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Shrawak - Pratikraman

Shastri, Nandanlal · 2009/11

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धन्यवाद।
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)
"श्रावक प्रतिक्रमण" गृहस्थोंके लिये अत्यन्त
उपयोगी और संग्रहणीय ग्रथ है। इसका प्रकाशन
श्रीमती ब्रह्मचारिणी गुलाबबाईजी तथा उनके भाई
धर्मपरायण सेठ मोतीलालजी केसरीमलजी छावड़ा
निवाई (जयपुर) वालोंने ज्ञानावरणीय कर्मक्षयार्थ
स्वकीय द्रव्यसे किया है इसके लिये हम ब्रह्मचा-
रिणी श्री गुलाबबाईजी तथा उनके भाई सेठ मोती-
लालजी केसरीमलजी छावडा सा० को भूरि भूरि
धन्यवाद देते हैं।
मन्त्री, श्री आचार्य शांतिसागर छाणी
ग्रंथमाला सागवाड़ा (डूंगरपुर )
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श्री १०८ श्री आचार्य
जैन प्रन्यमाला सोजी महाराज छाणी दिगम्वर
डूंगरपुर के
नियम व उ
साहित्यका
१-मग्रन्थमालाका उद्देश्य प्राचीन संस्कृत के
उद्धार करना है।
२-प्राचीन आर्ग:प्रन्योंका सर्वत्र मुलमताले प्रचार हो
प्रन्यमाला समस्त प्रन्ध लागत मूल्य पर दिये जायगे,
त्यागो, व्रतो धौर संयमीको विना मूल्य दिये जायंगे।
३-इल प्रन्यमालामें मूल प्रत्यके साथही मापा ग्रन्थ छप सकेंगे।
फेवल भापाके प्रत्य नहीं छपेंगे।
प्रत्येक वर्ष में पक अन्य प्रकाशित किया जायगा। यदि ग्रन्थ
घटा हुआ नो दो तीन वर्णमें पूरा होगा, एक अन्य पूर्ण हुये
विना दूसरा नहीं छपेगा।
५-इस प्रत्यमालामें दिगम्बर जैन सनातन वीसपन्यी आम्नायके
ही आर्णप्रन्य प्रकाशित होंगे।
-इस प्रन्यमालाकी रजिस्टरी हो गई है। इसलिये इसका फार्म
नियमित सुचारु रूपसे होता है।
७-२५५ रु० प्रदान करनेवाला स्थायी प्राहक होता है।

८-१०)रु प्रदान करनेवाला सहायक समझा जाता है।
६-एक हजार रुपया प्रदान करनेवाला संरक्षक समझा जाता है।
१०-इन सवको ग्रन्थमालाके समस्त ग्रन्थ भेट रूप दिये जाते हैं।
इस ग्रन्थमालाकी सहायता करना प्रत्येक साधर्मी भाईका
आद्य कर्तव्य है।
पता-मन्त्री हीरालालजी मुनीम
श्री आचार्य शांतिसागर छाणो प्रन्थमाला
सागवाडा [डूंगरपुर]
अन्थमालामें प्रकाशित ग्रन्थ।
१ करुणामृतपुराण
२ रयणसार सार्थ
by
३ भकामर शतद्वयी
Iy
४ श्रावक प्रतिक्रमण
२)
भविष्यमें प्रकाशित होनेवाले ग्रंथ।
रनकरण्ड श्रावकाचार पं० चम्पालाल कृत भाषानुवाद
वसुनन्दी शावकाथार पं० चम्पालाल कृत
उमास्वामी श्रावकाचार
पटौपदेश रनमाला
पता-मन्त्री हीरालाल मुनीम
श्री आचार्य शान्तिसागर छाणी प्रन्थमाला
सागवाडा [गरपुर

Ausada
Berdapater
Boom
392288RS
FROAOrade
992
श्री १०८ आचाय श्रीशान्ति मागर जी छानी वाले।
Buite
Basic

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RESUsaramsatsansar सृमिका EFFENSrirannnnnnnnn प्रतिक्रमण पाठके रचयिता कौनसे महानुभाव हैं? इसके निश्चयका हमारे पास कुछ साधन नहीं है, तो भी श्रुतसागराचा- ने कई जगह गौतम महर्णिमा उल्लेख किया है। सहस्रनामकी टीका प्रतिक्रमणके पाठका विवरण 'उक्त च महर्षि गौतमस्वा- मिना' इत्यादिप्रकारले रपष्ट किया है। पेगौतम महर्षि कीन थे? और इस वसुंधगको फिस समय पवित्न किया इस विग्यका प्रकाश इतिहासम फरेंगे। प्रतिक्रमणफी एम्त लिपित (संवत् १६०५ की लिखो) प्रति ईरके प्रसिद्ध भंडारमें है और भी ईडरके भंगारमें अनेक प्रतिकरणको प्रति मिलती हैं। मुनियोंके प्रतिकरण पाठको भिन्न २ प्रति हैं परन्तु उन सब प्रतियोमे पर्ताका नाम देखने में नहीं आया। अतएव इस प्रतिकरण पाठके कर्ताका निश्चय विचाराधीन है। प्रतिकपण पाठसे यह प्रतीत होता है कि यह संग्रह किया है, क्योंकि इसमे भगवान वसुनंदो सिद्वान्तचक्रवतोंके रचित श्रावकाचारकी गाथा मिलती है, परन्तु यह वात नहीं है क्योंकि प्राचीन प्रतियों में यह पाठ नहीं है। संभव है किसी विद्वान्ने व्रत और प्रतिमाओंका स्वरूप समझाने के लिये यह पाठ निवेशित किया ( ) हो। अस्तु, जो कुछ हो । प्राचीन प्रतियोंसे यह किसी ग्वाम महर्षि का बनाया हुआ प्रतीत होता है। संभव है कि गोतम महर्षिका ही पनाया हो। प्रतिक्रमण पाठ प्रथम भावनगरसे प्रसिद्ध हुमा, फिर सेठ हीराचंद नेमचंद शोलापुरवालों ने मगठीमें प्रसिद्ध किया च गुर्जर भाषामें प्रसिद्ध हो चुका है । इस प्रकार उसका प्रचार सर्गव देव नेमें आता है परन्तु संयुक्त प्रांत और मध्य प्रातमें इसका प्रचार नहीं है इसलिये हिन्दी भाषामें प्रसिद्ध किया जाता है। आशा है समस्त वन्धुगण इससे लाभ लेगें। यदि इससे कुछ लाभ हुआ तो सामायिक पाठ भी जो गौतम महर्णिस्त संग्रहीत ? प्रकाशित किया जायगा। इसमें मेरी अनतासे जो कुछ भागमविरुद्धता हुई हो विद्वजन धमाकर एक पतसे सूचित करेंगे जो आगामो संस्करणमें सुधार दी जाय। भवदीय- नन्दनलाल जैन वैद्य, ईडर (वर्तमान-मुनि श्रीसुधर्मसागर ) MAMTARAXNZE2:Zzxxxx Asstate प्रस्तावना & एम पाठकगण ! यह प्रतिक्रमण आपके करमलामे उपस्थित है। प्रतिक्रमण किसको कहते है ? और वह क्यों करना चाहिये यह वतला देनेसे इस पुस्तकको उपयोगता अधिक बढ जायगी। प्रतिक्रमणका "अपने भले घुरे किये हुए (कृतकर्म) कर्मों का आत्मनिंदा पूर्वक त्याग करनेका भाव-आत्माका ऐसा विशुद्ध परिणाम कि जिसमें अशुभ क्रियाओंको निवृत्ति हो" यह चाच्यार्य है। इस प्रकारके भाव भेद विज्ञानको उत्पन्न करते हैं। प्रतिक्रमण पट आवश्यकोंके अंतर्गत एक भेद है। पट आवश्यकोंका पालन करना गृहस्थ और मुनियों के लिये नितान्त आवश्यक है। इतना ही नही, किन्तु प्रतिक्रमण करनेसे आत्मो- न्नतिके साथ साथ भावोंकी विशुद्धि और कर्मों की निजरा सातिशय होती है। जीवमात्र सुख और शांतिका मार्ग अन्वेषण करते हैं। सुख और शांतिका प्रधान मार्ग वीतरागता-कपायोंकी निवृत्ति है। कपायोंकी विजय पापाचरणोंसे भय, विषयोंसे निवृत्ति, ममत्वत्याग, स्थात्मबोध और स्वात्मगुण चिन्तवन करनेसे होती है। प्रतिक- मण करनेसे उक्त पांचों कार्य स्वयमेव सिद्ध होते हैं। प्रतिक्र- (घ ) मण आत्मसाधनका ओर निर्वाणपदका मुख्य अंग माना गया है। अनादिकालसे यह जीव हिंसा, भूत चोरी, कुशील और परिग्रह इन पंच पापोंमें निमग्न हो रहा है। और इनसे ही जन्म मरणके भयंवर दारुण दुःखोंको उठा रहा है। प्रतिक्रमण फरनेसे हिंसादि व्यापारों से ग्लानि, पापकमासे भय और अशुभ क्रियाओंसे विक्त बुद्धि उत्पन्न होती है। प्रतिक्रमण करनेवाला भव्य-जीव अपने प्रत्येक कार्यको विचारता है कि यह कार्य करनेसे मेरे पापाचरणोंको वृद्धि होगी एमलिये मैं इसका त्याग फलं। मानसिक व्यापार व संकल्प विकल्पोले भी वह भयभीत होता है । प्रतिक्रमण करनेवाला जीव पंचेन्द्रियोंके विषयोंसे विरक्त होता है और ऐले कारणकलापोंका परित्याग करता है जो विपयोंके बढ़ानवले हैं। पापाचरण और विषयोंके सेवन करनेसे व्यामोह वहता है इसलिये आत्मवोध जागृत नही होता है। प्रतिक्रमण करनेसे पर-पदार्थों से मोहका नाश होता है, इसलिये स्वात्नवोधको प्राप्ति होती है जिससे श्री अरहंत परमात्माको भक्ति, रत्ननयको पवित भावना और स्वात्म-धर्ममें दृढता प्राप्त होती है। देह भोगादिकोंले विरजता, कषायोंकी विजय, सुख और शांतिका मार्ग विकाश होता है। मन वचन और शरीरके व्यापारोंका पुद्गल परमाणुओं पर गहरा असर पड़ता है । आत्मामें कषायोंकी सचिक्कणता होनेसे उन पुद्गल परमाणुओंका आत्माके साथ घनिट संवन्ध हो जाता (ङ) है और वही संवन्ध आत्मगुणोंका-सुख और शांतिको धात करता है। इसलिये कषायोंको विजय करना और मन वचन कायके व्यापारोंको रोकना हो यथार्थ सुख और शांतिका मार्ग है। प्रतिक्रमण करनेसे कपायोंकी विजय होती है, सुख और शान्तिका मार्ग विकाशको प्राप्त होता है इसलिये प्रतिक्रमण करना परमावश्यक कार्य है। प्रतिक्रमण-स्वात्मशिक्षक है। इससे अपने आप अपने दुष्कृत्योंको शिक्षा ली जासक्ती है। स्वात्म गुणोंके विकाश- की शिक्षा भी मिलती है। प्रतिकरण करनेके लिये सबसे प्रथम वाह्यशुद्धिपर पूर्ण ध्यान देना चाहिये । क्योंकि शुभाशुम निमित्त ही आत्माको भले बुरे मार्गमें ले जानेवाले होते हैं। वाह्यशुद्धि-आत्मभावोंको विशुद्ध रखती है। इसलिये शरीर शुद्ध वचन शुद्धि और मन शुद्धि जिस प्रकार सर्वोत्तम रहे उस प्रकार वाहाशुद्धिको करना चाहिये। भोजन शुद्धि-मनशुद्धिका कारण है इसलिये आहार पान शुद्धि, स्नान शुद्धि, वस्त्रशुद्धि, स्थानशुद्धि, जिनागमकी आशानुसार विचार शुद्धि और वचन शुद्धि रखनी चाहिये। अपने मावोंको विशुद्ध करनेके लिये जो कुछ भले बुरे काम किये हों उनका विचार ( स्मरण ) करना चाहिये। भविष्यमें ऐसे घुरे कार्य न हों ऐसी दृढ़ प्रतिज्ञा करनी चाहिये। इस प्रतिक्षाको दृढ़तर वनानेके लिये स्वात्मविश्वास-पूर्वक वीतराग ( च ) प्रभुके गुणोंकी भावना निरंतर करना चाहिये। अपने दुपत्यों- को निवेदन करना चाहिये, मनन करना चाहिये और परित्यागके लिये तत्पर रहना चाहिये। प्रतिक्रमण करनेके प्रथम लघु सामायिक पाठ अवश्य करना चाहिये। नैष्ठिक श्रावफ और मुनियों के व्रत नियममे होने हैं। उनके व्रतोंमें अतीचारादि दोपोंका उसावन होना संभव है इसलिये उनको अपने व्रतोंकी विशुद्धिके लिये प्रतिक्रमण करना चाहिये । परन्तु पाक्षिक श्रावकोंके व्रतमें अभ्यास मात्र ही होता है अतएव व्रतोंको दृढ बनानेके लिये तथा दोपोंके विचारके लिये प्रतिक्रमण फरना नितान्न आवश्यक है एवं व्रतोंको मावना भी व्रतका पक- देश पालन करना है। प्रतिक्रमण करनेसे व्रतोंको (भहिसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य और परिग्रहत्याग ) भावना पुष्ट होती है। प्रतिक्रमण दैनिक, रात्रिक, पाक्षिक, चातुमासिक और सांव सरिफ भेनोंसे अनेक प्रकार है। चातुर्मासिक और सांवत्सरिक परिक्रमणमें पूरी जाप्य १०८ देना चाहिये, अवशेपमें १८-२७- ३६ भो देते हैं। प्रतिकपण करनेमें "णमोकार मात्र को स्पष्ट वोलना चाहिये और जहांतक हो पंच परमेष्ठोके गुणोंका चितवन विशेष ध्यान- पूर्णक करना चाहिये। कितने ही स्थलों पर 'णमो अरहंताणं' से प्रारंभकर "यावंति जिनचैत्यानि विद्यन्ते भुवनत्रये। ताति सततं, भत्त्या त्रिःपरीत्य नमाम्यहं" यहां पर्यन्त पाठको पढ़ना चाहिये।

(छ) प्रतिक्रमणका समय कमसे कम दो घड़ी है। इससे कम समरमें प्रतिमपण नहीं होता है। ये दो घडी प्रातःकाल मध्यान फाल और सायंकालके समयकी लेना चाहिये। प्रतिमामण करते समय इन बातोंका विशेष ध्यान रखना चाहिय- (२) व्यापार, गृह और दृष्ट-वियोग-अनिष्ट, संयोग सम्बन्धी भानुल्लताको छोड देनी चाहिये। (२) पुत्र, मित्र, माई. बन्धु, और कुटुम्ब परिवारोंको चिन्ता छोटकर प्रतिगामण करना चाहिये। (३) मनको वशकर सावधानीसे प्रतिक्रमण करना चाहिये। (४) उत्साह और प्रेमसे प्रतिकरण करना चाहिये । श्रा- लस्य बार मनाइर प्रतिक्रमणके घातक है। (४) बासन ठोक ग्पना चाहिये। परिग्रहका परिमाण फरना चाहिये। (५) कायोत्सर्गशरीरसे ममत्व त्याग करनेके लिये उपसा मोजीतनेका प्रयत और अभ्यास डालना चाहिये। (६) णमोकारमंत्र, २७ श्वासोच्छ्वासमे जपना चाहिये। शीघ्रता,अरिथरता और कायरताको दूरकर प्रतिक्रमण करना चाहिये (७) प्रतिक्रमणके लिये जिनमुद्रा (नासिकानदृष्टि ) का धारण करना और शांतिसे विषयक्रयायोंको जोतनेका विशेष उद्योग करते रहना चाहिये। (८) प्रतिक्रमण पाठको और उसके अर्थको मनन करने हुए प्रतिकरण करना चाहिये (ज) (६)समस्त जीवों में प्रेमभावना, गुणीजनोंमे भक्ति भावना, दुःखी ( अज्ञान और कुचारितसे दुःखी ) जीवों में करुणा भावना और मात्सर्य जीवोंसे साम्य भावना रखकर प्रतिक्रमण करना चाहिये। (११)जहांपर कायोत्सर्ग आवे वहांपर णमोकार मंत्रको जाप्य ६ वार देना चाहिये परन्तु वीरभक्तिमें १८-२७- ३६-१०८ आदिका क्रम जैसा प्रतिक्रमण करना हो देनी चाहये। भवदीय-मुमुक्ष जनोंका दास- नन्दनलाल जैन वैद्य । ईडर ॐ श्रोजिनाय नमः श्रावकमातक्रमण ईपिथ। नि सगोहं जिनानां मदनानुमं निःपरीत्येत्य भक्त्या, स्थित्वा गत्वा निपयोच्चरणपरिणतोऽन्त शनैहस्तयुग्मम् ।। भाले संस्थाप्य बुद्धया मन दरितहरं कीर्तये शक्रवन्ध, निन्दादूर सदाप्त क्षयरहितममुं ज्ञानभानुं जिनेन्द्रम् ॥१॥ भावार्थ-मन वचन कायले शुद्ध होकर, अनुपम श्री- जिनालयमें जाकर भक्ति-पूर्वक तीन प्रदक्षिणा देकर फिर कुछ समय पर्यन्त थोडा स्थित होकर पुनः धीरे धीरे श्रीजिनेन्द्र भग- वानके दक्षिणाभिमुख बैठकर भाव भक्ति पूर्वक स्तोत्र पढ़े। अपने दोनों हाथोंको कमलाकार बनाकर और अपने मस्तकपर स्थापनकर समस्त पापोंको दूर करनेवाले इन्द्रादिक देवोंसे २ श्रावक-प्रतिक्रमण परम 'पजित समस्त दोषोंसे रहित अविनश्वर तथा ज्ञानरूपी सूर्ण ऐसे श्री अरहंत भगवान श्रीजिनेन्द्रदेवको मैं अपनी बुद्धिको शुद्धतासे स्तुति करता हूं ॥१॥ श्रीमत्पवित्रमकलंकमनन्तकल्प, स्वायंभुवं सकलमंगलमादितीर्थम् ।। नित्योत्सवं मणिमयं निलयं जिनानां, त्रैलोक्यभूपणमहं शरणं प्रपद्ये ॥ २ ।। भावार्थ-जो जिनालय परम ऐश्वर्ण सहित है, पवित्र है, कलंक रहित है, अनंत कालसे जिसकी रचना स्वयंसिद्ध है और जो श्री जिनेन्द्र भगवानके विराजमान होनेको भृमि होनेसे श्रीजिनेन्द्रदेवके ल्मान ही परमपूज्य है । श्रोजिनेन्द्रदेवके समान ही परम पवित्र है, मंगलमय है। अतएव यह जिनालय संसार समुद्रसे पार करनेके लिये सबसे १--जल मृत्तिका आदि वस्तुओसे शरीर शुद्ध होता है मंत्रोंके प्रभावसे मनको शुद्धि होती है । श्रद्धा और भक्तिके अनुरागसे वचनको शुद्धि होती है। वस्त्र भूमि द्रव्य आदि पदार्थ भी जल गोमय और कुशासे शुद्ध होते हैं और मंत्रोंसे भी शुद्ध किये जाते हैं। २-श्रीजिनेन्द्र भगवानके उत्तर या पूर्व मुख हो पूजन व दर्शन करनेकी जिनागममें आज्ञा है। ३--जिन-मंदिर भी अरहंतके चैत्यके समान पूज्य है, नव देवोंमेंसे एक देव है। -

श्रावक-प्रतिक्रमण
३
मुख्य तो है। जो लशकालोन उत्सवोंसे जगतको आनंद करने
वाला है, रत्नोंने जिसकी रचना हुई है इसलिये वह तीनों
लोकोंको सुशोभित पारनेवाला है। ऐसे श्रोजिनालयको मैं
शरण होता है ॥२॥
श्रीमतारमगंभीररयावादामोधलांछनम् ॥
जीयात् त्रैलोक्यनाथस्य शासनं जिनशासनम् ॥ ३॥
भावार्थ--को अन्तरंग अनंतकेवलज्ञानरूपी लक्ष्मीसे
सुशोभित है और चाहा प्रत्यक्ष परोक्ष वाधारहित अजेय
सत्य लक्ष्मीसे भूपित है, जो परम गंभीर है, स्याहादको अमोघ
मुद्रासे धरती ऐसा है लोक्य प्रभु श्रीजिनेन्द्रदेवका यह
शासन चिरकाल जगतके जीवोंका मंगल करो॥३॥
श्रीमुखालोकनादेव श्रीमुखालोकनं भवेत् ।
आलोकनविहीनस्य तत्सुखावातयः कुतः ॥४॥
भाषर्थ-श्रीजिनेन्द्रदेवके मुखके दर्शन करने मानसे हो
मुक्तिरूपी लक्ष्मीका अपरम्पार सुख टोखने लगता है। भला जो
श्रोजिनेन्द्र देवके दर्शन नहीं करते हैं उनको सुख किस प्रकार
प्राप्त हो सकेगा?
अद्याभवत्सफलतानयनयस्य,
देव त्वदीय चरणाम्बुजवीक्षणेन ।।
अद्य त्रिलोकतिलक प्रतिमासते मे,
मंसारवारिधिरयं चुलुकप्रमाणम् ॥५॥

४ श्रावक-प्रतिक्रमण भावार्थ-हे देव ! आज आपके चरण-काल देखनेले मेरे दोनों ही नेत सफल हुये हैं। हे तीन लोको तिलक ! आज आपके दर्शन मानसे संसारसी समुद्र मुझे चुल्लूभर पानोके समान जान पडता है॥५॥ अद्य मे क्षालित गात्र नेत्रे च विमलीकृते । स्नातोऽहं धर्मतीर्थपु जिनेन्द्र तव दर्शनात् ॥६॥ भावार्थ-हे जिनेन्द्र देव ! आज आपके दर्शन करनेसे मेरा शरीर पवित्र हो गया है। मेरे दोनों नेत्र निर्मल हो गये हैं और आज मैंने धर्मरूपी तोमे स्नान कर डाला है॥६॥ नमो नमः सच्चहितंकराय वीराय भव्यांबुजभास्कराय। अनंतलोकाय सुरार्चिताय देवाधिदेवाय नमो जिनाय || भावार्थ-जो भगवान श्रीवर्तमान स्वामी समस्त जीवोंका भला करनेवाले हैं भव्यरूपी कमलोंको सूर्याके समान प्रफुल्लित करनेवाले हैं। अनंतलोकको देखनेवाले हैं। देवोंके द्वारा पूज्य हैं और देवोंके भी परमदेव हैं ऐसे श्री अरहंतदेव भगवान श्रीमहावीर स्वामीके लिये मैं वार वार नमस्कार करता हूं ॥७॥ नमो जिनाय त्रिदशार्चिताय विनष्टदोपाय गुणार्णवाय । विमुक्तिमार्गप्रतिबोधनाय देवाधिदेवाय नमो जिनाय ॥८॥ भावार्थ-जो अरहंतदेव इन्द्रोंके द्वारा पूज्य हैं। क्षुधा तृषा आदि अठारह दोषोंसे रहित हैं। अनंत गुणोंके समुद्र हैं, मोक्षमार्ग के उपदेश देनेवाले हैं और देवोंके भी अधिपति-देवाधिदेव श्री धावक-प्रतिक्रमण ५ सरहंत भगवान देव हैं ऐसे श्रीअरहंतदेवके लिये वार चार नम- स्कार है॥८॥ देवाधिदेव परमेश्वरवीतराग! सर्वज्ञ तीर्थकर सिद्ध महानुभाव ॥ त्रैलोक्यनाथ जिनपुंगव बर्द्धमान ! स्वामिन् गतोऽस्मि शरण चरणद्वयं ते ।।९।। भावार्थ--हे देवाधिदेव ! हे परमेश्वर ! हे चोतराग! हे सर्गज्ञ ! हे तीर्थ कर! हे सिद्ध ! हे महानुभाव! हेत्रलोक्यनाथ! हे जिनपुंगव ! हे बडेमान ! हे स्वामिन् ! में आपके पवित्र चरणकमलोकी शरण लेता हूँ॥६॥ जितमदहपढेपा जितमोहपरीपहा जितकपायाः । जितजन्ममरणरोगा जितमात्नयों जयंतु जिनाः ॥१०॥ भावार्थ--हे जिनेन्द्रदेव! आप ही हर्ष और उपको जीतने... वाले हो, मोह और परोप होको जीतनेवाले हो, पारों ( क्रोध- मान माया लोभ) को जीतनेवाले हो, जन्म-मरण और रोगको जीतनेवाले हो, मत्सरताको जीतनेवाले हो और समस्त दोपोंको जीतनेवाले हो अतएव आप जिनेन्द्र हो । हे भगवन् ! आप सदैव जयवंत रहो ॥ १०॥ जयतु जिनवर्द्धमानस्त्रिभुवनहितवर्यचक्रनीरजबंधुः । त्रिदशपतिमुकुटभामुग्चूडामणिरश्मिरंजितारुणचरणः ॥११॥ भावार्थ-जो तीनोलोकोंके समरत जीवोंका सदोदित ६ श्रावक-अतिक्रमण हित करनेवाले ऐसे पवित्र धर्मचक्ररूपो कमलके लिये सूर्यके समान हैं, जिनके चरणकमलोंको लालिमा इन्द्रोंके मुकुटके चूडापणि रनकी शोभाको अद्वितीय प्रकाश कर रही है। ऐसे श्रीभगवान् वद्ध मान स्वामी सदा जयवंत हों ॥११॥ जय जय जय त्रैलोक्यकाण्डगोभि शिखामणे ! नुद नुद नुद स्वांतध्वतिं जगत्कमला नः।। नय नय नय स्वामिन शांति नितांतमनन्ति मां, नहि न हि न हि त्राता लोके कमित्र भवत्सरः ॥१२॥ भावार्थ-हे भगवन् ! आप तीवलोक अद्वितीय शोभाको धारण करने वाले चूडामणि रतके समान हैं इसलिये आपको जय हो जय हो पुनः पुनः जय हो। हे प्रभो! भार हो जगतरूप कमलको प्रकाश करनेके लिये सूर्याक समान हैं इसलिये मेरे मोहांधकारको दूर कीजिये, दूर कीजिये, दूर कीजिये । हे रवामिन् ! अविनश्वर शातिको मुझे प्रदान कीजिये, प्राान कीजिये, प्रदान कीजिये । हे भव्यजीवोंके अद्वितीय मित्र! आपके सिवाय मेरी रक्षा करने वाला, संसारके दारुण दुःखोंसे बचाने वाला अन्य कोई नहीं है, अन्य कोई नहीं है, अन्य कोई नहीं है ॥ १२ ॥ चित्ते मुखे शिरसि पाणिपयोजयुग्मे, भक्ति स्तुर्ति विनतिमंजुलिमञ्जसव ।। चेक्रीयते चरिकरीति चरीकरीति, यश्चर्करीति तव देव स एव धन्यः ॥१३॥ भावार्थ-हे देव ! हे अर्हन ! हे मंगललोकोत्तम शरणभूत!

श्रावक-प्रतिफमज
जो पुरुष अपने मनमें आपको भक्ति करता है। मुखसे आपकी
स्तुति करता है। मस्तकसे विनय पूर्वक नमस्कार करता है।
और अपने दोनों हाथरूपी कमलोंसे आपके लिये अंजुलि करता
है। हे भगवन ! वह पुरुष इस संसारमे अत्यन्त धन्य है, पुरु-
पोत्तम है, भव्य है और संमार समुद्रमे शीघ्रही पार होने
चाला है ॥ १३॥
जन्मोन्माज्यं भजतु भवतः पादपद्मं न लभ्यं,
तच्चेत्स्वैर चरतु न च दुर्दैवतां सेवतां सः ॥
अश्नात्यन्नं यदिह सुलभं दुर्लभं चेत्सुधास्ते,
शुव्यावृत्य कवलपति कः कालकूट बुभुक्षुः॥१४॥
भावार्थ हे भगवन् ! हे महेन् प्रभो! पुरुषको जन्म मरण,
दूर करनेवाले आपके पवित्र चरणकमलका सेवन करना चाहिये
यदि उनकी प्राप्ति न हो सके तो अपनी प्रवृत्ति इच्छानुसार करे
परन्तु उसे मिथ्या देवताओंका सेवन नहीं करना चाहिये ।।
जैसे कि इस संसारमें जिसको अमृत मिलना कठिन है वह
सुगम रीतिसे प्राप्त होनेवाले अन्नका भक्षण करता है परंतु मख-
को मिटानेके लिये विषका भक्षण नहीं करता ॥ १४ ॥
रूपं ते निरुपाधिसुंदरमिदं पश्यन्सहस्रक्षणः,
प्रेक्षाकौतुककारि कोऽत्र भगवन्नोपेत्यवस्थांतरम् ।।
वाणी गद्गदयन् वपुः पुलकयन् नेत्रद्वय स्रावयन्,
मृीन नमयन् करी मुकलयन चेतोपि निर्वापयन्॥१५॥

श्रावक-प्रतिक्रमण भावार्थ-हे भगवन् ! यह आपका रूप वस्त्र अलंकार आदि उपाधियोंको धारण किये बिना ही अत्यन्त सुन्दर है। तथा देखनेवालोंको अत्यन्त कौतुक उत्पन्न करनेवाला है। हे प्रभो! इस संसारमें कौन पुरुप है जो आपके ऐसे सुन्दर ससको देखकर अपनो अवस्थाको न वश्ले। (आपके सुन्दर सपको देखने मात्रसे ही जीव अपना अपरथाको वलकर स्वाभाविक तत्व अव- स्थाको प्राप्त हो जाते हैं ) हजार नेलोको धारण करने वाला इन्द्र भी आपके उस सुंदर रूपको देखकर अपनो वाणीको गदगद बना लेता है। अपने शरीरको प्रफुल्लित कर लेता है। उसके दोनों नेत्रोंसे अश्रुधारा वहने लगतो है। वह इन्द्र अपने मस्तक- को नमा लेता है। दोनों हाथोंको जोड़ लेता है और अपने हृदयमें अत्यन्त संतुर हो जाता है ॥ १५ ॥ वस्तारातिरिति त्रिकालविदिति त्राता त्रिलोक्या इति, श्रेयः सूतिरिति श्रियांनि धरति यः सुगणामिति । प्राप्तोहं शरणं शरण्यमगतिस्त्वां नत्वजोपेक्षण, रक्ष क्षेत्रपदं प्रसीद जिन कि विज्ञापितों पतैः ॥१६॥ भावार्थ- हे भगवन् ! भाप समस्त फर्मरूपी शनुभोका नाश करने वाले हैं। समस्त पदार्थों की त्रिकालवती समस्त पर्यायोंको एक साथ सतत जानने वाले हैं। अनेक प्रकारको कल्याण परंपराको उत्पन्न करने वाले हैं। अांत चतुण्यके निधि हैं और देवोंमें भी आप ही सर्वश्रेष्ठ हैं। इसके सिवाय आप ही समस्त जीवोंको वास्तविक शरण देने वाले है और अत्यन्त

श्रावक-प्रतिक्रमण
कल्याणमय पटको प्राप्त हुए हैं। हे प्रभो! मैं यह सब कुछ समझ
कर और मुझे अपनो कोई दूसरी गति (मार्ग) दिखाई नहीं देनेके
कारण ही आपके शरणमे पाया है। इसलिये हे नाथ! आर
प्रसन्न हजिये। अपनो उपेक्षाका परित्याग कीजिये और मेरी
रक्षा कोजिये। अब मेरा आपके सिवाय कोई भी शरण नहीं
है। इसलिये मेरी उस प्रार्थनाको गुप्त रखने का लाभ
होगा ? ॥१६॥
त्रिलोकराजेन्द्रकिरीटकोटिप्रभामिगलीहपदारन्दम् ।
निर्मूलमुन्मूलितकर्मवृक्षं जिनेन्द्रचंद्रं प्रणमानि भक्त्य ॥
भावार्थ-तीन लोकमें उत्पन्न होनेवाले राजा महाराजा'
और इनके करोडों मुकुट को प्रभासे जिनके चरण-काल
सुशोभित हो रहे हैं और जिन्होंने फर्मरूपी वृक्षको समूर
जड़से नष्ट कर डाला है । ऐने श्राजिनेन्द्र भगवान श्राचन्द्र-
प्रभुको मैं बड़ी भक्ति और विशुद्ध भावनासे नमस्कार
करता हूँ ॥१७॥
करचरणननुविध नादटना निहतः प्रमादतः प्राणी।
ईयांपथमिति भीत्या मुचे तद्दोपहान्यर्थ ॥ १८॥
भावार्थ-मार्गमें चलते हुए मेरे हाथ पैर और शरीरके
हलन चलनसे जिन प्राणियोंका विघात हुआ हो। प्रमाइसे जो घात
हुआ हो उस दोपको दूर करनेके लिये ईपथ-गमनका परित्याग
फरता हूं । गमनागमन क्रियाओंको रोक आत्मविशुद्धिको भाव-
नको धारण करता हूँ ॥१८॥

श्रावक-प्रतिक्रमण
ईपिथे प्रचलवाध मया प्रमादा-
देकेन्द्रियप्रमुखजीवनिकायवाधा ।।
निर्वर्तिता यदि भवेयुगान्तरेक्षा,
मिथ्या तदस्तु दुरितं गुरुभक्तितो मे ॥ १९ ॥
भावार्थ-हे भगवन् ! ईर्यापथपूर्वक शुद्धिसे चलते हुए
भी मुझसे प्रमाद वश यदि ऐकेन्द्रिय आदि जीवोंकी विराधना
हुई हो तो वे मेरे सव दोष गुरु-भक्तिके प्रसादसे मिथ्या हो ॥३॥
प्राग्दिग्विदिगंतरकेवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः ।
ये सर्वद्धिसमृद्धा योगिगणास्तानह वदे ॥ १ ॥
इस श्लोकको पढ़कर पूर्ण दिशामे तीन आवर्त और नति
करनी चाहिये ॥१॥
दक्षिणदिग्विदिगंतरकेवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः ।
ये सर्वद्धिसमृद्धा योगिगणास्तानहं वंदे ॥२॥
इस श्लोकको पढकर दक्षिण दिशामे तीन आवत और नति
करनी चाहिये॥२॥
पश्चिमदिग्विदिगंतरकेवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः।
ये सर्वद्धिसमृद्धा योगिगणास्तानहं बंदे ॥३॥
इस श्लोकको पढकर पश्चिम दिशामे तोन आवर्त और नति
करनी चाहिये ॥३॥

श्रावक-प्रतिक्रमण १ उत्तरदिग्विदिगंतरकेवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः । ये सर्वद्धिसमृद्धा योगिगणास्तानह बंदे ॥ ४॥ इस श्लोकको पढ़कर उत्तर दिशा में तीन आवर्त और नति करनी चाहिये ॥४॥ सामयिक। नमः श्रीवर्द्धमानाय निघृतकलिलात्मने । सालोकानां त्रिलोकानां यद्विद्या दर्पणायते ॥१॥ भावार्थ--जिनका अनन्तज्ञान अलोक सहित तीनों लोकोंको स्पर जानता है और जिनने अपनी आत्मासे समस्त दोष नष्ट कर दिये हैं ऐसे सर्वज्ञ वीतराग श्रीवीर भगवानके लिये नमस्कार है॥१॥ प्रकटसहजभाव. शुद्धचैतन्यविम्बः, नयनिकरकरॊधैर्ध्वस्तमोहान्धकारः ॥ नोट-पूर्व दिशामे' केवलो मगवान तोयंकर परम देव सिद्ध भाचार्य उपाध्याय साधु और जिनचैत्य चैत्यालय विद्यमान हैं तथा सद्धि धारक गणधर देव हैं उनको बंदना हो। इसी प्रकार दक्षिण पश्चिम उत्तर दिशामें नमस्कार करे। नोट-“पडिकमामिभंते इरियावहियाएविराहणाए इत्यादि दण्डक पाठको पढ़कर कायोत्सर्ग करना चाहिये । पुनः "पापि. 'ठेन दुरात्मना जडधिया" इत्यादि श्लोकोंको पढकर साधु प्रतिकापा करना चाहिये।

२०
श्रावक-अतिक्रमण
स्वमतगगनचारश्चारुचारित्रतेजाः,
जयति जगति वीरः केवलज्ञानभानुः ॥२॥
भावार्थ--कर्मरूपो आवरण और समस्त प्रकारके दोपोंको
दूर करनेसे जिसने अपने आत्मीक शुद्ध खभावको प्रकट कर
दिया है। समस्त प्रकारकी कालिमारहित शुद्ध ज्ञायकखरूप
प्रतिबिंवले जो प्रकट हो रहे हैं। द्रष्यार्थिक-पर्यायार्थिक आदि
नयोंके समूहरूपी किरणोंसे मोहान्धकारको जो समूल नाश कर
रहे हैं। जा स्याद्वाइमतरूपो आकाशमें विहार कर रहे हैं। निष्क-
लेक और साजन हितकर चारित्ररूपी तेजसे जो सुशोभित हो
रहे हैं। ऐसे तीन जगतके समस्त चराचर स्वरूपको प्रत्यक्ष प्रकट
करने वाले श्रीमहावीर भगवान रूपी सूर्ण सदैव जगतमें
जयवंत रहो ॥२॥
यः सर्वाणि चराचराणि विधिवव्याणि तेषां गुणान,
पर्यायानपि भूतभाविभवतः सर्वान् सदा सर्वथा ॥
जानीते युगपत्प्रतिक्षणमतः सर्वज्ञ इत्युच्यते।
सर्वज्ञाय जिनेश्वराय महते वीराय तस्मै नमः ॥३॥
भावार्थ-जो अन्तीन्द्रिय सूक्ष्म पदार्थ और स्थूल पदार्थों को
त्रिकालवी समस्त अनन्तानन्त पर्यायोंको एक साथ वाधारहित
निरंतर प्रत्यक्ष जानता है, जिसका शान आवनश्वर और
अनंत है ऐसे श्रीवीतराग अष्ट प्रातिहार्य विभूषित त्रिलोक पूज्य
श्रीवीर भगवानको भाव भक्तिपूर्वक विकाल नमस्कार है ॥३॥

श्रावक-प्रतिक्रमण
२१
येऽभ्यासयंति कथयंति विचारयति,
संभावयति च मुहुर्मुहुरात्मतत्वम् ।।
ते मोक्षमक्षयमनुनमनतमाख्यं,
क्षिप्रं प्रयांति नवकेवललब्धिरूपम् ॥ १ ॥
भावार्थ-जो आत्मत्वका निरंतर अभ्यास करते हैं, पठन
पाठन करते हैं, आत्मतत्वका उपदेश करते हैं, शांतिपूर्वक
निरंतर विचार करते हैं, स्व दृश्यमें मनन करते हैं, वार धार
उसी तत्वका चितवन करते हैं, ध्यान करते हैं वे अविनाशीक
महान अनन्तसौरय वाधारहित मोक्षसुखको शीघ्र ही प्राप्त
कर लेते हैं। आत्मतत्त्वका विचार करनेवालोंको ही नव केवल-
लब्धियां स्वयमेव प्राप्त हो जाती हैं ॥१॥
सामयिकके समय क्या करना चाहिये ?
सम्मामि सध्यजीवाणं सच्चे जीवा खमंतु मे।
मेत्ती मे सब्वभूदेसु वैरं मज्झ ण केणवि ।।
भावार्थ-सामायिक करनेके समय सबसे प्रथम समस्त
जीवोंके साथ वैरभाव त्याग करनेके लिये, परिणामॊमें विशेष
विशुद्धि करनेकेलिपे निष्कपटभावसे निस्पृह होकर सब
जीवोंको क्षमा करे-मनसे कपाय भावोंका परित्याग करे तथा
समस्त जीवोंसे भी क्षमा करनेकी याचना करे। समस्त जीवोंक
साथ मैत्रोभावनाको प्रकट करे और किसी जीवके साथ
बैरभाव नहीं रक्खे ॥२॥

श्रावक-यतिकमण सामयिकमें विचार । अशरणमशुभमनित्यं दुःखमनात्मानमावसामि भवं । मोक्षस्तद्विपरीतात्मेति ध्यायंतु सामयिके ।। ३ ।। भावार्थ-इस संसारमें जीवका कोई भी शरण नहीं है मरणसे कोई भी नहीं बचा सक्ता है । यह संसार अशुभ है क्षण भंगुर है दुःख स्वरूप और दुःखका कारण है । इसलिये यह संसार आत्माका हितकारक नहीं है। संसारकी कोई भी वस्तु (धन-भोग-विभव-विषय-और शारीरादि) सुखकारक नहीं है। संसारकी समस्त वस्तुएं आकुलता और दुःखसे परिपूर्ण हैं। मोक्ष शरणभूत है-सुखमय है, अक्षय है. वाधारहित है, आत्माके सत्य स्वरूपमय है। मुझे किस प्रकार मोक्ष सुखकी प्राप्ति हो ? इस प्रकारका ध्यान व विचार सामायिकमें करना चाहिये। सामयिकका स्वरूप। आसमययुक्तिमुक्तं पंचाघानां मनोवाकायैः ।। सर्वत्र च सामयिकाः सामायिक नाम शंसंति ।। भावार्थ-मन वचन कायसे हिंसादिक पंचपापोंका समय- की मर्यादाकर परित्याग करना सो सामयिक है। आत्माके भावों में किसी सकल्प विकल्पके द्वारा पंचपापोंकी प्रवृत्ति नहीं करना तथा द्रव्यरूपसे पंच पापोका परित्याग करना सोसाम- विकवत है।

श्रावक-प्रतिक्रमण २३ मामयिकका ग्रहण ( सामायिक करनेका मंकल्प ) भगवन् ! नमोऽस्तु ते एपोह पूर्वाहिक (मध्याहिक, अपराहिक) देववंदनांकरिष्यामि (इति सामयिक स्वीकार) भावार्थ है अर्हन् भगवन् ! आपके लिये नमस्कार है । यह में अमुक नाम धारक अमुक • गोत्र अमुक जाति अमुक वर्ण अमुक शाखा और अमुक'"आम्नायका इस अमुक प्राममें इस संवत्सरकी अमुक" मास अमुक तिथिमें प्रातःकालकी देव वंदना (मध्यान्हकाल या सायंकाल ) कर्म करनेका प्रतिष्ठापन करता हूं और अहन्त परमात्माके समक्ष चारों दिशाोंमें दिगंजलि कर सामयिक रवरूप स्वीकार करता हूं। इस प्रकारका संकल्पकर तोन नति बीर बारह भावत करे। प्राग्दिग्विदिगन्तरतः केवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवा.। ये सर्वद्धिसमृद्धा योगीशास्तानहं बंदे ॥ १॥ दक्षिण दिग्विदिगन्तरत: केवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवा । ये सर्वद्धिसमृद्धा योगीशास्तानहं बंदे ॥२॥ पश्चिमदिग्विदिगन्तरतः केवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः। ये सर्वर्द्धिसमृद्धा योगीशास्तानहं बंदे ॥ ३ ॥ उत्तरदिग्विदिगन्तरतः केवलिजिनसिद्धसाधुगणदेवाः। ये सर्वद्धिसमृद्धा योगीशास्तानहं चंढे ॥ ४ ॥ भावार्थ-एक एक दिशामे दोनों हाथोंको कमलाकार जोड़कर तीन तीन आवर्तकर प्रदक्षिणा पूर्णक एक एक दिशाका श्लोकका उधारण करता हुआ १२ गवरी और नीन शिरोनति करे।

श्रावक-प्रतिक्रमण लघु सामयिक सिद्ध सपूर्णभन्यार्थ सिद्धेः कारणमुत्तमम् । प्रशस्तदर्शनज्ञानचान्त्रिप्रतिपादनम् ।। सुरेंद्रमुकुटाश्लिष्टपादपद्मांशुकैसरम् । प्रणमामि महावीरं लोकत्रितयमंगलम् ।। भावार्थ-जो इस भूमंडलके समस्त भव्यजनोंके अभीष्ट मनोरथोंको सिद्ध करनेके लिये पूर्ण कुशल हैं। जो कृतकृत्य हो चुके हैं। जिनने त्रिलोकका अधिपतित्व प्राप्त कर लिया है, सर्व- जीवोंके हितके लिये सर्वोत्कृष्ट सम्यग्दर्शन-सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चारित्र स्वरूप मोक्षमार्गको प्रकट करनेवाले हैं, जो भक्तिसे भत्रंत वशीभूत हुए देवेन्द्रोंके मुकुटोंको मणिको अपने पवित्र चरणकमलोंकी प्रभासे प्रभान्वित करनेवाले और तीन जगतमें महामंगल स्वरूप हैं ऐसे त्रिलोकके प्रभु श्री महावीर भगवानको नमस्कार करता हूं। सिद्धवस्तुवचोभक्त्या सिद्धान् प्रणवतां सदा। सिद्धकार्याः शिवं प्राप्ताः सिद्धिं ददतु नोऽव्ययाम् ।। भावार्थ-सिद्ध और साध्यके भेदसे वस्तु दो प्रकार है। जो वस्तु सर्वांगरूपसे अपने स्वरूपको अत्यत प्राप्त हो जाने इतकृत्यरूप हो चुकी है उस सिद्धवस्तुके वचनोंके श्रवण मात्र से उत्पन्न हुई आभ्यंतर गाढभक्तिसे साष्टांग नम्र होकर सिद्ध परमात्माको नमस्कार करता हूं। हे सिद्ध परमात्मन् ! आपने

श्रावक-अतिक्रमण
समस्त कार्य सिद्ध कर लिये हैं। हे प्रभो! आपने अविनाशीक
मोक्षसुख प्राप्त कर लिया है। अतएव इम लोगोंको भी अवि-
नाशीक सिद्धि प्रदान कीजिये।
नमोऽस्तु धूतपापेभ्यः सिद्धेभ्य ऋपिपरिपहे।
सामयिक प्रपद्येऽहं भवभ्रमणसूदनम् ॥
भावार्थ--समस्त प्रकार पापकर्मों से सर्वथा रहित सिद्ध
परमेष्ठी और मुनीश्वरोको दिव्य सभाको नमस्कार है। अब मैं
संसारके परिभ्रमणको नष्ट करनेवाले इस सामायिकको प्राप्त
होता है।
समता सर्वभूतेषु संयमः शुभभावना।
आर्तरीद्रपरित्यागस्तद्धि मामयिक व्रत।
भावार्थ-समस्त प्राणीमात्रपर समताभाव होना, शत्रु
और मित्रपर समान भाव रखना, प्राणी मात्रपर दयाभाव रखकर
संयम पालन करना, मनके रागडेप करनेवाले संकल्प विकल्पको
जीतना, आर्त और रोद्रध्यानका परित्याग करना और सटेव
धर्म ध्यानका विचार करना सो सामायिक है।
साम्यं मे सर्वभूतेषु वैरं न मम केनचित् ।
आशाः सर्वाः परित्यज्य समाधिमहमाश्रये ॥
भावार्थ-मेरा समस्त प्राणी मानपर साम्यमाव हो मेरा
रभाव फिसी भी प्राणीके साथ नहीं हो । संसारके विषय भोग
और इष्ट पदार्थों की प्राप्तिको इच्छाका सर्वथा परित्यागकर
निशल्यभावसे समाधिमरणकी भावना करता है।

२६ श्रावक-प्रतिक्रमण रागाद् द्वेषान्ममत्वादा हा! मया ये विराधिताः। क्षाम्यंत जन्तवस्ते मे तेभ्यो मृपाम्यहं पुनः ।। भावार्थ-किसी प्रकारको वस्तुके रोगभावसे या हे पभावसे अथवा मोहभावसे हा! मैंने जिन जिन प्राणियोंकी विराधना की हो वे प्राणी मुझपर क्षमा करें और मेरा भी उनपर क्षमाभाव है। मनसा वपुपा वाचा कृतकारितसम्मतैः । रत्नत्रयभवं दोपे गहें निन्दामि वर्जये । भावार्थ हे भगवन् ! मैंने रत्नत्रयके पालन करनेमें मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदना से जो जो दोष लगाये हों उन दोषोंका परिशोधन करनेके लिये मैं प्रायश्चित्तको स्वी- कार कर मैं अपनी आत्माकी इस दुष्प्रवृनिकी गर्दा करता है और भविष्यमे मुझसे ऐसी प्रवत्ति किसी कालमें नहीं हो ऐसी भावना करता हूं। तैरश्चं मानवं दैवमुपसर्ग सहेऽधुना। कायाहारकषायादीन् प्रत्याख्यामि त्रिशुद्धितः ॥ भावार्थ-मैं अव इस सामायिकके अनुष्टानके समय तिर्ग- चोंके द्वारा होनेवाला उपसर्ग, मनुष्योंके द्वारा होनेवाला उपसर्ग, देवोंके द्वारा होनेवाला उपसर्ग अथवा पापकर्मके उदय द्वारा होनेवाला उपसर्गको यथात्मशक्ति सहन करता हूँ और काय शरीर ) भोजन विषय भोगादिककी इच्छा तथा क्रोध मान माया लोभ आदि कषायोंसे निर्ममत्वभावको धारण करता हूं शरीर भोगापभोग और कषायों से निस्पृह होता हूं।

शवक-प्रतिक्रमण २७ राग द्वेष भय शोक महोत्सुक्यढीनताः । व्युत्सृजामि त्रिधा सर्वमरति रतिमेव च ।। भावार्थ-हे भगवन् ! मैं इस सामायिकके समय समस्त वाह्य पदार्थासे रागभाव, द्वेषभाव, भय, शोक, हर्णभाव, ओत्सुक्यभाव, दीनभाव आदि समस्त प्रकारके भावोंका परित्याग करता है। और हे भगवन् ! में अपने मन वचन कायको शुद्धिसे वाहा पदा- पर प्रीति और प्रोनिका भी त्याग करता है। जीविते मरण लामेऽलामे योगे विपर्यये । बधावगै मुखे दुःखे सर्वदा ममता मम || भावार्थ-हे भगवन् ! अव इस सामायिक अनुष्ठानके समय पर्यन्त मैं अपने जीवन, मरण, लाभ, मलाम, अनिए संयोग. इष्ट वियोग, मित्र, शत्रु सुग्ध और दुग्व आदि समस्त वस्तुओं में साम्य- भावको धारण करता है। मेरे अब इस समय किसी वस्तुपर गग टेप नहीं है। मला पुरा परिणाम नहीं है। सांसारिक इष्ट भौगोपभोग पदार्थों को प्राप्तिकी भावना नहीं है और उनकी अप्राप्तिमें दुख भी नहीं है। आत्मैव मे सदा ज्ञाने दर्शने चरणे तथा । मत्याख्याने ममात्मैव तथा संवरयोगयोः ।। भावार्थ-हे भगवन् ! मुझको सम्यग्दर्शन सम्यज्ञान और सम्यकचारित्रकी प्राप्तिका कारण पक यह मेरी आत्मा ही है। तथा काय काय आहारादिक दुर्भावों की इच्छा रखनेवाली एक यह मेरी पात्मा ही है। समस्त कौका गंवरण करनेके लिये श्रावक-प्रतिक्रमण कारणभून एक यह आत्मा ही है और पाप कौंका परित्याग करनेवाला यह आत्मा हो है। एको मे शाश्वतश्चात्मा ज्ञानदर्शनलक्षणः । शेपा बहिर्भवा भावाः सर्वे संयोगलक्षणाः ।। भावार्थ-हे भगवन् ! इस निरंतर परिवर्तन संसारमें एक मेरा आत्मा ही अविनश्वर है। संसारके अन्य (काय, भोग, उपभोग, बंधुजन, धन संपत्ति आदि) समस्त पदार्थ विनाशीक है, दुःखदायक हैं। दुःखों के कारणभत हैं। इन पदार्थों को आत्माके साथ किसी प्रकारका संबंध नहीं है। ये समस्त पदार्थ आत्मासे सर्वथा भिन्न हैं। कोक संयोगसे ये पदार्थ आत्मखरूप प्रतिभासित हो रहे हैं। इसलिये इनके संबंधका परित्याग करनेमें मेरी कोई भी हानि नहीं है। ऐसी भावना से मैं इनसे ममन्वभावका परित्यागकर सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान' और सम्यकचारित्र स्वरूप अपनी अविनश्वर आत्मापर ही मम- त्वभाव करता हूं। संयोगमूल जीवेन प्राप्ता दुःस्वपरंपरा । तस्मात्संयोगसबंधं त्रिधा सर्व त्यजाम्यहं ।। भावार्थ-हे भगवन् ! इस जोवने अनादिकालसे कौके संयोग से होनेवाले विषय-भोग-काय आदिके संयोगसे दुःख सहन किये अब तो उनके दुःखोंसे चित्त ऊब गया है। इसलिये इस सामायिकके अनुष्ठान के समय समस्त पुत्र मित्र भाई बंधु-विषय भोग और शरीरसे ममत्वभावका मन वचन कायसे सर्वथा

श्रावक-प्रतिक्रमण
२६
परित्याग करता है और अपने आत्माको फाँसे रहित होनेकी
भावना करता है।
एव सामयिकात्साम्यभावं मेस्वखण्डितम् ।
वर्ततां मुक्तिमानिन्या वशीचूर्णायितं प्रभो ! ॥
भावार्थ---हे प्रभो! इस प्रकार सामायिकके अनुष्ठानके
समय सदैव मेरे अखंडित साम्यभाव हो । अथवा सामायिककी
प्रक्रियासे सदेव मेरे समस्त पदार्थों में साम्यभाव होता रहे।
और यह साम्यभाव ही मुक्तिरूपो कन्याके पाणिग्रहण करनेके
लिये वशीचूर्ण होगा। अर्थात् साम्यभावसे ही इस जीवके
संसारका भयानक परिचक्र नागको प्राप्त होगा और मोक्षका
अविनाशोक अनंत सुख प्राप्त होगा।
मोहधांतविदारण विशदविश्वोभासिदीप्तिश्रियं,
सन्मार्गप्रतिभामक विबुधसंदोहामृतोत्पादकम् ॥
श्रीपादं जिनचन्द्र शांतिशरण सद्भक्तिमानामि ते ।
भूयस्तापहरस्य देव भातो भूयात्पुनर्दशनम ||
हे जिनेन्द्र चन्द्र ! आप मोहध्वांतके विदारनेवाले हैं, समस्त
लोक अलोकको प्रकाशित करनेवाली शान लक्ष्मीसे सुशोभित हैं,
श्रेष्ठ मार्गके द्योतक हैं, ज्ञानवानोंको अमृत उत्पन्न करनेवाले हैं,
शांतिके एक मात्र शरण हैं, संसारतापको हरनेवाले हैं, इसलिये
आपके चरण कमलको भक्तिभावसे नमस्कार करता हूं। हे
भगवन! आपके फिर दर्शन प्राप्त हो ऐसी प्रार्थना करता है।
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३० श्रावक-प्रतिक्रमण अथ श्रावक प्रतिक्रमण निःसंगोहं जिनानां सदनमनुपमं त्रिःपरीत्यैत्य भक्त्या, स्थित्वा गत्या निषिद्धयुच्चरणपरिणतोऽन्तःशनैर्हस्तयुग्मम् । भाले संस्थाप्य बुद्धया मम दुरितहर कीर्तये शक्रबंधे, निंदादूरं सदाप्तं क्षयरहितममुं ज्ञानभानुं जिनेन्द्रम् ।। अर्थ-परिग्रहका परिमाण र भव्यजीव अनुपम श्रीजिनेन्द्र देवके मंदिरमें जाकर प्रथम तीन प्रदक्षिणा करे, और भकिसे भगवान्के दक्षिण हाथ तरफ स्थिन हाकर 'जय जय जय"निस्सहो निस्सही निस्सही' इस प्रकार उच्चारणकर अति विनयसे अपने दोनों हाथोंको मस्तक ऊपर रखकर पापके नाश करनेवाले निंदासे रहित, अविनाशीक, परमपवित्र और ज्ञानके सूर्य ऐसे श्रीजिनराजको बारम्बार नमस्कार कर. उनके गुणोंका अनन्य- भावस चिंतवन करे। भावार्थ प्रतिक्रमण ( लगे हुए दोपोंकी विशुद्धि पूर्णक त्याग भाव ) स्वात्मज्ञान विना नहीं होता है। स्वात्मनान उत्पन्न होनेके लिये, मोहका त्याग करना नितांत आवश्यक है। मोहका त्याग-पर वस्तुओंका परिमाण अथवा पर वस्तुओके त्याग करने से होता है। इस लिये प्रतिक्रमण करनेके प्रथम समस्त प्रकारके परिग्रहका परिमाण करना चाहिये। इसका कारण एक यह भी है कि दोपोंकी निवृत्ति राग द्वपके अभावसे होती है। राग और द्वेष दोनों पर वस्तुओंके सम्बन्धसे ही होते हैं। इसलिये परिग्रहका परिमाण करना अति आवश्यक है। .

श्रावक-अतिक्रमण ३१ मोहरहित, परम विशुद्ध, परमशांत; अनंत सुख सहित, सर्वज्ञ और त्रिलोक पूज्य अरहंत भगवान् अमूर्तीक (आत्मा- अमूर्तीक होनेसे अतीन्द्रिय है ) आत्माका प्रत्यक्ष अनुभव करा रहे इसलिये प्रतिक्रमण करनेवाले भव्य जोवोंको स्वात्म-बोध प्राप्त होनेके लिये अरहंत प्रभुके गुणोंका चितवन करना चाहिये, जिससे खात्म-वोधको प्राप्ति हो और दोपोंसे ग्लानि उत्पन्न हो। यद्यपि बद्धकर्म दोषोंकी ग्लानिसे निझरित नहीं होते, तथापि पापाचरणसे भय और आत्मोन्नतिको विशुद्ध भावना स्वयमेव प्रकट होती है पडिकमामि भंते, इरियावहियाए, विराहणाए अणा- गुते अइगपणे, णिग्गमणे ठाणेगमणे, चंकगणे, पाणुग्ग- मणे विज्जुग्गमणे, हरिदुग्गमणे उच्चारपस्सवण खेलसिंहा- णय वियडिपईठावणियाए जे जीया एइंदिया वा, वेइंदिया वा, तेइंदिया वा, चउरिदिया वा, पंचेदिया वा, पण्णो- ल्लिदावा, पेल्लिदावा संघदिदावा, संघादिदावा, उद्दा- दिदावा, पग्दिाविदावा, किरिच्छिदावा, लेसिदावा, छिदि- दावा, भिदिदावा, ठाण दोवा ठाणचंकमणदोवा, तस्सुत्तर- गुण तस्सपायच्छित्तिकरण तस्स विमोहिकरणं अरहंताणं बाव भय वताणं णमोकारं पज्जुवासं करेमि तावकार्य पावकम्म दुच्चयं वोस्सरामि ॥ भावार्थ-प्रतिक्रमण करनेका मुख्य कारण यह है कि.

३२ श्रावक-प्रतक्रमण - आत्मामें साम्यभाव, आत्म विशुद्ध भावना और समस्त जोव मात्रमें मैत्री भावनाको जाग्रति । और यह इसीलिये पाक्षिक, नष्ठिक, साधक और पूज्य मुनोश्वर निरंतर फरते हैं। प्रतिक्रत- णको दृढताके लिये अणुव्रत, महाव्रत और समितियोंका पालन किया जाता है। अभ्यासके लिये समितियां श्रावकलोक भी न्यनाधिकनासे पालन करते हैं। समितियोंका पालन करनेपर भी सूक्ष्म जीवोंको वाधा होना संभव है इसलिये प्रतिक्रमण करते समय यह विचार करना चाहिये कि यत्नाचार पूर्वक गमन करने पर भी मुझसे जीवोंकी विराधना हुई होगी यह मेरी फायरता है, मैं अपनी इस अशक्तिसे उत्पन्न हुये दोपोंको आत्मग्लानि पूर्वक मिच्छामि दोक्कणं) छोड़ना चाहता हूँ। प्रमाद और अज्ञानतासे गमन करनेमें, विना प्रयोजन इधर उधर भटकनेमें, व्यापारार्थ सचित्त भूमिपर गमन करनेमें, मोहसे समस्त प्रकारक आरंभ करनेमें, कुत्सित स्थान (जिस स्थानपर अनायास ही जीव वाधा हो) पर विहार फग्ने , वीभत्स ( कूद फांद आदि) गमन करनेमें, प्राणियोंसे परिपूर्ण भूमिपर गमन फरनेमें, हरित वनस्पति शैवाल कीड़, अनंतकाय जिस भूमिमें निवास करते हों ऐसे स्थानार गमन करनेमें, अनंत जीव वाली भूमिपर मलमूत्र क्षेपण करने में, लार, कफ और थूकवाली भूमिपर कूदने में और आद्रित भूमिपर कार्य करनेमें जो एकेन्द्रिय दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय, और पंचेन्द्रिय जीवोंको मैंने पोड़ा दी हो, पेलिकर दुख दिया हो, एकत्र कर त्रास दिया श्रावक-प्रतिक्रमण ३३ हो, संघहितकर नाश किये हों, उपद्रवकर आघात पहुंचाया हो, संतापित किये हों, फ्लेशित किये हों, लेस दिये हों, लीपदिये हों, पांच (पाद) से कुचल दिये हों, घसीटकर हानि पहुंचाई हो, लकड़ीसे पीटे हों, अस्त्रशस्त्रले छेदे हों, अंगोपांगोंको काटा हो, स्थानांतरकर दुखित किये हों, मानसिक पीड़ा दी हो, अपहरण कर दुःस दिया हो, वचनले मर्ग छेदन किया हो। कुमार्गमें लगाकर पतित किये हों और मिथ्यामार्गका उपदेशकर अनंत दुःखोंके समुदमें गिराये हों, इत्यादि अनेक प्रकार जीवोंको कष्ट दिया हो उन समस्त कर्मा का मैं इस समय विशोधन करता हूँ। अपनी मनान और प्रमाद दशासे क्षोमित होता है। आत्मग्लानि से भयभीत हूं। हिंसाके कार्योंसे उरता है। मेरो मात्मासे अव किसी जीवको वाधा न हो ऐसी दृढ़ भावना "सत्वेष मैत्री का चार बार चिन्तवन करता है। आत्मशक्तिका ऐसा विकाश चाहता है कि जिससे मैं सब जीवोंके साथ साम्यभाव प्रगट कर स और सबका उत्को धारण कर सक् । मैं अपने कृत कमों (किये हुए कर्मों) का पश्चात्ताप करता है, मेरेसे जिन जोवोंशे दुख प्राप्त हुआ है उसके लिये में समवेदना प्रकट करता हूं। और मेरे मनमें इत्तनो विशुद्धि हो कि अब मुझसे भविष्यमें ऐसा अनिष्ट किसो जीवंका न हो । जव तक भगवान् अरहंत प्रभुका प्रतिपादित णमोकार मंत्र नववार स्पष्ट उच्चारण न कर लू तवतक समस्त पापफर्म, दुष्टकृत्य और शरीरसे ममत्वभावको छोड़ता है। (नोट-९वार णमोकार मंतको जाप २७ श्वासोच्छ्वासमें देनी) ३ ३४ श्रावक-प्रतिक्रमण ईर्यापथे प्रचलताध मया प्रमादा- देकेन्द्रियप्रमुखजीवनिकायवाधा ।। निर्तिता यदि भवेद् युगांतरे वा मिथ्या तदस्तु दुरितं गुरुभक्तितो मे ॥ १ ॥ अर्थ-ईर्यापथ पूर्वक गमन करनेपर भी भाज मुझसे प्रमाद और अज्ञानके वश एकेन्द्रिय प्रभृति जोयॉफी जो विराधना हुई हो, वह अरहंत परमात्माकी भक्तिसे मिथ्या हो। करचरणतनुविधातादटतो निहितः प्रमादतः प्राणी । ईर्यापथमिति भीत्या मुञ्चे तद्दोपहान्यर्थम् ॥ २ ॥ अर्थ-शरीर और हाथ पांव आदि अवयवोंके इधर उधर हिलानेसे, प्रमादयश जिन जीवोंको कष्ट हुआ है, वह मैं अपनी ईर्यापथको विशेष शुद्धिके लिये प्रतिक्रमण करता है और उसने उत्पन्न हुए पापोंको मिथ्या चाहता हूं। इच्छामि भते इरियावहियस्म आलोचे पुवुत्तरदक्षिण- पच्छिम चउदिसु विदिसासु विरहयाणेण जुगंतरदिहिणा दहवा ईवडवचरियाए पमाददोसेण पाणभदजीवसताण उवघादो कदा वा कारिदो वा, कीरंतो वा समणुमणिदा बस्स मिच्छामि दुकडं ॥३॥ अर्थ-हे प्रमो ! अब मैं पाप काँसे अत्यंत भयभीत हो गया है। इसलिये वारों दिशा और विदिशाओंमें ईर्यापथ पूर्वक मन करते हुए जो पापकर्य मुझसे हुआ है उसकी मैं बार बार धावरु-प्रतिक्रमण ३५ यालोचना करता है। प्रमाट तथा दृष्टिोपसे जीवोंका घात स्वयं किया हो, दूसरेसे कराया हो, अन्यके करनेमें भला माना हां इत्यादि सब कार्यों से उत्पन्न तुप मेरे दोष मिथ्या हो। प्रतिक्रमणकी महिमा। जीवे प्रमादजनिताः प्रचुराः प्रदोषा. यस्मात्प्रतिक्रमणतः प्रलय प्रयांति ।। तस्मानदर्थममल गृहियोधनार्थ वक्ष्ये विचित्रभवकर्मविशोधनार्थम् ॥ १ ॥ थर्थ-जीव प्रमाद और अमानतासे अनंत (दोप) पाप कर्म करते हैं। प्रतिक्रमण करनेसे उन दोपोंकी शांति हो जाती है इस लिये हत कर्मों की शुद्धिके लिये यह प्रतिक्रमणका स्वरूप ग्रह- स्योंके लिये प्रतिपादन किया जाता है। भावार्थ-प्रतिक्रमण करने से मनको शुद्धि, किये हुए कर्माको निर्जरा और दोषोंसे भय उत्पन्न होता है। पापिष्टेन दुरात्मना जडधिया मायाविना लोभिना । रागद्वेपमलीमसेन मनसा दुष्कर्म यन्निमितम् ।। त्रैलोक्याधिपतेजिनेन्द्र भवतः श्रीपादमूलेऽधुना निदापूर्वमहं जहामि सततं वर्तिपु. सत्पथे. ॥२॥ अर्थ-हे बैलोक्य प्रभो! हे जिनेन्द्र ! में बड़ा पापी, दुष्ट, अज्ञानी (जडबुद्धि), मायाचारी और लोभी हमने अपने मनको , -- ३६ श्रावक-प्रतिक्रमण रागद्वैपसे मलीनकर अनंत दुष्कर्म किये हैं। हे जिनराज ! अब मैं मापके चरण कमलोंकी शरण लेकर आपके समक्ष उपस्थित हो निंदापूर्वक उन सवको छोडता हूं और सन्मार्गमें चलनेके लिये वाध्य होता है तथा भविष्यमें मुझसे कुत्सित फर्म न हों, ऐसी मेरी इच्छा है। खम्मामि सम्पजीवाणं सव्वे जीवा खमंतु मे । मैची मे सव्वभूदेसु वैरं मज्झ ण केणवि ॥ ३ ॥ अर्थ-मैं समस्त जीवोंपर क्षमा करता है और मुझे भी सब जीव क्षमा करो । मेरी समस्त जीवमानमें मित्रता हो। मेरे साथ किसीका भी वैर नहीं है। भावार्थ-साम्यभाव धारण करनेके लिये सबसे प्रथम यह आवश्यक है कि अपने मनकी अत्यंत विशुद्धि फरे धौर वह इस प्रकार-कि मनको विकारित करनेवाले क्रोध, मान, माया, लोभ, वो आदि दुर्गुणोंको हृदयसे निकाल डाले, किसीने भी अपना अनिष्ट किया हो तो भी उसके ऊपर क्षमा धारण करे। इतना ही नहीं किन्तु उसके साथ बंधुत्व भाव रहे । कदाचित् अपनेसे किसीका अनिष्ट होता हो तो उससे अपने अपराधकी क्षमा चाहे और भविष्यमें जीवमात्रको अपना बंधु समझकर किसीसे विरोध न कर साम्यमाव धारण करना चाहिये। रागबंध य दोषं च हरिस्सं दीणभावय । अस्सगचं भयं सोगं रदिमरिदं च वोस्सरे ॥४॥ अर्ण-रागसे किया हुमा कर्मबंध, अनिष्ट संयोग और इष्ट वियोग होनेसे उत्पन्न हुआ द्वेष, विषय प्राप्तिसे उत्पन्न .

श्रावक-प्रतिक्रमण
हुई दीनता, अभिमानसे उत्पन्न हुआ मदोन्मत्तता, इस-
लोक और परलोक सम्बन्धी भय, इष्ट वियोगले उत्पन्न हुआ
शोक, परवस्तुकी आकांक्षारूप मनोविकारसे उत्पन्न हुथा रति-
भाव और भरतिभाव आदि समस्त विकार भावोंको छोडता है।
इस प्रकार समस्त पर व्यसे रागद्वेष, हर्ष-विपाद, भादि
न्यामोहताका परित्याग करे और आत्माकी परम विशुद्ध भव-
स्थाका विचार करे।
हा दुट्ठकर्य हा दुह चिंतिय भासिय च हा दुहें।
अतो अंतो उज्झमि पच्छुत्तावेण वेयंतो ॥५॥
अर्थ-हाय ! हाय !! मैंने दुष्ट फर्म किये, हाय ! हाय !!
दुष्ट कर्माका वार वार चितवन किया । हाय ! हाय !! मैंने दुष्ट
मर्मभेदक वचन कहे । इस प्रकार मनवचन और कायकी दुष्टता
से मैंने अनंत कुत्सित कर्म किये । इन कार्यों के बदले अव मुझे
मत्यंत पश्चात्ताप होता है और इस शबान दशासे मेरा अंतकरण
अत्यंत फ्लेशित हो रहा है। मैं कृतकर्मों का जैसे स्मरण करता
से मुझे मेरी आत्मापर अतिशय ग्लानि उत्पन्न होती है और
पश्चाताप होता है।
नोट-परम पवित्र अरहंत भगवान के समक्ष इस प्रकार अपने
मन वचन कायसे किये हुए दोपोंको कहे, आलोचना करे, गर्दा
करे और आत्मनिंदा पूर्वक प्रतिक्रमण करे।
ढच्चे खेत्ते काले भावे य कदा वराहसोहणयं ।
जिंदणगरहणजुत्तो मणवचिकायेण पडिक्कमणं ॥६॥

३८ श्रावक-प्रतिक्रमण अर्थ-द्रव्य क्षेत्र काल और भावके निमित्तसे किसी जोवकी विराधना अथवा प्राणपीड़ा हुई हो, वह मैं आत्मनिटा और गहरे (दोपोंको चितवन पूर्वक ग्लानिका होना) पृांक मन वचन कायकी शुद्धिसे परित्याग करता है। एइंदिय वेदिय तेइदिय चउरेदिय पंचेदिय पुनधिकाइय. आउकाइय, तेउकाडय, याउकाइय, वणप्फटिकाहय, तस्स- काइय एदेंसि उद्दावण परिदावणं विगहण स्वघादो कदो वा कारिदो या कीरतो वा समणुमणिदो तम्स मिच्छामि दुक्कडं। अर्थ-एकेन्द्रिय जोव (जिनके एक स्पर्शन हो इन्द्रिय होतो है। दो इन्द्रिय जीव (जिनके स्पर्शन और रसना ये दो इन्द्रिय हों) तीन इन्द्रिय जीव (जिनके स्पर्शन, रसना और घाण ये तीन इन्द्रिय हों) चार इन्द्रिय जीव (जिनके स्पर्शन, रसना, प्राण और चक्ष ये चार इन्द्रिय हों) पांच इन्द्रिय जीव (जिनके स्पर्शन, रसना, घाण, चक्षु, और श्रोत ये पांच इन्द्रिय हों), पृथ्वोकाय, जलकाय, अग्निकाय, वायुकाय, वनस्पतिकाय और स ( दो इन्द्रिय, तीन इन्द्रिय, चार इन्द्रिय और पंचेन्द्रिय जीवोंको लस कहते हैं ) कायके जीवोंकों मैंने स्वतः मारे हों. दूसरेसे मराये हो, अन्यके मारने पर अनुमोदना की हो अथवा उक्त प्रकारके जीवोको संताप दिया हो,'दूसरेसे सताप दिलाया हो, अन्यके संतापित करनेमे सहमत हुआ हो। अथवा प्राणियोंके अंगोपां- गका वियोग किया हो, कराया हो, करनेको भला माना हो इत्यादि श्रावक-प्रतिक्रमण ----- अनेक प्रकार मुझले जिन जोवोंको पीड़ा हुई है उससे उत्पन्न झुए पापकों का परित्याग करता हूं। मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदनासे जिन जीवोंका घात मुझसे हुआ है वह निशंक हो। दसणश्यसामाझ्य पोसहसचित्तरायभत्तीय। बमारमपरिग्गह अणुमणमुद्दिठदेसविरदो य ।। एयासु यथा कहिद पडिमासु पमादाइकया। इच्चारं सोहणळं छेदोन्चट्ठावणं होउ मझं ।। अर्थ-दर्शन १ व्रत २ सामायिक ३ प्रोपधोपचास ४ सचि- सत्याग ५ रातिभुक्तत्याग ६ ब्रह्मचर्य ७ आरंभत्याग ८ परिग्रह- त्याग १ अनुमतित्याग १० और उद्दिष्टत्याग ११ इसप्रकार श्राव ककी ग्यारह प्रतिमा होती हैं। इन प्रतिमाओंका व्यक्त रूप अथवा समस्तरूप अभ्यासरूप अथवा इतरूप पालन पाक्षिक, नैष्ठिक श्रावक करते हैं। प्रतिमा धारणा चाहे किसी प्रकारसे हो परन्तु संभव है कि प्रमाद और अज्ञानसे अतीचार-अनाचार अथवा व्रतमंगरूप दोप लगे हो, उसको मैं उपस्थापना करता हूं। अरहत सिद्ध आयरिव उवज्झाय सब्यसाहु सक्किय सम्मत पुचगं सम्बदं दिढव्वद समारोहियं मे भवदु मे भवदु में भवदु॥ अर्थ-अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और सर्वसाधु श्रावक-प्रतिक्रमण इन पंच परमेष्ठोकी साक्षीपूर्णक सम्यक्त्वसहित उत्तम व्रतोंको दृढता मेरे हो सम्यग्दर्शन सहित सदाचारकी प्राप्ति मेरे हो। देवसिय पडिक्कमणाए सवाईच्चार सोहिणि- मित्त पुवापरियकमेण आलोयण सिरी सिद्धभचि काउ- स्सग्गं करोमि। - नोट-१ प्रतिक्रमण चार प्रकार होता है। देवसिक (दिवस संबंधी), रात्रिक (रात्रि सम्बन्धी), पाक्षिक (१५ दिन संबंधी) मासिक (चातुर्मासिक और सांवत्सरिक) यदि दिवसका करना है तो देवसिय शन्द लगाओ। यदि रात्रिका प्रतिक्रमण करना है तो राइय शब्द लगाओ। जैसा प्रतिक्रमण करना हो वैसे शब्दकी योजना यहां पर करनी चाहिये। २-अतीचार-व्रतादिकोंका पालन करनेमे वाह्यभ्यंतर कार- णोंके लिये व्रतोंकी दृढ़ता रखते हुए भी कुछ भंगरूप दोर्षोंका उत्पन्न करना अतीचार है। भंगाभंगवृत्तिको अतीचार कहते हैं। अनाचार-मनमें कुछ विकार होना और ऐसे प्रमादसे ब्रतमें शिथिलताका होना अनाचार है। व्रतमंग-व्रतका एक देश छेद करना व्रत भंगता है। और अनर्गल (स्वेच्छाचार पूर्णक ) प्रवृत्ति होकर खच्छन्द रहना व्रत नाशता है। व्रतका पालन-मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदनासे होता है। व्रतोंके पालन करनेके लिये वाह्याभ्यंतर शुद्धिको विशेष श्रावक-प्रतिक्रमण ४१ अर्थ-दिवस संबंधी शारीरिक, मानसिक और वाचनिक कार्य करने में जो दोष मैंने किये हों, उनका प्रतिक्रमण करता हूं और अपने मनको विशुद्धिके लिये अपने किये हुए दोपोंकी वार वार आलोचना करता हूँ दोपोंसे सर्गथा मुक्त श्रीसिद्ध परमात्माका स्वरूप चिन्तबन कर सिद्धभक्तिमें लीन होता हूं। नोट-सिइभक्तिके लिये वार णमोकार मंतकी जाप देना चाहिये। णमो अरहताणं, णमो सिद्धाणं, णमो आयरीयाणं, णमो उबझायाणं, णमो लोए सब्बसाहणं चत्वारि मंगलं, अर- हंत मंगलं, सिद्ध मंगलं, साहु मंगलं, केवलिपपणतो धम्मो मंगली चत्तारि लोगोत्तमा, अरहंत लोगोत्तमा, सिद्ध लोगोत्तमा, साहुलो. गोत्तमा केवलिपण्णत्तो धम्मोलोगोत्तमा। चचारिसरणं पवनामि, अरहंतसरणं पञ्चज्जामि, सिद्धसरणं पन्चज्जामि, साहुसरणं पंन्यज्जामि, केवलिपण्णतो धम्मो सरणं पच्चजामि । आवश्यकता होती है । आभ्यन्तर शुद्धिके लिये मनकी पवित्रता प्रधान कारण है। मानसिक ग्लानिसे ही प्रायः व्रतोंमें अतीचार लगते हैं। इसलिये मनको सदैव शुद्ध रखना चाहिये। वाहा शुद्धि भी व्रतोंको स्थिर करनेमें प्रधान कारण है। चंचल बुद्धि कुछ सहज निमित्तके मिलने पर ही चलित हो जाती है और मन तथा आत्माके ऊपर अपना अधिकार जमा लेती है। यह सब जानते हैं कि संगतिको असर तत्काल होता है "चिरंत नाभ्यासनिबंधनेरिता गुणेषु दोपेषु च जायते मतिः' इसलिये वाहाशुद्धि पर ध्यान रखना चाहिये।

४२ श्रावक-प्रतिक्रमण - अट्ठाईदीवदो समुद्देसु पण्णारस कम्मभूमीसु जाव अरहताणं सयवाण आदियराण तिथ्थयराण 'जिणाणं जिणोत्तमाणं केवलियाण सिद्धाण बुद्धाणं 'परिमिबुदाणं अतयडाणं पारयडाणं धम्मायरियाणं धम्मदेसयाण धम्मणायगाणं धम्मवरचावरंगचकनहीणं देवादिदेवाणं णाणाण, देसणाणं चरित्ताण सदा करोमि । किरियम्म करेमिभत्त पडिकमण सावज्जोग पञ्चकामि जावनियम तिविहेण मणसावचिया कायेण ण करेमि प्ण कारेमि अण्णपि । करण समणुमणामि तस्स भत्ते अइ- चारं पडिकमामि जिंदामि गरहामि अप्पाणं जाच अरहताण भयवंताणं णमोकार पज्जुवासं करेमि तावकायं पावकम्म दुच्चरियं बोस्सरामि। १ अढाईद्वीप और पंद्रह कर्मभूमिमें होनेवाले सयोगकेवली, ( अरहंत ) संसारके भयको नाश करनेवाले तीर्थकर, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय, और सर्वसाधु ये पाच परमेष्ठी हैं। ये सत्य मार्गका प्रत्यक्ष अनुभव कराते हैं । इसलिये इनकी साक्षी पूर्वक सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्रको धारण करता हूं। दूसरोंको इस सत्यमार्ग पर चलनेका उपदेश करूंगा। सुझले इस मार्गमें चलते हुए अतीचार आदि दोष लगे हों उनको शुद्धिके लिये मन वचन- कायकी विशुद्ध भावनासे आत्मनिंदा पूर्वाक त्याग करता हूं।

धायक-प्रतिरमण ४३ - थोम्माम्यह जिणारे तियरे करली अणन जिणे । गरपवर लोयाहिए विहयग्यमले मठप्पणे ॥ लोबस्सु जीयबरं धम्म नित्यकरे जिणे बंदे । अरहते फित्तिम्से चवीमं चर फेवलिणो । उसहमजिय च बंद मंभवमभिणंदणं च । सुमदं च पोमप्पह गुपामं जिग च चंदप्पहं वदे ।। मुविहिं च पुरयन मीयतसेय च बासुपूज्ज च । विमलमणन भयवं धम्म मनि च वदामि । कुंच च जिणवरिट आंच मल्लि च मुणिमुन्धयं च । १ कर्म मल रसित. बिलोफ पृय भोर मानने परिपूर्ण ती- अंकार, केन्दो भगवान भोर केवलो प्रणीत जिन वर्गको पुनः पुनः रमरण कर बंदना करना है। मपमादि वीगन्त चतुर्विणति देवको भावभनिने बंदना करता है। ये चीवोन भगवान जन्म मरणादि समस्त दाप रहिन, परम शात, मनन सुपसंपन, मंग- लमय लोकोत्तम और शरणभूत है। मिड परमात्मा भी समस्त फर्ममल रहित. पग्म विशुद्ध, शुरुनन्य रूप. अनंनगुणांके पिंड 11 शुद्धामाका प्रत्यक्ष दर्शन इनकी मक्किने प्राप्त होता है। ता कर कंवली, परम ध्यानको मृति दोनेने यागो हैं जिन चैन्या- लय यह धर्मका आयतन | इसलिये से प्रतिकरण करते समय तीर्थयार, केवलो. सिद्ध जिनधर्म, जिनचैत्यालयको वन्दना करता,

श्रावक-प्रतिक्रमण
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णमि वंदे अरिहणेमि तहपास वट्टमाणं च ।
एवमए अभिच्छुपा विहुयरयमला पहीणजरमरणा ॥
चउविसपि जिणवरा तित्थयरा मे पसीयंतु ।
कित्तिय वदिय महिया ऐदे लोगोत्तमा जिणा सिद्धा॥
आरोगाणाणलाह दितु समाहिं च मे वोहि ।
चंदेहि णिम्मलयरा आईचा उहियं पयासंता।
सायरमिव गभीरा सिद्धासिद्धं मम दिशतु ।
यावंति जिनचैत्यानि विद्यन्ते भुवनत्रये।
तावंति सततं भक्त्या त्रिःपरीत्य नमाम्यहं ।।
नोट-'णमो धरहताणं' यहांसे प्रारम्भ कर "त्रिपरोत्य नमा-
म्यहं" पर्यन्त मूल पाठको पढ़कर नव वार नमस्कार मंत्रको
जाप्य देना चाहिये । और यह भी स्मरण रखना चाहिये कि जिस
जिस स्थान इस पाठका उल्लेख किया हो वहां पर यह पाठ
पढ़कर जाप देकर कायोत्सर्ग करना चाहिये।
श्रीमते वर्द्धमानाय नमो नमितविद्विप
यद् ज्ञानान्तर्गत भूत्या त्रैलोक्यं गोष्पदायते ।।
अर्थ-मोहादि भयंकर शत्रुओंका नाश करनेवाले, भोर लो-
कके जाननेवाले ऐसे श्रीवर्द्धमान भगवान के लिये नमस्कार है
तवसिद्धे णयसिद्धे संजमसिद्धे चरित्तसिद्धे य ।
णाणम्मि दसणम्मिय सिद्धे सिरसा णमस्सामि ॥
। अर्थ-तप, नय, ज्ञान, संयम, चारित्न, ज्ञान और दर्शनादिसे
सिद्ध पदको प्राप्त हुए सिद्ध परमात्माको नमस्कार है।

श्रावक-प्रतिक्रमण ---- इच्छामि भंत सिहमत्ति काउस्मगो कर तस्सा लोचे- उसम्मणाण सम्पदमण जम्मचरित जुलाण अह विहकम्म- विप्पमुकाणं अगुण मपणाणं उडलोयम्मिम्मि पयष्टियाणं तव सिद्धाण णयसिद्वाणं संजमसिद्धाणं चरित्त- सिद्धाणं सम्मणाण सम्नदमण मम्मचरित्तसिद्धाण अतीदा- णागदवट्टम्माणकाल तय सिद्धाण सन्चासिद्धाणं मया- णिच कालं अंचेमि पूज्जेमि वदामि णमस्मामि दुक्खक्खउ कम्पक्सउ बोहिलाहो सुगडगमण समाहिमरणं जिणगुण- संपत्ति होउ मज्नं। इच्छामि मंते देवसिय आलोचेउ सिद्धभक्ति कायो- त्सगं करेमि। अक्ष-हे भगवन् ! मैं सिद्धमक्ति धारण करनेके लिये दिवस संबंधो रुत फोकी आलोचना करता हूं। सम्यग्दर्शन सम्यग्ज्ञान सम्यकचारित्रमयो,आठ फर्म रहित, आठ गुण सहित, लोकके अत मागमें विराजमान तपमान संयम सम्यकचारित दर्शन और परम- ध्यानादि उत्तम गुणोंसे सिद्ध अवस्थाको प्राप्त हुए मत, भविष्य भीर वर्तमान काल सम्बन्धी समस्त सिद्ध भगवानको मैं अभ्य- भना करता ह, पूजा करता हूं, गुणोंका चिंतवन करता है। नमस्कार करता है। सिद्ध भक्तिसे मेरे दुःखोका नाश, सम्यग्द- शंन छान चारित्रकी प्राप्ति, मुगति गमन, समाधिमरण और जि- नगुण प्राप्ति हो । मावार्थ-मेरी आत्मा सिद्धात्माके समान शुद्ध अनंत गुणमय, सम्यग्दर्शन शानचारित्रमयी निष्कलंक और अक्षय ४६ श्रावक-प्रतिक्रमण है परंतु कमलसे विकृत रूप हो रहा है। “मेरी आत्मा परम शांत और सुखी हो" इस भावनाको सिद्धिके लिये सिद्धभक्ति धारण करता हूं। इस प्रकार सिद्धोंके गुणोका चिन्नबन कर आत्मस्वरूपका विचार करते हुए अपने दोपोंको आलोचना करे। ( वार नमस्कार मंत्रकी जाप्य देकर सिद्ध भक्तिका कायोत्सर्ग धारण करे आवककी ग्यारह प्रतिमाओंका खरूप । पंचुंबर सहियाई सत्तविवसणाइ जो विवज्जइ । सम्मतविशुद्धमइ सो दसण सावउ भणिओ॥१॥ अर्थ-पाक्षिक, नैष्ठिक और साधक इस प्रकार श्रावकके नोन भेद हैं। पाक्षिक श्रावक-वह हो सकता है जो सबसे प्रथम श्री जिनेन्द देवके प्रतिपादित सात तत्त्वोंका यथार्थ श्रद्धान करें। क्योंकि धर्मको मूल भोति श्रद्धा है-विश्वास है विना इसके धर्मपथका अनुयायो हो नही सक्ता । इसका कारण एक यह भी है कि सुख-शांति और प्रेम ये तीनों धर्मके अंग हैं और ये विना विश्वासके यथार्थ नहीं हो सके हैं। इसलिये जिन-आनाको हृदयसे धारण करता,हुश्रा कपायोंके घटाने के लिये (कपायें हो आत्मस्वरूपके प्रकट होनेमें वाधक हैं) सदाचारका पालन करे। पाक्षिक श्रावक जिनदर्शन १, जलगालन २, रात्रिभोजन त्याग ॥ पांच उदवर, (बड़फल-पोपलफल-कठूमर-पाकरफल-उदंबर) त्याग, मद्यत्याग, मधुत्याग ६, मांसत्याग और ७जीवदया .

श्रावक-प्रतिक्रमण Ku प्रतिपालन ८ ये आठ मूल गुणोंका पालन करता है। अभ्यासके लिये पांच अणवत ( हिंसा-झट- चोरो-फुगोलका त्याग और परिपाका परिणाम), तीन गुणप्रत चार शिक्षाचन आदि का पालन करता है । सप्त व्यसनो ( जुआ पेलना, मास भक्षण, मदय पान, शिकार खेलना, चोरी करना, वेश्यागमन फरना और पर- स्रो सेवन परना) को उभयलोकमे टुलदायक समझकर सेवन नरी करता है। यमध्य सेवन भी नहीं करता है। चाय और अभ्यन्तर शुद्धिके लिये पूर्ण प्रयत्नशील रोता है। पट आवश्यक (देवपूजा १ गुम उपासना २स्वाध्याय करना ३ संयम पालन करना ४ तप धारण करना ५ शोर सुपात्रको दान देना ६) कौंको नियमित करता है। ये सब फर्तव्य पाक्षिक श्रावफफे हैं इन फर्तव्यके साथ धार्मिक नीति और व्यवहार नीति भी पालन करना चाहिये। सबसे प्रथम पाक्षिक थावको २५ दोष रहित सम्यक दर्शन निदपि पालन करना चाहिये । नैष्टिक धायक उक्त समस्त कर्तव्योंको पूर्ण रूपसे पालना करता है तथा सम्यग्नशनको विशुद्धि विशेष रखता है। ग्यारह प्रतिमायें नौष्टिक तथा साधक श्रायफकी होती हैं। दर्शनप्रतिमा धारण करनेवालोंके भी उक्त कर्तव्य है। पंच अणुचयाई गुणबयाई हति तह तिणि । सिक्खाव्ययाई चारि विजाणिविदियस्मि वाणम्मि ॥ अर्थ-पांच अणुवत, तीन गुणवत, और चार शिक्षायतोंको जो नियमसे पालन करता है वह व्रत प्रतिका धारक है। , :.

४८ श्रावक-प्रतिक्रमण पाणादिवादि विरदि सच्च मदत्तस्स बज्जण चेव । थुलयड वभचेरं इच्छाये गंथपरिमाण ॥३॥ अर्थ-स्थल हिंसा, झूट, चोरो कुशोलका त्याग और परिग्रह- का परिमाण ये पांच अणुव्रत है। जे तसकाइय जीवा पुन णिदिठाण हिंसि दया । ए इंदिय विणुकारण तं पदम बद थूल ।। ४॥ अर्थ-जो आंखोंसे दोख सके, ऐसे त्रस जीवोंको नहीं मारना तथा विना प्रयोजन एकेन्द्रिय जीवोंकी हिंसा नहीं करना सो प्रथम अहिंसाणुव्रत है। अलियण जपणीयं पाणिवह करंतु सच्चवयणपि । रोयेण य दोसेण य णेयं विदियं वयं थूलं ॥ ५ ॥ अर्थ-राग द्वषसे अनोति वचन नहीं कहना मौर जिन वचनोंके कहनेसे किसी जीवकी हिंसा होती हो ऐसा सत्य वचन भी नहीं बोलना सो सत्याणुव्रत है। पुरगामि पट्टणाइ पडिय कह च णिहियवीसरीयं । परदव्यमगिण्हं तस्स होय धूलं वयं तिदिय ॥ ६॥ अर्थ-नगर, ग्राम और चौड़ाया आदिमें पड़ा हुआ, भूला हुआ, गिरा हुआ, पराया ( अन्यका ) द्रव्य नहीं लेना सो अचौ- र्वाणुव्रत है। सम्वेसु इत्थि सेवा अणंगकीडा सयाविवज्जतो। मूलयड बंभचारी जिणेहिं भणियो पवयणम्मि ।। ७॥ .

श्रावक-प्रतिक्रमण - अर्थ-पके दिवसों में सर्वथा स्त्रीमानका त्याग करना; पर. स्रोफा सेवन नहीं करना और अनंगकोड़ा नहीं करना सो ब्रहा. चर्याण व्रत है। जं परिमाणं कोह धणधाणहि-कवनाईणं । तं जाण पचमवय णिदिठ मुवामयाज्जयणे ॥ ८॥ अर्थ-धन, धान्य, चांदी, नुवर्ण आदि परिग्रहका परिमाण करना सो परिग्रह परिमाण नामका अणुव्रत है । इस प्रकार ये पांच अणुव्रत हैं। पुन्चुत्तरदक्विणयच्छिमासु काउण जोयणपमाणं। परदो गमणणियत्ती दिसि गुणव्ययं पढमं ।।९।। थर्थ-पूर्वोत्तरादि चारों दिशाम परिमाणकर उसके बाहर नहीं जाना सो प्रथम गुणवत दिग्बत है। चयभंगकारण होई जमिन देगा नत्थ णियमेण । कीरइ गमणणियची तं जाग गुणअयं विदियं ॥ १० ॥ अर्थ-टिन्त्रतके अभ्यन्तर. दिशाओंको मर्यादाकर बाहर नहीं जाना तथा जिस देशमें व्रतके भंग होनेको संभावना हो ऐसे देशमें नहीं जाना सो द्वितीय देशवत नामक गुणवत है। अयदंड पास विकिर कुडतुला माणकूड परिमाणं । ज सग हो ण कीरइ तं जाण गुणन्ययं तिदिये ।। ११ ॥ अर्थ-अनर्थदण्ड-पापोपदेश, हिंसाशन, दुग्धति, अपध्यान और प्रमादचर्या भेदसे पांच प्रकार है । तथापि इसके अनंत भेद होते हैं। इन सवका यही अभिप्राय है कि जिन कार्योंसे कुछ श्रावक-प्रतिक्रमण प्रयोजन विशेष सिद्ध न होता हो और हिंसा तथा क्लेश परिणाम अधिक होते हों ऐसे लोहे के शस्त्र, लाठी आदि हिसाका व्यापार, झूठी राज, खोटे वांट आदिसे व्यापार आदिका त्याग करना सो तृतीप गुणत्रत हैं। जं परिमाणं कीरइ मंडणतंबुलगंधपुफकाण। तं भोयविरह भणिय पहम सिक्खावयं सुते ॥ १२ ॥ अर्थ-भोग और उपभोगसे वियोंका सेवन होता है। मोग उसे कहते हैं जो एकवार भागनेमे आवे । शरीरको श्रृंगार करनेवाली चीजें, पान, सुगंधित पदार्थ तेल इत्र पुष्पादिका परि- माण करना सो भोगविरति शिक्षात्रत है। सगसत्तीए महिला वत्याभरमाण जंतु परिमाणं । तं परिभोय णिन्वुत्ती विदियं सिक्खावयं जाणे ॥ १३ ॥ अर्थ-बार बार मोगनेमें आवे उसे उपभोग कहते हैं। उपभो- गरूप स्रो, वस्त्र, आभरण आदिके सेवन करनेका नियम करना सो दूसरा शिक्षाव्रत है। अतिहिस्स सेविभागो तिदियं सिक्खावयं मुणेयव्य । तत्थ वि पंचाहियारा णेया सुत्ताण मग्गेण ॥ १४ ॥ अर्ग-उत्तम मध्यन और जघन्य भेदसे पान तीन प्रकार हैं।पात्रमें चार प्रकारका दान देना तथा चैत्य, चैत्यालय, सिद्ध- क्षेत्र,शास्त्र, स्वाध्यायालय, विद्यालय, औषधालयमें दान देना सो तृतीय शिक्षाबत है।

श्रावक-प्रतिक्रमण
धरिऊण वत्थमेत्त परिग्गहं छंडिऊण अवसेसं ।
सगिहे जिणालये चा तिविहाहारस्स चोस्सरणं ॥
ज कुणदि गुरुपयासे सम्ममालो दऊण तिविहेण ।
सल्लेहण चउत्थ सुत्त सिक्तात्रय भणिय ।।
अथ-वस्त्रमाल परिग्रहको रखकर अवशेष समस्त परिग्रहका
त्यागकर अपने घरमें अथवा जिनालयमें सल्लेखना धारण करे।
व्रतफल सिद्धि समाधिमरणसे हो होती है इतना ही नहीं
किंतु समाधिमरण आत्मसिद्धिका अंतिम उपाय है,
सुगतिका वीज है। समाधि मरण विधि-प्रतीकार रहित मरणके
कारण उपस्थित हाने पर साम्यमाव और शांतिसे श्रीर्यपूर्वक,
क्रोधादि विकार रहित शरीरका विसर्जन करना सो समाधिमरण
है और उसकी सिद्धिके लिये क्रमसे तीन प्रकारके आहारोंफा त्याग
गर्म
जल अथवा तक (छांछ-महा) का सेवन करे और
अनावश्यक्ता होनेपर उसका भी त्याग करे।अपनी पर्याय में किये
हुप भले बुरे कर्मोको आलोचना पूर्वक प्रतिक्रमण करे, पश्चात्ताप
करे और सबसे क्रोधातिविकारभावोंकी क्षमा मांगकर शांतिसे
णमोकार मंत्रका ध्यान धरता हुआ शरीरको छोड़े। यह चौथा
सल्लेखना नामका शिक्षाव्रत है। इस प्रकार दूसरी प्रतिमा,धारण
करनेवाला श्रावक इन बारह व्रतोंको पालन करता है।
तीसरी सामायिक प्रतिमा।
जिणवयणधम्मचेइय परमेडिजिणालयं णणिञ्चति जं
चंदण तिभाल करेड़ सामाहय त खु ।।

५२
थावक-प्रतिक्रमण
अर्थ-वाह्य और आभ्यंतर शुद्धिको धारणकर, पूर्व अथवा
उत्तर दिशाको तरफ मुखकर, पफान्त निर्भय स्थानमें,१२ भावतः।
को फरता हुआ ४ प्रणाम (दिशावती चैत्य चैत्यालय मुनि
भादिको) चारों दिशाम फरे और स्थिर मन वचन कायले समता
पूर्वक सामायिक करे । सामायिक फुत्सित ध्यान और चिंतना
छोढ़ देनी चाहिये। जिनदेव, जिनयचन, जिनधर्म, जिनालय
और पंच परमेष्ठोके गुणोंका चिन्तवन, ध्यान, वंदना स्तुति यादि
निकाल फरना सो सामायिक है। समतासे राग द्वप और उसके
उत्पादक कारणोंका परित्याग करना सो सामायिक प्रतिमा है।
उत्तम मझ्झ जहण्णं तिविहं पोलहरिहाण मुद्दिष्टं ।
सगसत्तीएमासम्मि चउसु पन्वेसु इकायब्ध ।।
अर्थ-प्रोषधोपवास उत्तम मध्यम और जघन्यके भेदसे तीनप्रकार
हैं। उत्तम वह है जिसमें धारणा और पारणाके दिवस एकासन
पूर्वक उपवास करना, इसमें समस्त प्रकारके आरंभका त्याग कर
देना चाहिये । निर्भय होकर निःशल्यता पूर्वक पंच परमेष्टोका
ध्यान धरना चाहिये । मध्यम समस्त हिंसक आरंभको छोड़कर
उपवास करनेसे होता है। जघन्य आम्ल अथवा एक अन्नको
प्रहण कर स्वाध्यायादिसे शांति लाभ करता हुआ धर्मसेवन
करनेसे होता है। पर्वके दिन प्रोपधोपवास करना चौथी प्रतिमा
है।
सज्जी जदि हरियं तयपत्तपवालकंदफलवीयं ।
भप्फासुगं च सलिलं सचित्तणिवित्तिमं ठाणं ॥

श्रावक-प्रतिक्रमण
५३
अर्थ -सचित्त वस्तु-हरित अंकुरपत्र, फल, कंद, बीज और
भप्रासुफ जलादि सेवन नहीं करना सोचम प्रतिमा है।
मण वयण काय कदकारिदाणुमोदेहि मेहुणं णवधा।
दिवसम्मि जो विवज्जदि गुणम्मि सो सावउ छेदो ॥
अर्थ-मन वचन काय और कृत कारित अनुमोदनासे
दिवसमें मैथुन सेवन नहीं करना सो छटो प्रतिमा है।
पुन्वुत्तण विवहाणंपि मेऊण सम्बदा विवज्जतो।
इथिकहादि णियत्ती सत्तमया गुण बंभचारी सो ॥
अर्थ-नव प्रकारसे स्त्री मात्रका त्याग तथा स्त्रो कथादिका
भी त्याग करना सो सातमी प्रतिमा है।
जं कि पि गिहारम व उथोव वा सया विवज्जेदि।
आरंभ णिवित्तमदि सो अहम सावओ भणिओ ॥
अर्थ--थोडा बहुत गृह संबंधी आरंभ छोड़ना सो आठमी
प्रतिमा है।
मुत्रूण वत्थमेस परिग्गहं दंडिऊण अवसेस ।
तथापि मुच्छण करेदि जाणिसो सावओ णमो ।।
अर्थ-घन मात्रको रखकर अवशेष परिग्रहका त्याग करना
सो नवमी प्रतिमा है।
पुठोबा पुच्छे वा णिय गेहि परेहि सगिहकज्जे।
अणुमणणं जोणकरेदि वियाण सो सावओ दसमो॥
अर्थ--जो अपने अथवा अन्यके गृहकार्य संबंधी आरंभमें
अनुमति नहीं देता है, सो दसमी प्रतिमा धारक है।

५४
थाचक-प्रतिक्रमण
एयारसम्मि ठाणे उक्किठो सायओ हवई दुविहो।
वत्थेक धरो पढमो कोवाण परिग्गहो विदिओ।
अर्थ-उत्कृष्ट श्रावकके क्षुल्लक ऐल्लक ऐसे दो भेद हैं।
प्रथम वस्त्रका रखनेवाला और दूसरा कौपीन मात्र रखनेवाला है।
तव वय नियमावासय लोचं कारेदि पिच्छगिण्हेदि ।
अणुवेहा धम्मझाण करपत्ते एक ठाणम्मि ।।
अर्थ--उभय प्रकारके उत्कृष्ट श्रावक तप, व्रत, नियम, संयम
ध्यान, प्रथमकी समस्त प्रतिमाएं सदाचार नियमसे पालन
करता है। निदाप आहार एक समय पाणिपात्रमें लेता है सो
कषायोंका विजयो एकादश प्रतिमा धारक है ।
इस प्रकार संक्षेपसे पाक्षिक नैष्ठिक श्रावकका सदाचार है।
इस सदाचारके पालन करनेसे उभयलोककी सिद्धि होती है।
इतना ही नहीं किन्तु यह सदाचार नीतिपय होनेले राजभयादि
रहित पूर्ण सुखका सत्यमार्ग है ।
इच्छमे जो कोइ दिवसियो अइयारो अणाया तस्स
भंते पडिक्कामामि पडिक्कर तरस मे सम्मतमरण समाहि-
मरणं पंडितमरणं बीरियमरणं दुक्खक्खउ कम्मखउ बोहि-
लाहो सुगइगमणं समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मझ्या ।
अर्थ-इस प्रकार उक व्रतोंमे मुझसे दिवस संवधो अती-
चार लगे हों उसका प्रतिक्रमण करता हू । इससे यह भी चाहता
इंकि सामाधिमरण आदि उत्तम गुण प्राप्त हों।

श्रावक-प्रतिक्रमण ५५ दसण वय सामाव्य पोसह सचिन रायभत्तय । चमारंभ परिग इ अणुपण उद्दि देस विरदोय ।। एयामु यथा कहिद पडिमासु पमादाइ कयाइ चार सोहण छदोपहाणं अरहन सिद्ध आयरीय उव. हाय सध्यमाहु मक्खियं सम्मत पुग मुच्चट दिदादं समारोहियं मे भवदु मे भवद मे भवदु । अय देवसिय पडिकपणाए सव्वाइचार विसोहिणिमिच पुयायिकमेण पडिकमण भत्ति कायोत्सगं करोमि (णमोकार मंघको जाप्य वार ) इस प्रकार फारोत्सर्ग (णमोकार मंत्रको जाप्य ६ वार) देकर पुनः णमो धरताणं' यहांसे प्रारंभकर यांचंति जिन- वेत्यानि' इस लोक पन्ति मूल पाट पढ़कर पुनः कायोत्सर्ग धारण करे। णमो अरहताणं णमो मिट्टाणं णमो आयरीयाणं । णमो स्वझायाणं. णमो लोए सम्धसाहूणे ॥ णमो जिणाणं ३ णमो णिसीहोए ३ णमोथुए मम मगल अरहत सिद्ध युद्ध णिग्य णिम्मल सममण शुममण सुसमत्थ समजोगसममान सल्लघट्टाणं २ णिमय णिराय णिहोस गिम्मोह णिम्मम णिसंग णिसल्लमाणमायमोस- मूरणे तयपहात्रण गुणरयण सीलसायर अणंत अप्पमेय महदि महावीर वट्टमाण बुद्धिरिसिवेदि । ३ - श्रावक-प्रतिक्रमण णमो थुदे ३ मम मंगल अरहताय सिद्धाय बुद्धाय जिणाय, कैवलिणो ओहिणाणिणो मणपज्जयणाणिणो चउरसपुव्वगामिणो सुदसमिदिसमिद्धाय तवोय बारस विहो तवसी गुणाय गुणवतोय महारिमि तित्थ तित्थकराय पवयणं पक्यणीयं णाणं णाणीय दंसणं दसणीयं सजमो सजदाय विणओ विणीयःय बंभचेग्वासो वभचारीय गुत्तीओचे गुत्तिमंतीय मुत्तियोचेव मुत्तिमतोय समिदीउचेव समिदियं तोय सुसमय परममय परसमय विदुखति खवगाय खतिमंतोय खीणमोहाय खीगवंतोर बोहिय बुद्धाय बुद्धिमतोय चेयरूक्खाय चेइयाणि उढमहतिरियलोए सिद्धायदणाणि णमसामि सिद्धणिसीही याउ अहावय पन्धदे सम्मदे णि- ज्जते चंपाएं पावाए मझिझमाए इस्थिवालियम्सहाये जाउ अणाउ काउदि सिद्ध णिसिहीयाउ जीवलोयम्मि इसिपव्व भरतलगयाणं सिद्धाणं बुद्धाण कम्मचक्कामुक्काण णीरयाणं णिम्मलाणं गुरु आइरिय उवज्झायाणं पुवतिन्थेर कुलय- राणं चाउवणेय सवण संघोय भरहेरावएमु दससु पंचसु महाविदेहेसु लोए सति माहुओ सजदा तवसी एदे मम मंगलं पवितं एदेहं मंगलं करेमि मावदो विशुद्धोसिरसा अहिवंदिऊण सिद्धेकाऊणं अजलि मच्छयमि पडिलेहिय अठत्तरिउ तिविहं तियरयण सुद्धोत्थ ॥ अर्थ है जिनराज! आपके लिये नमस्कार है । स्तुत्य-चंद- नीय, मंगलमय अरहंत भगवान मेरा मगल (कल्याण) कोजिये ।

श्रावकप्रतिक्रमण ५७ , है महावीर! आपका स्तवन करता है। आप राग, दोप मोह, ममत्व-परिग्रह, शल्प, ( माया मिथ्या निदान ) और काय रहित हो। आपने साभ्यभाष धारणकर समस्त मौका नाश किया है । शुभ भावोंको धारणकर निर्भय हो गये हो । मापके तप ही प्रधान योग है, इसलिये आप गुण-रन हो, शीलके सागर हो, अप्रमेय हो, महान हो, मुनि महर्षि और झानोजनोंसे पत्यलोक शिरोमणि सर्वज्ञ हो ।कर्ममल रहित सिद्ध हो (भविष्यमें ) शुद्ध हो, अनंतगुणोके पुंज हो, प्रभो ! मुझे मंगल फरो। केवलो, अरहंत, तीर्थकर, अवधिज्ञानी, मनःपर्यायवानो, थत- केवलो, शास्त्रज्ञानो, पवित्रतम और तपके धारक यतीश्वर गुणी (ऋचार्ग मुनीश्वरको गुणी कहते हैं ) गुणवान्, महपि, सिद्धा- न्त, सिद्धांतज्ञानो, ज्ञानो सम्यग्दृष्टि, संघमो विनय करने योग्य, ब्रह्मचारी, गुप्तिधारक, समिति पालक, स्वसमयके ज्ञाता, क्षीणमोह शानी, पि, महर्षि और ऋद्विधारक, मुनीश्वर मेरा कल्याण करो। तीन लोकमें जितनी जिनप्रतिमा, जिन चैत्यालय, सिद्धक्षेत्र और तीर्थक्षेत्र हैं उनको मैं नमस्कार करता हूं। अगपद, सम्मेदाचल गिरनार, चंपापुर, पावापुर, हस्तनापुर आदि तोोंसे और विदेह क्षेत्र तथा समस्त कर्मभूमिसे जितने जीव कमल रहित सिद्ध बुद्ध, और निर्मल हो गये हैं वे चार प्रकारके संघको मंगल करो, पवित्र करो, शांति करो। विशुद्ध भावनासे मैं अष्टांग ( हाथ पैर

५८
श्रावक-प्रतिक्रमण
मस्तक और छाती) नमस्कार करता है। मेरे फों का नाश
करो।
नोट-मूल प्रतिक्रमण पाठमें अा मूलगुणोंका पडिक्कमण
नहीं लिखा है। पाक्षिक श्रावकके मूलगुणोंमें अतोचार अना-
चार अवश्य हो लगते हैं। अतएव पाक्षिकोंको नीचे लिखा पाठ
प्रतिक्रमण करते समय अवश्य ही पढना चाहिये।
(१) हे भगवान् ! मैंने मूलगुणोंको पालन करते समय
मध (दारु)के त्यागमें अचार (अथाणा), चलित दही, छाछ, कांजी
और आसवों ( अर्क)का सेवन किया कराया और सेवन करनेकी
अनुमति दी इस संबंधी अतीचार अनावार जो मुभासे दिवस
संबंधी लगा हो उसका मैं प्रतिक्रमण करता है।
(२) हे भगवान् ! मैंने मूलगुणोंका दूसरा भेद मांस त्याग
व्रतमें चाममें रखा हुआ घी, तेल, पानी सेवन किया हो, सड़ा
हुआ अन्न, चलित आटा, आदि पदार्थ हींग (चाममें रखकर
आती है ) तथा मांस मिश्रित औषधी सेवन को हो उस संबंधी
अतीचार अनाचार मुझसे हुआ हो उसका मैं प्रतिक्रमण करता हूं।
(३) हे भगवान् ! मैंने मूलगुणोंका तीसरा भेद मधु त्यागमें
१२ ( गोले ) फूल ( ऐसे फूल जिन में मिठासके लिये बहुतसे नस
जीव आफर निवास करते हों) आदि सेवन किये हों इत्यादि
तत्सम्वन्यो मैं प्रतिक्रमण करता हूं।
(8) हे भगवान् ! पंचोदूंवर त्यागमें अज्ञात फल, चलित
फल, विना शोधे देखे कच्ची फली, तथा क्षफल, (जिसमें हिंसा,
1

श्रावक-प्रतिक्रमण ५६ ५ Ha- - इस प्रकार सात व्यसनोंमें जो जो दोष लगाये हो उनका भो विचारवर आलोचना पूर्वक प्रतिप्रामण फरे। अधिक हो धीर फल अल्प हो अमे-२ ) आदि सेवन किये हों तत्सम्बन्धी अतोचार त्याटिका में प्रतिक्रमण करता है। सारे भगवान् । मैं मलगुणका पाचवां गतिभोजन नामक गुणके पालन करनेमें दो धड़ो (सूर्योदयास्त ) के अनंतर पदाओंका सेवन किया हो. अथवा औषधि निमित्त बनाकर रमादि मेयन किये हों तत्सम्बन्धी जतीचार मुझसे लगा हो उसफा में प्रतिग्रमण फरता ।। (६) भगवान् ! मने मूलगुणका छहा भेट जलगोलन नामक गुणके पालन करने में दो मुहर्त व्यनोत हो जानेपर भी विना छने (गले ) पानोरा उपयोग किया. जोवाणी (विनछन ) जहांसे पानी लाया गया वहा पर नही पहुचाया, मलिन और सछिद्र यग्नसे जल छाना, जीवाणी (विनछन ) का विचार नहीं किया तत्सम्बन्धी अतीचार त्यादि, उमका में प्रतिक्रमण करता (७) हे भगवान् । मैंने मूलगुणका सातवां भेद जिनदर्शनके पालन करने में प्रमाट किया, अविनयसे कार्य किया, मन, वचन और फायफी शुद्धि नही रगी त्यारितोचार अनाचार मुझम्मे लगे हों उमका में प्रतिक्रमण करता है। है भगवान् ! मैंने मूलगुणका आधा भेद जीवदयाके पालन करने में प्रमाद और अशान रग्या, विना प्रयोजन जीवोंको सताया, अंगोपाग छेदे इत्यादि अनोचार मुझसे लगा हो तन्म- म्वन्धी में प्रतिक्रमण करता है।

६०
श्रावक-प्रतिक्रमण
पडिकमामि भते दसण पडिमाए संकाए कंखाए
विदिगिच्छाए परपासंडपसंसणाए पसंथूए जो मए
देवसिओ अइचारो अणाचारो मणसा चचिया कारण
कदो वा कारिदो वा वीरतो या समणुमणिदो तस्स
मिच्छामि कडा
हे भगवान् ! कृतकोंका पश्चात्ताप पूर्वक प्रतिक्रमण करता
हूँ। दर्शन प्रतिमाके पालन करनेमे, जिनमार्गमें शंका को हो;
शुभाचरण पालनकर संसार सुखको आकांक्षा ( निदान ) को
हो, धर्मात्माओंके मलिन शरीरको देखकर ग्लानि को हो, मिथ्या-
मार्ग और उसके सेवनेवालोंको प्रशंसा की हो, इत्यादि जो मैंने
दिवस संवन्धो तोचार मन वचन कायसे किये हों, कराये हों,
अन्यके करनेने अनुमति प्रदान की हो तत्सम्बन्यो समस्त कार्यों को
आलोचना करता हूं, पश्चात्ताप करता हूं और चे फर्म निरर्थक
हों, ऐसो इच्छा करता हूं।
पडिक्कमामि भंते वद पडिमाए पढमे थूलयडे
हिंसाविरदिवदे वहेण वा वधेण वा, छएण वा अइभारा-
रोपणेण वा, अणपाणिगेहेण चा जो भए देवसिउ
अइचारो अणाचारो मणसा, चिया. कारण कदो वा
कारिदो वा कीरंतो वा समुणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुकणं ।
अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने कृतकमौकी आलोचना पूर्णक
पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। दूसरो व्रत प्रति-
माके अंतर्गत प्रथम अहिंसाणुव्रतके पालन करने में जीवोको बांधे

श्रावक-प्रतिकमण ६२ हो; मारे हों, अंगोपांग छेदे हों, शक्तिसे अधिक वोझ लादा हो भोर अन्न पानका निरोध किया दो, इत्यादि अनेक अतीचार अनाचार दिवस संबंधी मुझसे मन, वचन, काय और कत, कारित अनुमोदनसे लगे हों वे निरर्थक हों ऐसो मेरी भावना है। पटियामामि भते बट पडिनाए विदिये थूलयडे असच्चविरदिवंद मिच्छोपदेशेण या रहे अकारखाणेण वा कूडलेह करणेग वा णासावहारेण वा सागारमतमे- एण चाजो मए देवसिउ अइचारो अणाचारो मुणसा चचिया काएण कदो वा कारिदो चा कीरतो चा सम- णुमणिदो तम्स मिच्छामि दुकडं ।। हे भगवान् ! अपने रुत फाँको आलोचना पूर्वाक पश्चात्ताप करता हुभा प्रतिक्रमण करता है। दूसरी प्रतिमाके अनर्गत स्थूल सत्ययुतमे मिथ्या उपदेश देनेग्ने, पकांतमे कही हुई बानको प्रकट कर देनसे, झूठा लेप लिखनेले, धरोहर हरण करनेसे, फिसोफे इंगित चेशसे अभिप्राय समझकर भेद प्रगट कर देनेले इत्यादि अनेक प्रकार भतीचार अनाचार मन वचन, फाय और कृता कारित, अनुमोदनासे हुये हों वे निराक हो । पटिकमामि भंते वद पडिमाए तिदिये थूलयडे येणविरदिवदे थेणपओगेण वा, थेणहरियादाणेण वा, विरुद्धरज्जाइक्कमणेण वा, हीणाहियम्माणुमाणेण वा पडिरूवय चवहारेण वा जो भए देवसिउ अहचारो धावक-तिक्रमण अणाचारी मणसा वचिया कायेण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा ममणुमणिदो नस्स मिच्छामि दुकडं ।। अय- भगवन् ! मैं अपने कृत कर्मों को आलोचना पूर्णक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता है। दूसरी प्रतिमाके अंतर्गत रथल अचीर्याणुव्रतके पालन करनेमें दिवस संबंधो मन, वचन, फाय और कृत. कारित, अनुमोदनासे चोरीका प्रयोग वत- लाया हो (स्वयं तो चोरी न की हो परन्तु दूसरोंको ऐसा व्यापार वतलाना जिससे वह चोरी करे.) चोरसे अपहरण को हुई दय ग्रहण की हो, राज्यके विरुद्ध कार्य किया हो ( वस्तुओंका कर चुराया हो, रेलकी टिकिट आदिमें चोरी की हो, राजाको भाजा भंग की हो ) तोलनेके वांट कमतो वढ़तो राखे हों और अधिक कोमतो वस्तुमें अल्प कोमतो मिलाकर बदले दो हों, इस प्रकार अनेक दोप किये हों वे सब निरर्शक हों। पडिकमामि भते वद पडिमाए चउथे थूलपडे अचंभविरदिवदे परविवाहकरणेण वा इत्तरियागमणेण चा परिग्गहिदा परिग्गहिदागमणेण वा अणंगकीडणेण वा कामत्तिव्यामिणिवेसेण वा जो मए देवसिउ अचारो अणाचारो मणसा वचिया काएग कदो वा कारिदो कीरतो वा समणुमणिंदो तस्स मिच्छामि दुकडं । अर्श-हे भगवान् । मैं अपने व्रतोमें लगे हुये दोपोंकी आलो- चना पूर्णक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। दूसरी व्रत प्रतिमाके अंतर्गत स्थल ब्रह्मचर्याणुव्रतके पालन करने में 1

श्रावक-प्रतिक्रमण
दिवससंबंधी मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदनासे
भन्यके पुत्र पुत्रियोंका विवाह (कन्यादानके करनेमें महान धर्म
होता है ऐसा अन्य धर्मवाले मानते हैं कि हो, घ्यभिचारिणो
स्रोके घरके साथ व्यवहार आना जाना आदि रखा हो, वेश्या
कुमारिका और विधवा इत्यादिक परिग्रहीत और अपरिग्रहीत
त्रियोंके साथ कामवासनासे व्यवहार (बोलना हंसना आदि)
किया हो, काम सेवनके अंग सिवाय अन्य अंगसे काम चेट की
हो, कामके तीव विकारसे चीमत्स विचारा हो इत्यादि अनेक
प्रकारके दोप दिवस संवन्धी मुझसे बने हो दूसरेसे कराये हों,
अन्यके करनेमें वर्णमाना हो सो सव मिथ्या हो।
पडिकमामि भते बद पडिमाए पचमे धूलयडे
परिग्गहपरिमाणवदे खेतवत्थूण परिमाणाइकमणेण वा
धणधण्णाणं परिमाणाइक्कमणेण या हिरण्णसुवण्णाणं परि-
माणाइकमणेण वा दासीदासाणं परिमाणाइक्कमण
कृप्यपरिमाणाइक्कमणेण वा जो मए देवसिर अइचारो
मणसा पचिया कारण कहो वा कारिदो वा वीरतो
वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुकडं ।।
अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमे लगे हुए दोषोंको
मालोचना पूर्णक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। दू-
सरी प्रतिमाके अन्तर्गत स्थूल परिग्रह त्यागनतमें जमीन (क्षेत्र)
घर, गाय बैल प्रभृति धन और गेह आदि धान्य, सुवर्ण, चांदी,

६४ धावफ-प्रतिफमण दासी, दास, चन, गौर भांड (वर्तनादि) इत्यादि समस्त परि- प्रहफे परिमाणका मैंने मन वचन फाय वीर कृत कारित अनुमोद. नासे उल्लंघन फिया हो, अन्यमे फगया हो, अन्य करने में मनुमति दो हो तो, उस मबन्धी समस्त दोष मिथ्या हों। पडिकामि भते वदपडिमाए पढमे गुणपदे उद्ध- चईकमणेण चा अहोवईफमणण वा, तिरियबईकरण चा खेतवद्धिएण वा सदि अंतराधांणण या जो भए देवसिक अडचारो मणमा चचिया काएण कदो वा कारिदो चा कौरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुपाड ।। अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने चुतमे लगे हुए दापोंको आलोचना पूर्णफ पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता मैिंने व्रतप्रतिमाके अन्तर्गत गुणवतका प्रथम भेद दिग्यत नामक व्रतके पालन करनेमें ऊळदिशाका अतिक्रमण किया हो, नोचेको दिशामा अतिक्रमण किया हो, तिगंग्दिशाया अतिक्रमण फिया हा, क्षेत्रको मर्यादा वढाई हो अथवा मर्यादाका विस्मरण किया हो इत्यादि अनेक प्रकारके दोप दिवस सम्बन्धों मैंने किये हो, भन्यके फरनेमें अनुमति दो हो तो वे सब मिथ्या हों। पडिक्कमामि भंते वद पडिमाए विदिए गुणव्यदे आणयाणेण वा विणिजोगेण वा सद्दाणुवाएण वा रूपाणु- वाएण वा पुग्गलखेवेण वा जो मए देवसिउ अइचारो मणसा चचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समशुमणिदो वस्स मिच्छामि दुक्कडं। १ धावफ -प्रतिक्रमण ६५ वर्ण-हे भगवन् ! मैं अपने व्रतमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता है । दूसरी प्रतिमाके अंतर्गत गुणवनका दूसरा मेद देणवतके पालन करनेमें, मर्यादा किये हुप घेतके वाहरले वस्तु मगाई किलो प्रयो- जनसे कहींपर गमन होता है मर्यादाके बाहर यदि किसी वस्तुको लानका हमारा अभिप्राय है और या वस्तु स्वयं न जाकर अन्यसे मगवाई तो मर्यादा वादर जानेका प्रयोजन सिद्ध हुआ परंतु प्रत्यक्ष व्रत भंगके भयसे स्वयं गमन नही किया इसलिये यह भंगामंगपत्तिरूप अतीचार है ) हो । मर्यादाके वाहर वस्तु भजी हो, बंफर पत्थर फंककर अन्य मनुष्यसे मर्यादाके वाहरका कार्य किया हो, शब्द आदिको समस्या दिग्नलाकर काय किया हो, अपना रूप दिखलाफर मर्यादाले वाहाका कार्य सिद्ध किया हो इत्यादि अनेक दोष मन वचन फायसे दिवसमें मैने फिये हों, अन्यसे कराये हों अथवा अन्यके करनेमें अनु- मति प्रदान की हो तो वे सब मिथ्या हो। पोडकमामि मंते वदपडिमाए तिदिए गुणवदे कंदप्पेण वा कुक्कृचिएण मोक्खरिएण वा असमक्खिया- हिकरणेण वा भोगोपभोगाणस्थकेण जो मए देवसिउ अइ- चारो मणसा चचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कड ॥ अर्थ-हे भगवन् ! मैं अपने प्रतोंमें लगे हुये दोपोंको मालोचना पूर्णक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ । ५ ६६ श्रावक-प्रतिक्रमण दूसरी व्रत प्रतिमाके अंतर्गत गुणवतका तीसरा भेद अनर्थदण्ड- विरति व्रतमे रागके उदयसे स्मित हास्यसे थट्टा की हो, कुत्सित भापण किया हो, शरीरकी खोटी चेष्टा को ही, विना योजन वकवाद किया हो, ध्यर्थके कार्य किये हों (प्रयोजन विना हिंसा- जनक व्यापार किया हो) भोगोपभोगकी सामग्री अपेक्षासे बहुत ही अधिक निष्काम संग्रह की हो। इत्यादि अनेक प्रकारके दोप मन वचन कायसे दिवसमें मैंने किये हों अन्यसे कराये हों अथवा किसांके करनेपर हर्ष प्रकाशित किया हो तो वे सब दांप मिथ्या हों। पडिक्मामि भंते वदपडिमाए पढमे सिक्खायदे फा- सिदिय भोगपरिमाणाइक्करणेण वारसदिय भोगपरि- माणाइक्कमणेण वा घाणिदिय भोगपरिमाणाइक्कमणेण वा चक्खिदिय भोगपरिमाणाइक्कमणेग वा मणिदिय भोगपरिमाणाइक्कमणेण वा जो मए देवसिउ अइचारो मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वासीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं । अथ- हे भगवन् ! मैं अपने प्रतोंमें लगे हुये दोषोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिकरण करता हूं।बत प्रतिमाके अंतर्गत प्रथम शिक्षाक्त भोगपरिमाण व्रतमें स्पर्शन इंद्रिय (चर्स-इसका गर्ग, शीत, हलका, भारी, रूस, स्निग्ध, कोमल, कठिन ) विषय है और इस विषय संबंधी भोग-( जो एकवार भोगनेमें आवे ऐसे पदार्था के परिमाणमें ) रसना इन्द्रिय (जीभ 7 श्रावक-प्रतिक्रमण ६७ इसका मिष्ट, कटु, तिक, कपायला और खट्टा विषय है इस विषय सम्बन्धो भोग पदार्थों के परिमाणमे) नाणेन्द्रिय (नाक- इसका विषय सुगंध तथा दुर्गध इस विषय सम्बन्धी भोग पदार्थों के परिमाणमें) चनुरिन्द्रिय (आंग-इसका काला पाला नाला लाल सफेद पदार्श, इस विषय संबंधी भोग पदार्थों के परिमाण) श्रोत्रोन्द्रिय (कान-सका विषय आवाजका ज्ञान, इस विषय सम्बन्धी भोग पदार्थों के परिमाण ) इस प्रकार पांच इन्द्रियोंके विषय सम्बन्धो भोग पटाके परिमाणका भातक्रमण मन वचन काय द्वारा दिवसमें स्वयं किया हो, अन्यसे कराया हो, फिसीके करने में भला माना हो इत्यादि दोप मैने किये हों तो वे सब मिथ्या हों। पडिक्कमामि भंते बदपडिमाए विदियसिक्खायदे फासिदिय परिभोगपरिमाणाइक्कमणेण वा रसणिदिय परिमोगपरिमाणाइक्कमणेण वा घाणेदिय परिभोग- परिमाणाइक्कमणेण वा चक्विदिय परिभोगपरिमाणाइ- क्कमणेण वा सवाणिटिय परिभोगपरिमाणाइक्कमणेण जो पए देवसिउ अइचारो मणसा वचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरतो या समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ अर्ण-हे भगवन् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोषोंका आलोचना गर्नक प्रतिक्रमण करता हूँ। व्रत प्रतिमाके अंतर्गत शिक्षाप्रतका तीसरा भेद उपभोग (जो वार वार भोगने में आवे)

६८
श्रावक -प्रतिक्रमण
परिमाण व्रतमें स्पर्शनेन्द्रिय उपभोग परिमाण, रसनेन्द्रिय उपभोग
परिमाण, प्राणेन्द्रिय उपभोग परिमाण, चक्षरिन्द्रिय उपभोग परि-
माण और श्रोत न्द्रिय उपभोग परिमाण इस प्रकार पाचों इन्द्रिय
उपभोग सम्बन्धी पदार्थों का अतिक्रमण मन वचन कायसे किया
हो, कराया हो, कर देनेको भला माना हो इत्यादि अनेक दोष
दिवसमें मुझसे बने हों तो वे सब मिथ्या हों।
पडिक्कमामि भंते वदपडिमाए तिदिए सिक्वायदे
सचित्तणिक्खेवेण वा सचित्तपिहाणेण वा परउवएसेण वा
कालाइक्कमणेण वा मच्छरिएण वाजो मए देवसिर अइचारो
मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा
समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
अर्थ-हे भगवन् ! मैं अपने लगे हुए दोषोंकी आलोचना
पूर्णक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। व्रत प्रतिमा
के अंतर्गत शिक्षावतकातीसरा भेद अतिथिसंविभाग नामक व्रतमें
सचित्त-( जीवयोनि जीवोत्पत्ति होनेका स्थान ) वस्तु,
प्रासुक अचित्त पदार्थको रखा हो, सचित्त वस्तुसे ढका हो,
अन्य किसीके प्रतिपादित करनेसे दिया अथवा अन्यका द्रव्य
अपना द्रव्य कहकर दिया हो, दान देनेमें समयका विच्छेद
(लोभ और कलुषित परिणामोंके कारण यह भावना करी हो
कि यह समय ज्यापारादिका है इसलिये कौन इस समय आहा-
रादि दान देने जाता है) किया हो, दान देनेमें अन्य भव्या-
'लाओंके साथ द्वेष (प्रतिष्ठादिके कारण अर्थात जो अन्य कोई

श्रावक-प्रतिक्रमण ६६ धर्मात्मा दान करे तो उसके साथ यह विचार कर छप करे कि इसकी प्रतिष्ठा सर्वत्र होगी और मैं बड़ा अमीर होकर चुप रह गया इसलिये मेरो निंदा होगी इसलिपे छप) फिया हो इत्यादि अनेक प्रकारके दोप, मन, वचन, कायसे दिवसमें मैंने स्वयं किये हों, अन्यसे कराये हों, किसीके करनेमें संमति प्रदान की हो तो ये सब दोष निरर्थक हों। पडिकमामि भंते वदपडिमाए चउत्थे सिक्खादे जीविदासंसणेग वा मरणासंसणेण वा मिचाणुराएण वा सुहाणुवधेण या णिदाणेण या जो मए देवसिड अइचारो मणसा चिया कारण कदो वा कारिदो या कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुवाडं ।। अर्धा-हे भगवन ! मैं अपने व्रतमें लगे हुए दोषोंफी आलो- चना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करना है। व्रत प्रतिमाके अंतर्गत शिक्षावतका चीथा भेद समाधिमरण व्रत पालन करनेमें जोवित रहनेको (मैं अभी अधिक जीवित रहा तो अच्छा अथवा जीनेकी आशासे समाधिमरणमें शिथिलता करना) आशा रखना, मरणका भय करना, हाय ! मैं मरजाऊंगा क्या? ऐसे परिणामोंसे संक्लेगित होना अथवा शोवतासे मरण होनेकी इच्छा रखना, इष्ट मित्रजनोंसे प्रेम (राग) करना, पूर्नमें भोगे हुए भोगोंका स्मरण करना और प्रतादिक पालन कर सांसारिक सुखको इच्छा करना इत्यादिक अनेक दोष दिवसमें 'मैंने मन

श्रावक-प्रतिक्रमण
-
वचन कायसे किये हों, अन्यसे कराये हों, किसीके करनेमें
अनुमति प्रदान की हो तो वे सव दोष निरर्थक हों।
पडिकमामि भते सामाइयपडिमाए मणदुप्पणिधाणेण
वा वाकदुप्पणिधाणेण वा, कायदुप्पणिधाणेण वा अणा-
दरेण वा सदिअणुव्यठाणेण वा जो मए देवसिउ अइचारो
मणसा वचिया काएण कदोवा कारिदो वा कीरंतो वा
समणुमणदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥
अर्थ-हे भगवन् ! में अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी
आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करनेका
इच्छुक हूं। तीसरी सामायिक प्रतिमाके पालन करनेमें मनकी
स्थिरता न रखी ( आर्श और रौद्रध्यान पूर्वक मनको अन्य
प्रकार चलायमान किया ) वचनको स्थिरता (सामायिक पाठका
शुद्ध उच्चारण न कर वकवाद आदि करनेसे वचनकी दुश्ता
धारण की) न रखी, शरीरको स्थिरता (एक आसनसे स्वस्थता
पूर्वक निर्मिकार सामायिक नही किया किन्तु शरीरको दुष्टतासे
आंगोपांगको इधर उधर चलायमान किया) नहीं रखी, सामायिक
करनेमें अनादर प्रकट किया अथवा सामायिक पाठका विस्मरण
किया इत्यादि अनेक प्रकारके दोष दिवसमें मैंने मन वचन कोयसे
किये हों, अन्यसे कराये हों, किसी अन्यके करनेमें अनुमति प्रदान
की हो,तो वे सब दोष मिथ्या हों।
पडिक्कमामि भंते पोसहपडिमाए अप्पडिवेक्खिया-
अमज्जियासग्गेण वा अप्पडवेक्खियापमज्जिदाणेण वा
2-

श्रावक-प्रतिक्रमण अप्पडिवेक्खियापमज्जियासंघारोवक्कमणेण वा आवस्स- याणदरेण पा सदि अणुबठाणेण वा जो मए देवसिर अइचारो मणमा चचिया कारण कदो चा कारिदो वा कीरतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ अर्थ-हे भगवन् ! अपने व्रतोमे लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्णक पश्चात्ताप करना हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। चौथी प्रोषधोपवास नामक प्रतिमाके पालन करने में दृष्टि से जीवजंतुओ- को न देखकर और प्रमादले जीवजंतुओंका शोधन किये विना मल मूत्रका क्षेपण किया हो अथवा पूजाके उपकरण आदि वस्तुयें विना देखे विना शोधे ऐसे ही जीवजंतुवाली जमीनमें रखी हों। विना देवे और विना सोधे उपकरण पुस्तक आदि सयमोपयोगी वस्तुओंको ग्रहण किया हो, विना देरी विना शोधे विस्तर (पारो) धादि विछाये हों, पट आवश्यक पालन करनेमें अनादर किया हो, अथवा सामायिक, पूजन, स्तवन आदिका ९ गृहस्थोंके लिये पट आवश्यक दोनों प्रकारके पालन करने चाहिये । समता, चंदना, स्तुति, प्रतिक्रमण, स्वाध्याय और का- योत्सर्ग इनको आवश्यक फहते हैं। अथवा देवपूजा, गुरुकी उपा- सना, स्वाध्याय, संयम, तप और दान ये भो छह आवश्यक हैं। दोनों प्रकारके आवश्यकोंका अभिप्राय परिणामको सरल और पचित्र रखनेका है इसलिये आवश्यक कर्ममें अनादर करना व्रतमें शिथिलता है।

७२
श्रावक-प्रतिक्रमण
पाठ विस्मरण किया हो इत्यादि अनेक दोष दिवसमें मैंने
मन वचन कायसे स्वयं किये हों, अन्यसे कराये हों, अन्य
किसीके करनेमें अनुमति प्रदान की हो तो वे सव दोप मिथ्या
हों।
पडिक्कमामि भंते सचित्तवि'दि पडिनाए पुदविका-
इआ जीवा संखेज्जासंखेज्जा आउकाइआ जीया संखेज्जा-
संखेन्जा तेउकाइआ जीवा संखेज्जासंखेना वाउ काइआ
जीवा संखेज्जासंखज्जा वणप्फदिकाइआ जीवा अणंता-
पता हरिया विया अंकुरा छिण्णाभिण्णा एदेसि उद्दावणं
पादावण विराहणं उवघादो कदो वा कारिदो वा कीरतो
वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।
अर्थ-हे भगवन् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी
आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करनेका इच्छुक
हूं। पांचवीं सचित्तत्याग प्रतिमाके पालन करनेमे जलकायके
संख्यात अथवा असंख्यात जीव, तेजकायके संख्यात असंख्यात
जीव, वायुकायके संख्यात असंख्यातजोव, पृथ्वीकायके संख्यात
असंख्यात जीव और वनस्पतिकायके अनंतानंत जीव, हरितकायके
जीव, हरित अंकुर, वोज कंदमूल आदिके जीव और साधारण
चनस्पतिक जीवौंका छेदन किया हो, भेदन किया हो, प्राणोंका
घात किया हो, पांव (पग) आदिसे कुचल दिये हों, त्रास दिया
हो, पीडा करी हो और उनको विराधना की हो इत्यादि
अनेक दोष मैंने मन वचन कायसे स्वयं किये हों, अन्यसे

श्रावक-प्रतिकमण कगये हों, किसी अन्यके करनेमें सहमत हुआ हो तो वे सब दोष मिथ्या हों। पडिक्मामि भंते राइभत्तपडिमाए णव विह- संभचरियस्स दिवा जो मए देवसिउ अइचारो मणसा वचिया कारण कदो वा कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तम्स मिच्छामि दुकडं ।। अर्धा-हे भगवन् ! मैं अपने व्रतमें लगे हुए दोपोंको आलोचना पूर्णक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करनेको इच्छा करता है। पाठी दिवा-मैथुन त्याग नामक प्रतिमाके पालन करनेमें नव प्रकार-खियोंके विषयकी अभिलापा, लिंग विकार, घृत दुग्धादि पुष्टरस त्याग, स्त्री, पशु, नपुंसक, विट और सप्त विषयोंके लोलप मनुष्योंके आश्रित बस्तिका त्याग, स्त्रियोंके मनो- हर अंग निरीक्षण त्याग, स्त्रियोकी धुरी वासना आदर सत्कारका त्याग, अपनी पूजा प्रतिष्ठाके श्रवणका त्याग, अंगभंगारकात्याग संगीत नृत्य वादिव आदिका श्रवण किया हो इत्यादि अनेक दोष दिवसमें मैंने मन वचन कायसे स्वयं किये हों, अन्यसे कराये हों किसी अन्यके करनेमें भला माना हो तो वे सव दोप मिथ्या हो। १-इस प्रतिमाका नाम रात्रिभुक्त त्याग भी है इसलिये चारों प्रकारके माहारमें मोह किया हो, पूर्वमें भोग हुए रसोंका स्मरण किया हो, निदान किया हो और रसोंको न भोगते हुए भो मैं रसभोग रहा हूँ ऐसा स्मरण किया हो इत्यादि दोप मैंने स्वयं किया हो अन्यसे कराया हो, किसीके करनेपर संमति दी हो तो ये सब मिथ्या हों।

श्रावक-प्रतिक्रमण पडिकमामि भंते इत्थिकहायत्तगेण वा इस्थिमणोह- हरांग निरिक्खिणेण वा पुनस्याणुस्मरणेण वा मुक्कोपण- रसा सेवणेण वा सरीरमंडणेण वा जो मए देवसिउ आइ- चारो मणसा वचिया काएण कदो वा कारिदोवा कीरतो वा सपणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कड ।। अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोपोंकी आलोचना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता है। सातवी ब्रह्मचर्य प्रतिमाके पालन करनेमें स्त्रियोंके मनोहर - गोंका निरीक्षण किया हो, पूर्वकालमें भोगे हुए विषयोंका स्मरण कर मनको विकारित किया हो, कामोत्पादक पुष्ट रसोंका सेवन किया हो, स्त्रियोंको आसक्त करनेवाला शरीरका शृङ्गार किया हो इत्यादि अनेक प्रकारका दोप मैंने दिवसमें मन, वचन, काय से किया हो, अन्यसे कराया हो, किसी अन्यके करनेमें सम्मति प्रदान की हो तो वे सब दीप मिथ्या हों। पडिक्कमामि भंते आरंभविरदि. पडिमाए कसायव- संगएण जो मए देवसिउ आरंभो मणसा चचिया काएण कदो बा, कारिदो वा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोमें लगे हुए दोषोंकी आलो- चना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। आठमो आग्मत्य ग प्रतिमाके पालन करनेमें क्रोध, मान, माया, लोभ और मोह आदि कषायोंके वश पापकर्मों का आरंभ दिवसमें मैंने श्रावक-प्रतिकमाण ७५ romwen मन, वचन कायसे किया हो, अन्यसे कराया, हो; अन्य किस के करनेमें अनुमति प्रदान की हो तो वे सब दोप मेरे मिथ्या हों। पडिक्कमामि मंते परिग्गहविरदिपडिमाए वत्थमेत्त परिग्गहादो अररम्मि परिगाहे मुच्छापरिणामो जो भए देवसिड अइचारो मणासा पचिया कारणा कदो वा कारिदो बा कीरंतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं । अर्ग-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोमें लगे हुए दोपोंकी आलो- चना पूर्णक पश्चाताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूं। नवमी परिग्रहत्याग प्रतिमा के पालन करने में वस्त्र मान परिग्रह सिवाय अन्य परिग्रहमें मूर्छा की हो तो उस सम्बन्धी दिवसमें मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदनासे किये हुए दोपों को मिथ्या चाहता हूँ। पडिक्कमामि भने अणुमणविरपिडिमाए जं किंपि अणुमणण पुढापुढेण कदं वा कारिदं वा कीरंतो वा सम- णुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कड ।। अर्थ-हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोषोंकी आलो- चना पूर्वक प्रतिक्रमण करता है । दशमी अनुमति विरति प्रतिमाके पालन करने में अन्यके पूछने पर अथवा विना पूछनेपर भी जो कुछ अनुमति दी हो तत्सम्बन्धी मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदनासे दिवसमें किये हुए समस्त दोष मिथ्या हो। पाडकमामि भते उहिडविरदिपडिमाए उद्दिदोस- - " श्रावक-प्रतिक्रमण बहुलं आहारिय वा आहारावियं वा आहारिजंतं समणु- मणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ।। अर्थ हे भगवान् ! मैं अपने व्रतोंमें लगे हुए दोषोंकी आलो- चना पूर्वक पश्चात्ताप करता हुआ प्रतिक्रमण करता हूँ। ग्यारहवीं उद्दिष्टत्याग प्रतिमाके पालन करनेमें उहिए दोषसे दूषित आहार स्वयं सेवन किया हो, अन्यको उद्दिष्ट दोष सहित आहार कराया हो, उहिष्ट दोष दूषित आहारके करनेमें संमति प्रदान की हो तत् सम्बन्धो जो दोष मन वचन कायसे मुझसे हुए हों वे सब मिथ्या हो। निर्ग्रन्थ पदकी वांछा। इच्छामि भते इमं णिग्गंथ्थं पावयणं अणुत्तरं केव- लियं णेग्गइयं सामाइयं संसुद्धं सल्लघत्ताणे सिद्धिमग्गं सेढिमग्गं खंतिमग्गं मोत्तिमग्गं मोक्खमां पमोक्खमग्गं णिज्जाणमग्गं णियाणमग्गं सम्बदुःखपरिहाणिमग्गं सुचरियपरिणियाणमग्गं अविहत्तमविसंति पव्ययणमु- त्तमंत सदहामि तं पत्तियापि तं रोचेमि तं फासेमि इदो उत्तरं अण्णं णच्छि ण भूदं ण भवं भविस्सदि गाणेण वा दसणेण वा चरितण वा सुत्तण वा इदो जीवा सिझंति मुच्चंति परिणिव्याणयंति सव्वदुःखाणमंतं करंति परिवि- याणंति समणोमि संजदोमि उवरदोमि उवसंतोमि उव- घिणि पडिमाणमायामोसमूरण मिच्छणाण मिच्छदंसण .

धावक-प्रतिक्रमण ७७ मिच्छरितं च पडिविरदोमि ममण्णाण सम्मईसणसमचरित्रं चरोचेमिजं जिणवरेहि पणत्तो इत्य मे जो कोई देवसिउ राईउ अइचारो अणाचारो तम्स मिच्छामि दुक्कड ॥ अर्थ-हे भगवान् ! मैं निर्गन्थपदकी इच्छा करता हूं। जबतक मेरा संसारसे संवन्ध है तवतक भव भवमें यह निजगत्- पूज्य और मंगललोकोत्तमशरणभूत निर्गन्यपद ( समस्त परि- प्रहादि रहित परम दिगंवर अवस्था ) वारवार मिलो। बाह्य और आभ्यंतर समस्त परिग्रह रहित, अनुत्तर-( मोक्ष- मार्गका साक्षात् चिन्ह निर्गन्य लिंग सिवाय अन्य किसी भी लिंगसे मोक्षकी प्राप्ति नहीं होती है इसलिये निम्रन्थपद लोको- चर है) केवलशानका उत्पाठक, रत्नत्रयका वीज, सर्व सावध रहित, परम उदासीनताका कारणभृत,आलोचना प्रायश्चित्त निर- तीचारता प्रतिक्रमण आदि गुणोंसे परम विशुद्ध, माया मिथ्या निदान इस प्रकार शल्यत्रय रहित, आत्मसिद्धिका प्रधान मार्ग उपशमक्षयोपशमादि श्रेणियोंका साक्षात् मार्ग, परिग्रह क्रोध मान माया लोभ काम और व्यामोहादि समस्त विकार रहित होनेसे सर्वोत्तम निर्भय परमात्म प्राप्तिका प्रत्यक्ष मार्ग, त्यागका मार्ग, मोक्षमार्ग, उत्कृष्पदफा मार्ग, संसारके परिभ्रमणसे रहित निदोष मार्ग, निर्वाणका मार्ग, सर्वदुःखोंके नाश करनेका मार्ग, उत्तम सदाचारके उत्पन्न करनेका मार्ग, अवाधित मार्ग, स्वत- न्त्रताका मार्ग, निर्भयताका मार्ग, सब सुखोंका मार्ग और-सर्वो- त्कृष्ट मार्ग ऐसा निग्रन्थ पद है।

७८ श्रावक-प्रतिक्रमण मैं उक्त सर्वोत्कृष्ट निग्रंथपदको विशुद्धभावोंसे श्रद्धान करता हूँ और संशयादि समस्त विकार रहित शुद्ध निश्चयसे चाहता हूं, विशुद्ध भावोंसे निश्चयरूप मानता हूं, विश्वास करता हूं, सहृदयसे खोकार करता है, अनन्य भावनासे प्रेम करता हूं, भक्तिभावले स्पर्श करता हूं, पवित्र भावों से धारण करना चाहता हूं। इस निम्रन्थपद सिवाय और दूसरा कोई भी उत्तम नहीं है। प्रथम कोई नही था और न भविष्यमें कोई इसके समान होगा। सम्यग्ज्ञान, सम्यग्दर्शन, सम्यक्चारित्र और सम्यक् आगमसे यह निग्रन्थपद सर्वोत्कृष्ट है, इसके धारण कर- नेसे ही जीव मोक्षमार्गमें प्रात होंगे। सिद्धपदको प्राप्त होंगे। सम स्त कर्म रहित सर्गथा मुक्त होंगे अर्थात् फिर कभी संसारके बंध- नमें नहीं प्राप्त होंगे। इसी निन्धपश्से निर्वाणपदको प्राप्त होंगे, सन दुःखोंका नाश करेंगे। समस्त जीवादि तत्वोंके माता होंगे। इसलिये मैं इस महान् परमपूज्य निर्गन्यपदको धारण करता हूं और उसकी प्राप्तिके लिये संयममा आराधन करता हूं। विपय कषायोंसे उपशांत होता हूं. विरक्त होता है । परिग्रह क्रोध, मान, माया, लोभ, मात्सर्ग, द्वेप, राग, काम, भय, प्रपंच और समस्त व्यामोहको छोड़ता हूँ। हिंसा, झूठ, चोरी, कुशोल और परिग्रहका त्याग करता हूं। मिथ्याज्ञान, मिथ्यादर्शन, मिथ्याचारित से सर्वदा विरक्त हो गया हूं। अव मैं सदाके लिये इनका परि- त्याग करता हूँ और सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चारित्रका' श्रद्धान करता है। जो जिनेन्द्र भगवानने कहा है वह सत्य है, .

श्रावक-प्रतिक्रमण
प्रमाणित है, निश्चय है; अबाधित है। उसका में विश्वास करता
९ श्रद्धान करता हूं इस विषयमें मुझसे जो कुछ अनोचार अना-
चार हुए हों तो वे सब मिथ्या हों।
इच्छामि भंते वीरमात्ति काउस्सग्गं करेमि जो मए
देवसिउँ ( राईउ चउमासिउ सांवच्छरिउ ) अइचारा अणा-
चारो आभोगो अणाभोगो कई वाईट माणसिउ दुचरित
दुचारिउ दुव्मासिउ दुप्परिणामिउ दुम्समिणिउ णाण
दंभयो चरिते सुत्ते समाइए एयारस एह पडिमाणं विरा-
हणाए अहविस्स कम्मम्स णिग्पादणाए अणहा उस्सासि-
देण वा णिस्सासिदेण वा उम्मिसिदेण वा णिमिसिदेण
वा खासिदेण वा छिकिदेण वा जंभाईदेण वा सुहुमेहि
अंगचलाचलेहि दिहिचलाचलेहि एदेहि सम्वेहिं समाहि
पत्तेहिं आयारेहिं जाव अरहंताणं भयवंताणं पज्जावासं
करेमि तावकायं पावकम्म दुचरियं बोस्सरामि। दसण
चय सामाइय पोसह सचिन राय भत्तीय। वमारंभपरि-
गह अणुमणमुद्दिह देसविरदो यः।
एयासु यथा कहिट पडिमासु देवसिओ पमादाइकया
इच्चार सोहण छेदोवडावणं होउ मझ्झ ।
अरहंत सिद्ध आयरिय उवज्झाय सञ्चसाहु सक्खियं
१ देवसिउ.३६ राउ १८ और चंउमासिउ सांवच्छरिमओ १०४
वार णमोकार मंत्र पढकर जाप्य दे।

श्रावक-अतिक्रमण सम्मत पुब्वगं दिढव्वद समागेहियं मे भवदु मे भवदु मे भवदु । देवसिय पडिक्कमणाए सव्वाइचार विसोहिणिमित्त पुन्वापरियकम्मेण निष्ठितकरण वीरभत्तिकायोस्सग्गं करेमि। "णमो अरहताणं" यहांसे प्रारंभकर "याति जिन- चैत्यानि" इस श्लोकपर्यन्त पढफर पुनः नववार णमोकार मंत्रकी जाप्य देना चाहिये। हे भगवान् ! मैं वोरप्रभुकी भक्ति करनेका इच्छुक हूं और इसके लिये मैं इस विनाशीक शरीरसे ममत्वभाव छोड़ता हूं। दिवसमें (गनिमें इत्यादि) आवश्यक क्रियाओंके करते हुये मैंने आलस किया हो, व्रतादिकोंको भंग किया हो, उनमें अतीचार लगाये हों, शिथिलता धारण की हो, मनमें ग्लानि उत्पन्न की हो, प्रकटरूप दंभवृत्तिसे व्रत पालन किये हों, लजाके लिये एकदम अपनेको छुपाकर आचरण किये हों, मन, वचन और शरीरकी दुष्टतासे व्रतोंका पालन किया हो, वीभत्स उच्चारण कर कार्य किया हो, राग द्वेष अज्ञान और प्रमादसे विनय रहित उद्दण्डतासे व्रतोंका पालन किया हो, अपशब्द कहकर महत्ता बतलाई हो, कुत्सित परिणामों (बुरे भावों) से कार्य किया हो, बुरे स्वप्नमें दोष उत्पादन किया हो, सम्यग्दर्शन ज्ञान चारित्र और जिनागमकी १जैसा प्रतिक्रमण किया हो वैसी ही णमोकार मंत्रकी जाप देनी चाहिए अर्थात् दिवस संबंधी प्रनिक्रमणकी ३६ वार णमो- कारकी जाप देना उसी प्रकार उक्त लिखित नियमसे रात्रिकी १८ बार णमोकारकी जाप देना आदि ।

श्रावक-प्रतिक्रमण विराधना को हो, प्रतिमाओंकी विराधना को हो, इत्यादि अनेक दोष मुमसे बने हो, वे सब मिथ्या हों। आठ कर्माको नाश करनेवाली क्रियाओंके प्रयत्न करने में (सामायिन-प्रतिक्रमण-ध्यान-तप-पूजा और स्वाध्याय ये सव कर्मा के नाश करनेके कारण हैं। श्वासोच्छ्वाससे, नेत्रोंकी टंकारसे खांसनेसे, छींकनेसे, जंभाई लेनेसे, नक्ष्म अंगोंके हिलानेसे, आंगों- गिके फेफनेसे दृष्टिदोपसे इत्यादि समस्त क्रियाओंसे सूत्रपाठ आदि क्रियाओंका विरमरण किया हो, अविनय को हो, प्रमाद और अशानसे अन्यथा प्ररूपणा की हो तो में इस प्रतिक्रमणके समय वीर भगवानको भक्तिरूप कायोत्सर्ग धारण करता हूं और तव तक पापकर्माको सर्वथा छोडकर शरीरसे भी ममत्व त्याग करता हूँ। वीर प्रभुका स्तवन । यः सर्वाणि चराचराणि विविश्द्रव्याणि तेपां गुणान्, पर्यायानपि भूतभाविभवतः सर्वान् सदा सर्वथा । जानीते युगपत्यतिक्षणमतः सर्वज्ञ इत्युच्यते, सर्वज्ञाय जिनेश्वराय महते पीराय तस्मै नमः॥१॥ अर्थ-जो समस्त चराचर पदार्थोंको तथा समस्त द्रष्य और उनकी कालत्रयवती समरत पर्यायोंको एक साथ प्रतिक्षण सदैव जानता है उसफो सर्वज्ञ कहते हैं। वीर भगवान सर्वश हैं वीतराग हैं और महान् पूज्य जिनेश्वर हैं इसलिये वीर प्रभुको नमस्कार है।

८२ श्रावक-अतिक्रमण वीरः सर्वसुरासुरेन्द्रमहितो वीरं बुधाः संश्रिताः वीरेणाभिहितः स्वकर्मनिचयो वीराय भक्त्या नमः ।। बीरातीर्थमिदं प्रवृत्तमतुलं वीरस्य घोरं तपो वीरे श्रीधृतिकीर्तिकांतिनिचयो हे वीर ! भद्र त्वयि ।।१।। अर्थ-हे वीर प्रभो ! आपकी समस्त इन्द्र पूजा करते हैं। विज्ञ गणधरादिक आपकी सेवा करते हैं और आपने समस्त कोको नष्ट कर दिया है इसलिये हे वीर! आपको नमस्कार है। धर्मतीर्थ आपसे इस कालिकालमें चल रहा है, माप घोर तपको धारण करनेवाले परमयोगी हो । आपमें श्री, कांति, कीर्ति आदि सर्व गुणोंका वास है अतएव आप कल्याणभागी हों। ये वीरपादौ प्रणमंति नित्यं, ध्याने स्थिताः संयमयोगयुक्ताः। ते बीतशोका हि भवंति लोके, संसारदुर्ग विपमं तरंति ॥शा अर्थ-जो मनुष्य संयमको धारण कर और ध्यानमें लीन होकर वीरप्रभुको नमस्कार करता है वह समस्त शोकको दूरकर संसार समुद्रसे पार हो जाता है। वीर प्रभुका चरित्र। चारित्रं सर्वजिनैश्चरितं प्रोक्तं च स्वशिष्येभ्यः । प्रणमामि xपंचभेद *पंचमचारित्रलाभाय ॥१॥ * सामायिक १ छेदोपस्थापना २ परिहारिविशुद्धि, ३ सूक्ष्मसां- पराय ४ और यथाख्यात ५॥ * साक्षात्माक्षका कारण यथाख्यात चारित है।

धावक-प्रतिकरण अर्थ-सदाचार जिनेन्द्र भगवानने स्वर्ण पालन किया है और समस्त जीवोंके उपकारके लिये सवको बतलाया है। उत्तम चारित्रकी प्राप्तिके लिये नमस्कार करता हूं। व्रतसमुदयमूलः सयमाम्कयो, यमनियम- पयोभिर्वद्धितः शीलशासः। समितिकालिनमारो गुप्ति- गुप्तप्रवालो, गुणकुसुमसुगधिः सत्तपश्चित्रपत्रः ॥ शिवसुख- फलदायी यो दयाछाययोट्यः, शुभजनपथिकानां खेद- नोदे समर्थः । दुरितरविजनाप प्रापयनंतभावं, स भववि- भवहान्दैनौस्तु चारित्रवृक्षः ॥ २ ॥ अर्थ-ग्रत, संयम, नियम, यम, शोल, समिति, गुप्ति, तप, महाव्रत और दश धर्म चारित्रका रूप है। चारित्र मोक्षको देने- चाला दयामा बोज है. समस्त पाप और संसारका नाश करने- वाला है। धर्म महिमा । धम्मो मंगलमुकित अहिंसा सजमो तयो । देवा वि तस्स पणमंति जम्स धम्मे सयामणो ॥१॥ अर्थ-धर्म समस्त मंगलोंमेसे प्रधान मंगल है, अहिंआ, संयम और तप ये धर्मके रूप हैं । जो मनुष्य धर्मको पवित्र हृद. यसे धारण करता है उसको देवता भी नमस्कार करते हैं।

श्रावक-अतिक्रमण धर्मः सर्वसुखाकरो हितकरी धर्म वुधाश्चिन्यते 'धर्मेणैव समाप्यते शिवसुखं धर्माय तस्मै नमः ।। धर्मानास्त्यपरः सुहद्भवभृतां धर्मस्य मूलं दया धर्मे चित्तमह दधे प्रतिदिन है धर्म ! मां पालय ||२|| अर्थ-धर्मका मूल दया है, धर्मको विद्वान् गण वरादिक मुनीश्वर धारण करते हैं,धर्मसे सर्व सुखोंकी प्राप्ति और कल्याण होता है। धर्म सेवन करनेसे मोक्षको प्राप्ति होती है। धर्म ही जगतका बंधु है इसलिये धर्म सेवन करने में अपना चित्त लगाता हूं। हे धर्म! मेरी रक्षा कर! तेरे लिये नमस्कार है। इच्छामि भते पडिकमणा इचारमालोचेर तत्थ देसा. सिआ, असणासिआ अथाणासिआ कालासिआ मुद्दा- सिआ काउस्सग्गासिआ पणमासिआ पडिक्कमणाए तत्थसु आवासयसु परिहीणदा जो मए अचासणा मणसा बचिया काएण कदो वा कारिदो वा कीरतो वा समणुपणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कड। दसण वय सामाइय पोसह सचित्तराय भत्तय । बंभारंभपरिग्गह अणुमणमुद्दिछ देसविरदेदे । एयासु यथा कहिद पडि- मासु पमादाकया इच्चार सहिण छेदोषहवेण अर- हत सिद्ध आयरीय उवज्झाय सवसाहु सक्खियं सम्म- तपुधगं दिढव्वदं समारोहियं मे भवदु ३ अथ देव- सियडिक्कमणाए सव्वाइचारविसोहिणिमित्तं पुवापरिय कम्मेण चउवीसतित्थयरभक्ति काउस्सग्गं करेमि ।।

श्रावक-प्रतिक्रमण अर्थ-हे भगवन् ! अंतमें मैं अब प्रतिक्रमणमें लगे हुए दोषोंकी आलोचना करता हूं। द्रव्य क्षेत्र काल और भावोंकी भनुकूल योग्यता नहीं मिलनेसे, देश, आसन, स्थान, काल, मुद्रा कायोत्सर्ग, श्वासोच्छ्वास, नमस्कारादि विधि, और स्तुति आदि क्रिया में शोधताके लिये, छह मावश्यक काँके करनेमें कुछ भी होनता प्राप्त हुई हो, अथवा प्रमाद और अज्ञानसे जिन दोपोंकी (अथवा मन, वचन, काय और कृत कारित अनुमोदना द्वारा) प्राप्ति हुई हो तो वे सब मिथ्या हों। इस प्रकार दोपोंको शांतिके लिये चोवीस तीर्थकरभक्ति व कायोत्सर्ग धारण करें। णमोकार मंत्र वार पढकर जाप देखें। "णमो अरहताणं" से प्रारंभकर "यावंति जिन चैत्यानि" इस श्लोक पर्यन्त पाठ पढ़ना चाहिये और कायोत्सर्ग धारण करना चाहिये। चवीमं तित्थयरे उसहाई वीर पच्छिमे बंटे। सव्वेमि गुणगणहरसिद्ध सिरसा णमस्सामि ॥१॥ अर्थ-प्रथम ऋपभदेवको आदि लेकर वीर प्रभु पर्यन्त चौवीस तीर्थर, गणधर और सिद्धपरमेष्टीको नमस्कार करता हूं। ये लोकेऽपसलक्षणधरा ज्ञेयार्णवांतर्गताः। ये संपन्नवजालहेतुमथनाश्चंद्रार्कतेजोधिकाः । ये साध्धिन्द्रसुराप्सरोगणशतेंगीतप्रणुत्यचिंतास तान् देवान् ऋपमादिवीरचरमान भक्त्या नमस्याम्यहं ।। अर्थ-समस्त शेय पदार्थोके शाता, एक हजार आठ शुम "

८६
श्रावक-प्रतिक्रमण
-
लक्षणोंसे विराजमान, संसारके बंधनको नाश करनेवाले, करोड़ों
सूर्य और चंद्रमासे भी अधिक तेजस्वी, मुनीश्वर नरेन्द्र और देवे-
न्द्रसे पूज्य ऐसे अपभादि चौवीस तीर्थंकरोंको नमस्कार
करता है।
नाभयं देवपूज्य जिनवरमजितं सर्वलोकप्रदीपं ।
सर्वज्ञ सभवाख्यं मुनिगणवृषभ नंदनं देवदेव ।।
कमरिघ्न सुबुद्धि वरकमलनिभं पद्मपुष्पामिगंधं ।
क्षांत दांत सुपाव सकलशशिनिभं चंद्रनामानमीडं ।
विख्यातं पुष्पदंतं भवभयमथनं शीतलं लोकनाथ ।
श्रेयासं शीलकोश प्रवरनरगुरु वासुपूज्यं सुपूज्यं ।
। मुक्त दान्तेन्द्रियांश्च विमलमृपिपति सिंहसन्यं मुनीन्द्र ।
धर्म सद्धर्मकेतुं शमदमनिलयं स्तौमि शांति शरण्य ॥
कुथु सिद्धालयस्थं श्रमणपतिमरं त्यक्तभोगेषु चक्र ।
मल्लिं विख्यातगोत्रं खचरगुणनुतं सुव्रत सौख्यराशिं ॥
देवेन्द्राय नमीशं हरिकुलतिलक नेमिचन्द्र भवन्तं ।
'पार्श्व नागेन्द्रवंद्य शरणमहमितो बर्द्धमानं च भक्त्य
* १ इन तीनों श्लोकोंका अर्थ बहुत ही सरल है। ऋषभ १
अजित २ संभव ३ अभिनन्दन ४ सुमति ५ पद्मप्रभ ६ सुपार्श ७
चंद्रप्रभ ८ पुष्पदन्त : शीतलनाथ १० श्रेयांसनाथ ११ वासुपूज्य
१२ विमलनाथ १३ अनन्तनाथ १४ धर्मनाथ १५ शांतिनाथ १६
कुंथनाथ १७ भरनाथ १८ मल्लिनाथ १६ मुनिसुव्रत २० नमि-
नाथं २१ नेमिनाथ २२ पार्श्वनाथ २६ महावीर २४ इस प्रकार
पौवीस तीर्थकर है।

श्रावक-प्रतिक्रमण इच्छामि भंते चउवीस तित्थयर भत्ति काउस्सगो उतस्सालोचेउ पच महाकल्लाणसपण्णाण अह महापाडि- हेर सहियाणं चउतीस अतिशय विशेषसजुत्ताणं बत्तीस देवेन्द मणि मउड मत्थय महियाण चलदेव वासुदेव चक्क- हर रिसि मुणि जय अणागारोवगूढाण थुइसय सहस्स णिलयाण उसहाइ वीर पच्छिम मंगल महापुरिसाणं भत्तिए णिच्चकालं अच्चमि पुज्जेमि चंदामि णमंसामि दुक्ख- खउ कम्मक्खउ बोहिलाउ सुगइगमणं समाहिमरण जि- णगुणसपत्ति होउ मज्झ ।दसण वय सामाइय पोसह सचि- तरायमत्तीय । चंभारंभ परिग्गह अणुमणमुद्दिठ देसविर- देदे । एयासु यथा कहिद पडिमासु पमादाकया। इचार सोहणलं छेदोवडावणं अरहत सिद्ध आयरीय उवज्झाय सब्यसाहु सक्खिय सम्मत्त पुन्धगं दिढव्बद समारोहियं मे भवदु मे भवदु मे भवदु । अथ देवसिय पडिकमणाए सव्वा- इचारविसोहिणिमित्तं पुयायरीय कमेण आलोयण सिद्ध- भत्ति पडिक्कमणभत्ति णिछिदकरण वीरभत्ति चउवीस तित्थ- यरभत्ति कृत्वा तद्धीनाधिकत्वादिदोपपरिहारार्थ सकलदो- पनिराकरणार्थ सर्वमलातिचारविशुद्धयर्थ आत्मपवित्रीकर- णार्थ समाधिमक्तिकायोत्सर्ग करोमि ।। (णमोकार मंत्र वार २७ श्वासोच्छ्वासमें जाप्य ) अर्थ-हे मगवन् ! मैं समस्त दोषोंको दूर करनेके लिये - श्रावक-अतिक्रमण चौवीस तीर्थ करोंकी भक्तिरूप कायोत्सर्ग धारण करता हुआ अपने कृत कर्माको आलोचना करता हूँ। महान् पंच कल्याणकोले सुशोभित, भाट महा प्रातिहार्य सहित, चौतीस अतिशय सहित, बत्तीस प्रकारके देवेन्द्रोंके मस्त- कमें लगी हुई मणियोंसे पूज्य, वलभद्र-चामुदेव-बकरतो-रुद्र- ऋषि-मुनीश्वर-यतो-अनगार आदि महान् पुरुषों के शिरोवंद्य, देवेंद्रोंकर सतत वंदनीय पभदेवसे प्रारंभकर वीर भगवान पर्यत चौवीस तीर्थडुर महामंगलके करनेवाले हैं, पुण्य पुरुष है, उनकी मैं त्रिकाल बंदना करता है, स्तवन करता है, पूजा करता हूं,नमस्कार करता हूं। चौवीस भगवानको भक्तिसे दुःखोंका नाश हो, कर्माका नाश हो, रत्नत्रयको प्राप्ति हो, शुभ गति हो, समाधिमरण हो और श्री जिनेन्द्र देवके गुणों की प्राप्ति हो । दर्शनादि प्रतिमामे सर्न दोपोंको विशुद्धिके लिये पूर्ण आचा- यों को परिपाटोके अनुकूल अपने समस्त कृत कर्मों की आलोचना पूर्वक श्री सिद्ध प्रतिक्रमणभक्ति-चौरभक्ति और चौवीस ताशंकर भक्ति करनेपर विशेष दोपोको शुद्धिके लिये समाधि- भकि कायोत्सर्ग धारण करता हूँ। अरहंत, सिद्ध, आचार्य, उ- १-अशोक वृक्ष, पुष्पवृष्टि, दिव्यध्वनि, चामर, भामंडल,छन लय, सिंहासन और दुन्दुभि वाजोंका वजना ये आठ प्रतिहार्य हैं। २दश जन्म, दश केवलज्ञान और चौदह देवकृत इस प्रकार चौतीस अतिशय अरहंत भगवानके होते हैं।

श्रावक-अतिक्रमण AAPANA MARA -~-~ . पाध्याय और सन साधुझी साक्षी पूर्वक सम्यग्दर्शन सहित उत्तमोत्तम व्रतोंका समारोह मेरे हृदयमंदिरमें हो। ( वार णमोकार मंत्र २७ श्वासमे) शास्त्राभ्यासो जिनपतिनुतिः सगतिः सर्वदायः । सद्वृत्तानां गुणगणकथा दीपपादे च मौनम् ।। सर्वस्यापि प्रियहितवचो भावना चात्मतत्त्चे। सपद्यतां मम भवभवे यावदेतेऽपवर्गः ॥ १ ॥ अर्थ-जैनागम अथवा जिन सिद्धातका अभ्यास, श्री जिनेन्द्रदेव भगवानको भक्तिपूर्वक चंदना, सदाचारधारी जैन यति ब्रह्मचारो-ऐल्टक और विद्वान् महात्माओंका संग, थो जिनेन्द देव प्रभृति पुण्य पुरुषांको कथाका श्रवण, दूसरोंकी निंदाका त्याग, दूसरोंके तिररकारमे मीन, समस्त जीव मात्रमें प्रेम, हित मित वचन और आन्मभावना इतनो वरतुओंका समा- गम जव तक मोक्षको प्राप्ति न हो तब तक नित्य भव भवमे रहो तव पादौ मम हृदये मा हृदय तब पदद्वये लीनं । तिष्ठतु जिनेन्द्र ! तायद्यावनिर्माणसंप्राप्तिः ॥ अर्ज- है जिनेन्द्रदेव ! आपके पवित्र चरणकमल जब तक मुझे मोक्षको प्राप्ति न हो तब तक मेरे हृदय मंदिरमें. विराजमान रहो और मेरा हृदय आपके चरणकमलोंमे लीन रहे। अक्खरपयत्थहीण मचाहीणं च ज मए मणिय त खमणाणदेव य मज्झवि दुक्खक्खयं दितु ॥

श्रावफ-प्रतिक्रमण अर्थ-हे जिनशासन (जिनागम ) देव ! मैंने अक्षर माता रहित जो कुछ भशुद्ध उच्चारण किया हो, सो क्षमा करो और मेरे दुःखोंका नाश करो। दुक्खक्खर कम्मक्खउ चोहिलाहो मुगइगमणं । सम्म समाहिमरणं जिणगुणसंपत्ति होउ मज्झं । अर्थ-हे भगवन् ! मेरे दुश्वोंका नाश हो, कर्माका नाश हो, रत्नत्रयकी प्राप्ति हो, सुरगतिगमन हो, सम्यग्दर्शनको प्राप्ति हो, समाधिमरण हो और श्रोजिनराजके गुणोंको प्राप्ति हो ऐसी मेरी भावना है। इच्छ मि भंते इरियावहियस्स आलोचउ पुच्चुत्तर दक्षिण पश्चिम चदिसु विदिसासु विहरमाणेण जुगु- तरदिहिणा दहवा उत्रउवचरियाए पमाददोसेण पाण- मूद जीवसत्ताण उवधादो कदो वा कारिदो वा कीरतो वा समणुमणिदो तस्स मिच्छामि दुक्कडं ॥ (९ वार णमोकार मंत्रकी जाप और आवर्त चारों दिशामें एवं प्रणुत्ति)। पामप्पा बढमई परमेट्ठीण करोमि णवकारं । सगपरसिद्धिणिमित्त कल्लाणालोयणा वोच्छे ॥१॥ भावार्थ-अनंत ज्ञानके धारक श्री अरहंत भगवानको नम- स्कार करता हूँ। और जीवों के कल्याणार्थ मैं कल्याणलोचना कहता हूं। .

श्रावक-प्रतिक्रमण
६५
रे जीवा नभवे ससारे संमग्त बहुवार ।
पत्तो ण गोहिलाहो मिच्छत्तविजभय यडीहि ॥२॥
भावार्य-रे जीव ! मिथ्यात्यकर्मकी तीन प्रकृतियोंके उदय
से इस अनंत जन्म मरणरूपी संसारमे तूने अनंतवार परिभ्रमण
किया। परंतु अब तक तुझे रत्नलयकी प्राप्ति कभी नहीं हुई ॥२॥
संसार भमणगमणं कुणत्त आराहिओण जिणधम्मो ।
तेण विणा वर दुक्खं पत्तोसि अणंत वा ई ॥ ३ ॥
भावार्थ-इस संसारमें परिभ्रमण करते हुए तुने जिन धर्म-
का कभी नहीं पालन किया और उस सैनधर्मके आराधनाके विना
इस संसारमें तुझको अनंतवार महान दुःख प्राप्त हुए हैं ॥ ३ ॥
संसारे णिवसंत्ता अणंत मरणाइ पाविओसि तुम ।
केवलिण विणा तेति संखा पति णो हबई ।। ४ ।।
भावार्थ-इस संसारमें निवास करते हुए तू ने अनंतवार
मरण किये परंतु उस एक जैनधर्मके विना उन मरणोंको संख्या
पूरी नहीं हुई । अर्थात् जन्म मरण का अंत नहीं हुआ।
तिणिसया छनीसा छावहिसहस्सबार मरणाई।
अंतोमुडुत्तमझे पचोसि णिगोयमझ्झम्मि ॥ ५॥
भावार्थ-रे जोव ! तू ने निगोदमें अंतमुहूर्त कालमें छयासठ
हजार तीन सौ छत्तीसवार मरण किया ४८ मिनटमें ६६३३६ वार
जन्म मरणके दुखको प्राप्त हुआ ॥ ५॥

१२
श्रावक-प्रतिक्रमण
वियलिदिए असीदी सही चालीसमेव जाणेहि।
पचेदिय चवीस खुद्दभवतो मुहुत्तस्स ॥६॥
भावार्थ-हे जीव ! तू ने दो इन्द्रिय अवस्थामें उस अंत-
मुहूर्त कालके मध्य अस्ती ८० क्षुद्रभव धारण किये । ते
इन्द्रिय अवस्थामे ६० साठ क्ष इभव धारण किये । चौ इन्द्रिय
पर्यायमें ४० चालीस क्षुद्रभव धारण किये और पंचेन्द्रिय पर्याय
के २४ क्षद्रभव धारण किये। इस जीवने एक अंतर्मुहूर्त
कालमें ६६३३६ जन्म मरण किये इसका स्पष्टो कारण यह है
कि - एकेन्द्रियके ११ भेद हैं-एक ही जीव उन ११ भेदोंमें क्रम
से एक श्वासोच्छ्वासके समय १८ वार जन्म मरणको प्राप्त होता
है इसलिये एकेन्द्रियके प्रत्येक भेदमें ६०१२ जन्म मरणको प्राप्त
होता है। सव मिलाकर ६६१३२ भेद होते हैं। और दो
इन्द्रिय आदिके समुश्ति भेद २०४ को जोड़ देनेसे ६६३३६ मेह
होते हैं।
अण्णोण्ण खन्जता जीवा पावंति दारुणं दुक्ख ।
ण हु चेसिं वज्जची कहपावइ धम्ममह सुण्णो ।।७।।
भावार्थ-परस्पर एक दूसरेके साथ क्रोध करते हुये वे जीव
अत्यंत घोर दुःखको प्राप्त होते हैं। उनकी कभी पर्याप्ति ही
पूरी नहीं होती है। उनके धर्म बुद्धि नही है अतएव निरंतर
वे दुस्खके हो पात्र हैं। अनंतानंत जन्म मरणके दुःखोंको सहन
करते हैं ॥७॥

श्रावक-प्रतिक्रमण
६३
Ju-
मायायिया कुडयो सुजणजण कोवि णाई सन्थे ।
एगागी भमई सदा णहि वीओ अस्थि संसारे ।। ८॥
भावार्थ-इस भयानक संसारमें परिभ्रमण करते हुए जीवके
साथ माता पिता कुटुंबके लोग तथा परिवारके लोगोंमेंसे एक
भी अपने साथ नही जाता है। यह जीव सदैव अकेला हो
परिभ्रमण करता है और अपने किये पाप कमौके फलसे जन्म
मरणके महान दारुण दुखोंको प्राप्त होता है । परन्तु इसका
साथी कोई नहीं होता है।
आउलए विएशेण समत्थो कोवि आउदाणे य ।
देवेंदो ण णरेंदो मणिओसह यतजालाई ॥९॥
भावार्थ-जव आयुका अन्त आता है । आयु पूरी हो
जाती है तब कोई भी उस आयुको नहीं बढ़ा सकता है । न
इन्द्र वढ़ा सकता है, न चक्रवती वढा सकता है और न मणि
औषधो वा यंत्र तंत्र भाटि। कोई भी किसी प्रकारसे आयुको
नहीं बढा सकते हैं।
संपडि जिणारधम्मो लद्धोसि तुमं विसुद्ध जोएण।
खमसु जीवा सव्वे पो समये पयरेण ॥१०॥
भावार्थ-रे जीव । इस समय महान पुण्योदयसे मन
वचन कायके योगोंकी विशुद्धिसे तुझे इस जैनधर्मकी प्राप्ति हुई
है। इसलिये वडे प्रयत्नके साथ प्रत्येक समयमें तू समस्त जीवों
को क्षमाकर विशुद्ध भावसे दया पालन कर ॥ १० ॥

श्रावक-प्रतिक्रमण
तिण्णिसया तेसहि मिच्छाता सणस्स पडिबक्खा।
अण्णाणे सद्दहिया मिच्छाये दुक्कडं हुन्ना ॥ ११ ॥
भावाथ-आत्माधर्मका प्रतिपक्षी मिध्यात्त्व है । मिथ्या-
त्वके ३६३ तीन सौ तिरेसठ मेद हैं। यदि उनका मैंने अपने
अज्ञानसे श्रद्धान किया हो तो वे सब मेरे पाप मिथ्या हो। संसार
में सबसे भयंकर पाप एक मिथ्यात्व हो है। संसारके परिभ्र-
मणका मूल कारण भी एक मिथ्यात्व ही है। इसलिये आम-
हितेच्छु भव्य जीवोंको सवले प्रथम मिथ्यात्वका परित्यागकर
भाव विशुद्धसे दूढ श्रद्धान पूर्वक सम्यग्दर्शन धारण कर चा-
हिये और अज्ञानसे जो मिथ्यात्व भाव हुए हों उनसे वह कर्मा की
निर्जरा होनेके लिये भावना करना चाहिये और भविष्यमें
मिथ्यात्व भाव नहीं हो इस प्रकारकी भावना करनी चाहिये।
महुमुज्जमंसजुआपमिदीवसणइ सत्तमेयाई ।
णियमो ण कयं च तेसिं मिच्छाये दुक्कडं हुज्जा ॥१२॥
भावार्थ--मद्य-मधुमांसका सेवन और जुआको आदि लेक
जो सात व्यसन है उनके परित्यागका नियम कदाचित् मैंने न
किया हो तो वह सब पाप मेरा मिथ्या हो। सप्त व्यसनोंका
सेवन जन्म मरण रूप संसारको वढानेवाला है। सर्व प्रकारके
पवित्नाचरणोंसे सप्त व्यसनोंका परित्याग करना चाहिये।
अणुन्वय महन्यया जे जमणियमासीलसाहुगुरुदिण्णा।
जे जे विराहिदा खलु मिच्छा ये दुकड हुज्ज ॥१३॥

श्रावक-प्रतिक्रमण भावार्ण-साधु परमेष्ठी अथवा भाचार्य परमेष्ठी आदि (गृहस्थाचार्य) पूज्य पुरुषोंने मेरे हितके लिये अणुनत महा- व्रत और समगील नियम अथवा यमरूपसे दिये हों और उनमें से जिन जिन व्रतोंको विराधना दुई हो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो णिच्चिदरधादुसत्तय तरुदमवियलेंदिए छच्चे। सुरणरयतिरिय चउरो चउदममणुए सदसहस्मा ॥१४॥ एदे सम्ये जीवा चउरासी लक्सजाणिवासियत्ता। जे जे विराहिया खलु मिन्छा मे दुबाड हुज्जा ॥ १५ ॥ भावार्थ-नित्य निगोटके जीवोंको सात लाख योनि, इतर निगोदके जोगोंकी सात लाग्न योनि, पृथ्य कायिक जीवोंको सात लाख योनि, जल कारिक जीवोंको सात लाख योनि अग्निकायिक जीयोंकी सात लाख योनि, वायु कायिक जीवों- को सात लाख योनि, दो इन्द्रिय जीवोंको दो लाख, तन इन्द्रिय जीवोंकी दो लाय, चोइन्द्रिय जीवोंकी दो लाए योनि देवोंकी चार लाख योनि नारको जीवोंको चार लाख योनि पंचे- न्द्रिय तिर्गचौकी चार लाख योनि और मनुष्योंकी दस लाख योनि इस प्रकार समस्त संसागे जीवोंकी योनि चौरासी लाख हैं। इन चौरासी लाग्य योनिमें उत्पन्न हुए जिन जिन जीवों- को विराधना मेरेसे हुई हो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो । पुढवीजलग्गिवाओ तेओवि वणप्फई य वियलतया । जे जे विरहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज ।। १६ ॥

:३६ श्रावक-प्रतिक्रमण भावार्थ-पृथ्वीकायिक जीव जलकायिक जीव अग्निको- -यिकजीव वायुकायिकजीव वनस्पतिकायिकजीव और विकल. नय-(दो इन्द्रिय तीन इन्द्रिय चार इन्द्रिय ) जीचोंकी जो जो विरोधना मुझसे हुई हो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो ।। १६ ॥ मल सत्तरा जिणुत्ता वयवि उये जा विराहणा विवहा । सामाइय खमइया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज ॥१७॥ भावार्थ- श्री भगवान जिनेन्द्र देवने व्रतोंके यतोचार (मल) सत्तर बतलाये है। उनमें से जो जो अतीचार मुझसे लगे हों या मुझसे व्रतकी ही विराधना हो गई हो अथवा सामा- यिक और क्षमा भावोंमे विराधना हो गई हो तत्संबंधी जो पाप मुझसे हुआ है वह सव मेरा पाप मिथ्या हो॥१७॥ फलफुल्लछल्लिवल्लि अणगल हाणं च धोवणाईहिं । जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज ॥ १८॥ भ वार्थ - फल पुष्प छाल लता आदिको कार्यमें लानेसे “जिन जिन जीवोंकी विराधना हुई हो, विना छाने पानीसे स्नानादि करनेसे जीवोंकी विराधना हुई हो । विना छने जल से वस्त्रादि धोने में जिन जीवोंको विराधना हुई हो । इत्यादि “अनेक प्रकारसे जलके जीवोंकी विराधना हुई हो वह मेरा सब पाप मिथ्या हो ॥१८॥ णो सील व खमा विणाओ तबोण संजमोवासा। ण कया ण भाविकया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ।। १९॥

थावक-प्रतिक्रमण
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भावार्थ-हे भगवन् ! मैंने जो शील पालन नहीं किया हो,
समा भाव न धारण किये हों, देव शास्त्र गुरु और धर्मायतनों-
की विनय नहीं की हो, सयम पालन नहीं किया हो और उप-
वास आदि तपश्चरण नहीं किये हों तथा उनके धारण करने-
को भावना भी नहीं की हो तत्संबंधी वह सव मेरा पाय
मिथ्या हो।
कंदफलमूलवीया सचित्तरयणीय भोयणाहारा ।
अण्णाणे जे विक्रया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥२०॥
भावार्थ-हे भगवान् ! यदि मैंने अपने अज्ञानसे कंद
मूल, फल, वीज आदि खाये हों अन्य सचित्त पदार्थोंका भक्षण
किया हो इत्यादिक पापारंभ किया हो, जो जो पाप मैंने किया
हो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो ॥२०॥
णो पूया जिणचरणे ण पत्तदाणं ण चेइयागमण |
ण कया ण भाविय मये मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥२१॥
भावार्थ- मैंने श्रोजिनेन्द्र भगवानके पवित्र चरणकमलों-
की पूजा न. की पात्रमें दान नहीं दिया और न इयांपथ
पूर्वक गमनागमन ही किया तथा न इन पवित्र कार्योंके करनेको
भावना ही की इस प्रकार जो पाप मुझसे लगे हों चे सव मेरे
पाप मिथ्या हो ॥२॥
भारमपरिग्गह सावज्जा बहुपमाददोसेण ।
जीवा विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्न ॥२२॥

'श्रावक-प्रतिक्रमण भावार्थ-हे भगवन् ! मैंने अपने प्रमादके दीपसे ब्रह्मचर्या- में दोष लगाये हों, बहुत आरंभ तथा वहुत परिग्रहके संचय फरने में अत्यधिक पाप किया हो, जीवोंको विराधना को हो और सावध कार्यों के करनेसे जिन जीवोंकी विराधना की ही वे सब मेरे पाप मिथ्या हो ॥२२॥ सत्तस्सिखित्तभवा तीदाणागय सुक्ट्ठमाणजिणा। जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥२३॥ भावार्थ-हे प्रभो! एक सौ सत्तर (१७०) कर्मभूमियोंमे होनेवाले भूत भविष्यत् वर्तमान काल संबंधो श्री तीर्थंकर 'परम देवाधिदेवोंकी जो विराधना की दो उनका जो अनादर किया हो अथवा अश्रद्धाके भाव प्रकट किये हों तत्संबंधो मेरा समस्त पाप मिथ्या हो ॥ २३ ॥ . अरुहा सिद्धा इरिया उवज्झाया साहु पंचपरमेट्ठी। | जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥२४॥ भावार्थ-भगवान् श्री अरहंत परमेष्ठी, श्री सिद्ध परमेष्ठी, 'श्री आचार्य परमेष्ठी, श्री उपाध्याय परमेष्ठी तथा सर्वसाधु 'परमेष्ठी की जो जो विराधना मुझसे हुई हो जो अविनय हुआ 'हो पंच परमेष्ठीकी पवित्र आशा भंग हुई हो अथवा अश्रद्धा की हो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो ।२४॥ जिणवयण धम्मचेश्य जिणमडिया किहिमा अकिट्टिमया। जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥२५॥ J

थापक-प्रतिक्रमण
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भावार्थ-हे भगवन् ! मैंने जनवचन, जिनधर्म, जिनचैत्य,
जिनालय और कृत्रिम अकृत्रिम जिन प्रतिमाओंकी जो विराधना
की हो, आमा भंग की हो, अविनय और आसादना किया हो
तो वह सब मेरा पाप मिथ्या हो ॥२५॥
दसणणाणचरित्ते दोसा अहह पच भेयाई ।
जे जे विराहिया खलु मिच्छा से दुक्कडं हुज्ज ॥२६॥
भावार्थ-सम्यग्दर्शनके आठ शंकादिक दोप है। सम्य-
ज्ञानके आठ दोष हैं और सम्यक्चारित्रके पांच ढोप हैं। उन
समस्त टोपोंमेंसे जो जो दोप मुझ लगे हों वह सब मेरा पाप
मिथ्या हो ।२६॥
-
महसुहओही मणवजयं तहा केवल च पचमयं ।
जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कड हुज्ज ॥२७॥
भावार्थ-हे भगवान् ! मैंने मतिज्ञग्न श्रुतज्ञान अवधि-
शान मनःपर्यायशान और केवलज्ञान इन पांच प्रकारके शानों-
मेंसे जिस किसी ज्ञानकी विराधना की हो-आसादना की हो
तत्संबंधी वह सब मेरा पाप मिथ्या हो ॥२५॥
आयारादी अगा पुन्च पदण्णा जिणेहि पण्णाचा ।
जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुकड हुज्ज ॥२८॥
भावार्थ-हे भगवान् ! श्रुतज्ञान ( समयदेवता ) के
ग्यारह अंग और चौदह पूर्ण श्री जिनेन्द्र भगवान्ने बतलाये
हैं। उनके स्वरूपमें जो जो विराधना मैने को हो तत्संबंधी
वह समस्त मेर, पाप मिथ्या हो ॥२८॥

१००
श्रावक-प्रतिक्रमण
-
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पंचमहाब्धयजुत्ता अहादस सहम्स सीलकयसोभा ।
जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥२९॥
भावार्थ- हे भगवन् ! पांच प्रकारके महाव्रतोंसे भले
प्रकार सुशोभित और अठारह हजार शीलवतसे विभूपित ऐसे
श्रोजिनेन्द्र भगवान्को मैंने जो विराधना की हो, उनका अवि-
नय किया हो, अश्रद्धाके भाव प्रगट किये हों तो तत्संबंधी वह
मेरा सव पाप मिथ्या हो ॥२६॥
लोए पिया समाणा रिद्धिपवण्णा महागण वइया ।
जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुकडं हुज्ज ॥३०॥
भावार्थ-हे आत्मन् ! तूने इस संसार में अनेक सिद्धियों
के धारक सर्वोत्कृष्ट महिमाको प्राप्त और जगतके पिताके
समान गणधर देवोंकी जो जो विराधना की हो तत्संबंधी
वह सब मेरा पाप मिथ्या हो ॥३०॥
णिग्गंथ अज्जिया ओ सडासढीय च चउविहो संघो।
जे जे विराहिया खल मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥३१॥
भावार्थ--है भगवन् ! मैंने परम दिगंवर निनथ मुनि
आर्यिका श्रावक और श्राविका इस प्रकार चार प्रकारके संघको
विराधना की हो, अविनय प्रकट किया हो, मिथ्याभाव प्रकट
किया हो तो तत्संबंधी वह मेरा सब पाप मिथ्या हो ॥३२॥
देवासुरामणुस्सा णेरड्या तिरियजोणिगयजीवा ।
जे जे विराहिया खलु मिच्छा मे दुक्कडं दुज्ज ॥३२॥

श्रावक-प्रतिक्रमण - भावाय हे भगवान् ! मैंने भवनवासो व्यन्तर ज्योतिष और कल्पवासी इस प्रकारके देवोंकी विराधना की हो असत दूषण लगाये हों। मनुष्य तिर्णच और नारकी जीवोंकी विरा- धना की हो तो तत्संवन्धी वह मेरा सब पाप मिथ्या हो ॥३२॥ कोहो माणो माया लोहो एदेय रायदोसाइ। अण्णाणे जे वि कथा मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ॥३३॥ भावार्थ हे भगवन् ! मैंने अपने प्रधानभावसे जो क्रोध मान, माया, लोभ, राग, द्वेप और कामादिक जो दुर्भाव किये हों अथवा अनानसे क्रोधादिक निंद्य कार्य किये हों तो तत्सं- बंधी वह मेरा समस्त पाप मिथ्या हो ॥३३॥ परवत्थ परमहिला पमादनोएण अज्झियं पावं । अण्णात्रि अकरणीया मिच्छा मे दुक्कडं हुज्ज ||३४|| भावार्थ-परवस्त्र और परस्त्री आदिके संबंधसे प्रमादयोग पूर्वक जो पाप मैंने किये हों अथवा जो जो नहीं करने योग्य कार्य किये हों वे सब मेरा पाप मिथ्या हो ॥३४॥ इको सहारसिद्धो सोह अप्पा वियप्प परिमुक्को। अण्णोण मज्झ सरणं सरणं सो एक परमप्पा ॥३५॥ भावार्थ-जो आत्मा एक है। शरीरादिक नोकर्म, द्रव्य- कर्म और भावकर्मसे रहित है। स्वभावसे स्वयं सिद्ध है और सर्व प्रकारके विकल्पोंसे रहित है । ऐसे एक आत्माकी हो मैं शरण जाता है। ऐसे परमात्माके सिवाय अन्य कोई भी मेरे लिये शरण नहीं है ॥३५॥ ::

૨.૦૨
श्रावक-अतिक्रमण
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अरम अरूप अगंधो अवावाहो अणंत णाणमओ।
अण्णो ण मज्झ मरणं सरणं सो एक्कपरमप्पा ॥३६॥
भावार्थ-जो परमात्मा रस रहित है। रूप रहित है ।
गंध रहित है। पुद्गलीक जड़ पदार्थो के गुणधर्मों से सर्नया
रहित है सब प्रकारकी वाधासे रहित है और अनंतज्ञान स्वरूप
है। ऐसा एक परमात्मा ही मुझ शरण है । अन्य कोई भी
शरण नहीं है ॥६॥
णेयपमाणं णाणं समए इक्केण हुँति ससहाये ।
अण्णो ण माझ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥३७॥
भावार्थ--परमात्माका यह अनन्तज्ञान यद्यपि अपने
स्वभावमे ही स्थिर रहता है तथापि वह प्रत्येक समयमें
समस्त ज्ञेय पदार्थोको जानता रहता है अर्थात् परमात्माको
ज्ञान आत्माके प्रदेशोंमें प्रतिष्टित होनेपर भो समस्त ज्ञेय
पदार्थों में व्यापक है-सवको प्रत्यक्ष करनेवाला है। ऐसा परमात्मा
ही मुझ शरण है। अन्य कोई भी मुझ शरण नहीं है ॥३७॥
एयाणेय वियप्पप्पसाहणेसयसहावसुद्धगई।
। अण्णो ण मज झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा॥३८॥
भावार्थ-उस परमात्माको चाहे एक प्रकारसे सिद्ध किया
जाय चाहे अनेक प्रकारसे सिद्ध किया जाय वह सदा अपने ही
स्वभावमें शुद्ध बुद्ध स्वरूप स्थित रहता है । ऐसा परमात्मा
हो मुझे एक शरणभूत है, अन्य कोई भी मुझे शरणभूत
नहीं है ॥३॥

श्रावक-प्रतिफमण
१०.
44
देहपमाणो णिच्चो लोयपमाणो विधम्मदो होदि।
अण्णो ण मज्द सम्ण सरण सो एक्क परमप्पा ॥३९॥
भावार्थ-यह परमात्मा नित्य है। शरीर प्रमाणके वरा-
र और प्रदेशोंक द्वारा लोक प्रमाण है। केवल समुद्वावमें
मात्मा समस्त लोकके प्रमाण असंख्यात प्रदेशी सर्वगत होता
। इसलिये याद आत्मा प्रदेशों की अपेक्षा भी लोक प्रमाण
है। पद परमात्मा ही मुझक शरणभूत है अन्य कोई भी
शरण नहीं है ॥३॥
केवलदसणणाणं मपये इक्केण दुण्णि उवओगी।
अण्णो ण मन्द मरणं सरणं सो एक्क परमप्या ॥४०॥
भावार्य-उस परमात्माके फेवलदर्शन और केवलशान
इस प्रकार दोनों ही उपयोग एक समयमें एक साथ होते हैं ।
भऔर ये दोनों उपयोग धनंतकाल पर्यन्त एक साथ ही पदा-
योंके स्वम्पको व्यक्त करते रहते हैं। ऐसा परमात्मा हो मुझे
गरणभूत है ॥४०॥
सगस्न सहजसिद्धो बिहावगुणमुक्ककम्मवावारो।
अण्णो ण मज्झमरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४१॥
मावाण-पद परमात्मा अपने स्वाभाविक स्वरूपमें हो.
लोन रहता है। स्वाभाविक स्वभावसे ही सिद्ध है और राग
हेपादिक भाविक गुणोंसे रहित होनेके कारण समस्त फाँके
व्यापारमे रहित हैं। ऐसे वे परमात्मा ही मुझे शरण
उसके सिवाय अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है ॥४१॥

१०४ श्रावक-प्रतिक्रमण सुण्णोणेय असुण्णो णोकम्मो कम्मवज्जिओ णाणं । अण्णो ण मन्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४२॥ भावार्थ-वह परमात्मा रूप रस गंध स्पर्श रहित होनेके कारण शून्य है तथा ज्ञानमय आत्मम्वरूप होनेके कारण शून्यरूप भी नहीं है । उस परमात्माका ज्ञान नोकर्मोंसे भी रहित है ऐसा वह परमात्मा मुझे शरण है शानावरण आदि काँसे भी रहित है अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है ॥४२॥ णाणउ जो ण मिण्णो वियप्पभिण्णो सहावसुक्खमओ। अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४३॥ भावार्थ-जो परमात्मा अपने केवल ज्ञानसे कभी भिन्न नहीं है परन्तु सव प्रकारके विकल्पोंसे सनथा सदा भिन्न ही है । वह परमात्मा अपने स्वाभाविक सुखमय है ऐसा परमात्मा ही मुझे शरण भूत है अन्य कोई भी शरण नहीं है ॥४॥ अच्छिष्णो वच्छिण्णो पमेय रूवत्त गुरुलहू चेव । अण्णो ण मज्झ सरणं सरणं सो एक्क परमप्पा ॥४४॥ भावार्थ-जो कभी किसी प्रकार छिन्न भिन्न नहीं होता है जो सदैव अखंड स्वरूप है। तथा अवछिन्न है। अंतिम शरीरके प्रमाणके समान है अथवा असंख्यात प्रदेशमय है । जोशानके द्वारा समस्त पदार्थोके समान है। समस्त पदार्थों का भाता है। जो मगुरुलघुगुणसे सुशोभित है। ऐसा पर- मात्मा ही मुझ शरणभूत है। अन्य कोई शरण नहीं है ॥en- श्रोचक-प्रतिममण सुहुअसुहपावविगयो सुहमहा वेण तम्मय पत्तो। अण्णो ण मज्म मरण सरणं मो एक्क परममा ॥४५॥ भावार्थ---जो परमात्मा शुभभाव और अशुभभाव दोनों से रहित है। जो केवल शुद्धस्वभावके द्वारा अपनो आत्मा हो में तल्लीन है। अथवा जो अपने फेवल शुद्धस्वभावमें ही प्रतिष्टित है। ऐसा परमात्मा ही मुझे भरणभूत है अन्य कोई भी मुझे शरण नहीं है ॥५॥ णो इत्यो णो णउसो णो पुमो णे पुण्ण पावमओ। अग्णो ण मज्झ सरणं सरण सो एक्क परगप्पा ॥४६॥ भावार्थ-जो परमा मा न तो खो स्वरूप है। न नपुं- सक स्वरूप है। न पुरुप स्वरूप है । न पुण्यस्वरूप है न पापमप है। न किया है न अक्रिय है । वह परमात्मा अपने स्वभायमें ही सुस्थित है । वही परमात्मा मुझ शरण है अन्य कोई भी गरण नहीं है ॥४६॥ ते कोण होदि सुयणोतं कस्स बंधवो ण सुयणो वा । अप्पा हवेइ अप्पा एगागी जाणगो सुद्धो ॥४७॥ भावार्थ हे आत्मन् ! तेरा इस संसारमें कोई भी सगा संबंधी कुटुंवी नहीं है । तथा तू भी किसीका सगा संबंधी कुटंबी नहीं है । यह आत्मा सदैव अपने आत्मस्वरूप ही है, सुस्थिर है अकेला है समस्त पदार्थाका प्राता है सदैव शुद्ध अनंत सुखमय है ॥४७॥ P श्रावक-प्रतिक्रमण जिणदेवो होउ सयामई सु जिणसासणे सया होउ । सण्णासेण य मरणं भवे भवे मज्झ संपदओ ॥१८॥ भावार्थ-मैं श्री जिनेन्द्रदेवको ही सदा सेवा करता रहूं। श्री जिनेन्द्र देवके सिवाय अन्य किसी देवको न मानूं। मेरी बुद्धि सदा श्रीजिनशासनके सेवन करनेमें तल्लीन रहे। जैनधर्मको श्रद्धा-भक्ति और सेवामें मेरी बुद्धि रहे। जिनवर्ग- को छोड़कर अन्य किसी भी धर्ममें मेरी बुद्धि न जाय । मेरा मरण सदा समाधिपूर्णक हो हो । समाधिमरणके सिवाय अन्य मरण नहीं हो। यह सम्पत्ति मुझ भव भवमें प्राप्त हो । जिणो देवो जिणो देवो जिणो देवो जिणोजिणो। दयाधम्मो दयाधम्मो दयाधम्मो दयासया ॥४९॥ भावार्थ-इस संसारमे सच्चे देव पक जिन ही हैं, देव एक जिन ही है। देव एक जिन हो हैं। भगवान् श्री जिनेन्द्र देव-श्री अरहंत देव ही देव हैं। अन्य कोई भी देव नहीं है। धर्म दयारूप ही है। धर्म दयामयी हो है । धर्म दया ही है। धर्म सदा दयामय ही होता है । दया धसके सिवाय अन्य कोई भी धर्म नहीं है और न हो सक्ता है महासांहूं महासाहू महासाहू दिगंबरा। एव तच्च सदाहुज्ज जाव णो मुतिसगमो ॥५०॥ . भावार्थ-महासाधु नग्न दिगंवर महर्षि ही होते हैं । महा साधु दिगंबर जैन मुनीश्वर ही होते हैं । महासाधु दिगंवर ही । . .

श्रावक-प्रतिक्रमण १०७ होते हैं अन्य कोई भी महासाधु नहीं है । हे प्रभो! जवतक मुझ मोक्षकी प्राप्ति न हो तब तक मेरे हृदय में यही अटल श्रद्धान और यही तत्व दृढतासे बना रहे अर्थात् मोक्षकी प्राप्ति पर्यन्त सत्यदेव सत्यगुरु सत्यधर्मको श्रद्धा अविचलभावसे निरन्तर बनी रहे 1 एवमेव गओ कालो अणतो दुक्खसगमो। जिणोवदिह सण्णासेण यत्तारोहणा कया ॥५॥ भावार्थ-हे प्रभो! आज तक मेरा अनंतकाल संसारके दारुण दुःखको भोगते हुप हो व्यर्थ व्यतीत होगया।मैंने अब तक श्री श्रीजिनेन्द्र देव भगवान के द्वारा कहे हुये समाधिमरणके लिये कभी भी प्रयत नहीं किया। अव मेरा मरण हो तो समा- धिमरण पूर्णक ही हो ऐसो मेरो दृढ़ भावना भव भवमें निरन्तर बनी रहे। संपद एव संपत्ता दाहणा जिणदेसिया। कि कि ण जायदे मज्म सिद्धिसंदोहसंपई ॥५२॥ भावार्थ--हे प्रभो ! महान् पुण्योदयसे इस समय मुझे श्री जिनेन्द्रदेव भगवानकी कही हुई आराधना प्राप्त हुई हैं। इनके प्राप्त हो जानेसे इस संसार में ऐसी कौनसी सिद्धी और संपत्ति है जो मुझे प्राप्त नहीं हो। इन आराधनाओं के प्रभावसे समस्त प्रकारकी सिद्धियां स्वयमेव अवश्य ही प्राप्त हो जायगों उसमें किसी प्रकारका संदेह नहीं है।

श्रावक-प्रतिक्रमण, - . । अहो धम्म अहो धम्म अहो मे लन्धि णिम्मला। F. संजादा संपया सारा जेण सुक्खमणूपम ॥५॥ भावार्थ--यह श्री जिनेन्द्रदेवका कहा हुआ दया धर्म बड़ा ही आश्चर्यकारक है। तथा यह सबसे उत्कृष्ट है सर्वोसम है और यह मुझो प्राप्त हुई अत्यन्त निर्मल काललब्धि भी अतिशय आश्चर्या उत्पन्न करनेवाली है। इस निर्मल काललब्धि और जिनके प्रसादसे मुझे आराधना रूप सर्वोत्तम संपत्ति प्राप्त हुई है। इस आराधनारूप महा संपत्तिसे ही उपमा रहित मोक्ष- सुख अवश्य ही प्राप्त होगा। एव आराहतो आलोयणा बंदण पडिक्कमणं । पाइब फलय तेसि णिद्दि अजिय बम्मेण ॥५४॥ भावार्थ-इस प्रकार आलोचना वंदना और प्रतिक्रमणको आराधना करनेसे भगवान् श्री जिनेन्द्रदेवको कही हुई मोक्ष अवश्य प्राप्त होती है। यह आलोचनाका स्वरूप अति संक्षेपमें देशयति "अजित" ब्रह्मचारीन मनोश रूपसे कहा है।

- - श्रावक-प्रतिक्रमण १०६ अथ मिच्छामि दुक्कडम्। प्रणमु श्री अरिहंतने, भजु सरस्पति भावे, जीव अनंता में बहु हण्या, कहेना पार न आवे'। ते मुज मिच्छामि दुक्कडम्, अरिहंतनी साख ॥ १॥ के मे जीव विराधीआ, चोर्याशी लाख ! सार संभाल नहिं करी, कीधा छे बहु घात ते मुजः ॥२॥ इतर नित्य निगोदना, सात सातज लाख । सात लाख पृथ्वी तणा, सात अपज काय ॥ ते मुज० ॥३॥ दश लाख वनस्पति, प्रत्यक्ष साधारण । सात लाख तेज कायना, सात वायुज जाण ॥ ते मु० ॥४॥ वे ती चौ इन्द्रि जीवना, बवे लाख विख्यात । देव, पशु बली नवरा, चार चार च्यात ॥ ने मुज० ॥५॥ चौद लाख मनुप गतिए, लक्ष चोर्याशी गणीया। कृत कारित अनुमोदना, मन बच कायथी हणीया॥ते सुन्न एणी पेरे परमवे में कर्या, कयाँ पाप अनत । त्रिविध त्रिविध करी हुँ भन्यो, दुग्गति दातार ते मुज०॥७॥ हिंसा करी में जीवनी, बोल्यो जुठा-पोल | दोष अदत्ता दानसुं, मैथुन हणमाद ॥ ते मुज० ॥८॥ परिग्रह मेलव्यो कारमो, कीधोक्रोध विशेष। मान माया लोम में कर्या, वली राग ने द्वेष ते सुजला| - श्रावक-अतिक्रमण चाडी करी में चोतरे, वेर झेर बधायां । कुगुरु, देव कुधर्मने, करी प्रतीतने पालया। ते मुज०॥१०॥ क्रोध करी जीव दुखव्या, कीधा कुडां कलंक। निंदा करी में पारकी, रात दिवस बसत ॥ ते मुज० ॥११॥ खाटकीना भवर्म कर्या, जीवना वध कीध । वाधरीने भव चरकली, मारी कंई अगणीत ते मुज०॥१२॥ माछीने भवे माछलां, झाली जल थकी कादयां । प्रपच करी भवे पारधी, मृग मारीन पाड्यां ॥ते मुंज०॥१३॥ काजी मुल्लांने भवे, पढी मंत्र कठोर । जीव अनंताजे में कर्या, पाप लाग्यां अघोर ते मुज०॥१४॥ कोटवाल नो भव में कों, कर्या आकरा दंड । बंधीवान मरावीया, पाख्या कोरडा अंग ते मुज०॥१५॥ कुंभारनो भव में कर्यो, मार्या भट्टीने तापे । तेली भवे तल पीलीया, पेट भरीयु में पापे ॥ते मुज०॥१६॥ परमाधामीने भवे, दीयां नारकी दुःख । छेदन भेदन वेदना, लेश दीधुं न सुख ॥ते सुज०॥१७॥ खेड्डु भवेहल खेडीयां, फोड्यां पृथ्विनां पेट । आदु सुरण घणां कां, खधां खूब चपेट ॥ते मुज०॥१८॥ मालीने भवे रोपीयां, नानाविधि वृक्ष । मूल पात्र फल फूलना, पाप लाग्यांए लक्ष ते मुज०॥१९॥ वणशारानो भव में कर्यो, भर्यो अधिक भार । पोथी पुठे कीडा पड्या, नहि दया लगार ते मुज०॥२०॥ , श्रावक-प्रतिममण पाने मवे छेतो, कीया रंगना पास । अग्नि जल वीधाघणां, जीव परुभ्या छ सास ते मुज०॥२१॥ सुरपणे रण सुजता, मार्या माणस वृन्द । मदिरा मांस मधु भख्या, साधां मूल ने कंद ।।ते मुज०॥२२॥ खाण सोदावी में अति घणी, तेना पाणी उलेच्यां। आरंभ कीधा अति घणा, नहीं पापज पेख्यां ॥ते मुज०॥२३॥ अघोर कर्म का वली, वनमा दव दीघो। जीव अनंताने भरथीने, नहि कर्मथी बीधो; ते मुज०॥२४॥ भाडभुंजानो भव में कर्यो, मार्या भडीमांजीव, । जुवार चणा बहु सेकीया, पडता अति बुंदा ते मुज० ॥२५॥ बिल्ली भवे ऊंदर हण्या, गरोलीए अंतारी, | मूढता थकी, में जुलीख मारी; ते मुज० ॥२६॥ सुवावड दूपण घणा, आणी गर्भ गलाव्या,। जीव अणी विध्या घणा, भांग्या शीयलवत ते मुज० ॥२७॥ लुहारनो भव में कर्यो, घडयां शस्त्र अनेक,। कोस कुहाडा ने पावडा, मार्या मुकी विवेक ते मुज० ॥२८॥ सुतारनो भव में कार्यों, लीला वृक्ष वढाव्यां, । 'आवल बावल बोरडी, झाझा मृल कपाव्यां ते मुज० ॥२९॥ ह.थीना मव' में कर्या, जीव पुंछ पछाडया, । पंखी माला तोडीया, सुंढे कईकने झाडथा; ते मुज ॥३०॥ कडीआना भव में कार्या, कुवा वाव खोदाच्या, टांका में पधावीआ जीव अनत कपाच्या ते मुज० ॥३१॥ मनुष्य भवे २१२ धावक-प्रतिक्रमण . धोबीना भव में कर्या, जलना जीच मारथा,। धूलवते कईक ढांकीया, दान देता वार्या; ते मुज० ॥३२॥ गुज्जरना भवमें कर्या, लीला भारा वढान्या, पाडा वल ने ऊंटना, नाक छेदी बीधान्या; ते मुज० ॥३३॥ चणिकना भव में कर्या, कुडां पापज कीधां, । ओछु भापी अदकुं लीधु, तेना दोपन लीधा; ते मुज० ॥३४ विकथा चोरी करी वली, सेव्या पंच प्रमाद, । इष्ट वियोग पडावीया. रुदन विखवाद; ते मुज० १३५|| राधण पीसण, एवा आरंभ अनेक, । राधण बालक इंधणा, पाप लाग्या विशेष ते मुज० ॥३६॥ साधुने श्रावक तणा, व्रत लाईने भांग्या, । मूल अने उत्तरतणां, मुझ दोपज लाग्या; ते मुज० ॥ ३७ ।। वींछु सिंह ने चीतरा, गीध स्यालनो समडी,,। ए हिंसक तणे भवे, हिंसा कीधी में अदकी; ते मुज० ॥३८ एणी परेभवे, में कर्या, बांध्यो कर्म अनंत,। विविध त्रिविध करी ओचलं, करुं जनम पवित्र ते मु०१३९ राग वेसाडी जे भणे, गाय ढाल सहित, नरुन्द्रकीर्ति कहे तेहना, छुटे पास त्वरित ते मुज ॥४०॥ इति मिच्छामि दुक्कडं सम्पूर्ण। समाप्त ॐ

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Shrawak - Pratikraman

Author
Shastri, Nandanlal
Title
Shrawak - Pratikraman
File name
Shrawak - Pratikraman
Text
OCR done
Citation
1935
Published
2009/11
Publisher
Calcutta, Jain Siddhantprakashak Press
Language
Sanskrit
Pages
118
Library
Sanmati Library
Classification
Jain sahitya
DLI number
344310
Barcode
99999990234182.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
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