Sanmati Library, Jaipur

Pooja

Munshi, Heeralal · 2009/11

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प्रकाशकीय वक्तव्य। प्रिय सज्जन वृन्द ! मै आपको सबसे पहले इस पुस्तफके कर्ता महाशयका संक्षिप्त परिचय करा देना बहुत उचित समझता हूं। पुस्तकके कर्ता महाशय मुंशी हीरालालजी साहिवका जन्म संवत् १९२० में खंडेलवाल जैन जाति संबंधी छावडा गोत्रमें माननीय सेठ लक्ष्मणलालजी छावडाके घरमें हुआ। श्रीयुत सेठ लक्ष्मणलालजी यद्यपि सर्राफीकी दुकान करते थे तो भी आपने हमारे वकील साहिबको रुचिके अनुसार हिन्दी उर्दू व फारसीकी शिक्षा दिलाई। आपने थोडे,समयमें ही अपनी.प्रमा विनी बुद्धि के अनुसार खूब विद्या प्राप्त करली और आप अपनी जन्मभूमि जयपुर, नगरमें ही रियासतके उप महकमे में उच्च मुलाजिम हो गये। आपने वहां कई वर्षों तक बहुत योग्यताके साथ कार्य किया। पीछे आपने वकालात करना प्रारंभ कर दिया । अस्तु, आज आप जयपुरके बहुत प्रतिष्ठित वकीलोंकी मुख्य गणनामें गिने जाते हैं और न्यायपरायणता व धर्मपरायणतामें प्रसिद्ध हैं। आपकी धर्मरुचिका नमूना हमको देनेकी आवश्यकता नहीं है क्योंकि हमारे सुयोग्य सहृदय पाठक इस पुस्तक निर्माणसे ही समझ गये दोंगे। वकीलसाहवके खयाल धर्मशास्त्रानुकूल इसीलिए २ रहते हैं कि आपकी धर्ममें रुचि प्रथमसे ही हैं। विशेष रुचि आपकी कुछ वर्षोंसें इतनी बढ़ गई है कि आप अपनी आजीविकाको गौण ममझते हुए धर्म कार्यमें विशेष समय लगाते हैं। अब इस पुस्तकके विषयमें भी कुछ लिखता हूं। यह पुस्तक समस्त पूजाअर्थों का सार है तथा भक्तिमार्गका मुख्य साधन है। कई बातें ऐसी खोज के साथ-लिखागई हैं जिनका पता कई प्रथोंके देखने से भी नहीं लगे। पद्य रचना सरल और सरस एवं भाव तथा भक्ति गर्मित है। पूजा करनेवालों को इससे कई तरह की सुविधाएँ प्राप्त होंगी। वास्तव में वकील साहव ने एक उपयोगी पुस्तक बनाकर धार्मिक जैन समाजका उपकार किया है इसलिये वकील साहिव धन्यवाद के पात्र हैं आरै विशेष धन्यवादाह यों हैं कि आपने अपनी न्यायोपार्जित लक्ष्मी का इस पुस्तकके संपादनसे विशेष सदुपयोग किया है यदि पाठक गण इस पुस्तक को . अपनावेंगे तो आशा है कि वकील साहव और भी अपनी भाक्तिरस पूर्ण कृतिका आस्वादन करावेंगे। दीपमालिका सहृदयों का दास- इन्द्रलाल शास्त्री, वी० सं० २४४६ - जयपुर।

m प्रस्तावना। प्रिय पाठकगण! मेरा सं० १९७२ में श्रीसम्मेदशिखरजी की यात्राफा विचार तुमा गौर तदनुसार मैं वहां गया और भगवानके गुणानुयाद गाकर पूजा करने के लिए मैंने कोई मनोनुकूल छोटा पाठ तलाश किया परंतु नहीं मिला तब मैंने प्राचीन कवियों द्वारा बनाई हुई स्तुतियोंसे भगवानका गुणानुवाद गाया, अस्तु वहांसे लौटने पर मैंने यह विचारफिया कि कोई ऐसा छोटा पाठ बनाया जाये जिससे यात्रियोको बहुत सुमीता हो तथाअनेकरागरागिनियों द्वारा अपने चित्तको उत्साहित करके भक्ति युक्त करें इस विचार हो विचारमें सुगंधदशमीका दिन आया ।सदिन यहां धनालालजी सौगा- नीके श्रीमंदिरजीमें भजन होते हैं भजन समयमें एक प्रामीण भा ने खुदके पनाए हुए भजनोंसे भ- गयान के गुणानुवाद गाए । उनभजनोंको सुनकर मेरे चित्तमें दृढ़ श्रद्धान होगपा कि भगवानकी मक्तिके यश सरस्वती है। मेरो सो कुछ धर्ममें रुचि श्रीयुक्त प्रातःस्मरणीय मनालालजी संजीदार 'जोकि जयपुरमें एक नामो विद्वान् प पुरुष होगप है' के सदुपदेशसे थी उसकी शिन भजनोंके सुननेसे औरभी होगई अन्तु मचि को होगई परंतु सिर्फ रचि दी पया फरे गयोंकि इतनी विद्याकी योग्यता नहीं, कारण कि मैं संस्थत नहीं पढ़ा और पद्यरचना आदि कुछ नहीं कर जानता और!तो भो मैंने जिन पाणीको भक्तिले प्रशायसे कई भजन यनाए जिन्हें यथासमय प्रकाशित करूंगा तथा यह पूजन

४
..
बनाई जो आप सजनोंके सामने उपस्थित है इसमें जो कुछ न्यूनाधिकता हो उससे पाठक महा।
शय मुझे भी सूचित करें जिससे आगेके संस्करणमें ठीक २ प्रकाशित करा दी जाय । इस पुस्तक
के शोधनमें मुझे निम्नलिखित महाशयोंसे सहायता मिली है अतः मैं हदयसे आगार मानता
हुआ उन्हें धन्यवाद देता हूं।
श्रीमान पंडित चौथमलजी शर्मा ज्योतिषी, पंडित इन्द्रलालजी शास्त्रों-जयपुर
पंडित फस्तूरचंदजी साह, पंडित सूयालालजी पाटनी जयपुर
और मैं अपने प्रिंयपुत्र चि० यालचंद्रको भी हदयसे आशीर्वाद देता है जिसने लिखने, गानकी
चाल बताने आदि कई कार्योंमें यथाशा मदद दी है अन्नमें पाठक महाशयोंसे मेरी यह निवेदन है
कि भगवानके गुणानुवाद नित्य प्रति करें तथा धर्मलाभ उठावें और इस पुस्तक गुणोंका ग्रहण
करे और अवगुण निकाल देवें क्योंकि-" हंसो हि क्षीरमादत्ते तन्मिया वर्जयत्यपः।
धर्मानुरागी सज्जनोंका दास
मुन्शी हीरालाल वकील सरिश्ता
जयपुर स्टेट
नोट-यह पुस्तफसिर्फ सांक महसुल [आध मानेका टिकट] आने पर विनामूल्य मेजी जायगी
एता-मुन्शी हीरालाल वकील सरिश्ता
आकठोंका गस्ता जयपुर सिमी ।

पूजन करनेवाले भाइयोंको खास सूचना । ... १। प्रथम श्रीजिनेन्द्रदेवकी समुच्चय स्थापना करके अपद्रव्यसे पूजन करें फिर जिन भगवानके क्षेत्रकी वंदना करने जावें प्रारंभसे ही उन वंदनीय भगवान्की स्तुति गान करना प्रारंभ कर देवे और जब क्षेत्र पर पहुंच जावे तो खास भगवानकी पंचकल्याणकी तिथि नक्शेसे मालूम करके पूर्घ चढावें इसही तरहसे- प्रत्येक जिनालयकी पूजन करें। २। यदि अलग २ पूजन तथा कोई खास तीर्थकरकी ही पूजन की जावे तो इसही प्रकार इनही मंत्रोंसे स्थापना आदि करके जयमाला पढ़ें पुनः शांतिपाठ आदि यथावत: करें। ३। यदि चौबीसो तीर्थंकरोंकी समुच्चय पूजन ही की जाये तो समुच्य स्थापना, अष्ट झ्य, पंचमंगलादिका पाठ पढकर जयमाला पहें और सिर्फ समुच्चयार्घ द्वारा पूजन करें।

४ । यदि प्रत्येक तीर्थकरकी विस्तारपूर्वक पूजन करना हो तो स्थापना, अपद्रव्य आदि तो समुच्चयवत् चढा और जयमाला उनही तीर्थकरकी वोलें । ५। यदि विशेष. अवकाश न मिले तो जयमाला पढकर संपूर्ण तीर्थंकरोंको समुचय मंत्र द्वारा समुच्चयार्थ प्रदान करें। ६ । प्रत्येक भगवानकी साज वाज पर गाने वजानेके साथ भी अत्यंत भक्तिसे पूजन हो सकती है इसमें जितनी देर लगाना हो लगा सकते हैं। निवेदक- मुंशी हीरालाल वकील सरिश्ता, जयपुर स्टेट। [नोट] यों तो यह पूजन ही पनाई गई है परंतु यदि कोई भाई साली भजन, स्तुति ही करना चाहे तो जयमाला द्वारा यह भी कर सकता है। ग्रंथकर्चा--

ॐ
श्रीचतुर्विंशतितीर्थकरोंकी
भजन गायन गर्भित पूजा।
मंगलाचरण।
चाल दिसंभा।
चौवीसों जिन पति नमू, नमूं शारदा माय।
विघ्न हरण मंगल करण, र> पाठ सुखदाय ॥१॥

चौ०
पूजा
||२||
अय समुचय पूजा।
स्थापना।
प्रकट हुये गुण सर्व दोष अष्टादश भाजे।
प्रातिहार्यवसुयुक्त अतुल महिमा छबि छाजे ॥
समवशरणके माहि ज्ञान केवल युत राजे ।
कर्म अरिनको जीत लोकके शिखर विराजे ॥१॥
दोहा।
ऐसे तीरथ नाथ प्रभु , जिनाधीश जग इद्ध ।
आ तिष्ठहु मम निकट अब , करो कार्य सब सिद्ध ।
ओहीं ऋषभादिवर्द्धमानांतचतुर्विंशतितीर्थकरपरमदेवसमूह पत्र अवतर अवतर (संवौ.
पट) अत्र तिष्ठ तिष्ठ (ठः ठः) अत्र मप समिहितो भव भव (वपद् )
॥२॥

नौ० अथ मटका चाल जंगला। पूजा ॥३॥ चाल मोदी। हे जिनेश गणधरेश, तार तार तार । गतिके च्यारके दुःखोंसे मोहि, टार टार टार (टेर)। झारीमें भरा शुद्ध जल, अर्पण है वार वार । मम जन्म मरण मेटिये दुठ कर्म मार मार ॥१॥ मोही अषभादिमहावीपर्यंतचशितितीर्थकरेभ्यो जलं नियामीति स्वाहा ॥१॥ मेरे पुण्य उदय अब आयो, मैं शरण तिहारी पायो (टेर)। पावन चंदन कदली नंदन, घसि प्यालो भरि लायो। भव आताप निवारण कारन, तुम ढिग आन चढायोचिंदनं २॥ तारो मोकू दीन दयाला, शरण तिहारी आयो (टेर)। AIIRIL

चौ०
पूजा
॥४॥
चाल मांड।
अक्षत उज्वल प्राशुक लेकर, कंचन थाल भरायो।
अक्षत पद पावनके कारन, तुम ढिंग भेंट चढायो॥अक्षतं ॥३॥
चाल चौपाई।
चपा चमेली जूही ताजा, लायो प्रभु तुम पूजन काजा।
भेंट धरूं मैं तुम जिनराई, कामवाण विध्वंस कराई ।पुष्पं ॥४॥
में आयो पूजन काज, प्रभु तुम विघ्न नशानेवाले (टेर)
मैं व्यंजन नाना लायो, सुवरणको थाल भरायो।
मेरी हरो क्षुधामई व्याध हो, तुम रोग मिटानेवाले नैवेद्यं ॥५॥
चाल जंगला झझोटी।
उबार दीज्योजी स्वामीजी मोरी नाव (टेर)।
करूं आरती आपकी, दीपक ज्योति जगाय ।
॥४॥

अंधकार अज्ञानकों, दीज्यो शीघ्र नशाय ॥ दीपं ॥३॥ चौ० पूजा चाल उमाज। प्रभुजी मैं थानें पूजन आयो, मेरी अरज सुनों दीनानाथ (टेर) अगर तगर कृष्णागुरु चंदन, धूप दशांग वनायो। अष्ट करमके नाश करनको,अगनी संग जलायो। धूपं ॥७॥ चाल गोपीचंदको। मो पर करुणा कीजिये मैं दास तिहारा (टेर) श्रीफल केला आम नरंगी, पके फल सब ताजा। लोंग छिवारा भेट चढाऊ , मोक्ष मिलनके काजा॥ फलं ॥८॥ चाल मांडा हो जिन राजा वामी, मैं तो थानें पूजूं मन वचकाय (टेर)। अष्ट द्रव्य भर थालमें जी, लीनों अर्थ वनाय। ५॥

चौ
पंचम गति मोहि दीजियेजी , पूजू अंग नमाय ॥९॥
ऊँहीं ऋषभादि वीरांतेभ्यो निर्वधामीति स्वाहा ।
अथ पंचकल्याणका
पूजा
॥६॥
दोहा।
छह महीनेके पूर्व ही , गर्भ समय जिनराय ।
धनपतिने नगरी रची , इंद्र सु आज्ञा पाय ।
चाल चौपाई।
गर्भवासमैं जब प्रभु आये। सोलह स्वप्ने मात लखाये ॥
छपन कुमार देवियां आईं । निज निज मनमैं अति हर्षाईं।
माताकी दासी सम होई । करत भई सेवा सव कोई ॥
ता दिनको मैं पूजरचायो। भक्ति भाव अति चित उमगायो॥१॥
ओंीं चतुर्विशतितीर्थ कराणां गर्भकल्याणकेभ्योऽर्घ निर्वामीति स्वाहा ॥१॥

पूजा चौ० सोलह कारण पूरव भाया। तीर्थकर पद ता फल पाया। तीन ज्ञान युत जन्म लहाया। पांडुशिला सुरन्हवन कराया। तांडव नृत्य इंदरचवाया। मात पितादिक मन हरपाया। भक्ति भाव मो मन अतिछाया।जन्मकल्याणक पूजनआया॥२॥ ऑही चतुर्विशतितीर्थराणा जन्मल्याणकेभ्योनिवपामीति स्वाहा ॥२॥ तप इच्छा जब तुम मन आई। लौकांतिक आ भक्ति बढाई ॥ नगन दिगंवर रूप धराया। मन पर्जय तव ज्ञान लहाया। कर द्वादश विधि तप रस भीने । कर्म शत्रुतत छन छय कीने॥ तप कल्याणक पूज रचाऊं। येही अवसर मैं भी पाऊं ॥३॥ पौड़ी नशितितीर्थराणां तपकल्याणकेभ्योऽयं निपामीति स्वाहा ॥३॥ पोदा। धाति चतुष्टय नाशकर , केवल ज्ञान लहाय ।

- पूजा चौ० ॥८॥ । lue दोष अठारह टार कर , अहर्त पद प्रगटाय ॥ छियालीस गुण प्राप्त कर, सभा जुद्वादश मांहि । भव्य जीव उपदेश कर , पहुंचाये शिव ठांहि ॥ पूजूं ज्ञान कल्याणको , घर चरणनमैं शीश । भव वाधा मेरी हरो, हे त्रिभुन के ईश ॥४॥ ओहीं चतुर्विंशतितीर्थकराणां ज्ञानकल्याणकेभ्योऽयं निपामीति स्वाहा ॥ ४ ॥ गुणस्थान आतिम लिया, किये कर्म सब नास । आठों गुणधारी भये, कीना शिवपुर वास। अष्ट द्रव्य लै मैं करूं, कर्म नशावन हार। पूजा मोक्ष कल्याणकी , शिवरमणी भर्तार ॥५॥ ओहीं चतुर्विशतितीर्थकराणांज्ञानकल्याणकेभ्योऽर्य निर्वामीति स्वाहा ॥५॥ MA EMAL

चौ
॥९॥
प्रय जयमाला।
दोहा।
चौवीसों जिनराजकी, महिमा अपरंपार ।
वरनत सुरनर थकगये, कोउ न पायो सार ॥२॥
बाल चौपाई
ऋषभनाथ जिन धर्म धुरंधर । पूर्जे ध्यावें नमें पुरंदर ॥
जीत सके न कर्म अरि यातें । तुमको अजित कहत सबताते॥२॥
संभव भववाधा जग टारन । निर्भय पद देवें सुख कारन ।।
अभिनंदन आनंदके कंदा। सुमरण करत मिटै भवफंदा ॥३॥
सुमति जिनेश्वर सुमतीदाता । कुमत नशावन जगविख्याता॥
पदम नाथ छट्टे जिनराई । धर्मामृतका पान कराई ॥४॥
नाथ सुपारस जगकी फांसा । काट किया शिवपुरमैं वासा ॥
॥९॥

चौ० पूजा ॥१० चंदा प्रभु शाशतें युति भारी । तप धर कर्मकलंक निवारी॥५॥ पूजत पुष्पदंत जिनराई । सो नर भव आतंक नशाई ॥..' शीतल जगको शीतल कीना। चारौं गति आताप हरीना॥६॥ श्रीश्रेयांसश्रेयके करता। वंदन करत होइ दुख हरता॥ वाषुपूज्य चंपापुर थाना । तीर्थ किया कर पंच कल्याना ॥७ विमलनाथ निर्मल विख्याता। भविजीवनको सुखके दाता ॥ तुम गुण गिनत पार नहिं आया।अनंत नाम यातै प्रभुपाया।॥८॥ धर्म नाथ है जग उपकारी।रलत्रय दश लक्षण धारी ।। शांतिनाथ शांतीके करता। दुःख शोक भय आदिक हरता॥९॥ कुंथु भोग चक्री सुख नाना । कर्म काटि पहुंचे शिवथाना॥ काम चक्रि अर तीरथ नाथा|त्रय पद जुत जिन अर विख्याता ३० Recenene .

पूजा चौ० लखि जिन मल्लिवाल ब्रमचारी। कामदेव लाजत भयोभारी। मुनिसुव्रत तीर्थकर वीसा । काट कर्म वसु भये जगीसा ॥११॥ नमि जिन पूजत हैं सव आई । सुरनर मुनिजन भाक्ति वढाई॥ नेमिनाथ पशु करुणाधारी । तज दी राजुल राज दुलारी ॥१२॥ पारस चरण स्पर्श जु पाया। पार्स पहाड़ समेद कहाया। वर्धमान प्रभु धर्मजिहाजा। भवजलतारन भव्य समाजा॥१॥ दिव्यधान कर धर्म वताया। सोही गौतम गुरुने गाया ॥ पंचम काल अंत तक येही । भविजनका उद्धार करेही ॥२४॥ 'हीरा' मन जिन भक्ति सुहाई। अष्ट द्रव्य ले पूज रचाई ।। तुमरी चरण शरण सुखदाई । भव भव में पाऊं जिनराई ॥१५॥ चोवीस जिनंदा पापनिकंदा, सुखके कंदा जयवंता। चाल घत्ता।

पूजा ॥१२ चाल इन्द्र सभा। १ मैं पूजूं ध्याऊं भक्ति बढाऊं, निज रस पाऊं भगवंता ॥१६॥ ऑहीं चपिशतितार्थ करभ्यो महा नपामीति स्वाहा ॥ अथ श्रीऋषभनाथजी स्वमीकी पूजा । श्रीतीर्थंकर आदिके , ऋषभनाथ जिनराज । विघन हरण मंगल करन, तारन तरन जिहाज॥१॥ मोक्षमार्ग नेता प्रभू , भेत्ता कर्म कलेश । ज्ञाता लोकालोकके, वंदू हे जगतेश ॥२॥ कुलकर जो थे चौदवें , नाभिराय भूपाल । मरुदेवी तिनकी प्रिया , रूप शील गुणमाल ॥३॥ बदि अपाढकी दौजको, ताके उर अवतार । पुरी अजोध्या, लियो , सारथ सिध छार ॥ ४॥ १२॥

पूजा नौ० ॥१३ चैत्र कृष्ण नवमी तिथी , जनमे श्री जिनदेव । शुद्ध वंश इक्ष्वाकुमैं , जगत करै तुम सेव ॥ ५॥ अपने अपने स्थानमें , सुनि घंटादिक नाद । चतुर्णिकायक देव सब, आये तज परमाद ॥ ६ ॥ अति हर्पित सब इंद्र हो, देवादिक सँग लीन । पुरी अजोध्या आयकै , दी प्रदक्षणा तीन ॥७॥ गृह प्रसूतिमें जायके , इन्द्राणी जिनराय । ला निज करतें इन्द्रको , सौंपे शीश नमाय ॥८॥ ऐरावत पर इन्द्र ने , लीने गोद विठाय । पांडुशिलाले जायके, थापे अति हर्षाय ॥९॥ पंचमक्षीरसमुद्र जल , हाथों हाथ मंगाय। १३॥

चौ० पूजा ॥१४ सहस अठोतर कलश” , किया न्हवन जिनराय ॥१०॥ इन्द्राणीने भक्ति कर , किया योग्य श्रृंगार। नृत्यगान करती भई , उमगि उमगि सुरनार ॥ ११ ॥ कर नियोग आ नगरमें , उत्सव किया अपार । श्रीजिन सेवा करनकों,राखे देव कुमार ॥१२॥ धन्य धन्य जयवंत प्रभु , यह कह बहु शिरनाय । गये सर्व निज थानको, मनमैं अति उमगाय ॥ १३॥ अंगुष्ठामृत पान कर , ज्यों दोयजका चंद। क्रमसौं बढत जिनेश तुम , स्वजन वृंद आनंद ॥१४॥ युवा अवस्था प्राप्त कर , राज संपदा पाय। कर्मभूमिकी आदिमें , राजनीति प्रगटाय ॥१५॥ १४॥

चौ० बांध सीम नगरादिकी , जन रक्षाके काज। रक्षा विधिमें निपुण अति , थापे क्षत्रिय राज ॥१६॥ समझाई षद् कर्म विधि , वर्णभेद बतलाय । तात हे प्रभु आपको , कहत ब्रह्म ऋषिराय ॥१७॥ राज संपदा भोगतें, वीत गया बहुकाल। नीलांजन भेजी तुरत , सुरपति अवधि सँभाल ॥१८॥ करत नृत्य नीलांजना , हाव भाव बतलाय । दिखा अपूरव दृश्यको , ततछन गई विलाय ॥ १९ ॥ इस कौतुकको देखकर , मनमें किया विचार। देह भोग अरु संपदा, है सब जगत असार ॥२०॥ वारह भावन चिंततें,लोकान्तिक सुर आय। १५॥

चौ०
पूजा
-
कीनी थुति भगवानकी , धन्य धन्य जिनराय ॥२१॥
चैत्र कृष्ण नवमी दिवस , बन प्रयागमैं जाय ।
सकल संग त्यागी भये , निर्मल चारित पाय॥२२॥
मनपर्जय तत्छन भया , भये आत्म लवलीन । । ।
षट् महिनेका नियम धर , थिर आसन जिन कीन ॥ २३ ॥
छह महीने बीते जबै , मार्ग चलावन काज ।
पुर ग्रामादिकमैं गये , अशन हेत जिनराज ॥२५॥
अंतराय होते रहे , विधि नियोग छहमास ।
करत विहार जिनेशको , देखे नृप श्रेयाँस ॥२५॥
पूर्व जन्म सुमरण भये , मुनि अहार विधि जान।
नवप्रकार की भक्ति कर , पड़गाहे भगवान ॥२६॥

. यौ० पूजा 1१७ दे जिन करमैं इक्षुरस , दानतीर्थ प्रगटाय । देवन कर पूजित भये , अति प्रसन नृपराय ॥२७॥ तप दुर्द्धर प्रभुने किया, सही परीपह भूरि। शुक्लध्यानके योगते, घाति किये चकचूरि ॥२८॥ फागुण सुदि एकादशी, प्रगटा केवल ज्ञान । दिव्यध्वनित जगतका , दूर भया अज्ञान ॥२९॥ समोशरणके मध्यमें , हे त्रिभुनके राय ।। भव्यनको उपदेश कर , मोक्षमार्ग प्रगटाय ॥ ३० माघ कृष्ण चौदस दिवस , अष्टापद गिरि शीश । मुक्ति नारि तुमने वरी , हे त्रिभुनके ईश !॥३१॥ हे वृषभध्वज आपकी , धनुप पांचसौ काय । ॥१७॥ .

चौ ধুলা १८) हेम वर्ण तनं मोहनों, देखत मन हुलसीय ॥ ३२ ॥ लख चौरासी पूर्वकी , भई सु उत्तम आय । लक्षपूर्व तप धारके , पंचम गति तुम पाय ॥ ३३॥ दर्श आपको ना मिल्यो, ताते हे वृषभेश। . : . बहुत कालतें भ्रमत हूं , काटो कर्म कलेश ॥३३॥ धन्य भाग मेरो भयो, पूजन आयो आज। . "हीरा" की वाधा हरो, सिद्ध करो मम कांज ॥३५॥ ओं ह्रीं वृषभनाथजिनेन्द्राय अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ श्री अजितनाथ स्वामीकी एमा। चौल जंगल मंझोटी तिराय दीज्योजी प्रभुजी मोरी नाव (टेर) • १८॥ .

नौ० पुना १९॥ अजितनाथ जिन राज तुम , सकल गुणोंकी खान । सर्व दोष मेरो हरो, होय पापकी हान ॥१॥ जेठ अमावसकी प्रभू, छांडा विजय विमान । विजया माता उर वसे, जय जय जय भगवान ॥२॥ माघ सुकल दशमी दिवस , हुआ जन्म कल्यान । जितशत्रू भूपाल घर , वटा किमिच्छा दान ॥३॥ वंश सुवर इक्ष्वाकु में, भये चन्द्रमा आप। पुरी अजोध्या जननका, दूर भया संताप ॥१॥ हेम वरण तन सोहनो, गजका चिन्ह सुहाय। साई चारसत धनुषकी, उन्नत प्रभु की काय ॥५॥ पूरव ठारह लाखमें, युवा अवस्खा पाय। '.

चौ० २० पूर्व तरेपन लाख प्रभु, किया राज सुखदाय ॥६॥ माघ सुकल दशमी दिवस, झूठा सब जग जान।। राजभोग सब छांड कर, घरा आपने ध्यान ॥७॥ काटे शुक्ल सुध्यानतें, चारो घाति महान। . पौष शुक्ल एकादशी, प्रगटा केवलज्ञान ॥८॥ समवशरण द्वादश सभा, रचि धनपतिने सार। पहिली मुनिजन दूसरी, कल्प देवता नौर ॥९॥ साध्वी गण अर आविका, गण तीजी विख्यात। चौथी पंचम नारियां, जोतिष वितैर जात ॥१०॥ छट्टी भावेन देवियां, सप्तम भावन देव । अष्टम नवमीमें करें, व्यंतर जोतिष सेव ॥११॥ - Rao २०॥

नो. + ना ॥२१॥ दशमी वैमानिक सभा, मनुष्प ग्यारवी माहि। सभा वारवीके विषै, पशु गण वैठे आहि ॥ १२॥ इसप्रकार द्वादश सभा, भई जगत विख्यात । तिन विच गंध कुटी विर्षे, राजत तुम जगतात ॥ १३॥ दिव्य ध्वनि भइ नाथ की, सर्व अर्थ मय सार। सर्व लोककी हित करी, भया जगत उपकार ॥१४॥ लाख पूर्व रह योगमैं, सम्मेदाचल शीश । चैत सुकल तिथि पंचमी, भये मुक्तिके ईश ॥१५॥ सकल जगतको जीतकर, भये कर्म वलवंत। जीत सके नहिं आको, यातें अजित कहंत ॥१६॥ जनम मरणके दुःसते, “हीरा" अति भय वान । १५ चौ० भूमा २२॥ शरण आपकी.आपडा, बेग करो कल्यान ॥ १७॥ ओं ही अजितनाथजिनेन्द्राय पंचकल्याणपाप्तये अर्धे निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ संभवनाथजीको पूजा।। चाल आसावरी। श्री संभव जिनको कर प्रणाम, में पूजूं पाऊं मुक्ति धाम (टेर) छांडा ग्रैवेयक हे जिनेश, सित फागुण अष्टमि हे महेश ॥१॥ श्रावस्ती नृप दृढरथ सुजान, तिनकी महिषी उर वसे आन । कातिक अंतिम दिन जन्म आप,सव दूर करण संसार ताप ॥२॥ माता सेनालखि वदन चंदु, आशिष दीनी चिर जीव नंद। पंदरह लख पूरव रह कुमार, हो युवा लिया पितुराज भार॥ ॥ कियाराज जगतमैं नीति थाप, लख चवालीस पूरव सुआप। २ २२॥

चौ०
॥२३॥
मगसिर पूरणमासी जिनेश, तप उत्सव कीना आ सुरेस ॥४॥
भई तपश्चरणमहिमा अपारं, श्री संभव तुमको नमस्कार ।
बदि कातिक चौदस तिथि विशाल,भया केवल टूटे कर्म जाल ।।
रचि समवसरण विधि देव आय, ताकी महिमा वरणी न जाय।
रह लक्ष पूर्व अनगार अप, स्याद्वाद न्याय कर धर्म थाप ॥६॥
सित पष्ठि चेतकी हे मुनीश, सम्मेद थकी भये मुक्ति ईश।
तुम चरण चिन्ह घोटक लखाय,धनु चार शतक शुभ हेम काय ७
तुम गुण गणको नहिं छेवदेव, सुरनर मुनिजन सव करत सव।
में वो तुमपद बार वार, भव सागरतेंमोहि तार तार॥ ८॥
दोदा।
संभव जिनके अतुल गुन, को कवि करै वखान ।
'हीरा' भक्ति प्रसादतें, पावै मोक्ष निधान ।
॥२॥

चौ० पूजा ।२४ ओं ही संभवनाथमिनेन्द्राय पंचकल्याणमाप्तयेऽध निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ अभिनंदनजी बाल चौपई। श्रीआभिनंदनजिनवर ध्याऊ वंदन कर अति भक्ति वढाऊं। सित वैसाख षष्ठि जिनराई विजय विमान छोडसुखदाई ॥१॥ सिद्धार्था जननी उर आये संवर भूप अयोध्या जाये। माघ शुकल वारस हे त्राता जनम भयो तुम जग विख्याता॥२ हेमवर्ण तन छवि अति सोहै कपि लक्षण सबके मन मोहै। जन्म महोत्सव हे जिनराई कीनो सुरपति हर्ष वढाई ॥३॥ वाल अवस्था त्याग प्रभु राज्य पिताका पाय । सुख मय कीना जगतको नीति धर्म वतलाय ॥४॥ दोहा। ।२४॥

पौ० चाल चौपई राज संपदा भोगकर बहुत काल सुखरास । इन्द्रिय सुख दुख जानकर जगतै भये उदास॥५॥ सव जग वस्तु अथिर प्रभुजानी, तप इच्छा निज मनमेंठानी। वारह भावन जव प्रभुभाये, तव लोकांतिक सुर मिल आये|| जन्म दिवसहीको तप लीना, सुरनर मिल तप उत्सव कीना। ज्ञानावरणादिक दुख दाई, इतने आतम ज्योति न पाई ॥७॥ वेला शुभ अपराह्न सुहाई, ता वर प्रभुने घाति नसाई। पोप सुकल चौदस सुखदाई, केवल ज्ञान लह्यो जिनराई॥८॥ समोशरण में आपके, गणधर इकसौतीन । वारद सैईसेंरु डेढसो, मन पर्यय परवीन ॥९॥ पोदा १२ चौ० पूजा केवलि सोले सहस अरु, प्रति गणधर लखतीन । नोसहसंअरुआठसौ, युत अबधी निज-लीन ॥१०॥ शिक्षक पंचासत उपरि, दो लख तीस हजार। पूरव धर पैचीससौ, बादी ग्यारे हजार ॥११॥ वैक्रिय महस गुनासअरु, श्रावक थे त्रयलाख । भई श्राविका पंचे खं, जिनवाणीकी साख ॥१२॥ तीनलाखू त्रित सहस, छैहंसौ ऊपर जान। भई आर्यका संगमैं, तुमरे हे भगवान ॥१३॥ पूर्व लाख पंचासकी, आयु भई सुखदाय। सार्द्ध तीन सत धनुषकी, उन्नत प्रभुकी काय ॥ १४॥ चाल चौपई। सुदि वैसाख षष्ठि जिनराई । तादिन तुम पंचम गति पाई ॥ २६ गौ० ॥२७॥ गिरि समेद पर आनंद कूटा, कर्म अघाति तहां पर छूटा॥५॥ मोक्ष गये तहांत मुनिराई, तिनकी संख्या आगम गाई। कोडा कोडी तसि सुजानो, तापर सत्तर कोड वखानो॥ ६॥ लक्ष सप्त अरु सहस वियाला, सात सतक वंदू मुनि माला। अभिनंदन आनंद अतिकीजे, अभयथान 'हीरा'को दाजे॥१७॥ दोहा। अष्ट द्रव्यको लेयकर पूज करी गुणधाम । अभिनंदन तुम चरणको पुनि पुनि करो प्रणाम ॥१८॥ ओं ही अभिनंदनजिनेन्द्राय पंचकल्यागाप्राप्तयेऽर्थ निवपामीति स्वाहा । अथ सुमतनायनी। ": माल नौपाई। पंच कल्याण सुमति प्रभु पाये, पूजू ध्यावू मन वच काये।

चौ० पूजा २८) वैजयंत तजकर जिनराई, सित सावण दोयज सुखदाई ॥१॥ मात मंगला उरमैं आये, मेघप्रभके पुत्र कहाये। चैत्र शुक्ल एकादारी स्वामी, जन्मे तुम त्रिभुवनमें नामी ॥२॥ नगर अयोध्याके नरनारी, किया महोत्सव अति सुखकारी! सुदि नवमी वैशाख सुहाई, तादिन प्रभु तप-लक्ष्मी पाई ॥३॥ चैत्र पूर्णिमा तिथि सुखदानी, आप भये प्रभु केवल बानी। समोशरण धनपतिआ कीना, द्वादशसभा तहां रच दीना॥॥ दोहा गंध कुटी के वीच मैं, राजत आप जिनेश । हेमवर्ण छवि यों दिपे, मानों कोटि दिनेश ॥५॥ दिव्यध्वनि मुख तें खिरी, गणधर प्रश्न वसाय । २८! .

चौ०
२९॥
नय प्रमाण निक्षेप अरु, सप्त तत्त्व दरसाय ।। ६॥
नव पदार्थ पट द्रव्य पुनि, अस्ति काय हैं पांच ।
काल तीन गुपती त्रयी, सुमति पांच व्रत पांच ॥७॥
द्वादश तप अरु भावना, पंचा .र महान।
उत्तर गुण अरु मूल गुण, और च्यारविध ध्यान ॥ ८॥
दश लक्षण है धर्म अरु, रत्नत्रय सुख दाय।
सोलह कारण भावना, तीर्थकर पद दाय ॥९॥
इत्यादिक बहु भेद युत, सत्यधर्म समझाय।
कुमति हरी सब जगत की, तातें सुमति कहाय ॥१०॥
काय तीनसो धनुषकी, चकवा चिन्ह लखाय ।
पूर्व लक्ष चालीसकी, भई आपकी आय ॥११॥
॥२६॥

चौ
०
।३०
चैत्र शुक्ल ग्यारस दिवस, गिरि समेदके शीश।
मुक्ति भये हे नाथ तुम, नमौं नमौं जगदीश ॥ १२॥
सुमति मुझे आ दीजये, सुमतिनाथ महाराज।
अव विलंव नहिं कीजये, “हीरा' हितके काज ॥१३॥
ओं ही सुमतिनाथजिनेंद्राय पंचकल्याणमाप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा ।
अय पदम प्रभुनी
दोहा
उपरिम अवकतै चये, कौशांची पुर आय।
माघ कृष्ण छिट गर्भमैं, आये श्री जिनराय ॥१॥
कार्तिक कृष्ण त्रयोदशी, लीना जन्म धराय ।
धारण नृप तुम पितु भये, भई सुसीमा माय ॥२॥
N
1॥३०॥

चौ बना कार्तिक सुदि तेरस दिवस, धारयो तप वन जाय । तेला थापा आपने, निश्चल ध्यान लगाय ॥३॥ मंगलपुरके नृपति वर, सोसदत्त घर जाय। किया अशन प्रभु आपने, सव जनको सुखदाय ॥ ४॥ चैत्रमासकी पूर्णिमा, केवल ज्ञान उपाय । लोकालोकविलोकके, धर्म स्वरूप वताय ॥५॥ फागुण कृष्णा चोथको, गिरि समेद पर जाय। मुक्त लही प्रभु आपने, पूजू अर्घ चढाय ॥६॥ रक्त वर्ण प्रभु आपका, चिन्ह सुपा लखाय । है ईसो धनु काय अरु, पूर्व तीस लख आय ॥७॥ मो किंकरकी वीनती, सुनिये श्री जिनराय । १॥ ARIA RA चौ० पूजा ॥३२॥ भव भवमें तेरा शरण, पावू मैं सुखदाय ॥८॥ भक्ति भाव मम उर वढयो, आयो मन हुलसाय । 'हीरा' अपने भक्तको, लीजो चरण लगाय॥९॥ पदम नाथ युग चरणको, जो पूजै मन लाय। सुख संपति सव भोग कर, भव सागर तिर जाय ॥१०॥ ओही पद्मप्रभुजिनेन्द्राय पंचकल्याणमाप्तये अर्ध निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ सुपार्श्वनाथजी चाल सरांग दृढ मनसे सुपार्श्वका शरण लिया (टेरे) मध्यम प्रैवेककसे आकर नगर वनारस स्थान किया। शुकल भादवा षष्ठि गर्भ दिन जेठ द्वादशी जन्म लिया॥१॥ ३२॥

नौ 1३३॥ पृथिवी देवी मात तिहारी सुप्रतिष्ठ नृप तात भया। हरित वर्ण भइ देह आपकी स्वस्तिक लच्छन धार लिया ॥२॥ वीस लाख पूरवकी आयू धनुष दोय सो काय भया। जन्म दिवसकोदीक्षा धारी तेलेकावत धार लिया ॥३॥ पाडल पुर नगरी के माहीं नृप महेन्द्र घर अशन भया। फागुण वदि छिट घाति नाशकर केवल ज्ञान उपाय लिया ॥४॥ फागुण वदि सातें शुभ तिथिमें गिर समेदसे मोक्ष भया। सुरनर मुनि सब मिलकर आये पूजा करके लाभ लिया ॥५॥ दोबा। लख चौरासी योनिमें, बहुत सही में त्रास । जन्न मरण करता फिरा, ठारह वर प्रति स्वास ॥६॥ १३३॥

-
-
चौ०
पूजा
.
३४॥
नित निगोद की सात लख, सात इतर की जान ।
भूजल तेजरु वायु की, सात सात ही मान ॥७॥
दश लख है तरु कायकी, चौदह मनुज सुजान।
देव पशू अरु नारकी, चार चार लख ठान ॥८॥
विकलेन्द्रियकी लाख छह, सब चौमसी लाख ।
कुल कोडी है एकसो, साढ निनण३ लाख ॥९॥
इनमै भ्रमता हे प्रभू, मैं आया तुम पास।
हीरा' को निज दास लख, तारो नाथ सुपास ॥१०॥
ओहीं श्रीसुपार्श्वनाथ जिनेन्द्राय पंचकल्याणपतये नित्रपामीति स्वाहा ॥
1508
39
प्रय चन्द्रमभुजी।
चालमांड।
हो चंदा प्रभु स्वामी मोहे उवारो चहुगति त्रासते (टेर)
॥३४॥

चो पुमा ॥३श श्रीवर्मानृप प्रथम भये फिर, प्रथम स्वर्ग भये देखें। अजितसेन छहखंडी नृपढ़े, भोगे भोग अछेव ॥ अच्युतें इन्द्र पद पाय भये, प्रभुपेदमनाभ भूपाल । वैजयंत में पहुंचे फिर जिन, किये भोग बहुकाल ॥ किये भोग वहुकाल, जनम मृतुना टरा। ताके टारन काज, तीर्थकर पद धरा ॥१॥ चंद्रपुरी में चन्द्र अनोखे, उदय भये प्रभु आप। संसारी जीवनका तुमने, मेटा जग संताप ।। महामेन ना तात तिहारे. भई लक्ष्मणा माय। चेत पंचमी अमिन पक्षको, वमे गर्भमें आय ॥ वसे गर्भमें आय, जगत आनंदभया।

चौ
पूजा।
छपन कुमारी देवि, मात सेवन किया ॥२॥
जनम पौषबदि ग्यारस पाया, भये मंगलाचार।
उत्सव आ देवोने कीना, मात पिताके द्वार।
इन्द्राणी प्रसूति घर जाकर, लाई गोद उठाय ॥
ऐरावति हस्ती पर तुमको, लीने इन्द्र विठाय ।
लीने इन्द्र विठाय, शब्द जय जय हुए।
पांडु शिला लेजाय, थाप तुमको दिये ।।३॥
सहस अठोतर कलश लायकर, किया जन्म अभिषेक।
इन्द्राणी शृंगार किया पुनि, करके बहुत विवेक ॥
हम हम हम गन्धर्व सुरोंने, धुनि मृदंगकी कीन।
झननन झननन झांझ वजाई, और बांसरी बीन।
-
॥३६॥

चौ० और वांसरी बीन, साज सब साजिया। साढे वारहकोड, सुवाजा वाजिया॥४॥ कर उत्सव सुर पुरमें लाये, किया सुतांडव नृत्य । देख कल्याणक जन्म आपका, हुये सभी कृत कृत्य ॥ उत्सव कीना मात पिताने, दिया किमिच्छक दान। रहा न याचक पुरके मांही, किया सकल मनमान॥ किया सकल सनमान, धन्य जिन जन्मये। अतिशय पुन्य उपाय, देव सुर पुर गये ॥५॥ दश लख पूरव आयू धारी, धनुप डेढसो काय। चरणन चिन्ह केन्द्रमा सोहे, चन्द्र वर्ण जिनराय ।। राज अखंड किया जग माही, प्रजापाल हितकार 1३७

चौ०
पूजा
हुई अरुचि जब राज भोग से, तपका हुवा विचार ॥
तपका हुवा विचार लौकान्तिक आगये।
निज नियोग को साध थान अपने गये॥६॥
जब तप धरने आप पधारे, सुरनर मुनि भये साथ ।
विठा पालकी नृप विद्याधर, लेगये हाथों हाथ ॥
देवोंने फिर गही पालकी, अपनी अपनी वार।
जव पहुंचे प्रभु वन के मांही, भूषण वसन उतार॥
भूषण वसन उतार, लौंच तुमने किया।
जन्म तिथी शुभ पाय, आप तप धर लिया।
मन पर्यय प्रभु ज्ञान लहाया, जोगासन लिया धार।
तेलावत कर पारण कीना, पद्मखंड नृप द्वार ।
॥३॥

नौ
पूगा
1३६
पंचाश्चर्य दानपतिके घर, भये गगनतें सार ।
रत्नपुष्प गंधोदक वरपे मंद सुगंध क्यार ।।
मंद सुगंध वयार, दुंदुभिध्वनि भई।
दानपती नृप चन्द्रदत्त, भये सुखमई ॥
लख रचना यह कई जनोंने, मुनि पदवीली धार।
वारह विधि तप तुम संग कीना, सहा परीपह भार ।।
तीन मास छद्मस्थ रहे फिर, घाति कर्म दिये मार।
शुक्लध्यानप्रभाव आपके, उपजा केवल सार ॥
उपजा केवल सार. अतुल महिमा भई।
फागुण कृष्णा साते, तिथि शुभ वरणई ।।
दोष अठारह टर गये सारे, गुण छियालिस प्रगटाय।

चौ०
॥४०॥
प्रतिहार्य वसु प्रगट भये अरु, अर्हत पद लिया पाय॥
समवशरण की रचना राची, राजत श्री भगवान ।
सभा जु द्वादश जुरी मनोहर, किया धर्म व्याख्यान ।
किया धर्म ब्यारून, अंग द्वादश कहे।
गणधरादि ने समझ, ताहि धारण किये।
अक्षर रहित भई जिनवाणी, सकल जीव समझाय ।
होठ तालु नहि हिले प्रभूके, सव जीवन सुखदाय॥
लक्ष पूर्व समवसृति युतरह, गिर समेद पर जाय ।
योग निरोध किया प्रभु तहां पर, चार अघाति नशाय ॥
च्यार अघाति नशाय, वास शिव पुर किया।
केवल तिथि को मोक्ष, महा फल पा लिया।
॥४०॥

पूजा
नौ०
४१॥
पहुंगत भोगी लख चोरासी, कर्मन की सहि त्रास ।
भव सागरसे मोय उवारो, पूरो मनकी आस ॥
दो कर जोडूं शीश नमांवू पूजू वारम्वार ।
लक्ष्मण सुत हीरा” शरणे आया, वेग उतारो पार ॥
वेग उतारो पार, दीनके नाथ हो।
अधम उधारण चन्द्रनाथ विख्यात हो।
गों ही श्रीचंद्रमभनिनेन्द्राय पंचकल्याणमाप्तयेय निर्वपामीति स्वाहा ॥
अय पुष्पदंतनी।
चाल मांडा
पुष्पदंत भगवान नमूं में मनवच तनसेजी।
कर्मशत्रु यो टार नमूं में मनवचतनसंजी॥टेर ॥
॥४१॥

चौ०
पूजा
1४२१
GA
फागुण वदि नवमी दिवस, आरण दिवतै आय।
रामा देवी उर वसे, काकिंदा पुर माय ॥१॥
मगसिर सुदि राके दिवस, जनमे श्री भगवान ।
नृपति वर्य सुग्रीव घर, वटा किमिच्छक दान ॥२॥
युवा होय पितुराज्य पर, भोगे भोग अपार ।
राज त्याग तिथि जन्मको, लिई तपस्या धार ॥३॥
पंच महाव्रत नग्नता, सुमति पांच परकार ।
पट आवश्यक भूशयन, केसलींच सुखकार ॥४॥
पंचेंद्रीका दमन अरु, दन्त धवनका त्याग ।
स्नान त्याग इक भुक्ति अरु, खडे हार विनराग ॥५॥
यह ठाइसौं मूल गुण, अरु उत्तर गुण भेद।
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॥४२॥

मो० १५३ चौरासी लख जानकर, पाले प्रभु विन खेद ॥६॥ कातिक सुदि दोयज तिथी, किये घातिया नाश। केवल ज्ञान उपायके, कीया धरम प्रकाश ॥७॥ चंद्रवर्ण तन सोहनो, मकर चिन्ह सुखदाय । काय धनुप शतकी धरी, दो लख पूरव आय ॥८॥ भ.दो सुदि आठ दिवस, च्यार अधाती नास। गिरि समेदते हे प्रभू, कीना शिवपुर वास ॥९॥ 'हीरालाल' की वीनती, सुनिय श्री जिनराय । कर्मरोगको मेटिये, पूजूं तुमरे पाय ॥१०॥ मोती श्रीपुष्पदननिनेन्दाग पंपल्यागमाप्तऽय निर्वगामीनि स्वाहा । ३४॥

पूजा 1४४ अय शीतलनाथजी- चाल मांड। शीतलता मोये कीजिये, भवदाह मिटाकर (टेर) चैत कृष्णकी आठ तिथिको, अच्युतदिवते आये। भहलपुरमै मातसुनंदा, दृढरथ पिता कहाये जी ॥१॥ माघ कृष्ण वारस शुभ तिथिमैं, जन्म आपने पाया। पूर्वाषाढरु धनुषलग्नमैं, जगविच आनंद छायाजी ॥२॥ महा वदि वारस होय दिगम्बर, तपरस मांही भीने । तीन वरस छद्मस्थ रहे फिर, घातिकर्म क्षय कीनेजी ॥३॥ पोष कृष्ण चोदस शुभतिथिमें, केवल ज्ञान उपायो। कर विहार भव्य वहु वोधे, जगमें ज्ञान बढायोजी॥४॥ सुदि आठे आसोज मासमैं, कर्म अघाति नशाया। ORG ४४॥

18 लघुअक्षर परिमाण कालमें, निवाघ पद पायाजी॥५॥ नित निगोदमें काल अनंता, कोंने दुख दीने । एक स्वासमैं ठारे ठारे, जन्म मरण हम कीनजी फेर निकल व्यवहार राशिमें, क.क तालिवत आयो। एकेन्द्रिय तन धर थावरमैं, काल अनंत गमायोजी॥७॥ काललब्धितें त्रस भी होकर, विकलत्रय तन धारयो। वचन अगोचर दुःख सहे तहां, सुमरन हृदय विदारयोजी || पंचेन्द्री हो भये असैनी, मन विन ज्ञान न पायो। मन भी पाय दीन पशुगतिमें, अज आदिक उपजायोजी॥९॥ र जनोंने हे जिन मम तन, काट काट कर खायो। पकड पकड अथवा जीवितको, अग्नी मांहि जलायोजी ॥१०॥ ।४५

चौ०
पूजा
इत्यादिक अगणित पशुगतिदुख, कहत अन्त नहिं आई।
छेदन भेदन मारन ताडन, भार वहन दुख दाईजी ॥११॥
सिंह व्याघ्र आदिक हो मैने, दीन पशुनको सत.ये।
चीर फाड कर उनको ख ये, वहु विध पाप उपायेजी ॥१२॥
ताफल मर कर गयो नरकमें, अशुभ उदय अति आयो ।
याद करत मुझ हृदय फटत है दुःख अनन्ता पायोजी ॥१३॥
क्रूर नारकी देख नये मुझ, दौड दोड कर आये।
मार मार कर मेरे तनके, तिल तिल खंड करायेजी ॥१४॥
बार बार शूली पर दीनो, नाना दुःख दिखायो।
सर्प व्याघ्र आदिकवन मुझ तन, तोड २ कर खागोजी॥१५॥
इत्यादिक दुख सहे निरंतर, त्रास बहुत मैं पायो।
॥४६॥

गोर पूना 1४७ काल असंख्य नाथ नरकोंमें, क्षणिक चैन नहि आयोजी॥१६॥ अशुभ कर्मके मंद होनतें, मानुष भवमें आयो। नीच दरिद्री कुलमै उपज्यो, तहां भीआति दुख पायोजी ॥१७॥ देव योगते पाय उच्चकुल, मदमें आत्म भुलायो। इष्ट अनिष्ट वियोग योगमें, व्याकुल है दुख पायोजी ॥ १८॥ मंद कपाय आदि कारणते, सुरगतिमें उपजायो। नारि चियोग आदितें वहांभी, रोरोकर विलखायोजी ॥१९॥ परका विभव देख प्रभु मनमें, ईषा भाव वढायो। वाहन वन कर सेवा कीनी, सुरभी वन पछतायोजी॥२०॥ या प्रकार में काल अनन्ता, चतुर्गती भरमायो। दुःख निरंतर सहत सहत अव,शरण आपकी आयोजी॥२१॥ HATI Reme HAAR चौ० पूजा ।४८ वेग हरो यह भ्रमण नाथ अव, मैंने वहु दुख पायो। 'हीरा' की प्रभु अरज यही है, चरणन शीश नमायोजी ॥२२॥ दोहा हेम वर्ण अति सोहनो, निब्बे धनु की काय । श्रेष्ठ चिन्ह श्रीवत्स अर लक्ष पूर्व की आय ॥ भवाताप नश जात हैं, तुम पूजत जिनराज। यातें शीतल आपको, कहत सकल गणराज॥ ओही श्री शीतलनाथजिनेंद्राय पंचकल्याणमाप्तयेऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ श्रेयांसनाथजी। चाल मांडा श्रेयांसनाथ महाराज, नैया पार लगानेवाले (टेर) । पो. पूना तुम विमल भूपके प्यारे, माता विमलाके मन हारे। थे सिंहपुरी के राजा, कुल इक्ष्वाकु दिपानेवाले ॥१॥ मातान स्वप्न लखाये, वदि जेष्ठ पष्ठि उर आये। पुष्पोत्तर तुमने छोडा, जगके दुःख मिटाने वाले ॥२॥ वदि फागुण ग्यारस जनमे, भया हर्ष सबके मनमे। आये देव महोत्सव करने, तीनू ज्ञान घरानेवाले ॥३॥ शुभ फागुण वदि ग्यारसको, तप धरा कर्म नाशनको। अनुप्रेक्षा द्वादश भाई, तप दादश तपनेवाले ॥४॥ तिथि माघ अमावस आई, तुम केवल लक्ष्मी पाई। गुण छियालीस प्रगटाये, तत्व ज्ञान बताने वाले ॥५॥ तन अस्मी धनुष ऊंचाई, लक्षण गेंडेका सुखदाई। वय वरस लाख चोरासी, कांचन कान्ति युक्त तनवाले।

चौ० दिन सावन अन्तिम आया, तब मोक्ष महा फल पाया। भये निराकार अविकारी, सदगुण आठ धरानेवाले ॥७॥ मेरे अष्ट कर्म निरवारण, अब आप मिले शुभ कारण। स्वामी तुम हो अधम उधारण, मेरी आशपूरणेवाले॥८॥ मो मनमें हर्ष बढाया, ले अष्ट द्रव्य यहां आया। हीरा" नाच नाच गुण गाया, हो तुम मुक्ति पठानेवाले ॥१॥ ऊँह्रीं श्रीश्रेयांसनाथ जिनेन्द्राय पंचकल्याणप्राप्तये अर्घ निर्वामीति स्वाहा । अथ वासपूज्यजी चाल अडिल्ल । वासपूज्य जिनबालब्रह्मचारी भये, जिनके पंचकल्याण एकपुरही भये। महाशुक्रको छांड नगर चंपापुरी, नृपतिवर्य वसुपूज्य पराक्रम केशरी जयावती तिनप्रिया गर्भप्रभु अवतरे, बदिअबाढ़ तिथिषष्टि सकल जन सुख भरे ॥ फाल्गुण चौदस कृष्ण जन्म प्रभुने लिया । अरुण वरण छवि देख जगत मोहित भया ।

पूजा चौ० ।१६। इन्द्रादिक सुर आय मेरुपै लेगये, करि अभिषेक जिनेश सुखी मनमैं भये ॥२॥ पुनर वार आ नगर मांहि उत्सव किये, मात पिताको पूज थान अपने गये ॥ वाल चंद्रवत वढत युवा जब जिन भये, अति प्रसन्नमुख कमल देख मत्र सिरनये ॥३॥ तीन लोकको जीत जगत विजयी भया, ऐसा भी बलवान काम प्रभु वस किया। दुःखरूप यह जगत नाथने जानके संयम लीना जन्म तिथीवन आनके ॥४॥ द्वादश घिषि तप किया परीपह सन सहे।

चौ० पूजा 1201 Gs रागादिकको त्याग कर्म इस विधि दहे ।। चोथे गुणते सतम तक इम क्षय करी । नरक और तिर्यंच आयु द्वय दुख भरी ॥५॥ मिथ्यात्वादिक सप्त मोहकी जानये, देव आयुको मिला प्रकृति दश मानये। अष्टममैं चढ नवम थानमें थिर भये, कर्मप्रकृति इम नाश ध्यान निश्चल किये ॥६॥ नरकगती नरकानुपूर्वी मामये, तिर्यकगति तिर्यगानुपूर्वी जानये । विकलत्रय अरु स्त्यानगृद्धित्रिक क्षय किया, आतप अरु उद्योत एक इन्द्रिय गया ॥७॥ 1५० मा गौ० 1५१ साधारण थावर अरु सूक्षम क्षय करे, मध्यम आठ कपाय वेद द्वय भी हरे। छै हास्यादिक नाश वेद पुनाशिया, क्रोध मान माया मिल आगम भासिया॥८॥ छत्तीस प्रकृति यह नाश दशम गुणमें गये, लोभ प्रकृति वहां चूर नारित निर्मल किये। ग्यारम गुण उल्लंधि वारमे थिर भये, ज्ञानापरणी पांच विघ्न पंच क्षय किये ॥९॥ चक्षु अचक्षु अवधी केवल दर्शना, वरण च्यार अरु निद्रा प्रचला भी गिना। सोल प्रकृति यह नाश त्रयोदसमें गये, 1५१ चौ० पूजी 1५२॥ शुक्ल माघकी दोज केवली जिन भये ॥१०॥ कर विहार जगमांहि प्रगट शिव मग किया, आयु शेषके समय स्थान चौदस लिया। प्रकृति पिच्यासी तत्क्षण ही प्रभु क्षयकरी, भाद्र चतुर्दाश शुक्ल वरी शिव सुंदरी ॥१॥ प्रथम बालब्रह्मचारी तुमको जानके, मुक्ति गमन दिन तुमरा अति शुभ मानके । पोषध व्रत धर ब्रह्मचर्य सब पालते, दश लक्षणमैं ब्रह्मचर्य दिन मानते ॥१२॥ दोहा। लक्ष बहत्तर वर्षकी, भई आपकी आय । ११२॥

पूमा चौ० 2 महिष चिन्ह तुम चरणमें, सत्तर धनुकी काय ॥ १३ ॥ वंश जु वर इक्ष्वाकुमें, द्वादशवें तीथेंश। 'हीरा" याचत हे यही, काटो कर्म कलेश ॥१५॥ माँ ही श्रीपासपुगनिनेंद्राय पंचाल्यागप्राप्तयेय निपामीति स्वाहा । 11 T सय विपलनायकी। यार मरो। विमल जिनेश्वर नमत सुरेश्वर चरण कमल पूजूं तेरे । मन वच तनतें शरण तिहारी, हरो कर्म वसु विधि मेरे (टेर) सहमार स्वर्गतें चयकर, जेष्ठ कृष्ण दशमी दिनको। मात सुरम्या उरमें आये, हर्ष भया सवही जनको ॥१॥ माघ चोथ सित परवमें जनमे, जगमें ज्ञान प्रकाशनको। 1५३३ । MADAM

चौ०
पूजा
॥५४॥
नृपकृतधर्म भये अति हर्षित, पाकर त्रिभुवनपति सुतको॥२॥
लक्ष पंचदश वरस बालपन, वरस तीस लख राज किया।
जन्म तिथी दिन कारण पाकर, राज छांड वैराग लिया ॥३॥
वरस तीन छद्मस्थ रहे फिर, घाति चतुष्टय नष्ट किया।
माघ सुकल षष्ठी तिथिको तुम, केवल ज्ञान उपाय लिया॥४॥
वरस तीन कम लक्ष पंचदश कर विह र सब देशनमें ।
दे उपदेश भव्य बहु तारे, पहुंचाये श्रीशिवपुरमें ॥५॥
वदि अषाढ आठको प्रभुने, सर्व कर्म चकचूर किये।
जग असार यह त्याग दिया, अरु गिरि समेदतें मोक्ष गये ॥६॥
रागादिक सव दूर भये अरु, अष्ट कर्म मल दूर गये।
सकल आत्मगुण प्रगट भये जिन, विमलनाथ तुम सिद्ध भये ७
PAL
॥५४॥

1 पूजा चौ. 1५1 चिन्ह वराह रु हेमली, साठ धनुषकी काय । पुरी कंपिला ईश जिन, वर्ष साठ लख आय ॥८॥ भ्रमत भ्रमत अति दुखित हो, आयो तुम दरवार । "हीरा" याचत है यही, करिये भवदधि पार ॥ ९ ॥ माँ ही श्रीविपनायनिनेन्द्राय पंचकन गायमामय निर्वपापीति साहा। प्रय अनंतनायनी। चाल फाफोकोहोलो। अनंतनाथ जिनराई, पूजूं मन वच काई (टेर) पुष्पोत्तरसे प्रभु तुम आये, पुरी अजोध्या माही। सिंहसेन नृप तात तिहारे, सर्वयसा भइ माई ॥ मोलद स्वान लखाई ॥१॥ AS TIL चौ० पूजा कातिक वदि राके शुभ आई, तादिन गर्भ धराई। जेठवदी वारस शुभ दिनमें, जनम लिया जिनराई॥ सब जग वटो बध ई ॥२॥ देव देवियां सब मिल आकर, जन्म कल्याण कराई। वरस तीस लख आयू धारी, धनु पचासकी काई। सेही चिन्ह धराई ॥३॥ जन्म तिथीको ही प्रभु तुमने, वारह भावन भाई। जाय महावन धरी तपस्या, धन्य धन्य जिनराई॥ शीघ्र प्रभु धाति नशाई ॥४॥ चैत वदी मावसको प्रभु तुम, केवल ज्ञान लहाई। धर्म वताया दस लक्षण मय, सोलह कारण गाई॥ . enero नी 1५७॥ रत्नत्रय समझाई-॥५॥ गिर समेद पर ज्ञान तिथीको, मुक्ति आपने पाई। सुरनर मुनि जन सब मिल आये, चरणों शीश नेमाई ।। मंगल गान कराई-11६॥ अष्ट द्रव्य ले पूजन आया, धननन घंट वजाई। वीन वासरी ताल मजीरा, झननन झांझ बजाई। छिम छिम नृत्य कराई-॥७॥ भव भव भ्रमता “हीरा" आया, भक्ति भाव उर लाई। भववाघा मेरी आप नशावो, हेत्रिभुवन पति राई ।। नांच नांच गुनगाई-॥८॥ मीही श्री नानामिन नापामात निपामानि सामा।

।
अथ धर्मनाथजी।
पूजा
५
भगवान धर्म नाथके, चरणों में चितगया।
दुःख रोग शोक पाप, ताप दूर सब भया
सर्वार्थ-सिद्धि” चये, नृप भानुकी प्रिया।
शुभनाम सुव्रताके उर, अवतार आ लिया।
त्रयोदशी वैशाख कृष्ण, गर्भ दिन भया।
सुदि माघकी त्रयोदशी, जन्म जिन लिया।
बहुकाल राज्य सौख्य भोग, त्याग सव दिया।
तिथि जन्म की जिनेश, वनमें जाय तप लिया।
शुभ पौष शुक्ल पूर्णिमा, सव घाति नाशिया।
कल्याण ज्ञान नाथका, सुर गणनें आ किया।
जनजान्न्ना
१५८

नौ०
उपदेश समवसरणमें, जिननाथने दिया।
जिनधर्मका स्वरूप, इस प्रकार वरणया ।
सम्यक दर्शन ज्ञान अरु, निर्मल चारित जान ।
रत्नत्रय यह जीवके, निज स्वभाव पहिचान ॥१॥
उत्तम क्षमा सु सत्य अरु, मार्दवं आर्जव मान।
मंयम शोवर त्याग तप, आकिंचन गुणखान ॥२॥
बन्चर्य यह दश कहे, श्रेष्ठ धर्मके भेद।
इनको पालत जे मुनी, करत कर्म सब छेद ॥ ३॥
पंच महाव्रत गुप्ति त्रय, समिती पांच प्रकार ।
मुनिवर पर्म सु वरणया, तेरह विधि जगसार ॥४॥

१] चौ० पूजा अणु व्रत पंचरु चार है, शिक्षाव्रत सुखकार । त्रय गुण व्रत प्रभुने कहे, श्रावक व्रत गुणकार ॥५॥ इत्यादिक बहु भेद युत, सत्य.धर्म दरशाय । धर्मनाथ प्रभु तुम भये, यातें पूजू पाय ॥६॥ शेष कर्म सब नाशकर, भये मुक्तिके ईश। जेष्ठ शुक्लकी चोथ दिन, बंदत सकल मुनीश ॥७॥ जन्म थान रतनांग पुर, कनक वर्ण जिनराय । आयु वर्ष दश लाखकी, बजू चिन्ह सुखदाय ॥८॥ पंच और चालीस धनु, उन्नत प्रभुकी काय । दर्शक जन चितको हरे, हीरा' वंदत आय ॥९॥ ओं ह्रीं श्रीधर्मनायजिनेन्द्राय पंचकल्याणमाप्तयेऽधै निर्वामीति स्वाहा । 1६० नी. भय शांतिनाय स्वामी। ६१ हमा श्री शान्ति नाथ स्वामी, भव दाहको मिटायो । दे शान्ति पूर्ण दर्शन, शुभ शांति रस पिलावो ॥ टेर ॥ सर्वार्थ सिद्धि तजकर, पुर हस्तिनाग स्वामिन् । एराके गरभ आये, यदि भाद्र सप्तमी दिन ॥१॥ हुवा जन्म दिन मनोहर. शुभ जेष्ठ कृष्ण चौदस । ना विश्वसेन घरमें, छाया प्रमोदका रस ॥२॥ तीर्थश काम चक्री, पद तीन आर पाये। छे खंड साध पृथिवी, नृपगण सभी नमाये ॥३॥ गृह स्वामि हस्ति वनिता, सेनापती पुरोहित ।

- चौ० पूजा ६२ शुभ अश्व शिल्पि चेतन, करते जगतको मोहित ॥४॥ था चक्र शुभ सुदर्शन, अरु खड्गपति सुनंदन । शुभ छत्र दंड चामर, माण काकिणी रतन गिन ॥५॥ निर्जीव सप्त यह मिल, चोदह रतन भये जिन । अति पुन्यसे ही मिलते, मिलते न पुन्यके विन ॥६॥ निधि कोल पांड्डे पिंगल, नैसर्प संखं पद ।। मानव अनेकरत्नी, महाकाल नाम नवमा, ॥७॥ इक एक रत्न निधिके, इक इक हजार देवा। होके नियोग तत्पर, करते थे नित्य सेवा ॥८॥ बत्तीससँहस रक्षक, 'ठारह किरोड घोडे । बत्तीस सहस राजा, रहते थे हाथ जोडे ॥९॥ Ram ६२॥

८1०810000
पूगा
चौरासी कोड प्यादे, पौरासीलाख गज वर ।
चौरासी लाख स्थथे, गो तीनलाख सुन्दर ॥१०॥
छिन हजार राणी, सौंदर्य रूप खानी
इत्यादि तुम विभूती, कहनेको कोन ज्ञानी ॥११॥
पाकर भी सर्व संपद, तृष्णा यही तुमारी।
इच्छा करी हे गिनवर, पानेको मुक्ति नारी ॥ १२ ॥
संचि छोड चंचल, तिथि जन्मको जिनेश्वर।
तप जाय वनमें लीना, हर्षित भये सभी नर ॥१३॥
सब घातिकर्म ईंधन, ध्यानाग्निसे जलाकर ।
सित पोप दशमि तिथिको, केवल दिया चराचार ॥ १५ ॥

चौ० पूजा) ६४॥ कीनी कुवेरं आकर, रचना समवसरण की। इन्द्रादि देव मिलकर, अ ये शरण चरणकी ॥१५॥ सौधर्म इन्द्र आ फिर, तुमको प्रणाम करके। की यो स्तुती मनोहर, शिर को नमाय करके ॥ १६ ॥ शिव मार्गविधि विधाता, ब्रह्मा जिनेश तुम हो । सब जगको बोध दाता, बुध हे जिनेश तुम हो ॥ १७॥ आत्मीक सुख प्रकर्ता, शंकर जिनश तुम हो। सब लोकमैं प्रगट जिन, पुरुषोंमें श्रेष्ठ तुम हो॥ १८ ॥ तुम नाम स्मर्ण तैं जिन, रोगिनके रोग जावें। सादि विष धरोंके, विष शीघ्र ही नशावै ॥ १९ ॥ तुम नाम मंत्र जपते, ग्रह दुष्ट- सब पलाबैं। ६॥

पूजा
चौ०
६५
MOCOMBORNHINom
दुर्भिक्ष चोर मारी, प्रेतादि ना सतावें ॥२०॥
सिंहादि क्रूरता तज, अति मित्रता दिखावें ।
निज दर्प छोड अरिगण, चरणोंमें शीश नावें ॥ २१ ॥
सेवा तुमारि जो भी, करते हैं हे जिनोतम ।
पाते हैं सर्व सम्पद, हे नाथ ! वे नरोतम ॥ २२॥
करते हैं ध्यान जो जन, मनमें तुम्हारा निश दिन।
संसार ताप उनका, होता है दूर हे जिन ॥ २३ ॥
सव कर्म क्लेश तजकर, पाते हैं शान्ति वे नर ।
यातें हे नाथ तुमको कहते, हैं शान्ति मुनिवर ।। २४ ॥
इत्यादि करके संस्तव, आनन्दमग्न होकर।
वे इन्द्रराज बैठे, अपनी सभामैं जाकर ॥२५॥

चौ० पूजा । ६ भई द्वादशांगमय जिन, दिव्यध्वनी तुम्हारी। सबही का भ्रम मिटाया, गणधरने कंठ धारी ॥१६॥ करके विहार सवही, देशोंमें तुम हे स्वामी। धर्मोपदेश देकर, किये भव्य मोक्षगामी ॥ २७॥ छवि हेम चिन्ह मृगका, लख वर्ष आयु पाई। चालीस चाप काया, जिन आपकी सुहाई ॥२८॥ गिरिवर समेदतें तुम शुभ जन्मकी तिथी दिन । पाई वो नित्य लक्ष्मी जा है अनन्त स्वामिन ।। जल आदि द्रव्य लेकर पूजूं मैं हे जिनेश्वर । कर शांति शांति स्वामिन 'हीरा' के नाथ ईश्वर ॥ भोंहीं श्रीशांतिजिनेन्द्राय पंचकल्याणमाप्तयेऽर्थे निर्षपामीति स्वाहा । REATMENT 2012

भय कुंपुगयनी।
गो
वंदू भावमे श्री कुंथुनाथ जिनराय (टेर)
सरवारथसिधि त्याग प्रभू तुम हास्तिनागपुर आय।
सावन वदि दशमी शुभ दिनको गर्भ वसे जिनराय ॥१॥
सूर्यराज नृप तात तिहारे श्रीमति भई तुम माय।
सुदि राकें वैसाख जन्म ले सुरनर मन हरपाय ॥२॥
कामदेव चक्री तीर्थकर तीनों पद तुम पाय।
भूमि साथ छह खंड किये वश बडे बडे नृपराय॥३॥
भोग भोग बहुकाल निरंतर इन्द्रिय मन सुखदाय ।
शिवराके वैसाख दिवसको भये नाथ मुनिराय ॥४॥

६८ चैत शुक्ल शुभ तीज दिवसको घाती सर्व नशाय । केवलज्ञानयुक्त हो जगको मोक्ष मार्ग वतलाय ॥५॥ जन्म तिथीको ही हे प्रभु तुम कर्म अघाति क्षिपाय । खड्गासनते गिरि.सम्मेदपर भये मुक्तिके राय ॥६॥ आयु पिचाणवै लाख व सकी पांच तीस धनु काय । चिन्ह छागका भया मनोहर हेम कान्ति मन भाय ॥ ॥ कुंथ आदि सवही जीवनकी रक्षा विधि बतलाय । सब जगमैं विख्यात भये तुम कुंथनाथ सुखदाय ॥ ८॥ नेत्र सफल भये हे जिन मेरे तुम दर्शनको पाय । चरण नमनसे मस्तक मेरा हुआ सफल जिनराय ॥९॥ करण सफल भये तुम गुण सुनकर जिव्हा तुम गुन गाय । AIMAGES का चौ० SCALE करयुग सफल भये हे जिनवर तुमपद अर्घ चढाय ॥१०॥ सवही अंग पवित्र भया प्रभु तुम सेवा मैं आय। निर्मल चित्त भया अ. मेरा तीनों शल्य नशाय ॥११॥ 'हीरा तुमसे अरज करत है वार वार शिर नाय । जन्म मरणका दुःख मिटावो करुणा कर जिनराय ॥१२॥ ओं श्रीधनायजिनेन्द्राय पंचकल्याणमाप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ अरहनाथजी। वाल उमाका हो अरहनाथ प्रभूजी मैं तुम, पूजन आया। तुम भक्ति वसी उर मांहि जिनेश्वर, मैं तुम पूजन आया। अपराजितको तजकर प्रभु तुम, हथनापुर अपनाया। । ३ पूजा' चौ० 1७०॥ मित्रादेवीके उर आये, तातं सुदरशन पाया ॥१॥ गर्भ दिवस फागुण सुदि तृतिया; राज वंश उमगाया। जनम लिया मगशिर सुद चोदस, तीन लोक हरपाया.॥२॥ देवादिकने उत्सव कीना, सर्व जगत सुख पाया। उमंगवढी आनंद की हरिके, तांडव नृत्य रचाया ॥३॥ तायेइ ताथई नृत्य कराया, करसे चमर दुराया। छम छम छम छम धूपरू वाजे, धननन घंट बजाया ॥४॥ हम हम हम हम मृदंग बजाई. झननन झांझ बजाया। वीन वासुरी आदि वजाकर, ताल सहित सुर गाया ॥५॥ मधुर मधुर वाणी सुन सवही, दर्शक गण हरपाया। इलादिक उत्सव इन्द्रादिक, करके अति सुख पाया ॥६॥ aman 1७० चौ. 1७१ अपने अपने अस्थान गये सव, जगमैं आनंद छाया। युव होय छह खंड राजपा, सव जन सौख्य बढाया ॥७॥ मग शिर सुदि एकम तप लीना, आतम ध्यान लगाया। सोले वर्ष छद्मस्थ रहे फिर, घाति चतुष्क.नसाया ॥८॥ कातिक वदि वारस दिन तुमने, पद अरहंत लहाया। दे उपदेश भव्य बहु तारे, मोक्षमार्ग बतलाया ॥९॥ सहसचौरासी वरस आयु धरती से धनुष तन पाया। मीन चिन्ह शुभ भया तिहारे कनक वर्ण दरसाया ॥१०॥ चैत वदी मावस शुभ तिथिमैं मुक्ति थान तुम पाया। पंचमगतिको पाय प्रभू तुप जोति स्वरूप धराया ॥११॥ अनादि कालसे चहुंगत मांही सुख स्वपने नहिं पाया । ७ FIL चौ० पूजा 1७२) पाप कर्म बह मैंने कीने जैनवचन नहिं भाया॥१२॥ अष्ट द्रव्य प्राशुक संग लाया मनमैं हर्ष बढाया। नाच गाय कर पूज रचाई, पुण्य भंडार भराया ॥१३॥ पुण्य उदय मम आज भयो प्रभु चरणन चित्त लगाया। अष्ट कर्मका संग छुडावो 'हीरा' शीश नवाया ॥१४॥ दोहा। हे कुरुवंशी चन्द्रमा तुम गुण अगम अपार। सुरगुरु वरणन कर थके पावै को प्रभु पार ॥ ओं ह्रीं श्रीअरहनाथ जिनेन्द्राय पंचकल्याणमाप्तयेऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ मल्लिनाथजी। चाल जंगला घरवा ७२ जिनेश्वर मल्लि मैं तेरी शरण चरणोंमें आया हूं।

ना ॥१ ॥ चौ० 1७३' N पूरिये आश मो मनकी, विपद से मैं दुखाया हूं॥ टेर। छोडकर थान अपराजित वास मिथिलापुर. कीना। कुंभराजा पिता तुमरे, भये अति धीर बलधारी। प्रजापति नाथ तुम माता, सकल गुणयुक्त अविकारी॥३॥ शिता एकादशी मगशिर, लिया अवतार हे जिनवर । शची इन्द्रादि आये मिल, भया आनंद सब घर घर ॥३॥ रहे तुम बालब्रह्मचारी, वाढ नव शील की ठानी। चमक विजली की जो तुमने, सकल संपद अथिर जानी ॥४॥ सुकल मगशिर की तेरसको, धरा मुनि वेष जा वनमैं रहे दिन तीन थिर आसन, भये लवलीन आतममैं ॥५॥ ||७३।

पूजा चौ० अरज हीरा' की सुन स्वामी निकालो शीघ्र भववनसे ॥११॥ ओं ही भोमल्लिनायजिनेन्द्राय पंचकल्याणपाप्तये अर्धे निर्वपामीति स्वाहा ॥ अथ मुनिसुव्रतनाथजी। ७|| बाल मांड PARA मुनि सुव्रत स्वामी मैं तो थान पूजूं मन वच काय ॥ टेर।। प्राणत दिवको छांडके जी राजग्रही मैं आय । सांवण बदिकी दोज तिथिको, गर्भ वसे जिनराय ॥१॥ नृप सुमित्र पितु आपके जी पदमावति भइ माय । बदि दशमी वैसाखको जी लीनूं जन्म धराय ॥२॥ राजसंपदा त्यागके प्रभु तपइच्छा मनलाय। सुदि दसमी वैसाखको जी बैठे ध्यान लगाय॥३॥ ७५॥

गो० अरज हीरा' की सुन स्वामी निकालो शीघ्र भववनसे ॥११॥ पो भोमस्निायमिनेन्द्राय पंचासागपातगे म निपामीति स्वाहा ॥ प्रय मुनिगुनानापनी। बाप्त मां मुनि सुव्रत स्वामी में तो थाने पूनूं मन वत्र काय ।। टेर ।। प्राणत दिवको छांडके जी राजग्रही में आय। सांवण वदिकी दोज तिथिको गर्भ वमे जिनराय॥१॥ नृप मुमित्र पितु आपके जी पदमावति भह माय । नदि दशमी वैमामको जी ली जन्म घराय ॥२॥ राजमंगदा त्यागके पभु नपइच्छा मनलाय । मुदि दसमी मासको जी बेठे ध्यान लगाय॥३॥ hot चौ० पूजा १७६। द्वादश विधि तपधारके जी दीने कर्म क्षिणाय । वदि नवमी वैसाखको जी लीनो केवल पाय ॥ ४ ॥ द्वादशांग वाणी खिरीजी सकल जीव सुखदाय। दशमी फागुण कृष्णको प्रभु लीनी मुक्ति बराय ॥५॥ इन्द्र नरेन्द्र फणेन्द्र मिल सब कीनो उत्सव आय । आनंद मंगल गायकेजी बहु बिधि साज सजाय ॥६॥ कच्छप चिन्ह रु श्याम छबि जिन, बीस धनुषकी कार्य। बरस सहस प्रभु तीमकीजी भई आयु सुखदाय ॥७॥ "हीरा" चहुंगत कीचमैंजी लिपटा कर्म बसाय । अब उज्वल प्रभु कीजियेजी करुणा नीर बहाय ॥ ८॥ तीर्थकरहो वीसवेंजी मुनिसुत्रत जिनराय। AL ७३ चौ० ७७. आशा बिसवा बीस है जी नैया पार लगाय॥९॥ भों ही श्रीमुनिसुव्रतनायजिनेन्द्राय पंचकर गणमाप्तयेय निर्वपापीति स्वाहा । अय नेमिनाथजी। चाल चौपाई। श्रीनमिनाथ चरण युग ध्याऊं अष्ट द्रव्य ले अर्घ चढाऊं। आश्विन दोज कृष्ण हे स्वामी तज अपराजित अन्तर्यामी । वा माताके उरआये मिथिलापुरमें आनंद छाये। बदि असाढ दसमी जगत्राता जन्मलिया सबको सुखदाता ॥ युवा होय तुम हे जिनराई भोगी राज्य विभव सुखदाई। कारण पा आतमरस भीना, जन्मतिथीको तुम तप लीना। दुर्द्धर तप नव वर्स करीना, शुक्ल ध्यानकर घाति हरीना ॥ १७७

चौर
मगसर सुद ग्यारस शुभ मानी आप भये प्रभु केवलज्ञानी ।
धनपति सुरपति आज्ञा पाई समोसरण विधि आय रचाई ॥
मानस्थंभ रु सरवर खाई पुष्प वाटिका कोट बनाई।
नाटशाल अरु उपबन सोहै वेदी ध्वजा शाल मन मोहै।
कल्पद्रुम बनस्तूप सुहाये महल पंक्ति अरु कोट बनाये ।
ताविच द्वादश सभा रचाई गंध कुटी राजत जिनराई ॥
वृक्ष अशोक रु रत्नसिंहासन भामंडल भव सप्त प्रकाशन ।
चौसैंठ चमर छत्रत्रय सोहै दिव्यध्वनि सब जनमन मोहे ॥
पुष्प वृष्टि अरु दुंदभि वाजै यह अठ प्रातिहार्य तुम राजै।
गणधर सँतरह जानिये बादी एकहजार ।

पूजा चौ० 1७९/ C वाल। पैदरासो भये केवली प्रतिगण बीसहजार ॥ पैंतालीसो आयका वैक्रिये डेढहजार । एकलाख श्रावक भये हे नमिजिन तुम लार ॥ चौईसो इक्यानवै बरस नाथ सुखरास । कर विहार सब देशमैं किया धर्म परकास ॥ चौदस वदि वैसाख सु आई, गिरि समेद तें मुक्ती पाई। सब सुरनर मिल भंगल गाया, मोक्ष कल्याण जिनेस कराया ।। वीस हजार वरस जिनराई, आयु भई छवि हेम सुहाई पंदरा धनु तन उन्नत से है, लक्षण रक्त कमल मनमोहै॥१३॥ चहुंगत “हीरा" वहु फिरो, कहूं न पायो चैन । ५६) चौ० SOOPME पूजा 1201 अष्ट कर्म के जालसे, पाया दुख दिन रैन ॥१२॥ आया शरणै आपके, और न पाई ठौर। अबतो सुखमय कीजिये, अरज करूं कर जोर ॥१५॥ ओं ह्रीं नमिनाथर्जिनद्राय पंचकल्याणमाप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ नेमनाथनी। चाला हो नेमजिन तुम वाल ब्रह्मचारी, पूजू अष्टद्रव्य भरि थारी। अपराजित को छांड प्रभु तुम, सौरीपुर सुखकरी ॥१॥ सेवादेवी के उर आये, कातिक छिठ गाजियारी। जनमालिया सावन सुदि छिठको, हे जगके हितकारी ॥२॥ समुदविजय के भये सुनंदन, श्याम वरण तन धारी। ८०

पूमा
नो
वाल चंद्रवत युवा भये वढ, युवती जनमनहारी ॥३॥
रूपवती कन्या राजुलसे, व्याह करन चितधारी।
सज वरात जूनागढ़ पहुंचे, उमंगभई सब लारी ॥४॥
पुर समीप दुखिया पशु गण लख, भया दुःख चितभारी।
व्याह काज इनका वध होगा, सुन यों वित्त विचारी॥५॥
धिक इन्द्रिय सुख जिनके कारण, करत अनर्थ अनारी।
जिहा इन्द्रिग लोलुपतातें, बस पर धरत कढारी॥३॥
काट काट उनको सावत हैं, बुद्धि गई मब मारी ॥७॥
यो विनार करते करते ही, राग भाव मय दर किया।
सर्व परिग्रह साग नाथने, अनुमेशामें वित्त दिया ॥८॥

चौ. पूजा Me अथिर सर्व यह वस्तु जातहै, विजलीवत संपद सारी। नहीं भरोसा है इस तनका, जगमैं है किसकी नारी ॥९॥ नहीं शरण इस जगमैं कोई, मरना सवको पडताहै। एक क्षणिक भी मृत्यु राजतै, कौन बचा यहां सकताहै ॥१०॥ गती च्यार मैं रुलता रुलता, जीव जगत मैं फिरता है। कर्मोंके वस दुखी भया अति, पलभी दम नहिं धरता है ॥११॥ इस संसार महावनमैं यह, जीव अकेला भ्रमता है। साथी सगा न कोई इसका, भिन्न सभीसे रहता है ॥१२॥ हाड मांससे बना अशुचि आति, मल मूत्रादिक का घर है। प्रेम करै ऐसे अंग मांही, ऐसा कौन चतुर नर है ॥१३॥ छिद्र युक्त नावमैं जैसे, पानी क्षण क्षण भरता है। ALPG ८२ गौ० कश्रिय आतम भी तैसे, योग द्वारसे करता है।॥१४॥ व्रत समिती आदिकतें जब यह, आश्रय सब रुक जाता है। संवर युक्त आतमा निर्मल, नारित में तब रमता हे ॥१५॥ ध्यान अग्नितें करत निर्जरा, पूर्व कर्म सब अडते हैं। तब कांके नाश होतही, लोक शिम्बर पर चढते हैं ॥१६॥ क्षमा आदि हैं धर्म जीवके, योगी इनमें रमते हैं। यही है शिव मारग जगमें. भव्य इन्हीमे तिरते हैं ||१७|| अधोमध्य अरु उर्च भेदते. विविध लोक पड द्रव्य भरा। याने भिन्न अलोक सभी है जानत है सर्वज्ञ नरा ॥१८॥ इस मंमार चतुरगति माही. नरभव अतिही दुर्लभ है । नामें भी उत्तम कुल दुर्लभ, रत्नत्रर अति दुर्लभ है ।।१९।।

चौ० पूजा यातें अब उत्तम व्रत धरकर, कर्म नाश करना चाहिये। पलभर भी दुर्लभ नरभव यह, निष्फल नहिं खोना चहिय॥२०॥ इस प्रकार चिंतन करतेही, लौकांतिक रिषि भी आये। जय नंदादिक शब्द उचरते, प्रभु चरणों में शिरनाये ॥२१॥ ८४ दोहा। AGROD ऋषि गणने यो स्तुति करी, धन्य धन्य जिनराज। यह विचार अच्छा किया, निज अरु पर हितकाज ॥२२॥ स्वयं बुद्ध प्रभु आप हो, कौन करै उपदेश । हम नियोगवश दर्शको, आये हे लोकेश ॥२३॥ इत्यादिक स्तुति कर गये, लोकांतिक निज थान। सावन सुदि छठिको हुवा, प्रभुका तप कल्यान ॥२४॥ ८४ चौ0 प्रभु तो दीक्षा लेगये, यह सुन राजुल नार। अति दुःसित हो चित्तमें, फिर यों किया विचार ॥२५॥ पति विन जीवन हे वृया, पती गये गिरनार । संयम धरना उचित है, अब उनहीं के लार ॥१६॥ यह विचार अति शीघ्रही, प्रभुके सन्मुख जाय । भई आर्यका वो सती, धन्य धन्य जगमाय ॥२७॥ दिन छणेन छद्मस्य रह, पायो केवलज्ञान। आधिन सुदि रा दिवस, जग प्रगटावन भान ॥२०॥ कर विहार मर देशमें, धर्मामृत बरसाय। साने गुरु अपाङको. भये मुक्त जिनराज ॥१९॥ काय धनुप दमझी भई, सहर वर्ष की आय । ।

न पूजा मुक्तिस्थान गिरनार अरु, संख चिन्ह सुखदाय ॥३०॥ हे भवि कुमुद निशेश जिन, तुम गुण अगम अपार । "हीरा" याचत है यही, हूं भवसागर पार ॥३१॥ ओं ह्रीं श्रीनेमिनाथजिनेंद्राय पंचकल्याणमाप्तये अर्घ निर्वपामीति स्वाहा । अथ पार्श्वनाथजी। चाल छंद कवित्त । हो जी पारसनाथ प्रभु मैं, तुमको पूजन आयाजी। भक्ति भावके प्रगट करनको, आठौं अंगनमायाजी ॥१॥ तज प्राणत दिव नगर बनारस, वामा उरमैं आयेजी। आसित दोज वैशाख मासमैं, अश्वसेन हरषायेजी ॥२॥ जन्म चैत्र सुदि ग्यारस के दिन, दश अतिशययुत पायाजी। 40 चौ० पूजा R तिनका वर्णन गणधरादिने, आगममैं यों गायाजी ॥३॥ अतिशय रूप अतुल्य वल, नाहिं पसेवै निहारोंजी। तन सुगंध प्रिय हित वचन, रुधिर स्वेत आकाराजी॥४॥ लक्षण सहस रु आठ तन, समचतुष्क संठानाजी। वज्र वृषभ नाराच युत, जन्म आपका मानाजी ॥५॥ बाल ब्रह्मचारी रह प्रभुने, राज्य भोग सर्व त्यागेजी। वदि ग्यारस वैसाख मासमैं, मुनि बन शिवमग लागेजी॥६॥ चाल सोरठा। एक दिवस जिनदेव, बैठे निश्चल ध्यानमैं। पूरव वैरी एक, कमठ जीव आया तहां ॥७॥ लाल नेत्र अतिक्रूर, क्रोध अग्नि तैं जलत अति । ८७ चौ. पूजा किये उपद्रव भूरि, तिनका कुछ वर्णन करूं ॥८॥ वर्षा मूसल धार, वरसाई उस दुष्टने । चली प्रचंड वयार, परवत भी तृणवत उडे ॥९॥ वर्षाये पाषाण भीम अग्नि वर्षा करी। हाहाकार महान, करत भूत वेताल अति ॥१०॥ इत्यादिक विकराल, होत उपद्रव प्रभु खडे । ज्यों मेरु गुणमाल, भई खवर धरणेन्द्रको ॥११॥ मस्तक लिये चढाय, पद्मावतिने आनकर । नागराजने आय, फड मंडप प्रभु पै किया॥१२॥ दूर भये उपसर्ग, भगा असुर भयभीत हो । घाति कर्म संसर्ग, भया दूर प्रभु का तदा ॥१३॥ 45 दोहा। पूजा चौ० ८९ चैत कृष्ण की चोथ तिथि, प्रगटा केवल ज्ञान। समवशरण रचना करी, धनपतिने तहां आन ॥१४॥ योजन शत इकमैं सुभिख, कवेलाहार न होय । वढे नही नखे केश अरु, उपसर्गादि न कोय ॥१५॥ दीखत मुख चहुँ दिशि प्रभु, गगन गमन सुखकार। सब विद्या इश्वरपनो, अर्दया नाहि लगार॥१६॥ अनिमिषे हग प्रभु की भई, तन छाया नहिं लार। अतिशय केवल ज्ञानके, प्रगट भये दश सार ॥१७॥ देव चरित चौदह भये, अर्धमागधी भास। आपसमें अति मित्रता, विमल दिशा आकास ॥१८॥ ८९ चौ० फलै फूल फल सर्व ऋतु, भूमी काच समान । प्रभु चरणों तल कमलढे, नभते जय जय गान ॥१९॥ मंद सुगंध समीर अरु, गंधादिककी वृष्टि। निष्कंटक भूमी भई, हर्षित सवही सृष्टि ॥२०॥ धर्म चक्र आगे रहे, मंगल आठ प्रकार। अतिशयं यों श्री पावके, प्रगट भये सुखकार ॥२१॥ तरु अशोक जग शोकहर, रतन सिंहासन जान । तीन क्षत्र प्रभु शिर लसैं, भामंडल सुखखान ॥२२॥ पुष्प वृष्टि होवै सदा, दिव्यध्वनि जगसार । ढारै चौंसठ चमर जख, वाजै दुंदुभि लार ॥२३॥ केवल ज्ञान अनन्त सुख, केवल दर्शन जान । १० पूजा ६१ बल अनंत यह नाथके, धाति नाशतें मान ॥२४॥ केवल उपज्यो जानकर, सव देवन संग आय । इन्द्रराज अति भक्ति युत, प्रभुको शीश नमाय ॥२५॥ प्रभु सन्मुख अति मग्न हो, गद्य पद्य मय सार। रचना कर यो स्तुति करी, भवि जीवन सुखकार ॥२६॥ चाल तोटक छंद। तुम मुक्ति मार्ग प्रगटन दिनेश, भवताप हरण करता निशेश। जनमादि रोगहर वैद्यराज, सेवत तुम पद सब देवराज ॥२७॥ तुम वचनामृत कर पान ईस, भये सर्प युगल मरकर निगीश । तुम नाम मंत्र जपते जिनेश, क्षय होय रोग शोकादि क्लेश ॥२८॥ नहिं सिंह व्याघ्र नहिंसर्प खाय, डाकिनिशाकिनियोगिनि पलाय चौ० पूजा ९२ ग्रह अशुभ सर्व शुभ फल करत, सब पाप कर्म नाशत तुरंत ॥ तुम ज्ञान महोदधि है अमेय, तामैं विंदूवत जग प्रमेय । तुम गुण अनन्त हैं हे जगीश, कहनेको समरथ नहिं गणीश ॥ दोहा। इत्यादिक संस्तव किये, इन्द्रराज हरषाय । फिर बैठे निजस्थानमैं, सुमरत गुण जिनराय ॥३१॥ दिव्य ध्वनि जिनदेवकी, सर्व अर्थ मय सार। सुर नर मुनिजन हित करी, भई सर्व सुखकार ॥३२॥ कर विहार बहु काल लों, धर्मामृत वर्षाय । सावन सुदि आ दिवस मुक्ति वरी जिनराय ॥३३॥ ता दिन” सम्मेद का, भया पार्श्वगिरि नाम । १२ चौ० जा १३ मन वच तनसे मैं करूं, वारम्वार प्रणाम ॥४॥ गिरि समेद की बंदना, करण जात जे लोक। अति उन्नत बहु दूरतें, देख करत हैं ढोक ॥३५॥ हरित वर्ण नव हस्तकी, भई नाथकी काय । चिन्ह भया शुभ सर्पका, वरस एकशत आय ॥३६॥ तुम सेवा” हे प्रभो, पदमावति धरणेन्द्र। लोकविर्षे नामी भये, पूजन हार जिनेंद्र ॥३७॥ तुम चरणोंकी सेवते, आधि व्याधि नश जात । "हीरा" याचत है यही, मुक्ति पठावो तात ॥३८॥ भों ही श्रीपार्श्वनायजिनेंद्राय पंचकल्याणप्राप्तयेय निर्वपामीति स्वाहा । 2Cर चौ० पूजा अथ श्रीवर्द्धपान । चाल छंद पद्धसी। जय वर्द्धमान गुण गण निधान, सवै मुनिजन तुम चर्ण आन। अपराजित तजि कुंडल पुरेश, नृपवर सिद्धारथ घर जिनश ॥ ब्रह्मादेवी उर वसे आय, सुदि साढ षष्ठि दिन जगतराय । जनमे सुदि तेरस-चैत्रमास, वंदित ही होवै पाप नाश ॥२॥ जब अष्ट वरस के भये नाथ, इक दिन बहु राजकुमार साथ । वन क्रीडा करते वीर धीर, देखे संगम सुरने गंभीर ॥३॥ प्रभु धैर्य परीक्षा करण काज, इक किया उपद्रव कपट साज । भया कृष्ण सर्प अतिही विशाल, ताके फण सहश्र भये कराल॥ क्षण क्षण विष उगलत नेत्र लाल, फूत्कार करतजों निकट काल। देखत ताको सब नृप कुमार, डर डर कर भागे धैर्य छार ॥५॥ IMPOR १४ सोरठा। पूजा चौक देख भयंकर व्याल, हर्षित प्रभु तापर चढे । खेलन लगे कृपाल, ज्यों फूलन की मालमें ॥६॥ II दोहा। देख प्रभू की धीरता, निर्भय हृदय विशाल । सुरने माया दूर कर, धरयो चरणमैं भाल ॥७॥ बाल अवस्था देख तुम, अतुल शक्ति नहिं जान। कीनो जो अपराध मैं, क्षमिये दयानिधान ॥८॥ वार वार यों अरज कर, मनमैं संगम सुर निज थानमैं गया पूज जिनराय ॥९॥ तीस वरस वय जब भई, प्रभु मन भया विराग। बहु पछताय। ९५ । चौ० पूजा मगशिर सुदि दशमी दिवस, दिया परिग्रह त्याग ॥१०॥ इक दिन बैठे ध्यानमैं दुष्ट रुद्रने आय। किये उपद्रव अति प्रबल, सुनत हृदय फट जाय ॥११॥ प्रभू मेरुवत थिर रहे, युक्ति चली नहिं एक । तब लजित हो रुद्रने, छोड दई सब टेक ॥१२॥ नम्र होय आति स्तुति करी, पूजे प्रभुके पाय। फिर अपने थानक गया, वार वार शिर नाय ॥१३॥ IBPS चाल छंद तोटका एक दिवस प्रभु करत विहार, देख चंदना हर्ष अपार । किस विधि प्रभुको दूं अहार, यों ताके मन भया विचार॥१४॥ बंधन टूटगये तत्काल, भाजन भया स्वर्ण का थाल ।

चौ० ६७ 2PGE: बनगये कोदू तंदुलभात, वो यों कहत भई हे तात ॥१५॥ तिष्ठ तिष्ठ है शुद्ध अहार, लीजे होवे कृपा अपार। सती करनतें लियो अहार, सुरगण कीनों जय जय कार ॥१६॥ दोहा-दुख दूर सवही भया, कुटुंब मिला सव आय । धन्य धन्य सति चंदना भये वीर प्रभु साय ॥ १७॥ प्रभुने द्वादश वर्षलों किई तपस्या सार। दशमी सुदि वैसाखकी भव्य जीव सुखकार ॥१८॥ धाति नाश प्रभुके भये उपज्यो केवल ज्ञान। समवशरण रचना करी धनपतिने तहां आन ॥१९॥ सोरठा--सर्व जीव तहां आय बैठे निज निज स्थानमैं । दिव्य ध्यान जिनराय भई जगत हित करनको ॥२०॥ ९७ चौ० पूजा ९८ जीवाजीव पदार्थ इनके भेद प्रभेद सव । षड द्रव्यादिक सार्थ नय प्रमाण सव कथन कर ॥२१॥ रत्नत्रय समझाय मुनि श्रावक के धर्म का। वरणन कर जिनराय मुक्ति मार्ग प्रगटन किया ॥२२॥ दोहा-विहरण कर सव देशमैं द्वादशांग दरसाय । धर्म तीर्थ प्रचलित किया हे त्रिभुवनके राय ॥२३॥ कार्तिक मावस दिवसको प्रातः काल मझार। पावापुरतें जिन भये मुक्तिरमा भरतार ॥२४॥ तादिनतें इस लोकमैं दीपावली विधान । कार्तिक मावस दिन करत सर्व जीव शुभ मान ॥२५॥ तुम मंदिर आ प्रातही हे त्रिभुवन के राय। Deater पूज १६ प्रगट करत निज मोद सव मोदक चरण चढाय ।। २६॥ सप्त हस्त तन कनक सम वरस बहतर आय। हरिवंशी हरिचिन्ह जिन वंदू शीश नमाय ॥२७॥ तुम तीरथ अवलों करत सकल जगत उपकार। 'हीरा' आया तुम शरण अब तो वेग उवार ॥२८॥ ओं ही श्रीवर्धमानजिनेन्द्राय पंचकल्याणमातयेऽर्घ निर्वपामीति स्वाहा । महा अर्थ। अडिल्ल-वृषभ आदि वीरांत चतुर्विंशति जिन देवा। इन्द्र चन्द्र नागेन्द्र करें जिनकी नित सेवा ॥२॥ चक्री आदिक नमैं चरण तुम हे जगराई। अष्ट द्रव्य भर थाल पूजहूं मन वच काई ॥२॥ ओं ही श्रीकृषभादिवीरांतचतुर्विंशतितीर्थकरेभ्योऽर्थे महाथै निर्वपामीति स्वाहा । १६ चौ० पूजा benener १०० अथ आशीर्वाद। जिन पूजारौं पुन्य बढे सब पाप पलाई। रिद्धि सिद्धि सव होय दुःख दारिद्र नशाई ॥१॥ परभवमैं सुर होय इन्द्र चक्री पद पाई। केवल ज्ञान उपाय लहै मुस्ती सुखदाई ॥२॥ दोहा-यातें जिन पूजा सदा, करिये भक्ति वढाय । अष्ट द्रव्य भरि थालमैं प्रभु चरणों चित लाय ॥ अथ शांतिपाठ । सोरठा-चौवीसों जिनराज, शांति करो सब जगत में। नृपति, प्रजा, मुनिराज, आदि सभी का दुख हरो॥ अडिल्ल-शांति करो जगमाहि विघ्न सवही हरो। दुःख सभी के हरो सर्व जन सुख करो॥ 20339020 १००

चौ०
पूजा
१०१
मंगल जगमें करो पाप सबके हरो।
पुण्य वृद्धिगत करो रोग सब क्षय करो।
चलंततिलका उंद।
देवेंद्र देव जिनको नित पूजते हैं, जो जीवका जगत बंधन तोडते हैं।
वेशांतिनाथ जिन शांति करोहमशा,मेरेहरोसकल कर्म महा कलेशा॥
स्रग्धरा छंद।
धर्मात्मा भूप होवे, अरु सकल प्रजामें सदा क्षेम होवें।
वर्षा हो खूब भूपै समय समयपै, व्याधिका नाश होवे ।।
दुर्भिक्ष प्लेग चौरी क्षण भर नन्हे पापका नाश होवे ।
श्रीमद्वीर प्रभूको सुवृषे जगतमें सर्वको सौख्य देवे ।।
१०१
१ श्री महावीरस्वामीका २ धर्म।

चौ०
GG
पूजा
१०२/
शिखरिणी छ।
अहो शांति स्वामिन् सब सुख करो जीव गणके।
कृपातें 'हीरा' के सब दुख हरो भूभ्रमण के॥
महा दुःखी मैं हूं भटक नित संसार वन में।
पड़ा आके मैं हूं प्रभु अब तुमारे चरण में ।
इति शांतिपाठः।
इष्ट मार्थना।
अडिल्ल-करूं शास्त्र अभ्यास और जिनपति नमूं ।
श्रेष्ठ जनोंकी करूं संगती मन दमूं ॥
विज्ञजनों के करूं गुणों की नित कथा।
करूं किसी के नहीं दोषकी में कथा ॥
१०२

चौ.
पूजा
१०३
सवको प्रियहित वचन बोलकर सुख करूं।
निज आतमके मांहि सदा मैं रति धरूं।
करूं भक्ति से सेव प्रभो तुम चरण की।
नहीं लहूं अब कभी पीर भवभ्रमण की।
उपजाति छंद।
सुपाद तेरे मन मांहि मेरे। सुचित्त मेरा पद मांहि तेरे ॥
तोलों रहे हे जिननाथ स्वामी।जोलों वनूं मैं नहि मुक्तिधामी॥
सोरठा-सुख पावें सव जीव रोग शोक सव दूर हो।
मंगल होय सदीच यह मेरी है भावना ।।
इति इष्ट प्रार्थना ।
कायोत्सर्ग।
नव वार श्रीणमोकार मंत्र का शुद्ध मनसे जाप करना चाहिये।

चौ०
पूजा
१०४
अथ विसर्जन ।
चाल अखिल्ली
पूजन हर्षित होय करी मैने जिन स्वामी ।
अल्प ज्ञानतें लगे दोष क्षमिये जग नामी ।
अक्षर मात्रा अल्प अधिक कीने उच्चारण ।
सो सब क्षमिये दीन बन्धु हे अधम उधारण॥
आह्वानन विधि ठान भाक्तियुत पूजा कीनी।
वार वार गुण गाय करी मैं स्तुति रसभीनी॥
अब मेरी हे नाथ अरज है तुम चरणोंमें ।
यथापूर्व जिनदेव विराजो निजथानकमैं ॥
इति चौवीस तीर्थंकरोंकी भजनगानगर्भित पूजापाठ समाप्त ।
शुभ भूयात् ।
१०४

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Pooja

Author
Munshi, Heeralal
Title
Pooja
File name
Pooja
Text
OCR done
Citation
1915
Published
2009/11
Publisher
Culcutta, Jain Siddhant Prakashak Karyalay
Language
Sanskrit
Pages
114
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Jain sahitya
DLI number
344270
Barcode
99999990234143.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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