Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Chief Minister
Front matter
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चीफ मिनिस्टर
विद्या प्रकाशन मन्दिर
नई दिल्ली-2
.
चीफ मिनिस्टर विजयतेंडुलकर
लेषक:
मूल्य
30.00
मंस्करण : 1991
प्रकाशक :विद्या प्रकाशन मंदिर
1681,दारयागंज, नई दिल्ली-2
हिन्दुस्तान वाफसंट प्रिंटर्स शाहदरा, दिल्ली-32
CHIEF MINISTER by Vuaya Teadekor
विजय तेंदुलकर के मूल मराठी नाटक 'माऊ मुरारराव' का हिन्दी अनुवाद अनुवादिका ललित देसाई नाटक के मंचन की अनुमति अनुवादिका से प्राप्त करना आवश्यक है। पत्र- -व्यवहार के लिए पता: ससित देसाई १.बी; बड़ा बाजार मागं पुराना राजेन्द्र नगर नई दिल्ली-११००६०
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चीफ मिनिस्टर
पुरुप-पात्र
मुरारराव : चीफ मिनिस्टर (मुख्यमंत्री)
देसाई हर सत्ताधारी से चिपटे रहने वाला चाटुकार
मोगरे : चीफ मिनिस्टर का पी० ए०
नानालाल :एक छोटा-सा व्यापारी
टी.टी. विरोधी दल का एम० एल० ए.
गवताहम चीफ मिनिस्टर केपार्टी के हाई कमाण्ड का सदस्य तथा
कैबिनेट मंत्री
सुदाम: मंनिमाडल का सदस्य-कैबिनेट मंत्री
भारमो (सिरफर): एक सामान्य व्यक्ति, जिसने कभी मुरारराव के लिए
अपनी किडनी दी पी
सवावत: सरकारी अधिकारी
सिपाही, नोकर, यादि
स्त्री-पान
मंजुला : चीफ मिनिस्टर को पली
२
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पहला अंक
4
(सायंकाल । टेबल पर हार और फूलों के गुच्छों का बहुत बडा
ढेर रख । है।)
मुरारराव : (टेलिफोन पर बात कर रहे हैं ।) नहीं-नही मैं सिर्फ निमित्त
मात्र हूँ। विजय तो आप सबकी शुभकामनाओं का फल है ।।
हो हो। जिम्मेदारी बहुत बड़ी है। काम आसान नही है।
सम्पादकीय लिखेगे ? लिखिए, जरूर लिखिए, लेकिन फिजूल
ज्यादा मेरी तारीफ मत कीजिए। मैं बहुत छोटा आदमी हूँ।
पार्टी के नेताओं की कृपा है । नही, निर्णय एकमत से ही हुआ
था। आपकी जानकारी गलत है । बिल्कुल गलत । देखिए ऐसा
है, मतभेद तो होते ही हैं, पसन्द-नापसन्द की बात भी होती
है, आखिर पार्टी इन्सानों से ही बनती है । फैसला एवमत से
हुआ था। रावसाहव ने खुद ही तो मेरे नाम का सुझाव दिया
था। चौधरी साहब ने अनुमोदन किया था।
(देमाई उनके पीछे एक मोटा हार लिए फोटोग्राफर से साथ
-
आइये। पहले अपोइण्टमेण्ट लेकर आया करें। कल सुबह
दिल्ली जा रहा हूँ। शाम को वापिस आऊंगा । ठीक है । अभी-
अभी जरा फुरसत मिली है। सुबह में भीड़ लगी हुई थी।
टेलीविजन के लिये राज्य के नाम अभी सन्देश भी रिकार्ड
१० । करवाना है। आज शाम को ही प्रसारित होगा। चलता है। आज ही का तो दिन है । अभी पीछे ही उस बीमारी से उठा हूँ। लेकिन ज्यादा मेहनत से अभी भी थकान हो जाती है। नहीं, अव तबीयत बिल्कुल ठीक है। ईश्वर की कृपा है । और हां, आज के पेपर मे आपने हमारा वह इतहार डाल दिया, उसके लिये धन्यवाद । रात जरा देर हो गई थी देने में । लोग कुछ कह तो नहीं रहे? जिस तक पहुंचना चाहिये, उस तक पहुंच गया, तभी फायदा है। देखते है । अच्छा थेंक यू । (रिसीवर रख कर वहीं अनमने-से खडे रहते है।) देसाई · (पीछे से) मुबारक हो मुरार : (घूमकर) कौन ? देसाई साहब मैं, अनन्त देसाई । मुबारक हो बहुत-बहुत मुबारक हो ! जरा देर हो गई। (गामने आकर जबरदस्ती हार डालता है। मुरारराव जम्हाई रोकते है। फोटोग्राफर फोटो लेता है।) बहुत अच्छा हुआ। मुरार :धेक यू। देसाई : आपका मुख्यमन्त्री पद के लिये चुना जाना, इस राज्य के लिये बड़े सौभाग्य की बात है। अब तो यह राज्य हर बात मे आगे रहेगा। इसमें शक की कही कोई गुंजाइश ही नहीं। मुरार : अच्छा! देसाई : विरोधी तक कह रहे हैं: "यह सम्मान आपका नहीं, पूरे राज्य का सम्मान है। मुरार : (नौकर के हाथ में पकड़ी ट्रे मे से दो पेड़े निरपेक्ष भाव से देते हुए) लीजिए पेड़े लीजिए । चाय लेंगे? (फोन बजता है । मुरारराव की मुद्रा चिढी हुई) देसाई : मैं देखू साव, किसका फोन है ? (मुरारराव इशारे से मना करते हुए फोन उठाते हैं। देसाई फोटोग्राफर के कान के पास ..
बात करके उसे वापस भेज देता है ।)
मुरार : (रिसीवर में) कौन आई० जी० पी० बसाले? क्या कह रहे
हैं ? बात करना चाहते हैं ? दीजिये. लाइन दौजिये ।
(जम्हाई रोकते हुए) श्रेय तो बडों को ही है। मैं बहुत छोटा
इन्सान हूँ। आप सबके सहयोग से जो भी कुछ बन पडेगा,
करूंगा। (जम्हाई रोकते है।) हा-हां मालूम है । क्या कह
रहे है ? (एकदम चौकन्ने हो जाते है, और फिर ढीले पड जाते
हैं।) मैंने सोचा, मिल गया। अभी तक नही मिला ? पता
गलत है, तो सही पता ढूंढना भी तो आपका काम है बसाले!
नाम गलत होने की कोई गुजाइश नहीं है । नही, मुझे नहीं
लगता। चाहे कही से भी ढूंढ लाइये । दैटभ युअर हैडेक ।
पुलिस कोर्स है आपके पास, कोई ऐरे-गरो की सेना तो नहीं
इकट्ठी की गई। चौबीस घण्टे देता हूँ आपको । कोना-कोना
छानिए पर उसे जिन्दा~~या नही~जिन्दा ही लाकर
हाजिर कीजिए । अब और बहाने नहीं सुने जाएंगे।
(रिसीवर पटक कर विचारमग्न खडे रहते है ।)
देसाई . किसके बारे मे बात हो रही थी साँब ? वैसे ही पूछ रहा हूं--
मुरार : पहले के मुख्यमन्त्रियो को भी आप ऐसे ही पूछते होगे देमाई ?
देसाई : (हंसते हुए) हां-हाँ साब! अपनी तो हाजिरी पिछले दम
सालो मे रोज लग रही है यहाँ । आप तीसरे सी० एम० है।
पर आप इतने डिस्टर्व किसलिए है ? मिलना किसे चाहते
है ? हम ले आएंगे उसे ढूंढकर उसमे है क्या ?
(टेलीफोन बजता है।)
मुरार : (रिसीवर पर) यस ?
मोगरे : (लाइन पर) साहब मैं मोगरे । नानालाल जमनादास आए
हैं आपके अभिनन्दन के लिये ।
मुरार: नानालाल ! अच्छा-अच्छा, वो नानालाल । भेजिये उसे ।
.
..
१२
(नानालाल फूलों का एक बड़ा-सा चुके लेकर आते हैं ।)
देसाई : (नानालाल को अपनत्व से) आइये नानालाल ।
नानालाल : (देसाई की परवाह ना करके सीधे मुरारराव को गुच्छा देकर
शेकहैण्ड करते हुए) वैरी ग्लंड सर ! हार्टी कांग्रेट्स ! मैं
नानालाल हूँ, एक छोटा-सा व्यापारी। सोशल वर्क भी करता
हूँ, और आप को तो शुरू से ही बहुत चाहता हूँ । आय एम
हैपियेस्ट टूडे गाह्न ! हालात के मुताबिक बहुत काविल
आदमी चुना है आपकी पार्टी ने । ग्रेट ईवण्ट । ग्रेन डीलर
एमोसिएशन और अन्ध सेवा समिति की ओर से में आपका
अभिनन्दन करता हूँ।
मुरार : (पेडे देते हुए) पेड़े लीजिये । कुछ (जम्हाई रोकते हुए) चाय
वगैरा?
नानालाल नो, नो, थंक यू वेरी मच, मैं तो सिर्फ अपनी खुशी जताने
चला आया। हमारी तरफ से आपको फुल मपोर्ट है साहव ।
एमोनिएशन और ममिति ने तो प्रस्ताव भी पास कर दिया है।
अब आपका ज्यादा वक्त नहीं लेना । टाइम इज मनी । चलता
। (नमस्कार करके चला जाता है।)
देमाई नानालाल एकदम फिट आदमी है साव ! अपना इटरेस्ट
अच्छी तरह जानता है । अव ग्रेन डीलम और अन्धों में कोई
मम्बन्ध है क्या? लेकिन यह है कि दोनो संस्थाओं में बराबर
मौजूद है।
मुरार : देसाई, हर कोई अपना इटरेस्ट देखता है-
देसाई : यही तो मैं कह रहा हूँ। नानालाल भी तो आम लोगों जैसा
ही है। लेकिन वो कौन है-जिसे आप मिलना चाहते हैं ?
जिसे ढूंढ निकालना चाहते है--विरोधी दल के एम० एल०
ए. टी. टी० आते है । (पीठ पीछे कुछ छिपाये हुए)
भरार : (टी टी० को देखकर वश होते है आइये, आइये टी०टी.
१३
आप भी आये हैं आज के कुम्भ मेले में?
टी०टी० : कुम्भ मेला खत्म हो गया होगा, यही सोचकर आया था।
(गुलाब का फूल सामने करके मुरारराव को नजर करते हुए)
यह हमारे मालिक-मकान के बाग का है। हमारा बाग तो
नासिक में रह गया। (सिर्फ फूल देखकर मुरारराव थोडे
नाराज दिखाई देते हैं।) छोटा है, पर बहुत सुन्दर लगा इसी-
लिए ले आया! आपका यश भी इस फूल की खुशबू की तरह
ही फैले, वगैरा-वगैरा""याने ऐमे मौके पर कुछ काव्यात्मक,
कुछ सुन्दर-सुन्दर शब्द बोलने की रीत है ना, इसीलिये। वैसे
तो गुलाब खुद ही बोल रहा है अपनी खुशबू से । क्यों देसाई,
आपने चीफ-मिनिस्टरों का ठेका ही ले लिया है क्या ? हर
चौफ-मिनिस्टर के स्वागत के लिए आप, विदाई के लिए आप,
जन्म-दिन पर आप, हर जश्न मे माप, पता नहीं कहां-कहाँ
किसलिए आप मौजूद होते हैं---
वेसाई : (हसकर) है, है, अभी वैसे कुछ हुआ नही है इस राज्य में
टी०टी० । इतना जरूर है, जो भी यहाँ का मुख्यमंत्री होता
है उसकी दीर्घायु हुआ करती है-
री०टी० : होती होगी, होती होगी। वह अमर भी हो सकता है।
मुरार : पेड़े खाइये टी० टी०, मुंह मीठा कीजिये पहले"(पूरी
जम्हाई लेकर) कव से आ रही थी, मौका ही नही मिला !
(पेडे देते हुए) लीजिये । कल से विधान सभा में तो कड़वे
भाषण देने ही हैं।
टी०डी० : आपने हमारी थोड़ी मुश्किल कर दी है मुरारराव !
मुरार : मुश्किल, आपकी कमी मुश्किल ? सामने चाहे मुरराराव हो
या खुद ईश्वर, आपकी लोप तो गरजती ही रहती है। आप
अपना काम शुरू रखिये टी० टी०हम भी प्रयाशक्ति अपना
काम करते रहेंगे। संघर्ष जारी रहना ही चाहिये।
-
.
टी०टी० : हाँ, संघर्ष से जरा जागरुकता रहती है विधानसभा में, वरना विधान सभा तो शयनागार ही हो जायेगी। वैसे आपको पार्टी के कुछ बैंक-वंचर्स ने उसे शयनागार बना ही डाला है। परसो आपका का वह हंबीर थोराल, अर्थमंत्री को उत्तर देने के वक्त कैसे मागम से सो रहा था, देखा नहीं आपने ? मुरार : शर्म आती है ऐसे मौको पर, लगता है क्या यही है हमारी लोकशाही? (गले मे कुछ अटका हुआ-सा महसूस करते हैं ।) टी०टी०: क्या हुआ : 7 मुरार : टेलिविजन के लिये सुवह राज्य के नाम मंदेश रिकार्ड करवाया था, उसी की याद गई। मैंने उसमें लोकतंत्र पर ब. गौरव- पूर्ण विचार रखे हैं। क्या लेंगे? चाय, कॉफी? टीटी० : सिर्फ चाय कॉफी ? मुरार : (हसते हुए) तब फिर क्या चाहिये ? टी०टी० : सिर्फ चाय कॉफी से आज का दिन सेलिब्रेट करना ठीक नही है मुरारराव! मुरार : यह सम्मान से ज्यादा जिम्मेदारी है टी० टी०, मैंने अपने टी० वी० संदेश में भी यही कहा है । काम सचमुच बहुत कठिन है । देसाई : आप तो मजाक कर रहे हैं साँब। "मैन ऑफ द कामिस"- मुश्किल से मुश्किल परिस्थितियों मे दमकने वाले इन्सान-~ आपका वर्णन तो इन्ही शब्दों में करना पडेगा। टी०टी० : देसाई, आपका मक्खन लगाना हो गया शुरू जोर-शोर से? देसाई : वह रुका कहां था? एक से एक गुणी नैता मिल रहे हैं हमे... हम करें भी तो क्या करें? मुरार : अच्छा देसाई,फिर मिलेंगे। देसाई : (बुरा न मनाते हुए) हां हां, जरूर । मैं तो आता ही रहूंगा। अच्छा टी० टी०। (अन्दर की ओर जाते हुए) जब आया ही ..
हूँ तो भाभी साहिबा को भी एक बार मुबारफलाड देता जाऊँ टी०टी० : (मुरारराव को) अब आप से क्या कहे ? इतना जरूर है कि ऐसे चमचों से जरा सावधान रहिये । मुरार : सब को अच्छी तरह पहचानता हूँ मैं टी. टो। (हाथ के गुलाव से खेलते हुए) टी टी० : मूड में नहीं लगते आप आज । इस अधिकार और सम्मान पाने को खुशी कम से कम एक दिन तो आप मनाते । फेरीवाले से जिन्दगी की शुरुआत करके आज आप मुख्यमंत्री तक बन चुके हैं । उम पर जिस खूबी से एक-एक करके आपने पहले वाले सी० एम० को अकेला और निहत्या कर दिखाया.. और हां, वह परसों वाला निर्णयात्मक प्रस्ताव तो बहुत लाजवाब रहा। अभी कुछ दिन पहले ही तो आपका एक प्रकार से पुर्नजन्म हुआ है। यह दिन देखने के लिये आज आप मौजूद हैं, यही क्या कम सौभाग्य की बात है, मुरारराव ! केवल बड़ों की क्यों ? आप पर तो ईश्वर की भी बड़ी कृपा है। मुरार : हाँ टी० टी०; इसमें कोई शक नहीं कि ईश्वर की और प्रधान- मंत्री तक की मुझ पर बड़ी कृपा है। लेकिन आज सुबह मे में जरा वेचन है। दो०टी० : थयों ? प्रधानमंत्री की कृपादृष्टि के लिये ? (धीमे स्वर में) कोई और नई खबर है क्या ? मुरार: नहीं, जिसकी वजह से मैं आज जिन्दा हूँ, उमसे मिलूं, उस के लिये कुछ कर, ऐसा बारबार सुबह से मुझे कचोट रहा है" tists : (निराश हो कर) अच्छा, अच्छा । वो जिसने अपनी किडनी दे कर आपकी जान बचाई थी? मिलिये उससे । जरूर कीजिये उसके लिये कुछ। अब तो आसानी से आप उसकी मदद कर, सकते हैं। जिस-जिस के लिये कुछ करने को आपका जी चाहता है, उन मवका भला करने का समय अपने आप चलकर आ गया " .. .
है अब तो आपके पास। मुरार : (थोड़ा निराश हो कर) पर वो है कहाँ ? उसे मिलना चाहिये टी०टी० । सम के लिये तो नहीं, पर उसके लिये मैं जरूर कुछ करूंगा। (फोन बजता है, मुरारराव उत्सुकता से फोन उठाते हैं।) यस ! कौन? मोगरे : (फोन पर) साहब मैं, मोगरे । 'लोकतंत्र बचाओ' संस्था के कुछ प्रमुख कार्यकर्ता आए हैं । आपका सरेआम सत्कार करना चाहते हैं । चन्दा और हेट मांग रहे हैं। मिलने के लिये भेजूं ? मुरार : (फोन पर) देखते हैं। सात बजे पार्टी की मीटिंग है। उसके बाद राज्यपाल से मिलने जाना है। अगर वे राजी हो तो उन्हें रात देर से बुला लीजिये । और कहिये चन्दा ऐसे नहीं मिलेगा। चन्दा लेकर सत्कार न करने वाले बहुत देखे हैं आजकल । यह भी एक तरह का करप्पान ही है, हमें इसे बढ़ावा नहीं देना चाहिये। मोगरे : (लाइन पर) अच्छा साहब, कहे देता हूँ। मुरार : (जल्दी से) वह आखिर की दात मत बताना-नही तो सब गड़बड़ कर दोगे। (अन्दर से देसाई आकर पीठ किये हुये मुराररात को अपनी गर्दन झुकाकर अभिवादन करता है । और टी०टी० की तरफ हँसकर, देखकर चला जाता है। मुरारराव फोन पर ही बात कर रहे है ।) और हाँ, आई० जी०पी० बसाले को फिर एक बार रिंग करके डॉट-नही, याद दिलाइये, कहिये किसी भी हालत में उसे यहां जरूर आना चाहिये। नहीं तो उसकी रिटायरमन्ट पक्की। मोगरे : (लाइन पर) बता देता हूँ साहब ! मुरार: (फोन पर) और हां, अलग-अलग विभागो के सस्पेंड किये जाने वाले अधिकारियों को सूची तैयार हो गई ? मोगरे : सूची तो वहुत बड़ी हुई जा रही है साहव- "..Ja .. मुरार : (फोन पर) और भी बड़ी कीजिये । चाहे तो बाद में सबको रोइन्स्टेट कर लेगें, पर फिलहाल तो इस सूबे ने हमारी अधिक कार प्राप्ति जोर-शोर से पता लगनी चाहिये सबको (पीछे से मंजुलावाई आती हैं। टी० टी० हंसकर उन्हें अभि- वादन करते हैं।) मुरार : (फोन पर) और--हैलो--रेडियो पर वह अनाउन्समैट हो गई क्या मोगरे? मोगरे : (लाइन पर) कौन-सी साहब ? हाँ हाँ पर उसे सुनने के लिये समय कहाँ मिला ? चलो खैर रेडियो तो अपना ही है। अनाउन्समंट हो ही गई होगी। कल इसकी पूरी व्यवस्था कर ... दीपो. मंजुला : अनाउन्समैट हो चुकी है। (मुरारराव घूमकर देखते हैं । रिसीवर रखने लगते हैं।) मंजुला : जरा इधर दीजिये रिसीवर मोगरे से बात करनी है मुझे (रिसीवर लेकर) मोगरे, कल सुबह ही उस इण्टीरियर डेको- रेटर को बुलवा लीजिये । मुख्यमंत्री के बंगले पर शिफ्ट करने से पहले वहां का सारा फर्नीचर बदलवाना है। पहले का सारा निकलवा देना है। वहाँ सब कुछ नया होना चाहिये । (रिसीवर रख देती है।) मैंने सुनी है अनाउन्समैट रेडियो पर। मुरार: क्या? मंजुला : ए० एच० दो सौ सत्तर से मिलने वाले ब्लड ग्रुप के सिन्दकर नाम के आदमी ने कुछ समय पहले एक मरणोन्मुख इन्सान को अपनी किडनी दे कर उपकृत किया था। वही इन्सान अब सिन्दकर को किसी जरूरी काम से मिलना चाहता है। श्री सिन्दकर जहां कही भी हों उस आदमी से सम्पर्क करें। हो गई -- आपको तसल्ली? मुरार : इससे क्या तसल्ली होगी? वह मिलें तब तो" ?
मंजुला : जब इतनी कोशिश हो रही है, तो जरूर मिल जायेगा। है ना टी. टी. ? ज्योतिषी को बुलाकर उसे कुन्डली भी दिलाई थी, उसने भी कहा, जरूर मिल जायेगा--कोई मामूली ज्योतिषी नही, राष्ट्रपति का चुनाव परिणाम बताने वाला ज्योतिषी है यहा टी०टी० : फिर तो जरूर मिल जायेगा। ना मिलने का कोई कारण ही नही है ! हाँ अगर किडनी देने वाला वह आदमी आज अस्तित्व में ही ना हो, तो बात दूसरी है। मरार : नही-नही होगा, कैसे नहीं ? मंजुसा : इनके तो दिलों-दिमाग पर वही छाया हुआ है कल से । रात- भर तड़पते रहे। सुबह-सुबह मुझे उठाकर बोले, उसी को बदौ- लत में आज यह दिन देख रहा हूँ। ऐसा संगता है, सब कुछ उसी का दिया हुआ है, यह दिल की धड़कन, यह शरीर, यह आंखें सब कुछ उसी के दम पर है। कह रहे थे, मैं वही हूँ। उस के शरीर के एक भाग से ही मेरा माज मस्तिस्व है। उस के महादान से ही बार में जिन्दा हूँ। टी०टी० : (आश्चर्य से) बरे मुरारराव !क्या यह सच है ? मंजुला : उसे महात्मा कह रहे थे। मुरार : (जरा सकुचाते हुए) शम्द गलत हो सकता है। आदत से आ गया जुबान पर । लेकिन इसमे झूठ भी क्या है ? (टेलिफोन बजता है । मुरारराव टेलिफोन उठाकर) मुरार:यस?' मोगरे : (लाइन पर) साहब, में मोगरे । रावसाहब आए हैं मिलने के . : लिये। मरार: (कड़वे स्वर मे) भेज दीजिये । (रिसीवर रख कर) आ ही गया आखिर। मंजुला : कौन ? रावसाहब ना? आ ही गई आखिर बला।
. (टी0 टी0 बड़े मजे में यह प्रतिक्रिया देख रहे हैं। रावसाहब चांदी की मूंठ वाली छड़ी और दरवारियों के स्टाइल मे मुरार- राव और मंजुलाबाई को मुककर सलाम करते हैं। उनके पीछे काला चश्मा लगाये हुए एक व्यक्ति आता है। कोने में बैठ जाता है।) रावसाहब : रामराम मुरारराव साहय, रामराम मौजी। भरार : दैठिए। रावसाहय : (बैठकर) क्यो टी०टी०, विरोधी दल के लोग फौरन हाजिर, औ? (खुद ही हँसते हैं) बहुत अच्छे, बहुत अच्छे । स्वस्थ लोकतंत्र के लिये यह जरूरी भी है। मुरार : अरे भई उन्हे पेड़े दो। (जैसे ही नौकर ट्रे लेकर पास आने लगता है, वैसे ही उसे रावसाहब की तरफ भेजते हैं।) लीजिये, रावसाहब । मुंह मीठा कीजिए। राषसाह्य : जरूर-जरूर, क्यों नही । पर हमारा मुंह तो बिना मिठाई के ही मीठा हो चुका है मुरारराव ! काबिल आदमी उचित जगह पर आ जाये तो अच्छा लगता है। किसी शायर ने भी कहा है । (एक और कहता है ।) अगर गुणों का आदर होता हो अपना व्यक्ति- गत विरोध आहे लाने वाले कम से कम हम तो नही है। वैसे हमारी इनकी (यह टी० टी० को उद्देश्य करके) लाख स्पर्धा हो, (बाहे ठोक कर) लडना हो तो बड़े जोर-शोर से लड़ेंगे भी, पर ऐसे जैसे कुस्ती हो । कुश्ती सत्म, स्पर्धा भी खत्म, उसी समय प्रतिस्पर्धी से हाथ मिलानेवालों में से हम हैं । आदमी मे स्पोर्टमैनशिप तो होनी ही चाहिये । वैसे राजनीति भी क्या है, कुस्ती का सेन ही तो है। (टी. टी. तालियां बजाते हैं । रावसाहब शायराना तरीके से उसे कबूल करते हैं।) डी.टी.: मापण तो तालियों के लिए था रामसाहब ! पर क्या यह सच नहीं है कि फेरीवाने का हस्का पन्या करने वाला एक मामूली ।
२० आदमी, आज जब एक सूबे का मुख्यमंत्री बन गया है, आपको दिल से मंजूर है? रावसाहम : आपको तो ऐसा ही लगेगा। अगर हम कहें कि इन्सान के दो पर होते हैं, तब भी तो आप विरोध ही करेंगे। तब आप कहेंगे कि इन्सान के चार पैर होते हैं। दो पर हमने किसी अपने मतलव से छिपा लिये हैं, यह आरोप सत्तारूढ़ दल पर पोप कर, किसी न्यायाधीन पूछ-ताछ, नही तो माफी की मांग, या फिर सभा त्याग की मांग आप जरूर करेंगे। दी०टी० : इन्सान का एक पेट होता है, और उसे भरने की जिम्मेदारी शासन पर है । इतना आप मान गए, तो भी बहुत है राव- साहब, पैरो की बात रहने दीजिए। रावसाहब : (पेट पर हाथ फिराकर) इन्सान का पेट ! यही तो आप बायें. पक्ष वालो का मूल सिद्धान्त है। ठीक है, इसी से तो भापके भी पेट भरते हैं- टी०टी० : हमारे पेट बहुत छोटे है, रावसाहब ! पेट तो सत्ताधीशो के होते रहने मुरार : (जम्हाई रोकते हुए) जाने दीजिए टी०टी०, आप दीजिये रावसाहव, कल से तो बहस करनी ही है। रावसाहव : बहम कैसी? थोडा हँसी-मजाक है, बस और क्या ? जिन्दगी का मतलब है मजा । चार दिन का मेला है, दुनिया से लेकर भी क्या जाना है आखिर? शायर ने कहा है, (शेर सुनाते हैं) क्यो माजी? मजुला: चाय लीजिये। रायसाहब : नही, अब चाय का मजा नही आयेगा। पेड़ो से मुंह मीठा हो गया है। फिर सही। चलू मैं ? (उठते हैं, एकदम गम्भीर ही जाते हैं।) कुछ कहना चाहता था शाम की मीटिंग से पहले, लेकिन अब बाद में कहूंगा। (टी० टी० की तरफ एक नजर -
डालते हैं।
टी०टी० : (इसारा समझकर उठते हुए) मैं चलता हूँ.
मुरार: नही नही (रावसाहब से) आइये, हम जरा उधर बात कर
लेते हैं । आइये" (रावसाहब को ले कर अन्दर जाते हैं ।)
रावसाहब : (अन्दर जाते-जाते टी० टी० को) माफ करना बेअदबी
करने का कतई इरादा नही था मेरा' (दोनों अन्दर जा चुके
.
.
मंजसा : बड़ा पाप है मरा! कौन-सी नई मुसीबत खड़ी करेगा,
भगवान जाने।
टो० टी० : चाहे शायर ने ना कहा हो, लेकिन ये तो मुसीबतें बढ़ाने वालों
में से ही हैं, मंजुलादेवी! मुरारराव को चन नहीं लेने देंगे यह
आस्तीन के 'शेर।
मंजुला : कई बार तो लगता है, क्यों इस फंदे मे फंस गये ? इतने बुरे-
बुरे लोगों से पाला पड़ता है, अब किसको क्या कहो। वो
देसाई है ना ! सीधे भाभी-भाभी करते रसोईघर में ही धुस
आया 'कहने लगा इस बंगले में आपके आने से पहले भी मैं
आता रहा हूँ। बेशरम कही का!
टो० टी० : यही तो लोकप्रिय बनने के गुर हैं। राज्य चलाने वालों को
यह सब सीखने ही पड़ते हैं। पति के साथ पत्नी को भी (धीमी
आवाज में) लेकिन वहां जो बैठा है, वह कौन है ?
मंजुला : कौन ? (देखकर धीमी आवाज मे) पता नहीं । रावसाहब के
साथ आया था न ? उनको तो कोई न कोई ऐसा मुरीद चाहिए
ही जो उनके शेरों की दाद दे-
टो० टी० : मतलब यह दाद है उनकी?
भंजला : और नहीं तो क्या ?
री. टी० : और हम उसी के सामने रावसाहब के बारे में
मंजुला : मैं तो और भी बोलूगो। मैं किसी दल के हाइकमाई की
:
२२ नौकर नहीं। मैं अपनी मर्जी की मालिक हूँ। मुझे किसी का डर नही ! टी०सी० : अब आप मुख्यमंत्री की पत्नी हैं, मजुलादेवी ! आपको जरा सम्भलकर ही रहना चाहिए । आपका कहना मुरारराव को भारी पड़ सकता है। आपके किसी गलत कथन से सरकार तक उलट-पुलट सकती है." मंजुला । (शर्माकर) हटिये । (मुरारराव आते हैं।) मुरार : क्या हुआ? ऐसा क्या कह दिया आपने टी० टी०? टी०टी० · यो कहाँ हैं ? भरार : कौन रावसाहब ? वो तो चले गये उधर से ही । (मंजुलाबाई से) माजी को प्रणाम कहिए, ऐसा सन्देश है उनका। मंजुला : मांजी? टी०टी० : वाह ! वेटा हो तो ऐसा गुण्डा- मजुला : मजाक छोड़िए! (मुरारराव को हल्के स्वर से) उसे देखा क्या, वो- मरार : (देखते हुए) कौन है ? मजला : रावसाहब के साथ आया था-- टी. टी० : उनके पीछे ही आया था-मैंने देखा था। मुरार : रावसाहब अपना चमचा यहां भूल गये ? यह नहीं हो सकता... मजुला : फिर कौन है वो? (यो काले चश्मे वाला इन्सान कोने मे चुपचाप बैठा है।) मुरार : (टेलिफोन की तरफ जाते हुए) मोगरे से पूछना पडेगा मजुला : मोगरे से किमलिए, सीधे उसी को पूछ लेती हूँ। (उस आदमी के पास जाकर, गला साफ करते हुए।) आप- काले चश्मे के अन्दर से अॅन्मेन्ट माइण्डेडली देख रहा है।) मुख्यमंत्री से कोई काम या क्या ? (वह गर्दन हिलाकर मना -(वह आदमी
२३
कर देता है ।) फिर यहाँ किसलिए कामे हैं ? रावसाहब के
साप आये ये क्या?
आदमी : (उठते हुए) कौन रावसाहब ?
मंजुला : अकेले थापे थे क्या यहाँ ?
भारमो : हाँ।
मंजुला : और कुछ काम भी नहीं है आपको?
प्रावमी : नहीं।
मजला: तो क्या आपने इस जगह को ऐरे-गैरो का वेटिंग रूम समझ
रखा है?
मुरार : (टी० टी० को) हैरानी है। कार्य के बगैर यह घुसा कैसे
पहाँ ? (जोर से) देखिये, पहले आप यहां से चलते बनिये।
जायेंगे या बुलया पुलिस को? जाइये, चलते बनिये...
टो० टी० : रुकिए मुरारराव, उसे जरा शिक्षा देना जरूरी है। (थोड़ा
आगे होकर उस आदमी से) यहां कौन रहता है, पता है ?
मुख्यमन्त्री ! मुख्यमन्त्री कौन होता है मालूम है ? पूरे राज्य
का मुखिया । मुखिया को बहुत काम होते हैं।
आदमी : (बोर होकर अपना हाथ थोड़ा झटक कर 'पता है ऐसा संकेत
करता है।)
टी० टी० : तो फिर भले आदमी, बेकार विन बुलाये यहाँ आकर क्यों बैठे
हो?
आदमी : बोर हो गया हूँ बहुत।
टी०टी० : क्यो बोर क्यो हो गये ?
आवमी : अपन फिर नही आयेंगे।
मजुला : किमी ने यहां जाने के लिए बुलावा भेजा था क्या?
आदमी : हो।
टी०टी० : हो ? मुख्यमन्त्री ने तुझे बुलावा भिजवायत था? (मुरारराव
से)च थोड़े ढोले लगते हैं । जाओ भाई, अपना रास्ता नापो।
२४ मंगला (वह आदमी नाक के नीचे सरका हुआ चश्मा ठीक करते हुए जाने लगता है।) मुरार : (कुछ शंका होती है।) ठहरो; नाम क्या है तुम्हारा? सच- सच बताओ.- आदमी : किसका? मेरा? सिंदकर । भाई सिंदकर कहते है अपन को। मुरार :: (एक साथ) भाई सिंदकर ? आदमी : क्या हुमा ? अपना नाम है यह। मुरार : जरा रुको। (टी० टी० देख रहे हैं। दो कदम आगे होकर) मुख्यमन्त्री ने किसलिए बुलाया था आपको यहाँ ? आदमी : मुझे क्या पता-उसे ही पता होगा। काम पर था, तो बहुत से लोग किसी इश्तहार की चर्चा कर रहे थे। उस इश्तहार में मेरा नाम था शायद। मैंने भी कभी किमी को अपनी एक किडनी दी थी। जिसे किडनी दी थी, उससे मिलूं ऐसा मुझे कहा गया । वो आजकल कहाँ रहता है, यह पता करने के लिए हस्पताल मे फोन किया। हस्पतालवालों ने यहां का पता दे दिया। (मंजुलाबाई और मुरारराव एकटक देख रहे हैं।) चलते हैं अपन। मुरार : (अनिश्चित मन स्थिति मे) किडनी देने का कोई सबूत ? मादमी : मबूत? (पास जा कर, डूमॅटिकली शर्ट पैष्ट से निकालकर पेट की निशानी दिखाता है। मुरारराव ऐसे हो जाते है, जैसे किसी ने तेज धार वाला धाकू दिखा दिया हो।) आप क्या समझते हैं, झूठ बोल रहे हैं हम? (सर्ट पंण्ट मे घुसाकर दर- वाजे की ओर जाता है। जाते-जाते) वह जरूर कोई पाजी होगा। साला वर्गर काम के इश्तहार देकर बुलवाता है। मेरी आधे दिन की कमाई चौपट : मुरार: क्या काम करते हो?
1
आरमी : वर्कशाप मे मेकैनिक हूँ।
मुरार : (धीरे से मंजुलाबाई को वहीं होगा क्या यह ? तुझे कुछ याद
7
मंडला : तब का चेहरा-कुछ बता नहीं सकती। यह काला चश्मा-2
(वह आदमी बाहर जा धुका है।) छी:, मुंह से शराब की
बदबू भी आ रही थी।
मरार : (जल्दी से टेलीफोन उठाकर) मोगरे--अभी-अभी जो आदमी
यहां से गया, उसे जाने मत दीजिये। रोके रहिये उसे।
(मंजुलाबाई को) जरा अच्छी तरह से याद कर लें. मैंने तो
उसे देखा भी नहीं था। सिर्फ समाचार पत्र मे फोटो, और वह
भी बेहोशी मे ऑपरेशन के बाद बस इतना ही देखा
था पर तूने तो देखा था उसे 'ऑपरेशन के बाद ।
मंजुला : वह चेहरा अलग था। पर ऐसा ही कुछ था वह भी। कुछ
नहीं कह सकती.''बहुत ही मामूली था चेहरा और उस
वक्त वह बेहोश भी तो था। कपड़े भी हस्पताल के थे। (फोन
बजता है । मुरारराव फोन उठाते है।)
मोगरे : (लाइन पर) उसे रोक रखा है साहब । पर वह रुकने के लिए
तैयार नही है । जाने की कह रहा है ।
भार : पांच मिनट और रोके रहिये। किडनी निकालने की निशानी
तो है उसके पेट पर । फिर नाम भी वही बता रहा है।
मोगरे : (लाइन पर यह सब सुनकर) साहब...!
मुरार : नहीं, आपसे नही। (रिसीवर रख देते हैं।)
मंजुला : पर मुंह से शराब की बदबू"
टी०टी० : आपको किडनी देने वाला आदमी यही है या नही. सवाल यही
है न मुरारराव?
मुरार हो। कही कोई और ही बहाना बनाकर अपना काम न साथ
ले। तब तो विरोधियो को चर्चा के लिए अच्छा खासा मजमून
..
..
२६
मिल जायेगा।
टी०टी०:पर वह तो आपका एक हिस्सा है ! भापको जीवन देने कासा! .
प्रापकी धड़कन, आपकी रष्टि, आपकी दुनिया, आपका
अस्तित्व उसी से है, सुबह मंजुलादेवी से भी यही कह रहे येन
आप ? और अब जब वह सामने आया है, आप उसे पहचान
भी नहीं सकते ? आप भी कमाल करते हैं मुरारराव ? आपकी
मात्मा कुछ नहीं कहती? या सत्ता पाकर वह भी सो गई
कहीं?
(निलंज हंसी हंसते हैं।)
मुरार : मजाक छोडो टी०टी०। ऐसे मामलों में अपना शक दूर कर
लेना हमेशा अच्छा रहता है। राजनीति में कौन कब कैसे खेस
दिखा जाय, क्या पता?
(फिर फोन बजता है । मुरारराव रिसीवर उठाते हैं।)
मोगरे : (लाइन पर) साहब"
मुरार : रुकिये जरा...
(रिसीवर नीचे रखकर बेचनी से चक्कर लगाते हैं।)
मंजुला : इतना याद है, तब वह मेकैनिक नहीं था।
टी०टी० : लेकिन बाद में तो बन सकता है ? इतने समय में जब कोई
चीफ मिनिस्टर बन सकता है, तो क्या कोई और मेकैनिक
नहीं बन सकता?
मुरार, क्या करूं."कसे तसल्ली करवाऊँ?
टी०टी० : उसे इसी वक्त लॉक-अप मे बन्द करवाकर पुलिस इन्क्वायरी
के आर्डर दे...
मुरार : (जरा गुस्से मे) टी. टी...
(फोन फिर बजता है । बन्द हो जाता है।)
टी०टी० : मेरा कहा मानेंगे मुरारराव ? वो जरूर वही होगा--आपको
बीड़ी की तरह किडनी दे कर आपसे कुछ भी न लेकर लापता
२७
हो जाने वाला!
मंजुला : लेकिन उसका हुलिया-शराबियों जैसी उसकी हालत---
टोटो. इसीलिए तो मुझे पक्का विश्वास है । अच्छे घर का कोई
चरित्रवान इन्सान अपनी किडनी किसी को बिना कुछ लिए.
कभी देता क्या? खुद की दो किडनियो में से एक किडनी देना,
जेब से दस रुपये निकालकर देने जैसा आसान तो नहीं है
मंजुलादेवी! ऐसा करना इन्सान की जिन्दगी और मौत का
सवाल है। कोई कितनी ही कीमत क्यों न दें, कोई भी सभ्य
समझदार आदमी अपनी किडनी इस तरह देने को तैयार न
होगा। मैं तो नहीं मानता। अपने आप बिना किसी कीमत के
और ये भी न जानते हुए कि लेने वाला आदमी कौन है, अपनी
किडनी पागल की तरह दे गया-इसका मतलब है वो आदमी
कोई ऐसा वैसा ही है। यह जो अभी गया है न, इसी की तरह
होगा, मुरारराव !
मुरार: अच्छा!
टी०टी० : मुझे तो यह वही लगता है । आप चाहे इसे बाहर निकाल दें,
या घर में रख लें। विरोधियों की बात मानने का चलन ही
कहां है आप लोगों का ? मैं चलता हूँ अब-~चलता हूँ
मंजुलादेवी-
मजुला : बैठिये टी० टी०; खाना खाकर जाइये--
टी०टी० : सॉरी, खाने के लिए मना करना मेरे लिए वैसे मुश्किल ही
होता है, लेकिन अभी जरा पार्टी की कार्यकारिणी की मीटिंग
है। चुनावों में हमारी हार का पोस्ट-मार्टम जो किया जाना
है। आप हर चुनाव जीतते है और हम हर अपनी हार का
पोस्ट-मार्टम करते रहते है--ऐसा तो अब जैसे लिखा ही जा
चुका है। जाना होगा मुझे। फिर से एक बार बंस्ट-विशेज ।
कल मिलेंगे ही असेम्बली मे। सिर्फ कल ही हम आपके
२८ स्वागतार्थ बैच बजायेंगे। (जाते हैं। टेलीफोन बर) मुरार : (बैठे हुए हैं । मंजुलाबाई से) तुझे क्या लगता है ? मंजुला : मेरा क्या ? आपको क्या लगता है, वो ज्यादा जरूरी है। मुरार : (चुपचाप उठते हैं । जाकर रिसीवर उठाते हैं।) मोगरे : (लाइन पर) साहब, अब शान्त हो गया है वह । मंशे में लगता मुरार : नशे मे! मोगरे : (लाइन पर) हाँ साहब ! मुझे लगता है, जब उसे यहां रोका था, तब उसने अपने मुंह मे कुछ डाल लिया था। कोई गोली होगी शायद। बाद मे वह एकदम चुप ही हो गया। मंजुला : क्या कह रहा है मोगरे ? कैसा नशा है ? मुरार : कोई खास बात नहीं। (फोन पर) मोगरे, उसे इधर भेज दीजिये। मोगरे : (लाइन पर) साहब-(थोड़ी देर बाद) अच्छा साहब ! (मुरारराव फोन रख देते हैं।)) मंजुला : कैसा नशा ? क्या कह रहा था मोगरे ? मुरार : (बेचनी से) कहा न, कुछ नहीं। (पुलिस का एक सिपाही उस आदमी को पकडकर ले आता है । वह आदमी खुद को सम्भाल नही सकता। आंखों का काला चश्मा अब नाक तक उतर आया है।) मजुला : (उद्वेग से) यह सब क्या है ? सिपाही : पक्का अफीमची लगता है साला !... (गीभ काटकर मुरार- राव को) भूल हो गई सरकार। (मुरारराव उस आदमी की तरफ एकटक देख रहे हैं । पास जाते हैं । उसे नशे की हालत मे देखते रहते हैं। वह आदमी अपनी गर्दन भी सम्भाल नही पा २१ - मुरार : सिंदकर..! (उससे कोई रिस्पॉन्स नहीं मिलता। उसका लट- कता हुआ सरठोड़ी से पकड़ कर ऊपरकरते हुए सिंदकर. (सिपाही बड़ी हैरत से यह सब देख रहा है। मुरारराव धीरे से उसका काला चश्मा उतार कर उसकी जेब में रख देते हैं। (भावुक स्वर से) सिंदकर" (खुद को सम्भाल रहे हैं। सिंद "कर"यह क्या सिंदकर औ? मंजुला:ले जाने दीजिये उसे- मरार : नही । (सिपाही से) उसे गैस्ट-रूम में ले जा और ठीक तरह सुला दे। सिपाही : सरकार...! मुरार : मैं जो कहता हूँ वो कर । गैस्ट-रूम में ले जाकर ठीक से सुला दे इसे, और गाड़ी भेजकर डॉक्टर को बुलाने के लिये कह मोगरे से। सिपाही : जी सरकार ! (उस आदमी को ले जाने लगता है।) पर गैस्ट- रूम में तो पंडित जी है । कल सुबह जाना है उन्होंने मुरार: (माद करते हुए) पंडितजी...! मंजुला : अजी वही 'याद नही"चुनाव में आपकी जीत के लिये हवन करवाने वाले गुरार: तो फिर हमारे बैड-रूम मे ले जा उसे... मंजुला :......? मुरार: (जल्दी से गुस्सा होते हुए) देख क्या रहाहै गधे ? सुनाई नहीं देता? (फिर अपने आपको सम्भाल कर) कोई एक रुक जाना उसके पास । देख उसकी जेबें ठीक से टटोलकर और गोलियां हो तो निकाल लेना--(मंजुलाबाई बड़ी कठिनाई से धुप हैं । सिपाही उस आदमी को ले जाता है।) मंजुला: हमारे बैड-रूम में रखेंगे उसे और वह भी इस हालत में... मुरार: (खुद मैं खोये हुए से) हो। (धीरे-धीरे) इसी तरह की सब .. ...
ध्यवस्था होनी चाहिये उसकी यहाँ भी।
'मंगला : (चोंककर) क्या...?
मुरारः (धीरे-धीरे अपने ही मूड में, भावुक स्वर से) यह मुख्यमंत्री
का हुक्म है। (होश में आकर) समझती क्यों नहीं आप...
मंजला : समझ गई । अब आप माराम कीजिये । कितने पक गये हैं...
फिर शाम को पार्टी की मीटिंग भी है, रात को राज्यपाल से
मेंट है.
मुरार: (शान्ति से) माज मैं कुछ नहीं करने वाला।
मजला: क्या कहा ?
मुरार : मंजुला, मुख्यमंत्री बन जाने से ही क्या मैं एक हाइमांस का
इन्सान नहीं रहा?
मंजला: मतलब?
मुरार: कम से कम आज तो मेरा ध्यान और किसी बात में नहीं
लगेगा..
मंजुला : तब क्या करने की सोची है आपने ?
मुरार : उसके पास ही रहूंगा मैं-~~-यह-मेरी जिन्दगी का हिस्सा-
मुझे जीवन देने वाला-
मजुला: (कुछ कहना चाहती है, लेकिन रुककर) अच्छा, ऐसा ही
कीजिये । सुदाम भाईसाहब को रात खाने पर बुला रही हूँ मैं।
पार्टी मीटिंग यही रखने के लिये कहे देती हूँ उन्हे ।
मुरार : (आग्रह से) नहीं-पार्टी-मीटिंग यहाँ नही होगी।
मजुला : आज पार्टी-मीटिंग मे आपका होना जरूरी है। आप समझते
क्यों नहीं ? मंत्रिमंडल की सूची मंजूर करवानी है न? कल
सुबह फिर सूची ले कर आप दिल्ली जाने वाले हैं...
मुरार: मंजुला, आज मैं पार्टी मीटिंग मे नही जाऊंगा।
मंजुला : तव कसे-सीधे ही सूची दिल्ली
मुरार: दिल्ली कल दोपहर को जाऊँगा-सुबह पार्टी मीटिंग हो
।
जायेगी। मंजला: (निःश्वास छोड़कर) अच्छा, सुदाम भाईसाहब को पही कह- लवा भेजती हूँ। और किसे-किसे खाने पर बुलाना है ? सुयह कह रहे ये- मुरार: किसी को भी नहीं। (मंजुलाबाई अन्दर चली जाती हैं । मुरारराव अकेले किसी और मूड मे। अचानक खुश हो उठते हैं। स्वतः गुनगुनाते लगते हैं । टेबिल के पास जाकर बैठ जाते हैं । रिसीवर उठा- । मुरार:कोन मोगरे? मोगरे : (लाइन पर) जी साहब ! बैंड-रूम में सुला दिया है उसे। डॉक्टर को गाड़ी भी भेज दी है। मुरार : (हपित स्वर में) कोई है ना उसके पास ? मोगरे : जी हाँ। मुरार : जरा ध्यान रखिये-नहीं तो भाग जायेगा फिरसे-(रिसी-' वर पिन पर रखकर, फिर उठाकर) मोगरे-! मोगरे : जी साहब? मुरार : राज्यपाल से रात को अपॉइंटमेंट कैसिल कर दीजिये। (लाइन पर मोगरे चुप) सुन रहे हैं ना? शाम की पार्टी-मीटिंग में मैं उपस्थित नहीं हो सकता। उन लोगो से भी कहलवा भेजिये। मोगरे : पर साहब गलतफहमी होने की सम्भावना." मुरार : (ऊँचे स्वर से) तो आप चले जाइये गलतफहमी दूर करने। आज के सभी कार्यक्रम कसिल । कल सुबह की बजाय हम दोप- हर को दिल्ली जायेंगे। (रिसीवर रख देते हैं। अपनी अचकन उतार कर सोफे पर फैक देते हैं। फिर कुछ माद आने पर रिसीवर उठाते हैं।) मोगरे- .. मोगरे : (लाईन पर) जी साहब ! मुरार : जरा आई.जी०पी०बसाले को दीजिये। (रिसीवर रख देते हैं। पोड़ी देर बाद फोन बजता है । रिसी. वर उठाते हैं।) मोगरे : (लाइन पर) साहब, प्राय० जी० पी० साहब बोल रहे हैं। मुरार : (शर्ट की आस्तीन को ऊपर करते हुए रिसीवर पर) कौन ? बसाले?मिल गया हमारा आदमी? "अभी तक नहीं मिला? यही उम्मीद थी मुझे । 'तलाश जारी है ? पूरी दुनिया छान मारिये बसाले ! आपको नहीं मिलने वाला वह ! मिल ही नही सकता ! मैं जो कह रहा हूँ। दुनिया के पांचवे नम्बर पर है ना आपका गुप्त पुलिस विभाग ! शर्त लगाते हैं, शतं !. हो ही नहीं सकता, क्योकि वह आपको नहीं मिलनेवाला । ढूंढते रहिये, बस ढूंढ़ते ही रहिये । नही नहीं, यहां आने की जरूरत नहीं । बिल्कुल मत आइये । अच्छा। (रिसीवर रख देते हैं। किसी मूड मे उंगुलियों से टेबत बजाते हैं। फिर उठकर अन्दर चले जाते हैं। क्रमशः अन्धेरा । अब सफेद परदे पर प्रकाश होता है । टेलिविजन पर अनाउन्सर अनाउन्समेंट करती है : "अब राज्य के नये मुख्यमंत्री नाग- रिकों के नाम एक सदेश देंगे । यह संदेश हमने अपने स्टूडिओ में पहले से ही टेलिविजन केन्द्र के लिये विशेष रूप से रिकार्ड किया था।" फिर मुख्यमंत्री मुरारराव का भाषण सुनाई पडता है, और वे दिखाई देते हैं।) दोस्तो, इस राज्य का मुख्यमंत्रीपद मुझ जैसे सामान्य सेवक के हाथ में सौंपकर मेरी पार्टी, और हम सबके प्रिय प्रधानमंत्री ने बहुत बड़ी जिम्मेदारी मुझ पर डाली है, ऐमा मैं समझता हूँ। इस राज्य की महान परपरा तथा मुझसे पहले यहाँ के मुख्यमंत्री का लोकहित में व्यतीत कार्य-काल, और उनकी कार्यकुशलता, तथा राज्य के सम्मुत आज के अनेक विकट प्रश्न, इस सारी स्थिति का पूरा जायजा लेते हुये, मुझ जैसे सामान्य कार्यकर्ता की मुख्यमंत्री पद पर नियुक्ति, सम्मान से कहीं अधिक एक चेतावनी है, ऐसा भी मैं समझता हूँ। आज हमारा देश एक कठिन दौर से गुजर रहा है। अनेक बाहरी और अन्दरूनी समस्याएँ मुंह फाड़े खड़ी हैं। पिछले कुछ समय से प्राकृतिक संकटों ने भी विकास की घुड़- दौड़ में बहुत रोड़े अटकाये हैं। और हमने अपने रास्तों को बड़ी मजबूती से अपनी कमर कसके साफ किया है । हमे गर्व है कि हमारा सूबा इस मामले में हमेशा से ही आगे रहा है । सूखा पड़ा, बा आई, देश के इतिहास में चीजों की अभूतपूर्व कमी और कमरतोड़ मंहगाई हमने देखी, लेकिन हम डगमगाए नहीं । देश जीवित तो राज्य जीवित ! इस मुद्दे को ध्यान में रखकर ही हमने इतनी तकलीफें सही और अपने प्रिय प्रधान- मंत्री को अपना सहयोग दिया। इस राज्य की जनता का यह सद्भाव रडे गर्व का विषय है। आज भी राज्य के सामने अनेक गम्भीर समस्याएँ हैं। उत्पादन में अपेक्षित बढोत्तरी नही है । इसीलिये चीजों की कमी और बेकारी की स्थिति बनी हुई है । महगाई भी है, जनसंख्या में वृद्धि को जितना हम चाहते थे उतना रोकने में हम असफल रहे हैं, लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि साक्षरता के क्षेत्र में इस राज्य द्वारा की गई प्रगति बड़े गर्व का विषय है । बन्द या हड़ताल जैसे तरीकों से उत्पादन में कमी आती है, और अन्ततः राज्य के हालात पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। मुझे खेद से कहना पर रहा है कि इस तथ्य की जितनी जानकारी लोगों को होनी चाहिए, उतनी नहीं है। खेकिन चिन्ता की कोई बात नही है। इस राज्य के
३४
नागरिक विचारवान और काफी प्रबुद्ध हैं । मुझे विश्वास है
कि हमारे सामूहिक प्रयत्नों से हमारा सूबा विकास के नये-नये
आयामों को छूता जायेगा।
मुझे आशा ही नही, विश्वास है कि आप सब की शुभ
कामनाएं मुझे सदैव प्रेरणा देती रहेंगी। राज्य के सूखा-पीड़ित
भागों और पिछड़ी हुई जमातों की अधिक-से-अधिक सहा.
तया करने का मैं आप सबको आश्वासन देता हूँ। मैं वचन
देता हूँ, कि रोजगार में बढ़ोतरी, मॅहगाई की रोकथाम, जीवन
की सभी आवश्यक वस्तुओं की उपलब्धि, नि.शुल्क शिक्षा,
इन सब के लिये मैं मनसा-वाचा- कर्मणा प्रयत्न करता रहूंगा।
परिस्थिति विकट जरूर है, तब भी आप सब के सहयोग से उस
पर विजय पाली जायेगी। और प्रत्येक को उसका वांछित
हिस्सा मिल जाय, ऐसी मेरी भरपूर कोशिश रहेगी । जय
हिन्द ! जय स्वराज्य !
(फिर से उजाला।
मुरारराव, मंजुलाबाई, सुदाम पाटिल, टेलिविजन देस
रहे हैं। मंजुलाबाई टेलिविजन का स्विच ऑफ कर देती हैं।)
मुदाम : गुइ परफॉर्मन्स । रिअली गुड् । आप को कैसा लगा भाभी?
मजता: ठीक ही था, लेकिन...
मुराम : लेकिन क्या?
मंजुसा : कुछ नही, सुदाम भाईसाहब ! आजकल ये कुछ ज्यादा ही
मेच्योर दिखाई देने की कोशिश करते हैं।
मुराम: क्यों?
मंसा: अब देखिये ना, अब से मत्रिमंडल मे आये हैं, सब से मैं कह
रही हूँ, मालों को गय किया करें। लेकिन मजाल है जो ये
मेरी बात मुनें। उस यस तो बीच-बीच के कुछ पोड़े से ही
बाल पके हुए थे, तब से अगर पुस्कर देते तो...
सुगम : यह तो सच है, हो साहब आज आप काफी जवान दिखाई देते । पर भाभी, क्या आप ऐसा नही सोचती कि राजनीति में कालों की अपेक्षा सफेद बालों की ज्यादा अहमियत है ? जब से मैं राजनीति में आया हूँ, तब से बड़ों के मुंह से यही सुनता आया हूँ..."ज्यादा मत बताइये, हम सब समझते हैं । राज- नीति मे ही बाल सफेद हुए हैं..." इतना कह दिया कि कोई बस्स आर्युमैट नहीं। नौजवानों के लिये अपने-अपने घर जाने का यही संकेत काफी होता था। हाल ही की पार्टी मीटिंग में भी यही भाषा चलती रही। एक ने तो टोपी उठाकर अपने थोड़े से सफेद बाल भी दिखा दिये। मंजुला : सफेद बालों का होना जरूरी नहीं है, भाईसाहब! रावसाहब के बाल कहाँ सफेद हैं ? रोज बिला-नागा डाय करता होगा मरा! मुराम : हाँ ! क्योकि रावसाहब का दायरा सिर्फ राजनीति नही है भाभी ! वे सिनेमा और नौटंकी की दुनिया मे भी बराबर चहल- कदमी करते हैं। मंजुला : हाँ-हो, पता है, औरतों की तलाश में फिरते हैं, यही ना? सुगम : मैंने तो सुना नहीं बाबा ! अपने तो कानों पे हाय ! लेकिन अपने साहब तो ऐसे नहीं हैं ? उन्हें सफेद से काले रंग कर क्या करना है? मंजुला : सभी बातें क्या लोगों की खातिर ही करनी होती हैं ? अपनी पलो की सातिर भी तो कुछ करना चाहिये । सुराम : परभाभी-पत्नी को तो पता ही होता है-अपने पति का। मौरी, पति के बालों के असली रंग का। भंसा:सर भी हर परनी पाहती है कि उसका पति लोगों को ज्यान दिखाई दे। इस पर भी कुछ कहना है आपको? मुरार : बरे उसकी क्या सुनता है""भाषण के बारे में कुछ बता दल.
की तरफ से कोई आक्षेप तो नही आ सकता? दल से बाहर
की मुझे जरा भी चिन्ता नही । शत्रु की अपेक्षा घर के भेदियों
का ज्यादा डर है हमे।
सुदाम : मुझे नहीं लगता इस भाषण के बारे में कोई कुछ कहेगा।
झमेलों वाले सभी मुद्दे जानबूझ कर टाल दिये गये थे।
मुरार : यह अपना मत बता रहा है तू ?
सुदाम : नहीं नहीं। सिर्फ बयान कर रहा हूँ। वैसे भाषण बहुत अच्छा
था। और आज के भाषण की अपेक्षा सभी का ध्यान कल
घोषित होने वाले नये मंत्रिमंडल की ओर होगा. "पार्टी-
मीटिंग में भी सिर्फ यही चर्चा का विषय था। लेकिन जब
आपने मीटिंग में आने से मना कर दिया, तो हजार तरह
के
शक लोगो का दिमाग कुतरते रहे।
मुरार : और तेरा? तेरा ध्यान नये मंत्रिमंडल की घोषणा की तरफ
है या नहीं?
सुदाम : झूठ क्यों बोलू? है। मत्री नहीं बना तो एक रात में ही
कीमत घट जायेगी मेरी अपनी कॉन्सटीचुएसी मे । सारे किये-
कराये पर पानी फिर जायेगा। पहले अगर मंत्री ना बना होता
तो बात और थी। पर एक बार बनकर ड्राप हो जाओ तो
देखो अफवाहो को बाढ ! स्मगलिंग से सीधा सम्बन्ध जोड़ देंगे
लोग। नहीं तो सोचेंगे, किमी सरकार विरोधी काम मे हाय
होगा।
मुरार : तुझे ड्राप ही कर रहा हूँ मैं।
सुदाम : जैसे आपको मर्जी। (चेहरा एकदम उतर जाता है।)
मुरार : अरे नहीं बाबा । तेरे बगैर कैसे चलेगा मेरा? तेरे सर पर
ही तो यह जिम्मेदारी ली है, सुदाम !
मुराम : (खुदा हो कर) मंत्री ना भी बनायें, तो भी मैं आपका साथ
•देता रहेगा।
मुरार : खामख्वाह तेरी निष्ठा की परीक्षा क्यों लेता। ले लिया तुझे
भी लिस्ट में।
सुदाम : क्यू ! (खुशी से फूलकर) राज्यमंत्री की श्रेणी में या..
मुरार : फुलपलैंड मत्री बना रहा हूँ तुझे। लगता है ऊपर से कोई
खास विरोध नहीं होगा। इस बार तुम्हारे विभाग को पूरी
अहमियत दी जाय, ऐसी हवा तो थी दिल्ली मे।
सुदाम : सच बताऊँ ? मैंने तो यह सोच ही लिया था कि जब मुझे
खाने पर बुलाया गया है, तो नये मत्रिमंडल मे भी मुझे शामिल
कर ही लिया होगा। अब इतनी बड़ी जिम्मेदारी में निभा
सकूँ, इसकी शक्ति भगवान मुझे दे।
मुरार : अपनी कॉन्सटीचुएन्सी में देने वाला भाषण यहां मत झाड़।
(सिपाही आता है।)
सपाही : वह उठ गया है सरकार ।
मुरार : अच्छा! उसे यहाँ ले आ।
सपाही : जी..." (जाता है।)
मरार : तू उसे देखना चाहता था ना सुदाम ? अब उठ गया है वो।
यही आ रहा है।
मंजुला : इनका नया अर्धाग !
मुरार: (जरा इरीटेट हो कर) मंजुला!
मनुला : इसमें झूठ क्या है ? डॉक्टर तक बुलाया'..
सुदाम : डॉक्टर? वो किसलिये ?
मुपर : होश में नही था वह । मोगरे कह रहा था कोई गोलो बोली
खा ली थी उसने इसीलिये सोचा पहले से सतर्क रहना
ज्यादा ठीक होगा।
मंजुला : गोली मफीम की थी।
मुरार: (जरा गुस्से से) तो क्या हुआ
(आगे सिंदकर, पोछे से सिपाही आता है। सिंदकर का चेहरा
:
?
.
एक्स्प्रेशनलेस ।)
सिपाही : ए ठहर ! खड़ा रह चुपचाप ।
(सिंदकर चलता ही रहता है। आखिर एक कुर्सी उसके आगे
लगाकर सिपाही बड़ी मुश्किल से उसे रोकता है।)
मगर : जा तू । (सिपाही जाता है।) सिंदकर' •(ब्लक) अब
कैसे हो सिंदकर?
(सिंदकर कुर्सी के पीछे से रास्ता ढूंढ़कर आगे चलने का प्रयल
करता है । जमीन पर कुछ ढूंढ रहा है।)
मुरार : (प्यार भरा स्वर) क्या हुआ? कुछ चाहिये क्या?
सिंदकर : (ढूंढ़ते हुये) चप्पलें. "मेरी चप्पलें...
मुरार : चप्पलें "वो तो बाहर होगी। नही ऊपर बैड-रूम में...
(सिंदकर उनके बोलने की तरफ ध्यान न देते हुए, चप्पलें
ढूंढता हुआ आगे-आगे चलता जाता है। दीवार से टकरा जाता
है। शायद इसका दर्द उसे महसूस नहीं होता।)
मुरार : (दर्द से) अरे-अरे! (सिंदकर के पास जा कर उसका सर
मलना चाहते है
सिदकर : (इसका ध्यान भी उसे नहीं है ।) किसने ली? मेरी:.....
चप्पले...
मजुला : चप्पलें कौन लेगा?
सिंवकर : (एकदम ब्लंक चेहरे से) चप्पलें...
'मेरी...
मुरार : चप्पलें मिल जायेंगी बाद में सिंदकर । अभी बैठो-बठो ।
(उसे हल्के से पकड़कर बिठाते हैं 1) चुपचाप बैठ जा।
सिंदकर : (तुरन्त उठकर) लेकिन मुझे 'चप्पलें."चाहिये थी"
(चलना शुरू कर देता है । रास्ते मे खड़े सुदाम को) यह ठीक
नहीं है.. चप्पलें छिपा दी हैं मेरी।
सुराम : किसने छिपाई?
सिरकर: मुझे ही पूछ रहे हो। (चुपचाप चलता रहता है।) दरवाजा
३६ कहाँ गया, दरवाजा "जाता हूँ....."चप्पलों के बगैर.... चप्पलें छिपा दो"दरवाजा भी छिपा दिया? मुरार : किसी ने कुछ नही दिया। पहले यहाँ बैठ सिंदकर । (उसे बिठाने का प्रयत्न करते हैं।) चुपचाप बैठ । हिलना नही । सिंदकर : (उठते हुए) लेकिन क्यों ? बाहर जाना है" मगर : अब खाना खा कर ही जाना, जहां भी जाना है। सिरकर : चप्पलें? मंजुला : उसे तो चप्पलों की हो रट लगी हुई है "ढूढ़ दीजिये ना उसे एक बार- मुरार : (मंजुलाबाई को इशारे से चुप कराते हुए) सिंदकर हमारी यह इच्छा है."दिली इच्छा है"कि तू आज हमारे यहाँ साना खाए। सिकर: चप्पलें." मुरार : चप्पलें मिल जायेंगी, नही तो नई ले लेंगे 'चप्पलों को क्या कमी है ? पर आज तो तू यहाँ है, खाना खाके जाना । आज के दिन की खुशी और भी बढ़ जायेगी। हमें अच्छा लगेगा। (मंजुलाबाई से) जरा गरम कॉफी मे आना-(वह जाती हैं । सिंदकर लक खड़ा है।) रुकोगे न सिंदकर? सिरफर: साला- मुरार: क्या हुआ? (सिंदकर अपना सिर जोर से पीट लेता है।) मरार: कॉफी पी लो, कॉफी जरा घुस्ती मा जायेगी। (सुदाम से) ड्रग के नशे में है अभी भी। (सिंदकर उठकर चलने लगता है। मुरारराव उसे रोकना चाहते हैं, वो किसी मूड में बसता ही रहता है।) मुरार: (जबरदस्ती उसके साप पिसटते हुये से) सिंदकर, सिंदकर, सककहाँ पना?
उसे पकड़ - .. सिवकर : काम पर काम पर जा रहा हूँ... (चलता रहता है।) मुरार : (सिंदकर का रोकने में नाकामाव होकर) सुदाम' (सुदाम जाकर सिंदकर को पकड़ता है।) सिंवकर : अरे छोड़िये मुझे-छोड़िये (काबू होना चाहता है। चेहरा ब्लक) मुरार : नहीं सिंदकर, तू ऐस नहीं जा सकता."सुदाम पकड़ के रख (वेल बजाते है । सिंदकर रुका हुआ। जो सिपाही आता है उसे) कुछ नही जा (सिपाही कन्धे झटक कर चला जाता है।) सुदाम : साहब कितनी देर ऐसे पकड़े रखेगे इसे ? जाने दीजिये जहाँ जाना चाहता है।" मुरार . नही, विल्कुल नही ! (सुदाम चौंककर देखने लगता है।) अभी नहीं। कॉफी आ रही है। तुम नही जानते सुदाम, इस हालत मे कहाँ जायेगा यह रात का वक्त है .."ऊपर से इस की यह हालत किसी चीज की होश नहीं इसे.. पेट मे भी कुछ नही-और हम खाना खाएँ ? .." (सुदाम मुरारराव की तरफ देखता रहता है । इस वक्त तक सिंदकर पीठ किये हुये एक तरफ पैट के बटन खोलने का प्रयल कर रहा है।) मरार : क्या हुआ सिंदकर? (जल्दी से घण्टी बजाते हैं । सिपाही दोबारा आता है।) जल्दी से बाथरूम मे ले जा इसे---जा.. भाग... सिपाही : (सिंदकर से) पल ये--- मुरार : (एकदम गुस्से से) अगर वह खुद जा सकता तो तुझे बुलाने की क्या जरूरत थी गधे ? इतनी भी अक्ल नही तुझे ? मूर्ख कही का। ठीक से पकड़ कर ले जा। जल्दी कर- (सिपाही जबरदस्ती सिंदकर को पकड कर अन्दर ले जाता
है।) सम्भालना इसे-कही जाने की कोशिश करेगा-गिर
जायेगा--यही वापिस ले आना-लापरवाही मत करना-
(सिंदकर और सिपाही अन्दर जा चुके है।) (सुदाम को)
ड्रग्ज से बरवाद हुआ जा रहा है। स्वास्थ्य खराब हो चुका
है। ठीक से खा-पी भी कहाँ सकता होगा । मुझे तो लगता है,
यह जल्दी ही मर जायेगा-.
सुदाम : मुझ से पूछो तो साहब, इसे बचाने की कोशिश करना बेकार
मुरार : लेकिन मैं ऐसी कोशिश करूँगा सुदाम ! तुझे हैरत होगी।
समझेगा मैं पागल तो नहीं हो गया, राज्य की जिम्मेदारी के
साथ-साथ यह भी कर रहा हूँ। लेकिन ऐसा नहीं है । इमी
इन्सान की वजह से मैं आज जिन्दा हूँ। इसने उस वक्त मुझे
अपनी किडनी दी तमी आज मैं हूँ, और बदले में मुझ से कुछ
मांगा भी नहीं । कुछ भी नही । सीधा चला गया। और आज
मैं उसे ऐसे ही मरने दूं? मैं उसे यूँ ही छोड़ दूं? यह कैसे हो
सकता है, सुदाम ! (भावुक स्वर से) इन्सानियत नाम की
भी कोई चीज है या नहीं ? मैं अपने पेट में उसका एक जिन्दा
हिस्सा लिये हुए हूँ. मैं और वह अब बंध चुके है..(मंजुला-
बाई कॉफी ले कर आती हैं।)
मंजुला : कहाँ है आपका वो?
• मुरार : अब तक आ जाना चाहिए था. (व्यग्रता से कॉल-वेल बजाते
हैं । सिपाही आता है) कहाँ है रे वो..
सिपाही :(
: (टालमटोल करते हुए) है"
मुरार : जल्दी ले आओ उसे यहाँ...
सिपाही : कपड़े बदल रहे हैं उसके...
मुरार : क्यों ?
सिपाहो : (संकोच में कपड़ों में 'कर दो उसने"
४२
सुदाम: क्या!
मंजुला · छी: ! कहाँ!
सिपाही : (मंजुलाबाई से) बाहर ही कारपेट पर...
मंजुला : कारपेट पर!
मरान : कमाल है ! (स्वर बदलकर) रहने दो। वैसे भी हम यह
फ्लंट छोड़ हो रहे हैं 'उघर नई कारपेट्स् होगी....
मंजुला . तो क्या हुआ? (सिपाही से) और तुम लोग सब क्या कर
रहे थे?
सिपाही : हम हम क्या करेंगे "उसे कोई सुध-बुध ही नही थी."
मजुसा उसे भले ना हो पर तुम्हे तो होश था या नहीं?
सुदाम : आप परेशान मत होइये, म.जाकर देखता हूँ क्या बात है--
मुरार : तुम रुको । (खुद अन्दर चले जाते हैं । मंजुलाबाई गुस्से मे ।)
सुदाम : अजीब है।
मजला : अब आप ही बताइये, कैसे क्या करें ?
सुवाम : हमारे साहब तो एकदम हिसाबी-किताबी इन्सान.. भावना
से कोसों दूर "पिछले साल जब मत्री थे, तो कितना बड़ा
करप्शन का आरोप लगा था, 'त्यागपत्र दीजिये' का कितना
शोर विरोधियो ने मचाया था। साहब जब खाद्यमंत्री थे तो
सूखे की बात लेकर विरोधियों ने प्रदर्शन और घेराओं का
हंगामा खड़ा कर दिया था। कोई पतली खालवाला होता तो
कभी का कुसी छोड़कर भाग लेता, लेकिन माहब तो हिमालय
की तरह अडिग रहे । हिले तक नहीं। इतनी ताकत थी तभी
तो साहब आज तक टिके रहे और आज वही इस तरह !
मंजुला : मेरी समझ मे तो कुछ भी नहीं आ रहा । मुख्यमत्री बनने को
खुशी मनाने चली थी, तो यह बखेड़ा खड़ा हो गया।
सुवाम : नही । यह उनके स्वभाव मे नही है, भाभी !
मला : पर जो कुछ हुआ है, वह तो सच है, तब क्या?
। (मुरारराव सिंदकर को पकड़े हुए धीरे धीरे आते हैं। सिंदकर ने एक बड़ी पैट, टाई से बांधकर पहनी हुई है। चेहरा ब्लक ?) मुरार : आ। बैठ यहाँ। उसे रिवाते हैं। प्यार से पूर्णपाते हैं। वंठ। ले, कॉफी पी ले। (मजुलाबाई सिदकर र के हाथ में क्रॉफी का कप देने लगती हैं । इधर ला। उससे पकड़ा नहीं जायेगा। (खुद सिंदकर को कॉफी प्लेट मे उंडेलकर देने लगते हैं।) सुदाम : मैं पिला देता हूँ साहब... मुरार : नही । तुझसे नही होगा। (सिंदकर को कॉफी पिला रहे हैं।) वच्चा है एकदम । कुछ नहीं कर सकता और जाने लगा था." कैसे जाता बेटे ? रास्ते पर भीड़ कितनी "ले, कॉफी ले... सिंदकर : (कॉफी पीने से जरा चुस्त हो कर उठते हुए) बस्स । (चलने लगता है।) मुरार : अरे ! फिर से कहां चला ? सिंदकर'" (रोकते है।) सिंदकर : कौन रोक रहा है मुझे ? मार : नहीं सिंदकर, ऐसे मत जाओ.. सिंदकर : साला, उल्लू का पछा ! (सिंदकर यह मुरारराव से कहता है, और मुरारराव शॉक्ड ।) सुदाम : (शर्ट की बांहे ऊपर करते हुए ! ऐं किसे कह रहा है उल्लू का पछा? राज्य के मुख्यमंत्री हैं वे सिंदकर : उल्लू का पछा! सुवाम: अदब से बात कर! मरार : जाने दे, सुदाम । होश में नही है वो । 'सिंवकर : कौन कहता है मैं होश मे नहीं हूँ ? उँगलियां दिखाओ बरा- बर गिनता हूँ। बोलने का काम नहीं। दिखाओ उँगलियाँ, दिखाओ! मुरार : हाँ हाँ । तू बिल्कुल होश में है, सिंदकर.. : . : सिरकर : हाँ 555 मुरार : इसीलिये तो कह रहा हूँ तू खाना-वाना ठीक से खा ले." सिंदकर : हट् ! मुरार : हमारा तुम्हारा एक अलग ही रिश्ता है । है ना सिंदकर? सिंदकर . तुम्हारा होगा, अपन का नही । मुरार : मैं जिन्दा हूँ, मुख्यमंत्री हैं, उसका कारण मेरे पेट की स्वस्थ किडनी है "जो तूने दी है."तूने 'बदले में कुछ भी नहीं मोगा जिसके... सिंदकर : साली चप्पलें... भरार : सिंदकर, आज तू यहाँ से खाली हाथ नहीं जायेगा। (यह सुनकर सिंदकर लड़ने के लिये तैय्यार हो जाता है।) मतलब तू जा नही सकता''तेरा जाना ठीक नहीं होगा- सिंदकर : दरवाजा कहाँ गया? मुरार : मिल जायेगा बाद मे। सिंदकर : नहीं। पहले मिलना चाहिये । और चप्पलें.."वो भी... सुदाम : (धीरे से) अब आप बोलिये नही साहब ! जब दरवाजा ही नहीं मिलेगा तो जायेगा कसे"खाना तय्यार होने तक यही घर मे फिरता रहेगा."हाँ... (सिंदकर किसी चीज से टकराकर गिर पड़ता है।) मरार : (आगे हो कर) अरे अरे" (पास जाकर सम्भालते हैं।) घोट तो नहीं आई सिंदकर? कहां लगी? सिंदकर : (पंट की जेब टटोलते हुए) पंसे "पंसे गये "चप्पलें भी गई.. दरवाजा गया"साला"क्या मजाक है."मजाक ही है."(उठने का प्रपल करता है।) पर भी गये... मुरार : (भावुक स्वर मे) चिन्ता मत कर दू सिंदकर, बेशक सब कुछ चला जाये, तो भी मैं हूँ मैं हूँ तेरा"इस राज्य का मुस्प- मंत्री तेरे पीछे पर्वत की तरह खड़ा हूँ" करकर : (देखता रहता है । इशारे से पास बुलाता है। मुरारराव के पास
४५
आते ही आँख मारते हुये) डरो मत-मैं भी तुम्हारा हूँ.."
मुरार : हो ना?
(मुरारराव की तरफ देखकर सिंदकर चुम्बन लेने का संकेत
करता है।)
मंजुला : यह क्या ? कोई देख लेगा तो क्या कहेगा...
मुरार : कहने दो । अब मैं उसकी फिक्र नहीं करता मंजुला ! एक अतग
ही माहौल में पहुंच गया हूँ मैं । सच्चे प्रेम के संसार में...
मंजुला : इसका और आपका प्रेम !
मुरार : हां, इसका और मेरा प्रेम ! दिव्य प्रेम ! एक खून का प्रेम
मंजुला! एक ब्लडग्रुप का प्रेम ! किडनी की शल्यक्रिया के
एक कोमल तंतु से हम बंध गये हैं, है ना सिंदकर?
सिंदकर : (हाँ में सिर हिलाता है) आय लव्ह यू ! (बेसुरा गुनगुनाने
लगता है।)
मंजुला : कब तक चलेगा यह तमाशा?
भरार : सिंदकर ! आखिर हम दोनों के मन एक हो गये, अच्छा हुआ ।
शरीर तो पहले से ही एक हो चुके थे।
सुराम : (मंजुलाबाई से) ऐसा वैसा कुछ नहीं भाभी ! आप इसका
सीधा-साधा अर्थ समझो.."हाँ...
मुरार : सिंदकर, सिंदकर आज का दिन बहुत मूल्यवान है।
सिंवकर : (इंग्लिश म्यूजिक गाने का प्रयत्न करता है।)
मुरार : गा, मेरे पंछी
.."मेरे प्राण गा"
मंजुला : (सुदाम से) अब मुझसे नहीं सुना जाता".
सुदाम : यह सब "वैसा" नही-सीधे अर्थों में...
भरार : (सिंदकर के गले में बांहे डालकर) अब अपने दिव्य प्रेम से हम
लोक्य प्रकाशित कर देंगे-अपने प्रेम के बूते
का ऐसा कल्याण कर डालता हूँ"विरोधियों की
निकाल देता है-घर के भेदियों की चमड़ी उधेड़ता
""गा""
४६ - तू मिल गया 'सच्चे मानों में दिल ने दिल की राह पाली- (उसे हल्के-से छूकर) तेरी जात कौन-सी है सिंदकर ? जरूर ही वह नीची होगी-इसका मतलब हमारा यह शारीरिक सम्बन्ध समाजवाद कहलायेगा--हर जाति के लिए एक अच्छा उदाहरण रहेगा-क्रान्तिकारी कहलाएगा--- मंजसा : (जल्दी से) भाई साहब, मैं जरा अन्दर खाने की तरफ देखती हूं-(अन्दर चली जाती हैं।) मुरार : क्यों सुदाम, तुम्हे आश्चर्य हो रहा होगा यह सब देखकर ? सुवाम : आपको नही हो रहा ? भरार : युगों-युगों के बन्धन हैं यह-सिंदकर और मैं-दो शरीर-- किडनी एकमही । आत्मा एक । कितनी शान्ति महसूस हो रही है। सुराम : (धीरे-से) साहब, यह सब ठीक है, लेकिन बाहर किसी को पता चल गया तो बहुत बड़ा स्कंण्डल होगा... मुरार : स्कैण्डल ? इसमें कौन-सा स्कंण्डल ? कसा स्कंण्डल? यह तो दुनिया का सबसे पवित्र रिश्ता है, सुदाम ! सुदाम : पर लोगों की समझ में भी तो आना चाहिये... मुरार : इसमें ना समझने की क्या बात है ? सिंदकर और मैं. मैं और सिंदकर- सुदाम : (गला साफ करते हुए) आखिर आप दोनो पुरुष हैं साहब । मुरार : तो? (एकदम भ्यान में आकर) सुदाम इतनी बुरी नजर? छिः छिः। सुदाम : अपने बारे मे नही, लोगों के बारे में बात कर रहा हूँ। सिवकर : क्या कोई गड़बड़ है ? मुरार : कुछ नही भया । अभी खाना आता है, हम दोनों खाएंगे। (सुदाम अनजाने ही कानों मे उँगलियां डाल लेता है।) और मजे से उकार लेंगे। ऐसा पाठ स्कूल में पढ़ा पा हमने । स्कूल को एक-एक याद ताजी हुई जारही है। अ थी, पर वही पढ़ाई खत्म हो गई सिंदकर : (मुरारराव की तरफ निर्विकार रूप से देखते हुए).उल्लं का पछा! (मुरारराव संत्फकॉन्शस हँसते हैं ।) उल्लू का पट्ठा! उल्लू का पट्ठा! मुरार : (जरा अस्वस्थ होकर, दूर से देखते हुए नौकरों को) क्या है रे? जल्दी-से खाना लाओ पहले-भागो-यहां क्यों खड़े हो- (नौकर दौड़कर अन्दर चले जाते हैं ।) सिंदकर : (मुरारराव की तरफ उसी तरह देखते हुए) उल्लू का पट्ठा मुरार : (ध्यान ना देने का प्रयत्न करते हैं) खाना आता ही है सिंद- : कर. सिंदकर : उल्लू का पट्ठा मरार : अरे सुदाम तुम बैठो ना." "खड़े क्यों हो? आं? खड़े क्यों हो तुम? सिंवकर उल्लू का पट्ठा! मुराम : मैं जरा चलूँ साहब । खाने का क्या है, कभी बाद में खा लूंगा --कल, परसों कभी भी मैं तो घर का ही हूँ-जरा थोड़ा पार्टी का काम था -अभी-अभी याद आया-मैं तो भूल ही चला था- मुरार : क्यों ? रुक जाओ ना सिंदकर : (ऊँची आवाज से) ए उल्ल के"पढ़े ! सुवाम : नही--अन्दर भाभी को बता दूं-सुबह आऊँगा-सुबह-~~ अब आज्ञा दीजिये-जाता हूँ- (जल्दी से अन्दर चला जाता है 1) सिंदकर : (मुरारराव की तरफ ब्लकली एकटक देखता है। फिर हंसते हुए) उल्लू का पट्ठा!
:
मुरार : (स्वर दर्द से भरा हुआ) जब तुम ऐसा कहते हो मैया और
वो भी किसी के सामने तो यूं ही गलतफैमी हो जाती है।
लोगों को क्या पता अपना रिश्ता ?
सिंदकर : रोत् । रो। अच्छी तरह रो।
मुरार : तुमसे मैं आदर की अपेक्षा नहीं करता. अपना रिश्ता ही
अलग है--मैं कुबूल करता हूँ कि मैंने कुछ पाप जरूर किए
होगे-आखिर राजनीति है--सेर को सवा सेर होकर
दिखाना पड़ता है राजनीति में "यह सज्जनों का क्षेत्र नहीं है
" पर जब और लोगों के सामने कुछ भी हो, इस राज्य का
मुख्यमन्त्री हूँ मैं-
सिंदकर : और जोर से रो।
मुरार : सिर्फ इतना लिहाज करना, और हमे कुछ नहीं चाहिये हम
दोस्त "हम भाई.."एक थाली मे खाएँगे--
सिंदकर : जोर से रो।
मुरार: नही." (भावना-भरे स्वर मे) भैय्या. 'भय्या.. (रोने लगते
तभी नौकर आ जाता है । एकदम सम्भलकर) क्या है रे?
क्या है ?
नौकर : (सकुचाकर) खाना खाना लगा दिया है."
मुरार : आ रहे हैं, चल-चल भैय्या-
(अंधेरा । सफेद परदे पर प्रकाश ।
टेलिविज़न पर खबरें। खबरें पढ़ने वाला:
"नए मुख्यमन्त्री श्री मुरारराव का अभिनन्दन की के लिए
उनके निवास स्थान पर सुबह से ही उनके चाहने वालो की
भीड़ लगी हुई थी-"
मुख्यमन्त्री को हार फूल आदि देने के दृश्य । उनका हंसता
हुआ पेहरा।
भूतपूर्व मुख्यमन्त्री ने नए मुख्यमन्त्री के विषय में एक पत्र
में
अपने उद्गार व्यक्त करते हुए कहा है कि कामगर वर्ग से
आने वाले इस मुख्यमन्त्री द्वारा सही मानों में इस राज्य का
बहुमुखी विकास होगा, ऐसी आशा में व्यक्त करता हूँ। इसी
प्रकार के उद्गार नए मुख्यमन्त्री ने भी भूतपूर्व मुख्यमन्त्री के
लिए व्यक्त किए और कहा कि उनके द्वारा शुरू किए गए
पुनीत कार्य हम पूरे करके छोड़ेंगे-"
सफेद परदे पर अंधेरा।
अंधेरा।
प्रकाश । घड़ी में पन्द्रह या तेरह घण्टे बजते हैं। मुरारराव
और सिंदकर अन्दर से बाहर आते है । मुरारराव सन्तुष्ट हैं।
नाइट गाउन पहना हुआ है।)
मुरार : (डकार लेते हुए: पानदान लेकर पालथी लगाकर बैठता है।)
तू हमारे यहाँ आया, तूने हमारे साथ चार कौर खाना खाया,
हमें इससे अपना आज का दिन कुछ सार्थक हुआ-सा लग रहा
है । आज बहुत-बहुत खुश हूँ मैं।
सिंदकर : दरवाजा उधर है ना ?
मुरार : क्या हुआ?
सिंदकर : चलता हूँ।.
मरार : कहां जा रहे हो?
-सिंदकर : जाना चाहता हूँ यहां से ।
मुरार: अभी?
सिंदकर : हाँ । जाऊँगा।
मुरार : पर''जरा रुक जाओ। पान खाकर जाना"।
सिंदकर : नहीं (जेवें टटोलने लगता है) साला...
मुरार : क्या हुआ (कोई बात ध्यान में आते हुए) लेकिन मुझे तुझसे
जो कहना था, वह अभी बाकी है। मतलब अभी तक तू..
वैसे ठीक नही था।
:
सिकर: (चौकन्ना होकर फिर से जेबें बड़ी उत्सुकता से टटोलता
:
मगर : (यह सब देखते रहते हैं । फिर गला साफ करते हुए) तो
मैय्या! यह मौका देखते हुए एक-दो बातें कहना चाहता हूँ
तुझसे, सुन रहा है ना तू
(सिंदकर अब पागलों की तरह जेबें बार-बार उलट-पुलटकर
देख रहा है। इस वक्त उसका ध्यान कही नही है। जेबें
उलट-पुलट करने की गति और तेज हो जाती है।)
मुरार : मैया' (सिंदकर का ध्यान नहीं है।)
भैय्या... (सिंदकर का ध्यान नहीं है।)
तो भैय्या.
(अत्यधिक गति से सिंदकर वही जेवें उलट-पुलट करने में लगा
हुआ है।)
मुरार : (भावना से भरे हुए, और कुछ भयभीत होकर यह सब कुछ
देख रहे हैं।) जो तुझे चाहिये वह उसमें नहीं मिलने वाला
भैया। उसमें वह है ही नहीं । क्योकि मैंने वह निकाल लिया
है । जरा यहाँ बैठ और मेरी बात ध्यान से सुन । तेरी ही
भलाई की बात हम करने जा रहे हैं।
(कोई असर नही है। सिंदकर अद्भुत गति से अपने काम में
लगा हुआ है । एक्दम रुककर जेवें टटोलने के लिए निकाली
हुई कमीज, वह गुस्से से जमीन पर पटवता है । मुरारराव
की तरफ लड़ने के इगदे मे देखता रहता है।)
सिरकर : (जोर-से दांत भीचते हुए) उल्लू का पट्टा"
मुरार : (जरा पपराकर) मंया (धीरज करके मिदकर की तरफ
पान बढ़ाते हुए) से पान ले। (सिंदकर लड़ाई के इरादे से
मरारावगी सरफ देखता रहता है।) भैय्या पान से।
(मिदार एक तरफ पकता है, और उसी लड़ाई हाले पोन में
खडा है।) ले पान ले मैय्या "खुद अपने हाथों से मैंने बनाया है। (सिंदकर घर से मिट्टी कुरेदने जैसा कुछ करता है। क्रोधी मुद्रा में हो।) मैं 'मैं डालूं पान मुंह में ? कर, आ कर 'कर माआ देखू"इधर कर मुंह इधर उधर नही (सिंदकर और मुरारराव, उसी जगह पकड़न-पकड़ाई जैसा करते हैं और सिंदकर एकदम से टारजन की तरह चिल्लाकर दौड़ते हुए बाहर निकल जाता है। मुरारराव अन्दर जाने वाला दरवाजा ठीक से बन्द करके टुथ- प्रिक से दाँत कुरेदते हुए चुप बैठे रहते है । सिंदकर वापिस आकर चिढा-सा खडा रहता है।) आ गए भैय्या। आबैठ। दरवाजा बन्द है ना? सभी दरवाजे बन्द हैं ? तेरे सारे इरादे जानते हुए सारी व्यवस्था पहले ही कर दी थी मैंने । यूं ही थोड़े मुख्यमन्त्री बन गया मैं ? सत्ता को गोली खाकर मस्त हुए पहले मुख्यमन्त्री से भी तेज निकला मैं, वो तो बैठ गया हाथ मलते हुए। अब तो बैठेगा ना भैया? नहीं तो खड़ा रह चल । (सिंकदर जबरदस्ती बैठ जाता है।) मेरी बात सुनकर तू जरा विचार करने लायक रहे । इसीलिए तो मैंने तेरी जेबों से गोलियां निकलवा ली थी। (सिंकदर उठना चाहता है।) बैठ भैय्या । (जमीन पर पड़ी उसकी कमीज उठाकर उसकी तरफ फेंकते हुए) यह डाल ले । गोलियां चाहिए हो तो तुझे मेरा कहना सुनना पड़ेगा । (सिंदकर बड़ा अनमना-सा होकर कमीज डालता है।) अब मैं बोलना शुरू करता हूँ। (उठकर एक तरफ रसा हुआ पैड और बॉलपेन लाकर बैठ जाते हैं ।) मगर कोई शंका हो तो एक हाय ऊंचा उठाना। ऐसे। (हाय ऊँचा करके दिखाते हैं।) जब मैं पूर्छ तभी अपनी ५२ बात बताना । तो मैया, किसी एक संयोग से हम इकट्ठे हुए। पारीर मिलेमतलव लह-अप, किडनी वगरा, तब मैं मुख्यमन्त्री नही था। मैं मुख्यमन्त्री बनूंगा ऐसा तो किसी ने सोचा भी नहीं था। खुद मैंने भी नहीं सोचा था, दूसरों की तो बात ही क्या ? जब मैं मरने लगा था, तब डॉक्टरों ने एक विशिष्ट ब्लड ग्रुप का विज्ञापन देकर एक ट्रैप या एक किस्म का पिंजरा लगाया था और उस पिंजरे में तू अपने-आप खिंचकर चला आया...बिना किसी के बुलाये बिना कोई मांग किये "वैसे देखा जाय तो लालच के लिए भी उस वक्त उस पिंजरे मे कुछ रखा नहीं गया था। एक किडनी खोकर तू चला गया। और फिर तेरे लिए जाने-अनजाने मेरे दिल में एक अजीब-सा अपनापन घर कर बैठा । इसीलिए दूसरा पिंजरा तेरे लिए बनाया गया। मुख्यमन्त्री बन जाने के बाद जिस नए विज्ञापन में तू फैसकर यहाँ चला आया । (यह सारी बातें चल रही हैं, लेकिन सिंदकर का ध्यान उधर नहीं है। सिंदकर बारी-बारी से एक हाथ बार-बार ऊंचा कर रहा है।) कुछ कहना है? सिंवकर : गोलियां, गोलियां ! मुरार : बाद मे । हाँ तो फिर अपने मुद्दे पर आते हैं हम । अब तू यहाँ से आसानी से नहीं जा सकता। इस वक्त में जो कुछ भी चाहूँ, कर सकता हूँ, मसलन तुझे दहशतवादी कहकर सरक्षण कानून के अधीन अभी इसी समय जेल, या गद्दार कहकर हमेशा के लिए देश-निकाला! लेकिन अधिकार इस्तेमाल करने की भादत होते हुए भी मुझसे यह नहीं हो सकेगा, क्योकि तेरे लिए मेरे दिल मे कृतज्ञता की भावना है। यह अनुभव कुछ अलय ही है। लेकिन राजनीति की कृतघ्नता-भरी जिन्दगी में यह घेज मुझे अच्छा लग रहा है। .
। (सिंदकर दोनों हाथ ऊँचे करके पागलों की तरह उन्हें हिला रहा है।) हाथ नीचे कर भैय्या, और आगे सुन । आज मैं तेरे लिए ऐसा कुछ करना चाहता हूं, जिससे मुझे कुछ सन्तोष मिले। वैसे मैं बड़ा असन्तुष्ट आदमी हूँ। हो, तो मैं तेरे लिए क्या कर सकता हूँ? सिदकर : (हाथ नीचे करते हुए) गोलियां । मरार : या तो मैं एक ऐसी नौकरी तुझे दिलवा दूं, जिसमे काम कम-से-कम हो, एअर कण्डिशन्ड कैबिन हो, मोटी तन- ख्वाह हो, बार-बार विदेश जाने का चान्स हो। (सिंदकर उंगलियों से 'गोली' का इशारा करता है । अलग-अलग तरीकों से।) तू हां कह दे, तो मिल गई समझ। वैसे इस शहर की किसी आलीशान जगह पर कोई आलीशान फ्लैट भी मैं तुझे दिलवा सकता हूँ। तू चाहे तो उसे चौगुने किराये पर चढ़ा सकता है या उसमें औरतों से धन्धा करवा सकता है। (सिंदकर की ओर से अब भी कोई उत्तर नहीं) नहीं ? जो कुछ मैं कह रहा हूँ, वो तू ठीक से सुन भी रहा है या नहीं ? जिन्दगी मे दुबारा तुझे यह सब कुछ सुनने को नही मिलेगा। अच्छा ये भी रहने दे, तू चाहे तो किसी अच्छे-से उद्योग कालायसन्स और वो भी बिना अपना हिस्सा रक्खे मैं तुझे दिलवा सकता हूँ। पूरी सोने की खान, तुझ अकेले को! (वेट करके) यह भी नहीं ? चलो छोड़ो, तो फिर.. कॉन्ट्रैक्ट देने वाली किमी कमेटी का अध्यक्ष तुझे बनवा दूं? देख ले, कॉन्ट्रैक्ट देने के बदले मे तो सभी ऋद्धि-सिदियों हाय जोड़े सामने सड़ी रहती है । कार, सराय, शबाद, इम्पोटेंड टी० बी० संट, फिज, एअरकण्डीशनर, फनिश्ड पलंट, इनमें से कुछ भी, या यह सब कुछ मिल सकता है । (पोड़ी देर रककर)गोलियां सा-सा के तेरा तो दिमाग सराब हो गया है।
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(सिंदकर न बोलते हुए ओंठो के इशारे से 'गो' 'सी' यह पम्म
बार-बार दोहरा रहा है। चेहरा टेढ़ा-मेढ़ा कर रहा है।)
तू भी कमाल का है। अब एक और जबरदस्त ऑफर है, ठीक
से सुन। राज्य के सहकारी बैंक के मैनेजिंग डायरेक्टर की
पोस्ट ! एक पूरे का पूरा वैभवशाली साम्राज्य ! साथ मे
चमचों की लम्बी कतार, ऐसा ओहदा है यह कि वक्त आने पर
मन्त्री तक झुक जाते हैं । कितनी बड़ी पोस्ट ! और जो पहले
बतायी थी वही सब सुख-सुविधाएं । सिंदकर की तरफ मुरारः
राव की पीठ है, पीछे ताली की आवाज । मुरारराव मुडकर
देखते हैं।) ये हुई ना बात ! अब समझा तू ! (सिंदकर ने
मच्छर मारा है ।) नही इतने पर भी नही । तू आदमी है या
हवान ? कोई महात्मा-वहात्मा समझता है क्या खुद को ?
और तो और महात्माओं के मुंह भी पानी आ जाता है सता
के नाम पर! बड़े-बड़े रईसो से मिलने वाले मान-सम्मान के
नाम पर ! फिर तू किस खेत की मूली है ? अब आखिरी
मौका है."एक ही ऑफर "तेरा भरपेट कल्याण करने वाली
.."खुद भगवान भी झड़प ले जिसे । जहाँ से बिना शर्त चुने
जाओ ऐसी कौन्सटीचुएन्सी का टिकट-लोकप्रतिनिधि की
सनद जेब में रखकर मनमाना स्वार्थ साधने का एक पास !
सत्ता से लेकर मत्ता तक जब जी मे आये, पांच साल तक
तिजोरी खोलने की एकमात्र चाबी ! बोल, हो बोल देभंया
-बोल दे हाँ-और समझ ले तुझे मैने वह दे दी।
(मुडकर देखते हैं । सिंदकर कुर्सी से गायब ।)
अरे ! कहाँ गया ? कहां गया तू भाई ?
(सिंदकर टेबल के नीचे बैठा हुआ है।)
(ढूंढकर) वा. बेटे ! ऐसा मजाक ! बाहर निकल पहले।
निक्ल बाहर!
६ (सिंदकर वैसे ही टेबल के नीचे बैठा हुआ है । मुरारराव भी उसके सामने बैठ जाते हैं !) लालच से तू बच नही सकता भया । यह सरासर कायरता है। यह तो रोने वाला खेल हुआ। बाहर आकर सिर्फ नम्बर:- बता। एक-एक नम्बर याने मेरा दिया हुआ एकाएक खजाना है खजाना! बोल एक की दो, या दो की तीन, या फिर चार? या पांच या सात ? कोई भी एक नम्बर बोल । बोल नम्बर । इक्का मा छक्का ? सोच ले छक्का बुरा नहो- (सिंदकर वैसे ही चुप) नही ? अभी तक तेरा पत्थर दिल ललचाया नहीं ? अच्छा इनमें से कोई भी आकड़े एकदम दो ---ठीक ! कम्पनी का दिवाला--एक में दो "एक मे दो... कोई भी उठाओ "एक ही दफा दो का बैकेट.."चलो जल्दी करो""जल्दी करो" (सिंदकर पहले की तरह ही टेबल के नीचे चुप बैठा हुआ है।) एक और तीन ?दो और पांच? चार और सात ? या अगर चाहो तो छ: और"छः ? या पांच ? कोई भी दो-कोई भी तीन-आखिरी मौका--तीन- जल्दी करो-उठाओ तीन कोई भी तीन--(सिंदकर पहले की तरह ही चुप।) (मुरारराव पसीना पोछकर तेज सांस लेते हुए चक्कर लगाते हैं ।) अच्छा । तुझे कुछ नही चाहिये? कर्म से ही दरिद्री है तू । हठ की भी हद हो गई। बिना कुछ दिये सब कुछ मिल रहा है, वो इसे नही चाहिये। मुख्यमन्त्री का प्रत्यक्ष अपमान कर रहा है तू । अधिकार पाये हुए मुझे अभी चौबीस घण्टे भी नहीं हुए, लेकिन तेरी भलाई के लिए सत्ता का गैर उपयोग तक करने चला था मैं । तुझे इसकी जरा भी कद्र नहीन बन्दर के सामने मोती डाल देने वाली बात हुई, यह तो। मेरी कोशिशे खत्म हुई, मैं हार गया। बाहर आ, जा अब । तू जा सकता है । तेरी गोलियां वापिस कर दूंगा मैं। (सिंदकर टेबल के नीचे से बाहर आकर खड़ा हो जाता है।) हद से ज्यादा हठी है तू, लेकिन तुझे कुछ फायदा पहुंचाने की मेरी इच्छा प्रभी भरी नहीं। तेरे लिए नहीं, अपने दिल की तसल्ली के लिए मुझे तेरे लिए कुछ करना पड़ेगा । मेरे मन का बोझ मुझे हल्का करना ही पड़ेगा। मुझे अपनी आत्मा मुक्त करनी होगी। अपना कर्तव्य करना होगा । - (मुरारराव चक्कर लगा रहे हैं । अचानक मुरारराव सिंदकर को नीचे सीधा गिराकर उसकी छाती पर सवार हो जाते हैं।) भैया सिंदकर ! आखिर नाकामयाब होकर मुझे यह रास्ता अप- नाना पड़ा ।फेरीवाले की जिन्दगी मेफुटपाथ पर म्यूनिस्पलिटी से अपनी जगह का गैर कानूनी हक लेने के लिये जो रास्ता अपनाना पड़ता था, वही रास्ता मुख्यमंत्री बन जाने के बाद भी अपनाना पड़ेगा, ऐसा मैंने स्वप्न में भी सोचा नही था। लेकिन कभी-कभी सत्य स्वप्न कि अपेक्षा ज्यादा अद्भुत लगता है । आदन ना रहने के बावजूद भी मैंने आज इस रास्ते को अपना ही लिया। तेरे पर पडूया तेरी छाती पर सवार हो जाऊँ, इन दोनों रास्तो मे से मुझे यही रास्ता ज्यादा पसंद आया। तो अब मुझे वचन दिये वगैर तेरी छुट्टी नहीं होगी। आज मैं तुझे जो एक से एक बढ़िया चीजें पेश कर रहा था, तूने उनमें से एक भी स्वीकार नही की। लेकिन भविष्य में जिस चीज की तुझे जरूरत होगी वो तू मुझ से ही मागेगा, यह वचन तुझे आज देना ही होगा। जब तक तू ववन नहीं देगा, तब तक मैं तुझे छोड़गा नही।(टेलीफोन बजने लगता है। सिंदकर की छाती पर बैठे-बैठे ही मुरारराव रिसीवर उठाते है।) (रिसीवर पर) कौन बसाले ? पूरा महर छान मारने पर भी तुम्हे यह नहीं मिला? तो फिर बैठे रहिये हाथ पर हाथ घरे । वह नहीं मिला तो अपनी रिटायरमैट पक्की समझिये । कुछ भी करिये, उसे ढूंढ निकालिये । बहाने बिल्कुल नहीं सुनूंगा। नही, अभी जरा काम में हूँ, सुबह, गुड नाईट,एण्ड स्वीट ड्रीम्स । (रिसीवर रख देते हैं । ) बैठो चिल्लाते हुए बेटे, अच्छे पकड मे आये हो। जब मैं फेरी वाला था तब यह फौजदार था, बहुत तंग करता था। अब चखाता हूँ इसे भी जरा मजा। (याद आते हुए) हो तो मैया... सिंदकर : जो चाहिए होगा मुझे। वो आप से मांग लूंगा। छोड़िये अब । छोड़िये । वचन देता हूँ । छोड़िये ! (मुरारराव उठ खड़े होते हैं। सिंदकर भी जैसे-तैसे उठकर खड़ा हो जाता है।) मुरार : तू राजनीति में नहीं है । इसलिये थोड़ा-बहुत सच जरूर बोलता होगा। मानना पड़ेगा। सिंदकर : साला, अब हमारी गोलियां दीजिये और दरवाजा खोलिये ! मुरार : दोनों की व्यवस्था है । चल! (अन्दर जाने वाला दरवाजा खोलते हैं। सिंदकर का हाथ पकड़ कर उसे बाहर जाने वाले दरवाजे की तरफ ले जाने लगते हैं । अन्धेरा । प्रकाश । रात । अकेले मुरारराव सोफे पर जरा कठिनाई से सोये हुये हैं। जोर-जोर से खर्राटे भर रहे है। मंजुलाबाई आती है।) मंजुला : यह क्या? यहीं सो गये? कब गया वो? और हॉल का दर- वाजा किसने बन्द किया था? मैं तो डर गई थो, आपको कही कुछ कर ही ना दे वो। उसका क्या भरोसा? मुरार : (उठकर खुशी से) मंजुला जी हमने ही उसे कुछ कर दिया। वचन ले लिया, वचन-जिन्दगी में जब भी उसे कुछ चाहिये होगा, वो हमसे ही मांगेगी। सिर्फ हमसे। (पैर पसार कर फिर सोफे पर सोने की तैयार करते हैं।) ..
मजुता : यह क्या? वेड-रूम नही है सोने के लिये ? मंत्री बनो चाहे
मुख्यमंत्री, पुरानी आदतें नही छूटेंगी मरी...(मुरारराव को
लेकर अन्दर चली जाती हैं।)
(सफेद परदे पर प्रकाश । परदे पर टी०वी० अनाउन्सरः-
"यह थी कल के कार्यक्रमो की रूपरेखा । आज की सभा अब
समाप्त होती है। कल शाम सात बजे तक के लिये आज्ञा
दीजिये । नमस्कार।"
अनाउन्सर सस्मित नमस्कार करती है। उसके आँख मारने का
आभास । सफेद परदे पर अन्धेरा।
रंगमंच पर भी परदा)
पहला अंक समाप्त
DOO
दूसरा अंक (सफेद परदे पर प्रकाश। टी०वी० समाचार वक्ता और दृश्य।) समाधार वक्ता : यह खबरें हम दूरदर्शन सेवा केन्द्र से प्रस्तुत कर रहे हैं। डिब्बेवालो की राष्ट्रीय परिषद् का आज शहर में बड़ी धूम- धाम के साथ उद्घाटन हुआ। खास तौर से बनाये गये शाही शामियाने में एक सोने का डिब्बा खोलकर, माननीय मुख्य- मन्त्री ने इस परिषद् के उद्घाटन की घोषणा की। अध्यक्षपद से बोलते हुए सांस्कृतिक और मछली उद्योग मन्त्री श्री राव- साहब पन्हाले ने कहा "पार्श्वभूमि में प्रदर्शनकर्ताओं की घोष- णाएँ और शोर) "शहरी संस्कृति को डिब्बेवालों की संस्कृति कहते हैं। जिसके हाय मे पालने की डोरी है," यह मुहावरा अब बदल गया है। "जिस के सिर पर डिब्बों का भार, वही करेगा राष्ट्रोद्धार' अब यह नया मुहावरा चल पड़ेगा। पालने की डोर पकड़ने वाली, अब बड़े-बड़े दफ्तरों में जा कर मोटी-मोटी फाइलो का उद्धार कर रही हैं। फिर भी हमारा देहाती डिब्बेवाला बाहरवासियों का अन्नदाता"वक्त आने पर प्राणों पर खेल जायेगा पर अपने काम से पीछे नही हटेगा, ऐसी गवाही मैं देता हूँ। क्योकि वह मदं है."वह राष्ट्रवादी है। ...
६०
पदाहाहट ।)
(फिर से समाचार बना)
राष्ट्रीय युवा मंघ की तरफ से आज एक विचित्र प्रगर का
जुलूस निकाला गया। देश की विकट परिस्थितियों को प्यान
में रहते हुए अपनी सर मांगे पाप साल तक तहान रपो जार्य,
यह मांग जुलूम के नेताओं ने मुम्पमन्त्रीजी से मिलकर उनके
गामने गी। जुसग के राष्ट्रीय उदेश्य का म्यागत करते हुए
माननीय मुग्यमन्त्री ने नेताओं के साप अनेक विषयों पर गों
दिममेरापीती।
हररे पोर में पान एक पागम में इमान ने भारमन
कर पोड़ी देर के लिये वातावरण में तमामपा दिया।
पापर यह गान गरो के हमारे गे माया पा। मेरी fre.
पर मिीन गानो मेरिणी ने प्यान नहीं दिया, मी.
सिमीरी गभार मौर निगाहोरको जगा
पागोगना उग मानिने पिया मोर.
पा। माfirfast ने पाले मास
ही पिने भामियों को मार मार पर
rand wri fornertif
नायगादी।
दी। बताया जाता है कि इसके बाद सभा का काम-काज ठीक से चलता रहा। गोलीकाण्ड के मृतको की संख्या अब सात हो गई है" सफाई कर्मचारियो की हड़ताल का आज सड़सठवाँ और सम. झौते की बातचीत का छियासठवां दिन है। आज भी दोनों पक्षों में बातचीत चलती रही। माननीय मुख्यमन्त्री ने सवाद- दाताओं से कहा 'हम अभी भी आशावादी है।' 'मुख्यमन्त्री समय बरबाद करके हड़ताल की सफलता को जानबूझ कर असंभव बना रहे हैं । 'हड़ताल फिर भी जोर-शोर से जारी रहेगी', ऐसा हड़ताल कर्मचारियो ने संवाददाताओ को बताया। आज मुख्यमन्त्री की पत्नी श्रीमती मंजुलादेवी ने शहर-सफाई अभियान के महिला संघ में दस मिनट भाग लेकर सफाई करने वाली महिला स्वयंसेविकाओं से पूछ-ताछ की। लायसेन्स के मामले को लेकर आज विधान सभा फिर से गूंज उठी। विरोधी दल द्वारा उपस्थित किया गया नया मुद्दा न मानते हुए माननीय सभापति ने कहा कि 'इसमें कुछ टैकनिकल कठिनाइयां होने के कारण यह नहीं माना जायेगा।' बाद में दिये हुए जोशीले भाषण में अपने विरोधियों पर चारों ओर से चढाई करते हुए मुख्यमन्त्री ने उनके सभी आरोप झूठे होने का दावा किया। "चरित्रहनन के ऐसे हीन प्रयत्नों पर वलि होकर कभी भी मैं त्यागपत्र नहीं दूंगा।" यह बात उन्होंने फिर एक बार गरज कर कही। सत्तारूढ़ पक्ष ने इस घोषणा का स्वागत बड़े जोर-शोर से किया। इस पर विरोधी पक्ष ने सभा का त्याग कर दिया। लायसेन्स के मामले में आज पुलिस ने शहर के प्रमुख व्यापारी और अंध सेवा समिति के अध्यक्ष श्रीयुत नानालाल जमनादास को गिरफ्तार कर लिया और बाद में उन्हें जमानत पर छोड दिया गया। लायसेन्स के मामले में पकड़े गपे व्यापारियो की. संख्या अव आठ हो गई है। शहर के संवाददाताओं द्वारा आयोजित एक चाय पार्टी में मुख्यमन्त्री ने लायसेन्स के मामले को जड़ से उखाड़ फेंकने का आश्वासन दिया। देश में बढ़ते हुए भ्रष्टाचार के बारे में उन्होने चिन्ता व्यक्त की। बाहर एकत्रित प्रदर्शनकारियों पर उस समय थोड़ी लाठी चलानी पड़ी। इस लाठी काण्ड में लग- भग पतीस लोगों के जख्मी होने का समाचार मिला है। इसके बाद महिला प्रदर्शनकारियों ने मुख्यमन्त्री को करीब डेढ़- घण्टे तक घेराव में रखा। (सफेद परदे पर अंधेरा। रंगमंच पर प्रकाश । मुख्यमन्त्री के नये बंगले का सेट । रंगमंच पर मुरारराव टेलिफोन पर गरम । एक तरफ देसाई खड़ा है।) मुरार : (रिसीवर मे गुस्से से) कुछ नही सुनूंगा। मुझे समझाने की जरूरत नही है सेठजी! सम्पादकीय का रुख सीधा है। कौन- सा? यह मुझसे क्यों पूछ रहे हैं ? मैं करप्ट हूँ। यही और कौन-सा? आपकासम्पादक मुझे करप्ट कहता है। नही कैसे ? यही कहना उसका मकसद है। मैं आपका काम करके करप्शन का एक नया आरोप क्यों लूं? मैं कुछ नही कर सकता। वेरी सॉरी। सम्पादक के विरुद्ध? मैं कौन हूँ कहने वाला? आपका सम्पादक है वो । आप चाहे तो उसे रखें या फिर निकाल दें। मैंने भी अब कुछ मामलो में सख्ती बरतने की सोची है। (थोडी देरसुनते रहते हैं)आपका प्रश्न है, में कुछ नही कहूंगा । प्रोसीड तो होइये, देखते हैं। हाँ; लेटर दीजिये, फिर मिलिये । ठीक है, मिलिये। देख लिया जायेगा। (रिसीवर रखकर देसाई से) जरा कड़वा बूंट पिलाया है तभी माया है ठिकाने ? सम्पा- एक को पत्र दे रहा है, नौकरी से छुट्टी करवायेगा उसकी । वैसे .
mero मैंने कुछ नहीं कहा उससें । मैं कौन होता है कहनेवाला? देसाई : टैक्स के मामले में आपके बिना पार लगना मक्किल है। यह बात उसकी समझ में आ गई होगी। आखिर है तो बनियो ना। अपना मतलब अच्छी तरह समझता है। मुरार : चालाकी में तो मैं उसका बाप हूँ। सीधों से बेशक हम सीधे रहते हैं, लेकिन हमें कोई बुरा समझे तो" देसाई : ठीक है साब, बिल्कुल ठीक है। मुरार : इस फटीचर सम्पादक को मैंने ही फॉरन भिजवाया था शिष्ट- मण्डल मे। दो कमेटियों पर भी लिया था। इसके अलावा इसकी लड़की की शादी में खुद शरीक हो कर सौ रुपये का तोहफा दिया था। आदमी तो दो कौड़ी का भी नहीं है। चोर कहीं का ! सोचा ,गरीब है, जाने दो। इतने पर भी मैं ही करप्ट ? कहता है सारे नियमों को तोड़कर यह लायसेन्स कैसे दिये ? मक्खन भी लगाता है, कहता है, "मुख्यमन्त्री के स्वच्छ चरित्र से हम पूरी तरह आश्वस्त हैं।" देसाई : पर साब, वो अकेला नही है । उसकी क्या बिसात जो इतना सब कह दे ? उसके पीछे कौन-कौन किस-किस उद्देश्य से है, सुना ही होगा आपने? मुरार: हाँ, जानता हूँ मैं । वो रावसाहब... (याद आने पर अत्यधिक रोषपूर्ण घेहा।) बेसाई और वो टी. टी.. मुरार : टी० टीका तो दिमाग खराब हो गया है आजकल देसाई : साड, और भी एक है उनके साथ । मुरारकीन? साई : अब क्या बताऊँ सान, बेकार चुगलखोरी का इल्जाम लगेगा। भरार: नहीं लगेगा। कौन है वो ?.. देवाईसवारतें।
.. मुरार : कौन सदावते? देसाई : अपने सचिवालय का। मुरार : परिचय विभाग का डायरेक्टर? वो? देसाई : वही। मुरार : उसका क्या ताल्लुक है? देसाई : उस सम्पादक के साथ उसके घनिष्ट सम्बन्ध है । मुरार ' अच्छा! देसाई : सदावर्ते की कविताएँ उस दैनिक के रविवारीय परिगिप्ट में हमेशा छपती है। पिछले महीने कई बार वो सम्पादक और यह सदावर्ते, उस ब्लू-मून बार में रात को इकठे बैठकर पोते भी दिखाई दिये थे। भगवान जाने पोते-पीते क्या बात की होंगी! इतनी रद्दी कविताएँ वो सम्पादक यूं ही थोडी छाप देगा? वो भी बार-बार । बदले मे कुछ तो.. भरार : सच कह रहा है। देसाई : कोई ना कोई भेद की बात जरूर बताई होगी उस सदावर्त ने 'यूं ही थोड़े सम्पादकीय लिखने की हिम्मत पड़ी होगी उस फटीचर सम्पादक की? मुरार: : (जरा विचार मग्न । फिर एकदम फोन उठाकर) कौन ? मोगरे ? जरा परिचय विभाग के प्रमुख सदावर्ते से मिलाइये । ऑफिस मे नही है ? घर पर मिलाइये । घर पर। (ठहर कर) घर पर भी नही है ? कहाँ है, पता लगाकर मुझे रिंग करने के लिये कहिये उसे । जल्दी । (रिसीवर रखकर) अभी छुट्टी कर देता हूँ। : देसाई : ऐसा मत कीजिए साव"""वेचारा बाल बच्चों वाला है.'' मुरार : घर के भेदी के लिये कोई क्षमा नही, देसाई। (हमारा ही अन्न सा कर, हम से ही वैईमानी? (रिसीवर फिर से उठाकर) मोगरे, सदावर्ते जहां कही भी हो वही उसे सस्पेंशन प्रार्डर दे --
दिये जायें।
मोगरे :.(लाइन पर) पर साहब"
।
मुरार : दीज़ आर माय ऑर्डर्स।
मोगरे : (लाइन पर) पर सरकारी नौकरी मे किसी पर कुछ आरोप
लगे बिना..
'मुरार : आरोप गये जहन्नुम मे । सदानते को अभी से सस्पैण्ड समझो,
बल्कि इसी मिनट से।
मोगरे : (जरा रुककर) अच्छा साहब, मज देता हूँ ऑर्डर्स ।
'देसाई : (मुरारराव रिसीवर रखते है। उसी समय) उसकी जगह
किसी और को सौंपने की भी तो व्यवस्था करनी पड़ेगी साब!
कुछ भी हो काम में रुकावट नही पड़नी चाहिए । आजकल दिन
ऐसे हैं विरोधी दल वालों ने तो वैसे ही शोर मचा रखा
..
मुरार
मुरार : उसकी जगह भरने के लिये कोई है तुम्हारी नजर में ?
बेसाई : एकदम बताना तो जरा मुश्किल है साब" लेकिन अगर आप
कहे तो हो जायेगा कोई एक ।
मुरार : नियुक्त कर दीजिये उसे।
देसाई : लेकिन वो इस विभाग का नहीं है.'
: यह हमारे ऑर्डर है। अर्जी दे दीजिये, एपॉइण्टिड लिखकर
साईन कर देता हूँ। घर के भेदी को निकाल ही देना चाहिये ।
देसाई : बहुत अच्छा साब ! आपकी दूरदर्शिता के क्या कहने ! "एक
पंथ दो काज!
मुरार : इतना कुछ करने पर भी, हम पर कुछ ना करने के इल्जाम
.
लगाने जाते हैं।
देसाई : राजनीति है साब ! लोग जलते हैं । आप को उन्नति चुभती है
उन्हें।
भरार : मैं अपने काम के बल पर बना हूँ, देसाई ! आय एम ए सेल्फ
१६
:
मेड मैन ! किसी से कुछ लिया दिया नहीं मैंने।
देसाई : यही बात है। तभी तो कुछ लोगों को आप ज्यादा ही खटकते
हैं । उस पर आपकी जात...
मुरार : वो मुझे भी चुभती है कभी-कभी। पर मेरा इस जात में पैदा
होना, मेरे हाथ में तो नही है ?
देसाई : सही है."
मुरार : लेकिन मेरी पत्नी तो ऊंची जात की है ना?
देसाई : इसी लिये तो आप और भी ज्यादा चुभते हैं लोगों को। भाभी
साहिबा की जात, उनका रूप"इस उम्र में भी कैसी-
(मंजुलाबाई बाहर से आती है। साथ में एक सिपाही। उसके
पास शॉपिंग के बहुत से पैकेट्स।)
मंजुला : जाकर अन्दर रख दे। (सिपाही पैकेट्स लेकर अन्दर चला
जाता है । मंजुलाबाई बैठते हुए) थक गई बावा । महिला सभा
से शहर-सफाई, वहां से क्लब, फिर वहां से परली तरफ की
झोपड़ियो के लोगों से बातचीत.."वहाँ की औरतो ने तो तंग
ही कर दिया। गाडी छोड़ने का ही इरादा नही था उनका।
कुछ तो आकर सामने लेट गई।
मुरार : घेराव डाला?
मजुला : आप का नाम लेने के लिये हठ कर के बैठ गई। (शरमा जाती
देसाई : (उत्सुकता से) फिर?
मजुला : आपको मतलब?
देसाई : नहीं, नहीं, ये बात नहीं
मंजुला : (मुरारराव को) वहाँ से आते हुए मार्किटिंग भी करती आई।
परदो के कपड़े एकदम टॉप मिले और कार्पेट्स तो वण्डरफुल
उठवाकर नये बिछवायेंगे कल । फर्नीचर बहुत सुपर्द
था. मैंने तो झट से ऑर्डर दे दिया !
मुरार : वैसे जरूरत तो नहीं थी."जो है वो क्या बुरा है। नया ही तो मंजुला : आप अपना दर्शन अपने तक ही रखिये, 'सादा जीवन उच्च विचार' । मुझसे नहीं होगा। कितने लोग आते हैं यहाँ । फॉरे- नर्स भी आयेंगे। अपने देश की इमेज भी तो रहनी चाहिये दुनिया में । हमारा बंगला देखकर वो लोग क्या सोचेंगे ? फिर प्रधानमन्त्री भी तो आ रहे हैं परसों.. मुरार : खूब याद दिलाई। देसाई, आई० जी० पी० बसाले का फोन मिलाना जरा."प्रधान मन्त्री को परसो मीटिंग के बारे में कहना है कुछ... मंजुला : उन झोपड़ियों के सुधार कार्यक्रम के लिये.शुरू में कम से कम चार-एक लाख रुपये तो चाहिये होगे हमे । सुना ना आपने ? मैंने कमेटी में बता भी दिया है." मुरार : क्या ? मंजुला : किसी भी तरह से दिलवा दूंगी। मुरार : जरूरी कामों तक के लिये यहाँ पैसा नहीं है... मंजुला : वो सब आप जानिये । मैंने तो कह दिया है ! मुरार : अरे लेकिन, ये क्या अपने घर के पैसे हैं ? मंजुला : झोपड़ियो का सुधार मेरे घर का काम तो नहीं है। इसने सुन्दर शहर पर वो एक कलंक है । फॉरेनर्स जव यहां आते होंगे, तो क्या सोचते होगे? देश की इज्जत तो हमेशा ही महत्वपूर्ण होती है । मैं कुछ नही जानती, कुछ भी कीजिये, पैसे दिलवा दीजिये। मैं वचन दे चुकी हूँ। चार लाख से कम नहीं लूंगी। बाद में उद्योगपतियों और व्यापारियों से और भी ले लूंगी। इधर-उधर से जमा किये हुए चार पैसों पर वह लेडी रामराव कमेटी में अपनी शान बधारती फिरती है और में मुख्यमन्त्री की पली होते हुए किसी से पीछे क्यों रहूं ? :
देसाई : (फोन मिलाकर) साब, आई० जी० पी०- मुरार : (रिसीवर मे) कौन ? वसाले ! आज आपकी वजह से डेढ घटे तक घेराव मे फंसे रहे हम । महिला प्रदशिकाओं को हटाने के लिये महिला पुलिस ही नहीं थी वहाँ। कारण नही पूछ रहा हूँ मैं | अच्छा प्रधानमंत्री की पब्लिक मीटिंग की क्या व्यवस्था कर रहे हैं ? मीटिंग है, ये तो याद है ना ? पर व्यवस्था क्या कर रहे हैं ? कितनी? चार रिजर्व बटलियन्स ? और सादे कपड़े वाले ? ज्यादा रखिये । कुछ ज्यादा तैनात कीजिये। सभा स्थल पर सिटी की चार वटैलियन्स काफी है। शहर में जितनी हो सके उतनी अधिक रखिये। साथ मे कितने देने वाले हैं ? फिजा जरा गड़बड़ है. गफलत से काम नही चलेगा। मेरी नाक कट जायेगी। और देखिये हमारी घोष- णाएँ जोर-शोर से पोपित होती रहे, इस काम के लिये बहुत लोगो की जरूरत पडेगी। विरोधियो के भी प्रदर्शन हैं । हमारी आवाजें उनसे ऊपर ना उठी तो बाद में पी० एम० हमारी बिन पानी की कर देगे। नही, दल पर निर्भर नहीं रहना है। उसकी स्यवस्था अलग से की जायेगी। आपको जो काम बताये गये हैं, उनसे मतलव रसिमे बसाले ! दूसो के मामलों में पड़ना ठीक नहीं ! शहर के चौक मे प्रदर्शन करने वालों की खिचड़ी बड़े जोरो-शोरों से पक रही है। उस जले हुए आदमी की राम पी० एम० को नजर करने का इरादा है उनका । हमारे आदमी जोरदार होने चाहिये। समय आने पर लड़ने की तयारी भी रमनी होगी। किमी भी हालत में पी० एम० तर राम नहीं पहुंचनी चाहिये । प्रधानमंत्रीकीवार पौर में सनी ही नहीं चाहिए। और वो जिम्मेदारी आपरी है। गाडीके गोरे एप मर भी गया तो उमे बाद में देरा सँगे। पुलिस पी. निस्ट में मांग परहकर मे आइये जरूरत पांजोदमदमारपये - . रिपोय- दीजिये उन्हें । जरे नी भोगफलत नहीं नहीं होनी चाहिये । उस दिन का पूरा कार्यक्रम ठीक से समझ लीजिये। देसाई मिलेंगे ही आप से । उनसे सलाह-मशवरा कर के सब कुछ तय कर लीजिये। (रिसीवर रख देते हैं ।) मंजुला : फिर कितने लाख देंगे? झोपड़ियो के सुधार" मुरार : (जरा चिढ कर)ओ मेरी मां, मेरे सामने इससे भी बडे सवाल हैं । (देसाई को उपस्थिति से संकोच कर) अव कैसे समझाऊँ आपको । अच्छा देखूगा । लेकिन झोंपड़ी का सुधार माने क्या ? आप करने क्या जा रही हैं ? मंजुला : पूरी झोपड़पट्टी के चारों ओर यूकलिप्टस की धनी झाडी लगाई जायेगी। झोपड़ियो पर सुन्दर-सुंदर चित्र बनवाये जायेंगे। झोपड़पट्टी के बच्चो और औरतों को अच्छे-अच्छे कपड़े बांटे जायेंगे। यूकलिप्टस की झाड़ी से अन्दर की झोप- डियां नजर नहीं आयेंगी । और वहां की बदबू भी यूकलिप्टस के सुगंध से दव जायेगी। इतने पर भी अगर किसी का ध्यान उस तरफ गया, तो सुन्दर-सुन्दर चित्रों से झोपड़ियां अच्छी दिखाई देंगी। बच्चे और औरते अच्छे-अच्छे कपड़े पहने हुए दिखाई देंगे। देसाई : वाः, वाः ! याने मब कुछ एकदम बदल जायेगा, यूं कहिये ना । मंजुला : आपसे पूछा नहीं था, देसाई । (फोन बजने लगता है।) देसाई : (फोन उठाकर) यंस- मोगरे : (लाइन पर) मैं, मोगरे, माह्व को दीजिये जरा । देसाई : क्या बात है, मुझमे कहिये । मोगरे : (लाइन पर) साहब है ना वहाँ ? देसाई : (नाराजगी से रिसीवर मुरारराव को देते हुए) यह मोगरे, कभी-कभी बहुत नखरे दिखाता है, साव! --
७०
.
मुरार : (रिसीवर मे) हो । कौन ? सदावर्ते? कौन सदावर्ते
देसाई : वही साब, परिचय विभाग का प्रमुख । आपने जिसको सस्पैन्ड
किया है।
मुरार (स्वर मे कुछ सख्ती) हाँ । बोलिये "बोल रहा हूँ। (गुस्सा
हो कर) कितनी बार पूछेगे ? हाँ, आप को सस्पैन्ड कर दिया
गया है । जो कुछ भी कहना हो लिखकर दीजिये। चार्जशीट
बाद मे दे दी जायेगी। दोप' और वो भी मुझी से पूछ रहे है ?
यू-आर-सस्पन्डिड । खत्म । नही, मिलने से कोई फायदा
नहीं। कल सुबह किसी को चार्ज दे दीजिये । और फिर कभी
अपना चौखटा सचिवालय में नहीं दिखाइये । माइंड यू । कविता
कीजिये कविता।
(रिसीवर रख कर) नॉन्सेस ! पूछ रहा था! अपराध क्या
है ? इतनी हिम्मत !
(यह सब कुछ सुनकर देसाई खुश है। मंजुलावाई अन्दर चली
जाती है ।)
देसाई : (जहाँ मजुलाबाई बैटी थी वहां का एक अखवार उठाकर उसे
कंज्युअली देखते हुए, अनजाने में एकदम) वाप रे !
मुरार . क्या हुआ?
देसाई : नहीं, कुछ नहीं । ये-अखबार वाले-
मुरार अब और क्या हुआ? कौनसा अखबार है यह ? गिरिराज !
और क्या कीचड उछाली है उसने ?
(अपसेट हो जाते हैं ।)
मंजुला - (अखवार खोजती हुई अन्दर से आती है) भूल ही गई थी मैं
तो । आते समय जान बूझ कर लाई थो-
मुरार : लाओगी ही। मेरे विरुद्ध बापड़ जो उछला जाता है उसमे !
देसाई : भाभी माहिवा के कहने का मतलब यह नहीं था-
मुरार: तू उमड़ी तरफदारी मत कर क्या लिसा है उस अखबार में?
७१ देसाई : कुछ नहीं, गंदा-सा एक कार्टून है- 'मंजुला : (बेतहाशा हंसने लगती है, फिर एकदम रुककर गंभीर चेहरे से) कुछ नहीं । हंसी आ गई थी। मुरार : समझ गया। मेरा कार्टून होगा। (देसाई) लिखा क्या है पढ़ो तो सही? देसाई : (बड़ी मुश्किल से सभ्य शब्दो मे बताने का प्रयत्न करते हुए) यही है सतारूपी मक्खन का भूखा-मोटा बिल्ला.! --यही है पा- -(अड़ जाता है।) कुछ नहीं। हमेशा की तरह । और आता हो क्या है उसे, साव । उसका लेवल ही यही है । मजुला : मेरा तो अब इन बातों से मनोरंजन होने लगा है। रोज का रोना कौन रोये ? लेकिन दिमाग कमाल का पाया है उसने । हर लेख में इतने नये-नये शब्द सूझते कसे है उसे ? मार : (गुस्से से) मेरा बस चले तो उसे जिन्दा ना छोडूं-देश निकाला दे दूं- देसाई : (अखबार अच्छी तरह से तह लगाकर जेब में रखते हुए) लेकिन साब को इनके पीछे पड़े रहने का टाईम कहाँ है ? हाथी चले अपनी चाल- मुरार : (देसाई की जेब मे रखे अखबार को देखते हुए) वो अखबार पढ़ने के लिये तुझे टाईम है देसाई ? देसाई : (अखबार जल्दी से निकालकर सोफे पर फैकते हुए) ना ना साद "जब फैक ही देना है तो घर जा कर कचरे को टोकरी मैं फेंक देता.."उसमे पढ़ने लायक है क्या ? झूठ-मूठ के आरोप ""जिनका न कोई तुक है" बकवास "ट्रेश... मुरार : हिम्मत हो तो आरोप लगा के देखें. "जेल में ना डलवा दूं? देसाई : इतनी हिम्मत होती तो लंगोटियां उतारने का ही काम क्यों करता? (मंजुलाबाई से) माफ कीजिये भाभीसाहिबा". मजुला : (सोफे पर पड़ा अखबार हाथ में ले कर। उसे देखने मे मस्त । . ?
एकदम उपर देखकर) क्या हुआ?
देसाई : जरा अश्लील भाषा यूज़ कर बंठा-
मंजुला : कौन-सी?
देसाई : यही-यो-लंगोटी-
मंजुला · इसमे अश्लील क्या है ? मेरे कहने का मतलब (अखबार की
ओर इशारा करते हुए) यह सब पढ-पढ कर आजकल मुझे
कुछ महसूस ही नहीं होता...
मुरार : मन्दर जाकर जरा चाय भिजवाएंगी ? (मंजुलाबाई हाँ
कहती हुई अन्दर चली जाती हैं। उठते हुए अखबार उठाने के
इरादे से असवार की तरफ एक बार देखती हैं, लेकिन फिर
असवार बिना उठाये अन्दर चली जाती हैं । मुरारराव देसाई
से) तू जरा आई० जी० पी० वसाले की तरफ जाकर परसा
की आम सभा का वन्दोवस्त देख आ...
देसाई : (उठते हुए) बहुत अच्छा.''
(मोफे पर पड़े अखबार की तरफ एक क्षण देसता रहता है।
फिर चलते हुए) गाड़ी लेकर जाता है...
(देमाई जा घुमा है। अब मुरारराव अदेते हैं। सोफे पर पड़े
अपवार की ओर सिंचते हैं; उगे उठा लेते हैं । जल्दी से अरा.
पार एक नजर देखकर, फिर ठीक से पढ़ने सगते हैं। पेहरे
पर अनुरूप भाव आते हैं। बीच में मुठियो भिव जानी है।
गर पर पगीना आ जाता है। टेलिफोन बजने सगता है।
मुगरराव एकदम घबराकर असबार अपने पीपे छिपाते हैं।
फिर वही रागकर टेलिफोन उठाते हैं।)
मांगरे : (माइन पर) हेनो, साहा"
मुरार :सो। (गमा माफ करते हैं।)
मोगरे : रायमाय मिसना पाले हैं।
मार : (पुग्मा मे) यो...
७३
मोगरे : (लाइन पर) आने के लिये कह दूं उनसे साहब ?
मुरार : (गुस्से पर काबू पाते हुए) हां, और कर भी क्या सकते हैं।
(रिसीवर रख देते हैं। फोन फिर बजने लगता है। रिसीवर
उठाकर) अब और क्या है ?
मोगरे : (लाइन पर) टी० टी० आये हैं।'
भरार : रुकने के लिये कहिये उनसे । मैं जरा काम कर रहा हूँ।
(रिसीवर रख देते हैं। फिर से अखबार की तरफ बढ़ते हैं।
उसे फाड़ने लगते हैं। लेकिन फाड़ने की बजाय उसे फिर वहीं
कहीं छिपा देते हैं। नौकर चाय ले कर आता है । मुरारराव
गुस्से के मूड में ही बैठे-बैठे चाय पीने लगते हैं । नौकर अन्दर
चला जाता है। अन्दर से सुदाम आता है।)
सुदाम : नमस्कार साहब !
मुरार : (उसे देखते हुए) औ.."उधर से कैसे आया ?
सुदाम : यूं ही, किसी खास वजह से नहीं। गाड़ी उघर के दरवाजे की
तरफ पार्क की थी, इसीलिये उसी दरवाजे से चला आया।
रास्ते में भाभी मिल गई, रुककर दो चार बातें उनसे भी कर
ली...
मरार : कैसी बातें?
सुदाम : सही आम बातें-- फर्नीचर, परदे...
मुरार': अच्छा ! (चाय पीते हैं । मूड डार्क है।) चाय लोगे ?
सुराम : पीके चला था। और एक जगह चाय पीने जाना भी है।
घेराव मे कोई विशेष तकलीफ तो नहीं हुई ?
मुरार: हुई भी होगी तो सहन करनी पड़ेगी। तेरे आने की कोई खास
वजह ? सुवह विधान सभा में तो इकठे थे हम
सुदाम : जी हाँ । सब पूछा जाय तो वैसे वजह खास कुछ नहीं...
मरार : लेकिन कुछ तो जरूर होगी ?
सुदाम : हाँ, थोड़ी सलाह लेनी थी।
७४
मुरार : मुझसे?
सुराम : जी हाँ, क्यों?
मुरार: कुछ नहीं।
सुदाम : (जरा अस्वस्थ होते हुए) ऐसा क्यों पूछा आपने साहब ?
जरूरत पड़ने पर मैं हमेशा आपसे ही सलाह लेता आया हूं."
पिता की तरह माना है आपको...
मुरार : हाँ, हो। पूछ जो पूछना है।
सुदाम : (आंख ना मिलाते हुए) मतलब साहब"शायद आजकल..
(लड़खड़ाते हुए) मेरा फोन टैप किया जा रहा है."
मुरार : अच्छा!
सुदाम : सोचता हूं, अगर सचमुच ऐसा है तो यह बडी अजीब बात
है। वैसे "यह कोई मामूली बात नही मतलब साहब, मैं एक
फुलफ्लज्ड मंत्री हूँ.."दल की कार्यकारणी का मैम्बर हूँ. और
एक निष्ठावान कार्यकर्ता हूँ-लोक प्रतिनिधि हूँ-ऐसा तो
अंग्रेजों के राज्य में भी नहीं हुआ।
मुरार : अंग्रेजो के जमाने में तू तीन-एक साल का होगा...
सुदाम : मेरे कहने का मतलब यह नही है। अपने बारे में नहीं कह
रहा हूँ मैं । वैसे ही जनरल बात कर रहा था। एक मंत्री का
फोन टेप होने का मकसद
मुरार : अच्छी बात नहीं है यह ।
सुदाम : तब भी वह हो रही है"(लडखडाते हुए) और आप आप
जानते ही होंगे इसके बारे मे.
मुरार : ऐसा क्यों सोचता है तू ?
सुदाम : अगर ना भी पता हो तो मुझे करेक्ट कर सकते हैं लेकिन
गृह-मंत्रालय तो आप के ही हापों में है।"
मुरार: मुझे कोई जानकारी नहीं है !
सुदाम : बाप कह रहे हैं इसलिए मान लेता हूँ..
अबोली
?
मरार : मान लेता हूँ याने ३ मानवाही पडेगा
मैं झूठ बोल रहा हूँ ऐसा
सुराम : ना'"ना"बिल्कुल नहीं...
मुरार : अगर सोचते हो तो सीधा आरोप लगाओ।
सुदाम : नहीं. "यह मकसद नहीं था मेरा...
मुरार : तेरे फोन के बारे में पूछ-ताछ कर लूंगा मैं । और कुछ
सुदाम : और ''नहीं, कुछ नही."
भरार : मतलब सिर्फ इसीलिए आया था तू?
“सुदाम : यूं ही चला आया था...
मुरार : यूं ही आया था ! तो बैठना।
सुदाम : जाना है जरा.."चाय पार्टी में...
मुरार : अच्छा तो जा।
मुदाम : (अस्वस्थता) वैसे अभी थोड़ा समय है...
मुरार : जो करना है, उसे एक बार सोच ले सुदाम । वैदूं कि जाऊँ-
यह रवैया ठीक नही। (टेलिफोन बजता है। रिसीवर उठा-
कर) रावसाहब आ गये?
मोगरे : (लाइन पर) चल पडे हैं साहब । लेकिन टी० टी०."
मुरार : बिठाये रखो उन्हे (रिसीवर रख देते है। पानदान लेकर बैठते
हैं । पान बनाने लगते है।) पान खाओगे, सुदाम
सुदाम : (अभी भी अस्वस्थ है।) ना।
मुरार : तुम सोचते हो कि मैं तुम्हारा फोन टैप करवाता हूँ ?
सुदाम : (इस सीधे प्रश्न से हड़बड़ाकर) ? नही, नहीं साहब...
नहीं-बिल्कुल नही-
मुरार : तुम्हारे विश्वास का सबूत क्या है ?
सुदाम : विश्वास-मतलब...?
मुरार : पक्का विश्वास भी नही है ?
सुगम : (जुबान बड़खड़ाते हुए) सच पूछा जाय तो"फोन टैप होता
?
७६ है यह सच है-इस बारे मे मेरी जानकारी पक्की है । मुरार : और फोन टैप मेरे हुक्म से होता होगा-(सुदाम कुछ बोलना चाहता है। लेकिन चुप रहता है।) बोल ना । तू सोचता है मैंने ही तेरा फोन टैप करवाने का बन्दोबस्त किया है ? यही सब जायजा लेने आया है क्या तू ? (सुदाम चुलबुलाते हुए खड़ा रहता है।) मुरार : एक साथ काम करने वालों के लिए एक दूसरे पर ऐसा शक- सुबह करना ठीक नहीं है, सुदाम । सुदाम : (चिढ़कर) में भी यही कह रहा हूँ-- मुरार : तब भी तूने मेरे बारे में इस तरह सोचा, जो तेरे पिता के समान है ? सुदाम : मैं भी क्या करता ! वजह ही कुछ ऐसी थी- मुरार : यह सही है सुदाम! तेरा फोन टैप होता है। मेरे ही दिये हुए ऑडर्स हैं। सुदाम : लेकिन क्यों? मुरार : मंत्रिमण्डल के हर मन्त्री का फोन टैप किया जाय, यह मेरे ही ऑडसं हैं। सुवाम : मेरा भी? जिसकी आप पर इतनी निष्ठा है... मुरार : निष्ठा की कीमत भी तुम्हे मिल गई ! उपमन्त्री से फुलफ्लग्ड मन्त्री बना दिया है तुझे मैंने। पहले के मुख्यमन्त्री से की गई बेईमानी का इनाम। सुराम : ईमानी तो सभी ने की? मरार : मना कौन करता है ? इसीलिए सभी के फोन टैप करने के भी मेरे ऑडर्स हैं । जो एक बार बेईमान हो सकता है वह दोबारा भी हो सकता है, सुदाम! सुदाम : (संकोच से) यह बात आप पर भी लागू हो सकती है . देवदवी के लिए माफ कीजिए- ७७ . मुरार : अभी पाइंट यह नहीं है, क्योकि मैं मुख्यमन्त्री हूँ। कल मुझे मात देकर तू मुख्यमन्त्री बन जायेगा तो तेरे लिए भी बेईमानी का कोई सवाल नहीं रह जायेगा। लेकिन तब तक तो मुझे तुम पर नजर रखनी ही पड़ेगी। सुदाम : इसका मतलब, मुझ पर आपको भरोसा नही रहा? मुरार : असल में मुझे तुम पर भरोसा कभी था ही नहीं । सौदेबाजी में सौ फीसदी भरोसा करके चलना मुझे मेरे फेरी के धन्धे ने सिखाया ही नहीं। फिर भी औरों की बजाय तुझ पर मैं ज्यादा भरोसा करता था, क्योंकि कुछ समय तक तुझे मेरे सहारे की जरूरत थी, लेकिन अब जिसकी जरूरत खत्म हो चुकी है। सुकाम : साहब (बहुत ज्यादा भावना से भर कर चुप हो जाता है।) मुरार : अगर ऐसा न होता तो रावसाहब की अभिनन्दन सभा में तू इतने उत्साह से शामिल न होता। रावसाहब की सिद्धान्त- प्रियता और सेवा-भाव की इतनी मुंह भर-भरकर तारीफ भी नकरता- सुदाम : लेकिन वो एक शिष्टाचार की बात थी... मुरार : वही तो। मुझसे पूछे बिना अव तुझे यह सब सूझने लगा है। सुदाम : साहब, आप तो जानते हैं कि राजनीतिक मामलों में रावसाहब और मेरी कभी बनने वाली नही है उनके बारे में मेरी सही राय भी आप जानते हैं." मुरार : मेरे बारे में भी शायद तेरी सही राय वे जानते हों। लेकिन वह सब मैं कहां जानता हूँ ? वही जानने के लिए ही तो फोन रैप करने की जरूरत पड़ी । मुदाम : (दोबारा उठते हुए) चलता हूँ मैं देर हो जायेगी" (रावसाहब आते हैं। हाथ में चांदी की मूठ वाली छड़ो।) रावसाहब : (झुककर) रामराम, रामराम मुरारराव! कैसे हो सुदाम जी? .
मुरार: (सुदाम को एक तरफ ले जाकर धीरे से ) इसके बारे मे हम बाद में बात करेंगे। अभी कुछ मत बोल। अपनी पॉलिसी की तरह । समझे? (सुदाम ना समझकर भी यह सब कुछ सुन लेता है।) अच्छा! अब तू जा सुदाम। (रावसाहब ध्यान से देख रहे हैं । सुदाम चला जाता है।) रायसाहब : आज विरोधी दल को दरवाजे पर बिठा रखा है, मुरारराव ! मुरार : जिसकी जो सही जगह है वह उसे कभी न कभी दिखानी ही । पड़ती है। आज इधर कैसे चले आये ? (मंजुलाबाई बाहर आई हुई हैं-- रावसाहब को देखकर फिर से अन्दर चली जाती हैं।) रावसाहब : कोई खास वजह नही, इस तरफ से जा रहा था, सोचा मिलता चलूं। सुना स्त्रियों के घेराव में फंस गये थे आप ? वैसे बुरा तो नहीं है। मुरार : सच कहा जाय, तो आपको ही होना चाहिए था मेरी जगह । रावसाहब : अब हमे कौन पूछता है, मुरारराव ! हमे तो अब खत्म ही समझो..- मुरार : होम डिपार्टमेंट की ऐसी कोई रिपोर्ट नहीं है। रावसाहब : इतनी बारीक नजर रखते हैं हम पर? मुरार : मन्त्री हैं न आप। आपका संरक्षण ही तो सरकार का पहला काम है, रावसाहब ! रावसाहब : आपकी कृपा है साहब ! लेकिन देखा जाय तो सरकार का पहला काम मुख्यमन्त्री पर व्यर्ष के आरोप लगाने वालों को कड़ी सजा देने का होना चाहिए। बहुत कीचड़ उछालता है वो गिरिराज वाला आप पर। कोई दिखा रहा था माज अख- बार, लेकिन हमने तो पढा नहीं। यूं ही गन्दी नाली मे कोन हाथ डाले? कार्टून भी है शायद एक गन्दा । देखा या नहीं - ७६. आपने? मुरार : नहीं बाबा । इतना टाईम ही कहां है मेरे पास? रावसाहब : ठीक है । लेकिन इस पर अब कोई एक्शन लेने का समय जरूर आ गया है । आखिर हर चीज़ की कोई हद होती है- मुरार : अच्छा ! रावसाहब : यह वाहियातपना जितनी जल्दी हो सके, खत्म होना चाहिए। केस कर दीजिये उस पर । कुछ भी हो आखिर हमारे राज्य के मुख्यमन्त्री हैं आप- मुरार : ऐसा सोचते हैं आप? रावसाहब : कुछ भी कहिये, आप ने विरोधियों को बड़ी ढील दे रखी है- लोकतन्त्र वगैरह सब ठीक है लेकिन कोई हद होती है ? मुरार : ठीक है, लेकिन किस कदर तक हद...? रावसाहब : आप एक्शन ले ही डालिये, दया बिल्कुल मत दिखाइये- मुकदमा कर दीजिए उस पर मान हानि का- मुरार : इससे और भी ज्यादा बिकेगा अखबार, यही न? रावसाहब : बाँ? ज्यादा बिक्री... मुरार : वो गन्दी टीकायें लोग और भी ज्यादा शौक से पढ़ेंगे। मान- हानि के मुकदमे से हमारी और बदनामी होगी-विरोधियो के पौ बारह हो जायेंगे और शायद हमें मुख्यमन्त्री पद से उठा- कर बड़ी आसानी से फेंक दिया जायेगा- रावसाहब : मेरे कहने का मतलब यह नहीं था--- मुरार : लेकिन यही सच है न ? रावसाहब आपकी सलाह के लिए मैं आपका बडा आभारी हूँ। हमसे आपको बड़ा प्यार रावसाहब : हो हां, बेशक- मुरार : गुप्त रिपोर्ट में भी इसके काफी प्रमाण दिखाई दिए हैं हमें। खुद को धन्य मानते हैं हम । रावसाहब : (विषय बदलते हुए) मांजी कहीं दिखाई नहीं दे रही ? --
मुरार : आपकी मांजी ना? अन्दर हैं।
रावसाहब : (उठते हुए) अच्छा। नमस्कार कह दीजिएगा। वैसे ही आ
गया था। लेकिन विरोधियों के मामले में आप कोई कड़ा
निर्णय लें, ऐसी मेरी बड़ी इच्छा है, मुरारराव !
मुरार : विरोधियों का मतलब विरोधी दल वाले ही या घर के भेदी
भी?
(कुछ क्षणों तक अजीब स्तब्धता। एकदम फोन बजने लगता
रावसाहब : (निश्वाःस छोड़कर) फोन बज रहा है।
मुरार : (फोन के पास जाकर रिसीवर लेते हुए) यस मोगरे ?
मोगरे : (लाइन पर ऑकवर्ड होकर) साहब"
मुरार : टी० टी० न? भेज दीजिए उन्हें अन्दर (रिसीवर रख देते
है।) विरोधी दल के विरोधी को बुलवा लिया है।
रावसाहब : बहुत इन्तजार करवाया।
(टी० टी० आते हैं।)
मुरार: आइये टी० टी० ! माफ करना। हाँ, आपको थोडा इन्तजार
करना पड़ा-
(टी. टी. चुप हैं। जेब से एक छोटी-सी पुड़िया निकालकर
उसमें से बभूत जैसी कोई चीज रावसाहब के माथे पर लगाते
हैं।)
रावसाहय : कसी भभूत है, सत्यसाई बाबा की है क्या? आखिर आप भी
उम रास्ते पर चलने लगे.
(टी० टी० मुरारराव के माथे पर भभूत लगाते हैं)
टी०टी० : और क्या करें?
रावसाहय : अच्छा है, बहुत अच्छा है। जीवन में किसी न किसी शक्ति पर
अक्षा होनी ही चाहिए। अच्छा, पलते हैं हम मुरारराव। दी
हुई सूचना पर पोड़ा विचार कीजिए। राज्य की और दल की
भलाई को देखते हुए ऐसी. सूचना देना ज़रूरी,समुझा"
भी हो सकती है हमारी "अच्छा चलता ई.प.
(झुककर प्रणाम करके चले जाते हैं।)
मुरार : कसे हो टी० टी०, आजकल तो कभी इधर भोना ही नहीं हुआ
5"
आपका..
सी०टी० : यहां एक मित्र रहा करते थे हमारे। आजकल वो यहाँ नहीं
रहते।
?
मरार : (यह बात बुरी लगती है) अच्छा ? कहाँ गये वो?
टो० टी० : कौन जाने कहाँ गये । यहाँ नहीं रहते।
मुरार : तो आज आप यहाँ भूलकर आ गये हैं शायद ?
टी०टी० : नही, मित्र से मिलने नहीं आया था। मुख्यमन्त्री से मिलने
आया हूँ।
मुरार : अच्छा, अच्छा ! क्या काम था मुरूममन्त्री से ?
टो० टी० : एक काम तो हो चुका !
मुरार : कौन-सा ? (थोड़ा रुककर) वो भभूत
टो० टी० : हो। (बची हुई भभूत की पुडिया देते हुए) यह बची हुई भी
रख लीजिए। प्रधानमन्त्री के लिए।
मुरार : प्रधानमन्त्री के लिए?
टो० टी० : पवित्र बभूत है ! किसी बाबाजी की नही ! खुद को जिन्दा
जला डालने वाले एक इन्सान की है, इस देश के एक अभागे
प्रजाजन की है।
मुरार : (उठकर खड़े हो जाते है । तीन स्वर में) टी० टी० !
.टी. टो० : विरोधियों का यह एक और गन्दा कारनामा है, यही आप
कहेंगे न? लेकिन ऐसा कहकर उस मरने वाले गरीब का
मजाक मत उड़ाइये, मुरारराव ! उससे उसके हालात ने ऐसा
करवाया और यह हालात इस देश और इस राज्य की सरकार
द्वारा ही तो पंदा किये गये है !
८२
मुरार : सूखा राज्य द्वारा पैदा किया गया है ?
टी० टी० : हाँ । अनाज का नही । अनाज का सूखा तो वैसे भी हर साल
अपने देश मे कही न कही पड़ता ही है। उससे निराश होकर
कोई खुद को जला नही डालता। हमारे देश का आदमी बडा
ढीठ है । लेकिन आपने जो सूखा पैदा किया है वो आशा का
मुरार : ऐसा आप लोग तो कहेगे ही। आप का काम जो बनता है
इससे । सरकार द्वारा किये गये कामों की तरफ ध्यान ना देकर
उसके द्वारा ना किये जाने वाले कामों को बढ़ा-चढ़ाकर बताना
यही तो है आपकी राजनीति ।
टी०टी० : वैसे सरकार द्वारा किया गया कोई काम हम भूनते नहीं।
मसलन सत्ताईस तारीख का गोलीकाण्ड।
मुरार : (गुस्से से बेकाबू) उसके हालात आप जसे विरोधियों द्वारा
पैदा किये गये थे, टी० टी० !
टो० टी० : क्यों नही । इस सरकार को किसी भी तरह बदनाम करके उस
से सत्ता खसोटना हमारे अस्तित्व के लिये जैसे जरूरी है।
लेकिन क्या अपना दिमाग गिरवी रखकर पुलिस द्वारा गोली
चलवाना काबिले-तारीफ है ?
मुरार : कानून और व्यवस्था की दृष्टि से ऐसा निहायत जरूरी था।
नही तो क्या दंगा-फसादियों के चुम्बन लेकर पुलिस उन्हें
आलिंगन में लेती?
टरो० टी० : जो मारे गये वो क्या दंगा-फसादिये थे? लंगडा भिखारी, सात
साल का लड़का, घर के दरवाजे मे बैठकर चावल साफ करने
णी..
मरार : एक बार गोली चलनी शुरू हो जाये तो प्रत्येक गोसी बिल्कुल
निशाना लगाकर नही दागी जाती । उस पर वो इसाका धनी
वस्ती वाला था। यह बात जानते हुए भी आप जानबूझ कर
वाली
३ - । चिल्ला रहे हैं टी०टी०? टो०० : फिर वही बात ! हम तो जानबूझ कर चिल्लायेगे, लेकिन आपके जुनूनों से लोकहित कैसे हो सकेगा? और वो लायसेन्स • वाला मामला." मुरार : उसकी चर्चा की यहाँ जरूरत नहीं- टो० टी० : विधान सभा में भी आपने इसकी चर्चा नहीं होने दी- मरार : वो सभापति का निर्णय था। टी०टी० : सभापति भी तो आपका था। मुरार : यह सरासर आरोप लगाया जा रहा है. 'सभापति पर" टी०टी० : लेकिन यह सच है। मुरार : फिर खुले आम लगाश्ये आरोप। मैं आपको चेतावनी देता हूँ, टी०टी० टो० टी० : बेवकूफों की तरह ऐसी चेतावनियां स्वीकार करके जेल जाने की इच्छा नही है हमारी। लेकिन इतना तो आप भी जानते हैं मुरारराव कि आरोप एकदम सही है। व्यर्थ मुकरने से क्या फायदा ? लायसेन्स वाला झमेला भी सही है। मुरार : अच्छा तो आज आप इसीलिये आये हैं ? इतने दिनो बाद? दो० टी० : आने का दूसरा कारण भी है । मैं आपको एक-दो सूचनायें पहले से देने आया हूँ। मुरार : 'दोस्ती' की सूचनायें ? टो० टी० : नहीं, सिर्फ सूचनायें । हमारे मित्र आजकल यहाँ नहीं रहते। सूचनायें माननीय मुख्यमंत्री के लिये ही है। मुरार: क्या? टो० टी० : खुद को जला डालने वाले उस आदमी की राख लेकर परसों हम प्रधानमंत्री की गाड़ी के सामने लेटने वाले हैं। वो राख प्रधानमंत्री अपने माथे से लगायें, यह हमारी मांग होगी। मुरार : ऐसा आपको करने ही नही दिया जायेगा। इसकी पूरी व्यवस्था । : - ।
८४ . कर दी जायेगी। टी०टी० : और हम यह करके रहेगे । हमने भी इसकी पूरी व्यवस्था कर ली है। लायसेन्स-झमेले की चर्चा भी जब तक खुलकर नहीं होगी, तब तक विरोधी दल विधान सभा और विधान परिषद का काम ठीक से चलने नहीं देगा, आज हमने यह फैसला कर लिया है। कल से यह फैसला लागू किया जायेगा। हम पूरी ताकत से शोर मचायेंगे। मुरार : (गुस्से में) बहुत अच्छा! सूचनाओं के लिये मुख्यमंत्री आपके आभारी हैं। टी०टी० : इससे अनेक विधायक बिल, बेकार बीच में लटक जायेंगे। मुरार : उसकी फिक्र आप क्यों करते हैं ? टी० टी० : क्योकि आपकी तरह, अभी हम वेशमं नही हुये। लोगों ने हमें अपने कामों के लिये चुना है, इसका हमे अभी पूरा अहसास है । मुरार : हमारे लोकहित के प्रयासों पर भी तुम जहरीली टीका करते हो, क्या यह उसी का सबूत है ? टी०टी० : वह टीका सिद्धान्त पर होती है, प्रयासों पर नही । मतलब वह टीका आप पर होती है। मुरार : मतलब हम जनता की जो भलाई करते हैं, उसे आप नहीं चाहते-- टी०टी० : क्योकि आपका सत्ता में रहना लोगो के हित में नहीं है, ऐसा हमारा विश्वास है। जो सरकार निरपराध लोगों पर गोलियां चलवाती है, जहाँ आदमी खुद को जिंदा जला डालते हैं और सरकार के कान पर जूं तक नहीं रेंगती, बल्कि वह समाज के भ्रष्ट सरमायेदारो और अपराधियों को सरक्षण देती है, और इसी भ्रष्टाचार को मिलीभगत के दम से अपना अस्तित्व बनाये रखती है, वह घोसे के सिवा और क्या हो सकती है? ...: तो आप आ जाइये सत्ता मे, लव अच्छी तरह समान बायेंगे कि .. .
बेबुनियाद प्रतिक्रियायें दिखाना कितना आसान होता है... टी०टी० : आप खाली तो कीजिये कुर्सियां, एक बार सता देकर हमें एक्स्पोज करने के लिये। इसके लिये भी कुसियां नहीं छोड़ सकते आप? अरे कपड़े उतार लिये जायें तो भी कुर्सी पकड़े रहेगे आप."। नंगे रह लेंगे, पर सत्ता के बिना नहीं सरेगा आपका! मुरार : (एकदम भड़क उठते हैं) स्टॉप इट! स्टॉप इट आय से! (कमीज की बांहें ऊपर करते हुये) साला मैनचोद ! बन्द करो बकवास नही तो.. टी०टी० : चलो हो जाने दो, मैं भी किसी कच्चे गुरु का चेला नहीं हूँ। (दोनों की पोजीशन द्वन्द्वयुद्ध की । नोकर आकर जल्दी से झांकते हैं । यह सुनकर मंजुलाबाई भी अन्दर से आ जाती हैं।) मंजुला : (देखकर) क्या हुआ? कौन है ? टी० टी० ! टी०टी० : (ढीले पडकर) नमस्कार भाभी जी ! मंजुला : क्या हो रहा था ? क्यो गुस्सा दिलवाया इन्हें ? (मुरार राव से) आप शान्त हो जाइये। ब्लडप्रेशर की तकलीफ है आपको, इतना गुस्सा क्यों करते हैं ? डॉक्टर ने क्या बताया है? बिल्कुल शान्त रहिये । दस मिनट तक आँखें बन्द करके चुप- चाप बैठे रहिये यहाँ (उन्हें एक तरफ बिठा देती है। टी०टी० को जरा एक तरफ ले जा कर) आप क्यों नही समझते टी. टी० ! पहले से ही राज्य की जिम्मेदारी इनके सर पर है और आप है कि बेवक्त आकर आदमी को और गुस्सा दिलाते हैं। टी० टी० : मैंने उन्हें गुस्सा नही दिलवाया। खुद ही गुस्सा हो गये। मैं तो सिर्फ हालात से वाकिफ करा रहा था उन्है । मंजुला : लेकिन अभी ना कराते, तो क्या बिगड़ जाता? आजकल ब्लडप्रेशर बहुत बढने लग गया है इनका। 1
टी०टी० : हमारा भी बढ़ने लग गया है। अभी परसों चेक-अप करवाया
मंजुला : तो फिर आपको बहुत संभलकर रहना चाहिये। (कुछ सूझता
है। उत्साह से) मैं कहती हूँ आप ऐसा क्यों नहीं करते?
टी०टी० : क्या?
मंजुला : आप-मसलब विरोधी दल-साल-भर के लिये अपना विरोध
अपने तक ही क्यों नही रख लेते ?
टी०टी०: अच्छा!
मंजुला : ज्यादा नही। सिर्फ साल भर । मैं सोचती हूँ रोज-रोज के
विरोध से किसी का भी ब्लडप्रेशर बढ़ सकता है।
टी०टी० : सर चकरा जाता है। रोज-रोज वही आरोप, वही प्रमाण ।
लेकिन इन लोगो पर किसी तरह के असर का तो नाम ही मत
लो।
मंजुला : इसीलिये तो कह रही हूँ, साल-भर विरोध बन्द करके देखिये ।
टी०टी०और उन्हें क्या मनमानी करने दें?
मजला . वैसे भी नतीजा क्या होता है ?आप ही तो कह रहे थे कि सारी
मुसीबते आप को ही हैं।
टी० टी० : मान लेते है कि साल-भर मनमानी करके, थक जायें ये शायद
जरूरी नहीं । लेकिन हां एक सम्भावना है, पेट भर साने के
वार कुछ देर के लिये आदमी को खाने की वासना मर जाती
है। तो शायद थोड़े दिन के लिये इनका काम भी सफाई से
चलने लगे।
मजला : क्या बात कही है ! तो फिर अमल कबसे करना शुरू करेंगे?
टी० टी० : मैं कौन होता हूँ अमल करने वाला? और भी तो लोग हैं
हमारे-प्रतिदिन सरकार का विरोध करते-करते विरोध की
आदत ही हो गई है उनकी । आपस में भी हमेशा विरोध !
मजला : उन्हें समझाइये।
टी० टी० : ऐसा कौजिये मामी जी! एक बार आप खुद आकर क्यों नहीं
समझाती?
मंजुला : लेकिन मेरा आना ठीक नही होगा। मुख्यमंत्री की पत्नी
विरोधी दल की सभा में ! इनके इमेज को चोट नहीं आयेगी
क्या ?
..
टो० टी० : यह तो सच है। लेकिन बाद में ऐसी घोषणा करवा दीजिए कि
मेरे पति मेरी इस भूमिका से सहमत नही हैं । एक व्यक्ति के
नाते अपनी भूमिका अलग से सामने रखने का मुझे पूरा हक है ।
नही तो वेश बदल कर सभा में आ जाइये ।
मंजुला : (उत्साह से) मुझसे हो सकेगा ऐसा? स्कूल में नाटक में काम
किया करती थी।
टो० टी० : मुख्यमंत्री की पत्नी से क्या नही होगा जो दिल मे आये, वह
कर सकती हैं आप। अभी ही देख लीजिये न, पूरे देश मे न
मिलने वाली चीजें आप को आसानी से हासिल है।
मंजुला : हासिल नहीं की है, खुद-ब-खुद चली आई हैं । यह मुख्यमंत्री
हैं न; इमीलिये कोई न कोई मेंट देता रहता है। मना करने
पर भी मानते थोड़े है लोग?
टो० टी० : सच कह रही है !
मंजुसा : कई बार तो इन्हें पता भी नहीं होता। मुझे हो लेना पड़ता है।
उन्हें बताइये नहीं, हो । वैसे तो कही भी मत बताइये । वेकार
बात का बतंगड़ बनेगा।
टी० टी० : विल्कुल नही बताऊँगा। लेकिन आता कौन-कौन है भाभी जी,
वह सारी चीजें लेकर?
मंजुला : किसी से कहेगे तो नही?
टी०टी०नहीं।
मंजला : छोड़िये-
टी०टी० : बताइये भी-
।
:
मंजुला : नानालाल, जमनादास, वो यूनुस मुहम्मद, अशोक सेठिया,
और भी बहुत-से आते हैं । अच्छे हैं सभी लोग ।
दो० टी० : होंगे ही। और कौन-कौन ?
मंजसा: नही, इतने काफी हैं।
टी०टी०: फिर भी?
मंजुला : छोड़िये ना नाम में क्या रखा है ?
टो० टी० : कुछ नही । (उठते हैं) अच्छा भाभी जी, चलता हूँ अब मैं ।
मंजुला : तो मैं आऊँ आपकी सभा में ? क्योंकि भाषण पहले से तैयार
करना पड़ेगा मुझे
टी०टी० : भापण तैयार रखिये आप । कही ना कही काम आ ही
M
जायेगा।
.
मंजुला : और कुछ नही, उनके सर का बोझ थोड़ा हल्का कर सकूँ, यही
सोचती हूँ।
टी. टो०: ठीक सोचती हैं।
मंजला : और एक बात मेरे दिल मे थी। पूर्वी ?
टी०टी० : बेशक !
मंजुला': दूसरे किसी को पूछो भी तो मुसीबत ! बाय दो वे, ये अभिनेत्री
तिलोत्तमा कैसी है?
टी० टी० : अभिनेत्री तिलोत्तमा ! क्यों भई ? अभिनेत्री की पूछ-ताछ
क्यों?
मंजुसा : ऐसे ही । कसी है वो?
टी०टी० : पता नही। आपके पति के पीछे पड़ी रहने वाली इन अभि-
नेत्रियों की एन्क्वायरी करने का समय कहाँ होता है हमारे
पास ! लेकिन जब अभिनेत्री है वो तो सुन्दर होगी ही।
मंजला : जवान भी होगी?
टी०टी० : बिल्कुल ! सेक्सी भी होगी !
मंजुला : तो फिर ठीक ही है।
८६ टी०टी० : क्या? क्या ठीक है ? मंजुला : कुछ नही । यह पेपरवाले कुछ भी छाप देते हैं। आज उस गिरिराज में पढा था। टी०टी०:किसके बारे में? मंजुला : आपने नहीं पढा? ये-और वह--एक बडे होटल में आगे नही बता सकती। कुछ भी हो हम सभ्य लोग हैं। पेपरवालों के मुंह कौन लगे लेकिन इनकी वहुत भद्द उड़ गई । उम्र भी तो हो गई है अब इनकी। पर मैं कहती हूँ, चीफ मिनिस्टर के बारे में लोग ऐसे कैसे छाप सकते हैं ? टी०डी० : उन्हे तो जेल में बन्द करवा देना चाहिये । आप कहिये मुरार- राव से। मंजुला : सीधे नाम तक ले लेते हैं । टी०टी० : कमाल है उनकी! मंजुला : मैं तो केस करने की सोच रही हूँ। मैं चीफ मिनिस्टर की पली हूँ। मुझे अपने पति की इमेज का कुछ तो अभिमान होना चाहिए। टी०टी० : बेशक होना चाहिये ! तो फिर चलूं मैं ? मंजुला : हाँ। जय आपके दल की मीटिंग हो तब खबर भिजवा . . दीजिये। टोन्टी०: जरूर। (टी० टी० जाते हैं। फोन बजने लगता है। मंजुलाबाई फोन लेती है।) मंजुला : (रिसीवर पर) हैलो-चीफ मिनिस्टर नहीं हैं-नहीं हैं याने नहीं हैं, एक दफा कहा नाi! फिर? मैं उनकी पत्नी बोल रही हूँ। आप कौन ? कौन नानालाल ? नानालाल जमनादास ? (एकदम ध्यान आकर) हो, हो। आप हैं, वो नानालाल ? कसे हैं ? पकड़े गये थे ? जमानत पर छूटे हैं ? बाप जैसे
इन्सान को भी पकहते हैं, कमाल है इन पुलिस वालों की भी!
हीरे की अंगूठी ना? ठीक आ गई थी। बहुत अच्छी है। इनसे
मिलना है ? आइये ना, माइये । कब आयेंगे? हाँ, हो, रात
को देर से ना? जरूर आइये। पीछे का दरवाजा खुला
रसूंगी। आप जैसो के लिये तो हमारे बंगले के सभी दरवाजे
हमेशा के लिये खुले हैं नानालाल जी, आइयेगा। हां, खबर कर
दूंगी। अच्छा! (रिसीवर रख देती हैं।)
(अन्धेरा।
फिर प्रकाश।
वही दीवानखाना। हल्की रोशनी में सिगरेट पीते हुए कोई
पीठ किये हुए बैठा है। पड़ी को टिक-टिक । मुरारराव आते,
मुरार : (बड़ी लाईट जलाते हुए) कहिये नानालाल जी !
(वो बैठा हुआ आदमी एकदम से घूम जाता है । नाक पर
गॉगल । दाढी नही है । पहली नजर में पहचान मे नही आता।)
मुरार : (घबराकर) कौन? (शरीर कांप रहा है) कौन-कौन हैं
आप?
सिंदकर : पहचाना नही प्यारे?
मुरार : प्यारे! कौन प्यारे?
सिंदकर : तेरी जिन्दगी का पार्टनर ।
मुरार : कैसा पार्टनर ! कौन पार्टनर !
सिंदकर : मैं तेरा भाई । खाना जो मिले दोनों खायें, खुशी-खुशी डकार
लें।
मुरार : एकदम पागल दिखता है।
सिंदकर : और तू ! उल्लू का पट्ठा! (रहस्यपूर्ण हंसी हंसता है।)
मुरार : मुंह सम्भालकर बात कर "नानालाल कहाँ है ?
सिंदकर : (मुरारराव की पीठ पर पपकी देते हुए) अबे छोड यार
--
।
. नानालाल की बात मुरार : (दूर होते हुए) किसकी पीठ पर थपकी दे रहा है ? और ऊपर से ये बेअदबी! सिंदकर : (लाड़ से मुरारराव का कॉलर खीचते हुए) मार्स! मारू ! क्यों वे ! इतने दिनों के बाद मिला है और ऊपर से अकड़ता है ! (कॉलर छोड़कर) चल पान निकाल ! मुरार : नौकर नही हूँ... सिंदकर : खाली-पीली बकबक मत कर यार, पान वना । बना तो! मुरार : तू..(पहचान कर) सिंदकर ! भैया सिंदकर ! सिंदकर : नही तो क्या उसका वाप? (मुरारराव के गले में हाथ डाल- कर) कितने दिनो के बाद मिले हैं हम, है ना? मगर : (अपने आप को छुड़ाते हुए) गले से हाथ हटा पहले। सिंदकर : (हाथ हटाते हुए) अच्छा यार, ले हटा ही लिया। लेकिन बहुत खुशी हुई तुझसे मिलकर । रोज सोचता था आज मिलूंगा, कल मिलूंगा, लेकिन मिल ही नहीं सका । शहर से बाहर था मैं। मरार : शहर से बाहर? सिंदकर : एक-दो जगह मारपीट की। पुलिस ने शहर से बाहर निकाल दिया । आज मेरी सजा का वक्त पूरा हो गया, सोचा पहले तुझी से मिल लूं। मरार : राज्य के मुख्यमन्त्री के साथ एकवचन मे बात कर रहा है तू ? सिंदकर : हम तो भगवान से भी यूं ही बात करते हैं एकवचन मे, यार- यार करके, और तू तो मेरा पार्टनर है, मेरा दोस्त ! मेरा भाई ! एक थाली में खायें (हंसता है) हमे तो हमेशा तेरी अपनी उस मुलाकात की याद आती है। बड़ा मजा आया था ! मुरार : क्या काम है मुझसे ? सिंरकर : गोली मार काम को। इतने दिन के बाद मिला है, बड़ा अच्छा .
1 लग रहा है। (एकदम मुरारराव को नीचे गिराकर उनकी छाती पर सवार हो जाता है। फिर हंसते हुए) ऐसे ही गिराया था ना तूने मुझे उस रात, याद है? मुरार : (सांस फूली हुई) पहले तू एक तरफ हो। उठ! कोई देख लेगा। सिंदकर : (उठकर दूर होते हुए) ले हो गया यार, सब कुछ याद आ रहा है। (इधर-उधर घूमते हुए) तुझे याद है ? मुरार : (बड़ी मुश्किल से उठकर, कपड़े झाड़ते हुए) तुझे काम क्या है बता, और यहाँ से जा। मैं साली नही हूँ। सिंदकर : इतनी रात को भी तू खाली नहीं है ? (गाल पर प्यार से चपत लगाते हुए) क्यों रे मुरारी? मुरार : (गाल झटकते हुए) मुरारराव ! सिंदकर : एक जिन्दगी के हिस्सेदार हैं हम ! लेकिन तू तो है मुरारराव, और मैं ? मैं क्या सिर्फ "भैय्या" ? तू मुख्यमन्त्री और मैं शहर से निकाला हुआ एक गुण्डा ? साली अजीब बात है। हम एक फोटो खिंचवा लेते! मुरार : कोई काम हो तो बत्ता, नही तो चलता दिख यहां से। सिंबकर : अवे मुरारी के बच्चे, किसके सामने नखरे दिखाता है ? साले मेरी वजह से तू है। मैंने तुझे अपनी किडनी दी, इसीलिए तू बच गया। मेरी किडनी पर जी रहा है और मुझी से अकड़ता है? एक दूंगा. (हाथ उठाता है । मुरारराव पीछे हट जाते हैं । सिंदकर हाप नीचे करके हंसते हुए) डरपोक ! हम इतने निडर और साले तू मुख्यमन्त्री हो कर भी इतना डरपोक ? हमारा पार्टनर ! (जेन से चार मिनार सिगरेट का पैकेट निकालकर एक सिगरेट मुंह में लेकर, फिर मुरारराव को ऑफर करते हुए) ले ! सिग- .. रेट ले । ले भी यार । चाहे तूने पान नही खिलाया, लेकिन हम तुझे सिगरेट पिलायेंगे। ले (डॉटकर) ले! (मुरारराव जल्दी से सिगरेट ले लेते हैं । सिंदकर पहले अपनी सिगरेट सुलगाता है, फिर मुरारराव की।) सिंदकर : (कश ले कर) मजा आ गया। काम-काज कैसा चल रहा है तेरा ! सव कुछ जोश मे है न? मजा आता है न मुख्यमन्त्री बन के ? क्यो वे कितना पैसा बना लिया? दो चार करोड ? या पांच पचास लाख ? साला हम कही बकेगा नही यार" तूने क्या कहा था, याद है ? शरीर दो है, पर आत्मा एक है ! आत्मा याने ? किडनी? हाँ तो कितनी एस्टेट बना ली ? कुछ गड़बड घोटाला? उस लायसेन्स के घोटाले से कितने बना लिये ? मरार : गोली. गोली नही है शायद तेरे पास ? गोली ! सिंवकर : क्यो ? तुझे चाहिये ? तेरे पास तो दूसरी गोली है। (बन्दूक दागने जैसा इशारा करता है ।) साली एकदम ऊपर पहुंचा देने वाली ! सात साल के लड़के को गोली मारता है तू ? सुना है घर मे बैठी चावल साफ करने वाली औरत को भी तू सीधे ऊपर पहुंचा देता है । साला लंगड़े भिखारी को भी गोली ! मुरार : वह मैंने नही चलाई। सिंदकर : हट साले, कबूल करने की भी हिम्मत नहीं है तेरे पास। मुरार : हिम्मत का सवाल नही है यह । जहां-जहां गोली चले वहाँ-वहाँ मुख्यमन्त्री खुद भी हाजिर हो, अगर ऐसी लोगों की मांग हो तो.. सिंदकर : (नाक को एक साइड पर उंगला खुकर) नखरे कितने करता है? किडनी की कसम ले कर बोल यार" मुरार : तेरा काम क्या है ? तू बस उतना कह दे। रात बहुत हो रहा है । सुबह फिर मुझे बहुत से काम हैं। सुबह जल्दी उठकर कुछ
फाइलें भी देखनी हैं।
सिंवकर : वैसे देखा जाय तो शहर के सारे दादा और दारु-भट्ठो वाले
तेरे दल में हैं।
मुरार : फालतू बातें नहीं चाहिये-
सिंदकर : ऑल-राइट ! नहीं चाहिये तो ना सही। तूने एक बारे हमसे
वचन लिया था, याद है ? तुझे याद ना हो तो कोई बात नहीं।
पर मुझे अच्छी तरह से याद है। जिन्दगी मै हमे किसी चीज
की जरूरत आन पड़े तो हम तुझी से मांगे। मेरी छाती पर
बैठकर तूने यह वचन लिया था। याद आया?
मुरार : लिया होगा।
सिंदकर : चाहे तू ना हो, लेकिन हम वचन के सच्चे हैं। वह वचन हम
कभी भूले नहीं। पर माला तेरे से कुछ मांगा जाय, ऐसा कभी
हमें लगा ही नहीं। आजकल लगने लगा है कि कुछ मांग ही
लिया जाय । मांगना ही पड़ेगा। सिर्फ तू वह दे सकता है और
में मांग सकता हूँ।
भरार : ऐसा क्या है?
सिदकर : (कश लेकर शान्त स्वर में) किडनी !
मुरार: क्या?
सिंदकर : मेरी किडनी। वही जो तेरे पेट में लगाई गई थी। या उसे
भी भूल गया?
मुरार: हो!
सिदकर : कब देगा?
मुरार: क्या?
सियकर : मेरी किडनी के वापिस कब देगा?
मराल. होश मे तो है ना तू ?
सरकर : देख यार, नसरे मत कर। किडनी की बात कर !
मुरार: अरे क्या कह क्या रहा है तू ?
..
६५ सिंदकर : अपनी किडनी हमें वापस चाहिये वस ! मुरार : किडनी विडनी भी कही वापिस मांगी जाती है... सिंदकर : हम मांग रहे हैं। हमें चाहिए वह । तूने क्या कहा था, याद कर । मुझे कभी भी कुछ चाहिये हो तो तुझमे ही मांगूं । मुझसे ऐसा वचन लिया था तूने। मुरार : इसका यह मतलब नहीं कि तू किडनी मांगे। सिंदकर : यह हमारे मर्जी की बात है। हमारे दिल में जो आयेगा वही मांगेगे। यह मत मांगना, वह मांगना, ऐसा उस वक्त तूने कहा था क्या? मुरार : लेकिन ऐसी अजीब मांग... सिंदकर : यार, संभलकर बात कर किडनी किसकी है ? मुरार : जब ली थी तब तेरी थी- सिंदकर : उसी की वजह से तू जिन्दा रहा ना ? साफ साफ बोल... मुरार : हाँ ! सिंदकर ; इसका मतलब मेरी वजह से तू जिया। जिन्दा रहने में मेरी हिस्सेदारी है। ऐसा तूने ही कहा था। मुरार : इसीलिये क्या किडनी... सिंदकर : बहुत हो चुकी हमारी हिस्सेदारी। आगे से हमें नहीं चाहिये तेरी हिस्सेदारी। जब अपना हिस्सा हमे वापिस चाहिये, तो किडनी ही तो मागंगा? बोल ! नही मागंगा क्या? मुरार : यह देख सिंदकर- सिंदकर : चीफ मिनिस्टर, खाली-पीलो, फिजूल बातें मत कर । जब मैंने तुझे किडनी दी थी तब किसी ने हमसे जबरदस्ती की थी क्या हमारी खुशी का सवात या न वो। हमने तुझे देखा तक नहीं था, काला है या गोरा है। तू तब चीफ मिनिस्टर कहाँ था? साला तू कौन था, यह भी हम नहीं जानते थे। मैंने तुझे किडनी क्यों दी? सिर्फ अपनी खुशी । बस । अब वैसे ही अपनी किडनी ?
.. । हमे वापस चाहिये हमारी खुशी । बोल कब देगा? गरार : (होशियार होने लगते हैं) देख सिंदकर, कल सुबह, नही तो परसों मेरे पी० ए० को फोन करके अपॉइण्टमेण्ट ले ले, फिर हम इसके बारे मे... सिंदकर : नही अपने पास टाईम नहीं है । अभी ठहरा ले जो ठहराना है । भरार : लेकिन तू अभी सुनने की हालत मे नही है । सिंदकर : क्योकि अपना विचार पक्का है । अपनी चीज कब वापिस लेनी है, इसका फैसला कोई दूसरा क्यो करे? खुद फैसला करेंगे। तेरे साथ हमे हिस्सेदारी नही चाहिये, बऽऽस ! ज्यादा बोलने की जरूरत नही है । तू हमारी किडनी लौटा दे, मामला खत्म ! मुरार : पैसे लौटाने की तरह आसान तो नहीं है यह ? सिंदकर : जब हमने तुझे किडनी दी थी, तब क्या आसान या साला, जिन्दगी और मौत का सवाल था। बड़ा ऑपरेशन था। तब दी थी या नही हमने किडनी? - ? मुरार: लेकिन... - सिंदकर : जैसे दी थी, वैसे हम वापिस मांगते हैं। लेते वक्त कैसे जल्दी से ले ली थी? वैसे ही दे डाल अब! मुरार : देख सिंदकर, किडनी देने के तेरे हौसले की जितनी तारीफ की जाय, उतनी कम है- सिंदकर : बकबक मत कर किडनी दे। मुरार : ठीक है। हम इस सवाल पर जरा अच्छी तरह सोचते हैं। सिंदकर ! तेरे दिल में यह ख्याल आया कैसे ? सिरकर : सच कहूं चीफ-मिनिस्टर? साली एक दिन सुबह हमे पाग आई और सोचा कि एक इन्सान की जिन्दगी के हम हिस्सेदार हैं। पार्टनर हैं। हमारी एक किडनी उसके पेट में है। और अपने पास साती एक ही किडनी है। और वो हमारा पार्टनर पाने तू है...! एकदम साला सरफिर गया। ऐसा कमीना 1 अखंबारवालों WMT पार्टनर ? ऐसे काले-धन्धे में हिस्सेदारी गरीबों के पेट कीट कर राज्य में लफड़ेबाजी करने वाले इन्सान के साथ पार्टनर- शिप ? साला इससे तो शराब की भट्ठीवाला अच्छी है। मुरार : सिंदकर, तेरा दिमाग भी शायद विरोधियों और के ऊल-जलूल प्रवार से बिगड़ गया है। सिंदकर : झूठ ! हम कभी अखबार पढ़ते ही नहीं। लकिन हर जगह पूमते हैं हम और आंख, कान खुले रखते हैं। चाहे बाकी सब कुछ नशे मे गायब हो जाय (सर की तरफ इशारा करते हुए) पर यह होश में रहता है। सब चीजें बराबर अन्दर नोट होती रहती है। चीफ मिनिस्टर, तू पत्थर दिल इन्सान, गरीबों को तंग करता है । अमीरों के मजे करवाकर, उनसे समझौता करके अपनी जेबें भरने वाला, तू बहुत बड़ा जेब-कतरा है । मुरार : सिंदकर ! सिक्का : तू बेगुनाहों की जान लेकर अपनी जान बचाने वाला जालिम खूनी है। मुरार : शटअप सिंदकर... सिंदकर : तू शरीफ लोगों के वोट निगलकर डाकुओं के दल में शामिल एक घोखेबाज लीडर है। मुरार : सिंदकर, एक चीफ मिनिस्टर के सामने यह सब बक रहा है तू? संरकर : तू सिर्फ चीफ मिनिस्टर की खाल ओढ़ने वाला डरपोक गीदड़ है। सब लोग भी यही कहते हैं। मुरार: तुझे--तुझे जेल भिजवा दूंगा । देश निकाला दे दूंगा। सिरकर : ए, डर किसे दिखाता है ? हम यह सब कुछ कर चुके हैं ! हमारी किडनी निकाल दे, बस। बाकी बातें फिर । ऐसे नाला- यक और परपर दिस इन्सान से पार्टनरशिप ? अरे इट! पार्टनरशिप सरम होनी ही चाहिये अब ! मरार : मेरे बारे में विरोधियों द्वारा फैलाई गई बातों से तुझे गलत- -
फहमी हो गई है सिंदकर।
सिंवकर : तेरे विरोधी साले कौन और कहाँ रहते हैं, हम जानते भी
नही। अपनी सारी फैमियां तो लोगो के कहने से बनी हैं।
मुरार : लोगों का क्या? ये तो विरोधियों के प्रचार पर से बलि होते
-
सिंदकर : क्योकि उनकी हालत तो पहले से ही खराब होती है । उनका
जीना नरक बन चुका होता है। उनके वोट निगलकर, उनकी
तरफ से मुंह फिराकर राज करने वाले तुम उन लोगों को
दिखाई देते हो, इसीलिये । चीफ मिनिस्टर ! तुम्हें लगता है कि
तुम आंखें बन्द कर लोगे, तो शायद तुम्हें कोई देख नही
सकेगा। लेकिन लोग देखते हैं--बाकायदा !
मुरार : किसी विरोध करने वाले धन्येबाज की तरह बोल रहा है
तू"
सिवकर : गाली मत दे। हम अपनी तरह से जीते हैं, और बोलते हैं ।
किडनी दी थी तब भी ऐसे ही जीते थे, वो वापिस मांग रहे हैं,
तब भी ऐसे ही जी रहे हैं । अपनी मर्जी से । लोग जो कुछ बोल
रहे हैं, वो अगर झूठ हो तो ला मां की कसम और कह यह
सब कुछ झूठ है । कह ना!
मुरार : मां कसम, यह सब कुछ झूठ है।
सिंदकर : (डिसगस्ट से) अरे रे! चीफ मिनिस्टर, सत्ता ने तेरे अन्दर
के इन्सान को इतना झूठा बना डाला है ? इतना ? मो को
कसम तक खा गया तू ? लोग जो कहते हैं उनमें से ज्यादातर
बातें सौ फीसदी सच हैं । उसका प्रमाण पूरा शहर चिल्ला-
चिल्लाकर दे रहा है।
मुरार : बंठना । हम कुछ वियर-वियर पीते हैं...
सिंदकर : नहीं ! पार्टनरशिप सत्म। (मुरारराव के पेट में उंगलियाँ
टुंसाकर) किडनी वापिस दे, पल या मैं सुद ही निकाल हूं?
.
:
मुरार : अरे, लेकिन! कोई आ गया तो...
सिंदकर : हम किसी से डरते नहीं । जो अपना है, हम उसे वापिस मांग
रहे हैं । साला कोर्ट भी इसमे कुछ नही कर सकता।
मुहार : मैं किडनो वापिस नहीं दूंगा-अगर मैंने ऐसा कहा तो?
सिंदकर : तू कह सकता है। तू चालाक है । मुझसे वचन ले लिया, लेकिन
तूने वचन नहीं दिया।
मुरार : (खुश हो कर) यही तो..
सिंदकर : (पेट में से एक अजीद-सा दिखाई देने वाला लोहे का कुछ
निकालता है।
मरार : क्या है वो?
सिंदकर : किडनी वापिस पाने का तरीका।
मरार: ओ: नो!
सिंदकर : (वो अजीब-सा हथियार खींचकर लम्बा और लम्बा किये
जाता है।) साला एक दम रामबाण !
मुरार : नहीं, नहीं
(लाइटस् बदलते हैं।
सिंदकर और उसके अजीब से हथियार की "बिभार" छाया
पोछे दिखाई पड़ती है । हथियार चमकने लगता है। सिंदकर
को आंखें भी चमकने लगती हैं। उनमें पागलपन की झलक
--
सिरकर : भलो चीफ मिनिस्टर...
मसर : नही, सिंदकर ! सवाल हल करने का यह रास्ता नहीं है--
सरकर : कमीज ऊपर कर ऊपर कर कमीज..
मुरार : यह जबरदस्ती हो रही है."
सिंवकर : पजामा नीचे कर चल.. किडनी.. मेरी किडनी...
भरार : बचामो'"कौन है उधर "सिंदकर इसके लिये प्रधानमंत्री
तुझे कभी क्षमा नहीं करेंगे-
सिवकर : अपनी किडनी ले ही रहूँगा मैं..बस्स"पार्टनरशिप खत्म... (मुरारराव चिल्लाना चाहते हैं, लेकिन गले से कुछ दवी-दबी- सी आवाजें निकलती हैं। सिंदकर उनकी तरफ जाने लगता है । मुरारराव की बहुत लम्बी चीख ! मुरारराव जेब से एक ऑड दिखाई देने वाला पिस्तौल निकाल कर सिंदकर की तरफ उसका रुख किये हुये है । सिंदकर आगे आगे बढ़ रहा है। इस सब के साथ "विझार" बैंक ग्राउंड म्युजिक, जंगली जानवरों की आवाजें वगैरा । मुरारराव आंखें बन्द करके पिस्तौल दागते हैं। पिस्तौल में से पानी की एक बड़ी धारा निकलती है । भीगे हुए सिंदकर का विकट हास्य । उसके हाथ में वो अजीब हथियार। मुरारराव पीछे-पीछे हो रहे हैं। भीगे हुए सिंदकर को छींक आने लगती है। उसके नाक में कुछ अजीब-सा हो रहा है, उसका ध्यान नहीं है । मुरारराव उसके पेट में घुसा लगाते हैं। सिंदकर को जोर से छीक आती है, और मुरारराव इस आवाज से हड़बड़ाकर नीचे बैठ जाते है। सिंदकर फिर भोर से हंसता है । अब वह बहुत पास आ चुका है। उसके हाथ में वो अजीब हथियार चमक रहा है। सिंदकर की चमकती हुई आंखें । डरे हुए मुरारराव । उनकी लम्बी चीख! अन्धेरा। म्यूजिक धीमा होता जा रहा है । प्रकाश । 'फेड- सा। फिर मंजुलाबाई माकर स्विच ऑन करती हैं । मुख्यमंत्री की पत्नी को सूट करता हुआ नाईट गाऊन, वासों में काफी पिर्ने धगरह। मुरारराव टेबल के पास रसो कुर्सी पर पसीना-पसीना हो कर किसी भ्रम में बैठे हैं।)
१०१ मजता: क्या हुआ? यो टारजन की तरह क्यों चिल्लाये ? मरार : वो.'वो.. मजला : कोन वो? मुरार : वो"सिंद.."सिंदकर.. मंजुला : सिंदकर ! वही जिसने आपको किडनी दी थी? मुरार : बाप रे! भयंकर! मंमुसा : सपना तो नहीं देखा आपने? मुरार : (पेट को पकड़े हुए) मेरी किडनी। मंजुला : पर हुमा क्या ? मुरार : दो गया कहाँ ? सिंद-सिंदकर? मंजुला : अंजी वो तो कब का मर गया." मुरार: क्या! मंजुला : हाँ वही सिंदकर न? वो मर गया। दो महीने हो चुके। उसकी जो एक किडनी बच गई थी दो बेकार हो गई थी। दूसरी मिली नहीं, इसलिए मर गया । मैंने आपको जानबूझ कर ही नहीं बताया। मुरार : (लम्बी सांस छोड़ते हैं।) मंजुला : वो सपने में आया था क्या? मसर : बाप रे! मंजुला : ऐसे टेढ़े-मेढ़े होकर बैठे-बैठे सो जाने से ऐसे ही अनाप- शनाप सपने आते हैं आपको। फिर भी आप ऐसे ही सोते हैं । अन्दर चलकर ठीक से सोइये । चलिए। कोई नहीं है सिंदकर- फिदकर । सब आपके खयाली चक्कर हैं। चलिये ! (मुरारराव उठते हैं । अनजाने दोनों हाथ पेट पर । मंजुलाबाई के पीछे वैसे ही चलते हैं। फिर एकदम रुक जाते हैं । खुद-ब- सुद हंसते हैं। हाथ नीचे करके मजे में चलते हुए अन्दर घने जाते हैं। बंक ग्राउंड पर इस दृश्य को सूट करने वाला पुलिस : ..
बंड शुरू हो जाता है। मुरारराव के अन्दर चले जाने पर
अन्धेरा।
सफेद परदे पर प्रकाश।
पुलिस बैंड शुरू । परदे पर अचकन डाले हुए मुरारराव गार्ड
ऑफ ऑनर लेते हुए। सीधे खड़े है । सलाम करने की मुद्रा मे।
पेट खासा मोटा दिखाई दे रहा है।
पुलिस बंड के साथ-साथ थोड़ी-थोड़ी देर बाद दूर से सुनाई
पड़ने वाती तोपों की आवाजें भी सुनाई देने लगती है।
क्रमश: अंधेरा।
पुलिस बैड चालू रहता है।
और तोपों की आवाजें भी।)
परदा का गिरना
DOD
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