Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Kaivalya Shastar�
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ॐराम
कैवल्य शास्त्र
ज्याला प्रसाद सिहल, एम० ए०
जगरपद भेगेदाा सेटिया
जैन प्रधालय
र, (राजपुतान)
सत् शान प्रकाशक मन्दिर,
मामू भाजा, अलीगढ सिटी, युक प्रदेश ।
कापी राइट लेखक के नाम १९२३ के० पी० दर के प्रबन्ध से इलाहाबाद ला जरनल प्रेस, इलाहाबाद में छपा।
प्रस्तावना पुस्तक कीभावश्यकता उसके पढ़ने से ही प्रत्यक्ष होजायगी। मेरी लेखनी को प्राप्त हो देव-नागरी भाषा लज्जित ही होसकती थी। भगवान की कृपा से श्रीयुत सूर्यकान्त शास्त्री, व्याकरणतीर्थ ने उसे इतने कष्ट से तो बचा लिया, परन्तु फिरभी मेरे गवारपन को वह कहाँ तक ठीक करते । अतएव सम्भव है कि अब भी अनेक त्रुटिया रहगई हों। उन के लिये केवल यही प्रार्थना कर सफता हू कि सुहृदय पाठक कृपा पूर्वक मुस्करा कर उन भूलों को स्वय सुधार लें । उनका प्रेमपूर्ण-विनोद भी मेरे लिये हित- कर ही होगा। शास्त्री जी को भला मैं कैसे धन्यवाद दू । उनके कष्ट का प्रतिफल तो उनके अपने ही प्रेमभाव का आनन्द हो सकता है। आशा है कि भगवान् की कृपा से इन्हीं सिद्धान्तों के अनुसार सामाजिक आचरण पर विचार "सामाजिक धर्म"नामी दूसरी पुस्तक में होगा। पाठक यह जान फर प्रसन्न होंगे कि इसी पुस्तक का अग्रेजी सस्करण Eternal Truth के नाम से इङ्गलेण्ड व अमरीका में भी प्रकाशित हो रहा है । उर्दू का अनुवाद भी हो रहा है और आशा है कि द्रव्य सम्बन्धी सुभीता होने पर अन्य भाषामों में भी अनुवाद शीघ्र प्रकाशित होंगे। अलीगढ सिटी, युक्त प्रदेश । ज्वालाप्रसाद सिहल वा० १० अगस्त १६२३ }
तथा वेदान्त-शास्त्र में श्रद्धा रखने वाले जन-समाज के लिये
अत्यन्त लाभदायक है।"
श्री गोपीनाथ कविराज जी, ऐम० ए०,
प्रो. कुइन्स कालिज, गवर्नमेंट संस्कृत लाइब्रेरी,
सरस्वती-भवन, बनारस-"अद्वितीय योग्यता का
ग्रन्थ देश के दार्शनिक साहित्य में नि सन्देह उन्नति
असाधारण तीक्ष्ण बुद्धि व विवेचन शकि प्रभावशाली
ग्रन्थ सरल व युक्तिपूर्ण वर्णन चुभती हुई जोरदार
शैली कदाचित् कभी ऐसी पुस्तक पढने का सौभाग्य प्राप्त
होता है। दर्शन व धर्म के सत्य व नित्य तत्व जान कर उनके
अनुसार सर्वदेशीय धर्म के निर्माण का प्रयत है और इस में,
लेखक ने सफलता प्राप्त की है।
श्री सूर्यकान्त जी शास्त्री. व्याकरणतीर्थ,
विद्या-भास्कर, महेवड, जि. सहारनपुर-"इसे
यदि ससार का उत्पत्ति से लेकर प्रलय तफ का इतिहास
कहा जाय तो अनुचित न होगा। इस में स्पष्टतया समझाने
का प्रयत्न किया है कि एक ही आदि तत्व से सृष्टि की उत्पत्ति
कैसे और क्यों हुई। अद्वैत से द्वैत कैसे हो गया, सर्वातीत
निर्गुण ब्रह्म सृष्टि से पूर्व किस अवस्था में था और फिर
रुपान्तरित कैसे हो गया । माया का वास्तविक स्वरूप
क्या है । 'स तपोऽतप्यत्' 'एको बहुस्यां प्रजापेय इत्यादि
श्रुतियों का रहस्य क्या है । क्षीरा शायी नारायण, उसका नाभि-
"
ॐ राम विषय सूची। पृष्ठि १ ४१ ७८ ८६ विषय भूमिका १-जड व चैतन्य २-पूर्णात्मा-ईश्वर ३-आदि तत्व-परब्रह्म ४-सृष्टि की रचना-विधि ५--जीवात्मा ६-मनुष्य शरीर ७-अमरता, आवागमन, मुक्ति वा निर्वाण ८-अवतारों का रहस्य ६---सत्त्व, रज, तम १०-जीवनोद्देश्य ११-आध्यात्मिक अनुशा व दण्ड-दैविकगुण १२-सहायक गुण-व्यक्तिगत १३- सहायक गुण-सामाजिक १४---सस्कार व स्वतत्रता १५-शुद्धि १६-दैविक प्रेम १७-अनुफमणिका १२७ १३८ १४७ १६४ -- फमल, उस में बैठा हुआ ब्रह्मा, उसकी सृष्टि, इन पौराणिक रहस्यों का विचित्र विवेचन देखकर दांतों तले अड्गुल बानी पड़ती है...लेखक ने जहा कोरी प्रकृति के उपासकों को मात्मा मृत रसास्वाद कराया है वहा एकान्त आत्मवादियों को वास्त विफ पञ्चभूतों के चने भी चबवाये हैं मादितत्व की वास्तविकता विचित्र-लीला और रूपान्तर-धारिणी-शकि पर ध्यान न दे दार्शनिक अपने अपने मत का प्रचार करते हैं पर जड और चेतन की गांठ दिनोंदिन उलझती ही जाती है । जड चेतन का वास्तविक अविरोध दिखाते हुए लेखक ने इस दुर्गम घाटी को सई सलामत पार कर दिखाया है .पाश्चात्य विद्वान भौतिक विज्ञान की उधेड़ वुन में हैं तो प्राच्य दार्शनिक आध्यात्मिक समुद्र में गोते खा रहे हैं .पर विश लेखक ने सब को युक्ति तथा प्रणय से मना कर एक ही तत्व का उपासक बनाकर कमाल किया है इस कलुपित फलिकाल में जब कि सम्पूर्ण मानव-समाज अपनी प्रखर पिपासा शान्त करने के लिये दृश्य ससार के परदे को उठा कर प्रेममय परमात्मा को निहारना चाहता है यह पुस्तिका भकों के लिये दैविक उपहार है लेखक के दिव्य सदेश ने वह भूल मिटा दी, झूठा पर्दा उठा दिया और प्रेमामृत की ओर इशारा कर अपना कार्य कर दिया यह जीवन- पथ के लिये प्रज्वलित दीप-शिखा है यह दिव्य-दर्पण है इस में यदि पाठकों ने ध्यान पूर्वक देखा तो अवश्य ही उन्हें मप्रतिम रूप सपन्न भगवान के दर्शन होंगे।"
कैवल्य शास्त्र
भूमिका
सभ्यता की आरम्भिक अवस्था में मनुष्य जहा भी बिना
प्रत्यक्ष कारण के किया शक्ति पाते थे वहा ही चैतन्य जीव को
कल्पना करते थे। शनैः शनै इन सब के अधिष्ठाता की कल्पना
हुई। ऐसे
और नियमबद्ध जगत् के लिये सञ्चालक की
परम आवश्यकता प्रतीत होती है। अस्तु यह अधिष्ठाता इस
ससार का ईश्वर हुना और वह भी कैसा कि सर्वशक्तिमान्
और सर्वश, जिस से संसार का प्रबन्ध सफलता पूर्वक हो
सके। ऐसा पूर्ण शक्ति वाला ईश्वर स्वभावत ही सर्व व्यापक
होगा, उसकी सभी बाते पूर्ण हैं । उसकी शक्तियां व गुण
अचिन्त्य हैं । उस पर विश्वास करने वालों के लिये परम क्षमा-
वोन और पापियों के लिये परम भयंकर, अपने असख्य देवता व
फ़िरिश्ते रूप अनुचरों के द्वारा स्वर्ग में पुण्यों का फल देने वाला
और नरक में दड देने वाला है।
- ईश्वर सम्बन्धी यह विचार अपनी उत्पत्ति की स्वाभाविक
त्रुटियों से युक्त ये । भिन्न भिन्न स्थानों के विचारों और
रिवाजों में भेद होने के कारण ईश्वर सम्बन्धी विचार भी पृथक्
पृथक् हुये। कैसा आश्चर्य है कि एक ही ईश्वर, सम्पूर्ण ससार
के अधीश्वर ने संसार के असीम दुख और हानि का कारण
फूट का वीज, अनेक मतों-जो कि सब ईश्वर को अपना ही
समझते हैं और उसी की आशाओं पर निर्भर होने का दावा करते है-को उत्पन्न करके घो दिया। कैसा दृश्य है । एक ही ईश्वर के अनुयायी आपस में उसे एक व अद्वैत स्वीकार कराने को लडते हैं, यद्यपि वह सब के सब पहले से ही इसमें विश्वास करते हैं। यह अद्भुत परन्तु सत्य है कि मतों का झगडा यथार्थ गुण और दोपों पर मति भेद होने से नहीं है और न रिवाजो के भिन्न होने से हो सकता है, क्योंकि एक ही मत के मनुप्यों मे भी ऐसा होता है परन्तु वह इसके लिये लडते नहीं। परन्तु जब एक ईश्वर प्रत्येक जाति के लिये पृथक पृथक हो जाता है और उनके पृथक् पृथक् रिवाजों पर अपनी मुहर लगा देता है तव लडाई छिड जाती है। परन्तु फिर भी ईश्वर की एकता में कुछ भेद न पडा, कैसा आश्चर्य है ! परन्तु सत्य एक है और ईश्वर भी यथार्थ में एक ही है। यह समस्या उसके कारण नहीं किन्तु हमारे ही कारण हैं। हमारे विचार हमारी त्रुटियो से भरे रहते हैं । हमारे स्वाभिमान, अह- एवं पक्षपात आदि दोप हमको उसका और उसकी सृष्टि फा यथार्थ स्वरूप देखने नहीं देते। यदि हम अपने पक्षपात युक विचारो को छोड कर सुले मन से विवेचन शक्ति का आश्रय लेफर वास्तविकता की ओर बढे तोधर्म के उस अचल सिद्धात फो, जो ईश्वर ने अपने स्वरूप में ही नियत किया है प्राप्त कर सकते हैं। कुछ पुरुप अपनी त्रुटियों से ऐसे हताश हुए कि उन्होंने ईश्वर को जानना असम्भव ही कह दिया । पल्तु फिर भी वह इतना कहते हैं कि वह सर्वशक्तिमान, सर्वव्यापक तथा सर्वज्ञ है। सब प्रकार से पूर्ण है, परम दयावान है और करोड़ों सूर्यों से भी अधिक प्रकाश वाला है। यह अधिकारी पुरुषो को दर्शन भी देता है, आशा भी देता है। यथार्थ में वह खरूपत. - - . ( ३ ) न जानने योग्य नहीं है किन्तु हमने उसके जानने का प्रयत्न विना उसके सफेतों को गृहण किये हुए ही किया । हमें अपने मनगढन्त विचारों को छोड कर उसके दिये हुये विवेक का प्रयोग करके उसके सत्य खरूप को जानना उचित है। जब उसने हम में अपने जानने के लिये प्रपल इच्छा उत्पन्न की है और अपने जानने के रास्ते को दिखाने के लिये हमें विवेक और विचारशक्ति भी दी है तो फिर वह न जानने योग्य केसे हो सकता है ? उसने तो जानने के लिये उपाय हमें दे दिये, परन्तु हम अपने ही नेत्रों के टोप से उनको देख नहीं पाते। यदि हम उसके सकेत को गृहण करे तो धर्म और नीति के उन अटल सिद्धातों पर पहु- चेंगे कि जो व्यक्तियों अथवा समाजों की परपनाओं के दोप से रहित होंगे और सम्पूर्ण ससार व सब युगों के मनुष्यों के रिये एक ही होंगे। क्योंकि उनका आधार उसी पूर्ण ब्रह्म का पूर्ण प्रकाश रूप और पूर्ण ज्ञान होगा जो फि सब के लिये समान है। जिन त्रुटियों के कारण हम परमात्मा को नहीं पहचानते, उन्ही हमको धर्म का आधार, समाज की आवश्यकताओं में अथवा एफ दैविक धार्मिक चितवृत्ति में खोजने पर चाधित किया। हम अपने को ठोक राह पर समझते थे परन्तु यथार्थ में हम दूसरी ही पगडण्डी पर चल दिये, कारण कि अव धर्म के सिद्धांत अचल न रहे। धामिक चित्तवृत्ति के अनेक दरजों फा शून्य तफ भी होना तो इसी से प्रत्यक्ष है कि ससार में अनेक प्रकार के पापी पुरप होते हैं। इसलिये ऐसी धामिक चित्तवृत्ति फोई निश्चित वस्तु नही कही जा सकती फि जिसके आधार पर धर्म का विचार दृढ हो सके। सामाजिक विचार से भी अनेक कठिनाइया उत्पन्न होती हैं । एक प्रकार के सङ्गठन और सभ्यता वाली समाज अपनी बातों को दूसरी समाजों से मनमाने ८ -- का प्रयत्न करेगी। धार्मिक सिद्धांतों के दृढ न होने से ससार के सव व्यक्तियों के हृदयों मे निरन्तर एक प्रकार का सग्राम रहेगा, जिसका परिणाम समय पाफर धर्म का पतन और स्वार्थ की वृद्धि ही होगी। अव भी भीषण युद्ध होंगे , परन्तु इतनो और होगा कि वह धर्म प्रचार की पवित्र उत्तेजना से रहित होंगे। धर्म का आधार दृढ़ न होने का यह खाभाविक परिणाम है। किसी के जीवन की रक्षा करने मे झूठ बोलना उचित ठहरा दीजिये और शीघ्र ही वह सब झूठ, जिनसे किसी को हानि नही होती, अनुचित नही रहते। अपनी रक्षा के लिये भूठ बोलना अधर्म नही रहता और फिर तो यह उन्नति पूर्ण ही हो जाती है- झूठ से बचना इस कारण कठिन है कि समाज ही ऐसी है, अस्तु व्यवहारिक भूठ अनुचित नहीं है। यह केवल खार्थ सिद्धि के लिये भूट है और सो भी सहज स्वभाव से व अनुताप रहित । दाम्पत्य सम्बन्ध में ढील हुई कि विवाह पद्धति नए कर स्त्रियों में सर्वाधिकार व स्वतन्त्रता के पक्षपाती भी दीखने लगे। खाधि- कार और स्वतन्त्रता के विचार कहा तक नहीं बढ़ सकते? धर्म के जहाज कालगरहूट जाता है और क्षुब्धससार समुद्र उसे इधरने उधर फेंक कर तहस नहस कर डालता है। कारण प्रत्यक्ष है। धर्म के अन्यापेक्षी होने से अनेक प्रकार के तर्को की सम्भावनाहोकर शिथिलता उत्पन्न हो जाती है । फिसी कल्पित दैव कोयुक्ति रहित और नि शङ्क आशाओं का हमारा विवेक विरोध करता है और हमारी मनगढन्त वाधा तथा परिमितताने हमे हमारी कल्पनाओं के स्थान पर फिसी अचल, विवेकयुक, सत्य सिद्धात के स्थापन करने से रोक रक्खा है। बस, हम आत्मिक जीवन के अस्थिर आधार वाले खतन्त्र विचारक होकर, मनुष्यजाति को उत्तम और श्रेष्ठ गुणों से रहित की हुई, कुछ कुछ समझी हुई, प्रकृति से उत्पन्न तृष्णा से चञ्चल होने के लिये छोड देते हैं। कोई कोई सत्य की आवश्यकता समाज के कल्याण के कारण नही कहते फिन्तु उसको चित्त को पवित्र करने की शक्ति के कारण उसको गुण कहते हैं। कुछ लोग उसका महत्व मुक्तानन्द का दैना कहते हैं। परन्तु विना इस रहस्य को जाने हुए कि ऐसा क्यों होता है, यह केनल अपने अनुभव का निरूपण है कि जो हमको सत्य प्रतीत होता है। परन्तु सम्भव है कि दूसरों को ऐसा स्थिर और निश्चल न ज्ञात हो जो कि अपने विचारों के अनुसार इसमें तर्फ और भेद कर सकते हैं। और फिर कोई मनुष्य अपने को पवित्र क्यों करे, उसफी पवित्रतासे उसे फिस युक्ति पूर्ण सिद्धात के अनुसार क्या लाभ है ? फिसी का विचार है कि धर्म से आत्मा का विकाश होता है और धर्म के अपरिमित होने से इस विकाश की भी कोई सीमा नहीं है । न मालूम इस अनन्त विकाश का किसी समय क्या स्वरूप होगा। यह सिद्धान्त केवल अज्ञानता व शक्तिहीनता की स्वोरुति है। कुछ मनुष्यों का विचार है कि जोवात्मा अनेक विचार, स्वभार व वृत्तियों का केवल सङ्ग मात्र है। अस्तु शरीर के के शान्त होने पर कोई आत्मा पृथक स्थित नहीं रहता, परन्तु जिन विचारों, विशेषताग्री, स्वभावों व सिद्धान्तों को उस व्यक्ति ने अपने में प्राप्त किया था, जो कि उसकी आत्मा का सार तत्व थे, वह अवश्य पीछे के मनुष्यों में रहते हैं। जिस प्रकार हमारे पूर्व पुरुषों की आत्माएँ हमारे भीतर विद्यमान हैं इसी प्रकार हम भी आगामी मनुष्यों में उपस्थित रहेंगे और इस प्रकार से हमारे जीवन का सार तत्त, जो सच्चा जीवात्मा है, अविनाशी कहा जा सकता है । कहा जाता है कि किसी पूर्व .
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- (८) है। इसके पश्चात् इस शास्त्र का सिद्धान्त प्रारम्भ होता है और तीसरे पाद मे आदि वस्तु परब्रह्म के गुणों का अनुस- धान किया गया है। यह दिखाया गया है कि ब्रह्म-जिज्ञासा बिना अपरिमित स्वरूप के प्राप्त हुए शान्त नहीं होती। इसका कारण मनुप्य की कल्पना-शक्ति को निर्बलता नही, वरन् सिद्धान्त को अन्तरीय आवश्यकताएँ हैं। यदि मनुष्य के अल्प शान के स्थान में ईश्वर का पूर्ण ज्ञान भी हो फिर भी इस सिद्धान्त में कोई भेद नहीं पड़ता। ऐसा अपरिमित स्वरूप स्वभा- बत. ही सर्व व्यापक होगा और संसार की सम्पूर्ण वस्तुएँ उसी का स्वरूप होगी क्योंकि किसी परिमित वस्तु को भी स्वतन्त्र स्थिति से अपरिमित भी परिमित हो जायगा। इस कारण इस अपरिमित स्वरूप में जड विस्तृत्व व चेतनता दोनों का ही चीज रूप उपस्थित होगा। यह स्वरूप परिमाण रहित अविच्छन्न व निरन्तर है क्योकि सर्व व्यापक वस्तु में शून्य अवकाश नही हो सकता। चतुर्थ पाद में यह दिखाया है कि इस आदि स्वरूप से फिस प्रकार से चेतनता के स्वाभाविक गुणों के कारण जड चैतन्य तथा सम्पूर्ण ससार उत्पन्न होता है। यही चेतनता मूल शक्ति है। प्राकृतिक कार्य -कारण सम्न्वध प्राकृतिक अनुकरणताका केवल कथन है और उसकी शक्ति का स्रोत यही आदि शक्ति है। पचम पाद में जीवात्मा का विशेष निरूपण है और छठे पाद में उसके व शरीर के परम्पर सम्बन्ध पर विचार है। जीवात्मा पृथक् व्यक्ति होने से जब तक वह आदि वस्तु में विलीन हो कर मुक्ति को प्राप्त न होगा तब तक पृथक् व्यकि रूप स्थिति में ही रहेगा। उस समय तक उसका पुनर्जन्म होना स्वाभाविक व युक्ति पूर्ण ही है। आदि वस्तु से उत्पन्न हुया जीवात्मान अनादि है और न अविनाशी; परन्तु इससे उसके उत्पन्न हुई चित्त की वृत्तियों को शात करने के लिये अनेक जन्म गृहण करने पर कोई आक्षेप नहीं होता। इस प्रसग से सप्तम पाद समाप्त होता है। अष्टम पाद में अवतार अथवा पुर्ण पुरुष के सम्भव सरूप का विचार है। नने पाद में सृष्टि को त्रिगुणात्मिक तीन दशानों, जो जड व वेतन्य दोनों के यथार्थ बोध के लिये आवश्यक है, के सिद्धान्त की व्याख्या है । दशम पाद में जीवनोद्देश्य पर विचार है। एकादश पाद में आदि वस्तु के स्वाभाविक गुणों पर अचल धर्म का निर्माण फिया है। उसकी अचलता का कारण सत वस्तु के अचल गुणो पर निर्भर होना है। द्वादश व त्रयोदश पादों में सापेक्षक, व्यक्ति गति व सामाजिक धर्म का विवरण है। चतु दश पाद मे सरकार सम्बन्धी सिद्धान्त च मनुष्य की खत- न्त्रता का विचार है । पन्द्रहवें पाद में चित्त-शुद्धि व प्रायश्चित का रूप दिपाया है मौर सोलहवें पाद में अन्य निर्मल दैविक प्रेम में विश्राम को प्राप्त होता है। इस प्रकार से उस अगम्य को जानने का प्रयत्न किया गया है और इस ज्ञान की दृढ नीव पर अचल धर्म फा, कि जो केवल विवेक के आधार पर होने से सब जातियो और सब समयो के लिये एक हो है, निर्माण किया गया है। इससे जितना धर्माकाश स्वच्छ हो उतनी ही इसकी सफलता है। बस, यही प्रार्थना है कि इस विचार-शैली को द्धि होने से यह ऐसे धर्म के निर्णय का कारण हो कि जिस से सब पक्ष वाले सन्तुष्ट हो कर प्रेम और आत्मिक समता से एक हो जाय। ससार की शान्ति के हेतु हम सब इस प्रार्थना को करे । हम सदेव उस प्रभु का स्मरण करें क्योंकि वही भाग्यशाली हैं जो उसके चरणों में है। ॐराम
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ॐ राम
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कैवल्य शाख
१-जड व चैतन्य।
मैं सम्पूर्ण संसार की सत्यता पर विश्वास भले ही न करू
परन्तु अपनी सत्यता में सन्देह नही कर सकता, कारण यह
है कि यह सन्देह ही सन्देह करने वाले की स्थिति का प्रमाण
है। यह पश्चिम के विख्यात दार्शनिक का सिद्धात है। परन्तु
फिर भी बहुत से इस स्वात्मा को ही नहीं मानते और कहते
हैं कि यह चैतन्य शक्ति जिस को हम जीवात्मा कहते हैं केवल
शारीरिक सगठन का परिणाम है। परन्तु इस सिद्धात पर पूर्ण
विश्वास कभी नही हुआ और ऐसे आलस्य दार्शनिकों के रहते
• हुए भो ससार सदैव जीवात्मा को सत्यता को सत् ज्ञान का
प्रथम पद समझता चला आया है। और यह अविवेफ से नही,
क्योंकि यदि मेरे प्रात्मा फी शरीर से पृथक् कोई स्थिति नही है
तो फिर मेरा सत्य का अनुसधान अथवा ससार की सत्यता
के जानने के प्रयत सब व्यर्थ हैं। ऐसी दशा में तो मुझे केवल
इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि किसी न किसी प्रकार
भलाई वावुराई से अपने शरीर को यथासाध्य सुप दू,
क्योंकि
शरीर के शात होने पर मुझसे फोई हिसाब नहीं लिया जा
सकेगा। उस समय मेरी कोई स्थिति हो न होगी कि जिससे
हिसाव लिया जाय।
शरीर से पृथफ जीवात्मा की स्थिति की निर्मूलता के
समर्थन मेंएफ बडी युक्ति यह दी जाती है फि अनुभव कहता
F
को प्राप्त (१२) है कि शरीर में किमी दोप के हो जाने से जीवात्मा की क्रिया में भी दोप उत्पन्न हो जाता है। और यह कभी कभी तो इतना तीव्रतम होता है कि एक ही शरीर में दो आत्मा अथवा अनेकात्मा प्रतीत होते हैं। ऐसी तीत्र दशामों के अतिरिक्त यह तो साधारणत देखा जाता है कि भिन्न भिन्न मनुप्यों का स्नायु सगठन एकसा नहीं होता। अस्तु, उनको मानसिक शकियों मे भी भेद होता है। और जव मनुप्य का शरीर मृत्यु होता है तब कोई ऐसा कारण नही दोपता कि जिससे जीवात्मा का पृथक् जीवित रहना प्रमाणित हो सके। जिन विशेषताओं से हम जीवात्मा की स्थिति को पहचानते थे वह अब कही भी नही दीखती। हमारे जीवन के कार्यो का कारण हमारे शरीर के स्नायु सम्बन्धी ज्ञान से समझ में आ सकता है अतएव जीवात्मा के पृथक कहने का कोई कारण नहीं रहता। परन्तु यदि और कारणों से जीवात्मा की पृथक स्थिति सत्य जान पड़े तो ऊपर की कठिनाइया दुस्तर नही हैं। यदि जीवात्मा को अपनी शक्तियों को प्रकट करने के लिये शरीर की आवश्यकता है तो उन शक्तियो का प्रकाश शरीरकी इन्द्रियो को सख्या, दशा और योग्यता के अनुसार ही हो सकेगा। यदि किसी इन्द्रिय के सविकारया नष्ट हो जाने से जीवात्मा की उस शक्ति का प्रकाश नहीं होता तो इसका कारण यह हो सकता है कि उस शक्ति के प्रकट करने के लिये उपयुक्त इन्द्रिय न रहो, ही नहीं कहा जा सकता कि जीवात्मा । जैसे "मनुष्य एक मांख से अन्धा है यह 7जीवात्मा भी कानी है है तो न तो में ही वह पृथक होता
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. ( १४ ) दोनों नेत्रों के अनुभव मिल कर मन मे एक जान पड़ते हैं परन्तु स्नायु जाल में कोई स्थान नेत्रों के स्नायुओं के मिलने काज्ञात नहीं होता। इसी प्रकार अमुक समय पर जो मुझे अपनी सम्पूर्ण शारीरिक दशा का ऐश्वभाव सा आभास रहता है उसका सहचर फोई विशेष म्नायु-केन्द्र प्रतीत नही होता। मानसिक और स्नायु सम्बन्धी क्रियाओं को ऐमी अस- गति का वडा सुन्दर व विख्यात उदाहरण इस तार, कि "तुम्हारा पुत्र मर गया", के “अर्थों" के मानसिक विचार का है। यदि इसमें से पहला अक्षर "तु" निकाल लिया जाय तो इसका अर्थ विलकुल दूसरा हो जाता है । यद्यपि प्राकृतिक उत्तेजक कारण में अधिक भेद नही पडा, परन्तु उसके परिणाम में अत्यन्त अन्तर हो सकता है। पहली दशा तो तार पाने वाले का सम्पूर्ण जीवन ही शोकमय हो सकता है और दूसरी में केवल एक दुख प्रकाशक पन ही फल निकलेगा। दोनों परिणामों में जो क्रिया शक्ति व्यय होती है वह प्राकृतिक उत्ते- जना के अनुसार नही कही जा सकती। इन "अर्थो" को भी प्रभाव भिन्न भिन्न मनुष्यों पर भिन्न भिन्न होगा। अतएव "अर्थ" के समान्तर स्नायु क्रिया में कुछ भी नहीं है और "अर्थो" का समझना केवल मानसिक क्रिया है। "अर्थ" का प्रभाव स्मरण शक्ति में भी प्रत्यक्ष है। अर्थ रहित अक्षरो व शब्दों के मेल को तो कई बार दुहराने से भी स्मरण रसना कठिन है, परन्तु यदि उसी समय पर कोई मनुष्य एक बार भी कोई ऐसी बात पाहे कि जिसफा सुनने वाले से विशेप प्रयोजन हो तो वह विना दुहराये ही स्मरण रहेगी। परन्तु यह कहना कि अर्थ का स्नायु केन्द्र में यह समांतर है वडा कठिन है। विशेष कर तब जब कि हम यह विचार करें । कि कितने असल्य विचार, अर्थ, सिद्धात व और अनेक मानसिक वस्तुएं हमारे मन में भरी रहती हैं। जीवात्मा की एकता च सायौगिक क्रिया शक्ति हर्ष और कप के विचार में भी प्रत्यक्ष होती हैं। हर्प और कष्ट कोई विशेष प्रकार की शारीरिक क्रिया नहीं हैं चरन यह मात्र हैं जो किसी भी क्रिया के सङ्ग हो सकते हैं और भाव मानसिक हैं। यद्यपि प्राकृतिक उत्तेजना एफ हो अथवा एक सी हो परन्तु मन फी दशा में भेद होने से जो पदार्थ एफ समय हर्पदायक है वही दूसरे समय पर कष्टदायो हो सकता है। इसके अतिरिक्त हर्ष अथवा कष्ट से युक्त एक अन्तरीय साम्यभार भी हो सकता है। कोई मनुष्य चिन्ता के कारणों के होते हुये भी प्रसन्न रह सकता है अथवा नाटक समाज के कृत्यो पर जनता के सह हंसते हुये भी यह अन्तर शोफ्युत रह सकता है। मानसिक माव की इस अन्तरीय एकता का समातर स्नायु केन्द्र नहा है। कोई रह जो कि स्वय हर्पदायक हैं किसी विशेष चित्र मे सयोग को प्राप्त होकर उस चिन के अर्थों के कारण फटदायी हो सकते है। फिसी चित्र में प्राकृतिक उत्तेजनाओं के एक ही समूह फे अवलोकन से भिन्न भिन्न मनुष्यों के भिन्न भिन्न मानसिक भार होंगे। अतएव यह अध्यात्म सम्बन्धी भाव केवल शारीरिक क्रियाओं के समांतर नहीं हो सकते। जब कोई चालक खाद्य पदार्थ प्राप्त करने के लिये प्रयत्न फरता है और सफल भी होता है, तो फिर जब उस को प्राव- श्यकता होती है तो कर फम करना पड़ता है और फलीभूत होने वाली क्रिया तक वह पहले से शीघ्र पहुंच जाता है। सांयोगिफ सिद्धान्त के अनुसार दोनों बार की क्रियायें सम्पूर्ण और एक ही कम से होनी चाहिये । परन्तु हर्ष के सयोग से , सफल क्रिया ही विशेपता को प्राप्त करती है और जीवात्मा को ग्रहण शक्ति के कारण वह क्रिया ही उस क्रिया क्रम का मुख्य अङ्ग रहने पाती है । इस प्रकार स्वभावों की उत्पत्ति भी यन्त्रसदृश क्रियाओं से मानसिक भावों के अनुसार होती है। यथार्थ में मस्तिष्क की निःस क्रियायें भी जीवात्मा की पृथक स्थिति की समर्थक हैं। क्योंकि यह उन दशाओं को दिखाती है कि जिनमें जीवात्मा का ध्यान उन क्रियाओं में नहीं होता जिससे कि यह प्रमाणित होता है कि केवल यान्त्रिक स्नायू क्रिया उस क्रिया से भिन्न हैं जिसमें जीवात्मा का ध्यान पूर्णतया उन क्रियाओं को ओर रहता है। अनेकात्मिक दशा में भी जीवात्मा कुछ स्मृतियों को भूल सकता हो, अथवा मस्तिष्क में एकत्रित वस्तुओं से पूर्णतया काम न ले सकता हो, परन्तु उसके मानसिक भाव वही रहते हैं। इससे जीवात्मा की पृथक् स्थिति में कोई दोष नहीं होती। यन्त्रो के दो होने से कार्य दो प्रकार के हो सकते हैं परन्तु उससे कर्ता दो नहीं हो जाते । सहात्मिक दुष्प्राप्य दशा सम्भव है कि शारीरिक मन-जिसकी व्याख्या आगे होगी-की असा धारण वृद्धि व शक्ति प्राप्त करने से हो जाती हो परन्तु ऐसा बहुत कम हो सकता है। जो जन्तु बीच में काट देने पर दो हो जाते हैं उनका कारण एक दूसरे जीवात्मा का उस दूसरे भाग में प्रविष्टि होना हो सकता है। जैसे कि "ऐमीवा" नामक जन्तु शरीर के विभक्त होने से उत्पन्न होता है। यह क्रिया बड़े चड़े जीवधारियों में इस कारण से नहीं हो सकती कि उनके शारीरिक सङ्गठन के विशेष प्रकार का होने से फटा हुआ भाग जीवात्मा को उपयोगी नही रहता। और जीवात्मा का उसमें रहना असम्भव हो जाता है। और इन जन्तुओं में भावश्यक वस्तुएं दोनों भागों में रहती हैं। शक्ति सरक्षण की युक्ति भी जीवात्मा फी पृया स्थिति को निमूल सिद्ध नहीं करती। यद्यपि जीवात्मा नवीन शक्ति उत्पन्न नही कर सकता तथापि यह अपनी शक्ति की चाल को विना सम्पूर्ण शक्ति के परिमाण में भेद डाले यदल सफता है। दृढ़ सकल्प से धार्मिक कार्य करने में जो सञ्चित शक्ति अधिक व्यय होती है वह ऐसे व्यक्ति की सिति का प्रमाण है जो उस सञ्चित शकि राशि में से एकाएक इच्छानुसार शक्ति व्यय फरले का अधिकार रसता हो। यह केरल यन्न सदृश क्रिया के सिद्धांत से समझ में नहीं आ सकता, क्योंकि प्राकृतिक उत्तेजनामों के एक ही समूह का प्रभाव भिन्न भिन्न मनुष्यों पर भिन्न भिन्न होता है। यह नहीं कहा जा सकता कि इस भेद का कारण पूर्व में विचार-सयोगों को यन्त्र सद्दश उत्पत्ति है। क्योंकि उस उत्पत्ति में भी मानसिक प्रभावों की यह भिन्नता उपस्थित होगी। एक जड यन्त्र और जीवित शरीर में यहा भारो भेद है। जब फिसी यन्न को चला दिया जाय तो यह सदेव एक ही प्रकार से चलता है और उसकी चाल में अड़चन पड़ने से चन्द हो जाता है। परन्तु जब कोई जीवित शरीर कार्यक्रम में किसी अडचन में पडना है तो यह ठहरता नहीं वरन् उससे पार हो फर अभीष्ट पदार्थ तक पहुचने का प्रयत्न करता है। यह विवेक युक दृढ़ामह जोषित शरीरों का विशेष गुण है। यदि किसी यन्त्र का काम करने घाला कोई भाग विगड़ जाय या निकाल लिया जाय तो सम्पूर्ण यन्त्र बन्द हो जाता है, परन्तु शरीर के फिसी विशेष भाग पर आघात होने से मृत्यु होना आवश्यक नहीं। इसके अतिरिक यन्त्र के भागों पर भी प्रभाव पडना ( १८ ) सम्भव है, परन्तु जीवित शरीर में सम्पूर्ण शरीर ही प्रभावित होता है। यन्त्रों में ऐसा ऐक्यभार नहीं होता जैसा जीवित शरीरों मे । और फिर अद्भुत बात यह है कि यन्त्र स्वय जीवात्मा की प्रयोजनयुक्त क्रियाओं के फल हैं। मानसिक शक्ति शरीर से स्वतन्त्र ही नहीं वरन् उसके विरुद्ध भी कार्य कर सकती है। यह उस समय प्रत्यक्ष हो जाता है जब हम जान वूमा फर धर्मानुसार कार्य करते हैं। यद्यपि हमारो शारीरिक इच्छाये हमे दूसरी ओर आकर्षित करती हों, और हमारे दुष्कर्म को कोई देखने वाला भी न हो, और न हम को अपने धर्म कार्य मे यश प्राप्ति की आशा हो, फिर भी हम धर्मानुसार कार्य करने का प्रयत करते हैं। हमको अपनी इच्छाओं का विरोध करने मे बडा कर करना पड़ता है और हम फरते हैं। यह सत्य है कि धर्म सम्बन्धी विचारों की उपलब्धि हमें बाहरी समाज से होती है परन्तु केवल विचार में किया शक्ति नही है । इस विचार के अनुसार कार्य करने की इच्छा हमारी शारीरिक इच्छाओं की महान शक्ति के विरद्ध कदापि फलीभूत न होती यदि हम उसके साथ अपने दृढ सङ्कल्प का सयोग न फरते। और फिर हमारे विचारों के सङ्गठन में भी जीवात्मा की ग्रहण शकि कार्य करके व्यक्तिगत विशेषताओं को उत्पन्न करती है। प्राकृतिक प्रभावों के एक ही समूह का पृथक् पृथक् पुरुषों पर भिन्न भिन्न प्रभाव पड़ना सहचर सिद्धांत के बहुत कुछ विरुद्ध तो है ही परन्तु मृत्यु के समय मानसिक शकियों का पूर्णतया अभाव तो उसको निमूल ही कर देता है । उस समय चैतन्याहत वस्तु को एक दशा तो दृष्टिगोचर होती है, परन्तु उसकी सहधरी दूसरी दशा का कही पता नहीं है जिससे सिद्ध होता है कि दोनों दशाओं का एकत्रित न होना सम्भव है। यदि इसका कारण किसी ऐसी वस्तु का अभाव है कि जिसका शरीर भी शरीर के समान तत्वों से बना हो परन्तु हो वह शरीर से स्वतन्त्र, तो भी जीवात्मा का पृथक् होना सिद्ध होता है यद्यपि उसफा शरीर भी विस्तृत्व गुण से युक्त है। और फिर प्रथम तो मेरी सत्यता के सिद्ध करने की आवश्य- कता ही नही है। और सब वस्तुओं की सत्यता का प्रमाण मुझे सन्तुष्ट करने वाला होना चाहिये। परन्तु मेरा "मुझ" से क्या प्रयोजन है ? क्या इसका अर्थशरीर हे जिसको में देखता ह और जिसफो मैं अपना शरीर कहता है और जिसके अगों में मैं मेरे हाथ, मेरे पैर, मेरा मस्तक, मेरी रीढ की हड्डी, मेरी आस, मेरे कान ऐसा अभिमान करता हू? प्रत्यक्ष में ऐसा नहीं है क्योंकि यह वह वस्तुएँ हैं जिनका अधिकार मुझे है। मैं उनका स्वामी ह। इस लिये वह और मैं एक नहीं हैं। मेरी उपस्थिति के स्पष्ट चिन्ह क्या है ? मैं विचार करता है। मैं समझता हू । मैं हस्त- व्यापार करता है। मैं स्मरण करता है। मैं अविष्कार करता। मैं सफरप करता हूँ। मैं देखता है । मैं सुनता हूँ। मैं करता ह इत्यादि । यदि मैं देखनाव सुनना न चाहू तो मेरी आखें नही देख सकती और मेरे कान नहीं सुन सकते। यदि मैं सोना चाहू तो मेरा मस्तिप्फ विचार नही कर सकता। मैं स्वप्न देखता हू परन्तु वह विचार करना नहीं है। मस्तिष्क की अनिच्छित क्रिया मुझे गाढ़ निद्रा से वर्जित रख सकती है जैसे कि कोई चडा कष्ट मेरे हाथ को बिना मेरी इच्छा के विचलित कर देता है। इन सव में 'मैं निर्वाधित फर्ता हूँ। मैं यह कभी नही कहता कि मेरी आमैं देखती हैं। मेरे कान सुनते हैं। मेरा शरीर सोता है या कि मेरा मस्तिष्क विचार करता है इत्यादि ।
( २० ) स्वप्न में भी यदि मैं सब कार्यक्रम मस्तिष्क पर ही छोड दं तो दृश्य असंगत, बेढंगे और धुंधले हो जाते हैं। और यदि स्वप्न में मैं लेश मात्र भी इच्छा वा सकल्प करू तो मेरा स्वप्न का ससार तत्काल पहले से अधिक स्वच्छ और सप्रयोजन हो जाता है । जो कार्य क्रम मुझसे इतना स्वतन्त्र प्रतीत होता है वहां पर भी मेरा कैसा अधिकार है। स्मृति में अविच्छिन्नता का अनुभव कौन करता है। यह चोध मुझे कैसे होता है कि अमुक वार्ता भूत काल की है जिस का अनुभव मुझे उस समय हुआ था? यह सत्य है कि विचार करने में मैं उन्ही विचारों को उलटता पलटता रहता है कि जिनको मैंने पहले से प्राप्त कर लिया है परन्तु मैं नये नये सिद्धांतों को कैसे स्थिर करता ह? और मेरा यह उलटना पलटना भी विवेकयुत कैसे होता है कि जिससे प्रत्येक विचार को उसके प्राकृतिक अनुकरण के बदले प्रयोजनानुसार यथोचित सम्मान देता ह? यह सत्य है कि बाल्यावस्था में मैं वह सब फर्म नहीं कर सकता जो युवा अवस्था में कर सकता है। यद्यपि उस समय मेरी शक्तियां पूर्ण नहीं होती परन्तु मेरी व्यक्ति रूप दशा में कोई विक्षेप नहीं पड़ता। जब मैं गाढ़ निद्रा में होता हूं अथवा सज्ञा हीन होता ह तो पया मेरी इन्द्रियां वैसी अल्प शक्ति होती हैं अथवा मेरी जीवात्मा वैसी शक्ति हीन होता है जैसा कि वाल्यावस्था में होना कहा जाता है ? इसके अतिरिक्त शरीर के जीवित रखने के लिये किस अंग को आवश्यकता है ? जब मस्तिष्क क्लोरोफोर्म से क्रिया होन हो जाता है फिर भी शरीर जीवित रहता है। जब शरीर की सम्पूर्ण क्रियाएँ शांत हो जाती हैं तव भी हृदय कुछ समय तक ( २१ ) कार्य करता रहता है। यदि हृदय का चलना बन्द हो जाय तो अफस्मात् मृत्यु हो जाती है । परन्तु आज फल मनुष्यों को उनके हदय की चाल को फिर सञ्चालन करके जीवितफर दिया गया है। ऐसा एक विवरण छप चुका है कि * एक स्त्री का हृदय चलना चन्द हो गया था परन्तु अपने खोये हुए पुत्र के प्रेम ने उसे जीवित रसा । वह बात चीत करती रही और शनै. शनै हृदय फिर चलने लगा। इससे सिद्ध होता है कि जीवा- त्मा की स्थिति शरीर के सङ्गठन पर पूर्णतया निर्भर नहीं हैं। यदि मृत्यु का कारण किसी शारीरिफ पदार्थ का अभाव है तो उस पदार्थ के प्रविष्ट करने से पुनर जीवन सम्भव होना चाहिये । वास्तव में जीवित और निर्जीव पदार्थो के भेद फा कारण क्या है यह कोई भी नहीं कहता केवल किया शक्ति के भेद का अनुभव किया जाता है । जिस हिसाब से जड पदार्थ जीवित शरीर में पाये जाते हैं उसी हिसाब से मिला कर यदि पृथक् एफ पुतला यनाया जाय तो भी वह जीवित नहीं हो सफता। अतएव जीवन शक्ति जड पदार्थों के किसी विशेष सयोग का परिणाम मात्र नही हो सकती। पश्चिम में सर औलीवर लौज जैसे विज्ञानवेत्ता शरीर रहित जीवात्माओं का प्रत्यक्ष अनुभव कर रहे हैं। भारत- वासियों के लिये तो जीवात्मा फी पृथक स्थिति स्वय प्रमा- णित है। कहा जाता है कि आत्मा की उन्नति होते २ एक समय वह आता है जब योगी को अपने पूर्व जन्मों फा वृत्तांत ज्ञात हो जाता है। योग कोई फल्पित सिद्धांत नहीं है किन्तु अनुभवगम्य व परीक्षा किये हुये सिद्धातों का समूह है। *इसदेवी का हाल ६जुलाईसन् १९२२के "लीटर" केनवें पृष्ठि पर छपा है।
( २२ ) सृष्टि में जीवन रक्षा के लिये एक प्रकार का निरन्तर सग्राम होता रहता है । जो जीवधारी कठिनाइयों को जीत कर अपने जीवन को अपनी दशाओं के उपयुक्त बना लेता है वही अपनी इष्ट सिद्धि में फली भूत होता है। परन्तु यह विवेक और सङ्कल्प के बल से ही हो सकता है । इन मानसिक शक्तियों का इतना अधिक प्रभाव है कि यह केवल मानसिक वृत्तियों में ही नही किन्तु शारीरिक सङ्गठन में भी परिवर्तन कर देती हैं। इससे यह प्रतीत होता है कि जीवात्मा अपनी शक्तियों के पूर्ण प्रकाश के लिये शरीर को यथोचित बना लेता है। और जीवा का शरीर के सङ्गठन का परिणाम होने के बदले शरीर सङ्गठन ही जीवात्मा की इच्छा के अनुकूल प्रतीत होता है। यह प्रश्न भी हो सकता है कि जब हमारी शक्तिया व स्वभाव हम को अपने माता पिता से मिलते हैं तो इसका क्या कारण है कि कुछ सन्तान माता पिता से विरुद्ध स्वभाव वाली होती है? और एक ही माता पिता के दो पुत्र मानसिक स्वभावों, धार्मिक विचारों और शारीरिक दशाओं में भी भिन्न भिन्न देखे जाते हैं। एक परम विचारणीय वात और है। यदि यह मान भी लिया जाय कि हमारी मानसिक शक्तिया हमारे शरीर के सङ्गठन का ही परिणाम हैं तब भी यह प्रत्यक्ष है कि हमारा मन अत्यन्त सूक्ष्मता से मिश्रत और सङ्गठित काई वस्तु है। बृहत स्मृतिया, तीन इच्छाएं, रागद्वप, गम्भीर सिद्धात, प्रवल बुद्धि आदि सब मन में सङ्गठित हैं। इस कारण मृत्यु से पूर्व ही यह सङ्गठन नष्ट हो जाना चाहिये और यह शक्तिया व वृत्तिया व्यय हो जानी चाहियें। कहा जा सकता है कि वुढापे में यही होता है। परन्तु जब कोई मनुष्य अपनी पूर्ण शक्तियों के होते हुए - " ( २३ ) भी हृदय के बन्द होने से मर जाता है तब उसके मन को क्या दशा होती है ? उसकी शारीरिक शक्ति तो अवश्य क्षीण हुई परन्तु वही यात उसकी मानसिक शक्तियों के सम्बन्ध मे नही कही जा सकती। वास्तव में जड और चैतन्य के इस वाद विवाद का कारण हमारी पूर्व प्रवृत्तियों का पक्षपात है। हम जड और चैतन्य के गुणों मे पूर्णतया वैमनस्य समझते हैं। इसलिये यदि जड प्रकृति में विस्तृस्न का गुण है तो जीवात्मा में, जो इसके विरुद्ध गुण वाला है विस्तृत्व नहीं हो सकता। इस कारण अद्वैतवादी जद प्रकृति या चैतन्य आत्मा दोनों में से एक ही की सत्यता को मानते हैं । अतएव जहा प्रकृतिवादी प्रकृति से विरुद्ध गुण वाली किसी वस्तु की सत्यता को मानने के लिये तैय्यार नहीं है और जीवात्मा की पृथक् स्थिति को निर्मूल करने के लिये विवेक विरुद्ध युक्तियां देते हैं तहा चैतन्यवादी भी ससार को त्रिकाल में प्रसत्य तथा केवल मन को करपना सिद्ध करने के लिये वडे अद्भुत विचार प्रकट करते हैं । नवीन वेदान्ती कहते हैं कि जिस प्रकार अन्धकार में पड़ी हुई रस्सों में हमको सर्प मासता है, परन्तु जव प्रकाश होता है तब हमें ज्ञात होता है कि वहा सर्प न कभी था और न कभी होगा, जिस प्रकार हमको अपने स्वप्न के ससार मे अनेक पदार्थ विना किसी आधार के भासते हैं , इसी प्रकार यह ससार मी झूठा है। यह ससार न कभी था न है और न फभी होगा। यह हमारा केवल अज्ञान है, जिससे कि यह ससार हमको भासता है। सत् वस्तु केवल दिव्य प्रात्मा पर ब्रह्म है और हम उसके प्रतिविम्न हैं । परन्तु यदि उस रस्सी के पास हम पत्थर का एक टुकडा रख दें तो हमें सर्प के पास ( २४ ) मेढ़क और दीखने लगेगा। यहां पर विचार करने की बात यह है कि यद्यपि हमें सर्प और मेंढक वहां दिखाई पड़ेंगे जहां कि यथार्थ में चह नहीं हैं,परन्तु सर्प और मेंढक की भिन्नता कल्पित नही है। वरन् इस भिन्नता का आधार सत्य वस्तु रस्ती और पत्थर की भिन्नता है। इसी प्रकार यद्यपि हम संसार के विविध पदार्थों को उनके यथार्थ रूप मे न देखते हों पल्तु हम यह अव- श्य कह सकते हैं कि उनकी भिन्नता निर्मल नहीं है। एक पद और चलिये और ऐसी दशा का विचार कीजियेफिजिसमें मिट्टी की रस्सी सी और मिट्टी का ही पत्थर के टुकडे जैसा बना कर अन्धेरे में रख दिया जाय तो यह दोनों सत्य वस्तु भी रूप में तो भिन्न होंगी पल्तु पदार्थ में एक होंगी । इसी प्रकार यह ससार भी पदार्थ में एक रहते हुए भी रूप में दोनों रूपों में जो हमको दोखते हैं वह और जो यथार्थ हों उनमें भी- भिन्नता रस सकता है। इस प्रकार स सार को भिन्नता कल्पित नहीं हो सकती। यदि हम स्वप्नों पर सूक्ष्म विचार करे तो हमें ज्ञात होगा कि खप्न के दृश्य वाइसकोप की तसवीरों के सदृश होते हैं। ऐसा भासता है जैसे कि हमारी दृष्टि खप्न में न तो इतनी दूर जाती है और न इतनी स्वच्छ होती है जितनी फि जाग्रत् अव- स्था में । हमारी अपनी चेतनता भी इतनी तीन नहीं होती और सारे दृश्य में कुछ धुधलापन सा होता है। कभी कभी हम खप्न में ही किसी कार्य के करने वा हो जाने की इच्छा फरते हैं। और वह कार्य होता हुआ हमको दीखता नहीं, परन्तु हमको ऐसा भासता है कि मानो वह कार्य हो गया। जैसे कि यदि स्वप्न में हम पर कोई आक्रमण करे और हमको बचने की कोई सम्भावना न हो और यदि उस समय स्वप्न में ही हम ऐसी - , ( २५ ) दशा का विचार करने लगे कि जिसमें हमारे बचने की सम्मा. घना हो तो हमको ऐसा अनुभव होता है कि जैसे विना उस दशा के प्रत्यक्ष में हुए ही हम उस प्रकार वच आये हों। ऐसी ही दशा हमारी ऊपने या अर्धनिद्रा में होती है । परन्तु यह कोई न कहेगा कि ससार केवल चित्र के समान है। खप्न और ससार की इस प्रकार तुलना नहीं हो सकती । स्वप्न और चित्त दोनों ही केवल प्रदर्शन मात्र हैं और ससार सत्य वस्तु है। स्वप्न हम जीवधारियों का भी देखते हैं । परन्तु यथार्थ में उनको सत्ता चहा नही होती। तो क्या ससार के जीवधारी भी ऐसे ही असत्य होते हैं, जैसा कि जड पदार्थों के लिये कहा जाता है ? ऐसी दशा में तो ससार की किसी वस्तु, जड घ चैतन्य, के लिये भी आधार वस्तु की आवश्यकता नहीं है और दिव्य आत्मा पर ब्रह्म की सत्ता भी अनावश्यक और अनि- श्चित हो जाती है । इस प्रकार जड और चैतन्य दोनों की सत्ता ऐसी हो जाती है मानों वे कभी हुए ही नहीं । मैं अपने आपको भी स्वप्न में चलते फिरते कार्य करते देखता है। अस्तु मेरी सत्ता भी असत्य होनी चाहिये । युक्ति युक्त सिद्धांत का कार्य ससार की प्रत्यक्ष बातों के भेद को समझाना है और यदि वह उनको असत्य ही कह दे तो उसकी शाब्दिक रचना तर्क सगत हो अथवा न हो-व्यर्थ है। ऐसे शाब्दिक तर्फ का कोई वास्त- विक अर्थ नहीं और उसका परिणाम केवल सत् मार्ग से भ्रष्ट होना है। इसके अतिरिक्त दृष्टात किसी प्रमाणित विषय मैं उदाहरण देकर उसको अच्छी तरह समझान के लिये ही दिया जा सकता है। इष्टात खय प्रमाण नहीं है। फिर हम यह कैसे सिद्ध करते ' ( २६ ) हैं कि संसार में किसी प्रकार की भी सत्यता नहीं है। कोई वस्तु किसी विशेष रूप को किसी थोडे से समय के लिये ग्रहण कर सकती है परन्तु इसका अर्थ यह कभी नहीं होता कि यह रूप कभी हुआ ही नहीं अथवा यह कि उस वस्तु ने उस रूप को कभी ग्रहण ही नही किया। एक और प्रश्न यह है । वेदान्ती कहते हैं कि इस असत्य ससार के सत्य सा प्रतीत होने का कारण हमारा अज्ञान वा अविद्या है। जब यह अधिया दूर होती है तो जीवात्मा को ज्ञान होता है और वह यधार्थ रूप को देखता है। परन्तु इस ज्ञान का प्राप्त करना शरीर की सहायता से ही सम्भव है। इसी की सहायता से हम ज्ञानी पुरुषों का सत्सङ्ग करने हैं। पुस्तक पढते हैं, योगाभ्यास करते हैं और सत्य को प्राप्त करते हैं। यह शरीर असत्य ससार का ही एक पदार्थ है, अतएव यह भी असत्य व निमूल है। कदाचित् इसकी भी कोई सत्ता नही और इसका भास हमारे अज्ञान से ही होता है। परन्तु एक असत्य व निमूल वस्तु जीवात्मा को सत्य ज्ञान के प्राप्त करने में सहायता कैसे दे सकती है ? यह मानते हुए भी कि क्रिया-शक्ति शरीर की नही. वरन् जीवात्मा की है यह प्रश्न होता है कि जीवात्मा को अपनी शक्तियों के प्रकट करने के लिये किसी असत्य वस्तु की आवश्यकता क्यों हुई ? वस्तुतः वह भी जो अपने को जीवन मुक्त कहते हैं खाते हैं,सोते, हैं, पीते हैं, शौच करते हैं और इस प्रकार सर्व कार्य करते हैं। जिन्होने सत्य रूप को देख लिया है उन्हें इन कम्माँ की क्या आवश्यकता वह कहते हैं कि शरीर अपने स्वभाव का पालन करता है । परन्तु बिना जीवात्मा के शरीर में कुछ भी करने की शक्ति नहीं क्योंति वह तो असत्य, निमूल व ( २७ ) न होने के समान है। जब जीवात्मा शरीर को छोड़ देता है और मृत्यु हो जाती है तब शरीर कुछ भी नहीं कर सकता। फिर वह कहते हैं कि जीवात्मा अपने पूर्वजम्मों के सस्कारों को भोगता है । परन्तु यह सस्कार कहा से आये और कैसे यह भोगे जा सकते हैं १ असत्य ससार में हुए कार्य भी असत्य होंगे। यदि रेल मथया किसी आटे की चक्की को क्रिया असत्य है तो शरीर की भी असत्य होगी। ऐसी क्रिया का अथवा किसी भी क्रिया का जो असत्य शरीर के द्वारा हो, प्रभाव जीवात्मा पर सस्कार रूप से कैसे हो सकता है ? यह सम्मव ही कैसे हुआ और फिर यह अविद्या कहा से आई ? यदि यह अनादि है तो अनन्त भी होगी। ऐसी दशा में इसका उद्भव वा नाश कुछ भी नही हो सकता । इम लिये मुक्ति व निर्वाण को पात चीत ही व्यर्थ है। ज्ञान प्राप्त करने, धर्म कार्य करने, पापों से बचने, सत्सङ्ग करने अथवा किसी भी कार्य करने का फोई प्रयोजन नहीं। यदि यह अविद्या परब्रहा से पृथक रहती है और कभी कभी उसको आवृत कर लेती है तब तो यह बडा अद्भुत है वरन् दिव्यात्मा परब्रह्म से भी अधिक आश्चर्य जनक वस्तु है क्योंकि यह उसे भी ढक देती है। इस के अतिरिक्त इन दोनों में से किसी की भी स्वतत्र सत्ता दूसरी वस्तु को भी परिमित कर देगी और उनमें से कोई भी अप- रिमित या सर्व व्यापक न हो सकेगी। फिर, इन दोनों का परस्पर सम्बन्ध किन नियमों पर है ? क्या उन नियमों को नियत करने के लिये कोई और तीसरी सत्ता?? और यदि अविद्या स्वतन्त्र सत्ता वाली नहीं है वरन् केवल गुण मात्र है, तो कोई आधार भी होगा कि जिसका यह गुण है, क्योंकि - . (२८) गुण की निराधार स्वतन्त्र ससा नहीं हो सकती। यदि वह आधार दिव्यात्मा पखा है तव तो दोनों एक ही वस्तु हैं और फिर अविद्या का कोई अन्त हो ही नहीं सकता और न उससे मुक्ति ही हो सकती है। परन्तु यह उत्तर देंगे कि अज्ञान, अविद्या व माया का आदि तो नहीं, परन्तु अन्त अव. श्य है। इस कारण जीवात्मा की मुक्ति असम्भव नहीं है। जय कि अविद्या किसी में अन्त को प्राप्त होती है उसी समय वह और जीवों में उपस्थित भी होती है। इस कारण जहां तक हमारे ज्ञान की शकि जाती है उसका पूर्ण अन्त नहीं होता । परन्तु उन व्यक्तियों में जिनमें कि वह नष्ट हो जाती हैं फिर नहीं व्यापती, कारण यह कि उसका आदि नहीं है। इसका अर्थतो यह हुआ कि व्यक्तिरूप जीवात्मा जिनमें अनादि अविद्या मिली हुई है स्वय अनादि हैं, परन्तु ऐसा मानने पर बहुत सी समस्याएँ खडी हो जाती हैं । यह अनादि जीवात्मा परब्रह्म से स्वतन्त्र होने चाहिये और सत्य सत्ता एक नहीं किन्तु असख्य होंगी। क्योंकि ऐसी दशा में सब का एक अपरिमित तत्व न हो सकेगा। इसेसे आकार और रूप को उपाधियां उत्पन हो जायगी और वेदान्त के सम्पूर्ण सिद्धात पर पानी फिर जायगा । दूसरे अब यह नहीं कहा जा सकता कि अविद्या के नाश होने पर जीवात्मा परब्रह्म में लीन हो जायगा। यह तो तभी हो सकता है जब जीवात्मा और पर- ब्रह्म दोनों पूर्व से ही एक हो और फिर पीछे से अविद्या आवृत कर ले। परन्तु ऐसी दशा में अविद्या का भी आदि होगा । अतएव जव जीवात्मा सदेव ही परब्रह्म से पृथक् है तब उस भिन्नता का नाश नही हो सकता। तीसरे अविद्या के आदि न होने से मुक्त जीवात्मा फिर बन्धन में नहीं मा ( २६ ) सकता तो फिर नवीन बन्धन में पडे जीवात्मा कहा आवंगे ? अथवा सम्पूण अविद्या सम्पूर्ण सृष्टि सहित कभी भविष्य में अन्त को प्राप्त होकर फिर उदय न होगी! दूसरी ओर एक पाश्चात्य दार्शनिक नि.शङ्क भाव से कहता है कि यह सम्पूर्ण संसार केवल कल्पना मात्र है। मैं विस्तृत्व का ध्यान बिना किसी विशेष आकार व रूप घ विस्तृत्व वाली वस्तु के ध्यान किये नही कर सकता । यह सव मन में चित्रित मूर्तिया मेरी कल्पना मात्र ही हैं। मत- एव विस्तृत मेरी इन फल्पनाओं के बिना कोई सचा नहीं रख सकता। इस प्रकार सब बाह्य वस्तुएँ भी किसी न फिसी आत्मा की, चाहे वह मैं हू अथवा कोई और हो, कल्पना मात्र हैं। यह वाह्य कल्पना-आकार, रंग आदि- मेरी दष्टि की भिन्न भिन्न दशाओं में भिन्न भिन्न स्वरूपों को प्राप्त होते हैं। जैसे किसी वस्तु से दूर होने पर वह छोटी प्रतीत होती है, जो आफार व रूप कि सूक्ष्म दर्शन यन्त्र से भासता है वह केवल नेत्रों से नहीं दीस पडता। किसी किसी मनुष्य को रग दीख नही पडते, यह उदाहरण हैं। मेरी अनुपस्थिति मे वस्तुओं की स्थिति और उनकी सत्ता के निरन्तर भासने का कारण यह है कि मेरे अतिरिक्त और भी जीवात्मा उनके दृष्टा हैं । इस समय उनमे जो परि- वर्तन हुआ प्रतीत होता हे उसका कारण दूसरे जीवात्माओं फा उन पर क्रिया करना है, परन्तु ऐसी क्रिया से उन वस्तुओं में कोई स्वतन्त्र सत्ता नही था सकती। मैं स्वप्न में भी कार्य करता हू, परन्तु इससे स्वप्न स्वतन्त्र आधार वाले नहीं हो सकते । यह सत्य है कि वाद्य कल्पना मेरे मन की अन्तरीय कल्पनाओं से अधिक स्पष्ट व स्थिर प्रतीत होती है, इसका कारण यह है कि यह वाह्य कल्पना पूर्णात्मा, जो पूर्ण और अद्वितीय है, की है । मैं दूसरे अल्पज्ञ जीवात्माओं को उनकी अपने आपसे समानता होने के कारण पहचानता ह और उनको सत्य वस्तु समझता है । जीवात्मा में विस्तृत्व नहीं है वरन् चैतन्यता है । इस कारण उसकी कल्पनाओं में भी विस्तृत्व नहीं हो सकता। अस्तु विस्तृत्व वाली जड वस्तु प्रकृति की कोई भी सत्ता नहीं है अर्थात् किसी यथार्थ वस्तु में विस्तृत्व नही हो सकता। परन्तु यह सिद्धात मूल प्रश्न को पूर्णतया बचा जाता है। यह जीवात्मा का विस्तृत्व से रहित होना सिद्ध नहीं करता । केवल यह बतलाता है कि हम जीवात्मा को देख नहीं सकते जैसे कि हम आकाश स्थित सूक्ष्म वायु "ईथर" को नहीं देख सकते, परन्तु हमारे देखने की शक्ति न होने से जीवात्मा का विस्तृत्व से रहित होना सिद्ध नहीं होता । हमारे न देख सकने का कारण हमारी अपनी निर्बलता हो सकती है। वास्तव मे जिस क्षण हम विस्तृत्व को कल्पना कहते हैं उसी क्षण हम यह स्वीकार करते हैं कि विस्तृत्व व जीवा. त्मा मे कुछ न कुछ समानता है। यदि विस्तृत्व जीवात्मा से पूर्णतया विरुद्ध होता तो हम किसी विस्तृत्व आकार व रूप वाली वस्तु की कल्पना भी न कर सकते। यह सिद्ध करने का तो बडा प्रयत किया है कि सब वस्तु कल्पना मात्र हैं, परन्तु यह सिद्ध करने का लेशमात्र भी प्रयत्न नहीं किया कि कल्पना विस्तृत्व से रहित हैं और सारा झगड़ा यही है। इसके अतिरिक्त हमारी मानसिक कल्पना इन बाह्य वस्तुओं से पूर्णतया भिन्न हैं । यह भिन्नतामात्रा को नहीं किन्तु
( ३१ )
गुण को है। हमारे मन में चित्रित कल्पना यथार्थ में चित्र.
रूप ही नही होती। भाख बन्द करके जब हम किसी वस्तु
का ध्यान करते हैं तो उस वस्तु का कोई चित्र नही सिचता,
फिन्तु हम केवल यह समझ लेते हैं कि अमुक वस्तु इस
माकार व रूप की है। अतएव यह सिद्ध नहीं होता कि जब
वह वस्तु हमारे खुले हुए नेत्रों के सम्मुख होती है तव भी
उसमे कोई सत्यता नहीं ।
स्वप्न में दृष्टि का विस्तार इतना कम होता है, समय
और स्थान ऐसे उडते हुए व बदलते हुए प्रतीत होते हैं कि
स्वप्न और बाह्य ससार में तुलना नही हो सकती। स्वप्न में
मैं जीवित मनुष्यों को और अपने आप को भी देखता हू ।
तो पया मैं तथा अन्य मनुष्य भी करपना मात्र में मेरी जागृत
अवस्था की चेतनता स्वप्नावस्था को चेतनता से अधिक
स्वच्छ व तीव्र होती है और अन्य मनुष्य भी स्वप्न के मनुष्यों
से अधिक स्थिर व सत्य प्रतीत होते हैं तो क्या इसका
कारण यह है कि यह और मैं दोनों ही पूर्णात्मा की कल्पना
मात्र हैं।
मैं दूसरे जीवधारियों को अपने समान होने से पहचा.
नता है। परन्तु ऐसे जीवधारी भी हैं जिनमें वह समानता
नहीं पाई जाती, जैसे कि एमीया की क्रियाएँ मेरी क्रियाओं
से भिन्न हैं। वनस्पति दूसरा उदाहरण है । एमीचा व वन
स्पति में जीवात्मा है या नहीं ?
परमात्मा पूर्ण है इस लिये उसकी दृष्टिभी पूर्ण है। जिल
वस्तु में हमें चार पार्श्व दीखते हैं उसके यथार्थ स्वरूप में उस
को छै दोख सफते हैं। जैसे कि मक्खी का पर्व नेत्रों की
अपेक्षा सुक्ष्मदर्शन यन्त्र से अधिक अच्छा दीखता है, परन्तु
( ३२ ) यह भेद मात्रा का है। हम ऊपर देख चुके हैं कि परमात्मा की कल्पनाओं का जैसा अल्प अनुभव हमको होता है, अर्थात् सासारिफ पदार्थ जैसे भी हमको दीखते हैं, उनसे भी हमारी कल्पना गुणों के विचार से भी भिन्न हैं । तो क्या इसका अर्थ यह है कि अल्प और पूर्ण आत्माओं में भी केवल मात्रा का ही नहीं किन्तु गुण का भी भेद है ? ऐसी दशा में जहा यह कहा जाता है कि अल्प जीवात्मा में विस्तृत्व नहीं है, यहा परमात्मा में इसके विरुद्ध गुण हो सकता है। और ऐसे भिन्न गुण वाले परमात्मा की कल्पनाओं में विस्तृत्व का गुण हमसे स्वतन्त्र व सत्य हो सकता है। हमारे मन की कल्पना याह्य वस्तुओं के चित्र कहे जाते हैं । तो क्या यह वाद्य वस्तु परमात्मा के भी मन में किन्हीं और बाह्य वस्तुओं के जो फि और अधिक सामर्थ्यवान मात्मा की कल्पनाएँ हैं-चित्र है? यदि ऐसा है तब तो इस श्रेणी का कहीं अन्त नहीं है। नहीं तो यह प्रत्यक्ष हे कि बाह्य वस्तुऐं, केवल कल्पना रूप चिन नही हैं वरन् सत्य वस्तुएँ - हैं जो अपनी स्वतन्त्र सचा रपती हैं। पूर्णात्मा एक फल्पित वस्तु है। हम उसके रूप, सङ्गठन, शक्ति, धर्म और उसका जीवात्माओं से जो सम्बन्ध है उसको नहीं जानते और न हम यह ही जानते हैं कि वह ससार को कैसे उत्पन्न करता है । यह सब बातें हमारे ज्ञान से परे हैं। परन्तु क्या इस प्रकार उसकी स्थिति को कल्पित करके उन वस्तुओं को, जिनको हम वाह्य कल्पना कहते हैं, स्वतन्त्र सत्ता को न मानने के लिये हमें युक्ति मिल जाना पर्याप्त नहीं है। यदि कोई और आत्मा ससार को देखने वाली न हो तो जिस समय मैं गाढ निद्रा में होता उस समय संसार की कोई सत्ता न रहे। जब मैं गाढ निद्रा में अथवा सज्ञा हीन होता हू तव मेरी भी सत्ता क्या इसी कारण रहती है कि कोई और मात्मा मुझे देखता है या मेरी चेतनता को अनुभव करता है ? नही तो मेरी निरन्तर सत्ता का क्या कारण है? हम एक फुट को इञ्च से नापते हैं। सूक्ष्मदर्शन यन्त्र में फुट व इञ्च दोनों ही बढ जाते हैं, परन्तु उन दोनों का परस्पर सम्बन्ध एक ही रहेगा। इससे सिद्ध होता है कि परिवर्तन हमारी दृष्टि की शक्ति में है वस्तुओं के आकार में नहीं है। यदि विस्तृत्व केवल कल्पना ही है और इस कारण आध्या- त्मिक है तव तो चैतन्यवाद और प्रकृतिवाद में कोई वास्त- विक विरोध ही नही रहता । जो जड प्रकृति का गुण समझा जाता है वह आध्यात्मिक उपाधि हो जाती है। और यदि विस्तृत्व पूर्णतया असत्य है तो सत्य सत्ता में असत्य सत्ता कहा से आ गई। इसके अतिरिक्त यदि वह अपरमित पर- मात्मा सर्वव्यापक है तब वह पदार्य व कल्पना सब ही में व्यापफ होगा इस कारण रूप, आकार व विस्तृत्व भी उससे पृथक् नहीं हो सकते । व्यापकता का सिद्धांत ही विस्तृत्व को सिद्ध करता है। एक दूसरे दार्शनिक का मत है कि स्थान व समय दोनों मन की क्रिया के स्वाभाविक रूप हैं। इसी कारण प्रत्येक वस्तु के ज्ञान में इनका होना आवश्यक है। अतएव पत्तुओं का स्वरूप मन के इन दोनों स्वाभाविक गुणों से रगा रहता है। इसी कारण हम उनके यथार्थ स्वरूप को नहीं देख सकते और सम्भव है कि वह यथार्य स्वरूप इस स्वरूप से पूर्णतया
( ३४ )
मिन्न हो । परन्तु स्थान व समय का सहजज्ञान विषय होने
से यह सिद्ध होता है कि वह ऐसी सत्य वस्तु है कि उनको
अपनी सत्यता की सिद्धि के लिये किसी और प्रमाण की
आवश्यकता नहीं है। इसका तात्पर्य यह नहीं है कि यह
केवल मानसिक वृत्तिया हैं। वास्तव में यह कहा जा सकता
है कि स्थान और समय और अपनी आत्मा में किसी समा-
नता के कारण मैं विचार व तर्फ शक्ति के उदय से पूर्व ही
बिना किसी झिझक के उन्हें स्वीकार कर लेता हू।
वह कहते हैं कि विचारात्मक बुद्धि इन भ्रमात्मक स्व.
रूपों के ज्ञान को प्राप्त करती है और क्रियात्मक बुद्धि आत्मा
व परमात्मा को स्वतन्त्र सत्ता चाली वस्तु सिद्ध करती है।
क्योंकि मेरे प्रत्येक कार्य में उनकी स्वीकृति होती है।
मैं तर्क से इसको सिद्ध न कर सकू, परन्तु मेरी क्रियात्मक
बुद्धि जो विचार विषयक से अधिक निश्चयात्मक है उनकी
सत्ता की ओर संकेत करती है। इसमें तो सन्देह है कि
क्रियात्मक बुद्धि परमात्मा की सत्ता को स्वीकार करती है,
परन्तु इसमें लेशमात्र भी सन्देह नही कि इसमें स्थान और
समय की सत्ता की स्वीकृति अवश्य है। मैं स्थान और
समय की सत्ता को मानते हुए केवल विचार ही नहीं करता
किन्तु कर्म भी करता हूं। यह मैं अपनी ज्ञान इन्द्रियों की
शकि के चेतन होने से पूर्व ही करता हूं। क्योंकि नवोरपन्न
शिशु जव हाथ पैर हिलाता है तब ही इनको स्वीकार कर
लेता है। स्थान और समय क्रिया के लिये इतने ही आवश्यक
हैं जितना कि जीवात्मा। अतएव स्थान और समय भी ऐसी
ही सत्य सत्ता वाले हैं जैसा मैं हू।
अतएव दार्शनिको का एक दूसरा समूह द्वैतवाद को खी.
।
( ३५ ) कार करता है । जड प्रकृति और चैतन्य आत्मा दोनों ही सत्य वस्तु हैं जिनकी स्थिति एक दूसरे से स्वतन्त्र है । परन्तु प्रकृति तो जड और जीवात्मा अल्प शक्ति है । दोनों में कोई सा भी इस जटिल व विचित्र ससार को उत्पन्न नही कर सकता और न नियम बद्ध ही कर सकता है। इस कारण ईश्वर जो सर्वव्यापक, सर्वशक्तिमान् तथा सर्वज्ञ है, प्रकृति और जीवा- स्मा को मिला फर सृष्टि की रचना करता है। यह तीनों अनादि व अविनाशी हैं । इन तीनों की स्थिति एक दूसरे से स्वतन्त्र है , परन्तु उनकी शक्तियां व धर्म भिन्न भिन्न हैं। और बहुत सी बातो के अतिरिक्त जिन का विचार "ईश्व- र" नाम दुसरे पाय में होगा एक जटिल समस्या है जो इस सिद्धात की जड को ही काट देती है। कहा जाता है कि यह पूर्ण परमात्मा सर्वव्यापक है। सर्वव्यापकता का अर्थ यह है कि ससार के सूक्ष्म से सूक्ष्म वस्तु में भी उसकी स्थिति है । यदि "अ" "व" में सर्वव्यापक है तो "" केवल "अ" का एक दुसरा स्वरूप है क्योंकि यदि "" में "अ" के अतिरिक कोई और वस्तु भी है तो "" के सव सूक्ष्म से सुत्म स्थानों में केवल "अ" ही नहीं होगा। इस कारण हम "अ" को सर्वव्यापक नही कह सकेंगे। इसी प्रकार यह ससारभी ईश्वर का ही एक दूसरा स्वरूप होना चाहिये। यदि कोई और वस्तु भी ईश्वर के समान अनादि व अनन्त है और जिस की सत्ता ईश्वर की सत्ता से स्वतन्त्र है तो ईश्वर सर्वव्यापक नहीं हो सकता । कभी कभी यह कहा जाता है कि ईश्वर इसी प्रकार सर्वव्यापक है जिस प्रकार आकाश आकाशस्थित वस्तुओं में है , परन्तु आकाश केवल स्थान वा अवकाश के अर्थ में कोई पृथक् सचा वाली वस्तु नही है। यह तो किसी पूर्व स्थिती ( ३८ ) शून्य से क्या प्रयोजन है ? क्या कोई स्थान ऐसा शून्य था जहा पर कि उसको अपनी उपस्थिति नही थी और जिससे उसने संसार को रच दिया तव तो वह सर्वव्यापफ नहीं है। उसके बाहर आकाश में क्या वस्तु है ? अथवा वह शून्य स्थान में किस प्रकार रहता है ? इन अनेक सितारों की रचना किस समय और कैसे हुई क्या वह सदैव बनाता और विगाडता रहता है अथवा उसके काम करने का कोई विशेष समय है ? इसके अतिरिक्त शून्य से कोई वस्तु प्रकट भी कैसे हो सकती है। मन गढन्त तथा युकि रहित सिद्धातों से सत्य जिज्ञासा सतुष्ट नहीं हो सकती। सर्वव्यापकता पर विचार करने से यह तो प्रत्यक्ष होगया कि अद्वैतवाद ही सत्य हो सकता है। यदि ईश्वर की सत्ता को छोड़ भी दे फिर भी प्रकृति और जीवात्मा दो सता रह जाती है। यदि यह दोनों परिमित हैं तो उनसे परे अपरिमित घस्तु फमा है ? उस अपरिमित वस्तु का इन दोनों से क्या सम्बन्ध है ? प्रकृति और जीवात्मा के परस्पर सम्बन्ध का प्रवन्ध किस प्रकार होता है और सृष्टि की रचना किस प्रकार हुई ? क्या कोई अपरिमित वस्तु विना सर्वव्यापक हुए अप- रिमित हो सकती है ? क्या परिमित परन्तु स्वतन्त्र सत्ता उस अपरिमित को भी परिमित न कर देगी? वास्तव में आश्चर्य यही है कि दार्शनिकों ने बड़े बडे गम्भीर सिद्धांतो के निश्चय करने में और उनको बडी सूक्ष्म युक्तियों से समर्थन करने में तो इतना कष्ट उठाया, परन्तु जो वात प्रत्यक्ष थी वही न पकडी फि प्रकृति व जीवातमा में भी समानता है। विवेकानुसार किसी वस्तु की खतन्त्र सत्ता नही हो सकती जब तक कि उसमे अपना विशेष ,
(३६)
विस्तृत्व न हो। चैतन्य व आध्यात्मिक शब्दों का प्रयोग
विस्तृव से विरुद्ध अर्थों में अर्थ रहित शब्द हैं। गुण, दशा,
सम्बन्ध विचार करने की सुगमता के लिये अलग समझ लिये
जाय , परन्तु उनकी यथार्थ में कोई खतन्त्र सत्ता नही हो,
सकती। ऐसी पृथक्ता में ही उनकी सत्ता विस्तृत्व रहित कही
जा सकती है। यदि जीवात्मा भी इसी प्रकार विस्तृत्व रहित
है तो वह शरीर का केवल गुण मात्र हो सकता है और शरीर
के साथ उसका भी अन्त हो जाना चाहिये । और यदि जो
युक्तियां कि जीवात्मा के पृथक् स्थिति को सिद्ध करने के
लिये दी जा चुकी हैं वह हमको सतोप जनक हो तो यह मा.
नना पडेगा कि आत्मा में भी अवश्य विस्तृत्व है। उसका
स्वरूप क्या है आगे के एक पाद में कहेंगे । परन्तु हमारा
उसको न देख सकना उसमें विस्तृत्व न होने का प्रमाण
नहीं है । हम और भी वस्तुओं को नहीं देख सकते जिनमें कि
हम घिस्तृत्व होना स्वीकार करते है जैसे कि वायू, ईथर,
परमाणु। कोई कोई कहते हैं कि सत्य सत्ता केवल शक्ति ही
की है जो विस्तृत्व को धारण कर लेती है। यदि इसका
अर्थ यह है कि शकि ही क्रिया करने वाली सत्ता है तब तो
यह यात ठीक हो सकती है क्योंकि कोई कार्य विना शकि
के नहीं हो सकता। और यदि इसका अर्थ यह है कि
विस्तृत्व शक्ति से प्रफ्ट हो जाता है तो इसका असम्भव होना
प्रत्यक्ष है, सिवाय उस दशा के जव कि शक्ति में ही
विस्तृत्व हो चाहे हम उसको देख न सके । जड प्रकृति और
चैतन्य जीवात्मा के गुणों में इतनी भिन्नता होने से भी समानता
का होना असम्भव नहीं हो जाता। परथर गिरता है और वायु
। ऊपर को चढता है। नियमित तोल का पत्थर याकार में घट
.
(४२)
परिस्थिति के सङ्कुचित विचारों से परे जाने का प्रयत्न
कर रही है, परन्तु जो ज्ञान की उन्नति में केवल एक महत्व
पूर्ण पाद रूप था वह धर्माचार्यों के लिये पत्थर की लकीर
हो जाता है कि जिससे तनिक भी इधर उधर होने से सीधी
सडक नर्क को मिलती है। उसकी शक्ति सीमा रहित है।
घह शून्य से ही संसार को प्रकट कर देता है। यह एक तृण
के सूचम से सूक्ष्म स्थान में भी उपस्थित है। उसका ज्ञान
अपरिमित है । वह भूत, वर्तमान, भविष्य सब को जानता है ।
कोई उसे विशेष व्यक्ति कहते हैं और कोई उसको निरा-
फार समझते हैं, परन्तु उसके गुण सब पूर्ण हैं । विशेष व्यक्ति
में आकार और रूप का बन्धन है इस लिये निराकार स्व.
रूप में सर्च व्यापकता और अपरिमितता रूप गुण ठीक ठीक
घट सकते हैं और उसके रूप के निरूपण की आवश्यकता
नही रहती, परन्तु चाहे वह साकार हो या निराकार उसकी
शक्तियां सब पूर्ण है।
इस सिद्धात पर कि वह ससार को शून्य से प्रकट कर
देता है हम विचार कर चुके हैं। हम यह भी देख चुके हैं कि
सर्वव्यापकता में प्रकृति व जीवात्मा की स्वतन्त्र सत्ता नहीं
रह सकती और ऐसी दशा में वह उसी के स्वरूप होंगे।
यह तर्क हो सकता है कि आत्मा शरीर में सर्वव्यापक है
और फिर भी उससे स्वतन्त्र है, परन्तु यथार्थ में ऐसा नहीं
है। जिस समय हम संज्ञाहीन होते हैं उस समय पिन चुभाने
से हमें वह उत्तेजना नहीं होती जो किजागृत अवस्था में होती
है। जागृत्-अवस्था में भी यदि किसी विचार में डूबे हों तो
हमें बहुत सी बातों का भान नहीं होता जब तक कि किसी
असाधारण प्रभाव से हमारा ध्यान उस ओर आकर्षित न
-
( ४३ ) हो, जोवारमा शरीर में इसी प्रकार सर्व-व्यापक प्रतीत होता है जैसे मीठे पानी में खाड हो, परन्तु यथार्थ में खांड जल में सर्व व्यापक नहीं कही जा सकती। ऐसी कभी कभी होने वाली व्यापकता सर्व-व्यापक वस्तु की नहीं हो सकती। सर्व व्यापकता के लिये सूक्ष्म से सूक्ष्म स्थान पर उपस्थित होना ही नहीं फिन्तु यह भी आवश्यक है कि वह प्रतिक्षण निरन्तर उपस्थित रहे। सर्वव्यापकता से स्वभावतः यह प्रतीत होता है कि प्रकृति व जीवात्मा में ही नहीं किन्तु ईश्वर घ प्रकृति और जीवात्मा के तत्व में भी समानता है। उसके सर्वशक्तिमान और सर्वज्ञ होने से भी बहुत सी कठिन समस्या उपस्थित हो जाती हैं। यह एक पुराना प्रश्न है कि ईश्वर ने इस ससार को क्यों बनाया जिसमें इतना दुःख इतना पाप इतनी घृणित व कुत्सित वस्तु हैं। इस प्रश्न का समाधान अनेक असन्तोषजनक प्रकारों से किया जाता है। कोई कहते हैं कि भलाई के पूर्ण अनुभव के लिये कुछ बुराई फा होना भी आवश्यक है। जैसे बिना सूर्य से तपे हम पेड की छाया का पूर्ण आदर नहीं करते इसी प्रकार बिना के सुख का पूर्ण अनुभव असम्भव है, परन्तु इसका तात्पर्य यह हुआ कि हममें स्वाभाविक दुष्टता है जिससे हमें मलाई ग्रहण करने की आवश्यकता है। हमारे स्वभावों को दुष्ट किसने बनाया १ यदि यथार्थ ज्ञान की हमें अपने मन को शुद्ध करने के लिये आवश्यकता नही किन्तु ईश्वर की शक्ति व प्रभाव को समझने के लिये है तो यह प्रश्न होता है कि ईश्वर अपनी शक्ति को समझाना ही क्यों चाहता है ? क्या वह भी दीन मनुष्यों के समान अहङ्कार व अभिमान से प्रस्त है? कोई कहते हैं कि ईश्वर ने ससार अपनी असीम कृपा । (४४) के प्रयोग करने के लिये बनाया है। यह तो परमात्मा का अद्भुत खेल हुआ कि पहिले तो कृपा की आवश्यकता उत्पन्न कर दे और फिर कृपा करे ! क्या मनुष्यों को दुःखी करना ही कृपा करना है? वह कृपासिन्धु इस बात को सहन ही कैसे करता है कि उसकी सृष्टि के जीवधारी दुखी हों? क्या उसकी पूर्ण शक्ति ऐसा नहीं कर सकती कि हमें उसकी कृपा व कोमलता का यथावत् ज्ञान विना पाप व दुःख के ही हो जाय? कोई कोई तो दुख रहित केवल सुख से परिपूर्ण ससार को नीरस कहते हैं। वे अपने निर्माता का कैसा यश गाते हैं कि उसको ससार को रसीला बनाने के लिये दुख की आवश्यकता पड़ी! कोई कहते हैं कि परमात्मा ने ससार को इस लिये बनाया है कि जीवात्मा अपने सस्कारों को भोग सकें। अपने पुण्य पापों का सुख दुःख भोग सके। क्योंकि स्वर्ग और नरक दोनों संसार में ही हैं। वह कहते हैं कि ईश्वर, जीवात्मा और प्रकृति तीनों अनादि हैं। सृष्टि के प्रवाह में जीवात्मा फर्म करते हैं। इन कम्मों से संस्कार बनते हैं । जब नियमानुसार प्रलय होती है तो बहुत से जीवात्मा ऐसे रह जाते हैं जिनके सस्कार शेप रह जाते हैं। इन सस्कारों को शांत करने के लिये सृष्टि की फिर रचना होती है । संस्कार अच्छे, बुरे दोनों प्रकार के होते हैं। इस कारण ससार में सुख और दुख दोनों होते है। परन्तु फर्म तो तय ही हो सकते हैं जर ससार पहले से हो। यद्यपि ईश्वर की इस सृष्टि के आदि का किसी को झान न हो, परन्तु ऐसी सृष्टि कि जिसमें संस्कार बनते हों ईश्वर द्वारा रचा जाना इस यातको सिद्ध करता है कि आदि में किसी समय बिना सस्कार के भी जीवात्मा के (४५) जिनके सस्कार इस सृष्टि में बने। इस सिद्धात से प्रथम तो सृष्टि रचना का आदि होना ही निश्चित हो जाता है। दूसरे मूल प्रश्न का कोई उत्तर न मिला। क्योंकि उस प्रथम सृष्टि में भी जिससे पहिले कि कोई सृष्टि नही थी और जिसमें प्रथम ही सस्कार घने थे घुराई व भलाई होगी इसी कारण मले व बुरे सरकार बने जिससे पीछे का सब सृष्टि प्रवाह भ्रष्ट हो गया। यह नहीं कहा जा सफताकि सस्कार जीवात्मा में स्वाभाविक हैं इस कारण उनके बनने की आवश्यकता नहीं क्योंकि ऐसी दशा में उनमें परिवर्तन नहीं हो सकता और अच्छे सस्कार अच्छे ही रहेंगे और बुरे बुरे ही रहेंगे। ऐसी दशा में सस्कारों के शात करने अथवा पुण्य पाप का फल देने का कोई प्रयोजन ही नहीं रहता। और सृष्टि रचना की भी कोई आवश्यकता नहीं रहती। यदि हमारी प्रकृति स्व- भावत ही बुरी है तो वह अच्छी नहीं हो सकती। यदि जीवात्माओं को भी ईश्वर ने ही बनाया हो तो इस प्रश्न की कठिनता और भी बढ़ जाती है। उसने ऐसे जीवात्मा क्यों बनाये जो पाप कर सकें और यदि भूल से पहिले यह कर भी दिया तो अब क्यों नहीं उनको नष्ट करके ससार सदैव के लिये पवित्र फर देता? फेवल यह फह देने से कि सृष्टि प्रवाह अनादि और अनन्त है कोई प्रयोजन सिद्ध नहीं होता। इससे तो केवल ईश्वर की अपनी भूल को ठीक करने की अशक्ति सिद्ध होती है। कोई कोई बुराई की सत्ता ही नहीं मानते। हमें कोई चात पुरी अपने अल्पज्ञान के कारण प्रतीत होती है। भलाई और धुराई विचार की घात हो सकें या न होसकें, परन्तु दुःख एक भाव है जिसे ऐसी सुगमता से नहीं उडाया जा सकता ।
परन्तु वह कहते हैं कि हमारा दुस्स उसकी कृपा का प्रमाण हैं। क्योंकि अब हम पवित्रता और उसकी दया को प्राप्त करने की राह पर हैं। यह हमारी जांच का समय है। हमें यह सिद्ध करना है कि हम उसकी दया के पात्र हैं। यह इस बात का चिन्ह है कि वह हममे इस जांच में पड़ने की शकि समझता है। यह इस बात का सङ्केत है कि वह हम पर अपनी दया की वर्षा करने के लिये उतारू बैठा है। हमें भी सन्तोप करना घ उसको धन्यवाद देना उचित है । हमें उस की इच्छानुसार रहना चाहिये जिससे आने वाली शातिको प्राप्त कर सकें। परन्तु जब वह हमको पहले से धर्मात्मा व सत् पुरुप बना सकता था तो फिर इस प्रकार दुःख से जाच करने की क्या आवश्यकता थी? दुःख सामर्थ्य का चिन्ह नही है। कोई उसको सहन करलेते हैं और कोई नही कर सकते। उलटे खिन्न होकर अधिक गिर जाते हैं । इसका अर्थ यह हुआ कि दुःख पापों का परिणाम नही किन्तु उसकी दया का चिन्ह है । कैसी अद्भुत दया है । यदि हम उस जाच में न उतरें तो क्या शांति फिर भी मिलेगी ? यदि इसका यह अर्थ हो कि दुःख हमारे पापों का फल है और उसके भोगने से हमारे पाप नए होकर हम पवित्र हो जाते हैं, और भविष्य में अधिक सुखमय जीवन के अधिकारी हो जाते हैं तो इसमें दया क्या हुई; हमारे पापों का दण्ड तो मिल ही गया। इसके अतिरिक्त इस मूल प्रश्न का कि ससार में पाप क्यों हुआ कोई उत्तर ही नहीं मिला। कोई कहते हैं कि किसी भी कर्म मे स्वाभाविक घुराई नही किन्तु हमारे शरीर अथवा समाज पर उसके चुरे प्रभाव के कारण वह बुरा कहाता है। किसी को मारने की क्रिया में (४७ ) कोइ चुराई नहीं है । युद्ध में ऐसा होता ही है। एक धर्मात्मा न्यायाधीश किसी घातक को प्राण दण्ड देता है, परन्तु इससे पतित नहीं होता। परन्तु जो वध मनुष्य जानि के कल्याण के लिये अथवा अपनी रक्षा के लिये नहीं किन्तु अपने द्वीप को शात करने के लिये किया जाता है वही पाप हो जाता है। इसी प्रकार दूसरे की वस्तु लेना स्वभाव से पाप नहीं है, चाहे घह राजनैतिक अपराध हो। जब कोई भूको मरता मनुष्य भोजन मात्र के लिये चोरी करता है तो उसे निन्दित नहीं समझते। परन्तु स्वभाव से नीरस कम्मों और हम में अथवा समाज सङ्ग- ठन में वैमनस्य ही क्यों हुआ? सब बातें समान भाव में क्यों न रची जिससे किसी दशा में भी कोई दोष न होता? यह कहा जा सकता है कि प्रत्येक स्थिति पूर्व की कारण रूप स्थिति का स्वाभाविक परिणाम है । परन्तु दुख तो भाव सम्बन्धी है। यदि स्वाभाविक परिणाम के साथ यह दुख न लगा होता तो कहा जा सकता था कि ससार में कोई कष्ट नहीं है और सब बातें प्राकृतिक कार्य क्रम से होती हैं, परन्तु ऐसा कोई कार्य क्रम ही क्यों है जिसमें किसी दुख की सम्भावना हो? अथवा हमारे स्वभाव ही ऐसे क्यों न कर दिये कि इस कार्य क्रम के दुःख का अनु- भव ही न होता? अच्छा, भलाई और बुराई के प्रश्नको जाने दीजिये। उसने संसार को बनाया ही क्यों? क्या उसको अपनी शक्ति दिखानी थी? क्या वह भी प्रशंसा की इच्छा रखता है ? यह कैसी अद्भुत यात है कि उसकी यह अभिलापा पूर्ण भी नहीं हो सकती क्योंकि उसने मनुष्य को अल्पज्ञ यनाया है जिससे कि सृष्टि की असख्य आश्चर्य-जनक वस्तुओं का
कैसा अद्भुत
(४८ )
मनुष्य को ज्ञान ही नहीं होता और बहुत सी वस्तुओं का
ज्ञान वह केवल तर्क से प्राप्त करता है।
क्या ईश्वर सृष्टि की रचना अपने समय को व्यतीत करने
के लिये अथवा अपने मन को बहलाने के लिये करता है ?
क्या उसको भी समय भारी लगता है, परन्तु
उसका खेल और कैसी अनोखी उसफी प्रवृत्ति दूसरों का
कष्ट और उसका मन बहलाव ।
कोई कहते हैं कि वह अपना असीम प्रेम सब को देने के
लिये सृष्टि बनाता है, परन्तु कैसा अद्भुत उपाय है प्रेम
दिखाने का क्या उसफा प्रेम सुखमय ससार में न दिखाया
जा सकता था? इन "सब" की रचना ही क्यों की केवल
अपने चित्त को बहलाने के लिये। यदि यह "सव" पहले से
ही स्वतन्त्र जीवात्माओं के स्वरूप में उपस्थित थे तो उसने
क्यों न अपना अद्भुत दर्शन सदैव देकर बिना किसी जाच के
उन्हें अपना प्रेम दिखाया। कैसा न्याय है कि पहिले तो झगड़े
और कष्ट में फेंक दिया और फिर अपने ही यनाये हुए दुखों
से आप ही उनके रक्षक बने । वास्तव में या तो ऐसे ईश्वर में
दया का होना असम्भव है अथवा उसके सर्वशक्तिमान् होने
के सम्बन्ध में हमारा विचार असत्य है।
इससे भी कठिन समस्या उसके सर्वज्ञ होने से होती है।
वह सब प्रकार से पूर्ण है। उसका ज्ञान भी पूर्ण है। उसका
ज्ञान हमारे से अधिक विस्तृत व सूक्ष्म हो सकता है परन्तु
कम नहीं हो सकता। वह भूत, वर्तमान व भविष्य की सूक्ष्म से
सूक्ष्म सम्भव वात को जानता है। वह जानता है कि अमुक
समय पर गोपाल क्या करेगा। यदि ऐसा है तो प्रत्यक्ष ही
गोपाल का कार्य पहले से ही नियत है, नहीं तो वह शान
( ६ ) का विषय कैसे हो सकता है। यह सत्य है कि ईश्वर का ज्ञान इसके नियत होने का कारण न हो, परन्तु उसका प्रमाण अवश्य है। यदि वह कार्य पूर्व से ही नियत है तो उसका दोष गोपाल पर क्यों ? इसका यह उत्तर हो सकता है कि दोप का कोई प्रश्न नहीं। ईश्वर यह जानता है कि गोपाल क्या करेगा , परन्तु वह यह भी जानता था कि इसका परिणाम क्या होगा। वह कार्य व उसका परिणाम दोनों ही नियत थे । यह तो प्राकृतिक कार्य क्रम मात्र है। एक ईर ऊपर से गिरती है और उसके दो टुकडे हो जाते हैं। इसमें उत्तरदायित्व की कोई बात नहीं है। यही दशा मनुप्य के कम्मों की है। विचार करो कि यदि गोपाल को नियत समय पर छत्त पर से गिरना है, तो उसका परिणाम, कि एक विशेष प्रकार से गिरने पर उसकी टाग टूट जायगी, ईश्वर को ज्ञात है। गोपाल गिरने का उत्तरदाता न हो , परन्तु टाग तो उस- की फिर भी टूटेगी ही। यहां तक तो कुछ झगडा नहीं है परन्तु इस गिरने से गोपाल के भावों में कोई अन्तर न पड़ना चाहिये। गिरने का स्वामाविक परिणाम टाग का टूटना हो परन्तु उसके साथ गोपाल को दु ख क्यों हो? यह तर्फ हो सकता है कि यदि गोपाल को नन्दन धक्का दे दे तो यद्यपि गोपाल अपने गिरने में दोषी नही है फिर भी उसको टाग के टूटने का दुख सहन करना पडेगा। इस दशा में भी उत्तरदा- यित्व का सिद्धात यह कहेगा कि गोपाल को इस गिरकर दु.ख का दण्ड उसके अपने किसी पूर्व कर्म का फल मिला है। उसने नन्दन को काट दिया होगा अथवा उसने किसी और पुरुप को कर दिया होगा जिसका उसको यह दण्ड मिला। परन्तु जब सब कर्म ही पूर्व नियमित हो जाते हैं तव लम्पी से ।
( ५० )
लम्बी श्रेणी में भी कोई ऐसा कार्य नहीं रहता जिसका गोपाल
उत्तरदायी हो सके । उसको किसी दशा में भी दुःख नहीं
होना चाहिये । यदि ईश्वर में जानने की शक्ति है परन्तु यह
उस शक्ति का प्रयोग भविष्य के जानने में नही करता तो भी
काम नहीं चलता। यह बात ही कि भविष्य जाना जा सकता
है इस बात को सिद्ध करती है कि भविष्य इतना निश्चित
है कि वह ज्ञान का विषय हो सके। इससे उत्तरदायित्व
के सिद्धात की समस्या मे कोई भेद नहीं पड़ता। यह भी
कहा जा सकता है कि ईश्वर यह तो जानता है कि गोपाल
क्या करने वाला है , परन्तु यह यह भी जानता है कि गोपाल
अपनी स्वतन्त्र इच्छा से उसमे परिवर्तन भी कर सकता है।
यदि गोपाल ऐसा नही करता तो वह अवश्य उसका उत्तर
दायी होना चाहिये । और यदि गोपाल उसमें कोई पापमय
परिवर्तन कर दे तो फिर वह पयो न दोषी हो ? परन्तु ईश्वर
इस बात को जानता है या नही कि गोपाल अमुफ परिवर्तन
करेगा अथवा कोई परिवर्तन नहीं करेगा ? यदि वह यह नहीं
जानता तब तो उसका ज्ञान मनुष्य की बुद्धि से परिमित है।
और यदि वह इसको भी जानता है तो वह परिवर्तन भी पूर्व
से नियत है। इसका अर्थ यह होगा कि गोपाल को यथार्थ में
कोई स्वतन्त्रता नहीं। उसका मन स्वभावतः उसी कार्य की
ओर जायगा जो पहले से नियत है।
यह कहा जाता है कि ईश्वर केवल सिद्धांतों व नियमों
को जानता है उनके विशेष प्रयोगों से उसे कुछ प्रयोजन नहीं।
इससे उसका ज्ञान बहुत कुछ परिमित हो जाता है। वह
सर्वज्ञ नहीं हो सकता। वह गापाल के कर्मा को नहीं जान
सकता और इसलिये न तो उसको दण्ड दे सकता है और न
( ५१ ) पुण्य फल दे सकता है। वह केवल एक बार नियम बना देता है और फिर सो जाता है। वह संसार का फिर कुछ प्रबन्ध नहीं करता। यदि विशेष प्रयोगों को न जानने से ईश्वर की शक्ति की अपूर्णता है तब इस में भी सन्देह है कि वह नियम भी बना सकता है या नही। क्योंकि इस कार्य के लिये तीव्रतम चैतन्य शकि की आवश्यकता है जिससे नियम सम्बन्धी सम्पूर्ण स्थितियो, सम्भावनाओं व परिणाम का यथावत् ज्ञान हो सके। यह तभी हो सकता है जब छोटी छोटी बातो के जानने की शक्ति भी हो । और यदि उसमें इनके जानने की शकि तो है पल्तु वह उस शक्ति का प्रयोग नहीं करता और जान बूझ कर अमान अवस्था में रहता है तो भी उत्तरदायित्व की समस्या सडी हो जाती है। 'एक और बडी कठिन समस्या है। ईश्वर सर्व व्यापक, सर्व शकिमान् व सर्वज्ञ है। वह एक पत्थर के टुकडे आदि सब वस्तुओं में व्यापक है। परन्तु उसके यह गुण उस पत्थर के टुफडे में दूढ़े भी नहीं मिलते । पत्थर के टुकडे को भी सर्व शक्ति मान् व सर्वज्ञ होना चाहिये नही तो यह कैसे कहा जा सकता है कि पत्थर में ईश्वर उपस्थित है ? यह कहा जाता है कि ईश्वर पत्थर में है तो सही परन्तु उसकी शक्तिया उसमें गुप्त हैं । इससे कई प्रश्न खडे होते हैं । उसके सर्व व्यापक होने का जो अनुमान है व सत्य हो या असत्य, परन्तु इसके विरुद्ध यह निश्चित है कि पत्थर में उसके गुणों को हम नही देख सकते। इसका परिणाम यह हो सकता है कि हम अपने पूर्व के अनुमान पर फिर विचार करें, परन्तु इससे हमको यह अधिकार कदापि नहीं होता कि हम एक दूसरी मनमानी हाफ दें कि उसके गुण पत्थर में गुप्त रूप से हैं। दूसरे यदि वह गुण गुप्त रूप से भी ( ५२ ) पत्थर में उपस्थित हैं तो भी क्या वे कभी त्रिकाल में प्रत्यक्ष होते हैं ? यदि ऐसा नहीं है तो हमारे पास यह कहने के लिये कि ईश्वर पत्थर में किसी समय भी उपस्थित है क्या कारण है? तीसरे हम जानते हैं कि ससार में कुछ पदार्थ तो चैतन्य और कुछ जड़ हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि ईश्वर के गुण चैतन्य पदार्थों में इतने गुप्त नही हैं जितने कि जड पदार्थों में हैं, क्या इसका अर्थ यह है कि ईश्वर अपनी ही सत्ता के विविध भागों में एक ही समय पर जीवित और जीव रहित, चैतन्य व जड़, फर्ता व अकर्ता हो सकता है ? फिर जड और चेतनके गुण कहा तक तो ईश्वर के है और कहां तक प्रकृति व जीवात्मा के हैं ? और क्या प्रकृति व जीवात्मा के स्वाभाविक गुण ईश्वर के गुणों को द्वा लेते हैं जो वह गुप्त हो जाते हैं और अपने गुणों को प्रकट कर देते हैं ॐराम ३-आदि तत्व-पर ब्रह्म। हमने देखा कि जिस प्रकार हम समझते हैं उस प्रकार प्रकृति व जीवात्मा की स्वतन्त्रसत्ता, सृष्टि का प्रयोजन, मनुष्य का उत्तरदायित्व, ईश्वर की सर्व व्यापकता सर्व-शक्तिमत्ता और सर्वशता में ठीक नहीं घटते। यदि यह गुण यथार्थ में उसमे हैं तो इनका अर्थ उन प्रों से भिन्न है जो हम अब तक सम- । झते रहे हैं। इनमें सबसे अधिक महत्व का गुण सर्व व्यापकता है। विना इस गुण के ईश्वर, ईश्वर ही नहीं रहता। इसके कारण सब पहिले ही कहे जा चुके हैं। उनके अतिरिक्त, एक कारण यह भी है कि विना ईश्वर के सव व्यापक हुए और विना सव वस्तुओं के उसके स्वरूप मात्र हुए हमारी जिज्ञासा
.
सन्तुष्ट नहीं हो सकती, और न हमारी ब्रह्मशान सम्बन्धी
समस्या का काई उत्तर ही मिल सकता है। जब तक आदि
तत्व एक से अधिक माने जावेंगे तब तक यह स्वीकार
करना पडेगा कि वह एक दूसरे से परिमित हैं। परिमित का
अर्थ ही यह है कि उससे परे कुछ और भी है जिससे कि यह
सीमा बधी । हमारा मन इस खोज को तभी छोडता है जब वह
अपरिमित तत्व तक पहुचता है क्योंकि फिर परे जाने की
सम्भावना ही नहीं रहती।
ब्रह्मशान सम्बन्धी समस्या का केवल अपरिमितताके सिद्धात
से ही शात होने का कारण मनुष्य की अल्पज्ञता नही किन्तु
समस्या की स्वाभाविक आवश्यकता अथवा आदि तत्व का
प्राकृतिक स्वभाव है। ज्ञान के भेद से वीच के पदार्थो की सख्या
व दशा के ज्ञान में भेद हो सकता है, परन्तु अन्तिम तत्व तो
अपरिमित हो हो सकता है । प्रत्येक परिमित वस्तु के सिद्धात
का स्वाभाविक परिणाम यही है कि वह अपने से अतिरिक और
वस्तु की सत्ता के लिये स्थान छोड दे। यदि यह भी मान लिया
जाय फि किसी पूर्णात्मा का ज्ञान भी पूर्ण है जिससे वह यह
भी जानता है कि उसकी अपनी उत्पत्ति कर कहा और कैसे
हुई, तो उसको यह भी जानना चाहिये फि उससे पहिले व
उसके परे क्या था, और फिर उससे परे, फिर उससे परे इसी
प्रकार अनन्तश्रेणी तक । ऐसी उत्पत्तियों का अन्त नहीं होता
जब तक कि उसका पूर्णज्ञान भी अपरिमित तस्व तफन पहुंचे।
कोई कहते हैं कि इसी अपरिमित के एक भाग को हम
नाप सकते हैं। जो यात किसी एक रस वस्तु के
सम्बन्ध में सत्य हो सकती है वही उसके पूर्ण स्वरूप के लिये
भी सत्य होगी। अस्तु जब भाग नापा जा सकता है तो पूर्ण
-
माग के
( ५४ )
-
स्वरूप भी नापा जा सकता है। फिर तो जिसे हम अपरिमित
कहते हैं यह परिमित हो जाता है और किसी वस्तु का भी
अपरिमित होना असम्भव हो जाता हैं। परिमित के विरुद्ध
अपरिमित का होना न्याय विरुद्ध है क्यों कि जिस विस्तृत्व
में परिमित की दशा हो सके उसका अपरिमित रूप हो ही नहीं
सकता । अपरिमित शब्द का अर्थ ही विस्तृत्व से सम्बन्ध
रखता है। अस्तु यह सिद्धात नितान्त असम्भव है । परन्तु ससार
का आदि तत्व परिमित भो नहीं हो सकता क्योंकि फिर उस
के परे भी कोई वस्तु होगी। यह नहीं कह सकते कि उसके परे
कुछ नहीं है। यदि उसके परे पूर्णतया शून्य स्थान है तो इस बात
के अतिरिक्त कि यह परिमित ससार कैसे, कब और कहाँ
उत्पन्न हुआ, क्योंकि शून्य में से कोई वस्तु प्रकट नहीं हो
सकती, एक प्रश्न यह है कि उस शुन्य स्थान की भी कोई सीमा
है या नही ? शून्य स्थान के नाप का होना तो शङ्का से हो प्रत्यक्ष है
क्योंकि जब भाग नापा जा सकता है तो सव भो नापा जा
सकता है । यदि उसके परे शून्य-स्थान भी नही है तव तो यह
कहना ही कि आदि तत्व परिमित है व्यर्थ है, क्योंकि परिमित
होना बिना सीमावद्ध हुए असम्भव हैं । नही तो वह भी सीमा-
रहित अपरिमित तत्व हो जाता है। इस प्रकार परिमित और
अपरिमित दोनों सिद्धातों में ही विकट शङ्का हो सकती है,
परन्तु जैसा कि कह चुके हैं परिमित से अपरिमित अधिक
युकि युक्त है क्योंकि परिमित ही का अपरिमित में अन्त होना
आवश्यकीय व सम्भव है और इसी प्रकार बुद्धि को सन्तोष
हो सकता है।
कोई कोई यह भी कहते हैं कि आत्मिक सत्ता अपरिमित
भी हो सकती है और फिर भी नापने योग्य नहीं हो सकती।
(५ ) क्योंकि उसमें विस्तृत्व नहीं है । परन्तु अपरिमित शब्द से हो स्थानापेक्षा सिद्ध होती है । इस के अतिरिक्त यह प्रश्न भी है कि ऐसा परम आत्मा सर्व-व्यापक है या नहीं, यदि है तब तो यह सब वस्तुओं में व्यापक है और इस कारण उसमे भी विस्तृत्व है। और यदि वह सर्व-व्यापक नहीं है तो धर्म-विचार से भी यह व्यर्थ है, क्योंकि वह सर के कम्मों को जान नहीं सकता, और सिद्धात विचार से भी व्यर्थ है क्योंकि वह वस्तु जो सर्व- व्यापक नहीं है सब का तत्व नही हो सकती। अपरिमितता केवल अद्वैतवाद में ही सम्भव है । ति सिद्धात में स्वभावत ही अपरिमितता नही हो सकती, क्योंकि प्रत्येक वस्तु दूसरी से परिमित रहेगी। जब हम एक ही वस्तु सर्वत्र उपस्थित समझे तव ही वह अपरिमित हो सकती है। विस्तृत्व तथा समय के विचार से अपरिमित वस्तु ऐसी होनी चाहिये कि सम्पूर्ण परिमित वस्तुओं में व्यापक हो जिससे वह स्वय अप- रिमिति हो सके। वह और सय वस्तुओं का तत्व रूप तब ही हो सकती है जय कि यह सर्व-व्यापक हो। कोई वस्तु सर्वव्यापक उसी समय हो सकती है जव और सब वस्तु उसकी ही स्वरूप मात्र हों । इससे अद्वैतवाद ही सत्य हो सकता है। सत्ता के विचार से ही उस स्थान का, जिसमें वह सत्ता हो, अस्तित्व सिद्ध होता है। गुण और शक्ति की सत्ता में विस्तृत्व न हो परन्तु उनकी सत्ता स्वतन्त्र नहीं हो सकती। उनकी स्थिति किसी ऐसी वस्तु के आधार पर ही हो सकती है कि जिसकी सत्ता स्वतन्त्र हो अर्थात् जिसमें विस्तृत्व हो । अस्तु स्वतन्त्र सत्ता विना स्थान के नही हो सकती। स्थान व उसमें स्वतन्त्र सत्ता दोनों उसी समय अपरिमित हो सकते हैं जबकि सम्पूर्ण स्थान उस एक सत्ता से परिपूर्ण हो और यह एफ सत्ता - स्थान के अपरिमित विस्तार के साथ स्वय अपरिमित हो। ऐसे सिद्धांत में स्थान का कोई सूक्ष्म से सूक्ष्म विन्दु भी उस अप- रिमित तत्व से शून्य नही रह सकता। इसी प्रकार सत्ता के विचार से समय को स्थिति भी सिद्ध होती है। इसमें एक और विशेषता है कि शक्ति तथा वस्तु दोनों की सत्ता उस समय को सिद्ध करती हैं कि जिस समय उनकी उपस्थित है। समय के विचार से वही अपरिमित हो सकता है कि जिसका कोई आदि न हो । और जो वस्तु दूसरे से उत्पन्न हुई हो वह अनादि नही हो सकती । वह वस्तु ही जो सर्व- व्यापक हो और जिससे शेष सब वस्तुएँ बनी हों समय के विचार से अपरिमित हो सकती है। यह वस्तु एक है अद्वैत है और सर्वव्यापक है, इसलिये उसकी उत्पत्ति का कोई प्रश्न नहीं हो सकता। जब एक से अधिक वस्तुओं की सत्ता सिद्ध की जाती है तो सब परिमित हो जाती हैं जैसा कि हम देख चुके हैं । इस कारण कोई एक वस्तु ऐसी होनी चाहिये कि जो अपरिमित हो और जिससे कि और सब वस्तुएं उत्पन्न हुई हो । इससे पूर्व कोई और वस्तु नही हो सकती क्योंकि हम यह नहीं कह सकते कि इससे पूर्व कोई अर्धसत्ता थी। हम अर्ध भाग किसी विशेष 'एक' वस्तु की अपेक्षा से कहते हैं, परन्तु यहाँ जो वस्तु सब के आरम्भ मे होगी वही एक होगी। यदि कोई अपरिमित एक सत्ता किसी और अपरिमित एक सत्ता के पूर्व में स्थिति हो तो यह दूसरी सत्ता उस पहली सत्ता का ही कोई खरूप होगी। इसका अर्थ यह कभी नहीं हो सकता कि कोई समय के विचार से अपरिमित वस्तु सख्या में एक से कमहो सकती है। अस्तु,स्थान मे अपरिमित वस्तु ही अढत नहीं किन्तु समय में अपरिमित भी अद्वैत ही हो सकती है।
इस अद्वैत अपरिमित सत्ता के साथ स्थान विस्तार व समय दोनों ही अपरिमित होंगे। यह सिद्धात न्याय सगत ही नहीं है घरन् सम्भव भी केवल यही है । इस प्रकार आदि तत्व का समय व स्थान दोनों में अपरिमित होना उसके परिमित होने से अधिक सुवोध व युक्ति सगत है, नही तो उससे पूर्व व परे भी कोई वस्तु होगी और वही सर्व-व्यापक और मपरिमित अद्वैत वस्तु कहलायेगी। अद्वैत तथा अपरिमित तत्व का यह सिद्धाति हो, कि जिससे स्थान व समय को भी अपरिमितता सिद्ध होती है, ब्रह्म सम्बन्धी समस्या का सन्तोष-जनफ उत्तर हो सकता है। आदि तत्व ऐसा होना चाहिये कि वह जड व चेतन सव वस्तुओं में व्यापक हो सके। वह ऐसा होना चाहिये कि जिससे ससार के सब भिन्न भिन्न पदाथ बन सकें । ऐसी दशा में ही वह सर्व-व्यापक हो सकता है क्योंकि उससे बनी हुई वस्तु यथार्थ मे उसी के दूसरे स्वरूप होंगे। जड प्रकृति का मुख्य गुण विस्तृत्व है । जीवात्मा को पृथक् स्थिति भी तभी हो सकती है जव उसमें विस्तृत्व हो । कोई स्वतन्त्र सत्ता भो विस्तृत्व रहित नही हो सकती। अत. आदि तत्व में भी अपरिमित विस्तार होना आवश्यक है । इस निर्णय से यह प्रतीत होता है कि विस्तृत्व जो जड प्रकृति का गुण है वह आदि तत्व में भी है। चेतन और जड सृष्टि का मुख्य भेद चेतनता की उपस्थिति व अभाव है, परन्तु यह चेतनता भी आदि तत्व में होनी आव- श्यक है नहीं तो वह सृष्टि में हो ही नहीं सकती। क्योंकि अप- रिमित आदि तत्व के अतिरिक्त और कोई वस्तु ऐसी नही है जिससे सृष्टि के पदार्थो का उदय हो सके। और वही आदि तत्व जड़ पदार्थों का भी तत्व है। उसकी चेतनता जड पदार्थों ( ५८ ) में भी होनी चाहिये नही तो वह आदि तत्व सर्व-व्यापक नहीं हो सकता। अतएव आदि तत्व की चेतनता ऐसी होनी चाहिये कि वह केवल जीवात्माओं में ही नही फिन्तु जड पदार्थों में भी रह सके। सूक्ष्म जतु ऐमीवा से लेकर उन्नत मनुष्य तक की भिन्न भिन्न आत्माओं से ही नहीं किन्तु स्वय मनुष्य की चेतनता की मिन्न भिन्न दशात्रों से भी यह सिद्ध होता है कि चेतनता के दर्जे हो सकते हैं। जैसी चेतनता जागृत अवस्था होती है वैसी स्वप्न अवस्था में नहीं होती। और गाढ़ निद्रा में तो दशा प्रायः कुछ २ वृक्ष व पत्थर जैसी हो जाती है। गाढ निद्रा में स्वप्न का साधुधला परन्तु भिन्नता सहित अनुभव भी नहीं होता। वास्तव में उस समय कोई ज्ञान इन्द्रिय कार्य नहीं करती, परन्तु जीवन क्रियाए सब ठीक इसी प्रकार होती रहती हैं जैसे कि वृक्ष में, परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि उस समय कुछ भी चेतनता नहीं होती। जब हम गाढ निद्रा से जागते हैं तब हमें उस समय अनुभव की हुई शाति व सुख की स्मृति होती है। यह भाव हमारा अनुमान नहीं है जो हमने अपनी प्रफुल्लित दशा को देख तर्फ द्वारा किया हो। हमे ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे हमको वह सुख-~वह सुख नहीं जो हमको इस समय होता है किन्तु वह सुख जो हमें निद्रा के समय हुमा था-ही स्मरण होता है। स्मृति अनुभव की ही हो सकती है। कोई अनुभव विना चेतनता के नहीं हो सकता यद्यपि गाढ निद्रा में हमें भिन्नता का अनुभव नही हो सकता था, परन्तु हम में इतनी चेतनता थी कि उस सुख का अनुभव हमारे मन में अङ्कित हो जाय और जागने पर स्मरण हो। स्मृति उसी समय हो सकती है जब हमारी चेतनता की दशा ऐसी हो जिससे भिन्नता ( ५ ) का अनुभव कर सकें। क्योंकि उसी समय हम भूत व घर्च मान में भेद समझ सकते हैं। जब हमारे जागृत अवस्था की चेत नता की दशा गाढ निद्रा में ऐसी हो जाती है कि अपनी सत्ता का भी पूर्ण अनुभव हम नहीं कर सकते तो अवश्य सम्भव है कि चीज रूप चेतनता जिससे हमारी चेतनता उत्पन्न हुई है हमारी गाढ निद्रा को चैतनता से भी अधिक सूक्ष्म हो, जिससे वह जड और चैतन्य दोनों पदार्थों में समान रह सके । ऐसी दशा जड़ और चैतन्य, जीवित व निर्जीव पदार्थों में यह भेद होगा फि जहां चैतन्य पदार्थों में इस वीज रूप चेतनता का विशेष विकास होता है वहा जड पदार्थों में यह नहीं होता। इस बीज रूप चेतनता की उन्नति हो कर मनुष्य की पूर्ण चेतनता में परिणत होना विवेक विरुद्ध नहीं है। ससार के अनेक भिन्न भिन्न जड पदार्थ एक ही प्रकृति से बने कहे जाते हैं। कि में न तो अनेक रग हैं और न अनेक मात्राओं की घनता है। हीरे और फोयले का कितना भेद है । परन्तु उनका तत्व एफ ही है। और कहते हैं कि कोयले पर बहुत सा दवाव पडने से उसका हीरा भी हो सकता है। जल अपने जल, बर्फ और भाप के तीन स्वरूपों में कैसे भिन्न रूप और गुण वाला होता है परन्तु तत्व जल ही रहता है। जव ऐसे भिन्न भिन्न गुण च रूप जड सृष्टि में भी एक वस्तु से उत्पन्न हो जाते हैं तो फिर इसी सिद्धात के अनुसार चेतनता में भिन्नता होने में फ्मा याधा है । जड और चैतन्य के परस्पर चैमनस्य सम्बन्धी पूर्व स्थिति विचारों के पक्षपात के कारण हम जिन नियमो को प्रकृति में प्रत्यक्ष देखते हैं उन्हें चैतन्य में घटाते हुए मिझते हैं, परन्तु कोई सिद्धात जो दोनों सृष्टियों के भेद को जहा तफ सम्भव हो सके एक करने में सहायता करे वह उससे विरोधी विचार की जिस वस्तु अपेक्षा अधिक युक्ति सगत है। यदि हम जड व चैतन्य में पूर्णतया वैमनस्य समझेगे तो अद्वैतवाद असम्भव है। विना अद्वैत सत्ता के 'अपरिमित स्वरूप' समझ में नहीं पाता और चिना अपरि- मितता तक पहुचे जिज्ञासा को शांति नहीं है। आदि तत्व में प्रकृति का विशेष-तत्व विस्तृत्व ही नहीं किन्तु जीवात्मा का विशेष तत्व चेतनता भी है। जैसे जीवात्मा में चेतनता विशेष विकसित होती है उसी प्रकार जड प्रकृति में विस्तृत्व विशेष वृद्धि को प्राप्त होता है। अतएव जहां जीवात्मा में चेतनता की शक्तियों का प्रकाश होता है वहां जड पदार्थों में उसकी शक्ति विस्तृत्व को विशेष वृद्धि आवृत से होती है। जड पदार्थों को घनता यथार्थ में विस्तृत्व का ही परि- वर्तन है। किसी पदार्थ का किसी स्थान में किसी समय पर जो विस्तार होता है उसी विस्तार के सिकुडने से गाढ़ापन प्रकट हो जाता है । धनता की भिन्नता ही किसी न किसी रूप से प्राकृतिक संसार के प्रकट होने का कारण है । इस प्रकार आदि तत्व के दो गुणों के भेदाभेद से ही सृष्टि के पदार्थ प्रकट हो जाते हैं । अतएव आदि तत्व की सत्ता विस्तृत्व व चेतनता के विशेष गुणों के साथ समय व स्थान रूपी दो दशामों में स्थित हैं। यह निर्णय आश्चर्य जनक भले ही हो परन्तु इससे बचने का कोई उपाय भी नही है । ब्रह्मज्ञान सम्बन्धी समस्या के संतोष जनक उत्तर के लिये अपरमितिता आवश्यक है। अप- रिमितता केवल अद्वत सत्ता में हो सकती है। ऐसी मत सत्ता ससार की भिन्नता को तत्व में एक करनेवाली होनी चाहिये। जीवात्मा व जड ससार दोनों में से किसी को असत्य कहने से सन्तोप नहीं हो सकता क्योंकि एक प्रत्यक्ष सर ( ६१ ) सत्ता का कोई भेद ज्ञात नही होता। और न पूर्ण परमात्मा के सिद्धात से ही काम चल सकता है। कोई कोई कह सकते हैं कि यह नास्तिकता है। जिसको सत्य की जिज्ञासा है वह उन विचारों को मानने पर वाधित नहीं है कि जिन की विवेक से जाच नहीं की गई। यह सिद्धात ईश्वर की सत्ता को न मानता सही परन्तु जिस अर्थ में हम समझते हैं उसमें वास्तव में ईश्वर की कोई सत्ता नहीं। जो है ही नही उसे कोई अस्वीकार क्या करेगा। असत्य का अस्वीकार करना और सत्य की घोपणा करना पाप कदापि नहीं हो सकता । इसके अतिरिक्त यह सिद्धात पूर्णतया नास्तिकता काभी नहीं है क्योंकि अगले पाद में यह दिखाया जायगा कि सृष्टि को रचने वाली शक्तियों का उत्पादक जड प्राकृतिक गुण विस्तृत्व नही है वरन् चैतन्य गुण बीज रूप चेतनता का है । परन्तु हमारे ऐसा दिखा सफने वन दिखा सकने से इस सिद्धात में कोई भेद नहीपड सकता। आदि तत्व का यही सिद्धात विवेक से ठीक प्रतीत होता है कि जो सृष्टि के अनेक जड व चैतन्य पदार्थो के तत्व को एक करता है और किसी से विरोध नहीं करता। अतएव इसकी सत्यता के लिये सृष्टि रचना की क्रिया का विवरण आवश्यक नहीं है। फिर भी अगले पाद में यह देसने का प्रयत्न किया जावेगा कि विवेक हमारी इसमें भी सहायता कर सकता है या नहीं। फिर अवतारों का रहस्य और दैविक प्रेम आस्तिक भाव को विवेक पूर्ण फर दृढ़ कर देते हैं। कुछ लोग बडी शाति से यह पूछेगे कि काा ईश्वर की अस्वीकृति से धर्म की स्थिति असम्भव नहीं हो जाती। क्योंकि इससे उस महान सत्ता का महत्व जाता रहता है कि जो ससार का प्रवध करने में सहायक था व पुण्यात्मा और पापियों को ।
फर्मानुसार फल देता था परन्तु वह विश्वास रखें कि सत्य के पहचानने और धार्मिक सिद्धातों को उस अटल सत्य पर निर्भर फरने से धर्माचरण में एक असत्य व अपूर्ण सिद्धात पर निर्भर रहने की अपेक्षा अधिक वल व दृढ़ता का संचार होगा। कोई काई जीवात्मा की पृथक् सत्ता मानने में ही आपत्ति करते हैं । जड शरीर ही-जिस मे आदि तत्व से उत्तपन्न होने के कारण कुछ न कुछ चेतनता होनी चाहिये-अपने विशेष संगठन से इस प्रकार की वेतनता को क्यों नहीं प्राप्त कर सकता? परन्तु जव योगी अपने पूर्व जन्मों को स्मरण कर सकता है तो इस में कोई प्रश्न ही नही रह जाता। जिस प्रकार कि पदार्थ-विज्ञान में बहुत सी बातें उन पुरुषों के विश्वास पर स्वीकार करनी पडती हैं जिन्होंने फि उनका अनुभव किया है इसी प्रकार यहा भी हम कुछ बातें उन पुरुषो के विश्वास पर मानते हैं कि जिन्होंने योगाभ्यास व प्रात्मानुभव किया है। जिस प्रकार विज्ञान सम्बन्धी अनुभव वह कर सकते हैं जो उसके योग्य हों इसी प्रकार योग सम्बन्धी ज्ञान भी अधिकारियों को हो सकता है। इसके अतिरिक्त सिद्धांत ऐसा होना चाहिये जो विवेक-सगत हो और ससार के रहस्य को सुगम करता हो। प्रथम पाद में यह दिखाया जा चुका है कि जीवात्मा की पृथक् सत्ता न मानने से बहुत सी बात समझ में नहीं आती और शरीर व जीवात्मा को एक समझने की अपेक्षा उनका पृथक् २ मानना अधिक युक्ति सगत है । पृथक्ता का सिद्धात एकता के सिद्धांत से अधिक चित्ताकर्षक व निश्चयात्मक है। और लोग यह आपत्ति करेंगे कि इस सिद्धांत के अनुसार जीवात्मा आदि तत्व अथवा परब्रह्म परमेश्वर से अधिक शक्तिः वाला अधिक उत्तम व विशेष उन्नति वाला व्यक्ति है। इस यात 1 को फि यह सम्पूर्ण जड ससार एक प्राकृतिक सत्ता से उत्पन्न होता है कोई भी अस्वीकार न करेगा। फिर यह कोई नहीं पूछता कि क्या उपवन का सुन्दर पुष्प आदि प्रकृति की अपेक्षा अधिक उत्तम तथा उन्नत व विशेप है । यदि कहो कि पुष्प तो जीवधारी सृष्टि है तो कोई हीरे अथवा लाल के लिये भी यह नहीं पूछता कि क्या यह आदि प्रकृति से उत्तम वस्तु हैं। इन दोनों बातों में हमारे विचारों के भेद इसलिये हैं कि हम ईश्वर को पूर्ण व्यकि समझते रहे हैं और उसके गुणों का अनुसधान इस प्रकार, जैसे कि जड पदार्थों का किया है, कभी नहीं किया। इसके अतिरिक विशेषता का प्रश्न तो अन्यापेक्षी है । कोई वीज को जिससे वृक्ष निकलता है वृक्ष से बडा समझ सकते हैं। दूसरे वृक्ष को जो आकार व रूप में वडा होता है और जिस पर बीज लगते हैं चीज से वडा फहेंगे। परन्तु यथार्थ में वृक्ष और वीज दोनों एक ही चक्र के दो अश हैं । सृष्टि चक्र अपने स्वभान में स्वय स्थित है इसका कारण की आवश्यकता नही पडती। वह अपनी गति के प्रत्येक प्रश के लिये कारण अपने आप उत्पन्न कर लेता है। यह नहीं कहा जा सकता कि उसका एक चरण दूसरे चरण से उत्तम है क्योंकि प्रत्येक चरण का कारण उसी में से उत्तपन्न होता है। प्रत्येक वस्तु उसी आदि तत्न से निकलती है और उसी में समा जाती है यह प्रश्न भी हो सकता है कि क्या सर्वशक्तिमत्ता व सर्वज्ञता के विचार पूर्णतया निर्मूल हैं। सर्व-व्यापकता पर तो कोई दोष नही आता क्योंकि वह तो इस सिद्धात के लिये भी अति आवश्यकीय है। सर्वशक्तिमत्ता व सर्वशता पूर्णतया असत्य नहीं है, परन्तु उनका अर्थ कुछ और ही है। आदि तत्व सर्वशक्तिमान् है क्योंकि ससार की सम्पूर्ण शक्तिया उसी में । रहती हैं। यही एक अद्वत सत्ता है । अस्तु ससार में कोई गुण, शकि, ववस्तु इससे खतरता किसी वस्तु से उत्पन्न नहीं हो सकती। सब वस्तु इसी एफ तत्व से उत्पन्न होती हैं । कोई शक्ति ऐसी नही हो सकती जो स्वभाव से इसकी विरोधी हो अथवा जो इसी के स्वभाव का परिणाम न हो। इन सब शक्तियों को मूल वीज रूप चेतनता आदि तत्व में खिति रहती है और जब उसके एकाग्रत होनेसे सृष्टि चक्र एफवार चल जाता है तब यह सब शक्तिया प्राकृतिक कार्यक्रम के अनुसार प्रकट हो जाती हैं। वह आदि तत्व इस विचार से सर्वशक्तिमान नही हो सकता कि वह उन शकियों का प्रयोग जान बूझ कर कर सके। ईश्वर केवल अपनी इच्छा के प्रभाव से सृष्टि को शून्य में से उत्पन्न नही कर सकता। उसकी बीजरूप चेतनता सृष्टि रचना को प्रारम्भ कर देती है। सृष्टि उस ही में से प्राकृतिक नियमों के अनुसार प्रकट हो जाती है। आदि तत्व सर्वज्ञ है परन्तु उस प्रकार नहीं जैसा कि हम समझते हैं हमारा ज्ञान यथार्थ ज्ञान का जो हम से खतत्र हैं प्रद- र्शन मात्र है। यह सम्भव है कि यह प्रदर्शन अपूर्ण व अशुद्ध हो । अतएव वह वात, वस्तु, क्रिया आदि ही जिन के प्रदर्शन मात्र को हम ज्ञान कहते हैं यथावत, सत्य, पूर्ण व निश्चित शान है। जहां इस अपूर्ण अशुद्ध प्रदर्शन मात्र ज्ञान के अधिकारी हम हैं वहां वह सब ज्ञान की वस्तुएं आदि तत्वके आधार पर हैं क्योंकि कोई वस्तु उससे परे नहीं हो सकती। आदि तत्व में हमारे प्रदर्शन मात्र ज्ञान की सत्य वस्तु ही नहीं किन्तु और भी असख्य सत्य वस्तु हैं जिनका हम को पता तक नहीं है। आदि तत्व का ज्ञान हमारे ज्ञान से अधिक विस्तीर्ण, यथावत, व स्वच्छ है । इस विचार से आदि तत्व सर्वज्ञ है। उसकी सर्वज्ञता का यह अर्थ - ( ६५ ) नहीं कि वह इन शानों को समझता हो अथवा उन का भिन्न भिन्न वोध रखता हो। धर्म सवन्धी दृष्टि से भी आदि तत्व सर्वज्ञ कहा जा सकता है। कहते हैं कि ईश्वरसे कोई छल नहीं कर सकता क्योंकि यह हमारे गुप्त से गुप्त फम्मा को देखता है । ईश्वर को छलना सम्भव हो या न हो परन्तु आदि तत्व का छलना अवश्य पूर्णतया असम्भन है। हमारा प्रत्येक फर्म नियमानुसार हमारे स्वभाव में स्पय अकित हो जायगा और इस अफित होने का जो प्राक तिफ परिणाम होगा वह भी अपने आप नियमानुसार उपस्थित होगा। ऐसा ईश्वर हमारे भीतर बैठा छोटी से छोटी बात को लिख लेगा और उसीके अनुसार फल देगा वा दड देगा। उसका ज्ञान ऐसा है कि उससे कोई छिपाव नहीं हो सकता। राम ४-सृष्टि का रचना विधि /पदार्थ विज्ञान सय वस्तुओं को किसी न किसी प्रकारके फंप, हरकत होने की क्रियाओं से उत्पन्न हुआ कहता है । पृथिवी, सूर्य, तारे आदि सब किसी न किसी ऐसी ही क्रिया से बने हैं। जब किसी ऐसी वस्तु पर जो अपने से हलकी वस्तु में स्थिति है कोई शक्ति कार्य करती है तो हरफत उत्पन्न होती है । इस के लिये फपित वस्तु व कपन करनेवाली शक्ति ही की आव- श्यकता नहीं किन्तु यह भी परमावश्यक है कि फपित वस्तु के परिस्थित वस्तु को धनता फपित वस्तु से कम हो। हमारे सिद्धांत में सब वस्तुओं का तत्व केवल एफ अद्वैत वस्तु आदि तत्व परब्रह्म है जो एक रस है तो फिर एक रस वस्तु में हर- कत कैसे हो सकती है। और वह एक रस भी कैसा कि अप- रिमित विस्तार वाला कि जिसमें किसी अन्य वस्तु के आ- को सम्भावना भी नहीं है और न उसकी परिस्थिति में को अन्य वस्तु उससे हलकी हो सकती है। उसके भीतर को स्थान शून्य भी नहीं हो सकता उसमें न परमाणु और न पर माणुओं के बीच का अवकाश हो सकता है। ऐसे आदि तत्व सृष्टि को उत्पन्न करने के लिये हरकत कैसे हो सकती है? हरकत से सृष्टि नहीं बनी तो किस प्रकार प्रकट हुई। यदि किसी शीशे को बोतल में हम कोई ऐसी वायू भ दें जो जम सकती हो और उसके मह को इस प्रकार वन्द क दें फि उस में और वायु न जा सके और फिर उस वायु के थोडासा समादें तो उसके एक भाग के जमने से जो उसकेपर माणुओं की सिकुडन होगी, और उस सिकुड़न से जो अवका बढेगा उससे शेप वायु के बिना जमे परमाणु फैल कर उस अवकाश की पूर्ति कर देंगे क्योंकि वायु में फैलने व सिकुड का गुण है । अव भी सारी बोतल में चही वस्तु होगी परन्तु उसमें से कुछ जमी हुई होगी और कुछ पहले से भी सून होगी। धनता के भेद की आवश्यक दशा उपस्थित हो जायगं और अब जमी हुई वायु उस बोतल में हरफत कर सकती है यदि आदि तत्व में भी लचकता का गुण उपस्थित है अर्थात उसफा एक ही परिमाण निरन्तता मे भेद डाले विना विस्तृत में घट बढ सकता है तो उसमें भी ऐसी क्रिया हो सकती है जैसी कि बोतल में हुई और दो दर्जी की घनता जो हरकत के लिये आवश्यक है उत्पन्न हो जायगी। यह प्रश्न अवश्य है कि वह जमाव वा गाढापन किस प्रकार उस आदि तत्व में हो सकता है। यदि ऐसे जमाव का कोई स्वाभाविक फारण-जिसमें किसी मन्य वस्तु की सहायता की प्रावश्यकता न हो-हो सकता हो तब तो यह निश्चय पूर्वक कहा जासकता है कि ऐसी क्रिया उसमें भी हो सकती है। आदि तत्व सब से सूक्ष्म वस्तु है । अतएव वायु से उसमें लचकत अधिक ही होगो न कि कम। हम अपने जीवन में अनेक बार यह देखते हैं कि कभी कभी हमें अपनी स्थिति का वडी तीव्रता से बोध होता है । साधा- रणतया हमारी चेतनता कुछ फैली हुई सी रहती है । जब हम अपना ही ध्यान करते हैं तब यह तीव्र हो जाती है। अधिकतर यह क्रिया आणिफ होती है परन्तु यदि सूक्ष्म दृष्टि से हम इसे देखें तो हमें ज्ञात होगा कि यह न तो इतनी क्षणिक है और न इतनी साधारण हो है जैसी हमको प्रतीत होती है। यदि हम फिसी स्थान में शान्ति से बैठकर अपनी सत्ता का ध्यान करें, अर्थात् इस बात का विचार करें कि हमारी सत्ता प्रत्यक्ष है, तो हमारी क्रिया भी एक प्रकार की सिकुडन से आरम्भ होती है। यदि हौले हौले "मैं हू" का ध्यान करें तो मन में मैं" को मन्द गति से उच्चारण (म-अ-ए-ऐ-ऐं) करने के साथ ही मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि मैं अपनी चेतनता को वाद्य वस्तुओं से पृथक् कर के अन्दर की ओर ही नही सींचता परन् अपने शरीर के अन्तिम भागों से भी अपनी चेतन सत्ता को किसी मध्यस्थान की ओर, जैसे कि हृदय है, पीचता है। ऐसा अनुभव होता है कि मानों तीव्रता को प्राप्त करने के लिये चेतनता अपनी विस्तृत दशा से सिकु- डती हो । वास्तव में यदि ससार की चिन्ताओं को छोड कर शान्तचित्त से इस क्रिया को कई वार किया जाय तो ऐसा अनुभव होने लगता है कि मानों असख्य अति सुक्ष्म परमाणु कुछ "हम" सा शब्द करते हुये शरीर के नीचे के भागों से उठते हैं और वह भाग सुन्न से होते जाते हैं (यह सुन्न सा होना दुसमय नहीं होता परन सुखमय होता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि प्रात्मा के रहने का स्थान शरीर के मध्य में कही है। यहां पर तो प्रयोजन केवल यह है कि चेतनता के तीव्र होने में जो सिकुडन का सा भाव है उसे प्रत्यक्ष कर दें। इस बात को कोई अस्वीकार न करेगा कि अपनी चेतनता के तीव्र चोध में उसकी एकाग्रता होना आवश्यक है। एकाग्रता का प्रकृति- सम्बन्धी खरूप विस्तृत्व का सिकुडना है। यदि आध्यात्मिक चेतनता और प्राकृतिक विस्तृतत्व ऐसे निर्भद मिले हों कि वह पृथक् न हो सके तो यह प्रत्यक्ष है कि चेतनता के एकाग्र होने के साथ साथ विस्तृतत्व की सिकुडन होगी। "मैं" के उच्चारण मे चेतनता विस्तृत दशा से एकाग्र होती है। अक्षर "ह" के संग चेतनता का चोव होने लगता है और यह बोध 'ह' अक्षर "ॐ" के साथ पूर्ण हो जाता है और फिर इस अक्षर के दीर्घ रहने से नेत्र खुल जाते हैं और फिर वाह्य ससार च अपने शरीर का कुछ नवीन चेतना सहित भान होता है। मैं अपने मन को वाह्य वस्तुओं मे फिर प्रवृत्त करता है परन्तु ऐसी अज्ञता के साथ नहीं जैसा कि मैं अपनी चेतनता की विस्तृत दशा में करता था वरन् कुछ विशेष चेतनता के साथ ऐसा करता हूं कि जिसमें मुझे यह बोध रहता है कि मेरी सत्ता उन वस्तुओं से जिनको फि मैं देखता हू पृथक् है । इस अवस्थामें मुझे ऐसा अनुभव होता है मानों चेतनता की किरण मेरे सारे शरीर के भागों में जाती हों। और इसमें यह एक विशेषता होती है कि जहां एकान होने में क्रिया मन्द गति से होती थी तहा एकाग्र हुई चेतनता के विस्तृत होने में एक साथ विजली सी फटेगी और एकदम शीघ्रता से चेतनता की लहर चारों ओर शरीर में फैल जायगीं।
क्रियात्मक चेतनता आदि शक्ति है । अतएव यह खाभावतः ही सदैव एफ दशा में एकाप्र अथवा विस्तृत नहीं रह सकती। यदि बाह्य उत्तेजक पदार्थो से हम अपना सम्बन्ध पूर्णतया तोड दें फिर भी चेतनता अपने स्वभाव से ही समय समय पर एकाग्र होती रहेगी और कभी कभी हमको अपनी सत्ता का बडा तीव्र वोध हो जाया करेगा। इस एकाग्रता व विस्तृत दशा के होते रहने के लिये किसी बाहरी उत्तेजना की आवश्यकता नहीं है। साधारणतया एकाग्रता बाहरी उत्तेजनामों से इतनी अधिक होती है कि उसको स्वाभाविक होना सहज में समझ में नहीं आता। वास्तव में ऐसी वाहा उत्तेजनामों से हुई चेतनता को एकाग्रता के अनेक सहज अवसर होने से उसकी अपनी क्रिया से वोध होने का गुण भी छिपा जाता है। परन्तु यह बात ही कि चेतनता क्रियाशील है दशा परिवर्तन को आवश्यक बना देती है। और इससे उस दशा परिवर्तन का स्वाभाविक होना सिद्ध होता है । सब से साधारण व स्वाभाविक परिवर्तन एकाग्रता व विस्तृतता का है । उनका जड स्वरूप सिकुडना और फैलना है। कोई कोई यह कह सकते हैं कि शक्ति की एक दशा क्रिया रहित भी हो सकती है जिसमें कि वह गुप्त अवस्था में स्थित रहती है । इसलिये चेतनता का सदैव एकाग्रत व विस्तृत होता रहना आवश्यक नहीं है । परन्तु दो बातें स्मरण रखनी चाहिये। प्रथम तो विस्तृत दशा ही एक प्रकार की गुप्त अवस्था है। भेद केरल इतना ही है कि इसे गुप्त अवस्था से प्रकट करने के लिये अर्थात् एकाग्रत करने के लिये किसी अन्य उत्तेजना की मारश्यकता नहीं है क्योंकि चेतनता क्रियात्मक जीवित शक्ति है। दूसरी बात यह है कि गुप्त अवस्था का अर्थ यह है कि (७०) अमुक शक्ति प्राकृतिक नियमों के अनुसार, जो नियम कि सृष्टि की रचना में प्राकृतिक कार्य क्रम से खतःही बन जाते हैं, अभी प्रकट नही हुई। हम उसको गुप्त अवस्था में स्थित इस लिये कहते हैं कि हमें उफका प्रकट अवस्था व उन दशाओं का जिनसे कि वह प्रकट होती है अनुभव हो चुका है। नहीं तो उस विशेष शक्ति का अस्तित्व ही जय होता है जब वह प्रकट अवस्था में होती है। उस समय तक "वल" का कोई खरूप होता है कि जिससे अनेक शक्तियां प्रकट हो सकती हैं। परन्तु आदि तत्व की बीज रूप चेतनता आदि शक्ति है और आदि तत्व के अनुसार प्रतादि व अविनाशी है । इस कारण यह नहीं कह सकते कि वह फिसी पूर्वस्थित वल रूप अवस्था से प्रकट हुई क्योंकि ऐसा कहने से उसके अस्तित्व की आदि हो जायगी। जैसा कि पहले कह चुके हैं इसी मूल शक्ति से जब कि वह सृष्टि चक्र को एक बार चला देती है प्राकृतिक कार्य- क्रम के अनुसार अनेक शक्तिया प्रफट हो जाती हैं। अतएव यह चेतनता रूप शक्ति स्वाभावत ही क्रियात्मक है। आदि शक्ति चेतनता के इन गुणों से सृष्टि रचना का रहस्य प्रत्यक्ष हो जाता है। आदि तत्व में भी वीज रूप चेतनता है। उसकी दशा भी एकाग्रता व विस्तृतना में बदलती रहनी चाहिये। एकाग्रता की क्रिया उसमें भी इसी सिद्धान्त पर परन्तु इस क्रिया से अधिक सूक्ष्म होनी चाहिये। यह स्मरण रखना चाहिये कि आदि तत्व हमारे अनुभव की सब वस्तुओं से अधिक कोमल, हलका व सुक्ष्म होगी उसकी विस्तृत चेतनता की लेशमात्र एकाग्रता से भी सिकुडन उत्पन्न हो जायगी। परिणाम यह होगा कि इस एकाग्रता के साथ वैसा ही जमाव व फैलाव होगा जैसा फि बोतल में भरी हुई घायु में हुआ था।
( ७१ ) मादि तत्व की निरन्तरतामें कोई भेद नहीं पड़ेगा परन्तु उसमें अब दो दशा प्रकट हो जायगी। एकाग्रत होतो हुई चेतनता की बढ़ती हुई शकि उस जमे हुए भाग को स्थिर नही रहने देगी फिन्तु सारे पिड में फप कर देगी जैसे कि पृथ्वी की अन्तरीय उत्तेजना से भूचाल आजाता है। क्षोभ के केन्द्र के परिस्थित आकाशपत्तों और सृष्टिया स्थित होगी वह कदाचित् उस पिण्ड में एक दूसरे प्रकार की हरकत प्रकट करने का कारण होगी इन अनेक प्रकार की गति कम्प स्पन्द हरफन आदि से यह पिण्ड अधिक स्थूल ही नही होगा किन्तु उस पिण्ड के अन्तरगत भी घनता के अनेक दर्जे प्रकट हो जायगे। एकाग्रता को प्राप्त हुई चेतनता के एकदम विकसित होकर सम्पूर्ण पिण्ड में फैलने पर इन सब में एक नयीन असीम शक्ति का सयोग होगा जब इससे एक प्रकार का अन्तरीय सघट, दवाव व वेग प्रकट होगा जिससे असरय चेतनता की किरण उस पिण्ड में फैल फर असस्य फम्प के केन्द्र प्रकट कर देगीं। प्रत्येक कप केन्द्र अनेक नवीन फम्पों को प्रकट करेगा और उन सब में स्थान, दिशा, समय, व कार्य करती हुई शक्ति के तेज फी भिन्नता से असस्य भेद उत्पन्न हो जायगे। परमाणुओं की संख्या बढ़ने के साथ कम्पों को भिनता व सयोगों में भी बढती होगी और परिणाम में ऐसी अद्भुत सृष्टि होगी जैसी कि हम देखते हैं। इस पर यह फटात किया जा सकता है कि बोतल में तो अवकाश सीमा यद्ध है और उसके भीतर की वायु घट वढ नही सकती। इस कारण उसमें से एक अश के जमने पर दूसरे अश का फैल जाना सम्भव है परन्तु सृष्टि के चारों ओर भित्ति नहीं हैं। सृष्टि रचना सम्पूर्ण आदि तत्व में नहीं होती क्योंकि आदि तत्र के अपरिमित होने से उसका परिमाण नहीं हो ( ७२ ) सकता । यह वैज्ञानिक अनुभव से भी प्रमाणित होता जैसा कि भागे दिखाया गया है। जिस स्थान पर कि सृष्टि रचना की किया होती है उसके चारों ओर आदि तत्व का ही अपरमित विस्तार होता है और उस स्थान को सीमावद्ध करने के लिये यह अपरिमितता ही दुस्तार भित्ति का काम देती है। जब सिकुडन होती है तो जो अंश के निकट पत्ती होते हैं वह आवश्यकता अनुसार सूक्ष्म हो जाते हैं और इस सब के चारों ओर स्थिर आदि तत्व का वही अपरिमित विस्तार रहता है । फिर उस पिण्ड के भीतर भी घनता के अनेक भेद हो जायगे, क्योंकि निकट वचों आकाश स्थित और सृष्टियों का प्रभाव इस नवीन पिण्ड के सब अशों पर एक सा नहीं पड़ेगा घरन् स्थान के भेद से उन प्रभाओं की तीव्रता दिशा आदि में भेद हो जायगा और अनेक प्रकार की घनताऐं प्रकट हो जायगी। इस सम्बन्ध में यह समझ लेना चाहिये कि सृष्टि की रचना जो ऊपर दिखाई है अपरिमित वस्तु के किसी विशेष स्थान में होती है । साधारणतया यह विचार किया जाता है कि ईश्वर ने सम्पूर्ण ससार को एक साथ उत्पन्न किया है। इस सिद्धान्त से प्रथम तो अपरिमितता पर दोप आता है और दूसरे यह विज्ञान सम्बन्धी अनुभव से भी विरुद्ध है। जिस समय नवीन सितारे और ग्रह चक्र उत्पन्न होते दृष्टि होते हैं उसी समय दूसरे तारे टूटते हुए और शनै शनै. आदि तत्व में परिणत होते ज्ञात होते हैं। आकाश के अपरिमित विस्तार में जहा एक स्थान में सृष्टि रचना हो रही होती है उसी समय दूसरे स्थान पर प्रलय होती है। इससे आदि तत्व के स्वभाव 4 गुणों में कोई भेद नही पड़ता। यह फटाक्ष हो सकता है कि ऐसी दशा में चेतनता सम्पूर्ण आदि वस्तु को एक व्यक्ति के समान नहीं है किन्तु ( ७३ ) यह उस एक तत्व में ही पृथक् पृथक् स्थानों पर भिन्न भिन्न दशाओं में हो सकती है। ऐसी चेतनता विच्छेदात्मक है । यदि ऐसे सिद्धात की आवश्यकता पडे तो भी हमको सत्य की जिज्ञासा से मुह नहीं मोडना चाहिये । ज्योतिप सम्बन्धी अनु- भवों का, जिनकी परीक्षा हो सकती है, पडन सहज नहीं है। इसके अतिरिक्त कोई वास्तविक कठिनता भी नहीं है। आदि तत्व के लिये एक अथवा अनेक चेतनताओं का कोई प्रश्न नहीं है क्योंकि उसमें अल्प सत्ताओं के समान व्यकि भाव नहो है। आदि तत्व में बीज रूप चेतनता खाभाविक है और उस स्वभाव को लिये हुए वह तत्व एक व अपरिमित है। यदि उसी एक तत्व में अनेक स्थानों में भिन्न भिन्न दशा हो तो उनसे उस तत्त की स्वाभाविक एकता व अद्वत मे कोई भेद नहीं पड़ता। जैसे कि जड प्रकृति भिन्न भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन्न दशाओं में स्थित है परन्तु इससे हमको यह कहने का अधिकार नहीं होता कि अमुक स्थान पर प्रकृति प्रकृति ही नहीं है या यह कि प्रकृति की तात्विक एकता व निरन्तरता में भेद पड गया। यह इस बात के स्मरण करने से प्रत्यक्ष हो जायगा कि ससार को प्रत्येक वस्तु उस आदि तत्व का ही एक रूप है और वह यादि तत्व अपने फिसी भी रूप से पृथक् वा विरक नहीं कहा जा सकता। इस दृष्टि से देखने से ज्ञात होता है कि बीज रूप चेतनता व विस्तृतत्व दोनों आदि तत्व के दो गुण मात्र हैं और जैसे कि उसके एक गुण विस्तृतत्व के भिन्न भिन्न स्थानों पर भिन्न भिन दशाओं में होने से कोई दोप उत्पन्न नही होता इसी प्रकार उसके दूसरे गुण चेतनता के भिन्न भिन्न दशाओं में प्रकट होने से कोई आपत्ति नही हो सकती। इस कटाक्ष का कारण कदाचित् यह है कि हमें चेतनता को,एक अल्प सत्ता से सम्बन्ध रखने के ( ७४ ) कारण व्यक्तिगत समझने का अभ्यास पड गया है। परन्तु यदि हम चीज रूप चेतनता को इसी प्रकार एक गुण समझे जिस प्रकार कि विस्तृतत्व को समझते हैं तो इसमें कोई फठिनता नहीं रह जाती। कुछ भी हो वैज्ञानिक अनुभव यह सिद्ध करता है कि जब एक स्थान पर सृष्टि रचना हो रही हो उसी समय दूसरे स्थान पर प्रलय हो सकती है। और इन अनुभागों में और हमारे सिद्धांत में कोई विरोध नहीं है। एक यह प्रश्न हो सकता है कि सृष्टि रचना को प्रारम्भ करने को चेतनता की विस्तृत अवस्था में क्षोभ किस कारण ने होता है। प्रथम तो यह पहले कह चुके हैं कि चेतनता एक स्वयक्रियात्मक शक्ति है और इस कारण वह खतः ही तीव्रता को प्राप्त होती हैं। वरन् सम्भव है कि इस विस्तृत व तीव्र अवस्था का नियत समय भी हो । दूसरे इस नियम के टूटने का भी कारण हो सकता है। कभी विस्तृत चेतनता वाले अश में किसी हटे हुये सितारे प्रादि के आघात से भी तत्काल चेतनता एकान होने लगती है। क्दाचित् यही उस चित्र का तात्पर्य है जिसमें पायं धर्म सम्बन्धी देवताओं के रूप में सृष्टि रचना दिखायी है। उसमें क्षीर समुद्र के जल से घिरे हुए भगवान महाविष्णु सहस्त्र शीश चाले शेष जी की शय्या पर लेटे हुए हैं। विष्णु के चरणों के पास उनकी स्त्री, शक्ति, माया, लक्ष्मी है जिनकी सहायता से विष्णु ससार को रचते हैं। उनकी नाभि से एक कमल की डडी निकलती है और उसके सिरे पर एक खिला कमल है। उस कमल से ससार को उत्पन्न करने वाला ब्रह्मा प्रकट होता है। योगी नारद जी भी वीणा लिये खडे हैं। परिस्थित जल आदि तत्व का अपरिमित विस्तार है जो किसी विशेष सुष्टि के ( ७५ ) चारों ओर होता है। शेष का अर्थ "फम" हैं और इसका सकेत उस सूक्ष्म वस्तु की ओर है जो चेतनता के एकान होने व पिण्ड जमने से, शेष रह जाती है। इस शेष की शय्या पर विष्णु, अर्थात् धारण करने वाला, शयन करता है। और यह उस पिण्ड के खरूप हैं जिसके अन्तरगति सृष्टि प्रकट होती तथा स्थित रहती है। परन्तु अव विष्णु अकेले नही हैं किन्तु उनके साथ उनकी शक्ति, अर्थात् कम्पन शक्ति जिससे सृष्टि होती है, भी है। वह कमल को लम्बी डडी एकाग्र होती हुई चेतनता का रूप है। जब यह एकान हुई चेतनता विकसित होती है तो कमल के फूल के समान पिल जाती है और उसमें से तीन चेतनता का परम धेग ब्रह्मा रूप ससारका कर्ता प्रकट ही कर चारों ओर सृष्टि रचना के सम्पूर्ण कार्यों में तत्पर हो जाता है और श्री नारद उस आदि आध्यात्मिक शब्द की ओर समेत करते हैं जो आदि कम्पन का सहकारी था। इस सम्बंध में यह भी विचारणीय बात है फि माग्यों की दार्शनिक पुस्तकों में किसी स्थान पर तो ईश्वर में व्यक्तिगत स्व- रूप और गुण कहे हैं कि जिन पर हम विचार कर चुके हैं और दुसरे स्थानों पर उसको अव्यक्त व अकर्ता कहा है जो अपना ही यज्ञ कर के सृष्टि रचता है। उसमें ज्ञान नही है परन्तु वह चेतनता से रहित भी नहीं है। किन्तु उसकी सूक्ष्म चेतनता केरल "वोध मात्र" है जो बाज रूप चेतनता को ही दूसरों शब्दों में निरूपित किया गया है । इन सिद्धान्तों को ध्यान में रखते हुए यह ज्ञात होता है कि आर्यों के विविध दर्शन परस्पर विरोधी नही हैं वरन् परस्पर पूर्ति करने वाले हैं। जब ऋषि ने देखा कि मनुष्य अपनी आध्यात्मिक आवश्यकताओं को ससार की प्रवृत्ति में पूर्णतया भूले हुए हैं तो साख्य शास्त्र का सिद्धान्त प्रकट हुमा जिसने पुरुष को निश्चल, शान्त, अकर्ता व दृष्टा के रूप में निरूपण किया और प्रकृति को संसार का रचने वाला व कर्ता बताया। जीवात्मा भी पुरुष है । अस्तु उसका वास्तविक स्वभाव निश्चित व शान्त होना है। उसका खभाव चिन्तित अथवा दुसी होना नही है जैसा कि मनुष्य अपने रूप के अज्ञान से अपने को बना लेते हैं। इस अज्ञान का नाश करना ही मुक्ति प्राप्त करने का उपाय है। यह स्मरण रपने की बात है कि प्रकृति के अर्थ स्वभाव के हैं। आदि तत्व, जब तक कि उसमें कम्पन उत्पादक चेतनता की एकाग्रता प्रकट नहीं होती तब तक केवल वीज रूप चेतनता को ग्रहण किये हुए यथार्थ में शान्त निश्चल और अफर्ता आदिक है। परन्तु उसफा खभाव चेतनता की कम्पन उत्पादक एकाग्रता, संसार का क्रियाशील कारण है। कम्पन के प्रकट होने से सृष्टि प्रकट हो जाती है। चेतनता सहित पुरुष चैतन्य है परन्तु कम्पन अथवा एकाग्रता वय जड़ हैं अतएव पुरुष चैतन्य और प्रकृति जड है। परन्तु इससे मनुष्यों के कर्मों से रहित हो कर आलसी बन जाने का भय था । अतः एक और ऋषि ने कहा कि प्राकृति (जिससे तात्पर्य जड विस्तृतत्व का था क्योंकि यह जड सृष्टि कातत्व रूप है, और जड सृष्टि के अर्थों में प्रकृति शब्द का प्रयोग होने लगा था) जड है और इस कारण किया नही कर सकती और सलार को नही रच सकती । यह केवल सृष्टि का उपादान कारण हो सकती है जिससे चैतन्य ब्रह्म सृष्टि को रचता है। यहा पर चेतनता से प्रयोजन वीजरूप चेतनता से है जो क्रिया शील हो कर सृष्टिको रचती है और अनेक रूपों को प्रकृति अर्थात् विस्तृत्व से प्रकट करती है।
( ७७ ) परन्तु इसमें भी भय था कि मनुष्य ब्रह्म और प्रकृति को दो और विरोधी न समझने लगें। अतः एक और ऋपि की आवश्य. कता हुई जिसने कहा कि प्रकृति ब्रह्म से पृथक् नही चरन उसी से प्रकट होती है। इन सब में सत्य का अश है परन्तु उस कोन जानने के कारण और प्रत्येक सिद्धान्त के प्रयोजन प अब- सर को न जानने से मनुष्यों ने यह विचार कर लिया कि प्रत्येक सिद्धान्त सपूर्ण है। इससे आगे चलकर एक नवीन सिद्धान्त निकल आया कि ससार पूर्णतया असत्य है । इस पर विचार हो ही चुफा है। यह भी विचारणीय है कि जो लोग यह कहते हैं कि ईश्वर जोव, प्रकृति तीनो अनादि व अविनाशी हैं उनके सिद्धान्त में भी एक सत्य का अश है। सृष्टि की रचना आदि तत्व के स्वभाव से ही होती है । उस आदि तत्व की सत्ता के साथ उसका स्वभाव भी अवश्य स्थित होगा। और जब हम आदि तत्व फा आदि नही कह सकते तो उसके स्वभाव का भी आदि नही हो सकता। उस स्वभाव का परिणाम ऐसी सृष्टि है कि जिसमें जड व चैतन्य दोनो प्रकार के पदार्थ हैं। हम कोई समय नियत नही कर सकते जव प्रकृति अथवा जीवात्मा प्रथम प्रकट हुए। परन्तु यह प्रकृति व जीवात्मा की सत्ता के सिद्धान्त के सम्बन्ध में सत्य हो सकता है। इसका अर्थ यह कभी नहीं हो सकता कि कोई विशेष जीवा- मावाजीचात्माएँ अथवाजड प्रकृति का कोई रूप वा अमुफ सृष्टि या कोई सितारा अनादि है। जीवात्मा व प्रकृति का प्रत्येक रूप आदि तत्व से ही प्रकट हुआ और आदि तत्व में हो अवश्य समा जायगा।
(७८) । ५-जीवात्मा पिछले पाद में सृष्टि रचना के मूल सिद्धान्त पर विचार हो चुका है। यद्यपि मूल सिद्धान्त को विवेक से निश्चित कर सकते हैं तो भी उसकी सम्पूर्ण क्रियाओं का निरूपण करना कठिन है। क्योंकि वह समय समय के विशेप विशेष सयोगों से इतने भिन्न भिन्न रूप धारण कर लेती हैं कि उन में रूपान्तर को नियत सीमा नही रहती। परन्तु मुख्य मुख्य वात वास्तविक स्वभावों पर निर्भर रहती हैं। सपूर्ण सम्भावनाओं पर विचार कर उनमे जोव असम्भव प्रतीत हो उन को त्याग कर सम्भव को ग्रहण करने से ऐसे स्वभाव का ज्ञान हो सकता है। इस स्वभाव के ज्ञात होने पर मूल सिद्धान्त पीछे की विविध क्रियाओं की अपेक्षा अधिक निश्चित रूप से जाना जा सकता है। सृष्टिको विविध रचनाओं के सम्बन्ध में भी बहुत से सिद्धातो का कथन है। कुछ लोग अनेक लोक, खड, द्वीप आदि की, जिन के अनेक रूप और गुण हैं, कल्पना करते हैं । कोई कोई यह भी ठेका लेते हैं कि वह नाना लोकों में स्थित अलख्य प्रकार की जीवात्मा, पदार्थ व रूपों का हाल, जो कि साधारण मनुष्य के ज्ञान से परे है, हमें बता सकते हैं । परन्तु इन रहस्यों से चाहे वह सत्य हो अथवा असत्य हमें कोई प्रयोजन नही । हमारे लिये तो संसार की विशेष रचनाओं का ज्ञान उस पदार्थ विज्ञान में उपस्थित है जिसे कि वैज्ञानिकोनेवडी योग्यता व कष्ट से एक- त्रित किया है। परन्तु हमारे मूल सिद्धान्त की पूर्ति के लिये ही इतना दिखाना आवश्यक है कि जड और चैतन्यकाभेद फिस प्रकार से हुआ। - ( ७६ ) वीज रूप चेतनता के एकाग्र होते ही एक पिण्ड पहले से अधिक स्थूल दशा में प्रकट हुआ। एकाग्रता की क्रिया फिर भी होती रही और उस क्रिया के साथ वह पिण्ड भी अधिक अधिक सिकुडता रहा । यही नही किन्तु उस के सिरे के भागों की चेतनता एकान चेतनता के केन्द्र की अपेक्षा अधिक शिथिल हो गई । आकाशवचों सितारों के प्रभाव व अन्तरीय क्षोभ के कारण उत्पन्न हुए कम्पन से स्थूलता अवश्य वढी होगी। कमल के खिलते ही चेतनता की किरण चारों ओर फैल जाती हैं। इस अवस्था में जड और चैतन्य का भेद प्रकट हो सकता है। उन भागो से जिन में ज्ञान किरणो ने प्रवेश किया जीवात्मावनी और जो भाग कि इन फिरणों के बीच में रहे उन्हों ने जड पदार्थो का रूप धारण किया। इन किरणों का किसी अश में प्रवेश करना और किसी में न करने का कारण यह है कि फमल के सिलने, अर्थात् एकाग्रत चेतनता के विस्तृत होने, से पूर्व ही उस पिड में घनता के अनेक भेद प्रकट हो जाते हैं जैसा कि पहले दिखा हैं जब तक प्राकृतिक पदार्थ जिन से कि शरीर बनता है प्रकट न हों तब तक वह चैतन्यात्मक परमाणु ईथर सदृश अथवा उस से भी सूक्ष्म दशा में रहेगा और जब यह सब पदार्थ उत्पन्न होकर यथा परिमाण एकत्रित हो जाते हैं तो चैतन्यात्मक परमाणु उस में प्राकृट हो जाता है। इन पदार्थो के सयोग में मिल कर स्पर्श से उन की उस शिथिल और सूक्षम चेतनता मे चैतन्या- त्मक परिमाणु नवीन शक्ति का सचार कर देता है और वह सम्पूर्ण सयोग जीवित पदार्थ कहलाने लगता है । इस आरम्भिक एक जीव रूपी शरीर से फिर और बढती हो सकती है। जब शरीर में आवश्यक पदार्थ अधिक बढे तो उस के दो टुकड़े हो (८०) गये और उस दूसरे में एक और चैतन्यात्मक परमाणु मा चैठा जिससे एक नवीन जीव उत्त्पन्न हो गया। जब ऐसे कई शरीर जुडे रह जायें और उस सगठन चाह्य आघातों द्वारा विशेष धर्म प्रकट हो जाय तो पहले से अधिक शकिमान् जीवात्मा उस शरीर सगठन मे आ बैठेगा जीवात्मा के संगठन में भी संकीर्णता कई कारणों से उत्पन्न हो सकती है। एफ तो बहुत से चैतन्यात्मक परमाणुओं से मिल कर कोई जीवात्मा संगठित हो सकता है अथवा उस एक जीव रूपी शरीर में बहुत से अनुभवों के एक- त्रित होने के कारण आत्मिक शक्तियों के विकाश होने से जीवात्मा के स्वरूप मे भेद हो सकता है। यह स्मरण रखना परमावश्यक है कि चैतन्यात्मक परिमाणुओं में जो वायु व ईथर से भी अधिक सूक्ष्म है लचकन अवश्य होनी चाहिये, और इसी कारण से उस के रूप मे परिर्वतन होना भी सम्भव है । जिस प्रकार जड पदार्थों के परिमाणुओं के रूप भिन्न २ होने से उन के गुण भी भिन्न हो जाते हैं इसी प्रकार चैतन्यात्मक परिमाणुओं के रूप में अन्तर होने से विविध प्रकार के जीवात्मा प्रकट हो सकते हैं। जीवात्मा की शक्तियों के विकाश से स्वभावतः ही जीवात्मा के रूप में भी कुछ न कुछ अन्तर होगा। तीसरा कारण यह भी हो सकता है कि शरीर के पदार्थों की सूक्ष्म चेतनता का प्रभाव भी जीवात्मा पर पड़े क्योंकि उनकी चेतनता भी जीवात्मा के ससर्ग से विकसित होती है। इस सिद्धात से असत्य प्रकार के जीवात्मा सम्भव हो सकते हैं । परन्तु इनके भेद परस्पर विरोधी नहीं है। क्यों कि जीवात्मा का रूप वायु से भी अधिक लचकदार होता है। प्रत्येक जीवात्मा के रूप में उसके विशेष स्वभाव अकित होंगे और वह उसी शरीर की ओर पासष्ठ होगी जिस में कि उन स्वभावों की ( १ ) प्रवृत्ति हो सके। इस प्रकार जीवात्मा एक प्रकार के शरीर को छोड कर किसी अन्य योनि के शरीर को भी धारण कर सकता है। इस से यह भी सम्भव है कि जो जीवात्मा एक योनि को छोड दूसरी में आया है वह उस नई योनि में किसी नवीन क्रिया शक्ति का भी प्रकाश कर सके और इस प्रकार उस योनि के अनुभवों की वृद्धि कर सके। परन्तु यह साधारण नियम नहीं हो सकता। साधारणतया जीवात्मा अपनी ही योनि में शरीर बद- लता रहेगा और जब वह उस योनि के सगठन में पूर्ण हो जायगा तव अगली योनी में अपने आप नियमानुसार चला जावेगा। यह भी विचारणीय बात है फि योनियों की भिन्नता व्यक्तियों के परि- वर्तन ले नही होती वरन् व्यक्ति समूह के परिवर्तन से होती है। यही कारण है कि मनुष्य की उत्पत्ति जो चन्दर से कही जाती है वह अब नहीं होती। इस का कारण यह है कि एक व्यक्ति समूह जो किसी विशेष सासारिक परिस्थिति में रहता है वह समूह का समूह उस परिस्थिति के अनुसार स्वभाव बना लेता है। और इस उन्नति को जारी रखने के लिये जीवात्मा की कमी नही होगी क्योंकि नवीन शरीरों के लिये जीवात्मा पुराने शरीरों के अन्त होने से प्राप्त होते रहेंगे। इन बातों का जो कुछ भी प्राध हो परन्तु दो सिद्धात तो आध्यात्मिक उत्त्पति के विचार से प्रत्यक्ष हैं । एफ यह कि चैतन्यात्मक परमाणु लचकदार है । इस से मन के अनुभव उसके रूप में अकित हो सकेंगे। दूसरा यह कि जीवात्मा में जड पदार्थों को भी अपने ससर्ग से सचेतन करने की शक्ति है। इसका एक आरम्भिक रूप मन के सयम से जड पदार्थों में कम्पन उत्पन्न कर देना है। इस के मानने में कोई भी आपत्ति नहीं है कि एक मनुष्य की चैतन्य शक्ति का प्रभाव दूसरे पर पड़ता है। इसी से अनेक ( २ ) प्रकार के विचार दूसरों में उत्पन्न किये जाते हैं। दूसरों के भाव जनता में फैल जाते हैं और दूसरों का तात्पर्य व प्रयोजन समझ में आता है। इस से अधिक बढ़ी हुई दशा में यह गुण मैसमेरेजिम, हिपनोटिजम, व टेली पैथी आदि मे पाया जाता है । जब यह बातें दूर से ही सम्भव हैं तो जव जीवात्मा शरीर के भीतर है तो उस का प्रभाव उन पदार्थो पर जिन से कि उस का स्पर्श है अवश्य ही इन दशाओं की अपेक्षा अधिक गहरा होगा। ॐराम ६-मनुष्य शरीर। प्राचीन आर्यो के दर्शन शास्त्र की गम्भीरता से चकित हो, जिस समय कि और जातियां सभ्यता की प्रारम्भिक अवस्था मे ही थी उस समय के आर्यों द्वारा अविष्कृत योगाभ्यास की अद्भुत क्रियाओं से अचम्भित हो कुछ लोग विश्वास करने लगे हैं कि प्रारम्भ में ही 'अग्निपुत्र" अथवा पूर्णोन्नत जीव आत्माओं ने ससार में ज्ञान का प्रकाश किया। इसी विचार से "थियोसो.. फीफल सुसाइटी" की विख्यात सभापति डाक्टर ऐनी वीसेण्ट ने अपनी "विलडिग औफ दी फौसमौस" (सृष्ठि की रचना) नामक पुस्तक में एक बडी अद्भुत बात लिखी है। उन के विचार में जव सृष्टि प्रलय पर ब्रह्म में समा जाती है तब उस सृष्टि के आत्मोन्नति को प्राप्त हुये जीवमात्मा अपने आदि कारण परब्रह्म में मिल तो जाते हैं पर अपनी विशेप २ उन्नति के अनुसार कुछ, न कुछ व्यकिगत भाव बनाये रखते हैं। जब नई सृष्ठि बनती है तो वह अपने ज्ञान को लिये फिर शरीर धारण करते हैं और " अपना ज्ञान आदि मनुष्यों को देते हैं। जिस समय यह आत्मा ब्रह्म में विलीन रहते हैं उस समय उनका ज्ञान भी परब्रह्म में ही रहता है । क्योंकि उनके और परब्रह्म के शरीर में कोई भेद नहीं है । इस सिद्धात के तार्किक परिणाम को वह इन शब्दों में स्वी कार करती हैं क्योंकि प्रत्येक उस ज्ञान को जिसका कि पूर्व के असल्य मनवन्तरों में प्राप्त किया था अगले मनवन्तर में साथ लाता है। और इस प्रकार हमारी समझ में आने लगता है कि जैसे चेतनता तुरीय अवस्था को प्राप्त कर फिर अल्पशता को प्राप्त हो जाती है इसी प्रकार परब्रह्म की अपरिमित चेतनता भी अन्तर में समा कर फिर प्रकट हो सकती है। और जिस प्रकार हम अपने अनुभव को भूल नही जाते वरन् लौटने के साथ वह फिर प्रत्यक्ष होजाते हैं उसी प्रकार जो हमारे अत्परूप में सम्भव है वही उस अविनाशी के सम्बध में भी किसी विशेष रूप में ठीक होगा। और उस का अविनाशी जीवन भी असख्य मनवन्तरों के असख्य अनुभवों से कुछ न कुछ उन्नति करता होगा। इस सदैव बढती हुई उन्नति का परिणाम हमारे लिये वृद्धि है-उस के लिये क्या है यह सिवाय उस के कोई नहीं जान सकता!" (प्रष्ट ३८) इसका स्पष्ठ अर्थ यह है कि आदितत्व अथवा परब्रह्म उन्नति शोल पदार्थ है। उसकी चेतनता व ज्ञान कदाचित् पूर्व समय में ऐसा नहीं था जैसा अव है और भविष्य में यह क्या होगा यह भी कोई नहीं कह सकता। पर ऐसी सत्ता न तो विस्तृतत्व के विचार से और न समय के विचार से ही अपरिमित हो सकती है उन्नति शब्द के अर्थ ही से फिसी सम्पूर्ण व्यकि की उन्नति प्रकट होती है । सम्पूर्ण व्यक्ति का अर्थ ही परिमित सत्ता है। उन्नति तभी हो सकती है जव फिसी की आदि हो । हम कभी यह नही कह सकते कि उन्नति यहा से प्रारम्भ होती है जब तक कि - [ ८४ ) हम उस पदार्थ की सत्ता की आदि तक न पहुच जाय । क्यों कि सम्भव है कि वह पद भी उन्नति का ही परिणाम हो। उसके आदि के पूर्व भी कोई वस्तु अवश्य होगी। फिर ऐसी उन्नति का अन्तिम परिणाम परब्रह्म को भी ज्ञात नहीं हो सकता। क्यों कि उस की इस समय की अर्धउन्नत दशा होने से वह भी पूर्ण उन्नति का विचार नहीं कर सकता । वास्तव में ऐसी पूर्ण उन्नति कुछ होगी भी या नहीं यह कोई नहीं कह सकता। इस सिद्धात को अस्वीकार करने में तो धर्माचार्य च दार्शनिक दोनों ही सह मत होंगे। क्योंकि धर्म सम्बध से ईश्वर पूर्ण शकि वाला होना चाहिये और इस कारण उस में उन्नति का अवसर ही नही हो सकता। दार्शनिक विचार से भी आदि तत्व अपरिमित होगा। और उसके स्वाभाविक गुण प्रत्येक स्थान और समय में समान होने चाहिये। उस में उन्नति का कोई प्रयोजन नही । मनुष्य जाति के आदि गुरु चाहे इस से पूर्व सृष्टि में उन्नत जीवात्मा थे अथवा बह और सष्टियों में उन्नति प्राप्त कर के भ्रमण करते हुए हमारी सष्टि में आ पहुचे । परन्तु यह आवश्यक है कि वह गुरु का काम शरीर धारण कर के ही कर सके होंगे। भूतात्मक शरीर और मानसिक शरीर में बडा भारी भेद है। जब हम स्वप्न अवस्था व एक प्रकार की देहातीत वृत्ति में हों अथवा जब हम विचार में मग्न होते हुए ध्यान में स्थित होने लगें तो हमें शात होता है कि हमारी विचार शक्ति उस दशा में हमारे भूता त्मक बन्धनों से बद्ध नहीं होती। हम जिस वस्तु को स्वप्न में प्राप्त करने की इच्छा करते हैं उस को कुछ अद्भुत विधि से प्राप्त कर लेते हैं। यदि स्वप्न में हम फिसी राक्षस को दखें और उस के भय से सज्ञाहीन न होकर यह विचार करें कि अमुक प्रकार से उस राक्षस से जीत सकते हैं अथवा उस को मार सकते हैं (८५) अथवा हमस्वय उस से बच सकते हैं तो तत्काल वह दशाप्रकट हो जाती है और हमें ऐसा अनुभव होता है मानों हम बच गये। उसमें दृश्यों का परिवर्तन अद्भुत शीघ्रता से होता है। जब विचार करते करते हम ध्यानवस्था में होने लगते हैं तो ऐसा प्रतीत होता है कि हमारे विचार ही प्रत्यक्ष रूपधारण करते जाते हैं। जैसे हम किसी मकान अथवा पुरुप का विचार करते हों तो वह मकान या मनुष्य हमारे नेत्रों के सम्मुख चित्रित हो जाता है। दूसरी ओर जागृत अवस्था में हमारी विचार श्रेणी को बाह्य सत्ताओं से एक धृष्ठ आघात सा लगता है और इस आघात से हमारी चेतनता उत्तजित हो जाती है जिससे हमारी शक्ति की सीमा का हमें तीब अनुभव होता है। भूतात्मक शरीर के इस प्रत्याघात व प्रतिकार से चेतनता को तीव्रता में वृद्धि होकर विचार शक्ति शनै शनै उन्नत हो जाती है। मनुष्य शरीर में यह विचार शक्ति पूर्णता को प्राप्त होती है। विचार पद पद पर भौतिक अनुभवों से सीमारद्ध होने से नियम युक्त हो जाता है। कथन शक्ति व भाषा का उदय मनुष्य की विशेषताएं हैं और इन्हो से शान का सचय करना भी सम्भव हो गया है। सचित ज्ञान सदैव यह स्मरण कराता रहता है कि हमारे पूर्वजों ने क्या प्राप्त किया और उस से हम को उन्नति करने की उत्तेजना करता रहता है। विचार करने के अभ्यास से विचार शक्ति स्वय ही बढती रहती है। विचारों का नियमवद्ध होना उस समय नष्ट हो जाता है जब उनका भौतिक सीमा सेससर्ग छूट जाता है जैसा कि स्वप्न अवस्था व ध्यान अपस्था में होता है। कदाचित् इस बात का कारण यही है कि जब शरीर रहित जीवात्मा साधकों द्वारा वात चीत करती हैं तो एक आश्चर्य मय ससार का हाल कहती है जहा प्रत्येक जीवारमा अपनी इस संसार - की परम इच्छामों को प्राप्त हुई प्रतीत होती है। यही इस बात का भी कारण है कि जिन्होंने बडे बडे पाप किये होते हैं उनको अपने मानसिक जीवन में प्रत्यक्ष नरक दीखता है । जय वह अपने भूतात्मक शरीर में होते हैं तब भी कभी कभी बड़े भयभीत हो जाते हैं और मृत्यु के समय तो उनका भय असह्य हो जाता है। जब इस शरीर में होने से सांसारिक यथार्थ दशाओं का ज्ञान हो सकने पर भी उनकी ऐसी दशा हो जाती है तो फिर क्या आश्चर्य है कि जब उन को विचार शक्ति पूर्णतया स्वतत्र हो जाय तो उनको दुस्तर नरक कासा अनुभव हो। यह भी स्वाभा. 'विक है कि ऐसे मानसिक जीवन का थोडासा समय भी युग के समान प्रतीत हो । इसीलिये स्वप्नावस्था के दो चार घण्टे हमें महीनों और वर्षों के समान प्रतीत होते हैं। हमारा विचार ही हम से सब करा लेता है। उस जीवात्मक सगठन में जिसके रूप में तो विचार शक्ति सम्बधी अन्तर हो गया है परन्तु जिसने इस स्थूल शरीर को छोड़ दिया है विचार शक्ति की क्रिया प्रायः स्वतत्र हो जाती है। परन्तु यह विचार शक्ति उन्ही शैलियों, विचारों और विश्वासों के अनुसार कार्य करेगी जिन्होंने कि सासारिक जीवन में वार चार होने से जीवात्मा के स्वरूप में स्थान प्राप्त कर लिया है। इन गुणों से मनुष्य शरीर को एक विशेषता प्राप्त है । इस शरीर द्वारा सवेत होकर स्वतत्रता से संसार के आघातों के विचार युक्त प्रतिकार व प्रत्याघात करने की शक्ति के कारण अपनी इच्छा से आत्मोन्नति करने का सुभीता इसी शरीर में है। हम तर्फ कर सकते हैं, अनुभव भी कर सकते हैं और इस प्रकार किसी कार्य के करने की सर्वोत्तम विधि को प्राप्त कर सकते हैं। धर्म, ईश्वर, पुण्य, पाप, प्रेम, पवित्रता, उपासना, ध्यान, योग ( ८७ ) के सिद्धातों की उत्पत्ति, व अनेक पदार्थ विज्ञानों की वृद्धि यह सब जीवात्मा व भूतात्मक शरीर के सयोग से ही हुए हैं। अात्मिक उन्नति से शरीर जीवात्मा के लिये अपने ही स्वरूप के शान को प्राप्त करना सम्भव कर देता है। मनुष्य शरीर को प्राप्त कर के जीवात्मा ईश्वर को भी प्राप्त कर सकता है । "मनुष्य ईश्वर का प्रतिचिव है" इस कथन का यही रहस्य है । इसी कारण आर्म्य धर्म ग्रंथ कहते हैं कि देवता भी मनुष्य शरीर का आदर व इच्छा करते हैं। यह दिखाया जा चुका है कि जीवित शरीर के जड पदार्थो की सत्तेजित चेतनता भी चैतन्यात्मक परमाणु पर प्रतिक्रिया कर सकती है। मनुष्य शरीर मे केवल भूत पदार्थ ही नहीं वरन् असख्य जीवित जन्तु भी हैं। अस्तु ऐसे शरीर की प्रतिक्रिया और भी तीव्र होगी। दूसरे जिस प्रकार बहुत से मनुष्यों से बनी हुई समाज के सदस्यों में एक प्रकार का सयुक्त भाव होता है इसी प्रकार शरीर में सगठित असख्य जन्तुओं की चेतनता से भी एक सयुक्त भाव प्रकट हो जायगा और इन जन्तुओं में अति- निकट व घनिष्ट ससर्ग होने से वह भाव समाज सगठित मनुप्यों के भार से अधिक गहन व अविच्छिन्न होगा। दूसरी ओर जीवात्मा ने भी इस शरीर के यथोचित योग्यता प्राप्त करने में बहुत सी नगीन शक्ति प्राप्त कर ली हैं ऐसी जीवात्मा व ऐसे शरीर के गहन व सयुक्त भाव को परस्पर तीव्र प्रतिक्रिया से मध्यम्य ईथर अथवा दूसरा कोई सूक्ष्म पदार्थ जो शरीर के सोनले स्थानों में भरा हुआ हो सतेजित हो फर एक प्रकार का ईथरी शरीर बना सकता है जो जीवात्मा व शरीर के सम्बन्ध में ग्रन्थि का काम करे। शरीर के विविध भाग जो शारीरिक सयुकभाव द्वारा जीवात्मा को आकर्षित करते हैं उससे जीवात्मा (८) की चेतनता उनकी ओर खिच कर मध्यस्थ ईथर को सतेजित कर सकती है। एक सूक्ष्म भूतारमफ शरीर वाले जन्तु के लिये ऐसे प्रवन्ध की आवश्यकता न हो परन्तु जैसे जैसे शरीर का संगठन सकीर्ण होता जाता है वैसे ही शरीर व जीवात्मा की परस्पर प्रतिक्रिया भी गहन होती जाती है। कदाचित् इन्ही कारणों का परिणाम यह है कि कभी कभी हमको एसा अनुभव होता है कि हमारी शारीरिक इच्छा हमें हमारी इच्छा के विरुद्ध घसीट ले जाती है और कभी कभी इस घिसटने का निरोध हम अपनी सम्पूर्ण चैतन्य शक्ति से करते हैं। हमारे शारीरक मन का (जो शारीरिक जन्तुओं के सयुक्त भाव व जीवात्मा की प्रतिक्रिया का फल है) यह कृत्रिम-मानसिक कार्य्य इच्छित वस्तु के विचार के प्रभाव को, जोकि आध्यात्मिक मन के सन्मुस उपस्थित होता है, प्रभाव बढा देता है। यदि आध्यात्मिक मन उस इच्छा के विरुद्ध निश्चय करता है तो उसे शारीरिक मन को वश में करने के लिये विशेष शक्ति का प्रयोग करना पड़ता है। इससे इस बात का रहस्य समझ में आजाता है कि निर्मल बुद्धि व मन की उन क्रियाओं में जिनमें कि शारीरिक आवश्यकताओं इच्छाओं फा समावेश रहता है इतना तीव्र भेद क्यों प्रतीत होता है । यही कारण इसका भी है कि कुछ मनुष्यों को जीवात्मा के शारीरिक सङ्गठन के परिणाम होने का सिद्धान्त इतना अच्छा लगता है। जैसा कि पहले पाद में कह चुके हैं यह शारीरिक मन कभी कभी विशेप वृद्ध को प्राप्त कर के सहात्मिक दशा को प्राप्त करता है। - ( 6 ) - ७- अमरता, आवागमन, मुक्ति अथवो निर्वाण। प्राय. सव जो जीवात्मा की पृथफ सत्ता मानते हैं उसको अविनाशी भी कहते हैं। जीवात्मा की अमरता ऐसी आवश्यक समझो जाती है कि वे मनुष्य भी जो कि इसको मानसिक क्रिया व विचारों का सगठन मात्र समझते हैं, अमरता के अर्थ करने की आवश्यकता समझते हैं और कहते हैं कि जीवात्मा का सार, अर्थात् उस व्यक्ति के विशेष विचार व स्वभाव, इस का- रण से अविनाशी हैं कि वह सदैव के लिये आगामी मनुष्यों में स्थिति हो जाते हैं। जैसा भूमिका में दिखा चुके हैं यह सिद्धात तर्फ को सहन नहीं कर सकता। इस से कोई ऐसी स्वतन्त्र सत्ता सिद्ध नहीं होती जो अविनाशी हो सके । वह विशेष विचार व स्वभाव आगामी मनुष्यों में स्थान पाने और न भी पावें । नष्ट हुए महाद्वीप ऐटलाण्टा के निवसियो की जीवात्मा इस विचार से अमर नहीं फहो जा सकती। दूसरी ओर भारतीय दार्शनिक भी जीवात्मा को अविनाशी मानते है । जिस सिद्धात में जीवात्मा की अमरता के साथ प्रकृति व ईश्वर की स्वतत्र सत्ता भी मानी गई है उन परतो विचार हो चुका है और यह दिखा दिया गया है कि आदि तत्व की अपरिमितता का विरोधी होने से यह सिद्धान्त असम्भव है । परन्तु आश्चर्य है कि जो जीवात्मा को परब्रह्म से उत्पन्न बताते हैं वह भी जीवात्मा को अविनाशी कहते हैं। यह तभी सत्य हो सकता है जब "जीव" से प्रयोजन तो आदि तत्व से उत्पन्न जीवात्मा हो और "मात्मा" का प्रयोजन आदि तत्व के उस अंश से हो जो जीवात्मा का आधार है। इस प्रकार - "मात्मा" अमर कही जा सकती है परन्तु जीव कदापि अमर नही हो सकता। जो जीवात्मा सृष्टि रचना में भिन्न भाव को प्राप्त होता है वह उस मिन्नता के नष्ट होने पर फिर आदितत्व में समाजाना चाहिये । जैसे जड पदार्थ जो उसी प्रकार प्रकट होते हैं, और फिर उसी में समा जाते हैं। कुछ धर्माचार्यो के और भी अद्भुत विचार हैं । यह जीवा. स्मा की उत्पत्ति तो मानते हैं परन्तु नाश स्वीकार नहीं करते। वे कहते हैं कि उस का आदि तो है परन्तु अन्त नही। यदि सव जीवात्माओं की एक बेर उत्पत्ति हो चुकी है तो किसी समय भविष्य में एक बडी अनोखी दशा प्राप्त होने वाली है। जव सव फी मुक्ति हो जायगी, तब कदाचित् नवीन जीवात्मा उत्पन्न किये जायगे । ईश्वर की सत्ता के अतिरिक्त सम्पूर्ण स्थान जब तक मुक्त जीवात्माओं से भर न जायगा तब तक इसी प्रकार वह उन को उत्पन्न करता रहेगा। इस सिद्धांत में अपरिमितता नहीं हो सकती क्यों कि ईश्वर का व्यक्तिरूप होना च जीवात्माओं की संख्या से परिमित होना आवश्यक हो जाता है। यह समस्या तभी सुलझ सकती है जब जीवात्मा लय भी हो जाते हो जिस से चक्र पूरा हो सके । ऐसा चक्र अनन्त समय तक चलता रहे तो भी ऊपर की कठिनता उपस्थित न होगी। कोई कोई तो आत्मा को अविनाशी ही नहीं कहते किन्तु यह भी कहते हैं कि इस शरीर को छोड़ कर जीवात्मा दूसरा जन्म नहीं लेता वरन् मुक्ति के दिन की राह देखता है । इस का एक अर्थ यह होगा कि मनुष्य च पशुओं के जीवात्मा विरोधी है और जीवात्मा की सुक्ष्म जंतु से सभ्य मनुष्य तक उन्नति नहीं होती। इस के अतिरिक्त प्रत्येक नवशिशु में एक नवीन जीवात्मा होगी। और एक समय वह आ सकता है जब कि सारी पृथ्वी मुक्ति की राह देखती हुई जीवात्मानों से भर जायगी। दूसरे कोई कारण भी नही दीखता जिस से जीवात्मा एक चार एक शरीर में प्रविष्ट हो सके परन्तु अनेक बार प्रविष्ट न हो सके, यदि पहला सम्बन्ध ईश्वर ने स्थापित किया तो भी यह नये बच्चो के लिये नवीन जीवात्मानों के सदैव बनाने का कष्ट उठाने की अपेक्षा एक ही जीवात्मा में अनेक शरीर धारण करने की शक्ति उत्पन्न क्यों नही कर देता। यह विधि पहली से अवश्य ही सहज तथा युकिसयुक्त व उचित है। एक वडा कठिन प्रश्न यह है कि जो मनुष्य इस जीवन में यडा पापी रहा है और जिस की पाप मय वृत्ति मृत्यु के समय नए नही हुई क्या वह भी मुक्ति के दिन वर्ग में अपनी वृत्तियों को साथ ले जायगा? यदि ऐसा नही होगा तो उन वृत्तियों का नारा या सुधार कैसे होगा? सुधार की साधारण विधि पापों का प्रत्याघात होना अथवा जान बूझ कर सुधार करना है। परन्तु इन दोनों विधियों में सत्कर्मो की आवश्यकता है जिन से पापिक धृत्तियों का विरोधी स्वभाव उत्पन्न होकर उनका नाश फर दे। परन्तु इस सिद्धान्त में ऐसा करने का अवसर ही नहीं मिलता। जीवन के पापों को ईश्वर भले ही क्षमा कर दे परन्तु वह पापिक वृचिया तो रह जायगी और इस परम क्षमा के पश्चात् भी वह वर्ग में पाप कर सकता है। यदि एक समय स्वर्ग में पाप करने पर शैतान नरक में डाल दिया गया तो वर्ग के नगीन पापो भी उसकी सगति के लिये जा सकते हैं । अतएव ईश्वर की कृपा का प्रमाण, विशेष पापों को क्षमा करने की अपेक्षा, यह अधिक प्रत्यक्ष होता कि वह इन पापिक गृत्तियो के ही नाश का अवसर देता। पापिक वृत्तियो को नरक का घडे से यडा कष्ट अथवा वर्ग का यडे से चडा सुख नष्ट नहीं कर सकता। कारागृह का प्रभाव - ( २ ) जो पक्के पापियों पर पड़ता है उस से यह बात प्रत्यक्ष है । यह सम्भव है कि नरक के दण्ड च खर्ग के सुख सांसारिक सुख और दण्डो से अधिक तीव्र हों परन्तु उसके साथ साथ पाप करने का स्वभाव अपराध करने के स्वभाव से अधिक गहरा होता है। दूसरा पहले ही का परिणाम है । दूसरा आपत्ति कारक तभी होता है जब वह समाज में दण्डनीय कार्य करा दे । परन्तु पहले का सांसारिक परिणाम साधारणतया प्रत्यक्ष में बुरा प्रतीत नहीं होता और इस कारण उस की वृद्धि के लिये अधिक अवसर मिलता है। अतएव धामिक विचार से पुनर जन्म अधिक उचित है। और दार्शिनिक विचार से तो पुनर जन्म का सिद्धान्त ही सत्य हो सकता है। हम देख चुके हैं कि मानसिक शक्ति, विचार व स्वभाव जीवात्मा के विशेष स्वरूप के कारण होते हैं। उस स्वरूप की बढती हुई स्थूलता का कारण उसमें एक प्रकार की आध्या- त्मिक क्रियाओं के वेग का एकत्रित होना है। जब तक यह वेग शान्त न होगा, और उसके स्वरूप की स्थूलता नष्ट होकर जीवा- स्मा अपने भिन्नता रहित आदि रूप को प्राप्त नहीं करेगा तब तक वह नये नये शरीर धारण करता रहेगा। यह उस समय तक होता रहेगा जब तक कि जावात्मा आदि तत्व में लीन न हो जायगा । यह सम्भव है कि दूसरा उचित शरीर धारण करने से पूर्व जीवा- स्मा मानसिक जीवन व्यतीत करे परंतु उस जीवन से न तो वृत्तिया ही शात होगी और न वह स्थूलता हो नष्ट होगी। हां इतना हो सकेगा कि कुछ इच्छाएं मानसिक सतुष्टि से शात हो जाय । मानसिक जीवन से वृत्तियां और भी दृढ़ हो जायंगी क्योकि उन को स्वतत्रता से क्रिया करने का अच्छा अवसर प्राप्त होता है। परन्तु स्थल शरीर के समान उस समय सचेत प्रत्याघात की ។ सम्भावना न होने से, वह किसी रोक के विरुद्ध कार्य न कर सकने से शात नहीं होती और जीवात्मा फिर किसी उपयुक्त शरीर से आकर्पित होगा। जो पहले सम्भव था वह फिर भी सम्भव होगा। इसमें कोई विवेक विरुद्ध मनगढन्त रोक नही हो सफ्ती। जय शुद्ध होते होते जीवात्मा का स्वरूप आदि तत्व के रूप को प्राप्त करता है तो बन्धनों से छुटकारा, निजात,मुक्ति, निर्वाण, मोक्ष, कैवल्य होता है। फिर वह दूसरा शरीर धारण नहीं करता क्योंकि उसका वह भिन्न रूप ही नष्ट हो जाता है। एकान चेतनता की वह किरण जिससे जीवात्मा के रूप की उत्पत्ति हुई थी परि- स्थित पदार्थ में विस्तृित हो जाती है। परन्तु इसका अर्थ यह नही है कि ऐसी दशा सदैव रहेगी। इस सृष्टि की प्रलय के पश्चात् नवीन सृष्टि की उत्पत्ति के समय जव चेतनता फिर एक- त्रित होगी तो आदि तत्व का वह अथ जो पहले जीवात्मा था और जो क्षोभ मडल के अन्तर्गत है फिर अवसर के अनुसार जड या चैतन्य स्वरूप धारण करेगा । परन्तु इस सृष्टि की प्रलय व दूसरी के उदय तक यह मुक्त दशा में रहेगा। सृष्टि के उदय होने के पश्चात् उस फो क्रियाओं से वह शकि वेग जो उस को पूर्व में प्राप्त हुआ था शनै शनै शात होता जाता है । शक्ति अधिक शकि-सग्रह से अस्प-शक्ति-सग्रह की ओर जाती है । एकत्र चेतनता का वह केन्द्र जिस ने प्रथम वेग प्रदान किया था कदाचित् शात अथवा विस्तृत हो जाता है। यह निश्चय है कि सृष्टि के उदय व प्रलय दोनों में युगों का समय लग जाता होगा । चेतनता के एकाम होने की क्रिया में भी बहुत समय लगता होगा। यह ऐसी क्षणिक क्रिया नहीं हो सकती जैसी कि हमारी तीव्र व अप चेतनता में होती है। इस (६४) M अन्तरीय वेग के शांत होने से स्वभावत. प्रतिकारक वस्तुओं का विलय होना प्रारम्भ हो जायगा। कहते हैं कि तव सूर्य ठडे हो जाते हैं और पृथ्वी जीवधारियों से रहित हो जाती है। जीवात्माओं की चेतनता भी शांत व विस्तृत होने लगेगी। चैतन्यात्मक परमाणुओं के विशेष स्वरूप अपने आधार के न रहने से सरल व एक रस होने लगेंगे। जो जीवात्मा अपने स्वरूर को अव भी बनाये रखते है वह दूसरे शरीर धारण करने के लिये निकटवतों रची हुई अथवा रचना क्रम में तत्पर सृष्टियों की ओर आकृष्ट हो जाते हैं। ऐसे स्वाभाविक लय से आवागमन के सिद्धांत पर दोप नहीं आता। यह कहना कि वह जीवात्मा जिन में मानसिक स्वभाव सजीव है और इस कारण विशेष स्वरूप को प्राप्त हैं उन को दूसरे शरीर, उन स्वभावों को शात करने के लिये धारण करने पड़ते हैं, इस से पूर्णतया भिन्न है कि प्रलय के समय यह मानसिक स्वभाव ही शात होने लगते हैं और जीवा- स्मा का स्वरूप भी असख्य जड पदार्थो के समान एक रस होने लगता है । यह दूसरी क्रिया उस समय नहीं हो सकती जव मानसिक वृत्तिया तो प्रवल हो और प्रलय का समय न हो। घास्तव में योगी, जो मुक्ति प्राप्त करने के लिये आध्यात्मिक क्रिया करते हैं, उसी समय मुक्त हो सकते हैं जब वह निर्विकल्प समाधि प्राप्त कर लें। उस दशा में उन को अपना अथवा और किसी वस्तु का बोध नही रहता । उन के उपस्थित स्वभाव इस जीवन से शात हो जाते हैं और वह नवीन संकल्प विकल्प से नवीन शरीर नहीं बनने देते। जब इस एक रस दशा में वह शरीर छोडते हैं तो आदि तत्व में लय हो जाते हैं। पुण्य मय जीवन, भकि उपासना से मुक्ति के लिये उचित दशा बनायो जाती है परन्तु यथार्थमुक्ति निर्विकल्प समाधि से ही होती है। इस आध्या- - मित्क क्रिया में आध्यात्मिक शकियां भी प्राप्त होतो हैं। उन की सरल जीवात्मा सृष्टि को सूक्ष्म शक्तियों से एक रस हो कर उन का प्रयोग कर सकती हैं। पूर्व में ऐसी सरल दशा होते हुए भी जीवात्मा इतने शक्ति शाली इस कारण नही थे कि उस समय उनमें विचार से प्रेरित हो कर कार्य करने की शक्ति नहीं थी। यह शक्ति उन में मनुष्य को जीवात्मा होने से आई और अव यह शकि उस फो उन सूक्ष्म शकियों पर, जिन से वह एफ रस हो रहा है क्रिया करने में सहायता करती है। इच्छाओं के दमन करने से जो बाध्यात्मिक शक्ति की वृद्धि होती है चेतनता के प्रभाव को इस क्रिया में बढा देती है। परन्तु मुकि तर होगी जब इन आध्यात्मिक शक्तियो की इच्छा का भी त्याग होगा क्यों कि यह भी जीवात्मा को को की ओर पीच कर किसी विशेष स्वरूप को स्थित करती हैं । इस प्रकार त्याग ही से योगी निर्विकल्प समाधि प्राप्त करता है। कोई नहीं जानता कि प्रलय कब होगी, जो उस समय से पूर्व मुकि चाहते हैं उनको क्रिया करनी आवश्यक है । इसके अतिरिक्त उस समय भी असाधार- एतया प्रवल इच्छा वाले जीवात्मा बच फर अपव्यकस्वरूप को धनाये हुए दूसरी सृष्टि की ओर आकृष्ट हो जाते हैं। अतएव निश्चिन्त होने के लिये मुक्ति के लिये फर्म करना उचित है। ८-अवतारों का रहस्य । यह कहा जा चुका है कि चेतनता में दूसरों पर प्रभाव डालने का अद्भुत गुण है । विविध पदार्थों को आकर्षण शक्ति एक प्रारम्भिक रूप है। प्रेम और सहानुभूति, में यह गुण विशेष ऋद्धि प्राप्त करता है, इसी से उन में एक विशेष आकर्षण है, जिससे दो जोवात्माओं का मेल हो जाता है। प्रेम प्रेमी को में मगन रख कर उस के मन को पवित्र घसरल करता है। इन से मन की चंचलता का निरोध होता है । इसी कारण आत्मशान अपने इष्ट देव के लिये अनन्य भक्ति प्राप्त करना चाहते हैं मो कोरे ज्ञान से सन्तुष्ट नहीं होते। भाव ज्ञान को वश में कर सकत है। प्रेम भी भाव है इस से वह केवल ज्ञान की अपेक्षा अधिः सुगमता से सासारिक प्रलोभन का विरोध कर सकता हैं । इस के अतिरिक्त प्रेम के आकर्षण से उन आध्यात्मिक शक्ति घा जीवात्माओं को सहायता प्राप्त हो सकती है जिन तक वह आप पण पहुच सके। हलके व सूक्ष्म पदार्थ में स्थूल पदार्थ को अपेक्षा हरफा अधिक सुगम है। पवित्र मन पापी मन की अपेक्षा अधिक सूर पदार्थों व शक्तियों से एक रस होते हैं । अतएव पवित्र मनुष्य की इच्छा में पापियों को अपेक्षा अधिक प्रभाव होता है । इस का कारण केवल उनकी आत्मिक शक्ति ही नहीं फिन्तु यह भी कि उनकी शक्ति की क्रिया को घर्षण कम अनुभव होता है । इस से स्वार्थ मय प्रेम का प्रभाव इतना नही होता। समय पाकर जर पवित्र व सविनय प्रेम भक्ति का रूप धारण करता है तो उसमें कुछ अद्भुत सुत्मता, निश्चलता, पवित्रता व आनन्द आ जाते जब ससार में पाप और अन्याय बढ़ते हैं तो धर्मात्माओं का जीधन कठिन और दुःसमय हो जाता है। कभी कभी महान जीवात्मा उत्पन्न होकर अन्याय का विरोध करते हैं व उस को नष्ट करने का प्रयत्न करते हैं। प्रासुरी शकि कुछ समय के लिये चाहे दव जाय परन्तु शीघ्र ही फिर प्रवल हो जाती है। जब तक हम अन्याय के साथ लडते हैं तब तक हमारे मन की आकर्षण . ( ६७ ) शक्ति अपने आप को लक्ष्य बनाये रहती है परन्तु अपनी त्रुटिया से हम अपनी आध्यात्मिक शक्तियों का प्रयोग नही कर सकते। जब पाप व अन्याय के अत्यन्त बढ जाने से मनुष्य अपनी रक्षा करने में असमर्थ होते हैं, तो उनकी निराश्रयता से उनके हृदय से ईश्वर के प्रति यह शुद्ध मर्म भेदीप्रार्थना निकलती है कि वह स्वय प्राकर उन के कष्ट को निवारण फरें। ऐसी प्रार्थना जब करोडों पवित्र व प्रेम परिपूर्ण हृदयों से निकलती है तो उस में असीम मार्फपण शक्ति होती है। और जब इस की लहर किसी ऐसे जीवात्मा तक पहुचती है जिसने फि ससार के कष्ट को दूर कर धर्म स्थापन करने के लिये यथेष्ट आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त कर ली हैं तो वह इस ओर आकर्षित होकर किसी धर्मात्मा के घर शरीर धारण करता है। ऐसा जीवात्मा अपनी आध्यात्मिक शक्ति के चिन्ह बालकपन से ही दिखाने लगता है और मनुष्य उस को अवतार कह कर उसकी उपासना करने लगते हैं। जिस परमोन्नत जीवात्मा में ससार के कल्याण करने की इच्छा के अतिरिक और कोई व्यक्तिगत भाव जीवात्मक संग- उनको उपस्थित रखने के लिये नहीं रहता वह जीवात्मा स्थल शरीर को छोड कर भगवान् विष्णु के रूप से मानसिक जीवन व्यतीत करता है । विष्णु संसार के पालन करने वाले हैं क्योंकि यह पवित्र भक्तों की प्रार्थना से आकृष्ट होकर पाप को नाश करने और धर्म को स्थापन करने के लिये प्रस्तुत रहते हैं। उनके जीवात्मा का खरूप पूर्णतया विलीन ससार के कल्याण करने की इच्छा की प्रबलता के कारण नहीं हुआ, परन्तु उनकी आध्यात्मिक क्रिया से यह सव शक्तिया जो योग से प्राप्त होती हैं उन्हें प्राप्त हो चुकी हैं। अतएव जब ऐसा जीवात्मा शरीर धारण करता है तो उस में आध्यात्मिक शक्तिया शीघ्र ही प्रकट होने लगती हैं । अन्य पुरुषों ( १८ } के सस्कारों को शांत करने के लिये वह जन्म धारण करते हैं, और उसी आवश्यकता के अनुसार उनका जीवन चरित्र बन जाता है जो देखने में उनके सस्कारों का परिणाम प्रतीत होता है। एक विशेष समय में उनकी आवश्यकता होतो है । उस समय की आवश्यकताओं के अनुसार ही उनका जीवन होता है। सम्पूर्ण आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त कर शरीर धारण किये हुए ऐसा जीवात्मा ही सबसे अधिक 'पूर्ण सचा ईश्वर के समान हो सकता है। यदि वह चाहें तो अपनी इच्छा से पञ्च भूतों से भी कार्य करा सकते हैं। परन्तु वह ससार को उत्पन्न करने वाले या उस को नियम बद्ध रसने वाले नहीं हैं। वह सृष्टि के रहस्यों को जानते हैं और उनका प्रयोग भी कर सकते हैं । वह समय अथवा विस्तृतत्व के विचार से अपरिमित नही किन्तु उस अपरिमित तत्व के ज्ञाता हैं। उनके द्वारा वह सब कुछ कर सकते हैं जो प्राकृतिक सिद्धातो के अनुसार हो सकता हो । यह दया के समुद्र व कृपा के निधान हैं। उनकी न कोई जाति है न वह किसी विशेष धर्म वा देश के पक्षपाती हैं। उनकी दया सव के लिये जो उसके खोजी हाँ एक सी है। उनका दर्शन हा पवित्र करने वाला है। वह धर्मात्मानों की रक्षा के लि जन्म धारण करते हैं। फिर ससार में धर्म का राज्य होता है और मनुष्य सुख से जीवन व्यतीत करते हैं। यह है विष्णु का पूर्ण अवतार। यदि संसार में कोई वस्तु प्रेम व भक्ति के योग्य है तो वह यह विष्णु हैं। यह अवतार विशेष अवस्था में प्रकट होता है। केवल यही आवश्यक नहीं है कि ससार में असा अन्याय व दुख हो, परन्तु वह अन्याय से पीडित मनुष्य स्वय पवित्र, धर्मयुक्त व भक्त होने चाहिये, क्योंकि उसी समय उन की प्रार्थना में यथेष्ट आकर्पण ( 8 ) शक्ति हो सकती है। अतएव जव पाप और अन्याय को अधिक वृद्धि हो तो उसके नाश की सब से उत्तम विधि भगवान के प्रेम व भक्ति का प्रचार है । चाहे वह भगवान् को सत्ता किसी रूप में समझे। अपने अपने ईश्वर के प्रति प्रार्थना, विचारों की एकता के कारण विष्णु भगवान् को हो पहुचेंगी । यदि वह इस सिद्धात के रहस्य को समझ कर भक्ति करेंगे तो उनकी आकर्षण शक्ति का लक्ष्य ठीक रहने से उसका प्रभार अधिक होगा। विशेप अवतार को पारुष्ट करने के अतिरिक प्रेम व भक्ति चित्त की शुद्धि करने के कारण भी पाप निवारण में सहायक होंगे। इस से समाज में वह आत्मिक शक्ति उत्पन्न होगी जो केवल पवित्रता से ही प्राप्त हो सकती है ओर जिसकी अन्याय के साथ किसी प्रकार के भी युद्ध करने के लिये परमावश्यकता है। पूर्णावतार के अतिरिक्त साधारण अवतार भी अनेफ दों को शक्ति वाले सन्त महात्माओं के स्वरूप में आत्मोन्नति द्वारा सदैव होते रहते हैं। अनेक उपदेश व आचरणों से वह संसार में दैवीय सम्पदा को बढा कर आध्यात्मिक स्रोत को सूखने से बचाते हैं। वह ससार की सब प्रकार से कल्याण कामना करते हैं। परन्तु सृष्टि के स्वाभाविक प्रवाह में हस्ताक्षेप नहीं करते, नहीं तो ऐसे हस्ताक्षेप का कोई अन्त न होगा। क्यों कि उसकी कुछ न कुछ आवश्यकता सदैव बनी रहती है । परन्तु जब अन्याय असा हो जाता है तो उनकाआध्यात्मिक बल भी विशेष अवतार को आकृष्ट करने में सहायता देता है। जव मनुष्यों के सस्कार भगवान् को ओर लगेगे तो वह स्वय उनके कष्ट निवारण के लिये प्रकट हो जायंगे । सन्त महात्मा उन सस्कारों को अपने प्रेम प्रभाव से उदय करने में सहायक होते हैं। कुछ मनुष्य आपत्ति करते हैं कि भगवान का अवतार ( १०० ) असम्भव है, भगवान् सर्वव्यापक हैं इस लिये परिमित शरीर में चन्द कैसे हो सकते हैं ? सम्पूर्ण ससार का शासन करते हुए किसी एक देश अथवा एक पृथ्वी पर कैसे रह सकते हैं ? यह युकिया उस समय उचित हैं जब ईश्वर में, चाहे वह साकार हो या निराकार, व्यकिगत भाव हों, क्योंकि एक व्यक्ति स्वरूप एक ही समय दो पृथक् पृथक् स्वरूपों में कैसे रह सकता है । अतएव अवतार का सिद्धान्त उन लोगों के लिये असम्भव है जो जीवात्मा, प्रकृति, व ईश्वर को पृथक् पृथक स्वतन्त्र सत्ता मानते हुए ईश्वर को ससार का रचयिता कहते हैं। आदि तत्व प्रत्येक जड व चैतन्य पदार्थ में अवतीर्ण है। विष्णु रूप जीवात्मा अथवा उनका विशेष अवतार आदि तत्व का सव से अधिक उन्नति शील स्वरूप है। वह कल्पित सिद्धान्त के ईश्वर नहीं किन्तु वह सत्ता हैं जो यथार्थ में पूर्ण ईश्वर के सब से अधिक समान हैं। परन्तु एफ बात से सचेत भी रहना चाहिये। कभी कभी कोई पुरुप योग के किसी रहस्य को किसी प्रकार प्राप्त कर, उसके द्वारा किसी साधारण आध्यात्मिक शक्ति को प्राप्त कर, सर्वोच्च अवतार होने का दावा करने लगते हैं। इससे केवल नये पन्थ प्रकट हो जाते हैं और समाज मे झगड़े के नये कारण उपस्थित हो जाते हैं। अज्ञ मनुष्य सन्मार्ग से भ्रष्ट हो जाते हैं। ऐसे दावेदारों से सचेत हो कर व्यवहार करना उचित है। पूर्ण अवतार अत्यन्त विशेष अवस्था में प्रकट होते हैं। जब वह प्रकट होते हैं तो वह भिन्नता नही किन्तु एकता का प्रचार करते हैं। झगडे के बजाय शान्ति फैलाते हैं। उनका ज्ञान पूर्ण और उनके चिन्ह स्पष्ट होते हैं।
राम -सत्त्व, रज, तम। सृष्टि रचना विधि में देख चुके हैं कि किस प्रकार निश्चलव शात दशा में किया का उदय हुआ और उस क्रिया से किस प्रकार स्थूलता प्रकट हुई। जब तक क्रिया का उदय न हो तब तक निश्चल दशा सिर रह सकती है परन्तु क्रिया के प्रकट होते ही स्थूलता का प्राप्त होना स्वाभाविक है । इन तीनों दशाओं का नाम ही सत्त्व, रज व तम है । सत्त्व केवल शात सत्ता की दशा है। क्रिया की दशा रज है और रज का स्वाभाविक परिणाम स्थूलता तम है। यह शब्द उन स्वभावों के लिये भी प्रयोग होते हैं जिन से यह दशा प्रकट होती हैं । जब हम दो दशाओं की तुलना करेंगे तो उन में अवश्य ही कुछ न कुछ अपेक्षा भाव होगा। एक दशा दूसरी से अधिक सात्विक हो सकती हैं यद्यपि दोनों ही क्रिया- स्मक रज की दशा हों। वह क्रिया जो सात्विक दशा की ओर ले जाती हों उन क्रियाओं से अधिक सात्विक होंगी जो केवल रज की दशा को ही तीवकरती हैं । परन्तु उन में कोई भी पूर्णतया सात्विक नहीं हो सकती। इस विचार से प्रत्येक पदार्थ व क्रिया का कोई न कोई विशेष स्वरूप होगा। चोरी और प्राण हरण के भी इस प्रकार दर्जे हो सकते हैं। जो चोरी भूको मरते हुए भोजन प्राप्ति के लिये होगी यह उस चोरी से अधिक सात्विक है जो स्वाभाविक चोर करता है। क्योकि दूसरी दशा की अपेक्षा पहली का प्रयोजन शुद्ध है और शुद्धता सात्विक गुण है । निर्धन विधवाय नि सहाय बालक की चोरो तामसिक है क्योकि यह पापिक वृत्तिकी बढी हुई दशा का चिन्ह है। किसी निर्वल व अन्याय से पोडित की रक्षा के । १०२ ) निमित्त धर्म युद्ध में प्राण हरण करना सात्विक है। सिपाही की आजीविका होना राजस है और स्वार्थ के लिये हनन करना तामस है। इस विचार से भोजन करना कि शरीर धर्म पालन करने के योग्य बना रहे सात्विक है। स्वाद के लिये भोजन करना राजस और दूसरों पर अत्याचार के निमित्त शरीर बलवान बनाने के लिये भोजन करना तामल है। कोमल प्रेम मय, दयाल, ईमानदार और सत्यधारो स्वभाव सात्विक है । चतुर, उद्यमी, अनुसधानी स्वभाव राजस है । और क्रोधी, उग्र, मूर्ख और मत्सरी स्वभाव तामस है । स्वभाव ही नहीं वरन् शरीर में भी यह भेद हो सकता है। शुद्ध कोमल और इलका शरीर सात्विक है और रक्तपूर्ण, उत्साहीव बलवान शरीर राजसी है । अपवित्र आलसी शरीर तामसी है। पर एक ही मनव एक ही शरीर में यह तीनों दशा भिन्न भिन्न समयों पर उप- स्थित होसकती हैं। उपासना व भक्ति में मन सात्विक है। सा- सारिक प्रवध में लगा हुआ मन राजसी है और क्रोध, काम, मत्सर, ईर्षा आदि मे तत्पर मन तामसी है । शुद्ध स्नान किया हुया इच्छानों की उत्तेजना से रहित शरीर सास्तिक है; सुग- धित, सुसजित व सांसारिक कार्यो में तत्पर शरीर राजसी है, निद्रा, आलस्य व अपवित्रता की दशा में शरीर तामसी है। जड पदार्थो का भी इस सिद्धात के अनुसार विचार हो सकता है। इस प्रकार रगों के भी भेद हो सकते हैं। श्वेत रंग सात्विक है, लाल रंगराजस है और काला रगतामस है। ताजे- फल और दूध से बनी हुई मीठी वस्तुएं सात्विक भोजन है, मिठाई और मसालेदार पदार्थ राजसी हैं और वासे, तीक्ष्ण व नशीले पदार्थ तामसी हैं । सात्विक वस्तु आनन्द दायक होती हैं, में सुख दुख मिले होते हैं और तामसी घृणा उत्पन्न करने वाली , .
( १०३ ) होती हैं । वायू सात्विक हैं । रस रूपयुक्त वस्तु राजसी हैं और स्थूल पृथवीतत्व युक्त वस्तु तामसी है। और फिर विविध वायु, रस और स्थूल वस्तुओं में भी इसी प्रकार तुलना हो सकती है। ऊपर दिये हुए कुछ उदाहरण है । यह विभाग आदि तत्र की मूल दशानों के आधार पर ही निर्भर है। जो निश्च- लता के समान है वह मात्विक है । जिस में क्रिया से कुछ न कुछ समानता है वह राजस है और वह जिन का खभाव अविवेकी क्रिया अथवा आलस है और अकर्मण्यता के समान है वह तामसो है। यह विचार केवल बुद्धि विलास के लिये ही नहीं वरन व्यव- हार सम्बन्ध से भी महत्व पूर्ण है । हम देख चुके हैं कि राजसी किया का स्वाभाविक परिणाम तामसी दशा है। रज में अपनी क्रिया को दोहराने का प्राकृतिक स्वभाव है । अत. राजसी क्रिया स्वभावत बढती रहेगी । एक क्रिया दूसरी क्रिया उत्पन्न करेगी और यह क्रम उस समय तक चलता रहेगा जब तक कि यह क्रियाएँ तामस मे परिणत न हो जायें । अतएव जो मनुष्य शुद्ध व सात्विक होना चाहते हैं उन को अपने कर्मों के सम्बन्ध में सदैव सचेत रहना चाहिये। मनुष्य समाज के सदस्य होने से हम क्रिया रहित तो नहीं हो सकते परन्तु हम को यह ध्यान रखना चाहिये कि हमारे प्रयोजन व क्रियाविधि दोनों सात्विक हों। हमारे कार्य्य उदार सत्याग्रही व धार्मिक होने चाहिये । मनुप्यों और वस्तुओं के चुनाव में भी हम को सात्विक होना चाहिये । सा- त्विक पुरुषों को सगत से सात्विक गुणों की वृद्धि होती है और राजसी घ तामसी पुरुषों को सगति से रज और तम गुणों की वृद्धि होती है। सास्विक भोजन से हमारा मन निश्चल व शात रहेगा ।राजसी भोजन से हमारा स्वभाव रागात्मक होगा और ( १०४ ) हम को तामसी भोजन से हम मालसी कर्तव्यहीन व चिड चिडे स्वभाव के होंगे। इस का कारण शारीरिक मन पर भोजन का प्रभाव है। इस सिद्धान्त का एक और परम प्रयोजनीय परिणाम है। जिस वस्तु की किसी विशेष भोर गति हो तो उसकी गति में उसी ओर को वेग बढता जायगा जब तक कि वह किसी ऐसी अवस्था को प्राप्त न हो जिसमें प्रतिकार का होना सम्भव हो। जैसे ऊपर से गिरती हुई गेंद पृथवी से टक्कर खाकर फिर ऊपर को उछलती है । यदि हम चाहे कि यह पृथवी पर न गिरने पावे और उससे पूर्व उस को गति में परिवर्तन हो जाय कष्ट करना पडेगा । यदि हम एफ तरता लेकर उस को गेंदे की गति के मध्य में लगादे तो गेंद तखते से टक्कर खाकर ही उछल जायगी और पृथवी तक न गिरने पावेगी । इसी प्रकार हमारे जीवात्मा को स्वाभाविक गति भी अपनी क्रिया के वेग को ताम- सिक दशा तक बढातो है। यदि हम प्रतिकार की अवस्था से पूर्व ही उर्धव गति से उन्नति करना चाहते हैं तो इस अधोगति का प्रतिकार करने को हमें सात्त्विक प्रभावों के तख्ते के लगाने की आवश्यकता है। वह भक्त लोग जो किसी विशेष अवतार के उपासक होते हैं साधारणतया कहते हैं कि सब बाते भगवान को इच्छानुसार होती हैं । उन से कभी कभी प्रश्न होता है कि फमा चोरी और हत्या भी उसकी इच्छा के अनुसार हैं । ऊपर के विचारों से उत्तर प्रत्यक्ष हो जायगा । चोरी व हत्या करने का स्वभाव जीवात्मा के पूर्व के राजसिक स्वभाव का प्राकृतिक तामसिक परिणाम है और सत्कर्म उन वृत्तियों के परिणाम हैं कि जो स्वाभाविक रज और तम के विरुद्ध सात्विक प्रभावों के मध्यस्थ कर देने से उत्पन्न होती हैं। अतएव विशेष अवतार के समान सात्विक जीवात्मा का प्रभाव सत्कर्मो की वृद्धि करने ( १०५ ) वाला ही हो सकता है। आर्म्य धर्म ग्रथों में यह कहा गया है फिसत्व, रज,व तमप्रकृति के तीन गुण हैं और परब्रह्म शुद्ध सत्य रूप है । यह भी कहा जाता है कि प्रकृति से ही नाम रूप की उत्पत्ति होती है नहीं तो परब्रह्म में न नाम है न रूप । यदि हम सृष्टि की रचना विधि को स्मरण रखें तो इनका अर्थ स्पष्ट हो जाता है। पोज रूप चेतनता की विस्तृत दशा में न तो कोई रूप की परिमितता है और न कोई कम्पन अथवा कोई और क्रिया है जिससे शब्द प्रकट हो। परन्तु जब वह चेतनता एकत्र होने लगती है तो तत्काल स्वरूप प्रकट हो जाता है और उस पिण्ड में जो कम्पन होता है उसी से शब्द भी प्रकट हो जाता है। "शब्द ईश्वर के साथ था, शब्द ही ईश्वर था" इस कथन का सकेत भी इसी ओर है। शब्द को ईश्वर इस कारण कहा है कि शब्द के सहचर कम्पन व हरफत से हो सृष्टि का उदय होता है। अल्पाक्षर आध्यात्मिक शब्दो अथवा नामों के आध्यात्मिक प्रभाव का कारण भी उनका इन्ही मादि शन्दों से सम्बन्ध है। इससे पूर्व आदि तत्व शुद्ध सात्विक रूप में था। परन्तु अव उसमें प्रकृति का उदय हो गया है अथवा निरन्तर परिवर्तन का सिद्धात फार्म्य करने लगा है। यह प्रकृति उस समय तक सात्विक दशा में है जब तक कमल के खिलने से उस पिण्ड में घोर क्षोम नही होता। और जब यह होता है तर तो फपन आदि की आधी सी चल जाती है और सृष्टि का रचना क्रम पूर्ण रूप से होने लगता है और उस समय प्रति राजसिक दशा में होती है । जय एकान चेतनता के शात होने से सृष्टि निर्जीव अथवा शक्ति हीन होने लगती है तब उसकी तामसिक दशा प्राप्त होती है। ऐसी प्रकृति का परिणाम जो कुछ वस्तु होगी उसी में यह ( १०४ ) तामसी भोजन से हम मालसी कर्तव्यहीन व चिड़चिडे स्वभाष के होंगे। इस का कारण शारीरिक मन पर भोजन का प्रभाव है। इस सिद्धान्त का एक और परम प्रयोजनीय परिणाम है। जिस वस्तु की किसी विशेष ओर गति हो तो उसकी गति में- उसी ओर को वेग वढता जायगा जब तक कि वह किसी ऐसी अवस्था को प्राप्त न हो जिसमें प्रतिकार का होना सम्भव हो। जैसे ऊपर से गिरती हुई गैंद पृथवी से टक्कर खाकर फिर ऊपर को उछलती है। यदि हम चाहें कि वह पृथवी पर न गिरने पावे और उससे पूर्व उस की गति में परिवर्तन हो जाय तो हम को कष्ट करना पडेगा। यदि हम एक तरता लेकर उस को गंदे को गति के मध्य में लगादे तो गेंद तसते से टक्कर खाकर ही उछल जायगी और पृथवी तक न गिरने पावेगी । इसी प्रकार हमारे जीवात्मा की स्वाभाविक गति भी अपनी क्रिया के वेग को ताम- सिक दशा तक बढाती है। यदि हम प्रतिकार की अवस्था से पूर्व ही उर्धव गति से उन्नति करना चाहते हैं तो इस अधोगति का प्रतिकार करने को हमें सात्विक प्रभावों के तख्ते के लगाने की आवश्यकता है। वह भक्त लोग जो किसी विशेष अवतार के उपासक होते हैं साधारणतया कहते हैं कि सब वाते भगवान को इच्छानुसार होती हैं। उन से कभी कभी प्रश्न होता है कि क्या चोरी और हत्या भी उसकी इच्छा के अनुसार हैं । ऊपर के विचारों से उत्तर प्रत्यक्ष हो जायगा। चोरी व हत्या करने का स्वभाव जीवात्मा के पूर्व के राजसिक स्वभाव का प्राकृतिक तामसिक परिणाम है और सत्कर्म उन वृत्तियों के परिणाम हैं कि जो स्वाभाविक रज और तम के विरुद्ध सात्विक प्रभावों के मध्यस्थ फर देने से उत्पन्न होती हैं। अतएव विशेप अवतार के समान सात्विक जीवात्मा का प्रभाव सत्कर्मों की वृद्धि करने १५ । ( १०५ ) वाला ही हो सकता है। आर्यधर्मग्रंथों में यह कहा गया है फिसत्व, रज,व तमप्रकृति के तीन गुण हैं और परब्रह्म शुद्ध सत्व रूप है । यह भी कहा जाता है कि प्रकृति से ही नाम रूप की उत्पत्ति होती है नहीं तो परब्रह्म में न नाम है न रूप । यदि हम सृष्टि की रचना विधि को स्मरण रखें तो इनका अर्थ स्पष्ट हो जाता है । वोज रूप चेतनता की विस्तृत दशा में न तो कोई रूप की परिमितता है और न कोई कम्पन अथवा कोई और क्रिया है जिससे शब्द प्रकट हो । परन्तु जर वह चेतनता एकत्र होने लगती है तो तत्काल स्वरूप प्रकट हो जाता है और उस पिण्ड में जो कम्पन होता है उसी से शब्द भी प्रकट हो जाता है । "शब्द ईश्वर के साथ था, ही ईश्वर था" इस कथन का सकेत भी इसी ओर है। शब्द को ईश्वर इस कारण कहा है कि शब्द के सहचर कम्पन व हरफत से ही सृष्टि का उदय होता है। अल्पाक्षर आध्यात्मिक शब्दों अथवा नामों के आव्यात्मिक प्रभाव का कारण भी उनका इन्ही आदि शब्दों से सम्बन्ध है। इससे पूर्व आदि तत्व शुद्ध सात्विक रूप में था। परन्तु अव उसमें प्रकृति का उदय हो गया है अथवा निरन्तर परिवर्तन का सिद्धात फार्म्य फरने लगा है। यह प्रकृति उस समय तक सात्विक दशा में है जब तक कमल के खिलने से उस पिण्ड में घोर क्षोभ नही होता। और जब यह होता है तब तो कपन आदि की आधी सी चल जाती है और सृष्टि का रचना क्रम पूर्ण रूप से होने लगता है और उस समय प्रकृति राजसिक दशा में होती है । जय एकान चेतनता के शात होने से सृष्टि निर्जीव अथवा शक्ति हीन होने लगती है तब उसकी तामसिक दशा प्राप्त होती है । ऐसी प्रकृति का परिणाम जो कुछ वस्तु होगी उसी में यह ( १०६ ) तीनों खभाव उपस्थित होंगे। यह सरण रखना चाहिये कि प्राक- तिक सत्व पूर्णतया निश्चल दशा नही है घरन् केवल तुलना विचार से ही सात्विक है। और यहो स्वभावतः होना चाहिये क्योंकि प्रति का सार ही परिवर्तन किया है। प्रति सम्बन्धी कोई वस्तु भी पूर्णतया निश्चल नही हो सकती। अतएव भक को उचित है कि इन तीनों गुणो से परे शुद्ध सत्व में स्थित हो। इस विचार से साधन करते हुए शनैः शनैः वह अपने आत्म स्वरूप तक पहुच जायगा। १०-जीवनोद्देश्य यह युग युगान्तरों का प्रश्न है । बडे बडे दार्शनिको के विवाद के पश्चात् भो ससार वही है जहां पहले था। कोई कहते हैं कि सुख की प्राप्ति ही जीवन का उद्देश्य है । परन्तु यह आव.. श्यक नहीं है कि वह सुख तत्काल द्राप्त होने वाला इन्द्रिय सुग्ध हो । वह सुख सामाजिक प्रशसा अथवा अपने ही मन के धार्मिक विचारों का सतोप, अथवा स्वर्ग के सुखों की प्राप्ति की आशा, अथवा भगवान के प्रेम में स्थान पाने की अभिलापा के रूप में हो सकता है । अथवा वह सुस किसी भविष्य जीवन में प्राप्त होने चाला हो सकता है। परन्तु दूसरे तर्फ करते हैं कि ऐसी दशा भी हो सकती हैं जिस में सुख का सकेत उस कार्य से पूर्णतया भिन्न होता है जो कि मनुष्य करता है। जब कोई मकान जल रहा हो और कोई पुरुष अपने जीवन को भय में डाल कर किसी चालक को बचाने भीतर दौडता है तो सामाजिक प्रशसा, स्वर्ग अथवा दूसरे जन्म का सुख इतने बलवान् नहीं होते कि उस को ( १०७ ) तीक्ष्ण शारीरिक कष्ट और मृत्यु भी सहन करने को प्रस्तूत फर दे । और भी जो द्रष्टा हैं उन को तो ऐसी प्रेरणा नही होती, यद्यपि यह भी सामाजिक प्रशंसा अथवा स्वर्ग का सुख अवश्य चाहते हैं । उस समय धर्म का दृढ विचार ही प्रेरक होता है। यह सत्य है कि जब वह चालक को बचाने में सफल हो जाता है तो उसको अपनी सफलता पर अत्यन्त हर्ष होता है । सामा- जिक प्रशसा इस वर्ष को वढा भी सकती है । उसको अपने धर्म के पालन करने से सतोप भी होगा। परन्तु जब उसने वह कार्य हाथमें लिया था उस समय इन में से कोई भी उस के मन में न था। यह माननीय है कि सम्भवत उस दृढ धर्म विचार को उस के करुणा भाव से, जो कि सम्भव है कि उसके मानसिक सग- ठन में विशेष बलवान हो और जो बालक की नि:सहाय दशा के ध्यान से उचेजित हो गया हो, अधिक सहायता मिली हो । परन्तु उस भाव के उत्तेजित होने का अर्थ यह कदापि नही हो सफता कि उस समय उसके मन में किसी प्राप्त होने वाले सुख का विचार उदय हुमा था। यह सत्य ही है कि मनुष्य असख्य फर्म प्रतिदिन ऐसे करता रहता है जिन में सुख प्राप्ति का उसे विचार भी नहीं होता। अतएव कुछ मनुष्य कहते हैं कि धर्म का उद्देश्य मनुप्य की शक्तियों की वृद्धि है। हम देख चुके हैं कि जीवात्मा की स्वाभा- विक गति तम की ओर है इस कारण उन स्वाभाविक शक्तियों के अनुसार कार्य करना प्राकृतिक हो सकता है परन्तु धार्मिक कदापि नहीं कहा जा सकता। यदि कोई मनुष्य स्वार्थ के लिये आध्यात्मिक शक्तिया भी प्राप्त कर ले तो धर्म विचार से वह शक्रिया भी उसे पतित करने वाली ही होंगी। क्योंकि सासारिक प्रलोभन के सतुष्ट करने के साधनों में वृद्धि हो जाने से उनकी शक्ति बढ़ जाती है। इस प्रकार यह सम्भव है कि प्रत्यन्त प्रभाव शाली होने पर भी वह पुरुष धार्मिक न हो। हमारे प्रतिदिन के जीवन में यह अनुभव होता है कि शक्ति और धर्म का ससर्ग आवश्यक नहीं है। वह क्रिया शक्ति जिन का परिणाम सुख और सतोप हों स्थिर हो जाती हैं। और जो दुखन्त होती हैं वह नष्ट हो जाती हैं । यदि धर्म से शक्तियों की वृद्धि होती हो तोधर्मपालन स्वभाव से ही सुसमय होना चाहिये । प्रत्येक धार्मिक कार्य उस सुख की इच्छा से भले ही न किया जाय परन्तु उसका परिणाम अवश्यमेव सुख होना चाहिये। यह सत्य है कि आचरण का निश्चयसाधारणतयातर्फद्वारा नही किया जाता । जो नियम हमारी परिस्थित समाज में प्रचलित होता है उसी को हम स्वीकार कर लेते हैं। अव निश्चय करने का कार्य्य व्यक्ति के बदले समाज करती है। समाज द्वारा इस निश्चय के होने में महान् जीवात्मानों के आचरण व व्यवहार का बड़ा प्रभाव पड़ता है। उन के कार्य व विचार करने की शैली अनुकरण मात्र से सर्व साधारण में फैल जाती हैं। बहुत कुछ इन समाज के नेताओं के निश्चय पर निर्भर है। और उन का निश्चय तर्फ द्वारा विवेक युक्त होगा। इस में सन्देह नहीं कि इस प्रकार निश्चित किया हुआ प्रत्येक सिद्धांत परमानन्द की प्राप्ति चाहता है। परन्तु इस परमा. नन्द के अर्थ भिन्न भिन्न होते हैं। कोई तो अधिक से अधिक शारीरिक सुख को चाहते हैं। दूसरे सारे समाज के सम्पूर्ण सुख की अधिक से अधिक मात्रा को देने वाले सिद्धात को श्रेष्ठ सम- झते हैं। तीसरे समाज के संगठन को द्रुढ़ता ही को व्यक्ति सुख के लिये मानते हैं । परन्तु मानन्द सम्बधी सब
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( ११० ) भी सम्भव है। परन्तु अभावात्मक सुख सब प्रकार के कष्टों से, चाहे वह स्पष्ट हो चाहे अभावात्मक, रहित है । वह पूर्णतया शांति च निश्चलता है। गाढी निद्रा केवल दुस का अभाव ही नहीं वरन् स्पष्ट हर्ष- दायक भी है । जो जीवन कि निश्चल, शांत, अथवा उदासीन भी है उस के लिये स्पष्ट सुख से रहित होना आवश्यक नहीं है वरन् उस में एक प्रकार की प्रानन्द मय शाति भरी रहती है । परन्तु यह आनन्द चाहे वह गाढी निद्रा का हो अथवा शात जीवन को हो उसी समय समझ में आ सकता है कि जब हमारी भिन्नात्मक चेतनता कार्य करती हो। गाढ़ी निद्रा में मुझे स्पष्ठ सुख व अभावात्मक सुस में भेद प्रतीत नहीं होता। परन्तु जब मैं जागता ह तब मुझे निद्रा के सुख की स्पष्टता ज्ञात होती है। इसी प्रकार जव पूर्ण समाधि होती है तब यह भेद शात नहीं होता परन्तु समाधि से जागने पर उस सुख की ऐसी स्मृति होती है कि वह आनन्द वर्णन नही हो सकता। अतएव यह सत्य है कि आदि तत्व की दशा में स्पष्ठ सुप के ज्ञान की कोई सम्भावना नहीं है क्योंकि सुख और दुस तो जीवात्मा में प्रकट हुई भिन्नात्मक चेतनता की क्रिया के फल हैं । परन्तु इस का अर्थ यह नहीं है कि ऐसी दशा श्रेष्ठ नही है। यदि किसी अत्यन्त प्रवृत करोड पति से पूछा जाय कि उस को पूर्णतया गाढी व हर्षदायक निद्रा अच्छी लगती है अथवा उस को अपने साधारण जीवन के सुखों और प्रसन्नताओं सहित भिन्नात्मक चेतनता अधिक प्रिय है तो उसका उत्तर क्या होगा इस में कुछ भी सन्देह नही किया जा सकता । यह सत्य है कि उस की प्रवृति बडी कठिन है परन्तु साथ ही उस का सुख भी अतुल है । वह चाहे तो और अधिक सम्पत्ति प्राप्त करने के लिये दौड़ धूप छोड दे परन्तु उसकी राजसिक क्रिया उसे खीच - (१११. ) लेजाती हैं। और जिनकी आवश्यकता केवल जीवन के चनाये रखने के लिये हैं उन को भी उनके प्राप्त करने के लिये कर करना पड़ता है । कदाचित् यह भी अपने साधारण जीवन के दुखों और चिन्ताओं की अपेक्षा गाढी निद्रा को ही चाहेंगे। इस से अतिरिक्त दुसरा उपाय ही क्या है ? यह तो हम देख ही चुके हैं कि एक न एक दिन हमारी यह दशा होनी ही है। हम केवल इतना ही कर सकते हैं कि चाहें तो पहले पृथयो पर गिर ले और चाहें तो सुग्न दुस से युक्त एक अत्यन्त लम्वे मार्ग के बीच में ही तरतालगा दे । इधर उधर धरकेसाने का क्या फल? क्ष्म अपने अभीष्ट म्यान पर शीघ्र से शीघ्र पहुच फर क्यों न मुक्ति में शाति को प्राप्त करे ? परन्तु समाज का क्या प्रवध है ? इस से तो भय है कि मनु- प्यों में अक्षमण्यता च मालस्य फैल जायगा । इस समाज फा सगठन विपर जायगा और फिर व्यक्तियों का अभीष्ट भी सिद्ध न हो सकेगा। क्यों कि किसी भी प्रकार का जीवन विना स्थिर समाज के सुख से व्यतीत नहीं हो सकता । परन्तु इस विचार से जीवनोद्धेश्य की प्राप्ति के लिये समाज सगठन का महत्व हम पर प्रत्यन हो सकता है परन्तु जीवनाद्देश्य नही बदल सकता। उद्देश्य तो मादि तत्व का प्राप्त करना रहा और उस प्राप्ति के साधनों के निश्चय करने में हम न समाज को भूल सकते हैं और न व्यक्ति को। इस के अतिरिक्त धार्मिक जीवन से उस व्यक्तिका ही कल्याण नही होता वरन् यह समाज को भी नियम पद्धघ शात रखता है । इस बात के अनुभव से कुछ लोगो ने धर्म का माधार ही समाज की आवश्यकताओं को बना दिया। परन्तु यदि सामाजिक आवश्यकता ही आधारमान ली जाय तो यह मावश्यकता समय पाकर यदल सकती हैं और उनके साथ ( ११२ ) धर्म के सिद्धांत भी बदल जायगे । बहुत से मनुष्य समाज के लिये असत्य भापण में दोप नही समझते परन्तु उस सामाजिक लाम से उस असत्य का आध्यात्मिक प्रभाव बदल नही सकता समाज के लिये सब बातों का त्याग कभी कभी अत्यन्त कर दायी भी हो सकता है। कोई कोई साम्य वादी ऐसी समाज सगठित करना चाहते हैं जिस में व्यक्तियों की बनाई वस्तु एक सामाजिक भण्डार में दी जाय और उन के बदले मेहनत के अनु- सार टिकट सामान खरीदने का दिये जाय। कोई कोई स्त्रियों को सब पुरुषों के लिये स्वतन्त्र कर विवाह पद्धति को ही नष्ट करना चाहते है । सामाजिक आवश्यकता ऐसा आधार नहीं हो सकती कि जिन पर धर्म का स्थिर स्थान स्थापित हो सके। परन्तु जव धर्म का आधार आध्यात्मिक आवश्यकता होगी तो व्यक्ति का भी फल्याण होगा और समाज भी स्थिर रहेगा। ऐसे धर्म सिद्धातों में जिनका उद्देश्य आदि तत्व को प्राप्त फरना है एक और विशेषता है। हम देख चुके हैं कि योगी आध्यात्मिक शक्तियों को प्राप्त करके अपनी चेतनता को शक्ति का अधिक से अधिक प्रयोग कर सकता है । वह धार्मिक सि- द्धात जो योग अथवा आध्यात्मिक क्रियाओं के लिये हमारी दशा को यधोचित करें अवश्यमेव जीवात्मा कोवलवान बनावेंगे। वही गुण जो जीवात्मा के स्वरूप को सरल व.एफ रस करेंगे उस दशा को उपस्थित करने में सहायक होंगे कि जिस का प्रकट करना योग का भी उद्देश्य है। इस प्रकार जिस मार्ग के यह गुण प्रथम पद होंगे उसी मार्ग का योग आगे का स्थान होगा। परन्तु कुछ लोग इस अस्पष्ट सुख से संतुष्ट नहीं होते। वह पवित्र प्रेम में मगन रहने का जोवनोद्देश्य उपस्थित करते हैं। जिस प्रेम में वह निरतर मगन रह सकते हैं वह उन को सांसा.
रिक दुगों से ही अनभिज्ञ न रक्खेगा वरन उन कोस्पष्ट सुख देगा। ऐसे प्रेम का उचित ध्येय कोई सांसारिक वस्तु नहीं हो सकती वरलु भगवान का ही कोई स्वरूप हो सकता है। सासा रिकप्रेम में घटना बढ़ना हो सकता है। वह मन्सर, झगडे,अप्रस- नता, और अनेक प्रकार की कठिनताओं से क्षुब्ध हो सकता है। परन्तु दैविक प्रेम में ऐसी कोई विन, वाधा नहीं है। वह निर- न्तर शुद्धि करता हुआ बढ़ता रहता है यहा तक कि समय पाकर भक्त अपने इष्ट देव के स्वरूप के दर्शन के असीम अदभुत आनन्द मेंसशाहीन हो जाता है। परिणाम में अधिक अन्तर नहीं है । जब तक शरीर में रहते हैं तव तक योगी व भक दोनों समाधि के असीम आनन्द का अनुभव र ज्ञान प्राप्त कर सकते हैं। सावन में दोनों को अद्भुत आध्यात्मिक अनुभव होते हैं। दोनों को एक ही प्रकार के धर्माचरण का प्राश्रय लेना पडता है। ऐसे धर्म का आध्या. त्मिक आधार होने से उस की आवश्यकता आध्यात्मिक योगी वआध्यात्मिक भक्त दोनों को ही होती है । यथार्थ में इन दोनों में वैमनस्य नहीं है। प्रेम योगो को उस के अभ्यास में मन को शुद्ध रख कर सहायता देता है। और जब वह आत्मदर्शन प्राप्त कर लेता है उस समय भी दैविक प्रेम सासारिक प्रलोभनों से उसकी रक्षा करता है। उस शान के रहते हुये भी सासारिफ प्रलोभन उसके भागों पर प्रमान डाल कर उसे अपनी ओर खीच लेते हैं । परन्तु जब एफ भाव अत्यन्त भरा हुआ हो तो और भावों ir का आघात निष्फल होता है। योगी समाधि मेतो सुरक्षित रहता हो है परन्तु जाग्रत अवस्ण में भी देविफ प्रेम द्वारा वह अपनी रक्षा करता है। दूसरी ओर मन के शुद्ध होने से मक भी शने २ योगाभ्यास को प्राप्त करता है । ऐसे आध्यात्मिक ज्ञान । ११४ ॥ के प्राप्त होने से उसके प्रेम का लक्ष्य भी ठीक हो जाता है और उसी लक्ष्य के अनुसार मन की एकापता होने से उसका अभीष्ट "भगवान का दर्शन" शीघ्र सिद्ध होता है। ऐसे दर्शन के पश्चात उसे कोई इच्छा नहीं रहती और वह निर्विकल्प समाधि प्राप्त करता है। इन दोनों का परिणाम ही एक नहीं है वरन् साधन भी दोनों का संग होना उचित है। कुछ मनुष्यों का विचार है कि निष्काम कर्म करने से मुक्ति प्राप्त होती है । हम देख चुके हैं कि मुक्ति का अर्थ क्या है । वह अवस्था तो निर्विकल्प समाधि के पश्चात् ही सम्भव है। निष्काम फर्म से मन शुद्ध हो जाने से उन्नति सुगम हो जाती है और इस विचार से यह कहा जा सकता है कि उसले मुकि हो जाती है। निष्काम कर्म में मनुष्य परिणाम की चिन्तान करते हुए धर्म पालन करता है। ऐसे फर्म मे चिन्तासे उत्पन्न वन्धन तो नहीं रहता परन्तु विचार व क्रिया का तो रहता ही है। यह कर्म सात्विक है परन्तु फिर भी फर्म होने से रज स्वरूप ही है। आध्यात्मिक योगी व आध्यात्मिक भक दोनों भी पूर्णतया कर्म रहित नहीं हो सफते। और उनका फर्म भी निष्काम होगा। परन्तु वह इस से भी अधिक करते हैं। वह अपनी अभीष्ट सिद्धि के लिये विशेष साधन भी करते हैं। उन दोनों के लिये भी निष्काम कर्म साधन रूप है । प्रेम से निष्काम कर्म सुगम हो जाता है और निष्काम कर्म से प्रेम मय खभाव हो जाता है । इस स्थान पर ही आध्या- त्मिक शुणों के अभ्यास का महत्व भविष्य के साधनों के लिये सबसे अधिक प्रतीत होता है। योगी और भक दोनों के लिये निष्काम कर्म परमावश्यक है । जब वह अपने अभीष्ट को प्राप्त कर लेते हैं तब उनका कर्तव्य अपने उपदेश वाचरण से संसार का उपकार करना रह जाता है। आध्यात्मिक ज्ञान, प्रेम व निष्काम कर्म सप किसी न किसी रूप में साथ ही रहते हैं। १९-आध्यात्मिक अनुज्ञा व दड-दैविक गुण इस प्रकार हमें आदि तत्व के खभावों में अपने धर्म के सिद्धात का आधार प्राप्त हो जाता है । ससार के जड व चेतन सम्पूर्ण पदार्थों का आधार वह निश्चल आदि तत्व सब से सूक्ष्म, इलका, बारीक, कोमल, वीज रूप चेतनता सहित अद्वत सत्ता है। वह गुण जिनके अभ्यास से जीवात्मा में भी यही दशा उपस्थित हो सकती हो हमारी जोधात्मा के स्वरूप को सरल करने व हमारे अभीष्ट, आत्मदर्शन व मुक्ति, की प्राप्ति में सहायक होंगे । और वह कर्म जिनसे हमारी विरुद्ध गति हो दोष होंगे। ऐसे धर्म सिद्धात में माध्यात्मिक परिणाम का स्वाभाविक दड होगा। अवन तो भयं- कर नरक से डराने की आवश्यकता है और न स्वर्ग सुख के प्रलो- मन की । परब्रह्म, आदि तत्व अथवा नित्य ईश्वर सर्व व्यापक है और वह प्रत्येक कर्म को लिख लेगा। इस में कोई भूल नहीं हो सफतो क्योंकि यह अङ्कित होना प्राकृतिक हैं । हम कोई बात छिपा नहीं सकते। और छिपावें भी किस से? अपने आप से ही? इस विचार से गुण दैविक वसहायक हो सकते हैं। वह गुण जो जीवात्मा के खरूप को सरल व सूक्ष्म अपने ही स्वाभाविक प्रभाव से करते हैं दैविक हैं। और वह गुण जो इन दैविक गुणों के अभ्यास में सहायक होते हैं सहायक गुण हैं। सहायक गुण व्यकि गत और सामाजिक हो सकते हैं। पहले तो व्यकि को ही वय सहायता देते हैं और दूसरे समाज संगठन की स्थिरता की रक्षा द्वारा सहायक होते हैं । समाज सङ्गठन भी ऐसा होना चाहिये कि अभीष्ट सिद्धि में वह वाधक न हो वरन् सहायक हो। दैविक गुण नित्य हैं क्यों कि उनका आधार आदि तत्व का नित्य खभाव है। सहायक गुण भी सिद्धान्तों के अनुसार होने चाहिये जिससे उनका प्रयोजन सिद्ध हो सके परन्तु छोटी छोटी बातों में व्यक्तियों व समाज की आवश्यकता के अनुसार उनमें भेद हो सकता है परन्तु यह भेद मुख्य सिद्धात के विरुद्ध नही होना चाहिये। इस प्रकार सत्य दैविक गुण है। आदि तत्व की अद्वत व एक रस सत्ता है। सत्य यह है जिसमें द्वैत न हो। जब हम असत्य बोलते हैं तो उसी समय हमारा मन एक वस्तु के दो खरूपो पर लग जाता है। ऐसे असत्य से मानसिफ क्रिया अनेक प्रकार से बढ जाती है। एक प्रकार तो ध्यान का दो बातो पर लगना ही है। उस असत्य की रक्षा अथवा उस को प्रकट न होने देने की चिन्ता, हमारा जान बूझ कर भोली भाली सच्ची सी चेष्ठा बनाये रखने का प्रयत, दूसरे प्रकार हैं । एफ असत्य और सहस्रों असत्यों का कारण होता है। शनै शनै. इसका स्वभाव पड जायगा और हमारी जीवात्मा का स्वरूप स्थल होता चला जायगा और हमारे स्वभाव भी स्थूल हो जायगे। जहां सत्य से हमारा मन शात व एक रस रहेगा वहां असत्य बोलने के अभ्यास से हमारा जीवन आधी के समान क्षुब्ध हो जायगा । निष्कपटता व उदारता सत्य ही के परिणाम हैं। द्वैत भाव, कपट, व छिपाव सव असत्य के स्वभाव है । सत्य केवल वाणी से ही सम्बन्ध नहीं रखता वरन् यह विचार व क्रिया में भी हो सकता है। मैं दूसरे मनुष्यों के सम्बन्ध में अनुचित विचार कर सफता हु जिन का मैं प्रकट होना न चाहगा । मैं उनके सम्बन्ध में सत्य विचार रख ( ११९ ) 'सकता जिनके छिपाने की मुझे चिन्ता न होगी। यह तो संभव है कि किसी अच्छे काम की अपने द्वारा होने की वार्ता में प्रकट न होने देना चाह परन्तु यदि वह फिसी प्रकार से प्रकट हो जाय तो मुझे उससे कुछ चिन्ता न होगी। परन्तु दूसरी दशा में इसके विरुद्ध प्रभाव होगा। कर्म के विचार से भी चोरी, काम विषय सम्बन्धी पाप, बेईमानी असत्य मय मानसिक खभाव के परि- णाम है। विश्वास पालन, ईमानदारी, सत्य, दृढता, छलहीनता, कुटिलता न होना, इन सव का आधार सत्य है । मन वचन फर्म से सच्चे मनुष्य का मन शुद्ध व जीवात्मा पवित्र होगा। असत्य वादी के प्रलोभनों और पापों में प्रवृत्त होने की अधिक सम्भावना है। उसकी आत्मा स्थल होकर शारीरिक मन के अधिक समान हो जाने से शारीरिक इच्छा व प्रलोभनों से अधिक प्रभावति होगा। सत्य मय जीवन से जीवात्मा के अधिक सूक्ष्म, सरल, चैतन्य हो जाने से, चेतनता के प्रभाव के चढने से व मन की सूक्ष्म गति हो जाने से बुद्धि भी सूक्ष्म व निर्मल हो जायगी। और असत्य मय जीवन से उसकी विचार शक्ति निर्मल हो कर वह मनुष्यों में पशु के समान हो जायगा। कमी कभी यह कहा जाता है कि कुछ विशेष अवस्थामों में सत्य पाप और असत्य पुण्य हो जाता है। यदि अशर्फी लाल, केदारी कोमारने के लिये पीछे दौडता हो और चौराहे से केदारी एक मोर को चला जाय और तोता उस को देख ले और अशी तोता से पूछे कि केदारी किधर गया तो यदि तोता सत्य भोलता है तो यह एक मनुष्य के प्राण हरण का कारण होता है। तोता केदारी के जीवन को असत्य बोल कर और एफ दूसरी ही सड़क की ओर सफेत करने से बचा सकता है। ऐसी दशा में सत्य तो पाप है और मूड पुण्य है। सत्य हो चाहे असत्य हो tr पेसी दशा में भी उसका आध्यात्मिक प्रभाव तो होगा ही। यह सात्विक असत्य है और फिर उसका प्रभाव एक दुसरे नित्य दैविक गुण दया के प्रभाव से कम भी हो जायगा, परन्तु यह नहीं कहा जा सकता कि यह झूठ ही नहीं है। असत्य के स्वरूप से इसका प्रभाव होगा ही परन्तु वह एक विरोधी प्रभाव के कारण कुछ दुर्बल हो जायगा। परन्तु इससे हमको यह अधिकार नहीं हो जाता कि हम यह कह दें कि उसका स्वभाव ही बदल गया और असत्य ही सत्य के समान हो गया । वास्तव में इस झूठ के लिये भी व्रत उपासना द्वाराप्रायश्चित आवश्यक है जिसके शुद्धा- त्मक प्रभाव से दया का प्रभाव असत्य के प्रभाव को नष्ट करदे । इसके अतिरिक्त इस दृष्टान्त में असत्य बोलने का कारण कुछ अंश तक खार्थ भी हो सकता है। यदि तोता उत्तर ही न दे अथवा केदारी को जाने की दिशा को बताने से मना कर दे तो सम्भव है कि अशर्फी तोता पर ही टूट पडे। और तोता मृत्यु के लिये प्रस्तुत नहीं है । अथवा यह हो सकता है कि तोता पहले तो न बतावे परन्तु जब उसको धमकाया जाय तो डरकर केदारी व अपने को बचाने के लिये दूसरी ही दिशा की ओर सकेत कर दे। हम इसके लिये तोता को दोपी भले ही न ठहरावे परन्तु इससे प्रायश्चित की आवश्यकता तो प्रत्यक्ष हो जाती है। एक दूसरी कठिन समस्या समाज के हित के लिये अथवा देश की रक्षा के लिये असत्य भाषण है। यह असत्य स्वार्थ के कारण होने से क्योंकि अपने देश से प्रेम हम इस लिये करते हैं कि वह हमारा है इस लिये नहीं कि हम दया से प्रेरित होते हैं- राजसिफ है । इसमें पुण्य रूप विरोधी गुण सामाजिक सहायक गुण देश प्रेम है। ऐसे असत्य का प्रभाव ऊपर के उदाहरण से अधिक होगा। ऐसे असत्यों को उचित स्थिर करने के सिद्धांत - का परिणाम हम कपट युक्क राजनीति, राजनैतिक वयुद्ध सक्न्धी असत्य समाचारों के विस्तार व सत्य समाचारों की काट छोट आदि में देखते हैं। जितना इस प्रकार के फर्म जनता को असत्य से परिचित करते हैं उतना ही निश्चय पतन होता है। कोई मनुष्य चाहे तो पर उपकार के लिये इसी प्रकार असत्य बोल सकता है जैसे कि वह और कोई कष्ट उठाने के लिये प्रस्तुत हो परन्तु उस को इस नम में नहीं रहना चाहिये फि यह असत्य ही नही अथवा इसमें कुछ हानि नही । उसको उसका फल भी भोगना पडेगा नही तो उसे प्रायश्चित्त कर लेना चाहिये। पूर्ण सत्य के परिणाम रूप अन्य गुण न्याय परायणता, साहस, निर्भयता, और उदासीनता हैं । जिस को सत्य के ऊपर द्वदस्थिति होती है उसको फिसी बात का भय नहीं होता । उस को अपने विचारों के अनुसार कार्य करने का साहस होता है और साधारण सुख दुख की ओर वह उदासीन होता है । फष्टों से वह अपने धर्म ले नही गिर सकता। वह सत्य के लिये दुख सहन कर सकता है । असत्यवादी की दशा इसके विरत होती है । उस का साहस डीग मात्र होता है। धर्मात्मा मनुष्यों के सन्मुस उस का शिर नीचा रहता है। यह उसी समय डींग भारता है जब उस को धिक्कारने घाला कोई नहीं होता। वह अपनी बेईमानी व छल को चतुरता पर अभिमान भी करता है। परन्तु यह उसी समय होता है फि जव सुनने वाले दीन, सहा- नुभूति अथवा प्रशसा करने वाले हों। वह अधिक भयभीत इस लिये नही होगा कि कुछ कारण उसे बचाये रहते है । एक कारण समाज का पतन है । वास्तव में जब समाज के सदस्योका साधा- रणतया पतन हो जाता है तब ही पाप खुल्लम खुल्ला होते है व पापी डीग मारते है । ऐसी दशा से असत्य का स्वाभाविक स्व- ( १२२ ) शीलता, क्षमा व सहन शीलता उत्त्पन होते हैं । इस से विरुद्ध प्रकार के वचन व कर्म उसी मनुष्य को हानि पहुचायेंगे । दुसरों के प्रति बुरे विचारों से दूसरों की हानि हो चाहे न हो पर विचार फरने वाले की तो अवश्य ही होती है। क्योंकि वह विचार उस के मन में स्थित हो जाते हैं । अहकार व क्रोधयुक्त वाणी वा व्यवहार दोनों ओर द्वप उत्त्पन्न कर के सांसारिक समस्या चाहे उत्पन्न करेंवा न करें परन्तु वह उस मनुष्य कीजीवात्मा का पतन तो अवश्य करेंगे जो उन का प्रयोग करता है। जहां क्षमा से दोनों ओर शाति होगी वहां बदला लेने के विचार से बदला लेने वाले की दशा, दूसरे मनुष्य पर लेशमात्र प्रभाव डालने से पूर्व ही बहुत दिनों तक, क्षुब्ध रहेगी। आत्मसन्मान की रक्षा के लिये बदला आवश्यक हो या न हो जहा सात्विकता का प्रश्न हो वहा कोई दूसरा उत्तर नही होसफता वास्तव में वही जोसन्मान करने योग्य हैं क्षमा भी कर सकते हैं क्योंकि वह उदार चित्त होते हैं और बदला लेने की शक्ति रहते हुए भी क्षमा करते हैं । इस का अर्थ यह नहीं है कि जो लोग निर्बल हों उन को बदला अवश्य लेना चाहिये क्यों कि उस से तो उन की शारीरिक व सामाजिक निर्व- लता से मानसिक निर्बलता और मिल जाती है। जहासामाजिक धर्म की आज्ञा अपराधी को दंड दिलाना हो वहा भी हृदय में तो क्षमा ही करनी चाहिये। अहिसा का सिद्धात भी इन्ही गुणों के आधार पर है। प्राण हरण के प्रत्येक कार्य से जीवात्मा स्वभावत. ही अधिक कठोर, स्थूल और मन अधिक निर्दयी हो जाता है । प्राण हरण की आव- श्यकता अपनी अथवा किसी दूसरे की रक्षा के लिये भी हो सकती है। आत्म रक्षा व्यक्ति गत सहायक धर्म है और यह उसी समय न्याययुक्त हो सकता है जब इस से प्रयोजन आध्यात्मिक ( १२३) उन्नति अथवा किसी विशेष धर्म पालन के लिये समय प्राप्त करना हो । परन्तु यहा भी ऐसे कार्य का जो खरूप से दोप युक्त है निर्दोष सिद्ध करने का प्रयत्न मात्र ही है। यह सात्विक दोष भले ही हो परन्तु गुण नहीं हो सकता।ऐसी ही दशा मे अर्थात् अपनी रक्षा के लिये झूठ बोलना राजसी है, क्योंकि भूठ छोटे छोटे वहानों से बोला जा सकता है परन्तु प्राण हरण करना बडा धोर कर्म है और सुगमता से वार यार नहीं हो सकता। जव प्राण हरण सामाजिक धर्म की आज्ञानुसार किया जाता है जैसायुद्ध में होता है तो वह राजसी होता है। और जब वह स्वार्थसिद्धि के लिये अथवा विपय प्राप्ति आदिक के लिये किया जाता है तो तामली होता है । सामाजिक अथवा राजनैतिक विचार से यह अपराध न हो परन्तु उस का आध्यात्मिक परिणाम तो होगा ही। हत्या से स्वभाव निर्दयी व फटोर होता है। दूसरी ओर अहिसा से जीवात्मा अधिक शुद्ध व शक्तिशाली हो जाता है। जीवात्मा के प्रभाव को सूक्षम करने से उस की दूसरी चेतनाओं पर प्रभाव डालने की शक्ति प्रबल हो जाती है । जय कोई मनुष्य विचार व फर्म में पूर्णतया अहिसा धर्म का पालन करने वाला होता है तो वह अपने शत्रुओं को अपने शील से ही जीत लेता है और मास- मती पशु भी उस के सन्मुख उस के प्रभाव से हिसा को भूल जाते हैं। साधारणतया अहिंसा का सिद्धात सव मनुष्यों से पालन न हो सके परन्तु इस का कोई कारण नहीं कि हम उस के सिद्धात से भी अनभिज्ञ रहें । मनुष्यों की शक्ति से उसके प्राध्या- मिक स्वभार में परिवर्तन नहीं हो सकता। उस के अनुसार माचरण करने के प्रयत्न से इतना फल तो होगा कि सात्विक इत्या ही होगी, और राजसिक व तामसिक हत्या की वृद्धि मे उत्पत्र पतन से समाज की रक्षा होगी।
( १२६ ) प्रमोद प्रसन्नता के राजसिक खरूप है क्योंकि इनमें स्पष्ट किया होती है। साधारण जनता का स्वभाव राजसी होने से इनमे सात्विक प्रसनता से भी अधिक फैलने की शक्ति है । चपलता तामसिक है और नीच वृतियों को आनन्द देने वाली होती है परन्तु सात्विक स्वभावों के लिये वह घृणित प्रतीत होती है। कोई कथन व कार्य जिसमें कुछ भी चतुरता नही है उसे तामसी मनुष्य भाव मरा कह कर प्रशंसा करते हैं। हास्य, प्रमोद और चपलता गुणों का कार्य तो इस लिये नहीं करते कि उन में चेतनता शक्ति निश्चल शांत व प्रसन्न नहीं रह सकती, परन्तु फिर भी वह इतने बुरे नहीं हैं जितने फि विरोधी दोष हैं । जहा गुणों से मन आनन्द मय व विवेकयुक्त रहता है वहां हास्य प्रमोद और चपलता और विशेष फर के अन्तिम विवेक में बाधक होते हैं। इनसे कभी अशुभ परिणाम भी निकलते हैं जिनसे कि स्पष्ट हानि अथवा झगड़े हो जाते हैं। हास्य, प्रमोद व चपलता की अपेक्षा प्रसन्नता, शाति और निश्चलता अधिक समय तक स्थिर रह सकते हैं। यह दूसरे गुण हैं और पहले केवल सुख हैं जो अपने राजसी व तामसी स्वभावों के कारण और अधिक पतित हो सकते हैं। अतएव समाज व व्यक्ति दोनों के हित के लिये मनुष्य को प्रसन्न, शात व निश्चल होना चाहिये । उसको केवल दोपों से ही नही बचना चाहिये वरन् इन राजसिक स्वरूपों और विशेप कर चपलता से भी पृथक् ही रहना चाहिये। परन्तु कोई मनुष्य दुःख में भी प्रसन्न कैसे रह सकता है? जिसका हृदय विपाद से भरा है उस की चेष्टा में विपाद होगा। यही नहीं वरन् वह मनुष्य भी जिस को दुःख का कोई कारण नही यदि विपाद रूप चेष्टा रखने लगे तो कुछ दिनों में बिना कारण विषपण रहने लगेगा। दूसरी ओर जो दुखों में होते हुए ( १२७ ) भी प्रसन मुख रहने का प्रयल करते है वह यथार्थ में अपने मानसिक कष्ट को कम कर लेते हैं। वाह्य चेष्टानों के निरन्तर अभ्यास से वह अन्तर में भी प्रसन्नता शांति और निश्चलता उत्पन्न कर सकते है । इस से स्वभाव में आश्चर्य जनक परि वर्तन हो जाता है और दुखमय जीवन भी हर्पमय हो जाता है। इस सिद्धात का प्रयोग गुण प्राप्त करने के लिये तो श्रेष्ठ है परन्तु यदि यह अपने को केवल धर्मात्मा दिखाने के लिये किया जाय तो यह दम हो जाता है जो असत्य का परिणाम रूप एक दोष है। दभ का परिणाम गुणों का प्राप्त करना इस कारण से नहीं होता कि उसमें मन का ध्यान इस प्रयोजन पर नहीं लग सकता दूसरे ऐसी कृत्रिम चेष्टा को स्थिर रखने का प्रयत्न भी नहीं होता क्योंकि वह वोडे समय की कार्य सिद्धि के लिये ग्रहण की जाती है। १२-सहायक गुण-व्यक्ति गत । सहायक गुण दैविक गुणों की उनके कार्य में सहायता करते है। सहायक गुण ऐसी मानसिक व सामाजिक परिस्थिति उपस्थित करते हैं जिनसे दैविक गुणों का उदय व अभ्यास सुगम हो जाय । व्यक्तिगत सहायक गुणों के उदाहरण धर्मनिष्ठा, शौच, विवेक, श्रद्धा, विश्वास, सतोप, मितव्ययिता, सयम, ब्रह्मचर्य, और आत्मरक्षा है। धर्मनिष्ठा से मन निश्चल, शात व कोमल होता है । इस को कृत्रिम धर्मनिष्ठा को आडम्बर सेन मिलाना चाहिये। धर्मनिष्ठामन सेसम्बंघरखती है। इससे ध्यानऐसीसत्ता पर जमताह जोपवित्र, पुण्यात्मक, दया धान, रुपामयी, शात व निश्चल है। जो विचार .
( १३० ) m ही साथ यह उपासना व खाध्याय भी करता रहे। विवेक रहित होने से ही ऐसे विचारों का प्रचार हुआ है । विचार शून्यता दो पूर्ण विरोधी कारण हो सकते हैं। यह पूर्ण तामस के कार भी हो सकती है और शुद्ध सत्व से भी। शुद्ध सत्व वाली तं पुण्य पाप के विवेक के पश्चात् प्राप्त होती है। और तामसं दथा विचार रहित पाप का परिणाम हे। तामसिक विचा शून्यता जीवात्मा के लिये कल्याणकारी नही हो सकती। वा मुकि नही है । इस प्रकार पहले दूसरी ओर के सिरे तक जान में मुक्ति के लिये साधन का समय बढ जाता है । बोच में तरत लगाने के बदले यह तो जान बूझ कर लगे लगाये तख्ते के निकाल देना है कि जिस से पहले नीचे गिर पडें । परन्तु इस प्रकार गिरने में एक और भय है । ऊचे से गिरती हुई गेंद पृथ्वी से टकराने के पीछे इतनी ऊचा नहीं चढती जितनी कि वह पहले थी। पृथवी की जिस आकर्षण शक्ति ने गिरने के वेग को बढा दिया था वही अब उसके ऊचे उठने में बाधक होती है। प्रतिरो- धक पदार्थो के अभाव की दिशा में पतन होना तो सहज है परत फिर उटना कठिन है। नष्ट करना सहज है परन्तु निर्माण करना फठिन है । तामसिक दशा की ओर जाने का वही खभाव, जिस से पतन मे शीघ्रता होतो हे उर्द्धव गति को रोकता है। जिस प्रकार गेंद को वाले से मार कर उसकी उर्व गति को बढ़ाकर उसको ऊचा फेंक सकते हैं, इसी प्रकार प्रात्मा की उन्नति के लिये भी सहायता की आवश्यकता होगी और विवेक की फिर भी आवश्यकता होगी। यह सत्य है कि विवेक क्रियात्मक है परन्तु वह क्रिया सात्विक है और उसका फल जीवात्मा की शुद्धता है । गुणों का अभ्यास भी क्रियात्मक है परन्तु इस कारण उस अभ्यास को नही त्यागा जा सकता। अधोगति का प्रतिरोध .
( १३१ ) हो प्रयत्न है मौर प्रयत्न किया है। परन्तु बिना किसी ऐसी क्रिया के उन्नति हो ही नही सकती। ऐसी क्रियाओं का त्याग सात्विक दशा को प्राप्त नही कराता। यह अकर्मण्यता आलस्य और विचार हीनता के तामसिक अशों का फल है। "चिन्ता न करो" इस प्राशा का प्रयोजन विपाद युक्त चिन्ता से है क्योंकि वह दोप है जैसा हम देख चुके हैं। इसके अतिरिक्त यह उन फाय्या के लिये भी कहा जा सकता है जो अकस्मात् भूल से हो जाय । परन्तु वहा भी हम को भविष्य में सचेत रहना उचित है । इससे जान बूझ कर असख्य अनुचित कार्य करने की अनुमति कदापि नहीं हो सकती। हमारे प्रत्येक कार्य की जाच विवेक से होनी चाहिये । धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन व सत महात्माओं का सग इसगुण के वृद्धि करने वाले हैं । प्रतिदिन के कार्यों का ब्योरा घनाना व रात्रि को शयन से पूर्व दिन भर के कामों को स्मरण करना भी इसके लिये अति लाभदायक हैं । विवेक से हमें यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। श्रद्धा व विश्वास उसको रक्षा करते हैं। उनसे हमारे कार्यों में भी हमारा सपूर्ण आध्यात्मिक बल साथ रहता है। श्रद्धा विश्वास जब विवेक रहित होते हैं तो वह अधे हो जाते हैं और उन्नति प्रतिरोधक होते हैं । नहीं तो इनसे आध्यात्मिक उन्नति में सहायता मिलती है । क्योंकि इनसे चित्त की एकाग्रता सुगम हो जाती है। फिर भी अधविश्वास विश्वास हीनता की अपेक्षा श्रेष्ठ है। क्योंकि इस दूसरी दशा में तो मनुष्य अवलम्बन रहित हो जाता है। यह उस सशयात्मक स्वभाव के विरोधी हैं जिसमें मनुष्य प्रत्येक पात में छिद्र ही देखता है । विवेक युक सुतर्फ तो सत्य की जिज्ञासा है, परन्तु केवल पक्षपात करना जान बूझ कर नेत्र चन्द करना है। श्रद्धा से मनुष्य निश्चयात्मक भाव से सधा रहता है और 1 -- । ( १३२ ) संशयात्मक स्वभाव चाला मनुष्य क्षुब्ध समुद्र में पतवार रहित नाव के समान है। क्षुब्ध समुद्र में निरअवलम्ब होने की अपेक्षा तो लंगर डाले रहना ही श्रेष्ठ है। चाहे वह स्थान घर से बहुत दूर हो । यदि घर जाने की राह हमको ज्ञात हो जाय तो विवेका- नुसार उस को जितना शीघ्र सभव हो स्वीकार कर लेना और फिर उसपरजमे रहना चाहिये। किसीरास्तेचलनेवाले के विचार से हमको अपनी राह नहीं छोड़नी चाहिये । परन्तु यदि किसी पुरुष का कथन सुगर्भ युक्तियों से युक्त हो अथवा ऐसा प्रतीत होता हो कि उस पुरुप ने हमारे घर को देखा है तो हमें उसके परामर्श को स्वीकार करना चाहिये । इसका नाम श्रद्धा विश्वास है। कुछ मनुष्यों का यह कहने का स्वभाव होता है कि सब पर- मात्मा की इच्छानुसार होता है। जब इस कथन का कारण विनय शोलता होता है तो यह श्रद्धा विश्वास कहलाते हैं और जब इसका कारण आलस्य होता है तो यह विचार रहित भवि- तव्यतात्मक विश्वास होता है। पुण्यात्मा मनुष्य अपनी शक्ति के अनुसार पूर्ण उद्योग करता है परन्तु उसकी प्रशसा खय नहीं ग्रहण करता । वह उस सब को निगुण व सगुण ईश्वर को जिसका भी वह उपासक हो अर्पण कर देता है। सफलता व निष्फलता दोनों में उसका भाव एक सा विनीत और सतुष्ट रहता है परंतु इससे वह पुरुषार्थ हीन नही होता । उसमे श्रद्धा है परन्तु भाग्य पर अंध विश्वास नहीं है। श्रद्धा विश्वास विनीत भाव के सयोग से सन्वों को प्रसन्न कर उनके उपदेश द्वारा विवेक को बढाते हैं। कोई अपना समय पूर्णतया सशयात्मक स्वभाव वाले को शिक्षा देने में नष्ट करना न चाहेगा क्योंकि वह पुरुष आदर से सुनने और समझने के बदले तर्फ से केवल खंडन करने में ही प्रसन्न होते हैं। उचित वृत्ति तो यह है कि सूक्ष्म विचार करे --- । ( १३३ ) और जो विवेक युक्त हो उसे ग्रहण करे। विना समझे तर्फ करना हठ है जो जिज्ञासुओं के लिये लाभदायक नहीं है। सतोप, प्रसन्नता, शाति और निश्चलता गुणों की सहायता करता है। इसका विरोधी दोष तृष्णा है। जो मिले उसी में प्रसन्न रहना और दूसरों की वस्तुओं की इच्छा न करना सतोप है । इसका अर्थ यह नहीं है कि मनुष्य को अपनी दशा के सुधा. रने का प्रयत्न नहीं करना चाहिये । परन्तु किसी भी दशा में उस को खिन्न अथवा असतुष्ट नहीं रहना चाहिये। तृष्णा उस दशा में ईर्ष्या हो जाती है जब कि ध्यान अपनी दशा को सुधारने की विधियों के बदले दूसरे के सौभाग्य को बिगाडने पर लगा हो। उद्यम बुरा नही है परन्तु उसमें बराबरी करने के लिये निश्चया- त्मक व शात उद्योग होना उचित है। उद्यम उन्नति का कारण है । असन्तोप से उन्नति हो चाहे न हो परन्तु उससे आध्या- स्मिक पतन होता ही है। ईर्ष्या दोप है। सतोप युक्त उद्यम सात्विक है, असतोप युक्त उद्यम राजसी है। और ईर्ष्या युक्त तृष्णा तामसी है । पहले मनुष्य दूसरे की उन्नति से भी प्रसन्न होते हैं। दूसरे प्रकार के मनुष्यों का भाव अन्य मनुष्यों के सौ- भाग्य के समाचार सुनने पर कुछ ऐसा होता है मानो किसी वस्तु के अमान से दुपी हो रहा हो और तीसरे प्रकार के मनुष्यों को सो पेसे समाचार से स्पष्ट दुख होता है। सतोपी मनुष्य धर्मानुसार कार्य करता है। वह उसी से सतुष्ट रहता है जो उसे मिल जाय वह न इधर देखता है और न उधर । किसी यथार्थ में लाभकारी प्राप्त करने योग्य वस्तु के लिये तो वह कष्ट करने के लिये तय्यार होता है परन्तु किसी तुच्छ वस्तु अथवा अप्राप्य वस्तु के लिये वह अपनी शाति भङ्ग नहीं करता। वह सासारिक उन्नति के लिये कर्म तो करता है [ ( १३४ ) " परन्तु उसके लिये अपने धर्म को नष्ट करने को तय्यार नहीं है और स्वार्थ व परमार्थ दोनों का उचित रूप से पालन करता है। वह मेहन्ती है परन्तु चिन्ता नहीं करता। वह अपनी अपेक्षा दूसरों के सुख व कल्याण का अधिक विचार करता है। वह अपनी शारीरिक इच्छाओं को स्वतन्त्र नहीं होने देता और इसी कारण से निश्चल व शांत रहता है। वह विवेक से यथार्थ सुख का ज्ञान प्राप्त करके उसकी प्राप्ति के लिये प्रयत्न करता है। ऐसी सतोपी वृत्ति के लिये मितव्ययिता व आत्म सयम परम आवश्यक हैं। केवल गुणों के अभ्यास से ही काम नहीं चलता वरन् पापिफ वृत्तियों का निग्रह भी होना चाहिये । क्रोध, निर्दयता, फायरता, असत्यता, बेईमानी, कठोरता, अभिमान, ईर्ष्या, मत्सर, चपलता, तृष्णा आदिक दोषों को केवल गुणों के अभ्यास से ही निर्बल नहीं करना चाहिये वरन् उनका स्वय भी निग्रह करना चाहिये । तामसिक वृत्तियों को तो पूर्णतया रोकना चाहिये और राजसिक वृत्तियों के व्यवहार में मितव्ययिता होनी चाहिये । परन्तु इनमें भी मितव्ययिता केवल एक वीच की दशा है जिसकी आव किता सामाजिक अवस्था अथवा पूर्व स. स्कारों के कारण होती है। मितव्ययिता विरोधी विचारों के लिये केवल एक मध्यावस्था है नही तो प्रयत्न तो यही होना चाहिये कि सात्विक आदर्श सदैव ध्यान में बना रहे। ब्रह्मचर्य शरीर व मन दोनों के लिये ही अत्यन्त आवश्यक है। मनुष्य शरीर की विशेषता को तो हम देख ही चुके हैं। ब्रह्मचर्य से हमारी शारीरिक शक्ति सुरक्षित रहती है, शरीर निरोग और स्वस्थ रहता है, और शारीरिक सयुक्त भाव स्थिर रहता है। निर्बल शरीर का सयुक्त भाव झटपट क्षुब्ध हो सकता है और उसका प्रभाव मन पर भी पड़ सकता है। स्वस्थ शरीर से ( १३५ ) मन भी स्वस्थ रहता है और आध्यात्मिक उन्नति के लिये उसका यत्र उपयोगी दशा में बना रहता है। इसमें अमितव्ययिता से शरीर दुर्वल है। जाने से जीवात्मा अपनी पूरी शक्तियों का प्रकाश नहीं कर सकता। इस से आध्यात्मिक व भौतिक दोनों प्रकार की उन्नतियां स्थगित हो जाती हैं। काम ऐसी प्रयल शकि है कि यह समाज के लिये सब से कठिन समस्याओं में से एक है। जाति की धार्मिक निर्बलता का एक बडा भारी कारण यही काम शकि है । इसमें अमितव्ययिता होने से सपूर्ण अवगुण आजाते हैं । इससे मनुष्य अच्छे प्रकार से कर्म करने योग्य भी नहीं रहता। उसकी दिपावट व सुप के लिये इच्छा तो बढ़ जाती है और उसका शरीर मालसो व सुस्त बन जाता है। इसमें थोडी सी भी भूल मे पतन हो सकता है। इस लिये ब्रह्मचर्य की रक्षा में मनुष्य जितना चैतन्य रहे वही थोडा है। जहां काम सम्बन्धी व्यरहार में अमितव्ययिता अति निन्द- नीय है तहा नियमित धर्मानुसार स्त्री पुरुष का सबन्ध भी समाज की रक्षा के लिये आवश्यक है। आध्यात्मिक उन्नति भी स्थिर समाज में ही हो सकती है और उसकी रक्षा के लिये योग्य मनुष्य की आवश्यकता होती है । परन्तु निर्वल सन्तान उत्पन्न करने मे समाज की कोई सेवा नहीं होती। इससे तो साध पदार्थों पर फेवल भार बढ़ता है। यही नहीं वरन् पेसे निर्वल शरीर चाले, फि जिनका न शरीर स्थिर है और न मन, ससार को भी अधोगति की ओर घसीट ले जाते हैं। उनकी स्थिति ही समाज को भय रूप है। यह प्रभार बढता ही चला जायगा। इसका प्रतिरोध केवल एक ही है कि इसका कारण, व्यभिचार नष्ट किया जाय । यदि धर्मनिष्ठा च ब्रह्मचर्य को समाज में वृद्धि हो तो और सब गुण तो स्वभावत ही पीछे पीछे चले आते हैं । समाज अपने शरीर व मन दोनों को ही फिर प्राप्त कर लेता है। ब्रह्मचर्य शरीर को स्वस्थ व स्थिर रख कर शकि शाली (पुरुष) गुण सत्य व उससे उत्पन्न गुणों के विकाश में सहायक होता है। निर्बल शरीर व अस्थिर मन वाले मनुष्य की अपेक्षा बलवान मनुष्य के कोमल व शात होने की सम्भावना अधिक है। धर्मनिष्ठा तो खय मन पर प्रभाव डालतो है और उसको शुद्ध करके व शारोरिक इच्छाओं का निरोध करके सत्गुणी का विकाश करती है। खार्थी व कठोर मनुष्यों को अपेक्षा पवित्र व कोमल हृदय मनुष्य छोटी छोटी बातों मे भी अत्यन्त सत्यवादी होगा। ब्रह्मचर्य शरीर रक्षा के लिये परम आवश्यक है और शरीर आध्यात्मिक उन्नति के लिये आवश्यक है। इसको अच्छी तरह समझ लेना चाहिये कि सामाजिक सगठन सम्बन्धी वह सव विचार जो दाम्पत्य सम्बध में शिथिलता का प्रस्ताव करते हैं वह उस सगठन के नाश का प्रबंध स्वय करते हैं । यह न समझना चाहिये कि पूर्ण स्वतत्रता से प्राकृतिक नियमों के कारण काम सम्बधी अमितव्ययिता नष्ट हो जायगी या कि आजकल की रोक टोक के कारण प्रतिकार द्वारा यह बढती है । इस सिद्धात पर तो फिर किसी भी पाप व अपराध का निषेध नहीं होना चाहिये क्योंकि पूर्ण स्वतत्रता से सब बातें अपनी मर्यादा मे आ जायेंगी । परन्तु अनुभव इस आशा के विरुद्ध है। काम इच्छा की वृद्धि का कारण उस का निरोध नहीं घरन् उस में निरत होना है। इससे कामशक्ति निर्बल हो सकती है और उस का खभाव निःसन्देह निर्वल हो सकता है परन्तु वह निर्बलता उस शक्ति की स्थिरता व बल मे होगी उसकी उत्तेजना में नहीं । और यह कोई उन्नति का चिन्ह नहीं है। बहुत से पशु प्राकृतिक मर्यादा मे जो रहते हैं उसका कारण खतत्रता नहीं ( १३७ ) है परन् यह है कि उन में मनुष्य के समान चतुरता व कल्पना शकि नहीं होती । और फिर कुछ पशुओं में, जैसे कि वन्दर, यह भी देखा जाता है कि छोटे बच्चे भी अपने बड़ों को नकल करते हैं। मनुष्य तो इच्छित वस्तु तथा उससे प्राप्य सुस की फरपना कर सकता है और इस प्रकार इच्छा के वल को अपनी ही क्रिया से बढ़ा सकता है । उस का अन्तिम परिणाम ध्यान में इस कारण नहीं रहता कि मनुष्य भविष्य में प्राप्त होने वाले सुखों की अपेक्षा निकट वत्ती सुखों को अधिक चाहता है । इच्छा के वार वार पूर्ण होने से उस का बल घटता नहीं घरन वढता है । साधा- रणतया तो मन गृहस्थरूपी धुरी के चारों ओर घूमता है । क्षोम- रहित गृहस्थ जीवन के नष्ट होने से चपलता बढ जायगो और स्वभाव की स्थिरता घट जायगी और इस से जाति का धार्मिक तेज निर्मल हो जायगा । स्त्री पुरुषों के परस्पर व्यवहार की स्वतत्रता से मन निरावलम्ब हो जाता है और वह कौन सा अव- गुण है जो अस्थिर मन में प्रवेश न कर सकता हो । इस सम्बध में फिसी मो चेतावनी में अनुचित शीघ्रता नही कही जासकती। भविष्य की मनुष्य समाज को नष्ट भ्रष्ट करने के लिये स्त्री पुरुषों के पारस्परिक सम्बध की शिथिलता के प्रस्ताव ही अत्यन्त भय- कारी हैं । ब्रह्मचर्य का अभ्यास केवल फों में ही नहीं होना चाहिये वरन वाणी व विचारों में भी होना उचित है । कुत्सित वस्तुओं का विचार करना, अश्लील वृत्तातों का पढना व अनु- चित गीतों का गाना, यह सब अपना प्रभाव मन पर डालते हैं और काम इच्छा को उत्तेजित करते हैं। कोई शिक्षा प्रणाली इस सम्बध में जितनी अधिक सचेत हो उतना घोडा है। और न कोई समाज ही अपने साहित्य को इस विचार से निरीक्षण करने में अधिक सावधान कही जा सकती है।
( १३८ ) आध्यात्मिक उन्नति के लिये मनुष्य शरीर की आवश्यकता को हम जान ही चुके हैं । उस की रक्षा हमारा प्रथम कर्तव्य है। हम को उस की रक्षा अवगुणों अर्थात् मानसिक रोगों से, शारी- रिक रोगों से व आघातों से करनी चाहिये परन्तु पुण्यों से नहीं। जब उस की रक्षा ही हम गुणों के अभ्यास के लिये करते हैं तो फिर उस की रक्षा में गुणों का त्याग कैसे कर सकते हैं। यह युकि कि किसी गुण का थोड़ा सा उल्लघन उसीगुण में भविष्य में पूर्णता प्राप्त करने के विचार से किया जाय तो वह अनुचित नही है अशुद्ध है क्योंकि यह इस बात को पूर्णतया भुला देती है कि फिसो गुण से उत्पन्न वडे से बडे कष्ठ को सहन कर लेना ही उस गुण की पूर्णता है । यह यात ही कि किसी को यह सिद्धांत युक्तिपूर्ण प्रतीत होता हे इस बात का प्रमाण है कि उस को उस गुण मे पूर्णता प्राप्त नहीं है। इस कारण यदि कोई किसी भी कारण से धर्म मार्ग से भूल जाय तो उसे अपने को उस कर्म प्रभाव से शुद्धि कर लेना उचित है । जहा मनुष्य इन युक्तियों से आत्मरक्षा का सर्मथन करते हैं तहां वह अपने जीवात्मा की अपने ही अव. गुणों से रक्षा करने की चिन्ता नहीं करते । इस यथार्थ आत्म- रक्षा को पहली विधि ब्रह्मचर्य पालन है क्योकि इस से शरीर अपनी और प्रकारों से भी रक्षा करने के योग्य हो जाता है। और धर्मनिष्ठा हमारे मन को हमारी अनुचित इच्छात्रों से रक्षा करती है। और इस विचार से दैविक प्रेम का प्रभाव भी अकथनीय है। राम १३-सहायक गुण-सामाजिक दैविक व सहायक गुणों के अभ्यास सेही सामाजिक सगठन स्थिर होगा, साय साथ सामाजिक संगठन की स्थिरता से इन गुणों के अभ्यास में भी सहायता मिलेगी। समाज की अस्थिरता मनुष्य के सुधार के फर को बढा देती है क्योंकि व्यकिगत कठि नतामों में अच सामाजिक क्षोम और मिल जाता है। किसी सामाजिक स्थिति से धर्मात्मा मनुष्य काशातिमय जीवन व्यतीत फरना भी कठिन हो सकता है। व्यक्तिगत गुणों से सम्पूर्ण समाज भी शात रह सकती है क्योंकि उनमे समाज के सच ही सदस्य धर्मात्मा होंगे। परन्तु सब मनुष्य आध्यात्मिक उन्नति की एक ही अवस्था में नहीं होते । अस्तु क्षोभ के कारण प्राय उपस्थित होते हैं। अतएव सामाजिक गुणों का विशेष विचार भी आवश्यक है। ऐसे गुणों के लिये राजनैतिक दड व सामाजिक सम्मति रूप दी सामाजिफ अनुशाएँ हैं । यह अनुशाएं. आध्यात्मिक अनुशा से अधिक प्रत्यक्ष हैं और इसी कारण ऐसे मनुष्यों के लिये अधिक प्रभाव शाली होती हैं। यदि इन अनुशाओं के कारण इन मनुष्यों में सामाजिक गुण भी आजावे तो भी शनैः शने और गुण उन में प्राप्त हो जायगे । क्योंकि राजनैतिक व सामाजिक अनुशाओं के लिये भी अन्तिम अनुशा आध्यात्मिक ही है । अस्तु इन अनु- शाओं के अनुसार व्यवहार गुणों का विकाश करने वाला होगा। ऐसी अनुशात्रों के आधार पर जो सगठन हो उस की रक्षा केवल अन्तरीय वित करने वालों से ही नहीं करनी चाहिये परन् बाह्य आघातों से भी फरनो आवश्यक है। अतएच सामाजिक गुणों का केल शांतिमय व्यवहार ही फल होना पर्याप्त नही है वरन् उन से बाह्य आधातों से रक्षा का भी प्राव होना चाहिये। सामाजिक आपश्यफनामों से ऐसे कर्म करने पड़ जाते हैं जो दैविक गुणों के विचार से अनुचित प्रतीत हों और किसी फिसी अवस्था में जैसे कि अपराधियों के न्याय में च धर्म पूर्ण युद्ध में, ऐसी आवश्यकताएँ इतनी अधिक हो जाती हैं कि प्रत्येक कर्म का ( १४० ) प्रायश्चित करना सम्भव न हो । ऐसी दशा में कार्यों को अपना धर्म समझ कर करना चाहिये और उन में अपनी इच्छा का लेश मात्र भी समावेश नहीं रखना चाहिये।इस से वह फर्म सात्विक हो जायगे । क्योंकि वह केवल आवश्यकता के अनुसार होंगे और उन में अपनी क्रिया के विस्तार का राजसिक स्वभाव न होगा । इस सम्बध में यह भी स्मरण रखना चाहिये, जैसा कि पहले भी कह चुके हैं कि असत्य भापण हिसा को अपेक्षा सुगम है अस्तु सामाजिक रक्षा के लिये प्राण हरण किया जा सकता है परन्तु असत्य भापण इस प्रयोजन से भी अनुचित है। दृढतायुक्त गुणों का आधार सत्य है और धर्मानुसार आत्मरक्षा के सम्पूर्ण कर्म सत्य के आधार पर होने चाहिये। विना सत्य के आधार के उन मे धार्मिक बल नहीं होगा और सम्भावना यह है कि वह अनेक बहानों से युक्त अनुचित फर्म हो। दूसरे सत्य के अश से वह कर्म भी सात्विक हो जायगा और उस का अनुचित विस्तार नहीं होगा। इस के अतिरिक्त मनुष्य का अपना जीवन भी शुद्ध होना चाहिये और इस प्रकार वह प्रत्येक कर्म के लिये प्रायश्चित न करता हुआ भी पवित्र रह सकता है। और फिर उस को उन कर्मों की चिन्ता नही करना चाहिये क्योंकि ऊपर के सिद्धांतों के अनुसार आचरण करने से उस का धर्म सुरक्षित रहेगा। और यदि उस का अपना आचरण धर्मानुसार नहीं है तो उसके सामा- जिक फर्म भी अशुद्ध होंगे और उस के सम्पूर्ण जीवन की पवि- प्रता न होने से उस को प्रत्येक कर्म के लिये प्रायश्चित करना आवश्यक है। सम्भव है कि ऐसे सामाजिक कर्म करने वाले सव मनुष्य पवित्र न हों परन्तु उन से हमें कोई प्रयोजन नही । ऐसे मनुष्य सब अवस्थाओं में मिलेंगे। वह अपने कर्मों के फल भोगेंगे । हमारा कार्य तो केवल सिद्धातों का निरूपण करना ( १४१ ) है। उनके अनुसार आचरण करने या न करने से प्रयोजन उन का है अथवा उस समाज का है जिस के कि वह सदस्य हैं। कभी कभी दो सामाजिक गुणों नियमानुसार आचरण व अन्याय के प्रतिरोध, में विरोध उपस्थित होता है। नियमानुसार आचरण की ती सामाजिक जीवन के लिये ही आवश्यकता है। विना शातिमय समाज के किसी प्रकार को भी उन्नति नहीं हो सफती। कोई राज्य नियम व शाति के स्थापन में अनुचित दृढता नहीं कर सकता । परन्तु कोई नियम गुणों का उत्पादक भी हो सकता है और वह गुणों का विरोधी पाप मय भी हो सकता है। यदि किसी देश की नीति गुण उत्पादक नहीं है तो वह नीति होने योग्य ही नहीं ऐसी नीति सामाजिक सङ्गठन को स्थिर करने के चदले उसके नाश का कारण उपस्थित कर देती है। इसके कई कारण हो सकते हैं । जब मनुष्यों का कोई विशेष सघ अधिकार प्राप्त कर ले तो वह और सघों को हानिकारी और अपने लिये लाभकारी नियम बना सकता है, अथवा अयोग्य पुरुप अधिकार प्राप्त कर बढ़ेंगे नियम बना सकते हैं, अथवा योग्य पुरुष भी भूल से ऐसा कर सकते हैं, अथवा कोई अन्यायी अत्याचार कर सकता है अथवा किसी विदेशी राज्य के उस देश के निवासियो के भले को चिन्ता न करने से ऐसा हो सकता है। तीसरी दशा में तो कोई फठिनता नहीं है क्योकि ऐसी भूल सब से ही सम्भव है। इसका उपाय ऐसे नियमों का प्रतिरोध नही है वरन् उनका नियमानुसार सशोधन है। ऐसी स्थिति के, जो प्रत्येक प्रकार की राज्य प्रणाली व अधिकार में अनेक चार हो सकती है, सुधार के लिये शाति मय प्रतिरोध के असीम भय जनक सम्भावनाओं का भार नहीं लिया जा सकता। दूसरी दशा में सशोधन के सग उन अयोग्य पुरुषों को भी पृथक् फरना उचित है । परन्तु यथार्थ ( १४२ ) कठिनता तो पहली, चौथी व पाचवी दशामों में है क्योंकि उनमें दोपियो का पृथक् करना सहन नहीं होता और जहा पहली दो दशाओं में जानबूझ कर हानि नही की गई थी तहा इन तीन दशाओं में जान बूझ कर अनुचित नियम बनाये जाते हैं । अस्तु इन तीन दशाओं में अन्याय का प्रतिरोध ही यथोचित गुण है। परन्तु इस गुण के विचार शून्य व विवेक युक्त प्रयोगों का शान बड़ा कठिन है। इसमें भय यह रहता है कि इसके प्रयोग से सामाजिक सङ्गठन को नष्ट करने वाली ऐसी बडी बडी शक्तिया सचलित न हो जाय कि जो अपने वेग से बुरों के सद्ग अच्छे नियमों को भी उडा दे और सम्पूर्ण समाज को ही नट भ्रष्ट कर दे । ऐसी अवस्था भी प्राप्त हो सकती है कि जिसमें इस भय को भी सहन करना पडे परन्तु इससे पूर्व स्थिति पर शाति मे पूर्ण विचार कर के इसकी आवश्यकता प्रत्यक्ष कर लेनी चाहिये। अनेक बार तो अत्याचारियो के अपने बल के अभिमान से भी उत्तेजना बढ जाती है और शात विचार का अवसर मिलना असम्भव हो जाता है। यथार्थ में प्रभुता मद उत्पादक है और उस समय यह स्मृति नहीं रहती किवही कार्य कि जो चलवानों के हितार्थ किये गये हैं फिसी समय उन करने वालों के हो लिये अत्यन्त हानिकारक होगे। कोई अत्याचार भी सदैव स्थित नही रह सकता। किसी न किसी दिन उसका अन्त अवश्य होगा और जब हिसाव का व्यौरा होगा तो यह ज्ञात होगा कि सम्पूर्ण अनुचित लाभ से हानि अधिक हुई । स्वार्थ प्रेरित विचार हीन प्रतिरोध और विवेक पूर्ण धर्मानुसार प्रतिरोध की एक बड़ी सुन्दर परीक्षा प्रतिरोधक को कष्ट सहन करने की शक्ति है। अनुचित नियम के भङ्ग के दण्ड को सहर्ष सहन करके अन्याय का प्रतिरोध अवश्य धर्मानुसार है। परन्तु नियम के अनुचित तरोध में निशङ्क ( १४३ ) होने का निर्णय अति सुक्ष्म तथा पूर्ण विचार से होना चाहिये। जव उस विचार में और भी विश मनुष्यो की अनुमति हो तो यह उस विचार के उचित होने का चिन्ह हो सकता है । सशस्त्र प्रतिरोध व शात प्रतिरोध में एक भेद है । सशस्त्र प्रतिरोध में तो उसके भय व सभावनाएँ सबको प्रथम से ही ज्ञात होती हैं परतु शांत प्रतिरोध में उसके सम्पूर्ण परिणाम सब पर प्रकट नहीं रहते । सशस्त्र प्रतिरोध में उसके करने के निश्चय के लिये ही वडे साहस की आवश्यकता होती है और शात प्रतिरोधमें जनकट का समय उपस्थित होता है तब अत्यत सहन शीलता की आव- श्यकता होती है। कार्य क्रम में सशस्त्र साहस को आवश्यकता होती है और शातप्रतिरोध में अपने मन पर पूर्ण स्वत्व की आवश्यक्ता होती है । प्रतिपक्ष की अवस्था सशस्त्र की अपेक्षा शातमय प्रतिरोध में अधिक कठिन, अप्रिय व सभ्रम हो जाती है क्योंकि इसमे उसको निहत्थे मनुष्यों के विरुद्ध वल के प्रयोग की आवश्यकता होती है। इन सब कारणों से शातिमय प्रतिरोध का अवलम्बन उसी समय करना चाहिये जब और कोई उपाय न रहे। जहां प्रजाकी अनुमति से शासनप्रणालो में सुधार करने की सम्भावना हो वहा तो इस प्रतिरोध का कदापि प्रयोग नहीं करना चाहिये । अथवा जहा देश की नीति में कोई दोप न हो और यदि दोप तो हो परन्तु उसका सुधार व्यवस्थापक सभा के द्वारा सुगमता से हो सके तो वहा नियम विरुद्ध किसी मनुप्य सघ के अभीष्ट सिद्धि के लिये ही इस प्रतिरोध का प्रयोग अनुचित है। इन सब विचारों से ऐसी अनेक दशा हो सकती हैं कि कोई अटल नियम नही बंध सकता वरन् दोनों गुणों के केवल साधारण परिणाम का निरूपण हो सकता है । साधारण- तया नियमानुसार आचरण का गुण ही ठीक है। हर किसी को - में ( १४४ ) नियम भग करने के लिये धर्मविचारका बहाना बनाने का अधि- कार नही दिया जा सकता। एक बार तो वह यथार्थ में धर्मा नुसार भी होगा पल्तु उसके पश्चात् अनेक समयों पर धर्म का केवल चहाना होगा। इसके अतिरिक्त सिद्धान्तों के समझने में भूल भी हो सकती है। परन्तु असाधारण अत्याचार को दशा शातिमय प्रतिरोध के प्रयोग की आवश्यकता पड़ सकती है जब एक मनुष्यो की समाज को समाज किसी नियम का विरोध करे तो उचित यही है कि उसकी फिर जाच हो । प्रतिरोध उस समय सात्विक होता है जब वह अपनी रक्षा अथवा किसी दूसरे की रक्षा में किया हो परन्तु इसका प्रयोजन किसी दूसरे को हानि पहुचाने का विचार नहीं होना चाहिये । यह उस समय राजसिक हो जाता है जब इसके उपायों में दूसरों का कष्ट भी आजाता है, चाहे इस समय भी यह केवल अपनी रक्षा के ही लिये हो। यह उस समय तामसी हो जाता है जब वह होपात्मक हो जाय और प्रतिपक्ष को दड देने के लिये उसको नष्ट करने की इच्छा से किया हो। यह राजसी व तामली दशाएँ समाज के सुधार के लिये आवश्यक हों या न हो परन्तु आध्यात्मिक विचार से तामसी दशा तो अवश्य ही दोपयुक्त है। भविष्य में भी ऐसे अत्याचार को असम्भव करने के लिये भी शांतिमय प्रतिरोध तामसी नही है परन्तु द्वोपात्मक दड देने के विचार से किया हुआ प्रतिरोध तामसी है । सात्विक प्रतिरोध तो गुण है परन्तु जव मनुष्यों की समाज की समाज ऐसा करती है तव उसके तामसी हो जाने का भय रहता है क्योंकि साधारण मनुष्य तो सव सात्विक नही होते। अस्तु ऐसे प्रतिरोध को समाजिक करने में बड़ी सावधानी से कार्य करना चाहिये क्योंकि इससे समाज की स्थिति के लिये , भी भय के कारण उत्पन्न हो सकते हैं। इसी प्रकार पुण्यात्मक घ लाभकारी नियमों का पालन सात्विक है। सम्पूर्ण नियमों का पालन केवल सामाजिक संगठन को स्थिर रखने के लिये राजसी है। और पापात्मक नियमों का भय के कारण से पालन तामसी है। नियमानुसार आचरण व अत्याचार का प्रतिरोध यह दोनों गुण तो अधिकारी व आधीन शक्तियों के परस्पर सम्बध के विषय में हैं। सहन शीलता व परस्पर सहायता सामाजिक गुण समान शकि वाले मनुष्यों में वर्त्तने योग्य हैं । निश्चलता, शांति व प्रसन्नता के दैविक गुणों की तीव्रता के अनुसार सामाजिक गुण नियमानुसार आचरण की मात्रा होती है, सत्य के अनुसार अत्याचार के प्रतिरोध व देश प्रेम की तीनता होती है, और सहन शीलता व परस्पर सहायता की शक्ति दया, कोमलताव विनय शीलता पर निर्भर है। जिस प्रकार दया व न्याय के दैविक गुणों में विरोध हो सकता है उसी प्रकार सामाजिक जीवन में भी सहन शीलता व समाज रक्षा की आवश्यकताओं में विरोध हो सकता है। परन्तु साधारणत. सहन शोलता के विना सामाजिक जीवन असम्भव हो जायगा। असहनशीलता से तो समाज का प्रयोजन ही नष्ट हो जायगा। सार्थक समाजिक जीवन के लिये सहन शीलता ही नहीं वरन् परस्पर सहायता भी आवश्यक है । परन्तु किसी अपराधी की सहायता पुण्य नही हो सकती। जिस प्रकार ब्रह्मचर्यामरक्षा शरीर की स्थिति के लिये आवश्यक हैं इसी प्रकार सामाजिक सङ्गठन की स्थिरता के लिये देश प्रेम प्रापश्यक है। कभी कभी देश प्रेम में स्वाभिमान के भाव च आत्मगौरव सम्बन्धी विचारों की शक्ति का भी सयोग ( १४६ ) हो जाता है परन्तु दैविक गुणों मे तो उसका आधार सत्य है। जब देश प्रेम सत्यता से युक्त नहीं होता वरन् सामाजिक प्रशसा के विचार से होता है तो वह इतना दृढ़ नही होता । कोमलता व विवेक से युक्त देश प्रेम सात्विक है। इन गुणोसे रहित होने पर वह धर्मोन्मत्तता की वह तामसी दशा है जो कट्टरता, अभिमान, व अहंकार से उत्पन्न होती है। जब देश प्रेम चतुरता व विचार से युक्त होता है तो इसकी दशा राजसी होती है। देश प्रेम समाज संगठन की स्थिरता के लिये अत्यन्त आव- श्यक होने से परम गौरव युक्त सामाजिक गुणो में से है । जब हम विचार करते हैं कि समाज मनुष्यों की शक्तियों के विकाश पर कितना प्रभाव रखती है और उनके लिये आध्यात्मिक उन्नति सम्भव करती है तब हमें ज्ञात होता है कि समाज रक्षा के लिये जो कुछ भी किया जाय थोडा है। कोई कोई तर्फ करसफते हैं कि केवल उन्ही समाजों को जीवित रहने का अधिकार है कि जिनके सिद्धांत सर्वोच्च हों। इस युकि को अन्त तक फैलाओ तो पृथवी पर बहुत ही थोडे मनुष्य बचेंगे। इसमे दोष तो यह है कि यह युक्ति सिद्धान्तों की रक्षा करती है मनुष्यों की नहीं। समाज से लाभ यह है कि व्यक्तियों को अपने सुधार का अवसर मिले। उस समाज की रक्षा उस के सिद्धांतों की रक्षा के लिये नही करनी चाहियेवरन उसके जीवित सदस्यों के लिये फरनी चाहिये जिनके लाभ के लिये कि उन सिद्धांतों की रचना हुई है। किसी जाति के उन्ध सिद्धातों से उसको संसार की जातियों मे गौरव युक्त स्थान प्राप्त हो सकता है परन्तु उससे उसके स्वतन्त्र जीवन व्यतीत करने के प्राकृतिक अधिकार मे कोई विशेषता नही हो सकती। ऐसे उच्च सिद्धान्तों के कारण वह जाति और अवनति जातियों की सहायता कर सकती है ( १४७ ) परन्तु उसको उन्हें दासता में रसने का अधिकार नहीं हो सकता। देश प्रेम उतना ही आवश्यक व न्याययुक्त है जितनी कि आत्म रक्षा है, वरन् उससे भी अधिक है क्योंकि देश प्रेम एक व्यकि की ही रक्षा नहीं करता वरन् बहुत से व्यक्तियों की करता है। १४-संस्कार व स्वतन्त्रता यह प्रत्यक्ष है कि आदि तत्व को दशा अथवा मुक्ति को प्राप्त रने के पूर्व जो सस्कार जीवात्मा ने सचय फर लिये हैं वह गांत हो जाने चाहिये । जीवात्मा उस शरीर की ओर आकृष्ट होगी जिस में उसके शारीरिक सगठन व उसकी अन्य सम्पूर्ण परस्थिति के कारण जीवात्मा के सस्कारों को शांत होने फा अवसर मिल सकेगा। मनुप्य अपने इस जीवन की अधिकतर दशाओं को पूर्व के जीवनों में ही बना लेता है । यह दशाए इस प्रकार कहा तक नियमित हो सकती हैं अथवा किन सिद्धान्तों के अनुसार जीवात्मा व शरीर का ससर्ग होता है यह बातें जानने योग्य हो वा न हो परन्तु इसमें कोई सन्देह नहीं हो सकता कि जीवात्मा व शरीर का सम्वन्ध कुछ न कुछ इसी प्रकार की समा- नता के अनुसार होगा। अनमेल जीवात्मा व शरीर में अफरमाव हुआ सम्बन्ध स्थिर रह नही सकता। सम्भव है कि इसी प्रकार अनुसधान करने से समय आने पर यह सम्रन्य विषयक सिद्धान्त भी ज्ञात हो जाय | और उनमें से कुछ तो अब भी निर्णय किये जा सकते हैं। हम पहले देख चुके हैं कि जो विचार या भाव मन में एक वार भी आता है उस की वार यार आने की सम्भावना हो जाती . ( १४८ ) है। इसी कारण बुरे विचार पहले विचार करने वाले ही कि हानि करते हैं । इसी प्रकार सम्भव हैं कि जो मनुष्य दूसरों को अनेक प्रकार के कष्ट देता है वह उन्ही के समान कष्टों की सामिग्री अपने लिये भी अपनी जीवात्मा मे उत्पन्न कर लेता हो । उस के वत्त मान जीवन में भी ऐसा हो सकता है कि यदि उस पापी की कल्पना शक्ति किसी समय अति तीव्र हो जाय तो उसके प्रत्या- चार से पीड़ित व्यक्ति उसके सन्मुख पाते और अपना बदला लेते हुए उसको प्रतीत हो । अत्याचार क्रिया में ही भय भी 'मिश्रित हो सकता है भय से मन की वृत्तियां बाह्य वस्तुओं व विचारों के प्रवेश के लिये खुल जाती हैं, अस्तु उस समय पाते अधिक गहरी अंकित होंगी। अतएव जो मनुष्य दूसरों के दुख देखने मे प्रसन्न होता है वह इसी अकन के द्वारा अपने लिये भी भविष्य में वैसी ही दशा का प्रबन्ध करता है । इस सम्बन्ध में अत्याचार से पीड़ित व्यक्तियों की मानसिक दशा का भी वडा भारी प्रभाव है । उस अकन को सफल करने के लिये जिस स्थिति की आवश्यकता हो उस की पूर्ति उन की घदला लेने की इच्छा से हो सकती है । अकन व इच्छा दोनों का पारस्परिक परिपूरक व्यवहार कभी भविष्य में दोनों मनुष्यों को भिडा सकता है। इस प्रकार असंख्य सम्बन्ध, सकोर्णता व प्रति क्रियाएं उत्पन्न हो सम्पूर्ण जीवन की साधारण दशाऐ सुगमता से नियत कर सकती हैं। शरीर व जीवात्मा के समर्ग के और नियम भी ऊपर कहे हुए नियम में मिश्रित हो सकते हैं। अति तीच इच्छाऐ जो इस जीवन में सतुष्ट नहीं हुई उन की दूसरे जीवन में पूर्ण होने की सम्भावना हो सकती है । यह इच्छा किसी जड़ पदार्थ, अमूर्त वस्तु अथवा किसी जीवित मनुष्य के सम्बन्ध में हो ( १५६ ) सकती है। पहली दो दशाम्रों में तो उस इच्छा की गति उस शरीर की ओर ले जायगी जिस में प्रविष्ट होने से वह इच्छा सफल हो सके। यह तो इच्छा की तीव्रता के ऊपर ही अधिक तर निर्भर है। इस के उदाहरण सुन्दर शरीर अथवा सम्पति प्राप्त करने की इच्छाएं हैं। तीसरी दशा में उस इच्छा का प्रभाव उस मनुष्य जीवात्मा की दशा की भी अपेक्षा रखता है। यदि उस मनुष्य में भी उस इच्छा के अनुसारकाई प्रति भाव उपस्थित है तो वह इच्छा पूर्ण हो सकती है। और यदि ऐसा नहीं है तो यह इच्छा अचल प्रतिरोध के विरुद्ध व्यर्थ क्रिया करने में ही शात हो जायगी अथवा अप्रभावित रह जायगी। इसी प्रकार हम ऊपर देख चुके हैं कि बदला लेने की इच्छा को अफन के नियम से सहायता मिलती है । अस्तु अनुचित इच्छानों की गति नष्ट होने की ओर होती है और उचित इच्छाओं की गति सतुष्टि की ओर होती है। केवल उन इच्छाओं से हो नहीं जो इस जीवन में पूर्ण न हुई हो परन् सतुष्ट हुई इच्छाओं से भी आगामी जीवन की दशानियत हो सकती हैं। प्रत्येक इच्छा मन की एक किया है और प्रत्येक मानसिक क्रिया के एक बार हो जाने से उसका पार वार प्रकट होना सुगम हो जाता है। चाहे कोई इच्छा पूर्ण हो जाय अथवा असतुष्ट रह जाय परन्तु भविष्य के लिये वह कुछ न कुछ स्वभाव भथवा सस्कार छोड जायगी। यथार्थ में सतुष्ट होने से यह पुनर्पत्ति का स्वभाव सतुष्टि फी प्रसन्नता के सयोग से अधिक दृढ हो जायगा जो इच्छा पूर्ण नहीं होती वह भी सतुष्ट होने तक स्थित रहने का प्रयत्न करती हैं और यदि नए भी हो जाय तव भी इच्छा करने वाले का परिचय व सम्बन्ध उन विचारों व भावों से करा जाती हैं और यह विचार व भाव मन में किसी ने किसी रूप से फिर उदय हो सकते हैं । इस प्रकार कलुषित इच्छाओं से पापिक स्वभाव और शुद्ध इच्छामों से पुण्यात्मक स्वभाव बनते हैं। पापी व अपराधी मनुष्य अपने जीवन का अभिमान फरे या न करे परन्तु उन का सशयग्रस्त, भयप्रद, सकटमय व अशांत जीवन इच्छा करने योग्य नही कहा जा सकता और काई शातिप्रिय पुण्यात्मा मनुष्य उन की दशा को प्रहण करने में सहमत न होगा । इस के अतिरिक्त ऐसे जीवन के जो स्वभाव-शेष अथवा सस्कार होंगे वह भी आगामी जीवन की दशाओं को नियत करेंगे। हमारे कार्यो का हमारे ऊपर ही प्रभाव एक और प्रकार से भी होता है। प्रत्येक क्रिया किसी अतिसूक्षम पदार्थ में फिसी विशेष प्रकार के कम्पन की लहर उत्पन्न करती है । और यह लहर उस समय तक फैलती जायगी जब तक कि वह किसी में लयन हो जाय अथवा उस का वेग शात न होजाय। जो संस्कार हमारे जीवात्मा में एक कार्य से उत्पन्न होते हैं वह उसलहर को आकर्पित करेंगे क्योंकि दोनों ही एक क्रिया के परिणाम हैं। इस से घह सस्कार, अच्छा या बुरा जैसा कुछ भी हो, अधिक तीव हो जायगा । इस के अतिरिक्त उस लहर का प्रभाव और भी अनेक मनुष्यो पर पड़ेगा और उन में हमारे से समानता उत्पन्न होने से हमारे जीवन के सयोगो की उत्पति होगी। इस प्रकार अच्छे व बुरे कार्यो का प्रभाष अपने आप ही चढता रहता है। यह अनुभव किया जा सकता है कि जीवात्मा में शुद्ध, सुन्दर व कोमल भावों के होने से शरीर की गति भी कोमल व सुकुमारता की ओर हो जाती है, और तामसी मानसिक स्व- भावों से शरीर भी कठोर, निकृष्ट व वेदना हो जाता है। धन- वान् मनुष्यों की जीवन चर्या ही उनके शरीर को कोमल व सुकु- मार बनाती है। जिस मनुष्य ने इस जीवन में शुद्ध गुणों को अभ्यास से प्राप्त किया है वह दूसरे जन्म में फिसी धनवान गृहस्थ में सुन्दर कोमल शरीर को प्राप्त करेगा। परन्तु इससे यह परिणाम नहीं निकलता कि सब धनवान् मनुष्य पुण्यात्मा होने चाहिये क्योकि किसी किसी को वह शाति सुन्दर शरीर या सपत्ति अथवा दोनों के प्राप्त करने की तीव्र इच्छा से इच्छा. सतुष्टि के नियम के अनुसार प्राप्त हो सकते हैं। ऐसी दशाओं में यह भी सभव है कि उनकी मानसिक रत्तिया पूर्णतया अशुद्ध हों अथवा उनके शरीर निकृष्ट व वेढगे हो। और यातों में भी उनका जीवन अशात हो सकता है। अपने पूर्व सस्कारों से उन के अनेक शत्रु हो सकते हैं। अथवा उन में धन के मद से अकर्मण्यता हो सकती है। सम्भव है कि पूर्व जन्म में उन के पापिक स्वभावों की इतनी अधिक वृद्धि हो गई हो कि अब धन की सहायता से उनको उनके प्रयोग में पूर्व जन्म की अपेक्षा और अधिक सुविधा व अवसर मिले। समानता के नियम में और नियमों के विन्न करने से यह परिणाम निकल सकते हैं । इसी सिद्धात के अनुसार पापिक स्वभाव वाले जीवात्मा को नीच व निर्धन गृहस्यों में जन्म लेना चाहिये । यह सत्य है कि बहुधा धनवान मनुष्य आलसी, अहकारी, स्वार्थी व अत्याचारी होते हैं परन्तु यह स्वभाव उनके पूर्व जीवन के फल हो सकते हैं जैसा कि ऊपर देख चुके हैं। या वह इस जीवन के धन के मद के प्रभाव हो सकते हैं। नही तो साधारणतया धनवान मनुप्य ज्ञानोन्नति के सवर्द्धक होते हैं और सभ्यता की उन्नति पर उन का असीम प्रभाव होता है। वह दयावान व दानशील होते हैं। दूसरी ओर निर्धन मनुष्य भी बहुधा विनय शील, सत्कार शील, दयावान् व सत्यवादी होते हैं। यह उनके इस जीवन की दशा व , ( १५२ ) T सगति के कारण हो सकता है और उसफा यह भी कारण हो सकता है कि साधारण जनता की मानसिक दशाओं में केवल साधारण परिवर्तन होते हैं । इन साधारण सीमाओं के अन्तर्गत असख्य दों की पापिकता, शुद्धता, इच्छाएँ, सुकुमारता, अकन्' व भाच उपस्थित होते हैं। पक्के पापी धनवानों अथवा मध्य श्रेणी के मनुष्यों में अधिक नहीं होते। पापिक स्वभाव घाली समाज श्रेणी भी साधारणतया धनवान नहीं होती। निर्धनता का कारण पूर्व जन्म का अत्यन्त लोभ भी हो सकता है जव कि सम्पत्ति के प्राप्त होते हुए भी जीवन चर्या निर्धनों की सी रखी थी। मानसिक अस्थिरता से शारीरिक अस्थिरता भी उत्पन्न हो जाती है । ऐसा मनुष्य मद्यपानी वनकर उसके सम्पूर्ण मानसिक व शारीरिक परिणामों को सहन कर सकता है। यह भी सम्भव है कि मानसिक दोपों का विशेष शारीरिक रोगों से सम्बन्ध हो । इस प्रकार ईर्ष्या के स्वभाव से आगामी शरीर कडु रोग से ग्रस्त हो सकता है। ऐसा ही परिणाम अफनके नियम के अनुसार भी हो सकता है। दूसरो को अगभग करने वाला आगामो जीवन में कोढी हो सकता है मनुष्य की जीवात्मा का स्वरूप अधिक कठोर व जडवत् हो से पशुओं के जीवात्मा के समान हो सकता है और अपने प्रधान मानसिक स्वभाव के अनुसार पशु शरीर ग्रहण कर सकता है। जैसे कि भयफर व निर्दयी स्वभाव वाला भेडिया हो सकता है। परन्तु ऐसा बहुत ही कम होता है क्योंकि साधारणतया तो मनुष्य जाति में ही असत्य प्रकार के सस्कारों के लिये अवकाश है। न गुण व दोपों का विवरण और न जीवात्मा व शरीर के ससर्ग के नियमों का निरूपण पूर्ण कहा जा सकता है। इस विचार से धर्म क्षेत्र का अन्वेपण ही नही किया गया अस्तु इस पद्धति के अनुसार अनुसन्धान करने के लिये तो सभी अति विस्तृत अवकाश है। परन्तु जो कुछ कहा जा चुका है वह यह दिखाने के लिये तो पर्याप्त है कि स्वर्ग घ नरक दोनों पृथ्वी पर ही है और अपने ही बनाये होते हैं । जव ससार में असह्य कष्टों की ओर दष्टि करते हैं तो ज्ञात होता है कि कोई ऐसा अपराध या पाप नही कि जिसका यथेाचित दड सासारिक कष्टों से न हो सकता हो ! कल्पित सुसों व कष्टों के आविष्कार करने की आवश्यकता ही नहीं रहती। अगणित अत्यत करदायी रोग, निर्धनता की असह्य वेदनाएँ, पापियो का निकृष्ट, अपवित्र, सशयग्रस्त, क्षेमपूर्ण और कष्टमय जीवन बड़े से बडे दड हैं।वह कौन सा पाप है कि जिसका उचित दड कोई कटपूर्ण रोग नही हो सकता? परन्तु यह दड काई सर्वोच्च न्यायाधीश नहीं देता। यह तो आध्यात्मिक प्रकृति में सस्कारों के शुद्ध व पूर्ण अफित होने का परिणाम है। प्राध्यात्मिक गुणों के अभ्यास व प्राध्या- त्मिक साधनों द्वारा कैसी आध्यात्मिक उन्नति, स्वर्गीय अनुभव, अद्भुत प्राध्यात्मिक शक्तिया, आनन्द पूर्ण व शाति मय जीवन प्राप्त होता है। इससे अधिक सुख व पुरस्कार क्या हो सकता है ? क्या फरिपत स्वर्ग और नरक में आध्यात्मिक अनुशा के इन परितोपो व दडों से भी अधिक अन्तर हो सकता है ? परन्तु इन सिद्धातों में स्वतत्रता ने कौन सा स्थान पाया ? अब यह दिखाया जायगा कि पूर्व कर्मों से इस जीवन की दशाओं के इतने नियत हो जाने पर भी मनुष्य की स्वतत्रता में कोई भेद नही आता । प्रत्येक कर्म का प्राकृतिक प्रभाव अवश्य होगा जिय कोई मनुष्य इच्छानुसार कार्य करने में सफल नहीं होता तव भी उसकी इच्छाओं का वल व्यर्थ नए नहीं हो जाता। किसी विशेष स्थिति में मनुष्य के प्रयत की अपेक्षा उसके सस्कार अधिक बल- ( १५४ ) चान हो सकते हैं परन्तु उसके वर्तमान काल के कार्यों के गुण व तीव्रता के अनुसार भविष्य के लिये तो सस्कार बनेंगे ही। पूर्व जन्म के सस्कारों के निरोध के लिये उसकी स्वतंत्र इच्छा का चल पर्याप्त न हो परन्तु भविष्य के लिये संस्कार बनाने में उस की स्वतन्त्र इच्छा अवश्य परम प्रभाव शाली है। यह अपने कार्यों के लिये उत्तर दाता होगा और जैसा करेगा वैसा ही भरेगा । यह सत्य है कि पूर्व सस्कारों से केवल जीवन के सयोग ही नहीं बनते वरन् उसकी मानसिक वृत्तिया भी वतनी हैं । परतु जो कार्य इन वृत्तियों का परिणाम हो उसका कारण उस मनुष्य के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता। और जहा तक उस के ऊपर इस जीवन के सयोगों का प्रभाव पडा है उस का भी उत्तर दाता वही है क्योकि यह सयोग उसके पूर्व सस्कारों से प्रकट हुए हैं । इस जीवन में भी उसको सब प्रकार के अवसर उपस्थित हैं। यदि फिर भी वह अपने सुधार में असावधानी करता है तो यह उसी का दोष है। सचेत हो कर अपना सुधार करना असम्भव नहीं है यह इसी बात से प्रत्यक्ष है कि चारों ओर मनुष्य अपना सुधार करते दीस पडते हैं । यह सब जानते हैं कि पुण्यात्मक होना शुभ है। यदि कोई पुण्यो के सम्बन्ध में अनुसधान नहीं करता, पुण्यात्माओं का सग नहीं करता, गुणों का अभ्यास नही करता वरन् अपने पापिक स्वभावों को बेरोक टोक कार्य करने देता है तो वह उनको तीव्र होने से नही बचा सकता। यह तो प्राकृतिक क्रम के अनुसार होगा ही। हम पहले देख चुके हैं कि कभी कभी ऐसा होता है कि हम अपनी किसी इच्छा के विरुद्ध अपनी पूर्ण शक्ति का प्रयोग करते हैं । अपने स्वभावों के विरुद्ध कार्य करने की स्वतन शक्ति का यही प्रमाण है। कभी कभी ऐसा होता है कि वह स्वभाव हमारे प्रयत्न से ।
( १५५ ) अधिक बली हो। जैसा कि उस समय होता है जब फि फिसी शारीरिक इच्छा के अनुसार कोई प्रतिभाव आध्यात्मिक मन में भी उपस्थित हो। ऐसी दशा में यद्यपि हम उस समय अपने प्रयत्न में सफल नहीं होते परन्तु उस प्रयल से भविष्य में सफलता प्राप्त होने की सम्भावना बढ जायगी क्योकि उससे वह स्वभाव निल हो जायगा और उसका प्रतिरोधी स्वभाव प्रवल हो जायगा। अस्तु सब दशाओं में स्वतत्र इच्छा के प्रयोग के लिये पूर्ण अवसर होता है और इस से सस्कारो के सिद्धात में भी कोई भेद नही पडता । उन मनुष्यों के लिये कि जिनमें गुणों के समझने की बुद्धि व इच्चा मात्र भी नहीं है उनके लिये धर्म व नीत की पद्धति दीपग्रह के सकेत के समान हैं। यदि वह उन सकेतों की अवज्ञा करते हैं तो उस के परिणामों को यह अपने ही दोप के कारण सहन भी करेंगे। लग भग सभी गुण व दोपो के भेद को जानते हैं परन्तु पापी मनुष्य अन्तिम सुख की अपेक्षा तत्काल सुख का आदर करता है और पुण्यात्मा पवित्रता व अन्तिम शाति को क्षणिक सुखों से अच्छा समझता है। प्रत्येक बडे फार्य में पापी भी उसके नीच ऊच सब को सोच लेता है । वह युक्तिमय तर्फ से निश्चय फरता है और फिर उसके अनुसार कार्य करता है। परन्तु पुण्यात्मा होने का प्रयत्न नहीं करता। यदि कोई मनुष्य ऐसे विचार युक्त इच्छा पूर्वक फिये हुए फर्म के लिये भी उत्तरदायी नहीं हो सकता तो फिर उत्तरदायित्व कहते ही किस को हैं ! यदि ऐसे विचार पूर्ण कार्य में भी कोई मनुष्य गुणो की ओर से असावधान रहे तो कौन सा आश्चर्य है कि उस के साधारण कर्म भी गुणो से रहित हों, और वह दोनो ही के उत्तरदायित्व से नहीं बच सकता। यदि उस के सिद्धातो पर उस के कुसग ( १५६ ) का प्रभाव है तो उचित है कि वह उस कुसग को छोड़ दे। जब वह किसी अपराध के करने में तर्क व विचार कर सकता है तो अपने सुधार के लिये भी कर सकता है। जैसा कि कहा जा चुका है धर्म, नीति व महान् पुरुषो के जीवन दीपग्रहो के समान हैं। परन्तु वह उन को देखते हुए भी अपनी गति को बदलने का प्रयत्न नहीं करता। वरन् यदि कोई सत् पुरुष उसके कल्याण के लिये उसे कुछ उपदेश भी करता है तो बहुत सम्भव है कि उस का परिणाम केवल फटाक्ष पूर्ण प्रत्युत्तर ही हो । फिर भला वह स्वकृत असावधानी के परिणामों का दुःस कैसे न सहे। फिर सस्कार भी ऐसे अटल नहीं होते। वह भो शक्तियां हैं जो विरोधी शक्तियों से रोकी जा सकती हैं। उन दोनों शक्तियों की तीव्रता में सग्राम होगा अतएव सफल होने के लिये जहा हम ने थोडे से वल का और प्रयोग किया और हमारी इच्छा पूर्ण हुई । यदि हम इस में सफल न भी हों तो भी उस प्रयत्न से हमारे पूर्व सस्कार का बल कम हो जायगा और एक नवीन सस्कार उत्पन्न हो जायगा जिससे कि हमारी इन्द्रिय निग्रह की शक्ति बढ जायगी। जब कोई घटना हो जाती है तो बहुत से लोग कहते हैं कि भावी ऐसी ही थी। परन्तु इस से यह सिद्ध नहीं होता कि थोडे और प्रयत्न करने से उस कार्य में परिवर्तन नही हो सकता था। मनुष्य के पूर्व स स्फारों से उस के जन्म को व शरीर की परिस्थित दशाएँ नियत हो सकती हैं। परन्तु फम्र्मों के सूक्षम अशों मे उस को पूर्ण स्वतत्रता है और सुधार का द्वार उस के लिये सदैव खुला है। कदाचित् यही कारण है कि भविष्य वाचक ज्योतिषी लोग मुख्य मुख्य भविष्यों को ही बता सकते हैं क्योंकि उनके उत्पादक संस्कार विशेष बलवान होते हैं। इसी कारण से जातीय भविष्य व्यक्तिगत भविष्य की अपेक्षा अधिक सुगमता ( १५७ ) से निश्चय किया जा सकता है। क्योंकि बहुत से मनुष्यों के सयुक्त सरकार का प्रतिविद एक व्यकि के सस्कार के प्रति- विव की अपेक्षा आध्यात्मिक दृष्टि वालों के लिये अधिक स्पष्ट होता है। उन दशाओं में भी जिन में कि किसी कार्य का होना पूर्णतया निश्चित हो सत्य से प्रेरित प्रयत्न व्यर्थ नहीं हो सकता क्योकि उस प्रयत्न से ही एक नवीन शुभ सस्कार उत्पन्न हो जायगा । जातीय समस्याओं में भी धर्मयुक जातीय प्रयत्न से जाति का धर्म वल भविष्य के लिये बढ जायगा चाहे वह प्रयत्न वर्तमान में सफल हो वा न हो। इस के अतिरिक सव भविष्य वाणी भी सत्य नहीं होती और नसव मनुष्य भविष्य को जान ही सकते हैं। भविष्य में जो कुछ भी हमारे लिये सचित हो वर्तमान में तो हमारा धर्म प्रत्यक्ष है। गुणो की सीमाओं के अन्तरगत हम अपनी रुचि को स्वतत्रतादे सकते हैं परन्तु जिन सस्कारों के प्रभाव को हम जानते भी नहीं उन सस्कारों के झूठे यहाने से हम को उनसीमाओं को उल्ल धन नही करना चाहिये। १५-शुद्धि यह विचार हो सफता है कि ऐसे आध्यात्मिक धर्म के अनु- सार आचरण करना सहज नहीं है। किन्तु यथार्थ में यह पेसा सुगम है कि इसमें सव दर्जी का अभ्यास घ सुधार सम्भव है। गुण सय सात्विक है। उनमें प्रत्येक के अभ्यास से सात्विक दशा की प्राप्ति होगी। और सात्विक दशा की और उन्नति होने में भी शनै शनै प्राप्त हो जायगे। जीवात्मा की और सब गुण । ( १५६ ) का प्रभाव है तो उचित है कि वह उस कुसंग को छोड़ दे। जब वह किसी अपराध के करने मे तर्क व विचार कर सकता है तो अपने सुधार के लिये भी कर सकता है। जैसा कि कहा जा चुका है धर्म, नीति व महान् पुरुषों के जीवन दीपग्रहो के समान हैं। परन्तु वह उन को देखते हुए भी अपनी गति को बदलने का प्रयल नहीं करता। वरन् यदि कोई सत् पुरुष उसके कल्याण के लिये उसे कुछ उपदेश भी करता है तो बहुत सम्भव है कि उस का परिणाम केवल कटान पूर्ण प्रत्युत्तर हो। फिर भला वह स्वकृत असावधानी के परिणामो का दुःख कैसे न सहे । फिर सस्कार भी ऐसे अटल नहीं होते। वह भी शक्तियां हैं जो विरोधी शक्तियों से रोकी जा सकती हैं। उन दोनों शक्तियों की तीवता में संग्राम होगा अतएव सफल होने के लिये जहा हम ने थोडे मे चल का और प्रयोग किया और हमारी इच्छा पूर्ण हुई । यदि हम इस मे सफल न भी हों तो भी उस प्रयत्न से हमारे पूर्व संस्कार का बल कम हो जायगा और एक नवीन सस्कार उत्पन्न हो जायगा जिससे कि हमारी इन्द्रिय निग्रह की शक्ति बढ जायगी। जब कोई घटना हो जाती है तो वहुत से लोग कहते हैं कि भावी ऐसी ही थी । परन्तु इस से यह सिद्ध नहीं होता कि थोडे और प्रयत्न करने से उस कार्य में परिवर्तन नही हो सकता था। मनुष्य के पूर्व स स्कारों से उस के जन्म की व शरीर की परिस्थित दशाएँ नियत हो सकती हैं। परन्तु कर्मो के सूक्षम अशों में उस को पूर्ण स्वतत्रता है और सुधार का द्वार उस के लिये सदैव खुला है। कदाचित् यही कारण है कि भविष्य वाचक ज्योतिपो लोग मुख्य मुख्य भविष्यों को ही बता सकते हैं क्योंकि उनके उत्पादक सस्कार विशेप बलवान होते हैं। इसी कारण से जातीय भविष्य व्यक्तिगत भविष्य की अपेक्षा अधिक सुगमता ।
से निश्चय किया जा सकता है। नोंकि बहुत से मनुष्यों के सयुक्त सरकार का प्रतिविद एक व्यक्ति के सस्कार के प्रति. विव की अपेक्षा आध्यात्मिक दृष्टि वालों के लिये अधिक स्पष्ट होता है। उन दशाओं में भी जिन में कि किसी कार्य का होना पूर्णतया निश्चित हो सत्य से प्रेरित प्रयत्न व्यर्थ नहीं हो सकता क्योकि उस प्रयत्न से ही एक नवीन शुभ सस्कार उत्पन्न हो जायगा । जातीय समस्याओं में भी धर्मयुक्त जातीय प्रयत्न से जाति का धर्म वल भविष्य के लिये बढ जायगा चाहे वह प्रयत्न वर्तमान में सफल हो वा न हो। इस के अतिरिक्त सय भविष्य वाणी भी सत्यनही होती और न सब मनुष्य भविष्य को जान ही सकते हैं। भविष्य में जो कुछ भी हमारे लिये सचित हो वर्तमान में तो हमारा धर्म प्रत्यक्ष है। गुणों को सीमाओं के अन्तरगत हम अपनी रुचि को स्वतत्रतादे सकते हैं परन्तु जिन सस्कारों के प्रभाव को हम जानते भी नहीं उन स स्कारों के झूठे बहाने से हम को उनसीमाओं को उल्ल धन नही करना चाहिये। १५-शुद्धि यह विचार हो सकता है कि ऐसे आध्यात्मिक धर्म के अनु- सार आचरण करना सहज नहीं है। फिन्तु यथार्थ में यह ऐसा सुगम है कि इसमें सब दर्जी का अभ्यास व सुधार सम्भव है। गुण सव सात्विक है। उनमें प्रत्येक के अभ्यास से सात्विक दशा की प्राप्ति होगी। और सात्विक दशा की और उन्नति होने में और सब गुण भी शनै शनै प्राप्त हो जायगे। जीवात्मा की ( १५८ ) सात्विक दशा और इन गुणों मे स्वाभाविक सबन्ध होने के कारण इन दोनों में से एक की उपस्थिति में दूसरे की उपस्थिति भी होगी। हम को उचित है कि जितने गुणों का अभ्यास हम से सम्भव हो करें और यह विश्वास रखें कि दूसरे गुण भी समय पाकर हमें प्राप्त हो जायगे। यही दशा अवगुणो की भी है । उन से तामसी दशा प्रकट होती है और तामसी दशा से वह उत्पन्न हो जाते हैं। प्रलोभनों से जहां तक सम्भव हो सचेत रहना चाहिये। सहायक गुण इस सचेत रहने में हमारी सहायता करेंगे। यदि हम अपनी सहायता करें स्वय तो प्रकृति भी हमारी सहायता करेगी। सत्मार्ग में एक पद भी हमारी आगे बढने की शक्ति की वृद्धि करेगा। अपने ही कल्याण के लिये हम को दोपों का त्याग और गुणो को ग्रहण करना चाहिये । हमारी आध्यात्मिक शक्ति की अवगुण हानि करते हैं। हमारे अशुभ सस्कार हमको अनेक दुस व कप्ट मय जीवनों को प्राप्त फराते हैं । इनके अतिरिक्त एक और भी कारण है कि जिससे हमको अपने ही कल्याण के लिये अपनी शुद्धि करनी चाहिये । हम देख चुके हैं कि हमारी मानसिक गति के कारण हम को अनेक स्थूल शरीर धारण करने पड़ते हैं। हमारा सम्बन्ध समाज से इस जीवन के साथ ही नहीं टूट जाता। अतएव हमें उचित है कि हम समाज को अव की अपेक्षा अधिक शाति मय व शुद्ध बनाने का प्रयत्न करें जिससे जब हम फिर शरीर धारण करें तो अधिक सुस से रह सके । सम्भव है कि हम उसी समाज में फिरन लौटें परन्तु यदि इसी कारण सव कोई अपने आचरण मे असा. घधान हो जाय तो फिर हमको किसी समाज में भी शातिमय जीवन न मिलेगा। हमें अपना धर्म पालन करना चाहिये और प्राशा करनी चाहिये कि और लोग भी ऐसा ही करेंगे। यदि हम ( १५६ । अपना धर्म पालन नहीं करते तो दूसरो की असावधानी का दुख करने का हमको कोई अधिकार नहीं है। अस्तु सव समाजो की शुद्धि होनी चाहिये । इसके अतिरिक हमें यह भी स्मरण रखना चाहिये कि अवगुणो के अभ्यास से हम दूसरे जीवन को पुण्या- त्मक समाज मे नही प्राप्त कर सकते। इस कारण उचित है कि हम अपने को पवित्र, आनन्द मय और शाति पूर्ण समाज के योग्य बनावें। ऐसा करने से हम अपने ही भविष्य जीवन को उत्तम नहीं बनावेंगे वरन अपनी समाज की शुद्धि में भी सहायता फरेंगे। इससे हम अपनी समाज को शुद्ध जीवात्माओं के जन्म के योग्य बनाने में सहायता करेंगे और जय फिर उसी समाज में लोट फर आवेगे तो उत्तम सत्सग प्राप्त करेंगे। जो अत्याचार से पीडित हो उनको अपनी शुद्धि की चिन्ता करनी चाहिये क्यों- कि तब ही "दिव्य रक्षक" के प्रादुर्भाव के लिये उचित दशाएं उपस्थित होंगी और उन्हें "उन" के दर्शन का अधिकार होगा। हमें अपनी जीवात्मा को अपराधियो के शरीर के योग्य नहीं होने देना चाहिये। न तो अपराधी का जीवन ही आनन्दमय है और न उसका परिणाम ही शुभ है । अस्तु हमे समाज को शुद्ध जीवात्माओं के जन्म के योग्य बनाने में सहायता करनी चाहिये और ऐसा करने में हम अपने भविष्य को भी सूधार लेंगे। जो पापों में इवे हुए हैं वह भी अपनी शुद्धि कर सकते हैं। यह सत्य है कि उनके मानसिक स्वभाव वली हो गये हैं और उन पर स्वत्व प्राप्त करना कठिन है परन्तु उनकी उन्नति में सहायता के लिये भी साधन हैं। परम आवश्यक तो सुधार का दृढ विचार है। यदि गुणों की ओर वह एक बार भी दृष्टिपात करें, यदि वह सत्मार्ग में एक पद भी चलें तो मानसिक भावों पर खत्व प्राप्त करना इतना कठिन नहीं रहता जितना प्रतीत होता है। उपवास . ( १६० ) के सिद्धात में भी एक वडा भारी रहस्य है। कोई कोई इसका उपहास कर सकते हैं। परन्तु यह केवल कयन मान नहीं है वरन् अनुभव किया जा सकता है। यदि तर्फ से सन्तोप न हो अनु- भव से अवश्य हो जायगा । हम देख चुके हैं कि भोजन पदार्थ सात्विक, राजसी व तामसी होते हैं। उनके मानसिक प्रभाव भी सहज ही में समझ में आते हैं। मसालेदार स्वादिष्ट पदार्थों से इच्छाएँ अधिक तीव्र होंगी। चासे पदार्थों से मन व शरीर में आलस्य उत्पन्न होता है। परन्तु किसानो के समान साधारण नवीन पदार्थ व फलों से न तो इच्छाएं ही तीव्र होंगी और न मन ही पाल्सी होगा वरन् उनसे मन शीतल, सचेत व शात रहेगा। इसका कारण यह है कि भोजन से शारीरिक संयुक्त भाव पर प्रभाव पड़ता है। यदि शारीरिक मन शुद्ध रहता है तो शारीरिक इच्छाएं अधिक प्रपल नहीं होती और आध्यात्मिक मन की शक्तिया अधिक अन्तरमूपी होती है और बुद्धि अधिक निर्मत्य व सूक्ष्म होती है । उस समय जो कार्य किये हों अथवा जिनके करने का विचार हो वह विवेक की फसोटी पर कसे जा सकते हैं। तव आध्यात्मिक मन प्रत्येक वस्तु के यथावत् रूप को निर्मल दृष्टि से देखता है क्योंकि उस समय वह शारीरिक इच्छाओं की प्रवल व विचार शून्य उत्तेजना से आवृत नहीं होता । बस यह उपवास का रहस्य है। वह शारीरिक मन की गति को निर्वल और आध्यात्मिक मन की बुद्धि को तीन कर देता है। इस साधन के प्रत्येक अभ्यास से यह प्रभाव बढ़ता जाता है। विवेक की शक्ति बढती जाती है और शारीरिक इच्छानों का बल व तीवता घटती जाती है। उपवास का प्रभाव उस समय कई गुणा हो जाता है जब उस के साथ प्रार्थना, उपासना व स्वाध्याय भी हों । प्रार्थना से मन का भार सा उतर जाता है और इस से उसे विश्राम प्राप्त होता है। गुणो और शुद्धता की वृद्धि से आध्यात्मिक शक्ति के चढने के कारण वाह्य परिस्थिति पर भी प्रभाव पड़ता है। और यदि इस शक्ति की वृद्धि अधिक हो जावे तो इससे हम दयावान् व शक्तिशाली जीवात्मानों को भी प्राकर्पित करके माध्यात्मिक सहायता प्राप्त कर सकते हैं । परन्तु कम से कम यह मन के भार को उतार कर उस को शुद्ध व सरल करने में तो अवश्य ही सहायता करती है। जिस समय शारीरिक मन बाधा न करता हो उस समय इस साधन से आध्यात्मिक मन को अपनी शुद्धि में सहायता मिलती है क्योंकि इससे बुद्धि व विवेक शुद्ध व पुण्या- त्मक प्रसगो में लीन रहता है। इस से जीवात्मा की दया सात्विकता की ओर बढेगी और उस दशा के स्वाभाविक गुण उदय होंगे। और जय गुणो का विफाश हो जायगा तब इस साधन से वह स्थिर व दृढ हो जायगे । इस प्रकार एक पापी भी अपने स्वभाव को सुधार सकता है । उपवास से शरीर की भी शुद्धि होगी और उस की दशा भी सात्विक हो जायगी। इस शारीरिक प्रभाव से भी आध्यात्मिक साधन में और अधिक सहायता मिलेगी। उपवास का समय व सख्या करने वाले की आवश्यकता घ सहन शक्ति के अनुसार होनी चाहये । जब कोई मनुष्य उप- घास न भी करता हो तब भी यह सात्विक भोजन करने व नित्य प्रत प्रार्थना, उपासना व स्वाध्याय कर के अपनी आध्यात्मक उन्नति की वृद्धि कर सकता है । सात्विक भोजन वह है जो शारीरिक इच्छाओं को उत्तेजित न करे,मद उत्पन्न न करे, स्वाद अथवा रसनेन्द्रिय को प्रयल न करे, दूसरे को फट नदे, धर्मपूर्वक प्राप्त कया हुआ हो और शरीर को स्वस्थ व कार्योपयुक्त रखे। ऐसा भोजन प्राकृतिक दोपो से रहित होगा और उस में किसी ( १६२ ) दूसरे के कट से उत्पन्न संस्कार भी मिश्रित न होंगे। ऐसे भोजन से शुद्धि में सहायता मिलेगी और भविष्य के लिये अशुद्ध सस्कार नही बनेंगे। जो सव बातों का ध्यान न रख सके वह जितना कर सके उतना करे । सत्मार्ग में उसका प्रत्येक फर्म भविष्य के लिये उसके गुणों को प्रवल करेगा। छोटी छोटी बातो से ही बडी बडी बातें प्रकट हो जाती हैं। परन्तु इस बात का ध्यान रखना चाहिये कि उपवास इतना नहीं करना चाहिये कि जिससे शरीर निर्मल हो जाय। हम देख चुके हैं कि शरीर की स्वस्था- वस्था आध्यात्मिक उन्नति के लिये भी आवश्यक है । सासारिक धर्मों के लिये शरीर को उचित दशा में रखते हुए शुद्धि के साधन करते रहना चाहिये। ऐसी धर्म पद्धत्ति किसी विशेप मत कीसम्पति नही है। यह फिसो विशेष अवतार व पैग़म्बर के कथनों पर निर्भर नही है। इसमें केवल विवेक का ही अधिकार स्वीकृत है और विवेक पर मनुष्य मात्र का अधिकार है। आदि तत्व सम्पूर्ण मनुष्य जाति, पशु, घनस्पति व जड पदार्थ सव का आत्मा है । ऐसे आदि तत्व के नित्यगुणों के आधार पर स्थित धर्म पद्धति जाति, मत अथवा पहाड़ वा समुद्रों से सीमा बद्ध नहीं हो सकती। मनुष्य जाति का तत्व तो एक ही है। जाति व मत के भेद से उस तत्व में भेद नहीं हो सकता। उसके गुण तो सय स्थानों पर समान ही रहेंगे। एक ही गुण व दोप का आध्यात्मिक प्रभाव देश, काल, जाति धमत के विचार से भिन्न भिन्न नही हो सकता। उनको चाहे कोई माने अथवा न माने परन्तु परिणाम तो एक ही होगा क्योंकि किसी के मानने या न मानने से प्राकृतिक नियमों में भेद नहीं पड़ता । यह सिद्धांत सवमतों के लिये समान है। इस विवेक युक्त सत् धर्म में सब मत वालों का समान अधिकार है इसकी स्वीकृत प्रहण करे। ( १६३ ) से किसो भो मन का अपमान नहीं होता। यह तो मनुष्य मात्र का खाभाविक अधिकार है। अय मनुष्य जाति अपने अधिकार को फिर यह धर्म पद्धति है भी क्या ? आदि तत्व सम्बन्धी सिद्धांत दार्शनिक है अस्तु इसपर पक्षपात का फटाक्ष नहीं हो सकता। रही गुणों की बात सो अय भी कोई मत गुणों को दोप नहीं कहेगा । भेद इतना ही है कि इन गुणों के मन माने निरूपण के स्थान पर अय उनका आधार नित्य व अचल आदि तत्व है। हमें अपनी ओं को भी इन नित्य सिद्धातो के अनुसार सशोधन करने में कोई कठिनता नहीं होनी चाहिये। हम अपने जीवन के सुधार के लिये राजनैतिक व सामाजिक परिवर्तन करते हैं। राज- नैतिक व सामाजिक संस्थाओं के सुधार के लिये नवीन अनुभव वज्ञान से हम सहायता लेने में नहीं हिचकते । यही बात हम धर्म में क्यों नहीं करते ? धर्म के बाल्य अवस्था में जय युकि युक्त धर्म समझ में नही आ सकता था श्रद्धा उत्पन्न करने के लिये चम. स्कारों की आवश्यकता थी। ऐसे समय पर दार्शनिक धर्म का प्रयोजन नहीं था। उस समय मनुष्य एक चैतन्य, पूर्ण, सर्व शकि मान दण्ड व पुरस्कार देने वाले की आशा तो पालन कर सकते वे परन्तु उनके कर्मों के आध्यात्मिक प्रभावो के सम्बन्ध में तर्फ से सिद्धि सिद्धातो के लिये बहरे हो जाते। परन्तु हम अय उस अवस्था में नहीं है । ससार तर्फ सिद्ध सिद्धातो के लिये रीता है। अब तो सव बातें प्रमाणित व युक्ति पूर्ण होनी चाहिये। तो क्या धर्म अब भी फरिपत ही रहना चाहिये? क्या हम उन- पूजनीय पैगम्बरो व अवतारो का, जिन्होंने अपने समय में मनुष्यों को वही दिया जिसकी उनको आवश्यकता थी और जिसको यह पचा सकते थे, अपमान नहीं करते जब हम यह कहते हैं कि जो भोजन उन्होंने बाल्यावस्था के लिये नियत किया था वही युवा- वस्था के लिये भी उपयुक्त है। वह स्वयं तो अविवेकी नहीं थे और वह एक विवेक युक्त सत् धर्म का कभी निरादर न करते। तो फिर वह मनुष्य जो उनका आदर करते हैं व उनके अनुयायी हैं क्यों उसका सिदर करें? हम अपनी विशेष प्रथानों को जहां तक वह आध्यात्मिक सिद्धातों के विरुद्ध न हों रस सकते है । परन्तु ऐसे भेद से विवेकानुसार अथवा धर्मानुसार कोई भेद नही हो सकता। हम अपने अपने विशेष सन्तों, पैगम्बरोध अवतारों की उपासना कर सकते है परन्तु हमें यह समझ लेना चाहिये फि तत्व विचार से वह सब एफ ही है । उसी एफ आदि आध्या- त्मिक तत्व के प्रश हैं। वास्तव में हम सव ही क्यों न ऐसे सव महान पुरुषों का आदर करें चाहे वह किसी देश के भी हो। महानता का आदर तो अधिकार है। धर्म के पवित्र नाम पर युद्ध, झगड़ावमत्सरता आदि की फालिमा अव न लगने देना चाहिये। धर्मनिष्ठ मनुष्य कट्टर नहीं होता वरन् सत्यवादी, फोमल, दयावान, विनीत, प्रसन्नचित्त, शान्त और निश्चल धुद्धि वाला होता है उसके चारो ओर कल्याण ही कल्याण वहता है। १६-दैविक प्रेम। 'हम सब जानते हैं कि हमारा सांसारिफ प्रेम किस प्रकार हमारे जीवन के चक्करों की धुरी के समान होता है । इससे हम एक ध्येय में बधे रहते हैं और उससे इधर उधर दूर भटकने नहीं पाते। इससे हमको अपने ऊपर स्वत्व प्राप्त करने में सहायता मिलती है। यह और सब भावों को बाहर ही रख कर वित्त को शुद्ध है ( १६५ ) करता है। फिर भी इसमें विघ्न हो सकते हैं। हमारा प्रेमी ही हमले प्रेम न करे। अनेक प्रकार के झगडे, मत्सरता तथा भ्रम उपस्थित हो सकते हैं। इन सव त्रुटियों के होते हुए भी ससार की शुद्धि, माध्यात्मिक उन्नति वस्थिरता के लिये प्रेम कैसी प्रभाव शाली वस्तु है । यदि कोई वस्तु नरक को भी सचा स्वर्ग चना सकती है तो वह प्रेम है। प्रेमधैर्घ्य दिलाता है। प्रेम स्थिर रखता है। प्रेम प्रफुल्लिता करता है और प्रेम मानन्द में मगन करता है । पका पापी भी कैसी प्रेम दृष्टि से अपने बालक की ओर देखता है ! फिर भला दैविक प्रेम तो कैसी उत्कृष्ट वस्तु होगी! उसमें न झगडे है न भ्रम है न मत्सर है न विघ्न, केवल एक निरतर स्रोत अद्भुत आनन्द का। वह अद्भुत है, परमानन्द है, भकथनीय है ! धैर्घ्य देने को, प्रफुल्लित करने को, स्थिर रसने फो, और दिव्य दर्शन के दिव्यानन्द के आफाशवत् उच्च शिखर पर उडा ले जाने को वह सदैव निकट है। अन्तरीय स्रोत से उमडते हुए उन आनन्द मय अश्रुओं की धाराई में कौन सी अपवित्रता ठहर सकती है। उनसे पवित्रहुए विवेक के नेत्रों को फिर कौन यस्तु आवृतफर सकती है। उस पवित्र अति कोमल, अति विनीत जीवात्मा की असीम शक्ति के सन्मुख कौन वस्तु ठहर सकती है। हमें भी अनु मय हो, उस के एक कण का ही हो, तो बस हम कृतार्थ हुए । इसमें माश्चर्य भी क्या है ? हम किसी मनुष्य से प्रेम करते हैं, क्योकि हम उसकी सुन्दरता पर मुग्ध हैं । उसको सरलता याति प्रद है। उसकी सुन्दरता अति मोहिनी है। उसमें अद्भुत दया, रूपा तथा सङ्कोच है । परन्तु उस महान् जीवात्मा केसमान, जिसने हमारे लिये मुक्ति का भी निरादर कर दिया, दया, कृपा, सङ्कोच, क्षमा से पूर्ण अत्यन्त शक्तिशाली परन्तु असीम प्रेम से कोमल मनुष्य हमको कहा मिलेगा? वह अपने जीवात्मा सरूप -- -- को केवल धर्म के स्थापन व अधर्म के नाश के लिये स्थित रखते हैं कैसा बुद्धिमान संसार है जो उनका चिन्तन नहीं करता! छोटी सी बात के लिये हम मनुष्य के चरणों पर गिर जायगे परन्तु उनसे प्रेम नही करते जो दया व कृपा की मूर्ति हैं !हमारी शुद्धि के लिये उनकी सहायता सदैव उपस्थित है परन्तु हम उस ओर दृष्टिपात भी नहीं करते! पापी व धर्मात्मा दोनों के लिये उनका परम उदार हृदय खुला है। उनकी कृपा सव के लिये समान है । परन्तु हमको स्मरण नहीं रहता, हमको सूझ नहीं पडती और हम उस इस्त कमल का, जो हमारा अवलंब है, त्याग कर देते हैं । हम प्राध्या- त्मिक गुरू की खोज करते हैं परन्तु उस गुरू का जो सदैव हमें उन्नति करने को प्रस्तुत है ध्यान भी नहीं करते! निष्काम कर्म से हमारी इच्छाएँ शुद्ध हो सकती हैं । ऐसा ही उपवास व उपासना से भी हो सकता है। परन्तु वह कौन सी बात है कि जिसको दैविक प्रेम न कर सकता हो? यह साधन भी है और उद्देश भी है। उस अद्भुत आनन्द को कौन त्यागना चाहेगा और किसके लिये ? मुक्ति के लिये, जब उसकी इच्छा हो तव आवे । हमारे यथार्थ कल्याण को वह जानते हैं, केवल अपने चरण कमलों में सदैव रखें। बस इस हमारी प्रार्थना को स्वीकार करें और शेष जो इन्श हो सोकरें। हम पापी हैं, अवश्य हैं। जैसे कुछ भी हैं सो हैं । जैसे भी हैं उनकी शरण में हैं। क्या वह हमारा त्याग कर देंगे? क्या उनका अद्भुत प्रेम हमको पवित्र न कर देगा। हम अधिकारी नहीं हैं, तो क्या वह हमकोअधिकारी बनान लेंगे? यदि यह अधिकारियों पर ही कृपा करते हैं तो क्या हुआ। यह तो उनका अनाधिकार ही था। परन्तु नही, वह तो दया की मूर्ति है, वह अपने ही विचार से अधिकारियों को भी शरण वेंगे। यह तो उनका स्वभाव ही है । वह इसके विरुद्धकुछ कर ही नही सकते फिर हम चितित क्यों? उनके चरण कमलों में पड़े हैं और सब कल्याण होगा। परन्तु उनके प्रेम में क्या हम सांसारिक धर्मों को छोड दें। क्या अब हम उनकी चिन्ता न करें जिनको हमारे प्रेम की ही इच्छा है? हम किस मुप से दया की प्रार्थना करते हुए उनके सन्मुख होंगे जब हमको उन पर दया नही आती जो हमारी दया के इच्छुक है ? जब हम दुसरी को काट दें, दूसरों पर अत्याचार करें तो वह हम पर क्यों दया करें? उनका जीवन तो अत्याचार और दुख के नाश के लिये है उसकी अनुज्ञा के लिये नही। वह धर्मात्मा होने में हमारी सहायता कर सफते हैं परन्तु पापी और अपराधी होने में कदापि नहीं कर सकते । हम उनके सम्मुख तो छल कोडे, बस जैसे कुछ हैं, उनके सामने खुले हैं वही हमारी शुद्धि फर यही प्रार्थना है। परन्तु क्या हम अपने को उनके दर्शन का अधिकारी नही बनावेंगे? वह अपनी कृपा से हमें भीतर जाने से न रोक परन्तु क्या हम अपवित्रता को लिये हुए प्रवेश करने की ढिठाई करेंगे? नहीं, हम बस उनके द्वार परही पडते हैं, हृदय से करुणा पूर्ण, हम अनाथ उनका स्मरण करते हैं। यह देखो। अद्भुत प्रकाशवान असीम दया मूर्ति स्वय ही द्वार पर आते हैं। यह का! उठाते हैं, हम को पापियों को अपने कोमल हाथों से। लगाते हैं हृदय से आह ! क्या कभी हम इसको भूल सकते हैं। कैसी कृपा! कि जिसके हम कदापि अधिकारी न थे और न जाने कमी हो भी सकेंगे। मोह भगवन् ! हमारी बुद्धि काम नहीं देती। केवल आपही हमें उसका अधिकारी बना सकते हैं। जहा अपनी कृपा से आपने चढाया है वहा रहने के योग्य बना दीजिये, और अपना हाथ सदेव हमपर रखे रहिये। हे भगवन बरदान दो कि अब भविष्य में धर्म पथ हमारे सन्मुख स्पष्ट रहे।
( १६८ ) आपका जो प्रेम हमारे प्रति है उसका कौन कथन कर सकता है। परन्तु हम माप से किस प्रकार प्रेम करें? जो इच्छा रहित है उसे किस वस्तु से प्रसन्न करें? सत्य है हमारा प्रेम स्वीकार हो जायगा। आप का प्रेम कैसा अथाह है ! हमारे इस प्रेम में भी हमारी अपनी शुद्धि ही आप को अभीष्ट है। परन्तु आपसे प्रेम करें कैसे? सत्य है आपको हमारे प्रेम के वाह्य चिन्ह की आवश्यकता नही आप तो हृदय को परखते हैं। परन्तु क्या हमारे अपवित्र हृदय में आपका प्रेम रह सकता है ? हा! आपके लिये प्रेम का एक कण भी कैसे प्राप्त हो! उसका एक कण भी हमारी शुद्धि का चिन्ह है और उसीसे आप सन्तुष्ट भी होते हो। कैसी आपकी अद्भुत कृपा है ! जिनको प्रेम करते हैं उनके प्रेम करने योग्य गुणों का हम ध्यान करते हैं। हम उनके दया से युक्त शुद्ध काँ को चर्चा करते हैं, हम उनके पवित्र और पुण्यमय जीवन का ध्यान करते हैं, उनके चरित्रों में हम मगन हो जाते हैं । उनके चरित्रों की चर्चा करने, गान करने, सुनने में हम अपने को भूल जाते हैं। क्या आप के साथ भी हम ऐसा ही करें? क्या हम उन सुन्दर चरित्रों का अध्ययन करें जो आपने पृथ्वी पर शरीर धारण कर के किये थे? क्या हम दूसरों से आप के महत्व की, दया की, कृपा की, प्रेम की, प्रेमाश्रु पूर्ण नेत्रो से पुलकित शरीर से चर्चा करें? क्या आपके गुणानुवाद मे, ध्यान में आपके अद्- भुत स्वरूप के दर्शन में अपने को भूल जाय? तो क्या इस प्रकार आपका प्रेम अपने हृदय में स्थित करने का प्रयत्न करें? परन्तु यह प्रेम केवल प्रतिरूप मात्र तो न होगा? आपके चरण कमलों में प्रति रूप मात्र को अर्पण कैसे करें हमारी सामर्थ्य इतनी ही है परन्तु इसके अर्पण करने में सकोच होता है। आप ही अपनी असीम कृपा से इस प्रतिरूप को ही सत्य प्रेम कर लीजिये । जो । . ( १६६ ) आप को इच्छा हो सो कीजिये, हम तो जैसे हैं वैसे हैं और पैसे हो आपके चरण कमलो की शरण हैं। लोग हमसे पूछते हैं कि आप कौन हैं ? हम का उत्तर दें? वह कहते हैं कि आप केवल कल्पित वस्तु हैं। परन्तु आपने तो मनुष्य शरीर भी धारण किया था और अब भी कही न कही हमारी रक्षा के हेतु आप उपस्थित हैं। हामहाराज तो अपने इस समय के निवास स्थान के भी दर्शन कराइये। वह कहते हैं कि आप पृथ्वी पर ईसा मसीह थे कोई फहते हैं कि आप मुहम्मद थे, और लोग कहते हैं कि आप राम जी थे, और कहते हैं कि आप कृष्ण जी थे। कोई आपको बुद्ध बताते हैं। कोई महावीर और कोई नानक, हमारे लिये तो आप वही थे और हैं कि जिन्होंने निज स्वरूप को प्राप्त किया परन्तु हमारे हित के लिये मुक्ति का भी तिरस्कार कर दिया, जो अब भी हमारी रक्षा करते हो, जो शरणागत व्यक्तियो का उद्धार करते हो और जय मनुष्य जाति आपके दर्शन के लिये प्रार्थना करती है तो उसके उद्धार के लिये दिव्य रूप से अवतार धारण करते हो, हे भगवन् हम आपके दर्शन के लिये प्रार्थना करते हैं ! जो आपकी इच्छा हो सो हो, हम जानते हैं कि आपकी इच्छा हमारे कल्याण की ही होगी। अपना प्रेम हमको भी दान करो।भगवान् । क्या अपने प्रेम समुद्र में से हमको एक बूद भी न दोगे? एक वूद तो हम लेंगे हो क्योकि हम जानते हैं कि आप मना नहीं कर सकते, परन्तु वह कर मिलेगी? बस अभी दो फि जिससे हम आपके पवित्र नए के स्मरण में मग्न हो जाय। ॐराम
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