेवी ब्रह्माणी च व्यवस्थिता रुद्रशक्ति समाख्याता महापष्टिनमोऽस्तुते । धात्रीत्वं कार्तिकेय स्य स्त्रीरूपामदनस्य च । स्वत्मसादविघ्नेनजिरंजीवतुमेसुतः ततो भूमौगोमयेनोपलिप्यमातुः सकाशाद्वालकमानाय्य वालकं यत्नेनतत्र निधाय पिता हस्तेनस्पृष्ट्वाऽथर्ववेदोक्तां रक्षापठेत् । कृत्यानां परिक्षार्थ तथा रक्षोभयस्य च । रक्षा कर्म करिष्यामि ब्रह्मातदनु मन्यताम् । नागः पिशाचागन्धर्चाः पितरोयक्षराक्षसाः पृथिव्यामन्तरिक्षेचयेचरन्तिनिशाचराः । विदिक्षदिक्षुयेचान्येया. न्तुत्वांतेनमस्कृताः । पान्तुत्वामृपयोब्रह्मादिव्याराजर्पयस्तथा। पर्वताश्चैवनयश्चतथासर्वेचसागराः। भग्नीरक्षतुतेजिह्वांप्राणा- रक्षन्तुवायवः । सोमोव्यानमपानन्तुपर्जन्यापरिरक्षतु । उदान- (४०) कर्मकारडरत्नाकरे, पष्ठीपूजपद्धतिः ॥ विद्युतःपान्तुसमानस्तनयित्नवः। वल्लभिस्तेषलपातुवाचंबाच- स्पतिस्तथा । कामतेपान्तुगन्धर्वाःसत्यमिन्द्रोऽभिरक्षतु । प्रजांच वरुणोराजासमुद्रोनाभिमण्डलम् । चतुःसूर्यादिशाश्रोत्रचन्द्रमा. वतुतेमनः । रेतस्तेपान्त्विमायोपोरोमाण्यौपधयस्तथा । अाकाश तेनिशापातुदेहंतवसुन्धरा । वैश्वानरस्तवगिरःपातुविष्णुःपरा क्रमम् । पौरूपंपुरपश्रेप्टोब्रह्मापातुभ्रवौतव । देहंदेहविशेषेणतयपातु- वसंधरा । एतैर्चेदात्मकर्मत्रैः कृत्वाव्याधिविनाशिनी । मयैवं कृत- रक्षस्त्वंदीर्घमायुरबाप्नहि । ब्रवीतुप्यस्तितेब्रह्माविष्णुरुद्रौनधै- वच । स्वस्तिवायुस्तथासूर्यः स्वस्तिदेवामहोरगाः । नारदश्चतथा- स्वस्ति कुर्वन्त्वायुःसदैवहि । इतिरक्षांपठित्वाजातकं वस्त्रभूपणा- दिभिर्विभूष्यस्वांकेनिधायसपत्नीकमाचार्यसम्पूज्यदक्षिणा संक- ल्पं विदध्यात-पदेत्यादिदेशकालौ, संकीर्त्यामुकराशिरमुको ऽहममुकराशेःकुमारस्य कन्याया वा करिष्यमाए पष्ठीमहोत्सव- कर्मणः साद्गुण्यार्थजातस्य दीर्घायुरारोग्यावाप्तयेपष्टीदेव्याः प्रीतयेचेमां दक्षिणाममुकगोत्रायसपत्नीकाय तुभ्यमहंदास्ये । ॐतत्सन्नमम । अद्यपूर्वोच्चारित अमुकोऽहंपूर्वपूजित देवतानां साद्गुण्यार्थ न्यूनातिरिक्तदोपपरिहाराय चेमांभूयसींदक्षिण नानानामगोत्रेभ्यो विप्रेभ्योनटनर्तकगायकेभ्योविभज्यचदास्ये । तथाचब्राह्मणान्भोजयिष्ये । ( कतिचिद्देशेषुपष्ठीदेव्या यामचतु- चतुष्टयपूजामपिकुर्वन्ति । धनुर्वाणेनपोटलिकायां राहुवेधनंचकुर्व- न्ति वस्त्रभूपणधारणकाले वालाकस्यनासरंध्रयोर्नस्यदत्वाछिका कारयन्तिलौकिकाप्रथैषा) ततःसूतिकागारे मुराहिकृतिनिर्गुडी वचाकुष्टंचसर्पपाः। विल्वपत्रमयोपः कुमारायुःप्रपोषकः । एवं- गवाज्येनसहधूपंकृत्वायजमानकुमारयोर्महानीराजनं विधाय वालकंमातुरंकेसमर्पयेत् । ततोद्वारप्रदेशेपूर्वोक्तछांगरक्षकाञ्चस्था- पयित्वाराबौजगरणकुर्यात् । प्रभातेजातेचोत्तरांगपूजनंविधाय देवान् विसृज्यमंगलतिलाकाशीर्वादादिकंच गृह्णीयात् । ततो ब्राह्मणेभ्योनटनर्तकादिभ्योदक्षिणापारितोपिकंचदद्यात् । इतिष० कर्मकाण्डपलाकर पष्ठीपूजापरिमापा । (४७१) अथनामकरण सूत्र व्याख्या। -CENT -- दशम्यामुत्थाप्य ब्राह्मणाम्भोजयित्वा पितानामकरोति।११ प्रसदिनमारभ्यदशम्या रव्या- मतीतायामेकादशेऽनि सूतकागृह रसूतिका-उत्याध्य भाद्धपतिकोण श्रीन वाहाणामोजपित्या पिता कुमारस्य नाम सज्ञां संयमहारार्थ-रोति 'अस्मिपि संस्कारे मिनुरेयोहममत का इति- ग्रहणादन्यत्रापि नियमोऽगम्यते । “मदनाने नारदीये'-सूना ते नामकर्म विवेयं स्वकुलो- चितं ॥ गोभिल सूत्रे ~(दाराने व्युष्टे नाम करणम्) याग्यवल्स्य:~श्रदयेर दशे नाम !! मदनरत्ने-द्वादशे दशमे वापि जन्मतोपि त्रयोदरी पोटपे विशतीचेव द्वाविंशे-वर्णत: मामात् ॥ कारिकायाम्-~-एक दरो द्वादरोका मासे पूर्ण मारे ॥ अष्टादशेऽहहि तथा यदत्यन्ये मनीपिणः शतराने व्यतीत वा पूर्ण संवत्सोवा ॥ "ज्योतिनियन्ये गर्ग:-प्रमाक्रति विश्वादौ सनिका- लेपि नाचरेत् ।। मुव्यफ ले नामकरणाशक्ती स्मृरोक्त कालम ह कारिकायां--मुख्यक'ले यदाना- भवेय कतै न शक्यते ।। उत्तानामन्यतमस्मिदिन स्यातु गुणान्नुते ॥ कश्यप.उक्तकाले-प्रकर्तव्या द्विजानामखिला किया. अतीते च कालेषु वर्तव्याश्चोत्तरायणे | सुरेन्येऽप्यमुरेज्ये वा न स्तगेन च वावे । शुभ लग्ने शुभारो च शुभेऽह शुभवासरे। चन्दतारा चलोपेते नैधनोदय वजिते । पूर्वाह्न क्षिप्र नक्षत्र चरस्थिरमृदूपु ॥ नानमङ्गल घे पैश्च रहस्यदक्षिण श्रुतौ । प्रयोजनं च यते नामाखिलस्य व्यवहार हेनुः शुभावह कमउभा यहेतु । नाम्नै कति लभते मनुष्यस्तन प्राप्त खजु नामम ॥ द्वरतर चतु'क्षरं का घोरदाय तरन्त थं दो मिनिटानं कृत कुर्मान्न ादितम्) । द्वेऽनरे यस्य द्वयनर चव - अक्षरण यस्य तचतुरनरमनयोरिकल्प । किंव घोपरदादि घोपवदानग्मादी यस्यतनाम्नस्तद्घोपवदादि । घोपवन्ति चाक्षराणि-- गघट । जमन । डण । दधन । वभमह । इयेतानि-अन्तान्तरमन्तमध्येऽन्तस्था यस्य तदन्तस्तस्यम् । अन्तस्था:-यवनाः । दो/- भिनिष्टन दीपमहस्वम् । अमिनिटानम्सनं यस्य तदीभिनिशनम् । कृतं कृरत्ययान्तं कुमारस्थ नामयं कुर्यत् । पक्षान्तरे कृतम् पितामहादि नान तत्कुत--- न तद्धितं तद्धित प्रत्ययान्त न कुत-अजाक्षरमक रास्त्रिय तद्वितम् । ३) स्विस नाम्नि सिंघमाह-अयुजाल मयुनानि विषमाथि मादित्यक्षरण यस्मिनाम्नि तदयुजाक्षरम् । याकारान्तमाकारोऽन्त यस्य तदाकारान्त तद्धित तद्वितप्रत्ययान्तं स्त्रिये स्त्रिया नाम कुयाँदित्यनुषंगा । (शमंत्राह्मणस्य वर्म क्षत्रियस्य गुप्तेति वैश्यस्य ४) ब्राह्मणस्य सिय पूर्वोक्त ल नगा ना ना ते शमति । तत्रियस्य वर्मति वैश्यस्य गुप्तेति पदम् । तदुक्तंशंखेन--कुलदेवता न तत्रादि मासचन्धं नाम पिता या बुाद. न्योऽपि वा कुलद । अत्रकेविन्-जन्मनाम तु गौपयेत् ॥ इति सरणाजन्मनक्षनगंवन्धिनाम .
(४७२) कर्मकाण्टरमाकरे नागपूजापतति । गुप्त सस्थाप्य व्यवहागर्थमन्य न म कुय दित्साहु । मासनामानि पशिष्टेनोक्तानि- कृष्णोऽनन्तो ऽन्युतश्चको वैकुगमोऽ। जन न उपे द्रो यज्ञपुरुषा वापुदवस्तथा हरि । योगीरा पुण्डरीकाक्षोमा- सनामान्यनुक्मात् । श्रन यथाच र चैन दिमार्गशोप दिवानम । इति नम० ज्याव्या ।। ० ॥ अथनामकरणपद्धति॥ अत्रपारस्करसूत्रमादौनिर्दिष्टम्-सूतकांन्ते नामकर्मविधेयमिति- नारदीये॥तत्रसुतकं दशाहमेव सर्ववर्णानां-लोकाचाराद् भवति । अत्रपचे सर्ववर्णानामेकादशेहनि-एवनामकर्मभवति । तस्येयं पद्धतिः । ततोनामकर्मदिनेसवालांसूतिकांसंस्नाप्याहतेवाससी परिधायपंचगव्येनाभिपिंच्यपावयित्याच सूतिकाग्रहाद्वालमा- तुरंके-उत्थाप्याग्रतः पंचवाद्यपुरः सरंजलपूर्णकुंभं सौभाग्य- वत्यावाकन्यायाः शिरसिधृत्वावालपूजास्थलेथानीय ततःपितावा न्याकार्यकर्तापूर्वोक्तक्रमेणगणेशादि पंचागदेवतानांपूजनंकुर्यात। संकल्पः अद्यत्यादि अमुकशर्मा ममास्य जातस्य पुत्रस्य पौत्रस्य वा वीजगर्भसमुद्भवैनो निवर्हणाय करिष्यमाणनामकर्मकर्मणि निर्विघ्नतासिध्द्यर्थ गणेशादि पंचाग देवतानां पूजनं करिष्ये । इतिपूजयित्वा-ततोहोमकर्मवेदींविधायाचार्यवरणम्-अद्येत्यादि० अमुकोऽहममुकगशेः पुत्रस्य कन्याया वा करिष्यमाण नामकरण फर्मणि कर्मकर्तुमाचार्यत्वेनत्वामहंवृणे-संप्रार्थ्यचकुशकण्डिका विधिंकुर्यात्--त्रिभिःकुशर्हस्तमात्रमिताभूमिपरिसमुहागोमयो- दकेनउपलिप्यस्फेनवास्रवेणोदकसंस्थाः स्थण्डिलप्रमाणास्तिस्रो- रेखाः कृत्वाअनामिकांगुष्ठाभ्यां लेखाभ्यः पांशूनुध्दृत्यमणिको अद्भिरभिषिच्यतेजसे पात्रेऽग्निमात्माभिमुखंस्थापयित्वा-अग्ने- दक्षिणतोब्रह्मासनमास्तीर्यकुशस्तीर्वावरणद्रव्यंब्राह्मणंचसम्पूज्य अयेहकर्त्तव्यनामकरणाख्य संस्कारकर्मणि प्रायश्चित्ताख्यपंचग व्यहोमेब्रह्मकर्मकर्नु मेभिवरणद्रव्यमत्वेनत्वामहंवृणे-इतित्रया- कृत्वासंमायच । वृतोऽस्मीतिप्रत्युक्तिः। यथाविहितंकर्मकुरु, कर्मकाएरक्षाकरे, गायक पूजापतिः॥ (४७३ ) करवाणितिब्रह्माब्यात- ततोऽग्ने प्रदक्षिणांविधाय कल्पिताश- नेउपवेशयित्वाकर्मकुरु, कवाणीतित्रामा प्रत्युक्तिः । तत्रतदंग- सया त्रीब्राह्मणाम्भोजयिष्येऽथवाभोजनपर्याप्तमामान्नवातन्नि- पक्रयीभूतंद्रव्यदास्ये- ततःप्रणीतापानंपुरतः कृत्वाद्भिरापूर्य- कुशराच्छाद्याग्नेरुत्तरतः कुशोपरिनिदध्यात्।। वहिमष्ठिमादाये- शानादिप्रागाहरुदक्संस्थमग्ने परिस्तरणकृत्वाश्रग्नेः पश्चिमतः पवित्रछेदनानित्रीणिकुशतरूणि पवित्र करणार्थसाग्रमनन्तगर्भटे- कुशतमणे, मोक्षणीपात्रम्, प्राज्यस्थाली, पंचगव्यपात्रम्, सम्मा जनकुशास्त्रयः, उपयमनकुशासप्तः, प्रादेशमितपालाशसमिध- स्तिस्रः, स्त्रयः, याज्यं, पूर्णपात्रम्, क्रमेणैतान्यासदनीयानि यथापूर्वम् । ततापवित्रच्छेदनकुशद्वैपवित्रेछित्वा प्रोक्षणीपात्रं- प्रणितासन्निधौनिधाय प्रणीतोदकेना युत्य पवित्राभ्यांप्रणीतो' दकमुत्पूय पवित्रेमोक्षणीपुनिधाय दक्षिणेनहस्तेनप्रोक्षणीपात्र. भुत्थाप्य सव्येकरेधृत्वा तदुदकं मध्यमानामिकाभ्यांमध्यपर्वाभ्या मुच्चाल्य प्रणीतोदकेन पुनःप्रोयचाज्यस्थाल्यादीनि पूर्णपात्र- पर्यन्तानिवस्तृनिमोक्षणीजलेन क्रमेणैकैकशः पवित्राभ्यांसपोदय प्रणीतारन्योरन्तरालेपोक्षणीपात्रेनिदध्यात । तत्राज्यस्थाल्या- माज्यनिरूप्यतत्रैवाग्नौाज्यं ब्रह्माधिश्रयति तत्रज्वलदुल्मुकंप्र- दक्षिणमाज्यस्य समन्ताभ्रामयित्वादक्षिणेनहस्तेनपांचमधोमुख- श्रुवमग्नौ तापयित्वा सव्ये पाणकृत्वादक्षिणेनहस्तेनसम्मार्जन कुशाग्रैर्मूलतोऽनपर्यन्तंमूलैरनमारभ्याधस्थान्मूलपर्यन्तंप्रणीतोदके नाभिषिच्यपुनःप्रतप्यदक्षिणतोनिदध्यात् । प्राज्यमुत्थाप्यतत्रा- ज्यमग्नेः पश्चादानीयपूर्वपवित्राभ्यामुत्पूय-अवेक्ष्यचतस्मादपद्र- व्यनिरसनंकृत्वा पवित्राभ्यांप्रोक्षणीश्चपूर्ववदुत्पूय-उपयमन- कुशानादाय सत्येकृत्वासमिधोऽभ्याधायोतिष्टन तिनोधृतात्ताः समिधस्तूपणीमग्नौप्रक्षिपेत् । ततःसपवित्रेणमोक्षण्युदकेनदक्षिण मुलकेनाग्निमीशानादि-उतरपर्यन्तंसम्मोत्यपवित्रेप्रणितायांनि- दध्यात् । संम्रवधारणाप्रोक्षणीपापणीतारन्योरन्तरालेनिद- ६० (४७४) • कमफारारानावरे नामवर्णपूजा द्धिति 3 ध्यात् । इनिपर्युक्षणान्तकर्मसमाप्यपूर्वोक्तविधिनापंचगव्यंकृत्वा (अत्रबहुषुपुस्तके नामकरणकर्मणिपार्थिवाग्नेःपूजनमस्ति) पार्थि- वोनामकरणे) विधानपरिजातोक्तत्वात) परंचपारस्कराचार्यण- नामकर्मणिहोमानुदेशात । कतमोऽग्निाहा इतिद्वेधीभूतेकित्वत्र सूतिकाशुद्धयर्थ पूर्वाचा:पञ्चगव्य पानंहोमचैवविहितं-इत्याकां. क्षायां कस्याग्नेःस्थापनंपूजनंचयथेष्ठम् । इति । (अनपंचगव्य. होमपानयोस्तुसूतिकायाःप्रायश्चित्त शुद्धयर्थनिमितकविधिरस्तु (प्रायश्चितेविधिश्चैव) इतिवचनात् । अत्रविधिनामाग्नेरावाहनं पूजनंचयथेष्टंनतुपार्थिवाग्नेः॥ विहांसोविचारयन्तु) भूर्भवः स्वः, विधिनामारने-इहागच्छेहतिष्टसुप्रतिष्टितोयरदोभव ॥ ॐ तवेवाग्नि स्तदादित्यस्तद्वायुस्तदुचन्द्रमाः । तदेवशुक्रतद्ब्रह्मताऽ. आपासप्रजापतिः ॥ विधिनामाग्नयेनमः । इतिमन्त्रेणपाद्या- दिनीराजनान्तंसम्पूज्य दक्षिणजान्वाकुंच्यब्रह्मणान्वारब्धोजुहु यात् । 30 प्रजापतयेस्वाहा, इदंप्रजपतयेनमम । मनसा-30 इन्द्रायस्वाहा-इदमिन्द्राय० । 30 अग्नयेस्वाहा-इदमग्नये० । 30 सोमायस्वाहा-इदंसोमाय० । इत्याचारावाज्यभागौचहुत्वा- अन्वारं त्यक्त्वा सप्ताधिककुशपिंजूलिना पंचगव्यहोमकुर्यात् । तन्मन्त्रा:-30 इरोवतीत्यस्य वसिष्ठपिस्त्रिष्टुप्छन्दो विष्णु देवतापंचगव्यहोमे विनियोगः। 30 इरावतीधेनुमतीहि भृतम् सूयवसिनीमनवेदशस्या। व्यस्कनारोदसी विष्णवेतेदाधत पृथि- थीमभितोमयूरवैःस्वाहा । इदंविष्णवेनमम । इदंविषणुरित्यस्य मेधातिधिपिर्गायत्रीछन्दो विष्णुर्देवतापंचगव्यहोमेविनियोगः। ॐ इदंविष्णुर्विचक्रमेत्रेधानिदधेपदम् । समूढमस्यपासुरेस्वाहा । इदंविष्णवेनमम । ॐ मानस्तोकेइत्यस्यपरमेष्ठीमृषिजगतीछन्दो रुद्रोदेवता पंचगव्यहोमे विनियोगः । ॐ मानस्तोके तनयेमान ऽआयुपिमानो गोपुमानोऽअश्वेपुरीरिपःमानो वीरान्द्रभामि नोवधीविष्मन्तः सदमित्वाहवामहे स्वाहा । इदमद्रायनममः। अन्नप्रणीतोदकं वालकस्योपर्यपिअभिपिंचयेत् । ॐ शन्नोदेवी- कर्मकाण्डरत्नाकर नामकर्णपूजापद्धतिः । (४७) रित्यस्यदध्यङ्गाधर्वण ऋपिर्गायत्रीछन्दः सवितादेता पंगव्यहों में विनियोगः। 30 शन्नोदेवीरभिष्टयऽप्रापोभवन्तुपीतये । संय्यो रभिश्रवन्तुनः स्वाहा इदमद्भ्योनमम । ॐ तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्र ऋषिर्गायत्रीछन्दः सवितादेता पंचगव्यहोमे विनि- योगः । ॐ भूर्भुवःस्वः, तत्सवितु० स्याहा । इदंसवित्रनमम । ॐ प्रजापतेनत्वेत्यस्य हिरण्यगर्भ ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः प्रजापति देवतापंचगव्यहोमे विनियोगः। 30 प्रजापतेनत्वदेतान्यन्यो- विश्यारूपाणिपरितावभूव । यत्कामास्तेजुहुगस्तन्नोऽस्तुब्धय ॐस्यामपतयोरयीणा स्वाहा । इदंप्रजापतयेनमम । इतिपंचगव्य होमंकृत्वा ब्राह्मणान्वारब्धंभरादिनचाहुतिपर्यन्तंजुहुयात् । 30 भूरादिव्याहृतीनां प्रजापतिर्थ पिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दांसि- अग्निवायुसूर्यादेवताःप्रायश्चित्तहोमे विनियोगः । ॐ भूःस्वाहा इदमग्नयेनमम । 30 भुवःस्वाहा इदंवायवे 30 स्वास्वाहा इदं सूर्याय०i 30 त्वन्नोअग्ने इतिवामदेवऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्नि- चरणौ देवतेप्रायश्चित्तहोमे निनियोगः। 30 वन्नोअग्नेश्वरण- स्थविद्वान्देवस्यहेडोऽअवयासिसीष्ठाः । यजिष्टोवन्हितमः शोशु. चानोविश्वाद्वेषासिप्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्नीवरुणाभ्यां नमम { 30 सत्वन्नोऽअग्ने इतिवामदेवऋषि त्रिष्टुप्छन्दोऽग्नि- देवताप्रायश्चित्तहोमेचिनि० 1 30 सत्वन्नोऽअग्नेऽयवमोभवोसी नेदिष्टोऽअस्थाऽउपसौ ब्युष्टौ । अवययनोव्वरुप रराणो वीहिमृडीकसहयोनऽधिस्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम ।। ॐ अयाश्चाग्नेऽइति प्रजापतिबंपि धिराट् छन्दोऽग्निर्देवता प्राय- श्चित्त होमेविनियोगः । ॐ अयाश्चाग्नेऽस्य नभिशस्तिपारच सत्यमित्व मयाऽसि । अयानो यज्ञं वहास्ययानोधेहि भेपज स्वाहा इदमग्नये नमम । 30 येतेशतमिति शुनः शेफ पि त्रिष्टुप्छन्दो वरुणः सविता विष्णु विश्वेदेवामन्तः स्खश्चिदेवाः सर्व प्रायश्चित्त होमेविनियोगः। ॐ येते शतंवरूण येसहस्र यज्ञियाः पाशा वितता महान्तः । तेभिर्ना अद्यसवितोत विष्णु- (४७६) कर्मकाण्डरत्नावरे नामार्ण पूजापद्धतिः । विश्वेमचन्तुमस्तः स्वर्काः स्वाहा:-इदं वरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्योदेवेभ्यो मम्भ्यः स्वर्केभ्यश्च नमम । ॐ उदुत्तममिति शुनः शेफ ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दो वरुणो देवता प्रायश्चित्तहोमेविनि- योगः। ॐ उदुत्तमं वरुणपाश मस्मदवा धर्म विमध्यमश्र थाय। अधाव्ययमादित्य व्रतेतवा नागसोऽअदितये स्याम-स्वाहा- इदं वरणादित्याभ्यां नमम । इत्यन्चारब्धं कृत्वापंचगव्यमिश्रितेन घृतेन स्विष्ट कृद्धोभं कुर्यात् । ॐ प्रजापतये स्वाहा-इदं प्रजापतये नमम । 30 अग्नयेस्विष्टकृतेस्वाहा इदमग्नयेस्विष्टकृतेनमम । ततः संस्रव प्राश्याचम्य अद्यत्यादि. अमुकोऽह ममुकराशेर्यालकस्य नामकरण निमित्तक होमकर्मणः सांगपलायाप्तये इदं पूर्णपात्रं- प्रजापतिदैवतममुक शर्मणे ब्रह्मणे तुभ्यमहं सम्प्रददे । 30 तत्स- नमम ॥ ॐ स्वस्तीति ब्रह्मा स्यात् । ॐ सुमित्रियान मंत्रस्य दध्यंगाथर्वणऋपी रापो देवता नृच्यत्प्राजापत्या गयत्री छन्दः शिरः प्रोक्षण प्रणीता विमोके विनियोगः। 30 सुमित्रियानऽ- श्रापऽऔषधयः सन्तु । इतिपविताभ्यां प्रणीता जलेन शिरः संमोक्ष्य । ॐ दुर्मित्रियारतस्मैसन्तु योस्मान्द्वेष्टियं च वयंद्विप्मः॥ इति प्रणीता जलं ईशान्यां विमोकं कुर्यात् । ॐ देवागात्विति अत्रि ऋपि रुणिक्छन्दो मनसस्पतिर्देवता वहि होमे विनि योगः । ॐ देवा गातु विदो गात विवागातुमित मनस्पत इम देव यज्ञस्वाहा पातेधाः स्वाहा इति वहि हामः पूर्णाहुतिस्तु न भवति । ततो हुतशेष पंचगव्यं सूतिकायै पावयित्वा, मृतिका गृहं च तेनैव पंचगव्येन शुद्धयर्थ संप्रोक्ष्य, ततः सूतिकां तत्रा नयति सा च चालकमकेकृत्वा अग्नेः प्रदक्षिणां कृत्वा भामे उपविशेत् । श्राचम्य गणेशादीन्नमस्कृत्य पुष्पांजलिदत्वा ततः संलग्ने-आचार्यों वा कुमारस्य जनकः पूर्वोक्त प्रकारेण पंचना- मानि-अष्टगन्ध द्रव्येणाश्वत्थपत्रेषु वा श्वेतवस्त्रे वक्ष्यमाण प्रमा णेन सुवर्णसलाकया लिखेत । (प्रमाणानिसूत्रव्याख्या निर्दि- टानि ) तदनुसारादादौ कुलदेवता संवन्धं प्रथम नाम यथा कर्मकाएरलॉकर मानकर्णपूजापद्धति (2) .. "वदरीशदत्त शर्मा" ? द्वितीयं जन्ममास देवताक संवन्धं नाम यथा वा तन्मासनामवत् यथा “माधवानन्द शर्मा चैत्रादिः" तृतीयं नाक्षत्र नाम "अमरदेव शर्मा" चतुर्थ नाम घोपवदादीति गृहासूबानुसारतो हकार वर्ग तृतीयचतुर्थ यरलय मध्यं चतुरक्षर तद्धितान्तरहितं कृदन्तान्त-यथा “जीवानन्द शर्मा" पंचम नाम स्वकुलानुसाराव्यावहारिक कुर्यात्-यथा “रामकृष्ण शर्मा”। एवं पंच नामानि चालकस्य लिखित्वातंडुलपूर्ण पात्रेनिधाय-30 एतन्ते० ॥ ॐ भूर्भवः स्वः, वालकस्य नामानि सुप्रतिष्ठितानि भवन्तु-इतिप्रतिष्ठाप्य । ततः आदित्यादि नवग्रहाणां सर्वपां दानानि क्रमशः कुर्यात् । ततो लग्न दानानि कृत्वा ततो लिखित नामानि सद्रव्यं शंख मध्ये धृत्वा स्वेष्टदेवं प्रणम्य “पिता स्वयं घा श्राचार्य: श्रावयेत् । ततः शरवस्व मुखे कृत्वा चालकस्य दक्षिण कर्णसमीपे शंखाग्रभाग नीत्वा तद्रंध्रद्वाराभो कुमार ? त्वं अमुक शर्मा, अमुक धर्मा, अमुक गुप्त इति नामासि दीर्घायुभव ततो नामकर्ता नाम श्रावयित्वा ब्राह्मणान्प्रतिव्यात् । भो ब्राह्मणाः? अमुकनामायं भवन्तोऽभिवादयते । आयुष्मान्भव-अमुक । इति ब्राह्मणा वदेयुः। इति प्रमेण पंचनामानि श्रावयेत् । शर्मान्तं विप्रस्य धर्मान्तं क्षत्रियस्थ, गुप्तान्तं वैश्यस्य । दासान्तं शूद्रस्य नाम कुर्यात् । कुमार्यापि नामकरणं-आकारान्त विपमाक्षर- श्रुतं तद्धितान्तं नामसमन्त्रकं कुर्यात् । तत प्राचार्याय दक्षिणा- दानम् अधेत्यादि-अमुकराशे रमुकवालकस्य वैजिक गाभिक, दुरितोपशान्तये नाम कर्माख्य संस्कार कर्मणः साद् गुण्यार्थ माचार्यायेमा दक्षिणां तथा च न्यूनातिरिक्त दोपपरिहारार्थ नाना नामगोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो नटनर्तक गायकादिभ्यश्च विभज्य दास्ये । ॐ तत्सन्नमम । तथा च ब्राह्मणान्मोजयिष्ये । ततोऽग्ने मत्तरांग पूजनं कृत्वा यायुपं कृत्वा स्थापित्तदेवना अग्निं च चिसृज्य कलशजलेन मंत्राभिपेकादिकं कुर्यात् ।। इति नाम- करण पद्धतिः।
(४७) कर्मकाण्डरत्नाकरे, समारोहणानिष्क्रमणापद्धतिः ॥ अथ खट्वारोहणम् । इदानीमेव नामकरणोत्तरं । खट्वारोहस्तु कर्तव्यो दशमे द्वादशेऽपिवा । इतिप्रयोगपारिजातके ज्योतिनिवन्धे । आन्दोला शयेनपंसो द्वादशे दिवसे शुभः । त्रयोदशस्तु कन्यायो न नक्षत्र विचारणा । गदाधर पारस्करसूत्र द्वितीय भाष्य कारेणनामकरण दिने पोडपदिने द्वानिश दिनेऽपि ज्योतिर्विदादिष्टेमुहुर्तेऽप्युक्तः । ततः स्वेष्ट देवता समीपंगत्वा शिशुं प्रणामयित्वा उपायनं समर्घ्य ततो हरिद्रारंजित पर्यंक समीपे शिशुमानीयमाता वा सौभाग्य वती स्त्री रस्तेपुप्पं निधायशेपशायिनंप्रार्थयेत् । शेष शायि न्यथा शेषशय्यायां सुग्वितोसित्यम् । तथायं मम चालोऽपि शय्यायां सुग्वमाप्नुयात् । इत्युक्त्वा वालकंपूर्व शिरसं शय्यायां संस्थाप्य यशोदां प्रार्थयेन्-मातर्यगोदेहि त्वया श्रीकृष्णपरि रक्षितः । तथा त्वंमम चालं च सर्वदा रक्ष दुःस्वतः । इतिग्वट्वां चालयेन् । इनिग्वदगारोहणम्- अथ निकमणसूत्रव्यारया- (चतुर्थेमासि निष्कमणिका श) कुमारस्य जन्मचतुर्भमासि निग्मामणिका गृहाहहिनिम्नमणं करोति पिता -(सूर्यमुदीक्षय- नितम्चनुरिनि ) श्रयतच्चक्षुर्देवहितम्, इत्यादिनाभृयश्चशरदः शानात् । इत्यन्तेनमंत्रेण सूर्यभगवन्तं रश्मिमालिनमुदीनयति फुमारंप्रदर्शयति पिता । ज्योनिनिवन्धे-तृतीयेवा चतृवो मासि निष्क्रमणंभवेत् । ततस्तृतीयेश्य मासिमर्थस्यदर्शनम् । विष्णु- भात्तरे संस्कारप्रकरणे-मासे चतुर्थफर्तव्यं शिशोनिष्क्रमणगृहात् । विगीयानां दिशांनय तथाचन्द्रार्फयोहितः। पूजनंबासुदेवस्य गग. नस्य प कारयेत् ॥ भविष्योतर-द्वादगेऽहनिराजेन्द्र शिशोनिया- मांगृान् । त्यादि बहुमतसम्मत्यापकृप्य विशेषतः शीतन्यास देशेपु प्रायः समानाराच्गनामार्म दिवसएयसूर्यायलोकनं पान रन्नीनिदेशागारादि यदुमतसम्मतिः ।
- यार्मकायडरलावर सूर्यावलोकन निकमणपद्धतिः। (४७६) अथ सूर्यावलोकननिष्क्रमणपतिः ततो नाम कर्मदिनेवा चतुर्थेमासि चन्द्रतारानुकूले दिनेऽलंक- तंशिशुसूतिकां च सूर्यमुदीक्षयति । तत्रादौगृहांगणे पूर्वस्यां दिशि भूमौगोमयेनोपलिप्य तत्र यवैस्तडुलैर्वाऽष्टदल कमलविलिख्य सिन्दरेण पूर्य ततः गंधपुष्पाक्षत धूपदीप नैवेद्यादि पूजासामग्री च सम्पाय, स्वासन उपविश्याचम्यप्राणायामत्रयं विधाय पिता ऽन्यो वा संकल्पं कुर्यात् । अयेत्यादि० अमुकशाहममुकराशेर- मुकशर्मणो ऽस्यवालकस्य करिष्यमाण गृहान्निष्क्रमणकर्मणि सूर्यावलोकन विधौसर्वारिष्टनिवृत्तये कलशे दिगीशानां दिशांच- न्द्रस्पसूर्यस्य वासुदेवस्य गगनस्य च पूर्वागतया पूजनंकरिष्य । तत्रादावष्टदले कलशपूजोक्त विधिना कलश संस्थाप्य सम्पूज्य च ध्यायेत् । श्रागच्छन्तुमहाभागादिगीशाद्यादिवौकसः। समाविशन्तु कलशेरक्षार्थ वालकस्यमे । 30 एतन्ते. 30 भूभूवः स्वः, दिगी- शादि गगनपर्यन्तादेवताः अस्मिन्कलशं समागच्छन्तु तिष्ठन्तुसु प्रतिष्टिना वरदाभवन्तु, इतिप्रतिष्ठाय । अक्षतैः कलशेवक्ष्यमाण नाममन्त्रैः-30दिगिशेभ्योनमः दिग्भ्योनमः ॥ चन्द्रायनमः ॐ सूर्यायनमः ॐ वासुदेवायनमः । 30 गगनाथनमः । इत्या- चाहापाद्यादिभिः सम्पूज्य च प्रार्थयेन-अपमत्तंप्रमत्तं वा दिवारा बमथापि वा रक्षन्तुसततं सर्वेदेवाः शक्रपुरोगमा । इति संप्रार्थ्य अथ च शश्वघटादि नादपूर्वकं शान्तिपाठपूर्वक वालकमातुः क्रोडे. धृत्वा वहिरानीयसूर्य भगवन्तंपूजयेत् मूतिकार्याचमनंकरयित्वा ताम्रपानेरक्तचन्दनेन सूर्यविम्बं लिखित्वाऽग्रेसंस्थाप्य सजलदुग्ध मर्धार्थपुटकेनिधाय | संकल्प:-अद्येत्यादि० अमुकराशे रमुंकवाल- स्य वैजिकगाभिक दोपोपशान्तये श्रादित्यस्य पूजनंकरिष्ये । ध्या नम् 30 पद्मासनः पद्मकरोद्विवाहुः पद्मघुतिः सप्ततुरंगवाहः । दिवाकरोलोकगुरुः किरीटीमयिप्रसादं विदधातुदेवः । प्राकृ. प्णेनरजसावर्तमानो विवेशयन्नमृतं मर्त्य च हिरण्ययेन सविता , ..
(१०) कर्मकाय दरक्षाकरे सूर्यावलोकन निप्पणपतिः। -- रथेनदेवोयाति भुवनानिपश्यन् । इनिमन्त्रेण वा 0 सूर्यायनमः अनेन च पाद्यदिनीराजनान्तं सऽपूज्य सफलजलयुतं दुग्धमजलौ. पूरयित्वा 30 एहिसूर्य सहस्त्रांशोतेजोराशेजगत्पते । अनुकम्पयमां भक्त्या पहाणार्घ्य दिवाकर । इति वारत्रयमयंदत्वा सूर्यप्रदर्श येत् ॐ तच्चक्षुरितिदध्यङ्ङाथर्वण ऋपिरुष्णिक्छन्दः सूर्योदेवता सूर्योदीक्षणे विनियोगः। ॐ तचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक मुचरन् । पश्येमशरदः शतंजीवेमशरदः शत ई० शृणुयामशरदः शतं प्रव्रवाम शरदः शतमदीनाः स्यामशरदः शतंभूयश्चशरदः शतात् । इति मन्त्रेणवालक सूर्यप्रदयप्रार्थयेत् 30 हरितयरथंदिवाकरंकनक मयाम्वुजरेणुपिजरम् । प्रतिदिनमुदये नवनवंशरणमुपैमि हिरण्य रेतसम् । दक्षिणासंकल्पः-अग्रेत्यादि संकीर्त्यामुकराशेरमुकवाल' स्य कृतस्यनिष्क्रमणारब्ध संस्कारकर्मणःसूर्यावलोकनस्यच सांग तासिद्धयर्थमिदंद्रव्यं अमुकशर्मणे प्राचार्यायदास्ये । यथासंख्य- कान् विप्रांश्च भोजयिष्ये ततःकलशजलेन ससृतिका वालकमभि पिंच्यतिलकंकृत्वाशीर्वादंदद्यात् । इति सूर्यावलोकन निष्क्रमण पद्धतिः अथ सूतिका जल पूजाकर्म-अथ च नामकर्मोत्तरेऽपिमूति- कायादैवे पित्रेकर्मणिनाधिकारः । धर्मसिन्धुसारे-अथ मूतिका- शुद्धिःदशाहान्तमोतकाया अस्पृश्यत्वनिवृति मकर्मजातकर्मादि प्राप्तकर्माधिकारश्च । जातष्टेि विवाहोपनयनादिकर्मसुतु पुत्रप्र. सूतानांविंशतिरात्रान्तेऽधिकारः । कन्यापसूनां मासान्तेऽधिकारः उक्तंच मुहुर्तचिन्तामणौ--कवीज्यास्त चैत्राधिमासेनपोपेजलंपूज- येत्सूतिकामासपूतौ । वुधेद्विज्यवारे विरिक्ततिथौहिचादतींवर्क नैर्ऋत्यमैत्रः । इति । अथ जलपूजा सूतिका कर्म पद्धतिः अध च मूतिका जलपूजनं पुत्रप्रसववत्या एकविंशति दिनादा • राभ्य कन्याजनन्यामोसोत्तरपूर्वोक्त चन्द्रतारानुकुलसद्वासरे जल पूजा कर्तव्या ततः प्रातर्जल पूजार्थिनी संस्नाप्य पंचगव्यमभि- पिंच्यपंचवारं चुलुकेनपावयित्वा चगणेश पूजास्थलमागत्याचम्या फर्मकाएटरमारे शन्नप्राशनसूनच्यारया। (४१) रक्षां विधाय 30 अद्येत्यादि० देशकालौ संकीर्खामुकराशिरमुकी नाम्नीदेव्यहममुकाराशेर्वालकस्य वैजिक गाभिक दुरितोपशान्न- ये श्रात्मनः समस्त देवपिनादि कर्माधिकार प्राप्तये गणेशादि जलमात्त्राणां पूजनमहं करिष्ये - ततोगणेशं सम्पूज्य कलश पू जोक्त विधिना कलशं संस्थाप्य तत्रजल मात्रः, श्रावाहयेत्-ॐ श्रावाहयामि देवेशीजलमात्त्रः सुमंगलाः। प्रायुसनानदात्मा श्च पूजार्थ स्थापयाम्यहम् ।। एतन्ते। ॐ भूर्भुवास्वः, मत्स्यादि सप्तजलमातर इहागच्छन्तु सुप्रतिष्टिता वरदाभवन्तु । इति प्रति- ष्ठाप्य वक्ष्यमाण नाममत्रैःपूजयेत् - अमत्स्गनमः । कृम्य- नमः । ॐवाराहानमः। कुक्कुट्यैनमः। अमण्डूक्यैनमः । जलूक्यैनमः । सोमायनमः । इतिसम्पूज्य नैवेद्यनिवेदयित्वा दक्षिणांसमय (कतिचित्प्रदेशेषु जलपूजनं नद्यादौजलाशये चा कुर्वन्तिसमाचारात्कुर्यात) ततःप्रार्थयेत् - अनमस्तेभ्योजलेशि- भ्योमातृभ्यश्चनमाम्यहम् । दीर्घायुपंप्रयच्छन्तु जातकायशुभाय मे । इतिसम्प्रार्यसूतिकागृह शुद्धयर्थतत्रगृहेमादेशमात्र स्थंडिल कृत्यापंचभूसंस्कार पूर्वकमग्निसंस्थाप्य नवग्रहमन्त्रैयथा संख्यक हुत्वा तत्रसूतिका तिलपात्रंकृत्वा न्यायुपंकृत्वा कलशजलेनाभि- पेकंकृत्वा मंत्राशिदद्यात् । ततोब्राह्मणभोजयित्वा दक्षिणांदत्वा च यथासुखविहरेत् । इति सूतिकाजल पूजापद्धतिः अथ दुग्धपानम्-एकत्रिशदिनेचैवपयाशंखेनपाययेत् । अन्न- प्राशन नक्षत्रे दिवसोदयराशिपु । अथ दुग्धपानपद्धतिः ॥ अथ चैकत्रिशदिने कुमारस्य कन्याया वा जन्म दिवसगणनयाविना चन्द्रतारानुकूलेऽपिस्वेष्ट देवतां सम्पूज्य शर्करायुतं दुग्धं शंखे संस्थाप्य-30 आपायस्व समेतुते विश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवा- व्वाजस्यसंगथे । इति मन्त्रण सोमन्ध्यायन्नभिमन्त्रयित्वा माता अन्या चा सुभगा शचनन वालकं पाधयेत् । अन्यस्मिन्दिनेऽपि- अन्नप्राशनोक्तनक्षत्रचन्द्रतारानुकूलेऽन्हि-अनेनैव विधानापायये।
(२) धर्मवायरलवर अन्नप्राशास्त्रव्यागया। अथ-अन्नप्राशनसूत्रव्याख्या (पष्ठे मामेऽन्नप्राशनम् 1१) जन्मत पट मारी युमारस्यानप्राशन धर्मयुर | नारद ---जन्मतोमासि पर स्यात्मारणामाशन पम् । तदभवे एम्मागि नवगे दरमऽपिया। द्वादशवासि युति प्रथमानाशन परम् । सम्प गो वा गम्पूर्ण पेचिमिचिति परिता । प'वाय- ध्मे मासि पुम्सा मीणा तु पश्चगे। सप्तमे मामि वा पाय नाममा शुभम् । रिको दिनक्षयनी द्वादशोमएमीममाम् । सरत्या यतिथय पोका गिननीयज्ञपमा । चन्द्रवार प्रशमति कृष्ण था- न्त्यत्रिक विना । श्रीधर-श्रादित्य तिष्यक्सुमाग्य करानिलारिप रिभान विष्णु परणात्तरपण- मिना । बालाप्रभोजनविधौ दशमे पिशुखे। विरेपो मुहर्त अन्धेपु हटव्य ।(स्थालीपा थापयित्वाऽऽज्यभागाविया ज्याहुतिर्जुहोति देवी पाचमउनयन्त देवास्ता विश्व रूपा पशनोवदन्ति शानोमन्द्रेप भूजं दुहानाधेनुर्यागमानुपसुष्टु ते तु स्वाति । घाजिनो अति च द्वितीयायाम् । २) अन्नप्राशनस्यति कर्तव्यत। विशेपमाह-स्थानीपाक चर वयाविधि अपयित्वा अ धारावभ्यभागी हुवा द्वे-प्राति जुहोति ।। दयों वाचमिताधिया जोनो प्रतिच द्वितीयाम् । इत्यन्त सूत्र-प्राज्येन — देवीं वाच, इत्यादि क्या-एकामातुर्ति जुयात् । इद याचे इति त्याग विधाय चकारापुनदेवी पचमित्येतरयान्ते वाजोन । रथ देवी वचमिति वाजिनो प्रथेति च द्वाभ्याम्भ्या द्वितीयामाज्या ति हुत्वा 'इद याचे याज य च,, इति त्याग कुर्यात् ॥२॥( स्थालीपारस्य जुहोति प्राणेनानिमशीय स्वाहाऽऽपानेन गन्धा- शीय स्वाहा, चक्षपा रूपाण्यशीय स्वाहा श्रोत्रेण यशोशीय स्वाहेति ।३।) स्थालीप वस्य चरो प्राऐनानमशीयेत्यादिभिश्चतुमि प्रश्वतख पाती हाति । ३ । ( शना ते सर्वासान्सर्वमन्नमेकतोदृत्वाथैन प्राशयेन् । तृणीमहन्तेति था हन्तकार मनुष्या इति श्रुत । ४) तत स्विष्ठ कृदादि प्रशनन्त विध य माविमानस्तुमधुरतितकषायादीन् सर्वमन्न भरभोज्यलयपेयचोष्यादि एकत एकस्मिन् पत्रे-रत्येकीकृत्याथान तामन कुमार प्रा शयेत् । तूष्णीं मन्नहित हत इति वति मत्रेण कुत , ह तकार मनुष्या इतिते । हतकार मनुष्या उजोति-इति श्रवणत । 'मार्कण्डेय -देवत पुरतरतस्य धान्युत्सगगतस्य च । मल कृतस्य दतव्यमन प न स कांचनम् । (भारद्वाजामाण्सेन वाक् प्रसारकामस्य ५) (कपि जलमा सेनानद्यकामस्य ६) ( भत्स्यै निकामस्य ७ ) ( कृपायाऽना- युष्कामस्य ) श्रार्या ब्रह्मयचस कामस्य ६ ) (सौ सयकामस्य १०) भरद्वा ज्या पक्षिगया मासेन कुमारस्य प्रारन कारयितव्यम् । यदीय कामना भवति । अय कुमारो वग्मी स्यादिति कामयेत् । यदि छमारोऽन्नाद स्यादिति कामयेत्तदा लपिंजलमाश प्राशयत् । कपिंजल - कर्मकाण्डरत्नाकर अन्नप्राशनकर्मपद्धतिः। (४८३ फरंडयो मयूरः फैचितितिरी पैति । यदि कुमारीऽयं जवनः शीघ्रगामीरयातदा ययालब्धं मस्या- प्राशयेत् । स यदि कुमारो दी युः स्यादिति कामयेता पृकपायाः माश प्राशयेत् । यदि कुमारो ब्रह्मवर्चस्वी स्यादिति कामयेत्तदा-पाटया: मा प्राशयेत् यदि वाक्प्रसारादीनि चहावर्चसान्तानि सर्वकामान्कायेत् सर्वणि पूर्णकानिमासानि क्रमेण प्राशयेत् । एकीतल ना प्राशयेदिति भर्तृ यज्ञः ४ । १. 1 (अन्नपर्याय वा ततो चाह्मण भोजनमानमयोय वा ततो ग्राह्मणभोजनम् । ११ अनपरिपाट्या वा-प्रश्देकीकृत्य प्रागयेदित्यर्थः । ततः कर्म समाप्तावकस्य ब्राह्मणस्य भोजनं कारयितव्यम् । अत्र कंडिकापरिसमाप्तौ द्विरुक्तिः । व्यास:-अनित्राशन कालेऽपि भूमी वाल समाविरोत् । वाराहं पूजयेद्रदेवं पृथिवीं च तयाग्रहान् । वालकस्य जीविका परिरक्षार्थ तदुक्तं कारिकायाम्-कृतः शनमुत्संगा द्वाशी वाले समुत्रनेत् । काय तस्य परिक्षानं जीविकाया अन्न्ताम् । देवताग्रेऽथविन्यस्य शिल्पभाण्डानि सशःशस्माणि चव प्राणि ततः पश्येत लक्षणम् । प्रथमं यत परेव लस्ततो भाण्डं खयं तदा । जीविका तस्य वालस्य तेनैवेति भविष्यति। गभधानादिका भन्नतारानान्ता मलिम्जुचे। आकणवेधा, पु. क्रिया नान्या त्याहम.फरः । इति अनप्राशन सूत्र व्याख्या । ॥ अथअन्नप्राशनकर्मपद्धतिः ॥ अथचानप्राशनकर्म जन्मतःपप्टेऽष्टमे दशमेद्वादशेमासि पूर्णसंव- त्सरेवापुमपापांकुर्यात स्त्रीणांतु-प्रापंचमादयुग्मेमासिसम्वत्सरे पूर्णवातचज्योतिविदादिष्टे शुभेऽन्हिसरंभकर्मकृत्वान्नप्राशनदिने कर्तानित्यक्रियः शुचिोंतेवाससी परिधायपूजाकर्मस्थलमागत्य सामग्रीसम्पाद्यस्वासने-उपविश्याचम्यदीप प्रज्वलय्यभूतोत्सा दनकृत्वाप्राणायामनयंविधायस्वस्तिवाचनपठित्वापूजाघसंस्थाप्य संकल्पकुर्यात अद्येहेत्यादिदेशकालौ संक्रीामुकोऽहं ममामु- कराशेरमुकनाम्नः पुत्रस्य (कन्यायाचा) मातृगर्भमलप्राशन शुध्य नाद्यनमवर्चस तेजइन्द्रियायुर्लक्षण फलसिद्धिचीजगर्भसमुद्भवनो निवर्हणद्वाराश्रीपरमेश्वर प्रीतयेऽन्नप्राशनाख्यकर्मकरिष्ये-तत्पू- र्यातयागणेशादि पंचागदेवतानांपूजनंनान्दीश्राद्धपुण्याहवाचन चकरिष्ये।-इतिसंकल्पपूर्वोक्त गणेशादिपंचांगपूजांविधायतत्रैव गृहाभ्यन्तरे होमार्थवेदींकृत्वा तत्रपंचभूसंस्कारपूर्वकमग्नि संस्था (४८४) कर्मकार डरत्नाकर, अन्नप्राशनकर्मपद्धतिः। प्य चरणद्रव्यविमंचसम्पूज्य श्रोत्यादिसकीामुकोऽहममुक- राशेः पुत्रस्यान्नमाशनांगहोमकर्मणिकृता कृतावेक्षणरूपव्रह्मकर्म वर्तममुफगोत्रममुकशर्माण ब्राह्मण मेभिर्वरणद्रव्यव्रह्मत्वेनत्वां- वृणे । कमकुम, करवाणीतिमत्युक्तिः । यथाचतुर्मग्वोब्रह्माप्रार्थ्य- स्वयंकर्मकत्तमशक्तश्चेत्तदाचार्यमपिवृणुयात् । ततोहोमवेदीशाने कलशंसंस्थाप्य सम्पूज्यचरक्षासूत्रमभिमन्य तत्रैवस्थापयेत् । कुशकंडिझांकुर्यात् । तत्राग्नेदेतिणतोतामणेत्रिभिः कुशैराशनंदत्वा तत्राग्नेःपूर्वतः परिकाम्यब्रह्माणमुपवेशयेत् । ततोऽग्नेरुत्तरतवास नद्वयंप्रणीताप्रोक्षण्योराधारर्थ कल्पयित्वाप्रणितापात्रंसव्येपाणी- कृत्वा जलेनापूर्यकुशराच्छाद्य ब्राह्ममुखमवलोक्यपश्चिमासनेनि- धानालभ्यपूर्वासनेनिदध्यात् । ततःपरिस्तरणा कुशमुष्टिमादाय पूर्वपश्चिमयोरुत्तरादक्षिणोत्तरयोः पूर्वाग्रैःकुशैःपरिस्तरणकृत्वा बीणि कुशतरुणानिद्वेपवित्रेप्रोक्षणीपात्रंमाज्यस्थालींचरस्थालीम् पंचसमाजनकुशान्, सप्त-उपयमनकुशान्, तिनःसमिधा, सव- माज्यं, तण्डलान, सदक्षिण, पूर्णपानं, कर्मदक्षिणां, चैतानि, वस्तृनिप्रासंस्थान्युदगग्राणि-अग्नेरुत्तरतास्थापयेत् । अन्नप्राश- नार्थवस्तृन्य पिकल्पनीयानि । उद्धरणपोसौवर्णराजतंबा, मधु- रादिसर्वरसान, सर्वमन्न, घत, मधु, दधि, दुग्धं, च, घेदपुस्तकं, शस्त्रलेखनी, शिल्पभाण्डानिच, भारद्वाजादि, मांसानिचवां, सुवर्ण, रजत,चस्थापपेत, । ततत्रिभिःकुशैढेपवित्रेप्रच्छिद्यमोक्ष- पीपानं प्रणीतातउत्तरतोनिधागप्रणीतोदकेनाभ्युक्ष्य तजलपवि- नाभ्यामुत्पूयपवित्रेप्रोक्षण्यांनिधाय तत्प्रोक्षणीपासव्येकरेकृत्वा तदुदकंदक्षिणानामिझांगुष्ठाभ्यामुच्छाल्य, प्रणोतोदकेनप्रोक्ष्य, तत्प्रोक्षण्युदकेनाज्यस्थाल्यादीनिसमस्त वस्तुनिनोक्षयेत् । तत श्राज्यस्थापयामाज्यप्रक्षिप्य, चरस्थाल्यांप्रणितोदकमासिच्य, त्रि: प्रक्षालितांस्तण्डुलांस्तत्रप्रक्षिष्य, युगपदग्नावारोपयेत् । प्रोक्षणी पात्रमग्निप्रणीतयोमध्येनिदध्यात् । प्राज्यव्रह्माश्रावयेत्-चस्व यमाचार्यावापाचयेत् । ज्वलदुल्मुकमादायाज्योत्तरतउभयोःसम " -- कर्मकाण्डरत्नाकर अन्नप्राशनकर्मपद्धतिः । (४८५) न्ताभ्रामयित्वाप्रक्षिपेत् ॥ उदकस्पर्शः, श्रुवमधोमुखंतप्योप- स्पृश्यकुशाग्रैर्मुलतोऽग्रपर्यन्तंकुशमूलैरग्रतोमूलपर्यन्तंसंमाया॑भ्यु- क्ष्यपुनः प्रतप्योपस्पृश्यदक्षिणतः कुशोपरिनिदध्यात् । आजमुत्था प्यचरोः पृणनीत्वोत्तरतः संस्थाप्य, चरमुत्थाप्याज्यस्यपश्चि- मतोनीत्वोत्तरतः संस्थोप्याज्यमग्नेः पश्चादानीयचमंचानीयाज्य स्योत्तरतःसंस्थाप्य,पवित्राभ्यामाज्यमुत्पूयप्रोक्षणींचोत्पूयोपयम- मनकुशान्सव्येहस्तेकृत्योतिष्टन-धृताक्ताः ममिधः स्तृणीमग्नौ प्रक्षिप्य, प्रोक्षण्युदकेन-ईशानायुत्तरपर्यन्तंपर्युक्ष्यपवित्रेप्रणीतायां निधाय प्रोक्षणीपाभ्रसंस्त्रवधारणार्थमग्निमपीतयोमध्येनिधाय संकल्पंकुर्यात्-अधेत्यादिसंकीामुकोऽहं समास्य बालकस्य (कन्याया) अन्नप्राशनविधौहोमकर्मणायदये-ततःशुनिनामाग्नि संस्थाप्य, 30 एतन्ते. पठित्या, 30 भूभुवःस्वः, शुचिनामाग्ने ? इहागच्छेहतिष्टसुप्रतिष्ठितोवरदोभवेतिप्रतिष्ठाप्य 30 तदेवाग्नि- स्तदादित्यस्तचायुस्तदुचन्द्रमाः । तदेवशुक्रंतद्धमताऽआपासम जापतिः । इतिध्यात्वा 30 शुचिनामाग्नयेनमः। इतिनाममंत्रण श्रावाहनादि नीराजनान्तंसम्पूज्य ॥ जिवापूजनंकुर्यात् ॐ फरात्यैनमः ॐ धूमिन्यनमः श्वेतायैनमः 0 लोहितायैनमः ॐ महालोहितायनमः 30 सुवर्णायनमः ॐ पद्मरागायनमः सम्पूज्य ॐ ब्रह्मणेनमः ॐ विष्णवेनमः । ॐ रुद्राय नमः, इति रेग्वाश्च सम्पूज्य, दक्षिण जान्वाच्य णान्यारब्धो जुहुयात् । 30 प्रजापतये स्वाहा, इदं प्रजापतये नममेति मनसास्मरेत् । ॐ इन्द्रायस्वाहा, इदमिन्द्रायन० ॐ अग्नये स्वाहा, इदमग्नये नमम ॥ ॥ सोमाय स्वाहा इदं सोमा- यन। अन्बारंभं त्यक्त्वारे प्राज्याहुतीर्जुहोति । ॥ देवीं वाच- मिति भार्गव ऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दो वाग्देवता-श्राज्यहोमे विनि- योगः। ॐ देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति ।। सानोमन्द्रेपमूर्ज दुहाना धेनुर्वागस्मानुप सुष्टुततु- स्वाहा, इदं वाचेनमम आ व्याजो न इति देवा अपपलिष्ट- (४६) कर्मकाण्डरक्षाकरे, अप्नप्राशनकर्म परति । प्छन्दोऽन्न देवताबाज्यहोमे विनियोगः। ॐ देवीं ब्वाचमज नयन्तः देवास्तां विश्वरूपाः पशवोवदन्ति । सानो मन्द्रेपमृर्ज दुहाना धेनुर्वागस्मानुपसुष्ट तैतु स्वाहा । ॐ व्याजो नोऽअद्य प्रसुवातिदाने व्याजो देवा ॥२॥ ऋतुभिः कल्पयाति । व्याजो हिमासर्ववीरं जजान विश्वाऽधाशाव्याजपतिर्जयेयम् स्वाहा । इदं वाचे व्वाजाय च नमम । ततःश्रवण चम्मभिघार्याज्यमिश्रि- तेन स्थालीपाकेन जुहोलि-30 प्राणेनेत्यादिनां चतुर्णा मन्त्राणां प्रजापति पियंजुश्छन्दोऽन्न देवताहोमे विनियोगः। ॐ प्राणे- नान्नमशीयस्वाहा, इदं प्राणाय नमम । ॐ अपानेन गन्धानशीय स्वाहा, इद मपानाय न० । ॐ चक्षुपा रूपाण्यशीयस्वाहा, हदं चतुपे० . श्रोत्रेण यशोऽशीयस्वाहा, इदं श्रोत्रायः । ततः स्थालीपाकेनैव स्विष्टकृतं जुहुयात् ।। 30 अग्नये स्विष्ठ कृते- स्वाहा, इदमग्नये । ततो महा व्याहृत्यादि प्रजापत्यान्तानवा- हुतीराज्येन जुहुयात् । ॐ भूः स्वाहा, इदमग्नये न० । ॐ भुवः स्वाहा इदंवाय ॐ स्वः स्वाहा इदसूर्याय० । 30 त्वन्नोऽअग्ने 30 सत्वन्नोऽअग्ने, अनयो मिदेवदिस्त्रिष्टुप्छन्दोऽ- ग्निवरुणोदेवतेप्रायश्चित्त होमे विनियोगः । ॐ त्वन्नोऽअग्ने व्वरुणस्य विद्वान्देवस्य हेडोऽभवयासिसीष्ठाः । यजिष्ठो वन्हि तमः शोशुचानो विश्वाटेषासि प्रमुमुग्ध्य स्मन् स्वाहा-इद- मग्नीवरुणाभ्यां नमम । सत्वन्नोऽअग्नेऽवमोभवोती नेदिष्टोऽ- अस्याऽउपसौ व्युष्टौ । अवयवनो वरुणरराणो व्चीहिमृडी- कसुहवोन एधि स्वाहा । इदमग्नीवरणाभ्यां नमम । ॐ श्रयाश्चाग्ने, इत्यस्य वामदेवर्षि स्त्रिष्टप्छन्दोऽग्निर्देवता प्राय- श्चित्त होमेविनियोगः । ॐ प्रयाश्चाग्ने छनभिसस्तिपाश्च सत्यमित्वमयाऽअसि । अयानो यजं वहास्ययानो धेहि भेपज स्वाहा इदमग्नये । ॐ येतेशतमित्यस्य वामदेवर्षिस्त्रिष्टुप्छन्दो वरुणः सविता विष्णुर्विश्वेदेवाः मम्तः स्वर्काश्च देवताःप्रायश्चित्त होमे विनियोगः। ॐ येते शतं वमणं ये सहस्रं यज्ञियाः पाशा कर्मकाण्डरनाकरे, पानप्राशनपतिः । (४७) वितता महान्तः । तेभिन्नोऽत्रदा सवितो त विष्णुर्विश्वेमुचन्तु ममतः स्वर्काः स्वाहा इदं वरुणाय सवित्रे विष्णचे विश्वेभ्यो देवेभ्यो मरुभ्यः स्वभ्यश्च ननम | 30 उदुत्तममित्यस्य शुनः शेफर्पिस्निप्छन्दो वरुणो देवता प्रायश्चित्त होमे विनियोगः । ॐ उदुत्तम व्वरुपाशमस्म दवाधमं विमध्यम श्रथाय । श्रथा चयमादित्य व्रते तवानागसोऽअदितये स्याम स्वाहा "इदं वरु- पाय न० । ॐ अग्नये प्रजापतये स्वाहा-इदमग्नये प्रजापतये च नमम । ततः संस्रवप्राशन, पवित्रप्रतिपत्तिः, पूर्वस्यां प्रणीता चिमोकः । पूर्ण पात्रं सम्पूज्यायेत्यादि संकीामुकोऽहं ममामुक- नक्षत्रोपलक्षितस्यामुकनास्नः पुत्रस्यान्नप्रासनांगहोम कर्मणः सांग फलाप्तयेऽपूर्णपूरणार्थ चेदं पूर्णपात्रं सदक्षिण तुभ्यं ब्राह्मणे संप्रददे । ब्रह्मा गृहीत्वा ॐ अन्कर्म कर्मकृत्तः सहयाचा मयो भुवा । देवेभ्यः कर्मकृत्वास्त प्रेत सचाभुवः। ॐ स्वस्ति (पूर्णाहुति- निगोमिल बचनात) ततो कृतमंगल स्नानसुवस्त्रपरिधान शिशु माता स्वयं चोत्संगे धृत्वा तत्रानीय पूर्वाभिमुखेन स्वासन उप- विश्याचम्यगणेशादि देवानसम्पूज्यप्रणम्य च सल्लग्ने समायाते लग्नदानानि प्रथकपूधक्, वातद्व्यमेकीकृत्य कुर्यात्। द्रव्यं ब्राह्म- पांश्चसम्पूज्यायेत्यादि देशकालोसंकीामुकोऽह ममुकराशे ममपुत्रस्यान्नप्राशनकर्मणि सामयिकलग्नारधिकेन यत्रकुत्र स्थिता नामादित्यादि नवग्रहाणां कूराणामनिष्ट फल शान्त्यर्थं शुमानां शुभ फलाधिक्यप्राप्तये-इदमुवर्ण तनिष्क्रयीभूतंद्रव्यं वा ज्योतिर्विदे ऽमुकशर्मणे ब्राह्मणायदास्ये । 30 तत्सन्नमम । ततो वालकनवीन वस्त्रभूपणादिभिः समलंकृत्य ततः सर्वान्रसान्सर्वमन्नंसव्यंजन चैकस्मिन्सुवर्णादिपात्रेकृत्वा, भारद्वाजादि पक्षिविशेपाणां सूत्र- व्याख्या मीमांसोक्तानिमांसानि वागादिकामनार्थ यथा संभव- समानीय, पात्रे एकीकृत्य वा मांसानि पृथक् पृथक् स्थापयेत् । ततो ऽन्नमेकीकृत्य सुवर्णान्ताईतया, अनामिकया, 30 हन्त,, । इति मंत्रेण पंचवारं प्राशयेत् कन्यांतु तृष्णी प्रारयेत् । ततो मांसा- u (१) कर्मकाण्डलाफरे, अन्नप्राशी पद्धति । निच प्राशयेत् । जलेन हस्तौपादौ प्रक्षाल्य ब्राह्मणेभ्यो भृयसी दक्षिणांदद्यात् । ततःसमाचारा सुसंस्कृतायां भूमौसुवस्त्रमास्ती. र्यतत्र श्वेततण्डुलैा वर्णद्रव्येण बाराहाकृतियन्त्रं लिग्वित्वा, तदुपरिपार्थिवं वस्त्रमास्तीय, ३0 एन्ततेपठित्वा 30 भूर्भुवः स्वः पृथ्विदेवि, इहागच्छेहतिष्टेत्याचाहनादिभिः पृथिव्यैनमः इति मंत्रेणपंचोपचारैःसम्पूरय ततोऽधस्तायने 30 दंष्ट्रोदृतवसुन्धरा यवाराहायनमः, इति मंत्रण सम्पूज्य स्वेटदेवताभ्योनमस्कृत्यमा गलिक वा च यित्वापसूत्रनिर्मितं कटिसूत्रं कटिप्रदेशेवध्या, हस्तेपुष्पंगृहीत्वा प्रार्थयेत् ॐ रक्षनं चसुधेदेवि सदासर्वगतेशुभे आयुष्प्रमाणंनिखिल निक्षिपस्व हरिप्रिये । अचिरादायुपस्तस्यये केचित्परिपन्थिनः जीवितारोग्यवित्तेपुनिर्दहस्वाचिरेणतान् । धा- रिण्यशेपभूतानां मातस्त्वमधिमाद्यसि । अजए चाप्रमेया च सर्वभूननमस्कृते । कुमारं पाहिमातस्त्वं ब्रह्मातदनुमन्यताम् । तत्र शंग्यघंटादिक मांगलिकध्वनौक्रियमाणे शिशुमुपवेशयेत् । ततो वि प्रान्पूजयित्वा दक्षिणां च दत्वाऽऽशिपो वाचयित्वा नीराजनं कुर्यात् । ततस्तदने पुस्तकं, वस्त्रं,लेग्वनी, सुवर्णादिकमुद्रा शिल्प- कृत्य भाण्डानि च, संस्थाप्य, तदासवालको प्रथमंयद् गृह्णाति तेन तस्य जीविकाभवेदिति ज्ञातव्यम् । तिलपात्रदानकृत्वा ततः श्राचार्यादि दक्षिणा संकल्पः अद्यत्यादि संकामुकराशेर्मम पुत्रस्य होमसहितान्नप्राशनकर्मणः सांगफलप्राप्तये इमां दक्षिणा माचार्यविप्रायदास्ये, तथाचेमाभूयसीं दक्षिणां नानागोत्रेभ्यो विप्रेभ्यश्चविभज्यदास्ये तथा यथा संख्यकान्त्राह्मणांश्च भोज- यिष्ये । ततो न्यादींश्च सम्पूज्यविसृज्यच न्यायुपंकृत्वापाचार्यः कलशजलेन यजमानमभिषिच्य मंगलतिलकमाशिषं च दत्वा यजमानः यस्यस्मृत्वेति कर्मसमापनं कृत्वा विप्रान्भोजयित्वा स्वयंभुञ्जीत। इत्यन्नप्राशन कटि सूत्रवंधन कर्म पद्धतिः ।
(४६) कर्मकाण्डरत्नाकरे, जन्मोत्सवकपद्धतिः। अथवर्धापन (जन्मदिवस) पूजाविधिः । उक्तं चादित्य पुराणे-स्पेश्च जन्मदिन स्नातमाल वारिभिः । गुरु दयाग्नि विप्रांरन पर. नीया प्रयत्नत स्विनक्षत्र च पितरस्ता देव.प्रजापति, । प्रति मगर यरातत्यश्च महोस । गणेश कुलदेव श्च प्रज्ञाश्चवर्षिशेपतः । गौय धमाकाश्यपछी च जगहां शुभाम् । दीर्घ युपान्मु- नीन्समार्कण्डेयादिपाश्छुभान् । शुमन्तजामदाय दिशाश्च हनायुधम् । एत तेति प्रतिष्ठाप्य चतुर्यन्त श्च नाममि । पाद्यादिमि पूजरित्या स्तुपया ॥ शेषं प्रयोगस्पष्ट।। - अथ प्रतिवर्पजन्मोत्सवकर्म पद्धतिः इदं कर्मापनयनात्पूर्व वालकस्य पिता कुर्यात् । उपनयनान- न्तरंतु स्वयंकुति । एतदुत्सवस्य जन्मदिवसगणनाकतिचिद्देशेषु चन्द्रमासगणनया जन्मतिथावब्द प्रवेशेकुर्वन्ति । कतिचित्सु सौर प्रमाणत: सौरांशक गणनयाब्दप्रपेशदिने जन्मोत्सवं कुर्वन्ति । यधादेश समाचार स्तथाकर्तव्यः । ततः कर्ता प्रतिसाम्वत्सरिक जन्मतिधौवा सौरांशक जन्मदिवसे प्रातस्तिलतैलमिश्रहरिद्रादि मंगलद्रव्यैः स्नानंकृत्या भूतनवस्त्रंपरिधाय पूजास्थलमागत्य स्वा. सने चोपविश्याचम्य दीपं प्रज्वाल्य सम्पूज्य भूतोत्मादनंकृत्वा निंव, गुग्गुल, हरिद्रा दी, गौरसर्पप,पूगीफलान्वितां पोटलिका पीतकौशेय वस्त्रोपरि कृत्वारक्षोनमंत्रै रभिमध्य एतन्ते. प्रतिष्ठाप्य 30 यदावमिन्दाक्षायणा हिरण्यर्ट० शतानीकाय सुमन स्यमानाः । तन्मऽश्रावध्नामिशतशरदायायुप्मांजरदष्टियथासम् । इतिपोटलिकांवध्वा शान्तिपाठंकृत्वा गणेशादिपंचागपूजनंविधाय तत्रकलशेवाश्वेतवस्त्रेवदयमाणपकारेणदेवता स्थापनेपूजनं च कुर्यात् । तत्रअर्घसंस्थाप्यप्रधानसंकल्पकुर्यात् । श्रोत्यादिदेश- कालौ संकीर्णामुकराशिरमुकगोत्रप्रवरो ऽमुकोऽहमद्यमदीय जन्मदिने अथवाममपुत्रस्यजन्मदिने आयुरारोग्यादिवृद्धयेवर्ष- वृद्धिकर्मकरिष्ये तदंगत्वेनदध्यक्षतपुंजेपु कुलदेवतादीनांगुदीनां मार्कण्डेयादीनांचपूजनंकरिष्ये-दुर्गायनमः | ॐ भुवनेश्व- + धर्मकाए रत्नाकरे, जन्मोत्सव पद्धतिः । (४६०) यैनमः । ॐ कुलदेवतायैनमः। 30 गुरुभ्योनमः । ॐ पितृभ्यो- नमः। 30 मातृभ्यो। 30 अग्नये। 30 विप्रेभ्यो। 30 देव- ताभ्यो । 30 सूर्याय। ॐ चन्द्राय। भौमाय० । ७० बुधाय० । 30 वृहस्तये० । 30 शुक्रायः। ॐ शनैश्चराय० । 30 राहवेनमः। 30 केतवे। 30 नवग्रहादिदेवताभ्योनमः । अनवग्नपत्यधिदेवताभ्योनमः । उ०पंचभूतेभ्योः०३कालाय । युगाय० 1 सम्वत्सराय० । जन्ममासाय०। पक्षाय०) अस्मज्जन्मतिथयेनमः। अस्मज्जन्मनक्षत्राय० । अस्मज्जन्मरा- शये। शिवायै। असम्भूत्यै० । अप्रीत्यै। संतत्यै। अनये 1 30 अनुसूयायै०। 30 मायैः । ॐ विष्णवे । ॐ भद्रायै० । 30 इन्द्रायः । 30 अग्नये । ॐ यमाय० । नितयेनमः । ॐ वरुणायनमः । ॐ वायवेनमः । 30 धनदाय नमः । ॐ ईशानायनमः । ॐ अनन्तायनमः । ॐ ब्रह्मणेनमः । इतिनाम मंत्रैरावाल "एतन्तेति" प्रतिष्ठाप्य भूर्भुवःस्वः 30 दुर्गादिब्रह्मान्तदेवताभ्योनमः । सुप्रतिष्टतावरदाभवन्तु-अने- नैवपाद्यगंधाक्षतधूपदीपादिभिःसंपूज्य पष्टिदेविइहागच्छेह- तिष्ठेत्यावाह्य पष्ठयैनमः इतिपाद्यादिकंदत्वा ॐ जगन्मातल- गद्धोनि जगदानन्दकारिणि । प्रसीदममकल्याणिमहापष्ठिनमोड- स्तुते । इतिमंत्रणपुष्पांजलित्रयेणगधादिभिः सम्पूज्यहस्तेपुष्प- धृत्वावरंमार्थयेन् । 30 रूपंदेहि यशोदेहि कल्याणदेवि ? देहिमे । पुत्रान्देहिधनदेहिसर्वानकामांश्चदेहिमे । इतिवरंपार्यप्रणम्यतत्र- श्वेतवस्त्रेचन्दनेनाटदलंकृत्वाक्षतानादाय ॐ भगवन्मार्कण्डेये- हागच्छेदतिष्टेत्यावाहास्थापयित्वा 30 मार्कण्डेयायनमः, इति मन्त्रेणपाचादिकंदत्वा-इदमनुलेपनं चंदनपुष्पादिभिःसम्पूज्य 30 श्रायुःप्रदमहाभागसोमवंशसमुद्भवः । महातपमुनिश्रेष्ठमाण्टेय- नमोऽस्तुते । इतिपुष्पाञ्जलित्रयेणगन्धपुष्पादिभिरभ्यर्यवरंमार्थ- पेन्मार्कण्डेयापमुनयेनमस्तेमदायुपे । चिरजीवीपथात्वं. पैभयिष्यामितभामुने ?| मार्कण्डेयमहाभागसप्तकल्पान्तजीयन | (४६१) कर्मकाण्डरत्नाकर, जामोत्सवकपद्धतिः । आयुरारोग्यसिद्धयर्थमस्माकंघरदोभव । नराणामायुरारोग्यैश्चर्य- सौख्यैःसुखप्रदः । सौम्पमूतेनमस्तुभ्यदीर्घायुष्यमयच्छमे । मार्क एडेयमहाभागमार्थयेत्वांकृनालिः । चिरजीवीयथात्वंभोभवि- प्येऽहंतथामुने ? । इतिवरंपार्थ्यप्रणम्यतत्रैवाटदलमध्ये पूर्वादि- ऋमतः। 30 अश्वत्थाम्नेनमः, पायाहयामि स्थापयामि। पूज- चाम्येवमयोध्यम् । 30 घलयेनमः । ॐ व्यासायनमः। 30 हनुमतेनमः। 30 विभीपणायनमः । 30 कृपायनमः । पर- शुरामायनमः । 30 कार्तिकेयायनमः । तत:कमलान्तरादिक्ष ॐ जन्मदेवतायैनमः। 30 स्थानदेवतायैनमः । ॐ मत्यक्षदेव- तायनमः । अवासुदेवायनमः। 3. क्षेत्रपालायनमः । ॐ पृथिव्यैनमः । यद्भ्योनमः। अतेजसेनमः | अचायवेनमः। अन्तरिक्षायनमः। ॐ याकाशायनमः, ऊमितिमंत्रैर्गन्धाक्ष- तादिभिः सम्पूज्यप्रार्थयेत् । प्रीयंतांदेवताःसर्वाःपूजागृहन्तुतामम। प्रयच्छन्त्वायुरारोग्यंयशासौख्यंचसंपदः । मन्त्रहीनं भक्तिहीन क्रियाहीनंमहामुने । यदर्चितमयादेवपरिपूर्णतदस्तुमे । इतिपठि- त्वा ततोवर्षफलंदेवज्ञोवाचयित्वादुष्टस्थानस्थग्रहाणांदानसामग्री सम्मुखीकृत्यसम्पूज्यब्राह्मणांश्चपाद्यगंधादिभिः सम्पूज्यसंकल्प- कुर्यात् -~-ॐ अग्रेत्यादिदेशकालौ संकीामुकगोत्रप्रवरोऽमुक नक्षत्रोपलक्षितो ऽमुकराशिरमुकोऽहं जन्मकालतोऽद्य यथा संख्यकाब्दप्रवेशसमये ऽमुकलग्नावधिकेनादित्यादि नवग्रहाणां यथास्थानस्थितानां क्रूरग्रहाणां दुष्टदोपोपशान्त्यर्थ शुभानां शुभ- फलाधिक्य प्राप्तये दशायामन्तर्दशायां गोचरेष्ठकवर्गेसर्वतोभद्रे नैर्याणे च शुभफलप्राप्तये, एतद्रव्यंग्रहाणां प्रीत्यर्थ ब्राह्मणेभ्यो विभज्यदास्ये । इति दस्वा ततस्तिलपात्रं पुरताकृत्वा सम्पूज्यविध च पूजयित्वा कुशत्रय तिल जलान्यादाय देशकालौ संकीर्यामुको ऽहमदीय जन्मदिने दीर्घायुष्यकाम, एतास्तिलाँस्सोमदेवत्यान्- यथानाम गोत्राय द्विजाग दातुमहमुत्सृजे । इति दद्यात । ॐ सर्वभूतेभ्योनमः पलिंदत्वा ततस्तंडुलदानंकृत्या घृतच्छायादानं कर्मकाण्ड त्नाकर, चूडाकरण सूत्रव्याख्या। (४६२) च कृत्वा सतिल गुडमिश्रितं दुग्धं कर्त्ता खांजलौपूरयित्वार्ध मार्कण्डेयायनिवेद्य तदर्धाञ्जलिपयो वक्ष्यमाण मन्त्रेण त्रिवारं सकृद्वापिवेत् । मंत्र:- 30 अंजल्यमित क्षीरं सतिल गुडमिश्रि- तम् । मार्कण्डेय वरं लब्ध्वा पिवाम्यायुष्य हेतवे । इति पीत्वा- चम्य 30 मार्कण्डेयाय नमः। 30 गोभ्यो नमः। 30 ब्राह्मणेभ्यो नमः । इति प्रणम्य मार्कण्डेय क्षमस्वेति विसृज्य 30 अश्वत्थामा बलिप्सो हनूमांश्च विभीषणः । कृपः परशुरामश्च सप्तैते चिरजीविनः । सप्तैतांश्च स्मरेन्नित्यं मार्कण्डेयमाष्टमम् । जीवे हर्षशतंसाग्रमपमृत्युविवर्जितः । इत्यष्टौ स्मृत्वा ब्राह्मणेभ्य आशीर्ष गृहणीयात् । विप्रेभ्यो दक्षिणां दत्वा भोजयित्वा च यथा सुखं विहरेत् । इदं च वर्धापन यदि जन्ममासो ऽसंक्रान्तस्तदा शुद्ध मास एव तत्तिथौ कार्य नत्वधिके । इदं वर्धापनं यावद्वाल्यं पित्रा- दिभिः कार्यम् । पश्चादुपनयनोत्तरं स्वयमेवेतिस्कन्दपुराणे - खंडन नखकेशानां मैथुनाध्वगमौ तथा । श्रामिषं कलहं हिंसा वर्ष वृद्धौ विवर्जयेत् ।। इति ।। इति वर्धापन [जन्मोत्स] कर्म पद्धतिः। अथचड़ाकरणकेशान्तसूत्रव्याख्या। (साम्वत्सरिकस्य चढ़ाकरएम् ? पथ घृण करण शान्त नेण सूचयति । सम्वत्सर द मनिकन्त सम्रावि तस्य कुमारस्य च मर्म फुयंत् । (तृतीये चाऽप्रतिहत्तर) तृतीय वा सम्ब से इतिहतऽलावशिष्ट (यथा मङ्गल या सर्वपाम् ३) यथा यद्वा मंगलेल्या- लाचार सवारण ना व्यवस्थर । यस्यालगाम सरिय य चूइमं क्रियते तस्य सांदरि- परय यस्य Tirst ताय ति व्यवस्था । यस्यकुन्न स्ति नियमस्तरययदच्दया विकल्प । अन्य तु यथा माल श धर्म शवन्तर विहित कालन्तरोप रूक्षणपाहु --अतय सापारल्य विकला । वृहस्पति कृतोऽस्टे रिशी नमाजमतो या विरेएत । परम सप्तमे चापि हिया पुगोपि कममम्। प्रयोग पारिजाते--आयुरन चिपमंऽर द्वितीये। अनीया. संवति विकल्प पुल धर्मत पारिख याम्-सम्भा युदयने इषलक्ष विर पत पं.रश (४६३) कर्मकार उरत्नाकर चढ़ाकरणसूत्रव्यारया। वर्षस्ययेशान्तः४) पोटप पाण्यतीतानि यस्ससौ पांडप वर्पः तस्य स्प्तदर्श व देशान्तः केशान्तास्यः स्पारो भवति ४ । (ब्राह्मणान्भोजयित्वा माता कुमारमानायप्लाच्याहते वाससी परिधाप्यांक श्राधायपश्चादग्नेरुपविशति ५) चूहा काणांगत्या त्रीवादा- गान्मोजयित्वा माता जनमी कुमारं पुत्रं चुदापरणाई मादाय गृहीत्वा माहाव्य-स्तापयित्या-- अहते नवे सादास पाससो द्वे वये परिधाप्य परिहित पाररित्या-त्तरीयोरीयादेक-गे- नाधाय स्थापयित्या वादग्नेः पदिमत उपविशति मारते ॥५॥ मतरि रजस्वलायां तु विशेषः- वृहस्पतिः -प्राप्तमम्युल्य श्राद्वं पुन रस्कार कणि । पत्नी रजस्वला चेस्यत्म पुर्यातत् पिता तदा । विवाहोत्सव योपु माता यदिरजरला सायुमाप्नोति पंचमं दिवमं विना । सुमुहर्तालावाक्य सारे शातिः-लामे सुमुहूर्तस्य रजो देपपस्थिते । धियं सम्पूज्य विधिवतनोमलमाचरेत् । मदनररने~सूनोमातरि गर्भिण्या कर्म न कारयेन् । पंचमत्ाक् तद्ववं तु रियामकिारयेत् । सपनात्यायुयासिदा दोषो न वियत । गर्भ मातुः कुमारस्य म दुच्चिालय तुं। पंचमासान्ध. वुदित उन कारयेत् । (अन्यारब्ध आज्याहुती- हुत्वा प्राशना ते शीतास्वप्सूपणा आशिचति उपणेन वाय उदके नेहादित केशान्ध. पेति ६) तत श्र धारा बहाणा उपस्पृष्ट-पाजाहतो, थावादि स्विष्ट कृदन्ताश्चतुर्दशा त्या संलव प्राशनान्देशीतास्वप्मु-उष्णा अप आसिंचतिप्रक्षिपति वक्षमाणमण । अन्धाधग्रहरे ननि. त्य ज्याहुति होमो नियम ने । (वेशमश्निति च केशान्ते ७) वेशान्ते पुनरऐन वादन. वेदिते केशसभु वपेति विशेष । (प्रथान नवनीत डि धृत पिंड दध्नो वा प्राश्यति ) तत गोदक शंकानन्तरम्नास्यासु नवनीत राि घृतपिंडदानी वा पिएडं प्रारयति 'मामुक्षेपणे" प्रक्षिपति ॥ (तत प्रादाय दक्षिण गोदान मुन्दहि-सवित्रामसूताईच्या श्राप उन्दन्तु ते तनूं दीर्धायुत्वाय वर्चस इति )तस्ताभ्योऽभ्य लुनवदेशमादाय दक्षिणं गोदान शिरसो दक्षिणप्रवेशस्य गोशानं वेशसमूहमुन्दति लेदयति । श्राद्रंकरोतीत्यर्थः । पेनमें या सविता प्रसूता इत्यादिना दीयुत्वावर्चसे इत्यन्तेन (त्रेण्या शलल्या विनीय त्रीणि शतरणान्य- न्तर्दधाति-मोषधनि) प्रेण्या विश्वतया श्लल्या शल्यवपक्षक्टकन यिनीय पृषककृत्य पूनिधिवाशिता पेश लतिको तस्या अन्तमध्येऽन्तरा श्रोणि निसायकानि कुशतरणानि दानाणि- दधाति धरयति ओषधे प्रायस्व इतिमंत्रेण ॥ (शिवोनामेति लोहतुरंमादाय नियतयामी- विश्वपति ११) ततः शिवोनात्यनेन मन्त्रण लोपुर ताम्ररितमायगं क्षुरमादाय गृहोला दक्षिा करेण निवर्तयामी स्यनेन मंत्रण प्रवपति में तुरं शतरुणमिनिदधाति । (येना वपसपिता सुरेण सोमस्य राजो वरणस्य विद्वानू। तेन ब्रह्माणो वयते दम- यायुप्पं जरद पिर्यथास्यादि सपेशानि प्रच्छिद्यान हे गोमयपिण्डे प्रास्युत्युत्त- कर्मकाण्डरत्नोक्रे चूईरिरसूत्रव्यारय।। (६६४) सकत्मछिद्य - रतो प्रिंयमाणे १२) यनावपदिति स्प्रेण केशसहितानिकुशतरणानि प्रच्छिद्य खण्डत्वाऽग्नेहरतो भूभागे ध्रयमाणे स्थाप्यमाने --अ नह-आर्यभे गोम पिण्डे प्रात्यति प्रक्षिपति । (एच द्विरपर तूष्णी १३) एवमुक्केन प्रकाण द्वि , वि र मुदिनादि गोमयणि निधानात मपर करणी मत्र रहित कुर्यात् । इतरयोश्चोन्दनादि १४) इतरयो पश्चिमोत्तस्योगोंदान यो रुन्दन क्लिंदन प्रतिकर्म चारारसम्मक रिम्नक भवति । ( अथपश्चात्ल्यायुपमिति १५ ) अथ दक्षिण गोदनस्य निल्नदि प्रच्छेदनान नर पश्चाद्गो दानेविशष्म ह- व्यायुपमिति न्य युपजमदग्ने इत्यादिना मन्त्रणसकेशानि कुशतरुणानि तणीविं प्रन्छियगामयपिगड़ ग्रास्यति । (अयोत्तरतोयन भूरिश्चादियोक् च पश्चाद्धि सूर्यम् । तेनतेवपामि ब्रह्मणा जीवातवेजीपनाय सुश्वोक्यायस्पस्तय इति १६) अथानन्तरमुत्तरतागोदान उत्रनादिगमय पिण्ड निधानन्ते नियमाह-नभूमिरा इति स्वस्तय इय न्तनमनणकृत्वशाना कुशतरुण ना 'उदनद्विस्प्णी (त्रि. क्षुरणशिर प्रदक्षिण परिहति समुख केशान्ते यत्क्षरणमजयता सुपेशलावत्या ऽऽवतिकशाञ्छिन्धि शिरोमा । रयायु प्रमोपी मुसमिति च केशान्न १७) नि नावारन् चरणशिरमूडान प्रदक्षिण यया भवति तथा परिहातिशिरम रमन्तात्प्रदविण शुरन ममतीत्यर्थ न यत्तुरेण, इत्यादिमा प्यायु प्रमोपारियन्त कशमुखमहितशिर पहिरति मने पेशन्त च मुसमितिपदं प्रतिपत । अ वपे । अन पिमन्मना द्विरुष्णामिति हरिहर (तातिरइमि शिर• समुघ नापिताय क्षुरप्रयच्छति मधुएवन्परिवति १८) ताभि शीतोष्णाभिरद्धि उमारस्यशिर स्मुद्यादै विधायनापिताय फौरका नाति विरे पायद मरगन्परिवप इति मनग्ग प्रयच्छति । (यथामगल फेशशेप करणम् १६)श ना २पारण शिसस्थपन वेशशपकरण यथामगत कुलावार ग्यव स्थामनतिकम्यभवति कुलाचाराश्च पधा-उक्त च कारिकायाम् । चरागप तत पुर्यायस्मिन् गात्र गधोथितम् । व शिटा दक्षिण भाग उभयत्रापि कश्या शिसाउसि शियभि पभियंता परित फेशपयाव मुण्ड श्व भूगोमता युयन्यशिरामप्रमाल मिदाचित् । वशिष्ठत गस्यानियता आशा पाझेतु -शिर्वानोपातीस्या पाचर सस्तागिराम् । ( अनुगुप्तमत सरेशामय सिहनिधायगोष्ठं पत्यलउदकाने या २०) अनुगुन्टमायतम गमय पिसारा रोग निधाय स्थापयि गाज पामर पोदोगत व्दपात सस्य समाय। (प्राचार्यायवाददाति २१) या चय गय गाच य मिलपितद दशनि ( मासा मान यम बराच क्या २३) छादशरात्र र्ट. पराका খিসর ২৪ ५० मार त्मिपरनामाभिवा म.पा २३ 1 दाम सत शारा र यानीमायनपनम्यति। विरित चपन च. गायोभारम - - (४५) कर्मकाण्डरक्षाकरे, चूटाफरणपद्धतिः। मातापित्रो रौमृते । प्राधाने सोमपागे च रूपनसात स्तम्। मुण्डनचौमासश्च सर्व तीर्थप्रयं विधिः गयित्यारक्षेत्र विगाला गियाम् प्रयाग प यत् गयायां पिगट पातनम् । दान दय तरुक्षेत्र वागणस्यां तनुत्य जेन् विष्णु. प्रयाग तीर्थयात्राया तिमातृनिये गतः कचाना वपन कयां यान विकलोगो । इति निपेऽपि (नाँच केशोनियः रयात इति नीच वेशत्व निधनानाविना हसायगानीयम् । गदाधर: मुगडलस्य निपी कन तुविधीयते इति वृहस्पतिवचनात् भारते प्रायः शमश्रुकमणि कारयतिसमाहितः उप मुखोत्बारका तथा युर्विदतेमहान् । तदुक्तंकारिकायाम् । जातकम दिया स्त्रीणां दृहकपतिका क्रिया. । ती होमेतु मन्त्रस्थादितिगोभिलभारितम् । वृद्धशातातपः प्राक् पृथक्षणाद्वाल.प्रागन प्राशनान्शुिः कुमारस्तुसविज्ञेयोयाटमौजीनित्यम् । गौतमः- गुपनर नात्या मच दमनाः । मयम सं प्र मणोऽपि जयेत । उच्छिष्टादानप्रयतानस्यु; मापातकम् । चूिणाकरणकेशान्त सूत्र व्याख्या। तत्रादौ केशाधिवासन विधिः, । अथ च समाचारात्पूर्वस्यां रात्रौ चूड़ाकरणात्पूर्व रात्रौ तदिने वा केशाधिवासनं चक्ष्यमाण पिधिना कुर्यात् । तत्रादौ गणेश पूजनार्थ संकल्पः - अन्यत्यादि सकामुक शर्माहममुकराशे रमुकशमणो ऽस्य कुमारस्र करि- माण केशाधिवासन कर्मणि निर्विघ्नता सिद्धये श्रीगणेश्वरस्य पूजन करिष्ये - एवं महागणपति सम्पूज्य केशाधिवासन सामग्री संपादयेत् । तत्रादौ नूतनपीतकौशेय वस्त्रस्यचतुरंगुलायत चतु- रस्त्र द्वादश खंडानिकृत्वा पृथक् पृथक् पात्रे संस्थाप्य प्रत्येकस्यो- परि गन्धाक्षत हरितदुवा हरिद्रासिद्धार्थ द्रव्यं गौरसर्पपाणि घ प्रक्षिप्य रक्त त्रिगुणित सूत्रेण द्वादश पोटालिकावध्या पूर्वोक्त गणाधिपेल्यादि रक्षासूत्रेणाभिमंत्र्य संकल्पं कुर्यात-अद्येहामुक शर्माहममुकराशेरमुकशर्मणोऽस्य कुमारस्य श्वः करिष्यमाण चूड़ाकरणकर्म सिध्धेऽद्यरात्रौ केशाधिवाशनं करिष्ये-इति सका- ल्पं कुमारं मातुः क्रोडे कृत्वा---एकां पोटलिकामादायादौ कुमा- रस्य शिग्वां स्वाचारानुसारं मध्ये वर्तुलाकागं निर्माय तस्यां दृढ तरं वध्वा तत उत्तराभिमुग्वस्य पूर्वस्यां शिरो दक्षिण भागे, कर्मकापरलाकरे चूडाकरण पद्धति.। (४६६) तिस्रस्तिस्स्रो जूटिका स्त्रेण्या सलल्या कृत्वा प्रतिजटिकायां प्रत्येकांपोटलिकां वध्या सपोटलिकाभि स्तिभिस्तिसभि टिका भि रेकैकं गोदान सम्पाद्यवं पश्चिमोत्तरयोरपि सम्पाद्याचारादे- कां पोटलिकां चरे-एकां कर्तरे च वध्वा 30 एतन्तेति प्रतिष्टा. प्य सपोटलिस्थान्केशान्पीतोष्णीपादिना वध्वा सयत्नं रक्षयेत् । अत्र केशाधि वासनविधौ कतिचित्पद्धतौ समन्त्रको विधिरुक्त। सच प्रमाण रहितः । तत ताम्रपात्रेऽनहुहमद्रवमपर्युपितम् । गोमयंगव्यं घृतं नवनीत दधिवा निगुणित सित सत्र वेष्टितं ताम्रपरिष्कृतं तिग्मधारं लोहखरं त्रेणी त्रिस्वेता मावण्डां शल्य- ककंटकीम् । कुशपत्रत्रय निर्मितानि त्रिगुण सितसूत्र वेष्ठितानि नव कुशतरुण त्रिकाणि च स्थापयेत् । तत याचारादक्षिणा संक- ल्पः। अद्यत्यादि संकीर्खामुक शर्माहममुकशर्मणोऽस्य कुमारस्य चूड़ा करण कर्म पूर्वागस्य कृतस्यास्य केशाधि वासन कर्मणः सांगता सिध्यै इमां दक्षिणाममकशर्मणे ब्राह्मणाय दास्ये । इति केशाधि वासनम् ॥ अथ च चूड़ाकरणपद्धतिः थध च चूड़ाकरणकर्म दिने पिता प्रातस्त्थाय स्नानादिकं नित्य कर्मकृत्वा वहिः शालायां पत्नीकुमार सहिनः पश्चिमद्वारेण मंग लवाद्य ध्वनिसहितस्तत्रस्वासने उपविश्य पत्नी वामतः कृत्वा तस्यांके कुमारमुपवेश्य - आचम्य भूतोत्सादनादिकं विधाय तत्र स्थान सर्वतोभद्रादिदेवान् प्रणम्य - पूजयित्वा च कर्मारभेत् वहिःशालायां चूड़ाकरणे अशक्तश्चेद् गृहाभ्यन्तरे गणेशादि पंचा- गदेवताः सम्पूज्य नान्दी श्राद्धविधाय ततः कुमारहस्तेनापिपुनः गणेशादीन् पूजयित्वा कर्मार्थ हस्तमात्रां वेदिकां निर्माय-आचम्य प्राणायानत्रयं कृत्वा संकल्पं कुर्यान्-श्रोत्यादि अमुकोई अमुकराशेरमुक माणवकस्य ममास्यपुत्रस्य वीजगर्भ समुद्भवै- नोनिवर्हण पूर्वक मायुर्वलाभि वृद्धये चूड़ाकरण कर्माहं करिष्ये, वर्गकापरतावरे चूदाकरणगतिः । (४६७) ततः पितास्वयं कर्मकर्तुमशक्तश्चेत्तदाचार्य वृणुयात्-प्राचार्य ब्राह्मणंपाद्यगंधादिभिः सम्पूज्यवरण सामग्री करेकृत्वा गन्धोक्ष- तान् क्षिप्त्वा संकल्प:--अद्य० अमुकोऽहंममास्य माणवकस्य करिष्यमाण चौल कर्मणि-श्राचार्य कर्म कर्तुमेभिर्वरणद्रव्यैरमुक- गोन-अमुक शर्माणं ब्रामणमाचार्यत्वेन त्वामहं वृणे-घृतोऽ- स्मीति-प्राचार्योक्तिः श्राचार्यस्तु यथास्वर्ग. इति संमार्य ततो हस्तमात्रां भूमि कुरीः परिसमूहा गोमयोदकेनोपलिप्य श्रवमूले नोत्तरोत्तरस्तिस्रोरेग्वा विलिख्यउल्लेखनक्रमेण अनामिकांगुष्ठा- म्यामदमुद्धृत्यपूर्वे क्षिप्त्वा जलेनाभ्युक्ष्य पाद्यगंधादिभिः सम्पूज्य तेजसेपाने अग्निमादायस्वाभिमुखवेद्या स्थापयेत् ततः ब्रह्माएंवृणुयात्-ततः अग्नेमत्तरतः कल्पितासनोपरि ब्राह्मणंपाद्यादिभिः सम्पूज्यवरणसामग्रीकरे धृत्वा श्रोत्या. अमुकोऽहं ममास्यमाणवकस्य करिष्यमाण चूड़ा कर्मणः कृताकृतावेक्षरुप व्रत्मकर्मकर्तुमेभि चरणद्रव्यैरमुकशर्मा ब्राह्मणं ब्रह्मत्वेनत्वामहंवृणे वरणद्रव्यंदत्वाप्रार्थयेत् । यथा चतु. मखो० व्रतोऽस्मीतिप्रत्युक्तिः यथाविहितं कर्मकुरु करवाणीत प्रतिवचनम् । ततोऽग्ने दक्षिणतो ब्रह्मणेत्रिभिः कुशरासनंदत्वा । तत्र ब्रह्माणंपूर्वतोऽग्नेः परिकाम्यकल्पिताशने उपवेशयेत् । ततो ऽग्नेरुत्तरत श्रासनद्वयं प्रणीताप्रोमण्योराधाार्थकुशैकल्पयित्वा प्रणीतापानं दक्षिणहस्तेनादायसव्येपाणौकृत्वा जलेनापूर्य कुशै- राच्छाद्यब्रह्ममुग्वमवलोक्य पश्चिमासने निधायालभ्यपूर्वासने निदध्यात् । ततः कुशमुष्टिमादाय पूर्वपश्चिमयोरुत्तरार्दक्षिणो- त्तरयोः पूर्वाग्रैः कुशैः परिस्तरणकृत्वा । ततस्त्रीणिकुशतरूणानि द्वैपवित्रेप्रोक्षणी पात्रमाज्यस्थाली चरुस्थाली पंचसंमार्जनकुशान सप्तोपयमनकुशान, तिस्त्रः समिधः वमाज्यं सदक्षिण पूर्णपा- नम्, कर्मदक्षिणां चैतानिवस्तृनिमाक्संस्थानि उदगग्राणि-अग्ने- मत्तरतः स्थापयेत् । ततः कुमारस्यमाता सुग्बोष्णजलेन कुमार संस्नाप्यतस्मै श्रहतेवाससीपरिधाप्यतमंके श्राधायोग्नेः पश्चिमत:- (१) कर्मकाण्डरक्षाकरे, चूड़ाकरणपतिः । - भर्तुर्वामभागे उपविशति । ततस्त्रिभिः कुशट्टै पवित्रेप्रच्छिन्। प्रोक्षणीपात्रप्रणीतातः उत्तरतोनिधायप्रणीतोदकेनाभ्युच्यतज्जलं पवित्राभ्यामुत्पूयपवित्रे प्रोक्षण्यांनिधाय तत्प्रोक्षणीपात्र सव्येकरे कृत्वा तदुदकंदक्षिणानामिकांगुष्ठाभ्यामुच्छाल्यप्रणीतोदकेनप्रोक्ष्य तमोक्षणयुदकेना ज्यस्थाल्यादीनि समस्तवस्तूनि प्रोक्षयेत् । ततः श्राज्यस्थाल्यामाज्यं प्रक्षिप्य ब्रह्मातमग्नावारोप्य श्रावयित्वा प्रो क्षणीपात्रमग्निप्रणीतयोमध्येनिदध्यात । ब्रह्माज्यमवतार्य ज्वल- दुल्मुकमादायाज्योत्तरतः समन्ताभ्रामयित्वा प्रक्षिपेत् । प्रणीतो दकास्पर्शः । श्रुवमादायाधोमुख प्रतप्योपस्पर्य पंचसंमार्जन कुशा अर्मूलतोऽग्रपर्यन्तं कुशमुलैरग्रतो मूलपर्यन्तंसमाया॑भ्युक्ष्यच पुन: प्रतप्योपस्पृश्य स्वदक्षिणतः कुशोपरिनिदध्यात् । आज्यमुत्था- प्याग्नेः पश्चादानीय पवित्राभ्यामाज्यमुत्पूयप्रोक्षणी चोत्पूयसप्त उपयमनकुशान् सव्येहस्ते कृत्वोतिष्ठन्ताक्ताः समिधस्तूष्णी मग्नौ प्रक्षिप्य प्रोक्षण्युकदेन ईशानादयुत्तरपर्यन्तंपर्यक्ष्य पवित्रेप्र- णीतायां निधाय प्रोक्षणीपात्रं संखवधाराणार्थ अग्निप्रणीनयो- मध्येनिधाय पाद्यादिभिः सभ्यनामाग्निं 30 सभ्यनामाग्नयेनमः, इति मंत्रेणावाहा 30 एतन्ते० पठित्वाॐ भूर्भुवः स्वःसभ्यनामा- ने, इहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिष्ठितो वरदोभवेतिप्रतिष्ठाप्य 30 तदे वाग्निस्तदादित्य स्तद्वायुस्तदुचन्द्रमाः । तदेवशुनं तदब्रह्मताs- आपः सप्रजापतिः । इति ध्यात्वा चत्वारिशृंगा० इति च पठित्वा 3 सभ्यनांमाग्नयनमः, इति मंत्रणासनपाचादि नीराजनान्तस- म्पूज्य रेखापूजनं,30 संसत्वायनमः ॐ रंरजसेनमः ॐ तंतमसे नमः . जिव्होभ्योनमः जिव्हापूजनं च कृत्वा दक्षिणंजान्याच्य ब्रह्मणान्वारब्धो जुहुयात् । तत्रप्रत्याहुत्यनचरं सुवावस्थित हुतशे पघृतस्य प्रोक्षनीपान्नेमक्षेपः कार्यः । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतयेनमम इति मनसा 30 इन्द्रायस्वाहा इदमिन्द्रायनमम । ॐ अग्नये स्वाहा इदमग्नयेनमम । स्वाहा इत्याघारावाज्यभागी च हुत्वा भूरादिहोमकुर्यात् । ॐ भूरादिव्याहृतीनां प्रजापति कर्मकाण्डरनाकरे, चूडापरणपद्धतिः। (४६) ऋपियत्र्युष्णिगनुष्टुप्छन्दांसि अग्निवायुसूर्या देवताश्चूडाकर- गांग होमे विनियोगः | ॐ भूः स्वाहा इदमग्नयेनमम । अभुवः स्वाहा इदं वायवेनमम , ॐ स्वः स्वाहा इद सूर्यायनमम । ॐ त्वन्नोऽअग्न इति यामदेवपि स्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निवरुणोदेवते चूड़ा- करणांग होमे विनियोगः 30 त्वन्नोऽग्ने व्वरूपस्य विद्वान्देव स्यहेडोऽअवयासिसीष्ठाः यजिष्ठो वन्हितमः शोशुचानो विश्चा द्वेषा ॐ सिप्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम । 30 सत्वन्न इति वामदेवास्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निवरुणौदेवते चूड़ाकरणांग होमे विनियोगः | ॐ सत्यन्नोऽअग्ने अवमोभवो तीनेदिष्टो ऽअस्या उपसोब्युटौ । अवयवनोव्याण र्ट० रराणोचीहिम- डीक ई० सुहयोन एधि स्वाहा इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम । ॐ भयाश्चाग्न इति वामदेवर्षिस्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवता चूड़ाकरणांग होमे विनियोगः ३० अयाश्चाग्नेऽस्य नभिशस्तिपाश्चसत्यमि स्वमयाऽअसि । अयानोयज्ञं वहास्ययानोधेहिभेषज ॐ स्वाहा इदमग्नयेनमम । ॐ येते शतमिति वामदेव वापिस्त्रिष्टुप्छन्दः व्वरूप:सविता विष्णुर्विश्वेदेवामरुतः स्वाश्चदेवताः चूड़ाकरणांगहोमेविनियोगः । ॐ येतेशतंवरुणयेसहस्रंयज्ञियाः पाशाब्बिततामहान्तः । तेभिनाऽअद्यसचित्तोतविष्णुर्विश्वे{चन्तु मानास्वस्त्रिहा-दंवरुणाय सवित्रे विष्णवे, विश्वेभ्यो मरु द्भ्यः स्वभ्यश्चनमम || 0 उदुत्तममितिशुनाशेफ ऋपिस्त्रिष्टु- प्छन्दो चरणोदेवता चूड़ाकरणाडहोमेविनियोगः। 0 उदुतम ज्वरुपपाशमरमधवाघमंचिमध्यमश्रथाय । अथाव्वयमादित्य- व्रतेतवानागसोऽअदितयेश्यामस्वाहा-इदंश्चमणायादिलयेनमम ! ॐ प्रजापतयेस्वाहा-इदंप्रजापतयेनमम । ॐ अग्नये स्विष्टकृते स्वाहादअग्नयेस्विष्टकृतेनमम । इत्याज्याहुतिहोम विधाय- संम्रयंप्राशयेत् । ततःप्रणीतोदकेनसंमार्जनकृत्वापवित्रप्रतिपत्ति विधाय प्रणीताविमोकंकृत्वा पूर्णपात्रंसम्पूज्यव्रह्मणेदद्यात् । तत्र संकल्पः-अग्रेत्यादि ममास्याकस्यामुक राशेरमुकनाम्नः कृत- (५८०) फर्मकाण्डरत्नाकर, चूडाकरण पद्धति । च्चूड़ाकरणकाडीभूतहोमकर्मणःसांगतासिद्धय-इदंसदक्षिणपूर्ण पात्रंब्रह्मणेतुभ्यसम्प्रददे । ॐ तत्सन्नममइतिदत्वा । लग्नदानानि- कुर्यात्--संकल्पः । अयेत्यादि० अमुकोऽहंममास्यामुकराशेः कुमारस्य चूड़ाकरण सामयिकलग्नावधिकेनामुकलग्नेनसर्यादिनव ग्रहाणाराणांदुष्टदोपोपशान्त्यैशुभानांशुभफलाभिवृद्धयै, इदं सुवर्णरजतादिद्रव्यममुकदैवतं-अन्यद्धान्यादिद्रव्यवा-अमुकशर्मणे देवजायाचार्यायवादास्ये । तत्सन्नमम । ततश्चूड़ाकरणसामग्री कल्पयेत् । ततस्तानस्यकुण्डिकाद्वयंसुग्योष्णशीतलचजलम् । पूर्वो- तस्थापितवस्तूनि प्रानडुहगोमयगव्यनवनीतादिपिण्डानि कर्तर तुरशललीकंटकनवसंख्याककुशतमपत्रिकाणि नूतनंकांस्यपात्रं नापितश्चेमान्युपकल्प्य-कांस्यपात्रेयानडुहगोमयस्य वर्तुलाकृ- तिमध्यग्वातपुष्करंकृत्या तन्मध्येदधिदुग्धनवनीतहरित दर्वाहरि द्रादीनिमंगलवस्तृनिधत्वा कुमारंमातुरंकेधत्वा कर्मवेद्योउतरभागे पूर्वाभिमुखोभृत्वास्वस्तिवाचनादिकं सैरन्ध्रद्वाराप्रथानुसारं मंग- लगीतध्वनिवाजित्रादिपुरःस्सरमुपकल्पितेपात्रे वक्ष्यमाणमन्त्रेण शीतास्वप्सु-उधणाअपमासिचति । उष्णेनेतिपरमेष्टिऋषिः प्रतिष्टाछन्दोलिङ्गोक्तादेवता-उष्णोदकाशेके विनियोगः । उष्णे नब्बायऽउदकेनेहादितेकेशान्वपाततस्तृष्णींदधिकृतनवनीतपिण्डा न्यप्सुप्रक्षिपेत् । ततःपित्ताचाकर्माचार्योवक्ष्यमाणमंत्रेण जलमा- दायस्ववामभागस्थितागामातुर्दक्षिणभागेस्थितस्यपूर्वाभिमुखस्य- कुमारस्यादौ मूलभागेदक्षिणपावस्थंगोदानाधः स्थितामेकांजूटि- कामाद्रीकरोति । ॐ सवित्रेतिप्रजापतिषिर्गायत्रीछन्दापो- देवताक्लेदनेविनियोगः । ॐ सवित्राप्रसूताईव्याऽआपऽउन्दन्तुते- तनम् । दीर्घायुत्वायसे । ततस्त्रेण्या (विश्वेतया) शलल्या (शलकीकंटकेन ) तृणीकेशान विरलान् कृत्वोर्ध्वमूलानिजूटिका संलग्नामाणिवीणिकुशतमणान्यन्तर्दधाति चयमाणमंन्त्रेण-- श्रोपधे-इत्यस्यप्रजापतिपिर्यजुश्छन्द प्रोपधिदेवताकुशान्तर्धाने विनियोगः । ओषधेत्रायच स्वधितेमैन हिर्ट०सीः। ततः (५०२) कमकाएरत्लाफर, चूदाकरणपद्धति । सकुशकेशान् पितासव्येनहस्तेनगृहीत्वा दक्षिणकरेणवत्यमाण मन्त्रणक्षुरंगृह्णाति । शिवोनामेल्यस्यप्रजापतिपिर्यजुश्छन्दः क्षुरोदेवताचरग्रहणेविनियोगः । 30 शिवोनामासिस्वधितिस्ते पितानमस्ते अस्तुमामाटैि सीः। ततोवक्ष्यमाणमन्त्रेण ताम्र- परिष्कृलमायस क्षरमादायसकुशकेशेषुनिदधातिसंलग्नंकरोती- त्यर्थः । निवर्तयामीत्यस्यप्रजापतिपिर्यजुश्छन्दः चरोदेवता पूर्वगोदानस्थप्रथमजूटिकायां चरनिधानेविनियोगः । 30 निवर्त- याम्यायुपेऽन्नाद्यायप्रजननायरायस्पोपायसुप्रजास्त्वायसुचीर्याय । ततोवयमाणमन्त्रेण सकुशप्रथमकेशजूटिकां सुरेणप्रच्छिनत्ति । ॐ येनावपत्सविताक्षुरेणसोमस्यराजोव्वरूपस्थविद्वान् । तेन- ब्रमाणोव्वपतेदमस्यायुप्यंजरदष्ठियधासत् । ततरिछन्नसकुशकेश- जटिकां पितामागग्राणिशिशुमातुर्हस्तेदद्यात् । साचस्ववामपाव स्थापित कांस्यपात्रमध्येयानहगोमयपुस्फरेनिदधाति । अत्र- जलस्पर्शकुर्यात । एवमेव विधिनेतरजूटिका द्वयस्यापिप्रत्येकजूटि- कायाः पूर्वोक्तरीत्या-यार्दीकरण-शलल्यामथक्करणम्-कुशत्रि- कान्तर्धान-क्षुरग्रहणं-जटिकोपरितुरसंलग्नीकरण---सकुशकेशम- च्छेदन---छिन्नकेशानांमातृहस्तेदानंतथा- आनुडहगोमयपिण्ड- निधानान्तं च मन्त्र रहितं द्विवारं कुर्यात् । इति दक्षिण गोदानम् । पश्चिम गोदाने पूर्ववदक्षिणभाग जूटिकाया:- ॐ सवित्रा मसूता० द्विवारं चेति मन्त्रेण क्लेदनम् । तृष्णी शलल्या विरली करणम् । ॐ श्रोषधे प्रायव० इति मन्त्रेण कुशत्रिकान्तर्धानम् । क्षुरस्पतु सकृद् ग्रहणानपुनर्मत्र संस्कारः। (एक द्रव्ये कर्मावृत्तौ सकृन्मंत्र वचनम्) इति कात्या- यनोक्तः । निर्वतयामीनिमन्त्रेण केशेषु तुर संलग्नं । छेदने विशेष:-30 यायुपमित्यस्प नारायणपि रुष्णिक छन्दोऽग्नि- देवना पश्चिम गोदानस्थ प्रथमजूटिका छेदने विनियोगः । ॐ ध्यायुपं जमदग्नेः कश्यपस्य व्यायुपम् । यद्देवेषु व्यायुपं तन्नोऽ- अस्तु व्यायुधम् । इतिहित्वापूर्ववद् गोमयपुष्करे निदध्यात् ।
कर्मकाण्ड नाफर, चूड़ाकरणपद्धति । (५०१) जलस्पर्शः। पश्चिमगोदानस्थ शेपजूटिकयोरपि-उन्दनादि गोमय पिण्ड निधानानि तृष्णीं वारद्वयं कुर्यात् । जलस्पर्शश्च ॥ इति. पश्चिमगोदानम् । अथचोत्तरगोदाने प्रथम जूटिकायाः ॐ सवित्रा प्रसूता० इति क्लेदनम् । शलल्या नूष्णीं विरली करणम् । ॐ श्रोपधे घ्यायुष्य कुशान्तर्धानम् । नूष्णीं चरादानम् । ७० निवर्त- यामि चरनिधानं च कुर्यात् । छेदनमात्रस्यैव प्रथमंत्रः । ॐ यनेति वामदेवर्षि यजुश्छन्दः क्षुरोदेवता उतरस्थजूटिकाकेश छेदने विनियोगः । ॐ यनेभूरिश्वरा दिवं ज्योक् च पश्चाद्धि सूर्यम् । तेन ते व्वयामि ब्रह्मणा जीवातवे जीवनाय सुश्लो- क्यायस्वस्तये । इति छित्यापूर्ववद् कुमारमाता गोयम पुष्करे प्राशयेत् । जलस्पर्शः । एवमुत्तर गोदानस्थेतरजूटिकयोरपि क्लेदनं विनयनं कुशान्तर्धानं-तुरादानं-तुरनिधानं-छेदनंगोमय पिण्डमाशनं च तृष्णीं कुर्यात् । जलस्पर्शः । ततो वक्ष्यमाण मंत्रेण सकृत्कुर्यात् ॐ यत्तुरेणेति वामदेवऋषिर्यजुश्छन्दः क्षरोदेवता शिरसिक्षर परिहरणेविनियोगः। ॐ सरक्षरेण मज्जयता मुपेशसाध्वपला वावपति केशाँपिछन्धि शिरोमाऽस्यायुः प्रमोषीः। इतिवारमेकं चरं शिरसिभ्रामयित्वा वारद्वयं तूष्णीं भ्रामयेत् । ततो नापितमाहय नापितस्तच्छेषजलेन सुखवपनार्थ सर्व शिर श्राद्री कृत्य वक्ष्यमाणमंत्रेण नापिताय सुरंप्रयच्छेत् । ॐ अक्ष्व- एवन्नित्यस्य वामदेवऋपिर्यजुश्छन्दः चरोदेवता नापिताय तुर प्रदाने विनियोगः । ॐ अदण्वन् परिवप । इति नापितहस्ते दुरंदत्वा परिचपामीति नापितो चूयात् । ततो नापितोऽपि शलल्या 'पूर्वशिग्वं-उदकशिखं, मध्यशिखं वा यथा कुलाचार वर्तलाकारं कृत्वा सूत्रेणवेष्टयित्वा शिखायज्य केश चपनंविधाय माता पूर्ववद् गोमयपुष्करेप्रासयेत् । मातृका विसर्जनान्ते स्वल्प- जलाशयेतदभावे गोष्ठेचानिधापयेत् । ततः पर्युप्तशिरसं सुस्नातं कुमारं पुप्पमालावरत्रादिभिरल कृत्य होमवेदी समीपमानीय- अग्नेः पश्चादुपवेशयेत् । प्राचार्याय वरं गोदानं वा तिलपात्र फर्मकाएरत्नाकरेचदाकारण पद्धतिः। (५०१) दानं वा तनिष्क्रयीभूतद्रव्यं हस्तेधृत्वा अद्यत्यादि० अमुकराशे रमुकनाम्नः पुत्रस्य चड़ाकरणकर्मणः सांगफलावाप्तये साद् गुण्यार्थमिमांदक्षिणाममुकशर्मणे-प्राचार्याय तुभ्यमह · सम्म ददे । नानागोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो भूयसीं दक्षिणां च दास्ये सांगतासिद्धयर्थ दशनात्मणान् वा यथासंख्यकान्भोजयिष्ये । इति संकल्प्य सभ्यनामाग्निसम्पूज्य हस्तेऽक्षतानादाय ॐ गच्छगच्छ सुरश्रेष्ट स्वस्थानेहव्यवाहन । इष्टकाम समृद्धयर्थ पुनरागमनं कुरु । (पूर्णाहुतिन भवति ) ततस्यायुपकरणं कृत्वा गणेशादि पंचाग देवता विज्याचार्यों मनलाभिषेकतिलकमंत्राशिपं च दद्यात् । इति चूड़ाकरणपद्धतिः। अथ कर्णवेधपद्धतिः। .. अथच कर्णवेधो देशाचार कुलाचारतो व्रतबन्धात्पूर्व मेव तृतीये पंचमे सप्तमे चव ज्योतिः शास्त्रोक्त चन्द्रनारानुकले सल्लग्ने शुभेऽह्नि पिता स्वकीय प्रातः कृत्यं निवर्त्य गणेशादि- पञ्चागदेवतानां पूजनं कुर्यात-तत्र स्वासन उपविश्याचम्य दीपं प्रज्वाल्या संस्थाप्य संकल्प:--अोइत्यादि-अमुकोऽहममुक- राशेः पुत्रस्य करिष्यमाण कर्ण वेध कर्मणि निर्विधताप्राप्तये पूर्वांगत्वेनगणपति पूजनं करिष्ये तदंगतया गौर्यादिपोषमात्- पांपूजन कलशस्थापनं पुण्याहवाचनं नान्दीश्राद्धं वसोर्धारा पातनं नवग्रहपूजनं च करिष्ये-इति पूर्वोक्त प्रकारेणसम्पूज्य ततः कलशे केशवादि देवानां पूजनं कुर्यात् । सङ्कल्प:-अद्येहेत्यादि संकी- ामुकोऽहममामुकराशेरमुकनाम्नः पुत्रस्य वीजगर्भ समुदभवनो निवर्हण द्वारा पुष्ट्यायुः श्री विवृद्धये च कर्णवेध कर्मणि कलशे केशवादि देवानां पूजनं करिष्ये-ॐ भूर्भुवः स्वः केशवादि देवा अस्मिन्कलशेसमागच्छन्तु तिष्ठन्तु सुप्रतिष्ठिता वरदाभवन्तु ॐ ५०) कायरतावारे कर्णधासनिः। एतन्ते० प्रतिष्ठाप्य ॐ केशवायनमः । ॐ हरायनमः । ॐ ब्रह्मणे नमः । ॐ चन्द्राय नमः । ॐ सूर्याय नमः । ॐ दिगी शेभ्यो नमः । ॐ नासत्याभ्यां नमः । वायवे नमः। 30 सर- स्वत्यै नमः । ॐ स्वेष्ठ देवतायै नमः । ॐ ब्राह्मणेभ्यो नमः । ॐ गवे नमः | ॐ गुरुभ्यो नमः । इति नाम मन्त्रैः पाद्योदिभिः सम्पूज्य स्वेष्टदेवं ब्राह्मणान् भिपकवरं सौचिकं च नमस्कृत्य ततो माता भूषण वस्त्रादिभिरलंकृतं वालकप्राङ्मुख गुरमोदकादि- भुजानं स्वोत्संगे धृत्वा अद्येहेत्यादि संकीर्त्यामुकोऽहममुकराशे रस्यममवालकस्यकर्णवेध लग्नाद्यत्रकुत्र स्थानस्थितदुष्टग्रहैः सूचि तारिष्ट निवृत्यर्थंग्रहाणां प्रीतये-इमांलग्नदान दक्षिणा ममुकशर्मणे विप्राय दास्ये इति लग्न दानं कृत्वा शुभेलग्ने पितायान्यो सौचिको ब्राह्मणस्य सुवर्णशलाकया रजतशलाकया वायुरूपस्यादौ दक्षिण कर्णमभिमन्यवेधयेत् मंत्र:-ॐ भद्रंकणेभिरिति प्रजापतिपि स्त्रिष्टुप्छन्दो लिङ्गोक्तादेवता दक्षिणकर्णाभिमंत्रणे विनियोगः ॐ भद्रं कर्णेभिः शृणुयामदेवाभद्रंपश्येमाक्षभिर्यजत्राः स्थिरैरं- गैस्तुष्टवा ॐ सस्तनूभिर्व्यसेमहि देवहितंयदायुः । इति दक्षिण कर्ण चैधयित्वा वाममभिमन्त्रयेत् -अवयन्ती वेदेति प्रजापति पिस्निप्छन्दो लिङ्गोक्तादेवना वामकर्णभिमन्त्रणे विनियोगः ॐ वक्ष्यन्तीवेदागनीगन्ति कर्ण प्रिय र्ट. सखायं परिपस्वजा। योयेवसिंक्ते वितताधिधन्वन् ज्याइय र्ट० समनेपारयन्ती । इति वामकर्ण वेधयेत् • कन्यकाया मन्त्ररहितमादौ वामकर्ण वेधयित्वा ततो दक्षिणकर्णवेधनानन्तरम् वामनासापुटमपि वेध. येत् । अयेत्यादि संकीर्त्य अमुकोऽहं मामास्य वालकस्य कर्णवेध * टि–(कन्यायाः ज्योति शास्त्रममारोन-कन्यायाघ्राणवेध स्यात्सद्वारे विषमेन्दके । शाययाम सिते पक्ष मैत्रक्षिप्रोत्तराचरे॥वामॉग चैपसौभाग्यं नारीणां शास्लमपितम् । सव्य कणं केवयित्वा यश्चादक्षिणचित् ॥ यामनामापुटं चैव च्छेदयेत्तु अमनम्।
फर्मकायरानाकरे अक्षाराम्भपातिः। (५०५). कर्मणः सांगतासिद्धयै-इमां भयसींदक्षिणां नानानामगोत्रेभ्यो विप्रेभ्यो विभज्यदास्ये तथा च ब्राह्मणाम्भोजयिष्ये । इतिदत्वो- त्तरांगपूजनं कृत्याभिषेकतिलकमन्त्राशिपं दद्यात । इति कर्णवेधपद्धतिः। . अथाक्षर स्वीकार विद्यारंभ परिभापा। प्रथ च-अक्षरारंभः, धर्म नौकायाम्-~-विद्यारंभ. पंकऽदे शुभः स्यातत्तुभं हित्वा मौभ्यसंज्ञेयनेऽक । हरतादित्ये वायुमित्रेच शके पौरो दखे लाद विष्णो शुभः स.। मन्दारलग्नांश दिनं विहाय राशौस्थिरे कृष्ण दिप्तमेव । रिक्ताटमीयनलं रिहायशुद्धेऽष्टम चाक्षरस्वीकृतिः स्यात! संस्कार प्रकाशे माकरडेयः-अभ्यंगस्नानपूर्व तुगंधायैश्च विभूषितः। रक्त वस्नं समास्तीर्थ तण्डुलोपरिपूजयेत् । पूजयिका हरि लक्ष्मी देवीं चैव सरस्वतम् । रवविद्या सूक्कागश्च स्वविद्या- श्चविशेषत: । एतैपामेयदेव.नानाम्नाय हुयातम् । दक्षिणाभिनिाग्याणांकर्तव्यंच.त्रपूजनम् । प्राइमुसोगुरुरासीनीवरुण शामुरपशिशुम् । अध्याययोतप्रथमंद्विजार्श नि:प्रपूजितम् । परिप्रतिपर्दिचैव वयित्वातथष्ठमीम् । रिक्तपिञ्चदशीचैयारिभौमदिनंतथा । एवमुनिश्चितकालबिद्यारम्भंतुक र येत् । विगेपोज्योति.माग्यपुष्टव्य । नि. विद्यारंभपरिमापा ।। ॥ अथअक्षरस्वीकारविद्यारम्भपद्धतिः ॥ - 0:0:0:0::- अथचकुमारपितानित्यकर्मविधाय पूजास्थलमागत्य दीपंप्रज्वाल्य भूतोत्सादनादिकर्मकृत्वा तत्रादौशान्तिपाठंकृत्वा अर्घसंस्थाप्य- तज्जलेनात्मानपूजासामग्री च संप्रोदय प्राणानायम्यगणेशादि- पंचांगदेवान्पूर्वोक्तपद्धत्यनुसारेणसंपूजयेत् संकल्पंकुर्यात्-अद्य- त्योदिसकीामुकोऽहं, अमुकराशेरमुकशर्मणोऽस्यपुत्रस्यसकल विद्यापारंगत्वप्राप्तिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ, अक्षरारंभंविद्या- कर्मकार डरत्माकरे अक्षर र पद्धतिः । -- रंभचकरिष्ये,, नत्पूर्वागतयागणेशादिवरुण पूजनं पुण्याहवाचन.. मातृकापूजनं बसोर्धारानिपातननान्दीश्राद्ध-नवग्रदार्चनंचकरि- प्ये,, ततस्तत्तत्कर्मकृत्वाकञ्चिन्मनोहर काष्टपीठोपरिनवंश्वेत- वस्त्रप्रसार्यतत्रदध्यक्षतपुंजेषुवक्ष्यमाणविधिना वक्ष्यमाणदेवामा- चाहयेत्-संकल्पः-अद्यत्यादि. अमुकोऽहं अमुकराशे रस्थमम पुत्रस्याक्षरस्वीकार विद्यारम्भकर्मणोःपूर्वागत्वेनदध्यक्षतपुंजेषु गणेशादिश्यैनिकान्त देवानां वेदादि प्रवर्तकानांब्रह्माद्याचार्याणां, वेदादि विद्यानां च, अावाहन पूर्वकं नाममंत्रः पूजनं करिष्ये, तत्रादीमध्ये--ॐ भूर्भुवः स्वः, गणेश, इहागच्छेहतिष्ठ, पूजार्थमा- वाह्यामि, एवंसर्वत्र-ॐ भूर्भुवः स्वः विष्णो इहा । ॐ भू० लदिम, इ० । ॐ भू० कुलदेवि इ० । 30 भू०. सरस्वति। 0 भूनहनिहा० । ॐ भू० व्यास ३० । . भू० गौतम इ० । ॐ भू० मिने० इ० । 0 भू० मनो इ० । 3. भू० पाणिने इ० । 30 भू० कात्यायन इ० । 30 भू० पातञ्जले इ० । ॐ भू० गास्क इ० । भू० पिंगल इहा० । ॐ भू० गर्ग इहा । ॐ भूकपिल भू° कणाद इ०। धन्वन्तरे इ० । 0 भू० वामन इ० । ॐ भू° कृशाश्व इ० । 30 भू० भरत इ० 10 भू नकुल इहा० । 30 भू० गोभिल इ0 130 भृ० यजुर्वेद इ° । ॐ भू० ऋग्वेद इ० 1 30 भू० सामवेद इ० 1 30 भृ० अथर्ववेद इ० । 30 भूर्भुवः स्वः, अष्टादश पुराणानि, इहा- गच्छन्त्विह तिष्ठन्तु पूजार्थमावाहयामि । ॐ भू° न्याय इ० १ 30 भू० मीमांसे इ० । 30 भू० धर्म शास्त्र इ० । 30 भू० शिक्षे इ० ॐ भू० कल्प० । 0 भू व्याकरण इ° । ॐ भू० निरुक्त इ० । ॐ भू छन्दांसि, इहागच्छन्त्विहतिष्ठन्तु, ॐ भू० ज्योतिप इ०॥ वेदान्त इ० 1 30 भृ' सांख्य इ० । ॐ भू० पातलल इ०॥ ॐ भू० काव्य इ० 1 ॐ ० अलंकार इ° । . वैद्यक इ०॥ ० धनुर्वेद इ० । ॐ भूगांधर्ववेद ३० । ॐ भू० शिल्प- शास्त्र ३० । भू० पालकाप्प इ० [ 30 भू० शालिहोत्र इ० । भू० वाल्मीके 30 भूत पकार डरलाकरे, अक्षयरम्मपद्धतिः । (५०७) 30 भू० पालकाचार्य इ० । 30 भू० विश्वकर्मन् इ० । ॐ भू० श्यैनिक इ० इतिमंन्त्रैराबाहा ॐ एतन्तेति प्रतिष्ठाय, ॐ भूर्भुवः स्वः गणेशाद्यावाहितदेवाः सुप्रतिष्टिना वरदा भवन्तु ॥ अत्र गणेशादीनासावाहने पूजने च विशेष:-ततः प्रादेशमात्रां भूमि गोमयेनोपलिप्य पालाश दंडोहतांमृद मानीय सैक तं स्थंडिलं- निर्माय तस्योपरितया मृदा पंचकोणं पट्कोणं वा सरस्वती यंत्रं कृत्वा सरस्वतीमावायेन-~30 भूर्भुवः स्वः, भुवनमातः सर्ववाझय रूपेसरस्वति, इहागच्छेहतिष्ट, 30 एतन्तेति पठित्या 30 स० अस्मिन्यत्रे सरस्वतितुप्रतिष्ठितावरदाभव इतिप्रतिष्ठाप्य तत्रादौ गणेशंध्यायेत्---अविरलमदधारा धौत कुंभः शरण्यः, फणिवरवृतगात्रः सिद्धसाध्यादिवंद्यः त्रिभुवनजनविघ्न ध्वान्त विध्वंसदक्षो, वितरतुगजवक्र संततं मंगलवः ॥ ततोविष्णु-- उद्यत्कोटि दिवाकराम मनिश शंख गदां पद्मज, चक्रं विनन मिन्दिरा वसुमती संशोभि पाद्वयम् । कोटीराङ्गद हार कंडल धरं पीताम्बरं कौस्तुभोद्दीप्नं विश्वधरं स्ववक्षसि लसच्छ्रीवत्स चिन्हं भजे ॥ ततो लक्ष्मीकान्या कांचन सनिमा हिमिगिर साध्यैश्चतुभिर्ग:इस्तोरिक्षक हिरण्मयामृतघट रापिच्यमाना श्रियम् ।। विश्राणां वरमज युग्ममभयं हस्तः किरीटोज्पला, क्षौमाबद्ध नितम्ब विम्य ललितां धन्वेऽरविन्द स्थिताम ततो देवीं-अध्यारूढां मृगेन्द्र सजल जलधर श्यामला हस्तपः, शूल वाणं कृणणं त्वरि जलजगदा चाप बाणान्वहन्तीम् ॥ चन्द्रो तसांत्रिनेत्रा चतरभिरभितः खेटकंविभ्रतीभिः, कन्याभिः सेव्य- मानां प्रतिभट भयदां शूलिनीं भावयामि ॥ ततः सरस्व तीम्या कुन्देन्दु तुपार हार धवलाया शुभ्रवस्त्रा वृता या वीणा वर दंड मंडित करा पद्मासना । या ब्रह्माच्युत शंकर प्रभृतिभिर्देवैः सदा वन्दिता सामापातु सरस्वती भगवनी निःशेष जाध्या पहा ॥ इति ध्यात्वा- वयमणमौः सर्वेषांपूजनकुर्यात्-30 गणानान्त्वा० । वि. या श्वेत (५८) कमाण्डरत्नाकरे अगर पद्धति । ५ ष्णोरण्ट 30 श्रीश्चते। 32 सरस्वतीयोन्यांगर्भमतरश्विभ्यां पत्नीसुकृतंवित्ति । पाया रसेनव्वरुणेनसाम्नेन्द्र ॐश्रियैज- नयन्नप्सुराजा । वापूर्वावाहितदेवेभ्योनमः इति मंत्रेण पाद्यादिभिः पंचोपचार पूजनंकृत्वा । ततो वेद्यांपंचभूसंस्कारपूर्वकमग्निसं- स्थाप्य, आचार्यब्रह्मणोधरणपूर्वक ब्रह्मोपवेशनादि पक्षणान्तं कर्मकृत्वा पूर्वोक्तस्थापनक्रमेण नामद्वितीयान्तमंन्न द्रव्यदेव- ताभिर्ध्यानकुर्यात् संकल्पः-अद्येत्यादि० अमुकोऽहं अमुकराशे- रमुकवालकस्याक्षरारम्भ विद्यारम्भ होमकर्मणा, प्रजापत्यादि श्यैनिकान्तान् तथा भूरादि प्रजापत्यन्तान्देवान् अग्निस्विष्ठकृतं चा ज्येनयक्ष्ये, इति तत्तद्देवताभ्योमयापरित्यक्तं यथादेवतमस्तुन मम । 30 भूर्भुवः स्वः पुष्टिवर्द्धननामाग्ने इहागच्छेहतिष्ठ, 30 एतन्तेति प्रतिष्टाप्य, 30 पुष्टिवर्द्धननामाग्नयेनमः इति समपूज्य, जिह्वा पूजनं रेखापूजनंकृत्वा प्राचार्य ब्रह्मणोर्वरणंकृत्वा 30 प्रजा पनयेस्वाहा इदं प्रजापतयेनममः। 30 इन्द्रायस्वा इदमिद्रायनमम अग्नयेस्वाहा इदमग्नयेनमम । सोमायस्वाहा इदंसोमाय नमम । इत्याघारावाज्यभागौहुत्वा पूर्वस्थापनक्रमेण चतुर्थ्यन्तैर्ना मयंत्र रेकैकामाज्याहुति गणेशादि श्यैनिकान्तेभ्योजुहुयात् ॐ गणेशायस्वाहा, ३० विष्णवेस्वाहेत्यादि हुत्वा भूरादिनचाहुतिहोम सिष्टकृद्धोमं च समाप्यपूर्णपात्रदानान्तं कृत्वा, प्राचार्यादिभ्यो होमनिमित्तकदक्षिणांदत्वा, तत अभ्यंगस्नान पूर्वक वस्त्रालङ्कारा दिमिभूपितं कुमारंगणेशादि देवान्प्रणमय्य, लग्नसामयिकदाने कुर्यात् दानसामग्री ब्राहमणं च सम्पूज्य संकल्पंकुर्यात्-प्रोत्या. दिदेशकालौ संकीर्त्या मुकोऽहं करिष्यमाणाक्षरस्वीकार विद्यार- म्भ लग्नाद्यत्रकुत्र स्थानस्थितानां सूर्यादि ग्रहोणां शुभानां शुभ- फलाभिवृद्धये पूराणां दुष्ठफलनिवारणार्थ मिदंसुवर्णरजतादिद्रव्य यथानाम देवत्यममुफ शर्मषे ब्राहमणायदास्ये, 30 तत्सन्नमम,, ततो गुम्वृणुगान् वस्त्रालंकरणादिवरणासामग्री सम्पूज्य गुरूंच- अयेत्यादिसकीामुमोऽहं करिष्यमाणाक्षर स्वीकार चिद्यारंभकर्म- कर्मकाराष्टरलाकर विद्यारम्भपद्धति. । (५०६ ) णिएभिर्वरणद्रव्य रमुकशर्माणं ब्राह्मणं गुरुत्वेनवृणे-इतिसामग्री तस्मैदत्वा,, ब्राह्मणाः ॐअक्रन्कर्म० इति पठित्वा,, कुमारो गुर प्रार्थयेत-पुष्यहस्त:-ॐ गुब्रमागुरुर्विष्णु गुरुर्देवोमहेश्वरः । गुरुः साक्षात्परब्रह्मस्तस्मै श्रीगुरवेनमः ,, ततोगमः पालाशदडोद्धृत धूलिसंयुतमनोहरे शुभकाष्ट पीठेसुवर्णशलाकया पंचकोणं सरस्व- तीयंत्र विलिख्य,, गमा पूर्वाभिमुग्यो भृत्वापश्चिमाभिमुग्व कुमार कृत्वा,, कुमारः पुष्पहस्त आदौगणेशप्रणम्य ततोयंत्र सरस्वतिमा- वाहयेत्-3भूभवास्वःविद्यामातः सर्ववाझयरुपे सरस्वति, इहा गछेहतिष्ट इत्यावाहा, ॐ एतन्तेति पठित्वा ॐ भूर्भवः स्व:, अस्मिन्यत्रसरस्वति सुप्रतिष्टितावरदाभव, ॐ सरस्वतीयोन्या गर्भमन्तर श्विभ्यांपत्नी सुकृतंविभत्ति । अपा ॐ रसेनबरुणेन साम्नेन्द्र ॐ श्रियैजनयात्रप्सुराजा,, इतिमंत्रेणपाद्यादि नीराजना- न्तं संप्रज्प,, चित्तानुसारं हिरण्परजतादि द्रप मुपायनं समर्पपि त्वा प्रार्थयेत्-सरस्वति नमस्तुभ्यं वरदे कामरूपिणि । विश्व- वन्ये विशालाक्षि विद्यान्देहिनमोस्तुते ,, ततो गुरुंपणमेत-30 अज्ञान तिमिरांधस्य ज्ञानांजनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन त स्मैश्रीगुरवेनमः ॥ ततो गुमः सुवर्णशलाकयारजतशलाकयावा, अकारादिक्षकारान्तावानलिखित्वासंपूज्य चकुमारं ग्राह्यत,, 1-30 नमासिन्द,, अाइ ई उ ऊ ऋ ऋटु ल ए ऐ श्रो औ अं अः॥क ग्व ग घ ङ, च छ ज झज, द ड ढ ण,त थ द धन, प फ ब भ म, य र ल च, श ष स ह क्ष,, इत्ति लेवयि- स्वा---पुनःकुमारंप्रामुखकृत्वा अक्षराणित्रिवारंवाचयित्वा ततो विद्यारंभकारयेत,, 30 नारायणनमस्कृत्य नरंचैवनरोत्तमम् ।। देचींसरस्पतींच्यासं ततोजयमुदीरयेत् ॥ वागर्थाविवसंपृको चागर्थप्रतिपत्तये । जगतःपितरौयन्दे पार्वतीपरमेश्वरी । येनाक्षर समाम्नाय मधिगम्यमहेश्वरोत् । कृत्स्नंव्याकरणप्रोक्त तस्मैपा- विनयेनमः । वृद्धिरादैच । गौरीश्रयाकेतकपत्रभंगं० । यस्यज्ञान- दयासिन्धोः एवंगुरुमुखाच्छुत्वाकुमार पटेत् । ततोगुरुचरणयो (५१०) कर्मकारहरताकरे, अनयनसूत्रन्यांख्या । 3- रुमाभ्यां हस्ताभ्यां वादयित्वा गुरुदक्षिणांच निवेद्यप्रणम्यच भूयसींसंकल्पयेत्-अद्यत्यादि संकीर्त्यामुकोऽहं अमुकराशेः कुमारस्थ अक्षरस्वीकार विद्यारम्भ कर्मणोरङ्गत्वेनअक्षतपुंजेपु गणेशादिदेवतानां पूजनस्यहोमकर्मणश्च साद्गुण्यार्थमिमांदक्षिण नाना नामगोत्रेभ्यो विभज्यदास्ये, 30 तत्सन्नमम यधासंपादि- तान्नेनब्राह्मणांश्चभोजयिष्ये, ततापूर्वपूजित देवानग्निचविसृज्य मन्त्राशिपंगृहीयात् । इत्यक्षरस्वीकारविद्यारम्भपद्धतिः , अथउपनयनसूत्रव्याख्या । अथापनयननिरुपणम् ( अष्ठनपं ब्राह्मणमुपनयत् ।। गर्भाप्टमेवा।।) प्रप्टौ वर्षाणि अतीतानि यस्य प्रसो भष्टापरत न ह्मण द्विजोत्तममुपल्या उप रानारययन र एक रण मस्कुय । ॥ गभाटमपु व गभ गणराह चरित। द अटमो यपा तालि गाहमानि तेषु उपनय : ततश्च पता चगऽग्राम या उपनय दित्यय -(एकादशवपनराजन्यम् ३३) एमाश यागय नीतानि यस्य मौ एक शस्त समतो द्वा श वप इत्"र्थ सज य क्षतियार नर्यात्याज्यते । (छादशवर्ष वश्यम्। ६ । द्वाश य१ ण्यतिबन्तानि यस्य स तथा तं जपत खयोग यशगु नया ॥ (यथा गारा वामपाम् !!) पक्षारामार-अथ या राईपा मााए शनिया यथा भगल यया उनधर्म, गदा र स माला न र गृत्यन्नरोक्त पचप दि यसपग्रह -मनु - दाग पागम्य पाय चित्रस्यपचम ।। सावमाथिन पष्ठ वेशस्यहाथिनो 5 ग ।। (पारायन गा2-52मा "परमारऽपि ।। द्विज यमायाद्विपापस्यमाए । मासला- गहनारद रामपागा पा गुन पवितश्यायवानवसागरम शाधना पद शास्भविद्यानिश रद 1 पनीत कुना विधिवदायर -गर्ग-विन रम्ननितिष शिराश्यपना तगतिविध्याा || पदामा गृहस्पति -शलपन र प्रोफ TETराविपिना । जन्ममासविचार - राजमात एट - दिदायत्तपिटोयष्टीर गगानियतदनानि ॥ गाम्य पत किाम गरिश्च सपा प्रराव गनुगममामि गुरुगुजिमाह महम्मति पानोरया मोरयगुना | शिोगमा दाद्वियाधिकारिया- पाम्-मान गुर गगनतय॥in अनीम दुग्गा पूरये 1ि कर्मचारडस्नाकरे, उपनयनसूत्रव्याग्या । - पुगवाना इतम्रय रलुना सचत्रे पश्चिगयु शुभगो यद रया॥ तिथिमा राजमात गट वृतीका शो गया परमी दशमी तया, । द्वितीगा चम भावला त -तिमहात गातो मस्या तयश्च प्रतिपद्य पिया कुनयुद्धितिशय ॥ वृष्णपन तुर्थी व मातम्गदि दिपय प्रयोदशी चफ 7'अट 1 गलगहा ।। प्रदोष दिनमपिकार्यमुर गाभिलेन-- पर्श च द्वादश च। अरागन का प्रागिर वीज तागा सालिना ॥ बृहदगान्य वचनम् ॥ मायाग प्रगीत यस्तु नैमित्तिो भगा सप्तमा माघ शुॐ तु तृतीया च क्षया ता युमन र वागश रस्ता मात्र ज्योतिर्निया गारद - शायाधिपति पा 7 शा खाधिपयन त श स मिलिग दुनासि मामग्रदे-गाम जुपानिपा गुर मौम्य गौरमिता । नामो विवागाई क्षत्रियाग 7 गुशिाम 5 घनशधारिणम नपारिजात-हम् देव प्रिय 7 शो प्रयासपु पापुन वृस्पती । किानुय धी दिनमा वध ॥ गजमाए पुनर्वसुनिपनि पुगो कृत त्रि पुन गारमही पाहनक्ष नेषु व अविदापास्न्यायास्तदुक्त दीपिाया की हि चत पुगपनत । ॥ प्रशो 72 ह य दिमृच परHT ॥स्वरोदय गुप्त भोगता क-वित पपग्राण ५ गुमा भघु काय पनाय गय ना ॥ सामा यता नगशुद्धिगह ॥ मुत चिन्तामगो नरा 3 ar- रिपव त श भन मग लिप' य गला पूग' गोत्यो पिस्तनो ॥ उत्प तान हल ल प्रतेऽहि पास याया दिो यदि गर्नति गरिय दनध्यायो बन रन विनया ॥ना दा श्र , त घेताद यायम्त्यात तदोपनन कार्य कारभन कारयामदनरत्ननारद विनता व तना पने ग ग्रह । अरहर पनौस पुन ररकारमति सक्टेनुचडेश्वर दाइदिश चव धराप पप्पथ पि M T पतौतथा शुषणप्रपते यह न पुर्याद्वतमगल नि । पिरप याति शास्नद्रव्य (ब्राह्मणाभोजयत्त च) नन्द्राह्मणान् भोनयेत् श्राशयेत राचकगार पन तग्गाश्यदिति ( चा गानुज्यते) (प्युप्तरि समल वृतमा नयति ७) परिमा त उनमुन्तिशिरोय पर्युप्त शिर स्तम कृत यथा स भारतवर्णनिर्मित बल द्यलकार प्रानयति अपुरपा प्राच य समा अच पिनयनकर्ता । तक्रममाह वृद्ध गर्ग पिता पितामहो भ्र ता शन्योग जानता पानायक रीस्यात पूर्व पर पर तथा पितयो। येन (दभाव तुि पिता तदभ १ तुिन ता तदभ वेनुमोदर पितिवित्र पर न क्षत्रिय पैश्यया त्योस्तु पुरोहित (वउपनर सदृष्टय वा त्योस्वध्यानऽनधिकार तमाचार्य लक्षणयमनोक्तम्-स यवर लिपाक्ष सवभूतस्य पर प्रास्तिको वदनिरत शुचिराचार्य उच्यते वेदाधनसम्पन्न प्रतिम नविविद्विय न यानयत तिIT णुय' चनत गुरु २॥ पश्चादग्न - (५१२) कर्मकाण्डरनाकरे, उपनयनसूत्रन्याया। स्वस्थाप्य ब्रह्मचर्यमागामिनिवाचयति ।।) तत प्राचार्यामा कमाने पश्चिमतः यत्मनों दक्षिणतः अवस्थाप्य अतितं कृत्या प्राचर्यमागामिनि हि, इति प्रेपमुम्वा माण पकं ब्रह्मचर्य मागमिनि वाचति (ब्रह्मचार्यसानीतिच) प्राचार्य मानि इत्याचार्या माणक प्रेपनि प्रेषितश्चमाणको ब्रह्मचर्यग नि इति वदेत् । अथैनंवासः परियापति, येनेन्द्राय वृहस्पति वासः पयंदध दमृतन्तेनत्वरपरिदधाम्यायु दीर्घायुस्थाययलाय वर्चसइति १०) श्रथ याचनानन्तर ए-कुमारप्राचार्यः वचरमाण लतण गणादिवान परिवापयति परिहतकारयति येनेन्द्रादि इत्यादिमंत्रपठि वा । मेसनांव नीते) इदुलकं परियाधमाना वर्णपवित्र नपुनीच प्रागत् । प्राणापाना-या वनमाददना स्वायादेवी सुभगाग्वलेपम् इति ११ ततः मेवानां मौज्या दिकांगन्यमाण लक्षणां ववनोते कटि प्रदेगे त्रितांवर ग्याग्रथितां प्रादक्षिगयेन वैटयति इगरुक्तइत्यादिना मेसलेयम् इत्यन्तेनमत्रणमाणपक पठितन इति हरिहरः । श्राचार्यस्येति गदाधर । युवामुगासा परिचीत आगात्म श्रेयान् भवति जायमान त धीराम: क्चयउनयति खायो मनसा देवयात इति या । १२ । तूष्णी वा १३ । इति मंत्रण या हणी वा मेखला पनीते ॥ अत्र यद्यपि सूत्र कारेण यज्ञोपवीतधारण न सृत्रितं तथापि एक वस्त्राः प्राचीना वीति 'न' इति प्रेतोदकाने प्राचीना वौतित्व विधानात, दडाजिनोपर्वातानि मेसला चैव धारयेत् ॥ इति साजरल्पवयेन ब्रमच रिण उपवीतधागास्मरणान् । तथा सदोपतिनाभाव्यं सम बद्धशिवेन च, विशिस पर्वातश्च यत्करोति न तत्कृतम् ॥ इति हरि---असनवसरे समाचार- यतोपवीताजिगे भवत , इति भतृ यज्ञ व्यतिरिक्तवासुदेवादि सर्वग्रन्थेषु फांचयरूपयो- तमेवलिखितं तत्र चविरोधापयोते शाखन्तर यो मंत्रो ग्राह्य । यज्ञोपर्वत परम पवित्र प्रजापते- त्महज पुरस्तात् अ युष्य मयं प्रति च शुभ्रं यज्ञोपवीत बल मस्तु तेज, इति चासुदेव. "यज्ञीय- वीतलक्षणं स्मृत्यर्थ सारे,, कापसतौम गोवाल शाणच क तृणादिकम् ,यथासंभरती धार्यमुप- वीत द्विजातिभिः ॥ तन्निर्माण प्रकारमाह-शुचौ देशे शुचिः सूत्रसहतालिमूलवे,अवेष्टय पण्ड वत्मतस्त्रिगुणीकृत्य यत्नत ॥अब्लिगःस्त्रिभि सम्यक । प्रक्षाल्योवृतंतु तत् । अप्रदक्षिणमावृत साविन्या त्रिगुणो कृतम् ॥ अध प्रदक्षिण वृत्त समयानवसूनक त्रिविश्य दृढवध्वाहरिब्रोशराम्मेत् । यज्ञोपवीतमितिच मन्त्रेणानेनारयेत् । सूत्रंसलोमकंचेत्स्य तत कृत्वादिलोमकं । सानिया.दराला- ऽद्भिर्मप्रिताभिस्तदुतयेत ॥ विच्छिनंवा यधीयातिभुक्त्वानिर्मितमुत्सृजेत् । ठवरोचनभ्यांचवृतद्धि- दतेकटिम् । तध्दार्यमुपवीतत्यानातिलानचोच्छ्रितम् । स्तनादूमधोनामेधार्यतत्क्वंचन । ब्रह्मचा- रिणमे यात्स्नातत्त्यदेवहूनिच ॥ तृतीयमुतरीयवावस्नाभ वैचतुर्थक । ब्रह्मसूत्रंतुसव्यशस्थिते- यज्ञोपवीतिता ॥ प्राचीनागेतितामय कंटस्थे हनियोतिता, संयज्ञोपवीताथैत्रिवत्सूत्रंचम्मु ।
कर्मकाण्डरलोकरे उपनयन सूत्रन्याख्या। पुरामुंजबालसन्ग्यायामांत-नुषु ॥ यशोपत्रीततन्तुदेवता -32 बार,प्रयमत तौदितीयग्नि त. धेवच । तृतीयेनागदेपत्यं यत्सोमदेवना । पंचमेपितृदेवस्यपञ्चरमजापति । ममम नारर अमे सूर्यदेवता । सवयास्तुनवमइत्येत्तास्तंतुदेवता । महाण सादितसूत्रमविष्णुना प्रगुणी-रदेण- दत्ताप्रन्धिर्वमाविम्याचाभिमप्रित । तमामयंसजगतार्यानोभ द्वापरंगवतोपकार पास सम्भवम् । यज्ञोपवीताभिमन्त्रणविधिः-सम्पमाद संकीर्य इदंचियिचक्रमे । म गणानन· पतीयाध्यायेद्विष्णुगुणात्मकम् । भप हि तितित्रिभि क्ष लयेबासूत्रां । गायध्यादशनिवार मन्त्रयेदुपयोतकम् । देवतानवतन्तनांफ्रोणपरिकर पयेत् । अवारंप्रथमतन अग्निाद्वितीय । अग्निदत्तपुरोऽनेनत्रितीयंचाभिमन्वयेत । नमोस्तुसपैयेतेगचतुर्थगोमदेयत । ययगौमप्रतनेप- पंचमस्तृिदेत । उदारिततिमन्प्रेणापर्षदेचप्रजापति । प्रा परेनत्पमाप्रात्सप्तमे निलमायोत् मान्दो नियुद्विमन्त्रेणचाप्रमेयममाह्वयेत् । मगायौंदेवा मदनाइतिमन्त्रेणमन्त्रयेत । विश्वान्देवांश्चैत्रनामे विश्वेदेवासमन्त्रत । महामायग्रंथौचविष्णुचैवद्वितीयके । त्रितीयेयाचवतन्मस्थापत् ॥ एतन्त तिमणप्रतिष्ठा परिकल्पयेत् । प्राध्यादिविनयोगाश्चप्रयोगेकलायाम्यहम् ॥ नपयज्ञोपवीतानि धृत्वा जीर्ण नि सत्यजे। ॥ जोयतापपीनानि शिरोमागंण स यजेत् ॥ (अथाजिनं प्रयच्छति) मित्रस्य चक्षुर्द्धरणं बलीयस्तेजो यशस्वी रथविर समिद्धम् श्रानन्यं वसनं जरिष्णु परीद पाध्यजिनं दहमितिवद् । ) इत्यनेन मंत्रणा नसारणम् । तूष्णीया (दई प्रयच्छति) तं प्रति रद्धाति । योमे दंड पगपतद्वैहायमोऽधिभूमम् ॥ तमद्द पुनगढद' आयुधै दाणे घमवर्च- सयेति । १४ । प्राचा माणरकाय वक्ष्यमाण लक्षण दः प्रयच्छति तूष्णीमाक्रश्च तं दं। दक्षिण तेन प्रतिगृहातियो में दइ इति मन्त्रेण दटाश्च पाल शवलकोटम्परा, महागा या विशां यथामध्यं ज्ञेया । मन च शासान्तरोयं प्रह्यम् । पेशसम्मितो प्रस्य दो ललट सम्मित क्षत्रियस्य घ्राणसम्मितो वैश्यस्य इति । (दोघ वदेकेदीर्घसमुपैतीति वचनात्) 11- 1 एके प्राचार्या दीक्षायां यथा दण्डप्रदान सोमे तथेपछन्ति तन जयस्व वनसत इत्यादिना यज्ञस्योह च इत्यन्तेन मत्रेण यजमा) दड उच्छ्यति । तदन ब्रह्मचारी केन हेतुना दीर्घसवा एष उपैति यो ब्रह्मचर्यमुपैति, इत्यारभ्य ब्रह्मचर्यस्य दीर्धसत्र सम्पत्प्रतिपादनान । अवास्याद- मिरजलिनाजलिं पूरयत्यापोहितितिसृभिः । १६ । ) मा दट प्रदानान्तर आचार्य अस्प मागावस्याअलि स्वकीयानलिस्थाभिरभि अपोहितीत्यादिकाभिस्तिमि अम्भि पूरयति । अनि सूर्यमुदीक्षयति वचतुरिति १७१) अथ अनन्तरं एन पाणवी सूर्यसुदीक्षत्र इत्येव प्रेप्य सूर्यमादित्य उदीजयति अवलोकन कारयति, स च प्रेषित तच्चक्षु , इत्यादिना भूय- श्व शरद शतात इत्यतेन मन्त्रेण सूमुिदीक्षते (अथास्य दक्षिणा समधि हृदयमालमत, ( ५१४) कर्मकाण्डरनाकरे उपनयमसूत्रव्याख्या । मम व्रतेते हृदय दधामि ममचित्तमनुचित्त त अस्तु मम वाचमेश्मना जुषस्व गृह- स्पतिष्वा नियुनक्तुमा मिति ।१८।) अध सूर्य दर्शनानन्तर प्राचार्योऽम्य माण्वस्य दक्षि- पा समधि दक्षिणस्कधस्योपरि स्व दक्षिण हस्त नीत्वा हृदयं पक्ष मम व्रतेते इत्यादिना नियुन तुमह्यम्, इत्यन्तेन मनेण पालभते स्पृशति ॥ (प्रथास्य दक्षिण हस्ते गृहीत्वाऽह को नामासिति १६ ।) अपहृदयालभ नान्तर, प्राचार्य अस्य माणवकस्य स्वकीयेन दक्षिणहस्तेन दक्षिण हस्त गृहीत्या को नामासति अाह ब्रवीति । असावह भो३ इति प्रत्याह २०1) एव पृटो माणवक – असौ अमुकशमहं भो३ इति प्रत्याह प्रतिवचन दद्यात् (अथैनमा- एकस्य ब्रह्मचार्यसीति २१1) भवत इत्युच्यमान इ द्रस्य । मचार्यस्यामिराचार्यस्तवाहमाचार्य- स्तवासाविति २२ । ) भय प्रतिपचना नतर प्राचार्य एन माणवक क्स्य ब्रह्मचर्यमि इत्याह पृच्छति भवत इति माणवकेनोच्यमाने इन्द्रस्य ब्रह्मचार्यस्यमिराचार्यस्तवहमाचार्यस्तव अमुकशर्ममिति (अथैनं भूतेभ्य. परिददाति प्रजापतये त्वा परिददामि देवाय त्वा सवित्रे परिददा- म्यभ्यस्त्वोपधीभ्य परिददामि धावा पृथ्वीभ्यान्त्यापरिददामि, विश्वेभ्यस्वादेवे. भ्य परिददामि सभ्यस्त्वा भूतेभ्य परिददाम्यरिष्ट्या इति ॥ २३ ॥२) इति द्वि. तीयाकडिका। मथ मनतरम् एनं कुमारू भाचार्य भूतेभ्य प्रजापतिप्रभृतिभ्य प्रतिरक्षितु ददाति प्रयच्छति । मत्र-प्रजापतये त्वा इत्यादि मरिष्ट्या इत्य त । अथ तृतीया कडिका-(प्रदक्षि- णमग्निपरोल्योपविशति । ११) एव वस्त्रदानादिभिराचार्यण संस्कृतो माणवकोऽग्नि दक्षि ण परिक्रम्य अग्ने पश्चादाचार्यस्य उतरत पविशति इति जयरामहरिहरौ । प्राचार्यस्य दक्षिणत इति गर्ग पद्धतो। श्राचार्य्यरयोत्तरत इति वासुदेव । अमरत्तरत इति गदाधर (अन्वारब्ध भाज्याहुतीहुत्वा प्राशनान्तेऽथैन" स शास्ति ब्रह्मचार्यस्योपाशनकर्म युर मादिवासु पुप्या समिधमाघेहपोशानिति २ ) तत प्राचार्य प्राधागदि खिष्ठकृदन्ताश्चतुर्दशाहुती त्वा ससवप्राशनाते, मात्र पुनरवारमानुपाद चतुर्दशाहुति होमच्यतिरिक्त होमप्रतिपधाधं ॥ अथ श्रान्तम्माचार्य , एन मारणपक सशास्ति शिक्षयति, कप मनचारी असि १ असानीतिमाणवान प्रयुक्त , अप अशान पिव इति । अशानीति प्रस्तुत कर्म स्नानादिक, स्ववणाधम विहितपुर विधेहि, करवाणि, इति प्रत्युत मादिवा सुपुप्या स्वागीरिति । नस्वपानीति परयुक्तः । वाच गिरमच्छ नियमय यरहानौतिप्रत्युकः । समिध कक्ष्यमाणकोणाभाहि मग्नौप्रक्षिपति आपाशानति पूर्ववत् ।। ( प्रथास्मै सावित्रीमन्वाहो तरतोऽग्ने प्रत्या मुखायोपविष्टायोप सन्नाय समीक्षमाणाय समीक्षिताय । दक्षिणतस्तिष्ठत मासीनायके ।। पच्चो वर्चश सचि तृतीयेन सहानुवर्तयन् याच यच्छ नक्षणान्वारन्ध कर्मकाण्डरत्नाकर, उपनयनसूत्रव्याख्याः । (५१५) . , श) अस्मै ब्रह्मचारिणे सावित्री सवितृ देवत्यां गायत्री चंदरका विस्वामित्र दृष्टा अचं भन्वाद आदिशति । कथं भूताय प्रत्यङ् मुखाग, पश्चिम मिमुसाय पुनः प) भूताय उपविष्टाय के, भनेरुत्तरस्यां दिशि । तयो परमायपादोप संग्रहणादिना भजमानाय, तथा समीक्षमाणाय सम्यक् भाचार्यमवलोक्यते, तथा आचार्येण सम्य गवलोकिताय पक्षान्तरमाह दक्षिणतः अन्नेर्द- क्षिणस्यां दिशितिष्टते उद्वायउद्वी भूताय या प्रासीनाय उपविष्टाय इत्येके प्राचार्या: सावित्री- प्रदानमन्यते । कथमन्वाह पच्छः पादं पार्द, अशः तदनु भईर्चमचम् तदन च सर्वां तृतीयनवारण समिलित्या प्रमावर्तयन्पयन् ॥ (सम्वत्सरे पएमासे चतुर्विशत्यहेद्वादशाहे- . परहेज्यहेवा ६) सद्यस्त्वे गायत्रों ब्राह्मणायानुयूयादाग्नेयोपै ब्राह्मण-इतिश्रुतेः ।१ त्रि- भराउन्यस्य ।। जगदीश्यस्य ।।। सर्वेषां वा गायत्री १०॥ सावित्रीप्रदानस्यकाल विकल्पानाह-सम्बत्सरे उपनयनमारभ्य पूर्णेवषण्मासपडवमासाः परापास्य, (स्वार्थप्यम् ) "तद्धितरवादसो वृद्धिलोगः । छन्दोवस्त्राणि भवन्ति इतिवचनात् । तस्मिन् पणमास्ये, चवि. शल्यहे, चविशल्या अहोभिः रुपलक्षित. कालश्चतुर्विशत्यह, स्तस्मिन् द्वादशाहे द्वादशभि- रह मि. लक्षितः कालीद्वादशाह रतस्मिन् । षडंहपड्भिरहोमिरपलक्षितः कालः पडहस्तस्मिन् । यह त्रिभिरहोभिरुषलक्षित. कालः व्यहस्तस्मिन् । वा शब्दः सर्वेषु सम्वत्सरादिषु संवध्यते ।। एतेकालविकल्पाः । श्राचार्यस्य शुश्रुषादिशिष्यगण तारतम्यापेक्षा एवं सामात्येन सावित्री प्रदा- नम्यकालविकल्पा नभिधाया धुना ब्राह्मणस्य विशेषमाह । तु शब्द: पत: ज्यावृत्ती, ब्राह्मणस्य नैतेकाल विकला; किन्तु क्षत्रिय पैश्ययोः ब्राह्मणस्य सद्य एवं गायत्रीमनु ब्रूयात् । फुत: भाग्नेयोयै ब्राह्मण, इति ते. । आग्नेयः अमि देवत्यः ब्राह्मणः इति वेदवचनात् । त्रिधुमराजन्यस्य जगी वैश्यस्य, सर्वेषां वा गयी, राजन्यस्य क्षत्रियस्य निष्ठभम्, प्छिन्दो यस्याः सानिपता विष्ठभम्, जगती छन्दो यस्याः ऋच: सा जगती तो " जगताम् । वैश्यस्यशिः सावित्रों मनु- व्यादित्यनुपज्यते । सर्वेषां वा गायत्री, सर्वषो ब्राह्मणक्षत्रियविशाम् गायत्रीमव गायत्रीछन्दस्कामेवं सावित्रीम् । सवितृदेवताका, तत्सवितुः इति सकल वेदशाखाम्नाता ऋचमनुयात्-इतिवृताया- कंडिका । देवी भागवते गायत्री निर्णये व्यास:~-ॐ कारं पूर्व मुच्चार्य भूवः स्वस्तधैव च ॥ चतुर्विशत्यक्षरांश्च गायत्री प्रोच्चोततः । शताक्षरांच गायत्री सदावर्तयेत्सुधी. ॥ चतुर्वि- शत्यक्षाणि "गायच्या.' कीतितानिहि जातवेद मनाम्नी च ऋचमुच्चारयस्त । त्र्यंबक्यर्चमा वृत्य गायत्री सतवर्ण का ॥ भवायं महापुण्या सजाप्या बुधैरियम्, कपडोंकारा गायत्री विविधामता ॥ पञ्च प्रणव संयुक्ता जपेदित्यनुशासनम् ॥ जपसंख्पाष्ठ भागात पादो जाप्यस्तुरी. यकः । सद्विजः परमोज्ञेयः परंसायुज्यमाप्नुयात् । संपुटका पदाकारा मवेरसा उर्ध्वरेतसाम् । गृहस्थी, -- (५६) कमकाण्डरत्नाकर उपनयनसूत्रव्याख्याः । 1 , ब्रह्मचारी वा मोक्ष थी तुरीयां जपेत् ॥ तुरीयपादो गायत्र्या परो रजसे सावदीम तत्रैक प्रणा- ग्राह्या गृहस्थैर्ब्रह्मवादिभिः-अत्रसमिदाधानम् --अन्न सावित्री प्रदानोत्तरकाले समिधा प्राधानं प्रक्षेपः ब्रह्मचारिणोभवति । अनानाविति भाष्यकारः" अनावसरस्य पाठादेवसिद्धेः पाणिनान्निपरि- समूहति ) अने सुवः मुश्रुवर्तमाकुरु यथा त्वमग्ने सुत्रय, सुश्रुवा असि एवमासुनयः सौश्रव- संकुरु, यथात्वनग्न देवानां यज्ञस्य निधिपा असि एवमहं मनुष्याणां वदस्य निधिपोभूयासमिति । १२) पाणिना दक्षिण . हस्तेन अग्नि प्रकृतहोमाधिकरणं परिसमूहति संधुक्षयति इन्धन प्रक्षेपेण वा- माण: पंच भर्भत्रैः कारिक.या विशेषः प्रति मंनं त्रिभिः का?रगे सुश्रव श्रादिभिः श्रो सुश्रुव इत्येकं यथा त्वं रयाद्वितीयकम् यथा त्व. मग्ने देवानां मंत्रेण पि तृतीयकम् । कृत्वा पक्षणंवहेरुत्थाय समिदातुतिः । समिल्लक्षणंछन्दोग परिशिडे-नांडगुष्ठादधिकाकार्या समित्थूलतया क्वचित् न वियुक्तात्यचाचैवनसकोटा न पाटिता । * देशानाधिक न्यूनान तथ स्यादिशाखिका न सपण न निर्वयां हं.गे विज्ञानता ब्रह्मपुराणे- पातासाश्वत्यन्यग्रोध प्लक्षवैकंकोद्भवाः । अश्वत्योदुम्वर विल्वश्चंदनः सरलस्तथा । शालश्च देवदा- रश्चादिरश्चेनिराशिम: (प्रदक्षिणमग्निम्युक्षोत्तिष्ठन्समिधमादधातिअग्नये समिध- माहार्पवृहत जातवेदसे यथा त्वमग्ने समिधासमिध्यहऽएवमहमायुषा मेधया घञ्चसामजया पशुभिब्रह्मवर्चसेन समिन्जीवपुत्रोममाचार्यो मेधाव्यहम् सामसा- म्यनिराकरिशस्वी तेजावी प्रहायचस्यानादो, भूयास • स्वाहेति ॥३॥) एवंद्वितीयां तथा तृतीयाम ॥४॥) एपात इतिया ru) समुच्चयेवा ॥६॥) ततः प्रदक्षिणं यथा भवति तदा अग्नि पर्यु:य दक्षिणहरत गृहीतोदवन परिषियउत्याय उधाभूय भा:मुसलिछन् समिधं समिप्यते दीप्यते अग्निनियेति समित् तासमिधंपादधातिप्रदिपति । बेन भनेण, अग्नये समिधमाहार्पमिलादि भूयारा र्ट स्वाहा इत्यतेन ३-एकामनेनैव मंत्रण द्वितीयां समिधमादधाति । तथा उनैनैवमंत्रेण तृतीययाम्, विकल्पमाह एप.ते असमित इत्यादि पाचप्यामिपीमहि, इस्यन्तेन या मंत्रेण मथना अग्नये समिधं इति एषाते इति द्वयोर्मन्प्रयोः समिदा- धाने रानुगः एक्यम्, ततस्य मंत्रया ते सनि नेपः इनित्रयो मंत्र विकल्पाः पूर्ववत् परिसमू- हत पर्युषणे ॥३॥) पूर्ववत् अग्ने सुनना इत्यादिभिः पंपभिमन्त्रैः परिममूहनं पक्षणमपि यसगा। (पाणीप्रतप्य मुखंवितृष्ठे नूगअग्नेऽसितम्यमेशाहि मायुहाऽअग्ने स्थायुमेदेहि । वर्चादाऽमग्नेसिव गदेहि । अग्नेयन्वातन्या ऊनंतम्मऽभापृणगया मदेवः सविता | मांगदेवी सरस्वती मेधामयिनी देवा वायत्तांपुष्कर सज:- यिति । )पणो हतौरतप्य रणं मग्नी तापयित्वा नन्ग नंधि- स्यादिमिः सप्तभि- कर्मकाण्डरलाकरे उपनयनसूत्रध्यारया । (५१७) मन्ने प्रतिम-पाणियांमुस विमायलन टादि चितुकान्ता प्रति दिन मेधामन्य सविता । मस- देवी सरस्वती अनयोराध रिपत्यध्यहार अनशिपचारप्राप्ता चिापटा लिरयन्त-तत्रागनि च मनप्यायन्ता, बाकराणश्यच अंत्रयशोवलमितिश्रगान व मइत्यननम प्रेशर प्रभृतीनि पदान्तानि अगन्यालमैत एनपक् इत्यनन मुग, प्राणु इसनेननासिक, चतुन्त्यिन्न पापी श्रेत्र मित्यने अवणे, यशोयलमित्स्य पाठमानम् ॥ त्रयुपाणि पुरने भस्मना ललाट मीनायां दनिगे से हदि च, व्यायुपमिति प्रति मनम्, आयुषम् इत्यतै श्चभिमनगद अनामिका रीटेन भस्मना ललाट प्रीवा दक्षिण सहृदयेषु प्रतिसाद व्यायुपणि कुते । मन्त्र व्यायु पण सूत्रकारानुक्कमरि प्रमिद्धत्वात् शिपरपरा चरित वात् कियते । ततो ब्रह्मचरी सध्या मुपा याग्निकार्य कृत्वा गुरुकृपसग्रहण वृद्धतरप्य भिवादन पद्धपु नमरकार कुर्यात्पय यगण स्मृत्यन्त रोक्कमभिवादनलि यते-ततोऽभिवाश्यदानसायहमितिम्रवन्' पप्रयोग ॥ इतिचतुर्थी डिस (अनभिक्षाचर्यचरणम् ।११) न पसरभिक्षाचयानुनम् । (भव पूर्वानाहरणो भित २१ भवन्मध्यमाज य ३३ भवदन्त्यारेश्य 1) माछब्द पूर्वोयस्या सा भवत्पूर्वाभिमानामा द्विोत्तमामिक्षतेयाचते । तथैवमा बन्दामध्ययस्या साभवन्मभ्याता राजन्य क्षत्रियोभिनेतेत्यनुपग । भर द अन्त्येयस्या साभात्यातावैश्य तृतायोवर्ण भिला- भिक्षतेत्यनुवर्तते । उक्तचमनुना-प्रतिगृह्येप्सितदण्डमुपरथाय चभास्करम् ॥ प्रददिणारीत्या ग्निचरेद्भक्ष्ययथ विधि । (त्रि स्खोऽप्रत्यारयायिन्य Nि) पड्दादशाऽपरिमितावा 11 मातरप्रयमामके 191) भिक्षेदांतोद्विकमत्वाद् द्वितीयकम हतिसइति । तिसस्त्रियोभिता भिक्षतक भूता भनस्य यायिन्य प्रत्या यानिरापर्तुशालयासाता प्रत्या यन्यि नप्रत्यारया यि या अस्यास्यायिय ता अप्रत्यान्यायिनी । द्वितीयाथप्रथमा, ५वासिय , द्वादशवा, अर रिभिता । वा असरयाता । वा निमोभित धरापय प्त्यपक्षया एक प्राचाय मातरस्वजननी प्रथमभिशेतत्यादु । श्रयच थमाहदर्म । इतिक्क । यारपव ~~-ग्रामणपुचरे भैय- मनि चामराय ॥ ए ब्राहाणविषयम् । अतएवब्यास ब्राह्मणक्षत्रियविशश्चरेयुभैक्षम व हम् । सजातीगृह येवसार्ववर्णांकमववा (माचार्यायभैक्षनिवेदयित्वाधाग्यतोऽद शेपतिष्ठे दित्यका आचायोगगुरवभेन तव्याभिक्षानिपयित्वा इय भिक्षामयाल वेतिसमयेवा यतामौनी शभिसा निवेदन तरतो यापदरतमयतिटेनोपसिनच शयीतगगतइत्येवेसूधकारा घन्तिद तु भनियममन्यामह ततश्चविकल्प अहिट सकारण्यात् समिध आहत्य तम्मिनग्नौ पूर्वपदाधाय चाच पिज्यत अईसन् अछिदनुस्वय भ माइत्यर्थ भरण्यामपामत समिध सलक्षणा आइत्य प्रानीयस्तस्मिनग्नी (५८) कर्मकाण्डरताकरे, उपनयनसूत्रव्याख्या । यत्र उपनयनागरीम कृत स्तस्मिन्पूर्ववत् परिसमूहनादि चायुपकरण न्त यावदाधाय हुत्वा वाचं विसृजतेमौनं त्यजति वा यमपक्षे (अध शाय्य क्षरालवणाशीस्यात् । १०) (दंडधार- एमग्नि परिचरण गुरशुश्रुषाभिक्षाचर्या ॥११॥) मधुमाट समज्जेमां पर्यासनस्त्री गमना नृता दतांदानानि वर्जयेत् ।१२। श्रत ऊर्श्वब्रह्मचारिणा यमनियमानाह-अध शयि- तुंशोलमस्य असावध शायीस्यात् तथा अक्षारमलरणं चश्नातीत्येवं शीलोऽक्षारलवणी भवेत् । दंडधारणदण्डस्य स्व वर्णविहितस्यधारण कुर्यात् । दंडानिनोपवीतानिमेखलाचैवधारयेत् । इत्ये- तदुपलक्षणत्वेन्सदान्न्हिरूपकुर्यात् । अग्ने परिचरणसायप्रात. परिसमूहनपूर्वन्यायुप कारण न्तेनसमि दाधानम् ॥ गुरुशुश्रपागुरो शुषापरिचर्याताकुर्यात् । मिक्षार्थचया भिक्षाचयाभेक्षचरणमितियावत्- मधुक्षौद्र, मा.पललमजननदाद वाप्लपम्, स्नानंतोदवेनउपरिसटवादीआसनमुपवेशनम् । मामन परिमसृरिकाद्यासनेवा स्त्रीगमनस्लीमध्ये अवस्थाम, भिगमनस्योपरिवक्ष्यमाणत्वात्, अन्तमसत्यवदनमत्तानापरद्र -व्याणा ग्रादान ग्रहण स्तेयमित्यर्थ एतानिमध्वादीनिवर्जयेत (अष्टाचत्वरिशद्ववर्षाणि घेब्रह्मचर्य चरेत् ।१३।) अाभिरधिकानि चत्वारिंशत् वाचत्वारिंशत् तानि वाणि अब्दानि वद ब्रह्मचर्य बेद ग्रहणार्थ ब्रह्मचर्यमुत्त लक्षणम् चरत अनुप्ठेित् अम्मिन्पक्ष चतुर्णमपि बदानाम व बतादेश ॥ सर्व बदा हुति होमश्च । (द्वादस द्वादश वा प्रतिवेदम् ।१४। यावग्रहण वा ।१५) अनुकल्पमाह-वात दुक्तौ द्वादश द्वादश वप णि प्रति वदम् वदे वदे ब्रह्मचर्य चरदित्यनुवर्तते। तत्राप्यशती यावद् ग्रहणम् यावद् वेदस्य वेदयो बेदानावाग्रहणं । प्राचार्यात्पाठतोऽर्थतश्च स्वाकरण तायद् वा ब्रह्मचर्य चरेत् । (वासासि शाण क्षौमाधिमानि ।१६।) वर्णव्य- वस्थया परिधानयनाण्याह-ब्राह्मण क्षत्रिय विशा ब्रह्मच रिपो यथा राख्य शाण कौमा विकानि पत्राणि परिधेयानि भवन्ति-तत्र राणमय शाण क्षौम तुमा अतसी तद्विकारमयं-- क्षोर्म मात्रिक अमिपस्य विकार. माविरम् ऊर्जामयमित्यर्थ. (ऐणेयमजिनमुत्तरीय ब्राह्म. णस्य १७१) एणी हरिणी रस्या. इदं एगीय अजिनं कृत्ति. उत्तरीयं भवति ब्राह्मस्य ब्रह्म चारिणः ॥ (गैरवराजन्यस्य १) रुरुमग विशप चिगमग. इति प्रसिद्ध तायेदमजिनं रोरयन् ॥ राजन्याय क्षत्रियस्यात्तरोय भवनि-( अथ श्राज गन्य वा पैश्यम् १६) मनप पस्नग्यान दमाजम्--अनि ति अश्वा गव्यं गा इद गव्य अजिनं वेश्यस्योत. रो भपति ( सर्वेषां या गन्यमहति प्रधानात् ।२०1) पक्षातर माह--राषा मामण पत्रिग रिशा व्यजिन या उत्तरीय भय पदा -मगति गुरय प्रविधमन, फल. प्रपनयर ॥ गयहि मजिनानां प्रधानम्, एणमाजिनप्रगतीनाम्यादीनां गो: प्राधान्यं यत.
कर्मकाएहनाकरे, उपनयनसूपव्याख्या। पवा गन्यस्य चर्मण. पुरुष सं वधिलन प्रधानत्वात, तथा च प्रति, तच्छाय पुष्पं गव्यता त्वचमधुः इति ॥ (माजी रशना प्राणस्य २१) (अनुज्या गजन्यस्य १२२१) (मौवीं वैश्यस्य ॥२३॥ ) ( मुनाभावे पुशान्तफ वरयजानाम् ॥२४॥ ) मजा मुंज: तृणविशेषः तन्मयो मौजी रशना मैसला ब्राह्मणाय ब्रह्मचारिणोगवति गुज्या चापस्यज्या गुणाः रसना गजन्यस्य ह्मिचारिणः म.पी तृण विशेपस्तन्मयी रशना पैश्यस्य भवति । मुंजस्या- भावेऽल.मे ब्राह्मणस्य चुःशानां कुसमयी रशना भवति । तुज्यं या मभने चत्रिरस्य प्रशन्तक मयी भवति । मौर्यभाये रवजा वैश्यस्य मुंजाभन्दात्र धनुज्या मौयं भावोपलद पार्थः । (पालाशो ब्राह्मणस्यदराष्टः ।२१1) (वैचोरोजाय१ १२६३) योदुम्बरोपैश्याय ॥२४॥ ( सर्वे का सर्वेपाम् ।२८1) सच पेश मितः पादादि पेश मूलावधि प्रमाणकः पालाशदंडो ब्राह्मणस्य । वैल्य: विल्ववृक्षोभयः क्षत्रियस्थललाट संमित. ललाटावधि प्रमाणाधू मध्यावधि रित्यर्थः । उदुम्बर वृक्षोभवो वैश्यस्य ब्रह्मचारिणीमुख संमितः । श्रौदपुटावधिः दण्डः । यद् या सर्वेषां ब्राह्मण क्षत्यि विशt ब्रह्मचारिणां सं पालाश वै योग्यरा: अनियमेन दंडाभवन्ति, नियमोऽत्र नारित मुख्यालामे यथालाभ मुपादेयम् । (आचार्येणाहूत उत्थाय प्रति शृणु- या २६1) प्राचार्यण गुरणा ग्राहृव. भाकारित: उत्थाय उपोभूत्या प्रति शृणुयात् प्रति यवनं दद्यात् ब्रह्मचारी । (शयानं चेदासीन बासीनं चेत्तिष्टान्ते तिहंत चेदभिकामन्तं चेदभिधावन् ।३०1) चेददि शयानं स्वान्तं ब्रह्मचारिणं गुरुरावयति तदासीन अविष्ट सन् प्रति वचनंदद्यात । असोन्मुभविष्ठ चेदाह्वयति तदातिनुत्थित यदि निन्मुत्थितमान्यति त्दा अभि झामन् गुरममिमुरं गच्छन् प्रति श्रृरा यात । अभिनामन्तमभिमुसमागन्छन्तमाचार्यः ब्रह्म- चारिण यदि आन्त्यति तदा स ब्रह्मचारी अभिमुरां धवन् सन् ऽतिशृणुयात् ( स एवं वर्त- मानोदमुत्राद्य वसतीति ।३६१) स ब्रह्मचारी एवमुत्तेनमार्गरण ब्रह्मचर्य वर्तमानस्तिान् अमुन स्वर्ग अद्य इव ति सन् वसंत तिष्ठति । द्विरुक्ति रहला. ॥ (तस्यस्नातकस्थ कीर्तिमति ३२) तस्य ब्रह्मचारिणः स्नातकस्य समावृत्तस्य कीतिर्यशोभवति । (प्रयः स्ना- तकाः भवन्ति विद्यारनातको व्रतस्नातको विद्यावत स्नातकः, इति ।३३) त्रयः निप्रकारा. स्नातका: भवन्ति क्थं को विद्यास्त तक: अपरो व्रतनातक अन्यो विद्यामत स्नातकः (समाय घेदमसमाप्य व्रतंयः समायते स विद्यास्नातकः ३४१) ( समाप्य व्रतं असमाप्य वेदम्यः समावत ते स व्रतस्नातक. ३५) (उभय समाप्य यः समावतते सविद्याव्रत स्नातकः, इति ।३६) समाप्य समाप्तिपटतोऽर्थ- तश्च अवसाननीत्या वेदं वेदम्य मत्र ब्राह्मणामिकामेवा शारा य समावर्तते साति स हाचारी (५२०) कर्मकाण्डरत्नाकरे, उपनयनसूत्रन्याख्या । विद्यानातका भवति एव समाप्य प्रत द्वादश वार्षिकादिक ब्रह्मचर्य असमाप्य असम्पूर्णमधील वेदं एका शाखायो ब्रह्मचारी समावर्त्तते स्नान करोति स व्रतस्नातकोभवति । उभय चेदं ब्रह्म- चच समाप्य अन्त नीत्वा य स्वति स विद्याप्रत मातको भवति । (प्रपौड़पात् वर्षा ब्राह्मणस्यानतीतःकालोभवति ।३७१)(श्रादाविर्ट शाद्राजन्यस्य 1) (पाच- तुर्विट शाद वैश्यस्य ।३६) उपन्यनय लस्यपग्मावमिाह प्रापोऽशात्पोड शात्वर्षात् प्राक ब्राह्माणस्यविप्रस्यानतीत नअतीत उपनयनस्यकाल समयाभवति । पाद्वाशितद्वाविंशतिद्वर्षात पूर्वचत्रियस्य, पाचतुविशाा, चतुर्दिशतिवर्षादाक् पैश्यस्यउपनग्न.काल अनतातोभवति भव. तातिसर्वत्रसम्व यते ( अतऊर्ध्वपतितसावित्रकाभवन्ति 121) अत पचदशात् ,एकविर्ट) शतात् प्रयोपिर्ट शाद्वर्षादूर्घअनुपनीता ब्राह्मणक्षनियवेश्या यथासख्यपतितमापिनीका पतिता. स्खलिता अधिकारभ कानिता सावित्री गायली ये-५ तेपतितसावित्रीका भवन्तिसम्पद्यन्ते- नैना गुपनयेयुग्नाध्यापये नयाजयेऽर्नचैभिवहारयेयु ४१ ) सतानपतितसावित्रीकान्नउपनये यु उपनयन सस्कारेण न सस्कु शिष्या ! कैश्चिदति कान्त निदै रुपनी तानपि न अध्यापयेयु न वेद पाटयायेयु । तथा न याजययु ! कैश्चिदति मान्त निषेधै बैद मध्यापितानपि न याजयेयु न यज्ञं कारयेयु । एभि पतित सावित्रीकै अनुपनीतै रुपनीतैर्वा सह न व्यवहरेयु ॥ न व्यप हरेत् (स्नानाशयनभोजनविवाहादिभि कर्मभिर्नव्यवहारकुयु ॥-कालातिकमे- नियतवत् ।।२। ) गर्भावानादीनिउपनयनान्तानि कमागिनियतकालान्यभिहितानि यदिदैववशादा- स्पुरुषापराधाद्वादोपाहातपानियतस्यकलस्यातिकमोभवति। तदापिर्तव्यमितिमन्दह निर्णयमाह- पालातिरमेयस्यसस्कारकर्मण शस्त्रेनियमितोय काल तस्यातिमेलघनेनियतपतन्त्यिवत् नित्ये- श्रौतर पेनित्येपु यविहितंतद्वत् अनादिष्टप्रायश्चित्तभवति । तत कृतप्रायश्चित्तस्या तिमातर ले- संस्कारकर्मण्यधिकार सम्पद्यते । मनादिष्ठ नायश्चित्तेपि क व्यापंचमडिकन्तेरच्यते । अत्रका- लादिकमर पलक्षणम् अत अन्येपामपिवर्मा नाइदमनादिष्टमेवसर्वप्रायश्चित्ताकारण प्रायश्चि तान्तम्यानुपदिष्टत्यात् । रितुश्रौतानामतिदेशेप्राप्तेअविज्ञातेप्रतिमहाच्यातिभि सर्व भिश्चतुर्थर्ट सर्व- प्रायश्चितचैत्यस्यैवकालातिमनियतवदित्यनेनानिदेश कृतोनपदेश गृह्यकारेगाना विज्ञानप्रत्यदा- अनिमूलम् । विमिदमार्थदिसमसामदिकयाजुर्वेदिकं देत्यनिश्च रमाक्र्मत यश्रौत्तवरपव्याहति चतुष्टय पर पारुण होम प्रायश्चित मुहिप्पमत्र गृह्यसूत्रे गृयोक्ता कर्मणामपि स्मार्तत्वात्तद् ध्रेपे तस्य याति दशो युतो न पुन प्रयन यंद मूल कर्म भ्रवादिष्टानाम्-फारिलोयाम्-मुय पालेनरे कर्म कर्तु यदि न शायत, गौणालेपि वर्तव्यं तदनादिकम् ॥ (त्रिपुरुष पतित गावित्री पाणामपत्य सस्कारो ना ध्यपांच |३) इदानी पनित सावित्रोषिये कर्मकार नाकरे, उपनयनत्रन्याया। (५२१) संस्कार प्रति प्रतिमाह त्रिपुर नीन् पुस्पान् यत् ये पतित गाविमोकाः पिट पुत्र पीना ताग. पत्ये पुने संस्कारः उपनयन भवति, न पुनश्चतुर्थ दीनाम् । तोच उपनीतानामपि, अमापनं न भवति, निषिद्धरय पुगरनुज्ञापन प्रति प्रसव इति । उपनयनस्यैव प्रति प्रसयात् ।। (तपास स्कारेप्सु मात्य स्तोम नेष्ट्या फाममधीयोरल्यावहार्या भवन्तीति यचनात् ४४॥) तेषां सावित्री कारणामध्ययः सरकारयितुं फामः सहाय स्तोमेन यज्ञ विशेषण इया प्रात्य रतो यतं कृत्वा व्यवहार्यो भवति उपनयनादि संस्कार योग्यो भवति, तस्मात् वाममिछया प्रात्यस्तोम प्लेटवा अथायीरन् वेद पटेयः, व्यवहाया: लोके विद्वाना मध्यानादिपु कर्ममु योग्याः भवतीति वचनात् श्रुतेः । इति पंचमी करिडका । अधचेदानी माय: पनि सादिक । विषय प्रसंगात्-स्मृत्यं तरोका अपि मसंस्कारा लिप्यन्ते ।। पंधधिरस्तब्धं जदगदगद पंरपु कुन्ज वामन रोगात शुष्मगिविश्लामिषु ॥ प्रयोग परिजायते--ब्राहगयां ब्राह्मण मातो ब्राह्माणः स इति श्रुतिः तस्साच पंटयधिरकुब्ज वामनपर पु जड गद् गद् रोगात शुकाम विषलागिषु । मत्तोन्मत्तेपु मूयेषु शयनस्थे निरिन्द्रिये । ध्वस्त पुंस्त्वेषु चैतेषु संस्काराः स्युर्यधोचितम्--मत्तो- न्मत्तौ र संस्कार विति वे चित्प्रचक्षते । कर्मखन धिकारच्च पतित्यं नास्ति चैतयोः। तदपत्यं च संहार्यगपरेवाहरन्यथा ॥ संस्कार मत्रहोमादौन करोत्याचार्य पतु मानीराग्नि समीपं या सावित्री स्पृश्य या जपेत् ॥ कन्यावंकरगादायत्सर्व वित्रण कारयेत । एवमेव द्विजाती- कार्यों मुण्डोलना ॥ मृत्यथसारप्रवम् मापस्तम्बः-शुद्राण मदृष्ट कर्मणामुश्याम् । इदं च रथ कारस्याप नयनम् तस्य च मातामही द्वारकं शत्यं अट कर्मा द्यपानादि हितानामिति विष्णु -- नापरीक्षित याजयेत मध्यापये मोपनयत । अत्र शौनय:-श्र रयावान गाचौल कलंड तीतेऽतु मरणम् श्राहला मुसंस्कृत्य इत्यादी का काम् के. म्होपेतु पाद कर समाचरेत्-~-बूदाया अच्छे स्थानपदीत्येव मोरितम्-श्रनापादि तु सर्वत्र दि.णं तिगुणं चरेत् ॥ लुपते कर्मणि सर्वन प्रा.श्चितं विरते । प्रायश्चित्ते कृते पश्चात ल्लुप्तं कर्भ समाचरेत् । आश्वलायन कास्किायान्तु-प्रायश्चित्तेकृतेऽतीतं कर्न कृतातमित्युत्तम्-प्रायश्चित्ते कृते पधादती- तमपि फर्मयै ॥ कार्यमित्येके, प्राचार्या नेत्यन्येतु विपश्चित:-मंटनस्तु कालातीतेपु सर्वेषु प्राप्त वत्स्वपोषु च कालातीतानि वृत्वैव विदध्य दुत्तराणि तु-अथ पुनरुपनयनमाह--मनुः अशाना- हाश्य विणू मून मुरा संसृष्टमेव च । पुनः संस्कार मर्हन्ति यो वर्णा द्विजातयः । "चंद्रिवायां धौधायन: मिन्यु सौ पोर सौ रान् तथा प्रत्यन्तबासिनः, अगांग कलिगांश्च गत्या संस्कार- महति-हेमाद्री पाझे-प्रेत शय्याप्रति ग्राही पुन. संस्कारमहति वृद्धमनु.जोदन् यदि गमागचेद् त बुम्भे निमच्य च । उदृत्य शापयित्वास्य जात कर्मादि कारयेत्-मितालग- - (६२२) प.मकाण्डरत्नाकरे, उपनयनसूत्रन्याख्या .. यां पराशर:--य: प्रत्यवासतो वित्रः प्रव्रज्यातीविनिर्गत:-अनाशकनिवृत्तश्चगाहस्यं चचिकीर्षति- रायरे त्रीणि कृच्छागि श्रीणि चान्द्रायणानि च । जातकर्मादिभिः सर्वः संरकृतः शुद्धिमाप्नुयात-- शतातपः-लसुनं गूजनं जाध्यापलाई च तथा शुनं ॥ उष्ट्र मानुए के भाश्य रासभी क्षौर भोज. नात. उपायनं पुनः कुपतिप्त कृच्छं चरेग्मुहुः । त्रिस्थली सेती-- कर्म नारा जलरपति करतोया विलंघनात ॥ गंडकीचा तरणात पुनः संरकारमर्हति-इति पुनयपनयनम् । अथ वेदारम्भ सूत्र व्याख्या। सूत्र कारेण ब्रह्मचर्यवरितव्रत निरूपणप्रकरणे (अष्ठा चत्वारिंशद्वर्षाणि वेदग्रह्म- चयं चरेत् ) का० २ ० ५ सू० १३ पा० गृ० (द्वादश द्वादश चाप्रति वेदम् ।१५) वेदाभ्यासे नै। ब्रह्मचर्य चरेदिति निरूपितम् । वेदारम्भ कर्मणः पृथक् काल कर्मणि नोके उपनयन निरूपणा नतरं समावर्तन कर्मव सूनितम् । वेदसमाप्य स्नायात् का० २ कं. ६ । पा० गृ० सू० ॥ अत्र सूचे वेद समाप्ति विनासमावर्तनस्यानधिकारः सम्पयते--प्रतः उपनयनान्तरमेव वेदारम्भ कालोप गम्यते अतः उपनीय गुरु: शिष्यं महाच्या हृतिपूर्वकम् ॥ वेदमध्यापयन शै.चा चारश्च रिक्षयेत् ॥ अध्ययनारम्भस्तु प्रथमस्य वेदस्यय कार्य:-- उक्तं च संस्कार प्रकाशे वशिष्टः-यच्छाखीयैस्तु संस्कारैः संस्कृतो ब्राह्मणीभवेत् । तच्छाखा ध्ययनार्यमन्यथातितोभवेत् । अधीत्यशाखामरगीयांपरश.खां ततः पटेत् । पारपय गोयेषांवेदः सपदिहणः । तच्छाकर्मकुवति तच्छाखाध्ययन तथा । सर्पमध्ययनं कुर्वन् ब्रह्मसायुयमाप्ट्यात्- एतदेवनतादेशन विसर्गषु । इति उपाकर्म होमातिदेशादतादेदानेवेदारम्भे प्राप्नोति । इति गुरोः उगनान्तरं वेदाध्यापन विधागाघउपनयनोत्तर पालं पुण्येनि मातृपूजापूर्वकं वेदारम्भ नितित्तमाभ्यु दायासमाचार्यों विधाय उमानान्तरं संल्लग्नेन या पंचभू संस्कारपूर्वकं लौविकाग्निरथापरित्या ब्रह्मचारिणमाहूय-- अग्नेः पश्चात् स्वस्गोत्तरतः अवेश्य ब्रह्मोपदेशनाद्य.ज्यभागान्तकृत्या, यदि- रिगयेदमारभते तदापृथिव्यै स्वाहा मानयेखाहा इति देाज्याहुत्तीहुत्या ब्रह्मणे छन्दोभ्य इत्याद्यानवा- हुतात्या रोषसमायित यदियदेतदाज्यभागानन्तरं मन्तरिक्षायस्वाहा, वायवेम्यातिविशेषः । यदा समयदेवदाप्य भागान्तरं दिदेण्याह सूर्ययखातिपिरेपः । यदापर्यवेदं तदाभ्यभागान्ते, दिग्भ्यः पाहा-पन्द्रस्याति पिरे.पः रत्येकदा यदारम्भ स्वदायमागानन्तरं घमणप्रतिथे पदाति यद्वय या ब्राह्मगे छन्दोभ्यः इत्याहुतिद्वयं च हुत्या । प्रजापतये झ्याचा: मामन्त्रेण दुहुयात् । अनन्तरं महाय्यालदि सिटान्ता दशायुतीहुंचा प्राशनंविधाय पर्णपाप्रपरयान्यतरं मला कर्मकाएरनाकरे, समायर्तनसूत्रम्यापाः । दन्या में संचारिणे यथाविधिवद मध्यापयितुपारभते । शेपंगद्धतौसष्टम् । इति वेदारम्भ मतदा निरर्पणम् । अत्र गदाधर भध्यकारेण मझचारि मतलीपे प्रायश्चित्तम् आग्नेयं शुक्रियम, अप- निपद । शीलभं । गोदानं चेति पत्र प्रतन्मुकानि ग्रन्थविस्तार भयादिह नोच्यन्ते तत एवज्ञातव्यानि । (अथ समावर्तन सुत्रव्याख्या) (चंद ट० समाप्यतायात् ||१॥) ब्रह्मचर्य या साचत्वारि रंशकम् ॥२॥ वेद मंत्रवाहणात्मक समाष्यसम्यक् पारितोर्थश्चान्तं नीत्दारनायाद्वन्य माणेनविधिना स्नान कुर्यत अथया ब्रह्मचर्य व्रतं अष्टाचत्वारि टे० शकं प्राचत्वारिंशद् वर्ष निवर्त्य समाप्य अवसाने प्राप्य गुरणानुमतः स्नागादिनि सम्बन्धः (द्वादशकेप्यके ॥३॥) एफे सूत्रधारा द्वादशकपि द्वादशवर्ष समाप्येऽपि ते, चरिते स्नायाक्त्यिनुपज्यते । (गुरुणानुशात: ॥em) अवाहित मपि उभयवेदं व्रत च य.सन प्य स्नाय दित्यनुषज्यते यतः पूर्व स्नातक विमुकम् ( विधि- विधयस्तश्ववेदः ॥५॥ वेद ट० समाप्य रनयात् इन्युक्तं तत्रवर शब्देन कमुच्यते इलतबाह विथत्ते इति विधीयते इति वाविधिः दर्शपूर्णमासाभ्यां यजेत् । अग्निहो जुहुयात् इत्यादि विधायक घाहणपास्यम् । विधयितेविनियुज्यते वाहाण बायेन कांगत्वनति विधा मंत्रः इंपत्वा : तर्क- शनार्थवादोऽभिधीयते यथाप्रता: शर्करा उपदधातितेजोवैस्तम्, इति अंजने तैलवसान्निापि संभवति, तत्र तेजावै तमितिघृत संस्तवात्तवर्यते घृताक्ताः इति तेनविध्यर्थः पादममा विदशाब्देना- भिधीयन्त इत्युक्तम् त कल्पभागमितिभर्तृयज्ञः । तमीमांसेतिकल्पतरः च शब्दानामधेयसमह इति हारिहरः (पडंगमके. 5) एके सूत्रकाराः पड गंवेदं समाप्यस्नामादित्याहुः । पर शिक्षा फाप व्याकरण निरुक्तः जोतिपछन्दास्यंगानियत्यवदस्यपगः तपडंगम् । ( नकल्पमात्रे ) करप. मात्र ग्रन्थमात्र मत्रे वा ब्राह्मणे वा अधीते नरनानमिच्छन्ति । कल्पमात्राध्यनस्य अनुनायो.य- स्वात् । यतः अथातोऽधिकार अयातीधर्मजिज्ञासा, अथातोब्रह्मजिज्ञासा, इत्यादिभिरधिकारसूत्रः अधीतसकलारस्यानि होनादिकम त्वधिकार, इत्याचाचर्यते (फामन्तुयाक्षिकस्य ) तुशब्दः पतच्यावृतौ । काममिच्छ्या य शिकस्य अवर्यवादियज्ञ विद्याकर्मकुशलस्य स्नानचिन्ति अयार्थ. मंत्राह्मणा मकवेदमयीत्य अवयुध्यच नायादित्येकः पक्षः सांग पेदमधीत्यामध्य च स्नायादिति द्वितीय, ग्रंथमात्रमप्यधीय य पियां चाभ्यास्य स्नायादिति तूतीयः, यज्ञविद्याविर- हेमन्त्रमाने श्रोते न स्नागादितिनिधः । यतोवेदाध्ययन वेदयिहिताग्निहोत्रादि कर्मानुष्ठान प्रयोजनम् । (उासंगृहा गुरु टंसमियोऽभ्याधायपरिश्रितस्योत्तरतः कुशेपुप्रागपु स्थित्वा याना गुदकुमानाय अत्यन्तरग्नयः प्रविष्ठागोहयउपगोहयोमयूखो .
(५२०) कमाण्डरत्नाकरे समावर्तनसूत्रन्यारया । प्राचाय मनोहास्ससलों विरजस्तनूदू पुरिन्द्रियहातान्विजहामियोरोचनस्तमिह गृहामीत्य क रम दपोगृहीत्वातेनाभिपिंचते तेनमामभिपिचामिथियै यससे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्चसा- येति ॥६) स्नयारित्युक्त स्त्र क्थस्नायादित्यपक्षितेश्राह पसगृह्यउपसंग्रह ग विधिना गुरप्रणम्य समिधस्तिस परिसमूहनादि न्यायुप करणान्तेन विधिना अ चायनि-तित समावर्तनागहाम नौ अधयप्रक्षिप्य अनसमिधोऽभ्याधायत्युतम् समिधाधान किंवदा हुत्यादि समावर्त होम पूर्व उतश्चात । चदाहुति होग कुत प्रप्तः इति चेत् । एतदेवतादेशनविसगइत्यतिदेशात, पूर्वभशुपसगृह्यगुट समिधोभ्याध्यायतिपाटार समिदाधाना नतरपदाहुतीन मनसरइतिगम्यते, नैतत्वम् 'त्याहिवदाहुतीनामवसर. समिदधानत्पूर्व, समि दाधानचनात्पूर्वमितिम मस्यज्ञापित्तत्वात कथसय मुपयनमियम दधातिसाप्रायणीया, यार्ट स्ना स्म सदनीया, इतिश्रुते तस्म समावर्तनन्तहोमन्ते उपसरहणादि परिश्रितस्य परिवटि त्स्यसर्वत इच्छारित्स्य समावर्तनागहीम सधन निस्थापन प्रवरस्य उत्तरस्मिन्भागे प्रागणेषु कुश्पु भारतीषु छन शि, पाम्, अछा मुम्भाना परिणतरा प्तानम्सरयानमाल जप्त पूणा न मान दिशुभपरचमुखाना हि त्वा उ ययभरवतरग्य, स्यादिनाम ण, तमिगृह एमि र रे एकस्मात् प्रथमतः मकारा का दिति यायन पक्षिारयायमस्वरूप लदक्षिण रोनगृहीत्वा सरह अनिश्चिते | अभ्युस्त्या मानशिरत स्का क्त तत्रम भ तनमामभिचा मित्य दिब्रह्मवर्चसायेंत्यत ।-(२. नियम एतायनावर ताराम, यमावस्य पिंचतायद्यातदधिनायशइति-प्रापीहिष्ठतिचम पृचम्, निभिस्तृणीमितरै १०) एवएकोदकुम्भजल साध्यस्नानमभिवाय इतरसप्तोदकुम्भजलस्नन मा. विरे पाभिधानात् । इत्ययमव सव कुम्भजल ग्रहए साधारणे । मन,तिप्रतीयते, तत सव योद्वितीया दिसम्भेम्य प्रत्यक, यमस्य त ति पलमाद य वक्ष्यमाणमयथा मममिचित। तदथाया य मितद्वितीयम् आपाहितितृतीयम्, य व शिवच र्थम् तस्मादरगमितिपचमम्, तूष्णीमितराणि प्रोणिस्न नानि ( उदुत्तममितिमै नलामुमु यनिधाय बायोन्यत्परिधाया दित्यमुपतिष्ठते उद्यभ्रा भ्रपरिमोमरुद्भिरस्थात प्रतयाभिरस्थादरासनिरुति दशसनिमाकुत्र विद गमय । उद्यमानमा रिद्रोमभिरस्या हवा । पभिरस्थ छत्तमनिरसि, शतमनिम कुर्वाविदन्म गमय । उपन्ध्राज गु रिन्द्रोमनिरस्याहसय, यापभिररथ सहन सनिलसिसहस्रसनिमाकुर्वा दि मागमयति 1१1) • तममितिमरमर रिसनामुन्न न्य, छ व साम या शिरोमार्गणन्सिार्यताच भूमीनिक्षिय- यदानगरिध ग ा यसरी उय न यि गिग पनि ॥ (दपितिल - पाप्राश्यजटा लीमनमानिसहस्योदुम्वरए दन्ता धावत- मावायम्हट येस्तरतरन्य .
पारडरमाकरे, समायतनसूत्रस्यायो । (५२) सोमोगजायमागमत् । सर्गमुचम्ममाक्ष्यं तेयशप्ताच भगेनच इति ।११) तत्तोऽधि- तिलान मन्यतारा--प्राश्यमाशिवाजटाश्च लोमानिच नरानिचजटालीम नगनितानि संत्यहाय कपयित्नत्यर्थः । ( संहत्येति णिचोलोपछा- ) स्पयराहर्तुमसत्पत् । अदुम्बगदादाहुल सम्मितेन कनिष्ठिया प्रयत्स्थूलेनउदुम्बरका ठेन अन्नाय यव्युत्ध्यमितिमन्नण छन्ता याययंतप्रचारयेत् । महाणोद्वादशाङ्गलेन, राजन्योदश लेन, वैश्योऽ। गुरेन, इतिविशेष नजटा तांग नस पपन निमिता दुसरमपुर स्नास्वेति-पुन शब्दयामांश्चस्नाचमाप्यते । अतोनानन्तरंस्तनाचमनं विधाय दनन् पक्षालयदितिमिद्धम् । (उत्साय पुनस्नात्याऽनुलेपनम् नामिकयोमुसरयचोप- गृहीते । प्राणापानौमतपयचदतर्पयश्रोत्रंमतपय इति ।१३। ) उत्लाट गुगन्धिद्रव्यण शरी मुद्वयंपुनर्भूय रनावाशिर प्रतीपगानिप्रक्षाल्य अनुलानंचन्दनादि मुरानायिकयोश्चउप गृति। मुगनामिचिाऽनुलिपति । प्राणाप नौमेतर्पयत्यान्निा । श्रीमतर्पयदित्यन्तेनन्न्त्रण । पिनर शुध-यमितिपारयोरधनजन दक्षियांनिपिच्यानुलिप्यजपेत् सुनधामहमक्षी भ्वांभूयासटपर्चा मुरंग सुशुस्वाभ्यांभूयासमिति १३) तत पाण्यानेज-म्- स्तयो प्रक्षालननुरकरार व परियन्टेनमंत्रेण प्राचीनागीती दक्षिणाभिमुसो-भूया। दक्षि- रास्यादिशि निन्यप्रक्षिप्य यज्ञोपवीतो त्या पितृकर्मकाण निमित्त लदस्पर्शविधाय चंदनाना- सुगन्धिाच्या ग प्राण्यालिप्य । सुचत मगनी यामि यादि भूयासमिति-अन्तं जपेत । (महत्यासोंधौतम्बमौोणान्छादयीन-परिधास्य यशोधास्यै दीर्घाए त्वाय जाद- हामि । शाचीवामिशरद पुरुचीरायस्पोपममितव्ययिष्य इति ।१५) ततः अनवमशपवित्रक स वसनम्,श्रा छादयीतपन्दिधीत । तल्लाभेप्रमाण अरजवणधीतक्षालितं । परिध स्याइत्यादिनाअभिमंव्ययिय-~~ इत्यन्तमन्त्रेण (अयोत्तरीयम्-यशसामाधावापृथिवी যাহার दाहती। यशोभगस्त्रमादिन्दयशामाप्रतिपद्यतामिति ।१६१) प्रथपरिधेय पागधनन्तर तासमेत्तर यवास यशपत्यादि यशोमानियता मित्यन्टेनमात्रेण अच्छायीत पूरणसम्पाय । ( एकंचेत्पूर्वस्यांतरवर्गेणप्रच्छादयीत ।१७) चेद्यदिएवमेववासोभवति तरपूर्व येव परियायस्यव मम उत्त वर्गणतमागे पन्छान्योत पूर्वात नैवमन्त्रेण । (सुमनस. प्रतिगृहति-यामारजमदग्निः अजायै मायै कामायन्द्रियाय तामहंप्रतिगृह णामि यशसाचभगेतचेति ८t) सुगनम पुपाणिप्रतिशरणाति मन्यनतन्यारत्तेया पाहर दित्यादि ग्रामाच भगेन रेत्यन्तेन मत्रेण । (अथवा घधन ते यद्यमोसमा मिन्द्रश्चकार विपुल पृथु तेन सनविता. सुमन समावनामि यशो मशीति (1) प्रथा प्रति गृह्य भययनातशिरसि यध्नाति, यद्योs- ( ५२६) कर्मकाएटरक्षाकरे, उपनयनसंस्कारपद्धतिः । मरसा मिति मत्रेण (उपणापेण शिरोवेष्ठते-युवासुवासेति ।२०) प्णीषण पूर्वोक्त लक्षणेन तृतीयेनव ससा शिरो मूर्द्धनं बेष्ठयते । युवा स्वासा इत्यादि क्या देवयन्त इत्यन्तयों ॥ ( अलंकरण मसि भूयोऽलारणं भूयादिति फर्णवेष्ठको १२१०) अलकरणमसीति मंत्रेण दक्षिणेत्तर कर्णयो बेष्ठ भूपणे प्रति मंन प्रति मुचते परिपत्ते । (वृत्ररयेत्यते क्षिणि ।२२।) नस्लेत्यादिना चक्षुमदेहि इत्यन्तेन मणक्याक्रम दक्षिणव मना त्या अक्षिणी अक्ते स वीराननेनससरोति ॥ (रोचिएणु रसीत्यात्माचमादर्श प्रेक्षते ।२३। ) रोचिष्णु रमि इत्यन्तेन मरण श्रात्मान मुख प्रमृत शरीर-मादश-दर्पणे प्रक्षते पश्यति । (छत्रं प्रति गृह्णाति-गृहस्पते छदिरसि पाप्मनो मामन्त र्धेहि तेजस्ये यशसी मा-तधेहोति । २४) छत्रमानपत्र वृहस्पतेश्छदिरसि, इति मन्त्रेण परिगृति प्रतिष्ठेस्थो विश्वतो मापात मित्युपानहीप्रति मुञ्चते । २५ । ) प्रतिष्ठेस्यो, इति मन्नण प नहीं पार नणी पादयो प्रति मु-ते नस्य द्विवचनात् परिधातु पयत्याच युगपत्तायो प्रतिमुंचत॥ (विश्वाभ्यामा नाटा पस्परिपाहि मां इति पैमानाष्टाभ्यस्परिपाहि सर्वत इति रणव दंडमादत्ते १२६ ) विश्यान, इत्यनन मनेण वैण, परामय दण्डयछि पारो त चोत्तन्यायेन पूर्वदाई त्यस्त्व, इदमभिषा पनि दगइन गा त, कर्मात स्न न पत्ता बरोति नाचार्य ( दन्तप्रक्षाल- नादीनि नित्यमधिवास श्छनोपानहञ्चापूर्वाणि चेन्मन्न । २७।६] दन्तप्रक्षालन- म दी येपा पुष्पादीनां तानि दन्त प्रक्षालन दीनि नित्यममि सर्वदा मनवन्ति स्न ताप्य भवति, वरासोच छां च उप नही च व सोपानहं चकराइण्डेपि सतानि चेरि अपूव णि नूतनानि प्रियन्ते गृह्यन्ते त्दा मंत्रो भवति तद् ग्रहणे । २७ । इति पष्ठी कडिका ॥ अग्रे सप्त यष्टग्यो क्यिो प्राच यण स्मत नियमनिरण कृत सूत्र व्याया प्रसगात्तेष'- मपि-अवसग्रहो भवितुमर्हति परञ्च समावर्तनपद्धतौ रनातक प्रति प्राचार्यस्योप देशत्वात विछपेषणमत्वा ग्रन्थविस्तार भगाय स्नातकस्य नियमान् प्रयोगे वक्ष्ये ॥ ॥ इति समावर्तन सूत्र व्या या ॥ ॥ अथउपनयनसंस्कारपदितः ॥ तत्रत्रामणस्याष्टवार्षिकस्य क्षत्रियस्यैकादश वार्षिफस्प वैश्यस्य द्वादशवापिफस्यया मगलसपामुपनयनम् । अथोत्तरायणे पूर्वोक्त पुरपेहनि गणेशादि पञ्चांगजापूर्वकमाभ्युदयिकंत्राद्धं कृत्वायधा- फर्मकाण्डरनाकरे, उपनयनपद्धतिः । (५२७) शक्त्या ब्राह्मणान्गायत्रीनवग्रहादीनां जपकरणार्थवृत्वावहिः पूर्वोक्तांपोडशस्तम्भनिर्मितांशालांसम्पाद्यतत्र सर्वतोभद्र, ग्रह- यागभद्र वास्तुभद्रादीश्चनिर्माय सम्पूज्यच उपनयनात्पूर्वऽन्हि ग्रहमखंकृत्वाहोम समाप्ययदिकुमारः पूर्वोक्तसूत्रोक्तवभ्य उप- नयमावभ्यतीतकालोचा पतितसावित्रीको चाजन्मादिचूडाकरणा न्तसंस्कारहीनश्चेत्तदा अनादिष्टसंज्ञक प्रायश्चित्तमाचरेत, तस्या यप्रयोगः-श्रथ अनादिष्टप्रायश्चित्तपद्धतिः-प्रथाचार्यः उपन- यनात्पूर्वाहेबटुनासह गणेशादिपूजास्थलमागत्य-प्राचम्यप्राणा- नायम्यप्रणम्यच-संकल्पकुर्यात्-अद्येत्यादिदेशकालोसंकीय - अमुकोहंममास्या मुकराशेरमुककुमारस्य, गर्भाधानपुंसवन सीम- न्तजातकर्म नामकरण निष्क्रमणान्नप्राशन चौलकर्मान्तानां संस्का- राणां कालातिपत्तिदोपनिवृत्तिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ अनादिष्ट प्रायश्चित्तहोमकरिष्ये ततः पञ्चभूसंस्कारपूर्वकमग्नि स्थापयित्वा कुशकंडिकाविधिनासमित्प्रक्षेपणान्तं कर्मकृत्वा नवाहुतीर्जुहोति- अभूःस्वाहा भुवःस्वाहा स्वःस्वाहा भूर्भुवःस्वःस्वाहा त्व- नोअग्ने सत्वन्नोअग्नेदेअपाश्चाग्ने ७येतेशात उदुत्तमइतिनवा- हेति होमात्मकं प्रायश्चित्तंकुर्यात् । चौलातिरिक्त संस्काराणां प्रमा- दादकरणेप्रत्येक पादकृच्छू तस्मिन्नेवाग्नौ प्रतिसंस्कार नवाहुति होमं पृथक पृथक् संकल्पं कृत्वा सकृदाचरेन् । चौलाकर कृच्नं चटुनाकारयेत् । अशक्तीतत्मत्याम्नायत्वेन दशसहस्रगायत्री जपः जपदशांश तिलाज्याहुति होम गौदानं द्वादश ब्राह्मण भुक्त्यादि प्वक प्रायश्चित्त कारयित्वा अतीतजातकर्मादीनि कृत्वोपनयन तंत्र समाचरेत् । अथोपनयनेनसह चौलकरणविधिः । यदि उप- नयनेनसह । चौलकरण चेत्तदापूर्वेद्यः संस्कार द्वयंसंकीर्त्य युगपतू स्वस्तिवाचन ग्रह्यज नान्दी श्राद्धादीनि कृत्वा तहिनेरात्री पूर्वी', केशाधि यासनविधिना केशजूदिकागोदानान कृत्वा परेदाः पूर्वोक्तं चौलमयोग विधिवत्सर्वकृत्वा ततश्चौलान्त संस्कारान्ते कुमारस्य उपनयनानिमित्तकं वपनं कृत्वा वयमाणविधिना उप- नयन संस्कारमाचरेत् । इत्युपनयनेनसहचालकरणम् ।
फर्मकाण्डग्ताकरे, उपनयन द्धिति । अथोपनयनपद्धतिः अथच शुभेहिजोतिर्विदादिष्ठेप्रातःकुमारस्यवपनंकारयित्वा मंगल स्नानहरिद्रादिभिःकारयित्वागणेशसन्निधायुपगम्य,याचम्य प्रणम्य च पूर्वदिने अकृतप्रायश्चित्तश्चेत्तदा कुमारेणापि कामाचार कामा वादकामभक्षणादिदोपापनोदनाथ प्रत्याम्नायीभूतंकृच्छ्रनयं कार- येत् ततः कृच्छ्रत्रय प्रत्यास्नायी भूतानि त्रीणि सुवर्णग्वण्डानिवा प्रत्योम्नायीभूत द्रव्यं तिलोपरि पाने धृत्वा गंधादिना सम्पूज्य ब्राह्मणं च सम्पूज्य संकल्पं कुर्यात् । अयेत्यादि अमुकराशिर- मुक शर्माहं कामाचार कामवाद कामभक्षणादि दोषानुपत्तये स्वस्य च उपनेयत्व सिद्धये वृछत्रय, गोत्रय, निष्क्रयी भूतानि सतिलानि सुवर्णग्वंडानि वरजित मुद्रिकाः अमुकशर्मणे ब्राह्मणाय दास्ये । 30 तत्सन्नममेति दद्यात् । शक्तश्चेद् गोदान त्रयमेकं घा कुर्यात अद्येत्यादि संकीर्त्यामुकोह-ममास्य कुमारस्यो पनयनकर्मणि तत्पूर्वांगतयात्रीन्ब्राह्मणानहं भोजयिष्ये-तत्पंक्ती वटुं च पयसादिना भोजयेत् । भोजनोत्तरं वटुं स्नापयित्वा- अथाचार्यः पिता (क्षत्रियवैश्ययोस्तु पुरोहितादयः) उपनयन वेदीसमीपमागत्य उपनयन सामग्री सम्पाद्य उपनयन वेद्यां दक्षिण हस्तेन कुशैः परिसमुह्यपूर्व क्षिप्त्वा गोमयोदकेनोपलिप्य सुवमूलेन मागग्रास्तिस्रो रेग्वा विलिरय, उल्लेग्वन क्रमेणा नामि- कांगुष्ठाभ्यांमृदुमुल्य जलेनाभुचर तैजसपात्रोपनीतमग्निं वेद्यां स्वाभिमुखे संस्थाप्य तदरक्षाभ द्रव्यं नियुज्य अग्नेः पश्चात् स्वासने उपविश्य ततः पर्यंत शिरसमलं कृतं कुमारं वाद्यध्वनि मंगलपाठ पुरः सरं मण्डपस्य पश्चिम द्वारेणशालायां प्रदक्षिण मनि परिमाममाएं प्राचार्यसमीपमानयति । तत प्राचार्यः कुमार स्वदक्षिणभागेऽग्नेः पश्चाटुदद्दमुप मुपवेशयेन-संकल्पं कुर्यादा- चार्यः अयत्यादि देशकालो संकीर्ण अमुकोहं ममास्य पुत्रस्य (शिष्यस्य) चा वीजगर्भ समुद्भवनोनिवर्हण पूर्वक श्रौतस्मात कर्मकापरतारे, उगनमारत.। . (५२६) यात् ब्रह्मचर्य -- कर्मानुष्टान सिद्धि द्वारा, ब्रह्मवर्चाभि वृद्धये श्रीपरमेश्वर प्रीतये पोडश संस्कारान्तर्गतोपनयन संस्कारं करिष्ये-ततो माणवकः स्मार्त्ताचमनं कृत्वा उदंङ् मुखेन बद्धांजलिः सन्नाचार्य प्रेक्षते । ततः श्राचार्यों बद्धांजलिंकुमारं प्रति मागाम्, इतिप्रेषयति, नतो वटुः ब्रह्मचर्यमागाम--इति वदेत् ।। धुनरा- चार्य:, ब्रह्मचार्यसानीति पृच्छेत् वदुः-ब्रह्मचार्यसानीतिव्यात् ।। अथैनवासः परिधापयत्याचार्यः। नत्राचार्यः पठेन् ॐ येनेन्द्रा येत्यंगिरा ऋपिर्युहती छन्दोबृहस्पति देवता वासः परिधाने चिनियोगः ॥ ॐ येनेन्द्रायवृहस्पतिर्वासः पर्गदधादमृतम् ।। तेनत्वापरिदधाम्यायुषे, दीर्घायुत्वायवलाय वर्चसे, माणवकाय द्विराचमनं कारयेत, अमन्त्रकम् ।। ततो माणवकस्य कटि प्रदेशे सूत्रोक्ता मेवला मौंज्यादिकां श्राचार्या बन्धीते, माणवकस्यैव मंत्रपाठः । इयं दुम्क्तमिति बामदेव ऋपि बिष्टुप्छन्दो मेग्वला देवता मेग्वलायन्धने विनियोगः ।। आइयं दुरुक्तं परिवाधमाना व्वर्षपवित्रंपुनतीमयागात् ।। प्राणापानाभ्यां यलमादधानारवसा देवीसुभगामेग्वलेयम् ।। इति कटिनदेशे मेग्यला त्रिरावेष्ट्य प्रवर संख्ययाग्रंधीः करोत्याचार्यः । युवासुवासः इतिमंत्रेण मेग्वला वंधनम् तृष्णी वा (अत्र सूत्रकारेण शिग्वा बंधनं नोत्तम्--परंच सदोपवीतिनाभाव्यसदावद्धशिखेन च इतिकात्यायनः । स्मृत्वी. कारंचगायत्री निवनीयाच्छिखां ततः इतिनागदेवः इत्याचार्यो गायत्री मंत्रेण वटोः शिखावन्धनं करोति ॥अत्रावसरे सूत्रकारण- यज्ञोपवीताजिनधारणेनोक्ते, तथापि दंडाजिनोपवीतानिमेखला चैवधारयेत् , याज्ञवल्क्यः-विभृयाइंड कौपीनोपवीताजिनमेखला: इति व्यासः । इति प्रमाणाभ्यां तेकार्ये )अश यज्ञोपवीतधारण प्रयोगः (उक्तंचछन्दोगपिरिशिष्ठे-संकल्पः अद्येत्यादिदेशकालो- * मेला सप्त हस्तास्या दजिनं तु द्विहस्तकं । पहिलीम व्यंगलंच राईकं वा निसंदरम। निवृता मेसला कार्यान्विरं स्यात्समारता । त-संध्यस्त्रय. काय! पंपासप्तया पुन । अत्र प्रवरगंग्या नियम इति वृताः।
(५३०) कर्मकागमताकरे, उपगगनपद्धति । संकीर्त्य अमुकोऽहं ममास्यपुत्रस्य शिष्यस्य वा श्रौतस्मातकर्मा- नुष्ठान सिध्यर्थं श्रीपरमेश्वरप्रीतये उपनयन संस्कारकर्मणि वज्ञोपवीताभिमंत्रणेकरिष्ये ततः पूर्वोक्त प्रकारनिर्मित यज्ञोप- वीतसूत्रे पादाय 30 इदं विष्णुरिति मेधातिथि पिविष्णुदेवता गायत्रीछन्दः सूत्र त्रिगुणीकरणे विनियोगः ॥ इदं विष्णुर्विच- क्रमेत्रेधानिदधेपदम् । समूढमस्यपासुरे स्वाहा इति मन्त्रेणएकं ब्राजालेन एक त्रिगुणकुर्यात् । एवं द्वितीयमपि, प्रक्षालनम् अ आपोहिष्ठेति तिस्त्राणां सिन्धुद्वीप ऋपिः श्रापोदेवता गायत्री छंदः यज्ञोपवीत प्रक्षालने विनियोगः 30 अपोहिष्टामयोभुवस्ता- नउर्जेदधातनः महेरणोय चक्षसे । योवाशिवतमोरसस्तस्य भाज- यतेहनः । उशतीरिवमातरः । तस्माऽअरंगमामयोयस्थक्षयाय. जिन्वथ आपोजनयथाचनः ततः प्रक्षालनादनन्तरं दशगायत्री मन्त्रैरभिमंत्र्य नवतन्तु देवता यावाहयेत् प्रथमतन्तौ 30 कार मावहयामि, द्वितीयतन्तौ 30 अग्निदृतं पुरोदधेहव्ययाहमुपद्रवे देवां २॥ श्रासादयादिह 30 अग्निमाचाहयामि, तृ. अनमोस्तु सभ्यो येके च पृथिवीमनु । येऽअन्तरिक्ष येदिवितेभ्यः सप्- भ्योनमः ॐ सर्पानायाहयामि, च० ॐ व्यय ई० सोमवृते तव मनस्तनूपुविभृतः प्रजावन्तः सचेमहि । सोमवावाहयामि,पं0- 0 उदीरतामवरऽउत्परासऽउन्मध्यमाः पितरः सोम्यासऽअसुय्य ऽईयुरवृकाऽतज्ञास्तेनोवन्तुपितरो हवेपु । पंचमतौपित्त्रहनावा- हयामि,प०ॐप्रजापतेनत्वदेतान्यन्योविश्वारूपाणिपरितायभूय । यत्कामास्तेजुहुमस्तन्नो ऽअस्तुव्वय ॐ स्यामपतयोरयीणाम् । पूजापतिमावाहयामि, सप्तमतन्तौ ॐानोनियुदाभः शतनीभि रध्वर ० सहस्रिणीभि रुपयाहियज्ञम् । व्वायोऽअस्मिन्सदने मादयस्वयूयम्पात:स्वस्तिभिःसदानः । अनिलमावाहयामि । अ० ॐ सुगावोदेवाः सदनायाजग्मेद र्ट० सवनंजुपाणः भरमाणा व्वहमानाहन्वी ॐ प्यरमैधत्तव्यसवोव्वसूनिस्वाहा । यममावा हयामि । नवतन्तौ ॐ विश्वेदेवास आगत श्रृणुतामऽइम ई. , कर्मकाण्ड लाकरे, उपनयनाद्धति । हषम् । एवं चाहानपीदत । विश्वान्देवानावाहयामि यज्ञोपवीत प्रन्धिदेवता आवाहनन् -प्र-ॐ ब्रह्मयज्ञान प्रथम पुरस्ताद्विसी- मतः सुरुचोव्वेनऽआवः। सब्बुध्न्याऽउपमाऽअस्यविष्ठाः सत- श्चयोनि मसतश्चश्विः । द्वि० ॐ इदं विष्णुर्विचक्रमे, त्रेधानिद- धेपदम् । समृढमस्यपा ॐ सुरेस्वाहा । तृ. ॐ वक्रव्यजामहे सुगन्धि पुष्ठिवर्धनम् । उस्किमियवन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमाम- तात। ग्रन्थिदेवताभ्योनमः। प्रणवाद्यावाहितदेवताभ्योनमायथास्था नमहं न्यसामिसंपूज्यध्यायेत् २० प्रजपतेर्थसहजपवित्रकार्पास- सूत्रोद्यनमसूत्रम् । ब्रह्मत्वसिध्यैचयशः प्रकाशंजपस्यसिद्धिं कुरु नमसन्न ॥) ततः कलशोपरिधृत्वा 3. जोपवीतावाहितदे- वेभ्यो नमः 30 एलन्तेतिप्रतिष्ठाप्य संपूज्य च 30 आकृष्णेन- इतिपठित्या सूर्याय दर्शयित्वा एवं संस्कृतं यज्ञोपवीतं । शाग्वान्तरीय वक्ष्यमाण मंत्रेण धारयेत् ॥ ततः आचार्य:-ॐ. यज्ञोपवीतमिति परमेष्टी ऋषिः त्रिष्टुप्छन्दः लिंगोक्ता देवताः श्रौतस्मात कर्मानुष्ठान सिध्दथे यज्ञोपवीत परिधाने विनियोगः ॐ यज्ञोपवीतं परमं पवित्र प्रजापतेर्यत्सहर्ज पुरस्तात् || भायु- प्यमा प्रतिमच शुभ यज्ञोपवीतं बलमस्तु तेजः ॥ 30 यज्ञोप- वीतमसि यज्ञस्यत्या यज्ञोपवीतेनोपनहामि ॥ इति मंत्रं पठन्सन् वटोर्दक्षिण वाहुमुधृत्य वामस्कन्धोपरि निदध्यात् अत्रापिमाण चक प्राचमनद्वयं कुर्यादमन्त्रकम् ततः स्व स्व वक्त मेणेयाद्य- जिनं पाहिलीम यज्ञोपवीतवत्परिदध्यात् ।। 30 मित्रस्य चक्षुरिति वामदेव ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः अजिनं देवता अजिन धारणे विनि- योगः-11-ॐ मित्रस्य चक्षुमणं वलीयस्तेजो यशस्त्रि स्थविर ट• समृद्धम् । अनाहनस्यं व्यसनं जयिष्णुः परीदं व्याज्यजिन दधेशग ॥ अधाचार्य: वक्ष्यमापदंई पादादिशिखातं ललाट संम्मितं प्राण प्रमाणे न त्रैवर्णिक पालाश वैल्वोदुम्बरजम् । तत्तवर्ण EिO भगु-उपर्धात वटोरम तथेतरयोस्मृते। छंदोगपरिध ग्रहाचारिण एफस्परस्नातस्थ विद्दनिवा।।
(५३२) कर्मकाण्डरत्नाकर, उपनयनपद्धति । वटवे तृष्णीं समंत्रकं वा वक्ष्यमाण मंत्रेण प्रयच्छति ॥ ॐ यो मे दण्ड इति प्रजापति ऋपि यजुश्छन्दो दण्डो देवता दंडग्रहणे विनियोगः । 30 यो मे दंडः परापतद्वैहायसोऽधि भूम्याम् तमहं पुनरादद ऽघायुपेब्रह्मण ब्रह्मवर्चसाय ॥ इति बटुः प्रगृह्य वक्ष्य- माण मन्त्रेणोच्छ्रयति । ७० उच्छ्रयस्वेति प्रजापति ऋपि यजुश्छ- दः दण्डो देवता दण्टोच्छ्यणे विनियोगः" । 30 उच्छ्यस्त्र वनस्पतऽऊयामापाहा ई० हसः आस्य यज्ञस्योदचः" ॥ ततः आचार्यः स्वमंजलिमद्भिरापूर्य तेनेव माणवकांजलिमापूरयति चक्ष्यमाणमंत्रैः ॥ ॐ आपोहिष्ठेत्यादि त्रयाणां मंत्राणां सिन्धु- द्वीपऋषिर्गायत्रीछन्दः श्रापो देवता माणवकांजलिपूरणे विनि- योगः ॥ ॐ अापो हिष्ठामयो भुवस्तानऽऊर्जे दधातन महेरणाय चक्षसे । १ । योवः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेहनः उशतीरिव मातरः २ तस्माऽअरंगमामवो यस्य क्षयाय जिन्वथऽापोजन यथाचनः । ३ । इति माणवकांजलि मद्भिः पूरयित्वा एनं सूर्य- मुदीक्षस्व इति प्रैपं ददाति ततो माणवक सूर्यमुदीक्षमाणः सन्नं जलिस्थं जलंतृष्णीं सूर्याय प्रक्षिप्योर्ध्ववाहुरादित्य मुपतिष्ठते वक्ष्यमाणमंत्रेण । ७० तच्चक्षुरिति दध्यंगाथर्वण ऋषि मी त्रिष्टुप्छदः सविता देवना सूरयों दीक्षणे विनियोगः 30 तचतुर्देवहितं पुरस्ताच्छुक मुच्चरत् । पश्येम शरदः शतं जी वेम शरदः शत शृणुयाम शरदः शतं प्रबवाम शरदः शतमवीनाः स्याम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ।। अथाचा यो माणवकस्य दक्षिणांसस्योपरि स्व दक्षिण हस्तं नीत्वा वक्ष्य- माणमंत्रेण हृदयमालभते-मम व्रतेन इति प्रजापति पित्रि- प्टुप् छन्दो वृहस्पतिर्देवता हृदयालंभने-विनियोगः ॥ 30 मम व्रतेते हृदयं दधामि मम चित्त मनुचित्तं तेऽस्तु मम व्वोच मेकमना जुपस्व बृहस्पतिष्ट्वा नियुनक्तमहाम् ॥ अथाचार्यो मा णयकस्य सांगुष्ठं दक्षिणं हरतं गृहीत्वा को नामासीत्याह एवं पृष्टोब्रह्मचारी अमुकशर्माहं भोः इति प्रत्याह । पुनराचार्यामाण कर्मकापहलाको नयनपद्धति.। (५३६ वकं पृच्छतिकस्य ब्रह्मचार्यसीति माणयको नृते भवनः इति माण वकेनोच्यमाने 30 इन्द्रस्येति प्रजापतिर्मपिः लिंगोक्ता देवताः प्राचार्यपाठे विनियोगः । इन्द्रस्य ब्रामचार्यस्यग्निराचार्यस्त था- हमाचार्यस्तव अमुक शर्मन् । अमुक शभन्नित्यत्र अमुक स्थाने,, श्री........"शर्मन् इति बटुनामान्तं पटेत ॥ श्रथैनं भूतेभ्यः परि ददाति मन्त्रेण-30 प्रजापतयेत्वेति प्रजापतित्रापिः लिंगोक्ताः देवताः घटुरक्षाकरणे विनियोगः प्रजापतये त्वा परिददामि देवायत्यासचिनेपरिददाम्यदभ्यरत्वौपधीभ्यः परिददामिन्द्याचा थिवीभ्यान्त्यापरिददामिविश्वेभ्यस्त्वाभूतेभ्यःपरिददामिसर्वभ्य- स्त्वाभूतेभ्यः परिददाभ्यरिष्ट्य ॥ तताकुमारोऽग्निंप्रदक्षिणीकृत्य श्राचार्यस्योत्तरतः (वामभागेपूर्वाभिमुग्योभृत्वा) उपविशति । श्रथ ब्राह्मवरणामासनमग्नेदेक्षिणतः कल्पयित्वापावादिभिः । चरणद्रयंत्रामपंचसम्पूज्य-अत्यत्यादिदेशकालौ संकीामुको- हममास्ययोः उपनयनकर्मणि तदंगीभूतवनकमणिताना वेक्षणरूपव्रत्मकर्मकतमनेन वरणद्रव्येणामुकगोत्र ममुकशाएं ब्रामणंत्रमत्वेनत्वामहंधणे । वृतोस्मीनिवामान्यान् । यथा- विहितं कर्मकुम कारवाणीनिहाणोक्तिः ततो व्रमाणमग्नेः । प्रदक्षिण कारयित्वा कल्पितासने उदमुग्यमुपवेशयेन् । ततोग्ने गत्तरतः प्रागनः कुशरासन द्वयं कल्पयित्वा-प्रणीतापात्रं सव्ये करेकृत्वा दक्षिणहरतोध्दत वृतपात्रस्थोदकेन पूरयित्वा पश्चि- मासने निधाय हस्तेनालभ्य पूर्वासने स्थापयित्वा ॥वहिमष्टिमा- दाय (यावद्भिः प्रयोजनं) ईशानादिमाग हिभिरदा संस्थमग्ने रुत्तरतः पश्चाद् वा परिस्तरणं कृत्वा । पवित्र छेद- नानित्रीणि कुशतरुणानि ॥ पवित्रेसाने 'अनन्तगभेद्वे फुश तरूणे । पोक्षणीपात्रं श्राज्यस्थाली तैजसीचम्स्थाली, सम्मान कुशास्त्र यः उपयमनकुशा स्त्रिप्रभृतयः पंच सप्त वासमिधस्तिस्रः प्रादेश मान्यः सुवः गव्यमाऽयं, पूर्णपात्रं, दक्षिणा, चरोवा, यधायदा- साध, तस्त्रिभिः कुशतरुणैः उकुशतरूणे प्रच्छिद्य संस्थाप्य ( ५३४) कमाउरत्नाको उपनयनपचति । प्रोक्षणी पात्रं प्रणीता सन्निधौ निधाय तत्रहस्तेन प्रणीतोदक मासिच्य, पवित्राभ्यामुत्पूय पवित्रेमोक्षणी पात्रे निधाय दक्षिण हस्तेन प्रोक्षणी पात्रमुत्थाग सव्ये पाणौ कृत्वा तदुदकं दक्षिणा नामिकांगुष्ठाभ्या मुच्चाल्य प्रणीतोदकेन प्रोक्ष्य प्राज्यस्थाल्या- दीनि पूर्णपात्रपर्यन्तानि प्रोक्षणी जलेन रासादनक्रमेणैकैकशः प्रोक्ष्य प्रणीतारन्योरंतराले प्रोक्षणीपात्रं निधाय, प्रासादितमाज्य माज्यस्थाल्यां पश्चादग्ने निहितायां प्रक्षिप्य प्रणीतोदकमासिच्य तत्राज्यं ब्रह्माधिश्रयति ज्वलदुल्मुकमादाय भाज्योपरिस मन्तात् प्रदक्षिण क्रमेण भ्रामयित्वा, दक्षिण हस्तेन श्रवमादाय प्रांचमधोमुख तापयित्वा सव्ये पाणौकृत्वा, दक्षिणेन सम्मार्जन कुशाप्रै लतोऽग्रपर्यन्तं मृलैरग्रतो मुल पर्यन्तंसमृज्य तान् कुशानग्नौप्रक्षिपेत, प्रीतोदकेन संमोच्य पुनः पूर्ववत्मतप्यस्व दक्षिणतो निदध्यान, भाज्यमग्नेः पश्चादानीय पूर्व पवित्रा भ्यामुत्पूप अवेक्ष्यापद्रव्य निरसनंकृत्वा प्रोक्षणी जलेन पवित्रा- भ्यां संमोक्ष्य । उपयमन कुशान् दक्षिणाहस्तेनादाय वामे कृत्वो- तिष्टनतिनः समिधः अग्नौ प्रक्षिप्य प्रोक्षण्युदकं दक्षिण चुलुके कृत्या ईशानादि उदगान्तमग्नि प्रदक्षिण क्रमेण संपोक्ष्य पवित्रे पूणीतापानेनिधायाघारादीन् जुहुयात् संसवधारणार्थ प्रोक्षणी पात्रं प्रणीताऽन्यो मध्ये निदध्यान् ॥ ततः समुदभव नामाग्नि, मावास्येत् । ॐ एतन्ते इति ॐ भूर्भुवः स्वः समुद्भव नामाग्ने इहागच्छेहतिष्ठसुप्रतिष्टितो घरदो भव ॥ रत्वारि श्रृंगा इति ध्यात्वा गंधादिभिः सम्पूज्य रेग्वा पूजनं जिवश पूजनं च कृत्वा । तत श्राधाराद्याश्चतुर्दशाहुतीब्रह्मणान्वारम्धो जुहुयात । हुत शेष घृतं संस्रव प्राशनार्थ प्रोदणी पात्रे क्षिपेत् । ॐ प्रजापतये स्वाहा इदंप्रजापतयेनमम ॐ इन्द्रायवारा इदमिन्द्राय ॐ अग्नयेस्वाहा इदमनये. सोमायस्वाराइदंसोमाय । इत्याघारापाज्यभागी हुत्वा ॐ भूरादिव्याहृतीनांप्रजापतिर्मपिस्त्रिष्टप्छन्दः अग्निवायु- गर्यादेवताउपनयनांग होमोवीनयोगः। ॐ भूःस्वाहाइधमग्नये- कर्मामाकरे, उपनयागतिः । (५३५ ) नमम . भुवःस्वाहा इदंवायवेन० 1 30 स्वास्वाहा इदंसूर्याय त्वन्नोऽअग्ने सत्वन्नोऽग्ने इत्यनयोर्वामदेव ऋषिम्निष्टप्छंदः अग्निवरुणोदेवते उपनयनांगहोमे विनियोगः । ॐ त्वन्नोऽग्ने वरुणस्य विद्वान् देवस्यहेडोऽअवयासिसीष्टाः । यजिष्टोवह्नि- तमः शोशुचानोचिश्चाद्वेषासिप्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्नी- करुणाम्यांनमम असत्वन्नोऽअग्नेऽअवमोभवोत्तीनेदिष्टोऽअस्था ऽउपसोव्युष्टौ अवयवनोव्वरुपर्ट राणौ वीहिमृडीकर्ट सुह वोन एधिस्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम-30 थयाश्चाग्ने इतिवामदेवऋषिन्त्रिष्टप्छन्दः अग्निर्देवता उपनयनांगहोमेवि०। श्रयाश्चाग्नेहानभिशस्निपाश्च सत्यमित्वमयाऽसि । श्रया नोयन्वहास्यवानोधेहिभेपजस्वाहा इदमनयेनमम । ॐ येते- शतमितिवामदेवऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दोच्चमणः सविताविष्णुर्देवता विश्वेदेवामरतः स्वर्णाश्चदेवताः उपनयनांगहोमेविनियोगः । ॐ येतेशतंब्चमण्येसहसंयज्ञियाः पाशाचिनतामहान्तः तेभि- न्नोऽअद्यसवितोतविष्णुविश्वसंचन्तुमस्तः स्वःस्वाहा इदंच- मणाय, सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्योमस्दभ्यः स्वभ्यानमम ।। 30 उदुत्तममितिशुनः शेफाषिनिष्ठप्छन्दः व्वणोदेवता उपनय- नांगहोमेविनियोगः। 30 उदुत्तमं बझापाशमस्मदनाधम चि. मध्यम श्रथाय । अधाब्ययमादित्यवते तवानागसोऽअदितये स्यामस्वाहा । इदंश्चमणाय० । 30प्रजापतयेस्वाहा हदप्रजापतये० 30 अग्नयेस्विष्टकृतेस्वाहा--उदमग्नयेस्विष्टकृतेनमम--इतिहोम- विधायसंस्रयंप्राश्य, पवित्राभ्यां प्रणीताजलेन संम्माय, पवित्रपतिपत्तिः प्रणीताविमोक कृत्वा ब्रह्मणे पूर्णपात्र दानम्-श्रयह अमुक शर्मा अमुकर्शमणो- ऽस्य चटोः उपनयनांग होम कर्मणः सत्पुण्यार्थ अपूर्ण पूरणाय च इदं सदक्षिणं पूर्णपात्रं ब्राह्मणे तुभ्यं संपददे इति दद्यात् । स्वस्ति ब्रह्मा गान् । तत प्राचार्यो वर्ट शिक्षयति ब्रह्मचासि, इति वदेदाचार्य:--असानि, प्राचार्य:-अपोशान, ५ ..
(५३६) पर्मकाएरक्षाकरे, उपनयनपति:। प्रश्नानि इति वदुः, प्राचार्य:-कर्मकुम, वढः, करवाणि, प्राचार्यः मादिवासुपुष्याः॥ वटुः, न स्वपानि, प्राचार्य:-वाचं यच्छ, पटुः यच्छानि, प्राचार्यः समिधमाधेहि, वटः, श्रादधानि, प्राचार्यः पुनः अपोऽशान ॥ वटुः,अनानि,ततोज्योतिर्विदादिष्टेलग्नदानकुर्यात् । ततः सद्रव्यदानसामग्री संपाय समोक्ष्य च संकल्प:-श्रधेत्यादि देशकालौसंकीर्त्य अमुकराशिरमुक्शर्मा ममेदानींसावित्रीग्रहणे ऽमुकलग्नावधिकरमुक स्थानस्थितादित्यादिनवग्रहः सूचितारिष्ट निर्वृत्तिद्वारा शुभफलप्राप्तये ग्रहाणांसन्तुष्ट्यर्थ इदंसुवर्णतनिष्क यीभृतंद्रव्य वा आमुक शर्मणे ब्राह्मणाय श्रन्येभ्यश्च वा दास्ये । तन् सन्नमम (पितातिरिक्तोगुमश्चेत्तस्य वरणकुर्यात् पितुस्तुपूजन मात्र) ततो गुरुवरणद्रव्यं गुरुं च सम्पूज्य, संकल्पः, अद्येत्यादि संकीर्त्यअमुकराशेर्मम साविन्युपदेशद्वारा द्विजत्वसिद्धये, पतेन चरणद्रव्येण यमुकगोत्रममुक शर्माणं ब्राह्मणं गुरुत्वेनत्वामहवृणे इति दत्वा, वृतोस्मीति गुरुर्ब्रयात् । अथ च गुमः अग्नेस्त्तरतः स्वदक्षिणपायें पश्चिमाभिमुग्वं वटुमुपविश्य स्वयं पूर्वाभिमु- ग्वोभूत्वा वक्ष्यमाण प्रकारेण साविन्युपदेशकरोति, ततो चटाकर्णी स्पृष्ट्वायमुकगोत्रोऽमुकशर्मा,अभिवादयेइत्युक्त्यादक्षिणहस्तेन दक्षिणपादस्पृष्ट्वासव्येनसव्यंपादस्पृष्टयाचरणयो शिरोधस्वानमेत् तन्त्रप्रथमवारमैकैकंपादश्रावयेत्। -प्रणवस्यत्रत्माऋपिदवीगायत्री छन्दःपरमात्मादेवता व्याहृतीनां प्रजापति पिःगायन्युषिणगनुभ- श्छन्दांसि अग्नि यायु सूर्या देवता । तत्सवितुरित्यस्य विश्वामित्र पिर्गायत्री छन्दः सवितादेवता माणवकोपदेशने विनियोगः अथ च शुभे लग्नेशखादिरवेजायमाने,वाससाऽऽछादनं कृत्वागुरु: दक्षिणकर्ण भूभवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् । इति प्रथमपादं श्ववियित्वा वाचयेच । द्वितीयपादम् । भर्गोदेवस्यधीमहि इति श्रावयित्वा पाचयेच । तृतीयपादम् धियोयोनः प्रचोदयात् इति श्रावयित्वानाचयेच्चततोद्वितीयवारं अर्धर्चश्रावये । ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि । इति द्वितीय- कर्मकाण्डपताकर, उपनगरात:। (५३७) - मर्द्धर्च श्रावयित्वावाचयेन् ततस्तृतीयवारं सम्पूर्ण 30 भूर्भुवः स्वः तत्सवितुरेण्यंभोंदेवस्यधीमहिधियोयोनः प्रचोदयात् । इति सर्वां श्रावयित्वाचाचयेच्चवटुम्- क्षत्रियाय, देवसवितुः प्रसुवयज्ञ मसुक्यज्ञपतिंभगाय । दिव्योगंधर्वः केनः केतन्नः पुनातुवाचस्पति जनाः स्थदतु । वैश्याय-30 विश्वारूपाणि प्रति मुंचतेकविः प्रासावीद् भद्रं द्विपदेचतुष्पदे, विनाकमख्यत्सविता व्वरेण्योऽनुप्रयाण मुपसोधिराजति । सर्वपांचा ब्रह्मगायत्री मुप- दिशेदित्यपरोपक्षः। ततो वित्तशाध्यजितांगुरवेवरं (ब्राह्मणस्य गौवर राजन्यस्यभूमिः वैश्यस्यनश्यम्, सर्वेषां वा गौवरम् ) चराभावेसुवर्णादि दक्षिणांदद्यात् ।। संकल्प:-अद्येहअमुकराशिर- मुकशर्मा-(वर्मा गुप्तो चा) अहंकृततत्सवित्री ग्रहणकर्मणः साद्गुण्यार्थ इदं सुवर्णमग्नि दैवतरजतंचन्द्रदैवतं वा घर निष्क्रयी- भूतं गुरवेतुभ्यमहसंप्रददे ततो गरोश्चरणयोः प्रणिपला समर्पयेत् श्रायुप्मान्भवसौम्य, इति गुमवदेन ततो ब्रह्मचारी तत्कालिकांम ध्यान्ह संध्यांचोपासीन । अथ उपनयनारनौ समिदाधानं कुर्गात् ततः प्रादेशमात्रंशुष्ककाष्ठं वा गोमयोपल, तन्त्र पंचधा विभक्तं संधुक्षणार्थ पर्युक्षणार्थमुदकं । समिस्तिस्रः संस्थापण ब्रह्मचारी अग्नेः पश्चादुपविश्यादौ वक्ष्यमाणैः पंचभिमत्रः अग्निं हस्तेन परिसनयति संधुक्षयतीत्यर्थः हस्ताभ्यां सन्धुक्षणप्रसिद्धिरस्ती- तिहरिहरः । सुश्रवइत्या दीनां पंचानां मंत्राणां ब्रह्माऋषिः यजुश्च्छन्दः अग्निर्देवता अग्नाविंधन प्रक्षेपणे विनियोगः ॥ ॐ अग्ने सुश्रवः सुश्रवसम्माकुरु । इति मंत्रेण एकमिंधनमेकशुकमु. पलं वा नौ प्रक्षिप्य,द्वितीयमाददे . यथात्वमग्नेसुश्रवः सुश्र वाऽअसि । इति भक्षिप्य तृतीयमाददे-30 गवम्मा ॐ सुश्रयः सौश्वसंकुरु ।। इति प्रक्षिप्य चतुर्थमाददे-30 यथात्वमग्नेदेवानां यजस्य निधिपाऽसि । इतिप्रक्षिप्य पंचममाददे, 30 एवमहं मनु- ष्याणां वेदस्य निधिपोभूयासम् । इति पंचममनिपेत् इति अग्नि उभाग्यां हस्ताभ्यां सन्धुक्ष्य प्रज्वलितं कृत्वा दक्षिणहस्त चलके (५३) कर्मकायरानाकर, उपनयनप । . जलं गृहीत्वा, ईशानादुत्तर पर्यन्तं प्रदक्षिण क्रमेणपर्युक्ष्य, ततो ब्रह्मचारीउत्थाय, वक्ष्यमाण मंत्रेणसमिधमादधाति-30 अग्नय इति प्रजापतिर्ऋषिराकृतिछन्दः समिद्देवता समिदाधानेविनियोगः ततो घृताक्तोमेकां गृहीत्वा अग्नये समिधमाहार्पवृत्ते जात- वेदसे, यथात्वमग्ने समिधा समिध्यसऽपवमहमायुपामेधयाय- चसा प्रजयापशुभि ब्रह्मवर्चसेनसमिन्धे, जीवपुत्रोममाचार्यो मेधाव्यहमसान्य निराकरिष्णुर्यशस्वी तेजस्वी ब्रापस्यान्नादौ भूयास स्वाहा, इत्यनेनवै द्वितीयां तनीयाम्के कशः जहोति ।। [अत्र समित्प्रक्षेपणेमंत्र इयोरिकल्प:-अग्नयेसभिध० १ एपाते अग्ने, इतिवासमुच्चयेन नतस्तृष्णी मुपविश्य पूर्ववत् अग्नेः सुश्र- वइत्यादि पंचभिर्भन्नः इन्धनप्रक्षेपण परिसमानं धुंक्षणम्, अद्- भिरग्नेः प्रदक्षिणं पर्युक्षणंच कुर्यात् । ततस्तृष्णीमग्नौ हस्तौन- प्य मुस्वविमार्टि ललाटादि चिवुकान्तं परमाणैः सप्तभिमन्त्रैः प्रौच्छति । 30 तनूपाऽग्ने इत्यादीनां सप्तमंत्राणां प्रावत्सार पि त्रिष्टुप्छन्दः अग्निर्देवता अग्न्या लम्भने विनियोगः-~ॐ तनृपाऽअग्नेऽसितन्वमेपादि । 3. श्रायुर्दाऽअग्नेऽम्पायुमैंदेहि ।।२।। 30 बोंदाऽअग्नेऽसि व्यों मेदेहि ।। 30 अग्ने यन्मेतन्याऽ उनतन्म ऽप्राण ॥४॥ 3- मेधामेदेवः सविता बादधातु ।।२ॐ मेधामदेवी सरस्वती आदभातु ॥६॥ ॐ मेघामश्विनौदेवावाधत्तां पुष्कर स्रजो ॥७॥ (थशिष्टाचारप्राप्ताः केचित्पदार्थाःलिख्यन्ते । हरिहर.)तः उभाम्यां हस्ताभ्यां गिरस यापद समुहमालभ्य जपति--30 अंगानि च मऽत्राप्यायनाम् ॥ सर्वाङ्ग स्पृशेत मुखे-30 ऽआप्पायतान् नासिकारंध्रयोः, प्राणश्चमऽत्राप्यायताम् ॥ नेत्रयो, चतुश्चम ऽआप्यायताम् । कर्णयोः-धोत्रेचमऽबाप्पायताम् । वाहो--30 यशोवलं वमहापापनाम् तत.हस्तीपक्षात्य ॥ ततः अपमूले नभस्मंगृहीत्वा,तेनभस्मनाललाटादिपु न्यायुपंकरोति ॥ दक्षिणा नामिकया ३० न्यायुपमितिनारायण पिषिणक्छंदः-अग्निर्दे चाकचम 3A (५६) कर्मकाण्डरक्षाकरे, उपनयनपद्धतिः। वता यायुपकरणेविनियोगः ॥ व्यायुपंजमदग्नेः-इति ललाटे, ३० कस्यपस्यन्यायुषम् -ग्रीवायाम्, ।। 30 पद्देवेपुयायुपम्-दक्षि पांसे,-3 तानोऽअस्तुत्र्यायुपम्-इतिहदि,-अथाग्नेरभिवादनम्- अमुकगोत्रो ऽमुकप्रचरोयजुर्वेदान्तर्गता मुकशास्वाध्यायी अमुक शर्माहंभोः । अग्नेस्वामभिवादये । इत्युभाभ्यां हस्ताभ्यां कएँ- स्पृष्ट्या शिरसानमेत्-ततोगुणस्पृष्ट्वा दक्षिणहस्तेनगुरो- दक्षिणंपादस्पृष्ट्वा सव्येनसव्यंस्पृष्ट्वा शिरोऽधनमनंकृत्वापूर्व- वदुक्त्वाभोः गुरोस्त्वामभिवादये अभिवादितोगुरुश्चभोः । अमुकशर्मन् वायुप्मानभयसौम्य । इत्याशिदद्यात ततः स्म त्युक्तानप्यभिवादयेत ॥ (याजवल्क्यः)-.-ततोऽभिवादये- अदानसावमितिलवन ॥ अभिवादनप्रकारमारमनु:--भोशब्द... कीर्तयेदन्ते स्वस्यनाम्लोभिवादने । नाम्नास्वरूपमायोहिमोशन्दे ऋषिभिःस्मृतः। आयुष्मान्भव सौम्येनिवाच्योविमोभिवादने ।। अकारश्चास्यनाम्नोन्तेवाच्यः पूर्वाक्षरप्लुतः ।। उत्थायमातापि- तरौ पूर्वमेवाभिवादयेत् । श्राचार्यश्च ततोनित्यमभिवाद्योथिजा- मता | मनु:--अभिवादनशील नित्यंवृद्धोपसे विनः चत्वारि तस्यवदन्तायुः प्रज्ञायशोयलम् । अयान निभिवादनानाद-मनु:- योनवेत्यभिवादस्थविप्रः प्रत्यभिवादनं ॥ नाभिवायासविदुषा यथाशूद्रस्तथैवसः 11 शातानप:-उदश्यांसुतिकांनारी भतनीगर्भ. पानिनी । पाग्वण्डंपनितंत्रात्यं महापानकिनंशठम् । नास्तिककि- तबस्नेनं कृतघ्ननाभिवादयेन् । वृदस्पलिस्तु-जपयज्ञजलस्यं च- समित् पुष्पकुशानातिलान् । उपात्राभक्षान्नयहन्तनाभिवाद. येत् । अभिवाद्यद्विजस्चैतानहोरात्रेणशुध्यति ।। (अथातोभिक्षाचरणम्-~ -दुक्तं याज्ञवल्क्येन-दंडाजिनो पीतानि मेग्वलां चैव धारयेत् । सूत्रं च भवत्पूर्वा ब्राह्मणो मिक्षेत ॥ भवन्मध्यमा राजन्यो, भवदन्त्या वैश्यः ) तत्रादौ मातरम् ॥तत प्राचार्यों नृतन वस्त्रनिर्मितां झोलिका कक्ष. लविनीं सद्ध्यां सफलां ब्रह्मचारिणो दक्षिणस्कन्धे निधाय कमकाएटरलाकरे, उपनयनपतिः । (५४०) (भो अमुकशर्मन् भिक्षार्थ गच्छ) ततो ब्रह्मचारी सलक्षण- मुत्थाय प्रथममातरं याचेत्-भवति भिक्षां देहि मातः । धुरुपं प्रति भिक्षणे-भवन् भिक्षां देहि-इति ब्राह्मणोवदेत्- क्षत्रियस्तु भिक्षा भवति देहि मानः, पुरुप प्रति भिक्षा भवान ददातु, वैश्यस्तु-मातदेहि भिक्षा भवति ? पुरुपंप्रति भिक्षां ददातु भवान् ॥ अन्यांप्रति भिक्षणे मातः, इतिशब्दोन वाच्यः । भवति भिक्षा देहीति वाच्यम् ॥ ततो ब्रह्मचारीमातामंडपात कीयहरे वस्त्रभूपणादिभिरलंकृता कुटुम्बस्त्री परिजनैः सह तिष्ठंती, मनोहरे पात्रे सफल, मिष्ठान्न मोदकादिपकानसहित सुवर्ण रजत सुद्रारत्नादि सहित हरिद्रा रंजिततंडलान् गृहीत्वा भिक्षार्थमा- गत ब्रह्मचारिणं दद्यात् ॥ ततो ब्रह्मचारी भिक्षां लब्ध्वा ॐ खस्ति इतिवदेत् । ततः-अन्ये भ्योपिगृह्णीयात् ॥ तत श्राचार्य समीपमागत्य, भोगुरोइयं भिक्षा मयालब्धा, इति निवेद्य प्रणम्य च, गुरोरनुजया प्रात्मभोजनार्थ वा स्वीकुर्यात् । यदि गुरुः पिता चेत्तल्लब्ध भैयं द्रव्यादिकं ब्राह्मणेभ्योदद्यात् । अन्यश्चेत् स्वयंस्वीकुर्यादिति समाचारः, इति भिक्षाचरणम् । ततश्राचार्यो ब्रह्मचारिणेनियमान् श्रावयेत् , अधः शयीत । अक्षार लवणाशी स्यात् । दंधारण कर्तव्यम्-अरण्यात्स्वयं प्रशीर्णाः समिध पाह- तिच्या सायं प्रातः संध्योपासन पूर्वक मग्निपरि चरणं कर्तव्यम् ।। स्वाध्यायाविरोधेनगुरुशुश्रूपा च कर्तव्या । सायंप्रातर्भिक्षा चर्या कर्तव्या मधुमांसाशनं न कर्तव्यम् ॥ नद्यादौमज्जननकर्त्तव्यम् उहतोदकेन स्नायादित्यर्थः । कुशासनोपरिमसूरिका युपधानं कृत्वा नोपविशे---स्त्रीभिः सह गमनं तन्मध्ये अवस्थानं च पर्जयेन् । अनृतं न वदेत् । अदत्तादानं चौर्य न कुर्यात् । स्मृत्य तरोक्ता यमनियमाश्चानुष्ठेयाः ॥ अष्टाचत्वारिंशद्वर्षाणि वेद ब्रह्मचर्य चरेत् । द्वादश द्वाशदश वा प्रतिवदेम् । यावद्ग्रहण चा शयानश्चेदाचार्यणाहत उत्थाय प्रतिशृणुयात्, श्रासीन श्चेत्तिष्ठन्, तिष्ट रचेदधिकामन् , अधिकामश्चेदभिधावन् ।
(५४१) कमकाए इरत्न.करे येदारम्नाति । स एवं वर्तमानो मुत्राद्ययसत्यमुत्राद्य वसतीति । यएवंवि- घामानस्तम्य स्नातकस्य कीर्तिर्भवति ॥ तत प्राचार्याय- वरदानम्, अद्यत्यादि संकीय, अमुकोहं अमुकराशेः पुत्रस्य- उपनयनांग होमकर्मण: सांगताइदंद्रव्यंगांचवा चरप्रत्या- म्नायीभूतं अमुक शर्मणे प्राचार्याय तुभ्यं सम्प्रददे ।। अतत्सन्न- मम ब्रामण भोजन संकल्पम्, भूयसी संकल्पं च कृत्वा [अत्रापि न पूर्णाहुतिः] ततः समुद्भवनामाग्ने कत्तरांगपूजनं कृत्वा अक्षतान गृहीत्वा विसृजेत् ॥ ॐ गच्छगच्छ सुरश्रेष्ठस्वस्थाने त्वंसमुदभव इष्टकाम समृध्द्यर्थ पुन रागमनं कुरु ।। ॥ इत्युपनयनपद्धतिः।। अयचेदारम्भपद्धतिः । अयोचार्या ब्रह्मचारिणासह वेदारम्भ वेदीसमीपमागत्य स्वासने उपविश्याचम्य गणेशादीन्नमस्कृत्य, वेदारम्भ वे पंचभूसंस्कारान्कुर्यात दक्षिणहस्तेन कुशैः परिसमूहा पूर्वे, क्षिप्त्वा गोमयोदकेनोपलिप्य, अवमूलेन प्रागग्रास्तिस्रो रेग्या विलिरुग, उल्लेग्यन क्रमेणानामिकांगुष्ठाभ्यां मृदुमुद्धृत्य, जलेनाभ्युत्य, तैजसपात्रोपनीनमग्निं वेद्यो स्वाभिमुखे संस्थाप्य तद्रनार्थ मिंधनं नियुज्य, संकल्प:-अद्यत्यादि देशकालौसंकीर्खामुकोई अमुकराशेरमुक वटोर्यजुर्वेदादि क्रमेण वेदारम्भ कर्मणि प्रजापति, इन्द्र, अग्निं, सोम, अन्तरिक्ष वायं, ब्रह्माणं, छन्दासि पृथ्वी- मग्निं ब्रह्माणं, छन्दाऊसिटिवंसूर्य ब्रमाणं, छन्दासि, दिश- श्चन्द्रमसम् ब्रह्माणंछन्दासि प्रजापतिं देवान पीन, श्रद्धा, मेघां, सदसस्पति, अनुमति, अग्नि, याय, सूर्य, अग्नीवरूणी, अग्नीवरुणो, अग्नि, बरुण, सवितारं, विष्णविश्वान , ममता, स्वर्कान. व्यमणं, प्रजापति स्विष्टकृतं चाज्येनाहं यक्ष्ये, ततो ब्रामवरणम्--अद्यत्यादि० कर्तव्य घेदारम्भांगी भूतहवन कर्मणि, , , , कर्मधार राना, घेदारम्भाति । (५४२) . " ब्रह्मकर्भर्तमनेनवरणद्रव्येण अमुरुगोत्रममुकशर्माणबामणं, ब्रह्मत्वेनावृणे, घृतोस्मीति ब्रह्मामात । यथाविहितं कर्मकुम, करवाणि, ततोग्निपरिभामणं कारयित्वा, श्रग्नेक्षिणतः कुशासने उपवेशयेत् । ततोऽग्नेमत्ततरतः प्रागनकुशरासनद्वयं कल्पयित्वा, प्रणीतापात्रं सव्येहरतेकृत्वादक्षिण हस्तोतवृतपानस्थोदकेन- पूरयित्वा, पश्चिमासनेनिधाय हस्तेनालभ्य, पूर्वासनेस्थापयित्वा वतिष्ठिमादाय ईशनादिमाग यहिभिदक संस्थमग्ने सत्तरनः पश्चाद्वापरिस्तरणं वृत्वापवित्रछेदनानि त्रीणि कुशतरूणानि, पवित्रेसाग्रेअनन्तगर्भ कुशतरणे, आज्यस्थाली, तैजसी सम्मा- र्जनकुशास्त्रयः, उपयमनकुश स्त्रिप्रभृनिपंचसप्तया, समिधस्त्रिः प्रादेशमाच्यः, मुया, गव्यमाज्यं, सदक्षिण, पूर्णपान, दक्षिणा घरोवा, यथावदासान्य ततम्मिभिः कुशैईकुशतरूणे पच्छिद्यपृथक संस्थाप्य, मोक्षगीपात्रं प्रणीतासन्निधौ निधाय, दक्षिणहस्तेनप्रणी- तोदकमासिच्य, पवित्राभ्यामुत्पृय, पवित्रप्रोक्षणीपात्रे निधाय- दक्षिणहस्तेनप्रोक्षणीपात्रमुत्थाप्य सव्येपाणैकृत्वा तदुदकंदक्षिणा नामिकांगुष्ठाभ्यामुच्छाल्य, प्रणीतोदकेन, प्रोक्ष्य, प्रणीतारन्योरंत. राले निदध्यात , श्रासादितमाज्य, प्राज्यस्थाल्यां पश्चादग्नेनि- हितायांप्रतिप्य, प्राणीतोदकेनासिच्य, तत्राग्नी ब्रहमामाज्यमधि श्रयति । ज्वलदुल्मुकमादाय, श्राज्योपरिसमन्तात्प्रदक्षिणक्रमेण भ्रामयित्वा दक्षिणहस्तेन श्रुवमादाय पाँचमधोमुम्ब तापयित्वा सन्धे पाणी वृत्वादक्षिणेन सम्मार्जन कुशाग्रैमलतोऽग्रपर्यन्तं, मृलैरातोमूलपर्यन्तंसमृज्य, तान्कुशानग्नौमक्षिपेत् । प्राणीतोदके नाभिपिच्य पुनः पूर्ववत्प्राप्यस्व दक्षिणतोनिदध्यात् ॥ प्राज्य मग्नेःपश्चादानीय, पूर्वपवित्राभ्यामुत्यवेदय, अपद्रव्यनिरसनं कृत्वा । प्रोक्षणीजलेनपवित्राभ्यामाषिच्य, उपयमनकुशान दक्षिण हस्तेनादाय सत्येकृत्योत्तिष्टनवृतान्ताः तिस्रःसमिधः अग्नौमति- प्य, प्रोक्षण्युदकंदक्षिणचुलुकेगृहीत्वा । ईशानाादगान्नमग्नि प्रद क्षिणक्रमेण परिपिच्य, पविन्नेप्रपीतापात्रेनिधाय, आघारादीन्जुहु - , कर्मकागहराकरे, धेद्वार पर तिः । , यात, संस्रवधारणार्थ प्रोक्षणीपात्रं प्रणीनारन्योर्मध्ये निदध्यात्, ।। आचार्यस्यहोमकर्तृत्वेपित्रादिः-३६माज्यंतत्तदेवतायैमया परि- त्यक्तंयथादैवत्तमस्तुनमम । 0 एतन्तेदेव० पटित्या . भूर्भुवः स्व', हरिनामारने सुप्रतिष्टितोवरदोभव, इतिप्रतिष्टाप्य । अग्ने नयसुपधाराये ऽस्मानविश्वानिदेव व्ययुनानिविद्वान् । युयोध्य. स्मज्जुहुराणमेनोभूयिष्ठान्तेनमऽतिविधेम ॥ इतिमन्त्रेणपायादि नीराजनान्तहरिनामाग्नि सम्पूज्यरेग्यापूजन जिहापूजनंचकृत्वा । ब्रह्मचारिणमग्नेः पश्चात्स्योत्तरनः समुपवेश्य । दक्षिणं जान्या- च्यतामणान्धारब्धोजुहुयात् । ३० प्रजापतेस्वाहा, इदंप्रजापतयेन- ममइ तिमनसा, ॥ हुनशेपतसंम्रवधारणार्थ मोक्षण्यांक्षिपेत् ।। 30 इन्द्रायस्याहा-इदमिन्द्रायनममा 30 अग्नयेस्वाहा इधमग्नये नमम । सोमायस्वाहा-इदंसोमायनमम । इदानीमन्यारंभंत्य- कृत्वावेदातीर्जुहोति-श्रादौस्वशाग्वीयवेदाहुति होति, अधयजु- दाहुनयः-30 अन्तरिक्षायस्वाहा-इदमन्तरिक्षायनमम । 30 व्यायवेस्वाहा-इदंव्वायवे० ॥ 30 ब्रमणेस्वाहा इदंब्राह्मणे० ३० छन्दोभ्यःस्वाहा इदंछन्दोभ्यः ॥ ग्वेदाहुनयः 30 पृथिव्यैस्वाहा इदंपृथिव्यैनमम ॥ 30 अग्नयेस्वाहा इदमग्नयेनमम ब्रामणे- स्वाहा इदंब्रह्मणनमम | 30 छन्दोभ्यःस्वाहा इदंछन्दोभ्योनमम । सामवेदाङ्तयः - दिवेस्वाहा इदंदिवेनमम । 30 सूर्यायस्वाहा इदंसूर्यायनमम | 30 ब्रह्मणेस्वाहा इदंत्रणेनमम । छन्दोभ्यः स्वाहा इदग्छन्दोभ्योनमम । अथर्ववेदाहुतयः-30 दिग्भ्यःस्वा. इदंदिग्भ्योनमम । 0 चन्द्रमसेस्वाहा इदंचन्द्रमसेनमम । 30 ब्रह्मणेस्वाहाइदमब्रह्मणेनमम । छन्दोभ्यःस्वाहाइदञ्छन्दोभ्यो नमम । सर्वसामान्याहुतयः-30 प्रजापतयेस्वाहा इदम्प्रजापतये नमम || देवेभ्यःस्वाहा इदन्देवेभ्योनमम | 30 ऋषिभ्यःस्वा० इदंऋपिभ्योनमम | 0 श्रध्दायैस्वाहा इदंश्रद्धायैनमम । अमेधा यैस्वाहा इदमेधायनमम । 30 सदसस्पतयेस्वाहा इदंसदसस्पतये नमम 1 30 अनुमतयेस्वाहा इदंमनुमतयेनमम। ततोब्रमणाऽन्या- धमकानकर घेदारम्पतिः । । ५५) , रब्धः ॥ ॐ भूरादिव्याहृतीनां प्रजापतिपिः गायत्र्युष्णिगनुष्ट भछन्दांसि, अग्निवायुसूर्यादेवताः वेदारम्भांगहोमेविनियोगः॥ ॐ भूस्वाहा इदमग्नयेनमम । 30 भुवास्वाहा इदंव्यायवेनमम । ॐ स्वःस्वाहाइदं सूर्यायनमम॥ 30 त्वन्नोऽअग्नेसत्वन्नोऽअग्ने इत्यनयोर्यामदेवऋषि:त्रिष्टुप्छन्दःअग्नीवरुणोदेवते वेदारम्भाग- होमेपिनियोगः।। अत्वन्नोऽअग्नेव्यमणस्य विद्वान्देवस्यहेडोऽअव- यासिसीठाः । यजिष्टोवहितमः शोशुचानोविश्वाटेपासिप्रमु- मुग्ध्यस्मत्स्वाहा इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम । ॐसत्वन्नोज्नेऽवमो भवोतिनेदिछोऽअस्याऽउपसोव्युष्ठौ अवययनोव्यरुण र्ट० रराणो व्वीहिमृडीक टं० सुहयोन एधि स्वाहा इदमग्नी ब्वरूणाभ्यां न मम । 30 अयाश्चाग्ने इति वामदेवऋपिस्त्रिष्टुन्छदः अग्निदेवता वेदारभ्मागहोमे विनियोगः 30 अपाश्चाग्ने बनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वमयाऽसि । अयानोयज यहास्पयानोधेहिभपज ॐ स्वाहा । इदमग्नयेनमम ॥ 30 येतेशतमिति चामदेवपिस्त्रिष्टु- प्छन्वो व्यरुणः सविता विष्णुर्विश्वेदेवामन्तः स्वर्णाश्चदेवता वेदारम्भाङ्ग होमे विनियोगः। 30 येतेशतंचमणयेसहायजियाः पाशाविततामहान्तः। तेभिनोऽअद्य सवितोत विष्णुर्विश्वे मुंच- न्तुममतः स्वर्काः स्वाहा । इदं ब्वमणाय सविनविष्णवेविश्वेभ्यो देवेभ्योमम्झ्यः स्वक्र्केभ्यश्चनमम । 30 उदुत्तममितिशुनः शेफ ऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दः वररुणोदेवता वेदारम्भाङ्गहोमेविनियोगः । 30 उदुत्तमंचरुणपाश मस्मधवातमं विमध्यम ॐ स्रथाय । प्रथा व्वयमादित्यवतेतवानागसो अदिनयेस्याम, स्वाहा । इदं वरुणाय नमम | 0 प्रजापतये स्वहा इदं प्रजापतयेननमम-3"अग्नये स्विष्टकृते स्वहा इदमनये स्विकृते नमम । संस्रवप्राशनं पवित्रा म्यांमार्जन पवित्रपतिपत्तिः अग्नेः पश्चिमं प्रणीता विमोकः। ब्रह्मणेपूर्णपात्रदानम्संकल्पः अद्यत्यादिसंकीर्त्यअमुकराशिरमकोई ममैतवेदारम्भाग हवनकर्मणः सांगफल प्राप्तये अपूर्णपूरणार्थ इदंसदक्षिणपूर्णपात्रम् ब्रह्मणेतुभ्यंसम्प्रददे इतिदद्यात्-0अक्र- कर्मकाण्डलाफर घेदाम्मतिः। । पृथ) कर्मकम्भकृतः सहचाचामयोभुवा । देवेभ्यः कर्मकृत्वाऽरतप्रेत सचामुयः । 0 स्याहा। इति वहिहोमकृत्या-ततोत्रहाचारीविघ्नेश सरस्वती हरिलक्ष्मीस्वविद्याम, (वेदसंहिता) चपूजयेत् इति- गदाधरः ।। मनुः ब्रह्मरम्भेऽवसानेच पादौनालीगुरोःसदाव्य- त्यस्तपाणिनाकार्य मुपसंग्रहणगुरोः। प्राणायामैत्रिभिःपूतस्तत आकारमहति । 3. कारंव्याहृतिस्तिस्त्रः सपूर्वोत्रिपदांततः।। उक्त्वारम्भेच्च वृतान्तमन्वहंगौतमोब्रवीत् । कुलपरंपरागत वेद- मादौअध्यापयेत्-वसिष्टः-पारंपर्यागतोयेपांचेदासपरिवहणः । तच्छाग्वकर्मकुर्वीत तच्छावाध्यगनंतथा ॥ गुरुपूजांनतः कृत्वा विद्या सर्वा:समारम्भत ।) ततोब्रह्मचारीसंकल्पं कुर्यात् अय- त्यादि. अमुकराशिरमुकोई, करिष्यमाण वेदारम्भकर्मणः पूर्वांगत्वेन गणेश सरस्वतीहरिलक्ष्मीस्ववेदसंहितादीनां यथा- लब्धोपचारेणप्रजनंकरिष्ये। तनापट्टेतामादिस्थाल्यांदध्यतपुंजो- परिया, अभूर्भुवःस्वः गणेशमावागामिपूजार्थं स्थापयामिचएवं सर्वत्र ॥ 0 भू० सरस्वतीम् भू० लक्ष्मीम् 1 0 भू०विष्णु 30 भूर्भुवःस्वास्वविद्याम्-आवाहयामिपूजार्थस्थापयामि ततो चक्ष्यमाणनाममन्त्रैः पृथक् पृथक, पंचोपचारदक्षिणादिभिः सम्पू- जयेत् ॐ गणेशायनमः | 0 सरस्वत्यैनमः । अहरयेनमः । 3.0 अलपनमः । ब्रह्मविद्यायैनमः । इतिमन्नसम्पूज्य ततोगन्ध मालावस्त्रादिभिागसम्पूज्य-पूर्ववत्पादोपसंग्रहणंकुर्यात् । यदि पितुरतिरिक्त वाहमणश्चेत्तदावासांगुलिभिगुरुवरण कुर्यात्वरण द्रप्यसम्पूज्य श्रोत्यादि अमुकराशिरमुकोहंकरिष्यमाणवेदारम्भ कम्मणिएभिरचरणद्रव्येणअमुकगोत्रप्रवरअमुकशर्माएंवेदज्ञगुरु- त्वेनत्वामहंवृणे वरणद्रव्यंदत्वामार्थयेत-गुरुमागुमविष्णुर्गुर- देवो महेश्वरः गुमासाक्षात्परब्रह्मस्तस्मै श्रीगुरयेनमः । ततोगुमः ब्रह्मचारिणं अग्नेरुत्तरतः उदभुवप्राङ्मुग्वंचा प्रागपुकुशेपूपचि श्यस्मार्ता चमनं कृत्वा प्राणायामं विधाय ब्रह्मांजलिं कार- यित्वास प्रणवच्याहृतिपूर्वी गायत्री पाठयित्वा स्वेदारम्भ कर्मकार डराकरे, वेदारम्मपद्धति । कुर्यात् । अपेत्वादिग्वन्नामान्त्यस्य माध्यंदिनीयकस्य, वाजसने यस्य यजुर्वेदस्य विवस्वानृपियच्यादीनिछन्दांसिलिंगोक्ताः देवता वेदारम्भकर्मण्यभ्ययने विनियोगः ॥ हस्तफणाकृतिकृत्या वामहस्तकरतलोपरि दक्षिणवाहुमूलंदक्षिण जघनोपरिविन्यस्य उदात्तादिस्वरसहितं स्तंचातयित्वा, श्रारभेन-हरि:30-30 भूर्भुवःस्थः तत्सवितुः २० इपेत्त्योउर्जत्वा व्वायव्यस्थदेवोव:- सविताप्रार्पयतु श्रेष्ठतमायकभणऽ प्राप्यायध्वमन्याऽइन्द्राय- भागम् ॥ प्रजावतीरनमीवाऽअयक्ष्मा मावरतेनऽईशतमाघशर्ट सोधृवाऽयस्मिन्गोपतौत्यातदीयंजमानस्य पशून्पाहि । (१) व्यसोः,पवित्रम् । अलस्वल्पाभोक्षेमकरः॥ अथऋग्वेदः-30 ऋग्वेदस्य-अग्निमीठे इत्यस्यमन्त्रस्य, मधुश्छन्दा ऋपिर्गायत्री छन्दःअग्निवतावेदारम्भकम्मणि ऋग्वेदारम्भकरणेविनियोगः। ॐ अग्निमीलेपुरोहितं यज्ञस्यदेवमत्विजम् । होतारंरनधात- मम् । इतिऋग्वेदारम्भः । अथसामवेदारम्भः॥ ॐ अग्नमाया- हीति सामवेदादिमन्त्रस्य, गौतमपिर्गायत्रीद्धन्दोऽग्निर्देयता घेदारम्भमणि सामवेदाध्ययने विनियोगः ॥ अग्नेयाया- हिवीतयगृणानोहव्यदातये । निहोतासत्सिरिपि।।-इतिसाम वेदारम्भः-३० शन्नोदेवीरिति अथर्ववेदस्यादिमन्त्रस्य दध्यङ्का- धर्षण ऋषिर्गायत्रीछन्दः अग्निर्देवता वेदारस्भकरमणि अथर्ववे दाध्ययनेविनियोगः-30 शन्नोदेवीरभिष्ठयऽनापोभवन्तुपीतये ॥ शंयोरभिस्रवन्तुनः ॥ पुनःपूर्ववतूसपण्वव्याहृतिपूधिकांगायत्री- पठित्वा ।। 3 विरामोऽस्तु ।। इतिवेदानधीत्य, ब्रह्मचारीपूर्व- वद् गुरुपादावभिवंद्य प्रणम्यचगुरुदक्षिणासंकल्पंकुर्यात्-अयेत्या दिअमुकोहं, मयाकृतस्य वेदाध्ययनकर्मणः सांगफलाबाप्तये गोबरमत्याम्नायीभूतमिदंद्रव्यं, गुरवेतुभ्यमहंसम्प्रददे, इतिगुरु- चरणयोऽत्यापूर्ववतूपणमेत्-30 आयुष्मान्भवसौम्य, विद्यावा. न्भवसौम्य ततस्त्रायुषकरणकृत्वा अधचलोकाचाराट् ब्रहमचारी काश्यांविद्याध्ययनार्थ तीर्थपर्यटनार्थयागच्छति ॥ तदावाजिनः -- कर्मकाण्डरलायो, ममावर्तन रतिः (५७) सहबह्मचारीदण्डादिभिः परियुतासन्, अग्रतोगच्छेत्तदनुयापि नोपिगच्छन्तु । ततापूर्वस्यादिशिवाग्रामदेवता सन्निधौगत्यातत्र देवंसंपूज्य प्रणम्यपरिक्रमणचतुष्टयकृत्वा ततो माता या पिता सगोत्रिणः तत्रगच्छन्ति,सतोब्रचारिणप्रवोधयन्ति, भोव्रह्मचा- रिनत्वांगृहेपाठयिष्यामः ततोब्रह्मचारी 30 तदस्तु ।। इत्युक्त्वा ततस्तंत्रचारिण, दृढपुरुषस्यस्कन्धारुढं कृत्वा वेदारम्भवेदीसमीप मानयन्नि, अध्यायुपंजमदग्नेरितिललाटे कश्यपस्यत्र्यायुपमिति ग्रीवायांय देवेयु च्यायुपमितिदक्षिणांसे । तन्नोऽअस्तुत्र्यायुपमिति हृदि ॥ ततोवेदाध्ययनसांगतार्थगौदानवातिलपात्रकुर्यात्-अद्य- त्यादि०अमुकराशिरमुकशहिं करिष्यमाण वेदारम्भकर्मणिवेदा ध्ययनस्यसांगतासिध्यर्थमिदंव्यंगोप्रत्याम्नायीभृत ममुकशर्मणे कर्मोपदेशकायाचार्यायतुभ्यंसम्पददलितोदशबाहमणान भोजयेत् अथ समावर्तनपद्धतिः। अथसमावर्तन संस्कार पद्धतिः-अथ च ब्रह्मचारी गुरुमर्थदानेन संपूज्य (याज्ञवल्क्यः गुरतुवरं दत्वा स्नायीत तदनुजया । वेद व्रतानिवा पारं नीत्वा युभयमेवया ।। इति प्रमाणात समावर्तन करणाधिकारार्थ स्व गायत्री गुरुवे वरं (ब्राह्माणस्थ गौवरः) वा गो प्रत्याम्नायी भूतंद्रव्यं दद्यात्-तत्र संकल्प:-गां वा द्रव्यं संपूज्य-ॐ अन्यत्यादि संकीर्त्य-अमुकोई समावर्तन स्नाना- धिकार सिद्धये इमां गां गोनिष्क्रयीमृत सुवर्ण रजतं वा गुरुवे तुभ्यमहं सम्प्रददे ।। पितुर्गरत्वे पुरोहिताय दद्यात् ।। इति दत्वा आयुष्मान् भव सौम्य, इत्याशियं लब्ध्वा गुरूंप्रार्थयेत् ॥ भोगुरो अहं स्नास्यामि । इति प्रार्थ्य-स्नाहि गुरुवंदेत इति लब्धानुजो ब्रह्मचारी वक्ष्यमाण विधिना स्नायात । तत प्राचार्यः समावर्तन कमका डरत्न करे समानान वेदी समीपमागत्यप्राट् मुग्यमुपविश्य, स्व दक्षिणत उदमुत्रं ब्रह्मचारिणमुपवेश्य वाचम्य प्राणायाम वयंविधाय, गणेशादी- प्रणम्य प्रतिज्ञा संकल्पं कुर्यात-अद्यत्यादि संकीय अमुकोह ममुक नाम्नोऽस्थवटोः ब्रह्मचर्य समापन पूर्वक स्नातकत्व सिद्धये समावर्तन का करिष्ये । नतो वेद्यां कुशकं डिकामारभेत ॥ ततो दक्षिणाहरतेनकुशैः समावर्तन वेदी परिसमुहाकुशान्पूर्व क्षिप्त्वा गोमयोदकेनोपलिप्य, सुवमूलेन प्रागनास्तिस्रो रेग्वा विलिख्य उल्लेखन क्रमेणानामिकां गुष्ठाभ्यां मृदुमुध्दृत्य, जलेनाभ्युक्ष्य, तेजसपानोपनीतमग्निं वेद्यां स्वाभिमुख संस्थाप्य, तद्रक्षार्थद्रव्यं नियुज्य ब्रह्मवरणं कुर्यात-जात्मणं सम्पृज्यद्रव्यं च, अद्यत्यादि- अमुकनाम्नो बटोः समावर्तनांगहोमकर्मणि, पृ.ता कृता वेक्षण- रूप ब्रह्मकर्म कर्तुमनेन वरणद्रव्येए अमुक शर्माणत्वां ब्रह्मत्वेन वृणे। इतिदत्वावृतोस्मीतियात् । कर्मकुम, करवाणीतिप्रत्युक्तिः। ततोऽग्नेः प्रदक्षिणं कारयित्या अग्नेदीक्षएनः कुशैः कल्पिनासनो पर्युपवेशयेत् ।। ततोग्नेरुत्तरतः प्रागनकुशरासनद्वयं कल्पयित्वा प्रणीतापात्रं सव्यहम्तेधृत्वा दक्षिणहस्तोत घृतपात्रोदकेन पूर- गित्वा, पश्चिमासने निधाय हस्तेनालभ्य पूर्वासने स्थापयित्वा, पहिमष्ठिमादाय ईशानादि प्रागग्गै बाहिभिरुदक्संस्थमग्नेरुत्तरतः पश्चाद्वा परिस्तरणं कृत्वा, पवित्र छेदनानित्रीणि कुशतमणानि, पवित्रे सारे अनन्त गमद्वे कुशतरणे प्रोक्षणीपात्रं याज्यस्थाली तैजसी चरुस्थाली सर्जिन कुशास्त्रयः, उपयमन कुशास्त्रि. प्रभृतयः पंचसप्तवा, समिधस्तिस्रः प्रादेशमान्या, स्रवः गव्य- माज्य, पूर्णपात्रं दक्षिणावरोवा यथायदासाद्य, विशेपोपकल्पनी यानि वस्तृनि-धनं पृथक् पृथक् दशधा विभक्तं, पर्थक्षणार्थ जल समिस्तिस्रः हरिताः कुशाः स्नानार्थ सौंपधि मिश्रित तीर्थजल पूर्णा अप्ठौ कलशाः । सहस्रधारी ताम्रमयी, सूर्योप- स्थानार्थ वस्त्रं, भोजनार्थ दधितिलानि, नापितः स्नानार्थं शीतलं जल, शौदुम्परं यन्तधावनं वर्णप्रमाणकं, उद्वर्तनं स्नानार्थ मुष्ण- कर्मकाण्डराकरे, समावर्तनपद्धतिः । मुदकं, चन्दनं नूनने वाससी यज्ञोपवीतं पुष्पाणि माला च, शिरो- वेष्ठनम्-उत्तरीय, परिधानवस्त्राणि कुण्डले, अंजनं दर्पणं, छत्रं उपानहौवैणवो दण्डश्चेति संगृह कर्मारभेत् ॥ ततस्त्रिभिः कुरा- तरुणः द्वे कुशतमणे प्रछिद्य पृथक् संस्थाप्य प्रोक्षणीपात्रं प्रणीता- सन्निधौ निधाय तत्र हस्तेन प्रणीतोदकमापिच्य, पवित्राभ्या- मुत्पूय पवित्रे प्रोक्षणीपु निधाय, दक्षिणहस्तेन मोक्षणीपात्र मुत्थाप्य सव्ये करे कृत्वा तदुदकं दक्षिणा नामिकां गुष्टाभ्या मुच्छाल्य प्रणीतोदकेन प्रोक्ष्य प्राज्यस्थाल्यादीनिपूर्णपात्र पर्थ- न्तानि प्रोक्षणी जलेनग्रासादन क्रमेणैकैकशः प्रोक्ष्य, प्रणीतारन्यो रंतरालेप्रोक्षणी पानं निधाय, प्रासादितमाज्य, भाज्यस्थाल्यां, पश्चादग्नेनिहितायांप्रक्षिप्य, प्रणीतोदकमापिच्यतत्राज्यंब्रह्माधि- श्रयति, ज्वलदुल्मुकमादाय, आज्योपरिसमन्तात प्रदक्षिणक्रमण भ्रामयित्वा, दक्षिण हरतेन अवमादाय, चमधोमुखं तापयित्वा सत्येपाणौकृत्या दक्षिणहस्तेन संम्मान कुशाग्रेसलतोऽग्रपर्यन्तं, मूलैरग्रतो मूलपर्यन्तं संम्माज्य कुशानग्नौप्रक्षिप्य प्रणीतोदकेना भिपिच्य, पुनः पूर्ववत्प्रतप्य स्व दक्षिणतोनिदध्यान् ॥ श्राज्यमग्ने पश्चादानीय, पवित्राभ्यामुत्पूय, अवेक्ष्यापद्रव्य निरसनं कृत्वा, प्रोक्षणी जलेन पवित्राभ्यामापिंच्य उपयमनकुशान दक्षिणहस्ते- नादाय, सब्येकृत्वाउत्तिष्ठन् दक्षिणहरतेन छूनाक्तास्तिस्रःसमिध आदाय तृप्णीमग्नौ प्रक्षिप्य, प्रोक्षण्युदकम् दक्षिणचुलुकेगृहीत्वा, ईशनादि उदगान्तमग्निं प्रदक्षिण क्रमेण परिपिच्य पवित्रे प्रणीतां पाने निधाय, श्रापारादीन् जुहुयात् ।। संत्रय धारणार्थ प्रोक्षणी- पात्रं प्रणीतारन्यो रंतराले निदध्यान् ॥ द्रव्यदेवताभि ध्यानं कुर्यात् ॥ श्रयेत्यादि संकीर्त्य-अमुक नाम्नोऽस्य वटोः समावर्तन कर्मणि तत्रप्रजापति, इन्द्रम्, अग्निम्, सोमम्, अंतरिक्षम्, वायुम्, ब्रह्माणम्, छन्दाऊसि, दिवं, सूर्य, ब्रह्माणं, छन्दासिप्रजापतिम्, देवान, ऋपीन, श्रद्धां, मेघां, सदसस्पति अनुमति, अग्नि, वायु, सूर्य, अग्नीवमणौ,अग्नीवरुणौ, अग्निं, व्यरणसवितारं, विष्णं, , , , , + (१५०) कर्मकार रत्नाकर, समावर्तनपतिः । . विश्वेदेवान भरता, स्वर्कान, व्यरुणं, प्रजापति, स्विष्ठकृतंचाज्ये- नाहं यक्ष्ये (आचार्गस्यहोमकर्तृत्वे, पिनादिः, इदमाज्यं तत्तद्दे- वतायै मया परित्यक्तं यथा दैयनमस्तु न मम ॥) ततः (व्रतान्तेराजपुत्रकः) इति स्मरणान् राजपुत्रनामानमग्नि मावाहयेत् ) 0 भूर्भुवः स्वःराजपुत्रनामाग्ने । इहागच्छेहतिष्ठ, 0 एतन्ते इति प्रतिष्ठाप्य 30 तदेवाग्नि० इति मंत्रेण वा 0 राजननांमाग्नये नमः इति मंत्रेण सम्पूज्य, दक्षिणं जान्याचा, ब्रह्मणान्वारब्धो जुहुयात-वेग-30 प्रजापनये स्वाहा इदं प्रजा- पतयेनमम । 30 इन्द्राय स्वाहा-इदमिन्द्रायनमम । ३० अग्नये स्वाहा इदमग्नयेनमम । इत्याचाराज्यभागीहुत्वा, अन्यारंभत्य- क्त्वा, समावर्तनांग होमस्यप्रधानाहुती हुयात् । तत्रादौ यजु- धंदाहुनया-30 अन्तरिक्षाय स्वाहा इदमन्तरिक्षायनमम । ३० वायवे स्वाहा इदं वायवे० ब्रह्मणे स्वाहा-इदं ब्रह्मणे । 30 छन्दोभ्यः स्वाहा इदं छन्दोभ्यः-अथ ऋग्वेदाहुतयः 30 पृथिव्यै स्वाहा इदं पृथिव्यैनमम । 30 अग्नये स्वाहा इदमग्नये । 30 ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्रमणे० ॐ छन्दोभ्यः स्वाहा इदं छन्दोभ्य० । सामवेदाहुतयः दिवे स्वाहा इदं दिवेनमम 0 सूर्यायस्थाहा इदं सूर्याय०३० ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्रहणे. छन्दोभ्यः स्वाहा इदं छन्दोभ्यः अथर्ववेदाहुतयः-ॐदिग्भ्यः स्वाहा इदं दिग्भ्यो नमम । ॐ चन्द्रमसे स्वाहा-इदं चन्द्रमसे० --ब्रह्मणे स्वाहा इदं ब्रमण०३. छन्दोभ्यः स्वाहा-इदं छन्दोभ्यः। अथ संल्लग्न सामान्याहुतयः-ॐ प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतयेनमम । ॐ देवेभ्यः स्वाहा इदं देवेभ्यः। ॐ ऋषिभ्यः स्वाहा इदं ऋषिभ्यः। ॐ श्रद्धायै स्वाहा इदं श्रद्धायै। मेधायै स्वाहा-इदं -मेधायै. २० सदसस्पतये स्वाहा-इदं सदसस्पतये । 0 अनुमतये स्वाहा इदमनुमतयेनमम । इति कर्माला हुतयोहुत्वा ब्राह्मणान्चारधोजु- हुयात् ॐ भूरादिव्याहृत्तीनां प्रजापतिऋषिर्गायत्री-उशिणग- नुष्टुम्छंदांसि अग्नि वायु सूर्या देवताः समावर्तनांग होमेविनि- कर्मकायहरताकरे, सम.वर्तनपति। -- योगः (भूः स्वाहा इदमग्नयेनमम - भुवः स्वाहा इदं वाय- वे० ॐ स्वः स्वाहा इद पूर्याय० ॐ त्वन्नोऽसग्ने सत्वन्नोअग्ने इत्खनयोर्वामदेव पित्रिष्टुप्छन्दः अग्नीवरुणो देवते समावर्तनां गहोमे विनियोगः । अत्वन्नोऽग्ने व्यरूपस्य विद्वान् देवस्यहेडो ऽवयासिसीटाः यजिष्ठोवन्हितमः शोशुचानोविश्वाडेपासि प्रमुमुग्ध्यस्मत्स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम सत्वन्नोऽअग्ने ऽवमोभवोतीनेदियोऽमस्याऽउपसोव्युष्ठौ । अवयवनोब्बरुण र्ट। रराणोच्ची हिमृडीक ४० सहयोनऽाधि स्वाहा । इदमग्नीवरुणाभ्यां 30 अयाश्चाग्ने इति वामदेवऋपित्रिष्टुप्छन्दः अग्निर्देवता समा- वर्तनांग होमेदिनियोगः-अश्रयाश्चाग्नेधनभिशस्थिपाश्च सत्य मित्वमयाऽअसि श्रयानोयज्ञ व्यहास्पयानोधेहि पज ॐ स्वाहा इदमग्नये-30 येतेशतमिति चामदेवऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो वरुणः सविताविष्णुर्विश्वेदेवामरुतः स्वर्काश्चदेवताः समावर्तनांग होमे विनियोगः ॐयेतेशतंवरुणेयेसहस्रयजियाः पाशाविततामहान्तः तेभिन्नडिअन्धसवितोत विष्णुर्विश्वे मचन्तुमरुनः स्कर्णास्वाहा इदं व्यरुपाय सवित्रे विष्णवेविश्वेभ्यो देवेभ्योमरुद्भ्यःस्वभ्य- स्चनमम । 30 उत्तममितिशुनः शेफऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः व्यरुणो देवतासमावर्तनांग होमेविनियोगः 30 उदुत्तमंत्र्यमणपाश मस्म- दवाधम विमध्यमश्रथाय, अथाव्वयमादित्यव्रते तवानागसोड अदिनयेस्याम स्वाहा० इदं व्वरुणायनमम, प्रजापतये स्वाहा इदं प्रजापतयेनमम | 30 अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा, इदमग्नयेखि ष्ठकृतेनमम संम्रवंप्राश्य, प्रणीनाजलेन पवित्राभ्यां मुविसंम्माप अग्नौ पवित्रातिपत्तिः अग्नि पश्चिमे प्रणीताविमोकं कृत्वा ब्रह- मणेपूर्णपात्रंदद्यात्-श्रोत्यादि० अमुकोऽहंममसमावर्तनांगहोम कर्मयःसांगकल पानये अपूर्णपूरणार्थ इदं सदक्षिण पूर्णपात्रं ब्रह्म णे तुभ्यंसंपददे ॐ स्वस्तीति व्रमाव्यात् । ततौब्रह्मचारी गुरुमा भिवन्ध,वश्यमाणमन्त्रैमनिमंत्रेणैकमिन्धनमग्नौप्रक्षिपेत् तत्रमंत्रः अग्ने अव इत्यादीनां पंचानां मन्त्राणां ब्रहमापिर्यजश्छन्दः (५५२) कर्मकाण्डरनाकरे, समापनपद्धति । अग्निर्देवता समिन्धने विनियोगः- अग्ने सुश्रवः सुश्रयसंमा कुरु ॥१॥ इत्येकं शुश्कमिन्धनमग्नौ प्रक्षिपेत् । 30 यथात्वमग्ने सुश्रवः सुश्रवाऽअसि । द्वितीयंक्षिपेत् । एवंमासुश्रवः सौत्र वसंकुरु । तृतीयं अयधात्वमग्नेदेवनायजस्यनिधिपाऽअसि, चतुर्थं , - 30 एवमहं मनुष्याणां वेदस्यनिधिपो भूयासम् इति पंचमप्रक्षि- पेत् । एवंहस्ताभ्यांधंक्ष्य वन्हिमुत्तजितंकृत्वा जलेन ईशानाादगंत प्रदक्षिणक्रमेण वन्हिसम्माय, नतो ब्रह्मचारी उत्थाय दक्षिण हस्ते घृताक्तामेकां समिधमादायोतिष्ठन् 30 अग्नयेसमिधमिति प्रजापतिऋषिराकृतिश्छन्दः समिद्देवता समिदाधाने विनियोगः । अग्नये समिधमाहार्ष वृहते जातवेदसे यथात्वमग्ने समिधा समिध्यसऽएव महमायुषामेधयाव्यर्चसाप्रजयापभुमिब्रह्मवर्च- सेनसमिन्धेजीवपुत्रोममाचार्यो मेधाव्यहमसान्यनिराकरिष्णुर्यश स्वीतेजस्वीब्रह्मवर्च स्थस्नादोभूयासम् स्वाहा इत्येकांहुत्वा अनेनैवमंत्रणद्वितीयांतृतीयांचहुत्वापुनः पूर्ववत्अग्नेसुश्रवापंचभि मन्त्रैःपंचन्धनप्रक्षेपणंधुवर्णअग्निपर्युक्षण, विधायतूष्णींपाणीप्रत प्यमुग्वं विमाष्टितनूपाअग्नेरित्यादिसप्तभिमनःप्रतिमन्त्रेणललाटादि चिवुकपर्यन्तंमुखहस्ताभ्यांप्रोछति। अतनूपाअग्नेइत्यादिसप्तानां मंत्राणाम् अयत्सारऋपिः त्रिष्टुप्छन्दः अग्निर्देयता अग्न्यालंभने विनियोगः तनूपायग्नेऽसितन्मेपाहि ॥१॥ ॐ श्रायुर्दाऽअग्ने ऽस्यायुमदेहि ॥२॥ 30 व्यौदाऽअग्नेऽसि व्वोंमेदेहि ॥३।। ॐ अग्ने यन्मे तन्वाऽऊन तन्मऽ प्राण ।४1 30 मंधां मेदेवः सविता श्रादधातु १५ मेधां मे देवी सरस्वती आदधातु ।। ॐ मेधामश्विनौ देवायाधत्तांपुष्करजी इतिप्रीच्छयित्वा वक्ष्य- माणमंत्रैराचार्यो पटोः सर्वाग पूतप्तपाणिना आलभेत ॥ ॐ अगानिचमऽऽआप्यायताम् । इति सर्वांगम् ॥ ॐ वाक् चमऽमा- पगायताम्-इति मुखम् । ॐ प्राणश्चमऽआप्यायताम्-इति ना सारन्ध्र ॥ ॐ चतुश्चमऽयाप्यायताम्-इति चक्षुपी ॐ श्रोत्रं चमऽआप्यायताम्-श्रोत्रे मंत्रपर्यायेण-यशोवलं च मऽाप्या- कर्मकायरताकरे, समावर्तनपति। यताम्-इति वाह । तत हस्तौ प्रक्षालयेत् यथानामिकयाऽग्ने भस्मगृहीत्वा वक्ष्यमाणमंत्रः व्यायुपाणि कुर्यात् । ॐ न्यायुपमिति नारायणऋपिदिणक्छन्दः अग्निदेवता त्र्यायुपकरणे विनियोगः । त्र्यायुपंजमदग्नेः इति ललाटे। 30 कश्यपस्य घ्यायुपमितिग्रीवायाम् । ॐ यद्देवेपु त्र्या-युपम्- इति दक्षिणांसे । ॐ तन्नोऽअस्तु व्यायुपमिति-हृदि-ततो ब्रह्मचारी व्यस्तहस्ताभ्या मग्नेरभिवादनं कुर्यात् । अमुकगोत्रो ऽमुकमवरो यजुर्वेदान्तर्गतामुक शोग्वाध्यायी, अमुकोऽभो अग्ने त्वामभिवादधे ।। इत्यग्निमभिवाय, ततः कणीस्टष्ट्वाव्यस्ताभ्यां हस्ताभ्यांअमुकगोनेत्यायुक्त्वा,भोगुरोत्वामभिवादये गुरुस्तुयायु प्मान्भवसौम्यअमुक ततोऽग्नेगत्तरतः दक्षिणोत्तरश्रेणियुताना ताम्रादिमयानां जलपूर्णकुम्मानां पंचपल्लवावृतमुग्यानां पुरस्तात् हरितकुशान् प्रागग्रानास्तीर्य, तेपुकुशेपुवाचारी उदङ् मुखेनों- पविष्य (गणनायां दक्षिणतोवामगतिन्यायेन) प्रथमत्वं दक्षिणस्यै- वभवति । तत्रादौ दक्षिणस्थादौ उदकंभादुदकं गृहीत्वा, 30 येप्स्वन्तरमिति प्रजापति ऋषिर्यजुश्छन्दः, यापोदेवता अपांग्रहणे विनियोगः । येस्वन्तरग्नयःप्रविष्टागोड्या उपगोहयोमयूग्वो मनोहारसखलोब्धिमजस्तनृदुपिरिन्द्रियहा तान् विजहामियोरो- चनस्तमिहगृहामि । इति मंत्रणप्रथम जलकुम्भादक्षिणहरतचुलुके जलंगृहीत्वा वक्ष्यमाण मंत्रेण प्रात्मानमभिपिंचति । वक्ष्यमाण मंत्रेण तेनोदकेनब्रह्मचारीस्वीकीयशिरसोऽभिपेकं कुर्यात् । अभि पेकानन्तरं शेपजलं सहस्रधारां शिरसिकृत्वा तत्र क्षिपेत् वासर्व कुम्भाभिषेकान्ते सर्वेषां जलेनैकैकशः सहस्रधाराभिः स्नायात्, तेनेति प्रजापतिर्गपिर्यजुश्छन्दः श्रपोदेवता अभिपेचने विनि- योगः । तेन मामभिपिंचामि श्रियैयशसे ब्रह्मणे ब्रह्मवर्च- साय । इति मंत्रेए अभिपेक कृत्वा, सहस्रधाराभिर्वाशिरसि जलं क्षिपेत् । तनः पूर्वोक्तयेऽअप्स्वन्तरग्नय इति मंत्रणव कलशाष्ट- कानां चुलुकेनजल ग्रहणंकरोति । अभिषेकस्यैव पृथक पृथक्मंत्राः ७० (५५४) फर्गका एसाफरे, समापनपद्धतिः । सन्ति । ततो द्वितीयकलशजलं येप्स्वन्तरग्नयः इति चुलुकेगृहीत्वा येनेति प्रजापतिर्मपिः अनुष्टुप्छन्दः श्रापोदेवता अभिपेचने विनियोगः ० येनश्रियमकृणुतां येनावमृश्यता सुराम् । येना- क्ष्यापभ्यपिंचतां यहां तदश्विनायशः । इत्यभिपिंच्य ततः पूर्ववद्, येऽसस्वन्तः । आपोगृ०॥ ॐ आपोहिष्टेति सिन्धुद्वीप 'ऋपिर्गायत्रीछन्दः अपोदेवता अभिपेचने विनियोगः ॐ यापो हिष्टामयोभुवस्तानऽऊर्जेदधातन । महेरणाय चक्षसे । इत्यभिपिं- च्य ३१ चतुर्थकुम्भान् । येशप्स्वन्तः जलमादाय आयोवऽ इति सिन्धुद्वीप ऋपिर्गायत्रीछन्दः पापोदेवता अभिपेचने विनियोगः ॐ योवः शिवतमोरसस्तस्य भाजयतेहनः । उशतीरिवमातरः इत्यभिपिच्या ततः पंचम कुम्भात । येऽयवंत इति जलं. ॐ तस्माऽअरंग इति सिन्धुद्वीप ऋपिर्गायत्री छन्दः पापोदेवता अभिषेचने विनियोगः ॥ ॐ तस्माऽअरंगमामयो यस्य क्षयाय जिन्वय । प्रापोजन यथा चनः ॥ इत्यभिपिच्य, ततः पाठ सप्तम अष्टम कुम्भानां जलमैकैकशः, ॐ येऽप्स्वन्तरग्नपः इति मंत्रण पूर्व जल ग्रहण, तृप्णीमभिपेचनम्-कुर्यात् पूर्ववत् (कचि- पुस्तके इदानीमभिपेकानन्तरं, अभिषेकावशिष्ठ जलेन सहस्र- धाराभिः स्नानं निर्दिष्टम्-सूत्रकारेणणु शिरसोभिषेकश्चुलुके नोक्तः नतु सहस्रधाराभिः॥ देशसमाचारोऽयम् ।)-वक्ष्यमाण मंत्रेण ब्रह्मचारीमौजीमेखलमित्रपठनस्वयमेवशिरोमार्गेनिस्सार्य भूमौ क्षिपेन्-ॐ उदुत्तममिति शुन:शेफऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः वरुणो देवता मेखलोन्मोके विनियोगः ॥ 30 उदुत्तमं व्यरुणपाशमस्म दवा धर्मब्धिमध्यम श्रमाय । अथावयमादित्यव्रतेतवानागसोड अदितयेस्याम ॥ इति मेखलामुन्मुच्य तृपणी मुदगग्रं दण्डमजिन च भूमौ निधाय, उपकल्पितवासस्तृष्णी परिधाय द्विराचम्यवक्ष्य माण मंत्रः आदित्यमुपतिष्ठते । 30 उद्यन्भ्राजभृष्णुरिति प्रजा- पतिपिः शकरीछन्दः आदित्योदेवता सूर्योपस्थाने विनियोगः॥ ॐ उद्यन्नाजभृष्णुरिन्द्रो मरुभिरस्थात्माता वभिरस्थाइश- , कर्मकायरत्नाकरे, समावर्तनपतिः। - सनिरसि दशसनि मा कुर्वाविदन्मागमय । उद्यन्भ्राजभृष्णुरिन्द्रो मरुद्भिरस्थादियायाचभिरस्थाच्छत सनिरसि शत सनिमा कुर्वा- चिदन्मागमय । उद्यभ्राजभृष्णुरिन्द्रोमभिरस्थात्सायं यावभि रस्था त्सहस्रसनिरंसि सहस्रसनि मा कुर्वाविदन्मागमय । इति मंत्र ब्रह्मचारी उत्तिष्ठन्नवं वाहुः सृयोपस्थानं कुर्यात् ।। तत उपकल्पितं दधि तदभावे तिलान्या दक्षिणहस्तमध्य सोमतीन प्राश्यजटालोमनवानां नापितद्वारा निकृन्तनं कृत्वा ॥ वपननि- मित्तक शीतलोदकेन स्नात्वा प्राचभ्य ततो नामए द्वादशांगुल दीर्घेण, क्षत्रियो दशांगुलेन, वेश्योऽष्ठांगुलेन, कनिष्ठिकाग्रभाग स्थूले न उदुम्बरकाप्टेन दन्तधावनं वक्ष्यमाणमंत्रेण कुर्यात्- 'अन्नाद्यायेत्याथर्वण पिग्नुष्टुप्छन्दः-सोमोदेवता दन्तधावने निनियोगः ॥ अन्नाधाय व्यहचसोमोराजाऽनयमागमत् । समेमुखं प्रमादयते यशसा च भगेन च ।। ततो द्वादशगंडूपान कृत्वा, पाचम्य सुगन्धि द्रव्येण कटुतैलमिश्रित हरिद्रापिष्ठादि- युतेन कल्केन गात्रोद्वर्तनं कृत्वा सशिरस्कं तप्तोदकेन स्नात्वा, ततः केशरचन्दनाद्यनुलेपनमादाय, तेन चन्दनेन उभौ हस्ताघुप- लिप्ययक्ष्यमाणमन्नै वक्ष्यमाण अंगानि उपगृहीते ॐ प्राणापाना- विति प्रजापतिपिर्यंजुश्छन्दः लिंगोक्तादेवता चन्दनोप संग्रहणे विनियोगः ॥ श्रादौ-उभाभ्यां हस्ताभ्यां मुखं नासिकां च लिम्पेत् प्राणापानौ मे तर्पय । ततश्चक्षुषी- चक्षुर्म तर्पय ।। ततः कणौ-30 श्रोत्रं मे तर्पय, नतो हस्तौ प्रक्षाल्य, अपसव्यं कृत्वा, तदवनेजनं दक्षिणाभिमुखः पितृतीर्थन दक्षिणास्यां भूमौ निर्षिचे वक्ष्यमाण मंत्रेण-ॐ पितर इति प्रजापत्यश्विसरखत्य ऋषयो यजुश्छन्दः पितरो देवताः निषेचने विनियोगः । ॐ पितरः शुन्धध्वम् इति पाण्योरयनेजनं जल भूमौ निषि- चेत् ॥ अन्नपित्र्यत्वा सव्यं भूत्वोदकस्पर्शः ॥ तनोऽनुलेप- नानन्तरं केशवादि · नामभिर्वादशतिलकान धारयेत-यथा ॐ केशवायनमः ललाटे १ 30 नारायणायनमः उबरे (५५६) कर्मकार रत्नाकरे, समावर्तनपद्धं तिः। २ ॐ माधवायनमः हृदये : 30 गोविन्दायनमः कंठकूपके ४ 30 विष्णवेनमः दक्षिणकुक्षौ ५ मधुसूदनायनमः दक्षिणवाही ६.30 त्रिविक्रमायनमः कर्णमृलयोः ७ 30 पामनायनमः वाम कुक्षौ ८ 0 श्रीधरायनमः वामयाही . ॐ पद्मनाभायनमः पृष्ठदेशे १० दामोदरायनमः ककुदि ११ 30 वासुदेवायनमः मूर्ध्नि १२ ललाटेवंशपत्राकृतिक मध्यशून्यधारयेदितिच ॥ एवं- तिलकान्धृत्वा वक्ष्यमाणमंत्रजपेत-ॐ सुवक्षाइति प्रजापति- ऋपि, यजुश्छन्दासवितादेवताजपे विनियोगः॥ ॐ सुचक्षाऽह मनीभ्यांभूयास सुवर्चामुखेनसुत्कर्णाभ्यांभूयासम् ॥ अथ वासापरिधत्ते-30 परिधास्यैइत्याथर्वणपिः पंक्तिछन्दोवासो- देवताश्रधोवस्त्रपरिधाने विनियोगः॥ 30 परिधास्यैयशोधास्यै, दीर्घागुत्वाय जरिदष्ठिरस्मि । शतंचजीवामिरारदः, पुमचीरायस्पो- पमनिसंव्ययिष्ये ॥ ततोद्विराचम्यपूर्वमभिमंत्रितं यज्ञोपवीतं द्वितीयंधारणकुर्यात् । (स्नातस्यद्वेवहनिवाइतिवचनात) वस्ना- भावेतृतीयंउत्तरीयाभावे चतुर्थचयथासंपदायः।) 30 यज्ञोपवी तमितिपरमेष्ठीपिः-त्रिष्टुप्छन्दोलिंगोक्तादेवताः यज्ञोपवीत परिधाने विनियोगः-30 यज्ञोपवीतं परमंपवित्र प्रजापतेर्यत्स. हजपुरस्तात, आयुष्यमा प्रतिमुंश्चशुभ्रं यज्ञोपवीतंवलमस्तुतेजः । अथोत्तरीयम्-30 यशसामेत्यथर्वणऋपिः पंक्तिश्छन्दोलिंगोक्ता देवता उत्तरीयपरिधाने विनियोगः 0 यशसामायावापृथिवी राशसेन्द्रावृहस्पती। यशोभगश्चमाऽविंदद्यशोमाप्रतिपद्यताम् अने नैवमन्त्रेण कौशेयादिदुकूलेनाच्छादयेत् । (एकमेववस्त्रंचेत्तेनेवो- त्तर वर्गणप्रच्छादयीत ) ततो द्विराचमनं कृत्वा पुष्पमालां गृह्णाति । 30 या श्राहरदिति भरद्वाज ऋषिरनुष्टुप्छन्दः सुमनसो देवता पुष्पमाला ग्रहणे विनियोगः ॥ 30 याऽाहरज्जमदग्निः श्रद्धायै, मेधायैकामयेंद्रियाय । ताऽअहमति गृह्णामियशसाच भगेनच,इति गृहीत्या वक्ष्यमाण मंत्रेण शिरसिवध्नाति । ॐ यद्यशोऽप्सरसा- मितिभरबाज पिर नुछुप्छन्दः सुमनसोदेवताः पुष्पमाला धारणे कर्मकार डरताकरे, समावर्तनपद्धतिः। (५५७) विनियोगः। ॐ यद्यशोऽप्सरसामिन्द्रश्चकार विपुलं पृथुतेन संग्र- थिताः सुमनसः पायध्नामियशो मयि॥ अथोष्णीपेण शिरोवेष्ट- यते । ॐ युवासुबासो ऽ इति विश्वामित्रपिस्त्रिष्टुप्छन्दः शिरोदेवता शिरस्युष्णीप वेष्टने विनियोगः, ॐ युवासुवासा परिवीत भागात्सउश्रेयान्भवति जायमानः तन्धीरासः कवया उन्नयन्ति स्वाध्योमनसा देवयन्तः । ततः अण्डलादीन्यलकाराणि वासांसिवा-ॐ अलंकरणमिति प्रजापति पिर्यजुश्छन्दः अलं करणं दैवतं वस्त्रभूपणालङ्करण विनियोगः-ॐ अलङ्करणमसि भूयोऽअलङ्करणं भूयात् । इति कुण्डल वस्त्रान्यद्भपण हारा- दिभिरलंकृत्वा बक्ष्यमाणमंत्रण चक्षुषी अंजनेनाते ।। 30 वृत्र- स्थासि कनीनकश्चक्षुर्दाऽअसि चतुर्मे देहि ।। अनेनैव दक्षिणवामी संस्करोति । तत्र आदर्श प्रेक्षते-30 रोचिष्णुरिति प्रजापतिपि- यजुश्छन्दः अादर्शीदेवता आत्मानमादर्श दर्शनेविनियोगः ।। रोचिष्णुरसि ।। इति सर्व देह दर्पणे पश्यति ॥ ततश्छत्रं प्रति गृह्णाति, अबृहस्पतेरदिरिति गौतमऋपि रा वहतीछन्दः छत्रं देवता छत्र ग्रहणे विनियोगः ॐ बृहस्पतेश्छदिरसिपाप्म- नो मामन्तर्धहि तेजसो यशसोमामन्तधेहि ।। ततोवदयमाएमंत्रण (प्रतिष्ठ) इति मंत्रस्य द्विवचनान्तत्वात् पादयोर्यगपत्प्रतिमंचते परिधत्ते ।। ७० प्रतिष्ठे इति विश्वामित्र ऋषिविराट्छन्दो लिंगो- क्ता देवता उपानत्प्रतिग्रहणे विनियोगः । प्रतिष्ठेस्थोब्विश्वतो मापतम् । ततो वेणवदण्डमादत्ते-ॐ विश्वाभ्य इति याज वल्क्य ऋषियंजुश्छन्दो दण्डोदेवता दंदग्रहणे विनियोगः 30 विश्वाभ्योमा नाष्ट्राभ्यस्परि पाहि सर्वतः इति वेणय (वांस) यष्टिकां गृहीत्वा भाचार्य समीपमागत्य प्रणम्यच (धारयेवैष्णवीं यष्टिं सोदकं च कमंडलुम् ॥ यज्ञोपवीतं वेदंच शुभे रौक्मे च कुण्डले) तत प्राचार्यमुखात् स्नातको नियमान शृणुयात् (उक्तं च पारस्कर गृह्यसूत्रे कांड २ कांडिका नः) स्नातकस्य यमान वनाम । स्नातस्य ब्रह्मचर्य समावृतस्य वर्णिकस्य नियः ( ५५८) फमकाएडरत्नाकर समानपनि । मान वक्षामः ।। (कामादितरः कामादिच्छया इतरः द्विजाते- रन्य शूद्रोपिनियमेपु-अधिक्रियते ॥ (नृत्यगीत वादिनाणि न कुर्यानचगच्छेत् ॥) नृत्य तालायनुकरणगात्र विक्षेपः, गीतं पड्जादिस्वरै धृवादिरूपकः विशेप लावण्यरागध्वनिः । वादिनं शब्दगुणात्मकं तंत्रीमृदंगादिभेदेन चतुर्विधम् ॥ एतानि स्वयं न कुर्यात्--एतान्यन्य: क्रियमाणानिष्टुं श्रोतुंवान गच्छेत् ॥ (काम- न्तु गीतं गायति वैवगीते या रमत इतिश्रुतेपिरम् ॥) क्षेमेनक्तं ग्रामान्तरं न गच्छेत् ।५।) कुशलेसति रात्रौ अन्यग्राम न गच्छेत् (श्रापदितु नक्तमपि गच्छेत् । (न च धावेत् ।।) अकारणं शिघ्रं न गच्छेत् (उदपानाचे क्षण वृक्षारोहण फलप्रपतन, संधिसर्पणं, विवृतस्नान, विषमलंघनं, शुक्तवदनं, संध्या दित्यप्रेक्षण, भैक्षणानि न कुर्यात् , न हवै स्नात्वा भिक्षेतापहवै स्नात्या भिक्षां जयतीनि श्रुतेः । कृपस्यावेक्षणे उपरितः अधो- मुखीभृत्वा चिरकालकौतुकेन न कुयात् , वृक्षोपरिगमनं, अाम्रादि फलानां त्रोटन, संध्यायां मार्गगमनं, कुमार्ग शीघगमनं, नग्न स्नानं, पर्वतगर्तादे रुच्छालनेन लंघनम् । अश्लीलं तु त्रिविधं लज्जाकरं, दुःखकर, अमंगलसूचकंचन चूयात् ने क्षेतादित्यमुद्यन्त, नास्तं यान्तं कदाचन नोपरिष्टं न वारिस्थं न मध्यं नमसो गतम्, पकानभिक्षा, एतानि क्षमेसति वर्जयेन् ( वर्पत्यपावृतो बजेदय मेवनः पाप्मानमपहनदिति ब देवेइन्द्रे वर्वतिसति अनाच्छादितः सन् वक्ष्यमाणमंत्र जप्त्वा गच्छेत् । 30 अयमेषज्रः पाप्मानमपहनन् इति । (अप्स्वात्मानं नावेक्षन 5) जलेस्व मुख न पश्येत् । (अजातलोम्नी विपु र्ट० सी पंढंचनोपहसेन् ११ ) भृकुटि पलकादिपुरोमरहितां कृर्चाकारां श्रोष्टरोमा पुरुषाकृति स्त्रियम् । नोपहसेत् न तयासह गच्छेत् नपुंसकमपिनोपहसेत् । गर्भिणी विजन्येति चूयात् ।११। सकुल- मिति न कुलम् ॥१२॥ भगालमितिकपालम् ।१३। मणिधनुरितीन्द्र धनु: १४॥ गभिषी स्त्रियम् विजन्याइत्येवं चूयात् ।११। सकुलu , बायलाफर मापनपतिः। ( 4 ) विशेषम् सकुलमिति स्यात् । कपालमानुपाशिरः भगालमिति यात् । इन्द्रधनः मणिधनुरिति चूयात् । (गांधयन्ती परस्मैनाच- क्षीत १५१ परस्य गोस्ववत्संपाययन्ती, तत्स्वामिनेन कथयेत् ॥ (उर्वरायामन्तहितायां भूमात्सर्प १० स्तिस्तन्न मृत्रपुरीपेकुर्यात् ।१६। उर्थरायां सस्यवत्यां भूमोवहुपरतहितायां च भूमी ऊर्य तिष्ठनसन् । उत्सर्पन्नपि च मलमूनेन कुर्यात् । [ स्वयंप्रशीर्णेन काप्टेन गुदं प्रमजीतः।१स्त्रयं भूमौ पतितेन, अयजिकेन, का टखण्डेन मलोत्सर्गान्ते गुदं मलद्वारं प्रोंच्छयेत् (विकृतंवासोना च्छादयीत् ॥१८|| विकृतं नील्यादीन्या रंजितम् स्वाचार विद्ध वरुन परिदधीत स्मृत्युक्तकौशेयादिरक्तपीतवासांसितुपरिधेया. निसन्ति दृढव्रतोवधत्त्रः स्यात् सर्वपामित्रमिव ।१६ । हृढस्थिरं व्रतमारम्भकर्मयस्यसो हदवतः स्यात् भवेत् ॥ वधात् । घातात् । प्रात्मानंरक्षतीति वधात्रः स्यात् स्वेपांपरेपांच मित्र मिव हित- कारीस्योत् । मैत्रोत्रात्मणउच्यते, इति स्मरणान् इति सर्वसाधारण नियमाः अधच समावर्तनान्तद्विजा त्रिराबवतमाचरेयुस्तदवक्ष्ये तिम्रोरात्रीतचरेत् ।११ तिम्रः त्रिसरत्यारात्रीः अहोरात्राणिवतं चक्ष्यमाणंचरेत् अनुतिष्ठत् । अमासाश्यमन्मयपायी ॥२॥ मांस नमक्षयेत् । जल मृन्मयेनपात्रेण न पिवेत् ।[स्त्रीशूद्रशवकृष्ण- शकुनिना चादर्शनमसम्भापाचतः ।३। स्त्री शूद्रादिभ्योऽसंभाषणं कुर्यानयादित्यर्थः शवोमतशरीरंकृष्णशनिःश्वाकुर्कुरः एतेषाम दर्शनम् नावलोकयेदित्यर्थः [शव शूद्रसूतकान्नानि च भादद्यात् ॥४॥ शवोमनकातस्मिजातेसतिक्रीत्वालव्ध्या वायत् जातिमिर- द्यते शूद्रस्यअवरवर्षस्य नापितादेभोज्यान्नस्थापियदन्नंतच्छुद्रा- न्नं हविपानातिरिक्त कोद्रान्नादिकंच सूतकेप्रसवाशौचेसति यत् ज्ञातीनामन्नतत्सूतकान्न तानिशावशूद्रसूतकानिनाद्यान्नभक्ष येत् । मूत्रपुरीषष्ठीवन चातपे न कुर्यात ॥शा मलमूत्रोत्सर्जन धर्मे सति नकुर्यात् । तथाष्टीयनयत्कृत्य,मुग्वलालकफादिनिःस्राव न कुर्यात् [ मर्याच्चात्माननान्तर्दधीत ६] छत्रवस्त्रादिभ्याशरीरं -- (५६०) कर्मवाट हरन करे, मगायतनपइति. । सूर्यातनगोपपेत तप्तेनोदकार्थान् फुर्वीत ज तप्तजलेन शौचा क्रिया विदध्यात् (श्रवज्योत्प रात्रीभोजनम् । दीपप्रज्वाल्यरा- त्रीभोजनम् । कुर्यात् । सत्यवदनमेवया) । । सत्ययात् मिथ्या भापणं न कुर्यात् । अमांसाशनादीन्यपिच ॥ यत्र सूत्र. कारेण यावन्ति स्नातक व्रतान्युक्तानि न तावत्येवानुतिष्ठेत् ॥ अपितु मन्यादि स्मृतिप्रणी तान्यपितानि तु ततएव यानि अथ च वटुः पूर्वोक्त नियमान् श्रुत्या, पूर्वदाचार्यस्य चरणौवंदयित्वा पूर्णाहुतिंजुहुयान्ततः पूर्णाहुतौ मृटनामाग्निं सम्पूज्य-संकल्प कुर्यात-ययेत्यादि संकीर्त्य अमुकोहं ममास्य वटोः समावर्तन कर्मणः सांगफलावाप्तये मृटानौ पूर्णाहुतिहोम करिष्ये--ततो घृताभ्यक्त श्रीफलं रक्तकौशेययन वेष्ठितं गंधपुप्पादिभिः सुपू. जितं स्रवे निधाय उत्थाय, समिद्धेऽग्नौ घृतधारया वक्ष्यमाण मंत्रेण जुहुयात् ॥ ॐ मुनिंदिव इति भरद्वाजपिस्त्रिष्टुप्छन्दः वैश्वानरो देवता मृटनामाग्नौ पूर्णाहुति होमे विनियोगः- ॐ मुनिं दिवोऽअरतिपृथिव्या वैश्वानरमृतऽअजात मग्निम् । कविसम्राजमतिथिं जनानामासन्नापानं जनयन्त देवाः-स्वाहा इदमग्नये वैश्वानरायनमम ॥ इति जुहुयात् ॥ (पूर्वोक्त पूर्णाहुति निषेधस्य समावर्त्तनेऽभावा दत्र पूर्णाहुति भवति) ततः प्रदक्षि- पाचतुष्टयं कृत्वा, ततः स्नातकस्य पित्रादिः समावर्तनान्तकर्मणां परिपूर्णार्थ गोदानं कुर्यात् ।। पुरोहितायदत्वा उत्तरांगत्वेन राज पुत्र नामाग्निं सम्पूज्य,गणेशादिग्रहयोग सर्वतोभद्र वास्तुभद्रस्थ देवताः पृथक् पृथक् सम्पूज्य-मतिमादान संकल्पं कुर्यात्नये- त्यादि अमुकोहं ममास्यपुत्रस्य उपनयन वेदारम्मसमावर्तनक- मर्मणि ग्रहयागस्य सर्वतोभद्रस्य वास्तुभद्रस्य इमाः सुपूजिताः सौवर्णीः राजती प्रतिमाःसवस्त्राछन्नाः, तत्तदोचार्येभ्यो ब्राह्मणे- भ्योदास्ये, ॐ तत्सन्नमम इतिवत्याजापकादिभ्योपि जपसंख्यया दक्षिणांदद्यात् नानानामगोत्रेभ्योभूयसीमपि दद्यात् ततोब्राह्मण मोजनसंकल्पः अद्येत्यादि अमुकोहं अस्य पुत्रस्य उपनयन वेदा- कर्मकारत्नाकरे, मापनपद्धतिः । (५६) रंभ समावर्तन कर्मणां साद्गुण्यार्थ ब्राह्मणान् भोजयिष्ये ॥ अग्न्यादिदेवान् चिम्जेत अक्षतानादाय हस्ताभ्यां क्षिपेत् . उस्रावेतंधूाहौयुज्येधामनश्रूऽअवीरहण ब्रह्मचोदनौ । स्वस्ति- यजमानस्यगृहाणि गच्छतम् । ॐ यान्तुदेवगणः सर्वे पूजामादाय मामकीम् । इष्टकामसमृद्धयर्थं पुनरागमनायच । ततः कलशजले- नअभिषेकं कृत्वा मंत्रतिलकं कुर्यात् । ततो देवोपभुक्तनिर्माल्य रक्षामन्धनसूत्रं च पूर्वोक्तमंत्रः कुर्यात् || ततः स्वगृहंगत्वा पूर्वो- क्तत्रिरात्रवतमाचरेत्स्नातकः-स्नातकस्य माता चतुर्थे अहानि चौलकेशानुपनयनकेशांश्च पूर्वोक्तप्रकारेणगोष्ठे जलाशये या स्थापयेत् । इति समावर्तन संस्कार पद्धतिः। नवाप्टनयभूवर्षे, भाद्रकृष्णदले शुभे, श्रीकृष्ण जन्मदिवसे जयन्त्यां चुधवासरे ॥२॥ आदित्यनामके यंत्रे, इन्द्रप्रस्थे शुभेपुरे, संरच्य मुद्रितः कर्म काडरत्नाकरो ह्यसौ ॥२॥ नानाग्रन्भान्समालोक्य, सप्रमाणोऽधुनामयां, देवानन्देन विदुषा वद्रीनाथनिवासना ॥॥ द्वितीय स्तस्यचैवासौ, खंडःसंस्कार कर्मणाम्, संपूर्णतामगाच्चैव, गुरुपादाऽनुकम्पया ॥४॥ ,
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इति संस्कारखण्डः
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कर्मकाण्डरनाकरे, दानपरिभाषः। (५६) श्रीगणेशायनम , सभीष्ट प्रदातारं नमामि पदरीश्वरम्, पानसं शिवपऽहं चावं. गर्थिव परम् । अश दानपरिभाषा-तत्रादौ दानस्वरूपमार देवल-मोन मुदिरी पात्रे, श्रद्धया प्रतिष दनम् । दानन्त्यिभिनिदिष्ट व्या'यानं तस्यप यते ! तथा~परस्परबं.. त्यन्तो द्रव्यत्यागोदानम्, तच्चदानं हेतुताद्विविधम्-असाभक्तिभेदात्, तत्र- श्रवा अस्तिदानं परले साधनम् । स्नेहपूर्वक मभिध्यान, भक्ति । तदगीतायां त्रिविधमुक्तम्-~दातव्य मितियह न दायरऽनुपकारिणे । देशक ले च पात्रे च तदान साविक स्मृतम् । राजसम्-यत्तु प्रत्युपरागर्थ फल मुद्दिश्यया पुन । दीयते च परिलिजस भुदास्तम् । तामसम्---श्रदशकालेर दानपात्रेयचदीयते । असकृतमवज्ञात तत्तमस मुदा. हतम् ॥ गारडे-मईतयत्सु वर्णादिदानतत्कायिकं स्मृतम् । अातानान भयंदान मिस्पतदायिक स्मृतम् । विद्यामादाय यग्जाये तन मनन द्विता । उक्त च दानधर्म-तपो धर्म, कृतयुगे ज्ञ नं भताटुग स्तम् । द्व.परे चावरा प्राकार, कनौदान दयादम ॥ गारुडे. दानान मत्त दान विद्यादान पिदुर्वधा । मात्र समस्त विद्याना नियमवाधिदेवतम् । ययारिष्टो दवाना विष्णु कारण पूरप । तथायिय प्रद श्रेटो गई याश्च गरीयसम् ॥ दानपात्रम् --- खाध्यायी त्पम युत्त प्रतिमह विवरित । शुद्राम पनकं नायातमान श्रेष्टमन्यते । गाडे विशेष -छ प्राणा मानभ्या परमभिक्षामथापिया । दावा प्राप्नाति पुरष स्वामानशरय । विपकी जीवित दीर्घ धर्मक माथमा नुयात । सर्वमय भवदत्त छत्राणां भोजन कृत । भारत दानधर्म-फुही निति यस्यान विद्यभ्यासन जोयति । गोत्राणि तारयत्स्य दश पूर्वा शपरान् । छात्राणा रक्त दान च सर्वशालेषु गीयते । स्वगलोषचमहीयन्ते छान्वृत्ति प्रदानरा । प्रथम दान माचाय दत्वा श्रेटमनुक्रमात् । ततान्यषां च विप्राणा दद्यापानानुमरत । समिधा वस्थितान्विान्दोहित्र विट्पत्तिथा । भगिनय विरुपण तथा वधू-गृहागतान् । नाति माम मरस्वता-सुमूर्खानपि भावत । अतिकम्य महारौद्र रौरव नरक बनत् । भाचार्य लक्षणम्-- नानाविध नि माणिकर्ताकारयिताचय । सर्व धम विधिज्ञश्च सबैमाचार्य उच्यत । वेद वदा शारन यो पारग समदर्शन । दभताभादिरहित सोयो वदपारग । अप्राह्य दानानि- अजिन मृतशायाच मा चाभयतो मुसीं । कुरक्षत्रे च गृह नो नभूय पुरुषो भवत् । मनु-हिरण्य भूम मरवगामनबासस्तिलान्तम् । अविद्वा-प्रति गुहानो भस्मो भवति-~ फटबत अविद्वन्विय सपा याहीन । दानकाल स्मृत्यन्तरे-दर्शातगुण दार तदशान दिनक्षय । शतप्न तच सानो शतम्न विवे तत । युगादौ तच्छत गुणमयमे तच्छता हतम् । सोमग्रह तन्वतम्न त तनावग्रह । पौर्णमासीषु सवायुमासन सहितामु च । दत्ताना (१६४) चमकाए डरत्नाकरे दानप्रतिग्रहविधि. मिह दानाना फलं शतगुणं भवत् । निमित्तदानकाल --ग्रहणोद्वाह सक्रान्तियात्राति प्रसर्वेषु च । दान नैमित्तिक ज्ञेय रानावपि नदुष्यति । अथदानविधिः। . सूर्यारण सम्बादे दानधर्म–श्रीसूर्यउयाच-स्नात्वानित्य क्रियां कृत्वा कशुचिर- लकृत ! ब्रह्मण न्दय वस्तू न गन्ध द्यैरय॑ये सुत । दान ददेह ममुरू दद्याद्विप्रारे जलम् । दरस्वति द्विजेनात मितिदानविपिस्मृत । ॐ तत्सत्पूर्वमुच्चार्य गृहीत्व तुकरे जल्म् । सतिलकुश हस्तस्तु काल ज्ञान समुच्चरेत् । प्राङ्मुसश्चोमुसोवा पैत्रे याम्यमुखस्तथा । (नतुनान्दी मुग्वे ) वामन पाणिना र पृष् वा स्मरेत्तद्वस्तुदैवतम् । विप्राय मुक गोत्राया मुक्कामो ह्यहदढे । नममे स : दवं द्विज हस्तेजलखग ( कन्यादानाति रिक्त दानेपु नममेत्युच्चारणम्) स्वस्तीत्युक्त च मिणदानम क्षयता नयत् । त निमिति सत्रोक्त मन्यत्त्यागइतिस्मृतम् । कन्या दाने विशेष --क यादान निस्प गोत्रोचरण पूर्वरम् । गो, या, प्रतिमा, शम्या, पस्य प्रदपयेत् । विभज्यतिविना दातानतत्पलमव प्नुयात् । दानप्रतिष्ठा---प्रतिष्टा सर्वदागना स्वर्णमक्षयकारकम् । द नमक्षयतायाति सम्प्रदामनुयत्कृतम् । तीर्थादी त्याग विधिना सम्प्रदान सम फलम् । तवद्धनुषुधन व देवत्व प्रतेमामु च । यावद्विप्रोनगृहणीयात्स्वसोत्युक्ते तुतद्दसु ।। ॥ प्रतिग्रहविधिः॥ नापतेय त्रिमात्रा स्तुप्रयोशच्या मारम्भेपुरवंश ।निस सार्दास्तु-यामानास्तत्वाय चिन्तक । गौतम – अन्तजानुकर कृ या सकुशतुतिलादम् । फलान्यपिच सधाय प्रदद्यान्द्रद्रया वितो । वृद्धवसिष्ट-नाम निसमुच्चार्य सम्प्रद, नस्य चात्मन । सम्प्रव्य प्रयच्छति कन्या- दान तु पुंस्त्रयम् । स्मृत्यन्तरे-सीय दशकलादि तुभ्यसप्रददे इति । नममेति खस्य वस्य मितिमपि कीर्तया। प्रचेता-दक्षिण हस्तमध्ये ब्राह्मणस्याग्नेय तीर्थ, पागायन प्रति sीया दिति-विष्णु धर्मात्तरे-प्रतिग्रही वा सावित सर्वत्रवान वीतयत । ततस्तु कीर्तयेत्सा) द्रव्यण द्रव्य देवतम् । सम पयात पश्चात्कामस्तुत्या प्रतिग्रहम् । तदन्त कीयस्वस्ति प्रतिग्रह विधिस्त्वयम् । प्रतिग्रहान्त ब्राह्मणस्य पत्तव्यता-आदित्य पुराणे-उधार- शुनरस्त्रानो द्रपिण सैपुशोदकम् । गृण याइक्षिरे हस्तदन्ते स्वस्तिकीत्येत् । प्रतिग्रह 43 दुन्च प्रतिगृत्यद्वितीमात । मन्द्र पठेनु राजन्ये, उपांशु च तथा पिशि । (मद्र मध्यमस्वर) मनस तु तथा गढे स्पस्ति वाचन मेपर । गोकार ब्राह्मगे पुर्यात निरोंकार महीपती पांमुच तथा पश्यै मनमा सस्ति शुदा ० कर्मकापडरत्नाकरे, दान द्रव्यदेवता (५६) दाने द्रव्यपरत्वेन देवता वक्ष्ये। हेमाद्रौ विणु धर्मोत्तरे- अभयं सर्व देवत्यं भूमि विष्णु देवता । कन्यादामस्तथा- दागी भाजापत्या प्रतिनाः ॥ अग्निपुराण-प्राजापत्यो गज. प्रोफरतुगो यमदत ॥ गया चैक शर्फ सा कथितं यम देवत्म् । महिपश्यतथायाम्य, स्ट्रोक्त स्त । रोट्रोन विनिविष्टा भागमाने य मादिशेत् । मपंतु वारण विद्याद्वराहणार तथा । आरएम पराव सो करिता वायुदेवता । मला- शयानि सर्वाणि समुद्राश्च कमण्डलु । कुम्भश्च संचैव वारणानि भरन्तिहि । समुद्र जानि रत्नानि वारुणानि प्रच्यक्षते । पानेयं कनकं प्रोक्त सर्व लोहानि चाप्यथ । प्राजापत्यानि सस्यानि पयानानिच्यानि । विया: सर्वगंधाश्व गाधवि विपक्षणी. विद्या ब्राह्मी विनिया दिघोष करणानि च । सारस्वतानि यानि पुरतका- दोनि परि-त. । वाईसत्यं स्मृतं वासः सौम्याई यारसारतमा । पक्षिणस्तु तयासर्वे वायत्र्याः परिकारिता.। रोपा शिल्पभाड ना निर्माच टवता । द्रुमाणमय पुरयाणा शाहरतिस्थता, पलाना मरिमर्वेषा देबोझे नापति । सत्यमास विनिर्दिष्ट मगायत च । त्रं कृष्णाजिनं शय्या स्थमास्मश्च । पानही तथा यानं रचन्यत्प्राणि परिम् । सर्वचाङ्गि रसत्वेन प्रतिमहोत मान्य. । शूरोपयोगिटत्सव पानमन ध्वजाकिम् तो सर्व वियं सर्व देवतम् गृच शमादेनत्यं यदनुक्त विनोतमा । विहे.य विणदेवन्यं सर्वदा विधि वदिभि । वाक्ये जलमादाय करणाय प्रतिग्रहम् । दातुमन प्रयोगान्ते यमुनस्मै सुरायो । इस्मों प्रतिगृह्णामि तन्ते स्वस्ति कीर्तयेत् । अथ दानसमये प्रतिग्रह स्थानानि । प्रतिगृहणीत गापुच्छे कए वा इस्तिना करे। मूनिदायो मजव टेऽश्वतर गधी । अश्वं का कटाया वा दान मुद्दिश्यवारयत् । शय्यासने यह ज्ञा सस्यश्यानाय काचनम् । अष्ट्रय विस्वा मृगश्च महिपादिकान् । गोधामविधानेन पने सस्पृश्याक्षिणः । न दंड स्मूले पलं सगृह्यगौरवात् । हेमाद्रीतु-भूमे प्रतिम कुयाभूमि कृत्वा प्रदक्षिणम् । करदात्या कन्याच दास दात्यो द्विजोती। मारुह्यच गनस्योक्त कर्णोधारवस्य कीर्तित तयाचैक शफानान्तु सापाच विशेषत । प्रतिगृहणीत अंगेजी पुन्छकृष्णानिन तथा । एक शफा णि स्तेप गएव । चिशव सर्वे ग्राह्या पुन्धविपक्षणे । गृहणीयान्मर्षि भृङ्गे सडग वै पृष्टदशत । प्रतिग्रहस्योगस्य याना चाधिरोहणात् ॥ वीजानामुष्मा- दाय स्ना मादाय सर्वश । चलंदशान्तादादया परिधायापियापुन । भारह्यौ पानही मञ्च मारुत्येवच पादुकै । धर्मध्वजौतु सस्पृश्यगृहणीयादानवेदिभि । श्रदत्तीर्यच सर्वणि जलयानानि यानिव । प्रायुधानि समादाया तथामुन्य विभूषणम् । आमुन्य व त्यर्थ { पुत्रमुत्सङ्गमारोप्य प्रतिग्रहणीत दरकम् . रथस्थ मुग्वे स्पृष्ट्वा प्रतिगृहणीत कूपरे । कूवरो युगाधारक टम् । युग्य वाचन व स्त्राणां नागयुक्त प्रतिगृहे । - (५६६) कर्मकाण्डराफरे, गोदानपरिभाषा । द्रव्याणामथ सबका ढदसश्रणानर व चये जलसादाय कोणाथ प्रतिग्रहम् । दान फलान्तुि अथ विस्तार भिया नशित नि, हेमाद्रि दानखराइतोशयानि । तत्रादौ वृहद्गोदान परिभाषा । उक्त व स्त्यन्तरे देशाला - एवघ नाशन पुरा4 राकामाध मिद्धिदम् । स्वर्गपवर्गद चावक्ष्य गोदानमुत्तमम् । अयने विषुवपाते वैधृती सूयसक्रम । अमावास्य पौर्णमास्यां द्वारश्या राहु पणि । म वादीच युगादीच जन्मक्षपुर मनि । यसले पहोताते दु रवानेऽद्भुत र्शने । तेयोगे प्रतिष्टासु गावो या शिव दिना । स्थानान्याह-तीथ दवाज्ये गाष्टे सगमेज्ञमण्डपे । श लग्रामशिला- ग्रेच शिवलिंगस्य सनिधी । इत्यादि शुभतशेपु स्वगृह वापयस्विनीम् दद्यादास्तिक्यदुध्याता महमा द्विनपुगव । गौदानयोग्य ब्राह्मणानाह-महाभारते कुलीनाय सुगौल यवदबदाग्वादिने । प्रा भिंद्य शनाताय सागाय प्रतारिए । सद्वृताया प्रमत्त य दान्त य करातये । कोरहिसा विकीनाय सदामानोप जीत्र।। सर्वदानानि ध्यानि निगुत्त विपि तयत् । गोरगवता प्राह हेमाद्रीभविष्ये-शाम्ले गायि ब्रह्मविष्णु समाथी सगाप्रसवतीय नि स्थ वराणिचाणिच । शिरोमध्यमान्य सभूतमय शिव । ललाटाग्रे स्थनागौरी नासावशेच परामुरा । क्वलाश्वतरोनागौ नासायुग्ममुपाश्रितौ । कण र विनोदवी चक्षुपा शशिभारफरौ । दत बायव सव निझ्या वरण स्थित । सरस्वतीच हुवार मासक्षौच गरायो सयाद्वय तथोष्ट भ्या ग्रो निन्द रामाश्रित । रनामि वना शेतु सच्याश्चोरमि सस्थना । च.पारसकनो धम खय जपासुगस्थिन । खुरमध्यतु गन्धब खुराप्राचानगा । सुराणापश्चिमाया ग्ण अमासो तथा स्वच सकला पृष्ट वमत्र सवसिथिए । धोणी तस्था पितर सोमो लागूलमाति । आरित्य रश्मयागाला भूतश्ववितसाचाद्गगच गामने गामय यमुनास्थिता क्षोसा सतावो नमदा दध्नि मस्थिता। हुनाशन स्वयसा व ह्मणाना गुरु प । मष्टा यशति देवाना या या मयुमस्थिना । दर पिकाया सागरायायोक्रा महाभारत-दानानामिह सनपा गादान विशिष्पत । गव अटा परिवाश्च पावना जगदुक्तमा । दानसमयोक्त प्राकारश्चस्मृतिकौस्तुभेगो-ता सर मार्ग प्रामुको मवस्थाध्य दातापु-दवशिय प्रामुखस्ति । पानभूत विस्तर दक्षिणा मुरान्तिछेत् । द त यथाशक्तिान कयुन मापात्र मादाया स्नगोऽयं निक्षिप्य राम्लेि प्रान विप्रपाणी घताक्त सतिल कुशपु छ निक्षिप्य अलक्षिपेत् । वचिद्गापुर पितृतपण वृत्तवा गोदननिन्ति, मा-याचित प्रतिगृहानि यो पिता प्रयच्छत । तानुभो त सग नक्तु वियय । इत तपण विधान, महाभारताका गापतीच ॥ इति गौदान परिभाषा। प्रयाग पदामि ॥ --050--- कर्मकागहरस्माकर, गोदानपतिः। अथ गोदानपद्धतिः। , अध च गोदानकर्ता सुस्नातः हस्तौपादौप्रक्षाल्य सुलिप्ता यांभूमौस्यासनेउपविश्य, करौसपवित्रौकृत्वा, यथोक्तलक्षणांगांपू र्वाभिमुखीं सवत्सामवस्थाप्य, सुलक्षणं ब्राह्मण मुदमुग्वंस्था- प्य स्वयं पूर्वाभिमुग्योभूत्या श्राचम्यस्वानभूमौगंधेन चतुरम- डलंकृत्वा तत्रार्घपात्रसंस्थाप्यजलेनापूर्य गन्धपुप्पासतादीस्तृष्णी निक्षिप्य, तेनजलेन गोदानसामग्री मात्मानं च संमोक्ष्य, आधार सम्पूज्य, भूतोत्सादनं कृत्वा प्राणायामंविधाय सुमुग्यश्चेतिक गणेशंसंप्रार्य कुश तिलयव जलान्यादाय प्रधान संकल्पं कुर्यात् । ॐ विष्णुर्विष्णु रिहरिः ।। 30 श्रीमद्भगवतो महापुमस्येनि देशकालो सकी.मुकसंवत्सरे अमुकमासे पक्षे निधौ वारेनक्षत्रे योगे, कर्णे अमुकप्रदेशे पुण्यतीर्थेऽमुककाले, अमुकगोत्रोऽमुकश- हिं श्रुतिस्मृति पुराणोक्त फलावाप्तये, अमुककर्मनिमित्तक श्री परमेश्वर प्रीतयेगोदानं करिष्ये, तत्प्रतिग्रहार्थ ब्रामणस्य पूजन- पूर्वकं वरणंचकरिष्ये, ततः स्वदनिणेयजीयवृक्षोद्भवासने उदङ् मुग्न ब्राह्मणमुपवेश्य पूजयेत् ॐ विष्णुस्वरूपिणे ब्रामणायनमः इति मंत्रेणासनपाद्यार्थ्यादिकंदत्वा, वक्ष्यमाणमंत्रः पूजनंकुर्यात् अशापद्धनध्वान्तसहस्रमानयः समीहितार्पणकामधेनवः । सम स्ततीर्थाम्बुपवित्रमूर्तयोरक्षन्तुमांब्राह्मणपाद पांसवः ।। समस्त संपत्समवाप्तिहेतवः समुत्थितागः कुलधूमकेतवः । अपारसंसार समुद्रसेतवः पुनन्तुमांब्राह्मणपादपांसवः । चिौघदर्शना त्क्षिप्त क्षीयते पापराशयः । वन्दनान्मंगलावाप्तिरर्चनादच्युतंपदम् ।। आधिव्याधिहरं नृणांमृत्युदारिदयूनाशनम् । श्री पुष्ठिकीर्तिदेवंदे विप्रश्री पादपंकजम् । तत्फलंकपिलादानेकात्तिस्यां ज्येष्टपुष्करे तत्फलं पांडवश्रेष्ट चिप्राणां पादक्षालने I इति पादौमक्षाल्य । ॐ गन्धद्वारा मितिगंधम् । ॐ नमोस्त्वनन्तायेति पुष्पगालादिभि (५८) कर्मकापडcatकरे, गोदान रतिः । रभ्यर्च, वरणसामग्री धौतोत्तरीय कमंडल्वादीन्संपूज्य, संकल्पः अधेत्यादिसंकीर्त्याऽमुकोऽहकरिष्यमाणअमुकर्मणि, एभिर्गन्धा- क्षत पत्रपुष्प फल यज्ञोपवीत ताम्बूलादिभि गोदान प्रतिग्रहार्थम- मुकवेदाध्यायिनममुकगोत्रममुक शर्माण ब्राह्मणं त्वांवृणे । वृतो ऽस्मीति ब्राह्मणोवदेत् ततः प्रार्थयेत् यदचनं कृतविप्र तवविष्णु स्वरूपिणातत्सर्वममदीनस्य विष्णवेऽस्तुसमर्पणाम् । ततास्वपुरतः प्राङ्मुखींगामवस्थाप्य,वसंतदुत्तरतोन्यस्य अक्षतपुष्पैःॐ अागा- वोऽअगमन्नुत भद्रमन्त्सीदन्तु गोष्ठेरणयन्त्वस्मै । प्रजावती: पुरुरूपाइहस्युरिन्द्राय पूर्वीरुपसोदुहानाः। ॐ आवाहयाम्यहंदेवी गांत्वां त्रैलोक्यमातरम् । यस्याःस्मरणमात्रेणसर्वपापैः प्रमुच्यते। स्वंदेवीत्वंजगन्मातात्ववेवासिवसुन्धरा । गायत्रीत्वंच सावित्री गंगात्वंच सरस्वती । तृणानि भनसेनत्य ममतस्रवसेप्रभो । भूत प्रेतपिशाचांश्च पितृदैवत मानुपान् । सर्वास्तारयसेदेविनरका स्पापसंकटात् । इत्यावाहपूजयेत् . सवत्सायेगवेनमः पाद्यम् स्नानं समर्पयामि पुष्पाणिगृहीत्वा ॐ नमोवोविष्णुमूर्तिभ्यो विश्वमातृभ्यएवच । लोकाधिवासिनिभ्यश्च रोहिणीभ्योनमोनमः ॐ गोः अग्रपादाभ्यांनमः 30 गाः पश्चात्पादाभ्यांनमः ॐ देह- स्थायाचन्द्राणां शंकरस्यसदाप्रिया धेनुरूपेणसादेवीममपापं व्य- पोहतु । 30 गोमुग्वाय नमः । २० विपणोक्षसियादेवी स्वाहा याचविभायसोः चन्द्राऽर्कशक्र शक्तिर्यासांधेनुर्वरदास्तुमे । 30 गोः शृगाभ्यांनमः ॐ गोकर्णाभ्यांनमः अचतुर्भग्वस्ययालक्ष्मी- लक्ष्मीधनदस्य च । लक्ष्मीर्यालोकपालानां साधेनुर्वरदास्तुमे । ॐ गोः पृष्ठायनमः . स्वधात्वं पितृमुख्यानां स्वाहा यज भुजां तथा ॥ सर्वपाप हराधेनु स्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छमे । 30 गोः पुच्छाय नमः । चत्रम्-30 आच्छादनंमयादत्तं सम्मा शृध्दांसुनिर्मलं । मुरभिर्वस्त्रदानेन प्रीयतांपरमेश्वरी ॥ गन्धम्- 30 सर्वदेव प्रियंदेवि चन्दनं शशिसनिभम् । कस्तुरी कुंकुमाचंच गौर्गन्धः प्रतिगृहाताम् । अक्षताः पुष्पाणि च-30 नमोयो विश्व कर्मकाथानाकरे, गोदानपतिः । (५६९) मृतिभ्यो विश्वमातृभ्य एवच ॥ लोकाधिवासिनीभ्यश्च रोहि- पीभ्योनमोनमः ॥ ॐ गवेनमः पुष्पमाला समर्पयामि । धूपम्- ॐ अानन्दकृत्सर्वलोके देवानांचसदाप्रिये ॥ गोस्त्वंपादि जगन्नाथे धूपोयंप्रतिगृह्यताम् दीपम्-~-30 आनन्द दायिनि शिचे, सर्वसौ भाग्यदायिने । सर्वपापहरेमात पोऽयं प्रतिगृहाताम् । नैवैद्यम्- ॐ सुरभिस्त्वं जगन्माता नित्यं विष्णुपदेस्थिता गोग्रासोऽयंमया दत्तो नैवैद्यप्रतिगृह्यताम् ॥ घंटाचामरमंत्र:--30 यत्तेमयार्पित शुध्दं घंटाचामरमुत्तमम् । अवेयं तद् गृहाणत्वं मुनित्रिदशवन्दिते। ततो गोदेहे देवादीनावाहयेत अक्षतपुष्पैः पूजयेच-शृंगमूले-30 ब्रह्मविष्णुभ्यां नमः शृंगाग्रे-३॥ सर्वतीर्थभ्योनमः! शिरोमध्ये- ॐ महादेवायनमः । ललाटे-30 गौम्यनमः। नासारन्ध्र-30 परामुचायनमः । नासापुटयोः-30 कंधलाश्वतराभ्यांनमः । कर्णयोः-ॐ अश्विभ्यांनमः । चक्षुषोः-30 शशिभास्कराभ्यां नमः । दन्तेपु-30 वायुभ्योनमः । जिव्हायां-30 वरुणायनमः हुंकारे--ॐ सरस्वत्यैनमः । गंडयो:-ॐ मासपक्षाभ्यांनमः । श्रोष्ठयोः-30 संध्याद्वयायनमः ॥ ग्रीवायाम्-30 इन्द्रायनमः। कक्षे-30 रक्षोम्योनमः उरसि-30 साध्येभ्योनमः । जंघासु- ॐ धर्मायनमः । खुरमध्ये-30 गंधर्वभ्योनमः । 'खुरापु-30 पन्नगेभ्योनमः । खुरपश्चिमागेपु-30 अप्सरोगणेभ्योनमः। पृष्टे- 30 एकादशरुद्रेभ्योनमः।सर्वसंधिपु] अवसुभ्योनमः । श्रोण्योः ॐ पितृगणेभ्योनमः । पुच्छे-30 सोमायनमः । पुच्छकेशेपु- सूर्यरश्मिभ्योनमः । गोमूत्रे- गंगायैनमः । गोमये-30 यमु- नायनमः। क्षीरे-30 सरस्वत्यैनमः। दनि-ॐनर्मदायैनमः घृते-30 वन्यनमः । रोमसु-30 अष्टाविंशतिदेवकोटिभ्यो- 'नमः ॥ उदरे-30 पृथिव्यैनमः । स्तनेपु-30 चतुःसागरेभ्योनमः । इति देवांस्तीयांश्चावाहा ॥ ततः शक्तोसत्यां रौप्यखुरां ताम्र- पृष्ठां-स्वर्णशृंगी, घंदाचामर विभूपिता लागूलसमर्पित रत्नमुक्ता- फलां सुपस्त्राच्छादितां गां संभूष्य समीपे वामभागे-कांस्यमय - ७२ (५७०) कर्मकाण्डरत्नाकर गोदानपदतिः। 'दोहन पात्रं चसंस्थाप्य-प्रार्थयेत-30 नमोगोभ्यः श्रीमतीम्यः सौरभेईभ्यएवच । नमोब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्योनमोनमः । गावोममाग्रतः सन्तु गावोमेसन्तुष्टनः। गावोमेपार्श्वयोः सन्तु गांमध्येवसाम्यहम् ॥ पंचगावः समुत्पन्ना मध्यमाने महोदधौ । तासांमध्येतु यानन्दा-तस्यैदेव्यैनमोनमः। गवामंगेषु तिष्टन्ति भुवनानि चतुर्दशा यस्मात्तस्माच्छिवं मेस्यादिहलोके परत्र च । ब्रह्मादयस्तथादेवा रोहिण्यः पान्तुमातरः॥ अथ तर्पणविधानम् कूशाक्षत जलैःसाध्दै गृहीत्वा पुच्छमाहतः । कराभ्ा तर्पयेद्देवान् देवतीर्थेन मंत्रवित् । प्राजापत्येनमनुजान पितृन्पित्र्येणतर्पयेत । ततः प्रामुग्यो दाता सकुशाक्षतयवं गोपुच्छं गृहीत्वा सततजल धारया देवतीर्थेन देवांस्तर्पयेत्-केचित् गोपुच्छोदकेन तर्पणमि- च्छन्ति,, यान्दिनीसुशीलाद्याः कामदाश्चैवधेनवः। ताः सर्वाः पुच्छतोयेन तर्पितास्तर्पयन्तुमाम् ॥ ब्रह्माविष्णुमहादेवः कार्तिक- श्च गणाधिपः । पुष्पचापो महेन्द्रश्च भगवानच्युतांग्रजः ॥देवाः समस्ताः सगणाः सवाहन परिच्छदाः। वसवोठो द्वादशार्कारुद्रा sएकादशैवतु॥ विश्वेदेवाश्चसाध्याश्च ममतोमातररतथा गर्वा गुह्यकाश्चैव सागराः सरितस्तथा । राक्षसायक्षवेतालाः पूतनाः पर्वताद्रुमाः । तीर्थाण्यप्सरसश्चैव पशवः पन्नगाखगाः । ऋक्षाणि- राशयोयोगामासयपर्तुवासराः। श्रयनेचयुगा:कल्पास्तधामन्वंतरा णिच । भुवनानिदिशौकाश्चतथासर्वेन्द्रियाणिच । 30 कारश्चैव गायत्रीछन्दांस्यंगानिचैवहि । वेदोश्चस्मृतयश्चैवपुराणानितथैवच । श्रायुर्वेदोघनदोगान्धर्वोमंत्रगह्वरः । श्रौपध्योवनसम्भूतानाम्या- श्वसुपिप्पलाःसानुगादेवता श्चैवमुनयःसगणास्तथा। ऋपयोग- पिपल्यश्चसिध्दाश्चसगणास्तथा । प्रजाःप्रजापतिश्चैव येन्येविन विनापकाः। विद्याधराश्चदैत्याचप्राचार्या गुरवस्तधा। डाकिन्यः नपालाश्च भैरवाश्चाष्ट संख्यकाः । स्थावराअंगमाचैव भूतग्राम- स्वतुविधिः अक्षयेनामृतेनैव मंगलेनसुयारिणा। गोपुच्छाग्रच्युते नेहमहत्तेनहितेऽग्यिलाः । शाश्वतींतृप्तिमायान्तु दाढर्ययुक्तवर- कर्मकाण्डरलाकरे, गोदानपातः । (4) ५ प्रदाः । सूर्यःसोमः कुजः सौम्योगुरुः शुक्रः शनैश्चरः । ग्रहाश्च तृप्तिमायान्तु राहुकेतुसमान्विताः । इन्द्रोवन्थिमोरक्षः पाशी- वायुधनाधिपः । ईशोनन्तस्तथाब्रह्मा सर्वतेतर्पितामया। साविन्या सहलोकेशः सलक्ष्मीक श्चतुर्भजा महेशश्चोमयासाद तृप्तिमा- यान्तु शाश्वतीम् । अनिवशिष्ठो भृगुगौतमौच । मरीचिदक्षौ पुलहः पुलस्त्यः। प्रचेतसः काश्यपविश्वमित्रौ भरद्वाज संज्ञो जमदग्निर्मुनिश्च । अन्येचसर्वे मुनिपुंगवाश्च गृह्णन्तुदत्तं जलम- धतुष्टाः । इतिदेवतर्पणम् । ततोयज्ञोपवीतं कण्ठावत वितंकृत्वा, अक्षतकुराजलै मनुष्यतीर्थेन सनकादी स्तर्पयेत्-30सनकासनन्द- नश्चैवतृतीयश्चसनातनः । कपिलश्चासुरिश्चैव वोदुःपंचशिग्वस्त था। तेतृप्तिमाखिला यान्तु गोपुच्छोदकतर्पणैः। ततोऽ पसव्यं- कृत्वा द्विगुणितकुशतिलजलैः पितृतीर्थेन, पित्नस्तर्पयेत्-ॐ कन्यवाडनलः सोमोयमश्चैवार्यमातथा { अग्निष्वात्ताः सोमपा- श्चतथावर्हिषदश्चये । तेसर्वेतृप्तिमायान्तुगोपुच्छोदकतर्पणैः। ततो यमादीन्-30 यमायधर्मराजायमृत्यवे चान्तकायच । वैवस्वताय- कालायसर्वभूतक्षयाय च । श्रोदुंबरायदध्नाय नीलायपरमेष्टिने । घृकोदरायचित्रायचित्रगुप्नायवैनमः । ततः स्वपित्ऋन् ॐ पिता पितामहश्चैव तथैव प्रपितामहः । माता पितामहीयतथैव प्रपि- तामही। मातामहम्प्रमातामहोवृद्धप्रमातामहस्तथा।मातापितामही प्रमातामहीवृद्धप्रमातामहीतथा । अक्षय्यतृप्तिमायान्तुगोला- लोच्युतोदकैः। त्रिकमातामहाचमातामह्यादिकंत्रयम् । तेचताश्च प्रदत्तंमेस्वीकुर्वन्तुजलमुदा । येमृतावै पितृव्याश्चमातुलाश्वसुरा स्तथाप्राचार्यागुरुमित्राद्यातेगृहन्तुशुभंजलम् । येवसंबंधिनो पुत्रा पन्हिदाह विवर्जिता । अपमृत्युमृतायेच तेतृप्तिं च लभन्त्विह । पितृवंशेमृतायेच मातृवंशेचयेमनाः गुरुश्वसुरवंधूनांयेचान्येवांध- वामृताः। येमेकुले लुप्तपिंडाः क्रियालाप गताश्चये । विरूपा ओमगर्भाश्चजाताजाताः कुलेमम। तेसर्वेतृप्तिमायान्तु गोपु- च्छोदकतर्पणैः । गोत्रेमदीये विसुतामृताये गोत्रेच मातुर्ममयेवि- (५७२) कमकाण्डरत्नाकर गोदानपद्धति । पन्नाः। गर्भच्युताश्राद्धविवर्जिताश्चतेभ्यःस्वधाऽनेनजलेनकृत्वा । भृग्यग्नि बज्रादि जलादिशस्त्रै विपाएदतनखरै जगेः पंचत्व- भावंविगताश्चयेचतेभ्यःप्रदत्तंशिवमस्तुतोयम् । येरौरवादौनरके निमग्नाः । क्रियाविलुप्ताश्च कृताऽपकाराः । जन्मान्तरेयेममदास भूतास्तेप्यक्षयांतृप्ति मिहाभजन्तु । येयान्धवा अवांधवायेन्यज- मनिवांधवाः। तेसर्वेतृप्तिमायान्तु गोपुच्छोत्सृष्ठवारिभिः। तर्पण फलम्-धेनुपुच्छेकरंकृत्वा तर्पणंच करोतियः । आत्मानंतारयेद्वितो दशपूर्वान्दशापरान् । प्रार्थना-सन्तर्पितामयायेच गोपुच्छोदकतर्प- ऐंः । आयुर्वृद्धिंताथा तुष्टिंमेधांमज्ञांच संततिम् । आरोग्यधनला- भच संतुष्ठाश्चददन्तुमे । इतिगापुच्छोदकतर्पणंकृत्वा । अथसंकल्प: 3 ततः सव्येनाचम्य कांस्याज्यपान घृतदिग्धं कुशसुवर्ण तिल- युतंगापुच्छंकरेकृत्वोदड्मुग्वः 30 नमः परमात्मने पुराणपुरुषोत्त- माधाद्य ब्रह्मपोन्हि द्वितीयपराध्द श्रीप्वेतवराहकल्पेऽठाविंशति- तमे कलियुगे प्रथमचरणे जम्वृदीपे भरतखंडेऽमुकनामसंवत्सरेऽनु कायने मासेपक्ष नियौ वारेनक्षत्रे योगेकरणे एवंविधौ पंचांग, अमुकोऽहं श्रुतिस्मृति फलावोप्नये सुपूजितामिमां सवत्सांगां रुद्रदेवत्यां यथाशक्त्यलंकृतां निग्विलदुःख दौर्भाग्य दुःस्वप्नदु. निमित्तामुक ग्रहयाधाशांतिपूर्वकमायुरारोग्य धनधान्य द्विपद • चतुष्पद संतति प्राप्तिद्वारा (वामुककर्मनिमित्तक) गोरोमतुल्य वत्सरावधि सकलभोग परिपूर्ण स्वर्गलोक प्राप्तिकामः श्रीयज्ञ- पुरुपप्रीतये ऽमुकगोत्रायअमुकवेदाध्यायिनेऽमुकशर्मणे ब्राह्मणा यतुभ्यमहं संप्रददे । तत्सन्नमम 0 यज्ञसाधनभूताया विश्व- स्यायविनाशिनी । विश्वरूप घरोदेवाप्रीयतामनयागया। इत्युचार्य सकुशजलतिलंगोपच्छंब्रामणहस्तेदद्यात् । यिनोपठेत्-30द्योत्या ददानुएथिवीत्या मतिगृहात । देवस्यत्वासयितः प्रसवेरिवनोहु. भ्यांपूप्पो हस्ताभ्यां प्रतिगृह्णाति । अस्वस्ति,इमांगांप्रतिगृह्णामि इतिमा कोदात्कस्माऽप्रदात्कामोदारकामायादात। कामोदाता फामाप्रनिगृहीताकामैनत्ताइनिविप्रोपटेन्-ततोगोदानप्रतिष्टास कर्मकाण्डरलाकरे, उभयमुपीगोंदानविधिः । (५७३) । कल्प:-अधेत्यादिदेशकालौसकी.मुकोऽहंकृततद्गोदानप्रतिष्ठा सिध्यर्थइदंसुवर्णमग्निदैवतं(वारजतंचन्द्रदैवत्तम्)ब्राह्मणायतुभ्यमहं संपददे, 30 नमम ।। ततः सव्राह्मणांधेनु कानिचित्पदान्यनुव्रज्य महाभारतोक्तां गोमती जपन् गोब्राह्मणायोः प्रदक्षिणात्रयं कुर्यात् 30 गायोमामुपतिष्ठन्तुहेमशृग्यः पयोमुचः । सुरभ्यः सारभेयश्चसरितः सागरंयथा । गांव: पश्या. म्यहनित्यं गायः पश्यन्तुमांसदा । गावोऽस्माकंवयंतासांयतोगाव स्ततोवयम् । यमोक्तामपिच-गावःपवित्रं परमं गावोमंगलमुत्त- मम् । गावः सर्वस्यलोकस्य गावोधन्याः सवाहनाः । नमोगोभ्यः श्रीमतीभ्यः सौरभेगीभ्यएवच । नमो ब्रह्मसुताभ्यश्च पवित्राभ्यो नमोनमः । ब्राह्मणाश्चैव गावश्चकुलमेकं द्विधाकृतम् । एकत्रमंत्रा स्तिष्ठतिहविरन्यत्रतिष्ठति । वशिष्टोक्तौ च पठेत्-घृतक्षीरादुघा- मावोधुतयोन्योवृतोद्भवा । पुतनयोधृतावा स्तामेस्सन्तुसदा- गृहे । घृतमेहृदयेनित्यंघृतंनाभ्यांप्रतिष्ठितं । घुतमेससर्वतश्चैवगवां मध्येवसाम्यहम् । गावोममाग्रतःसन्तुगावोमेसन्तुपृष्ठताकृष्णव- च्चैव गौलाकेगवांमध्ये वसाम्यहम् । इतिगोमती पठित्वा । ततो माहाणोगोपुच्छोदकेन यजमानमभिषिचेत् 30 द्योः शान्ति तत स्तिलकंकृत्वा आशिपंदद्यात् ॐ सोमोधेनुर्ट० सोमोऽअर्वन्तमाशु ० सोमोवीरं कर्मण्यंददाति सादन्यं विदथ्य है. सभेयंपित श्रवणं योददाशवस्मै ।। तत प्राचार्यादिभ्योपि दक्षिणांदत्वो ब्राह्म पश्चिभोजयेत् । इति गोदान पद्धतिः 050~-~~ अथोभयतोसुखी गोदान विधिः उक्तंच स्मृत्यन्तर-स्वर्णशॉरौप्यखुरा मुक्तालागूलभूषिता । कास्यापोदना शुभ्रांसस्त्रा द्विजपुंगवे । प्रसूयमाना योदद्यादेनु विरणसंयुताम् । यानद्वत्सोयोनिगतो यारद्गर्भन चति । तावद्गी पृथिवी शेया मशनानकनना । देवल अलंकृत्योता विधितामुवी पलान्तिाम् । देयाचद्विालामध्या पलैकादक्षिणा- धमा । वरानु-गुवर्णमालेतदवंचमु यमु चम् । सुवर्णस्यस घेणतदध्दनापिवापुन । तस्याप्यन्द शत- .
(५७४) कर्मकाण्डरवाकर, गोदानपरिभाषा । , वापि पचाशततोदयम् । यथाश्य यापि दातव्याविश व्य विजितेति ॥ उभरतीमुसी स्वर्ण पेण दत्ता, सथ शुश्येत्पातपश्चन | । सुवर्णनि दक्षिणयुगीपारि मापक एव ग्राह्य । अत्यशक्ती विशति माप वा दद्यात् इत्यर्थ ॥ इत्युभयमुखी धेनुदान परिमापा- ॥ अथउभयमुखीधेनुदानपद्धतिः ॥ अथचोभयमुखी धेनुदानकर्ता, प्रसववतींगामवेक्ष्य, स्नात्वादान सामग्री-पूर्वोक्तांप्रकल्प्यवत्समुख योन्यतर्गतेऽपि तांगांपूर्वोक्त. विधानेन सम्पूज्य ब्रामणंच दरिद्रवहुकुटविनं वेदपारगसुशील माययथाविभववस्त्रालंकारादिभिःसुसज्य तत्रसंकल्पः-अचे त्यादि, सकीामुकोहं करिष्यमाणोभयमुग्वी धेनुदानकर्मणि, अमुकगोत्र ममुकवेदाध्यायिन ममुकशर्माणब्राह्मणं प्रतिग्रहार्थत्वां वृणे, वृतोऽस्मीतिव्राह्मणोव्यात-ततोगामपिपूजयेत-30 त्वम- हीमवनिविश्वधनांतुींतयेष्यायक्षरंतीम् । अरंमयोनमसजदर्णः सुतरणाम् । आयंगौटाभिरक्रमीदसदन्मातरंपुरः पितरंचप्रयं न्सः । इतिमन्त्राभ्यांवापूक्ति प्रकारेणसालंकारै सम्पूज्य समपंप्रतीक्षत्-पदावत्समुखोयोनिनिर्गतोभवति, तदाकांस्यपान घृतपूरितं पूर्वोक्तसुवर्णयुतं सकुशतिलाम्बुसहितंपुर्वाभिमुखोमृत्वा (गांचवपूर्वाभिमुखींकृत्वा) दक्षिणहस्ते घृतदिग्धगोपुच्छं च निधाय, संकल्पकुर्यात्-ॐ विष्णुर्विष्णुविष्णुः अधेत्यादि देश- कालो संकीर्त्यामुकोऽहं यथोपस्करयुतामुभयतोमुखी समुद्रशैल- घनोपेतपृथ्वीदानसमफलावाप्तये धेनुवत्सरोमसंख्याकयुगदेवलो कमहिमत्व पितृपितामहप्रपितामहकुलशतनरकोत्तारणपूर्वककृत- क्षीरबहकुल्याकदधिपायसकर्दमदेशाधिकारणकोत्तरकेप्सितकामो ब्रह्मलोकावाप्तिकामः एकोनविंशतिकुलोतारणार्थचेमारुद्रदेवत्यां माममुकगोत्रायामुकवेदाध्यायिने अमुफशर्मणेतुभ्यसम्प्रवदे-नम मेतिसएनतिलपूर्णकांस्पपात्रसुवर्णयुतं गोपुच्छंसकुशजलंतध्दस्ते. , कर्मकाएरत्नाकरे, उभयमुखीगोदानपद्धति । पत्वामार्थयेत्-यज्ञसाधनभूतायाविश्वस्यायविनाशिनी । विरष- रूपधरोदेवःप्रीयतामनयागवा । इमांगृहाणोभयमुखीभवास्त्राता ममाऽस्तुवै । ममवंशयिशुध्देश्चसदास्वस्तिकरोभव | विप्रस्तु- यौस्त्याददातुथिवीत्वाप्रतिगृह्णातु । देवस्यत्वासावतुः प्रस- वेश्विनो हुभ्यांपूष्णोहस्ताभ्याम्-प्रतिगृह्णामि । इतिगोपुच्छपगृह पठेन्- कोदात्कस्माऽअदात्कामोऽदात्कामायादात् । कामो दाताकामः प्रतिगृहीताकामैतत्त ॥ अथचेदानींसुवर्णमुद्रासहस्त्रमा रम्यपश्चविंशति पर्यन्तसुवर्णमुद्रा हस्तेनिधाया प्रतिष्ठासंकल्प कुर्यात-प्रोत्यादि संकीर्णामुकोऽहं कृतस्योभयतोमुखीधेनुदा- नकर्मणः प्रतिष्ठामेता सुवर्णमुद्राः, श्रमकगोत्रायामुकशर्मणे ब्रामणागतुभ्यंसम्प्रददे तत्सन्नमम,ततोविप्रःपटेल-आइरावती धेनुमती हिभूतं सूगवासिनी मनुवेदशस्था॥ व्यस्कनारोदसी विष्णवेतेदार्थ पृथिवीमाभितोमयूखः १११ ० स्योनापृथिवीभ- वाक्षरानिवेशनी, यच्छानाशर्मासप्रथाः ॥ इतिमंत्रद्वगंपठित्वा पुनर्चदेन--30 प्रतिगृहन्त्विमांधेनुं कुटुम्वार्थेविशेषतः। स्वस्ति- भवतुमेनित्यं रुद्रमातर्नमोस्तुते ।। इतिनत्वागृहीतायाधैनोदति णपाणिना योन्योन्मुखवत्ससुखंस्पृष्ट्वा मंत्रपठेत्-30 गर्भेनुस- तन्वेषा मवेदमहं देवानां जनिमानि विश्वाशतमापर । प्रायसीर रक्षन्नद्यश्येनो जवसानीरदेयम् । इति वत्समाकृष्येत् । वत्से- निष्कासिते सति कार्यान्तरमाह -ततोयजमानो हस्तोपादौप्रक्षा- स्था चम्प प्राणानायम्यच । संकल्प:-प्रोत्यादि देशकालो संकीर्त्यामुकोहं कृतस्योभयतो मुखीगोदान कर्मणः सांगता- सिद्धये वेदोक्त मंत्रै स्तपर्ण होमंच करिष्ये ततप्राचार्यः हस्तमितं स्थंडिल चतुरस्र कृत्वा तत्र होमपद्धत्युक्त प्रकारेण वरदनामाग्नि सस्थाप्य प्रतिछाप्यच समिदाधानान्तं कर्मकृत्वा । द्रव्यदेवता भिध्यान पूर्वक द्रव्यत्यागं कुर्यात्-संकल्प:-अद्यत्यादि अमुकोई, करिष्यमाणोभयतोमुग्वी घेनुदान कर्मणि, प्राधाराधन्वाधान देवेभ्य प्राज्पेन तथाच घृतेन पृथिव्यै चतस्र पाहुती गौम्यव्या- .
, हृतिभिश्चतुरसीत्याज्याहुतीः स्विष्टकृद्देवादिभ्यो मयापिरित्यक्तं पवादकतमस्तु नमम तत आधाराद्यन्वाधानान्तं कृत्वा ततःकुशा- स्तुत भूमो, अग्ने पश्चात्साक्षताभिरभिर्वक्ष्यमाण मंत्र देवादी स्तर्पयेत्-तेचमंत्राः-ॐ देवासो दिव्येकादशस्थ पृथिव्यामध्ये कादस्थ । अप्सुक्षितो महिनैकादशस्थतेदेवासो यज्ञमिमं जुषध्वम् । देवांस्तर्पयामि, ॐ उशंतस्त्वा निधी महाशन्तःसमिधीमहि । उन्श- न्नुशतावह पित्ऋन्हविषेऽअत्तवे । पित्तास्तर्पयामि, ॐ इमम्मे गंगेयभुने सरस्वति शुतुद्रीस्तोमं सचतापरुपण्या । असिकन्या मरुद्द्बधेषितस्तया किये शृणु ह्यासुपोमया । सरितस्तर्पयामि । अद्रिभिः सुतोमतिभिश्चनोहितः। प्रचोरयन्रोदसी मातरा शुचिः। रोमाण्यव्यासमया विधावतिमधोर्धारा पिन्वमानो दिवे दिवे । पर्वतांस्तर्पयामि। ॐ बनस्पते शतवल्शो विरोह सहन वल्शा विवयं कहेयम् । यन्त्वामयं स्वधितिस्तेजमानः प्रणिनाय महतेसौभगाय । बनस्पतीस्तर्पयामि। ॐ समुद्रज्थेष्टाः सलिल स्यमध्यात्पुनानायं त्यन्वीयमानः । इन्द्रोयावज्रीवृषभोररावस्ताऽ थापोदेवीरिहमामवन्तु । समुद्रांस्तर्पयामि । ॐ अहिरिव भोगैः पतिवाहुं ज्यायाहेतिं परिवाधमानः । हस्तघ्नो विश्वावयुनानि विद्वान्पुमान्पुमा ॐ संपरिपातु विश्वतः । नागांस्तर्पयामि । ॐ मधुव्वाताऋतायते मधुक्षरन्ति सिन्धवः। माध्वीर्नस्संत्वोपधीस्त- र्पयामि । ततोवक्ष्यमाण मन्त्रैश्चतस्तस्रोज्याहुतिर्जुहुयात्-30ईले द्यावापृथिवी पूर्वचित्तयेग्नि धर्म सुरुच यामन्निष्टये। याभिर्भरे का रमशाय जिन्वधस्ताभि रुपुऊतिभिरश्विनागतम् खाहा-इदं पृथिव्यैनमम । ॐ महीद्यौः पृथिवीच न इमं यज्ञं मिमिक्षताम् । पिपृतान्नो भरीमभिः स्वाहा-इदंपृथिव्यैनमम | 30 ऊर्वीपृथिवी यहुले रे अंतेऽउपवेनमसा यज्ञेऽअस्मिन् । दधातेये सुभगे सुप्रतृर्ती द्यावारक्षतं पृथिवीनो 5 अभ्यात्स्वाहा इदंधिव्य । ॐ गौरीमिरगय सलिला नितत्तत्येक पदी द्विपदी साचप्पदी। श्रष्टापदी नवपदी धभूयुपी सहस्राचरा कमाएटरलापरे उमरमुखीगोदानप्रद्धति । (५७) परव्योमो मन्त्स्वाहा इदं गोयनमम । इति चतस्राज्याहुती द्रुत्वा गायत्रीमंत्रए चतुरशीत्याज्याहुतीः प्रजापतयेजुहुयोन-इंद प्रजापतयेनममेतित्यागः । ततः स्विष्टकृदादिहोमशेष समाप्या चार्यायदक्षिणांदत्वान्येभ्योपिभूयसीदद्यात्ततोगामनुबज्यपूर्वोक्त गोदानपद्धत्युक्तप्रकारेण-गोमती पठेत्-या ॐ नमोगोभ्याश्रीम- तीभ्यः सौरभेईभ्यएवच । नमोब्रह्ममुताभ्यश्च पवित्राभ्योनमो नमः इतिगो मण्यो प्रदक्षिणात्रयविधाय,स्वस्तिवाचनपठित्वा ग्निविसृज्य, अभिपेकतिलकारोपणादिकंकृत्वा आशिपंगृहीत्वा,, पायसादिनाद्वादश ब्राह्मणान्भोजयित्वा, तेभ्योददिणांच दत्वा सुहृद्युतो जीत । इत्युभयमुखी गदानपद्धतिः। अथच प्रसंगादुभयमुखी गोप्रतिग्रह प्रायश्चित्तमाह-उक्तंच दानोद्योतेऽरुणस्मृतौ-कृच्छ्त्रयपायश्चित्तंकुर्यात् । रहस्यप्रायश्चि त्तेष्वशक्तश्चेन् चतुर्विंशति सहस्रं गागनींजपेद्वा । इत्युभयमुग्वी गोदानप्रतिग्रह प्रायश्चित्तम् ।। अथ तिल धेनू दानविधिः मनुरित मह. स्नागिन कुशात्तरे । धेनुतिलमयों कृत्वा सर तरल कृतम् ॥ धे दोन कुति आके नतु व मरम् । स्वर्णगीरौप्यग्युरा नाणवतीतथा । कुर्याचरागनिका गु- स्यामा विश्वलाम् । इक्षुपाद ताम्रष्ठो शुचिमुक्ता फ्लेक्षणाम् । प्ररख पान ध्यण फलदतमयों शुभम् खग्दा- मच्छा कुर्वीत नानीत रतनान्त्रिताम् । मितवस्त्र युन्या पटाभरण भूपिताम् । इयमस्थ न सपनाकृता श्रद्धासमति र कास्यार दोहना दद्यात्देशव, प्रीयतामिति । अया-उत्तमामि धेनु स्यालाभार चतुष्टया । वत्सभारेण कुर्वीत अर्धभारेगा वा भवेत् । चतुर्यारेन वाकुर्याद्गृवित्तानुमारत नि भार- मानमाह--तुलापल शतप्राभार स्यादिशतिस्टले ! भारतो मानापिये पलाधिक्यम् ॥ तिलधेन्वादीनां प्रतिमाविकन्या युक्तं हेमाद्री ब्रह्मवैवत्त दानमाले तु देवच प्रतिमान प्रकीर्तितम् । धेननामपि धेनुत्व श्रुत्युक्त दानयोगत । दातुबेद नाले तु धन्य परिकीर्तिता । विप्ररय व्ययकालेतु द्रव्य तदिति निश्चय । दानगति विप्रेणु द्रव्यमागचनागम् । स विदुपातेन बिय स्मै व्या विभो । कु, भरगा कार्य चाच मत । अन्यमा नाम्यात येवमाह पितामह ।। इति तिल गेनू दान विधि - ३ - 44 च (५७) कर्मकाण्डरत्नाकरे, तिल धेनूदानपद्धतिः । , ॥ अथतिळधेनुदानपद्धतिः॥ अथचयजमानः कृतनित्यक्रियः । पूजास्थलमागत्य गणेशादिदेवा संपूज्य,तत्रैवानुलिप्तेभूमौवस्त्रोपरिवा-एणेयालिनोपरि, कुशा- नास्तीर्य, तत्रवित्तशाट्यविवर्जितभारचतुष्टयादारभ्य द्रोणपरि- मितास्तिलान्विकीर्यधेनोः प्रतिकृति,मिनुपादांगुड़मुखी-शर्करा- जिव्हां ताम्रपृष्ठां स्वर्णशृंगी गंधघाणवती स्रग्दामपुच्छां प्रशस्त पात्र श्रवणांफलदंतमयींनवनीतस्तनी सितयुग्मवस्त्राच्छादितां घण्टाभरणभूषितां, कृत्वा । तदधर्दैनवत्संचैवकल्पयित्वा । प्राच- म्यप्राणानायम्य प्रधानसंकल्पं कुर्यात-अद्येत्यादि सकील- मुकोऽहं सर्वपापक्षया-करिष्यमाणतिलधेनुदानकर्मणि ब्राह्मण घरणपूर्वकं गोपूजनंचकरिष्ये, ततःप्राक्तगोदानपद्धत्यनुसारेण ब्राह्मणंगांचसम्पूज्य, वृत्वाच ॥ पूर्वोक्तगोदानपध्दत्यनुसारेण आवाहनादिकंकृत्वा, ततःपूर्वाभिमुखोभूत्वा घृतपूरितंकांस्य पात्रं ससुवर्ण तिलकुशाम्बुसहितं सग्दामं दक्षिणहस्तेनिधाय- संकल्पः-30 विष्णुः ३ अयेत्या दिदेशकालौ संकीर्त्यामुकोऽहं सर्वपापक्षयपूर्वक समरतपित्ऋणां निरतिशयानंद गोलोकावाप्तये श्रात्मनश्चश्रुतिस्मृति पुराणोक्तफलावाप्तये, इमांसवत्सांतिलधेनु ममुकगोत्रायामुकशर्मणे ब्राह्मणायतुभ्यमहं संप्रददे । ३० तत्सन्न मम, केशवार्पणमस्तु-ततासुवर्णमुद्रांसतिलकुशाम्बुयुतां हस्ते. निधाय-संकल्पः-अद्यतत्तिलघेनुदानप्रतिष्टार्थ मिमांसुवर्ण- मुद्राममुकशर्मणे तुभ्यमहसंमददे, ॐ तत्सन्नममकेशवार्पणमस्तु- ब्राह्मणोपठेन्-30 इरावतीधेनुमतीहिभूतं सूयवसिनीमनवेद. शस्या। व्यस्फभ्नारोदसी विष्णवेतेदाधर्थ पृधिचीमभितोमयूग्वः । अस्थोनाधिविनोभवन्नृतरानिवेशनी। यच्छान शर्मसप्रथाः । इतिपठित्वायदेत-30 प्रतिगृह्णन्त्विमांधनकुटुंयाथै विशेपतः । स्वस्तिभयतुमेनित्यं मद्रमातर्नमोस्तुते । ततःमाधयेत-30 या लदमीः सर्वभूतानां याचदेवेष्यवस्थिता । धेनुरूपेणसादेवी मम- कर्मकाण्डरलाकरे, पादानविधिः (१७) पापंव्यपोहतु ॥ वागोदानोक्तां गोमतीपठित्वा तिलधेनुमार्थना- पठेन्- तिलाश्चपितृदेवत्या निर्मिताश्चेहगोसवे । ब्राह्मणात न्मयीधे दत्तापीणातु: केशवः । ततःकलशजलेन यजमानमभि पिंच्याशिषंदत्वा तताकेशवादिद्वादशनामैदशब्राह्मणान्संपूज्य क्षीरादिभिभॊजयेत् ।। इतितिलधेनुदानपध्दतिः ।। अथ वृषभ दान परिभाषा- उक्तं च भविष्योत्तरे-दशधेनु समोनव्याने कश्चैव धुरंधरः ॥ दशधेनु प्रदानादि एकोविशि- ध्यते ॥ अलंकृत्य घशान्तं पुरायेन्हि समुपस्थिते ॥ रौप्यलागल संयुक्तं ब्राह्मणाय निवेदयेत् । मरणानेन राजेन्द्र तंप्रदद्याद्वामिते । धर्मस्त्वं वपरूपेण जगदानन्द करकः । अष्टम्त रचिटान मतः पाहि सनातनः । सप्तन्न कृतं पापं वाइमन: कय संभवम् ॥ तत्सर्व विलयंयाति पढामन कर्मण ॥ तं धर्मरू, यूपक गारव्या का प्रपूनयेत-- तीक्ष्ण शृंगाय विद्महे धर्मादाय धीमहि सनोप. प्रचोदयात् ॥ इति हप. गायत्रो ॥ पाश्चमुच अस्थाय, दाता पूर्वमुसोभवत् ॥ वकुद स्पर्शत्विा च दद्यात्तं द्विजगवे ।। इति वृप दान परिभापा--- अथरषदानपद्धतिः। '0:- अथ वृषदान कर्ता, प्रातनित्यकर्म समाप्य, शुभेहिया पुण्य काले गणेशं सम्पूज्य, गोमयेनोपलिप्य, तत्पश्चिमे पूर्वाभिमुखे नोपविश्य तत्र पश्चिमाभिमुग्वं बृपमवस्थाप्य, सक्तश्चे द्रौप्य- लांगूल घण्टाचामर जद्रघण्टिका दिभिरलंकृत्य । स्वदक्षिणभारे, उदड्मुग्यं स्वासने ब्राहमणमुपवेश्य, आचम्य प्राणायामं कृत्वा, . गरोशिंध्यात्वा स्वस्तिवाचन पठित्वा । संकल्पं कुर्यात्-ततः कुश तिलयवजलान्यादाय, ॐ श्रयेहेत्यादि देशकालौ सकी मुकोहं जन्म जन्मान्तर कृन कायिक वाचिक मानसिक विविध पापानुपत्तये बृपरोमसम संख्य वर्ष सहस्रावधिगोलोक चासो- त्तर पुनर्जन्मन्यिह लोके वेदोपनिषद्याजकत्व ब्रह्मकुल जन्म (६०) कर्मकाण्डरनाकर, पदानपद्धति प्राप्त्यर्थ (वामुकग्रह पीडाव्यथादि समस्त दुष्टारिष्ठ निवृत्यर्थ ममुकग्रहप्रीतये) श्रीपरमेश्वर प्रीतये वृषभ दानं करिष्ये-तत्प्रति ग्रहार्थ ब्राह्मणस्य पूजन पूर्वकं वरण वृषभस्यपूजनंच करिष्ये-ततो ब्राह्मणं संपूज्य-वरणसामग्री हस्तेनिधाय,-30 अद्यत्यादि संकी ामुकोहं करिष्यमाण वृषदानकर्मण्येभिर्गन्धाक्षत वस्त्रयज्ञों- पवीतादि द्रव्यैरमुक गोत्रप्रवरममुक शर्माणं ब्राह्मणं वृषदान प्रति ग्रहार्थं त्वांणे -वृतोऽस्मीति ब्राह्मणोब्रूयात्-वृषपूजयेत-आवा- हनम्-30 आवाहयाम्यहं देवं धर्मपादं महावृष , सर्व सौख्यप्रदे तस्मै वृषभाय नमोनमः ततः-30 तीक्ष्णशृङ्गायविद्महे धर्मपादाय धीमहि । तन्नोवृपः प्रचोदयात्-इतिवृषगायत्र्या पाद्यगन्धवस्त्र घण्टा किंकिणीजालादिभिः संभूष्य धूपदीपनैवैद्यादिभिः संपूज्य च, दान संकल्पं कुर्यात्-यव कुशजलतिलान्यादाय-30 अद्य. त्यादि देशकालौसंकीामुकोहं जन्मजन्मांतरकृत कायिकवाचिक मानसिक विविध-ज्ञाता ज्ञात सकलपापानुपत्तये वृषरोमसंख्यक वर्षसहस्त्रावधि गोलोकवासोत्तरान्य जन्मन्यिलोके वेदोपनिषद् पारङ्गत ब्रह्मकुल जन्मप्राप्त्यर्थ, (वामुकग्रहपीडाव्यथादि समस्त दुष्टारिष्ठ निर्धत्यर्थममुकग्रह प्रीतये) श्रीपरमेश्वर प्रीतयेच यथा शक्त्यलंकृतं रुद्र देवतमिमं वृपं, अमुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यं संप्रददे नमम-ततो वृपककुदं हस्तेनस्पयित्वा ब्रह्मणायदयात- 30 धर्भस्त्वपरूपेण पठेन्--30 कोदात्कस्मा० । ततोहस्ते सुवर्ण कृत्वा प्रतिष्ठासंकल्पा-अद्येत्यादि वृपदानप्रतिष्टार्थ मिदंसुवर्ण शर्मणे तुभ्यमहं संप्रददे । ततोभूयसीदत्या शीहीत्वा ब्राहमण भोजनं दद्यात् इति वृषदानं पद्धतिः। . अध महिपी दानविधिः- उतच माद्री -महिपो दान माशरम्य कायाति युधिरिः । पुरा पश्चिमायुष्य मा यामप्रद ता। पन्द्रोपगगे च फासियामरनेगुव । शुध पक्ष पदश्यांसंकाती च विगतः । सबरिष्ट विना- ।
फकारतरत्नाकर महिपीदानपद्धतिः । (१) शाय चित्तीद्वेग प्रशान्तये । दुःस्वप्नदर्शने चव शनिपोडा निवारणे । प्रस्तां प्रथमावर राबंदोष विति ताम् । सालंकृता स्वर्णशंगा सुहमतिलवालकाम् । ताम्रदोहारीप्यारा सप्तधान्योपरि स्थिताम् ॥ रनामाल्या रक्तवस्त्रां टिकाभिः सुशोगिताम् । एत्माच महिपा प्रामुखी स्थापयत्ततः । दयाद्विाय शान्यर्थ दरिद्राय कुटुम्बिने दद्यात्प्रदक्षिणात्य बाहाणं तां पयस्विनीम् । प्रलिमह स्मृतस्तस्यादेशे खयभुवा ॥ इति महिपी दानविधिः ॥ अथमहिपीदानपद्धतिः॥ . अथ च महिपीदान कर्ता-परिभापोक्त दिने, मृद्गोमयोप लिप्तायांभूमौ, पूर्वोक्तांसामग्रीसुवर्णशृङ्ग, सुवर्णतिलक, ताम्रदोह रौप्यखुर, सप्तधान्य, रक्तवस्त्र, घण्टा, नद्रघण्टिका, इतिधृत्वा, यथोक्त लक्षणं ब्राह्मण मुदङ्मुखं कुशाशनोपरि कृष्णकर्षासनेस्व दक्षिणत उपवेश्य, हस्तौपादौप्रक्षाल्य, स्वासने उपवेश्या चम्य प्राणायाम विधाय हस्ताक्षत पुष्पः सुमुखश्चेति गणेशं ध्यात्वा- समयं प्रतीक्षन्-ततः शंकल्पं कुर्यात्-30 अद्येत्यादि देशकालौ सकामुकोई, ममसर्वाऋष्ट निवृत्तिपूर्वक मायुरारोग्यै श्वर्या- भि वृद्धयेवा अमुकराशिस्थ शनिग्रहस्थितेन तत्कृतामुकरिष्ठ प्रशा- न्तयेच यथाशक्त्यलंकृतांमहिषी ब्राह्मणाय दास्ये, तत्पूर्वांगत्वेन ब्राह्मणास्य पूजनपूर्वकं वरणं महिषी पूजनंच करिष्ये । नमो स्त्वनन्तायेति ब्राह्मणं पाद्यगन्धादिभिः संपूज्य । कृष्णवस्त्र धौतोत्तरीय परिधानवस्र रजतसुद्रादियुतं करेकृत्वा । अद्येत्यादि संकीर्यामुकोई ममामुक जन्मराशिसकासादमकस्थ शनिग्रहपीडा निवारणार्थं महिपीदानकर्मणि, एभिर्गन्धाक्षतरक्त पुष्पमाला घस्त्रताम्बूलादिभिर्महिपी दानप्रतिग्रहार्थममुकगोत्रममुकवेदाध्या पिनममकशर्माणं ब्राह्मणं त्वांवृणे-वृतोऽस्मीति ब्राह्मणो ब्रूयात् । ततोमहिपीमानीय सप्तधान्योपरिकृत्वा-पूजयेन्-अयमस्वरूपा (५२) कर्मकायरताकरे, महिषीदानपद्धति । यै महिप्यैनमः, इति नम स्कृत्य प्रार्थयेत्--ॐ महिपी ब्रह्मपुत्री च लक्ष्मीरूपेण संस्थिता । प्रार्थितासिमयादेवि यममार्ग निवारय, इति संमार्थ्य--30 महिषी यमरूपात्वं विश्वामित्र विनिर्मिते । पूजिता हरमे पापं सर्वदान फलप्रदे । इति मंत्रमुक्त्वा-30 यम- स्वरूपायै महिप्यै नमः । इति मंत्राभ्यां, अवाहनं, आसन, पाद्य, अयं प्राचमनं, स्नान, रक्तवस्त्राच्छादनं गन्धाक्षतपुष्प रक्त- माल्यानि सुवर्णतिलकं च समर्पसुवर्णशृड्गी रौप्यखुरां कृत्वा ताम्रदोहनं च वामभागे संस्थाप्य । घण्टांगलेवध्या क्षुद्रघण्टिका मालांच सुसज्य धूप दीप नैवैद्यादिभिः सम्पूज्य हस्ते तिल कुश जलंनिधाय-ॐ अद्येत्यादि देशकालौ संकीर्खामुकनक्षत्रोप लक्षितोमुकराशि, रमकोऽहं श्रुतिस्मृति पुराणोक्तफलाप्तये, तथाय शनेश्वरजनित समस्तव्याधि शान्त्यर्थ, इदानीममुकपर्वणि, इमां सु पूजितां यथाशक्यलंकृतां महिषींचमदैवतां, अमुरुगोत्रायअमुक- वेदाध्यायिनेसुपूजितायअमुकशमणे ब्राह्मणाय तुभ्यंसंमददे । नममेति तिलकुशजलेन दक्षिणहस्तेन महितीपृष्ठंस्पृशन्-30 इन्द्रादिलोकपालानां याराजमहिषीशुभा । महिषीदानमाहात्म्या- त्सास्तुमेसर्वकामदा । धर्मराजस्यसाहाय्येयस्याः पुत्रःप्रतिष्ठितः। महिपासुरस्यजननी यासास्तुवरदामम । इतिमन्त्राभ्यां ब्राह्मण हस्तेदद्यात् । विप्रोऽपिमरिपीटष्टस्पृष्ट्वा । 3. देवस्यत्वा । पठित्वा स्वस्तीतिप्रतिगृह्य । ॐ कोदात्कस्मा० इतिपठित्वा ततोयजमानः सविप्रांमहिपी प्रदक्षिणीकृत्य, स्वासनेउपविश्य प्रतिष्टासंकल्पं कुर्यात् अन्येत्यादिस्मृत्वामुकोहं महिपीदानप्रति टार्थमिदं सुवर्णतुभ्यंसंप्रददे नमम । ततोभूयसीविभज्याचार्याय दक्षिणांदत्वा स्वयंसचैलहरिद्रादि चूर्णेनस्नात्वा अन्यद्वाससी- परिधाय ब्राह्मणान्भोजयित्या स्ययं जीत । इतिमरिपीदानपध्दतिः। -..- कर्मकारतरत्नाकरे, मश्वदानपतिः । (५८३ ) - अथ अश्वदान विधिः ताच महाभारत-सर्या किरणांपेतं युगान्दीप वर्जितम् । योऽयं ददातिविप्राय स्वर्गलोके महीयते । अवमेध भरपंयस्तु पत्लौ न पाते । असदारन्तु तेनेह क-गं विधिपूर्वपम् । स पयाले रौप्य, सुवर्ण लंकृतं ममात्र । सदक्षिण सत्रं च दद्यातमग्निहोरिणे । चन्दसूपिगगे च, मन्वादिषु युगादिषु । अयनान्पुि गुगयेषु पलेपश्व प्रदायेन ॥ इति अश्व दानविधिः श्रधाश्वदान पद्धतिः। Waan अधच सुलिप्तायांभूमौ पूजासामग्रीसंपाद्य, यथा शक्तिसु- वर्णपट्ट हयकल किकिणीजालावृतकं सवन्त्राच्छादितारुढासनष्ट- छमश्वंसुसज्य, ब्राह्मणमाहृयोत्तरमुग्वमुपवेश्य स्वयंयजमानः पूर्वाभिमुम्बः स्वाशनेउपविश्य, हस्तौपादौ प्रक्षाल्य प्राणायाम विधाय, सुमुखश्चेतिगणेश संप्रार्थ, संकल्पंकुर्यात्-श्रोत्यादि देशकालौ संकीामुकोहं चातुर्वर्गार्थ कामपूर्वकारवरोमसमसं- ख्यकदिव्याव्दान्सूर्यलोक निवासार्थमश्वदानंकरिष्ये । तदंगतया ब्राह्मणपूजनपूर्वकंवरणं । अश्वपूजनं च करिष्ये । ततो नाम पाद्यगंधादिभिः संपूज्य धरणसामग्री हस्तयोनिधाय, 30 अधे त्याद्यमुकोऽह मेभिगंधाक्षत सद्रव्य धौतोत्तरीय वासोभिरमुक गोत्रं शर्माणंब्राह्मणमश्वदान प्रतिग्रहार्थं त्वांवृणे | 3 वृतोऽस्मी- तिब्राह्मणोक्तिः । ततः धान्योपर्यश्चमुत्थित्वा । . विभ्राबृह- त्पिवतु सौम्यमित्यादि सूर्यसूक्तेन, वा ॐ महार्णवेसमुत्पन्नउच्चै स्वसपुत्रक । मयात्वं पूजितोवाजिन्शान्तिदोभवसर्वदा । अनेन- मंत्रेण सुवर्णतिलकाकृतललाटं, ग्रैवैयकसुपर्याणान्वित, रौप्यर- नकटकशोभित हीरकनेत्रं, ताम्रखुरं, क्षौमपुच्छं, सुवासस, शुभ्र- संवृतं, स्वायुधान्वितं, धान्यरत्नोपरिसुसज्जितमुत्थितमश्वं पाया- दिनीराजनान्तं सम्पूज्य, संकल्प:-~अन्येत्यादि देशकालौसंकीर्य अमुकोऽहं चातुर्वर्गार्थ कामपूर्वकाश्वरोम संख्यकदिव्याद्वान्सूर्य- लोक निवासकामः स्वर्गकामोवा, यमदैवतं सर्वालंकारयुतं श्रश्व (५८४) कर्मकाण्डरक्षाकरे, भूमिदानपद्धतिः । - , , सुपूजिताय ब्राह्मणाय, अमुकगोत्रप्रवराय, अमुकशमणे, तुभ्यमहं संप्रददे, ॐ तत्सन्नमम, इतिसकुशतिलोदकं अश्वस्यग्रहीतदक्षि- कर्ण, ब्राह्मणहस्ते, ॐ उच्चैः श्रवास्त्वमश्वानां राज्ञां विजय कारकः । सूर्यवाहनमस्तुभ्यमतः शान्ति प्रयच्छमे, इतिपठित्वा दद्यात् , ब्राह्मणश्चकर्णगृहीत्वा देवस्यत्वासवितुः प्रसवेश्विनो हुभ्यां पूष्णोहस्ताभ्याम् । इति पठित्वा, 30 स्वस्तियजमान स्यकामाः सत्याः सन्तु, ततः ॐ कोदादितिकोमस्तुतिं च पठेत् । ततोयजमानः सव्राह्मणमश्वं प्रदक्षिणीकृत्य अश्वसप्तसप्तति पदानियावत् अश्वाग्रतो गत्वामनसि, सूर्यनारायणध्यायन,दर्श- यित्वाच परावृत्य,स्वासनेउपविश्य दान प्रतिष्ठांकुर्यात्-अद्यत्यादि संकीर्त्यामुकोह अश्वदानकर्मणि दानप्रतिष्ठासिध्यर्थमिदं सुवर्ण रजतंवा, अमुकशमणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे, तत्ससन्नम ततो ब्राहमणान्भोजयित्वा । स्वयमपि जीत, । इत्यश्वदानम् । भूमि दान परिभाषा- उक्तं च महाभारते-प्रादेशमात्र भूमितु योदद्यादनुपरकृताम् । न ससीदति कृष्ण नव दुर्ग- ग पारनुते । मुदितो राजते प्राज्ञः शफेण सहनन्दति । यान्ति लागलमुखेन रमास भूमामारते दुस्ति शरोमकारिण । तान्ति शंकरपुरे सागानि तिछे । भनिनदान मियः कुरुते मनुष्य । वृध्दवसिष्ठ:---- यत्किचिस्ते पाएं जन्म प्रभृतिमानव: । अपिगोचर्म मात्रेण भूमिदानेन शुध्यति । स्वदत्ता परदत्तांच योहरेच वसुधगम् । -पष्ठिपि सहस्त्राणि विष्टाया जायते कृमिः ॥ इति अथ भूमिदान पध्दतिः , अथ च भूमिदानकर्ता देयभूमेत्पिड, ताम्रपत्रेधृत्वा गृहे वा तीर्थादिभ्यः स्यासने उपविश्याचम्प, दीपंप्रज्वाल्य, अर्घस्था- पनादि कर्मकृत्वा, तिलकुशजलं इस्तेनिधाय, प्रतिज्ञा संकल्प- कुर्यात्-अवेत्यादि संकीर्ण अमुकोई करिष्यमाण भूमिदानक- मंणि गणेशादिपूजनपूर्वकम् नधा च भूमिदान प्रतिग्रहार्थ ब्राह्म- पस्य पूजनपूर्वकं चरणंकरिये, ततो गणेशं सम्पूज्य पृषला.
व.मागरत्नाकर, भूमिदानपतिः । म्वर धरमिति विष्णुंच स्मृत्वा, नमोस्त्वनंतायेति मंत्रेण ब्राह्मण पाद्यगन्धादिभिः संम्पूज्य चरणद्रव्यंच हस्तेकृत्वा-श्रोत्यादि अमुकोऽहं एभिर्गन्धाक्षतधौतवस्त्रादिभिः करिप्यमाण भूमिदोन प्रतिग्रहार्थ अमुकगोत्रममुकशर्माण त्वामहंवृणे इतिदत्या वृतोस्मी तिप्रत्युक्तिः । ततो भूमिपूजयेत् । ध्यानन् शुक्लवर्णमहीकार्या दिव्याभरणभूपिता। चतुर्भुजासौम्य वपुश्चन्द्रांशु सदृशाम्बरा । दिनांगानांचतुर्णातुकार्यापृष्टगतामही सौंपधियुतादेवीशुक्ल- वर्णाततः स्मृताः। 30 भूरसिभूमिरस्थदितिरसि विश्वधाया विश्वस्थ भुवनस्यधीं । पृथिवीं यच्छ पृथिवीं ई० ह पृथि- चौमाहि र्ट० सीः । इति ध्यात्वा ॐ मृम्यैनमः इति मंत्रेणतामू पात्रस्थ भूमिपिंड, (वामूभिमूल्यं सुवर्णादिद्रव्यम् ) सम्पूज्य दान संकल्पं कुर्यात् अयेत्यादि देशकालो संकीर्य श्रमकोऽहं पष्ठिसहस्रवर्पमित गोलोकवासकामो वा सकलपाप दूरीकरणर्थ श्रीपरमेश्वर प्रीतये इमाभूमिविष्णुदैवतकाम,अमुकगोत्राय, अमु. कवेदाध्यायिने अमुकशर्मणे ब्राह्मणायतुभ्घसंप्रददे, तत्सन्नमम ब्राह्मण हस्तेदत्वा, ॐ देवस्यत्वा सवितुः प्रसवेश्विनो/हुभ्यां पूष्णोद्दस्ताभ्यामू । 30 कोदात् इतिकामस्तुतिं च पठित्वा, . विष्णवे भुवं प्रतिगृहामि 1 30 स्वस्तीतिवदेत् दानप्रतिष्ठां कुर्यात् अद्यहेत्यादि अमुकोऽहं कृतस्यभूमिदानकमणः प्रतिष्टार्थ इदं सुध. मग्नि दैवतं अमुकशर्मणे ब्राह्मणाय संप्रददे। ततो ब्राहमणो यजमान मभिपिंच्याशीर्वादं दद्यात् । इति भूमिदान पद्धतिः श्रय गृधर्मशालादानपरिभाष-उक्तञ्चमार्कंडेयपुराणे-कुर्गा प्रतिधयगृह पथिकाना हितावहम् । निनगेहेदेशं वा सानो यो नियोजयेत् । अक्षयपुग्यमुद्दिष्ट तस्य स्वारगम् । सर्वकामममृद्धोऽसौ देववहि विमोदते, (प्रनिश्रयो धर्मशाला )-भविष्यपुराणे--प्रश्रिये सुविस्ताणे धारिते सम्लेयने । दीनानाथ जनार्थाय वर्तिन कृतं भरे । मदनररने भविष्ये--एवं संभृत- संभार म्हंकृत्वा द्वजोत्तमान् । पुलशीलसमायुक्तागृहमस्यामि गयेन् । निराश तथा राजस्भ्योत्त (५) कर्मकाण्डरत्नाकरे, गृहदानपद्धतिः । नहाफळम् । ब्रह्मवैवर्तपुराणे-गृहाङ्गणे कारयित्वा कुंडमे सम्खलम् । ग्रहयज्ञ प्रार्तव्यस्तुष्टि- पुष्टिवर सदा ॥ रक्षोघ्नानि च सूतानि पटेयुनाहगरतत । वास्तो पूजापरतव्या दिशालाना वलि क्षिपेत् । ततः पुण्याह घोपण छाह्मणांस्तेषु वैश्मसु । प्रदेश वा स्ववास्तुसमाय नुपप्रवेशयेत् । यज. मानस्ततस्नात शुलाम्बरधरः शुचि । रहस्य विहित पूर्व ततरमै प्रतिपादयत - मत्स्यपुराणे- य एव समान वेष्ठ पिनिवेदयेत् । फरामोडि शतं याबदालीने महीयते । शेप प्रयोगेम्पछन । ॥ अथगृहदान (धर्मशाळा) दानपद्धतिः ॥ अधचदातापूर्वोक गृहनिर्माणविधिनायधाशक्तिगृह(धर्मशालांवा) निर्मितंकृत्वा । पूर्वोक्तगृहवास्तुस्थापनविधानेन, ग्रयागपुरः सरं वास्तुस्थापनान्तं कर्मकृत्यो ॥ तत्रसंकल्पेविशेषोऽयम्-ततोयज- मानः तत्रमंडपेप्रविश्य, शुभासने उपविश्याचभ्य दीपप्रज्वलय्य शान्तिपाठंकृत्वा, प्रतिज्ञासंकल्पं कुर्यात्-अद्यत्यादिदेशकालो संकीर्त्याऽमुकोहं गृहदानकर्मणो निर्विघ्नतासिध्यर्थ गणेशादि नवग्रहान्तपंचाग देवतानां पूजनपूर्वक तत्पूर्वागतया, प्राचार्या- दीनांचरण ग्रहपूजन, ग्रयागहोम शिलान्यासपूर्वक वास्तुपूजनं स्थापनंचकरिष्ये, श्रवसकृत्यं पूर्वोक्तपध्दतिभिःकुर्यात्-होमा- न्तेयजमानो होमसांगतासिध्यर्थं सर्वेषांदेवानां प्रीतये, ऋत्वि- ग्भ्यः सुवर्णरजतान्यतरदक्षिणां प्राचार्यायगांचदद्यात्-ततः थाचार्यादयः सपिवारंयजमानमभिषेकमंत्रैर्ग्रहरेदीशानस्थकलश- जलैदूर्वापल्लवैमंगलघोपपुरस्सरमभिषिचेयुः । तदनंतरंयजमानः उद्वत्तनपूर्वकस्नात्या, स्नानवस्त्रत्यक्त्वा, शुक्लवस्त्रपरिधाप गीत- मंगलवाद्यादिभिगृहं, गृहप्रतिष्ठोक्तः पूर्वोक्तः रक्षोघ्नपावमान, मंत्रैः त्रिसून्याप्रदक्षिणक्रमेणावेष्टय, तैरेवसदुग्धजलधारांगृहस्पो परितः पातयित्वा, गृहमध्येगत्वा, तत्रगृहस्यदक्षिणाभागे, अष्ट दलकमलं लिग्वित्वा तदुपरिप्रस्थमात्रांस्तिलान्ताम्नपात्रेधृत्वा, तत्रो परिउपधानादिसर्वोपकरण सहितांशय्यां पूर्वापरायतां स्थापयि- स्वा, तत्रान्युत्तारणकृतां सौवर्णीलक्ष्मीनारायणमतिमांसंस्था कर्मकायरत्नाकरे, गृहदानपद्धतिः । (५७) , , प्य, सम्पूज्यच, सुवस्त्रभूपणभूपितं सपत्नीकंब्राह्मण गृहदान प्रतिग्रहार्थवृत्वा, तध्दस्तंकरेणगृहित्वा, सुलग्नेमङ्गलवाचादिभिः सह, 30 एहहिनारायणदिव्यरूप, सर्वामरैर्वन्दितपादपम । शुभाशुभानन्दशुचामधीश, लक्ष्म्यायुतस्त्वं हि गृहंगृहाण ॥२॥ नमःकौस्तुभनाथायहिरण्यकवचायच, क्षीरोदार्णवसुप्तायजग- ध्दात्रेनमोनमः॥ नमोहिरण्यगर्भाय,विश्वगर्भायवनमः । चरा चरस्यजगतोगृहभूतविदेनमः॥शा भूलॊकपमुखालोकास्तवदेहेव्यः यस्थिताः । नन्दन्तियावत्कल्पान्तं तथाऽस्मिन्भवनेगृही ॥४॥ त्वत्प्रसादेनदेवेशपुत्रपौत्रैर्युतीगृहे । पंचयज्ञक्रियायुक्तोक्सेदाचन्द्र तारकम् ॥शा इतिसपत्नीकं ब्राह्मणंग्रहाभ्यंतरे शय्योपरिउदङ्मु- ग्यमुपवेश्य, स्वयंभूमौ आसनोपरिमाड्मुखउपविश्य, प्राचम्य- कुशतिलयवजलान्यादाय, देशकालौसकीय अमुकराशिरमुकोऽहं मम आत्मनः सकलपापक्षयपूर्वकं, कल्पकोटिशताचधिककाल श्रीलक्ष्मीनारायण चरणारविन्दसमीप निवासकामः! इदंसदा- रुज शिलानिर्मितंयथाशक्ति संपादितकांस्यपात्रादिभाजन, सर्व धान्यादि, लवण,शर्करा, घृतादिपरियुतं, समश्चतृलिकावितानादि सर्वांपकरणसहितम् । अश्वरथदासदासीयुतं, सदीपप्रभाभिरुद्यो सर्वदेवतंगृहं, अमुकगोत्राय अमुकवेदाध्यापिने, अमुकर्मणे ब्राह्मणाय, तुभ्यंसम्प्रददे, 30 तत्सन्नमम । इतिव्राह्मणहस्ते सकु- शजलदत्वा । शैलजपरमंदिव्यं सर्वधान्ययुतंत्विदम् । सा- पस्करसंयुक्तंगृहंगृहद्विजोत्तम । ततोब्राह्मणः, 30 देवस्पत्वा० इतिपठित्वा, 30 प्रतिगृहामीत्युक्त्वा, कोदोत्कस्माऽअदात. इतिकामस्तुतिपठेत् । ततोगृहदानप्रतिष्टांकुर्यात्-अद्यत्यादिदेश कालो संकीामुकोऽहं कृततद्गृहदान प्रतिष्टासिध्दर्थमिदंसुष- णम् । अग्निदेवतंदक्षिणां, अमुकशर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यसम्पददे, (गृहदानप्रतिष्ठानियमंतु-सहस्रसुवर्णमुद्रामारभ्यैक सुवर्णावरा- मिति-भारते) ततस्तस्मैपादुकोपानह छत्रचामरादिकंदत्वा, प्रार्थयेत्-संपन्नवाप्यसंपन्नं गृहोपस्करभूपितम् । सर्वसम्पूर्ण- , (५८८) कर्मकाण्डरक्षाकरे, शय्यादानपद्धति तामेतु, त्वत्प्रसादाद्विजोत्तम । ततोभूयसीदक्षिणदित्वा पूर्वपूजि- तदेवान विसृज्यघृतछायांकृत्वा आशीर्वादंगृहीत्वा ब्राह्मणांश्च भोजयेत् । इतिगृहदानपध्दतिः॥ अथ शय्यादान विधिः। उक्तंच हेमद्रौ भविष्य-शय्यादान प्रविक्षामि तवपाडुकुलोद्वह । यदित्या शिव- मागीस्याम्हिलोके परम्रच । हसतूली प्रतिच्छा शुभाण्डोपधानिकाम् । प्रच्छादनपटीयुकां, धूपगन्धादिवासिताम् । तस्यासंस्थापयेध्दमं । हरिल म्या समनित्यम् उच्छीर्षके घृतभृतकलश- परिकल्पयेत् । विरेय पांडव श्रेष्ट सनिद्राग्लशोजुधै. । चतुषोणेषु संस्थाप्या, यथाशक्तियुधिष्ठिर । घृतकुमगोधूम पूर्णपाजलस्यच ' दीपीकोपानहन्छन, चामरासनभाजनम् । पायपुस्थापयेद्- भत्तया राप्तवान्यानिचाहि । शयनस्थस्यभवति यदन्यदुपकारकम् । शम्मामेवंविधाक वा ब्राह्मणा योपपादयेत् । सपत्नीकाय पूज्य परायेन्हिविधि पूर्वकम् । एवंशय्याप्रदानेतु । विधिरेष. प्रकीर्तितः स्वर्गेपुरंदरगृहसूर्यपुत्रालय तथा । सुसंवसत्यमोजन्तु शय्यादानप्रभावत : । पीडयन्तिनतयाम्या: पुनयाभीपणानना. कल्प विकल्परहितः स्वयस्वरािजते ॥ इति शम्यादन विधि ॥ - - अथ शय्यादान पद्धतिः। :0:---- अथव शय्यादानकर्ता, पुण्यकाले लिप्तायांभूमौ स्वासने प्रामुग्व उपविश्य दीपंप्रज्वाल्य, चिम्य, हंसतल्यादि समा- युक्तां शय्यांपूर्वापरायतामारतीय शिरः प्रदेशे घृनपूर्ण ताम्रकलश निद्रारव्यं तथा चतुष्कोणेपु, घृतकुम्भं । १। कुम्कुममिश्रित जलकुम्भं । गोधूमपूर्ण जलपूर्णच कुम्भं संस्थाप्य । पादपदेशे चतुर्वतियुतं ज्वलन्नं दीपं संस्थाप्य । शय्याधाप्रदेशे कपरादि वासितं जलपूर्णकलशं, संस्थाप्य, अन्यानि चोपस्करणानि धान्यानि भांडानिच पाययोः संस्थाप्य, शय्योपरि अग्न्युत्तारण मृतां लक्ष्मीनारायणसुवर्णप्रतिमां तानपात्र पूरिततिलोपरि कमेकाएपरत्नाकर शरणादानपतिः । (५) संस्थाप्य, नोमणमुक्ङ्मुग्व मुपश्य, गणेशनमकृत्य, अर्घ संस्था- प्प विशानुत्सार्यच वात्मण वरणं कुर्यात, ब्राह्मणं चरणद्रव्यंच सम्पूज्य संकल्पं कुर्यात्-श्रोत्यादि सकीय, अमुकोहं करिष्य माए शय्यादान कर्मणि, पभिवरणद्रव्येण, अमुकगोत्रममुकशर्मा- एं शय्यादानप्रतिग्रहार्थ त्यांणे, इति ब्रामण वृत्वा, शय्योपरि लक्ष्मीनारायण प्रतिमा पूजनं कुर्यात् । ततः एतन्ते तिप्रतिष्ठाप्य सहस्रशीत्यादि, पुरुपसूक्तेन पंचोपचारादिभिः प्रतिमा संपूज्य, पुप्पाक्षत हस्तः-30 नमः, प्रमाण्यदेव्यै । इति मंत्रेण, चतुर्दिशं शय्यां प्रदक्षिणी कुर्वन् शय्योपथक्षत पुष्पाणिक्षिप्त्वा, शय्यादान संकल्पं कुर्यात अग्रेत्यादि, देशकालौ संकीय, अमुकोदं सकल पाप क्षय पूर्वक धर्मार्थ काममोक्षप्राप्तये सर्वसुग्वाप्तिपूर्वक, अप्सरोगण सेव्यमान विमानारोहण पूर्वकभूत संप्लव कालावधि स्वर्गलोक घास कामः। श्रीपरमेश्वर मीत्यर्थ मिमां दाममयी हंसतृली, गण्डोपधान, प्रछादनादि वग्त्र पादुकोपानच्छन्न चाम- रासन सुवर्णरजतभूपणनानाभयभोज्यादि वाहनायुध परिवृतां लक्षमीनारायणसुवर्णप्रतिमायुतां शय्यां प्रजापतिदैवतां अमुक गोत्रप्रवरायामुकबामणाय तुभ्यंसंप्रददे । इति शय्यांस्पृष्ट्या सकुशजलं ब्रामण हस्तेदद्यात-30 नमम इत्युक्त्वा प्रार्थयेत- यथानकृष्णशयनं शून्यसागर जातया। शय्याममाप्य शून्यास्तु । तथा जन्मनि जन्मनि । यस्मादशून्यं शयन केशवस्य शिवस्यच । शय्याममाप्य शून्यस्तु तथा जन्मनि जन्मनि । ब्राह्मणश्च-30 स्वति प्रजापति देवतायै प्रतिगृहामि इत्युक्त्या गृहीयात् । ३० कोदादितिच पठेत् ।। लतो यजमानः स्ववित्तानुसारं कर्षमात्रंवा सुवर्णी हस्तेनिधाय यद्येत्यादि अमुकोहं कृततत् शय्यादान प्रतिष्टार्थ मिदंसुवर्णी विष्णुदैवत ममुकशर्मणे तुभ्यं संप्रददे । भूयसी दक्षिणांदत्वा ब्राह्मणान्भोजयेत् । इति शय्यादान पद्धतिः ।
(५६०) कर्मकाएंडरताकरे, तुलादानपरिमापा: । ऋथ तुलादान परिभाषांवक्ष्ये । युद्धिष्टरउवाच-भगवन्ड्रोतु मिच्छामि तुलापुरुप संज्ञकम् । कोहीमः कस्यपूजा च सकल्पः कोयथाविधिः ॥ श्रीकृष्णउवाच-ग्रस्तसूर्य तथाचन्द्र देवयाना सरितटे लतहोंमें विशे. शणाात्मानं तोलयेद्बुधः ॥ भूमिकम्पे तथोल्कायर्या निघतोत्पातदर्शने | तथा दुर्ग्रह पोडा यामात्मानं तोलयेत्तथा । मंडपं च यशाशपया उत्तमम्मध्यमंतथा। कुर्यात्पूर्वोक्त विधिना द्वाराणि तप्रकल्पयेत् । तन्मध्ये स्थापयद्विद्वानस्तं भंदारमयं शुभम् । पलाशसदिरा श्वत्थ देवदारु शमी- मयम् । पद्मनस्यवा कुाचतुर्हस्त प्रमाणकम् | मानहीनाधिक कृत्वा कृतमप्य कृतभवेत् ॥ तस्मात्सर्व प्रयत्नेन सप्रमाणं च कारयेत् । रविसंकम कालेपि खांतनुं परितोलयेत् । पीतवस्त्रेण संबाद्य चंदनेनानुलेपयेत् । तत्रादौतुगणेशं च मातृका मंडलं तथा ॥ पूजयेद्गन्धपुष्पैश्च धूपै- पैस्तथोत्तमैः ॥ विष्णुधर्मोत्तरे--तुलादानं प्रवक्ष्यामि सर्वपापप्रणाशनम् । यद्ीयां चरितं पूर्वलक्षमा नारायणेन च ॥ पुण्यं दिन मथासाद्य तृतीयाया विशेषतः । गोमयनानु लिप्ताया भूमौ कुर्याध्दटं शुभम् ॥ दाजशुभवृक्षस्य चतुर्हस्तप्रमाणतः । सुवर्णं तत्रपनीत्खशच्या घटित घंटे ॥ सौवर्ण स्थापयेतत्र वासुदेवं चतुर्भुजम् । शिक्य द्वयन्तुवनीयात्स्थापय पिटके ततः । तत्रारुहेत्सवस्त्रास्त्र. सालंकार भूपितः । अभीष्टदेिवतांगृह्य स्नापयित्वा घृतादिभिः ।, तुल पुरष दानस्य विधिरेषप्रकीर्तित. ॥ रोगपरत्वेन तम्ना शार्थं द्रव्य विशेपेण तुलादानान्युक्तानि- गारडे-तुला पुरष दानंतु गणु मृत्युजयोद्भवम् । अथलाई प्रदातव्यं सर्वरोगोपशान्तये ॥ कास्यचयक्षमा देयं त्रपुचाशी विकारके । अपस्मारंच सीसंख्यात्तानं कुष्टेसुदाहणे । पैत्तलंरक्क पित्तेच रूप्यं प्रदर मेहयोः। सौवर्णसर्वरोगेषु प्रदद्यान्मृत्यु नोदनम् ॥ फलोद्भवं तथा दद्याद् प्रहरायो दीर्घ दारुणे । गुडंभस्मक रोगेतु पौगन्नु गण्डमालके । जागलं चाग्निमांद्यनु रोमोत्पाते तुपौष्पकम् । मधूभवं तथा देयं कासश्वास जलोदरे । घृतोद्भवं तयादेयं छदिरोगोप शान्तये । सोरं पित्तविनाशाय दाधिक भगदारुणे। लावणं वेपनाशाय पैष्टं दुविनाशने ॥ अनंच सर्व रोगस्य नाशनं स्मृतमेवच । आर्ते यदास्यात्पात्रंबा प्राप्नुयात्पुण्यदेशतः । नित्यं मृत्युंजय प्राप्त विधिना यत्प्रदीयते । तदेव सर्वशाल्यर्थं भवताह न संशयः ॥ तुलादानेकुण्ड मंडपादि- तच सुवर्ण तुलायामेवा पश्यक मिति हेमायादयः, रत्नरजतादि मुलायान्तु कृताकृतमित्युक्त संभव । होमाद्य शकौतु मण्डपादि रहितमेव कुर्यात् । नत प्रमंत्रो होमोवा एवमेव प्रदीयते । इतिमारस्योके: । ग्रहमंत्रा द्वारजाप मंमाश्चनेत्यर्थः ॥ तुलापुरुषदानोपयोगि देवतादिमदन रने विश्परमातो:-विरोप दानं कथितं तुलादि तस्मात्तुला लक्षण मुच्यते प्रायः ॥
कर्मकायहरत्नाकरे, तुलादानपरिभाषाः । (५१) गातुलाप्रमाण स्मृतमंगुलानिध्यगुने पावित्रमाणे प्रतिद्वयेभ्यंगुलपट्क २ शतागुलाठोत्तमगुलानम् स्मुनिशनि. पव च धातुबंधाचंधेपानमुगनिवेश्या । ईश. शशीमास्तरदसया रयाद्वि भामागुरूराम्नी । प्रजापतिविश्वगणगद्विधाता पर्जन्य शम्भूपितृदेवताच सौम्यश्चयामराज अश्विनी उलेरामिनावरणामहद् गण | धनेशगंधर्य जलेश विष्णुडे चतुर्विशतिरेव देवताः ॥ भन सौम्योनुध ॥ स्यात् पंचविश पुरुष गएको यस्तोल्यमानस्तुलयामहात्मा । एताविधेयास्तापनीयमग्यो स्वाचिंता देकत मूर्तयस्ता ॥ पडंगुल स्थाचतुरस्वपिंड प्रांतदूये विगुग्नन्तनामः । पार्थ द्वयं तमतुलं स्यादेवं मया से पथितं प्रमाणम् ।। मध्यापुरे खलियांगुलानि पचाधिका विशतिरेय देध्यं । एकागुलोस्याद्भातीद पिंड स्तत्राधिदेवः विळ- वासुवि स्यात् । सद्धातुवैध शुभकाठपाट पिंडेगुलद्वन्दमधोविधरम् ॥ अधोदयभूम्यधिदेवतास्यातुला- न्तरे भूमिपत्तिनिवेश्य ॥ तुलादानेयंत्र सच वेद्यां वागोमयोपलिप्ते समे भूमौ कर्तव्य:- तत्राचा भूमौ या पेद्या मध्य निहस्तभित चतुरन व्यासं कृत्वा प्रागरं दक्षिणोत्तर नवरेखाभिस्तचतु- टिकोक पुर्यात् । न कोष्ठ नि प्रकोष्टानि प्रत्यक नव नागुलानि संयन्ते । ततोपहिग्न्त पक्तियुक्तु- दिक्षुमध्यकोष्टानि चत्वारि माजयित्वा तदुपर्युपान्त्यपति पु पार्ययोरप्रयं त्रय त्यक्त्या प्रतिदिशं प्रति मायकोटद्य मार्जयेत् । तदित पद पद कोष्टानि च पारि द्वाराणि सियन्ति । ततोमध्यस्थितपोश- कोष्टानि मायेत् । तनाव ह्ये एककोणको विहाय कोणकोटद्वारपीटतिरालवतान्यवर शनिपं च चको- छनिमार्जयेत् । तथाचमध्यचतुरस्त्रपीठ पादा सिध्यन्ति । ततोमध्याञ्चत्परिवत्तानिकुयात् । तनाये चत्वरंगुलानियास द्वितीयेऽष्टौ तृतीयेचतुर्विशति , चतुर्थेषड्विंशतिरिति तमसुरंगुलमृत्त कणिका- रूप पीतेन रजसा पूरयित्वा कर्णिकाअधिरेखा मितेन रजसा निमाय, तद्वहि रशंगगुलात्मवृत्ते पीतरक्त पितरजोभि सपादित मूलमध्याप्राणिशोडशसराणि सपाद्य तत्केशरादधिरे सितैनवा जसांगुलीनता संपाद्य तच्चतुविशाकुला मतदहिवृत्तेरजसादि पटौ पनागि रत्ताप्राणि पुर्यात् । ततोदलान्तरसां सितैनरजसा विधाय, दलान्तराणि कृष्णेनरजसा पूरयित्वा तद्वहितका. पुलस्तरां वहि तसा सितेनैव रजसासपाद्य वृत्तद्वयान्तरं परितोऽष्टदलायतं तन्मध्यचिन्हे शोडश धाविभज्य प्रतिभागयवाकारान्पोडशारान, श्यामपौतारुणश्वेतरजीभि कल्पयित्वा, तदंतरेण यथायोगरजोभ पूरयित्वा तदहि सित पितारुण श्यामहरिता पंचरेखा लिखेत् । तद्वहि. पीठे क्षेत्र चतुरस्त्रयथासीभरजोभि रक्त कृष्वा पीठायविरेसी सितेनरजसा चतुरखा रचयेत् द्वारदेवाणि पूर्वादित पीतश्यामसितहरितरजोभि पूरयेत् । श्राग्ने. यादिकोण कोश्चतुष्टय लोहित हरितण्यामधवले पूरयेत् । आग्नेयादिपीठचतुष्टयं पचकोष्टा- स्मतुक्रमात्सित रक्त पीत कृशारजोभि पूरयेत् । तत सितेन रजसा गुलोनतेनवहिश्चतुरस्ररेखा कयां दितिमदनलादय । इदमेय वारुणां मण्डल जलाशयोत्सर्गादौनेयम् । पुनस्तव-वनात्त- , कर्मकाण्डरवाकरे, दुलादानपद्धतिः । मेभागे अग्नेयांशक्तिमुज्वला । अहिले दक्षिणेडनै त्याखड्गमा लग्वेत । पाशान्तु वारणलंग्व्यध्वज पैवायुगाचरे । कोवेयान्तुग-दलिख्यईशान्यां शलनालिखेत् । शलस्यवामदेशेतु चक्र पद्मच दक्षिणे इतिपोटशार चत्रम् ॥ इति । चारुणमण्डलभद्रोद्धारः top Lth | पंचताधार घोडशकोश त्मकपी श्वेतम् | षर कोडात्मकमुत्तरद्वार पीतम् । 22 षट् कोठात्मकं दक्षिणा द्वारं कृष्णं रत्तम् ना स्वेच्छा रजनपुरये वा पीतम् षट्कोटात्मक पश्चिमद्वारश्वतं हरितम् अथ तुळादानपद्धतिः। श्रथ च तुलादानकर्ता पूर्वोक्त परिभापा नुसारेणोद्धारपूर्वक वारणमंडलंगोमयोपलिप्ते भूमौपोडशारंहस्तत्रयात्मकं चतुरनं लिम्वित्वा तत्तद्गैरापूर्य सुसज्य च पूर्वोक्त लनघटेचानीय - फगवार लाकरे, तुलादानपततिः । (५६३) , तत्रसंस्थाप्य, शुध्देधौतेवाससी परिधाप्य मंडपे पूर्वाभि मुखेनो पविश्याचम्य प्राणानायम्य, रक्षादीप प्रज्वलय्य, प्रतिज्ञासंकल्प कुर्यात-श्रोत्यादि देशकालौ सका मुकशर्माहममात्मनो दुष्टग्रह पीडायखिलरोगादि निवृत्तिपूर्वक दीर्घायुष्यप्राप्नये श्री परमेश्वर प्रीत्यर्थममुक तुलादान फर्मणि निर्विघ्नता सिद्धये तदंग त्वेन गणेशादि पंचांगदेवतानां पूजनं प्राचार्यवरणच करिष्ये ततः पूर्वोक्तविधिना गणेशादीन्संपूज्य, रक्षासूत्रमभिमन्यकलशोपरि संस्थाप्य, प्राचार्यवृणुयात वरणद्रव्यमाचार्य च सम्पूज्य बरणद्र- व्यंहस्ते निधाय संकल्प:-श्रोत्यादि देशकालो सकीामुको- ऽहं करिष्यमाण तुलादान कर्मण्येभिर्मान्धाक्षत पुष्पपूगीफल यज्ञो पचीत चासोलंकरण वरणद्रव्यैः अमुकतुलादान प्रतिग्रहार्थ ममुक गोत्रममुकभवरान्वितममुकायेदाध्यापिन ममुकशर्माणं ब्राह्मण माचार्यत्वेनत्वामहंवृणे वरणसामग्री तस्मैदत्वावृतोऽस्मीत्याचार्यों योन्-कर्मकुरु करवाणीति प्रत्युक्तिः ततः प्रार्थयेत् आचार्यस्तु यथास्वर्गे शकादीनां वृहस्पतिः । तथात्वंममयज्ञेऽस्मिन्नाचार्यों भव. सुव्रत। तत प्राचार्यों गोविन्द, मृत्युंजय, धर्मराजनांसतिसंभवे ईशादिचतुर्विशति देवानां च सुवर्णप्रतिमाः स्वाल्यांनिधाय अग्न्यु तारण विधिना संस्नाप्य अग्न्युत्तारणंकृत्या पूजयेत्-संकल्पानये. त्यादिसंकीर्य, अमुकोऽहं मम दुष्टग्रहजनिताऽखिलरोग निवृत्ति पूर्वक दीर्वायुष्य प्राप्निद्वारा श्रीपरमेश्वर तुलापुरुप प्रीतयेकरिप्य- माण तुलोदानकर्मणि सुवर्णप्रतिमानामुपरि गोविन्द मृत्युंजय धर्मराजानां पूजनंकरिध्धे-तत्रादौ गोविन्दं ध्यायेत् ॥ अधश्चत्रा गदाभूध्ददक्षिणेचामयोःक्रमात् । अब्देशंखमधः पद्मगोविन्दः कपिलाङ्गकः 0 इदं विष्णुरिति मेधातिथि ऋषिर्गायत्रीछन्दः विष्णुर्देवता तुलादाने गोविन्दावाले पूजने विनियोगः । 30 इदं विष्णुर्विचक्रमेत्रेधानिदधेपदम् । समूढमस्थपा सुरेस्वोहो 30 एतन्ते देवसवितर्यज्ञ प्राइवहस्पतये ब्रह्मणे । तेनयज्ञमवतेन यज्ञ पतिं तेनमामव । मनोजूतिर्जुपता माज्यस्य वृहस्पति यज्ञमिमें (५४४) कर्मकाएरत्नाकरे, तुलादान पद्धति तनोत्वरिष्ठं यज्ञ ० समिमंदधातु । विश्वेदेवासऽइहमादय- न्तामोंप्रतिष्ट । 0 भूर्भुवः स्वः गोविन्देहागच्छेह तिष्ठ सुवर्ण प्रतिमायां सुप्रतिष्टितोयरदोभव इति प्रतिष्ठाप्य पुरुषसूक्तेनवा 30 गोविन्दायनमः इति मंत्रेण सम्पूज्य, मृत्युञ्जयध्यायेत्-ॐ ज्यवक वृषभारूढं प्रतिवत्कैत्रिलोचनम् । कपाल शूलखट्वाङ्गं चंद्रमौलिसदाशिवम् 130 च्यम्बकमिति वशिष्टऋपि स्पंधक रुद्रोदेवता तुलादान कर्मणि सुवर्णप्रतिमायां मृत्युंजयावाहने पूजनेच विनियोगः-30 व्यवय्यजामहे सुगन्धि पुष्टिवर्द्धनम् । उवारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीयमाऽमृतात् ।। ॐ एतन्ते पठित्वो। 0 भूर्भुवः स्वः, त्र्यम्बके हागच्छेह तिष्ट सुप्रतिष्ठितो वरदोभव-ध्यायेत्-30 मृत्युंजयश्चदेवोऽयं चतुर्बाहु स्त्रिलोचनः । अक्षमालाधरोदेवो दक्षिणेनतुपाणिना । वामेनामृत कुण्डीच धारयन्नमृतान्विताम् । वरदाभयपाणिश्च दिव्याभरण भूषितः । शुक्लः सुनीलवासाश्च पद्मास्योपरि संस्थितः । इति मृत्युंजय प्रतिमा सम्पूज्य मृत्युंजय प्रतिमाया मात्मनि च न्यास कुर्यात-30 जां हृदयायनमः, 30 जी शिरसे स्वाहा, तूं शिखायैव, 30 जै कवचाय हुम्, ॐ जौं नेत्रत्रयाय वौषट् , अ जा, अस्त्रायफद् इति मृत्युञ्जय प्रतिमाया मात्मनिचन्यासं कृत्वा, न्यवक प्रतिनां वेदोक्त मृत्युञ्जय मंत्रेण वा नमस्ते रुद्रमन्यवेति नीलसूक्तेन सम्पूज्य । श्रावरणशक्तीः पूजयेत्-ॐ जयायैनमः, ॐ विजयायैनमः, ॐ अजितायैनमः, ॐ अपराजितायैनमः, 30 भद्रकाल्यैनमः, 30 कपालिन्यैनमः, 30 म्यायनमः ॐ मृत्यु पराजितायै नमः, इति नाममंत्रैर्गन्धाक्षता दिभिः प्रादक्षिण्येन क्रमेण सम्पूज्य, पुनः प्रार्थयेत् -अमृत्युञ्जय टि० " लोहतुलादाने प्रतिगृहीतु' शिरसि, ललाटे, जिह्वामूले, गंडयो उदय, नाभी, गुहा. भटगंधेन • जूम इतिमृत्युजयमन्त्र संस्कृत्वा सतिसंभत्रे प.पलात्मलोहदंडकष्णधान्योपरि हत्या वस्त्रेणाघाद्य तुलादानान्ते संकल्प माचार्याय दद्यात् लोहतुलादाने । अयमेन निधिविशेष , , " 6 कर्मकाएदलायरे, तुलादानपद्धतिः । (५५) ततः त्रिलोकेश, दयालो भक्तवत्सल । रक्षमा देवदेवेश स्वल्प मृत्यु- भयात्ममो । इति संप्रार्थ, केचिदन्न धर्मराज पूजनमप्याचरन्ति, यथा चारः कर्तव्यः, प्रतिमायां धर्मराजमावाहयेत-ॐ धर्मराज धर्मभूति जगदानंदकारकं । ध्यायामि मनसादेवं धर्माधर्मस्थ साक्षिणम् । 0 यमायत्वेतिदध्यङ्डार्वण ऋपिर्यजुश्छन्दो धर्म राजोदेवता तुलादान कर्मणि सुवर्णप्रतिमायां धर्मराजावाहने विनियोगः-ॐ यमायत्वाडिरस्वते पितृमते स्वाहा धर्म: पित्रे । इत्याचाहा एतन्तेति प्रतिष्ठाप्य ] 30 भूर्भुवः स्वः। धर्मराज इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्टितो वरदोभव । धर्म रांजायनमः, इति मंत्रेण धर्मराजं सम्पूज्य । पोडशारयंत्रस्य पूर्वादिदिक्षु, दशदिक् पालानां पूजनं पूर्वोक्तन ग्रहयागोक्तेनविधिनाकुर्यात् वा पूर्वे-30 इन्द्रायनमः इद्रमावाह- यामि स्थापयामि इति गंधाक्षताभिः सम्पूज्य, आग्नेये-30 अग्नयेनमः, दक्षिणे-30 यमायनमः, नैर्ऋत्ये-ॐ निव॑तयेनमः, पश्चिमे-ॐ वरुणायनमः, वायव्ये-ॐ वायवेनमः, उत्तरे-ॐ कुवेरोयनमः ईशाने 30 ईशायनमः इति सम्पूज्य चल्युक्त प्रकारेण सर्वेभ्योवलीदत्वा पोडशोर यंत्रमध्ये पृथ्वीमावायेन-आगच्छ सर्चकल्याणि वसुधे लोकधारिणि तुलाधः स्थापयामित्वां सशैल बनकानने ॥ ॐ स्योना पृथ्वीति मेधातिथि पिर्गायत्रीछन्दः पृथ्वीदेवता तुलादाने पृथिव्यावाने स्थापनेच विनियोगः-स्यो ना पृथिविनो भवानृक्षरा निवेशनी यच्छानः शर्मसप्रथाः । एतन्तेति प्रतिष्ठा 30 भू० पृथिवि इहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिष्ठिता वरदाभव ! ॐ पृथिव्यै नमः, इति सम्पूज्य, तत यज्ञवृत्तोद्भव तुलास्तंभं फलकं च तत्रानीय पश्चगव्येन संमोक्ष्य । तुलास्तंभ स्थापनार्थ गर्त कुर्यात-30 अनन्तायनमः, ॐ कूर्मायनमः 3 पृथिव्यैनमः, इति पोडशार मध्पे सम्पूज्य, तत्रगर्तकृत्वा तुलास्तंभ मारोपयित्वा दृढं कुर्यात् । तत फलक स्यकोणौ च तुश्चतुरंगुलौत्यक्त्ता कौणयोर्मुजादिरशनां शिक्यां वध्वा दक्षिणो फर्मकाएसरलाकरे, तुलादानपद्धति . तर लवं फलक रतभोपरि निदध्यात् । ततस्तुलापूजनं कुर्यात- 0 तुलायैनमः, इति मन्त्रेण तुलांपंचोपचारादिभिः सम्पूज्य, रक्त पीतादिवस्त्रेणतुलां समाच्छाद्य, ततस्तुलायां दक्षिणकोणमारभ्यो त्तर वृध्द्या, ईशादि चतुर्विशति, पूर्वपूजिताः प्रतिमाः सूत्रेष्वाल- व्य, वक्ष्यमाण नाममंत्रः याचाहा प्रतिष्ठाप्य पूजयेत् । ततस्त्रि सूत्र्यां प्रतिमांवध्दा, दक्षिणकेणे तुलाफलकोपर्यालव्य, तत्र, ३० ईशायनमः श्राबाहयामि स्थापयामि पूजयामि एवं क्रमेण, ॐ शशिने नमः । ॐ नारुतायनमः ।। 30 रुद्रायनमः । ॐ सूर्याययनमः।श विश्वकर्मणेनमः । ॐ गुरवेनमः । अङ्गिरोऽग्निभ्यांनमः। 30 प्रजापतयेनमः ।।। 30 विश्वे भ्योदेवेभ्योनमः ॥१०॥ ॐ जगद्विधात्रेनमः ।। ॐ पर्जन्यश भुभ्यांनमः ॥१२॥ तत उत्तरफलकमागे-ॐ पितृदेवताभ्योनमः आवाहयामि स्थापयामि पूजयामि ।१३। एवं सर्वत्र-ॐ सोमाय नमः ॥१४॥ ॐ धर्मायनमः ।१५ ३0 अमरराजायनमः ।१६। ॐ अश्विभ्यांनमः।१७ 30 जलेशायनमः।१८। ॐ मित्रा वरु- णाभ्यांनमः ।१६। 30 मरुद्गणेभ्योनमः ।२०। 0 धनेशायनमः २२॥ गन्धर्वायनमः ॥२२॥ 30 जलेशायनमः। ॐ विष्णवे नमः ॥२४॥ इतिस्थापयित्वा । इतिनाममन्त्रैः पंचोपचारादिभिः सम्पूज्य, तत स्तुला मध्य शृंग्वलायां पूर्ववत्सून्ने सुवर्णप्रतिमां घध्या, 30 पासुफयेनमः, वासुकिमावाहयामिस्थापयामि । तत स्तंभमूले अनन्तायनमः प्रा० स्था० पू० । तदुपरि-30 भूम्य धिपतयेनमः, श्रा० स्था० पू० शृङ्गलासु-30 सर्पेभ्योनमः, आ. स्था० पू० । ॐ तुलास्थ देवेभ्योनमः, इति पाद्यगन्धधूपदीपादि भिः सम्पूज्य, ततो नूतनशुक्लाम्वर धरो यजमानः हस्ते पुष्पां- जलिंधत्वा, चारत्रयं तुलांपरिक्रम्य वक्ष्यमाण मंत्रैरामंत्रयेत् । ॐ नमस्ते सर्वदेवानां शक्तिस्त्वं सत्यमाश्रिता । सानीभूता जगडाची निर्मिता परमेष्टिमा । एकतः सर्वसत्यानि तधान्त- मानानि । धर्माधर्मकृतां मध्ये स्थापितासि जगद्धिते । त्वंतुले , कर्मकार डसनाकरे, तुलादानपद्धतिः । (५७) सर्वभूतानांप्रमाणमिहकीर्तिता । मातोलयन्तीसंसारादुन्दरस्व नमो स्तुते । योऽसौतत्याधिपोदेवापुस्पापंचविंशकः । सपपोऽधिष्टितो देवित्वयितस्मानमोस्तुते। इतिपुष्पाक्षतैःतुलांसंमार्थ्य,प्रचंतुलापुरुष गोविन्दप्रार्थयेत-30 नमोनमस्तेगोविन्द तुलापुरुपसंज्ञक । त्वं- हरेतारयस्वास्मानस्मात्संसारसागरात । इत्यक्षतपुष्पाणि, तुला. स्थगोविन्दोपर्यवकीर्य, पुनःप्रदक्षिणा चतुष्टयंगोविन्दस्यकृत्वा, ततः-शुध्दनूतनवासांसिपरिधाय, दक्षिणहस्तेलोहशस्त्रंगृहीत्वा कोडेस्वेष्टदेवमादाय पूर्वाभिमुखस्तुलाया उत्तरभागेवस्त्रास्तृते गृहीतकुसुमांजलिः सूत्रेणगोमयादिना चातुलायामवलवितायाः गोविन्दप्रतिमायाः मुत्रं पश्यनसावधानतयाग्रासीत् । ततस्तुला यादक्षिणभागे समादधिकतोलनीयद्रव्य, सुवर्ण,रजितंताम्रलाई वाघृतमन्नादिद्व्यं यथावित्तप्राचार्यादिः स्थापयेत् । अल्पमृत्यु- निवारणार्थ, वापुष्ठिकामेयजमानेभूमिसंस्थ, यावतादक्षिणपिटक- भवति ताबद्रव्यस्थापयेत् । ततोयजमानः क्षणमात्रंतुलायांस्थि- त्वा, पुष्पाक्षतहस्तामन्त्रंपटेत् । ॐ नमस्तेसर्वभूतानां साक्षिभू तेसनातनी। पितामहेनदेवित्वं निर्मिताविश्वयोनिना । त्वयाधृतं जगत्सर्वं सहस्थावरजङ्गमैः । सर्वभूतात्मभूतेशे नमस्तेविश्वधा- रिणि । इतिसंप्रार्थ्य, श्रवतीर्यच, तोलितद्रव्गं गंधाक्षतादिभिः सम्पूज्य, वस्त्रेणााद्य,-संकल्पकुर्यात्-अयेत्यादि देशकालौ- संकीय, अमुकोऽहमम (अस्यवालकस्यवा) रग्रहजनित सर्वा रिष्टनिवृत्तिपूर्वकदीर्घायुष्यप्राप्तिकामनया, श्रीपरमेश्वरप्रीतये यात्मसमतोलितमिदममुकद्रव्यममुकदैवतं, अमुकशर्मणेब्राह्मणाय प्राचार्याय अन्येभ्योबाह्मणेभ्यो बायांशनविभज्यदास्ये, इति द्रव्योपरिक्षिप्त्वा, प्रतिष्ठार्थसुवर्ण यथापित्तद्रव्यहस्तेनिधाय- अधेत्यादिश्रमुकोऽहमम (अस्यशिशोरितिवा) अमुकद्रव्यतुलादान टि. उस्तचविष्णुधर्मोत्तरेतबारहत्सवस्त्रास्त्रः पुगलकारभूपित.। अभी. प्टांदेवतांगृह्यस्नापयित्वाधृतादिगि ॥ इनिप्रमाणानान सूर्य धर्मराजयोग्रहणमि- तिबोध्यम् ।। , (५६८) कर्मकाण्डरताकरे, ग्रहदानपञ्चतिः । कर्मणः सांगफलाप्तये, इदकर्षमितंसुवर्ण, रजितादिद्रव्यंवा, अमुकशमणेभाचार्यायदानप्रतिष्टांसम्प्रददे, तथान्यूनोतिरिक्तदो- पंपरिहारार्थमिमांभूयसीदक्षिणांनानानामगोत्रेभ्योविभज्यदास्ये, तथा-तुलादानकर्मण: साइफलप्राप्त्यर्थ यथासंख्यकान्ब्राह्मणा- न्भोजयिष्ये,॥ ततःपुष्पाक्षतहस्तः-30 यान्तुदेवगणाःसर्वे इति देवान्विसृज्य, प्राचार्यायप्रतिमादत्वा घृतछायापध्दत्यनुसारेण घृतेछायांदृष्ट्वापरिधेष वस्त्राणित्यक्त्वा, हरिद्रोद्वर्तनादिभिः स्नानंकृत्वा अभिषेकादिमन्त्राशिपंगृहीत्वा, तुलाद्रव्यंतदेवब्राह्म- णेभ्योविभज्यदद्यात्, नचिरंरक्षयेत् । इतितुलादानपध्दतिः। , , अथ ग्रहाणां दान पद्धतिः अथ सूर्यादिवारेषु ग्रहदोषो : पशांतयेवाकेवलपुण्यवृद्धये दानानि । तत्रादौग्रहाणामणिदानम् ॥ माणिक्यमुक्ताफलविद्रुमा णि गात्मकं पुष्पक बज्रनीलम् ॥ गोमेदवैडूर्यकमरकताः स्यूर- नान्यथोजस्यमुदेसुवर्णम् । दद्यादितिशेपः ॥ अथमहामूल्य रत्नदानेयस्य सामर्थ्याभावस्तदर्थ मल्पमूल्यानरत्नान्युक्तानि । देयंतुष्ट्यविद्रुम भौमभान्वोरूप्यंशुक्रद्वोरचहेमगुरोश्च ।। मुक्तामरे लाहमर्कात्मजस्थलाजावतः कीर्तितः शेषयोश्चेति । अथ प्रत्येक ग्रहस्य पृथग्द्रव्यदानानि ।। ग्रहदानक्रम वक्ष्ये सर्वसिद्धिकरंपरम् । सर्व शांतिकरं नृणांसर्वपापप्रणाशनम् । श्रादौसूर्यस्य॥ कौसंभव स्त्रंगुडहेमतामाणिक्यगोधूम सुवर्णपनम् ॥ सवत्सगोदानमिति प्रणीतं सूर्यस्यतुष्ट्यैसुमसूरिकाच ॥ द्रव्यसम्पूज्य ब्राह्मणंच स- म्पूज्य ॥ यथा कामसंकल्प्य दद्यादितिसर्वत्रयोध्यं ॥ अथदान वाक्यम् ॥ दिवाकरः पद्मसंस्थः पद्मभृत्प्राणियोधनः ॥ दानेनाने नसंतुष्टोजायतामकिरीदभृत् ॥चन्द्रस्य ॥ धृतकलशंसित वस्त्रं कर्मकाण्डरलाकरे प्रहदानपदतिः । (५६) दधिशखमौक्तिक सुवर्णच ॥ रजतं चतण्डलान्नंतुष्टयैदद्याद्विधोः क्षीरम् ॥ दानवाक्यम्॥ अमृतांशुःप्राणिजीवी किरीटीवरदाशशी।। दानेनानेनभवतुप्रसन्नोवरदोमम॥ भौमस्य ॥प्रवालगोधूमममूरि- काश्च वृषसताम्रकरवीरपुष्पंम् ।। पारक्तवस्त्रंगुडहेमधेनुं दद्याद्वि- धिज्ञेहिकुजस्यतुष्टयै ।। दानवाक्यम् ॥ चतुर्भुजोमेपगतः शूलीरतां घरः कुजः ॥ तुष्टोभूयात्स दास्माकन्दानस्यास्यप्रभावतः ॥धुधस्य नीलवस्त्रमुगदानं बुधाय रत्नपाचींदासिकाहेमसपिः॥ कांस्यदत कुञ्जरस्याथमेषोरौप्पंसस्य पुष्पजात्यादिकश्च ।। दानवाक्यम् ॥ चतुर्भुजः पीतवपुः किरीटीचर्मासिभृहंडधरश्चहारी || पीताम्बरः सोमसुतोवुधस्तुदानेनशांतिममसंप्रयच्छतु ।। गुरोः ॥ अश्वःसुवर्ण शुभपीतवस्त्रंसपीतधान्यंलवणंसपुष्पं ॥ सशर्कररजनीभिश्चयुक्तं दानायचोक्तंसुरारा जमंत्रिणः ।। दानावक्यम् ॥ किरीटीपीतवदनः पीतवासाश्चतुर्भजः दानेनानेनसंतुष्टो भूयाद्देवपतिर्गः ॥ शुक्रस्य-चित्रवस्त्रमपिदानवार्चितमीतयेमुनिवरैः प्रणोदितम् । तंडलचूतसुवर्णरूप्यकं, वर्कपरिमलोहिबीहयः ॥ दानवाक्यम्- दैत्यमन्त्रीचतुर्वाहुःकिरीटीशान्तिदासदादानेनभूयान्मन्त्रज्ञोभा- गवः कविनायकाशनेः नीलकंमहिषीवस्त्रं कृष्णलोहंपयश्विनीम् तैलमाषकुलित्थाश्च,देयाः सौरिमुदेसका। दावा-नीलद्युतिः शूलधरः, किरीटीगृध्रसस्थितः । दानेनवरदोभूयादानेनग्रहनायकः। राहो:-राहोर्दानम् कृष्णमेपोगोमेदलाहकवलम् । सुवर्णनाग- रुप्यंच सतिलंताम्रभाजनम् । दावा० । अर्द्धकायोनीलवपुश्च- न्द्रादित्यविमर्दनः । दानेनानेनवरदोभूयाच्चर्यधरस्तमः ॥के तो।। केतोवेडूर्यममलतलंमृगमदस्तथा । उर्णातिलैस्तुसंयुक्तंदद्यात्सर्या- धसिध्दये । दानवाक्यमधूम्रवर्णारौप्यवक्रोगृध्रस्थस्तारकाग्रहः । प्रसन्नोवरदोभूयादानेनममसर्वदा । अथान्यच्चवारेषुदानद्रव्यम् । भानुस्ताम्बूलदानादपहरति नृणांवकृतवासरोत्थंसोमः श्रीग्यण्ड. दानादवनिसुतभवोरक्तपुष्पप्रदानोत् । सौम्य शक्रस्यमन्त्री घृत- दधिपयसोर्भार्गवः शुभ्रवस्त्रात्तैलाल्लोहाच्च सौरिस्तिलरजत (६००) कर्मकाण्डरनाकरे, रजोदर्शनपरिभाषा । सुवर्णैश्चैवसर्वग्रहेन्द्राः ॥ ग्रहान्स्वर्णमयान्कृत्वा योविप्रेभ्यःप्रय- च्छति तद्दिनेषु यथाशत्या सर्वानकामान् सविन्दति । ॥ इति ॥ भदा निदा अथकर्मकाण्ड रत्नाकरस्य चतुर्थः शान्ति खण्डः प्रारभ्यते,, ही काररूपां श्री शक्ती, प्रणम्य भुवनेश्वरीम्,, शान्तिखण्डं विवक्ष्येह, सर्व दोषप्रशांतये,, श्रीगणेशायनमः,, अध च प्रथम दर्शने विमामादी गति गरिनस्य शान्ति पूर्वकम- नुष्टेरवात शान्ति वक्तु तन दुष्टमासाद्यभिधीयते । उत्त च मुहर्त चिन्तामणी- संस्मे दर्श रिक्ता सध्याषष्ठी द्वादशी धृतीषु रोगेष्ठ-या च्द्रसूया परागे पाते चा नो रजोदर्शन शत् । प्राय रस शुभमा मागराधेय फाल्गुने ॥ ज्येष्ठ श्रावणयो शुक्ले स्वारे सत्तनीदिशा ॥ प्रशुभ मासा --चत्र ज्येष्ठापाइ भाद्रपौषा अशुभा [ माश्वि रोजीमध्यः । शेपा शुभावहा । शुक्लाक्ष जुभ कृष्णोऽगुभ , तिथिपु ।।।४।१६ ||१२||१४|१५/ १३० एता असुभा । नत- नेषु ।२।।३ ।।।।।1१०111111111111२०। २।५। अशुभान्यन्यानि शुभानि । योगे. परिघ वेधृति व्यतीपाता भरमा म म् । शेपा शुभा । भद्रारहिं तानि कानिप्रास्तानि । लग्नेषु ११२१४ दुष्ानि ६।१०।११मध्यम नि, अन्यानि भानि । दिसस्य प्रथमोभाग शुभ । द्वितीयो मध्यम । तृतीयोनेष्ट । उभेमध्यऽशुभे रानिरप्य शुभा । महाशिा निन्दिता । मभयायाश्च चतुर्थाऽम द्वादशश्शश्वद्रोनेट । मरणाशौचाशुभम् ॥ रजो दर्शनसमयेपरिधान वस्त्र फलम् -नीर्ण कृष्णा नील रक्त परिस्तिस्त्र रायशुभानि । शान्तिमाह नारद -निय तिथिवारेषु या पुष्प प्रदश्यते तन शान्ति प्रकर्तव्या घृतदूर्वा तिलाक्षते । तत्प्रत्येक मष्टशतं गयया हुयात्तत । स्वर्णगोभू दिल यासादोपापनुत्तय । रोप प्रयोगे स्पाम् ॥ इति दुए तो शन शान्ति परिभाषा ।। -- अथ-प्रथम दुष्टरजो दर्शनशान्ति पद्धतिः। अथ च पूर्वोक्त दुष्टरजोदर्शन दिवसाचनुर्थे ऽहनि सायंकाले गोमयेनोपलिप्तायां भूमौयवरष्ट दलकमलं विरच्य ॥ तदुपरि कर्मकापसरलाकरे, निधरजोदर्शनशान्तिपद्धतिः। कलशस्थापन विधिना कलश संस्थाप्य संपूज्य च । तत्रवधूमाना• व्यतजलेनादौ पूर्वक्ति पूजाखण्डोक्ताभिषेकमंत्रैर्देवस्यत्वेति, सुरास्त्वामभिपिंचन्त्वित्यादिभिर्वा द्यौः शान्तिरित्यादिभि मंत्र मिणद्वाराऽभिपकपूर्वकं सुग्वोष्णोदकेन तां वधू स्नापयित्वा शुद्ध वाससीपरिधाय, तद्वितीय दिवसे वाचन्द्रतारानुकुले दिवसे भर्ग प्रातरभ्यङ्ग पूर्वकंस्नात्या, शुभासने उपविश्य, पत्नींदक्षिण तउपवेश्य च रजोदर्शनात्पूर्वंगमनेकृते कृच्छ्रादिप्रायश्चित्तंकुर्यात स्ववित्तानुसारं द्रव्यं ताम्रपाने तिलोपरि स्थापयित्वा द्रव्य ब्राह्मणांच पूजित्वा संकल्पं कुर्यात्-अयेत्यादि देशकालौ संकी- ामुकराशिरमुकोऽहं सपत्निको यन्मयास्यांभार्यायां रजोदर्शना त्पूर्व वृधागमनं कृतं तदोष परिहारार्थ मिदं तिल सुवर्ण कृच्छ प्रत्याम्नायी भूतं रजतंवाऽमुक शर्मणे ब्राह्मणाय तुभ्यं सम्प्रददे तत्सनमम । इति कृच्छ्रे विधाय । श्राचम्यपञ्चांग पूजासामग्री सम्पाद्या संस्थाप्य स्वस्तिवाचनं पठित्वा गणेशादि पञ्चाङ्गा पूजनं कुर्यात्-तत्रसंकल्प:-अयेत्यादि सं० अमुकराशिरमुकोऽहं ममास्याः भार्यायाः निंद्यमासतिथि नक्षत्र वासरेषु जात प्रथम रजोदर्शन दोषशान्त्यर्थं करिष्य माणे शान्ति कर्मणि, गर्भाधाना ख्य संस्कारकर्मणिच निर्विवता सिद्धय श्रीभगवतो गणेश्वरस्य पूजनं कलशस्थापनपूजनं पुण्याह वाचनं मातृकापूजनं नान्दी श्राद्धं वसोर्धारा निपातनादि ग्रहपूजनं रक्षाविधानं च करिष्ये । इति पूर्वोल्लिखित पद्धत्यनुसारेण पंचाग पूजांविर्धाय । होमार्थ वेदिकांनिर्माय संकल्पं कुर्यात्-अयेत्यादि संकीामुकोऽहं ममास्याः पल्याः मासर्वं तिथिवार योगकरण मुहर्त कुस समय दुर्वस्त्रादिषु यत्रकुत्रचिदुष्टे जात प्रथम रजोदर्शन सूचितारिष्ट निवृत्ति द्वारा तथाच प्रतिगर्भ संस्काराति शयद्वारा, अस्यांजनि- प्यमाण सर्वगर्भाणां वीजगर्भसमुद्भवैनोनिवर्हणद्वाराश्रीपरमेश्वर. प्रीत्यर्थ यथाशास्त्रोक्त प्रकारेण शान्तिं करिष्ये ॥ ततो होमवेद्यां पंचभूसंस्कार पूर्वकमग्निं संस्थाप्य । प्राचार्य ब्रामणं सम्पूज्य कर्मकाण्डरताकरे, दुष्टरजोदर्शापद्धतिः । वरणद्रव्यं हस्तेनिधाय संकल्पं कुर्यात्-अद्यत्यादि, अमुकोऽहं एभिर्गन्धाक्षत पुष्प पूगीफल वासोभिः, दुष्टरजोदर्शन शान्ति कर्मणि, श्राचार्यत्वेन त्वामहं वृणे इति तस्मैदत्वा । 0 प्राचार्य स्त्विति मार्थयेत् ॥ ततो ब्रह्माण सम्पूज्य । संकल्प:-अद्येत्यादि० अमुकोहं एभिर्वरणद्रव्यै दुष्ठरजोदर्शन शान्ति कर्मणि, अमुक शर्माण ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे । इतिवृत्वा-अ यथा चतुर्मुखो ब्रह्मेत्यादिना प्रार्थयेत् । ततो रुद्रीपाठार्थ, चण्डीपाठार्थ, होमा) च, ऋत्विजापाठकांश्च बृणुयात्-ततः सुर्वणप्रतिमा अग्न्युत्तारण पूर्वकं पंचामृतेन संस्नाप्य । होमवेदी शाने कलशं संस्थाप्य सम्पूज्य च तत्र प्रतिमा संस्थाप्य गायत्री स्वरूपिणी भुवनेश्वरी मावाहयेत् । ३० उद्यद्यति मिन्दु किरीटां तुङ्गकुचां नयनत्रययुक्तो स्मेरमुग्वीं वरदाड्कुपोशा भीतिकरां प्रभजे भुवनेशीम् । घा गा- यत्री मंत्रेणावाह्य, ॐ भुवनेश्वर्यैनमः, इति मंत्रेणसम्पूज्य । नतो भुवनेश्वरीत उत्तरस्यां पुनः कलशं संस्थाप्य, तत्र गणेशादि नव ग्रह देवानावाह्य सम्पूज्यच रक्षोनसूक्तेन रक्षास्त्रमभिमंत्र्य तत्रैव कलशेस्थापयेत् । ततयाचार्यो ब्रह्मोपवेशनादि पक्षणांत कुशकंडिकाविधिं कृत्वा । एतन्तेति मंत्रेण तारण वरदनामाग्निं प्रतिष्टाप्य . चत्वारि श्रृंगा० पठित्वा, . अग्नेनय० । इति मंत्रणवा, 30 तारणवरद नामाग्नयेनमः, इत्यनेनच नीराजनान्त मग्निं सम्पूज्य रेग्या जिहाश्चपूजयेत् ॥ ततो यजमानो देवता भिध्यानपूर्वक द्रव्यत्यागं कुर्यात् । संकल्पः-प्रद्यामुकोह मादौ रजोदर्शन शान्तिकर्मणायदये-तत्र प्रजापति, इन्द्र, अग्नि, सोम, थाज्येन, सवितृरूपांभुवनेश्वरी श्राज्येनाज्याभिघारित दूर्वातिल यव द्रव्यश्च, अग्निं, वरुणंसवितार विष्णु विश्वान्देवान्मरुतः स्वर्कान, वरुणं, प्रजापति, प्रग्निवैश्वानरं चाज्येनाहयदये । इद माज्यमाघाराज्य भागदेवनाभ्यः प्रजापतये, अग्नयेच मयापरि- त्यक्तं यथादेवतमस्तु- ॐ तत्सन्नमम । एवं यजमानेन द्रव्यत्यागे कृते । प्राचार्यः ब्राभान्वारब्धः कुर्यात् । ततः संस्रवधारणार्थ ..
कमकाण्उरत्नाकरे, दुरिजोदर्शनशान्तिपद्धति । (६०३) . प्रोक्षणीपात्रं प्रणीतागयोरंतरालेनिदध्यात् ।। प्रजापतयेस्वाहा इदं०,इतिमनसामजापतिध्यात्वा इन्द्रायस्वाहा,इदं० अअग्नये स्वाहा,इदै० सोमाय स्वाहा । इदंइत्याधारावाज्यभागो चहुत्वा प्रधानहोमं कुर्यात् (संस्कारको स्तुभेतु सवितृत्वेनभुवनेश्वर्याएव पूजनंचोक्तम् अतोगायन्याजुहुयात् )/गायत्रीमंत्रस्यविश्वामित्र ऋपियत्रीछन्दः सवितादेवता प्राज्यदूर्वादियवतिल होमेथि- नियोगः ॐ भू० तत्सवि० स्वाहा । इत्याज्यदृर्वातिल यचादिभिः १०८ आहुतिप्रधानहोमंकृत्वा ब्रह्मणा इन्वारब्धः अाज्यादिभिः स्विष्ठकृतंहुत्वा भूरादिव्याहाहृति होम सर्वप्रायश्चित्त होम च कुर्यात् । ततः संस्रवंप्राश्य पवित्राभ्यां मुखसमााग्नौ पवित्रे क्षिप्त्वा प्रणीताविमोककुर्यात् । ब्रह्मणे पूर्णपात्रदानम् अद्येत्यादि अमुकोहं कृतस्य दुष्ठरजोदर्शन शान्तिहोमकर्मणः सत्पुण्यार्थ । अपूर्णपूर्णतासिद्धये ससुवर्ण सदक्षिणचेदं पूर्णपात्रं ब्रामणेतुभ्यं संप्रददे । 30 अक्रन्कर्म० इतिपठेत् 30 तनूपा अग्ने रित्यादिभि रगान्यालभेत ततः पूर्णाहुतिंजुहुयात् ततस्यायुपं कुर्यात् । ततः सपत्निकोयजमानो गोदानकुर्यात् । अशक्तश्चे त्तिलपात्रादि दा. नार्थ संकल्प:-अद्येत्यादि देशकालो संकीामुकोह ममास्याभा- र्यायाः दुष्ठरजोदर्शन सूचितारिष्ठनिवृत्तिपुरः सरंसकलसौभा- ग्य प्राप्त्यर्थ श्रीपरमेश्वर प्रीतयेभुवनेश्वरी शान्निकर्मणः सांगता सिद्धये, दद ससुवर्ण सदक्षिण गोप्रत्याम्नायी भूतंद्रव्य, प्राचा. र्याय तुम्यसंप्रददे एवं नवावृत्ति चंडीपाठस्य रुद्रीपाठस्य होतु श्चदक्षिणां तत्तेदाचार्येभ्योदद्यायान् । ततः क्षेत्रपालाय वलिंदत्वा अग्निसम्पूज्य विसृज्य च ततः प्राचार्यादयः कलशजलेन यजमा- नमभिषिचेयुः । तिलकं कृत्वा रक्षासूत्रवध्वा घृतच्छायादर्शनं कारयित्वा तदानं च विधाय ब्राह्मणान्भोजयेत् तस्यामेवरात्रौ गर्भाधान सस्कोरंकुर्यात् । ।। इनि दुष्ठरजोदर्शनशान्तिः ।
(६०४) कर्मकाण्डलाकरे, श्रीशान्तिपद्धति. अथ संस्कार्य मातरजोदर्शने श्री शान्ति परिभाषा-- उक्तं च मुहूर्त चिन्तामणी-प्रातुमत्याः सूतिकाया सूनौश्चौलादि नाचरेत्-उक्तं च प्रवेतसा-यस्यमागलिकं कृत्यं तस्यमाता रनस्खला । वैधव्यं जायते तन मनाया. पाणिपीउने । ज्योतिनिबंधे गा - विवाहोत्सर यज्ञेषु मातायदि रजरना । तदास मृत्युमाप्नोति परमंदिवसंबिना वसिष्ट ---यस्यमालिकार्य तस्मातारजस्वना । अतः । तत्रै वृहस्पति -प्राप्तमभ्युदय श्राध्दं पुत्रसंस्कारकर्मणि । पत्नीरजालाचे स्यानकुर्यातलिताता । माधवीये-प्राररभोत्तर गोदर्शने न कनिषेध इत्यर्थ ॥ प्रारंभश्च नानाश्राद्धम् ॥ मेघातिथि ---प्रारंभोवर यज्ञे समापीनत शत्रयो । नाबाद विवाहादी योध्देशक परिक्रिया । मुहर्त चिन्तामणी-तान्दीश्राध्दोत्तर मातु पुणे लगातरेनहिं । शान्त्याचौल ब्रत पाणिग्रह कार्यान्ययानसत् ॥ वृहस्पति --धन्यच विवाहस्यानडत्वं मनवयन । चूड़ायां च शिशोमृत्यु विघ्नयात्रा प्रवेशयो । वाक्यसारे तु-अलाभे सुमुहत्तस्य रजोदोपे युगस्थित त्रिय संपूज्य विधिवत्ततो मगलमाचरन । हेमीन पमितामा श्रीसूक्तविधिनायत् प्रवृच पायस हुत्माभिषिच्याहतमाचरेत् । संग्रहे तु प्रकारान्तर मुक्तम्---संकटे समनुप्राप्ते सतके समुपागते ॥ कूप्नांडीभिघृत (त्ता गा च दद्यालयस्विनीम् । चौलोपनयनोद्वाह प्रतिष्टारिकमाचरेत् । इति ॥अथसंस्कार्यमातरजोदर्शनश्रीशान्तिपद्धतिः॥ n अथसंस्कार्यस्यच सुतस्यकन्यायावा चूडोपनयन विवाहादिषु, मातुर्नान्दीश्राध्दोत्तरं रजोदर्शनंजातंचेत्तदा संस्कार्ययोः पिता संस्कारकर्तावा, शुचौदेशेगणेशंसम्पूज्य, कलशस्थापन विधिना कलशंसंस्थाप्य, सम्पूज्यच तत्रकलशे पूर्णपात्रोपरि ताम्रादिपात्रं स्थापयित्या, तबमापमितांसुवर्णप्रतिमांश्रीस्वरूपिणीमग्न्युत्तारण पूर्षिकांसंस्थाप्य, संकल्पंकुर्यात्-अद्यत्यादिदेशकालौ संका मुकोऽहं ममास्थामुकस्य बीजगर्भसमुद्भवैनो निवर्हणद्वाराकरि- प्यमाण चूडोपनयनपाणिग्रहणादिकर्मसु (चाकन्यायाःकरिष्य- माण विवाहकमणि) संस्कार्यस्यमातुर्नान्दीश्रादोत्तरंरजोदोपस जातस्यतत्तदोपोपशान्त्यर्थ, शुभफलप्राप्तयेन, । श्रीशान्तिकर्म- णिसुवर्षपतिमायांश्रीपूजनं श्रीसूक्तस्यनयावृत्तिपाठपूर्वक सप्त- कर्मकाण्डरसाकरे, श्रीशान्तिपद्धतिः। (६०५) , शतीपाठंचाहं ब्राह्मणद्वारा कारयिष्ये तच्छांत्यर्थं पायसेनहोम कारयित्वा गोदानंचकरिष्ये । ततयाचार्यवृत्या पाठकांश्चवृणु- यांत-ततः-30 हिरण्यवर्णा हरिणीमितिनाग्वेदोक्तश्रीसूक्तेन पोडशोपचारै श्रियंसम्पूज्य, श्रीसूक्तस्य नवावृत्तिपाठंकृत्वा सप्त शतीपाठंकुर्यात-ततःपाठावसाने, हस्तपरिमितंस्थंडिलहोमार्थनि- भय होमपद्धत्युक्तप्रकारेण समिदाधानान्तंकर्मकृत्वा । ॐ वरदा ग्नयेनमः इति मन्त्रेणवरदाग्निसम्पूज्य । आधारावाज्यभागीहु- त्वा, चरुणापायसेन श्रीसूक्तस्यप्रत्चेन नवार्णयमन्त्रेणाष्टोत्तर- शताहुतीर्हत्वा भूरादिनवाहुतिहोंमें पूर्णाहुत्यन्तंकृत्वा । ततःपूर्वी क्तप्रकारेण कुमारीपूतांकृत्वाभोजयित्वा ताभ्योदक्षिणांचदत्वा । गोदानपद्धत्युक्तप्रकारेण तद्दोपशान्त्यर्थ गोदानकुर्यात् ॥ तत श्राचार्यपाठकेभ्योदक्षिणांदत्वा । ततश्राचार्य उमाराङ्गपूजनंविधाय कलशजलेनसंस्कार्य श्रीसूक्तनाभिषिच्य पूर्वोक्ताभिषेक मन्त्रैरपि- पिंचेत । ततस्तिलकारोपणादिकं कृत्वाशीर्दद्यात ततोत्राह्मणा म्भोजयेत्। इतिश्रीशान्तिपध्दतिः॥ कन्या रजोदर्शन शांतिपरिभाषा। - अथ रितगृहे विवाहात्पूर्वमेव कपारजस्वला चेत्तनिर्णय शान्तिश्चवक्ष्ये, उक्त च सस्कार कौस्तुभे मदन रत्ने-वशिष्ट ---मस्कृतागृहे रजस्वला भवेद्वधूरचे । वृपलोमतानुमा । मातापिताज्येष्ट सहोदरश्च प्रजन्तिपीर नवनयोऽपि न य शहेन्तां प्लीपति स्याद्या - ग्योनपिन्य न च यसरन्यो । अनो न कयौदने विळच क्योनग्निा दाम्पतोत्र । प्रतीक्ष्यवर्पवयम प्रपतारजस्वलासाप्रारीतुनुनम् । कन्या रजोदोघे शान्तिः-मामृतुमतासुध्धा वानिकृतिमात्मन शुचिकारयित्वातामुद्रह दवैराग्यो । सन् चपुयाहतु गणयटादित दुधौ । दानापिगृह यहा। पोलयरोताम् । यथा तत्तु या गा शर, कन्याधिकादि वारा यागिनि रनदान तस्यायथा- विधि दयाद्वाहापामानि व राक्षिणम् । सम्यानातवेयु वराय प्रतिमाश्यत् । उपाध्यतिदिन पारानीपीत्वा गाय । प्रदृष्टर नमधारयमाणै तभूपणाम् । नामुद्र सरी पाडेजुहुयाद्विशः । यक्षपा:-विवाहे तितने होतकालपस्थिते । भ्यागृनुमतीशास्थं कुर्वन्तियाशिफा स्नापयित्वा १६०६) कर्मकाण्ठरत्नाकरे कन्यारजोदर्शनशापितदति । - तुताकया मर्वयित्वायथाविधि युंजानामाहुति हुत्वा ततस् विपत्तयेत् । वौधयनसूत्रे- --अथ यदिकन्नो स्यगोनावोद्यमानायां रजस्वलास्यात्तामनुमत्रयेत् पुमांसौमित्रावरुणा पुपांसावश्विन वुभौ । पुनानिन्द्र- श्वसूर्यश्च पुमा पसन्दधात्विति । अय द्वादशगननलंकृत्या प्राशये सब गन्यमयशुद्धाकृत्वाविवहेत् । मथ च वरोह पुराणाकात्यायन विधानेन पितृाहे कापाया रजोदशेनशांतिरित्यं सूत्रित- अत्र देवता गणेशमिद्धि बुद्दीन्द्रेन्द्राणी विनाश्रिय अामा प्रतिमा: सम्पूच्च । अग्नि संस्थाप्य भाज्यभाग'- ते गणानान्वेतिगरेश, अम्बे अधिके, इति मिनुिद्धिं च इन्द्रदेवा, इति इन्द्रद्र रायो । इदं विष्णु रिति विष्णु, श्री श्यते इतिश्रियम् । सम्पूज्य एभिरेय मत्रैरष्ट विशति सख्यया प्रत्यकं जुहुयात् । तथैव ग्रहाण मनैरपि प्रत्येकपष्टा विंशतिपख्यया होम विधाय ततो भूरादि विष्टकृदन्त पूर्ण इति च हुबोत्तरागत्वेन गणेशादी-संपूज्य दिया लेभ्यो वलिदान वियाय प्राचार्याय गोवस्त्र हिरण्यादि प्रतिमामि सददद्यात् । तत आशिषं गृहीत्वा ब्राह्मणान्भोजयेत् । इति कन्यारजोदशेने शान्ति परिमापा । - कन्या रजोदर्शनशांति पद्धतिः अथ च कन्या पिना कन्या विवाहत्पूर्व विवाहसन्निधौ चूहाभ्य. तरे पूजास्थलमागत्याचम्ब दीपप्रज्वाल्य प्रधानसंकल्पं कुर्यात- अद्यत्यादि देशकालौ सकीामुकोहं, ममगृहेकन्यायाः जात प्रथमरजोदर्शनसूचित समस्तप्रायश्चित्तनित्यर्थवराह पुराणोक्त प्रकारेण शान्तिकरिष्ये, तदंगतयागणेशादि पंचांगदेवतानांपूजन पूर्वकं, प्राचार्य ब्रह्मणोवरणं च करिष्ये-ततोगणेशादि पूजनं विधाय हस्तपरिमितायांवद्यां पंचभूसंस्कार पूर्वक वरदाग्निमा- वाहसंस्थाप्यप्राचार्य ब्रह्मणोवरणं कृत्वा, होमवेदीशाने कलश- स्थापन विधिना कलशं संस्थाप्य,तत्रताम्र पात्रोपरि गणेशादीनां सप्तसुवर्ष प्रतिभावारजतप्रतिमाः संस्थाप्य ॐ गणानान्त्वा० इति मंत्रेण गणेशमावाहा, 30 अम्बे ऽअम्बिके ऽअम्बालिकेनमा नयतिकश्चन । ससस्त्यश्चकः सुभद्रिकोकाम्पीलवासिनीम् । इति सिद्धिबुद्धिम् । ॐ इन्द्रदेवाऽयावृणानाःसुमृटीको भवतुजातवेदा इति इन्द्रद्राण्यौ० । ॐ इदविष्णुर्विचक्रमेत्रेधानिदधेपदम् । समृह मस्यपासुरेस्याहा । इति विष्णुम् ! 30 श्रीरचतेलक्ष्मीश्च० । .
कर्मकाण्डरसाकरे, गोमुखप्रसव शान्तिपरिभ.पाः (६०७) इतिश्रियं । पंचोपचारःसंपूज्य । वरदाग्निंच सम्पूज्य द्रव्यत्याग संकल्पंकुर्यात्-वाद्येत्यादिसंकीर्त्य स्वगृहजात कन्यारजोदर्शन शान्तिकर्मणि आघाराज्यभागावाज्येन गणेशसिद्धिबुद्धीन्द्रेन्द्राणि विष्णुश्रियः प्रत्येकमष्टाविंशति संख्ययाज्येन सूर्यादि ग्रहांश्चता- भिरेव संख्याभिातत्तन्मंत्रर्तुत्वा स्विष्टकृतं भूरादिनवाहुति होमा न्तेचाज्येनयदये । इति द्रव्यत्यागंकृत्वा गणेशादीन् प्रत्येकंपूर्वोक्त मंत्रैस्तेनैवक्रमेण प्रत्येकमष्टाविंशति संख्ययाहुत्वा तथा च नवग्र- हान् तत्तन्मत्रःप्रत्येकमष्ठाविंशति संख्यया चहुत्वा स्विष्टकृदन्ते भूरादिनबाहुति होमविधाय संश्रव प्राशनादि पूर्णपात्रदानान्तं कर्मकृत्या पूर्णाहुतिहुत्या उत्तराग पूजनंविधाय । प्राचार्य संपूज्य गोदानोक्तपध्दत्या सवत्सांगां सम्पूज्य संकल्पकुर्यात् । अयेत्या- दि. अमुकोऽहं ममगृहे कन्यायाः प्रथमरजोदर्शनजात सकलमा- यश्चित्तपरिहारार्थ वराहपुराणोक्त शान्तिकर्मण: सादगुण्यार्थ इमांगां चा गोप्रत्याम्नायीभूतं सुवर्ण रजतंवा प्राचार्यायतुभ्यं संपदे 30 तत्सन्नमम इनिदत्वा घृतच्छायादिकंकृत्याभिषेक तिलकाशीग्रहण च कृत्वा ब्राह्मणाम्भोजलित्वा स्वयं जीत । इति पितगृहे विवाहात्पूर्व कन्यारजो दर्शनशान्ति: .0' अथगोमुख प्रसव शान्ति परिभाषा । तमादपहुशान्त्यंगत्वाद् गोमुखासचोभिधीयते, प्रयोग पारिजाते-गर्ग:-प्रणिपत्य रविवारी प्रायश्चित्त मनुम्मरन् । सर्वारिष्ट विनाशाययदु ज्योतिरर्णवे ॥ पिनश्टि सुतारिष्ठे मारिष्ठे तथैव च । प्रायश्चित्तंतदा कुर्यात्तत्तदोषस्यशान्तये । पूषश्विनौ गुरुः सा मयाचित्रेन्द्र भूलभे । एतेषु जातस्य बुद्गिी जननं तथा । (अत्र प्रायश्चित्तं मूलादि शान्ती गोजननं कुर्या दित्यर्थ.) जन्मतात्रजन्भर्ने, शुभवारे शुभेदिने । कृत्वाभ्यंगादिकं सर्प गृहालबार पूर्वरम् । गोमये नोपलियाध गृहस्ये शान भाये। पंजे कर्गिका युफै रजाभिः क्षेत वर्णके । ब्रही स्तन विनिक्षिप्य यथा वित्तानुसारत । नव सूप॑ च तन्मध्ये रक्त पर प्रसारयेत् । स्थापयित्या शिशु तत्र पुन, सूत्रेण वेष्टयेत् । प्राट् मुख तम व पादं तिल (६०) कर्मकाण्डरमाकरे, गोमुखामवशान्तिपद्धतिा । गर्भ गत शिशुम् । गोमुखदर्श यित्वाथ पुनांत तुगोमुखार (शिशुमभि गोमुस दर्श यित्वेत्यर्थ ) विष्णुर्यानीनिसून गव्येन सापच्छिशुम् (पचगव्येन ) गयामगेषु मप्रेण ग्या मगेषु सस्पृशेत् । विष्णो श्रेष्टेतिमनण गोप्रसूटतुवालकम् । प्राचार्यस्तु समादाय पश्चान्मात्रे ददेत्तदा । ज्योतिर्निवन्येतु-साचार्य स्तुसमादाय पश्चन्माने ददेपितेतिपाठ ॥ माताजघन भागस्था शिशुमानीय त मुखात। (गोमुगात) तत पित्रे तुसादद्य त्ततोमात्रे सदापये। वले स्थाप्य पिताऽग्याथ पुनस्य मुसमीक्ष्ये। गोमुन गामयतर दधिसपिश्च सयुतम् । आपोहिष्टादिभिमत्रै रभिषिचेत्तत शिशुम् । मूनच प्रायत पुन र मन्त्रेण तदापिता । (अगा दगात्संभवसीत्यनेन मत्रेण ) मूर्धनि निस्वन यत शिशु स्थापयत्तत । पुण्याह पाचयेहप या ब्रह्मणै यदपारौ । दरिद्रायाथ विप्राय तागामभ्यर्थंदापयेत् । गोपरत्र स्वर्ण पान्यानिदद्या- दो दित मार (सूर्यादिग्रहेभ्यो दद्यात् ) पाशक्ति यनदद्याद्ब्राह्मणेभ्यरतदा पिता । ततो होम प्रकुर्वं तस्वस्व शासातमागन । उल्लेखादिक कृत्वा आज्यभागान्त माचरेत । होमस्ये शान दिग्भाग धागोरि घट शुभम् । पचगय घटे स्थाप्य तिलास्तत्र विनिक्षिपेत् । क्षीरदुमपाय पञ्चरत्नानि निक्षिपेत् । ५६नयुग्मन सवाद्य ग्धादिभि स्याचयेत् । विष्णु परुणमभ्यस्य प्रतिमा च विधानत । यत इन्दादिभिमत्र कुभस्पृश्या भमनयेत् । (यतइन्द्रति पड़चस्य सूक्तस्य ग्रहणम् ) दविमध्यज्य टुक्तेन होम पुय द्विधानत । थापो हिटेति तिसूभि रमेसोमइया तद्विष्णो परम पद मक्ष भ्या मिति सूक्त । ऋम्भिराशि प्रत्यच चटाविंशति सत्यया । अशक्तौ चाष्ट ररय वादधिमध्याज्य संयुतम् । श्रादित्यादिग्रहाणां च होम कुर्यात्समप्रकम् । श्रादि त्यादि ग्रहाणां च होम दधिमध्यान्यनेत्यन्वय ध्यादि ग्रहणस्य पैयथ्यांपत्ते । इतिग्गेति गोमुख प्रसव शानि परिभाषा ॥ अन्यथा पुपर्द -0-re ॥अथगोमुखप्रसवशांतिपद्धतिः॥ अथपिताजोतकस्य जन्मनक्षत्रदिवसेऽन्यस्मिन्शुभदिने नाम कर्मदिनेवागृहाभ्यन्तरे गोमयोपलिप्तेशुचौदेशे स्वासनेउपविश्य- दीपप्रज्वलय्याचम्यभूतोत्सादनादिकंकृत्या, शास्तिपाठंकृत्वा यघसंस्थाप्यगणेशप्रणम्यप्रधानसंफरपंकुर्यात्-प्रद्येत्यादिदेशका- लौसकीामुकोह ममुरुनक्षत्रोत्पन्नस्यामुकरागेरस्य शिशोरमुक नक्षत्रोत्पत्ति चितारिष्टनिरसनपूर्पक श्रीपरमेश्वरमीतये गोमुग्व कर्मकाए रत्नाफरे, गोमुगप्रसवशान्तिपद्धतिः। (६०६) प्रसवशान्तिकरित्ये, तत्पूर्वांगत्वेन गणपतिपूजनं कलशस्थापनपूर पकवरुणपूजांपुण्याहवाचनाभ्युदयिकमातृकापूजनंसूर्यादीनांपूज- नंचकरिष्ये , ततोगणेशादीन्सम्पूज्य, प्राचार्यस्यपूजनपूर्वकंचरण- कृस्था, ततवाचार्योगोमयोपलिप्तभूमौ कर्णिकोयुतश्वेताप्टदलं कमलविलिख्य तन्मध्देवित्तानुसारेण द्रोणादिपरिमितान्त्रीही. न्संस्थाप्य तदुपरिनचीनशूर्पनिधाय तस्मिनरत्तवस्त्रप्रसार्य तिल पूरितंकृत्वा तत्रैवतिलगभगतशिशुं पूर्वशिरस्कंप्रत्यक्पादकृत्वा शिशुससूर्परक्तसूत्रेणावेष्टय शिशुसन्निधौपूर्वाभिमुग्वींगामुपस्था- प्य, गोमुग्नशिशोरपरिकृत्यागोमुग्यात्प्रसवं, भावपित्याशिशुपञ्च गव्येन, वक्ष्यमाणशतपथोक्तेनसूक्तनस्नापयेदभ्युक्षेद्वा-मन्त्रा:- 30 विष्णुर्योनिंकल्पयतु त्वष्ट्रारूपाणिपिट० शतु । ग्रासिंचतुप्रजा पतिर्धातागभन्दधातुते ।। 30 गर्भधेहिसिनीवालिगभन्धेहि- पृथुष्टुके । गर्भन्तेऽअश्विनौ देवाचाधतांपुष्करस्रजी ।। 30 हिरण्ययीऽधरणीयाभ्यांनिर्मन्यतामश्विनौदेवी । तन्तगर्भदधा महेदशमेमासिसनवे ।। इतिसूक्तेन शिशंस्नापयित्वाऽभ्युक्ष्यवा। वक्ष्यमाणमन्त्रेणगोःसर्वाङ्गेपुस्पृशेत्-मन्त्रा~30 गवामॅगेपुति- टन्तिभुवनानिचतुर्दश । यस्मात्तस्माच्छिवं मेल्यादिहलेोकेपरत्रच । इतिगोरंगानिस्पृष्ट्वा । ततप्राचार्यतिंगोमुग्यप्रसूतवालकं वक्ष्य- माणमन्त्रएशूदुत्थाप्यगोजघनभागस्थायैमानेदद्यान्तन्मन्त्र:- 30 विषयोःश्रेष्टेनरूपेणास्यांनाऱ्यांगवीन्याम् ॥ पुमांसंपुत्रानाधे- हिदशमेमासिसृतवे । इतिमाताचप्वालहस्ताभ्यांगृहीत्वा । गोमुग्वपर्यन्नमानीयपित्रेदद्यात । पितातंशिशें हस्ताभ्यांगृहीत्वा तदेवमात्रेदद्यात माताचतंशिशंभूतन वस्त्रेस्थापयेत् । ततापिता नव्यवनस्थितस्य शिशोमवपश्येत् ततश्राचार्योवक्ष्यमाण त्रिभि मंत्र:पंचगव्येनाभिषिचेत । मंत्रा: -आपोहिष्टेतितिरुणां सिन्धु द्वीपभाषिर्गायत्रीछन्दः पापोदेवतापंचगव्याभिषिचने विनियोगः ॐ आपोहिष्टामयोभुव स्तानऽऊर्जेदधातन । महेरणायचक्षसे योवाशिवतमोरसस्तस्य भाजयतेहनः ।उशतीरिवमातरः। ७१ (६०) कर्मकाण्डरत्नाकरे गोमुखप्रसवशान्तिपद्धति ।। ॐ तस्माऽअरइमामवो यस्यक्षयाय जिन्वय । आपोजन यथाच नः। इत्यभिषिच्य वक्ष्यमाण मन्त्रेण मूर्ध्नि शिशुं त्रिरवघ्राणं कुर्यात् । मंत्र:--ॐ अंगादंगात्संभवसि हृदयादधिजायसे । श्रात्मा पुत्रनामासि सजीव शरदः शतम् । इति वारत्रय मवघाय, मात्रे दद्यात् । ततो ब्राह्मण द्वारा पुण्याह वाचनं वाचित्वा, तां गां दरिद्वाय कुटंविने ब्राह्मणाय दद्यात- तत्र संकल्पः-अद्यत्यादि संकीर्त्या मुकोऽहं, अमुकराशे रस्यशिशो रमुक कालोत्पत्ति सूचितारिष्ट दरी करण) श्रीपरमे- श्वर प्रीतये कृततद्गोमुख प्रसव शान्तिकर्मणः सांगता सिध्दये, इमासवत्सांगारुद्रदेवतां अमुकर्मिणे ब्राह्मणाय तुभ्यमहं संप्रददे। इतिदत्या गोदान प्रतिष्ठार्थ सुवर्णांच दद्यात् । ततेो ग्रहाणां प्रीतये यथाशक्ति गाभूहिरण्यवासांसिदद्यात् । ततार्यो होमवदी सन्निधावागत्य, वेद्यो पचभू संस्कार पूर्वक मग्निं संस्था- प्य वेदीशाने कलश पूजोक्त विधिना कलशद्वय स्थापयेत् । तत्रैक- स्मिन्कलशे ब्रह्मवरुण सहितानादित्यादि नवग्रहान्नावाह्य संपूज्य च, द्वितीयकलशे पश्चरत्न पञ्चपल्लवान् पंचगव्यं तिलान् क्षीरवृक्ष त्वकषायांश्च निक्षिप्य युग्मवस्त्रेण संछाद्य पूर्णपात्रोपरि ताम्रपात्रे तिम्घुसुवर्ण प्रतिमासु, अग्न्युत्तारितासु विष्णुवरुणयक्ष्यघ्नान्स्था पयेत्पूजयेच्च । तत्रादौ विष्णुमन्त्रः-30 तद्विष्णोः परमं पद र्ट। सदा पश्यन्ति सूरयः । दिवीच चक्षुराततम् । ततोवरुणम्-30 तत्वायामि ब्रह्मणाव्वन्दमानस्तदाशास्ते यजमानो हविभिः । महेडमानो वरुणोहयोध्युमश ० समानऽत्रायुः प्रमोपीः । ततो पदमहणम्-ॐ अक्षीभ्यान्ते नासिकाभ्यां छुचुकादधि ॥ यक्ष्म शीर्षण्य मस्तिष्का ज्जिाया विवृहामिते । इति त्रीन्देवान्संस्था प्य । एतन्ते० पठित्या, अभूर्भुवः, स्वःविष्णुवरणयक्ष्मणः, इहागच्छन्त्यितिष्टन्तु सुप्रतिष्ठितावरदाभवन्तु, इति प्रतिष्ठाप्य। पूर्वोक्त मंत्रैर्वा नाममंत्रैः सम्पूज्य-तत्कलशं स्पृष्ट्वो, वक्ष्य- माष सूक्तं पठेत्-30 यत इन्द्रभयामहे ततोनोऽअभयंकृधि । .
कर्मकाएटरलाकरे, गोमुराप्रसवशान्तिपद्धति (६११) N मघवन्धि तथतन्नऽअतिभिर्थिद्विपोविमुधोजहि ॥१॥ त्वंहिराध- स्पतरोधसोमहः क्षयस्यासि विधतः । तत्वावयं मघवन्निन्द्रगिर्व- ए: सुतावन्तो हवामहे १२१ इन्द्रः स्पल्लुत वृत्रहा परस्यानो व्वरेण्यः । सनोरक्षिपच्चरम समध्यमं सपश्चात्पातुन:-पुरः ।। त्वनः पश्चादधरा दुत्तरात्पुर इन्द्र निपाहि विश्वतः । श्रारे अस्मत्कृणुहि दैव्यं भयमारे हेतीरदेवीः ।४। अद्याद्या श्वश्वहन्द्रत्रा स्वपरेचनः । विश्वाचनो जरितसत्पते श्रहादिवा नक्तंच रक्षिपः १५॥ प्रभंगीशूरो मघवातु वीमघः संमिश्लो वीर्यायकम् । उभाते वाह वृपणाशतक्रतोनियावजू मिमिक्षतुः। ततोयजमानो द्रव्यत्यागं कुर्यात्-पयेत्यादि देशकालौ संकीयोमुकोहं गोमु- ग्य प्रसव शान्तिकर्मणि, पद्धत्युक्त विष्यवादिदेवेभ्यःपूर्वाङ्गदेवेभ्यः प्रधान देवताभ्यो दधिमध्वाज्यद्व्यैः प्रत्येकमन्नपाटाविंशति श्रष्टान्यतर संख्या हुतिभिः । उतरोङ्ग देवताभ्यश्चमयापरित्यक्तं, तत्तदैवतमस्तु नमन ॥ तत आचार्यों ग्निस्थापन होमपद्धत्यनु- सारेण ब्रामोपवेशनादि पर्युक्षणान्तं कर्मकृत्वावरदनामाग्न- येनमः, वरदाग्निमावाह्य 30 एतन्तेति, प्रतिष्ठाप्य, सम्पूज्यच । अग्निप्रणीतयोर्मध्ये प्रोक्षणीपात्रं संस्थाप्य, ब्रह्मणान्वारब्धा, श्राधारावाय मागौचहुत्वा अनन्वारब्धः प्रधानहोम कुर्यात्- तत्रादौ-30 तद्विष्णोरिति मेधातिथि ऋषिर्गायत्रीछन्दो विष्णु देवता, दधिमध्याज्य, मिश्र होमेविनियोगः । ॐ तद्विष्णोः परमंपर्ट सदापश्यन्ति सूरयः । दिवीय चक्षुरा ततम् स्वाहा। इत्ति मंत्रेण विष्णुमष्टाविंशत्याहुतिभिर्जुहुयात् ।। असक्तश्चेदष्ट संख्यया जुहुयादेवं सर्वत्र बोध्यम्-30 आणेहिति लिसणां सिन्धुद्वीप ऋषिर्गायत्रीछन्दऽआपोदेवता दधिमध्वाज्य मिश्र होमेविनियोगः ॥ 30 आपोहिया मयोभुवस्तान जर्जदधातन । महेरणायचक्षसे स्वाहा-इदंवरुणाय । पूर्ववत् २८ संख्यया 30 योवः शिवतमोरस स्तस्यभाजयतेहनः उशतीरिवमातरः स्वाहा- इदंवरुपाय ।। तस्माऽभर गमामवो यस्यक्षयाय जिन्वय सापो कर्मकाण्डरताकरे, गोमुखप्रसवशान्ति पद्धति जनयधाचनः स्वाहो- इदंवरुणाय, 30 अप्सुमे सोम इतिमेधा- तिथिर्गपिरनुष्टुप्छन्दः प्रापो देवताः, दधिमध्वाज्य मिश्रहोमे विनियोगः ।। 30 अप्सुमेसोमोऽब्रवीदन्त विश्वानि भेषजा । अग्निंच विश्वसभुवमापश्च विश्वभेपजीः स्वाहा -इदंवरुणाय- पूर्ववत् २८ संख्यया । अक्षीभ्यामिति परणां मन्त्राणां कश्य- पो विवृहा ऋपिरनुष्टुप्छन्दो यदमहादेवता दधिमध्याज्य मिश्र होमेविनियोगः । 30 अक्षीभ्यान्ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुयका दधि । यक्ष्म शीर्षण्यं मस्तिष्का जिह्वाया विहामिते -स्वाहा- इदंयमध्ने-२८ सं0 1 30 ग्रीवाभ्यस्तऽउष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो ऽअनुक्यात् । यक्ष्मंदोषण्यं मंसाभ्यां चाहुभ्यां विवृहामिते स्वा- हा । इदंयक्ष्मन्ने । अत्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्टोहदयादधि । यम मतस्नाभ्यां यक्नः प्लोशिभ्यो विवृहामिते स्वाहो-इदं यक्षमध्ने ।२८सं० 30 जरूभ्यान्तेऽअष्ठीवद्भ्यां पार्णिभ्यां प्रपदा- भ्यां । यक्ष्म श्रोणिभ्यां भासदाभससो विवृहामिते स्वाहा- इदंयमध्ने २८ सं० । मेहनादनं करणाल्लोमभ्यस्तेनखेभ्यः। यमसर्वस्मा दात्मनस्त मिदं विहामिते स्वाहा-इदंयक्षमध्ने । २८ सं० ॥ 30 अगदा दङ्गो ल्लोस्नो लोग्नो जातं पर्वणि पर्वणि । यमं सर्वस्मा दात्मनस्तमिदं विवृहामितेस्थाहा-इदंयामध्ने । २८ सं० हुत्वा, ततःमर्यादिनवग्रहाणां मन्त्रैश्च पूर्ववत् २८ संग्व्याया नवग्रहेभ्योहुत्या, 30 अग्नये स्विष्टकृते स्वाहा-इदमग्नये स्विष्ठ- कृते । ततो भूरादिनवाहुति होम पूर्णाहुत्यन्तं कुशकंडिकोक्त नीत्या समापयित्वा । तत:कलशद्वयजलमेकीकृत्यसपत्निपुत्र यज. मानस्याभिषेकं कृत्वा महलतिलकंच कृत्वा पाशीर्वादं दद्यात् । ततो ब्राह्मणेभ्योकर्मनिमित्तक दक्षिणां दत्वा नामपान्भोजयेत् ।। ॥ इति गर्गाक्त गोमुखममव शान्ति पध्दतिः॥ .
'कमका एनाकरे, मूलशान्तिपरिभाषा । (६१३) प्रथमूलशान्तिपरिभाषांवक्ष्ये । उर्फच गहरी चिन्तामणौ~-प्राधेपिता नाश मुपैतिमूल पादेद्वितीये जननी तृतीय। धनंचतुर्थं च शुभोज्यशास्त्या सर्वत्र सत्स्या दहिभेबिलोमम् ॥ मूलवृक्ष विभागो जपणर्णवे- मूलस्तं भात्वचा शारा पपुष्पं फलं शिया । घटिका विभागस्तव ॥ पैदाश्च मुनयश्चय दिशश्च यसबस्तथा । नंदायाणा रसारुद्रा मूलभेदाः प्रकीर्तिताः । फलम्। मूले मूलविनाश: स्यारस्तंभेहानिर्धचयः । त्वचिधात विनाशायशासामातुविनाश कृत् । परापरिपारस्य पुष्पेनु गृावल्लभः । फलेषु लभतेराश्य श.सायामल्प जीवितम् । मास परत्वेन स्वर्गादि वासं भूपाल वल्लभे---वृषालि सिंहेषु पटेषु मूलदिविस्थित युग्म तुलगिगासु । पातालगं मपधनः कुलीर नशे मयविति संस्मरन्ति-फलम् - स्वर्गमूले भवेद्रज्यं प.तालेच धनागमः । मृत्यु लोक यदा मूलं तदा शून्यं समादिशेत् ॥ वशिष्टः-नैन्यभोद्भुत मुतः सुतावा क्षिप्रादयस्य रघपुरं निहन्ति । अभुक्तमूल माह पशिष्ट:-ये टान्ते घटिकाचैका मूलादौ घटिकाद्वरम् । अस मूलमिल्याहु जतितत्र विवर्जयेत् । वृहन्मनुनातु-ज्यशान्तं घटियातु मूलादौ घटिकी र्धकम् । तयारतर्गता नाडी, अभुक्तं मूलमुन्यते । भल्लाट:-अभुक्त मूलसंभवं परित्यजेतु वालक ॥ रामाष्टकं पिताथवा नतन्मुख चिलोकयेत् । अत्रत्याग विधाने स्वत्वस्यापायापातकिर त्यजतो त्यादौ त्यजतेदानार्थत्या गावाच । सिंहादि प्रसूति वन्मूल सूतस्यापि पीडनं भवतीति केचित् तन । सागविधानपि स्वत्वापाये प्रमाणाभावात् । भतश्चात्र त्यजतिना जन्मदर्शना- भायो वा जन्मत्यागपक्ष समाष्टके दर्शनेवाग्यद्वारा जातकर्मादि करणंमध्ये चाकस्मिक दर्शमे शाति पूर्व स्वमंतत्करणम् । अनस्त्यागपक्षपीडनादि भवत्येवेति । पुरयस्वल्प अवश्यत्याज्यत्वात् मूलोत्पन्न प्रतिगृहीतुश्च नत्याग शांतिकादिनप्रत्युत्पत्तिकाले स्क्वाभावन मूलोत्तम पुत्रत्वाभावात् । तस्माचान्ति प्रकुर्वीत ग्रहाणा र चेतसामिति दिक ॥ शत मूलानि देवशमनोहरे- वर्हिः शिखा, हरि कान्ता, सहदेवी, पुनर्नवा, । शरसा, वराहीच, काकजंघा, सुलक्षणा ॥८॥ तुविका चैव, कन्धु., कपूरो, काकवरिलका । काटिकाच, चांका; श्वेताऽकों, व्याघ्र पत्रिका ॥१६॥ दन्ती, चारवगधाच, मुसली, गिरिकर्णिका । इन्दवारुण्य, पामार्ग शसपुष्पी, कुमारिका ॥२४॥ शल्लकी, चाश्वगंधारी, निर्गुडी, देवदालिका । वट:, शमी, तथाप्लक्ष., पालाशो, श्वस्थ एवच ||३|| 'बूत, श्चोदुबरो, जम्बू, नंदीवृक्षो, थवेतमा, पुनागो, थार्जुनी, शोको, वकुलो, श्मंतकस्तथा ॥४३॥ शाल, स्ताल, स्तमालश्च पाटलः शतपत्रिका । मधूपश्च, शिरीषच, श्रोतो, वृहतीद्वयं ॥५२॥ क्ला, चातिबला, चैव पाठा, नागवला, तथा । जातीच मुलरचर केतकी कदली तथा ६१ मातुलिंगी, जगन्ती च, यवानी, पुद्रिका तथा । द्रोणपुष्पा, तथाकुंभी, -
कर्मकाण्डरलाकरे, मूलशान्तिपरिभाषा ।
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श्रीपर्णी, मदनस्तथा ॥६॥ चंपकं, पद्मक, चैव, तथाकांचन पुष्पिका, सिद्धेश्वरी च, पदरी,
राजघृक्षो, धवस्तथा ।।७६॥ कुंदश्च, मुचकुंदश्च, गोजिह्वा, घरकंदुका । डाडिमी, वीजपूरीच,
ब्राह्मी, चामलकीतथा १८४॥ गराज, अथ पुष्पी, मत्स्याक्षी, चाटरूपक । तरंगिणी, गुइचीच,
निशाह्वा, शतमूलिका ६२॥ वाकुची, काकजंघाच, बर्बरी, तुलसी तथा । कुश काशश्चन्नुमुलं
तथासर्षप मूलकम् ॥१००॥ इति शत मूलनामानि ॥
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उतच विधानपारिजातके:-अथात.सप्रवक्ष्यामिमूलजातहितायवै । मातापित्रोधनस्यारिकुलहा त
हितायवा॥१॥ त्यागोव मूलजापानां स्यादष्टान्दात्तुदर्शनं अभुक्तमूल जाताना पग्ल्यिागोविधीयत॥२॥ पर-
शेने वापिपितु सोऽपि तिष्टेममाष्टकम् । एवंदुहितरिपोक्तं मूलजायांग्लंयुधैः ॥३॥ मुख्यकालं प्रवक्ष्यामि
शान्तिहोमस्थयत्नत । जातम्यद्वादशाहेवा जन्मक्षवाशुभेदिने ॥४॥ समष्टके द्वादशाकुद्रेयांच्छान्तिकमा-
दरात् । यदेवशान्तिक कुर्यात्कर्मतत्राचदमहे । सस्कृते पुण्यदशेतु मंडपंकारयदुध ॥६॥ मंत्राभिमंत्रि.
तेस्ताय प्रोक्षितायातितोतत तनोदकुभ सुश्ल- गणरक्त व्रणनिनितम् ॥७॥ सुवलं च निणिक्तं
कारयेनिर्मलाभमा । वस्त्रावगुंठितकुर्यात्पूरयत्तीर्थवारिणा ॥८कूर्चहमसमायुत्तंचूतपल्लवशोभितम् ।
स्वस्तिकोपरि विन्यस्य सक्षीरनुमपल्लवम् ।।६।। द्रोण नाहीश्च निक्षिष्य वेशाने व निधापयेत् । पंचर-
लानि निक्षिप्य सर्वोपधिसमन्वितम् ॥१०॥ अतिधिपुष्पाचे श्रीरुद्रं च स्पृशन् जपेत् षडंगसहितंशान्ये
जपेद्वेदमस्यया ।।११।। वचोदसूतवछन्दोगोरुद्रसामभि एकादशाष्टनिटेक सख्यया शकिनाजपेत्
॥१२॥ तत्राप्रतिरथसूक्त शतरुद्रानुवाक्कम् । रक्षामंत्र तथापुण्य रक्षोघ्नंच स्पृशन्नपेत् ॥१३॥ श्रयम्बक
जपेत्सम्य गठोत्तरसहस्रकम् । एक्वार तथा नापी पावमानी स्पृशजपेत् ॥१४॥ जपस्य पंचकुंभास्युय
वातदलाभत श्रीदस्यकाभश्च सर्वसूक्तानितरतु ॥१॥ तथान्यं च शुभकुम्भं पूर्वोत्तलक्षणेत्तम् ।
चतुष्प्रस्त्रवणं कुर्यात्पंचवक्र तुतद्भवेत् ॥१६॥ गजाश्वरथ्यावल्मीकात्संगमाद्रदगाकुलात् । राजद्वार
प्रदेशाचमृदमानीयनिक्षिपेत् ॥रणा कुम्भस्यनैऋतेदेरी होमस्थान प्रकल्पयेत् । गोमयाल्लेपितदेशे कुयो
स्थडिलमुत्तमम् ॥१८॥ कृत्गग्नि मुखपर्यन्त मुल्लेखादि स्वशास्त्रत । पूर्ण त्रविधानान्तं सा
पूजासमारभेत् ॥१६॥ नत्र देवता र मुवणनप्रयलत निकपात्रणवान पार्दनाय स्वशक्लिन ॥२०॥
प्रतिमलिनणोपेता कारयित्वाविचक्षण यद्वामूल्यसुवर्णस्य स्थापयित्वाप्रपूजयत् ॥२१॥ सुवर्णसर्वदेवत्य
सर्वदेवात्मकोनल सर्वदेवात्मकोविर सर्व वयोमरि ॥२. संस्मरनितिरयामसुमुखनर वाहनम् । रक्षो
शिांसहस्त दियाभरणभूदिनम् ॥२३॥ प्रतिमापूजनायीय वस्त्रयुग्मं प्रकन्ययेन् पाजकारये मौ'
रंजित घोहितंदुले ॥२४॥ विशद्दलोपेते मुफ्लेव कर्णियान्विाम् । तस्योपरि न्यरेत्तानंकलश ताम्र
गुगमयम् ॥२॥ शुस्वाण सशर तनमूलानि निति ॥ मूलानिरातमूलानि स्वयमुगटयत्पिता॥२॥
कर्मकापरलाकरे, मूल शान्ति परिमापर (६१५) --- भगल्याश्वावित्राश्च भीषयः कायाम्यहम् : प्रासांमूलानियगढीयारताला विशेषतः ॥२७॥ दिएकान्ता सहदेवी तुलसी च शतावरी | रथाकणिकामध्ये वस्त्रगन्धाधलकृतम् ॥२॥ कूर्चहेम जलोपेतं कुम्भमाप. घिसंयुतम् । पुम्मोपरि न्यसेद्विद्वान्मूलनवानदेवतम् ॥२६) अधिप्रत्यधिदे याच दक्षिणोत्तरदेशतः मधिय गजवादीज्येष्टानमत्र देवतम् ॥३० पूर्वपाशप्रत्यधिच देवतं पूजयेस्तः । उसरा मार-प अनुराधान्तमर्च ये ॥३१ऐन्द्रादीशानायन्तं पूजयेत्स्वास्वनामतः । स्वलिजकैश्मनेश्वप्रधानादीन्त्रपूजयेत ॥३२॥ पंचामृतेन संस्नाप्य प्रवाहायसमचंयंत् । उपचारः पोशभियद्वापंचोपचारकः ॥३३॥ रक्त चन्दन गन्याय पुषश्चैवसितामितेःमपरशादिधूपश्चपृतदोषस्तथैवच ॥३४॥ सुरांपोलिक मांसाधनेवेदी चौदनादिभिः मास्यमास शुरादीनि ब्राह्मणश्चपिपर्नयेन् ।॥ ३५ ॥ मुरास्थाने प्रदातव्यचारमन्धय मिथितम् । पायसंलवणोपेत मामस्थाने प्रदापयेत् ॥ ३६ ॥ रकगन्धायलामतुयधालाभंममर्चयेत् । पुष्पांना ल्यन्तमभ्यर्च्यहोमकुयायथोदितम् ॥ ३७॥ निवापप्रोक्षणादीनिचरो: फुयायथाविधि । हनिही- त्वा विधिवनेत्यपरचाहुवेत् ॥ ३८ ॥ मोपुणः परापरेति, यन्तदेवातियापुनः । पायस त- सम्भिधेहुवेदष्टोत्तरंशतम् ॥ ३६॥ समिदाण्यचस्पश्चाच्छक्तितः सख्यया हुवेत् । अधिदैवत योश्चापिजुहुयात्स्वस्वमन्त्रतः ॥ ४० ॥ चतुर्थ्यन्तैनमोन्तैश्चस्वाहान्तैश्चसमन्त्रकैः । नक्षत्रदेवता भ्यश्चपायसेनतुहोमयेत् ॥ ४१ ( कृणुष्वेतिपदशभिः जुलुयान्कृसरंततः । गायन्याजातवेदसे- त्र्यंबकमितिकमात् ॥ ४२ ॥ सीरा जन्तितामग्निवास्तोष्यत्यग्निमेश्य । क्षेत्रस्यपतिना, एणना, भग्निदूतं तथैवच ॥ ४३ ।' इतिमन्त्रः कृसरंजुहुयात् )श्रीसूक्तनतथाविद्वान्समिदाग्यचा नकमात् । मष्टोत्तरशतैवापिअष्टाविंशतिभिः क्रमात् ॥ ४४ ॥ अष्टष्ट सख्ययावापिजु,याच्छक्तितोवुधः पन: सोमेन जुहुयात्पायमन्तू त्रयोदश । ४५ ॥ चतुर्गहीतमाज्यंच यातेरदेति मन्त्रतः सूत्रेण जुड्या दाज्य महाव्याहतिभिःकमात् ॥ ४६॥ हुत्वास्यिष्टकृततपश्चात्प्रायश्चित्ताहुतिर्हयेत् ' आचार्यो- यजमानोवावन्हीपूर्णाहुति हुवेत । ४७ । समुद्रादिति सूतेन प्रजापत्याऋचातथा । पूर्णदवि, सप्ततेमग्नेएतैः पूर्णाहुतिहुधेत् ॥ ४८ ।। होमशेषंसमाप्यथवन्हिमारोपयोधः । कुंभाभिमन्नणं कुर्याद्दक्षिणेनाभिमशयेत् । ४६ ॥ मृत्युप्रशमनायाधजपैयंवकरातम् । रुद्रकुम्भोक्तमार्गेपरद्रमन्त्र स्पृशजपेत् ॥ ५० ॥ धूप दीपौचनैवेद्यकुम्म्युग्मेनिवेदयेत । । रुद्रकुंभेनितिषुम्भव )प्रसादयेत्त तोदेवमभिषेकार्थमादरात् ।। ५१ ॥ तस्मिकालेग्रहातिध्यकत्र्तव्यंभूतिमिच्छना । पृथप्रशस्ततेनैव नक्षत्रैश्यासहेबवा ॥ ५२ ।। अभिषेकविश्विक्ष्येपूर्वाचार्यरुदाहृतम् । भद्रासनोपविष्टस्ययजमा. नस्य ऋत्विज्ञः ॥ ५३ ॥ दारपुत्रसमेतस्यकुर्यु:सऽभिषेचनम् । अक्षोभ्यामितिसूतैनपावमानी. भिरेवच ॥ ५४॥ आपोहिष्टेतिनदभिः यतइन्प्रदयेनचासहस्राक्षयचेनापिदेवस्यत्वेतिमंत्रकैः ।।५४॥ शिवसंकल्पमत्रेणवक्ष्यमाणश्चमात्रकैः । तच्छयोरभिषेकन्तुसर्वदोषोपरान्तिदम् ।। ५६ ।। सर्वकाम कर्मकारहरनारे,मूल शान्तिपद्धतिः । प्रददिव्यंमगलानांचमगलम् । वस्त्रातरितकुंभाभ्यापश्चात्तुम्नापयदुध ।। ५७ ॥ तत' शुरलम्बर- घर शुलमाल्यानुलेपन । यजमानोदक्षिणाभिस्तोप्यात्विगादिकान् ॥५८ ॥ कृष्णांपयम्पीनींद- बादाचार्यायसवरसकाम् । निक्रातिप्रनिमापनहेमकुभचदायवेत् ।। ५६ ॥ ग्रहण प्रतिमावत्रतत्त. ज्जापेभ्यश्रर्पयेत् । श्रीरुद्रजापिनदय कृष्णोंनड्वान्त्रयत्नत ॥ ६. इतरेभ्योयथाशक्त्याचदक्षि- णाम् । उत्तालाभेतथादद्य दाचार्यब्राह्मऋत्विजाम् ॥ ६१॥ तन्नन्मल्यप्रदातव्यशत्तयावाधप्रदापयेत् । भाचार्यायचयहत्ततदब्रह्मणेददेत ।। ६० ॥ सदस्यायब्रह्मणो मृविग्यश्चतदर्धकम् । रागहोया. दाशिषस्तभ्य प्राणम्याथ क्षमापयेत् ।। ६३ ॥ दद्याद नपायसादिब्राह्मण भोजयेन्छतम् । अलाभेस- तिपचाशद्दशक्तदल भत ॥ ६४ ॥ सर्वशान्तेश्चपठन ब्राह्मणैराशिपस्तत गृहीतमापयेद्विद्वाग्निप्रति प्रीयतामिति ॥ विधाने चरितेह्यस्मिन्तत शान्तिर्भवेद्ध्वम् । गएडान्तेष्वेवमेवस्या सापाये वेव- मवहि ।। ६६ । पुष्याद्यर्धतथैवच, इतिशातिरत्नादौ ॥ शेष प्रयोग स्पष्ट । इति शौनकोक्त मूल शांति परिभाषा । --- ॥ अथमूलशान्तिपद्धतिः॥ अथचमूलनक्षत्रोत्पन्नसुतयोः पितासूतकातेचन्द्रतारानूकूले द्वादशाहे, पो तयोर्जन्मदेवाशुभेदिने, अष्ठमेमासिवाद्वादशेमासि, वाप्ठमाव्देद्वादशेन्देवा, मूलशान्त्यर्थं शालायांवोगृहोभ्यन्तरे, यथाशक्तिमंडपेंविरच्यस्तभतोरणादिभिः सुसज्यपूजापरलोक्त रतंभमंडपपूजोपध्दत्यनुसारेण सम्पूज्यच, तत्रादौगणेशादिपञ्चांग पूजांकुर्यात् सचविधिः, सपत्निपुत्रोयजमानः प्रातःस्नात्वानित्य क्रियांसमाप्य, मंडपेपश्चिमद्वारेणसमागत्य शुभासनेउपविश्य, रक्षादीपंप्रज्वलय्याचभ्य भृतोत्सादनं कृत्वा पत्नीसपुत्रां स्वदक्षि- पतउपवेश्य, संकल्पंकुर्यात-अवेत्यादि देशकालोसंकीर्त्य, श्रम फगोत्रोऽमुफराशिः सपत्निपुरोऽमुकोहं मूलनक्षत्रोपलक्षितस्य- धर्नधरराशे रमुकवालकस्यामुकचरण सजनमूलनपत्रसूचितपितृ मानायरिष्टनियुत्तिपूर्वक सर्वोपद्रवशान्त्यर्थं शुभफलप्राप्तये श्री पररेश्वर प्रीत्यर्थच शौनकोक्तविधानेन ग्रहयागसहितमलशान्ति- कर्मणि तत्पूर्याद्वात्वेन श्रीगणेश्वरस्यपूजनपूर्वकं कलशस्थापन, , कर्मकार रत्नापारे, मूलशान्तिपद्धतिः। पुण्याहवाचन, नान्दीश्राद्धनवग्रहाणां पूजनंकरिष्ये, तथाचमूल- शान्तिकमसमृद्धये, प्राचार्यत्रमणोः सदस्यऋत्विजांमद्रैकादशि न्यादि, अप्रतिरथसूक्तादिपाठकानां तथामहामृत्युंजयादि जापका नांवात्मणानां पूजनपूर्वकंवरपंचकरिष्ये, ततोगणेशादिपंचांगपू- जांकृत्वा पुण्यतीर्थजलेन वापंचगव्येन, अश्रापोहिष्टा मयोभुव स्तान अर्जदधातनः । मदेरणायचक्षसेयोवः शिवतमोरसतस्यभा जयतेहनः । उशतीरिवमातरस्तस्माऽयरंग मामबोयस्यन्याय- जिन्वयऽथापोजनयधाचनः ।। इतिमंत्रमंडपशालांचाभिपिच्य। मण्डपस्यनै तभागेस्थंडिले सपादहस्नांवेदिकांहोमार्थनिर्माय तत्र होमपद्धत्युक्तप्रकारेण पंचभूसंस्कारपूर्वकमग्निमुपसमाधाय, तद्र क्षार्थमिन्धननियुज्य ततोमंडपेशानभागेरुद्रकलशस्थापनार्थ द्रोण परिमितान्त्रीहीन निक्षिप्यतदुपरिस्वस्तिकाकारयित्वा श्वेतादि- पंचवर्णरंगरापूर्य, तत्रश्लक्षणंसुवर्तुलवृहत्ताम्रकलशं । (अशक्त श्चेत) रक्तवर्णमृण्मयकलशं कलशपूजोक्तविधानेनसंस्थाप्य सम्पूज्यच । तत्कालशरक्तवस्त्रेणावेष्टय तदुपरितण्डुलपूरित ताम्र पानन्यस्य, तत्रवस्त्रसौवर्णीरुद्रप्रतिमामग्न्युत्तारणपुर्वकंपंचगव्य- संस्नापितांसंस्थाप्य । आर्यादिब्राह्मणानाहययथाक्रमेण गन्धा, दिभिःसम्पूज्य घृणुयात्-तत्रसंकल्प-अद्येहेत्यादिदेशकालौ, सकीामुकोहं, कर्तव्यमूलशान्तिकर्मणि । प्राचार्यकमक ब्रह्म कर्मकत्तुं रुदैकादशियादिसूक्तपाठकमका, एतेषायथासंख्यक ब्राह्मणानांपूजनपूर्वक । अमुकामुकत्राह्मणान, एभिवरणद्रव्यैः युष्मान्वृणे, वरणद्रव्यतेभ्योदत्वा, यजमानःसांजलिपुटःप्रार्थयेत- भोब्राह्मणायथाविहितं कर्मकुरुध्वम् । तेचकरवामयथामति,इति युः। प्राय:स्वयंपूजनादिकमकुर्याद्वा,यजमानद्वाराकारयेत् । तत्ररुद्रपूजनम्-संकल्पः-अवेत्यादिसकीामुकोई मूलशांति कमणिबीहपरिस्थापितमद्रकलशे, सुवर्णप्रतिमायां भद्रपूजनंकरि प्ये । एतन्तेतिप्रतिष्टाप्य, पूर्वपूजापटलोक्तवेदोक्त शिवार्चन- पद्धत्यावा . त्र्यंबकं०-इतिमन्त्रेण रुद्रसम्पूज्योपस्पृश्य, ततों मकाएडरत्नाकरे, मूलशान्तिपतिः । . रुद्रकलशादुत्तरस्यां चतुर्दिनुचतुरः कलशान-मध्येचपंचभयथा विधिसंस्थाप्य तत्रचरणमावाह्य पृथक्पृथक् पूजयेत् । तत्रमध्य कलशे पूर्णपात्रोपरि शतमूलानि, तदलाभेविष्णुकान्ता सहदेवी तुलसीशतावरी कुशान्संस्थाप्यवरुणं पूजयेत् । (अत्रपंचकलश- स्थापनमाचाविकल्पमाहुः ) विकल्पपक्षेउत्तरस्थैकस्मिनकलशे शतमूलोदीनिस्थापयित्वावरुणपूजयेत् । ततोरुबैकादशिन्याचार्य:- रुद्रकलशंस्पृष्ट्वा-पडंगन्यासपूर्वकंसांगांद्रकादशिनींजपेत्-(सच विधिःपूर्वोक्तपूजापटलेमकादशिन्यादिपरिभाषायांदृष्टव्यः) ततः पंचकुम्भपक्ष-अप्रतिरथादिसूक्तजापकः पूर्वकुम्भ स्पृशन् ॥ 30 प्राशुशिशान० इत्यादि द्वादशमंत्रान रुझ्द्यष्टाध्याय्यास्तृतीया ध्यायोक्तान जपेदयमेवाप्रतिरथसूक्तः (य० सं० अ०।१७ में ३३ तः ४४ याचत) ततोदक्षिणभस्पृशन, एकादशवारं, रुश्रूष्टाध्या- ययाः पंचमाध्यायस्य, नमस्तेख्द्रमन्यव०, इत्यादि पोडशचं शत- रुद्रानुवाकं जपेत् ॥ ततःपश्चिमकुम्भंस्पृशन, एकादशवारंपूर्वोक्त पूजापटलस्थरतोनसूक्तंजप्त्वा, पुन:- कृणुष्वपाज, इतिपश्च- चस्य वामदेवनापिस्त्रिप्टुप्छन्दोऽग्निर्दयता मलशान्तिकलशेजपे विनियोगः ॥ 30 कृणुष्वपाजः प्रसितिन्नपृथ्वीयाहिराजेामवा २ऽहभेनत्रिष्वीमनु प्रसितिंद्रूणानोऽस्ताऽसिविध्यरक्षसस्तपिष्टैः शतवनमोसऽनाशुया पतन्त्यनुस्पृशधृषताशोशुचानः। तप प्यग्नेजुहापतंगानसन्दितो चिसृजविप्वगुल्का: ।। प्रतिस्पशो व्यिसृजतर्षितमोभवा पायुर्विशोऽअस्याऽअदब्धः। योनोदूरेऽथ घसर्टसोयोऽअन्त्यग्नेमाकिटे व्यधिरादधीत् ।३। उदग्नेतिष्ट प्रत्यातनुप्वन्यामित्रों ओपनात्तिग्महेते । योनोऽयरातिर्ट० समिधानच नीचातघयतमं नशुपकम् ४ अभिवप्रतिविध्या ध्यम्मदा विकृणुष्व दैव्यान्यग्ने । अवस्थिरातनुहि यातनां जामिमजामि प्रमृणीशिवृन् । इतिएकादशवारंजपेत् ॥ तत उत्तरकुम्भस्एशन, अष्टोत्तरसरस्रवृत्त्यः व्यंयकमन्त्रजप्त्वा पार मेकंवदयमाण पायमानीश्चजपेत् ॥ ॐ पुनन्तुमापितरइत्यादि कमकाण्डरमाकरे, मूलशान्तिपतिः ६१६ ) नयमन्त्राणां प्रजापतित्रापिमत्रलिंगोक्तादेवताः, मूलशान्तिकल शेजपे विनियोग:-30 पुनन्तुमापितरः सोम्यासः पुनन्तुमापि- तामहाः । पुनन्तुप्रपितामहाः पवित्रणशतायुपा रा पुनन्तुमापिता महा:पुनन्तुप्रपितामहाः पवित्रेएशतायुषाविश्वमायुप्रश्न ।। अग्नऽआयूॐ पिपवसध्यासुवोजमिपंचनः । आरेवाधस्वदुच्छु नाम् ।३३ पुनन्तुमादेवजनाः पुनन्तुमनसाधियः । पुनन्तुधिश्वाभू. तानिजातवेदः पनीहिमा पवित्रेणपुनीहिमाशुक्रेणदेवदीयत । अग्नेक्रत्वामातूंडरनु १६॥ यत्तेपवित्रमर्चिष्यग्ने विततमन्तरा । ब्रह्मतेनपुनातुमा 1) उभाभ्यांदेवसवितः पवित्रेणसवेनन । माप नीहिविश्वतः । वैश्वदेवीपुनती व्यागाद्यस्यामिमा बढ्य- स्तन्योव्वीतपृष्टाः । तयामदन्तः सधमाधेपुव्ययस्यामपतयोर यीणाम् । ततापंचकुम्भानामुत्तरभागे,शुद्धभूमौचतुर्विंशतिदलं कमलरक्तशुक्लतंटुलैलिखित्वा तन्मध्येकर्णिकायांसुलक्षणंसुवर्णः कलश, वारजततानमृदन्यतमकलशंसंस्थाप्य, तत्राभ्यंतरेशतस लानितदभावे विष्णुकान्तासहदेवी शतावरीतुलसीकुशान्कंकुम पञ्चसुन्धिद्रव्य सप्तमृदादिप्रक्षिप्य, कलशस्थापनविधिना धान्य पूर्णपात्र निधानान्तंकर्मकृत्वा । तदुपरिरक्तवस्त्रे अष्टदलकमल चिलिख्यमध्ये कर्णिकायांनिष्कवातदर्ध चतुर्थाशप्रमाणसुवर्णध- दिनां मूलनक्षनाधिपति नितिप्रतिमां यथोशलक्षण, अग्न्यु तारणपूर्वकं पञ्चांमृतस्नापितांसौवर्णी-30 यन्तेदेवी निलिरा वन्धपाशंग्रीवास्वविन्नृत्यम् । ततेविष्याम्यायुपोनमध्यादथैतपि तुमध्दिप्रसूतः । इतिमन्त्रेणमध्ये संस्थाप्य, एतन्तेदेव० पठित्वा ॐ भूर्भवास्वः मुलाधिपनिते इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितो घरदोभय ।। इतिप्रतिमायांनितिप्रतिष्ठाप्य तदक्षिणभागेमूला घिदेवंज्येष्टानक्षत्राधिपमिन्द्रप्रतिमायांअभृ०इन्द्रेहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्ठितोवरदोभव,निर्गतियामेप्रत्यधिदेवंपूर्वापाढाधिपंतोयम्- अभूतोयह ति००यापनाममंत्र भौचतुर्विंशतिदले पूगी- फलानिसंस्थाप्यतेयुपूर्वदलमार पेशानपर्यन्तंउत्तरापाहाधनुराधाप (६२० ) कर्मकाण्डरनाकरे, मूलशान्निपद्धति चन्तानक्षत्रदेवताः क्रमेणस्थापयेत् ॥ तत्रायंस्थापनेक्रमः-0 भू र्भुवः स्वः उत्तराषाढादेवाः, विश्वेदेवा,उहागच्छन्त्विहतिष्ठन्तुसु- प्रतिष्टितावरदा भवन्तु ॥१ॐ भू० श्रवणाधिप गोविन्द इहो. सु० रा. भू. धनिष्टाधिपावसवः इ० सु०१३ . भू. शत- भिषग्देववरुणड सु० २०१४। 30 भु० पूर्वभाद्रपदाधिप,अजचरण -इ०१30 भू० उत्तराभाद्गपदाधिप, अहिर्वधन्य, इहा० । ३० भू० रेवतीनक्षत्राधिप पूपन,इहागच्छेह तिष्टसुप्रतिष्ठितोवर- दोभव ॥ ॥ ३० भू० अश्विनीदेवौ, दास्त्रौ इहागच्छतमिहतिष्टतं सुप्रतिष्टितौवरदौभवेतम्।। 30 भू० भरणीनक्षत्रदेवयम, इ०सु० व० ।। 30 भू० कृतिकादेव अग्नेइ० ॥१०॥ 30 भू० रोहिणीदेवन- रमन,१११॥ भू० मृगशिरोधिपचन्द्र इ११२। भूप्रार्द्रा- धिपरुद्रइ० ११३॥ 30 भू० पुनर्वसुदेवतेअदितेइ०११४१ 30 भू० पुष्या धिपवाक्पते इ० ॥१॥ ३० भू० श्लेपाधिपाःसर्पाः इहागच्छन्त्विह तिष्टन्तु सुमतिष्ठिनावरदाभवन्तु १३॥ 30 भू० मघादेवाःपितरः, इहागच्छन्तु ।१७अत्रोदकस्पर्शः ॥ ॐ भू. पूर्वाफाल्गुनीदेवते भगइ० ११८1 30 भू° उत्तराफाल्गुनीदेवते अर्यमन्इ० ११६। 30 भूहस्तदेवसूर्य इ० १२०॥ 30 भू० चित्रादेवत्वष्टः इ० २१ 30 भू० स्वातीदेववायो इ० २२ 30 भू० विशाग्वाधिपौइन्द्राग्नीदहागच्छत मिहतिष्टनसुप्रतिष्टितौ वरदौभवेतम् ।२३। ॐ भूर्भुवः स्वः अनु- राधादेवमित्रइहागच्छेहतिष्ठसुप्रतिष्ठतोवरदोभव ।२४। एतन्ते. पठित्वा 30 भूविश्वान्देवानारभ्य मित्रपर्यन्ताश्चतुविंशतिदेवताः सुप्रतिष्टितावरदाभवन्तु ॥ इति प्रतिष्ठाप्य ॥ पूजासंकल्पं कुर्यात् अयेत्यादिदेशकालौसंकीर्त्यामुकराशिरमुकोहं मृलनक्षत्रामुक चरण जातस्यामुकपुत्रस्य सूचितामुकारिष्ठ निवृत्तये शुभफलप्राप्तये च करिष्यमाण मूलशांतिकर्मणि मुलाधिष्ठात्रि देवतानितेरधिदे- यता प्रत्यधिदेवता सहिनस्य च कलशोपरिस्थापित सुवर्णप्रति- मासु तथाचभूमौचतुर्विशतिदलस्थानतपूगीफलेपुतत्तत्पतिमासु च उत्तरापाढामारभ्योनुराधा पर्यन्तानां चतुर्विशतिनक्षम्राणां ."
कमकाण्डरत्नाकरे, मूलशान्तिपद्धतिः । ( ६२१ ) देवतानां पूजनं च करिष्ये तंत्रेणहोमवेदीशाने कलशस्थापन नव ग्रहाणांस्थापन पूजन च करिष्ये इति संकल्यनितिध्यायेत् , गृहीताक्षतपुष्पः-ध्यायामि निर्गतिं कृष्णसुमुग्वं नरवाहनम् । रक्षोधिपंग्वङ्गहस्तं नानाभरणभूषितम् ३० यन्तेदेवी नितिराय- धन्ध पार्शग्रीवास्ववित्यम् । तंते विष्याम्यायुपोनमध्यादत पितुमद्धिप्रसूतः । इति मन्त्रेण पंचोपचारैः सम्पूज्य अधिदेव प्रत्यधि देवयोर्नाममंत्राभ्यां पूजनंकुर्यात्-30 मूलाधिदेवायेन्द्रा यनः इति दक्षिणभागे 30 मूलप्रत्यधि देवायतोयायनमः । इति संपूज्य नक्षत्रदेवेभ्योनमः इति नक्षत्रदेवानपिसंपूज्य, वात- वैषांपुरुषसूक्तेन पूजनंकुर्यात् , ततो होमवेदीशानकोणे कलशवि- धिना कलशंसंस्थाप्य संपूज्य च ग्रयागोक्तपद्धत्या तत्र साधिदे- वप्रत्यधिदेवा नादित्यादि ग्रहानाचाहा संपूज्य च तत्र पंचाशत्कु- शनिर्मितं ब्रह्माणमपि संस्थाप्य संपूज्य च रक्षासूत्रमभिमन्य प्रतिष्ठाप्यतत्रैव कलशे स्थापयेत् । ततो होमवेदी समीपमागत्य पूर्वोक्त होमपद्धत्यनुसारेण ब्रह्मोपवेशनादि, अर्थवत्प्रोक्षणान्तं कर्मकृत्वा । होमसामग्री पायसंचरंकृसरं (तिलौदनम् ) अपयि. वापर्युक्षणान्तकृत्वा । (शान्तिकेवरदः) इतिवरदनामाग्निं, एतन्ते तिप्रतिष्टाप्य । पंचोपचार सम्पूज्य रेग्वाजिहारचपूजयेत् । अये. त्यादि देशकालौं संकीर्त्यामुकोऽहं सग्रयाग मूलशान्तिकमणि द्रव्यदेवतामिध्यान पूर्वक महयन्ये तत्र प्रजापति, इन्द्र, अग्निम् सोम,प्राज्येन,नवग्रहानष्ठसंख्याभिः समिच्चज्यलिलाहुतिभिः विनायकादि पंचलोकपालानिन्द्रादि दिक्पालाश्चद्विह्निःसंख्याभिः समिदाज्याहुतिभिःनितिं प्रतिद्रव्यमष्टोत्तरशतसंख्याहुतिभिः इन्द्रम् अपश्चअष्टाविंशति संख्याभिघृतचर्वाहुतिभि श्चविश्वेदेवा द्याश्चतुर्विशति देवता श्रष्टसंख्याभापायसाहुतिभिाऋग्वे दोक्त- रक्षोन्न कृणुष्व, इति पंचदशभिः ऋग्भिःप्रत्यर्चपष्टसंख्याभिास टि. नितिपूजने परिभाषोक्त ३४ श्लोकादौ-मपङ्गादिधूपैश्च, इत्यादि मिनद्यान्तं पूजयेत् ।
(६२२) फर्मकाण्डरत्नाकरे, मूलशान्तिपद्धतिः। रानोहुतिभिःसवितारंदुर्गा,न्यवकम्ऋत्विक्स्तुति दुर्गावास्तोष्पति अनिक्षत्राधिपतिम् मित्रावरुणौ,अग्नि,चाप्टसंख्याभिःकृसरोन्नों हुतिभिः श्रिय, हिरण्यवर्णा, इतिपंचदशभिः श्रीसूक्तऋम्भिाप्रति मंत्रमष्टसंख्याभिर्वाहुतिभिश्चर्वाहुतिभिश्च,, रुद्रं वृताहुतिभिः, शेषधृतेनखिष्टकृतमग्न्यादि प्राजापत्यान्तानाज्येनायध्ये,, दं संपादितचर्वादिद्रव्य,अाघाराज्यभागदेवताभ्यो नवग्रहदेवताभ्यो ऽधिदेवप्रत्यधिदेवेभ्यश्च विनायकादि लोकपालेभ्यइद्रादिदिक्पाले भ्यश्च,, निऋतीन्द्रतोयेभ्यस्तथा विश्वेदेवमारभ्य मित्रपर्यन्तेभ्य श्चतुर्विंशतिनक्षत्रदेवेभ्यश्च ॥ विष्ठकृदग्नयेमहाव्याहृतिदेवताभ्यः सर्वप्राश्चित्त देवताभ्यः प्रजापतये च मयापरित्यक्तं 30 तत्पद्य- धादेवतमस्तु नमम ॥ तत श्राचार्योदक्षिणं जान्वाच्य ब्रह्मणान्या- रब्धोमनसा प्रजापति यात्वा-30 प्रजापतये स्वाहा,, इदप्रजा- पतयेनमम | 30 इन्द्रायस्वाहा-इदमिन्द्राय० 30 अग्नयेस्वाही इदमग्नये । ३० सोमायस्वाहा इदं सो० इत्याघाराज्य भागौ च हुत्वाप्राचार्योऽज्वारं त्यक्त्वाऋत्विग्भिासहादौग्रहयागोक्तरीत्या आदित्यादि ग्रहेभ्योसमिद्भिः प्रत्येकं अष्ठसंख्याभिहत्या (अत्र केचिद्गोप्रसव शान्ति होम मप्याचरन्ति ) ततोघृतेन चरुणा पालाश ग्वादिर समिद्भिर्यताक्तपायसेन नितिं जुहुयात्-30 यन्ते देवीति प्रजापति पि स्त्रिष्टुप्छन्दो निर्ऋतिर्देवता घृतमिश्र समित्पायसादि द्रव्य, होमे विनियोगः ॥ ॐ यन्तेदेवी निति- राबवन्ध पाशग्रीवा स्ववित्यम् । तते विष्याम्यायुपोन मध्य तथैतं पितुमद्धि प्रसृतः स्वाहा । इदंनिब्रतये नमम ॥१०८॥ ततोs- धिदेवमिन्द्राय-ॐ इन्द्रऽासामिति प्रजापतिर्गपिस्त्रिष्टुप्छन्दा F इन्द्रोदेवता घृताक्त पायसादिद्रव्यहोमे विनियोगः॥ ॐ इन्द्रः- आसान्नेता वृहस्पतिदक्षिणा यज्ञः पुरऽएतुसोमः । देवसेनानी मभिभंजतीनां जयंतीनां मानो यन्त्यग्रम् स्वाहा-इदमिन्द्रायः (२८) प्रत्यधिदेवेभ्योऽद्भ्यः-3 यापोहिष्टेति सिंधुद्वीय ऋषि- स्त्रिष्टुप्छन्दः पापोदेवताः घृताक्त पायसादि होमे विनियोगः ।
कर्मकाएरक्षाकरे, मूलसान्तिपद्धतिः । (६२३) ---. - आपोहिष्टामयोभुवस्तान अर्जदधातनः महेरणायचक्षसेस्वाहा इदमद्भ्योनमम (२६) तत उत्तरापाटादि देवतानां नाममंत्र र संख्याहुतिभिः प्रत्येकं धृताक्त पायसेन चतुर्विशति देवांजुहयात- विश्वेभ्योदेवेभ्योनमः स्वाहा । इदंविश्वेभ्योदेवेभ्यो नमम ।। ॐ गोविन्दायनमः स्वाहा-इदंगोविन्दाय नमम । 30 वसुभ्यो नमः स्वाहा । इदंवसुभ्यो नमम । 30 वरुणाय नमः स्वाहा- इदंवरुणायनमम । 30 अजचरणाय नमः स्वाहा-इदमजचरणाय नमम । अअहिर्बुध्न्यायनमः स्वाहा । इदमाहियुध्न्यायनमम | 30 पूष्णेनमः स्वाहा-इदंपूष्णे नमम ! दस्त्राभ्यांनमः स्वाहा- इदंदनाभ्यांनमम | 30 यमायनमः स्वाहा-इदंयमायनमम !, 30 अग्नयेनमः स्वाहा-इदमग्नयेनमम । 30 धात्रेनमः स्वाहा-- इदंधात्रे । चन्द्रमसे नमः स्वाहा-इदंचन्द्रमसे० । शिवाय स्थाहा इदंशिवाय । यदितयेस्वाहा-इदमदितयेनमम । वा. क्पतयेनमः स्वाहा-इदंवाक्पतये। 30 सभ्योनमः स्वाहा- इदैसभ्योन० । पित्भ्योनमः स्वाहा-इदंपित्भ्यो। 30 भगायनमः स्वाहा-इदंभगाय । ॐ अर्यम्णेनमः स्वाहा- इदमर्यो । ॐ सवित्रेनमः स्वाहा । इदंसवित्रे । ॐ त्वष्ट्रे नमः स्वाहा । इदंत्वनमम । ॐ यायवेनमः स्वाहा-इदंवायवेन ॐ शक्राग्निभ्यांनमः स्वाहा-इदंशकाग्निभ्यां ॐ मित्रायनमः स्वाहा-इदमित्रायनमम । इतिमनत्र देयेभ्यो हुत्वा । रचोधन- कृसर होम कुर्यात्-30 कृष्णुप्वेति पंचदश मंत्राणां वामदेवऋपि. स्त्रिपटुप्छन्दो रनोहाग्निर्देवता कृसरहोमे विनियोगः ॥ ॐ कृष्णुरवपाजः प्रसितिन्नपृथ्वी याहिराजे व्यामधा-२४॥ इभेन । तृष्वीमनुप्रसितिं द्रूणानो स्तासि विध्यरतसस्तपिटैः स्वाहा (१).. इति श्रष्ठयारं चुहुयात्प्रतिमंत्रेण,-30 तवभ्रमासआशुया पतन्त्य. नुस्पृशधूपताशोशुचानः । तपू प्यग्ने जिलापतंगान सन्दितो. विराज विष्व गुल्काः स्वाहा । ८ वरम् । प्रतिस्पशो विसृज, तूणितमो भवा पायुर्विशोऽयस्याऽअदब्धः । योनौदरेऽअघशंसो, (१२४) कर्मकापडरताकरे, मृलशान्तिपतिः। योऽअन्त्यग्ने माकिष्टे व्यथिराकधर्मात् स्याहा ।।। इत्यष्टधाहत्वा ।। ॐ उदग्नेतिष्ट प्रत्यातनुष्यन्गमित्रांनोपतातिग्महेते । योनो ऽअराति समिधानचके नीचातं धयत सन्न शुष्कं स्वाहासाधारं० ॐ उवाभव प्रति विध्याध्यास्मदा विकृणुष्व देव्यान्यग्ने । अपस्थिरा तनुहि यातुजनांजामिमजामि प्रमृणीहि शत्रून्स्वाहा। ।वारं । ॐ सतेजातानि सुमतिं यविष्ठयईवते ब्रह्मणेगातुमैरत्। विश्वान्यस्मै सुदिनानिरोयोद्युम्नान्यों विदुरोऽअभिद्योत् स्वाहा 1 वारं । 30 सेवग्नेऽग्रस्तुसुभगः सुदानर्यस्त्वा नित्येन हबिपाय उक्थैः । पिपीसति स्वऽअायुपिदुरोणे विश्वेदस्मै सुदिनासा सदिष्ठिः स्वाहा । ८ चारं । अर्चामिते सुमतिं द्योप्यक्सिते वावाता जरतामियंगीः । स्वश्वास्त्वासुरथा मर्जयेमास्मे क्षत्राणि- धार येरनुयून्स्वाहा । वारं । 30 इहत्वा भूर्याचरेदुपत्मन् दोषा- वस्ती दिवा समनुदयन् । मीलन्तस्त्वा सुमनसः सपेमादिद्युम्ना तस्थिवांसो जनानाम् स्वाहा, 1८ बारं । यस्त्वास्वश्व सुहिरण्यो, अग्नऽउपपातिवसुमतारथेन । तस्यत्रोतामवसि तस्थ सखायस्ताधिश्य मानुषम् जुजोपत्, स्वाहा । ८ वारं । ॐ महोरुजामि वन्धुतावचोभिस्तन्मापितु गोतमादन्वियाय । त्वंनोऽअस्य वचसश्चिकिद्धि होतर्य विष्ठ सुक्रतो दमूनाः स्वा- हा ८ वारंजुहुयात् । 30 अस्वप्नजस्तरणायःसुशेवां अतन्द्रासो घृकाऽअश्रमिष्ठाः। तेपायवःसध्यूचोनिषद्याग्ने तवनःपान्त्वमूरः स्वाहा । ८ वार० 30 येपारवोमामतेवन्ते अग्नेपश्यन्तो अन्धं- दुरितादरक्षन् । ररक्षतान्सुकृतो विश्ववेदा दिप्सन्तइद्रिपवो नाहदेभुः स्याहाः। ८ वारं० । ॐ त्वयावय स धन्यस्त्वोतास्तव प्रणीत्यश्यामवाजन् । उमाशमासूदयसत्यतातेऽनुष्टुकृणुहहयाण: स्वाहो ८ वारं० । 30 आयतेऽअग्ने समिधाविधेम प्रतिस्तोम शस्यामानं गृभाय । दहाशसोरक्षसः पाद्यस्म्गन्होनिदो मित्रम होऽअवद्यातस्वाहा । इत्यष्टवारंवसरान्नजुहुयात । गायन्या विश्वमित्रऋषिःगायत्रीछन्दसवितादेयताकृसरानहोमविनियोगः 30 ..
कर्मकापटरक्षाकरे, मूल शान्तिपद्धतिः । (१२५) - भुर्मुवःस्वाहा तत्सवितु स्वाहा । - वार जु । जातवेद स्य कश्यप ऋपि त्रिष्टुप्छन्दो दुर्गा देवता कृसरान होमे विनियोगः । ॐ जातवेदसे सुनवाम सोम मरातीयतो निदा हातिवेदः । सनः पर्षदतिं दुर्गाणि विश्वानावेव सिन्धुदुरिता त्यग्निः स्वाहा वारंजु० । 30 त्र्यंबकमिति वसिष्टपिरनुष्टु- प्छन्दः रुद्रोदेवता कृसरान्नहोमे विनियोगः। 30 वयजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्द्धनम् । उर्वारुकमिवन्धनान्मृत्योर्मक्षीयमाम- तात् स्वाहा । ८ वारंजु० । इदंमद्रायनमम । ७. स्पर्शः । ॐ सीरायुजन्तीति सौम्यबुध ऋपिर्गायत्रीछन्दाऋत्विकस्तुतिर्देवता कृसरानहोमे विनियोगः । ॐ सीरा गुजन्तिकवयोयुगा वितन्वते पृथक् । धीरादेवेषुसुम्नया स्वाहा । वारंज० 30 तामग्नि वर्णा- मितिसौभ पित्रिष्टुप्छन्दो दुर्गादेवता कृसरान्नहोमे विनियोगः तामग्निवर्णा तपसाज्वलन्ती वैरोचनीकर्मफलेषु जुष्टां । दुर्गा देवीं शरणमप्रपद्ये सुतरसितरसेनमः सुतरसितरसेनमा स्वाहा ८ वार० 1 0 वास्तोष्पत इत्यस्यवसिष्ठऋषि त्रिष्टुप्छन्दो वास्तो पतिर्देवता कृसरान्नहोमे विनियोगः ॐ वास्तोप्पतेप्रतिजानी हास्मान्त्स्वावेशोऽव्यनमीवोभवानः । यत्वेमप्रतितन्नोजपस्वश- न्नोभव द्विपदेशचतुष्पदै स्वाहा ८ । वा०1 30 अग्निमीलइत्यस्य करावोमेधातिथिपिर्गायत्रीछन्दोऽग्निर्देवता कृसरानहोमे विनि योग:-30 अग्निमीले पुरोहितं यज्ञस्यदेवमृत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् स्वाहा ८। 30 क्षेत्रस्येति चामदेवमपि रनुष्टप्छन्दः क्षेत्रपालोदेवता कृसरान्नहोमे विनियोगः 30 क्षेत्रस्यपतिनावयं हितेनेचजयामसि । गामश्चंपोपयिन्वासनो सूलातीशे स्वाहा वारं० । गृणानेतिजमदग्निपिर्गायत्रीछन्दो मित्रावरूपों देवते कृसरानहोमे विनियोगः :-30 गृणाना जमदग्निना योना घृतस्यसीदतम् । पातसोम मृतावृधा स्वाहा ८ वारंजु०१ अग्नि दतमिति विरुपाक्षऋपिर्गायत्रीछन्दो ऽग्निर्देवता कृसरान होमे विनियोगः । 30 अग्निंदतपुरोदधे हव्यवाहमुपवे । देवांशा ७६ (२६) फालिरहरक्षाकरे, मूल शान्तिपबतिः । प्रासादयादिह स्वाहा । इत्यष्ठ वारं० इति कृसरहोमः । अथमिश्न होमः-ततः श्रीसूक्तांचदशमंत्रैः प्रतिमंत्राष्टसंख्याभिः समिदा- ज्यचरुद्रव्याणि जुहुयात-30 हिरण्यवर्णामिति श्रीसूक्तस्य पंच- दशमंत्राणांश्रानन्दकर्दमचिक्लीतेन्दिरासुतऋषयो मंत्रोक्ताश्छ- न्दांसि श्रीदेवता समिदाज्य चमहोमे विनियोगः । 30 हिरण्य वर्णा हरिणींसुवर्णरजतस्रनाम् । चन्द्राहिरण्मयीं लक्ष्मी जातवेदो ममावह स्वाहा । एवमष्ठवारं प्रतिमंत्रेणजुहुयात्-30 नाम्मऽा- वहजातवेदो, लक्ष्मीमनपगामिनीम् यस्यांहिरण्यविन्देयं गामश्वं पुरुषानहम् स्वाहा ।२। 30 अश्यपूर्वारथमध्यां हस्तिनाद प्रबोधि- नीम् । श्रियंदेवीमुपह्वये श्रीर्मादेवीर्जुषताम् स्वाहा ।। ॐ कांसो स्मितां हिरण्यप्राकारामाद्रज्वलन्तीन्तृप्तां तर्पयन्तीम् । पझे स्थितां पद्मवर्णा तामिहोपह्वयेश्रियम् स्वाहा ।४। चन्द्रांप्रभासा यशसाज्वलन्तीं श्रियंलोके देवजुष्ठामुदाराम् । तापद्मनेमिंशरण महं प्रपद्येऽलक्ष्मीमनश्यतां त्वांवृणोमि स्वाहा ।। 3. आदित्य घणे तपसोऽधिजातो वनस्पति स्तववृक्षोऽथविल्वः । तस्यफलानि तपसानुदन्तु मायाऽन्तरायाश्च वाह्या अलक्ष्मीः स्वाहा ।। ॐ उपैतुमादेवसखः कीर्तिश्चमणिनासह । मादुभूतोऽस्मिराष्ट्रेऽस्मि कीर्तिमृद्धिंददातुमे स्वाहा 11 क्षुत्पिपासामलांज्येष्ठामलक्ष्मी नारायाम्यहम् । अभूतिमसमृद्धिं च सर्वां निर्णदमेगृहात् स्वाहा । tell ॐ गंधद्वारा दुराधर्षां नित्यपुष्टां करीषिणीम् । ईश्वरी सर्वभूतानां तामिहोपवयेश्रियम् स्वाहा।। ॐ मनसः काममा कृतिं वाचः सत्यमशीमहि । पशूनांरूपमन्नस्य मयि श्रीः श्रयता- यशः स्वाहा ।१०। ॐ कर्दमेन प्रजाभूतामयिसंभवकर्दम । श्रियं वासयमेकुले मातरंप मालिनीम् । स्वाहा ।११। 30 प्रापः सूज- न्तु स्निग्धानि चिक्लीतवसमेगृहे । निचदेवींमातरं श्रियं वासय । मेकुले स्वाहा ।१२। 30 आद्रांपुष्करिणी पुष्टिंसुवर्णा पद्ममालिनी म् । चन्द्रां हिरण्मयीं लक्ष्मीजतवेदोमऽावह स्वाहा ।१३। 30 श्राद्रायः करिणीं यष्ट्रिसुवर्णां हेममालिनीम् । सूर्या हिरण्मयीं कमकाण्डरनारे, मूलशान्तिपद्धतिः । (६२७) लक्ष्मी जातवेदोमऽभावह स्वाह १४ ताम्म आवहजातवेदो लक्ष्मी मनपगामिनीम् । यस्यां हिरण्यप्रभूतं गावो दास्यो ऽश्वा न्विन्देयंपुपानहम् स्वाहा ॥१५॥ इति श्रीसूक्तेन प्रतिमंत्रणाप्ठधा पूर्वोक्तद्रव्यं हुत्वा | ततः पायसेन त्रयोदशसंख्यया सोमं वक्ष्य- माणमंत्रेण जुहुयात् 0 स्वनः सोमेल्यस्यएन्द्रोविमर्वऋषिः पंक्ति श्छन्दः सोमोदेवता पायसहोमेविनियोगः त्वन्नः सोमविश्व तोगोपा । ऽअदाभ्योभव सेधराजन्नपत्रिधो विवोमदेमानोदुः शंस ईशताविवक्षसे स्वाहा । इतित्रयोदशवारंहुत्वा । ततःस्रवेण चतु राज्यं गृहीत्वा वक्ष्यमाणेन रुद्रहोमं कुर्यात- यातेमद्रेति प्रजापतित्रपि रनुठुप्छन्दः एकरुद्रोदेवता श्राज्यहोमे विनियोगः 30 यातेरुद्रशिवातन् रघोरा ऽपापकाशिनी । तया नस्तन्धा शन्त- मया गिरिशन्ता भिचाकशीहि स्वाहा ॥ इति रुद्रहोमं कृत्या अन्वारब्ध आचार्यःकुर्यात् ॐ अग्नयेस्विष्ठकृते स्वाहा । इदमग्नये स्विष्टकृतेनमम । ततोनवाहुतिहोम:-30 भूरादिव्याहृतीनां प्रजापति,पिर्गायत्र्युष्णिगनुष्टुभश्छन्दांसि अग्निवायु सूर्यादे. वताः प्रायश्चित्त होमेविनियोगः। 30 भूः स्वाहा इदमग्नयेन- मम । ॐ भुवः स्वाहा इदंयायवेनमम | 30 स्वः स्वाहा इदंसू. र्यायनमम 10 त्वन्नोअग्ने इत्यस्य वामदेव ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः अग्नीवरुणोदेवते प्रायश्चित्तहोमे वि०। ॐ स्वन्नोऽअग्नेचरुणस्य विद्वान्देवस्यहेडोऽअवयासिसीष्टाः यजिष्टोवन्हितमः शोशुचानो विश्वाद्वेषा सिपमुमुग्ध्यस्मात्स्वाहा, इदमग्नीवरुणाभ्यांनमम | ॐ सत्वन्नो अग्नेइत्यस्य वामदेव ऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः अग्नीव:- पौदेवते प्रायश्चित्त होमे० 0 सत्वन्नो अग्ने ' ऽअवमोभवो तीनेदिष्टोऽअस्था ऽउषसोब्युष्ठौ । अवयवनो वरुण ० रणो वीहिमृडीकर्ट० सुहवान एधिस्वाहा, इदमग्नीवरूणाम्यांनमम । 30 अयाश्चाग्ने इत्यस्यवामदेवपिस्त्रिष्टुप्छन्दो ऽग्निर्देवता प्रायश्चित्तहामेयाश्चाग्नेऽस्यनभिशस्तिपाश्च सत्यमित्वमया प्रभसि । अयानोयज्ञयहास्ययानाधेहिभेषज स्वाहा इदमग्नये कर्मकाण्डरत्नाकरे, मूलशान्तिपद्धतिः। नमम । ०येतेशतमितियामदेवपि त्रिष्टुप्छन्दो वरुणोदेवता प्रायश्चित्त येतेशतव्वरुणयेसहस्रयज्ञियाःपाशाविततामहान्तः तेभि अद्यसविन विष्णुर्विश्वेमुचन्तु मरुतः स्वर्काः स्वाहा। इदंघरुणाय सवित्रे विष्णवे विश्वेभ्योदेवेभ्यो माझ्यः स्वर्क भ्यश्चनमम | 30 उदुत्तममितिशुनः शेफऋषिस्त्रिष्टुप्छन्दो वरुणो देवता प्रायश्चित्तहोमे० । ७. उदुत्तमव्यरुणपाशमस्मदवाधर्म विमध्यमश्रथाय । अथा व्वयमादित्यव्रतेतवानागसोऽअदितये स्थामस्वाहा । इदंवरुणायनमम । प्रजापतयेस्वाहा-इदंप्रजाप तयेनमम । ततोवहिहोमः । ॐ स्वाहा । संस्रवनाशनम् । पवित्र प्रतिपत्तिः। प्रणीताविमोकः। ततोयजमानः पूर्णपात्रं ब्रह्मणे दद्यात्-अद्यत्यादिसंकीामुकोऽहं मूलशान्तिकर्मणः सांगफला प्तये, अपूर्णपूरणार्थ मिदंसदक्षिण पूर्णपात्रं ब्रह्मणेतुभ्यममुक शर्मणे सम्प्रददे तत्सन्नमम || 30 अक्रन्कर्म कर्मकृतासहव्याचा मयोभुवा । देवेभ्याकर्मकृत्वाऽस्तंप्रेतसचाभुवः । इतिपठित्वा बलिदानकुर्यात । तत्रादौ पूर्वोक्त ग्रहयागोक्त बलिदानपद्धत्यनुसा रेण नवग्रहादिभ्यो विनायकादिभ्यो दिपालेभ्यश्चवलीन्दत्वा । ततोनित्यादिभ्योवलीन्दद्यात्-भूमौसदीपपायसदध्यक्षतवलिं वा संस्थाप्य, अनितये सांगाय सपरिवाराय सायुधायसशक्ति कायएपसदीपयलिनमः ॥ इतिसम्पूज्य ॥ हस्तेजलगृहीत्वा- भोभोनिर्माते, एतंसदीप पायसवलिं भक्ष २ ममयजमानस्य सकुटुंचस्य आयुष्का क्षेमकर्ता शांतिकर्ता पुष्टिकर्ता तुष्टिकर्ता भय, ७० मन्डलेशंचत्वांजावा मयाभक्त्यानिवेदितम् । इदमये मिदं पायंदीपोऽयं प्रतिगृहाताम् । इतिवल्युपरिजलविसृजेत् ॥ एवंसर्वत्र-30 इन्द्रायनमः वलिंसम्पूत्य जलंगृहीत्वा भोभो. इन्द्र गतं । 30 अभ्यः सांगाभ्यः सपरिवाराभ्यः सायुधाभ्यः सशक्तिकाभ्योनमः सं० मो. श्राप:०|| 30 विश्वेभ्यो देवेभ्यो नमः सं० भो० विश्वेदेवा ममगजमानस्य यायुष्कर्तारः । ॐ विष्णवेनमः। भोभो थियो । पसुभ्योनमः, भोभावसया कर्मकाण्डरत्नाकरे, मूलशान्तिपद्धतिः । (६२६) कर्त्तारा भवन्तु। 30 वरूणायनमः भाभायरूण 10 अजचरणा- यनमः भोमी अजचरण 3. अहिर्बुध्न्यायनमः । भोभो अहिर्बुध्न्य० । ॐ पूष्णेनमः, भोभोःपूपन । 30 अश्विभ्यांनमः भो अश्विनौ० कर्तारौ० 30 यमायनमः। भोभोयम। . अग्नयेनमः, भोरअग्ने। धोत्रेनमः भोधाता चन्द्रा- यनमः भोरचन्द्र० । 30 रुद्रायनमः । भोररुद्र। शत्रोदकस्पर्श: 30 यदितयेनमः भोरअदिते. आयुष्की। 30 गुरवेनमः । भोरगुरो । 30 सर्पभ्योनमः भोसर्पाः। ॐ पितृभ्योनमः, भोभोःपितरः। 30 भगायनमः, भोरभग । अर्यम्णेनमः भो अर्यमन । ॐ सवित्रेनमः भोःसवितः1 ॐ त्वष्टेनमः, भोर स्त्वष्टः । ॐ वायवेनमः, भोरवायो । ॐ इन्द्राग्निभ्यांनमः, भोरइन्द्राग्नी गृह्णीतम् । श्रायुष्कर्तारौ । ॐ मित्रायनमः, भोरमित्र। ॐ रुद्रायनमः, भोरमद्र० ॥ एवनम्रत्यादि मद्रान्ते भ्योवलीन्दत्वा उदकंसंस्पृश्य पूर्वोक्तक्षेत्रपालवलिपद्धत्युनुसारेण क्षेत्रपालायवलिंदद्यात् ॥ ततापूर्णाहुति संकल्प:-अयेत्यादि संकीर्खाऽमुकोई ममामुकयालकस्य मूलनक्षत्र जमनशान्ति होम कर्मणः न्यूनातिरिक्त दोपपरिहारार्थ मृडाग्नौपूर्णाहुतिहोम करि- प्ये ॥ ततोनारिकेल पूगीफलंबारक्तवस्त्राछादितंकृत्वा सुचेसुर्वच सम्पूज्य वक्ष्यमाणमन्त्रैर्जुहुयोत्-तन्त्रमन्त्रा:-ॐ समुद्रादुर्मि रितिसूतस्य वामदेवऋपि स्त्रिष्टुब्जगतीछन्दांसि, अग्निदेवता, पूर्णाहुतिहोमेविनियोगः-30 समुद्रादमिर्मधुमाँगरउदारदुपा शुनासममृतत्वमानट् । वृतस्यनामगुयदस्ति जिहादेवानाममृत तस्यनाभिः शब्बयनाममनवामा घृतस्यास्मिन्यज्ञे धारयामा नमोभिः । उपत्रमाणवच्छस्यमानंचतुः शृंगोऽयमीद्गौरऽए- • तत् ।२। चत्वारिशदात्रयोऽअस्यपादाद्वेशीसप्तहस्तासोऽअस्य । निधावद्धौवृषभारोरवीति महादेवा मा २ प्राविवेश || त्रिधाहितपणिभिर्गद्यमानं गचिदेवासोघृतमन्वविन्दन् । इन्द्र एक सूर्यऽएकजजानवेनादेकर्ट स्वधयानिष्टतनः । एताऽअर्थन्ति फर्मकाण्डरत्नाकर. मूलशान्तिपद्धति द्यात्समुद्राच्छतव्रजारिपणानाचचक्षे । घृतस्यधारा अभिचाक सीमि हिरण्ययोव्वेतसोमध्यऽनासाम् ॥५॥ सम्यक्स्रवन्तिसरि- मोनघेनाऽअन्तर्हदामनसापूयमानाः। एतेऽअन्त्यूभयोघृतस्यमृगा इवक्षिपणोरीषमाणाः।। सिन्धोरिवप्राध्यनेशुधनासोव्यातप्रमि पःपतयन्तियहाः। घृतस्पधाराऽअरुषोनव्याजीकाष्ठाभिन्दन्नर्मि भिःपिन्धमानः अभिप्रवन्तसमनेवयोषाकल्याएयः स्मयमाना सोऽअग्निम् । घृतस्यधारासमिधोनसन्तताजुषाणाहथतिजात चेदाः ।। कन्याऽइयवहतुमेतवा 5 उअंज्यजानाऽअभिचाकशी मि । यत्रसोमःसूयते यत्रयज्ञोघृतस्यधाराऽभितत्पवन्ते ।। अभ्यर्पनसुष्टुतिंगव्यमाजिमस्मासुभद्रादविणानिधत्त । इमंयज नयतदेवतानोघृतस्यधारामधुमत्पवन्ते ।११ धामन्तेविश्वं भुवन मधिश्रितमन्तः समुद्रेहृद्यन्तरोयुपि । अपामनीकेसमिथेयऽा- भृथस्तमाश्याम मधुमन्तंतऽभिमस्याहा १११ 30 प्रजापत्तनत्वे तिहिरण्य गर्भऋपिस्त्रिष्टुप्छन्दः प्रजापतिर्देवता पूर्णाहुतिहोमे विनियोगः। 30 प्रजापतनत्वदेनान्यन्धोविश्वारूपाणिपरितावभू व यत्कामास्तेजहुमस्तन्नोऽअस्तुब्वयस्यामपतयोरयीणाम् स्वा हा।१।०पूर्णादीति,ौर्णनाभनपिरनुष्टुप्छन्दः इन्द्रोदेवतोपूर्णा हुतिहोमेविनियोगः । ॐ पूर्णादविपरापतसपूर्णापुनरापत । व्व स्नेवविक्रीणाव्वहाऽइषमूर्जर्ट शतक्रतो स्वाहा । ॐ सप्ततेऽअ ग्नेऽइतिसप्तमृपय स्त्रिष्टुप्छन्दोऽग्निर्देवता पूर्णाहुतिहामे विनि योगः-सप्ततेऽअग्नेसमिधः सप्तजिह्वाः सप्तऽमृपयः सप्त- धाम प्रियाणी ॥ सप्तहानोः सप्तधात्वायजन्ति सप्तयेानि राणा- स्ववृतेनस्यहा। इतिपूर्वोक्तचतुर्दशमंत्रैरविच्छिनघृतधारभिरग्निंत स्वा, ततोघृताभिघारितं रक्तकौशेय स्त्रवेष्ठितंश्रीफल सुवेकृत्वो स्थाय-ॐ मानमितिभरद्वाजापित्रिष्टाछन्दः वैश्वानरोदेवता मृडाग्नौपूर्णाहुतिहोमेविनियोगः । ॐ मूर्दानं दिवोऽअरतिपृथि व्यावैश्वानरमृऽाजातमग्निम् । कविर्टसम्राजमतिथिंजनाना मासन्नापा जनयंतदेनाः साहा--इनिपूर्णाहुतीहुस्नाऽग्नि कर्मकापटरलाकरे, गुलशान्तिपद्धतिः (६३१) मेधा प्रार्थयेत् । ॐ सदस्पतिमद्भुतं प्रिय मिंद्रस्यकाम्यंम् । सनिम्मेधा मयासिप ॐ स्वाहा ११ - याम्मेधां देागणा: पितरश्चोपासते । तयामामयमेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ।। भेधाम्मे वरुणो ददातुमेधामग्निः प्रजापतिः मेधामिन्द्रश्च व्वायु- श्च मेधांधाता ददातुनः स्वाहा । ३। श्रद्धां मेधांयशःप्रज्ञां विद्या पुष्टिं व श्रियम् । श्रायुष्य द्रव्यमारोग्यं देहिमे हव्यवाहन [४] ततो वक्ष्यमाण मन्त्रैः प्रतिमंत्रं ललाटाचिवुकपर्यन्तं पाणिप्रतपन पूर्वकं मुखं प्रोछेत् । तनूपाऽअग्नेऽसि तन्वंम्मे पाहि । " आयुर्दाऽअग्नेऽस्यायुर्मेदेहि । 30 व्वोंदाऽअग्नेऽसि व्यर्चामेदेहि । ॐ अग्ने यन्मे तन्वाऽऊनंतन्मऽआपृण । 30 मेधांमे देवःसविता आदधातु । 30 मेधांमे देवी सरस्वती श्रादधातु । ॐ मेधामश्वि नौ देवावायत्तां पुष्कररजौ । ततोंगालंभनं कुर्यात्-30 अंगानि चमऽआप्यायताम् । सर्वांगान्युपस्पृशेत् । 30 वाक्चमऽआप्याय- तामितिमुखे । प्राणश्चमऽाप्यायताम्-नासिकायां । 30 चतुश्चमऽश्राप्यायताम्-नेत्रयोः । ॐ श्रोत्रंचमऽआप्यायताम्- कर्णयोः॥ ॐ यशोवलंचमऽआप्यायताम्--याहोः ।। अत्रोदक स्पृष्ट्वा तत स्त्र्यायुप करणं-30 याशुषं जमदग्नेः-इतिललाटे । 30 कश्यपस्य घ्यायुपम्-इतिग्रीवायाम् । ॐ यद्देवेपुयायुषम्- इतिदक्षिणांसे । ॐ तन्नोऽस्तुन्यायुषम्-इतिहृदि । ततोन्द्र कुम्भस्य मुग्वं वा दक्षिणतः स्पृष्ट्वा रुदैकादशिनी,शतवारं ज्यवक मंत्रंच जपेत् । ततो निति कुम्भरुद्रकुभ ग्रहादींश्च पंचोपचारः सम्पूज्य । शान्तिमण्डपस्योत्तरभागे, चा गृहांगणे गोमयेनोप- लिप्य तत्र फलक पीठं संस्थाप्य तत्र श्वेतवस्त्रं प्रसार्य, तदुपरि सपत्निपुत्री यजमान उपविष्ठःशववाद्यादिरवे जायमाने मङ्गलगी तानि शृण्वन् पत्नी वामभागे कृत्वा-संकल्पं कुर्यात-प्रोत्या दि देशकालो संकीर्त्य सपुत्र पत्निकोऽहं ममपुत्रस्थामुकवालकस्य मूलनक्षत्रामुकपादजनन सूचितारिष्ट निवृत्तये शुभ फलप्राप्तयेच अभिषेकमंत्रः शान्त्यन्त स्नानं करिष्ये-ततः सर्वोपधीभिरनु (६३२) कर्मकाएहरताकरे, मूलशान्तिपतिः लिप्ताङ्गस्य नूतन वस्त्र परिधाप्यमानस्य प्राङ्मुखो पविष्ठस्य या यजमानस्याचार्यादयः सर्वकलशोदकमेकीकृत्वाउत्थाय वक्ष्यमाण मन्त्रैरभिपेकं कुर्यः । तत्रमन्त्रा: -क्षीभ्धान्ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुयुकादधि । यक्ष्म शीर्षण्यमस्तिष्कानिहाया विवृहा- मिते। १। ग्रीवाभ्यस्तऽउष्णिहाभ्यः कीकसाभ्योऽअनुक्यात । यक्ष्मंदोषण्यंमंसाभ्यांबाहुभ्यांविदामिते ।। ग्रांत्रेभ्यस्तेगुदाभ्यो वनिष्टोहृदयादधि । यदममतःस्नाभ्यांयक्नप्लाशिभ्योविवृहामिते ।३। ऊरुभ्यान्तेऽअष्ठीवद्भ्यां पाणिभ्यां प्रपदाम्याम् । यक्ष्म श्रोणिभ्यां भासदाद्भससो विवृहामिते ।४। मेहनादनं करणा ल्लोमभ्यस्ते नखेभ्यः । यदम सर्वस्मादात्मनस्तदिदं विवृहामिते । शअङ्गादगाल्लोम्नोलोम्नो जात पर्वणि पर्वणि । यदम सर्वस्मा- दात्मनस्तदिदं विबृहामिते । ६। ततः पावमानी भिश्च 30 पुन- न्तुमापितरः सोम्यासःपुनन्तुमापितामहाः । पुनन्तुप्रपितामहाः पवित्रेण शतायुषा । ७। पुनन्तुमापितामहाः पुनन्तुप्रपितामहाः। पचित्रेण शतायुपा विश्वमायुर्व्यश्नवै ।८। अग्नप्रायॐ पिपवसऽ प्रासुवोजमिपंचनः। आरे वाधस्वदुच्छुनाम् ।६। पुनन्तुमादेव जनाः पुनन्तु मनसाधियः । पुनन्तु विश्वाभूतानि जातवेदः पनीहिमा । १०। पवित्रेण पुनिहिमा शुक्रेण देवदीद्यत् । अग्ने कृत्वा क्रतूं ॥ऽ रनु । ११ । यत्तेपवित्रमर्चिष्यग्ने धिततमन्तरा। ब्रह्मतेन पुनातुमा ।१२। पवमानःसोऽअद्यन:पवित्रेण विचर्षणि । यापोता सपुनातुमा । १३ । उभाभ्यां देवसवितः पवित्रेण सवेनच । मापुनीहित्यिश्वतः । १४ । चैश्वदेवी पुनीती देव्यागा- द्यस्यामिमा वव्यस्तन्वो बीतपृष्टाः । तयामदन्तः सधमादेषु व्वयस्याम पतयोरयीणाम् ।१५। 30 आपोहिष्टा मयोभुव 'स्तानSऊर्जदधातन । महेरणाय चक्षसे । १६। 30 योवः शिव रिसर , भाजयते हनः । उशती रिवमातरः। १७ । तस्माऽ घरजमाम वो यस्यक्षयाय जिन्वध । श्रापो जनयधाचनः । १८ । शन्नोदेवीरभिष्टपापोभवन्तुपीनये । शंयोरभिश्रवन्तुनः । १६ ।
कर्मफाएटरलाकरे, मूलशान्तिपतिः (६३) - ईशाना वार्याणांयक्षन्तीश्चर्षणीनाम् ।श्रोपोयाचा मिभेषजम् ॥२०॥ अप्सुमेसोमोऽअववीदन्तविश्वानिभेयजा। अग्निवविश्वशम्भुवम् 1 २१ । आपाप्रणीतभेषजं व्यरूपं तन्वे ३ मम । ज्योक्चसूयहशे । २२ । इदमापाप्रवहत यक्तिंच दुरितमयि । यद्वाहमभिदुद्रोह यद्वाशेपऽउतानृतम् । २३ । श्रापोऽअद्यान्वचारिपं रसेन समग- स्महि । पयस्वानग्नऽआगहिं तम्मासंसृज वर्चसा । २४ 0 यता इन्द्रभयामहे ततोनोऽअभयं कृधि । मद्यवंग्धितव तन्नतिाभ- विद्विषोविमृधोजहि । २५ । त्वहि राधस्पते राधसोमहः यय- स्थासि विधतः । तत्वा व्वयं मधवनिन्द्रगिर्वणःसुतावन्तो हवा. महे । २६ । सहस्राक्षेण शतशारदेन शतायुषा हविषा हार्पमे नम् । शतंयथेमंशरदोन यातीन्द्रो विश्वस्य दुरितस्य पारम् ।२७। शतंजीव शरदो वर्द्धमानः शतं हेमन्ताच्छुतमुवसन्तान् । शत मिन्द्राग्नी सविता बृहस्पतिः शतायुपा हविषेमं पुनर्ददुः । २८ । श्राहार्षन्त्या विद्विन्त्वा पुनरागः पुनर्नव । सर्वाङ्ग सर्वतेचक्षुः सर्व मायुश्चतेविदम् । २६ । 30 देवस्थत्वा सवितुःप्रसवेश्विनोर्याहुभ्यां पूष्णोहस्ताभ्याम् । सरस्वत्यै व्वाचोयन्तुर्यन्त्रिये दधामि वृहस्पते छूवा साम्राज्ये नाभिषिवामि । ३० । देवस्यत्वासवितुःप्रसवेश्वि- नोर्याा पूष्णो हस्ताभ्याम् | अश्विनोभैषज्येन तेजसे ब्रह्म- वर्चसायाभिपिंचामि । ३२ । देवस्यत्वा सवितुःप्रसवेश्विनो_हु- भ्यां पूष्णोहस्ताभ्याम् । सरस्वत्यै भैषज्येन वीर्यायान्नाद्या याभिपिचामि । ३३ । देवस्यत्वासवितुःप्रसवेश्विनोहुभ्यां पूष्णोहस्ताभ्याम् । इन्द्रस्येन्द्रियेण वलाय श्रियैयशसेऽभिपिचामि" । ३४ । ॐ यजाग्रतो दूरमुदैति देवन्तदु सुप्तस्य तथैवैति । दुरंग- मज्योतिषांज्योतिरेकं तन्मेमनःशिवसंकल्पमस्तु ।३५॥ येनकर्मा एयपसो मनीषिणो यजे कृण्वन्ति विदथेषुधीराः। यद पूर्वयक्ष मन्तः प्रजानां तन्मेमनः शिवसंकल्पमस्तु । ३६। यत्प्रज्ञानमुत घेतो धृतिश्चयायोतिरंतरमृतं प्रजासु । यस्मान्नऽऋते किंचन कर्म क्रियते तन्मेमना १३७॥ येनेदंभूतं भुवनं भविष्यत्परिग्रहीतममृते . ८० फर्मकाए हस्ताकरे, गूलशान्तिपनि' नसर्वम् । येनयजस्तायते सप्त होता तन्मेमनः शिव० यस्मि- न्नृचः सामयज़पियस्मिन्प्रतिष्ठिता रथनाभा व्यिवाराः । यस्मि श्चित:सर्वमोतंप्रजानां तन्मेमनः ।। सुपारथिरश्वानि घयन्मनुष्योन्नेनीयतेभी शुभिर्वाजिन इव । हृत्प्रतिष्टं यदजिरं जविष्ठं तन्मे० । ४०। ७० तच्छंश्योरावृणीमहे गानयज्ञपतये । देवी स्वस्तिरस्तुनः स्वस्तिमानुपेभ्यः । अचंजिगातुभेपज ट। शन्नोऽप्रस्तुद्विपदेश चतुस्पदे । ४१ । अतः परं शौनफोक्त रष्टदिक् पाल मन्त्रैरभिपेक कुर्यात्-30 योऽसौवनधरोदेवो महेन्द्रो गज वहानः । मूलजोत शिशोदीप माता पित्रोद्यपोहतु।१। योसौ शक्ति धरोदेवो हुतभुग्मेप वाहनः। सप्तजिह्वः सदेवोऽग्निर्मूल दोपव्यपोहतु । २ । योऽसौदंडधरोदेवो धर्मों महिप याहनः । मूलजात शिशोदाप मातापित्रोर्यपोहत । ३। योऽसौखद्गधरो देवो नितिर्राक्षसाधिपः। प्रशामयतु मूलोत्थं दोपं गएडान्त सम्भवम् । ४ । योऽसौपाशधरोदेवो वरुणश्चजलेश्वर नक्रवाहः प्रचेतानो मूलोत्थाऽघंव्यपोहतु । ५। योऽसौदेवो जगत्मायो मास्तोमुगवाहनः । प्रशामयतु मूलोत्थं दोपं चालस्य शान्तिदी। योऽसौनिधिपतिर्देवोगदाभृन्नरवाहनः। मातापित्रोः शिशोश्चैव मूलदोपं व्यपोहतु ७ योऽसाविन्दुधरोदेवः पिनाकीवृप चाहनः। आश्लेषा मूल गण्डान्त दोपमाशु व्यापोहतु । ८ । विघ्नेशः क्षेत्र पोदुर्गा लोकपाला नवग्रहाः सर्वदोष प्रशमनं सर्वं कुर्वन्तु शान्तिदाः। ततोऽभिपेक विधौ पूर्वोक्तः पौराणिकमन्त्रः सुरास्त्वा ममिचिन्त्वित्यादिभि व्यासाष्टकेनाऽपिचाभिपिंच्य, ॐ शांतिरस्तु पुष्टिरस्तु तुष्टिरस्तु बृद्धिरस्तु पच्छ्यस्तदस्तु यद्रोगः शोकः कष्ठं दुःखं द्रारियूं तो प्रतिहस्तमस्त, भूर्भवः स्वः, अमृताऽभिषेकोऽस्तु ॥ इत्यभिषिच्य ततः सपत्नि पुन्नं यजमानं यस्त्रान्तरित कुम्भाभ्यां स्नापयित्वा, ततोयजमानःशुक्लयस्त्राणि परिधाप्य, पूर्वोक्त प्रकारेण घृतच्छाया दर्शनं कृत्वा स्नानवस्त्रा- एपाचार्याय दद्यात् । ततोगोदानम्-गोदानपद्धत्युक्त प्रकारेणगां कंमकार डरत्नाकरे, मूलशान्तिपति. (६३५) सम्पूध्य देवादीस्तर्पयित्वा, प्राचार्य सम्पूज्य संकल्पं कुर्यातू- अधेत्यादि देशकालो संकीर्त्यामुकराशिः सपत्नि पुत्रोऽहं ममोस्य पुत्रस्य मूलक्षत्र प्रथमाद्यमुकपाद जनित सूचितारिष्ठ निवृत्ति पूर्वक सर्वोपद्रव शान्त्यर्थं शुभफल प्राप्नयेच शौनकोक्त विधानेन कृतस्य मूलशान्तिकर्मणः साद्गुण्यार्थमिमा सवत्सां कृष्णांगां (गवाभावे गोनिप्कयीभूतं हिरण्यं रजतंबा) तथा मुलदेव नियंति सुवर्ण प्रतिमामधिदेव प्रत्यधिदेव सहितां सवस्त्र कुम्भां चप्राचार्यायामुक शर्मणेतुभ्य संप्रददे, ततःप्रतिष्ठांकृत्वा प्रदक्षिणा चतुष्टय विधाय, ततो रुद्रजापिनं ब्राह्मणं कृष्णमनड्वाहंच सम्प- ज्य वृपभे चन्दनेन त्रिशूलचक्र चिन्हे कृत्वा-संकल्पः-अद्येत्यादि० मूलशांति कर्मणि झनैकादशिल्यादिपाठ कर्मणः साद्गुण्यार्थं श्री रुद्रप्रतिमा कृष्णमनड्वाहं सवस्त्र रुद्रकुम्भंचामुकशर्मणे रुद्रजा- पिने सप्रतिष्ठितंतुभ्यंदास्ये,तत्सनममा ततःशान्तिसूक्तादिजाप- केभ्यो ब्राह्मणेभ्योऽपिदक्षिणांदत्या भूयसीदक्षिणा संकल्पंचकृत्वा यथांश विभज्य ततश्राचार्यादयो यजमानस्यसपरिवारस्य पूर्वोक्त- पद्धत्यनुसारेण तिलकाक्षतादिरोपणे तत्तन्मत्रै रक्षाबन्धनं श्यायुय करणच कृत्वाशीदिंदाः यजमानोऽपि प्रणिपत्यक्षमापयेत् । ततः मावाहित देवानग्निंच सम्पूज्य-30 यान्तुदेवगणाः सर्वे पूजामादायमामकीम् । इष्टकामसमृध्यर्थं पुनरागमनायच । ॐ गच्छगच्छेति च विमुज्य, ततः पायसादि भोज्यपदार्थः शतपंचा- शहशवा ब्राह्मणान्यधाशक्तिभोजयेत् अनेन शान्तिकर्मणा श्री भगवान्यज्ञपुरुषो निऋतिदेवश्च प्रीयताम् । ततो ब्राह्मणान्भोज- यित्वा स्वजनैः सह जीत ।। इति मूलजनन शान्तिपद्धतिः।
(६३६) कमेकाएडरत्नाकर, मूलशान्तिपतिः अथ माश्लेषा जनन शान्तिपरिमापा-तंच शान्तिसार--भारपायान्तु- जताना शास्तिव त्याम्यत.परम् । जातस्यद्वादशाहेचशान्तिकीम समाचरेत । मसम्भवतुजन्मरामन्यस्मिन्वाशुभे दिने । स्नातोम्यगादिभिरत स्मिन्बरयेत द्विजोत्तभान् । पत्रापिपाकिसहयामूलवत् । विभभास्तु- द्वयवातस्लामतः । देवतास्थापने कमेरुद्राभिमंत्रणे । मूलती फवारणम्भेनिक्षिप्य पूजयेत् । गोमया- लेपितेदेरोधात्वादुपरिशोभिते । पकर्जकास्येप्रशिद्दलान्वितम् । तहले कारयेद्यद्वारकपीतसितासितः। कर्गिकार्यान्य सेबीन् स्थापयत्तेपुकुम्भाम् । भाजिघ्रालगत्यानयाकलशस्थापनशुभम् । इमामगंगेमंत्रणा- पूरयेत्तीर्थधारिण। कुम्मचकनगन्यायैस्तत्तत्मनः पूजयेत् । मा.फलोगोरियनक्षिपदच्यौपयादिवान् । कुंभारन्स्यिगनेनु,भाश्लेवाप्रतिमायजेत् । निष्क,निमा) पादेवकारपिस्वास्पशक्तित:।तत्पूर्वोत्तरमनदक्षिणा- तरयोर्यजेत् । इन्द्रादीक्षानार्यन्तमिताक्षणिपूजयेत् । क्षणदेवतेतिकेथिस् । मूलो नविधानेनाम्भयोरभि- भत्रणम् । रदरिदकुम्भेतुपूर्ववच्चेपमाचरेत् । मूलशातिरपंचामृतस्नानादिमुनि द्यान्तमित्यर्थः । नमो- मस्तुमर्पभ्यः पूजामन्त्रइतीरितिः सरितस्विनेत्रश्चद्विभुज्ञा: पोतवनमाः । फलफ मिरास्तोरणदिव्याभरा भूषिताः । एध्यास्वाततोऽभरच्यहोमर्मसमाचरेत् । वक्त शाखोस.मार्गा, भाचार्यस्यायवाचरेत । मुखान्तक निवत्प्रहविगदायशास्त्रतः । इदंसर्प प्रोड्यात्साविप्रत्यधिदेवतम् । इंदवि० भष्टोत्तरशत- वार्थप्रष्टाविंशतिमेषच । मूल दत्रयच्छेहोपकर्मसमाचरेत् । पूर्ण त्यन्तकर्माणिकृत्वासपात तथाकुम्मे. नलचाक्षिप्याभिषेकमयाचरेत् । दारपुत्रसमेतस्य यजमानस्य पूर्ववर । मभिषिचे तपाचार्य ऋविम्भि सहितस्तथा अभिनेत्रितकुंभाद्भिरभिषेकनमारभेत् । तया पौराणमंत्रैश्चपल्लवैरभिषेचयेत् । भाश्लेषान- जातस्यमातापित्रोनिस्यय । प्रतज्ञातिकुलस्थानांदोयंसर्वव्यपीदतु । योऽसौवागीश्वरीनाम अधिदेवाह- तिः । मातापित्रोः शिशोश्चैवगएडान्चव्यपान्तु । पितरः सर्वभूतानरिक्षन्तुपितरःसदा । सनिक्षत्र- जातस्यवित्तवहातिक्विान् । एवंकृतेऽभिषेवेनुसुर्पशांतिवद्धवम् । तत: शुक्लाम्बरधरोयजमानः मुभूषितः । दक्षिणभिस्ततीविधानमूलवञ्च सतोषयेत् । भुक्तवद्भ्यश्चत्रिप्रेभ्यः सीकुादाशियो । इत्यु नविय ननपद ऋष्टकोपोहति । अथोत्तरांगपूजानतेसाघमन्त्रः-सधीशनमस्तुभ्यनागा- 'नाचगणाथिए । गृहणाध्यमयादत्तं सवारिष्टप्रशान्तये । मूलनक्षत्रवत्कुत्सार्पगण्डेस्वनामत. । ॥ इति शोनकोक्त मारलेषाशान्ति विधिः।। M ६ - ॥ अथाश्लेषाशान्तिपडतिः॥ अथाश्लेषोत्पन्नशिशोः पितोद्वादशाहे वाजातस्य सार्पजन्म था चन्द्रतारानुकूले शुभदिने मूलनक्षत्रवद् मण्डपादिकं कृत्वा कर्मकाण्डरक्षाकरे, आगलपाशान्तिपतिः । (६३७ ) मण्डपोत्तरभागेयज्ञान्तस्नानाऽभिपेकार्थचमण्डपंविधाय, मंडपेस तिमंडपपूजां कुत्वा, गोमयोपलिप्तेदेशे शुभासनेउपविश्य, दीपं- प्रज्वलय्य, आचम्यसर्पभूतोत्सादनं कृत्वा, शान्तिपाठंकृत्वा- संकल्प:-प्रोत्यादि देशकालौस्मृत्वा ममास्यपुत्रस्य श्राश्लेपा जन्मसूचित पित्राथरिष्ठादि शान्तिद्वारा श्रीपरमेश्वरप्रीत्यर्थ, गोमुग्नप्रसवपूर्वक आश्लेपो शान्तिकरिष्ये, तत्पूर्वाङ्गत्वेन गणेशा दि पंचांगदेवतानां पूजनंचकरिष्ये ।। ततोगणेशादीन्पूजयित्वा- प्राचार्यादीन् वृणुयात-ततअष्ठौचतुरोया ब्राह्मणान्सम्पूज्य-संक ल्प:-अयेत्यादि० अमुकोऽहं ममास्य धाश्लेपानक्षत्रजातस्य, आश्लेषाशान्तिकर्म कर्तकारयितंच प्राचार्यादीनां वरणकरिष्ये- ततोचरणद्रव्य, प्राचार्यव्रह्मासदस्य ऋत्विक एकादशिन्यादि, अ प्रतिरथपाठशान्तिसुक्तादि पाउकास्कादिभ्यो दद्यात् ।। इतिता न्वृत्वा-यथाविहितं कर्मकुरुध्वम्-यजमानोक्तिः ॥ ततःकरवामः- प्रत्युक्तिः । वापृथक्पृथक्वृणुयात-तत्रादौगौमुखप्रसवशान्ति पूर्वी स्तविधिनाकृत्वा । आचार्यों मंडपंचागृहाभ्यंतरे शान्तिस्थलंपञ्च गव्येन चागंगादिजलेन, ३० आपोहिष्टामयोभुवेतिभिः, भूमि सम्मोदय मंडपेसति तत्पूजनंकृत्वा, तत्रादौनत्यभागे स्थंडिले पञ्चभूसंस्कारपूर्वकमग्निं स्थापयित्वातद्रक्षार्थ द्रव्यंनियुज्य ॥ ततो होमवेदीशानभागे गोमयोपलिप्तेस्थले रंगरंजितस्थल निर्माय- तत्रद्रोणप्रमाण ब्रीहीन्निक्षिप्य, तदुपरिव्रणरहितं रक्तकुम्भसंस्था प्य, तत्कुंभस्यचतुर्दिनुकुम्भचतुष्टयं संस्थाप्य, मध्यकलशाभ्यंतरे मृलपरिभाषोक्त शतमूलानितदभावे-तुलसी, सहदेवी, शतावरी, अपामार्ग, कुशानिक्षिप्य, कलशस्थापनविधिना संस्थाप्यसम्पूज्य चतदुपरि तंडुलपूर्णताम्रपानस्थापयित्वा तत्ररकवस्त्रप्रसार्य, ततः भग्न्युत्तारणपूर्वका सुवर्णनिर्मितां श्रीरुद्रप्रतिमांसंस्थाप्यसंकल्पा- अद्येत्यादिसकीय, अमुकोऽहं, आश्लेषाशान्तिकर्मणि रुद्रकलशो- 'परि, सुवर्णप्रतिमायां श्रीरुद्रस्य पूजनंकरिष्ये, 30 एतन्ते० इति पटित्वा, ॐ भूर्भवास्वः, श्रीरुद्रानसुवर्णप्रतिमायां सुप्रतिष्ठितो , (६८) फर्मकाएरत्नाकरे. आश्लपाशान्तिपतिः। , वरदोभव । इतिप्रतिष्टाप्य, 30 त्र्यंबकंयजामहे० । अनेनैव वापूर्वोक्त वेदोक्त पूजापध्दत्यासम्पूज्य, तत्रन्द्रजापकाकुम्भंस्ट छ्वा रुद्रकादशिनींपठेत् ॥ ततोऽष्टशतवारं त्र्यंबकमन्त्रं, पाचमा नीश्च, पुनन्तुमापितरः, इत्यादिनव, सकृनपेत ॥ ततयप्रतीर थादिसूक्त जापकःपूर्वोक्त मूलशान्त्युक्तप्रकारेण पूर्वादिकुम्भार ट्वा चतुर्पकुम्भेपुतत्रोक्तानि मन्त्रसूक्तानिजपेत ॥ (ग्रंथविस्तारा मात्रसंग्रहीतानि ) ततरुद्रकुभोत्तरभागेचतुर्विशतिदलकमलेकणि कासहितं, पिष्टादिनाविलिख्य, रंगेनपूरयित्वा तन्मध्येकर्णिकायां सुलक्षण सुवर्णकलशं वारजत, ताम्रमृदन्यतमकलश, संस्थाप्य तत्राभ्यन्तरे शतमूलानितदभावे, विष्णुकान्ता शतावरी सहदेवी कुशातुलसीश्चकुंकुम पंचसुगन्धिद्रव्य सप्तमृदादिप्रक्षिप्य, कलश स्थापन पूजनविधिना-संस्थाप्य सम्पूज्यच, तदुपरिताम्रादिपूर्ण पात्रेश्वेतवस्त्रोपरि, अष्टदलकमलंबिलिख्य कर्णिकायां, अग्न्यु शारणपूर्विकांसकृति, आश्लेपादेवसर्पप्रतिमां, तद्दक्षिणेअधिदे वतागुरोः, तद्वामे प्रत्यधिदेवता पित्मणांप्रतिमाःसंस्थाप्य, श्रावा हनकुर्यात्-30 भूर्भुवःस्वः मध्येसुवर्णप्रतिमायां, आश्लेपानक्षत्र देवाःसर्पाः, इहागन्छतित्वहतिष्ठन्तु पूजार्थव आवाहयामि स्थाप यामि। तद्दक्ष-3. भूर्भुवःस्वः साधिदेवपुष्पनक्षत्राधिपगुरो इहागच्छेहतिष्टपूजार्थत्वां आवाहयामि स्थापयामि । तद्वामे- ॐ भूर्भुवःस्वः सर्पप्रत्यधिदेवाः मघानक्षत्रेशाःपितरः, इहागच्छ न्त्विहतिष्ठतु, पूजार्थव या स्था० । ततोभूमौ चतुर्विंशतिदलेपु पूर्वादिक्रमेण-पूगीफलानि साक्षतपुंजानि प्रतिमावासंस्थाप्य तत्रैवक्रमेण-30 भूर्भुवःस्थः पूर्वफाल्गुनीदेवभग, इहागच्छेह तिष्ठपूजार्थस्थाप्पामि । एवंसर्वत्र-30 भू° उत्तराफाल्गुनीदेव अर्थमन, इहा० । २। 30 भू० हस्तदेवरवेइहा० । ३ । ॐ भू. चित्रादेवत्यष्टः इहा। ४। 30 भू० स्वातीदेव, वायो, इहा || ॐ भू० विशाग्वादेवौ शाक्राग्नी इहागच्छतम्, इहतिष्टतंपूजार्थ वामावाहयामिस्था०।६।०भूअनुराधादेवमित्र,इहा०1७३ भू० कर्मवायरक्षाकरे, मापा शान्तिपद्धतिः । (१३) ज्येष्ठादेवइन्द्र, इहा। 30 भू मृलदेवनितेइहा० ॥६॥ उदकस्पर्श:-0 भू० पूर्वाषाढादेवतोय, इहा० ॥१०॥ ॐ भू० उत्तराषाढादेवा विश्वेदेवाः दहागच्छन्त्विहतिष्टन्तु पूजार्थं युष्मा- न्वावाहयामि स्थापयामि ॥११॥ ३॥ भू० श्रवणदेवविष्णो इहा० ॥१२॥ 30 भू. धनिष्टादेववसवः इहागच्छन्त्विदलिष्ठन्तु पूजार्थ व आवाहयामि स्था० ॥१२॥ 0 भू० शतभिपग्देववरण इहा० ॥१४॥ ॐ भू० पूर्वाभाद्रपदादेव, अजचरण इहा० ॥१५॥ ३० भू० उत्तराभाद्रपदादेव अहिर्वधन्य इहा० ॥१६॥ 30 भू० रेवती देवपूषन, इहा ॥१७॥ अभू० अश्विनीदेवौ दनौ इहागच्छतं इह- तिष्टतं पूजार्थ युवामायाहयामि स्थापयामि ॥१८)) 30 भू० भर- णीदेवयम इहा ॥१६॥ 30 भू० कृत्तिकादेव अग्ने इहा० ॥२०॥ ॐ रोहिणीदेव प्रजापते, इहा० ॥२१॥ ॐ भू० मृगशिरसोदेव सोम इहा० ॥२२॥ भू० श्रादेव शिव इहा० ॥२७॥ उ० स्प० ॐ भु पुनर्वसुदेव अदिते इहा० ॥२४॥ एवं नक्षत्रदेवासंस्थाप्य एतन्तेतिपठित्वा । ॐ भूर्भवः स्वः कर्णिकामध्ये कलशोपरि प्रतिमासु आश्लेपानक्षत्रदेवताः सार्पाः साधिदेव प्रत्यधिदेव गुरु पितरसहिताः तथा भूमौ कमलदलेषु पूर्वाफाल्गुन्यादिचतुर्विशति नक्षत्रदेवताः भगाद्यदितिपर्यन्ताः इहागच्छन्त्विनिष्टन्तु सुप्रति- टितावरदाभवन्तु । इति प्रतिष्ठाप्य, पूजासंकल्प:-अद्येत्यादि देशकालो संकीा ऽमुकोहममास्य बालकस्यामुकस्य श्राश्लेषान- क्षन्नामुकपादजनित सूचितारिष्टनिरसनपूर्वकं सर्वोपद्रव शान्त्यर्थ चतुर्विशतिदलोपरि प्रतिमासु अावाहित सद्यदितिपर्यन्तानां साधिदेवप्रत्यधिदेव सहितानांयथालव्धोपचारेण पूजनंकरिष्ये- तन्नादौ कलशोपरि सन्ध्यायेत असारक्तास्त्रिनेत्राश्च द्विभुजाः पीतवस्त्रकाः । वरदाभयहस्ताश्च दिव्याभरणभूपिताः । तदगुरुम् ॐ पीताम्बरः पीतवपुः किरीटीचतु मैजोदेवगुरुप्रशान्तः। दधाति दंडचकमंडलुच तथाक्षसूत्रं घग्दोऽस्तुगाम् । वामेपित्ऋन्-30 शुक्लायराः शुक्लगन्धाःशुक्लयज्ञोपवीतिनः । श्रात्मनोऽभिमुग्या- (६४०) कर्मकाएटरत्नाकरे, पाटेपाशान्तिपतिः । सीना ज्ञानमुद्रानिरायुधाः । इतिध्यात्वा सर्पपूजार्थमंत्रः-ॐ नमोऽस्तुसभ्योयेकेचपृथिवीमनु । येऽअन्तरिक्षयेदिवितेभ्यः सर्प भ्योनमः । ॐ सम्योनमः इति संपूज्य, गुरुपजनेमंत्र:-30 वृह- स्पते ऽअति यदोऽअर्हामद्विभाति ऋतुमज्जनेषु । यहीदय- च्छवसऽऋतमजात तदस्मासुद्रविणं धेहिचित्रम् । 30 गुरवेनमः सम्पूज्य, पितृपूजनेमंत्र:-30 पुनन्तुमापितरःसोम्यासः पुनन्तुमा पितामहाः पुनन्तुप्रपितामहाःपवित्रेणशतायुपा । 30 पितृभ्योनमः संपूज्य अन्येषां पूर्वाफाल्गुन्यादिदेवानां नाममंत्री पुरुपसूक्तेन पूजनं कुर्यात्। ततो होमस्थंडिलोत्तरे कलशस्थापन विधिना कलशं संस्थाप्य सम्पूज्य तत्रैवकलशे सूर्यादिनवग्रहान्साधि प्रत्यधिदेव सहितान् ग्रहयागोक्तपद्धत्यनुसारेणावोह्य, लोकपालक्षेत्रपाला दीश्चावाहपेत् तेनैवविधिना संपूज्य, ततो होमवेद्यां ब्रह्मोपवेश- नादि अर्थवत्प्रोक्षणान्तं कर्मकृत्वा, होमद्रव्याणि, चरुंपायसंश्रप- यित्वा कृसरान्नं च पाचयित्वा, समिदाज्यादि संपाचपर्युच्यच, वरदनामाग्नि 3 एतते. पठित्वा 30 भू० वरदनामाग्ने इहाग-. च्छेहतिष्ट सुप्रतिष्टितो घरदोभव, 30 घरदनामाग्नयेनमः सम्पू- ज्य रेखाभ्योनमः . जिह्वाभ्योनमः सम्पूज्य, ततोऽग्नि प्रणीत- योमध्ये संस्रवधारणार्थ प्रोक्षणीपात्रंनिदध्यात् ततो यजमानो द्रव्यत्यागंकुर्यात्-संकल्पः-अद्यत्यादि देशकालौ संकीर्याऽमुकोई सग्रहयाग, पाश्लेपा शांतिकर्मणि तत्र प्रजापति, इन्द्र, अग्नि, सोम, घृताहुतिभिः समिच्चज्य तिलाहुतिभिरष्टसख्यामि नवग्रहान् तदधिदेवताः प्रत्यधिदेवताश्चताभिश्चतुःसंख्याभिराहु- . तिभिः पंचलोकपालान्दशदिक्पालांश्चद्विद्विसंख्याभिःसमिच्चर्या ज्याहुतिभिःसर्पान् प्रतिद्रव्यमष्टोत्तर शतसंख्यभिधुतमिश्रपायस : अधिदेवगुरुं प्रत्यधिदेयान्पित्वांश्च प्रतिद्र- म राहुतिभिभगाद्याश्चतुर्विंशतिदेवता . अष्टसंख्याभिराहुतिभिः रक्षोनसुक्तदेवान् पंचदशमि ऋग्भि प्रत्यगष्ट संख्याभिः कृसराहुतिभिः सवितारं, दुर्गा, त्र्यंबक + ६५१) कर्मकार डरताकर, आपने पाशान्तिपनि। ऋत्यिस्तुति दुर्गा, वास्तोष्पतिं अग्निक्षेत्राधिपति मित्रावरुणौ अग्निचाप्टसंख्याभि राहुतिभिसोमंत्रयोदश संख्याभिराहुतिभिः रुद्र चतुगृहीतेनाज्येन,स्विष्टकृनंअग्न्यादि प्राजाप्रत्यान्तांश्चाज्येना- यक्ष-इंद संपादित द्रव्यं यथा देवतमस्तनमम, तत प्राचार्यो रनोधनसूक्तेनरक्षासूत्र मभिमन्य कलशोपरिधृत्वा, प्रत्मणान्वार- रब्धो दक्षिणं जानुनिपात्याघारोवाज्यभागौच हुत्वा, अन्वारम्भ त्यक्त्वा ग्रहयागोक्त होमपद्धत्यनुसारेण, ग्रादित्यादि दिपाला लान्तेभ्यो देवताभ्योसमिच्चज्य तिलाहुतिभिर्दुत्या, ततो गोप्रसवहोम पूर्वोक्त प्रकारेण विष्ण्वादिभ्योहुत्वा, ततो घृतमि- श्रितेन समित्तिलपायसादिद्रव्येण प्रधानहोम अष्टोतरशतं, सर्प- भ्यो वक्ष्यमाणमंत्रेणकुर्यात्-30 नमोस्तुसभ्य इति प्रजापति पिरनुष्टुप्छन्दः सादेवताः होमेविनियोगः-३0 नमोऽस्तुसपै. भ्योयेकेच पृथिवीमनु । येऽअन्तरिक्षयेदिवितेभ्यः सर्पभ्योनमः । स्वाहा । इदंसर्पेभ्योनमम ! इति १०८ वारं जुहुयात् । ततोऽधिदेव वृहस्पतये २८ वारं० 30 वृहस्पते, इति गृत्समदऋपि स्त्रिष्टुप्छन्दो वृहस्पतिर्देवता होमेविनियोगः 30 बृहस्पतेऽप्रतियदर्योऽअर्हाय- मद्विभातिकतुमज्जनेषु । यद्दीदयच्छवसऽऋतप्रजात तदस्मासुद्र- विषंधेहिचित्रम् स्वाहा. इदंवृहस्पतयेनमम २८ वारंहुत्वा तिता प्रत्यधिदेवपितृभ्यो ऽष्टाविंशतिसंख्याभि सुहयात् । पुनन्तुमा पितर इति प्रजापतिऋपि रनष्टप्छन्दापितरोदेवता होमेविनियोगः 30 पुनन्तुमापितरः सोम्यासः पुनन्तुमापितामहाः पुनन्तुप्रपि तामहाः पवित्रेण शतायुपा । पुनन्तुमा पितामहाः पुनन्तुप्रपिता- महाः ॥ पवित्रेण शतायुपा विश्वमायुर्व्यश्नवे स्वाहा ॥ इदंत भ्योनमम, उ०प० तताभगादि चतुर्विशति नक्षत्रदेवेभ्यो ऽष्ठ संख्याभिर्नाममंत्रः पायसेनवा यवायतिले र्जुहुयात् ।, 30 भगा- यनमः स्वाहा । इदभगाय नमम, एवंसर्वत्र 30 अय॑म्णेनमः स्वाहा । 30 सूर्यायनमः स्वाहा । 30 त्वष्ट्रेनमः स्वाहा। आवायनमः स्वाहा। 30 शक्राग्निम्यानमः स्वाहा, इदंशका- :
कनकाराग्लाकरे, मानेपाशान्तिपद निः। (६४२) । ग्निम्यानमम । ॐ मित्रायनमः स्वाहा। 30 इन्द्रायनमास्वाहा० नियंतयेनपः स्वा० उ० स्प० । ७0 तोयायनमः स्वाहा । 30 विश्वेभ्यो देवेभ्योनमः स्वाहा-इदं विश्वेभ्यो देवेभ्योनमम । ॐ विष्णवेनमास्वाहा । ॐ वसुभ्योनमः स्वाहा । इदं वसुभ्यो नमम । 30 वरुणायनमः स्वाहा 30 अजचरणाय नमः स्वाहा ॐ अहिर्बुध्नायनमः स्वाहा । ॐ पूष्णेनमः स्वाहा । दस्राभ्यां नमः स्वाहा । इदंदम्राभ्यां नमम । ॐ यमायनमः स्वाहा। ॐ अग्नयेनमः स्वाहा । ॐ ब्रह्मणेनमः स्वाहा । 30 चन्द्र मसे नमःस्वाहा । रुद्रायनमःस्वाहा । उ०प० । अदित्यै नमः स्वाहा, इदमदित्यनमम । अतः परंप्रत्येक मंत्रणाष्ट संख्यया कृणुष्यपाजेत्यारभ्य यातेरुद्रेत्यन्तै मूलशातिहोमोक्तमंत्र जुहु यात्- ग्रंथविस्तारभियान्नात्रसंग्रहीताः । उदकंस्पृष्ट्वा-ततः स्विष्ट कृतं हुत्वा ब्रह्मणान्वारब्धो भूरादिनवाहुतिभिहत्वा प्रणितावि- मोकान्तं कृत्वा पूर्णाहुतिं कुर्यात् तद्यथा साचार्या यजमानः पूर्णा- हुतिकुर्यात्-तत्रसंकल्प:- अद्येत्यादि देशकालासकामुकरा- शि रमुकाऽहंममास्य पुत्रस्थाश्लेपा नक्षत्र जनन शान्ति हाम कर्मणा न्यूनातिरिक्त दोषपरिहारार्थ श्रीपरमेश्वर प्रीतये मृड. नामाग्नौ पूर्णाहुति होम करिष्ये, ततःश्रीफलं रक्त कौपेय वस्त्र- वेष्टितं पूगीफलेवास्रवेनिधाय, मूलशान्त्युक्त प्रकारेण, अंगालंभ नान्तं कर्मकृत्वा, उदकंस्पृष्ट्वा,मृलशानिमचन् रुद्रकंभं, सार्पर्कभंच संपूज्य-30 व्यंवकयजामहे० मत्रेणरुद्र, अनमोस्तु सभ्यो येके च पृविवीमनु । येऽअन्तरिक्षयेदिवितेभ्यः सर्पेभ्योनमः ॥ इति प्रसादयित्वा, ततः स्नानमण्डपे श्वेत वस्त्रं प्रसार्य तदुपरि शत मूलानिवा श्रीपर्णी कुशादिकान विकीर्य, तत्रयजमानः सपत्नि पुत्रः पद्मासनेनोपविशेत् तत्र संकल्प:-अद्येत्यादि संकी मुकराशिरमुकः सपत्निपुत्रोऽहम्-ममपुत्रस्याश्लेषा नक्षत्रामुक पाद जनन सूचित मातापित्राद्यरिष्ट दोष परिहार्थ शुभाप्तयेचा भिषेक मन्त्रैर्यजान्तस्नान महं करिष्ये, ततप्राचार्यादयो ब्राह्मणाः . , २५३) का एलाकरे, पारने शान्तिरसतिः . उत्थाय, पूर्वोक्त मूलशान्त्यभिषेक मंत्रः ४१ अभिषिच्य, ततोऽ भिषेकपद्धत्युत्ततः सुरास्त्वामित्यादिभिरभिपिचच्य, वक्ष्यमाण मन्त्रैशाभिषेक कुर्य-30 श्राश्लेपा ऋक्षजातस्य मातापित्रोर्धनस्य च । भ्रातृजानि कुलस्थानां दोपं सर्वव्यपोहतु । पितरः सर्वभूता. नां रक्षन्तु पितरःसदा । सर्पनक्षत्रजातस्प वित्तंच जातियांधवान । इत्यभिपेकं कृत्वा, सहस्रधाराभिः स्नात्या नृतन वस्त्रपरिधान कृत्वा वृतछायादर्शनं कुर्यात् , ततो गोदानादि संकल्पं कुयान्- ततः सवत्सांगामानारप, गोदानपद्धयुक्त विधिना सम्पूज्य ब्राह्मणंच, सकल्पं कुर्यात्-प्रत्यादि संकीर्णामुकराशिरमुक शर्मा सपत्निपुत्रोऽहं ममास्य पुनस्यारलेपानक्षत्रोत्पन्नस्य माता पित्रोःसर्वारिष्ठ निवृत्तिपूर्वकं शुभफलातये, कृतस्याश्लेपा शान्ति होमकर्मणः साद्गुण्यार्थ इमांसवत्सांगां श्रोचार्याय तुभ्यंदास्पे, तस्सन्नमम,ततःप्रतिष्टांकृत्या,तनोन्द्रजापकं कृप्यामड्याहंच- संपृज्य-संकल्प:-श्रये अमुकोऽहंयारलेपाशांतिकर्मणः साद्- गुण्यार्थ श्रीमद्रप्रीतये इभमनवाहरुद्रदैवतं तुभ्यंदास्ये, ततःप्रति छांकृत्वा || मात्विक्सदस्यादि प्रात्मणान्सम्पूज्य-अयत्यादि० श्रमुकोहं पाश्लेपाशान्तिकर्मणःसादगुण्यार्थ ब्रह्मसदस्यविक्सप्त शती शान्तिकाध्पाय सुरुदिपाठकारकेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो इमादक्षि पां यशिविभज्यदास्य-तथेमाभूयसीदक्षिणांचान्येभ्यो ब्राम- णेभ्यो विभज्यदास्ये, अ तत्सन्नमम, तत्याचार्यादयःपूक्ति प्रकारेण अभिपेकं मन्त्रतिलकाचतारोपणंचकृत्वा रक्षाबंधनादि पाशीर्वाददाः ॥ ततउत्तराङ्गपूजनंकृत्वा-ताम्रपानेसफलार्घ्यगृही त्वा-30 सर्पाधीशनमस्तुभ्यं नागानांचगणाधिप । गृहाणार्य मयादत्तं सर्वारिष्टप्रशांतये । इत्ययंदत्वा-~~30 यान्तुदेवगणाः इतिदेवंविसृज्य ॥ अग्निंचविसृज्य, यजमानस्य महानीराजनं कारयित्वा , ब्राह्मणान् भोजयेत् ।। इत्यारलेपाजननशान्तिपध्दतिः ।।
(६४) प्रथ कायायनोत्ता यमलजनन शान्तिः~-मपातोगमनप्रायश्चितविधिया. মহয়্যাথায্যালাননগ্নানিয়মি:। ॥ श्रथयमलजनन शान्तिपरिभाषा। इशिस्नायि- राम्यागो, २ भागागोदेसी गहमी यस्यानो रिलि रामापरिगतागपूर (भागन्द्र- तारानुकूलेऽन्यमिन्सुदिनी ) कणाशोदागौरप.यमुरगहन्त । प्लास्टीम्स्यन्यरामोवा गौ सयंगरत शामिश्रीतये नदिएपर्व र सौरलतापूर्ण, गीविभिमतोनापत्रिका, नितिमि., कयानश्चिन, इतिद्वगा, देण, पंचामन प्रयास भरायप, त्वा,अलंकृत्यती में पर अनास्तरमालोमा रिवाSSYAगाविमा होति, वी रनानमंत्रः, स्थालीप वस्याहोति, अग्नयस्वाल, सोमायर पाहा, परमाना. राहा, पादर यस्वाहा, गाणा रस्वाहा, मर-प.रवाहा, यमाय वादा, तायाहा, मृत्य यहा, स्वाक्ष,अन्नयतिप्रकृतेरवाहा, शी, एतथे होतात अलूरनकोता; शैननाय प्रशि-सभिवानरोधमाकमाजालबाबदुकुम्भ प्रलने, प्रामनरागन नभंगगृत्यपानिय कृपलाये शोर मर्प गे छमध्वविनारेऽन्य त्यात भूकम्पोला- पात पाक सी रागम ( मैथुन) प्रेक्षाणा देत माप्रद शान्तिकाविधिनाकृत्या प्राचार्यायवादव नामा भोयिस्का स्वरि गायि चारशिप.नियशान्तिभवतीनि ।। अथयमलजननादिशान्तिपद्धतिः । अथ यजमानः प्रसवदिवसादशाहोवं, नामकर्म दिवसे वा चन्द्रतारानुकले शुभेऽन्हि, प्रातनित्यकर्मसमाप्य गृहाभ्यंतरे पूजास्थलमागत्य, प्लक्ष १ औदुंवर २ घट : अश्वत्थ ४ शमी ५ देवदारु, ६ वृक्षाणां कपायं (रसं) एकीकृत्य, श्रष्ठौमृण्मय कलशानापूर्य तत्र गौरसर्पप हिरण्य दूर्वांकुरान पल्लवान्मक्षिप्य, संस्थाप्य च, आचम्य भूतोत्सादनादि कर्मकृत्वा संकल्पं कुर्यात- अद्यत्यादि० अमुकराशि सपत्निकोऽहं ममयमल जननेन सूचिता रिष्ट निरसनद्वारा सर्वोपद्रव शान्त्यर्थ स्वस्तिवाचन गणेशादि पंचांग देवता पूजामपूर्वकंकपायाप्टकलश स्थापनं तैः स्नानं तदन- त्तर-कात्यायनोक्त विधानेन होम गोदानंच करिष्ये ततोब्राह्मणां, श्चभोजयिष्ये, ततः स्वस्तिवाचनं पठित्वा गणेशादि पंचांगदेवा- सम्पूजप, कलश स्थापन पूजन प्रकारेणाप्टौ कलशासंस्थाप्य (६१) कर्मवाएटरत्नावरे यमल जननशान्तिपतिः। संपूज्य च, - आचार्य वृणुयात- -प्राचार्य ब्राह्मणसम्पूज्यसंकल्प:- अद्येत्यादि० अमुकराशि रमुकः सपत्निकोऽहंकर्तव्यैतद्यमलजनन शान्तिकर्मणि, प्राचार्यकर्मकर्तृमेभिवरणद्रव्यैरमुक शर्माणंब्राह्मण माचार्यत्वेनत्वांवृणे, कर्मकुम, करवाणि, ततः सपत्नीकंयजमानं गृहांगणे पूर्वाभिमुख मुपवेश्य, पत्नींचामतः कृत्या-प्राचार्यावक्ष्य माण मंत्रः कलशाष्ठकवारिणायथाक्रमेणाट वारं, मंत्रान्पठित्वा स्नापयेत् , तत्रमंत्रा:-30 ग्रोपोहिष्टा मयोभुवस्तान अर्जदधा- तन । महेरणाय चक्षपे ।। योवः शिवतमोरस स्तस्यभाजयते हुनः । उशतीरिवमातरः ।। तस्माऽअरंग मामवीयस्थ क्षयाय जिन्वय । आपोजनयथा चनः ।। 30 कयानचित्र आभुवती सदावृधः सग्वा । कयाश चिष्टयावृता ।। कस्त्यासत्योमदानाम हिटो मत्सदन्धसः । दृढाचिदारुजेव्वसु ।। त्रातारमिन्द्र मवितारमिन्द्रर्ट हवे हवे सुहबशूरमिन्द्रम् । हयामिशळं पुरुहूत मिन्द्रस्वस्तिनो मघवाधाविन्द्रः।। इतिपंचेन्द्रसूक्तं ॐ व्यरुण स्योत्तम्भनमसिब्वरुणस्यस्केभसर्जनीस्योव्वरुणस्पात सदन्यसि व्वमणस्य ऋतऽसदनमसि व्यम्पस्य ऋतसदनमासीद ॥ इ० पंच वारुणसुक्तं । 30 इदमापः प्रवहता वद्यं च मलंचयत् । यच्चाभि दुद्रोहा नृतं यच्चशेपेऽअभीरुणम् । पापोमातस्मा देनसः पवमानश्च मुंचतु। ॐ अपाघमप किल्विपमप कृत्यामपोरपः । अपामार्गत्व मस्मदप दुस्त्वयर्टसुव । एतैमत्रैर्दम्पत्योः लानं, अष्ठकलश जलै रछधा । मंत्रं पठित्वा अभिषेकं कृत्वानव्यवस्वैरलं कृत्य, होमवेदी समीप मागत्य तत्र कुशेपूपविष्य, पत्नींदक्षिणतः कृत्वा, संकल्पः-अयेत्यादि संकीर्त्यामुकोहं सपत्निका यमलजनन होम कर्मणि, पंचभू-संस्कारपूर्वक मग्निस्थापन महंकरिष्ये, ततो होम पद्धत्यापंचभू संस्कारपूर्वकमग्निस्थापनं कुशकंडिका-विधानं ब्रमो पवेश नांदि कर्मकृत्वा, द्रव्यदेवताभि ध्यानपूर्वक द्रव्यत्याग कुर्यात्- अन्धेत्यादि सपत्निकोऽहं-यमल जनन शान्तिकमणि- कात्यायनोक्तविधानेन,-प्रजापति, इन्द्र, अग्निं, सोम, श्राज्येन , बैंगवाएटरतावारे, यमलजनन सान्निपद्धति । (६४६) N अपः इन्द्रं, वरुणं, अपः, अपामार्ग, प्राज्येन, नतः अग्न्यादी. निस्वष्टकृदन्तान स्थालीपाकेन, महाव्याहत्यादि-गायश्चित्तदेवताः प्रजापतिं चाज्येनाहं यक्ष्ये-एतदाज्यादि द्रव्य माघाराज्य भाग देवताभ्यः प्रधानदेवताभ्यउत्तरांग देवताभ्यश्च मयापरित्यक्तम्- तत्सन्नमम-ततः संव-धारणार्थ-प्रोक्षणी पात्रमग्निप्रणीतयोम मध्ये धृत्वा ॥ तत प्राचार्यों ब्रह्मणान्वारब्धः दक्षिणं जानुनिपात्य श्राधारावाज्य भोगौ च हुत्वा-त्यक्त्वान्यारंभः प्रथम, स्थाली पाकेन-30 आपोहिष्टेति तिसृणां सिन्धुढीपऋपिर्गायत्री छन्दः आपो देवताः, यमलशान्ति होमे विनियोगः ॥ ॐ आपोहिष्टा मगो भुवस्तानऽऊर्जेदधातन । महेरणायचक्षसेस्वाहा । इदमद्भ्यो नमम एवं सर्वत्र ।। 30 योत्रः सिव तमोरस स्तस्य भाजयते हनः । उशतीरिवमातरः स्वाहा ।। 30 तस्माऽयरंगमामयो यस्य क्षयाय जिन्वथ । आपो जनयथाचनः स्वाहा ।। 30 कयान इति द्वयोर्वामदेव ऋषिः गायत्रीछन्दः रुद्रोदेवता यमलशान्तिहोमे० ।। 30 कयानश्चित्रऽभुव दृती सदावृधः सम्वा । कयाश चिष्टया वृता स्वाहा ।। आ करत्वासत्यो मदानामर्टहिष्टो मत्सदधसः । दृढाचि दारजे व्चसु स्वाहा ।२। 30 त्रातारमिन्द्रमिति गर्गऋषि स्त्रिष्टुप्छन्दः, इन्द्रोदेवता यमलशान्तिहोमे वि०। 30 त्रातारमिन्द्र मवितारमिन्द्रर्ट हवे हवे सुहवर्टशूरमिन्द्रम् । हृयामि शक पुरू हतमिन्द्रस्वस्तिनोमघवाधात्विन्द्र: 'स्वाहा, इतिपंचेन्द्रेण पंचा- हुति हयात् ॥ 30 वरुणस्येति प्रजापति ऋषिः पंचयजूंषि वरुणो देवता यमलशान्ति होमे चि० । 30 व्वरूपस्योत्तम्भनमसि व्वरुण स्पस्कंभसजनीस्थो व्वमणस्यऽऋत सदन्यसि व्चमणस्यऽऋत सदनमसि व्यरुणस्यऽनात सदममासीद स्वाहा । इतिपंचवारुणे नापि पंचवारं० । 30 इदमाप इति प्रजापति,पिमहापंक्तिश्छन्दः श्रापोदेवता यमलशांतिहोमेवि० । 30 इदमापः प्रवहता वयं च मलं च यत् । यच्चामि दुद्रोहा नृतंयच शेपेऽमभीरुपम् । श्रापो मातस्मादेनसः पयमानश्च मंचतु स्वाहा । 30 अपाघमिति शुन:
(६७) कालापार, निगमशान्तिावति । शेपऋपिर्गायत्रीछन्दः अपामार्गो देवता यमलशान्ति होमेवि० । 30 आपाघमप किल्विपमप कृत्यामपोरपः । अपामार्ग त्वमस्म दपदुस्त्वयर्टसुव स्वाहा ॥ 30 अग्नयेस्वाहा,उदमग्नयेनगम ।। सोमायस्वाहा इ० 1 0 पवमानायस्वाहा इ० । उ०पावकाय स्वाहा इ० । 30 मारुलायस्वाहा इ०। 30 मरुद्भ्यःस्वाहा इ० । 30 यमायस्वाहा इ०। 30 अन्नकारस्थाहा इदमन्तकायनमम । 30 मृत्यवेस्वाहा इ० । उ०प० । 30 ब्रमणस्वाहा इ०। 30 अग्नयेस्विष्ठकृतेस्याहा इ० । ततो होमपध्दत्यनुसारेण भूरादि- नवाहुतिहोमानन्तरं संग्रवप्राशनादिक कुर्यात्ततापूर्णपात्रदा नादि पूर्णाहुतियायुषकरणान्तं कृत्वा गोदानादि ऋत्विदक्षि पादानान्ते मन्त्राशिगल्लीत्या ब्राह्मणाम्भोजयेत् ॥ इतियमलजननशान्तिपद्धतिः।। अथ विकासव शांति परिभापा। उक्त चशातिसर्वर-तत्रयमुगाचे मात्र प्रयमुतोरदि। मातानिनो कुलस्याक्तिता निष्ठमद्भवेत । उटगशोधनानि सवामहद्भवेत । तस्यका शात्वावा शाह शुभदिने । प्राचार्य- मृस्विताश्याग्रहपुर मम्म् । ब्रह्मविष्णु महेशे द्र प्रतिमा स्वर्गात कृता । पूजयद्धान्यराशिस्य बन शोरिशकत । पचम वनशैरद पूनये द्रद्रमाया । रसूतानिवत्यादि शान्तिसूतानि । (रद गन्ययारुद्रसूतानि पेदित्यर्थ ) प्राचाया स्यात्तत्र सामाध्यस्लैिश्चरम् । अशोत्सहस्रब रतया निरानीतुवा देत "श्चतु मामिपुर सम् 1 ब्रह्मा सिद्रिस्पयत' भयामह । तत स्विष्टकृत हुवावलिपू'दुनितत अभिषेक कुटुम्ग कृतचर्य प्रपू यत् । हि गधनुरेषावमृत्विादक्षिण तत । प्राज्यस्पीक्षण वृत्वा शामि तुम येत् । इतिनिकप्रमवशाति परिभाषा। अथ त्रिकप्रसव शान्तिपद्धतिः। अथ च वालकस्य पिता, पुत्रजन्मदिवसादेकादशाहेद्वादशाहे अन्यस्मिन चन्द्रतारानुकले चा शुमदिने, परिभाषोक शान्ति सामग्रीसंपाद्य स्वासने उपविश्य, आचम्घ दीपं प्रज्वलग्य भूलो, त्सादनं कृत्वा शान्तिपाठं कृत्वा अर्घसंस्थास्य-संकल्प:-अये लादि सकी| मुफराशिरमुकोऽहं निकप्रसव शान्तिकमणि W 4 कारगपागधरतापरे, पियासवशान्तिपनि । (६५८) , निर्विघ्नतासिद्धये, श्रीभगवतो गणेश्वरस्य जनकरिष्ये-तथाच तत्पूर्वाङ्गत्वेन कलशस्थापन पुण्याहवाचन नान्दीश्राद्धमातृका पूजा बसोझैरानिपातन पूर्वक नवग्रहाणां पूजनं च करिष्ये । ततो गणेशादि पंचांगदेवतानां पूजनंविधाय, प्राचार्यादीनांवर कुर्यात्-तत प्राचार्य प्राप्तत्विकन्द्रसूक्तशान्तिपाठका संपूज्य संकल्प:-अयोत्पादि० अमुको विकासयशांतिकर्मणि एभिवर पद्न्यैरमुकगोत्रानमुकामुक शर्मणो ब्राह्मणानाचार्य ब्रमत्विक सूक्तशान्ति, कर्मकत्वान् वृणे, वरणद्रव्यं यथांश विभज्य, कर्मकुरु, करवाणीति प्रत्युक्तिः तत आचार्यों होमवेदी कृत्वा पंचगव्येन संमोक्ष्य पंचभूसंस्कार पूर्वक मग्नि संस्थाप्य, तत्पूर्वमागे कलश संस्थाप्य, तम्रग्रहानावाध सम्पूज्य च तत्कलशस्योत्तरस्यां पंचरतु धान्यराशिपु पंचकलशानवणान्कलशपूजोक्त विधिना संस्थाप्य तत्रब्रह्म विष्णुमहेन्द्ररुद्राणां पंचदेवानां सुवर्णप्रतिमाः अग्न्युत्ता रण पूर्वक पंचकलशोपरि पंचप्रतिमाः संस्थाप्य,-संकल्पः-अद्य. त्यादि० अमुकोऽहं त्रिकप्रसव शान्तिकर्मणि कलशोपरि स्थापितोसु सुवर्णप्रतिमासु ब्रह्मादीनां पूजन करिष्ये० 30 एतन्ते पटित्वा,, 30 भूर्भुवः स्वः पंचकलशोपरि सुवर्णप्रतिमासु ब्रह्मादिपंचदेवता सुप्रतिष्टितावरदाभवन्तु, इति प्रतिष्ठाप्य तत्रादौब्रह्माणं पूर्वकल- शोपरि पूजयेत् ब्रह्मजज्ञानं प्रथमपुरस्ता द्विसीमतःसुरुचोव्वेन ऽआवासबुध्न्याऽउपमाऽअस्यविष्ठाः सतश्चयोनि मसतश्चब्धिव इतिमंत्रेण ब्रह्माणं संपूज्य दक्षिणे विष्णु -30 इदं विष्णर्विच- क्रमेत्रेधानिदधेपदम् समूढमस्यपासुरे । 0 विष्णवेनमः सम्प्र- ज्य पश्चिमे पहेशम् 30 तत्युपाय विद्महेमहादेयायधीमहि । तन्नोन्द्रः प्रचोदयात् । 30 महेशायनमः उत्तरेइन्द्रम्-आयतइन्द्र भयामहेततोनोऽअभयंकृधि मघवन्छग्धि तवतन्न अतिभिर्विद्विषो विमृधोजहि । ॐ इन्द्रायनमः । ततश्चतुर्णांमध्ये रुद्रकलशे रुद्रं पूजयेत्-30 नमस्तेम्द्रमन्यवऽउतोतऽइपवेनमः । बाहुभ्यामुतते- नमः। 30 मद्रायनमः, इति सम्पूज्य, ततः मृत्तजापकश्च मद्रक- फकाएर, प्रिनसशान्तिपतिः (६४) लश स्पृशन्नेकादशवारं प्रतिमूक्तंपटेन्-30 कद्रुद्रायेति भद्रसूक्त स्थाष्टमंत्राणां करवपिर्गायत्रीछन्दो भद्रोदेवता पाठेविनियोगः 0 कट्ठद्रायमचेतसमीदुष्टमायनव्यसे । बोचेमशप्तमहदै ॥१॥ यथानो अदितिः करत्पश्वेतृभ्योयथागवे । यथा तोकायमद्रियम् ||२|| यथानोमित्रोचमणो यथामदश्चिकेतति । यथाविश्वेसजो- पसः ॥३॥ गाधयतिंमेधपतिन्द्रजलापभेजम् । तच्छयोसुम्नमी- महे ॥४॥ यः शुक्रडवसूर्यो हिरण्यमिवरोचते । श्रेष्ठोदेवानांवसुः || शंनः करत्यर्वते सुगंमेपायमेष्ये। नृभ्योनारिभ्योगये || अस्मेसोमश्रियमधिनिधेहिशतस्पवृणाम् । महिश्रयस्तुविचम्णम् ॥७॥ मानः सोमपरिवापोमाऽरालयो जुहुरंत | थानइन्द्रोवाजेभ- ज ॥८॥ 30 यास्तेइत्यस्य करवऋपि रनुष्टुप्छन्दः रुद्रोदेवता पार्ट विनियोगः 30 यास्तेप्रजा अमृतस्य परस्मिन्धामन्नृतस्य । मृर्धा- नाभासोमवेन आभूपन्तीसामवेदः 30 इमान्द्रायेतिरुद्रसूक्तस्य नव मंत्राणां कुत्सपि जगतीछन्दः रुद्रोदेवतापाठे विनियोगः 30 इमारुद्रायतवसेकपर्दिनेक्षयद्वीराय प्रभरामहेमतीः । यथास- मद्विपदे चतुष्पदे विश्वंपुष्टंग्नामे अस्मन्ननातुरम् ।। मुडानोन्द्रो तनो मयस्कृधिक्षयाहीराय नमसाविधेमते यच्छंचयोश्चमनुराये जेपिता तदश्याम तवमद्र प्रणीतिपु शश्यामते सुमतिं देवय- ज्ययाक्षयद्वीरस्य तबरुद्रमीड्वः सुम्नायन्निहिपो अस्माक माचरा रिष्टवीरा जुहवामतेहविः । त्वेषवयंरुद्रयजसाधवक कविमवसे निदयामहे । पारे अस्मदैव्यहेडो अस्यतुतुमति मियमस्याबृणी महे ।। दिबोवराहमरूपं कपदिनत्वेषरूपनमसानियामहे । हस्ते विभ्रद्वेषजावार्याणि शर्मधर्मछर्दिरस्मभ्ययंसन् शइदंपवित्रेमस्ता मुच्यतेवचःस्वादोः स्वादीयोरुद्रायवर्धनम् । रास्वाचनो अमृत मतभोजन मतोकायतनयायड | मानोमहान्तमुतमानो अभमानउत्तन्नमुनमानउक्षितम् । मानोवधीः पितरंमोतमात रंमानः प्रियास्तन्बोरुद्ररीरिपः मानस्तोकेतनयेमानऽआयुषि मानो गोपुमानोअश्वेपुरीशिपः । मानोवीरान्द्रभामिनोवधीई ६५०) कर्मकामनाकरे, निमशान्तिगदभिः येष्मन्तःसदमित्वाहवामहे ।। उपतेस्तोमान्पशुपाहवाकर रास्वा पितमस्तांसुम्नमस्मै । भद्राहितेसुमतिडयतमाथा वयमहत्त. गीमहे ।।। 30 उपते, इतिमद्रसूक्तस्य मन्त्रयोः कुत्सपिन्त्रिष्टु छन्दः रुद्रोदेवता पाटेविनियोगः ॥ 30 उपतेस्तोमान्पापाइवा करं रास्थापितमरुतांसुन्नमस्मे । भद्राहितेसुमतिर्मुटयतमाथा व्य- यमवइत्तेघृणीमहे ।१०। श्रारेतेगोघ्नमुतपूनपघ्नंतमद्वीरसुम्नमस्मे तेश्रस्तु । मृदाचनोअधिचबूहिदेवाधाचनः शर्मयच्छद्विवर्हाः ।। इतिद्वितीयः । ॐ पातेपितः, इतिपञ्चदशमन्त्राणां गृत्समदपि जगतीछन्दांसि रुद्रोदेवता तृतीयरुद्रसूक्त पाठे विनियोगः। ॐ श्रातेपितर्मरुतांसुम्नमेतुमानः सूर्यस्यसंशोयुयोधाः । अभिनो वीरोश्रर्वतिक्षमेतप्रजायेमभिरुद्रः प्रजाभिः ॥ त्वाऽदतेभिरुद्रशंत मेभिः शतंहिमाअशीयभेपजेभिः । व्यस्मद्वेपोवितरंगहो व्यमी वाश्चातयस्वाविपृचिः ।२। श्रेप्टोजातस्यरुद्रः श्रियाऽसितमस्तवस्व वसांवज्रवाहो। पर्षियःपारमंहसः स्वस्तिविश्वाअभीतीरपसो- युयोधि ।३। मात्वारुद्रचुधामानमोभिर्मा सुष्टुतीवृषभमासहति उन्नोवीराँअपर्यभेषजेभिर्भिपक्तमत्वाभिपजांशृणोमि ।४। हवी मविहवसेयोहविभिरवस्तोमेभीरुद्रंदिषीय | ऋदृदरःसुवोमानो अस्यैवभ्रुः सुशिमोरीरधन्मनायै ।श उन्माममादपमो मरुत्वान् त्वक्षीयसावयसानाधमानम् । शृणीवच्छायामरपो अशीयाविवा सेयरुद्रस्यसुन्नम् ।। कस्यतेन्द्रमृडयाकुर्हस्तोयोअस्तिभेपजोजला पः। अपभरिपसोदैव्यस्यामीनुमावृपभचक्षमीथाः प्रवभ्रवे वृषभायविश्वतेचेमहोमहीं, सुष्टुतिमीरयाभि । नमस्याकल्मली किन नमोभिणीमहि त्वेपरुद्रस्यनाम 1 स्थिरेभिरंगैः पुरुरूप उग्रोवर्धः शुक्रेभिः पिपिशेहिरण्यैः॥ ईशानादस्यभुवनस्यभूरेन वाउपोषद्रुद्रादसूर्यम् ।। अहन्विभर्पिसायकानि धन्वाहनिक यजतंविश्वरूपम् । अहन्निदंदयसेविश्यमभ्वं नवायोजीयोन्द्रस्त्य दस्ति ।१०। स्तुरिश्रुतंगरीपदयुवानं मृगनभीममुपहन्तुमुग्रम् । मृडाजरित्रेमद्रस्तवानोऽन्यते अस्मन्नियपन्तुसेनाः ॥११॥ कुमारश्चि ..
कर्मकार रत्नाकर त्रिकासवशान्तिपतिः (६५) पितरंवन्दमानं प्रतिनानामन्द्रोपयन्तं । भूरेतारंसत्पतिगृणीवे स्तुतस्त्वंभेपजारास्यस्मे ।१ यायोभपजामतः शुचीनियासन्त मावृषणोयामयोभु । यानिमनुरव्रणीतापितानस्ताशंचयोश्च मुद्र स्थचश्मि ११३६ परिणोतीरुद्रस्यवृज्याः परित्वेपस्पदुमतिमही गात् । अवस्थिरामघवद्भ्यस्तनुष्य मीढ्वस्तोकायतनयाय- मृड १११ एचावभ्रोवृपभचेकितानयधादेवनहणीपेनहंसि ॥ हवन श्रुन्नोरुद्रहयोधि वृहद्वदेमंविदथेसुवीराः ॥१५॥ इतितृतीयसूक्तः ।। ॐ इमारुद्रायेतिचतुर्जामन्त्राणां वशिष्ठऋपिजगतीछन्दो रुद्रो- देवता शान्तिकर्मणिचतुर्थ रुद्रसूक्तपाठे विनियोगः ॥ ॥ इमाम द्रायस्थिरधन्वनेगिरः क्षिप्रेपवेदेवायस्वधाम्ने। अपाङ्हलायसह मानाय वेधसेतिग्मायुधाय भरताशृणोतुनः ।। सहिक्षयेणक्षम्य स्थजन्मनः साम्राज्येन दिव्यस्यचेनति । अवन्नवन्तीरुपनो दुरश्च रानमीयो रुद्रजासुनोभव १२१ यातेदियुदवसृष्टा दिवस्परिदमया चरतिपरिसावृणक्तुनः । सहसंतेस्वपिवातमेषजा मानस्तोकेपुतन येपुरीरिषः । मानोवधीरुद्रमापरादामातेभूमप्रसितौहीडितस्य, श्रानोभजवहिषिजीवशंसेयूयंपातः स्वस्तिभिःसदानः ।४। इति रुद्रसूक्तान्येकादशवारंजपित्या, ३. चंचाचम् । इतिरुद्रेःसप्तम शान्त्यध्यायंचपठेत् । तत श्राचायाँहोममेद्यां पध्दत्युक्तप्रकारेण पर्युक्षणान्तंकर्मकृत्वा प्रोक्षणीपात्रं संस्रवधारणार्थमग्निप्रणीत योर्मध्ये धृत्वा । एतन्ते०, इतिपठित्वा भूर्भुवस्वः,वरदनामा अग्ने इहागच्छेहतिष्ट सुप्रतिष्टितोवरदोभवेति प्रतिष्टाप्य, वरदनामाग्नयेनमः सम्पूज्य यजमानो द्रव्यदेवता मिध्यानपूर्वक द्रव्यत्यागकुर्यात्-अद्यत्यादि संकीर्त्य, निकप्रसव शान्तिकर्मणि प्रजापतिमिन्द्रमग्नि सोममाज्येन,आदित्यादि ग्रहान् समिनामित प्रत्येकमष्ठसंख्यया साधिपत्यधिदेवांश्चतुःसंख्यया, विनायक दि पंचलोकपालानिन्द्रादि दशदिक्पालांश्चहि संख्यया, विष्णुम- हेशेन्द्ररुद्रान्प्रधानपंचदेवा न्प्रत्येकमष्टोत्तरशतसम्यया और स्विष्टकृतम्-अग्न्यादि प्राजापत्यान्तांश्चाज्येनादयत्य, इंद , १६५२) कर्मकाण्उरलाफर, त्रिक प्रसवशान्तिामति. तत्तद्देवताभ्योमयापरित्यक्तं यथादेवतमस्तु, 30 सन्नसम । ततः आचार्यों ब्रह्माणाऽन्वारब्धो दक्षिणजान्याकुंच्या घाराज्यभागौ च हुत्वा अन्वारंभंत्ययस्या, सात्विक ग्रहयागोक्तपद्धत्युक्त प्रकारेण, दशदिक्पालान्तान्हुत्वा ततः प्रधान देवेभ्यो ब्रह्मविष्णुमहेश्वरेन्द्र रुद्रेभ्यः पूर्वोक्त ब्रह्मजज्ञानमित्यादिभिः पंवभि मंत्र: प्रत्येक समित्तिलाज्य चम्द्रव्य रष्टोत्तरशतसंख्य होने हुत्वा, स्विठकद्धो मंविधाय, भाज्येन भूरादि नवाहुति होम बहिहोमंचकृत्वा, संस्त्र. वप्राशनान्तं विधाय प्रह्मणेपूर्णपात्रं दत्वा ततो ग्रहयागोक्त चलि दानरीत्या ग्रहादिलोकपालन्तेभ्यो दध्यक्षतवलिं चा पायसवलिं निवेदयित्वा ब्रह्मादि पंचम्यो वलिदानंविधाय क्षेत्रपालाय वलि दत्ता पूर्णाहुतिहोमं कुर्यात् , ततःसपत्निपुत्रो यजमानो गोदान कुर्यात्-तदभावे निष्क्रयीभूतं तिलपात्रादिकं च कुर्यात् संकल्पः अद्यत्यादि देशाकालौ संकीर्त्य सपत्निकोहं ममसुतत्रयानन्तरं सुताजननेन वा कन्यानयानंतरं पुत्रजननेन सूचितारिष्टनिरसन द्वारा शुभफलप्राप्त्यर्थं कृतस्य त्रिकप्रसवशान्निहोमकर्मणः । साद्गुण्यार्थ इमांगांवा गोप्रत्याम्नायीभूतं सुवर्ण रजतादिद्रव्यं तथेमाः सुपूजिताश्चप्रतिमाः अमुकशर्मणे आचार्याय तुभ्यंदास्ये, तथा सूक्तादि शान्तिपाठकेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो, इमांदक्षिणां तथा नानागोत्रेभ्यो ब्राह्मणेभ्यो भूयसींदक्षिणां विभज्यदास्ये, तथा पक्वान्नेन ब्राह्मणांश्व भोजयिष्ये दक्षिणांचदास्ये,हत्याचार्यादिभ्यो कर्गदक्षिणांविभज्य, पूर्वावाहितारन्यादिदेवाना मुत्तरादपूजन कृत्वा विरहज्यच, पूजित घटकलशोदकेनाभिपेक पद्धतिना सपुत्र पत्नीकस्यस्वस्था भिपेकमाचार्यादिभिःकारयित्वा घृतच्छायादर्शनं कुर्यात्-ततः शानोभद्रेति शान्तिपाठंकृत्वा तिलकाक्षतादिरो- पणाशीर्वाद गृहीयात् । ततो ब्राह्मणान्भोजयित्वा स्वयंचभुजीत। इनिशांतिपटलातत्रिकप्रसवशान्तिपद्धतिः।
परमकाएउरलाकर, त्रिकप्रसवशान्तिपति । ॥अथपित्रायेकननत्रजननशांतिपरिभापाः ॥ - अथ पृद्धागोतक नक्षा जनन शान्ति परिभाषा--- उक्त शान्तिमारे- एक मात्र दिन भाना या पितृ पुग्यो । प्रसूतिश्चत्तया त्युविदकस्यनिश्चय । भ्रात्रानाभगिन्यारियर्थ । पुनया मातापितृदने पुस प्रयोरित्यर्थ ॥ तर नापिम यामि सा चामल्तु । शुभते शुभचार च चन्दतारावलाविते । रिष्टविष्टि विरजतु प्रारम दरममुगी । प्राचार्यग्य पूर्वच तुरोयजा द्वित्तमान् । पुपया हवाचयिता तु शानि-कर्म सनापरत् । अग्नेरीशानदिम्भाग नननप्रतिमा तत । तरक्षातमनण पूजय शोरि क्षमावशिष्टप्रोले चालायनागिशिष्ट क्ता । अननन तद्देवता च पूजयत् । वय माणज्योति निघनार ण च द्य सम्मान नष्टय । । रक्शीपन मग दुदिनिमुख ता । मानवतुम -ग हुने दष्टार शतमू । तर वृक्षाकेनत्यर्थ । प्रत्यारामिद ाज्य प्राश्चि -1मय च मभिपारन उदिावा पितृपुनका । इयमपितृप्रहामुपलक्षयम् ॥ यत्रम तन्मद वारस्यामि पदस्थ । पखालकग्गादा-राचायपूजयत्पुन । 1ि रक्षिणा द्या मापनय मुखएवम् । तूच प्रतिमासन या यवस्त्रादिभि राह । यानरग्यामना शनि दद्यातदोपरान्तया भोज् यद् नााणन् स्वान् वित रायविवर्जित ए कृत्यासिननु शातिभाति निश्चितम् ।। ॥ अथपित्राद्यकनक्षत्रजननशांतिपद्धतिः ।। अथ च कर्ता नित्यकर्मसमाप्य, पूजास्थलमागत्य शुभासने उपविश्याचम्प, दीप प्रज्वलय्य भूतोत्सादनं विधाय, स्वस्तिवा- चनं पठित्वा संकल्पंकु र्यात-प्रोत्यादि देशकालौ संकीर्त्या मुकोऽहम, अमुकनक्षत्रोपलक्षितस्यामुकराशेरस्यपुत्रस्य पित्राधे- कनक्षत्रजनन सुचितारिष्ट निवृत्तये शुभफलाप्तये, सर्वोपद्रय निरसनार्थ श्रीपरमेश्वरप्रीतये चैकनक्षत्रजनन शान्तिकरिष्ये- तत्पूर्वांगत्वेन निर्विघ्नता सिद्धये, गणपत्यादि पंचांग देवतानां प्रजनंकरिष्ये-तथा होमार्थ प्राचार्य ब्रह्मविजा तथा सप्तशती शान्त्याध्याय पाठकानां च पृजनपूर्वक वरणकरिष्ये इति सकल्प्य गणेशादि नवग्रहान्त पूजन विधाय (माता पितनक्षत्रे पुत्रान्या जन्मानिजाते तत्रादौ गौमुखप्रसवशान्तिं कृत्वा कर्ममारभेत् ) भ्रातृभगिन्योर्धात्री रेकनक्षत्रोत्पन्तौ चगौप्रसवं कृत्वा वक्ष्यमाण विधानेन शांतिकुर्यात-तत प्राचार्यादीनां चतुर्णांवरणकृत्वा, (६५४) कमकाण्डरत्नाकर,पित्रायेंकनक्षप्रशान्तिपद्धति. . प्राचार्या गौरसर्पपानादाय भृतोत्सादनं कृत्वा पंचगव्येन भूमि संमोदय, तत्र होमवेदी निर्माय पंचभूसंस्कार पूर्वक मग्निं संस्था प्य, होमवेद्या ईशाने कलशविधिना कलशं संस्थाप्य तत्रनवग्रहा नावास सम्पूज्य च तन ताम्रपूर्णपात्रोपरि पभावितश्वेतवस्त्रप्र- सार्य तदुपरिसौवर्णी जन्मनक्षत्र देवता प्रतिमामग्न्युत्तारण पूर्वि- कांसंस्थाप्य 0 एतन्तेति० पठित्वा, भूर्भवः स्वः अमुकनक्षत्र देवात्रसुवर्ण प्रतिमायां सुप्रतिष्ठितोवरदाभव इति प्रतिष्टाप्य, (अवनक्षत्रदेवता कमंत्रं मूलशान्त्युक्त नक्षत्रदेवतास्थापन विधौ विचार्य गृहीत्वातेन पूजनंकुर्यात् ) ग्रंथविस्तारभयानात्रमंत्राः प्रदर्शिताः । एवं नक्षत्रदेवं पाद्यादिभिः सम्पूज्य रक्षासूत्रमभिमंत्र्य तत्रकलशेसंस्थाप्य, होमवेद्यां ब्रह्मोपवेशनादि चाप्रपणान्तं कर्म कृत्वा ततो यजमानो द्रव्यदेवता भिध्मान पूर्वकं द्रव्यत्याग कुर्यात्-अद्येत्यादि देशकालौ संकीत्यकनक्षत्रजनन शांतिकर्मणा ऽहंयक्ष्ये-तत्रादौ प्रजापतिमिन्द्रमग्निं सोममाज्येन, अमुकनक्ष- ब्रामुकदेवता समिच्चज्यद्रव्यैण प्रत्येकमष्टोत्तर शतसंख्याहुति- भिशेषेण स्विष्टकृत,अग्न्यादिप्राजापत्यन्नांश्चाज्येन यक्ष्येतदेतद्धोम द्रव्यमेतद्देवताभ्यो मयापरित्यक्त यथादैवतमस्तुनमम । तताचा- ोवरदनामाग्नि ॐ एतन्ते इतिप्रतिष्ठाप्य वरदनामाग्नयेनमः सम्पूज्य रेखाभ्योनमः ॐ सजिव्हाभ्योनमः सम्पूज्य च प्रोन- णीपात्रं सत्रवधारणार्थ प्रणीतारन्योरंतराले निधाय, अन्यारब्ध आधारावाज्य भागौच जुहुयात् प्राचार्यादयऋत्विक्पाउका नक्ष त्रदेवता मंत्रणाष्टोत्तरशत संख्यया समिच्च,ज्य द्रव्यैः प्रत्येक प्रधानहोमकुर्यः एवं प्रधानहोमं कृत्वा प्राचार्यों ब्रह्मणान्वारब्धः स्विष्टकृद्धोमव्याहत्यादिनवाहुतिहोमं दिक्पालेभ्योवलिं दत्वा सस्रवप्राशनं कृत्वा ब्रह्मणे पूर्णपात्रं दत्वा वहिहोम पूर्णाहुति च कृत्वा श्रोचार्याय गांवानिष्क्रयीभृतं द्रव्यंदत्वा, ऋत्विक् पाठका- दिभ्यापि दक्षिणां दद्यात् ततः कलशजलेन अभिषेकं पूर्वोक्तमंत्र: कृत्वा तिलकारोपण रक्षाबंधनं च विधाय धृतच्छाया दर्शनंकृत्वा करीकाक्षाकरे, पिनायकमनशान्तिपादनः ।। ३५५) थाशीर्वादं गृहीत्वाग्नि देवांश्चविस्मृज्य, ब्राह्मणान्भोजयित्वा स्वयमपि च भुञ्जीत । इत्येकननत्रजननशान्तिः । अथ प्रथमोर्धदजनन तथा सदन्त जननशान्ति परिमापा | उतच पाहमाद्री विष्णुधर्मासरेच शान्तिमारमंग्रह-दन्तजन्मनि बालानां लक्षणं तन्धिोधमे । उपरिप्रया रस्य जारते हि शिशोदिना. (ताः ) ॥दन वा सह रस्यर याजन्मभार्गवसत्तम ॥ मातरंपितरचैव खादत्यात्मानमेवय , शान्तितत्र प्रवक्ष्यामि तामेनिगदत:शृणु । गजष्टस्थितवालंनौस्थवास्नापयेद् युधः । तदभावेतु धर्मश कोचनेचारासने । सधैः रागिंधवाजेः पुष्पफलैस्तथा । पंचगव्येनरले व मृत्तिकाभिवभार्गव । स्नापये दित्य वयः ॥ स्थालीपाकेनयात र पूजयेत्तदनन्तरम् । चतुर्थ्यन्तनानासकृदा तिः ॥ सप्त हंचानकत्तव्यं तथा ब्राह्मणभोजनम् । अष्टमेऽनिविप्राण तथादेया व दक्षिणा ॥ कांच रजतं गांच भुवंवा धान्यमेव च। अदभुतसागरेत्वा पंचदशी शान्तिरुका~-तति:-पालानामष्टममागि पटेमासिततः पुनः । दंतायस्पच जायन्ते मातावानियतेपिता । बालकःपीड पतेतत्र खयमेवशमयः । दधिज्ञौतात्ताना- मश्वत्यसमिधांततः । जुयादष्टचशत प्राज्ञोमनेण मक्ति । धेन्वाक्षिणांदद्यात्ततापयतेशुभम् । साधा- रणेन प्रकारान्तरमुक्तपद्मपुगणे-सामान्येनिषिध्देन्तनमनि स मान्यगुणस्न नमत परम् । भद्रासनेनिवे. शन मूनिमूलफ्लैस्तथा । सर्वोय. सर्वबीजः सर्वगंधस्तथैवच । मायापुजयचथ पन्हिसोमममीरणाम् पर्वताश्च तथास्याता देव देव च केशवम् । एतेषामेव जुयातद्धृतमग्नौ यथाविधिः । ब्राह्मणानान्तुगतव्य यथाशत्तयाचदक्षिणा । तनावलकृतंयालमासमेनेतूपवेशयेत् । पूच्याश्चाविश्व नायों ब्राह्मणा.मुहदस्तथा इति दुर्दन्तजनशान्तिविधिः॥ - ." , अथप्रथमोज़तथासदन्तजननशान्तिपद्धतिः । अथव शान्तिकर्ता चन्द्र तारानुकले शुभमुहत्त, शुभासने, उपविश्य दीप प्रज्वलय्याचम्याघसंस्थाप्य भूतोत्सादनंकृत्वा, प्राणानायम्य-संकल्पं कुर्यात्-यद्यत्यादि. अमुकोऽहममुकराशेः अस्यबालकस्य सदन्तजनन शान्ति कर्मणि, (वा) प्रथमोर्ध्व दन्त- जननशान्तिकर्मणि, (चा) निंघमासादिपु दन्त जननशान्तिकर्मणि, सर्व विघ्नोपशान्त्यर्थ-श्रीगणेश्वरादि पंचांग देवतानां पूजन धिनाव्यत्यागं कुर्यात-संकल्पः-अद्यत्यादि टेशकालौसंकीर्त्या पानप्रणीता रन्योरंतराले निदध्यात ततोयजमानः संकल्पचि. कर्मकाण्डरताकरे, विधायकगक्षनशाविपद्धतिः करिष्ये-ताच पूर्वोक्त प्रकारान्तर्गतामुक प्रकार प्रथम दन्त जनने सूचितारिष्टनिरसनार्थ सर्वकल्याणहेतवे श्रीपरमेश्वर प्रीतये निषिद्ध दन्तजननशान्तिं करिष्ये-ततः पूर्वोक्तप्रकारेण गणेशादि पूजनं कृत्वाहोमार्थं वेदी निर्माय, तत्राचार्य प्रामाणं च वृत्वा, ततो घृताचार्या होमवेयां पंचभूसंस्कार पूर्वक मग्निं संस्थाप्य- तदीशानकोणे कलशस्थापन विधिना कलशंसंस्थाप्यसंपूज्य तत्र नवग्रहानायाहा संपूज्य च, ततोहोमवेद्युत्तरे द्वितीयं वृहत्कलशं स्थापयित्वा, तत्र सर्वोपधि, सर्वधान्धवीज, सर्वगंध, पंचरत्नानि, पंचगव्य च प्रक्षिप्य, तत्तन्मत्रै रभिमंत्र्य संपूज्य च, चालकमा नीय, गजपृष्ठे वा नौकायां, तदभावेतु-कांचने वरासने, भद्रा सनोपविष्टं चालक तत्सर्वोपध्यादि जलेन पूर्वोक्त मूलशान्त्युत्ता भिषेक मंत्रैरभिपिंच्य, उद्वर्तनपूर्वकं संस्नाप्य च नव्येयोससी परिधाप्य, अंके धृत्वा पूजास्थल मागत्य, ईशानकलशे ताम्रपूर्ण पात्रो परिपंच सुवर्णप्रतिमाः अग्न्युत्तारण पूर्वकं वन्हिसोमवायु पर्वत केशवानां संस्थाप्य, संकल्पंकुर्यात्-अद्यत्यादि संकीर्त्या मुकोई ममास्यामुकराडोलकस्य निंद्यदन जनन शान्ति कर्मणि, स्थापित कलशोपरि सुवर्ण प्रतिमासु वन्हिसोमवायु पर्वत केशवा नां पूजनं तथा कलशे सर्यादि नवग्रहाणां पूजनं च करिष्ये,ततः, एतन्ते० 30 भूर्भुवः स्वः सुवर्ण प्रतिमासुवन्ह्यादि केशवान्ता देवाः कलशाभ्यंतरे ब्रामवरूण सहिना नवग्रहाश्च सुप्रतिष्ठिना वरदाभवन्तु, इति प्रतिष्ठाप्य, चतुर्थ्यौ ममंत्रैः पूजयेत-30 ग्रहावरुण सहित भास्करादि ग्रहेभ्योनमः। 30 अग्नयेनमः, ॐ सोमाय नमः, ॐ वायवेनमः, 30 हिमनदादि चतेभ्योनमः, देवदेवकेशवाचनमः,, होमवेदी समीपमागत्य ब्रह्मोपवेशनादि पर्युक्षणान्तकर्मकृत्वा वरदनामाग्नि, ३० एतन्ते० इति प्रतिष्टाप्य,, ॐवरदनामाग्नयेनमः संज्यरेग्याजिवाश्च पूजयेत् ॥ मोक्षणी 30 पामधारडरक्षाकर, निधदतजननशान्तिपतिः (६७) मुकोहं ममास्यामुकराशेरमुकवालकम्य, प्रथमोपंक्ति देनजनन शान्तिकर्मणि, वा सदंतजन्मजनन शां० वा निदिनमासादौ दंत जनन शान्तिकमणि, वरदाग्नौ-प्रजापति, इन्द्रम्, अग्नि सोम, श्राज्येन, चहिसोमवायं हिमवदादिपर्वतान देवदेवंकेशयं,अष्टोत्तर संख्यया प्रत्येक भाज्येन अग्न्यादिकान स्विष्ठकृतं चाज्येनाहंयदये इदमाज्यं मयापरित्यक्तं यथादैवतमस्तुनमम । ततश्राचार्य:ब्रह्मणा ऽन्वारब्धो मनसाप्रजापतिध्यात्यो जुहयात्-30 प्रजापतये स्वाहा इदंपजापतयेनमम,अइन्द्रायस्वाहा । इदमिद्रायनमम । अग्नये स्वाहा इदमग्नयेनममइतिदुत्वा,यन्वारंभत्यक्त्वावक्ष्यमाण मन्त्रैः १०८ संख्याघृताहुतिभिःप्रत्येकंजहान-यथा-30 वन्हयेनमःस्वाहा इदंवन्हयेनमम १०८वारंजहयात्ए,सर्वत्र । असोमायनमःस्वाहा इदं० १०८३०वायवेनमास्वाहाइदंयायवेनमम १०८ हिमवदादि पर्वतेभ्योनमःस्वाहा, इदं हिमवदादि पर्वतेभ्योनमम १०८ । 30 देवदेवकेशवायनमःस्वाहा इदंदैवदेयकेशवायनमम१०८॥ इति प्रधान होमं हत्वा अतः परंहोमपद्धत्युक्त प्रकारेण भूरादि पूर्णाहुत्यन्तं हुत्वान्यायुपं कृत्वा ततो यजमानो गोदानादिकं कृत्वा जापकपा ठकेभ्यो दक्षिणांदत्वा, ग्राचार्यः कलशजलेन पूर्वोक्ताभिपेक मन्त्री अभिषिच्य मंत्रतिलकं कृत्वा रक्षासूत्रंबध्या मंत्रपाठं कृत्वाशिप दंद्यात् ततो धृतच्छायांदृष्ट्या, आवाहितदेवानग्नि च विमुज्य ब्राह्मणान्भोजयित्वा स्वयंभुजीत । दति निंद्यदंतजनन शांति पद्धतिः । ॥अथसहजननशांतिविधिः ॥ अथशान्तिविधि प्रोक्तपण्मासान्तकुहदिनेगा शं पूजयेदादपूाहेमातृकाग्रहान् । प्रतिमा कारयेद्देव्या स्वर्णरोप्यादिधातुजाम् । तस्यासपूतये श्यामवामाङ्गपासिनीम् । भवस्यभौति हरणी सर्वाधिप्रणाशिनीम् । रुद्रादिनजदिक्षा शियामागवासिनीम् । भद्रदभिद्रकालीच त्रिपु रासुरनाशिनीम् । कामदांमोक्षदांचाधामधुकैटभमदिनीम् । रासुन्दरमुसामुनेत्राचारभूषणाम् । निनेत्रांबहुनेमांपच रुकुराग्लशोभिताम् । शियाशिव प्रयारम्यारामदु खप्रणाशिनीम पुराणापुण्यदा , (१) कर्मकायरमाकरे, सदजनगशान्तिपतिः पुण्यामंभि.श्यामाप्रपूजयेत् । प्रणयादिनमोन्त' सुअप्राविशतभिस्ततः। पूजयच्छचितीची बन्न पदिकतानिकः । गधैःपुष्पस्तथाधूपदीपनपथपायसे । बलिदानस्तुसंतोप्यदक्षिणाभिश्चतीपयत् । मुत्रासिन्योधगायन्त्योगृहांगणविभूषणः । अदरामौतयोमध्येचालकौमातृसंयुत्ती। पररपरके विन्यस्यमीनेनैविधानवित् । परस्परोपायनंचपूर्ववासप्ररल्ययेत् । दक्षिणाभिस्त थावस्त्रः परस्प रोपपाणिपु । मोदकानिविचिप्राणिदेयानिचतथासमान । श्रन्योन्यवोनणंपुर्यादालन्योथमातृभिः । तत.रवभवनं विश्यगीतवादिननिस्यने. । श्याम मुन.पूज्यमशत्तर्पिणीकामप्रदादु:खनुतशिवदा। लारिहनीप्रसव यनाशिनी दिव्यादिविस्तापरितोपमानाम् । इति कृत्वाविनश्यत सहप्रायसंभवः। •षस्तुगिरिजेचान्यद्वक्ष्यामियसमाहितः ॥१४॥ ॥अथसहजननशांतिपद्धतिः ॥ अथ च प्रथमप्रसववत्याजलपूजाभ्यन्तरे एकस्मिन्गृहे, यथा एकस्यैवपुरुपस्योभेभार्ये, वापितापुत्रस्यभार्येवासहोदरयोर्भायें, सहप्रसववत्यौचेत्तदाशांतिः कार्यासाच-पण्मासान्तेकुहृदिने अ मावास्यायां पृथक् पृथक् कर्त्तव्या ॥ अथचकर्ता आमावास्यायाँ प्रातर्नित्यकर्मसमाप्य, गणेशनमस्कृत्य स्वस्तिवाचनपठित्वा प्रधा नसंकल्पंकुर्यात्-अद्यत्यादि देशकालौसकीा मुकराशिरमुको ह मद्यकुहदिने अमुकराशे रमुकजातस्य सहजननदोषोपशान्त्यर्थ मायुरारोग्यादि चातुर्वर्गार्थसिध्दथे, गणपत्यादि पंचांगदेवताना, पूर्वाङ्गत्वेन पूजनकरिष्ये-तथाचशान्त्यर्थ हरवामानवासिनी श्या मादेवींचपूजयिष्ये, ततोगणेशादि पूजनकृत्वा, कलशोपरिताम्र पात्रे सुवर्णप्रतिमामग्न्युत्तारणपूर्विकांसंस्थाप्यश्यामादेवीमावाह येत्-30 पायाह्याम्यहंदेवी, श्यामांवक्षनुतांशुभाम् । भवस्य भीतिहरणीं सर्वारिष्ठनिवारणीम् ।। 30 एतन्ते. पठित्वा, 30 भूर्भुवःस्वः शिवधामाङ्गवासिनि, श्यामादेवि, इहागच्छेहतिष्ठ सुप्रतिष्टितावरदाभव ॥ इतिप्रतिष्ठाप्य-30 श्यामादेव्यैनमः, इतिमन्त्रेण वाश्रीसूक्तेन पाद्यादि नीराजनान्तदेवीं सम्पूज्य उपा यनंनिवेद्य वक्ष्यमाएमन्त्रैः पुष्पांजीलप्रतिमन्त्रेणसमर्पयेत् -8 , .
। ফলাফ, মননয়লিনি: श्यामादेव्यैनमः । ॐ वामांगवासिन्यैः । ३० भवमीतिहरण्यै नमः सर्वारिष्ठमणाशिन्यै०। रुद्राण्यैनमः। 30 दक्षजा 2010 दक्षाय-10 भववामांगवासिन्यैः। भद्रदायै। 30 भद्रकाल्यै। 30 त्रिपुरासुरनाशिन्यै०। ॐ कामदायै० । ॐ मोक्षदायैः । ॐ याद्याय। ॐ मधुकैटभमदिन्यै०। 30 सुरूपायनमः। 30 सुमुस्यै। 30 सुनेत्रायै । 30 चामभूपणा यै०। 30 त्रिनेत्रायै० । अ वहुनेत्रायै । 0 चारकुंडलशोभि ताये। शिवाय। शिवप्रियायै। रम्यानमः । रामदुःखप्रणाशिन्यैनमः । 30 पुण्यदायै०। 30 पुण्यायैनमः इत्यष्ठाविंशतिमन्त्रैरभ्यर्य, पुनधूपदीपवल्यादिभिः संतोष्यपूजा स्थलयत्नेनसंरक्ष्य, अदरात्रसमयेगृहांगणेसुवासिनीभिर्गीतादि गीयमानेसति । तयोःप्रसूत्योर्मध्येवालको परस्परांकेतूष्णींविन्य स्य परस्परोपायनं भूपर्णमोदकादीनिचदत्त्वा अन्योन्यवीक्षणक स्वी चालकयोश्चततः स्वस्वंचालकंगृहीत्वा गीतवादित्रनिःस्वनैः सहस्वस्वंगृहंमविश्यपूजास्थलमागत्य,पुनः पूर्ववनश्यामादेवींसंपू ज्य । ततःसफलायंदत्वा, प्रार्थयेटी थःयुवित्तंसुतंदेषिदेहि सौभाग्यनिश्चलम् । कल्याणदायिनिशिवे श्यामादेविनमोस्तुते । उत्तरांगपूजनंकृत्वाकलशजलेन सपत्निपुत्रयजमानमभिषिच्या शिर्षदद्यात् ॥ इतिसहजननशान्तिपध्दतिः ।। -- अथ आमावास्या जनन शांतिपरिभाषा । उक्तं च शान्तिसारं नारद.- अथातो दर्शनानानां मातापित्रादरिद्रता । तसहिारार्थ शान्ति वत्या मितेपदा । पुरा पाहं वाचयित्वासक्नु संकल्प पूर्वकम् । कुंदा स्थडिलकुर्यात्तद्देशे स्थापयेत् पटम् (तद्देशेतत्ममीपे ) तनिक्षिपेन्द्रश्य दधिचीर तालिम् । ( आदिशब्दाद्गोमूत्रगोमये) भ्यप्रोधौदुम्बराश्वत्था: सचूता निम्बास्तथा । एता वृनमूलानांवगादील्लवांस्तथा । पंच नानि निक्षिप्य वस्त्रयुग्मेगा वेष्टये । स समुद्र सरितस्ती निजलदानदाः । आषान्तुयजमान य दुरितक्ष प्रका (६६०) कर्मकाण्डरत्नाकर, दर्शजननशान्तिपद्धतिः। रका । आपो हष्ठा न्यूचनाथ कयान श्चश्त्युचा । यत्किंचेदगृवाचैव समुद्रज्येष्ट इत्युचा । अभिमंत्र्योद- कर दाने: पूर्वरदेशके । हदिरकर चर कृष्णसतंच नीलपम् एतेषां तगल चैव सर्वतोभद्रमुद्धरेत् कुंभत पश्चादग्ने श्चपूर्वता हरिद्वारगरसिंडुले सताभदमुनादित्यर्थ । दर्शस्यदेवतायाश्चमोमसूर्य स्वरूपकम् । प्रतिमा स्वजानित्यं राजनीताम्रजातमा । (पितृरूपाया दर्शदेवतायाः सोमसूर्य योश्चस्वरूप प्रतिमारूपं स्थापये दित्यर्थ. इति प्रयोग पारिजातः । सर्वतोभद्रमध्ये य स्थारयेद्दर्श देवताम् । ग्रहणमत्रयुग्म तद्वर्ण गन्धपुष्परम् । प्राप्यायस्वैति मंत्रेण सवित पश्चात्तथैवच उपचार समागध्य ततो होमबत्यो । कृत्वा वन्प्रितिष्टा'ग्र मतुमकन्पमीदृशम् । आयुरारोग्य मित्यर्थ सारिष्ट प्रशातये । पुत्रस्यदर्श नननंतस्यदोष निरहणम् । मातापित्रो. कुमारस्म मरिष्टप्रशान्तये । तेषा मायु. श्रियेचेर शानिहामकोम्यहम् । (आयुरारोग्यविश्लोकद्वयेन नुसंकल्पं कृत्वेत्यर्थः) समि परचचरुद्रव्यं क्रमेण तुहुयाद् गृहो । हुनेत्मस्तृिमत्रेण मोमोयेनुंच मंत्रन, एतश्चप्रत्येक हुनेष्टीतरं शतम् (एतैरिति वहुवचना पितृहोमोप्यष्टोत्तर शतमिति प्रयोगपारिजात.) दर्शस्य देवताहाम अष्टाविंशति मायया। दो मेचनु कृत्यायविदाच्याभिषेचनम् । श्री सूक्तम युषसूक्तंसमुद्रज्येष्ठा इत्यूवा एतेमन्त्ररभिषेक मानापि शिशौस्त । तन हिमादिम्गाद्वीप्रशेष समापयेत । हिरण्यरजत चव कृष्णविनुसदक्षिणा । अन्येभ्योऽयियाशक्ति दंतव्यादक्षिणा तया । ब्रह्मणामोनयेतबारय स्वतिसचन्म। इति नारदोक्त दर्शशान्ति परिभाषः । । अथामावाश्याजननशांतिपन्हतिः । अथच कर्त्ता नित्यकर्म समाप्य-गृहाभ्यंतरे पूर्वदिक्ष एकोन- विंशति रेग्वात्मकं सर्वतोभद्रं विरच्य स्वासने उपविश्या चम्य प्राणानायम्य, दीपं सम्पूज्यसंकल्पंकुर्यात्-प्रोत्यादि देशकालो संकीामुकोहं ममास्य जातस्य दर्शजनन सूचितस्य मातापित्रोः कुमारस्य च सर्वारिष्ट प्रशांतये, आयुरारोग्य सिध्दये च श्रीपर मेश्वर प्रीत्यर्थ, दर्शजननशान्ति कर्मणि, निर्विघ्नता सिद्धये- गणपतिपूजन कलशस्थापन पुण्याहवाचन मातृका पूजन नान्दी श्राद्ध ग्रहपूजन पूर्वकमाचार्यत्त्विग्वरणानिच करिष्ये ॥ ततो गणे- शादीन्संपूज्य, संधतो भद्रे मंडलदेवानावाहसंपूज्य च-तत्र करमकायरत्नाकरे, दर्शजननशान्तिपद्धतिः । (६६१) - मध्ये-ताम्रकलश-संस्थाप्य, तत्र संगमजलं पंचगव्यं न्यग्रोधो दुम्बरोश्वत्थचूतनिववृक्षाणांमूलत्वचापल्लवांश्चपंचरत्नानिनिक्षिप्य चन्त्रयुग्मेन संवेच्य कलशपूजोक्त विधिना संस्थाप्य संपूज्य च । तत आपोहिष्टेत्यचेन, कयानश्चित्र इतिया पूर्वोक्त समुद्रज्येष्टा इतिसूक्तनोदकमभिमंत्र्य ॥ तदुपरिताम्रपूर्णपात्रं तंडुलपूरितं चिन्यस्यतत्र चरणं संपूज्य, तत्र पूर्णपात्रोपरि मध्ये सुवर्णप्रति- मादर्शदेवतात्मकपितृरूपां, 30 येचेह पितरो येचने हयाँश्च विझया 15उचनप्रविन । त्वंवेत्थ यतितेजातवेदः स्वधाभि- यजर्द० सुकृतं जुपस्व ॥ इतिमंत्रण संस्थाप्य तद्दक्षिणेसोम रजत प्रतिमाया मावाहयेत-मंत्र:-30 प्राप्यायस्व समेतुतेचिश्वतः सोम वृष्ण्यम् । भवाव्वाजस्य संगथे । इनिसोमंसंस्थाप्य, पित- वामे-सवितारमावाह्येन-मंत्रः सवितात्यासवानासुवतामग्नि गहपतीनाम् । इति संस्थाप्यभिमत्रैः संपूज्य; ततः कुंभात्पश्चिम दिशि, होमवेदी कल्पयित्वा होमपद्धत्युक्त विधानेन पंचभू- संस्कार पूर्वकं प्रोक्षणान्तं कर्मकृत्या संस्रवधारणार्थ-प्रोक्षणीपात्र मग्निप्रणीतयोर्मध्ये धृत्वा ततोवरदनामाग्नि संपूज्य द्रव्यत्याग कुर्यात-श्रोत्यादि० अमुकोऽहं ममास्यजातस्य दर्शजननमूचिता- रिष्ट निरसनपूर्वकं दर्शशान्तिकर्मणायक्ष्ये तत्राधाराज्य भागदेव ताभ्यो नवग्रहदेवताभ्योऽष्टसंख्याभि स्तथा पितृसोम सवित देवेभ्योऽष्टोत्तरशताहुतिभिः प्रत्येक । वाष्ठविंशत्यन्यतम संख्या- भिहस्वा खिष्टकृदादि भूरादिनवाहुतिहोम घृतेन, तत्तद्देवताभ्यो परित्यक्तं यथादेवतमस्तु नमम ॥ अप्रजापतये स्वाहा । ॐ इन्द्रायस्वाहा। 30 अग्नयेस्वाहा । 30 सोमायस्वाहा । इत्याधारा वाज्यभागौहुत्या प्रधानहोमकुर्यात्तत्रादौ नवग्रहाणांमत्र: प्रत्येक २८ विंशत्याहुतिभिर्दुत्वा । येचेह पितरः ०१०८ 1 30 प्राप्यायस्व० १०८ असवितात्वा०११०८तत:-~ -अग्नये स्विष्ठ कृतेस्वाहा । ततो भूरादि नवाहुत्याज्यहोम हुत्वा । सर्वतोभद्रस्थ कलशजलेन पूर्वोक्ताभिपेक मंत्रैः श्रीसूक्तेन च सपत्निपुत्रयज (६६२) कमकाण्डरत्नावरे, ग्रहणजननशान्तिपद्धतिः । मानमभिषिच्य, ततोचलिदानान्ते पूर्णाहुतिंकृत्वा, प्राचार्यायवरं कृष्णांसवत्सांगांदत्त्वाशेष समाप्य ऋत्विगाचार्यादिभ्यो दक्षिणां दत्वा श्रावाहित देवान्संपूज्याग्निं विसृज्य यजमान तिलकारोप- णेनाशिपं दत्वा ब्राह्मणान्भोजयित्वा शान्तीः पाठयित्वा स्वस्ति वाचनकुर्यात् ।। इत्यमावास्या जनन शान्ति पद्धतिः ॥ अथ ग्रहणजनन शांतिविधिः। अथ शै नकोक प्रहजनन शतिविधिवक्ष्ये-ग्रह चन्द्रसूर्यस्य प्रसूति दिजायते । व्याधिपीडातदात्रीणामादौतु सतु शनात् । इत्थस पायतेयस्तु तस्य मृत्युनसंराय व्याधि पडा च दारिशोकचकलहोभवेत् । शान्तिपौरवक्ष्यामिनराणां हितकाम्यया । यस्मिन्नतेविरुपैण ग्रह- रणयदिजायते । तन तनाधिपरूप मुणाल्पयेत् । (प्रक्षाधिपस्यरूपमित्यर्थ) यथशचयनुसा- रेण पित्तशाधनकारयेत् । सूर्यग्रहेसूर्यरूप हिरण्येन सशक्तित । चन्द्र ग्रहेधीमनजतेन विशेषत राहीरूप प्रकुर्वीत नागनैवविचक्षण (नागनसोसवेन) शुचौदरे प्रयत्नेन गोमयेनीपलेपयेत् । तस्यो परिन्यसद्धीमानववस्वमुशोभनम् । नयाणाचैवरूाण स्थापन तनक रयेत् । रजाक्षत गन्धरक्त- पुष्पावराणि च सूर्यग्रहे प्रदातव्य सूर्यनीतिरराय च । श्वेतवस्त्रश्वतमाल्य सेतगधानुलेपनम् चन्द्रग्रह प्रदात य चन्द्रप्रीतिकरायच ! राहक्यपदात्तव्य कृष्णपुष्पांचराणिच । दद्यानक्षत्रनाथाय राहुप्रीतिकरायच । सूर्य सम्पून येद्धीमान कृष्णेनतिमत्रत । चन्द्रग्रहै तथा सभ्यगिमदेवेतिमत्रत । कयानश्चित्रमणराहुयरनेनपूजयेत् । एक्सपूजयेद्वीमान्समिद्भिश्च के सभवे । (सूर्यग्रहइत्यध.) चन्द्रग्रहेच पालश समिद्भिर्नुहुयात । दूर्वाभियाद्धीमानाही । सप्रीणनायच । समिद्धिम्रह्म मृतस्य नक्षनेशाय नेत् । प्राज्येन चरुणाचैव तिलेश्चजहुयात्तत । निभ्यइत्यर्थ । पंचाध्यै पचरत्न पचत्वपचपल्लवै । जलैर धधकल्कैश्चसहित कलशोदक अभिषक प्रकुतियजमानस्य भत्नत मवारण सभूतै रापा हमादिभित्रिभ । इमीगगे इत्यादितत्वायामीति मप्र अभिषेके निवृत्तेतुयजमान समाहित आचार्य पूजयाश्चरशान्तो विजितेद्रिय । तस्मैयाटप्रयत्नन भत्त्या प्रतिकृतित्रयम् । चैव दक्षिणा दद्यायजम्न समाहित इत्यग्रहण जाताना सर्वारिष्ट विनाशनम् कधित भार्गवेणेद शौनकायमहत्मने । इति ग्रहणजात शान्तिनिधिः सरलत्वानप्रयोगोदर्शित ॥ 1 कार्मकारखाकरे, वागदर्दष्ट्राजानतान्तिपतिः । अथ कार्तिकवाराहदंष्ट्राजननशाांति परिभाषा। स्मृत्यादिपु-दिनषदककमकाया:- सप्ताहानियकार्तिक । वराहदंष्ट्राविया वजयासप कर्मसु । इति केचिन्मतम्---वैधशास्त्रेतु कतिकस्य दिनान्यष्टापष्टौ चपाग्रहायणे । यमदंधा समान्याता सल्पाहारः सजीपति (ग्रन्थान्तरे) लोही तासी च रौप्यो तदनुखलु-महा राजती फालदंष्ट्रा ऊर्जेमासे मुनीन्द्रा रिप्रदशदिवसबैमानमा यतास'म् । पारस्या तातन शोनिजकुलपिरति स्तामयाना तय राजत्यदिव्यहानि भपति च नियत स्वर्णयावं शुभानि ।। ज्योतिपर्णवेतु- तुलार्कतमिखिदिनेश्चलोह ताम्रीयरोप्यान्निजयामर्दताः इहप्रजातस्यसमरिलिज्ञानवान्त्या शुभौदर्शभ- बांधवास्त्री ॥ स्मृत्यन्तरे--विनापादेतृतीयेच यदाभानु:प्रज्ञायते । तदार यादमासे च विक्षया कालदंघमाः ॥ इत्यादि प्रमाण वाफ्यैस्तुलार्कत एप पूर्योक्त दंष्ट्राणां मानं नतु चान्द्रमानती गाना भनतीति शास्त्रसम्मतिः । सर्वसम्मत्यातु-दष्ट्राप्रभागे भगवान्धरित्री प्रयोदशाहे ऽकृत काति- फ्स्य । तसिभकुर्याद् व्रतगेयास्तुविवाहयात्रा शुभमंगलानि । तत्रशान्तिः प्रकर्तव्यादंदादीप निवारिका धेर्नुपयःस्विनींदद्यात्सर्वदोषोपशान्तये । गर्गमते तु-गर्ग उवाच-प्रधान संप्रवक्ष्यामि दष्ट्रायां जननेफलम् । सिंह सर्पन्तथाश्यानत्रयोदशव्यवस्थिताः प्रथयात्मनाशाय पितृनाशीद्विती यके । तृतीयेमानाशाय चतुर्धेयशनाशनम् |पंचमेधातरहन्ति पटेगोत्रतयोभवेत् । सप्तमैमातुलं हन्ति सर्वस्वचाभितथा । नवमेद्रविणहन्तिदशर्मस्वामिनंतथा । श्वभूमकादशहन्तिद्वादशेस्वमुरंतथा प्रयोदशेशुभविद्यात् दयाफलमीदृशम् ॥ मत्य स्वर्गे च पाताले-चत्वारिदिनसंप्यया । फल वच्यामिलोकेषु दनाद्वादशके तथा । स्वर्गलोकेमवेत्सोव्यमर्त्यलोकेमहद्भरम् । पातालेचभवेल भो दंड्रायास्तुव्यवस्थि तेः । तत्रशान्तिप्रवक्ष्यामि साचार्यमतेनतु । ब्राह्मणान्वृणुयात्पूर्व कुलोनान्वेद परगान् । प्रतिमांकारयेद्विष्णो निष्कनिष्कापादत्तः । मंडलंकारयेत्तत्र रकान्जबीहितंडुलैः । तत्रैककलशंस्थाप्रपंचालनमंयुतम् । शतोषधानिनिक्षिप्यसौषधियुनानिच ॥ (शतोपधानिशतमूलानि मूलशातिपरिभाषायामुक्तानि ) वेदोपेनविधानेनकलशस्थापयेत् बुधः । तत्रोपरिन्यसे पात्रस्वर्णवा रोप्यताम्रकम् । तन्मध्येप्रतिमोत्थाप्य, पीताम्बरधरांशुभाम् । विष्णोरराटमंत्रणप्रतिमापूजयेत् इधाः । उपचारःपडशभिः किया पंचोपचारकैः । तस्मात्तु नैते देशे स्थंटिले गनप्रकायेत् । ख स्वशाखोतविधिना कुर्यादग्निमुसंततः ॥ निमध्य स्तिविद्वान्होम कुत्स्विशक्तिः । विर्य चान्य होमान्तमभिषेकं समाचरेत् । दारपुत्रसमेतस्ययजमानस्यसम्पिंजः । अतीभ्यामितिसूकता पावमानीभिरेव च । विण ररप्टमंप्रेण शिवसंकल्पमत्रयः । तत रहावर रसुभगोधा लेपनः । यजमानो दक्षिणाभिस्तोप येदस्विगादिकान् । धेनुपयस्विनी तर तिमविनसंधुताम् । गुप्रमानना (६४) कर्मकार डरताकरे, चाराइष्ट जननशानिनपद्धतिः भूत्वाप्राचार्यायप्रदापयेत् । अन्येभ्योदक्षिणदिद्यात्तथारित्तानुमारत ।भूयमीदक्षिणादयात्राह्मणम् भोजयेद्दश । एक्कातिक्दशाया शान्ति कंउस्तेनर 1 सपनिमान्य प्नोति जोरद्वपरातमुधी । व्रत वधेभवेत्कुष्टौदीक्षाचापि सुनिष्फ ना । विवाहेचापिवेध०१दष्ट्राया फलमीदृशम् । इति- ८ अथकार्तिकवाराहदंष्ट्राजननशांतिपद्धतिः। , अथ च शान्तिकर्ता पूजा स्थलमागत्य स्वासने उपविश्य आचम्य, प्रतिज्ञा संकल्पं कुर्यात्-अग्रेत्यादि देशकालौ संकीर्त्या मुकराशिरमुकोहं कर्तव्यो मुक बालकस्य कन्यायार्वा दंष्ट्रा जनन शान्तिकर्मणि निर्विघ्नतासिद्धये गणपत्यादि पंचाङ्ग देवतानां पूजन पूर्वकं गर्गोक्त विधानेन वाराहदंष्ट्रा जनन शांतिंचकरिष्ये, ततः पंचाङ्ग देवताः सम्पूज्य, तत्र तंडुलै रष्टदल कमलं विरच्य सिंदरेणापूर्य तन्मध्ये ताम्रकलशं मृण्मय कलशं वा संस्थाप्य, जलेनापूर्य पंचपल्लव शतमूलानि तत्रनिक्षिप्य प्राचार्य वृणुयात्- वरण द्रव्यं ब्राह्मणं च संपूज्य, वरणद्रव्यं हस्तेनिधाय संकल्प:- अद्यत्यादि सकीर्त्य, अमुकोऽहं ममास्य बालकस्य गर्गोंक्तविधिना दंष्ट्रोजनन शान्तिकमणि, एभिर्षणद्रव्येणामुक शर्माणं ब्राह्मण माचार्यत्वेनाहं चुणे, वरणद्रव्यं दत्वा, वृतोऽस्मीति ब्राह्मणो यात् । कर्मकुरु कर वाणीति प्रत्युक्तिः। ॐ श्राचार्य स्त्विति प्रार्थयित्वा, तत प्राचार्यः कलश पूजयित्वा, ततस्तदुपरि तंडुल पूरित ताम्रपान--30 पूर्णादवि परापत सुपूर्णापुनरापत । वस्नेव विक्रीणा वहाऽइपमूर्ज शतक्रतो । इतिपूर्णपात्रं संस्थाप्य तदु- परि निष्क निष्कार्द्ध वा यथावित्त सुवर्ण प्रतिमां महाविष्णो रग्न्युत्तारण पूर्विका संस्थाप्य सौवर्णी दंष्ट्रामपि च स्थापयित्वा, संकल्प:- अद्येत्यादि संकीामुकोऽहं ममास्य पालकस्यतुलार्के वाराह दंष्ट्रासु जननत्यान्मातापित्रोर्वा स्वस्य च समस्तदुःखदौ ग्यादि दोपानुपत्तये शुभफल प्राप्तये च गर्गीक विधिना कर्मकारतरत्नाकर, दंप्रजननश.पद्वति: (६६५) -- कलशोपरिसुवर्ण प्रतिमायां महाविष्णोःपूजनं करिष्ये-30 विष्णो रराटमसि विष्णोः श्नप्त्रेस्थो विष्णोः स्यूरसि बिष्णोध्रुवोडास वैष्णव मसिव्विष्णवेत्वा ॥ इतिमंत्रेण वा पुरुष सूक्तंन पोडशो पचारेण संपूज्य, ततस्तन्मंडलस्यं कीयरे नैर्ऋत्यभागे हस्तपरि मितस्थंडिलं कृत्वा कुशकण्डिकोक्त विधिना पञ्च भूसंस्कार पूर्व कमग्निं संस्थाप्य,कृशास्तीर्णादि प्रोक्षणी निधानान्तं कर्मकृत्वा- 30 वरदाग्ने इहागच्छेह तिष्ट, ॐ एतन्ते देव इति पदित्वा 30 भूर्भुवः स्वः वरदाग्ने सुप्रतिष्ठितो वरदो भवेति प्रतिष्ठाप्य 30 अग्निदूतं पुरोदधे हव्यवाह मुप हवे ॥ देवाँ प्रासादयादिह ।। इति मंत्रेण सम्पूज्य ब्रह्माणं वृणुयान्-ब्रह्माणंसम्पूज्य वरण द्रव्य हस्तनिधाय, संकल्प: -अद्येत्यादि अमुकोऽहं करिष्यमाण घराह दंष्ट्रा जननशान्ति कर्मणि कृता कतावेक्षणादि ब्रह्मकर्म फतु ब्रह्मत्वेन त्वामहं वृणे वृतोऽस्मीति कर्मकुरु करवाणीति प्रत्युक्तिः ॥ तत आधारावाज्यभागौ हुत्वा (नान्वारंभः) मधु गुड़ शर्करातमिश्रिततिलैः प्रधानहोमं कुर्यात्---विष्णोरराट मिति प्रजापतिषि यजुश्छन्दो विष्णुर्देवता दंष्ट्रा जनन होम कर्मणिविष्णुप्रीतयेत्रिमध्वस तिलहोमेविनियोगः-30 विषयोर राटमसि बिष्णोः श्नपत्रस्थो विष्णोः स्यूर सि व्यिष्णोधुवोऽसि वैष्णवमसि विष्णवेत्या, इति मंत्रेण सहलाहुती?त्वा, n: 30 श्रग्नये स्विष्टकृते स्वाहा इदमग्नये स्विष्ठकृते नमम, ततोभूरादि नवाहुति पायश्चित्त होमं कृत्वा पूर्णपात्र दानान्ते संस्रवप्राशनं प्रणीता विमोकं पूर्णाहुतिं च कृत्वा, मंडपोत्तर देशे सपत्निपुत्रं यजमान भद्रासनस्थ, स्थापित शतमूलादि गर्भित कुम्भजलेन मूल शान्त्युक्त विधिना श्वेत वस्त्रोपर्युपवेशयित्वा पत्नीं चामतः कृत्वा संकल्प कुर्यात्-अधेत्यादि संकीर्त्या मुकराशिः सपत्नि पुत्रो ऽहममुकराशे रमुक बालकस्य, वराह दंष्ट्रा जनन सूचिता रिष्ट निवृत्तये शुभफल प्राप्नयेच अभिषेकमंत्रः शान्तिस्नानं करिप्पे,, ततो हरिद्रादि सतैल सापधि-लिप्ताङ्गानां त्रयाणां कर्मकाररत्नाकरे, दंजिननशान्तिपरति । d प्रामुग्वानांमाचा मूलशान्त्युक्तमंत्र 30 अक्षिभ्यांते इत्यादि तत्रोक्तं द्विपदे शंचतुष्पदे, इत्यन्तैरेकचत्वारिंशन्मत्रैरभिषिच्य । ततः-30 योऽसौ वज्र धरो देवो महेन्द्रो गजवाहनः दंष्ट्रा जात शिशोदा मातापित्रो व्यपोहतु । १ । योऽसौ शक्तिधरोदेवो हुतभुग्मेषवाहनः । सप्त जिह्वः सदेवोग्नि दंष्ट्रादोपं व्यपोहतु ।२। योऽसौ दंडधरोदेवो यमो वहिपवाहनः । दंष्ट्राजात शिशोदोषं मातापित्रो यंपोहतु । ३ । योऽसौखड्गधरोदेवो नितिर्राक्षसाधिपः । प्रशामयतु दंष्ट्रोत्थंदोपंगण्डान्तसम्भ- घम् । ४ । योऽसौ पाशधरोदेवो वरुणश्च जलेश्वरः नस्वाहा प्रचेतानो दंट्रोत्थाऽघं व्यपोहतु । ५। योऽसौदेवो जगतमाणो मारुतो मृगवाहनः । प्रशामयतु दंष्ट्रोत्थंदोष वालस्य शान्तिदः १६। योऽसौ निधिपतिर्देवो गदाभृन्नर वाहनः । मात्रा पित्रोः शिशोश्चैव दंष्ट्रादोषं व्यपोहतु । ७। योऽसाविन्दुधरोदेवः पिनाकी वृषवाहनः । वराह दंष्ट्रजनितं दोपमाशुब्यपोहतु ॥८। ० विघ्नेशः क्षेत्रपो दुर्गा लोकपालानवग्रहाः । सर्वदोष प्रशम नं सर्वकुर्वन्तु मंगलम् । । । ततःसपत्निपुत्रं यजमानं वस्त्रान्त रित कुम्भाभ्यां स्नापयित्वा, शुक्ल वस्त्राणि परिधाप्य धृतच्छा या दर्शनं कृत्वास्नानवस्त्राण्याचार्यायदद्यात् ततोगोदान पद्धत्यु- क्तप्रकारेण गांसंपूज्य देवादीस्तपित्या--संकल्प:-अधेत्यादि देशकालौ संकीर्खामुकराशिः सपत्निपुत्रोऽहंममास्यपुत्रस्य (न्यायाः) तुलार्कवराहदंष्ट्राजननसूचितारिष्टनिवृत्तिपूर्वकसी पद्रव शान्तिपूर्वक दंष्ट्राजननशांति कर्मणः साद्गुण्यार्थमिमा- सवत्सां गां तथा विष्णुप्रतिमां हैमी पराहदंष्ट्रां सकुम्भारवा थाचार्यायामुकशर्मणेत्तुभ्यंसंप्रददे। तत्सनमम,ततःप्रतिष्टांकृत्वों प्रदक्षिणा चतुष्ठय विधाय कलशजलेन यजमानमभिर्पिच्य रक्षा- सूचचध्यामन्नतिलकाशीर्वादंदत्वा देवान्थिमृज्य दशवात्मणा न्मोजयेत् । ॥ इति तुलायराहदंया जनन शान्तिपति, ।।
कर्मकागरक्षाकरे, सिहागवादिप्रसवशान्तिपद्धति । (६६७ अथ सिंहगवादि प्रसव शांतिपरिभाषा। " पाथ सिंहादिप्रसूनगादिशा-नय ---मद्भुनसागरनार मनोमिलगते चैश्य यगी सत्रसूयते । माणतस् निर्दिष्ट पभिम सनरय प्रसूतात क्षणदय तांगांविधायदापया। ततो दौमानि घृताक्त मधुपर्षपै । या तोनाता नामयुत जुयात्तत (व्याहृतिभिाना ) सोयास प्ररत्नेन त्याद्विप्राय दक्षिणा । वस्नयुग्म य गाय सुवर्ण २ प्रापयत् । इष्टदेवामनेय तत शान्ति मा 'युति । अथर्वयद परिशिष्टेक्तिशान्ति -मधेनु च महिर्ष धाऐवडगदिना । सिंहगाय प्रमूरन्ते स्वामिनीमृत्युमागा. । विधानातकर्तश्नरेणदितमिच्न मोरे सूक्त प्रकर्तव्योहोन सूस्यिप्रये प्रगानतिलसनियर पायसशर युतम् । सत्सल्वर प्रोक्तदाना-अष्टौ यथाविधि । प्रचपायगया (सूर्य मन्त्रेण ) तागां विप्रारदापयत् । तान निदापया-दिललाह हिरा व वरालवणनया । सनधान्यक्षिनिमय एवं स्मृतम्-~-कास्यानि सनप्रणतो दृष्ट पानि । इति सिंहादि प्रसूगिनादि शान्ति विधि सरलत्यानप्रयोगो दर्शित । अब सीतामृत सर्पशांति विधिः। उक्त च नंदीपुराणे --कार्तिकेयालाहमाय फालनाकारितोर7 । नियतयम्य म रयतेनेतमभाम् । मरण पते मिधागा तथा । शान्ति प्रा व्याक तिकयनचोरिता। आदोगणेशसम्पूज्य मानतच । मृत्यु अन्य प्रतिया चरणपाले पयदुर तस्मि सोश्रोलेख्य कऋत्रुरापुम् । निने द्विभुजपीत वस्नेगतिम् । व्यवकेशवमोण पूजयविधि- त्रिय । मृत्यजयन क्ठेचा प्रपूरम् । नमो तुम यानेनहाम प्रकल्पधेर । चरकृतेन तया होगात ह्य भराये । दरपुत्रसमतस्य यजमानस्यामा इतिकार्तिस्य । केचिन्मत--वृषभौतमलोपतो न्य च प्रदापयेत् । मू यंत्रास्तिया तायवाउदापयत् । गोदापाकव्यं यदिचेत्सिद्भिनिन्छति । इपिसीतामृत सर्पशान्तिः। अथ सर्पयुग्म दर्शनशान्तिः ईश्वर आच --- सपग्मयतापश्येत्तदाहानि प्रजायते । महानिर्भवास्यशरीरे व्य सिपा- न्म तच छोत्तरात जुयाययुनो । नमार्गाभ्य इतिगुनी तुश्याविधि । मृत्युजस्य प्रतिमा यति प्रपूजय ।। इतिसपंद्र-द्रदशन शान्ति श्रथ काकविष्ठापतन शांतिः । अश्रयग्धोपरामो विटांसपचतेयनि । क्षौरवृक्षसमारा स्तस्यमिरिमापाशुपक्षसमरूडो वियपद्यतेयदि । त यलक्ष्मी नर्गयासिनिमिम सनरामय निरालम्बीयाको विटासम्पयते यदि । - (ER) कर्मकाएदखाकरे, फाकविष्ठापतनशान्तिपद्धतिः शिरसिततियस्या.रामासातस्य मृत्युः । स्कन्धवाह्ययवापृष्ठे विष्टापततिरस्य चेत् । भ्रातृकष्टंभवेत्तस्य, भयवादेहनाशनम् वासोः । पततिविष्टातुमिदन शोभवत्तदा । कुतापुमाग्निन्सारा, दरोगमादित गुह्मपततिर पुग्नाशीभवेत्तदा । उवावाजा नास्य, कायविध प्रपद्यते ।द्वाहनस्सनाशः रयायो राज्ञः सकाशतः । चरणेप्रपतेदस्य, देशत्यागोभत्तदा । निगलभ्वोयदाकाको विश्वेितांकरोतियेत् । उत्तरात्पूर्वमायाति शनुनशभित्तदा । याम्याः परादिशंयाति फुगणाविटांप्रपद्यते । मम्मतरतीमृत्युः मर्वनाशोभवेतादा। इति काफविटापतनफलम् । अथशांतिः-यस्यांगप्ररद्विष्टा, सस्नानमाचरेत् । वस्त्रत्यागोभवेत्तस्यरायः शान्तिारोहिसः । धनुकाचदातव्यासलिंबारशमिता। पंचरत्न य दातव्य दक्षिणाचवाक्तिः । सतिलमधुमिहानमोलस्तयत् । अथकाकविष्ठापतनशान्तिपद्धतिः । अथचकर्ता काकपिटा पतन क्षणेजलाशये गत्वा-संकल्प:- अयेत्यादि० अमुकोह ममामुकांगे काकविष्टापतन जनितदुदोषोप शान्त्यर्थ, सचैल स्नानं करिष्ये, इतिसचैलस्नात्वा परिधेय स्नान वस्त्राणि परित्यज्योन्यवासः परिधाय स्थंडिलेग्नि मुपसमाधाय। घरदाग्निमावाह्य, दीशाने कलशं संस्थाप्य, तत्रग्रहानावाह्य, ब्रह्मोपवेशनादि पर्युक्षणान्तं कर्मकृत्वा, आधारा घाज्यभागी हुत्वा । मधुतिल सपिभिर्गायत्री मंत्रेण वा व्यवक मंत्रेणे, न्द्रमंत्रेणचाठोत्तर शतंहोमविधाय उत्तरतन्नं समाप्य स्वशक्त्या- दक्षिणां दद्यात् । होमा शक्तीतु-सचैलंस्नात्यातिलपात्रेण सह मापान दानं घृतच्छायां कुर्यात् वासप्तशती पाठं कुर्यात्कारये द्वासर्वदोषपरिहारार्थ गोदान पंचरत्नवानंच कुर्यात् ।। इतिकाकविष्ठापतनशांतिपद्धतिः। अथ काकमैथुनदर्शनशांतिविधिः । हेमाद्रीगर्ग:-श्वेतकाकमैथुनदर्शन मेवानिष्ठायहम् । काको मैथुनयुक्तश्चेतूनेत: सयदिदृश्यते । मारसंहितायान्तु---दिवावाय दिवारानीयः पश्येत्काक मैथुनम् ॥ सनरोमृत्यु माप्नोतिस्पयवा स्थाननाशनम् । तहरामनायेत्थं शान्तिकर्मसमाचरेत् ॥ गृहस्मशानभागेतु होम- कर्मकाण्डरक्षाकर, पल्लीपतजननशान्तिपद्धतिः (६६६) स्थान प्रदल्पयेत् । स्वगृयोक विधानेन तस्थाप्य हुताशनम् । मसान्ते समिदमाज्य नेदष्टोत्तरं शतम् । प्र.ि.मन्त्रंत्र्यंबकेण अपमृत्युद्वयनच । व्याहृति भित्राहि तिलेजप.धन्तं प्रकल्पयेत् । पूर्णाहुतिय जुहुय स्कत्ता सुचिरलं कृतः । स्वर्णगी रौप्यपुरा कृष्णांपर्नु पयसिनीम् । वबाल- फारसहितानिक द्वादशसंयुताम् । तदन तदनिकायुताम् । यथावितानुसारेणतन्न्यूनाधिक कल्पना । प्राचार्य यथोत्रियायतादात्कुटुम्बिने । ब्राह्मणान्मोजयेत्पश्चात्वस्तिवाचनपूर्वकम् । एवंयः कुरुतेसम्यसतहोपात्प्रमुच्यते । । इति काफमैथुनदर्शनशान्ति विधिः । अथ पल्लीपतनशरठारोहणशांतिः। . उकंच वशिष्ट संहितायाम्-~-बुज्यगेमस्तक धंगे. पतिते फलमुच्यते । मस्तके राज्य- लाभ.स्यद्भालेकणेच भूपणम् । नेत्रयोस्त्रिलाभ स्यात्पुगंधनासिकोपरि । मुम्बेसुभोजनकराठे स्त्रीलामः स्वधेयोजयः। सेते ती वद्धिरया दर्धवृद्धि.करदये । वक्षस्थलेतुसौभाग्य हृदिप्रीति विवर्धनम् । पुत्रलभस्तु कुनौस्यानाभीप्रीतिविवर्धनम् । अर्थलाभातुपृष्ठे'या पाययोः सुहृदागमः । कटिस्थाने वरमलामो गुस्थान समागमः । गुददेशे विनश.स्या दूरूजावे श्चवाहनम् । जंघयोः पादयोश्चैव सदागमनमादिशेत् ।। पादतश्चोर्ध्वमनं कुर्यादामस्तकादि । गाप्रेप्रदणिणैचापि राज्यलाभोभत्तदा । मस्तकापादपान्तं यदिगच्छेदधोऽपिवा । भवेयुश्चतदातस्य कुटुम्ब फलहामयाः । सरदीपतनादेव सचैनं स्नानमाचरेत् ॥ यांमपादेतु गमनं स्त्रीणांव्यक्त फवदेत् ।। माग्दसंहितायाम्-फलप्ररोहणेचैव सरटस्य प्रचारतः । सर्वगेप्यशुभं विद्याच्छान्ति पुर्यात्स्य- शफितः । शुभस्थाने शुभावाप्तिरशुभेदोपशान्तये । तरस्वरूप सुवर्णेन रद्ररूप तथैवच । मृत्यु- जयेन मन्नण वस्त्रादिभिरार्चयेत् । अनि सत्रप्रतिष्ठाप्यजुहुयात्तिलपायसै. आचायों वारुपीः सूकै.कुयोराभिपेचनम्। श्राज्यावलोकनं वृत्या शस्त्या ब्राह्मण भोजनम् । गणेशक्षेत्रपालार्फ दुगांक्षोपयंगदेवता । तासांप्रात्य जप कार्य. शेपं पूर्ववदाचरेत् । ऋत्विग्भ्योदक्षिणांद्यापोडशेभ्यः स्वशक्तितः॥ ॥ इति पल्लीपतन शरठारोहणशान्तिः ॥ प्रय विनायकशान्ति परिभाषा-तत्रादौप्रतिमूलादिनिर्णयः-स्मृतिचंद्रिकायांभृगुः चारमानानतरंयत्रकुलया, कस्यचिन्मृति तदोद्वाहीनकार्य : कृतोवैश्व्यमाप्नुयात् । शौनक-पितापिता- महरचैत्र माताचे पितामहो । तिव्यास्त्रीपुताधाता भगिनीचा विवाहिता । एभिरत्रविपश्व प्रतिकूल बुधैस्मृतम् । पित्रादिमरणेतु विशेषमाह शोनका:-वरवी रितामाता पितृभ्यश्चमोदरः एतेषांप्रतिकूलं च महाविश्नप्रदभवेत् । मांडव्य:-पितुराशीच मस्यालदध मातुरेवहि । मासस्यचिमा.
(६७०) कर्मकायरत्नाकरे, विनायक परिभाषाः । यंयास्तदर्धभ्रातृपुत्रया. दैवज्ञमनोहरे विशेष:--प्रतिकूलेपडिपमासमे के विवजयेन् मेवातिथि: प्रेतकााण्यनित्यचरेनाभ्युदयकिय म् । ज्योतिःप्रकाशे:----प्रतिकूलेपित्तश्या विवाहानासमंतग । दुर्मिक्षेराष्ट्रभंगेच पित्रोर्वाप्राणशराये । प्रो.जयामक्किन्यायां प्रतिकूलंनष्पति । मेधातिथि: पाचतुर्थततः पुंसिपंचमेशुभदभवेत् । दधिरोगाभिभूतस्य दूरदेशस्थितस्य च उदासत्तिनश्चैवप्रतिकूलनविद्यते । संकटे समनुप्राप्तेयाजवन्क्येनयेागिना । शातिरतागणेशस्य मृत्वातांशुभमाचरेत । प्रत्या शातियस्तु निधे सतिदारुणे। य करोनि शुभंताव द्वितस्यपदेपदे । विशेषोनिर्णयप्रयेसुदृष्टव्यः । अधविनायकशान्तिविधिः। उफचलैडे- ग्रामणेः नप्रियेश्यै. शासिद्धिक मुकैः । कर्मनिर्विघ्न सिध्यर्थसुपूजन- स्तु गजाननः । महार्णवे- यजमानस्तु शूद्गश्चेदृरिवग्भिस्ता नियोजयेत् ।। स्नपनं तस्य कर्तव्यं पुण्यहि विधिपूर्वकम् । शुक्लपक्ष चतुर्थीच वारेण धिषणस्य च । तिध्येच वीरनक्षत्रे तस्यैव पुरतो नृपेत्यपरा भविष्ये ॥ तच्छ्रोफाम स्नपनपरम् । धिषणत्यगुरोः। तस्य विनायकस्य । तपादौ देवता पूजोक्ता पराके भविष्ये~व्योमकेशंतु सम्पूज्य पार्वती भोमनं तथा, कृष्णस्य पितरं तात्ह्यर्कमारंसित था। धिषणं क्लेद पुत्रंच कोण लक्ष्मच भरत, वितुर्द पालेय नंद कस्यच धारण ॥ व्योम केश. शिव.। भीमजो गरेश [ भारो भौम. सितः शुक्र । यलदपुत्रोधः । कोण. शनैश्चर । लक्ष्मतांश्चन्द्रः । वाहुलेय. स्कंदः । याज्ञवल्क्यः । गौरसर्षपरत्वेन साज्य नोत्सादितस्यच ॥ सर्वोपयैः सर्वधै विलिप्त शिरसस्तथा । भद्रासनोप- विष्टस्य स्वस्तिवाच्याद्विजै. शुभ.। उत्सादितस्य उद्वतितांगस्य, सपिधानि मात्स्ये-सह या वचा व्याघ्री वा चातिवलातथा । शसपुष्पी तथासिही चारमीतु सुवर्तुला । महोषकष्टकं होता महाहान.ए योजयेत् । महादेवन्यान्युक्तानिपुसमासी कन्या मुले रजनी द्वयम् । शट चंपक मुस्ताच साषधिगण स्मृतः। याज्ञवल्लय.-अश्वस्थानाद्गजस्थानी द्वल्मीकासंगमाददात् । मृत्तिमा रोचनं गंध गुग्गुलंचविनिक्षिपेत् । या माहता एक वर्णश्चतुर्भिः कलशेहदात् ॥ कलशैराहताखप्सुक्षिपेदित्यर्थः । अत्र मिशेपो बैज वापगृह्ये । भ्यश्च कुम्भाना हत्य तेगु सापधी: मर्नगंधान् हिरण्यनीहि ययगुग्गुलून् । मृदमाखूत्कर मिति प्रक्षिपेदिति शेषः ॥ यावल्लयः--चमण्यागुडहेरणे स्थाप्य भद्रासनंततः । मंत्राः-- सहसान शनधारगृषिभिः पापनं कृतम् । रेनत्यामभिषि चामि पावनान्यः पुनन्नुते । भर्गत पणो राजा भगमिन्द्रोदृहस्पतिः । भगर्मिदग्य यायुश्च भग सप्तर्षयोददु । अयत्तेवेशेषु दोगाग्य सोम तय चमूनि । ललाटेकेन्योरणा रापस्तदनंतु सर्वदा । पूर्वादि यलशनये एकको मंगस्नु मननयमिति किाने स्वरः । सर्व पतशेपुमंत्रत्रयमित्सरार्फ. । सुर्फ चैतदेव विनिगमका चतुःप्रस्रवणे- t - करकारपरत्नाकरे, विनायक परिभाषा:। . गावान । मातस्य साईप तल सुवरणोदुम्बरेातु । जुहुयानमूर्द्धनि कुशान् मुख्य नपरिगृह्य च। गतश्च संगिशाश्वतथा शाराकटकटी। यूप्मांटो राजपुत्रश्येयन्तस्याहारामन्तितः ॥ श्रारातु शालट करः । कूष्मांडो राजगुनश्यति पाठः मूर्धनिदोमः । नाममिलि मनश्च भमस्कार समन्वितैः । पूर्वोक्त परणामभि स्तलं स्पा च शेपेगों आदि नाममि वलिंदद्यात । इतिविमान- श्वरः । अपरार्फतु--पूर्वोक चतुनामभिस्तैले त्या तरेप नामभिः कृता कृतादि वलिदयः चरहोमरतु नास्त्येवत्युक्तम् ॥ दद्या चतुष्पधेश कुशानास्तीर्यसयतः । एताकृत स्तंइलाश्च पल लौदन मेयर । मत्स्या-पको स्तवाचा यमासमंतापश्यतु । मांगत्स्यभिने । एतावदितिपय मपर्यवेत्यर्थः । तिलपिष्ट मित्र योदनः । पलतोदनः । पुष्पं चित्रं सुगंधच सुरोच त्रिविधामपि मूलकं पूरिका पूपां स्तथेवोडेरकरन: । धन पायसंचैप गुडमिश्र समोदकम् ॥ ब्राह्मणः कापि सुरागमाया । शानियोश्याभ्यान्तु पैप्टी नग्राह्येत्यत्रमूलं मृग्यम् । मुलक प्रसिद्धग्राह्य मितिमहार्णवे।। तदाकार: पिटविकारः, इतिविज्ञानेश्वरः । डेरवसजः क्षुद्रापूपा इसारा । महावेतु- वर्तुलेश्चतुरखैश्च दोघे: पिठविकारकैः । निर्मिताः सजउन्यन्ते उडेरक समाख्यया । गुड मित्र पिष्ठ मित्यर्थः । मोदका लड्डकाः वृहत्तरा शरण कुल्मापा: फतानि चेत्यधिक मुक्तम् । एतत्सर्व मेकस्मिन्सूर्य निधाय, सकृनिवेदये दित्यर्थः । एता सर्षानुपाहत्य भूमौ कृत्वाततः शिरः विनायकाय जननी मुपतित्तताम्पिकाम् । दूर्यासर्षप पुष्पाणां दत्वार्य पूर्णमंजलिम् । दूर्यादि पूर्णमंजलि सजलं विनायकायाम्बिकायवायं दत्वोपतिष्ठदित्यर्थः । मंत्र:-३० एदेहि यशोदेहि भगं भगवति देहिमे । पुत्र देहि धनंदहि सर्वान्क मांश्चदेहिमें ! बिनायकोपस्थाने भगवनियूह, इति शिशानेश्वर: । अतः शुक्लाम्परधरः शुक्ल मल्यानुलेपनः न हाणाम्भोजयेतवाददुग्म गुरोरपि । एवं विनायकः पूरी महाश्चैव विधानतः । कर्मणांफल माप्नोति श्रियंप्राप्नोत्यनुत्त- माम् ।। मागमेतु विनायकां विकयोः पीठे विशेष उक्ता.-~श्रादौ पदोणकरया पद्म मष्ट दलं ततः । फेशरैः शोभितं तच चतुरसततीभवेत् । श्रामनंकल्पयित्वातु प्रणवेनयथा विधि: कर्णिकाया न्यसेद्देव गणेश चाम्किा तथा । आदित्यं च तथान्यस्प ब्रह्मविष्णुमहेश्वरान् । न्यसेत्तपीठमध्ये चपट्यने पुमितादिक न् । मात्ऋश्चरेशरा ग्रेषु पूर्वादिषुपूजयेत् । ततश्चाष्ट दलेक श्रेपूनये देवतास्तथा । कौमारं पूर्व दिग्भागे चाग्नेयाच कुपाकम् । दक्षिणेश्नमित्युक्तं नैऋत्ये कौशिक तथा । अपस्तारं पारणे च निशान यायुगोचरे । कवी पिन्यरोस्पंद मीशपने प्रमेयकम् । पूर्वादि पद्मानेच । सोमादोश्व प्रहान्य त् । ततः इन्द्राग्नी पूर्वपत्रे च वाग्नेयांच कुमारिका । ब्रमाणीदक्षिणेचैप वाराही नैर्ऋतेतथा । वैष्णवो पश्चिमें पूज्या चामुंडा वायनेतथा। मातरश्चोत्तरे पूच्या ईशकोणे महेश्वरी । इ द्रादीनष्टदिकालान्पूर्वादि कमश न्यसेत् । शचीस्व हाच * (६७२) कमकाण्डरत्नाकरे, विजायतशान्तिपद्धति । . वाराही खजिनी वारणी तथा । मृगा हढा च कौपारी शुलिनोच तथाष्टमी व नू शक्ति दड खा पाशाकुश गदा अपि । निशूल लोक पालाना मायुधानिमाल्लिखेत् । एरावत तय मेप महिप प्रेत सहक । मकरच मृगचैव नरवृषभ तथा ॥ एरावत पुरीकोवामन कुमुदोजन । पुष्पदन सार्वभौम सुप्रतीकच दिग्गजा कारादिनमोन्तेश्व पूजनीया प्रयत्नत पीतवस्त्रयुगच्छन कलश ननपूरित मलात्पूर्वमागेतु सहिरणगफ्लान्वितम् । गणाना- तिमत्रेण सहस्त्रचाष्टमयुतम् । भद्रासनस्थाप्टदल देवतागहनमप्युक्तम् तत्रैवमध्यकूमा- डनामान पूर्वपात्रेत्रमेयकम् । दक्षिणस्यां विशाग्य च पश्विमेयक्ष व उत्तराजपुनतुचेश ने जृम्भक तथा । भाग्नेया यज्ञविक्षेप विरूपाक्षचनशते । वायव्यूषुचसस्थाप्य सूवाटर मेवचेति । बलिदाने विशेषस्तत्रैव । चनुपथगत्वा चतुविशतिदेवेभ्योवलियद्यायपाविधि । विमुव्यश्व तथाश्येनस्त्र्ययकोयक्षएबच। कूषांटी भरवश्चेति पूर्वस्य दिशि संस्थिता । पलिंगृहण नुतेमवमयादत्तयथा विधि। विनायकश्चानाडोरारपुस्त धेवय यज्ञविते कश्चैब कुलगायैनमानन प्रामारी दक्षिणस्या पूननीयाप्रयत्नत पंकेशोशूर्पकोडीहे -- पेतश्चकुमक विहातोलोहिताक्ष पश्चिमस्यां दिशिस्थिता त्तरस्या प्रवक्ष्यामि देवतामुनिसतम । विनायक क्षेत्रपाली वैश्रवणस्तत परम् । महासेना महादेवो महाराजा सुवातिता । एतेरापूजनकृत्वा वलिदान तत परमिति । इति विनायक शाति परिभापा। -- अथप्रतिकूलविनायकशांतिपद्धतिः । अथच प्रतिकृलशान्तिकर्तापरिभाषोक्तसापिंड्यादि त्रिपुरुषी विचायप्रेतस्थ सपिंडीश्राध्दान्ते यावद्वार्षिकभदानादि कर्मसमा पपिस्वा, मासोत्तरेचाभ्यंतरेज्योतिः शास्त्रोक्तशुभदिने प्रातर्नित्य कर्मसमाप्य, स्वासनेउपविश्य रक्षादीपंप्रज्वलय्य, सम्पूज्यचति पाटकृत्वा, प्रधानसंकल्पकुर्यात-अधेत्यादि देशकालौ संकीर्त्या मुकोऽहं ममास्यामुकराशेरमुकस्य वीजगभमुद्भवैनौ निवर्हण द्वाराश्रीपरमेश्वरप्रीतयेकरिष्यमाणामुकसंस्कारकर्मणि, स्वत्रिपुरुषा भ्यन्तरेनिश्चयोत्तरं प्रतिकृलत्वात्तहोपपरिहारार्थ शुभसौभाग्य- श्वर्यामिसिद्धये विनायकशान्तिंकरिष्ये, ततोगणेशादि ग्रहपूजा न्तं पंचागपूजनं कृत्वा, अत्रकेचिघृद्धिश्राद्धमपीच्छन्ति ॥ ततश्रा चार्योगृहाभ्यन्तरे वा यथावकाशस्थानेगोमयोपलिप्ते, भूमौ,भद्रा , कर्मकार रक्षाको प्रतिफल विनायक शान्तिपनि । (७३) - * सनार्थ पञ्चवर्णरंगरंजयित्वा तकस्वस्तिकंकृत्या, तस्यादिदिनु चतुर स्वस्तिकान ऋत्विरिभाकारयित्वा, ( मध्यस्वरितकेरक्तमानु दुई चर्मोत्तरलोमप्राचीनग्रीयंसंस्थाप्य) कलिवर्ण्यत्वातस्योपरि श्रीपीपीठं ( पीढ़ा) संस्थाप्यश्वेतवस्त्रेणाच्छादयेत् ॥ ततयाचा वरणंकृत्वा चतुरोबामणांत्विजश्चत्वा, तेचऋत्विजः पूर्वा 'दिक्रमेणचतुर्दिक्षुचतुर्पस्वस्तिकेपुचतुरः कलशाधान्यराशिः स्रग्दा • मवेष्टितकंठानवाहतवस्त्रभूपितान संस्थाप्य, नदीसंगमोदकेनवाह "दोदकेनापूर्य,तेयु(अश्वस्थानाद्गजस्थानाद्वल्मीकात्संगमातहृदान्म त्तिकांनीत्वा) 0 उदृतासिवराहेणकृष्णेनशतवाहुना । मृत्तिकेहर मेपापंयन्मयादुष्कृतंकृतम् । इतिचतुर्पपंचमृदाप्रक्षिप्य। ॐ गंध द्वारामिति चन्दनागरुकस्तुरीकर्पूरादीन्गंधानगोरोचनंगुग्गुलंचा क्षिप्य पूर्वोत्तसहदेव्यादिमहोपध्यष्टकंक्षिप्त्वा कलशस्थापनश्रा जिघ्रत्यारभ्य प्रसन्नोभसवदेत्यन्तं कलशपूजोक्त विधिनाप्रत्ये कंसंस्थाप्य सम्पूज्यच ॥ केचित्तु-ईशानेरुद्रकलशमपीच्छन्ति ।। तेनैवप्रकारेणस्थापयित्वा ॥ तत्रपूर्वस्यऋत्विग्घस्तेनपूर्वकलशस्थ्ट्र या ।। 30 हिरण्यवर्णाहरिणीमिति श्रीसूक्तेनाभिमन्त्रयेत् ॥ एवं दक्षिणस्थऋत्विग्दक्षिणकलशस्मृत्वा ।। 0 महित्रीणामबोस्तुपक्ष म्मिनस्यार्थए । दुराधर्षवरुणस्य ११ नहिपाममाचनमाड सुधारणेषु । ईशरिपुरधशर्टसः ।। तेहिपुत्रासोऽअदितेःमजीवसे माय । ज्योतिर्यच्छन्त्यजनम् ।३। कदाचनस्तरीरसिनेन्द्रसश्च सिदाशुषे । उपोपेन्नुमघवन्भृय इन्नुतेदानन्देवस्यपृच्यते ४ तत्स वितुर्वरेण्यं भर्गो०१५। ७० परितेडभोरथोस्मारॉअश्नोतुविश्वनः । येनरक्षसिदाशुपः । भृभुवःस्वःसुप्रजाः प्रजाभिःस्या सुवीरो धीर सुपोपापोषैः । नर्थप्रजाम्मेपाहिश स्थपशून्मेपाहाथर्य पितुम्मे पाहि १७ श्रागन्मविश्ववेदसमस्मभ्यंचसुवित्तमम् । अग्नेसम्घाडभिसहऽायच्छस्व । अयमग्निहपतिराहपत्यः प्रजयाच्वसुवित्तमः । अग्नेगृहपतेभिद्युम्नमभिसहआयच्छस्व है। अयमग्निःपुरीप्योरयिमान्पुछिवर्दनः । अग्नेपुरीष्याभाग्नमभि कर्मबागहरताको प्रतिकुलविनायक शानिपतिः - सहऽवायच्छस्व ।१०। गृहामाविभीतमायेपध्दमुजम्बिभ्रताप मसि । ऊर्जाम्बिभ्रद्वःसुमनःसुमेधागृहानैमिमनसामोदमानः ॥११॥ थेपामध्येतिप्रवसन्न्येपुसौमनसोबहुः। गृहानुपह्वयामहे तेनोजा नन्तुजानतः ॥१२॥ उपट्टताऽइहगावऽउपहताऽअजाक्यः। अथोड अन्नस्यकीलालऽउपहतोगृहेपुनः । क्षमायवः शान्त्यैप्रपद्येशिवर्ट) शरमर्ट शय्योःशय्योः।१३। 3 शान्तिः । ततःपश्चिमकलशं स्पृष्ट्या 1-30 इमम्मेव्वरुणश्रुधीहवमद्याचमृडयत्वामवस्युराचके ।। तत्वायामिव्रह्मणाब्वन्द मानस्तदाशास्तेयजमानोहविभिः। अहेड मानोवरुणेहवोध्युरुशर्ट समानऽआयुःप्रमोषीः ।। स्वन्नोऽअग्ने ध्यकणस्यविद्वान्देवस्यहेडोऽप्रथयासिसीष्टाः । यजिष्ठोवन्हितमः शोशुचानोविश्वाद्वेषा सिप्रमुमुग्ध्यस्मत् ।। सत्वन्नोऽअग्नेवमो भवोतीनेदिष्टोऽअस्याऽउषसोन्युष्टौ । अवयवनोव्वरुपर्ट रराणो वीहिमडीकर्ट सुहवोनsएधि ।४। महीभूषुमातरर्ट सुबतानामृत स्थपत्नी मधसेहुवेमतुविक्षत्रा मजरन्तीमुरूची ॐ सुशर्माण मदितिटसुप्रणीतिम् । सुत्रामाण पृथिवींद्यामनेहस !. सुशर्माण मदितिर्ट० सुप्रणीतिम् । देवीनाव स्वरित्रा मनागसमवन्तीमारुहेमा स्वस्तये ।६। सुनावमारुहेय मस्रवन्ती मनागसम् । शतारित्रा ॐ स्वस्तये । अानोमित्रावणा घृतैर्ग- ध्यति मुक्षतम् । मध्वारजासिसुक्रतू ।। प्रवाहवासिमृतंजीय- सेनऽश्रानोगव्यतिमुत्ततंघृतेन । आमाजने श्रययतंयुवानाश्रुतम्मे मित्रावरुणाहवेमा ॥ शन्नोभवन्तुव्वााजेनोवेषुदेवताता मितद्रवः स्वर्काः जम्भयन्तोहिंवृक र्ट० रक्षासिसनेम्यरमाय- घातमीवा 1१०1 32 व्याजेव्वाजेश्वतव्याजिनोनोधनेपुविप्राऽअमू- ताऽऋतज्ञाः । अस्यमध्वः पियतमादयध्दन्तृप्ता यात पथिभिः- वयानैः॥११॥ इतिवारणसूक्तेनाभिमंत्र्य तत उत्तरकलशंस्पृष्ट्वा, ॐ सहस्रशीपुरुपः इत्यादिपुरुपसूक्तनाभिमंन्य, ततः पंचमंन्द्र कलश, ३ नमस्तेमद्रमन्यवः । इत्यादिरुद्रसूक्तेनाभिमंत्र्य सम्पूज्य म तत प्राचार्यो भद्रासनस्योत्तरभागे मनोहरंकाष्टपीट संस्थाप्य पं.सकारातापारे, प्रतिकुलविनाका शान्तिपद्धतिः। (६७५) तत्र पिष्टेनषट्कोणं यंत्रंसवर्तुलं तद्वाहो,अष्टदल कमल सवर्तुलंच कमलया। अंगुलद्वय विस्तराह हिश्चतुरस्र ग्रहस्था पनार्थमष्ट बडंकृत्वा योक्त रंगरापूर्य, तत्यक्ष्यमाण देवानावाहयेत । तत्रादी मध्ये अग्न्युत्तारण पूर्वकं विनायकांवियोः प्रतिमाद्वयं संस्थाप्य । गणेशमावास्येन--30 एकदन्ताय विद्महेवनुदायधी- माहितन्नोदतिः प्रचोदयात् ॐ भूर्भुवः स्वः विनायकमावाहयामि स्थापयामि । एवं त्र, ततोऽम्बिकाम्-~30 सुभगायै विझ- हे काममालिन्यधीमहि, तन्नोगौरीप्रचोदयात् ॥ 30 भूगौरीं। ॐ श्रादित्यायनमः । ॐ ब्रामणेनम: । ॐ विष्णवेनमः । ॐ महेश्वरायनमः । ततःपटकोणेपु-अमितापनमः । असम्मि तायनमः। 30शालकायनम:01 30 कटंकटायनमः। 30 - प्मांडाय नम: | 0 राजपुत्रायनमः । ततः पट्कोणान्तरालेपु- व्योमकेशायनमः। 30 पार्वत्यैनमः। ॐ भीमजायनमा 30 स्कंदायनमः। ॐ वसुदेवायनमःविष्णवेनमा । पट्कोणवत्तले पूर्वादिक्रमेणमात्वाः-30 भू० कादित्रयोदश गृहमातृभ्योनमः ॥ ततः कमलाष्टदलेपु पूर्वादिक्रमेण-30 भूक कौमारायनमः । ॐ कुमारायनमः | ॐ श्वेतायनम:01 30 कौशिकायनमः । ॐ अपस्मारायनमः । ॐ विशारगयनमा स्कंदायनमः | 30 प्रमेय कायनमः। ततस्तेनैवक्रमेणपद्मा न्तरालाप्टभागेषु-30 इन्द्राण्यैनमः। 3. कुमारिकायैनमः । ॐ ब्रह्माण्यैनमः | ३0 वाराहानमः । ॐ वैष्णव्यैनमः। 30 चामुंडायैनमः । ॐ धृत्यादिमातृभ्योनमः । ॐ माहेश्वर्यै नमः । ततःपूर्वादिक्रमेणग्रहान-पूर्वे-30 शुक्रायनमा । . चन्द्रायनमा 1 30 भौमायनमः । ॐ राहवेनमः । शनिश्चराय नम: | 0 केनवेनम: ! गुरवेनम: । ॐ बुधायनमः । ततश्चतुरस्रा द्वह्निः पूर्वादिक्रमेणलोकपालाम्-- इन्द्रायनमः । अग्नयेनमः। यमागनम:01 + 32 नि तयेनमः 1 30 बरुपायनम: | 0 चायवेनम: । ॐ सोमायनमः। ॐ ईशा-
फरमर डरलाकर, प्रतिफल विनायक शान्ति पद्धति ।
मायनमः । तत्सन्निधौ-30 शच्यैनमः । स्वाहायनमः । ॐ
चारोहानमः । ॐ वशिन्यैनमः । वारुण्यैनमः | अमृग्यै
नमः । 30 कौमार्यैनमः | ॐ शूलिन्यैनमः। तत्रैवदिक्पाला
नांदक्षिणे--30 बज्रायनमः । अशक्तयेनम: । अदंडायनमः॥
30 खगायनमः । ॐ पाशायनमः । ॐ अंकुशायनमः। 30
गदायैनमः । त्रिशूलायनमः । तत्रैववाहनानि-30 एराव
तायनम: । मेलायनमः। 30 महिपायनमः । ॐ प्रेताय
नमः । ॐ मकरायनम: | 30 मृगायनमः। 30 नरायनमः ।
ॐ वृषभायनमः । तद्वहिस्तेनैवक्रमेणदिग्गजान्-30 एरावता
यनमः । 30 पुंडरीकायनमः । ॐ चामनायनमः | 30 कुमुदा
यनमः । ॐ अंजनायनमः । 30 पुष्पदन्तायनमः। 30 सार्व
भौमायनमः। 30 सुप्रतीकायनमः । ततोचहिस्तेनैवक्रमेणाष्ठ
भरवान्-30 प्रमेयकभैरवायनमः। 3. यजविक्षेपकभैरवाय
नमः130विशाखभरवायनमः | विरूपाक्षभरवायनमः।
30 यक्षभरवायनमः। 30 सुर्यकोटरभरवायनमः । 3. राज
पुत्रकभैरवायनमः। 30 जंभक भैरवाय नमः ॥-इतिसंस्थाप्य
सम्पूज्यच-तताचार्य:-
:-30 गणानान्त्वा० । इतिगणपतिमन्त्रे
ण अष्टोत्तरसहस्रमन्त्रैः प्रतिमंत्रणकैमोदकंयुग्मदर्वाङकुरयुतं
गणेशायनिर्विघ्नतासिध्दयेनिवेदयेत् ॥ असक्तश्चेदष्टोत्तरशतंनिवेद
पेत् ॥ तत प्राचार्योगृहोर विधिनाप्रादेशमात्रांहोमवेदी निर्माय,
पञ्चभूसंस्कारपूर्वकमग्निसंस्थाप्य, वरदनामाग्निंसम्पृज्य, याचा
चैव्राह्मणोवरणत्या । घृतसंस्कारंकृत्वा तदैवचरूमग्नावारोष्ण
' संस्कृत्यच ॥ ब्रह्मातनवाग्निसमीपेतिष्ठेत् ।। ततयजमानो गवाज्य
द्रवितेन गौरसर्पपसौंपधणेश्चन्दनागरु कस्तृरिकादिभिश्चोतः
निनसर्यानोचतुणीभानांमध्ये पूर्वनिर्मितेभद्रासनेउपविश्य स्व
गृहोत्तमार्गणस्वस्तिवाचनकुर्वीत,नसकल्पः-प्रोत्यादिदेशका
लौसकीामुकोहं करिष्यमाणप्रतिकृलविनायकशांतिकर्मणिसा
पदवशांतये,कल्याणहेतवेसौभाग्यवतीभिश्चतुःमस्रयाकंभजलेलंग
फर्मका उरताको प्रतिकुलविनायक शांतिपद्धति. (६७७) लाभिपेकंकारयिष्ये,ततोजीवत्पतिपुत्राभिश्चतिभिस्त्रीभिाकुरी रभिपेकंकारयेत-ततः पूर्वकलशमादाय-30 सहस्राक्षशतधारमपि भिःपाचनंकृतम् । तेनत्वामभिपिंचामिपावमान्यापुनन्तुते ।तंकल- शंतत्रैवपूर्वे स्थापयेत्सर्वत्र । दक्षिणकलशेन-भगंतेव्वरुणोराजा भगंसूर्योवृहस्पतिः । भगमिद्रश्चवायुश्च भगंसप्नर्पयोददुः ।। पश्चिमकलशेन-0 यत्तेकेशेपुदौर्भाग्य सीमन्तेयच्चमूर्द्धनि । ललाटेकर्णयोरक्ष्णो रापस्तद्दनन्तुसर्वदा । तत उत्तरकलशमादाय पूर्वोक्त स्त्रिभिमत्रैरभि पिंच्य कलशेपूर्ववत्स्थापयित्वा तत ईशा- नकलश जलंगृहीत्वा यजमानशिरसि सहनछिद्र ताम्रपात्रं सहस्र- धारमुपरितः कृत्वा-वृहत्पाराशरोक्तमत्रैरभिपिंचेत् ३० एतद्वैपाव- मानं सहस्राक्षरस्मृतम् । तेनत्वांशतधारेण पावमान्यः पुनन्त्विमाः ११॥ शमादिदशदिक्पाला ब्रह्मेशाः केशवादयः । श्रापस्तेघ्नन्तुदो- र्भाग्य शांतिददतुसर्वदा ।। 30 सुमित्रियानऽश्राप ऽऔषधयः सन्तुदुर्मित्रियास्तस्मैसन्तु योस्मान्द्वेष्टियंचव्ययं द्विष्मः । समुद्रा गिरयोनद्योमुनयश्च पनिवताः । दौर्भाग्यघ्नन्तुते सर्वेशान्तिय च्छन्तुसर्वदा ।४। पादगुल्फोरुजंघासु नितम्बोदरनाभिषु । स्तनो- रुबाहुहस्ताग्र ग्रीवास्वंसांगसन्धिषु ।। नासाललाट कर्णभूकेशा. न्तेषुचयस्थितं । तदापोध्नन्तुदौर्भाग्य शान्तियच्छन्तुसर्वदा ।। एवमभिपिंच्य, तत प्राचार्यायजमानस्य पश्चात्तिष्ठन्सव्यपाणि गृहीतकुशांतरिते यजमानस्य मुर्द्धनिसार्षपतैल मौदुम्बरेणवेण जुहुयात् । मंत्रा:-30 मिनाय स्वाहा | अ संमिनाय स्वाहा । शाल,यस्वाहा । ॐ कटकटायस्वाहा । 30 कूष्मांडायस्वाहा । राजपुत्रायस्वाहा । ततो यजमानस्तथैव होमवेदीसन्निधापा. गत्य स्वासनेउपविश्य, देवताभिध्यानपूर्वकं द्रव्यत्यागंकुर्यात् ॥ अधत्यादि कृतमंगलाभिषेकोऽमुकोई प्रतिकूल विनायकशांतिक- मणि, घृतेनाधाराज्यभाग देवतास्ततश्चरुणाप्रधानदेवान्-मितं समितं, शाल,कटकटं, कृण्मार्ड, राजपुत्र,हुत्वा-ततश्चाज्येनस्विष्ठ- कृतहुत्वा-ततोभूरादिनवाहुतिहोम पद्धत्यनुसारेणयये । एतद्- ६५% ) फर्मकाएरत्नाकरे, प्रतिकृलविनायक शांतिपद्धति.। व्यतत्तद्देवताभ्योमयापरित्यक्तं यथादेवतमस्तुनमम । इतित्यागं विधाय होमपद्धत्यनुसारेण समिधाधानंकृत्या आघाराज्यभागी हुत्या, ( नान्वारंभः ) चरुणामधानहोम कुर्यात्-30 मिनाय स्वाहाइट ३० संमितायस्वहार८७० शालायस्वाहा२८ कटकटाय स्वाहा२८ 30 कूष्मांडायस्वाहा २८ 30 राजपुत्रायस्वाहा । इति प्रत्येकमष्टाविंशति ,संख्याभिहत्या, अष्टोत्तरशतसंख्याभिः-ॐ गणोनन्त्वा० इतिचहुत्वाॐश्रीश्चतेति विकांचाष्टविंशतिसंख्या याहुत्व, वा एकैकसंख्ययाश्चतुर्यन्त ममंत्रः यंत्रस्थापित देवा- नपिचहुत्वा । ॐ अग्नयेस्विष्टकृतेस्वाहा इतिस्विष्टकृतं विधाय होमपद्धत्युक्तप्रकारेण भूरादिप्रायश्चितहोम विधाय पूर्णाहुत्यन्तं कर्मकृत्वा । ततो यजमानश्चरुकोपेणचामाषौदनेन, अभिषेकशा- लागंचैन्यादिदितु, लोकपालेभ्यो बलीनदद्यात् ,वलिमकारश्चपू. क्तिः । तत्रक्रमः-इन्द्राय अग्नये. यमाय निर्ऋतये वरुणाय वायवे० सोमाय० ईशानाय ब्रह्मणे० अनंताय क्षत्रपालाय । इतिवलीन्दत्वा, ततोयजमानः उष्णोदकेन स्नात्या शुक्लमाल्यां- वरधर प्राचार्यणसहितः पूजास्थल मागत्य 30 एकदन्ताय विद्महे वक्रतुंटायधीमहि तन्नोदंतिः प्रचोदयात् । इति मंत्रेण पुनर्गणेश उपायनान्तं सम्पूज्य, अंविकांपूजयेत्-30 सुभगागे विद्महे काममालिन्यधीमहि । तन्नोगौरी प्रचीदयात् । इतिसंपूज्य ततः कृताकृनतंटुल तिलयुक्तौदनं पश्चापक्रमांस, त्रिविधिसुरा (मद्यमांसानि विश्वजिनानि) मूलकापूप पूरिकोंडेरकदध्यन्नपापस सगुर मिश्रपिटल इट्टक कुल्मापफलानि । पूर्वी क पूजामंत्राभ्यां- सविनायकाम्बिकायैच तमुपहारं शिरसाभूमौ प्रणम्य ततोऽर्य- पात्रं सजलगन्धाक्षत पुप्पदृर्वाफलयुतं अध्यवामहस्ते धृत्वाउत्ता- नंदक्षिण हस्तमुपरि कृत्या-30 विनायक नमस्तेस्तु विघ्नसंघनि- गृहाणपरयाप्रीत्यासफलाघसुरेश्वर ततोवारिणादेवं संस्त्राप्य फलमनिवेदयेत् ततोऽम्बिकाम् 30 गौरिदेविनमस्तुभ्य, मंविके यिानाशिनि । गृहाणपरयाप्रीत्या सफलामहेश्वरि । तथैव . वारक, कर्मकारत्मापरे, मनिषलाय शांतिपतिः । (६७) फलमग्रेनिवेदयेत् । ततोगणेशंपुष्पाक्षतहस्तःप्रार्थयेन् रूपंदेहिय- शोदेहि भगभगवन्देहिमे । पुत्रान्देहिधनंदेहि संन्कामांश्च देहिमे, ततो स्विकाम् ॐ स्पंदेहियशोदेहिभगभगवतिदेहिमे । पुत्रान्देहि धनदेहि सर्वान्कामांश्चदेहिम । ततोनृतनशू कुशानास्तीयोप- हारशेपं कृताकृततंडुलादिकंनत्रनिधाय, चतुष्पथं ( चतुर्मार्ग- पधं ) गत्वा-वक्ष्यमाणपकारेण देवान्संपूज्य यलीन्दद्यात्-तत्रादौ पूर्व, 3. विमुख्यादिपदेवेभ्योनमः इतिसम्पूज्य शूर्पस्थद्रव्य चतुर्धाकृत्वेकभागमादाय बल्युपरिदीपं प्रज्यलय्य-30 विमुख्य श्चतथाश्येन स्यचकोयक्षएव च कृष्मांडोभेरयश्चेति पूर्वस्यादि. शिसंस्थिताः वलिंतृहन्तुतेसर्वे मयादयधाविधिः । इतिवल्युपरि जलक्षिप्त्वा पूर्वस्यांप्रक्षिपेत्-एवंसर्वत्र ततोदक्षिणे ॐ विनायका दिपड्देवेभ्योनमः सम्पूज्य द्वितीयभागमादाय-30 विनायकश्च कृष्मांडो राजपुत्रस्तथैवच । यज्ञविक्षपफश्चैव कुलंगायैनमोनमः । अपामारी दक्षिणस्यांपूजयामिप्रयत्नतः । वलिंगृहन्तुतेसर्वेमयोद यथाविधिः दक्षिणे प्रक्षिपेत् । ततः पश्चिमेशूर्पकेश्यादिषदेवेन्यो नमः सम्पूज्य-30 शूर्पकेशी शुर्पक्रोडीहप्रपेतश्चकुम्भका विरु- पाक्षोलोहिताक्षःपश्चिमस्यांदिशिस्थिताः वलिंगृहंतुतेसर्वे मयाद तं यथाविधिः । ततउत्तरे 30 विनायकादिपड्देवेभ्योनमःसंपूज्य 30 विनायका क्षेत्रपानोवैश्रवणस्ततः परम् । महासेनोमहादेवी महराजः सुकीर्तिताः । वलिंगृहन्तुतेसर्वे मयादत्तयथाविधिः तत हस्तौपादौ प्रक्षाल्याचम्य, पूजास्थल मागत्याचार्यायवस्त्रद्वयं गोदानं च दवा नस्विरम्योऽन्येभ्यश्चदक्षिणांदत्वा विनायकां विकायोरुत्तरङ्ग पूजनंकृत्वाविसृज्यश्राचार्यायकलशजलेनयजमान सकुटुम्ब मभिपिंच्याशीर्दत्वा शांतिपाठंकृत्वाकर्मेश्वरार्पणंकुर्यात ततो ब्राह्मणाम्भोजयेत् । इति प्रतिकृल विनायक शांतिपद्धतिः।।
(६८०) कर्मकाण्डरलाकरे, प्रतिकूल गुर्वकशांति गरिमापाः । अथगुर्वर्कशान्तिपरिभाषा। मुहर्त चिन्तामणौ-चटुकाया जन्मराश त्रिकोणायद्विसप्तगः । श्रेप्टे गुरुः खपटव्याचे पूजयान्यन निदितः । ज्योतिर्निवन्धेर्ग:-लोरणां गुरपलं प्रेष्टं पुरषाणार वेबलम् । जन्म निदशमारिस्थः, पूजया शुभदोगुरुः । विवाहेध चतुर्थाष्ट द्व दशरथो मृतिप्रदः । देवता नष्टात्मजा धनयता विधया खुशीला पुत्रा िपता हतघा भगा विपुत्रा । र्यामिनिया विगतपुध धवा धनान्यया प.ध्याभवेत्सुरगुरौ, मशोभिजामा। गर्ग.-सर्वन पि शुभदिद्याद दिशाव्दा- त्पर गुरु: 1 पंचपाव्दारेष सुभगोचरतामता । रजस्वलाया: कन्याया गुरुशुद्धि नचिन्तयेत् । अष्टमपि.प्रकर्तव्यो विप हं त्रिगुणाचनात्। अर्क ‘गुपोंबलं गौयां रोहिरयर्क बलास्मृता । कन्याचन्द्र कलाप्रोक्का वृषली लग्नतावला, वर्षा भवेदूरी नववर्षाच रोहिणी दशा भवेत्कन्या प्रतऊये रजस्वला । प्रथगुरुपूजाविधिः मंदरत्ने स्कान्दे-- कन्या विवाह कलेतु शुद्धिर्यस्या नविदते । ब्रह्मणस्योपनयने यस्यस्यादुः स्थिसागतः । एभिः पूजा गुरो: कार्या विधियद् भक्ति भावितैः । मदन्ती का पुष्पाणि पत्रं पाल श सर्पपाः । काम दम्पन्नः । गुइची चाप्यपामार्ग यि शंखिनी पचा । सहदेयो विष्णुकान्ता सर्वोषध्यः शतावरी कुष्टमांसो हरिद्रद्वै मुरा शलय चन्दनम् । पपकचोर'मुळंच सोपध्यः प्रकीर्तिताः । तपारपायभंगश्च पंच गव्यं जलं तधा। नूतनं सौदभंच पीतवान्न समन्वितं । पंचरत्नैः समायुक्त मीशान्या स्पाप्यचानलात् । याऽभौधोति मंत्रेण सोत्त्वस्मिन्विनिक्षिपेत् । कुंभस्योपरिभागेतु स्थापयि- स्थानहस्पितिम् । सुवर्णपानेसौवर्ण प्रतिमांमापसम्मिताम्। कारयेसुयधाशक्तिविजयाव्यवियजितः । पीतवस्त्रयुगच्छमपीतयज्ञोपयोतिनम् । पूजयेद्गन्धपुष्पाये तत होमसमाचरेत् । समिधा रयत्थ! सस्य होम्या यष्टोत्तर शतम् । तिलबाहि यय पं च होतव्यं च यथापमम् । वृहस्पति मंत्रण पिरसमन्वितम्। जपेयं गुरश्चियशान्त्यर्थभक्तिभावतः। एकोनविंशसाहस्रोतव्यंशुभमिच्छ ता। नरांचदोतव्यंचरणावातिलादिमिः । ततोहीमावगानेनुपूज्येषहरूपतिम् पीतमन्धस्थापुप्प- भूपदापग्यभनितः । दध्योदन व पंचफ ताम्बूलगंयुतम् । नमस्तेंगिरसानाथ पाश्यतेथ दृरात । हरपीडितानाम मृतायनमोनमः । पूजरित्या मुराचार्य परसादय निपैदयेत । गम्भीररुपान- दियायमुमतिप्रभा । नमस्तेयाय तांतगृहाणाध्य वृसते । सयदत्य सुरेश य जपहोमसम्बयत । मत्यायनेमारय होमपूजादिगस्तम । तत्य गृहाणगान.यधै पदस्पते नमो नमः । मन्त्रेण नन- गंडस्प्यपरवरगंशाधये ना । जोया दृहसति: राशिवाय मुगिराः । प.य.पतिदपमन्यो भकुन्। गिदारम । योचार गरेको प्रतिमा तयुरिष्टिः । प्रायम्य च गप युक्ता माचार्याय निवेदया । माययान नियती पर वारपारगः । यजमान गरिन रितं जितेन्द्रियम् । मुम्मोदक गृहीत्वा मन्त्रोत:प्रवन । इदमाचौपगप्रेम AT I या म.पधीर सावता मारिवानियत। पररमा द्विपापति दुभिरि । बान्ताकान्तयतपास गुदगु च प पू.स्परे: पूरामभपायमानुपाशातोगुरगंगालो रमि गुर्गा पूजा विधिः। - .
कमका रक्षाको प्रतिकृल गुमयांतिपदनिः । (६५१) ॥ अथपूतिकूलगुरुशांतिपद्धतिः ॥ अधचपूर्वोक्त परिभाषानुसारेण वटुकन्याजन्मराशिभ्यां देव गुमः जन्मराशिस्थ तृतीयस्थ पष्टस्थ दशमस्थ गोचरस्थानेषु सामा न्यपूजामपेक्षते चतुरष्ठमद्वादशस्थ गोचरस्थानेषु द्विगुणपूजामपे नते, नदोपपरिहारार्थ वक्ष्यमाणपध्दत्यनुसारेण गुरुपूजनंकुर्यात्- अथचकर्त्ता प्राननित्यकर्मसमाप्य शुचौदेशेशुभासने उपविश्या चम्य रक्षादीपप्रज्वलन्य गणेशादिपंचांगपूजनंकृत्वा, तदीशान भागे नृतनंमृण्मयकुम्भ, तीर्थजलपूरितं पीतवस्त्रपंचरत्न सम्मा युक्तं, सर्वोपधिप्रश्वत्थसमिदग्वंह पंचपल्लवपंचगव्यादिकानिच तन्त्रप्रक्षिप्य, कलशपूजोक्तविधिनाकलशसम्पूज्य ।। ननपूर्णपात्रो परि सुवर्णपानरजतताम्रादिपावासंस्थाप्य तत्रसौवर्णीगुरुम तिमामग्न्युत्तारण पूधिकासंस्थाप्य, पीतवस्त्रेणाछाध पोडशोपचा रपूजने पीतयज्ञोपवीतंचसमर्थ, पीनपुष्पपीतचन्दनादिभिः सम्प ज्य दध्योदनपीनौदनं चणकानलकादीन्नैवैद्यदत्वा ततःप्रार्थ येरु-30 नमस्तेगिरसानाधवाक्पनेथवृहस्पते । ऋरग्रहेपीडिताना ममृतायनमोनमः । इतिसफलपुष्पांजलिंनिवेद्य, ततप्राचार्यजापक च वृत्या-संकल्पकुर्यात-अधेत्यादिदेशकालौ संकीामुकोई, ममास्यवटोः (कन्यायावा ) वीजगभ समुद्भवैनो निवर्हणद्वारा करिष्यमाण चौलोपनयन संस्काराग्व्यकर्मणि-(बांकरिष्यमाणा मुकीकन्यायावियाह संस्काराव्यकर्मणि) अमुकनननोपलक्षित स्पवटोः अमुकराशिसकासात, गोचराष्टकवर्गाभ्या ममुकदुश्चि क्य स्थानस्य गुरुग्रहस्य दुर्दापोपशान्तये शुभफलप्राप्तयेच वेदोक्त विधानेनैकोनविंशति सहस्र मन्त्रजापकार्थ-प्रमुकगोत्र अमुक शर्माब्रामण मेभिवरणद्रव्यैः जापकत्वेन त्वामहंघृणे । इतिवरण द्रव्यदत्त्वा । वृतोस्मीतिकमकुरु, करयाणीतिप्रत्युक्तिः (अमुकन- त्रोपलक्षितायाः कन्यायाः अमुकराशिसकासात, गोचराष्ट्रकव र्गाभ्या ममुकदुश्चिक्य स्थानस्य गुरुग्रहस्य दुदीपोपशांतये शुभ परमागरत्नाको, प्रतिलगुशान्तिपद्धति । फलप्राप्तये वैधव्यादि दोपोपशान्तयेच, वेदोक्तविधानेनैकोनविं शति सहस्त्रजपकर्मकर्तुं मेभिर्वरणद्रव्यै रमुकगोन ममुकशर्माणं नात्मणं जापकत्वेन त्वामहंघृणे) इतित्रायणं कृत्वा-सचब्राह्मणो ममयजमानस्येति संकल्पविधिना वेदोक्तमन्त्रंगुरोर्जपेत् ॥ ततो जपान्तहस्तमा स्थंडिलं होमार्थनिर्माय होमपध्दत्यनुसारेण पंच भूसंस्कारादि ब्रह्मोपवेशनान्तं कर्मकृत्वा, वरदनामाग्निं सम्पूज्य, द्रव्यदेवताभिध्यानपूर्वक द्रव्यत्यागंकृत्वा, आघाराज्यभागौहत्या, 30 बृहस्पतइत्यस्य गृत्समदमृपिस्त्रिष्टुप्छन्दो वृहस्पतिर्देवना, श्वत्थसमिन्दोमे (बाययाज्यतिलहोमे) विनियोगः।। अबृहस्पते. इतिमन्त्रेणा घोत्तरशतसमिन्दोमंकृत्वा ततोयवाज्यतिलैजप दश मांश होमविधाय ॥ होमपध्दत्युक्तप्रकारेण भरादिहोमादारभ्य पूर्णाहुत्यन्तकर्मकृत्वा । ततःपीतगंधपुष्पादिभिः ३० बृहस्पते. इतिमन्त्रेणसम्पूज्य । सफलायं निवेदयेत्मन्त्रः--30 गम्भीर दृढरूपांग दिव्यज्यसुमतिप्रभो । नमस्तेवाक्यतेशान्त गृहाणाऱ्या बृहस्पते । अध्ययारिणा गुरुपतिमांसंस्नाप्य, फलमग्रेनिधाय, ततो जपहोमसमर्पये--भक्त्यायतेसुराचार्यजपहोमादिसत्कृतम् । तत्वगृहाणशान्त्यर्थ बृहस्पतेनमोनमः । ततःपुष्पाक्षतहस्तः प्रार्थ पेन्--30जीवोवृहस्पतिः सूरिराचार्यागुकरगिरः । वाचस्पतिदेय मन्त्रीशुभकुर्यात् सदामम । ततउत्तराङ्गजनंकृत्वा देवयिमृज्य, गांचसम्पज्य गोदानोक्तविधिना प्रतिमासहितंगामाचार्यायदत्वा । ताकुम्भोदकेनसपरिवारं संस्कार्यचवक्ष्यमाणमन्त्रैरभिपिंचेन- 30 इदमापाप्रबहता वाचमलचयत् । पच्चाभिदुद्रोहानृतं यच्च शेपेऽयभीमणम् । आपोमातस्मादेनसः पवमानश्चमचतु ।११ 30 तामग्निवांतपसाज्यलती वैरोचनीकर्भफपुजुष्टां । दुर्गादेवी शरणमहंमपये ।। 3 यायोषधीः पूर्वाजातादेवेभ्यस्त्रियुगपुरा। मनेनुयभणामहशतधामानिसप्तच ।। 30 अश्यावतीसोमा यतीमर्जयन्तीमुदोजसम् । श्रावित्सिसर्वाऽयोपधीरस्माऽअरिष्ट तानये ।। 30 सहस्राक्षशतधारमृपिभिः पावनंयनम् । तेनत्वाम कमेकागदरताकरे, प्रतिकृता. शान्तिपतिः । - भिपिचामि पायमान्यःपुनन्तुते ॥५॥ भगतंवरुणोराजा भगमिन्द्रो बृहस्पतिः । भगमिन्द्रश्चवायुश्चभगंसप्तर्पयोददुः ।। यत्तेकेशेषु दौर्भाग्यं सीमन्तेयत्रमृध्दनि । ललाटेकेशयोरक्षणो रापस्तदनन्तु सर्वदा ततस्तिलकाक्षतादिरोपणं कृत्वापाशीर्दद्यान ततोब्राम णान्भोजयेत् ।। ।। इलिप्रतिकूलगुनशान्तिः ॥ .. अथ प्रतिकूलार्कशांतिः । . স্মথৰ ৰাণান্ধবি লুলীয়ানা বলুখাল द्वादशस्थेपुस्थानेषु उपनयनविवाह संस्कारयोः पुरुपत्य सूर्यश्चे. त्तहिवत्यमाण शांतिकृस्वासंस्कारौकुर्यात्-सनविधिः-कर्तायादौ गणेशादिपंचांश पूजनं कृत्वा, ततः ईशानकोणे ताम्रकलशंजलपूर्ण तन्नपंचरत्नं सापधिगणं पंचगव्यं पंचपल्लयं अर्कवृक्षग्वण्डं च क्षिप्या कलशपूजोक्त विधिना सम्पूज्य ततः पूर्णपात्रोपरि तान पानविन्यस्य तत्राग्न्युत्तारण पूविकांप्रतिमा संस्थाप्यरक्तवत्रणा. छाद्य-प्राचार्यजापकंच सम्पूज्य वरणद्रव्यंकरेकृत्वा संकल्पकुर्यात् अद्यत्यादि संकीर्त्या मुकोहंममास्य पुत्रस्यामुकनक्षत्रोत्पन्नस्या मुकराशेरमुकस्यकरिष्यमाण उपनयनकमणि ( ৰাৰিৰঙ্কা संस्कारकर्भणि) जन्मराशिसकात्सूर्यग्रहामुकदुश्चिक्य स्थानस्थितेन तत्कृतदुष्टारिष्ट निवारणार्थ झटिति शुभफलप्राप्तये च सूर्यग्रहस्य शान्तिकमकर्नु, नथाचवेदोक्तविधना, सप्तसहस्र संख्यकजपकर्म कत्तु मेभिवरणद्रव्यै रमुकगोत्रप्रवरममुक शर्माणमाचार्यत्वेन तथा चा मुकशर्माणं जापकत्वेनयुवांणे इतिवृत्या, आकृष्णेतिमंन्त्रेण कलशोपरि सूर्यनारायण मावाहा, पोडशोपचारेण सम्पूज्य, मि. ठान्नौदनं गोधूम धूपकादीन्नैवैद्यसमर्य, उत्थाय दुग्धमिश्रितज- लेन र्यार्घदयात्-30 नमोस्तु सूर्याय सहरभवने नमोस्तुवैश्या- नर जतवेदसे । त्यमेवचाफ़ प्रतिगृहदेव देवाधिदेवायनमोनमस्ते (६४) कर्मकाण्डरनाकर, प्रतिशुक्रारिभाषाः । ।। ॐ नमोभगवतेतुभ्य नमस्ते जानवेदसे । दत्तमयमयाभानो स्वंगृहाणनमोस्तुते ।।२। ३० एहिसूर्य सहस्रांशोतेजोराझोजगत्पते अनुकंपयमांदेवगृहाणार्य नमोस्तुते । ततोजापकः पूवात कारण संकल्पंकृत्वा विनियोगःपूर्वकंसप्तसहस्रमंत्रं, अाकृष्णेनेतिजपेत तताप्राचार्या दीन्वृत्वा, आधारावाज्यभागौहत्वा, असमिद्भिर टोत्तरशतं जमिद्धोमंविधाय पायसेनजपदशांश होमंकृत्वा,होमप- द्धत्युक्त प्रकारेणान्याधानादि पूर्णाहुत्यन्तं कर्मकृत्याःपूजास्थलमाग- त्य पूर्वोत्तमंत्रारत्रयं सफलायदत्वाप्रार्थयेत् ॐसर्वदेवाधिदेवाय आधिव्याधिविनाशिने । पूजांग्रहाणमेदेव सर्वव्याधिविनश्यतु । तनो जपादिकं समर्पयेत्---30 सूर्यायसांगाय सपरिवाराय,, मयायत्कृतं तनिवेदयामि । ॐ नमः सूर्यायशांताय सर्वरोगवि- नाशिने । ममेप्सिनं फलदत्वा प्रसीदपरमेश्वर, तत उत्तरांगपूजन विधाय देवंविमृज्य गोदानोतविधिना रक्तवर्णागांप्रतिमायुतामा चार्यायदद्यात् तत प्राचार्यः कलशजलेन गुरुपूजोतमंन्त्रैर्वा अभि- पैक मंत्रैयजमानमभिपिंच्याशीर्वादं दद्यात् ततो ब्राह्मणान्भो- इति प्रतिकृलार्क शांनिपद्धनिः । सायेन् । अथ प्रतिशुक्रशान्ति परिभाषा । प्रतिशुक्रदीपमाह मुहर्त्तचिन्तामणी--देश्ययायभिमुखदक्षिण यदि या गपु. विशुगणी नोटा । वालम्जत विपद्यनयोटाचेद्वन्ध्या भवतिच गमगोत्वगमा । पदाहबादरायण':- मरतगतंगो पुने तरागागुग्यमागते । नटेनीय निरशी वानवगंच लयदधृम । 1- अमंगने गुरके सिंहस्थता हानी पंसर सनर कायाभूतिगृहविगत् । 11 - नगर प्रपा विषयाः पदय परपोडगे विबुधनीर्थयात्रियोः । पपीड़न नप्रतिभागयो भनिदोपकृष। यिधत तीर्थयात्रयो य प यांगन्या पिधान्या लगोपात्राप्पा नगरकोटयाना पदर्शनयात्रा। तं धंयामा पुि शुभाम्नदोष गम्मुमक्षिण योरर दोवानमातीनि शास्त्र मम्मी । यादरायण-कश्यपु पशिपु चानिमगिर मुर। भागेगा प्रतिगुनानि श्रीपतिः - पर पुरे काम र मिली।
कर्मकाण्डरत्नाकरे, प्रतिशुकशांतिपद्धतिः । (६) पिचा तीर्थयात्रायो प्रतिसुकानदुष्यति । बुधानुकल्येनशुक्रास्नापवादमाइश्रीपती-अगस्त गतेप्या स्फुजिति प्रयाया वुधौयदिस्या दगुलपती । यातव्य दिशावतामध। बालविशेष प्रतिशुक्रापवादं शुमास्तेच विशेषमाह मुहतचिन्तामणी--य.पचन्द्रः पूषाभास्किाये प.दरकाधीनदुखोऽप्रदने । पराशर:-पागादिवशि भ धानि याय सिति च दमाः । तावच्छका- भवेदंधः समुखेगमनं हितम् । पूर्वपदस्यदतत्यं निपातनाच्छुऋोधीयदाभवत्तदासम्मुग्वे दक्षिणभागच दोपक्रनीति प्रमाणम् । अथैविधेऽपि शुक्रसांमुख्य वश्यकतध्येचगमने शान्तिमाह यपिष्टः-तद्दीप शमनाय शानि वक्ष्ये समाप्तः । कृत्याशाति प्रयत्नन पश्चातराचे समाचरेत् । भृगुलाने भुगोवार भृगोगं भृगूदये । पोप भृगुवाऽपियावच्छुक्रोदयंप्रति । रजननच शुद्धनकारये रतिमांगो: लिग्वेदष्टदलं पद्मं कांस्य पाच तण्डुलः । एल सूदमावरवंध्य प्रतिमांतत्रपूजयंत । शुरु पुष्पाक्षतर्ग-धे.शुभ्रमुक्ताफलान्वितैः । उपचाराणिकायर्याणि भृगुमन्त्रेणधीमता । दन्मन्त्रेण अपं कुर्यात्मम्मगष्टौसरं शतम् । कमन्ते तनमन्त्रेण भल्याचा प्रदारयेत् । श्नेतगंधानतःपुप्पः क्षीर- मिश्रेण वारिणा । संप्रायंच प्रयत्मन प्रतिमाभूपणान्यता । देवनायवदातव्या शत खसहितवच, ब्राह्मणान्मोजयत्पश्चान्स्वयं जातयंधुभि. । ततः सम्मुखजोदोपस्तरक्षणादेवनश्यति ।। ॥ इति प्रतिशुकशान्ति परिमापा॥ अथ प्रतिशुक्रशान्तिपद्धतिः । अपच पूर्वोक्त विपपेषु शुभाशान्तिकर्ता शुक्रवार चन्द्रलारस- नुकृले गुभदिने । पूजास्थलमागत्य गणपत्यादि ग्रहपूजान्त पंचांग पूजनं कृत्वा ततः कांस्यापात्रे श्वेत तण्डुलै रष्टदलं कमलं घिरच्य तत्राग्न्युत्तारणपूर्षिकां साश्वशुक्रटकिनां रजत प्रतिमा संस्थाप्य, संकल्पं कुर्यात- अद्येत्यादि संकीामुकराशिरमुकशर्माहं, द्विरागन कर्मणि वानीर्थगमन यात्रादिषु प्रतिशुमसम्मुम्ब दक्षिण- योपानुपत्तये, स्थापित रजत प्रनिमायां शुक्रपूजनं करिष्ये-ततः श्वेतपुष्पाक्षायेत-30 श्वेतांवरः श्वेतपुः किरीटी चतुर्भजो दैत्य गुरुः प्रशान्तः । तथाक्ष मूत्रंच कमण्डलुंच जपंच विभ्रद्वरदो स्तुमाम् ॥ ॐ भूर्भुवःस्वः भोजकट देशोद्भवभार्गवसगोत्र शुक्ल वर्ण शुक्रअस्यां साश्वपतिमाया मिहागच्छेहतिष्ठेत्यावाह्य । 3.
(६६) कर्मकाण्डरत्नाकर प्रतिशुकशांतिद्धनि । अन्नादिति प्रजापत्यश्वि सरस्वतीन्द्रा ऋपयोतिजगतीछन्दः शुक्रो देवता शान्ति प्रतिमायां शुक्रस्थापने विनियोगः-30 अन्नात्परि तोरसं ब्रह्मणा व्यपियत्क्षत्रं पयः सोमप्रजापतिः। तेनसत्य मिन्द्रियं धिपान शुक्रमन्धसऽइन्द्रस्येन्द्रियमिदं पयोऽमृतमधु । 30 एतन्ते देव० इति प्रतिष्टाप्य । ॐ शुक्रायनमः, इति सम्पूज्य संवैतवस्त्रेणाचेष्ठय उपायनं निवेद्य, अष्टोत्तरशतंशुक्र मंत्र जप्त्वा, ततः श्वेतगन्धाक्षत मुक्ताफल दुग्धमिश्रित जलमंजलौनिधाय उत्तिष्ठन्नई दद्यात्तत्रमन्त्रः 30 दैत्यमन्त्री दिवादीचोश नाभार्गवः कविःश्वेतोथमंडलीकान्यो विधिस्थोभृगवेनमः इत्यर्थ वारिणा प्रतिमासंस्नाप्य मुक्ताफलंनिवेदयेत् । नतःश्वेतपुप्पाक्षतः पार्थयेन्-30 त्वत्पूजयानयाशुक्र सम्मुग्यत्वसमुद्भवं । दोपं विनाशयक्षिप्रंरक्षमांतेजसांनिधे । ननः उत्तरांगपूजनकृत्वा, प्रति मादानं कुर्यात् । ब्राह्मणं सम्पृज्य संकल्पकुर्यात-अद्यत्यादिसं- कीर्त्या मुकराशिरमुकोऽह प्रतिशुक्रमांन्तिकर्मणि, द्विरागमनादि दोषानुपत्तये, इमांसाश्वशुक्र प्रतिमांकांस्यपात्रसहितां भृगदैवत्यां रजतस्का ममुकगात्रायामुकशर्मणे तुभ्यंसंप्रददे 30 तत्सन्नमम एवं दानप्रतिष्टांकृत्वा । कलशजलेन यजमानमभिषिंच्याशीर्दद्यात ततो ब्राह्मणाम्भोजयित्वा यथेष्टगमनं यात्रादिकंकुर्यात् अत्रके- चिद्वंशपात्रे प्रतिमास्थापनं पूंजनंच वक्ष्यन्ति यथासमाचारस्तथा कर्तव्यः। इति प्रतिशुक्रशांनिपद्धतिः । अथ नवग्रहशांतिः। तनादित्य शांति । मदनरस्नमविष्योत्तरे-यादिन्यवार इस्तन वन्य क्विनइ । मनोकगिविनाम- कुाजा समारिन । प्रत्यहननसानग्य भविपरिः । सगरमवाप्ने युनिखापमानम् भाकर शुदगीपणा यानेनन । तामसारितारपुष. प्रपूजयेत् । सयानयुगर गरनाय का सहपावित परमं सितसे मुाद मारनामा कि करायडररनाकर, भवनह शान्तिः। , - समिनीटातरशत्माविंशतिस्वयहांतध्यामधुगाभ्यानाप तेनर । भगमिधः । मन्नेगाननविदुप प्राणायपदापर्यत । अदिध्य नमस्तुभ्यंमत्तमपी दिवाकर संग: गवार स्वास्नानमा सामागगन । सूर्यपोडासु पोर मु कृता शान्तिः शुभप्रदः ।। प्रथचन्द्रशाति:-तद्वञ्चित्रामगृह्यसोमय रविपक्षण: 'अननीयतविधिना पूजा- दिवंरिधोः । सप्तमेतुततः प्राप्ते कुब्रिामण भोजनम् । सप्तरयते । कपात्रेयास्त्राप्य सोम- रजत सम्भवम् । तत्र नायुगन्ने श्चनपुर प्रपश्यनम् । होमघृततिलः कुर्यासोम ना- म्नानमंत्रयित् । ममि तरशत मत्राविंशतिरेगा । होतव्यामसुमपिम्यां दनान नेग च । दश्या शिखरे कृत्या ब्राणाय निचंद येत । मंगानेन रजिन्द्र मम्यक् भनया समन्वितः । महादेव जातियतको पुष्प मोदीर पाटुर । सोम मोम्योभास्माकं सर्वदाने नमो नमः । 'प्रथ भौमशान्ति:-पारया मंगार के गृद्य क्षमायां नक्त भोजनम् । पृथिव्यामवननुपात्र भोजनम् । सप्तमत्वथ मंप्राप्ते हेमें ताने निवेश्य थे। रक बन्न युगन्छन्नं धुकुमना नुलपितम् । निवेद्य भा याकं सार पुष्प धूपा क्षतादिभि. होत तिलै. कुत्कुिजनाम्नाचमंत्रवित । समि- धोटोत्तरशत माविशतिरैववा । हातव्यामधुमपियां दध्नाचंय तेन च । मंत्रणानेन तंदग ब्राह्मणाय फुबिने । कुज कुप्रभवोऽपित्व मंगलः परिगद्यसे । अगलं निहत्याशु सर्वदा यच्छ मंगलम् । अथ बुधशान्ति:-विगासामु बुधं गृह्य सप्त नक्तान्यथा चरेत् । दुहेम मयंकृत्वा रथापिनं कांस्य भाजने । हरिद्वस दुग्ल्छनं पीतमात्यानु लेपनं । और यष्टिक नैवेद्यं ब्राह्मणाय निवेदयत । होम घृततिले. कुर्यादबुधन म्ना च मंत्रवित । समिधोत्तर शत माविशतिरेवच । दुधत्वं बुद्धिजननो वाधवान्मर्वदा द्रणम् । तत्वायवोधं कुरमं सोम पुत्रायते नमः ॥ अथ गुरु शान्ति:- गुः चैकानुराधासु पूजयेद् भत्ति तोनर. पूर्वोत्त विधिना या सप्तनतान्यथा चन्त । हम हममर्यपात्रं रथाप यत्वा गृहस्पति । पंतिाम्बर युगन्छन पात य.वीतिनम् । पादुकोप नहच्छत्रका इलु विभूषितम् । पूजयेत्पीत कुयुगे युकुमेनविलंपिटम् । धूपदीपादिभिदिव्य . फलश्चन्दन (डुलः । खंडसाधोपहारैश्च गुरोरने निवेदयेत् ॥ धर्मशास्त्रार्थ तापक्ष ज्ञान विज्ञान पारग। विबुधाति हराचिन देवाचार्य नमोस्तुने । होम घृत तिलैः कुर्याद् गुरुनाम्ना च वित् । समियोत्तर शतमष्ठाशिनि रेवच । होतव्या मधुमपिन्या नाव धुतेनच । विपनस्थे गुरौकार्या मह शन्तिरियं नृभिः । अथ शुक्र शांतिः-शुकं ज्येष्ठा संगृयक्षमाया (धव्या ) नक्त भोजनम् । (दिनस्यामभागरीपे) गुरूक्त ममागण द्विज मंत पंगेन च। सप्तम्त्यथ संप्राप्ते रोयं शुकग्नुकारयेत् । वंगपात्रे च संस्थाप्य पूजयस्मित पंकजैः । तदभावै मितः पुष्पैस्तांबूलचन्दनेन च । अयेतस्य प्रदातव्यं परमं धुत संयुनम् । दद्यादनेन मंग ब्राह्मणाय कुटुम्बिने । भार्ग शुषश्च श्रुनिम्मृति विश रद. । हित्वा (६) पवारलाकरे, नशान्तिपद्धति । प्रहकृतान्दोपानाट रारो यदोऽस्तुस । हाम घृत तिलै कुर्याच्छुक नम्नाच र प्रवित् । समिधी- मोत्तरशत मष्टाविंशतिरवच । अथ शनैश्चरादि शान्ति शनैश्चरं राहुकेतू लोहपानेषु चिन्यसेत् । कृष्णागर रमृतो धूपो दक्षिणाच 'वशक्तित । यथाक्रम शमीदूर्वा कुशाना समिध स्मृता । मातम्ररथ सप्राप्तेतदनिय कारयेत । वृष्ण वस्त्र युग छान मैक कारयेयुध । मृगनाम्या ममालय कृमरान्विनिदधर । होमावमाने तत्सर्व ब्राह्मणायोष पादयत । शनैश्चर नमस्तेऽस्तु नमाने राहवेना । केन च नमस्तुभ्य सर्वशान्ति प्ररन्मे । इति मदनरस्ने भविष्योत्तर नवपद शान्ति विधि । नवाप्टनवभूवर्षे, आश्विन्ये शुक्लपक्षके । दुर्गोत्सव दशम्यांच श्रवणरवेर्दिने ॥४॥ आदित्यनामकेयंत्र, इन्द्रप्रस्थे पुरेशुभे । संरच्यमुद्रितः कर्मकाण्डरत्नाकरोलसौ || चतुर्थस्तस्यचैवाऽसौ,ग्वंडाशान्त्यादिकर्मणाम् । सम्पूर्णनामगादद्य गुरुपादानुकंपया ॥३॥ प्रशंसन्तुग्रन्थं विमलमनयः कर्मनिपुणाः । प्रवृत्तोनवाहं जगतियशसः ख्यापनकृते ॥ प्रबन्धव्याजेन स्वयमिह महत्कर्मसरणौ । मयाशङ्कापडू। निजमनसिलग्नः परिहतः॥४॥ नात्रातीवनकर्तव्यं दोष दृष्ठिपरंमनः दोपोद्यविद्यमानेऽपि तचित्तानांप्रकाशते ॥५॥ . VIDYA इतिवैदिक पं. देवानन्द डिमरीविरचित कर्मकांडरत्नाकरस्यशांतिवडश्चतुर्थः ॥ समाप्तः ॥ संपूर्णीऽयग्रन्थः ॐशान्तिः RATIYA . LIPR? RAN