Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
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आरण्यकाण्डम्-३.
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श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥दोहा-कटि निपंग कांये धनुप, माथे तिलक विशाल ॥ शत्रुशाल सुरपालकर, वंदौ दशरथलाल ॥ १ ॥ आत्मयान महादुई श्रीरामचन्द्रजीने दंडकनामक महावनमें प्रवेश करके तपस्वी लोगोंके आश्रममंडल देखे ॥ १॥ जिन आअोमें जगह २ कुग चीर ८ जहां बाविद्याकी लक्ष्मीका तेज अच्छी तरह विराजमान होरहाहै, जैसे सूर्यनारायण आकारामें रहतेहैं और उनको मारे प्रकाशके कोई नहीं निहार मक्का, तपस्वियोंके आश्रम ब्रह्मविद्या प्रभाव करके तेजवान होनेसे बडी कठिनतासे देखने योग्यहैं ॥ २॥ वह आश्रम सब जीवोंके आसरा लेनेके थलेहैं, उनके : मदाही झाड बुहारकर स्वच्छ किये जाते और चारों ओर अनेक प्रकारके पशु पक्षियोंसे जो सदा पूर्ण रहते ॥ ३ ॥ अप्सराओंके झुण्डके झुण्ड सदा यहां आकर ममीन नाच गाकर इनकी पूजा करने, जहां पडे विस्तारकी यजगाला बनीहै, जिनमें अमिकुंड व मृगचर्म और कुशादि धरे हैं ॥ ४ ॥ होम करनेका ईधन श्रीगणेशाय नमः ॥ प्रविश्यतमहारण्यदंडकारण्यमात्मवान् ॥ रामोददर्शदुर्धर्पस्तापसाश्रममण्डलम् ॥ १ ॥ कुशचीरपरिक्षितंत्राहयालक्ष समावृतम् ॥ यथाप्रदीप्तंदुर्दशंगगनेमूर्यमंडलम् ॥ २॥ शरण्यंसर्वभूतानांसुसंमृष्टाजिरंसदा ॥ मृगेवहुभिराकीणपतिसंवेःसमावृतम् ॥ ३ पृजितंचोपनृत्तंबनित्यमप्सरसांगणेः ॥ विशालेरमिशरणैःसुम्भाण्डेरजिने कुशेः ॥४॥ समिद्भिस्तोयकलशेःफलमूलेश्वशोभितम् ॥ आरण्ये हातोःपुण्यै स्वादुफलैर्वृतम् ॥ ५॥ वलिहोमाचि पुण्यंब्रह्मयोपनिनादितम् ॥ पुप्पेश्वान्ये परिक्षिप्तपमिन्याचसपद्मया ॥ ६॥ फलमूल .. नदर्तिश्वीरकृष्णाजिनांवरैः ॥ सूर्यवेश्वानराभैश्चपुराणैर्मुनिभिर्युतम् ॥ ७ ॥ पुण्यश्चनियताहारःशोभितंपरमपिभिः ॥ तद्ब्रह्मभवनप्रख्यंबल पनिनादितम् ॥ ८॥ ब्रह्मविद्भिर्महाभागेाह्मणेरुपशोभितम् ॥ तदृष्ट्वाराघवःथीमांस्तापसाश्रममंडलम् ॥ ९॥ हुए कलग व कंद मूल फल भोजन करनेके लिये रक्खेहैं, और बडी २ जातके वनैले स्वादयुक्त फल पवित्र २ वृक्षोंके समूहोंमें लग रहेहैं ॥ ५॥ इन सब मोम नित्यही बलि और होम होवाहै, प्रतिदिन पुण्यमय वेदध्वनि उठतीहै अनेक प्रकारके फूलभी इधर उधर खिल रहे हैं, और विचित्र कमल जिनमें खिले हुए नलभी विराजमान होरही हैं ॥ ६ ॥ इन सब आश्रमों में कंद मूल फल खानेवाले चीर मृगचर्म वल्कलादिधारण करनेवाले सूर्य और अनिके समान प्रका- निपत समयार बोलने, देखने, सुननेवाले, जितेन्द्रिय, प्राचीन चतुर वृद्ध मुनियोंके समूह वास करतेहैं ॥ ७ ॥ नियताहारी पवित्र परमर्पियोंके समूहमे शोभित गदा येद पढने का शब्द प्रतिध्वनित होनेमे सव आश्रम ब्रह्मलोकके समान शोभायमानहैं ॥ ८ ॥ महातेजवान् श्रीमान् रामचन्द्रजी महाभाग ब्रह्मको पहँच .
आर० पा.रा.भा. ॥२॥ M धामणगोंसे शोभित उन तपस्वियोंके आश्रममंडलको देखकर ॥.९ ॥ अपने महा धनुपकी प्रत्यंचा उतारकर उनकी ओरको चले, दिव्यज्ञानसंपन्न महर्पियोंने राम चन्द्रजीको देखा व जाना ॥ १० ॥ इसकारण प्रसन्नहो सवही श्रीरामचन्द्र व महायशस्विनी श्रीजानकीजीके सन्मुख वे मुनिलोग चले फिर चन्द्रमाके समान धर्मका आचरण करने वाले श्रीरामचन्द्रजीको उदय देख ॥ ११ ॥ व लक्ष्मण जानकीजीको भी निहार सब दृढव्रत मुनियोंने मंगलके आशीर्वाद दिये, और उनका भलीभांति आदर सन्मान किया ॥ १२ ॥ वह सब वनवासी कपिलोग विस्मिताकार होकर रामचन्द्रजीके रूपकी सुन्दरता, लावण्यता, सुकुमारता, और गुपता देखकर विचार करनेलगे कि, ऐसे सुकुमार वनमें क्यों कर आये ॥ १३ ॥ वह सब मुनिलोग अचरजमें आकर रामचन्द्र लक्ष्मण और जानकीजीको विना पलक मारे इकटक देखने लगे ॥ १४ ॥ सर्व जीवोंके ऊपर दयाकरनेवाले बडे भाग्यशाली कपि लोगोंने अपूर्व अतिथि रामचन्द्रजीको पर्णकुटीमें लाय टिकाया अभ्यगच्छन्महातेजाविज्यंकृत्वामहधनुः ॥ दिव्यज्ञानोपपन्नास्तेरामंदृष्ट्वामहर्पयः ॥ १०॥ अभिजग्मुस्तदाप्रीतावेदेहींचयशस्विनीम् ।। तेतुसोममिवोद्यतंदृष्ट्वावेधर्मचारिणम् ॥ ११॥ लक्ष्मणंचेवदृष्ट्वातुवैदेहींचयशस्विनीम् ॥ मंगलानिप्रयुंजाना प्रत्यगृह्णन्दृढव्रताः ॥ १२ ॥ रूप संहननलक्ष्मीसौकुमार्यसुवेपताम् ॥ ददृशुर्विस्मिताकारारामस्यवनवासिनः ॥ १३ ॥ वैदेहीलक्ष्मणरामनेरनिमिपरिव ॥ आश्चर्यभूतान्दह शुःसर्वतेवनवासिनः ॥ १४ ॥ अनंहिमहाभागाःसर्वभूतहितेरताः ॥ अतिथिंपर्णशालायांराघवंसन्न्यवेशयन् ॥ १५॥ ततोरामस्यसत्कृत्यवि धिनापाकोपमाः॥ आजहुस्तेमहाभागाःसलिलंधर्मचारिणः ॥ १६॥ मंगलानिप्रयुंजानामुदापरमयायुताः॥ मूलंपुष्पंफलंसर्वमाश्रमंचमहा त्मनः॥ १७ ॥ निवेदयित्वाधर्मज्ञास्तेतुप्रांजलयोब्रुवन् ॥ धर्मपालोजनस्यास्यशरण्यश्चमहायशाः ॥ १८॥ पूजनीयश्चमान्यश्चराजादंडधरो गुरुः॥ इंद्रस्यैवचतुर्भागप्रजारक्षतिराघव ॥ १९ ॥ राजातस्माद्वरान्भोगात्रम्यान क्तेनमस्कृतः॥ तेवयंभवतारक्ष्याभवद्विपयवासिनः ॥२०॥ ॥ १५॥ पहुँचतेही प्रथम भली भांति कुशल प्रश्नकर सत्कार कर अगिकी समान तेजवाले धर्मात्मा ऋपि लोगोंने सुन्दर पवित्र जल लाय चरण इत्यादि धोनेको दिया ॥ १६ ॥ अनन्तर उन समस्त धर्मके जाननेवाले अपि लोगोंने परम हर्प युक्तहो मंगल आशीर्वाद प्रयोग करके सुन्दर कंद फलादि सानेको दिया और आश्रम रहनेको दिया ॥ १७ ॥ फिर सब धर्मके जाननेवाले ऋपि लोग हाथ जोडकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोले कि, आप हम लोगोंके धर्मपाल शरण्य हैं व परम पशस्वी हैं ॥ १८॥ आप परम पूजनीय व मान्यभी है क्योंकि, दंडधारी राजा गुरुके समान होता है राजा इन्द्रका चौथा भाग होता है इस कारण सवही प्रकार आप पूजा करनेके योग्य हैं। क्योंकि, जब आपही प्रजाकी रक्षा करते हैं वो उनके अर्थ, धर्म, काम, मोक्ष चारों पदार्थ सिद्ध हो जाते हैं।॥ १९॥ सब लोगोंके नमस्कार IN 7 मा का" : ने गला अट और वह अंटरमनीय भागांको भी भोग करता है ! हे रायर ! हम लोग आपके राज्यमें वास करते हैं अतएव आपको हमारी रक्षा करनी::..! ॥२०॥ गनन ! नगाग्दी वा यनही रहो आपही हम लोगों के राजा मो आपको हमारी रक्षा करनी चाहिये यदि आप कहें कि, तुम लोगभी नपोवलमे :::: मा रमको मो नहीं क्योंकि, हम लोगोंने कोषका त्यागकर इन्द्रियोंको जीत एकवारही दंड देना छोड़ दिया है ॥ २३ ॥ तपस्यांके सिवाय हम लं.:: भीर उल नहीं, आप गर्भ बालरकी नमान आपको हमारी रक्षा करनी उचितहै, यह कहकर उन सब ऋषि मुनियोंने विविध प्रकारक पुष्प साल भग साना र मीना महित गमनन्दजीकी पूजा की ॥ २२ ॥ इसी प्रकारसे औरभी सिद्ध, तापस भुनिलोगोंने अमिकी समान तेजस्वी उन प्रभु . :. गमरनजीकी स्थाविधानने पूजा की ॥ २३ ॥ ॥ इत्या श्रीमहामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकांडे मापाटीकायां प्रथमः सर्गः ॥ १ ॥ नगरस्थोवनम्योपात्रांनोगजाजनेश्वरः ॥ न्यस्तदंडावयंराजञ्जितकोषाजितंद्रियाः ॥ २१ ॥ रक्षणीयास्त्वयाशश्वदर्भभूतास्तपोधनाः ॥मा मुनारले मूःपुटपन्यथरावयम् ॥ वन्येश्रविविधाहारःसलक्ष्मणमपूजयन् ॥२२॥ तथान्येतापसा सिद्धारामवैश्वानरोपमाः॥न्यायवृत्तायन न्यायनर्पयामामुरीवरम् ।।२३ ।। इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकांडे प्रथम सर्गः ॥३॥ कृतातिथ्योथरामस्तुराग स्योदयनंप्रति ॥ आमंध्यममुनीन्सर्वान्यनमेवान्यगाहत ॥ १॥ नानामृगगणाकीर्णमृक्षशार्दूलसेवितम् ॥ ध्वस्तवृक्षलतागुल्मंदुर्दर्शसलिलान यम् ॥ २॥ निपजमानशरुनिझिल्लिकागणनादितम् ।। लक्ष्मणानुचरोरामोवनमध्यंददर्शह ॥ ३ ॥ सीतयासहकाकुत्स्थस्तस्मिन्वोरमृग ॥ वदगिरिगाभपुरुषादमहास्वनम् ॥ 2 ॥ गभीराक्षमहावविकटविकटोदरम् ॥ वीभत्संविपमंदीविकृतंचोरदर्शनम् ॥ ५ ॥ श्रीरामचनलीग कार अन्जी हुनई पातर जर प्रभान हुआ तब उन आश्रमवासी सब मुनियोंने पूछ पाछकर वनमें विचरण करने लगे ॥ 1 :- ल अनेक भाविक जीप उन्नु विमान थे रीछ और गार्दूलभी घूम रहे थे। इस बनके पेड व येलें सब सूख गई थीं और सब ताल तलैयं सूखकर भयः 20 गई थी ॥ २ ॥ १म इनमें पक्षियोंका चह चहाना नहीं आता था न भौरोंकी गुंजार होरहीथी केवल झिल्लीकी झनकार सुनाई आती थी । :: मार गमलबजाने ग मी दगा देगी ॥ ३ ॥ निमके पीछे काकुत्स्थ रामचन्द्रजी सीताजीके साथ उस घोर पशुओं करके नेवित वनमें पहा: गिरी गमान मारे गानेराले रहे गाद करनेवाले एक राक्षमको देखते हुये ॥ ४ ॥ इस राक्षसकी आंखें बहुतही गंभीर थीं, वदन अति विशाल :- भी मा किया. मां गरीरका गठन अति भयंकर था यह राक्षस ऐमा भयावना था कि, जिसे देखतेही मनुष्य डर जाय, कहीं टेढा, कहीं सीया, ':
. वा.रा.भा. आर० ॥३॥ 1 ऊंचा खाली, बराबर अंग कोई न था, उसकी सूरत बडी डरावनी थी ॥ ५ ॥ वह राक्षस रुधिरसे भीगा व्यायका चमडा ओढे था जिस समय वह दवाती लेताया वो प्रलयकालकी समान सब भूतोंको त्रास उपजानेवाला विदित होताथा ॥ ६॥ वह तीन शेर, बारह व्याघ, दो भेडिये, दश चीतल मृग, व दांत सहित चरबी लगा एक हाथीका मस्तक ॥ ७ ॥ जो लोहेके शूलमें पिंधा हुआथा लियेथा औरवडाही चिल्ला रहाथा फिर वह रामचन्द्र लक्ष्मण और मैथिली सीताजीको देख ॥ ८ ॥ महाक्रोधके वश होकर संहारके कालमें कतान्तकी समान उनके ऊपरको दौडा व महा भयावनी गर्जना करके पृथ्वीको कँपावा हुआ॥ ९॥ विदेहरानाकी दृहिता सीताजीको गोदमें लेकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोला कि, तुम दोनों जन जटा चीर धारण किये वनमें खी सहित आयेहो इससे अपनेकोमराहुआही समझो वसानंचर्मवेयावसादरुधिरोक्षितम् ॥वासनंसर्वभूतानांव्यादितास्यमिवांतकम् ॥६॥ त्रीन्सिहांश्चतुरोव्याघान्दोवृकोपतान्दशासविपाणवसा दिग्धंगजस्थवशिरोमहत् ॥७॥ अवसज्यायसेशुलेविनदंतमहास्वनम् ॥ सरामलक्ष्मणंचेवसीतांदृष्ट्वाचमेथिलीम् ॥ ८॥ अभ्यधावत्सुसंकु दप्रजाःकालइवांतकः ॥ सकृत्वाभैरवनादंचालयन्निवमेदिनीम् ॥ ९॥ अंकेनादायवैदेहीमपक्रम्यतदात्रवीत् ॥ युवांजटाचीरघरौसभाक्षिीण जीवितौ ॥ १०॥ प्रविष्टौदंडकारण्यंशरचापासिपाणिनौ ॥ कथंतापसयोर्वाचवासःप्रमदयासह ॥ ११ ॥ अधर्मचारिणीपापोकायुवांमुनि दूपको ।। अहंवनमिदंदुर्गविराधोनामराक्षसः ॥ १२ ॥ चरामिसायुधोनित्यमृपिमांसानिभक्षयन् ॥ इयनारीवरारोहाममभार्या भविष्यति॥१३॥ युवयो पापयोश्चाहंपास्यामिरुधिरंमृधे ॥ तस्यैवंब्रुवतोदृष्टविराधस्यदुरात्मनः ॥ १४॥ श्रुत्वासगर्वितवाक्यंसंभ्रांताजनकात्मजा ॥ सीताप्रवे पितोदेगात्प्रवातेकदलीयथा ॥ १५ ॥ तांदृष्ट्वाराघवःसीतांविराधांकगतांशुभाम् । अत्रवीलक्ष्मणवाक्यमुखेनपरिशुप्यता ॥ १६॥ ॥ १० ॥ शर, चाप, वलवार हाथमें लेकर इस वनमें आयेहो फिर यह वो मुझसे कहो कि तुम्हारे साथ यह सी क्योंकर है? ॥ ११ ॥ तुम लोग अधर्मका आच रण करनेवाले पापस्वभावी हो, और तुमसे मुनियोंके चरित्रको कलंक लगाहै मो तुम लोग कौनहो ? हम राक्षस हैं हमारा नाम विराध है हम दुर्गम वनमें रहते हैं ॥ १२ ॥ हम प्रतिदिन ऋपियोंका मांस खातेहुये हथियार बांधकर इस दुर्गम वनमें फिरा करते हैं इस वरारोहा म्रीको हम अपनी भार्या बनायेंगे ॥१३॥ तुम दोनों महापापी हो इससे युद्धकर हम तुम्हारा दोनोंका रुधिर पियेंगे जब दुष्टात्मा विराधने ऐसे दुर्वचन कहे ॥ १४ ॥ ऐसे गर्वीले वचन सुनकर जनककुमारीसीताजी यदुनही घबराई जिस प्रकार प्रचंड पवनके वेगसे केला कांप जाय इसी प्रकार उनका शरीर भयसे कांपनेलगा ॥ १५॥ श्रीरामचन्द्रजी शुभ मीताजीको पिराध राक्षमकी
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गादमें गई देखकर उदास हो लक्ष्मणजीमे वोले ॥ १६ ॥ हे सौम्य ! राजा जनकजीकी कन्या शुभाचरण करनेवाली हमारी वी सीताजीका विराधकी गोदी में स्थित
होना देशो॥ १७ ॥ यह यशस्विनी राजपुत्री अत्यंत सुसमे पालन पोपण की गई सो अब यह राक्षसके वश पड़ीं सो वरदान मांगनेसे जो कैकेयीकी इच्छा थी वह
आज माल हुई ॥ १८ ॥ जो कैकेयी अपने पुत्रको राज्यदिलाकरभी संतोपसे न रही उसने बड़ी दूरका आगम देखा कि, यदि यहां रहेंगे तो हमारे पुत्रका राज्य
अटल नहीं रहेगा इससे वनवास दिलवाया ॥ १९ ॥ समस्त प्राणियोंका प्यारा जानकर हमको वनमें भिजवाया अब उन बिचली माता कैकेयीदेवीका मनोरथ
मफल हुआ ॥ २० ॥ हे लक्ष्मण ! इससे अधिक और दुःस क्या होगा कि राज्य हरा गया पिताजीका मरण हुआ जानकीजीको राक्षसने छुआ भला इससे बढकर
कोई दुःसहे? ॥ २१ ॥ जब रामचंद्रजीते ऐसा कहा तब शोकसे घिरे आंसू भरे हुए, मंत्रसे बँधे सर्पकी समान ऊंथे वासले गर्जकर महा क्रोधयुक्तहो लक्ष्मणजी
पश्यसौम्यनरेंद्रस्यजनकस्यात्मसंभवाम् ॥ ममभायीशुभाचारांविराधांफेप्रवेशिताम् ॥ १७॥ अत्यंतसुखसंवृद्धाराजपुत्रीयशस्विनीम् ।। यद
भिप्रेतमस्मासुप्रियंवरवृतंचयत् ॥ १८॥ केकेय्यास्तुसुसंवृत्तंक्षिप्रमद्येवलक्ष्मण ॥ यानतुष्यतिराज्येनपुत्रार्थेदीप्रदर्शिनी ॥ १९ ॥ ययाई
मर्वभूतानांप्रियःप्रस्थापितोवनम् ॥ अद्येदानींसकामासायामातामध्यमामम ॥ २० ॥ परस्पर्शावेदेह्यानदुःखतरमस्तिमे ॥ पितुर्विनाशा
सौमित्रेस्वराज्यहरणात्तथा ॥ २१ ॥ इतिब्रुवतिकाकुत्स्थेवाप्पशोकपरिप्लुतः ॥ अत्रवीलक्ष्मणःक्रुद्धोरुद्धोनागइवश्वसन् ॥ २२॥ अनाथइ
वभूतानांनाथस्त्वंवासवोपमः ॥ मयाप्रेष्येणकाकुत्स्थकिमर्थपरितप्यसे ॥२३॥शरेणनिहतस्याद्यमयाकुद्धेनरक्षसः॥ विराधस्यगतासोहिमही
पास्यतिशोणितम् ॥ २४ ॥ राज्यकामेममक्रोधोभरतेयोबभूवह ॥ तंबिराधेविमोक्ष्यामिवज्रीवत्रमिवाचले ॥ २५ ॥ ममभुजवलवेगवेगितः
पततुशरोस्यमहान्महोरसि ।। व्यपनयतुतनोश्चजीवितंपततुततश्चमहींविर्णितः ॥ २६ ॥ इत्या श्रीम० वा० आ० अर• द्वितीयःसर्गः॥२॥
पोले ।। २२ ।। हे काकुत्स्थ ! आप इन्द्रकी समान सब प्राणियोंके स्वामी होकर विशेषतः मुझ सरीखे सेवकके विद्यमान रहते इसप्रकारका विलाप क्यों करतेहैं? ॥२३॥
हम मोषित होकर दम चिराध राक्षसको बाण मारतेहैं, यस बाणके लगतेही यह प्राण छोडदेगा और पृथ्वी इसका रुधिर पियेगी ॥ २४ ॥ राज्यकी कामना करते हुये
भरलनीपर जो क्रोध हमको उत्पन्न हुवाथा सो वन धारण करनेवाले इन्द्रने जिस प्रकार पर्वतोपर वज्र छोडाथा उसी भांति में भी यह क्रोध विराधपर छोडताहूं।
॥ २५ ॥ हमारी भुजाओंके पलोंके वेगसे वेगयुक्त होकर हमारे छोडे तीर इसके हृदयमें जाकर गडेंगे, इसका जीवन नाराको प्राप्त हो जायगा, और यह धूम २
कर पृषीपर गिर जायगा ॥ २६ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां द्वितीयःसर्गः ॥ २॥
पा.रा.भा.
आर०क
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न०३
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फिर वह विराध राक्षस अपने वचनकी ध्वनिसे समस्त वनको पूर्ण करता हुआ यह बोला-जो मैं पूछताहूं सो बतावो, कि तुम कौनहो और कहांफो जाओगे।।
॥१॥ उस अंगारके समान जलते वदनवाले राक्षसने जब इस प्रकार पूछा तब महातेजस्वी श्रीरामचंद्रजी इक्ष्वाकुकुंलमें अपना जन्म बताकर कहो टगे ।।
॥ २॥ कि हम क्षत्रियहैं और जो धर्म क्षत्रियोंके हैं वहभी हम सब करते हैं इस समय हम वनमें आयेहैं इस यावको तू जान, हम लोगभी तुझको जाननेकी
इच्छा करते हैं कि तू कौनहै ? और किस कारण इस दंडकारण्यमें विचरण करताहै ॥ ३॥ तिसके पीछे विराध राक्षस उन सत्यपराकम करनेवाले श्रीरामचंदनीसे
बोला कि, राम ! मैं अपना वृत्तान्त कहताहूं श्रवण करो ॥ ४ ॥ मैं जवनामक राक्षसका पुत्र हूं मेरी मावाका नाम शवदा है इस पृथ्वीके बीच सब राक्षस
अथोवाचपुनर्वाक्यं विराधःपूरयन्वनम् ॥ पृच्छतोममहिब्रूतंकौयुवांकगमिष्यतः ॥ ३ ॥ तमुवाचततोरामोराक्षसंज्वलिताननम् ॥ पृच्छंसुम
हातेजाइक्ष्वाकुकुलमात्मनः॥२॥ क्षत्रियोवृत्तसंपनीविद्धिनौवनगोचरौ ॥ त्वांतुवेदितुमिच्छावःकस्त्वंचरसिदंडकान् ॥ ३॥ तमुवात्रविरा
धस्तुरामसत्यपराक्रमम् ॥ हंतवक्ष्यामितेराजन्निवोधममराघव ॥ ४॥ पुत्रःकिलजवस्याहंमाताममशतदा ॥ विराधइतिमामाहुःपृथिव्यांस
राक्षसाः॥५॥तपसाचाभिसंप्राप्ताब्रह्मणोहिप्रसादजा ॥ शस्त्रेणावध्यतालोकेऽछेद्याभेद्यत्वमेवच ॥ ६॥ उत्सृज्यप्रमदामेनामनपेक्षीयथा
गतम् ॥ त्वरमाणीपलायेथांनवांजीवितमाददे ॥७॥ तंरामःप्रत्युवाचेदंकोपसंरक्तलोचनः ॥ राक्षसंविकृताकारंविराधंपापचेतसम् ॥ ८॥
क्षुद्रधिक्त्वांतुहीनार्थमृत्युमन्वेपसेध्रुवम् ॥ रणेप्राप्स्यसिसंतिष्टनमेजीवन्विमोक्ष्यसे ॥ ९॥ ततःसज्यं धनुःकृत्वारामःसुनिशिताशरान् ॥
सुशीप्रमभिसंघायराक्षसंनिजघानह ॥ १०॥
हमको पिराध नामसे पुकारा करतेहैं ॥ ५॥ मैंने 'तपस्या करके ब्रह्माजीके प्रसादसे किसी शमद्वारा हम न मारे जांय न हमारे अंगही कट टूटसकें न
हम मारे जाय ऐसा.वरदान पायाहै ॥ ६॥ अतएव तुम लोग युद्धकी वासना छोड शीघ्रतासे इस म्रीको यहीं पर त्याग कर जिस स्थानने आये हो वहींको चले
जाओ क्योंकि मैं तुम्हारा जीव नहीं लेना चाहता ॥ ७ ॥ तब रामचंद्रजी क्रोधसे लाल २ नेत्र कर उस पाप निरत विकटाकार राक्षसको यह उत्तर देते हुए-ने
अधम । तुझको धिक्कार है तेरा आशय और इच्छा बहुत बुरीहै तू निश्चयही मृत्युको खोजताहै सो अभी उसको प्रान होगा सडाहो, जबतक तू जीता रहेगा तयवक तेरा
निस्तार हमसे नहीं ॥८॥९॥ अनन्वर श्रीरामचन्द्रजीने अतिशीघ धनुपपर पाण चढाकर बहुत सारे तेज बाण उस राक्षसको लक्ष्य करके छोडे ॥१०॥
ittinkakkani
॥४॥
उन्होंने धनुपपर रोदा चढाय सुवर्णके पंखे लगे अतिवेगवान् गरुड और पवनकी समान शीघगामी सात तीर चलाये॥११॥वह सातों वाण मोरकी पूंछकी समान चित्र विचित्र निराधकी देहको भेदकर रुधिरमें लिपट अग्रिकी समान चमकते हुए पृथ्वी पर गिरे ॥ १२ ॥ तब वह राक्षस बाणसे विधकर विदेहराजकुमारी सीताजीको पृथ्वीपर बैठालकर शूल उठा क्रोधर्म भर रामचन्द्र व लक्ष्मणजीकी औरको दौडा ॥ १३ ॥ वह बहुतही चिल्लाता हुआ इन्द्रध्वजके समान शूल धारणकर मुस फैलाये यमराजकी समान शोभा धारण करता हुआ ॥ १४ ॥ उस राक्षसको आता देख दोनों भाई उस यमराजकी समान विराधराक्षसपर दीप्तिमान वाणों की पप करनेटगे ॥ ३५॥ तब उस अतिभयानक राक्षसने हँस कर खडे हो जभाई ली, जब कि, उसने जंभाई ली तब उसके शरीरसे वह सब शीघ्रगामी धनुपाज्यागुणवतासप्तवाणान्मुमोचह ॥ रुक्मपुंखान्महावेगान्सुपर्णानिलतुल्यगान् ॥ ११ ॥ तेशरीरंविराधस्यभित्त्वावहिणवाससः ॥ नि पेतुःशोणितादिग्धाधरण्यांपावकोपमाः ॥ १२ ॥ सविद्धोन्यस्यवेदेहीशूलमुद्यम्यराक्षसः ॥ अभ्यद्रवत्सुसंक्रुद्धस्तदारामसलक्ष्मणम् ॥ १३ ॥ सविनद्यमहानादंशुलंशक्रध्वजोपमम् ॥ प्रगृह्याशोभततदाव्यात्ताननइवांतकः ॥ १४ ॥ अथतीभ्रातरीदीप्तंशरवपववर्पतुः ॥ विराधेराक्षसेत स्मिन्कालांतकयमोपमे ॥१५॥ सग्रहस्यमहारौद्रःस्थित्वाऽज़ुभतराक्षसः ॥ भमाणस्यतेवाणाःकायानिप्पेतुराशुगाः॥ १६॥ स्पर्शात्तुवरदानेन प्राणान्संरोध्यराक्षसः ॥ विराधःशुलमुद्यम्यराघवावभ्यधावत ॥१७॥ तच्छूलंबज्रसंकाशंगगनेज्वलनोपमम् ॥ द्वाभ्यांशराभ्यांचिच्छेदरामःश प्रभृतांवरः ॥१८॥ तद्रामविशिखेश्छिन्नंशूलंतस्यापतद्भुवि ॥ पपाताशनिनाच्छिन्नमेरोविशिलातलम् ॥ १९॥ तौखड्गीक्षिप्रमुद्यम्यकृष्णसर्पा पिसोद्यती ।। तूर्णमापेततुस्तस्यतदाप्रहरतावलात ॥२०॥ पाण निकलकर पृथ्वीपर गिर पडे ॥ १६ ॥ तिसके पीछे वह विराध राक्षस बहुतही दुःखको प्राप्तहोकरभी ब्रह्माजीके वरदान देनेसे मरा नहीं और जीता रहा व शूल उठाकर श्रीराम लक्ष्मणके सामनेको दौडा ॥ १७ ॥ उस कालमें वह वज्रसमान शूलका अग्रभाग आकाशको छूता अमिकी समान रूप धारण करता हुआ । तप शम्न धारण करनेवालोंमें श्रेष्ठ रामचन्द्रजीने दो वाोंसे उस शूलको काट डाला ॥ १८॥ जिस प्रकार वज्रसे कटकर मेरु पर्वतकी वडी शिला पृथ्वीपर गिर मिही श्रीरामचन्द्रजीके वाणसे टुकडे २ होकर विराध राक्षसका शूल पृथ्वीपर गिर पड़ा ॥ १९ ॥ जब उसका शूल कट गया तब राम और सक्ष्मण अति शीन काटने को तैयार काले नागकी समान दो खड्ग ले उसके सामने को दौडे और उसके समीप जा बल वीर्यसे खड्ग उमके ऊपर प्रहार करने 55 गा.रा.भा. आर० स०४ . टो॥२०॥ नन यह राक्षस उन दोनों नर श्रेष्ठों करके अधमरासा हे कर अपने दोनों हाथोंसे दोनोंको पकड यह सोचने लगा कि इनको कहीं दूर ले जाकर पटक . कर मारडालूं ॥ २१ ॥ तबतकभी उस राक्षसका शरीर नहीं कांपा तिसके पीछे श्रीरामचन्द्रजी उस राक्षसके मनकी बातको जानकर लक्ष्मणजीसे बोले कि, भला होगा यह राक्षम अपने कंधोंपर चढाकर इस मार्गमें चले ॥ २२॥ हे सुमित्रानन्दन ! यह राक्षस जहां हमको ले जानेकी इच्छा करताहै वहां ले जाये। क्योंकि पह जिग रास्तेपर हमें लिये जाताहै यही हमारे जानेका मार्गहै ॥ २३ ॥ उस अतिबलवान् विराधराक्षसने अपने बलद्वारा राम और लक्ष्मणको दो वाल कोकी ममान अपने दोनों कंधोंपर उठा लिया ॥ २४ ॥ फिर उन दोनों जनोंको कन्धोंपर बैठाल कर भयानक वनकी ओर चिल्लाता हुआ वह निशाचर दोने लगा ॥ २५ ॥ फिर वह राक्षस अनेक २ भांतिके वृक्ष लगे विविध प्रकारके पक्षियों के समूहसे मनोहर शृगालों करके युक्त चीते व्याघों साँसे भरे और मवध्यमानःसुभृशंभुजाभ्यांपरिगृह्यती॥अप्रकंप्यौनरव्याघौरौद्रप्रस्थातुमैच्छत ॥२१॥ तस्याभिप्रायमाज्ञायरामोलक्ष्मणमब्रवीत् ॥ वहत्वयम लंतावत्पथानेनतुराक्षसः ॥२२॥ यथाचेच्छतिसौमित्रतथावहतुराक्षसः॥ अयमेवहिन पंथायेनयातिनिशाचरः॥२३॥ सतुस्वबलवीर्येणसमुत्क्षि प्यनिशाचरः ॥ वालाविवस्कंधगतीचकारातिवलोदतः ॥२४॥ तावारोप्यततःस्कंधराघवौरजनीचरः ।। विराधोविनदन्धोरंजगामाभिमुखोव नम् ॥२५॥ वनमहामेघनिभंप्रविष्टोद्रुमेमहद्भिर्विविधैरुपेतम् ॥ नानाविधे-पक्षिकुलैर्विचित्रंशिवायुतंव्यालमृगैर्विकीर्णम् ॥२६॥ इत्यापें श्रीमद्रा मायणेवाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे तृतीयःसर्गः ॥३॥ ह्रियमाणौतुकाकुत्स्थौदृष्ट्वासीतारघूत्तमौ ॥ उच्चैःस्वरेणचुक्रोशप्रगृह्यसुमहाभुजी ॥ ॥१॥ एपदाशरथीरामःसत्यवान्छीलवाञ्शुचिः ॥ रक्षसारौद्ररूपेणह्रियतेसहलक्ष्मणः ॥२॥ मामृक्षाभक्षयिष्यंतिशार्दूलद्वीपिनस्तथा ॥ माहरोत्सृजकाकुत्स्थानमस्तेराक्षसोत्तम ॥३॥ तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वावेदेशारामलक्ष्मणौ ॥ वेगंप्रचक्रतुर्वीरौवधेतस्यदुरात्मनः॥४॥ महा मेपकी समान निविड वनमें प्रवेश करता हुआ ॥ २६ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायां तृतीयः सर्गः ॥ ३ ।। जब विराध रघुनंदन रामचन्द्र और लक्ष्मणजीको हरण करके ले चला यह देखकर सीवाजी अपनी बडी २ बाहें उठाकर बडे जोरसे रोय २ विलाप करने लगी ॥१॥ और बोली कि हा! यह भयंकर आकारवाला राक्षस साधु स्वभाववाले सत्यमें रत, पवित्र, दशरथकुमार श्रीरामचन्द्र व लक्ष्मणजीको हरे लिये जाता है ।। ॥२॥ कोई चीता व व्याघ्र भेडिया इकली पाकर हमको खा जायगा तिससे हे राक्षसोंमें श्रेष्ठ ! हम तुमको नमस्कार करती हैं कि, तुम इन दोनोंको छोड दो हमें सालो ॥३॥ बल वीर्यवाले रामचन्द्र और लक्ष्मणजीने जानकीजीके ऐसे दीनवचन सुनकर उस दुरात्मा विराधक मार डालनेमें बडी शीघता की ॥४॥ 不決米*******茶 *******沈
गानी॥ || पल योगगमन रमजान मानारि गमे नीमनगमकर गणमा
मुमित्रानंदन लालगनीने इन भयानक गक्षमका बांया हाथ और श्रीरामचन्द्रजीने शीवतामे उसका दहना हाथ तोड डाला ॥५॥जब दोनों हाथ टूट गये तब मेघवर्ण
विगामममिनही पुन्यको पान होकर उनी ममय पृथ्वीमें गिर पडा तय ऐमा बोध हुआ मानों कोई पर्वत पत्रकी चोटसे फटकर पृथ्वीपर गिरा ॥ ६॥ जब वह गिर
नया नर श्रीगमनन्दजी और लक्ष्मणजीने टात मुझी चूनोंसे उसको मूत्र मारा और वारंवार पृथ्वीपर उठा २ कर पटकने लगे और फिर बहुतही पसीटा ॥
॥ ७ ॥ यह गिर पहलेभी गमचंदजीक बहुन यागाने विधा और सङ्गके प्रहारसे शरीर छिन्न भिन्नभी हुआथा और इस समय वार २ पृथ्वीपर पटकाभी गया
ग्लनोभी नहीं मग स्योंकि प्रयाजीका वरदानथा ॥ ८॥ दीनको शरणदेने वाले श्रीरामचन्द्रजी पर्वतकी समान विराध राक्षसको सवही प्रकारसे अवध्य देख
सननी चाले ॥ १ ॥ हे पुरुषश्रेष्ट ! इस राक्षसने ऐसी नास्या कीहै कि गम्रकी सहायनासे बांधकर इसको कोईभी नहीं जीत सकता, अतएव इसको जीवा
नम्यगदस्यमामिविःमयंचाहुंचभंजह ।। रामस्तुदक्षिणंचाईतरसातस्यरक्षसः॥५॥ सभग्नवाहुःसंविनःपपाताशुविमूर्छितः ॥ धरण्यांमेघसं
काशीपबभिन्नदयाचलः ॥ ६॥ मुष्टिभिर्वाहुभिःपद्भिःमूदर्यतीतुराक्षसम् ।। उद्यम्योद्यम्यचाप्येनंस्थंडिलेनिप्पिपेपतुः ॥ ७॥ सविडोबहुभि
गांगेगमाभ्यांनपग्धिनः ॥ निप्पिष्टोबहुधाभूमौनममारसराक्षसः ॥ ८ ॥ तंप्रेक्ष्यरामःसुभृशमवध्यमचलोपमम् ॥ भयेष्वभयदःश्रीमानिदं
निमशीन ॥ ९॥ तपमापुरुषव्याघ्रराक्षसोयनशक्यते ॥ शस्त्रेणयुधिनिर्जेतुंराक्षसंनिखनावहे ॥१०॥ कुंजरस्येवरोदस्यराक्षसस्यास्यलक्ष्म
॥ नैम्मिनगमहन्सलन्यतारीद्रवर्गमः ॥ ११॥ इत्युक्त्वालक्ष्मणराम प्रदरःखन्यतामिति ॥ तस्थौविराधमाक्रम्यकंठेपादेनवीर्यवान्।।१२॥
गयागणोक्नंगनमःप्रश्रितंयचः ॥ इदंप्रोपानकाकुत्स्थंविराधःपुरुपर्पभम् ॥ १३ ॥ हतोहंपुरुपव्याप्रशक्रतुल्यवलेनवे ॥ मयातुपूर्वत्वंमो
टानमानःपुरुषर्षभ ॥ ११ ॥ कौसल्यासुप्रजास्तातरामस्त्वविदितोमया ॥ वेदेहीचमहाभागालक्ष्मणश्चमहायशाः ॥ १५ ॥
माही पलीमें गाडाकर दार देते हैं ॥30॥ हे लक्ष्मण ! तुम इस ममय हाथीकी समान प्रचण्ड स्वभावयाले इस राक्षसके लिये वनमें एक अति बडा गढा
गां॥1॥वीरान लक्ष्मणजीको इस प्रकार गदा सोदनेकी आना देकर श्रीरामचंद्रजी अपने चरणसे इस राक्षसका गला दारकर सडे रहे ॥ १२ ॥
म पर निगार विगर पुरुपभेष्ठ श्रीरामानंदजी यह यनन श्रवण करके विनय सहित यह बोला ॥ १३ ॥ हे पुरुपसिंह ! मैं आपके इंद्रतुल्य पराक्रममेही
मगही गरा, नाभेट ! मैंने अपना अमानमे आपको नहीं पहनाना ॥ १४॥ हे तात! इस समय जाना कि, आप श्रीरामचंद्रजी हैं सती कौशल्याजी
गारको पाकर भेष्ट पुरनी हुई है और इन महाभाग्पाली जानकी और परम कीर्तिमान् लक्ष्मणजीकोभी मैंने भली भांति पहचान लिया ॥ १५ ॥
शा.रा.भा. आर०२ स०४ L पर में पहले नुम्बुरुनाम गंधर्वथा, विश्रवाके पुत्र कुबेरजीने हमको शाप दिया वस उसी शापके वश हम इस पापी निशाचरयोनिको प्राप्त हुए ॥ १६ ॥ जब उन्होंने हमको भाप दिया नब मैंने बहुत विनय करके प्रसन्न किया तब महायशवाले वैश्रवणजीने हमसे कहा कि, जब दशरथजीके पुत्र रामचन्द्रजी युद्ध में तुम्हारा वध करेंगे १७ ॥ तब फिर तुम गंधर्वका शरीर पाकर स्वर्गमें आओगे, और शाप उन्होंने इसकारण दियाथा कि मैं समय पर उनकी सेवामें नहीं उपस्थित हुआथा गय उन्होंने अविशय कोधारूढ होकर यह शाप दिया कि राक्षस होजा, ॥ १८ ॥ और उनकी सेवामें न पहुँचनेका यह कारणथा कि मैं रंभा अप्सरापर मोहित हो रहाथा तब राजा वैश्रवणने मुझको यह शापदिया, सो अब मैं तुम्हारे प्रसादसे इस घोर शापसे छूट गया ॥ १९ ॥ हे परंतप ! अब मैं अपने स्थानको जाताहूं आपका भला हो कि हमको इस शापसे छुड़ाया अब ऐसा कीजिये कि, यहांसे कुछ दूर शरभंगका आश्रम है ॥ २० ॥ यहांसे छःकोसकी दूरीपर महाप्रतापी अभिशापादहंघोरांप्रविष्टोराक्षसींतनुम् ॥ तुंबुरुर्नामगंधर्वःशप्तोवेश्रवणेनहि ॥ १६॥ प्रसाद्यमानश्चमयासोत्रवीन्मांमहायशाः ॥ यदादाशरथी रामस्त्वांवधिप्यतिसंयुगे॥ १७॥ तदाप्रकृतिमापन्नोभवान्स्वगंगमिप्यति ॥ अनुपस्थीयमानोमांसद्धोव्याजहारह ॥ १८॥ इतिवैश्रवणोरा जारंभासक्तमुवाच ॥ तवप्रसादान्मुक्तोहमभिशापात्सुदारुणात् ॥ १९॥ भवनस्वंगमिप्यामिस्वस्तिवोस्तुपरंतप ॥ इतोवसतिधर्मात्माशरभं गःप्रतापवान् ॥२०॥ अध्ययोजनेतातमहर्पि-सूर्यसन्निभः॥ तंक्षिप्रमभिगच्छत्वंसतेश्रेयोभिधास्यति ॥२१॥ अवटेचापिमांरामनिक्षिप्य कुशलीब्रज ॥ रक्षसांगतसत्त्वानामेपधर्मःसनातनः ॥ २२ ॥ अवटेयेनिधीयंतेतेपालोकाःसनातनाः ॥ एवमुक्कातुकाकुत्स्थंविराधःशरपीडितः ॥ २३ ॥ वभूवस्वर्गसंप्राप्तोन्यस्तदेहोमहाबलः ॥ तच्छ्रुत्वाराघवोवाक्यलक्ष्मणव्यादिदेशह ॥ २४ ॥ कुंजरस्येवरौद्रस्यराक्षसस्यास्यलक्ष्मण ।। वनेस्मिन्सुमहाञ्चःखन्यतारौद्रकर्मणः॥ २५ ॥ इत्युक्वालक्ष्मणराम प्रदरःखन्यतामिति ॥ तस्थौविराधमाक्रम्यकंठेपादेनवीर्यवान् ॥ २६॥ शरभंग नाम महात्मा रहते हैं उन महर्पिका तेज सूर्यके समानहै आप उनके पास शीघही जाइये वह आपका कल्याण शीवही करेंगे ॥ २३ ॥ हे रामचन्द्रजी ! अब हमें गढेमें डालकर कुशलपूर्वक चले जाइये, गढेमें दवनाही मरनेके पीछे राक्षसोंका सनातन धर्म है ।। २२ ॥ जो कि राक्षस मरनेके पीछे गडहा सोदकर दाप दिये जातेहैं उनको अक्षय लोकोंकी प्राप्ति होतीहै, वाणसे पीडित महावलवान् विराध रामचंद्रजीसे यह कह ॥ २३ ॥ देहको त्यागकर स्वर्गको होनेको हुआ, श्रीरामचन्द्रजीने राक्षसके ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मणजीको आज्ञादी ॥ २४ ॥ कि हे लक्ष्मण ! तुम इस बनके बीच प्रचंड हाथीकी समान भीम कर्म करने वाले राक्षसके दाबनेको एक बहुत बड़ा गडहा सोदो ॥ २५॥ लक्ष्मणजीको गडहा खोदनेकी आज्ञा देकर वीर्यवान् रामचंद्रजी स्वयंभी अपने पैरसे विराधका प्राप्त
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गला दबाकर सडे रहे ॥ २६ ॥ फिर लक्ष्मणजीने सन्ता लेकर महात्मा विराधके निकटही एक बड़ा गडहा. सोदा ।। २७ ॥ फिर रामचन्दनीने गमे कान
जिनमें लगे हुए हैं ऐसे विराधके मस्तक परसे अपना चरण हटालिया और उसको उठाकर उत्त गडहेमें डाल दिया उस समय विराध अति घोर राब्दमे निसाने लगा।
॥ २० ॥ युद्धमें दृद्धचित्त और सत्य विक्रम करनेवाले श्रीरामचंदजी व लक्ष्मणजी दोनोंने हर्ष सहित विकटाकार उस बडे राक्षसका संयाममें पराजय करा, और आनी
भुजाओंके बलसे उठाकर उस रोते हुएको गडहेमें डालकर पाट दिया ॥ २९ ॥ सब कुछ जाननेमें चनुर वह दो नरश्रेष्ठ तीखे वाण व खगले असुर विराधका
संहार न होते देखकर बुद्धिके प्रभावसे गढमें उसके मरनेके उपाय जानकर और उसमें ही उसको डालकर वध करते हुए ॥ ३० ॥ श्रीरामचन्द्रजीने जिम प्रकार
ततःखनित्रमादायलक्ष्मणःश्वभ्रमुत्तमम् ॥ अखनत्पार्वतस्तस्यविराधस्यमहात्मनः ॥२७॥ तंमुक्तकंठमुत्क्षिप्यशंकुकर्णमहास्वनम् ॥ विराणा
शिपच्चभ्रेनदंतंभैरवस्वनम् ॥ २८॥ तमाहवेदारुणमाशुविक्रमौस्थिरावुभौसंयतिरामलक्ष्मणी । मुदान्वितौचिक्षिपतुर्भयावहनदंतमुत्क्षिप्यवले
नराक्षसम् ॥ २९॥ अवध्यतांप्रेक्ष्यमहासुरस्यतीशितेनशस्त्रेणतदानरर्पभो ॥ समर्थ्यचात्यर्थविशारदावुभौविलेविराधस्यवधप्रचक्रतुः॥३०॥
स्वयंविराधेनहिमृत्युमात्मनःप्रसारामेणयथार्थमीप्सितः॥निवेदितःकाननचारिणास्वयंनमेवधःशस्त्रकृतोभवेदिति॥३१॥तदेवरामेणनिशम्य
भापितंकृतामतिस्तस्यविलप्रवेशने ॥ विलंचतेनातिवलेनरक्षसाप्रवेश्यमानेनवनविनादितम् ॥ ३२ ॥ प्रहृष्टरूपाविवरामलक्ष्मणौविराधमुव्यां
प्रदरैनिपात्यतम् ॥ ननंदतुर्वीतभयोमहावनेदिविस्थितौचंद्रदिवाकराविव ॥३३ ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे
चतुर्थःसर्गः ॥४॥
अपने प्रयोजनानुसार विराधको मृत्युकै मुखमें डालनेका अभिलाप किया, काननचारी विराधनेभी वैसेही अपने प्राण त्यागनेकी कामनासे स्वयं रामचन्द्रजीसे कहा
था कि तुम शमसे हमको नहीं मार सकोगे ॥ ३१ ॥ रामचन्द्रजीने विराधक ऐसे वचन सुन उसको गडहेमें दावनेका विचार किया, तिसके पीछे उस गढेमें डाल
न समय पिराध ऐसा घोर चिल्लाया कि उस शब्दसे सब वन और वह गढा एक साथही भर गया ॥ ३२॥ इस प्रकार महावनमें श्रीरामचन्द्र व लक्ष्मणजी उस विराध
राक्षसको पृथ्वीमें पाटपूटकर दोनोंही एक प्रकार हर्पसे भर खिलगये और भयहीन होकर उस समय वह दोनों जन आकारामें उदय हुए मूर्य चंद्रमाकी समान दीति
|मान होने लगे ॥ ३३ ॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकांडे भापाटीकायां चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥
आर०का वा.ग.भ . तत्पश्चात् वीर्यवान् श्रीरामचंदजीने भीमबलवाले राक्षसको मारकर सीताजीको प्रेमसहित लपटाय बहुत समझाया बुझाया ॥१॥ और तेजसे दीतिमान अपने छोटे भाई लक्ष्मणजीसे बोले कि, यह वन स्वभावसेही दुर्गम और कष्टका देनेवाला है। इससे पहले कभी इस भांतिका वन हम लोगोंने नहीं देखा ॥२॥ निससे शीघही तपोधन शरभंगजीके आश्रमको चले चलो यह कहकर श्रीराम चन्द्रजी शरभंगजीके आश्रमकी ओरको चले ॥ ३ ॥ वहां पहुंचकर तपोवलसे जिनकी आत्मा शुद्ध हुई है, देवताओंकासा प्रभाव जिनमें है ऐसे महर्पि शर भंगजीके निकट एक बड़े अचरजकी बात रामचन्द्रजीने देखी ॥ ४ ॥ कि, सूर्यकी अनिकी प्रभाके समान देवराज इन्द्र अपने शरीरकी प्रभासे प्रकाशित देवताओंके साथ श्रेष्ठ रथपर चढे हैं ॥५॥ उनका रथ पृथ्वीमें न खडा होकर आकाश मार्गही टिका है उनके सप गहनोंमेंसे चमक निकल रही और पहरनेके वस्त्र बहुतही उजले थे॥ ६ ॥ वैसेही वखाभूपोंसे सजे हुए औरभी अनेक महात्मा हत्वातुतंभीमवलंविराधराक्षसंवने ॥ ततःसीतापरिप्वज्यसमाश्वास्यचवीर्यवान् ॥१॥ अत्रवीद्धातरंरामोलक्ष्मणंदीप्ततेजसम् ॥ कटवनमिदंदुगन चस्मोवनगोचराः ॥२॥ अभिगच्छामहेशीघ्रंशरभंगंतपोधनम् ॥ आश्रमंशरभंगस्यराघवोभिजगामह ॥३॥ तस्यदेवप्रभावस्यतपसाभावितात्म नः॥ समीपेशरभंगस्यददर्शमहदद्भुतम् ॥ ४ ॥ विभ्राजमानंवपुपासूर्यवैश्वानरप्रभम् ॥ रथावरमारूढमाकाशेविबुधानुगम् ॥५॥ असंस्पृशंतं वसुधाददर्शविबुधेश्वरम् ॥ संप्रभाभरणंदेवंविरजोवरधारिणम्॥६॥तद्विधेरेवबहुभिःपूज्यमानमहात्मभिः॥ हरितेर्वाजिभिर्युक्तमंतरिक्षगतंरथम्॥ ॥७॥ दर्शादूरतस्तस्यतरुणादित्यसन्निभम्॥ पांडुराभवनप्रख्यंचंद्रमंडलसन्निभम् ॥८॥अपश्यद्विमलंछचित्रमाल्योपशोभितम् ॥ चामरव्य जनेचायेरुक्मदंडेमहाधने॥ ९॥ गृहीतेवरनारीभ्यांधूयमानेचमूर्धनि ।। गंधर्वामरसिद्धाश्ववहवःपरमर्पयः ॥१०॥अंतरिक्षगतंदेवंगीर्भिरग्र्याभि रेडयन् ॥ सहसंभापमाणेतुशरभंगेनवासये ॥ ११ ॥ दृष्ट्वाशतक्रतुंतवरामोलक्ष्मणमब्रवीत् ॥ रामोथरथमुद्दिश्यधातुर्दर्शयताद्भुतम् ॥ १२ ॥ उनकी पूजा कर रहे हैं रामचन्द्रजीने दूरसे देखा कि, इन्द्रका सूर्यकी समान प्रभावाला हरितवर्ण व श्यामवर्णके घोडे जिसमें जुतरहे ऐसा रथ अन्तरिक्षमें खडाहे । ॥ ७ ॥ जिसकी दीनि दुपहरियाके सूर्यकी समान पाण्डुवर्णके वादलकी समानहै उज्ज्वल चन्द्रमंडलकी समान गोल ऐसे रथको श्रीरामचन्द्रजीने देखा ॥ ८ ॥ । उसमेंका छत्र बहुतही उज्ज्वल है उस पर चित्र विचित्र मालायें लटक रही हैं फिर चामर व्यजन देखे जिनमें सुवर्णकी दंडी लग रहीथी जो पडे मोलके और बड़े । श्रेष्ठ थे ॥ ९॥ दो उत्तम स्त्रिये छत्र और चमरको धारण किये इन्द्रजीके मस्तक पर घुमाती थीं बहुत सारे गंधर्व, देवता, सिद्ध, और परमर्पिगण एक साथ मिलकर "॥ १० ॥ श्रेष्ठ वचनों से उन देवराज इन्द्रकी स्तुति कर रहे थे उस कालमें इन्द्रजी महर्षि शरभंगजीके साथ पार्तालाप करनेमें लगे हुये थे ॥ १३॥ श्रीरामचन्द्रजी उन्हें देख उनकै रथको यता भाई लक्ष्मणको अचरजके सहित यह दिखाकर कहने लगे ॥ १२ ॥ हे भइया ! देखो परम दीप्तिमान, श्रीयुक्त, सूर्यकी समान देदीप्य । मान यह विनित ग्य अन्तरिक्षमें टिकाहुआ शोभा पा रहाहै ॥ १३ ॥ हमने पहले शत यज्ञ करनेवाले इन्द्रजीके घोडोंकी जो वार्ता सुनी थी, सो यह अन्तरिक्षमें टिकरे, निधय यही घोडे होंगे ॥ १४ ॥ हे पुरुपसिंह ! इस रथके चारों ओर जो मैकडों खड्ग हाथमें लिये, कुंडल पहरे युवा पुरुप खडे हैं॥ १५ ॥ जिन मवकी ही छाती पडी चादी है, चाहे परियकी नमान विशाल हैं, पहरनेके कपडे जिनके लाल हैं, जो लोग कि, व्याप्रकी समान दुईप हैं, अर्थात् उनके पास कोई नहीं जा माना ।। १६ ।। जिन मोंके ही गलेमें जलती हुई अनिकी समान हार शोभा पारहेहैं और पचीस २ वर्षकीहीमी उमर जान पडती है ॥ १७ ॥ यह सब पुरुषश्रेष्ठ अनिमंतंथियात्रुष्टमहतंपश्यलक्ष्मण ।। प्रतपंतमिवादित्यमंतरिक्षगतंस्थम् ॥ १३ ॥ येहया पुरुहूतस्यपुराशक्रस्यनःश्रुताः ॥ अंतरिक्षगता दिव्यास्तइमेहयोध्रुवम् ॥ ११ ॥ इमेचपुरुपव्यापयतिष्ठंत्यभितोदिशम् ॥ शतंशतंकुंडलिनोयुवान-खड्गपाणयः॥ १५ ॥ विस्तीर्णविपुलो रस्काःपरिचायतवाहवः ॥ शोणांशुवसनाःसर्वव्याप्राइवदुरासदाः ॥ १६ ॥ उरोदेशेषुसर्वेपाहाराज्वलनसंनिभाः॥ रूपंविभ्रतिसौमित्रेपंचविं शतियापिकम् ।। १७ ॥ एतद्धिकिलदेवानांवयोभवतिनित्यदा ॥ यथेमेपुरुपव्याप्रादृश्यतेप्रियदर्शनाः ॥ १८ ॥ इहेवसहवैदेह्यामुहूततिष्टल क्ष्मण ।। यावनानाम्यहंव्यक्तंकएपद्युतिमात्रथे ॥ १९ ॥ तमेवमुक्त्वासौमित्रिमिहेवस्थीयतामिति ॥ अभिचक्रामकाकुत्स्थ शरभंगाश्रमंत्र ति ॥ २०॥ ततःसमभिगच्छंतप्रेक्ष्यरामंशचीपतिः ॥ शरभंगमनुज्ञाप्यविबुधानिदमत्रवीत् ॥ २१ ॥ इहोपयात्यसौरामोयावन्मांनाभिभाप ते॥ निष्टानयनतारत्तुततोमाद्रष्टुमर्हति ॥ २२ ॥ जितवंतंकृतार्थहितदाहमचिरादिमम् ।। कर्मानेनकर्तव्यमहदन्ये सुदुष्करम् ॥ २३ ॥ मिग प्रकार कि, प्रिय दर्शन जान पड़ते हैं, वैसेही सब देवतागण ऐसे रूप व उमरवाले जान पड़ा करतेहैं व इनका शरीर सदा ऐसाही रहता है कि, मानों पच्चीस वर्ष की अनम्याई ।। १८॥ निसमे हे लक्ष्मण! वैदेहीजीके सहित यहांपर एक मुहूर्न भरवक तुम टिके रहो जबतक कि हम स्पष्ट २ यह न जान आ कि रथवाले युति मान् यह गंजस्त्री पुरुष कौन हैं ? ॥ १९ ॥ लक्ष्मणजीसे यह कह कि तुम यहीं टिके रहो रामचंद्रजी शरभंगजीके आश्रमको गमन करने लगे ॥ २० ॥ श्रीरा महजीको आने दर देशकर गनीनाय इन्द्रजी गरभंगजीमे विदाले अनुचर देवताओंसे बोले ॥ २१ ॥ यह रामचंदजी इस ओरको चले आतेहैं, सो जब तक कि यह हममे कुछ पोटम निममे पढेही नुम हमको और जगह ले चलो जिससे यह हमको देख न सकें ॥ २२ ॥ इनको अभी और लोगोंके न करने योग्य बड़ा कठिन विशेष भारी कार्य करना पड़ेगा जबकि यह गलनको जीनकर उनकार्य होंगे तब इनके दर्शन करेंगे जो अभी दंगन को गो न जाने रायण यह वृत्तान्त जानकर क्या कुछ अनकर दटावं ॥ २३ ॥ निमंक पीछे पत्रधारी अवनी महर्षि गम्भंगनी यात्रा ले और उनका विशेष सन्मान करके घोडे जते हुए स्थपर बैठकर स्वर्ग चले गये ॥ २४ ॥ जब महनाक्ष इन्द्रजी चलेगये नय गमनंदजी भाना और भाषा मीतानी गहित अमिहोपमें पठे हुए शरभंगजीके समीप आये ॥ २५ ॥ राम लक्ष्मण और मीताजी मयनेही उनके दोनों चरण पकडे तय गम्भंगजीने उनको टिकने के लिये स्थान पनादिया और भोजनादिके लिये निमंत्रणभी करदिया और बैठनेको कहा नव श्रीरामचंद्रजी मीनाजी लक्ष्मणनी वहां पर बैठे ॥ २६ ॥ तिसके पीछे रघुनंदन रामचंद्र जीने शरभंगजीसे इन्द्रके वहां आनेका कारण पूछा तव शरभंगजीने इन्द्रक आनेका मव नान्न कह सुनाया ॥ २७ ॥ और योले हे रागर ! यह पर अथवत्रीतमामंत्र्यमानयित्वाचतापसम् ॥ रथेनहययुक्तेनयाँदिवमरिंदमः ॥ २४ ॥ प्रयातेतुसहयाक्षेराधम्मपरिच्छदः ॥ अग्निहोत्रमुपासी नेशरभंगमुपागमत् ॥ २५॥ तस्यपादौचसंगृह्यराम सीताचलक्ष्मणः ॥ निपेदुस्तदनुज्ञातालब्धवासानिमंत्रिताः ॥ २६ ॥ ततःशकोपयानं तुपर्यपृच्छतराघवः ॥ शरभंगश्चतत्सर्वराघवायन्यवेदयत् ॥ २७ ॥ मामपवरदोरामब्रह्मलोकंनिनीपति ॥ जितमुणतपसादुप्पापमकृतात्म भिः॥ २८ ॥ अहंज्ञात्वानरव्याप्रवर्तमानमदूरतः ।। ब्रह्मलोकंनगच्छामित्वामदृष्ट्वाप्रियातिथिम् ।।२९|| त्वयाईपुरुपव्यामधार्मिकेणमहात्मना । समागम्यगमिप्यामित्रिदिवंचावरंपरम् ॥ ३० ॥ अक्षयानरशार्दूलजितालोकामयाशुभाः ॥ बायाश्चनाफपृष्ठयाश्रप्रतिगृह्णीप्यमामकान् ॥ ॥ ३१॥ एवमुक्तोनरव्याघ्रःसर्वशास्त्रविशारदः ॥ ऋपिणाशरभंगेनराघवोवाक्यमत्रवीत् ॥ ३२॥ दाता इन्द्रजी हमको ब्रह्मलोकमें ले जानेकी इच्छासे यहां आयेथे हमने उग्र तप करके उस लोकको जीत लियाहै कि, जिसका जीवना विना परमात्माके भजन किये बहुत दुर्लभहै ॥. २८ ॥ परन्तु हे पुरुपसिंह श्रीरामचन्द्रजी ! आप निकटही आगयेहैं यह जानकर आप सरीखे प्रिय पाहुनेके साथ विना मिले यस लोकको नहीं गया ॥ २९ ॥ हे पुरुषव्याघ्र ! आपही परम धर्मनिष्ठ और महात्मा, सो हमारे मनमें यहहै कि, आपसे मिलकर फिर स्वर्ग, या ब्रह्मलोक कहींको चले जायगे ॥ ३० ॥ हे नरश्रेष्ठ ! हमने स्वर्ग और ब्रह्मलोक इत्यादि जितने भर शुभ और अक्षय लोकहें सबहीको जर कर लियाहै तो अपनी तपस्यासे जीते हुए वह सब लोकही हम आपके अर्पण करते हैं आप उनको ग्रहण कीजिये ॥ ३१ ॥ महर्पि शरभंगजीने जय इस प्रकार का F+ सब मम शासो
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जाननेगले पुरुषश्रेष्ठ गमनन्दजी उनमे वोले ॥ ३२ ॥ हे महामुने ! यदि आप कहैं वो जो लोक आपने जीतेहैं. हम उन सबको यही बुलाद परन्तु इस
नमें आपकी आना लेकर हम बसना चाहतेहैं मो बताइये कि, कौनसे स्थानमें वासकरें ॥ ३३ ॥ इन्द्रकी समान बलवान घुनंदन श्रीरामचन्द्रजीने जब
इन प्रकार का नर फिर महापंडित शरभंगजी बोले ॥ ३४ ॥ हे श्रीरामचंद्रजी ! इस वनमें सुतीक्ष्णनामक परम तेजस्वी धार्मिक और जितेन्द्रिय एक महर्षि
राम करते हैं या तुम्हाग भला करेंगे और रहनेको स्थानभी बतायेंगे॥ ३५ ॥ और यह जो पुप्पो करके शोभित मन्दाकिनी नदी पूर्वकी ओरको वह रही है सो
किनारे २ ही चले जाइये यम महर्षि सुतीक्ष्णका आश्रम आजायगा ॥३६॥ हे पुरुषशार्दूल ! यहां जानेका यह मार्ग दृष्टि आता है हे तात ! सर्प जिस प्रकार
पुगनी नलीको छोडकर चला जाता है वैसेही हमभी इस समय यह पुराना देह छोडेंगे आप एक मुहूर्ततक हमारे ऊपर दृष्टि करके इस स्थानपर खडे रहिये ॥३७॥
अहमेवाहरिप्यामिसालोकान्महामुने|आवासंत्वहमिच्छामिप्रदिष्टमिहकानने।३३॥राघवेणेवमुक्तस्तुशक्रतुल्यवलेनवे॥ शरभंगोमहाप्राज्ञःपुन
साप्रसीदनः ॥३२॥ इहराममहातेजाःसुतीक्ष्णोनामधार्मिकः ॥ वसत्यरण्येनियतःसतेथेयोविधास्यति ।।३।। इमामंदाकिनीरामप्रतिस्रोतामनु
वज ॥ नहींपुप्पोपपदांततस्तगमिप्यसि ।। ३६॥ एपपंथानरव्याघमुहूर्तपश्यतातमाम् ॥ यावनहामिगाबाणिजीणांत्वचमिवोरगः॥ ३७॥
तनीग्निससमाधायहुत्वाचाज्येनमंत्रवत् ॥ शरभंगोमहातेजाःप्रविवेशहुताशनम् ॥ ३८॥ तस्यरोमाणिकेशांश्चतदावह्निर्महात्मनः॥ जीर्णात्वचं
नदस्थीनियचमांसंशोणितम् ।। ३९ ।। सचपावकसंकाशःकुमारःसमपद्यत ॥ उत्थायामिचयात्तस्माच्छरभंगोव्यरोचत ।। ४० ॥ सलो
कानाहितामीनामृषीणांचमहात्मनाम् ॥ देवानांचव्यतिक्रन्यब्रह्मलोकंव्यरोहत् ।। ४१ ॥ सपुण्यकर्माभुवनेद्विजर्पभःपितामहंसानुचरंददर्शह ॥
पितामहवापिसमीक्ष्यतंद्विजननंदसुस्वागतमित्युवाच ॥ ४२ ॥ इत्यार्प श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे पंचमःसर्गः ॥६॥
या कहार पाम तेजस्वी गरभंगजी पयाविधि अग्निमें ईधन लगाय मंत्र पढ घृतसे आहुतिदे उसमें प्रवेश करते हुए।॥३८॥ भगवान् अनिजीने क्षणमात्र ही उन महात्मा
गग्मंगनी नमस्त गये, केग, हली, मांम, रुधिर और पुरानी साल इत्यादि जलाडाली ॥ ३९ ॥ तव शरभंगजी साक्षात् अग्निकी समान मूर्तिमान् कुमारका रूप धारण
कर अमिर देरने निकल कर शोभा पाने लगे और उनका पहला रूप जाता रहा ॥ ४०॥ तिसके पीछे वह अग्निहोत्र करनेवाले महात्मा पिगणोंके और देवताओंके
गर गोकोको नारकर यमलोकको चले गये॥४१॥वहां जाकर पुण्यकर्म करनेवाले ब्राह्मणश्रेष्ठ शरभंगजीअनुचरवेष्टित पितामह ब्रह्माजीके दर्शन करते हुये ब्रह्माजीने
भी उन विजश्रेष्टके दर्शन कर उनको अपने घोरे पिठाप कुशल प्रश्नकर सब वृत्तांत पूछा।।४२॥इत्याचे श्रीमदावा आदि०अरण्यकांडे भापाटीकायां पंचमःसर्गः॥५॥
आर०क न०६ परभंगजी जब ब्रह्मलोकको चले गये, तब दंडकवनवासी मुनिगण इकडे होकर तेजसे देदीप्यमान रामचन्द्रजीकी शरणमें आये ॥१॥ उनमें वैखानस जो कि, ॥९॥ प्रजापतिके नोंसे उत्पन्न हुए थे, बालखिल्य जो रेतसे उत्पन्न हुए हैं कुछ सम्प्रक्षाल थे जो परमात्माके चरणोंके धोनेसे हुये थे कुछ मरीचिप थे जो सूर्य या चन्द्रमाकी किरणकोही पीकर रहते कुछ अश्मकुट्ट थे, जो पत्थरसे कूट २ कर कचाही अन्न भक्षण करते, कुछ पत्राहार तापस थे जो केवल पत्तेही भोजन करते ॥ २॥ कुछ दन्तोलूखली थे जिनके दांतही ओखलीकी समान थे अर्थात् कचा अन्न दातोंसेही चवा जाते थे, कुछ उन्मनक थे जो सदा कंठतक जलमें डूबे रहते, बहुत नारे गात्र शप्प थे जो पिना बिछाये पृथ्वी परही सोते, बहुत अशष्य थे जो सोतेही नहीं कुछ विछातेही नहीं, वैसेही पृथ्वीपर पडे रहते थे, बहुत अनवकाराक थे, जिनको येदाध्ययन और पूजा पाठ करनेसे छुट्टीही नहीं मिलतीथी॥३॥ बहुतसे मुनि जलाहारी थे जो जलही पीकर रहते कुछ वायुभोजी येजो केवल हवाही साकर जीते. जो शरभंगेदिवंप्राप्तेमुनिसंघाःसमागताः ॥ अभ्यगच्छंतकाकुत्स्थंरामज्वलिततेजसम् ॥ १॥ वेखानसावालखिल्या संप्रज्ञालामरीचिपाः॥ अश्म कुट्टाश्चवहवःपत्राहाराश्चतापसाः ॥२॥ दंतोलूखलिनश्चैवतथैवोन्मजकाःपरे ॥ गात्रशय्याअशय्याश्चतथैवानवकाशिकाः॥३॥मुनयःसलिला हारावायुभशास्तथापरे ॥ आकाशनिलयाश्चैवतथास्थंडिलशायिनः ॥ ४॥ तथोलवासिनोदांतास्तथाईपटवाससः ॥ सजपाश्चतपोनिष्ठास्त थापंचतपोन्विताः॥५॥ सर्वेत्राहयाश्रियायुक्तादृढयोगसमाहिताः॥ शरभंगाश्रमेराममभिजग्मुश्चतापसाः ॥६॥अभिगम्यवधर्मज्ञारामंधर्म भृतांवरम् ॥ ऊचुःपरमधर्मज्ञमृपिसंघा:समागताः॥७॥ त्वमिक्ष्वाकुकुलस्यास्यपृथिव्याश्चमहारथः।। प्रधानश्चापिनाथश्चदेवानांमधवानिव॥८॥ आकाशनिलय थे जो बिना ऊपर कुछ छायेछुये खुले मैदानमें पड़े रहते कुछ स्थण्डिलशायी जो पृथ्वीपर पडे रहते ॥ ४ ॥ कुछ उर्घबाहु जो कि सदा ऊपरहीको हाथ उठाये रहते, कुछ दान्तथे जिनकी इन्द्रिय सदा अपने २ समय परही अपनी २ वासनाको चाहतीं, कुछ कपि ऐसे थे जो सदा नीले वन पहरे रहते ऐसे बहुत जपी जो सदा जप किया करते कुछ तपोनिष्ठ थे जो सदा तपही करके भगवान्का ध्यान किया करते । कुछ पंचतपानुष्ठाई थे जो गरमियोंमें पंचामि तापा करते थे ॥ ५॥ यह जितने भर अपि लोग थे सवपर ब्राह्मी श्री विराजमान थी, सबके चिन दृढ योगाभ्यासमें लग रहे थे, यह तर तपस्वीगण शरभंगजीके आश्रममें आकर रामचन्द्रजीके शरणापन्न हुए ॥ ६॥ इस प्रकार धर्मात्मा अपिलोग सब वहां आकर धार्मिक श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजीने कुराल प्रश्न पूछकर बोले ॥ ७ ॥ हे परमधर्मज्ञ ! तुम रथी गणोंमें श्रेष्ठहो; इक्ष्वाकुकुलके मध्यमें प्रधानहो, इन्द्रजी जिस प्रकार संसारकी रक्षा करतेहैं मेही रामभी सप -
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आर०क स०७ निगगे हे गरण्य ! हम आश्रय लेनेकेलिये आपके निकट आयेहैं हे श्रीरामचंदजी ! आप हम लोगोंकी रक्षा कीजिये। क्योंकि निशाचरगण हम लोगोंका नाश किये नई ॥ १९ ॥ हे राजकुमार ! इस पृथ्वीपर आपके सिवाय हमारी कोई गति नहींहै हे रघुकुलचूडामणि ! राक्षसोंके हाथसे हम सबकी आप रक्षा करें ॥२०॥ धर्मात्मा काकुत्स्यनन्दन श्रीरामचन्द्रजी उन तपस्वी कपि लोगोंकी ऐसी विपद उनके मुखसे सुनकर सबसे बोले ॥२१॥ कि हमसे इस प्रकार कहनेकी आपको उ आवश्यकता नहीं है, हम तो आप लोगोंकी आज्ञाके पालन करनेवाले हैं सो केवल आप अपनेही कार्य करनेको हमें चाहे जिस वनको भेज दीजिये ॥२२॥ जपकि हम इस पनमें आयेहैं तब आप लोगोंको जो डर राक्षसोंसेहै उसहीको मिटाने के अर्थ व पिताजीकी आज्ञा पालनेके लिये इन दोनों कार्योंके अतिरिक्त और कार्य करनेको हम नहीं आये ॥ २३ ॥ हम जो इस वनमें आयेहें सो आप लोगोंके कार्यको साधन करनेहीके लिये आयेहैं क्योंकि जो पिताजीहीकी आज्ञा पालन ततस्त्वाशरणार्थवशरण्यंसमुपस्थिताः॥परिपालयनोरामवध्यमानान्निशाचरैः॥१९॥ परात्वत्तोगतिवीरपृथिव्यांनोपपद्यते । परिपालयनःसर्वा वाससेभ्योनृपात्मज ॥२०॥ एतच्छुत्वातुकाकुत्स्थस्तापसानांतपस्विनाम् ॥ इदंप्रोवाचधर्मात्मासर्वानेवतपस्विनः॥२१॥ नैवमर्हथमावक्तुमाज्ञा प्योदंतपस्विनाम् ॥केवलंनस्वकार्यणप्रवेष्टव्यंवनंमया ॥२२॥ विभकारमपाक्र९राक्षसैर्भवतामिमम्॥पितुस्तुनिर्देशकर प्रविष्टोहमिदंवनम् ॥२३॥ भवतामर्थसिद्धयर्थमागतोयदृच्छया ।तस्यमयंवनेवासोभविष्यतिमहाफलः ॥२४ ।। तपस्विनारणेशत्रून्हंतुमिच्छामिराक्षसान् ॥ पश्यतुवीय मृपयःसभातुमॆतपोधनाः॥२५॥ दत्त्वावरंचापितपोधनानांधौधृतात्मासहलक्ष्मणेन । तपोधनेश्चापिसहार्यदत्तःसुतीक्ष्णमेवाभिजगामवीरः॥ ॥२६॥ इत्या श्रीम० वा. आ० अर० पष्ठःसर्गः॥६॥रामस्तुसहितोमात्रासीतयाचपरंतपः ॥ सुतीक्ष्णस्याश्रमपदंजगामसहतैद्विजैः ॥१॥ करनी होती तो किसी और ही ओरको चले जाते, अब हमारा वनवास सफल हो जायगा क्योंकि आपका कार्यभी सधैगा ॥ २४ ॥ हमने वनमें तपस्वीलोगोंके गनु राक्षसोंके संहार करनेका संकल्प कियाहै तपोवलसे युक्त कपिलोग हमारे और हमारे भावाके बाहुबलको देखें ॥ २५ ॥ धर्मधुरन्धर वीर रामचन्द्रजी तपस्वी लोगोंको ऐसा वरदानदे उन लोगोंकी पूजा पातकर और उन्हें साथले लक्ष्मणके सहित सुतीक्ष्णऋपिके आश्रमकी ओर चले + ॥ २६ ॥ इत्या श्रीमामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे भापाटीकायां पष्ठः सर्गः ॥ ६ ॥ शत्रुओंके तपानेवाले श्रीरामचंद्रजी धाता लक्ष्मण, सीता और ब्राह्मणों के साथ पौपाई-भारत पपा मुनत रघुनायक । घोल वचन धरे धनुशायक ।। +दोहा-निशिचर होन करौं महि,भुज उठाय प्रण कोना सकल मुनिनके आश्रमन, जायजायसुखदीन । ॥ १
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प.रा.भा. आर० स०७ मीनाजी सदिन जो कि, हमने तपस्यासे पाये हैं उन सब देवपियों करके सेवित लोकोंमें आनन्दसे वस कर काल व्यतीत कीजिये ॥ १२॥ पुरन्दर इन्द्रजी जिस पार मामानीने घोटने हैं पैसेही आत्मज्ञांनी श्रीरामचन्द्रजी, कठोर तपके तेजसे प्रदीप्यमान सत्यवादी महर्षि सुतीक्ष्णजीसे बोले ॥ १३ ॥ महामुने ! जब हम पाहेंगे वर आपही उन लोकोंको ग्रहण कर लेंगे इस समय हम यह प्रार्थना करते हैं कि, इस समय इस वनमें हमारे रहनेको आप स्थान बतादीजिये ॥ १४ ॥ गौतमपंगीय महात्मा शरभंगजीके मुखसे हमने यह बात सुनी है कि, आप सबही कुछ वृत्तान्त जानते हैं, और सब प्राणियोंका हितसाधन करनेमें रत हैं ॥१५॥ जगत्मसिद्ध महर्पि सुतीक्ष्णजीसे जय रामचन्द्रजीने ऐसा कहा वो वह अतिशय आनन्दित होकर मधुर वचन बोले ॥ १६ ॥ श्रीरामचन्द्रजी! यही आश्रम बहु नही श्रेष्ठ है इसमें अनेकानेक ऋपि लोग वसते हैं और कन्द मूल फल भी इस आश्रममें सर्व समय बहुत सारे मिला करते हैं, अतएव तुम इस स्थान ही वसकर तमुग्रतपसंदीप्तमहर्पिसत्यवादिनम् ॥ प्रत्युवाचात्मवानामोब्रह्माणमिववासवः ॥ १३ ॥ अहमेवाहरिष्यामिस्वयंलोकान्महामुने ॥ आवासंत्व हमिच्छामिप्रदिष्टमिहकानने ॥ १४ ॥ भवान्सर्वत्रकुशल सर्वभूतहितेरतः ॥ आख्यातंशरभंगेनगौतमेनमहात्मना ॥ १५॥ एममुक्तस्तुरामे णमहर्पिलोकविश्रुतः ॥ अत्रवीन्मधुरंखाक्यंहर्पणमहतायुतः ॥ १६॥ अयमेवाश्रमोरामगुणवानम्यतामिति ॥ ऋषिसंघानुचरितःसदामूलफले युतः ॥ १७ ॥ इममाश्रममागम्यमृगसंघामहीयसः॥ अहत्वाप्रतिगच्छंतिलोभयित्वाकुतोभयाः ॥ १८॥ नान्योदोपोभवेदत्रमृगेभ्योन्यत्र विदिवे ।। तच्छुत्वावचनंतस्यमहर्लक्ष्मणाग्रजः ॥ १९॥ उवाचवचनंधीरोविगृह्यसशरंधनुः ॥ तानहंसुमहाभागमृगसंघान्समागतान् ॥२०॥ हन्यांनिशितधारेणशरेणानतपर्वणा ॥ भवांस्तत्राभिपज्येतकिंस्यात्कृच्छ्रतरंततः ॥ २१॥ एतस्मिन्नाश्रमेवासंचिरंतुनसमर्थये । तमेवमुक्त्वो परमंरामासंध्यामुपागमत् ॥ २२॥ विहार करो ॥ १७ ॥ इस आश्रममें अनेक बडे २ शरीरवाले मृगगण आकर निडर हो इधर उधर सबको अपने पसे लुभाते हुए घूमा करते हैं, उनसे कोई नहीं योलवा, और फिर भी लौट जाते हैं ॥ १८ ॥ अतएव आप जानलें कि, कुछ थोडा बहुत डर है भी वह केवल पशुगणोंकाही भय है इसके सिवाय इस स्थानमें और कोई भय नहीं है महर्पिके ऐमे वचन सुन श्रीरामचन्द्रजी ॥ १९ ॥ धनुष और शरग्रहण करके उनसे बोले कि, हे महानुभाव ! उन आये हुए मृगके गुण्डोंको ॥ २० ॥ आने पैने धारखाले वाणोंसे हम संहार कर डालेंगे परन्तु ऐसा करनेसे आपको कष्ट होगा सो इससे हमें बडा कष्ट होगा ॥ २१ ॥ यह वचन सुन कपिराज कुछ न बोले तर रामचन्दजीने जाना कि, मुनि मृगोंका वध नहीं चाहते तब उनसे बोले कि, इस मृगवाधित आश्रमपर बहुत दिनोंतक नागड्या नहीं है यह कहकर गमचन्द्रजी मध्या करनेको गये ॥ २२ ॥ सायंकालकी सन्ध्या करके श्रीरामचन्द्रनी वहीं सुतीक्ष्णजीक आश्रमपर लक्ष्मण और जानकीनी महिन मे ॥ २३ ॥ निमके पीछे मभ्या होने के पश्चात् जब रात्रि हो आईतब महात्मा सुतीक्ष्णजीने.आपही वपस्वियोंके भोजनकरने योग्य अन उनी पुरुपयों को प्रदान किया और बहुत भांतिम आदर भी करते हुए ॥२४॥ इत्यार्प श्रीमद्राव्याल्मी०आदि आरण्यकाण्डे भापाटीकायां सप्तमः सर्गः॥७॥ श्रीगमनजी मुतीग करके इस प्रकार पूर्व जाकर लक्ष्मणजीक सहित यह रात्रिइसी आश्रमपर व्यतीत करके प्रभात होतेही जागे ।। 3 11 और सीताजीके सहित सकामे पाश्रीगमनमजीने उन जटमे नान करा व हाथ पैर धो जो कि कमलोंकी सुवासने युक्तथा ॥ २॥ फिर श्रीरामचन्द्र लक्ष्मण और वैदेहीजी देवताओंके अन्याम्सपश्रिमांमध्यांतवासमकल्पयत् ॥ सुतीक्ष्णस्याथमेरम्येसीतयालक्ष्मणेनच ॥ २३ ।। ततःशुभंतापसयोग्यमनस्वयंसुतीक्ष्णःपुरुप पंभाभ्याम् ॥ नाभ्यांमुमत्कृत्यददामहात्मासंध्यानिवृत्तोरजनींसमीक्ष्य ॥ २६ ॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्य आर याड मनमःमर्गः ॥ ७ ॥ गमस्तुमहसौमित्रिःसुतीक्ष्णेनाभिपूजितः ॥ परिणाम्यनिशांतवप्रभातेप्रत्यबुध्यत ॥ १॥ उत्थायचयथा कालंगरयामहमीतया । उपस्पृश्शसुशीतनतोयेनोत्पलगंधिना ॥ २ ॥ अथतेनिंसुरांश्चैववैदेहीरामलक्ष्मणौ ।। काल्यंविधिवदभ्यर्च्यतपस्वि गणपने ॥ ३ ॥ वदयंतदिनकरंदृष्याविगतकल्मपाः ॥ सुतीक्ष्णमभिगम्येदंशक्षणवचनमब्रुवन् ॥४॥ सुखोपिताःस्मभगवस्त्वयापूज्येन प्रजिताः ॥ आपृच्छामःप्रयास्यामोमुनयस्वरयंतिनः ॥ ५॥ त्वरामहेवयंद्रष्टुकृत्स्नमाश्रममंडलम् ॥ ऋषीणांपुण्यशीलानांदंडकारण्यवासि नाम् ॥ ६॥ अभ्यनुतातुमिच्छामःसभिर्मुनिपुंगवः ॥ धर्मनित्येस्तपोदाँतैर्विशिखेरिवपावकः ॥ ७॥ अविषयातपोयावत्सूर्योनातिविरा जा ।। अमार्गणागतालक्ष्मीप्राप्येवान्यययर्जितः ॥ ८॥ कायोचित विमलानुसार अघि आदि देवताओं की पूजा उस तपस्वीमेनित वनमें करते हुए ॥ ३॥ और उदय होते हुए सूर्य भगवान के दर्शन कर निप्पाप वे कुमार सुती निकट आकर मिनीत मनोहर बननमें बोले ॥ ४॥ हे भगवन् ! आपके निकट पहुनई पाकर हम इस रात्रिमें यहां बहुत सुखसे बसे अब हम दण्डकारण्यमें नागे कारण भापकी अनुमनि चाहते हैं स्मोकि यह ऋषि लोग हमको चलनेके अर्थ शीवता करा रहे हैं ॥५॥ दण्डकारण्यवासी पवित्रस्वभाववाले ऋपि होगा गमा आश्रममण्डल दर्शन करने के लिये हमारी इच्छा हुई है मो हम उनको शीघ्र देखेंगे ॥ ६ ॥ अव इच्छाहै कि आप आज्ञा दे दें वोहम इन सब बिना वाली अपिक ममान भायुनः मत्यनित्र वा करके जिन्होंने अपनी इन्द्रियोंको जीव लियाहै ऐसे मुनिश्रेष्ठोंके साथ चले जाय॥७॥अन्याय करके प्राप्तहुई लक्ष्मीको पाकर आर०क ना.ग.भा. 1॥१२॥ स०८ जिस प्रकार पुरुपान पुरुषों के संबंध छोड मनुप्प असह हो उठता है, सो सूर्यका ताप वैसा असह न होते २॥८॥ हम यहांसे चलनेकी वासना करते हैं श्रीरामचन्द्रजीने यह कहकर टक्ष्मण और सीताजी के साथ सुनीक्ष्णजीके चरणोंकी वन्दना की ॥९॥मुनिश्रेष्ठ सुतीक्ष्णजीने चरणवन्दन करते हुए उन दोनों राम और लक्ष्मणजीको उठाकर गाठ आलिङ्गन किया और उनसे स्नेह साने वचन बोले ॥ १० ॥ हे श्रीरामचन्द्रजी ! लक्ष्मणजी और छायाके समान साथ चलनेवाली इन सीताजीके मंग आप निर्विन मार्गमें चले जाय ॥ ११ ॥ हे वीर ! योगमें जिनके चित्त लगे हुएहैं ऐसे दण्डकारण्यवासी इन सब ऋपियोंके रमणीय आश्रम देख आइये ॥१२॥ भोक प्रकारके बहुत कंद मूल फल सहित फूले हुए वनों में जिनमें भले २ श्रेष्ठ मृगगण रहते हैं और पक्षियोंके झुण्डके झुण्ड भरे हैं ॥ १३ ॥ जहां स्वच्छ जल तापदिच्छामहेगंतुमित्युक्त्वाचरणीमुनेः ॥ ववंदेसहसौमित्रिःसीतयासहराघवः ॥ ९॥ तौसंस्पृशंतीचरणावुत्थाप्यमुनिपुंगवः ॥ गाढमाश्लि प्यमस्नेहमिदंवचनमब्रवीत् ॥१०॥ अरिष्टंगच्छपंथानंरामसौमित्रिणासह ॥ सीतयाचानयासाधूछाययेवानुवृत्तया ॥ ११॥ पश्याश्रमपदंरम्यं दंडकारण्यवासिनाम् ॥ एपांतपस्विनांवीरतपसाभावितात्मनाम् ॥१२॥ सुप्राज्यफलमूलानिपुष्पितानिवनानिच ॥ प्रशस्तमृगयूथानिशांतप क्षिगणानिच ॥१३॥ फुल्लपंकजखंडानिप्रसन्नसलिलानिच ॥ कारंडवविकीर्णानितटाकानिसरांसिच॥१४॥ द्रक्ष्यसेदृष्टिरम्याणिगिरिप्रस्रवणा निन ॥ रमणीयान्यरण्यानिमयूराभिरुतानिच ॥ १५ गम्यतांवत्ससौमित्रेभवानपिचगच्छतु ॥ आगंतव्यंचतेदृष्ट्वापुनरेवाश्रमंप्रति ॥ १६ ॥ एवमुक्तस्तथेत्युक्त्वाकाकुत्स्थःसहलक्ष्मणः ॥ प्रदक्षिणमुनिकृत्वाप्रस्थातुमुपचक्रमे ॥ १७ ॥ ततःशुभतरेतूणीधनुपीचायतेक्षणा ॥ ददौसीता तयोर्भावो-खगौचविमलौततः ॥ १८ ॥ आवध्यचशुभेतूणीचापेचादायसस्वने ॥ निष्कांतावाश्रमातुमुभौतौरामलक्ष्मणौ ॥ १९ ॥ पाली वाल तलैयोंमें कमल फूल रहेहैं और उन्हीं तालावों पर हंस और कारंडवादि पक्षी विराजरहेहैं ॥ १४ ॥ और इनके अतिरिक्त देखनेमें अतिमनोहर पर्वतोंके भारने और जहां मोर शोर कर रहे हैं ऐसे वन भी आप देखेंगे ॥ १५ ॥ वत्स सौमित्रे ! गमन करो श्रीरामचन्द्रजी आपभी जांय, परन्तु इन सब आश्रमोंके दर्शन करके फिर भी इस स्थानमें आप लौटकर आवें ॥ १६॥ जब सुतीक्ष्णजी यह बोले तव श्रीरामचन्द्रजीने कहा कि ऐसाही होगा यह कहकर लक्ष्मणजीके साथ सुती गजीकी परिक्रमा कर जानेके लिये तैयार हुये ॥ १७ ॥ अनन्तर बडे २ नेत्रवाली सीताजीने दोनों भाइयोंको श्रेष्ठ तरकस धनुष और दो निर्मल खड्ग दिये जो कि रामपन्जीने पटक्ष्मणजीने खोलकर पर दियेये ॥ १८ ॥ वय श्रीरामचन्द्रजी व लक्ष्मणजी दोनों भ तर र ट : और ॥ १२ डाल यात्रा
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करनेके लिये आश्रमसे बाहर हुए ।। १९ ॥ रूपवान् दोनों रघुवीरोंने महर्षि सुतीक्ष्णजीकी आज्ञा पाकर धनुप बाण और असि धारण करके सीताजीके सहित शीय
मात्राझी ॥ २० ॥ इत्या श्रीमद्रा० वा० आ० आरण्यकाण्डे भाषाटीकायामष्टमः सर्गः ॥ ८॥ रघुनंदन रामचन्द्रजी जब सुतीक्ष्णजीकी आज्ञा लेकर यात्रा करने
हुए नव मीवाजी नेह साने मनोहर वचन श्रीरामचंद्रजीसे बोलीं ॥ १ ॥ यद्यपि आप अतिशय महात्मा हैं परन्तु परमसूक्ष्मरूपसे विचार कर देसनेसे आप अधर्मको
संचय करते हैं, इस समय कामजव्यसनसे निवृत्त होतेही यह अधर्म नहीं होगा ॥ २॥ कामज व्यसन तीन प्रकारके हैं मिथ्यावाक्य अर्थात झूठ बोलना व इससे
भी परम भारी और दो पाप हैं ॥ ३ ॥ परस्री गमन ( पराई ग्रीसे भोग करना) और विना वैरकेही वृथा प्राणीको मार डालना यह पाप बडे भारी हैं हे रघुनन्दन !
शीनंतीरूपसंपन्नावनुज्ञातामहर्पिणा ॥ प्रस्थितीधृतचापासीसीतयासहराघवौ ॥ २०॥ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्य
आरण्यकांडेऽष्टमःसर्गः ॥ ८॥ सुतीक्ष्णेनाभ्यनुज्ञातंप्रस्थितरघुनंदनम् ॥ हृद्ययास्निग्धयावाचाभर्तारमिदमत्रवीत् ॥ १॥ अधर्मतुसुम
क्ष्मणविधिनाप्राप्यतेमहान् ॥ निवृत्तेननशक्योयंव्यसनात्कामजादिह ॥२॥ त्रीण्येवव्यसनान्यद्यकामजानिभवत्युत ॥ मिथ्यावाक्यंतुपर
मंतस्माद्गुरुतरावुभौ ॥ ३ ॥ परदाराभिगमनंविनावरंचरौद्रता ॥ मिथ्यावाक्यंनतेभूतंनभविष्यतिराघव ॥ ४॥ कुतोभिलपणंत्रीणांपरंपांध
मनाशनम् ॥ तवनास्तिमनुप्येंद्रनचाभूत्तेकदाचन ।। ५॥ मनस्यपितथारामनचेतद्विद्यतेकचित् ॥ स्वदारनिरतश्चैवनित्यमेवनृपात्मज ॥६॥
धर्मिष्टःसत्यसंधश्वपितुर्निर्देशकारकः ॥ त्वयिधर्मश्चसत्यंचत्वयिसर्वप्रतिष्ठितम् ॥ ७ ॥ तच्चसर्वमहावाहोसत्यंवोटुंजितेंद्रियः ॥ तववश्येंद्रिय
वंचभूतानांशुभदर्शन ॥ ८॥ तृतीयंयदिदंरीदंपरप्राणाभिहिंसनम् ॥ निवरंक्रियतेमोहात्तचतेसमुपस्थितम् ॥९॥
आपने कभी मिथ्या वचन नहीं कहा न कभी आपआगेको कहेंगे ॥ ४ ॥ हे नरश्रेष्ठ ! और आप धर्मका नाश करनेवाला परस्त्रीगमन नहीं करते सो हे नरनाथ !
ना नो यह पात आपमें कभी हुई न होगी ॥५॥ आपने किसी कारण वश होकर मनके वीचमें भी पराई स्त्रीकी अभिलापा नहीं की। हे राजकुमार ! आप सदाही
अपनी नीमें अनुरागी रहते हैं ॥ ६॥ आप धर्मात्मा और सची प्रतिज्ञा करनेवाले हैं पिताजीकी आना पालन कर रहे हैं धर्म और सत्य सब आपमेंही टिके हुये
है ॥ ७ ॥ हे महापाहो ! जो लोग जितेन्द्रिय हैं वह लोगही इन सब बातोंका पालन कर सकते हैं । हे शुभदर्शन ! सब प्राणी आपकी जितेन्द्रियताको
जानते हैं ।। ८ । परन्तु विना अपराध प्राणियोंकी हिंसा करनेका जो यह भयानक तीसरा व्यसन है इस समय वही व्यसन आपमें उपस्थित हुआहै ॥ ९ ॥
रा.ग.मा. आर० गीर आपने प्रतिज्ञा की है कि, दंडकारण्यवासी ऋपि लोगोंकी रक्षा करनेके लिये युद्धर्मे हम राक्षसोंके प्राण संहार करेंगे॥ १०॥ इसी कारण आपने धनुप वाण ग्रहण कर लक्ष्मण सहित दण्डक नामसे जो वन विख्यात है उसमें यात्रा की है ।। ११ ॥ अतएव आपको यात्रा करते हुए देखकर और आपका अंगीकार पालन रूपवत जानकर आपके पारलौकिक और ऐहिक सुखके विषयमें हमारे मनको बडी चिन्ता होरही है ॥ १२ ॥ हे वीर | दंडकारण्यका जाना हमें अच्छा नहीं लगता सो इनका कारण भी कहती हैं आप श्रवण करें ॥ १३ ॥ हे महाराज ! आप धनुष वाण ग्रहण करके भाईके सहित वनको जायँगे वहां पर जो आप किसी राक्षसको देख पायेंगे वो कहीं न कहीं अवश्यही वाण त्याग करेंगे ॥ १४ ॥ निकट रक्खा हुआ काठ जैसे अनिके तेजको बढाता है वैसे ही यह धनुष जिसके पास रहता प्रतिज्ञातस्त्वयावीरदंडकारण्यवासिनाम् ॥ ऋपीणांरक्षणार्थायवधःसंयतिरक्षसाम् ॥ १०॥ एतनिमित्तंवचनंदंडकाइतिविश्रुतम् ॥ प्रस्थितस्त्वं सहभानाधृतवाणशरासनः ॥ ११॥ ततस्त्वांप्रस्थितंदृष्ट्वाममचिंताकुलंमनः ॥ तद्वृत्तंचिंतयंत्यावेभवेनिःश्रेयसंहितम् ॥ १२॥ नहिमेरोचते पीरगमनंदंडकान्प्रति ॥ कारणंतत्रवक्ष्यामिवदंत्याःथूयतांमम ॥१३॥ त्वंहिवाणधनुष्पाणिर्धात्रासहवनंगतः ॥ दृष्ट्वावनचरान्सन्किञ्चित्कुर्याः शरव्ययम् ॥ १४ ॥ क्षत्रियाणामिहधनुर्हताशस्येंधनानिच ॥ समीपतःस्थितंतेजोबलमुच्छ्रयतेभृशम् ॥ १५॥ पुराकिलमहावाहोतपस्वी सत्यवाञ्चुचिः ॥ कस्मिंश्चिदभवत्पुण्येवनेरतमृगद्विजे ॥ १६॥ तस्यैवतपसोविघ्नकर्तुमिंद्रःशचीपतिः ॥ खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमंभटरू पधृक् ॥ १७ ॥ तस्मिस्तदाश्रमपदेनिहित खड्गउत्तमः ॥ संन्यासविधिनादत्तःपुण्येतपसितिष्टतः ॥ १८॥ सतच्छस्त्रमनुप्राप्यन्यासरक्षणत त्परः॥ वनेतुविचरत्येवरक्षन्प्रत्ययमात्मनः ॥ १९ ॥ यत्रगच्छत्युपादातुमूलानिचफलानिच ॥ नविनायातितखगन्यासरक्षणतत्परः ॥२०॥ वहभी किसी न किसी पर चलायाही चाहता है क्योंकि क्षत्रियों के पास रहकर धनुष उनके बलको बढाताहै ॥ १५॥ हे महाबाहो ! पहले कोई मृग पक्षियों करके पुक्त पुण्यमय वनके वीच एक सत्यमें टिके हुए पवित्र आचरण करनेवाले तपस्वी रहतेथे ॥ १६ ॥ शचीपति इन्द्रजी इन ऋषिको तपस्यामें विघ्न करनेके लिये चोदाका वेप बनाय सङ्ग हाथमें लेकर उनके आश्रममें आये ॥ १७ ॥ और उस आश्रममें उस तपोनिष्ठ पवित्र मुनिके पास धरोहरकी भांति खड्ग रखकर चले गये ॥ १८॥ मुनिजी इस अस्त्रको पाकर इसकी रक्षा करनेके लिये बहुत यल करने लगे और विश्वासघातक न बनना पडे इस कारण इस अस्रको संगही लेकर वनमें घूमने लगे ।। १९ ॥ वद धरोहर वस्तुकी रक्षा करनेमें इतना यत्न करते कि जयक ॥ १०
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1.भा. आर० स०० सौभाने वाली कि, दंडकारण्यगमी मपि लोगों की रक्षा करनेके लिये युद्ध में हम राक्षसोंके प्राण संहार करेंगे ॥ १०॥ इसी कारण आपने धनुप वाण ग्रहण Reमहिला नाममें जो वन विभपात है उसमें यात्रा की है ॥ ११ ॥ अतएव आपको यात्रा करते हुए देखकर और आपका अंगीकार पालन रूपवत नारमा पाग्लोकिक और पहिक सुसंक विषयमें हमारे मनको बडी चिन्ता होरही है ॥ १२ ॥ हे वीर | दंडकारण्यका जाना हमें अच्छा नहीं लगता सो मामान भी रहती है आप भपण करें ॥ १३ ॥ हे महाराज ! आप धनुप वाण ग्रहण करके भाईके सहित वनको जायँगे वहां पर जो आप किसी राक्षसको गाने को कहीं न कहीं अपरपही पाण त्याग करेंगे ॥ १४ ॥ निकट रक्खा हुआ काठ जैसे अमिक तेजको बढाता है वैसे ही यह धनुष जिसके पास रहता प्रनितातस्तवावीरदंडकारण्ययामिनाम् ॥ऋपीणांरक्षणार्थायवधःसंयतिरक्षसाम् ॥ १०॥ एतनिमित्तवचनंदंडकाइतिविश्रुतम् । प्रस्थितस्त्वं मदभागातयाणशरामनः ॥ ११॥ ततस्त्वांप्रस्थितंदृष्ट्वाममचिंताकुलंमनः ॥ तद्वृत्तंचिंतयंत्यावैभवेनिःश्रेयसंहितम् ॥ १२ ॥ नहिमेरोचते रिगमनंदंडकान्प्रति ॥ कारणंतत्रवक्ष्यामिवदंत्याःश्रूयतांमम ॥१३॥ त्वंहिवाणधनुष्पाणिर्भावासहवनंगतः ॥ दृष्ट्वावनचरान्सर्वान्कञ्चित्कुर्याः शव्ययम् ॥ १४ ॥ भत्रियाणामिहधनुर्हताशस्येंधनानिच ॥ समीपतःस्थितंतेजोवलमुच्छ्रयतेभृशम् ॥ १५॥ पुराकिलमहाबाहोतपस्वी मत्यानिः ॥ कस्मिंश्चिदभवत्पुण्येवनेरतमृगद्विजे ॥ १६॥ तस्येवतपसोविघ्नकर्तुमिंद्रःशचीपतिः ॥ खड्गपाणिरथागच्छदाश्रमभटरू पपुर ॥ १७॥ तस्मिंस्तदायमपदेनिहितःखनउत्तमः ॥ संन्यासविधिनादत्तःपुण्येतपसितिष्टतः॥ १८॥ सतच्छस्त्रमनुप्राप्यन्यासरक्षणत त्परः ॥ वनेतुविचरत्येवरक्षन्प्रत्ययमात्मनः ॥ १९ ॥ यत्रगच्छत्युपादातुमूलानिचफलानिच ॥ नविनायातितखगन्यासरक्षणतत्परः ॥२०॥ ६सी किनी न किमी पर चलायाही चाहता है क्योंकि क्षत्रियोंके पास रहकर धनुप उनके बलको बढाताहै ॥ १५॥ हे महावाहो ! पहले कोई मृग पक्षियों करके पुन पुग्यमय पनके बीच एक नत्यम टिके हुए पवित्र आचरण करनेवाले तपस्वी रहतेथे ॥ १६ ॥ शचीपति इन्द्रजी इन ऋपिको तपस्यामें विन्न करनेके लिये गोगा ये पनाप सन हायमें लेकर उनके आश्रममें आये ॥ १७ ॥ और उस आश्रममें उस तपोनिष्ठ पवित्र मुनिके पास धरोहरकी भांति खड्ग रखकर चले का॥10॥ मुनिजी इन अनको पाकर इनकी रक्षा करने के लिये बहुन यत्न करने लगे और विश्वासघातक न बनना पढे इस कारण इस अम्रको संगही लेकर नगमने हो॥10॥ पादर, दम्नुकी रक्षा फरनेमें दनना यन्न । .
----- सादाका मेष मनाय बना हायमें लेकर उनक आभममें आगे ॥ १७॥और उग पाश्रम पोनिष पनि पनि माग - गये ॥10॥ बनिनीमा लगाmum- नहीं करतेथे ॥ २० ॥ सदा सङ्ग संग लिये फिरनेमे सहज २ में मुनिका विश्वास तप करनेसे हट गया और उनका स्वभाव कठोर होगया ॥२१॥ तिसके पीछे वह उमी गरमे प्राणियोंको मारने लगे और मतवालेसे होगये और अधर्मसे घिर शस्त्र साथ रखनेसे अंत समय नरक को गये ॥ २२ ॥ शस्त्रको पास रखनेसे पहले ऐसा हुआया इमही कारणमे पंडिन लोग शमसंयोगको अभिसंयोगकी समान विकारका हेतु कहा करते हैं ॥ २३ ॥ हे प्राणनाथ ! हम आपसे बहुत स्नेह करती हैं इस कारण आपको स्मरण दिलाती है कुछ हम आपको शिक्षा नहीं करती ! हे वीर ! आप धनुप धारण करके ऐसा कार्य मत कीजिये ॥ २४ ॥ निरपराध दंडकवासी गमोंको माग्नेका विचार मत कीजिये. हे वीर ! विना अपराध किसीको भी वध करना आपको उचित नहीं है ॥ २५ ॥ वनमें विचरते हुए क्षत्रियोंका धनुष धारण करना निरपराध जीवोंको मारनेके लिये नहीं वरन दुःसी लोगोंकी रक्षाही करनेके लिये है।। २६ ॥ वनवासीको क्या शन्न धारण करना उचितहै तपस्वि नित्यंशघ्रपरिवहनुक्रमेणसतपोधनः । चकाररौद्रीस्वांबुद्धित्यक्त्वातपसिनिश्चयम् ॥२१॥ ततःसरौद्राभिरतःप्रमत्तोधर्मकर्पितः॥ तस्यशस्त्रस्यसं वासावगामनरकंमुनिः।। २२॥ एवमेतत्पुरावृत्तंशस्त्रसंयोगकारणम्॥ अनिसंयोगवद्धेतुःशस्त्रसंयोगउच्यते ॥२३॥ स्नेहाच्चबहुमानाच्चस्मारये वानशिवये ।। नकथंचनसाकार्याग्रहीतधनुपात्वया॥२४॥ वुद्धिवरविनाहंतुंराक्षसान्दंडकाश्रितान्॥अपराधविनाहंतुंलोकोवीरनमस्यते॥२५॥ भत्रियाणांतुषीगणांपनेपुनिपतात्मनाम् ।। धनुपाकार्यमेतामदार्तानामभिरक्षणम् ॥२६॥ कचशस्त्रंकचवनकचक्षात्रंतपःवच॥व्याविद्धमिदमस्मा भिर्देशधर्मस्तुपूज्यताम्॥२७॥कदर्यकलुपादिर्जायतेशस्त्रसेवनात्॥ पुनर्गत्वात्वयोध्यायांशत्रधर्मचरिप्यसि ॥२८॥अक्षयातुभवेत्प्रीतिःचथ अशुयोर्मम ॥ यदिराज्यहिसंन्यस्यभवेस्त्वंनिरतोमुनिः॥२९॥धर्मादर्थ-प्रभवतिधर्मात्प्रभवतेसुखम् ॥ धर्मेणलभतेसर्वधर्मसारमिदंजगत् ॥ ॥३०॥आत्माननियमस्तेस्तैःकर्पयित्वाप्रयत्नतः॥ प्राप्यतेनिपुणेर्धमानसुखाल्लभतेसुखम् ॥ ३१ ॥ योमें क्या क्षत्रियोंका स्वभाव गोभा पावाहै ? कहां शम्र कहां वन ? कहां क्षत्रियधर्म ? कहां तप ? यह सब कर्म एक दूसरेसे विरुद्धहैं इससे वनका ही धर्म यहां पर बनना चाहिये ॥ २७ ॥ परावर गग्रका व्यवहार करनेसे बुद्धि कादर और मलिन होजातीहै जब आप अयोध्याजीको लौट चलें तब फिर क्षत्रियोंके धर्मका आचरण कर लेना ॥ २८ ॥ आप राज्यपरित्याग करके जो यहां पर ऋपियोंके धर्मका आचरण करेंगे तो हमारे सास और श्वशुर दशरथजीकी प्रीतिभी आपमें अधिक होगी। क्योंकि उन्होंने भी यही आतादीहै कि मुनिषेप धारण कर वनमें वसो ॥२९॥ धर्मसेही अर्थकालाभ होताहै धर्मसेही सुख उत्पन्न होताहै. वरन् धर्मसे ही सब कुछ गन होजाना दम कारण धर्मही मंसारमें एक मात्र सार वस्तु है अतएच.आपभी धर्मका ही आचरण कीजिये ॥ ३० ॥ चतुर मनुष्य बहुत यत्नसे शरीरको कष्ट दे दुर्वल 形形***** पा.ग.भा. आर० स०१ करके धर्मका लाभ करतेहैं, क्योंकि शारीरिक सुखजनक उपायसे धर्म प्राप्त नहीं होता . ॥ ३१ ॥ हे प्रियदर्शन ! तुम सदा शुद्धचित्त होकर, तपोवनमें करने योग्य जो धर्मानुष्ठानहैं उनके करनेमें मन लगाओ त्रिभुवनके सूक्ष्मातिसूक्ष्म सब विषयही आपको विदितहैं तब फिर कौन धर्मविपयमें आपको समझा सकता है ? ॥ ३२॥ हम न केवल सियों के स्वभावसे जो चंचलता होतीहै उसकेही वश होकर ऐसा कहा इस समय अनुज लक्ष्मणके साथ विचार करके जो उचित समझा जाय, विलम्ब न लगाकर उसको कीजिये ॥ ३३ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां नवमः सर्गः ॥ ९ ॥ पतिकी भक्ति करनेवाली मैथिली जानकीजीके ऐसे वचन कहनेपर परम धर्मनिष्ठ रामचन्द्रजी उनको सुनकर अपनेको भली भांति समाहत जान उत्तर देतेहुर ॥ १॥ हे धर्मने देवि जानकी! नुमने स्नेह वचनसे क्षत्रियकुलका धर्म बताकर जो कुछ कहा वह सबही हितकारी और बहुत अच्छाहै ॥ २॥ किन्तु देवी ! कोई नित्यंशुचिमति सौम्यचरधर्मतपोवने॥ सर्वतुविदितंतुभ्यं त्रैलोक्यमपितत्त्वतः॥३२॥ स्वीचापलादेतदुदाहृतंमेधर्मचवक्तुंतवकःसमर्थः ॥ विचार्य बुद्धयातुसहानुजेनयद्रोचतेतत्कुरुमाचिरेण ॥ ३३॥ इत्याचे श्रीमवा० आ० आरण्यकांडे नवमः सर्गः ॥ ९॥ वाक्यमेतत्तुवैदेयाव्याहृतंभर्तृ भक्तया ॥ श्रुत्वाधस्थितोराम प्रत्युवाचाथजानकीम् ॥ १॥ हितमुक्तत्वयादेविस्निग्धयासदृशंवचः ॥ कुलंव्यपदिशंत्याचधर्मज्ञेजनकात्म जे ॥२॥ किंनुवक्ष्याम्यहंदेवित्वयैवोक्तमिदंवचः ॥ क्षत्रियेर्धार्यतेचापोनातशब्दोभवेदिति ॥३॥ तेचादिंडकारण्येमुनयःसंशितव्रताः॥ मांसीतेस्वयमागम्यशरण्यंशरणंगताः॥ ४॥ वसंतःकालकालेपुवनेमूलफलाशनाः ॥ नलभंतेसुखंभीरुराक्षसे क्रूरकर्मभिः॥५॥ भक्ष्यंतेराक्ष सभामर्नरमांसोपनीविभिः ॥ तेभक्ष्यमाणामुनयोदंडकारण्यवासिनः ॥ ६॥ अस्मानभ्यवपद्यतेमामूचुर्द्विजसत्तमाः ॥ मयातुवंचनं श्रुत्वातेपा मेवंमुखाच्युतम् ॥ ७ ॥ कृत्वावचनशुश्रूपांवाक्यमेतदुदाहृतम् ॥ प्रसीदंतुभवंतोमेहीरेपातुममातुला ॥ ८॥ दुःसिन होकर वचन न सुनावे इसही कारण क्षत्रियलोग धनुप धारण करते हैं सो यह वार्ता कहकर तुमने स्वयंही अपने प्रश्नका उत्तर देलियाहै फिर भला हम और क्या उत्तरदें ॥ ३ ॥ दंडकारण्यके रहनेवाले महातपस्वी ऋपि लोग दुःखित होकर स्वयंही यहां आकर हमको सबका शरण देनेवाला समझ हमारी शरण आये॥ १ ॥ अपि भीरु ! वह लोग नित्य फल मूल भक्षण करके घनमें वास करतेहैं, परन्तु क्रूरकर्म करनेवाले राक्षसोंके उपद्रव करनेसे वह मुनिगण सुख नहीं पा सकते ॥ ॥ ५॥ इसके मिवाय राक्षस नरमांसभोजी वो होतेही हैं सो वैसे नरमांसोपजीवी भयंकर स्वभाववाले राक्षसोंसे अनेक मुनि लोग भक्षण किये गये हैं ॥६॥ उनसे पचेरुचे दंडकारण्यवामी मुनि लोगोंने हमारे निकट आ हममे यह सप दुःखकानांत कहा नब हम उनके ऐमे यचन सन ॥ ७ ॥ उनकी प्र मार र उनसे --- बोले कि आप हम पर प्रसन्न हूजिये हमको बहुवही उजा आतीहै कि आपके पेने दुःखित वचन सुनें ॥ ८ ॥ क्योंकि आप लोग स्वभावसेही हम लोगोंके पूज्य हैं किन्तु हम ममय आप हमारीशरणमें आये अनन्तर हमने उनके सामनेही कहा कि हमें क्या करना होगा सोआज्ञा कीजिये ।। ९ ॥ तत्र सबहीने एकत्रहो मिल कर कहा राम ! दंडकारण्यमें बहुसंख्याक कामरूप निशाचरोंने एकत्र होकर अतिशय कष्ट देना आरंभ कियाहै ॥ १० ॥ आप उनके हाथोंमे हमारा उद्धार कीजिये । है अनय ! होम करनेके काल और पौर्णमासी अमावास्याके दिन जब हम यज्ञ करने लगतेहैं ॥ ११॥ तब वह मांसके सानेवाले राक्षस लोग आय २ कर हठसहित पनाविध्वंस करते और हमको सताते हैं अतएव इन राक्षसोंमे व्याकुल महातपस्वी लोगोंको ॥ १२ ॥ आप चाइये| उन लोगोंको हम पराजिव नहीं कर सकते तपमें रत अपिगण इस प्रकार राक्षसोंके दुःख फंदमें फँसकर छुटकारा पानेकी वासनासे आपकी शरण लेते हैं यदीडशेरहंविरुपस्थेयरुपस्थितः ॥ किंकरोमीतिवमयाव्याहृतंद्विजसंनिधौ॥९॥ सर्वेरेवंसमागम्यवागियंसमुदाहृता ॥राक्षसेदंडकारण्येवहुभिः कामरूपिभिः ॥ १०॥ अर्दिताःस्मभृशंरामभवानस्तत्ररक्षतु ॥ होमकालेतुसंप्राप्तेपर्वकालेपुचानघ॥ ११॥ धर्पयंतिस्मदुर्धर्षाराक्षसाःपिशिता शनाः।। राक्षसेर्धपितानांचतापसानांतपस्विनाम् ॥१२॥ गतिमृगयमाणानां भवान्नःपरमागतिः॥कामंतपःप्रभावेणशक्ताहंतुंनिशाचरान् ॥१३॥ चिरार्जितंनचेच्छामस्तपःखंडयितुंवयम् ॥ बहुविनन्तपोनित्यंदुश्चरंचेवराधव ॥२॥ तेनशानमुंचामोभक्ष्यमाणाश्चराक्षसेः ॥ तदद्यमानानक्षो भिदंडकारण्यवासिभिः॥ १५॥ रक्षकस्त्वंसंचभ्रात्रात्वन्नाथाहिवयंवने ॥ मयाचेतद्वचःश्रुत्वाकात्स्न्येनपरिपालनम् ॥१६॥ऋपीणांदंडकारण्येसं श्रुतंजनकात्मजे । संश्रुत्यचनशक्ष्यामिजीवमानःप्रतिश्रवम् ॥ १७ ॥ आपही हम लोगोंके परम गति, यद्यपि हम तपस्याके प्रभावसे स्वयंभी राक्षसोंका संहार कर सकते हैं ॥ १३ ॥ तथापि बहुत कालकी बटोरी हुई तपस्याके क्षय करनेको हमारा अभिलाप नहीं होता । हेरघुनन्दन ! तपस्या जैसे कि वहुत कष्टोंसे इकट्ठी होतीहै वैसेही इकट्ठा करनेके समय इसमें अनेक विनभी होतेहैं ॥ १४ ॥ इसी कारणमे राक्षम लोग खाभी लेतेहैं पर हम उनको शाप देकर नहीं मारते, क्योंकि तपका फल शाप देनेसे नहीं रहता तिससे दंडकारण्यवासी राक्षसोंसे मताये हुए हम लोगोंकी ॥ १५॥ माता लक्ष्मणके सहित आप रक्षा करें क्योंकि आपही हमारे रक्षाकर्ता हैं जब हमने मुनियोंके ऐसे वचन सुने तत्र उनसे कहा कि, आप लोगोंका पाटन हम सब प्रकारमे करेंगे ॥ १६ ॥ हे जानकी ! हमने दंडकारण्यवासी तपस्विगणोंकी यह वार्ना सुनकर उनकी रक्षा करनेकी प्रतिज्ञा की 14 ४ आर० स०१ है, सो प्राण रहते इस प्रतिज्ञाके पालन करनेमें किसी भांति विमुख नहीं होंगे ॥ १७ ॥एक तो पिगणों के सामने प्रतिज्ञा फिर उसमें मत्यही हमाराभी परन अभीष्ट है । फिर भला हम इसके विपरीत कैसे कर सकते हैं ? हे सीते ! तुम्हें, लक्ष्मणको और अपने प्राणको भी हम त्याग कर सकते हैं ॥ १८ ॥ परन्तु प्रतिज्ञा करके विशेषतः ब्राह्मणों के विषयमें सो हम कभी त्याग नहीं कर सकते तिससे अपिलोगोंका पालन करना हमारा परम कार्य है ॥ १९ ॥ पि लोगाके न कहने पर भी जब कि, सबही भांतिसे उन लोगोंकी रक्षा करना हमारा आवश्यकीय कार्य है, फिर भला प्रतिज्ञा करके किस प्रकार उन कार्यमे विनुसहों जो हो हे सीते ! तुमने हमारे प्रति स्नेह और सौहार्दसे जो वचन कहे सोभी हमने जाने ॥ २० ॥ इससे हम बहुत सन्तुष्ट हैं, क्योंकि कोई भी कुप्यारे मनुप्यते हित मुनीनामन्यथाकर्तुसत्यमिष्टंहिमेसदा ॥ अप्यहंजीवितंजह्यांत्वांवासीतेसलक्ष्मणाम् ॥ १८॥ नतुप्रतिज्ञांसंश्रुत्यत्राह्मणेभ्योविशेषतः ॥ तदन श्यमयाकार्यमपीणांपरिपालनम् ॥ १९ ॥ अनुक्तेनापिवैदेहिप्रतिज्ञायकथंपुनः ॥ ममस्नेहाचसौहार्दादिदमुक्तंत्वयावचः॥ २० ॥ परितुष्टो स्म्यहंसीतेनानिष्टोनुशास्यते ॥ सदृशंचानुरूपंचकुलस्यतवशोभने ॥ सधर्मचारिणीमत्वंप्राणेभ्योपिगरीयसी ॥ २३ ॥ इत्येवमुक्त्वावचनं महात्मासीतांप्रियांमैथिलराजपुत्रीम् ॥ रामोधनुष्मान्सहलक्ष्मणेनजगामरम्याणितपोवनानि ॥ २२ ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकांडे दशमः सर्गः॥ १० ॥ अग्रतःप्रययौरामःसीतामध्येसुशोभना ॥ पृष्टतस्तुधनुष्पाणिर्लक्ष्मणोनुजगामह ॥ १ ॥ तौपश्यमानौविविधाशेलप्रस्थान्वनानिच ॥ नदीश्वविविधारम्याजग्मतुःसहसीतया ॥२॥ सारसांश्चक्रवाकांश्चनदीपुलिनचारिणः ॥ सरांति चसपद्मानियुतानिजलजेःखगेः ॥३॥ कारी वचन नहीं कहता । हे शोभने ! तुमने हमसे अपने वंशके योग्य उचित वचनही कहे हैं तुम हमारी धर्मचारिणी हो, हम तुमको प्राणभी अधिक प्यारा समझते हैं ॥ २१ ॥ धनुप धारण किये हुए महानुभाव श्रीरामचंद्रजी जनकदुलारी सुकुमारी सीताजीसे इस प्रकारके वचन कहकर टक्ष्मणजीरे सहित परम रमणीय तपोवनों में गमन करते हुए ॥ २२ ॥ इत्याएँ श्रीमद्रामायणे पाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां दशमः सर्गः ॥ १० ॥ श्रीरामचन्द्रजी आगे, सुशोभित सीताजी बीचमें और लक्ष्मणजी धनुप धारण करके पीछे २ जाने लगे ॥३॥ उन दोनों भाइयोंने जानकीजीफे सहित जानेके समय विविध भांतिके पर्वत, वन, नदी, नालाय आदि देखे ॥ २॥ मारम और पकया, पकवी नदियों के किनारे पम रहे और फमलालले जल मरगाती ॥ ॥
REt. आदिको करके युक्त सरोवर देखे ॥ ३॥ चीता, वाघ आदिकोंके झुण्डके झुण्ड, सुविशाल शींग जिनके ऐसे मदसे उन्मद असे वराह और वृोंके वैरी हायी ॥४॥ देसने दिसाते चले तिसके पीछे जर दिवाकर अस्ताचलंसम्मुखीन हुए वत्र रामचन्द्र लक्ष्मण व सीवाजीने बहुत दूर चलकर एक योजनमें विस्तार जिसका ऐसा एक तालाब देसा ॥५॥ उस वालायमें हाथियोंके झुण्डके झुण्ड नहा रहे, बहुत सारे लाल और श्वेत कमलफूल खिल रहे जलपक्षी सारस और हंस कल्टोलें कर रहेथे ॥६॥ और उसका जल अतिनिर्मल था श्रीरामचन्द्र लक्ष्मण व जानकीजीने उस रमणीय सरोवरपर गीत और बाजेका शब्द सुना, परन्तु कोई गाने बजानेवाला दिसाई न दिया ।। ७ ॥ महारथी श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मणजी दोनों कौतुहलके वश होकर धर्मभृत् नामक ऋपिसे पूछते हुए ॥ ८ ॥ हे महर्षे ! यह बडे आचर्यका शब्द सुनकर हम । यूथबंधाचपृपतांमदोन्मत्तान्विपाणिनः ॥ महिपश्चिवराहांश्चगजांश्चद्रुमवेरिणः ॥ ४ ॥ तेगत्वादूरमध्वानलंबमानेदिवाकर ॥ ददृशुःसहिता रम्यंतटाकंयोजनायतम् ॥ ६॥ पद्मपुष्करसंवाधंगजयूथैरलंकृतम् ॥ सारसेहंसकादंवेःसंकुलंजलजातिभिः ॥ ६॥ प्रसन्नसलिलेरम्येतस्मि न्सरसिशुभुदे ।। गीतवादिवनिोपोनतुकश्चनदृश्यते ॥ ७॥ ततःकौतूहलादामोलक्ष्मणश्चमहारथः ॥ मुनिधर्मभृतनामप्रष्टुंसमुपचक्रमे ॥८॥ इदमत्यद्भुतंश्रुत्वासर्वपांनोमहामुने ॥ कौतूहलंमहाजातंकिमिदंसाधुकथ्यताम् ॥ ९॥ तेनेवमुक्तोधर्मात्मारायवेणमुनिस्तदा ॥ प्रभावंसरसः क्षिप्रमाख्यातुमुपचक्रमे ॥ १० ॥ इदंपंचाप्सरोनामतटाकंसार्वकालिकम् ॥ निर्मितंतपसाराममुनिनामांडकर्णिना ॥ ११ ॥ सहितेपेतपस्ती मांडकर्णिमहामुनिः ॥ दशवर्षसहस्राणिवायुभक्षोजलाशये ॥ १२ ॥ ततःप्रव्यथिताःसर्वेदेवाःसामिपुरोगमाः ॥ अत्रुवन्वचनंसर्वेपरस्परस मागताः ॥ १३ ।। अस्माकंकस्यचित्स्थानमेपप्रार्थयतेमुनिः ॥ इतिसंविनमनसःसर्वेतत्रदिवौकसः ॥ १४ ॥ ततःकर्तुतपोविनंसर्वदेवेनियो जिताः ॥ प्रधानाप्सरस-पंचविद्युचलितवर्चसः ॥ १५॥ मरकोही पग कौतूहल हुआहे ? अवएव इस घटनाका सविशेप समस्त वर्णन कीजिये ।। ९ ॥ जय श्रीरामचंदजीने इस प्रकार कहा वर धर्मात्मा ऋपि तत्क्षण इस सरों परके प्रभावका वर्णन करने लगे ॥ १० ॥ कपि बोले हे रामचंद्रजी ! इस तडागका नाम पंचाप्सरहै इसमें सदा जल रहताहै कभी सूखता नहीं । महर्षि माण्डक निने तपोपटने इसको बनायाहै ॥ ११ ॥ वह महामुनि माण्डकर्णि दशहजार वर्ष केवल पवन भोजन करते यहां रह कठोर तप करते रहे ॥ १२ ॥ इस तरस्याते| न्त्र, वरुण, कुबेर, अनि सूर्यादि देववा सब बहुतही व्यथित होकर परस्पर इकट्ठे होकर कहने लगे ॥ १३ ॥ यह ऋपि हमसे किसीका पद पानेके लिये तप कर नहै । इस प्रकार निभय करके देवताओंके अंतःकरण महाउदिन होगये ॥ ३४ ॥ तब उन सब देवताओंने मिलकर उनके तपमें विन करनेकी अभिलाप.ते, विज .भा. आर० मीही गमान प्रभाराली पांच मुल्य अप्नराओंको भेजा ॥ १५ ॥ अप्सराओंनेभी देवताओंका कार्य सिद्ध करनेके लिये अपने और पराये विपयके जाननेवाले महर्षि पाणिनीको मदनके मदमे मतवाला कर दिया ॥ १६ ॥ कपिजीने उन पांचों अप्सराओंको अपनी स्त्रीकी भांति ग्रहण करके उनके लिये इस सरोवरमें न दीखने पाटा एन्दर पर बनाया ॥ १७ ॥ पांचों अप्सरायें यथासुखसे इस गृहमें वास करके तपके प्रभावसे युवा अवस्थाको प्राप्त हुए उन ऋपिका मन मुदित करनेको उनके मंग विहार करने लगीं ॥ १८ ॥ मुनिजीके सहित विहार करती हुई उन अप्सरा गणोंकेही वाजे बजाने और गानेका यह शब्दहै, व उन्हींके गहनोंका यह मनोहर शब्द सुनाई देताहै ॥ १९ ॥ महायशस्वी श्रीरामचंद्रजी भाता लक्ष्मणजीके सहित विशुद्ध चित्त महर्पिजीकी इस कथाको सुन बडा अचरज पाते हुए। अप्सरोभिस्ततस्ताभिर्मुनिर्दृष्टपरावरः॥ नीतोमदनवश्यत्वंदेवानांकार्यसिद्धये ॥ १६ ॥ ताश्चैवाप्सरसःपंचमुने पत्नीत्वमागताः ॥ तटाके निर्मितंतासांतस्मिन्नंतर्हितंगृहम् ॥ १७ ॥ तत्रैवाप्सरसःपंचनिवसंत्योयथासुखम् ॥ रमयंतितपोयोगान्मुनियौवनमास्थितम् ॥ १८॥ तासां संक्रीडमानानामेपवादित्रनिःस्वनः ॥ श्रूयतेभूपणोन्मिश्रीगीतशब्दोमनोहरः ॥ १९ ॥ आश्चर्यमितितस्यैतद्वचनंभावितात्मनः ॥ राघ वःप्रतिजग्राहसहभाबामहायशाः ॥२०॥ एवंकथयमानःसददर्शाश्रममंडलम् ॥ कुशचीरपरिक्षितंबायालक्ष्म्यासमावृतम् ॥ २१ ॥ प्रविश्य सहदेद्यालक्ष्मणेनचराघवः ॥ तदातस्मिन्सकाकुत्स्थ श्रीमत्याश्रममंडले ॥ २२ ॥ उपित्वाससुखंतवपूज्यमानोमहर्मिभिः ॥ जगामचाथ मांस्तेपांपर्यायेणतपस्विनाम् ॥ २३ ॥ येपामुपितवान्पूर्वसकाशेसमहास्ववित् ॥ कचित्परिदशान्मासानेकसंवत्सरंवचित् ॥ २४ ॥ कचिच्च नतुरोमासान्पंचपदचपरान्कचित् ॥ अपरत्राधिकान्मासानध्यर्धमधिकंक्वचित् ॥२५॥ त्रीन्मासानटमासांश्चराघवोन्यवसत्सुखम् ॥ तत्र संवसतस्तस्यमुनीनामाश्रमेपुवै.॥२६॥ ॥ २० ॥ और कैसे अचरजकी बातहै यह कहते २ चारों ओर कुश चीर जिनमें पडे, ब्राझीशोभासमन्वित आश्रममंडलको श्रीरामचंद्रजी देखते हुए ॥ २१॥ वह बहुत गीय माता लक्ष्मण और भार्या जानकीजीके सहित वनशोभासम्पन्न आश्रमोंमें प्रवेश करते हुए ॥ २२॥ जब वहां ऋपियोंने कंद मूल फलोंसे उनकी पूजाकी तप रामचन्द्रजी यहां सुससे बसे, फिर वारी २ से रामचन्द्रजी सवही ऋपियोंके आश्रमोंपर गये और पूजा पाते हुए ॥ २३ ॥ वह महास्वपित् श्रीरामचन्द्रजी पहले जिनके आश्रममें पीय, उम ममय फिर उनके आश्रममें जाते हुए । वह किसी आश्रममें पूरे दश महीने, कहीं पूरे वर्षभर ॥ २४ ॥ कहीं चार महीने कहीं पांच महीने ही छः महीने की एक गर्वमेभी अधिक, वहीं पगवादेगे अधिक. कई ********** ॥ १ । - सामसपारपाका वाचणार मग योग . Nee-.- ག གནས་འ ག ་ གནངམས་བག आठ महीनेत कई कहीं इसमें न्यूनाधिक रहे ऐने तिन मुनियों के आश्रमों पर श्रीरामचन्द्रजी बसे ॥ २६ ॥ सवही जगह वह सुखसहित रहे; उन आश्रमाम बनते हुए पिटोगोंकी अनुकूटनाने सीतासहित दश वर्ष श्रीरामचन्द्रजीने वितादिये २७ । इस प्रकारसे धर्मके जाननेवाले श्रीरामचन्द्रजी सीताके माथ गर पुष आश्रमों में घूम धाम कर फिर महर्षि सुनीषणजीके आश्रममें आये जहां मुनिगणोंने उनकी बड़ी पूजाकी ॥ २८ ॥ वहां पर शत्रुओंके मारनेवाले भीगन्नी कुछ दिन रहकर एक दिन विनय सहित उन महामुनि सुतीक्ष्णजीसे ॥२९॥ श्रीरामचंद्रजी पूछते हुए कि, हे भगवन् ! इस वनमें मुनियों में श्रेष्ठ भगवान अगरन्यजी ॥ ३० ॥ वसते हैं, यह बात हमने बहुत कपि लोगोंसे सुनीहै परन्तु यह हमने अबतक न जानपाया कि उन महातपस्वीजीके रहनेका कौन वनहै ? ॥ ग्मनभानायनययुःसंवत्मगदश ॥ परिमृत्यवधर्मज्ञोराघवःसहसीतया ॥ २७ ॥ सुतीक्ष्णस्याश्रमपदंपुनरेवाजगामह ॥ सतमाश्रममागम्य मुनिभिःपरिपूजितः ।। २८ ॥ तत्रापिन्यवसद्रामाकिंचित्कालमरिंदमः ।। अथाश्रमस्थोविनयात्कदाचित्तमहामुनिम् ॥ २९॥ उपासीनःस काकुत्स्थ गुतीक्ष्णमिदमत्रवीत् ।। अस्मिनरण्येभगवनगस्त्योमुनिसत्तमः ॥३०॥ वसतीतिमयानित्यकथा-कथयतांश्रुतम् ॥ नतुजानामितंदेश निस्वास्थमहत्तया ॥ ३१ ॥ कुनाश्रमपदरम्यमहर्पस्तस्यधीमतः ॥ प्रसादार्थभगवतःसानुजःसहसीतया ॥ ३२ ॥. अगस्त्यमधिगच्छेयमभि वादयिनमुनिम् ।। मनोरथोमहानेपदिसंपरिवर्तते ॥ ३३ ॥ यद्हतंमुनिवरंशुश्रूषेयमपिस्वयम् ॥ इतिरामस्यसमुनिःश्रुत्वाधर्मात्मनोवचः ॥ ॥ ३३ ॥ मुनीक्षण प्रत्युवाचेदंप्रीतोदशरथात्मजम् ।। अहमप्येतदेवत्वांवकुकामःसलक्ष्मणम् ॥ ३५ ॥ अगस्त्यमभिगच्छेतिसीतयासहराव ॥ दिष्टयात्चिदानीमर्थस्मिन्स्वयमेवीपिमाम् ।। ३६ ॥ अयमाख्यामितेरामयत्रागस्त्योमहामुनिः ॥ योजनान्याश्रमात्तातयाहिचत्वारि पेननः ॥ दक्षिणेनमहान्धीमानगस्त्यभ्रातुराश्रमः ॥ ३७ ॥ ॥ ३१ ॥ फिर यहभी नहीं जाननं कि उन धीमान महर्षिनीका उस वनमें रमणीक आश्रम कौनसाहै ? उनके प्रसादके लिये लक्ष्मण और जानकीके सहित ॥ ३२॥ भारपीक पाम हम प्रणाम करनेको जाया चाहते हैं। इस प्रकारका महा मनोरथ हमारे हृदयमें वर्त रहाहै ॥ ३३ ॥ वहां पर जाकर हम स्वयं मुनिराजजीकी सेवा कगंगे। इस प्रकार सुनीलजी धर्मात्मा गमचन्द्रजीकी पाणी सुन ॥ ३४ ॥ दशरथजीके प्यारे दुलारे पुत्र श्रीरामचन्द्रजीसे बोले कि हम लक्ष्मण सहित आपसे यह काही थे कि ॥ ३५ ॥ आप लक्ष्मण य जनककुमारी सीताजीक सहित अगस्त्यजीक निकट जाइये सो बडे भाग्यकी बातहै कि, आपनेही अपने मुखसे पद पाई पूर्ण ॥ ३६॥ हेभीरामचन्द्रजी। महर्षि अगस्त्यजी जिस पनमें रहते हैं उसको हम बताते हैं, हे वात ] इस आश्रमसे दक्षिण दिशाकी ओर सोलह कोरा आर०क स०१० पागं पटे जाइये, नप अगस्त्यजीके भावाका आश्रम आपकी दृष्टि आवेगा ॥३७॥ इस आश्रमकी भूमि बडी व समानहै यहां पिप्पलीके वृक्षोंका वन शोभित होरहाहै भीर नाना भौतिक पक्षी शब्द करनेहैं । ऐसे परम मनोहर और विविध भांतिके फल पुष्प युक्त वनके देशमें यह आश्रम प्रतिष्ठितहै ॥ ३८ ॥ वहांपर स्वच्छ वारिसे भरे पहुए सारे मरोवर है, हंस, कराकुल, चकवा, चकवी और सारस इत्यादि जलमें खेल किया करतेहैं ॥३९॥ हे श्रीरामचन्द्रजी! उस आश्रममें आप एक रात्रि पान करके प्रभाव होनेही उस आश्रमके निकटस्थ वनको करवटमें छोड दक्षिणकी ओरको गमन कीजिये ॥४०॥ वस चार कोश मार्ग चलतेही विविध भाँतिके शोंमे पिरा हुआ रमणीय वनमें हर्पित अगस्त्यजीके रहनेका आश्रम देखोगे ॥ ४१ ॥ सीता और लक्ष्मणजी तुम्हारे साथ वहां वास करके परम प्रसन्न होंगे, स्थलीप्रायवनोदेशेपिप्पलीवनशोभिते ॥ वहुपुप्पफलेरम्येनानाविहगनादिते ॥ ३८ ॥ पद्मिन्योविविधास्तत्रप्रसन्नसलिलाशयाः ॥ हंसकारं डयाकीर्णाश्शक्रयाकोपशोभिताः ॥ ३९ ॥ तत्रैकांरजनीव्युप्यप्रभातेरामगम्यताम् ॥ दक्षिणांदिशमास्थायवनखंडस्यपार्श्वतः ॥४०॥ तत्रा गस्त्याश्रमपदंगत्वायोजनमंतरम् ॥ रमणीयेवनोदेशेवहुपादपशोभिते ॥ ११ ॥रंस्यतेतत्रवैदेहीलक्ष्मणश्चत्वयासह ॥ सहिरम्योवनोदेशोबहु पादपसंयुतः॥ ४२ ॥ यदिवुद्धिःकृताद्रष्टुमगस्त्यंतमहामुनिम् ॥ अयैवगमनेवुद्धिंरोचयस्वमहामते ॥४३॥ इतिरामोमुनेःश्रुत्वासहभ्राताभि वायन ॥ प्रतस्थेगस्त्यमुद्दिश्यसानुजःसहसीतया ॥४४॥ पश्यन्वनानिचित्राणिपर्वतांश्चाभ्रसन्निभान् ॥ सरांसिसरितश्चैवपथिमार्गवशानुगान् ॥ १५॥ सुतीक्ष्णेनोपदिष्टेनगत्वातेनपथासुखम् ॥ इदंपरमसंहष्टोवाक्यलक्ष्मणमब्रवीत् ॥ ४६॥ एतदेवाश्रमपदंनूनंतस्यमहात्मनः ॥ अग स्त्यस्यमुने तुर्दश्यतेपुण्यकर्मणः ॥ १७॥ यथाहीमेवनस्यास्यज्ञाता-पथिसहस्रशः॥ सन्नताःफलभारेणपुष्पभारेणचद्रुमाः ॥ १८॥ क्योंकि वह अनेक प्रकारके वृक्षोंसे युक्त वन अविरमणीयहै ।। ४२॥ हे महामते !यदि महर्षि अगस्त्यजीके दर्शन करनेका अभिलापहै तो आजही जानेका विचार कीजिये ॥ ४३ ॥ श्रीरामचन्द्रजी सुतीक्ष्णमुनिके ऐसे वचन सुन उनको प्रणाम करके माता लक्ष्मण और जानकीजीके सहित अगस्त्यजीके देखनेको प्रस्थान करते हुए ॥ १४ ॥ मार्गमें जाने के समय बहुतसारे विचित्र वन, बादलोंकी समान ऊँचे २ पहाड, नदी सरोवर सबही श्रीरामचन्द्रजी देखते जातेथे ॥ ४५ ॥ इस प्रकार भीरामचन्दजी सुनीश्णजीके बताये हुए मार्गमें यथासुखमे गमन करके परम प्रसन्न और हर्पितहो लक्ष्मणजीसे बोले ॥ ४६ ॥ कि निश्चयही पुण्य कर्म करनेवाले हान्मा अगम्यमपि नाका पद आप 米米米米米米米米米米米米 1 । मे- THT :
मुहुए मैकडों हजारों पेड हमने देखे हैं ॥ ४८॥ यह देखो पके हुए पिप्पलीके फलोंकी कडवी गन्ध पवन वेगसे वहीहुई चली आतीह ॥४९॥ स्थान २ म इक दि किये हुए काठके बोझ और छिन्न वैडूर्यमणिक वर्णकी समान हरे कुराभी यहां देख पडते हैं ।। ५० ॥ आश्रममें स्थित हुई अनिकी यह वही धूमशिखा, कृष्णमेघयुक्त पर्वकं गिसरकी समान वनके बीच दृष्टि आतीहै ।। ५१ ॥ और यह ब्राह्मण लोग स्वच्छ तीर्थक जलमें स्नान करके अपने लाये हुए फूलोंके समूहमे इष्ट देवताओंकी पूजा कर रहे हैं ।। ५२ ।। हे सौम्य । महर्पिसुतीक्ष्णजीके मुखसे जैसा श्रवण किया था उसीके अनुसार यहांपर सब कुछ देखकर हमको निश्चयही जान पडताहै कि, पही अगस्त्यजीक भाताका आश्रमहै ॥ ५३ ।। जिन महर्षिअगस्त्यजीने सब लोकोंको हित करनेकी कामनासे बल सहित साक्षात् मृत्युकी समान दैत्यको मारकर इस पिप्पलीनांचपकानांवनादस्मादुपागतः ॥ गंधोयंपवनोत्क्षिप्तःसहसाकटुकोदयः।।४९॥ तत्रतत्रचदृश्यतेसंक्षिप्ता काष्ठसंचयाः।। लूनाश्वपरिदृश्यं तेदर्भावदूर्यवर्चसः ॥ ५० ॥ एतच्चवनमध्यस्थंकृष्णाभ्रशिखरोपमम् ॥ पाक्कस्याश्रमस्थस्यधूमासंप्रदृश्यते ॥ ५१ ॥ विविक्तेपुचतीर्थपुकृत यानाद्विजातयः ॥ पुण्योपहारंकुर्वतिकुसुमेःस्वयमजितेः॥५२॥ ततःसुतीक्ष्णवचनंयथासौम्यमयाश्रुतम् ॥ अगस्त्यस्याश्रमोभ्रातुनूनमेपभ विष्यति ॥५३॥ निगृह्यतरसामृत्युंलोकानांहितकाम्यया ॥ यस्यभ्रानाकृतेयंदिकशरण्यापुण्यकर्मणा॥५४॥ इहेकदाकिलङ्करोवातापिरपिचे खलः ॥ भातरीसहितायास्तांत्राह्मणनोमहासुरौ ॥५५॥धारयन्त्राह्मणंरूपमिल्वलःसंस्कृतंवदन्॥आमंत्रयतिविप्रान्सश्राद्धमुदिश्यनिघृणः॥ ॥५६॥ भ्रातरंसंस्कृतंकृत्वाततस्तंमेपरूपिणम् ॥ तान्द्विजान्भोजयामासश्रादृप्टेनकर्मणा॥१७॥ ततोभुक्तवतांतेपांविप्राणामित्वलोत्रवीत् ।। वातापेनिष्क्रमस्वेतिस्वरेणमहतावदन् ॥५८॥ ततोनातुर्वचःश्रुत्वावातापि,पवनदन ॥ भित्त्वाभित्त्वाशरीराणिब्राह्मणानांविनिष्पतत् ॥१९॥ ब्राह्मणानांसहवाणितेरेवंकामरूपिभिः ॥ विनाशितानिसंहत्यनित्यशःपिशिताशनेः॥६॥ दक्षिण दिशाकोभी मयंक पसने योग्य कियाहै ॥ ५४ ॥ ऐसा प्रसिद्धहै कि पहले एक समय महा असुर बाह्मणोंका घात करनेवाले वातापि और इल्वल नामक दो फूर कर्म करनेवाले भाई इकट्ठे इस वनमें वास करतेथे ॥ ५५ ॥ उन दोनों से निर्दयी इल्वल जब श्रादका समय आवे तो बाह्मणका वेप धर संस्कृत उच्चारण करके बाह्मणोंको निमंत्रण कर ॥ ५६ ॥ जब सब ब्राह्मण आजावें तब अपने नावा मेपरूपी वातापिको श्रादके कहे अनुष्ठानके अनुसार उत्तम रूपसे 'रांधकर सप बाह्मणों को भोजन करावे ॥ ५७ ॥ तिसके पीछे जब बाह्मण भोजन कर चुकें इल्वल अति ऊंचे स्वरमे ( वातापि । निकल आओ) यह वचन कहता ॥ ५८ ॥ वावापि भावाका शब्द सुनकर मेटेकी समान शब्द करता हुआ ब्राह्मणों के शरीर फाड २ निकल आता ॥ ५९ ॥ यह इच्छानुसार रूप धारण करनेवाले मांस - आर०क ना.ग.भा. स०११ भोगी गमुर इस प्रकार प्रतिदिन परस्पर मिलकर सहत २ ब्राह्मणों की हत्या करते ॥ ६०॥ यह देखकर महर्षि अगस्त्यजीने देवताओंकी प्रार्थनाके वश हो। भारमें उम महा असुर यानापिको भक्षण करलिया, ऐसी बात प्रसिद्धहै ॥६१॥ जय श्राद्ध पूरा होगया इस प्रकारसे कहके ब्राह्मणों के हाथ धुलानेके लिये जल दे. " पानापि ! पाहर निकल आओ" यह कहकर इल्वल भाताको पुकारने लगा ।। ६२॥ जब इल्बलने वार २ अपने भाईको पुकारा तब यह देखकर मुनियों भात भगरत्यजीने हँसकर विप्रयाती इल्वलसे कहा ।। ६३ ॥ हमने तुम्हारे मेपरूपी धाता वातापिको पचा डाला; वह यमराजके गृहको चला गया सो अब उस पाहर होनेशी नामर्य कहाँ ? ॥ ६४ ॥ निशाचर इल्वल भाईके मरनेकी वार्ता सुन करके क्रोधयुक्तहो महर्पिअगस्त्यजीके मारनेको तैयार हुआ ॥ ६५ । अमेही यह मारनेको दौडा कि महर्पिजीने प्रज्वलित अमिके समान दृष्टिसे एक बार देख दिया, बस देखने मात्रसेही वह भस्म होगया और प्राण त्यागन करदिये ॥६६॥ अगस्त्येनतदादेव प्रार्थितेनमहर्पिणा ॥ अनुभूयकिल श्राद्धेभक्षितःसमहासुरः॥६१॥ ततःसंपन्नमित्युक्त्वादत्त्वाहस्तेवनेजनम् ॥ भ्रातरंनिष्क्रम पेतिइल्वलःसमभापत ।। ६२ ॥ सतदाभापमाणंतुभ्रातरंविप्रघातिनम् ॥ अब्रवीत्प्रहसन्धीमानगस्त्योमुनिसत्तमः॥६३॥कुतोनिष्कमितुंश तिर्मयाजीर्णस्यरक्षमः ॥ भ्रातुस्तुमेपरूपस्यगतस्ययमसादनम् ॥ ६४ ॥ अथतस्यवचःश्रुत्वाभ्रातुर्निधनसंश्रितम् ॥प्रधर्पयितुमारेभेमुनिको धानिशानरः ॥६५॥ सोभ्यद्रवद्विजेंद्रतमुनिनादीप्ततेजसा । चक्षुपानलकल्पेननिर्दग्धोनिधनंगतः॥६६॥ तस्यायमाश्रमोभ्रातुस्तटाकवन शोभितः। विप्रानुकंपयायेनकर्मेदंदुष्करंकृतम् ॥ ६७॥ एवंकथयमानस्यतस्यसौमित्रिणासह ॥ रामस्यास्तंगतःसूर्य-संध्याकालोभ्यवर्तत ॥ ॥ ६८॥उपास्यपश्चिमांसंध्यांसहभानायथाविधि ॥ प्रविवेशाश्रमपदंतमृपिंचाभ्यवादयत् ॥ ६९॥ सम्यक्प्रतिगृहीतस्तुमुनिनातेनराघवः ॥ न्ययसत्तांनिशामेकांपाश्यमूलफलानिच ॥ ७० ॥ तस्यारान्यांव्यतीतायामुदितेरविमंडले ॥ भ्रातरंतमगस्त्यस्यआमंत्रयतराघवः ॥ ७१ ॥ जिन्होंने ब्राह्मगगोंके ऊपर दयाके वश होकर इस प्रकारका औरके न करने योग्य अनुष्ठान कियाथा उन अगस्त्यजीके महात्मा भाईकाही यह तडागमय शोभित । पहै ॥ ६७ ॥ श्रीरामचंद्रजी लक्ष्मणजीके साथ यह वार्ता कहतेही रहे कि इतनेमें भगवान् भास्कर अस्ताचलचूडावलम्बी हुए और संध्या होआई ॥ ६८॥:: भीरामचंद्रजीते गाता लक्ष्मणजीक सहित विधिवत् सायंकालकी संध्या समान करके अगस्त्यजीके भाईके आश्रममें प्रवेश किया और अगस्त्यजीके भाईको प्रणाम वित ॥६९ ॥ और अगस्त्पनीके भाईनेभी उनका भली भांति शिष्टाचार किया और कंदमूल फल खानेको दिये सो भोजनकर श्रीरामचंद्रजी एक रात्रि यहां पर बसे ।। ॥ १८ "फिजपानपीन गगी और मयं नारायण निकल न कि हे भगवन् ! हम आपको प्रणाम करते हैं हमने यहां बडे सुखसे यह रात्रि विताई अब इस समय विदा दीजिये अब आपके बडे भाई गुरुदेव अगस्त्यजी के दर्शन कर नेको हमारी अभिलापा हुई है॥७२॥ यह कहकर ऋपिकी आज्ञा ले उनके आश्रमका वन देखते भालने सुतीक्ष्णमुनिके बताए हुए आश्रमको जाते हुए ॥७३॥ जाने समय बनके मध्यमें नीवार, पनस, शाल, वञ्जुल, तिनिश, चिरविल्व ( नक्तमाल) मधूक, वेल ॥ ७४ ॥ विन्दुक इत्यादि परस्पर फूली फली लनानि गाभिन सैकडों हजारों वृक्ष श्रीरामचंदजीने देखे ॥ ७५॥ अनेक प्रकारके पक्षीगण मतवाले होकर उन वृक्षोंपर गुंजार कर रहेथे कुसुमित भिसर टता और वानर गोंके निकट रहनेसे वहां अतिशय शोभा होरही, और हाथियों की शृंडके आघातसे उन वृक्षोंकी टहनियां टूट रहीीं ॥ ७६ ॥ यह देखकर राजीवलोचन अभिवादयेत्वाभगवन्सुखमस्म्युपितोनिशाम् ॥ आमंत्रयेत्यांगच्छामिगुरुंतेद्रष्टुमग्रजम् ॥ ७२ ॥ गम्यतामितितेनोक्तोजगामरघुनंदनः ॥ यथोद्दिष्टेनमार्गेणवनंतच्चावलोकयन् ॥ ७३ ॥ नीवारान्पनसान्सालान्वंजुलांस्तिनिशांस्तथा ॥ चिरिविल्यान्मधूकांश्चविल्यानथनतिंदु कान् ।। ७१ ॥ पुप्पितान्पुप्पिताग्राभिलताभिरुपशोभितान् ॥ ददर्शराम-शतशस्तकांतारपादपान् ।। ७५ ॥ हस्तिहस्तैविमृदितान्वानरेक पशोभितान् ॥ मत्तैःशकुनिसंघेश्वशतशःप्रतिनादितान् ॥ ७६ ॥ ततोत्रवीत्समीपस्थंरामोराजीवलोचनः ॥ पृष्ठतोनुगतंबीरलक्ष्मणलक्ष्मिव धनम् ॥ ७७ ॥ स्निग्धपत्रायथावृक्षायथाक्षांतामृगद्विजाः ॥ आश्रमोनातिदूरस्थोमहर्भावितात्मनः॥ ७८ ॥ अगस्त्यइतिविख्यातोलोके स्पेनेवकर्मणा ।। आश्रमोदृश्यतेतस्यपरिश्रांतश्रमापहः ॥ ७९ ॥ प्राज्यधूमाकुलवनश्चीरमालापरिष्कृतः ॥ प्रशांतमृगयूथश्चनानाशकुनिना दितः ॥ ८० ॥ निगृह्यतरसामृत्युलोकानांहितकाम्यया ॥ दक्षिणादिक्कृतायेनशरण्यापुण्यकर्मणा ॥ ८१ ॥ तस्येदमाश्रमपदंप्रभावाद्यस्यरा क्षसः ॥ दिगियंदक्षिणाबासादृश्यतेनोपभुज्यते ॥ ८२ ॥ श्रीरामचंद्रजी अपने पीछे आते हुए निकटवर्ती लक्ष्मीके बढानेवाले लक्ष्मणजीसे बोले ।। ७७ ॥ इन सब वृक्षोंके पने जैसे चिकने दिखाई देते हैं और मृगगण जैसे शान्तचिन दृष्टि आते हैं सो इन सब बातों से ज्ञात होताहै कि उन विशुद्धचित्त महर्षि अगस्त्यजीका आश्रम अब अधिक दूर नहीं है । ७८ ॥ जिन्होंने अनेक कर्म द्वारा लोकमें प्रसिद्ध अगस्त्यनाम पाया है, उनही महर्पिजीका थके हुए लोगोंके श्रमका हरनेवाला यह आश्रम दिखाई देताहै ॥ ७९ ॥ यज्ञका धुवाँ वनमें छाय रहाहै वृक्षोंकी डालियोंपर चीर वस्त्र टँग रहेहैं; वैरको छोडे हुए सब मृग इधर उधर घूमरहे हैं । अनेक प्रकारके पक्षी मधुर २ नाद कर रहेहैं ॥ ८० ॥ जिन्होंने मनु प्पोका हित करनेकी कामनाते वलसहित मृत्यु और असुरोंको जीतकर दक्षिण दिशाको सबके वास योग्य कर दियाहै ॥ ८॥ ॥ और जिनके प्रभावसे राक्षस लोक वा.रा.भा. यासित होकर इस दक्षिण दिशाकी ओर केवल देखते और आते वो हैं परन्तु किसीको पीडा नहीं दे सकत; उन्हा पुण्यकम आश्रमहै ॥ ८२ ।। उन पवित्र वेत्ता अगस्त्यजीने जबसे इस आश्रममें आकर वास कियाहै तबसे निशाचरलोग वैर छोडकर शान्तचित्तहोगये हैं ।। ८३ ॥ भगवा: २०११ अगस्त्यजीकी यह दक्षिण दिशा आगस्त्यादिकनामसे त्रिलोकीमें प्रसिद्ध होगई है और उनके प्रभावसे क्रूर कर्म करनेवाले निशाचरगोंके दवजानेसे यह दिर मुनिलोगोंके वास करने योग्य होगई है ॥ ८४ ॥ पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचल उनकी आज्ञाका प्रतिपालनही करता हुआ, सूर्यका मार्ग रोकनेके लिये और निरंट. नहीं बढता ॥ ८५॥ लोकोंके वीचमें विख्यात कर्म करनेवाले दीर्घायु महर्षि अगस्त्यजीका विनय युक्त मृगगण सेवित यही आश्रमहै ।। ८६ ॥ जवा यदाप्रभृतिचाक्रांतादिगियंपुण्यकर्मणा ॥ तदाप्रभृतिनिर्वैराःप्रशांतारजनीचराः ॥ ८३ ॥ नानाचयंभगवतोदक्षिणादिक्प्रदक्षिणा ॥ प्रथिता । त्रिपुलोकेपुदुर्धर्षाकरकर्मभिः ॥ ८४ ॥ मार्गनिरोद्धंसततंभास्करस्याचलोत्तमः ॥ संदेशंपालयंस्तस्यविंध्यशैलोनवर्धते ॥ ८५ ॥ अयंदीर्घायु । पस्तस्यलोकेविश्रुतकर्मणः ॥ अगस्त्यस्याश्रमःश्रीमान्विनीतमृगसेवितः ॥ ८६ ।। एपलोकार्चितःसाधुर्हितेनित्यरतःसताम् ।। अस्मानधिगत: नेपश्रेयसायोजयिप्यति ॥ ८७॥ आराधयिष्याम्यत्राहमगस्त्यंतमहामुनिम् ॥ शेपंचवनवासस्यसौम्यवत्साम्यहंप्रभो ॥ ८८॥ अत्रदेवाःसर्ग धर्वाःसिद्धाश्चपरमर्पयः ॥ अगस्त्यंनियताहाराःसततंपर्युपासते ॥ ८९ ॥ नात्रजीवेन्मृपावादीकरोवायदिवाशठः ॥ नृशंस पापवृत्तोवामुनिरेप तथाविधः ॥९० ॥ अत्रदेवाश्चयक्षाश्चनागाश्चपतगैःसह ॥ वसंतिनियताहाराधर्ममाराधयिष्णवः ॥९१॥ हम सर्व लोकोंमें पूजित सदा साधुलोगोंका हित चाहनेवाले साधु चरित्र इन महर्षि अगस्त्यजीके आश्रममें जायँगे, तब वह अवश्यही हमारा मंगल विधान करेंगे ।। ॥ ८७ ॥ हे शुभदर्शन ! हम इसी आश्रममें रहकर महर्षि अगस्त्यजीकी आराधना करेंगे और वनवासका शेप समय यहीं बिता देंगे॥ ८८ ॥ इस आश्रममें देवता गन्धर्य, तपस्या करके सिद्ध हुए, महर्पि लोग निराहार रहकर सदाही अगस्त्यजीकी भलीभांति सेवा किया करते हैं ॥ ८९ ॥ महर्षि अगस्त्यजीका प्रभाव ऐसाहै कि इनके आश्रममें झूठ बोलनेवाला, शठ, दुष्ट, निर्लज, पापपरायण पुरुष किसी भांति जीता हुआ नहीं रहसकता ॥ ९० ॥ इस आश्रममें देव, यक्ष, नाग, और ॐ एक समय अगस्त्यजीका शिष्य विन्ध्याचलपर्वत सूर्यका मार्ग रोकने के लिये अधिकतासे बढने लगा यह देख देवता पहुत भयभीतहो अगस्त्यजीकी शरण जाफर कहने लगे कि, आप अपने शिष्यको इस दुर्घट कार्यके करनेसे निवारण कीजिये तव अगस्त्यजी विन्ध्याचलके निकट गये पर्वतने इन्हें देख कर प्रणाम किया और चरण पकडे २ पछा गुरु देव ! आज्ञा कीजिये कैसे आगमन हुभा ? अगस्त्यजी बोले जबतक हम टौटकर न आवं तत्रफ तुम योहीं पड़े रहो, विन्ध्यने स्थास्तु कहा, तबसे अगस्त्यजी दक्षिणदिशामें आकर रहने लगे और फिर उधर न गये विन्ध्याचल गुरुआज्ञासे आजतक लेट रहाई ।।
पसीना धर्मकी आराधना करने के लिये नियवाहारी होकर वास करते हैं ॥ ९१ ॥ महात्मा महर्षि लोग इस आश्रममें सिंदहो देह त्याग नवीन देह धाम कर सूर्यनुल्य देदीप्यमान विमानमें सवार हो स्वर्गको गये हैं ॥ ९२ ॥ जो समस्त पवित्र कर्म करनेवाले प्राणीगण इस आश्रममें रहते हैं वह देवताओंकी उपा कर दाताओंके प्रमादमे देवत्व, पाव, और विविध राज्यों को प्राप्त होते हैं ॥१३॥हे सुमित्राकुमार! हम इस समय उसही आश्रममें आय पहुंचे हैं। तुम पहले प्रवेशका उन मुनिमे यह निवेदन करदो कि हम मीनाके सहित उनके आश्रममें आये हैं।९४॥इत्या श्रीमद्रा० वा० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकायामेकादराः सर्गः॥१॥ पमा जर गमनवजीने कहा, ना उनके छोटे भइया लक्ष्मणजी आश्रममें प्रवेश करके अगस्त्यजीके शिप्यके समीप पहुँचकर कहने लगे ॥ १ ॥ कि राजा दरम्य जीके बडे पुत्र महारलवान श्रीरामचन्द्रजी आनी बी मीताजीके साथ महर्पिजीके चरणोंका दर्शन करनेको आये हैं ॥ २॥ और हमारा नाम लक्ष्मणहै, हम अवसिद्धामहात्मानोविमानःसूर्यसंनिभेः॥ त्यक्त्वादेहान्नवेदहःस्वर्याता परमर्पयः॥९२॥यक्षत्वममरत्वंचराज्यानि विविधानिच ॥ अवदेवायन मछंतिभृतेरागधिताःशुभैः ॥९३॥ आगताःस्माश्रमपदंसौमित्रप्रविशाग्रतः॥ निवेदयेहमांप्राप्तमृपयेसहसीतया॥९॥ इत्या श्रीम वाल्मीआ. अर० एकादशःमर्गः।।११॥ मप्रविश्याश्रमपदंलक्ष्मणोराघवानुजः॥अगस्त्यशिप्यमासाद्यवाक्यमेतदुवाचह ॥३॥राजादशरथोनामज्येष्टस्तस्त्र मुनोचली गमःप्राप्तोमुनिद्रष्टुंभार्ययासहसीतया ॥२॥ल मणोनामतस्याहंभ्रातात्ववरजोहितः ॥ अनुकूलश्वभक्तश्चयदितेश्रोत्रमागतः ॥३॥ तेपर्यवनमत्युमंप्रविष्टाःपितृशासनात् ॥ द्रष्टुमिच्छामहेसर्वेभगवंतंनिवेद्यताम् ॥ ४॥ तस्यतद्वचनंश्रुत्वालक्ष्मणस्यतपोधनः ॥ तथेत्युक्त्वाति शरणंप्रविशनिवेदितुम् ॥५॥ सप्रविश्यमुनिश्रेष्ठंतपसादुष्प्रधर्षणम् ॥ कृतांजलिरुवाचेदंरामागमनमंजसा ॥ ६॥ यथोक्तलक्ष्मणेनेवनिप्या गस्त्यस्यसंमतः ।। पुत्रौदशरथस्यमौरामोलक्ष्मणएवच ॥ ७॥ प्रविष्टायाश्रमपदंसीतयासहभार्यया ॥ द्रष्टुंभवंतमायातीशुश्रूपार्थमरिंदमौ॥८। दिलमार्ग परमभन और उनके अनुकूल चटनेवाले उनके छोटे भाई हैं सो कदाचित् आपने हमारी वार्ना सुनीही होगी ॥ ३ ॥ हमने पिताजीकी आ.. अतिभयंकर बनमें प्रवेग कियाहै और अब भगवान् अगस्त्यमुनिके दर्शन करनेकी हमको अभिलापा हुईहै, सो आप उनसे यह वृत्तान्त निवेदन कर दीजिये ॥ ४ ॥ वह नपोषन लक्ष्मणजीके यह वचन श्रवण कर उनसे आपका आना निवेदन करता हूं यह कह कर इस वार्ताको महर्षि अगस्त्यजीसे कहनेके निमित्त अग्रिगृहमें प्रो. करना हुआ ॥ ५ ॥ और यहां पहुँचकर हाथ जोड तपोबटसे प्रदीप मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीसे रामचन्द्रजीके आनेका समाचार कहा ॥ ६ ॥अगस्त्यजीका दिन लक्ष्मण जीके बननके अनुमार कहने लगा कि अयोध्याजीके राजा दशरथ कुमार राम और लक्ष्मण ॥ ७ ॥ आपके आश्रममें अपनी भार्या सहित आयेहैं, वह शत्रुत."
स० 13 आसित होकर इस दक्षिण दिशाकी और केवल देखते और आते तो हैं परन्तु किसीको पीडा नहीं दे सकते; उन्हीं पुण्यकर्म करनेवाले महाप अगस्त्यजाका यह अमहे ।। ८२ ॥ उन पवित्र वेत्ता अगस्त्यजीने जबसे इस आश्रममें आकर वास कियाहै तबसे निशाचरलोग वैर छोडकर शान्तचित्नहोगये हैं ।। ८३ ॥ भगवान त्यजीकी यह दक्षिण दिशा आगस्त्यादिकनामसे त्रिलोकीमें प्रसिद्ध होगई है और उनके प्रभावसे क्रूर कर्म करनेवाले निशाचरगोंके दबजानेसे यह दिशा रोगोंके वास करने योग्य होगई है ॥ ८४ ॥ पर्वतोंमें श्रेष्ठ विन्ध्याचल उनकी आज्ञाका प्रतिपालनहीं करता हुआ, सूर्यका मार्ग रोकनेके लिये और निरंतर बढता ॥ ८५ ॥ लोकोंके बीचमें विख्यात कर्म करनेवाले दीर्घायु महर्पि अगस्त्यजीका विनय युक्त मृगगण सेवित यही आश्रमहै ॥ ८६॥ जब वि पदाप्रभृतिचाक्रांतादिगियंपुण्यकर्मणा ॥ तदाप्रभृतिनिर्वैराःप्रशांतारजनीचराः ॥ ८३ ॥ नानाचयंभगवतोदक्षिणादिक्प्रदक्षिणा ॥ प्रथिता विपुलोकेषुदुर्धारकर्मभिः ॥ ८४ ॥ मार्गनिरोद्धंसततंभास्करस्याचलोत्तमः ॥ संदेशपालयस्तस्यविंध्यशैलोनवर्धते ॥ ८५॥ अयंदीर्घायु स्तस्यलोकेविश्रुतकर्मणः ॥ अगस्त्यस्याश्रमःश्रीमान्विनीतमृगसेवितः ॥८६॥ एपलोकार्चितःसाधुर्हितेनित्यरतःसताम् ॥ अस्मानधिगता नेपश्रेयसायोजयिष्यति ॥ ८७ ॥ आराधयिष्याम्यत्राहमगस्त्यंतमहामुनिम् ॥ शेपंचवनवासस्यसौम्यवत्साम्यहंप्रभो ॥ ८८॥ अत्रदेवाःसगं पिन्द्राश्चपरमर्पयः ॥ अगस्त्यंनियताहारा सततंपर्युपासते ॥ ८९ ॥ नावजीवेन्मृपावादीकूरोवायदिवाशठः ॥ नृशंस-पापवृत्तोवामुनिरेप १०॥ अनदेवाश्चयक्षाश्चनागाश्वपतगैःसह ॥ वसंतिनियताहाराधर्ममाराधयिष्णवः ॥९१॥ 1.हित चाहनेवाले साधु चरित्र इन महर्षि अगस्त्यजीके आश्रममें जायँगे, वव वह अवश्यही हमारा मंगल विधान करेंगे ॥ अगस्त्यजीकी आराधना करेंगे और वनवासका शेप समय यहीं बिता देंगे॥ ८८ ॥ इस आश्रममें देवता गनीकी भलीभांति सेवा किया करते हैं ॥ ८९ ॥ महर्षि अगस्त्यजीका प्रभाव ऐसाहै कि नहीं रहसकता ॥ ९० ॥ इस आश्रममें देव, यक्ष, नाग, और न्यजीफी शरण जाफर कहने लगे कि, आप अपने शिप्यफो हीजिये कैसे आगमन हुआ ? अगस्त्यजी । MA क *** . . ट रहा। MAAREE ma..in sarveen-IRATRam- NAINITA णगी यह पचन पण कर उनसे आपका आना निवेदन करताहूं यह कह कर इस वार्ताको महर्षि अगस्त्यजीसे कहनेके निमित्त अमिगृहमें प्रवेश LI || ५ ॥ और पहा पहुँचकर हाथ जोड तपोबलसे प्रदीप्त मुनिश्रेष्ठ अगस्त्यजीसे रामचन्द्रजीके आनेका समाचार कहा ॥६॥अगस्त्यजीका शिप्य IMAMMI 4.10 मारने लगा कि अयोध्याजीके राजा दशरथ कुमार राम आर लक्ष्मण ॥ ७ ॥ आपके आश्रमम अपनी भार्या सहित आयह , वह शत्रुतापन ' भीगण धर्मकी आराधना करनेके लिये नियवाहारी होकर वास करते हैं ॥ ९५ ॥ नहात्मा महर्षि लोग इस आश्रममें सिदहो नेह त्याग र सूर्यतुल्य देदीप्यमान विमानमें सवार हो स्वर्गको गये हैं ॥ ९२ ॥ जो समस्त पवित्र कर्म करनेवाले प्राणीगण इस आश्रममें रहते हैं वह देवताओंकी आमना करके देववाओंके प्रसादसे देवत्व, यक्षत्व, और विविध राज्यों को प्राप्त होतेहैं ।।१३॥हे सुमित्राकुमार! हम इस समय उसही आश्रममें आय पहुंचे हैं। तुम पहले रोग करके उन मुनिसे यह निवेदन करदो कि हम सीवाके सहित उनके आश्रममें आये हैं।।९४॥इत्याचे श्रीमद्रा० वा० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकायामेकादराः सर्गः॥३॥ नसा जब रामचन्द्रजीने कहा, तब उनके छोटे भइया लक्ष्मणजी आश्रममें प्रवेश करके अगस्त्यजीके शिप्यके समीप पहुँचकर कहने लगे ॥ १ ॥ कि राजा दशरथ जीके बडे पुत्र महाबलवान श्रीरामचन्द्रजी अपनी वी सीताजीके साथ महर्पिजीके चरणोंका दर्शन करनेको आये हैं ॥ २॥ और हमारा नाम लक्ष्मणहै, हम उनके अवसिद्धामहात्मानोविमाने सूर्यसंनिभैः॥ त्यक्त्वादेहानदेहे स्वर्याताःपरमर्पयः॥१२॥यक्षत्वममरत्वंचराज्यानि विविधानिच ॥ अवदेवाःप्रय च्छंतिभूतैराराधिताःशुभैः ॥९३|| आगताःस्माश्रमपदंसौमित्रप्रविशाग्रतः॥निवेदयेहमांप्राप्तमृपयेसहसीतया॥९॥ इत्या श्रीम वाल्मीआ० अर० एकादशसर्गः॥११॥ सप्रविश्याश्रमपदंलक्ष्मणोराघवानुजः॥अगस्त्यशिप्यमासाद्यवाक्यमेतदुवाच ॥१॥राजादशरथोनामज्येष्टस्तस्य सुतोवली ॥रामःप्राप्तोमुनिंद्रष्टुंभार्ययासहसीतया ॥२॥ल मणोनामतस्याहंभ्रातात्ववरजोहितः ॥ अनुकूलश्चभक्तश्चयदितेश्रोत्रमागतः ॥३॥ तेवयंवनमत्युग्रंपविष्टाःपितृशासनात् ॥ द्रष्टुमिच्छामहेसर्वेभगवंतंनिवेद्यताम् ॥ ४॥ तस्यतद्वचनंश्रुत्वालक्ष्मणस्यतपोधनः । तथेत्युक्त्वाग्नि शरणंप्रविवेशनिवेदितुम् ॥५॥ सप्रविश्यमुनिश्रेष्ठंतपसादुष्प्रधर्षणम् ॥ कृतांजलिरुवाचेदंरामागमनमंजसा ॥ ६॥ यथोक्तंलक्ष्मणेनेवभिप्यो गस्त्यस्यसंमतः ॥ पुत्रौदशरथस्येमौरामोलक्ष्मणएवच ॥ ७॥ प्रविष्टावाश्रमपदंसीतयासहभार्यया ॥ द्रष्टुंभवंतमायातीशुथुपार्थमरिंदमौ ॥८॥ तिकारी परमभक्त और उनके अनुकूल चलनेवाले उनके छोटे भाई हैं सो कदाचित् आपने हमारी वार्ता सुनीही होगी ॥ ३ ॥ हमने पिताजीको आज्ञासे निकर गनमें प्रवेश कियाहै और अब भगवान् अगस्त्यमुनिके दर्शन करनेकी हमको अभिलापाहुईहै, सो आप उनमे यह वृत्तान्त निवेदन कर दीजिये ॥ ४ ॥ I आर०कां० स० १२. .पा.ग.भा. ॥ २० ॥ आपकी मेया करने व देखने के लिये यहां आये हैं ॥ ८॥ सो इसमें जैसा कर्तव्यहो वही आज्ञा आप कीजिये, शिष्यके मुखसे रामचन्द्र व लक्ष्मणजीका आगमन सुन ॥ ९ ॥ और महा भाग्यवती सीताजीकोभी आगमनकी वार्ता सुन करके महर्षि अगस्त्यजी बोले, कि बडे भाग्यकी बातहै बहुत दिनोंपर श्रीरामचन्द्रजी हमा दर्शन करनेको यहां आये हैं ॥ १० ॥ और मैंनेभी मनसे इनके समागमकी आकांक्षा कीथी तिससे आगे जाकर आदर मान सहित श्रीरामचन्द्रजीको नाता और स्त्री महित ॥ ११॥ यहां लिवालाओ और अबतक तुम किस कारणसे उनको यहां नहीं लिवालाये, जब महात्मा धर्मज्ञ अगस्त्यजीने इस प्रकार कहा ॥ १२ ॥ गो शिष्य कर जोड कर जो आज्ञा अभी लिवाये लाताहूं कह और प्रणाम करके तभी वहांसे बाहर आ आदर सहित लक्ष्मणजीसे बोला ॥ १३ ॥ आपमें रान यदवानंतरंतत्त्वमाज्ञापयितुमर्हसि ॥ ततःशिष्यादुपश्रुत्यप्राप्तरामसलक्ष्मणम् ॥ ९॥ वैदेहींचमहाभागामिदंवचनमब्रवीत् ॥ दिष्टयारामश्चिरस्या द्यद्रष्टुंमांसमुपागतः ॥१०॥ मनसाकांक्षितंह्यस्यमयाप्यागमनंप्रति ॥ गम्यतांसत्कृतोरामःसभार्य-सहलक्ष्मणः॥११॥प्रवेश्यतांसमीपमेकिमयं नप्रवेशितः। एवमुक्तस्तुमुनिनाधर्मज्ञेनमहात्मना॥१२॥अभिवाद्यात्रवीच्छिष्यस्तथेतिनियतांजलिः॥तदानिष्क्रम्यसंभ्रांतःशिष्योलक्ष्मणमत्रवी त्॥१३॥कोसौरामोमुनिंद्रष्टुमेतुप्रविशतुस्वयम्॥ततोगत्वाश्रमपदंशिष्येणसहलक्ष्मणः॥१४॥दर्शयामासकाकुस्त्थंसीतांचजनकात्मजाम् ॥ तंशि प्यप्रश्रितंवाक्यमगस्त्यवचनंब्रुवन् ॥ १५॥ प्रावेशयद्यथान्यायंसत्कारार्हसुसत्कृतम्।।प्रविवेशततोराम-सीतयासहलक्ष्मणः॥१६॥ प्रशांतहरिणा कीर्णमाश्रमंावलोकयन् ॥ सतत्रब्रह्मणःस्थानमग्नेःस्थानंतथैवच ॥१७॥ विष्णोःस्थानमहेंद्रस्यस्थानंचैवविवस्वतः।।सोमस्थानंभगस्थानंस्थान कौवेरमेवच ॥१८॥धातुर्विधातुःस्थानंचवायोःस्थानंतथैवच॥स्थानंचपाशहस्तस्यवरुणस्यमहात्मनः ॥१९॥ स्थानंतथैवगायच्यावसूनांस्थान मेवच स्थानंचनागराजस्यगरुडस्थानमेवच॥२०॥कात्तिकेयस्यचस्थानधर्मस्थानंचपश्यति।ततःशिष्य परिवृतोमुनिरप्यभिनिष्पतत् ॥२१॥ कौन हैं ? वह भगवान् अगस्त्यजीके दर्शन करनेके लिये आवे और स्वयं प्रवेश करें अनन्तर लक्ष्मण उस शिप्यके सहित वहां गये जहां श्रीरामचन्द्रजीथे ॥ १४ ॥ उस शिष्यको जनककुमारी सीता व श्रीरामचन्द्रजीको दिखादिया, उस शिप्यने बड़ी नरमाईसे अगस्त्यजीके वचन श्रीरामचन्द्रजीसे जाय कहे ॥ १५ ॥ या नियम भलीभांति आदर सत्कार करके श्रीरामचन्द्रजीको लक्ष्मण व सीताजीके सहित आश्रममें प्रवेश कराया ॥ १६ ॥ उस आश्रममें प्रवेश करनेके समय श्रीमा चन्द्रजीते देखा कि परमशान्तस्वभाव हरिण चारों ओर बैठेहैं, ब्रह्मा, शिव ॥ १७ ॥ विष्णु, इन्द्र, सूर्य, चन्द्र, भग, कुबेर ॥ १८॥ धाता, विधाता, पवन, पाशहः । महात्मा परुण ॥ १९ ॥ गायत्री, वसु, नागराज वासुकी,आदि सर्प, गरुड ॥॥२०॥ कार्तिकेय और धर्म, इन सबकी पूजाके निमित्त अलग २ स्थान बन हुए एक २ करके श्रीगमचन्दजीने देखे मुनिअगस्त्यजीभी अपने शिष्योंके संग होमशालामसे निकले ॥ २१ ॥वीर्यवान् श्रीरामचन्द्रजी सब तपस्वियोंमें बडे तेजवान अगस्त्पनीको मामने आने देशकर टक्षण युक्त लक्ष्मणजीसे बोले ॥ २२ ॥ हे लक्ष्मण ! भगवान् अगस्त्यजी ऋपि कुटीसे बाहर निकलते हैं इस समय हम उदा ला शुक्र होकर उन नपःप्रकाशित कपिवरके निकट गमन करंगे ॥ २३ ॥ ऐसा कहकर महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी कुटीसे बाहर आयेहुए सूर्यके समान तेजवान महर्षि अगस्त्यजीके चरण छूकर प्रणाम करते हुए ॥ २४ ॥ धर्मात्मा श्रीरामचन्दजी सीता और लक्ष्मणजीके सहित ऋपिजीके चरणोंकी वंदना करके करजोड उनके आगे गडे रहे ॥ २५ ॥ यह देखकर महर्षि अगस्त्यजीने आदरसहित रामचन्द्रजीको ग्रहण किया चरण पखारनेके लिये जल मँगवा दिया, आसन देकर चिंटने की अनुमति दी किर कुगल प्रश्न किया.॥ २६॥ तिसके पीछे अगस्त्यजीने अग्निमें आहुति देकर उन आये हुए पाहुनोंको अर्घ्य दिया, और वानप्रस्थ धर्मके नंददायतोगमोमुनीनांदीप्ततेजसम् ॥ अत्रवीद्रचनंवीरोलक्ष्मणंलक्ष्मिवर्धनम् ॥२२॥ बहिर्लक्ष्मणनिष्कामत्यगस्त्योभगवानृषिः ।। औदायें णावगच्छामिनिधानंतपसामिदम् ॥२३॥ एवमुक्त्वामहावाहुरगस्त्यंमूर्यवर्चसम् ॥ जग्राहापततस्तस्यपादीचरघुनंदनः॥२४॥अभिवाद्यतुधर्मा त्मातस्थौगमःकृतांजलिः ॥ सीतयासहवेदेह्यातदारामःसलक्ष्मणः ॥ २५ ॥ प्रतिगृह्यचकाकुत्स्थमर्चयित्वासनोदकैः ।। कुशलप्रश्नमुक्त्वाचा स्यतामितिमोत्रवीत् ॥२६॥ अग्निहुत्वाप्रदायार्घ्यमतिथीन्प्रतिपूज्यच ॥वानप्रस्थेनधर्मेणसतेपांभोजनंददौ ॥२७॥ प्रथमंचोपविश्याथधर्मज्ञोमु निपुंगवः ॥ उयाचराममासीनंपांजलिंधर्मकोविदम् ॥२८॥ अन्यथाखलुकाकुत्स्थतपस्वीसमुदाचरन् । दुःसाक्षीवपरेलोकेस्वानिमांसानिभाये त् ॥२९॥ गजासर्वस्यलोकस्यधर्मचारीमहारथः। पूजनीयश्चमान्यश्चभवान्प्राप्तःप्रियातिथिः॥३०॥ एवमुक्ताफलेर्मूले पुप्पैश्वान्यैश्चराघवम्॥ पूजयित्वायथाकामंततोगस्त्यस्तमब्रवीत् ॥ ३१ ॥ इदंदिव्यंमहचापहेमवव्रविभूपितम् ॥ वैष्णवंपुरुपव्याप्रनिर्मितं विश्वकर्मणा.॥ ३२ ॥ अनुगार आहार करने की मामयी दी ।। २७ ॥ अनन्तर धर्मके जाननेवाले महर्षि अगस्त्यजी प्रथम स्वयं बैठ पीछे कर जोडकर बैठेहुए धर्मपंडित श्रीरामचन्द्रजीसे पोले ॥२८॥ हे गमचन्द्रजी ! तपस्वी यदि पाहुनेका मत्कार न करके उसके प्रति और कोई अन्यथा आचरण करै तो वह झूठी गवाही देनेवाले मनुष्यकी समान पन्योकमें अपना मांस भक्षण करनाहै ॥ २९ ॥ फिर आप तो महारथी और सब लोकोंके धर्मचारी खजाहैं तिसार आपने प्रिय अतिथिकी भांति हमारे आश्रममें आगमन कियाहै । अतएव आपकी पूजा और सन्मान करना हमारा सब भांतिसे कर्तव्य है ॥३०॥ यह कहकर महर्पिजी फल, मूल, पुष्प, व औरभी उत्तम २ उनके पदार्थामै यथाभिलपित भांतिमे गमचन्द्रजीकी पूजा करके फिर कहने लगे ॥ ३१ ॥ हे पुरुपश्रेष्ठ ! यह विश्वकर्माका बनाया हुआ, स्वर्ण और वा.रा.भा. आर०कां० ।२३ ॥ स०१३ वत्र मणिसे विभूपित दिव्य और बड़ा वैष्णव चाप ॥ ३२ ॥ और सूर्यके समान प्रभावसम्मन्न उत्तम वाण यह दोनों चीजें हमें ब्रह्माजीने दी हैं इन्द्रजीने दो तरकस जिनके वाण कभी नहीं निवडते हमको दिये हैं ॥ ३३ ॥ तीखे बाणोंसे परिपूर्ण और अभिके समान चमकते हुए यह उत्तम दो वरकम और यह स्वर्णमय कोशबद्ध खड्न इन्द्रजीने हमको दिये हैं ॥ ३४ ॥ हे श्रीरामचन्द्रजी! पहले भगवान विष्णुजीने इस वैष्णव धनुपकी सहायतासे युदमें महायली छली असुरोंको संहार करके देवताओंको दीतिमती लक्ष्मी प्रदान कीथी ॥ ३५॥ हे मानद ! वज्रधर इन्दजी जिमप्रकार वजधारण करते हैं, तुमभी तैसेही पवित्रयश प्राप्त करनेके अर्थ यह शर चाप खड्ग और दो तरकस ग्रहण करो ॥ ३६ ॥ महा तेजस्वी भगवान् महर्षि अगस्त्यजी ऐमा कहकर महापण्डित प्रवीण रामचन्द्रनीको अमोघःसूर्यसंकाशोब्रह्मदत्तःशरोत्तमः ॥ दत्तोमममहेंद्रेणतूणीचाक्षय्यसायको ॥३३॥ संपूर्णानिशिवेणिवलद्भिरिवपावकः ॥ महाराजतकोशो यमसिहमविभूपितः ॥३४॥ अमेनधनुपारामहत्वासंख्येमहासुरान् ॥ आजहारश्रियंदीप्तांपुरविष्णुर्दिवौकसाम् ॥ ३५॥ तदनुस्तीचतूणीवशरं खरंचमानदः॥ जयायप्रतिगृह्णीप्ववववधरोयथा ॥३६॥ एवमुक्त्वामहातेजाःसमस्तंतद्वरायुधम् ॥ दत्त्वारामायभगवानगस्त्यःपुनरत्रवीत्॥ ॥ ३७ ॥ इत्याचे श्रीम० वा० आं० अरण्यकांडे द्वादशःसर्गः ॥ १२॥ रामप्रीतोस्मिभद्रतेपरितुष्टोस्मिलक्ष्मण।।अभिवादयितुंयन्मांप्राप्तीस्थः सहसीतया ॥१॥अध्वश्रमेणवांखेदोवाधतेप्रचुरश्रमः॥ व्यक्तमुत्कंठतेवापिमेथिलीजनकात्मजा॥ २॥ एपाचसुकुमारीचखेदेश्चनविमानिता॥ प्राज्यदोपवनप्राप्ताभर्तृस्नेहप्रचोदिता ॥ ३॥ यथेपारमतेरामइहसीतातथाकुरु ।। दुष्करंकृतवत्येपावनेत्वामभिगच्छती॥४॥एपाहिप्रकृतिःस्त्री णामासृष्टेरघुनंदन ॥ समस्थमनुरज्यंतेविपमस्थंत्यतिच ॥५॥ वह समस्त अतिश्रेष्ठ वैष्णव आयुध देकर फिर बोले ॥ ३७॥ इत्या श्रीमद्रा० पा० आदि० आरण्यकाण्डे भाषाटीकायां द्वादशः सर्गः ॥ १२॥ हे श्रीरामचन्द्र ! तुम जो सीतासहित हमको प्रणाम करने आये हो इससे हम तुम्हारे और लक्ष्मणके प्रति बहुतही प्रसन्न हुए हैं, तुम्हारा मंगल होरे ॥ ३ ॥ यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि, मार्ग चलनेकी थकावटसे तुमको महाकष्ट हुआ है । जनककुमारी सुकुमारी जानकीजीभी विश्राम करना चाहती हैं ॥ २॥ यह बडी ही सुकुमार हैं, इन्होंने भला कभी काहेकोही कष्ट सहा होगा परन्तु पतिसे स्नेहके कारण इस बडे कष्ट देनेवाले वनमें यह आई हैं ॥३॥ हे श्रीरामरन्यजी ! जान कीजीका मन जिसमें प्रसन्न रहे वही तुमको करना चाहिये, क्योंकि तुम्हारे साथ २ उनको rur rai ******** ॥ २३ पातीका मन जिम जगन ग्रीनपत्रांकामा मारियाक मकी दलनि दुई है नबने मियाँका स्वभावही ऐसा है कि, धनवान् पुरुषको ग्रहण करती और दरिद्रको त्याग करती हैं ॥ ५ ॥ खिये बिजलीकी चपलता, प्रमोंकी नीयता, गरुड और पवनकी गीयताका अनुकरण करती हैं ॥६॥ परन्तु इन तुम्हारीभार्या जानकीजीमें इन सबमें से कोई भी दोष नहीं है। यह देवताओंक पीचर्ने अरुन्धतीकी समान वर्गमनीय और कीर्तिमती हैं ॥ ७ ॥ हे शत्रुदमनकारी ! तुम सुमित्राकुमार और सीताजीके साथ जिस देशमें वास करोगे वही देश गोभायमान हो जायगा ॥ ८॥ जब कपिने इस प्रकार कहा तब श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड विनीत पचनसे अग्निके समान नेजस्वी उन महर्षि अगस्त्यजीसे कहा । ॥ हे मुनिवर ! हमारे, हमारी भार्या और हमारे भाताके गुणोंसे जो आप प्रसन्न हुएहैं इससे मैं धन्य और अनुयह भाजन हुआ ॥ १० ॥ निममें आना कीजिये कि, ऐमा कोई स्थान है जहां वनभी बड़ा हो और जलभी सरलवासे प्राप्त होजाया करे और वहां हम कुटी बनाकर स्वच्छन्दता शतदानालोलत्वंशवाणांतीक्ष्णतायथा ॥ गरुडानिलयोशेव्यमनुगच्छंतियोपितः ॥ ६॥ इयंतुभवतोभा दोपेरतैर्विवर्जिता ।। श्लाघ्याच अपदेश्यानयथादेववकंचती ॥ ७ ॥ अलंकृतोयंदेशश्चयवसौमित्रिणासह ॥ वेदेह्याचानयारामवत्स्यसित्वमरिंदम ॥ ८॥ एवमुक्तस्तुमुनि नागवामयतांजलिः॥ याचप्रश्रितंवास्यमृपिंदीप्तमिवानलम् ॥ ९ ॥धन्योस्म्यनुगृहीतोस्मियस्यमेमुनिपुंगवः ॥ गुणेःसभ्रातृभार्यस्यगुरुनः परिनुप्यति ॥ १०॥ किंतुव्यादिशमेदेशंसोदकंबहुकाननम् ॥ यत्राश्रमपदंकृत्वावसेयंनिरतःसुखम् ॥ ११॥ ततोत्रवीन्मुनिश्रेष्ठःश्रुत्वारामस्य भापितम् ॥ ध्यावामुहूर्तधर्मात्माततोवाचवचःशुभम् ॥ १२ ॥ इतोद्वियोजनेतातबहुमूलफलोदकः ॥ देशोबहुमृगःश्रीमान्पंचवट्यभिविश्रु नः ॥ १३ ॥ तत्रगत्वाश्रमपदंकृत्यासौमित्रिणासह ॥ रमस्वत्वंपितुर्वाक्यंयथोक्तमनुपालयन् ॥ १४ ॥ विदितो पवृत्तांतोममसर्वस्तवानघ । लपमश्रप्रभावेणग्नेहादशरथस्यच ॥ १५ ॥ हृदयस्थंचतेछंदोविज्ञातंतपसामया ॥ इहवासंप्रतिज्ञायमयासहतपोवने ॥ १६॥ गे वाम कग ॥1॥ श्रीगमचन्द्रजीके वचन श्रण करके धर्मात्मा मुनिवर मुहूर्तभरतक चिंता करके शुभ वचन बोले ॥ १२ ॥ हे वत्स ! इस स्थानसे आर कांगो अन्नपर पंचाटी नामक विण्यात एक अतिसुन्दर स्थान है इस स्थानमें फल, मूल और जल बहुतायतसे मिलताहै और अनेक प्रकारके पशुभी वहीं पाग करी है।३॥ तुम लक्ष्मणनी साथ वहां जाओ और आश्रम बनाकर पिता दशरथजीका सत्यपालन करते हुए सुखसे वास करो ॥ १४ ॥ हे पापरहित : हम नहर पाने के कारण तार प्रभावमे तुम्हारा और दशरथजीका समस्त वृत्तांत जानते हैं कारण, दशरथजीका हमसे बडा स्नेहथा नहीं तो ऐसे वृत्तान्। की सा आवश्यकनाथी ॥ १५॥ और हम नरके प्रभारने यहभी जानते हैं कि, आपके मनमें क्याहै जो कि यह प्रतिज्ञा करके हमारे निकट आप वसैं:
1.रा.भा. आर०कां २१ ॥ स०१३ पत्र मणिमे विभूपित दिव्य और बड़ा वैष्णव चाप ॥ ३२ ॥ और सूर्यके समान प्रभावसम्पन्न उत्तम बाण यह दोनों चीजें हमें ब्रह्माजीने दी हैं और इन्द्रजीनं दो तरकस जिनके पाण कभी नहीं निवडते हमको दिये हैं ॥ ३३ ॥ तीखे बाणोंसे परिपूर्ण और अनिके समान चमकते हुए यह उत्तम दो वरकस और पह स्वर्णमय कोशवद खन्न इन्द्रजीने हमको दिये हैं ॥ ३४ ॥ हे श्रीरामचन्द्रजी! पहले भगवान् विष्णुजीने इस वैष्णव धनुपकी सहायतासे युद्ध में महावली उली असुरोंको संहार करके देवताओंको दीनिमती लक्ष्मी प्रदान कीथी ॥ ३५॥ हे मानद । वज्रधर इन्द्रजी जिसप्रकार वजधारण करते हैं, तुमभी तैसेही पवित्रयश पाम करने के अर्थ यह शर चाप खड्ग और दो तरकस ग्रहण करो ॥ ३६ ॥ महा तेजस्वी भगवान् महर्षि अगस्त्यजी ऐसा कहकर महापण्डित प्रवीण रामचन्द्रजीको अमोघःसूर्यसंकाशोब्रह्मदत्तःशरोत्तमः ॥ दत्तोमममहेंद्रेणतूणीचाक्षय्यसायको ॥३३॥ संपूर्णौनिशिनर्वाणवलद्भिविपावकैः॥ महाराजतकोशो यमसिहेमविभूपितः ॥३४॥ अमेनधनुपारामहत्वासंख्येमहासुरान् ॥ आजहारश्रियंदीप्तांपुराविष्णुर्दिवौकसाम् ॥ ३५॥ तदनुस्तौचतूणीचशरं खगनमानदः॥ जयायप्रतिगृह्णीवववज्रधरोयथा ॥३६॥ एवमुक्त्वामहातेजाःसमस्तंतद्वरायुधम् ।। दत्त्वारामायभगवानगस्त्यःपुनरत्रवीत् ॥ ॥ ३७ ।। इत्याचे श्रीम० वा० आं• अरण्यकांडे द्वादशःसर्गः॥१२॥रामप्रीतोस्मिभद्रतेपरितुष्टोस्मिलक्ष्मण ॥अभिवादयितुंयन्मांप्राप्तीस्थः सहसीतया ॥१॥अध्वश्रमेणवांखेदोवाधतेप्रचुरश्रमः॥ व्यक्तमुत्कंठतेवापिमैथिलीजनकात्मजा॥२॥ एपाचसुकुमारीचखेदेश्चनविमानिता ॥ प्राज्यदोपवनप्राप्ताभर्तृस्नेहप्रचोदिता ।। ३॥ यथैपारमतेरामइहसीतातथाकुरु ॥ दुष्करंकृतवत्येपावनेत्वामभिगच्छती॥४॥एपाहिप्रकृतिःस्त्री णामामृष्टेरघुनंदन ॥ समस्थमनुरज्यंतेविपमस्थंत्यजंतिच ॥५॥ पह ममस्त अतिश्रेष्ठ वैष्णव आयुध देकर फिर वोले ॥ ३७॥ इत्याचे श्रीमद्रा० वा. आदि० आरण्यकाण्डे भापाटीकायां द्वादशः सर्गः ॥ १२॥ हे श्रीरामचन्द्र ! तुम जो मीनामहित हमको प्रणाम करने आये हो इससे हम तुम्हारे और लक्ष्मणके प्रति बहुतही प्रसन्न हुए हैं, तुम्हारा मंगल होवे ॥ ३ ॥ पह स्पष्ट मात होता है कि, मार्ग चलनेकी थकावटसे नुमको महाकष्ट हुआ है । जनककुमारी सुकुमारी जानकीजीभी विश्राम करना चाहती हैं ॥ २॥ यह बडी ही रकुमार हैं, इन्होंने भला कभी काइकोही कष्ट सहा होगा परन्तु पतिसे स्नेहके कारण इस बड़े कष्ट देनेवाले वनमें यह आई हैं ॥३॥ हे श्रीरामचन्द्रजी ! जान कीजीसा मन जिममें समान रहे वही नमो करना पानिप,पयोंकि नम्हारे गाय पनको आका होने का 路於染器平米米米卡 क ॥ २१ ॥ m सरंकी उत्पनि दुई है नरमे बियॉका खनावही ऐसा है कि, धनवान् पुरुषको ग्रहण करती और दरिदको त्याग करती है ॥ ५ ॥ नि विजलीकी चपलता, अवोंकी नीयता, गमड और पवनकी गीषवाका अनुकरण करती हैं ॥६॥ परन्तु इन तुम्हारी भार्या जानकीजीमें इन सबमेंसे कोई भी दोष नहीं है। यह देवताओंके पीवमें अन्यनीकी समान वर्गमनीय और कीर्तिमती हैं ॥ ७ ॥ हे रात्रुदमनकारी ! तुम सुमित्राकुमार और सीवाजीके साथ जिस देशमें वास करोगे वही देश गांभापमान हो जायगा ॥ ८॥ जर पिने इस प्रकार कहा नव श्रीरामचन्द्रजीने हाथ जोड विनीत वचनसे अनिके समान तेजस्वी उन महर्षि अगस्त्यजीसे कहा ॥ हे मुनिवर ! हमारे, हमारी भाके और हमारे माताके गुणोंसे जो आप प्रसन्न हुएहैं इससे मैं धन्य और अनुयह भाजन हुआ ॥ १० ॥ तिमी आमा कीजिये कि, रोमा कोई स्थान है जहां वनभी बड़ा हो और जलभी सरलतासे प्राप्त होजाया करे और वहाँ हम कुटी बनाकर स्वच्छन्दता शतवदानालोलत्वंशवाणांतीक्ष्णतायथा ॥ गरुडानिलयो-शेध्यमनुगच्छंतियोपितः ॥ ६॥ इयंतुभवतोभार्यादोपेरेतैर्विवर्जिता ॥ श्लाध्यात्र व्यपदेश्यानयथादेयप्वकंधती ॥७॥ अलंकृतोयंदेशश्चयवसौमित्रिणासह ।। वैदेयाचानयारामवत्स्यसित्वमरिंदम ॥ ८॥ एवमुक्तस्तुमुनि नागपसमयतांजलिः॥ याचप्रथितंपाक्यमृपिंदीप्तमिवानलम् ॥ ९॥धन्योस्म्यनुगृहीतोस्मियस्यममुनिपुंगवः ।। गुणैःसनातृभार्यस्यगुरुनः परितुप्यति ॥ १०॥ किंतुव्यादिशमेदेशंसोदकंबहुकाननम् ।। यत्राश्रमपदंकृत्यायसेयंनिरतःसुखम् ॥ ११॥ ततोत्रवीन्मुनिश्रेष्ठ श्रुत्वागमस्य भाषितम् ॥ ध्यात्वामुहूर्तधर्मात्माततोवाचवचःशुभम् ॥ १२॥ इतोद्वियोजनेतातबहुमूलफलोदकः ॥ देशोबहुमृग श्रीमान्पंचवन्यभिविश्रु तः ॥१३॥ तवगत्वाश्रमपदंकृत्वासौमित्रिणासह ॥ रमस्वत्वंपितुर्वाक्यंयथोक्तमनुपालयन् ॥ १४ ॥ विदितो पवृत्तांतोममसर्वस्तवानघ। तपमश्रप्रभावेणग्नेहादशरथस्यच ।। १५ ।। हृदयस्थंचतेछंदोविज्ञातंतपसामया । इहवासंप्रतिज्ञायमयासहतपोवने ॥ १६॥ मे पाग काम ॥ ११ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके वचन श्रवण करके धर्मात्मा मुनियर मुहूर्तभरतक चिंता करके शुभ वचन बोले ॥ १२ ॥ हे वत्स ! इस स्थानसे आठ कोगो अन्नरपर पंचवटी नामक विख्यात एक अतिसुन्दर स्थान है इस स्थानमें फल, मूल और जल बहुतायतसे मिलवाहै और अनेक प्रकारके पशुभी वहां पाग करतं । १३॥ तुम लक्ष्मणजी के साथ यहां जाओ और आश्रम बनाकर पिता दशरथजीका सत्य पालन करते हुए सुखसे वास करो ॥ १४ ॥ हे पापरहित मरने के यग होने कारण तप प्रभावसे तुम्हारा और दशरथजीका समस्त वृत्तांत जानते हैं कारण, दशरथजीका हमने वडा स्नेहथा नहीं तो ऐसे वृत्तान्त जानकी सा आवश्यकनाथी ॥ १५॥ और हम तपर प्रभावने यहभी जानते हैं कि, आपके मन क्याहै जो कि यह प्रतिज्ञा करके हमारे निकट आप बसेंगे आर० स०१ और शिप पामस्थान की याना क्यों पूछते हैं ? अर्थात् हमारे निकट राक्षस नहीं आ सकते आप उनको मारना चाहते इस कारण आप यहां रहना नहीं शाहले ।। १६॥ इमी कारण हम कहते हैं कि, तुम पंचवटीको चले जाओ, वह बनैला देश अति रमणीय है वहां सीताके मनकोभी सन्तोप होगा ॥ १७ ॥ पंचवटी यडाई करने योग्य है, और बहुत दूरभी नहीं है, इस गोदावरीके निकटही है मिथिलेशदुलारी वहांपर प्रसन्न होकर रहेंगी ॥ ॥१८॥ हे महाराहो ! वह बहुत फल मूल करके युक्त अनेक भांतिके विहंगमोंसे परिपूर्ण पुण्यमय और निर्जन देश अति रमणीयहै ॥ १९ ॥ तुमभी सदाचारी भीर रक्षाकार्य करने में समर्थहो उस स्थानमै वास करके तपस्वी लोगोंका पालन भली प्रकार कर सकोगे ॥ २० ॥ हे वीर ! यह जो जो महुयेके वृक्षोंका महावन दिगाई देता है उसके उनर ओर होकर तुमको जाना होगा, फिर उसके पीछे तुमको न्ययोध वृक्षोंका वन प्राप्त होगा ॥ २१ ॥ तिसके पीछे विशेप स्थानपर पहुँच अतशत्वामहंगमिगच्छपंचवटीमिति ॥ सहिरम्योवनोदेशोमैथिलीतवस्यते ॥ १७॥ सदेशालाघनीयश्चनातिदूरेचराघव ॥ गोदावर्याः ममीपेनमैथिलीतत्ररंस्यते ॥ १८॥ प्राज्यमूलफलैश्चैवनानाद्विजगणैर्युतः ॥ विविक्तश्चमहाबाहोपुण्योरम्यस्तथैवच ॥ १९ ॥ भवानपिसदा नारःशक्तश्रपरिरक्षणे ॥ अपिचाबवसत्रामतापसान्पालयिष्यसि ॥ २०॥ एतदालक्ष्यतेवीरमधूकानांमहावनम् ॥ उत्तरेणास्यगंतव्यंन्यग्रो धमपिगच्छता ॥ २१॥ ततःस्थलमुपारुह्यपर्वतस्याविदूरतः ॥ ख्यातःपंचवटीत्येवनित्यपुप्पितकाननः ॥ २२ ॥ अगस्त्येनैवमुक्तस्तुरामः मौमित्रिणासह ॥ सत्कृत्यामंचयामासतमृपिंसत्यवादिनम्॥२३॥ तौतुतेनाभ्यनुज्ञातौकृतपादाभिवंदनौ॥ तमाश्रमपंचवटीजग्मतुःसहसीतया ॥ २१ ॥ गृहीतचापौतुनराधिपात्मजीविपक्ततूणीसमरेष्वकातरौ ॥ यथोपदिष्टेनपथामहर्पिणाप्रजग्मतुःपंचवटींसमाहितौ ॥ २५ ॥ इत्या श्रीम• वा० आ० अरण्यकांडे त्रयोदशःसर्गः॥ १३॥ नेमे नुनको एकपर्वत दिखाई देगा, उस पर्वतके कुछ दूरही विख्यात पंचवटीका वन है वह सदाही फूला फला रहता है ॥ २२॥ श्री अगस्त्यजीके ऐसे वचन श्रवण फरे भीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके महित सत्यवादी ऋपिका भली भांति आदर सत्कार करके उनसे विदा मांगतेहुए ॥ २३ ॥ अगस्त्यजीकी आज्ञा पाकर दोनोंजन उनके चरणोंकी बन्दना करके सीताजी के साथ पंचवटी आश्रमके लिये चले ॥२४॥ समरमें न डरनेवाले दोनों नृपकुमार धनुप धारण कर और तरकस पांपकर महर्षि अगस्त्यजीने जो मार्ग बता दियाथा अतिसावधानीमे उस मार्गके द्वारा पंचवटीकी यात्रा करते हुए ॥ २५ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिमाये आरण्यकांडे भापाटीकायां प्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥ स *************** ॥ २३
अनन्तर श्रीरामचन्द्रजीने पंचवटीक मार्गमें जाते २ एक भयानक पराक्रमवान् महाशरीरखाले गीपको देसा ॥ ३ ॥ महाभाग श्रीरामचन्द्र और लक्ष्मणजी बनमें
इम पक्षीको देख राक्षस समझकर उससे पूछने लगे कि, तुम कौनहो ? ॥ २॥ गीध मधुर और प्यारे वचनोंसे उनको प्रसन्न करके बोला, कि-हे वत्स ! तुम हमको
अपने पिताका मित्र समझो ॥ ३ ॥ तब श्रीरामचन्द्रजीने उसको पिताका मित्र जानकर पूजा करते हुए प्रेमभावसे उसका कुल और नाम गूंठा ॥ ४ ॥
श्रीरामचन्द्रजीके वचन सुनकर गीध सब जीवोंकी उत्पत्तिके वर्णनका प्रसंग वर्णन करके अपना कुल और नाम कहने लगा ॥ ५॥ हे महावाहो ! हे राम!
पूर्वकालमें जो कि, प्रजापति हुएथे, हम क्रमशः उन सबका नाम बतलाते हैं आप श्रवण कीजिये ॥ ६ ॥ कर्दम उन सबमें बडेथे उनके पीछे विस्त, शेप,
अथपंचवटींगच्छवंतरारघुनंदनः ॥ आससादमहाकायंगृधंभीमपराक्रमम् ॥ ३॥ तंदृष्ट्वातीमहाभागीवनस्थंरामलक्ष्मणौ ॥ मेनातेराक्षसंपक्षिववा
णीकोभवानिति॥२॥ततोमधुरयावाचासौम्ययात्रीणयनिव । उवाचवत्समाविधिवयस्यंपितुरात्मनः ॥३॥सतंपितृसखंमत्वापूजयामासराघवः॥
सतस्यकुलमव्यग्रमथपप्रच्छनामच ॥ १॥ रामस्यवचनं श्रुत्वाकुलमात्मानमेवच ॥ आचचक्षेद्विजस्तस्मेसर्वभूतसमुद्भवम्।।५||पूर्वकालेमहावा
होयेप्रजापतयोऽभवन् ॥ तान्मेनिगदतःसर्वानादितःशृणुराघव॥६॥कर्दमःप्रथमस्तेपांविकृतस्तदनंतरम्॥शेपश्चसंश्रयश्चैववहुपुत्रश्चवीर्यवान्।।७॥
स्थाणुमरीचिरविश्वक्रतुश्चेवमहावल ॥ पुलस्त्यश्चांगिराश्चैवप्रचेताःपुलहस्तथा ॥ ८॥ दक्षोविवस्वानपरोऽरिष्टनेमिश्चराधव ॥ कश्यपश्चमहाते
जास्तेपामासीचपश्चिमः॥९॥प्रजापतेस्तुदक्षस्यबभूवुरितिविश्रुताः॥ पटिदुहितरोरामयशस्विन्योमहायशः॥१०॥ कश्यपःप्रतिजग्राहतासामष्टी
सुमध्यमाः॥अदितिंचदितिवदनूमपिचकालकाम् ॥ ११॥ ताम्रांक्रोधवशांचेवमनुंचाप्यनलामपि ॥ तास्तुकन्यास्ततःप्रीतःकश्यपःपुनरत्र
वीत् ॥ १२ ॥ पुत्रांस्त्रैलोक्यभर्तृन्वैजनयिष्यथमत्समान् ॥ अदितिस्तन्मनारामदितिश्चदनुरेवच ।। १३ ॥
संश्रय, वीर्यवान, बहुपुत्र ॥ ७ ॥ स्थाणु, मरीचि, अत्रि, महावलवान् ऋतु, पुलस्त्य, अंगिरा, प्रचेता, पुलह ॥ ८॥ दक्ष, विवस्वान्, आरेष्टनेमि यह क्रमसे उत्पन्न
हुए महात्मा कश्यप उन सबमें छोटेथे ॥ ९॥ हे महायशस्वी श्रीरामचन्द्रजी ! उनमें दक्षप्रजापतिके यशस्विनी लोकमें विख्यात साठ ६० कन्यायें उत्पन्न हुई ॥१०॥
उनमें अविसुन्दरीआठ कन्याओंका कश्यपजी विवाह करते हुए । उनके नाम अदिति, दिति, दनु, कालका ॥११॥ ताम्रा, क्रोधवशा, मनु व अनला; विवाह होजाने
पर प्रसन्नहो कश्पपजी इन दक्षकन्याओंसे बोले ॥१२॥ कि, तुम हमारी समान त्रिलोकीका भरण पोपण करनेवाले पुत्र उत्पन्न करो यह सुन दिति अदिति दनु॥१३॥
आर०कां०
.रा.मा.
स०१४
२३॥
और फाटका यह तो येसे पुत्र प्रान करनेके लियौ अभिलापिनी हुई और शेप चारोंने पतिके कहनेमें ध्यान न लगाया अदितिके तेंतीस ३३ देवता हुए ॥ १४ ॥
अदिविके गर्भमें १२ आदित्य ८ वसु ११ रुद्र/२ अश्विनीकुमार उपजे । और दितिने भी बडे यशस्वी दैत्य उत्पन्न किये ॥ १५ ॥ पहले वन और
समुद्रमहित यह पृथ्वी उनहीकी थी। हे आरिन्दम ! दनुने अश्वग्रीवनामक एक पुत्र उत्पन्न किया ॥ १६ ॥ और कालकाने नरक और कालक नामक दो पुत्र
उत्पन्न किये मोथी, भासी; श्येनी, धृतराष्ट्री और शुकी ॥ १७ ॥ ताम्रासे यह लोकविख्यात पांच कन्या जन्मी उसमें क्रौञ्चीसे उलूक पैदा हुए भासीसे भास
जन्मे ॥ १८॥ श्वनीने अति तेजस्वी श्येन और गीधोंको प्रसय किया और धृतराष्ट्रीसे सब हंस ॥ १९ ॥ और चकवा चकवियोंको भी उसीने उत्पन्न किया, शुकीके
कालकाचमहावाहोशेपास्त्वमनसोभवन् ॥ अदित्यांजज्ञिरेदेवास्त्रयस्त्रिंशदरिंदम ॥१४॥आदित्यावसवोरुद्राअश्विनौचपरंतप॥ दितिस्त्वजनय
रपुत्रान्दैत्यास्तातयशस्विनः ॥ १५ ॥ तेपामियंवसुमतीपुरासीत्सवनार्णवा ॥ दनुस्त्वजनयत्पुत्रमश्वग्रीवमरिंदम॥ १६॥ नरकंकालकचैवका
लकापिव्यजायत । कीचींभासींतथाश्येनीधृतराष्ट्रीतथाशुकीम् ।। १७॥ ताम्रातुसुपुवेकन्या पंचेतालोकविश्रुताः ॥ उलूकाअनयत्कींचीभासी
भासान्व्यजायत ॥१८॥ श्येनीश्येनश्चिगृधांश्चव्यजायतसुतेजसः ॥ धृतराष्ट्रीतुहंसांश्चकलहंसांश्चसर्वशः॥१९॥ चक्रवाकांश्चभदंतेविजज्ञेसापिभा
मिनी ॥ शुकीनतांविजज्ञेतुनतायांविनतासुता ॥ २० ॥ दशक्रोधवशारामविजज्ञेप्यात्मसंभवाः॥ मृगींचमृगमंदांचहरीभद्रमदामपि ॥२१॥
मातंगीमयशार्दूलींश्वेतांचसुरभीतथा ॥ सर्वलक्षणसंपन्नांसुरसांकद्रुकामपि ॥ २२ ॥ अपत्यंतुमृगाःसर्वेमृग्यानरवरोत्तम ॥ ऋक्षाश्चमृगमदायाः
सृमराश्चमरास्तथा ॥ २३ ॥ ततस्त्विरावतींनामजज्ञेभद्रमदासुताम् ॥ तस्यास्त्वेरावतःपुत्रोलोकनाथोमहागजः ॥ २४ ॥ हश्चिहरयोपत्यंवा
नराश्वतपस्विनः ॥ गोलांगूलाचशार्दूलीव्याघ्रांश्चाजनयत्सुतान् ॥२५॥ मातंग्यास्त्वथमातंगाअपत्यंमनुजर्पभ ॥ दिशागजांस्तुकाकुत्स्थश्वेता
व्यजनयत्सुतान् ॥ २६॥
नता कन्या हुई और नताके विनता उत्पन्न हुई ॥२०॥ हे राम ! क्रोधवशाके दश कन्या उत्पन्न हुई उनके नाम यहहैं यथा-मृगी, मृगमंदा, हरी, भदमदा ॥ २१ ॥
मातंगी, शार्दूली, श्वेता, सुरभी, सुरसा, कट्ठका यह सब कन्यायें शुभ लक्षण सम्पन्न थीं ॥ २२ ॥ हे नरश्रेष्ठ ! समस्त मृग मृगीसे उत्पन्न हुए और काले व
सफेद रीछ ममर चमरी आदि मृगमन्दाके जन्मे ॥ २३ ॥ भद्रमदाने इरावती नामक कन्या प्रसव की उसका पुत्र लोकपाल महागज ऐरावत हुआ ॥ २४ ॥
सिंह वानर और गोपुच्छगण हरीके उत्पन्न हुए, शार्दूलीने व्यानोंको प्रसव किया ॥ २५ ॥ हे पुरुपवर श्रीरामचंदजी ! सब हाथी मातङ्गीके पुत्र हुए । श्वेताने
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॥ २३ ॥
दिग्गजों को उनन किया ॥ २६ ॥ सुरभीक दो कन्या हुई, यशस्विनी-गहिणी और गन्धवा ।। मा किया हैं गम ! नुग्माने नागोंको अमर किया, और करके सर्प उत्पन्न हुए ॥ २८ ॥ महात्मा कश्यपजीकी दूसरी मी मनुसे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र यह मर मनुष्य जन्मे ॥ २१ ॥ मो मी कहावत चठी आतीहै कि, मुमसे ब्राह्मण वक्षःस्थलसे क्षत्रिय, जयाओंसे वैश्य, और चरणोंसे शूद्रोंकी उत्पत्ति हुई ॥३०॥ भनयाने गम भ्रष्ट कलगुन वृक्ष जने, विनता शुकीकी पौत्री, और कटू सुरमाको कन्या बहन हुई .॥ ३१ ॥ उनमें कडूने सहस्रों नागपुत्र उत्पन्न किये यही सब पपीको धारण किये हुए हैं और विनताके दो पुत्र गण्ड र अरुण हुए ॥ ३२ ॥ हम तिनही गरुडजीसे उत्पन्न हुएह, सम्माति हमारे बड़े भाई हैं ! हे अरिनाशक तनोदहितरीरामसुरभिर्दव्यजायत ॥ रोहिणींनामभदंतेगंधींचयशस्विनीम् ॥ २७ ॥ रोहिण्यजनयगावोगंध-वाजिनःसुतान् ॥ सुरसाजन सानागावामकअपनगान् ॥ २८॥ मनुर्मनुष्याअनयत्कश्यपस्यमहात्मनः ॥ ब्राह्मणान्क्षत्रियान्वेश्याञ्शूद्रांश्चमनुजपभ ॥ २९ ॥ मुख तोत्राझगाजाताउरसम्भत्रियास्तथा । उरुभ्यांजज्ञिरेवेश्या पद्यांशूद्राइतिश्रुतिः॥३०॥ सर्वान्पुण्यफलान्वृक्षाननलापिव्यजायत ॥ विनता गगशीपात्रीशमुन्मास्यसा ॥ ३१ ॥ कर्नागसहवंतुविजज्ञेधरणीवरान् ॥ द्वौपुत्रौविनतायास्तुगरुडोऽरुणएवच ॥ ३२ ॥ तस्माजातोह मरणात्मपानिश्रममाप्रजः ।। जटायुरितिमांविदिश्येनीपुत्रमरिंदम ॥ ३३ ॥ सोहवाससहायस्तेभविष्यामियदीच्छसि ॥ सीतांचतातरक्षिप्येत्व पियानेमलक्ष्मणे ॥३१॥ जटायुपंतप्रतिपूज्यराघवोमुदापरिष्वज्यचसन्नतोभवत् ॥ पितुर्हिशुश्रावसखित्वमात्मवाजटायुपासंकथितंपुनःपुनः ॥ ॥ ३५ ।। मतपसीतापरिदायमैथिलींसहेवतेनातिवलेनपक्षिणा ॥ जगामतांपंचवटींसलक्ष्मणोरिपून्दिधक्षन्सवनानिपालयन् ॥ ३६॥ इत्या श्रीम. या आ० अरण्यकांडे चतुर्दशःमर्गः॥ १२ ॥ ततःपंचवटींगत्वानानाव्यालमृगायुताम् ॥ उवाचलक्ष्मणरामोधातरंदीततेजसम् ॥१॥ हमाग नाम जरा व हमारी माताका नाम श्रॉनी जानिये ॥ ३३ हे तात । यदि इच्छा होने वो हम तुम्हारी वनमें वमनेके समय सहायता करें और जब तुम लसणजी गहिन कहीं उनमें कंद, मूल, फल लेने जाया करोगे तो हम सीताजीकी रक्षा किया करेंगे ॥ ३४ ॥ रामचंद्रजी प्रफुल्लतासे जटायुको भेंट और उसक! पूजाका उमको प्रणाम काते हुए, और पिताजीके साथ जो मित्रता उसकी थी सो उसे जटायुके मुखसे वारंवार श्रवण करने लगे ॥ ३५॥ फिर वह बलवान् जटायु आपमें मीशजीको रक्षाका भार मींपकर उसको साथ ले लक्ष्मणजीके सहित शत्रुओंको जलाते वनकी रक्षा करनेके लिये सुप्रसिद्ध पंचवटीमें गमन करते हुए ॥३६: इल्याएँ भीमा या आआरण्यकांडे भापाटीकापां चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥ तिसके पीछे यह अनेक प्रकारके सी और पशुयुक्त पंचवटीमें गमन करके तेज: HINDI वा.रा.भा. आर०कां ॥२४॥ ************* प्रकाशमान भाता लक्ष्मणसे बोले ।। १ ।। हे सौम्य ! महर्षि अगस्त्यजीने जिसको बवायाथा अब हम उसी सदा फूले फले वन करके शोभायमान पंचवटीमें आगरे हैं ।। २ ।। आश्रम बनाने के योग्यस्थान निर्णय करनेमें तुम भलीभाँति चतुरहो तिससे इस काननके चारों ओर दृष्टि डालिये कि, कौनमे स्थानमें हमारे मनमाना आश्रम वन सकताहै ।। ३ ।। हे लक्ष्मण ! जिस स्थानमें तुम हम और जानकीजी विशेष प्रसन्नता सहित रह सकें और जलभी जहां निकदही हो ऐसे स्थानको तुम खोजी ॥४॥ जिस जगह वन और जल दोनोंही रमणीय और पावनहों व ईंधन, पुष्प, कुश, जल जहां निकटही पाया जाये ऐसा स्थान देसो ॥ ५॥ श्रीरामचन्द्रजीने जब इन प्रकार कहा तब लक्ष्मणजीने कर जोडकर सीवाजीके सामने रामचन्द्रजीसे कहा ॥ ६ ॥ हे भाई साहब ! हम आपके विद्यमान रहते मैकडों वर्गतकभी स्वाधीन नहीं हैं न कुछ विचारही सकतेहैं और हमारा विचार ठीक भी नहीं है तिससे अब आप स्वयंही मनोहर स्थान देख भाल हमको वहां आश्रम बनानेकी आज्ञा दीजिये आगताःस्मयथोद्दिष्टयंदेशमुनिरस्रवीत् । अयंपंचवटीदेशःसौम्यपुप्पितकाननः ।।२।। सर्वतश्चार्यतादृष्टिःकाननेनिपुणोद्यसि ॥ आश्रम कतर स्मिन्नोदेशेभवतिसंमतः ।। ३ ॥ रमतेयत्रवैदेहीत्वमहंचेयलक्ष्मण ।। तादृशोदृश्यतांदेशःसनिकृष्टजलाशयः ॥ ४ ॥ बनरामण्यम्यनजलराम ण्यकतथा ॥ सन्निकृष्टंचयस्मिंस्तुसमित्पुष्पकुशोदकम् ॥५॥ एवमुक्तस्तुरामेणलक्ष्मणःसंयतांजलिः ॥ सीतासमक्षंकाकुत्स्थमिदंवचनम ब्रवीत् ॥६॥ परवानस्मिकाकुत्स्थत्वयिवर्पशतंस्थिते॥ स्वयंतुरुनिदेशेक्रियतामितिमविद् ॥७॥ सुप्रीतस्तेनवाक्येनलक्ष्मणन्यमहायुतिः॥ विमृशवोचयामासदेशंसर्वगुणान्वितम् ॥ ८॥ सतरुचिरमाक्रम्यदेशमाश्रमकर्मणि ॥ हस्तेगृहीत्वाहस्तेनरामःसौमित्रिमत्रवीत् ॥ ९॥ अयं देशःसमा श्रीमान्पुष्पितेस्तरुभिर्वृतः ।। इहाश्रमपदंरम्य॑यथावत्कर्तुमर्हसि ॥१०॥ इयमादित्यसंकाशेःपञःसुरभिगंधिभिः ॥ अदूरदृश्यतेरम्या पमिनीपद्मशोभिता ॥११॥ यथाख्यातमगस्त्येनमुनिनाभावितात्मना । इयंगोदावरीरम्यापुप्पितेस्तरुभिता ॥ १२॥ हंसकारंडयाकीर्णा चक्रवाकोपशोभिता ॥ नातिदूरेनचासनेमृगयूथनिपीडिता ॥ १३ ॥ ।। ७ । महायुतिमान् श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके यह वचन सुन परम प्रसन्न हो विचारकरके सर्व गुणों करके युनः एक मनोहर स्थान सोज टेने दुए ॥ ८॥ पह स्थान सब भांतिसे मनोहर और आश्रम बनाने के योग्य था वहां श्रीरामचन्द्रजी पदार्पण कर अपने हाथसे लक्ष्मणजीका हाथ पकडकर योठे ॥ ९ ॥ यह स्थान परम श्रीसम्पन्न है भूमि यहांकी बरावर है और फूले हुए वृक्षोसे घिराहुआ है तिससे तुम इस स्थानमें योग्य पर्णकुटी बनाओ ॥ १० ॥ मूके नमान उपल चित्त प्रसन्न करनेवाली सुगन्धि जिनमें आरही हैं ऐसे कमटके फूलोंके सहित यह पुष्करणी यहांसे निकटही यहरही है ॥ ११ ॥ पिगुलामा महर्षि अगस्त्पनीने जिसप्रकार कहा था यह देखो वैमेही फुलाने वृक्षोंमे शोभित गोदावरी दृष्टि आती है ॥ १२॥ यहाँ रंग और ॥ २१ रह नदी न रहोंने बड़ी दूर है न बहुत निकटही है मृगोंके यूथके यूय जहां घूम रहे हैं ॥ १३ सिले हुये वृक्षोंसे शोभिंत मोर गण जहां नाद कररहे हैं : गुका जिनमें विद्यमान पग्म मनोहर देसनेमें दिव्य वडे २ ऊंचे यह सब पहाड दिखाई देते हैं ॥ १४ ॥ उन सब पहाडोंके स्थान २ सुवर्ण चांदी और ना वकी विविध स्वनामे मजहुए हाथियों के समान गोभा पा रहे हैं ॥ १५ ॥ साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, निवार तिनिश, पुन्नागसे शोभित ॥ १६:: आम, अगोक, तिटक, कनकी और चंगा आदि पुष्प, गुल्म, लवा इत्यादि वृक्षोंसे शोभायमान ॥ १७ ॥ स्यन्दन, चन्दन, कदंब, लकुच, धव, अश्वकर्ण, मं. गमी. टाक श्री पटल इन तम्बगेंने भी घिरे हुए हैं ॥ १८॥ हे लक्ष्मण ! यह स्थान अतिशय पवित्र, अतिशय मनोहर, अनेक प्रकारके मृग, और पक्षियोंसे में मयूरनादितारम्याःपाशवीबहुकंदराः॥ दृश्यतेगिरय-सौम्या-फुल्लस्तरुभिरावृताः ॥ १४ ॥ सौवर्णराजतेस्तानेर्देशेदेशेतथाशुभैः ॥ गवाक्षिताद वाभांतिगजा परमभक्तिभिः ॥ १५ ॥ सालेस्तालेस्तमालेश्वखरे पनसर्दुमः॥ नीवारेस्तिनिशेश्चैवपुन्नागेश्योपशोभिताः ॥ १६॥ चूतैरशों के स्तिलकेतकरपियंपकैः॥ पुष्पगुल्मलतोपेतेस्तेस्तैस्तरुभिरावृताः॥ १७ ॥ स्पंदनेश्चंदने पापनसेलकुचैरपि ॥ धवाश्वकर्णखदिरेःशनी किंगुकपाटलैः ॥ १८॥ इदंपुण्यमिदंरम्यमिदंबहुमृगद्विजम् । इहवत्स्यामसौमित्रेसार्धमेतेनपक्षिणा ॥ १९॥ एवमुक्तस्तुरामेणलक्ष्मणःपरली ग्दा । अनिरणाश्रमंभ्रातुश्रकारसुमहावलः ॥२०॥ पर्णशालांसुविपुलांतत्रसंघातमृत्तिकाम् ॥ सुस्तंभांमस्करर्षिकृतवंशांसुशोभनाम् ॥ ॥ २१ ॥ शमीशाखाभिगस्तीर्यदृढपाशायपाशिताम् ॥ कुशकाशशरःपर्णःसुपरिच्छादितांतथा ॥ २२॥ समीकृततलांरम्यांचकारसुमहा। लः ॥ निवामंगषयस्यार्थप्रेक्षणीयमनुत्तमम् ॥ २३॥ सगत्वालक्ष्मण श्रीमानदगोदावरीतदा ॥ नात्वापद्मानिचादायसफलःपुनरागतः॥२॥ पूर्ण है, मी जाऊ महित दम स्थानार हम वास करेंगे ॥ १९ ॥ जय श्रीराम चन्द्रजीने ऐसा कहा तब श्रीलक्ष्मणजीने बहुत शीघ्र रामचन्द्रजीके रहनेके पग्म भाग एक स्थान बनाया ॥ २० ॥ उसमें बड़ी भारी पर्णशाला बनाई भीतें मिट्टीसे उठादी सुन्दर खंभ गाड दिये, ऊपर लंबे २ वांस धरे ॥ २० । उन निगा पानोपर शमीकी दालिये काट २ कर छादी फिर उन शासाओंको रस्सियोंसे अति दृढता सहित बांध दिया, कुश, काश, और शरपत्रसेनी भागि उमको पार गरर करदिया ।। २२॥ तिसपर शमीकी डालियोंकी पत्नियें छा कसकर बांधदी, ऐसा मनोहर स्थान लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजी निपिनाया ॥ २३ ॥ जर स्थान बन नुकावी श्रीमान् लक्ष्मणजी गोदावरी नदीमें नहाकर वहांसे कमल के फूल और अनेक फल लेकर आश्रमको लौटे ॥२४ आर०का . **************************** T लक्ष्मणसे बोले ॥ ३॥ हे सौम्य ! महर्षि अगस्त्यजीने जिसको बतायाथा अब हम उसी सदा फूले फले वन करके शोभायमान पंचवटीम आगये आश्रम बनाने के योग्य स्थान निर्णय करनेमें तुम भलीभाँति चतुरहो तिससे इस काननके चारों ओर दृष्टि डालिये कि, कौनसे स्थानमें हमारे मनमाना आश्रम वन हे ॥ ३ ॥ हे लक्ष्मण! जिस स्थानमें तुम हम और जानकीजी विशेष प्रसन्नता सहित रह सकें और जलभी जहां निकटही हो ऐसे स्थानको तुम सोजो ॥ ४ ॥ जिस जगह यन और जल दोनोंही रमणीय और पावनहीं व ईधन, पुप्प, कुश, जल जहां निकटही पाया जाये ऐसा स्थान देसो॥५॥ श्रीरामचन्दजीने जब इस प्रकार कहा तब लक्ष्मणजीने कर जोडकर सीताजीके सामने रामचन्द्रजीसे कहा ॥६॥ हे भाई साहब ! हम आपके विद्यमान रहते सैकड़ों वर्पतकभी स्वाधीन नहीं हैं न कुछ विचारही सकतेहैं और हमारा विचार ठीक भी नहीं है तिससे अब आप स्वयंही मनोहर स्थान देख भाल हमको वहां आश्रम बनानेकी आज्ञा दीजिये आगताःस्मयथोद्दिष्टयंदेशमुनिरत्रवीत् ॥ अयंपंचवटीदेशःसौम्यपुप्पितकाननः ॥२॥ सर्वतश्चार्यतांदृष्टिकाननेनिपुणोयसि ॥ आश्रमःकतर स्मिनोदेशेभवतिसंमतः ॥३॥ रमतेयत्रवैदेहीत्वमहंचैवलक्ष्मण ॥ तादृशोदृश्यतादेशःसनिकृष्टजलाशयः ॥४॥ बनरामण्यकंयत्रजलराम प्यूकंतथा ॥ सन्निकृष्टंचयस्मिंस्तुसमित्पुष्पकुशोदकम् ॥५॥ एवमुक्तस्तुरामेणलक्ष्मणःसंयतांजलिः ॥ सीतासमक्षकाकुत्स्थमिदंवचनम ब्रवीत्॥६॥ परवान स्मिकाकुत्स्थत्वयिवर्पशतंस्थिते॥स्वयंतुरुचिरेदेशेक्रियतामितिमविद् ॥७॥ सुप्रीतस्तेनवाक्येनलक्ष्मणस्यमहायुतिः॥ विमृशबोचयामासदेशंसर्वगुणान्वितम् ॥ ८॥ सतरुचिरमाक्रम्यदेशमाश्रमकर्मणि ॥ हस्तेगृहीत्वाहस्तेनरामःसौमिनिमत्रवीत् ।। ९॥ अयं देशःसमा श्रीमान्पुप्पितेस्तरुभिर्वृतः ॥ इहाश्रमपदंरम्यंयथावत्कर्तुमर्हसि ॥१०॥ इयमादित्यसंकाशे पञःसुरभिगंधिभिः ।। अदूरदृश्यतेरम्या पद्मिनीपद्मशोभिता ॥११॥ यथाख्यातमगस्त्येनमुनिनाभावितात्मना । इयंगोदावरीरम्यापुप्पितेस्तरुभिता ।। १२ ।। सकारंडवाकीर्णा चकवाकोपशोभिता ॥ नातिदूरेनचासन्नेमृगयूथनिपीडिता ॥ १३॥ ॥ ७ ॥ महायुतिमान् श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके यह वचन सुन परम प्रसन्न हो विचारकरके सर्व गुणों करके युक्त एक मनोहर स्थान सोज लेते हुए ॥ ८॥ यह स्थान सब भांतिसे मनोहर और आश्रम बनानेके योग्य था वहां श्रीरामचन्द्रजी पदार्पण कर अपने हाथसे लक्ष्मणजीका हाथ पकडकर योठे ॥ ९ ॥ यह स्थान परम श्रीसम्पन्न है भूमि यहांकी बराबर है और फूले हुए वृक्षोंसे घिराहुआ है तिससे तुम इस स्थानमें योग्य पर्णकुटी बनाओ ॥ १०॥ सूर्यके समान उज्ज्वल चित्त प्रसन्न करनेवाली सुगन्धि जिनमें आरही हैं ऐसे कमलके फूलोंके सहित यह पुष्करणी यहांसे निकटही यहरही है ॥ ११ ॥ पिशुशात्मा महर्षि अगस्त्यजीने । जिसप्रकार कहा था यह देखो वैसेही फुलाने वृक्षोंमे शोभित गोदावरी दृष्टि आनी है ॥ १२॥ यहां रंग और कारंडप पोप पानी Amini ॥ २१ १२७ यह नदी न यहांसे बडी दूर है न बहुव निकटही है मृर्गोके यूथके यूथ जहां घूम रहे हैं ॥ १३ ॥ सिले हुये वृक्षोंसे शोभित मोर गण जहां नाद कररहे हैं बहुन गुफा जिनमें विद्यमान परम मनोहर देखने में दिव्य बडे २ ऊंचे यह सब पहाड दिखाई देते हैं ॥ १४ ॥ उन सब पहाडोंके स्थान २ सुवर्ण चांदी और ताम्र वर्णकी विचित्र रचनामे सजेहुए हाथियों के समान शोभा पा रहे हैं ॥ १५॥ साल, ताल, तमाल, खजूर, कटहल, निवार तिनिश, पुनागसे गोभित ॥ १३॥ आम, अशोक, तिलक, केतकी और चंपा आदि पुप्प, गुल्म, लता इत्यादि वृक्षोंसे शोभायमान ॥ १७ ॥ स्यन्दन, चन्दन, कदंब, लकुन, घय, अवकर्ण, खैर, शमी, नाक और पटल इन तरूवरों ने भी घिरे हुए हैं ॥ १८ ॥ हे लक्ष्मण ! यह स्थान अतिशय पवित्र, अतिशय मनोहर, अनेक प्रकारके मृग, और पक्षियोंमे पार मयूरनादितारम्याःप्रांशवीबहुकंदराः ॥ दृश्यंतेगिरयःसौम्याःफुलस्तरुभिरावृताः॥ १४ ॥ सौवर्णेराजतेस्तानैर्देशेदेशेतथाशुभेः ॥ गवाक्षिताइ वाभांतिगजाःपरमभक्तिभिः ॥ १५ ॥ सालेस्तालेस्तमालेश्वखर्जूरेःपनसर्दुमः ।। नीवारेस्तिनिशेश्वपुन्नागेश्वोपशोभिताः ॥ १६॥ नूतैरशोके स्तिलकै केतकैरपिचंपकेः॥ पुप्पगुल्मलतोपेतेस्तैस्तैस्तरुभिरावृताः॥ १७ ॥ स्यंदनैश्चंदनेनीपे-पनसेलकुचेरपि ॥ धवाश्वकर्णखदिरेःशमी किंशुकपाटलैः ॥ १८॥ इदंपुण्यमिदंरम्यमिदंबहुमृगद्विजम् ॥ इहवत्स्यामसौमित्रेसार्धमेतेनपक्षिणा ॥ १९ ॥ एवमुक्तस्तुरामेणलक्ष्मणःपरखी रहा । अचिरेणाश्रमभ्रातुश्चकारसुमहाबलः ॥२०॥ पर्णशालांसुविपुलांतत्रसंघातमृत्तिकाम् ॥ सुस्तंभांमस्करीःकृतवंशांसुशोभनाम् ॥ ॥ २१ ॥ शमीशाखाभिरास्तीर्यदृढपाशावपाशिताम् ॥ कुशकाशशरःपर्ण-सुपरिच्छादितांतथा ॥ २२॥ समीकृततलारम्यांचकारसुमहार लः॥ निवासंराघवस्यार्थप्रेक्षणीयमनुत्तमम् ॥ २३॥ सगत्वालक्ष्मण श्रीमानदगोदावरींतदा ।। स्नात्वापद्मानिचादायसफलःपुनरागतः ॥२४॥ पूर्ण है, सो जटायुके सहित इस स्थानपर हम वास करेंगे ॥ १९ ॥ जब श्रीराम चन्द्रजीने ऐसा कहा तब श्रीलक्ष्मणजीने बहुत शीघ्र रामचन्द्रजीके रहनेके लिये परम श्रेष्ठ एक स्थान बनाया ॥ २० ॥ उसमें वडी भारी पर्णशाला बनाई भीतें मिट्टीसे उठादी सुन्दर संभ गाड दिये, ऊपर लंबे २ यांस धरे ॥ २१ ॥ उन तिरछे यासोंपर शमीकी डालिये काट २ कर छादी फिर उन शाखाओंको रस्सियोंसे अति दृढता सहित बांध दिया, कुरा, काश, और शरपत्रसे भली भांति उसको छाकर बराबर करदिया ॥ २२॥ तिसपर शमीकी डालियोंकी पत्तिये छा कसकर बांधदी, ऐसा मनोहर स्थान लक्ष्मणजीने श्रीरामचन्द्रजीके रह ने लिये पनाया ।। २३ ।। जब स्थान बन चुका तो श्रीमान् लक्ष्मणजी गोदावरी नदीमें नहाकर वहांसे कमल के फूल और अनेक फल लेकर आश्रमको लौटे ॥२४॥ * पा.ग.भा. ( ******************** शिर लक्ष्मणजीने फूलोंमे यथाविधि वास्तुशान्ति करके उस कुटीको पवित्रकर भीरामचन्द्रजीको दिखाया ॥२५॥ श्रीरघुनंदन रामचन्द्रजी सीताके सहित लक्ष्मण आर०३० भीकी पनाई यह शुभदर्शन कुटी देखकर परमप्रसन्न हुए ॥ २६ ॥ और बहुतही हपमें भरकर दोनों बाँहोंसे लक्ष्मणजीको स्नेह सहित अपनी छातीसे लगा लिया स०१६ और पंडे मनोहर प्रेमसने बचन बोले ॥ २७ ॥ हे कार्यकरने में चतुर ! हम तुम पर बहुतही प्रसन्न हुए हैं तुमने यह बडा भारी कार्य किया सो इस कार्यका तुमको पुरस्कार देना चाहिये अतएव इसके बदलेहीमें हमने तुमसे भेंटकी ॥ २८॥ हे लक्ष्मणजी ! तुम्हारी समान विचारवान सबका भाव जाननेवाले, उपकार माननेवाले, और धर्म के जाननेपाले पुत्रके रहते राजा दशरथजीकी मृत्यु नहीं हुई ॥ २९ ॥ लक्ष्मीके बढानेवाले श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणसे ऐसा कहकर परम सुख भोगमय बहुत ततःपुप्पयलिंकृत्वाशांतिंचसयथाविधि ॥ दर्शयामासरामायतदाश्रमपदंकृतम् ॥२५॥ सतंदृष्ट्वाकृतंसौम्यमाश्रमंसहसीतया ॥ राघवःपर्णशाला यांहर्षमाहारयत्परम् ॥ २६ ॥ सुसंहप परिष्वज्यवाहुभ्यांलक्ष्मणंतदा ॥ अतिस्निग्धंचगाढंचवचनंचेदमत्रवीत् ॥२७ ॥ प्रीतोस्मितेमहत्कर्म सयाकृतमिदंप्रभो ॥ प्रदेयोयनिमित्तंतेपरिप्वंगोमयाकृतः ॥२८॥ भावज्ञेनकृतज्ञेनधर्मज्ञेनचलक्ष्मण ॥ त्वयापुत्रेणधर्मात्मानसंवृत्तापितामम ॥ ॥ २९॥ पवलक्ष्मणमुक्त्वातुराधबोलक्ष्मिवर्धनः ।। तस्मिन्देशेबहुफलेन्यवसत्ससुखसुखी ॥३०॥ कंचित्कालंसधर्मात्मासीतयालक्ष्मणेनच ॥ अवास्यमानोन्यवसत्स्वर्गलोकेयथामरः ॥ ३१॥ इत्या श्रीम० वा० आ० अर० पंचदशःसर्गः ॥ १५॥ वसतस्तस्यतुसुखंराघवस्यम हात्मनः॥ शरव्यपायेहेमंतऋतुरिटःप्रवर्तत ।। १ ।। सकदाचित्प्रभातायांशर्वरिघुनंदनः॥ प्रययावभिपेकार्थरम्यांगोदावरी नदीम् ॥२॥ प्रहः कलशनस्तस्तुसीतयासहवीर्यवान् ॥ पृष्टतोनुत्रजन्धातासौमिचिरिदमब्रवीत् ॥३॥ अयंसकालःसंप्राप्तःप्रियोयस्तेप्रियंवद ॥ अलंकृतइवाभाति येनसंवत्सरःशुभः ॥ ४॥ नीहारपरुपोलोकःपृथिवीसस्यमालिनी ।। जलान्यनुपभोग्यानिसुभगोहव्यवाहनः ॥५॥ फल युक्त उम आश्रमपदमें वास करने लगे ॥ ३० ॥ वह धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी सीवाऔर लक्ष्मण करके सेवित होनेपर देवलोकमें देवताकी समान वहां कुछ दिन वास करने हुए ॥३१॥ इत्या श्रीमत्रा० वा. आदि० आर मापाटीकायां पंचदशः सर्गः ॥१५॥ महात्मा रामचन्द्रजीके वहां सुखसे वास करते २ शरत्काल बीता और सयका प्यारा हेमन्त समय आया ॥३॥ एक समय रात्रि बीतकर प्रभात हुआ वो उस समय श्रीरामचन्द्रजी लान करनेके लिये रमणीक गोदावरी नदीपर जाते हुए ॥२॥ ॥ २५ वीर्यवान् साता लक्ष्मणजी सीताजी के साथ जलका कलश हाथमें लेकर उनके पीछे २ चलते हुए नम्रतासे बोले ॥ ३ ॥ हे प्रिय बोलनेवाले ! जो इस समय आपको प्पाराहै, यह यही हेमन्तकाल उपस्थित हुआहै । इस हेमन्तके समागमसेही शुभ संवत्सर मानो सजकरही मनोहर हुआहै ॥ ४ ॥ शरदीके प्रभावसे सबही लोगोंके IN कि गरीर.रुले होगये, और पृथ्वी अनाजोंसे भरपूर होरहीहै और अग्रिही इस समय लोगोंको प्रिय लगतीहै शरदीसे पानी नहीं छुआ जाता ॥ ५॥ इस समय मन गण नये अनाजसे देवता और पितरोंकी विशेष भांतिसे पूजा करके नवसस्य निमित्त यज्ञ करते हुए निप्पाप हुए हैं ॥ ६ ॥ इस समय सब देशोंमें काम्यवस्तु, दही, इ.' गोरम आदि बहुत पान होताहै, इस समय विजयकी इच्छा किये हुए राजा लोग देशोंमें घूमनेके लिये यात्रा करते हैं ॥ ७ ॥ दक्षिण दिशामें सूर्य भगवान्का आ अनुराग होनेमे उनर दिशा तिलकहीन ग्रीकी नाई शोभारहित होगई है ॥ ८ ॥ एक तो हिमालयपर स्वभावसेही बहुत पाला पडताहै तिमपर अब सूर्य भगवान उ- बहुत दूर होगये हैं; तिसमे हिमरानका हिमालय ( पालेका घर ) नाम ठीक २ होरहाहै ॥ ९ ॥ इस समय दुपहरियामें घूमना अच्छा लगताहै धूप लगने र होताहै, इस समय सूर्य सबके सुस देनेवाले, और छाया तथा जल एकवारही नहीं सेवन किया जाता ॥ ३० ॥ अव सूर्य नारायणका वह पहलामा तेज नह नवाययणपूजाभिरभ्यर्च्यपितृदेवताः॥ कृतारयणकाःकालेसंतोविगतकल्मपाः ॥६॥ प्राज्यकामाजनपदाःसंपन्नतरगोरसाः। विचरंतिमहीप' लायात्रार्थविजिगीपवः ॥७॥ सेवमानेदृढ़सूर्यदिशमंतकसेविताम् ॥ विहीनतिलकेवस्त्रीनोत्तरादिक्प्रकाशते ॥८॥प्रकृत्याहिमकोशाढयोदूरमूर श्वसांप्रतम् ॥ यथार्थनामासुव्यक्तहिमवान्हिमवान्गिरिः ॥९॥ अत्यंतसुखसंचारामध्याह्नस्पर्शतःसुखाः ॥ दिवसाःसुभगादित्याश्छायासलिला भंगाः ॥१०॥ मृदुसूर्याःसुनीहारा पटुशीता:समादिताः ॥ शून्यारण्याहिमध्वस्तादिवसाभांतिसांप्रतम् ।।११॥ निवृत्ताकाशशयनाःपुप्पनीता मारुणाः॥शीतयुद्धतरायामास्त्रियामायांतिसांप्रतम् ॥ १२ ॥ रविसंक्रांतसौभाग्यस्तुपारारुणमंडलः ॥ निःश्वासांधइवादर्शश्चद्रमानप्रकाशते ।' ॥१३॥ ज्योत्स्नातुपारमलिनापौर्णमास्यांनराजते ॥ सीतेवचातपश्यामालक्ष्यतेनचशोभते ॥१४॥ प्रकृत्याशीतलस्पोहिमविश्वसांप्रतम् । प्रवातिपश्चिमोवायुःकालेद्विगुणशीतलः ॥ १५॥ कुहरा पडने व पवन चलनेसे जाडा बहुतही अधिक पडताहै तिस जाडेके पडनेसे जीवमात्रही जडीभूत होगये, तिससे सबही वन सूनेसे जान पड़ते हैं प्रभातक हिमयस्त होकर प्रकाशित होताहै ॥ ११ ॥ पुष्य नक्षत्र युक्त इस पुष्पमासमें और पाला पड़ती हुई धूसर वर्ण इन दिनोंकी रात्रि विना छाये हुए स्थानमें नहीं मो जाता अब रात्रियों में शीत अधिक पडता है ॥ १२ ॥ जिसप्रकार वासकी वाफ लगनेसे दर्पण अंधासा होजाताहै, वैसेही सुखसेव्यतादि सवही सौभाग्य :- ममय सूर्यने दपजाने और वर्फके द्वारा किरणोंके ढक जाने और धूसरपर्ण होजानेसे चंद्रमाकाभी अब प्रकाश नहीं है ॥ १३ ॥ तुपार करके मलीन होनेमे दनी अप पूर्णमासीकी रात्रिभी नहीं खिलती,केवल दीखतीहै, जैसे सीताजी धूमके लगनेसे श्याम होगई हैं और शोभित नहीं होतीं ॥ १४ ॥ स्वभावतः शीतलतायु .
पा.ग.भा. आर० ॥ २६ ॥ स०१ पछादिया परन अब हिमसे आवृत और उससे मिलकर दूना शीतलहो चलरहा है ।। १५ ।। यव और गेहुँओं करके पूर्ण ओस जिनमें पडीहुई ऐसे समस्त वन सूर्यके उदप होनेपर शब्द करते हुए सारस और कींचादिक पक्षियोंसे व्याप्त होकर शोभा विस्तार करते हैं ॥ १६ ॥ सुवर्णके वर्णवाले शालिसमूह खजूरके फूलकी समान बन्दुल भरीहुई पालोंके लगनेसे कुछएफ झुकेहुए विराजरहे हैं ॥ १७ ॥ सूर्य आकाशमें ऊँचे उठकर चन्द्रमाके समान शीतल अल्प प्रकाशमय दृष्टि आतेहैं स्योंकि इधर उधर फैलीहुई उनकी किरणे पालेसे ढक रही हैं ॥ १८ ॥ धूपका तेज सबेरै २ वो कुछ होताही नहीं दुपहर को कुछ एक सुखका देनेवाला होताहै और उसी समय वर्ण कुछ पीला पडजानेसे पृथ्वीमें शोभित होता है ॥ १९ ॥ प्रभातमें ओसकी बूंदोंके गिरनेसे हरी २ घास गीली होरहीहैं उस घासपर सूर्यकी किरणें पडनेसे बनभृमिकी सीमा नहीं रहती ॥२०॥ वनैला हाथी अधिक प्यासा होनेपरभी शीतल जल छूतेही उसी समय शृंड बैंच लेताहै ॥ २१ ॥ डरपोक आ वाप्पछ्न्नान्यरण्यानियवगोधूमवंतिच ॥ शोभतेभ्युदितेसूर्येनदद्भिःकौंचसारसैः ॥ १६॥ खजूरपुप्पाकृतिभिःशिरोभिःपूर्णतंडुलैः ॥ शोभतेकिं निदालंबादशालयःकनकप्रभाः॥ १७॥ मयूखैरुपसर्पद्भिर्हिमनीहारसंवृतः॥ दूरमप्युदितःसूर्य-शशांकइवलक्ष्यते ॥१८॥ आग्राह्यवीर्यःपूर्वाहे मध्याह्नस्पर्शतःसुखः ॥ संसक्तःकिंचिदापांडुरातपःशोभतेक्षितौ ॥ १९॥ अवश्यायनिपातेनकिंचित्पक्लिन्नशादला ॥ वनानांशोभतेभूमिर्नि विष्टतरुणातपा ॥२०॥ स्पृशन्सुविपुलंशीतमुदकंद्विरदःसुखम् ॥ अत्यंततुपितोवन्य प्रतिसंहरतेकरम् ॥ २१ ॥ एतेहिसमुपासीनाविहगाज लचारिणः ॥ नावगाहंतिसलिलमप्रगल्भाइवाहवम् ॥ २२॥ अवश्यायतमोनदानीहारतमसावृताः ॥ प्रसुप्ताइवलक्ष्यतेविपुष्पावनराजयः ॥ ॥ २३ ॥ वाप्पसंछन्नसलिलारुतविज्ञेयसारसाः ॥ हिमावालुकास्तीरे सरितोभांतिसांप्रतम् ॥ २४॥ तुपारपतनाचैवमृदुत्वाद्भास्करस्यच ॥ शैत्यादगाग्रस्थमपिप्रायेणरसवजलम् ॥ २५ ॥ जराझझरितःपत्रैःशीर्णकेसरकर्णिकैः॥ नालशेपाहिमध्वस्तानभांतिकमलाकराः ॥२६॥ दमी जिस प्रकार युद्धमें नहीं जाते, वैसेही यह जलचर पक्षीगण जलके समीप बैठ रहकरभी किसी प्रकारसे जलमें डुबकी नहीं मारते ॥ २२ ॥ प्रसून शून्य वन भेणी रात्रिम ओस और अंधकारसे ढकजाने, और प्रभावको कुहरके अँधेरेसे छिप जानेपर ऐसी लगतीहै मानों सोय रहीहै ॥ २३॥ अब समस्त नदिये वाफसे ढकी ई हैं, और उनके तीरका रेतभी पालेके पडनेसे गीला होरहाहै, और शब्द करते हुए सारसोंके घूमनेसे सब नदियें बहुतही शोभायुक्त हुई हैं ॥ २४ ॥ वर्फके रने और सूर्यका वेज मंद होनेसे, शीतके वशहो पर्वतोंके अग्रभागका जलभी प्रायः स्वादिष्ठ होगयाहै ॥ २५ ॥ अब जराके वश होजानेसे पत्नोंके गिर जाने और पराडियों के टूट जाने व दिमयस्त होजानेमे कमल फूलमें केवल हंडी मात्र रह गई है अब कमलाकर मरोवर शोभा नहीं पाने ॥ २१ 未来将***号 ॥२७
हे पुरुषश्रेष्ठ । इस दारुण हेमन्त कालमें धर्मात्मा भरतजी आपकी भक्तिके वशहो नगरमें रहकरभी दुःसका बोझ सहन करते हुए तपस्या करते होंगे ॥२७॥ और राज्य
मान और अनेक प्रकारके राज्योचित सुख छोडकर नियत समयपर आहार करके तपस्वी हो शीतल पृथ्वीपर शयन करते होंगे ॥ २८ ॥ वह निश्चय प्रतिदिन
समय निरालस्यहो मंत्री आदिकोंके साथ सरयू नदीमें नहानेके लिये जाते होंगे ॥ २९ ॥ भरतजी स्वभावसेही सुकुमार हैं और परमसुसमे पलकर इतने बडे
हुए हैं । नो भव वह किम प्रकारसे पाला पडते हुये प्रभात कालमें सरयूके जलसे स्नान करते होंगे? ॥ ३० ॥ आर्य ! वह कमलनेत्र, श्यामवर्ण, बडाई करके युक्त
गोभावान्, मूक्ष्मोदर, धर्मज्ञ, सत्यवादी, श्रीमान, परम्रीविमुख, जितेन्द्रिय ।। ३३ ॥ पियवचन बोलनेवाले शत्रुओंका दमन करनेवाले लंबी भुजाओंकाले लजागील
अस्मिंस्तुपुरुपव्याप्रकालेदुःखसमन्वितः ॥ तपश्चरतिधर्मात्मात्वद्भक्त्याभरतःपुरे ॥ २७ ॥ त्यक्त्वाराज्यंचमानंचभोगांश्चविविधान्वहून् ।
तपस्वीनियताहारःशेतेशीतेमहीतले ॥२८॥ सोपिवेलामिमांनूनमभिपेकार्थमुद्यतः॥ वृतःप्रकृतिभिर्नित्यंप्रयातिसरयूंनदीम् ॥२९॥ अत्यं
तसुखसंवृद्धासुकुमारोहमादितः । कथंत्वपरराचेपुसरयूमवगाहते ॥ ३० ॥ पद्मपक्षणःश्याम श्रीमानिरुदरोमहान् ॥ धर्मज्ञःसत्यवादीचही
निषेधोजितेंद्रियः ॥ ३१ ॥ प्रियाभिभापीमधुरोदीर्घवाहुररिंदमः ॥ संत्यज्यविविधान्सौख्यानायंसर्वात्मनाश्रितः ॥ ३२ ॥ जितःस्वर्ग
स्तवधानाभरतेनमहात्मना ॥ वनस्थमपितापस्येयस्त्वामनुविधीयते ॥ ३३॥ नपित्र्यमनुवर्ततेमातृकंद्विपदाइति ।। ख्यातोलोकमवादोयंभरते
नान्यथाकृतः ॥ ३४ ॥ भर्तादशरथोयस्याःसाधुश्चभरतःसुतः ॥ कथंनुसांवाकैकेयीताहशीकूरदर्शिनी ॥ ३५ ॥ इत्येवंलक्ष्मणेवाक्यंन्नेहाद
दतिधार्मिके । परिवादंजनन्यास्तमसहनाघवोऽब्रवीत् ॥ ३६॥
श्रीमान् भरतनी सब सस भोगको जलांजलि देकर अंतःकरणसे आपकोही आश्रय किये हुएहैं ॥ ३२ ॥ हे वनवासिन् ! यद्यपि आपके बाता महात्मा भरतजी तापस
धर्मका आश्रय करके वनवासी नहीं हुएहैं तथापि उन्होंने आपके अनुरूप कार्यकर स्वर्गको जीत लियाहै ॥ ३३ ॥ जगदमें जो यह कहावत चली आती है कि, मनु
प्पोंमें पिताका भाव नहीं आवा परन् माताहीका स्वभाव आताहै सो भरतजीने इस कहावतके विरुद्ध कर दिखाया, क्योंकि उनमें कैकेयीका स्वभाव नहीं है ।
॥ ३४ ॥ परन्तु श्रीराजाधिराज महाराज दशरथजी जिसके स्वामी और साधु भरतजी जिसके पुत्र वह जननी कैकेयी किस प्रकारसे ऐसी क्रूर बुद्धिवाली हुई ?
।। ३५ ।। महात्मा लक्ष्मणजीने जब भाईके स्नेहके वश हो इस प्रकार कहा तब श्रीरामचन्द्रजी माता कैकेयीको वह निन्दा न सहतेहुए कहने लगे ॥ ३६ ॥
44 : 44at- आर० स०१ दिया पपन अप हिमसे आवृत और उससे मिलकर दूना शीतलहो चलरहा है ॥ १५ ॥ यव और गेहुँओं करके पूर्ण ओस जिनमें पडीहुई ऐसे समस्त वन सूर्यके प होनेपर शब्द करते हुए सारस और कींचादिक पक्षियोंसे व्यान होकर शोभा विस्तार करते हैं ॥ १६ ॥ सुवर्णके वर्णवाले शालिसमूह खजूरके फूलकी समान इल भरीहुई पालोंके लगनेमे कुछएफ झुकेहुए विराजरहे हैं ॥ १७ ॥ सूर्य आकाशमें ऊँचे उठकर चन्द्रमाके समान शीतल अल्प प्रकाशमय दृष्टि आतेहैं कि इधर उधर फैलीहुई उनकी किरणे पालेसे ढक रही हैं ॥ १८ ॥ धूपका तेज सवेरे २ वो कुछ होवाही नहीं दुपहर को कुछ एक सुखका देनेवाला होताहै भी समय वर्ण कुछ पीला पडजानेसे पृथ्वीमें शोभित होता है ॥ १९ ॥ प्रभातमें ओसकी बूंदोंके गिरनेसे हरी २ घास गीली होरहीहैं उस पासपर सूर्यकी नभमिकी सीमा नहीं रहती ॥२०॥ वनैला हाथी अधिक प्यासा होनेपरभी शीतल जल छूतेही उसी समय यूँड बैंच लेवाहै ॥ २१ ॥ डरपोक आ गोधूमवंतिच ॥ शोभंतेभ्युदितेसूर्यनददिकोंचसारसैः ॥ १६॥ खजूरपुष्पाकृतिभिःशिरोभिःपूर्णतंडुलैः ॥ शोभंतेकिं १० ॥ मयूखेरुपसर्पद्भिर्हिमनीहारसंवृतः॥ दूरमप्युदितःसूर्य-शशांकइवलक्ष्यते ॥१८॥ आग्राह्यवीर्यःपूर्वाद शोभतेशितौ ॥ १९॥ अवश्यायनिपातेनकिंचित्प्रक्लिन्नशाला ॥ वनानांशोभतेभूमिर्नि 7 ॥ अत्यंततुपितोवन्य प्रतिसंहरतेकरम् ॥ २१ ॥ एतेहिसमुपासीनाविहगाज गीदारतमसावृताः ॥ प्रसुप्ताइवलक्ष्यतेविपुप्पावनराजयः॥ ~ ॥ तपारपतनाच्चैवमृदुत्वादास्करस्यच ॥ ॥२३॥ " - ***** ... Shabhaiya !! . ३ ? म NAWINNIMAILat वाना कहने में लगेहुये हैं कि, इतनेहीमें कोई राक्षसी अपनी इच्छासे घूमतीहुई वहां आई ॥ ५ ॥ यह राक्षसी दरावदन रावणकी बहन थी नाम इसका शूर्पणसा था वह देववाओंकी समान रामचन्द्रजीके निकट आकर उनको देखती हुई ॥६॥ उसने देखा कि, रामचन्द्रजीका वदन प्रदीनिमान है, बाँहें घुटनोंतक आती हैं, दोनों नेत्र कमलदलकी समान बड़े हैं, चाल हाथीकी समान है, शिरपर जटा धारण किये हुये हैं ॥ ७ ॥ अंग प्रत्यंग अतिकोमल हैं, वल विक्रम पार है, शरीर राज लक्षणों करके युक्त है, वर्ण नीले कमलकी समान श्यामता लियेहुये है, कोटि मदनकी समान सुन्दर हैं ॥ ८ ॥ इसप्रकार साक्षात् इन्द्रकी समान श्रीराम चन्द्रजीको देखकर राक्षसी कामसे मोहित हुई । श्रीरामचन्द्रजीका वदनमण्डल श्रेष्ठ था, राक्षसीका मुख सराव था. रामचन्द्रजीका मध्य देश गोलाकार व राक्षमीका उदर अति बृहत् था ॥ ९ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके दोनों नेत्र अति विशाल व राक्षसीकी आंखे अति बुरी थीं. रामचन्द्र के अतिश्रेष्ठ बरवाले वाल थे सातुशूर्पणखानामदशग्रीवस्यरक्षसः॥ भगिनीराममासाद्यददर्शनिदशोपमम् ॥६॥ दीप्तास्यंचमहाबाहुंपद्मपत्रायतेक्षणम् ॥ गजविक्रांतगमनं जटामंडलधारिणम् ॥७॥ सुकुमारंमहासत्त्वंपार्थिवव्यंजनान्वितम् ॥राममिंदीवरश्यामंकंदर्पसदृशप्रभम् ॥ ८॥वभूवेंद्रोपमंदृष्ट्वाराक्षसीकाममो हिता ।। सुमुखंदुर्मुखीरामवृत्तमध्यमहोदरी ॥ ९॥ विशालाक्षेविरूपाक्षीसुकेशंताप्रमूर्धजा ॥ प्रियरूपंविरूपासासुस्वरंभैरवस्वना ॥१०॥तरुणं दारुणावृद्धादक्षिणवामभापिणी ॥ न्यायवृत्तंसुदुर्वृत्ताप्रियमप्रियदर्शना ॥११॥शरीरजसमाविष्टाराक्षसीराममब्रवीत् ॥ जटीतापसवेपेणसभार्यः शरचापधृक् ॥१२॥ आगतस्त्वमिमंदेशंकथंराक्षससेवितम् ॥ किमागमनकृत्यंतेतत्त्वमाख्यातुमर्हसि ॥ १३॥ एवमुक्तस्तुराक्षसस्याशूर्पणख्यापरं तपः॥ ऋद्धितयासर्वमाख्यातुमुपचक्रमे ।। १४॥आसीदशरथोनामराजानिदशविक्रमः ॥ तस्याहमग्रजःपुत्रोरामोनामजनेःश्रुतः ॥ १५ ॥ और राक्षमीके केग ताम्रपर्ण थे. श्रीरामचन्दजी प्रिय रूपवान और राक्षसी महाभयानक रूपथी. श्रीरामचन्द्रजीका अतिमधुर स्वर था और राक्षसीका स्वर निवान्तकर्कग भीपण और भयंकर था ॥ १० ॥ श्रीरामचन्द्रजी युवा थे, प राक्षसी महावृद्धा थी. श्रीरामचन्द्रजी अतिमधुर वचन बोलनेवाले, व राक्षसी| अत्यन्त कलंगभापिणी थी. श्रीरामचन्द्रजी न्यायवृत्त और राक्षसी दुर्वृत्ता थी. श्रीरामचन्द्रजी देखनेमें जैसे प्यारे थे, वह राक्षसी देखनेमें वैसीही कुप्यारी थी। ॥ ११॥ ऐमी शूर्पणसा महाकामातुर होकर श्रीरामचन्द्रजीसे बोली कि, तुम जटारसाये तपस्वीका वेश धारे धनुप वाण लिये स्त्री सहित ॥ १२॥ किस कारणसे राक्षसोंमे मेपिन दिशामें आयेहो तुम्हारे यहांपर आनेका क्या प्रयोजन है ? सो यथार्थ कहो ॥ १३ ॥ शत्रुओंके तपानेवाले श्रीरामचन्दजी राक्षसी शूर्पणखाकी यह पाना सुनकर सरलता महित कुछ न छिपातेहुए सब वर्णन करनेलगे ॥१४॥श्रीरामचंद्रजी बोले कि, देवताओंकी समान विकमयान दशरथजी नामक एक वा.रा.भा. आर० ॥ २७॥ हे भया ! मँझली माता कैकेयीकी निन्दा मत करो, तुम केवल इक्ष्वाकुनाथ भरतजीकेही गुणगणोंका बखान करो ॥ ३७ ॥ यद्यपि हमारी बुद्धि एक मात्र वनवासमें निश्चित और दृढवत हुईहै, तथापि भरतजीके स्नेहके वश होकर बावरीसी होगई है ।। ३८ ॥ भरतजीकी प्रिय मधुर हृदयको अमृतकी नाई सिंचन करनेवाली मनको आह्वाद देनेवाली वार्ता वार २ हमारे मनमें स्मरण हो रही है ॥ ३९ ॥ नहीं जानते कि, कितने दिनोंमें फिर महात्मा भरतजी और शत्रुन्न जीसे तुम्हारे सहित हम मिलेंगे ॥ ४० ॥ रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकारसे विलाप करते २ भाता लक्ष्मण और सीताके सहित गोदावरी नदीपर पहुँचकर स्नान करते हुए ॥ ४१ ॥ फिर सबने गोदावरीके जलसे पितृगणोंको देवतोंको तर्पण करके उदित सूर्य व और दूसरे देवताओंका स्तोत्र किया ॥ ४२ ॥ नतेंऽवामध्यमातातगर्हितव्याकदाचन ।। तामेवेक्ष्वाकुनाथस्यभरतस्यकथांकुरु ॥३७॥निश्चितेवहिमेवुद्धिर्वनवासेदृढव्रता। भरतस्नेहसंतप्तावा लिशीक्रियतेपुनः ॥३८॥ संस्मराम्यस्यवाक्यानिप्रियाणिमधुराणिच॥ हृद्यान्यमृतकल्पानिमनःप्रहादनानिच ॥३९॥ कदाह्यहंसमेप्यामिभरते नमहात्मना॥शत्रुघ्नेनचवीरेणत्वयाचरघुनंदन ॥४०॥ इत्येवंविलपस्तत्रप्राप्यगोदावरी नदीम।चक्रेभिपेकंकाकुत्स्थःसानुजःसहसीतया ॥४॥ तर्पयित्वाथसलिलैस्तैःपितॄन्देवतानपि॥स्तुवंतिस्मोदितंसूर्यदेवताश्चतथानघाः॥४२॥ कृताभिपेकःसरराजरामःसीताद्वितीयःसहलक्ष्मणेन ।। कृताभिपेकस्त्वगराजपुत्र्यारुद्रःसनंदिर्भगवानिवेशः॥४३॥इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे पोडशःसर्गः ॥१६॥ कृताभिपेकोरामस्तुसीतासौमित्रिरेवच ॥ तस्मागोदावरीतीरात्ततोजग्मुःस्वमाश्रमम्॥३॥ आश्रमंतदुपागम्यराघवःसहलक्ष्मणः॥ कृत्वापौर्वाहि कंकर्मपर्णशालामुपागमत् ॥२॥उवासमुखितस्तत्रपूज्यमानोमहर्षिभिः॥ सरामापर्णशालायामासीनःसहसीतया॥३॥ विरराजमहावाहुश्वित्र याचंद्रमाइवालक्ष्मणेनसहभावाचकारविविधाःकथाः॥४॥ तदासीनस्यरामस्यकथासंसक्तचेतसः॥ तंदेशराक्षसीकाचिदाजगामयदृच्छया॥६॥ भगवान् भृतनाथ पार्वती और नन्दीके सहित स्नान करके जिस प्रकारसे शोभाको प्राप्त होते हैं सीताजी और लक्ष्मणजीके सहित नहाकर श्रीरामचन्द्रजीने भी वैसेही शोभा धारण की ॥४३॥ इत्याचे श्रीमदा० वा० आदि० आर० मा.टी. पोडशः सर्गः ॥१६॥ श्रीरामचन्द्रजी, सीवाजी, व लक्ष्मणजी तीनोंजन लान करके गोदापरीके तीरसे आश्रमको लौटे ॥ १ ॥ और श्रीरामचन्द्रजीने आश्रममें पहुँचकर लक्ष्मणजीके साथ प्रथमकालकी सब क्रिया कर पर्णशालामें प्रवेश किया ॥ २ ॥ और महर्षि लोगोंसे पूजे जाकर वहां सुखसे वास करने लगे. उस काल सीताजीके सहित पर्णशालामें आसीन होनेसे ॥ ३ ॥ महाबाहु रामचन्द्रजी, चित्रा नक्षत्र युक्त पत्र माको समान शोभा पाने लगे। निमके पीछे भाता लक्ष्मणजीके महित रामचन्द्रजीने अनेक प्रकारकी कथा पार्ना आरंभ करदी ॥ ४॥ इमप्रकारमे पेठे रहकर कथा 经系统,尤其弦长组经长安轻型 Twitthaikh ।
हम तुम्हारे इस भाताके सहित इस मानवी, कुरूपा, असती कराला और नतोदरी सीताको भक्षण करजाँयगी॥ २७ ॥ तुम कामभोगमें तत्पर होकर हमारे सहित और पर्वतोंके झंगोंको देखते हुए दंडकारण्यमें विचरण करोगे ॥ २८ ॥ वचन बोलनेमें चतुर रघुनंदन श्रीरामचन्द्रजी यह वचन सुन ऊंचे स्वरसे हँसकर करनयना शूर्पणसासे बोले॥२९॥इत्यापैश्रीमद्रा०वा आदि आरण्यकाण्डेभापाटीकायां सनदशः सर्गः ॥१७॥ श्रीरामचन्द्रजीने उपहास करनेके लिये हँसकर मधुर वचनसे उस कामके फंदमें फँमीशूर्पणखासे कहा ॥ १ ॥ अयि कल्याणी ! हमारा विवाह होगयाहै यह सीताजी हमारी स्त्री हैं । सो तुम सरीखी स्त्रियोंको सौतका होना बहुतही दुःसका विषय है ॥२॥ परन्तु हमारे यह छोटे भाता लक्ष्मणजी सच्चारैत्र श्रीमान् वीर्यवान् और प्रिय दर्शनहैं। इनका विवाह अभी नहीं हुआहै अथवा अतदार इनके इमांविरूपामसतींकरालांनिर्णतोदरीम् ।। अनेनसहतेभ्रात्राभक्षयिष्यामिमानुपीम् ॥ २७॥ ततःपर्वतशृंगाणिवनानिविविधानिच ॥ पश्यन्सह मयाकामीदंडकान्विचरिष्यसि ॥ २८ ॥ इत्येवमुक्तःकाकुत्स्थःग्रहस्यमदिरेक्षणाम् ।। इदंवचनमारेभेवक्तुंवाक्यविशारदः॥२९॥ इत्या श्रीम० या० आदिकाव्येऽरण्यकांडे सप्तदशःसर्गः ॥ १७॥ ॥ तांतुशूर्पणखारामःकामपाशावपाशिताम् ॥ स्वेच्छयालक्ष्णयायाचास्मितपूर्वम थाप्रवीत् ॥ १॥ कृतदारोस्मिभवतिभार्येयंदयितामम ॥ त्वद्विधानांतुनारीणांसुदुःखाससपनता ॥२॥ अनुजस्त्वेपमेभ्राताशीलवान्प्रियद र्शनः॥श्रीमानकृतदारश्चलक्ष्मणोनामवीर्यवान् ॥३॥ अपूर्वीभार्ययाचार्थीतरुणःप्रियदर्शनः॥ अनुरूपश्चतेभर्तारूपस्यास्यभविष्यति॥४॥ एनंभजविशालाक्षिभर्तारंभ्रातरंमम ॥ असपत्नावरारोहेमेरुमर्कप्रभायथा ॥५॥ इतिरामेणसाप्रोक्ताराक्षसीकाममोहिता ॥ विसृज्यरामंसहसाततो लक्ष्मणमत्रवीत् ॥६॥ अस्यरूपस्यतेयुक्ताभाहिवरवर्णिनी॥ मयासहसुखंसर्वान्दंडकान्विचरिप्यसि ॥७॥ एवमुक्तस्तुसौमित्रीराक्षस्यावाक्यको चिदःततःशूर्पनखीस्मित्वालक्ष्मणोयुक्तमब्रवीत् ।।८॥ कथंदासस्यमेदासीभार्या भवितुमिच्छसि॥ सोहमार्येणपरखान्भ्रानाकमलवर्णिनी॥९॥ निकट मी नहीं है अथवा इन्होंने बी परिग्रह नहीं कियाहै ॥३॥ इन्होंने पहले कभी स्त्रीका सुख नहीं भोगा है इसी कारण यह विवाहार्थी हुएहैं और विशेष करके यह युगाई तिससे यह सब प्रकारसे तुम्हारे लायक स्वामी होंगे ॥ ४ ॥ हे बडे नेत्रोंवाली! सूर्यकी प्रभा जिसप्रकार सुमेरुकी भजना करतीहै, तुमभी वैसेही सौतरहित होकर हमारे इन भाईकी स्वामीकी भांतिसे सेवा करो ॥ ५॥ वह कामसे मोहित हुई राक्षसी रामचन्द्रजीके यह वचन सुनकर तुरन्त लक्ष्मणजीके निकट जाकर कहने टगी॥ ६ ॥ मैं सब नियोंसे अधिक सुन्दरहूं विससे तुम्हारे इस रूप लायकही भार्या बनूंगी तुम हमारे सहित सुखपूर्वक समस्त वनोंमें विचरण करोगे ॥ ७ ॥ उस राक्ष सीसे ऐसा मुन वचन बोलनेमें चतुर सुमित्रानंदन लक्ष्मणजी मन्द मन्द हँसकर उससे यह युक्तियुक्त वचन बोले ॥ ८ ॥ अयि कमलवर्णिनि ! हम दास, फिर किस Ye 59 मा.रा.ना. आरक ॥२८॥ राजा थे हम उनके ज्येष्ठ पुत्रहैं लोकमें हमारा नाम रामहै ॥ १५ ॥ और इनका नाम लक्ष्मण है, यह हमारे आज्ञाकारी छोटे भाताहै, और यह विदेहकुमारी हमारी भार्या हैं इनका सीता ऐसा नामहै ॥ १६ ॥ पिता और माता कैकेयीके कहनेसे धर्मके लाभकी आशा और धर्मकी रक्षा करनेके कारण बनमें वास करनेके लिये हम इस स्थानमें आये हैं ॥ १७ ॥ इससमय यह हमारी इच्छा तुमको जाननेकी हुई है, तुम कौनहीं किसकी बेटीहो; और किसकी सीहो ? हमें वो ऐसा जान पडता है कि, तुम राक्षसोंका मन मोहने वाली राक्षसी हो ॥ १८ ॥ और तुम किसलिये यहां आई हो सो सत्यही सत्य कहो ? यह वचन सुनकर वह मदनसे आतुर हुई राक्षसी बोली ॥ १९ ॥ हे रामचंद्र ! तुम ठीक २ हमारा परिचय सुनो हम कहती हैं, हम शूर्पणखा नामक कामरूपा राक्षसी ॥ २० ॥ सबको भय उपजाती हुई अकेली इस वनमें घूमा करती हैं, हमारे भइयाका नाम रावणहै सो कदाचित तुमने इसका वृत्तान्त व नाम सुनाही होगा ॥ २१ ॥ हमारे और दो भ्रातार्यलक्ष्मणोनामयवीयान्मामनुव्रतः॥ इयंभार्याचवैदेहीममसीतेतिविश्रुता ॥१६॥ नियोगातुनरेंद्रस्यपितुर्मातुश्चयंत्रितः॥ धर्मार्थधर्मकांशी चवनवस्तुमिहागतः ॥ १७ ॥ त्वांतुवेदितुमिच्छामिकस्यत्वकासिकस्यवा ।। त्वंहितावन्मनोज्ञांगीराक्षसीप्रतिभासिमे ॥ १८ ॥ इहवाकिंनि मित्तंत्वमागताहितत्त्वतः ॥ सात्रवीद्वचनंश्रुत्वाराक्षसीमदनार्दिता ॥ १९ ॥ श्रूयतारामतत्त्वार्थवक्ष्यामिवचनमम ॥ अहंशूर्पणखानामराक्षसी कामरूपिणी ॥ २० ॥ अरण्यंविचरामीदमेकासर्वभयंकरा ॥ रावणोनाममेधातायदितेश्रोत्रमागतः ॥ २१ ॥ प्रवृद्धनिद्रश्चसदाकुंभकर्णोमहा वलः ॥ विभीषणस्तुधर्मात्मानतुराक्षसचेष्टितः॥२२॥ प्रख्यातवीर्याचरणेभ्रातरौखरदूपणी ॥ २३ ॥ तानहंसमतिकांतारामत्वापूर्वदर्शना त् ॥ समुपेतास्मिभावेनभर्तारपुरुपोत्तमम् ॥३४॥ अहंप्रभावसंपन्नास्वच्छंदवलगामिनी ॥ चिरायभवभर्तामसीतयार्किकरिष्यसि ॥ २५ ॥ विकृताचविरूपाचनचेयसदृशीतव ॥ अहमेवानुरूपातेभायारूपेणपश्यमाम् ॥ २६ ॥ भाइपोका नाम कुम्भकर्ण और विभीषणहै, कुम्भकर्ण अति बलवान है और सदा सोताही रहता है, और विभीपण परमधार्मिक है राक्षसोंके चरित्र उसमें नहीं हैं ॥ २२ ॥ सर और दूपण यह दोनोंभी हमारे भाता रणमें बडे वीर्यवान् और बलशाली लोकमें प्रसिद्ध हैं ॥ २३ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ श्रीरामचंदजी ! तुमको प्रथम देसनेही हम उन सबको छोड छाँड तुम्हारा अपूर्व रूप देख पुरुषोनम जान प्रेमके मारे अपना पति बनानेके लिये यहां आई हैं ॥ २४ ॥ हममें बडा पराक्रमहै, और पल होने के कारण जहां इच्छा होतीहै वहीं स्वच्छन्दतासे घूमती रहती हूं । मो तुम सदाके लिये हमारे स्वामी होना । इस सीताको लेकर क्या करोगे ॥२५॥ पह मीता विरुदाकार और कुरूपाहै, किमी भांतिभी यह तुम्हारे योग्य नहीं है हमको देखो, हमही रुपके हेतु तुम्हारी भार्या पननेणे योग्य ॥ २६ ॥ xxkxxxATHA ॥ २८ 4.4 मारवठोने परमपन - --. हम तुम्हारे इम भाताके सहित इस मानवी, कुरूपा, असती कराला और नतोदरी सीताको भक्षण करजाँयगी ॥ २७ ॥ तुम कामभोगमें तत्पर होकर हमारे सहित और पर्वतोंके शृंगोंको देसते हुए दंडकारण्यमें विचरण करोगे ॥ २८ ॥ वचन बोलनेमें चतुर रघुनंदन श्रीरामचन्द्रजी यह वचन सुन ऊंचे स्वरसे हँसकर क्रूरनयना णसासे बोले।।२९॥इत्यापैश्रीमदा०वा आदि आरण्यकाण्डेभापाटीकायां सप्तदशः सर्गः ॥१७॥ श्रीरामचन्द्रजीने उपहास करनेके लिये हँसकर मधुर वचनसे उस कामके फंदमें फँसीशूर्पणसासे कहा ।। १ ।। अयि कल्याणी! हमारा विवाह होगयाहै यह सीताजी हमारी स्त्री हैं । सो तुम सरीखी नियोंको सौतका होना बहुतही दुःसका विषय है ॥२॥ परन्तु हमारे यह छोटे भातालक्ष्मणजी सच्चारत्र श्रीमान् वीर्यवान् और प्रिय दर्शन हैं । इनका विवाह अभी नहीं हुआहै अथवा अतदार इनके इमांविरूपामसतींकरालांनिर्णतोदरीम् ॥ अनेनसहतेभ्रानाभक्षयिष्यामिमानुपीम् ॥ २७॥ ततःपर्वतशृंगाणिवनानिविविधानिच ॥ पश्यन्सह मयाकामीदंडकान्विचरिष्यसि ॥ २८ ॥ इत्येवमुक्तःकाकुत्स्थ ग्रहस्यमदिरेक्षणाम् ॥ इदंवचनमारेभवक्तुंवाक्यविशारदः ॥२९ ॥ इत्या श्रीम. या० आदिकाव्येऽरण्यकांडे सप्तदशःसर्गः ॥ १७ ॥ ॥ तांतुशूर्पणखारामःकामपाशावपाशिताम् ॥ स्वेच्छयालक्ष्णयावाचास्मितपूर्वम थात्रवीत् ॥ १॥ कृतदारोस्मिभवतिभायंदयितामम ॥ त्वद्विधानांतुनारीणांसुदुःखाससपनता ॥२॥ अनुजस्त्वेपमेभ्राताशीलवान्प्रियद र्शनः॥श्रीमानकृतदारश्चलक्ष्मणोनामवीर्यवान् ॥३॥ अपूर्वीभार्ययाचा तरुण प्रियदर्शनः॥ अनुरूपश्चतेभर्तारूपस्यास्यभविष्यति॥४॥ एनंभजविशालाक्षिभर्तारंभ्रातरंमम ॥ असपत्नावरारोहेमेरुमर्कप्रभायथा ॥५॥ इतिरामेणसाप्रोक्ताराक्षसीकाममोहिता ॥ विसृज्यरामसहसाततो लक्ष्मणमत्रवीत् ॥६॥ अस्यरूपस्यतेयुक्ताभार्याहवरवर्णिनी ॥ मयासहसुखंसर्वान्दंडकान्विचरिष्यसि ॥७॥ एवमुक्तस्तुसौमिनीराक्षस्यावाक्यको विदःततःशूर्पनखीस्मित्वालक्ष्मणोयुक्तमत्रवीत् ॥८॥ कथंदासस्यमेदासीभार्याभवितुमिच्छसि॥ सोहमार्येणपरवान्भ्रानाकमलवर्णिनी॥९॥ निकट ग्री नहीं है अथवा इन्होंने खी परिग्रह नहीं कियाहै ॥३॥ इन्होंने पहले कभीखीका सुख नहीं भोगा है इसी कारण यह वियाहार्थी हुएहैं और विशेप करके यह युवा, तिससे यह सब प्रकारसे तुम्हारे लायक स्वामी होंगे ॥ ४ ॥ हे बडे नेत्रोंवाली ! सूर्यको प्रभा जिसप्रकार सुमेरुकी भजना करतीहै, तुमभी वैसेही सौतरहित होकर हमारे इन भाईकी स्वामीकी भांतिसे सेवा करो ॥ ५ ॥ वह कामसे मोहित हुई राक्षसी रामचन्द्रजीके यह वचन सुनकर तुरन्त लक्ष्मणजीके निकट जाकर कहने लगी ॥ ६ ॥ में सब वियोंसे अधिक सुन्दरहूं तिससे तुम्हारे इस रूप लायकही भार्या बनूंगी तुम हमारे सहित सुखपूर्वक समस्त बोंमें विचरण करोगे ॥ ७ ॥ उस राक्ष सीसे ऐसा मुन वचन बोलनेमें चतुर सुमित्रानंदन लक्ष्मणजी मन्द मन्द हँसकर उससे यह युक्तियुक्त वचन बोले ॥ ८ ॥ अयि कमलवर्णिनि ! हम दासहैं फिर किस ******.. 59 पा.रा.भा. आर० ॥ २० ॥ म० १८ • कारण तुम हमारी सी बनकर दासी बननेकी अभिलापिणी हुईहो ? हम इन वडे धाता रामचन्द्रजीके दासह ॥ ९ ॥ हे विशालनेत्रवाली ! तुम सिद्धकामा, और आनन्दिता होकर सर्वभावसे संपत्तिमान हमारे बडे धावा आर्य श्रीरामचंद्रजीकी दूसरीखी बनो. क्योंकि उनसे विवाह करनेमें तुम्हारी विधि भली मिलेगी। उनका श्यामरंग तुम्हारे वर्णसे कुछ २ मिलताहुआहै । परन्तु हमारा तुम्हारा रंग कुछभी नहीं मिलता ॥ १० ॥ फिर जब इनसे विवाह कर लोगी वो यह कुरूपा, असती, (वा जिनके सामने और कोई सती नहीं) भय उपजानेवाली, कृशोदरी, और वृद्धा भार्याको त्याग करके तुममेंही अनुरागी हो जायगे ॥१३॥ अयि वरवर्णिनि ! अपि वरारोहे। कौन चतुर पुरुष है जो तुम्हारे इस श्रेष्ठ रूपका अनादर करके मानुषीमें अनुरागीहो ? ॥ १२॥ जब लक्ष्मणजीने इस प्रकार कहा नौ बडे पेटवाली सब लोकोंको डरावनेवाली निशाचरी शूर्पणखा उस हँसीकी वातको न समझकर लक्ष्मणजीकी बातको सत्यही समझी ॥ १३ ॥ तिसके पीछे पह मोहित होकर पर्णकुटीमें सीवा समृद्धार्थस्यसिद्धार्थामुदितामलवर्णिनी ।। आर्यस्यत्वंविशालाविभाभिवयवीयसी ॥ १० ॥ एतांविरूपामसतींकरालांनिर्णतोदरीम् ॥ भायाँ वृद्धांपरित्यज्यत्वामेवेपभजिप्यति ॥.११ ॥ कोहिरूपमिदंश्रेष्ठंसंत्यज्यवरवर्णिनि ॥ मानुपीपुवरारोहेकुर्याद्भावविचक्षणः ॥ १२॥ इतिसाल क्ष्मणेनोक्ताकरालानिर्णतोदरी ॥ मन्यतेतद्वचःसत्यंपरिहासाविचक्षणा ।। १३ ।। सारामंपर्णशालायामुपविष्टंपरंतपम् ॥ सीतयासहदुर्धर्पमत्रवी काममोहिता ॥ १४ ॥ इमांविरूपामसतींकरालांनिर्णतोदरीम् ॥ वृद्धांभार्यामवष्टभ्यनमांत्वंबहुमन्यसे ॥ १५॥ अद्यमांभक्षयिष्यामिपश्य तस्तवमानुपीम् ॥ त्वयासहचरिष्यामिनिःसपनायथासुखम् ॥ १६ ॥ इत्युक्त्वामृगशावाक्षीमलातसदृशेक्षणा ।। अभ्यगच्छत्सुसंकुद्धामहोल्ला रोहिणीमिव ॥ १७ ॥ तामृत्युपाशप्रतिमामापततीमहावलः ॥ निगृह्यराम कुपितस्ततोलक्ष्मणमब्रवीत् ॥ १८॥ क्रूरैरनार्यःसौमित्रपरिहासः कथंचन ॥ नकार्यपश्यवैदेहीकथंचित्सौम्यजीवतीम् ॥ १९ ॥ जीके साथ बैठेहुये. शत्रुओंके वपानेवाले अजेय श्रीरामचन्द्रजीसे कहने लगी ॥ १४॥ कि तुम इस बुढिया कुरूपा रुशोदरी, भय उपजानेवाली असती सीमें अनुरागी होकर हमारा आदर सन्मान नहीं करते ॥ १५॥ तिससे तुम्हारे सामने ही इसी मुहूर्तमें हम इस मानुपीको भक्षण करेंगी और सौतहीन होकर यथा सुसरो घूमा करेंगी ॥ १६ ॥ यह कहकर जलते अंगारेकी समान चमकते हुये नेत्रोंवाली निशाचरी महाकोधमें भरकर हरिणके वचोंकी समान नेत्रपाली सीताजी के सामनेको दौडी जैसे रोहिणीकी ओर उल्का घावमानहो ॥ १७॥ उस यमकी फांसीकी समान राक्षसीको सामने आते देखकर श्रीरामचन्द्रजी कोधर्म भर उसको रोक लक्ष्मणजीमे बोले ॥ १८ ॥ हे लक्ष्मण ! स्वभावयाले झोंके गाथमें देगी करनाभी किसी iनि rs.--- 致路祭奖学张教多多学学名经学多多终考 ॥ २९. 2 होनेमेही जानकीजीको अपने जीवन में संदेह हुआ है ॥ १९ ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ ! इस समय तुम इस कामसे मन हुई बडे पेटवाली कुरुपिणी अमती राक्षमाका औरभी घुरूप करदो ॥ २० ॥ महाबलवान् श्रीलक्ष्मणजीने श्रीरामचंद्रजीके यह वचन सुनकर महाकोधित हो तलवार उठाकर उनके सामनेही राक्षमी भर्पणसाके नाक कान काट डाले ॥ २३ ॥ नाक कान कटाये हुये योर स्वभावशाली वह राक्षसी उस समय विकट शब्दसे चिल्लातीहुई जहांसे आई थी उमी बनकी और गीताने दौडी ॥ २२ ॥ अति भयंकर शरीखाली कुरूपा वह राक्षमी शरीरमें रुधिर लगायेहुये वाकालीन बादरकी समान विविध प्रकारके शब्द करने रगी ॥ २३ ॥ निसके पीछे वह वाह उठाकर घावोंसे रुधिर बहाती गर्जती हुई महायनमें प्रवेश करगई ॥ २४ ॥ वहां प्रवेश करके उसी कुरुप रूपसे राक्षस इमाविरूपामसतीमतिमत्तांमहोदरीम् ॥ राक्षसीपुरुपच्याविरूपयितुमर्हसि ॥ २० ॥ इत्युक्तोलक्ष्मणस्तस्या बुद्धोरामस्यपश्यतः ॥ उद्धृत्य खगचिच्छेदकर्णनासेमहाबलः ॥ २१ ॥ निकृत्तकर्णनासाविस्वरंसाविनद्यच ॥ तथागतंप्रदुद्रावधोराशूर्पणखावनम् ॥ २२ ॥ साविरूपा महावोराराक्षसीशोणितोशिता ।। ननादविविधान्नादान्यथाप्रापितोयदः ॥ २३॥ साविक्षरंतीरुधिरंबहुधाघोरदर्शना । प्रगृह्यवाहगर्जतीप्रवि वेशमहावनम् ॥ २४ ॥ ततस्तुसाराक्षससंघसंवृतंखरंजनस्थानगतंविरूपिता ॥ उपेत्यतंभ्रातरमुग्रतेजसंपपातभूमीगगनाद्यथाशनिः ॥ २५ ॥ ततासभायंभयमोहमूर्षिछतासलक्ष्मणराघवमागतंवनम् ॥ विरूपणंचात्मनिशोणितोक्षिताशशंससर्वभगिनीखरस्यसा ॥ २६ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडेऽष्टादश-सर्गः ॥ १८ ॥ तांयथापतितांदृष्ट्वाविरूपांशोणितोशिताम् ॥ भगिनीकोषसं तप्त-खर पप्रच्छराक्षसः ॥ १॥ उत्तिष्टतावदाख्याहिप्रमोहंजहिसंभ्रमम् ॥ व्यक्तमाख्याहिकेनत्वमेवंरूपाविरूपिता ॥२॥ काकृष्णसर्पमासी नमाशीविपमनागसम् ।। तुदत्यभिसमापनमंगुल्यणलीलया ॥३॥ गणोंसे घेरेहुए जनस्यानवासी उग्रतेजवान अपने भाई सरके निकट जाकर आकाशसे वज्रपातकी समान पृथ्वीमें गिरी ॥ २५ ॥ रुधिर जिसके सब अंगोंमें लगा हुआ भय और मोहसे जिसका चिन ठिकाने नहीं ऐसी उस खरकी बहिन राक्षसी शूर्पणखाने खरसे सी और भाताके सहित श्रीरामचन्द्रजीका वनमें आना और उनसे अपने नाक कान काटे जानेका सर वृत्तान्त कह सुनाया ॥ २६ ॥ इत्या श्रीमद्रा० वा० आदि० आरण्य० मापाटीकायामष्टादशः सर्गः॥ १८ ॥ राक्षम सर अपनी वहनको कुरुपा शरीरमें रुचिर लगाएहुई और पृथ्वीमें पडीहुई देखकर क्रोधसे संवापित हो बूझने लगा ॥ ॥ सरने कहा, उठकर पिठो, नान्न वो कहो, मूगे और चित्तको चपलताको छोडो, स्पष्ट २ कहो कि, किसने तुमको ऐसा विरूप किया ? ॥ २॥ किसने सामने बैठे हुए, कुण्डली ।।।
रा.स.मा. आर०क स० १९ पपिए निगम पिपर काले मापको रोटमही उंगली पोरुएसे छेडकर जगायाहै ? ॥ ३ ॥ उसने तेरेसाथ कुत्सित व्यापार कर अब भयंकर विप पिया, में फाटकी फांनी डाली मा पहनानी इन पातको जो विपनि उसके ऊपर पढेगी उसको नहीं समझा है।॥ ४॥ पल विक्रम सम्पन्न यमराजकी समान चलने vil'ममापिणी यमनमान नुम किसके पास गईथी, कि जिमने तुम्हारी यह दशा की है ? ॥५॥ देव गन्धर्व भूत और महात्मा ऋपि लोगोंमें कौन ऐसा वीर्यवान् है frमको शिर किया है ॥ ६ ॥ देवताआमें पाकशासन सहस्रलोचन इन्द्रके सिवाय बाह्माण्डमें हम ऐसा और किसीको नहीं देखते जो हमारा अप्रिय मार करे ॥ ७ ॥ हम जिस प्रकार जलने मिटेहुए दूधको अलग कर पीलेताहै आज हम भी प्राणहरणकारी तीरोंके समूहसे उसके शरीरसे प्राण अलग कालपाशंगमामन्यकंटमोदानबुध्यते ॥ यस्त्वामयसमासाद्यपीतवान्विपमुत्तमम् ॥ ४॥ बलविक्रमसंपन्नाकामगाकामरूपिणी ॥ इमामव स्थानीनातकनानकममागता ॥५॥ देवगंधर्वभूतानामृपीणांचमहात्मनाम् ॥ कोयमेवंमहावीर्यस्त्वांविरूपांचकारह ॥ ६॥ नहिपश्याम्यहं लोग कुन्मिमपिप्रियम् ॥ अमरेपुसहस्राक्षमहेंद्रपाकशासनम् ॥७॥ अद्यामार्गणेःप्राणानादास्येजीवितांतगैः॥ सलिलेक्षीरमासक्तंनिप्पिब शिलारनः ॥ ८॥ निदतस्यमयासंख्येशरसंकृत्तमर्मणः ॥ सफेनंरुधिरंकस्यमेदिनीपातुमिच्छति ॥ ९॥ कस्यपत्ररथाःकायान्मांसमुत्कृत्य मंगताः ॥ प्रष्टाभक्षयियंतिनिहतस्यमयारणे ॥ १० ॥ तंनदेवानगंधर्वानपिशाचानराक्षसाः ॥ मयापकृष्टंकृपणशक्तास्त्रातुंमहाहवे ॥११॥ उपलभ्शनःसंगांतमेशंसितुमर्हसि ॥ येनत्वंदुविनीतेनवनेविकम्यनिर्जिता ॥१२॥ इतिभ्रातुर्वचःश्रुत्वाकुद्धस्यचविशेषतः ॥ ततःशूर्पणखावा पपमवाप्पमिदमत्रवीत् ॥ १३ ॥ तरुणीरूपसंपनौसुकुमारीमहावलौ ॥ पुंडरीकविशालाक्षीचीरकृष्णाजिनांवरी ॥१४॥ फलमूलाशनौदांती नापमौत्रामवारिणी ॥ पुत्रौदशरथस्यास्तांत्रातरीरामलक्ष्मणौ ॥ १५॥ गे कि जिनने नुमको विष कियाहै ॥ ८ ॥ समरमें मुझ करके शरजालद्वारा छिन्नमर्म किस मरेहुए पुरुपका फेन सहित रुधिर पृथ्वीने पीनेकी इच्छाकीहै ? ॥ ॥टाईने मुा करके मारंडुए किन पुरुषके देहमे मांस नोच २ कर आनंद सहित चील गिद्धादि पक्षी सायँगे ॥१०॥ हम संग्राममें जिसके ऊपर चढाई करेंगे उस हत सागरीपादेवना, स्पा गन्धर्ष, क्या पिशाच, क्या राक्षस, कोईभी उद्धार करनेको समर्थ नहीं होगा ॥ ११ ॥ इस समय तुम सहज २ सावधान होकर हमसे कहो कि, किन ः प्पनिने वनमें पराक्रम प्रभाग करके नुमको पराजित किया है ? ॥ ॥ १२ ॥ महाकोधित हुए अपने भाई सरके यह वचन सुनकर शूर्पणखा आंसू, पोपोली ।।१३॥कि नगण, रूपमम्पन्न, सुरुमार, पदापरवान, कमलनयन चीर व मृगचर्मधारण किये ॥१४॥ कन्द मुल फलके खानेवाले, जितेन्द्रिय.
तपस्वी, ब्रह्मचारी, राजा दशरथके दो पुत्र राम लक्ष्मण ॥ १५॥ वह देसनेमें गन्धर्वराजको समान और राजलक्षणोंकरके युक्त जान पडतह् । यह दाना देव हैं। अथवा दानव इसका कुछ निश्चय नहीं हो सकता ॥ १६ ॥ हमने देखा है कि, वहाँपर उन दोनों जनोंके साथ एक रूपवती सत्र भूषण धारण किये हुई वस्थाको प्रान मीभी है ॥ १७ ॥ उन दोनों भाइयोंने मिलकर उस सीके कहनेसे; जैसे कोई अनाथ कुलटा स्त्रीकी दुर्दशा करता है, वही दशा हमा अर्याद नाक कान काट डाले ।.१८ ॥ हम कुटिल चरित्रवाली उस स्त्रीका और उन दोनोंजनोंका झाग सहित रुधिर समरमें पान करनेकी इच्छा करती' ॥ १९ ॥ तुम हमारी यह पहली अभिलापा पूर्ण करो, हम संग्राममें उस नीका और उन दोनोंका खून पियेंगी ॥२०॥ जव शुर्पणखाने यह वचन कहे तर कोधित होकर महारलवान् यमकी समान १४ राक्षसोंको आजादी कि ॥ ॥ २१ ॥ शवलगाए हुए चीर व मृगचर्म पहरे हुए दो मनुष्य शेर दर: गंधर्वराजप्रतिमापार्थिवव्यंजनान्विती ॥ देवीवादानवायतीनतर्कयितुमुत्सहे ।। १६॥ तरुणीरूपसंपन्नासर्वाभरणभूषिता ।। दृष्टातवमयानान तयोर्मध्येसुमध्यमा॥१७॥ताभ्यामुभाभ्यांसंभूयप्रमदामधिकृत्यताम् ।। इमामवस्थानीताईयथाऽनाथाऽसतीतथा ॥१८॥ तस्याश्चानुवृत्तायान्न योनहतयोरहम् ।। सफेनंपातुमिच्छामिरुधिररणमूर्धनि ।। १९ ॥ एपमेप्रथमःकाम-कृतस्तत्रत्वयाभवेत् ॥ तस्यास्तयोश्चरुधिरपिवयमहाम हुवे ॥ २०॥ इतितस्यावाणायांचतुर्दशमहावलान् । व्यादिदेशखर कुद्धाराक्षसानंतकोपमान् ॥२१॥ मानुपीशस्त्रसंपन्नीचीरकृष्णाजिना रौ । प्रविष्टौदंडकारण्यंचौरंप्रमदयासह ।। २२ ॥ तौहत्वाताचदुर्वृत्तामुपावर्तितुमर्हथ ।। इयंचभगिनीतेपारुधिरममपास्यति ॥ २३ ॥ मनी स्थोयमियोस्वाभगिन्याममराक्षसाः ॥ शीप्रंसंपाद्यतांगत्वातीप्रमथ्यस्वतेजसा ।। २४ । युप्माभिनिहतोदृष्ट्वातावुभीमातरौरणे । इयंप्रता मुदितारुधिरंयुधिषास्यति ।। २५ ॥ इतिप्रतिसमादिप्याराक्षसास्तेचतुर्दश ६ तवजग्मुस्तयासाधंधनाचातेरिताइबु ॥२६॥ इत्याएँ श्रीम.. पर आ• अर० एकोनविंशःसर्गः ॥ १९॥ ॥ ततःशूर्पणखाघोराराधवाश्रममागता ॥ राक्षसानाचचक्षेतौभातरीसहसीतया ॥१॥ रण्यमें ग्रीसहित आये हैं ।। २२ । सो तुम उन दोनों जनोंको और दुधावीको मार करके लौट आओ, क्योंकि हमारी बहन उनका रुधिर पियेगी ॥ २३ ॥ हे राक्षसो ! नुम लोग शीम जाकर बलसे उन दोनों जनोंको संहार करके हमारी वहनका यह अभीष्ट मनोरथ पूरा करो ॥ २४ ॥ युदमें उन दोनों भाइयोंको मार डालाहै सो देखकर हमारी यह बहन अतिशय संवोपित और हर्पित होकर युद्धके स्थलमें उनका रुधिर पियेगी ॥ २५ इन प्रकारकी आज्ञा पाकर यह चौदह राक्षस वायुसे चलायमान मेषकी समान शूर्पणखाके साथ जहां श्रीरामचन्दजीथे, उस स्थानकी यात्रा करते हुए ॥२६ इत्यार भीमदा० वा. आ. आरण्य० भापाटीकाथामेकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥ तिसके पीछे शूर्पणखा श्रीरामचन्द्रजीके आश्रममें आई, और राक्षः।
आर०क प स०२० **** "जी सहित उन दोनों माताओंको दिखा दिया ॥ १ ॥ उन राक्षसोंने पर्णशालामें महाबलवान श्रीरामचन्द्रजीको श्रीसीताजीके सहित बैठा और लक्ष्मणजीसे न देखा ॥ २ ॥ श्रीमान् रघुनन्दन रामचन्द्रजी इन राक्षसोंको आयाहुआ देखकर दीप्तिसे तेजवान भावा लक्ष्मणजीसे बोले ॥ ३ ॥ हे लक्ष्मण ! एक पडीभर तुम गीताजीके निकट रहो । इतनेमें हम इस राक्षसीके पक्षपाती इन सब राक्षसोंको मार डालें ॥ ४ ॥ तब विदितात्मा लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके परन श्रवण करके "तथास्तु" कह उनकी वात शिरमाथे चढाते हुए ॥५॥ व इधर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रभी सुवर्णभूपित महाधनुपमें रोदा चढाय इन सब राक्षसोंसे बोले ॥ ६ ॥ हम दो भाता हैं, नाम हमारा राम व लक्ष्मण है राजा दशरथजीके पुत्र हैं हम सीतासहित इस दुर्गम दण्डकारण्यमें आये हैं ॥ ७ ॥ हम फल मूल तेरामंपर्णशालायामुपविष्टंमहावलम् ॥ ददृशुःसीतयासाधलक्ष्मणेनापिसेवितम् ॥२॥ तांदृष्ट्वाराघव श्रीमानागतांस्तांश्वराक्षसान् ॥अब्रवीद्धातरं रामोलक्ष्मणंदीमतेजसम् ॥ ३ ॥ मुहूतभवसौमित्रसीतायाःप्रत्यनंतरः ॥ इमानस्यावधिष्यामिपदवीमागतानिह ॥ ४॥ वाक्यमेतत्ततःश्रुत्वा रामस्यविदितात्मनः ॥ तथेतिलक्ष्मणोवाक्यराघवस्यप्रपूजयन् ॥५॥ राघवोपिमहच्चापंचामीकरविभूपितम् ॥ चकारसज्यंधर्मात्मातानिर सांसिचायीत् ॥ ६॥ पुत्रोदशरथस्यावांभ्रातरौरामलक्ष्मणौ ॥ प्रविष्टौसीतयासाधूदुश्चरंदंडकावनम् ॥ ७॥ फलमूलाशनौदांतोतापसी ब्रह्मचारिणी ।। वसंतीदंडकारण्येकिमर्थमुपहिंसथ ॥८॥ युष्मान्पापात्मकान्हंतुंविप्रकारान्महाहवे ॥ऋपीणांतुनियोगेनसंप्राप्त सशरासनः॥९॥ तिष्ठतेवात्रसंतुष्टानोपावर्तितुमईथ ॥ यदिप्राणैरिहार्थोवोनिवर्तध्वनिशाचराः ॥ १०॥ तस्यतद्वचनं श्रुत्वाराक्षसास्तेचतुर्दश ॥ ऊचुर्वाचंसुसंकु दाब्रह्ममा शूलपाणयः ॥ ११ ॥ संरक्तनयनाघोरारामंसंरक्तलोचनम् ।। परुपामधुरामापंहपादृष्टपराक्रमम् ।। १२ ।। रसानेवाले अपनी इन्द्रियोंको जीतेहुएहैं वपस्वी और ब्रह्मचारी होकर दण्डकारण्यमें वास करतेहैं, सो, तुम किसकारण हमारे ऊपर चढाई करते हो ॥ ८॥ यदि कहो कि तुम तपस्वी होकर धनुष क्यों धारण किये हो वो इसका उत्तर यह है कि तुम लोग पापात्मा हो सो महावनमें ऋपि लोगोंकी आज्ञासे हम तुमको विनाश करनेके लिये धनुप धारणकर यहां आये हैं ॥ ९ ॥ सन्तुष्ट होकर इसी स्थानमें खड़े रहो, आगे न बढो; हे निशाचरगण ! यदि प्राणों का मोह होवे, और तुम इसका प्रयोजन समझते हो तो यहांसे लौट जाओ हम किसीको नहीं मारेंगे ।। १० । ब्रह्मघाती, शूलधारी; भयंकर यह चौदह राक्षस श्रीरामचंद्रजीके यह वचन श्रवण करके महाक्रोधित हो बोले ॥ ११ ॥ सवही लाल २ नेत्र कर रामचंदके प्रति कठोर वचन कहते थे वह सब श्रीरामचंद्रजीके पराक्रमको नहीं जानते थे ॥३१ हमने हायुन हो, मधुर वचन बोलनेवाले श्रीरामचंदजीसे बोले ॥ १२ ॥ तुमने हमारे प्रभु महात्मा सरको क्रोध उपजायाह, इस कारण अभा युद्धम है। हायमे मारे जाकर नुमको गीवही प्राण छोडने पड़ेंगे ॥ १३ ॥ तुम इकळे हो और हम बहुत हैं, इसलिये लडाईमें युद्ध करना तो दूर है हमारे सामने भी :- गरे नहीं हो सकोगे ॥ १४॥ हमारे इन बाहोंमे परिय, शूल और पटासे घायल होकर तुमको प्राण, वीर्य और हायमें धारण किया हुआ धनुष त्याग करना पडेगा। १५ ॥ यह चौदह गक्षम दम भांतिमे कहकर महा कोधित हो आयुध और सड्न उठाकर श्रीरामचंद्रजीके सम्मुख दौडे ॥ १६ ॥ और यह दुर्जर अग गम शूलादि श्रीरामचंदजीके ऊपर चलानेलगे । उन चौदह राक्षसोंके चलाये हुए शूल आदि श्रीरामचन्द्रजीने ॥ १७ ॥ चौदहही स्वर्णभृता कोषमुत्यायनोभर्नुपरस्यसुमहात्मनः ॥ त्वमेवहास्यसेप्राणान्सयोस्माभिर्हतोयुधि ॥ १३ ॥ काहितेशक्तिरेकस्यबहूनारणमूर्धनि ॥ अस्माा. ममनःस्थातुंकिंपुनर्योन्दुमाहये ॥ ११॥ एभिर्वाहुप्रयुक्तेश्वपरिघेःशूलपट्टिशेः॥ प्राणांस्त्यक्ष्यसिवीर्यचधनुश्वकरपीडितम् ॥१५॥ इत्येवमुक्त्वाम गधागक्षमास्तेपतुर्दश । उद्यतायुधनिविंशाराममेवाभिदुद्रुवुः ॥ १६॥ चिक्षिपुस्तानिशूलानिराघवंप्रतिदुर्जयम् ॥तानिशूलानिकाकुत्स्थः समस्नानिचतुर्दश ।। १७॥ तापद्भिरेवचिच्छेदशरैःकांचनभूपितेः ॥ ततःपश्यन्महातेजानाराचान्सूर्यसन्निभान् ॥१८॥ जग्राहपरमकुद्धश्चतुर्दश शिन्याशितान् । गृहीत्वाधनुगयम्यलक्ष्यानुदिश्यराक्षसान ॥ १९ ।। मुमोचराघवोवाणान्ववानिवशतक्रतुः । तेभित्त्वारक्षसांवेगादांसिनि गलाः ॥२०॥ विनिप्पेतुस्तदाभूमौवल्मीकादिवपन्नगाः॥तेर्भग्नहृदयाभूमौभिन्नमूलाइवद्रुमाः॥२१॥ निपेतुःशोणितस्माताविकृताविगतासवः। नामापतितान्द्रप्रागममीकोधर्मिता ॥ २२ ॥ उपगम्यखरंसातुकिंचित्संशुष्कशोणिता ॥ पपातपुनरेवार्तासनिर्यासेववल्लरी ॥ २३ ॥ सोंगे काटकर फेंक दिये । नत्तमान महातेजवान् श्रीरामचन्द्रजीने सूर्यके समान प्रभावयाले वाण ग्रहणकर ॥ १८॥ उनको धनुप पर चढाय महा क्रोधवान हो च। |गक्षोंगे नाकार शिला पर पैनारे वाण ॥ १९ ॥ छोडे, जिसप्रकार इन्द्र वज्र छोडते हैं । यह सब नाराच अति वेगसे राक्षसोंकी छातियोंमें प्रवेश शिरमें गले ॥ २० ॥ पृषीमें गिरे जिम प्रकार बमईमसे सांप निकला करते हैं, राक्षसभी इन सब बाणोंसे छिन्न भिन्न हृदयहो पृथ्वीमें गिरे जैसे जड कटे ने | भूमिमें गिर पडने हैं ॥ २१॥ यह राक्षम कटेजेमें वाण लगनेके कारण रुधिरमें सराबोर हो रहे थे, प्राण जाते रहे थे उनकी सूरतें बिगड गई थींना उन गक्षों को गिग हुआ देसकर राक्षमी शूर्पणसा कोधने अधीरा होकर ।। २२ ।। अपने भाई सरके पास जा फिर कातरहो गिर पड़ी. उस समय उ आर०क स० २० जी महित उन दोनों भाताओंको दिसा दिया ॥ १ ॥ उन राक्षसोंने पर्णशालामें महाबलवान् श्रीरामचन्द्रजीको श्रीसीताजीके सहित बैठा और लक्ष्मणजीसे सा ॥ २ ॥ श्रीमान् रघुनन्दन रामचन्द्रजी इन राक्षसोंको आयाहुआ देखकर दीप्तिसे तेजवान धाता लक्ष्मणजीसे बोले ॥ ३ हे लक्ष्मण ! एक मीनाजी निकट रहो । इतनेमें हम इस राक्षसीके पक्षपाती इन सब राक्षसोंको मार डालें ॥ ४ ॥ तब विदितात्मा लक्ष्मणजी श्रीरामचन्द्रजीके रके "तथास्तु" कह उनकी यात शिरमाथे चढाते हुए ॥५॥ व इधर धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रभी सुवर्णभूपित महाधनुपमें रोदा चढाय इन सब राक्षसोंसे दो भाना है, नाम हमारा राम व लक्ष्मण है राजा दशरथजीके पुत्र हैं हम सीतासहित इस दुर्गम दण्डकारण्यमें आये हैं ॥ ७ ॥ हम फल मूल यामुपविष्टंमहाबलम् ॥ ददृशुःसीतयासाधलक्ष्मणेनापिसेवितम् ॥२॥ तांदृष्ट्वाराघवःश्रीमानागतांस्तांश्चराक्षसान् ॥अब्रवीद्रातरं ततेजसम् ॥ ३ ॥ मुहूर्तभवसौमित्रसीतायाःप्रत्यनंतरः ॥ इमानस्यावधिप्यामिपदवीमागतानिह ॥ ४॥ वाक्यमेतत्ततःश्रुत्वा त्मनः ॥ तथेतिलक्ष्मणोवाक्यराघवस्यप्रपूजयन् ॥५॥राघवोपिमहच्चापंचामीकरविभूपितम् ॥ चकारसज्यधर्मात्मातानिर ६॥ पुत्रोदशरथस्यावांभ्रातरौरामलक्ष्मणौ ॥ प्रविष्टौसीतयासाचदुश्चरंदंडकावनम् ॥७॥ फलमूलाशनौदांतोतापसी दंडकारण्येकिमर्थमुपहिंसथ ॥८॥युप्मान्पापात्मकान्हंतुंविप्रकारान्महाहवे ॥ऋपीणांतुनियोगेनसंप्राप्तःसशरासनः॥९॥ "नमईथ ॥ यदिवाणेरिहार्थोवोनिवर्तध्वंनिशाचराः ॥ १०॥ तस्यतद्वचनं श्रुत्वाराक्षसास्तेचतुर्दश ॥ उचुर्वाचंसुसंकु ॥ संरक्तनयनाघोरारामसंरक्तलोचनम् ॥ परुपामधुराभापहृष्टादृष्टपराक्रमम् ॥ १२ ॥ '' और ब्रह्मचारी होकर दण्डकारण्यमें वास करतेहैं, सो, तुम किसकारण हमारे ऊपर चढाई करते हो ॥ ८॥ यदि कहो 'मका उत्तर यह है कि तुम लोग पापात्मा हो सो महावनमें ऋषि लोगोंकी आज्ञासे हम तुमको विनाश करनेके भी स्थानमें खडे रहो, आगे न बढो; हे निशाचरगण ! यदि प्राणोंका मोह होये, और तुम इसका प्रयोजन • ॥ ब्रह्मघाती, शूलधारी, भयंकर यह चौदह राक्षस श्रीरामचंद्रजीके यह वचन श्रवण करके प्रति कठोर वचन कहते थे वह सब श्रीरामचंद्रजीके पराकमको नहीं जानते थे ********* ॥ ३१ ART 1111५1१५ । शि, ISRH मा यो निकित आ mins मान गानेवाले, पोस भानुभूमीपशोकानinni पर्वचनेपनिनिता वाच्यंगोपन पातनः ममनापा युवाया तप र गगरा ऑगमो.नानापोटी.. . चन्द्रको मारडालनेके लिये जो वीर चौदह राक्षस भेजे थे ॥ ८॥ रामचन्द्रने मर्मभेदी बाणोंको छोडकर शूल, पटा आदि हाथमें लिये हुए क्रोधपरायण, उन मयही राक्ष मोको युद्धमें मारडाला ॥ ९ ॥ अतिशय तेजस्वी राक्षसोंको क्षणभरमेंही पृथ्वी पर पड़ा हुआ देख और रामचन्द्रका यह भारी कार्य देख मुझको महाभय लगता है । ॥ १० ॥ मैं डरी हुईहूं,उत्कंठितहूं, और विपादित होकर सवही जगह भय देखती दुई तुम्हारी शरणमें आईहूं ॥ १३॥ तुम किस कारणसे हमारा उद्धार नहीं करते विपाद रूप मगर और गोहोंसे भरे हुए तरंग उठते हुए गंभीर शोकसागरमें डूब रही हैं ॥ १२॥ जो मांस खानेगले राक्षस हमारे साथ तुमने भेजेथे उन सबको रामचन्दने नीखे बाणोंसे मारडाला ॥ १३ ॥ यदि हमारे ऊपर और उन सब राक्षसोंकी सन्तानोंके ऊपर तुमको दयाहो, यदि रामचन्द्रसे युद्ध करनेकी शक्ति तेतुरामेणसामाःशुलपट्टिशपाणयः ॥ समरेनिहता सर्वेसायकैमर्मभेदिभिः ॥९॥ तान्भूमीपतितान्दृष्ट्वाक्षणेनैवमहाजबान् ॥ रामस्यचमहत्क ममहांबासोभवन्मम ॥ १० ॥ सास्मिभीतासमुद्विग्नाविपण्णाचनिशाचर ॥ शरणत्वांपुनःप्राप्तासर्वतोभयदर्शिनी ॥ ११॥ विपादनक्राध्यु पितेपरित्रासोमिमालिनि ॥ किंमानवायसेमनांविपुलेशोकसागरे ॥ १२ ॥ एतेचनिहताभूमौरामेणनिशितेःशरैः । येचमेपदवीप्राप्ताराक्षसाः पिशिताशनाः॥ १३॥ मयितेयधनुक्रोशोयदिरक्षःसुतेपुच ॥ रामेणयदिशक्तिस्ततेजोवास्तिनिशाचर ॥ १४ ॥ दंडकारण्यनिलयंजहिराक्ष सकंटकम् ।। यदिरामममित्रानंनत्वमद्यवधिप्यसि ॥ १५ ॥ तवचेवाग्रतःप्राणांस्त्यक्ष्यामिनिरपत्रपा ॥ बुद्ध्याहमनुपश्यामिनत्रामस्यसंयु गे ॥ १६ ॥ स्थातुंप्रतिमुखेशक्तःसवलोपिमहारणे ॥ शूरमानीनशूरस्त्वंमिथ्यारोपितविक्रमः ॥१७॥ अपयाहिजनस्थानात्त्वरितःसहवांधवः ॥ जहित्वंसमरेमूढान्यथातकुलपांसन ॥ १८॥ मानुपीतीनशनोपिहंतुंवेरामलक्ष्मणौ ॥ निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्यवासस्तेकीहशस्त्विह ॥ १९॥ और वेज तुममें हो ॥ १४ ॥ तव तौ राक्षसकुलके कण्टकरूप दंडकारण्यवासी रामचन्द्रको आजही मारडालो यदि शत्रुओंके मारनेवाले रामचन्द्रको तुम आजही संहार न कर डालोगे ॥ १५ ॥ तो हम लाजरहित होकर तुम्हारे सामनेही प्राण त्याग करेंगी, क्योंकि हमें अपनी बुद्धिमे जान पड़ता है कि तुम संग्राममें ॥ १६ रामचन्द्र के सामने सडे न हो सकोगे, यपपि तुम्हारे साथ चतुरंगिनी सेनाभी भारी है और तुम अपनेको शूर कहकर अभिमानभी करतेहो किन्तु वास्तवमै तुम शूर नही हो और तुम्हारा विक्रमभी मिथ्या कहनेकेही लियेहै ॥ १७ ॥ हे मूढ ! हे कुलाधम ! तुम इस मुहूर्नमेंही बन्धु बान्धव कुटुम्ब सहित इस जनस्थानसे भाग जा TITTET में यदि उनको मारनेकीभी सामर्थ्य तुममें नहीं है तो हीनवीर्य दुर्वल होकर किस प्रका .रा.भा. आर०क ॥ ३२ ॥ म.२६ ******** शरीरका रक्त कुछेक सूख गया था इस कारण वह गोंद लगी लवाके समान दृष्टि आती थी ॥ २३ ॥ राक्षसी अपने नावा खरके निकट गोकसे पीडितहो घोर चिल्लाने लगी और उदासीन मुख व विकट शब्दसे रोने लगी ॥२४॥ खरकी वहन शूर्पणखा राक्षसी युद्धमें राक्षसोंको मराहुआ देख वेगो दौडआकर सरने बोली कि, राक्षस सब मारे गये ॥ २५ ॥ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां विंशतितमः सर्गः ॥२०॥ अनर्थके निमित्त आईहुई शूर्पणखाको फिर पृथ्वीमें पड़ी हुई देखकर क्रोधमें भर खर फिर जोरसे कहने लगा ॥३॥ कि, हमने तुम्हारा प्रिय कार्य करनेके लिये मांस खानेवाले, चौदह राक्षसोंको आज्ञादी है सो अब फिर तुम किस कारणसे रोरही हो ? ॥ २ ॥ वह राक्षस जो कि, हमने भेजे हैं सब हमारे अनुरागी भ्रातुःसमीपेशोकार्ताससर्जनिनदंमहत् ॥ सस्वरंमुमुचेवाष्पंविवर्णवदनातदा॥२४॥निपातितान्प्रेक्ष्यरणेतुराक्षसान्प्रधाविताशुर्पणखापुनस्ततः॥ वचंचतेपांनिखिलेनरक्षसांशशंससर्वभगिनीखरस्यसा ॥ २५॥ इत्या श्रीम० वा० आ० अरविंशतितमः सर्गः ॥२०॥ सपुनःपतितांदृष्ट्वाको धाच्छूर्पणखांपुनः ॥ उवाचव्यक्तयावाचातामनर्थार्थमागताम् ॥१॥ मयात्विदानोंशुरास्तेराक्षसाःपिशिताशनाः॥ त्वत्प्रियार्थविनिर्दिया किमर्थं रुद्यतेपुनः ॥ २॥ भक्ताश्चैवानुरक्ताश्चहिताश्चममनित्यशः ।। हन्यमानानहन्यतेननुकुर्युर्वचोमम ।। ३ ॥ किमतच्योतुमिच्छामिकारणंयत्कृते पुनः ॥ हानाथेतिविनदंतीसर्पवच्चेप्टसेक्षितौ ॥ ४ ॥ अनाथवद्विलपसिकिंनुनाथेमयिस्थिते ॥ उत्तिष्टोत्तिष्टमामेववेकुव्यत्यज्यतामिति ॥५॥ इत्येवमुक्तादुर्धपोखरेणपरिसांत्विता ॥ विमृज्यनयनेसाझेखरंभातरमत्रवीत् ॥ ६॥ अस्मीदानीमहंप्राप्ताहतश्रवणनासिका ॥ शोणितौघपरि क्लिन्नात्वयाचपरिसांत्विता ॥७॥ पिताश्चत्वयाशुराराक्षसास्तेचतुर्दश ॥ निहंतुंरावयंघोरंमत्प्रियाथसलक्ष्मणम् ॥ ८॥ भक्त और सदाही हित करनेवाले हैं वह किसीके मारेसे मरनेवाले नहीं हैं और सबही अंतःकरणसे हमारी आज्ञाका पालन करते रहते हैं ॥ ३ ॥ फिर तुम कित कारण हा नाथ २ कह वार २ चिल्लाकर सर्पके समान लोट रहीहो, सो इसका क्या कारण है ? उसको मैं जानना चाहता हूं ॥ ४ ॥ हमेसा रक्षक होनेपरभी तुम किस कारण अनाथके समान विलाप करती हो ? उठो और शोकका त्याग करो ॥ ५॥ सरने जब इस प्रकार कहकर पिपेप भांतिसे शूर्पणसाको समझाया बुझाया तव दुईर्प शूर्पणखा आँसूभरे नेत्रोंको पोंछ बोली ॥६॥ कि, हमारे नाक कान दोनोंही गये हैं और मैं खूनसे भीग गई हूं इस अवस्थामें पहले समान फिर तुम्हारे पास आई हूं और तुमने हमको बहुत समझाया बुझाया ॥ ७॥ परन्तु नुमने मारा पिप कार्य करनेकी कामनासे लक्ष्मण सहित भयानक गम चन्द्रको मारडालना लिये जो वीर चौदह राक्षस भेजे थे ।। ८ ॥ रामचन्दने मर्मभेदी बाणोंको छोडकर शूल, पटा आदि हाथमें लिये हुए क्रोधारायण, उन सबही राक्ष मोको युद्धमें माराम ॥ ९ ॥ अतिशय तेजस्वी राक्षसोको क्षणभरमेंही पृथ्वी पर पड़ा हुआ देख और रामचन्द्रका यह भारी कार्य देख मुझको महाभय लगताहै ।। ॥ १० ॥ मैं डरी हुईहूं,उत्कंठितहूं, और विपादित होकर सबही जगह भय देखती हुई तुम्हारी शरणमें आईहूं ।। 13 ॥ तुम किस कारणसे हमारा उदार नहीं करते हम विपाद रूप मगर और गोहोंसे भरे हुए तरंग उठते हुए गंभीर शोकसागरमें डूब रही हैं ॥ १२ ॥ जो मांस खानेवाले राक्षस हमारे साथ तुमने भेजेथे उन सबको गमचन्द्रने तीखे बाणोंसे मारडाला ॥ १३ ॥ यदि हमारे ऊपर और उन सब राक्षसोंकी सन्तानोंके ऊपर तुमको दयाहो, यदि रामचन्द्रसे युद्ध करनेकी शक्ति तेतुरामेणसामाःशुलपट्टिशपाणयः ॥ समरेनिहता सर्वेसायकैमर्मभेदिभिः ॥९॥ तान्भूमीपतितान्दृष्ट्वाक्षणेनेवमहाजवान् ॥ रामस्यचमहत्त ममहांनासोभवन्मम ॥१०॥ सास्मिभीतासमुदिनाविपण्णाचनिशाचर ॥ शरणंत्वांपुनःप्राप्तासर्वतोभयदर्शिनी ॥ ११॥ विपादनकाध्यु पितेपरित्रासोनिमालिनि ॥ किंमानवायसेमनांविपुलेशोकसागरे ॥ १२ ॥ एतेचनिहताभूमौरामेणनिशितैः शरैः ॥ येचमेपदवींप्राप्ताराक्षसाः पिशिताशनाः ॥ १३ ॥ मयितेयधनुक्रोशोयदिरक्षःसुतेपुच ॥ रामेणयदिशक्तिस्तेतेजोवास्तिनिशाचर ॥ १४ ॥ दंडकारण्यनिलयंजहिराक्ष सकंटकम् ।। यदिरामममित्रघ्नंनत्वमद्यवधिप्यसि ।। १५ ॥ तवचेवाग्रतःप्राणांस्त्यक्ष्यामिनिरपत्रपा ।। बुद्ध्याहमनुपश्यामिनत्वंरामस्यसंयु गे ॥ १६ ॥ स्थातुंप्रतिमुखेशक्त सवलोपिमहारणे ॥ शूरमानीनशूरस्त्वंमिथ्यारोपितविक्रमः ||१७|| अपयाहिजनस्थानात्वरितःसहवांधवः ।। जहित्वंसमरमूढान्यथातकुलपसिन ॥ १८ ॥ मानुपौतौनशक्नोपिहतुवेरामलक्ष्मणी ॥ निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्यवासस्तेकीहशस्त्विह ॥ १९॥ और तेज तुममें हो ॥ १४ ॥ तब तो राक्षसकुलके कण्टकरूप दंडकारण्यवासी रामचन्द्रको आजही मारडालो यदि शत्रुओंके मारनेवाले रामचन्द्रको तुम आजः। संहार न कर डालोगे ॥ १५ ॥ तो हम लाजरहित होकर तुम्हारे सामनेही प्राण त्याग करेंगी, क्योंकि हमें अपनी बुद्धिमे जान पडता है कि तुम संग्राममें ॥ १६॥ रामचन्द्र के सामने सडे न हो सकोगे, यद्यपि तुम्हारे साथ चतुरंगिनी सेनाभी भारी है और तुम अपनेको शूर कहकर अभिमानभी करतेहो किन्तु वास्तवमें तुम शूर नहीं हो और तुम्हारा विक्रमभी मिथ्या कहनेकेही लियेहै ॥ १७ ॥ हे मूढ ! हे कुलाधम ! तुम इस मुहूर्तमही पन्यु वान्धव कुटुम्ब सहित इस जनस्थानसे भाग जाने नहीं गौ राम और लक्ष्मणको संयाममें संहार करो ॥ १८॥ राम लक्ष्मण मनुष्य हैं यदि उनको मारनेकीभी सामर्थ्य तुममें नहीं है तो हीनवीर्य दुर्बल होकर किस प्रक:
1.रा.भा. आर०क म०२ ॥ ३२॥ शरीरका रक्त कुछेक सूख गया था इस कारण वह गोंद लगी लताके समान दृष्टि आती थी ॥ २३ ॥ राक्षसी अपने प्राता सरके निकट शोकसे पीडितहो घोर चिछाने लगी और उदासीन मुख व विकट शब्दसे रोने लगी ॥ २४॥ सरकी बहन शूर्पणखा राक्षसी युद्धमें राक्षसोंको मराहुआ देख वेगसे दौडआकर सरसे योली कि, राक्षस सब मारे गये ॥ २५ ॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां विंशतितमः सर्गः ॥ २० ॥ अनर्थक निमिन आईहुई शूर्पणखाको फिर पृथ्वीमें पड़ी हुई देखकर क्रोधर्म भर खर फिर जोरसे कहने लगा ॥१॥ कि, हमने तुम्हारा प्रिय कार्य करनेके लिये मांस खानेवाले, चौदह राक्षसोंको आज्ञादी है सो अब फिर तुम किस कारणसे रोरही हो ? ॥ २ ॥ वह राक्षस जो कि, हमने भेजे हैं सर हमारे अनुरागी धातुःसमीपेशोकार्ताससर्जनिनदंमहत् ॥ सस्वरंमुमुचेवाप्पंविवर्णवदनातदा॥२४॥निपातितान्प्रेक्ष्यरणेतुराक्षसान्प्रधाविताशूर्पणखापुनस्ततः॥ वधंचतेपांनिखिलेनरक्षसांशशंससर्वभगिनीखरस्यसा ॥ २५॥ इत्या श्रीम० वा. आ० अर० विंशतितमः सर्गः॥२०॥ सपुनःपतितांदृष्ट्वाको धाच्छूर्पणखांपुनः ॥ उवाचव्यक्तयावाचातामनर्थार्थमागताम् ॥१॥ मयात्विदानशूरास्तेराक्षसाःपिशिताशनाः॥ त्वत्प्रियार्थविनिर्दिष्टा किमर्थ रुद्यतेपुनः ॥२॥ भक्ताश्चैवानुरक्ताश्चहिताश्चममनित्यशः ॥ हन्यमानानहन्यतेननुकुर्युर्वचोमम ॥३॥ किमेतच्योतुमिच्छामिकारणंयत्कृते पुनः ॥ हानाथेतिविनतीसर्पवचेष्टसेक्षितौ ॥ ४॥ अनाथवद्विलपसिकिंनुनाथेमयिस्थिते ॥ उत्तिष्ठोत्तिष्टमामेववेकयंत्यज्यतामिति ॥५॥ इत्येवमुक्तादुर्धीखरेणपरिसांत्विता ॥ विमृज्यनयनेसाखरंभ्रातरमत्रवीत् ॥ ६॥ अस्मीदानीमहंप्राप्ताहतश्रवणनासिका ॥ शोणितीघपरि छिन्नात्वयाचपरिसात्विता ॥७॥ प्रेपिताश्चत्वयाशुराराक्षसास्तेचतुर्दश ॥ निहंतुंराघवंघोरंमत्प्रियार्थसलक्ष्मणम् ॥ ८॥ भक्त और सदाही हित करनेवाले हैं वह किसीके मारेसे मरनेवाले नहीं हैं और सवही अंतःकरणसे हमारी आज्ञाका पालन करते रहते हैं ।। ३ ॥ फिर तुम किस कारण हा नाथ २ कह वार २ चिल्लाकर सर्पके समान लोट रहीहो, सो इसका क्या कारण है ? उसको में जानना चाहता हूं ॥४॥ हमेसा रक्षक होनेपरभी तुम किस कारण अनाथके समान विलाप करती हो ? उठो और शोकका त्याग करो ॥ ५॥ सरने जब इस प्रकार कहकर पिपेप भांतिसे शूर्पणसाको समझाया बुझाया तब दुई शूर्पणखा आँसूभरे नेत्रोंको पोंछ बोली ॥६॥ कि, हमारे नाक कान दोनोंही गये हैं और मैं खूनसे भीज गई हूं इस अवस्थामें पहलेके समान फिर तुम्हारे पास आई हूं और तुमने हमको बद्भुत समझाया बुझाया ॥ ७॥ परन्तु तुमने हमारा प्रिय कार्य करने की कामनासे लक्ष्मण सहित भयानक राम ****************************** AN VAN.... .-N-- m : HEAF*** गिरवीर मानन ॥ ८॥ गमनन्त्रले मर्मभेदी आनाको छोडकर शूल, पटा आदिहाथमें लिये हुए कोशारायण, उन सरहा रारा गिरजग्गी गमनाम अगमरमंदी पृषी पर पड़ा हुआ देश और गमचन्द्रका यह मारी कार्य देख मुझको महाभय लगताहै । 11. गाद दिलाई. पर विवादित होकर माही जगह भव देखती दुई तुम्हारी शरणमें आईहूं ॥13॥ नुम किस कारणमे हमारा उदार नहीं करते। Primarहलेको नांग नंदुर गंभीर गोरुनागर, ड्रा रही हैं ॥ १२॥ जो मांस सानेवाले राक्षस हमारे साथ तुमने भेजेथे उन सबको IATE कामे मात्र॥ १३ ॥ कटे हमारे कार और उन मा गानोकी सन्तानोंके ऊरर तुमको दयाहो, यदि रामचन्द्रसे युद्ध करनेकी शक्ति मामाशुनपनिलागयः ॥ ममर्गनिहता ममायकर्मर्मभेदिभिः ॥१॥ तान्भूमीपतितान्द्रमाणेनेवमहाजवान् ।। रामस्यचमहत्क समाधामोमान्मम ।। 3. || मास्मिभीताममुदिनाविषण्णाचनिशाचर ॥ शरणंत्वांपुनःप्राप्तासर्वतोभयदर्शिनी ॥ ११॥ विपादनकाध्यु लिमोनिमानिनि । किमानवायमेमनांविपुदेशोकसागरे ।। १२ ।। एतेचनिहताभूमौरामेणनिशितेःशरैः ॥ येचमेपदवींप्राप्ताराक्षसाः शिगितागनाः ।। १३॥ मचितवधनुरोगोपदिग्नःसुतेपुन । गर्मणयदिशक्तिस्तेतेजोवास्तिनिशाचर ॥१४॥ दंडकारण्यनिलयंजहिराक्ष मटकम | बदिगमममिनमनत्वमयाविष्यनि ॥ १५॥ तपोवामतःप्राणांस्त्यश्यामिनिरपरपा ॥ बुद्धयाहमनुपश्यामिनत्वरामस्यसंयु ॥ १६॥ स्थानिमगंगकामपलोपिमहागणे ।। अरमानीनशूरम्त्वंमिथ्यारोपितविकमः ।।१७॥ अपयाहिजनस्थानात्वरितःसहवांधवः ।। नियमांप्रदायवालानन ॥ १८ ॥ मानुपीतीनशकोपिरंतुरामलक्ष्मणो । निःसत्त्वस्याल्पवीर्यस्यवासस्तेकीहशस्त्विह ॥ १९॥ ११ ॥ 12ी गामा करामा दंडकारण्यामी गमवयको आजही मारडालो यदि शत्रुओंके मारनेवाले रामचन्द्रको तुम आजही KUTTE 14. पाजातभार लामासनेही या करेंगी, क्योंकि हमें अपनी बुद्धिमे जान पड़ता है कि तुम संग्राममें ॥ १६॥ HTTET, पगारेगार मिनी मेनाभी भारी है और तुम आनेको शर कहार अभिमानभी करलेहो किन्तु पाहायमें तुम गर नहीं yी मिलाindi ॥10॥कुलापन ! गुम इम मर्नमही बन्धु बान्थर कुटुम्ब सहित इस जनस्थानमे भाग जाओ Amirm गया मागेर मनुल गरि उनको माग्नेकीभी मामयं तुममें नहीं है नी हीनवीर्य दुर्बल होकर किस प्रका आर०का स० २२ रह सकोगे ॥ १९ ॥ रामचन्द्र के तेजमे निन्दितहो थोडेही समयमें तुम्हारा नाश हो जायगा । दशरथकुमार रामचन्द्र स्वभावसेही अतिशय तेजस्वी हैं॥२०॥ और उनके भाई टक्ष्मणभी महावीर्यवान हैं, कि जिन्होंने हमारे नाक कान काट डाले हैं इस प्रकारसे वह बडे उदरवाली राक्षसी बहु भाँतिसे विलाप कर ॥ २१ ॥ भाो पाना सरके निकट शोकके मारे व्याकुलहो अचेत होगई और दुःखसे व्याकुलहो दोनों हाथोंसे छाती पीट २ कर रोने लगी ॥ २२ ॥ इत्या श्रीमद्रा० पान्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायामेकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥ ॥ शूर्पणखाने जब क्रोधर्म भरकर इस प्रकार खरका तिरस्कार किया तब तेजस्व भागला शूरवीर सर राक्षसोंकी सभाके बीचमें उससे कठोर वचन कहने लगा ॥ १ ॥ कि तुम्हारा अपमान होनेसे जो कोष हमको हुआहै उसकी तुलना नहीं है पगार छोडे हुए नमकीन जलके ममान इस कोषको धारण करनेकी हममें शक्ति नहीं है ॥ २॥ रामचन्द्र और लक्ष्मण तो मनुष्यहैं हममें जो पराक्रमहै उससे हम रामतेजोभिभूतोहित्संक्षिप्रविनशिप्यसि ॥ सहितेजःसमायुक्तोरामोदशरथात्मजः ॥२०॥ भ्राताचास्यमहावीर्योयेनचास्मिविरूपिता ॥ एवं लिप्यपदुशोराक्षसीप्रदरोदरी ॥ २१ ॥ भ्रातुःसमीपेशोकानिष्टसंज्ञावभूवह ॥ कराभ्यामुदरहत्वारुरोदभृशदुःखिता ॥ २२ ॥ इत्याचे श्री. • आ० अर• एकविंशःसर्गः ॥ २१॥ एवमाधर्पितःशुरःशूर्पणख्याखरस्ततः॥ उवाचरक्षसांमध्येखर खरतरंवचः॥१॥ तवापमानप्रभवः क्रोधोयमतुलोमम ॥ नशक्यतेधारयितुंलवणांभइवोल्वणम् ॥२॥ नरामंगणयेवीर्यान्मानुपंक्षीणजीवितम् ॥आत्मदुश्चरितैःप्राणान्हतोयोद्यविमो तते ॥३॥वाप्पःसंधार्यतामेपसंभ्रमश्वविमुच्यताम् ॥ अहंरामसहभ्राधानयामियमसादनम् ॥ ४॥ परश्वधहतस्याद्यमंदपाणस्यभूतले ॥ रामस्यरु चिरंरकमुष्णंपास्यसिराशसि ॥५॥ संप्रदृष्टावचःश्रुत्वाखरस्यवदनाच्युतम्॥प्रशशंसपुनािद्धातरंरक्षसांवरम्॥६॥ तयापरुपितःपूर्वपुनरेवा शंसितः ॥ अववीपर्णनामखर सेनापतितदा ॥ ७॥ चतुर्दशसहस्राणिममचित्तानुवर्तिनाम् ॥ रक्षसांभीमवेगानांसमरेप्वनिवर्तिनाम् ॥ ८॥ गनको कुछ नहीं गिनते उस रामने जो कुकर्म कियाहै उसके पापसे वह आजही निहत होकर प्राण त्याग करेगा ॥ ३ ॥ इस कारण तुम रोना धोना छोड डरका त्याग करो हम अवश्यही रामके सहित लक्ष्मणको यमपुरीमें पठावेंगे ॥ ४ ॥ अयि राक्षसि ! अब मरणोन्मुख रामचन्द्रजी जब हमारे शरसे घायल होकर मर गांपगे नब तुम उनका लाल २ गरम २ रुधिर पान करना ॥ ५॥ शूर्पणखा खरके मुखसे निकले हुए यह वचन सुन मूढ़तासे अधिक हर्पमें भर फिर उस राक्षस भेट गरी पडाई करने लगी॥ ६॥ जर निगाचरीपूर्पणसाने प्रथम निन्दा की और फिर प्रशंसा की तस तत्क्षण सर, दूपणनामः अपने सेनापतिसे बोला ॥७॥ तिनमान ! जो मप भानिने माग रिय अन्यान करनेवाले जो कभी गनमें पीट नहीं दिगाने अनियेगवान भ ।। ३३ कर. मष र रxr जो लोगोंकी हन्या करके सदा खेला करते हैं जिनका पराकम भयानक और जिनका वर्ण नीले वादरके समानहै ऐसे राक्षसोंको सब प्रकारमे मजाकर हमारे सामने लाओ ॥ ९ ॥ इसके सिवाय शीघ्र चलनेवाला रथ, धनुप, विचित्र आणसमूह तेजधारखाली अनेक भांतिकी शनिये और खड्गभी ले आओ।। १०॥ हे रणपंडित महानुभव ! राक्षसोंके प्रथमही महात्मा पुलस्त्यवंशसे उत्पन्न हम, जो रामचन्द्र राक्षसोंको मारनेके लिये आये हैं उन दुर्विनीत रामचन्द्र के वार्थ मंग्राममें आगे जानेकी इच्छा करते हैं ॥ ११ ॥ सरने जर इस प्रकार कहा तो दूषण तुरन्तही विचित्र वर्णवाले श्रेष्ठ घोडे जिसमें जुतेहुए सूर्यके समान चमकते हुए रथको सरके समीप ले आया ॥ १२ ॥ इस स्थका आकार मेरु पर्वतकी समान सब गहने इसमें तपाये हुए सुवर्णके लगेथे पहिये सुवर्णके बनेथे और दोनों नीलजीमूतवर्णानालोकहिंसाविहारिणाम् ।। सर्वोद्योगमुदीर्णानांरक्षसांसौम्यकारय ॥ ९ ॥ उपस्थापयमेक्षिप्ररथंसौम्यवपिच ॥ शरांश्चचि धानखगश्विशक्तीश्वविविधाःशिताः॥ १० ॥ अग्रेनिर्यातुमिच्छामिपौलस्त्यानांमहात्मनाम् ॥ वधार्थदुर्विनीतस्यरामस्यरणकोविद ॥ ११॥ इतितस्यत्रुवाणस्यसूर्यवर्णमहारथम् ॥ सदश्वेशरलेयुक्तमाचचक्षेथदूपणः ॥ १२॥ तमेरुशिखराकारंतप्तकांचनभूपणम् ॥ हेमचक्रमसंवाधये दूर्यमयकूवरम् ॥१३॥ मत्स्यैःपुप्पेर्द्वमै शैलेश्चंद्रकांतेश्वकांचनैः॥ मांगल्ये पक्षिसंवेश्चताराभिश्वसमावृतम् ॥ १४॥ध्वजनिस्त्रिंशसंपन्न किंकिणी वरभूषितम् ।। सदश्वयुक्तंसोमादारुरोहखरस्तदा ।। १५॥ खरस्तुतन्महत्सैन्यस्थवर्मायुधध्वजम् ॥ निर्यातेत्यत्रवीत्प्रेक्ष्यदूपणःसर्वराक्षसान् ॥ ।। १६ ॥ ततस्तदाक्षसंसैन्यंघोरचर्मायुधध्वजम् ॥ निर्जगामजनस्थानान्महानादमहाजवम् ॥१७॥ मुद्रे पहिशेःशुले सुतीक्ष्णेश्चपरश्वधैः ॥ खड्नेश्वरथस्यैश्वभ्राजमानःसतोमरेः ।। १८ ॥ शक्तिभिःपरिधोरेरतिमात्रैश्वकार्मुकः ॥ गदासिमुसलेर्वत्रेहीतेभीमदर्शनः ॥ १९॥ गुम्मजभी वैदूर्य मणिके वनेथे. ॥ १३॥ जिसमें मछली पुष्प, द्रुम, शैल, यह चन्द्रकांत मणि व सुवर्णके लगे हुएथे और सुवर्णकेही पक्षी और वारागणभी इस रयमें जड रहेथे ॥ ११ ॥ छोटी २ पेटियां इसमें लगी हुईथीं, खर क्रोधमें भराहुआ कुछभी विलम्ब न करके धजा पताका युक्त अच्छे घोड़ों करके चलाये जाते हुए रथार सवार हुआ ॥ १५॥ सरको सवारहुआ देखकर दूपणने रथ चर्म आदि हथियार लिये, घजा युक्त बढी सेनाको युद्धके लिये पयान करनेकी आजादी. उसने जर सब राक्षसोंसे इस प्रकार कहा ॥ १६ ॥ तब भयंकर चर्म ध्वजा युक्त वह राक्षोंकी सेना महावेगमे महाकुलाहल मचाती हुई जनस्थानसें चली ॥ ॥ ३७ ॥ उस सेनामें राक्षस मुद्गर, पटा, वेज शूल, फरसे, खड्ग, चक्र, व वोमरादिशन धारण किये शोभायमानथे ॥ १८॥ शक्ति, परिक, महाभयंकर धनुष, ना.रा.भा. आर०कां स०२३ ॥३४॥ गदा, पलपार, मूसल और भयंकर अख शत्र ग्रहण कर राक्षस जनस्थानसे निकले ॥ १९ ॥ इस प्रकार खरके मनकी बात करनेवाले बडे भयंकर सरुप चौदह हजार राक्षस जनस्थानसे बाहर हुए ॥ २० ॥ वह भयंकर राक्षस जब महावेगसे धावमान हुये तब इसको देखकर सरका रथभी कुछ निनके निकटही पहुँचा ॥ २१ ॥ सारथीने सरकी आज्ञा जानकर विचित्र वर्णवाले सुवर्णके गहने पहने घोडौंको शीघ्रतासे चलाया ॥ २२ ॥ उस समय रिसुवावी रारका चलया हुआ रथ अपने शब्दसे सहसा दिशा विदिशाओंको भर देता हुआ ॥ २३ ॥ अतिबलवान वह बड़े स्वरवाला खर क्रोधर्म भर यमराजकी समान शत्रु संहार करनेमें विशेष शीघता युक्त हो ओले वर्पाने वाले महामेषकी समान गर्जता हुआ सारथीसे बोला कि, रथ जलदी जलदी चलाओ ॥ २४ ॥ राक्षसानांसुघोराणांसहस्राणिचतुर्दश ॥ निर्यातानिजनस्थानात्खरचित्तानुवर्तिनाम् ॥ २० ॥ तांस्तुनिर्धावतोदृष्ट्वाराक्षसान्भीमदर्शनान् ॥ खरस्याथरथाकिंचिजगामतदनंतरम् ॥२१॥ ततस्ताञ्छवलानश्वांस्तप्तकांचनभूपितान् ॥ खरस्यमतमाज्ञायसारथिःपर्यचोदयत् ॥२२॥ संचोदि तोरथःशीघंखरस्यरिपुघातिनः॥ शब्देनापूरयामासदिशःसप्रदिशस्तथा ॥२३॥प्रवृद्धमन्युस्तुखरःखरस्वरोरिपोर्वधार्थत्वरितोयथांतकः॥ अचूचु दत्सारथिमुन्नदन्पुनर्महावलोमेघइवाश्मवर्पवान् ॥२४॥ इत्यापें श्रीमद्रा० वाल्मी० आदि० अरण्यकांडे द्वाविंशःसर्गः ॥ २२ ॥ तत्प्रयातंव लंघोरमशिवंशोणितोदकम् ॥अभ्यवर्षन्महाघोरस्तुमुलोगर्दभारुणः॥१॥ निपेतुस्तुरगास्तस्यरथयुक्तामहाजवाः ॥ समेपुष्पचितेदेशेराजमार्ग यदृच्छया ॥२॥श्यामरुधिरपयतंबभूवपरिवेपणम् ॥अलातचक्रप्रतिमंप्रतिगृह्यदिवाकरम् ॥३॥ ततोध्वजमुपागम्यहमदंडंसमुच्छ्रितम् ॥ समाक म्यमहाकायस्तस्थौगृधःसुदारुणः॥ ४॥ जनस्थानसमीपेचसमाकम्यखरस्वनाः ॥ विस्वरान्विविधान्नादान्मांसादान्मृगपक्षिणः॥५॥ इत्यापें श्रीमद्रा० या० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकायां द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥ जब इस प्रकारके वह भयंकर राक्षसोंकी सेना युद्ध करनेके लिये चली, तर गर्द भकी समान धूसरवर्ण महा डरावने मेघ आकारामें उठकर कडा शब्द करके रुधिर मिला हुआ जल वर्षाने लगे ॥ १ ॥ खरके रथमें जो तेज चलनेवाले घोडे जुत रहेथे, यह गजमार्गमें चलने के समय सहसा फूल बिछी हुई बराबर हुई पृथ्वीमेंभी गिर पडे ॥ २ ॥ सूर्यमंडलके चारों ओर श्यामवर्णका घेरा बन गया, इस घेरेका बाहरी भाग अरुण वर्ण और आकार अंगारचाकी समान गोलया ॥३॥ इसके पीछे बडे आकारवाला भयंकर गिद्ध बडी ऊंची सुवर्णकी रथकी ध्यजाके निकट आकर रंग उठाकर उसके ऊपर बैठ गया ॥५॥ रिकट गन्दकाग, मांग ग्वानेगले पशुपक्षीगण जनस्थानके समीप आकर भयंकर गम्द करके चिजाने लगे ॥ ५॥ ॥ ३४
सात
भयंकर मिरार पूर्व दिशामें राक्षसोंका अमंगलदायक भयंकर घोर शब्द करने टगे ॥ ६ ॥ मतवाले हाथियोंकी समान भयंकर मूर्तिवालं मंघ जलको समान रुराधर
सकर वहाँ के भय आकागको एकवारही छाटेने दुप ॥ ७॥ रु सदा करनेवाला ऐसा घोर अंधकार छाया कि दिशा विदिशा समस्त एक साथही उनी
ग, रिटनी दष्टि न आया ॥ ८ ॥ मन्ध्या रुधिरसे भीगे वसकी समान वर्ण धारण करके अकालमेंही प्रकाशित होगई भयंकर पशुपक्षीगणोंने खरके सम्।।
मुग करके कठोर मग्ने विमाना आरम्भ किया ॥ ९ ॥ श्वेत चील सियार और गिदगण सरको भय उपजाते हुए ऊँचे स्वरसे शब्द करने लगे, और युद्धमें जिना
बोलना मदा अमंगटका अजानेवाटाहै, ऐमी गालियांभी भय उपजाती हुई ॥ ॥ १० ॥ सेनाके सामने मुखसे अमि निकालतीहुई घोर शोर करने लगी सूर्य
व्याजागभिदीतायांदिशिवभैरवस्वनम् ।। अशिवयातुधानानांशिवाघोरामहास्वनाः॥६॥ प्रभिन्नगजसंकाशास्तोयशोणितधारिणः॥ आकाशे
तदनाकानीमांसाहकाः ।।७।। बभूवतिमिरंघोरमुद्धतंरोमहर्पणम् ॥ दिशोवाणदिशोवापिसुव्यक्तनचकाशिरे ॥ ८॥ क्षतजासवर्णाभास
ध्याकालंबिनायनी ॥ सरंचाभिमुखनेदुस्तदाघोरामृगाःखगाः।। ९॥ कैकगोमायुगृधाश्चचुक्रुशुर्भयशंसिनः ॥ नित्याशिवकरायुद्धेशिवाघोरनि
दर्शनाः ॥१०॥ नेदुर्वलस्याभिमुखंज्यालोहारिभिराननेः॥कवंधःपरिघाभासोदृश्यतेभास्करांतिके॥११॥ जग्राहसूर्यस्वर्भानुरपर्वणिमहाग्रहः ।।
प्रातिमामतःशीनिष्प्रभोभूदिवाकरः ।। १२ ।। उत्पेतुञ्चविनारात्रिंताराःखद्योततप्रभाः॥ संलीनमीन विहगानलिन्यःशुष्कपंकजाः ॥ १३॥ ।
तस्मिन्नणयाविनापुप्पफलीमाः॥ उद्धृतश्चविनावातरेणुर्जलधरारुणः॥१४॥चीचीकूचीतिवाश्यतोवभूस्तरसारिकाः॥उल्काश्चापिसनि |
घोपानिपेतुर्योग्दर्शनाः ॥ १५॥ प्रचनालमहीचापिसशैलयनकानना । खरस्यचरथस्थस्यनर्दमानस्यधीमतः ॥ १६॥
विकट परियाकार कबंध दियाई देनेलगा ॥ १३ ॥ महायह राहुने विना अमावस्या और पर्वकालकेही सूर्यको यस लिया पवन प्रचंड चलने लगी सूर्यकी दीमि जा'
रही ॥ 12 ॥ और गति न होनेपरभीतारागण पटरीजनेकी समान चमककर उदय हुए, तालाओंके कमल सूखगये मछलीभी सागर सरोवरमें ही लीन होग
और परमी नागको भान होगये ॥ १३ ॥ उस समय सब वृक्ष फल फूलों करके रहित होगये और विना पवनके चलनेपरभी महा धूरि उडने लगी बादल ला।
सोगरे ॥ ११ ॥ उस काल मेना पक्षी मिसाये हुये शब्दोंको त्याग करके (चीची कूचि इत्यादि) अर्थ रहित शब्द करने लगे, घोर भयावनी उल्कायें वः!
गदमे वार करके पनीर गिरने लगी ॥ १५ ॥ और बन उपवन और पर्वत सहित पृथ्वी कांपने लगी थीमान् सर रथमें बैठकर गर्जन करने लगा ॥ १६ ॥
आर सा.रा.भा. गरी पाई भुना पहनही गाने टगी, स्वर विगड गया, इस प्रकार इधर उधर देखते २ उसके दोनों नेत्रों में आंसू भर आये ॥ १७ ॥ उस खरके शिरमें वारंवार पर होनेगी, पापि मोदके मारे यह मंपाममें जानेसे नहीं लौटा, इन सब रोमहर्पण महाउत्पातोंको उपस्थित हुवा देख ॥ १८॥सर हँसता २ सब राक्षसोंसे बोला कि, पहगो पोर.दिगाई देनेवाले महाउत्पाव इस समय हो रहे हैं इनको देखकर मैं ॥ १९ ॥ ऐसे कुछ नहीं समझता कि, बलवान जिस प्रकार दुर्बलोंको नहीं गिना मेही हमारे पराकम इन उत्पातोंको मनमें स्थान नहीं देते जो हम क्रुद्ध होवें वो तीखे वाणोंसे आकाशमंडलसे वारागणोंको भी पृथ्वीपर गिरादें ॥२०॥ पर पोषित हो जो यमराजकोभी मृत्यु शोध लावें; इससे हम वलसे दर्पित रामचन्द्रको उसके भाई लक्ष्मण सहित ॥ २१ ॥ तीखे बाणोंके आघातसे विना पारंपतभुजामव्यःस्वरश्वास्यावसजत ॥ साखासंपद्यतेदृष्टिःपश्यमानस्यसर्वतः ॥ १७॥ ललाटेचरुजोजातानचमोहान्यवर्तत ॥ तान्समीक्ष्य मदोत्पानानुत्थितानोमहर्पणान् ॥ १८॥ अत्रवीद्राक्षसान्सर्वान्प्रहसन्सखरस्तदा ॥ महोत्पातानिमान्सर्वानुत्थितान्घोरदर्शनान् ॥ १९॥ नचिं तयाम्यहंपीदिलवान्दुर्बलानिय ॥ ताराअपिशरस्तीक्ष्णेःपातयेयंनभस्तलात्॥२०॥ मृत्युमरणधर्मेणसंकुद्धोयोजयाम्यहम् ॥राघवतंबलोत्सि संभातरंनापिलक्ष्मणम् ॥ २१॥ अहत्वासायकैस्तीक्ष्णेनोंपावर्तितमुत्सहे ॥ यनिमित्तंतुरामस्यलक्ष्मणस्यविपर्ययः॥२२॥ सकामाभगिनीमे स्तुपीत्वानुरुधिरंतयोः॥ नकचित्प्राप्तपूर्वोमेसंयुगेपुपराजयः ॥२३॥ युप्माकमेतत्प्रत्यक्षनानृतंकथयाम्यहम्॥ देवराजमपिक्रुद्धीमत्तेरावतगामिन म् ॥ २४ ॥ वज्रहस्तंरणेहन्यांकिंपुनस्तौचमानवौ ॥ सातस्यगर्जितंश्रुत्वाराक्षसानांमहाचमूः ॥२५॥ प्रहर्षमतुलंलेभेमृत्युपाशावपाशिता ॥ मर्मगुभमहात्मानोयुद्धदर्शनकांक्षिणः ॥ २६ ॥ ऋपयोदेवगंधर्वासिद्धाश्चसहचारणेः ॥ समेत्यचोचुःसहितास्तेऽन्योन्यंपुण्यकर्मणः ॥२७॥ मार डाले हुए नहीं टोटंगे । जिसके लिये रामचन्द्र व लक्ष्मणकी विपरीत बुद्धि हुई और उन्होंने उसके नाक कान काट डाले ॥२२॥ ऐसी हमारी वहन शूर्पणखा भाताके माहित रासका रुधिर पीकर मफल मनोरथ होवे। और हमें पराजय होनेका कुछ डरही नहीं, क्योंकि आजतक हम किसी संग्राममें पहले नहीं हारे हैं ॥ २३॥ सो तुम लोगों को सानही है इस कारण हम मिय्या नहीं कहते जो हम क्रुद्ध हो जायँ तो मन ऐरावत हाथीपर सवार इन्द्रको ॥२४॥ यद्यपि रणके मध्य उसके हाथमें वज्रभी हो गयापि मार डालें फिर राम लक्ष्मणके मारनेमें क्या पडी यात है। वह तो मनप्प हैं यह कहकर वर गर्जने लगा जिसे श्रवणकर राक्षसोंकी बडी भारी सेना ॥ २५॥ निरपित पनि पर्मा पदमीथी। इम ओर पदके देखनेगी यामनामे महात्मा योग आये ॥ २६ ॥ उनमें अषिगण गण गभग लोग सवही आये। वह पुण्य कर्म करनेवाले वहां सबही एकत्र होकर परस्सर कहने लगे ॥ २७ ॥ कि गौ, बामण, सुरसमे रहैं इसके मिवाय औरभी मय लोकसम्मत प्राणियोंका मंगल होवे और श्रीरघुनंदन श्रीरामचन्द्रजी युद्धमै पुलस्त्यवंशी राक्षसों को जीतें ॥ २८ ॥ जैसे चक्रधारी विष्णुजीने समस्त असुरश्रेष्टीको जीताथा। परमर्पिगण ऐसे, व औरभी अनेक प्रकारके वचन परस्पर कहने लगे ॥ २९ ॥ विमानोंमें बैठे हुए देवतालोग कौतूहलके वग होकर मृत्यु जिनकी निकट आईहै ऐसे राक्षसोंकी बडी सेनाको देखने लगे ॥ ३० ॥ इस समय सर रथपर चढा हुआ सेनाके अगले भागमें हुआ तब उसके अगल बगल श्वेनगामी, पृथुश्याम, यज्ञशत्रु, विहङ्गम, ॥ ३१ ॥ दुर्जय, परवीराक्ष, पुरुष, कलिकार्मुक, हेममाली, महामाली, सर्वास्य, और रुधिरारान । यह बारह महावीर राक्षन सरको स्वस्तिगोत्राह्मणेभ्यस्तुलोकानायेचसंमताः ॥ जयतांराघवोयुद्धपौलस्त्याव्रजनीचरान् ॥ २८॥ चक्रहस्तोयथाविष्णुःसर्वानसुरमत्तमान् ॥ एतजान्यच्चबहुशोब्रुवाणा परमर्पयः ॥२९॥ जातकोतूहलास्तत्रविमानस्थाश्वदेवताः ॥ ददृशुर्वाहिनीतेपांराक्षसानांगतायुपाम् ॥ ३० ॥ रथेन तुखरोवेगात्सेन्यस्यानादिनिःसृतः ॥ श्येनगामीपृथुग्रीवोयज्ञशाहंगमः ॥३१॥ दुर्जयःकरवीराक्षःपुरुषःकालकार्मुकः ॥ हेममालीमहामाली सास्योरुधिराशनः ॥ ३२ ॥ द्वादशैतेमहावीर्याःप्रतस्थुरभितःखरम् ॥ महाकपालःस्थूलाक्षःप्रमाथस्विशिरास्तथा ॥ चत्वारगतेसेनादूपणं पृष्टतोन्वयुः ॥ ३३ ॥ साभीमवेगासमराभिकांक्षिणीसुदारुणाराक्षसवीरसेना ॥ तौराजपुत्रौसहसाभ्युपेतामालाग्रहाणामिवचंद्रमों ॥३१॥ इत्यायें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे त्रयोविंशःसर्गः ॥ २३ ॥ आश्रमप्रतियातेतुखरेखरपराक्रमे ॥ तानेवीत्पातिका नामःसहभाबाददर्शह ॥ १ ॥ तानुत्पातान्महान्धोरात्रामोदृष्ट्वात्यमर्पणः ॥ प्रजानामहितान्दृष्ट्वावाक्यलक्ष्मणमत्रवीत् ॥ २॥ इमान्पश्यमहा वाहोसर्वभूतापहारिणः ॥ समुत्थितान्महोत्पातान्संहतुसर्वराक्षसान् ॥ ३॥ पेरे हुए जाते थे ॥ ३२ ॥ महाकपाल, स्थूलाक्ष, प्रमाथ और त्रिशिरा, यह चार राक्षस दूपण मेनापतिके पीछे २ चले जाते थे ॥ ३३ ॥ जिस प्रकार ग्रहजाल चन्द्र और सूर्यको प्राप्त होता है, वैसेही भीमवेग सुदारुण महाबलवान् राक्षसगण संग्रामकी अभिलापाकिये हुये सहसा राजपुत्र रामचन्द्र और लक्ष्मणजीके निकट पहुँने ॥३४॥ इत्या श्रीमद्रा०वा आ आरण्यकांडे भापाटीकायां त्रयोविंशः सर्गः।। २३ ॥ इस भाँति वीक्ष्ण पराक्रमवाला सर जब रामचन्द्रजीके आश्रमकी ओर चला, तब श्रीरामचन्द्रजीने श्वाता लक्ष्मणके सहित वह उत्पात जो कि खरके चलने के समय हुये थे सब देखे ॥ १ ॥ श्रीरामचन्द्रजी प्रजागों के अमंगलकारी महापौर इन सब उसातोंको देसकर अस्वस्थ चितसे लामणजीसे वोले ॥ २ ॥ हे महाबाहो ! सब प्राणियोंके प्राणनाश करनेवाले यह बडे भारी उत्पात राक्षसकुलका आर० स०२ in हिप हो गई मो गुम देगो ॥ ३ ॥ गर्दभकी ममान धूमर वर्णवाले बादलोंका समूह इस आकारामें इधर उधर दौडकर बडे शब्दसे गर्ज २ रुधिर ... T॥५॥ पर हमारे गय पाोंने धुआं निकटनाहै, मो यह युद्ध होनेका आनंद मना रहे हैं, और स्वर्ण जिनकी पीठमें लगा हुआ है ऐसे धनुपभी विच Ti॥ नगर पसीगण जिम प्रकाग्ने गन्द करते हैं इससे राक्षसोंको भय और प्राणसंशय आकर उपस्थित हुआ है ॥ ६ ॥ अब शीग्रही मार होगा इसमें भी मंदेह नहीं है । परन्तु हे वीर ! हमारा यह दहना हाथ वार २ फडककर हमारे जयकी सूचना करता है ।। ७ ।। हे शूर ! हमारी जय और गायकी पगजप निकट आय पहुंची है, तुम्हारा पदनभी प्रसन्न और प्रभायुक्त देख पडता है ॥ ८॥ हे लक्ष्मण ! युद्ध करनेके लिये तैयार हुए जिन पुरुषोंका अमीरभिधागस्तुरिमृजतेखरस्वनाः ॥ व्योमिमेघाविवर्ततेपरुपागर्दभारुणाः ॥ ४ ॥ सधूमाश्चशराःसर्वेममयुद्धाभिनंदिताः ॥ रुक्मपृष्ठानि पापानिनिष्टतेविरक्षण ॥ ५॥ यादृशाइहकूजतिपक्षिणोवनचारिणः ॥ अग्रतोनोभयंप्राप्तंसंशयोजीवितस्यच ॥ ६॥ संग्रहारस्तुसुमहा भरिप्पनिनमंशयः । अयमाख्यातिमेवाहुःस्फुरमाणीमुहुर्मुहुः ॥७॥ सनिकपैतुनःशूरजयंशवोःपराजयम् ॥ सुप्रभंचप्रसन्नंचतववहिलक्ष्य ने॥८॥ उपतानादियुद्धार्थयेपाभवतिलक्ष्मण ॥ निष्प्रभंवदनंतैपांभवत्यायुःपरिक्षयः॥ ९॥ रक्षसांनर्दतांघोपःथूयतेयंमहाध्वनिः ॥ आहता नांनभेरीणांगसे करकर्मभिः ॥ १०॥ अनागतविधानंतुकर्तव्यंशुभमिच्छता ॥ आपदाशंकमानेनपुरुपेणविपश्चिता ॥ ११ ॥ तस्माद्गृही सादेदशिरपाणिर्धनुर्धरः ॥ गुहामाश्रयशैलस्यदुर्गापादपसंकुलाम् ॥ १२ ॥ प्रतिकूलितुमिच्छामिनहिवाक्यमिदंत्वया ॥ शापितोममपादा भ्यागम्यतापत्समानिरम् ॥ १३॥ त्वहिशूरश्चवलवान्हन्याएतान्नसंशयः ॥ स्वयंनिहंतुमिच्छामिसर्वानेवनिशाचरान् ॥ १४ ॥ मग मलीन होजाता है, इनसे उन लोगों की आयुका क्षय होता है |॥ ॥ राक्षसों के घोर और गंभीर गर्जनका यह शब्द भी अब सुनाई आता है। व उन क्रूर मं करनेराले राक्षनोंकी भेगकी मनिभी अप सुनाई आती है ॥ १० ॥ इस कारण कल्याणके चाहनेवाले पंडित पुरुप विपनिकी शंका रहनेसे प्रथमही म भागली मिनिका ऐमा उपाय करते हैं कि, जिसमे वह विपनि निकट न आवै ॥ ११ ॥ इस कारण तुम धनुप धारण करके जानकीजीको ले वृक्षों करके पुनः दुर्गम परंतकी कन्दरामें चले जाओ ॥ १२॥ नुम हमारे इन वचनोंके प्रतिकूल आचरण मत करना । वत्स ! हम तुमको अपने चरणोंकी मोगरा कम गीपही जानकीको रेफर गिरिगृहामें पले जाओ ॥ ॥ १३ ॥ नुप शुर और यलयान हो, निषय न रातमा TRT सा -------- इममें मन्देह नहीं है परन्तु हम आपही इन सर्व निशाचरोंके मार डालनेकी इच्छा करते हैं ॥ १४ ॥ जब श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहा तब लक्ष्मणजी सील महित गर और चाप ग्रहण करके दुर्गम पर्वतकी कन्दरामें चले गये ॥ १५ ॥ जब जानकीजीके साथ लक्ष्मणजी पर्वतकी कन्दरामें चले गये तव श्री इनी बडे हर्षित हुए और कवच व याण रघुनंदनजीने ग्रहण किया ॥ १६ ॥अनिवर्णवाले कवचके धारण करनेसे श्रीरामचन्द्रजी अन्धकारमध्यमेंसे महामयिक ममान जान पड़ने लगे ॥ १७ ॥ तत्पधात् वीर्यवान् श्रीरामचन्दजी धनुपको उठाय, वाणोंको ग्रहण कर प्रत्यंचाकी टंकारके शब्दसे दिगाओंको पूर्ण करते हुए भली भांतिसे दृढहो वहां सडे होगये ॥ १८ ॥ उस समय महात्मा देवगण, गन्धर्वगण, सिद्धगण, और चारणगण संग्राम दे अभिलापामे यहां आये ॥ १९॥ लोकमें जो बर्पि प्रसिद्ध हैं वह मर महर्षिभी वहां आये वह सर पुण्यकर्म करनेवाले एकत्र होकर परस्पर मिल कहने । पवमुक्तस्तुरामेणलक्ष्मण सहसीतया ॥शरानादायचापंचगुहादुगांसमाश्रयत्।।१५।।तस्मिन्प्रविष्टेतुगुहालक्ष्मणेसहसीतया॥हंतनिर्युक्तमित्यु गम कवनमाविशत् ॥१६॥ सतेनानिनिकाशेनकवचेनविभूपितः ॥ बभूवरामस्तिमिरेमहाननिरिवोत्थितः ॥ १७॥ सचापमुद्यम्यमहच्छनाना दायवीर्यवान् ।। संबभूवास्थितस्तत्रज्यास्वनेःपूरयन्दिशः॥१८॥ततोदेवाःसगंधर्वा-सिद्धाश्चसहचारणेः॥समेयुश्चमहात्मानोयुद्धदर्शनकांक्षनाः। ॥१९॥ऋपयश्रमहात्मानोलोफेब्रह्मर्पिसत्तमाः ॥ समेत्यचोचुःसहितास्तेन्योन्यपुण्यकर्मणः॥२०॥स्वस्तिगोत्राह्मणानांचलोकानांचेतिसंगित ताः ॥ जयांगयोयुद्धपौलस्त्यानजनीचरान् ॥ २१ ॥ चक्रहस्तोयथायुद्धेसर्वानसुरपुंगवान् ॥ एवमुक्कापुनःप्रोचुरालोक्यचपरस्परम् ॥२२॥ चतुर्दशसहस्राणिरक्षसांभीमकर्मणाम् ॥ एकश्वरामोधर्मात्माकथंयुद्धभविष्यति॥२३॥ इतिराजर्पयःसिद्धाःसगणाश्चद्विजर्षभाः॥जातकोतला स्तस्थुर्विमानस्थानदेवताः ॥ २४ ॥ आविष्टंतेजसारामंसंग्रामशिरसिस्थितम् ।। दृष्ट्वासर्वाणिभूतानिभयाद्रिव्यथिरेतदा ॥ २५॥ ॥ २० ॥ गी, बामण व और सब लोकोंका सत्र प्रकारसे मंगलहो और श्रीरामचंद्रजी युद्दमें पुलस्त्पवंशीय निशाचरोंको जीतें ॥ २३ ॥ जिस प्रकार श्रीविष्न: नक हाथमें लेकर असुरश्रेप्टोको हरायाथा ऐमे रामचन्द्रजी जी । इस प्रकार कहकर वह फिर परस्पर अवलोकन करते हुए कहने लगे ॥ २२॥ कि भयंक: करनेराले राक्षम नी चौदह हजार (१४०००) हैं और धर्मात्मा श्रीरामचंद्रजी इकले हैं, सो इससे कह नहीं सकते कि किस प्रकार युद्ध होगा ॥ २३॥ इस प्राने राजर्पिगण, मिद्धगण, विद्याधरादि समस्त देवयोनिगण प्रधान २ ब्रह्मर्पिगण कौतूहलाक्रांत चित्त किये विमानोंपर स्थित हुए वहां खडेथे ॥ २४ ॥ महा. भीगपरन्द्रजीको नेजमें प्रविष्ट हुए ममरस्पटमें अकेला सडा देख, प्राणिमात्रही भयकै मारे दुःसी हुए कि नजाने महाराजको आज कैसा परिश्रम पड़ेगा असे सा.रा.भा. आर० इन ३४००० हजार दुष्टोंसे लड़ेंगे ! ॥ २५ ॥ महात्मा रुद्रजी जब कोध करते हैं और उनका रूप जैसा होजाताहै, वैसाही क्लेशरहित कर्म करनेवाले श्रीरामचन्द्रजीका रूप होगया जिसके समान विकराल रूप और नहींथा ॥ २६ ॥ आकाशमें देव गन्धर्व और चारण लोग ऐसा कहही रहे हैं कि इतनेमें महागंभीर शब्द करती, अति घोर दाल खड्यादि हथियार लिये ॥ २७ ॥ चारोंओरसे राक्षसोंकी अनी (सेना) बनी ठनी आपहुँची, जो वीरपनेकी वार्ता आपसमें कररहीथी ॥ २८॥उस सेनाले कोई २ लोग धनुपकी प्रत्यंचा च २ बजावे कोई वार २ जभाई लेते कोई ऊंचे स्वरसे चिल्लाते और कोई नगाडौंकोही बजातेथे ॥ २९ ॥ इस सब सेनाके राक्षसों का ऐसा घोर शब्द हुआ कि जिससे वह वन भर गया, और उस शब्दसे वनचारी पशु पक्षीभी घबडा गये ॥३०॥ और लौटकर पीछेको न देखतेहुए जित जगह रूपमप्रतिमंतस्यरामस्याकिएकर्मणः॥ वभूवरूपंकुद्धस्यरुद्रस्येवमहात्मनः॥२६॥ इतिसंभाष्यमाणेतुदेवगंधर्वचारणः ॥ ततोगंभीरनिदिंघो रचर्मायुधध्वजम् ॥ २७ ॥ अनीकंयातुधानानांसमंतात्प्रत्यपद्यत । वीरालापान्विसृजतामन्योन्यमभिगच्छताम् ॥ २८॥ चापानिविस्फारय ताजुभतांचाप्यभीक्ष्णशः॥ विप्रघुष्टस्वनानांचदुंदुभीश्चाभिनिनताम् ॥२९॥ तेपांसुविपुलःशब्दःपूरयामासतद्वनम् ॥ तेनशब्देनवित्रस्तास्त्रासि तावनचारिणः ॥ ३०॥ दुद्रुवुर्यत्रनिःशब्दंपृष्टतोनावलोकयन् ॥ तच्चानीकंमहावेगंरामंसमनुवर्तत ॥३१॥धृतनानामहरणंगंभीरसागरोपमम् ॥ रामोपिचारयंश्चक्षुःसर्वतोरणपंडितः॥३२॥ ददर्शखरसैन्यंतयुद्धायाभिमुखोगतः॥ वितत्यचधनुर्भीमंतूण्याश्चोद्धृत्यसायकान् ॥ ३३॥कोधमा हारयत्तीवधार्थसर्वरक्षसाम् ॥ दुष्प्रेक्ष्यश्वाभवत्कुद्धोयुगांताग्निरिवंज्वलन् ॥३४॥ तंदृष्ट्वातेजसाविष्टंप्राव्यथन्वनदेवताः॥ तस्यरुटस्यरूपंतुराम स्यददृशेतदा ॥ दक्षस्येवक्रतुंहंतुमुद्यतस्यपिनाकिनः ॥ ३५ ॥ वह शब्द अवणगोचर न होवै वहांको भागे । व इस ओर राक्षसी सेना धूम धामसे श्रीरामचंद्रजीके निकट आय पहुँची ॥३१॥ उस सेनाके वीरगण अनेक प्रकारके हथियार धारण कियेथे, वह सेना समुद्रसमान उफनती चली आतीथी, समरपंडित श्रीरघुनंदन रामचन्द्रजीने नेत्र डाल चारों ओर निहारा वो ॥ ३२ ॥ युद्ध करनेको सरकी सेना, उनके सोही चली आतीहै, वब श्रीरामचन्द्रजीने धनुपको उठाय, और तरकसमेंसे वाणसमूहको ग्रहणकर ॥ ३३ ॥ राक्षसकुलका संहार करनेके लिये महाकोष किया, उस समय श्रीरामचंद्रजीका ऐसा विकट स्वरूप होगया मानों प्रलयकालकी अमि है ॥ ३४ ॥ यन यता लोग उनका यह तेजसम्पन्न स्वरूप ********** प्पवित हा कोंकि उन्होंने च भयामना समयसीका म. माटेने चमार धारण गिधे, वह गेना गमरगमान नगी नागमातिनगरमा की मेना, उनकी A MARATHIMIR - nrnimamta श्रीरामचन्द्रजीकी वह क्रोधभरी मूर्ति उस समय उन सपने देखीथी ॥ ३५ ॥ जैसे नीले रंगके वादर सूर्योदयमें शोभा पाते हैं । राक्षसमेनाभी अनि मम वर्ग, कवच, स्थ आभरण और धनुप युक्त होकर उस काल वैगी की शोभा पाने लगी॥३६ ॥ इत्यापे श्रीमद्रा०या० आदि० आरण्यकांडे भाषाटीकायां चतुर्विगः सर्गः ॥२४॥ अपने साथियों के साथ आश्रममें आकर सरने शत्रुाक मारनेवाले श्रीगमचंद्रजीको क्रोधर्मे भरे और धनुप ग्रहण किये देखा ॥ १ ॥ ऐमा देखकर उमने कठोर प्रत्यंचा युक्त धनुष उठाकर सारथीसे ऊँचे स्वाहा कि रामचन्द्र के सामने रथ ले चलो ॥ २॥ सारथीने खरकी आज्ञानुसार जहां महाबाहु श्रीरामचन्द्रजी धनुषपर टंकार देते हुए इकठे सडेथे वहांपर घोडौंको चलाया ॥३॥ खरको रामचन्द्रजीके आगे जाताहुआ देखकर उसके मंत्री श्येनगम्यादि बारह राक्षम उमके तत्कार्मुकैराभरणेस्थेश्चतद्धर्मभिश्वाग्निसमानव ॥ बभूवसैन्यपिशिताशनानांसूर्योदयेनीलमिवाभ्रजालम् ॥ ३६॥ ॥ इत्याचे श्रीमद्रा• वा. आ० अर० चतुर्विशःसर्गः ॥ २४ ॥ अगरब्धधनुरामंक्रुद्धतंरिपुघातिनम् ॥ ददर्शाश्रममागम्यग्वरःमहपुरःसरेः ॥ १॥ तंहदासगुणंचाप मुद्यम्यखरनिस्वनम् ॥ रामस्याभिमुखंमुतचोद्यतामित्यचोदयत् ।। २ ॥ मग्यरम्याज्ञयामूतस्तुरगान्समचोदयत् ॥ यत्ररामोमहावाहुरेकोधु न्वन्धनुःस्थितः ॥ ३॥ तंतुनिप्पतितंदृष्ट्वासर्वतोरजनीचगः ॥ मुंचमानामहानादंसचिवाःपर्यवाग्यन् ॥ ४ ॥ सतेपायातुधानानांमध्येस्थ गतसरः ।। बभूवमध्येताराणालोहितांगइवोगातः ॥५॥ ततःशग्महयणगममप्रतिमौजसम् ।। अर्दयित्वामहानादंननादसमग्वरः ॥ ६॥ ततस्तंभीमधन्वानंकुद्धाःसर्वेनिशाचराः ॥ रामनानाविधे-शस्त्रेग्भ्यवपंतदुर्जयम् ।। ७ ।। मुद्गग्गयमेःशूले प्रामे ग्यङ्गे परश्वधैः ॥ गासाःसमरे रंनिजप्नरोपतत्पराः ॥ ८॥ तेवलाहकसंकाशामहाकायामहाबलाः ।। अभ्यधावतकाकुत्स्थंग्थैर्वाजिभिग्वच ॥ ९॥ गजेःपर्वतकूटाभेगमं युद्धजिघांसवः । तेगमेशरवर्षाणिव्यसृजनक्षमांगणाः ॥१०॥ चारोंओर हो लिये ॥ ४ ॥ नब ग्थपर चढा हमा स्कर दुर्विनीत गक्षसोंके बीचमें ऐमा शोभित होताया. जैमे तागओंके बीचमें प्रदीत मंगल ग्रह शोभित होताहै ॥५॥ अनन्तर यह सर श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर युद्धभ हजार वाण छोडकर महाशब्दसे चिल्लाने लगा ॥ ६ ॥ तिमके पीछे सब निशाचर क्रोधित होकर भयंकर धनुषधारी, निवारण करनेके अयोग्य दुर्जय श्रीरामचन्द्रजीको ताकका विविध भांतिके शर वर्षाने लगे ॥७॥ वह गक्षम, युद्धमें कोधितहो अनेक २ लोहेके सुन्दर शूल, फांसी, जन्दजीके ऊपर प्रहार करने लगे ॥ ८ ॥ फिर वह बडे • शरीवाले महावलपान मेघममान निशाचरगण, रथ, घोडे। । उनमें कुछ राक्षम पर्वनोंके शृंगसमान आकारवाले हाथियोंपर चढकर **** *** पा.रा.भा. ॥ श्रीरामचन्द्रजीको युद्धमें मार डालनेके लिये आये, इस कारण वह सब रामचंद्रजीपर वाणोंकी वर्षा करनेलगे ।। १० । जैसे मेघमाला पर्वोंपर वर्षा करतीहै, वैसेही याणवी उन निशाचरोंने श्रीरामचंद्रजीके ऊपर की, सब राक्षसों के मध्य जानकीजीवन कैसे शोभित होतेथे ॥ ११ ॥ जैसे प्रदोपकी यामिनियों में पार्षदोंके मध्य महादेवजी शोभित होते हैं । राक्षसोंके चलाये अव शस्त्र श्रीरामचन्द्रजीने ॥ १२॥ अपने वाोंसे ग्रहण किये, जैसे नदियोंकी धाराओंको महोदधि ग्रहण करता है यपपि श्रीरामचंद्रजीके अंगमें अतिघोर वह अस्त्र शस्त्र लगेथे पर इससे उनको कुछ व्यथा न हुई ॥ १३ ॥ जैसे प्रकाशमान बहुवसे पोंसे हिमालय पर्वतको पीडा नहीं होती। सर्व शरीरमें वाणों के लगनेरो रुधिर बहनेसे श्रीरामचंद्र ऐसे शोभित हुए ॥ ३४ ॥ जैसे सन्ध्याकालीन बादरोंके बीच होनेसे मूर्य भगवान् गोभित होते हैं । रघुनंदनजीकी यह अवस्था देख देव, गन्धर्व और सिद्ध व परमर्पिगण बडे विपादित हुए ॥ १५ ॥ कारण कि, अकेले रामचंद्रजीको सहयों निगाचर शैलेंद्रमिवधाराभिर्वर्षमाणामहाधनाः ।। -सर्वैःपरिवृतोरामोराक्षसैःकरदर्शनेः ॥ ११ ॥ तिथिष्विवमहादेवोवृतःपारिपदांगणेः ॥ तानिमुक्तानि शस्त्राणियातुधाने सराघवः ॥ १२ ॥ प्रतिजग्राहविशिखैनंद्योपानिवसागरः ॥ सतै ग्रहरणेघा भिन्नगात्रीनविव्यथे ॥ १३ ॥ रामप्रदीर्वहु भिर्वरिवमहाचलः ॥ सविधाक्षतजादिग्ध सर्वगात्रेपुराघवः ॥ १४ ॥ वभूवरामःसंध्यारैर्दिवाकरइवावृतः ॥ विपेदुर्देवगंधर्वाःसिद्धाश्चपरमर्प यः॥ १५॥ एकंसहस्रैर्बहुभिस्तदादृष्ट्वासमावृतम् ॥ ततोरामस्तुसंकुद्धोमंडलीकृतकार्मुकः ॥ १६॥ ससर्जनिशितान्वाणाञ्छतशोथसहल शः॥ दुरावारान्दुर्विपहान्कालपाशोपमात्रणे ॥ १७॥ मुमोचलीलयाकंकपत्रान्कांचनभूपणान् । तेशराःशवसेन्येषुमुक्तारामेणलीलया॥१८॥ आददूरक्षसांप्राणान्पाशा कालकृताइव ॥ भित्त्वाराक्षसदेहांस्तांस्तेशरारुधिरापुताः ॥ १९॥ अंतरिक्षगतारेजुप्तिाग्निसमतेजसः ॥ असंख्येया स्तुरामस्यसायकाश्चापमंडलात् ॥ २०॥ विनिष्पेतुरतीयोग्रारक्ष-प्राणापहारिणः ॥ तेर्धपिध्वजायाणिचर्माणिकवचानिच ॥२१॥ घेरे हुएथे । कपि आदिकोंकी यह अवस्था देख श्रीरामचंद्रजीने महाबोध युक्त हो धनुपको जोरसे बैंच ॥ १६ ॥ शत २ सहस्र २ अति तीखे बाण छोडे वे सत्र ग कसे नहीं सकते, वरन अनिवारी सहन करनेके योग्य नहींथे और देखनेमें यमराजकी फांसी के समानधे ॥ १७ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने लीलापूर्वक ॥१८॥ चलाई हुई यमकी फाँसियोंकी समान राक्षसोंका .. ********* ॥
.. गयां गहनों कर युन पाहु दाथियोंकी गुण्डके ममान जंग मैकडॉ हजारों काट डालीं ॥ २२ ॥ इनके अतिरिक्त सुवर्णक कवच धारण किय घाड र. माधी बात माग्महित दायी गुडमाग्मदिन घोडे ॥ २३ ॥ इन सबको प्रत्यंचासे छूटे हुए श्रीरामचंद्रजीके बाणोंने छिन्न भिन्न किया, और पैदलं र कर्ण यमग भान पहुँनाया ॥ २४ ॥ राक्षमगण, अयभाग जिनका महातीक्ष्णहै ऐसे नालीक, नाराच, और विकर्ण समूहसे कट कुट कर भयंका पल मरने लगे ।। २५॥ गुमानभंगी जिस प्रकार अनिको पाकर भली प्रकार घूम २ कर जलतीहै, वैसेही राक्षससेनाभी श्रीरामचन्द्रजीके मर्मभेदी: पारित कर मुग वान करनेको ममर्थ नहीं होमकी ॥ २६ ॥ उम मेनाके कोई २ महायलयान् शूरवीर राक्षस महाकोधित होकर श्रीरामचंद्रजीके पाइन्गहनाभरणानुरुन्कारकोपमान् ॥ चिच्छेदरामःसमरेशतशोथसहस्रशः ।।२२ ॥ हयान्कांचनसन्नाहानथयुक्तान्ससारथीन् ॥गजां. . जागेदान्महयान्मादिनम्नदा ॥ २३॥ पिन्छिदुर्विभिदुशेवरामवाणागुणच्युताः॥ पदातीन्समरेहत्वाअनयन्यमसादनम् ।।२४॥ ततोनाल. : नागम्नीक्षणानप्रतिकनिभिः ॥ भीममार्तस्वरंचकुश्छ्यिमानानिशाचराः ॥२५॥ तत्सैन्यंविविधेर्वाणेरर्दितंमर्मभेदिभिः ॥ नरामेणसुखं शुष्कंपन मिरामिना ।। २६ । केचिगीमवलाःशुराःप्रामान्लान्परश्वधान् ॥ चिक्षिपुपरमाद्धारामायरजनीचराः ॥२७ ॥ तेपांवाणे. पाहागमायारागीयवान् ।। जहारममग्राणांविच्छेदनशिगेधरान् ॥ २८॥ तेछिनशिरस पेतुश्छिनचर्मशरासनाः ॥ सुपर्णवातविक्षिप्तः न्यांपादपायथा ॥ २९ ॥ अशिष्टाश्रयेतत्रविपण्णास्तेनिशाचराः ॥ खरमेवाभ्यधावतशरणार्थशराहताः॥३०॥ तान्सन्धिनुरादायसमाश्व गणः॥ अभ्यधावन्मुकुट कुद्धकद्यांतकः॥३॥निवृत्तास्तुपुनःसर्वेदूपणाश्रयनिर्भयाः॥राममेवाभ्यधावंतसालतालशिलायुधाः।। गग. करगे श्रीरगल यादि बनाने लगे ॥ २७ ॥ महागाई वीर्यवान श्रीरामचन्द्रजी अपने बाणोंसे राक्षसोंके चलाये हुए अन शवोंको रोक इनके प्राण पकपणाभी उसरा दोहए ॥ २८ ॥ गदी उडने ममय जो उनके पंखोंसे पयन निकलतीहै जिस प्रकारसे उससे वृक्षसमूह पृथ्वीपर गिर जाते हैं गगण विनमानाही पीरनिग्ने लगे उनका धनुष और दाल तय्यारभी टूट टाट गई ॥ २९ ॥ बचे बचाये राक्षस श्रीरामचंद्रजीके वाणोंसे घायल पण प्यारो मीनभागमे गरकी गरण गरे ॥ ३० ॥ यह देशरुर दूषण महाक्रोधित होकर धनुप. सँभाल भागे हुए राक्षसोंको धीर बँधात पति के गमान गरगरण श्रीगमगंदी मम्मुग दौरा ॥ ३३ ॥ तब रणमे भागे हुए निशाचरगण दूषणका आसरा पाय लौटकर शाल, ".. .
F आर MET पाग, मार, भीर गल इन मप आयुधोंको धारण कर श्रीरामचन्द्रजीफे सामने धाये ॥ ३२॥ उन राक्षसोंने संग्राममें आतेही शूल, मुद्गर, पाशादि अन गोंगी भीगमरनजीके ऊपर की ॥ ३३ ॥ फिर वृक्षों की वर्षा और शिलाकी वृष्टि प्रारंभ होनेपर तिस समय भयानक और घोर लोमहर्पण संग्राम होने ॥ ३१ ॥ उपग्ने गक्षमगण भीगमचन्द्रजी पर अग्र शम चला रहे थे इधरसे श्रीरामचन्द्रजी राक्षसोंपर बाण वर्षा करते थे, यह देखकर राक्षसोंने फिर अख गोंमे भीगमरनजीको पीठिन किया ॥ ३५॥ श्रीरामचन्द्रजीने देखा कि, सर्व दिशा विदिशा राक्षसोंसे भर गई हैं और हमभी उनके वाणोंसे ढक गये हैं ॥३६॥ वह देगा भीगमरवतीने पा गन्दकर भयंकर राक्षसगणों के ऊपर परम देदीप्यमान गान्धवान चलाया ॥. ३७ ॥ इस गान्धर्वास्त्रके चलानेके पीछे श्रीरामचन्द्र गुनगुदाहनाशपाशदस्तामदायलाः ॥ सृजंतःशरवर्षाणिशस्त्रवाणिसंयुगे ॥३३॥ द्रुमवर्पाणिमुंचंतःशिलावर्षाणिराक्षसाः॥ तभूवाद्भुतंयुद्धंतु गुलरोमहर्पणम् ॥ ३४ ॥ रामस्यास्यमहाघोरपुनस्तेपांचरक्षसाम् ॥ तेसमंतादभिकुद्धाराघवंपुनरार्दयन् ॥ ३५ ॥ ततःसर्वादिशोदृष्ट्वाप्रदिश अनमाताः ।। रातमैःमर्यतःप्राप्तेःशरवा भिरावृतः ॥ ३६ ॥ सकृत्वाभैरखनादमनपरमभास्वरम् ।। समयोजयद्गांधर्वराक्षसेघुमहाबलः॥३७॥ ततःशरमदयाणिनिययुश्चापमंडलात् ॥ सर्वादशदिशोवाणरापूर्यतसमागतेः॥३८॥नाददानंशरान्धोरान्विमुंचतंशरोत्तमान् ॥ विकर्पमाणपश्यं तिगतमास्तेशरार्दिताः ॥ ३९ ॥ शरांधकारमाकाशमावृणोत्सदिवाकरम् ॥ वभूवावस्थितोराम-प्रक्षिपन्निवताञ्छरान् ॥ ४० ॥ युगपत्पत मान अयुगपबदतै शम् ।। युगपत्पतितश्चैवविकीर्णावसुधाभवत् ॥ ११ ॥ निहता पतिताःक्षीणाश्छिन्नाभिन्नाविदारिताः। तत्रतत्रस्मदृश्यंतेरा समास्तमहयशः ॥ ४२ ॥ सोप्णीपेरुत्तमांगैश्वसांगदेवाहुभिस्तथा । उरुभिर्वाहुभिश्छिन्ने नारूपेर्विभूपणेः ॥४३॥ जीके भनुपने हजार २ पाप निकलने लगे; उन निकलते हुए वाणोंसे समस्त दिशायें भरगई ॥ ३८ ॥ राक्षसगण इस समय यह नहीं देख सके कि, कव श्रीरामचन्द्रजी भित और भयंकर गर ग्रहण करने रुप छोड़ते और कय धनुपको आकर्पण करते हैं परन्तु केवल उनके वाणोंसे महा व्यथित होने लगे ॥ ३९ ॥ श्रीरामचन्द्रजीके भागाने अन्धकार उत्पन्न होकर दियाएर महित आकाग मंडटको ढक लेता हुआ परन्तु श्रीरामचन्द्रजी यरावर शरधारा छोड़ते चले जाते थे ॥ ४० ॥ उस वाण गो भने २ गाम महा पापल हुए कोई : गिरे हुए कोई २ गिग्ने हुए निगाई देने थे मे सक्षोंगे पोण होगई । ५ . ॥ रणमिमा मन्त्रा शंदे व अनेक २ भांतिके गहने ॥ ४३॥ अध, हस्ती, रथ, चमर, व्यजन, छत्र, व नाना प्रकारको ध्वजाओंसे ॥४४॥ व शूल पटादि शत्रोंसे जोकि रामचन्द्रजी के बाणोंसे कट २ टूट गये थे यह पृथ्वी अवि भयंकर होगई ॥ १५॥ इस प्रकार बहुतसे राक्षसोंको मारे हुए व पृथ्वीमें पडे देख बचे बचाये राक्षसगणअतिशय कातर होकर गऑफ जीतने वाले श्रीरामचन्दजीके सम्मुख जानेकोसमर्थ नहीं हुए॥४६॥ इत्या श्रीमद्रा वाल्मी०आदि आरण्यकांडे भापाटीकायां पंचविंशः सर्गः॥२५॥ महाबाहु दूपणने अपनी मेनाको श्रीरामचन्द्रजीसे मारी हुई देख भयंकर वेपवाले आक्रमण करनेके अयोग्य ॥ १ ॥ पांच हजार राक्षसोंको जो कि समरसे लौटनाही नहीं चाहतेथे और महावेगवानथे उनको युद्ध करनेके लिये आज्ञा दी॥ २॥ वह सब राक्षस समरमें जाय शूल, पटा, खड्ग, और वृक्षादिक व वाणोंकी दयेश्वद्विपमुख्यश्वरथेर्भिन्नेरनेकशः ॥ चामरव्यजनेश्छ्वेर्बजेर्नानाविधैरपि ॥ ४० ॥ रामेणवाणाभिहतैर्विच्छिन्नेःशूलपदिशेः॥ विच्छिन्ने सम रंभृमिर्विस्तीर्णाभूद्भयंकरा ॥४६॥ तान्दृष्ट्वानिहतान्सर्वेराक्षसाःपरमातुराः ॥ नतत्रचलितुंशक्तारामंपरपुरंजयम् ॥४६॥ इत्या श्रीमद्रा० वा. आ• अर० पंचविंशःसर्गः॥२५॥ द्पणस्तुस्वकसैन्यहन्यमानं विलोक्यच ॥ संदिदेशमहावाहुर्भीमवेगान्दुरासदान् ॥ राक्षसान्पंचसाह यान्समरेप्पनिवर्तिनः ॥ १ ॥ तेशूले पहिशःखड्ने शिलावर्पद्रुमेरपि ॥२॥ शरवरविच्छिनववर्पस्तंसमंततः॥ तद्माणांशिलानांचवपंप्राण हरंमहत् ॥३॥ प्रतिजग्राहधर्मात्माराघवस्तीक्ष्णसायकैः ॥ प्रतिगृह्यचतद्रपंनिमीलितइवर्पभः ॥ ४ ॥रामक्रोधंपरलेभेवधार्थसर्वरक्षसाम् ॥ ततःकोषसमाविष्टःप्रदीप्त इवतेजसा ॥ ५॥ शरेरभ्यकिरत्सैन्यंसर्वतःसहदूपणम् ॥ ततःसेनापति कुद्धोदूपण-शत्रुदूपणः ॥६॥ शरेरशनिकल्प स्तंराघवंसमवारयत् ।। ततोरामःसुसंक्रुद्धःक्षुरेणास्यमहदनुः ॥ ७॥ चिच्छेदसमरेवीरश्चतुर्भिश्चतुरोहयान् ॥ हत्वाचाश्वाशरस्तीक्ष्णेरर्धचंद्रे णसारथः ॥ ८॥ शिरोजहारतदक्षत्रिभिर्विव्याधवक्षसि ॥ सच्छिन्नधन्वाविरथोहताथोहतसारथिः॥ ९॥ पां टगागार श्रीरामचन्द्रजीके ऊपर करने लगे, वह वृक्ष और पर्वतोंकी वर्षा प्राणों की हरण करनेवाली थी॥३॥ धर्मात्मा श्रीरामचंद्रजीने अपने तीखे वार्णोपरही उग पाका ग्रहण किया और उसे ग्रहण करके नेत्र बंद कर लिये ॥ ४ ॥ फिर बडा कोप किया और सब राक्षसोंके संहार करनेका संकल्प किया उस समय पोप और नेजमे प्रकाशमान होतेहुए श्रीरामचंदजीने ॥ ५ ॥ दूपण सहित सेनाके ऊपर वाणोंकी वर्षा की। फिर शत्रुदूपण सेनापति दूपण कोधित होकर ॥ ६ ॥ पत्रकी ममान पाणोंमे श्रीरामचन्द्रजीको निवारण करने लगा। तब श्रीरामचंद्रजीने महामोधकर छुरके समान तेज बाणोंसे दूपणका धनुप ॥ ७ ॥ काटकर चार राणोंमे उनके रथमें जो पोडे नये उनको मारहाला । अखौंको तीक्ष्णवाणोंसे वधकर अर्द्धचंद्र पाणसे उसके सारथीका ॥ ८॥ शिर काटडाला । और तीन आरक त०२ याण राक्षस सरकी छातीमें मारे । तब दूपणका धनुपभी टूटा रथभी चूर्ण हुआ और घोडे व सारथीभी उसके मारे गये ॥ ९ ॥ तब उसने जिसके देसनेसे संनाटे हों; रुपं खडे हो जाएँ ऐसा पहाडके शृंग समान एक परिध ग्रहण किया वह सुवर्णके बन्धोंसे बँधा देवताओंकी सेनाको मर्दन करनेवाला ॥ १० ॥ लोहेकी कीलोंसे जड़ा शत्रुओंकी चरवी जिसमें लगी हुई वजके समान कठोर व शत्रुपुरके द्वारका विदारण करनेवाला ॥ ११ ॥ ऐसे महासर्पके समान उन परियको टे संग्राममें क्रूरकर्मकारी दूपण राक्षस श्रीरामचंद्रजीकी ओर धाया ॥ १२॥ श्रीरामचंदजीने उस दौडे आतेहुए दूपणके भूपणसहित दोनों कर काटडाले ॥ ३ ॥ हार्थोके कटं जानेपर उसका वह बृहदाकार परिघ स्थाननष्ट होकर इन्द्रध्वजाको समान समरमें गिरा ॥ १४ ॥ हाथ कटजानेसे मुँहके वल दूपणभी इसभांति पृथ्वीम जग्राहगिरिशृंगाभंपरिघंलोमहर्पणम् ॥ वेष्टितंकांचने पट्टेदेवसैन्याभिमर्दनम् ॥ १० ॥ आयसेःशंकुभिस्तीक्ष्ण कीर्णपखसोक्षितम् ॥ वनाश निसमस्पर्शपरगोपुरदारणम् ॥ ११ ॥ तंमहोरगसंकाशंप्रगृह्यपरिचरणे ॥ दूपणोभ्यपतद्रामंककर्मानिशाचरः ॥ १२ ॥ तस्याभिपतमानस्य दूपणस्यचराघवः ॥ द्वाभ्यांशराभ्यांचिच्छेदसहस्ताभरणीभुजी ॥१३॥ भ्रष्टस्तस्यमहाकायःपपातरणमूर्धनि ॥ परिघश्छिन्नहस्तस्यशक्रध्वज इवाग्रतः ॥ १४ ॥ कराभ्यांचविकीर्णाभ्यांपपातभुविदूपणः ॥ विपाणाभ्यांविशीर्णाभ्यांमनस्वीवमहागजः ॥ १५॥ दृष्ट्वातंपतितंभूमौदूपणं निहतंरणे ॥ साधुसाध्वितिकाकुत्स्थंसर्वभूतान्यपूजयन् ॥ १६ ॥ एतस्मिन्नंतरेकुद्धात्रयःसेनाग्रयायिनः ॥ संहत्याभ्यद्रवन्नाममृत्युपा शावपार्शिताः॥१७॥ महाकपालःस्थूलाक्षःप्रमाथीचमहाबलः॥ महाकपालोविपुलंशुलमुद्यम्यराक्षसः॥१८॥ स्थूलासम्पटिशंगृह्यप्रमाथीवपरथ धम् ॥ दृष्ट्वैवापततस्तांस्तुराघवःसायकैःशितैः ॥ १९॥ तीक्ष्णाग्रे प्रतिजग्राहसंप्राप्तानतिथीनिव ।। महाकपालस्यशिरश्चिच्छेदरघुनंदनः॥२०॥ गिरा जैसे दांत टूट जानेपर महामनस्वी गजराज पृथ्वीमें गिरताहै ॥ १५॥ दूपणको संग्राममें मराहुआ और पृथ्वीमें पडाहुआ देखकर सपही प्राणी साधु २ कहकर श्रीरामचंद्रजीकी प्रशंसा करनेलगे ॥ १६ ॥ इसीसमय उस खरके तीन सेनापति जो निशाचर सेनाके आगेही चलेथे परस्पर मिलकर मृत्युकी फाँसीसे बँधकर क्रोधमें भरकर श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख धाये ॥ १७ ॥ इन तीनोंके नाम महाकपाल, स्थूलाक्ष और , महापठयान् प्रमाथी थे, इनमें महाकपाल विशाल शूल, उठाय ॥ १८ ॥ स्थूलाक्ष पटा लेकर, व प्रमाथी फरशा ग्रहण करके श्रीरामचन्द्रजीकी ओर चले, इन तीनों अपने ऊपर आयाहुआ देख श्रीगमचन्द्रजीने तीक्ष्णवाणोंगे ॥ १९ ॥ दनकी अगवानी की जैगे पगुष्प भापर ये गा गोफ - गगानी पनि मागे 1%EKHANAL nan५. मामाला नी सुनंदननीने गिर ही उडादिरा ॥ २० ॥ व अगणित वाणांसे प्रमाथीका माथा, और स्थूलाक्षको मोटी आखाको पूरण कराया ॥ २१ ॥ यह नीना करे हुये शोंकी नाई पनी गिर पडे । इसके पीछे पांचहजार जो दूपणके अनुयायी राक्षसथे उन सबको अति कोधकर एक क्षणभरमें ॥ ॥ २१॥ महार र उन माकी श्रीदगरपसारने यमपुरको पठादिया, तब दृषण व उसके अनुगामी सैन्यको मारा गयाहुआ सुन ॥ २३ ॥ सरने कोधित होकर महालात और मरे मेनानियों को इस प्रकारमे आबादी कि, सेनापति लोगो ! दूपण तौअपने अनुगामियों समेत मारागया ॥ २४॥ बस अब तुम सब राक्षस पानी भाग मेनाकी माय टेकर विविध आकारके अम शन छोडकर मनुष्याधम रामचन्द्रको मारडालो ॥ २५॥ सर सेनापतियोंसे इस प्रकार कहकर अमोस्तुपाणीपःप्रममाथप्रमाथिनम् ॥ स्यूलासस्याक्षिणीस्यूलेपूरयामाससायकैः ॥ २१ ॥ सपपातहतोभूमीविटपीवमहाद्रुमः ॥ दूपण म्यानुगान्पंचमाहवान्कुपितःक्षणात् ॥ २२॥ हत्वातुपंचसाहरनयद्यमसादनम् ॥ दूपर्णनिहतं श्रुत्वातस्यचेवपदानुगान् ॥ २३ ॥ व्यादिदे भाषा:कुदामेनाध्यक्षान्महावलान् ॥ अयंविनिहतःसंख्यदूपणःसपदानुगः ॥ २४ ॥ महत्यासेनयासायुद्धारामकुमानुपम् ॥ शस्त्रेर्नानावि शाकानध्यमांगठमाः ॥ २५ ॥ एवमुक्त्वाखर क्रुद्दोराममेवाभिदुद्रुवे ।। श्येनगामीपृथुग्रीवोयज्ञशत्रुर्विहंगमः ॥ २६ ॥ दुर्जयःकरवीराक्षः परूपःकालकार्मुकः ॥ हेममालीमहामालीसर्पास्योरुधिराशनः ॥ २७ ॥ द्वादशैतेमहावीर्यावलाध्यक्षाःससैनिकाः ।। राममेवाभ्यधावंतविस अनःगतमान् ॥२८॥ ततःपायकसंकाशेहेमपविभूपितेः ॥ जघानशेपंतेजस्वीतस्यसैन्यस्यसायकैः ॥ २९ ॥ तेरुक्मपुंखाविशिखाःसधूमा सपाकाः ॥ निजप्नुस्तानिरक्षा सिवब्राइवमहाद्रुमान् ॥३०॥ रक्षसांतुशतंराम-शतेनेकेनकर्णिना ॥ सहस्रंतुसहस्रेणजघानरणमूर्धनि॥३१॥ नभिनार्माभरणाशिवभिन्नशगसनाः ।। निपेतुःशोणितादिग्धाधरण्यारजनीचराः ॥ ३२॥ में भा आपसी श्रीगमरनजीके ममग दौडा। सेनगामी, पृथुपीव, यज्ञशत्रु, विहङ्गम ।। २६ ॥ दुर्जय, परवीराक्ष, परुप, कालकार्मुक, हेममाली, सप्पास्य, महामाली, गिगा ॥ २७ ॥ यह पारद, महावीर मेनापनि आनी मेनाफे माथ श्रेष्ठ बाण वर्षातेहुए श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख धाये ॥ २८ ॥ इन सब राक्षसोंको तेजस्वी धोगपपणजीने अपने ऊपर आगहुआ देगार हेमवनविभूषित अपितुल्य माणोंसे सरकी इस बची बचाई सेनापर प्रहार करना आरंभकिया ॥ २९ ॥ वज्रपडनेसे निमकार को २ क्ष गिर जाते हैं, मेही भीरामचन्दजीक सुपर्ण परापाले सघूम अनिके समान बाणीसे राक्षसोका संहार होनेलगा ॥ ३० ॥ श्रीरामचन्द्रजीने एका पाण पर एकगा सक्षमीका महारकिया, व हजार पाण चलाकर हजार राक्षसोंका प्राण ठेलिया ॥ ३१ ॥ राक्षसगण रुधिरमें सनेहुए पृथ्वीमें गिरे 61 ******** पा.रा.भा. उनके कवच भूषण और धनुप छिन्नभिन्न और विदीर्ण होगये ॥ ३२ ॥ यज्ञकी वेदीपर जिसप्रकार कुश बिछे होतेहैं वैसेही संयामकी समस्त पृथ्वी रुधिरने सरा: : अर० पाल खुले हुए राक्षसोंसे व्याप्त होरही थी ॥ ३३ ॥ सब राक्षसोंके मारेजानेसे वनभूमि उनके मांस व रुधिरकी कीचसे ढककर क्षणभरही महाभयंकर नरका: म०२ ॥४१॥ समान होगई ॥ ३४ ॥ मनुष्यशरीरधारी रामचन्द्रने इकलेही विना रथपर चढे चौदह हजार भयंकर कर्म करनेवाले राक्षसोंको मारडाला ॥ ३५॥ सब नेना : पीचमें महारथी खर, त्रिशिरा और शत्रुओंके हनन करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी केवल यह तीनजन शेपरहे ॥ ३६ ॥ बचे बचाये राक्षस सपही लक्ष्मणजीके बडेभः श्रीरामचन्द्रजीसे मारेगये, यह समस्त राक्षस अतिशय बलवान्, भयंकर, व बढे दुःखसे सहनेके योग्यथे॥ ३७ ॥ इसप्रकार महासंग्राममें समस्त भयंकर बलवान तैर्मुक्तकेशै समरेपतितैःशोणितोशितैः ॥ विस्तीर्णावसुधाकृत्स्नामहावेदिःकुशेरिव ॥ ३३ ॥ तत्क्षणेतुमहाघोरंवनंनिहतराक्षसम् ॥ बभूवनिरप प्रख्यंमांसशोणितकर्दमम् ॥ ३४ ॥ चतुर्दशसहस्राणिरक्षसांभीमकर्मणाम् ॥ हतान्येकेनरामेणमानुपेणपदातिना॥ ५॥ तस्यसैन्यस्यसन स्यखरःशेपोमहारथः ॥ राक्षसस्त्रिशिराश्चैवरामश्चरिपुसूदनः ॥ ३६॥ शेपाहतामहावीर्या राक्षसारणमूर्धनि ॥ घोराद्धविपहा सर्वेलक्ष्मणस्यः ग्रजेनते ॥ ३७॥ ततस्तुतद्भीमबलमहाहवेसमीक्ष्यधर्मणहतंबलीयसा ॥ रथेनराममहताखरस्ततःसमाससादेन्द्रइवोद्यताशनिः ॥३८॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे पड़िशःसर्गः ॥२६॥ खरंतुरामाभिमुखंप्रयांतवाहिनीपतिः ॥ राक्षसत्रिशिरानामसति पत्येदमंत्रवीत् ॥ १॥ मांनियोजयविक्रांतत्वंनिवर्तस्वसाहसात् ॥ पश्यराममहावाहुँसंयुगेविनिपातितम् ॥२॥ प्रतिजानामितेसत्यमायुधंचा. मालभे॥ यथारामंवधिष्यामिवधाहसर्वरक्षसांम् ॥ ३॥ अहंवास्यरणेमृत्युरेपवासमरेमम ॥ विनिवर्त्यरणोत्साहंमुहूर्तप्राश्निकोभव ॥ ४ ॥ राक्षसोंको श्रीरामचन्द्रजीसे मराहुआ देखकर खर बडे भारी स्थपर सवार होकर बज उठाये हुये इन्द्रके समान रामचन्द्रजीके मारनेको चला ॥ ३८ ॥ इत्या श्रीमद्रा० वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां पड्विंशः सर्गः ॥२६॥ इसके पीछे.सर जब श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुस धाया, तब सेनापति त्रिमित राक्षस उसके समीप आकर कहने लगा ॥ १ ॥ मैं विक्रमवान हूं आप यह साहस त्याग करके मुझको रामचन्द्रको मार डालने के लिये नियत करके समरमें महाम: रामचन्द्रको मुझकरके माराहुआही देखिये ॥ २ ॥ में आपके समीप हथियार छूकर सत्यही प्रतिज्ञा करताहूं कि, समस्त राक्षसों के मारने योग्य रामचन्द्रको म -- निणयही मार दारंगा ॥ ३॥ या तो मंग्राममंही मगंगा, अथवा इन रामकोही मार वादंगा भाप क्षणके लिये गण उरगानको छोफर को ॥४१ . देसने रहिये ॥ ४॥ राम मारे जायेंगे तो आप आनन्दित चित्तसे जनस्थानको चले जाइये, और जो मेरा संहार हाव ता आप स्वयहा युद्ध कर सम्मुख होना ॥ ५ ॥ त्रिशिरा मृत्युके लोभसे इसप्रकार सरको प्रसन्न करके युद्ध करनेके लिये उसकी आज्ञा लेकर श्रीरामचन्द्रजीके सामने दौडा ॥६॥ तीन, वाले पर्वतकी समान वह तीन शिरवाला राक्षस देदीप्यमान घोडे जुते हुए रथमें चढकर श्रीरामचन्द्रजीके सम्मुख धाया ॥७॥ और महागेप जिस प्रकार जलधारावर्षात हुआ हो वैमेही घाण वांता जलके भीगे नगाडेकी समान शब्द करने लगा ॥८॥ रघुनंदन श्रीरामचन्द्रजीने त्रिशिरा राक्षसको अपने सम्मुख आते देखकर धनुप उठान गन्दकर तीखेयाण चाय ॥ ९ ॥ त्रिशिराके मारे, उस समय अतिबलवान सिंह और हाथीफे समान श्रीरामचन्द्रजी और त्रिशिराका तुमुल संयाम आरंभ हुअ प्रश्ष्टोपाहतेरामेजनस्थानप्रयास्यसि ॥ मयिवानिहतेरामसंयुगायप्रयास्यसि ।। ५ ।। खरनिशिरसातेनमृत्युलोभात्प्रसादितः ॥ गच्छयुद्धये त्यनुज्ञातोराघवाभिमुखोययो॥ ६॥ त्रिशिरास्तुरथेनेववाजियुक्तेनभास्वता ॥ अभ्यद्रवद्र्णेरामंत्रिशृंगइवपर्वतः ॥ ७॥ शरधारासमूहान्सम हामेघइयोत्सृजन् ॥ व्यसृजत्सदृशंनादंजलाईस्येवदुंदुभेः॥८॥आगच्छंतंत्रिशिरसंराक्षसंप्रेक्ष्यराघवः ॥ धनुपाप्रतिजग्राहविधुन्वन्सायकाशि तान् ॥ ९॥ ससंप्रहारस्तुमुलोरामत्रिशिरसोस्तदा ॥ संबभूवातिवलिनो सिंहकुंजरयोरिव ।। ३० ॥ ततत्रिशिरसावाणेर्ललाटेताडितत्रिभिः॥ अमपींकुपितोरामःसंरब्धइदमत्रवीत् ॥ ११ ॥ अहोविक्रमशूरस्यराक्षसस्येदृशंवलम् ।। पुप्पेरिवशहिललाटेऽस्मिपरिक्षतः ॥ १२ ॥ ममा पिप्रतिगृह्णीप्वशरांश्चापगुणाच्युतान् ॥ एवमुक्तस्तुसंरब्धःशरानाशीविपोपमान् ॥ १३ ॥ त्रिशिरोवक्षसिकुद्दोनिजघानचतुर्दश ॥ चतुर्भिस्तु रगानस्यशरःसन्नतपर्वभिः ॥ १४ ॥ न्यपातयततेजस्वीचतुरस्तस्यवाजिनः ॥ अष्टभिःसायकैःसूतंरथोपस्थेन्यपातयत् ॥ १५॥ जिमके देसनेमे रोम खडे होजातेथे ॥ १०॥ अनन्तर क्रोध न करनेवाले श्रीरामचन्द्रजी त्रिशिरा करके तीन वाणोंके द्वारा ताडित होकर जो उनके माथेमें लगे उनके लगनेमे रोपयुक्तहो गर्वित वचन कहने लगे ॥ ११ ॥ कि, अरे! विक्रमशूर निशाचर ! बस तेरा इतनाही बल है कि, तेरे चलाये हुए बहुत सारे वाण हम - माथेमें फूलोंकी ममान लगे मानो हमारी परीक्षा ली, हम वो जानते थे कि, तुममें कुछ विक्रम होगा, सो कुछभी नहीं ॥ १२॥ क्या आचर्यहै ! अब तू हम. अनुपके रोदेमे छुटे हुए वाणों के समूहको ग्रहण कर । यह कह बढा क्रोधकर विपधर सपोंकी समान ॥ १३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने चौदह वाण त्रिशिरा हृदयमें मारे और चार घोडोंको सन्नतपर्व वाणोंसे ॥ १४ ॥ महातेजवान श्रीरामचन्द्रजीने मार डाला और आठ वाणोंसे रथपरही उसके सारथीको म. . ।
-1 वा.रा.भा. आर० ॥४२॥ स०२ : .. गिराया ॥ १५ ॥ व एक बाणसे अति ऊँची उसकी ध्वजाको काटडाला जब सारथी और घोडे उसके मारे गये तब त्रिशिरा रथसे कूदनेको हुआ ॥ १६ वो उसी बीचमें महापराक्रमी श्रीरामचन्द्रजीने क्रोधसे अनेक बाण उसके हृदयमें मारे जिनके लगनेसे वह फिर शस्त्र ग्रहण करनेको समर्थ नहीं हुआ ॥ १४ फिर अप्रमेयात्मा श्रीरामचन्द्रजीने क्रोधमें भरकर वेगवान् तीन बाणोंकी सहायतासे उसके तीनों शिर काट डाले, तिसके पीछे धुर्वेके समान रुधिर गिर श्रीरामचंद्रजीके बाणोंसे पीडित त्रिशिरा ॥ १८ ॥ समरमें गिरा, जिसके शिर पहलेही गिर गयेथे । त्रिशिराके मारे जानेके पीछे शेप राक्षस भागकर खन शरणमें गये ॥ १९ ॥ और वहांभी खडेनहोकर सिंह करके भय पाये हुए मृगयूथकी समान भागेही चले गये तिनको भागे हुए देख खर रोपमें भर तिनको लौ : रामश्चिच्छेदवाणेनध्वजंचास्यसमुच्छ्रितम् ॥ ततोहतरथात्तस्मादुत्पतंतंनिशाचरम् ॥ १६॥ चिच्छेदरामस्तवाणर्हदयेसोऽभवजडः ॥ साः केश्वाप्रमेयात्मासामपत्तिस्यरक्षसः ॥ १७ ॥ शिरांस्यपातयत्रीणिवेगवद्भिस्त्रिभिःशरैः ॥ सधूमशोणितोद्वारीरामबाणाभिपीडितः ॥ १८॥ न्यपतत्पतितैःपूर्वसमरस्थोनिशाचरः॥ हतशेपास्ततोभनाराक्षसाःखरसंश्रयाः ॥ १९ ॥ द्रवंतिस्मनतिष्टंतिव्याधनस्तामृगाइव ॥ तान्खरः द्रवतोदृष्ट्वानिवर्त्यरुपितस्त्वरन् ॥ राममेवाभिदुद्रावराहुश्चंद्रमसंयथा ॥२०॥ इत्या श्रीमद्रा० वा. आ० अरण्यकांडे सप्तविंशःसर्गः ॥२७, निहतंदूपणंदृष्ट्वारणेत्रिशिरसासह ॥ खरस्याप्यभवत्रासोदृष्ट्वारामस्यविक्रमम् ॥१॥ सदृष्ट्वाराक्षसंसैन्यमविपर्दामहावलम् ॥ हतमेकेनरामेणदूपणः त्रिशिराअपि ॥२॥ तद्वलंहतभूयिष्ठंविमनाःप्रेक्ष्यराक्षसः ॥ आससाखरोरामनमुचिर्वासवंयथा॥३॥विकृप्यवलवच्चापनाराचानक्तभोजनान् । खरश्चिशेपरामायनुदानाशीविपानिव ॥ ४ ॥ ज्यांविधुन्वन्सुबहुशःशिक्षयात्राणिदर्शयन् ॥ चचारसमरेमार्गान्शरेरथगत-खरः ॥५॥ शीघ्रतासे श्रीरामचन्द्रजीकी ओर दौडा जैसे राहु चंद्रमाकी ओर दौडताहै ।। २० ॥ इत्या श्रीमद्रा० वा० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकायां सनविंशः सर्गः॥२७ दुषण और त्रिशिरा राक्षसको मरा हुआ देख संग्राममें श्रीरामचंद्रजीकी शूरता निहार सरके मनमेंभी भयका संचार हुआ ॥ १ ॥ सर विचार करने लगा कि और त्रिशिराको, सहनेके अयोग्य पराक्रमवान् महाबलवान राक्षसी सेनाके सहित अकेले रामचंद्रने संग्राममें मारडाला ॥ २ ॥ ऐसा विचार करता हुआ यह रा खर उदास होकर श्रीरामचंद्रजीके ऊपर दौडा, जैसे नमुचि दैत्य इन्द्रके ऊपर धाया था ॥ ३ ॥ और पडे जोरसे धनुप संचकर श्रीरामचंद्रजीके ऊपर क्रोधित सर्पक मपान रुधिर पान करनेवाले बाण छोटे ॥ ४ ॥ फिर यह प्रत्यंचाको पारंयार टंकार देना, अपनी शिक्षा और अमोफो दिग्पासाभा अनेक भोलिफे माण ॥ ४२ धरने मंग्रामभूमिन रयार यूमनेटगा ॥ ५॥ और सत्र दिशा वादगाआका उस महारया सरल दंग बरा भाग पा हायमें लिया ॥ ६ ॥ व अनिके अंगारोंकी समान सहन करनेके अयोग्य सायक समूहले आकाशको पूर्ण कर दिया जैसे मेघमंडल वृष्टि म ॥ ७ ॥ आकाग गर और श्रीरामचंद्रजीने छूटे हुए बाणोंमे छाकर सब प्रकारसे अवकारारहित होगया अर्थात् पृथ्वी आकाराके बीच २ में सवही जगह गावटी वान भरेय ॥ ८॥ नत्र परसर एक दूसरेकी मार डाटनेकी इच्छामे छोडे हुए वाणोंके जाल करके आकाराके छा जा से सूर्य भगवान्भी छिप गये ॥ ९ ॥ इसंगी महान महागन निम प्रकार अंकुग मारताहै वही सर तीसे नालीक नाराच और विकीर्ण अम्र शनोंसे श्रीरामचन्द्रजीको घायल करने लगा टम ममर मरही पाणी, ग्य, बेटे धनुषगरी सरको राक्षम पागधारी यमराजकी समान देखने लगे ॥ १३ ॥ उस काल खरने अपनी समस्त सेनाके विनारा मम प्रदिशोवाण-प्रदिशश्रमहारथःगापूरयामासतंदृष्ट्वारामोपिसुमहदनुः॥६॥ससायकैर्दुर्विपहेर्विस्फुलिंगरिखाग्निभिः॥ नभश्चकाराविवरंपर्जन्य दाशिभिः॥तिभूवशिर्वाणे खरगमविसर्जितेः॥पर्याकाशमनाकाशंसर्वतःशरसंकुलम्।।८॥ शरजालावृतःसूर्योनतदास्मप्रकाशते॥अन्यो न्यायमरंभानुभयोःमंप्रयुध्यतोः॥९॥ ततोनालीकनाराचैस्तीणाग्रेश्वविकर्णिभिः॥ आजवानरणेरामतोरिखमहाद्विपम्॥१०॥ तरथस्थंधनुप्पा गिंगामपस्थितम् ।। ददृशुःसर्वभूतानिपाशहस्तमिवांतकम् ॥ ११॥ हतारंसर्वसैन्यस्यपौरुपेपर्यवस्थितम् । परिश्रांतमहासत्त्वमेनेरामखरस्त दा॥१२॥ नमिडमियविक्रांत सिंह विक्रांतगामिनम्।।दृष्टानोदिजतेगमःसिंहःक्षुद्रमृगंयथा॥१३॥ ततःसूर्यनिकाशेनरथेनमहताखरः।। आससादा पांगमपतंगठ्यपारकम् ॥3॥ ततोस्यमशरंचापंमुष्टिदेशेमहात्मनः॥ खरश्चिच्छेदरामस्यदर्शयन्हस्तलाववम्॥१॥सपुनस्त्वपरान्सप्तशराना दायममणि ।। निजधानग्णेकुद्धाशकाशनिसमप्रभान् ॥ १६॥ ततःशरसहस्रेणराममप्रतिमौजसम् ।। अर्दयित्वामहानार्दननादसमरेखरः॥ १७॥ कसंगले पुरपार्थमें टिके हुए धैर्यवान महारली रामनवजीको रण करनेसे थके समझा ॥ १२ ॥ और सिंहकी समान विक्रम दिखाता हुआ सिंहकी पान र उपर पूमने लगा । मिह जिस प्रकार मृगो छानाको देखकर नहीं डरता पैसेही श्रीरामचन्द्रजी सरको देख कुछभी नहीं घबडाये ॥ १३ ॥ अनागर गर गर्व गमान पुनिगाली पहारथार नाकर श्रीरामचन्द्रजीके निकट पहुँचा, जिस प्रकार आगके धोरे पतंग पहुँचतेहैं ॥ १४ ॥ तिसके पीछे महात्मा भागमतीको गाने माने हापोंकी फुरती दिसाई और रामचन्द्रजीका वाण चदाहुआ धनुप मुट्ठीके थोरेसे काटडाला ॥ १५ ॥ फिर क्रोधमें भरकर इन्द्रके यो गुल्य प्रतापगाची लीग मान पाण पहण करके श्रीरामचन्दजीके मर्मस्थानमें मारे ॥ १६ ॥ और फिर सैकडों हजारों वाणोंसे श्रीरामचन्द्रजीको पीडितकर पा.र. आर० फीडा) खाकर मर जातीहै ॥ ५॥रेराक्षस ! दंडकारण्यवासी धर्माचरण करनेवाले महातेजवान् तपस्वियोंको मारकर तुझको कैसा बुरा फल प्रानहोगा सो नहीं जान । । ॥ ६ ॥ अथवा जो कूरस्वभाववाले जन चिरकाल पापकर्म करके लोकोंसे निन्दा पानेके पात्र हो जाते हैं, वह जन ऐश्वर्य पाकरभी जड गले हुए वृक्षके समान व: दिनोंतक नहीं रहसक्ने अर्थात् गिर पडते हैं ॥ ७ ॥ वृक्ष जिस प्रकार समय पाय कर फूलता है; वैसेही समयके आजाने पर पाप कर्मका भयावना फल निश्चयही प्रान होताहै ॥ ८ ॥ हे निशाचर ! जिस प्रकार विप मिला हुआ अन्न खानेसे शीघही मृत्यु होतीहै, वैसेही पाप कर्म करनेका फल थोडेही समयमें फलजाता है ॥ ९ ॥ रे राक्षस ! भयानक पाप कर्म करनेवाले और लोकोंका बुरा चाहनेवाले दुर्दोको वार्णोसे मारनेकेही लिये कपिलोगोंने मुझे राजाकर यहां पठायाहै ॥ १० ॥ मां वसतोदंडकारण्येतापसान्धर्मचारिणः ॥ किंनुहत्वामहाभागान्फलंपाप्स्यसिराक्षस ॥६॥ नचिरंपापकर्माण क्रूरालोकजुगुप्सिताः॥ ऐश्वर्यप्राप्य तिष्ठंतिशीर्णमूलाइवद्रुमाः ॥७॥ अवश्यंलभतेकर्ताफलंपापस्यकर्मणः॥ घोरंपर्यागतेकालेद्रुमःपुष्पमिवार्तवम् ॥८॥ नचिरात्प्राप्यतेलोकेपापा नांकर्मणांफलम् ॥ सविषाणामिवानानांभुक्तानांक्षणदाचर॥९॥ पापमाचरतांघोरंलोकस्याप्रियमिच्छताम् ॥अहमासादितोराज्ञाप्राणान्हंतुनि शाचर ॥ १०॥ अद्यभित्त्वामयामुक्ताःशराःकांचनभूपणाः॥ विदार्यापिपतिप्यंतिवल्मीकमिवपन्नगाः॥११॥ येत्वयादंडकारण्येभक्षिताधर्मचा रिणः ॥ तानद्यनिहतःसंख्येससैन्योनुगमिष्यसि ॥१२॥ अद्यत्वां निहतंबाणे पश्यतुपरमर्पयः॥ निरयस्थंविमानस्थायेत्वयानिहताःपुरा॥१३॥ प्रहरस्वयथाकामकुरुयत्नंकुलाधम ॥ अद्यतेपातयिष्यामिशिरस्तालफलंयथा ॥ १४॥ एवमुक्तस्तुरामेणकुद्धःसंरक्तलोचनः॥ प्रत्युवाचततोरामं प्रहसन्कोधमूच्छितः ॥ १५ ॥ प्राकृताम्राक्षसान्हत्वायुद्धेदशरथात्मज ॥ आत्मनाकथमात्मानमप्रशंस्यप्रशंससि ॥ १६ ॥ जिसमकार बमईको फोडकर पृथ्वीपर निकल आताहै, वैसेही इस समय हमारे शरासनसे छूटेहुए वाण तेरे शरीरको चीर फाडकर निकल आयेंगे॥११॥ पहले। जिन २ दंडकारण्यवासी धर्मचारी तपस्वीजनोंको भक्षण कियाहै सो तू आज हमसे युद्धमें माराजाकर सेना सहित उनके पीछे २ जायगा ॥ १२॥ पहले जो समस्त तापा तुझ करके मारे गये हैं, आज वह विमानमें बैठकर तुझको हमारे बाणसे मरा और नरकमें जाता हुआ देखें ॥ १३ ॥ रे नीच कुलमें उत्पन्न हुए !तु भली भाँतिसे यल करके हमारे ऊपर प्रहार कर, किन्तु आज हम निथयही तालफलके ममान तेरा शिर काटकर गिगदेंगे ॥ १४॥ जय श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहा नम फ्रोमो वश छोर परफे दोनों नेत्र लाल दोआये और कोरके मारे, ज्ञाम गोि गर भने २ समग्म माधारण राक्षमोकोमार वास्तवमें प्रशंसित न होनेपरभी तुम आपही किस प्रकारसे अपनी प्रशंसा करतेहो ॥ १६ ॥ बलवान् पराक्रमशाली नरगण नेजके | मारे गर्वित होकर किसी समयभी अपनी प्रशंसा नहीं किया करते ॥ १७ ॥ जिनका चित्त शुद्ध नहींहै, ओछा स्वभावहै ऐसे क्षत्रियोंमें अधम लोगही तुम्हारी समान निरर्थक गर्व प्रगट किया करते हैं ॥ १०॥ मृत्युसमयके निकट आजानेपर कौन वीर अपने वंशका परिचय देकर प्रशंसाके अयोग्य विषयमें अपनी प्रशंसा करता है। १९ ॥ जिम प्रकार आग अपने वापसे सुवर्णकी समान पीतलकी अधमताई प्रगट करतीहै वैमेही तुमने जो अपनी प्रशंसा की इस्से तुम्हारा ओछापनही प्रगट हुआ ॥ २० ॥ तुम क्या गदा धारण किये हुए समरमें टिके देखकर विविध धातुओं के आकार धगधर पर्वतकी समान हमको अकम्पनीय नहीं समझतेहो ? ॥ २१ ॥ हम विक्रांतावलवंतोवायेभवंतिनरर्षभाः॥ कथयतिनतेकिंचित्तेजसाचातिगर्विताः॥ १७॥ प्राकृतास्त्वकृतात्मानोलोकेक्षत्रियपासनाः ॥ निरर्थकवि कत्यंतेतथारामविकत्थसे ॥ १८ ॥ कुलंब्यपदिशन्वीर समरेकोभिधास्यति । मृत्युकालेतुसंप्राप्तेस्वयमप्रस्तुवेस्तवम् ॥१९॥ सर्वथातुलघुत्ते कत्यनेनविदर्शितम् ॥ सुवर्णप्रतिरूपेणतप्तेनेवकुशाग्निना ॥ २० ॥ नतुमामिहतिष्टंतपश्यसित्वंगदाधरम् ॥ धराधरमिवाकप्यपर्वतधातुभिश्चि तम् ॥ २१ ॥ पर्याप्तोहंगदापाणिहंतुंप्राणान्रणेतव ॥ त्रयाणामपिलोकानांपाशहस्तइवांतकः ॥२२॥ कामवह्वपिवक्तव्यं त्वयिवक्ष्यामिनत्वहम् ॥ अस्तंप्राप्नोतिसवितायुद्धविनस्ततोभवेत् ॥ २३ ॥ चतुर्दशसहस्राणिराक्षसानांहतानिते ॥ त्वद्विनाशात्करोम्यद्यतेपामथुप्रमार्जनम् ॥ २४ ॥ इत्युक्त्वापरमाद्धःसगदांपरमांगदाम् ॥ खरश्चिक्षेपरामायप्रदीप्तामशनियथा ॥२५॥ खरवाहुप्रमुक्तासाप्रदीप्तामहतीगदा ॥ भस्म वृक्षांश्चगुल्मांश्च कृत्वागात्तत्समीपतः ॥ २६ ॥ तामापतींमहतींमृत्युपाशोपमांगदाम् ॥ अंतरिक्षगतारामश्चिच्छेदबहुधाशरैः ॥ २७ ॥ लीलामेही गदा हाथमें लेकर समरमें पाशधारी यमराजकी समान तुम्हाराही नहीं वरन् त्रिलोकीके सपही प्राणियोंका संहार कर सकतेहैं ।। २२ ॥ हमको तुमसे औरभी कुछ कहनाथा, परन्तु उमको अब कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि सूर्य अस्त होनेपर आगये हैं सो विशेषदेर लगानेसे युद्धमें विन हो जायगा ॥ २३ ॥ तुमने जो १४०. चौदह हजार राक्षस मार डा. सो अव तुझको मारकर उनकी स्त्री पुत्रादिकोंके आंसू पोछेगे ॥ २४ ॥ यह कहकर खरने महाक्रोधितहो अतिश्रेष्ठ सुवर्णके बंद भी हुई गदा जो उसके हाथमें थी वह देदीप्यमान इन्द्र के वजकी समान उसने रामचन्द्रजीके ऊपर चलाई ॥ २५ ॥ यह प्रज्वलित बडी गदा उसकी भुजामे छुट कर अगल बगल के वृक्षटवादिकोंकोजलातीहुई श्रीरामचन्द्रजीके समीप आनेलगी ॥ २६ ॥ वय श्रीरामचन्द्रजीने वाण जाल चलाकर साक्षात मृत्युके फंदकी समान ००० या... आर ॥४५॥ ० निकट आती हुई, उस वडी गदाके आकाशमेंही खंड २ कर डाले ॥ २७ ॥ अतीय हिंसा करनेके स्वभाव वाली सांपिनी जिसप्रकार मंत्र और औपधिप्रभावमति: जातीहै वैसेही यह गदा श्रीरामचन्द्रजीके वाणों से टुकडे २ हो पृथ्वीमें गिरपडी।।२८॥इत्या श्रीमद्रा०वा आदि०आरण्यकांडे भापाटीकायामेकोनविंशः सर्गः॥२९ :: धर्मवत्सल श्रीरामचन्द्रजी.अपने बाणोंसे उस गदाको काटकर मुसकाय कोधर्मे भर खरसे कहनेलगे ॥ १ ॥ रे राक्षसाधम ! बस तुमने इतनाही अपना सब का, दिसाया तुम हम करके हीन बल होकर वृथा क्यों गर्जना करतेहो ॥ २॥ तुम केवल निरर्थक बकवाद करनेमें समर्थहो । तुम्हारी गदाने हमारे बाणोंसे टुकडे २ होरः पृथ्वीमें गिरकर तुम्हारे विश्वासको नष्ट किया ॥३॥और तुमने जो कहा था कि मरे हुए गक्षसोंके स्त्री पुत्रादिकोंके आंसू पोछंगे सो तुम्हारी यह बातभी मिथ्याहुई ॥४॥ साविशीर्णाशरैर्भिन्नापपातधरणीतले ॥ गदामंत्रोपधिवलैालीवविनिपातिता ॥ २८ ॥ इत्या श्रीम० वा. आ० अरण्यकांड एकोनविंशः सर्गः ॥ २९॥ भित्त्वातुतांगदांवाणैराघवोधर्मवत्सलः ॥ स्मयमानइदंवाक्यंसंरब्धमिदमत्रवीत् ॥ १॥ एतत्तेवलसर्वस्वंदर्शितंराक्षसाधम ॥श क्तिहीनतरोमत्तोवृथात्वमुपगर्जसि ॥२॥ एपावाणविनिर्भिन्नागदाभूमितलंगता ॥ अभिधानप्रगल्भस्यतवप्रत्ययघातिनी ॥३॥ यत्तयोक्तं विनष्टानामिदमथुप्रमार्जनम् ॥ राक्षसानांकरोमीतिमिथ्यातदपितेवचः ॥ ४॥ नीचस्यक्षुद्रशीलस्यमिथ्यावृत्तस्यरक्षसः॥ प्राणानपहरिप्यामि गरुत्मानमृतंयथा ॥ ५॥ अद्यतेभिन्नकंठस्यफेनवुवुदभूपितम् ॥ विदारितस्यमदाणेर्महीपास्यतिशोणितम् ॥६॥पांसुरूपितसागःवतन्य स्तभुजद्वयः ॥ स्वप्स्यसेगांसमाश्लिष्यदुर्लभांप्रमदामिव ||७|| प्रवृद्धनिद्रेशयितेत्वयिराक्षसपांसने ॥ भविष्यंतिशरण्यानांशरण्यादंडकाइमे ।। ॥ ८॥ जनस्थानेहतस्थानेतवराक्षसमच्छरेः ॥ निर्भयाविचरिष्यंतिसर्वतोमुनयोवने ॥९॥ अद्यविप्रसरिप्यंतिराक्षस्योहतवांधवाः॥वाप्पा वदनादीनाभयादन्यभयावहाः ॥ १० ॥ अद्यशोकरसज्ञास्ताभविष्यंतिनिरर्थिकाः ॥ अनुरूपकुलाःपत्न्योयासांत्वंपतिरीदृशः ॥ ११ ॥ और गरुडजीने जिसप्रकार अमृत हरण कियाथा, इस समय हमभी वैसेही नीच ओछे स्वभाववाले झंठी प्रतिज्ञा करनेवाले तुम्हारे प्राण हरण करेंगे ॥ ५॥ आर: हमारे पाणों करके विदारित होनेसे जब तुम्हारा शिर कट जायगा, तब पृथ्वी तुम्हारे गलेका झाग सहित रुधिर पान करैगी ॥ ६ ॥ आज तुम शिथिलहो गिरेः दोनों हाथोंसे सर्वांगमें रुधिर लगाये हुए दुर्लभ सीके समान पृथ्वीको चिपटाकर शयन करोगे ॥ ७ ॥रे राक्षसकुलके नाश करनेवाले ! यह दंडकपन सय टोगोंका आश्रय स्वरूप अपिगोंका आश्रम हो जायगा ॥ ८॥ रे राक्षस ! मेरे बाणममूहकरके जनस्थान राक्षमशून्य होनेमे मुनिगण निर्भय होकर राम प्रकारगे पनमें होकर घूमेंगे ॥ २ ॥ भरकरी मय राक्षमिय पन्धु बाग्थयों के मारेजानेगे कान करती नमारे भयगे आज जगन्याममे भाग " .. +
हामी यह तुम्हारेही ममान वंगकी यि आज गोकरमो मर्मको जानकर हीनवीर्य हो जायँगी ॥ ११ ॥रेनिर्लन ! शुद्रात्मा ! ब्राह्मणकंटक । मुनिगण तुमसे शंका का
अनिमें आहुनि दिया करते हैं मो आजमे वह भय जाता रहेगा ॥ १२॥ जय रघुकुमार श्रीरामचन्द्रजीने महाक्रोधके वराळेकर इस प्रकार कहा तब निशाचर गा|
कोरघुनही किर पडे ऊंचे स्वरमे रामचन्द्रजीको दुर्वाश्य कहताहुआ बोला ॥ ॥ १३ ॥ कि तुम निश्चयही गर्वितहो और भयहोनेपरभी भय नहीं करते,
मान मृत्यु पग होकर क्या कहने लायक क्या न कहने लायकहै, उसको नहीं समझ सकते ॥ १४ ॥ जो पुरुप कि कालकी फाँसी में बंध जाते हैं, उनकी अन्:
करनादिया इन्दियाकी वृनि जाती रहने के कारण उनको कार्याकार्यका ज्ञान नहीं रहता ॥ १५ ॥ निशाचर खरने श्रीरामचन्द्रजीसे इस प्रकार कहकः
शरीटीकर निकटही बहुत बड़ा एक गालका वृक्ष देखा ॥ १६ ॥ उस बडे भारी शालके पेडको देखकर युद्धमें उसकोही अपना अम्ररूप बनानेके लिये सी
नृशंसशील द्रात्मनित्यंत्राह्मणकंटक ।। त्वत्कृतेशंकितेरनौमुनिभिःपात्यतेहविः ।। १२॥ तमेवमभिसंरब्धंत्रुवाणराघवने ॥ खरोनिर्भर्त्सयामा
मगेपात्रतरस्वनः ।। १३ ॥ दृढ़सल्ववलितोसिभयेषपिरनिर्भयः ।। वाच्यावाच्यंततोहित्वंमृत्योर्वश्योनबुध्यसे.॥38॥ कालपाशपरिक्षि
मामांतिपुरुषाहिये । कार्याकार्यनजानंतितेनिरस्तपडिद्रियाः ॥ १५ ॥ एवमुक्त्वाततोरामसंरुध्यधुकुटिंततः ॥ सददर्शमहासालमविदूरेनि
भानरः ॥ १६॥ रणेपहरणस्यार्थसर्वतोयवलोकयन् ।। सतमुत्पाटयामाससंदष्टदशनच्छदः ॥ १७॥ तंसमुत्क्षिप्यवाहुभ्यांविनर्दित्वामहा
बलः ॥ गममुश्विनिक्षेपहतस्त्वमितिचात्रवीत् ॥ १८॥ तमापतंतवाणीवेश्यित्त्वारामाप्रतापवान् ॥रोपमाहारयत्तीबंनिहंतुसमरेखरम्॥१९॥
जानवंदग्नतोगमोरोपरक्तातलोचनः ॥ निविभेदसहयेणवाणानांसमरेखरम् ॥ २०॥ तस्यवाणांतराद्वक्तंबहुसुस्रावफेनिलम् ॥ गिरेःप्रस्रवण
स्वाधागानपरियाः ॥ २१ ॥ विफल सकृतोवाणे खरोरामेणसंयुगे ॥ मत्तोरुधिरगंधेनतमेवाभ्यद्रवहृतम् ॥ २२ ॥
किलकिलाकर उगको उगाड लिया ॥ १७ ॥ और घोर गंभीर शब्द करके दोनों भुजाओंने इस वृक्षको उठा लो तुम मारे गये' यह कहकर वह वृक्ष श्रीरामचंद्रजी
अपर पलाया ॥ १८ ॥ प्रतापरान् श्रीरामनंदजीने अपने ऊपर आतेहुए इस शालके वृक्षको अनेक बाणोंसे काट डालकर युद्धमें सरको मारठालनेके लिये मः
मा किया ॥ ११॥ महाकोष करने के कारण श्रीरामचंदजी नयन लाल २ हो आये, शरीरसे पसीना निकलने लमा, उन्होंने हजार बाणोंसे सरके अंगको छिन्न
मिन करडाला ।। २० । पर्वतके मरनेमे निमस्कार पानीको धारा निकलती रहतीहै, वैसेही सरको देहमें जो बाण लगनेके कारण छिद्र होगयेथे, उनसे रुभिः
गिरने लगा ॥ २१॥ गर भीरामजी पाणोंमे व्याकुल हो और रुधिर गन्धसे मतवाला होकर श्रीरामचंद्रजीके सामने बहुत शीयवासे धाया ॥ २२॥
. आरका पा.रा.भा. ॥४६॥ यह रुपिरसे बाहुआ और अतिशय कोधाविष्ट होकर इसत्रकारसे दौडा कि कृतास्र श्रीरामचंदजी शीघतासे दो तीन पग पीठको हटगये ।।२३।। इसके पीछे श्रीराम चंद्रजीने खरके मारडालनेके लिये दूसरे ब्रह्मदंडकी समान अमिसमान वाण ग्रहण किया ॥ २४ ॥ धीमान् देवराज इन्द्रजीने यह बाण श्रीरामचंद्रजीको अगस्त्पद्वारा दियाथा धर्मात्मा श्रीरामचंद्रजीने वही बाण धनुपपर, चढाकर खरके ऊपर छोडा ॥ २५॥ जय श्रीरामचंद्रजीने धनुपको संचकर वह महावाण छोडा, वय वह बाण वजके समान शब्द करताहुआ खरकी छातीमें लगा ॥ २६ ॥ सर उस बाणकी अमिसे भस्महोकर श्वेवारण्यमें रुद्रकरके भस्महुए अन्धकासुरेकी समान पृथ्वी गिरपडा ॥ २७ ॥ वृत्रासुर जिसप्रकार वनसे, नमुचि जिसरकार फेनसे, और बलासुर जिसरकार इन्चके वनमे हत होकर गिरेये सरभी चैनेही श्रीरामचंदजौके पाणसे नाराहोकर पृथ्वीमें गिरा ॥ २८ ॥ इससमय देवतागण चारणों के सहित महाहर्ष और विस्मय युक्त होकर नगाडे यजातेहुए भीरामचंदजीके कमर चारों तमापतंतंसंकु,कृतास्रोरुधिराप्लुतम् ॥ अपासर्पद्विधिपदंकिंचित्त्वरितविक्रमः ॥ २३ ॥ ततःपावकसंकाशंवधायसमरेशरम् ॥ खरस्यरामोन ग्राहब्रह्मदंडमिवापरम् ॥ २४ ॥ सतदत्तंमचवतासुरराजेनधीमता ॥ संदधेचसधर्मात्मामुमोपचखग्प्रति ॥२५॥ सविमुक्तोमहावाणोनितिसम निस्वनः॥ रामेणधनुरायम्यखरस्योरसिचापतत् ॥२६॥सपपातखरो मौदह्यमानःशरामिना ॥ रुदेगेवविनिर्दग्धःश्वेतारण्येययांधकः ॥२७॥ सवृत्रइववत्रेणफेनेननमुचिर्यथा ॥ वलोवेंद्राशनिहतोनिपपातहतःखरः ॥२८॥ एतस्मिनंतरेदेवाश्चारणःसहसंगताः ॥ दुंदुभीश्वामिनिमंतःपुष्प वर्षसमंततः ॥२९॥ रामस्योपरिसंहृष्टाववऍविस्मितास्तदा ॥ अर्थधिकमुहूर्तेनरामेणनिशितैः शरैः ॥ ३०॥ चतुर्दशसहवाणिरनमांकामरूपि णाम् ॥ खरदूषणमुख्यानानिहतानिमहामृधे ॥ ३१ ॥ अहोवतमहत्कर्मरामस्यविदितात्मनः ॥ अहोवीर्यमहोदायविप्णोखिदिदृश्यते ॥३२॥ ओरसे फूलोंकी वर्षा करने लगे ॥ २९ ॥ और सब देवता चारणगण फूल वरमाकर बडे विस्मित हुए कि डेढही मुहूर्नमें तीसे चाणोंने श्रीरामाजीने ॥३०॥ इस महायुद्दमें खर दूपण इत्यादि मुख्य राक्षसोंके सहित कामरूपी चौदह हजार राक्षसोंको मार डाला ॥ ३१ ॥ साक्षात् विष्णुजीकी समान मांदी भीरामचंानीका १ कावेरीनदी के किनारे श्वेतारण्यमें एक वित नाम राजर्षि तप फरतेथे, नय अन्धकार उन्हे मारनेको भाया ग ममग शिजीने स्टात मारहराराम मेहरया॥२॥पए जानेपर जब इन्द्रने विश्वरूपको पुरोहिन किया नव इन्द्रने गुप्तरूपमे देन्योंके निमित्त प्रमे आनि देते देण मारधारा विद्याप मरनेपर नमाने पर गुरफ Twirया NिIAN रापुर (द्रके माथ आनष इन्द्रने रवीध ऋषिमे उनकी जोधका हाड मांग वर्ष बनाय उगो मूत्रागुरकामंहार किया || नगाधिायको प्रधानीका पारामा तुगी राhि पारमाणे मोर नेपनमोपेनल्का मारा गल्ला ज्या ४ि म २ नम meपापा श्रीमपान rit, thatपानिपा॥
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- आर० ॥४७॥ स०३ . ******* सर दूपण त्रिशिरा आदि राक्षसों के मारेजानेपर अकम्पननामक राक्षस शीघ्रतासे जनस्थानसे पलायनकर लंकामें जाकर रावणसे कहनेलगा ॥ १ ॥ हे राजन् ! जनस्थानवासी अनेक राक्षस संग्राममें मारे गये और उनके स्वामी खरकाभी संहार होगया । और मैं किसी भांतिसे जीता बच यहां भागकर आयाहूं ॥ २॥ जब अकम्पनने ऐसा कहा तो मोधर्म भरनेके कारण रावणके नेत्र लाल होआये और वह अपने तेजसे अकंपनको भस्मसा करताहुआ बोला ॥ ३ ॥ किसकी उमर बीत चुकी । त्रिलोकीमें किसको आश्रय मिलना दुर्लभ हुआहै ? वह कौनहै ? जिसने हमारा महाभयंकर जनस्थान ध्वंस कर दिया ॥ ४॥ हमारा अप्रिय कार्य करके इन्छ, यम, कुबेर अथवा विष्णुभी सुखसे नहीं रह सकते ॥ ५॥ हम कालकेभी कालहैं हम अग्निकोभी जला सकतेहैं, अधिक क्या कहैं हम मृत्युकोभी मृत्युधर्ममें त्वरमाणस्ततोगत्वाजनस्थानादकंपनः ।। प्रविश्यलंकांवेगेनरावणवाक्यमत्रवीत् ।। १ ॥ जनस्थानस्थिताराजवाक्षसावहवोहताः ॥ खरश्चनि हतःसंख्येकथंचिदहमागतः॥२॥ एवमुक्तोदशग्रीवःक्रुद्धःसंरक्तलोचनः ॥ अकंपनमुवाचेदंनिर्दहन्निवतेजसा ॥३॥ तेनभीमंजनस्थानं इतममपरासुना ॥ कोहिसर्वेपुलोकेपुगतिनाधिगमिष्यति ॥ १॥ नहिमेविप्रियंकृत्वाशक्यंमघवतासुखम् ॥ प्राप्तुंवैश्रवणेनापिनयमेनचवि प्णुना ॥५॥ कालस्यचाप्यहंकालोदहेयमपिपावकम् ॥ मृत्युमरणधर्मेणसंयोजयितुमुत्सहे ॥६॥ वातस्यतरसागनिहंतुमपिचोत्सहे ॥ दहेयम पिसंकुद्धस्तेजसादित्यपावको ॥ ७ ॥ तथाक्रुद्धंदशग्रीवकृतांजलिरकंपनः ॥ भयात्संदिग्धयावाचारावर्णयाचतेऽभयम् ॥ ८॥ दशग्रीवोऽभयं तस्मैप्रददौरतसांवरः ॥ सविसन्धोत्रवीद्वाक्यमसंदिग्धमकंपनः ॥ ९ ॥ पुत्रोदशरथस्यास्तेसिंहसंहननोयुवा ॥ रामोनाममहास्कंधोवृत्तायत महाभुजः ॥ १०॥ श्यामःपृथुयशाःश्रीमानतुल्यवलविक्रमः ॥ हतस्तेनजनस्थानेखरश्चसहदूपणः ॥ ११ ॥ अकंपनवचःश्रुत्वारावणोराक्षसा धिपः ॥ नागेंद्रइवनिःश्वस्यइदंवचनमब्रवीत् ॥ १२ ॥ योजित कर सकतेहैं ॥ ६॥ हम कोधित हो तो अमि और सूर्यकोभी भस्म कर डालें और हम अपने वेगसे पवनकाभी वेग रोक सकतेहैं ॥ ७ ॥ दशवदन रावण जर इस प्रकारसे कोधित हुआ तब अकंपनने मारे भयके हाथ जोड सन्दिग्ध वचनोंसे अभयदान मांगा ॥ ८॥ तब राक्षसवर दशाननने अकंपनको अभय दिया, तब अंकंपन विश्वास कर स्पष्ट २ वृत्तान्त कहने लगा॥९॥ कि श्रीराजा दशरथजीके पुत्र सिंहसमान पुष्ट अंगवाले युवाअवस्थाको प्राप्त एक रामचन्द्र नामकहैं, उनके ऊंचे स्कन्धे व पडी २ भुजाडें ॥१०॥ श्यामरुप, महा यशस्वी, शोभायमान, अपने तुल्य किसी दूसरेका बल विक्रम नरखनेवाले उनहीं श्रीरामचन्द्रजीने जनस्थानमें दुपणके मदिवरारका गंदार किया॥११॥राक्षमोका राजा रायण अकंपनकी यह पानी सुनकर मदगे अंधे सर्पकी समान श्वास लेताआ गन पचन गातो
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܂ܢܬ आर गो किमने तुम्हारे मस्तकार प्रहार किया ॥ ४५ ॥ हे रावण ! विशुद्धवंश सूर्यकुटपदमें पड़ी हुई पृथ्वीकोभी उवार सकतेहैं ॥ २४ ॥ समुद्रकी वेला भृगाः यही दोनों दांत हैं उन रामरूप मदयाले हाथीको संग्राममें दर्शन करनेके योग्य आप पवनका वेगभी रोक सकतेहैं ॥ २५॥ और वह महायशस्वी श्रीरामच-:: मानो पाउ है चार राक्षनगणरुपी मृगोंके नारा करने वाले पाणही मानों जिनते हैं ॥ २६ ॥ हे दशानन ! पापात्मा लोग जिस प्रकार स्वर्गके जीनामा सिंहको जगा देने योग्य आप नहीं हैं ॥ १७ ॥ हे राक्षसराज ! धनुपरूप प्राणों को हर जीतनेको समर्थ नहीं हैं ॥ २७ ॥ मैं वो यह जानवाहूं कि देवासुर दलदलने भरे और याणरुप तरंगोंने युक्न घोर युद्धरुप जलसे भरे अति घोर रामरूप १ चिन देकर सुनिये ॥ २८ ॥ सीवानामक उनकी स्त्री एक लोकके म दभार गक्षगंद! प्रसन्न होओ और प्रसन्न होकर सीधे २ लंकाको चले जाओ और विशुद्धांशाभिजनाग्रहस्तस्तेजोमदःसंस्थितदोर्विपाणः॥उदीक्षितुंरावणनेहयु। डीम् ॥२४ ॥ भित्त्वावेलांसमुद्रस्यलोकानाप्लावयेद्विभुः ॥ वेगंना दग्भरतीमृगहानृसिंहः।।सुप्तस्त्वयावोधयितुंनशक्यःशरांगपूर्णानिशितासिदंष्ट्राः ॥ शक्तःश्रेष्ठःसपुरुषःस्रष्टुंपुनरपिप्रजाः ॥ २६ ॥ नहिरानी तालमुखंतिघोरेप्रस्तंदितुंराक्षसराजयुक्तम् ॥४८॥ प्रसीदलंकेश्वरराक्षसेंद्रलंकांपर, नतंवध्यमहंमन्येसर्वैर्देवासुरेरपि ॥ अयंतस्यवधोपायस्तन्ममैक बनेषु ।।१९।। एवमुक्तोदशग्रीवोमारीचेनसरावणः॥ न्यवर्ततपुरीलंकाविवेशचन भक्तांगीवीरनंरत्नभूपिता ॥ २९ ॥ नैवदेवीनगंधर्वीनाप्सरानन मर्गः॥३१॥ ततःशूर्पणखादृवासहस्राणिचतुर्दश । हतान्येकेनरामेणरक्षसांभीम संप्रमथ्यमहावने ॥ सीतयारहितोरामोनचैवहिभविष्यति॥३|| नादाननादजलदोपमा ॥२॥ सादृष्टाकर्मरामस्यकृतमन्यैःसुदुप्करम् ॥ जगाम १३२॥ वाढंकल्यंगमिष्यामिएकःसारथिनासह ॥ आनेष्यानि दीप्ततेजसम् ।। उपोपविष्टंसचिवमरुद्भिरिववासवम् ॥ १॥ आसीनंसूर्यसंकाशेक अनादित्यवर्णेनदिशःसर्वा प्रकाशयन् ॥.३४ ॥ मनि श्रीरामचन्द्रजी भी वनमें आनंद भोगें ॥ ४९ ॥ जव मारीचने इस प्रकार कहा तवदशवदारही है इसके सब अंग वरावर हैं कोई बडा छोय नहीं है ॥ २९ ॥न: इत्या भीमदा. पाल्मी० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकायामेकर्षिशः सर्गः ॥ ३३ ॥ इसी की स्त्री किस भाँति उसके समान होसकती है ? ॥ ३० ॥ सो अव महा हजार राक्षमों को परेहुए देगार ॥१॥ व सर, दूपण और त्रिशिराको मारा हुआ देखजायगी तव राम न वचेंगे वरन् अवश्यही मर जायँगे ॥ ३१ ॥ करने के अपोग्य भीरापरजीका किया हुआ कम देगकर अति उकमाके रावणपालिताला ॥ ३२ ॥ कि, अच्छा । हम अकेले मारथीके साथ यहां जायगे । -- ॥४ -- रारा सिपाना पागताण निगरकार निकट ३, मंत्रीगण मेन गन मनपान
सारामचन्द्रजीभी घनमें आनंद भोगें ॥४०॥जम मारीगनेग प्रकार कहानपदगदल गणमाको छोकर भग
भीमा- पाल्मीमान्दिआरपरकोभापाकायापकाना गर्मनी भनक नागगन भर
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र आमनार घेटनेने, सुवर्णमय वैदिसध्यगत प्रचलित अनिकी समान उसकी शोभा होरही है ॥ ५ ॥ देवता, गन्धर्व, भूत व महात्मा ऋषि लोगों के
अयोग्य अति भयंकर हवाये मानों दूमग यमराजही बैठाया ॥ ६ ॥ फिर देवताओं व राक्षसोंके मणियुक्त वन कक्ष पाव सहित, और ऐरावत हाथीके दांतोंसे
बहामार्ग निद छातीमें विद्यमान ॥ ७ ॥ टमकी वीमभुजा व दश शिर, पोशाक बडी सुहावन मनभावन, चौडी छाती, और शरीर राजलक्षण युक्तः ॥ ८॥ वह
जो वर्ष पणि पहर रहाहै, उममे देहकी कान्तिभी वैदूर्यमणिके सदरा थी, कानोंके कुंडल तपाये हुए सुवर्णके बने, वीसों भुजा परम सुन्दर, दांतोंकी कतार
अति सुन्दर, यदनमंडल अतीव महान, आकार पर्वतकी समान ॥ ९ ॥ देवताओंके सहित सैकडों संग्रामोंमें विष्णुचकके लगनेसे व और २ अनेक
देवगंधर्वभूतानामृपीणांचमहात्मनाम् ।। अजेयंसमरेवोरंव्यात्ताननमियांतकम् ॥ ६ ॥ देवासुरविमर्देपुववाशनिकृतव्रणम् ॥ ऐरावतविपाणा
मकृष्टकिणवनसम्॥७॥ विंशजंदशग्रीवंदर्शनीयपरिच्छदम् ॥ विशालवक्षसंवीरंराजलक्षणलक्षितम् ।।८॥ नद्धवेदूर्यसंकाशंतप्तकांचनभूपणम् ॥
गुभुजंशकदशनमहान्यपर्वतोपमम् ॥ ९॥ विष्णुचक्रनिपातेश्वशतशोदेवसंयुगे । अन्ये शस्त्रेःप्रहारेश्चमहायुद्धेपुताडितम् ॥ १० ॥ अहतांगेः
ममम्तेलदेवप्रहरणेस्तदा । अबोभ्याणांसमुद्राणांनोभणंक्षिप्रकारिणम् ॥११॥ क्षेप्तारंपर्वताग्राणांसुराणांचप्रमर्दनम् ॥उच्छेत्तारंचधर्माणांपरदा
गभिमर्शनम् ॥१२॥ सर्व दिव्याम्रयोक्तारंयज्ञविनकरंसदा ॥ पुरींभोगवतींगत्वापराजित्यचवासुकिम् ॥ १३ ॥ तक्षकस्यप्रियांभायाँपराजित्या
हास्यः । कलामंपर्यतंगत्वाविजित्यनग्याहनम ।। ११ ॥ विमानंपुष्पकंतस्यकामगंवैजहाग्यः ॥ वनचैत्ररथंदिव्यंनलिनीनंदनवनम् ॥ १५ ॥
महा गंपामोंमें अयों के प्रहाग्मे बहन भांनि ताडित हुआ ॥ १० ॥ और उसके सब अंगभी देवताओं करके शनद्वारा घायल हुएहैं किसीसे चलायमान न
पगे मम्मोकोभी गलरलाने की जिममें विशेष मामथ्र्य है, और शीघही सय कार्य करनेवाला ॥ १३ ॥ पर्वतोंके कंगूरोंको उखाड डालनेवाला देवताओंका :
वाला मर धोका जरमे उपाइनेवाला पगई पनिवता मियोंका सत्य हरणकारी ।। १२॥ दिव्यानोंका प्रयोगकारी और सर्व यज्ञ विनकारी, भोगवती
नमकनामक सर्पको पराजय करता हुआ उसकी प्रियसीको हरण करनेवाला कैलास पर्वतपर गमन करके नरवाना
fr हरण करनेवाला; चैत्ररथनामक दिव्यवन, नलिनी, नन्दन कानन, ॥ १५ ॥
पा... आर० •॥ ५० ॥ स० औरभी सब देवताओंके उद्यानोंका विनाश क्रोधसे जिसने करदिया है. फिर उदय होते हुए महाभाग्य चंद्रमा व सूर्यको ॥ १६ ॥ दोनों याँहोंसे निवारण करनेवाला तोंके समान ऊंचा व वीर्यवान् प दश हजार वर्ष वनमें तपकर ॥ १७ ॥ ब्रह्माजीको अपने सब शिर काट २ कर जिसने चढादियेथे, देव, दानव, गन्धर्व, पिशाच, पतंग, वा उरग ॥ १८ ॥ किसीके द्वाराभी जिसको मृत्युका भय नहीं जिसने केवल मनुष्योंको कुछ न समझ उनसे अभय नहीं माँगा, और ब्राह्मण लोग योंमें मंत्र १२ कर जिसकी स्तुति करनेलगेथे ॥ १९ ॥ यह महाबलवान् रावण होमशालामें गमन करके पवित्र सोमको नष्टकरदेता और दक्षिणा देनेके समय यज्ञको सकर देवा सर्वदा ब्राह्मणहननादिक क्रूर कार्योको कियाकरता ॥२०॥ सदा प्रजागोंका अहित आचरण करता कर्कश था अनेक प्रकारको पीडा देकर सब लोकोंका भय विनाशयतियःक्रोधादेवोद्यानानिवीर्यवान् ॥ चंद्रसूर्यामहाभागायुत्तिष्टतौपरंतपौ ॥ १६॥ निवारयतिवाहुभ्यांयःशैलशिखरोपमः ॥ दशार्प सहस्राणितपस्तत्वामहावने ॥ १७ ॥ पुरास्वयंभुवेधीरःशिरांस्युपजहारयः ॥ देवदानवगंधर्वपिशाचपतगोरगैः ॥ १८॥ अभयंयस्यसंग्रामेमृत्यु तोमानुपाहते । मंत्रैरंभिष्टुतंपुण्यमध्वरेपुद्विजातिभिः॥ १९॥ हविर्धानेपुयःसोममुपहंतिमहाबलः ॥ प्राप्तयज्ञहरंदुष्टंब्रह्मनंदूरकारिणम् ॥२०॥ कर्कर्शनिरनुक्रोशंप्रजानामहितेरतम् ॥ रावणसर्वभूतानांसर्वलोकभयावहम् ॥२१॥ राक्षसीभ्रातरंकूरसाददर्शमहाबलम् ॥ तंदिव्यवस्त्राभरणंदिव्य माल्योपशोभितम् ॥२२॥ आसने पविष्टंतकालेकालमिवोद्यतम् ॥ राक्षसेंद्रमहाभागपौलस्त्यकुलनंदनम्॥२३॥ उपगम्यात्रवीद्वाक्यंराक्षसीभ यविह्वला ॥ रावणंशहंतारंमंत्रिभिःपरिवारितम् ॥ २४ ॥ तमत्रवीद्दीप्तविशाललोचनंप्रदर्शयित्वाभयलोभमोहिता ॥ सुदारुणंवाक्यमभीत चारिणीमहात्मनाशूर्पणखाविरूपिता ॥ २५ ॥ इत्याऐं श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे द्वात्रिंशःसर्गः ॥ ३२ ॥ उपजानेवाला होनेके कारण लोक उसको रावण कहा करतेथे ॥ २१ ॥ राक्षसी शूर्पणखाने अपने क्रूर महावली भाताको देखा। यह रावण दिव्यवस्न, दिव्य गहने, और दिव्य माला पहर रहाथा ॥ २२॥ आसनपर भलीप्रकारसे बैठाथा, उस काल कालकी मूर्निसा प्रतीत होताथा ऐसा राक्षसनाथ महाभागपौलस्त्यकुलनंदन रिपुओंका नाश करनेवाला ॥२३॥ इस प्रकारके गुणोंसे युक्त रावणको देख लक्ष्मणजीने जोनाक कान काट डालेथे इस कारण भयसे विह्वलहो, मंत्रियोंके बीचमें बैठे हुए रावणमे बोली॥ २४ ॥ इस प्रकारकी निशाचरी जो कि श्रीरामचंद्रजीके द्वारा कुरूपको प्राप्त होगर्दथी जिसका नाम शूर्पणखा था पह निर्भय दारुण पचन कहती ले लोभमे मोहित भय दिगानी दीमिपान् पढे नेत्रपाले गएणमे बोली॥२५॥दनमा भीमदा पाल्मी. आदि- भागागाभागानीका RI amarur.M --- -ammar 1 ॥ 11 उस समय दीन होरही शूर्पणखा क्रोधयुक्तहो सब लोकोंके रुवानेवाले रावणसे मंत्रिगणांके सामने कडुवे वचन कहन लगा ॥ होकर सदाही कामभोगमें मतवाले रहते हो और तुम किसी विषयमें किसीकाभी निषेध करना या बाधा देना नहीं मानते । इसी कारण अवश्यही जानने के योग्य जो इस समय भयंकर विपद आ पहुँची है, तुम उसको नहीं जानते ॥ २॥ परन्तु जो राजा म्री इत्यादिक ग्राम्य भोग वस्तुओंमें सदाही आसन रहता, स्वेच्छाचारी और लोभी होता है। प्रजागण श्मशानकी अनिके समान उस राजाका आदर नहीं करते ॥ ३ ॥ जो राजा यथाकालमें अपने सब कायाँको नहीं करता है यह राजा और उसके कार्य न करनेसे अपने राज्य सहित विनाशको प्राप्त होता है ॥ ४ ॥ जो राजा श्रीआदिकोंके आधीन रहकर दूतोंको नियुक्त करके प्रजाका हाल नहीं जानता है तो हाथी जिस प्रकार दूरसेही दल २ वाली नदीको त्याग करके चले जातेहैं, प्रजा लोगभी वैसेही उस राजाको त्याग देने हैं ॥ ५ ॥ औरभी ततःशुर्पणखादीप्तारावणलोकरावणम् ।। अमात्यमध्येसंकुद्धापरुपंवाक्यमत्रवीत् ॥१॥ प्रमत्तःकामभोगेपुस्वेरवृत्तोनिरंकुशः॥ समुत्पन्नभयंचोखो व्यंनायबुध्यसे॥२॥ सक्तंग्राम्येपुभोगेपुकामवृत्तंमहीपतिम् ॥ लुब्धनवहुमन्यंतेश्मशानाग्निमिवप्रजाः॥३॥ स्वयंकार्याणियःकालेनानुतिष्ठतिपा र्थिवः॥ सतुवेसहराज्येनतेश्चकार्यविनश्यति ॥४॥ अयुक्तचारंदुर्दर्शमस्वाधीनंनराधिपम् ॥ वर्जयंतिनरादूरानदीपंकमिवद्विपाः॥५॥ येनरक्षति विपयमस्वाधीनं नराधिपाः॥ तेनवृद्धयाप्रकाशंतेगिरयःसागरेयथा ॥६॥आत्मवद्भिर्विगृह्यत्वंदेवगंधर्वदानवः॥अयुक्तचारश्चपल कथंराजाभवि प्यसि ॥७॥ त्वंतुवालस्वभावश्चबुद्धिहीनश्चराक्षस ॥ ज्ञातव्यंतनजानीपेकथंराजाभविष्यसि ॥८॥येपांचाराश्चकोशश्चनयश्चजयतांवर ।। अस्वाधी नानरेंद्राणांप्राकृतेस्तेजनेसमाः॥९॥ यस्मात्पश्यंतिदूरस्थान्सर्वाननराधिपाः ।। चारेणतस्मादुच्यतेराजानोदीर्घचक्षुपः ॥ १० ॥ जो नृपति लोग अपने आधीनमें न आये हुए राज्योंको उपाय करके अपने वश नहीं कर लेते, वह समुद्रमें पडे हुये पर्वतोंकी समान प्रकाशको नहीं प्राप्त होते ॥ ॥ ६ ॥ एक दो तुम स्वभावही चंचल हो और दूसरे कुछ तुम आचारभी नहीं करते; भला फिर विशुद्धचित्त देव दानव और गन्धोंसे पैर करके तुम किस प्रकार राज्य कर सकोगे। ॥ ७ ॥ हे राक्षस ! तुम बुदिरहित हो, बालकोंकासा तुम्हारा स्वभाव है और जिस घातको जानना उचितहै, उसको भी नहीं जानते भला फिर किसपकारसे अपने इस राज्यकी रक्षा कर सकोगे ? ॥ ८ ॥ हे विजयी श्रेष्ठ ! जिन राजा लोगोंके आधीन खजाना, दूत और नीति नहीं होती, ऐसे राजा लोग माधारण मनुष्योंके समान हैं ॥ ९ ॥ राजा लोग सब जगह अपने दूतोंको नियुक्त करके सब दूरका वृत्तान्त मानों देखते रहते हैं इसी कारण वह दीर्घचक्षु कहे आर जो 1100 जानती कि, नुसने कहीं भी दूतादि नहीं नियत कियेहैं और तुम साधारण बुद्धिवाले मंत्रियोंके साथ सदाही बैठे रहतेहो इसीकारणसे निजजन पौर नग्धानका जी नाग होगपाहे उसको तुम नहीं जानते ॥ ११ ॥ देखो ! अतिकठिन कर्म करनेवाले रामचन्द्रने इकलेही भयंकर कर्म करनेवाले चौदह हजार क्षम पर दुपणमति मार डाले ।। १२॥ उन रामचंद्रने फपिगणोंको अभय करदियाहै समस्त दंडकारण्यको निष्कंटक और जनस्थानको भयभीत कर दियाहै ॥१३॥ रागण ! गुम नो लोभी मतवाले और सदाही पराये आधीन रहनेवालेहो इसीकारण तुम नहीं जानते कि, तुम्हारे राज्यपर क्या भय आ पहुँचाहै ।। १४ ॥ जो गजा अनि नीराभावाला, अमावधान, गर्वित, शठ और अल्पदान करनेवाला होताहै, विपदके समय प्रजाभी उस राजाकी रक्षाकरनेके लिये कोई यत्न नहीं करती ॥ १५ ॥ जो राजा अतिशय अभिमानी होता, कोध स्वभाववाला होता, और जो अपने आपही अपना गौरव करता है, कोई जिसकी अगुकनारंमन्येत्यांप्राकृतेःसचिवैर्युतः ॥ स्वजनंचयतःस्थानिहतंनावबुध्यसे ॥ ११॥ चतुर्दशसहस्राणिरक्षसांभीमकर्मणाम् ॥ हतान्येकेनरामे परभमनापणः ।।१२॥ कपीणामभयदत्तंकृतक्षेमाश्चदंडकाः॥धषितंचजनस्थानंरामेणाक्लिएकारिणा॥१३॥त्यंतुलुब्धःप्रमत्तश्चपराधीनश्चराक्ष म॥ पिपरोस्पेसमुत्पन्नयद्यंनावबुध्यसे।।१४॥तीक्ष्णमल्पप्रदातारंप्रमत्तंगर्वितशठम् ॥ व्यसनेसर्वभूतानिनाभिधावंतिपार्थिवम्॥१५॥अतिमानि नमग्राममात्ममंभावितंनरम्॥कोधनंव्यसनेहंतिस्वजनोपिनराधिपम् ॥ १६॥नानुतिष्ठतिकार्याणिभयेपुनविभेतिच ॥ क्षिप्रंराज्याच्च्युतोदीन स्तृणैस्तुल्योभयेदिह ।। १७ ॥ शुष्ककाप्ठेर्भवेत्कायलोप्टेरपिचपांसुभिः॥नतुस्थानात्परिभ्रष्टै कार्यस्याद्वसुधाधिपः ॥१८॥ उपभुक्तंयथावासः मजोसमृदितायधा॥ एवंराज्यात्परिभ्रष्टःसमथापिनिरर्थकः॥ १९ ॥अप्रमत्तश्चयोराजासर्वज्ञोविजितेंद्रियः ॥ कृतज्ञोधर्मशीलश्चसराजातिप्टते निरम् ॥ २० ॥ नयनाभ्यांप्रसुप्तोवाजागर्तिनयचक्षुपा ॥ व्यक्तकोधप्रसादश्वसराजापूज्यतेजनः ॥२१॥ पासो नहीं सुनते । सिदके ममय उनके सगेही उसका नाश कर देतेहैं ॥ १६ ॥ जो राजा राजकार्यको अपने हाथसे नहीं करता और भय होनेपरभी नहीं इस्ला, ऐसे गजाको गीनही गन्यास्ट होना पडताहै अरि सवही कोई उसे तृणके समान जानने लगतेहैं ॥ १७ ॥ सूखे काठ ढेले और धूलसेभी बहुत कार्य होसकते है, परन्तु गम्पाट हुए राजामे कोई कार्यभी नहीं होमकता ॥ १८ ॥ पहरा हुआ वन और मलगिजी माला जिमप्रकार किसी कार्यकी नहीं होती । राज्य गनाभी मेघी गानिमम्पन्न दोस्रमी निरर्थक हाताई ॥ १०॥ जो गजा प्रपादहीन, मत भली भाँतिमे जितेन्द्रिय, सवन, और धर्ममें रत होते हैं वही राजप Harihiमर ॥२॥गतागनिधिसभी मीनिमात्र निमार फाफ मागनेर, मोर भिनका फोग. marartherman पा. वह राजाही लोकममाननें पूजे जानेहैं ॥ २३ ॥ परन्तु हे रावण ! नुम कुबुद्धि और इन समस्त गुणोंसे रहितहो, कारण कि राक्षसोंका वह सर्वनाश हुआ और तुमने लोक दांग टमका कुछभी नृनान्त न जाना ॥ २२॥ तुम केवल पराया अपमान करते हो सदाही भोगविलासमें मतवाले बने रहतेहो देशकालका निश्चय करना नहीं जानते और गुण दोषका विचार करनेका सामग्रं तुम्हारी बुद्धि नहीं रखती इस कारण तुमको शीग्रही विपग्रस्त और राज्यानटं होना पडेगा ॥२३॥ धन, वल, और गायुन गक्षमनाय गवन गाणसाको इस प्रकारमे आने समस्तदोष कहतीहुई देसकर घुद्धिलगाय बहुतही देरतक मनही मन विचारतारहा ॥ २४ ॥ इत्या श्रीमहावामी. आदि० आरण्यकाण्डे भापाटीकायां निराः सर्गः ॥ ३३ ॥ शूणिसा मंत्रियोंकी सभाके बीचमें अनेक प्रकारके कटुवचन कहरहीहै यह संतुगवगधुद्धिगुणेरतेर्विवर्जितः ॥ यस्यतेऽविदितारेरक्षसांसुमहान्वधः ॥ २२ ॥ परावमंताविपयेषुसंगवानदेशकालप्रविभागतत्त्ववित् ॥ अयुक्तयुदिर्गुणदोपनिप्रयेविपन्नराज्योननिराधिपत्स्यते ॥ २३ ॥ इतिस्वदोपान्परिकीर्तितांस्तयासमीक्ष्यबुद्धयाक्षणदाचरेश्वरः ॥ धनेनदर्पण पलेननाचिनोवितियामासचिरंसरायणः ॥ २४ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे त्रयस्त्रिंशःसर्गः ॥ ३३ ॥ ततःशूर्पगनादृष्ट्रावतीपरपंवचः ।। अमात्यमध्येसंमुद्र परिपप्रच्छरावणः ॥ ॥ कश्वराम कथंवीर्यःकिंरूप किंपराक्रमः॥ किमर्थदंडकार प्रयंप्रविष्टामुदुस्तरम् ॥२॥ आयुधंकिंचरामस्ययेनतेराक्षसाहताः ॥ खरश्चनिहतःसंख्येदूपणस्त्रिशिरास्तथा ॥ ३॥ तत्त्वंबहिमनोज्ञांगिकेन संगरिमपिता ॥ इत्युकारामसेंद्रेणराक्षसीक्रोधमूर्छिता ।। 2 ।। ततोरामंयथान्यायमाख्यातुमुपचक्रमे । दीर्ववाहुर्विशालाक्षश्चीरकृष्णाजिनां चरः॥ ६॥ कंदर्पममरूपश्ररामोदशरथात्मजः ॥ शकचापनिभंचापंविकृप्यकनकांगदम् ॥६॥ दीप्तानक्षिपतिनाराचान्सानिवमहाविपान् ।। नाददानंशगन्धोगन्विमुंनंतमहावलम् ॥ ७ ॥ दिगार गरणने योनि होकर पूछा ॥ ३ ॥ राम कौनहैं ? उनका वीर्य, रूप और पराक्रम कैसाहै ? वह किस कारणसे इस दुस्वर दंडकारण्यमें आयेहैं । ॥ २ ॥ उन्होंने जिनगे कि सर दूपण और विगिरा आदि राक्षसोंको युद्धमें मार डाला वह उन रामचंदजीके आयुध कैमेहें? ॥ ३ ॥ हे मनोहर शरीरवाली ! तुमको किसने विष करदिया ? मर यथार्थही कहो। जब राक्षसराज रावणने इस प्रकारसे कहा तब राक्षसी कोधसे मूछितहो ॥ ४ ॥ जैसेका वैसा ठीक २ श्रीरामचन्द्र जीका नाग कहने लगी । उसने कहा रामचन्द्र दगरथके पुत्र कामदेवकी समान रूपवान् दीर्वनाहु और विशालनेत्र, वल्कल व मृगचर्म धारग किये हुए ॥ ५॥ उमा अनुप इन्द्र के अनुपकी ममानहै उममें सुवर्णके बंद लगे हैं उस धनुपको सेंचार ॥ ६ ॥ तेज विपवाले सपाके समान प्रदीन नाराच रामचन्द्र आर पा.ग. 1. छोडते हैं यह हमने नहीं देखा कि ॥७॥ धनुपको किस समयमें बैंचतेहैं; यहभी हमने नहीं देखा केवल इतनाही देखाहै कि वाणवर्षा करके वह संग्राममें राक्षसेंका संहार करतेये।।८॥जैसे इन्द्र अकालमें ओले वर्पाकर श्रेष्ठ अन्नका नाश कर देते हैं इसीप्रकार भयंकर वीर्यवान्१४०००हजार राक्षसोंको॥९॥तीक्ष्ण वाणोंके प्रहम्मे ॥५२॥ अकेले पैदल रामचन्द्रजीने मारडाला। केवल आधेही मुहूर्तमें खरको दूपणके सहित संहारकर ॥१०॥ ऋपिगोंको अभयदे समस्त दंडकवनको मंगलमय करदिया॥35॥ उन आत्मज्ञानी महात्मा श्रीरामचन्द्रजीने वीफे वधकीशंका करके, केवल नाककानही काटकर हमहीको अकेला छोडाहै ॥ १२॥ लक्ष्मणनाम रामचन्द्रका छोटा महातेजस्वी गुण और विक्रममें अपने बडे धाताकी तुल्यहै, वह उनकाही अनुरागी भक्तहै। वह अतिशयबुद्धिमान् बलवान् और वीर्यवान् है ॥ १३ ॥ विक्रमवान् है, क्रोन विष्टहै, सपहीको जीतनेवाला और आप किसीसे जीते जानेके योग्य नहीं है और श्रीरामचन्द्रजीके दहिनाहाथ, वरन् शरीरके बाहर रहनेवाला प्राण है ॥१४:: नकार्मुकंविकपतरामंपश्यामिसंयुगे॥ हन्यमानंतुतत्सेन्यं पश्यामिशरवृष्टिभिः ॥८॥ इंद्रेणेवोत्तमंसस्यमाहतंत्वश्मवृष्टिभिः॥ रक्षसांभीमवीर्याणां सहवाणिचतुर्दश ॥ ९॥ निहतानिशरेस्तीक्ष्णेस्तेनैकेनपदातिना ॥ अर्धाधिकमुहूर्तेनखरश्वसहदूपणः ॥ १० ॥ ऋपीणामभयंदत्तंकृतले माश्चदंडकाः ॥११॥एकाकथंचिन्मुक्ताहंपरिभूयमहात्मना । स्त्रीवर्शकमानेनरामणविदितात्मना ॥ १२॥भाताचास्यमहातेजागुणतस्तुल्य विक्रमः ॥ 'अनुरक्तश्चभक्तश्चलक्ष्मणोनामवीर्यवान् ॥ १३॥ अमीदुर्जयोजेताविक्रांतोबुद्धिमान्वली ॥ रामस्यदक्षिणोबाहुर्नित्यंप्राणोपहिच २ः ॥ १४ ॥ रामस्यतुविशालाक्षीपूर्णेदुसदृशानना ॥ धर्मपत्नीप्रियानित्यंभर्तुःप्रियहितेरता ॥१५॥ सासुकेशीसुनासोरूःसुरूपाचयशस्विनी ॥ देवतेववनस्यास्यराजतेश्रीरिवापरा ॥ १६ ॥ तप्तकांचनवर्णाभारक्ततुंगनखीशुभा ॥ सीतानामवरारोहावैदेहीतनुमध्यमा ॥ १७ ॥ नेवदेवीन गंधनियक्षीनचकिवरी ॥ तथारूपामयानारीढरपूर्वामहीतले ॥ १८॥ और रामचन्द्रजीकी जो स्त्रीहै उसकें नेत्र बडे २ हैं और वदन पूर्णमासीके चंद्रमाकी समानहै, रामचंद्रको बहुत प्यार करती हैं, और वह सदा पतिकी प्यारी और । करनेवाला कार्य करती रहती हैं ॥ १५ ॥ उस यशस्विनी रामचंद्रजीकी स्त्रीके केश, नासिका, ऊरू और रूप अति उत्तमहै । वह मानो उस वनकी अधिष्ठात्री - देवी और दूमरी लक्ष्मीकी समान विराजमान होरही हैं ॥ १६ ॥ उनके वर्णकी ज्योति तपाये हुए सुवर्णकी समानहै, कमर पतली और नसोंकी पंक्तिका शिर': लालहै । यह अतिशय सुन्दरता युन हैं और मब नियोंकी शिरोमणिहैं, उन्होंने विदेह वंशमें जन्म ग्रहण कियाहै, और यह सीतानाममे संसारमें विरय्यातहैं ॥ १७ ॥ देशी, न गम्भन पक्षिणी, न फिनसरी किमीकीभी सुन्दरना उनकी गोभाक मंगमें नहीं पलमानी. यहांतक कि, कभी हमने पग प्रतीपर बस प्रकार -- सनी नहीं देगी ॥ १८ ॥ वह मीता निमकी मीही, और वह जिसको हमे भरकर भेट वह पुरुष समस्त प्राणी क्या, बरन इन्द्रसभा आधकसुखर्स जागा दिलाता है ॥ ११ ॥ मीवाक माही अंग सब लोकोंके प्रशंसा करनेके योग्य हैं और पृथ्वीमें उसका रूप अतुलनीयहै । वह सुशीला तुम्हारेही लायक भायों और तुम उमांही अनुरुप पनिहो ॥ २० ॥ उसके दोनों पयोधर ऊँचेहे जंया अति विशालहै और मुखमण्डल अति श्रेष्ठहै उसको हम सोच विचार कर तुम् पी होने के योग्य जानने गईथी ॥ २३ ॥ हे महाभुज ! सो इस कार्यको करतेही, क्रूर लक्ष्मणने हमारे नाक कान काट डाले, उस पूर्णचंद्रमुखवाली नि। एमागको दंगही ॥ २२ ॥ तुम फूल्याणकारीके पुष वाणों का लक्ष्य बनोगे, यदि उसको अपनीनी बनानेका तुम्हारा आराय हो वो शीग्रही रामचंद्रके जीत यस्यमीताभदायिनतुष्टापरिप्वजेत्॥ अभिजीवत्ससर्वेपुलोकेप्वपिपुरंदरात् ॥ १९ ॥ सासुशीलावपुःश्लाघ्यारूपेणाप्रतिमाभुवि ॥ तवा नुरूपाभार्यासात्वंचतस्याःपतिपरः॥२०॥ तांतुविस्तीर्णजघनापीनोत्तुंगपयोधराम् भार्यार्थतुतवानेतुमुद्यताहवराननाम् ॥ २१ ॥ विरः पिनास्मिरंणलक्ष्मणेनमहाभुज ॥ तांतुदृष्ट्वायदेहीपूर्णचंद्रनिभाननाम् ॥ २२॥ मन्मथस्यशराणांचत्वंविधेयोभविष्यसि ॥ यदितस्यान भिप्रायोभार्यात्वेतवजायते ॥शीप्रमुद्भियतांपादोजयार्थमिहदक्षिणः ॥ २३ ॥ रोचतेयदितेवाक्यममैत्तद्राक्षसेश्वर ॥ क्रियतांनिर्विशंकेनवचनं ममगाण ॥ २४ ॥ विज्ञायैपामशक्तिंचक्रियतांचमहापल ॥ सीतातवानवद्यांगीभार्यात्वेराक्षसेश्वर ॥ २५॥ निशम्यरामेणशरेरजिह्मगेर्हता अनस्थानगतानिशाचरान् ॥ खरंचदृष्ट्वानिहतंचदुपर्णत्वमयकृत्यंतिपत्तुमर्हसि ॥ २६ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिका अरण्यकार्ड चतुनिशःसर्गः ॥ ३४ ॥ ततःशूर्पणखावाक्यंतच्छुत्वारोमहर्पणम् ॥ सचिवानभ्यनुज्ञायकार्ययुद्धाजगामह ॥ १ ॥ तत्कार्यमनुग गम्गनिर्गवायदुपलभ्यर ।। दोपाणांचगुणानांचसंप्रधार्यबलावलम् ॥ २॥ हिना परण आगे धरकर गलो ॥२३॥ हे राक्षसराज रावण ! हमारा यह वचन यदि तुम्हें रुचाहो वो जो हमने कहा उसको चित्तसे शंका त्यागकर करो ॥ २४ ।। हे महापल 1 गुम उनको अममथं और अपनेको समर्थ जानकर इस सर्वांग सुन्दरी सीताको नीवनानेमें यलवान होओ ॥२५॥ रामचंद्रजीने सीधे चलनेवाले वाणं गमा उस जनरयानयासी राक्षमोंको सरदूपणके सहित मारडााहै यह सुनकर अब जो कुछ कर्तव्यहो सो करो ॥ २६ ॥ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल- कौर आश्किामेआरण्यकाठे भापारीकायां चतुनिंगः सर्गः ॥ ३४ ॥ ॥ शूणिसाके यह रोमहर्षण वचन सुन कर्तव्य स्थिरकर मंत्रियोंकी सम्मति गरण जारधानमें जाने को वैपार हुआ ॥१॥ गमन करने के समय उस कार्यको भली भांतिसे छानकर, और उसके सब विपयोंको भली प्रकार सोच विचार दान 03 .प.भा. आरक ९०३ १३॥ ************* गुणभी समझ लेता हुआ, बल, अबल सब जानलिया, उसको जानकीका हरलाना महात्मा रामचन्द्रजीसे वैर करनाही ठीक जंचा ॥२॥ सब कर्वयोंका मनमें निधय कर स्थिरबुद्धिहो प्रथम रमणीक यानशालामें गया ॥ ३ ॥ और यानशालामें पहुँचकर राक्षसराज रावण गुप्तभावमे सारथिमे योला कि, शीवही रय वैयार करो ॥ ४ ॥ रावणके ऐसा कहतेही एक क्षणमें शीघ्रता करनेवाले सारथीने जोरथ रावणकी इच्छानुसार था उस रथको सजाया ॥ ५॥ रावण उस इच्छानुसार कंचनसे,बने हुए रत्नभूपित पिशाचवदनवाले खिचड जिसमें जुते हुए, ऐसे स्थपर सवार हुआ॥ ६ ॥ जब वह रथ चला तब उसका शब्द मेघोंके गर्जनेकी समान होता था। कुबेरका छोटाभाई राक्षसपति श्रीमान् दशानन उस रथपर चढ, नदनदीपति समुद्रकी ओर चला ॥ ७ ॥ रावणके ऊपर जो चमर और छत्र टगे थे वह दोनों इतिकर्तव्यमित्येवकृत्वानिश्चयमात्मनः ॥ स्थिखुद्धिस्ततोरम्यायानशालांजगामह ॥ ३॥ यानशालांततोगत्वाप्रच्छन्नंराक्षसाधिपः ॥ मूतंसं चोदयामासरथःसंयुज्यतामिति ॥४॥ एवमुक्तःक्षणेनैवसारथिर्लघुविक्रमः ॥ रथंसंयोजयामासतस्याभिमतमुत्तमम् ॥५|| कामगरथमास्थायकां चनरत्नभूपितम् ॥ पिशाचवदनैर्युक्तंखरेःकनकभूपणेः ॥६॥ मेघप्रतिमनादेनसतेनधनदानुजः॥ राक्षसाधिपति श्रीमान्ययौनदनदीपतिम् ॥७॥ सश्वेतवालव्यजनःश्वेतच्छचोदशाननः ॥ स्निग्धवेदुर्यसंकाशस्तप्तकांचनभूपणः ॥ ८॥ दशग्रीवोविंशतिभुजोदर्शनीयपरिच्छदः ॥ निदशारिर्मु नींनोदशशीर्पइवाद्रिराट् ॥ ९॥ कामगरथमास्थायशुशुभेराक्षसाधिपः ॥ विद्युन्मंडलवान्मेघःसवलाकइवांवरे ॥१०॥ सशैलसागरानृपं वीर्यवानवलोकयन् ॥ नानापुप्पफलेवृक्षेरनुकीर्णसहस्रशः॥ ११॥ शीतमंगलतोयाभिःपद्मिनीभिःसमंततः ॥ विशालराधमपदेवेदिमद्भिरलं कृतम् ॥ १२ ॥ कदल्यविसंशोभनालिकेरोपशोभितम् ॥ सालेस्तालेस्तमालेश्चतरुभिश्वसुपुष्पितेः ॥ १३ ॥ श्रेष्ठ थे, रावणके देहकी कांति वैदूर्यमणिके समान नीली थी, वह सब तपाये हुए सुवर्णके भुपण पहरे हुए था ॥ ८॥ उसके दरामुख, दश गर्दन, और चीन भुजा थी देवगणोंके शत्रु, और मुनियोंके हनन करनेको यह रावण साक्षात् दश कँगूरों करके युक्त पर्वतराजसा दिखाई देता था ॥९॥ यह रापण उस यथेच्छाचारी विमान पर चढकर ऐसा शोभित हुआ मानों सौदामिनीकै संग श्यामधन बगलोंकी पांतिके साथ गगनमंडलमें जाता है ॥ १० ॥ रायण चलते २ समुरे तीरसर पहुँचा बीचमें उसने बहुतसे पर्वत प. समुद्रकी,तलैटीके देश देखे यह स्थान अनेक प्रकारके पुष्प फल और गोंगे,शोभायमान.थे ॥38॥ शीतल मंगल जलगुनः गलेपो 12.2842HARYA ... - क पपरथी दीपन और बडे,२ आभौमि मह देश अटकत पा ॥ १२॥ साडेबा पण भा, भोर, हमा, गरिमा मेष रहा + प - गाल, दाल, तमालादि नाना जातिके पुष्पित वृक्ष लगेथे ॥ १३ ॥ वह स्थान, जो सदा नियमित भोजनम मम रहत एम परमापयास शाभायमान था नाग, गरुड, गन्धर्व और सहयों किन्नरभी वहांपर थे॥ १४ ॥ और कामदेवको जिन्होंने जीत रक्खाहै, ऐसे सिद्ध और चारणगणभी उस स्थानमें शोभित हो रहे थे, आज्य, धूम्र, वैसानस, सास, वालसिल्य, मरीचि आदिसे व्यान ॥ १५॥ दिव्य वनाभूपण, दिव्य माला, और दिव्यरूप वियोंमे व्यानथा। क्रीडा व रतिकी विधि जानने वाली हजारों अप्सराओंके साथ सिंद्धगण विहार करतेथे ॥ १६ ॥ देवोंकी श्रीसम्पन्न स्त्रियांभी घूम रही थीं, अमृत पीनेवाले देव दानवोंके ममूह भी इधर उधर फिरते थि ॥ १७ ॥ हंस, कौञ्च, मण्डूक और सारससमूह चारों ओर बोलरहेथे । वैदूर्यमणिके समान नीलवर्णके पत्थर वहांपर विराजनेथे और समुद्रतरंगोंकी हिलोरवग यह देश अत्यंतनियताहारेःशोभितंपरमर्पिभिः ॥ नागेःसुपर्णगंधर्व किनरेश्चसहस्रशः ॥१४॥ जितकामैश्चसिद्धेश्वचारणेश्योपशोभितम् ॥ आजैवैखानसे मपिलिखिल्यमरीचिपेः ॥१६॥ दिव्याभरणमाल्याभिर्दिव्यरूपाभिरावृतम् ॥ क्रीडारतविधिज्ञाभिरप्सरोभिःसहस्रशः॥ १६ ॥सेवितंदेवपनी भिःश्रीमतीभिरुपासितम् ।। देवदानवसंघेश्वचरितत्वमृताशिभिः ॥१७॥ हंसकौंचप्लवाकीर्णसारसःसंप्रसादितम् ।। वैदूर्यप्रस्तरंस्निग्धंसांदसागरते जसा ॥ १८॥ पाण्डुराणिविशालानिदिव्यमाल्ययुतानिच॥ तूर्यगीताभिजुष्टानिविमानानिसमंततः।।१९।। तपसाजितलोकानांकामगान्यभिसं पतन् ॥ गंधर्याप्सरसश्चैवदर्शधनदानुजः॥२०॥ निर्यासरसमूलानांचंदनानांसहस्रशः॥ वनानिपश्यन्सौम्यानिमाणतृप्तिकराणि ॥२१॥ अगुरूणांचमुख्यानांवनान्युपवनानिच ॥ तकोलानांचजात्यानांफलानांचसुगंधिनाम् ॥ २२ ॥ पुप्पाणिचतमालस्यगुल्मानिमरिचस्यच ।। गुकानाचसमूहानिशुप्यमाणानितीरतः ॥ २३ ॥ शैलानिप्रवरश्चैिवप्रवाल निचयांस्तथा ॥ कांचनानिचशृंगाणिराजतानितथैवच ॥ २४॥ मदाही शीतल और स्निग्ध भावकरके युक्तथा ॥ १८ ॥ इन सब वस्तुओंके सिवाय, रावण दिव्यमालायुक्त, गीत और बाजोंकी ध्वनि जिसमें होरही ऐसे। श्वेतवर्ण विशालविमानोंको चारों ओर देखने लगा ॥ १९ ॥ जिन लोगोंने अपने तपोबलसे अनेक लोकोंको जीत लियाहै, और इच्छाचारी विमानोंपर जो बैठे हैं, कुरेरके छोटे भाई रावणने जानेके समय मार्गमें उन गन्धर्वगणोंको अप्सराओं के साथ देखा ॥ २० ॥ वहांपर वनमें गौंद रस मूल सहित हजारों सुन्दर, नासिकाको अपनी सुगन्धिमे नृन करनेवाले चंदनके वृक्ष देखे ॥ २१ ॥ अगरके मुख्य वन उपवन अंकोल वृक्षोंके सुगन्धित पुष्पित और जायफलके फलित बन उपचनादि देखे ॥ २२ ॥ मालनाम एक वृक्षके फूल और काली मिर्च के गुल्मसमूह समुद्रके किनारे फूले व मोतियोंके समूह गिरे हुए देखे ॥ २३॥ पर्वत व मूंगोंकी चट्टा ***** आर० पा.रा.भा. ', नोंके समूह व चांदी सुवर्णके शृंगभी रावणने देखे ॥ २४ ॥ सुविमल जलपूर्ण अद्भुत मनोहर सोते धन धान्यके सहित स्त्री रलयुक्त ॥ २५ ॥ हाथी घोडे ना. अनेक प्रकारके नगर देखते हुए रावणने शीतल मंद सुगन्ध पवनसहित ।।२६ ॥ सिन्धुराजका अनूप किनारा देखा, वह देखनेमें स्वर्गकेही तुल्य था, वहांपर म: ॥५४॥ ओरसे मुनियों करके सेवित मेघसम श्याम एक बरगदका वृक्ष देसा ॥ २७ ॥ उसकी समस्त शाखा चारों ओर शत योजनके घेरमें फैल रहीथीं जहांपर पहले बडे शमः वाले हाथी और कछुएको ॥ २८ ॥ गरुडजी भोजन करने के लिये इस पेडकी एक शाखापर बैठेथे पक्षियों के स्वामी गरुडजीके बोझसे उसकी एक डाली ॥ २९ :: जिसमें बहुत पत्रं लगेथे टूट गईथी उसी शाखाका आश्रय कर वैखानस, माप, मरीचिप, वालखिल्य ॥ ३० ॥ और धूम्रारूप परमर्पिगण मिलकर तपस्या कर : प्रत्रवाणिमनोज्ञानिप्रसन्नान्यद्भुतानिच ॥धनधान्योपपन्नानिस्त्रीरत्नरावृतानिच ॥२५॥ हस्त्यश्वरथगाढानिनगराणिविलोकयन् ॥तंसमंसर्वतः स्निग्धंमृदुसंस्पर्शमारुतम् ॥ २६ ॥ अनूपेसिंधुराजस्यददर्शत्रिदिवोपमम् ॥ तत्रापश्यत्समेघाभन्यग्रोधमुनिभिर्वृतम् ॥ २७ ॥ समंतायत्यताः शाखा शतयोजनमायताः ॥ यस्यहस्तिनमादायमहाकायंचकच्छपम् ॥२८॥ भक्षार्थगरुडःशाखामाजगाममहाबलः॥ तस्यतांसहसाशाखांभारे णपतगोत्तमः ॥२९ ॥ सुपर्णःपर्णबहुलांवभंजाथमहाबलः ॥ तत्रवैखानसामापावालखिल्यामरीचिपाः॥३०॥आजावभूवुधूम्राश्चसंगताःपरमर्प यः॥ तेपांदयार्थगरुडस्तांशाखांशतयोजनम् ॥३१॥ भग्नामादायवेगेनतीचोभोगजकच्छयो । एकपादेनधर्मात्माभक्षयित्वातदामिपम्॥३२॥ निपादविपयंहत्वाशाखयापतगोत्तमः ॥प्रहर्पमतुलंलेभेमोक्षयित्वामहामुनीन् ॥३३॥ सतुतेनप्रहर्पणद्विगुणीकृतविक्रमः॥अमृतानयनाथवेत्रका रमतिमान्मतिम् ॥ ३४ ॥ अयोजालानिनिर्मथ्यभित्त्यारत्नगृहंवरम् ॥ महेंद्रभवनाद्गुप्तमाजहारामृतंततः ॥ ३९ ॥ तंमहर्षिगणेर्जुएंसुपर्णकृत लक्षणम् ॥ नामासुभदन्यग्रोधंददर्शधनदानुजः ॥ ३६ ॥ थे। धर्मात्मा गरुडीने उन ऋपियों के प्रति दया करके एक पैरसेही उस शत योजनकी ॥ ३१ ॥ टूटी हुई शाखाको पकड दूसरे पैरसे गज कच्छपको दवाय महात्म्म उनका मांस साकर ॥ ३२॥ उस टूटी हुई शाखाकी सहायतासे समस्त निपाददेशको नाश करदिया इस प्रकार मुनिगणोंको बचाकर गरुडजी परमहर्पित हुएथे ।। ३३ : अनन्तर उस हर्पक बराहो गरुडजीका विक्रम दूना वढगया, तो इस कारण मतिमान गरुइजीअमृतके लानेका विचार करते हुए ॥ ३६॥ और लोहेके जालको तोडसा: ************ जमण अगदी MAR . हुआ ॥३६॥ वहांसे नदीपति समुद्र के दूसरी पार जाकर दूसरे वनमें परम पवित्र रमणीक एक निर्जन आश्रम रावणने देखा ॥ ३७ ॥ रावणने देखा कि मारीचा निगाचर मृगचर्म और जगजूट धारण करके नियताहार कर वहां वास करताहै ॥ ३८॥ राक्षस मारीच रावणको देखतेही मिला और यथा विधानसे विविध भा : अमानुपी भोग्य वस्तुओंसे रावणकी पूजा करताहुआ ॥ ३९ ॥ इस प्रकार भोजनकी सामग्री व जलसे स्वयं रावणकी पूजाकर मारीच अर्थयुक्त वचन यो:- ॥ ४० ॥ हे राजन राक्षसेश्वर ! आपकी और लंकाकी कुरालतावो है ? फिर आप किस कारणमे यहां शीघही पधारे हैं ॥ ४५ ॥ जब मारीचने ऐसा कहा तब :: बोट में चतुर महातेजस्वी रावगने इसप्रकार कहना आरंभ किया ॥ ४२ ॥ इत्या श्रीमद्रा० वा० आदि० आरण्यकाण्डे भापाटीकायां पंचत्रिंश सर्गः ।। ३.. तंतुगत्वापरंपारंसमुद्रस्यनदीपतेः ॥ ददर्शाश्रममेकांतेपुण्येरम्येवनांतरे ॥ ३७ ॥ तबकृष्णाजिनधरंजटामंडलधारिणम् ॥ ददर्शनियताहामा रीनामराक्षसम् ॥ ३८॥ सरावणःसमागम्यविधिवत्तेनरक्षसा ॥ मारीचेनाचितोराजासर्वकामेरमानुपेः ॥ ३९ ॥ तस्वयंपूजयित्वाचभोगे नोदकेनन। अर्थोपहितयावाचामारीचोवाक्यमब्रवीत् ॥४०॥ कचित्तेकुशलराजल्लंकायांराक्षसेश्वर । केनार्थेनपुनस्त्ववैतूर्णमेवइहागतः॥४॥ पवमुक्तोमहातेजामारीचेनसरावणः ॥ ततःपश्वादिदवाक्यमत्रवीद्वाक्यकोविदः ॥ ४२ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिका ऽरण्यकांडे पंचविंशःसर्गः ॥ ३५॥ मारीचयूयतांतातवचनंममभापतः ॥ आतोंस्मिममचार्तस्यभवान्हिपरमागतिः ॥ १॥ जानीपेतन नस्थानभ्रातायत्रखरोमम ॥ दूपणश्चमहावाहुःस्वसाशूर्पणखाचमे ॥ २॥ निशिराश्चमहावाहूराक्षसःपिशिताशनः ॥ अन्येचवहवःदान लब्धलक्षानिशाचराः॥३॥वसन्तिमनियोगेनअधिवासंचराक्षसाः॥वाधमानामहारण्येमुनीन्येधर्मचारिणः॥४॥चतुर्दशसहस्राणिरक्षसांभान कर्मणाम् ॥ शूराणालब्धलक्षाणांखरचित्तानुवर्तिनाम् ॥५॥तेत्विदानीजनस्थानेवसमानामहाबलाः॥ संगता परमायत्तारामेणसहसंयुगे ॥६॥ तात मारीच ! कहनाहूं श्रवण करो। हम बडे दुःखी हैं, तुमही विपदके समय हमारी परम गतिहो ॥ १॥ जिस स्थानमें हमारा भाई खर और महावाहु दून : पहन शूर्पणसा रहा करतीथी उस जनस्थानको तुम जानतेहीहो ॥२॥मांसका सानेवाला राक्षस त्रिशिरा व औरभी बहुत निशाचरगण युदमें उत्साहीवशूरवीर ।। : मेरी आजा पाटन करते हुए वहां वास करतेथे। वह सब निशाचरगण महावन धर्मचारी ऋपियोंके अनुष्ठानमें सदाही वाधा दिया करतेथे॥४॥ इन सब राक्ष:- मस्या १००० चौदह हजार थी, वह सबही भयंकर कर्म करनेवाले शूर युद्धमें उत्साही और खरके चित्तके अनुसार कार्य करनेवाले थे ॥ ५॥ इससमय जन्म आर० स० नके रहनेवाले महाबलवान सर इत्यादि राक्षस युद्धमें रामचंद्रके साथ ॥६॥ विविध भाँतिके अन शस्त्र धारणकरके व दुर्भेद्य कवच बांधकर युद्धमें भिडेथे तब रामचन्द्र महामोध करके ॥७॥ कुछभी कठोर वचन न कहकर धनुपपर बाण चढाय उनको छोड चौदह हजार उग्रतेजवान राक्षसोंको ॥ ८ ॥ मनुष्य रामचंद्रने सर व दूप सहित सबको संग्राममें तीक्ष्ण दीतिमान नाराोंसे संहार किया ॥ ९ ॥और त्रिशिराकोभी मार दंडकवनको अभय करदिया । उस रामचंद्रका आचरणी ठीक नहीं मालूम होता, क्योंकि उसके पिताने उसको निर्लज जानकर स्त्रीसहित घरसे निकाल दियाहै ॥ १० ॥ वही दुःशील, कर्कश, तीक्ष्ण, मूर्स, लोभी. और अपिजितेंद्रिय, क्षत्रियकुलकलंक रामचंद्र इस राक्षसोंकी सेनाका मारडालनेवालाहै ॥ ११ ॥ जो धर्मका त्याग और अधर्मका आश्रय करके सदाही प्रा नानाशस्त्रप्रहरणाःखरप्रमुखराक्षसाः ॥ तेनसंजातरोपेणरामेणरणमूर्धनि ॥ ७॥ अनुक्कापरुपंकिंचिच्छरैर्व्यापारितंधनुः ॥ चतुर्दशसहस्राणिरक्ष सामुग्रतेजसाम् ॥ ८॥ निहतानिशरैर्दीप्तर्मानुपेणपदातिना ॥ खरश्चनिहतःसंख्येदूपणश्वनिपातितः ॥ ९॥ हत्वात्रिशिरसंचापिनिर्भयादं डका कृताः ॥ पिनानिरस्तःकुद्धेनसभार्यःक्षीणजीवितः ॥ १० ॥ सहतातस्यसेन्यस्यरामःक्षत्रियपांसनः॥ अशीलःकर्कशस्तीक्ष्णोमूर्योलु ब्धोऽजितेंद्रियः ।। ११ ॥ त्यक्तधर्मात्वधर्मात्माभूतानामहितेरतः ॥ येनवैरविनारण्येसत्त्वमास्थायकेवलम् ॥१२॥ कर्णनासापहारेणभगि नीमेविरूपिता ॥ अस्यभायांजनस्थानात्सीतांसुरसुतोपमाम् ॥ १३॥ आनयिष्यामिविक्रम्यसहायस्तरमभव ॥ त्वयाह्यहंसहायेनपार्श्वस्थेनम हावल ॥ १४ ॥ भ्रातृभिश्वसुरान्सर्वान्नाहमवाभिचिंतये ॥ तत्सहायोभवत्वेमेसमर्थोह्यसिराक्षस ॥१५॥वीर्येयुद्धेचदचनास्तिसहशस्तव ॥ उपायतोमहारोमहामायाविशारदः ॥ १६ ॥ एतदर्थमहंप्राप्तस्त्वत्समीपंनिशाचर ॥ शृणुतत्कर्मसाहाय्येयत्कार्यवचनान्मम ॥ १७॥ योंका अहित करनेमें रत रहता है जिसने विना वैरही केवल अपने बलके घमंडमें आय ॥ १२॥ नाक कान काटकर हमारी बहन शूर्पणखाको विरूप करदिया। इस कारण जनस्थानसे उसकी स्त्री सीता जोकि देवताओंसेभी बढकर रूपमें है।।१३॥ हम अपने विक्रमसे ले आयेंगे तुमको हमारी सहायता करनी होगी, तुम महावलवान सहायके साथ ॥१४॥ व अपने भाइयों के संग हम सारे देवताओंकोभी कुछ नहीं गिनते, तिससे हे मारीच । तुम हमारे इस विषयमें सहायक हो क्योंकि तुम समर्थ ॥ १५॥ नुम महागरहो और सब प्रकारकी माया जानतेहो. वीर्यमें, गुदम, दर्पमें और उपायमें तुम्हारी समान दूसरा कोई नहीं है ॥ १६ ॥ हे निशाचर ! इसी का जगेम गमय हम तुम्हारे गमीप आये हैं इग समय हमारी महायता करने के लिये जो कुछ तुमको करना होगा गोम बदले है, तुम पण गारो ॥ १७ ॥ .
तुम चांदी की बिन्दियें युक्त स्वर्णके मृग वनकर रामचन्द्र के आश्रममें जा सीताके सामने इधर उधर फिरना ॥१८॥ सीता मृगरूपी तुमको देखकर निःसन्देहही अपनें. स्वामी रामचंद्र और लक्ष्मणसे यह कहेगी कि इस मृगको पकडदो ॥१९॥ जब वह रामचंद्र और लक्ष्मण मृगको पकड़नेके लिये आश्रमसे दूर निकल जाँयगे तब हम शून्य आश्रम पाकर सीताको सुससहित निर्विन ले आवेंगे, जिस प्रकार राहु चंद्रमाकी प्रभाको हरण कर लेता है ॥ २० ॥ जब उनकी वीहर लीजायगी तब रामचंद्र शोकके मारे दुर्वल होजायगे नव उतार्थ होकर यथासुख और निःशंक चिनसे रामचन्द्रको संग्राममें जीवलेंगे ॥ २१॥ रावणके ऐसे वचन सुननेही महा त्या मारीचका मुस सूख गया और वह अतिशय भयभीत होगया ॥ २२ ॥ और चिन्ताके वश होकर अपने सूखे होठोंको जीभसे चाटने लगा और उसके नेत्र मानों सौवर्णस्त्वमृगोभूत्वाचिबोरजतबिंदुभिः ।। आश्रमेतस्यरामस्यसीतायाःप्रमुखेचर ॥ १८॥ त्वांतुनिःसंशयंसीतादृशातुमृगरू पिणम् ॥ गृह्यता मितिभरिलक्ष्मणंचाभिधास्यति ॥ १९ ॥ ततस्तयोरपायेतुशून्येसीतायथासुखम् ॥ निरावाधोहरिष्यामिराहुश्चंद्रप्रभामिव ॥ २० ॥ ततः पारसुसंरामेभार्याहरणकर्शिते ॥ विलब्धप्रहारष्यामिकृतार्थेनांतरात्मना ॥ २१ ॥ तस्यरामकथा श्रुत्वामारीवस्यमहात्मनः । शुष्कंसमभद्र कंपत्रिस्तोवभूवच ॥ २२॥ ओष्ठौपरिलिहन्छुष्कोनेरनिमिपरिव ।। मृतभूतइवार्तस्तुरावणसमुदॆशत ॥२३॥सरावर्णवस्तविपण्णचेतामहावने गमपराक्रमज्ञः ॥ कृतांजलिस्तत्त्वमुवाचवाक्यंहितंचतस्मैहितमात्मनश्च ।। २३ । इत्या श्रीमद्रा० पा० आदि० अरण्य पत्रिंशःसर्गः ॥३३॥ तत्वाराक्षसदस्यवाक्यवाक्यविशारदः । प्रत्युवाचमहातेजामारीचोराक्षसेश्वरम् ॥ १॥ सुलभा पुरुपाराजन्सततंप्रियवादिनः ॥ अप्रियस्य नपथ्यस्यवक्ताश्रोताचदुर्लभः ॥२॥ ननूनंयुध्यसेराममहावीर्यगुणोन्नतम् ।। अयुक्तचारश्चपलोमहेंद्रवरुणोपमम् ॥ ३॥ निमेपहीन होगये । मारीच आरवभावसे मृतकतुल्य होकर रावणकी ओर देखता रहगया ॥ २३ ॥ वह पहलेहीसे महावन में श्रीरामचंदजीके पराक्रमको जानताया। इमीकारणसे भयभीत और शोकितचित्तमे हाथ जोडकर रावणसे अपने व उसके हितके करनेवाले वचन बोला ॥ २४ ॥ ॥ इत्या श्रीमदामायणे वाल्मी। कीय आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भाषाटीकायां पत्रिंशः सर्गः ॥३६॥ ॥ महातेजस्वी राक्षसराजके यह वचन सुन वाक्यविशारद मारीच उससे बोला ॥ ॥१॥ हे राजन् ! मुहँ देसी कहनेवाले लोग बहुत मिलते हैं किन्तु सुननेमें कुप्पारे और वास्तवमें हितकारीहों ऐसे वचोंके कहने सुननेवाले दोनोंही संसारमें कम मिटने हैं ॥ २ ॥ एक तो तुमने दूतोंको नहीं नियुक्त कर रखाहै कि, जिससे सब स्थानोंका वृत्तांत तुमको मिलता रहै, दूसरे तुम्हारा स्वभाव चंचल 14 प. आर० स० है । इसी कारणसे रामचन्द्र जो साक्षात् महेन्द्र और कुबेरकी समान महावीर्यवान् और श्रेष्ठ गुणोंकरके युक्त हैं इस बातको तुमने नहीं जाना ॥ ३ ॥ तात ! रामचन्द्रसे वैर करनेमें क्या राक्षसकुलका मंगल होगा ! रामचन्द्र क्रोधित होनेपर क्या सर्व लोक राक्षसोंसे शून्य नहीं कर सकते हैं? ॥ ४॥ का जानकी तुम्हाराही नाश करनेके लिये वोउत्पन्न नहीं हुई हैं ? कहीं सीताके ले आनेका यह व्यवहार तुम्हारे दुःखका कारण न हो ? ॥ ५॥ तुम इच्छानुसार चलनेवाले और निरंकुराहो अर्थात् तुम्हारा कहने सुननेवाला कोई नहीं है इसकारण तुम्हारे राजा होते समस्त लंका तुम्हारे और सर्व राक्षसोंके साथ क्या विनष्ट न होगी ? अर्थात् अवश्य होगी ॥६॥ तुम्हारी समान जो राजा बुरे शीलवाला पापबुद्धि और इच्छानुसार चलनेवाला होताहै, वह राजा अपनेको, समस्त राज्य :: अपने कुटुंपियोंको नाश करनेका कारण होताहै ॥ ७ ॥ रामचन्द्र अपने पिता करके नहीं त्यागे गये हैं, वह मर्यादा रहित भी नहीं हैं, अथवा लोभी, दुःशील अं.: अपिस्वस्तिभवेत्तातसर्वेषामपिरक्षसाम् ॥ अपिरामोनसंक्रुद्धःकुर्याल्लोकानराक्षसान् ॥ ४॥ अपितेजीवितांतायनोत्पन्नाजनकात्मजा ॥ अपि सीतानिमित्तंचनभवेद्यसनमहत् ॥५॥ अपित्वामीश्वरंप्राप्यकामवृत्तंनिरंकुशम् ॥ नविनश्येत्पुरीलंकात्वयासहसराक्षसा ॥ ६॥ त्वद्विधः कामवृत्तोहिदुःशील पापमंत्रितः ॥ आत्मानंस्वजनंराष्ट्रंसराजाहंतिदुर्मतिः॥ ७॥ नचपित्रापरित्यक्तोनामर्यादःकथंचन ॥ नलुब्धोनचदुःशी लोनचक्षत्रियपांसनः ॥ ८॥ नचधर्मगुणीनकौसल्यानंदवर्धनः ॥ नचतीक्ष्णोहिभूतानांसर्वभूतहितेरतः ॥ ९॥ वंचितंपितरंदृष्ट्वाकेकेय्या सत्यवादिनम् ॥ करिप्यामीतिधर्मात्माततःप्रबजितोवनम् ॥ १० ॥ कैकेय्या प्रियकामार्थपितुर्दशरथस्यच ॥ हित्वाराज्यंचभोगांश्चप्रविष्टोदंड कावनम् ॥ ११ ॥ नरामःकर्कशस्तातनाविद्वान्नाजितेंद्रियः ॥ अनृतंनश्रुतंचैवनैवत्वंवक्तुमर्हसि ॥ १२॥ रामोविग्रहवान्धर्मःसाधु-सत्यपरा क्रमः॥ राजासर्वस्यलोकस्यदेवानामिववासवः ॥ १३॥ क्षत्रियवंशके नाशकभी नहीं हैं।८॥कौशल्याकुमार अपनी माताके आनंदको बढाने वाले धर्मसे वा गुणों से हीन नहीं हैं; उनका तीक्ष्ण स्वभाव नहीं है और वह सदा सा प्राणियोंका अहित करनेमें रतभी नहीं हैं वरन् सबका हित करने में तत्पर हैं।॥९॥अपने सत्यवादी पिताको कैकेयी करके ठगा हुआ देखकर वह रामचन्द्रजी उनके सत्य । रक्षा करने के लिये वनको चले आये हैं॥१०॥और पिता दशरथ, व रानी कैकेयीका प्रियकार्य करनेकी वासनासे राज्यसुखको जलांजलि देकर श्रीरामचन्द्रजी दंडकारपनी आयेहैं॥११॥ हे नात! रामचन्द्र कर्करास्वभाववाले भी नहीं हैं, मूर्ख भी नहीं हैं, अजितेन्द्रियभी नहीं हैं और मिथ्या कहनातो दूरहै, वह इस अँठाईके प्रसंगमें भी न है, मो उनके प्रति ऐमे पचन कहना आपको उचित नहीं है ।। १२॥ अधिक कहांतक कहूं: रामचन्द्र धर्ममूर्ति हैं, माधु हैं, सत्पपराकमयान, और इन्द्र जिसमकार देषता नोमानी । ही वहनी नब लोगोंके राजा है ॥ ३ ॥ वह आने नेजमे जनाकुमारी जानकीजीकी रक्षा करते हैं तुम किस प्रकारसे उनकी जानकीजीको ग्न कानकी इशा करतहीक्योंकि उनके हरण करनेकी इच्छा करना माना सूर्यको किरणको हायसे पकडनाहै ॥ १४॥ सब वाणही जिसकी शिखा गदा और गा जिस रन हैं, और जिसकी मीमामें गमन करना असंभव है मो उन रामरूप प्रज्वलित अनिमें सहसा प्रवेश करना तुमको उचित नहीं 11 का नहानाही जिसका प्रकाशित मुसहै, वाणही जिमकी दीनि है इसीसे असह्य धनुर्वाण धारण किये; इसीमे तीक्ष्ण और शत्रुओंकी सेनाके संहार मां ॥ १६ ॥ कनाल ममान गमवदनी मन्मुन राज्य सुरा जीवन और अपना इष्ट छोडकर तुमको जाना उचित नहीं। यदि गयेभी तो जातेही तुम्हारा नाशहो लगा ॥ १७॥ उन नसकी तुलना नहीं है. जानकी उनकीही मी है और मदाही उनके धनुर्वलका आश्रय करके वनमें वास करतीहै । तुम किसी भांतिभी जानकीको कधनतम्बदडीभितस्वेिनतेजसा । इच्छसेप्रसभंहतप्रभामिवविवस्वतः॥१४॥ शरार्चिपमनाधृप्यंचापखङ्गेधरणे ॥ रामामिंसहसादीप्तनप्रवेट समनि ।। १५ ।। धनुर्व्यादितदीतास्यंशरापिममर्पणः ॥ चापयाणधरतीक्ष्णशचुसेनापहारिणम् ॥ १६॥ राज्यसुखंचसंत्यज्यजीवितंचेटमा स्मनः ॥ नात्यामादयितुंतातगांतकमिहार्हसि ॥ १७ ॥ अप्रमेयंहितत्तेजोयत्यसाजनकात्मजा॥नत्वंसमर्थस्ताहतुरामचापाश्रयांवने।। १८॥ नम्बौनरसिंहम्यसिहोरकस्यभामिनी ॥ प्राणेभ्योपिप्रियतराभार्यानित्यमनुव्रता ॥ १९॥ नसाधर्पयितुंशक्यामेथिल्योजस्विनःपिया। दीप्त बाहनासम्बगियामीतामुमध्यमा ॥२०॥ किमुद्यमव्यर्थमिमंकृत्वातेराक्षसाधिप ॥ दृष्टश्चेत्त्वरणेतेनतदंतमुपजीवितम् ॥ २१ ॥ जीवितं चमगीरगन्यचरमुर्लभम् ।। मममनिये सार्थविभीपणपुरस्कृतेः॥ २२ ॥ मंत्रयित्वासधर्मिष्टेःकृत्वानिश्चयमात्मनः ॥ दोपाणांचगुणानां गर्मप्रधापालालम् ।। २३ ॥ आत्मनश्रवलंज्ञानारावास्यवतत्त्वतः ॥ हितंहितवनिश्चित्यक्षमंत्वंकर्तुमर्हसि ॥ २४ ॥ ratी कर सकोगे ॥ १८॥ मिहके ममान चौडी छातीवाले नरसिंह रामचन्द्रजी नित्य अनुगव सीताजीको प्राणसे भी प्यारी समझते हैं ॥ १९ ॥ प्रज्व ल अग्रिकी निगा गमान गंजस्ती गमनजीकी रिय मी श्यामा अवस्थावाली जानकीको हरलानेकी किसीको भी सामर्थ्य नहीं है ॥ २० ॥ गागगन ! महागाम निधिक उपममे प्रयोजन क्या है। जो यनमें रामचन्द्रजी कहीं तुम्हें मिलभी गये तो वहीं तुम्हारे जीवनकी इतिश्री होजायगी ॥ २१ ॥ हंगो गार गुग प्राण यह इस मंमाग्में महादर्लभ है इसमे जो सुग भोग किया चाहो तो रामचन्द्रजीसे वैरभाव न करो अब यहांसे जाय सब विभीषणादि मंत्रियों के माध ॥ २२ ॥ गाहकर अपना भाभी रिभरकर गुग दोपोंको विचार रामचन्दजीके और अपने बलको जांचकर ॥२३॥ फिर रामचन्द्रजीके बलमें अपना बळ मिथ्या आर० नि मेरी रायमें तो तुमको चुप रहना उचितहै । बस तुम्हारा हित इसीमें होगा हमारेइन कडे वचनोंको जो मैंने आपका हित करनेके लिये कहे हैं क्षमा करना || ॥ २४ ॥ हमें कौशल्याधिप दशरथजीके पुत्र श्रीरामचन्द्रजीके साथ तुम्हारा युद्धमें समागम करना अच्छा नहीं लगता, इसकारण हे राक्षसनाथ ! फिरभी तुम्हारे हिनकी युक्तियुक्त पार्ना कहवाहूं तुम श्रवण करो ॥ २५ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदि० आरण्यकाण्डे भापाटीकायां समत्रिंशः सर्गः ॥ ३७ : में एक समय अपने बलवीर्यके घमंडके मारे पृथ्वीपर घूमता हुआ फिरताथा मेरे पर्वतकी समान शरीरमें सहस्र हाथियोंका बलथा ॥ १ ॥ हाथमें परिघ आम लिये मस्तकपर किरीट कानमें तपाये हुए सोनेके बने कुण्डल पहरेथा। मेरे देहकी कान्ति नीले वादरोंके समानथी इसप्रकारकी अवस्थामें लोकोंको भय उपजा: हुआ ॥ २ ॥ मैं दंडक वनमें घूम २ कर ऋपिलोगोंका मांस भक्षण करताथा अनन्तर धर्मात्मा महामुनि विश्वामित्रजी मेरे भयसे भीत होकर ॥ ३ ॥ अहंतुमन्येतवनक्षमरणेसमागमकोसलराजसूनुना ॥ इदंहिभूयःशृणुवाक्यमुत्तमंक्षमंचयुक्तंचनिशाचराधिप॥२५॥इत्या श्रीमद्रा वाल्मीकीय आदि० अर० सप्तविंशः सर्गः॥३७॥कदाचिदप्यहवीर्यात्पर्यटन्पृथिवीमिमाम् ॥वलंनागसहस्रस्यधारयन्पर्वतोपमः ॥॥ नीलजीमूतसंकाश स्तप्तकांचनकुंडलः ॥ भयंलोकस्यजनयन्किरीटीपरिघायुधः ॥२॥ व्यचरन्दंडकारण्यमृपिमांसानिभक्षयन् ॥ विश्वामित्रोथधर्मात्मामविस्तो महामुनिः ॥३॥स्वयंगत्वादशरथनरेंद्रमिदमब्रवीत् ॥ अयंरक्षतुमारामःपर्वकालेसमाहितः॥४॥मारीचान्मेभयंघोरंसमुत्पन्नंनरेश्वर ॥ इत्येवसु तोधर्मात्माराजादशरथस्तदा ॥५॥ प्रत्युवाचमहाभागविश्वामित्रमहामुनिम् ॥ उनद्वादशवर्पोयमकृतास्त्रश्चराघवः ॥ ६॥ कामंतुममतत्सेन्यं मयासहगमिप्यति ॥ वलेनचतुरंगेणस्वयमेत्यनिशाचरम् ॥ ७॥ वधिप्यामिमुनिश्रेष्ठशतवयथेप्सितम् ॥ एवमुक्तःसतुमुनीराजानमिदमत्रवी त् ॥ ८॥ रामानान्यदलंलोकेपर्याप्तंतस्यरक्षसः ॥ देवतानामपिभवान्समरेप्वभिपालकः॥९॥ जाकर राजा दशरथसे यह बोले कि, अमावस्या और पूर्णमासीको जब हम समाधि अवस्थामें रहेंगे उस समय इन रामचंद्रको हमारी रक्षा करनी होगी ॥ ४ ॥ हे राजन् । मारीच राक्षससे हमको घोर भय उत्पन्न हुआहै । जब कपिने इस प्रकार कहा तब धर्मात्मा राजा दशरथ ॥५॥ उन महर्षि महाभाग विश्वामित्रको प्रत्यु:: देते हुए कि, रामकी अवस्था अभी सोलह वर्षसेभी कमहै और अवविद्याभीअभी इन्हें नहीं आती ॥६॥ इसकारण इनको नहीं देसकते पन्तु तुम्हारा कार्य करनेके लिये हम अपनी वडी भारी चतुरंगिनी मेना सहित चलकर वहां उस निशाचरको॥७॥ यमलोकौ पठायेंगे जोकि आपका शहै, जिसका संहार करना आपको अभीष्टहै, विभामिनी गजा दशरथजीफे यह पचन सुन उनगे बोले ॥ ८॥ ययपि यह गन्म कि, आर मंगाममें देयताकिभी रक्षक हो और सम्हाग किप 1- क लोकोंमें प्रगट है परन्तु रामचंद्रके सिवाय और किसीका बलभी इस राक्षसका नारा करने में समर्थ नहीं होगा, इस कारण हे परंतप ! तुम्हारी जो बड़ी भारी चतुरंगिनी मेनाहै यह यहीं रहै ॥२॥ १० ॥ यह महातेजस्वी रामचंद्र वालक होनेपरभी राक्षसोंका नाश करनेमें समर्थ होंगे इससे हम इनको लेजायगे । हे राजन् ! तुम्हारा कल्याणहो ॥ ३१ ॥ महर्षि विश्वामित्रजी यह कहकर श्रीरामचंद्रजीको साथले परमप्रीतियुक्त हो अपने सिद्धाश्रममें आये ॥ १२ ॥ तिसके पीछे जब महर्षि विश्वामित्रजी वन करनेके लिये दीक्षित हुए, तब श्रीरामचंदजी विचित्र धनुषकी टंकार करतेहुए विश्वामित्रजीके समीप आये ॥ १३ ॥ उनके गलेमें सुवर्णकी माला मस्तकपर अलके हाथमें धनुप, दोनों नेत्र परम सुन्दर, एक मात्र जांघिया पहरे ब्रह्मचारी गरीर श्यामल वर्ण और अतिसुन्दरताईसे शोभायमान, नरतक उनके रैस इत्यादि पुरुपचिह्न नहीं प्रगट हुएथे ॥ १४ ॥ वह,अपने तेजसे समस्त दंडकारण्यको सुशोभित करके द्वितीयाके चंद्रमाकी समान उदय होते हुए आसीत्तवकृतंकमंत्रिलोकपिदितंनृप ॥ काममस्तिमहत्त्सैन्यंतिष्टविहपरंतप ॥ १० ॥ वालोप्येपमहातेजाःसमर्थस्तस्यनिग्रहे ॥ गमिप्येराम मादायस्वस्तितेऽस्तुपरंतप ॥ ११ ॥ इत्येवमुक्कासमुनिस्तमादायनृपात्मजम् ॥ जगामपरमप्रीतोविश्वामित्रःस्वमाश्रमम् ॥ १२ ॥ तंतथादंड कारण्येयनमुदिश्यदीक्षितम् ।। बभूवोपस्थितोरामश्चित्रविस्फारयन्धनुः ॥ १३ ॥ अजातव्यंजनःश्रीमान्यालःश्यामःशुभेक्षणः ॥ एकवस्त्रधरो धन्वीशिखीकनकमालया ॥ ११ ॥ शोभयन्दंडकारण्यंदीप्तेनस्वेनतेजसा ।। अदृश्यततदारामोवालचंद्रइवोदितः ॥ १५॥ ततोऽहं वसंकाश स्तप्तकाचनकुंडलः ।। बलीदत्तवरोदादाजगामाश्रमांतरम् ॥ १६॥ तेनहष्टःप्रविष्टोऽहंसहसेवोधतायुधः ।। मातुदृष्ट्वाधनुःसज्यमसंभ्रांतश्चकारह ।। १७ ।। अगजाननसंमोहादालोऽयमितिराघवम् ॥ विश्वामित्रस्यतविदिमभ्यधाकृतत्वरः ॥ १८॥ तेनमुक्तस्ततोबाणाशितःशबुनिवर्हगः ॥ तेनहिंताडितःशितःसमुद्रेशतयोजने ॥ १९॥ नेच्छतातातमहिंतुंतदावीरेणरक्षितः ॥ रामस्यशरवेगेननिरस्तोत्रांतचेतनः॥२०॥ दिगलाई देने लगे ॥ १५ ॥ उस समय हम वनकाश्चन कुण्डलधारी, मेघका रंग धारण करके ब्रह्माजीके दिये हुए वरप्रमावसे वलमदसे दर्पित हो विश्वामित्रजीके आश्रममें आये ॥ १६ ॥ में जनेही उनसे छिपकर हथियार लेकर आया वैसेही हमको आया हुआ देखतेही श्रीरामचंद्रजीने तत्क्षण आयुध उठाकर हर्पित हो अनुपपर गर चढाया ॥ १७ ॥ बहुवही मोहवश होने के कारण हम बालक समझ उनको ध्यानमें न लाकर बड़ीशीयतासे विवामित्रजीकी यज्ञवेदीके ऊपरको दौडे। ॥ १८ ॥ यह देखकर श्रीरामचंदजीने शत्रुओंके मारनेवाले तीखे बाणोंको चला हमें घायल कर शव योजन दूर समुद्रमें फेंक दिया ॥ १९ ॥ हे तात ! हमारे मारने की इच्छा उम समय उनको नहीं थी इसीकारणसे उन्होंने उस समय हमको संहार न कर रक्षा की तिसके पीछे हम रामचंद्रजीके वाणवेगसे मूर्षित होकर उतनी **************** आरब र पोगरे ॥२०॥ गंभीर गमुद्रक जटमें गिरे और बहुत देरके पीछे चैतन्यता प्राप्त कर लंकामें आये ॥ २१ ॥ इस प्रकारसे हमने वो रक्षा पाई । परन्तु कठिन मंकानाले गमगंदने अगिक्षिनाग और पाठक होनेपरभी हमारे सहायक सब राक्षसोंको मार डाला ॥ २२ ॥ इसी कारणसे निवारण करताहूं कि यदि तुम गपंजी माप पुर करोगे तो भयंकर विपदमें पडकर नाराको प्राप्त होजाओगे ॥ २३ ॥ और अपने आप यल करके समाज उत्सवोंके देखनेवाले और कीडा गीको पिरि जाननेराले गक्षोके कारण वृथा संताप वटोरोगे ॥ २४ ॥ वस सीताहीके लिये, अटा और अटारि, वा धवरहरोंसे पूर्ण नानारत्नभूपिता लंका नगरीयो गुप नागरान देगोगे ॥२५॥ जिस प्रकार किसी तालायमें सर्प होतेहैं वो वहांकी विचारी मछलियांभी गरुड करके मारडाली जाती हैं। इसी प्रकार जो पातितोऽहंतदातेनगंभीरसागरांभसि ॥ प्राप्यसंज्ञांचिरात्तातलंकांप्रतिगतःपुरीम् ॥२१॥ एवमस्मितदामुक्तःसहायास्तेनिपातिताः ॥ अकृतास्त्रे परामेणगलेनालिष्टकर्मणा ॥ २२ ॥ तन्मयावार्यमाणस्तुयदिरामेणविग्रहम् ॥ करिष्यस्यापदंघोरांक्षिप्राप्यनशिष्यसि ॥ २३॥ क्रीडारति विधिज्ञानासमाजोत्सवदर्शिनाम् ॥ रक्षसांचेवसंतापमनथंचाहरिप्यसि ॥२४॥हयंप्रासादसंवाधांनानारत्नविभूपिताम् ॥ द्रक्ष्यसित्वपुरीलंकावि नष्टमिथिलीटते ॥ २५ ॥ अकुर्वतोपिपापानिशुचयःपापसंश्रयात् ॥ परपाविनश्यंतिमत्स्यानागह्रदेयथा ॥ २६॥ दिव्यचंदनदिग्धांगा न्दियाभरणभूपितान् ॥ द्रक्ष्यस्यभिहतान्भूमौतवदोपात्तुराक्षसान् ॥ २७॥ हतदारान्सदारांश्चदशविद्वतोदिशः॥हतशेपानशरणान्द्रक्ष्यसित्वं निशानरान् ॥२८॥ शरजालपरिक्षिप्तामग्निज्वालासमावृताम् ॥ प्रदग्धभवनांलंकांद्रक्ष्यसित्वमसंशयम् ॥२९॥ परदाराभिमर्शात्तुनान्यत्पापतरं महत् ॥ प्रमदानासहस्राणितवराजन्परिग्रहे ॥ ३० ॥ भवस्वदारनिरतःस्वकुलंरक्षराक्षसान ॥ मानवृद्धिचराज्यंचजीवितंचेष्टमात्मनः ॥३१॥ डोस पार नहीं करते, ऐमे शुद्धात्मा पुरुषभी, पापात्माके आश्रयमें रहनेसे उस पापात्माके पापसे विनाशको प्राप्त होते हैं ॥ २६ ॥ इस कारण तुम देखोगे कि तुम्हारे निनो दोपमे दिप्प चंदन गरीरमें उगाये हुए, दिव्य वनाभुपण पहरे हुए निशाचर गण समूल भूमियों में गिरेंगे ॥२७॥और मरनेसे बचे आश्रयरहित राक्षस गण कोई पीरहित हो कोई पीके महित दो दिगाओंको भागेंगे ॥२८॥ नुम शरजालमे छाई हुई अमिकी शिखामे पीडित हुई, ऐसी लंकापुरीके सवही गृह एकही कालमें भस्म पुर गंगे ॥ २९॥ श्योंकि पराई गीफे हरणकरनेकी नुन्य और कोई भारी पाप नहीं है हे गजन् ! तुम्हारे रनवाममें सैकड़ों हजारों त्रियां विराजमान ६ ॥१. म भनी पण उनी गमान नियाग भागका कर अपने पंग, अभील पाण, गन्य, पद, मान और, गक्षमटकी रक्षा करो ॥२०॥ -
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- आर०क स०३९ स्मरण कर ॥ ९ ॥ मारडालनेकी इच्छासे कोधितहो, यद्यपि उनके पराक्रमको जानतेथे तथापि अपने वडे २ सींग आगेको झुकाय मृगरूपसे उनपर धाव मान हुए ॥ १० ॥ तब उन्होंने कानके समीपतक धनुपको खेचकर तीन नाराच हम तीन मृगोंके ऊपर चलाये, वह वाण गरुड व पवनकी गति समान चले ॥ ॥ ११ ॥ यह पनसम आकार वाले अतिघोर रक्त पीनेवाले वाण हम तीनोंके ऊपर आगमन करनेलगे ॥ १२ ॥ हम बडे मूर्खथे, पहलेही रामचन्द्रसे भय देसकर उनका पराकम भली भांति जानतेथे तोभी लडे, परन्तु हम तो उनका पराक्रम जान भागकर किसी रीतिसे वचगये, परन्तु वह हमारे सहाई राक्षस रामचन्द्रजीके दो घाणोंसे मारे गये ॥ १३ ॥ हे रावण ! हम किसीप्रकारसे रामचन्द्रजीके बाणसे अपने प्राणों को बचा तपस्वीका धर्म ग्रहणकर चित्तको अभ्यधावंसुसंक्रुद्धस्तीक्ष्णशृंगोमृगाकृतिः॥ जिघांसुरकृतप्रज्ञस्तंप्रहारमनुस्मरन् ॥१०॥ तेन त्यक्तास्त्रयोवाणा शिताःशनिवर्हणाः॥ विकृप्यसु महचापंसुपर्णानिलतुल्यगाः ॥ ११ ॥तेवाणावसंकाशाःसुघोरारक्तभोजनाः ॥आजग्मुःसहिताःसर्वेश्यासन्नतपर्वणः॥ १२॥ पराक्रमज्ञोराम स्यशठोदृष्टभयःपुरा ॥ समुत्क्रांतस्ततोमुक्तस्तावुभौराक्षसीहती॥ १३॥शरेणमुक्तोरामस्यकथंचित्प्राप्यजीवितम् ॥ इहप्रवाजितोयुक्तस्तापसो ऽहंसमाहितः ॥ १४ ॥ वृक्षेवृक्षेहिपश्यामिचीरकृष्णाजिनांवरम् ॥ गृहीतधनुपंरामंपाशहस्तमिवांतकम् ॥ १५॥अपिरामसहस्राणिभीत:पश्या मिरावण ।। रामभूतमिदंसर्वमरण्यंप्रतिभातिमे ॥ १६ ॥ राममेवहिपश्यामिरहितेराक्षसेश्वर ॥ दृष्ट्वास्वप्रगतराममुद्धमामीवचेतनः ॥ १७ ॥ रकारादीनिनामानिरामस्तस्यरावण ॥ रत्नानिचरथाश्चैववित्रासंजनयंतिमे ॥ १८ ॥ अहंतस्यप्रभावज्ञोनयुद्धतेनतेक्षमम् ॥ वलिंबानमुचिं यापिहन्यादिरघुनंदनः ॥ १९॥ रोके हुए इस स्थानमें योगका अवलम्बन करके तपस्या करते हैं ॥ १४ ॥ तबसे हम फांसी हाथमें लिये यमराजकी समान उन चीर व मृगचर्म धारण किये धनुपधारी रामचन्द्रको मानो प्रत्येक वृक्षके तले देखते हैं ।। १५ ॥ हम भयके मारे भीतहो निरन्तर सहनों रामोंको जहां तहां देखते हैं। इस समस्तही वनमें मानो श्रीरामच न्दजी हमको दिसाई देरहे हैं ॥ १६ ॥ हे राक्षसेश्वर ! हम रामचंन्द्र करके रहित स्थानमें भी बरावर केवल उन्हीं रामचन्द्रको देसते हैं, वरन् स्वनमेंभी उनाने देसकर मैं डरके मारे जागतेकी समान इधर उधर दौडने लगताहूं ॥१७॥ हे रावण ! हम तुमसे अधिक कहांतक कहै कि हम रामचन्द्रने यहांतक उर गये हैं कि-रत्न, रथ, इत्यादि जिन गन्दोंके आदिमें रकारहै उन शब्दोंके श्रवण करनेमेभी हमें डर लगता है ॥ १८ ॥ हम भली भांति उन ग्घुनंदन गमचन्द्रजीके परामको जानते on"t meaninनही, ना गम प्रा MAITA म 148,दम मग माम" .." . हैं। इस कारणमे उनके साथ युद्ध करना तुमको उचित नहीं है । यह राम बलि अथवा नमुचिको संहार करनेमें भी समर्थ है ॥ १०॥ हरावण ! तुम रामचन्द्र साथ गुद करो वा न करो, परन्तु यदि हमको देखनेका अभिलाप करतेहो तो हमारे साथ श्रीरामचन्द्रजीकी वार्ना मतकरो नहीं तो हम यहांसे चले जायेंगे ॥२० इन लोकमै धर्मका अनुष्ठान करनेवाले योगयुक्त होकरभी बहुतसे पुरुष पराया अपराध करनेसे सपरिवार विनाराको प्राप्त हुए हैं ॥ २३ ॥ इसी प्रकार तुम्हारे अपरा: हमको नाग होना पडेगा. हे निगाचर ! जो तुम्हारी इच्छा हो सो करो, परन्तु हम तुम्हारे साथ नहीं चलेंगे, हमें अपने प्राण प्यारे हैं ॥ २२ ॥ वह महातेज महाबुद्धिमान महायलवान रामचंद्रजी वास्तवमेंही निशाचरोंके काल हैं ।। २३ ।यद्यपि पहले जनस्थानका रहनेवाला अपावन खर, शूर्पणखाके लिये रामचंद्रमे माग रणरामेणयुद्धयस्वभमांपाकुरुरावण ॥ नतेरामकथाकार्यायदिमांद्रष्टुमिच्छसि ॥ २० ॥ बहवःसाधवोलोकेयुक्ताधर्ममनुप्टिताः ॥ परेपामपरा धेनविनष्टा सपरिच्छदाः ॥२१॥ सोऽहंपरापराधेनविनशेयंनिशाचर ॥ कुरुयत्तेक्षमतत्त्वमहत्वांनानुयामिवे ॥२२ ।। रामश्चहिमहातेजामहास सोमहाबलः ।। अपिराक्षसलोकस्यभवेदंतकरोऽपिहि ॥ २३॥ यदिशुर्पणखाहेतोर्जनस्थानगतःखरः ॥ अतिवृत्तोहतःपूर्वरामेणाक्लिष्टकर्मणा ।। अवरहियथातत्त्वकोरामस्यव्यतिक्रमः ॥ २४ ॥ इदंवचोवंधुहितार्थिनामयायथोच्यमानंयदिनाभिपत्स्यसे ॥ सवांधवस्त्यक्ष्यसिजीवितरणेह तोड्यगर्मणशरंजिलगः ॥२५॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांड एकोनचत्वारिंशःसर्गः ॥३९॥ मारीचस्यतु । तदारयंत्रमयुक्तंचरायणः । उक्तोनप्रतिजग्राहमर्तुकामइयौपधम् ॥ १ ॥ तंपथ्यहितवक्तारंमारीचंराक्षसाधिपः॥ अत्रवीत्परुपंवाक्यमयुक्तंकाल । गोदितः ॥२॥ दुप्फुलेतदयुक्तार्थमारीचमयिकथ्यते ।। वाक्यनिष्कलमत्यर्थवीजमुप्तमिवोखरे ॥३॥ डाला गया, परन्तु हम विपरमें रामचन्द्रजीका क्या अपराध है सो तुम्ही सत्य २ कहो ॥ २४ ॥ तुम हमारे बन्धुहो इश कारणमे हमने तुम्हारे मंगलफेही लिये य' मत्य वचन करे, यदि तुम हमारे वचनोंको न मानकर रामचन्द्रसे पर करेंगे तो निश्चयही बन्धु वान्धवों सहित रामचन्द्रजीके बाणोंसे युद्धमें विनाशको प्रातह। तुमको पाण परित्याग करना पडेगा ॥ २५ ॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायामकोनचत्वारिंशः सर्गः ॥ ३९ । जिम प्रकार मृत्यु जिमकी निकट ऐमा रोगी औषधि ग्रहण नहीं करता ऐनेही सहनेके योग्य व उचित मारीचके वचन रावणने ग्रहण नहीं किये ।। ३ ।। उस काल! वन निगारपनि रायणने मंगलजनक और युक्तियुक्त संगत वचन कहने वाले मारीचसे अयोग्य व कठोर वचन कहे |॥ २ ॥ हे मारीच ! तुमने जो यह राज आर म०। - प्रतिकुलपचन हमसे कहे, यह अयोग्य हैं और ऊसरमें बीजयोनेकी समान ॥ ३ ॥ तुम्हारे वचन मुझे युद्ध; रामसे नहीं हरातकते कारण कि, वह मूर्स पापशील साधारण मनुष्यहे ॥ ४ ॥ निप्फलहै जो पुरुप साधारण स्त्रीके कहनेसे माता, पिता, राज्य और सुहृद्दों को छोडकर एकसाथ वनमें चला आयाहै यह मूर्सता ... नो क्याहै ॥ ५॥ सो हम तुम्हारे सामने अवश्यही युद्धमें खरके नाशकरनेवाले उस रामकी माणसे अधिक प्यारी भार्याको हरण करंगे ॥ ६ ॥रेमारीच ! हनी अपनी बुद्धिसे अपने हृदयमें ऐसा निश्चय करही लियाहै, सो इन्द्र के सहित सुरासुरगणभी इसके विरुद्ध नहीं कर सकते । अर्थात् हमको इस संकल्पसे नहीं है सकते ॥ ७ ॥ यदि हम इस कार्यके विपयर्मे कर्त्तव्याकर्त्तव्य निश्चय करनेको तुमसे पूछते, तब तुमको उसके दोप, गुण, हानि, लाभ उपाय; इत्यादि कहने उचितथे " त्वद्राक्ये तुमाशंक्यंभेतुरामस्यसंयुगे । मूर्खस्यपापशीलस्यमानुपस्यविशेषतः ॥४॥ यस्त्यक्त्वासुदोराज्यमातरंपितरंतथा ॥ स्त्रीवाक्यंप्राकृ तंश्रुत्वावनमेकपदेगतः॥५॥ अवश्यंतुमयातस्यसंयुगेखरघातिनः ॥ प्राणे:प्रियतरासीताहर्तव्यातवसंनिधी॥६॥ एवंमेनिश्चिताबुद्धिहदि मारीचविद्यते ॥ नव्यावर्तयितुंशक्यासेंद्रेरपिसुरासुरैः ॥ ७ ।। दोपंगुणवासंपृष्टस्त्वमेवंवतुमर्हसि ॥ अपायंबाउपायवाकार्यस्यास्यविनिश्चये॥८॥ संपृटेनतुवक्तव्यंसचिवेनविपश्चिता ॥ उद्यतांजलिनाराज्ञोयइच्छेद्भूतिमात्मनः ॥ ९॥ वाक्यमप्रतिकूलंतुमृदुपूर्वशुभंहितम् ॥ उपचारेणवक्त व्योयुक्तंचवसुधाधिपः॥ १० ॥ सावमदतुयद्वाक्यमथवाहितमुच्यते । नाभिनंदेतद्राजामानार्थीमानवर्जितम् ॥ ११॥ पंचरूपाणिराजानो धारयंत्यमितौजसः ।। अमेरिंद्रस्यसोमस्ययमस्यवरुणस्यच ॥ १२॥ औप्ण्यंतथाविक्रमंचसौम्यंदप्रसन्नताम् ॥ धारयंतिमहात्मानोराजानः क्षणदाचर ॥ १३ ॥ तस्मात्सर्वास्ववस्थासुमान्याःपूज्याश्चनित्यदा ॥ त्वंतुधर्ममविज्ञायकेवलंमोहमाश्रितः ॥ १४॥ ८ ॥ जो ज्ञानवान मंत्री अपने ऐश्वर्यके अभिलापी होतेहैं वह राजा करके पूछे जानेपर हाथ जोड पूछे हुए विपयका उत्तर नम्रतासे निवेदन करतेहैं ॥ ९॥ कारण कि राजाओंके समीप, उपचारयुक्त मनोहर, मंगलजनक अप्रतिकूल वचनही कहने ठीकहैं ॥ १० ॥ मंगलजनक वचनसेभी यदि अपमान होता हो तो माननीय राजालोग उस सन्मान रहित वचनोंको सुन प्रसन्न नहीं होते अथवा ग्रहण नहीं करते ॥ ११ ॥ हे,निशाचर । अमिततेजस्वी महात्मा भूपतिलोग, अमि, इन्द्र, चंद, हम और करुण इन पंच देवनाओंका रूप धारण करते हैं ॥ १२॥ इममेही हे मारीच ! उनमें अमिकी गरमाई, इन्द्रका पराफम, चंद्रमाकी शीतलनाई, यम, .."RaikRRitikhatarki ।। ६० गमकी समानता और घरुणरुगमान प्रमग्नता होनी ॥ १३॥दम फारणगे गयी अवगर, ना गम्पाग गरमा गोरग१रुप पनका पिन भी
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पा.ग.भा. आर० हम गमको ठगार पिना युद्ध किये सीताको प्रानकर कृतकार्य हो फिर लंकापुरीको तुम्हारे सहित लौटेंगे ॥ २५ ॥ हे निशाचर.मारीच ! यदि तुम हमारे वचनोंके पनिरल कगेरे नी अभी हम तुमको मार डालेंगे, यह मेरा कार्य क्लसे तुमको अवश्य करना होगा कोई पुरुप राजाके विरुद्ध आचरण करके सुख संपत्ति नहीं पागना ।। २६ ।। रामचन्द्र के निकट जानेसे तुम्हारे जीवन में संशय मात्र है, परन्तु हमारे साथ विरुद्धाचरण करनेसे इसी समय तुम्हारी मृत्यु निश्चय होगी, सो पानी पुरिने यथाचित विचार कर इन विपयमें जो कर्तव्य हो सो करो।। २७ ।। इत्या श्रीमद्रा. वा० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकयां चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥ मागेर राशनपनि रापण करके राजाकी तमान मनोगत विषयमें आज्ञा पाकर शंका रहित चित्तसे यह कठोर वचन बोला ॥ १ ॥ कि हे निशाचरराज ! किस गायसीतामयुद्धेनवंचयित्वातुराघवम् ॥ लंकांप्रतिगमिष्यामिकृतकार्यःसहत्वया ॥२५॥ नोचेत्करोपिमारीचहन्मित्वामहमद्यवे॥ एतत्कार्यमव शंमेवलादपिकारिप्यसि ॥राज्ञोविप्रतिकूलस्थोनजातसुखमेधते॥२६॥आसाधतंजीवितसंशयस्तेमृत्युभ्रुवोह्यद्यमयाविरुध्यतः॥ एतयथावत्प रिगण्ययुद्धयायनपथ्यंकुरुतत्तथात्वम् ॥ २७ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे चत्वारिंशः सर्गः॥४०॥ आज्ञप्तो रावणेनेत्यप्रतिकूलंचराजयत् ॥ अत्रवीत्परुपंवाक्यंनिःशंकोराक्षसाधिपम् ॥१॥ केनायमुपदिष्टस्तेविनाशःपापकर्मणा ॥ सपुत्रस्यसराज्यस्यसा मात्यस्यनिशाचर ॥२॥ कस्त्वयासुखिनाराजन्नाभिनंदतिपापकृत्॥ केनेदमुपदिष्टतेमृत्युद्वारमुपायतः॥३॥ शत्रवस्तवसुव्यक्तंहीनवीर्यानिशा नर ॥ इच्छंतित्वांविनश्यंतमुपरुदंबलीयसा ॥४॥ केनेदमुपदिष्टंतेक्षुद्रेणाहितबुद्धिना ॥ यस्त्वामिच्छतिनश्यंतस्वकृतेननिशाच॥५॥वध्याः बलूनमध्यंतसचिवास्तवरावण ॥येत्वामुत्पथमारूढंननिगृह्णन्तिसर्वशः॥६॥अमात्ये कामवृत्तोहिराजाकापथमाश्रितः॥ निग्राह्यःसर्वथासद्भिः सनिग्रायोनगृह्यसे ॥ ७ ॥ पाप कर्म करनेवाले पुरुपने तुम्हें राज्य, मंत्रिवर्ग और पुत्रोंके सहित विनाश होनेका यह उपदेश दियाहै? ॥ २॥ कौन पापात्मा तुम्हारे सुखसे सुखी नहीं होसकताहै किन पारीने उपायके उलमे यह तुम्हारी मृत्युका उपाय तुम्हें बवला दियाहै ? ॥ ३॥ हे राक्षसनाथ ! तुम्हारे हीनवीर्य शत्रु लोग निश्चयही बलयान् पुरुपके नाप तुम्हारा पिरोश कराकर तुम्हारा नाश होता देसनेके अमिलापी हुए हैं ॥४॥ हे रावण ! किस दुष्ट बुद्धियालेने तुमको ऐसा उपदेश दियाहै ? उसदुष्टका यही भनिटाप कि, तुम अपने को प्रभावमेही नाराको पान होओ।॥५॥रायण! मंत्रिगण किमी प्रकारसे मार डालनेके योग्य नहीं होते, परन्तु जो सोटे रस्तेमें पाrit नहा मेरो पड़ी भाराला योग्य ॥६॥ देग्लो नुप काम का होकर पोटे मार्ग थलना चादनेहो और तुम्हारे मंत्री तथापि तुमको सम ***** AAAAAAAAAAA***** । .. जग नहीं गेरते. अंर मंत्रियों को गना कुमागम निगृहात करना चापि "मा... - समझ सकते हैं ॥ ७ ॥ हे निशाचर ! हे विजय करने वालों में उत्तर मीवान जाने मामीकोटी प्रसन्नताने धर्म, अर्थ, काम य यगको प्राप्त होते हैं ॥ ८ ॥ और जो स्वामीकीही प्रसन्नता न हुई तो सवही ब्य टायर बानीक गुगाने विकार होने के कारण मबही दुःसाब? और प्रजापरभी महाभय प्रान होनाहै ॥ ९ ॥ नरपाल प्रजाओंके यश वधर्मकी प्राति I. न कारण नाहीस्थाने भलीभाँति राजाकी रक्षाकरनी ठीकहै ॥ १० ॥ हे निगाचर ! अनि तीक्ष्ण स्वभाववाला सबका अनभल चाहनेवा- BEATS नमनाने नहीं रहनेवाला गजागन्यका पालन नहीं कर सकता है ॥ ११ ॥ जो मंत्री लोग बडी कठोर आज्ञा राजासे कहकर प्रकाशित कम 2.हि नागनी गाने दुःग रातेहै, जैन अयोग्य ऊंचे रथ हाकनेवाले मंदबुद्धि सारथीभी मालिकके साथ स्थगिरनेसे नष्ट होते हैं ॥ १२ ॥ इस लोग धर्ममर्थच कामंचयगधजयनार ॥ स्वामिप्रमादात्मचिवाःप्राप्नुवंतिनिशाचर ॥ ८॥ विपर्ययेतुतत्सर्वव्यर्थभवतिरावण ॥ व्यसनंस्वामि गुम्यायाननीतरंजनाः ॥ १॥ गजमलोहिधर्मश्रयशवजयतांवर ॥ तस्मात्सर्यास्ववस्थासुरक्षितव्यानगधिपाः ॥ १०॥ राज्यपालयित भावनाशननिशाचर ॥ ननातिप्रतिकलेननाविनीतेनगम ॥ ११ ॥ येतीक्ष्णमंत्राःसचिवाभुज्यतेसहतेनवे ।। विपमेपुरथाशीघ्रमंदसान अयोपया ॥ १२ ॥ वापःमायोलोकेयुतधर्ममनुष्टिताः ॥ पम्पामपराधनविनष्टाःसपरिच्छदाः ॥ १३॥ स्वामिनाप्रतिकूलेनप्रजास्ती:- नगर यमागानवर्धतेमृगागीमायुनायथा ||११|| अवश्यंविनशिप्यंतिसरावणगामाः॥ येपांत्वकर्कशोराजादुईदिरजितेंद्रियः॥१५॥ नदिएका कनालीयंचोग्मामादितमया ॥ अत्रत्वंशोचनीयोसिसमेन्योक्निशिप्यमि ॥ १६॥ मानिहत्यनुरामोसावचिरात्त्वांवधिप्यति । गंगागायोम्मिनियवाप्परिणादनः ॥ १७॥ दर्शनादेवगमस्यहतंमामवधाग्य ॥ आत्मानंचहतंविदित्वासीतांमबांधवम् ॥ १८ । १ मा धर्मानुशन किये जाने पदक मान्य गये आगधमे बंधुवांधर्वामहित नाशको प्रान होगयेहैं ॥ १३ ॥ हे दशानन ! प्रजा प्रतिकूलाचारी ती : सारा मान मियागे कर शिनगगाआदि मृगगोंकी नाई आगे वृद्धिको प्रात नहीं होती ॥ १४ ॥ अरे रावण ! तुम सोटीवुद्धिवाले कोण, कद वभागाने का पने गुम जिनकं गजाहा यह ममम्तही निशाचर अवश्यही मृत्यु के पास हो जायगे ॥ १५ ॥ जिसने कि तुम मम बालाई मत मांडण गारनीय हो, मेरी तुम्हाग हमारे उपग्भी काकतालीय न्यायकी ममान अकस्मात यह घोर दुःख आन पडाहै ।) १६ ॥ रामचं: गिगार कंगगे। कर गोसायने मारे जाने हम नोकतार्य होजायगे ॥ १७ ॥ परन्तु नुम निश्चय जानो कि, हम नो रामको आर० नहीं मरे घरहे और यहभी भलीभाँति समझ रक्खो कि, सीताको हरणकरतेही तुमभी अपने परिवारसहित मारे जाओगे ॥ १८॥ यदि हमारे साथ मिल रामचंद्रजीको शेगादे तुम सीता महारानीको आश्रमसे लेभी आये, तो हमारी, तुम्हारी, लंकापुरीकी, व निशाचर गणोंकी किसीकीभी रक्षा न होगी ।। १९ ॥ यदि तुम हमारे इन हितकारी वचनोंको न सुनकर ऐसा कार्य करनेसे नहीं रुकोगे तो तुम्हारा नाश हो जायगा क्योंकि जिस मनुष्यकी आयु क्षीण होजातीहै वह किसी सुहृद्के हितकारी बननोको नहीं माना करता ॥ २० ॥ ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायामेकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४१ ॥ ॥ मारीचने राक्षसराज रावणसे ऐसे कठोर वचन कहकर, फिर उसके भयसे भीतहो यहभी कह दिया कि अच्छा हम चलते हैं ॥ १ ॥ वह धनुर्वाणधारी और खड्ग धारण किये हुए रामचंद्रजी आयुध उठाकर हमारी ओर व तुम्हारी ओर देखें तो तुम अपने व हमारे प्राण गएही जानो ॥ २॥ हे तात ! रामचंद्रजीसे कैसाही आनयिष्यसिचेत्सीतामाश्रमात्सहितोमया ॥ नैवत्वमपिनाहंवैनैवलंकानराक्षसाः ॥ १९॥ निवार्यमाणस्तुमयाहितैपिणानमृष्यसेवाक्यमिदं निशाचर ।। परेतकल्पाहिगतायुपोनराहितनगृहंतिसुहृद्भिरीरितम् ॥२०॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांड एकत्र त्वारिंशःसर्गः ॥ ४१ ॥ एवमुक्त्वातुपरुपंमारीचोरावणंततः ॥ गच्छावेत्यत्रवीदीनोभयाद्राविंचरप्रभोः ॥ १॥ दृष्टश्वाईपुनस्तेनशरचापासि धारिणा ॥ मधोयतशस्त्रेणनिहतंजीवितंचमे ॥ २॥ नहिरामंपराकम्यजीवन्प्रतिनिवर्तते ॥ वर्ततेप्रतिरूपोऽसौयमदंडहतस्यते ॥३॥ किंतु कर्तुमयाशक्यमेवंत्वयिदुरात्मनि ॥ एपगच्छाम्यहंतातस्वस्तितेस्तुनिशाचर ॥ ४॥ प्रहृष्टस्त्वभवत्तेनवचनेनसराक्षसः ॥ परिप्वज्यसुसंश्लि एमिदंवचनमब्रवीत् ॥ ९॥ एतच्छोटीर्ययुक्ततेमच्छंदवशवर्तिनः ॥ इदानीमसिमारीचःपूर्वमन्योहिराक्षसः ॥६॥आरुह्यतामयंशीघ्रंखगोर वविभूपितः॥ मयासहरथोयुक्त-पिशाचवदनःखरैः॥७॥ पराकम प्रकाश कर कोईभी जीवित नहीं लौट सकता, फिर हम तो तुम्हारे खोटे आचारोंके कारण यमराजरूप रामचन्द्र के बाणोंसे मृत्युको प्राप्तहो तुम्हारेही ममान होजायँगे अर्थात् हम तुम दोनों मारे जायँगे ॥ ३ ॥ तुम्हारे ऊपर अपना सामर्थ्य प्रकाश करके जीताहुआ रहना संभव नहीं, क्योंकि तुम अतिदुरात्माहो! हम तुम्हारा करही श्या सकते हैं ? हे राक्षसराज. ! तुम्हारा मंगलहो हम चलते हैं ॥ ४ ॥ राक्षसपति रावण मारीचके यह वचन सुन परमहर्षित हो उससे भलीभाँति भेटा और यह वचन बोला ॥ ५॥ कि तुमने हमारे अभिप्रायके अनुमार जब कार्य करनेको कहा तब यही वचन तुम्हारा पीरोचित हुआ। पहले तुम एक MAHAKAAHE. गागरण मारीन गक्षमधे पर अप नुम हमारी मभान हर अभ मुप इभारे गाय शीघड़ी दस रस्मविभूषित भग्नरिधर्म निरप - T म.
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RANKAR पा.ग.पा. आर० नही मरे धरेहे और यहभी भलीभाँति समझ रखो कि, सीताको हरणकरतेही तुमभी अपने परिवारसहित मारे जाओगे ॥ १८॥ यदि हमारे साथ मिल रामचंदजीको भोगाद तुम मीता महारानीको आश्रमसे लेभी आये, तो हमारी, तुम्हारी, लंकापुरीकी, व निशाचर गोंकी किसीकीभी रक्षा न होगी ।। १९॥ यदि तुम हमारे इन दिनरारी चोंको न सुनकर ऐसा कार्य करनेसे नहीं रुकोगे तो तुम्हारा नाश हो जायगा क्योंकि जिस मनुष्यकी आयु क्षीण होजातीहै वह किसी सुहृद्के हितकारी बननों को नहीं माना करता ।। २० ॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायामेकचत्वारिंशः सर्गः ॥ ११ ॥ ॥ मारीचने राक्षसराज रावणसे ऐसे कठोर वचन कहकर, फिर उसके भयसे भीतहो यहभी कह दिया कि अच्छा हम चलते हैं ॥ १ ॥ वह धनुर्वाणधारी और खड्ग धारण किये हुए रामचंद्रजी आयुध उठाकर हमारी ओर व तुम्हारी ओर देखें तो तुम अपने व हमारे प्राण गएही जानो ॥ २ ॥ हे तात ! रामचंद्रजीसे कैसाही आनयिप्यसिचेत्सीतामाश्रमात्सहितोमया ॥ नैवत्वमपिनाहवेनैवलंकानराक्षसाः ॥ १९॥ निवार्यमाणस्तुमयाहितैपिणानमृष्यसेवाक्यमिदं निशाचर ॥ परेतकल्पाहिगतायुपोनराहितनगृहंतिसुहृद्भिरीरितम् ॥२०॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांड एकच त्वारिंशःसर्गः ॥४१॥ एवमुक्त्यातुपरुपमारीचोरावणंततः ॥ गच्छावत्यत्रवीदीनोभयाद्रात्रिंचरप्रभोः ॥ १॥ दृष्टश्चाईपुनस्तेनशरचापासि धारिणा ॥ मधोद्यतशस्त्रेणनिहतंजीवितंचमे ॥ २॥ नहिरामंपराक्रम्यजीवन्प्रतिनिवर्तते ॥ वर्ततेप्रतिरूपोऽसौयमदंडहतस्यते ॥३॥ किंतु कर्तुमयाशक्यमेवंत्त्वयिदुरात्मनि ॥ एपगच्छाम्यहंतातस्वस्तितेस्तुनिशाचर ॥ ४ ॥ प्रहृष्टस्त्वभवत्तेनवचनेनसराक्षसः ॥ परिप्वज्यसुसंश्लि मिदंपूचनमत्रवीत् ॥ ५॥ एतच्छोटीर्ययुक्तंतेमुच्छंदवशवर्तिनः ॥ इदानीमसिमारीचःपूर्वमन्योहिराक्षसः ॥६॥ आरुह्यतामयंशीघ्रंखगोर बविभूपितः॥ मयासहरथोयुक्त पिशाचवदनैःखरः॥७॥ पराक्रम प्रकाश कर कोईभी जीवित नहीं लौट सकता, फिर हम तो तुम्हारे खोटे आचारोंके कारण यमराजरूप रामचन्द्रके वाणोंसे मृत्युको प्राप्तहो तुम्हारेही ममान होजायेंगे अर्थात् हम तुम दोनों मारे जायँगे ॥ ३ ॥ तुम्हारे ऊपर अपना सामर्थ्य प्रकाश करके जीताहुआ रहना संभव नहीं, क्योंकि तुम अतिदुरात्माहो! हम तुम्हारा करही क्या सकते हैं । हे राक्षसराज. ! तुम्हारा मंगलहो हम चलतेहैं ॥ ४ ॥ राक्षसपति रावण मारीचके यह वचन सुन परमहर्पित हो उससे भलीभाँति भेटा और यह वचन बोला ॥ ५॥ कि तुमने हमारे अभिप्रायके अनुमार जब कार्य करनेको कहा नव यही वचन तुम्हारा पीरोचित हुआ। पहले नुग एक ******* गागा माग गधग गर भष नृप हपारी गमान गए अप गुम हमारे. साथ शीघणी इरा मणि .
. गानों को मान गया । फिर वहां पहुंचकर विदेहगजकुमारी सीताको लुभाकर इच्छानुसार स्थानमें चलदेना। तब हम राम लक्ष्मण मनि गृप आश्रम, वेग वशं यदुवक मीनाको दर लागे ॥ ८ ॥ ऐसा मुनकर नाडकातनय मारीचने कहा कि, बहुत अच्छा चलिये । तत्पश्चात् रावण नागर विमान ममान उस ग्यार ॥९॥ गीवनामे उम आश्रममे चले, और अनेक भांतिके पत्तन बन ॥ १० ॥ पर्वत नदी राज्य व नगरोंको देखते मानदंडगा आप जहां गमचन्दनीमा आश्रया ॥13॥ और आश्रमको मारीचके सहित रावणने देखा और दोनोंजने उस रत्नभूपित रथसे उतरे ।। १२॥ र मागवा हाय कडकर गाय कहने लगा कि, ई मने ! वनमें केलोंके वृक्षोंने पिराहुआ यह रामचन्द्रका आश्रम दिखाई देताहै ॥ १३ ॥ जिस कारणसे दि| प्रलोभविवाद यथेष्टंगंतुमईमि ।। तांगुन्येप्रसभंसीतामानयिप्यामिमेथिलीम् ॥ ८ ॥ ततस्तथेत्युवाचेनंरावणंताटकासुतः ।। ततोरावण | मार्गौपिमान मियनंग्थन् ॥ ९ ॥ आरुह्याययतुःशीघ्रतस्मादाश्रममंडलात् ॥ तथैवतत्रपश्यंतीपत्तनानिवनानिच ॥ १० ॥ गिरीश्वसरितः सांगठागिनगगणित ॥ ममत्वदंडकारण्यरावस्याश्रमंततः ॥ ११॥ ददर्शसहमारीचोरावणोराक्षसाधिपः ॥ अवतीर्यस्थात्तस्मात्ततःकां जनागात् ॥ १२ ॥ इम्तेगृहीत्वामारीचंरावणोवास्यमत्रयीत् ॥ एतद्रामाश्रमपदंदृश्यतेकदलीवृतम् ॥ १३॥ क्रियतांतत्सखेशीयदर्थवय गागनाः ।। नगरपना त्यामागेनोगतसम्तदा ॥ १४॥ मृगोभूत्वाश्रमद्रारिरामस्यविचचारह ॥ सतुरूपसमास्थायमहदद्भुतदर्शनम् ॥१६॥ मणिवागावःमिनामितमुन्नाकृतिः ॥ रक्तपमोत्पलमुखइंद्रनीलोत्पलश्रवाः ॥ १६ ॥ किंचिदत्युनतग्रीवइंद्रनीलनिभोदरः ॥ मधूकनिभ पार्थांजकिंजल्कमनिमः ।। 1।। वैदूर्यमंकाशसुग्स्तनुजंवःसुसंहतः ॥ इंद्रायुधसवर्णनपुच्छेनोध्यविराजितः ॥ १८॥ मनोहरस्निग्धव ग्निनानाविनः ।। मनगममोजातोमृगःपरमशोभनः ॥ १९॥ पग at गमर भीनामे उस कार्यका आरंभ करो । निशाचर मारीच रावणके यह वचन सुनकर ॥१४॥ महाअद्भुत मृगरूप धारण कर गरजी मारपर फिरने लगा ॥ ३५॥ इम मृग मांगोंका अप्रभाग मणिप्रवर सदशथा, और मुखकी आकृति श्वेत रुप्ण विविध वाँसे चित्रि श्री. पनमा कमर फूलकी नमान. श्राणयुगल इन्द्रनीलामकी ममानये ॥ १६ गर्दन कुछएक ऊँची, उदरभी इन्द्रनील मणिकी समता रखताथ: HTTभाग मारे गमनरी ममान और वर्ण पपगगकी तुन्यथा ॥ १७ ॥ सुप्रिय वैदूर्य मणिकी तुल्यथीं, दोनों जाँघ पतलीथीं सत्र मंधियें एक दूसरीसे ग. rist, inापकी ममान उपरको सीएं गिनमान होरहीथी ॥ १८ ॥ उसका वर्ण चिकना और मनोहरथा और शरीर उसका अनेक भांति आर० स०। नॉग लिमिया उम मागेच राक्षमने क्षण भरमें यह परमगोभायुक्त मृगमूर्ति धारण की ॥ १९ ॥ उस वनको शोभित करता हुआ और श्रीरामचन्द्रजीके आश्र सभी से पाममनोहर देगी योग्य रूपमे यह राक्षम प्रकाशमान करने लगा ॥ २० ॥ जानकीजीको ललचाने के लिये अनेक प्रकारकी धातुओंसे चित्र विचित्र रमाण फिर चागे और हरी २ पास चरता हुआ यह मृग रामचन्द्रजीके आश्रमपर विचरने लगा ॥ २३ ॥ उसके शरीरपर सैकडों चांदीके विन्दु ऐसे कि जिन दंग परमप्रीनि उपजे, यह मृग कभी २ वृक्षांकी कॉपलके नये २ पत्ते साता हुआ घूमने लगा ॥ २२ ॥ कभी केलोंकी बगियामें और निकारक में प्रांग का और कभी श्रीमीताजीकी दृष्टिक सम्मुख जाकर इस प्रकार आश्रमके इधर उधर वह मृग मन्दगतिमे चलने लगा ॥ २३ ॥ पीठपर नगर नाग चित्र विचित्र होनेमे उसकाल इस महामृगकी अतिशय शोभा हुईथी वह यथासुखसे रामचन्द्रजीके निकट घूमने लगा ॥ २४ ॥ आश्रममें गनमालयान्वंगमाश्रमपदंचतत् ॥ मनोहरंदर्शनीयरूपंकृत्वासराक्षसः॥२०॥प्रलोभनार्थवैदेह्यानानाधातुविचित्रितम् ॥ विचरन्गच्छतेशप्पं भादलानिमगंततः ॥२१॥ रोप्यविदुशतेचित्रभूत्वाचप्रियनंदनः॥विटपीनांकिसलयानभक्षयन्विचचारह ॥२२॥ कदलीगृहकंगत्वाकर्णिकारा नितस्ततः।तमागमंदगतिसीतासंदर्शनंततः॥२॥राजीवचित्रपृष्टःसविरराजमहामृगः ॥रामाश्रमपदाभ्याशेविचचारयथासुखम् ॥२४॥ पुनर्ग सानिवृत्तभविगारमृगोत्तमःगत्वामुहृतत्वरयापुनःप्रतिनिवर्तते ॥२६॥ विक्रीडंश्चपुनर्भूमीपुनरेवनिपीदति ॥ आश्रमद्वारमागम्यमृगयूथानिग छति॥२६॥मृगयूथैरनुगतःपुनरेवनिवर्तते।।सीतादर्शनमाकांक्षवाक्षसोमृगतांगतः॥२णापरिभ्रमतिचित्राणिमंडलानिविनिप्पतन् । समुद्रीक्ष्यच संतिमृगायेऽन्येवनेचराः॥२८॥उपगम्यसमात्रायविद्रयंतिदिशोदश॥राक्षसःसोपितान्वन्यान्मृगान्मृगवधेरतः॥२९॥प्रच्छादनार्थभावस्यनभक्ष यतिसंस्पृशन् ॥ तस्मिन्नेवततःकालेवेदेहीशुभलोचना ॥३०॥ कुसुमापचयेव्यग्रापादपानत्यवर्तत।कर्णिकारानशोकांश्चचूतांश्चमदिरेक्षणा ॥३१॥ गुमने ममय कभी दौडता कभी ठिठककर खडा होजाता, कभी मुहूर्त भरतफ आगेको आश्रममें चलता, कभी फिर झटपट लौट आता ॥ २५ ॥ कभी इधर उधर मेलना, कभी पृथीपर लेट जाता, कभी आश्रमके द्वारपर आकर सुससे चरते हुए मृगझुण्डोंके साथ चरने लगता ॥ २६ ॥ कभी मृगोंके साथही साथ आकर फिर मानानीको दिमाई देनेशी यांटामे फिर आश्रममें चला आता जानकीके दर्शनकी इच्छासे वह राक्षस मृग होगया ॥ २७ ॥ इसप्रकार यह मृगताको प्राप्त होकर विचित्र पंडालोगे पर फांद करने लगा दमकी कूद फांद देग और यन के मृग ॥ २८॥ उमके निकट आये और उमको मूंघतेही दशों दिशाओंको भागने लगे। मारीच यद्यपि सदा सगाशमाने गया. पानि उसने अपना भापटिगाने लिप उन मृगोको भक्षण नहीं किया केवल स्पर्श करने लगा। दगी ममय शुभलोचना घेदेहीजी ॥ । 11. Unrnीमर लिग भी irr कभी न कभी भाप या निकल पाती ॥
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आर. . स० मे इस प्रकारका मृगमा पारण करलियाहै । हे पुरुषसिंह ! यह मृगरूप गन्धर्व नगरकी समान अब रमणीय और परमदीप्तियुक्त है, परन्तु वास्तवमें यह मृग नहीं ७ ॥ रघुनंदन ! दस प्रकार रनचिरित मृग कभी पृथ्वीपर नहीं हो सकता। हे जगन्नाथ ! यह निश्चयही माया है इसमें कुछ सन्देह नीं ॥ ८ ॥ रसगयी इस प्रकार पहने टगे पर कुछएक मुस्काई हुई सीवाजीने राक्षसके छलसे मोहित हो लक्ष्मणजीको इस कहनेसे रोक दिया और आप परमहापैवलो बोली ॥९॥ हे आर्यपुत्र ! इन अभिराम मृगने हमारे मनको हरण कियाहै हे महावाहो। इसको पकड लाओ हम इस मृगके साथ खेला करेंगी ॥ १० ॥ क्योंकि हमारे न पुग्याभने यदुगने पुण्यदर्शन मृगगण चमर सगर घूमा करते हैं, जिनकी काली और सफेद पूँछ होतीहै ॥ ११ ॥ और ऋक्ष, पृश्व वानर व किन्नरादिभी घूमते हैं सानप मसारलपान और रूप पान हैं ॥ १२ ॥ परन्तु हे राजन् ! पहले कभी इस प्रकारका मृग हमारी दृष्टिमें नहीं आया, तेज क्षमा कान्तिमें यह मृगोंमें श्रेष्ठ मनोहोरिधोरतविचित्रोनास्तिरावव ।। जगत्यांजगतीनाथमायैपाहिनसंशयः॥८॥एवंछवाणंकाकुत्स्थंपतिवार्यशुचिस्मिता ॥ उवाचसीतासंहष्टा छानाहतनेतना ॥ ९॥ आर्यपुत्राभिरामोसौमृगोहरतिमेमनः॥ आनयेनंमहाबाहोक्रीडार्थनोभविष्यति॥३०॥इहाश्रमपदेऽस्माकंबहवःपुण्यदर्श नाः॥ मृगाभरतिसहिताश्चमराःसमरास्तथा।।१३॥क्षाःपृपतसंघाश्चवानराःकिन रास्तथा ॥विहरतिमहाबाहोरूपश्रेष्ठामहाबलाः॥३२॥नचान्यः सदशोराजन्दृष्टःपूर्वमृगोमया ॥ तेजसाक्षमयादीप्यायथाऽयंमृगसत्तमः।।१३।। नानावर्णविचित्रांगोरत्नभूतोममाग्रतः॥ द्योतयन्वनमव्यग्रंथोततेश शिसनिभः॥१४॥अहोरूपमहोलक्ष्मीःस्वरसंपञ्चशोभना मृगोऽद्भुतोविचित्रांगोहृदयंहरतीवमे॥१६॥यदिग्रहणमभ्येतिजीवन्नेवमृगस्तव आश्चर्य भूतंभवतिविस्मयंजनयिष्यति॥१६॥समाप्तवनवासानांराज्यस्थानांचनःपुनः॥अंतःपुरेविभूपाथोंमृगएपभविष्यति॥१७॥ भरतस्यार्यपुत्रस्यश्व श्रूणांनममप्रभो।मृगरूपमिदंदिव्यंविस्मयंजनयिष्यति॥१८॥जीवनयदितेभ्येतिग्रहणंमृगसत्तमः ॥ अजिनंनरशार्दूलरुचिरंतुभविष्यति ॥१९॥ ज्ञात होताहै ॥ १३ ॥ इसका सबही शरीर विविध वर्णोसे विचित्र हो रहाहै । मध्य २ में रत्नोंके बिन्दु बने हैं। यह मृग चन्द्रमाके समान वनभूमिको शान्ति भानसे प्रकाशित करता हुआ हमारे मम्मुख विराजमान हो रहाहै ॥ १४ ॥ अहह ! क्या सुन्दरताई है ! अहो क्या श्रीहै ! आहा क्या शोभाहै ! क्या मधुर इसकी पोलहै । यह अपूर्व पिचित्र अंगवाला मृग हमारे मनको चुराये लेताहै ॥ १५ ॥ यदि आप इसको जीता हुआही पकड़ देंगे तो बडा अपूर्व यह पदार्थ सदा निकट पहार शिम उपजाता रहा फोगा ॥१६॥ जप हम एनवागरे यतको प्रग करके फिर अपने राज्यमें चलेगी नब यह मृग हमारे रनधामफ भुषण हे गा ॥ १७ ॥ मियमसनद विपन्न सापक पकड मकें, तो इसका चर्मही परममनोहर होगा ॥ १९ ॥ इस निहत मृगके सुवर्णमय चर्मको कुशासनपर बिछाकर उसपर बैठ तुम्हारे सहित भगवानकी पूजा कर नको हमारा अभिलाप हुआहै ॥२०॥ यद्यपि स्वामीको इस प्रकारकी प्रेरणा करना स्त्रियोंके लिये स्वेच्छाचारिताहै और भयंकर, व अनुचिवभीहै, तथापि इस मृगकी विचित्र देहने हमको बहुतही विस्मय उपजायाहै ॥ २३ ॥ उसके कंचनके समान रोम, भली श्रेष्ठ मणिकी समान शृंग, प्रभातकालीन सूर्यकी नाई और आकाशकी) ममान प्रकारामान ।। २२ ।। रुपने श्रीरामचंद्रजीके हृदयमें भी विस्मय की अवाई हुई. सीवाजीके ऐसे वचन सुनकर और उस अद्भुत मृगको देख ॥ २३ ॥ तिसके गरीरकी सुन्दरताईमे रामचन्दजी लुभागये, तिसपै सीताजीने प्रेरणा की इस कारण हर्पितचित्त हो श्रीरामचन्द्रजी भावा लक्ष्मणसे बोले ॥ २४ ॥ कि, हे लक्ष्मण ! निहतस्यास्यसत्त्वस्यजावूनदमयत्वचि ॥ शप्पवृस्यांविनीतायामिच्छाम्यहमुपासितुम् ॥ २९ ॥ कामवृत्तमिदंरौदंत्रीणामसदृशंमतम् ।। वपुपात्वस्यसत्त्वस्यविस्मयोजनितोमम ।। २१ ॥ तेनकांचनरोग्णातुमणिप्रवरशृंगिणा ॥ तरुणादित्यवर्णेननक्षत्रपथवर्चसा ॥ २२ ॥ बभूव गययस्यापिमनोविस्मयमागतम् ॥ इतिसीतावचःश्रुत्वादृष्ट्वाचमृगमद्भुतम् ॥ २३ ॥ लोभितस्तेनरूपेणसीतयाचप्रचोदितः ॥ उवाचराघवो हृष्टोधातरंलक्ष्मणंवरः ॥ २४ ॥ पश्यलक्ष्मणवेदेवाःस्पृहामुल्लसितामिमाम्।। रूपश्रेष्ठतयाटेपमृगोऽयनभविष्यति ॥ २५ ॥ नवनेनंदनोद्देशे नवरथसंश्रये ॥ कुतःपृथिव्यांसौमित्रयोऽस्यकश्चित्समोमृगः ॥ २६ ॥ प्रतिलोमानुलोमाश्चरुचिरारोमराजयः ॥ शोभंतेमृगमाथित्यचित्राः कनकविंदुभिः ॥२७॥ पश्यास्यमुंभमाणस्यदीप्ताममिशिखोपमाम् ॥ जिह्वांमुखानिःसरंतींमेघादिवशतह्रदाम् ॥२८॥मसारगल्लर्कमुखःशंखमु कानिभोदरः ॥ कस्यनामानिरूप्योसौनमनोलोभयेन्मृगः ॥२९॥ आलोकन कगे इम मृगका श्रेष्ठ रूप देखकर जानकीजीकी अभिलापा उल्हसित हो उठी है । अतएव इस समय इसका प्राण धारण करना असंभव है ॥ २५ ॥ हे लक्ष्मण ! या पनमें, क्या नन्दनमें, क्या चैत्ररथकाननमें, अथवा पृथ्वीके किसी स्थानमें भी इसके समान मृग नहीं है ॥ २६ ॥ देखो इसके रोमोंकी पंक्तियें कुछ मोपी कुछ बंकिमाकार कैमी गोभाको पान होरही हैं, और तिसपर उसमें सुवर्णविन्दुओंके चित्रित होनेसे औरभी सुन्दरताई आई है ॥ २७ ॥ देखो भय्या ! मेघसे पिजली जिस प्रकार चमकती है वैसेही जमुहाई लेने के समय उसके मुससे अमिकी शिखाके समान प्रदीत जीभ निकलती है ॥ २८ ॥ इसका मुखमंडल इन्द्रनीलमणि लिमित पानपाके आकारमा है । पेट शंस और मोनीकी समान है, और इसके स्वरूपका निर्णय करना दुःसाध्य है; इसको देखनेसे किसका मन मोहित नहीं C5 ।.रा. आर. . स०६ होगा ।। २. । इसका रूप पके सुवर्णकी प्रभासे परिपूर्ण है और नाना प्रकारके रत्नमय है ऐसा दिव्य स्वरूप दृष्टि आनेसे किसका मन विस्मयको प्राप्त नहीं होना । ॥ ३० ॥ धनुर्धारी नृपविगण महापनमें शिकार करनेके लिये प्रवृत्त हो मांसके लिये अथवा विहारके लिये बहुत मृगोंको मार डालते हैं ।। ॥ ३१ ॥ अधिक करके वह राजा लोग मृगवधौ उग्रत होकर बडे २ वनोंमें मणिरत्न सुवर्णादि धातुरूप धनका संग्रहभी करते हैं ॥ ३२ ॥ हे लक्ष्मण } इस प्रकार पनपान्पकी राशिसे खजाना पड़ता है इसलिये वनमें सवही पुरुषाकी ब्रह्मकी नाई मनकी इच्छा सफल होती है ॥ ३३ ॥ हे लक्ष्मण ? अर्थकी इच्छा करनेवाला पुरुष अर्थसाधन वस्तुके कारण निःसंशय चित्तसे उस कार्यमें लगे तो अर्थशास्त्रज्ञ पंडित लोग उसकोही ठीक अर्थ कहते हैं ॥ ३४ ॥ इस कारणसे इस मृगके पर करने में कुछ दुविधा करनेकी आवश्यकता नहीं है । सुमध्यमा जानकीजी हमारे साथ इस मृगरत्नके श्रेष्ठ व सुवर्णमय चर्मपर बैठेगी ॥ ३५॥ कस्यरूपमिदंदृष्ट्वाजावूनदमयप्रभम् ॥ नानारत्नमयंदिव्यनमनोविस्मयंबजेत् ॥ ३० ॥ मांसहेतोरपिमृगान्विहारार्थचधन्विनः ॥ भंतिलक्ष्म णराजानोमृगयायांमहावने ॥३१॥ धनानिव्यवसायेनविचीयंतेमहावने ॥ धातवोविविधाश्चापिमणिरत्नसुवागनः ॥३२॥ तत्सारमखिलन णधिनंनिचयवर्धनम् ॥ मनसाचिंतितंसर्वयथाशुकस्यलक्ष्मण ॥ ३३ ॥ अर्थीयेनार्थकृत्येनसंबजत्यविचारयन् ॥ तमर्थमर्थशास्त्रज्ञा प्रादुर Oःसुलक्ष्मण ॥ ३४ ॥ एतस्यमृगरनस्यपराध्यकांचनत्वचि ॥ उपवेक्ष्यतिवेदेहीमयासहसमध्यमा ॥ ३५॥ नकादलीनमियकीनप्रवेणी नाविकी ।। भवेदेतस्यसदृशीस्पर्शेनेनेतिमेमतिः ॥३६॥ एपचेवमृग श्रीमान्यश्चदिव्योनभश्चरः ॥ उभावेतौमृगौदिव्यौतारामृगमही मृगौ ॥ ३७॥ यदिवायंतथायन्मांभवेद्वदसिलक्ष्मण ॥ मायेपाराक्षसस्येतिकर्तव्योस्यवधोमया॥ ३८॥ एतेनहिनृशंसेनमारीचेनाकृतात्म ना ॥ वनेविचरतापूर्वहिंसितामुनिपुंगवाः ॥ ३९ ॥ उत्थायवहवोयेनमृगयायांजनाधिपाः ॥ निहता-परमेष्वासास्तस्मादध्यस्त्वयंभृगः ॥१०॥ स्या कदली और प्रिएक मृगका चर्म क्या प्रवेणीनामक छागलकाचर्म, क्या मेपादिकका चर्म, कोई भी चर्म इस मृगके चर्मकी समान कोमलं, चिकना; व मनोहर हमको नहीं जाल होता है।॥ ३६॥ यही मा श्रीमान है. और remium nAmt: पेटमें रहतेही हुए जिस प्रकार सिमडीका गर्भ अपनी माताको मार डालताहै, वैसेही पूर्व समय इस वनमें राक्षस वातापिभी तपस्वी ब्राह्मणों के पेट में प्रवेग करके उन: मंहार किया करता था ॥ ४१ ॥ बहुत काल पीछे किसी समय वह वातापि तेजस्वी महामुनि अगस्त्यजीको पान होकर उनके द्वारा पचाया गयाथां ॥ ४२ ! फिर जब कि श्राद्धक पूर्ण होने उपरान्त वातापिको राक्षसरूप धारण करनेका इच्छुक देखा तब भगवान् अगस्त्यजी मुसकाय कर बोले ॥ ४३ ॥ पातापिट: अपने तनमे ज्ञानरहित हो इस जीवलोकमें अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको मारडाला है, इसी कारणसे हमने तुमको पचाडाला। ४४ ॥ हे लक्ष्मण ! जो हमारी समा: धर्मनिरत और जिनेंद्रिय पुरुषका निरादर करताहै, उस राक्षसके प्राण वातापीही की समान नष्ट होजाते हैं ॥ ४५ ॥ अतएव मारीच इस आश्रममें आकर अगस्त पुरस्तादिहवातापिपरिभूयतपस्विनः ॥ उद्रस्थोदिजान्हंतिस्वगर्भाश्वतरीमिव ॥ ११॥सकदाचिचिराल्लोकेआससादमहामुनिम् ॥ अगस्त्यंते जसायुक्तंभक्ष्यस्तस्यवभूवह ॥ १२॥ समुत्थानेचतद्रूपंकर्तुकामसमीक्ष्यतम् ॥ उत्स्मयित्वातुभगवान्वातापिमिदमब्रवीत् ।। ४३ ॥ त्वयाऽवि गण्ययातापेपरिभूताश्रतेजसा ।। जीवलोकेद्विजश्रेष्ठास्तस्मादसिजरांगतः ॥ ४४ ॥ तद्रोपिनभवेदेववातापिरिवलक्ष्मण ॥ मद्विधंयोतिमन्येत धर्मनित्यंजिनेद्रियम् ॥ ४५ ॥ भवेद्धतोयंवातापिरगस्त्येनेवमागतः ॥ इहत्वंभवसन्नद्धोयंत्रितोरक्षमेथिलीम् ॥ ४६॥ अस्यामायत्तमस्माकं पत्कृत्यरघुनंदन ॥ अहमेनंवधिप्यामिग्रहीप्याम्यथवामृगम् ॥ १७ ॥ यावद्गच्छामिसीमित्रेमृगमानयितुंदुतम् ॥ पश्यलक्ष्मणवेदेह्यामृगत्वचि ग...स्पृहाम् ॥४८॥ त्वचाप्रधानयाोपमृगोऽधनभविष्यति ॥ अग्रमत्तेनतेभाव्यमश्रमस्तेनसीतया ॥ १९॥ यावत्पतमेकेनसायकेननिह म्यहम् ॥ हत्येतगर्मआदायशोममेष्यामिलक्ष्मण ॥५०॥ जी करके वातापिकी नाई हमारे द्वारा मारडाला जायगा । इस समय तुम कवच इत्यादि बांधकर यत्नमाहित सीताजीकी रक्षा करो ॥ ४६ ॥ हे रघुनंदन ! हमारा कर्नव्य कार्य जानकीके अधीनहै इसलिये तुम सावधानीसे यहां टिके रहो, हम इस मृगको मारही डालेंगे, अथवा जीता हुआ पकड लावेंगे ॥ ४७ ॥ हे लक्ष्मण ! इम मृगचर्म लेनेकी जानकीको बडी अभिलापा हुई है, देखो अब हम बहुत शीयवासे इस मृगको पकडनेके लिये जायेंगे ॥४८॥ इस मृगका चर्म सर मृगोंसे अच्छाहै, आज निश्चयही इसको प्राण त्याग करना पडेगा । लक्ष्मण ! हम जबतक इस मृगको नहीं मारडालें तस्तक तुम सीताजीक साथ सावधानतासे आश्रममें टिके रहो ॥ ४९ ॥ हे लक्ष्मण ! मैं एक बाणसे शीघही मृगको मारकर इसका चर्म ले आऊंगा जबतक हम लौट कर न आवे तबतक तुम सावधानीसे are- गामण ! तुम जानकीको लेकर अनि बलवान् बुद्धिमान,अच्छे कार्यो करनेमें चतुर वली, श्रेष्ठ जटायुके साथ निरन्तर शंकित आर ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां त्रिचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४३ ॥ स० Prinी मदन गमगली माता लक्ष्मणजीको इस प्रकारले समझाय बुझाय सुवर्णनिर्मित मुष्टि लगा हुआ खड्ग हाथमें लेते हुए ॥ १ ॥ ति. समापिपला भाग तीन जगह मुसा हुआथा, ऐमा अना भूपण स्वरूप धनुप ग्रहण करके और दो तरकश बांध करके प्रचण्ड पराक्रमी श्रीरामचन्द्रजी गर ॥ २ ॥ पद मृगभेन मृगों का राजा रामचन्द्रजीको अपने सम्मुस आताहुआ देखकर भयक मारे अन्तर्धानहो फिर थोडी दूरपै उनको दीख पडा ॥ ३ पानियेनानियलेनपक्षिणाजटायुपाबुद्धिमताचलक्ष्मण ॥ भवाप्रमत्तःप्रतिगृह्यमैथिलीप्रतिक्षणंसर्वतएवशंकितः ॥ ५१ ॥ इत्या श्रीम० वा. भा• • निगत्वारिंशः सर्गः ॥ १३ ॥ तथातुतंसमुद्दिश्यभ्रातरंरघुनंदनः ॥ दधारासिंमहातेजाजांवूनदमयत्सरुम् ॥ १ ॥ ततस्त्रिविन: गंगापमादागात्मविभूपणम् ॥ आवध्यचकलापौरोजगामोदयविक्रमः ॥२॥तंवन्यराजोराजेंद्रमापतंतंनिरीक्ष्यवे ॥वभूवांतर्हितस्त्रासात्पुन मदर्शने भात् ।। ३ ॥ वदासिर्धनुरादायप्रदुद्राययतोमृगः ॥ तस्मपश्यतिरूपेणद्योतयंतमिवाग्रतः ॥ ४॥ अवेक्ष्यावेक्ष्यधावंतंधनुष्पाणिर- दाग्ने । अतिवृत्तमिवोत्पातालोभयानकदाचन ॥५॥ शंकितंतुसमुद्भांतमुत्पतंतमिवांवरम् ॥ दृश्यमानमदृश्यंचवनोदेशेपुकेचित् ॥६॥ सिरियमंत्री शारदंनंद्रमंडलम् ॥ मुहूर्तादेवददृशेमुहुरात्प्रकाशते ॥ ७॥ दर्शनादर्शनेनेवसोऽपाकर्पतराववम् ॥ सदूरमाश्रमस्यास्यमा! गोमृगतांगतः ॥ ८॥ आसीत्कुद्धस्तुकाकुत्स्थोविवशस्तेनमोहितः ॥ अथावतस्थेसुश्रांतश्छायामाश्रित्यशादले ॥ ९॥ पागदजीमी गड और पनुप याण धारण करके जिम ओर मृगया उम ओरको धाये । और देखते हुए कि, मृग अपने रूपसे चारों ओरको प्रक ससा हुआ मानो नामनेही विगज म्हाई ॥ ४ ॥ कभी वह मृग शाईपाणि रामको वारंवार देखकर वनमें दीढता कभी कुलांच मारकर दूर हो रहता कभी.. भरो करने गभाला ॥ ५॥ कभी गंपिन और शांतचिन होकर मानों आकागको चला जायगा ऐमी छलांग माग्दा, कभी अदृश्य होजाता, कभी दिखाई पड़ने हमार रमी जिन्न निम्न मेपममूहमें पिरोए गाग्दीय पन्द्रमण्डलकी ममान मतभर अवश्य होजाता और मुनमात्रही दूर दिखाई देता ।। ७ ॥ दम - Mमानीदरमसपिना गरी भाषमपान र ममा ॥८॥ गमन्त्री उगवी मामार्ग मोति --- को--. -... को गि और बहनही थककर एक पेडकी छायाके नीचे हरी दूवर्क सेतमें बैठगये ॥ ९ ॥ मृगरूपी मारीचने उनको उन्मादित करदियाथा, वह मारीच फिर अन्य मृगों के माय यदुन निरुटही गमचन्द्रजीको दृष्टि आया ॥ १० ॥ वह मारीच राक्षस श्रीरामचन्द्रजीको अपने पकडनेका अभिलापी जानकर, दौडा और मारे भयो उम ममर फिर अन्तर्धान होगया ॥ 3 ॥ और बहुत दूर जाकर फिर वृक्ष समूहोंके नीचे दिखाई दिया, महातेजवान रामचन्द्रजी यह देखकर अब उम मृगका माग्डालनाही निभव करते हुए ॥ १२ ॥ उन्होंने रोपरो भरकर फिर तरकरासे सूर्यके समान शत्रुका नाश करनेवाला प्रज्वलित एक बाण निकाला ॥ ॥ १३ ॥ और उनको हट धनुषार चहा बलने सेंच जलती हुई अनिके समान प्रकाशित तिस मृगपर ॥ १४ ॥ ब्रह्माका बनाया हुआ अति प्रज्वलित अन्न, उस मृगाली गभन माग योग्यही छोडा ॥ १५॥ गरश्रेष्ठ ब्रह्मायने छूटतेही वत्रकी समान मृगरूपी मारीचका हृदय विदारण करडाला तब वह मारीच अतिशय मनगुन्मादयामासमृगम्पोनिशाचरः ॥ मृगैःपरिवृतोऽथान्येरदूरात्प्रत्यदृश्यत ॥ १०॥ ग्रहीतुकामंदृष्ट्वातंपुनरेवाभ्यधावत ॥ तत्क्षणादेवसं पानात्पुनरंतहितोमवत ॥ ११॥ पुनग्यततोद्गदृक्षखण्डादिनिःसृतः॥ दृष्ट्वारामोमहातेजास्तंहतुकृतनिश्चयः ।। १२॥ भूयस्तुशरमुद्धृत्यकुपि नम्नवगाः ।। मूर्यरश्मिप्रतीकाशंज्वलंतमरिमर्दनः ॥१३॥ संधायसदृढंचापेविकृष्यवलवली ॥ तमेवमृगमुद्दिश्यज्वलंतमिवपन्नगम् ॥११॥ गुमानमलिनंदीतमग्रंब्रह्मविनिर्मितम् ॥ मभृशंमृगरूपस्यविनिर्भिद्यशरोत्तमः ॥ १५॥ मारीचस्येवहृदयंबिभेदाशनिसन्निभः ॥ तालमात्रम धोत्प्त्यन्यपतत्मभृशातुरः ॥ १६॥ व्यनद्रेग्यनाद्धरण्यामल्पजीवितः ॥ म्रियमाणस्तुमारीचोजहीतांकृत्रिमांतनुम् ॥ १७ ॥ स्मृत्वात दरनग्धोध्याकन तुलक्ष्मणम् ॥ इहप्रस्थापयेत्सीतातांशून्येरावणोहरेत् ।। १८॥ सप्राप्तकालमाज्ञायचकारचततःस्वनम् ॥ सदृशंराघवस्येव द्वामीनलक्ष्मणतिन ॥ १९ ॥ तेनमर्मणिनिर्विवंशग्णानुपमेनहि ॥ मृगरूपंतुतत्त्यकाराक्षसंरूपमास्थितः ॥२०॥ आतुर होकर गार वृक्ष ममान ऊपरको उछल पृथ्वीपर गिरपडा ॥ १६ ॥ और क्षीण प्राण मरनेके निकट पहुँच पृथ्वीपर गिरकर भयंकर शब्दसे बहुत चिल्लाया । उग गक्षमने मग्न मसर सह आनी बनावटी उलकी देह त्यागन कग्दी ॥ १७ ॥ अनन्तर मारीच मरनेके समय उस मायामय देहको त्याग रावणकी आज्ञा स्मरण कर विधाग्नं उगा कि, किम जायका अवलम्बन करनेमे मीता लक्ष्मणको यहां भेजें, और रावण शून्य आश्रमको पाकर सीताको हरण करले ॥ १८ ॥ यह विचा का पाना काल आया हुआ जान गरणी उपदेग कीहुई सम्मनिक अनुमार "हा सीते ! हा लक्ष्मण !" कहकर रामचन्द्र के समान कंठस्वर बनाकर उस राक्ष मामिलाना आरंभ किया ॥११॥ श्रीगमनवजी अनुपम याणमे उसका मर्मस्थान इवना विंध गयाथा, कि फिर यह मृगरूप धारण नहीं करसका और राक्षस
11.ग.भा.
आर
मनि पहण की ॥ २० ॥ मरनेके समय मारीचकी देह बडी भारी होगई उस भयंकर निशाचर मारीचको भूमिमें गिरा ॥ २१ ॥ रुधिरसे लिपटा पृथ्वीमें लोटताहुआ
भीगमरमजीने देगा और मनही मनमें सीवा और लक्ष्मणके वचन स्मरण करके आश्रमकी ओर लौटे ॥ २२ ॥ आश्रमको लौटनेके समय विचारनेलगे कि, लक्ष्मण
जीने पाटेही कहाया कि यह मारीचकी मायाहै । उनकीही बात इस समय सत्य हुई यथार्थही मारीचको हमने मार डाला ॥ २३॥ इस समय मारीचने “हा
मी ! हा लक्ष्मण!" पडे ऊँने शब्दसे यह कहकर प्राण त्याग किये हैं, न जाने सीता इस शब्दको सुनकर क्या करेंगी ॥ २४ ॥ अथवा महावाहु लक्ष्मणजी
फिल अथाको पाम होंगे। इस प्रकार चिन्ता करते २ धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीके रोम सडे होगये ॥ २५॥ उस काल मृगरूपी राक्षसको मार डालकर और इसका
गरुंगसुमहाकायोमारीचोजीवितंत्यजन् ॥ तंदृष्ट्वापतितंभूमौराक्षसंभीमदर्शनम् ॥२॥रामोरुधिरसिक्तांगंचेष्टमानमहीतले ॥ जगाममनसासी
तालक्ष्मणस्यवनःस्मरन् ।॥ २२॥ मारीचस्यतुमायैपापूर्वोक्तालक्ष्मणेनतु ॥ तत्तथाह्यभवच्चाद्यमारीचोऽयंमयाहतः ॥ २३ ॥ हासीतेलक्ष्मणे
लेपमाकुश्यतुमहास्वनम् ॥ ममारराक्षस-सोऽयंश्रुत्वासीताकथंभवेत् ॥ २४ ॥ लक्ष्मणश्चमहाबाहुःकामवस्थांगमिष्यति ॥ इतिसंचिंत्यधर्मा
त्मारामोदृष्टतनूरुहः ॥ २५ ॥ तत्ररामभयंतीव्रमाविवेशविपादजम् ॥ राक्षसंमृगरूपंतहत्वाश्रुत्वाचतत्स्वनम् ॥ २६ ॥ निहत्यपृपतंचान्यमांस
मादायरावयः ॥ त्वरमाणोजनस्थानंससाराभिमुखंतदा ॥ २७ ॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे चतुश्च
त्वारिंशःसर्गः ॥ १४ ॥ आर्तस्वरंतुतंभर्तुर्विज्ञायसदृशंवने ॥ उवाचलक्ष्मणंसीतागच्छजानीहिराघवम् ॥ १ ॥ नहिमेजीवितंस्थानेहृदयंवाव
तिष्ठते । कोशतःपरमार्तस्यश्रुतःशब्दोमयाभृशम् ।। २ ।। आक्रंदमानंतुवनेभ्रातरत्रातुमर्हसि ॥ तंक्षिप्रमभिधावत्वंभ्रातरंशरणैपिणम् ॥३॥
इन प्रकार चिहाना सुनकर विपादके मारे तीव भयसे रामचन्द्रजी भीत हुए ॥ २६ ॥ तिसके पीछे वह एक और मृगको मारकर और उसका मांस ग्रहण
करके शीयतामे जनस्थानकी ओर चले ॥ २७ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकान्ये आरण्यकांडे भापाटीकायां चतुश्चत्वारिंशः सर्गः ॥४४॥
रहो आभममें पनके मध्य अपने स्वामीकी समान पहुत करुणाका शब्द सुनकर सीताजी लक्ष्मणसे बोली, जाकर देखआओ रामचंद्रजीको क्या हुआ ?
पर पारमा पानी चिल्ला रहे हैं यह गन्द सुनकर हमारा मन प्राण अपने २ ठिकाने नहीं है ॥ २ ॥ पनके बीच ऊंचे स्थरमे रोतेहुए अपने माताका
1
या कामात भएपण कारण पूर्ण नेगी गागाई अपने माताकी पाक ठिये ॥ २ ॥
उग प्रकार मिलाना एलर, दिपा पनीम भाग सामना
॥ माननीमारनामामाभाग
गाय पेन दिम प्रकार मिहो यगमे पड़ते हैं तुम्हारे भैयाभी वैसेही राक्षसके वराम पड़े हैं, परन्तु लक्ष्मणजीको मृग मारने गमन करनेके समय जो रामचंद्रजी आज्ञा देगयेथे
उसको मग्न कर नीताजीने इस प्रकार कहे जानारभी रामचंद्रजीके समीप नहीं गये॥४॥तवमीवाजी नितान्त शुभित होकर लक्ष्मणजीसे बोली कि, हे लक्ष्मण ! तुम
गमगंजीके मित्र की गहो। ॥देसो तुम इस प्रकारकी अवस्थामेभी उनकी रक्षा करनेके लिये नहीं जाते । इससे समझ पडा कि, तुम हमको लेलेनेके लिये
गमनंहजीक बिनागकी कामना करनेहो ॥३॥ निभयही हमारे प्रति लुभानेसे नुम उनके ममीप नहीं जाते इसी कारणसे रामचन्दजीकी यह विपद् तुमको प्रिय
लगती है और तुमको उनमे कुछ स्नेह नहीं है ॥ ७ ॥ इमी कारण नुम महायुतिमान् रामचन्द्रजीको न देखकरभी निश्चिन्त बैठे हो । किन्तु तुम जो
ग्मांशमामिहानामिवगोपम् ।। नजगामतथोक्तस्तुभ्रातुराज्ञायशासनात् ॥४॥ तमुवाचततस्तत्रक्षुभिताजनकात्मजा॥ सौमित्रमित्ररूपे
भ्रानुस्त्वममिशात् ॥५॥ यस्त्वमस्यामवस्थायांभातरंनाभिपद्यसे । इच्छसित्वविनश्यंतरामलक्ष्मणमत्कृते ॥ ६॥ लोभानुमत्कृतेनूनंना
नुसन्धमिगधयम् । व्यसनंतप्रियंमन्येनेदोधातरिनास्तिते ॥७॥ तेनतिष्ठसिविश्रब्धंतमपश्यन्महाद्युतिम् ॥ किंहिसंशयमापन्नेतस्मिन्निहमयाभ
पर ।। ८५ कर्तव्यमिहतिष्टत्यायत्प्रधानस्त्वमागतः ॥ एवंढवाणविदेहीवाप्पशोकसमन्विताम् ॥ ९॥ अत्रवील्लक्ष्मणस्वस्तांसीतामृगवधूमि ॥
पत्रमागुग्गंधर्वदेवदानयगासैः ॥ १०॥ अशक्यस्तयवेदेहिभाजेनसंशयः ॥ देविदेवमनुष्येपुगंधर्वेपुपतत्रिषु ॥ ११॥ राक्षसेपुपिशाचेषु के
नामृगेपुर । दानपुरघोगुनसविद्येतशोभने ॥ १२ ॥ योरामंप्रतियुध्येतसमरेवासवोपमम् ॥ अवध्यासमरेरामोनेवत्ववतुमर्हसि ॥ १३ ॥
गमरजी अधीनमें होकर उनमें आये हो तो उनके यहां संशयापन्न होनेसे ॥ ८ ॥ मुझसे यहां रहकर क्या कार्य होगा ? जब वैदेहीजीने आँखोंमें आंसू
भाकर यह यहा कि, गुम्हारी तो यह दगा म्ही नो अब हम क्या करें ॥ ९ ॥ तव मृगीके समान डरी हुई सीताजीसे लक्ष्मणजी बोले कि, हे विदेहकुमारी !
नाग, असुर, गाय, देव, दाना, गक्षम ॥ १० ॥ कोईभी आपके स्वामीको जीतनेमें समर्थ नहीं है, इसमें कुछभी सन्देह नहीं है । हे देवि ! मनुष्य, गन्धर्व,
Isी ॥1॥ गक्षम, पिगार, किन्नर, मृग, व अतिघोर जीव इनमें ऐसा कोईभी नहीं है ॥ १२ ॥ जो इन्द्र के समान पौरुपी श्रीरामचन्द्रजीका सामना
समो. कलाः उनको ममरमें कोई मारभी नहीं सकता, इम लिये तुमको ऐसा अनुचित नहीं कहना चाहिये ॥ १३ ॥
आर० पा.ग.भा. स०४ और गमचन्द्रजीके पिना अकेली इस वनके बीच त्याग करनेकोभी किसी प्रकारसे हमारा साहस नहीं होता, इन्द्रादिबलवान् देवगणभी अपने बलसे रामचन्द्रजीके पलको नहीं रोक सकते ॥१४॥ अथवा सब त्रिलोकी समस्त देवतागणोंके सहित एकत्र मिलकरभी रामचन्द्रजीके पराजय करनेको सामर्थ्य नहीं रखते इससे आप शोक त्याग करके स्थिरचिन हूजिये ॥१५॥आपके स्वामी रामचन्द्रजी मृगोनमको हनन करके शीघही लौटेंगे और हम निश्चय कहते हैं कि, यह शब्द उनका नहीं है और न कोई पह देवरित शब्द है ॥१६॥ निशाचर मारीचही मन्धर्व नगर सदृशी मिथ्या माया विस्तार करके इसप्रकार शब्द चिल्लाकर कररहाहै । हे जानकि ! महात्मा राम करके आप हमारे निकट सौंपी गई हैं ॥ १७॥इसही कारणसे आपको त्याग करनेमें हमारा उत्साह नहीं होता। हे कल्याणि ! हे वरारोहे ! इन सब राक्षसोंके साथ हमारी नत्वामस्मिन्वनेहातुमुत्सहेराघवंविना ॥ अनिवार्यवलंतस्यवलैबलवतामपि ॥ १४ ॥ विभिलौके समुदितेःसेश्वरैःसामरैरपि ॥ हृदयंनिर्वृततेस्तु संतापस्त्यज्यतांतव ॥ १५ ॥ आगमिष्यतितेभर्ताशीघंहत्वामृगोत्तमम् ॥ नसतस्यस्वरोव्यक्तंनकश्चिदपिदेवतः ॥१६॥ गंधर्वनगरप्रख्यामा यातस्यचरक्षसः ॥ न्यासभूतासिवेदेहिन्यस्तामयिमहात्मना ॥१७॥ रामेणत्वंवरारोहेनत्वात्यक्तमिहोत्सहे ॥ कृतवैराश्चकल्याणिवयमेतैनिशाच २ः॥ १८ ॥ खरस्यनिधनेदेविजनस्थानवधंप्रति ॥ राक्षसाविविधावाचोव्याहरंतिमहावने ॥ १९॥ हिंसाविहारावैदेहिनचिंतयितुमर्हसि ॥ लक्ष्मणेनेवमुक्तातुकुद्धासंरक्तलोचना ॥२०॥ अत्रवीत्परुपंवाक्यलक्ष्मणंसत्यवादिनम् ॥ अनार्यकरुणारंभनृशंसकुलपांसन ॥ २१ ॥ अहंतवप्रियंमन्येरामस्यव्यसनमहत् ।। रामस्यव्यसनंदृष्ट्वातेनैतानिप्रभापसे ॥२२॥ 苏菜菜染法染治法老法治冲光染 गता होगई है ॥ १८॥ हे देवि ! सरको मारने और जनस्थानको विध्वंस करनेसे राक्षस लोग इस महावनमें हमारे ऊपर अनेक प्रकारके मोहिनी मायाके वचन प्रयोग किया करते हैं ॥ १९ ॥ हे जानकि ! साधु लोगोंकी हिंसा करनाही राक्षस लोगोंका एकमात्र खेल है इस कारण इस विषयमें चिन्ता करना किसीमकारसे भी आपको उचित नहीं है । जर लक्ष्मणजीने इसप्रकार कहा तबकोषके मारे जानकीजीके नेत्र लाल हो आये ॥ २० ॥ यह कठोर वचन सत्यवादी लक्ष्मणजीसे घोली कि, रे नृगंग । कुलनागा । नुम श्रीरामचन्द्रको मरवाकर दया करके हमारी रक्षा करनेको तैयार हुए हो, इस कारणसे यह ध्यान आर्यजनोचित नहीं है ।। २१ ।। एपने जाना कि गमपणमीकी यह पनी भारी विपद् नम्हारी गरामप्यारी नई है दमी कारण तुम उनको विपदो पढा दुभा देश्पकर ऐगा कहते हो ॥ २२ ॥ ॥ ६८ गान : नुमा मनान ना समभाव व गुन पापी गर्नुके मनमें जो ऐना निन्दनीय पाप रहेगा तो इसमें आधर्यही क्या है ? ॥ २३ ॥ तुम्हारा स्वमा परा गोरा गानाजी जो ले वनको आने लगे, तब हमारा लालच करके तुमभी अकेलेही उनके साथ आये । अथवा छिपकर भरतके भेजेहुए तुम स्वामी माप भाडाही ॥१॥ किन्तु ई नम्मण ! नुसते या भग्नने जो मनमें मोचा है, यह सिद्ध नहीं होगा क्योंकि हम पनपलाशलोचन, नीलोत्पलश्याम ॥ २५ ' धीगरवाटीपी टोकर किन काग्ने अन्यजनकी अभिलाषा करेंगी इममे हे लक्ष्मण ! हम तुम्हारे सामने निश्चयही प्राण त्याग देंगी ।। २६ ॥ क्यों। गमी बिना मन कालभी दम इन लोकमें प्राण धारण नहीं करमनीं । सीताजीके इस प्रकार रोमहर्षण कठोर वचन ॥ २७ ॥ सुन : मैगनियंपपवेपुपालक्ष्मगपद्येत ॥ त्वदिधेपुनृशंसेपुनित्यंप्रच्छन्नचारिपु॥२३॥ सुदुष्टस्त्वंवनेराममेकमेकोनुगच्छसि ॥ ममहेतोःप्रतिच्छन्नः प्रयुको मग्नेना ॥ २१ ॥ तन्नमिद्धतिसौमित्रेतवापिभरतस्यया ॥ कथमिंदीवरश्यामरामपद्मनिभेक्षणम् ॥ २६॥ उपसंश्रित्यभरिकामयेयं त्यन्जनम ॥ ममक्षतामामिप्राणांस्त्यस्याम्यसंशयम् ॥ २६॥ गमविनाक्षणमपिनेयजीवामिभूतले ॥ इत्युक्तःपरुपंवाक्यसीतयारोमहर्पणम्॥ ॥ २७ ॥ असीलक्ष्मणःमीनांपांजलिःमजितेंद्रियः ॥ उत्तरंनोत्सहेवक्तुंदेवतंभवतीमम ॥ २८ ॥ वाक्यमप्रतिरूपंतुनचित्रीपुमेथिलि || नभावपनार्गगामेपुलोकपुदृश्यते ॥ २९ ॥ विमुक्तधर्माश्रपलास्तीक्ष्णाभेदकराःस्त्रियः ॥ नसहेहीदवाक्यंवेदेहिजनकात्मजे ॥ ३० ॥ श्रीरयोगभयोमध्यंतनागमंनिभम् ॥ उपशृण्यंतमेमसाक्षिणोहिवनेचराः ॥ ३१ ॥ न्यायवादीयथावाक्यमुक्तोहंपरुपंत्वया ॥ धिक्काम परिन यन्मामांविशंकमे ॥ ३२ ॥ यमगती हाय जोडकर उनमें बोले कि, आर हमारी माक्षात् देवता हैं, इस प्रकार उत्तर देनेको हमारा साहस नहीं होता ॥ २८ ॥ परन्तु है जानकि : या प्रोग्य वातां कही है मोगियों के लिये इसका कहना कुछ विचित्र यात नहीं है, क्योंकि इस लोकमें वियोंका स्वभाव ऐसा देखाही जाता है ॥ २० ॥ पियोगी जाति ग्यभारही करनाल. धर्मानहीन है, यह पिता पुत्र इत्यादिमें परस्पर भेद करा देती हैं किन्तु हे जानकि ! तुम्हारी य' nirपानी पी जाती है, ॥ ३० ॥ अतिदुर पाणोंकी नाई यह तुम्हारे पचन हमारे दोनों कानोंको विद्धकर रहे हैं । अच्छा ! वनवासी देवतागण सबही गाशी का भरण गरे ॥ ३१ ॥ इलेपपा पानां कही है गयापि तुमने हमको कठोर वचन कहे तुमको धिकार है । निश्चयही तुम्हारा विनाशका- आर० पा.स.मा. उपस्थित है ( राक्षमालकी नाग करानेवाली तुझको धिक्कार है यह गूढ है ) जो हमपर ऐसी शंका करती हो ॥ ३२ ॥ हम सदाही गुरुजनोंकी आज्ञाका पालन किया गने हैं इसने रामचन्द्रजीकी आज्ञा मान तुम्हें छोड नहीं जातेथे किन्तु तुमने खीके स्वभाव और दुष्ट प्रकृतिके वश होकर हमको दुर्वचन कहे । हे वरानने ! मां गमनन्दजी हैं हमभी यहां जाते हैं, तुम कुशल क्षेमसे रहो ॥ ३३ ॥ और समस्त धनदेवतागण तुम्हारी रक्षा करें, हे विशालाक्षि ! बडे २ बुरे शकुन हमारे मानने प्रगट हो रहे हैं, इस कारणसे फिर रामचन्द्रजीके साथ आकर तुमको कुशल सहित देखें ॥ ३४ ॥ जब लक्ष्मणजीने इस प्रकारसे कहा तब जनकनन्दिनी मीजी अपिरलवाहिनी अश्रुधारासे भीजकर रोते २ लक्ष्मणजीसे बोली ॥ ३५॥ हे लक्ष्मण ! रामके बिना हम गोदावरी में डूब मरेंगी अथवा फाँसीसे प्राण त्याग करेंगी गीत्यादुष्टस्वभावेनगुरुवाक्येव्यवस्थितम् ॥ गच्छामियत्रकाकुत्स्थःस्वस्तितेऽस्तुवरानने ॥३३॥ रक्षतुत्वांविशालाक्षिसमग्रावनदेवताः॥ निमि तानिदिधोराणियानिप्रादुर्भवंतिमे॥ अपित्वांसहरामणपश्येयंपुनरागतः ॥३४॥ लक्ष्मणेनैवमुक्तातुरुदतीजनकात्मजा ॥ प्रत्युवाचततोवाक्यं तीवबाप्पपरिप्लुता ॥ ३६॥ गोदावरीप्रवेक्ष्यामिहीनारामेणलक्ष्मण॥आबंधिष्येऽथवात्यक्ष्येविपमेदेहमात्मनः ॥३६॥ पिवामिवाविपंतीक्ष्णंप्र वेक्ष्यामिहुताशनम् ॥ नत्वहंराघवादन्यंकदापिपुरुपंस्पृशे ॥ ३७॥ इतिलक्ष्मणमाश्रुत्यसीताशोकसमन्विता ॥ पाणिभ्यांरुदतीदुःखादुदरं प्रजवानह ॥ ३८ ॥ तामार्तरूपाविमनारुदंतीसौमित्रिरालोक्यविशालनेत्राम् ॥ आश्वासयामासनचैवभतुस्तंभ्रातरंकिंचिदुवाचसीता ॥३९॥ अथवा फिनी ऊंचे पर्वत इत्यादिक पर चढकर वहांसे अपनी देहको नीचे गिरा देंगी ॥ ३६ ॥ या तीक्ष्ण विप पान करेंगी, अथवा अनिमें प्रवेश करेंगी ॥ पापि श्रीरामचन्द्रजीके विना और किसी पुरुपको हम कभी स्पर्श नहीं करेंगी ॥ ३७॥ सीताजी इसप्रकार शोकयुक्त होकर रोते २ लक्ष्मणजीसे ऐसा कहकर आपके मारे अपना उदर पीटने लगी (सर्व राक्षसोंके नारा विना मेरी उदरपूर्ति न होगी यह ध्वनिहै) ॥ ३८ ॥ लक्ष्मणजीने विशालनयना जनकदुलारी सीताजी गुनो भी गई कि नीती पदी प्रनिता पूर्ण थी कि अन्य पुगएको म्पर्श न कम्गी अनिमें प्रवेश कर जाऊंगी इसमेभी पनि निकलनी फि जानकी अप्रिय प्रवेश कर गई थी और यद पापा indianलहे.पोलिभापमिटी एमादोलाद यथा-"जगामशरणं वहिपायमध्यंगचिस्मिना पायरे मामिण थिती गुग्यम् । भारगानीमयगु मर्धभूमहविधताम् । Mmment1-0nd marhwकनामा कामिनीप" " ने महाआरव भावमे रोते देखकर बहुत समझाया बुझाया परन्तु फिर जानकीजीने अपने देवर लक्ष्मणजीसे और कुछ न कहा ॥ ३९ ॥ तिसके पीछे जितेन्द्रिय और विशुद्धचिन लक्ष्मणजी हाय जोड प्रणाम कर कुछ एक विनती करते हुए और वारंवार उनकी ओर देखते दुःसित हो रामचन्द्रजीके निकट को चले ॥१०॥ इत्या भीमा वाल्मी आदि आरण्यकांडे भापाटीकायां पंचरत्वारिंशः सर्गः॥४५॥लक्ष्मणजी जानकीकी कटूक्तिमे पीडित हो क्रोधर्म भर श्रीरामचन्द्रजीको देश के लिये अतिव्ययचिनमे चले ॥ १ ॥ तिसके पीछे दशानन रावण यह सुअवसर पाकर यतीका रूप धारण कर भीवही श्रीमीताजीके सामने आया ॥२॥ बढ़ कोमल गेरुआ पत्र पहरे शिरसर वार रसाये छत्री लगाये खडाऊं पहरे बांये कंधेपर लाठी और कमंडलु हाथमें ॥ ३ ॥ वह अतिवली ऐसा त्रिदंडी संन्यामीका रुप ततस्तुसीवामभिवाद्यलक्ष्मणःकृतांजलि किंचिदभिप्रणम्य ॥ अवेक्षमाणोवहुशःसमैथिलींजगामरामस्यसमीपमात्मवान् ॥ ४० ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे पंचचत्वारिंशःसर्गः ॥ ४५ ॥ तयापरुपमुक्तस्तुकुपितोराघवानुजः ॥ सविकांक्षन्भृशंगमं प्रतस्थेनचिरादिव ॥ १॥ तदासायदशग्रीवः क्षिप्रमंतरमास्थितः ।। अभिचकामवेदेहीपरिव्राजकरूपधृक् ॥ २॥ लक्षणकापायसंवीतःशिखीची उपानही । वामेचांसेऽवसन्याथशुभेयटिकमंडलू ॥ ३ ॥ परिव्राजकरूपेणवैदेहीमन्ववर्तत ॥ तामाससादातिवलोभ्रातृभ्यारहितांचने ॥४॥ रहितांमूर्यचंद्राभ्यांसंध्यामिवमहत्तमः ॥ तामपश्यत्ततोवालाराजपुत्रीयशस्विनीम् ॥५॥ रोहिणींशशिनाहीनांग्रहबद्भुशदारुणः । तमुग्रंपाप फर्माणंजनस्थानगताद्रुमाः ॥ ६॥ संदृश्यनप्रकंपंतेनप्रवातिचमारुतः ॥ शीघ्रखोताश्चतंदृष्ट्वावीक्षतरक्तलोचनम् ॥७॥ स्तिमितंगंतुमारेभेभया द्रोदावरीनदी ।। रामस्यत्वंतरंग्रेप्सुर्दशग्रीवस्तदंतरे ॥ ८॥ उपतस्थेचवैदेहोंभिक्षुरूपेणरावणः ॥ अभव्योभव्यरूपेणभर्तारमनुशोचतीम् ॥ ९॥ उना सीताजीके सन्मुख हुआ, जब कि दोनों भाई आश्रममें नहींथे ॥ ४ ॥ जिस प्रकार विना चन्द्र सूर्यके सन्ध्याकालमें महा अंधकार हो आता है वैसेही पिना राम और रक्ष्मणजीके सीवाजीके निकट दशानन आकर परम यशस्विनी राजपुत्री जनकनन्दनीजीको देखनेलगा ॥ ५॥ जैसे चन्द्रमाकर हीन रोहिणी नक्षत्रको राहु देखे। जनरयानके समस्त वृक्ष उपस्वभाव पाप करनेवाले रावणको देखकर ॥ ६ ॥ हिलने झुलनेसे रहित होगये पवनका चलना बंद होगया । लाल:२ नेत्र किये सीताजीके प्रति उसकी दृष्टिकोलगी देख नदीभी शीघ्र गतिको त्याग मंद २ चहनेलगी ।। ७ ।। गोदावरी नदीका जलभीशंकाके वरा होकर मंद २ वहीं लगा। इमी अवसरमें रामचन्द्रजीका अन्तर चाहनेवाला दशमीच ॥ ८ ॥ भिक्षुकका वेश बनाकर वैदेहीजीके निकट आन पहुँचा, यह महाकुरूप दशानन अतिरूपवती ka आर० स०४ अपने लिये गोर कालीगुरं ॥ ९ ॥ जाननीको पसे पान हुआ जिसमकार चित्रानक्षत्रके निकट शनि आताहै, वहां पहुँच उसने ऐसा टीप टापका संन्यासी गि हानिकार लिनकोंमे टिपहुआ कुंआ हो और वहां आने वाला चट उसमें गिरे ॥ १० ॥ ऐसा छमवेशी साधुका वेश धारण किये हुर रावग उन पानी गाविया जानारीजीकी ओर देगार सडा हुआ ॥ १३ ॥ सुन्दर स्वरूप, दशनपंक्ति जिनकी मनोहर, वदन पूर्णचन्द्रसमान जो जानकीजी पर्गशालामें सीसपनिम्गी पीडित होगहीयीं ॥ १२ ॥ तिन कमलनेत्रा पीताम्बर धारण किये जानकीजीके निकट वह निशाचर हर्पसहित पहुँचा ॥ १३॥ ऐसी जानकी को दंग गाय काम याणमे पीडितदुवा उस समय वेदका उचारण करके जानकीजीकी प्रशंसा करके कहनेलगा ॥ १४ ॥ तुम तीनोंलोकमें उनमहो; भ्यानतोदेदों निवामिशनेश्वरः ॥ सहसाभव्यरूपेणतणेःकूपइवावृतः॥ १०॥ अतिष्ठत्प्रेक्ष्यवैदेहींरामपत्नीयशस्विनीम् ॥ तिष्ठन्संप्रेक्ष्यच नापींगमस्यरायणः ।।११॥ शुभांरुचिरदंतोष्ठीपूर्णचंद्रनिभाननाम् ॥ आसीनांपर्णशालायांवाष्पशोकाभिपीडिताम् ॥ १२॥ सतांपद्मपला शाक्षीपीतकोशेयामिनीम् । अभ्यगच्छतवैदेहीदृष्टचेतानिशाचरः ॥ १३ ॥ दृष्ट्वाकामशराविद्धोब्रह्मघोपमुदीरयन् ॥ अत्रवीत्प्रश्रितवाक्यर दिनेगक्षमाधिपः ॥ ११ ॥ तामुत्तमाविलोकानांपद्महीनामिवश्रियम् ॥ विभ्राजमानांवपुपारावण प्रशशंसह ॥ १५ ॥ रौप्यकांचनवर्णाभेपीत कौशयामिनि ॥ कमलानांशुमालांपमिनीवच विभ्रती ॥ १६॥ द्वीश्री कीर्तिःशुभालक्ष्मीरप्सरावाशुभानने ॥ भूतित्विंवरारोहेरतिवीस्वैर नारिणी ॥ १७ ॥ ममाःशिखरिणःस्निग्धा-पांडुरादशनास्तव ॥ विशालेविमलेन।रक्तांतकृष्णतारके ॥ १८ ॥ विशालंजवनपीनमूहकार फरोपमा ॥ एतापनितोवृत्तामंदतीसंप्रगल्भिती ॥ १९॥ और पपिनीमी ममान मनोहर कमल फूलोंमे समाकुल होरहीहो प्रेमी प्रगंमा रावणने की ॥१५॥ फिर कहा कि हे शुभानने ! तुम्हारा वर्ण विशुद्ध कांचनकी सदृश है, मार तुम पीले परे रंगमीन वा पोहो, कमल फूलोंकी माला गलेमें धारण कियेहो ॥ १६ ॥ हे वरारोहे । तुमहीं, श्री कीर्ति, लक्ष्मी, अप्सरा, अथवा होगा गाक्षात् पनि हो जो उनमें इम्यानुमार विहार करती हो मो वनलाओ कि तुम कौन हो ॥ १७ ॥ तुम्हारे सब दांव परस्पर ममान हैं, उनका भवभाग की ओर मरण पनीर और भत वर्ण । नुम्हारे नेत्र गुगल विगाल, निमल प्राणाई लिये, और हष्णनाराओं करके युग हैं ॥ १०॥ तुम्हारा *****************.. - NH tatha frometir Manीग मपाल रामनार च. गोलाकार में या फिर पापमान" ११. .
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पा.रा.भा. स०४६ तुम अकेली कैसे इस महापनमें नहीं डरतीहो ?हे वरानने ! तुम कौन हो, किसकी स्त्री हो कहांसे आई हो, और किस कारण इस दंडकारण्यमें ॥ ३१ ॥ अकेली विचरती हो । क्योंकि यह जगह घोर राक्षसों करके युक्त इस प्रकारसे महात्मा रावणने वैदेहीजीकी प्रशंसा की ॥ ३२ ॥ उसको ब्राह्मण वेप धारण किये आया हुआ देस जानकीजीने यथाविधि अतिथिसत्कारसे सब भांति उसकी पूजा की ।। ३३ ॥ प्रथम बैठने के लिये आसन दिया फिर चरण धोनेको जल, पुनः फलाहारादिक जो स्खेथे वह सौम्य दर्शन रावणको निवेदन किये ।। ३४ ॥ ब्राह्मणका वेप धारण किये लाल वस्त्र पहरे संन्यासीकी समान पात्र लिये जानकीजीने महात्माकी उपेक्षा न करनी चाहिये इस कारण बाह्मणकेही समान रावणका निमंत्रण करके कहा ॥ ३५ ॥ हे विप्र ! आप कुशासनपर सुखसहित बैठ जाइये, कथमेकामहारण्येनविभेपिवरानने॥ कासिकस्यकुतश्वत्वंकिनिमित्तंचदंडकान्॥३१॥ एकाचरसिकल्याणिघोरानाक्षससेवितान् ॥ इतिप्रशस्ता वैदेहीरावणेनमहात्मना ॥ ३२॥ द्विजातिवेपेणहितंदृष्ट्वारावणमागतम्॥ सर्वैरतिथिसत्कारैःपूजयामासमैथिली ॥३३॥ उपानीयासनपूर्वपायेना भिनिमंत्र्यच ॥ अत्रवीत्सिद्धमित्येवतदातंसौम्यदर्शनम् ॥ ३४ ॥ द्विजातिवपेणसमीक्ष्यमैथिलीसमागतंपात्रकुसुंभधारिणम् ॥ अशक्यमुद्धे पुगुपायदर्शनान्यमंत्रयदाह्मणवत्तथागतम्॥३५॥इयंबृसीब्राह्मणकाममास्यतामिदंचपाद्यप्रतिगृह्यतामिति ॥ इदंचसिद्धवनजातमुत्तमंत्वदर्थमव्यन मिहोपभुज्यताम् ॥ ३६॥ निमंत्र्यमाणःप्रतिपूर्णभापिणींनरेंद्रपत्रींसमीक्ष्यमैथिलीम् ॥ प्रसह्यतस्याहरणेदृढंमनःसमर्पयामासवधायरावणः ॥ ३७॥ ततःसुवेपंमृगयागतंपतिप्रतीक्षमाणासहलक्ष्मणंतदा॥ निरीक्षमाणाहरितं ददर्शतन्महद्वननैवतुरामलक्ष्मणौ ॥ ३८॥ इत्या श्रीम द्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये अरण्यकांडे पट्चत्वारिंशः सर्गः ॥४६॥ ********** और यह पाय ग्रहण कीजिये, व यह वनके फल सव आपकेही लिये रक्खेहैं, इनको भोजन कीजिये ॥ ३६॥ नरेन्द्रभार्या जानकीजीने जब इसपकार निमंत्रण किया तब रावण उनकी ओर देख अपना मन अर्पण कर अपने वध करानेको बलपूर्वक उनके हरलेजानेका निश्चय करताहुआ।॥ ३७॥ परम प्रियमूर्ति रामचन्द्रजी लक्ष्मण जीके सहित मृगया करने गयेथे. जानकी उस समय उनकी बाट देखती हुई इधर उधर दृष्टि करने लगी, तो केवल चारों ओर बड़े विस्तारवाली हो वर्गकी तत* ही दृष्टि आई, परन्त स ARTI नि ग जर संन्यासीपारी रायणने हरण करनेके अभिलापसे इस भांति पूँछा तब सीताजी आपही आप विचार करने लगीं ॥१॥ कि एक चो यह ब्राह्मण है दूसरे अतिथिहै जो हम इमने नहीं घोटती, ती कदाचित् शाप न देदे, एक मुहूर्त भर यह शोच विचारकर जानकीजी उससे बोली ॥ २ ॥ आपका कल्याणहो। हम मिथि सानरेग महात्मा जनकनीकी तौ कन्या और श्रीरामचन्द्रजीकी प्रिय भार्या हैं हमारा नाम सीताहै ॥ ३ ॥ विवाह होनेके पीछे इक्ष्वाकुवंशियोंकी राजधानी अयो ध्यानगरी यारह वर्पतक रहकर पूर्णमनोरथही अनेक प्रकारके मनुष्योंको दुर्लभ सुख हमने भोगे ॥ ४ ॥ फिर तेरहवें वर्षमै राजा दशरथजीने मंत्रिगणों के साथ मटाह करके रामचन्द्रजीके अभिषेक करनेका उद्योग किया ॥ ५॥ उनकी आज्ञानुसार सब अभिपेककी तैयारियां होने लगी, उस समय हमारी माननीया सासु गयणेनतुदेहीतदापृष्टाजिहीपुणा ॥ परिबाजकरूपेणशशंसात्मानमात्मना ॥१॥ ब्राह्मणश्चातिथिश्चेपअनुक्तोहिशपेतमाम् ॥ इतिध्यात्वामुहूर्त तुसीतावचनमब्रवीत् ॥ २ ।। दुहिताजनकस्याहमेथिलस्यमहात्मनः॥ सीतानामास्मिभद्रतेरामस्थमहिपीप्रिया ॥ ३ ॥ उपित्वाद्वादशसमा इक्ष्याणां निवेशने ॥ भुंजानामानुपान्भोगान्सर्वकामसमृदिनी ॥ ४ ॥ तत्रयोदशेवराजाऽमंत्रयतप्रभुः ॥ अभिपेचयितुंरामसमेतोराजमं निभिः॥५॥ तस्मिन्सनियमाणेतुराघवस्याभिपेचने । केकेयीनामभरिममार्यायाचतेवरम् ॥ ६॥ परिगृह्यतुकैकेयीचशुरंसुकृतेनमे ॥ ममप्रवाज भर्भरतस्याभिपेचनम् ॥ ७ ॥ द्वावयाचतभर्तारसत्यसंधंनृपोत्तमम् ॥ नाद्यभोल्येनचस्वप्स्येनपास्येचकदाचन ॥ ८॥ एपमेजी पितस्यांतोरामोयदभिपिच्यते ॥ इतिश्रुवाणकिकेयोंश्वशुरोमेसपार्थिवः ॥ ९॥ अयाचतार्थरन्वर्थर्नचयाजांचकारसा ॥ मममर्तामहातेजावय मानविंशकः ॥ १० ॥ अष्टादशहिवाणिममजन्मनिगण्यते ॥ रामेतिप्रथितोलोकेसत्यवान्छीलवाछुचिः॥११॥ केपीजीने अपने स्वामी राजा दशरथजीसे दो वर मांगे ।। ६ ।। कैकेयीजीने अपने सुरुतके बलसे शुरको धर्मके वराम करके हमारे स्वामी रामचन्द्रजीको वनवास, और भरतजीको अभिषेक ॥ ७ ॥ यह दो वर नृपश्रेष्ठ सत्यप्रतिज्ञ महाराज दशरथजीसे मांगे और उन्होंने सत्यप्रतिज्ञ, नृपतिश्रेष्ठ राजा दशरथजी अपने स्वामीसे मी पर मांग महभी कहा कि जो रामचंद्रजीका अभिषेक होगा, तो हम किसी प्रकारसे भी भोजन पान वा शयन न करेंगी ।। ८॥ और यही हमारे जीवनका |अंत होजायगा जो रामनन्दजीका अभिषेक हुआ तो हम न जियेंगी । जब कैकेयीने इस प्रकार कहा तो हमारे शुर महाराज दशरथजीने ॥९॥ उनसे बहुत पनाटि देने की प्रार्थना की परन्तु उन कैकेयीजीने न मानी उस समय महा तेजवान हमारे स्वामी पचीस वर्षके ॥ १० ॥ और हमारी आयु जन्मसे गणना करके ************************* आर० अठारह वर्षकी थी, हमारे स्वामी रामनामते विख्यात है, वह सत्यवान, सुशील, निर्मल स्वभाव ॥ १३ ॥ विशालनेत्र, सर्व प्राणियोंके हितकारी महाका परन्तु इनके पिता महाराज दशरथजी कामसे आर्त होगये थे ॥ १२ ॥ इसकारण कैकेयीका प्रिय करनेके लिये उन्होंने इस प्रकारके गुणसम्पन्न रामचं अभिपेक न किया और जब रामचंद्रजी अभिषेकार्थ अपने पिताके निकट आये तौ ॥ १३ ॥ कैकेयीने शीघही उनसे यह वचन कहा कि, हे रघुन: तुम्हारे पिताजीने तुमको जो आज्ञा दीहै वह हमसे सुनो ॥ १४॥ हे काकुत्स्थ ! भरतको यह निष्कंटक राज्य देना होगा और तुम्हें चौदह वर्षके लिये रहना पडेगा ॥ १५ ॥ इसकारण तुम वनमें जाकर पिवाके सत्यकी रक्षा करो और मिथ्यावादी न करो, पिताको इस कणसे छुडाओ. तब दृढवत हमारे मा. विशालाक्षोमहाबाहुःसर्वभूतहितेरतः ॥ कामार्तश्चमहाराज पितादशरथःस्वयम् ॥ १२ ॥ कैकेय्याःप्रियकामार्थतंरामनाभ्यपेचयत् ॥ अगिरी कायतुपितुःसमीपंराममागतम् ॥ १३॥ कैकेयीममभर्तारमित्युवाचद्रुतंवचः ॥ तवपित्रासमाज्ञप्तममेदंशृणुराघव ॥ १४ ॥ भरतायप्रदान मिदंराज्यमकंटकम् ॥ त्वयातुखलुवस्तव्यंनववर्षाणिपंचच ॥ १५॥ वनेप्रत्रजकाकुत्स्थपितरंमोचयानृतात् ॥ तथेत्युवाचताराम कैकेयीमानों भयः॥१६॥चकारतद्वचःश्रुत्वाभाममढवतः॥ दद्यानप्रतिगृह्णीयात्सत्यंबूयानचानृतम् ॥ १७॥ एतद्ब्राह्मणरामस्यव्रतधृतमनुत्तमम् ॥ सन्न भ्रातातुवेमात्रोलक्ष्मणोनामवीर्यवान् ॥१८॥ रामस्यपुरुपव्याघःसहाय समरेऽरिहा ॥ सभ्रातालक्ष्मणोनामब्रह्मचारीदृढव्रतः॥ १९॥ अगन उछलनुप्पाणिःप्रव्रजंतंमयासह ।। जटीतापसरूपेणमयासहसहानुजः ॥ २० ॥ प्रविष्टोदंडकारण्यधर्मनित्योदृढव्रतः ॥ तेवयंप्रच्युताराज्यान केय्यास्तुकृतेवयः ॥ २१ ॥ विचरामोद्विजश्रेष्ठवनंगंभीरमोजसा ॥ समाश्वसमुहूर्ततुशक्यंवस्तुमिहत्वया ॥२२॥ श्रीरामचंद्रजीने निडरहोकर कैकेयीसे ऐसाही होगा; यह कहा ॥ १६ ॥ हमारे दृढव्रतधारी स्वामीने उनके वचन सुनकर उसीके अनुसार कार्य किया. हे वह केवल लोकोंको दान किया करते हैं; परन्तु कभी किसीसे कुछ ग्रहण नहीं करते, सदाही सत्य कहते हैं कभी मिथ्या नहीं कहते ॥ १७ ॥ हे ब्राह्मण ! पर रामचंद्रजीका श्रेष्टवतहै । उनके सौतेले भाई लक्ष्मणजी अतिशय वीरहैं ॥ १८ ॥ व सदा रामजीके संग रहा करतेहैं पुरुपव्याघहैं समरमें निहारतेही शत्रुक:::: करते हैं वह नामचारी और दृढव्रतधारीहैं ॥ १९ ॥ धनुपवाण हाथमें ले, जटा रसाय तपस्वीका भेप बनाय रामचंद्रजीके व हमारे साथ २ वनमें चले आये ॥ २० ॥ इमकार दावतधारी महात्मा रामचंद्रजी भावा लक्ष्मण और अपनी सी सहित जटा रखाय तपस्वी वेप धारणकर दंडकारण्यमें आये ॥ २१॥ हे द्विजश्रेष्ठ ! अब हम तीनजन कैकयीके कारण राज्यभष्ट होकर अपने तेजके प्रभावसे गंभीर वनमें विचरण करते हैं । हे द्विजश्रेष्ठ ! एक मुहूर्त भर विश्रामकरो ॥ २२ ॥ अभी हमारे स्वामी बहुत सारे वनफल, मूल और, रुरु, वराह व गोधा वध करके बहुत मांस द्रव्य ले यहां आते होंगे जब वह आगे तब आपका भली भांतिसे सत्कार होगा इनमे विरानिये ॥ २३ ॥ इस समय आप अपना नाम गोत्र और वंश सत्य २ कहिये हे द्विज ! किस कारणसे आप इस दंडकारण्यमें अकेले घूमते हैं ॥ २४ ॥ जब रामभार्या मीताने इस प्रकारके वचन कहे वो महा बलवान राक्षसराज रावण उनको तीखा उत्तर देता हुआ वोला ।। २५॥ हे जानकि ! सुर असुर और मनुष्य महित समस्त लोक जिसके डरके मारे थर २ कांपते हैं हम वही राक्षसोंके राजा रावणहैं ॥ २६ ॥ तुम्हारा लावण्य कांचनकी समान है और तुम रेशमी वन पहररहीहो. हे अनिन्दिते ! तुमको देखकर अपनी स्त्रियों में हमारा अब कुछभी अनुराग नहीं रहा ॥ २७ ॥ हम बहुत सारी उत्तम स्त्रिये अनेक स्थानोंसे हरकर लाये हैं। आगमिष्यतिमेभर्तावन्यमादायपुप्कलम् ॥ रुरुन्गोधान्वराहांश्चहत्वादायामिपंवहु ॥२३॥ सत्वंनामचगोत्रंचकुलमाचक्ष्वतत्वतः ॥ एक श्रदंडकारण्येकिमर्थवरसिद्विज ॥ २४ ॥ एवंवत्यांसीतायांरामपन्यांमहाबलः ।। प्रत्युवाचोत्तरंतीरावणोराक्षसाधिपः ॥ २५ ॥ येनवित्रा सितालोकाःसदेवासुरमानुपाः ॥ अहंसरावणोनामसीतेरक्षोगणेश्वरः ॥ २६॥ त्वांतुकांचनवर्णाभांदृष्ट्वाकौशेयवासिनीम् ॥ रर्तिस्वके दारेषुना विगच्छाम्यनिंदिते ॥ २७॥ बहीनामुत्तमस्त्रीणामाहतानामितम्ततः॥ सर्वासामेवभद्रतेममाग्रमहिपीभव ।।२८।। लंकानामसमुद्रस्यमध्येमम महापुरी | सागरणपरितितानिविष्टागिरिमूर्धनि ॥ २९ ॥ तत्रसीतेमयासार्द्धवने विचरिष्यसि ॥नचास्यवनवासस्यस्पृहयिष्यसिभामिनी॥ ॥ ३० ॥ पंचदास्यासहस्राणिसर्वाभरणभूपिताः ॥ सीतेपरिचरिष्यतिभार्याभवसिमेयदि ॥ ३१ ॥ रावणेनेवमुक्तातुकुपिताजनकात्मजा ॥ प्रत्युवाचानवद्यांगीतमनाहत्यराक्षसम् ॥ ३२॥ सो नुम उन समस्तके बीनमें पटरानी बनो ॥२८॥ तुम्हारा मंगलहो. हेजानकि ! चारों तरफ समुद्रसे घिरीहुई पर्वतके शिर त्रिकूटपर लंका नामक जो नगरीहै वह हमा रही है ॥ २९ ॥ तुम वहां हमारे साथ महावनों में विचरण किया करोगी. हे भामिनि ! वहां विचरण करनेपर फिर तुमको इस वनमें वास करनेकी अभिलापा नहीं रहेगी ॥ ३० ॥ हे सीते ! यदि तुम हमारी भार्या वनोगी तो सर्व वखाभूपण भूपित पांच हजार दासिये तुम्हारी सेवा किया करेंगी ॥ ३१ ॥ "रावण यह जानता था कि, मैंने ऐने पाप किये हैं कि, जिससे जप तप करनेसे कदाचित् मुक्ति नहीं प्राप्त हो सकती इस कारण विरोध करके राम जिनको तत्त्वसे ईश्वर जानना था उनके हाथसे मरनेमें मुक्तिकी प्रानि विचारकर जानकीसे ऐसे वाक्य कहे कि जो ऐसे निठुर वचन कहूं वो शीव अधिक पाप करनेसे। में रा.भा. ******** पद पाऊँगा" अनिन्दिता जनककुमारी जानकीजी राक्षसराज रावण करके इस प्रकार कही जानेपर महाकोधित हुई, और उसका अनादर करके कहने लगी ।। आर० ।। ३२ ॥ जो यहां पर्वत सुमेरुके समान सबके आश्रय देनेवाले अकंपनीय, महासागरकी समान क्षोभ रहित हैं, ऐसे महेन्द्र तुल्य हम स्वामी रामचन्द्रजीकी अनु गता हैं ॥ ३३ ॥ जो सब शुभलक्षण युक्त वटवृक्षकी समान हैं, हम उनहीं सत्य प्रतिज्ञ महाभाग रामचन्द्रजीकी अनुगता हैं ॥ ३४ ॥ जो आजानु बाहुवाले हैं, विशालहृदय है, और सिंहके समान विक्रमके साथ चलनेवाले हैं हम उनहीं नृसिंह और सिंहसदृश रामचन्द्रजीकी अनुगता हैं ॥३५॥ उनका मुख पूर्ण चन्द्रमाके समान है, कीर्ति यहुतही विस्तारित होरही है और बांहें जिनकी अति बडी हैं, हम उन्हीं राजकुमार जितेन्द्रिय रामचन्द्रजीकी अनुगवा है ।। ३६ ॥ तुम शृगाल होकर सिंहीका अभिलाप करते हो, परन्तु तुम हमको नहीं ले सकते, जैसे सूर्यकी प्रभाको कोई नहीं छू सकता ऐसेही श्रीरामचन्द्रजीके तेजरूप अमिसे घिरी हमको महागिरिमिवाकंप्यमहेंद्रसदृशंपतिम् ॥ महोदधिमिवाक्षोभ्यमहराममनुव्रता ॥ ३३ ॥ सर्वलक्षणसंपन्नंन्यग्रोधमरिमंडलम् ॥ सत्यसंधमहाभाग महराममनुव्रता ॥ ३४ ॥ महावामहोरस्कंसिंहविक्रांतगामिनम् ।। नृसिंहसिंहसंकाशमहंराममनुव्रता ।।३५ ॥ पूर्णचंद्राननरामराजवत्संजितें दियम् ।। पृथुकीर्तिमहावाहुमहराममनुव्रता ॥ ३६ ॥ त्वंपुनजंबुकःसिंहीमामिहेच्छसिदुर्लभाम् ॥नाहंशक्यात्वयास्पष्टुमादित्यस्यप्रभायथा ॥ ॥ ३७॥ पादपान्कांचनानूनंबहून्पश्यसिमंदभाक् ॥ राघवस्यप्रियांभार्यांयस्त्वमिच्छसिराक्षस ॥ ३८ ॥ क्षुधितस्यचसिंहस्यमृगशत्रोत्तर स्विनः ॥ आशीविपस्यवदनादंदामादातुमिच्छसि ॥ ३९ ॥ मंदरंपर्वतश्रेष्ठंपाणिनाहर्तुमिच्छसि ॥ कालकूटविपपीत्वास्वस्तिमान्गंतुमिच्छ सि ॥ ४० ॥ अक्षिसूच्याप्रमृजसिजिह्वयालेढिचक्षुरम् ॥ राघवस्यप्रियांभार्यामधिगंतुंत्वमिच्छसि ॥४१॥ तुम पानेकी सामर्थ्य नहीं रखते ॥ ३७. ॥ अरे अभागे राक्षस ! जब कि, तेने रघुनन्दन श्रीरामचन्द्रजीकी भार्याके हरनेका अमिलाप कियाहै, तब तु निश्रयही सब वृक्षोंको सुवर्णमय देखवा होगा (स्वममें सोनेका वृक्षं देखना मृत्युरूप है) अथवा तुमको हमारा प्राप्त करना ऐसा दुर्लभ है जैसे कोई दरिद्र सुवर्णके सहस्रों पेउ अपने गृहमें देखनेकी इच्छा करै ॥ ३८॥ मृगारि शीघ्रगामी और बडे क्षुधित सिंहके मुखसे या विषधर सर्पके मुखसे तुम दांत निकालनेकी इच्छा करते हो ॥ ३९ ॥ तुम पर्वतवर मन्दराचलको भुजासे उत्पादन करना चाहते हो, और कालविप पीकर भी इस शरीर सहित सकुशल जाया चाहतेहो ॥ ४० ॥ क्या तुम मुची (सुई ) से अपने नेत्रोंको सुजानेकी इच्छा करते हो, या छुरेकी धारको अपनी रसनासे चाटना अच्छा समझते हो, क्योंकि जो तुम श्रीरामचन्द्र ।। मा जीकी परमप्यारी नारी हमको पानेकी इच्छा करते हो ॥४१॥ तुम श्रीवामें पर्वतका शिसरबांध समुद्र उवरना विचारतेहो, और सूर्य चन्द्रमा दोनोंको उभय भुजासे पकडना चाहते हो ॥ ४२ ॥ जो कि, तुमने श्रीरामचन्द्रजीकी प्यारी नारीको बलपूर्वक प्राप्त होनेकी इच्छा की है, सो यह इच्छा प्रेमी है, जैसे कोई जलतीहुई अग्नि वसमें बांधकर ले जाना चाहै ॥ ४३ ॥ तुमने जो रामचन्द्रजीकी कल्याणवतवाली भार्याको हरनेकी इच्छा की है, मो यह इच्छा लोहके त्रिशूलोंके वीचमें चलनेकी समानहै ॥४४॥ सिंह और शृगालमें,क्षुइनदी व सागरमें, अमृत और सिरकेमें जितना भेदहै उतनाही भेद श्रीरामचन्द्रजी और तुममें है ॥ ४५ ॥ कांचन शीशे और लोहे), चन्दन जल और कीचडमें वनमें हाथी और बिलाव, जितना अन्तरहै, उतनाही अन्तर श्रीरामचन्दनो और तुममें है ॥ ४६॥ गरुड और काकर्मे, मोर और जलमुर्गीमें, हंस और गीधमें जितना अन्तर है उतनाही अन्तर श्रीरामचन्दजी और तुममें है ॥ ४७ ॥ महेन्द्रसम अवसभ्यशिलांकंटेसमुद्रतर्तुमिच्छसि ॥ सूर्याचन्द्रमसौचोभीपाणिभ्यांहर्तुमिच्छसि ॥४२॥ योरामस्यप्रियांभायांपघर्पयितुमिच्छसि ।। अमिंप्रज्वलितंदृष्ट्वावस्त्रेणाहर्तुमिच्छसि ॥४३॥ कल्याणवृत्तांयोभारामस्याहर्तुमिच्छसि ॥ अयोमुखानांशुलानांमध्येचरितुमिच्छसि । रामस्युसदृशीभायांयोऽधिगंतुंत्वमिच्छसि ॥ १४ ॥ यदंतरसिंहमृगाल्योर्वनेयदंतरंस्यंदनिकासमुद्रयोः ।। सुराग्यसौवीरकयोयंदतरंतदंतरंदाश स्थेस्तथैवच ॥ ४५ ॥ यदंतरंकांचनसीसलोहयोर्यदंतरंचंदनवारिपंकयोः ॥ यदंतरंहस्तिविडालयोर्वनेतदंतरंदाशरथेस्तवेवच ॥ ४६॥ यदतर वायसवैनतेययोर्यदूतरंमद्दमयूरयोरपि ।। यदंतरहंसकगृध्रयोर्वनेतदूतरंदाशरथेस्तवैवच ॥ १७ ॥ तस्मिन्सहस्राक्षसमप्रभावेरामेस्थितेकार्मुक वाणपाणी । हतापितेहनजरांगमिप्येआज्यंयथामक्षिकयाऽवगीर्णम् ॥ १८॥ इतीवतद्वाक्यमदुष्टभावासुदुष्पमुक्कारजनीचरंतम् ॥ गात्रपकंपा द्वयथिताबभूवयातोदतासाकदलीवतन्वी ॥ १९॥ तविपमानामुपलक्ष्यसीतासरावणोमृत्युसमप्रभावः ।। कुलंबलंनामचकर्मचात्मनःसमापन क्षेभयकारणार्थम् ।। ५० ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये अरण्यकाण्डे सप्तचत्वारिंशःसर्गः ॥४७॥ प्रभावशाली श्रीरामचन्द्रजी जो धनुप वाण धारण किये इस पृथ्वीपर टिकेहैं, वो यदितुम हमको हरभी ले जाओगे तो तुम्हारे यहां हम वृद्धावस्थाको पात न होंगी, अर्थात वह बहुत शीय तुमको मारकर हयको लेआयेंगे । जिसप्रकार घृतमें मक्खी पडजाय तो घृत दूपित नहीं होता, परन् मक्सीही प्राण देतीहै अर्थात् हमारा कुछ न होगा तुमही मारे जाओगे ॥४८॥ जिस प्रकार पवनके चलनेसे कदलीका वृक्ष कंपायमान होकर हिलने लगताहै, वैसेही शुद्धत्वभाववाली तन्वंगी जानकीजी दुष्ट राक्षससे इस प्रकारके वचन कह थर २ कांपने लगी ॥ ४९ ॥ तिन जनकात्मजा सीताजीको कंपायमान देखकर मृत्युसमप्रभावयुक्त रावण उनको इसा नेकेलिये अपना कुल नाम और कर्म कहने लगा ॥ ५० ॥ इत्याचे श्रीमद्रा० वा० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकायां सप्तचत्वारिंशः सर्गः ॥४७॥ .॥
आर० स०४ माजीने इस कारसे कठोर वचन कहे नर रावणने महाक्रोधित होकर सुकुटि टेढी करके कहा ॥ १॥ हे परवणिनि ! हम कुवेरके सौतेले भाई हैं। हम पापगालीमा नाम दगग्रीव रापणहै तुम्हारा मंगलहो ॥२॥ जिस प्रकार प्रजागण मृत्युसे भय करते हैं, वैसेही हमारे भयसे भीत होकर, देव, गन्धर्व, पिशाच, निग और उरगगण सपराही सदा भागते हैं ॥ ३ ॥ हमने किसी कारणवरासे क्रोधर्मे भर द्वन्द्व करके संग्राममें विक्रम प्रकाश करके सौतेले भाई कुबेरको सब मारने जीत लियाहै ॥ ४ ॥ इस कारण यह हमसे उरकर धन धान्य ऋद्धि सिद्धि से भरी पुरी अपनी लंकापुरीत्यागकर पर्वतराज कैलासमें वास करते हैं ॥ ५॥ हे भो ! हमने आने वीर्य प्रभावसे उन कुवेरका इच्छानुसार चलनेपाला परमसुन्दर पुप्पकनामक विमानभी हरण करलियाहै हम उसी विमानमें बैठकर आकाशमार्गमें एवंपत्यांसीतायांसंरब्धःपरुपंवचः ॥ लला कुटिंकृत्वारावणःप्रत्युवाचह ॥१॥ भ्रातावेश्रवणस्याहंसापत्नोवरवणिनि ॥ रावणोनामभद्रं तेदशमी-प्रतापवान् ॥२॥ यस्यदेवाःसगंधर्वाःपिशाचपतगोरगाः ॥ विद्रवंतिसदाभीतामृत्योरिखसदापजाः ॥ ३॥ येनवैश्रवणोधातावैमात्रः कारणांतरे ॥ बंदमासादित क्रोधादणेविक्रम्यनिर्जितः ॥ ४॥ मद्भयार्तःपरित्यज्यस्वमधिष्ठानमृद्धिमत् ॥ केलासंपर्वतश्रेष्ठमध्यास्तेनरवाह नः॥५॥ यस्यतत्पुष्पर्फनामविमानंकामगंशुभम् ॥ वीर्यादावर्जितंभद्रेयेनयामिविहायसम् ॥६॥ ममसंजातरोपस्यमुखंदृष्ट्वैवमैथिलि ॥ विद्रवं तिपरिवस्ताःसुराःशक्रपुरोगमाः ॥७॥ यत्रतिष्ठाम्यहंतवमारुतोवातिशंकितः । तीवाशुःशिशिरांशुश्चभयात्संपद्यतेदिवि ॥८॥ निष्कंपपत्रास्त खोनद्यस्तिमितोदकाः ॥ भवंतियत्रतत्रातिष्ठामिचचरामिच ॥९॥ ममपारेसमुद्रस्यलंकानामपुरीशुभा॥ संपूर्णाराक्षसेोरेर्ययेंद्रस्यामराव ती॥ १० ॥ प्राकारेणपरिशिप्तापांडुरेणविराजता ॥ हेमकक्ष्यापुरीरम्यावेदूर्यमयतोरणा ॥ ११ ॥ चलने हैं ॥ ६ ॥ हे मैथिलि ! हमें कोष उत्पन्न हुआ कि हमारा मुख देखतेही इन्द्रादि मुख्य देवतागण महाभयभीत होकर दशों दिशाओंको भाग जाते हैं ॥ ७ ॥ जहां पर हम रहा करते हैं, यायु यहां पर शंकासहित चला करतीहै और सूर्यभी हमारे भयसे आकारामंडलमें चन्द्रमाके समान देख पडताहै ॥ ८॥ अपिक क्या कहें । जहां पर हम बैठते उठते व घूमते यामते हैं वहां पर वृक्षोंके पत्तेभी नहीं हिलते डुलते, नदियोंका जलभी बहनेसे रुक जाताहै ॥ ९ ॥ माईक पार हमारीलंका नामक परम सुन्दर नगरी है वह पुरी देखने में इन्द्रकी दूसरी अमरावतीहै भयंकर निशाचरगण उसमें रहा करतेहैं ॥ १० ॥ और वहांपर श्वेत पसरहरे गस पहुतमे गोभित हो रहे हैं, उस लंकापुरीके सब फाटक बेटी मणिके बने हैं और परकोटा सुवर्णकाहै, चारों ओर जिसके समुद्ररूपी साँई है, जिससे यह पुरी परम मनोहारिणी होगई है ॥ ११ ॥ वहांपर सदाही पाजोंकी धनि गूंजती रहती है। उसमें हाथी घोडे और रथसमूह बहुत भररहे हैं । यहांकी सर फुलपाडिये अभिलपित फल देनेवाले वृक्षोंसे युक्त हैं जिससे वाडियोंकी अति शोभा होरहीहै ॥ १२ ॥ हे राजपुत्री सीते ! तुम हमारे साथ उस नगरीमें वास करोगी, ना फिर मनुष्यों की गिर्योको कभी स्मरणभी नहीं करोगी ।। १३ ।। हे मनस्विनी वखणिनी! वहांर तुम यह दिव्य भोग करके जो मनुयोको महादुर्लभहे क्षीणायु रामरको कभी मनमें स्मरण न करोगी ॥ १४ ॥ और दशरथजीने भरतजीको राज्याभिषेक करके मन्दवीर्यवाले अपने बडे पुत्र श्रीरामचन्द्रजीको वनमें भेज दिया ॥ १५॥ हे पडे २ नेत्रवाली ! तुम उन राज्याट गतचित्त तपस्वी रामके साथ रहकर क्या करोगी? ॥ १६॥ हम समस्त राक्षसोंके राजा, कामवाणसे वांधे जाकर तुम्हारे हस्त्यश्वरथसंवाधातूर्यनादविनादिता॥ सर्वकामफलैर्वृक्षःसंकुलोद्यानभूपिता॥१२॥तत्रत्वंवसहेसीतेराजपुत्रिमयासह ॥ नस्मरिष्यसिनारीणामा नुपीणांमनस्विनि ॥ १३॥ भुंजानामानुपान्भोगान्दिव्यांश्वरवणिनि ॥ नस्मरिष्यसिरामस्यमानुपस्यगतायुपः ॥१४॥ स्थापयित्वाप्रियंपुरा ज्येदशरथोनृपः ॥ मंदवीर्यस्ततोज्येष्ठःसुतःप्रस्थापितोवनम् ॥ १५ ॥ तेनकिंभ्रष्टराज्येनरामेणगतचेतसा ॥ करिप्यसिविशालाक्षितापसेनतप स्विना ॥ १६॥ रक्षराक्षसभर्तारंकामयस्वयमागतम् ॥ नमन्मथशराविष्टंप्रत्याख्यातुंत्वमईसि ॥ १७॥ प्रत्याख्यायहिमांभीरुपश्चात्तापंगमि प्यसि ॥ चरणेनाभिहत्येवपुरूरवसमुवंशी ॥ १८॥ अंगुल्यानसमोरामोममयुद्धेसमानुपः ॥ तवभाग्येनसंप्राप्तंभजस्ववरवणिनि ॥ १९॥ एवमुक्तातुर्यदेहीकुद्धासंरक्तलोचना ॥ अत्रवीत्परुपंवाक्यरहितेराक्षसाधिपम् ॥ २०॥ कथंवेश्रवणंदेवंसर्वदेवनमस्कृतम् ॥ भ्रातरंव्यपदिश्य त्वमशुभंकर्तुमिच्छसि ॥ २१॥ अवश्यंविनशिप्यंतिसर्वेरावणराक्षसाः॥ येपांत्वंकर्कशोराजादुर्बुद्धिरजितद्रियः ॥ २२ ॥ पास आपही आये हैं मो हमारा निरादर करना तुमको उचित नहीं है ॥ १७ ॥ हे भीरु ! हमारा निरादर करनेसे पीछे तुमको पछताना पडेगा जिस प्रकार उर्वशी राजा पुरुरयाको लात मारकर संतापित हुईथी ॥ १८ ॥ राम मनुष्यहै, वह युद्धमें हमारी एक अंगुलीकी समानभी नहीं होगा । हे वरवणिनि ! हम तुम्हारी मौभा ग्यमेही आप यहां आये हैं, इससे तुम हमको अपना पति बनाओ ।। १९ ॥ जब रावणने इस प्रकारके वचन कहे, तर सीताजीके नेत्र कोषके मारे लाल २ होगये । वह उस निर्जन वनमें रावणसे यह कठोर वचन बोली ॥ २० ॥ सब देवताओंके नमस्कार करने के योग्य उन परमपूजनीय कुबेरजीको अपना भाई पवाकर तुम किस प्रकार निन्दनीय कार्य करनेका अभिलाप करते हो? ॥२१॥हे रावण ! तुम्हारी समान खोटी बुद्धिवाला कर्कश और अजितेन्द्रिय पुरुष आर० पा.रा.भा. स०४ जिनका राजाहै, उन सबही राक्षस गणोंको नाशको प्राप्त होना पडेगा ॥ २२॥ हे राक्षस ! इन्द्रपली शचीको हरण करके, चाहै कोई जीवित रहजाय, परन्तु रामभार्या हमको हरण करके कौन पुरुष यच कल्याण पासकताहै ? ॥ २३ ॥ रे राक्षस ! अत्यन्त रूपवती देवराज इन्द्र के पीछे उनकी भार्याको बलपूर्वक हरण करके चाहे किसीका जीवित रहना संभवभीहो परन्तु हमसमान वीको रामचन्द्रजीके पीछे अपमानवा करके अमृत पियाहुआ पुरुपभी मृत्युके हाथमे नहीं बच सकेगा ॥ २४ ॥ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायामष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥४८॥ पनापवान् दशग्रीव रावण सीताजीके यह वचन सुनकर, हाथपर हाथ मार अपने शरीरको बहुत बढावाहुआ ॥ १ ॥ तिसके पीछे वचन बोलनेमें चतुर अपहृत्यशचींभायांशक्यमिंद्रस्यजीवितुम्॥ नहिरामस्यभायांमामानीयस्वस्तिमान्भवेत् ॥२३॥ जीवेचिरंवत्रधरस्यपश्चाच्छचीप्रकृप्याप्रतिरूप रूपाम् ॥ नमाहशीराक्षसधपयित्वापीतामृतस्यापितवास्तिमोक्षः ॥ २४ ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्यरण्यकांडे अष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥४८॥ सीतायावचनं श्रुत्वादशग्रीव प्रतापवान् ॥ हस्तेहस्तंसमाहन्यचकारसुमहद्वपुः॥ १ ॥ समैथिलींपुनर्वाक्यंवभा पेवाक्यकोविदः ॥ नोन्मत्तयाश्रुतौमन्येममवीर्यपराक्रमौ ॥२॥ उदहेयंभुजाभ्यांतुमेदिनीमंबरेस्थितः॥ अपियंसमुद्रंचमृत्युंहन्यारणेस्थितः ॥३॥ अकंतुद्यांशरेस्तीक्ष्णैर्विभिंद्यांहिमहीतलम् ॥ कामरूपेणउन्मत्तेपश्यमांकामरूपिणम् ॥ ४ ॥ एवमुक्तवतस्तस्यरावणस्यशिखिप्रभे ॥ कुद्धस्यहरिपयतेरक्ते नेत्रेवभूवतुः॥५॥ सद्यःसौम्यपरित्यज्यतीक्ष्णरूपंसरावणः॥ स्वरूपंकालरूपाभंभेजेवेश्रवणानुजः॥ ६॥ संरक्तनयनः श्रीमस्तिप्तकांचनभूपगः॥ क्रोधेनमहताविष्टोनीलजीमूतसंनिभः ॥७॥ दशशीश फिर जानकीजीसे बोला; समझपडा कि तुम उन्मत्तसी हो गईहो । क्या हमारा वीर्य और पराक्रम तुम्हारे श्रवण गोचर नहीं हुए। ॥२॥ हम आका गमें टिके रहकर अपनी दोनों भुजाओंसे पृथ्वीको उठा सकते हैं, सब समुद्रके जलकोभी पीसकतेहैं; और युद्धमें यमराजकोभी मार सकते हैं ॥ ३ ॥ और तीखे पाणजालसे आकाशमें दिकेहुए सूर्यकोभी व्यथित कर सकते; और पृथ्वीमें गिरा सकते हैं तीक्ष्ण बाणोंसे ध्रुवलोककोभी नष्ट कर महातलको विदीर्ण करदूं हे अपने चिनमें उन्मत्त हुई मेरा कामरूप देस ॥ ४ ॥ इस प्रकार कहतेही क्रोधयुक्त होनेके कारण रावणके सांवरे नेत्र लाल होकर जलतीहुई अनिके समानताको पहुँचे ॥५॥ फिर यह कुमेरका छोटा भाई गवण दंडी भेपको त्यागकर शीवही यमरूप समान अपना तीक्ष्ण रूप धारण करता हुआ ॥ ६ ॥ और महा क्रोधपरायण होकर ******************x7 *****) - तपाये सोनेके वनेहुए गहनोंसे सुशोभित होकर नील मेघ सदृश श्रीमान निशाचर रूप प्रगट हुआ ॥ ७ ॥ उस समय यह दगमुख व वीम भुनावाला होगया, और उससे जो दंडीका भेष बनायाथा उसको छोड दिया और बडी कायावाला बनगया ॥ ८ ॥ उस राक्षसपति रावणने पहला रूप धारण कर लिया, परन्तु वम लाल रंगकेही पहरे रहा, और रमणीरत्न सीतरजीको देखकर ॥९॥ उन सूर्यके समान प्रभावाली, काले बालों करके युक्त ययाभुषण धारण किये हुए जानकीजीमे कहने लगा ॥ १०॥ कि त्रिभुवनविख्यात स्वामीके प्राप्त करनेकी यदि इच्छाहो तो हे वरारोहे ! हमारा आश्रय ग्रहण करो, हमही तुम्हारे समान पति हैं ।। ११॥ नुम बहुत कालके लिये हमारा भजन करो, हमही तुम्हारे वांछित और बडाई करने योग्य पति हैं । हे भद्रे ! हम कभी ऐसा आचरण नहीं करेंगे जो तुम्हें प्यारा न हो। ॥ १२ ॥ तुम मनुष्पके प्रति प्रीति त्यागकरके हमारी ओर अपना प्रेम लगाओ, राज्यसे बट परिमित आयुवाले अर्थरहित राममें ॥ १३ ॥ किन गुणोंसे तुम दशास्योविंशतिभुजोबभूवक्षणदाचरः ॥ सपरिव्राजकच्छ महाकायोविहायतत् ॥८॥ प्रतिपदेस्वरूपंरावणोराक्षसाधिपः ॥ रत्नांवर परस्तस्थानीरत्नंप्रेक्ष्यमैथिलीम् ॥ ९॥ सतामसितकेशातांभास्करस्यप्रभामिव ॥ वसनाभरणोपेतांमैथिलीरावणोऽब्रवीत् ॥ १० ॥ त्रिपु लोकेपुविख्यातंयदिभारमिच्छसि ॥ मामाश्रयवरारोहेतवाहसदृशम्पतिः ॥ ११ ॥ मांभजस्वचिरायत्वमहलाघ्यःपतिस्तव । नेवचाहकचिद्र देकरिष्येतवविप्रियम् ॥ १२॥ त्यज्यतांमानुपोभावोमयिभावःप्रणीयताम् ॥राज्याच्युतमसिद्धार्थरामंपरिमितायुपम् ।। १३ ॥ कैर्गुणेरनुक्तासिमू ढेपण्डितमानिनि ॥ यात्रियोवचनाद्राज्यविहायससुहृजनम् ॥१४॥ अस्मिन्व्यालानुचरितेवनेवसतिदुर्मतिः।। इत्युक्त्वामेथिलीवाक्यंप्रियाही प्रियवादिनीम् ॥ १५ ॥ अभिगम्यसुदुष्टात्माराक्षसःकाममोहितः ।। जग्राहरावण सीतांबुधःखेरोहिणीमिव ।। १६॥ वामेनसीतापद्माक्षीमूर्धजेपुक रेणसः ॥ उवास्तुदक्षिणेनैवपरिजग्राहपाणिना ॥ १७॥ तंदृष्ट्वागिरिशृंगाभंतीक्ष्ण,महाभुजम् ॥ प्रादयन्मृत्युसंकाशंभयार्तावनदेवताः॥१८॥ अनुरागिणी हुईहो? हे मूढे : पंडितमानिनि मैथिलि ! जो रामचन्द्र वीके कहनेमे राज्य और सुहृद्गणोंको छोडकर ॥ १४ ॥ जोकि हम हिंसक जन्तुओंके वास करनेकी भूमिमें बनके बीच वह दुर्मति रहताहै । इस प्रकार प्रियवचन कहनेके योग्य प्रियवचन बोलनेवाली मैथिलीजीसे ॥ ३५ ॥ यह कहकर अति दुष्टात्मा रापण जानकीजी के समीप आया और उनको ग्रहण किया, उस समय ऐसा बोध हुआ मानों आकाराके बीच बुधने रोहिणीको ग्रहण किया ॥ १६ ॥ उस समय सीता महारानी रावणके कठोर वचन सुन और इसका रूप देखकर कुछ ऐसी मूर्छितसी होगइ थीं कि शापके इरमें वाम बाहुसे तो रावणने उन पना क्षीका करापारा और दाहिनी भुजासे दोनों चरणोंको पकड उठा लिया ॥ १७ ॥ वनदेवता लोकभी उस समय उस पर्वतशृङ्गासदरा तीक्ष्ण डाढाले महासर्पतुल्य आर० ॥ गेनका राजाहै, उन सही राक्षस गणोंको नाराको प्राप्त होना पड़ेगा ॥ २२॥ हे राक्षस ! इन्द्रपली शचीको हरण करके, चाहै कोई जीवित रहजाय, परन्तु ' रामभार्या हमको हरण करके कौन पुरुप बच कल्याण पासकताहै ? ॥ २३ ॥ रे राक्षस ! अत्यन्त रूपवती देवराज इन्द्रके पीछे उनकी भार्याको बलपूर्वक हरण करके चाहे किसीका जीवित रहना संभवभीहो परन्तु हमसमान वीको रामचन्द्रजीके पीछे अपमानवा करके अमृत पियाहुआ पुरुपभी मृत्युके हाथमे नहीं पर सकेगा ॥ २४ ॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायामष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥४८॥ पनापवान् दशमीय रावण सीताजीके यह वचन सुनकर, हाथपर हाथ मार अपने शरीरको बहुत बढाताहुआ ॥ १ ॥ तिसके पीछे वचन बोलनेमें चतुर अपहत्यशचींभायांशक्यमिंद्रस्यजीवितुम्॥ नहिरामस्यभायांमामानीयस्वस्तिमान्भवेत् ॥२३॥ जीवेचिरंवज्रधरस्यपश्चाच्छचीप्रधृप्याप्रतिरूप रूपाम् ॥ नमाहशीराक्षसधपयित्वापीतामृतस्यापितवास्तिमोक्षः ॥ २४ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्यरण्यकांडे अष्टचत्वारिंशः सर्गः ॥ ४८ ॥ सीतायावचनं श्रुत्वादशग्रीवःप्रतापवान् ॥ हस्तेहस्तंसमाहन्यचकारसुमहद्वपुः॥१॥ समैथिलींपुनर्वाक्यंवमा पेवाक्यकोविदः ॥ नोन्मत्तयाश्रुतौमन्येममवीर्यपराक्रमौ ॥२॥ उदहेयंभुजाभ्यांतुमेदिनीमंवरेस्थितः॥ अपिबेयंसमुद्रंचमृत्युंहन्यांरणेस्थितः ॥३॥ अतुद्यांशरस्तीक्ष्णेविभिंद्याहिमहीतलम् ॥ कामरूपेणउन्मत्तेपश्यमांकामरूपिणम् ॥४॥ एवमुक्तवतस्तस्यरावणस्यशिखिप्रभे ॥ जुद्धस्यहरिपर्यतेरक्तेनेवभूवतुः ।। ५ ।। सद्यःसौम्यंपरित्यज्यतीक्ष्णरूपंसरावणः ।। स्वरूपंकालरूपाभंभेजेवैश्रवणानुजः ॥ ६॥ संरक्तनयनः श्रीमांस्तप्तकांचनभूपगः ॥ क्रोधेनमहताविष्टोनीलजीमूतसंनिभः ॥७॥ दगशीश फिर जानकीजीमे बोला; समझपडा कि तुम उन्मनसी हो गईहो । क्या हमारा वीर्य और पराक्रम तुम्हारे श्रवण गोचर नहीं हुए ? ॥२॥ हम आका गमें टिके रहकर अपनी दोनों भुजाओंसे पृथ्वीको उठा सकते हैं, सब समुद्रके जलकोभी पीसकतेहैं; और युद्दमें यमराजकोभी मार सकते हैं ॥ ३ ॥ और तीखे पाणजालमे आकागमें टिकेहुए सूर्यकोभी व्यथित कर सकते; और पृथ्वीमें गिरा सकते हैं तीक्ष्ण बाणोंसे ध्रुवलोककोभी नष्ट कर महातलको विदीर्ण करदूं हे अपने चिनमें उन्मन हुई मेरा कामरूप देस ॥ ४ ॥इस प्रकार कहतेही कोधयुक्त होनेके कारण रावणके सांबरे नेत्र लाल होकर जलतीहुई अभिके समानताको पहुँचे ॥५॥ फिर यह मेरका टोटा भाई गवण दंडी मेपको त्यागकर गीनही यमरूप समान अपना तीक्ष्ण रूप धारण करता हुआ ॥ ६ ॥ और महा कोधपरायण होकर बारम्बार TAMANSARMm-1-1-1-kir nkarm-aur- 54- AA ये मौके पनडुप गहनोंमे सुगोभित होकर नील मेघ सहग श्रीमान् निशाचर रूप प्रगट हुआ ॥ ७ ॥ उन समय वह दशमुख व वीस भुजावाला होगया, और एटगे जो दंडीका भैरवनासाया उसको छोड दिया और बडी कापावाला मनगया ॥ ८ ॥ उस राक्षसपति रावणने पहला रूप धारण कर लिया, परन्तु वन लाल रंगांदी पहे. रहा, और मनीरत्न मीताजीको देसकर ॥ ९ ॥ उन सूर्य के समान प्रभावाली, काले बालों करके युक्त बयाभुषण धारण किये हुए जानकीजीसे कहने लगा कि विभुनविख्यात स्वामीके पान करनेकी यदि इच्छाहो तो हे वरारोहे ! हमारा आश्रय ग्रहण करो, हमही तुम्हारे समान पति हैं ।। ११ ।। तुम पहा कालके लिये हमारा भजन करो, हमही तुम्हारे वांछित और बड़ाई करने योग्य पति हैं । हे भट्टै ! हम कभी ऐसा आचरण नहीं करेंगे जो तुम्हें प्यारान हो । ।। १२ । नुन मनुष्य के प्रति प्रीति त्यागकरके हमारी ओर अपना प्रेम लगाओ, राज्यसे घट परिमित आयुवाले अर्थरहित राममें ॥ १३ ॥ किन गुणोंसे तुम दशास्योविंशतिभुजोवभूवनणदाचरः ॥ सपरिवाजकन्छममहाकायोविहायतत् ॥ ८॥ प्रतिपेदेस्वरूपरावणोराक्षसाधिपः ॥ रक्तांवर घरस्तस्थौत्रीलप्रेक्ष्यमैथिलीम् ॥९॥ सतामसितकेशांतांभास्करस्यप्रभामिव ॥ वसनाभरणोपेतांमेथिलीरावणोऽब्रवीत् ॥ १० ॥ त्रिपु टोकेपुरियातं यदिभतामिच्छसि ।। मामाश्रयवरारोहेतवाईसदृश पनिः॥११॥ मांभजस्वचिरायत्वमहंलाध्यापतिस्तव ।। नैवचाहंकचिन करिष्येनाविप्रियम् ॥ १२॥ त्यज्यतामानुपोभावोमयिभावःप्रीयताम् ॥ राज्याच्युतमसिद्धार्थरामंपरिमितायुपम् ॥ १३॥ कैर्गुणेरनुक्तासिमू देपण्डितमानिनि।। यात्रियोवचनाद्राज्यविहायससुहजनम् ॥१४॥ अस्मिन्व्यालानुचरितेवनेवसतिदुर्मतिः।। इत्युक्त्वामेथिलीवाक्यंप्रियाहाँ प्रियवादिनीम् ॥ १५॥ अभिगम्यसुदुष्टात्मागमसःकाममोहितः॥ जग्राहगवणःसीतांबुषःखेरोहिणीमिव ।। १६॥ वामेनसीतापद्माक्षीमूर्वजेपुक रंगमः ।। योस्तुदक्षिणेनैवपरिजग्राहपाणिना ॥ १७॥ तंदृष्ट्वागिरिशृंगाभंतीक्ष्णद,महाभुजम् ॥ पाद्रवन्मृत्युसंकाशंभयार्तावनदेवताः॥१८॥ अनुगगिणी दुईहो ? हे मूडे। पंडितमानिनि मैथिलि ! जो रामचन्द्र वीके कहने राज्य और सुहृद्गुणोंको छोडकर ॥ १४ ॥ जोकि हम हिंसक जन्तुओंके यास कनेको भूमि के बीच वह दुर्मति रहताहै । इस प्रकार प्रियवचन कहने के योग्य प्रियवचन बोलनेवाली मैथिलीजीसे ॥ १५॥ यह कहकर अति दुष्टात्मा गरण जानकोजीर समीर आया और उनको ग्रहण किया, उस समय ऐसा बोध हुआ मानों आकाराके बीच बुधने रोहिणीको ग्रहण किया ॥ १६ ॥ उस समय मीना महागनी रायगके कठोर पचन सुन और इसका रूप देखकर कुछ ऐसी मूर्छितसी होगइ थी कि शापके डरमें वाम वाहुसे तो रावणने उन पद्मा श्रीका केगपाग और दाहिनी भुजामे दोनों चरणोंको पकड उठा लिया ॥ १७ ॥ यनदेवता लोकभी उस समय उस पर्ववशृङ्गासहरा तीक्ष्ण डायाले महासर्पगुल्य -- : आर० पा.रा.भा. 11 ७६॥ स०४ रावणको देस भयभीत होकर दशों दिशाओंको भागगये ॥ १८ ॥ देखतेही रावणका वह मायामय स्वर्णमंडित गर्दभजुवाहुआ भयंकर शब्दकारी दिव्य रथ : पर आ पहुँचा ॥ १९ ॥ उस स्थको देख रावणने गंभीर त्वर कठोर वचनोंसे जानकीजी को डांटा और धमकाया और उनको गोदमें लेकर स्थमें डाल दिया । ।। २० ॥ यशस्विनी सीताजी उस करके गृहीत हो जानेपर भयसे व्याकुलहो हा राम! हा राम ! कहकर पुकार करने लगीं, परन्तु रामचंद्रजी उस समय मा दूरये ॥ २१ ॥ रावणके प्रति जानकीजीका कुछभी अनुराग नहीं था इस कारणसे वह अपने छुड़ाने के लिये यथाशक्य चेष्टा करनेलगीं, परन्तु कामके वराहुआ सार पनगराजकी सीके समान उनको लेकर आकाशको उडगया ॥ २२ ॥ इस प्रकारसे राक्षसराज रावण आकाशमें जानकीको हरण करके लेचला. जानकीजीर मन भान्त चिन और आतुरकी समान यह कहकर बडे जोरसे विलाप करनेलगीं ॥ २३ ॥ हा गुरुचित्तप्रसादक ! महावाहु लक्ष्मणजी ! कामरूपी राक्षस का सचमायामयोदिव्याखरयुक्तःखरस्वनः॥ प्रत्यदृश्यतहेमांगोरावणस्यमहारथः ॥ १९॥ ततस्तांपरुपैर्वाक्यैरभितळमहास्वनः ।। अंकनादाय: देतीस्थमारोहयत्तदा ॥ २० ॥ सागृहीतातियुकोशरावणेनयशस्विनी ॥ रामेतिसीतादुःखार्तारामंदूरंगतंवने ॥२१॥ तामकामांसकामात पलंग यधूमिव ॥ विचेष्टमानामादायउत्पपाताथरावणः॥२२॥ततःसाराक्षसेंद्रेणह्रियमाणाविहायसा ॥भृशंचुकोशमत्तेवभ्रांतचित्तायथातुरा ॥२३॥ हालक्ष्मणमहावाहोगुरुचित्तप्रसादक ॥ ह्रियमाणांनजानीपेरक्षसाकामरूपिणा ॥ २४ ॥ जीवितंसुखमर्थचधर्महेतोः परित्यजन् । ह्रियमाणान धर्मेणमांराघवनपश्यसि ॥ २५ ॥ ननुनामाविनीतानांविनेतासिपरंतप ॥ कथमेवंविधंपापनत्वंशाधिहिरावणम् ॥ २६ ॥ ननुसद्योऽविनी तस्यदृश्यतेकर्मणःफलम् ॥ कालोप्यंगीभवत्यत्रसस्यानामिवपक्तये ॥ २७ ॥ त्वंफर्मकृतवानेतत्कालोपहतचेतनः॥ जीवितांतकरघोरंराम द्वयसनमामुहि ॥२८॥ इंतेदानींसकामातुकैकेयीबांधव सह ॥ ह्रियेयधर्मकामस्यधर्मपत्नीयशस्विनः ॥२९॥ मैं हरी जानीहूं सो इसको तुम नहीं जानतेहो ॥ २४ ॥ हा राम ! तुम धर्मकी रक्षा करनेके लिये प्राण, सुख, संपत्ति सबकाही त्याग करतेहो, इस समय अधर्मके द्वारा हरी जाती हैं सो क्यों नहीं हमें आनकर बचाते ? ॥ २५॥ हे शत्रुओंके तपानेवाले ! जो अपिनयी होते हैं आप उनका सदाही शासन किया कर. फिर क्यों नहीं ऐसे पापात्मा रावणका शासन करतेहो ? ॥ २६ ॥ अन्यायी पुरुषके कर्मका फल शीघही नहीं मिलवा; जिस प्रकार नाजके पफनेमें कुछ नभन का प्रपोजन होताहै इसी प्रकार समय आनेपर अन्यायका फल मिलताई ॥ २७ ॥ हे रावण 1 नुमने कालके प्रभावसे चेतना रहित होकर यह जो कर्म किया इसके | लिज गुमने गपचंरजीगे प्राणान्नकरनेवाली घोर विपदमें पढना होगा ॥२८॥झाय । म धर्मकी इच्छा करनेवाले पशस्वी रामचंद्रजीकी भगानी छोकर भी RA का mewww दिनकर कहने लगे ॥ ३२ ॥ अति कौतूहल होने के कारण धवरहरे, दोरण और अपारयोंने परिपूर्ण लंकानगरीके देखनेकी इच्छा कियेहुए हम यहाँपर आह ।। ३३ ।। इम नगरीक वन उपवन कानन और अच्छे २ भवन देखनेकी वासनासे हमारा आना यहाँपर हुआहै ॥ ३४॥ कामरूपिणी लंका हनुमानजी के यह कवन नुनकर फिर उनने अतिघोर कठोर वचन बोली ॥ ३५ ॥ रे अनसमझ वानरनीच ! यह पुरी राक्षसराज रावणसे पाली जाती है सो तू हमको बिना जीते। इमका दर्शन न कर सकेगा ॥ ३६ ॥ तब कपिश्रेष्ठ हनुमानजी उस राक्षसी रूप धारिणी लंका अधिष्ठात्रीसे बोले कि हे भद्रे ! इम नगरीका दर्श नकर हम फिर अपने स्थानको चले जायँगे ॥ ३७ ॥ यह मुन उस लंकाने भयंकर नादकर अतिवेगमे हनुमानजीको चरणका प्रहार किया ॥ ३८॥ दक्ष्यामिनगरीलंकांसाहप्राकारतोरणाम् ॥ इत्यर्थमिहसंप्राप्त परकौतूहलंहिमेशावनान्युपवनानीहलंकायाःकाननानिच ॥ सर्वतोगृहमुख्यानि दृष्टुमागमनंहिमे ॥३४॥ तस्यतद्वचनं श्रुत्वालंकासाकामरूपिणी ॥ भूयएवपुनर्वाक्यवभापेपरूपाक्षरम् ॥ ३५॥ मामनिर्जित्यदुद्धराक्षमेश्वरपा लिताम् ॥ नशस्यह्यद्यतेबष्टुपुरीयंवानराधम।। ३६ ॥ ततःसहरिशार्दूलस्तामुवाचनिशाचरीम् ॥ हापुरीमिमांभ।पुनर्यास्येयथागतम् ॥ ३७॥ ततः कृत्वामहानादंसालंकाभयंकरम् ॥ तलेनवानरश्रेष्टताडयामासवेगिता ॥३८॥ ततःसहरिशार्दूलोलंकयाताडितोभृशम् । ननादसुमहानाद वीर्यवान्मारुतात्मजः ॥ ३९ ॥ ततः संवर्तयामासवामहस्तस्यसोऽगुलीः ॥ मुष्टिनाऽभिजवानेनांहनूमानकोधमूच्छितः ॥४०॥ स्त्रीचेति मन्यमानेननातिकोपास्वयंकृतः ।। सातुतेनप्रहारेणविह्वलांगीनिशाचरी ॥ पपातसहसाभूमोविकृताननदर्शना ॥ ११॥ ततस्तुहनुमान्वी रस्तांदृष्ट्वाविनिपातिताम् ॥ कृपांचकारतेजस्वीमन्यमानःस्त्रियंचताम् ॥१२॥ ततोवेभृशमुद्विग्नालंकासागद्गदाक्षरम् ॥ उवाचागवितंवाक्यंहनूमं तपयंगमम् ।। १३ ॥ प्रसीदसुमहाबाहोजायस्वहरिसत्तम ।। समयेसाम्यतिप्टंतिसत्त्ववंतोमहाबलाः ॥ ४ ॥ वीर्यवान् वानरशार्दूल पवननंदन हनुमानजीने लंकासे अतिशय ताडित होकर बोरगर्जना करते हुए ॥ ३९ ॥ और बायें हाथकी उंगलियोंको सकोड महा शेर कोपर्ने भूच्छित हो लंकाके उपर मुष्टिका प्रहार किया ॥ ४० ॥ उसको स्त्री ममझकर हनुमानजीने बहुत क्रोध नहीं किया और बायें हायमे एक नाधारणमाही प्रहार किया, परन्तु विकट मुखवाली और विकट दर्शनाली राक्षसीरूपधारिणी लंका उम साधारणसेही आपातके लगतेही कांपकर उसी समय पृथ्वीर गिरगई ॥ ४ ॥ उसको पृथ्वीपर गिरीहुई देख तेजस्वी और वीर्यवान् पयनकुमार हनुमानजीने स्त्री समझ उसके ऊपर अनुयह प्रकाश किया ॥ ४२ ॥ तर रंकादेवी अत्यन्त न्याकुल होकर गरहित वाक्य और गदद कंठमे हनुमानजीको पुकारकर बोली ॥ ४३॥ हे प्रियदर्शन महाबलवान् कपिश्रेष्ठ ******* MATHMAnnnासी अधियानीमने मानी माग गरी ५१ PRAS नका , मालपारंगपत्र मायान T : mriti 14.1p.TA दान दियायामउगकर पणन कानीमा कागतो . प . TELE ... ' titutilisi मा , नरीमनान देना कि , गामाको भग भाग ना : ॥ १. नि १३ ॥ मनिमित्यपुरीम्कीटोनांकामरूपिणीम् ।। विक्रमणमहातेजाहनूमान्कपिमत्तमः ॥१॥अधारेणमदासीन : प्राकारमलगी । मिलना आर० स०४ होर दसों दिशाओंको भागगये ॥ १८ ॥ देसतेही रावणका यह मायामय स्वर्णमंडित गर्दभजुताहुआ भयंकर शब्दकारी दिव्य रथ वह २ ॥ उस स्थको देस रापणने गंभीर सर कठोर वचनोंसे जानकीजीको डांटा और धमकाया और उनको गोदगें लेकर स्थमें डाल दिया माली टन करके गृहीत हो जानेपर भयसे व्याकुलहो हा राम ! हा राम ! कहकर पुकार करने लगीं, परन्तु रामचंद्रजी उस समय बह • अन्गग नहीं था इस कारणसे यह अपने छुड़ाने के लिये यथाशक्य चेष्टा करनेलगीं, परन्तु कामके वशहुआ राव ये गक्षतराज रापण आकाशमें जानकीको हरण करके लेचला. जानकीजी कु 'माबाह लक्ष्मणजी ! कामरूपी राक्षस कर .... नादायवे कालगायंगम । निजिताईत्ययावीरविक्रमणमदायल ॥24॥ ददगनयंत्रणुगेयात्मा II TIME वामम ॥ ॥ यतात्यायानरःकश्चिद्रिक्रमावशमानयेत् ॥ तदात्ययानिविज्ञेयरसमभयमागतम ॥ nrrityuuNTINE WAI तत्प्रविश्यरश्रेिष्टपुगंगवणपालिताम् ॥ विधत्स्वमर्वकार्याणियानियानाम्यानमाला जालxx परसोवियफपिकंजरः ।।२॥ गरण और गपाग गक्षमाँ विनागका काल आय पचा ॥३०॥ इमलिये है ऋषिम" mil मिणजिपीनपने,गणागmil Warnerrormin को छोड कूदकर नाकारार वा राषिक ममय लंकानगर्गम प्रबंग करने हुये ॥ २॥ और कपिराज सुधीरजीके हितकारी हनुमानजीने इस लंकानगरीमें प्रवेश.करक प्रथमहीगगों के मस्तकार आना आयांचरण धरा क्योंकि पंडितलोगोंने इसको शत्रुओंके पराजय करने का मुख्य कारण बतायाहै ॥ ३॥ इसप्रकारसे महापराक्रमी पवन कुमार हनुमानजी रोविक समय पुरीमें प्रवेगकर मिलहप पुर्णाके ममूहले सुशोभित राजमार्गमें गमन करने लगे ॥ ४ ॥ हनुमानजीने देखा कि, हास्यसे उत्पन्न मनोहर गदमे विनादित, विविध भांतिक बाजोंका ध्वनि. हीरक सवित झरोखामे युक्त ॥ ५ ॥ और हीरे मोती मणियोंसे बनेहुये झरोखोंवाले गृहोंसे भूपित और उनकी मघननाये मेरमाला विगजितआकागमण्डलकी ममान लंका शोभा पायरहीहै ॥ ६॥ पम स्वस्तिक आदि श्वेत बादलकी समान राक्षसोंके मन्दिरोंसे लंकापुरी गामिन होकर चमक दमक रहीथी ॥ ७ ॥ और मर ओरसे मतिभद्र वर्षमान, नन्यावर्त स्वस्तिक आदि गृहोंमे शोभायमान थी, जिसमें चारद्वार भीतर प्रविश्यनगरीलंकांकपिगनहितंकरः॥ चक्रेऽथपादंसव्यंशवणांसतुमूर्धनिराशाप्रविष्ट सत्त्वसंपन्नोनिशायामारुतात्मजः ॥ समहापथमास्थायमु कपुप्पपिराजितम् ।।2।। ततस्तुतांपुरीलंकारम्याममिययोकपिः॥हसितोत्कृष्टनिनदेस्तूर्यवोपपुरस्कृतः ॥५॥ वनांकुशनिकाशेश्ववज्रजालविभू पितेः ।। गृहमापुरीरम्यावभासेद्यारियांबुदैः ।। ६॥ प्रजज्वालतदालंकारयोगणगृहेःशुभैः ।। सिताभसहशेश्चिपास्वस्तिकसंस्थितेः ॥७॥ पर्थमानगृदेवापिसरतःसुविभूपितेः । नाचित्रमाल्याभरणांकपिगजहितंकरः।।दाराघवार्थचरञ्श्रीमान्ददर्शचननंदच । भवनाद्भवनंगच्छन्ददर्श कपिउंजरः॥९॥विविधाकृतिरूपाणिभवनानिततस्ततः । शुश्रावरुचिरंगीतविस्थानस्वरभूषितम् ॥१०॥खीणांमदनविद्धानादिविचाप्सरसा मिकाधारकांनी निनदंपुराणांगनिःस्वनम॥१॥सोपाननिनदश्चिापिभवनेपुमहात्मनाम् आस्फोटितनिनादांश्चक्ष्वेडितांश्चततस्ततः॥१२॥ नागें औरकी धार लगे हो उमे मनोभद कहते हैं, जो इसमें पश्चिमकी ओरका द्वार न लगा हो तो इसेही नन्यावर्त कहते हैं, इसेही दक्षिणका द्वार न होनेसे एवंमान, और पूरा धार न होनेमे स्वस्तिक कहते हैं। इन मर शुभदायक भवनोंको जिनमें अनेक प्रकारके चित्र विचित्र माला आदि भूपण धरैथे, देखते भालते एपीरजी विवकारी हनुमानजी चले जानेथे ॥ ८॥श्रीरामचन्द्रजीक कार्यको सिद्ध करनेके मानससे जाते हुये हनुमानजी लंकापुरीको देख २ बड़े ही आनन्दित । थे, इस मंदिग्ग उगार कूद यह उमपरमे दुमरे परको कूद भलीभाँति जानकीजीको सोजतेथे ॥ ९ ॥ जब एक भवनसे दूसरे भवनमें जातेहुये विविधाकार और पिल भरनोंको हनुमानजी देगने लगे नप दृदय, कण्ठ और गिर इन स्थानों में उत्पन्न हुआ मन्द, मध्य और तारस्वर अलंकत मनोहर गीत उन्होंने सुना ११. वर्ग नेपाली अप्मरागों के रागनी ममान मदन मिश्रित ग्रियोंके शब्द उनकी क्षुद्रटिका, व नूपुर आदिका शब्द श्रवण करते ॥ ११॥ उन महात्माओंके ********************* मुं० ना.ग.मा. स० मगन होकर हमाग उभार करो ग्रीहत्या न करो। हे सौम्य ! वीर्यसम्पन्न महाबलवान् पुरुपलोग सीहत्या करनेके लिये कभी तैयार नहीं होते ॥ १४ ॥ महापटरान वीर्यगमन कपिवर ! हमही स्वयं लंकाकी अधिष्ठात्री हैं तुमने अपने वीर्यके प्रभावसे सबप्रकार हमको पराजित कियाहै ॥ ४५ ॥ हे कपिश्रेष्ठ ! सं सम्भू पानाजीने हमको जो वरदान दियाथा हम उसको वर्णन करती हैं, आप श्रवण करें. उन्होंने यह कहा कि ॥ ४६॥ जब कि, कोई वानर विक्रम काग करके गुमको अपने बगमें करलेगा, तवहीं तुम जान लेना कि, राक्षसोंको भय आय पहुँचाहै ॥ ४७ ॥ हे प्रियदर्शन ! आज तुम्हारे दर्शन करनेसे,वह ब्रह्मा बीमा नियन किपाहुआ ममय आय पहुँचा, यह इस अवश्य होनहार समयके टलनेकी किसी प्रकारमे संभावना नहींहै ॥ ४८ ॥ सीताके निमित्त दुरात्मा राक्षसराज अदंतुनगरीलंकास्वयमेवप्लवंगम ॥ निर्जिताईत्वयावीरविक्रमेणमहावल ॥४५॥ इदंचतथ्यंशृणुमेब्रुवंत्यावेहरीश्वर ।। स्वयंस्वयंभुवादत्तंवरदानं यथामम ॥ ४६॥ यदात्वांवानरःकश्चिद्विक्रमादशमानयेत् ॥ तदात्वयाहिविज्ञेयंरक्षसांभयमागतम् ॥ १७ ॥ सहिमेसमयःसौम्यप्राप्तोऽद्यतव दर्शनात् ।। स्वयंभूविहितःसत्योनतस्यास्तिव्यतिक्रमः॥४८॥सीतानिमित्तंराज्ञस्तुरावणस्यदुरात्मनः॥रक्षसांचैवसर्वेपांविनाशःसमुपागतः॥ ॥४९॥ तत्मविश्यहरिश्रेष्ठपुरीरावणपालिताम् ॥ विधत्स्वसर्वकार्याणियानियानीहवांछसि ॥५०॥ प्रविश्यशापोपहताहरीश्वरःपुरीशुभांराक्षस गुज्यपालिताम् ।। यदृच्छयात्वंजनकात्मजांसतीविमार्गसर्वत्रगतोयथासुखम् ॥५१॥ इत्यापें श्रीमद्रा० वा० आ० सुं० तृतीयः सर्गः ॥३॥ सनिर्जित्यपुरीलंकांचेष्ठांतांकामरूपिणीम् ॥ विक्रमेणमहातेजाहनूमान्कपिसत्तमः ॥१॥अद्वारेणमहावीर्यःप्राकारमवपुप्लुवे । निशिलंकांमहा सत्वोवियेशकपिकुंजरः ॥२॥ गग और ममस्त राक्षसोंके विनाशका काल आय पहुँचाहै ॥ १९ ॥ इमलिये हे कपिश्रेष्ठ ! तुम इस रावणकी पालित लंकापुरीमें प्रवेशकर अपनी इच्छानुसार सब रूपोंको पूराकरो जिम जिसकी नुमने इच्छा कीहै ॥ ५० ॥ क्या कहें, राजा रावणसे पाली जातीहुई यह मनोहर लंकानगरी शाप * ग्रस्त हुईहै, तुम इसमें प्रवेश करके भानी इच्छानुमार मय कहीं यथासुसमे गमन करके पतिव्रता जनककुमारी सीताजीको ढूंढो ॥५१॥ इत्या श्रीमद्रा० वा० आ० सुन्दर भाषाटी० तृतीयः सर्गः ॥३॥ महापटान, महातेजस्वी कपिश्रेष्ठ हनुमानजी अपने विक्रममे कामरूपिणी पुरियों में श्रेष्ठ लंकाको भली भांतिमे जीतकर ॥ १ ॥ वह महावीर्यवान् कपिकुंजर "********************* Ans रिपापा. बि स गुमय पाना संगे सही मका नाश होजायगा।
गरको गांउ दार नाकारसर वह रात्रिक समय लंकानगरीमें प्रग करते हुये ॥ २॥ और कपिराज सुग्रीवजीके हितकारी हनुमानजीने इस लंकानगरीमें प्रवेश करके यमदीगगों मम्तकार आना बायां चरण धरा क्योंकि पंडितलोगोंने इसको शत्रुओंके पराजय करनेका मुख्य कारण बतायाहै ॥ ३॥ इमप्रकारसे महापराक्रमी पवन कुमार हनुमानजी राधिक समय पुगेमें प्रवेगकर गिलहुए पुष्पाक ममृझे सुशोभित राजमार्गमें गमन करने लगे ॥ ४ ॥ हनुमानजीने देखा कि, हास्यसे उत्पन्न हुए मनोदर गन्दमे विनादित, विविध भानिक बाजाँका ध्वनि, हीरक सचित झरोखामे युक्त ॥ ५ ॥ और हीरे मोती मणियोंमे बनेहुये झरोखोंवाले गृहोंसे भूपित और उनकी मानताने मरमाला विगजितआकाशमण्डलकी समान लंका शोभा पायरहीहै ॥ ६॥ पम स्वस्तिक आदि श्वेत बादलकी समान राक्षसोंके मन्दिरोंसे का गाभिन होकर चमक दमक रहीथी ॥ ७ ॥ और मब ओरसे सर्वतोभद्र वर्षमान, नन्यावर्त स्वस्तिक आदि गृहोंमे शोभायमान थी, जिसमें चारद्वार भीतर प्रविश्यनगरीलंकांकपिगजहितंकरः॥ चकेऽथपासव्यंचशचूणांसतुमूर्धनि॥३॥प्रविष्टःसत्त्वसंपन्नोनिशायामारुतात्मजः ॥ समहापथमास्थायमु रुपुप्पविराजितम् ।।2।। ततस्तुतांपुरीलंकारभ्यामझ्यियोकपिः॥ हसितोत्कृष्टनिनदेस्तुर्यचोपपुरस्कृतैः ॥५॥ वांकुशनिकाशेश्चवज्रजालविभू पितेः।। गृहमधःपुर्गरम्यावभासेद्यारिबांधुदैः॥६॥ प्रजज्वालतदालंकारक्षीगणगृहेःशुभैः ॥ सिताभ्रसदृशेश्चित्रेपास्वस्तिकसंस्थितेः ॥ ७॥ पर्शमानगृहेशापिमर्यतःसुविभूपितेः॥तांचित्रमाल्याभरणांकपिगजहितंकरः॥८॥राधयार्थचर श्रीमान्ददर्शचननंदच ॥ भवनाद्भवनंगच्छन्ददर्श कपिएंजः॥९॥विविधाकृतिरूपाणिभवनानिततस्ततः। शुश्रावरुचिरंगीतंत्रिस्थानस्वरभूपितम्॥१०॥स्त्रीणांमदनविद्धानांदिविचाप्सरसा मिराशावांचीनिनदंनूपुराणांरनिःस्वनम।।११॥सोपाननिनदश्चिापिभवनेपुमहात्मनाम् ॥आस्फोटितनिनादांश्चश्वेडितांश्चततस्ततः॥१२॥ र मागे ओरको बार लगे हो उमे मांनाभन कहते हैं, जो इममें पश्चिमकी ओरका द्वार न लगा हो तो इसेही नन्यावर्त कहते हैं, इसेही दक्षिणका द्वार न होनेसे मान, और पूर्णकदार न होने सनिक कहते हैं, इन मय शुभदायक भवनोंको जिनमें अनेक प्रकारके चित्र विचित्र माला आदि भूपण धरेथे, देखते भालते गपीजी हितकारी हनुमानजी नले जानथे ।॥ ८॥ श्रीरामचन्द्रजीके कार्यको मिद करनेके मानससे जाते हुये हनुमानजी लंकापुरीको देख २ बड़े ही आनन्दित सविणे, दम मंदिग्गे उगार कूद यह उमाग्मे दूसरे परको कूद भलीभाँति जानकीजीको सोजतेथे ॥९॥ जब एक भवनसे दूसरे भवनमें जातेहुये विविधाकार और विशिल भरनोंको हनुमानजी देगन लगे नय हृदय, कण्ठ और गिर इन स्थानोंमें उत्पन्न हुआ मन्द, मध्य और तारस्वर अलंकृत मनोहर गीत उन्होंने सुना 1. संगमें रहनेराली अप्परागों रागकी ममान मटनमिश्रित नियोंके शब्द उनकी क्षुद्रटिका, व नूपुर आदिकाशब्द श्रवण करते॥११॥ उन महात्माओंके ना.रा.भा. स० भानसमूहों में गिों नीदियोंपर चढनेका शब्दभी सुनते, कहीं प्रसन्नतासे ताली बजानेका शब्द और कहीं कहीं सिंहनाद सुनते २ हनुमानजी ॥ १२ ॥ राक्षनों भानोंमें मंत्रोंका जप सुनते और वहुन स्थानोंपर राक्षसोंको वेदाध्ययन करतेभी हनुमानजीने देखा ॥ १३॥ और कहीं २ लगंग रापणकी स्तुति करनेमें लग रहेहैं, और अनेक राक्षसगण राजमार्गको सर्व प्रकारसे घेरे खडेहुएथे ऐसा हनुमानजीने देखा ॥ १४ ॥ अनन्तर जाते माननी मध्यम यानी आये जहां उन्होंने बहुतसे निशाचरोंको अवलोकन किया। उनमें कोई मुंडितमुंड, कोई दीक्षित, कोई जटाजूटधारी, कोई न्यादिक वग धारण कियेथे यह भेद लेते फिरतेथे ॥ १५ ॥ इनमें कुशोंकी मुहीही किसी २ के हथियारथे, और किसी २ के अभिकुण्ड अस शसथे, औ. शुधावजपतांतरमंत्रात्रतीगृहेपुवै॥ स्वाध्यायनिरतांश्चैवयातुधानान्ददर्शसः ॥१३॥ रावणस्तवसंयुक्तानगर्जतोराक्षासनपि ॥ राजमार्गसमा : स्थितंरक्षोगणंमहत् ॥ १४॥ ददर्शमध्यमेगुल्मेराक्षसस्यचरान्वहून् ॥ दीक्षिताञ्जटिलान्मुंडानगोजिनांवरवाससः ॥ १५॥ दर्भमुष्टिप्रहर : मिकुंडायुधांस्तथा ॥ कृटमुद्गरपाणींश्चचंडायुधधरानपि ॥ १६ ॥ एकाक्षानेककर्णाश्चचलदेकपयोधरान् ॥ करालान्भुनवस्त्रांश्वविकटान : नांस्तथा ॥ १७॥ धन्विनःखगिनश्चैवशतमीमुसलायुधान्॥पारघोत्तमहस्तांश्चविचित्रकवचोज्ज्वलान् ॥ १८॥ नातिस्थूलानातिकृशाना पांतिद्वस्वकान् ॥ नातिगौरानातिकृष्णानातिकुब्जानवामनान् ॥ १९ ॥ विरूपान्वहुरूपांश्चसुरूपांश्चसुवर्चसः॥ ध्वजिनःपताकिनश्चैवदः। पिविधायुधान् ॥ २० ॥ शक्तिवृक्षायुधांश्चैवपट्टिशाशनिधारिणः ॥ क्षेपणीपाशहस्तांश्चददर्शसमहाकपिः ॥ २१ ॥ कोई २ फूट मार और दंडको ही आयुध बनाये हुयेथे ॥ १६ ॥ और उन समस्त निशाचरगणोंके मध्यमें किसी २ की एकही आंखथी, किसीके एकही था. किमी २ की छातीपर एकही पयोधर झूल रहा था, उनके बदन विकराल थे, अंग अत्यन्त विषम थे आकार अति विकट और अंग अति : ॥ १७ ॥ नहींह हाथमें धनुष, राज, शतधी, मूमल और अतिश्रेष्ठ परिष थे, और सबकेही शरीरोंपर विचित्र कवच चमक रहेथे ॥ १ मरहीम पहल मोटे, न भनि दुसले, न अनि रम्ये, न अति छोटे, न अनि गोरे, न अनि काले, न अति कुबडे, न 3 नि बौने ॥ ११ ॥ मयही विरूप, परजी भागतीमा पनाकर और लिNि HIR रणकिणे, नपानत्रीने में म . 11पण पहर, अनेक प्रकारके वैरा धारण करनेवाले इच्छानुग पाल हनुमानजान दस ॥ २२ ॥ बहुत सारे तीक्ष्ण शूल और वज्रलिये महाबलवान सावधानीसे एक लक्ष राक्षस मध्यम कक्षामें स्थित हुये ॥ २३ । रायणकी आगामे रनयामकी रक्षा करते हुए हनुमानजीने देखे, फिर सुवर्णमय रावणका बडी बजायुक्त मंदिर देखा ॥२४॥ वह राक्षसराजका विख्यात मी पर्यनके बीच शिखरपर बनाया, इसके चारों और परिखा बनीथी जिसमें अनेक प्रकारकै श्वेत पन सिल रहेथे ॥ २५ ॥ चारों ओरसे यह भवन अति भीनामे विगहुआथा, और माक्षात् स्वर्ग समान दिव्य भावसे सजरहाथा मनोहर शब्द उसमेंसे उठ रहाथा ॥ २६ ॥ इसके द्वारपर घोडौंका शब्द प्रतिमा होरहाथा, व अनिअद्भुत २ घोड़े बँधेथे; रथयान विमानों में हाथी, व अश्व जुतेहुए थे ॥२७॥ और:सब भौविसे सजे सजाये हाथी घोडे द्वारपर टिकाये जातेथे, उनी स्रग्विणस्त्वनुलिप्तांधवराभरणभूषितान् ॥ नानावेपसमायुक्तान्यथास्वैरचरान्वहून् ॥२२॥ तीक्ष्णशूलधरांश्चैववत्रिणश्चमहावलान् ॥ शतसाहस्र मव्यग्रमारक्षमध्यमकपिः ॥२३ ।। रक्षोधिपतिनिर्दिएंददतिःपुराग्रतः॥ सतदातद्गृहंदृष्ट्वामहाहाटकतोरणम् ॥ २४॥ राक्षसेंद्रस्यविख्यातमदिमू निप्रतिष्टितमापुंडरीकावतंसाभिःपरिसाभिःसमावृतम् ॥२५॥ प्राकारावृतमत्यंतददर्शसमहाकपिः॥त्रिविष्टपनिभंदिव्यंदिव्यनादविनादितम् ॥ ॥२६॥ वाजिपितसंघुष्टमद्भुतेश्वहयेस्तथा ॥ स्थैर्याने विमानेश्चतथाहयगजेःशुभैः॥२७॥वारणेश्वचतुर्दते श्वेताभ्रनिचयोपमः ॥ भूपितरुचि रद्वारंमत्तेवमृगपक्षिभिः ॥२८॥ रक्षितंसुमहावीर्यातुधानेःसहस्रशः॥ राक्षसाधिपतेर्गुप्तमाविवेशगृहकपिः ॥२९॥सहेमजावूनदचक्रवालंमहाई मुक्तामणिभूपितांतम् । परार्घ्यकालागुरुचंदनाहंसरायणांतःपुरमाविवेश ॥ ३० ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकांडे चतुर्थःसर्गः ॥९॥ "चंद्रोपिसाचिव्यमिवास्यकुर्वस्तारागणेमध्यगतोविराजन् ॥ ज्योत्सावितानेननिपत्यलोकानुत्तिष्टतेनेकसहस्ररश्मिः ॥१॥ बहुन हाथी चोदन्ते व श्चत वादरके ममान बड़े २ उज्जलथे और अनेक प्रकारके सुन्दर पक्षी वहां द्वारपर बैठे शब्द कर रहेथे ॥ २८ ॥ वीर्यवान हजारों लाखों गमोंने यह भवन रसाया जाताथा, परन्तु महाकपि हनुमानजी ऐसे सुरक्षित रावणके गृहमेंभी गुप्तभावसे प्रवेश करहीगये ॥ २९ ॥ इस प्रकारसे हनुमानजीने रावण रनयाममें प्रवेश करके देखा कि, उसके धवरहरे तप्त वर्णके सुवर्णसे बनेहैं, और उन सबके ऊपर भाग महामूल्यवान मुक्ता मणियोंके समूहोंसे सुशोभित, और अनिश्रेष्ठ कालपर्णके अगर व चन्दनकी गन्धसे सुवासित होरहेहैं ।। ३० ॥ इत्याऐं श्रीमदा० वा० आदि० सुन्दरकांडे भापाटीकायां चतुर्थः सर्गः ॥ ४ ॥ "पंदमाभी महावीरजीको मंत्रीकी नाई सहाय देताहुआ तारोंके बीचमें शोभित होने लगा और अपनी चांदनी संसारमें फैलाता हुआ सहल किरणों से युक्त उदय ************* ******* था.. सुंक ॥१८॥ . स० . ना॥१॥ महावीरजी उस समय चंद्रमाको शंखकी कान्ति, दुग्ध, मृणालकीसमान कान्तिमान देखकर सरोवरमें हंसकी समान प्रकाशमान देखने लगे॥२॥" अनन्तर दिमाम पयननंदन हनुमानजीने देखा कि, रात्रिके प्रथम अधपहरमें सूर्यकी समान अधिक प्रकाशमान किरणों सहित चंद्रमा गोठमें भमण करते हुये मतवाले नृपभकी समान तारागोंके मध्यमें प्राप्त होकर वारंवार चंद्रिका राशि छिरकाते हुए विहार कर रहेहैं ॥ १ ॥ चंद्रमाके उदय दर्शन करनेसे लोकोंके समस्त पाप नाशको प्राप्त हुए, समुद्र बढा, और सबही प्राणी शोभायमान हुए ॥२॥ जो लक्ष्मी पृथ्वीपर मन्दराचल पर्वतमें प्रदोप कालके समय समुद्र और दिनको जलके मध्य कमल फूलों के समूहोंमें मिली रहती है, वही लक्ष्मी इस समय चंद्रमा टिककर विराजमान होरहीहै ॥३॥ चांदीके पीजरोंमें हंस, मन्दराचलपर्वतकी कन्दराओंमें सिंह और गर्वित हाथियोंपर चढेहुए वीर इन सबकी समान आकाशमें उदय हुए चन्द्रमाकी कला शो शंखप्रभंशीरमृणालवर्णाद्गम्यमानंह्यवभासमानम्।।ददर्शचंद्रंसकपिप्रवीर पोश्यमानसरसीवहंसम् ॥२॥” ततःसमध्यंगतमंशुमंतंज्योत्स्रावितानं मुहुरुद्धमंतम् ॥ ददर्शधीमान विभानुमंतंगोप्ठेवृपंमत्तमिवभ्रमंतम् ॥१॥ लोकस्यपापानिविनाशयंतमहोदधिंचापिसमेधयंतम्॥भूतानिसर्वाणि विराजयंतंददशशीतांशुमथाभियांतम् ॥२॥याभातिलक्ष्मी विमंदरस्थायथाप्रदोपेपुचसागरस्था। तथैवतोयेपुचपुष्करस्थारराजसाचारुनिशाकर स्था॥३॥ हंसोयथाराजतपंजरस्थःसिंहोयथामंदरकंदरस्थः ॥ वीरोयथागर्वितकुंजरस्थश्चंद्रोऽपिवधाजतावरस्थः॥४॥स्थित ककुभानिवती क्षणभृगोमहाचलःश्वेतवोवंशृंगः॥ हस्तीवजांबूनदबद्धशृंगोविभातिचंद्रःपरिपूर्णशृंगः ॥५॥ विनयशीतांबुतुपारपंकोमहाग्रहयाहविनष्टपंकः॥ प्रकाशलक्ष्म्याश्रयनिर्मलांकोरराजचंद्रोभगवाञ्छशांकः॥६॥ शिलातलंपाप्ययथामृगेंद्रोमहारणप्राप्ययथांगजेंद्रः ॥राज्यसमासाद्ययथानरेंद्रस्त थाप्रकाशोविरराजचंद्रः॥ ७ ॥ प्रकाशचंद्रोदयनष्टदोपःप्रवृद्धरक्षःपिशिताशदोपारामाभिरामेरितचित्तदोपःस्वर्गप्रकाशोभगवान्प्रदोपः ॥८॥ भित हो रहींथी ॥ ४ ॥ चन्द्रमाके कलंकरूप हरिण शृङ्गके स्पष्ट प्रकाशित होनेसे ऐसा बोध हुआ मानो तेज सींगवाला बैल, ऊंचे शिखावाला श्वेत वर्णका महा पर्वत, अथवा जाम्बूनद सुवर्णके बंधनसे जिसके दांत बोहों ऐगा हाथी शोभायमान हो रहाहै ॥५॥ वर्षा बीत जानेसे, उसका शीतल जल बिन्दुरूप कीचड दूर होग याहै । महा यह सूर्यको किरणके संबंधसे, चन्द्रमाकी प्रभा अवि वढगई व प्रकाश लक्ष्मीके आश्रयवश उसका कलंकभी अविस्पष्ट होगयाहै इस प्रकार चन्द्रमा अनिगए गोभायमान हो रहा ॥७॥ प्रकाशमान पन्द्रमाके उदयमे समान अंशकारका नाश होने, गोरे गांग Home शोभित होरहाहै ॥६॥ शिलातलपर बैठेहुए मृगराज सिंहके समान, रणके बीचमें सटे महागजकी समान, और राज्यपर स्थापित हुए राजाकी समन चन्द्रमा *失常率中央*非*非共央井沙非必 प्रेमकलहके न होने, और स्वर्गका मुख प्रकाशित होनेसे प्रदोषकाल गौरवयुक्त और शोभायमान हो रहाहै ॥ ८ ॥ कानोंको सुख देने वाली मनोहर मंकार इधर उधर सुनाई आय रहीहै। पतिवता त्रिये अपने २ स्वामीके साथ शयन कररहीहैं; और अतिशय अद्भुत पोरकर्म करनेवाले भयंकर वृनि निगाचर गक्षम लोग इधर उधर घूमतेहुए विहार करने में लग रहेहैं ॥ ९ ॥ उसी समयमें परमबुद्धिमान हनुमानजीने फिर देखा कि राक्षसगणोंके समस्त ग्रह-रथ, अव और सुवर्णमय आमोंसे पूरित होरहेहैं, वीरश्रीयुत और ऐवर्यमन व मदमन निशाचरगणोंसे भररहेहैं ॥ ३० ॥ उनके मध्यमें अमन राक्षसोंका परस्पर अधिक उनर प्रत्युनर करते कोई दृढहाथवाले उलझनयुक्त मतवाले प्रलाप वचन परस्पर कहकर निन्दा कर रहेहैं ॥ ३१ ॥ और कभी२ और कोई आनी छानीको बजाय रहेहैं, कोई २ अपनी प्राणप्यारीको चिपदाय रहेहैं, कोई विचित्र विविध वेश धारण कररहेहैं और अनेक धनुषकोही बैंच रहेहैं ॥ १२ ॥ अनन्नर तंत्रीस्वराः कर्णसुखाःप्रवृत्ताःस्वपतिनार्यःपतिभिःसुपृक्ताः ॥ नक्तंचराश्चापितथाप्रवृत्ताविहर्तुमत्यद्भुतरोवृत्ताः ॥ ९ ॥ मत्तप्रमत्ता निसमाकुलानिरथाश्वभद्रासनसंकुलानि ॥ वीरश्रियाचापिसमाकुलानिददर्शधीमान्सकपिःकुलानि ॥ १० ॥ परस्परंचाविकमाक्षिपं तिभुजांश्चपीनानधिविक्षिपंति ॥ मत्तालापानधिविक्षिपंतिमत्तानिचान्योन्यमधिक्षिपंति ॥११॥ रक्षांसिवक्षांसिचविक्षिपंतिगानाणिकांतासुच विनिपंति ॥रूपाणिचित्राणिचविक्षिपंतिदृढानिचापानिचविक्षिपंति॥१२॥ददर्शकांताश्वसमालभंत्यस्तथापरास्तत्रपुमःस्वपंत्यः॥सुरूपवक्रा वतथाहसंत्याक्रुद्धाःपराश्चापिविनिःश्वसंत्यः ॥ १३॥ महागजेश्चापितथानदद्भिःसुपूजितेश्चापितथासुसद्भिः।ारराजवीरेश्वविनिःश्वसन्द्रिहदोभुजंगे विनिःश्वसद्भिः ॥ १४ ॥ बुद्धिप्रधानानुचिराभिधानान्संश्रद्दधानालगतःप्रधानान् ॥ नानाविधानाचिराभिधानान्ददर्शतस्यांपुरियातुधा नान् ॥ १५॥ ननंददृष्ट्वासचतान्सुरूपान्नानागुणानात्मगुणानुरूपान् ॥ विद्योतमानान्सचतान्सुरूपान्ददर्शकांश्चिच्चपुनर्विरूपान् ॥ १६॥ हनुमानजीने देखा कि, लिये कोई अपने शरीरको चन्दनादि लगा रहीहैं, कोई शयन करतीहैं, कोई प्रफुल्लित वदनसे हँस रहीहैं, कोई २ कोषयुक्त होकर लम्बे २ भास ले रहीहैं ॥१३॥ उस समय उस रनवासमें सजे सजाये मतवाले हाथियोंके समूहका गर्जन होनेसे और विभीपणादि महामान्य साधुचरित्र वीरोंके निवामसे श्यास लेतेहुए सर्प समूहसे परिपूर्ण हदकी समान लंकापुरीकी शोभा होरहीथी॥१४॥अनन्तर हनुमानजीने उस लंकापुरीमें आस्तिक, मधुर वचन बोलनेवाले, विविध | पधारी जगतके मध्यम प्रधान और सुन्दर रुचिके नामधारी, मुखिया २ राक्षसोंको देखा ॥ १५॥ अधिक बुद्धिमान, विविध गुणधारी अपनी समान गुणवाले और स्वरुपवान राक्षसोंको देखकर हनुमानजीने बड़े आनंदित हुए, उन राक्षसोंमें कोई २ अधिक विरूप होनेपरभी प्रभायुक्त होनेके कारण सुरूपवानकी ममान *anikakaitin ॥१९ सुं ५ आने लगे ॥१६॥ निसके पीछे हनुमानजीने देखा कि, उन स्थानोंम अतिउत्तम गहनोंसे सजधजकर तारागणोंकी समान प्रियदर्शनवाली महानुभाव सुस्त पयुक्त निशाचरिये मयपानादि प्रियकार्योंमें आसक्त होकर हावभाव और कटाक्ष कररहीहैं ॥ १७ ॥ फिर हनुमानजीने रात्रिके समय चलते २ देखा कि. वहंगी जिसप्रकार अपने स्वामीसे भेंटी जातीहै, वैसेही अपने २ स्वामियोंसे चिपटाईजाकर कोई २ कामिनी महालना और हर्षके वशहो अपने रूपकी अधि काईसे मानो प्रज्वलित हो रहीहैं ॥१८॥ बुद्धिमान् हनुमानजीने फिर देखा कि कोई २ मनमानी विवाहिता पतिव्रता लिये अयारियों के नीचे और कोई २ अपने स्वामियोंकी गोदीमें मदनयुक्त चिनसे बैठीहैं ॥ १९ ॥ फिर हनुमानजीने देखा कि, नपायेहुए सुवर्णकी समान वर्णवाली व चन्द्रसदृश उजले वर्णयुक्त, किसी २ स्त्रीकी ओढनी नहीं है, और वह नंगी है. और कोई २ मानिनी होनेके कारण स्वामीके विनाही बैठी हैं ॥ २० ॥ कोई २ मनभावते स्वामीके नंगने ततोवगर्हाःसविशुद्धभावास्तेपास्त्रियस्तत्रमहानुभावाः॥प्रियेपुपानेपुचसक्तभावाददर्शताराइवसृस्वभावाः॥१७॥ स्त्रियोज्वलंतीपयोपगूढानिशी थकालेरमणोपगूढाः ॥ ददर्शकाश्चित्तमदोपगूढायथाविहंगाविहगोपगूढाः॥१८॥अन्याःपुनहर्म्यतलोपविष्टास्तत्रप्रियांकेसुसुखोपविष्टाः॥ भर्तुः पराधर्मपरानिविष्टाददर्शधीमान्मदनोपविष्टाः॥१९॥अप्रावृताःकांचनराजिवर्णाःकाश्चित्परास्तिपनीयवर्णाः ॥ पुनश्चकाश्चिच्छशलक्ष्मवर्णाः कांतमहीणारुचिरांगवर्णाः ॥२०॥ ततःप्रियान्प्राप्यमनोभिरामान्सुप्रीतियुक्ताःसुमनोभिरामाः ॥ गृहेषुदृष्टाःपरमाभिरामाहरिप्रवीरःसददर्श रामाः ॥ २१ ॥ चंद्रप्रकाशाश्चहिवक्रमालावका सुपक्ष्माश्चसुनेत्रमालाः ॥ विभूपणानांचददर्शमालाःशतह्नदानामिवचारुमालाः ॥ २२ ॥ नत्वेवसीतांपरमाभिजातांपथिस्थितेराजकुलेप्रजाताम् ॥ लतांप्रफुल्लामिवसाधुजातांददर्शतन्वीमनसाभिजाताम् ॥ २३ ॥ सनातनेवमनिसं निविष्टांरामेक्षणांतांमदनाभिविष्टाम् ॥ भर्तुर्मनःश्रीमदनुप्रविष्टांस्त्रीभ्यःपराभ्यश्चसदाविशिष्टाम् ॥ २४ ॥ अतिशय प्रसन्न होरही हैं। कोई २ फूलोंके गुच्छोंको धारणकर अतिशय मनोहारिणी और हर्पयुक्त होरहीहैं, और कोई २ स्वभावसेही चिनको संचे लेतीहैं ऐसी स्त्री महावीरजीने देखीं ॥ २१ ॥ शशिधरसदृश सुन्दरवदनोंके समूह, तिर्शी चितवन, सुकुमार धुकुटी और उत्तम नेत्रोंकी राशि; व दामिनी मंडलकी समान प्रभावान् गहने हनुमानजीकी दृष्टि पडे ॥ २२ ॥ परन्तु जो अतिशय कुलीन श्रेष्ठवंशमें उत्पन्न, जिनको विधाताने अपने मनकी कल्पनासे बनाया, श्रेष्ठ प्रफुहिता लताकी समान महासुन्दरता व सुकुमारकी खानिहैं ॥ २३ ॥ जो सदाही पतिव्रत मार्गमें सर्व भाँतिसे टिकी हुई, श्रीरामचन्द्रमेंही जिनकी केवल एक दृष्टि और श्रीरामचन्द्रही जिनके एक मात्र काम लालमा जिन्होंने स्यामीके निर्मल मनमें प्रवेशकियाहै, जो समस्त श्रेष्ठ प्रीकुलकी ललाम स्वरूप में ॥1॥ AKAA****** ॥ १ Anu-S मोसामा रिहर्म दुःखिन होकर मदाही रोती रहती हैं, पहले श्रीरामचन्द्रजीक सहबास समयम अत्युत्तम गहनाम प्रथम गिन जानक याग्य पादक जनक कट गाभायमान करता, जिनकी भुटिये सुकुमारहैं, व स्वर अतिमधुर, जो कि वनके मध्यमें नृत्य करती हुई मोरनीकै समान देखनेमं अति मनोहर हैं ॥ २५ नो स्वामी विरहमें भलीभाँति न प्रकागती हुई चन्दरेसाकी समान, धूरियुक्न सुवर्णकी समान, व्रणयुत वर्ण रेखाकी समान अथवा पवन मथित मेघमाल: समान अनि गोचनीय मूर्ति धारण कियेहुपहें ॥२६॥ उन नरेश्वर बोलनेवालोंमें श्रेष्ठ श्रीरामचंद्रजीकी भार्या सीताजीको बहुत देरतक ढूँढनेसेभी न पायकर, कपि । हनुमानजी कुछ क्षण के लिये अत्यन्त दुःसित और शिथिलयन होगये ॥२७॥ इत्या श्रीमदा० वा. आदि० सुन्दरकांडे भापाटीकायां पंचमः सर्गः ॥ ५ : उप्णार्दितामानुमृतायकंठीपुरापराहत्तिमनिष्ककंठीम्।।सुजातपक्ष्मामभिरक्तकंठीवनप्रवृत्तामिवनीलकंठीम्॥२५॥अव्यक्तरेखामिवचंद्रलेखांपास प्रदिन्यामिवमरेखाम्।क्षितपढामित्रवर्णरेखांवायुप्रभुनामिवहेमरेखाम् ॥२६॥ सीतामपश्यन्मनुजेश्वरस्यरामस्यपत्नींवदतांवरस्य ॥वभूवदुःखों पहन श्रिरम्यावंगमोमंददयाचिरम्य ॥२७॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये सुन्दरकांडे पंचमः सर्गः॥६॥ सनिकामविमानेषु पिचरनकामरूपधृक् ।। विवनारकपिलंकालायवेनसमन्वितः ॥ १॥ आससादचलक्ष्मीवानाक्षसेंद्रनिवेशनम् ॥ प्राकारेणार्कवर्णनभास्वरेणा भिमंत्रतम् ॥ २ ॥ नितंगहीम सिंहरियमहदनम् ॥ समीक्षमाणोभवनंचकारोफपिकुंजरः ॥३॥ रूप्यकोपहितेश्चित्रेस्तोरणेहॅमभूपणेः।। विनिवाभित्रकक्ष्याभिद्वारेमचिगवतम् ॥ ४॥ गजास्थितेमहामात्रःशूरेश्चविगतयमेः ॥ उपस्थितमसंहायहयेःस्यंदनयायिभिः ॥५॥ हमछानुसार रूप धारण किये कपिश्रेष्ट श्रीमान हनुमानजी मतसंड अठसंडे धवरहगेपर, इच्छानुसार शीघतासे भमण करते हुए लंकापुरीमें घूमनेलगे ॥१ और यही गीधनाके माथ गक्षमगज गयणके गृहके निकट पहुँचे । यह गृह मूर्य सम प्रकाशित और चाहर दिवारीसे घिराहुआ था ॥२॥ सिंह के समान म: परगान भयंकर गक्षमामे उम गृहको रक्षिन देखकर कपिकुंजर हनुमानजीने उसको जरा २ खोजनेका विचारकिया ॥ ३ ॥ हनुमानजीने देखा कि यह भव: पहुगमारे उपगृहोंमे परिपूर्ण और विचित्र गोभामे गोभायमान होरहाहै, इसके विचित्र दरवाजे चांदीक पर्नेहैं, और इनपर सुवर्णके काम होरहेहैं, सबही दार मनोहर काग्मे स्थापित किये इमलिये यह गृह अनिगर गोभायमान होरहा था ॥ ४ ॥ शूरतायुक्त परिश्रमविहीन हाथियोंपर चढे महावत् गणोंसे, व अति वेगवान रथं सुं० पा गडे पागने ॥ ५॥ सिंह और प्याम नर्मको धारण किये, मुवर्ण, चांदी य हाथीदांतकी प्रतिमाओंसे सुसज्जित और गंभीर गर्जनशाली विचित्र रथ उसके किनारे २ पुम गथे ॥ ६ ॥ अनेक प्रकारके ग्न अनिश्रेष्ठ आमन और बड़े २ रथ व महारयोंके समूहसे शोभित ॥ ७ ॥ और परमसुन्दर सुहावने अनेक पसार गायों मृग और पक्षी इन मत्र पस्तुओंने रायणका गृह भूपित और पूरितथा ॥८॥ सीमारक्षक विनीतस्वभाव परमशिक्षित राक्षसगण बड़ी सावधानीसे उस गहमी रक्षा कर रहे थे, भीर वा मुन्दर २गियोंमे ब्यान था ॥९॥ अनेक बडी म्रियों और प्रमोदयुक्त प्रमदाओंसे वह स्थान चारों ओर भर रहा है और अति श्रेष्ठ गहने सीमानारधनिमे यह स्थान मागरतुल्य गंभीरमायसे गन्दायमान होरहाथा ॥१०॥अधिक करके यह गृह सब राजचिह्नोंसे परिपूर्णथा, और अतिश्रेष्ठ महामोलके मिंडल्यामतनुवाणेदांतकांचनगजतीः ।। घोपवनिर्विचित्रेश्चमदाविचारित्रथैः ॥ ६॥ बहुरत्नसमाकीर्णपरासिनभूपितम्।महारथसमावाप मदान्धमदामनम्।।७॥दृश्य अपरमोदारेस्तेस्तैश्चमृगपक्षिभिः ।। विविधैर्वहुसाहटे परिपूर्णसमंततः॥ ८॥ विनीतेरंतपालेश्चरक्षोभिश्वसुरक्षितम् ॥ गुल्याभिभवरखीभिःपरिपूर्णसमंततः ॥९॥ मुदितप्रमदारवंराक्षसेंद्रनिवेशनम्॥ वराभरणसंहादेःसमुद्रस्वननिस्वनम् ॥१०॥तद्वाजगुणसंपन्न मुख्यधारनंदनैः ।। महाजनसमाकीर्णसिंहरिवमहद्वनम्॥११॥भेरीमृदंगाभिरुतंशंखघोपविनादितम् ॥ नित्यार्चितपर्वसुतपूजितंराक्षसे सदा ॥ ॥१२॥समुद्रमियगभीरंसमुद्रसमनिःस्वनम् ॥ महात्मनोमटेश्ममहारत्नपरिच्छदम् ॥ १३॥ महारत्नसमाकीणंददर्शसमहाकपिः ।। विराज मानंगपुपागजाश्वरथसंकुलम् ॥ ११॥ लंकाभरणमित्येवसोऽमन्यतमहाकपिः॥ चचारहनुमास्तत्ररावणस्यसमीपतः ॥१५॥ गृहाद्हराक्षसाना मुद्यानानिनसर्वशः॥ वीक्षमाणोप्यसंवस्तः प्रासादांश्चचचारसः ॥ १६॥ . पंदनकी सुगंपने और मुख्य २ राक्षमगोंमे व्यानथा. जैसे सिंहोंसे बडा वन ॥ ११॥ भेरी, मृदंग और शंखके शब्दसे शब्दायमान होरहाथा, और राक्षसगण निरनर इन ग्रहमें आने २ इष्टदेवनाकी पूजा करतेथे ॥३२॥ महात्मा राक्षसराज रावणका समुद्रतुल्य गंभीर और समुद्रकीही समान शब्दकारी इस प्रकार रत्न मामीमे परिपूर्ण भान था ॥१३॥ महाकपि हनुमानजीने अनेक रत्नोंमे युक्त उम गृहको देखा, उस गृहम जहां तहां गज, अब और रथ व्यानथे ॥१४॥ उस गुरुप भरनको देगार महापि हनुमानजीने पिनागकि, यह गृहमय लंकाका भूपणरूपदै; यह मानकर वह जहां रावण शयनकर रहाथा यहां गये ॥१५॥ परमा एक गामे इमो गामें गमन करने हो मुमिमा २ निगारगेंके गढ़ और फुलवाड़िये देगने भालने उम मंदिग्में घमने गरी ॥ ॥ १- निमके पीठ महावीर्यवान हनुमानजी महावेगमे छलांग मारकर प्रथम प्रहस्तके घरमें फिर वहांसे महापाकै भवनमें प्रवेश करते हुए ॥ १७॥ फिर वहांसे कुंभकर्णके मेगकार गृहमें फिर वहांमे कूदकर विभीषण वरपर महाकपि आये ॥ १८ ॥ वहांसे महोदरके घरपर कूदे, तिसके पीछे विरूपाक्षके स्थानपर आये फिर विपुस्जिदका घर सोजा, फिर विद्युन्मालीके भवनको आयगये ॥ १९ ॥ वहांसे वजदंष्ट्रके गृहार गये, फिर महाकपि हनुमानजी शुकके यहां पधारे, फिर युद्धिमान मारणके स्थानपर ॥ २० ॥ फिर वानरश्रेष्ठ हनुमानजी इन्द्रजीतके स्थानपर कूदे, वहांसे जम्बुमाली और सुमालीके भवनपर वानरश्रेष्ठ होरहे ॥२१॥ वहांम भोलुक भानार, गरिमांनुक भवनमे मूर्यगत्रुके यहां, फिर वहांते यह महाकपि वनकायके मंदिरसर पहुँचे ॥२२॥ फिर पवनकुमार धूम्राक्ष, व सम्पा अमात्यमहावेगाप्रहस्तस्यनिवेशनम्।।ततोऽन्यत्पुसुवेवेश्ममहापार्श्वस्यवीर्यवान् ।। १७ ॥ अथमेवप्रतीकाशंकुंभकर्णनिवेशनम् ॥ विभीपणस्य पतथापुरचेममहाकपिः॥ १८ ॥ महोदरस्यचतथाविरूपाक्षस्यचैवहि ॥ विद्युजिह्वस्यभवनं विद्युन्मालेस्तथैवच ॥१९॥ वहुदंष्ट्रस्यचतथापुसुवे ममहाकपिः । शुकस्यवमहावेगःसारणस्यवधीमतः॥२०॥ तथाचेंद्रजितोवेश्मजगामहरियूथपः॥ जंबुमालेःसुमालेश्वजगामहरिसत्तमः॥२१॥ गरिमातोश्रभवनमूर्यशवोस्तथैवच ।। वबकायस्यचतथापुडुवेसमहाकपिः॥२२॥धूम्राक्षस्याथसंपाते व मारुतात्मजः ॥ विद्युद्रूपस्यभीमस्य घनस्यापियनस्यन ॥ २३॥ शुकनाभस्यचक्रस्यशठस्यकपटस्यच ।। ह्रस्वकर्णस्यदंष्ट्रस्यलोमशस्यचरक्षसः॥२४॥युद्धोन्मत्तस्यमत्तस्यध्वजग्री यस्यमादिनः ॥ विद्युनिद्विजिहानांतथाहस्तिमुखस्यच ॥ २५॥ करालस्यविशालस्यशोणिताक्षस्यचेवहि ॥ पवमानःक्रमेणेवहनूमान्मारुता स्मजः॥ २६ ॥ तेपुतेपुमहापुभवनेपुमहायशाः ॥ तेपामृद्धिमतामृद्धिंददर्शसमहाकपिः॥२७॥ सर्वेपांसमतिक्रम्यभवनानिसमंततः ॥ आस मादायलक्ष्मीवात्रामसेंद्रनिवेशनम् ॥ २८ ॥ रावणस्योपशायिन्योददर्शहरिसत्तमः ॥ विचरन्हारशार्दूलोराक्षसीविकृतेक्षणाः ॥ २९ ॥ निरु परपर, यहांगे बिष्टूप, भीम, धन, विघनके स्थानपर ॥२३॥ इसके पीछे शुकनाभ, चक्र, शठ, कपट, हस्वकर्ण, दंष्ट्र, लोमश राक्षसोंके गृहोपर ॥२४॥ युद्धोमन, मन, धनग्रीव मादी, विएन्जितके, दिजिवके और फिर हस्तिमुरस्के स्थानपर ॥२५॥ वहांसे कराल, विशाल, शोणिताक्ष, इन सब राक्षसोंके भवनोंपर मुमार हनुमानजी पारी बार्गमे घूम य कूदे ॥२६॥ और उन सब बडे भवनों में इन समस्त अद्धिशाली राक्षसोंकी परमसमृद्धि महायशस्वी हनुमानजीने ली ॥ २७ ॥ इस प्रकारमे श्रीमान् महाकपि हनुमानजी क्रममे इन समस्तभवनोंपर घूम राक्षस रावणके गृहपर आये ॥ २८ ॥ वहांपर महावीरजीने देखा 482 मुं० चा.रा.भा. ॥२१॥ स० कि विकराल नेत्रवाली राक्षसिये अलग २ अपने पहरैपर रावणके शयनगृहकी रक्षा करतीहैं ॥२९॥ इनके अतिरिक्त रावणके गृहमें इधर उधर विचरण करती दर्द, शूल, मदर, शक्ति, और तोमर धारण किये हुए असंख्य राक्षसियोंके झुण्ड:हनुमानजीने देखे ॥३० ॥ शस्त्र धारण किये हुए बडी २ देहवाले राक्षसों भयन समूहोंमें लाल, श्वेत, घोडे बँधे देखे जो कि अनिशीव चलनेवाले थे ॥३१॥ और बडे २ श्रेष्ठरूपवाले बनके गोंके मर्दन करने वाले, भली भाँतिसे शिक्षित, युद्ध में परायन हाथीके समान गजभी बँधे देखे ॥३२॥ वह हाथी देखतेही शत्रुओंकी सेनाका संहार करनेवाले थे, व और पताकी समान जिनमेंसे मदका झर नासा झरनाथा ॥३३॥ समरमें 'शत्रु लोगोंसे जीतने के अयोग्य, मेघोंकी समान गर्जन करने वाले हाथी, और बहुतसी सेना, सुवर्णकी सब सामग्रीसे सम्पन्न उस भवनमें शूलमुद्गरहस्ताश्वशक्तितोमरवारिणः ॥ ददर्शविविधान्गुल्मांस्तस्यरक्षःपतेहे ॥३०॥राक्षसांश्चमहाकायान्नानामहरणोधतान् ॥ रक्ताश्वेतान्सि तांश्चापिहरीश्चापिमहाजवान् ॥३१॥ कुलीनापसंपन्नानगजान्परगजारुजान् ॥ शिक्षितान्गजशिक्षायामैरावतसमान्युधि॥३२॥ निहंतॄन्परसे न्यानांगृहेतस्मिन्ददर्शसः ॥ क्षरतश्चयथामेघान्स्रवतश्चयथागिरीन् ॥३३॥ मेघस्तनितनिर्घोपान्दुर्धन्सिमरेपरैः॥ सहस्रवाहिनीस्तत्रजांवूनद परिष्कृताः ॥ ३४॥ हेमजालेरविच्छिन्नास्तरुणादित्यसन्निभाः ॥ ददर्शराक्षसेंद्रस्यरावणस्यनिवेशने ॥३५॥ शिविकाविविधाकाराःसकपिर्मा रुतात्मजः॥लतागृहाणिचित्राणिचित्रशालागृहाणिच॥३६॥क्रीडागृहाणिचान्यानिदारुपर्वतकानिच ॥ कामस्यगृहकरम्यदिवागृहकमेवच ॥ ॥ ३७॥ ददर्शराक्षसेंद्रस्यरावणस्यनिवेशने ॥ समंदरसमप्रख्यमयूरस्थानसंकुलम् ॥३८॥ ध्वजयष्टिभिराकीर्णददर्शभवनोत्तमम् ॥अनंतरत्न. निचयंनिधिजालंसमंततः ॥ धीरनिष्टितकांगंगृहंभूतपतेरिव ॥ ३९ ॥ जहाँ तहां छाई हुई देखी ॥ ३४ ॥ वह सेना सुवर्णकी कडियोंके जालका बख्तर पहने, प्रातःकालीन सूर्यके समान चमकती दमकती, राक्षसनाथ रावणके स्थानमें हनुमानजीने देसी ॥ ३५॥ अनेक प्रकारकी पालकिये चित्र विचित्र लतायुक्त गृह, और चित्रपट शोभित गृह हनुमानजीने देखे ॥ ३६ ॥ विहार गृह और काठके यने हुये ( नकली ) क्रीडा पर्वत रमणीक रति करनेके सामान, और दिनको विहार करनेके गृह हनुमानजीने देखे ॥ ३७ ॥ और हनुमानजीने देखा कि गवणका गृह अतिश्रेष्ठ है, वह मन्दराचल पर्वतकी तलैटीकी समान मनोहर मोरोंके स्थानोंसे व्यामहै ॥ ३८ ॥ ध्वजा पताकाओंसे भूपित, असंख्य ल्न और ऋदि मिद्धिके ममूहमे परिपूर्ण और वहांपर भयरहित स्थिचिन गक्षमलोग उन निधियोंकी रक्षामें नियुक्त थे, देशनेगे बोध त था कि, ' FxxxHNAKKHAkkkkkkxx HKN************x x**** और यार २ उनको पृथ्वीर निहारती हुई कि, कदाचित रामचन्द्र आजाय. तिलक विसना हुआ व्याकुल चिन बुद्धिमती जानकोजीको अपना सर्वनाश करो। निमिनही रायण हरकर लेगया ॥ ४३ ॥ अनन्तर मनोहर दन्तवाली मन्द २ हास्प युक्त; जानकीजी राम और लक्ष्मण दोर्नोको नहीं देखने पर बन्धुजनोंके विर। मठीनमुगी और भयमे बहुतही पीडित हुई ॥४४॥ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकान्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां विपंचाशः सर्गः ॥ ५२ रायण को आकाराने उडताहुआ देखकर जनककुमारी सुकुमारी सीताजी महाभीत होकर घबडाई और बहुतही दुःखित हुई ॥ १॥ क्रोध करनेके कारण और रोते । उनके दोनों नेत्र ठाठ हो आये, वह आर्तस्वरसे रोकर उस कालमें भयंकर नेत्र कियेहुए राक्षसपतिसे कहने लगीं ॥ २॥ रेराक्षसाधम रावण ! हमको अकेली पार अंपेक्षमाणावहुशोपेनहींधरणीतलम् ॥ सतामाकुलकेशांतांविषमृष्टविशेपकाम् ॥ जहारात्मविनाशायदशग्रीवोमनस्विनीम् ॥ ४३ ॥ततस्तुसा नामदतीनिस्मितापिनाकृताचंधुजनेनमेथिली ।। अपश्यतीराघवलक्ष्मणावुभौविवर्णवकाभयभारपीडिता 122॥ इत्या श्रीमद्रा. वाल्मी० आदिकाव्यऽरण्यकांड द्विपंचाशः सर्गः ॥ १२ ॥ खमुत्पतंतंतंदृष्ट्वामैथिलीजनकात्मजा ॥ दुःखितापरमोदिनाभयेमहतिवर्तिनी॥१॥रोपरोदनता नाभीभीमाशंगासाधिपम् ॥ रुदतीकरुणंसीताह्रियमाणातमब्रवीत् ॥२॥ नव्यपत्रपसेनीचकर्मणानेनरावण ॥ ज्ञात्वाविरहितायोमांचोरयित्वाप । लायसे ॥३॥ त्वयानूनंदुष्टात्मन्भीरुणाहर्तुमिच्छता ॥ ममापवाहितोभर्तामृगरूपेणमायया ॥४॥ योहिमामुद्यतस्त्रातुंसोप्ययंविनिपातितः॥ । गृभगन पुगणोऽसीधारस्यसखामम ॥५॥ परमंखलुतेवीयदृश्यतेराक्षसाधम ॥ विश्राव्यनामधेयंहियुद्धेनास्मिजितात्वया॥६॥ईदृशंगर्हितंकर्म । कथंकृत्वानलनसशप्रियाचाहरणंनीचरहितेचपरस्यच॥७॥कथयियंतिलोकेषुपुरुपा कर्मकुत्सितम्॥ सुनृशंसमधर्मिष्टंतवशौटीर्यमानिनः॥८॥ | नांग करके लिये भागाजागाह अरे क्या इस नीचकर्मसे तुझे लाज नहीं आती? ॥ ३ ॥ रे दुरात्मन् ! मैं जान गई कि तृ डरपोक स्वभाववालाहै इस कारणगे हमारे हरण करनेका अभिटाप कर मायामय मृगरूप बना हमारे स्वामी रामचन्द्रजीको छलसे दूर लेगया ॥ ४ ॥ और इस समय हमारी रक्षा करने । लिये जो चार हुपधे उन हमारे भशुरके मुसा गृध्रराज जटायुजीकोभी तैने मार डाला ॥ ५ ॥ हे राक्षसाधम ! इससेही जाना गया कि, तुझमें कुछ वीरता नहीं ! तं वेवल हमारी अपना नामही सुनाकर हरण किया, कुछ तुझ करके हम जीती नहीं गई. हाँ, राम लक्ष्मणसे युद्ध कर हमें जीतता तो एक वावथी ॥ ६ ॥रेनीच भग्नमें पराई श्री हरण करने का यह नीच निन्दनीय कार्य करके तू लजिव नहीं होता ।। ७ ॥ रे अपनेको शुर माननेवाले ! तुने जो यह अतिनिर्लज और निन्दनी CS आर. स० 7.ग.Bा रिपाई मो इसकी मय पुरुष चरा कर २ के तुझे बुरा कहेंगे ॥ ८ ॥ तूने जो अपनी शूरताई की और शारीरक बलकी वार्ता कही सो तेरी इस शूरताको रिकारहै ! मेरे इस पलकोभी विकारहै ! तरे कुटके कलंकजनक ऐसे चारित्रपरभी धिक्कारहै ॥ ९ ॥ तू इस प्रकारसे हरण करके शीघताके साथ दौडा जाताहै फिर ॥१॥ भला हम क्या कर न ? हां यदि एक मुहूर्तभी तू खडा रहै, वो प्राण लेकर नहीं लौटने पावेगा ॥ १० ॥ राजकुमार रामचंद्र और लक्ष्मणजीकी दृष्टिके आगे आते ही मेनामदिन एक मुहूर्तभरभी प्राण धारण नहीं कर सकेगा ॥ ११ ॥ पक्षी जिस प्रकार वनमें लगीहुई दावानलको नहीं छू सकता, वैसेही उन राजकुमारोंके या गोका पर्ण महन करने की किसी भाँति तुझमें सामर्थ्य नहीं है ।। १२॥ इसकारण हे रावण ! भली भाँति अपना हिताहित विचार करके सीधी तरहसे हमको छोडदे नहीं नौ हमारे स्वामी अपने भाताके सहित हमारे इस पकडे जानेपर महाक्रोधित हो ॥ १३ ॥ यदि तू हमको न छोडदेगा तौ तेरा विनाश करनेके लिये यत्न करेंगे, धिक्केशायंचसत्त्यंचयत्त्वयाकथितंतदा ॥ कुलाकोशकरंलोकेधिक्तचारित्रमीहशम् ॥९॥ किंशक्यंकर्तुमेवंहियजवेनेवधावसि ॥ मुहूर्तमपितिष्ठत्वं नजीवन्प्रतियास्यसि॥१०॥नहिचक्षुःपथंप्राप्यतयोःपार्थिवपुत्रयोः॥ ससैन्योपिसमर्थस्त्वंमुहूर्तमपिजीवितुम्।।११।। नत्वंतयोःशरस्पशंसोढुंश कःकथंचन ॥ वनेप्रज्वलितस्येवस्पर्शमग्नेर्विहंगमः।।१२।।साधुकृत्वात्मनःपथ्यंसाधुमासुंचरावणामत्प्रर्पणसंक्रुद्धोधात्रासहपतिर्मम॥१३॥विधा स्यतिविनाशायत्वमायदिन{चसि ॥ येनत्वंव्यवसायेनवलान्माहर्तुमिच्छसि ॥१॥ व्यवसायस्तुतेनीचभविष्यतिनिरर्थकः ।। नाहंतमपश्यंती भतारवियुधोपमम् ॥ १५ ॥ उत्सहेशवशगाप्राणान्धारयितुंचिरम् ।। ननूनंचात्मनःश्रेयःपथ्र्यवासमवेक्षसे ॥ १६॥ मृत्युकालेयथामत्यावि परीतानिसेवते । मुमूर्पूणांतुसर्वेपायत्पथ्यंतन्नरोचते ॥ १७ ॥ पश्यामीहहिकंठेवांकालपाशावपाशितम् ॥ यथाचास्मिन्भयस्थानेनविभेपिनि शाचर ॥ १८॥ व्यक्तहिरण्मयांस्त्वंहिसंपश्यसिमहीरुहान् ॥ नदींवैतरणींपोरांरुधिरोघविवाहिनीम् ।। १९ ।। निम भागमे हमको हरण करके लिये जाताहै ॥ १४ ॥ सो हे नीच राक्षस ! वह तेरा आशय कभी सिद्ध नहीं होगा हम उन देवसमान अपने स्वामीको न देस नार ।। १५ । गधुगे परामें रहकर पहुनकालता प्राण धारण करनेको समर्थ न होंगी, हमको समझ पडताहै कि तू अपना कल्याण और हित नहीं देखता ।। १६॥ जिगार मृत्यु के समय लोगांसी पदि पिपरीत जाती -- और महाभीरण गजलप पत्रयुनः वृक्षाका पन अतिशीय दसणा ! आर उत्कृष्ट वयमाणमय पनलगहुएतपायहुए सुपणा ० ० ४ ० ॥ ! भी मदर इंटकाको सुतीक्ष्ण शाल्मली वृक्ष यह मय बहुत शीप तुझको दिखाई देंगे। उन महात्मा रामचंद्रजीका ऐसा अप्रिय कार्य करके नहीं जी सकोगे ॥२१॥ निमकार विएका पीनेगला बहुद देतक नहीं पण रस सकता. रे निघृण रावण ! इन सब बातोंस सटहै कि, तू कठिन कालकी फाँसीसे बँधाहै ।। २२ ॥ हमा! : महात्मा स्वामी मन्मुग संघाममें पान होकर फिर तुम्हारा कहीं निस्तारा नहीं; फिर तू कहां जायकर अचेगा; उन्होंने अकेलेही विना अपने माताकी सहायताके पर निसंप मारमें ।। २३ । चौदह हजार राक्षस मारडाले, वही सब अन्न रानोंके जाननेवाले महायलवान् वीर्यसम्पान श्रीरामचन्दनी ॥ २४ ॥ मुतीक्ष्ण बाणों मसूरने अस्नी प्रिय भागीक हरनेवाले तुझको अपश्यही मार डालेंगे. रावणके हार्थोके वीचमें बैठी वैदेहीजी भय और शोकयुक्त होकर इसमकारसे व औरभी बहुव भांतिः खड्गपत्रएनभीमपश्यसिरावण ] तप्तकांचनपुष्पांचवेर्यप्रवरच्छदाम् ॥२०॥ द्रक्ष्यसेशाल्मलीतीक्ष्णामायसे-कंटकेश्चिताम् ॥ नहिलमीहश कृत्वातस्यालीमहात्मनः॥२१॥धारितुंशक्ष्यसिचिरविपपीत्वेचनिघृणम् ॥ वद्धस्त्वंकालपाशेनदुर्निवारणरावण ॥२२॥ वगतोलप्स्यसेशन ममममहात्मनः निमेपांतरमात्रेण विनाभातरमाहवे ॥२३॥ राक्षसानिहतायनसहवाणिचतुर्दशा कथंसराश्वोवीर-सर्वास्त्रकुशलोवली॥२२॥ नवहिन्याच्छरेस्तीक्ष्णरिष्टभार्यापहारिणम् । एतचान्यचपरुपंवेदेहीरावणांकगाभियशोकसमाविष्टाकरुणविललापह (२५॥ तदाभृशाताबहुचें: भापिणीविलापपूर्वकरुणंचभामिनीम्।।जहारपापस्तरुणी विचेपतींनृपात्मजामागतगायवेपथुः॥२६॥ इत्या श्रीमहामायणे वाल्मीकीय आदियः रण्यकांड विपंचाशमर्गः ॥५३॥ हियमाणातुवेदेहीकंचिन्नाथमपश्यती ॥ ददर्शगिरिशृंगस्थान्पंचवानरपुंगवान्। शातेपांमध्येविशालाक्षीनी शेयंकनकप्रभम् । उत्तरीयंवरारोहाशुभान्याभरणानिच ॥२॥ मुमोचयदिरामायशंसेयुरितिभामिनीवस्त्रमुत्सृज्यतन्मध्येनिक्षिप्तंसहभूपणम्॥३॥ छोर परनके माथ करुणपरमे विलाप करने लगी ॥ २५ ॥ वह महाव्याकुल होकर अपने छुड़ानेकी चेष्टा करती हुई करुणा सहित विलाप करके अनेक दम कहने लगी, उस गार पाचारी रापण अपने शरीरको कँपाता हुआ उनको हरण करके ले चला ॥ २६ ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीप आदिकः ।। आरजे भापाटीकायां विचाराः सर्गः ॥ ५३॥ " जर रावण हरण करके लेचला तर जानकीजी और किसीको रक्षा करनेवाल: पार गली जाने लगी । और जाते २ उन्होंने पर्ववके शृंगपर बैठेहुए प्रधान पांच बंदरोंको देखा ॥ ३ ॥ व उन बडे २ नेत्रवाली जानकीजीने सुवर्णका भाना एक गम म कुछ गहने उतार उन बन्दरोंके पीरमें ॥ २॥ इस विचारसे डाल दिये कि, यह कदाचित् रामचंद्रजीसे यह सब नृत्तान्त कहभी सकते ना.ग.भा. स०१ 11020 पन जानकोजीका छोडा हुआ वन व भूपण बन्दरोंके बीचमें गिरा ॥ ३ ॥ जानकीजीके वस्त्र और भूपण डालनेका यह कर्म घबडाहटके मारे रावणने नहीं आर० गाना, उम काठमें मौवाजी बहुतही रुदन कररहीथीं उनको अनिमेष लोचनसे ॥ ४॥ पीली आंखोवाले वानरश्रेष्ठोंने सीताजीको अपने नेत्रोंसे वारंवार देखलिया पसरण पम्पापुरीको नांच लंकापुरीकी ओर ॥ ५॥ रोतीहुई सीवाजीको लेकर चला गया, अपनी मूर्तिमान मृत्युक्त्वरूप सीवाजीको हरण करके रावणके हर्पको मीमा न रही ॥ ६ ॥ यह तेज डाढवाली और तेज विपघाली सर्पिणीकी समान सीताजीको अंकमें भरकर आकाशमार्गमें होकर बहुतसे पर्वत वन नदियां व तरः गादि देसवा हुआ ॥ ७ ॥ बड़ी शीयताके साथ रावण मत्स्य, कच्छप, मगर नाके इत्यादिकोंके स्थान समुद्रको उतरगया, जिसप्रकार कि कमानसे छूटाहुन पाणं अति भीमवासे मोश चलताहै ॥ ८ ॥ जय रावणने जानकीजीको हरण किया, तब जगन्माताका हरण होनेके कारण क्षुभित होकर वरुणालय समुद्र तरंगविही: संभमातुदशग्रीवस्तत्कर्मचनबुद्धवान् ॥ पिंगाक्षास्तांविशालाक्षीनेत्रैरनिमिपैरिव ॥ ४॥ विक्रोशंतींतदासीतांददृशुर्वानरोत्तमाः ॥ सचपंपाम तिकम्बलंकामभिमुखःपुरीम् ॥५॥ जगाममैथिलीगृह्यरुदतीराक्षसेश्वरः ॥ तांजहारसुसंहृष्टोरावणोमृत्युमात्मनः ॥६॥ उत्संगेनेवभुजगींती क्ष्णदंष्ट्रांमहाविपाम् ॥ वनानिसरितःशेलान्सरांसिचविहायसा ॥ ७ ॥ सक्षिप्रंसमतीयायशरश्चापादिवच्युतः ॥ तिमिनक्रनिकेतंतुवरुणा लयमक्षयम् ॥ ८॥ सरितांशरणंगत्वासमतीयायसागरम् ।। संभ्रमात्परिवृत्तोर्मीरुद्धमीनमहोरगः॥९॥ वेदेयांह्रियमाणायांबभूववरुणालयः॥ अंतरिक्षगतावाच ससृजुश्चारणास्तथा ॥१०॥ एतदंतोदशग्रीवइतिसिद्धास्तदाब्रुवन् ॥ सतुसीतांविचेतीमंकेनादायरावणः ॥ ११॥ प्रवि वेशपुरीलंकांरूपिणीमृत्युमात्मनः ॥ सोऽभिगम्यपुरीलंकांसुविभक्तमहापथाम् ॥ १२॥ संरूढकक्ष्यांबहुलांस्वमंतःपुरमाविशत् ॥ तत्रतामसिता पांगींशोकमोहसमन्विताम् ॥ १३ ॥ निदधेरावणःसीतांमयोमायामिवासुरीम् ॥ अत्रवीच्चदशग्रीवःपिशाचीपारदर्शनाः ॥ १४ ॥ होगया, और उसके मीन और बडे २ सब सर्प व्याकुल होगये ॥ ९ ॥ इस प्रकार जानकीजीके हरण करनेके समय यह दशा तो नदीनाथकी हुई और अ! रिक्ष विचरण करने वाले चारणगण कहने लगे ॥१०॥ कि, अब रावण किसी प्रकार नहीं बच सकता, यहींतक इसके जीवनका शेप होगया । सिद्धा. भी ऐसाही कहने लगे। इस ओर रावण चेष्टारहित मूञ्छित सीताजीको गोदीमें लिये ॥ ११ ॥ अपनी लंकापुरीमें आया, वह सीताजीको नहीं लाया बरन् कहा भानी मृत्युको मोल ले आया। उस समय लंका नगरीमें बढे २ चौराहे और मार्ग सुशोभित हो रहे थे ॥ १२ ॥ वहां पहुँचकर अपने परमसुन्दर रनवासमें रावणने । . ॥ ८ TA अपने गागागरी मायालेभामा दशानन माताजीको आने रनयाममें स्थापन करके घोर दर्शना पियाचनियोंको आवा देता हुआ ॥ १४ ॥ कि, तुम भली भांतिसे इनकी रक्षा करो। कोई स्त्री व पुरुष हमारी विना आना इन मीताको नहीं देखने पात्र. मुक्ता, मणि, सुवर्ण वन, भूषण ॥ १५ ॥ इत्यादि जिस २ वस्तुकी यह इच्छा करें वह समस्तही इनको दी जाप यह मगे आना है व जो कोई मी तुममेंसे इन जानकीको अप्रिय वचन ॥ १६ ॥ ज्ञानसे व भज्ञानसे कहेगी वह निज शरीरमें अपने प्राणोंको न समझे इस तरह सब रक्षा करनेगालियोंमे कह महा प्रतापवान रावण ॥ १७ ॥ रनवाससे बाहर आ विचार करने लगा कि, इस समय हमको क्या करना उचित है यह सोच उसने पर उपर देसा नो आगेही मांसके सानेवाले आठ राक्षस बैठेथे ॥ १८ ॥ उन राक्षसोंको देखकर ब्रह्माजीके वरदानसे मोहित हुआ रावण उन राक्षसोंके बल की प्रगंमा करने लगा।॥ ३९ ॥ तुम लोग अनेक भाँतिके अम शम धारण करके शीघ्र इस स्थानसे जहाँपर सर रहा करताथा उस जनशून्य जनस्थानको स्थाननापुमान्नीवासीतापश्यत्यसंमतः । मुक्तामणिसुवर्णानिवखाण्याभरणानिच ॥१५॥ यद्यदिच्छेत्तदेवास्यादेयंमच्छंदतोयथा ॥ याच पक्ष्यतिदेहोंवचनंकिंचिदप्रियम् ।। १६॥ अज्ञानाधदिवाज्ञानानतस्याजीवितंप्रियम् । तथोक्त्वाराक्षसीस्तास्तुराक्षसेंद्र प्रतापवान् ॥ १७ ॥ निष्कम्यांतःपुरात्तस्मालिंकृत्यमितिचिंतयन् ॥ ददशीष्टीमहावीर्यात्राक्षसान्पिशिताशनान् ॥ १८॥ सतान्दृष्ट्वामहावीर्यावरदानेनमोहितः॥ दयानतानिवामपंप्रशस्यबलवीर्यतः ।। १९॥ नानाप्रहरणाःक्षिप्रमितोगच्छतसत्वराः ॥ जनस्थानंहतस्थानभूतपूर्वखरालयम् ॥२०॥ तत्रा स्पतांजनस्थानेशून्येनिहतराक्षसे ।। पौरुपंवलमाथित्यत्रासमुत्सृज्यदूरतः ॥२१॥ बहुसेन्यमहावीयजनस्थानेनिवेशितम् ॥ सदूपणखरंयुद्धेनिह नंगमसायकैः ।। २२ ।। ततःकोधोममापूर्वधिर्यस्योपरिवर्धते ।। वेरंचसुमहनारामंप्रतिसुदारुणम् ॥ २३ ॥ निर्यातयितुमिच्छामितचवेरंमहारि पोः॥ नहिलप्स्याम्यहंनिद्रामहत्वासंयुगेरिपुम् ॥२४॥ तंत्विदानीमहंहत्वाखरदूपणघातिनम् ।। रामशमोपलप्स्यामिधनलब्ध्वेवनिर्धनः॥२५॥ जा ॥ २०॥ और नुम लोग वहां बल और पारुपका आश्रय लेकर किसीकाभी डर न करके जनशून्य जनस्थानमें जाय टिके रहो ॥ २१ ॥ वहांपर गर और उपगई गति हमारी जो महावीर्यवान् बहुत सारी सेना रहतीथी, वह समस्त रामचंदके वाणसे सर दूपणसहित मारी गई ॥ २२ ॥ इस कारणसे हम को पहा फोप हुआहै, और इममेही हम पडे धीर्यवानका धीरजभी लोप होगया । इस समय रामचंद्रके प्रति हमारा महावैरभाव उपस्थित हुआहै ॥ २३ ॥ सो इस मपर परमगा गमरे पति यह अपना कोप हम प्रगट करना चाहते हैं, जबतक हम युद्दमें उस महाशत्रुका वध नहीं करलेते, तस्तक हमको सुखकी नींद न आरंगी ॥ २४ ॥ जिन प्रकार निर्शन पुरुष धन पान करके सुखी होताहै, वैसेही सर दूपणके मारनेवाले रामचंद्रजीका नारा करके हमभी सुखी होंगे ॥२५॥ ***** पा.रा.भा. आर० ॥८४॥ स०५ यह जानकीजीका छोडा हुआ वन व भूपण बन्दरोंके बीचमें गिरा ॥ ३ ॥ जानकीजीके वस्त्र और भूपण डालनेका यह कर्म घबडाहटके मारे रावणने नहीं जाना, उस कालमें सीताजी बहुतही रुदन कररहीथीं उनको अनिमेप लोचनसे ॥४॥ पीली आंखोंवाले वानरश्रेष्ठोंने सीताजीको अपने नेत्रोंसे वारंवार देसलिया रायण पम्पापुरीको नांच लंकापुरीकी ओर ॥ ५॥ रोतीहुई सीताजीको लेकर चला गया, अपनी मूर्तिमान् मृत्युस्वरूप सीताजीको हरण करके रावणके हर्पकी सीमा न रही ॥ ६ ॥ वह तेज डाढवाली और तेज विपवाली सर्पिणीकी समान सीताजीको अंकमें भरकर आकाशमार्गमें होकर बहुतसे पर्वत वन नदियां व वडा गादि देसवा हुआ ॥ ७ ॥ बड़ी शीघताके साथ रावण मत्स्य, कच्छप, मगर नाके इत्यादिकोंके स्थान समुद्रको उतरगया, जिसप्रकार कि कमानसे छूटाहुआ पाणे अति शीघ्रवासे सीधा चलताहै ॥ ८॥ जब रावणने जानकीजीको हरण किया, तब जगन्माताका हरण होनेके कारण क्षुभित होकर वरुणालय समुद्र तरंगविहीन संभ्रमात्तुदशग्रीवस्तत्कर्मचनवुद्धवान् ॥ पिंगाक्षास्तांविशालाक्षीनेवैरनिमिपैरिव ॥ ४ ॥ विक्रोशंतींतदासीतांददृशुर्वानरोत्तमाः ॥ सचपंपाम तिक्रम्यलंकामभिमुखःपुरीम् ॥५॥ जगाममैथिलीगृह्यरुदतीराक्षसेश्वरः ॥ ताजहारसुसंहृष्टोरावणोमृत्युमात्मनः ॥६॥ उत्संगेनैवभुजगींती क्ष्णदंष्ट्रांमहाविपाम् ॥ वनानिसरितःशैलान्सरांसिचविहायसा ॥ ७ ॥ सक्षिप्रंसमतीयायशरश्चापादिवच्युतः ॥ तिमिनक्रनिकेतंतुवरुणा लयमक्षयम् ॥ ८॥ सरितांशरणंगत्वासमतीयायसागरम् ॥ संभ्रमात्परिवृत्तोर्मीरुद्धमीनमहोरगः॥९॥ वैदेह्यांह्रियमाणायांवभूववरुणालयः॥ अंतरिक्षगतावाचःससृजुश्चारणास्तथा ॥ १०॥ एतदंतोदशग्रीवइतिसिद्धास्तदाब्रुवन् ॥ सतुसीतांविचेष्टतीमंकेनादायरावणः ॥ ११ ॥ प्रवि वेशपुरीलंकारूपिणींमृत्युमात्मनः॥ सोऽभिगम्यपुरीलंकांसुविभक्तमहापथाम् ॥ १२॥ संरूंढकक्ष्यांबहुलांस्वमंतःपुरमाविशत् ॥ तत्रतामसिता पांगींशोकमोहसमन्विताम् ॥ १३ ॥ निदधेरावणःसीतांमयोमायामिवासुरीम् ॥ अब्रवीचदशग्रीवःपिशाचीघोरदर्शनाः ॥ १४ ॥ होगया, और उसमेंके मीन और बडे २ सब सर्प व्याकुल होगये ॥ ९ ॥ इस प्रकार जानकीजीके हरण करनेके समय यह दशा वो नदीनाथकी हुई और अन्त रिक्षमें विचरण करने वाले चारणगण कहने लगे ॥१०॥ कि, अब रावण किसी प्रकार नहीं बच सकता, यहीतक इसके जीवनका शेप होगया । सिद्धगण भी ऐसाही कहने लगे। इस ओर रावण चेटारहित मूच्छित सीताजीको गोदीमें लिये ॥ ११ ॥ अपनी लंकापुरीमें आया, वह सीताजीको नहीं लाया बरन् कहींसे अपनी मृत्युको मोल ले आया। उम ममय लंकानगरीमें बडे २ चौराहे और मार्ग मुशोभित हो रहे थे । २॥ यहां पहुँचकर अपने परमसुन्दर रनयाममें रावणने (गोप गोमगे गण निन परमसुन्दशीको ले जाकर बैठा दिया ॥ १३ ॥ उग समय ऐसा योध ॥८ 47.
मीताजीको आने रनवाममें स्थापन करके घोर दर्शना पिशाचनियोंको आना देता हुआ ॥ १४ ॥ कि, तुम भली भांतिसे इनकी रक्षा करो। कोई त्री व पुरुष
हमारी विना आना इन सीताको नहीं देखने पाव. मुक्ता, मणि, सुवर्ण वन, भूपण ॥ १५॥ इत्यादि जिस २ वस्तुकी यह इच्छा कर वह समस्तही इनको दी जाय
यह मेरी आता है व जो कोई मी तुममेंसे इन जानकीको अप्रिय वचन ॥ १६ ॥ ज्ञानसे व भज्ञानसे कहेगी वह निज शरीरमें अपने प्राणों को न समझे इस तरह सब
रक्षा करनेगलियोंमे कह महा प्रतापवान रावण ॥ १७ ॥ रनवाससे बाहर आ विचार करने लगा कि, इस समय हमको क्या करना उचित है यह सोच उसने
घर पर देखा तो आगेही मांसके सानेवाले आठ राक्षस बैठेथे ॥ १८ ॥ उन राक्षसोंको देखकर ब्रह्माजीके वरदान मोहित हुआ रावण उन राक्षसों के बल
शीर्षकी नगंना करने लगा॥ १९ ॥ तुम लोग अनेक भाँतिके अब शय धारण करके शीव इस स्थानसे जहाँपर सर रहा करताथा उस जनशून्य जनस्थानको
यथानेनापुमान्धीवासीतापश्यत्यसंमतः ॥ मुक्तामणिसुवर्णानिवस्त्राण्याभरणानिच ॥ १५॥ यद्यदिच्छेत्तदेवास्यादेयंमच्छंदतोयथा ॥ याच
पक्ष्यतिदेहीवननंकिंचिदप्रियम् ॥१६॥ अज्ञानाद्यदिवाज्ञानानतस्याजीवितंप्रियम् । तथोक्त्वाराक्षसीस्तास्तुराक्षसेंद्र प्रतापवान् ॥ १७ ॥
निष्कम्यांतःपुगत्तस्माकिंकृत्यमितिचिंतयन् ॥ ददर्शाप्टोमहावीर्यात्राक्षसान्पिशिताशनान् ॥ १८॥ सतान्दृष्ट्वामहावीर्योवरदानेनमोहितः ॥
व्यानतानिदंयाक्यं प्रशस्यवलपीर्यतः ।। १९ ।। नानाप्रहरणाःक्षिप्रमितोगच्छतसत्वराः ॥ जनस्थानंहतस्थानभूतपूर्वखरालयम् ॥ २० ॥ तत्रा
स्यतांजनस्थानेशून्येनिहतराक्षसे ॥ पौरुषवलमाथित्यत्रासमुत्सृज्यदूरतः ॥२१॥ बहुसैन्यमहावीयजनस्थानेनिवेशितम् ॥ सदूपणखरंयुद्धेनिह
तंगमसायकैः ॥ २२ ॥ ततःक्रोधोममापूर्वधैिर्यस्योपरिवर्धते ॥ वेरंचसुमहनातंरामंप्रतिसुदारुणम् ॥ २३ ॥ निर्यातयितुमिच्छामितचवेरंमहारि
पीः॥ नहिलप्स्याम्यहंनिद्रामहत्वासंयुगेरिपुम् ॥२४॥ तंत्विदानीमहंहत्वाखरदूपणघातिनम् ॥ रामंशपिलप्स्यामिधनलब्ध्वेवनिर्धनः॥२६॥
जाओ ॥ २० ॥ और नुम लोग यहां बल और पौरुपका आश्रय लेकर किसीकाभी डर न करके जनशून्य जनस्थानमें जाय टिके रहो ॥ २१ ॥ वहांपर
गर और दूपणो मदिन हमारी जो महावीर्यवान बहुत सारी सेना रहतीथी, वह समस्त रामचंद्रके वाणसे खर दूपणसहित मारी गई ॥ २२ ॥ इस कारणसे हम
कोपा फोप हुआहै, और इसमेही हम पडे धीर्यवानका धीरजभी लोप होगया । इस समय रामचंद्रके प्रति हमारा महावैरभाव उपस्थित हुआहै ॥ २३ ॥ सो इस
समय परमगा गमके प्रति यह अपना शोध हम प्रगट करना चाहते हैं, जबतक हम युद्दमें उस महाशत्रुका वध नहीं करलेते, ववतक हमको सुखकी नींद
आरेगी ॥ २४ ॥ जिन प्रकार निर्धन पुरुष धन पार करके सुखी होताहै, वैसेही खर दूपणके मारनेवाले रामचंद्रजीका नारा करके हमभी सुखी होंगे ॥ २५ ॥
वा.रा.भा. आर ॥८५॥ तुम लोगजनस्थानमें रहकर राम किस समय क्या करते हैं, सदाही इस विषयकी यथा तथा खोज खबर लेते रहो ॥ २६ ॥ तुम सब लोग बड़ी सावधानीने वहांपर चले जाओ, और सदा उस रामचन्द्रको मार डालनेके लिये यत्न करते रहना ॥ २७ ॥ हमने पहले संग्राममें अनेकवार तुम लोगोंके बलको जान लियाहै, बस इसी कारण से हमने तुम लोगोंको जनस्थानमें बिठाया ॥ २८ ॥ वह आठ राक्षस इन अर्थ युक्त मीठे वचनोंको सुन और रावणको प्रणाम कर लंका छोड करके जनस्थानकी ओर गुप्तभावसे सबके सब चले ॥ २९ ॥ इस प्रकारसे रावण श्रीजानकीजीको परमहर्पित चिचसे ग्रहण करके और उनको अपने रनवासमें टिका, रामचन्दजीले महाशत्रुता करके मोहयुक्तहो परमानंदित हुआ ॥ ३० ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायां चतुप्पंचाराः सर्गः ॥५४॥ जनस्थानेवसद्भिस्तुभवद्भीराममाश्रिता ॥ प्रवृत्तिरुपनेतव्याकिंरोतीतितत्त्वतः॥ २६ ॥ अप्रमादाचगंतव्यंसर्वैरेवनिशाचरैः ॥ कर्तव्यश्चसदा यत्नोराघवस्यवधप्रति ॥ २७ ॥युष्माकंतुवलंज्ञातंबहुशोरणमूर्धनि॥ अतश्चास्मिञ्जनस्थानेमयायूयंनिवेशिताः ॥२८॥ ततःप्रियंवाक्यमुपेत्य राक्षसामहार्थमष्टावभिवावरावणम् ॥ विहायलंकांसहिताःप्रतस्थिरेयतोजनस्थानमलक्ष्यदर्शनाः ॥ २९ ॥ ततस्तुसीतामुपलभ्यरावणःसुसंग हृष्टपरिगृह्यमेथिलीम् ॥ प्रसज्यरामेणचवरमुत्तमंबभूवमोहान्मुदितःसरावणः ॥ ३० ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽर चतुप्पंचाशःसर्गः ॥५४॥ संदिश्यराक्षसान्धोरान्रावणोऽष्टौमहावलान् ॥ आत्मानंबुद्धिवेक्लव्यात्कृतकृत्यममन्यत ॥१॥ सचिंतयानोदे हींकामबाणेःप्रपीडितः ॥ प्रविवेशगृहरम्यंसीतांद्रष्टुमभित्वरन् ॥ २॥ सप्रविश्यतुतद्वेश्मरावणोराक्षसाधिपः ॥ अपश्यद्राक्षसीमध्येसीतांदुःख परायणाम् ॥ ३॥ अश्रुपूर्णमुखीदीनांशोकभारावपीडिताम् ॥ वायुवेगेरिवाक्रांतांमजंतींनावमर्णवे ॥ ४ ॥ मृगयूथपरिभ्रष्टांमृगीश्वभिरिवाय ताम् ॥ अधोगतमुखीसीतांतामभ्येत्यनिशाचरः॥५॥ रावणकी मतिमें भ्रम होगयाथा इसी कारणसे वह घोर महाबलवान् आठ राक्षसोंको जनस्थानमें भेजकर अपनेको कतरुत्य समझता हुआ कि, अय हमें कोई कार्य करनेको शेप नहीं रहा ॥ १ ॥ अनन्तर वह बराबर जानकीजीका स्मरण करतेहुए कामवाणसे पीडित होकर उन जानकीजीको देखने के लिये शीघ्रतासे अपने रमणीय गृहमें प्रवेश करता हुआ ॥२॥ राक्षसपति रावणने उस घरमें प्रवेश करके दुःखपरायण सीताजीको राक्षसियोंके बीचमें बैठी हुई देसा ॥ ३॥ सीताजीशोकके भारसे महापीडा पाय अतिशय दीनभावको प्राप्तहो नेत्रोंसे आंसू बहाती हुई बैठीथी, उस समय ऐसा बोध होताथा मानो नौका पायुके येगसे कांपकर जलमें डूबीहुई है ॥ ४ ॥ अथवा जैसे मृगी यूथमे विछुडकर कुनोंमे घिरीहो सीताजी शोकके पश पउनेमे विपश और धमाकुरो शिर एपापे तीधी ॥५॥ *#4AMAHARALAKART**** ॥८ रायण सन्मुख हाकर उन शाकस दानहुई सीताजीकी इच्छा न रहनेपरभी वलात्कारसे उनको उस देवगृह सहरा दिव्यभवनको दिखाने लगा ॥६॥ यह घर अनेकप्रकार अा अारी और धवरहरोंसे परिपूर्ण है, सहस्रों त्रियां इसमें हैं व अनेक प्रकारके पक्षी और विविध भाँतिके रत्नभी इस गृहमें हैं।॥७॥उसके सब थंभ हाथीदांत के बनेथे, सुवर्ण, स्फटिक, रजत, और वैदूर्य निर्मित परमचित्रित और देखनमें मनके हरण करने वालेथे ॥ ८ ॥ वहांपर समस्त वंदनवारे तपायेहुए सुवर्णकी बनी हुईथी, और वहांपर निरन्तर दिव्य दुन्दुभी आठ पहर बजती रहतीीं, रावण सीताजीके सहित इस गृहकी सुवर्णसे बनी हुई विचित्र सीढियोंपर.चढा ॥ १ ॥ यह घर हाथीदांत और चांदी निर्मित होनेके कारण अतिसुन्दर हजारों जालिये वहां लगी हुईथीं जिनको देखतेही मन हर जाय और भी बहुतसे घर वहां बनेथे जिनमें सुवर्णके तांतशोकवशांदीनामवशांराक्षसाधिपः ॥ सवलादर्शयामासगृहंदेवगृहोपमम् ॥ ६॥ हर्म्यप्रासादसंवाधंत्रीसहस्रनिपेवितम् ।। नानापक्षिगणेर्नुष्टं नानारत्नसमन्वितम् ॥ ७॥ दांतकैस्तापनीयैश्चस्फाटिकैराजतेस्तथा ॥ वज्रवैदूर्यचित्रेश्वस्तंभईटिमनोरमैः॥८॥ दिव्यदुंदुभिनिर्धापंततकांचन भूपणम् ।। सोपानकांचनंचित्रमारुरोहतयासह ॥ ९॥ दांतकाराजताश्चैवगवाक्षाःप्रियदर्शनाः ॥ हेमजालावृताश्चासंस्तत्रप्रासादपंक्तयः॥१०॥ सुधामणिविचित्राणिभूमिभागानिसर्वशः ॥ दशग्रीवःस्वभवनेप्रादर्शयतमैथिलीम्॥११॥दीविकाःपुष्करिण्यश्चनानापुप्पसमावृताः॥रावणोदर्श यामाससीतांशोकपरायणाम् ।। १२ ॥ दर्शयित्वातुवैदेहींकृत्स्नंतद्भवनोत्तमम् ॥ उवाचवाक्यंपापात्मासीतालोभितुमिच्छया ॥ १३ ॥ दशराक्ष सकोट्यश्वदाविंशतिरथापराः ॥ वर्जयित्वाजनान्वृद्धान्बालांश्चरजनीचरान् ॥ १४ ॥ तेषांप्रभुरहंसीतेसर्वेषांभीमकर्मणाम् ॥ सहस्रमेकमेकत्य ममकायपुरःसरम् ॥ १५ ॥ यदिदंराज्यतंत्रमेत्वयिसप्रतिष्टितम् ॥ जीवितंचविशालाक्षित्वंमेप्राणेर्गरीयसी ॥ १६ ॥ अँगले लगेथे ॥ १० ॥ सब भूमिभाग सुधाधवलित और मणिसमूह चित्रित रहनेके कारण विचित्र शोभा देरहाथा, इस प्रकारका भवन रावणने सीताजीको दिखाया ॥ ११ ।। उस मंदिरमें जगह २ बावली और छोटी २ तलैर्येभी बनीथीं, जिनमें अनेक प्रकारके पुष्प खिल रहेथे, दशग्रीव रावणने जानकीजीको यह सब कुछ दिखाया ॥ १२ ॥ इस प्रकारसे पापात्मा रावण जानकीजीको लुभानेकी इच्छासे अपना वह समस्त दिव्य गृह दिखलाफर कहने लगा ॥ १३ ॥ कि, जानकी ! यहां पनीस करोड राक्षस वालक और बूढोंको छोडकर हमारे अधीन हैं ॥ १४ ॥ उन सब भयंकर कर्म करने वाले राक्षसोंके हम स्वामी हैं । और हमारे इकटेही एक सहस्र दासहैं ॥ १५ ॥ अब हमारा यह समस्त राज्य तुम्हारेही वशमें है हे विशालाक्षि! हमारा जीवन भी तुम्हारे अधीन है; अधिक पा.रा.भा. आरं हम क्या कहैं तुम हमारे प्राणोंसेभी प्यारीहो ॥ १६ ॥ हे मैथिली ! हमारे रनवासमें जो सब उत्तम स्त्रियां है, सो तुम हमारी भार्या होकर उन सबके ऊपर पटरानी बनो ॥ १७ ॥ हे जानकी ! हमने जो कुछ कहा; वह तुम्हारे लिये विशेप हितकारीहै, तुम इस बातमें राजी होजाओ, दूसरी भांतिका अभिप्राय करके क्या करोगी, तुम्हारे कारण हम बहुतही संतापित हुएहैं सो तुम प्रसन्न होकर हमको भजो ॥ १८॥ चारों ओर सौयोजन समुद्रसे घिरी हुई शतयोजनके विस्तार वाली इस लंकापुरीको इन्द्रके सहित समस्त देव दानवभी किसी प्रकारका भय नहीं करासकें ॥ १९ ॥ क्या देवता, क्या गन्धर्व, क्या यक्ष, क्या ऋपि इन लोगों में किसीकोभी ऐसा नहीं देखते जो वीरतामें हमारी समानहो ॥ २० ॥ तो फिर भला, दीन तपस्वी राज्यघट, पादचारी, अल्पप्राण मनुष्य रामको लेकर तुम क्या करोगी? ॥ २१ ॥ इस कारणसे हे सीते ! हमही तुम्हारे योग्य पति हैं; तुम हमाराही भजन करो. हे भीरु ! यौवन सदा नहीं रहता इससे बहीनामुत्तमस्त्रीणांममयोऽसौपरिग्रहः ॥ तासांत्वमीश्वरीसीतेममभार्याभवप्रिये ॥१७॥साधुकिंतेऽन्यथावुद्ध्यारोचयस्ववचोमम ॥ भजस्वमा भितप्तस्यप्रसादकर्तुमर्हसि ॥ १८॥ परिक्षिप्तासमुद्रेणलंकेयंशतयोजना ॥ नेयंधर्पयितुंशक्यासेंद्रेरपिसुरासुरैः॥ १९॥ नदेवेपुनयक्षेपुनगंधर्व पुनर्पिपु॥अहंपश्यामिलोकेषुयोमेवीर्यसमोभवेत् ॥२०॥राज्यभ्रटेनदीनेनतापसेनपदातिना ॥ किंकरिप्यसिरामेणमानुपेणाल्पतेजसा ॥२१॥ भजस्वसीतेमामेवभहिंसदृशस्तव ॥ यौवनंत्वध्रुवंभीरुरमस्वेहमयासह॥२२॥दर्शनेमाकृथाबुद्धिराघवस्यवरानने॥कास्यशक्तिरिहागंतुमपिसीते मनोरथैः ॥२३॥ नशक्योवायुराकाशेपाशेर्वथुमहाजवः ॥ दीप्यमानस्यवाप्यग्नेग्रहीतुंविमलाःशिखाः॥२४ ॥ त्रयाणामपिलोकानांनतंपश्यामि शोभने॥ विक्रमेणनयेद्यस्त्वांमद्वाहुपरिपालिताम्॥२५॥लंकाया सुमहद्राज्यमिदंत्वमनुपालय ॥ त्वत्प्रेष्यामद्विधाश्चैवदेवाश्चापिचराचरम्॥२६॥ हमारे साथ इस लंका नगरीमें विहार करो ॥ २२ ॥ हे वरानने ! अब तुम रामचन्द्र के देखनेकी आशा छोडो ! उनमें क्या शक्ति है जो वह मनोरथसेभी यहां पर आसके ? ॥ २३ ॥ जिस प्रकार कोई महाप्रचंड पवन आकाशमें चलते हुये बांधाचाहै, परन्तु नहीं बांध सकता, या प्रदीप्त अग्निकी शिखाको कोई हाथसे पकडना चाहै तो नहीं पकड सकता, ऐसेही रामभी यहां नहीं आ सकता ॥ २४ ॥ हे शोभने ! समस्त भुवनोंमें हम ऐसा किसीको नहीं देखते कि, जो पराक्रम प्रकाश करके हमारी भुजाओंमे रक्षित तुमको लेजासके ।। २५ ॥ अतएव तुम इस विशाल लंकाके राज्यका पालन करो, हमारी समान सय पुरुप तुम्हारे अज्ञाकारी दास हो जायेंगे। और हमकोभी यदि मेवक ममझकर ग्रहण करो तो हमभी नुम्हारी आज्ञा के अधीन हो जाँपगे। मब देवतागण परन् स्थापर जंगमादि समस्त जगल तुम्हाराही दाम हो जायगा ॥ २६ ॥ अर तुम अभिपेकके जलसे धौतदेहा होकर सन्तुष्ट चित्तसे हमको तृतकरो पहले जन्मक तुम्हार जा कुछ पापथ वह सब वनवास कर निमे अपको बात होगरे ॥ २७ ॥ अव नुम लंकामें रहकर अपने पहले कियेहुए पुण्यों के फलको प्राप्तहो । हे मैथिलि ! यहांपर जो दिव्य मालायें दिव्य गन्ध ॥२८॥ और दिमाग राग हैं नुम उन नवको हमारे माय भोगकरो। हे समध्यमे ! भाई कुवेरका पुष्पक नाम ॥ २९ ॥ विमान सूर्यके समान प्रकाशमान हमारे यहां है। कुरेरके माथ मंग्राम करके उमको हम जीत लाये हैं, यह अतिविशाल रमणीयहै उसका वेग मनके वेगकी समानहै.॥ ३० ॥ सो हे सीते! उस विमानपर चढकर तुम हमारे माप विहार मुममदित करो। हे वरानने ! पमकी समान परम सुन्दर और सुविमल कान्ति सम्पन्न तुम्हारा मुख ॥ ३१ ॥ शोकके मारे मलीन होनेसे अभिपेजलनिन्नातुष्टावरमयस्वच ॥ दुष्कृतंयत्पुराकर्मवनवासेनतद्तम् ॥ २७ ॥ यच्चतेसुकृतंकर्मतस्येहफलमामुहि ॥ इहसर्वाणिमाल्या निदिव्यगंधानिमैथिली ॥ २८॥ भूपणानिचमुख्यानितानिसेवमयासह ॥ पुप्पकनामसुश्रोणिभ्रातुर्वैश्रवणस्यमे ॥ २९ ॥ विमानसूर्यसंका गंतग्मानिनितंरणे ॥ विशालंरमणीयंचतद्विमानंमनोजवम् ॥३०॥ तत्रसीतेमयासाविहरस्वयथासुखम् ॥ वदनंपद्मसंकाशं विमलंचारुदर्शन म् ॥ ३१ ॥ शोकातनुवरारोहेनभाजतिवरानने ॥ एवंवदतितस्मिन्सावस्त्रांतेनवरांगना ॥३२॥ पिघायदुनिभंसीतामंदमथूण्यवर्तयत् ॥ ध्याय नीनामियास्वस्थामीनांचिताहतप्रभाम् ॥३३॥उवाचवचनंधीरोगवणोरजनीचरः ॥ अलंबीडेनवेदेहिधर्मलोपकृतेनते ॥ ३४ ॥ आपोऽयंदेवि निप्पंदोयस्त्वामभिभविष्यति । एतीपादोमयाग्निग्धोशिगेभिःपरिपीडिती ॥३५॥ प्रसादंकुरुमेक्षिप्रवश्योदासोऽहमस्मिते ॥ इमाःशून्यमया पानःगुप्यमाणेनभापिताः ॥३६॥ अर गीमित नहीं होना, इम कारण नुम गोक न करो. जर रावणने इस प्रकारमे कहा तब पतिव्रताशिरोमणि सीताजी वनकी आइमें ॥ ३२॥ अपना चन्द्र गमान पदनमैटल दार गेने लगी. चिन्नामे उनका देह पीला पड़गया, यह बहुत ही अस्वस्थकी समान ध्यानमें मग्न होगई ॥ ३३ ॥ इसको देखकर वीर्यवान निशा पर गया उनमे पोटा कि, है वैदेही ! धर्मटोप होजानेको शंकामे ललित मतहोवो ॥ ३४ ॥ देखो तुम्हारे प्रति हम ऋपिग!केही उपदेश कियेहुए विधिक्रमसे प्रणय पन्धन पानेको नमार हुए हैं पिरोने राक्षमविवाह बलात्कार यहणमे लिसाहै यह लो हम अपने दशों शिरोंसे तुम्हारे मनोहर चरणोंको दबाते हैं ॥ ३५ ॥ हमारे पनि धमना प्रगट करने और विलंय मतकरो, हम तुम्हारे वरावर्वी दास हो जायेंगे, हमने कामके वराहोकर यह जो वार्ता कही देखो इसका कोई अंश निरर्थक .. . आर० ॥८७ ॥ नहीं जाय ॥ ३६ ॥ रावणने कभी इसप्रकारसे किसी स्त्रीके चरणों में प्रणाम नहीं कियाथा न शिरधराथा। दशानन मृत्यु के पशहोकर जनकनंदिनी मैथिलीजीसे इस प्रकार कहकर मनमें समझा कि, यह हमारीही होगई ॥ ३७ ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आर० भापाटीकायां पंचपंचाशः सर्गः ॥ ५५ ॥ शोकसे तपीहुई जानकीजी यह वचन सुन कुछ भय न करके मनहीमन रावणको तृणसमान समझती हुई उत्तर देती हुई कि ॥ १ ॥ राजा दशरथ साक्षात् धर्मके पर्वत सदृश अभेयसेतु और सत्य प्रतिज्ञासे सर्व संसारमें विख्यात थे, श्रीरामचन्द्रजी उनकेही पुत्र हैं ॥ २॥ यह भी धर्मात्माके नामसे तीनों भुवनमें विख्यात हैं, वहीं दीर्थयाहु विशाललोचन श्रीरामचन्द्रजी हमारे स्वामी और साक्षात् देवता हैं ॥ ३ ॥ उनके कंधे सिंहके समान हैं, वह महायुतिमान् और इक्ष्वाकुवंशमें उत्पन्न नचापिरावणःकांचिन्मू स्त्रीप्रणमेतह ॥ एवमुक्कादशग्रीवोमेथिलींजनकात्मजाम् ॥ कृतांतवशमापनोममेयमितिमन्यते ॥ ३७॥ इत्या श्रीमद्रा० वा० अर० पंचपंचाशः सर्ग ॥ ५५॥ सातथोक्तातुवैदेहीनिर्भयाशोककर्शिता ॥ तृणमंतरतःकृत्वारावणंप्रत्यभापत ॥ १॥ राजा दशरथोनामधर्मसेतुरिवाचलः ॥ सत्यसंधःपरिज्ञातोयस्यपुत्रःसराघवः॥२॥ रामोनामसधर्मात्मात्रिपुलोकेषुविश्रुतः॥ दीर्घबाहुर्विशालाक्षो देवतंसपतिर्मम ॥३॥ इक्ष्वाकूणांकुलेजातःसिंहस्कंधोमहाद्युतिः॥ लक्ष्मणेनसहभ्राबायस्तेप्राणान्वधिष्यति ॥ ४॥ प्रत्यक्षयद्यहंतस्यत्वया वैधर्पितावलात् ॥शयितात्वंहतःसंख्येजनस्थानेयथाखरः ॥५॥ यएतेराक्षसाःप्रोक्ताघोररूपामहाबलाः॥राघवेनिर्विपाःसर्वेसुपर्णेपनगाय था॥६॥ तस्यज्याविप्रमुक्तास्तेशराःकांचनभूपणाः ॥ शरीरंविधमिप्यंतिगंगाकूलमिवोर्मयः ॥७॥ असुरैर्वासुरेत्विंयद्यवध्योसिरावण ॥ उत्पायसुमहद्वेरंजीवस्तस्यनमोक्ष्यसे ॥ ८॥ सतेजीवतशेपस्यराघवोंतकरोतवली ॥ पशोएंपगतस्येवजीवितंतवदुर्लभम् ॥ ९॥ दुपे हैं वे भावा लक्ष्मणके सहित हो अवश्यही तेरे प्राणोंका वध करने यहां आयेंगे ॥ ४ ॥ यदि हम उनके सन्मुख बलपूर्वक इस प्रकारसे सेंची जाती तब तो युद्धमें सरकी समान निहत होकर तुमकोभी रणभूभिसे शयन करना पडता ॥५॥ तुमने जिन सब घोरतर महाबलवान् राक्षसोंकी वार्ता कही सो गरुडके निकट सर्पसमूह की समान रामचन्द्रजीके निकट यह सब राक्षस हीनवल विहीनतेज हो जायँगे ॥६॥तरंग जिस प्रकार गंगाजीके किनारेको तोडती है पैसेही श्रीरामचन्द्रजी अपने धनुपमे छूटेहुए उन स्वर्णभूपित वाणों के समूहसे राक्षमोंके शरीरका भेदन करेंगे॥ ७ ॥ हे रावण ! यद्यपि तू देव दानयोंसे अवध्य है, परन्तु रामचन्द्र के साथ यह पर भारी पैर करके किमी प्रकार ने प्राणन बगे॥८॥ यहपटपान श्रीरामचंरजीही तुम्हारे पदा जीवनका समर मग फर मंगे। दगी यसरमागे 牧草要教名统实然教数学教学先实党线 हुए पगुशी ममान अब तुम्हाग जीना दुर्लभ है ॥ ९ ॥ यदि श्रीरामचन्द्रजी क्रोध भरे नेत्रोंसे एक वारही तुझको देखें तो हे राक्षस ! तू तत्क्षणही, भस्म हो जायगा जिस प्रकार महादेवजीकी नेत्रामिसे कामदेव भस्म हो गया था ।। १० । जो चन्द्रमाकोभी आकारासे पृथ्वीपर गिरा सकते या नाश करसकतेहैं वह सीताको भी भागही यहां आकर इम स्थानमे छुडावेंगे ॥ ११ ॥ तेरी उमर पीतचुकी, श्री जाती रही, वीर्य समान होगया, इन्द्रियांभी अपने २ कार्यसे शिथिल होगई, इसमे सिटित होनाई कि, तुम्हारे लिये लंका नगरी निश्पही विधवा हो जायगी ॥ १२ ॥ तुमने जो पापकार्यकिया है इसका परिणाम कभी सुखकर नहीं होगा, स्योंकि भूने बिना किनारे भाव विना बलात्कारकर पतिकी मेवासे हमको अलग किया है ॥ १३ ॥ हमारे वह महायुतिमान स्वामी अपने माता लक्ष्मणके महिल काल आने वीर्यका आश्रय लेकर निडरहो निर्जन वनमें वास करते हैं ॥ १४ ॥ वह संग्रामस्थलमै वार्णोकी वर्षा करके तेरी देहसे बल, वीर्य, घमंड, व यदिपश्यनगमस्त्वांसपदीननापा ।। रक्षस्त्यमद्यनिर्दग्धोयथारुद्रेणमन्मथः ।। १० ॥ यश्चंद्रनभसोभूमीपातयेन्नाशयेतवा ।। सागरंशोपयेद्रा पिसमीतांमारयेदिह ॥ ११ ॥ गतासुस्वंगतश्रीकोगतसत्त्वोगतंद्रियः ॥ लंकावधव्यसंयुक्तात्वत्कृतेनभविष्यति ॥ १२॥ नतेपापमिदंकर्म मुमोदभविष्यति ॥ यानीतापिनाभायपतिपार्धात्त्ययावलात् ॥ १३॥ सहिदेवरसंयुक्तोममभर्तामहाद्युतिः।। निर्भयोवीर्यमाश्रित्यशून्ये पगनिदंडके ॥ ११॥ संतेवीर्यवलंदर्षमुत्सेकंचयथाविधम् ॥ व्यपनेप्यतिगात्रेभ्यःशवणसंयुगे ॥ १५ ॥ यदाविनाशोभूतानांदृश्यतेकाल गोदितः ।। तदाकार्यप्रमाद्यतिनगःकालयशंगताः ॥ १६॥ मांप्रधृष्यसतेकालःप्राप्तोऽयंराक्षसाधम ॥ आत्मनोराक्षसानांचवधायांतःपुरस्य ॥19॥ नशस्यायनमध्यस्थावेदिसम्भांडमंडिता।। द्विजातिमंत्रसंपूताचंडालेनावमर्दितुम् ॥ १८॥ तथाईधर्मनित्यस्यधर्मपत्नीदृढव्रता ॥ वयास्प्रष्टुंनशक्यारंगधमाधमपापिना ॥ १९ ॥ क्रीडतिगजहंमेनपद्मखंडेपुनित्यशः ।। हंसीसातृणमध्यस्थंकथंद्रक्ष्येतमद्दकम् ॥ २०॥ पर आकार अलग कर देंगे ॥ १५॥ कालके वग होकर जब कि प्राणियोंका नाश निकट आजाताहै, तब वह काठके बरा होकर कार्य अकार्यका विचार करनेमें मान: हो जाने में ॥ १६ ॥ रे राक्षमाधम ! जर कि, तने हमारा अपमान किया है, तब स्वयं तेरा, समस्त राक्षसोंका और सर्व रनवासोंके नाश होने का काल आ पहुँना है ॥ १७ ॥ जिम प्रकार ब्राह्मणों करके मंत्रमे पढ़ी हुई यज्ञकी सामग्रीसे विभूपित यत्रवेदी चंडालके छूने योग्य नहीं होती वैसेही हम भी गरे गर्ग करने योग्य नहीं ॥ १८ ॥रे राक्षमाधम !रे पापात्मा ! हम नित्य धर्मपरायण श्रीरामचन्द्रजीकी धर्मपत्नी हैं, मन वचन कायसे स्वामी हीके प्रति सपनाम कारण हम किमी प्रकारमे भी नेरे छुनेके गोग्य नहीं है ॥ १९॥ जो हंसिनी कमलपुप्पोंके मध्यमें राजहंसके साथ नित्य क्रीडा करती हैं यह किस ..पा.रा.भा. आर० ॥८८॥ प्रकारने तृणों के बीच बैठेहुए मुद्र (जलकाकविशेप) के प्रति दृष्टि डालेंगी ॥ २० ॥ रै राक्षस ! यह देह स्वभावसेही संज्ञाहीन है इसको बांध, या इसपर आघान दे, जो तेरी इच्छा हो सो कर हम किसी प्रकारसे इस शरीरकी रक्षा नहीं करेंगी हमें प्राणोंसे कुछ प्रयोजन नहीं है ॥ २१ ॥ और अधिक तू जो हमारे शरीरको स्पर्श करतो हम अपने जीतेजी यह कलंक पृथ्वीपर विस्तार नहीं कर सकेंगी ! वैदेहीजी इस प्रकारसे कठोर वचन कह ॥ २२ ॥ फिर रावगो और कुछ न बोली. तब रावण सीताजीके कठोर और रोमहर्पण वचन सुनकर ॥ २३ ॥ सीताजीको डर पानेके लिये कहने लगा कि, हे मैथिली ! मेरे वचन सुनो में बारह महीनेतक कुछ न कहूंगा ॥ २४ ॥ हे चारुहासिनी ! इस समयके मध्यमें यदि तुम हमको न प्राप्त होगी तो रसोई करनेवाले हमारे प्रातः कलेवेके लिये तुमको इदंशरीरंनिःसंज्ञवंधवाघातयस्ववा ॥ नेदंशरीरंरक्ष्यमैजीवितंवापिराक्षस ॥ २१॥ नतुशक्यमपक्रोशंपृथिव्यांदातुमात्मनः ॥ एवमुक्कातुवेदेही क्रोधात्सुपरुपंवचः ॥ २२ ॥ रावणंजानकीतत्रपुनोंवाचकिंचन ॥ सीतायावचनं श्रुत्वापरुपंरोमहर्पणम् ।। २३ ।। प्रत्युवाचततःसीताभवसं दर्शनंवचः ॥ शृणुमैथिलिमद्वाक्यमासान्द्वादशभामिनि ॥ २४ ॥ कालेनानेननाभ्येपियदिमांचारुहासिनि ॥ ततस्त्वांप्रातराशार्थसूदाश्छेत्त्वं तिलेशशः ॥ २५ ॥ इत्युक्त्वापरुपंवाक्यंरावण-शत्रुरावणः ॥ राक्षसीश्चततःक्रुद्धइवचनमब्रवीत् ॥२६॥ शीघ्रमेवहिराक्षस्योविरूपाचोरदर्श नाः॥ दर्पमस्यापनेष्यंतुमांसशोणितभोजनाः ॥ २७॥ वचनादेवतास्तस्यसुघोराघोरदर्शनाः॥ कृतप्रांजलयोभूत्वामेथिलीपर्यवारयन्।। २८॥ सताःप्रोवाचराजासौरावणोधोरदर्शनाः ॥ प्रचल्यचरणोत्कपैरियन्निवमेदिनीम् ॥ २९॥ अशोकवनिकामध्येमैथिलीनीयतामिति ॥ तत्रेयर क्ष्यतांगूढंयुप्माभि-परिवारिता ॥ ३० ॥ तनांतर्जनैवोरःपुनःसांत्वेश्वमेथिलीम् ॥ आनयध्वंवशंसर्वावन्यांगजवधूमिव ॥ ३१ ॥ टुकडे २ कर काट डालेंगे ॥ २५ ॥ शत्रुओंको रुवानेवाला रावण इस प्रकारसे कठोर वचन कहकर फिर कोधितहो राक्षसियोंको आज्ञा देता हुआ ॥ २६ ॥ हे विकटरूप, घोरदर्शन, रक्तमांसभोजी राक्षसीगण ! तुम सब शीघही जानकीका समस्त गर्व तोड टालो ॥ २७ ॥ वह घोरदर्शन निशाचरीगण यह सुन तत्क्ष णही हाथ जोड जो आज्ञा कहकर रावणके कहनेके अनुसार सीताजीको घेर लेती हुई ॥ २८ ॥ यह देखकर रावण मानों पृथ्वीको कंपित और विदीर्ण करता हुआ कई एक पग चलकर, उन घोर दर्शनवाली राक्षसियोंको विशेष रूपसे फिर आज्ञा करता हुआ ॥ २९ ॥ तुम जानकीको अशोक वनमें लेकर चली जाओ और सम मिलकर मदादनको धेरे रहकर गृहभायमे इनकी रक्षा कंगे॥३०॥धनकी हथिनीको जिमप्रकार पशमें किया जाना, तुम गयभी उमीवरहरो घोर नर्जन करके अधषा समक्षा समारनको हमारे वगर्भ ठाओ ॥ ३१॥ जब राक्षमेव रावणने इस भांति आज्ञा की, तब राक्षसिये सीवाजीको घेरकर अशोकवनमें ले गईं ॥ ३२॥ अनेक जातिक मनोछिन पुप फल सम्पन्न वृक्षसमूह और सत्र काल मतवाटेही विविध भांतिके विहंगम इस अशोक वनकी शोभाको बढातेथे ॥ ३३॥ शोकके वसमें पडीहुई जन कदुलारी मथिटीजी अगोक बनके मध्य राक्षसियोंके परामें पड़कर रहीं, जिस प्रकार व्याधियोंमें हरिणी रहती है ॥ ३४ ॥ अशोक वनमें फांसीसे बँधी डरपोक मृगीके समान अतिगर गोकमें मीनाजी रहीं, वह वहांपर किसी भांतिका सुस न पातकर सकी ।। ३५ ॥ विरूप नेत्रवाली राक्षसियों करके घुडकी डरपाई व धमकाई जाकर परमनिय स्वामी और देवरको सदा स्मरण करके और शोकसे सतानेके कारण चेतनारहित होकर जानकीजीने वहां किसी प्रकार शान्ति नहीं पाई ॥ ३६ ॥ इतिप्रतिसमादिष्टाराक्षस्योरायणेनताः॥अशोकवनिकांजग्मुमैथिलीपरिगृह्यतु ॥ ३२॥ सर्वकामफलेवृक्षेनीनापुप्पफलैर्युताम् ॥ सर्वकालमदेश्चा पिदिनसमुपसेविताम् ॥३३॥ सातुशोकपरीतांगीमेथिलीजनकात्मजा ॥राक्षसीवशमापन्नाच्यात्रीणहिरिणीयथा॥३४॥शोकेनमहताबस्तामे थिलीजनकात्मजा ।। नशमलभतेभीरुम्पाशवदामृगीयथा ॥ ३५॥ नविंदतेतरतुशर्ममेथिलीविरूपनेत्राभिरतीवतजिता ॥ पर्तिस्मरंतीदयितंच देवगीतनाभृद्भयशोकपीडिता ॥ ३६॥ इत्या श्रीम० वा. आ० अरण्यकांडे पदपंचाशः सर्गः।।५६॥ प्रवेशितायांसीतायांलंकांप्रतिपिता महः । तदात्रोपगारदपरितुष्टंशतक्रतुम् ।। १ ॥ लोक्यस्यहितार्थायरक्षसामहितायच ॥ लंकांप्रवेशितासीतारावणेनदुरात्मना ॥ २॥ पति यतामहाभागानित्यं वैवसुखैथिता ॥ अपश्यंतीचभर्तारंपश्यंतीराक्षसीजनम् ॥ ३ ॥ राक्षसीभि-परिवृताभर्तृदर्शनलालसा ॥ निविष्टाहिपुरीलं कातीग्नदनदीपतेः ॥ १॥ कथंज्ञास्यतितांसमस्तवस्थांतामनिंदिताम् ॥ दुखसंचिंतयंतीसाबहुशःपरिदुर्लभा ॥ ५ ॥ प्राणयात्रामकुर्वाणापा गाँस्यक्ष्यत्यमंशयम् ।। सभूयःसंशयोजातःसीतायाःयाणसंक्षये ॥ ६॥ लान भीमा पाल्मी० आदि० आरण्यकाण्डे भापाटीकायां पसंचाशः सर्गः ॥५६॥जिस समय जानकीजीको लंकामें रावण लेगा उस समय ब्रह्माजीने देवताओंके गजा इन्दगे हम प्रकारके चरन कहे ॥ १ ॥ त्रिलोकीके हित करनेके निमिन औरराभोंके नाशके निमित्त दुरात्मा रावण जानकीजीको लंकामें ले गयाहै ।। २॥ anो महाभाग्यमानी पतियतधर्मयुन जो सदा सुराहीमे इतनी बड़ी हुई हैं अपने स्वामीको न देखकर और राक्षसोंको देखकर ॥ ३ ॥ राक्षसियोंसे पिरी हुई पति मन पगली जानकी गयो पीचमें जो लंकापुरी है उसमें स्थित है ॥ ४ ॥ रामचन्द्रजी किस प्रकार जानेंगे कि, वहां निन्दारहित जानकीजी हैं घडे कष्ट और गमे गपसन्दको स्मरण करती हुई जानकी ॥ ५॥ भोजनादिके न करनेसे निभय प्राणोंको त्यागन करदेंगो, सो जानकीजीके प्राणरक्षा करनेमें हमको बडा **********KAR पा.रा.भा. आर प्र०न सन्देहहै ॥ ६ ॥ सो तुम शीघ्र यहांसे जाकर सुन्दर मुखवाली जानकीका दर्शन कर लंकापुरीमें प्रवेशकर यह हरि ले जाकर जानकीजीको देदो ॥ ७ ॥ जब यह वचन ब्रह्माजीने कहा तब रावणकी लंकापुरीमें इन्द्रजी आये और निद्राको अपने साथ लेते आये ॥ ८ ॥ तब इन्द्रने निद्रादेवीसे कहा कि, तू जाकर राक्षसोको मोहित कर. निदादेवी इन्द्रके यह वचन सुनकर परम प्रसन्न हुई ॥९॥ देववाओंके कार्य सिद्धि के निमित्त राक्षसोंको मोहित करती हुई. इसी अवसरमें इन्द्राणीके पति इन्द्रजी ॥ १० ॥ उस स्थानमें प्राप्तहो वनमें स्थित हुई जानकीसे बोले कि हे भद्रे ! मैं देवताओंका राजा इन्द्रहूं, हे सुन्दर हास्ययुक्त जानकी! ॥ १३॥ तुम्हारे और रामचंद्रके कार्य सिद्ध करने के निमित्त सहाय करनेको आयाहूं, हे जनककुमारी ! तुम शोच मत करो ॥ १२ ॥ मेरी कपासे सेनासहित रामचन्द्रजी सागर सत्वंशीघ्रमितोगत्वासीतांपश्यशुभाननाम् ॥ प्रविश्यनगरीलंकांप्रयच्छहविरुत्तमम् ॥ ७॥ एवमुक्तोथदेवेंद्रःपुरीरावणपालिताम् ॥ आगच्छ निव्यासाईभगवान्पाकशासनः॥ ८॥ निद्रांचोवाचगच्छत्वंराक्षसान्संप्रमोहय॥ सातथोक्तामघवतादेवीपरमहर्पिता ॥९॥ देवकार्यार्थसिद्ध्यर्थ प्रामोहयतराक्षसान् ॥ एतस्मिन्नंतरेदेवःसहस्राक्षःशचीपतिः ॥ १० ॥ आससादवनस्थांतांवचनंचेदमत्रवीत् ॥ देवराजोस्मिभदंतेइहचास्मिशुचि स्मिते ॥ १२ ॥ अहंत्वांकार्यसिद्ध्यर्थराघवस्यमहात्मनः ॥ साहाय्यंकल्पयिष्यामिमाशुचोजनकात्मजे ॥ १२॥ मत्प्रसादात्समुद्रसतरिप्य तिवले सह ।। मयैवेहचराक्षस्योमाययामोहिताःशुभे ॥ १३॥ तस्मादन्नमिदंसीतेहविष्यानमहस्वयम् ॥ सत्वांसंगृह्यवेदेहिआगतःसहनिया ॥ ॥ १४ ॥ एतदत्स्यसिमद्धस्तानत्वांवाधिप्यतेशुभे ॥ क्षुधातृपाचरंभोरुवाणामयुतैरपि ।। १५ । एवमुक्तातुदेवेंद्रमुवाचपरिशंकिता ॥ कथं जानामिदेवेंद्रत्वामिहस्थंशचीपतिम् ॥ १६॥ देवलिंगानिदृष्टानिरामलक्ष्मणसनिधी ॥ तानिदर्शयदेवेंद्रयदित्वंदेवराटस्वयम् ॥ १७ ॥ सीता यावचनं श्रुत्वातथाचक्रेशचीपतिः ।। पृथिवींनास्पृशत्पद्यामनिमेपेक्षणानिच ॥ १८॥ तर जायँगे. हे कल्याणी ! मेरीही मायाने इन राक्षसियोंको मोहित कियाहै ॥१३॥ इसी कारण हे जानकी ! मैं यह हवि अन्न तुम्हें देनेको निद्राके साथ आयाहूं सो हे जानकी ! तुम इसे लो ॥ १४ ॥ हे जानकी ! मेरे हायसे ये हवि भक्षण करनेसे तुमको क्षुधा और तृपा दशहजार वर्पतक भी न म्यापैगी ॥ १५॥ जब इन्द्रने ऐसा कहा तो डरतीहुई जानकी बोली कि, मैं यह कैसे जानें कि तुम राचीके पति इन्द्रहो ॥ १६ ॥ जो चिह्न राम लक्ष्मणके साथ मैंने आरके देरोथे । यदि तुम देवताओंके राजा इन्द्र हो तो उन चिद्रोंको दिखाओ ॥ १७॥ इन्द्रजीजानकीजीके पचन गुन पैरोंगे पृथ्वी न स्पर्श करते हुए और नेत्रोयो पलक ******* ॥८ M गगन.invr. Mrat-7 amमरा"---- लगना बंद होगया. देवताओंकी यही पहचान है कि पैरोंसे पृथ्वी नहीं स्पर्श करते उनके नेत्रोंके पलक नहीं लगते ॥ १८॥ भूलि रहित यस धारण कियदुप! जो फूल मलीन न हों ऐसे फूलोंकी माला धारण किये इन लक्षणोंसे जानकीजी इन्द्रको पहँचान परम हर्पित हुई ॥ १९॥ और फिर रोतीहुई बोली, हे भगवन ! भाग्यसे महाबाहु रामचन्द्रका नाम उनके भाई सहित आज मैंने सुना ॥ २० ॥ जैसे मेरे श्रशुर दशरथजी, पिता · जनकजी हैं तैसेही आज मैं तुम्हें देवनीहूं तुमसे मेरे पति सनाथ हुए ॥ २३ ॥ हे देवेन्द्र ! तुम्हारी आज्ञासे यह दूधकी बनी खीर खुकुलके वढानेहारी तुम्हारे हाथकी दी हुई मैं साऊँगी ॥ २२ ॥ सुहासिनी जानकीजीने यह हवि इन्द्र के हाथमे लेकर प्रथम अपने स्वामी रामचन्द्र और देवर लक्ष्मणजीको निवेदित की ॥ २३ ॥ और कहा कि, यदि मेरे महायली अरजोवरधारीचनम्लानकुसुमस्तथा ॥ तंज्ञात्वालक्षणेःसीतावासवंपरिदर्पिता ॥ १९ ॥ उवाचवाक्यंरुदतीभगवद्राघवंप्रति ॥ सहभ्रातामहा याहुर्दिष्ट्यामेश्रुतिमागतः ॥२०॥ यथामेश्वशुरोराजायथाचमिथिलाधिपः ॥ तथात्वामयपश्यामिसनाथोमेपतिस्त्वया ॥२३॥ तवाज्ञ याचदेवेंद्रपयोभूतमिदंहविः ॥ अशिष्यामित्वयादत्तरघूणांकुलवर्धनम् ॥२२॥ इंद्रहस्ताद्गृहीत्वातत्पायसंसाशुचिस्मिता ॥ न्यवेदयतभसाल क्ष्मणायचमैथिली ।। २३ ।। यदिजीवतिमेभर्तासहभ्रातामहाबलः ॥ इदमस्तुतयोभत्त्यातदानात्पायसंस्वयम् ॥ २४ ॥ इतीवतत्याश्यहविर्व राननाजहोक्षुधादुःखसमुद्भवंचतम् ॥ इंद्रात्प्रवृत्तिमुपलभ्यजानकीकाकुत्स्थयो-प्रीतमनावभूव ॥२५॥ सत्रापिशास्त्रिदिवालयंतदामीतोय यौराघवकार्यसिद्धये ॥ आमंत्र्यसीतांसततोमहात्माजगामनिद्रासहितःस्वमालयम् ॥ २६॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये ऽरण्यकांडे प्रक्षिप्तःसर्गः ॥ ॥राक्षसंमृगरूपेणचरंतंकामरूपिणम् ॥ निहत्यरामोमारीचंतूर्णपथिन्यवर्तत ॥१॥ तस्यसंवरमाणस्यद्रष्टुंरामस्य मैथिलीम् ॥ क्रूरस्वनोथगोमायुर्विननादास्यपृष्टतः॥२॥ भर्ना लक्ष्मणभाई सहित जीवितहैं तो यह जो मैं प्रेमसे देतीहूं वह यह पायस ग्रहण करें ॥ २४ ॥ वह सुमुखी इस प्रकार खीरको निवेदन कर पीछे आप भक्षण करती हुई. जिसके खातेही भूख प्यासका दुःख जाता रहा, इन्द्रसे यह कथा सुनकर कि, रामचन्द्र शीम आगे, रामचन्द्रमें मन लगाती हुई ॥२५॥ वह इन्द्रभी उस समय रामचन्द्रकी कार्य सिद्धिके निमित्त प्रसन्न होकर स्वर्गको गये, और वह महात्मा चलते समय जानकीजीको समझाकर निद्रा सहित स्वर्गको पधारे । यह सर्ग क्षेपकह॥२६॥इत्याचे श्रीमदावा आदि आरण्यकाण्डे भापाटीकायां क्षेपकः सर्गः ॥ ॥ उस ओर श्रीरामचन्द्रजी मृगरूपसे विचरण करने वाले कामरूपी निशाचर मारीचका संहार करके शीग्रहीआश्रमके मार्गको लौटे ॥ १ ॥ और श्रीजानकीजीको देखने के लिये अतिवेगमे चले। इसी समयमें एक सियार उनकी पीठके पीछे ************************** महारुतोर गाद करनेलगा ॥२॥ श्रीरामचन्दजी सियारके इस रोमाञ्चकर दारुण बोलको सुन अति भयभीतहो मनहीमनमें शंका करने लगे ॥ ३ ॥ जिस प्रका आ एका गाद यह मियार कर रहाहै, इससे तो ऐसा जान पडता है कि, कोई अशुभ होगा । इस समय राक्षसोंने जानकीजीको भक्षण न कर लियाहो, और सीताजी कुगलमही तभी मंगलहै ॥ ४॥ मृगरूपी मारीचने जान बूझकर हमारे बोलके समान जो चिल्लाहटकीहै, यदि लक्ष्मणने उस बोलको सुना हो ॥ ५॥ वस लक्ष्मणजी उम स्वरके सुनतेही तुरव सीताजी करके भेजे जाकर सीताको छोडकर वह शीघही हमारे निकट आगे ॥ ६ ॥ निश्चयही राक्षसोंने मिलकर जान की पर करनेकी अभिलापा की है और इसी कारणसे राक्षस मारीचने सुवर्ण मृगरूप धारण करके हमको आश्रमसे बहुत दूर किया ॥ ७ ॥ और हमको दूर मतस्यस्वरमानायदारुणंरोमहर्पणम् ॥ शंकयामासगोमायोःस्वरेणपरिशंकितः ॥३॥ अशुभंवतमन्येहंगोमायुर्वाशतेयथा॥ स्वस्तिस्यादपिवे देगाराक्षसभक्षणंविना ॥ १॥ मारीचेनतुविज्ञायस्वरमालक्ष्यमामकम् ॥ विकुष्टंमृगरूपेणलक्ष्मणःशृणुयाद्यदि ॥५॥ ससौमित्रि-स्वरंश्रुत्वाता नहित्याथमैथिलीम् ॥ तयैवप्रहितःक्षिप्रमत्सकाशमिहेप्यति ॥६॥ राक्षसैःसहितेनंसीतायाईप्सितोवधः ॥ कांचनश्चमृगोभूत्वाव्यपनीयाश्र मात्तुमाम् ॥७॥ दूरंनीत्वाथमारीचोराक्षसोभूच्छराहतः ॥ हालक्ष्मणहतोस्मीतियद्वाक्यव्याजहारह ॥ ८॥ अपिस्वस्तिभवेदाभ्यारहिताभ्यां मयावने ॥ जनस्थाननिमित्तंहिकृतवेरोस्मिराक्षसः ॥ ९॥ निमित्तानिचघोराणिदृश्यतेऽद्यबहूनिच ॥ इत्येवंचिंतयत्रामाश्रुत्वागोमायुनिःस्वन म् ॥ १०॥ निवर्तमानस्त्वरितोजगामाश्रममात्मवान् ॥ आत्मनश्चापनयनंमृगरूपेणरक्षसा ॥ ११॥ आजगामजनस्थानंराघवःपरिशंकितः॥ तंदीनमानसंदीनमासेदुर्मुगपक्षिणः ॥ १२॥ सव्यंकृत्वामहात्मानंघोरांश्चसमृनुःस्वरान् ॥ तानिदृष्ट्वानिमित्तानिमहाघोराणिराघवः ॥१३॥ लाकर फिर हमारे बाणमे घायल होकर लक्ष्मणकोभी यहां लानेके लिये हाय लक्ष्मण ! हम मारे गये! यह कहकर उस राक्षसने प्राण छोडे ॥८॥ इस शब्दको सुन लक्ष्मणभी तो पलेही आये होंगे, फिर जब वनमें आश्रमपर हम दोनों भाई न रहे तो कैसे कहैं कि, मंगल होगा। कारण कि, जनस्थानका नाश करनेके कारण हमसे और राक्षसों मे भाग रहे ॥ ९॥ और तिसपर यहां हमको घोर दुनिमिन दिखाई देते हैं, आत्मवान श्रीरामचन्द्रजीने शृगालका शब्द सुनकर इसप्रकार चिन्ता करते २ ॥ १० ॥ लौटकर पड़ी गीतामे आभमकी ओर गमन करने लगे। मृगरूपी मारीच जो उनको आश्रमसे दूर ले आयाथा, इस कारण रामचन्द्रजी जल्दीसे आश्रमको गले ॥21॥ और गंकितचिन होकरीरामगन्यजी आश्रम पहुँतष मय मृग पक्षीगण इनके मनको उदाम देगकर सब इनके निकट आये ॥ १२॥ पड़ सप मृग पसीगण उम कालमें रामचन्द्रजीकी बाई तरफ होकर कठोर स्वरसे शब्द करने लगे, उन महाघोर सत्र दुर्निमित्रोंको देखकर श्रीरामचन्द्रजीने देसा नो ॥ १३ ॥ प्रभाहीन हुए लक्ष्मणजी चले आते हैं, देखतेही देखते लक्ष्मणजी रामचन्द्रजीके निकट आ पहुँचे ॥ १४ ॥ रामचन्द्रजीको विपादिन व दुःखित देखकर लक्ष्मणजीभी विपादित और दुःखित हुए। तब श्रीरामचन्द्रजी अपने भाता लक्ष्मणजीकी निन्दा करने लगे ॥ १५ ॥ क्योंकि लक्ष्म जी मीताजीको राक्षसमेक्ति सूने वनमें अकेली छोडकर आयेथे लक्ष्मणजीका बायां हाथ पकडकर श्रीरामचन्द्रजी ॥ १६ ॥ आर्तके समान श्रवणकठोर) परिणाममधुर वचन कहने लगे कि, हे लक्ष्मण ! तुम सीताजीको त्यागकर जो यहां चले आये हो, यह तुमने अतीव निन्दाका कार्य किया है ॥ १७ ॥ ततोलक्ष्मणमायाँतंददर्शविगतप्रभम् ॥ ततोविदूरेरामेणसमीयायसलक्ष्मणः ॥१४॥ विपण्णःसन्विपण्णेनदुःखितोदुःखभागिना ॥ सजगहेऽथतं भ्रातादृष्ट्वालक्ष्मणमागतम् ॥ १५ ॥ विहायसीतांविजनेवनेराक्षससेविते ॥ गृहीत्वाचकरंसव्यंलक्ष्मणरघुनंदनः॥१६|| उवाचमधुरोदर्कमिदंपरुप मार्तवत् ॥ अहोलक्ष्मणगातेकृतंयत्त्वं विहायताम् ॥१७॥ सीतामिहागतःसौम्यकश्चित्स्वस्तिभवेदिति।। नमेऽस्तिसंशयोवीरसर्वथाजनकात्मजा ॥१८॥ विनष्टाभक्षितावापिराशसर्वनचारिभिः॥ अशुभान्येवभूयिष्टंयथाप्रादुर्भवंतिमे ॥१९॥ अपिलक्ष्मणसीतायाःसामय्यंगामुयामहे ॥जीवं त्या पुरुषव्याघ्रसुतायाजनकस्यवे ॥ २० ॥ यथावमृगसंघाश्चगोमायुश्चैवभैरवम् ॥ वाशंतेशकुनाश्चापिप्रदीतामभितोदिशम् ॥ अपिस्वस्तिभवे तस्याराजपुन्यामहावल ॥ २१ ॥ इदंहिरक्षोमृगसंनिकाशंप्रलोभ्यमांदूरमनुप्रयातम् ॥ हतंकथंचिन्महताश्रमेणसराक्षसोभून्नियमाणएवा॥२२॥ शुभदर्शन ! नुमने जो अली छोडा इमसे क्या सीताका भला होगा ? कभी नहीं । हे वीर ! जनककुमारी अव आश्रममें नहीं हैं इस बातमें हमको अब कुछ संशय नहीं होना ॥ १८ ॥ गपगपर जिस प्रकारके अशकुन हो रहे हैं इससे यह ज्ञात होता है कि, यातो सीताको कोई वनचारी राक्षस चुराकर ले गया या मारकर गागया होगा ॥ ११॥ हे लक्ष्मण ! जनककुमारीजी सब प्रकारसे कुशलह क्या हम ऐसा देख पागे? हे पुरुषसिंह क्या जानकी सबप्रकार कुरालसे जीती हैं । ॥२०॥ हे महापलपान् ! यह मृगगण, मियार और पक्षीगण सूर्यकी ओरको मुख करके महाभयंकर शब्द कर दशोदिशाओंको देखते हैं मानो इनमें आग लगी है। ऐसे भगकुन देखकर किम कार कह दें कि, राजपुत्री सीताजी कुशलसे हैं ? ॥ ॥ २१ ॥ यह मृगरूपी राक्षसभी हमको ललचाकर दूर ले आया, जिसको ********************** । पा.ग.भा. 法法或沈光源, आ स० फिर हमने पहुनही परिश्रम करके किसी भांति मार पाया, मरनेके समय उसने निज राक्षस मूर्ति धारण की ॥ २२॥ हमारा मनभी बहुतही दीन और पपाया हुआ है। और बाई आंसभी फड़क रही है । हे लक्ष्मण ! निःसन्देह सीता आश्रममें नहीं, यातो उनको कोई हरण करके ले गया, या मार्गमें मरी पडी ही॥२३॥इत्या भीमदा याल्मी० आदि० आर० भापाटीकायां समपंचाशः सर्गः॥५७॥लक्ष्मणजी महादीन और उदास मन होरहे थे उनको सीताके विना आता हुभा देसार धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी पूछने लगे ॥ ॥ हे लक्ष्मण ! जब हम वनको आये और उस समय जो हमारे साथही वनको आई थीं; और गुम जिनको छोडकर यहां आये हो; यह सीता कहां हैं ? ॥ २ ॥ जब हम राज्यसे भ्रष्ट होकर दीन भावसे दंडकारण्यको आये और उस समय जो मनभमेदीनमिहाप्रष्टचक्षुश्वसव्यंकुरुतेविकारम् ।। असंशयंलक्ष्मणनास्तिसीताहतामृतावापथिवर्ततेवा ॥२३॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मी कीय आदिकाव्येऽरण्यकांड सप्तपंचाशः सर्गः॥५७॥ सदृष्ट्वालक्ष्मणंदीनंशुन्यं दशरथात्मजः॥ पर्यपृच्छतधर्मात्मावदेहीमागतंविना ॥ १॥ प्रस्थितंदंडकारण्यंयामामनुजगामह ॥ कसालक्ष्मणवैदेहीयाहित्त्वात्वमिहागतः ॥ २॥ राज्यभ्रष्टस्यदीनस्यदंडकान्परिधावतः ॥ वसादुः समदायामेपैदेहीतनुमध्यमा ॥ ३ ॥ यांविनानोत्सहेवीरमुहूर्तमपिजीवितुम् ॥ कसामाणसहायामेसीतासुरसुतोपमा ॥ ४॥ पतित्वममराणां हिपृथिव्याश्चापिलक्ष्मण ॥ विनातांतपनीयाभांनेच्छेयंजनकात्मजाम् ॥६॥ कचिजीवतिवेदेहीमाणे:प्रियतरामम ॥ कचित्प्रव्राजनंवीरनमेमि ध्याभविप्यति ॥ ६॥ सीतानिमित्तं सौमिमृतेमयिगतत्वयि ॥ कचित्सकामाकैकेयीसुखितासाभविष्यति ॥७॥ सपुत्रराज्यांसिद्धार्थामृ तपुत्रातपस्विनी ।। उपस्थास्यतिकौसल्याकचित्सौम्येनकेकयीम् ॥ ८॥ हमारे दुःसमें महाय हुई, यह तनुमध्यमा जानकीजी कहां हैं ? ॥ ३॥ जिसके बिना हम एक मुहूर्त भरभी प्राण धारण करनेको उत्साही नहीं, वह देवकन्याके समान पाणमहाय जानकोजी कहां है ? ॥ ४ ॥ हे लक्ष्मण ! हम उन तपाये हुए सुवर्णके समान प्रभावाली जनकात्मजाके विना देवताओंकी प्रभुताई अथवा पृथ्वीकी राजाई उनकीभी अभिलापा नहीं करते ॥ ५॥ हे वीर ! हमारी प्राणोंसेभी प्यारी जानकी क्या अभीतक जीती हैं, क्या हमने जो चौदह वर्पतक वनमें रहनेकी प्रतिज्ञाकी है पह पियानो न होजायगी ॥३॥ हे लक्ष्मण ! मोवाके लिये हमारे प्राण त्यागने पर और तुम्हारे अयोध्या लौटजानेपर कैकेयी क्या सफलमनोरथ और सुखी होगी ॥ोपी दगार-भाने पुत्रको राम्पमानिगे जप मिय काम होगी, तय क्या ममपुत्रा, दीना, पम्पिनी, हमारी मागा कोगल्याणीको पिनपके साथ उसकी 洛洛這名客络资者求法涂老次法次法说完X球关法法 FIRH सेवा करनी होगी ॥ ८॥ हे टक्ष्मण ! वैदेही यदि जीवित हैं, तब तो हम फिर आश्रमको चलते हैं, और यह शुद्धचारिणी यदि परलोकमें ली गई हैं, जो हमभी) प्राण त्यागन करेंगे ॥ ९॥ जय हम आश्रममें पहुंचेंगे और सीता सन्मुख हँसकर यदि हमसे न बोलेंगी तभी हम प्राण त्यागेंगे ॥ १० ॥ इम कारणमे हे लक्ष्मण ! तुम बताओ कि, जानकी जीवित हैं ? अथवा तुम्हारी असावधानतासे उन तपस्विनी जानकीजीको राक्षसोंने वो नहीं भक्षण कर लिया ॥ ३३ ॥ वैदेहीजी कुमारी हैं, रालिकाहैं, और दुःख भोग करनेके अयोग्य हैं, वह इस समय हमारे दुःखसे निश्चय ही दुःखी हो सोच करके शोक करती होंगी ॥ १२॥ अतिगय दुरात्मा कर निगा चर मारीचने ऊंचे शब्दसे ( हा लक्ष्मण! ) कहकर सब प्रकारसे तुमको भय उत्पन्न करा दिया है ॥ १३ ॥ हम जानते हैं कि हमारे बोलके समान वह योल ज.नकी यदिजीवतिवेदेहीगमिष्याम्याश्रमंपुनः ॥ संवृत्तायदिवृत्तासाप्राणांस्त्यक्ष्यामिलक्ष्मण ॥ ९॥ यदिमामाश्रमगतवेदेहीनाभिभापते ॥ पुरःप्रह सितासीताविनशिष्यामिलक्ष्मण ॥ १०॥ हिलक्ष्मणवेदेहीयदिजीवतिवानवा ॥ त्वयिप्रमत्तेरक्षोभिर्भक्षितावातपस्विनी ॥ ११ ॥ सुकुमा रोचवालाचनित्यंचादुःखभागिनी ।। मद्वियोगेनवेदेहीव्यक्तंशोचतिदुर्मनाः ॥ १२ ॥ सर्वथारक्षसातेनजिटेनसुदुरात्मना ॥ बदतालक्ष्मणेत्यु पेस्तवापिजनितंभयम् ॥ १३॥ श्रुतश्चमन्यवेदेयासस्वर-सदृशोमम ॥ वस्तयापितस्त्वंचद्रष्टुंमांशीप्रमागतः ॥ १४॥ सर्वथातुकृतंकष्टसीता मुत्सृजतावने । प्रतिकर्तुनृशंसानारक्षसांदत्तमंतरम् ॥१५॥ दुःखिताःखरघातेनराक्षसाःपिशिताशनाः तेःसीतानिहताबोरेभविष्यतिनसंशयः ॥ १६ ॥ अहोऽस्मिव्यसनेमनःसर्वथारिपुनाशन ॥ किंत्विदानीकारिष्यामिशंकेप्राप्तव्यमीदशम् ॥ १७॥ इतिसीतांवरारोहांचिंतयन्नेवरावकः । आजगामजनस्थानत्वरयासहलक्ष्मणः ॥ १८॥ विगर्हमाणोऽनुजमार्तरूपंक्षुधाश्रमेणेवपिपासयाच ॥ विनिःश्वसञ्शुष्कमुखोविपण्ण प्रतित्र यंप्राप्यसमीक्ष्यशून्यम् ॥ १९ ॥ जीने सुनकर तुमको यहांपर भेजा है और तुमभी हमारे देखनेके लिये शीघही यहांपर आयेहो ॥ १४ ॥ तुमने सीवाजीको अकेली वनर्म छोड यहां आकर :: कष्टकर कार्य किया है । इससे निर्दयी राक्षसोको हमारे कियेहुए अपकारका प्रतिकार करनेको तुमने अवसर दे दिया ॥ १५॥ सरको मारडालनेसे मांसभः । राक्षसगण बहुतही दुःखित होगये हैं। उन घोरनिशाचरोंने निश्चयही जानकीको मारडाला होगा इसमें सन्देह नहीं है ॥ १६ ॥ हाय! शत्रुसूदन लक्ष्मण ! :: मस भांतिने विपदमें हो अब हम क्या करें। हमको शंका होतीहै कि, यह विपद् अवश्य होनहारहै ।। ३७ ॥ श्रीरामचन्द्रजी सुमुखी जानकीजीके लिये इस प्रयः । चिंता करके लक्ष्मणजीके सहित शीघतासे जनस्थानमें आये ॥ १८ ॥ क्षुधा, श्रम, और प्यासके मारे रामचन्द्रजीका मुख सूख गयाथा उन्होंने शोगि:
पा.रा.भा. आर० ॥१२॥ ॥ चिनसे दीर्घ निःश्वास त्याग करते लक्ष्मणजीकी आर्यभावसे निन्दा करते २ इस प्रकारसे आश्रममें आयकर देखा तो वहां सीता नहीं हैं वह आश्रम शून्य पडाहै ॥ ।॥ १९ ॥ जय सीताजीको नदेखा तब श्रीरामचन्द्रजी आश्रममें प्रवेश करके सीवाजीके खेलने के सब स्थान और वनवासके उठने बैठनेके स्यानमें हूँढने लगे. परन्तु पहांभी जनकनन्दिनीको न पाया, तब श्रीरामचन्द्रजीने जानकीजीके उठने बैठने और खेलनेके स्थानोंको विसूर २ स्मरण किया, स्मरण करनेही उनके गेम खडे होगये और बहुत घबडाये ॥ २० ॥ इत्यापें श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायामष्टपंचाशः सर्गः ॥ ५८ ॥ जब इसप्रकार श्रीरामचन्द्रजीने आश्रमके मार्ग, वचन कहे और वह लक्ष्मण कुछ न बोले तब फिर महादुःसीहो रामचन्दजी सुमित्राकुमारसे बोले ॥ ३ ॥ भाई ! तुम कैसे सीताजीको छोडकर यहां चले आये ? जब कि हम तुम्हारेही विश्वास पर सीवाको वनके बीच छोड आये हैं ॥२ ॥ यह देखतेही कि तुम नीताजीको स्वमाश्रमंसप्रविगाह्यवीरोविहारदेशाननुसृत्यकांश्चित् ॥ एतत्तदित्येवनवासभूमोप्रहप्टरोमाव्यथितोवभूव ॥ २० ॥ इत्या श्रीमद्रामायगे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडेऽएपंचांशः सर्गः ॥ ५८ ॥ अथाश्रमादुपावृत्तमंतरारघुनंदनः ॥ परिपप्रच्छसौमिनिरामोदुःखादिदं वचः ।। १ ।। तमुवाचकिमर्थंत्वमागतोऽपास्यमेथिलीम् ॥ यदासातवविश्वासाइनेविरहितामया ॥२॥ दृष्ट्वेवाभ्यागतंत्वांमेमैथिलीत्यज्यलक्ष्म ण ॥ शंकमा महत्पापंयत्सत्यंव्यथितंमनः ॥ ३॥ स्फुरतेनयनंसव्यंबाहुश्चहृदयंचमे ॥ दृष्ट्वालक्ष्मणदूरत्वांसीताविरहितंपथि ॥ ४॥ एवं मुक्तस्तुसोमिविलक्ष्मणःशुभलक्षणः ॥ भूयोदुःखसमाविष्टोदुःखितंराममत्रवीत् ।। ५ ॥ नस्वयंकामकारणतांत्यकाहमिहागतः ॥ प्रचोदित स्तयेवोग्रेस्त्वत्सकाशमिहागतः ॥ ६॥ आर्येणेवपराक्रुष्टलक्ष्मणेतिसुविस्वरम् ॥ परित्राहीतियद्वाक्यंमैथिल्यास्तच्छुर्तिगतम् ॥ ७॥ नात मार्तस्वरंश्रुत्वातवस्नेहेनमैथिली ॥ गच्छगच्छेतिमामाहरुदतीभयविकवा ॥८॥ त्यागकर यहां आयेहो, हमारा मन जो महाअनिष्टकी शंका करके व्यथित होता था वह हमारी शंका सत्यही सत्य हुई ॥ ३ ॥ तुमको मार्गमें दूरसेही जानकी विना अकेला आता देखकर हमारा, हाथ वामनेत्र और हृदयका बायांभाग फड़कने लगा॥ ४॥ शुभलक्षणयुक्त लक्ष्मणजी रामचन्द्रजीकी यह पानी सुन महादुःस्तिहो भीरामचन्द्रजीसे बोले ॥ ५॥ हम आप अपनी इच्छानुसार सीताजीको त्याग करके यहां नहीं आये वरन् उनके पठाये हुयेही आपके निकट आये हैं॥ ६ ॥ आपके बोलके समान बोल बनाकर जो किसीने (हमें बचाओ) कहकर भय और व्याकुलताके स्वरसे चीत्कार कियाथा, सो पही चिप्साहट जानकीजीके भषण गोचर हुई ॥७॥ उन्होंने 'लक्ष्मण ! हमें बचाओ' यह करुणाका घोल सुनकर भयगे विकलही आपके स्नेहके पराये मारे रोते समय पर andsetititikat.kikiki R कममरमरा awan o.+11 गाव माओ ॥ ८॥ वह कारगार हममे जानेको कहने लगी, तब हमने उनको विश्वास दिलाने के लिये यह वार्ता कही ॥९॥ हम ऐसा किसी राक्षसको नहीं को भीगमचन्द्रजीको भय उसजासके, इससे यह करुणाका वचन रामचन्द्रजीका नहीं, वरन् यह वचन किसी राक्षसने का और किसीने कहा होगा इस कारण पमा रहैं ॥10॥ हे मीते ! जो देवताओंकीभी रक्षा कर सकते हैं, वह श्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी "हमको बचाओ" यह नीच जनोचित वार्ता किसमकारसे कह ने हैं। इन कारणमे किमीने किसी कारणवग रामचन्द्रजीके बोलसा बोल बनाकर "लक्ष्मण ! हमको बचाओ" यह व्याकुल स्वरसे चिल्लाहद की है कुछभी मन्देह नहीं है ।। १२॥ है गोभने। किसी राक्षसने त्रासके मारे "बचाओ" यह शब्द कियाहै। इससे आप नीच ग्रीजनोचित मनोवेदना त्यागकर दीजि 1 १३॥ व्याकुल होने की कोई आवश्यकता नहीं है, न घबडानेका कुछ प्रयोजन, इस बातका विचार आप छोडें, क्योंकि लोक ऐसा कोई पुरुष नहीं है जो संग प्रचोद्यमानेनमयागच्छेतिबहुशस्तया । प्रत्युक्तामेथिलीरास्यमिदंतत्प्रत्ययान्वितम् ॥ ९॥ नतत्पश्याम्यहंरक्षोयदस्यभयमावहेत ॥ निता.' पनास्त्येतत्केनाप्येतदुदाहनम् ॥ १० ॥ विगहितंचनीचंचकथमायाभिधास्यति ।। त्राहीतिवचनंसीतेयत्रायेत्रिदशानपि ॥ ११ ॥ किं. मित्तंतुकेनापिधातुगलंयमस्वरम् ॥ विस्वरंव्याहृतवाक्यलक्ष्मणवाहिमामिति ॥ १२ ॥ राक्षसेनेरितवाक्यंत्रासाबाहीतिशोभने ॥ नभवत् : व्यथाकार्याकुनारीजनसेविता ॥ १३॥ अलंबिलवतांगंतुंस्वस्थाभवनिरुत्सुका । नचास्तित्रिपुलोकेपुपुमान्योरावरणे ॥ १४ ॥जातोवाजा- मानोगामंयुगेयः पराजयेत् ।। अजेयोराधकोयुद्धदेवेःशकपुरोगमः ॥ १५॥ एवमुक्तातुयेदेहीपरिमोहितचेतना । उवाचाऽथूणिमुंचतीदारुणमामि . पनः ॥ १६॥ भायोमयितयात्यर्थपापएपनिवेशितः॥ विनष्टेभ्रातरिप्राप्तुंनचत्वंमामवाप्स्यसे।। १७॥ संकेतादरतेनत्वंरामसमनुगच्छसि ॥को. नंदियधात्वननमभ्ययपद्यसे ॥ १८॥ रिपुःप्रच्छनचारीत्वंमदर्थमनुगच्छसि ॥ राघवस्यांतरंगेप्सुस्तथैननाभिपद्यसे ॥ १९॥ भीग्घुनन्दन गमनजीको ॥ १४ ॥ जीनमके आजके ममयही क्या परन् कभी ऐसा नहीं हुआ और न आगेको होगा, श्रीरामचन्द्रजीको तो संयाममें इन्द्रादि गानी नही जीत माले ॥१५॥ मोहिनचिन वैदेहीजीने हमारे यह वचत सुन आंसू त्यागकर रोते २ हमको यह दारुण वचन कहे ॥ १६॥ कि हमारे गुहाग अपना पापभाव स्थापित हुआहे, परन्नु भाता विनष्ट होनेपर तुम किमी भांतिमे हमको प्राप्त नहीं कर सकोगे ॥ १७ ॥ हम समझी कि, तुम भरतके : भारमे पठारे श्रीरामचन्दजीक माथ आयेहो, इमीले रामचन्द्रजीका आननाद करना सुनकरभी तुम उनकी सहायतार्थ नहीं जाते ॥ १८॥ अथवा तुम ह शुरु गरहो, हमारही ले लेने के लिये गमचन्द्रजौके पीछे २ रनमें फिरतेहो और सर्वदा अवसर ढूंढते हो कि, कव रामचन्द्र कहींको जाप, और हम इनको । .
पा.रा.भा.
आर०
स०५
करें इस कारणने नुम उनकी सहायता करनेके लिये नहीं जाते ॥ १९॥ जब वैदेहीजीने इस प्रकार कहा, तब अतिक्रोधके मारे हमारे नेत्र लालहोआये, रोपमें
भरकर भएर फडकने लगे और हम तमेही आश्रमसे चल सडे हुए ॥२०॥ जब लक्ष्मणजीने इस प्रकारका कहना आरंभ किया, तब रामचन्द्रजी शोकसे मोहित हो
कर लगे पोछे कि, हे सौम्य ! तुम जो जानकीको छोडकर यहां चले आये वह अतिशय दुष्कर कर्म हुआ ॥ २१ ॥ देखो, राक्षसोंका बल निवारण करनेकी हममें
पिलक्षण मामथ्र्य है, उसको जानबूझ कर भी तुम जानकीके यह क्रोध वचन सुन आश्रमसे बाहर चले आये ॥ २२ ॥ एक तौ स्त्री, दूसरे कोधित, ऐसी जानकीके
स्लोर पपनोंमे नुमभी उनको छोडकर यहांपर चले आये इससे हम तुम्हारे ऊपर प्रसन्न नहीं हुए ॥२३ ।। तुमने सीताके वचन सुन कोधके वशहो हमारी आज्ञा
एसमुक्तस्तुदेयासंरब्धोरक्तलोचनः॥कोधात्प्रस्फुरमाणोप्टआश्रमादभिनिर्गतः॥२०॥एवं वाणंसौमित्रिरामःसंतापमोहितः ॥अब्रवीदुप्कृतंसी
म्यतांविनात्वमिहागतः॥२१॥ जाननपिसमर्थमारक्षसामपवारणे ॥ अनेनक्रोधवाक्येनमैथिल्यानिर्गतोभवान् ॥२२॥नहितेपरितुष्यामित्यका
पदमिमैथिलीम्॥कुद्धाया परुपंश्रुत्वास्त्रियायत्त्वमिहागतः॥२३॥सर्वथात्वपनीततेसीतयायत्प्रचोदितः ॥ क्रोधस्यवशमागम्यनाकरोःशासनं
मम ॥२३॥ असोहिराक्षसःशेतेशरेणाभिहतोमया ।। मृगरूपेणयेनाहमाश्रमादपवाहितः ॥ २५॥ विकृष्यचापंपरिधायसायकंसलीलवाणेनचता
डितोमया ॥ मार्गीतनुंत्यज्यचविकवस्वरोवभूवकेयूरवरःसराक्षसः॥२६॥ शराहतेनैवतदातयागिरास्वरममालंब्यसुदूरसुश्रवम् ॥उपाहृतंतद्वचनं
सुदारुणंत्वमागतोयेनविहायमेथिलीम् ॥ २७ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांड एकोनपष्टितमः सर्गः॥९॥
ग उलंघन किया इनसे तुम्हारा यह कार्य बहुतही निन्दनीय हुआ है ॥ २४ ॥ देखो ! यह राक्षस जो मृग बनकर हमको आश्रमसे दूरतक लायाहै वह हमारे बाणसे
राहुआ पड़ाहै ॥ २५॥ हमने धनुप चढा संच उस पर वाण चहा लीलासेही एक वाणका इसके ऊपर प्रहार किया जिस वाणके लगनेसे इस राक्षसने मृगतनु
जोर विकल पर कर पाजू पहरे हुये निशाचरका शरीर धारण कियाहै ॥ २६ ॥ उसकाल हमारे वाणसे घायल होकर दूरसेही श्रवणगोचरहो इस प्रकारका हमारा
पोल पनाकर इन राशमके दारुण आननाद करनेमे तुम उमको सुन इस मपय जानकीको छोडकर यहां आयेहो ॥ २७ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे
शमीकीप भाविकार आरण्यकांडे भातारीफायामेफोनपष्टितमः सर्गः ॥ ५० ॥
आमममें मानके ममय श्रीरामनवजी वामनेत्रके नीचेका भाग अत्यन्तही फटकने लगा, पग २ पर चरण फिसलता, आर शरीर कपरहा था इन आराकु नाँका यह प्रभावहै कि जिम कार्यके लिये जाओ उसकी सिद्धि नहीं होती ॥ १ ॥ श्रीरामचन्द्रजी वारंवार अपशकुन होते देखकर आपही कहनेलगे कि, जाने सीता गलमें, अपवा नहीं ॥२॥ यह सोचते विचारते सीवाके दर्शन करनेकी लालसासे शीघ २ चलकर देखतेहुए कि आश्रम सूनापडाहै यह देखकर श्रीरामचंदजी बहुत उक माये ॥३॥ यह वेग महिन घर उपर भुजायें चला और घूमकर समस्त पर्णशालाके स्थान २ करके सोजनेलगे॥४॥रामचंदजीने पर्णशालामें गमन करके देखा कि वहां गीता नहीं है जानकी विन हेमंतस्तुकै समागमसे ध्वस्तपमिनीकी समान हो पर्णशाला अत्यन्त श्रीविहीन अवस्था में पड़ी थी॥५॥ वनदेवतागण आश्रमको श्रीपष्ट भृशमात्रजमानस्यतस्याधीवामलोचनम् ॥ प्रास्फुरञ्चास्खलद्रामोवेपथुश्चास्यजायते ॥ १॥ उपालक्ष्यनिमित्तानिसोशुभानिमुहुर्मुहुः ।। अपि मनुमीतायाइतियेव्याजहारह ॥ २ ॥ त्वरमाणोजगामाथसीतादर्शनलालसः॥ शून्यमावसथंडावभूवोद्विग्नमानसः ॥३॥ उद्धमनिववेगेन विभिपत्रानंदनः ॥ तबतबोटजस्थानमभिवीक्ष्यसमंततः ॥ ४ ॥ ददर्शपर्णशालांचसीतयारहितांतदा ॥ श्रियाविरहिताध्वस्तांहेमंतेपद्मिनी मिव ॥ ५॥ दंतमिवक्षेत्रग्लानपुप्पमृगद्विजम् ।। श्रियाविहीनंविध्वस्तंसंत्यक्तंवनदेवतेः ॥ ६॥ विप्रकीर्णाजिनकुशंविप्रविद्धवृसीकटम् ॥ हवाग्रन्योटजस्थानविललापपुनःपुनः ॥७॥ हतामृताचानष्टावाभक्षितावाभविष्यति ॥ निलीनाप्यथवाभीरुरथवावनमाथिता ॥ ८ ॥ गनापिनेतुंपुष्पाणिफलान्यपिनवापुनः ॥ अथवापभिनीयाताजलार्थवानीगता ॥९॥ यत्रान्मृगयमाणस्तुनाससावनेप्रियाम् ॥ शोकरक्ते क्षगःश्रीमानुन्मत्तस्यलक्ष्यते ॥ १० ॥ वृक्षादक्षप्रधावन्सगिरीश्चापिनदीनदम् ॥ बभ्रामविलपत्रामःशोकपकार्णवप्लुतः ॥ ११ ॥ और विमान देनार एकवारही छोडकर चलेगये, आश्रमके मृग पक्षी और समस्त पुप्पभी मलीन होगयेथे, वहांपरके वृक्ष मानों रोरहेथे ॥ ६॥ मृगचर्म और कुश पर उपर पदे और गामन छिन्नभिन्न और गिरे पडेथे, पर्णशालाकी ऐसी अवस्था देखकर श्रीरामचंदजी वारंवार यह कहकर विलाप करनेलगे।॥७॥कि निश्चय जानकी हगई, या माफ कोई अपया किमी करके भक्षण करडालीगई, या यह डरपोक स्वभावशाली छिप रही हैं या वनमें चली गई हैं ।। ८॥ अथवा वह फूल फल चुनके लिये कहीं श्नमें गई है या जल लाने के लिये मरोपर या नदीपर गई होंगी ॥ ९ ॥ श्रीरामचंदजीने यत्नपूर्वक ढूँढने भालने परभी वनके बीच प्रियाको कहीं न पाया, तब गोरके पार उनके ने टाल र होगरे उमममय वह उन्मनोंके समान फिरनेलगे ॥ १० ॥ श्रीरामचन्द्रजी शोको समुद्रमें डूबकर एक वृक्षसे दूसरे वृझने नीचे सा.ग.भा. आर. नौटकर जानेलो और विलाप करते २ नद नदी और पर्वोंपर घूमनेलगे ॥ ११ ॥ अनन्तर श्रीरामचंद्रजी उन्मनकी समान कदम्बादि वृक्षोंसे सीताजीको पूछने लगे कि है कदम्ब ! तुमने उन कदम्बपिया हमारी प्राणप्यारी जानकीको देखाहै ? यदि देखाहो तो उन शुभाननाकी वार्ता हमसे कहो ॥ १२॥ हे बिल्व ! वह बिल्वस ग गपाली पद्धय समान कान्तियुक्त पीले रेशमीन वन धारणकिये सीताको यदि तुमने देखाहो तो बताओ ॥ १३ ॥ अथवा हे अर्जुन ! प्रिया तुमको अतिशय चाहनीयी, गो यह क्षीणांगी जनककुमारी जीवितहैं या नहीं सो वताओ ॥ १४ ॥ अथवा यह ककुभवृक्ष ककुभके समान जांघवाली सीताको निश्चयही जानता होगा. स्योंकि इस वृक्षार टना पुष्प फल सवही लगे हैं ॥ १५॥ और चमरगणों के संगीत रवसे पारपूर्ण शोभा पारहाहै । हे वनस्पति ! तुम सब वृक्षोंमें प्रधान हो और जान अस्तिकनित्त्वयादृष्टासाकदंवप्रियाप्रिया ॥ कदंवयदिजानीपेशंससीतांशुभाननाम् ॥ १२ ॥ स्निग्धपल्लवसंकाशांपीतकौशेयवासिनीम् ॥ शंनस्वयदिसादृष्टाविल्लविल्लोपमस्तनी॥ १३॥ अथवार्जुनशंसत्त्वंप्रियांतामर्जुनप्रियाम् ॥जनकस्यसुतातन्वीयदिजीवतिवानवा॥१४॥ककु भःककुभोरूपांव्यक्तंजानातिमेथिलीम् ॥ लतापल्लवपुप्पाब्योभाति पवनस्पतिः ॥ १५॥ भ्रमरैरुपगीतश्चयथाद्रुमवरोयसि ॥ एपव्यक्तविजा नातितिलकस्तिलकप्रियाम् ॥ १६॥ अशोकशोकापनुदशोकोपहतचेतनम् ॥ त्वन्नामानंकुरुक्षिप्रप्रियासंदर्शनेनमाम् ॥ १७ ॥ यदितालत्व यादृष्टापकतालोपमस्तनी ॥ कथयस्ववरारोहांकारुण्यंयदितेमयि ॥ १८॥ यदिदृष्टात्वयाजंबुजांवूनदसमप्रभा ॥ प्रियांयदिविजानासिनिःशंकं कथयस्वमे ॥ १९॥ अहोत्वंकर्णिकाराद्यपुष्पितःशोभसेभृशम् ॥ कर्णिकारप्रियांसाध्वीशंसदृष्टायदिप्रिया ॥२०॥ कीभी मर रमणियोंमें श्रेष्ठ, अतएव वह कहां हैं सो वताओ 8 अथवा प्रिया तिलक पुष्पको बहुत प्यार करतीथीं इससे यह तिलक वृक्ष निश्चयही उनके वृत्तान्तको जानना होगा ॥ १६ ॥ हे अशोक ! तुम शोकको दूर किया करतेहो, इससे शोकसे हतचित्त मुझको प्रियाके साथ मिलाकर अपने नामवाला कर दो ॥ १७ ॥ हे नाल ! पदि तुमने उन पकतालकी ममान स्तनवाली जानकीको देखा है और हमारे ऊपर कुछभी दया करते हो तब वह वरारोहा सीता कहां है ? सो हमको बतादो ॥ १८ ॥ हे जामुन ! यदि जाम्बूनद सुवर्ण सम प्रभावाली हमारी प्रियाको तुमने देखा है तो निःशंक चित्तसे बताओ ॥ १९ ॥ हे कर्णिकार ! आज तुम •umनो मोटी नाळ एकताला । मोनापिनु देश बुटी सोचतरपुराई ।। आनाई । लक्ष्मण तुम कहा कौन इफली सिय छाडदीन निश्वर कोइ दाओ चोन्ह लेगयो उहाई ।। १ ।। सिय विन व्याकुल शरीर पनामा पाणधीर पार कौन होनार रगपले पहाई ॥२॥ प्रेमविका गम भये नुमटतामों पूछनगये शोकविवश बोलत नहि मय रहे मुरझाई ॥३।। आगे गृभ भेटभई ताने सकल वात कदी तेदिका प्रभु ****
पुष्पित होकर अत्यन्तशोभा पारहे हो और हमारी प्रियाभी तुमसे बहुतही स्नेह करती थीं सो यदि कहीं उन साध्वीको देखाहो तो कहो ॥ २० ॥ इसी प्रकार आम,
नीप, महासाल, कटहल, व अनारको देस २ कर श्रीरामचन्द्रजी उनसे कहते थे ॥२१ ॥ और बकुल, गुन्नाग, चन्दन, केतकी आदि और वृक्षोंके नीचे २ जाकर
भान्तचित्तहो उन्मनकी समान श्रीरामचन्द्रजी वनमें विचरने लगे ॥ २२ ॥ तिसके पीछे.श्रीरामचन्द्रजी मृग इत्यादि पशुओंसे पूछते हुए बोले कि, हे मृग !
तुम क्या उन मृगछौनाकीसी आंखोवाली सीताका कुछ वृत्तान्त जानते हो ? अथवा वह मृगलोचना मृगीगणों के साथ मिलकर घूमती होंगी॥ २३ ॥ हे गज
तुम्हारीही शंड समान आकारवाली उनकी जांवे हैं, यदि तुमने उनको देखाहो तो कहो ? इससे हे गजराज ! हमें वतादो कि, वह कहां है? ॥ २४ ॥ हे गाईल !
उन चंद्रवदना हमारी प्यारी मैथिलीको यदि देखा हो वो हमारा विश्वास करके हमें बतादो ! तुमको कुछ भय नहीं है अर्थात् तुम इस वातसे न डरो कि, हम
नूतनीपमहासालान्पनसान्कुररांस्तथा।।दाडिमानपितान्गत्वादृष्ट्वारामोमहायशाः॥२१॥वकुलानथपुन्नागांश्चंदनान्केतकांस्तथा।। पृच्छत्रामोवने
भ्रांतउन्मत्तइवलक्ष्यते॥२२॥अथवामृगशावाक्षींमृगजानासिमैथिलीम्।।मृगविप्रेक्षणीकांताभृगीभिःसहिताभवेत॥२३॥ गजसागजनासोरुमंदिह
यात्वयाभवेत् ॥तांमन्येविदितांतुभ्यमाख्याहिवरखारण॥२॥शार्दूलयदिसादृष्टाप्रियाचंद्रनिभानना ॥ मैथिलीममविस्रब्धःकथयस्वनतेभयम् ॥
॥२६॥किंधावसिप्रियेनूनंहष्टासिकमलेक्षणे।।वृक्षराच्छाद्यचात्मानंकिमानप्रतिभापसे||२६|| तिष्ठतिष्ठवरारोहेनतेस्तिकरुणामयिा नात्यर्थहास्य
शीलासिकिमर्थमामुपेशसे॥२७॥पीतकोशेयकेनासिसूचितावरवर्णिनिघावंत्यपिमयादृष्टातिष्टयद्यस्तिसौहृदम् ॥२८॥ नैवसानूनमथवाहिसिता
नाम्हासिनी।कृप्राप्तहिमानूनंयथापेक्षितुमर्हति।।२९व्यक्तंसाभक्षिताबालाराक्षसे पिशिताशनेः॥विभज्यांगानिसर्वाणिमयाविरहिताप्रिया३०
तुम्हेंमार डालेंगे ॥ २५॥ हे प्रिये ! हे कमलेक्षणे! तुम अब क्यों दौडी जाती हो? हमने अब निश्चयही तुमको देख लिया है तुम किस कारणसे इन वृक्षोंके मध्यमें छिप
कर हममे नहीं घोलती हो? ॥२६॥ हे वरारोहे ! हम वारंवार कहते हैं कि, तुम खडी रहो, व इधर उधर दौडती न फिरो, क्या हमारे ऊपर तुमको दया नहीं आती? तुम
वो कभी हमारे साथ इतना उपहास नहीं करती थीं क्यों हमारी उपेक्षा करती हो ? ॥ २७ ॥ हे वरवर्णिनी ! हमने तुम्हारे पीले रेशमीन वन देखकर तुमको
पहचान लिया है, और यहभी हम देख रहे हैं कि तुम भागही रही हो इससे यदि तुम कुछ प्रेम हमारे साथ रखती हो वो लौट आओ और भागती न फिरो॥२८॥
अथवा हे चारुहासिनी ! हमने जिसको देखाहै वह तुम नहीं हो, तुमको नो निश्चय ही किसीने मारडाला, यदि ऐसा न होता वो इस दारुण क्लेशके समयभी क्या तुमभी
हमको छोड सकतीहो ।। २९ ॥ सष्ट विदित होताहै कि, मांस खानेवाले राक्षसोंने हमारा वियोग पाईहुई हमारी पियाके अंगोंको खंड २ करके सा लिया ॥ ३० ॥
आर अहो इनका वह मनोहर दांत पाला; श्रेष्ठ मासिका युक्त, शुभकुंडल समन्वित, पूर्ण चंद्रमाके समान वदन राक्षस करके यस्व होजाने पर निश्पही पा.रा.भा. ॥९५॥ प्रभाहीन होगया होगा ॥ ३१ ॥ उनकी कोमल गरदन हार आदि भूपोंसे भूपित जिसके वर्णको ज्योति चंदनकी समान चिकनी और विगुदा है सो राक्षसोंने ऐसी मनोहर गरदनकोभी सा डाला, राक्षसोंने जब हमारी प्रियाको भक्षण किया होगा, तो न जाने उन्होंने कितना विटार किया होगा ॥३२॥ उनकी दोनों बाह पल्लवकी समान कोमल और हाथोंके गहनोंसे सुशोभित हैं निश्चय ही राक्षसोंने इधर उधर फैकफांक कर उनको सालिया उस काटमें उन दोनों वाहोंका अग्रभाग अवश्य कंपित हुआ होगा ॥ ३३ ॥ हाय हम क्या राक्षसोंके भोजनार्थ ही उनको आश्रममें अकेटा छोडकर यहां आयेये इससे ही वह वन्य बान्धव युक्त होकर भी राक्षसोंके पेटमें पड गई और कोई बन्धु वान्धव काम न आया ॥ ३४ ॥ हे लक्ष्मण ! क्या तुमने प्राणप्यारीको कहीं देखाहै नूनंतच्छुभदंतोष्टंसुनासंशुभकुंडलम् ॥ पूर्णचंद्रनिभंग्रस्तंमुखनिष्प्रभतांगतम् ।।३१।। साहिचंदनवर्णाभानीवाओवेयकोचिता। कोमलाविलयंत्या स्तुकांतायाभक्षिताशुभा ॥ ३२ ॥ नूनंविक्षिप्यमाणौतौवाहूपल्लवकोमलौ ॥ भक्षितीवेपमानायौसहस्ताभरणांगदौ ॥ ३३॥ मयाविरहितारा लारक्षसांभक्षणायवै ॥ सार्येनेवपरित्यक्ताभक्षितावहुवांधवा ॥ ३४ ॥ हालक्ष्मणमहावाहोपश्यसेत्वंप्रियांकचित् ॥ हाप्रियेशगताभदानीत तिपुनःपुनः ।। ३५ ॥ इत्येवंविलपनाम-परिधावन्वनाद्वनम् ॥ कचिदुद्भमतेयोगात्कचिद्विभ्रमतेवलात् ॥ ३६॥ कचिन्मत्तइवाभातिकांता न्वेषणतत्परः ॥ सवनानिनदी-शेलान्गिरिप्रस्रवणानिच ॥ काननानिचवेगेनभ्रमत्यपरिसंस्थितः ॥ ३७ ॥ तदासगत्वाविपुलंमहदनंपरी त्यसर्वत्वथमैथिलीप्रति ॥ अनिष्टिताशःसचकारमार्गणेपुनःप्रियायाःपरमंपरिश्रमम् ॥३८॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्य ऽरण्यकांडेपटितमः सर्गः ॥६॥ हा प्रिया ! हा सोते ! हा भद्रे ! तुम कहां गई इन शब्दोंको रामचन्द्रजी वार २ कहतेथे ॥ ३५ ॥ इस प्रकार वारंवार विलाप करते २ रामचन्दजी न २ में वेग सहित घूमने लगे कहीं ठोकर खाकर गिर पडते और कभी २ सब वन तथा दिशा विदिशाओंमें घूमने लगते ॥ ६६ ।। कभी रामचन्द्रजी उन्मनकी समान दृष्टि आते कभी २ मियाके ढूँढने में तत्पर होकर वेग सहित नदी पर्वत झरने और समस्त वनोंमें भमण करने लगे ॥ ३७ ॥ उस समय श्रीरामचन्द्रजी स्थिर होकर कहीं भी न रह सकते।और एक महा वनमें प्रवेश करके उसमें चारोंओर जानकीजीको एक २ वृक्ष और एकर स्थल ढूँढने परभी रामचन्द्रजीका अभिलाप पूर्ण नहीं हुआ। परन्तु वह फिरभीप्यारी सुकुमारी जनकदुलारीके खोज करने परिश्रम करने लगे॥३८॥इत्या श्रीमान् वाल्मी भादिभारण्यफोडे भापानीका प1ि . 洲淡淡辦关洲洲米米 इस प्रकार हूँढने भालते श्रीरामचन्द्रजी फिर आश्रममें आये तो देखा कि, शून्य पडा है, पर्णशालामें कोई नहीं है आसन भी सब इधर उधर पडे है ॥१॥ मत्र और वहां पर देस और वैदेहीजीको न पाकर श्रीरामचन्द्रजी टक्ष्मणजीके दोनों हाथ पकड रोकर बोले ॥ २॥ हे लक्ष्मण ! सीता कहां हैं । इस आश्रमसे किम स्थान को चली गई हैं ? हे सौमित्र ! प्रियाको किसने हरण किया, वा भक्षण किया ? ॥ ३॥ हे सीते ! यदि वृक्षको आडमें छिपी रहकर तुम्हें उपहास करनेकी इश्छा हों, तब तो जिवना चाहिये था उतना उपहास होगया, अब अधिक न दुःखी करो । देखो! हम महादुःसमें पडनेसे व्याकुल हो रहे हैं सो इस समय आनकर तुम शीच हमको धीरज दो, और समझाओ ॥ ४ ॥ हे सौम्य ! तुम जो इन सब विधासी मृगछौनोंके सहित सेल करतीर्थी सो इस समय यह सत्र तुम्हारे विना नेत्रोंसे अशुजल भरे चिंता कर रहे हैं ॥ ५॥ हे लक्ष्मण ! सीताके विरहमें हम कभी जीवन धारण नहीं कर सकते, उनके हर जानेसे उत्पन्न हुए घोरतर शोकने हमको दृष्ट्वाश्रमपदंशून्यंरामोदशरथात्मजः ॥ रहितापर्णशालांचप्रविद्धान्यासनानिच ॥१॥अदृष्ट्वातत्रवेदेहींसनिरीक्ष्यचसर्वशः॥ उवाचरामःप्राक्रुश्यप गृह्यरुचिरीभुजी ॥२॥ कनुलक्ष्मणवैदेहीकंवादेशमितोगता। केनातावासौमित्रभक्षिताकेनवाप्रिया।।वृक्षणावार्ययदिमांसीतेहसितुमिच्छसि। अलंतेहसितेनाधमांमजस्वसुदुःखितम् ॥४॥ये परिक्रीडसेसीतेविश्वस्तेमगपोतकेः ॥ एतेहीनास्त्वयासौम्येध्यायंत्यत्राविलेक्षणाः ॥५॥ सीतयार हितोऽहवेनहिजीवामिलक्ष्मण ।। वृतंशोकेनमहतासीताहरणजेनमाम् ॥ ६ ॥ परलोकेमहाराजोनूनंद्रक्ष्यतिमपिता ॥ कर्थप्रतिज्ञांसंश्रुत्यमयात्वम भियोजितः ॥७॥ अपूरयित्वातंकालमत्सकाशमिहागतः॥कामवृत्तमनार्यवामृपावादिनमेवच ॥ ८॥ धिकामितिपरेलोकेव्यक्तंवक्ष्यतिमेपिता ।। विवशंशोकसंतप्तंदीनंभममनोरथम् ॥ ९॥ मामिहोत्सृज्यकरुणंकीर्ति रमिवानृजुम् ।। कगच्छसिवरारोहेमामोत्सृजसुमध्यमे ॥ १० ॥ त्वयाविर हितश्चात्यक्ष्येजीवितमात्मनः ॥ इतीवविलपनामःसीतादर्शनलालसः ॥ ११ ॥ टक लियाहै ॥ ६ ॥ पितृदेव महाराज दशरथजीको निश्चयही हम परलोकमें मिलेंगे, और वह निश्चयही हमसे यह कहेंगे कि, हे राम हमने वो तुमको प्रतिज्ञा पूर्ण करनेको कहाथा, और तुमने भी स्वीकार कियाथा, कि हम चौदह वर्ष वनमें वसेंगे ॥ ७ ॥ सो तुम उस प्रतिज्ञाको पूर्ण विना कियेही इस समय कैसे यहां पर आये। स्वेच्छाचारी, मिथ्यावादी, और नीचवा युक्त तुमको ॥ ८॥ धिकार है ! सो निश्चयही इस प्रकारके वचन पिताजी हमें कहेंगे विवश गोकसे व्याकुल, दीन और मनोरथ टूटे हुए ॥ ९ ॥ व दया करनेके योग्य हमको यहां छोड कहां जातीहो ? जिस प्रकार कुटिल मनुष्यको कीर्ति छोड देती है वरागेहे ! हे सुमध्यमे ! तुम हमको न छोडो ॥ १० ॥ हम तुम्हारे विरहमें अपना जीवन परित्याग करेंगे, श्रीरामचन्दजी सौताके दर्शनाभिलापी होकर इस F .
**** प्रकार विलाप करने लगे॥११ ।। परन्तु दुःससे आरत हुए उन्होंने जानकीजीको न देखा; इस कारण वह जानकीके शोकमें निमग्न होकर ॥ १२ ॥ अतीव दल २ में फँने हुए महागजकी समान बहुतही व्याकुल होगये, । रामचन्द्रजीकी यह दशा देख लक्ष्मणजी उनके हितकी कामनासे कहने लगे ॥ १३॥ हे महाद्युतिमान् !आप विपाद न कीजिये। हमारे साथ यल कीजिये तव अवश्यही सीताका दर्शन मिलेगा। हे वीर ! यह बहुत कन्दराओंसे शोभित जो गिरवर है ॥ १४ ॥ इस वनमें घूमना जानकीजीको बहुत प्याराहै, क्योंकि वनको देख वह सदा मन होजातीथीं सो क्या अचरजहै कि वह वन देखने न चली गईहों अथवा कोई पुष्प शोभिव कमल युक्त तलैयां देखने गई हो ॥ १५॥ अथवा मत्स्ययुक्त वेतसनामक विहंगसेवित नदीपर वो न चली गई हों अथवा हम तुमको त्रासित करनेकी कामनासे नददर्शसुदुःखाताराघवोजनकात्मजाम् ॥ अनासादयमानंतंसीतांशोकपरायणम् ॥ १२ ॥ पंकमासाद्यविपुलंसीदंतमिवकुंजरम् ॥ लक्ष्मणो राममत्यर्थमुवाचहितकाम्यया ॥ १३ ॥ माविपादंमहावुद्धेकुरुयत्नमयासह ॥ इमंगिारेवरंवीरवहुकंदरशोभितम् ॥ ११ ॥ प्रियकाननसं चारावनोन्मत्ताचमेथिली ॥ सावनवाप्रविष्टास्यानलिनीवासुपुष्पिताम् ॥ १५॥ सरितंवापिसंप्राप्तामीनवंजुलसेविताम् ॥ वित्रासपितुकामा वालीनास्यात्काननेकचित् ॥ १६॥ जिज्ञासमानावैदेहीत्वांमांचपुरुपर्पभ ॥ तस्याह्यन्वेपणेश्रीमनक्षिप्रमेवयतावहे ॥ १७ ॥वनंसर्वविचिनुवो यवसाजनकात्मजा ॥ मन्यसेयदिकाकुत्स्थमास्मशोकेमनःकृथाः ॥ १८॥ एवमुक्तःससौहार्दालक्ष्मणेनसमाहितः॥सहसौमित्रिणारामोविचे तुमुपचक्रम।।१९॥तीवनानिगिरीश्चैवसरितश्चसरांसिच ॥ निखिलेनविचिन्वंतौसीतांदशरथात्मजौ॥२०॥तस्यशैलस्यसानूनिशिलाश्चशिखरा णिच ॥निखिलेनविचिन्वंतोनेवतामभिजग्मतुः ॥२१॥ विचित्यसर्वतःशैलंरामोलक्ष्मणमत्रवीत्।।नेहपश्यामिसौमित्रेवैदेहीपर्वतेशुभाम् ॥२२॥ इस वनके किसी स्थानमें वो न छिप रही हो ॥ १६ ॥ हे पुरुपसिंह ! वह यह जाननेके लिये वनमें लुकाई हैं कि, हम वा आप किस प्रकारसे उनको खोजकर पाठेंगे, मो हमको चाहिये कि उनके खोजनेका अवश्य यत्न करें ॥ १७ ॥ हे काकुत्स्थ ! आप वोमी यही मानते हो कि जानकी इसी वनमें हैं तब वो इस यनके सबही आश्रमोंमें सोजेंगे, अब शोक न कीजिये ॥१८॥ जब सौहार्दके वश होकर लक्ष्मणजीने इस प्रकार कहा तब रामचन्द्रजी सावधानचित्त होकर लक्ष्मणजीको संग ले इंटने लगे॥ १९ ॥ वन, गिरि, वालाव, एक २ करके दोनों भाइयोंने सीताको ढूंढनेके लिये छाने ॥ २० ॥ फिर उन पर्वतोंके कँगूरों, चट्टान, व शिखर व सब रनी २ सोजने पर जानकीजीके दर्शन न गुए.॥२१॥ उस कालमें समस्त पर्वतको ढूंढ भालकर श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीमे बोले कि, हे भाई। इस पर्वत पर प्यारी नालागमोटिनहीं आती ॥ २२॥ लक्ष्मणनी समस्त दंडकारण्यमें विचरण करते हुए भी जानकीजीको न पाकर दुःखसे संवतहो प्रदीत तेजवाले अपने भामा समरनजीम बोलें ॥ २३ ॥ कि महारठयान् विष्णुजीने जिसप्रकार वलिको बांधकर इस पृथ्वीको प्राप्त कियाथा हे बुद्धिमान् ! आपभी वैसेही जनककुमानी मीतानीको पायेंगे ॥ २४ ॥ वीर लक्ष्मणजीके यह वचन सुन दुःससे चित्त हरे हुए श्रीरामचन्द्रजी अवि दीनतासे बोले ॥२५॥ हे महाबुद्धिमान ! सारा वन रित हुये कमल कमलाकर सगेवर बहुत सारी कन्दराओंसे युक्त बहुत झरनोंसे सुशोभित यह पर्वत जरा २ करके देखा वढूंढा तथापि प्राणोंसे भी बहुत भारी प्यारी जानी जीह दर्गत हमने न पाये ॥ २६ ॥ मीवाजीके हरणसे मतापितहो श्रीरामचन्द्रजी शोकसे दुःसी और व्याकुल होकर इस प्रकार विलाप करते २ एक मुहूर्न भरत ततोरणाभिसंततोलक्ष्मणोवास्यमत्रवीत् ॥ विचरन्दंडकारण्यंभ्रातरंदीततेजसम् ॥ २३ ॥ प्राप्स्यसेत्वमहाप्राज्ञमैथिलीजनकात्मजाम् ॥ यथाविष्णुमंहावाहुयलिंबद्धामहीमिमाम् ॥ २४ ॥ एवमुक्तस्तुवीरेणलक्ष्मणेनसराधवः ॥ उवाचदीनयावाचादुःखाभिहतचेतनः ॥ २५ ॥ पनमुविनितंमत्रपमिन्य फुलपंकजाः ।। गिरिश्वायमहाप्राज्ञबहुकंदरनिर्झरः ॥ नहिपश्यामिवेदेहीमाणेभ्योऽपिगरीयसीम् ॥ २६ ॥ एवंसवि लपत्रामःमीताहरणकाशितः ।। दीनःशोकसमाविष्टोमुहूर्तविह्वलोऽभवत् ॥ २७॥ सविह्वलितसर्वांगोगतबुद्धिर्विचेतनः ॥ विपसादातुरोदीनोनिः शस्याशीतमायतम् ॥ २८॥ बहुशःसतुनिःश्वस्यरामोराजीवलोचनः ॥ हाप्रियेतिविचुक्रोशबहुशोवाप्पगद्गदः ॥ २९॥ तंसांत्वयामासत तोलक्ष्मणःमियाधयम् ।। बहुप्रकारंशोकात प्रश्रितःप्रश्रितांजलिः ॥ ३० ॥ अनाहत्यतुतद्वाक्यलक्ष्मणोप्टपुटच्युतम् ॥ अपश्यस्ताप्रियांसी नापाकोशत्मपुनःपुनः ॥३१॥ इत्याचे श्रीमद्रा० बाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे एकपष्टितमःसर्गः॥६॥सीतामपश्यन्धर्मात्माशोकोपह गतनः ।। विललापमहायाहूराम:कमललोचनः ॥ १ ॥ दिल होण् ॥ २७ ॥ वे विहीन और चैतन्य रहित होगये और सर्व शरीर विहल होगया इस प्रकार श्रीरामचन्द्रजी अतिशय व्याकुल और स्पन्दनाहीन होकर गरम मारे २ भामकर विलाप करने लगे ॥ २८ ॥ इसके पश्चात् राजीवलोचन श्रीरामचन्द्रजीने वारंवार पास ले हा प्रिये ! ऐसा कह गद्गद हो आंसू भर (पगादा गंदन करना आरंभ किया ।। २९ ॥ रामचन्द्रजीको देसकर उनके प्रिय धाता लक्ष्मणजी शोकसे आरत हो विनय सहित हाथ जोड उनको समझाने पुनाने लगे ॥ ३० ॥ परन्तु श्रीरामचन्द्रजी उनके मुसमे निकटेहुए वचनोंका अनादर करके प्रियतमा सीताजीके अदर्शनसे वारंवार रोदन करने लगे ॥३१॥ इल्ला भीमशवा. आदि. आरण्यकांडे भापाटीकापामेपष्टितमः सर्गः ॥६३॥ महाबाहु धर्मात्मा कमललोचन श्रीरामचन्द्रजी सीताजीके दर्शन न पा करके गोर के मारे गाना रहित हो विलाप करने लगे ॥ १ ॥वह सीताजीके दर्शन न पाकरभी, मानों उनको देखही रहे हैं इस भाव करके कामवाणसे पीडित हो विला! . गुना इसके माने पचन कहने लगे ॥ २॥ हे प्रिये ! तुम पुप्पोंको अतिशय प्यार करती हो सो इस समय अशोक शाखा समूहद्वारा अपना शरीर ढक कर हमा गोरुको अनिगप यदाती हो ॥ ३ ॥ हे देवि ! तुम्हारी दोनों जांचें केलेके खंभकी सदश हैं तुमने उनको कदलीसे छिपा रक्खा है सोहम उनको देख रहे हैं तुम अ: उनको नहीं छिपा मस्ती हो ॥ ४ ॥ हे भरे ! तुम हँसते २ कर्णिकारके वनमें प्रवेश करती हो, परन्तु हमको पीडन करके और अधिक उपहास करनेका प्रयोजन नहीं है ॥५॥ विशेप करके आश्रमके स्थानमें परिहास करना अच्छा नहीं होता हे प्रिये ! यह तो हम जानते हैं कि, स्वभावसेही तुम पारहासप्रिया हो ॥६॥ परन्: पश्यनिवनतांमीतामपश्यन्मन्मथार्दितः ॥ उवाचराघवोवाक्यंविलापाश्रयदुर्वचम् ॥ २॥ त्वमशोकस्यशाखाभिःपुप्पप्रियतराप्रिये ॥ आवृ जोसिशरीरंतेममशोकवियदिनी॥३॥ कदलीकांडसदृशोकदल्यासंवृतावुभौ ॥ उरूपश्यामितेदेविनासिशक्तानिगृहितुम् ॥ ४॥ कर्णिकारवनं भद्रेहसंतीदेविसेवसे ॥ अलंतेपरिहासेनममवाधावहेनवै ॥५॥ विशेपेणाश्रमस्थानेहासोयनप्रशस्यते ॥ अवगच्छामितेशीलंपरिहासप्रियं प्रिये ॥ ६ ॥ आगच्छत्वंपिशालाक्षिशून्योयमुटजस्तव ॥ सुव्यक्तंराक्षसे सीताभक्षितावाहृतापिवा ॥ ७॥ नहिसाविलपंतमामुपसंपतिलक्ष्म ण॥ एतानिमृगयूथानिसाश्रुनेत्राणिलक्ष्मण ॥ ८ ॥ शंसंतीवहिमेदेवीभक्षितांरजनीचरेः ॥ हाममार्येकयातासिहासाध्विवरवर्णिनि ॥ ९॥ हासकामायकैकेयीदेविमेद्यभविष्यति ।। सीतयासहनिर्यातोविनासीतामुपागतः ॥ १०॥ कर्थनामप्रवेक्ष्यामिशून्यमंतःपुरंमम ॥ निर्वीर्य इतिलोकोमानिर्दयश्चेतिवक्ष्यति ॥ ११ ॥ हे रिशालाक्षी! यह पर्णशाला सूनी पडी है इस कारण आओ। हे लक्ष्मण ! निश्चय होता है कि, सीवाको राक्षसोंने भक्षण कर लिया अथवा वह उनको हरण कर ले गये ॥ ७ ॥ इसी कारण वह हमको विलाप करते हुए देखकरभी हमारे निकट नहीं आती. हे लक्ष्मण ! इस पर ये मृग यूथगण रोदन करते हैं ॥ ८॥ यह भी माना पही कर रहे हैं कि, राक्षमान सीताका भक्षण कर लिया। हा अच्छे शीलवाली साध्वी । हा वरवर्णिनी समुसि! हा आर्या ! तुम कहां गई हो?॥९॥ अव सी. फरक पनि देशको गमन करना पडेगा, इतने दिनोंके पीछे कैकेयी देवी सफल मनोरथ हुई, क्योंकि अब यह देखेंगी कि, सीता सहित गये थे और आये सी" ॥ १० ॥ किंग पसारमे दम मीता रवि अपने रनराममें प्रवेश करेंगे ?मय लोग हमको पीप, रहित और निर्दयी कहकर निन्दा करेंगे ॥ ११ .
रिना मंग होनेमे निभयही हमको कातरता प्रान हो जायगी. कारण कि, जब हम वनवास करके घरको लौटेंगे और उस समय मिथिलानाथ जनकज
1 12 || गुगल पूगे तो किमत्रकार हम उनको अवलोकन करनेमें समर्थ होंगे ? विदेहराज निभय हमको विना सीताके देखकर ॥ १३ ॥ अपनी पुत्री जानर्क
रितागमे मंत्रहो मोहरू धग हो जायेंगे । पिता दशरथजीही धन्य हैं। क्योंकि वे स्वर्गमें वास करते हैं । अथवा अब हम भरतकी पालित अयोध्यापुरीको न जा.
॥ १४ ॥ अयोध्याकी यात नो एक ओर रही मीनाके विना तो हम स्वर्गकोभी शून्य समझते हैं। इस कारण हे लक्ष्मण ! तुम अब हमको इस वनमें छोडकर ॐ
ध्या चले जाओ ॥ १५॥ हम जानकीके बिना किसी प्रकारभी जीवन धारण करनेको समर्थ नहीं हैं । तुम हमारी ओरसे भलीभाँति भरतजीको गाढ आलं-
कानग्त्वंप्रकाशंहिसीतापनयनेनमे ॥ निवृत्तवनवासश्रजनकमिथिलाधिपम् ॥ १२ ॥ कुशलंपरिपृच्छंतंकथंशक्ष्येनिरीक्षितुम् ॥ विदेहराजोद्र
नमडियाविरहितंतया ॥ १३ ॥ सुताविनाशसंतप्तोमोहस्यवशमेप्यति ॥ " तातएवकृतार्थःसतववसतादिति " अथवानगमिष्यामिपुरीभरत
पारिताम ॥ १२ ॥ स्वगापिहितयाहीनःशून्यएवमतोमम ॥ तन्मामुत्सृज्यहियनेगच्छायोध्यापुरीशुभाम् । १५ । नत्वहंतांविनासीतांजीवेट
रिकथंचन गाढमाश्लिप्यभरतोवाच्योमद्रचनात्वया ॥ १६॥ अनुज्ञातोऽसिरामेणपालयेतिवसुंधराम् ॥ अम्बाचममकैकेयीसुमित्राचत्वया
विमी ।। १७ ॥ कोमल्याचयथान्यायमभिवाद्यागमाज्ञया । रक्षणीयाप्रयत्नभवतासूक्तचारिणा ॥ १८॥ सीतायाश्चविनाशोऽयंममचामित्र
मूदन ॥ विस्तरेणजनन्यामविनिवेद्यस्त्वयाभवेत् ॥ १९॥ इतिपिलपतिराघवेतुदीनेवनमुपगम्यतयाविनासुकेश्या ॥ भयविकलमुखस्तुला
गोऽपियधिनमनाभृशमानुरोपभव ।। २० ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकाण्डे द्विपष्टितमः सर्गः ॥ १२॥
कर पहना ॥ १६ ॥ कि, गमरन्जीने यह आना की है कि, तुमही इस राज्यका पालन करो । हे विभो ! माता कैकेयी व सुमित्रा अपनी मातासे ॥ १७ ॥ ॐ
कागल्याजोगेनगे मल्येकको मागआमानुसार पयायोग्य तुम प्रणाम कह देना और मदा नीके वचनोंसे समझा बुझाकर यल सहित उनकी रक्षाभी करते रहना ॥१८
गरु माग्नगाले ! और मेरी मानाजीने मीतानी व हमारे विनागका वृनान्त भी विस्तार सहित तुम निवेदन कर देना ॥ १९ ॥ श्रीरामचन्द्रजी सुके-
पाक विग्हमें पहा प्यार होकर हम कारमे पिटार करने लगे। तब भयके मारेलक्ष्मणजीका मुख पीला पड़गया मन व्यथित हुआ और वह बहुतही आतुर हो.
॥ २० श्रीमहामापणे पाल्मीकी आदिकाम्ये आरण्पकांडे भापाटीकायां विपरितमः सर्गः ॥ ६२॥
. पा.रा.भा. आर० राजकुमार श्रीरामचन्द्रजी प्रिया पिन हो शोक मोहसे आतुर होने के कारण लक्ष्मणजीको विपाद उत्पन्न कराते हुए आपभी वडे तीव विषादको पान हुए ॥ १ निसके पीछे यह विपुल शोकमें डूबकर लंबे २ शास लेते हुये, रोते २ शोकसे घिरे हुए लक्ष्मणजीको उपस्थित विपदके अनुरूप वचन कहने लगे ॥ २॥ हम सम. है कि हमारी समान युरे कर्म करनेवाला दूसरा पुरुष पृथ्वीपर और नहीं है, देखो एकके पीछे एक इस प्रकार लगातार शोक इकट्ठे होकर हमारे मन और हृदयक: येथे डालते हैं ॥ ३ ॥ पहले जन्ममें हमने इच्छानुसार वारंवार बहुत सारे पाप कर्म किये हैं आज उनका फल मिलरहाहै । इसीकारण हमारे ऊपर दुःसके ऊपर दुःस पड रहे हैं ॥ ४ ॥ राज्यका नाश होना, पिताजीका मरना, माताजीका वियोग होना, और बन्धु वान्धवोंसे छूटना, यह सब बातें जब याद आदी सराजपुत्रःप्रिययाविहीनःशोकेनमोहेनचपींडयमानः । विपादयन्भ्रातरमार्तरूपोभूयोविपादप्रविवेशतीवम् ॥१॥सलक्ष्मणंशोकवशाभिपन्नं शोके निमग्नोषिपुलेतुरामः ॥ उवाचवाक्यव्यसनानुरूपमुणंविनिःश्वस्यरुदन्सशोकम् ॥२॥नमद्विधोदुष्कृतकर्मकारीमन्येद्वितीयोऽस्तिवसुं धरायाम् ॥ शोकानुशोकोहिपरंपरायामामेतिभिंदन्हृदयंमनश्च ॥ ३ ॥ पूर्वमयानूनमभीप्सितानिपापानिकर्माण्यसकृत्कृतानि ॥ तत्रायमद्या पंतितोविपाकोदुःखेनदुःखयदईविशामि ॥ ४॥ राज्यप्रणाशःस्वजनैर्वियोगःपितुर्विनाशोजननीवियोगः ॥ सर्वाणिमेलक्ष्मणशोकवेगमापूर यंतिप्रविचिंतितानि ॥ ५॥ सर्वतुदुःखममलक्ष्मणेदंशांतंशरीरेवनमेत्यकेशम् ॥ सीतावियोगात्पुनरभ्युदीर्णकाप्टेरिवाग्निःसहसोपदीप्तः ॥६॥ सानूनमार्याममराक्षसेनाभ्याताखंसमुपेत्यभीरुः ॥ अप्यस्वरंसुस्वरविप्रलापाभयेनविकंदितवत्यभीक्ष्णम् ॥७॥ तोलोहितस्यप्रियदर्शनस्य सदोचितावुत्तमचंदनस्य ।। वृतीस्तनौशोणितपंकदिग्धौनूनप्रियायाममनाभिपातः ॥८॥ तो हमारे गोकक वेगको परिपूर्ण कर देती हैं ॥ ५ ॥ हे लक्ष्मण ! वनमें आकर सीताके साथ रहनेसे यह सवही दुःख छूट गयेथे बरन शरीरको क्लेशका नाम नहीं जान पड़ताथा, परन्तु आज जानकीके वियोगसे, काष्टके संयोगसे सहसा प्रदीम हुए अनिके समान वही दुःस फिर प्रपल होगये हैं॥६॥ निश्पही कोई सक्षम जन RTी से .. भर हम इस गरीरमे उनको न भेंट सकेंगे । उनका मखमंडल Vघरवाले बालोंके बीचमें शोभित, और सुन्दर, सुमधुर, सुकोमल, और साफ चिकना मँवारा हु। मो जानकीको राक्षसके बरा होनेसे राहुके मुसमें ग्रसेहुये चंद्रमाके समान निश्चय उस मुसकी अब सब सुंदरताई अलग होगई होगी ।। ९ ॥ पतिव्रता प्रियाकी वहस गरदन मदाही हारके गुच्छोंसे भूपित रहतीथी सो रुधिरपान करनेवाले राक्षसोंने शृनमें पाकर निश्चयही उसको भेदकर रुधिरपान किया होगा ।॥ १० ॥ हमारे न हो निर्जन वनमें राक्षसोंने चारों ओरसे घेरकर जब उनको संचना आरंभ किया होगा, तो उस समय वह बडे नेत्रवाली सीताने निचयही कुररीकी समान विलाप . होगा ॥ ११ ॥ हे लक्ष्मण ! हम यह हास्यमुख उदारस्वभाववाली सीता प्रथम हमारे साथ इस शिलातलपर तुम्हारे निकट बैठकर हँसते २ तुमसे कितनी बातें क तपक्ष्णसुव्यक्तमृदुप्रलापंतस्यामुखंकुंचितकेशभारम् ॥ रक्षोवशंनूनमुपागतायानभ्राजतेराहुमुखेयर्थेदुः ॥९॥ तांहारपाशस्यसदोचितां ग्रीवांप्रियायाममसुत्रतायाः ॥ रक्षांसिनूनंपरिपीतवंतिशून्येहिभित्त्वारुधिराशनानि ॥ १० ॥ मयाविहीनाविजनेवनेसारक्षोभिरावृत्यविकृपः माणा॥ नूनंविनादंकुररीवदीनासामुक्तवत्यायतकांतनेत्रा ।। ११॥ अस्मिन्मयासार्धमुदारशीलाशिलातलेपूर्वमुपोपविष्टा ॥ कांतस्मितालक्ष्म जातहासात्वामाहसीतापवाक्यजातम् ॥ १२ ॥ गोदावरीयंसरितांवरिष्ठाप्रियाप्रियायाममनित्यकालम् ॥ अप्यत्रगच्छेदितिचिंतयामिनेव । किनीयातिहिसाकदाचित् ॥ १३ ॥ पद्माननापद्मपलाशनेत्रापद्मानिवानेतुमभिप्रयाता ॥ तदप्ययुक्तंनहिसाकदाचिन्मयाविनागच्छतिपं जानि ।। १४ ॥ कामंत्विदंपुप्पितवृक्षखड्नानाविधैःपक्षिगणेरुपेतम् ॥ वनंप्रयातानुतदप्ययुक्तमेकाकिनीसातिविभेतिभीरुः ॥ १९॥ आ: त्यभोलोककृताकृतनलोकस्यसत्यानृतकर्मसाक्षिन् । ममपियासाकगताहृतावाशंसस्वमेशोकहतस्यसर्वम् ॥ १६॥ थीं ॥ १२ ।। यह नदियोंमें श्रेष्ठ गोदावरीहै, जो हमारी प्रियाको सर्वदाही बहुत प्यारीथी, सो हमारे मनमें यह बातभी आती है कि कदाचित् वह इस नदीके पर पली गहों । परन्तु नहीं वह अकेली यहाँपर कभी नहीं आतीथीं ॥ १३ ॥ तब क्या वह कमलदलके समान नेत्रवाली कमलमुखी जानकी कमल ले पली गई है। यहभी किमी प्रकार ठीक नहीं हो सकता, क्योंकि वह कभी हमारे विना कमल लेने नहीं जातीयीं ॥ १४ ॥ अथवा वह इस पुष्पित वृक्ष गोभित अनेक जानिके विहंगमोंने पूर्ण यह यन अपनी इच्छानुसार देखनेको गई हैं यहभी बात किसी भांति संभव नहीं हो सकती, क्योंकि उनका इरपोक स्वभ ओली पनके मध्य प्रवेग करनेमे यह बहुत डरतीथीं ॥ १५॥ हे भगवन् ! सूर्य ! आप सबके कवारुतको जानते हैं, और सत्य मिथ्या सबके साक्षीभी आपढ़े. ". .
आर० का मोरादपको पाटा दीजिये कि. हमारी प्रिया कहां चलीग अथवा कौन उनको हरकर लेगया ॥ १६ ॥ हे पयन | समस्त लोकोंमें ऐसा कुछ नहीं है लही मारे शान मार्गमें विदिन न होनाहो, इममे पतला दीजिये कि हमारी उन कुलमादारक्षनी सीताने प्राण दिये हैं या वह किसीसे हरी गई भारता मार्ग टिक रही हैं ॥ १७ ॥ जय श्रीरामचन्दनीने गोकयुक्त शरीरसे अचेतन अवस्थामें विलाप करना आरंभ किया तब नीतिशास्रमें स्थित विपीन रे मामिपिसामान उनमे गमपानुमार पचन पोले ॥ १८॥ हे आर्य ! गोक छोडकर धीरज धारण करके उत्साहयुक्तहो जानकीजीको हूँढिये । उत्साही Try कर कार्य करने भी कभी नहीं पाते॥१९॥बडे पौरूपी लक्ष्मणजीने जब ऐसा कहा तब रघुवंशियों में उत्तम श्रीरामचन्द्रजीने उस वचनको चिन्तनीय मोगुमाएननास्तितिनिधत्तेननित्यंविदितं भवेत्तय ॥ शंसस्ववायोकुलपालिनीतामृताहतावापथिवर्ततेवा ॥ १७ ॥ इतीवतंशोकविधेयदे गर्मपिगंतरिलपंतमेव ॥ उयानमामिबिग्दीनसत्त्वोन्याय्येस्थितःकालयुतंचवाक्यम् ॥ १८ ॥ शोकविसृज्याद्यधृतिभजस्वसोत्साहताचास्तु रिमार्गणेस्याः ॥ उत्साहवंतीदिनरानलोकेसीदंतिकर्मस्वतिदुष्करेषु ॥ १९ ॥ इतीवसौमित्रिमुदयपौरुषेयतमातरघुवंशसत्तमः॥ नचिंतयामा गतिविमुक्यान्पुनभदुःसंमहदप्युपागमत् ॥ २० ॥ इत्यार्प श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे त्रिपष्टितमः सर्गः ॥ ६३॥ मदीनोदीनयासालानक्ष्मणपारयमवयीत्।। शीघंलक्ष्मणजानीहिगत्वागोदावरीनदीम् ॥१॥ अपिगोदावरीसीतापमान्यानयितुंगता ॥ एवमुक्त स्तुगमेशामगःपुनरेसहि ॥ २॥ नदीगोदावरीरम्यांजगामलघुविक्रमः ॥ तालक्ष्मणस्तीर्थवतींविचित्वाराममब्रवीत् ॥३॥ नैनांपश्यामि नापुरुोशनोन-शृणोतिमे ।। कंनुमादेशमापनावदेहीक्लेशनाशिनी ॥४॥ मार नगिना परन पर एक पारही धीरजको छोडकर फिर महा दुःसमें वगये ॥२०॥ इत्या श्रीमदावा आदि० अर० भापाटीकायां त्रिपष्टितमः सर्गः ॥६३॥ गरमी दमन र अनुप्परि शेजार इस कारण फिर विलाप करने लगे दीन भावापन्न श्रीरामचन्दजी दीन वचन कह लक्ष्मणजीसे वोले कि, हे लक्ष्मण ! गीय गोगरी नगर जाकर जान आओ।कि, मीना कमल फूल लेनेको तो यहां नहीं चली गई हैं ? जय श्रीगमचन्द्रजीने ऐसा कहा तो लक्ष्मणजी फिर॥२॥ मग पाहे गोदारी नदीर गरे, भीर म रमणीप पाटवाली गोदावरी चागेओर जग २ करके दूँदभाल गमचन्द्रजीमे भीग्रही आकर कहा ॥ ३ ॥ कि.मी पामर नमे न पाया गुमागभी परन्तु उन्होंने न सुना। हे आर्य । पाने कौन देगौ मेगहागणी जानकीनी मीरा
मो उन यूक्ष्म मध्यमस्थान वालीका पता हम नहीं जानते लक्ष्मणजीके वचन सुनकर रामचन्द्र और भी दीन व संवापसे मोहितहो । ५ ॥ श्रीराम
चंरजी आपही गोदावरी नदीके वटपर गये और वहां सडे होकर पूछने लगे कि सीता कहां है ? ॥ ६ ॥ समस्त प्राणियोंने तथा गोदावरी नदी किसीने भी श्रीराम
चन्द्रजीको यह न बताया कि मारे जानेके योग्य राक्षस रावण सीताको हरकर ले गयाहै ॥ ७ ॥ तब पृथ्वी, जल, वायु, अमि, आकारा इन पांच भूतोंने व प्राणियोंने
गोदावरी नदीमे कहा कि रामचन्द्रजीमे सीताको बताओ, और शोच करते हुये रामचन्द्रजीने भी पूछा परंतु गोदावरीने न बताया ॥ ८॥ न बतानेका कारण यह
हुआ कि, रायणका रूप और उन दुष्टात्माके कार्योका स्मरण करनेके मारे भयसे गोदावरीनदीने श्रीरामचन्द्रजीसे सीताको न बताया ॥ ९॥ इस प्रकार जब
नहितवेभियरामयवसातनुमध्यमा ॥ लक्ष्मणस्यवचःश्रुत्वादीनःसंतापमोहितः ॥५॥ रामःसमभिचक्रामस्वयंगोदावरी नदीम् ॥ सतामुप
स्थितोरामःकसीतेत्येवमत्रवीत् ॥ ६॥ भूतानिराक्षसेंद्रेणवधाहेणहृतामपि ॥ नतांशशंसूरामायतथागोदावरीनदी ॥७॥ ततःप्रचोदिताभूतेःशं
सचास्मैप्रियामिति ॥ नवसाह्यवदत्सीतांपृष्टारामेणशोचता ॥८॥ रावणस्यवतद्रूपंकर्मापिचदुरात्मनः ॥ ध्यात्वाभयानुवेदेहींसानदीनशशंसह
॥ ९॥ निराशस्तुतयानद्यासीतायादर्शनेकृतः॥ उवाचरामःसौमित्रिसीतादर्शनकर्शिवः ॥१०॥ एपागोदावरीसौम्यकिंचिन्नप्रतिभापते ॥ किंनु
लक्ष्मणपक्ष्यामिसमेत्यजनकंवचः ॥ ११ ॥ मातरंचैववैदेह्याविनातामहमप्रियम् ॥ यामेराज्यविहीनस्यवनेवन्येनजीवतः ॥ १२ ॥ सर्वव्य
पानयच्छोकंवैदेहीकनुसागता ॥ ज्ञातिवर्गविहीनस्यवैदेहीमप्यपश्यतः ॥ १३ ॥ मन्येदीर्वाभविष्यंतिरात्रयोममजाग्रतः ॥ मंदाकिनीजनस्था
नमिमंप्रथयणगिरिम् ।। १४ ।। सर्वाण्यनुचरिप्यामियदिसीताहिलभ्यते । एतेमहामृगावीरामामीझतेपुनःपुनः ॥ १५ ॥
गोदायगने मीताजीके दर्शनने निराश किया तब श्रीरामचन्द्रजी सीताके विरहमे व्यथित होकर लक्ष्मणजीसे बोले ॥ १० ॥ हे.शुभदर्शन ! यह गोदावरी तो कुछ
भी उनर नहीं देनी परंतु हम सीताके बिना अपने देशमें जाकर पिता जनकजीसे क्या कहेंगे ॥ ११ ॥ और वैदेहीजीकी मातासे बिना जानकीके कैसे अप्रिय वचन
कहेंगे, जो जानकीजी राज्यविहीन बनमें कंद मूलादि भोजन कर जीते हुये हमारे ॥ १२॥ सब शोक अपनयन करतीयीं वह वैदेहीजी कहां गई। हम जाति के लोगोंसे
महायक विहीन होने के कारण और मीताजीका दर्शन न पानेके कारण ॥१३॥ जागरित रहनेसे रात्रि हमको बडी जान पडेगी अब हम मन्दाकिनी नदी जयास्थान और
मरना मरता हुआ यह पर्यत ॥ १४ ॥ इन मयही स्थानों में विचरण किया करेंगे ! जिससे कि सीताजीको देखें । हे वीर! यह मृगगण हमको वार २ देखते हैं ॥ ३५॥
*** पा.रा.भा. आर कारणसे शोकहत हमको वतला दीजिये कि, हमारी मिया कहां चलीगई अथवा कौन उनको हरकर लेगया ॥ १६ ॥ हे पवन ! समस्त लोकों में ऐसा कुछ नहीं है जो नित्यही तुम्हारे ज्ञान मार्गमें विदित न होताहो, इससे बतला दीजिये कि हमारी उन कुलमर्यादारक्षनी सीताने प्राण दिये हैं या वह किसीसे हरी गई हैं अथवा कहीं मार्गमें टिक रही हैं ॥ १७ ॥ जब श्रीरामचन्द्रजीने शोकयुक्त शरीरसे अचेतन अवस्थामें विलाप करना आरंभ किया तब नीविशाबमें स्थित हो अदीन हुये सौमित्रि लक्ष्मण उनसे समयानुसार वचन बोले ॥ १८ ॥ हे आर्य !शोक छोडकर धीरज धारण करके उत्साहयुक्तहो जानकीजीको +दिये । उत्साही पुरुप संसारी दुष्कर कार्य करनेमेंभी कभी नहीं घबडाते॥१९॥बडे पौरुषी लक्ष्मणजीने जब ऐसा कहा तब रघुवंशियोंमें उनम श्रीरामचन्द्रजीने उस वचनको चिन्तनीय लोके सर्वेपुननास्तिकिंचिद्यत्तेननित्यंविदितंभवेत्तव ॥ शंसस्ववायोकुलपालिनीतामृताहृतावापथिवर्ततेवा ॥ १७ ॥ इतीवतंशोकविधेयदेह रामविसंज्ञविलपंतमेव ॥ उवाचसौमित्रिरदीनसत्त्वोन्याय्येस्थितःकालयुतंचवाक्यम् ॥ १८॥ शोकविसृज्यायधृतिभजस्वसोत्साहताचास्तु विमार्गणेस्याः ॥ उत्साहवंतोहिनरानलोकेसीदंतिकर्मस्वतिदुष्करेषु ॥ १९ ।। इतीवसौमित्रिमुदापौरुपंबुवंतमातरघुवंशसत्तमः ॥ नतियामा सधृतिविमुक्तवान्पुनश्चदुःखमहदप्युपागमत् ॥ २० ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे विपटितमः सर्गः ॥ ६३॥ सदीनोदीनयावाचालक्ष्मणवाक्यमब्रवीत्॥ शीघ्रलक्ष्मणजानीहिगत्वागोदावरी नदीम् ॥१॥ अपिगोदावरीसीतापमान्यानयितुंगता । एवमुक्त स्तुरामेणलक्ष्मणःपुनरेवहि ॥ २॥ नदींगोदावरीरम्यांजगामलघुविक्रमः ॥ तालक्ष्मणस्तीर्थवतींविचित्वाराममब्रवीत् ॥३॥ नेनांपश्यामि तीर्थपुक्रोशतोनशृणोतिमे ॥ कंनुसादेशमापनावेदेहीक्लेशनाशिनी ॥४॥ समझकर न गिना वरन वह एक वारही धीरजको छोडकर फिर महा दुःखमें डूवगये ॥२०॥ इत्या श्रीमद्रावा०आदि० अर० भापाटीकायां विपष्टितमः सर्गः ॥६३॥ रावणकी हममें दृढ मनुष्यवृद्धि होजाय इस कारण फिर विलाप करने लगे दीन भावापन्न श्रीरामचन्द्रजी दीन वचन कह लक्ष्मणजीसे बोले कि, हे लक्ष्मण ! शीय गोदावरी नदीपर जाकर जान आओ।।१॥कि, सीता कमल फूल लेनेको तो वहां नहीं चली गई हैं ? जब श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहा तो लक्ष्मणजी फिर॥२॥ शीष २ पग घरके गोदावरी नदीपर गये, और उस रमणीय घाटवाली गोदावरीके चारों ओर जरा २ करके ढूँढभाल रामचन्द्रजीसे शीमही आकर कहा ॥ ३ ॥ कि, हमने सवही घापर यूँदा परन्तु कहींपर उनको न पाया पुकारा भी परन्तु उन्होंने न सुना । हे आर्य! जाने कौन देगमें राहारिणी जानकीजी चलीगई ॥४॥ 教教我我我我其修法生基带其到 || ३३॥ फिर तण वृक्ष पदया । • rnment IIT मागेसा॥11॥भारीमाता / MHT11 ......... सो उन सूक्ष्म मध्यमरथान पाठीका पता हम नहीं जानते लक्ष्मणनीके यचन सुनकर रामचन्द्र और भी दीन प संतापमे मोहितहो ॥ ५ ॥ श्रीगम पाणी आपही गोदापरी नदीके वटपर गये और यहाँ राडे होकर पूछने लगे कि सीता कहाँ है ? ॥ ६ ॥ समस्त प्राणियोंने गया गोदावरी नदी किगीने भी श्रीराम वनजीको यह न पाया कि मारे जाने के योग्य राक्षस रापण सीताफोहरकर ले गयाहे ॥ ७ ॥ तय पूरणी, जल, गायु, अभि, आकाग इन पांच भूगोंने गमाणियोंने गोदावरी नदीसे कहा कि रामपानजीरो सीताको पागो, और गोप करने मे रामनगीने भी पूणा गरंतु गोदामने न पताया ॥ ८॥न पानेका कारण यह दुमा कि, रापणका रुप और उस पृष्टारमाके कापीका स्मरण करो मारे भगरी गोनागरीगनी पीरागमागे गीताको ग पगागा ॥ १॥ इग प्रकार का ननितीगिरामगासातमध्यमा ॥ लक्ष्मणरगागाभानीनगंगापमोनिगः ॥६॥ गगनगगितामांगोरागनी || गमागण सोरामसीतेल्मेमगीत ॥ १॥ भवानिगारणामाणसागनि । मनाशशेगमागतमागीनागिनती II RETildवानीशं पिशामिति ॥ गणसासरशीतषमागणशोमा nan गाणगाना। मामगान गानशेमर RANIगानयासीमामानेकाः ॥ मागमसीनिनिशिकागोमागयोगनिपिनमा मेषः ॥19॥ मातरानावामागविना ॥ मागगग १२ ॥ गग WANTE सातिगतीमानलीगमतः ॥ १३॥ मनोमानामा unitientor मगिरिमागिदिमाविलग ॥ गोमागगानीगगामीrformin 0 1 ॥ ताया। MAITR HATTIKOTTrum पोरे ॥ १ ॥lf Hit in in चाहनाथा पग्नु गवण .. *** यह नय हमारी चदमुनी मीताको नहीं बताते तो हम ...... इधर उधर दमन - श्रीगमचद्रजीन पृथ्वीपर देखा जहां कि राक्षसक ५५५ । .. उपर दाटनी हुई ॥ ३६॥ गक्षमक अनुमरण करनेसे जानकीनीकी पैरोंक चिह्न उन चिह्नाक वा५ .
मलाह
॥२
॥
नदीगोदावरीरम्यांजगामलघुविक्रमः
॥
तालक्ष्मणस्तीर्थवतींविचित्वाराममब्रवीत्
॥३
॥
नेनांपश्यामि
पा.रा.भा.
आर०
कारणसे शोकहत हमको बतला दीजिये कि, हमारी प्रिया कहां चलीगई अथवा कौन उनको हरकर लेगया ॥ १६ ॥ हे पवन ! समस्त लोकोंमें ऐसा कुछ नहीं है
जो नित्यही तुम्हारे ज्ञान मार्गमें विदित न होताहो, इससे बतला दीजिये कि हमारी उन कुलमादारक्षनी सीताने प्राण दिये हैं या वह किसीसे हरी गई हैं
अथवा कहीं मार्गमें टिक रही हैं ॥ १७ ॥ जब श्रीरामचन्द्रजीने शोकयुक्त शरीरसे अचेतन अवस्थामें विलाप करना आरंभ किया तब नीतिशासमें स्थित
हो अदीन हुये सौमित्रि लक्ष्मण उनसे समयानुसार वचन बोले ॥ १८ ॥ हे आर्य !शोक छोडकर धीरज धारण करके उत्साहयुक्तहो जानकीजीको टूडिये । उत्साही
पुरुष संसारी दुष्कर कार्य करनेमेंभी कभी नहीं घबडाते॥१९॥बडे पौरुपी लक्ष्मणजीने जब ऐसा कहा वब रघुवंशियोंमें उत्तम श्रीरामचन्दजीने उस वचनको चिन्तनीय
लोकेषुसर्वेपुननास्तिकिंचिद्यत्तेननित्यंविदितंभवेत्तव ॥ शंसस्ववायोकुलपालिनीतांमृताहृतावापथिवर्ततेवा ॥ १७ ॥ इतीवतंशोकविधेयदेह
रामविसंज्ञविलपंतमेव ॥ उवाचसौमित्रिरदीनसत्त्वोन्याय्येस्थितःकालयुतंचवाक्यम् ॥ १८॥ शोकविसृज्यायुधृतिभजस्वसोत्साहताचास्तु
विमान्णेस्याः॥ उत्साहवंतोहिनरानलोकेसीदंतिकर्मस्वतिदुष्करेषु ॥ १९ ॥ इतीवसौमित्रिमुदापौरुषेत्रुवंतमातंरघुवंशसत्तमः॥ नचिंतयामा
सधृतिविमुक्तवान्पुनश्चदुःखमहदप्युपागमत् ॥२०॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे विपष्टितमः सर्गः ॥ १३॥
सदीनोदीनयावाचालक्ष्मणवाक्यमत्रवीत्॥ शीघ्रलक्ष्मणजानीहिगत्वागोदावरी नदीम् ॥१॥ अपिगोदावरीसीतापमान्यानयितुंगता ॥ एवमुक्त
॥ कंनुसादेशमापनानैदेहीकेशनाशिनी ॥४॥
समझकर न गिना वरन वह एक बारहीधीरजको छोडकर फिर महा दुःसमें डूबगये ॥२०॥ इत्या श्रीमद्रा वा आदि० अर० भापाटीकायां विपष्टितमः सर्गः ॥६३॥
रावणकी हममें दृढ मनुष्यधुद्धि होजाय इस कारण फिर विलाप करने लगे दीन भावापन्न श्रीरामचन्द्रजी दीन वचन कह लक्ष्मणजीसे बोले कि, हे लक्ष्मण !
शीय गोदावरी नदीपर जाकर जान आओ।।१॥कि, सीता कमल फूल लेनेको तो यहां नहीं चली गई हैं ! जय श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहा तो लक्ष्मणजी फिर॥२॥
भीष २ पग धरके गोदावरी नदीपर गये, और उस रमणीय घाटवाली गोदावरीके चारोंओर जरा २ करके ढूँदभाल रामचन्द्रजीसे शीघही आकर कहा ॥३॥
कि, हमने गपही पायपर ट्रॅदा परन्तु कहींपर उनको न पाया पुकारा भी परन्तु उन्होंने न सुना । हे आर्य ! जाने कौन देगमें क्लेशहारिणी जानकीजी चलीगई हैं॥४॥
यन, तपास्वनी पृथ्वीने ॥ २७ ॥ इन पुष्पोंकी रक्षाकीहै, महाबाहु धर्मात्मा श्रीरामच गजीम ऐसा कह ॥ २८ ॥ बहुत सारे झरने जिसमें झररहे ऐसे सामनेवाले पर्वतसे पुकारकर बोले. हे पर्वतश्रेष्ठ ! तुमने क्या उन मी गसुन्दरीको देखाहै ? ॥ २९ ॥ हमारी पिया हमारे विना रमणीय इस वनमें देखीहै ? जब इस पर्वतने इनकी बातका कुछ उनर न दिया तब यह क्रुद्ध होकर उस पर्वनमे बोले जिस प्रकार सिंह छोटे मृगोंसे कडककर बोलताहै ॥ ३० ॥ हे पर्वत ! जबतक हम तुम्हारे शृंग वोड न डालें, वस्तक तुम सोनेकी समान वर्ण वाली हमारी नीनाजीको हमें दिखादो ॥ ३१ ॥ जब श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहा तो मानों वह पर्वत जानकीजीको जानता हुआ श्रीरामचन्द्रजीको वताना अभिरक्षतिपुप्पाणिप्रकुर्वतोममप्रियम् । एवमुक्कामहाबाहुर्लक्ष्मणपुरुपर्पभम् ।। २८॥ उवाचरामोधर्मात्मागिरिप्रस्रवणाकुलम् ॥ कचित्क्षितिभृतां नाथदृष्टासर्वांगसुंदरी ॥ २९ ॥ रामारम्येवनोदेशेमयाविरहितात्वया ॥ कुद्धोत्रवीगिरितवसिंह क्षुद्रमृगंयथा ॥ ३० ॥ तांदमवणांहेमांगींसीता दर्शयपर्वत ।। यावत्सानृनिसर्वाणिनतेविध्वंसयाम्यहम् ॥ ३१ ॥ एवमुक्तस्तुरामेणपर्वतोमैथिलीप्रति दर्शयन्निवतांसीतांनादर्शयतराघवे॥३२॥ ततोदाशरथीरामट्यानचशिलोचयम् ॥ ममवाणामिनिर्दग्धोभस्मीभूतोभविष्यसि ॥३३॥ असेव्यःसर्वतश्चैवनिस्तृणदुमपल्लवः ॥ इमांवासारतं गायशोपयिष्यामिलक्ष्मण ॥ ३४ ॥ यदिनाख्यातिमेसीतामद्यचंद्रनिभाननाम् ॥ एवंप्ररुपितोरामोदिधक्षन्निवचक्षुषा ।। ३५ ॥ ददर्शभूमानि प्कतिराक्षसस्यपदमहत् ॥ वस्तायारामकांक्षिण्याःप्रधावत्याइतस्ततः ।। ३६ ।। राक्षसेनानुसृप्तायावेदेयाश्चपदानितु । ससमीक्ष्यपरिकांतंसी तायारानसस्य ॥ ३७॥ वाहनाथा पग्नु गरणकै भयसे नहीं बताया ॥ ३२ ॥ तब श्रीरामचन्द्रजी उस पर्वतमे फिर बोले कि तुम हमारे बाणानलकी अनंत अभिसे भस्म हो जाओगे ॥ ॥ ३३ ॥ फिर नृण वृक्ष पद्धयादि जल जानेसे कोई तुम्हारा आश्रय न लेगा हे लक्ष्मण ! आज इस गोदावरी नदीकोभी शुष्क करदेंगे ॥ ३४ ॥ यदि यह मन हमारी चंद्रमुखी नीताको नहीं बताते तो हम ऐसाही करेंगे, इस प्रकारसे श्रीरामचंद्रजी कोधान्वित होकर मानों उनको नेवोंसे भस्मही किये देतेथे ॥ ३५॥ पर उपर देखने २ श्रीरामचंदजीने पृथ्वीपर देखा जहां कि राक्षसके चरण चिह्न वनथे, व उसी स्थानपर भयभीत और रामचंद्रजीके दर्शनकी इच्छा किये इधर उपर दीदनी हुई ॥ ३६॥ राक्षसके अनुमरण करनेसे जानकीजीकभी पैरोंके चिह्न उन चिह्नोंके बीचमें बने देखे, सीताजीके व राक्षसके पद एक्रय मिले देख श्रीराम ..पा.मा. आर 1१००॥ न० इनके सफेवोंसे जान पडताहै कि मानों यह हमसे कुछ कहा चाहते हैं, लक्ष्मणजीसे ऐसा कहे उन मृगोंको देख पुरुपश्रेष्ठ श्रीरामचन्द्रजी उन मृगौते बोले।।१६॥हे मृगो! सीता कहां हैं ? यह कहतेही आंसू निकल आये वाणी गद्गद होगई, जव महाराज श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहा तो वह सब मृग सहसा उठ खडे हुए ।। १७ ॥ और जिस दिशाको रावण जानकीजीको हरण कर लेगयाथा उसी दक्षिण दिशाको मुखकर आकाशकी ओर निहार २ देखने लगे ॥ १८ ॥ वह सब मृगगण वारंवार उसी दक्षिण दिशाकी ओर मुखकर, चिघडते, और फिर श्रीरामचन्द्रजीकी ओर देख दक्षिणको दौडते ॥ १९ ॥ मृगगणोंकी यह धावमान होने और शब्दोंकी दशा देख लक्ष्मण जीने उनके हृदयका वृत्तान्त जान लिया ॥ २० ॥ अत्यन्त धीमान् लक्ष्मणजी अपने बडे भाता रामचन्द्रजीसे आरतकी समान बोले कि हे देव ! जर आपने वलकामाइवहिमेइंगितान्युपलक्षये ॥ तांस्तुदृष्ट्वानरव्याघोराघवःप्रत्युवाचह ॥ १६ ॥कसीतेतिनिरीक्षन्वेवाप्पसंरुद्धयागिरा ॥ एवमुक्तानरेंद्रेण तेमृगाःसहसोत्थिताः ।। १७ ।। दक्षिणाभिमुखाःसर्वेदर्शयतोनभःस्थलम् ।। मेथिलीह्रियमाणासादिशंयामभ्यपद्यत ॥ १८॥ तेनमार्गणग च्छंतोनिरीक्षतेनराधिपम् ॥ येनमागचभूमिचनिरीक्षतेस्मतेमृगाः ॥ १९ ॥ पुनर्नदंतोगच्छंतिलक्ष्मणेनोपलक्षिताः ॥ तेपांवचनसर्वस्वलक्षया मासचेंगितम् ॥ २० ॥ उवाचलक्ष्मणोधीमाञ्ज्येष्ठंभ्रातरमार्तवत् ॥ क्वसीतेतित्वयापृष्टायदिमेसहसोत्थिताः ॥ २१॥ दर्शयंतिशितिचेवद क्षिणांचदिर्शमृगाः ॥ साधुगच्छावहेदेवदिशमेतांचनेतीम् ॥२२॥ यदितस्यागमःकश्चिदार्यावासाथलक्ष्यते ॥ वाढमित्येवकाकुत्स्थ प्रस्थितो दक्षिणांदिशम् ॥ २३ ॥ लक्ष्मणानुगतःश्रीमान्वीक्षमाणोवसुंधराम् ॥ एवंसंभापमाणौतावन्योन्यंभ्रातरावुभौ ॥ २४ ॥ वसुंधरायांपतितपुप्प मार्गमपश्यताम् ॥ पुष्पवृष्टिंनिपतितांदृष्ट्वारामोमहीतले ॥ २५ ॥ उवाचलक्ष्मणवीरोदुःखितोदुःखितंवचः ।। अभिजानामिपुप्पाणितानीमा नीहलक्ष्मण ॥ २६ ॥ अपिनद्धानिवैदेह्यामयादत्तानिकानने ॥ मन्येसूर्यश्चवायुश्चमेदिनीचयशस्विनी ॥ २७ ॥ इन मृगोंसे पूछा कि सीता कहां हैं ? तब यह सब एका एक उठ खडे होकर ॥२१॥ दक्षिण दिशाकी ओर पृथ्वीको दिखाने लगे। इस कारण चलिये हम लोगभी इसी दक्षिण दिशाको चले चलें ॥२२॥ क्योंकि कदाचित् आपही सीता वहां मिलजायँ अथवा उनकी प्राप्तिका कोई उपाय मिल जाये, तव श्रीरामचन्द्रजी ऐसाहीहो कहकर दक्षिण दिशाकी ओर चले ॥ २३ ॥ इसके पश्चात् २ लक्ष्मणजी आगे २ आप चले दोनों भाई वन इधर उधर देखते भालते व आपसमें बात चीत करते २ चले ॥ २४ ॥ आगे चलकर देखा तो कहींपर फूल पडे हैं । पृथ्वीपर फूलों की वृष्टि पडी देखकर श्रीरामचन्द्रजी ॥ २५ ॥ पडे दासित हो दुःखित लक्ष्म णजीसे वोले, कि हे लक्ष्मण ! हम जानते हैं कि यह यही पुष्पहें ॥ २६ ॥ जो हमने पैदेहीजीको दियेथे और उन्होंने यह गप अपने अंगोंमें धारण कियेथे, यह ॥१०
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(पडाहै ॥ ४५ ॥ जो जगह २ पटकने वंदेमारनेसे टूट गयाहै । यह किसीके रथके लम्बे २ बाणभी सुषणक विभुपणास भूपि ॥ १८ ॥ह लक्ष्मण ! टूट फूट पड ह
जिनको देखनेसे भय उत्पन्न होताहै। वाणोंसे पूर्ण किसीके तूणीरभी पृथ्वी में पडे हैं ॥ ४९ ॥ देखो ! चाबुक और बाग हायमें लिये किमीका माथिभी मृतक पस
है। देसी यह किसी पुरुपराक्षसके जानेका प्रगट मार्ग बनाहै ॥ ५० ॥ हे शुभदर्शन 1 किस कारण से अतीव कठिनहृदय काममा निगाचरगणोंके महित हमारा
पहलेसे शवगुण अधिक वैर होगया तुम देसलेना कि इससे उनके जीवनका अंत होगा ॥ ५३ ॥ या तो राक्षोंने सीताको हर लिया चा भक्षण कर लिया, अया
उन तपस्विनीने प्राणत्याग करदिया होगा; किन्तु जर इस महाअरण्यमें जानकीजी मरणके निकट पहुँची तब पतिवत धर्मनेभी उनकी रक्षा न की ।। ५२ ॥
हे लक्ष्मण ! इस प्रकार से जब कि जानकी हरी गई और उम समय धर्मनेभी उनकी रक्षा न की तय मंसारमें ईश्वरीयशक्तिसम्पन्न और कौन पुरुष हमारा प्रिय करने में
अपविद्धश्चभग्नश्चकस्यसांयामिकोरथः ॥ रथाक्षमात्राविशिखास्तपनीयविभूपणाः ॥ १८ ॥ कस्येमेनिहतावाणा प्रकीर्णावोरदर्शनाः ॥
शराबरीशरैःपू विध्वस्तीपश्यलक्ष्मण ॥ १९ ॥ प्रतोदाभीपुहस्तोऽयंफस्यवासारथिहतः ॥ पदवीपुरुषस्येपाव्यक्तंकस्यापिरक्षसः ॥५०॥
वरंशतगुणपश्यममतेजीवितान्तकम् ।। सुघोरहृदयैःसौम्यराक्षसे कामरूपिभिः ॥५१॥ हतामृतावावेदेहीमतितावातपस्विनी ॥ नधर्मत्रायते
सीतांद्वियमाणांमहावने ॥ १२ ॥ भक्षितायांहिवेदेह्यांहृतायामपिलक्ष्मण । केहिलोकप्रियंकतुशता सौम्यममेश्वराः ॥५३॥ कर्तारमपिलोका
नांगरंकरुणवेदिनम् ॥ अज्ञानादवमन्येरन्सर्वभूतानिलक्ष्मण ॥ ५४ ॥ मृदुलोकहितेयुक्तंदतिंकरुणवेदिनम् ।। निर्यिइतिमन्यतेनूनमांत्रिदशे
श्वराः ।। ५५ ॥ ममाप्यहिगुणोदोपःसंवृत्तः पश्यलक्ष्मण ॥ अद्यैवसर्वभूतानांरक्षसामभवायच ॥५६॥ संहत्येवशशिज्योत्स्रांमहान्सूर्यइयो
दितः ॥ संहत्यैवगुणान्सन्मिमतेजःप्रकाशते ॥ १७ ॥
ममर्थ होगा? ॥ ५३॥ प्राणीगण इनही सब कारणोंसे अज्ञानमयुक्त समस्त लोकोंक कर्ता मुझ परमदयालु सुरखर परमेश्वरको नहीं मानते हैं ॥ ५४ ॥ हमारा
स्वभाव अतिशय कोमलहै, और सर्वदाही हम सब लोकोंका हितकार्य करते हैं और करुणा सहित उनका शुभाशुभ विधान करते हैं परन्तु हम सीताका उद्धार न करसके,
इस कारण इन्द्रादि देवता गण निश्चयही हमको वीर्यरहित समझेंगे ॥ ५५ ॥ हे लक्ष्मण ! विचार करके देखो! कि हमको प्राप्त होकर दया दाक्षिण्यादि समस्त
गुण दोषरूपमें बदल गये इन दोपोंसे हम छिप गये, अब कोई हमको पराकमवान् नहीं समझता इस्से अभी सर प्राणी व राक्षसों का नाश करनेके लिये ॥ ५६ ॥
चन्द्रमाकी चांदनीको मिटाय, महासूर्यके समान उदयवद हमारा प्रकाश देखो, जो कि सुशीलता इत्यादि गुणोंको छोड अब सबको ठीककरनेहैं ॥ ५७ ॥
वा.रा.भा. ॥१०॥ आर स० चन्द्रजीते बडा कोध किया ॥ ३७ ॥ धनुप व तूणीर ( नरकस) कोभी टूटा फूटा पृथ्वीपर पड़ा देख रथकोभीरती २ चूर्ण देख व्याकुलहो चकित होते हुये श्रीराम चन्द्रजी अपने प्यारे भातासे बोले ॥ ३८ ॥ हे लक्ष्मण ! देखो जानकीजीके गहनोंके सुवर्णविन्दु और बहुत सारी मालायें यहां पर टूटी पड़ी हैं ॥ ३९ ॥ हे भइया ! इस और देखो भूमिमें चारों ओर सुवर्णबिन्दुसम विचित्रित रक्तबिन्दुसमूह छिटक रहे हैं यह सीताका वो रुधिर नहीं है ।। १० ।। हे भइपा, लक्ष्मण! हमको जान पडताहै कि कामरूपी राक्षसोंने जानकीजीके खंड २ कर आपसमें बांटचंट उनको खाडाला ४३ ॥ हे लक्ष्मण ! ऐसा समझमें आताहै कि सीताके लिये झगडा होनेमे यहां दो राक्षसोंका घोर युद्ध हुआथा इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ ४२ ॥ हे सौम्य ! किसीका यह मुक्तामणिसे बना हुआ रमणीय विभूषित धनुप पृथ्वीपर भग्नंधनुश्चतूणीचक्किीणबहुधारथम् ॥ संभ्रांतहृदयोरामःशशंसभातरंग्रियम् ॥ ३८॥ पश्यलक्ष्मणवेदेह्याःकीर्णाःकनकविंदवः ।। भूपणानांहिसा मित्रेमाल्यानिविविधानिच ॥ ३९॥ तप्तविंदुनिकाशेश्वचित्रःक्षतजविंदुभिः ॥ आवृतंपश्यसौमित्रेसर्वतोधरणीतलम् ॥४०॥ मन्येलक्ष्मणने देहीराक्षसे कामरूपिभिः॥ भित्त्वाभित्त्वाविभक्तावाभक्षितावाभविष्यति ॥ ४१ ॥ तस्यानिमित्तंसीतायाद्वयोर्विवदमानयोः ॥ वभूवयुद्धंसी मित्रघोरं राक्षसयोरिह ॥ ४२ ॥ मुक्तामणिचितंचेदंरमणीयविभूषितम् ॥ धरण्यांपतितंसौम्यकस्यभनमहदनुः ॥ ४३ ॥ राक्षसानामिदंवत्स सुराणामथवापिका ॥ तरुणादित्यसंकाशंवेदूर्यगुलिकाचितम् ॥ ४४ ॥ विशीणपतितंभूमौकवचंकस्यकांचनम् ॥ छत्रंशतशलाकंचदिव्यमा ल्योपशोभितम् ॥४५॥ भगदंडमिदंसौम्यभूमौकस्यनिपातितम् ॥ कांचनोरच्छदाश्चेमेपिशाचवदना खराः ॥ ४६॥ भीमरूपामहाकायाक स्यवानिहतारणे ॥ दीप्तपावकसंकाशोद्युतिमान्समरध्वजः ॥ १७ ॥ ************************************* टूटा हुआ पढाहै ॥ ४३ ॥ हे वत्स ! या तो यह धनुप राक्षसोंका है वा देवताओंका है प्रातःकालके सूर्यको समान अरुण (लाल ) पैदूर्यमाणकी मूठ इसमें लगीहै ॥ ४४ ॥ किसीका यह सुवर्णका कवचभी रत्ती २ टूटा फूटा हुआ पृथ्वीपर पडाहै और यह शत २ शलाकासमन्धित दिव्यमालाशोभित छत्र किसका भूमि पर पडाहै ॥४५॥ हे सौम्प ! इसका दंडा टूट गया किसने तोडाहै व मोनेकी गर्दनी पडी पिशाचों समान मुसवाले गधे भी ॥ ४६॥ महा भयंकर व पडे आका खाले किमी रणने मरे पडे हैं । फिर दीनिमान् अनिके समान अतिदेदीप्यमान ममरमें स्वामीका प्रकाश करनेयाला TITM
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पडाहै ॥ ४७ ॥ जो जगह २ पटकने व दे मारनेसे टूट गयाहै । यह किसीके रथके टम्चे २ वाँणभी सुवर्णके विभूषणोंसे भूपिव ।। १८॥ हे लक्ष्मण ! टूटे फूटे पडे है
जिनको देखनसे भय उत्पन्न होता है । बाणोंसे पूर्ण किसीके तूणीरभी पृथ्वीमें पडे हैं ॥ ४९ ॥ देखो ! चाबुक और बाग हाथमें लिये किमीका माथिभी माफ पड़ा
है । देखो यह किसी पुरुपराक्षसके जानेका प्रगट मार्ग बनाहै ॥ ५० ॥ हे शुभदर्शन ! किस कारण से अतीव कठिनहृदय कामरूप निशाचरगणोंके महित हमारा
पहलेमे शतगुण अधिक वैर होगया ? तुम देसलेना कि इससे उनके जीवनका अंत होगा ॥ ५० ॥ या तो राममोंने सीताको हर लिया वा भक्षण कर लिया, अथवा
उन तपस्विनीने प्राणत्याग करदिया होगा; किन्तु जब इस महाअरण्यमें जानकीजी मरणके निकट पहुँची तब पतिव्रत धर्मनेभी उनकी रक्षा न की ।। ५२ ॥
हे लक्ष्मण ! इस प्रकारसे जब कि जानकी हरी गई और उस समय धर्मनेभी उनकी रक्षा न की तब संसारमें ईश्वरीयशक्तिसम्पन्न और कौन पुरुप हमारा प्रिय करने में
अपविद्धश्चभग्नश्चकस्यसांयामिकोरथः ॥ स्थाशमानाविशिखास्तपनीयविभूपणाः ॥ १८ ॥ कस्येमेनिहताबाणा:प्रकीर्णावोरदर्शनाः ।।
शराबरीशरैःपूर्णाविध्वस्तीपश्यलक्ष्मण ॥ १९॥ प्रतोदाभीपुहस्तोऽयंकस्यवासारहितः ॥ पदवीपुरुपस्येपाव्यक्तंकस्यापिरक्षसः ॥५०॥
वरंशतगुणंपश्यममतेजीवितान्तकम् ॥ सुवोरहृदयैःसौम्पराक्षसे कामरूपिभिः ॥५१॥ हतामृतावावेदेहीभक्षितावातपस्विनी ॥ नधर्मस्वायते
सीतांद्रियमाणांमहावने ।। ५२ ॥ भक्षितायांहिवेदेह्यांहतायामपिलक्ष्मण ॥ केहिलोकप्रियंकर्तुशक्ताःसौम्यममेश्वराः ॥ ५३॥ कर्तारमपिलोका
नांशुरंकरुणवेदिनम् ॥ अज्ञानाद्वमन्येरन्सर्वभूतानिलक्ष्मण ।। ५४ ॥ मृदुलोकहितेयुक्तंदांतंकरुणवेदिनम् ॥ निर्वीर्यइतिमन्यतेनूनमांत्रिदशे
श्वराः ॥ ५५ ॥ मांप्राप्यहिगुणोदोपःसंवृत्तःपश्यलक्ष्मण ॥ अद्येवसर्वभूतानांरक्षसामभवायच ॥ ५६ ॥ संहत्येवशशिज्योत्यांमहान्सूर्यइयो
दितः ॥ संहत्येवगुणान्सर्वान्ममतेजःप्रकाशते ॥ १७ ॥
ममर्थ होगा? ॥ ५३ ॥ प्राणीगण इनही सब कारणोंसे अज्ञानप्रयुक्त समस्त लोकोंके कर्ता मुझ परमदयालु सुरखर परमेश्वरको नहीं मानते हैं ॥ ५४ ॥ हमारा
स्वभाव अनिगय कोमलहै, और सर्वदाही हम सब लोकोंका हितकार्य करते हैं और करुणा सहित उनका शुभाशुभ विधान करते हैं परन्तु हम सीताका उद्धार न करसके,
इस कारण इन्द्रादि देवता गण निश्चयही हमको वीर्यरहित समझेंगे ॥ ५५ ॥ हे लक्ष्मण ! विचार करके देखो! कि हमको प्रान होकर दया दाक्षिण्यादि समस्त
गुण दोपरूपमें बदल गये इन दोपोंसे हम छिप गये, अब कोई हमको पराक्रमवान् नहीं समझता इसे अभी सब प्राणी व राक्षसोंका नाश करनेके लिये ॥ ५६ ॥
चन्द्रमाकी चांदनीको मिटाय, महासूर्यके समान उदयवत् हमारा प्रकाश देखो, जो कि सुशीलवा इत्यादि गुणों को छोड अब सबको ठीककरतेहैं ॥ ५७ ॥
आर वा.रा.भा. ॥१०॥ न० चन्द्रजीने बडा क्रोध किया ॥ ३७ ॥ धनुप व तूणीर ( वरकस) कोभी टूटा फूटा पृथ्वीपर पड़ा देख स्थकोभी रत्ती २ चूर्ण देस व्याकुलहो चकित होते हुये श्रीराम चन्द्रजी अपने प्यारे भातासे बोले ॥ ३८ ॥ हे लक्ष्मण ! देखो जानकीजीके गहनोंके सुवर्णविन्दु और बहुत सारी मालायें यहां पर टूटी पड़ी हैं ॥ ३९ ॥ हे भइया ! इस ओर देखो भूमिमें चारों ओर सुवर्णबिन्दुसम विचित्रित रक्तबिन्दुसमूह छिटक रहे हैं यह सीताका वो रुधिर नहीं है ॥ ४० ॥ हे भइया, टमण ! हमको जान पडताहै कि कामरूपी राक्षसोंने जानकीजीके खंड २ कर आपसमें बांटचंट उनको खाडाला ॥ ११ ॥ हे लक्ष्मण ! ऐसा समझमें आताहै कि नीताके लिये अगडा होनेसे यहां दो राक्षसोंका घोर युद्ध हुआथा इसमें कुछ सन्देह नहीं ॥ ४२ ॥ हे सौम्य ! किसीका यह मुक्कामणिसे बना हुआ रमणीय विभूषित पनुप पृथ्वीपर भग्नंधनुश्चतूणीचविकीर्णबहुधारथम् ॥ संभ्रांतहृदयोरामःशशंसभ्रातरंप्रियम् ॥३८॥ पश्यलक्ष्मणवेदेयाःकीर्णाःकनकविंदवः॥ भूपणानांहिसाँ मित्रेमाल्यानिविविधानिच ॥ ३९॥ तप्तविंदुनिकाशैश्चचिःक्षतजविंदुभिः ॥ आवृतंपश्यसौमित्रेसर्वतोधरणीतलम् ॥४०॥मन्येलक्ष्मण देहीराक्षसै:कामरूपिंभिः ॥ भित्त्वाभित्त्वाविभक्तावाभक्षितावाभविष्यति ॥४१॥ तस्यानिमित्तंसीतायादयोर्विवदमानयोः ॥ बभूवयुद्धती मित्रवोरं राक्षसयोरिह ॥ ४२ ॥ मुक्तामणिचितंचेदंरमणीयंविभूपितम् ॥ धरण्यांपतितंसौम्यकस्यभनमहद्धनुः ॥ ४३ ॥ राक्षसानामिदंवत्स सुराणामथवापिवा ॥ तरुणादित्यसंकाशंवेदूर्यगुलिकाचितम् ॥ ४४ ॥ विशीणपतितंभूमौकवचंकस्यकांचनम् ॥ छत्रंशतशलाकंचदिव्यमा ल्योपशोभितम् ॥१५॥ भगदंडमिदंसौम्यभूमौकस्यनिपातितम् ॥ कांचनोरच्छदाश्चमेपिशाचवदनाःखराः॥ ४६॥ भीमरूपामहाकायाक स्यवानिहतारणे ॥ दीप्तपावकसंकाशोद्युतिमान्समरध्वजः ॥ १७ ॥ - टूटा हुआ पडाहै ॥ ४३ ॥ हे वत्स ! या तो यह धनुप राक्षसोंका है या देवताओंका है प्रातःकाटके सूर्यको समान अरुण ( लाल ) वैदूर्यमणिकी मुठ इसमें लगीहै ।। ४४ ॥ किसीका यह सुवर्णका कवचभी रनी २ टूटा फूटा हुआ पृथ्वीपर पढाहै और यह शत २ शलाकासमन्वित दिव्यमालाशोभित ठप किसका भुमि पर पडाहै ।। ४५॥ हे मौम्य ! इसका दंडा टूट गयाहै किसने तोडाह व मोनेकी गर्दनी पडी पिशाचों समान मुसयाले गधे भी ॥ ४६॥ महा भयंकर प पडे भाका खाले किमीके रण में मरे पडे हैं । फिर दीनिमान् अनिके ममान अनिदेदीप्यमान गमरमें स्यामीका प्रकाश करनेवाला ध्वजायुतः किसीका युद्ध काम देनेपाछा रपभी
T,सुरअसुर, यश और राक्षो ममस्तही ठोक ।। ६७ ॥ हमारे याणजालसे खंड २ होकर गिरेंगे आज हम वाणोंको छोडकर इन समस्त लोकोंको - ६
मयांदा गन्य करेंगे ।। ६८.॥ हे लक्ष्मण ! प्रिया वैदेहीजी मरही गईहों अथवा हरही गईहो सो किसी अवस्थामें हों यदि ब्रह्मादि देवगण उन्हें हमको न
दहें ॥३॥ हम नगर सहित इस मर जगतका विनाश कर डालेंगे और जबतक हम सीताको न देख पावेंगे तबतक वाणोंसे चराचरको संतापित
कांगे ॥ ७० ॥ यह कहकर क्रोधमे श्रीरामचन्द्रजीकी आंखें लाल २ हो आईं, होठ फडकने लगे, श्रीरामचन्द्रजीने चीर वल्कल मृगचर्म और जटाजूट कसकर
बांधा ॥ ७१ ॥ उन कालमें धीमान रामचन्द्रजीने कोधित होकर जब ऐसे कार्यका अनुष्ठान किया तब उनका देह ऐसा प्रतिभात होने लगा कि जैसे पूर्व
बहुधानिपतिप्यंतिवाणीवेःशकलीकृताः॥निर्मर्यादानिमाल्लोकान्करिष्याम्यवसायकैः॥६॥हतामृतांवासौमिनदास्यंतिममेश्वराः ॥ तथारूपां
विदेहोंनदास्यतिदिप्रियाम् ॥ ६९ ॥ नाशयामिजगत्सर्वत्रेलोक्यंसचराचरम् ।। यावदर्शनमस्यावतापयामिचसायकैः ॥ ७० ॥ इत्युकाको
पताम्रातःस्फुरमागोष्टसंपुटः ॥ वल्कलाजिनमावध्यजदाभारमबंधयत्॥७१ ॥ तस्यक्रुद्धस्यरामस्यतथाभूतस्यधीमतः॥ चिपरंजनुपःपूर्वरुद्रस्ये
परभीतनुः ॥ ७२ ॥ लक्ष्मणादथचादायरामोनिप्पीडयकार्मुकम् ॥ शरमादायसंदीप्तंघोरमाशीविपोपमम् ॥ ७३ ॥ संदधेवनुपिश्रीमात्रामः
परपुरंजयः । युगांतानिरिखकुदइदंवचनमब्रवीत् ।। ७१ ॥ यथाजरायथामृत्युर्यथाकालोयथाविधिः॥ नित्यनप्रतिहन्यतेसर्वभूतेपुलक्ष्मण ॥
नथाहकोधर्मयुक्तोननिवायास्म्यसंशयम् ।। ७५ ॥ पुरेवमेचारुदतीमनिंदितांदिशंतिसीतांयदिवायमैथिलीम् ।। सदेवगंधर्वमनुष्यपनगंजगत्सशेलं
परिवर्तयाम्यहम् ॥ ७६ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे चतुःपष्टितमः सर्गः ।। ६४ ॥
काठमें गहनी विपुर वर करनेको नेपार हुपये ॥ ७२ ॥ अनन्तर उन्होंने लक्ष्मणजीके निकटसे धनुप ग्रहण कर और दृढ रूपमे धार करके सर्पसदृश घोर
दीन नायक ॥ ५३॥ श्रीरामचन्द्रजीने उन धनुप पर चढाया । और प्रलयकालकी अनिके समान कोषमें भरकर कहने लगे ॥ ७४ ॥ हे लक्ष्मण ! जरा,
मृग, काल, और विधि यह गप जिग प्रकारमे प्राणिमात्रके रोकनेने नहीं रुक सकते, वैसेही हम क्रोधित हुए हैं । निःसन्देह कोई हमको निवारण नहीं कर
मंगा ।। ७.५॥ सुदन्तगुना निन्दा रहित मिथिलराजनंदिनी सीताको चिना प्राप्त हुए हम देव, गन्धर्व, मनुष्य, पन्नग और पर्वन सहित समस्त जगत् मर्दित
इत्या श्रीमदामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां चतुःपटिवमः सर्गः ॥ ६४ ॥
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राग ॥ ७६॥
रा.ग.पा. आर 11.20 स० mmनुम देसा रहा कि अब यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, राक्षस, किनर, या मनुष्य कोईभी सुख प्राप्त करनेको समर्थ नहीं होगा ।। ५८॥ हे लक्ष्मण ! आज हमारे पाणनमूहले गमन आकाश व्यान हो जायगा, देसो आज हम त्रिलोकवासी प्राणियोंके गमनागमन रोक देते हैं आज हम त्रिलोकीको कालके कवरमें निक्षेप फगे ॥ ५९ ॥ जब हम मयका गमनागमन रोक देंगे तो इससे ग्रहों की चाल रुक जायगी चंद्रमा अन्तर्हित हो जायगे, वायु, अमि, और सूर्य इत्यादिकी युतिके मागहोगमे, नर जगह गाटा अंधकार छा जायगा ॥६० ॥ सबही शैलशिखर मथित हो जायगे, समुद्र सूख जायगे, वृक्षलता और गुल्म विध्वंस होजायगे, और पन एक नाधड़ी उजड जायगे ॥ ६१॥ हम तीनों लोकोंका नाश करदेंगे यदि इन्द्रादि देवगण मंगलमय जानकीजीको न देदेंगे ॥ ६२ ॥ तो हमारा पराक्रम नेपयक्षानगंधर्वानपिशाचानराक्षसाः । किनरावामनुप्यावासुखंप्राप्स्यतिलक्ष्मण ॥५८ ॥ ममास्त्रवाणसंपूर्णमाकाशंपश्यलक्ष्मण ॥ असं पातंकरिप्यामियोलोक्यचारिणाम् ॥ ५९॥ सनिरुद्धग्रहगणमावारितनिशाकरम् ॥ विप्रनटानलमरुद्भास्करद्युतिसंवृतम् ॥ ६० ॥ विनि मंभितशैलायंशुप्यमाणजलाशयम् ॥ ध्वस्तद्रुमलतागुल्मविप्रणाशितसागरम् ॥ ६१ ॥ लोक्यंतुकरिष्यामिसंयुक्तंकालकर्मणा ।। नतेकुश लिनीसीतांप्रदास्यंतिममेश्वराः ॥ ६२ ।। अस्मिन्मुहूर्तेसौमित्रेममद्रक्ष्यतिविक्रमम् ॥ नाकाशमुत्पतिष्यंतिसर्वभूतानिलक्ष्मण ॥ ६३ ॥ समा कुलममर्यादजगत्पश्याद्यलक्ष्मण ॥ आकर्णपूर्णरिपुभिर्जीवलोकदुरावरैः ॥ ६४ ॥ करिष्येमैथिलीहेतोरपिशाचमराक्षसम् ॥ ममरोपप्रयुक्तानां पिशिखानविलंसुगः ॥ ३५ ॥ द्रक्ष्यत्ययविमुक्तानाममपीद्दूरगामिनाम् ॥ नेवदेवानदेतेयानपिशाचानराक्षसाः ॥६६॥ भविष्यंतिममक्रोधा चेल्लोरमेऽपिप्रणाशिते ॥ देवदानवयक्षाणांलोकायेरक्षसामपि ॥ ६७ ॥ देगना. लक्ष्मण ! इमी मुहूर्तमें व हमारे पराक्रमको देखें कि, इस समय आकाशमेभी कूदकर कोई न बच सकेगा ॥६३ ॥ हे लक्ष्मण ! आज हमारे गारर गो टेर्वे गरजालले निरन्तर मर्दित होकर सब जगत् महान्याकुल मर्यादाशून्य हो जायगा, और मृग व पक्षीगण सवही सवभाँतिसे भान्त और पिन मोजांगे ॥ १४ ॥ आज हम मीताके लिये काननक प्रत्यंचा संच छोडे हुए वाणोंमे सब संसार पिशाच और राक्षसोंसे रहित कर देंगे ॥ ६५॥ इस गंमाग्ने गोभी हमारे दन बाणाको निवारण नहीं करसकेगा, आज देवता लोग देखेंगे कि ममूहके समूह याण हम करके रोप और क्रोध भरकर चलाये हुए दिलनी पर पाकर गिरते न देपता न दैत्य न पिगार न राक्षम ॥६६॥ जय हमारे कोधमे तीनों लोकोंका नारा दुभा तथ कोईभी रक्षा न पायेगा अधिक ***
राक, सुर, असुर, यक्ष और राक्षमोंके ममस्वही लोक ।। ६७ ॥ हमारे वाणजालसे संड २ होकर गिरेंगे आज हम पाणोंको छोडकर इन समस्त लोका
मयांदा गन्य कंग्गे ॥ ६८. हे लक्ष्मण ! प्रिया वैदेहीजी मरही गईहों अथवा हरही गईहों सो किसी अवस्था हो यदि ब्रह्मादि देवगण उन्हें हम
ददै ॥ ३१ ॥ हम चगचर सहित इस सत्र जगतका विनाश कर डालेंगे और जबतक हम सीताको न देख पावेंगे तबतक वाणोंसे चराचरको संता
कंग्गे ॥ ७० ॥ यह कहकर क्रोधसे श्रीरामचन्दजीकी आंखें लाल २ हो आई, होठ फडकने लगे, श्रीरामचन्द्रजीने चीर वल्कल मृगचर्म और जटाजूट कम
७१ ॥ उम कालमें धीमान् रामचन्द्रजीने कोधित होकर जब ऐसे कार्यका अनुष्ठान किया तब उनका देह ऐसा प्रतिभात होने लगा कि जी
बांधा
बहुधानिपतिप्यंतिवाणीधेःशकलीकृताः॥निर्मर्यादानिमाल्लोकान्करिष्याम्यवसायकैः॥६८॥हतांमृतावासौमित्रेनदास्यंतिममेश्वराः॥तथारूगां
दिवंदहीनदास्यंतियदिप्रियाम् ॥ ६९॥ नाशयामिजगत्सर्वत्रेलोक्यंसचराचरम् ।। यावदर्शनमस्यावतापयामिचसायकेः ॥ ७० ॥ इत्युक्त्वा ।
यताम्रानःस्फुरमाणोष्ठसंपुटः॥ वल्कलाजिनमावध्यजटाभारमवंधयत् ।। ७१ ॥ तस्यकुद्धस्यरामस्यतथाभूतस्यधीमतः॥ त्रिपरंजनुपःपूर्वरुदन्न
मौतनुः ।। ७२ ॥ लक्ष्मणादथचादायरामोनिप्पीडयकार्मुकम् ॥शरमादायसंदीप्तंचोरमाशीविपोपमम् ।। ७३ ॥ संदधेधनुपिश्रीमात्रामः
: ॥ युगांताग्निरिवकुद्धइदंवचनमब्रवीत् ॥ ७ ॥ यथाजरायथामृत्युर्यथाकालोयथाविधिः ॥ नित्यंनप्रतिहन्यतेसर्वभूतेपुलक्ष्मण ।।
थाहकोधसंयुक्तोननिवास्म्यिसंशयम् ॥ ७९ ॥ पुरेखमेचारुदतीमनिंदितांदिशंतिसीतांयदिवाद्यमेथिलीम् ॥ सदेवगंधर्वमनुष्यपन्नगंजगत्सर्शन
याम्यहम् ॥ ७६ ।। इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे चतुःपष्टितमः सर्गः ॥ ६ ॥
मनी मिपुर वर करनेको तैयार हुाथे ॥ ७२ ॥ अनन्तर उन्होंने लक्ष्मणजीके निकटसे धनुप ग्रहण कर और दृद्ध रूपमे धार करके सर्पसहर
गायक ।। ७३ ॥ श्रीरामचन्द्रजीने उन धनुप पर चढाया । और प्रलयकालकी अनिके समान क्रोधर्मे भरकर कहने लगे ॥ ७४ ॥ हे लक्ष्मण ! म.
3, और विधि यह मप जिस प्रकारमे प्राणिमात्रके रोकनेते नहीं रुक सकते, वैसेही हम कोषित हुए हैं । निःसन्देह कोई हमको निवारण नहीं है।
मकंगा ।। ७.५॥ सुदन्तयुका निन्दा रहित मिथिलराजनंदिनी सीताको बिना प्राप्त हुए हम देव, गन्धर्व, मनुष्य, पन्नग और पर्वत सहित समस्त जगत् नः
कर डालेंगे ॥ ७६ ॥ इत्या श्रीमामायणे वाल्मीकीये आदिकाधे आरण्यकाण्डे भापाटीकायां चतुःपटिवमः सर्गः ॥ ६४ ॥
पा.रा.भा. आर ॥१०२॥ लक्ष्मण ! तुम देखते रहो कि अव यक्ष, गन्धर्व, पिशाच, राक्षस, किन्नर, वा मनुष्य कोईभी सुख प्राप्त करनेको समर्थ नहीं होगा ।। ५८॥ हे लक्ष्मण ! आज हमारे पाणसमूहमे समस्त आकाश व्याप्त हो जायगा, देखो आज हम त्रिलोकवासी प्राणियोंके गमनागमन रोक देते हैं आज हम त्रिलोकीको कालके कवरमें निक्षेप करेंगे ॥ ५९ ॥ जब हम सबका गमनागमन रोक देंगे तो इससे ग्रहों की चाल रुक जायगी चंद्रमा अन्तर्हित हो जायगे, वायु, अमि, और सूर्य इत्यादिकी युतिके नाशहोनेसे, सब जगह गाढा अंधकार छा जायगा ॥ ६० ॥ सबही शैलशिखर मथित हो जायगे, समुद्र सूख जायगे, वृक्षलता और गुल्म विध्वंस होजायगे, और वन एक साथही उजड जायगे ॥ ६१ ॥ हम तीनों लोकोंका नाश करदेंगे यदि इन्द्रादि देवगण मंगलमय जानकीजीको न देदेंगे ॥ ६२ ॥ तो हमारा पराक्रम नेवयक्षानगंधर्वानपिशाचानराक्षसाः ॥ किन्नरावामनुप्यावासुखंप्राप्स्यतिलक्ष्मण ॥५८ ॥ ममास्त्रवाणसंपूर्णमाकाशंपश्यलक्ष्मण ॥ असं पातंकरिष्यामिपद्यत्रैलोक्यचारिणाम् ॥ ५९॥ सन्निरुद्धग्रहगणमावारितनिशाकरम् ॥ विप्रनष्टानलमरुद्भास्करद्युतिसंवृतम् ॥ ६॥ विनि मथितशेलाग्रंशुप्यमाणजलाशयम् ॥ ध्वस्तद्रुमलतागुल्मविप्रणाशितसागरम् ॥ ६ ॥ चेलोक्यंतुकरिष्यामिसंयुक्तंकालकर्मणा-॥ नतेकुश लिनीसीतांप्रदास्यंतिममेश्वराः ॥६२॥ अस्मिन्मुहूर्तेसौमित्रेममद्रक्ष्यतिविक्रमम् ॥ नाकाशमुत्पतिप्यंतिसर्वभूतानिलक्ष्मण ॥ ६३॥ समा कुलममर्यादंजगत्पश्याद्यलक्ष्मण ॥ आकर्णपूर्णरिपुभिर्जीवलोकदुरावरैः ॥ ६॥ करिष्येमेथिलीहेतोरपिशाचमराक्षसम् ॥ ममरोपप्रयुक्तानां विशिखानविलंसुराः ॥ ६५ ॥ द्रक्ष्यंत्यद्यविमुक्तानाममाद्दूरगामिनाम् ॥ नैवदेवानदेतेयानपिशाचानराक्षसाः ॥६६॥ भविप्यंतिममक्रोधा त्रैलोक्येऽपिप्रणाशिते ॥ देवदानवयक्षाणांलोकायेरक्षसामपि ॥ ६७ ॥ देखना. हे लक्ष्मण ! इमी मुहूर्तमें व हमारे पराक्रमको देख कि, इस समय आकाशमभी कूदकर कोई न वच सकेगा ॥६३ ॥ हे लक्ष्मण ! आज हमारे चापक मुसमे छूटेहुवे शरजालले निरन्तर मर्दित होकर सब जगत् महाव्याकुल मर्यादाशून्य हो जायगा, और मृग व पक्षीगण सवही सवभाँतिसे भान्त और विनष्ट होजायगे ॥ ६४ ॥ आज हम सीताके लिये कानतक प्रत्यंचा बैंच छोटे हुए वाणोंसे सब संसार पिशाच और राक्षसोंसे रहित कर देंगे ॥६५॥ इस मंमारमें कोईभी हमारे इन वाणाको निवारण नहीं करसकेगा, आज देवता लोग देखेंगे कि समूहके समूह बाण हम करके रोप और क्रोधमें भरकर चलाये हुए किननी २ पर जाकर गिरने हैं न देयना न देय न पिणाचन राक्षम ॥६६॥जय हमारे कोयमे नीनों लोकों का नाश हुआ तब कोईभी रक्षा ग पावैगा अधिक ANUARY मायाका वियोग आपसे अच्छा समझताहै कारण कि नदी, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व, दान व सारत् सागर ॥ ११॥ और शैल कोई भी आपका अप्रिय नहीं करसकते, जैसे यजमानका अप्रिय साधुलोग नहीं कर सकते । हे राजन् ! जिसने सीताको हरण कियाहै इस समय उस जनका सोज करना आपका कर्तव्य हुआहै ॥ १२ ॥ आप हमारे साथ धनुष हाथमें लेकर चलिये, और परमर्षि गणोंको सहायक बनाय समुद्र वन पर्वत हूँढंगे ॥ १३ ॥ विविध प्रकारकी ताल तलैयां व गुफायें और देवता गन्धर्वोके लोक समस्तही यल सहित आप ढूंढिये ॥ १४ ॥ जबतक कि आपकी ग्रीक हरनेवालेको न पायेंगे, और इस प्रकार शान्तभावसे ढूँढनेपरभी इन्द्रादि देवगण यदि आपकी भार्याको न दें तब हे कौशलेन्द्र ! पीछेसे आप उनको यथायोग्य फोनुदारप्रणाशंतेसाधुमन्येतराघव ॥ सरितःसागराःशैलादेवगंधर्वदानवाः ॥ ११ ॥ नालंतेविप्रियंकतुदीक्षितस्येवसाधवः ॥ येनराजन्हता सीतातमन्येपितुमर्हसि ॥ १२ ॥ मद्वितीयोधनुष्पाणिःसहाये परमर्पिभिः ॥ समुद्भवाविचेप्यामःपर्वतांश्ववनानिच ॥ १३ ॥ गुहाश्चविविधा घोरा पअिन्योविविधास्तथा ॥ देवगंधर्वलोकांश्वविचेप्यामःसमाहिताः ॥ १४ ॥ यावन्नाधिगमिप्यामस्तवभार्यापहारिणम् ॥ नचेत्सानाप्रदा स्यंतिपत्रोंतेत्रिदशेश्वराः ॥ कोशलेंद्रततःपश्चात्प्राप्तकालंकरिप्यसि ॥ १५ ॥ शीलेनसानाविनयेनसीतांनयेननप्राप्स्यसिचेनरेन्द्र ॥ ततःसघु त्सादयहेमपुखर्महेन्द्रवज्रप्रतिमेःशरीधेः ॥ १६ ॥ इत्याचे श्रीमद्रा० वा. आ० अरण्यकांडे पंचपष्टितमः सर्गः ॥ ६५ ॥ तंतथाशोकसंतप्तं विलपंतमनाथवत् ॥ मोहेनमहतायुक्तंपरियूनमचेतसम् ॥ १ ॥ ततःसौमित्रिराश्वास्यमुहूर्तादिवलक्ष्मणः ॥ रामसंवोधयामासचरणौचाभि पीडयन् ॥ २॥ महतातपसाचापिमहताचापिकर्मणा ॥ राज्ञादशरथेनासील्लब्धोमृतमिवामरेः॥३॥ तवचेवगुणेर्वद्धस्त्वद्वियोगान्महीपतिः ॥ राजादेवत्वमापनोभरतस्ययथाश्रुतम् ॥ ४॥ दंठ दीजियेगा ॥ १५ ॥ हे नरेन्द्र ! शीलतासे सामसे और विनय अवलम्बन करकेभी यदि आप सीताको न पायें, तब आप इन्दके वज्रसदृश सुवर्णपंखवाले गरजाटसे समस्त संसारको संहार कर डालियेगा ॥ १६ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भाषाटीकायां पंचपष्टितमः सर्गः ॥६५॥ श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणके वास्यसे क्रोध त्यागकर इसप्रकार शोक संतप्त और महामोहसे युक्त चेतना रहित होकर अनाथोंकी समान विलाप करना आरंभ किया । ॥ १ ॥ लक्ष्मणजी उनके चरण छूकर एक मुहुर्तभरतक उनको समझाने बुझाते हुए कहने लगे ॥ २॥ कि राजा दशरथजीने अनेक तपस्या और बहु विध धर्मानु ठान करके आपको पात किया था जिस प्रकार देवता लोगोंने अमृतको बडे २ उपायोंसे प्रान किया था ॥ ३ ॥ भरतजीसे जैसा जैसा सुनाथा उससे तो यही रा पा.रा.भा. आ १.३॥ स० गीतानी हरणसे कातर हुये श्रीरामचन्द्रजी सन्तापित हो सांपर्तकालयकालकी अमिके समान लोकोंका नाश करनेको तैयार हुए ॥ १ ॥ और प्रलयका लमें ममस्त जगत् दाप करनेके अभिलापी महादेवजीके समान वारंवार श्वास त्याग करतेहुए प्रत्यंचायुक्त शरासनको श्रीरामचन्द्रजी देखने लगे ॥२॥ लक्ष्मणजी श्रीरा मचन्द्रजीका अदष्ट पूर्व जो पहले कभी नहीं देखाथा, ऐसा क्रोध देखकर शुष्क मुख बना हाथ जोड उनसे बोले ॥ ३ ॥ आप पहलेसे मृदु, सर्व इन्द्रियोंको जीतने पाले और मर्षभुनों के हिवकारी कार्य करने में तैयार हैं सो इस समय कोधके वश होकर अपना स्वभाव छोडना आपको योग्य नहीं है ॥ ४ ॥ चन्द्रमा श्री, वायुमें गति, पपीमें धमा, ममें दीनि, इन चारोंमें यह चार पदार्थ नित्य हैं और आपमें यश सहित यह चारों पदार्थ विद्यमान हैं ॥ ५॥ एक जनके अपराधसे समस्तलोकको ************* तप्यमानंतदारामसीताहरणकर्शितम् ॥ लोकानामभवेयुक्तंसविर्तकमिवानलम् ॥१॥ वीक्षमाणधनु-सज्यंनिःश्वसंतपुनःपुनः॥ दग्धुकामंजगत्सर्वं युगतिपयथाहरम्॥२॥अदृष्टपूर्वसंक्रुद्धंदृष्ट्वारामंसलक्ष्मणः॥ अत्रवीत्पांजलिर्वाक्यमुखेनपरिशुष्यता॥३॥ पुराभूत्वामृदुर्दातःसर्वभूतहितेरतः॥ नक्रोधवशमापन प्रकृतिहातुमर्हसि ॥४॥ चंद्रेलक्ष्मी प्रभासूर्येगतिर्वायोभुविक्षमा॥ एतच्चनियतंनित्यंत्वयिचानुत्तमंयशः ॥५॥ एकस्यना पराभेनलोकान्हंतुंत्वमईसि ॥ ननुजानामिकस्यायंभनःसांयामिकोरथः ॥६॥ केनवाकस्यवाहेतोःसंयुगःसपरिच्छदः ॥खुरनेमिक्षतश्चायंसिक्को रुधिरविंदुभिः ॥७॥ देशोनिर्वृत्तसंग्रामःसुघोर पार्थिवात्मज ॥ एकस्यतुविमर्दोऽयंनद्वयोर्वदतांवर ॥ ८ ॥ नहिवृत्तंहिपश्यामिवलस्यमहतः पदम् ॥ नेफस्यतुकृतेलोकान्विनाशयितुमर्हसि ॥ ९॥ युक्तदंडाहिमृदव-प्रशांतावसुधाधिपाः ॥ सदात्वंसर्वभूतानांशरण्यःपरमागतिः ॥१०॥ हनन करना आपको उचित नहीं है, निश्चयही हम जानते हैं कि, यह जो रथ टूटा पड़ा है यह एकही जनका है बहुतोंका नहीं ॥ ६ ॥ किन्तु यह जुआयुक्त और परिच्छदमाहित रथ किसका है, और क्यों कर टूटा है इसको हम नहीं जानते, देखिये यह स्थान खुरियोंसे खुदखुदाय रहा है और रुधिरसे भीगनेके कारण अनिगय भयंकर हो रहाहै ॥ ७ ॥ निश्चयही यहांपर संग्राम हुआहै । और इन सब कारणोंसे यहभी बोध होताहै कि एक रथीके सहित और किसी पशुका युद्ध हुभाई दो जनोंका युद्ध नहीं हुआहै ।। ८ । वडी भारी सेनाके चरण चिह्न यहांपर नहीं दृष्टि आते इसलिये एक जनके अपराधसे समस्त लोकोंको विनाश करना आ पर उचित नहीं है ॥१॥ राजा लोग चराचरसर अतिशय शान्त और मृदु स्वभाववाले होते हैं, और अपराधानुसार दंड दिया करतेहैं आपभी सर्वदा सब भूतोंके शर ॥१ परम गति ॥10॥ हे रघुनंदन ! गंमारमें कौन पुरुष आपकी भार्याका वियोग आपसे अच्छा समझताहै कारण कि नदी, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व, दान समान मागर ॥ ११॥ और गेल कोई भी आपका अप्रिय नहीं करसकते, जैसे यजमानका अप्रिय साधुलोग नहीं कर सकते । हे राजन् ! जिसने सीताको हरण काम ममय उम जनका सोज करना आपका कर्तव्य हुआहै ॥ १२॥ आप हमारे साथ धनुप हायमें लेकर चलिये, और परमर्पि गणोंको सहायक बनाय समुद्र उन पर देगे ॥ १३ ॥ विविध प्रकारकी ताल तलैयां व गुफायें और देवता गन्धर्वोके लोक समस्तही यत्न सहित आप ढूंढिये ॥ १४ ॥ जबतक कि आपकी गीक हग्नेगलेको न पाविंगे, और इस प्रकार शान्तभावसे ढूंढनेपरभी इन्द्रादि देवगण यदि आपकी भार्याको न दें तब हे कौशलेन्द्र ! पीछेसे आप उनको यथायोग्य कोनुदारप्रणाशंतसाधुमन्येतरायच ॥ सरितःसागराःशेलादेवगंधर्वदानवाः ॥ ११ ॥ नालंतेविप्रियंकतुदीक्षितस्येवसाधवः ॥ येनराजन्हता मीनातमन्य पितुमर्हसि ।। १२ ॥ मद्वितीयोधनुप्पाणिःसहाये परमर्पिभिः ॥ समुद्भवाविचेप्यामःपर्वतांश्चवनानिच ॥ १३ ॥ गुहाश्चविविधः घोगपभिन्योरिविधास्तथा ॥ देवगंधर्वलोकांचविचेप्यामःसमाहिताः ।। १४॥ यावन्नाधिगमिप्यामस्तवभार्यापहारिणम् ॥ नचेत्सानाप्रदा स्पेनिपनि विदशेशगः ॥ कोशलेंद्रततःपश्चात्याप्तकालंकरिष्यसि ॥ १५ ॥ शीलेनसानाविनयेनसीतांनयेननप्राप्स्यसिचेन्नरेन्द्र ॥ ततःसग स्मादयहमपुंगेर्महेन्द्रावप्रतिमेःशरीधैः ॥ १६ ॥ इत्या श्रीमद्रा० वा. आ० अरण्यकांडे पंचपष्टितमः सर्गः ॥ ६९ ॥ तंतथाशोकसं पतं पिन्दपनमनाथवत् ।। मोहेनमहतायुक्तंपरियूनमचेतसम् ॥ १॥ ततःसौमित्रिरावास्यमुहूर्तादिवलक्ष्मणः ॥ रामसंवोधयामासचरणीचाभि पीडयन् ॥ २॥ महतातपसानापिमहताचापिकर्मणा ॥ राज्ञादशरथेनासील्लब्धोमृतमिवामः॥३॥ तवचैवगुणेर्वद्धस्त्वद्वियोगान्महीपतिः ॥ रागादेपत्तमापनोभरतस्ययथाश्रुतम् ॥ १॥ पिंख दीजियेगा ॥१५॥ है नरेन्द्र ! गीटतासे मामले और विनय अवलम्बन करकेभी यदि आप सीताको न पायें, तब आप इन्द्र के वज्रसदृश सुवर्णपंखवा गजाटगे गमरन मंगारको मंहार कर ढालियेगा ॥ १६ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे पाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायां पंचपटितमः सर्गः ॥६५, भीरामजीने लामण पारपसे कोष त्यागकर इमप्रकार शोक संतप्त और महामोहसे युक्त चेतना रहित होकर अनाथोंकी समान विलाप करना आरंभ किया । १॥ रमणजी उनके चरण छूकर एक मुहुर्तभरता उनको समझाते युझाते हुए कहने लगे ॥ २ ॥ कि राजा दशरथजीने अनेक तपस्या और बहु विध धर्मा: शान कर आपको पार किया था जिस प्रकार देवता लोगोंने अमृतको बडे २ उपायोंसे प्रान किया था ॥ ३ ॥ भरतजीसे जैसा जैसा सुनाथा उससे तो यही 公众和游客还关系法六合法经发形系 सा.रा.भा.. आ मानी रणसे 'कावर हुये श्रीरामचन्द्रजी सन्वापिव हो सावर्तकालयकाठकी अमिके समान लोकोंका नाश करनेको तैयार हुए ॥ १ ॥ और प्रलयका रमें ममम जगत दग्ध करने के अभिलापी महादेवजीके समान वारंवार श्वास त्याग करतेहुए प्रत्यंचायुक्त शरासनको श्रीरामचन्द्रजी देखने लगे ॥२॥ लक्ष्मणजी श्रीरा परजी का अहष्ट पूर्व जो पहले कभी नहीं देसाथा, ऐसा क्रोध देखकर शुष्क मुख बना हाथ जोड उनसे बोले ॥ ३ ॥ आप पहलेसे मृदु, सर्व इन्द्रियोंको जीतने पार और मांभूनोंक दिवकारी कार्य करनेमें तैयार हैं सो इस समय कोधके वश होकर अपना स्वभाव छोडना आपको योग्य नहीं है ॥ ४ ॥ चन्द्रमामें श्री, वायुमें गति, पपीमें धमा. मूगमें दीमि, इन चारोंमें यह चार पदार्थ नित्य हैं और आपमें यश सहित यह चारों पदार्थ विद्यमान हैं ॥ ५॥ एक जनके अपराधसे समस्तलोकको ******** तप्यमानंतदारामसीताहरणकर्शितम् ॥ लोकानामभवेयुक्तंसांवर्तकमिवानलम् ॥१॥ वीक्षमाणधनुःसज्यंनिःश्वसंतंपुनःपुनः॥ दग्धुकामंजगत्सर्वं गुगांतनयथाहरम् ॥२॥अदृष्टपूर्वसंकुद्धंदृष्ट्वारामंसलक्ष्मणः॥ अब्रवीत्पांजलिर्वाक्यमुखेनपरिशुष्यता ॥३॥ पुराभूत्वामृदुातःसर्वभूतहितेरतः॥ नकाशवशमापन प्रकृतिहातुमर्हसि ॥४॥ चंद्रेलक्ष्मी प्रभासूर्यगतियोभुविक्षमा॥ एतचनियतंनित्यंत्वयिचानुत्तमंयशः॥ ५ ॥ एकस्यना पग'नलोकान्तुंत्वमईसि ॥ ननुजानामिकस्यायंभग्नःसांयामिकोरथः ॥६॥ केनवाकस्यवाहेतोःसंयुगःसपरिच्छदः ॥खुरनेमिक्षतश्चायंसिक्तो रुधिरविंदुभिः ॥ ७॥ देशोनिवृत्तसंग्रामःसुघोर पार्थिवात्मज । एकस्यतुविमर्दोऽयंनद्वयोर्वदतांवर ॥ ८ ॥ नहिवृत्तंहिपश्यामिवलस्यमहतः पदम् ॥ नैकस्यतुकृतेलोकान्विनाशयितुमर्हसि ।। ९॥ युक्तदंडाहिमृदवःप्रशांतावसुधाधिपाः ॥ सदात्वंसर्वभूतानांशरण्यःपरमागतिः ॥१०॥ हनन करना आपको उचित नहीं है, निश्चयही हम जानते हैं कि, यह जो रथ टूटा पड़ा है यह एकही जनका है बहुतोंका नहीं ॥ ६ ॥ किन्तु यह जुआयुक्त भीर परिउदहित रथ किनका है, और क्यों कर टूटा है इसको हम नहीं जानते, देखिये यह स्थान खुरियोंसे खुदखुदाय रहा है और रुधिरसे भीगनेके कारण अनिगप भयंकर हो रहाहै ॥ ७ ॥ निश्चयही यहांपर संग्राम हुआहै ॥ और इन सब कारणों से यहभी बोध होताहै कि एक रथीके सहित और किसी पशुका युद्ध भाहे दो जनोंग युद्ध नहीं हुआहे ॥ ८ ॥ बड़ी भारी सेनाके चरण चिद यहांपर नहीं दृष्टि आते इसलिये एक जनके अपराधसे समस्त लोकोंको विनाश करना आ पोउशिनरी है ॥९॥ गजा लोगनगरपर अतिगप गान्त और मृदु स्वभाववाले होते हैं, और अपराधानुमार दंड दिया करते हैं आपभी सर्वदा सय भूतोंके शर प्य और परम गति हैं ॥ १० ॥ हेरघुनंदन ! संसारमें कौन पुरुप आपकी भार्याका वियोग आपसे अच्छा समझताहै कारण कि नदी, समुद्र, पर्वत, देवता, गन्धर्व, दान बमारत मागर ॥33॥ और गैल कोई भी आपका अप्रिय नहीं करसकते, जैसे यजमानका अप्रिय साधुलोग नहीं कर सकते । हे राजन् ! जिसने सीताको हरण कियाई दम ममय उम जनका खोज करना आपका कर्तव्य हुआहै ॥ १२॥ आप हमारे साथ धनुप हायमें लेकर चलिये, और परमर्पि गणोंको सहायक बनाय समुद्र बन पर्वत हुँगे ।। १३॥ विविध प्रकारकी वाल तलैयां व गुफायें और देवता गन्धर्वाक लोक समस्तही यल सहित आप ढूंढिये ॥ ११ ॥ जबतक कि आरकी पीक हरनेवालेको न पायेंगे, और इस प्रकार शान्तभावसे ढूँढनेपरभी इन्द्रादि देवगण यदि आपकी भार्याको न तव हे कौशलेन्द्र ! पीछेसे आप उनको यथायोग्य कोनुदारपणाशतेसाधुमन्येतराघव ॥ सरितःसागराःशेलादेवगंधर्वदानवाः ॥ ११ ॥ नालंतेविप्रियंकतुदीक्षितस्येवसाधवः ॥ येनराजन्दता मीतातमन्य पितुमईसि ॥ १२ ॥ मद्वितीयोधनुप्पाणिःसहाय-परमर्पिभिः ॥ समुद्भवाविचेष्यामःपर्वतांश्चवनानिच ॥ १३ ॥ गुहाश्चविविधा पोग पग्रिन्योविविधास्तथा ॥ देवगंधर्वलोकांश्चविचेष्यामःसमाहिताः ॥ १४ ॥ यावन्नाधिगमिष्यामस्तवभार्यापहारिणम् ॥ नचेत्सामाप्रदा स्पतिपतिविशेश्वराः ॥ कोशलेंद्रततःपश्चात्याप्तकालंकरिष्यसि ॥ १५ ॥ शीलेनसानाविनयेनसीतांनयेननप्राप्स्यसिचेनरेन्द्र ॥ ततःसधु रमादयदेमपुरोर्महेन्द्ररत्रप्रतिमेःशरोधेः ॥ १६ ॥ इत्या श्रीमद्रा० वा० आ० अरण्यकांडे पंचपटितमः सर्गः ।। ६९ ॥ तंतथाशोकसंपत पिलपतमनाथवत् ।। मोहेनमहतायुक्तंपरियूनमचेतसम् ॥ १॥ ततःसौमित्रिरावास्यमुहूर्तादिवलक्ष्मणः ॥ रामसंबोधयामासचरणोचाभि पीडयन् ॥ २॥ महतातपसानापिमहताचापिकर्मणा ॥ राज्ञादशरथेनासील्लब्धोमृतमिवामः॥३॥ तवचेवगुणेर्वद्धस्त्वद्वियोगान्महीपतिः।। राजादेवत्वमापनोभरतस्ययथाश्रुतम् ॥ ४॥ र दीतिरंगा ॥ १५॥ हे नरेत्र ! गीटतासे सामसे और विनय अवलम्बन करकेभी यदि आप सीताको न पावें, तब आप इन्दके वजसहश सुवर्णपंखवाले गरमागे ममग्न गंमारको मंहार कर डालियेगा ॥ १६ ॥ इत्या श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भाषाटीकायां पंचपष्टितमः सर्गः॥६५॥ भीगरी समग पापने कोर त्यागकर इमकार शोक संतन और महामोहसे युक्त चेतना रहित होकर अनाथोंकी समान विलाप करना आरंभ किया। ॥ १॥ समगनी उन चरण चूर गफ महुर्तभरतक उनको समझाने बुझाते हुए कहने लगे ॥ २ ॥ कि राजा दशरथजीने अनेक तपस्या और बहु विध धर्मानु शान कर आपको मान किया था जिम कार देवता लोगोंने अमृतको घडे २ उपार्योंसे प्रान किया था ॥ ३ ॥ भरतजीसे जैसा जैमा सुनाया उससे तो यही बा.रा.भा. आर० ॥१०४॥ ३०६ ज्ञात होताहै कि राजा दशरथ आपहीके गुणोंमें बँधकर, व आपकेही वियोगमै देवलोकको प्राप्त हुयेहैं ॥ ४ ॥ हे काकुत्स्य ! यदि आपही इस आई हुई विपदको न झेलेंगे तो अल्पप्राण मनुष्य कौन सह सकेगा। ॥ ५॥हेनरश्रेष्ठ ! आप अपने चिनको सँभालिये। विपद अनिके समान सबही प्राणियोंकोतर्श करती किन्तु क्षण कालमेंही दूर चली जातीहै ॥ ६ ॥ लोकका स्वभावही यहहै देखिये नहुपपुत्र ययाति, इन्द्रपदवी प्राप्त करके भी अनीतिसे स्वर्गसे च्युत हुआ था।॥ ७ ॥जो हमारे पिताजीके पुरोहितहैं, उन महर्षि वसिष्ठजीने एक दिनमें शतपुत्र उत्पन्न किये और एक दिन ही विश्वामित्रसे वह सब नष्ट होगये ॥ ८॥ हे कौशलेवर ! जगन्माता, सर्व लोकके नमस्कार करने योग्य इस पृथ्वीकाभी चलायमान होना पाया जाताहै अर्थात् भूकंपादि दुःख इसको हुआ करते हैं ॥ २॥ जो सूर्य चन्द्रमा जगत के नेत्र यदिदुःखमिदंप्राप्तंकाकुत्स्थनसहिष्यसे । प्राकृतश्वाल्पसत्त्वश्चइतर कासहिप्यति ॥ ५॥ आश्वसिहिनरश्रेष्ठप्राणिनःकत्यनापदः।।संस्पृशंत्य ग्निवद्राजन्क्षणेनव्यपयांतिच ॥ ६ ॥ लोकस्वभावएवैपययातिर्नहुपात्मजः ॥ गतःशक्रेणसालोक्यमनयस्तंसमस्पृशत् ॥ ७॥ महापयांवसि प्रस्तुयःपितुर्नःपुरोहितः ॥ अनापुत्रशतंजज्ञतथैवास्यपुनर्हतम् ॥८॥ याचेयंजगतोमातासर्वलोकनमस्कृता ॥ अस्याश्चचलनभूमेश्यतेकोश लेश्वर ॥ ९॥ यौधर्मांजगतोनेत्रीयत्रसर्वप्रतिष्ठितम् ॥ आदित्यचंद्रग्रहणमभ्युपेतीमहाबली ॥ १० ॥ सुमहांत्यपिभूतानिदेवाश्चपुरुपर्पभ ॥ नदेवस्यप्रमुंचंतिसर्वभूतानिदेहिनः ॥ ११ ॥ शकादिप्वपिदेवेपुवर्तमानौनयानयो । थूयेतेनरशार्दूलनत्वंव्यथितुमर्हसि ॥ १२॥ मृतायाम पिवैदेह्यांनष्टायामपिराधव ॥ शोचितुंनाईसेवीरयथान्य प्राकृतस्तथा ॥ १३ ॥ त्वद्विधानहिशोचंतिसततंसर्वदर्शनाः ।। सुमहत्त्वपिकृच्छेपुरा मानिर्विण्णदर्शनाः ।। १४ ॥ तत्त्वतोहिनरश्रेष्ठबुद्ध्यासमनुचिंतय ॥ युद्धयायुक्तामहाप्राज्ञाविजानंतिशुभाशुभे ॥ १५ ॥ और साक्षात् धर्मस्वरूप हैं, और जिनमें समस्त संसार टिका हुआ है उन महावलपान सूर्य चन्द्रमाकाभी ग्रहण हो जाता है ॥ १०॥ हे पुरुषश्रेष्ठ ! इस मकारने अति महत भूत और देवतालोगभी जब देयके वश हैं नव साधारण शरीरधारी प्राणियोंकी क्या गिनती है ? ॥ ३१॥ अधिक क्या कहें इन्दादि देवताओमभी नीति और अनीति सुख दुःख सुना जाया करता है, इससे हे नरसिंह ! आप अब व्यथित न हूजिये ॥ १२॥ हे रघुनंदन ! यदि जानकीजी हरी गई हों, या मृतकं होगईहों तोभी साधारण पुरुषोंकी समान आपको शोक करना योग्य नहीं है ॥ १३ ॥ हे वीर !आपकी समान सर्वदर्शी और हितदर्शी मनुष्यगण सचराचर बडीभारी विपद पडने परभी शोक नहीं करते ।। १४॥ हे नरश्रेष्ट ! आप भलीभाँति विचार करके यथार्थनासे शुभाशुभका विचार कीजिये। आपकी समान महामाश पुरुषगण युझिसे ! **#hitsAPRIMARY
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परमगीभात मिल सभी
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मृगक होगको सो
. . , मलागानम जाना है। "॥ निनांगुष और दौर जपना प्रगट हटिम नहीं आओ, तबतक उन मत्र अधुर अर्थात् अस्थिर काँक :
माने मी मानिकी आगा नहीं दोमानी और उनका जानना रिना क्रिया योग नहीं होता ॥ १६॥ हे वीर ! आपनेही मथम हमको अनेक
नकारागादिया र आरको अदंग देनमें दो मामात वृहमतिजीभी समर्थ नहीं हैं ॥ १७ ॥ हे महापाज ! आपकी बुद्धिको देवता लोगभी नहीं
नगी अर आपको यह वृद्धि गोमे इनकार ढक रही है, कि इस नमर हम उसको जगा रहे हैं ॥ १८॥ हे इशाकुमवर ! आप अपना दिव्य और मानवी
गरम दिनार गनंहार करने यन्न कीजि ।। ३९. ॥ हे पुरुषश्रेष्ठ ! आपको समस्त लोकोंके संहार करनेका क्या प्रयोजनहै ? आप उसी अपने शत्रुको
अगएगुणदोषाणामधुपाणांतुकर्मणाम् ।। नांतरणकियांतपांफलमिष्टंचवर्तते ॥ १६॥ मामेवंहिपुरावीरत्वमेवबहुशोक्तवान् ।। अनुशिष्याद्धिको
नुवामपिमानामृहस्पतिः ॥ १७॥ बुद्धिभतेमहाप्राज्ञदेवैरपिदुरन्यया ॥ शोकेनाभिप्रसुप्तंतेज्ञानसंवोधयाम्यहम् ॥ १८॥ दिव्यंचमानुपंचे
पमात्मनश्रयगकमम् ॥ इश्याकुपभावक्ष्ययतस्वदिपतांवधे ॥ १९॥ किंतेसर्वविनाशेनकृतेनपुरुपर्पभ ॥ तमेवतुरिपुंपाविज्ञायोद्धर्तुमर्ह
मि ॥ २० ॥ इत्याचे श्रीमहामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे पद्पष्टितमः सर्गः ॥६६॥ पूर्वजोऽप्युक्तवाक्यस्तुलक्ष्मणेनसुभापि
नम् ॥ माग्ग्राहीमहामाग्प्रतिजग्राहगवयः ॥ १॥ सनिगृहामहावाहुःप्रवृद्धरोपमात्मनः ॥ अवष्टभ्यधनुश्चित्ररामोलक्ष्मणमब्रवीत् ॥२॥ किंक
शिघ्यावहात्मागन्छावलक्ष्मण ।। केनोपायनपश्यावःसीतामिहविचिंतय ॥३॥ तंतथापरितापातलक्ष्मणोवाक्यमत्रवीत् ॥ इदमेवजनस्था
नंतमपितुमर्हनि ।। 2 । गक्षसेहुभिःकीर्णनानागुमलतायुतम् ।। संतीहगिरिदुर्गाणिनिर्दरा कंदगणिच ॥५॥
जानकर उगे शिमकर मीनासो पराये ॥ २० ॥ इत्या श्रीमामायणे पाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायां पट्पटिनमः सर्गः ॥६६॥
सदसणी कार अनिगय मारगर्भ सुन्दर वचन कहने पर सारके ग्रहण करनेवाले महाबाहु रामचन्द्रजीने उनको ग्रहण किया ॥ 1 ॥ तिसके पीछे
का प्रतापरा हुआ कोष गांतकर विचित्र धनुप धारण करके लक्ष्मणजीसे कहने लगे ॥ २ ॥ हे वत्स ! हम इस समय कहां जांय क्या करें और किस
राय जानकीको कामको ! नो तुम इनका विचार करो ॥ ३ ॥ तव लक्ष्मणजी अति संतापित रामचन्द्रजीसे बोले कि इस जनस्थानकोही हूंढना और खोज
कागा आपको उचित है ॥४॥ पहुत सारे राक्षमों करके समाकीर्ण और विविध भांतिक लता वृक्षोंसे युक्त इस जनस्थानमें अनेक गिरि गुहा कंदरा ॥ ५ ॥
आर०क पा.रा.भा. स०६ A#*####### । . पत्थरोंकी चट्टाने और अनेक जातिवाले मृगगोंसे पूर्ण गुफायें किन्नर गन्धर्व गोंके फिरनेके स्थान और भवन जहां बहुत सारे हैं ॥ ६ ॥ सो आप हमारे सहित सावशन होकर इन सब जगहको ढूंढ लीजिये, आपकी समान बुद्धिसम्पन्न महात्मा पुरुषोत्तम ॥ ७ ॥ आपदके समय कभी नहीं विचलते, जैसे वायुके ॥१०५॥ वेगसे पर्वत नहीं कांपते, यह सुन श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके साथ समस्त वन खोजा ॥ ८ ॥ उस समय श्रीरामचन्द्रजीने वडा कोप करके पैनी धारवाला भयंकर वाणभी धनुपपर चढायाथा, वहां जाते २ पर्वतकी समान आकारवाले बडे भाग्यवान् पक्षिश्रेष्ठ ॥ ९ ॥ जटायुको पृथ्वीपर पड़ा और रुधिरसे लिपटा हुआ देखा उसको पर्वतकी शृंगकी समान आकारयाला देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीसे बोले ॥ १० ॥ इसमें कुछ संशय नहीं है कि इस गृध्ररूपी वनचर निशाचरनेही जान गुहाश्वविविधाचोरानानामृगंगणाकुलाः ॥ आवासा किन्नराणांचगंधर्वभवनानिच ॥ ६॥ तानियुक्तोमयासाधंसमन्वेपितुमर्हसि ॥ त्वद्विधा बुद्धिसंपन्नामहात्मानोनरर्पभाः ॥७॥ आपत्सु न प्रकंपंतेवायुवेगेरिवाचलाः ॥ इत्युक्तस्तद्वनंसर्वविचचारसलक्ष्मणः॥८॥ कुद्धोरामःशरंघोरं संधायधनुपिचरम् ॥ ततःपर्वतकूटा महाभागंद्विजोत्तमम् ॥ ९॥ ददर्शपतितंभूमोक्षतजा,जटायुपम् ॥ तंदृष्ट्वागिरिशृंगाभरामोलक्ष्मणमत्र वीत् ॥ १० ॥ अनेनसीतावेदेहीभक्षितानात्रसंशयः ॥ गृध्ररूपमिदंव्यक्तंरक्षोभ्रमतिकाननम् ॥ ११ ॥ भक्षयित्वाविशालाक्षीमास्तेसीतांयथा सुखम् ॥ एनंवधिप्येदीप्तायै शरिरजिह्मगैः ॥१२॥ इत्युक्त्वाऽभ्यपतद्रष्टुंसंधायधनुपिक्षुरम् ॥ कुद्धोरामःसमुद्रांतांचालयन्निवमेदिनीम् ॥ १३॥ तंदीनदीनयावाचासफेनंरुधिरंवमन् ॥ अभ्यभापतपक्षीसरामंदशरथात्मजम् ॥ ११॥ यामोपधीमिवायुष्मन्नन्वेपसिमहावने ॥ सादेवीममचा णारावणेनोभयंहतम् ॥ १५॥ त्वयाविरहितादेवीलक्ष्मणेनचराघव ॥ द्वियमाणामयादृप्यारावणेनवलीयसा ॥ १६॥ कीको भक्षण कर लियाहै, बस यह ठीकही ठीक जान पडताहै यह राक्षस गृध्र बना वनमें घूमताहै ॥ ११ ॥ यह राक्षस उन विशालाक्षी सीवाको भक्षण करके यथासुससे विश्राम कर रहाहै । इस कारण हम सीधे चलनेवाले अनिके समान प्रकाशमान भयंकर वाणोंसे इसका संहार करेंगे ॥ १२ ॥ श्रीरामचन्द्रजी यह कहकर क्रोधित हो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको कँपाते हुये धनुपपर तीक्ष्ण बाण चढाय उसके देखनेको चले ॥ १३ ॥ तिसके पीछे पक्षिराज जटायु सफेन रुधिर उग लता हुआ अतिशय कातर वचनोंसे उन दशरथकुमार श्रीरामचन्द्रजीसे बोला ॥१४॥ आयुष्मान् तुम औषधिकी समान जिनको इस महापनमें सोजते हो, वह देवी जानकी और हमारे प्राण दोनोंही रावणने हर लिये हैं ॥१५॥ हेरघुनंदन ! महाबलवान् दशानन आपके और लक्ष्मणजीके आश्रममें न रहने पर सूनेसे जानकीको हर ले जाता हुआ 水城学院城建****洋** . . 472116॥ गमय हमने गाजीगरोटाने के लिये गन्मुराहो मुद करके उगो रथ और छत्रको तोड डाला तब रावण पृथ्वीम गिरा ॥ १७ ॥ यह भोपाल में हुये पडे हैं यह उमोही हैं और गमचन्द्रजी ! यह उमकाही संग्राममें काम देनेगला रथहै जो टूटा हुआ पडाहै ॥ १८ ॥ और यह सारथीभी है जो हमारे गाँके बहाने मरकर पृथ्वीर पडाहै यूटे होने के कारण जब हम लड़ते २थक गये तब राक्षसनाथ रावणने सड्नसे हमारे पंस काट डाले ॥ और वह मीताजीको ठेकर आकागमार्गमें चला गया, प्रथम तो हम रावण करके मारेही गये हैं, सो इस समय हमारा वध करना आपको उचित नहीं है । भीगमनन्दजी गिद्धक मुनने मोवाजीके विषय प्रिय वचन सुनतेही महाधनुपको त्याग करके आलिंगन करलेते हुए ॥ २१ ॥ और शोकसे अवश हो मीतामभ्ययपत्रोऽहंगवणधरणेप्रभो ॥ विचंसितस्थच्छत्र:पतितोधरणीतले ॥१७॥ एतदस्यधनुर्भग्नमतेचास्यशरास्तथा।। अयमस्यरणेराम: सामामि कोग्यः।। १८ ॥ अयंनुसारथिस्तस्यमत्पक्षनिहतोभुवि ॥ परिश्रांतस्यमेपक्षीछित्त्वाखड्ड्रेनरावणः ॥१९॥ सीतामादायवैदेहीमुत्पप. हासमम् ।। समानिहतंपूर्वमानतुंत्वमर्हसि ॥२०॥ रामस्तस्यतुविज्ञायसीतासक्तांप्रियांकथाम् ।। गृधराजपरिप्वज्यपरित्यज्यमहदनुः।। निपपानापशोभूमीमरोदसहलक्ष्मणः॥ द्विगुणीकृततापातारामोधीरतरोऽपिसन् ॥ २२ ॥ एकमेकायनेकृच्छ्रेनिःश्वसंतंमुहुर्मुहुः ॥ समीक्ष मिनोगमःमौमित्रिमिदमत्रवीत् ॥ २३ ॥ राज्यंभ्रष्टंबनेवास-सीतानष्टामृतोद्विजः ।। ईदृशीयममालक्ष्मीर्दहेदपिहिपावकम् ॥ २४॥ संपूर्णम. बयप्रायमहोदधिम् ॥ मोपिनूनममालक्ष्म्याविशुष्येत्सरितांपतिः ॥ २५ ॥ नास्त्यभाग्यतरोलोकेमत्तोऽस्मिन्सचराचरे । येनेयमहती: मयान्यसनयागुग ॥ २६॥ अयंपितुर्वयस्योमेगृधराजोमहावलः ॥ शेतेविनिहतोभूमीममभाग्यविपर्ययात् ॥ २७ ॥ गिरकर लक्ष्मणजी माहित गेदन करने लगे । यद्यपि श्रीरामचन्द्रजी महावीरथे तथापि दूना संताप पाकर बहुत व्याकुल होगये ॥ २२ ॥ उसकाल ८ फागमें पडे वाग्यार ऊपी वास लेते हुए देख शोकमे आतुर हो श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा ॥ २३ ॥ हम राज्यसे भ्रष्ट हुये वनमें वास हुआ, सीता गई और जटायुकी मृत्यु होगई हमारे खोटे कर्मसे उपस्थित हुई यह विपत्ति अग्निकोभी भस्म कर सकतीहै ॥ २४ ॥ हम अपने भाग्यकी क्या बात क हम दुःसके मनापने गांति पाने के लिये तलहीन तटहीन महासागरभी उतरें ! तो वह सरित्स्वामी समुद्रभी निश्चयही हमारे दुर्भाग्यके प्रभाक्से एकबार गायगा ॥२५॥ मगर लोकोंमें हन सा अधिक मंदभाग्य और कोई नहीं है क्योंकि हमने इतना बडा दुःखका जाल पाया है ।। २६ ॥ यह महावली ।
पा.रा.भा. आर०क ॥१०५॥ स०६ पत्थरोंकी चट्टाने और अनेक जातिवाले मृगगोंसे पूर्ण गुफायें किन्नर गन्धर्व गणोंके फिरनेके स्थान और भवन जहां बहुत सारे हैं ॥ ६ ॥ सो आप हमारे सहित सावधान होकर इन सब जगहको हूँढ लीजिये, आपकी समान बुद्धिसम्पन्न महात्मा पुरुषोनम ॥ ७ ॥ आपदके समय कभी नहीं विचलते, जैसे वायुके वेगसे पर्वत नहीं कांपते, यह सुन श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीके साथ समस्त वन खोजा ॥ ८ ॥ उस समय श्रीरामचन्दजीने वडा कोप करके पैनी धारवाला भयंकर पाणभी धनुपपर चढायाथा, वहां जाते २ पर्वतकी समान आकारवाले बडे भाग्यवान पक्षिश्रेष्ठ ॥ ९ ॥ जटायुको पृथ्वीपर पड़ा और रुधिरसे लिपटा हुआ देखा उसको पर्वतकी शृंगकी समान आकारवाला देख श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीसे बोले ।। १० । इसमें कुछ संशय नहीं है कि इस गधरूपी वनचर निशाचरनेही जान गुहाश्वविविधाघोरानानामृगगणाकुलाः ॥ आवासा किन्नराणांचगंधर्वभवनानिच ॥ ६॥ तानियुक्तोमयासाधसमन्वेपितुमर्हसि ॥ त्वद्विधा बुद्धिसंपन्नामहात्मानोनरर्पभाः ॥७॥ आपत्सु न प्रपंतेवायुवेगैरिवाचलाः ॥ इत्युक्तस्तद्वनंसर्वविचचारसलक्ष्मणः॥ ८॥ कुद्धोरामाशरंघोरं संघायधनुपिक्षुरम् ॥ ततःपर्वतकूटाभंमहाभागंद्विजोत्तमम् ॥ ९॥ ददर्शपतितंभूमौक्षतजा,जटायुपम् ॥ तंदृष्ट्यागिरिशृंगाभंरामोलक्ष्मणमत्र वीत् ॥ १०॥ अनेनसोतावेदेहीभक्षितानारसंशयः ॥ गृध्ररूपमिदंव्यक्तंरक्षोभ्रमतिकाननम् ॥ ११ ॥ भक्षयित्वाविशालाक्षीमास्तेसीतांयथा सुखम् ॥ एनंवधियेदीप्तांग्रेशरेवोरैरजिह्मगेः ॥१२॥ इत्युक्वाऽभ्यपतद्रष्टुंसंधायधनुपिचरम् ॥ कुद्धोरामःसमुद्रांतांचालयनिवमेदिनीम् ॥ १३॥ तंदीनदीनयावाचासफेनंरुधिरंवमन् ॥ अभ्यभापतपक्षीसरामंदशरथात्मजम् ॥ ११॥ यामोपधीमिवायुष्मन्नन्वेपसिमहावने ॥ सादेवीममचप्रा णारावणेनोभयंढतम् ॥ १५॥ त्वयाविरहितादेवीलक्ष्मणेनचराघव ॥ ह्रियमाणामयादृष्टारावणेनवलीयसा ॥ १६॥ कीको भक्षण कर लियाहै, बस यह ठीकही ठीक जान पडताहै यह राक्षस गृध्र बना वनमें घूमताहै ॥ ११ ॥ यह राक्षस उन विशालाक्षी सीताको भक्षण करके यथासुसमे विश्राम कर रहाहै । इस कारण हम सीधे चलनेवाले अनिके समान प्रकाशमान भयंकर वाणोंसे इसका संहार करेंगे ॥ १२ ॥ श्रीरामचन्द्रजी यह कहकर क्रोधित हो समुद्रपर्यन्त पृथ्वीको कँपाते हुये धनुपपर तीक्ष्ण बाण चढाय उसके देखनेको चले ॥ १३ ॥ तिसके पीछे पक्षिराज जरायु सफेन रुधिर उग लता हुआ अतिगप कातर पचनोंमे उन दशरथकुमार श्रीरामचन्द्रजीसे बोला ॥१४॥ आयुष्मान् तुम औषधिकी समान जिनको इस महायनमें खोजते हो, यह देवी जानकी और हमारे पाण दोनोंही रावणने हर लिये हैं ॥१५॥ हे रघुनंदन । महाबलवान् दगानन आपके और लक्ष्मणजीके आश्रममें न रहने पर मूनेसे जानकीको हर ले जाता हुआ ॥१०५ Pathan ******* हमने देसाहे॥ १६ ॥ उस समय हमने सीताजीको टुटाने के लिये सन्मुसहो युद्ध करके उसके रथ और छत्रको नोड डाला तब रायण पृथ्वी में गिरा ॥ १७ ॥ यह जो धनुष और बाण टूटे हुये पडे हैं यह उसकेही हैं और रामचन्द्रजी ! यह उसकाही संग्राममें काम देनेवाला रथहै जो टूटा हुआ पडाहै ॥ १८ ॥ और यह सारथीभी उमीका है जो हमारे पंखोके प्रहारमे मरकर पृथ्वीपर पडाहै बूढे होनेके कारण जब हम लडते २ थक गये तब राक्षसनाथ रायणने सनसे हमारे पंस काट डाले ॥ ११ ॥ और वह सीताजीको लेकर आकाशमार्गमें चला गया, प्रथम तो हम रावण करके मारेही गये हैं, सो इस समय हमारा वध करना आपको उचित नहीं है ॥ २० ॥ श्रीरामचन्दजी गिद्धके मुखसे मोवाजीके विषयक प्रिय वचन सुनतेही महाधनुपको त्याग करके आलिंगन करलेते हुए ॥ २१ ॥ और शोकमे अवग हो पृषीमें। सीतामभ्यवपन्नोऽहंरावणश्चरणेप्रभो ॥ विध्वंसितरथच्छवःपतितोधरणीतले ॥१७॥ एतदस्यधनुर्भग्रमेतेचास्यशरास्तथा।।अयमस्यरणेगमभन्नः सांग्रामिकोरथः॥ १८॥ अयंतुसारथिस्तस्यमत्पक्षनिहतोभुवि ॥ परिश्रांतस्यमपक्षाछित्त्वाखरुनरावणः ।।१९।। सीतामादायवैदेहीमुत्पपातवि हायसम् ॥ रक्षसानिहतंपूर्वमानहर्तुत्वमर्हसि ॥२०॥ रामस्तस्यतुविज्ञायसीतासक्तांप्रियांकथाम् ।। गृधराजपरिप्वज्यपरित्यज्यमहदनुः॥२१॥ निपपातावशोभूमौरुरोदसहलक्ष्मणः॥ द्विगुणीकृततापातोंरामोधीरतरोऽपिसन् ॥ २२ ॥ एकमेकायनेकृच्छ्रेनिःश्वसंतंमुहुर्मुहुः ।। समीक्ष्यदुः खितोरामःसौमित्रिमिदमत्रवीत् ॥ २३ ।। राज्यंभ्रष्टंबनेवासःमीतानष्टामृतोद्विजः ।। ईदृशीयममालक्ष्मीदहेदपिहिपावकम् ॥ २१॥ संपूर्णमपिचे दद्यातरेयमहोदधिम् ॥ सोपिनूनममालक्ष्म्याविशुप्येत्सरितांपतिः ॥ २५ ॥ नास्त्यभाग्यतरोलोकेमत्तोऽस्मिन्सचराचरे ॥ येनेयमहतीप्राप्ता मयाच्यसनपागुरा ॥ २६॥ अयंपितुर्वयस्योमेगृध्रराजोमहाबलः ॥ शेतेविनिहतोभूमौममभाग्यविपर्ययात् ॥ २७॥ गिरकर टक्ष्मणजी महित रोदन करने लगे । यद्यपि श्रीरामचन्दजी महावीरथे वथापि दूना संताप पाकर बहुत व्याकुल होगये ॥ २२ ॥ उसकाल जटायुको एकांतमें पडे वारंवार ऊँधी वास लेते हुए देख शोकसे आतुर हो श्रीरामचन्द्रजीने लक्ष्मणजीसे कहा ॥ २३ ॥ हम राज्यसे भ्रष्ट हुये वनमें वास हुआ, सीताजी हरी गई और जटायुको मृत्यु होगई हमारे सोटे कर्मसे उपस्थित हुई यह विपत्ति अगिकोभी भस्म कर सकतीहै ॥ २४ ॥ हम अपने भाग्यकी क्या बात कहैं ! हम इस दुःसके मंतापमे शांति पाने के लिये तलहीन तटहीन महासागरभी उतरें तो वह सरितस्वामी समुद्रभी निश्चयही हमारे दुर्भाग्यके प्रभाक्से एकवारही सूख जायगा ॥२५॥ मगर लोको हन साअधिक मंदभाग्य और कोई नहीं है क्योंकि हमने इतना बडा दुःसका जाल पाया है ॥ २६ ॥ यह महावली गिद्धराज पा.रा.भा. आर. हमारे पिताके प्रिय ससाह, सो यहभी हमारे भाग्यके फेरसे घायल होकर पृथ्वीपर शयन कररहे हैं * ॥ २७ ॥ रघुनंदन श्रीरामचन्द्रजी इस प्रकारके अनेक वचन कहते लक्ष्मणजीके सहित पिनाकी समान स्नेह दिखातेहुये जटायुको स्पर्श करते हुये ॥ २८ ॥ फिर श्रीरामचंद्रजी पंस कटे रुधिर हुये गृध्रराज जटायुको चिपट | कर "हमारी प्राणप्रिया मैथिली कहां गई है" यह कहकर पृथ्वीमें गिर पडे ॥ २९ ॥ इत्यापैश्री० वा आ० आरण्यकाण्डे भापाटीकायां सप्तपष्टितमः सर्गः॥६७॥ भीरामचंद्रजी भयंकर राक्षसके प्रहारसे पृथ्वीपर पडे हुये जटायुको देखकर परमबंधु सुमित्रापुत्रसे कहते हुये ॥ १ ॥ निचयही यह पक्षी हमारे लिये यत्न इत्येवमुक्काबहुशोराघवःसहलक्ष्मणः ॥ जटायुपंचपस्पर्शपितृस्नेहनिदर्शयन् ॥२८॥ निकृत्तपक्षरुधिरावसिक्तंतंगधराजपरिगृह्यराघवः ॥ कमैथि लीप्राणसमागतेतिविमुच्यवाचंनिपपातभूमौ ॥ २९॥ इत्या श्रीमवा. आ० अरण्यकांडे सप्तपष्टितमः सर्गः ॥६॥ रामःप्रेक्ष्यतुतंगधंभु विरौद्रेणपातितम् ॥ सौमित्रिमित्रसंपन्नमिदंवचनमत्रवीत् ॥ १॥ ममायनूनमधेपुयतमानोविहंगमः॥राक्षसेनहतःसंख्येप्राणांस्त्यजतिमत्कृते ॥ ॥२॥ अतिखिनःशरीरेऽस्मिन्प्राणोलक्ष्मणविद्यते ॥ तथास्वरविहीनोऽयंविकृवंसमुदीक्षते ॥३॥ जटायोयदिशक्कोपिवाक्यंव्याहरितुंपुनः॥ मीतामाख्याहिभद्रतेवधमाख्याहिचात्मनः ।। ४ ।। किंनिमित्तोजहागारावणस्तस्यकिमया ॥ अपराधंतुयंदृष्ट्वारावणेनहताप्रिया ॥५॥ कथं तमंद्रसंकाशंमुखमासीन्मनोहरम् ॥ सीतयाकानिचोक्तानितस्मिन्कालेद्विजोत्तम ॥६॥ करके हमारेही लिये राक्षससे मारे जाकर अय प्राणत्याग करते हैं ॥ २ ॥ हे लक्ष्मण ! इनका बोल धीमा पडगया और दृष्टिहीन हो आई है और प्राणभी अति मात्र व्याकुल होकर कुछेक इनकी देहमें टिक रहे हैं ।। ३॥ हे जटायु ! तुम्हारा कल्याणहो, यदि फिर तुममें कुछ बोलनेकी शक्ति हो तो सीताहरणका वृत्तान्त और तुम कैसे मारे गये,यह सब कह दीजिये॥४॥और रावणने किस निमिन आर्या जानकीको हरण किया और हमने उसका क्या अपराध कियाथा, जो वह हमारी प्राणप्यारीको हरण करके लेगया ॥ ५॥ हे विहंगवर ! हरणके समय जानकीका यह पूर्ण शशिसदृश मनोहर मुखमंडलं कैसा हो गयाथा ? और उन्होंने उस समय क्या कहा था ॥६॥ १. मया ॥ दान मलीन अधीन है अंग विहंग पागो क्षिति खिन्न दुरगगे । रापद दीन दयालु कपाल को देष दुरपी फरणा भइ भारी ||गीयको गोदमें राम कृपानिधि नन मरोजनम भरिधारी॥ यार दिभार मुगम पर वायुको पर उटानमा झारी ।।१॥ गोधको गोदमे गरन पानिधि देखतनननमों जल सरि ॥ टूक हो जाने सीतावियाफे जो पापी गोहफाफो पियार ॥ोट पान विहिरेन में हमें गाद विमल गिरि ।।यो दि गम भरे जहनन जटायुफी गरि टानमा सारं ॥२॥ ॥१० ****RARE उस राक्षसराज रावणका वीर्य, रूप और कर्म किसप्रकारकाहै ? हे तात ! उसका निवास कहांपरहै ? जो हम पूछते हैं सो सब बता दीजिये ॥ ७ ॥ तब धर्मात्मा जटायु लइसडावी वाणीसे विलाप करते व पूछतेहुये श्रीरामचन्द्रजीसे यह वचन बोला ॥ ८ ॥ राक्षसोंके राजा दुरात्मा रावणने वायु और दुर्दिन ( जय कि आकाशमें बादल आजाते हैं ) कारिणी महामायाका आश्रय करके सीताका हरण कियाहै ।। ९ ॥ हे तात ! जब हम लडते २ बहुत थकगये; तर निगाचर हमारे दोनों पंस काट सीताको ग्रहण करके दक्षिण दिशाको चलागया ॥ १० ॥ हे रघुनंदन ! अब हमारे प्राण रुकते हैं और दृष्टिभी समित होती है और हमको सत्र वृक्ष सुवर्णके दिखाई देते हैं, ‘मानो सब वृक्ष अपने शिरके केशोंमें खश और फूलोंकी माला पहर रहे हैं ॥ १३ ॥ रावण जिस मुहूर्तमें मीताको हर कथंवीर्यःकथंरूपाकिंकर्मासचराक्षसः ॥ कचास्यभवनंतातहिमेपरिपृच्छतः ॥७॥ तमुद्रीक्ष्यसधर्मात्माविलपंतमनाथवत् ॥ वाचाविरुवया राममिदंवचनमब्रवीत् ॥ ८॥ साहताराक्षसेंद्रेणरावणेनदुरात्मना । मायामास्थायविपुलांवातदुर्दिनसंकुलाम् ॥ ९॥ परिकांतस्यमेतातपक्षी छित्त्वानिशाचरः । सीतामादायवैदेहींप्रयातोदक्षिणामुखः ॥ १० ॥ उपरुध्यंतिमेप्राणादृष्टिभ्रमतिरावव ॥ पश्यामिवृक्षान्सौवर्णानुशीरा तमूर्धजान् ॥११॥ येनयातिमुहूर्तेनसीतामादायरावणः ॥ विप्रनष्टंधनंक्षिप्रंतत्स्वामीप्रतिपद्यते ।।१२।। विदोनाममुहूतोऽसौनचकाकुत्स्थसोऽत्रु धत् ॥ झपवडिशंगृह्यक्षिप्रमेव विनश्यति ॥ १३॥ नचत्वयाव्यथाकार्याजनकस्यसुतांप्रति ॥ वदेह्यारस्यसेक्षिप्रहत्वातंरणमूर्धनि ॥ १४ ॥ असंमूढस्यगृध्रस्यरामंप्रत्यनुभापतः ॥ आस्यात्सुत्रावरुधिरंम्रियमाणस्यसामिपम् ॥ १५ ॥ पुत्रोविश्रवसःसाक्षादातावैश्रवणस्यच ॥ इत्युक्ता दुर्लभान्प्राणान्मुमोचपतगेश्वरः॥ १६॥ लेगयाहै; उस मुहूर्तमें धनका खामी अपना बहुव दिनका नष्ट ( सोया हुआ ) धनभी शीग्रही पात करलेताहै, अर्थात् इस मुहूर्तकी खोई चीज शीघ्र मिल जाती है ॥ १२ ॥ इस मुहूर्तका नाम विंदहै, इस मुहूर्तकी खोई हुई वस्तु शीघ्र मिल जातीहै, सो रावण इसको नहीं जानताहै, हे राम! इस कारण वंशीका मांस ग्रहण करनेसे मछलीके समान शीय उसका विनाश होगा ॥ १३ ॥ इस मुहूर्तमें खोई हुई वस्तुही नहीं मिलती किन्तु शत्रुका नाशभी होताहै, तुमभी श्रीजा नकीजीको प्राप्त होने के विषय में और कुछ संदेह न करो रावणको संग्राममें मारकर शीवही सीताके सहित विहार करनेको तुम समर्थ होगे १४ ॥ तिसके पीउ रामचन्द्रजी साथ संभाषण करनेवाले सावधानचित्त मरनेके निकट गिद्धराज जटायुके मुखसे मांसयुक्त रुधिर वहनेलगा ॥ १५॥ उस समय जटायुने
पा.रा.भा.
आर के
॥१०७॥
२०६८
रायण विश्रवाका पुत्र, और कुबेरका भाईहै केवल इतनाही कहकर दुर्लभ प्राण त्याग करदिये ॥ १६ ॥ श्रीरामचन्द्रजी हाथ जोडे बोलिये ! वोटिये ! इसप्रका
रसे कहने लगे उसी समय उनके सामनेही जटायुके प्राण शरीरको त्याग करके आकाशको चलेगये ॥ १७ ॥ उस समय गिद्धराज चरणयुगल फैलाय अपना
शरीर फटफटाय भूमिमें शिर गिराय पृथ्वीमें गिरपडे ॥ १८॥ श्रीरामचन्द्रजी पर्वतसमान बडे आकारवाले ताम्रपत् रक्तनेत्र गृधको मराहुआ देखकर दुःखितहो लक्ष्म
णजीसे बोले ॥ १९ ॥ राक्षसोंके वसनेयोग्य दंडकारण्यमें बहुत वाँसे यह जटायुजी रहतेथे, सो आज उन्होंने देह त्याग करदिया ॥ २० ॥ इस प्रकार यह अनेक
पर्पतक जीवितथे, वह आज निहत होकर पृथ्वीमें शयन कर रहे हैं, हम समझे कि कालको उल्लंघन करना सहज नहीं है ।। २१ ॥ हे टक्ष्मण! देखो ये गृध्र हमारे कैसे
अहिब्रूहीतिरामस्य वाणस्यकृतांजलेः ॥ त्यत्वाशरीरंगृध्रस्यप्राणाजग्मुर्विहायसम् ॥ १७ ॥ सनिक्षिप्यशिरोभूमीप्रसार्यचरणातथा ॥
विक्षिप्यचशरीरस्वपपातधरणीतले ॥ १८॥ तंगृध्रप्रेक्ष्यताम्राक्षंगतासुमचलोपमम् ॥ रामःसुबहुभिर्दुःखैदींनःसौमित्रिमब्रवीत् ।। १९ ।। बहू
निरक्षसांवासेवर्षाणिवसतासुखम् ॥ अनेनदंडकारण्येविशीर्णमिहपक्षिणा ॥ २० ॥ अनेकवार्पिकोयस्तुचिरकालसमुत्थितः ॥ सोऽयमद्य
हताशेतेकालोहिदुरतिक्रमः ॥ २१ ॥ पश्यलक्ष्मणगृध्रोऽयमुपकारीहतश्चमे ॥ सीतामभ्यवपन्नोहिरावणेनवलीयसा ॥ २२॥ गृधराज्यपरित्य
ज्यपितृपैतामहंमहत् ॥ ममहेतोरयंप्राणान्मुमोचपतगेश्वरः ॥ २३ ॥ सर्वत्रखलुदृश्यतेसाधवोधर्मचारिणः ॥ शूराःशरण्या सौमित्रेतिर्यग्योनि
गतेष्वपि ॥ २४ ॥ सीताहरणजंदुःखेनमेसौम्यतथागतम् ॥ यथाविनाशोगृध्रस्यमत्कृतेचपरंतप ॥२५॥ राजादशरथः श्रीमान्यथामममहा
यशाः ॥ पूजनीयश्चमान्यश्चतथायंपतगेश्वरः ॥२६॥ सौमित्रेहरकाष्ठानिनिर्मथिष्यामिपावकम् ।। गृध्रराजंदिधक्षामिमत्कृतेनिधनंगतम् ॥२७॥
उपकारी हैं, सीताजीका उद्धार करनेमें तैयार होकर वली रावण दुरात्मा करके यह मारे गये हैं ॥ २२ ॥ और हमारे निमित्त पितृपितामहमाप्त महत् राज्य परित्याग
करके इन गधराजने प्राण छोडे हैं ॥ २३ ॥ हम जानते हैं कि सभी जातियोंमें शृरता युक्त शरण देनेवाले धर्माचरण करनेवाले साधु देखे जाते हैं सो मनुप्पादिके सिवाय
पक्षि आदि तिर्यग्योनिमेंभी ऐसे लोग देखे जाते हैं ॥ २४ ॥ हे सौम्य ! हमारेही लिये इन गृध्रने प्राण छोडे हैं इसलिये इनकी मृत्युसे सीताके हरणसभी अधिक हम
को दुःरा हुआहे ॥ २५ ॥ महा यशस्वी श्रीमान् राजा दशरथजी जिस प्रकारसे हमारे पूजनीय और माननीय, परोपकार करने और पिताजीका सखा होनेसे यह
विहंगमश्रेष्ठभी दमको वैसेही हैं।॥२६॥ हे सुमित्रानंदन ! तुम काष्ठ ले आओ हम अमि उत्पन्न करके हमारे लिो I
॥१०॥
हे लक्ष्मण ! यह जटायु पक्षियोंके राजा, और घोर कर्म करनेवाले राक्षसके हाथसे मारेगये हैं, हम इनको चितापर रखकर दाह करेंगे ॥ २८ ॥ यज्ञगील और आहितानियोंकी जो गति होती है, समरसे पराङ्मुस न होनेवाले, और भूमिदान करनेवाले पुरुपोंकी जो गति होती है ॥ २९ ॥ हे महारलवान गुधरान ! तुम हम करके मंस्कृत और हमारीही आज्ञासे उन सब श्रेष्ठगतियोंको प्राप्त होवो ॥ ३० ॥ धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी इसप्रकारमे यह कहकर दुःखित हो अपने बंधुकी ममान पक्षिराज जटायुको जटतीहुई चिताम चढाकर दाह करते हुए ॥ ३३ ॥ फिर वह महायरास्त्री वीर्यवान् श्रीरामचन्द्रजी सुमित्रानन्दन लक्ष्मण जीक माथ वनमें गये और बड़े आकारवाले मृगोंका वधकर उनका मांस ले फिर वहां आये जहां जटायुको दाह कियाथा । वहां आ जटायुको पिंड देनेके लिये तृण *** नाथंपतगलोकस्यचितिमारोपयाम्यहम् । इमंधक्ष्यामिसौमित्रेहतरौद्रेणरक्षसा ॥ २८ ॥ यागतिर्यज्ञशीलानामाहिताग्नेश्चयागतिः ॥ अपराव तिनांयाचयाचभूमिप्रदायिनाम् ॥२९॥ मयात्वंसमनुज्ञातोगच्छलोकाननुत्तमान् ॥ गृध्रराजमहासत्त्वसंस्कृतश्चमयात्रज ॥३०॥ एवमुक्काचिता दीप्तामारोप्यपतगेश्वरम् ।। ददाहरामोधर्मात्मास्वबंधुमिवदुःखितः ॥ ३१ ॥ रामोऽपिसहसौमित्रिवनयात्वासवीर्यवान् ॥ स्थूलान्हत्वामहारो हीननुतस्तारतंद्विजम् ॥ ३२ ॥ रोहिमांसानिचोद्धृत्यपेशीकृत्वामहायशाः ॥ शकुनायददौरामोरम्येहरितशादले ॥ ३३॥ यत्तत्प्रेतस्यमर्त्य स्यकथयतिद्विजातयः ॥ तत्स्वर्गगमनंक्षिप्रंतस्यरामोजजापह ॥ ३४ ॥ ततोगोदावरींगत्वानदीनरवरात्मजो ॥ उदकंचक्रतुस्तस्मैगृध्रराजाय तायुभी ॥ ३५ ॥ शास्त्रदृष्टेन विधिनाजलंगृध्रायराघवी || नात्वातीगृधराजायउदकंचक्रतुस्तदा ॥ ३६ ॥ सगृधराज कृतवान्यशस्करंसुदु करकर्मरणेनिपातितः ।। महर्पिकल्पेनचसंस्कृतस्तदाजगामपुण्यांगतिमात्मनःशुभाम् ॥ ३७॥ **** X*#Akkinka लाये ॥ ३२ ॥ और उम समस्त मांसके टुकडे २ कर डाले और उनके पिंड बना उनको हरी घासपर रख जटायुके अर्थ प्रदान किये ॥३३॥ ब्राह्मणलोग प्रेत पुरुपकी स्वर्गमानि होने के लिये जिन मंत्रों का जप किया करते हैं, श्रीरामचन्द्रजी जटायुको शीघ स्वर्ग प्राप्त करानेके लिये उन्हीं समस्त मंत्रोंका जप करनेलगे ॥३४॥ तिसके पीछे राजकुमार श्रीरामचन्न व लक्ष्मणजी दोनोंजन गोदावरीनदीपर जाकर जटायुके लिये तर्पण करते हुए॥ ३५ ॥ वह दोनों जन स्नान करके शास्त्रमें कहीहुई पिथिक अनुसार जटायुको जल देकर पिंड व तिलाभलि देते हुए ॥ ३६ ॥ गृध्रराज जटायु दुष्कर कार्य करते हुए युद्धमें मारे जाकर और महर्पिसदृश श्रीरामचन्द्र जीक दान जात हट ॥३७॥ तब राम और लक्ष्मण दोनों जन जलादिक्रिया समान करके पक्षिश्रेष्ठ जायुके प्रति पितृ बुद्धि त्यारित अ दनि स्यात अंट और मीनाजीके खोजनेमें मन लगा कर सुरश्रेष्ठ विष्णु और इन्द्रजीकी समान वनमें प्रवेश करतेहुए ॥ ३८॥ त्या ओटा दान आदिका मामयामध्यष्टितमः मर्गः ॥ ६८ ॥ ॥ जब पक्षिराज जटायुकी जलक्रिया होचुकी तब श्रीरामचन्द्र व लक्ष्मगजी दोना दहाने उन बन्ने कीटातील ट्रेन भाल्न हुए पश्चिमदिशाकी ओर चले ॥ १ ॥ और धनुप वाण खड्न हाथमें लेकर दोनों चावा जिन मार्गमें तयतक कोई मान न कमाया. टीशन कोणवाले मार्गको चले ॥ २ ॥ उस मार्गमें अनेक प्रकारके झाड वृक्ष वही लता आदि लगनेके कारण वह कृतातापिनियन म्याचदिप्रणिधायजग्मतुः ॥ प्रवेश्यसीताधिगमेततोमनोवनंसुरेन्द्राविविष्णुवासवौ ॥ ३८ ॥ इत्याचे श्रीम हामाया वारलाय आदिवायरण्यकांड अष्टपष्टितमः सर्गः ॥ ६८ ॥ कृत्येवमुदकंतस्मैप्रस्थितौराघवौतदा ॥ अवेक्षतौवनेसीतांजग्मतुः पश्चिमांदिशन 1 31 नांदिगदक्षिणांगत्वाशरचापासिवारिणी ॥ अविप्रहतमेक्ष्वाकौपंथानंप्रतिपेदतुः ॥ २॥ गुल्मवृक्षेश्वबहुभिलताभिश्वन वष्टितम् ॥ प्रातमदनीगं गदनवाग्दर्शनम् ॥ ३॥ व्यतिक्रम्यतुवेगेनगृहीत्वादक्षिणांदिशम् ॥ सुभीमंतन्महारण्यंव्यतियातामहावलौ ॥४॥ ततः परंजनस्थानाविको गम्यगवया ॥ क्रौंचारण्यंविविशतुर्गहनतीमहौजसौ ॥६॥ नानामेघधनप्रख्यंप्रहृष्टमिवसर्वतः ॥ नानावणेःशुभैः पुप्पगपभिगमनन ॥ ६॥ दिदृक्षमाणौवेदेहीतद्वनंतीविचिन्वतुः ॥ तत्रतत्रावतिष्ठतौसीताहरणदुःखितौ ॥ ७॥ ततःपूर्वेणतोगत्वात्रिकोशं प्रातस्तदा । चायनिकम्यमतंगाश्रममंतरे ॥ ८॥ दृष्ट्वात्तद्वनं घोरंबहुभीममृगद्विजम् ॥ नानावृक्षसमाकीर्णसवंगहनपादपम् ॥ ९॥ चारोंओरने विर. रहाया, इसी कारणसे वह अतिभयानक वा दुर्गम बोध होताथा । ३ ॥ उस मार्गमें होकर फिर वह महाबलवान् दोनों रघुवीर दक्षिणदिशाकी ओर बडे वेगने महावन में होकरके गले ॥ ४ ॥ इस प्रकारसे जाते २ जनस्थानसे तीन कोश दूर कौचनामक घने वनमें पहुँचे ॥ ५ ॥ यह वन अतिशय दुर्गम देखनमें बहुत सारे मेघोंकी ममान पठापना था, अनेक प्रकारके सुन्दर फूलोंके खिले रहनेसे मानों वह सब भाँतिसे हर्षपूरितथा और मृग य पक्षीभी उसमें बहुत थे ॥६॥ दोनों भाना मीनाजीक हरणसे दुःखित हो और उनके दर्शनकी कामनासे वह वन ढूँढते २ शान्तिके यश स्थान २ पर सडे हो जाने लगे ॥ ७ ॥ फिर यह पूर्व की ओर नीन कोश चलकर कौंचारण्यको नांघकर मातंगमुनिके आश्रमको देखते हुए ॥ ८ ॥ उस आश्रमका पन महाभयंकरथा और भयंकर स्पभावपाले ॥१० भनाजाति" . Areी ममान गहरी एक गिरिगुफा देसी, इस गुफामें नित्यही अधकार रहताथा ॥10॥ 11111.. वाली और विश्व वदन एक राक्षमीको देता ॥ ११ ॥ राक्षसी देसनेमें अति भयंकरीथी, साल अति कडीथी थोडे पराक्रमियोंको वडा भय देनेवाली भयंकर करनायुक लम्या पेट तीक्ष्ण इदि बडी विकराल ॥ १२॥ स्वभाव अति भयंकर था वडे २ मृगोंको वह भक्षण करती, रूप बडा भयावना शिरके बाल गलं, मी उस गामीको दोनों भाइयोंने देखा ॥ १३ ॥ तिसके पीछे वह निशाचरी रामचंद्रजीके आगे सड़े हुये लक्ष्मणजीके निकट आकर कहने दहशातेगिरीतबदरीदशरथात्मजा । पातालसमगंभीरांतमसानित्यसंवृताम् ॥ १०॥आसाबचनरव्याघ्रौदर्यास्तस्याविदूरतः॥ ददर्शतुर्महारूपां गतमीविकृताननाम् ॥११॥ भयदामल्पसत्त्वानांवीभत्सारौद्रदर्शनाम् ॥ लंबोदरीतीक्ष्णदंष्ट्रांकरालींपरुपत्वचम् ॥१२॥ भक्षयंतींमृगान्भीमान्वि कटामुकमूर्धजाम् ॥ अक्षतांतृतीतबभ्रातरौ रामलक्ष्मणौ ॥१३॥ सासमासाद्यतीवीरौव्रजंतंभ्रातुरग्रतः॥ एहिरंस्यावहेत्युक्तासमालमतलक्ष्मणम् ॥३॥यानननंवचनंसौमित्रिमुपगुहाच ॥ अहंत्वयोमुखीनामलाभस्तेत्वमसिप्रियः।। १५॥नाथपर्वतदुर्गेपुनदीनांपुलिनेपुच॥ आयुश्चिरमिदंवी ग्मयामहरंस्यमे ॥ १६॥ पवमुक्तस्तुकुपितःखड्गमुद्धृत्यलक्ष्मणः । कर्णनासस्तनंतस्यानिचकारिसुदनः ।।१७।। कर्णनासेनिकृत्तेतुविस्वरं पिननादना ॥ यथागतंप्रदुवावगभसीवोरदर्शना ||१८|| तस्यांगतायांगहनंबजतीवनमोजसा ॥ आसेदतुरमित्रन्नोभ्रातरीरामलक्ष्मणौ॥ १९॥ रगी कि "आश्री हम तुममे विहार करें" ना कहकर उसने लक्ष्मणजीको ग्रहण किया ॥ १४ ॥ और वह राक्षसी उनको चिपटाकर कहनेलगी कि, हे नाथ ! हमारा योगी नाम है. अब नुमको परम लाभ हुआ और तुमही हमारे प्यारे हुये ॥ १५॥ हे नाथ ! हमारे सहित सब जीवनतक नदियोंके किनारोंपर और नाना पकारक परनापर तुप विकार किया करना ॥ १६ ॥ शत्रुओंका नाश करनेवाले लक्ष्मणजीने इस बातसे झोधित होकर खड्ग उठाकर उस राक्षसीके नाक कान व धान काटाले ॥ १७ ॥ जप उनके कान नाक व स्तन काट डाले गये तब वह चोर दर्शनवाली राक्षसी विकट शब्दसे चिल्लाकर शब्द करतीहुई जहाँसे आईथी वहां को दी ॥ १८ ॥जय वह वहांने भाग गई तो महातेजवान् शत्रुओंके मारनेवाले श्रीराम लक्ष्मण दोनों भाई वेगसहित चलतेहुए एक गहन वनमें पहुँचे ॥ १९ ॥ PAR********* पा.रा.भा. आर०. ॥१०॥ स०६ वहां पहुँचकर सत्यवक्ता, शीलवान् पवित्र स्वभाव और परम तेजस्वी लक्ष्मणजी हाथ जोडकर तेजसे प्रदीप्यमान श्रीरामचन्द्रजीसे वोले ॥ २० ॥ हे चातः ! हमारा पाया हाथ जलदी २ फडकताहै और मन मानो बहुत उकसाताहै और प्रायः दुर्लक्षणभी बहुत दृष्टि आते हैं ॥ २१ ॥ इससे हे आर्य! आप सज करके तैयार होरहैं; और हमारी बात सुनें यह सब अपशकुन स्पष्टही कहे देते हैं कि, भय आयाही चाहताहै ॥ २२॥ परन्तु विजय हमारी अवश्य होगी । क्योंकि यह अतिभयानक पञ्चुलक पक्षी मानो हमारी युद्ध विजय कहता हुआ शब्द कर रहाहै ॥ २३ ॥ फिर जब महातेजस्वी श्रीराम लक्ष्मणजी उस समस्त वनको ढूँढ रहेथे कि इतनेहीमें एक विपुल शब्द मानो उस वनको विध्वंस करता हुआ होने लगा ॥ २४ ॥ उस वनमें एकाएकी प्रचण्ड पवन चलने लगा और इस वायुके चलनेसे वृक्ष परस्पर टकराने लगे। उसमें से एक शब्द समस्त वनको शब्दायमान करता हुआ उत्पन्न हुआ ॥ २५ ॥ श्रीरामचन्द्रजी लक्ष्मणजीके सहित खड्ग धारण करके "यह शब्द कहांसे हुआ"यह लक्ष्मणस्तुमहातेजाःसत्यवाञ्छीलवाञ्छुचिः॥ अत्रवीत्पांजलिवाक्यंभ्रातरंदीप्ततेजसम् ॥२०॥ स्पंदतेमेदृढंबाहुरुद्विग्नमिवमेमनः॥प्रायशश्चाप्य निष्टानिनिमित्तान्युपलक्षये।॥२१॥तस्मात्सजीभवार्यत्वंकुरुष्ववचनमम ॥ ममेवहिनिमित्तानिसद्यःशंसंतिसंभ्रमम् ॥२२॥ एपवंचुलकोनामपक्षी परमदारुणः॥ आवयोर्विजयंयुद्धेशंसन्निवविनर्दति ॥ २३ ॥ तयोरन्वेपतोरेवंसर्वतद्वनमोजसा ॥ संजज्ञेविपुलःशब्दःप्रभंजन्निवतद्वनम् ॥२४॥ संवेष्टितमिवात्यर्थंगहनमातरिश्वना ॥वनस्यतस्यशब्दोऽभूद्रनमापूरयन्निव ॥ २५ ॥ तंशब्दंकांक्षमाणस्तुरामःखड्गीसहानुजः ॥ ददर्शसुमहाकायं गक्षसंविपुलोरसम् ॥ २६ ॥ आसेदतुश्चतद्रशस्तावुभौप्रमुखेस्थितम् ॥ विवृद्धमशिरोग्रीवंकवंधमुदरेमुखम् ॥२७॥ रोमभिनिशितैस्तीणर्महा गिरिमिवोच्छ्रितम् ॥ नीलमेघनिभरौद्रमेवस्तनितनिस्वनम् ।। २८ ॥ अग्निज्वालानिकाशेनललाटस्थेनदीप्यता ॥ महापक्ष्मेणापिंगेनविपुले नायतेनच॥ ॥२९॥ एकेनोरसिघोरेणनयनेनसुदर्शिना ।। महादंट्रोपपनंतलेलिहानमहामुखम् ॥३०॥ जानने के लिये अभिलापी होकर इधर उधर देखतेथे कि चौडी छातीवाला बृहदाकार एक राक्षस सहसा देखपडा ॥२६॥ उसका पेट बहुत बडा व नाम उसका कान्ध था, यह श्रीरामचन्द्रजीके आगे आनकर खडा होगया,उसका मस्तक और गर्दन नहींथा शरीर बहुत बडाथा, मुख पेटमें था ॥ २७ ॥ रुवें भालेके समान तीखे, और सीधे थे आकार उसका महापर्वतकी समान ऊँगाथा स्पर मेघ गर्जनेकी तुल्य, रंग नीले मेघकी समान, व स्वभाव और आकार उसका बडा भयंकरथा ॥ २८ ॥ और उमका एक नेत्र माथेमें था वह अमिकी ज्यालाके समान प्रदीन और बडी २धूमिली पलके उसपर थी और यह नेत्र बढाभी बहुत था ॥ २९ ।। और उसका दूसरा नेत्र छातीम था वह नेष अतिशय भयंकर और वीक्षण दिखाईदना था, उमका मुसभी पड़ा भारीया और उसके मुसमें बडे दातोंकी पंक्तियां थीं यह उस मस्पो मातो 参差等等等等会这张古装美艺表示其总 मा M T धोनही देगाथा होट चाटरहाथा ॥ ३० ॥ और वह अपनी चार २ कोराकी लंबी दोनों बाहोंसे पकड २ ऋक्ष, सिंह, मृगादिकोंको भक्षण करता चला आताथा ।। || 31 || यह आनी दोनों बांहोंमे विविधयकारके मृग, पक्षी, क्ष और मृगयूथयोंको पकडना और अपने मुखमें छोडताथा ॥ ३२ ॥ जिस मार्गसे होकर राम सामगजीका जानाया, वह उमीको गेहुये पडाया, तब राम लक्ष्मणजीने घूमकर एक कोरा पर जाकर देखा नो ॥ ३३ ॥ अति घोरदर्शन दारुण भयंकराकार पडे गरीराला काय दिगलाई पडा वह आनी दोनों भुजाओंसे जीवजन्तुओंको सब प्रकारसे पकडताथा और उसके शरीरकी गठन देखनेसे ठीकही वह कबन्ध जात होताया ॥ ३४ ॥ किर महायलवान कवन्धने दोनों बडी २ वाहें फैलाकर राम और लक्ष्मण दोनोंकोही वलसे पीडन करके दोनोंको एक सायही भनयंतमहायोगशामिदमृगद्विजान् ॥ चोरीभुजीविकुर्वाणमुभौयोजनमायती ॥३१॥ कराभ्यांविविधान्गृह्यमझान्पक्षिगणान्मृगान् ॥ आक पंतरिकपतमनेकान्मृगयूथपान् ॥ ३२ ॥ स्थितमावृत्यपंथानंतयोर्धात्रोःप्रपन्नयोः ॥ अवतंसमतिक्रम्यक्रोशमानंददर्शतुः ॥ ३३ ॥ महांतंदा मणंभीमंकबंधभुजमवृतम् ॥ कवंधमिवसंस्थानादतिघोरप्रदर्शनम् ॥ ३४ ॥ समहावाहुरत्यर्थप्रसार्यविपुलौभुजौ ॥ जग्राहसहितावेपराधवीपी इयन्वयात् ॥ ३५ ॥ खगिनीढियन्यानोतिग्मतेजोमहाभुजी ॥ भ्रातरी विवशंप्राप्तीकृप्यमागीमहाबली ॥ ३६॥ तबधैर्याचशूरस्तुराधको नेपियर्थ ।। बाल्यादनाश्रयाचैवलक्ष्मणस्त्वभिविव्यथे ॥ ३७॥ उयाचचविपण्ण-सत्राघराघवानुजः ॥ पश्यमांविवशंबीरराक्षसस्यवशंग नम ॥ ३८॥ मयकेनतुनिर्युक्तःपरिमुच्यस्वरावर ॥ माहिभूतवलिंदत्त्वापलायस्वयथासुखम् ॥ ३९ ॥ अधिगंतासिवेदेहीमचिरेणेतिमेमतिः॥ पनिलभ्यसकाकुत्स्थपितृपैतामहीमहीम् ॥ १० ॥ तत्रमारामराज्यस्थास्मर्तुमर्हसिसर्वदा ।। लक्ष्मणेनेवमुक्तस्तुराम-सौमित्रिमत्रवीत् ॥११॥ पाण कालिया ॥ ३५ ॥ र पनुप और सङ्ग धारण किये हुए तीन तेजवान महायलवान्, महाबाहु वह दोनों चाता कबन्धमे बचें जाकर अवश होगये ॥ ॥ ३६॥ श्रीगमनन्दजी नो स्वभारमेही भैगन और शरता मम्मन्न थे, वह तो कुछभी व्याकुल न हुये, परन्तु लक्ष्मणजी वालक और अनाथ होनेके कारण एक रासी महा प्याकुल होगरे ॥ ३० ॥ और गोफ करके गवरनंदन बडे भाता श्रीरामचन्दजीसे बोले कि हे वीर ! देखो हम विवश होकर राक्षसके वश हुये हैं ॥ ॥ ३८ ॥ कारण परमात्र मकोड़ी देकर एट जाइये । और हमें इमराक्षसके आगे बलिकी भांति देकर यथा सुखसे आप भाग जाइये ॥ ३९ ॥ माना गम ! हम निमपट्टी ममान है कि आप गीयही वैदेहीको पान होंगे और पिता पितामहका राज्यभी शीग्रही आप करेंगे ॥ ४० ॥ अब इसममय यही रा.भा. प्रार्थना है कि आप राज्यपदपर प्रतिष्ठित होकर सदाही हमको स्मरण करते रहाकीजियेगा. जब लक्ष्मणजीने इस प्रकार कहा तव श्रीरामचन्द्रजी उनसे बोले ॥४॥ आर०क कि हे पीर! वृथा भीत न हूजिये तुमसरीखे पुरुष कभी व्यथित नहीं होतेहैं, दोनों भाइयोंसे इसी समय वह क्रूर ॥ ४२ ॥ महाबाहु, दानवश्रेष्ठ कवन्ध कहने लगा स०६९ कि तुम्हारे कंधे पेलोंकी समान ऊँचेहैं और हाथमें तुमने बडे २ धनुप और खड्ग धारण कियेहैं, सो वताओ कि तुम कौनहो ? ॥ ४३ ॥ तुम लोग भाग्यमेही इस भयंकर देशमें आकर हमारे नेत्रोंके सन्मुख पडेहो तुम्हारा यहाँपर क्या कार्यहै और तुम किस कारणसे यहाँपर आयेहो सो कहो ॥ ४४ ॥ हम भूखे होकर यहांपर टिक रहे हैं सो तुम धनुप पाण और खड्ग धारण किये हुए तेज सींगवाले बैलकी समान यहाँपर हमारे मुखमें आय पडेहो ॥४५॥ परन्तु अब हमारे मुसमें पड़ तुम्हारा मास्मत्रासंवृथावीरनहित्वादग्विपीदति ॥ एतस्मिनंतरेरोभ्रातरौरामलक्ष्मणौ॥४२॥ तायुवाचमहावाहुःकवंधोदानवोत्तमः ॥ कौयुवांवृपभस्कयौ महाखड्गधनुर्धरौ ।। ४३ ॥ घोरंदेशमिमंप्राप्तौदेवेनममचाक्षुपौ ।। वदतकार्यमिहवांकिमर्थंचागतौयुवाम् ।। १४ । इमंदेशमनुप्राप्तीक्षुधार्तस्येहति टतः॥सवाणचापखगोचतीक्ष्णशृंगाविवर्षभौ॥४५॥मांतूर्णमनुसंप्राप्तौदुर्लभंजीवितंहिवाम् ॥ तस्यतद्वचनं श्रुत्वाकवंधस्यदुरात्मनः ॥ ४६॥ उवाचलक्ष्मणरामोमुखेनपरिशुष्यता ॥ कृच्छ्रात्कृच्छ्तरप्राप्यदारुणंसत्यविक्रम ॥४७॥ व्यसनंजीवितांतायप्राप्तमप्राप्यतांप्रियाम् ॥ कालस्यसु महद्रीयंसर्वभूतेपुलक्ष्मण॥४८॥ त्वांचमांचनरव्याघव्यसनै पश्यमोहिती॥नहिभारोऽस्तिदेवस्यसर्वभूतेषुलक्ष्मण ॥४९॥शूराश्चबलवंतश्चकृता स्राश्चरणाजिरे। कालाभिपन्नाःसीदंतियथावालकसेतवः॥५०॥ इति वाणोदृढसत्यविक्रमोमहायशादाशरथिःप्रतापवान् ॥ अवेक्ष्यसौमित्रिमु दनविक्रम स्थिरांतदास्वांमतिमात्मनाकरोत् ॥५१॥ इत्यार्प श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे एकोनसप्ततितमःसर्गः ॥ ६९॥ जीवित रहना दुर्लभ है. दुरात्मा कबन्धके यह वचन सुनकर ॥ १६ ॥ श्रीरामचन्द्रजी वदन सुखाकर लक्ष्मणजीसे बोले कि हे सत्यविक्रम ! प्रिया सीताजीके हर णमे विपम विपद आपडीहै, सो इससे निश्चयही प्राण संहार होनेकी संभावनाहै तिसके ऊपर फिर पारंवार यह कष्टके ऊपर कष्ट पड रहेहैं ॥ ४७ ॥ अवतो यह महादुःख हमको भान हुआ है, अब प्रियाके पानेकीभी आशा त्याग करें । लक्ष्मण ! सब प्राणियोंमें कालका बडा वीय दिखलाई देताहै॥ १८ ॥ हे नरश्रेष्ठ लक्ष्मण ! देसो हम तुम दोनों कालकेही प्रभावसे कैसे दुःसमें पड़े हैं, प्राणियाँको दुःख देनेमें कालको कुछभी डर नहीं है ॥ १९ ॥ कालके वश हो बडे शूरवीर अन । गोंके जाननेवाले पुरुपभी रेनेमे बनाये हुये पुलकी समान संग्राममें खस जाते हैं ॥ ५० ॥ सत्य और अनतिक्रमणीय दृढविक्रमसम्पन्न, प्रतापवान् महायशस्वी दश ।
मागण। याचा मन. 4 . -- पिलपिमान नागमणजीने लक्ष्मणनीको देस ऐमा महते २ ज्ञानकै प्रभावमे अपने चिनको स्थिर किया ॥ ११ ॥ इत्या श्रीमामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकार भाषाटीरुपानेकोनमततितमः मर्गः ॥ ६९ ॥ ॥ श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मण इन दोनों भाइयोंको अपनी बाँहोंकी फांसीमें बँधाहुआ वहां गहा देग काय उनने बोला ॥ 1 ॥ अरे भत्रियश्रेष्ठ ! दोनों जन ! हम भुसे हुए हैं, विधाताने तुम दोनोंको चेतनारहित करके हमारे खानेको भनदिया है इसलिये हमको देख अब तुम क्या राह देख रहे हो तैयार होवो ॥ २ ॥ उसके ऐसे वचन सुनकर लक्ष्मणजी दुःखित व विक्रमप्रकाश करनेमें कत निभय होकर उम कालके अनुसार यास्य श्रीरामचन्द्रजीसे बोले ॥ ३॥ कि यह राक्षसाधम हम दोनोंही जनोंको पकडे हुआ है इसकारण आइये हम अभी दो सगासे तीनुतस्थितीदृष्ट्वाभातरीरामलक्ष्मणी ।। बाहुपाशपरिक्षिप्तौकबंधोवाक्यमत्रवीत् ॥ १॥ तिष्टतःकिनुमांदृष्ट्वाक्षुधातक्षत्रियर्पभो ॥ आहारा धामंदिष्टदियेनहतचेतनी ॥२॥ तच्छुत्वालक्ष्मणोवाक्यं प्राप्तकालंहितंतदा ॥ उवाचार्तिसमापनोविक्रमेकृतनिश्चयः ॥ ३॥ त्वांचमांचपुरा पूर्णमादनेगरमाधमः | तस्मादसिभ्यामस्याशुवाहूछिंदावहेगुरू॥ १ ॥ भीपणोऽयंमहाकायोराक्षसोभुजविक्रमः ॥ लोकंयतिजितंकृत्वाह्यावां तमिहेच्छति ॥ ५॥ निश्रेष्टानांवधोराजन्कुत्सितोजगतीपतेः ॥ क्रतुमध्योपनीतानांपशुनामिवराधव ॥६॥ एतत्संजल्पितंश्रुत्वातयोः क्रुद्ध म्नुगमः ॥ विदायर्यास्यंततोदितौभक्षयितुमारभत् ॥ ७॥ ततस्तौदेशकालज्ञोखड्गाभ्यामेवराववौ ॥ अच्छिदतांसुसंहृष्टीवाहूतस्यांसदे गयोः ॥ ८॥ दक्षिणोदक्षिणवाहुमसक्तमसिनाततः ॥ चिच्छेदगमोवेगेनसव्यंबीरस्तुलक्ष्मणः ॥ ९ ॥ सपपातमहावाहुश्छिन्नवाहुमहास्वनः ॥ पंचगानादिशवनादयन्नलदोयथा ॥ १० ॥ इगर रहे भाग दोनों हाथ काट डालें ॥ १ ॥ यह बडे आकारखाला भयंकर राक्षस केवल अपनी भुजाओंकीही सहायतासे सब लोकोंको सर्वप्रकारसे जीत अब हम तुमको माग्नेके लिये तैयार हुआ है ॥ ५॥ परन्तु हे राजन् ! यजमें आये हुए छागोंकी समान चेष्टारहित होकर मरना क्षत्रियोंके लिये बहुतही निंदाकी पास है ॥ ६ ॥ श्रीगम लक्ष्मणजीको प्रेमी वार्ता सुन निशाचर कबंध कोधित होकर मुँहयाय उनको भक्षण करनेके लिये तैयार हुआ ॥ ७ ॥ तव देश और कालके जागने गले श्रीगम और लामण दोनों भानाओंने सन ग्रहण करके उसकी दोनों भुजायें कन्धेपरसे काटडाली ॥ ८ ॥ चतुर श्रीरामचन्द्रजीने उसकी दाहिनी भुजा और पोशान लक्ष्मणजीने उमकी पाई भजा गीताने काट डाली ॥९॥ जब बाहें काट डाली गई तब भयंकर शब्द करता हुआ महाबाहु कबन्ध मेषकी समान घोर का.स.मा. आर० गर करके गगनमण्डल और दगा दिगाओंको अपने शब्दसे भर देता हुआ गिरपडा ॥ १०॥ फिर अपनी दोनों भुजाओंको कटाहुआ देखकर दानव कबंध रुधिरसे इरादा दोनों भाइयोंने बोला कि, तुम कौनहो ? ॥ ११ ॥ जय कबन्धने इस प्रकारसे पूछा तब महाबलवान् शुभलक्षणयुक्त काकुत्स्थ लक्ष्मणजी कान्धसे गमगतका परिचय देते हुए बोले ॥ १२ ॥ यह इवाकुवंशमै उत्पन्न हुए हैं और श्रीरामनामसे यह लोकमें विख्यात हैं और हम इनके छोटे भाई है हमारा नाम समग है ॥ १३॥ गाली जननी कैकेयी करके इनकी राज्यपानि रोकी जाकर सर्व त्यागी करा यह वनको पठाये गये सो यह हमारे और अपनी भार्याके गाय पनमें विचरण करतेथे ॥ १४ ॥ कि उनमें वास करनेके समय इन देवतुल्य प्रतापशाली श्रीरामचन्द्रजीकी भार्या हरी गई हैं सो उनको ही ढूँढते २ हम लोग मनिकृत्ताभुगौदृष्टाशोणितावपरिप्लुतः ॥ दीनःपप्रच्छतौवीरोकोयुवामितिदानवः ॥११॥ इतितस्यनुवाणस्यलक्ष्मणःशुभलक्षणः॥ शशं मतस्यकाकुत्स्थंकवंधस्यमहावलः ॥ १२ ॥ अयमिक्ष्वाकुदायादोरामोनामजनैःश्रुतः ॥ तस्यैवावरजंविद्धिभ्रातरंमांचलक्ष्मणम् ॥ १३ ॥ मानाप्रतिहतेराज्येरामःप्रवाजितोपनम् ॥ मयासहचरत्येपभार्ययाचमहद्वनम् ॥ १४ ॥ अस्यदेवप्रभावस्यवसतोविजनेवने ॥ रक्षसापहृताभार्या यामिच्छंताविहागतौ ॥ १५॥ तुकोवाकिमर्थवाकबंधसदृशोवने ॥ आस्पेनोरसिदीतेनभग्नजंघोविचेटसे ।। १६ ।। एवमुक्त कबंधस्तुल मणेनोत्तरंखनः ।। उवाचवचनंप्रीतस्तदिंद्रवचनंस्मरन् ॥ १७ ॥ स्वागतंवांनरव्यानोदिष्ट्यापश्यामिवामहम् ॥ दिष्टयाचेमौनिकृत्तौमेयुवा भ्यांगाधनी ॥ १८॥ विरूपंयञ्चमेरूपंप्राप्तंडविनयाद्यथा ॥ तन्मेशृणुनरव्याघ्रतत्त्वतःशंसतस्तव ॥ १९॥ इत्या श्रीम• वाल्मी० आदि. अरण्यकांडे मततितमः सर्गः॥ ७० ॥ पुराराममहावाहोमहावलपराक्रमम् ॥ रूपमासीन्ममाचिंत्यंत्रिपुलोके विश्रुतम् ॥ १॥ पहार भाये है ॥ १५ ॥ और तुम कौन हो? जो कबन्धकी समान वनमें घूमते हो। तुम्हारी जांघ टूटी हुई हैं और अतिशय दीपयुक्त वदनमडल छातीमें लगा हुआ ॥ १६ ॥ जय लक्ष्मगजीन ऐमा कहा तब इन्दके वचनका स्मरण करताहुआ कयन्ध प्रसन्न होकर बोला ॥ १७ ॥ कि आपलोग दोनोंही पुरुपोंमें श्रेष्ठहैं । आप मन्ती नगमेनो आये, आजभाग्यमेही हमने आपलोगोंको देशाहै और आपने जो हमारे बन्धनरूप हाथ काटडाले सो यहभी हमारे बडे सौभाग्यकी वातहै इसमें कुछ माद नहीं ॥ १८॥निमभीतिमे हमारा इम विरुपताका रूपया, व जिम ऊयमसे हम इस कुरूपताको पात हुये मोमय ज्योंका त्यों कहते हैं आप श्रवण करें ।।१९।। बारें धीमा पा० आदि० आरण्यकाण्डे भापाटीकायां मातितमः मर्गः ॥ ७० ॥ हे महावाह, श्रीरामचन्द्रजी ! पूर्वकालमें हमारा रूप अत्यन्त मन्दर अतितीग ॥११
ऐश्वर्य महापल व पराक्रमयुक्त और तीनों लोकोंमें विख्यात था ॥ १ ॥ और सूर्य चन्द्रमा व इन्द्र के गरीरकी समान हमाराभी रूपया, सो ऐमा नप धारण कर
हम तीनों लोकोंको इरसाने लगे ॥ २ ॥ हम धूम २ कर वनवासी ऋपिलोगोंको भयभीत करतेथे एक समय जाने २ हमने स्थूलशिरा नामक महर्षिको कोपित
कगया ॥ ३ ॥ वे महर्पिजी विविधभांविके वनके फूल फलादि इकट्ठे कर रहेथे कि, हमने अपने रूपके गर्वमे उनको विकारा और कोधित कगया तब उन्होंने
हमारी ओर देस अति घोरगाप दिया ॥ ४ ॥ कि जाओ मूर्स ! तुम्हारा रूपभी हमाराहीसा कुरूप होजायगा, जब हमने क्रोधयुक्तहो उनको गापदेने हुये देना
नो गापके उद्वारके लिये प्रार्थना की, कि इनका निवारण कब होगा ॥ ५॥ तव शापके अन्त होनेके लिये उन्होंने कहा कि, जिस समय श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे हाय
यथामूर्यस्यसोमस्यशकस्यचयथावपुः॥ सोऽहंरूपमिदंकृत्वालोकविनासनंमहत् ॥२॥ ऋपीन्यनगतात्रामवासयामिततस्ततः ॥ ततःस्थल
शिरानाममदर्पिःकोपितोमया ॥ ३॥ सचिन्वन्धिविधंवन्यरूपेणानेनधर्पितः । तेनाहमुक्त प्रेक्ष्यवंधोरशापाभिधायिना ॥ ४॥ एतदेवंनृशंसते
रूपमस्तुविर्हितम् ॥ समयायाचितःकुदःशापस्यांतोभवेदिति ॥ ५॥ अभिशापकृतस्येतितेनेदंभापितंवचः॥ यदाछित्त्वाभुजारामस्त्वांद
हेद्विजनेयने ॥ ६॥ तदात्वंप्राप्स्यसेरूपस्वमेवविपुलंशुभम् ॥ श्रियाविराजितंपुबनोस्त्वविद्धिलक्ष्मण ॥ ७ ॥ इंद्रशापादिदरूपंप्राप्तमेवरणा
जिरे ॥ अहंहितपसोग्रणपितामहमतोपयम् ॥ ८॥ दीर्वमायुःसमेप्रादात्ततोमांविभ्रमोऽस्पृशत् ॥ दीर्घमायुर्मयाप्राप्तंकिंमांशकःकरिष्यति ॥९॥
इत्येवंयुद्धिमास्थायरणेशकमधर्पयम् ॥ तस्यवाहुप्रमुक्तेनवत्रेणशतपर्वणा ॥ १० ॥ सक्थिनीचशिरश्चेवशरीरसंप्रवेशितम् । समयायाच्यमानः
सन्नानयघमसादनम् ॥११॥
काट दालेंगे और विजन पनमें नुमको फूंक देंगे ॥ ६ ॥ वस उसी समय तुम अपना सुविपुल और मनोहर रूप प्राप्त करलोगे, सो हे लक्ष्मण ! हम श्रीमान् दनुके
पुषहैं ॥ ७ ॥ गंगाममें इन्द्रजीके शापसे यह कबंधकासा रूप हमने पायाहै उसका ठीक २ वृत्तान्त यह है कि आगे हमने अत्युग्र तप करके ब्रह्माजीको प्रसन्न किया
॥ ८ ॥ नर उन्होंने हमको दीर्घायु प्रदान की तिसके पीछे हमारे चित्तमे त्रम हुआ और जिससे हमने गर्वित होकर विचारा कि, इन्द्र हमारा क्या कर सकते हैं
स्योंकि अब तो हमने दीर्घायु पालीहै ॥ ९ ॥ ऐसी बुद्धिमें स्थिर हो संग्राममें हमने इन्द्रको ललकारा तब उन्होंने अपना सौ धारका वन हमारे ऊपर छोडा जिसके
लगनेगे॥१०॥मम्नक कनपटी आदिमय अंग हमारेगरीरके भीतर पैठ गये । तिसके पीछे हमने अपनी मौत चाहीभी परन्तु उन्होंने हमें यमपुरको नभेजा ॥ ११ ॥
आर०क या.रा.भा. ॥११२॥ परन् केवल उन्होंने इतनाही कहा कि, जाओ पितामह ब्रह्माजीका वचन सत्य होवे और तुम बहुत दिनोंतक जीवित रहो तब हमने उनसे कहा कि, आपका वज्र लगनेसे हम शिर कनपटी मुख आदि अंगोंसे रहित होगये फिर भला हम किस प्रकारसे बिना कुछ साये पिये दीर काटतक जीवन धारण करने में समर्थ होंगे ॥ ३२ ॥ इस बातको सुनकर इन्द्रजीने कहा कि, बहुत अच्छा अब तेरी बाहें एक योजन लंबी हो जायेंगी और दोरकालतक जीवितभी रहोगे । ॥ १३ ॥ यह कहकर उन्होंने हमारे पेट में बडे २ दांत सहित मुखभी बना दिया तबसे हम अपने बड़े दोनों हाथ फैलाकर वनचरोंको पकड२ मुखमें डाटठेतहैं।॥१४॥ उनमें सिंह व्याज ऋक्ष आदि जो मिलने उनको पकड २ कर हम भक्षण किया करते थे, इन्द्रजीने फिर यहभी कहा था कि, जय श्रीरामचन्द्रजी और लक्ष्मणजी ॥१५॥ पितामहवचःसत्यंतदस्त्वितिमभात्रवीत् ॥ अनाहार कथंशक्तोभग्नसक्थिशिरोमुखः ॥ १२॥ वत्रिणाभिहितःकालंसुदीर्घमपिजीवितुम् ॥ मए वमुक्तःशक्रोमेवाहूयोजनमायती ॥ १३ ॥ तदाचास्यंचमेकुक्षौतीक्षणदद्मकल्पयत् ॥ सोऽहंभुजाभ्यांदी भ्यां संक्षिप्यास्मिन्वनेचरान् ॥११॥ सिंहदीपिमृगव्याघ्रान्भक्षयामिसमंततः॥ सतुमामत्रवीविंद्रीयदारामःसलक्ष्मणः॥१५॥छेत्स्यतेसमरेखाहूतदास्वगंगमिष्यति । अनेनवपुपाता तवनेस्मिन्राजसतम ॥ १६ ॥ यद्यत्पश्यामिसर्वस्यग्रहणंसाधुरोचये ॥ अवश्यंग्रहणंरामोमन्येऽहंसमुपेप्यति ॥ १७ ॥ इमांबुद्धिपुरस्कृत्यदेह न्यासकृतश्रमः ॥ सत्वंरामोऽसिभद्रतेनाहमन्येनराघव ।। १८॥ शक्योहंतुयथातत्त्वमेवमुक्तंमहर्पिणा॥अहंहिमतिसाचिव्यंकरिप्यामिनरर्पभ॥ ॥ १९ ॥ मिचैवोपदेक्ष्यामियुवाभ्यांसंस्कृतोनिना ॥ एवमुक्तस्तुधर्मात्मादनुनातेनराघवः ॥ २० ॥ समरमें तुम्हारे दोनों हाथ काटेंगे तब तुम स्वर्गको जाओगे । तबसे हेराजसत्तम ! हम इसी शरीरसे इस वनमें ॥ १६ ॥ जिस २ को देसलेतेहैं उन २को ग्रहण कर लेते हैं, व यहभी हमको निश्चयथा कि इन्द्र के वचनानुसार कोई न कोई अवश्य हमको मिलता रहेगा ॥ १७ ॥ सदा अपना ऐसाही विचार रसते हैं कुछ विशेष धमभी नहीं करतेथे, सो इस समय हमने सत्य २ जाना कि, श्रीरामचन्द्रजी आपही हैं क्योंकि और कोई हमको नहीं मारसकता ॥१८॥ क्योंकि महर्षिजीने जो कुछ कहा सो सत्यही हुआहै, इस कारण हे रामचन्द्रजी ! और तो हमसे कुछ नहीं हो सकता परन्तु हे नरभेष्ठ युधिद्वारा आपकी कुछ सहायता कर सकेंगे ॥१९॥ अर्थात् जप आप हमको अनिमें जलादेंगे तब हम आपको एक मित्र बनायेंगे,जब इस प्रकार उस दनुके पुत्रने महात्मा धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजीसे कहा तो ॥२०॥ PayTM सामग उसस भारामपत्रमा मालपा, रापण कर मार IImrn. .. ....."
.... 1 10 10 11 रावण करके हमारी यशस्विनी भायां सीवाजी हरी गई हैं ॥ २१ ॥ हम उस समय माताके सहित जनस्थानसे सुगक कहीर नले गरेये, तर वह उनको हरण करके ले गयाथा हम उस राक्षस रावणका केवल नाममात्र जानते हैं परन्तु उसका रूप ॥ २२ ॥ निवास व मात्र कुछभी नहीं जानने केवल गोकमे आते हुवे अनायकी समान इसी भाँतिसे वन २ में घूमते फिरतेहैं ॥. २३ ॥ सो तुम हमारे ऊपर उपकार करके हमारे पर दया कंगे उमको साओ और हाथियों के दाँतोंमे टूटे हुये सूखे काठ बटोर कर तुमको ॥ २४ ॥ एक गढा सोद हे वीर ! हम उसमें तुमको जलादेंगे अब जो पुग मीनाको हरण का जिम जगह लेगयाहै, सो समस्त हमसे कहो ॥ २५॥ यदि यथार्थही तुम इस बावको जानतेहो तो इससे हमारा बडा मंगल हो जायगा. इदंगादानंदक्ष्मणस्यसपश्यतः ॥ रावणेनहताभार्यासीताममयशस्विनी ॥ २१ ॥ निष्कांतल्यजनस्थानात्सहभ्रात्रायथासुखम् ॥ नाममात्रं बनानामिनापनस्वासः ॥ २२ ॥ निवासवाप्रभावाश्यंतस्यन विद्महे ।। शोकार्तानामनाथानामेवंविपरिधावताम् १२३॥ कारुण्यसदृशंकर्तु गुपकांग्णयताम् ॥ काष्टान्यानीयभन्नानिकालेशुप्काणिकुंजरेः ॥२४॥ धक्ष्यामस्त्यांवर्गवीरश्वभ्रमहतिकल्पिते ॥ सत्वंसीतांसमाचक्ष्वयेनवा पगादला ।। २६ । कुरुकल्याणमत्यर्थयदिजानासितत्त्वतः । एवमुक्तस्तुरामेणवाक्यंदनुरनुत्तमम् ॥ २६ ॥ प्रोवाचकुशलोवक्तावतारमपिरा पाम । दिव्यमम्तिनमेजाननाभिजानामिमैथिलीम् ॥ २७ ॥ यस्तांवक्ष्यतितंवक्ष्येदग्ध-स्वरूपमास्थितः ॥ योभिजानातितदक्षस्तक्ष्यराम गरपाम् ।। २८ ।। अदन्यस्यहि विज्ञाशक्तिस्तिनमैप्रभो ॥ राक्षसंतुमहावीयसीतायेनहतातय ॥ २९ ॥ विज्ञानं हिमहद्धर्यशापदोपेणरावक ॥ पानमयापासंगपलोकविहिनम् ॥३० ।। किंतुयावन्नयात्यस्तंसविताश्रांतवाहनः । तावन्मामवटेक्षित्वादहरामयथाविधि ॥३१॥ जय भीगपरजीन ऐमा पहा तो यह दानसभेष्ठ ॥ २६ ॥ अच्छा बोलनेवाला श्रीरामचन्द्रजीसे बडी कुशलताके साथ कहनेलगा, हमको अभी दिव्यज्ञान नहीं है काण यह नहीं जानां कि, जानकी कोई ।। २७ ।। परन्तु जो तुमको उन्हें बतावेगा, उसको हम तुम्हें बतायेंगे, आप हमें भस्म कीजिये फिर हम अपना पहला पार कर जो कि गरी जानकाहे उमगे आपमे यतादेंगे ॥ २८ ॥ हे प्रभो ! जिस महावीर्य राक्षसने आपकी सीताजीको हरण कियाहै सो विना भस्म हमीपी प्रकार भी यमनी न जान मांगे ॥ २९ ॥ हे राम ! पहले हममें बड़ा विज्ञानथा सो इस शापके प्रभावसे हमारा वह दिव्यज्ञान नष्ट होगया और सपी ऐगे मंमारसे निन्दित रूरको पात हुयेहैं ॥ ३० ॥ हे श्रीरामचन्दजी ! जबतक सूर्य भगवान्के घोडे थककर ******************************** 3 पा.रा.भा. आर० ॥११३॥ स०७: अरनाचलको न चले जायें, क्योंकि अब अस्ताचलको जानाही चाहते हैं तिससे पहलेही आप हमको गढेमें डालकर यथाविधि भस्म कर दीजिये ॥ ३१ ।। हे महावीर रपुनंदन । जब यथाविधि आप हमको गढेमें रखकर फूंक देंगे तब हम बतलायेंगे कि कौन रावणको जानताहै ॥ ३२॥ हेराघव है वीर | आप उस अरतिनिगन्ने पुरुषके साथ मिववा करलेना वह पराक्रमी वीर आपकी बडीभारी सहायता करेगा ॥ ३३ ॥ हे महाराज ! त्रिलोकीमें ऐसा कुछभी नहीं है जिगको यह पुरुष न जानता हो वह प्रथम किसी बडेही कारणके वश होकर त्रिलोकीमें घूमाहै ॥ ३४ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकाण्डे भापाटीकायामेकसप्ततितमः सर्गः ॥ ७१ ॥ ॥ जब कबन्धने उन दोनों वीरशिरोमणियोंसे ऐसा कहा तब नरश्रेष्ठ श्रीरामचंद्र दग्धस्त्वयाहमवदेन्यायेनरघुनंदन ॥ वक्ष्यामितंमहावीरयस्तवेत्स्यतिराक्षसम् ॥३२॥ तेनसख्यंचकर्तव्यंन्याय्यवृत्तेनराघव ॥ कल्पयिष्य तितेपीरसाहाय्यंलघुविक्रम ॥ ३३ ॥ नहितस्यास्त्यविज्ञातंत्रिपुलोकेपुराघव ॥ सर्वान्परिवृतोलोकान्पुरावकारणांतरे ॥ ३४ ॥ इत्याचे श्रीम दामायणे वा० आ० अरण्यकांड एकसप्ततितमःसर्गः ॥७॥ एवमुक्तौतुतीवीरौकबंधेननरेश्वरौ ॥ गिरिप्रदरमासाद्यपावकविससर्जतुः ॥१॥ लक्ष्मणस्तुमहोल्काभिचलिताभिःसमंततः ॥ चितामादीपयामाससाप्रजज्वालसर्वतः ॥ २ ॥ तच्छरीरंकबंधस्यघृतपिंडोपममहत् ॥ मेदसा पच्यमानस्यमदंदहतपावकः ॥ ३॥ सविधूयचितामाशुविधूमोऽमिरिवोत्थितः ॥ अरजेवाससीविभ्रन्माल्यंदिव्यमहाबलः ॥ ४॥ ततश्चिता यावेगेनभास्वरोविरजोवरः ॥ उत्पपाताशुसंहृष्टःसर्वप्रत्यंगभूपणः ॥ ५॥ विमानेभास्वरतिष्ठन्हंसयुक्तेयशस्करे ॥ प्रभयाचमहातेजादिशोदश विराजयन् ॥ ६॥ सोंतरिक्षगतोवाक्यंकबंधोराममब्रवीत् ॥ शृणुराघवतत्त्वेनयथासीतामवाप्स्यसि ॥७॥ व लक्ष्मणजीने पर्वतकी गुफामें लेजाकर उसको अनि देदी : ३ ॥ लक्ष्मणने बडी २ उल्काओंको प्रज्वलित करके चारोंओरसे अनि लगादी तब चिता भलीभाँतिसे जलने लगी ॥ २ ॥ तव कबन्धका पीके पिंडेकी समान चरबीसे परिपूर्ण वडा भारी शरीर अग्रिसे धीरे २ जलने लगा ॥ ३ ॥ जब चिता जलकर रहगई तय महारलपान् कवंध उसीसमप चिताको कंपायमान करता हुआ निर्मल वस्त्र और दिव्य माला धारण करके धुआँरहित अनिके समान उसमेंसे निकला ॥ ४ ॥ और दिव्य कांतियुनः शरीरमे वेगमें भर आनंदसहित उसी समय आकाशको गया उसके समस्त अंग प्रत्यंग गहनोंसे भूषितथे ॥ ५॥ तिसके पीछे यह अतिशय उजले हंमयुन परास्कर विमानमें बैठकर अपनीगरीरकी प्रभासे दशों दिशाओंको प्रकाशता हुआ ॥६॥ आकाशमें तत भी -- ********* ठगा कि हे रघुनंदन ! निन उपायमे आप सीताको मात करसकेंगे यह रीति ठीक २ सुनो ॥ ७ ॥ सन्धि, विग्रह, याने, आसन वैधीभाव और समाश्रय यह जो जैः गुनि वाय, मो राजा लोग इनकी सहायतासेही सब बातोंका विचार करते हैं और विना इनका आश्रय लिये किसी कार्यकीभी सिद्धि नहींहोती ॥ ८ ॥ सो इसमें दुदंगा ममय ममाश्रय नामक जोउपायहै, उसका आश्रय करना कहाहै सोजत्र बहुतही दुर्दशा होजाय तब लोग उसका आश्रय करते हैं सो इस समय आप कोभी इनी ममायके आश्रय टेनेका प्रयोजन हुआ है, क्योंकि इस समय आप लक्ष्मणजीके सहित वैसेही दुर्दशासे ग्रसे जाकर राज्यादिसें धष्ट हुएहैं । और इसी कारणमे आपके आर आपकी मीका हरणस्वरूप महादुःखभी आनकर पडाहै ॥ ॥ ९ ॥ इप्त कारणसे हे राजवर ! आपको दूसरेसे जिसका परिवारभी बहुत हो, उगने अश्यही मित्रता करनी होगी, हमने भलीभांतिसे सोच विचारकर देख लियाहै कि ऐसे उपायका अवलंबन न करनेसे आपके कार्यकी सिद्धि नहीं होगी। गमपयुक्तयोलोफेयाभिःसर्वविमृश्यते । परिमृष्टोदशांतेनदशाभागेनसेव्यते॥८॥ दशाभागगतोहीनस्त्वंहिरामसलक्ष्मणः। यत्कृतेव्यसनंप्राप्त त्वयादारप्रवर्पणम् ।। ९॥ तवश्यत्वयाकार्यःससुहृत्सुहृदांवर ।। अकृत्वानहितेसिद्धिमहंपश्यामिचिंतयन् ॥ १० ॥ श्रूयतांरामवक्ष्यामिसुग्रीवो नामवानरः॥धानानिरस्त कुद्धेनवालिनाशकसूनुना ॥११॥ऋष्यमूकेगिरिवरेपंपापर्यंतशोभिते॥निवसत्यात्मवान्वीरश्चतुर्भिःसहवानरः॥१२॥ वानरेंद्रोमहापीयस्तेजोवानमितप्रभासत्यसंघोविनीतश्चधृतिमान्मतिमान्महान्।।१३॥दक्ष प्रगल्भोयुतिमान्महावलपराक्रमःभावाविवासितो पीग्गज्यदतोमहात्मना।।१॥सतेसहायोमिवंचसीतायाःपरिमार्गणे॥ भविष्यतिहितेराममाचशोकेमन कृथाः॥१५॥ भवितव्यंहितच्चापिनतच्छ क्यमिहान्यथा|कमिक्ष्वाकुशार्दूलकालोहिदुरतिक्रमः।।१६||गच्छशीघ्रमितोवीरसुग्रीवंतमहाबलम्॥वयस्यंतंकुरुक्षिप्रमितोगत्वाधराधव ॥१७॥ १० ॥ हे श्रीरामचंदजी! सुनिये एक सुग्रीव नामक वानर है उसके भाईका नाम जो कि इन्द्रका पुत्रहै वालिहै; उस वालिने क्रोधकर सुग्रीवको घरसे निकालदियाहै ॥11॥ अब यह सुपीर पप्पमूकपर्यतपर अपने चार वानरोंके सहित रहताहै यह ऋप्यमूक पर्वत चारोंओर पंपावक शोभित होरहाहै ॥ १२ ॥ वह वानरेन्द्र सुग्रीव महातीर्थयान, महानेजस्वी, महादीनिमान, सत्यप्रतिज्ञ, नीतिशासका जाननेवाला, धारणशक्तियुक्त महान् ॥१३॥दक्ष प्रगल्भ प्रकाशमान् और महावलपराक्रमयुक्त है पग्ण उग महात्माको गन्य कारण याटिने घरमे निकालदियाहै ॥ १४ ॥ वह निश्चयही सीवाफे ढूंढने भालनेमें आपका सहायक और मित्र होगा । सो आप अब गोफ करनेमें अपने मनको न लगाइये वहां जाइये ॥ १५॥ कोईभी होनहारको नहीं मेटसकता, जो होनहारहै वह अवश्यही होगी, हे इक्ष्वाकुश्रेष्ठ ! कालकी गति परी दर्गमः ॥ १६ ॥ इस कारणमे हे धीर! आप शीघही इस स्थानसे महापराक्रमवान सुग्रीवके पास जाकर उसमे मित्रता करलीजिये, हे रघुनंदन ! इसी समय आर. पा.. ॥11॥ स० ७ आप गले जाइये ॥१७॥ प्रचालित अनिके सन्मुख उसको साक्षीकर सुग्रीवसे मित्रता कीजिये, परन्तु उस वानरनाथका अपमान आप कभी न कीजिये ॥१८॥ यह रुनाई कामरुपी इच्छानुसार रूप धारण करलेनेवालाहै, वीर्यवान् भी है और विशेष करके इस समय स्वयंभी किसीकी सहायता चाहताहै सो आपभी उसके क : करदेंगे ॥ १९ ॥ फिर वह कार्यका चाहनेवाला सुग्रीव सफलमनोरथ हो आपका कार्यभी अवश्य करदेगा वह अक्षराजकी सीमें सूर्यभगवान्से उत्पन्न हु इसमे वह साधारण वानर नहीं है और इस समय भाईकी शंकासे पंपाके किनारे २ फिरा करता है ॥ २० ॥ वह सूर्य नारायणकाऔरसपुत्र वालिके संग वैर कारण दुःसित है, इसमे आप अस रान अनिके समीप धरकर ऋष्यमूक पर्वतपर बैठे हुए उस वानरनाथसे ॥ २१॥ सत्यताके साथ मित्रताई कीजिपे, हेराघद अद्रोहायसमागम्यदीप्यमानेविभावसौ ॥ नचतेसोऽवमंतव्यःसुग्रीवोवानराधिपः ॥१८॥ कृतज्ञःकामरूपीचसहाया चवीर्यवान् ॥ शक्तं, द्ययुवाकतुकार्ययस्यचिकीर्पितम् ॥ १९॥ कृतार्थोवाऽकृतार्थोवातवकृत्यंकरिप्यति॥ समक्षरजसःपुत्रःपंपामटतिशंकितः॥२०॥भास्करर.. रस-पुत्रोवालिनाकृतकिल्लिपः॥ संनिधायायुधंक्षिप्रमृप्यमूकालयंकपिम् ॥२१॥ कुरुराघवसत्येनवयस्यवनचारिणम् ॥ सहिस्थानानिकार । नमर्याणिकपिकुंजरः॥२२॥ नरमासाशिनालोकेनेपुण्यादधिगच्छति ॥ नतस्याविदितंलोकेकिंचिदस्तिहिराघव ॥२३॥ यावत्सूर्यःप्रतपः सहस्रांशुःपरंतप॥सनदीविपुलान्छेलागिरिदुर्गाणिकंदरान ॥२४॥अन्विप्यवानरे साधपत्नींतेधिगमिष्यति॥वानरांश्चमहाकायान्प्रेपयि तिराघव ॥ २५॥ दिशोविचेतुंतांसीतांत्वद्वियोगेनशोचतीम् ॥ अन्वेप्यतिवरारोहांमैथिलीरावणालये ॥ २६॥ ॥११ पानरभेष्ठ नय स्थानों में कपिकुंजरोंके साथ जाजाकर ॥ २२॥ फिर भलीभांतिसे नरमांसके खानेवाले राक्षसोंकेभी लोकमें जासकताहै हे राघव ! लोकमें ऐसा स्थान नहीं जिने सुग्रीव न जानता हो ॥ २३ ॥ हे शत्रुओंके तपानेवाले रघुनंदनजी ! सहस्रकिरण सूर्य भगवानकी किरणें जहांतक पडती हैं, उतने जितनी २ नदियां और बडे २ पर्वत व पर्वतोंकी गुफा हैं ॥ २४ ॥ समस्त जगत्में जहां कहीं आपकी भार्या जानकीजी होंगी सो हे रघुनंदन ! यह सुग्री पायर आपमे मिला देगा कारण कि, वह तुरंत मय दिशाओम बडे शरीरवाले वानरोंको पठायेगा ॥ २५॥ व तुम्हारे वियोगसे शोच करती हुई श्रीजानकीजीद .
********* रायगो घरमें हुई तो वहांमभी ढूंढ़ लाकर आपको मिला देगा ॥ २६ ॥ अनाथा निंदा रहित सीवाजी मेरु पर्वतके शिखरके अग्रभागमें हों अथवा पातालमें निपान करती हों, कपिराज सुधीरजी वहीं जाकर राक्षसोंका नाश करके आपकी भार्या सीताको ले आयेंगे और आपसे मिला देंगे ॥ २७ ॥ इत्या श्रीमामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्य आरण्यकांडे भापाटीकायां दिसततितमः सर्गः ॥७२॥ ॥ कवन्ध इसप्रकारसे सीताजीके शोधका उपाय बताकर फिरभी श्रीरामचन्द्रजीमे यह अयंयुन वचन बोला ॥ ३ ॥ कि हे श्रीरामचन्दजी ! यही वहांका कल्याणदायक मार्गहै जिपर यह फूले हुम मनोहर वृक्ष लग रहे हैं, जो यहांसे पश्रिमकी ओर दृष्टि आते हैं ॥ २॥ उन वृक्षोंमें जामुन, चिरोंजी, कटहर, वट, पाकर, तेंदू, पीपल, कठचंपा, आम आदि अनेक प्रकार के हैं ॥ ३॥ और धवई, नागकेशर, अगेथू, तिलक, ममेमशृंगाग्रगतामनिंदितांप्रविश्यपातालतलेपिवाश्रिताम् ॥ एवंगमानामृपभस्तवप्रियांनिहत्यरक्षांसिपुनःप्रदास्यति ॥ २७ ॥ इत्याएँ श्रीम द्रामायणे पाल्मी० आदि० अरण्यकांडे द्विसप्ततितमः सर्गः ॥७२॥ दर्शयित्वातुरामायसीतायाःपरिमार्गणे ॥ वाक्यमन्वर्थमर्थज्ञःकवंधः पुनग्नीत् ।। १ ।। एपरामशिव पंथायवेतेपुष्पिताद्रुमाः॥ प्रतीचीदिशमाश्रित्यप्रकाशतेमनोरमाः॥२॥ जंबूप्रियालपनसान्यग्रोधप्तक्षतिंदुकाः॥ अश्वत्याःकर्णिकाराधनताशान्येचपादपाः ॥३॥ धन्वनानागवृशाश्थतिलकानक्तमालकाः ॥नीलाशोका-कदंवाश्चकरवीराश्चप्पिताः ॥ ४॥ अग्निमुख्याअशोकाश्रसुरक्ताःपारिभद्रकाः ॥ तानारुह्याथवाभूमोपातयित्वाचतान्वलात् ॥ ५॥ फलान्यमृतकल्पानिभक्षयित्वागमिष्यथ । तदनिकम्यकाकुत्स्थवनपुप्पितपादपम् ॥६॥ नंदनप्रतिमंत्वन्यत्कुरवस्तूत्तराइव ।। सर्वकालफलायत्रपादपामधुरस्रवाः ॥ ७॥ सर्वेचनात पस्नपनेवरथेवथा । फलभारनतास्तवमहाविटपधारिणः ॥ ८॥ शोभतेसर्वतस्तत्रमेयपर्वतसंनिभाः ॥ तानारुह्याथवाभूमीपातयित्वाथवा मुगम् ॥ ९॥ फलान्यमृतकल्पानिलक्ष्मणस्तेप्रदास्यति ॥ चंक्रमंतीवराशैलाशेलाच्छेलंबनादनम् ।। १० ॥ किलवार,याम. अगोक, कदम्य, कँदैल रह सब पुष्पित वृक्ष लगे हैं ॥ ४॥ हरे २ अशोक, नीवके वृक्ष सब प्रकारके औरभी उत्तम २ वृक्ष हैं सो आप उनपर चढके अपवा पलम हिलाकर फल भूमिमें गिराकर ॥ ५ ॥ अमृत समान फल खाते पीते हुए दोनों चले जाओ, हे काकुत्स्थ ! उस फूले वृक्षद्वारा परिपूर्ण वनसे आप निगल जायेंगे ।। ६ । नय और एक नन्दन और उत्तर कुरुदेशके समान वन मिलेगा, जिसमें सब काठमें फलें ऐसे मीठे फलवाले वृक्षभी लग रहे हैं । 1७॥ उम गनमें मर गमरमें मर कानु नेत्ररय वनकी समान विद्यमान रहती हैं, वह सब वृक्ष फलभारसे झुके हुए देख पडते हैं ॥ ८ ॥ वह सब मेघों और पर्व गोंकी ममान गांभायमान होते हैं। वहांपरभी उनपर चढ़कर अथवा जोरसे हिला झुला भूमिमें गिराकर जैसा ठीक समझा जाय ॥ ९॥ अमृतकी समान फल वह ***** ना.ग.भा. TH आपको देंगे, इस भांतिगे दोनों भाता पर्वतोपर होते हुए इस पनमें जाय ॥ १० ॥ फिर पंपानांमक सरोवरपर पहुँचोगे, यह सरोवरमें शिवार, शर्करा आर. (कर) और विछलनीभूमि नहीं है सब घाट परावर बने हैं ॥ ११॥ हे राम ! उसमें रेती बहुत श्रेष्ठ है विविध भांतिके कमल उसमें फूलते हैं, हंस, राजहंस, कौंच, स०७ कुरर आदि पक्षी ॥ १२ ॥ पम्माके जलमें पैरते हुए मनोहर शब्द बोलते हैं, यह मनुष्योंको देखकरभी नहीं डरते, क्योंकि पहले उन्हें किसीने कभी नहीं माराहै ॥ ॥ १३ ॥ हे श्रीरघुनन्दन ! आप स्थूलशरीरयाले घीके पिंडकी समान इन पक्षियोंको और रोहित, चक्रतुंड व नल नामक मछलियोंको वहांपर भक्षण कीजिये ॥ ॥ ११ ॥ हे श्रीरामचन्द्रजी! जिनके पंख नहीं होते और बडे शरीर जिनके होते हैं, त्वक् और बहुत कांटों करके युक्त ऐसी श्रेष्ठ मछलियोंको वाणोंसे मारकर ततःपुष्करिणीवीरोपंपानामगमिप्यथः ॥ अशर्करामविभ्रंशांसमतीर्थामशेवलाम् ॥ ११॥ रामसंजातवालूकांकमलोत्पलशोभिताम् ॥ तत्र दंसा नया कानाकुरराश्चैवराघव ॥ १२ ॥ वल्गुस्वराणिकूजतिपंपासलिलगोचराः ॥ नोद्विजंतेनरान्दृष्ट्वावधस्याकोविदाःपुरा ॥ १३ ॥ घृत पिंडोपमानस्थूलास्तान्द्रिनान्मक्षयिष्यथः ॥ रोहितांश्चक्रतुंडांश्चनलमीनांश्चराघव ॥ १४ ॥ पंपायामिपुभिर्मत्स्यास्तत्ररामवरान्हतान् ॥ निस्वरुपक्षानयस्तप्तानकृशानेककंटकान् ॥ १५॥ तवभक्त्यासमायुक्तोलक्ष्मणःसंप्रदास्यति ॥ भृशंतान्खादतोमत्स्यान्पंपायाःपुप्पसंचये ॥ १६ ॥ पद्मगंधिशिवंवारिसुखशीतमनामयम् ॥ उद्धृत्यसतदाक्लिष्टरुप्यस्फटिकसंनिभम् ॥ १७ ॥ अथपुष्करपर्णेनलक्ष्मणःपाययि प्यति ॥ स्थूलागिरिगुहाशय्यान्वानरान्वनचारिणः ॥ १८ ॥ सायाह्नविचरत्रामदर्शयिष्यतिलक्ष्मणः ॥ अपांलोभादुपावृत्तान्वृपभानिव नर्दतः ॥ १९ ॥ स्थूलान्पीतांश्चपंपायांद्रक्ष्यसित्वनरोत्तम ॥ सायाह्नविचरत्रामविटपीमाल्यधारिणः॥२०॥ और अमिमें भूनकर आप पंपासर पर भक्षण कीजिये ॥ १५॥ इसके सिवाय लक्ष्मणजी आपके प्रति भक्तिके वश होकर यहांके कमलपुष्पोंमें विचरती हुई उन उटियों के समूह आपको देंगे ॥ १६ ॥ पंपाका जल कमलपुष्पोंकी सुगंघिसे युक्त रोग विहीन स्वास्थ्यकर सुशीतल, चांदी और स्फटिक मणिके समान निर्मलहै जिसके पीने से कोई भी क्रेग नहीं होता ॥ १७ ॥ उस समयमें लक्ष्मणजी पुरैनके पत्तोंका दोना बना यह जल लाकर आपको पिलायेंगे और बडे २ बन्दर पर्वतोंकी | दाओं और नोंके रहनेवाले ॥ १८॥ मन्ध्याके ममय घूमनेके काठमें टक्ष्मणजी आपको दिखायेंगे, यह बडे २ वानर जल पीने के अर्थ बैलोंके समान शब्द करते हुए भागे हैं ॥ १९ ॥ हेनरभेष्ठ! फिर पंपापर बडे हट पुष्ट नीलेपीले भी यहुदमे बन्दर गृक्षोंकी शासा हाथमें लिये हुये सन्ध्याके समय बिचाने आप देखेंगे ॥२०॥ ।।११
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घा.रा.भा. आर० स०७ ॥११५॥ वृक्ष आपको देंगे, इस भाँतिसे दोनों भाता पर्वतोपर होते हुए इस वनमें जाय ॥ १० ॥ फिर पंपानामक सरोवरपर पहुँचोगे, यह सरोवरमें शिवार, शर्करा, (कंकर) और पिछलनीभूमि नहीं है सब घाट परावर बने हैं ॥ ११॥ हे राम ! उसमें रेती बहुत श्रेष्ठ है विविध भांतिके कमल उसमें फूलते हैं, हंस, राजहंस, कौंच, कुरर आदि पक्षी ॥ १२ ॥ पम्पाके जलमे पैरते हुए मनोहर शब्द बोलते हैं, वह मनुष्योंको देखकरभी नहीं डरते, क्योंकि पहले उन्हें किसीने कभी नहीं माराहै ।। ॥ १३॥ हे श्रीरघुनन्दन! आप स्थूलशरीरवाले पीके पिंडकी समान इन पक्षियोंको और रोहित, चक्रतुंड व नल नामक मछलियोंको वहांपर भक्षण कीजिये ॥ ॥ १४ ॥ हे श्रीरामचन्द्रजी! जिनके पंख नहीं होते और बडे शरीर जिनके होते हैं, त्वक् और बहुत कांटों करके युक्त ऐसी श्रेष्ठ मछलियोंको वाणोंसे मारकर ततःपुष्करिणीवीरोपंपांनामगमिप्यथः ॥ अशर्करामविभ्रंशांसमतीर्थामशेवलाम् ॥ ११॥ रामसंजातवालूकांकमलोत्पलशोभिताम् ॥ तत्र हंसा:प्लवाकोंचा कुरराश्चैवराघव ॥ १२ ॥ वल्गुस्वराणिकूजतिपंपासलिलगोचराः ॥ नोद्विजंतेनरान्दृष्ट्वावधस्याकोविदाःपुरा ॥ १३ ॥ घृत पिंडोपमान्स्थूलांस्तान्दिजान्भक्षयिष्यथः ॥ रोहितांश्चक्रतुंडांश्चनलमीनांश्चराघव ॥ १४ ॥ पंपायामिषुभिर्मत्स्यास्तत्ररामवरान्हतान् ॥ निस्त्वपक्षानयस्ततानकृशानेककंटकान् ॥ १५॥ तवभत्त्यासमायुक्तोलक्ष्मणःसंप्रदास्यति ॥ भृशंतान्खादतोमत्स्यान्पंपायाःपुष्पसंचये ॥ १६॥ पद्मगंधिशिवंवारिसुखशीतमनामयम् ॥ उद्धृत्यसतदाच्छिष्टरूप्यस्फटिकसंनिभम् ॥ १७ ॥ अथपुष्करपणेनलक्ष्मणःपाययि प्यति ॥ स्थूलानिगरिगुहाशय्यान्वानरान्वनचारिणः ॥ १८ ॥ सायाह्नविचरन्रामदर्शयिष्यतिलक्ष्मणः ॥ अपलोभादुपावृत्तान्वृपभानिव नर्दतः ॥ १९ ॥ स्थूलान्पीतांश्चपंपायांद्रक्ष्यसित्वनरोत्तम ॥ सायाह्नविचरनामविटपीमाल्यधारिणः ॥ २० ॥ और अमिमें भूनकर आप पंपासर पर भक्षण कीजिये ॥ १५ ॥ इसके सिवाय लक्ष्मणजी आपके प्रति भक्तिके वश होकर वहांके कमलपुष्पों में विचरती हुई उक्त मछलियों के समूह आपको देंगे ॥ १६ ॥पंपाका जल कमलपुष्पोंकी सुगंधिसे युक्त रोग विहीन स्वास्थ्यकर सुशीतल, चांदी और स्फटिक मणिके समान निर्मलहै| जिसके पीनेसे कोई भी क्लेश नहीं होता ॥ १७ ॥ उस समयमें लक्ष्मणजी पुरैनके पत्तोंका दोना बना वह जल लाकर आपको पिलाएँगे और बडे २ बन्दर पर्वतोंकी कन्दराओं और वृक्षोंके रहनेवाले ॥ १८॥ सन्ध्याके समय घूमनेके कालमें लक्ष्मणजी आपको दिखायेंगे, वह बडे २ वानर जल पीनेके अर्थ बैलोंके समान शब्द करते हुए आते हैं ॥ १९ ॥ हे नरश्रेष्ठ! फिर पंपापर बडे दृष्ट पुष्ट नीले पीले भी बहुतसे बन्दर वृक्षोंकी शाखा हाथमें लिये हुये सन्ध्याके समय विचरते आप देखेंगे॥२०॥ Primशत जल पलकरपपाकर जापाकल गाया आरRemic-.....-- ११ काम जल देगार व पीकर आगोकभूल जायेंगे और वहाँ फूले हुये तिलक, नक्तमालक आदिक वृक्षहैं ॥ २१ ॥ और रघुनंदन वहा भी पूछ रहे हैं परन्तु उन पुनों की माला बनाकर पहरनेवाला यहांर कोई पुरुष नहीं रहता ॥ २२ ॥ वह फूल न कभी मुरझातेहैं, न अपने आपसे गिरते हैं कारणं कि हर मांग लपिक नेले जो पिलोगहै, वह एकापविन होकर वहां रहतेथे ॥ २३ ॥ वह सब शिष्य कपिलोग अपने गुरुजीके लिये बनके फल फूल लेने जाते दुवेगोजके मारे पाजाने पर उनके गगग्मे जो पीने की बूंदें पृथ्वीर गिर पडती थीं ॥ २४ ॥ वहीं स्वेदबिन्दु उस कालमें उनके नपके प्रभावसे पुष्प होगये हैं है गुनन्दन ! पिटोगोंक पमीनेकी बूंदोंने उतन्न होने के कारण यह सब पुष्प अविनाशी होगये हैं ॥ २५॥ यद्यपि सब कपिलोग वहांसे अन्तर्धान होगये हैं परन्तु शिमोदकंवपादिवाशीकंचिहास्यामि ॥ सुमनोभिश्चितास्तत्रतिलकानक्तमालकाः ॥ २१॥ उत्पलानिचफुल्लानिपंकजानिचराघव ॥ नता निश्चिमात्यानिनवागेपयितानरः ।। २२ ॥ नगवेग्लानतांयांतिनचशीयंतिराघव ॥ मतंगशिप्यास्तत्रासन्नृपयःसुसमाहिताः ॥ २३ ॥ भागभितनानापन्यमाहगतागुगेः ॥ येप्रपेतुमहीपूर्णशरीगत्स्वेदविंदवः ।। २४ ॥ तानिमाल्यानिजातानिमुनीनांतपसातदा ॥ स्वेदविंदुस मुन्धानिनपिनश्यनिगया ॥ २५ ॥ तेपांगतानामद्यापिटश्यतेपरिचारिणी ॥ श्रमणीशवरीनामकाकुत्स्थचिरजीविनी ॥२६॥ त्वांतुधर्मेस्थि नानित्यंमभननममृतम् ॥ दृष्ट्वादेवोपमंगमस्वर्गलोकंगमिष्यति ॥२७॥ ततस्तद्रामपंपायास्तीरमाश्रित्यपश्चिमम् ॥ आश्रमस्थानमतुलं गोकाकुत्स्थपश्यामि ॥ २८ ॥ नतयाकमिनागाःशक्नुवंतितदाश्रमे ॥ ऋपेस्तस्यमतंगस्यविधानात्तचकाननम् ॥ २९॥ मतंगवनमित्येव रिश्रुग्घुनंदन ॥ नम्मित्रंदनमंकाशंदेवारण्योपमेयने ॥ ३० ॥ का परिचारिका भमणी नामक गारी यहांतर रटिआनीहै ॥ २६ ॥ हे श्रीगमचन्द्रनी ! आप साक्षात् देवताओंकी समान सब लोगोंके नमस्कार करने मग नियगिरण भमणी भारको अवलोकन कर गगंको रली जायगी ।। ॥ २७ ॥ हे काकुत्स्थनंदन ! जब आप पंपाके पश्चिम तीरपर जायँगे तब महर्षि 4in Hinाथोंमें गुन आथम रहि आरंगा ॥ २८॥ पृषीमें पह आश्रम अनुलनीय है मतंग मुनिजीके प्रभावके यशसे हाथीभी इस आश्रम काननको नहीं गाहो ॥ २१॥ मोगरणमे यह पन मांगाना नामने प्रसिद्ध आहे. हे रघुनंदन ! वह वन देवताओंके नंदनवनकी समान रमणीयहै ॥ ३० ॥ ** पा..भा. आर० स०७ उममें अनेक प्रकारके पक्षी सुहावनी बोली पोलते हैं यहां प्रवेश करके आप अच्छी तरहसे विहार कर सकेंगे और पंपाके सामनेही वृक्षसमूहसे सुशोभित कप्यमूक पर्व नई ॥३१॥ इस कठिनसे आरोहण करने के योग्य पर्वतकी रक्षा छोटे सर्प किया करते हैं और यह पर्वत उदार ब्रह्माजी करके पहले समयमें बनायागयाथा ॥ ३२॥ उम उदारपर्वत शृंगपर जो पुरुष शयन करके स्वममें जो धन प्राप्त करें जागनेपरभी उसको वही धन मिलताहै ॥ ३३ ॥ अधर्म कार्य करनेमें रत पापकर्म करनेाले पुरुषकै उम पर्यतपर चढनेपर राक्षमलोग उसके शयन करनेके समय उसको पकडकर वहीं संहार करदेते हैं ॥ ३४ ॥ हे श्रीरामचंद्रजी ! तिसके पीछे आप मांगाभम निवासी पंपातटविहारी हाथियोंके वचोंका घोर शब्द श्रवण करोगे ॥ ३५ ॥ उन सबके सिवाय आप कुछ एक लाल वर्णकी मदधारा चुआतेहुए नानाविहगसंकीर्णरस्यसेरामनिवृतः ॥ ऋष्यमूकस्तुपंपायाःपुरस्तात्पुप्पितद्रुमः ॥ ३१ ॥ सुदुःखारोहणश्चैवशिशुनागाभिरक्षितः ॥ उदारो ब्राह्मणावपूर्वकालेभिनिर्मितः ॥ ३२॥ शयानःपुरुपोरामतस्यशेलस्यमूर्धनि ॥ यःस्वप्नेलभतेवित्तंतत्प्रबुद्धोधिगच्छति ॥ ३३॥ यस्त्वेनं विप मानार पापकर्माधिरोहति ॥ तत्रैवग्रहत्येनंसुप्तमादायराक्षसाः ॥३४॥ ततोपिशिशुनागानामाकंदाश्रूयतेमहान् ॥ क्रीडतांरामपंपायांमतंगाश्रम वासिनाम् ॥३५॥ सत्तारुधिरधाराभिःसंहत्यपरमद्विपाः॥प्रचरंतिपृथकीर्णामेववर्णास्तरस्विनः॥३६॥ तेतत्रपीत्वापानीयंविमलंचारुशोभनम्।। अत्यंतसुखसंस्पर्शमर्वगंधसमन्वितम् ॥ ३७॥ निवृत्ताःसंविगाहंतेवनानिवनगोचराः ॥ ऋशांश्चद्वीपिनश्चैवनीलकोमलकप्रभान ॥३८॥ करूनपेतानजयान्दृष्ट्वाशोकंपहास्यसि ॥ रामतस्यतुशैलस्यमहतीशोभतेगुहा ॥ ३९ ॥ शिलापिधानाकाकुत्स्थदुःखंचास्याःप्रवेशनम् ॥ तस्या गुहाया:प्रारद्वारेमहामशीतोदकोह्रदः ॥ ४० ॥ बहुमूलफलोरम्योनानानगसमाकुलः ॥ तस्यांवसतिधर्मात्मासुग्रीवःसहवानरैः ॥४१॥ मिश्वर्ण वेगयुन हाथियोंके दलके दल इधर उधर घूमते हुए देखोगे ॥ ३६ ॥ वह हाथी पंपाका निर्मल सुन्दर और अत्यन्त सुखकारी सुवासित नीर पीकरके । ॥ ३७॥ पंपामगेवर विहारमे निवृनहो वनमें विहार किया करते हैं । हे श्रीरामचंद्रजी ! वहांपर आपरीछ, गैंडे, व्याघ्र और नील मणिवत कोमल कान्तिवाले ॥३८॥ कोमल और सुन्दर बनैले पशु का मृग देख शोक परित्याग करदेवोगे; हे श्रीरामचन्द्रजी ! उस पर्वतकी कंदराभी अतिशोभायमानहै ॥ ३९ ॥ उस कंदराके द्वारपर मदाही भारी गिला लगी रहती है इस कारण मरलतामे उसमें प्रवेश करना नहीं हो सकता उस गुफाके पूर्वद्वारसर एक बड़ा भारी अचल जलका कुंडहै ॥ ४०॥ म कुंडरे किनारंपर बहुतमे मूल व फलोंमे युनः अनेक २भांतिके रमणीक वृक्ष लगे हैं और वहींपर धर्मात्मा सुग्रीवजी वानरोंके सहित वास करते हैं ॥ ४५ ॥ - मारराजा भी HTTr
और वह सुग्रीवजी कभी २ उस पर्वतके शिखरपरभी बैठे रहते हैं, इस प्रकारसे वह कबंध श्रीराम लक्ष्मणजीले वताए ॥ ४२ ॥ फूलोंकी माला पहरे, मूर्यके
ममान प्रकागित आकागमें टिका हुआ गोभित होने लगा, उस बडे भाग्यवालेको श्रीराम लक्ष्मणजीने देखकर ॥ ४३ ॥ उस कबंधसे कहा कि, अच्छा इस ममय
हम सुग्रीवके निकट जाते हैं, और तुमभी स्वर्गको जाओ. उसने भी दोनों भाइयोंसे कहा आप अपने कार्यकी सिद्धि के निमिन जाइये ॥ ४४ ॥ तव कंबंध श्रीगम
लक्ष्मणजीकी आना टेकर प्रसन्न होकर स्वर्गको चला ॥४५॥ उस कालमें कयंत्र अपना पहला रूप पान करके शोभा समन्वित और प्रदीन शरीर होकर श्रीरामचन्द्रजीकी
ओर दृष्टि करके कहने लगा कि,आप सुग्रीवके साथ मित्रतास्थापन कीजिये॥४६॥इत्याएँ श्रीमद्रा० वा० आदि० आरण्यकांडे भापाटीकायां त्रिसततितमः सर्गः॥७३॥
कदानिच्छिपरतस्यपर्वतस्यापितिष्ठति।कवंधस्त्वनुशास्येवंतावुभौरामलक्ष्मणौ॥४२॥सम्वीभास्करवर्णाभःखेव्यरोचतवीर्यवान् ॥ तंतुखस्थम
हाभागतायुभीरामलक्ष्मणौ॥४३॥पस्थितीत्वंत्रजस्वेतिवाक्यमूचतुरंतिकेागम्यतांकार्यसिद्ध्यर्थमितितावत्रवीत्सच॥४४॥सुप्रीतीतावनुज्ञाप्यक
पंधपस्थितस्तदा॥४॥सतत्कबंध प्रतिपद्यरूपंवृतःश्रियाभास्वरसर्वदेहः॥निदर्शयनाममवेक्ष्यखस्थःसख्यंकुरुप्वेतितदाभ्युवाच॥१६॥इत्या
श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे चिसप्ततितमःसर्गः ॥७३॥तोकवंधेनतंमागपंपायादर्शितंवने।|आतस्थतुर्दिशंगृह्मप्रतीचीनृवरा
मजो।।तोशेलेयाचितानेकान्झौद्रपुप्पफलदुमान् ॥ वीसंतोजग्मतुष्टुंसुग्रीवरामलक्ष्मणौ॥२॥कृत्वातुशेलपृष्टेतुतोवासरघुनंदनी॥ पंपाया-प
शिमंतीरंराधयायुपतस्थतुः॥३॥तीपुष्करिण्या पंपायास्तीरमासाद्यपश्चिमम्।। अपश्यतांततस्तत्रशवर्यारम्यमाश्रमम्।।तीतमाश्रममासाद्यद्रुमे
बहुभिगवृतम् ।। मुरम्यमभिवीशंतोशवरीमभ्युपेयतुः॥५॥तादृष्ट्वातुतदासिद्धासमुत्थायकृतांजलिः॥पादोजनाहरामस्यलक्ष्मणस्यवधीमतः॥६॥
जप कसंध इमरकारमे कहकर स्वर्गको चला गया वय श्रीराम लक्ष्मणजी कबन्धका बताया हुआ मार्ग लेकर पंपासरोवरकी ओर पश्चिम दिशाको चले ॥ १ ॥
जिम ममप श्रीराम लक्ष्मणजी सुपीवके देखनेको जा रहेथे उस समय पर्वतोंके शिखरोंपर मधु समान स्वादयुक्त फल व फूलपाले अनेक २ वृक्ष उनके नयनगोचर
होने लगे ॥ २ ॥ यह दोनों भाना मार्गमें एक रात्रि एक पर्वतके ऊपर रहकर प्रभात होतेही पंपाके पश्चिम किनारेपर जा पहुँचे ॥ ३ ॥ पंपाके पश्चिम किनारे
पर पहुंचकर गपरीका रमणीय आश्रम श्रीराम लक्ष्मणजीने देखा ॥ ४ ॥ और उस विविध वृक्षसमूहसे समाकीर्ण रमणीय आश्रमको देखते हुये उसमें प्रवेश करके
गर्ग निकट आये ॥ ५॥ नप मिद्ध गवरी श्रीराम लक्ष्मणजीको देखतेही हाथ जोडे हुये बुद्धिमान् दोनों भाइयोंके चरणों में प्रणाम करती हुई ॥ ६॥
पा.ग.भा. आर०क स०७ और यथा विधिमे पाय आचमनीयभी शवरीने दिया, तिसके पीछे श्रीरामचन्द्रजी धर्मनिरता शबरीसे बोले ॥ ७ ॥ कि, तुमने सुख व विनोंको तो जीत लिया है, तुम्हारा तर पढ़या नो है और कोष तो तुम्हारे परामें है, हे तपोधने ! ॥ ८॥ तुम्हारे सब नियम तो भली भांतिसे चले आते हैं, तुम्हारे मनको तो सदा सुख रहताहै ? हे चारुभाषिणी! तुम्हारे गुरुकी सेवा करनी तो तुम्हें फलवती हुई है ॥ ९ ॥जब श्रीरामचन्द्रजीने इस प्रकार पूछा तो सिद्ध लोगोंकी अभिमता और तप सिद्धा गरी सामने निकल कर उनसे निवेदन करती हुई ॥ १० ॥ आज आपके दर्शनोंसे मेरे तपकी सिद्धि हुई, जन्म सफल हुआ, गुरुगणों की पूजा भलीभाँतिसे होगई ॥ ११ ॥ और तपस्याभी सार्थक होगई. हे पुरुषोत्तम ! आप देवताओंमें श्रेष्ठ हैं सबके अन्तरात्मा हैं सो इस समय आपकी पूजा करनेसे हमें ब्रह्मलोक पाद्यमाचमनीयंचसर्वप्रादाद्यथाविधि ॥ तामुवाचततोरामाश्रमणीधर्मसंस्थिताम् ॥ ७ ॥ कचित्तेनिर्जिताविनाःकञ्चित्तेवर्धतेतपः ॥ कचित्ते नियतःकोपआहारश्चतपोधने ॥८॥ कच्चित्तेनियमाःप्राप्ताःकच्चित्तेमनसःसुखम् ॥ कच्चित्तेगुरुशुथूपासफलाचारुभापिणि ॥ ९ ॥ रामे णतापसीपृष्टासासिद्धासिद्धसंमता ॥ शशंसशवरीवृद्धारामायप्रत्यवस्थिता ॥ १०॥ अद्यप्राप्तातपःसिद्धिस्तवसंदर्शनान्मया ॥ अद्यमेसफलं जन्मगुरवसुपूजिताः ॥ ११ ॥ अद्यमेसफलंतप्तस्वर्गश्चैवभविष्यति ॥ त्वयिदेववरेरामपूजितेपुरुपर्पभ ॥ १२ ॥ तवाहंचक्षुपासौम्यपूतासौम्ये नमानद ॥ गमिप्याम्यक्षयाँलोकांस्त्वत्प्रसादादरिंदम ॥ १३ ॥ चित्रकूटत्वयिप्राप्तेविमानैरतुलप्रभैः ॥ इतस्तेदिवमारूढायानहंपर्यचारिपम्॥ ॥ १०॥ तैवाहमुक्ताधर्मज्ञर्महाभागैर्महर्पिभिः॥ आगमिष्यतितेरामःसुपुण्यमिममाश्रमम् ॥१५॥ सतेप्रतिग्रहीतव्यःसौमित्रिसहितोऽतिथिः॥ तंचदृष्ट्वापराँल्लोकानक्षयांस्त्वंगमिप्यसि ॥ १६॥ एवमुक्तामहाभागैस्तदाहपुरुपर्पभ ॥ मयातुसंचितंवन्यविविधपुरुपर्पभ ॥ १७ ॥ मान होगपा ॥ १२ ॥ हे सौम्य ! हे मान देनेवाले ! हे शत्रुघाती !आपके शुभकारी नेत्रोंकी दृष्टि पडनेसे हम पवित्र होगई, अब आपके प्रसादसे हमको मप अभय लोकोंकी पानि हो जायगी ॥ १३ ॥ जिनकी हम सेवा करतीथीं वह ऋपि आपके चित्रकूट पर्वतपर पधारतेही अनुपम देदीप्यमान देवविमानोंमें चढकर इन आश्रममे स्वर्गको चले गये हैं ॥ १४ ॥ वह सत्र महाभाग्यवान धर्मात्मा महर्पिलोक स्वर्ग जानेके समय हमसे कह गये कि, श्रीरामचन्द्रजी तुम्हारे इस पुण्यजनक आभममें आवेंगे॥१५॥सो तुम लक्ष्मणजीकी और उन श्रीरामचन्द्रजीकी अतिथिको समान आदरसत्कारसे पूजा करना; उनके दर्शन करनेसेही तुमको सर्व अक्षय लोकोंकी मानि हो जायगी ॥ १६॥ हे पुरुपोनम ! उम ममय यह महाभाग्यशाली महफ्लिोग हममे इस प्रकार कहगयेथे, हे पुरुपश्रेष्ठ ! तभीसे हमने विविध भाँतिके भले भले 7
फल दूंदकर ॥ १७ ॥ आपकी सेवाके लिये पर रक्से हैं यह सब फल इसी पंपाके तीरवाले वृक्षोंके हैं धर्मात्मा श्रीरामचन्द्रजी शबरी करके इस प्रकार कहे जाकर
उममे यह वचन बोले ॥ १८ ॥ कारण कि, श्रीरामचन्द्रजीने अपने मनमें विचारलिया कि, यह परमात्माकोभी भलीभांति जानती है यह समझ उससे कहा कि,
हमने कात्यने तुम्हारे महात्मोंका प्रभाव और आचारका माहात्म्य॥१९॥ श्रवण किया था सो तुम यदि उचित समझो वो हम प्रत्यक्ष उनका वृत्तान्त देखनेकी इच्छा
करते हैं, श्रीगमचन्द्रजीके मुख से निकला हुआ ऐसा वचन सुन॥२०॥ शबरी उन दोनों लाताओंको वह घडा वन दिखाकर कहने लगी कि, मृग और पक्षियोंसे परि
पूर्ण काले बादरकी समान श्यामरंगका यह वन देखिये ॥ २१ ॥ हे रघुनन्दन ! इस वनका नाम मतंगवन प्रसिद्ध है. हे महायुतिमान् ! इस वनम विशुद्धात्मा हमारे
तपार्थेपुरुपच्यामपंपायास्तीरसंभवम् ॥ एवमुक्तःसधर्मात्माशवर्याशवरी मिदम् ॥ १८॥ राघवःपाहविज्ञानेतानित्यमवहिप्कृताम् ॥ दनोः
सकाशात्तवनप्रभावंतेमहात्मनाम् ॥ १९॥ श्रुतंप्रत्यक्षमिच्छामिसंद्रष्टुंयदिमन्यसे । एतत्वचनं श्रुत्वारामवक्रविनिःसृतम् ॥ २० ॥ शबरी
दर्शयामामतावुभौतदनंमहत् ।। पश्यमेववनप्रख्यंमृगपक्षिसमाकुलम् ॥ २१॥ मतंगवनमित्येवविश्रुतंरघुनंदन ॥ इहतेभावितात्मानोगुरखोमे
महायुते ।। जहयांचकिरेनीडमंत्रवन्मंत्रपूजितम् ।। २२ । इयंप्रत्यक्स्थलीवेदीयत्रतेमेसुसत्कृताः ॥ पुप्पोपहारंकुतिश्रमादुद्वेपिभिःकरेः।।२३।।
तेपातपःप्रभावणपश्याद्यापिरघूत्तम ।। द्योतयंतीदिशःसर्वा:श्रियायेद्यतुलप्रभा ॥२४॥अशक्नुवद्भिस्तंगतुमुपवासश्रमालसेः ॥ चिंतितेनाग
तानपश्यसमेतान्मप्तसागरान् ॥ २५ ॥ कृताभिपेकेस्तेय॑स्तावल्कला-पादपेप्जिह ॥ अद्यापिनविशुप्यंतिप्रदेशेरघुनंदन ॥२६॥ देवकार्याणि
कुद्रियानीमानिकृतानिवे॥ पुप्पैःकुवलयेःसाधम्लानत्वंनतुयांतिये ॥ २७ ॥
गुरु लोग मंत्र पूनिा या करने के लिये वेदक मंत्रोंमे काल हरण करतेथे ॥ २२ ॥ यह वही प्रत्यक्स्थलनामक वेदोहै; जिस वेदीपर बैठकर हमारे परम पूजनीय गुरु
योग पुपांजलि महित श्रमयुन हाथोंमे देवताओंकी पूजा करतेथे ॥ २३ ॥ हे रघुवर ! देखिये यह वही अनुपम प्रभायुक्त वेदी उनके तपोबलसे आजभी अपनी
दीमिग दगा दिगाओंको दिशा रहीहै ॥ २४ ॥ जय वह कापि लोग उपवासोंके परिश्रमसे आलसी होकर स्नान करनेको जानेमें सामर्थ्यहीन होगये, तब उनके चिन्ता
कोही सह गान ममय यहां आगये मो आप देखिये ॥ २५॥ हे रघुनंदन ! कपिलोगोंने स्नान करके यहां वृक्षोंपर जो अपने गीले वन टांग दिये हैं सो वह असतक नहीं
गगे । २३ ।। उन्होंने देवताओंका कार्य मापन करने के लिये नीले कमलोंके सहित यह जो समस्त पुष्प देवताओंको चढायेथे सो वह अबतक नहीं मुरझाये हैं ॥२७ ॥
आर०क ११८॥ आप सब धन देख चुके और जो वात श्रवण करनेके योग्यथी वह श्रवणभी करचुके अब हमने इस देहके छोडनेका अभिठाप कियाहै तो आप आजादीजिये। ॥ २८ ॥ जिनका यह आश्रमहै और जिनकी हम परिचारिका हैं उन विशुदात्मामहर्पियोंके निकट जानेका हमारा अभिलाप हुआहै ॥२९॥ श्रीरामचन्दजी क्ष णजीके सहित शबरीकी यह धर्मयुक्त वार्ता सुनकर अतिशय हर्षित हुये और बोले कि, यह बड़े आश्चर्यकी वातहै ॥३०॥ तिसके पीछे श्रीरामचन्द्रजी दृढवतराठी शबरीसे बोले कि, हे भद्रे ! तुमने हमारी पूजा भलीभाँतिसे की अब तुम सुख सहित जहां जाना चाहती हो वहांपर चली जाओॐ ॥ ३३ ॥ जय श्रीरामच न्द्रजीने इसमकारसे आज्ञा दी तब जटा, चीर और कृष्णमृगचर्मके वस्त्र पहरीहुई शबरी अपने शरीरको अनलमें आहुति दे ॥ ३२॥ प्रचलित अनिके समान स्वर्ग कृत्स्नंवनमिदंदृष्टश्रोतव्यंचश्रुतंत्वया ॥ तदिच्छाम्यभ्यनुज्ञातात्यक्ष्याम्येतत्कलेवरम् ॥ २८ ॥ तेपामिच्छाम्यहंगंतुसमीपंभावितात्मनाम् ।। मुनीनामाश्रमोयेपामहंचपरिचारिणी ॥ २९ ॥ धर्मिष्ठंतुवचःश्रुत्वाराघवःसहलक्ष्मणः ॥ ग्रहमतुलंलेभेआश्चर्यमितिचात्रवीत् ॥ ३० ॥ तामु वाचततोरामःशवरीसंशितव्रताम् ॥ अर्चितोऽहत्वयाभद्रेगच्छकामयथासुखम् ॥ ३१ ॥ इत्येवमुक्ताजटिलाचीरकृष्णाजिनांवरा ॥ अनुज्ञातातु रामेणहुत्वात्मानंहुताशने ॥ ३२ ॥ ज्वलत्पावकसंकाशास्वर्गमेवजगामह ॥ दिव्याभरणसंयुक्तादिव्यमाल्यानुलेपना ।। ३३ ।। दिव्यांबरधरा तत्रवभूवप्रियदर्शना ॥ विराजयंतीतंदेशविद्युत्सौदामनीयथा ॥३४॥ यत्रतेसुकृतात्मानोविहरंतिमहर्पयः ॥ तत्पुण्यंशवरीस्थानंजगामात्मसमा धिना ॥ ३५ ॥ इत्याचे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीय आदिकाव्येऽरण्यकांडे चतुःसप्ततितमःसर्गः ॥ ७ ॥ को चली गई स्वर्गमें गमन करनेके समय उसके आभरण मालायें व चन्दनादि सुगन्धित लगानेके सब पदार्थ दिव्य होगये ॥ ३३ ॥ उस कालमें वह दिव्यही वन पहरनेके कारण परम मनोहारिणी दृष्टि आतीथी, और वह दीप्तिमान् विद्युत्की समान उस स्थानको प्रकाशित करनेलगी॥३४॥ उसके गुरु वह विशुद्धात्मा महर्षि गण जिस स्थानों में विराजमानथे श्रमणीभी आत्मसमाधिके प्रभावसे परम पवित्रउस पुण्यलोकको चली गई ॥३५ ॥ इत्या श्रीमामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये आरण्यकांडे भापाटीकायां चतुःसप्ततितमः सर्गः ।। ७४ ॥ ***** ॐ भामिनि जो ते नेह लगायो॥ मुक्त भई सय आश पाशते मझलोक फलपायो । युगयुग कोरति पलिह सेसी कियो मापन मन भायो॥ प्रातकाल तेरो सुमिरन फारफे रेलको पाप गयो । यो चलदेव प्रसाद पर प्रभुवेद विर अस गायो ।
वह उन एमात्मा जय शबरी अपनी तपस्याके प्रभावसे स्वर्गको चलीगई तब धमात्मा श्रीराम चन्द्रजी लक्ष्मणजोक सहित चिन्तना करन लग महर्पिगोंका अद्भुत प्रभाव विचार एकही परमहितकारी अपने भाता श्रीलक्ष्मणजीसे बोले ॥ २ ॥ हे सौम्य ! हमने उन विशुद्धात्मा महर्षियोंके आर्ययुनः यह आश्रम देखे यहांपर मृग और व्याघलोग वैरभाव छोडकर विचरण करते हैं और अनेकप्रकारके पक्षीभी वास करते हैं ॥ ३ ॥ उनके स्थापन किये। हुये इन सन सागर तीमि हमने यथाविधानसे स्नान और पितृलोगोंको वर्पणभी किया ॥ ४ ॥ इससे हमारे अशुभभी नष्ट होगये और कल्याणभी, होगया. हे लक्ष्मण ! इससे हमारा मन इससमय बहुतही प्रफुल्ल होरहाहै ॥ ५ ॥ और हे नव्याध ! इस समय हमारा हृदयभी शुभभावसे पूरित है मो अर दिवंतुतस्यांयातायांशवयाँस्वेनतेजसा ॥ लक्ष्मणेनसहभावाचिंतयामासराघवः ॥ १ ॥ चिंतयित्वातुधर्मात्माप्रभावंतमहात्मनाम् ॥ हितका रिणमेकाग्रलक्ष्मणराघवोऽब्रवीत् ॥ २॥ दृष्टोमयाश्रमःसौम्यवह्वाश्चर्यःकृतात्मनाम् ॥ विश्वस्तमृगशार्दूलोनानाविहगसेवितः ॥ ३ ॥ सप्ता नांचसमुद्राणांतेपातीर्थपुलक्ष्मण ॥ उपस्पृष्टंच विधिवत्पितरश्चापितर्पिताः॥४॥प्रनष्टमशुभंयन्न कल्याणंसमुपस्थितम् ॥ तेनत्वेतत्पदष्टंमेमनोल क्ष्मणसंप्रति ॥५॥ हृदयेमेनरव्याघशुभमाविर्भविष्यति ॥ तदागच्छगमिष्याव:पंपांताप्रियदर्शनाम ॥६॥ऋष्यमूकोगिरियंत्रनातिनका शते ॥ यस्मिन्वसतिधर्मात्मासुग्रीवोंशुमतःसुतः ॥७॥ नित्यवालिभयात्रस्तश्चतुर्भि-सहवानरः॥ अहत्वरेचतंद्रष्टुंसुग्रीववानरर्पभम् ॥ ८॥ तदधीनंदिमकार्यसीतायाःपरिमार्गणम् ॥ इतिवाणंतवीरंसौमित्रिरिदमब्रवीत् ॥ ९॥ गच्छावस्त्वरितंतत्रममापित्वरतेमनः ॥ आश्रमात्तुतत स्तस्मानिष्क्रम्यसविशापतिः॥ १० ॥ आजगामततःपंपांलक्ष्मणेनसहप्रभुः॥ समीक्षमाणःपुप्पाढयंसर्वतोविपुलद्रुमम् ॥ ११ ॥ ही होगा इस कारण हम उस मनोहर पंपासरसर चलें ॥ ६ ॥ जिस पंपाके निकटही कप्यमूक पर्वत प्रकाशित होरहाहै जहांपर धर्मात्मा सूर्यके पुत्र सुग्री वजी पसते हैं ॥ ७ ॥ नित्य वालीके भयसे भीत चारों वानरों सहित वहांपर रहते हैं हम चारों वानरोंके सहित शीवही उन वानरश्रेष्ठ सुग्रीवजीको वहांपर देसने चलेंगे ॥ ८॥ कारण कि, सीताजीको खोजना हमारा कार्य है वह उन्हीं सुग्रीवके हाथमें है जब श्रीरामचन्द्रजीने ऐसा कहा तब लक्ष्मणजी उनसे पोठे ॥ ९ ॥ कि, हमारा मनभी शीनवा करता है इसकारण जल्दी चलिये यह सुन पृथ्वीवर दोनों भाई उस मतंगाश्रमसे चले ॥ १०॥ और वहांसे चलकर **** D%3D आर०क ना. -1 दोहा-रघुनंदन संकटहरन, विन विनाशन आप 1 बहा सचिदानंदघन, दूर करो संताप ॥ गुणसागर नागर परम, नरतनु धारि सरार । लीला विस्तारी जगत, नित मंगल दातार ।। जो नर नित सुमिरन करें, गुणमण प्रभुके गाय । ते विनु श्रम संसारके, पार भये सुख पाय ॥ भक्तन हितकारण घरो, प्रभुने मनुज शरीर । ऋषि मुनियनकी दासकी, दूर करी सवपीर ।। रुपा अनुग्रह अस करो, रहैं तुम्हारे ध्यान । प्रभु ज्यालापरसादको, यह वरदान न आन || जिमि २ ऋपियनसों भयो, प्रभुको शुभ संवाद । सो सब भापामें कियो, बुध ज्यालापरसाद ॥ पढहिं सन्तजन रुपा कार,सुमिरहि लक्ष्मणराम । यामें कुछ संशय नहीं, सिद्ध होत सब काम ।। ॥१२०
इदं श्रीवाल्मीकीयरामायणारण्यकाण्डंभापाटीकासमेतं मुम्बय्यां
क्षेमराज-श्रीकृष्णदासश्रेष्ठिना स्वकीये "श्रीवेङ्कटेश्वर"-
( स्टीम् ) मुद्रणालये मुद्रयित्वा प्रकाशितम् ।
संवत् १९६७, शके १८३२.
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इति श्रीवाल्मीकीयरामायणेऽरण्यकाण्डं भापाटीकासमेतं समाप्तम् ॥
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