Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Sohan Kvya Katha Manjari [ Part - 7 ]
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श्री श्वे० स्था० जैन स्वाध्यायी संघ, गुलाबपुरा का ५० वां पुष्प
सोहन काव्य-कथा मंजरी
भाग ७
卐
रचनाकार:
प्रकाशक:
श्री श्वे. स्था. जैन स्वाध्यायी संघ
गुलाबपुरा-३११०२१ (राज.)
स्वाध्याय-शिरोमणि, आचार्यप्रवर
श्रद्धय सोहनलालजी म. सा.
सोहन काव्य कथा मंजरी
भाग-७
(२९ चरित्रों का संग्रह)
卐 रचनाकार :
प्राचार्यप्रवर, श्रद्धेय सोहनलालजी म. सा.
卐 सम्पादक :
प्रवचन-प्रभाकर, श्री वल्लभमुनिजी म. सा.
प्रथम संस्करण:
दिसम्बर १९९५
ॐ मूल्य :
लागत मूल्य १३-०० रु.
अर्थ सौजन्य :
श्रीमान् प्रेमचन्दजी
नवीनकुमारजी तातेड़, बिजयनगर
卐मुद्रक :
मंगल मुद्रणालय
३/९ गंज, महावीर किल
अजमेर।
卐प्रकार:
श्री दे. था.नन्यायाची गंभ
गुलाबपुरा (राज.)
M
प्रकाशकीय - साहित्य की विधानों में कथा उतनी ही प्राचीन है जितनी कि स्वयं मानव-सृष्टि । जब दो व्यक्ति मिलते हैं एवं परस्पर कुशल-क्षेम के समाचार पूछते हैं, तब वे अपनी कहानी ही कहते हैं या सुनाते हैं । यही कहानी का उद्गम स्रोत है । तब से प्रब तक इस कहानी ने एक लंबी दूरी की यात्रा तय की है। कथा से कहानी, फिर लघुकथा व बोधकथा के रूप में विकसित होकर अब वह अ-कहानी की सीमा को स्पर्श करने लगी है। किसी भी प्रायु के व्यक्ति के लिए कहानी सुनना या पढ़ना प्रानन्ददायक होता है । अपने देश में ही दादी-नानी के द्वारा कहानी कहने-सुनने की परम्परा चली आ रही है। शिक्षितों और प्रशिक्षितों में समान रूप से कहानी की विधा लोकप्रिय है। विविध घटनाक्रम के साथ संजोए गए पात्रों के गतिमान जीवन के माध्यम से मानो पाठक अपने ही जीवन की कहानी पढ़ता है। वह घटना भी अपनी बात कहकर पाठक के मन में निराकार रूप से पैठकर उसे पान्दोलित करती रहती है अतः उसकी अनुगूज तो लम्बे समय तक सुनाई पड़ती रहती है । इस प्रकार कहानी जीवन से जुड़कर जीवन मूल्यों की समृद्धि का माध्यम बनती है । कथा का मूल प्राधार घटना का चमत्कार होता है तथा घटना-चमत्कार किसी धार्मिक, नैतिक या साहसिक मूल्य की स्थापना करता है। अति प्राचीनकाल में लिखी गई पंचतंत्र, हितोपदेश, बेताल पच्चीसी, सिंहासन बत्तीसी प्रादि की कथाएं नीति की शिक्षा प्रदान करनेवाली रही हैं जिससे व्यक्ति व समाज के जीवन को एक दिशा मिली है । इनमें वर्णित व्यक्ति एकाकी न होकर सम्पूर्ण समाज के एक प्रतिनिधि के रूप में उपस्थित होता है इसलिए पाठक उसके जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर पाते हैं । यद्यपि कथा का प्रस्थान बिन्दु व्यक्ति है किन्तु गन्तव्य तो समाज ही होता है । इस कथा-शिल्प के साथ यदि काव्यात्मकता का भी मधुर मेल हो जाय तो सोने में सुगन्ध आ जाती है। गेयत्व का मेल होने के कारण, माधुर्य में अभिवृद्धि होने से उसकी प्रभावशीलता द्विगुणित होकर पाठक के मन पर स्थायी असर कर जाती है । प्रस्तुत काव्यात्मक कथा-संकलन के कथाशिल्पी विद्वद्वरेण्य, परमश्रेष्ठ, मधुरवक्ता पाशुकवि प्राचार्यप्रवर, गुरुवर्य श्री सोहनलालजी म. सा. एक ऐसे ही अमर कथाकार हैं जिन्होंने अपनी कथाओं के माध्यम से तर्कजाल की भांति उलझे हुए मनुष्य के मन की समस्याओं को सुलझाया है, सांसारिक व्यामोह से उसे मुक्तकर मानवीय संवेदनाओं की अनुभूति से उसे सम्पन्न बनाया है और इस प्रकार स्वस्थ, प्रनासक्त एवं समर्पित व्यक्ति का तथा शुद्ध प्राचार वाले समाज का निर्माण किया है । वि. सं. २०४४ का वर्ष श्री स्वाध्यायी संघ के प्राद्य-संस्थापक, राजस्थान-केसरी, श्रद्धेय गुरुवर्य श्री पन्नालालजी म. सा. का जन्मशती वर्ष था । इसी समय, हमारी प्रास्था ( iii ) के केन्द्र स्वाध्याय-शिरोमणि, श्रद्धेय गुरुवर्य प्राचार्य श्री सोहनलालजी म. सा. ने अपने जीवन के ७७वें वसन्त में प्रवेश कर अपने महिमा-मंडित जीवन से हमें गौरवान्ति किया है। इसी वर्ष पूज्य गुरुवर्य द्वारा समुपदिष्ट श्री श्वे. स्था. जैन स्वाध्यायी संघ गुलाबपुरा ने भी अपनी स्थापना के ५० वर्ष पूरे किए हैं। इस प्रकार यह त्रिवेणी-संगम हम सभी के लिए परम हर्ष का विषय रहा है । पूज्य गुरुदेव के अनुयायी भक्तों की यह हार्दिक अभिलाषा थी कि उनके अब तक के प्रकाशित व अप्रकाशित काव्यात्मक कथानकों को-जो लगभग ३०० से भी अधिक हैं--क्रमशः प्रकाशित कराया जाय ताकि पाठक उनसे समुचित लाभ उठा सकें एवं साहित्य के अनुसंधित्सुत्रों के लिए भी पथचिह्न बन सकें। वर्तमान दूपित वातावरण युवकों को सत्साहित्य उपलब्ध नहीं होने से वे घटिया एवं चरित्रहन्ता साहित्य पढ़कर अपना समय नष्ट करते हैं। उन्हें भी व्यवहार व धर्मनीतिपरक साहित्य सुलभ कराना भी इसका एक उद्देश्य रहा है । सोहन काव्य कथा मंजरी के ६ भाग दिसम्बर १९९४ तक प्रकाशित हो चुके हैं, जिन्हें पाठकों ने काफी सराहा है। इसका यह सातवां पुष्प पाठकों को सादर समर्पित करते हुए परम हर्ष है। इस संकलन को तैयार करने में वि. सं. २०५० का चातुर्मास हमारे लिए स्मरणीय है । परमश्रद्धेय, प्राचार्यप्रवर श्री सोहनलालजी म. सा. ठाः ६ के चातुर्मास का अजमेर क्षेत्र को सौभाग्य प्राप्त हुआ। इसी चातुर्मास में इस काव्यकृति का संकलन व संपादन किया गया था। इस संकलन को तैयार करने में हमें प्रोजस्वी वक्ता, प्रखर प्रतिभा के धनी, प्रवचन प्रभाकर श्रद्धेय वल्लभमुनिजी म. सा. का हार्दिक सहयोग मिला जिन्होंने प्राद्योपान्त सभी कथानकों को पढ़कर प्रावश्यकीय सुझावों से लाभान्वित किया है। हमारी भावना थी कि श्रद्धेय प्रबचन प्रभाकर श्री वल्लभमुनिजी म. सा. के समक्ष ही उनके परिश्रम की फलश्रुति प्रस्तुत हो पाती किन्तु एकाधिक अपरिहार्य कारणों से प्रकाशन में विलम्ब होता गया एवं श्रद्धेय वल्लभमुनिजी म. सा को प्रासोज गुदी १२ सं. २०५० के दिन काल ने हमसे छीन लिया । हम सभी निरुपाय रहे । श्राज उनके परिश्रम की यह सातवीं कड़ी प्राप सभी के समक्ष प्रस्तुत करने का सुअवसर मिल सका है, इसके लिए हम पूज्य गुरुवर्य की कृपा के ऋणी हैं। श्रीमान् प्रेमचन्दजी नवीनकुमारजी तातेड़ (राताकोट वाले) हाल मुकाम बिजयनगर वालों ने अपने पिताश्री श्रीमान् मोहनलालजी सा. तातेड़ को पुष्य स्मृति में अपनी मातेश्वरी श्रीमती रसालकवरी तातेड की ओर से अयं सहयोग प्रदान कार का प्रकाशन कराया है । मा: हम उनके प्राभारी हैं। पागाई, पाठकगण इस काव्य कथामाला से लाभ प्राप्त कर जीवन में किया विज्ञपित करेंगे, इमी विश्वास में- -नेमानन्द माथिया m दि. दिसम्बर, १९९५ श्री. स्पान माया भूमिका जीवन की शिक्षा जीवन से ही संभव है। छोटी-छोटी कथाओं के माध्यम से जीवन अनुभवों को प्रस्तुत करके जीवन की शिक्षा देने की सुदृढ़ परम्परा हमारे देश में विद्यमान है । इतिहास-पुराण आदि में ऐसी अनेक कथाएं मिलती हैं। बौद्ध-परम्परा में जातक- कथाएं हैं तो जैन-परम्परा में भी ऐसी कथानों का प्राचुर्य है। हितोपदेश, पंचतंत्र, वृहत्कथा, कथासरित्सागर, सहस्ररजनीचरित, शुकसप्तति, सिंहासन द्वात्रिंशिका, बेताल पंचविंशतिका आदि प्राचीन कथासंग्रह मनोरंजक भी हैं और प्रेरणाप्रद भी। इनकी कथाओं को अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग भंगिमाओं के साथ प्रस्तुत करने के प्रयास हुए हैं। नई-नई कथाएं जुड़ती रही। कहीं पुरानी कथानों का नवीनीकरण किया गया। प्रसंग बदल गया, कथा का उद्देश्य भी बदल गया, पर उसकी संरचना जिस मनोवैज्ञानिक सत्य का उद्घाटन करने के लिए हुई थी, वह यथावत् रहा । प्रस्तुत संकलन में छोटी-छोटी कथाएं पद्य-बद्धरूप में प्रस्तुत की गई हैं। इन कहानियों में रचनाकार, गुरुवर्य, प्राचार्य प्रवर श्री सोहनलालजी म. सा. ने जीवन के सहज सत्य को नए आकर्षक ढंग से प्रस्तुत किया है। प्रत्येक कथा अध्यात्म की उन ऊंचाइयों का स्पर्श कराने वाली है जिन्हें आज की भाषा में नैतिकता कहते हैं । भौतिक संसार की नश्वरता को कवि ने जीवन का स्वप्न कहा है। निद्रा का स्वप्न प्रांख खुलने पर मिट जाता है और जीवन-स्वप्न प्रांख मींचने पर विरला जाता है। कवि अपनी प्रत्येक कथा में इस शाश्वत सत्य को विभिन्न उपमाओं, रूपकों व दृष्टान्तों से जब प्रस्तुत करते हैं तो मन मोहित हो जाता है। काव्य की सहज प्रांजल भाषा ने इनके कथ्य को सुबोध एवं सहज ग्राह्य बना दिया है । बात तो कोई भी कह सकता है, पर बात ऐसी हो जो जमे । सुनने वाले को विश्वसनीय लगे, तब वह सुनी जायेगी। अन्यथा तो सुनकर भी उसे अनसुना कर दिया जायगा। ये कहानियां सुनने योग्य हैं, पढ़ने योग्य हैं और स्मरण करने योग्य भी हैं। इसमें जीवन के सत्य के साथ एक चिन्तक एवं कवि हृदय सन्त का अनुभव भी बोलता है । पूज्य, प्राचार्य प्रवर, गुरुदेवश्री जीवन के एक तटस्थ दृष्टा हैं। प्रासक्ति से परे, रागद्वेष से रहित उनके हृत्फलक पर संसार के स्वरूप के जो विम्ब उभरे हैं, वे हृदय- स्पर्शी हैं । कवि जब निलिप्तभाव से अपने उन अनुभवों को शब्दों में प्राकार प्रदान करता है तो ऐसा लगता है मानों शुष्क दार्शनिक नहीं वरन् जीवन की गहराई में डूबा कोई योगी बोल रहा है । ये कथाएँ इसलिए मर्मस्पर्शी तो हैं ही, पठनीय एवं मननीय भी हैं । अच्छी कहानी के दो गुण होते हैं-एक संकेत (Suggestion) और दूसरा गूज (Echo) । इन दो गुणों के माध्यम से कथा का मनोवैज्ञानिक सत्य परिपुष्ट होकर प्रकट होता है। ये कथाएं इन दोनों गुणों से समन्वित हैं । एक वार सुनने या पढ़ने के बाद इनकी गूज लंबे समय तक श्रोता या पाठक के मन को तरंगित करती रहती है । प्राचार्य- प्रवर को लोक हृदय की अच्छी परख है, उनकी सूझ गहरी एवं निरीक्षक दृष्टि पैनी है इसलिए प्रत्येक कथा सामाजिकों के गुह्यतम हृदय-प्रदेशों तक पहुंच कर एक विशिष्ट प्रभाव छोड़ती है। प्राचार्यप्रवर ने जीवन के सत्य का उद्घाटन भी अनुभवों के फलक किया है। जब वे कहते हैं-कर्म बांधणो सरल जगत में भोगे तब दुःख - नं. २) तब ऐसा लगता है मानों वे हमारे ही अनुभूत सत्य को प्रकट कर रहे हैं। 'जैसा लावै वैसा पावे-पुण्य और पाप' एवं 'सोहन मुनि, जो संदेह लाता, जाता करणी हार में भी कविवर ने शाश्वत जीवन सत्य के मर्म को स्पर्श किया है। इस सूक्ष्मता के कारण प्रायः सभी कथाएं जहां उपदेशक हैं वहीं वे सूक्ष्म दार्शनिकतायुक्त उच्च नैतिकता से साक्षात्कार भी कराती हैं । मनोवैज्ञानिक सचाई को भी कवि ने खूब पकड़ा है । 'जिस कार्य को करने के लिए इन्कार किया जाता है, मन उस ओर विशेष प्राकर्पित होता है।' कवि ने इस सत्य को प्रथम कथा में ही प्रकट कर दिया है । कथाओं के द्वारा जैन शासन के मूल-सूत्रों को प्रतीव सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है । सिद्धान्तों की रुक्षता को कथानकों की कमनीयता से कम किया गया है। ऐसी शैली को आज की भाषा में अप्रत्यक्ष उपदेश (Indirect Preaching) कहा जाता है। इसे शिक्षण की सर्वोत्तम विधि माना जाता है। कवि का कथाकार व उपदेशक का रूप इरा प्रकार परस्पर गुम्फित हो गया है कि उन्हें अलग करके नहीं देखा जा सकता । गम कवि ने कहकर नहीं वरन् वैसा जीवन जीकर सिखाया है अत: प्रत्येक कथा की प्रभावो- त्पादकता बढ़ गई है। अन्य कथानकों की भांति प्रस्तुत संग्रह में भी राधेश्याम रामायण, लावणी बड़ी, द्रोण, लावणी छोटी, कोरो काजलियो, सदृश लोकतों का उपयोग किया है वहीं नेमजी की जान बनी भारी, एवन्तामुनिवर नाव तिराई बहता नीर में, हो भवियण शरणा चार जैसी जैन समाज में प्रचलित विशुद्ध भावपूर्ण तों पर भी रचनाएं की है। इन लोकप्रिय धुनों में गेयकाव्य को इतनी कुशलता से वांधा है कि पाठक व श्रोतागण भी उनके साथ ही भावविभोर होकर गा उठता है । जहां तक भाषा का प्रश्न है, कथाओं की भाषा काव्य-भाषा है । कहीं भी तुम्हता नहीं, शब्दों की तोड़-मरोड़ नहीं । प्रालंकारिक छटा भी है किन्तु वह सागान नहीं सहज है। रचनाकार सिद्धहस्त कवि हैं। श्रापकी भापा पर स्थानिकता का भी प्रभाव है अत: लार (साथ में) भायां (भाई), घणा (बहुत), वांरो (उनका), नई कानी (चारों तरफ), धूलधारणी होना (व्यर्थ हो जाना) श्रादि शब्दों का प्रयोग सहजय हो गया है। करज्यो रे, डरज्यो रे धादि क्रियापदों का प्रयोग कवि की पाटा साथ गहरी प्रात्मीयता को सूचित करता है । सरल, मुबोध भाषा में प्रापारा निता प्रक काव्यकृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं । मानाय श्री धर्म के गुट रहस्यों को गाम-मायों की मनोमुग्धकारी जली में बालपट्टी की तरह प्रस्तुत कर रहे हैं । कथाहा नमार प्रवाह और पाव्य की मीठाग इसमें एक माथ विद्यमान है। मेमनाथन: । अब पापों घोर भामानों का मान fr: इस बार 4 mi, गुनगुनायें और में मोदिन जाम ललो होगा। मनमा माया !
श्रीमती रसालकंवरजी तातेड़
FATHE
श्रीमान् प्रेमचन्दजी नवीनकुमारजी तातेड़ विजयनगर वालों के
द्वारा अपने पिताश्री धर्मनिष्ठ, सुश्रावक श्रीमान् मोहनलालजी सा.
तातेड़ की पुण्य स्मृति में, अपनी मातेश्वरी श्रीमती रसालकंवरजी
तातेड़ की प्रेरणा से प्रकाशित करवाकर भेट ।
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१ | लोहो सव्व विणासणो [ तर्ज : लावणी] ह काम पिपासा कितनी, है दुखकारी, तुम सुनो लगाकर ध्यान सभी नर नारी ॥टेर।। क चम्पापुरी में बसे, बड़े व्यापारी, उनमें माकंदी नामा सेठ बहुत धनधारी । T लक्ष्मी का नहीं पार, जगत में जहारी, जिनरक्ष और जिनपाल पुत्र गुणधारी ।। पढ़ लिखकर लीनी दोनों, खूब हुशियारी ।।१।। हाजों में भरकर माल, बेचने जावे, लवण समुद्र में ग्यारह बार फिर आवे । बूब कमा कर सम्पति, घर में लावे, पर तृष्णा मन से कम नहीं होवे पावे । धन पाये जान को जोखिम मांही डारी ।।२।। क वक्त भ्रात दोनों यों, मन में धारी, हम चलें माल भर पोत समुद्र मंझारी । पता पास प्रा कही, हकीकत सारी, धन लेने जावे पोत समुद्र में डारी ।। अतः इजाजत मिले हमें इस वारी ॥३॥ 'पता कहे लक्ष्मी की, कमी है नाँहीं, फिर क्यों करते हो लोभ तजो सब भाई । यह समुद्र यात्रा खतरे, वाली कहाई, अतः करो संतोष हिया के माँही ।। पुत्र कहे जाने की इच्छा हमारी ।।४।। बारहवीं बार नहीं जाना, पिता समझावे, पर अँची हिये में और बात नहीं प्रावे । जहाजों में भरकर माल समुद्र में जावे, अधबिच पाया तूफान जहाज फट जावे ।। डूब गई जो लाया सम्पत्ति सारी ।।५।। दोनों भ्रात के हाथ पाटिया पाया, तिरकर दोनों रत्नद्वीप को पाया। भूखे थे फल तोड़ तोड़ कर खाया, मिटी भूख तब बैठे तरु की छाया ।। प्राई रतना देवी वहां उस वारी ।।६।। कर क्रोध उन्हें फिर देवी ने ललकारा, हो जावो तैयार चले असिधारा । क्यों पाये लेकर मृत्यु अपनी लारा, सुन वाणी दुःखित हो मुख से यों उच्चारा ।। मृत्यु मुक्त कर, दो प्राज्ञा इस वारी ।।७।।
हँस कर बोलो करी परीक्षा थांरी, चलो महल में मिले सभी तैयारी । ले गई महल में भोगे भोग सुखकारी, भोगों से हो गये तंग हिया में धारी ।। फंस गये हैं फंदे माँय हुमा दुख भारी ॥८॥ सुस्थित देव इन्द्र प्राज्ञा फरमाई, लवण समुद्र की जल्दी होय सफाई। रतना देवी को जाकर दो दरसाई, प्राज्ञा को जाकर दीनी उसे सुनाई ।। सोचे इन्द्र की आज्ञा टरे ना टारी ।।९। दोनों कंवर को देवी यों दरसावे, मैं जाऊँ काम पर प्राज्ञा इन्द्र की प्रावे । सुख में रहो जहाँ जैसा चित्त में चावे, पर दक्षिण बाग मत जाय सर्प खा जावे ।। तीनों दिशा में फिरो स्वेच्छा धारी ॥१०॥ गये बाद में घूमे बगीचे माँही, रमणिकता लख रहे दिल में अति हरसाई । देवी ने दक्षिण की कैसे करी मनाई, चलो देख लें क्या है रहस्य उस माँही ।। देखा अस्थि ढेर दुर्गन्ध है भारी ।।११।। आगे शूली पर मानव चढ़ा दिखाया, दोनों भ्रात चल उनके पास में पाया । पूछी बात तब उसने यों दरसाया, म्हारी दशा ज्यों थारी होसी भाया ।। भोगों में चूस तन, दे शूली हत्यारी ।।१२।। सुन करके मन दोनों का कम्पाया, कैसे बचे हो उपाय कहो अब भाया । बचे वही जो होवे भाग्य सवाया, नहीं. वो देखो हड्डी ढेर लगाया ।। मोह माया का जाल बिछासी भारी ।।१३।। अष्टम चौदस प्राची बाग में जावे, वहाँ यक्ष अश्व का रूप धारकर प्रावे । तारू पार उतारूँ शब्द शब्द लगावे, उस वक्त पार होने की जो दरसावे ।। बैठा पीठ पर देता पार उतारी ।।१४।। अाठम के दिन दोनों बाग में प्राया, यक्ष शब्द सुन मन माँहि हरसाया । करो कष्ट से पार पाप यक्ष राया, शर्त मेरी यह लेना ध्यान में भाया ।। भोगों से मन को मोड़े वही हो पारी ।।१५।। विचलित हो गये भाव उसी क्षण माँही, दुगा डाल मैं फिर नहीं करू सुनाई। मानी शर्त तब उड़ गया पीठ बिठाई, उस क्षण देवी ने देखा ज्ञान लगाई ।। जा रहे समुद्र में गगन गति इस वारी ।।१६।। प्रा गई पास में रोप करी बतलावे, कहो त्याग कर मुझको कहां सिधाये । कई तरह से हाव भाव बतलावे, अडिग रहा जिनपाल सुने न सुनावे ।। कितना मोह है जिन रख ने यो धारी ।।१७।।
जन रक्ष का मानस सुनकर गया ललचाई, अतः देवी प्रा मीठी वात सुनाई। क वक्त तो देखो आँख उठाई, मन चला तत्क्षण दीना यक्ष गिराई ।। गिरते ही देवी ने लीनी सद्य दुधारी ।।१८।। केल नोंक पर खंड खंड कर दीना, जो अचल भाव से रहा स्थान जा लीना । त पिता से मिली हाल कह दीना, काम भोग में फंसा वही दुख लीना ।। अत: विषय से बचो सदा गुणधारी ।।१९।। जाता सूत्र का नौवा अध्ययन है भाई, सुरणी सुगुण नर लेवो हिये जमाई। जनपाल रहा मजबूत सुक्ख लिया पाई, भोगों में फंसकर जिन रख जान गंवाई ।। प्रतः ज्ञानी वचनों को लेवो धारी ।।२०।। प्राज्ञ' प्रसादे सोहन मुनि दरसावे, काम भोग से बचो यदि सुख चावे । दो हजार छत्तीस फतेहगढ़ प्रावे, महीना माघ सुद सातम गुरु मन भावे ।। श्री संघ यहां का है अति साता कारी ।।२१।। -- ३ । • . २ | कर्म-कथा -- [ तर्ज : उमर छोटी सी भाया सुणज्यो रे ई कर्म कथा पर ध्यान लगाज्यो रे ।।टेर।। कर्म बांधता डरज्यो मन में नहीं तर अति दुख पावो रे, घणा काल तक इण जग माही भटका खावो रे ।। भाया ।। १ ।। कथा पुराणा माँही आई वाही प्राज सुरणावां रे, सुणकर हिरदय मांही जमाज्यो अतः बतावां रे ॥ भाया ।। २ ।। एक वक्त नारद अंगीरा ऋषि साथ में जावे रे, देख तमासो एक, ऋषि नारद रुक जावे रे ।। भाया ।। ३ ।। ऋषि अंगीरा पूछे क्या है क्यों यहां पर ठहराया रे, नारद ने ऋषि अंगोरा से दरसाया रे ॥ भाया ।। ४ ।। देखो अज यह नाज खाय पर लाठी इसे दिखावे रे, एक दाणा मुख मांही ले ले लकड़ी खावे रे ।। भाया ।। ५ ।। कहे अंगीरा क्यों खाने दे इसका यह अधिकारी रे, खा जायं नष्ट हो पूजी सारी रे ।। भाया ॥ ६ ॥ नारद बोले यह दुकान है पूर्व भव में इसकी रे, कूड कपट कर वो दी वेलड़ी वहाँ पर विप की रे ।। भाया ।। ७ ।। इस बकरे का जीव वणिक था पूर्व भव के मांही रे, करता था व्यापार नाज का हरदम याँही रे ।। भाया ।। ८ ।। लोगों पर विश्वास जमाकर धोखा उनसे करता रे, किसी तरह कमती दे करके ज्यादा लेता रे ।। भाया ।। २ ।। लोग दिखावा करने खातिर नाम प्रभु का लेता रे, किन्तु हमेगा बक बिल्ली वत छल में रमता रे ।। भाया ।। १० ।। ४ अन्याय प्रनीति करके अर्थ का संग्रह इसने कीना रे, क्या फल होगा परभव मांही ध्यान न दीना रे ।। भाया ।। ११ ।। वही सेठ तज मानव भव को अज भव माँही पाया रे, जाण पापणी हाट प्राज कुछ खाना खाया रे ॥ भाया ॥ १२ ॥ एक नाज का दाणा भर भी इसका हक है नाँही रे, देख व्यवस्था यहाँ पर इसकी यह मन प्राई रे ॥ भाया ।। १३ ।। क्या है दशा जगत की देखो मोह में फंस नर नारी रे, कर कर खोटे काम व्यर्थ दुख पावे भारी रे ।। भाया ।। १४ ।। कर्म बांधणो सरल जगत में भोगे तब दुख पावे रे, अतः सज्जनों समझो हिय में जो सुख चावे रे ॥ भाया ॥ १५ ॥ 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि यों बार बार चेतावे रे, बचो कर्म बंधन से हरदम दुख टर. जावे रे ॥ भाया ।। १६ ।। दो हजार छत्तीस फागण बुद तेरह दिन गुरुवारो रे, बिजयनगर में ठाणा पांच के मंगला चारो रे ।। भाया ॥ १७ ॥ ५
३ | जैसा लावे वैसा पावे
[ तर्ज : उमर छोटी सी ]
संग में लाया रे,
वह मिले यहां पर सुख दुख भाया रे ।। टेर ।।
घर के मांही वैभव लखकर मन में मत गर्वाजे रे ।
पुण्य साथ में है थारे तो लावो लीजे रे ।। संग ।।१।।
दीन दुःखी की बात सुणीजे वाँ रो दुःख मिटाजे रे ।
बणे जहाँ तक साथी होकरं सहारो दीजे रे ।। संग ।। २ ।।
फिजुल खर्च कर नशा पता में धन ने मती लुटाजे रे ।
सावधान होकर के द्रव्य से लाभ कमाजे रे ।। सग ।। ३ ।।
पूर्व भव में पाप कमाया वे यहां पर दुःख पावे रे ।
पुण्य नहीं लाया रोटी विन नित तड़पावे रे ।। संग ।। ४ ।।
एक गांव के ठाकुर घर में थी पूरी नादारी ।
फाटा कपड़ा तन पर, भूखा पेट मझारी रे ।। संग ।। ५ ।।
सोचे एक दिन जाऊं कहीं तो रोटी पेट भर खाऊं रे ।
आधे पेट से रहूं हमेशा भूख मिटाळं रे ।। संग ।। ६ ।।
चला सुबह ही अपने घर से एक गांव में पाया रे ।
चलते चलते थक गया ठहरा तरुवर छाया रे ।। संग ।। ७ ।।
पूछ रहा है कहां रावला लोग उन्हें बतनावे रे।
जाकर पोल में बैठ गया नहीं पूछरण पावे रे ।। संग ।। ८ ।।
इतने में एक दासी पाई देख हियो हुलसायो रे ।
अव तो मारो काम सिद्ध हुवो मन को चायो २ ।। मंग ।। ९ ।।
ठाकुर पास बुलाकर बोला जल्दी जाकर कहिज है।
भूख सिंह जी बैठा पोल में मुजरी लीजे रे ।। मंग ।। १० ।।
आई दासी बात सुणाई सुण ठुकराणी जाणी रे । ठीक समय पर पाया द्वार नहीं रोटी पाणी रे ।। संग ।। ११ ।। खोटी होसी काम न बरणसी झट के ही कहला दू रे । ऐसे ढंग से करू इशारो झट समझा दूरे ॥ संग ॥ १२ ॥ दासी को समझाकर कहती ऐसे जाकर कहिजे रे । निरालबाई निछरावल लेवे यों कह दीजे रे ।। संग ॥ १३ ॥ भूख सिंह जी से कह दीजे निराल बाई कहलावे रे । सुण दासी की बात ठाकुर मन को समझावे रे ।। संग ।। १४ ।। यहां तो आगे ही भूखा है क्या मुझ भूख मिटावे रे । हुप्रा रवाना सोचो लाया वैसा पावे रे ।। संग ।। १५ ।। सुनकर कथा हिया में धरज्यो सोहन मुनि चेतावे रे । पुण्य पाप को देख तमासो पुण्य कमावे रे ॥ संग ॥ १६ ।। ७
४
स्वार्थ का सम्बन्ध
[ तर्ज : लावणी खड़ी]
क्यों करता विश्वास जगत में सब स्वार्थ का नाता है ।
बिन स्वार्थ तो देख यहां पर कोई पास नहिं प्राता है ।। टेर ।
बसन्तपुर में जितशत्रु नृप कमल प्रभा पटराणी है,
विद्या सागर मंत्री राज का नीति निपुण गुण खानी है ।
धनवान नगर में ज्ञानचन्द के विमल प्रभा सेठाणी है,
विनयवान विद्वान मनोहर पुत्र जिन्हों के दानी है ।।
शेर-संत सेवा में रहै नित ज्ञान ध्यान चित्त लाय जी,
किसी तरह भी काम मांही मन नहीं लगवाय जी।
देखकर उसको पिता यों बार बार समझाय जी,
कर काम तू नित हाट का, अब कहीं मत जाय जी ।।
बात एक भी जमे न उसके सेवा में नित जाता है ।। १ ।।
पिता विचारे कहूं इसे पर नहीं ध्यान में लाता है,
परणा बू अच्छी कन्या को यही भावना लाता है ।
देख विदुषी कन्या इसका सत्वर व्याह रचाता है,
वर ले अपनी वधू को वापिस अपने घर पा जाता है ।।
शेर-फिर भी हमेशा संत सेवा में वह तो जाय जी,
देखकर के यह व्यवस्था बहू को ससुर समझाय जी।
संत सेवा छोडता
छोडता नहीं दिया खूब दरसाय जी,
अब तो रखना हाथ तेरे तू इसे समझाय जी ।।
सुन करके सब बात ससुर की जी दुख से भर जाता है ।।२।।
प्रब मुझको ऐसा करना है जिससे काम में फंस जावे.
सहज छोड़कर संत सेवा की घर कायों में ला जावे ।
कहती पति को प्राप बिना तो क्षण क्षण भारी दिखलावे,
प्रतः पाप तज मुभको यहां गे बाहर कहीं भी नहीं जाये ।।
शेर-अगर चाहो जिन्दगी मुझ तो तजी मत जाय जी, संसार सूना आप बिन ऐसा मुझे दिखलाय जी। पती कहता संत सेवा मेरे मन में भाय जी, संसार की सब बात मेरे प्राती नहीं है दाय जी ।। सुन नारी बेहोश हो गई त्वरित होश में लाता है ।। ३ ।। रोती रोती नारी बोली ऐसे क्या फरमाते हैं, ऐसा क्या पाषाण हृदय है दया न दिल में लाते हैं। अंट संट केई बातें कह पूछे वहाँ क्यों जाते हैं, मेरे से नहीं सच्चा प्रेम सब ऊपर से दिखलाते हैं ।। शेर-सुनकर मनोहर सोचता यह बात सच दरसाय जी, स्नेह कितना मेरे प्रति है इसके मानस मांय जी । ज्यादा कहीं पर रुक गया तो देगी प्राण गंमाय जी, ध्यान रक्खू मैं सदा नहीं नार ऐसी पाय जी। उस दिन से सब काम छोड़कर जल्दी घर आ जाता है ।। ४ ।। अब तो इतना उलझ गया नहीं सत्संगत में जाता है, यार दोस्त भी कहें कभी तो उनको यो दरसाता है । क्या धरा है वहाँ जाने में मुझको अब नहीं भाता है, नारी प्रेम ही उत्तम जग में वह ही मुझे सुहाता है ।। शेर-छोड़कर जाऊँ कहीं तो नार मम मर जाय जी । देखे बिना मुझको कमी भी शांति नहीं वह पाय जी । क्षण एक का भी हो विरह तो उसका मन दुःख पाय जी, इतना भरा है स्नेह उसमें कैसे छोड़ा जाय जी ।। संत समागम अब तो बंधव मेरे को नहीं भाता है ।। ५ ।। इक दिन संत सभा में पूछे क्यों न मनोहर पाता है, तभी मित्र हो खड़ा गुरु से सारा हाल सुनाता है । नारी प्रेम है सच्चा, झूठा सभी धर्म का नाता है, संत कहे लेकर के प्राना कहीं तुझे मिल जाता है ।। शेर--मार्ग में मिल गया मनोहर मित्र यों दरसाय जी, चलो मेरे संग में क्यों व्यर्थ बात बनाय जी। इक बार करके संत दर्शन चल के वापिस प्राय जो, हठ से मनाकर मित्र को वह संग में ले प्राय जी । बंदन करके बैठ गया पर ऐसी मन में लाता है ।। ६ ।। -९ कब जाऊं मैं यहां से उठकर तभी संत फरमाते हैं, क्या कारण है कह दो भैया अमूल्य वक्त क्यों खोते हैं । गया समय नहीं पुनः कहीं भी कोई मानव पाते हैं, चला गया सो चला गया फिर अंत समय पछताते हैं । शेर-कँवर कहे हे पूज्य गुरुवर बात दू बतलाय जी, नारी स्नेह इतना है मुझसे बिन देखे मर जाय जी । संत बोले कर परीक्षा पता तुझे लग जायं जी, प्रेम मांही फंस कहीं धोखा नहीं खा जाय जी ।। संतों की बाणी सुन सच्ची कंवर हिये में जमाता है ।। ७ ॥ वंदन करके पाया घर पर नारी से दरसाता है, खीर पुड़ी तैयार कीजिए खाने को जी चाहता है ।। अभी बनाती कहा नार ने तभी कंवर फरमाता है, शूल भयंकर चली पेट में ऐसे कह सो जाता है ।। शेर-लम्बा करके पैर अपना स्तम्भ बीच फंसाय जी, जानता था वह कला लीनी समाधि लगाय जी। माल कर तैयार नारी चल वहां पर प्राय जी, सोते हुए यों देखकर · पावाज तेज लगाय जी ।। नहीं बोले तब देखे पास जा मूर्छागत दिखलाता है ।। ८ ।। नारी सोचे मालूम होता नहीं रहा है तन में श्वांस, सभी माल कब्जे में करके खोली कुचियें प्राकर पास । खीर पुड़ी खा करके रखली बची हुई थी अपने पास, फिर रोने को वैठी जोर से आवाज लगाई ले निश्वास । शेर-लोग प्राये दौड़कर देखा कंवर देखा कंवर . बेहाल जी, यम लोक वासी हो गया है शीघ्र दो निकाल जी। मिल सभी पग को निकाले फंस गया बेथाल जी, क्या करें तब एक बोला देवो घम्भ उबाल जी ।। इसके सिवा नहीं और कोई उपाय ध्यान में पाता है ।। ९ ।। बोली नारी मबके सन्मुख बात मेरी प्रब मुन लेना, इनके पग को काट दीजिए न्यंभ को रहने देना ।। लोग नोचने नारी शहती उसे ध्यान मांहि लेना, मा: कती नावो जल्दी देर, जरा भी मत सरना ।। १० शेर-~लाकर करौती हाथ दी, जल्दी करो इस वार जी, कंवर सुनकर सोचता झूठा सभी संसार जी। पैर कटवा रही मेरा दिखा स्नेह अपार जी, धिक् विषय ले श्वास सत्वर हो गया तैयार जी ।। कहे सभी से मूर्छागत तन कभी कभी हो जाता है ।। १० ।। सभी गये अपने अपने घर करते मुख से यों उच्चार, प्रायु बल लम्बा था इनका जिससे हो गये ये तैयार । उठ बैठे लख पति चरण में पड़ी सद्य प्राकर के नार, सौभाग्यवती हूं पुण्यवती हूं जिन्दे हो गये मुझ भरतार ।। शेर-देखकर नारी चरित्र को मन में करे विचार जी, विषयवश हो जाल में, मैं फंस गया इस वार जी। व्यर्थ ही सत्संग छोड़ा मिलती सुधा अनपार जी, त्यागकर संसार को अब ले लू संयम धार जी ।। नारी को प्रा बोला ऐसे अपनी बात सुनाता हूं ।। ११ ।। झूठे जग को तज कर अब मैं जाऊंगा मुनिवर के पास, आज्ञा लेकर दीक्षा ले ली मोड़ लिया अपना मन खास । विनय भाव से ज्ञानाभ्यास कर बन गया है गुरुवर का दास, प्रात्म साधना करके पूरण पा लीना उत्तम गति वास ।। शेर-पंचम पारे मांहि समझो वीर वाणी प्राधार जी, तिरना चाहो जगत से लो श्रद्धापूर्वक धार जी। सम्यक्त्व पाये बिन नहीं होगा कभी उद्धार जो, कह गये गुरु 'प्राज्ञ' हमको सुन लो सभी नर नार जी ।। ऐसी उत्तम सीख प्राप्त कर भव जल से तिर जाता है ।। १२ ।। समझ समझ यह मानव तन पा व्यर्थ न इसे गमा जाना, मोह माया में उलझ गया तो होगा अंत में पछताना । . अन्याय अनीति करके जोड़ा श्राखिर में तज़कर जाना, देख जगत के झूठे रिश्ते कुछ तो मन को समझाना ।। शेर-'प्राज्ञ' कृपा ‘सोहन' मुनि यों बार बार चेताय जी, संसार मोह को त्याग कर नित संवर मांहि प्राय जी । स्वार्थ से सेवा करे सब, स्वार्थ जब मिट जाय जी, अच्छी तरह से देखना फिर पास कोई नहीं प्राय जी ।। पार्श्व जयंती बिजयनगर में छत्तीस साल मनभाता है ।। १३ ।।
५
भाषा पर :
लाल अरु बाल भाई
:
[ तर्ज : नेम जी]
सुधा सम बोलो सब बानी, मिली यह उत्तम जिन्दगानी ।। टेर ।।
बिगड़ता काम सुधर जावे, लोक सब बस में हो जावे ।
कीर्ति जन जन में छा जावे, वाणी से जग में यश पावे ।
दोहा-वाणी बोल अमोल है, बोल सके तो बोल ।
हिये तराजू तोल के, पछे बाहर खोल ।।
सुनाते सदा यही ज्ञानी ।। सुधा० ।। १ ।।
समझ बिन दे भाषा उच्चार, इसी से होता बहुत बिगार ।
हुप्रा महाभारत करो विचार, ध्यान में लो सवही नर नार ।
दोहा-दुर्योधन के सामने, द्रौपदी यों दरसाय ।
अंधों के अंधे ही होते, कड़वे वचन सुनाय ।।
किया संग्राम हुई हानि ।। सुधा० ।। २ ।।
शहर एक धनपुर था नामी, अजित सिंह वहां का था स्वामी।
विजय भा मंत्री गुणधामी, वसंत सेना थी पटराणी ।
दोहा-इसी नगर में सेठजी, रहते हैं धनपाल ।
सेठाणी गुरण सुन्दर घर में, पुत्र लाल अर वाल ।।
कठिन से मिले प्रन पानी ।। सुधा० ।। ३ ।।
पितामह इनके धनधारी, नगर में च्याति थी भारी ।
संतरी रहते हर बारी, पाय भी घर में भी भारी ।।
दोहा ---भाग्य दया में हो गया इनका ऐसा हाल ।
धीरे धीरे घट गया उसके, मारे पर कामाल ।।
पलट गई क्षण में पुष्प वानी ।। मुधा० 11 ४ ॥
१२
. . प्राय भी अब कमती प्रावे, शाला में लाल बाल जावे । लाल शिक्षा में बढ़ जावे, बाल को ज्ञान नहीं पावे। दोहा-चंद समय में लाल ने, करली बी. ए. पास । बाल बाल ही रह गया, पढ़ा न कुछ भी खास ।। मिलेगा जो लावे प्राणी ।। सुधा० ।। ५ ।। लाल को नौकरी लग जावे, शहर के दफ्तर में जावे । बाल को घर धंधा भावे, मस्त तन उसका दिखलावे । दोहा-पावे नौकरी लाल की, जिससे चलता काम । शनिवार को प्राता घर पे, मिलते लोग तमाम ॥ सुने सब बैठ चऊँ कानी ।। सुधा० ॥ ६ ॥ सालम पुर गांव के मांही, व्यापारी सालम सुखदाई । सावित्री नारी धर माँही विदुषी बिमला है बाई । दोहा-ब्याऊँ घर वर देख के, पिता करे विचार । एक दिन देखा लाल को, पाया हर्ष अपार ।। इन्हीं संग ब्याऊँ मन पानी ।। सुधा० ॥ ७ ॥ लाल भी यह मन में लावे, ऐसी हो नारी मन भावे । सामिल रह जीवन बीतावे, सेवा कर सबकी सुख पावे । दोहा-ऐसे अवसर में वहां, आ गया सालम सेठ । करी सगाई विमला की तय, समझ काम सब रेट । बात सब मिल गई मनमानी ।। सुधा० ।। ८ ।। ठाठ से लाल विवाह कीना, सेठ ने माल बहुत दीना । परणकर पुन: गांव लीना, मनोहर सेठ जिमा दीना। दोहा-विमला प्राई सासरे, देखा वहां का हाल । घर की हालत बिगड़ी देखी, नहीं है कुछ भी माल ॥ शांति रख सब वहां की जानी ।। सुधा० ॥ ९ ॥ कोटिपति घर से मैं प्राई, यहां तो नहीं है इक पाई । लिया निज मन को समझाई, मुझे अब रहना है यहां ही। दोहा-घर मुप्राफिक हो गई, चंद समय के माँय । पूरे घर का धन्धा करती, आलस दूर हटाय ।। बहू क्या प्राई रमा रानी ।। सुधा० ।। १० ।। . . - .
वाल का विवाह हुमा वहां ही, साधारण घर की बहू आई। काम भी कर जाने नाही, सिखावे ज्येष्ठा प्यार लाई । दोहा-एक दूसरे के प्रति, घर में पूरण प्यार। कभी नहीं होती है यहां पर आपस में तकरार ।। खुशी में बीते जिन्दगानी ।। सुधा० ॥ ११ ॥ त्याग का मारग बतलाती, मंत्र नवकार भी सिखलाती। जमीकंद छोड़ो समझाती, निशी का भोजन तजवाती। दोहा-देवराणी को पास में, बैठाकर हर बार । सुखी बनाना चाहो जीवन, गन्दे तजो विचार ।। ध्यान में लेवो हित पानी ।। सुधा० ॥ १२ ॥ अतिथि एक दिन घर आये, भोजन की स्वीकृति भरवाये। देवर भाभी से दरसाये, दाल का हलवा बनवाये । दोहा~भाभी ने वहां त्वरित ही, कीना भोज तैयार । मेहमानों को जिमा दिया है, करके अति मनुहार ।। कहे वे भोजन लासानी ।। सुधा० ॥ १३ ।। जिमाकर सादर पहुंचाया, देवर जब भोजन हित पाया। थाल में लूखा अन्न पाया, देख भाभी को दरसाया। दोहा-भोजाई कहे लग गया, हलवा करने मांय । इतना घी कैसे कर लागा, देवर जी दरसाय ।। जोश में बोला प्रांख तानी ।। सुधा० ॥ १४ ।। खर्च करे पीहर में ऐसे, लगाती मुफ्त प्राय वैसे। समझ नहीं प्राय होय कैसे? बोल गया मन प्रावे वैसे । दोहा-सुन पीहर के नाम को, भाभी खाया जांश। नारी सब सुन लेती किन्तु पीहर निन्दा पर रोष ।। भाभी कहे तोच कहो बानी ।। मुधा० ।। १५ ॥ इत्ता घी सुनो पीहर माही, नौकर जन लेते हैं खाई। पीहर की कैसे दरसाई, वहां की तुलना कहां यहाँ ही । दोहा-देवर को इस बात में, मा गया रोष अपार । भोजन की थाली उला, फेंगी है तत्कार। जोश में छा गई हैवानी !! गुधा० ।। १६ ।। ४ खड़ाऊँ फेंकी भाभी पर, बचा सिर, लगी है अंगुली पर । चली गई भवन माँहि सत्वर, बोल गई ऐसे जोश भरकर । दोहा- यदि होते वे यहाँ पर मजा चखाते प्राज। जितना मन चाहे तुमं यहां पर करलो घर में राज । कहाँ है इनमें इनसानी ।। सुधा० ।। १७ ।। साधारण है इनकी नारी, अपढ़ यह देता इन्हें मारी । आदत है इनकी हरबारी, खड़ाऊँ उठा मुझे मारी। दोहा-विमला मन में सोचती, कब प्रावे शनिवार । पति देव पायेंगे उस दिन, प्राज वार गुरुवार ।। नार की गति, पति मानी ।। सुधा० ।। १८ ॥ शनि को पतिदेव पाये, लोग मिल उनको बैठावे । बात में गहरा रस लावे, बजे दस कोई न उठ जावे । दोहा-विमला बैठी भवन में, करे खूब इंतजार । रात गई अब पति प्रायेंगे, कहूं बात का सार ।। यही ली मन माँही ठानी ॥ सुधा० ।। १९ ।। पंचायत उठी लोग जावे, तभी प्रा भाई दरसांवे । भाभी को आप समझावे, संभल' कर मुख से दरसावे । दोहा-नहीं तो अनर्थ हो जाएगा, कहता हूं सच वाय । पिता कहे है अच्छा नाहीं, बहू बेटी सिर छाय ।। लगी मुह सबके बहूरानी ।। सुधा० ।। २० ।। और कहे ऐसे लघु भाई, बड़े घर से भाभी आई। कहार तो हम भी है नाँहीं, पीहर की महिमा रही गाई । दोहा-ज्येष्ठ बन्धु कहे बंधुवर, कहो साफ वृत्तान्त । बाल कहे वह अपने पापही, नहीं बात में तन्त ।। लाल सुन खा पीकर पानी ।। सुधा० ।। २१ ।। सीधा वह भवन माँहि प्राया, वात कर पति ने फरमाया । कहो क्यों घर में द्वन्द्व छाया, आज तक मैं नहीं सुन पाया । दोहा-नारी कहे नहीं पूछते, कलेह मूल है कौन । उनने ही यह खड़ा किया है सत्य कहें क्यों मौन ॥ प्रेम पर फेर दिया पानी ।। सुधा० ।। २२ ।। - .
पति कहे सच क्या ? दरसावे, नारी सव. बीतक बतलावें। खड़ाऊ उठा शीघ्र लावे, फेंकी सिर मेरा बच जावे । दोहा-नीचा करके बचा लिया, पड़ी अंगुली पर प्राय । नहीं तो सिर फट जाता मेरा, जाती यम घरमांय ।। करी वे गहरी नादानी ।। सुधा० ।। २३ ।। जुल्म अहो भाई ने कीना, काम यह अच्छा नहीं कीना। बात कह झूठ फंसा लीना, धोखे में मुझे डाल दीना। दोहा-जाता मैं तो नौकरी पीछे से यह काम । दादा भी ले पक्ष उसी का हो गया काम निकाम ।। जीवन हुआ इसका धूलधानी ।। सुधा० ॥ २४ ।। सोचकर क्रोध हिए लाया, अति वह दिल में दुख पाया। रात वह ज्यों त्यों बिताया, सबेरे पिता पास आया। दोहा-दादा प्रब होगा नहीं, मेरा यहाँ निर्वाह । जिन बातों का था विरोधी, वही पकड़ रहा राह ।। करूँ क्या छा गई हैरानी ।। सुधा० ।। २५ ।। पिता सुन मन में घबराये, कभी नहीं बात यह मुख लाये । आज यह कैसे दरसाये, मेरी यह शर्म सदा खाये। दोहा-पिता कहे क्या बात है क्यों इतना कुलाय । पुत्र कहे अन्याय हो गया सहा न मुझसे जाय ।। बालु यहाँ करे है मनमानी ।। सुधा० ॥ २६ ।। खड़ाऊ उसने दे मारी, चोट लगती सिर के भारी । हाल क्या होता इस वारी, बात यह हो गई दुखकारी ।। दोहा-इनमें शैतानी बढ़ी मैं तो जाऊँ काम । औरत से झगड़ा करे होता यों बदनाम ।। छाई है उसमें मस्तानी ।। सुघा० ।। २७ ।। पिता कहे ऐसी घर नारी, काग सब देती बिगारी । नारी के पीछे तू भारी, भूल करता है दम वारी। दोहा-प्रभी तुझे मैं यया अहं तु अच्छा विद्वान । भात मोलकर मुघ से बोलो गाहो घर में हार ।। कई मैं तुमको हित पानी ।। मुधा ।। २८ ।। १६ गांव में हर घर के माँही, मिटाऊँ झगड़े मैं जाई । करू क्या अपने घर माँही, देख रहा झगड़ा मैं यहाँ ही। दोहा--लाल कहे दादा सुनो, जब तक सजा न पाय । तब तक उसका बढ़े हौंसला, सहा यह कैसे जाय ।। बढ़ेगी उसमें णैतानी ।। सुधा० ।। २९ ।। बाल है तेरा ही भाई, गलती हो देवो समझाई। लाल कहे समझू नहीं भाई, भरी है उसमें खोटाई । नारी के पीछे कहे ऐसी मुख से बात । क्रूर कर्म उसका है ऐसा कैसे मानू भ्रात ।। प्रापस में हुई खेंचातानी ।। सुधा० ।। ३० ।। बात यह सुनी सभी नर नार, सेठ के घर हो रही तकरार । लाल कहे सम्भालो घर बार, नार के पीछे यह क्यों राड । दोहा-एक एक कर पा रहे शनैः शनैः नर नार । पिता देख यों सोचे मन में ऐसी करूँ इस वार ।। बात सब रह जावे छानी ।। सुधा० ।। ३१ ।। नहीं तो लोग हँसें हर बार, कहेंगे घर का करो सुधार । पराई मेटो आप तकरार, प्रतिष्ठा होगी मेरी छार । दोहा-पिता कहे सुन लाल तू, गुनाह किया जो बाल । बड़ा होय माफी कर देना, सुधर जाय सब हाल ।। लाल ने एक नहीं मानी ।। सुधा० ॥ ३२ ।। लाल कहे रहूं न इसके साथ, कहूं मैं अपनी सच्ची बात । क्रूरता इसकी सही न जात, बात की हद हो गई है तात ।। दोहा-पिता कहे सुन लाल तू मूरख पर यों रोष । बुद्धिमान को शोभे नांहीं तज दो उसके दोष ।। बात लो मेरी यह मानी ।। सुधा० ।। ३३ ।। पिताजी सुन लो निर्णय आज, सभी चाहें विगड़े सुधरें काज । आये सिर मेरे बुराई ताज, जगत में जावे मेरी लाज । दोहा-पर अब इसके साथ मैं, रहूं न घर के मांय । यदि प्रापको बालू प्यारा, जुदा करो मुझ ताय ।। कहूं मैं चौड़े, नहीं छानी ।। सुधा० ।। ३ 1 -- . । . . .. -- वालू सब सुन रहा चोखट पास, नहीं थी उसको इतनी प्राश। कलह छू जावेगा अाकाश, नहीं था- दिल में यह विश्वास । दोहा-पिताजी से ज्यादा करूं भ्राता का सम्मान । कभी न उसके सम्मुख बोलू, रक्खू पूरी प्रान ।। प्राजक्या सुन रहा यह बानी ॥ सुधा० ॥ ३५ ॥ प्यार था कितना दिल माही, कभी पढ़ पाते घर माँही। चीज ला देते मुझ ताई, कमी नहीं आने दी काँई । दोहा---बढ़िया वस्त्र पहना मुझे, खुश होते दिल माँय । बिचार करते बालू के, तब नयनों नीर भराय ।। आँखों से टपक गया पानी ।। सुधा० ।। ३६ ।। किये पर पश्चाताप लाया, हृदय में दुःख प्रति पाया। करे क्या गहरा उलझाया, कर्म सब मैंने निपजाया। दोहा-कैसे भाई सामने खड़ा रहूं. अब जाय । मुख देखना चाहे नांहीं ऐसे मन में लाय ।। हुई क्यों मुझसे नादानी ।। सुधा० ।। ३७ ।। सोच निज कमरे में पाया, वस्त्र अपने ही पलटाया । निकल झट भाभी दर माया, खड़ा रह ऐसे दरसाया। दोहा-भ्राता मेरे संग में, रहना अब नहीं चाय । मुंह देखना मेरा उनको, अच्छा नहीं लखाय ।। तजू यह घर मन में पानी ।। सुधा० ।। ३८ ।। अाज तक जो भी भूल कीनी, गलती से तकलीफें दीनी । सेवाएं उनसे मैं लीनी, पादर में कभी कमी कीनी । दोहा- इन सब दोपों के लिए, दे माफी वक्षाय । यह सब काह देना नाता से, जाऊ शीश नमाय ।। वालू के गिरा नयन पानी ।। सुधा० ।। ३९ ।। उसी क्षण लाल वहां प्राया, ध्यान नहीं दीना अदा भाया। उन्हें दिन देगे चल पाया, प्रांति प्रति मन माही लाया। दोहा --विमला मन में मोगा कंगा हो गया काम ! नहीं जानतीजतना होगा, दुःश का धाम !! बनी में क्यों यहां दुग दानी ।। गुधा ।। ४० !
बात क्यों मैंने निकाली, जीभ क्यों मेरी यहाँ चाली। कलेजा दीना मैं बाली, हुई क्यों मैं इतनी काली। दोहा-पतिदेव भी गर्म हो, इतने क्यों अकुलाय । यह अंगारे मैंने डारे, मेरी जीभ जल जाय । देवर को देख दया पानी ।। सुधा० ॥ ४१ ।। उसी क्षण शब्द यों पाया, भाभी जी जाऊँ चित्त चाया, क्षमा की भीख लेने प्राया, देवर ने ऐसे दरसाया । .. . *- . दोहा-श्रवण करके भाभी का, गद्गद हो गया मन्न । दोनों नेत्र से प्रांसू निकले, विकल हो गया तन्न ।। मैल दिल धोया नयन पानी ।। सुधा० ।। ४२ ।। उठकर पति पास आई, देवर को लेवें बुलवाई। रो रहे बाहर खड़े भाई, दया कर देखे उस ताँई ।। दोहा-लाल कहे देखू नहीं, मुख उसका इस बार । दुख पाओगे कहती हूं मैं, छोड़ गये घर बार ।। हो रही उसके मन ग्लानि ।। सुधा० ।। ४३ ।। देवर कहे भाभी सुन लेना, भैया को प्रणाम कह देना। नहीं अब यहां मेरा रहना, जाऊंगा जहाँ नहीं अपना । दोहा—मुख नहीं देखे माहरो, मैं भी दिखाऊँ नाय । ऐसे कह चलने लगा भाभी दौड़ी प्राय ।। पकड़ कहे हाथ क्या ठानी ।। सुधा० ।। ४४ ।। भाभी के बह रही अश्रु धार, देवर कहे जाने दो इस बार । अयोग्य हूं रहूं न तुम्हारी लार, जीवन अब मेरा है बेकार । दोहा -बाल कहे रहता. नहीं, जाने देऊं नाय । भाभी कहती शपथ दिलाऊँ छोड़ कहीं मत जाय ।। कहूं मैं हृदय खोल वाणी ।। सुधा० ।। ४५ ।। जहां तक भैय्या दिल मांही, सफाई मेरे प्रति नांही । कहूं मैं साफ साफ याही, रहूंगा हरगिज यहाँ नाँही ।। दोहा-भाभी कहे थारे प्रति, नहीं है बुरे विचार । ईश्वर की सौगंध खा कहती, दिल में है न विकार ।। सुनी दिल लाल हुमा पानी ।। सुधा० ।। ४६ ।। १९
त्वरित उठ लाल बाहर प्राया, बाल को छाती चिपकाया।
गले मिल नयन नीर लाया, मैल हुमा साफ हृदय पाया ।
दोहा-बाल कहे बांधव सुनो मत कहना यह बातः ।
मुख नहीं देखू बाल का, इससे मन दुख पात ।।
और सब दंड लेॐ मानी ।। सुधा० ॥ ४७ ।।
लाल कहे सुन बालू भाई, आने दे ये अवसर नाही।
भेद नहीं होवे दिल मांही, खुशी खुशी रहो घर माही ।
दोहा -इतने वहां पर आ गये, पिता बाहर से चाल ।
गले मिल रहे दोनों भाई करके हृदय विशाल ।।
निकल गई मुख से यों बानी ।। सुधा० ।। ४८ ।।
बढ़ी थी आपस मांही ठेस, मिटा दिया घर का सारा क्लेश ।
रहा नहीं मन में कुछ भी द्वेष, सिखा दिया प्रेम मंत्र का रेश ।
दोहा-बड़े घरों की बेटियां, करती सद् व्यवहार ।
बिगड़े बँधव प्रेम को, दीना सद्य सुधार ।।
प्रशंसा फैली चहूं कानी ।। सुधा० ।। ४९ ।।
धर्म का रहस्य समझावे, सामायिक संवर करवावे ।
त्याग पचक्खाण शुद्ध भावे, करो यह सबको दरसावे ।
दोहा-धर्म घोष अरणगार से, लिया श्रावक व्रत धार ।
मन बच तन से शुद्ध पालकर, लीना जन्म सुधार'।।
सफल की अपनी जिन्दगानी ।। सुधा० ।। ५० ।।
कहे मुनि 'सोहन' यों हर बार, सुधा सम बोलो सब नर नार ।
देव गुरु धर्म हिया में धार, इसी से होगा भव जल पार ।
दोहा-दो हजार छत्तीस का, पोस पूनम बुद्धवार ।
शहर केकड़ी प्राये विचरते, ठाणा पांच सुखकार ।।
खुशी हुई सबको मन मानी ।। सुधा० ।। ५१ ।।
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1 ६ अर्थ से अनर्थ : दो भाई ऊँट पर मोहरें -- • - [ तर्ज : छोटी कड़ी] है अर्थ अनर्थ की खान, सुनो नर नारी । अन्याय हुए हैं धन के पीछे भारी ।।टेर।। इक छोटे गांव में रहे साधारण भाई, घर घर में करते खेती काम सदाई। निर्धनता में रहे वहां दो भाई । एक दिन दोनों ही बैठे पास में आई ।।मि।। बातचीत में दोनों एम विचारी ॥१॥ इस हालत में कहां तक काम चलावें। भोजन के बिन हम रात दिवस दुःख पावें, अत: यहां से बैठ ऊँट पर जावें । मिले जहां से सम्पत्ति लेकर प्रावें ।।मि०।। अब यहां से चलने की करलो तुम तैयारी ।।२।। चढ़ी ऊँट पर दोनों हुए. रवाना । सीधा मिले या डाका डाल कर लाना । जैसे कैसे भी धन लेकर के प्राना । नहीं तो वापिस लौट यहां नहीं आना मि०।। निकल गये कई कोस हृदय में धारी ।।३।। चलते चलते अटवी भयंकर पाई। प्रागे जाने की भूमि विकट दिखलाई। अटवी से दौड़ते संत वहां गये प्राई । भगने का कारण पूछे दोनों भाई ॥मि०।। भाग रहे इतने क्यों क्या भय भारी ॥४॥ २१ संत कहे एक राक्षस यहां भयकारी । इधर जाय उसको देगा वह मारी। प्रतः कहूं तुम मारग देवो छारी। हंसने लगे दोऊ भ्रात बात सुन सारी मि०।। हम क्षत्री हैं तुम संत कायरता धारी ॥५॥ जायेंगे हम तो इसी राह नहीं भागें। भय राक्षस का भी हमको कुछ नहीं लागे। कह कर संत को उसी राह में लागे। लख कंचन का ढेर भाग्य हम जागे ।मि०।। संत बात नहीं मानी की हुशियारी ।।६।। सोचे संत जो राक्षस यहां बताता। वहीं वापिस पा गाड़े भर ले जाता। दुनिया को धोका देकर संत कहाता । मिथ्या बोलकर हमको भी भरमाता मि०॥ अब भरों ऊँट पर माल करो तैयारी ॥७॥ ऊँटों पर भरली पड़ी अशरफी सारी। पुनः लौटने की झट दिल में धारी। एक कहे राह में लग गई भूख करारी। कहे दूसरा पा रहा शहर अगारी मि०॥ वहां पर खाना माल यही मन धारी ।।८।। शहर पास प्रा दोनों ऊँट ठहराये। पाँच अशरफी लेकर एक सिधाये। जाते वक्त उसके दिल में यों पाये। मिला भाग्य से योग सीधा धन पावे ॥मि०।। किन्तु प्राधा तो लेगा वह निकारी ॥९॥ कैसे होऊँ दोनों का . मैं स्वामी। मिला देऊँ विष युक्ति उसने पायी। लेकर मिठाई मिला दिया विष नामी। खाते ही हो जावे पर भव गामी ।मि। बना बनाकर लाया हर्ष अपारी ॥१०॥ ऊँटों वाला भी सोचे कुछ मन मांहि । पहले वाली ही उसे भावना पाई। २२.
देखा उसको लीनी बंदूक उठाई। एक बार में मार गिराया भाई ॥मि० सोचे कामना सिद्ध हो गई मारी ॥११॥ लेकर बैठा खाने वहाँ मिठाई। खाते उड़ गये प्राण पखेरु वांहि । खा गया राक्षस संत बात दरसाई। धन से मर गये देखो दोनों भाई ॥मि०|| सुनकर धन से ममता देवो उतारी ॥१२॥ 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि चेतावे । धर्म ध्यान कर जीवन में सुख चावे । भजों सदा नवकार गुरु फरमावे । जन्म मरण दुःख काट मोक्ष पद पावे ॥मि०।। अमूल्य नर भव मिले’ न बारम्बारी ॥१३॥ . २३ . लोभ पर : ७ हाथ लगाते ही सोना हो [ तर्ज : द्रोण] . सब पापों का मूल लोभ बतलाया मा० । कष्ट बिन सोचे पावे जी। लालच में फंस गया दुःख आखिर में पावे जी ।।टेर।। एक शहर धवलपुर था इस भूमंडल पर मा० । नन्द राजा था नामी जी। दास दासी भंडार, नहीं थी कुछ भी खामी जी। पतिव्रता पटराणी सुशीला जिनके मा० । करे वह बहु दातारी जी। आया द्वार पर पावे वस्तुएँ इच्छित सारी जी। उसी नगर में लोभी राम एक रहता मा० । सदा घर में धन पावे जी ॥१॥ चलता उसका व्यापार शहर में नामी मा० । तथापि तृष्णा भारी जी। रात दिवस यों सोचे सम्पति प्रावे सारी जी। पत्नी थी और पुत्री एक गुण माला मा० । जीव तीनों घर मांहि जी। खान पान का खर्चा है ज्यादा कुछ नांहि जी। एक वक्त संत वहां चमत्कारी चल माये मा० । ख्याति सुन सेठ सिधावे जी ॥२॥ अहो निश सेवा करता तन-मन धन से मा० । एक दिन संत सुनावे जी। क्या चाहना है दिल में वो मुझको बतलावे जी। तब प्रसन्न होकर सेठ सद्य दरसावे मा० । कामना ऐसी मेरी जी। २४ हो जाय भावना सफल, कृपा हो जावे तेरी जी। मैं किसी चीज के जाकर हाथ लगाऊँ मा. । वही सोना हो जावे जी ।।३।। संत कहे तू पहले सोचले मन में मा० । शब्द मुख से खुल जावे जी। फिर कहे मुसाफिक काम तेरा सब ही बन जावे जी। वह बोला सोचली यही कामना मन में मा० । तथास्तु संत कहावे जी। उस ही क्षण उस सेठ हाथ में शक्ति प्रावे जी। जिसके लगावे हाथ सुवर्ण हो जावे मा० । सेठ मन आनन्द पावे जी ।।४।। सबसे पहले कपाट किये सोने के मा० । सभी बरतन कर दीने जी। पाट पाटले दबात कलम कंचन के कीने जी। फिर गया बाग में वृक्ष सुवर्ण के कीने मा० । देखकर शाह हरसाया जी । सोचे सेठ है मेरे पास में अनुपम माया जी । अब तो मन में फूला नहीं समावे मा० । उमंग घर घर पर पावे जी ॥५॥ लग रही भूख गहरी यों सेठ सुनावे मा० । सेठाणी भोजन लाई जी। रखा पाट पर थाल बात ऐसी दरसाई जी । गरम गरम ये भोजन जल्दी जीमे मा० । ग्रास जब कर में लीना जी। उस ही क्षण हुप्रा कंचन मन में दुःख वह कीना जी। प्रब सोना कैसे मुख मांहि वह रक्खे मा० । सेठ मन में घबरावेजी ।।६।। उस समय पुत्री गुणमाला पास में पाई मा० । प्यार से लिया उठाई जी। लगते ही हाथ कंचन मय हो गयी उनकी वाई जी। निर्जीव होय वह पड़ी भूमि के ऊपर मा० । सेठ लखकर चकराया जी होगा क्या प्रव हाल मेरा मन में दुख पाया जी। २५ यह देख व्यवस्था सेठाणी रही दूरी मा० । सेठ कर नहीं छू जावे जी ।।७।। अब तो लोग · सब रहे सेठ से दूरे मा० । भयंकर दुःख मन मांहि जी। हाथ लगे तो मरें शंक यह दिल में पाई जी। पागल श्वान सम देख सभी डरते हैं मा० । सेठ लेख मन में लावे जी। खान पान परिवार कोई मुझ काम न पावे जी । मैं तो समझता होगा धन सुख दाई मा० । . वही धन प्राण हरावे जी ।।८।। ऐसा द्रव्य क्या होगा प्रानंद कारी मा० । संत के स्थानक जावे जी। लगा पकड़ने चरण संत वहां से हट जावे जी। रहना मुझसे दूर पास मत पाना मा० । मुझे क्या सुवर्ण बनावे जी। सुनकर गुरु की बात सेठ झट शीश झुकावे जी । कृपा करी प्रब मेरा कष्ट मिटावो मा० । मुझे अब धन नहीं चावे जी ॥९॥ सन्त कहे तुमको पहले समझाया मा० । लोभ वश तू नहीं मानी जी। सेठ कहे लालच दुखदाई लीना जानी जी। अब समझ गया मैं अति सदा दुखदाई मा० । द्रव्य तज समता धारूजी। करू सदा मैं ईश भजन ममता को मारू जी। संत कहे अब तेरी क्या है इच्छा मा० । पूर्ववत् मुझे बनावे जी ॥१०॥ कहे तथास्तु संत वैसा हो जावे मा० । सेठ दिल शांति पाई जी। त्याग जगज्जंजाल भावना शुद्ध वनाई जी। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि यों कहता मा० । लालच तज जो सुख चावे जी। सुनकर सेठ वृत्तान्त हृदय के मांहि जमावे जी। दो हजार छत्तीस फागुण सुद सातम मा० । जोड़कर द्रोण में गावे जी ॥११॥ २६ ८ मेघ मुनि [ तर्ज : उमर छोटी सी ] मुक्ति पावे रे ! या सोई प्रात्मा जब जंग जावे रे ॥ टेर ।। एक वक्त श्री वीर पधारे, राजगृह के मांहि रे। वारणी सुनकर जनता प्रभु की, अति हरसाई रे ॥१॥ राजा प्रजा अरु मेघ कंवर भी, प्रभु दर्शन को जावे रे । विधिवत बंदन करके बैठे, प्रभु फरमावे रे ।।२।। चेतो चेतो ऐसा अवसर, नहीं हाथ में प्रावे रे । गमा दिया वह अन्त समय में, अति पछतावे रे ।।३।। धर्म करण हित उत्तम नर भव, कठिन कठिन तम पायो रे । अतः त्याग परमाद लाभ ल्यो, यू फरमायो रे ॥४॥ सुनकर वाणी मेघवरं को मनड़ों अति हरसायो रे । अंधकार मय जीवन में सूरज प्रगटायो रे ।।५।। बीत गयो सो गयो वक्त वह, पुनः लौट नहीं प्रावे रे । सफल बणे अवशेष समय यों मन में लायो रे ।।६।। प्रभु पास में प्राय कंवर, चरणा में शीश नमावे रे । 'दीक्षा लूगा' प्रभु चरण में, अरज सुणावे रे ।।७।। अहा सुहं देवानुप्रिये ! यों प्रभु वचन फरमावे रे । बंदन करके पुनः लौट, निज महलां प्रावे रे ।।८।। श्रेणिक तात अरु माता को निज भाव सद्य दरसावे रे । सुनकर मात, पिता, परणीता सब समझावे रे ।।९।। प्रभु वाणी का जिस मानस पर सही रंग चढ़ जावे रे । लगा मजीठी रंग कभी नहीं, हटने पावे रे ।।१०।। ra २७.
प्राज्ञा लेकर बड़े ठाठ से प्रभु पास में आवे रे । चारित्र कर स्वीकार शांति से दिवस बितावे रे ॥११॥ लघु संत होने से शैय्या पाखिर मांहि नावे रे । गमनागमन होने से पग की, ठोकर खावे रे ।।१२।। पूरी रात ही मेघ मुनि को, तनिक नींद नहीं आवे रे । चिंतन करते लघु मुनि जी अति घबरावे रे ॥१३॥ अहो ! अहो !! मुनिराज पूर्व में कितना प्रेम दिखाते रे। सारी रात ही बीती देखो, ठोकर खाते रे ।।१४।। राज महल के ठाठ बाट सब चिंतन मांहि श्रावे रे । ऐसे दुख नहीं सहन हुए, यों मन में लावे रे ॥१५॥ सूर्योदय होते प्रभु प्राज्ञा ले वापिस निज घर जाऊं रे । अपने दुख की बात प्रभु को जाय सुनाऊं रे ॥१६॥ हुप्रा सवेरा प्रभु पास पा सविनय शीश नमावे रे । तभी मेघ को वीर जिनेश्वर, यों फरमावे रे ।।१७।। अहो मेघ ! घर जाने की क्या तुमको मन में आई रे ? हन्तानाथ ! यह बात आपने, सच दरसाई रे ॥१८॥ पूर्व जन्म वृत्तान्त मेघ को, वीर प्रभु फरमावे रे । गज भव में अनुकम्पा करके, शशक बचावे रे ।।१९।। ढाई रात दिन तीन पैर से खड़ा रहा वन मांहि रे । ऐसा करके असह्य वेदना - तूने पाई. रे ॥२०॥ पूर्व जन्म कर श्रवण मेघ मुनि जाति स्मरण पावे रे । ज्ञान नेत्र से देख सभी मन, स्थिर हो जावे रे ।।२१।। प्रभु चरण में अर्ज करे यों, गिरते लिया बचाई रे । अनन्त दुःख पाया मैंने मुनि वर दरसाई रे ।।२२।। दो प्रांखों के सिवा समर्पण, तन सेवा के मांहि रे । गुरुजन की सेवा मांहि हूँ, इसे लगाई रे ।।२३।। जगी प्रात्मा मेघ मुनि की, कारज सिद्ध कर लीना रे । अध्याय प्रथम ज्ञाता सूत्र में, वर्णन कीना रे !॥२४॥ 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि कहे, प्रात्मा जब जग जावे रे । जन्म मरण जंजीर काट, मुक्ति पद पावे रे ।।२५।। २८ or क्रोध से हानि : मुनि दम सार [ तर्ज : छोटी कड़ी] है क्रोध दुःख का मूल, तजो हे भाई २ । होवे क्रोध से हानि, ज्ञानी फरमाई ।।टेर।। एक वक्त विचरते वीर कृतंगला पाये। वहां सिंहरथ है भूपाल प्रजा मन भाये । दमसार पुत्र विद्वान गुणी गुण गाये । पुत्र पिता दोऊ चाल सभा में पाये ॥मि. उस वक्त सभा में बनमाली दरसाई ॥१॥ श्रमणेश प्रभु महावीर यहाँ पर पाये। सुनकर के यह खबर भूप हरसाये । नृप पाये सब परिवार साथ में लाये । सविनय सविधि प्रभु को शीश झुकाये ।।मि.।। परिषद् में वाणी वीर जिनंद फरमाई ॥२॥ नरभव है अनमोल हाथ में पाया। मत खोवो व्यर्थ यों सटर पटर में भाया । धर्म ध्यान कर इनसे लाभ कमाया। वही जगत में अपना काम दमसार खड़ा हो प्रभु से अर्ज सुनाई ॥३॥ बनाया ॥मि.॥ सत्य वचन है प्रभु आपके सारे सुनकर मैंने अाज हृदय में धारे। करू आत्म कल्याण शरण प्रा थारे । दीक्षा लेने की चाह जगी है मारे ।।मि.।। तब वीर प्रभु ने अहा सुहं सुनाई ।।४।। मात पिता से प्राज्ञा झट ले लीनी । से भूप तैयारी कोनी। बड़े ठाठ . २९ •. प्रिय पुत्र की भट प्रभु को दीनी । चढ़ते भाव से. कंवर दीक्षा ले लीनी मि.।। सेवा कर लिया ज्ञान अंगों का पाई ॥५॥ फिर तप करने में गहरा जोर लगाया। बेला तेला अरु कर रहे खूब अठायां । मास खमण कर कृष कर दीनी काया । नहीं करे प्रदर्शन तप जप का मुनिराया ।मि.।। प्राडम्बर कर तप को देते लुटाई ।।६।। एक दिवस मुनिजी प्रभुः पास में आये। अपने मन के सभी भाव दरसाये। केवल पद को कहो नाथ को कहो नाथ कब पाये। मुनि को तत्क्षण प्रभुवर यों बतलाये ॥मि.।। वह समय तुम्हारा पास गया है प्राई ।।७।। यही भाव रहे एक पहर के मांहि। बनो केवली: संशयः इसमें नाँहि। किन्तु गोचरी जाते क्रोध गया प्राई । फिर देरी होगी सुन लो मुक्ति राही ॥मि.।। नहीं प्राने दूंगा क्रोधः कहे मुनिराई ॥८॥ जब गये गोचरी नर - एक सन्मुख पाया। देख उसे. उसे. मारग.. पूछे मुनिराया। सुनकर मुनि की बात क्रोष दिल छाया । अरे ! अरे !! यह मोड़ा सम्मुख पाया ।मि.।। कई दिनों से रहा काम पर जाई ॥९॥ इतने दिन बीमारी से. दुःख पाया। किया आज . विचार सामने आया बुरे भाव से गलत मार्ग बतलाया । उसी राह पर मुनि ने कदम बढ़ाया ॥मि.।। गरमी में चलते मुनि गये घबराई ।।१०।। इस कारण, मुनि के क्रोध हृदय में पाया । लब्धि फोड़कर जन जन को कल्पाया। थोड़े समय में फिर मन को समझाया । लीनी सद्य समेट लब्धि मुनिराया मि.।। प्राकर प्रभु के पास बात दरसाई ॥११॥ .
करके पालोचन जीवन शुद्ध बनाया।
प्राणी मात्र को मन कर शुद्ध खमाया ।
प्रभु पास में भाव सभी दरसाया ।
कब बनू केवली तब भगवन फरमाया ।मि.।।
दिवस सातवें केवल पद लें पाई ।।१२।।
घाति कर्म किया नष्ट भाव शुद्ध लाई ।
दमसार मुनि लिया केवल पद को पाई।
वही सातवां दिवस गया जब प्राई ।
जिस तरह वीर भगवान दिया फरमाई ॥मि.।।
केवली पद पा दिया भवि समझाई ।।१३।।
अंत प्रघाति कर्म खपा मुनि राई ।
नर देही को त्याग मोक्ष लिया पाई।
जन्म मरण का दीना दु:ख मिटाई ।
अनन्त सुख लिया सिद्ध स्थान में जाई ।मि.।।
वे बने निरंजन ज्योति में ज्योति समाई ।।१४।।
करके क्रोध दिया केवल आगे बढ़ाई।
प्रतः क्रोध दुख मूल तजो सब भाई ।
नहीं रहा क्रोध का लेश मात्र जब भाई।
दमसार मुनि ने केवल ज्योति पाई ॥मि.।।
'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि दरसाई ॥१५॥
१०
क्षमा गुण :
बहू ने सास को समझाया
[ तर्ज : छोटी...]
मानव वह इस जग में जन्म सुधारे।
तजकर दिल से क्रोध क्षमा गुण धारे ।।टेर॥
संतोषपुर एक शहर पृथ्वी पर नामी २ ।
संतोष सिंह रणवीर प्रजा का स्वामी।
प्रजाजनों का नृप है नित हित कामी।
दान पुण्य से महिमा उसने पामी ॥मि.॥
फैली कीर्ति जगति तल पर सारे ॥१॥ तज० ।।
रहे वहां जिनदास सेठ गुणधारी।
पाले अणुव्रत जिन प्राज्ञा अनुसारी।
सेठाणी विमला जिनके है घर नारी।
पुत्र सुमति ली पढ़ करके हुशियारी ॥मि.॥
अव पुत्र हाट का काम सभी संभारे ॥२॥
देख विदुषी कन्या पुत्र परणाया ।
प्रा गई बहू घर आनन्द मंगल छाया।
सभी कार्य में दक्ष देख सुख पाया।
पुण्योदय से धर्म कार्य मन भाया ।।मि.।।
सेठ दम्पति मन माँहि हर्षा रे ॥३॥
एक दिन सेठारणी तेला करने जावे ।
पास बुलाकर बहू को वात सुनावे ।
मैं जाऊं स्थानक घर का काम निभावे।
निपट काम से संध्या को वहां प्रावे मि.।।
प्रप्ट पहरिया तेला मन से धारे ॥४॥
बहु भी लीना तेला मन में धारी । सोचे घर की लीनी जिम्मेवारी। प्रतः काम में नहीं हो हमारी पोल । में रखती है हुशियारी॥मि ।। संध्या तक सारा काम दिया निपटा रे ॥५॥ सभी काम स्थानक जाने की बहू ने की तैयारी । प्राकर यों बोला सेठ उसे उस वारी । पाड़तिये पाये भोजन करो तैयारी । लगी बनाने खाना बहू उस वारी ।।मि.।। जीमाने में सारा वक्त निकारे ॥६॥ दूजा दिन भी इसी तरह से जावे । स्थानक जाने का समय नहीं मिल पावे । अन्य प्रऔरतें सासू को दरसावे । सेवा खातिर बहू क्यों नहीं आवे ।।मि.।। ऐसी भी क्या जो सास का नहीं संभारे ।।७।। कठिनाई से तीजे दिन बहू पाई। लखकर सासुजी मन में जोश भराई । सरल भाव बहू पैर दाबने चाई। तभी सास ने बहू को यों दरसाई ॥मि.।। तीन दिवस नहीं लीनी खबर यहां पा रे ।।८।। कर नरमाई बहू ने बात सुनाई। सुनकर सेठाणी बहू को यों दरसाई। खैर ! कहूं कल प्रालस दूर हटाई । करनी चीजें तैयार पारणे ताई ।।मि.।। बहू बोली, हो तेले मांहि विचारें ।।९।। यह काम तो मेरा जो कुछ चावे । उसके लिये तो आप नहीं फरमावे । यदि गलती हुई हो तो माफी वक्षावे । घर पाकर वह चिन्तन में लग जावे |मि.।। प्रातः चीजें रख दी सभी वना रे ॥१०॥ । मुझको भी पारणा करना सास जी पावे । तेले का सोगन पाल दातून मन भावे । ३३ 1. मुख को धो रही तभी सास जी पावे । देख बहू को सासू रोष भरावे मि.।। मारी बहू के सिर में लट्ठ उठारे ॥११॥ भरी रोष में. सेठाणी दरसावे । धो रही मुख को जरा शरम नहीं प्रावे । तेले का पारणा मेरे ध्यान नहीं लावे । अंट शंट केई बहू को बात सुनावे ।।मि.।। तू कंब रखेगी पारणा मेरे बना रे ।।१२।। खून बह रहा तदपि कर नरमाई। सासू के चरण पकड़कर बात सुनाई। सारी चीजें रखी हैं बनी बनाई। अब करें पारणा प्रापने देर लगाई ॥मि.) सुनी बहू की बात गई शरमा रे ॥१३॥ अन्दर जाकर देखी सामग्री सारी । सोचे सास यों अक्ल खप्त हुई मारी। सासू ने बहू से क्षमा मांगी उस वारी। छाती लगा कहे दीनी मुझे सुधारी ।।मि.।। जीवन भर तक क्रोध त्याग है मारे ।।१४।। 'प्राज्ञ' कृपा कहे 'सोहन' मुनि हितकारी। तजो क्रोध का जहर क्षमा लो धारी। बुद तेरस माघ की शंभू गढ़ मंझारी। दो हजार सैंतीस साल शुभकारी ॥मि.।। जोड़ करी दी जनता मांहि सुनारे ।।१५।।
११
सच्चा भक्त :
भगवान से बड़ा
[ तर्ज : छोटी कड़ी...]
कहलाने मात्र से भक्त नहीं हो जावे ।
सर्व समर्पण करे भक्त कहलावे ॥टेर।।
सुनो लगाकर कान यह कथा सुनावें ।
भगवन से बढ़कर भक्त कौन कहलावे ।
जैनेतर ग्रन्थ में इसका वर्णन पावे ।
उसी कथा का
भाव यहां दरसावे ॥मि.।।
सच्चा भक्त नहीं भौतिक सुख को चावे ।।१।।
अशोक पुरी में सुमन सेठ धन धारी।
क्रोड़ों का धन है पास नगर में जहारी।
परम विदुषी घर में सुन्दर नारी।
मिली पुण्य के योग सामग्री सारी ॥मि.।।
किन्तु नहीं संतान सेठ दुख पावे ।।२।।
एक वक्त नारद ऋषि चलकर के वहां प्रावे ।
देख सेठ
का हाल उसे फरमावे।
किस कारण से यह मुख तेरा कुम्हलावे ।
तब सेठ नमन कर अपना हाल सुनावे |मि.।।
संतान विना धन किसके काम में आवे ||३||
दे पाश्वासन नारद उसको समझावे ।
भगवान पास जा तेरा काम बनावे।
क्या कारण है हम इसे पूछकर पावें।
यह कहकर ऋषिवर प्रभु पास में जावे ॥मि ।।
वात करी नारद प्रभु को दरसावे ॥४॥
सभी तरह से सेठ सुखी दिखलावे ।
संतान बिना नहीं चैन एक क्षण प्रावे ।
बोले भगवन् वह सात जन्म भी पावे ।
किन्तु सेठ संतान एक नहीं पावे ॥मि.।।
नारदजी पा सेठ को बात सुनावे ॥५॥
सारी बात सुन सेठ प्रति दुख पावे ।
क्या होगा मेरा ऐसे मन में लावे ।
ऋषि तो कहकर पुनः स्थान सिधावे ।
पीछे से महात्मा एक वहां पर आवे ।।मि.।।
घूमे नगर में यों आवाज लगावे ।।६।।
कोई मुझे सम्मान सहित ले जावे ।
घर ले जा रोटियां जितनी मुझे खिलावे ।
वह उतनी ही सन्तान सहज में पावे ।
सुनकर दौड़ा सेठ वहाँ पर आवे |मि.।।
सम्मान करी योगी को घर पर लावे ।।७।।
पांच रोटियां खाकर ऋषि सिधावे ।
संतान सेठ धर क्रम से पांच ही आवें ।
अब तो सेठ दिल गहरा प्रानन्द छाये ।
पुत्र पौत्र से सारा घर भर जाये ॥मि.
ऐसे समय में नारद ऋषि वहां आवे ।।८।।
देख सेठ का हाल ऋषि फरमावे ।
यह छोटे मोटे बालक कहाँ से आवे ।
तब सेठ सभी निज बीतक उन्हें सुनावे ।
सुनकर नारद मन में विस्मय लावे ॥मि.।।
कैसे हुआ यह नहीं समझ में आवे ।।९।।
चलकर नारद विष्णु पास में प्रावे ।
नारद को लखकर त्वरित ईश फरगावे ।
जल्दी जाकर मनुज कलेजा लावें।
मुझे कलेजा सद्य यहां पर चावे ।।मि.।।
विना कलेजा मेरा जी दु:ख पावे ।।१०।।
सुनकर नारद सत्वर भू पर प्रावे।
करे याचना नारद घर घर जावे।
किन्तु कलेजा कोई न देना चाये।
हताश हाकर पुन: प्रभु घर जावे |मि ।।
मारग में कुटिया देख वहां पर प्रावे ॥११॥
योगी से अपनी बात नारद दरसावे । कहते ही कलेजा ले जावो फरमावे । लेकर कलेजा सीधा स्वर्ग में आवे । देख नारद को विष्णु यों दरसावे ।। मि.।। सच्चा भक्त अपना सर्वस्व लुटावे ।।१२।। ऐसे भक्तों की बात मिथ्या नहीं जावे । उनके वश भगवान स्वतः हो जावे । देख सेठ का हाल क्यों आश्चर्य लावे । मुझ से बढ़कर भक्त लोग कहलावे ॥मि.॥ ऐने भक्त ही जग में नाम कमावे ।।१३।। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि दरसावे । माया कपट तज सच्चा भक्त बन जावे। कथनी करनी में जरा फर्क नहीं प्रावे। उसका बेड़ा निश्चय पार हो जावे |मि.।। भाग्य शाली ही ऐसे गुण अपनावे ।।१४।। भीलवाड़ा से प्रासींद नगर में पाये। जोड़ करी यह सब ही जन मन भाये । दो हजार सैंतीस माघ बुद्ध कहलायै ॥मि.॥ सच्चे भक्त ही जीवन सफल बनावे ॥१५॥ सुख दाये। अष्टमी बुद्धवार ३७ १२ मच्छ क्यों हंसा [ तर्ज : जब तुम्हीं चले परदेश ] सब है बुद्धि का खेल जगत में मेल, सुनो सब भाई बुद्धि की महिमा गाई ॥टेर।। थी काश्मीर की महाराणी, अति चतुर महागुण की खानी । पाले मच्छियां रंग बिरंगी लाई ।। बुद्धि. ।। १ ।। मछियारा मच्छ एक लाया, पूछा नरं है झट कढ़वाया । मच्छ हंसा लख महाराणी शरमाई ॥२॥ हंसी का उत्तर नृप. से चावे, नृप बुला दीवान से फरमावे । नही पाया उत्तर, नृप ने दिया सुनाई ।।३।। सव माल जप्त करवा लूगा, एक माह में उत्तर दे दूंगा। दीवान कहे कर जोड़, करी नरमाई ।।४।। है उदास चित्त घर पर पाया, तब पुत्र भेद सब ही पाया । कही पिता से बात उत्तर दंलाई ॥५।। सुत उत्तर लेने को जावे, मारग में वृद्ध एक मिल जावे । चलो मेरे संग मेरे घर पर भाई ।।६।। रस्ते में वृद्ध को दरसावे, एक काम कहूं सो करवावे । राह कटे अरु थके न जलने मांहि ।।७।। वृद्ध सहारा प्रव चावे, सुनी वृद्ध मन में लाये । दिमाग फिरा यह मानव रहा दिग्बलाई ||८|| .. नदी पथ में जूते . पहने, छाया में छतरी को ताने । पका खेत लख कहे खायावा नाहि ।।९।। यह गांव शहर को बतलावे, अरु गांव को शहर कही गावे । प्राया गाँव तब वृद्ध से यों दरसाई ।।१०।। बैठा हूं मैं तरुवर छाया, यहां तलक तुम्हारे संग प्राया। सहतीर होय मज़बूत तो लेना बुलाई ॥११॥ पुत्री को घर जा बतलाई, सुनकर मन में यों लाई। है बुद्धिशाली नर दिया भेद समझाई ।।१२।। बात कहे अरु लट्ठ लावे, पानी में कांटे भग जावे। छतरी करी दे वीट पक्षी छिटकाई ।।१३।। कर्ज खेत पर तो नांहि, शहर को गांव वे दरसाई। करी नहीं मनुहार कोई भी प्राई ।।१४।। जब भोजन रुच रुच करवाया, वह गांव शहर को बतलाया । अच्छा साधन हो घर पर लेना बुलाई ॥१५॥ आप बुला उनको लावें, झट उठा वृद्ध वहां पर जावे । मनुहार करी ला दिया भवन बैठाई ।।१६।। पुत्री नौकर को बुलवाई, भोजन पय भेजी उस ताई। कहना बरस अच्छा है ताल भरजाई ॥१७॥ नौकर राह में रोटी खाई, पय पीकर ला दिया पकड़ाई। बाई कही सो बात सभी दरसाई ।।१८।। समझ गया एक रोटी खाई, पय पी थोड़ा दिया लाई । कंवर कहे जा कहना तू निज बाई ॥१९।।
मास घटा एक पय सूखा, रहा हंसी से मैं भूखा। सुनी भृत्य से बात समझ गई बाई ॥२०॥ नौकर से पूछ कर सब जानी, विद्वान कंवर को लिया मानी। पाने का कारण पूछ बोलि उठा ताई ॥२१॥ मामूली बात दू बतलाई, पर शर्त मेरी लो अपनाई। विवाह करो मुझ संग बात है याहि ॥२२॥ विवाह करी संग में लाया, पाकर पिता को दरसाया। दीवारण जाकर नृप को यों दरसाई ॥२३।। भेज पालखी मंगवा लो, अब उत्तर उनसे तुम पालो । उसी तरह महलों में ली बुलवाई ।।२४।। सब दासी पास में बुलवाई, एक खड्डे पर उनको लाई। हिम्मत कर लांघो इस खड्डे को बाई ॥२५॥ बस एक दासी ही लांघ सकी, बाकी सब ही वहाँ रुकी रही। महाराणी से बोली पुरुष यह बाई ॥२६॥ यह शत्रु भेदिया लो मानी, पूछा परखा और ली जानी। अतः हंसा यों मच्छ दिया बतलाई ॥२७॥ खूब द्रव्य घर पहुंचाई, बुद्धि से लिया प्रादर पाई। 'प्राज्ञ' कृपा 'सोहन' मुनि कथा सुनाई ।।२८।। दे १३ | मातृ भक्त [ तर्ज : छोटी कड़ी ] जीवन सेवा से सुखी बनानो भाई। मातृ भक्ति की कथा सुनो चित्त लाई ।।टेर।। संबलपुर में सबल सिंह महाराया। प्रजा जनों पर रखता पूरी छाया । दीन दुखी जन कोई द्वार पर प्राया। खाली उसको कभी नहीं लौटाया ॥मि.।। धन पाने का सार यही जग मांहि ॥१॥ विजया महाराणी है षट् गुण की धारी। पतिव्रता पुण्यवान रूप रस वारी। मधुर भाषी जन जन के मन को हारी। रखती पूरा ध्यान आवे कोई द्वारी ॥मि.।। सरल स्वभावी मान हृदय में नाहि ।।२।। इसी नगर में रहे एक दुखियारी । तीन पुत्र की मात बात कहूं सारी दरिद्रता का दुःख हिया में भारी । पुत्रों का लखकर हाल दुःख अनपारी मि.।। सोचे पुत्र यों श्रम कर करे कमाई ॥३॥ लावें। कर मजदूरी तीनों पैसे किन्तु उनसे पेट नहीं भर पावे । श्रम प्रति करें पर भाग्य न जोर लगावे । पाता है मानव पुण्य साथ में लावे ॥मि.।। सत्य वात यह ज्ञानी जन फरमाई ॥४॥ ४१ उस समय नगर में तस्कर शोर मचावे । चुरा चुरा कर घर से माल ले जावे । नगर निवासी भूप को यों दरसावे । तंग हो गये नाथ ध्यान में लावें ॥मि.।। अर्ज हमारी सुनिये ध्यान लगाई ॥५॥ नूप सुन करके प्रादेश यह सद्य लगाया। जो पकड़ चोर को मेरे पास ले पाया । वो पावेगा धन खूब यहां मन चाया । ऐसा उद्घोष शहर में सद्य कराया ।।मि.।। सुनी घोषणा जन जन के मन आई ।।६।। पकड़ चोर को द्रव्य राज से पावे । करे परिश्रम खूब हाथ नहीं प्रावे । जुल्मी तस्कर धोका देकर जावे । अाज तलक नहीं चोर नजर में प्रावे ॥मि.।। कैसे पकड़ें चोर, गये घबराई ।।७।। दोहा --तीनों बंधव में लघु, मन में करे विचार । मां का दुख मिट जायगा, पावें द्रव्य अपार ।। भूख से पीड़ित कहे यों छोटा भाई । मुझे बांध, दो नृप के पास पहुंचाई । द्रव्य भूप से पालो तुम . मन चाई। देना मुझको आप चोर बतलाई मि.।। कहता हित की बात सुनो दोऊ भाई ।।८।। दोनों भ्रात कहे जमती नहीं हमारे । लघु बंधव को चोर चोर उच्चारें। माता का दुख तो करी परिश्रम टारें। किंतु कर्म तो लगे हुए हैं लारे ।।मि।। बिना भाग्य के मिले नहीं एक पाई ॥९॥ तंगी से होकर तंग वही कर लीना । बांध 'त्रात को भूप समपंग कीना । खुम होकर नृप द्रव्य बहुत ही दीना । देख द्रव्य को नयन म्रात, भीना मि.!! विस्मित हो नृप पूछ बात यया भाई ।।१०।।
बंधव ने अपनी बात सत्य दरसाई ।
सारी बात सुन नृप के मन में पाई।
सेवक सच्चे माता के सुखदाई।
करी प्रशंसा भूप सभा के मांहि ।।मि.।।
ऐसी भक्ति हो सब पुत्रों के मांहि ।।११।।
जो पुत्र सदा ही मात पिता सुख चावे ।
वे ही निश्चय सेवा का फल पावे ।
लक्ष्मी दौड़ती उण घर मांहि पावे ।
सेवा करे वो मेवा निश्चय खावे |मि.॥
अतः भक्ति रस लीज्यो हिए जमाई ।।१२।।
"प्राज्ञ" प्रसादे 'सोहन' मुनि दरसावे ।
कथा श्रवण कर जो भी अमल में लावे ।
वह प्रानन्द अरु सौभाग्य सदा ही पावे।
बुद्ध पांचा मिगसर गुलाबपुरा में गावे ।।मि।।
दो हजार सैंतीस साल के मांहि ।।१३।।
४३
१४
बुद्धि पर :
चार सेठ
पुत्र
बेचे
लड्डू
[ तर्ज : छोटी कड़ी]
बुद्धि का है खेल जगत में भाई ।
बुद्धि से कितनी ऋद्धि लीनी पाई ।।टेर।।
कीर्तिपुर है शहर बड़ा
बड़ा गुलजारी।
कीति सिंह भूपाल मुल्क में जहारी।
दीन दुखी की सेवा करे हर बारी।
नहीं लौटा खाली प्राया राज के द्वारी ।।मि.।।
प्रतः प्रजा गण रहे सदा गुण गाई ।।१।।
धन्ना पन्ना दो सेठ नगर के मांही ।
सम्पति गहरी घर में कमी कुछ नांहि ।
दोनों की नारियां ऐसी होड़ लगाई।
लड़का लड़की हो देंगे हम परणाई मि.।।
आपस में करली बात जाणे कोई नांहि ।।२।।
धन्ना सेठ घर जन्म पुत्र ने पाया।
उत्सव करके तव सेठ अति हरसाया ।
गुरणपाल पुत्र का नाम सेठ दिलवाया।
योग्य हुप्रा तव शाला में भिजवाया ।मि.।।
वहां जाकर पुत्र श्रव करता खूब पढ़ाई ॥३॥
किंतु कंबर को
प्रावे नहीं पढ़ाई।
अन्तराय तर पायी उदय के मांहि ।
कब बांधे जीव का भोग समझ लो भाई।
अत: कर्म से बचो ज्ञानी फरमाई मि.॥
शिक्षक ने भी हार यहां पर खाई ॥४॥
अज्ञानी है पुत्र सेठ लिया जानी । किंतु बात यह रक्खी सबसे छानी।. कंवर रूप में देव कंवर लो मानी। लखकर जन जन बात करे चऊ कानी ॥मि.।। कंवर रूप की महिमा घर घर छाई ।।५।। पन्ना सेठ घर जन्मी सुन्दर बाई । पढ़ा लिखा कर दीनी योग्य बनाई। पत्नी ने सेठ को अपनी शर्त बताई। सुनी सेठ सब बात गया हरसाई मि.।। बोला तुमने अच्छी शर्त लगाई ।।६।। धनाढ्य घर में अपनी बाई जावे । यदि सेठ हां भरले काम बन जावे । अभी वहां जा कहूं सेठ मन भावे । पक्का कर सम्बन्ध बाई परणावें ॥मि.।। सेठाणी कहे शंका कुछ है नाहीं ॥७॥ - सेठ कहे सेठाणी से तुम जानो। मिलो सखी से अपनी शर्त बतायो। पक्की करके बात पुनः घर प्रावो । यह काम तुम्हारा तुम्हीं इसे कर पायो॥मि.।। सेठाणी सुन धन्ना सेठ घर आई ।।८।। सेठाणी से मिली शर्त दरसाई । सुनते ही उसको बान याद में प्राई । प्रापस में दोनों निर्णय करी सगाई । वापिस पाकर पति को बात सुनाई ॥मि.।। दोनों प्रोर ही खुशियां दिल में छाई ।।९।। चंद समय पश्चात वाई परणाई। विवाह करी ने सुन्दर पति घर प्राई । पति रूप लख मन में प्रति हरसाई । पर भोला पन लख दिल मांहि दुख पाई मि.।। प्रब तो रहना पति साथ में याहि ।।१०॥
धन्ना सेठ सेठाणी पर भव जावे। पीछे सब व्यापार ठप्प हो जावे । रही सम्पति सारी लोग खा जावे । भोलापन का सब जन लाभ उठावे ॥मि.|| घर में द्रव्य था उसको लिया बचाई ।।११।। सुन्दर खर्चा लखकर मन में लाने । पति से बोली घर धन घटता जावे। अतः करो कुछ काम खर्च चल जावे । पति कहे क्या करूँ काम बतलावें ॥मि.।। बढ़िया लड्डू सुन्दर सुन्दर दिये बनाई ।।१२।। खुशबू युक्त दे चार लड्डू बतलाया । सवा रुपये कीमत है यों दरसाया । जा बैठा उसको जहां स्थान बतलाया । नर नारी केई उस रस्ते पर पाया ।।मि.।। सेठाण्यां चार तब गुरु दर्शन को प्राई ।।१३।। बातें करती वापिस घर पर जावें। चारों के घर में कन्या बड़ी हो जावें । आपस में घर की दुख गाथाएं गावें। मिले योग्य तो उसके संग परणावें ॥मि.।। इतने में गुण पाल नजर गया प्राई ।।१४।। देख कंवर को चारों वहां चल पाई। पूछा परिचय मन में विस्मय लाई। जैसा रूप वैसा गुण है के नांहि । करें परीक्षा ऐसी मन में लाई मि.।। चारों ने चारों लड्डू लिये उठाई ।।१५।। कीमत पूछी रुपया सवा बतलाया । नारों के होते पांच उन्हें दरमाया। सुनकर बोली मूल्य ठीक बतलाया । कीमत देंगे भवन हमारे प्रायां मि.॥ अभी नहीं है पाम हमारे पाई।।१६।।
पहली कहे जहां घर में घर वहां पाना । नरम नरम है दूजी घर पर जाना। कठिन कठिन है तीजी का पहचाना । चौथी कहे हो रंग में रंग वहां पाना ॥मि.।। कहकर चारों अपने भवन सिधाई ।।१७।। घर आकर वह सारी बात सुनाई। सुनकर नारी मन मांहि हरसाई। बोली चिन्ता की कोई बात है नांहि । खूब ठाठ से भोजन दिया जीमाई ॥मि.।। पैसे लाना उस घर से देऊँ बताई ॥१८॥ घर में घर है श्रीफल तरु जहां पावें । उसी स्थान से पैसे मांग कर लावें। गया मांगने सेठारणी दरसावे। राजा बैठे पाट तभी घर पावें ॥मि.।। आ घर नारी को दीनी बात सुनाई ॥१९॥ नरम नरम जहां दाख बेलड़ी पावें । उसी स्थान पर प्राप मांगने जावें । गया मांगने सेठाणी दरसावे । काष्ट अश्व के लौह लगाम लगावे ॥मि.।। तभी माँगने पाना पहले नांहि ।।२०।। कठिन कठिन है वृक्ष सुपारी मानो । उसी स्थान पर समझो अब है जानो। गया मांगने बोली आपको प्राणो । गंगा जमुना रुके दाम तब पारणो ।मि.॥ पुनः लौट प्रा दीनी बात सुनाई ॥२१॥ मेंहदी झाड़ जहां रंग में रंग बताया। वहाँ जा के मांगना ऐसे नार दरसाया । गया मांगने सेठाणी फरमाया। प्राना गगन में फूल उदय में पाया ।मि.!! चारों स्थान पर घूमा मिली नहीं पाई ।।२२। ४७ हताश हो घर दीनी बात सुनाई। जा प्राया सब ठोर मिली नहीं पाई। नारी बोली क्यों घबरानो मन मांहि । सब प्रा जावेंगे दाम रहे नहीं पाई ।मि.।। दिया शाम का भोजन उन्हें जीमाई ।।२३।। पाट बैठ गया चन्द्र उदय में प्राया। तभी नार ने पति को वहां भिजाया । सेठाणी बोली दूंगी अन्य से पाया । यह सुनकर वापिस निज घर पे चल पाया ॥मि.।। दूजे घर में भेजा बात समझाई ॥२४॥ काष्ट अश्व के लौह लगाम लगावे । व्यापार बन्द कर ताला दे घर पावे। दस बजे रात में सेठाणी घर जावे । पहली मुसाफिक दूजी भी दरसावे ॥मि.।। कंवर पुनः प्रा दीनी बात सुनाई ॥२५॥ गंगा जमना हके भेद बतलाया। दोनों मार्ग हों बंद तभी बुलवाया। प्रर्द्ध रात्रि में तीजी के घर पाया। उसने भी कह उसी तरह समझाया ।मि.।। वापिस पाकर सारी बात बतलाई ॥२६॥ गगन फूल जब शुक्र नजर में आवे । उस वक्त गया वहां चारों ही मिल जावे। एक थाल में केई सामग्री लावे। पांच रूपये उस मांहि रख लावे ॥मि.।। ले लो पाप इण में से हो मन चाई ॥२७॥ मेंहदी लच्छे तुकुम उसमें लख कर सोचा इसने ले लू दाम उठाकर । इननी चीजें बयों लाई इममें रग्रफर । रहस्य होगा पाऊं पुनः घर जापार मि.।। शौच निवृत हो गा पुनः उठाई।।२८।।
घर नारी से प्राकर बात सुनाई। वह बोली मेंहदी लेना प्राप उठाई। वापिस पाकर मेंहदी ली कर मांहि । चारों ने अपनी चार कन्या परणाई मि.।। लाखों का देकर माल दिया पहुंचाई ।।२९।। चार बहू और गहरा धन ले पाया देख नार का चित्त अति हरसाया । पांचों बहनें मिली परिचय पाया । काम सभी अब सुन्दर ढंग पर पाया ।मि।। पहले जैसा दिया व्यापार चलाई ॥३०॥ उस समय विचरते धर्म घोष मुनि पाये । दर्शन हित परिवार सेठ संग जाये। बंदन कर बैठे गुरु वाणी फरमाये । ले लो लाभ नरभव मुश्किल से पाये ।।मि.।। सेठ प्रादि लिए श्रावक व्रत सुखदाई ॥३१॥ 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि हर बारी। चेतावे कर लो धर्म ध्यान सुखकारी। बांध सरेरी संघ है साताधारी । चरित्रवान संतों का प्राज्ञाकारी मि.!! यहां धर्म ध्यान की फुलवाड़ी सरसाई ।।३२।। - ४९
१५
आचार शुद्ध
गांधीजी व पादरी
[ तर्ज : राधे० ]
प्राचार शुद्ध व्यवहार शुद्ध की, जन मन ऊपर छाप पड़े।
बिना शुद्धि के उपदेशक हो, चाहे वे प्राचार्य बड़े ।।१।।
गांधी गये विलायत में तब, एक पादरी उनके पास ।
करके वात यों सोचे मन में, इन्हें बुलाऊं निज प्रावास ।।२।।
कहे पाप हर रविवार का, आमन्त्रण स्वीकार करें।
गांधी बोले शाकाहार ही, भोजन होगा यहां मेरे ।।३।।
सोचे पादरी गांधी जी यदि, स्वयं ईसाई बन जावे ।
तव तो सारा भारत ही, ईसा मसीह मत अपनावे ।।४।।
हर रवि को गिरजा से पादरी, गांधी जी के संग आवे ।
चर्चा करते खुलकर दोनों, स्व स्व पक्ष को बतलावे ।।५।।
बच्चे भी वहाँ इनकी बात में, काफी रस पाकर लेते ।
सुन गांधी के वचन प्रभावित, मन के मांहि वे होते ।।६।।
भोजन निरामिष एक रवि को, बनता लख बालक भोले ।
प्राज निगमिप भोजन कैसे, पिता सामने प्रा बोले ॥७॥
पिता पादरी कहे गांधी जी, प्राणी मांस को नहीं खाते ।
अपने सम सब को पीड़ा हो, ऐसी बातें बतलाते ।।८।।
बालक बोन्न जीयः कह रहे, हम भी मांग नहीं खायंगे।
प्राणी पान में मांस बने, वृक्षों में हम पल जायेंगे ।।१।।
पर मुनो ही गोले पादरी, उलटा घर में कहर नहा ।
मैंगो मानना चाहता उनको गुमपुत्रों पर प्रमरा ॥१०॥
यदि गांधी दो चार वक्त भी, मेरे घर पर आ जावे ।
ये बालक तो निश्चय, उनके अनुयायी ही बन जावे ।।११।।
पाये गांधी रविवार को, कहे पादरी अपना हाल ।
धावा बोला मेरे घर पर, अच्छी चली प्रापने चाल ।।१२।।
मैं चाहता था बना लेऊंगा, अब गांधी को ईसाई ।
काम हो गया उल्टा यहां पर, सारी घटना दरसाई ।।१३।।
निमन्त्रण वापिस लेता हूं, नहीं हुई मन की चाई।
समझा असर प्राचरण का हो, थोथी बातों का नांहि ।।१४।।
'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि कहे, आकर्षण जब बढ़ता है ।
कथनी करनी सम हो तब ही, रंग दूजों पर चढ़ता है ।।१५।।
१६ भोज राजा राजा : छः टका [ तर्ज : छोटी कड़ी 1 शांति खोजता फिरे जगत के मांहि । संतोष बिना नहीं शांति मिले कहीं भाई ।।टेर।। धारा नगरी का भूप भोज महाराजा । अश्व घुमावन काज जंगल में पाया । लकड़हारा सिर पर गट्ठर लाया। तन का गठ मजबूत मस्ताई छाया ।मि.।। नृप लखकर उसको ऐसी बात सुनाई ।।१।। कहो नाम क्या अपना दो बतलाई । तब कहा सुनो मैं राजा भोज हूं भाई । सुनकर नृप यों मन में विस्मय लाई । यह भोज कौनसा प्रगटा है यहां पाई॥मि.।। कैसे भोज हो दो मुझको दरसाई ।।२।। वह बोला कमी नहीं मेरे पास में कांई। लाकर भारी बेचू नगरी मांहि । कितने पाते दाम भूप दरसाई। वह बोला टका छः नित ही लेऊ कमाई ॥मि.।। सुनकर भूप के मन में ऐसे प्राई ।।३।। भरा खजाना लाखों नित ही पावे। फिर भी नहीं संतोप मेरे मन पावे । फिर पूछा उसको कैसे खर्च में लावे । इनका लेवो हिसाव अभी बतलाये ॥मि.!! यः टके को बांटू छ: हिस्से के मांहि ||४|| बोहरा, प्रामामी, मंत्री, सजाना, मांहि । सुद का प्रतिथि सत्कार में देकं लगाई। एका एक दकाना यनं ये माहि। मनका भूप हो विस्मित यो दरमाई।मि तेरी रहमामय काम नहीं पाई ॥
वह मेरे बने मेरे बोहरे हैं मात पिता सुखदाई । पाल पोस कर दीना योग्य बनाई। पुत्र पुत्री आसामी भविष्य के मांहि ॥मि.।। मंत्री नार है चाहे सदा भलाई ॥६॥ बचा टका एक रहे खजाना मांहि । बुरे वक्त बने सहाई। खाना पहनना स्वयं खर्च के मांहि । अतिथि खर्च में एक दू टका लगाई ॥मि.।। गृहस्थ धर्म है अतः लू सेवा बजाई ॥७॥ सुनकर उसकी बात भूप मन लाया। कितना है हुशियार ठीक समझाया । जीवन सुखी यह कितनी मस्त है काया। चिन्ता का नहीं है लेश हृदय में लाया ।मि.।। मेरे जीवन अरु इसके जीवन मांहि ।।८।। कितना है अन्तर देख रहा हूं यांहि । चिन्ता अस्त हूं लाखों का धन पाई । पर छः टकों से भोगे यह मस्ताई ॥मि.।। प्राज यहां मैं अच्छी शिक्षा पाई ।।९।। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि दरसाई । कथा श्रवण कर लीज्यो हिये जमाई। दो हजार साल सैंतीस अंटाली मांहि । बंसत पंचमी ठाठ से यहां मनाई ।।मि.।। तप जप की श्रद्धांजली गुरु को चढ़ाई ।।१०।। O ५३ १७ गर्व त्याग : अनुभव से [ तर्ज : छोटी कड़ी] सदा गरीबी रखे याद के मांहि । उसके जीवन में गर्व रहे कुछ नांहि ।। टेर।। सुजालपुर में लक्खी सेठ धन धारी। गृह कार्य में दक्ष सुशीला नारी। नगर मांहि विख्यात सेठ व्यापारी। लाखों का व्यापार चले हर वारी ॥मि.।। फिर भी तन पर रखता पूरी नरमाई ।।१।। जिनका है जीवन सादा पर उपकारी। प्रभाव ग्रस्त को लेता है संभारी। गुप्त दान दे सदा दुखी दुःख टारी। नहीं किंचित भी मान सरलता धारी ॥मि.।। वोले मीठे वचन सभी से जाई ॥२॥ रस्ते में होकर सेठ हाट पर जावे । फूटा कपाल यों बालक कह बतलावे । तुतली भाषा सुन सेठ अति मुस्कावे । नहीं शोध का लेग हृदय में प्रावे ॥मि.।। व्यवहार सेठ का सब को है मुखदाई ॥३॥ एक वक्त मेठ जी जाये बाग के मांहि । उनके पीछे युद्ध विद्यार्थी रहे जाई। पेना गट को अपनी बात गुनाई। पाप हमारी गंका देवो मिटाएं मि.! विशुन जीवन में लिया बनाई . विनय, सादगी, दान भावं किम पाये । फूटा कपाल उपनाम कहां धरवाये । शंका है आपसे हम मिटवाना चाहें। सेठ उसी क्षण उनको पास बैठाये ॥मि.।। अब कहूं बात मैं लेना ध्यान के मांहि ॥५।। लगा कपाल के हाथ उन्हें बतलावे । सारे सद्गुण का मूल यही दरसावे । जिस समय हाथ मेरा इस ऊपर जावे। उस समय दृश्य सब मेरे ध्यान में प्रावे ॥मि.।। जीवन की घटना देऊं तुम्हें सुनाई ॥६॥ मेरी माता अरु तात गरीबी मांहि । बड़े कष्ट से रहे थे दिवस बिताई। खाने को कुछ भी साधन घर में नांही । पास कोटिपति रहे अभी चंद भाई ॥मि.।। सात मंजिला भवन लिया बनाई ।।७।। मैं था बालक वय सात वर्ष के मांहि । खेला करता सेठों के बाल संग जाई । वे लाते चीजें घर से खाने के तांई । देख उन्हें गया मेरा मन ललचाई मि.।। मैं भी मांगता मात पास में जाई ।।८।। पिता गये पर लोक रहा मैं भाई । मुझे मांगता देख मात समझाई। वे हैं सेठों के पुत्र द्रव्य घर मांहि ! नहीं है मेरे पास एक भी पाई ।।मि.।। फिर भी देती चीज मात कुछ लाई ।।९।। कुछ दिनों बाद प्रामों की मौसम प्राई । देख अन्य के पास गया मचलाई । माता के पास प्रा अपनी बात सुनाई। सुन माता के मन में ऐसे आई मि.।। निश दिन का कहूं दु:ख सेठ घर जाई ।।१०॥ खाने की चीजें घर के मांहि खिलावे । ताकि बच्चा मम नही देखने पाये । लेकर अपनी बात सेठ घर जावे । सेठ दम्पति घर में बैठे पावे ॥मि.।। मिल धनपति से प्रपनी बात सुनाई ।।११।।
दिन दूने पाप धन मांहि बढ़ते जावें।
हर समय प्रापकी उन्नति दिल से चावें।
फले फूले परिवार सुखी हो जावे ।
बच्चे आपके लखकर जी सुख पावे ।।मि.।।
विनय करू एक सुनिये ध्यान लगाई ॥१२॥
अपने बच्चों को जो भी श्राप खिलावें।
घर में बैठा कर खिला उन्हें निकलावें।
बच्चों के हाथ में देख बाल मचलावे ।
भोला है समझे नांय खूब समझावे ।।मि।।
प्रतः कृपा कर दो मुझ कष्ट मिटाई ॥१३॥
सेठाणी क्रोध में कहे क्या बात सुणाई।
लड़के मेरे खायेंगे बाहर ' जाई ।
अरे ! तू होती कौन जो करे मनाई।
धन मद में दी कितनी ही गाल सुनाई ॥मि.।।
सुनकर उनके वचन मात दु:ख पाई ॥१४॥
नहीं बोल सकी दिल दर्द ले घर में आई।
पाते ही ग्राम की बात मैंने दरसाई।
खाऊंगा श्राम कह झगड़ा दिया मचाई।
मां भरी रोष में मुझको दिया सुनाई ।।मि.।।
भग जा नहीं तो दूगी खून चटाई ॥१५॥
मैं था अज्ञानी समझा वात को नही।
फिर भी मांग लख माता रोप भराई।
पत्थर उठाकर मारा सिर के मांई ।
खून खलक निकला तन गया रंगाई मि.।।
फिर पाया ध्यान तय माता प्रति घबराई ।।१६।।
किया धूब उपनार ही दवा लगाई।
उसके बाद ही मेरे समझ में पाई।
विद्यादिवों को गिर की चोट बताई।
गोट लगी या अन्नर मांग पनाई मि.।।
फटा मानक तब में बालय मा ॥१७॥
तब से दुराग्रह रहा न मन के मांही । माता ने एक दिन सारी कथा सुनाई। सुनकर उसकी बात हृदय में जमाई। परिवर्तन होता समय सही दरसाई ॥मि.।। है अब भी उसका असर सुनो दिल मांही ।।१८।। साधन हीन जन कैसे वक्त गुजारे। अपने अनुभव से समझूसुख दु:ख सारे । वह शिक्षा हर क्षण अब भी दिल में मारे । प्रतः करू संभार सभी घर जा रे ॥मि ।। यह तो काम है अपना क्या अधिकाई ।।१९।। धन पाने का सार नहीं पकड़ाई। दान पुण्य में देवें इसे लगाई। तब ही मिल पाता लाभ सुनो हे भाई । नहीं तो धन तज जाते पर भव मांहि ।।मि.।। सजग रहे वही धन से यश ले पाई ॥२०॥ द्रव्य दिखावा धन विष है जग माही । नहीं होती उससे कभी समाज भलाई । प्रतः दिखावा तजो सभी हित लाई । सादा जीवन बना रहे जग माही ।।मि.।। विद्यार्थियों को सेठ ने बात सुनाई ।।२१।। इसी तरह का जीवन सभी बनावे । करें प्रतिज्ञा ऐसे गुण अपनावे । करी प्रशंसा मुख से सब गुण गावे । नमन करी सब अपने स्थान सिधावे मि.।। धन्य बने शिक्षा से जीवन वनाई ।।२२।। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि दरसावे । दो हजार साल सैंतीस माघ मन भाये सुदी सप्तमी मंगल को रच गाये । विचरत ठाणा पांच खेजड़ी आये ॥मि.।। कथा श्रवण कर लीज्यो हिए जमाई ॥२३॥ ५७
१८
श्रद्धा पर:
चोर आकाश में उड़ा
[ तर्ज : नेमजी ]
श्रद्धा रख जीवन बन जावे श्रद्धा से मुक्ति पा जावे ॥टेर।।
देव
पामी।
सेठ जिन दास श्रावक नामी।
नहीं है घर में कुछ खामी।
गुरु धर्म
शुद्ध
व्रतों को पाले गुणधामी ।
दोहा-पुत्र एक गुणपाल है, चाले प्राज्ञा मांय ।
एक दिवस निज पिता पास में, बुला उसे समझाय ।।मि ।।
बात कहूं ध्यान मांहि लावे ॥१॥
मंत्र एक मेरे पास मांहि ।
तुझे मैं देऊं बतलाई ।
सिद्ध कर पावो सिद्धाई।
मौज से उड़ो गगन मांहि ।
दोहा-मंत्र बड़ा नवकार है, अद्धा इस पर लाय ।
विधि बता दू अभी सभी मैं, काम सफल हो जाय ।।मि.।।
शंका नहीं मन मांहि लावे ।।२।।
अंधेरी नउदस जब प्राये।
निया में बन मांहि जाये।
अग्नि में कुण्ड भरवावे ।
ऊपरलीका लटकाये।
-
दोरा.....म मर के चार मिन बारक. नवकार ।
एक कोबारे मात्रा मन में दिसत धारामि.!!
मित हो पिता को दरमाये ॥३॥
कहा वैसे C विचार कर चउदस जब पावे । कंवर चल वन मांहि जावे । ही करवावे। शंका यों मन मांहि लावे । दोहा-अग्नि मांहि गिर पडू, जलकर होऊं राख । बार बार यों चढ़े उतरते, कंवर गया है थाक ॥मि.।। चुराकर चोर रतन लावे ॥४।। पूछकर चोर बात जानी। हृदय में श्रद्धा वह पानी। सिद्ध करू मन में यह ठानी। रतन दे लिया मंत्र मानी। दोहा-- चंद समय में सिद्ध कर, उड़ा गगन के मांय । पीछे से प्रा पकड़ कंवर को, राज सभा में लाय ।।मि.।। कंवर मन में प्रति दुःख पावे ॥५॥ भूप के क्रोध हृदय छावे । कोष से चुरा के ले जावे । शूली पर इसको लटकावे । नगर में सबको दिखलावे । दोहा-ले जाते हुए कंवर पर, गया चोर का ध्यान । शूली हित मम उपकारी को ले जाते अनजान ॥मि.।। गगन में खड़ा हो दरसावे ।।६।। उपल यह मेरे कर मांहि । छोड़ दो तस्कर यह नांहि । बात यों उसने दरसाई। छोड़ दिया सुनि भूप वांहि । दोहा-संदेह दिल में प्रा गया, पाया दुःख अपार । 'सोहन' मुनि जो संदेह लाता, जाता करणी हार ।।मि.।। भव्य जन श्रद्धा मन लावें ॥७॥ दुल्लहा परम सदा गावे । प्रागम में वीर फरमावे । इसके बिन मुक्ति नहीं पावे । धर्म का सार बतलावे । दोहा-गुणताली प्रासाढ़ में, सुद सातम रविवार । साड़ी स्टोर हरिमार्ग में, प्राये कर विहार ।।मि.।। श्राद्ध रखं श्रद्धा सुख चावे ।।८।। ५९ १९ धर्म बिन जीवन व्यर्थ [ तर्ज : नेमजी...] गया जो वक्त नहीं आवे, धर्म बिन समय व्यर्थ जावे ।।टेर।। नगर एक सागर पुर मांहि । सेठ धनदास बसे वहां ही । सम्पत्ति गहरी घर मांही। रहा वह धन मद में छाई । दोहा-धर्म क्रिया से दूर है, धन से पूरा प्यार । कंवर भानु भी उनके सम ही, रखता निज व्यवहार ।।मि।। न्याय और नीति नहीं भावे ॥१॥ धावक एक धर्मदास नामी। नहीं है जिनके कुछ खामी । गुरगावली नारी सुख धामी। शीलवती पुत्री वह पामी। दोहा पाठ वर्ष की उम्र में, जाती स्थानक मांय । संत सती की सेवा करणे, धर्म मर्म को पाय मि.!! श्रद्धा दिल गहती पा जाये ॥२॥ विवाह के योग्य हुई बाई । भानु मग दीनी परणाई । गल सामरे प्राई : पदम्या लग्नबार दुम पाई। दोहा --- विना पर गम है, बीना हदय विचार ! माम मर पनि को गले, की पारे उतार मि.।। dav एक दिन गुणी मुनि पावे । यौवन वय शांत दांत भावे । देखकर बहू हर्ष लावे । मुनि को ऐसे दरसावे। दोहा-प्रभी तो प्रभात है पता काल का नाय । सुन मुनिवर की बात को धन्य धन्य दरसाय ॥मि.।। आगे बहू अपनी बतलावे ॥४॥ प्रापका ऐसा है व्यवहार । हमारे घर में बासी आहार । नया नहीं भोजन हुआ तैयार । बात सुन मुनि बोले उस बार । दोहा-सास ससुर पति प्रापकी प्रायु दो बतलाय । खुद भी बीस वर्ष की किन्तु बारह वर्ष बतलाय ।।मि.।। पति वर्ष पांच बतलावे ॥५॥ सासुजी छः माह के जानो। ससुर का जन्म मति मानो। सही है मारो बतलायो । रत्ति भर झूठ नहीं जाणो । दोहा-मुनिवर लेके आहार को, गये हैं स्थानक मांय । सुनी ससुर क्रोध में आकर बहू को यों फरमाय ॥मि.।। असत्य कहे, शर्म नहीं प्रावे ॥६॥ भोजन बिन सेठ हाट जावे । पुत्र को सब कही बतलावे । नार तुझ कुलटा दिखलावे । कहूं नहीं घर में रह पावे। दोहा-पति नार के पास प्रा, कहे किया अपमान । मात पिता की मुनिवर आगे कहते रखा न ध्यान ।।मि.।। बोली वह मुनि पास जावे ॥७॥ हकीकत मुनिवर दरसावे । प्राप वहां समाधान पावे।
पिता अरु पुत्र वहां जावे । सेठ सब मुनि को दरसावे । दोहा- मुनिवर बोले सेठजी, वह पूछी थी वाय । लघुवय में क्यों संयम लीना, पता काल का नाय ॥मि.।। कही वह बासी हम खावें ॥८॥ मुनि कहे उसने बतलाया पूर्व का सुकृत संग लाया। यहां नहीं धर्म ध्यान ध्याया। इसी से बासी दरसाया । कसे यह दोहा-बात कही सव सत्य है, आगे की फरमाय । मुनिवर बोले उसे पूछ लो, देगी वह बतलाय मि.।। पिता अरु पुत्र स्थान पावे ॥९॥ ससुर कहे मेरा जन्म नांहि । तैने बतलाई। बहू कहे धर्म क्रिया कांई। करी नहीं इस भव के मांहि । दोहा-धर्म बिना क्या जन्म है, नरभव उत्तम पाय । पशु पक्षी वत् पाकर जीवन, दीना व्यर्थ गमाय मि.।। वात सुन ससुर समझ जावे ॥१०॥ सास के धर्म ध्यान मांहि । मास छः बीते हैं यांहि । पति पर अपना भेद गाई दीना वह सब ही बतलाई । दोहा-'प्राज्ञ' कृपा 'सोहन' मुनि, धर्म करो मुखदाय । धर्म किये बिन यह नर जीवन केवल शून्य गिगाय मि.।। ज्ञानी जन ऐसे दरमाये ॥११॥ CE
२०
नियम पर
[ तर्ज : नेमजी"]
नियम ले शुद्ध भाव चाले ।
वही नर सुख सम्पति पाले ।।टेर।।
नगरी एक कौशाम्बी भारी।
भूपति प्रताप सुखकारी।
प्रजा का ध्यान हर बारी ।
रखे, दे दीन दुःख टारी ।
दोहा-एक समय इस नगर में, ज्ञानी गुणी अरणगार ।
ग्राम नगर पुर विचरत पाये भवि जीवां हितकार मि.।।
सुरणी सब दर्शन को चाले ।।१।।
जनता उमड़ उमड़ पाई।
परिषद् लखकर गुरुराई ।
त्याग की महिमा बतलाई ।
वाणी सुन जनता हरसाई।
दोहा -उस ही क्षण एक सेठजी, गुरु चरणों में प्राय ।
सदुपदेश दे अाज अापने, दीना मुझे जगाय ॥मि.।।
जीवन को त्याग मांहि ढ़ाले ॥२॥
इच्छा हुई लेऊ त्याग अपनाय ।
करा दो नियम मुझे गुरु राय ।
अति प्रिय सदा काम में प्राय ।
वही दो जमीकंद छुड़वाय ।
दोहा-गुरुवर बोले सोच लो,
पहले हिरदय मांय ।
इधर उधर करने का अवसर, फिर सन्मुख नहीं प्राय ॥मि.।।
शपथ फिर शुद्ध पाप पालें ॥३॥
सोचकर नियम लू गुरुराय । तजू नहीं चाहे प्राण भी जाय । जमीकंद दीना तब छुड़वाय । नियम ले सीधा घर पर प्राय । दोहा-निज नारी के सामने, करी नियम की बात । छोड़ दिया है मैंने आज से, जमीकंद नहीं खात ॥मि.।। मेरे लिये सब्जी यह टालें ॥४॥ बात सुन रोष मांहि पाई। नार यों पति को दरसाई। गये क्यों संत पास मांहि । काम है उनके तो योंहि । दोहा-खैर ! चले गये प्राप तो, कीना क्यों यह त्याग । नियम यहां पर नहीं चलेंगे, छोड़ो त्याग का स्वांग ।।मि.।। भाणे में रक्खू वह खाले ॥५॥ बनाऊं जमीकंद का साग । देखलू अाज तुम्हारा त्याग । खाये बिन कहां पर जावो भाग । बोल रही नारी ज्यू हो नाग । दोहा-साग बना जमीकंद का, रक्खा भाणे मांय । खाना है तो खालें इसको, वरना उठ नहीं पाय ॥मि.।। सेठ चोतरफा निहाले ॥६॥ सेठ कहे लादे कुछ प्राचार, साग नहीं खाऊं सही विचार । कड़क कर बोली ऐसे नार। साग तो खाना है इस वार । दोहा -बात कहूं सो मान लो, बदली हूं खूखार । लोक लाज से नहीं डरूंगी, सुनो बात का सार ॥मि.।। तुम्हारी कुछ भी नहीं चाले ॥७॥ शेर जिम गर्ज रही है नार । सेठ यों मन में करे विचार। ६४ प्राण का चाहे हो अपहार । तोडू नहीं लीनी गुरु की कार । दोहा.-घर में सब सामान है, गुड़ शक्कर प्राचार । किन्तु प्राज तो बदल गई यह, है कंकाली नार ॥मि.।। लगा दिये सबके ही ताले ।।८।। शक्ति जब नारी की जानी, सोचे यहां रोटी नहीं खानी । भोजन तज जाने की ठानी। खड़ा हुप्रा ऐसे सेठ मानी। दोहा-जाते सेठ को देखकर, भरी रोष में नार । उठा हाथ में जलती लकड़ी, हुई पति की लार ।।मि.।। नार को प्राती निहाले ।।९।। सेठ मन मांहि नार बक झक करके जावे । ग्राम के बाहर सेठ प्रावे । रात वहीं वन में सो जावे । घबराये। दोहा-मध्य निशा के बाद में स्वप्न सेठ को प्राय । मानों नार छाती चढ़ बैठी, अब रही कंठ दबाय ।।मि.।। बोल रही सब्जी तू खाले ।।१०।। यदि तू हो गया अब इन्कार । समझ ले दूंगी तुझको मार । कंठ को दबा के बारम्बार । बोल अब क्या कहे तू उच्चार । दोहा-घबरा करके सेठ ने दीना शब्द निकाल । खाऊ खाऊ खा लूगा अब, कहता सुनले हाल ।।मि.।। शब्द सुन चोर निहाले ।।११।। लाखों का द्रव्य चोर लाये। बैठ वहां पाती करवाये । शब्द ये कान में पाये। चोर चौकन्ने हो जाये ।
दोहा-समझा यहां पर भूत है, भूखा हमको खाय । धन माल को छोड़ सद्य ही, दौड़ वहां से जाय ।।मि.।। चोर की कला नहीं चाले ।।१२।। प्रातः जब सेठ जी जागे। पड़ा धन लाखों का प्रागे । प्रताप यह नियम का सागे । करू नहीं ग्रहण जिन्हें त्यागे। दोहा-धन कंचन को बांधकर, लीनी. गांठ बनाय । सिर पर रखकर चला वहाँ से, मन में हर्ष भराय ।।मि.।। सोचा यों नियम गुण गाले ।।१३।। सेठाणी मन में घबराई । छोड़ पति चले गयेकाई । रात भर नींद नहीं आई। कल्पना केई मन लाई। दोहा-यदि न आये सेठजी, क्या होगा मुझ हाल । नियम लिये तो लिये खुशी से देती बात को टाल ।।मि.।। रोष में काम किये काले ।।१४।। - चिन्ता में बैठी है नारी । पति चल पाये उस वारी । हुआ हैं हर्ष हृदय भारी। देख सन्मुख. आई नारी । दोहा-गठरी लख कर शीश पर, बोली वह तत्काल । इतना वजन उठाकर लाये, क्या है इसमें माल मि.।। उतारी गांठ निहाले ।।१५।। देखकर लाखों का धन माल । सोचे अब हो गये खूब निहाल । सेठ ने सुना दिया सब हाल । सुनकर बोली यों तत्काल । दोहा-गुरु दर्शन को नित्य ही, जागो नियम लो धार । सोचा सेठ ने स्वार्थ का जग, नहीं है इसमें सार मि.।। पहले क्यों तूने विघ्न डाले ।।१६।।
देखलो कैसा गुरु प्रभाव । नियम दे मिटा दिया दुखदाव । पाले कोई रखकर पूरण चाव। उसी की तिर जावेगी नाव । दोहा-प्रत्यक्ष में यह देखलो, पाया द्रव्य अपार । श्रद्धा से यदि धारे कोई हो जावे उद्धार ।।मि.।। नियम की महिमा हम गालें ॥१७।। सेठ सब देख हृदय धारी। स्वार्थ की दुनियां है सारी। तारे नहीं द्रव्य अरु नारी । सुगुरु ही जग तारण हारी। दोहा-अतः यहां से सद्य जा, पकड़ गुरु चरणार । लेकर संयम प्रातम तारु, होऊ भव जल पार ||मि.।। बात सब नारी कान डाले ।।१८।। सुना तब नारी हुई इन्कार । पाप नहीं लेवें संयम भार । आपका ही मेरे प्राधार । और सब झूठा है संसार । दोहा-सेठ कहे सब ठीक है, यदि तुम्हारी चाह । मेरे साथ में दीक्षा ले लो, यही है जीवन लाह मि.।। दीक्षा की बात नार टाले ।।१९।। पाखिर में प्राज्ञा सेठ लीनी । अरज गुरु चरणों में कीनी। शिक्षा गुरुदेव ने दीनी । भाव युत दीक्षा ले लीनी । दोहा-करणी करके सेठजी, पाया स्वर्ग विमान । अतः भव्य जन चेतो सत्वर, लो जग को पहचान ।।मि.।। आत्म नित संयम में चाले ।।२०।। 'प्राज्ञ' कृपा 'सोहन' मुनि गावे । उत्तम. बन वही जन मुक्ति पथ पावे । संशय नहीं मन मांहि लावे । दोहा-गुणताली प्रासाढ़ में, बुद्ध पांचम शनिवार । ललवाणी स्वाध्याय भवन में, जोड़ करी तैयार मि.।। भव्य ही नियम शुद्ध पाले ।।२१।। भावना जावे । ६७ः २१ विषय कषाय : [ तर्ज : नेमजी..] अनादि से लगे साथ मांहि, तजो अब विषय कषाय भाई ।।टेर।। जीव को रहे ये भटकाई। फेर भी संग तजे नांहि । लगे ज्यों रहा मधु रस पाई। किन्तु विष सम ये रहे छाई । दोहा जन्म मरण के बीच ये, ज्ञानी जन फरमाय । इनसे लख चौरासी जीव सब, रहे महादुख पाय ॥मि.।। जीव की खो रहे कमाई ॥१॥ कमाई यदि रखना चावो । तो इनको घर से निकलावो। पुरोहित सम काम बनवावो। दामाद युक्ति से कढ़वावो। दोहा-कथा कहूं इस ऊपरे, सुनलो ध्यान लगाय । कैसा काम किया है इसने, लीज्यो हिरदय माय मि.।। जीव सुख शान्ति ले पाई ।।२।। पुरोहित नगर मांहि नामी। विजय के नहीं धन की खामी। नार है सुन्दर गुण खानी। पुत्र एक पुत्री पंच पामी। दोहा -शादी कीनी चार की, पुत्र दिया परणाय । अच्छा घर वर देख उसे भी, रहा पिता परणाय मि.!! संबंधी सव ही गये प्राई ॥३॥ ६८ जाये। विवाह कर सबको पहुंचाये। जंवाई चार रह हमेशा माल जाने की मन में नहीं लाये । खूब चाये। दोहा-ससुर हृदय में सोचता, कहां तक ये घर खाय । किंतु सास को प्रिय जंवाई, इससे बोला नाय मि.।। दिवस केई दिये बिताई ।।४।। चारों ही बैठ बात कीनी । उक्ती यह नीति में चीनी । सोच भित्ति पर लिख दीनी। ससुर ने उसको लख लीनी । दोहा-कह्यो ससुर गृह स्वर्गसम, करे जंवाई वास । ससुर लिखी यदि समझदार हो, छः दिन करो निवास ।।मि.।। ज्यादा रहे मान हानि थाई ।।५।। पढ़कर ध्यान दिया नांहि । ससुर के मन में यों आई। ऐसे ये जाने के नांहि । नार से अपनी दरसाई। दोहा-मिष्टान्न स्थान पर प्राज तू, मोटा रोट बनाय । घी युक्त रखना भाणे में, दीनी विधि बतलाय मि.।। सोकरे दीने जीमाई ॥६।। जीमकर बड़ा यों मन लावे ! ये तो घर मांहि खावे । तीनों को ऐसे दरसावे । चलो अब अपने घर जावें । दोहा-तीनों बोले क्या हुआ, घी युक्त भोजन खाय । नीतिकार कहते हैं ऐसे, परान्न दुर्लभ पाय ।।मि.।। रहो यहां जावो मत कांहि ॥७॥ रहूं मैं अब यहां पर नांहि । रहा मणि राम दरसाई । 1- प्राज्ञा हित ससुर पास जाई । बात वह अपनी बतलाई। दोहा-राजी होकर ससुर ने, दीना अच्छा माल । दर्शन देना ऐसे कहकर, पहुंचाया सरपाल ॥मि.।। नार से पाकर फरमाई ॥८॥ तेल युत रोट भाणे मांहि । खिलामो अब उनको यांहि । कहा वैसा ही पुरसाई। जीमते माधव मन प्राई। दोहा-मित्रों अब रहना नहीं, जाना है निजग्राम । दोनों सुनकर बोले ऐसे, करो यहां आराम मि.।। माधव कहे तेल गया प्राई ।।९।। अरे ! तुम समझे कुछ नाही । सास यहां सोची अच्छाई। ठंड में तेल लाभदाई। प्रतः रक्खा भाणे मांहि । दोहा-अग्नि इससे तेज हो, खाना सब पच जाय । अतः तेल तो खाना अच्छा, क्यों समझो दुःखदाय मि.।। माधव कहे मैं तो रहूं नांहि ।।१०।। ससुर से प्राज्ञा वह लीनी। सद्य ही प्राज्ञा दे दीनी । सीख में पाई नहीं दीनी । नमन कर राह उसने लीनी । दोहा-दो जंवाई रह गये, कीना ससुर विचार। पूछा नार से कब सोने हित, पाते हैं हम द्वार मि.।। नार ने दीना दरसाई ॥१४॥ ठिकाना इनका है नांहि । पति कहे अाज रात मांहि । सोऊंगा द्वार पास जाई। खोलूगा द्वार इन्हें नांहि । ७० दोहा-दोनों खेल में मस्त हो, मध्य निशा में प्राय । बड़े जोर से प्रावाज ऐसी, खोलो द्वार सुनाय ।।मि.।। ससुर कहे द्वार खुले नांहि ।।१।। द्वार जहां खुला तुम्हें पावे । वहीं पर जाकर सो जावें। अश्व गृह खुला ही दिखलावे। गये वहां स्थान नहीं पावे । दोहा-अति ठंड से दोनों का, दोनों का, तन रहा कंपाय । खरडी प्रोढ़ कर भू पर सोये, सारी रात दुःख पाय मि.।। सुबह कहे विजय राम भाई ।।१३।। यहां अपमान हुमा भारी । करो चलने की तैयारी। दुःख से बीती रात सारी । अब नहीं रहता मैं धारी। दोहा-इच्छा तुम्हारी हो करो, मैं जाने को नांय । विजय राम प्राज्ञा लेने को, ससुर पास में जाय ॥मि.।। ससुर तो देखे भी नांही ।।१४।। ससुर ने जाते लख लीना । परामर्श बेटे से कीना। उपाय एक उसे बता दीना। पुत्र ने वैसा ही कीना। दोहा-माधव जावे आज ही खाकर गहरी मार । माल खा रहा मुफ्त में, शर्म न इसे लिगार ॥मि.।। वक्त जब भोजन की प्राई ।।१५।। बहनोई साला दोऊ लार । भोजन को बैठे थे उस बार । पिता प्रा बोला यों तत्कार । दाम लिया यहां से सद्य निकाल । दोहा-पुत्र कहे लीना नहीं, कहे लीना नहीं, कहां से लाऊं जाय । पिता हाथ में लकड़ी लेकर, उसको रहा दिखलाय ॥मि.।। सौंप दे रुपया सद्य लाई ॥१६॥ दोनों में झगड़ा हुआ भारी । पुत्र भी कर ली तैयारी। छुड़ाऊं धारी। बीच में बोला उस बारी। जामाता ७१
दोहा-पुत्र हाथ में जूती लीनी, लट्ठ पिता के हाथ ।
दोनों की जामाता ऊपर, पड़े मार वह खात ॥मि.।।
मार से गया वह घबराई ॥१७॥
केशव के मन में यों पाई।
माल सब निकल गया यांहि ।
लट्ठी अरु जती सिर मांहि ।
खाकर गया गहरा घबराई ।
दोहा-युक्ति से दामाद को, निकलाया घर बार।
घर से पुरोहित गया राज में, लखकर कहे दरबार मि.।।
देरी क्यों हुई दो बतलाई ॥१८॥
बात सब पुरोहित दरसाई
भूप सुन हर्षा मन मांहि
उपाय कर दीना निकलाई।
बुद्धि यहां खूब काम प्राई।
दोहा-प्रसन्न होकर भूप ने, दीना खूब इनाम ।
इस कथा से समझो मित्रों ! करो धर्म का काम मि.।।
इसी में अपना हित भाई ।।१९।।
पुरोहित वत् जीव को मानो।
दामाद सम प्रमाद का जानो।
विषय अरु कषाय दुःख खानो।
निकालो घर से, सुख पानो।
दोहा-अनादि काल से संग में, ये दामाद घर खाय ।
इन्हें समझ कर संगत छोड़ो, यदि हो सुख की चाय ॥मि.।।
करो स्वाध्याय रुचि लाई ॥२०॥
'प्राज्ञ' कृपा 'सोहन' मुनि चेताय ।
करो नित ऐसा श्राप उपाय ।
घुसे ये घर से बाहर जाय ।
वीर वाणी से समझ में प्राय ।
दोहा--गुणताली पासाढ़ में, वुद नवमी बुधवार ।
हीरा वाग मूथा के बंगले, जोड़ करी श्री कार ॥मि.।।
स्थान यह जयपुर के मांहि ॥२१॥
२२ | बड़ों से प्रशंसा नामी। [ तर्ज : नेमजी...] प्रशंसा गुरुषों से चावे, प्रागे वह बढ़ने नहीं पावे ।।टेर।। इन्द्रदत्त कलाकार नाम लिया जगति पर पामी। नहीं था उसका कोई शानी। कला का काम था लासानी। दोहा-सोमदत्त एक पुत्र है, करे कला अभ्यास । बना मूर्तियां अच्छी लाकर, रखे पिता के पास ॥मि.।। पिता लख कमियां बतलावे ।।१।। पुत्र सुन सूक्ष्म काम करता। कोरणी अच्छी वह भरता । सदा ही आगे रहा बढ़ता । ध्यान रख काम मांहि लगता । दोहा-फिर भी पिता कहता नहीं, अच्छा कीना काम । पुत्र विचारे करे प्रशंसा, पिता से मेरा नाम ।।मि.।। काम ऐसा कर दिखलावे ।।२।। कार्य वश पिता गांव जावे । पुत्र तब मन में यों लावे । कलाकार मूर्ति बनवावे । गुप्त निज नाम लिखवावे । दोहा- गणेश मूर्ति कोर कर, किया कला का काम । भूमि मांहि रखकर उसको, पुनः पा गया धाम ।मि ।। भेद इसका कोई नहीं पावे ॥३॥ पिता चल वापिस घर आया । पुत्र निज स्वप्न बतलाया। गणेश की प्रतिमा दिखलाया। भूमि में गढ़ी है दरसाया । ७३ दोहा-लोग वहां पर जाय के, खोदी भू तत्काल । गणेश मूर्ति लखकर बोले, हो गये प्राज निहाल मि.।। कला की बात फैल जावे ।।४।। देखने पिता पुत्र प्राये। कला लख पिता यों दरसाये ! कैसी यह सुन्दर दिखलावे । प्रशंसा कला की वो गावे । दोहा-पिता कहे सुन पुत्र तू, कलाकार हुशियार । कैसी सुन्दरता लाया है, देखो दृष्टि पसार ॥मि.।। बात सुन पुत्र दरसावे. ॥५॥ प्रतिमा, मैंने बनवाई। भूमि में मैं ही गढ़वाई। नाम है. इस पर मेरा ही। पिता को दीना दिखलाई । दोहा-पिता कहे तुझ काम में, देता कमी बताय । जिससे तुझ में लगन बनी रहे, आगे बढ़ता जाय ।।मि.।। तेरा अब बढ़ना रुक जावे ।।६।। प्रशंसा तू मुझसे चाई। भारी यह गलती तू खाई। बड़ाई जो. निज की चाई। समझ लो अब बढ़ना नांहि । दोहा-वचन पिता के श्रवण कर; पुत्र गिरा चरणार । गलती की वह क्षमा याचना, कर रहा वारम्बार ।।मि.।। भूल हुई निज की दरसावे ।।७।। लगाता पुत्र काम मांहि । खोल दिल करता दिन राई । तथापि वैसा हो नांहि । रुका तारीफ हृदय चाई। दोहा-'प्राज्ञ' कृपा 'सोहन' मुनि, कहे यों बारम्बार । निज प्रशंसा कभी न चाहो, यही ज्ञान का सार ।।मि.।। कथा के भाव हिए लावे ।।८।। ७४ २३ नकली से असली बना [ तर्ज : राधे ] नकल करना जो जानता वह, असल एक दिन बन जाये । नहीं चाहे जो कभी नकल वह, नहीं असल भी बन पाये ।।१।। जहां शाला में बालक जाते, पहले नकल कराते हैं। शनैः शनैः वे बालक एक दिन, असल रूप हो जाते हैं ।।२।। अमरपुर का अमरसिंह नृप, शूरवीर रणधीर महान । दीन दुखी की रक्षा करता, प्रजाजनों पर पूरा ध्यान ।।३।। अन्त:पुर में राणी धारणी, पति बल्लभ पतिभक्ता नार । पुत्री जिनके नाम सुशीला, सभी कला में है हुशियार ।।४।। दोहा -यौवन वयं में आ गई, पुत्री को लख मात । राज सभा में भेज दूं, समझे महिंपति बात ।।१।। शृगारित हो राजकुमारी, सभा भवन में आई है। शिष्टाचार लख भूपति उसको, अपने पास बैठाई है ।।५।। राजा सोचे भूल हुई यह, शादी योग्य हो गई बाई । राज काज में व्यस्त रहा मैं, नहीं ध्यान में यह प्राई ।।६।। अतः योग्य वर देख कहीं पर इसका ब्याह रचाना है । धार्मिक भावना है इसकी, वर धर्मात्मा ही लाना है ।।७।। लाड़ प्यार कर निज पुत्री को, वापिस करी रवाना है । ज्यों ही पायी सुता मात ने, भेद सभी पहचाना है ।।८।। - राजा राज के काम में, हो गया इतना व्यस्त । पता न कुछ भी लग सका, सूरज हो गया अस्त ॥२॥ दोहा :
अन्तःपुर में चलकर प्राया, राणी ने अरदास करी। बड़ी हो गई पुत्री अपनी, हम सोते हैं नींद भरी ।।९।। राजा बोला ठीक कह रही, नहीं ध्यान में यह पाई। निन्द्रा मेरी आज खुल गई, लख करके अपनी बाई ।।१०।। कहां ढूढने जावें दर दर, मेरे मन में यह प्राई। गंगा तट पर रहे संन्यासी, योग्य देख दें परणाई ॥११॥ उसी वक्त में चोरी करने, चोर वहां पर चल पाया। कई संतरी पहरा दे रहे, उनका वह नहीं भय लाया ।।१२।। दोहा-सुनी भूप की बात जब, तस्कर करे विचार जाकर संन्यासी बनू, ब्याह होय मुझ लार ॥३॥ उस ही क्षण वह हुआ रवाना, गंगा तट पर पाया है। गृहस्थ के सब वस्त्र हटाकर, तन पर भस्म रमाया है ।।१३।। सूर्योदय होते ही वहां पर, मंत्री गण कई प्राये हैं। अलग अलग संन्यासी प्रागे, भाव सभी दरसाये हैं ।।१४।। स्वीकृति मिलने पर राजा, निज पुत्री को ब्याहना चाहते । किन्तु सुनकर सभी संन्यासी, नहीं ! नहीं !! तब फरमाते ।।१५।। आखिर में चलकर उस ही, संन्यासी पास में आये हैं । उनको अपनी बात सुनाई. प्राशा दीप जलाते हैं ।।१६।। दोहा-देकर स्वीकृति प्राप अब, सफल करे सब काम । आज्ञा पाकर प्रापकी, हम जावें निज धाम ॥४॥ अरजी सुनकर मन्त्रीगण की, नहीं एक भी शब्द कहा । मौन स्वीकृति लक्षण माना, पुनः राज का मार्ग गहा ॥१७॥ प्राकर भूप से हाल कहा, संन्यासी हां भरते नांहि । एक एक से अरज करी पर, कोई ध्यान देते नांहि ॥१८॥ युवा संन्यासी मौन रहा, उसने हां या ना नहीं कही। इससे हमने यही समझा है, लेंगे मान वे बात सही ।।१९।। अतः श्राप जा उन्हें मनावें, काम सफल हो जायेगा। यदि मान ले वात प्रापकी, भव्य काम बन जावेगा ।।२०।। दोहा-चलकर भूप गया वहां, संन्यासी के पास । करी प्रार्थना कह रहा, मानों हे गुण रास ॥५॥ सुनकर सोचे अहो ! आज नृप, मेरे चरणों में पाया । बार वार कर अर्ज मेरे को, नम्र शब्द यह दरसाया ॥२१॥ जिसके प्रागे लोग सदा, कर बद्ध प्रार्थना करते हैं। कृपा दृष्टि रक्खो हम पर, यों वारम्वार उच्च रते हैं ।।२२।। ७ क्या पल होगा इसका हमको, दिल में शंका मत लावो ||३|| वही भूप प्रा सन्मुख मुझको, हाथ जोड़कर मना रहा । इसमें कारण क्या है यों, संन्यासी दिल में सोच रहा ।।२३।। नकली वेश बना करके मैं, यहां पर पाकर बैठ गया। इससे ही नर नाथ पास प्रा, मम चरणों को पकड़ रहा ।।२४।। दोहा-यदि असली वन जाऊं मैं, पा लेऊ शिवराज । फिर तो मेरे जन्म का, सुधर जाय सब काज ।।६।। पूरा राज्य अरु राजकुमारी, देता हूं नृप सुना रहा । किंतु ध्यान में लीन संन्यासी, अब तक कुछ भी नहीं कहा ।।२५।। संसार सराय में प्रा करके, जो इस मांहि फंस जाता है। नर भव जैसा अमूल्य रत्न पा, व्यर्थ इसे खो जाता है ।।२६।। मरते समय जीव यहां से, द्रव्य नहीं ले जाता है। मूढ़ मनुष्य दिन रात दौड़कर, कमर यों ही गमाता है ।।२७।। अब मुझको नहीं चाहे कुछ भी, यों खुद को समझाता है । करू भक्ति में सच्चे दिल से, ऐसा मन में लाता है ।।२८।। दोहा-जिस वेश को पहन लिया, उसी मुग्राफिक चाल । लज्जा रक्खू देश की, यही है सच्चा बोला भूप से यों संन्यासी, अब मुझको कुछ नहीं चावे । राजकुमारी अरु राज्य भी, मेरे मन को नहीं भावे ।।२९।। प्राया था मैं चोरी करने, राजन् ! अाप भवन मांहि । तभी सुना दू संन्यासी को, राजकुमारी परणाई ।।३०।। नकली वेश बनाकर मैने, यह चोला धारण कीना । सोत्रा राजकुमारी से प्रव, व्याह करूंगा रंगभीना ।।३१।। किन्तु अभी यों मन में पाया, यदि लालच में उलझाया । होगा वेश बदनाम जगत में, इससे दिल में शरमाया ।।३२।। दोहा-अतः नकल ने असल बन, क प्रात्म कल्याण । अव मुम्को नहीं चाहिए, भौतिक कुछ सामान ॥८॥ कह कर ऐसे ध्यान मग्न हुए, भूपति समझ गया सारी । धन्यवाद दे संन्यासी को, कहे पाप ममता मारी ।।३३।। बने नकल से असल प्राप, नृप ने तब यों गुण गाया है। शत शत वंदन है मेरा, यों कहकर स्थान निधाया है ।।३४|| इसी तरह से समझो भयो ! करो साधना चित्त लगा। एक दिन ऐसा आयेगा जो, सुप्त प्रात्म को लेंगे जगा ।।३५।। 'प्राज्ञ प्रसाद 'सोहन' मुनि कह, धर्म ध्यान करते जावो । हाल ।।७।।
२४ पात्र में कचरा .. [ तर्ज : राधेश्याम ] संत सदा उपदेश सुनाते, फिर भी श्रोता ज्यों के त्यों। नहीं ध्यान में आता कुछ भी, बने हुए हैं ऐसे क्यों ? यही बात समझाने के हित, कथा एक बतलाऊंगा। श्रोता गण संब सुनो ध्यान से, यहीं भाव समझाऊंगा ॥१॥ एक गांव का धनपति धन्ना, जनता मांही नामी था। किस जगह खर्च करना पैसे को, इसका अच्छा ज्ञानी था ।।२।। एक वक्त एक संत वहां पर, भिक्षा हित चलकर पाये । घर घर की भिक्षा लेते वे, धन्ना सेठ का घर पाये ॥३॥ दोहा-प्रेम संहित दी सेठ ने, उनको रोटी दाल । उठा पात्र चलने लगे, कहे सेठ तंत्काल ।।१।। कई दिनों से थी इच्छा, हो पाई सफल प्राज मेरी। संत चरण पड़ गये यहां, कुटिया पावन हो गई मेरी ॥४॥ कर जोड़ प्रार्थना करता हूं, अब पूरण प्राशा कर दीजे । सोती प्रात्मा जाग उठे, ऐसा उपदेश सुना दीजे ।।५।। संत कहे मैं अभी नहीं, एक हफ्ते बाद में पाऊंगा। तभी तुम्हारे उन्नत जीवन, हित की बात बताऊंगा ॥६॥ यह कह करके संत वहां से, अपने स्थान सिधाये हैं कब आये वह दिवस, सेठ के मन में भाव समाये हैं ॥७॥ दोहा--गिनते गिनते सेठ के, दिन वोहि गया प्राय । संत प्रायेंगे प्राज घर, देऊ माल बनाय ।।२।। खीर, मालपुवे, मेवे, फल, कई सामग्री तैयार करी। देऊंगा मैं श्राज संत को, बैठा है वह पास धरी ।।८।। प्राते संत ने रस्ते में कुछ, कचरा पात्र में डाल दिया। बड़ी मस्ती से चलकर पाते, देख सेठ हर्षाया हिया ।।९।। हाथ जोड़ कहे बहुत देर से बाट प्रापकी देख रहा । चलता चलता प्राया हं संन्यासी ने यों शब्द कहा ।।१०।।
भोली से निकाल पात्र को, सेठ सामने धर दीना। देख पात्र को सेठ सद्य ही, खीर पात्र लौटा लीना ।।११।! दोहा-संत कहे यह क्या किया, लिया पात्र लौटाय । सेठ कहे कचरा भरा, आप पात्र के मांय ॥३॥ बढ़िया खीर बिगड़ जायेगी, इससे मैंने हटा लिया। फिर डालूगा इसके मांहि, प्रथम पात्र को साफ किया ॥१२॥ यदि भूल से देता डाल तो विकृत हो जाती सारी। बीदाम पिश्ता चारोली युत, खीर बिगड़ जाती सारी ॥१३।। दिये पात्र में खीर माल पुवे, लेकर संत लगे जाने । तभी सेठ कहे क्या करते हो, कदम लगे क्यों लौटाने ।।१४।। कहा आपने, पाऊंगा. तब, मैं उपदेश सुनाऊंगा। आप जा रहे बिना सुनाये, शिक्षा फिर कब पाऊंगा ।।१५।। दोहा-संत कहे उपदेश सब, दीना तुझे सुनाय । सेठ कहे कब कह दिया, मैं तो समझा नांय ।।४।। नहीं समझा तो समझ अभी, मैं फिर तुझको समझाता हूं। खीर पात्र क्यों हटा लिया, यह प्रश्न सामने. लाता हूं ।।१६।। वह बोला उसमें कचरा था इससे मैंने हटा लिया । माल.कीमती बिगड़ जायगा, यदि, कचरे में डाल दिया ॥१७॥ संत कहे जब पात्र साफ हुआ, खीर बाद में ही डाली। शिक्षा रूपी खीर देऊ ले, अपने पात्र- को निहाली ।।१८।। काम क्रोध मद लोभ गन्दगी, कितनी पात्र में पड़ी हुई । अनादि काल, से गंदगी, ऐसी जीव साथ में लगी हुई ।।१९।। दोहा- इसीलिए उपदेश का, असर न हो मन मांय । हृदय पात्र. जब साफ हो, तब उपदेश समाय ।।५।। सेठ कहे सब सत्य बात है, मेरी समझ में अब प्राई । जब तक पात्र शुद्ध नहीं होता, तब तक बात जमे नांहि ।।२०।। एक शब्द भी नहीं कहा, व्यवहारिक ढंग से समझाया। बात जमाकर सेठ हृदय में, संत स्थान पर सिधाया ।।२१।। इस कथा से समझो यदि, वक्ता से कुछ लेना चावो । ईर्ष्या भावः, को- तजो हृदय से; तभी पाप उनसे पावो ।।२२।। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि कहे, अरि बैठे हैं निज-घर में । अब तक नहीं समझ पाये हम, मोह माया के चक्कर में ।।२३।। दोहा-भगवद् वाणी के बिना, नहीं होगा यह ज्ञान । अतः सदा स्वाध्याय का, रक्खो पूरण ध्यान.।।६।। -- . . ७९
२५
भावी
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पोत सब,
[ तर्ज : खेल ]
कोई नहीं जाने, भावी, क्या होसी इण संसार में ।। टेर ॥
भू मण्डल पर चमक रहा है, सुन्दर शहर अनूप ।
न्याय नीति का ज्ञाता त्राता ज्ञान सिंह है भूप जी ।।१।।
प्रजा जनों को माने पुत्र सम, करता सार संभार ।
दुख नहीं पावे मेरे नगर में, ध्यान रखे हर बार जी ।।२।।
उसी नगर में सुन्दर शाह एक, धन पति चतुर सुजाण ।
सेठाणी सुर सुन्दर घर में, पतिव्रता पुण्यवान जी ।।३।।
कभी सेठ ने भरे
चले उदधि के मांय ।
सेठाणी को समझा कर सब, घर का काम बताय जी ॥४॥
चलते चलते जहाज द्वीप में, ठहर गये हैं प्राय ।
स्वयं उतर कर सेठ देख रहा, इधर उधर में जाय जी ।।५।।
पड़ी खोपड़ी मानव की लख, मन में किया विचार ।
छट्ठी रात में बे माता प्रा, लिखती अंक लिलार जी ।।६।।
इसे उठाकर देख लेऊं मैं, क्या है इसके मांय ।
विस्मित होकर पढ़ रहा उसको, साफ नजर में प्राय जी ।।७।।
अग्गे कि कि भविस्सई लख,
भविस्सई लख, लीनी अपने पास ।
आगे क्या होने वाला है, ध्यान पड़ेगा खास जी ।।८।।
गाथा--जम्मो कलिंग देशे, पाणिगहणं अंक देश मझम्मि ।
मरणं समुद्दतिरे, अग्गे कि कि भविस्सई ॥
लेकर अपने पास पेटी में, रख लीनी उस वार।
पता लगाकर छोडूगा में, प्रब क्या होवनहार जी ।।९।।
देखे हमेशा पेटी खोलकर, पड़ी मिले उरण माय ।
समय निकलते बारह वर्ष हुए, घूमें द्वीपों मांय ॥१०॥
खूब कमा कर सम्पति वापिस, पा गया अपने ग्राम । सारा धन ला सौंपा नार को, कह दी बात तमाम ॥११॥ पेटी को रख अपने पास, नहीं दीना कुछ भी भेद । नारी पूछे नहीं बतावे, हुआ नार मन खेद जी ।।१२।। पेटी खोल लखे सेठ हमेशा, ताला देकर जाय । सेठाणी मन में यों सोचे, क्या है इण के मांय जी ।।१३।। ' भोजन करके देखे नित प्रति, नहीं भेद बतलाय । नारी सोचे अवसर पाकर, देखू यों मन लाय जी ।।१४।। एक दिन जल्दी मांहि सेठ की, चाबी वहां गिर जाय । काम जरूरी समझ शाह जी, त्वरित हाट पर जाय जी ।।१५।। सेठाणी वहां झट प्रा देखे, चाबी नजर में प्राय । प्राज फली है मनो भावना, मन मांहि हरसाय जी ।।१६।। सदा सेठ जी किस पूजी, को इतनी रहे संभाल । खोल पेटी को प्राज देखलू, क्या है इसमें माल जी ।।१७।। सत्वर खोला देख रही वह, विस्मय मन में लाय । मानव खोपड़ी इसका इतना, कैसे जतन कराय जी ।।१८।। इतनी सार करे ये इसकी, होगी निश्चय प्यारी । मेरे पर यह सौत बनाकर, रक्खी होगी लारी ।।१९।। मृत्यु बाद भी खोपड़ी उसकी, रखते हैं संभार । दर्शन करते नित प्रति इसका, समझ गई सब सार जी ।।२०।। अब इसका मैं सद्य मिटा दू, पूरा ही नाम निशान । नहीं रहेगी चीज सामने, बिसर जाय सब ध्यान जी ।।२१।। सोच उसी क्षण सेठाणी ने, चूरण उसका कीना। कई मसाले डाल खड्डी कर, भोजन बना रख दीना जी ।।२२।। सेठ भाणे में खड्डी रख दी, खा करके हरसाया । व्यंजन प्राज खड्डी का तुमने. कितना स्वाद बनाया जी ।।२३।। सुनकर सेठाणी बोली, हां खड्डी क्यों नहीं भावे ? अपनी प्यारी का खाना तो, सब ही मन से चावे जी ।।२४।। रहस्य भरी इस चर्चा को नहीं, सेठ समझ कुछ पाया । बोला सेठ नहीं समझ सका, तब उसने भेद बताया जी ॥२५।। सुनकर सारी बात सेठ, मस्तक के हाथ लगाया । प्रागे यह होने वाला था, भोजन संग खिलाया जी ॥२६।।
सेठ कहे यह पड़ी हुई थी; रत्नाकर की तीर । पड़ी देख पेंटी में इसको धरता मन में धीर जी ।।२७।। सुनकर हाल सेठारगी सेठ से, क्षमा याचना कीनी। शंका घुस गई मेरे मन में, बात सभी कह दीनी जी ।।२।। सेठ कहे मैं समझ गया, होना था प्रागे यह ही। खड्डी बनकर प्राज खोपड़ी, गई पेट के मांहि जी ॥२९।। अतः भावि को जान सके नहीं, कोई भी नर नार । ले लो खरची पर भव की अब, सुनकर कथा विचार जी ॥३०॥ 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि कहे, मौका नहीं हर बार । सुनकर भव्यों चेतो जल्दी, कर . लो प्रात्म सुधार जी ॥३१॥ DIO ८२ २६ पक्का हांडा के गार नहीं लगे [ तर्ज : मांड ] हो श्रोतागण सारा वचन हमारा । लिज्यो हिरदय धार ।।टेर।। कोमल दिल ने मोड़ लो रे, सरल कह्यो जग मांय । कोरा कागज ऊपर रे, लिखल्यो इच्छा प्राय ॥१॥ छोटा तरु ने जिस तरह रे, करणो चाहो होय । बड़ो हुप्रा रा बाद में रे, बदल सके नही कोय ।।२।। एक नगर ना शाह जी रे, धनदत्त नाम कहाय । पूजी घणी है सेठ के घर, नार मिली दुखदाय हो ।।३।। बात बात में कलह मचावे, रात दिवस घर मांय । तिलक सुन्दरी नामा पुत्री, माता सम हो जाय ।।४।। बात फैल गई घर घर मांहि । जाग गये नर नार। विवाह योग्य हो गई पुत्री। सोचे पिता हर वार ॥५॥ सेठ किसी से बात करे वह, हो जावे इन्कार । चिन्ता छा गई गहरी दिल में, किसके बांधू लार ॥६॥ ८३
पास पास सगपरण नहीं होवे,
जाऊं दूर विदेश ।
बात छिपी रह जायेगी वहां,
नहीं जाणे कोई रेश ।।७।।
दूर देश में सुन्दर कंवर से,
कीनी सेठ ने बात ।
सगपण पक्का करके प्राया,
विवाह विधि रचवात ।।८।।
सुन्दर कंवर बारात बनाकर,
प्राया सेठ के द्वार।
कंवरी स्वभाव की बात सुनी,
वह पररण गया उस वार ।।९।।
ठाठ वाट से विवाह करी ने,
जा रहे अपने ग्राम ।
रस्ते मांहि सोचे सुन्दर,
ऐसा करू मैं काम ।।१०।।
इसकी पादत अभी सुधारू,
नहीं तो मुश्किल होय ।
वहां पर कौन कहेगा इसको,
हम हैं घर में दोय ।।११।।
गाड़ी भरी मिट्टी बरतन से;
प्रागे पागे जाय।
खड़ बड़ कर रहे सुण सुन्दर ने,
ली लाठी कर मांय ।।१२।।
लगा फोडने वरतन बोला,
क्यों यह शोर मचाय ।
लोग कहे यह क्या करते हो,
बड़े पुरुप कहलाय ।।१३।।
वह बोला यह खड़ वड़ मुझको,
नहीं भाती है दाय।
चाहे कोई बोले सामने, दूगा लट्ठ जमाय ।।१४।। तिलक सुन्दरी मन में सोचे, इनका और स्वभाव । पीहर की रही बात पीहर में, यहां न चलेगा दाव ।।१५।। मौन रहूंगी तभी ठीक है, नहीं तो खाऊं मार। इस तरह यदि लट्ठ पड़े तो, कौन ले सार संभार ।।१६।। घर पाकर पति प्राज्ञा में, रहती है हर बार। गल्ती नहीं हो जावे कुछ भी, रखती खूब विचार ।।१७।। पिता विचारे जाकर देखू, पुत्री का क्या हाल । यही सोचकर जनक वहां से, पाया पुत्री घर चाल ।।१८।। पिता पुत्री से मिलकर पूछा, कैसा तुम्हारा काम। पुत्री बोली चुपका रहिज्यो, मत लीज्यो कुछ नाम ।।१९।। सोचे पिता यों पुत्री बदली, दीनी खूब समझाय । काम इशारे से सब हो रहा, कहने की जरूरत नांय ।।२०।। ससुर जंवाई से यों बोला, मेरा कलह मिटाय। खांडी हाँडी लाकर दीनी, सावत करके लाय ॥२१॥ ५
लोग कहे नहीं लागे गारा,
पक्की हांडी माय ।
जंवाई आगे बात सभी वह,
लोग कही दरसाय ॥२२॥
कहे जंवाई सासूजी भी,
पक्की हांडी समान ।
कितना ही उपाय करे अब,
नहीं प्रावेगा ज्ञान ।।२३॥
इस दृष्टांत से समझो भव्यों,
कोमल हृदय मांय।
जैसा ज्ञान भरोगे वैसा,
उस मांहि भर जाय ॥२४॥
'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि कहे,
वीर वाणी का ज्ञान ।
जिन पुरुषों ने लीना इसको,
कर गये वे कल्याण ||२५||
दो हजार गुणचाली असाढ़ की,
सुदी तीज बुद्धवार ।
जोड़ करी पुरोहित बाग में,
तालेड़ा भवन मंझार ॥२६॥
२७ नर भव [ तर्ज : छोटी...] कठिन कठिन तर इस नर तन को पाया । किये अनन्ते पुण्य ज्ञानी फरमाया ।।टेर।। दस बोलों का योग हाथ में प्राया। धर्म साधना करो गुरु फरमाया । गफलत में पाया मौका व्यर्थ गमाया। अंत समयं वह हाथ मसल पछताया ॥मि.।। बार बार यह सहज मिले नहीं भाया ॥१॥ एक गांव में दीन विप्र हरि सहाई। धन की कामना मन में रहे सदा ही। किसी व्यक्ति ने ऐसी बात सुनाई। रत्नाकर दे रत्न पाप लो पाई ॥मि.॥ यह सुनते ही अति उत्साह मन में छाया ।।२।। गया समुद्र के पास पानी उलचाया। क्या करते हो लोग उन्हें समझाया। किंतु धुन में नहीं एक सुन पाया । इसका श्रम लख देव वहां चल पाया ।मि.।। खुश हो करके करके चिन्तामणी बक्षाया ॥३॥ कहा इसे लो गहरा लाभ कमाना । सावधान रह इसको सदा बचाना । प्रलोभन वश ठंग से मति ठगाना । यह समझा कर हो गया देव रवाना ॥मि.।। हर्षित हो अब ऐसे मन में लायो ।।४।। मिल गया मुझे यह रत्न कमी कुछ नांहि । खूब करूंगा मौज मेरे मन चाई। बांध वस्त्र के छोर चला हरसाई । रस्ते मांहीं धर्म शाला एक प्राई ।।मि.।। अच्छा स्थान लख भू पर वस्त्र बिछाया ॥५॥ ८७ सोते ही विप्र को गहरी निद्रा पाई। चोरों ने देखा आज हुई मन चाई। कंकर बांध कर लीना रत्न चुराई । ले चिंतामणी तस्कर गये सिधाई मि.।। उठा वहां से विप्र स्थान पर प्राया ।।६।। . पूछे लोग क्या लेकर वापिस आया । कहे चिंतामणी रत्न कीमती लाया। दिखलावो कैसा रत्न प्रापने पाया। खोला उसको कंकर नजर में प्राया ॥मि.।। लखकर पत्थर विप्र प्रति पछताया ।।७।। 1 रोकर बोला हाय चिंतामणी पाया । सो गया वहां पर कीमती रत्न गमाया । इसी तरह से समझो नर भव पाया। चिंतामणी इसको ज्ञानी जन फरमाया ॥मि.।। कितना किया पुरुषार्थ तभी यह पाया ।।८।। संसार समुद्र में प्रातम नर भव पाया। यह अमूल्य रत्न सभी पंथ बतलाया। धर्मशाल परिवार संबंध विषय कषाय यह तस्कर रूप वताया ॥मि.।। पालस्य किया नर जो भी यहाँ ठगाया ।।९।। कराया। तज कर प्रमाद को सावधान हो रहिज्यो। चोरों से बचकर धर्म साधना कीज्यो। नरभव रत्न पा स्वाध्याय रस पीज्यो। अच्छा अवसर समझ सफल कर लीज्यो ।मि.।। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि ने गाया ।।१०।। दो हजार गुणनाली जेष्ठ शुभ पाया। सुद दगमी को अंगारवारं मन भाया । सांगानेर वा कुन्दन नगर सुखदाया। ठारगा पांच के प्रानन्द मंगल छाया ॥मि.!! वही तिरंगा धर्म में चित्त रमाया ।।११।। CD २८ ज्ञान की महिमा [ तर्ज : तावड़ा धीमो. ] ज्ञान की महिमा है भारी जी २ ज्ञान बिना नर पशु सरीखा ज्ञानी उच्चारी ॥टेर।। प्रथम ज्ञान पीछे दया सरे, यह जिनमत का सार । ज्ञान सहित किरिया करे तब, उतरे भव जल पार ॥१॥ एक सेठ कोटिपति घर में, सुन्दर कमला नार । रहे अनेकों मुनीम जिनके दास दासी परिवार ।।२।। एक समय व्यापार काज वह, जावे विदेशां मांय । जहाज माल से भरे पांच सौ, संग में ली एक गाय ॥३॥ बहुत दूर पर पोत पहुंच गये, प्राया शहर भारी। कचन पुर को देख सेठ यों, मन मांहि धारी ॥४॥ करू यहां व्यापार सोचकर, पोत लिये रुकवाय । सभी माल को समुद्र तट पर, लीना है उतराय ।।५।। गाय देख नर विस्मित हो गये, यह जीव काई । आज तलक नहीं देखा हमने है कैसा भाई ।।६।। सेठ समझ गया रहस्य बात का, गऊ धन यहां नांहि । अतः भेंट में ऐसी चीज दू, नृप विस्मय लाई ।।७।। भरा कटोरा ले रबड़ी का, चला सभा मांहि । संग सेठिये केई साथ में, आये हरसाई ॥८॥ नमन करी नृप के सम्मुख प्रा, रखी भेंट लाई । अपना परिचय देय भूप को, सब ही दरसाई ।।९।। भरा कटोरा देख सामने, नृप यों फरमाई । कैसी है यह भेंट सेठ जी, देवो वतलाई ।।१०।। ८९ सेठ कहे यह फल है वृक्ष का, लाया भेंट ताई। राजा बोला अनुपम फल यह, कैसे जाय खाई ।।११।। कहां से तोडू अब मैं इसको, देवो बतलाई। खट्टा मीठा कैसा स्वाद है, इस फल के मांहि ।।१२।। सेठ कहे झट उठा हाथ में, लो मुंह के मांई । धीरे धीरे पीवो पाप नहीं, बीज इणां मोही ।।१३।। लगा होठ के नरपति पीवे, स्वाद गया प्राई। सोचे मन में ऐसा फल तो, मैं खाया नांहि ।।१४।। राजा बोला किया माफ कर, करो बरगज यांही। जितनी चाहो मिले मदद सब, लीज्यो मंगवाई ।।१५।। ऐसे फल कितने हैं पास में, देवो फरमाई । सेठ कहे है वृक्ष पास में, दंगा फल लाई ।।१६।। बहुत तरह के फल पाते हैं, उस वृक्ष के मांहि । समय समय पर भेंट करूगा, मीठे फल लाई ।।१७।। अब तो सेठ हर रोज बनाकर, लावे मिठाई । पेड़ा पेठा मिश्री मावा दे, भांत भांत लाई ।।१८।। खाते खाते नृप ने भेजी, अन्तःपुर मांही । देख रानियां कैसा फल यह, विस्मय मन लाई ।।१९।। खाते ही बंद गई सीक तव ठेठ उदर ताई। ऐसे फल तो कभी न खाये, देना सदा लाई ॥२०॥ रहा जहां तक सेठ हमेशा, देता खूब लाई। खाने वाले करें प्रशंसा, ऐसी नहीं खाई ॥२१॥ एक माह तक सेठ वहां पर, खूब करे व्यापार । लाखों को वहां करी कमाई, कोना हिए विचार ।।२२।। वापिस जाऊं अपने देश में, लेऊं घर संभार । गही सोनकर पाया सभा में, दीनी अर्ज गुजार ।।२३।। प्रव जानिज देश नाय में, कार लीना व्यापार । पाप सपा से रहार भने, सूब लिया गजगार ॥२४॥ राजा बोला तुम जावो तो. वृक्ष हमें दे जाय । मट माह होरा राज की, लो यहां पर बावाम ॥२५!! ये मेवप ने यहां राजा दुग गुनाग । मंड पर जमा ही साटो प्रयः वाम !! १० छोड़ गाय को सेठ वहां पर हुअा सद्य तैयार । खूब खरीदा माल पोत में, भर लीना उस बार ॥२७॥ लाकर गाय को भूप पास आ, कह दीना सब हाल । राजा बोला जो भी फल दे, ले पाना तत्काल ॥२८॥ गाय किया पेशाब भूप को, ला दीना उस बार । पीते थूका भूप हृदय में, प्राया क्रोध अपार ॥२९॥ धोका देकर सेठ जा रहा, पकड़ लावो इस वार । नकली वृक्ष दे असली को ले, जाता देश मंझार ॥३०॥ दौड़ संतरी पकड़ सेठ को, नृप के सन्मुख लाय । रोष लाय नृप बोला ऐसे, धोखा देकर जाय ।।३१।। कड़वे गंदे फल का वृक्ष तू, छोड़ यहां पर जाय । माया करके अन्य वृक्ष दे, जरा शर्म नहीं प्राय ।।३२।। मीठे फल का यही वृक्ष है, सेठ कहे तत्काल । नहीं समझे तो अब समझा दूं इसका सारा हाल ।।३३।। दूध निकाल गाय का वहां पर बनवाया जब माल । खाकर समझा यही चीज है, नरपति पूरा हाल ।।४।। वस्तु वही पर ज्ञान बिना नहीं, प्रास्वादन कर पाय । अच्छी तरह से समझा तब ही, बना मिठाई खाय ।।३।। इसी तरह जिनवाणी रहस्य को, समझो गुरुजन पाय । नहीं समझे तो योग मिला यह, सभी व्यर्थ में जाय ।।३६।। अज्ञान अवस्था के कारण ही, जग में गोता खाय । अतः समझ स्वाध्याय करो नित, ज्ञानी जन फरमाय ॥३७।। 'प्राज्ञ' प्रसादे 'सोहन' मुनि कहे गुरु शिक्षा लो धार । हृदयंगम हो जाय अगर तो उतरोगे भव पार ॥३८॥ ।
२९ । मदनरेखा चरित्र ॥ [ तर्ज : ख्याल की] यह चरित्र अनुपम, मदन रेखा का सुनिये ध्यान इसी भरत की भू पर प्यारा मालव नामा देश । वहां सुदर्शन शहर मनोहर, मणिरथ है भूपेश जी ।।१।। लघुभ्रात युगवाहु जिनके, महागुणी नरवीर। मदनरेखा है पत्नी उनकी, परमगुणी गंभीर जी ।।२।। मणिरथ के कोई पुत्र हुआ नहीं, सोचा मन के माय । लघु भ्रात युवराज बनाकर, दीना काम संभलाय जी ॥३॥ दोनों बन्धव पूर्ण प्रेम से, रहे राज संभाल । सारी जनता परम सुखी है, घर घर मंगल माल जी ॥४॥ युगवाहु के पुत्र चन्द्र यश, वाल्य अवस्था मांय । योग्य हुआ वह सभी कला में, हुशियारी ली पाय जी।।५।। समयान्तर में सुख शय्या पै, अर्धरात के माय । मयण रेहा को सुपने मांहि, पूर्ण चन्द्र दिखलाय जी ।।६।। स्वप्न देखकर जागृत हो गई, पति पास में प्राय । मधुर गीत से जगा पति को, स्वप्न भाव दरसाय जी ।।७।। पूर्ण चन्द्र को देखा मैंने, प्राज स्वप्न के मांय । बहुत विनय से सारी बातें, दीनी वहां सुनाय जी ।।८।। युगवाहु कहे स्वप्न प्रापका, है प्रति प्रानन्द कारी । समय पूर्ण होने पर जन्मे, पुत्र महा सुखकारी जी ।।९।। प्रोजस्वी तेजस्वी पुत्र की, होरोगी महतारी। प्रिय मुख से प्रिय उत्तर पाकर, खुश हो गई है नारी जी ।।१०।। सत्य वचन जो श्राप कहे, वह कर लीने स्वीकार । क्षमायाचना करके वापिस, प्रा गई महल मंझार जी ।।११।। धमं साधना करने के हित, बैठ गई उस बार ! प्राया स्वप्न नहीं निप्पल होवे, सोने हृदय मंकार जी ।।२।। भाग्यशाली है जीव उदर में, शुद्ध भावना पाय । धर्म साधना कारने मांहि, चित्त महा लग जाय जी ।।१३।। मुन्त मती रे. दर्शन करती, जिनवाणी मन भाय । धर्म कार्य नित नया लगवा, स्वाध्याय मिनचाय जी ।।१४|| समय मुपाय दान करें निन, शुद्ध भावना नाय । शुभ भावों में महामणी , दिवा को जायजी ११५, एक दिन राणी छत के ऊपर, नहाने के हित पाय । युगबाहु की पत्नी पर, नृप की दृष्टि पड़ जाय जी ।।१६।। लखकर अनुपम रूप भूप के, हृदय वासना छाय । उसे प्राज तक देख न पाया, रूप अति मन भाय जी ।।१७।। मन में बस गई नार भूप के, सोचे सदा उपाय । काम वासना से प्राणी की, मति भ्रष्ट हो जाय जी ।।१८।। पुत्री सम मानी जाती है, लघु भ्रात की नार । किन्तु विषय लोलुपी नृप को, ध्यान न रहा लिगारजी ।।१९।। कामी नर अंधा कहलावे, सभी ज्ञान विसराय । जाति पांति और ऊंच नीच का, भेद रहे कुछ नाय जी ।।२०।। उसी समय वहां दक्षिण दिश से, रुद्रसेन भूपाल । चढ़कर पाया मरिणरथ नृप पर, सेना लेय विशाल जी ॥२१॥ मरिण रथ भी ले सेना साथ में, रणभूमि में जाय । युगबाहु कहे मैं जाता हूं, पाप यहीं रुक जांय जी ।।२२।। युद्ध जीतकर पाऊं जल्दी, यह है मेरा काम । उनको ऐसा मजा चखाऊं, फिर नहीं लेवे नाम जी ।।२३।। मणिरथ उसकी बात मानकर, खुशी हुमा अनपार । यह मौका है सुन्दर, मेरा काम बने इस वार जी ।।२४।। सोचा नृप ने मदनरेखा यहां, है एकाकी नार । यदि करू प्रयत्न सदा ही, सफल हो इस वार जी ॥२५।। युगबाहु तो गया युद्ध में, नहीं कोई रखवार । चतुर दासी को बुला पास में, समझाऊं सब सार जी ।।२६।। दासी जाकर उसको मेरे, अनुकूल कर प्राय । मेवा, मिठाई, वस्त्राभूषण, भेजू देकर प्राय जी ।।२७।। समझाकर दासी को सब कुछ, थाल दिया संभलाय । सामग्री लेकर महलों में, रानी पास में प्राय जी ॥२८॥ वाणी मधुर बोलती दासी, चरणों में नम जाय । महाराजा यह भेंट प्रेम से, भेजी आप लिराय जी ।।२९।। मदनरेखा निष्कपट भाव से, सोचे यों मन माय । मुझे पुत्रीवत् समझ ज्येष्ठजी, सामग्री भिजवाय जी ॥३०॥ बालक सम निर्दोष हृदय से, कर लीनी स्वीकार । भेद भाव नहीं समझ सकी, मन में है सही विचार जी ।।३१।। दिल में किंचित पाप नहीं, अपने सम पर को जाने । स्वयं दुष्टता रखे नहीं, नहीं बुरा और को माने 1॥३२॥ कुछ समय बाद दासी को समझा, भेजा उसके पास । जाकर चरण नमी और अपनी, कह दी बातें खास जी ।।३३।। ९३ महाराजा की नजर पड़ी, तब ही से पीड़ित थाय । अव तो कामना पूरी कर दो, महाराजा मन चाय जी ।।३४।। ऐसे शब्द दासी के सुनकर, आँखें लाल हो जाय । सिंहनी सम गरजकर बोली, यह क्या रही सुनाय जी ॥३५।। जहर हलाहल कटु शब्द तू, लेकर यहां पर आई। तुझे बोलते दासी ऐसे, जरा शर्म नहीं आई जी ॥३६।। फिर मत कहना ऐसी बातें, लू गी खींच जवान । सुनकर दासी लगी कांपने, बिगड़ जायेगी शान जी ॥३७।। डरते-डरते दासी भूप को, सारी बात सुनाय । सिंहनी सम वह हाथ न आवे, शांति दिल में लाय जी ॥३८।। कामी का मन रुके न जब तक, चरणपोष नहीं खाय । बुरी नियत रखता है हर दिन, धन अरु धर्म गमाय ॥३९।। चाहे कितना भी दुःख पावे, पर नहीं छोड़े काम । नीच नीच से नीच काम भी, करे होय वदनाम जी ।।४०।। मदनरेखा भी समझ गई है, जेठ नीति बदकार । शील धर्म को भंग करन का, है उसका विचार जी ॥४१।। अतः दूत के साथ पति को, को, वह पत्र पहुंचाय। शत्रु जीतकर युगवाहु भी, राह मांहि मिल जाय जी ॥४२।। करके नमन दूत ने सत्वर, पत्र दिया पकड़ाय । पढ़कर पत्र को युगवाहु ने, ध्यान दिया कुछ नाय जी ।।४३।। सेना साथ में है, युगवाहु कदली वन में प्राय । स्वयं वहीं रुक सेना को तब, आगे दी भिजवाय जी ॥४४॥ प्राकर दूत ने मयण रेहा को, दीना हाल सुनाय । शत्रु जीतकर सानन्द पा गए, रुके बगीचे मांय जी ।।४।। यह सुनते ही मदन रेखा भी, सत्वर वहां सिधाई। पाकर के उद्यान मांय, वह पति को शीश नमाई जी ॥४६।। लेकर के विधाम पति से, अपनी बात सुनाई। ज्येष्ठ हृदय में पाप भरा, विश्वास योग्य ये नाहि जी ।।४७।। किंतु युगवाहु के दिल में, हुया नहीं विश्वास । 'भाई ऐसा नहीं हो सकता, व्यथं को बकवास जी ॥४८॥ मगिरथ सोच रहा यो मन, जब तक जीवित भात । तब तक मेरी नहीं बन सकती, यही है सनी बान जी ||४९।। 'प्राज्ञ प्रसादे' मोहन मुनि महे, कितना बुग विकार । मातृ-मनेह को भूल, मारन को, हो गया है यार जी ।।१०।। किसी तरह भी युग पातु मो, पहुंगा पर शाम । स्दा मेरा माफ होप, मिट जाये द्वन्द मारनी||१.! - - युगबाहु जब नहीं रहेगा, निश्चय बस में प्राय । यहां से फिर यह कहां भगेगी, ऐसे मन में लाय जी ॥५२।। मरिणरथ करता है उपाय, अब जिससे हो विश्वास । ससझ सके नहीं भ्रात प्रौर, पहुंचा दू यम के पास जी ।।५३।। मालूम हुप्रा मरिणरथ को यह, शत्रु जीत पा जाय । कदलीवन में ठहरा हुआ है, निशां वहीं बिताय जी ।।५४।। वहां अकेला अच्छा अवसर, नहीं चूकू इस बार । अंधकार छाया है गहरा, हुमा जाने को तैयार जी ।।५५।। लेकर के तलवार हाथ में, कदली वन में प्राय । पाकर पूछा पहरेदार से, युगबाहु कहां पाय जी ।।५६।। पहरेदार ने मणि रथ के ये, शब्द सुनी मन लाय । मध्य निशा में यहां प्राकर, क्यों शब्द विचित्र सुनाय जी ॥५७।। वह बोला हे नाथ ! अभी तो, शयन कक्ष के मांय । सुख-शय्या पर शयन कर रहे, गहरी नींद छा जाय जी ।।५८।। चौकीदार से कहा, त्वरित जा, उनको यह दरसाय । महाराजा आये मिलने को, अभी रहे बुलाय जी ॥५९।। आज्ञा पाकर उस ही क्षरण, वह शयन कक्ष पर प्राय । बाहर से आवाज लगाकर, रहा उन्हें दरसाय जी ।।६०।। बुला रहे हैं नृपति प्रापको, सत्वर मिलना चाय । यह सुनते ही मयणरेहा के दिल में, धोखा प्राय जी ॥६१।। पतिदेव से बोली नाथ ! वहां, सावधान हो जाय । अभी यहां आने के कारण, खतरा रहा दरसाय जी ॥६२।। अतः आपसे मेरी प्रार्थना, अभी नहीं वहां जांय । कुछ समय निकलने बाद पधारें, भृत्य साथ ले जांय जी ।।६३।। किन्तु युगबाहु ने उनकी, सुनी नहीं कोई बात । व्यर्थ शंका यह मन में लावे, बुरे नहीं मुझ भ्रात जी ॥६४।। युगबाहु सोचे यों मन में, शत्रु जीतकर पाया। इसी खुशी में मुझसे मिलने, बड़ बान्धव यहां प्राया जी ।।६५।। अभी मिल में जाकर उनसे, भावी प्रबल कहाय । मयणरेहा कहे जरा दूर से, रुख तो देख लिराय जी ॥६६।। आए विपत्ति सन्मुख जिनके, सारी बात विसराय । हित की बात कहे उसे तो, बहुत बुरी लग जाय जी ।।६७।। शंकालु होती हैं नारिये, शंका व्यर्थ भराय । सुनी अनसुनी करके वहां से, भ्रात मिलन को जाय जी ।।६८|| उतर महल से नीचे प्राया, जहां भ्रात वहां जाय । कदलीवन के दरवाजे पर, भ्रांत खड़ा दिखलाये जी ।।६९।। - ९५ उन्हें पता क्या भ्रात हृदय में, कैसे भरे हैं भाव । समझा दूध को दूध सही वह, नमाचरण धर चाव जी ॥७॥ विष भरी तलवार गले पर, मरिणरथ दीनी चलाय । भ्रात घातकर महीपति वहां से, भगा नगर में जाय जी ।।७१।। राह में महाभयंकर विषधर, सोता नींद के माय । अश्व पैर से घायल कुपित हो, मणिरथ को डस जाय जी ।।७२।। विषधर का विष फैला तन में, नरपति वहीं गिर जाय । देह त्याग कर त्वरित प्रात्मा, दुर्गति मांहि जाय जी ।।७३।। कितना पाप करे छिप करके, आखिर जाहिर हो जाय । बुरे कर्म से भव-भव बिगड़े, ज्ञानी सच फरमाय जी ।।७४।। युगवाहु के लगी जोर की, भूमि पर पड़ जाय । मयणरेहा वहां पाई दौड़ती, देख पति दुःख पाय जी ।।७।। देखा पति को श्वास गिन रहे, चन्द समय मेहमान । हिम्मत रखकर कहे पति से, सुनलो देकर ध्यान जी ।।७६।। प्रात ध्यान तज धर्म ध्यान में, मन को श्राप लगावें। भाई पर नहीं द्वेष भावना, मन के मांहि लावें जी ।।७७।। मेरी भी नहीं चिन्ता लावें, शील प्रखंडित पालू। चाहे जितनी पाए विपत्ति, कुल रेखा पर चालूजी ॥७८।। अरिहंत प्रभु में ध्यान रखें, और शरण प्रभु का धारें। नवकार मन्त्र ही जपें हृदय में, झूठे नाते सारे जी ।।७९।। कोई किसी का ग्राण शरण हो, नहीं नजर में प्राय । चार शरण ही रक्षक सच्चे, देवे पार पहुंचाय जी ।।८।। साज दिया है पति देव को, अपनी चिन्ता टार । संलेखन-संथारा करवा, खोला स्वर्ग का द्वार जी ।।१।। खूब सुनाकर अन्त समय तक, जगा दिया धर्म राग। धर्म ध्यान ध्याता युगवाहु, दिए प्राण को त्याग जी ।।२।। मदन रेखा ने सोचा मन में, ज्येष्ठ हृदय में विकार । भाभी अनिष्ट कर सकता है वह, छाया पापाचार जी ।।३।। प्रतः सण ही तनू नगर तो, गोल रक्षा के काज । इमे पता नहीं मर्प दंग मे, पर भय गार महाराज जी १८४|| गरणा ने प्ररिहन प्रनु का, छोड़ चली परिवार । बात अंधेती पटवी मयंकार, लेनी नाम नवसारी ।। पर दोनों बाद भी मात्र, या अर्थी के गांद ! मशान भूमि में नेता यारक, दीनी माग समायो। मुगवा का तुम राजा मी बा. ही मारे गाम, पावादी विवाद भी मदनरेखा को शील धर्म की, रक्षा का है ध्यान । और न चिन्ता मन में कुछ भी, जा रही वन दरम्यान जी ।।८।। कांटे कंकर लगे पैर में, रक्त बहे दुःख पाय । जंगल भयंकर डरे अकेली, वन पशु सम्मुख प्राय जी ।।८९।। दहाड़ शेर की सुनकर वन में, मन में रही घबराय । महामन्त्र नवकार हृदय में, जपती आगे जाय जी ।।९।। प्राणी हिंसक मंत्र प्रभावे, कोई पास नहीं प्राय । चलते-चलते सूर्योदय का, समय पास पा जाय जी ।।९१।। गर्भकाल का समय आ गया, प्रसव पीड़ा हो जाय । चन्द काल में इन्द्र कान्ति सम, पुत्र रत्न लिया पाय जी ।।९२।। कर्मगति विचित्र जगत में, कहां से कहां ले जाय । राजकंवर का जन्म हुआ है, सुनलो ध्यान लगाय जी ।।९३।। क्या सोचे क्या होवे, क्षण में कोई पता नहीं पाय । अत: कभी तन-धन-यौवन का, दर्प नहीं मन लाय जी ।।९४।। वहां जंगल में कौन सार ले, पूछे कौन वहां प्राय । एकाकी महाराणी वहां पर, सोच रही मन मांय जी ।।९।। कैसे कर्म किए हैं मैंने, पति वियोग हो जाय । राजमहल, परिवार छूट गया, प्रा बैठी वन मांय जी ।।९६।। काम स्वयं करती है सारा, प्राधा चीर रही फाड़ । झोली बना सुला बालक को, बांध दिया है झाड़ जी ॥९७।। लटकाकर डाली से उसको, चली सरोवर पास । जल से तन को स्वच्छ किया, धोती है वस्त्र गुणरास जी ॥९८।। जल्दी जाकर उसे संभालू, प्राणवल्लभ मुझ लाल । दिल का टुकड़ा तरु पर लटका, क्या है उसका हाल जी ।।९९।। 'प्राज्ञ प्रसादे' 'सोहन मुनि' कहे, मातृ हृदय विशाल । कैसी भी स्थिति होवे सम्मुख, करे सार संभाल जी ।।१००।। नहीं समझे नादान मातृ ऋण, कैसे उसे चुकाय । भूल गये हैं सारी बातें, उल्टा दुःख दे जाय जी ॥१०१।। वापिस आते मारग मांहि, वन हस्ति मिल जाय । प्यासा था मदमस्त बना, पानी पीने को प्राय जी ।।१०२।। उठा सूड में, बहुत जोर से, फेंका अम्बर माय । तभी गगन में विद्याधर का, विमान उड़ता प्राय जी ॥१०३।। विद्याधर ने झेला उसको, विमान में बैठाय । बोला उससे सुनो सुन्दरी, भय नहीं मन में लाय जी ।।१०४।। हम दोनों ही मौज करेंगे, जग के सुख लें भोग । तेरा मेरा सहज रूप से, अच्छा मिल गया योग जी ।।१०।। ९७ मेरे पास में कमी नहीं है, भोगें भोग सुख मांय । इतनी बात सुनते ही उसका, हृदय गया घबराय जी।।१०६॥ अरे कर्म ! तू इस जीवन में, कितने खेल खिलाय । एक मिटा नहीं, दूजा सम्मुख, दुःख दौड़ा क्यों प्राय जी ।।१०७।। दुःख शृखला लग गई पीछे, अन्त नहीं दिखलाय । कर्म बांधकर लाई साथ में, उनको कौन मिटाय जी ॥१०८।। सोच रही विघ्नों के साथ में, केई विघ्न पा जाय । किन्तु साहस रखकर मन में, आगे बढ़ना चाय जी ॥१०९।। शील धर्म की रक्षा करते, चाहे प्राण भी जांय । अभी धैर्य से काम लिया तो, सहज सफलता पाय जी ।।११०।। पहले जैन मुनि के दर्शन, करू यह दिल में चाय । विद्याधर कहे अच्छी बात कही, यह मेरे मन को भाय जी ।।१११।। मेरे पिताजी जैन मुनि हैं, मैं वहां पर ही जाऊ । मेरे मन की कह दी तुमने, दर्शन अभी कराऊ जी ।।११२१. मुनिवर पास पहुंचकर दोनों, सविनय शीश नमाय । विधिवत् वन्दन करके बैठे, चरण शरण के मांय जी । ११३।। सोचे जिनवाणी सुनने की, गहरी मन में प्राय । चार ज्ञान के ज्ञाता मुनिवर, महागुणी कहलाय जी ॥११४।। दोनों को ही जान ज्ञान से, गुरु वाणी फरमाय । ब्रह्मचर्य की व्याख्या करके, भिन्न भिन्न समझाय जी।।११।। सुनकर मणिप्रभ विद्याधर के, दिल में भाव जग जाय । उसी वक्त वह खड़ा हो गया, नियम मुझे करवाय जी ।।१६।। परनारी सेवन का मेरे, जीवन भर पच्चक्तारण । स्वपत्नी की करू मर्यादा, रखू पूरा ध्यान जी ।।११७।। मयणरेहा का व्रत लेते ही, चित्त शान्त हो जाय । जो भी था 'मय मेरे दिल में, मिट गया मुनि पसाय जी ||१८|| इतने में ही वायु वेग सम, गगन पोर ने प्राय । माधि युक्त वहां देव देवी, परिवार माथ में लाय जी ।।११९॥ मामानिक सब मृत्यों संग में, देव . सभा में प्राय । पहले नमन महागनी को हार, फिर पागे वन बन जाय जी ।।१२०।। प्रदक्षिणा दे मुनि को बंदा, यंदन, को बंठा ग्राम ! विचार यह घटना मगर, विस्मय मग मनाया। ऐसी घटना जीवन में नहीं, को नकार में भाग ! मुनिराज में पहले नारगो, नयाँ बंदER२२!! विधिवत् चंदन पर मुदिर , : दरमाय । कारी कारा मा, यो नम:
- . पंचमहाव्रत धारी प्रापको, पीछे नमा यह प्राय । इसका रहस्य बतलाकर मेरी, शंका दूर हटाय जी ।।१२४।। हे मणिप्रभ ! मुनिवर बोले, सुनले ध्यान लगाय । मणिरथ युगबाहु का जीवन, दीना उसे सुनाय जी ।।१२।। पूर्वभव का युगवाहु यह, इसका पति कहलाय । मणिरथ ने तलवार वारकर, भू पर दिया गिराय जी ।।१२६।। अन्तिम समय धर्म ध्यान से, खूब साज दिलवाय । मोह भंगकर पतिदेव को, अरिहन्त शरण बतलाय जी ।।१२७।। चार शरण ही इस जीवन को, भव से पार लगाय । धर्मध्यान का भाता देकर, पतिव्रत धर्म निभाय जी ।।१२८।। अन्तिम सांसें पूरी लेकर, देवगति में जाय । अमर भवन में ऋद्धिशाली देव बना यह प्राय जी ॥१२९।। सभी प्रताप धर्म पत्नी का, धर्म ही पार लगाय । अतः प्रथम किया नमन बाद में, मुझको शीश झुकाय जी ।।१३०।। सारी घटना सुनकर राणी, शांति मन में लाय । पतिदेव की सद्गति हो गई, दिव्य देव बन जाय जी ।।१३१।। अब मैं अपनी शंका पूछ ल, मुनिवर से इस बार । ऐसा अवसर कहां मिलेगा, मन में हुआ विचार ।।१३२।। वंदन करके मुनिवर सन्मुख, अपनी बात सुनाय । लटका शिशु को प्राई डाल पर, उसका हाल फरमाय जी ।।१३३।। चार ज्ञान के धारक मुनिवर, सुत का हाल बताय । हे महारानी! मतकर चिन्ता, उचित स्थान पर जाय जी ॥१३४।। पुण्यशाली उस पुत्ररत्न को, पद्मरथ नृप ले जाय । मिथिला नगरी मांहि उसका, महोत्सव रहे मनाय जी ।।१३५।। पालन पोषण करती राणी, हर्षित हो मन मांय । ऐसे पुत्र से गोद भरी लख, फूली नहीं समाय जी ।।१३६।। नाम संस्कार भी किया है, उसका नमिराज कहलाय । सभी संबंधी प्रसन्न हो रहे, प्रत. शान्ति नृप पाय जी ।।१३७।। सुर युगबाहु कहे रानी से, सेवा हो दरसाय । मदनरेखा कहे पाप मुझे, अब मिथिला दो पहुंचाय जी ।।१३८।। अमर उसी क्षण निज शक्ति से, मिथिला में ले जाय । रणी ने सतियों को देखा, स्थानक में चल पाय जी ।।१३९।। सब सतियों को वंदन करके, बैठी सभा के मांय । अमृतमय वाणी सुन करके, वैराग्य मन में छाय जी ।।१४०।। जग झूठा यों समझ सती ने, सोचा करू कल्याण । उसी वक्त सतियों से बोली, सत्य आप फरमान जी ।।१४१।। - ९९ मेरी भावना दीक्षा लेकर, कर लू जन्म सुधार ! यह अवसर जा रहा हाथ से, विलंब न होय लिगार जी ।।१४२।। जाति कुल सम्पन्न राणी को, दीक्षा दी तत्काल । सती सुनता नाम रख दिया, षटकाया प्रतिपाल जी ।।१४३।। दीक्षा ले सुव्रता सती ने, तप चालू कर दीना। ज्ञान क्रिया दोनों के बल से, प्रात्म शुद्ध कर लीना जी ॥१४४।। मिथिला में तव चन्द्रकला सम, बालक बढता जाय । पुत्र प्रभावे शत्रु नृप भी, नमे भूप को प्राय जी ॥१४५।। पाठ वर्ष का हो गया बालक, कलाचार्य बुलवाय विनयवान, गुणवान कंवर नित नये ज्ञान को पाय जी ।।१४६।। चन्द समय में बुद्धि बल से, सभी कला पा जाय । कलाचार्य ला कंवर नमी को, नृप को दिया भुलाय जी ॥१४७।। देख कंवर को भूप प्रसन्न हो, किया खूब सम्मान । कलाचार्य को दिया खूब धन, पहुंचाया निज स्थान जी ।।१४८।। बचपन बीता यौवन वय को, पाये राजकुमार । परम विदुपी कन्याओं से, विवाह करे भूपाल जी ।।१४९।। 'प्राज्ञ प्रसादे' सोहन मुनि कहे, पुण्यवान जहां जाय । प्रानन्द-मंगल वरते हर दिन, लोग सदा गुण गाय जी ।।१५०।। योग्य राजकंवर को लखकर, नरपति करे विचार । इसको सब जिम्मेदारी दे, लेलू संयम भार जी ।।१५१॥ पुत्र काम करने लायक है, फिर क्यों देर लगाऊं। करूपात्म कल्याण समय वयू, अपना व्यर्थ गमाऊं जी ।।१५२१! राज्याभिषेक कर दिया उसी क्षरण, हो गए नृप नमिराय । गुरु पारा में प्राकर भूपति, दीक्षा ली अपनाय जी ।।१५३।। न्याय नीति से करते हैं वहां, राज श्री नमिराय । पूर्ण शांति है सभी प्रजा में, होये नहीं प्रकाज जी ।।१५४।। पर चली का भग नहीं मन में, मुख से करे निवाग । जना बाजा बनी प्रजा हो, यही कहावत ग्राम जी ।।१५।। नरपति श्री नाम मांगारिया, मुग मांग रहा मानन्द । किमी बात की कमी नहीं है, भुष पुण्य का कन्द जी ।।१५।। एधर नन्तगरगना भी, सामन्द में गय मनाम । गुवांगपुर में प्रजानी है. नरपति मुगा जी ।। १.१.३ नमीर राजा हा पहन, मन्द गरिन । बागका अनकना, बारमा ११८ कहा गया कि मुदगर, मोर ! है श्रेष्ठ श्वेत एक हस्ति हमारे, जंगल मांहिं प्राय । अपने सरदारों को भिजवा, पकड़ उसे मंगवाय जी ।।१६०।। हस्तिशाला मांहि करि के, दिया तुरन्त बंधवाय । महावत को प्राज्ञा दे दीनी, अच्छा माल खिलाय जी ।।१६१।। बात फैलते पट हस्ति का, पता नमि ने पाया। उसी वक्त लिख पत्र दूत के, हाथों वहां भिजवाया जी ।।१६२॥ समझाई सब बात दूत को, हस्ति दो लौटाय । लेकर पत्र तुरन्त दूत तब, सुदर्शनपुर प्राय जी ॥१६३।। चन्द्रयश की सभा बीच में, दूत आ गया चाल । अभिवादन कर पत्र भूप के, कर में दिया तत्काल जी ।।१६४।। लिखा पत्र में पटहस्ति मुझ, प्राया तुम्हारे पास । उसको जल्दी भेजो यहां पर, नृप प्राज्ञा है खास जी ।।१६५।। इतने दिन हुए नहीं सूचना, पाप अोर से प्राय । अतः पत्र के पढ़ते ही दो, पटहस्ति भिजवाय जी ॥१६६।। नहीं तो होगा कटुफल इसका, सुनिये ध्यान लगाय । जिसके जिम्मेदार पाप ही होंगे, स्पष्ट दिया लिखवाय जी ॥१६७।। उसी वक्त कर लाल नेत्र यों, चन्द्रयश फरमाय । अरे दूत जाकर कह देना, अपने मालिक तांय जी ॥१६८।। यदि मार्ग में रत्न मिले तो, वापिस नहीं लौटाय । हस्ति शाला में बंधा हुआ है, हिम्मत हो ले जाय जी ।।१६९।। इस पर भी सन्तोष न होवे, करिये जो मन चाय । जिसको मिले उसी की वस्तु, जग मांहिं कहलाय जी ।।१७०।। अपमानित कर खूब दूत को, वहां से दिया लौटाय । दूत खिन्न हो सत्वर वहां से, मिथिला में प्रा जाय जी ।।१७१।। सभाभवन में नमिराज को, बीतक बात बताय । अभिमानी राजा ने ऐसे, दीनी बात बढाय जी ।।१७२।। हस्ति रत्न मुझ पास आ गया, कैसे दू लौटाय । अपमानित कर मुझको वहां से, दीना सद्य भगाय जी ॥१७३॥ उदंडता सुन चन्द्रयश की, नृप को क्रोध आ जाय । सेनापति बुलाए तत्क्षण, प्राज्ञा उन्हें सुनाय जी ॥१७४।। जल्दी करो तैयारी यहां से, चतुरंगिणी लो लार । महाभयंकर युद्ध करन हित, हो जावो तैयार जी ।।१७५।। सेनापति कर सब तैयारी, भूपति सम्मुख प्राय । सभी तरह से सेना हाजिर, आप पधारें राय जी ।।१७६।। सेनापति की बात श्रवणकर, नृप सेना में प्राय । अस्त्र-शस्त्र सब सजा लिए हैं, चले स्वयं महाराय जी ।।१७७।। १०१ प्रादेश। कूच किया सेना ने सुख से, सुदर्शनपुर में प्राय । चारों ओर से घेरा नगर को, डेरा दिया लगाय जी ॥१७८।। चन्द्रयश ने जान लिया है, घेरा दिया है डाल । नमीरथ नृप चढ करके प्राया, सुन लिया सारा हाल जी।।१७९ ।। चन्द्रयश भी सेनापति को, दे दीना सत्वर सेना लेकर चलना, देर करो मत लेश जी ।।१८०॥ रणशूरा सेना ले प्राया, रणक्षेत्र के मांय । दोनों की तैयारी हो गई, शक्ति देवे दिखाय जी ।।१८१।। रणभेरी बज उठी जोर से, सुनी वीरता छाय । कायर मानव सुनकर वहाँ से, स्वयं भागना चाय जी ।।१८२।। सती सुव्रता जान युद्ध को, सोचे मन के मांय । अरे ! ....अनर्थ होयेगा भारी, भ्रात भ्रात रण मांय जी ।।९८३।। बिना गुनाह ही प्रजाजनों की, मृत्यु होय बेकार । पता नहीं है कौन सामने, लड़ने को तैयार जो ॥१८४।। अतः यहाँ से जाकर उनको, समझाऊं तत्कार । श्रा गुरुणी से अर्ज करी, मैं जाऊं युद्ध मंझार जी ।।१८५।। चाहिए. प्राज्ञा मुझे प्रापकी, सुव्रता अर्ज सुनाये । गुरुणीजी ने प्राना दीनी, सतीयुगल साथ में जावे जी ।।१८६।। प्राज्ञा पाकर हुई रवाना, रणभूमि में जाय । नमिरथ राजा देख दूर से, सन्मुख चलकर श्राय जी ।।१८७।। वंदन करके अर्ज गुजारे, कैसे आप पधारे। कारण क्या है रणभूमि में, कह दो भाव हो सारे जी ।।१८८।। महासती उपदेश रूप में, नमीरथ को समझाय । एक हाथी के लिए हजारों, मानव क्यों मरवाय जी ।।१८।। दया धर्म को निकला दिन मे, सोनो कुछ महाराय ! नम्र भाव मनमिरथ बोला, प्रश्न परिका नाय जी ।।१९।। यहां मान-सम्मान मार है रजत मी बान पर नहने है, नृप, और न को. बालनी ।।१९।। अपनी प्रतिष्ठा राजनीति नि, पुल को पान । मे गुन हो? मा पा कागि पाप मारजी।।११ मयान । लोटाको नाममा पारी।। 2 जिसने देखा बन्धु मिलन वे, नेत्र प्रार्द्र हो जाय जी ।।२०९।। यह सुनते ही नमिरथ राजा, चौंक पड़े तत्काल । किस तरह चन्द्रयश मुझ बन्धव, मैं समझ सका नहीं हाल जी ॥१९४।। पूर्वकाल का महासती ने, दीना हाल सुनाय । हे राजन् ! असली माता हूँ, संशय दूर हटाय जी ॥१९५।। चन्द्रयश महाराजा निश्चय, बड़ बन्धव कहलाय । सती वचनों पर नमीराज को, दृढ़ श्रद्धा हो जाय जी ।।१९६।। उस ही क्षण आदेश सुनाकर, युद्ध वन्द करवाय । क्षमा मांगने बड़ वन्धव से, लघुभ्राता रहा जाय जी ।।१९७।। प्रमुख जनों को अपने साथ में, ले लीने नरराय । विना सवारी पैदल जावे, हर्षित हो मन मांय जी ।।१९८।। युद्ध-विराम करा सती जी, चन्द्र पास में प्राय । अनायास लख सती मात को, स्वयं सामने जाय जी ।।१९९।। 'प्राज्ञ प्रसादे' सोहन मुनि कहे, महासती प्रभाव । अनेक मानव बचे मृत्यु से, फैली खुशियां चाव जी ।।२००।। सती पधारी कैसे यहाँ पर, विस्मय मन में लाय । विधिवत् वंदन करके राजा, खड़ा हो गया प्राय जी ॥२०१॥ महासती उपदेश रूप में, नृप को यों समझाय । पूर्वकाल का परिचय देकर, अपनी बात सुनाय जी ।।२०२।। नमीरथ नृप और तुम दोनों ही, मेरे हो अंगजात । दोनों वन्धव लड़ो परस्पर, अच्छी नहीं है वात जी ।।२०३।। विना मतलब ही लोग हजारों, काल गाल में जाय । महा अनर्थ होता है इससे, जीव नर्क गति पाय जी ।।२०४।। चन्द्रयश राजा को सती की, बात ध्यान में प्राय । जिस राजा से लड़ने आया, वह लघुबन्धव थाय जी ।।२०५।। उस ही क्षण सब जोश भूप का, झट ठंडा हो जाय । प्रेम भर गया गहरा मन में, मिलू भ्रात से जाय जी ॥२०६।। इधर चन्द्रयश मिलने जा रहा, नमि उधर से प्राय । बीच मार्ग में दोनों मिल गए, गहरा प्रानन्द छाय जी ।।२०७।। लघु वन्धव ने शीश झुकाया, अग्रज ने उसे उठाया । भ्रातृ प्रेम चित्रण की शक्ति शब्द कवि नहीं पाया जी ॥२०८।। मधुर मिलन से दोनों के नयनों में अश्रु प्राय । १०३ . दोनों प्रोर के जयनादों ने, अम्बर दिया गुंजाय । दोनों बन्धव उसी हस्ति पर, बैठे मन हर्षाय जी ॥२१०।। नगर निवासी सारे नगर को, दीना खूब सजाय । स्थान-स्थान पर द्वार बने, दोनों की जय लिखवाय जी ।।२११।। अमरपुरी सम शोभा लखकर, जन-जन आनन्द पाय । गाजे-बाजे से खुशी साथ में, राज्य मांहि ले प्राय जी ।।२१२।। दोनों बन्धव स्नेहपूर्वक, बैठे सिंहासन जाय। तभी चन्द्रयश के दिल मांहि, ऐसी भावना प्राय जी ।।२१३।। यह संसार असार भार सम, मुझे रहा दिखलाय । अतः इसी क्षण तजकर इसको, संयम लू अपनाय जी ।।२१४।। करी मन्त्रणा मंत्रीगरण से, तज करके संसार । आत्म साधना करके अपना, जीवन लेऊ सुधार जी ।।२१५।। अपना सारा राजभार, नमिराय को दिया सम्भलाय । चन्द्रयश नृप बड़े हर्प से, गुरु पास पा जाय जी ।।२१६।। चढ़ते भाव से दीक्षा लेकर, संयम में चित्त स्माय । ज्ञान-साधना करके तप में, जीवन दिया लगाय जी ।।२१।। दो राज्यों को नमिरथ राजा, सानन्द रहे संभाल । सभी प्रजाजन सुख से अपना, जीवन रहे निकाल जी ।।२१८।। कई वर्षों के बाद भूप से, दाह ज्वर हो जाय । उस पीड़ा से व्याकुल हो नृप, कई वैद्य नुलवाय जी ।।२१९।। अनेक विधि ने की निकित्सा, मांति नहीं हो पाय । जजों-ज्यों करे दवाई त्यों-त्यों, पीड़ा बढ़ती जाय जी ।२२०}} मंत्र-यंत्र एवं जादू-टोना, कोई काम नहीं प्राय । प्रयोग मारे फेल हो गए, वेदना बरती जाय जी ||२१|| रहिया वायदा नन्दन, सारे मन में मात्र । उसने ना मिली गुहा मांगनेन की पाय जी ।।२२।। मापुर १ की सभी शनियां, नन्दन धिमें हाल ! किन्तु मा को क मा नि गे, कष्ट उपादित मांय २६॥ पाइदे भर को या नीद में, घननाय । निमयनीही १२.४ - RTI, ही में प्राम।
तभी भृत्य वह नम्र शब्द में, नृप को यों दरसाय । स्वयं रानियां चन्दन घिस रही, कंकरण रहे टकराय जी ।।२२६।। कंगन की यह ध्वनि हो रही, सुनिये श्री महाराज । नरपति ने आदेश दिया यों, बंद करो पावाज जी ।।२२७।। सभी रानियां यह सुनते ही, कंकरण दिए निकाल । सौभाग्य रूप निज करके मांहि, एक-एक लिया डाल जी ॥२२८।। उसी समय वह कर्ण कटु ध्वनि, सहज बंद हो जाय । इससे रुग्ण भूपति मन को, अति शांति मिल जाय जी ॥२२९।। भृत्य पास में बुलाके पूछा मुझे सही बतलाय । चन्दन घिसना बंद किया क्या, कंकण ध्वनि नहीं प्राय जी ।।२३०।। तभी भृत्य कर जोड़ नम्र हो, ऐसी बात सुनाय । चन्दन अब भी घिसा जा रहा, कारण वह दरसाय जी ॥२३१।। अनेक कंकण थे कर मांहि, उनको दिया उतार । एक-एक कंकण पहना कर में, सभी आपकी नार जी ।।२३२।। इस कारण से कंकण ध्वनि, अब नहीं कान में प्राय । दो में है टकराव उक्ति है, शान्ति एक में पाय जी ।।२३३।। यह सुनते ही नमिराय जी, सावधान हो जाय । अरे प्रात्म ! एकाकी रह तू, शांति उसी में पाय जी ।।२३४।। सोचे राजा यदि मेरा यह, दाह ज्वर मिट जाय । आत्म शांति हित तब एकाकी, बिचरू मैं सुख मांय जी ।।२३५।। सारे राज्यभार को तजकर, देऊ ममत्व हटाय । जगज्जाल के निकल फंद से, दीक्षा लूअपनाय जी ॥२३६।। महीपति को यह बोध स्वयं का, जब दिल में हो जाय । उसी वक्त सब तन में पाया, दाह रोग मिट जाय जी ।।२३७।। मानो कुछ भी रोग ना हुअा, मात्र स्वस्थ हो जाय । उसी वक्त सब कुटुम्बियों को, लीने पास बुलाय जी ।।२३८।। मनोभावना जाहिर करने, अपनी बात सुनाय । रानी, स्वजन और सभी संबंधी, सुनलो ध्यान लगाय जी ।।२३९।। शान्ति अनुभव हो रही मुझको, रोग सभी विरलाय । प्राज स्वप्न में खूब स्वच्छ मेरु पर्वत दिखलाय जी ।।२४०।। १०५
इस पर्वत का विचार करते, जाति स्मरण हो जाय ।
जाति ज्ञान से स्पष्ट पूर्व भव, मुझे रहा दिखलाय जी ॥२४१)
पूर्वजन्म में साधु धर्म से, सुरगति लीनी पाय ।
वहाँ का प्रायु पूर्णकर यह जीव यहां पर प्राय जी ।।२४२।।
अब मैं यहाँ पर दीक्षा लेकर, भव फेरा टूटाल ।
मेरी आत्मा सिद्ध-बुद्ध बन, काटे सब जंजाल जी ॥२४३।।
उस ही क्षरण नृप बुला पुत्र को, राज्य दिया संभलाय ।
श्राप स्वयं लुनकर सिर का, दीक्षा ली अपनाय जी ।।२४४।।
सब कुटुम्ब को छोड़ विलखता, जैन मुनि बन जाय ।
अप्रतिबंध विहारी बनकर, वन संड मांहि जाय जी ।।२४५।।
स्वयं इन्द्र ब्राह्मण का रूप धर, मुनि पास में प्राय ।
कई प्रश्न किए हैं उसने, उत्तराध्यान के मांय जी ।।२४।।
प्रन्त अपीश्वर नमिराय ने, मोक्ष स्थान लिया पाय।
पावागमन का राह बंद कर, जन्म-मरण मिटाय जी ।।२४०।।
नियापार प्राचार्य गुरूबर, नानकराम जी महाराज ।
जिनकी सम्प्रदाय के मांहि, त्यागी-तपासी मुनिराज जी ।।१४।।
सो माघु एक मात्रय मुनिकर, ली गद गां।
पांच विगय को त्याग पठाई, कारे निरगर महायजी।।४।।
अनेक सन्तों में समा गुरुवार, पसालाल जी उपकारी।
सार्वजनिक पर समाज गलिश, काय कि हितकारी जी ॥२५.७१।
तानु नरण रज गोहन मुनि रहे, जपो ममा नवार ।
मबर, गामागिता अपना जीवन में, लोगफल अपगारी ||
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