Adarsh Library, Jaipur
Sangrah Hotel Ka Kamraha
Front matter
No text on this page.
होटल का कमरा
No text on this page.
होटल का कमरा
(नी-ग)
भगयतीप्रमाद याजपेयो
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
उपन्यासकार : एका परिचय "मेरा दूगरा उपन्याम मार्केट में प्रा शुगा है। प्रागने नहीं देगा।" "मादब, मैंने अपने इस उपन्याम में एक नया दर्शन पेश किया है।" "मेग बहानी-मग्रह छपने घाला है ग्राप अवश्य परियेगा।" "गई पविता लिपी है मुना?" अगर प्रापी माहित्य और माहिन्यारी में बहुत दूर का भी वास्ता पहा है नो मापने इनगे मिलते-जुलने वाक्य जरर गुने होंगे। काफी हाउस हो या टी-हाउस, रेल वा सफर हो या बम का सफर-- माहित्यकार बनने का दावा करने वाला वन जन्दी ऐसी कोई-न-कोई बात कह बैठना है। हम दोनों में प्राज गे तीन वर्ष पूर्व नप या मशाक प्रचलित था रिछोटा या बा, पिद्दी या पहाड - हर साहित्यकार एक ढोग होता है। पाप उपर पाम वैट नहीं कि उसने बजना शुरू पार दिया । "पाप दाजपंयोजी है।" -मोहल्ला कमेटी की एक मीटिंग थी। जिममें एक मजन ने इन गन्दी के साथ हमारा परिचय एक मारी प्रादमी के माय कराया। वात माई-गई हो गई। कितने ही वाजपेयी, त्रिवेदी और चतुर्वेदी पू० पी० के हर गोहल्ले और गली में वाते हैं। भीटिंग लगभग तीन घण्टे चली, यहम और झडप में हमारे वरावर बैठे उस व्यक्ति वाजपेयी ने भी गरमा-गरम हिस्सा लिया। फिर समाप्त होने के पश्चात् हन मयने अपनी-अपनी राह पकडी। जिस घर में सभा हो रही थी उसके गृहस्वामी ने दूमरे रोज हममे कहा-"पाप लोगों ने : ६: कल वाजपेयीजी से विशेष वात नहीं की। कुछ तो साहित्य चर्चा होनी ही चाहिए थी।" हम चाँके । हम में से एक ने उत्तर दिया-"क्यों कोई खास बात तो थी नहीं, न कोई साहित्य की चर्चा छिड़ी और फिर उन महागय से विगेप रूप से साहित्य की बात क्यों की जाती साहब।" उत्तर मिला, “वाह ! आप सब तो साहित्य प्रेमी है, वाजपेयीजी अनी नये-नये यहाँ आये हैं, कोई-न-कोई बात किसी-न-किसी बहाने छेड़ी जा माती थी।" "आखिर कौन महागय हैं यह वाजपेयी ! "अच्छा, तो आप अभी तक समझे नहीं। यह थे भगवतीप्रसाद वाजपेयी।" नाम सुनते ही हम चीके, चौकन्ने हुए और एक दम चुप हो गये । आदचर्य-निश्रित खीझ भी हुई। हमारी थ्योरी को इस उपन्यासकार ने गलत सिद्ध कर दिया। हमारे मज़ाक के फार्मूले का जैसे उस व्यक्ति ने कसकर मजाक उड़ाया। तीन घंटे हमारे पास वह व्यक्ति बैठा रहा और भूने से भी उसने यह आभास न होने दिया कि वह हिन्दी का जाना-माना उपन्यासकार है। छत्तीम उपन्यासों को पैदा करने वाला बड़ी शक्ति से कुछ भी कहे-मुने बगैर बहस में भाग लेता रहा। अभी कुछ ही दिन पूर्व उनका नया उपन्यास 'सपना बिया गया' साप्ताहिक हिन्दुस्तान में धारावाहिक रूप से छपा था । उसको लेकर हम दोनों में वर्ना भी हुई थी। ऐसा लेग्वक नुपचाप बिना-समझाये-जताये इतनी देर पान बैठकर भी उठ गया-ऐसा प्रतीत हया जैसे कोई चोर मंडली में जाकर बैठे, हम न पहचानें और पकड़ से निकल जाये। इस प्रकार वाजपेयीजी से हमारा परिचय आश्चर्य की नींव पर हुमा । तब से प्राज ताज का उठना-बैठना है, चाय और गप-गप है। पर दस महान् उपन्यासकार को हमने कभी अपनी शहनाई आप बजाते नहीं सुना । यह अफेली बात इसका प्रमाण है कि यह व्यक्ति महान् उपन्यासकार तो है ही, पर इससे कहीं अधिक महान मानव है । - :७: आश्चर्य वाजपेयीजी से घनिष्टना के एक वर्ष पश्चात् हुमा । हमारी मंडनी में हर दूसरे-तीसरेपोई-न-कोई दिनी आपघाते थे। और ममः-अननप, दात दिना तान पानी रचनामा नेदोरनी करते थे। उन महोदय के जाने के पश्चात् अन्धा-साना मसाजीड़ा लेते थे। पर एक दिन हमारे पाश्व का विकाना न रहा जब वाडोयो डी के घर उनी अनारो में हनने एक पवितो म्ह देखा और नदि ये--स्वयं नगवतीप्रसाद पायी । इस तरम्हर्ने इन व्यक्ति ने दूसरी चोट दी। हमने थ्योरी में कुछ संगोपन रिया और मजबूर होकर उन उजन्यानकार और कदि को दाको सद माहितगारों की पंक्ति ने अलग पौर पर बैठा दिया । क्या मालूम मार कार में हिम व्यक्ति कीर बैठे हाँ दही मनवदीप्रसाद वाडोवी हों। वह माना परिचय स्वयं नहीं देने। इसलिए उनका मदने अच्छा परिचय स्नग चित्र है जो अन्य स्थान पर मोमिन है । इन्हें पहिचान लीजिये, न्हीं ऐलान हो नि नाहित्यका यह कन्या माप साय पटों दा करता हे और फिर विना पहिचाने हायों ने निक्त जाय। लासनाय मेठ
होटल का कमरा
६
नाएँ
१७
.
२५
.
४६
स
रामपथ
सिंहनाद
एक प्रतीक्षा
पुनर्मिलन
• मिलन : एक बलिदान
उपहार
इन्द्रजाल
५८
६८
होटल का कमरा में मौन है, मिरगन मौन हूँ और विधान में प्रमिट विधान पी नाति मग मौन रहमा निश्चित है। लेनिन पर प्रचं नहीं हि मेरे गाग रहने को कुछ नहीं है। जन्म के समय मे ही मेरी यानी सी हु । गौतम नानगी नाति में जष्ट्र यना दिया गया है। मैं गय-पर मुनता. मय-छता है, लेरिन राय पर नही मरता। गव-पुछ दार-धार देगरी रहनी मेरे माग्य में लिया है। माज तक मनै चिनी भी गई नहीं की। प्राज तर मैंने कोई गम नही बनाया। प्राप मेरे यहाँ मावर चाहे जितनी देर वैठिए और चाहे जो कुछ कीजिए, मैं दिगी में कुछ नन्गा । एक वी वान दूमरे में कर देना मेरे लिए पाप है। यह बात दूमरी है कि प्रवन्ध की शिथिलता में मेग म्वरूप-मेगे बेगनपा--देखकर आप अनुमान लगा में कि कल कौन-कौन से लोग मेरे यहाँ पारे, वैटे, सोये और अपने गुणो या परिचय दे गये। लेपिन ऐमा मानव बम है । मेरी देनरेग निन्य होती रहती है। पलंग की चद्दर, मेज या मावरण और निथि-पपावली या पन्ना नवीन सूर्योदय की मांति निमय बदल जाता है। गफाई दिन में दो बार हो जाती है। लेकिन मैं अपना दु.स किमने और कैसे प्रकट करूं? हर राफाई के बाद में यह गौचने लगता है कि क्या मेरा जन्म इसीलिए हुना है कि जो लोग मेरे यहाँ पायें, मुझे गन्दा फरें ? और मैं कभी उनसे यह कह भी न सक रिमाप यह क्या कर रहे हैं । कभी मापने सोचा कि मेरी स्थिति वितनी दयनीय है ? पन्छा जाने दीजिये। मैंने कुछ सोचा है । पहले उगे गुन 10 : होटल का कमरा लीजिये। मुझे कुछ ना प्रतीत हुआ कि यह सब भी जीवन का ही लक्षण है नित्य ही देवता है कि जहां स्वच्छता के दवेतचरण मेरी नीमा के भीतर प्रविष्ट हुए, वहीं मानो उनके पीछे-पीछे ही मलिन-बसना मलिनता भी मंद ला सा धमको ! स्वच्छता का अस्तित्व धीरे-धीरे मन्द पड़ता गया, योति नलिनका सूब उछल-उछलकर, नाच-नाकर अपने पैर फैलाती न। अन्त में जब स्वच्छता के लिए नील का यह व्यवहार अनय हो गया, तो उसे अनुमानन ने काम लेना पड़ा । परिणाम यह हुआ कि माडू नारकर नलिनना को बाहर खदेड़ दिया गया। अब आप देखें कि मलिनता प्रांर स्वन्ता में संघर्ष की यह स्थिति जीवन के कितने निकट है ! स्वच्छता वयं के नाय अण-मर नो स्थिर नहीं रह पाती नीर मलिनता का व्यापारतुरन्त प्रारम्भ हो जाता है । मेम पर गमवानी न्यनी है। लेकिन मनुष्य की भूल को क्या कोगिएगा ! जो माहब कमरे में विराजमान हैं, वे बहुतपढ़े-लिग और एक नन्य नागरिक हैं, फिर भी निगरेट पीते हुए, उसकी राब, फ़र्ग पर ही गिरा रहे हैं । बनलागं, अब जाप टमक्तो नया कहेंगे? जीवन की इन स्थिति को देख देखकर मनो अपनर आश्चर्य में पड़ जाता हूँ। प्रश्न-पर-प्रदन मेरे मन में जमने लगते हैं। मैं मोनने लगता है कि आज की दुनिया में नफ़ाई ती अपेक्षा गन्दगी का ही मूल्य अधिक है, स्थान अधिक है, मान गोन भएन नी अधिक है। जोर सझे क्षमा करें तो मैं कहूंगा कि । होटल का कमरा : (११) तो मेरे सौभाग्य का श्रेय, मेरे गौरव की उच्चता भी कम महत्त्वपूर्ण नहीं है । मैं आज की सभ्यता की एक अमिट देन हूँ। साधारण नगरों मे चाहे मेरी उपयोगिता केवल प्रवासीवृन्द के लिए ही हो, किन्तु बड़े और विशाल नगरो में मेरा उपयोग नागरिकता का एक अंग बन गया है । ममाज के कठोर नियन्त्रण से जिनका जीवन-मोत ही मूखने लगता है, वे अपनी ग्रंथियां सुलझाने अथवा प्रानन्द के मन्द-मन्द झकोरे लेने, अन्तर की वेदना आंसुओं की भाषा में व्यक्त करने अथवा भविष्य का कर्म-पथ निश्चित करने का जब कही अवसर नहीं पाते, तब अन्त में मेरा द्वार खटखटाने पर विवश होते हैं और कभी-कभी तो ऐसी घटनाएँ नी हो जाती हैं, जो भटकते-मटकते एक दम मे यम जानेवाले पथिकों की जीवन-धारा ही बदल देती है । कई वर्षों की बात हुई। एक बार मेरे यहाँ एक ऐमी युवती आ गई, जिसके गीतं केश विसरे हुए थे। एक हाय में गीली साडी थी, दूसरे में तौलिया। स्पष्ट था कि वह बाथरूम से स्नान करके ग्रा रही है। भीतर पाने ही उसने किवाड में लगा हुआ कांच का हैडिल घुमाया और द्वार बन्द कर लिया । लेकिन जब द्वार बन्द हो गया, तब उसे कुछ ऐसा मालूम हुआ कि बाहर से भी कोई ताला लगा रहा है। उसने किवाड़ो को ज़ोर से खटखटाया। लेकिन तब तक ताला लगानेवाला जा चुका था । वह हैरान हो उठी कि यह बात क्या है ! क्या मेरे साथ कोई जाल रचा गया है ? वह पसीने मे भीग गई। कमरे में अन्धकार छाया हुआ था। इसलिए उसने विजली का बदन दवा दिया। कमरा प्रकाग से जगमगा उठा । लेकिन प्रकार हो जाने पर उसने देखा कि यहाँ यह नवयुवक कोन आ गया । चद्दर भी मेरा नहीं है । ओ , तो मैं भूल से दूमरे कमरे में आ गई। अनर्थ हो गया। कुगल इतनी ही है कि नव- १२ : होटल का कमरा रहा है। उसके युवक सो हृदय की गति तीव्र हो गई-~-यह क्या होनहार है ? यदि वह नवयुवक जाग पड़े तो। तो वह पूछेगा कि तुम कौन हो ? क्या तुम ? "पर तुम यहाँ कैसे ? क्या तुम्हारी मन्शा यह थी कि ? सोचते-सोचते वह काँपने लगी। कोई दूसरा अवसर होता, तो उसे अपनी ही इस कल्पना पर हंसी आ जाती । लेकिन उस समय वह स्वयं हंसी का पात्र वन गई। ऐसा जान पड़ता था कि उसका दम घुटा जा रहा है। इतने में उस युवक ने करवट ले ली। लेकिन उस युवती के मन में नाना प्रकार की कल्पनायों के बवंडर आ-जा रहे थे। वह सोच रही थी 'ऐमा न हो कि कहीं मुझे यात्मघात करना पड़े !' इसी अवस्था में लग- 'भग आधा घण्टा वीत गया। पर उस चुदती के लिए वह आधा घण्टा जैसे एक युग के समान बन गया था। इतने में द्वार वन्द करनेवाला पूर्व निश्चय के अनुसार आ गया। युवती ने घटना की सारी कथा कह- कर उससे क्षमा मांगी। युवती का दुर्वल मन अव भी कॉप रहा था । वह अपने कमरे की ओर जाने लगी। पर इतने में वह सोया हुआ-सा नवयुवक वोल उठा---'अव जाती कहाँ हो रंजना ? व्हरो, वात सुन लो। रंजना हक्की-वक्की रह गई। अरे यह तो उसका पूर्व परिचित सुनील है ! वह फिर लौट पड़ी। भण-भर पहले जिसके मुख पर भय, आशंका और घबराहट का भाव था, अव वही विमल हास में परिणत हो गया। वहबोली-~~-'मैं तुम्हें खोजते-खोजते हार गयी । लेकिन अब तो मिल ही गये। मैं अभी आती हूँ। जरा दम मार लूं। मुझे तुम से बहुत-सी वातें करनी है। समझे ? ये दोनों साथी वर्गों के विछुड़े हुए थे । जीवन के घटनाचक्र ने इन्हें बहुत दूर फेंक दिया था। पर उस दिन वे ऐसे मिले कि सदा के लिए एक बन गये। इस प्रकार सभ्यता की नई पौध के लिए मैं एक मिलन आज के पीड़ित, त्रस्त और अतृप्त मानव के अन्तर्मन का दर्पण हूँ। मेरे यहाँ आप सामाजिक नियन्त्रण की सीमा-रेखाओं से सर्वथा मुक्त और । मैं - ।
होटल का कमरा : १३ बच्चन्न हो जाते है। यहां कुछ भी बाध्ये, कुछ भी पीजिये, अपने गार्थी पौर माथी में चाहे जिस तरह मिये-योलि, मन में साये तो गाद भी पाल; नाहे अपने गा मे मिलवाइ वीनिये, चाहे समाधिस्य हो जाय, या चाहे नो अन्तरिक्ष में नीन होकर पुनर्जन्म पी तैयारी हो नार धोभिये, अपने पापको छोडकर कोई आपको मना नहीं करेगा। हो, दोशों का पालन प्रापको करना पड़ेगा। एक तो यह कि सामाजिक गामि मे पाप बाधा न डालिये और दूगरी यह कि पैसे की कमी कभी प्रवट न होने दीजिये । यस युग मापता है और हम गव आपके लिए, पीढ़ी-दर-पीढी के ताजमहल । कनी-मानी भागकर पाये हुए प्राणियों, गुप्तचरों और मालिकाग्दिो को जीवन या भी थोड़ा-बहुत परिचम मुझे मिल जाता है। ऐम भी दिन माते हैं जब देश को अमर विभूतियां मेरे यहां पदार्पण कर जाती है । मैने ये दिन भी देंगे हैं कि बाद मे जिनको मावंदेगिक गम्मान प्राप्त हुआ पौर जिनके तैलचित्र से हमारे स्वामियो ने अपनी वैटक गजाई...' जब मेरे यहाँ टहरे तय कोई उन्हें पहचान भी नहीं सका । किसी ने अपनी पोर मे एक कप चाय के लिए भी उनको न पूछा। मालूम नहीं वे मिलनी दूर गे पाये थे और कितने थके हुए थे। उनके पैर कुछ-मुट घुल- पुमरित थे। उनके परो में पड़े हुए हाले यह स्पष्ट बता रहे थे कि उन्होंने पहाडी जंगलों की पैदल यात्रा को है। प्रात-ही-माने उन्होने कपाट बन्द कर लिए। वे पलंग पर लेटे मोर तुरन्त गो गरे । कुछ देर बाद नौकर यह पूछने को पाया भी कि वे क्या पाना पनन्द करेंगे, पर मुझे ऐमा जान पड़ा कि वे जितने भूमं हैं, पर उसने कहीं अधिक हैं। ये इतमीनान की एक नीद-मर चाहते है 127 जब नौकार ने विवाः पटगटा, तब मैंने मृत भाषा में पर स्टार उमो विदा कर दिया कि मेरा बुलबुल मो रहा है, पर न मचा। पर परापक पान बजे ननरी नीद उचट ची। प्रोमा, १४ : होटल का कमरा . तो यह जानकर प्रसन्नता की एक झलक उनके मुख पर दौड़ गई कि उनका दायाँ हाथ अब भी चेस्टर के अन्दर पड़ी पिस्तौल पर स्थिर है। - वे तुरन्त उठे और ठहरने का हिसाव करके चल दिये । घंटे-भर वाद देखता हूँ, पुलिसवान या पहुंचा और पूरा होटल घेर लिया गया। हर एक कमरा छान डाला गया । -. पर सिंह की सन्तान कहीं इस तरह पकड़ में आती है ! वो इस घटना की चर्चा रही । लोग हाथ मल-मलकर रह गये कि पराधीनता की वेड़ियां काटनेवालों का सरदार हमारे यहाँ ठहर गया और हम उसका कुछ भी स्वागत न कर सके। तब मैंने मौन भाषा में कह दिया---'तुम तो रुपये को ठहराते हो । मनुष्य को ठहराना तुम क्या जानो ?' पर इस घटना से और भी एक बात स्पष्ट होती है। वह यह कि संसार में मनुप्य के प्रकट रूप की चाहे जितनी महिमा हो, किन्तु उसके गुप्त रूप के अागे वह तुच्छ है । संसार वर्तमान का उतना मान कभी नहीं करता, जितना अतीत का तात्पर्य यह कि जो सुलभ है, वह महत्त्वपूर्ण नहीं है। महत्त्वपूर्ण तो वह है जो दुर्लभ है। और कदाचित मेरा महत्त्व भी इसीलिए है कि मैं दुर्लभ को सुलभ बनाने का एक महँगा साधन हूँ। ईश्वर की इस अनोखी सृष्टि में तरह-तरह के व्यक्तित्व पड़े हुए हैं। इस समय मुझे एक ऐसे व्यक्ति की याद आ रही है जिसे मैं ग्राजीवन भूल न सकूँगा। वे मेरे यहाँ कई दिन ठहरे थे। वर्ण तो उनका श्याम था, लेकिन अाँख बड़ी-बड़ी थीं । बदन की छरहरी वेप-भूपा में अभि- नेता और तवियत के राजकुमार । नाम था उनका विश्वनाथ । उनके पास अधेड़ उम्र के एक सज्जन बहुत आते जाते थे। जबकि एक प्रकार से वे उनके मित्र ही थे। अच्छा-सा नाम था-वीरेश्वर । पर वे उन वेकार-से थे । उनकी वेषभूषा में विश्वनाथ जैसा बाँकापन न था। एक दिन की बात है, विश्वनाथ पलंग पर बैठा हुआ था। पीठ की ओर कई तकिये रखे हुए थे। पास ही महाशय वीरेश्वर विराजमान थे। धीरे-धीरे बातें वन्द हो गई और ऐसा प्रतीत हुआ कि विश्वनाथं की दिनों कुछ ।
इंजन काग: ११ प्रांवें पर ही है। इस हर दिसनार के गुरदे में वेद पर पड़ा। कर देगा-मो नोट पार। पर दीडर की हिन्दन पाहिबाबहा दे। इनिन र उनमें एक ने निकाटीद छोड दिद। इनर बार वार मापी, दोनों ने चाय दावाददर निरलका निदे। अन्त में जद वह चलने लगा, दो विश्वनय कुछ नहीं दोरा । पर जब वीरेश्वर विक उटाकर जाने नमा, नो सिदनाय ने कह दिया-'सुनो दोस्बर, जान पड़ता है प्राकल नृन बेगरी के कारण कुछ ज्यादा कष्ट में हो। अगर ऐसी बात है दो नुम्ने मेरी उब में मो का एक ही नोट क्यों निकाला? लो, और में पायो।' इमार वीरेश्वर ने विश्वनाथ के पैर धाम दि। दह रो पड़ा । रो-रोकर उमने विश्वनाय को बतलाया कि मेरा नतिर पनन इम नीमा तर हो चुका है कि चोरी भव मेरे लिए अपराध नहीं, पंगा हो गया है । लेकिन अब चाहे मैं भूखो मर जाऊँ, पर यह कर्म कभी न करूंगा। इस घटना से मैं इम निवपं पर पहुंचा कि पतित-में- पनित मनुष्य के अन्दर एक महकार-एक स्वाभिमान होता है। दुनिया के प्रागे वह चाहे जितना गिर जाय, पर अपने साथी के प्रागे जिग्ना टर्म स्वीकार नहीं होता। दिम्बनाय की उदारता ने जव वीरेश्वर के अहंकार को नुनोती दी, नब उमका हृदय हिल गया । वह अपने को छिपा न सका । आज मैं भी अाना कुछ छिपाऊँगा नहीं । जो कुछ मैंने भोगा है, सब कह डालूगा । प्राप मानते हैं- चीर, बदमाश, जुगारी, व्यापारी, सेठ, अफसर, शिक्षक डाँक्टर, वकील, कलाकार, नर्तकी और वैश्या कोई भी हो, ठहरने का निषेध मेरे यहां किसी के लिए नहीं है । व्यवहार सबके साथ मुझे एक मा करना पड़ता है । मैं अपना क्रोध, क्षोभ, उत्साह, और विषाद कभी कुछ प्रकट नहीं कर सकता। न मैं रो सकता हूँ, न गा सकता हूँ। तो क्या मेरा सिर नीचा इमीलिए है कि मैं मौन रहता हूँ ? मौर चूति मौन रहता हूँ, इसलिये किराये पर उटता हूँ। फिर किराये की दर भी १६ : होटल का कमरा ? मेरी आवश्यकता और अवसर के अनुसार बदलती रहती है । तो क्या मैं केवल उपयोग के लिए बनाया गया हूँ ? मनुष्य की सारी दुर्बलताओं का भार अपने कम्पित वक्ष पर लादे हुए इस तरह कब तक मैं चलता रहूँगा, इसका कोई ठिकाना नहीं, कोई निश्चय नहीं । हत्याएँ मेरे सामने होती हैं, जहर के प्याले मेरे सामने पिलाये जाते हैं। लज्जाहरण की मैं कमाई खाता हूँ। फिर भी कभी मुंह नहीं खोल सकता। मेरे चिरस्थिर अस्तित्व और चक्षुद्रप्टा व्यक्तित्व की यह कैसी विडम्बना है ! गहन अन्धकार से भरे, कर्दम और कलुप के वन, कठोर हाथों से, एक सभ्यताभिमानी मोहाकान्त मानव को, जब मैं वन्य-पशु की भांति व्यवहार करता देखता हूँ, तब चुपचाप यही सोचता रह जाता हूँ कि प्रभू, तेरी लीला अपरम्पार है । यह कितना अच्छा हुआ, जो तूने मुझे जड़ बनाया। यदि कहीं चेतन बनाया होता, तो ऐसे नारकीय दृश्यों को देखने से पहले अपने मनुप्यत्व के गौरव के नाम पर, या तो ये आँखें ही फोड़ लेता, या मेरा हृदय ही अपने-आप फट जाता।
No text on this page.
१८ : रेखाएँ तो सरिता को इतना बुरा मालूम हुआ कि उसने उलाहने से भरा हुआ ऐसा पत्र भेजा जिसे पढ़कर मैं तिलमिला उठा । अव तो विवश होकर मुझे आना ही पड़ता है । यहाँ के नाते से सरिता मेरी भाभी होती है। पर सरिता के साथ यदि मेरा यही नाता होता, तव तो कोई बात न थी। किन्तु उसके साथ मेरे जीवन के इतिहास के अनेक पुठ मुद्रित हुए है । आज जी न माना, तो अपने उसी अतीत इतिहास के पृष्ठ उलटने बैठ गया हूँ। एक दिन ननिहाल के पड़ोस के एक घर में मेरा निमन्त्रण था । आमंत्रित करने वाली नारी को मैं मामी कहा करता था । माँ से सुना था, बचपन में इस मामी का मुझ पर वहुत स्नेह रहा है । ननिहाल के उस मुहल्ले के शिशुओं में सब से अधिक स्वस्थ होने के कारण यो साधारण रूप से सभी मुझसे स्नेह रखते थे; पर उन सब से अधिक प्यार मुझे इस मामी का ही प्राप्त था। वे मुझे अपने साथ खाना खिलाती थीं, झूला झुलाती थीं और मेरे इच्छानुसार खिलौने तथा मिठाइयाँ मँगाती रहती थीं। इस कारण मैं अपने घर न रहकर अधिकतर उन्हीं के घर रहता था। बचपन के बाद शिक्षा-मंदिरों में घूमते-घामते जव मैं युवक होकर लीटा और अपने मामा के यहाँ गया, तभी मुझे उक्त निमन्त्रण मिला था। उस निमन्त्रण वाले दिन की याद अभी तक ताज़ी है । कुछ ऐसी वात भी थी कि दस-बारह वर्ष के बाद मैंने वैसा प्रिय भोजन पाया था। मैं भोजन करता जाता था, मामी मेरे ऊपर पंखा झलती जाती थीं, बीच- बीच में वे अपनी बातें भी कहती जाती थीं। खुब अच्छी तरह याद है, उन्होंने कहा था - "अाज दस-बारह वर्ष के वाद तुम मेरे वर पाये हो। तुम्हें क्या भला याद होगा कि मेरे घर के इसी आँगन में तुम वर्षों खेले हो । तुम्हें भला क्यों सुधि होगी कि मैंने अपने इन हाथों से तुम्हें कितने दिनों तक दूध-भात खिलाया है । यहाँ तक कि अनेक वार तुम, मेरे साथ, इतने विभोर होकर सो जाते रहे हो कि ५.र उस रात बहुत चेष्टा करने पर भी अपने नाना के घर नहीं रेसाएँ : १६ गये।" उस समय मैंने मामी से इन बातों के उत्तर में क्या कहा था, मो बिलकुल याद नहीं है। बस यही, इतना ही याद रहा गया है। हाँ, तो उस दिन सूब अच्छी तरह से छाकर भोजन कर लेने के अनन्तर मामी ने कहा-"सरिता, भैया को पान तो लगा दे।" मोजन में बाद जय उस दिन वह पान लगाकर ले पायी, तब एक बार मैंने उसे देया । ताजे फूलों का गगरा जैसे मदमाती सुगन्ध से निकट वर्ती व्यक्ति की इच्छाशक्ति को अपनी मोर खीच लेता है, वैसे ही सरिता को देखकर मेरे मन का चोर मुझे कामना के वाहन पर बिठाकर उड़ा ले चला । ठगा-सा रहकर में देर तक यही सोचता रहा-कमी यही सरिता एक नन्ही-सी झरना थी। प्राज तो "माज की बात बिल्कुल और है। प्राण तो यह वास्तव में सरिता है। मामी ने कहा-"सरिता अब सयानी हो चली है । उसका ब्याह जल्दी ही करना है।" सरिता मुझे पान देकर चली गई और मामी मुझमे इमो प्रसंग में बातें करने लगी। कहाँ-कहो वर ढूंढा गया है, कोन कसा है, किसके यहाँ किसने में तय हो जायेगा, यही सब वे बतलाती रही । प्रत्येक बात को मैं बड़े ध्यान से सुनता गया। अन्त मे उन्होने कहा-मैं तो प्रसत में कुछ और ही चाहती थी रमेश, लेकिन मेरे मन की बात हो नहीं सरी । लोगो ने कहा- वे कुलीन और बड़े प्रादमी है, तुम्हारे यहाँ व्याह करेंगे नहीं। मामी के मुंह पर मेरी दृष्टि थी । मुद्रा से ऐसा कुछ मालूम हुग्रा, से उनका स्वप्न-राज्य भंग हो गया है-उन्होने जो कुछ सोच रखा था, उसे होने नही दिया गया है । उस समय मैं क्या सोचता था, यह कैसे बताऊँ ? इतना ही कह माता हूँ कि मामी ने अपना यह मन्तव्य मुझसे प्रकट ही न किया हो। नो।
२० : रेखाएँ उस बार मैं अपने मामा के यहाँ एक मास रहा था। घर में कह आया था कि एक सप्ताह में आ जाऊँगा परन्तु वह सप्ताह तो इतनी जल्दी उड़ गया, जितनी जल्दी नूरजहां के हाथ का वाज़ भी न उड़ा होगा । दिन भर मित्रों में अठिलाया करता। उस गांव के निकट एक छोटी-सी नदी बहती थी। वह बड़ी मनचली थी । कभी-कभी जब एक- आप दिन पानी खुब बरस जाता, तव उसका वक्ष प्रान्त बहुत विशाल हो जाता था । एक कूल से दूसरे कूल का क्षेत्र दस गुना बढ़ जाता था। वा के दिनों में तो एक ही घण्टे में उसका रूप उग्न हो जाता था; फिर कम होते-होते दो-तीन दिन बाद पूर्ववत् हो पाता था । वह अपनी इस शोभा पर इतराया करती। उन दिनों प्रायः ऐसे अवसर भी आते थे जब उस नदी को इस रूप में देखकर अनेक पथिक निराश होकर लौट जाते या फिर दूसरे मार्ग से जाकर अपने अभीष्ट स्थान पर अभीष्ट समय के बाद पहुँच पाते थे। जाड़े के दिन थे । सरिता के सुविस्तृत कछार में गेहूँ और मटर के खेत डटे खड़े थे। उन हरे-भरे खेतों में सरसों और अलसी के फूलों की पंक्तियाँ देखते ही बनती थीं। वे कहीं ऊपर उठतीं, कहीं नीचे जाती, यहाँ तक कि थोड़े ही अन्तर से आने-जाने वाले पथिक एक-दूसरे को देख भी न पाते थे । अपने मित्रों के साथ सरिता के इस कछार की वहार देखने में भी प्रायः जाता था । हम घण्टों उसके तट पर बैठे-बैठे बातें करते रहे हैं। वार-बार मेरी ओर देख-देखकर वह तत्काल उन बड़ी-बड़ी आँखों को शील और लज्जा के बीच में बैठाकर नतमुख हो जाती थी। वह कुछ ऐसा समय था कि मौन भाषा में मैं न जाने क्या-क्या उससे कहता रहता और मेरी कल्पना की भाषा में वह न जाने क्या-क्या उत्तर देती रहती। कई दिनों के बाद एक बार अपनी पुस्तकों पर मेरी दृष्टि पड़ गयी तो एक उपन्यास उठाकर पढ़ने लगा। कुछ ही पन्ने उलटने पर देखता क्या कि उसमें यत्र-तत्र पेंसिल के निशान बने हुए हैं। मैंने मामी से पूछा- मैं Hnce
।
में नहीं आता,
"यह पुस्तक क्या कोई पढगया था ?"
मामी ने कहा --"हाँ, यह पुस्तक सरिता ले गयी थी। दूसरे दिन
उसने पढ़कर लौटा दी थी। तुम उस दिन, जान पड़ता है, कही गये
हुए थे रमेश । मैंने उसे ले जाने दिया था। क्या कही धब्बे पड गये हैं,
या कोई पन्ना फट गया है ?"
मैंने कहा-"नहीं, मैंने यों ही पूछा।"
मामी से इतना कहकर मैं एकान्त मे चुपचाप बैठ गया। उस समय
मेरे हृदय की कैसी अवस्था थी, यह बतलाना कठिन है। इस तरह
की बातें, जान पड़ता है, कहने को नहीं होती। वे तो हृदय के किसी
एक कोने से ही उठती है और वहीं स्थिर होकर बैठ जाती हैं। कोई
उन्हें छू नहीं पाता, कोई हृदय से उठाकर उन्हें अन्यत्र ले भी नहीं डा
सकता । इसलिए कैसे कहूँ, उस समय मैं क्या-क्या सोचता था ! ममझ
कैसे बताऊँ उन दिनों की दया।
परन्तु जब यह डायरी मेरी सहचरी हो रही है, तय इमने हृदयन्देश
मे अपनी इस लेखनी से मुझे सभी कुछ लिख देना है। फिर वह चाहे
जैसा हो।
एकाएक पन्ना उलट गया-कही एक भी अक्षर लिन्ना हुमा नहीं
मिला। जो कुछ मिला, वह केवल वही था-जिन मैं ऊपर बना हुआ
हूँ। वस, कहीं-कही पर खडी लकीर खीच दी गई थी और में:
कोई पंक्ति रेखाकित कर दी गई थी।
सच पूछिये तो उस समय इस बात ने मुझे बचा लिया।
लगा-यदि उसमे इतना भो न होता!
उपन्यास की भूमिका के जिन-जिन मंगो में -
था, मैं उन्ही अंशों को ध्यान से देखने लगा।
एक स्थान पर एक पैराग्राफ इन प्रकार दिन ----
जिसकी अोर कमी अांख उठाकर देव नीन्द दिने
नहीं, केवल सामाजिक मृखला के कारन हीन- -
।
- जनित शील के कारण भी। सम्भव है, हम उसे चाहते हों, क्योंकि उस दशा में हमारे मन में एक चोर घुसा रहता है । वर्षो हम उससे खुलकर बोल नहीं पाते, जी भरकर हँस नहीं पाते. यहाँ तक कि अवस्था-विशेष में उसके दर्शन भी नहीं कर पाते, वही हाँ वही एक दिन हमें मिल जाता है। प्रेम के खम्भों की ऊँचाइयों के दोनों छोर एक-दूसरे में इतने धुले-मिले रहते हैं कि दोनों हृदयों में वेतार के तार विर्षे रहते हैं।' मैंने देखा, इन शब्दों के मामने सरिता के हाथ की लाल पेंसिल से एक खड़ी लकीर बनी हुई है । आगे चलकर एक जगह छपा है- हम जिसे अभी बिलकुल नहीं चाहते यही बात उस सुदूर भविष्य की प्रथम सीढ़ी है जिस पर पहुँचकर कभी हम उसे चाहेंगे और इतना अधिक चाहेंगे कि केवल उसी को चाहेंगे । बात यह है कि हम जिससे घृणा कर सकते हैं उसमें प्रेम भी कर सकते हैं; अथवा यों समझिये कि जिससे प्रेम करने का हमें अधिकार है उससे घृणा करने का भी हमें पूरा अधिकार है। वरन् कहना होगा कि यह अधिकार तो हमें उससे भी पहले से है । तात्पर्य यह है कि जिससे घृणा की जा रही है उससे या तो कमी प्रेम किया जा चुका है या अब किया जानेवाला है। पर यह बात अब भी यह बतलाये बिना अपूर्ण रह जायगी कि मनुष्य बड़ा पाजी जीव है । कभी-कभी वह उपेक्षा के अन्दर से भी प्रेम करने लगता है। मैंने देखा, सरिता के हाथ की पेंसिल ने इन शब्दों के नीचे रेखा खींच दी है। मैंने पुस्तक ज्यों-की-त्यों बन्द करके रख दी। दोनों स्थानों में एक- एक कागज़ लगा दिया। एक-दो नहीं, अनेक वर्ष आये और चले गये। वसन्त पाया और कोने-कोने में झांककर चला गया । वर्षा की रिमझिम रातें इठलाती हुई आयीं और मुस्कराती हुई चली गयीं; पर यह पुस्तक ज्यों-की-त्यों रखी रही। क्या जाने सरिता ने और किन-किन स्थलों पर रेखाएँ खींची हों ! ऐसा जान पड़ने लगा, जैसे मेरे हृत्पिण्ड
No text on this page.
२४ : रेखाएँ अश्रुविन्दु मेरे हाथ पर टप से चू पड़ा। इसके साथ ही सरिता के मुर से यह भी सुनायी पड़ा--"कभी-कभी चिट्ठी तो भेजा करो रमेश ।" मैं इसका कुछ उत्तर न दे सका। उधर सरिता के तांगेवाले ने अपने घोड़े की पीठ पर जोर से चावु मार दिया कि मुझे ऐसा जान पड़ने लगा, मानो वह मेरी ही पीठ प , पड़ा है ! इसके बाद मैंने देखा, उसका तांगा हवा से बातें करने लगा है। मैंने सोचा था, मेरी हृत्पिण्ड रूपी-स्लेट पर जो रेखाएँ कमी खीं गयी थीं, वे कुछ धुंधली पड़ गयी हैं, पर अव मेरे हृदय के भीतर हाहाकार कह उठा-"नहीं ऐसी बात नहीं है।" आज फिर वही पुस्तक लेकर बैठा था। सोचा था, आगे भी देखू कि सरिता ने किन-किन स्थानों को रेखांकित किया है । पर ये पिछर चातें जो एकाएक मुझे मथकर छोड़ गयीं, तो अव यह पुस्तक आगे पि कभी उठाऊँगा भी या नहीं, कह नहीं सकता, हाँ, नहीं कह सकता ।
अपर्णा उनके नंग निलय से अभी लौटी हूँ। वे अब सो गये हैं । मेरा गरीर भी मव विश्राम चाहता है । लेकिन मेरा मन ? मन शान्त नहीं है। मुझे क्या हो गया है, यह मैं नहीं जानती। जमें-मैं क्यों पैदा हुई यह भी नहीं जानती। इतना अवश्य जानती हूँ कि पिताजी ने मुझे पदा लिया है। सन्तान की उत्पनि माता-पिता को प्रेरणा से ही होती है। प्रेरणा मे नहीं भी हो सकती है और प्रेरणा न रखने से भी हो सकती है। लेकिन उन्होंने तो मुझे केवल सन्तान होने के लिए ग्रामंत्रित किया है । हूँ तो मैं केवल बच्चा जनने के लिए पंदा हुई है ! मेरे जीवन की उपयोगिता केवल वच्चा जनने में है। मेरे जीवन में सत्य अगर कुछ हो सकता है तो यही-इतना ही। और यह सत्य जो इस समय सो रहा होगा? कौन जाने सो रहा है या करवटें बदल रहा है। उन्होंने पूछा था-"यह सत्य नाम का जानवर क्या बला है ?" "सत्य नाम का जानवर !" जैसे किसी मैसे ने तात मार दी हो और वह लगी हो मेरी छाती पर । मैंने उनकी ओर से अपनी दृष्टि हटा ली। क्योंकि इस कथन की कुरुचि पर मैं अपने मन की झलक उनके समक्ष प्रमट नहीं करना चाहती यो । किन्तु मुझे कुछ उतर नो देना ही चाहिये था। मैंने कह देना चाहा :-"दीदी से नहीं पूछा ?"
२६ : अपर्णा फिर खयाल हुआ कि दीदी को मैं नाहक़ बीच में डाल रही हूँ। तव साफ़-ही-साफ़ कह दिया-"सैलून में सिर के सफेद बाल चुनवाते हुए कभी बारवर से पूछ लिया होता ! बात कड़वी थी ही। तीर-सी लगी उनके हृदय पर । बोले----"हूँ, तो इसका मतलब यह हुआ कि मैंने ठीक ही सोचा था।" वोलते समय शीशे के सामने उनका मुंह था और सिगरेट का एक चौथाई भाग शेप रह गया था। इसके बाद वे चुप हो गये। मैं मन-ही-मन सोचने लगी-'क्या मेरा यही धर्म है ?' किन्तु मैं इस प्रश्न पर और अधिक सोच न सकी । क्योंकि बार-बार घुमा-फिराकर कुछ प्रश्न मेरे मस्तक पर बन्दूक के छरों की भांति लगने लगे । सन्तान के नाम पर जो व्यक्ति एक स्त्री की आत्मा पर पद प्रहार करके दूसरी का आह्वान करता है, उसे अपने रिश्ते में होनेवाले एक अनुज को, अपने यहाँ एकाध दिन के लिए आ जाने पर जानवर कहने का क्या अधिकार है, जब वह अपने मन से नहीं आया ? मैं और दीदी दोनों ही उसे बहुत अनुरोधपूर्वक ने आयी हैं। 'लेकिन यह तो उनके अधिकारों पर मेरा आक्रोश हुमा ।' मैं सोचने लगी। क्योंकि मैं दोपी समझने पर भी उनको दोप नहीं देना चाहती थी। मैं चाहती थी कि वे मुझे चाहे असत्य समझ लें; पर सत्य को असत्य न समझे। . X X X नींद नहीं आ रही है। समुद्र का जल जैसे वासों उठ रहा है, उछल रहा है। लहरों में फैल रहा है , आगे बढ़ता जाता है- बढ़ता जाता है और फिर लौट जाता है। उन्होंने क्रोध के मारे जव सोने से पहले दूध भी नहीं पिया तव मैं उठी; हालांकि मैं उठना नहीं चाहती थी, क्योंकि मेरा कोई दोप नहीं था। लेकिन मैंने सोचा-स्त्री का धर्म दाम्पत्य जीवन के मतभेद से भी ऊपर है। मैं दूध का गिलास उनके पास ले आयी। मैंने कहा-"लो, दूध पी अपर्णा : २७ - करण लो पहले, उसके बाद करवटें बदलना !" इस पर एक बार उन्होंने पाना सिर तकिये की मोर मोड लिया और फिर स्थिर हो रहे । रियर तो पमा हो रहे; क्योकि दाये पर का,मंगूठा और दो अंगुलिया हिल-हिन पर उनके मन का उत्पात व्यक्त कर रही थी- मैं तुमसे नाराज हूं। मुझे, तुम्हारा उत्तर गल गया । मैं उमे सहन नहीं कर पाता। चुप रहार ये जैसे यही कहने लगे। तब मैं विवश हो गई और फलतः में और भी ढीठ बन गयो । अपने स्वाभिमान को, अपने ग्रहम और पन्न: के पावन गौरव को, अपने हृदय की न्यायनिप्या मोर नेजोमपी माप साधना को मैंने एक कोने में रख दिया। अनुभव करने लगी कि मैं सच ऐमे गमाज की वधू हूँ, जो स्त्री को मानमर्यादा को याचनार पुरपये हर दुराग्रह, ढेप और अहंकार को ही अधिक महत्त्व देता है। धीरे से मुम्बाराकर मैने-"परे! नाराज हो गपे । उसोको, मुझे क्षमा कर दो। मैं नहीं जानती थी कि तुम मेरी बात का इतना बुग मानोगे । ऐसा ही था नो तुमने मेरी पादत क्यों लगब पी -- वयो इननी प्राजादी दी -क्यों मुझे इतना प्यार किया' बोलो।" तब वे उठे। मेरी प्रांखो में प्राव हालकर उन्होंने मुझे देना प्रो. बोले-"तुम बडी शैतान हो अपर्णा !" उनका यह कथन सचमुच मुझे बहुत प्रिय लगा। एक बार मेरे मन स्तल में जैसे कोलाहल मच गया, क्योंकि मुझे उनकी यह बात पर मच भी जान पड़ी। उन्होने गिलाम मेरे हार में ले लिया। फिर पीकर लेटते हुए वे कहने लगे -"सत्य मे गिष्ट तो बात है, मेरित मुझे ऐमा लगा जैसे धमडी बहुत ज्यादा है । इसीलिए मैने उपर नन्दन में उन ढंग से बात शुरू की थी।" मुझे इससे क्या? मैं सोचने लगी-जान पड़ता है अमीनक मल विषय से अलग नहीं हो पाये। उधर प्रगर में चुन रहे, नोनी ये मु. गलन सममने हैं । इसलिए मुझे कुछ-न-कुट बोलकर इन दिपक की समाप्त कर देना चाहिये। मैंने कर दिया - तोही २८ : अपर्णा - "जानेवाले हैं।" तब वे यकायक जैसे चौंक से पड़े हों ! वोले-"नहीं-नहीं; आया है तो दो-चार दिन खूब अच्छी तरह रखकर भेजना होगा । मौसाजी ने मेरे लिए बहुत कुछ किया है । कम-से-कम इसी खयाल से मेरा यह कर्तव्य हो जाता है कि । लेकिन वह तो पैर छूने के अनन्तर मुझसे कुछ वोला तक नहीं। न हो, कल फैक्टरी में भेज देना । तवियत बहल जायगी।" इस तरह यह विषय समाप्त हो गया किसी तरह । ---तो अब सोया जाय । आँखें झपकने लगी हैं। लेकिन सोने से पहले अव भी एक कर्तव्य निभाना रह गया है । बचपन से ही कुछ ऐसा अभ्यास रहा है कि रात के समय उठने पर कमरे की लाइट प्रॉन नहीं करती; टार्च से काम लेती हूँ। सो अपने कमरे के बाद उनके कमरे को पार करती आगे बढ़ी तो देखा, दीदी के कमरे के आगे फर्श पर एक रुनका 'पड़ा है । चमक रहा है, सफ़ेद-सफ़ेद । उठाकर देखा-मोह! यह तो दीदी की पायल का रुनका है। फिर आगे बढ़ी, टार्च की लाइट ऑफ़ करके । दीदी के कमरे के किवाड़ों पर धक्का दिया हल्का-सा, जिसमें ज्यादा पाहट न हो और दरवाजा अन्दर से बन्द न किया हो तो किवाड़ खुल "जाय। सो वही बात हुई । एक किवाड़ खुल गया। मैं वहीं खड़ी हो गई। सुना, दीदी खर्राटे भरती हुई सो रही है । तव चुपचाप किवाड़ को उसी प्रकार उढ़का दिया, फिर आगे जाने लगी। टार्च की रोशनी ग्रॉन कर 'लो, फिर घड़ी देखी। तीन बज गये थे। तब खयाल आया कि उनके कमरे से तो मैं बारह बजे ही लौट पायी थी! अनेक प्रकार की कल्पनाएँ मन में श्रा-जा रही थीं, तो मैं भी आगे बढ़ गयी। अव जो कमरा आ रहा है, सत्य वहीं सो रहा है। आज ही मन में पाया-क्या सत्य भी कमी सोता है ? सत्य तो जागृत अवस्था का नाम है । लेकिन फिर अपने से पूछ बैठी-तेरा सत्य तो तेरे अन्दर सदा सोया हुअा ही ही हृदय रहा है-तूने उसे जगाकर बाहर निकलने ही कर दिया ! यस, इतना ही सोच पायी थी कि देसा सत्य सोया नहीं; करवटें बदल रहा है। ये लो, यह उठ बैठा। बोला-"अरे! इतनी रात को। मैं प्राज यह सब क्या देख रहा हूं!" मन में पाया--देगू, फथन के क्षण मुद्रा का क्या भाव है ! कोरा विम्मय है या पूर्वामाम भी इसमें कुछ पा गया है। किन्तु मैंने मन के तूफान को भीतर-ही-मीतर मसोस कर कह दिया-"चुपचाप सो जानो। बात करने का वक्त नहीं है।" पौर में प्रागे बढ गयी। इस कमरे के बाद ही जीना पड़ता था, अत: मैं नीचे चली गई। भंडारे मे चूहे खड़मड़ मचाये हुए थे। रोरानी देखकर भाग खडे हुए। इस दृश्य को देखकर मुझे खयाल पा गया कि इस अमीम सृष्टि में माज अधिकांग पीड़ित सगंकित घोर भीरजनो की यही गति है। कि मागे बढकर सदर दरवाजे को जाकर देखा । देगा, ठीक ढग सेल चिन्ता की कोई बात नहीं है। प्रब की बार जब में लौटी तो देसा, सत्य ने दरबार र तिया है । सोचा, यह काम उसने समझदारी का दिया । . कर ज्यों ही मैंने पिडकी की तरफ टार्च का प्रराय : तो देना-सत्य सडा-गडा मूने प्राकाश वी पोर- .
३० : अपर्णा . रहा है। और आँधी के झकोरे की तरह कोई मेरे प्राणों से लिपटकर पूछ उठता है यह सब क्या हो रहा है ? तब यही सोचकर रह जाती हूँ कि मैं कुछ नहीं जानती। मैं कैसे जान सकती हूँ कि कहाँ क्या हो रहा है। क्योंकि मैं यह भी नहीं जानती कि मुझ क्या हो गया है। दूसरे दिन मेरा देर से उठना स्वाभाविक था। पहले भी अनेक अव- सरों पर मैं देर से सोयी हूँ। लेकिन कभी ऐसा नहीं हुआ कि आठ वज जाने पर स्वतः उन्होंने आकर मुझे न जगाया हो। किन्तु आज ऐसी वात नहीं हुई । आज उनके बजाय मुझे दीदी ने पाकर जगाया। इसके सिवा मैंने यह भी अनुभव किया कि अन्य दिनों की अपेक्षा आज वे प्रसन्न भी अधिक हैं । मेरे पलकों पर बरफ के पानी के छींटे मारती हुई वे कह रही थी--फिर साँझ होगी, फिर अँधेरा घना होगा, फिर तारे निकलेंगे और ऐसी ही सुहावनी-ऐसी ही मीठी-रात फिर पायेगी, अपर्णी । अव तो उठो, देखो, धूप वातायन से आकर रनियाँ के मुख-भाल पर पड़ने लगी। बदमाश कहीं की। कम-से-कम उसे तेरे हौसलों का कुछ खयाल तो करना ही चाहिये था। सुनकर मैं अवाक रह गई । कल रात की चिता-बारा उनके मस्तिष्क ले गयी नहीं है। सिर की पीड़ा भी थोड़ी कम हुई है। किन्तु तत्काल मुझ सँभल जाना पड़ा । एकटक दीदी की ओर देखकर थोड़ी मुस्कुराई और फिर आँखें मलती हुई उठ बैठी। फिर घड़ी देखकर हैरान रह गई । सचमुच आज अन्य दिनों की अपेक्षा अधिक देर हो गई थी और खानेवाले कमरे से आवाज आ रही थी-तेरे उठाये से न उठती हो तो मैं खुद जाऊँ। दीदी यह कह कर चली गयी--अब मैं जाती हूँ। जल्दी से तैयार होकर आ जायो । सब-के-सव चाय के लिए तुम्हारे ही 'इन्तजार में बैठे हैं थोड़ी देर बाद में पहुंची तो दीदी दूर ही से मेरी ओर देखकर कहने लगीं--"तो व्याकुल क्यों हुए जाते हो । वह या तो रही है। "ये पायीं। --
भारको महान् कान्निवारी समानते हैं, प्रानगममय जान उन्हें एक
अन मी मना नहीं करेगा।"
पर इन क्यों ने नी नगड़ा मान्न नहीं हुआ। क्योंकि-"
इतक
शालिनपल नहीं हो जाती, नवना हर एर त्रान्तिकारी को मनान वा
पद दिरचार तो न्ना ही पड़ता है।"
"पानि नामूहिक विद्रोह का नाम है। व्यनिवारी मामाजि विद्रोह
कमी शान्ति वापदन्डी प्रान्त कर माना।"
"विद्रोह में माहित बनाने के लिए पहले उन बनिदोहोमा
घटना पड़ता है, जो मानि-यया होने दे गरमाय एर चिना और
विचारक भी होता है।"
राजपथ - "कान खोलकर सुन लो अनामिका, मैं रूढ़ियों के समक्ष किसी प्रक सिर नहीं झुकाऊँगा। मैं परम्पराओं के खूखार नाखूनों से अपनी छा का मांस कदापि न नोचने दूंगा । मैं तुम्हारे साथ ही नहीं-मैं किसी साथ भी व्याह नहीं करूँगा ! मैं व्याह करूँगा ही नहीं।" ये शब्द थे, जो उमानाथ चलते क्षण अनामिका से कह गया था। "मैं भी समाज के समक्ष उसकी तर्जनी का उपहास-संकेत, उस : आँखों की कुटिल किरकिरी, उसके जहरीले तीरों का क्रूर निशाना उसके रात-दिन की वहस की सस्ती खाद्य-सामन्त्री कदापि न बनूंगी। अपने नारीत्व को अवैध और अपनी सन्तान को वंशगत उत्तराधिका वंचित, दरवाजे-दरवाजे का भिखारी कभी न वनने दूंगी। मैं l और परम्पराओं को तोड़ने का आन्दोलन भले ही कहें...-"लेकिन जीवन को उस अान्दोलन की वीभत्स प्रतिक्रियानों का शिकार वन किसी तरह पसन्द न करूंगी।" ये शब्द थे, जो अनामिका ने उमानाथ के उपर्युक्त कथन के उत्त कहे थे । पर झगड़ा इससे बढ़ता ही गया । उमानाथ ने कह दिया--" तुम्हारी साफ़-साफ़ गद्दारी है, क्रान्ति सेना के एक सैनिक के साथ । फिर इसके उत्तर में अनामिका ने और भी तीव्र स्वर में कहा था "एक विराट जनसमूह के साथ आगे-आगे चलते-चलते, महलों को ऊ देख-देखकर पूंजीवाद के नाश का नारा लगाने के बदले जो केवल अर्थ चलकर उन महलों पर तम्बाकू की एक.पीक मात्र छोड़ देने से गजपथ : ३३ . पापको महान् प्रान्तिकारी ममझ लेने हैं, प्राज या समय जगत् उन्हे एक क्षण को भी क्षमा नहीं करेगा।" पर इन कयनों से भी नगड़ा मान्न नहीं हुप्रा । गयोंकि-"जब ता प्रान्ति मपाल नहीं हो जाती, तब तक हर एक पालिाग को गमाज या यह निरनार तो गहना ही परना है।" 'शान्ति मामूहिक विद्रोह का नाम है । व्यक्तिवादी गागाजिनविद्रोह कमी त्रान्ति वा पद नही प्राप्त कर गाता।" "विद्रोह यो मामूहि यनाने के लिए पहोगपति को ही प्रागे वटना पडता है, जो पालि-गप्टा होने के गप-गाश एम चिनार पार विचारक भी होता है।" "जहाँ राजनैनित प्रान्ति के लिए यह एक अमिट गत्य है, नही पर नामाजिक प्रालि लिए यह एक ऐगी भान्ति , जिगने सागो परी में पावन दीरमालिश ये दिन भी नह गमि और मालोक या एक वीप नक नही जलने दिया। मैं उन थायर गोगों में में नहीं है अनामिका, जो तर्क गे हार मानकर अपना निश्चय यदल डालते हैं।" "मैं भी उन मर्ग लोगो में गे नहीं है. जो जिद्द को दृढना, हठ यो मंलग्नता मौर दुम्माहम की वीरता मानकर घमडगे फल उठा करते है। "मच्छी यान है। प्राज मेहम लोगो का राम्ना मनग होना है ! "यह मैंने उनी दिन मोच लिया था, जब तुमरो जान-यूभार नाराज पर दियापा।" प्राज क्यो म ममय प्राकाम कुछ-कुछ धुणे के रग का हो रहा है ? वयों कही गहराई जो गोटी देश परनी है, उगमे कालिमा अधिक बोलती है और क्यों कही हााापन जो मक्षित होता है, नो भूधलापन भी उजला जला-मा लगता है। क्यों की यह श्यामलला कोरों पर प्राकर श्वेत ३४ : राजपथ जैसे कोई विद्युत-पिंड हों। नगर के बीच लम्बी-लम्बी अट्टालिकाओं के ऊपर हरीतिमा की जो ऊँची-नीची पंक्ति दीख पड़ती है, वह नीम के सघन वृक्षों की शिरोराशि क्यों है ? क्यों धीरे-धीरे संध्या रजनी के दुकूल में छिपी जा रही है और क्यों चंचल विहंगावलियां दक्षिण से उत्तर की ओर द्रुतगति से उड़ी जा रही हैं ? केवल इसलिए कि मेरी अनामिका इस नगर में कहीं आई है। मुहाल, सड़क, गली और उसके प्रत्येक मकान में खोज आया; लेकिन कहीं भी उसका पता नहीं चला। सड़क पर स्थिति एक कोठी के ऊपर खड़ा-खड़ा उमानाथ यही सोचता-सोचता नीचे उतर गया और फिर टहलता-टहलता अदृश्य हो गया। घंटे भर से वह घनश्याम के कमरे में बैठा था। याते क्षण उसने अभिवादन मात्र किया था । वैठने पर कुछ बोला नहीं था । कभी कोई पत्र-पत्रिका उलटता रहा, कभी एक झटके के साथ उठकर कमरे से बाहर चला गया और लम्बी छत के किनारे जा खड़ा हुआ । कभी उधर से आते ही वोला--"एक गिलास जल" { जल पी लेने पर वह फिर चुप हो रहा । छत के किनारे जाकर उसने क्या देखा, क्या पाया, क्या अनुभव किया, किसको आँखों की अपलक दृष्टि में भरता रहा और किसको देख पड़ने पर भी नहीं देखा, छोड़ दिया, भूल गया कुछ भी घनश्याम की समझ की ओर से नहीं छू पाया तो उसने पूछा-~~-"चाय पियोगे ?" उत्तर मिला-"चाय ?" और साथ ही उमा कुछ सोचने-सा लगा। फिर बोला--"नहीं, अब नहीं पी सकूँगा।" आश्चर्य के साथ घनश्याम ने पूछा--"अाखिर क्यों ?" उत्तर में उमा मुस्कराने का प्रयत्न करने लगा । पर धनश्याम को कुछ ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे इस मुस्कुराहट पर आँसुओं के धागों से बनी हलकी-फुलकी, झीनी-झीनी, पवन होलन से लहराती मन्द-मन्दहरी छाया का परदा पड़ा हुआ है। फिर भी घनश्याम ने अपने छोटे भागिनेय .
राजपथ: ३५ गनेश से कह दिया- "चाय तो बनायो गनैस । मोर देखो, स्ट्रांग बनाना । अच्छा ।" x अब बत्तियां जल गई हैं । सडक पर रोशनी-हो, रोशनी काफी है। चलगाड़ियां जा रही हैं और बैलों के गले मे घंटियां बंधी हुई बोल रही हैं। बैलगाड़ी कोठी के सामने से मागे मी बढ गयी। घटियों का रव अब तक पा रहा है पता नहीं अनामिका इस समय यहाँ हो और क्या कह रही हो । हाँ, मुझे भी ऐमा प्रनीत होता है जैसे अनामिका अपने स्नानागार से कोई गीत गुनगुना रही हो--ऐसा गीत जो दिन में कई बार याद आता है । एक बार मैंने पूछा था कि जब तुम वायरूम में गाती हो; अच्छा गाती न मही, मान लो गुनगुनाती ही हो, तो उस गीत का मूल अभिप्राय क्या होता है ? यो तो अनामिका उत्तर देने में वही मुसर है। प्रवीण इतनी कि उस कमी सोचने की जरूरत नहीं पड़ती; लेकिन उस दिन न जाने क्यों, वह कोई स्पष्ट उत्तर न देकर अधरों के विकास के साथ सम्यक् मुस्कराने लगी थी। मैंने अपने मन में सोच लिया था, किमी-न-किसी बात का उत्तर केवत मौन होता है और क्षण भर मे यह बात भी मेरे मन में पाई थी कि वायरूम का गुजन सदा अपने प्राणो के देवता की उपासना में लीन आनन्द और सौख्य की एक विशिष्ट अभिव्यक्ति होती है। प्यार का प्रतिदान होता है, अात्मा का वह विरल स्वर, जिसमे आह्वान भी होता है और समर्पण की तृप्ति की पावन अभिव्यंजना । वह मुझे प्रव भी सुनाई पड़ रही है। पहिया जरा धीरे-धीरे आगे बढ़ता है। ठेला मरा भी तो खूब है । एक-दो-तीन-अरे, वीस वोरे होगे ये सव; बल्कि पाइप्स । आगे-मागे भंसा, पीछे मजदूर । लेकिन ये ठेलेवाले क्या बदन में तेल चुपड़कर बाहर निकलते हैं ? प्रन्यया इनके पुट्ठो पर मह काला काला चमकता-सा क्या है ? "हारमोनियम लेकर दो बच्चे गाने निकले हैं । एक अठारह साल का होगा। दूसरी एक छोकरी है। वह अभी ३६ : राजपथ ग्यारह की होगी। लड़के ने टीप लगाई.-"मैना तोरे नैना बेदरदी बड़े।' और छोकरी ने बीच में ही उसे कटी पतंग की तरह दौड़कर, उछलकर, झपट्टा मारकर, हस्तगत कर लिया-कि 'सैया तोरे नैना वेदरदी छी छी ! यह हमारी नयी पौध का नव-निर्माण हो रहा है ! ठेला वाला अब भी चला जा रहा है, है, खटर-खटर । और वह काला- काला-सा जो उसके बदन पर चमक रहा था, वह तो पसीना है यार ! हिश 'मैं भी क्या उजडु बन गया ! किन्तु बीस बोरे, यानी पचास मन बोझ ढोने वाला आगे-आगे भैंसा, पीछे-पीछे ठेलेवाला । दोनों ढो रहे है । एक पशु है, दूसरा मनुष्य, लेकिन यह मनुष्य कैसा है, जो पशु का काम कर रहा है ! क्योंकि मनुष्य नामधारी एक ऐसी जाति हमारे बीच बन गयी है, जो मनुष्य से पशु का काम लेना जानती है । और मनुष्य जो पशुवर्ग का काम करता है उसकी अपनी जिम्मेदारी कुछ नहीं है।' नहीं-नहीं-नहीं, कुछ नहीं है । क्योंकि देश के सुख-दुख के ठेकेदार जव मोटरों अथवा वायुयानों पर चलते हैं, तव उनके मस्तिष्क में योज- नात्रों की सफलता के स्थान पर वक्तव्य केवल वक्तव्य की कल्पनाएँ रहती हैं । "यह छोकरी है तो कोयले की जाति की, मगर गले की धार इसकी चलती कटार-सी है। "उँह । सड़क पर आने-जाने वाले क्या नहीं वकते ? मगर इससे हमारी जनता का मानसिक स्तर तो झलकता ही है। कुछ परेशान-सा घनश्याम पूछ रहा था-"कहाँ गये उमा वावू ? कुछ कह के नहीं गये । तुमने देखा तो होगा ही, उनको नीचे जाते हुए ।" "मैंने तो नहीं देखा मामाजी।" गनेश का सीधा-सा उत्तर था। "लेकिन तुम समझे नहीं कि मैंने प्रश्न क्या किया । मेरा मतलब यह कि जब कोई अपने यहाँ से जाने लगे, तब उसको देखना तो चाहिये।" 'नेवाले को मैं कैसे देखता रह सकता हूँ। क्योंकि कौन आता में देखने के सिवा मुझे और काम भी रहते हैं।" the राजपथ । "गनंग कहता तो ठीक है ।" घनश्याम मोच रहा था-" -"लेकिन फिर उमानाथ की शान ? कुछ ममझ में नहीं माना कि इम प्रादमी में कमे व्यवहार किया जाये । प्ररे पूछो, तुमको अगर कृष्णमुप करना ही था, तो तुम मुझमे कहकर ही करते।" उनने में आवाज पाई छुद-कुद- कुट् । घनश्याम ने अांख मे सकेत किया-देखो तो कौन है? गनेश भट द्वार को प्रोर दौड़ गया । पर दरवाजा खोलते ही चेचारा भौचक्का-सा रह गया । क्षीण, महीन और दुबल स्वर में एक मम्भ्रान नारी ने पूछा-"घनश्याम जी है ?" "हूँ तो। पर प्राप''आपके परिचय के सम्बन्ध में !" "परिचय ? परिचय मेरा उनसे नहीं; तो क्या मैं उनसे मिल नहीं मकती?" "तो फिर..." गनेग के कहने भर की देर थी कि वह युवती मागे बढ गई ! कैग विसरे नो नही वहे जा मदते, लेकिन ऐमा प्रनीत होता है, कधी का उपयोग किये हुए देर हुई । देत मारी गे तन ढका है। जूतियाँ श्वेत हैं, लेकिन उनमे मुनहरा काम मौन्दर्य की भनक मारता है । एक कलाई मे मोने की घटी, दूमरी में मुनहगे तीन घटियां है । व्लाउज श्वेत है और उममे श्वेन यूटे बने हुए है, यानो मे श्वेत हीरे चमक रहे है । वस्त्रो के पर फर क्लाथ का प्रोवरकोट पहने हार है। हाथ में पर्म है । अंगुलियो मे केवल पनि प्टिका के नक्षत्र हरे लाल झलकते हैं। वायी प्रांस के नीचे "बल्कि कोर पर एक तिन है। वरानियों के नीचे श्यामता झलक मारती है । वदन छन्ग, वर्ण गहुँमा और कटोरे मे नयन । किन्तु इन मदमे नामिका अत्यन्त गुन्दर है पीर होंठ बड़े प्यारे हैं, बडे रमीले । देवकर घनश्याम चकर में पड गया । पर इमी क्षण गम्मुख उपस्थित होने ही हाथ जोडकर पुवती ने पूछा- "उमेश जी अापके यहाँ ?" घनश्याम को पता है कि उमा कमी-कभी अपने उमेग नाम का भी उपयोग करता है। फिर भी वोल उठा-"उमेग! उमेश नाम तो ।
३६ : राजपथ ग्यारह की होगी। लड़के ने टीप लगाई..-"मैना तोरे नैना वेदरदी बड़े।' और छोकरी ने बीच में ही उसे कटी पतंग की तरह दौड़कर, उछलकर, झपट्टा मारकर, हस्तगत कर लिया-कि 'सैया तोरे नैना वेदरदी - छो छी ! यह हमारी नयी पौध का नव-निर्माण हो रहा है ! ठेला वाला अब भी चला जा रहा है, खटर-खटर । और वह काला- काला-सा जो उसके बदन पर चमक रहा था, वह तो पसीना है यार ! हिम''मैं भी क्या उजडु बन गया ! किन्तु बीस वोरे, यानी पचास मन बोझ ढोने वाला आगे-आगे भैसा, पीछे-पीछे ठेलेवाला । दोनों दो रहे है । एक पशु है, दूसरा मनुष्य, लेकिन यह मनुष्य कैसा है, जो पशु का काम कर रहा है ! क्योंकि मनुष्य नामधारी एक ऐसी जाति हमारे वीच बन गयी है, जो मनुष्य से पशु का काम लेना जानती है। और मनुष्य जो पभुवन का काम करता है उसकी अपनी जिम्मेदारी कुछ नहीं है।" नहीं-नहीं-नहीं, कुछ नहीं है । क्योंकि देश के सुख-दुख के ठेकेदार जब मोटरों अथवा वायुयानों पर चलते हैं, तब उनके मस्ति नात्रों की सफलता के स्थान पर वक्तव्य केवल वक्तः रहती हैं । "यह छोकरी है तो कोयले की जाति की, इसकी चलती कटार-सी है। "उँह । सड़क पर आने- वकते ? मगर इससे हमारी जनता का मानसिक स्तर ।
राजपण
जैचा नही ।
बढ़ता चला पा रहा होता। और सम एक पागोनी-गोity
दूसरे पर यस्टं हो पहरी । लेकिन नाग पहा हागो गाण
कुछ
उधर उमानाथ जय घड़ीई गीदिया गीगगा, thirii tam
पाया कि इस तरह मेरा यह गीड़ी उगा अर्थात् पी.-
अगला कदम ही है । तब यह अंगे मन कीगन नामा
मोचने लगा कि जो गलनियो शान अश्या प्रमान प्रायः
जाया करती हैं, ये हमको शितना पी में पानी १, affront
हमी उमगे भी यही अधिक प्रांग की।
ती का मका या प्रयनी गनियाभधागांत
ही की गायिका मिनाएं होती है। यति मनाneru init
होगी, यह और बात है। गीदी पर रोकाट माया की
उमे एक पाली नांगा जाना हादगा या in
रोककर इनमीनान के माय मर गया Interriter
देवी मे बदन वाती उमानाद मामा-पानी Ratant
माय-ब्याह कर उग रग बनाना I Am.
मं.लित नमन . अर और दाी मामी मr hitrat
अधिर दियो, पल भी सच :*
लामो नदी में नीdिrranthan
/
दु: । nrt: rki,
को नरम me,
दर मन्दः । Refer of
वटर युनः परमल र। free
हा प्रारदरruirint
EिRE RATE
--
.
४० : राजपथ है निकल ही गया-"प्रायेंगे तो मैं उनसे कह दूंगा कि आप स्वयं आई थीं। फिर चुप रह गया। लेकिन नाम जानते हुए भी जानबूझकर कहने लगा-"पर क्षमा कीजियेगा-अपना शुभ नाम तो वतलाया नहीं आपने ?" खड़ी होती-होती युवती न चाहती हुई-सी किंचित हँस-सी पड़ी। बल्कि एक तरह का तेवर-सा झलकाती हुई बोली-"बुरा न मानियेगा। नाम उन्होंने आपको ज़रूर बतलाया होगा। हम लोगों की बात दूसरी । आप लोग अपने मित्रों से हम लोगों की बातें छिपाना अभी सीख नहीं पाये । वैसे नाम मेरा अनामिका है।" घनश्याम सुनकर कुछ उद्वेलित-सा हो उठा । ऐसा जान पड़ा, मानो उसका रोम-रोम एक बार एक छोर से दूसरे छोर तक पुलकान्वित हो उठा है। तभी विवश होकर वह भी उठ खड़ा हुआ । बल्कि अनामिका को विदा करने के लिए द्वार तक पीछे-पीछे चला भी पाया । अनामिका जव सीढ़ी उतरने लगी तो घनश्याम बोला---'आप से मिल कर बड़ी प्रसन्नता हुई । विशेप रूप से यह देखकर कि आपको इस प्रसंग से मेरे यहाँ पाने में कोई संकोच नहीं हुआ। हमारे देश में अभी तक कम-से-कम आपकी जाति में इतना साहस प्रायः कम ही देखने में ग्राता है। अनामिका चलते क्षण यों भी अत्यन्त गम्भीर हो उठी थी। फिर घनश्याम ने उसकी इतनी प्रशंसा कर दी। तव अनामिका प्रतिक्रिया समाल न सकी। कुछ अन्यमनस्क-सी होकर बोली-~"लेकिन मेरी प्रार्थना है कि अब आप उनसे यह वात प्रकट न कीजियेगा कि कोई भटकता-भटकता यहाँ तक आया भी था उनके लिए।" घनश्याम तब जैसे आँखें फाड़कर जाती हुई अनामिका की ओर एकटक देखता रह गया । यकायक उसकी समझ में ही न आया कि क्यों यह नारी उमा से यह वात छिपाना चाहती है, जब छिपाने की बात करते क्षण आँखें उसकी पीड़ा प्रकट कर देती हैं।
राजपथ :४१ सगर्फ की दूकान का नाम पडता है, कामताप्रमाद गोकुलप्रसाद । और गोकुलप्रसाद उमानाथ का सहपाठी है । बचपन में दोनो साथ-माय स्कूल से लेकर कबड्डी तक में एक दूसरे को मान देते रहते थे। उमानाथ जब उसकी दुकान पर अपना वैग भूलकर चला पाया, तो गोकुलप्रसाद ने उसे अपने भतीजे से वहकर कोठरी के अन्दर रपया दिया कि फिलोसफर साहब चिडिया की तरह पय फडफड़ाते हुए अभी नमूदार होते हैं । लेकिन थोड़ी देर लटकाये बिना मजा न पैदा होगा। और उमानाथ तागे पर जाता हग्रा मन-ही-मन यह उक्ति माँच-सोच कर गुग हो रहा था कि 'ताड से जो गिरा तो खजूर में अटका', लेकिन ताड़ से जो गिरा तो नवाब का वेटा चिडीमार बन गया । और वह अपने पाप पर इस तरह हँस पड़ा कि उसकी प्रामों में प्रानू मा गये । थोडी देर मे तांगेवाले ने कहा- "लीजिये सरकार प्रा गया यह आपका सराफा !" लेकिन उमानाथ सड़क की गाल देस हक्का-बका रह गया। बोला-"लेकिन यह तो मराफा नयागत है बड़े मियां । मैंने यहां लाने के लिए केव तुममे कहा था ?" बडे मियां बोले-"सरकार क्लक्टरगज के नुक्कड़ पर खडे थे और मुंह था जनाव का गंगाजी की तरफ । अब सराफे को नये गज का बरखुरदार अगर मैंने समझ लिया, तो व्रता माफ हो, क्या कसूर हुआ हूजूर की जूतियो के तुफैल का ?" उमानाथ हँस पडा । योला-"अच्छा-अच्छा ठीक है । अव मराफा चौक ले चलो!" प्रनामिका अपनी गाडी को स्टियरिंग पर हाथ रक्से खिन्न- मना लौटी जा रही थी। आगे-आगे जो तांगा जा रहा था, उसमे बैठी नारी के वक्ष से लगा उसका चांद-विलोना एक कदुक का दुग्धामृत पान करता हुआ दूसरे से खेल कर रहा था। अनामिका देखकर सिहर उठी। उसके मन में पाया-'वे तो कहते है कि शिशुपालन की जिम्मे- दारी बीम से पहले कोई नारी निमा ही नहीं सकती।"उँह ! उनके ४२ : राजपथ , कहने से क्या होता है ! यों तो यह संसार नरक का कुण्ड है । इसके अन्दर एक ये बालगोपाल ही तो हैं जो इस घरती को स्वर्ग बना देते हैं। लेकिन वे तो कहते हैं कि हम विवाह ही न करेंगे । मुझे पिता की सम्पत्ति न चाहिये ।...हूँ । उन्हें न चाहिये-न चाहें वो; लेकिन जब चाहने वाले जन्म लेंगे, तव उनके अधिकारों की हत्या मैं कैसे होने दूंगी! और वे कहते हैं--'मुझे उन लोगों का समाज न चाहिये, जो पारस्परिक मनोभावों, आत्मगत आकर्षणों,.अाह्वानों, निमन्त्रणों और प्रतिदानों को वास्तविक विवाह न मानकर सात फेरों को ही विवाह मान बैठते हैं। उनका सिर फिर गया है। मुझे उनसे इसी विषय पर बातें करनी हैं। हमें जिन लोगों के बीच में रहना है, उनके संस्कारों का भी ध्यान रखना पड़ेगा । मैं यह पसन्द न करूंगी कि कोई हमें रखैल कहे । मैं उसकी जीभ खींच लूंगी !' उधर तांगे पर बैठा उमानाथ सोच रहा था- 'क्रान्ति सचमुच अकेले नहीं की जा सकती। अनामिका टीक ही कहती थी। और हिन्दुस्तान जैसे देश में तो विवाह-प्रथा का नाश सामाजिक क्रान्ति का विपय कभी नहीं बन सकता । यह वात आज मैं इसलिए नहीं स्वीकार कर रहा हूँ कि अकेले काम करते करते मैं हार गया हूँ। वल्कि यह एक अनुभूत सत्य है । अनामिका मिले, तो यह बात मैं उससे साफ़ तौर से कह दूंगा । नहीं-नहीं, मैं यह वात मरते दम तक स्वीकार न करूंगा। मैं उससे कभी यह न कहूँगा कि मैं थक गया हूँ, या इस सम्बन्ध में मैंने हार स्वीकार कर ली है । यह वात दूसरी है कि यदि अनामिका मुझे विवश कर दे, तो मैं इन्कार न करूं । पर ऐसा सम्भव कहाँ है ! दृढ़ता में वह मुझसे कहीं आगे है। लेकिन यदि उसने कोई दूसरा पथ स्वीकार कर लिया तो?' इस बात को सोचते ही उमानाथ कुछ ऐसा अनुभव करने लगा, जैसे उसका हृदय वंठा जा रहा है, डूबता जा रहा है । इतने में खटर झड्ड्चों फिश्च्स ।
राजपय : ४:- गाड़ी संमानो तो दद नेन्नि! और अनामिका गाड़ी से उत्तर कर देखने लगी कि मामले की छिया को चोट तिनी लगी । इधर-उधर के लोग दौड़ पड़े। होली के दिनों में जने पिववारियां चलती है वैसे ही दुर्घटना के अवमर पर वाक्यों का 'विरायटी मो होता है। बिना कुछ देखे समझे. ही बोल पड़े, जो ठंडाई छानने के बाद अब पान को गिलौड़ी मुंह में लॉग रहे थे-इन मोटरवालों की अांदों पर हमेगा ची चढ़ी रहती है ।- योः ! कोई मिम माहिबा हैं। "कॉलिज की लड़की होगी ।... तब जाने दो। शहर की सारी रौनक इन्हीं की बदौलत है बाबू ? वरना हल्दी-मिरचा, लोहा-लंगड़ और लोई-इकलाई के सिवा कुली.. मजदूरों के इस महर में अन्दर और धरा क्या है ? आंखों पर पट्टी बांधकर चलती हैं प्राप ? पट्टी नहीं, चश्मा है जनाव । जरा आँखें खोलकर बात प्रिया' कीजिय।... कैसे बात करते हैं आप? जरा सभ्यता सीखिये। —मैं तो नहीं सीख पायी, अब गऊहत्या करके आप ही सीम्ब लीजिये। - राम राम ! देखो तो वैचारी कुल जमा दस-पांच दिन ही यह दुनिया देख पाई थी! मानती हूँ। लेकिन आप लोग इन्हें वाड़े के अन्दर बांधकर क्यो नहीं रखते ? मैंने बचाने की हरचन्द कोशिश की, लेकिन आपकी सोचिये, किसी को मृत्यु को कोई कैसे रोक सकता है ? -पहिया बिल्कुल पमलियों के ऊपर जा पडा। नहीं, इतनी जल्दी ।। हाय-हाय ! अव भी जान वाकी है थोडी-सी । बेचारी पर फडफडा रही है। -ये प्रा गये प्राप। आप ही की वछिया है यह ? -हाँ थी तो मेरी ही ! मर गई क्या ?
४४ : राजपथ देखते हैं । देखकर उनसे बोल उठते हैं---अव आप ने क्या कहें मेम साहिबा ! वछिया मर गई मेरी । मेरी तकदीर फूट गई । क्योंकि अब सवाल यह है कि मेरी गैया दूध कैसे देगी ? सात से की व्हरी। कोई मामूली नहीं है । इसी क्वार में तो ली थी। बियाये हुए आज चारहवाँ दिन है। --- हाय रे पैसा ! उमानाथ का ताँगा भीड़ के कारण रुका हुआ था। इसलिए उतरकर वह भी यह दृश्य देख रहा था। अकस्मात् जो वछिया वाले का कथन उसने सुना तो कोई-कोई उसके कानों में वोल उठा- हाय रे पैसा ! • 'यानी इसको इस बछिया की इस आकस्मिक मृत्यु का दुःख नहीं है। फिकर केवल इस बात की है कि अब उसकी गैया से दूध और उस दूध से पैसा कैसे जायेगा। यकायक भीड़ में दृष्टि पड़ गई अनामिका पर । तव वह घूमकर उसके पीछे से पास पाकर चुपचाप जा खड़ा हुआ। इतने में अनामिका वोल उठी ~~ "सारा दृश्य मेरी आँखों के सामने से गुज़रा है; क्योंकि मैं पीछे से आ रही थी। मैं आपको विश्वास दिलाती हूँ कि मिस मालती ने इसको बचाने में कोई कसर बाकी नहीं रक्खी। लेकिन फिर होनहार को कौन रोक सकता है ?" इतने में कास्टेविल वोल उठा--"अब आप सब लोग जाइये और आप बोलिये, अभी इसको यहाँ से उठाकर आप खुद ले जाना चाहते हैं, या मैं कोई इन्तजाम करूँ ?" इतने में अनामिका जो अपनी गाड़ी की ओर जाने के लिए घूम पड़ी, तो उमानाथ को पास खड़ा देख चौंक उठी । बोली-"अरे ! प्राप यहाँ कहाँ ?" और उसी क्षण मिस मालती अनामिका के कन्धे पर हाथ रखकर बोली-~~Thank you dear लेकिन आज इतने दिनों बाद तुम यहाँ इस मजमे में टपक कैसे पड़ी ! ''और फिलासफ़र साहब, आप तो जैसे गूलर से फल हो गये।
राजपप:४५ उमानाथ हेमता हसता बोला-'इसका कारण भी इन्ही से पूछ तो।" और अनामिका ने मानाय का हाथ अपने हापों में लेकर मपनी गाड़ी की पोर वइते-बढते मालती से वह दिया-"पर पर पाकर गुदर- गू पर जा किसी दिन मेरी क्यूतरी, यहाँ अब तुमते या दात वस। तांगवाले का पैसा चुवापर फिर जब उमानाय अनामिका के बगल में यंटा, तो उसे ऐसा प्रतीत हुमा, जमे वह स्वप्न देख रहा है। लेकिन उमी क्षण उसे चारो मोर में भयकर आंधियों ने घेर लिया। वनों वह इस तरम का जीवन बिताने के लिए स्नेह वी सौतन रश्मियो (छोटे-छो. बच्चे, शिशु बालक-बालिकाएं, नाती-पोते) में वह वचित ही बना रहे और क्या वह विश्व के लिए नल्लो भर उलनी से भरी विनियो, कटुता और विप से बुभी आपत्तियां, मक्सियां मिनभिनाने पोय वीमन्म मानसिक दुर्गन्ध का बदन छोड़ जाय । गौर इस तरह जिद्द वो जो व्यक्ति सदा विजय मानते रहे हैं, क्या उनका मुंह इन माविल है कि दे विश्व के समक्ष मस्तक ऊंचा करके एक बार सगवं, महाँ और मोनाह खडे भी हो सके । और तभी उमने एक बार दिल थामकर कह दिया-- "सबसे पहले हमको सराफा चौक चलना है।" "मेरे लिए कोई चीज बनवा रहे हो क्या" अनामिका ने मूलगज चौराहे से चौक की तरफ गाडी घुमाते हुए पूटा। अपने मन-प्राण को यहाते-पहाते उमानाथ बोला-"सचमुच इस बार तुम्हाग यह मजाक पूरा कर देना है । मुझे अपने पहले उपन्यास की रायल्टी में मात मी रपया एडवाम मिले थे । उमी एक चीज बन रही है। देखो शायद पसन्द प्रा जाये । आश्चर्य का ममुद्र प्राज एक भगिमा मे पा गया है।" अनामिका ने एक बार घूमकर उमानाय की और देवा तो उसकी पुतलियां ऊपर की ओर से तिरछी घूम गई । फिर मामने देवनी-देखती शाहाद के प्रकार मे मन्द-मन्द हास झलकाती हुई कहने लगी-~"कल से माँ तुमगे बहुत याद कर रही है और मैं भी अभी तुम्हारी पोज में घनश्याम जी के यहां से ही पा रही है।"
सिंहनाद - - वह सिंह अव मौन हो चला था। दहाड़ना दूर रहा, खुलकर बात कहना भी अव उसके लिए दुष्कर “था । उसके बाल बढ़े हुए थे। स्नान न कर पाने के कारण बदन में मैल- जम गया था। गड्डों में फंसी हुई आँखों की कोरों में कभी-कभी कीचड़ आ जाता तो सविता अपनी धोती के अंचरा से पोंछ देती । शरीर सूख- कर कंकाल हो गया था लेकिन आत्म-चिन्तन के क्रम में कोई अन्तर न पड़ा था। सिकुड़ी हुई त्वचा की झुरियाँ सीधी-टेढ़ी रेखाओं से जो मनो- भाव व्यक्त करतीं, उनसे यही ध्वनि निकलती, मानो अब वह अपने आदमी होने से ऊब उठा है । कदाचित इसलिए कि वह जो सोचता है । उसे कर नहीं पाता । एक वार तो उसने वुदबुदाते हुए कह भी डाला था : गगनबिहारी राजहंस कमी एडियाँ रगड़ने के लिए नहीं जीता। सहारा लिये विना उठना कठिन था। इसलिए सविता रजाई तहाकर प्रायः उसके सिरहाने रख देती। बैठने का सुख भी अपना एक अर्थ रहता है। पति प्राणानारी सविता जानती थी कि जितने दिन, घड़ी और पलों का जीवन शेप है कर्म मोग करना ही पड़ेगा। अवधि बीतते ही पिंजरा खाली करके प्राण-पंछी पाप से आप उड़ जायेगा । वह यह भी जानती थी कि ये चुपचाप लेटे-लेटे क्या सोचते रहते हैं । एक दिन उन्होंने कहा • था - लगता है, मैं एक वुझी हुई मशाल हूँ, जिसकी गन्धमात्र धुएँ के साथ मड़ रही है । एक वैद्यराज की चिकित्सा चल रही थी, लेकिन मानसिंह की स्थिति तो उस घायल पक्षी की-सी थी जो जीवन शक्ति के प्रभाव . :
सिंहनाद : ४७ में पंख फडफडा रहा हो । कभी-कभी तो वे चुपचाप लेटे-लेटे प्रलाप भी करने लगते। मेरे ये बढे हुए केश काट न सको तो नोच ही डालो ! इनकी परछाई मुझे मौत-सी काली पोर मयावनी लगती है । उम्र का हर दिन मैं घाम की तरह चबाता रहता हूँ; फिर भी उसे पचा नही पाता । मुझे कही और ले चलो। तुम्हे नही मालून मेरी चप्पलें तूफानो से मोर्चा लेती रही हैं। मेरे विश्वासो का दम मत घोटो । क्या ऐसा नहीं हो सकता कि सूचना देनेवाले ने अभियानसिंह के बजाय भूल से अमिमान- सिंह लिख दिया हो। मैं उसकी राख के फूल लेने क्यों जाऊँ, जब कि घोड़े की लगाम अभी उसके हाथ में है। अामू बहते जाते हैं और प्रागा की वेल मुरझाना नही चाहती। -मेरा अभिमान जरूर लौट आयेगा । कहते है एक समय था, जव मानसिंह प्रादेशिक धारा-समा के मनो- नीत सदस्य थे। एक ऐसा मी युग या, जब समा-मंडत में मच पर विराजमान, ध्वनि-प्रसारक यंत्र से निस्सृत होती उनकी गुरुगमीर वाणी का प्रमाव सहस्रों के जन-समूह मे एका विजली की लहर विखेर देता था। एक अटूट सिद्धान्तवादी की मांति वे सर्वस्व उत्सर्ग कर देनेवाले व्यक्ति थे और दक्षिणपंथियों में तो उग्रतम नेता माने जाते थे। पर फिर काला- न्तर में एक ऐमा युग भी आया, जब वे अगले निर्वाचन में सफल न हो सके। यह सब कुछ था, किन्तु अपने समाज वे अव भी एक प्रतिष्ठित जननायक के रूप में प्रसिद्ध थे, यहाँ तक कि समय-समय पर उनको अब भी समा-समाज में समापति बनना पडता था। यद्यपि उनकी कार्यकारिणी की शक्ति अव क्षीण पड़ गई थी, किन्तु सेवा भावना का मोह उनको ऐसे अवसरों पर समा मंच की गद्दी संभालने को वाध्य कर ही देता था । जीवन में व्याप्त लोम, मोह और अहकार धीरे-धीरे समापन्न हो जाने पर भी मुमूर्ष प्राणी की कामनायो का तारतम्य चलता ही रहता है । मानसिंह बुदबुदा रहे ये; एक अभिमान चीज क्या है ? दूसरा पुत्र ४८ : सिंहनाद गौरव भी होता, तो क्या मैं उसे युद्ध-क्षेत्र में न भेजता ? देश के शत्रुओं की वर्वरता का दम्म धूल में मिला कर ही दम लूं इससे बढ़करप्रिय इच्छा और मेरी क्या हो सकती है। मेरे अभिमान के लौटने में देर हुई तो उससे मिलने मैं खुद चला जाऊँगा । इधर सविता बोल रही थी-ममझ में नहीं आ रहा कि तुम कह क्या रहे हो ! उधर इतिहास के पन्ने फर-फर उड़ते हुए बतला रहे थे। एक सभा-मंच पर लगे ध्वनि-प्रसारक यंत्र से बोलते हुए मानसिंह ने कहा था-~~यह ऐसा अवसर है जब देश की आजादी की रक्षा के परम पावन यज्ञ में सब को भाग लेना पड़ेगा। हमें अपने स्वार्थों की आहुति देनी ही पड़ेगी। जिस प्रस्ताव पर मानसिंह अध्यक्ष की हैसियत से यह घोषणा कर रहे थे उसका अभिप्राय यह था कि जो इस पवित्र यज्ञ में धन से अपनी आहुति दे सकते हैं वे आगे बढ़ें और भारतमाता की झोली भर दें। जो लोग निर्धन हैं उनको तन और मन से अपने माग का उत्तरदायित्व निभाने के लिए तत्पर हो जाना चाहिये । इसी प्रसंग में बोलते हुए मानसिंह ने कहा था-ऐसे पावन अवसर पर अपने देश की आजादी की रक्षा के लिए जो लोग व्यक्तिगत स्वार्थो का बलिदान नहीं करते, लोम और मोह को तिलांजलि देकर बिना उक- साये स्वयं आगे नहीं बढ़ते, उनको मैं अत्यन्त स्वार्थी, हृदयहीन, पामर और नीच ही नहीं देशद्रोही की भी संज्ञा देता हूँ। मित्रता के बत, वचन और आश्वासन जिस विश्वासघातक ने आज व्यर्थ कर डाले हैं, उसका बदला लेना हमारा धर्म है, कर्तव्य है, हमारी प्राण-संचारिणी साँस-सांस का अनिवार्य स्वर है। जो व्यक्ति इस स्वर में हमारा साथ नहीं देता मैं उसे पशु समझता हूँ! यह तो हुई मेरे विचार की बात । अव जहाँ तक मेरे व्यक्ति का सम्बन्ध है, इस परमपावन यज्ञ में धन-सम्बन्धी आहुति देने में तो मैं इस समय असमर्थ हो गया है, लेकिन एक आध दिन में ही अपने एक मात्र - मिहनाद: A तरण पुत्र अनिमानसिंह को युद्ध पर भेजने की प्रतिज्ञा करता हूँ। समा का कार्यक्रम समाप्त हो जाने के बाद मानसिंह जब मंच की मोहियां उतर रहे थे, तब एकाएक उनको वोष हुमा कि हृदय धड़क रहा है और पैर डगमगा रहे हैं । तब अपने मन को सान्त्वना देते हुए उन्होंने सोचा था—जीवन का सबसे बड़ा मौल्य तो मैंने इमो बात मे समभा है कि वर्तव्य हमको जिस मार्ग पर ले जाये, हम उस पर तत्काल चलना प्रारम्भ कर दें। अभिमानसिंह को सेना में भरती हुए अधिक दिन नहीं हुए थे। कालान्तर में उन्हें यह सूचना मिल गई कि वालोग के युद्ध में उमने वीर- गति प्राप्त की। मनुप्य की इच्छानो का अन्त नहीं है। जो त्याग ममपंण के रूप में विस्फोट करके बाहर निकलता है उसमे एक प्रकार की उदार गौरव- भावना होती है। एक ऐमी तिक्षिा जो अनेक प्रकार के द्वन्दो को महज ही अपने में ममेट लेती है। मानमिह मोचते जाते थे । छीना-झपटी को इस प्रराष्ट्रीय परम्परा के विनाश के लिए मैं युद्ध का पक्षपाती हूँ। अभिमान को मैने बडे अमि- मान के माय देश की आजादी की रक्षा के लिए भेजा था । मैं कोई कम- जोरी नहीं दिखलाऊँगा । प्रेरणा और अस्तित्व का मघर्प कभी बन्द नहीं होगा। मैं कोई प्रतिक्रिया लेकर थोडे चला जाऊंगा । विश्वासघात की मारी ममावनाएँ नष्ट करनी ही होगी। चाहे वह कोई हो, मेरे मन में किमी प्रकार की कुण्ठा का स्थान नहीं है । अभिमानसिंह चला गया तो चला गया, मैं-मुझे-मुझको इसका कोई पश्चात्ताप नहीं है। चितन के साथ उनके ग्रामू गिर रहे थे । सविता पास ही झुकी हुई खड़ी थी। उनके ग्रांसू पोछती हुई वह कह रही थी-पाज तुमको क्या हो गया है। इस तरह तो कभी तुम नहीं रोते थे। हालाकि सोचने के क्रम में कभी-कभी उनके कान के पर्यो पर किमी ५० : सिंहनाद ! प्रकार का स्वर अपना प्रभाव नहीं स्थापित कर पा रहा था, फिर भी उनकी अन्तश्चेतना में कुछ बातें उठती रहती थीं : श्रद्धा के दांव पर तो अपनी सबसे प्यारी वस्तु ही रखी जाती है। मैंने भी अभिमान के साथ अभिमानसिंह को देश की बलिवेदी पर भेजा था । वास्तव में मैं रो थोड़े ही रहा हूँ ! हर्प और गौरव के आँसू कौन कहता है कि दुर्बलता के चित होते हैं । हृदय तुम किसी तरह की कमजोरी न दिखाना और सविता तुम तो नसिंग की ट्रेनिंग भी पा चुकी हो । अव तुम युद्ध-स्थल पर जाकर अपनी यही सेवा फिर सँभाल लेना। आंसू नहीं नभल रहे हैं और सविता पूछती है-~-क्या तुम मुझसे कुछ कह रहे हो! आसन्नमरण की पावन बेला में नाना कामनायों और इन्हों से झूमला हुआ मानव अपनी भावधाराओं में वहता-वहता कभी-कभी स्वप्न देखने लगता है। न जाने कहाँ की शक्ति आ गई कि मानसिंह लेटे-लेटे उठ बैठे और बोले-~~-देखो-देखो सविता, मेरा अभिमान लौट रहा है । वह घोड़े पर सवार होकर आया है, दरवाज़ा खोलो, वह मुझसे मिलने आया है ! स्वामी को पुनः तकिया की और झुकाकर लिटाती हुई सविता स्वाभाविक मर्म वाणी में कह रही थी-पागल मत वनो अभिमान के. बाबू! कहीं कोई नहीं है वह आँसू पोंछती हुई स्वामी को दवा पिलाती जाती थी और सिंह अव सदा के लिए मौन होने लगा था। . ..
एक प्रतीक्षा देवकीनन्दन बाबू को जीवन-दर्शन से मिगेप अनुराग न पा । वे 'प्रकमर पाहा करते थे-यह मव ववावास है। आदमी सुख के लिए जीता है, अपने प्रानन्द के लिए जीता है। इस बात का कोई महत्व नहीं कि उम सुगनौर प्रानन्द की उपलब्धि कमे होती है। और उनकी श्रीमती मनोरमा देवी को स्वामी को इस बात से घोर मतभेद था। वे महामना जानसन के इस कथन से बहुत प्रभावित थीं कि हम सब किसी-न-किमी को प्रमन्न और सन्तुष्ट रखने की प्राथा में ही जीते हैं। देवकीबाबू अब एक उच्च पद पर थे। मासिक आय के हिसाब से देखा जाय तो नगर के उच्चाधिकारियो मे उनका तीसरा स्थान होता था। उनका अपना बंगला था। गाडी भी वे अपनी रखते थे। लॉन के प्रासपाम सुहावने फूलों के पौधो को रक्षा और व्यवस्था के लिए माली तो मा ही, दो घरेलू नौकर भी थे। गाडी के लिए ड्राइवर अलग था । सबके काम बेटे थे । वे जब परस्पर मिलते, तो या तो सकेतो से अपना अभिप्राय प्रकट कर देते, या अगर वोलते मी, तो बहुत मन्द स्वर मे। स्वामी के इस अनुशासन के सम्बन्ध में भी मनोरमा देवी ने शायद किसी अरवी कहावत के आधार पर अपना एक अभिमत स्थिर कर लिया था : मौन वृक्ष पर शान्ति का फल लगता है । देवकीबाबू अब चालीस के लगमग हो रहे थे और मनोरमा देवी छत्तीस की नही तो बत्तीस की अवश्य होगी। लेकिन अब तक उनके - .
५२ : एक प्रतीक्षा कोई संतान न हुई थी। बैठक में जो कभी मित्र लोग मा जमते, तो अव- सर निकालकर मनोरमा देवी भी इस विचार से वहां आ जाती कि मित्रों के आतिथ्य-सत्कार में कोई कमी न रहने पाये। उनकी धारणा थी कि वह आदमी सबसे बड़ा अभागा है, जो ऐसी महत्त्वाकांक्षा रखता है, जिसे चरितार्थ नहीं कर सकता । जितना और जो कुछ भी हम कर सकते हैं, उतना तो हमें हर हालत में करना ही चाहिये । कभी-कभी कोई मित्र देवकीवाबू से कहना चाहता-"यह बात समझ में नहीं आती कि आपके कोई सन्तान क्यों नहीं हुई ?" पर जब वह यह वात सीधे देवकीवाबू से न कहकर अपने समीप वैठे हुए मित्र के कान में फुसफुसा देता, तो वह उत्तर देता--"वको मत, परिवार नियोजन चल रहा है।" इस बात पर जब एक वार कहीं कई लोग हँस पड़े, तो श्रीमती मनोरमा देवो अपने पालतू कुत्ते रूवी के साथ उठकर चल दी। रूबी उस जाति का कुत्ता था, जिससे पिगमीज़ कहते हैं । ऊँचा कम, लम्बा कुछ अधिक, मुंह चपटा, लेकिन नाक के पास चौड़ा, नाक छोटी और उसी स्थान से सारे मुंह को टेढ़ा बनाती-सी, पूंछ पर बड़े-बड़े केशों का एक गुच्छा । छोटे-छोटे कानों पर लम्बे केश, आँखें छोटी, काली-नीली मिली हुई। वदन के सारे केश काले, मुलायम, कहीं-कहीं भूरे और काफी . लम्वे । मित्रों की यह मंडली विसर्जित हो गई, तो मनोरमा देवी साहब के पास पहुँचती हुई रो पड़ीं। देवकीवावू समझ गये, क्या है । वे कहने ही जा रहे थे कि मनोरमा देवी के मुंह से निकल गया - "इस उपहास के कारण तुम हो! अपने छम जीवन के अनुरूप अव देवकीवाबू मानने लगे थे कि जो सिद्ध नहीं हो सकता, वह सत्य भी नहीं हो सकता। और जिस बात का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण नहीं मिल सकता, वह सिद्ध भी नहीं हो सकता। इतने में रूबी उनकी गोद में आकर अपना प्यार देने लगा। उसकी पूंछ एक प्रतीशा : ५३ हिल रही थी और उमको नाक उनका मत्या सूंघ रही थी । देवकीबाबू ने उत्तर दिया-"यह उपहास है ही नहीं। इसको कहते हैं हाम्य-विनोद। मेरी समझ में नही आता तुम्हारा सेंस-प्रॉफ ह्य मर कभी-कभी क्यों खो जाता है ! फिर हमारे बीच मे यह रूबी किसी संतान से कम है ? तुम्हें मालूम होना चाहिये कि मनुष्य मात्र का एक ही विश्वविद्यालय है। और वह है आदर्श । प्रादर्श तो उच्च होना ही चाहिये।" रुबी तव तक देवकीवाबू की गोद छोड़कर मनोरमा की गोद में मुंह डालकर पूंछ हिलाने लगा । एक ठंडी सास जो मनोरमा के अन्तःकरण से फूट रही थी, भीतर समानर रह गयी। रुची बंगले के अन्दर या तो जंजीर से कही बैंधा रहता; या फिर मनोरमा देवी के साथ बना रहता । पर मनोरमा देवी जब कही किती सस्त्री के यहां जाती तो रुवी की जंजीर उनके हाथ में रहती । देवकी वाबू को यह अच्छा न लगता। उनका कहना था कि आदमी हो कि जानवर, सदा बन्धन मे नहीं रह सकता। कमी-कमी उसे बन्धन से मुक्त भी कर दिया करो। मनोरमा देवी ने सहज भाव से उनका यह सुभाव मान लिया । परिणाम यह हुआ कि रूबी को जव बन्धन से मुक्त कर दिया जाता, तब वह सजातीय मित्रता के अनुसंधान मे पडोस के बैंगलो मे भी चक्कर काट पाता । खान-पान में साधारण रूप से उसके साथ कभी कोई भेद- भाव न बरता जाता । मनोरमा देवी जव सोफासेट पर विश्राम करतो, तो रूबी भी उनकी गोद मे दुवक रहता । उसके बदन के मुलायम केगों पर हाथ फेरने में वे एक सिहरन का अनुमव करती और कमी-न-कभी तो उसके सिर तथा नाक पर प्यार-चिह्न भी अकित किये विना न मानती! नाश्ता करते समय मनोरमा देवी यदि उम नमकीन बिस्किट खिलाने लगती, तो देवकी वावू उसे मक्खन चचिन टोस्ट खिलाये विना न चूकते। इस प्रकार ख्वी देवकीबाबू के परिवार का एक प्रिय सदस्य वन ५४ : एक प्रतीक्षा गया था। अभाव का प्रश्न मनोरमा देवी के मन में जो कभी उठता,.. तो उन्हें स्वामी के इस कथन की याद मा जाती कि आदर्श सदा सच्चा होना चाहिये । तब वे झट से रूवी को प्यार दान करने लग जाती थीं। देवकीवावू को अपने कार्यालय से लौटने में प्राय: देर हो जाती थी। मनोरमा देवी को कभी कुछ अन्यथा सोचने का अवसर न मिले, अत: समाधान के लिए कपड़े उतारते-उतारते वे यह बतलाना कभी न भूलते कि जीवन बड़ा ही व्यस्त हो गया है । सभापतित्व के लिए कभी किसी महोत्सव में जाना पड़ता है। नियमितरूप से अखबार पढ़ने की आदत तुम्हें है नहीं; इसलिए तुम्हें क्या मालूम ? कभी किसी संस्थान, आश्रम या उद्योग-मन्दिर का उद्घाटन करने के लिए जाना ही पड़ता है। फिर उच्च अधिकारी मित्रों की पार्टियों में सम्मिलित हुए विना सामाजिकता का स्तर कैसे कायम रह सकता है ? इन समारोहों और पार्टियों में मनोरमा देवी को साथ ले जाने में, देवकीवावू कभी रूचि न लेते। इस सम्बन्ध में उनका विचार था कि नारी तो घर की शोमा होती हैं । मूल बात यह थी कि मनोरमा देवी नृत्यकला में बड़ी निपुण थीं, यहाँ तक कि अपने कौमार्य जीवन में वे कई बार विशेष पुरस्कार, डिप्लोमा, पदक और प्रशंसा-पत्र भी प्राप्त कर चुकी थीं। लेकिन उनका वर्ण कुछ श्याम था । यद्यपि रूप-सज्जा पूर्ण कर लेने पर उनकी सौन्दर्य गरिमा में किसी प्रकार का उल्लेखनीय प्रभाव न रह जाता था । पर उन्हें इस बात का ध्यान सदा बना रहता कि यदि किसी ने नृत्य करने का प्रस्ताव कर दिया, तब उसे टालना मेरे लिए कठिन हो जायगा । फिर भी जीवन का यह अंग बिल्कुल ही सूना न रह जाय, इसलिए वर्ष भर में एक-आध बार अवसर देखकर वे मनोरमा देवी को फ़ोन से बुला भी लेते थे। देवकीवावू जव कभी अपने कार्यालय जाते तव, और जव वहाँ से लौटते, तब भी; बल्कि कहना चाहिये कि कार की यात्रा में अवश्य उनके हाथ में कोई जासूसी उपन्यास अथवा अंग्रेजी मासिक पत्रिका रहती। , एक प्रतीक्षा : ५५ वाता-विनोद, रमी, करम, विलियई, शतरंज प्रादि ग्रीड़ानों में जो ममय व्यतीत होता, उनकी दृष्टि में उसका एक अलग महत्व या। किन्तु उममे परे यत्र-तत्र प्राने-जाने में जो समय लगता, उमकी उपयोगिता को ये विशेष महत्त्व देते थे। एक दिन की बात है, क्लब में रागिणी नाम की एक नतंको का मास्कृतिक कार्यक्रम या। उन्होंने मनोरमा देवी को दो चार फोन किया, किन्तु फोन खराब हो जाने के कारण उनका कोई उत्तर उन्हें नहीं मिला ! रागिणी देवी के नृत्य और गान को मुन कर वै ग्राम-विभोर हो उठे। नव यह कार्यक्रम समाप्त हुना, नव रागिणी देवी को बधाई देते हुए माहब को कहना ही पड़ा, आप तो हमारे देश की एक उच्च कोटि मी कलाकी हैं। आपकी क्या बात है । पर मच पूछा जाय, तो अभी मेरी तदियत भरी नहीं। मैं चाहता हूं-किसी दिन फिर अापका कोई कार्यत्रम रक्खा जाय। उन्होंने इसके लिए क्लब के मैटरी से प्राग्रह भी किया और उसने उसकी म्वीकार भी कर लिया। प्रफुल्लमन देवरीबाबु अपनी गाड़ी पर बैठे हुए चले जा रहे थे और रात के ग्यारह बज रहे थे। कार यी हैइलाइट में यकायक प्रागे कोई पडी हुई चीज दिवाई पट्टी । और निवट पाने पर ड्राइवर ने गाड़ी को उसने बचाकर निकालते हुए कहा-"कोई कुत्ता मरा पड़ा है।" एक विचारक की भांति देवीवाढू बोले--"आखिर को ससार टहरा । इनमें जीवन और मरण तो लगा ही रहता है।" गाडी चली जा रही थी और देवकोवाबू कहते जा रहे थे-"फिर प्रावारा कुने, जो मालिकों की अमावधानी से इधर-उधर चक्कर काटा करते है, ग्राजक्ल की इम व्यस्त मन्यता में वारो, बसो पोर ट्रको से पूरा संक्षरण भला कैसे पा सकते है ! ऐमी व्यवस्था होना नो वड़ा कठिन, दुप्पर, बल्कि असम्भव है कि कनी कोई दुर्घटना ही न हो। फिर ये तो पशु वहरे, मनुष्य को आकस्मिक मृत्यु को भी भला हम को रोक सकते ५६ : एक प्रतीक्षा गाड़ी आगे बढ़ गयी। मिनटों में वॅगला आ गया। मनोरमा देवी द्वार-मंच पर ही मिल गयीं । उन्हें सकपकाया हुना उदास देखकर सहसा देवकीवावू ने पूछा-"क्यों क्या बात है ?" मनोरमा देवी ने भर्राई हुई वाणी में उत्तर दिया--"रूबी का पता नहीं है ! कोई दो घंटे हुए, तुम्हारी प्रतीक्षा करता-करता फाटक के बाहर चला गया था। मैंने सोचा-तुम्हें देखने के लिए सड़क पर खड़ा होगा। पर......" इसके आगे वे कुछ न कह सकी। देवकीवावू उन्हें सान्त्वना देते हुए बोले-"घबरानो नहीं, यहीं कहीं होगा । अभी मिल जायगा।" ड्राइवर ने गाड़ी स्टार्ट की और स्वामी के साथ मनोरमा देवी भी उसमें बैठ गयों। गाडी अभी चार फर्लाङ्ग भी न चल पाई थी कि नगर के एक मुख्य राजपथ पर पहुँचते ही एक आशंका के साथ देवकीवावू वोले-"जरा यहाँ रोकना।" गाड़ी वहीं खड़ी हो गयी । यह वही जगह थी, जहाँ से देवकीवावू अभी थोड़ी देर पहले निकले थे। दोनों गाड़ी से उतरकर उस मरे कुत्ते को ध्यान से देखने लगे। देवकीवाबू का मन प्राधियों से घिर गया । मनोरमा का कण्ठ भर पाया। नयन सजल हो उठे। एकाएक देवकीवाबू ने कुछ सोचा, कुछ स्थिर किया। फिर उनके मुंह से निकल गया। हाय यह क्या हुआ ! यह तो अपना रूवी है ! फटे हुए जबड़ों से बहता हुआ रक्त जम गया था । जीभ बाहर निकली हुई थी । आँखें बन्द थीं। जिन मुलायम केशों पर हाथ फेरते हुए वे पुलकित होकर सिहर उठते थे, मनोरमा अपना अभाव भूली रहती थी, वे रक्त से सन गये थे ! ,
एक प्रतीक्षा : ५७
मनोरमा देवी वही बैठकर रो पड़ी और देवकीबाबू सिर पर हाथ
रखकर मन-ही-मन कहने लगे-मेरा यी आवारा नहीं था। आवारा
तो वास्तव में.....!
अब उनकी प्रांखों से भी प्रासू टपक पड़े।
बहुतेरी बातें, जिन्हें हम मुंह खोलकर कह नहीं पाते, आँसू उन्हें
सहज ही अपनी मूक भाषा में कह डालते है।
.
पुनर्मिलन अम्विका यह वात कभी भूल न पाता था कि फूलवती कभी कोई वस्तु उससे न मांगती थी । कभी उसने यह नहीं कहा कि मुझे कोई कष्ट है । अस्वस्थता में भी वह हंसकर ही वोलती। तापमान देखने के लिए कभी जो अम्बिका उसके बदन पर हाथ रख देता तो वह एक सिहरन के साथ बोल उठी---"अरे हटो ! मुझे कुछ नहीं होना-जाना है। दो चार दिन में उठकर फिर बछड़ी बन जाऊँगी।" आज जव अम्विका को उसकी इस बातों का स्मरण पा जाता तो उसकी देह में रोमांच हो उठता है। उस दिन कहीं उसने हँसते-हँसते कह दिया--"वछेड़ी !" "क्यों? बछेड़ी नहीं तो भैंस हूँ ? अच्छी नहीं लगती तुम्हें !" और एक नि:श्वास के साथ अम्बिका सोचने लगता है-~-वैसा कल- हास क्या फिर कभी अपना होकर इस भाँति आँखों में भरने को मिलेगा कि मैं ठगा-सा उसे निहारता रहूँ ! उस दिन अम्विका जमना के श्मशान घाट से ऊपर मुख्यपथ की और पैदल ही चल रहा था। ये पावन स्मृतियाँ उसके मानस में धुंध बनकर छा गयी थीं। वीणा के सारे तार झनझना रहे थे । पवन सन- सन डोल रहा था। नीम और पीपल के वृक्षों की टहनियाँ हिल-हिलफर झूम रही थीं। चक्कर काटती हुई हवा धूल उड़ा रही थी और दाएं ओर खड़े वृक्ष से कथा अपने आप गिर पड़ा था ! तभी सहसा उसे स्मरण मा गया एक दिन, जव उसका स्वास्थ्य ।
पुनर्मिलन : ५६. बिल्कुल टीक था। दोपहर का ममय होगा । वह उसके निकट जाकर पूछने लगा था-"मेरी धोती माफ़ कर दी?" "मैं गमी धोवन तो दन नहीं मकती कवि चण्डीदाम, जो विना धुलाई लिये दिन मर तुम्हारे और तुम्हारे पर नर के कपड़े माफ़ करती हूँ !" उमकी सवि-माधुरी पर मुग्ध होकर अग्दिका ने जब उत्तर । बुछ न वहा, तो वह प्राप-मे-ग्राप दोली-"नाराज़ हो गये ! अरे, मैं तो यूं ही कह रही थी कि दे तुम कहते क्या हो ! फूल तो नम्पूर्ण ममर्पण के लिए ही होते हैं ! तुम्हारी सेवा न करूंगी, मो मन कने मरेगा ? तृप्ति कैसे होगी? धोती तुम्हारे पलंग पर, तकिये के नीचे, तहायी हुई रक्बी है !" मैंने कह दिया-"मैं तुम्हारे ऊपर कभी नाराज हो सकता हूँ भला !"--तो वह बोली-"इन बातों को तुम क्या जानो ! मेरा तो ख्याल है, जो नाराज नहीं होता, वह पूरा प्यार पा ही नहीं सक्ता !' उस समय उसका लोम-लोम विहंस उठा था। उसके इम कयन पर वह उसे क्षण-मर देखता रहा था। उसरे आगे के दोनों दांन अघग्घुले दिमाई दे रहे थे और कपोलो पर अमृत-कूप बन गये थे। वह छवि-मुद्रा क्या कभी भूल सकती है ! तत्पश्चात् वह जो चलने लगा, तो उमने हाय बढ़ावर उमकी कमीज़ का छोर पकड लिया था। गोरे-गोरे हाथ, पतली-पतली अंगुलियां । क्लाइयो में कांच की सुन- हरी चूड़ियां, अनामिका में एक पतली मुद्रिका, जिसमें छोटे-छोटे लाल- हरे-नीले नग। कमीज़ का छोर उसके हाथ से छूट गया, तो वह संकुचित हो उठी थी। फिर जो कुछ न कहर वह चलने लगा, तो फूलवती ने उमकी धोती याम ली।-"अब जाते कहाँ हो ? बड़े भाग्य से तो पाये। और जब मा गये, तो अब बैठ लोन, थोडी देर " अम्बिका के मन में आया, जान पड़ता है, यह मुझे अपना प्यार “६० : पुनर्मिलन देना चाहती है । तव वह विचार में पड़ गया : अस्वस्थता की स्थिति में देहरस का विनिमय वर्जित कहा गया है। फिर भी जब उसने उसे भुज बन्धन में लपेट लिया, तब उस सिहरन में एक बार तो ऐसा जान पड़ा, जैसे वह इस संयोग का लोम संवरण न कर पायेगा। लेकिन उसे वापू का यह कयन याद था कि तपस्या जीवन की सबसे बड़ी कला है और प्रमाद शरीर का नहीं, वास्तव में मन का होता है । अत: फिर वह सँभल गया । एक निःश्वास ! और आज वह सोचने लगता है-यदि वह जानता कि फूलमती सचमुच देवलोक-वासिनी हो जायेगी, तो वह इस अवसर पर कभी न चूकता । परिणाम चाहे जो होता। माना कि संसार में प्यार की सीमा नहीं है । पर ऐसा एकनिष्ठ 'प्यार ! हाँ, तो उसने कहा-~~"क्या करूँ वैठकर ! तुम्हारा जी अच्छा नहीं है - तब मदिर हास के झकोर में वह बोल उठी थी- "अच्छा बोलो, के दिन में अच्छी हो जाऊँ ?" "ही-ही-ही-ही ! ----सच कहती हूँ, सब कुछ मेरे हाथ में है । जितने दिन चाहूँ, जी लूं ; जव चाहूँ तव सदा के लिए सो जाऊँ। सच ! ही- ही-ही-ही !" x फूलमती का शव वैलगाड़ी पर जमुनाघाट ले जाया गया था। साथ में गांव के दस व्यक्ति थे। दाह-संस्कार अम्बिका ने ही किया। धैर्य- पूर्वक वह सारे कृत्य निपटाता रहा । अन्त में जव वह आगे-आगे चला और पीछे-पीछे साथ के लोग, तो उसे अपनी जीवन-संगिनी की ये बातें बार-बार स्मरण आने लगीं। रह-रहकर उसे जान पड़ता, कोई उचक- कर उसके काम में कुछ कहने के बहाने कह देता है-फुऊऽऽ ! और 'फिर एकाएक खिल-खिलाकर हँस पड़ता है ।
पुनर्मिलन : ६६ 1 "मन मे मोरे हक उठन जव कोयल कूकत दन में !' फिर झभावात का एक बवण्डर-सा उसके मामने पाकर एक और चल देता है और चिन्तन का प्रम चलता जाता है। --उसे सदा मेरा प्यान बना रहता था। जिस दिन उमकी तबियत ठीक रहती, वह जरूर मिलती और मिलती भी तो साक्षात्कार होते- होते गोद में प्रा वैठती। कभी मेरी छाती पर सिर रसकर लेट जाती, कमी अखिो-मे-प्रांग डालकर मुस्करा उठती। कभी घण्टी उसी नाति हंसती-हंसाती मेरे मन में खेलती रहती और कभी-कभी तो गोद में मो मी जाती ! मैं कमी कुछ बहन की होता तो बोल उठनी-"क्यों ? क्या मैं एमी भारी हूं कि मन नहीं होनी ! फूल तो ठाकुरजी के ऊपर चढते ही हैं । फूलमती मेरा नाम ठहरा। देखते नहीं, जितनी हलकी लग रही है। हो-ही-ही-ही !" मैं चलने लगा तो सदा की मांति मुस्कराती हुई वोली-"अब जाते यहाँ हो ! वंठो! अरे बैठो !' मैंने कह दिया-"अब बैठकर क्या करूं? मुझे जाना जो है।" तब भौहों मे बल डालकर उमने कहा था-"जाना है मला कहां जाना है?" मैंने उत्तर दिया-"किशोर के यहाँ ।" "अभी कल उसका व्याह हुअा है। क्यो वेचारे का कीमती समय नष्ट कर रहे हो ?" "मुझे उसने घर पर ग्रामत्रित किया है।" "यो तो सीधै तोर में यह क्यों नहीं कहें कि उमकी दुलहिन वा मुस देखने जा रहे हो! ना बावा, मुझे दर लगता है कि कही !" मैंने कह दिया--"वको मत ! जाने दो मुझे।" तव लेटी-लेटी वह मुम्कराती हुई वोली-"विगड़ो मत मुभमे । मुझे पता है कि किशोर ने दुलहिन बड़ी मुन्दर पायी है। अच्छा बोली, तुम उसे देखकर मुझे भूल तो न जानोगे ? वैसे डरने की कोई वात तो ६२ : पुनर्मिलन नहीं है । मगर तुम अाखिर को पुरुष जो ठहरे ! -~~भमरा बड़ा नादान "फिर वही मूर्खता।" "सच कहती हूँ, मुझे बहुत पसन्द आयी। आदमी होती, तो डोरे डाले विना न मानती। मगर कुछ भी हो, उसकी देह भर ही सुन्दर है। मन इतना सुन्दर नहीं, जो प्रलोभन और मोह से परे हो । मुझे मालूम है, वह जीवन में कोई सीमा नहीं देखना चाहती। और तेवर तो उसमें इतना है कि तुमको जो कभी पा गयी, तो तुम चक्कर में पड़ जायोगे! अपमान करते उसे देर नहीं लगती। मगर तुमको इससे क्या ? रूप फिर भी बड़ी चीज है । निमन्त्रण देने वाली आंग्रे मिलते ही आदमी सब कुछ भूल जाता है। फिर उसमें प्राकर्पण भी बहुत है । मैं जब उसके पास वैठती हूँ, तो उठने का मन नहीं होता । लेकिन मेरे भी कगी दिन थे बाबू । याद हैं वे दिन, जब रात-रात भर सो नहीं पाती थी!" और वात-की-बात में उसकी आँखें भर आयी थीं। अम्बिका को फूलमती की वह मनोहर छवि किसी प्रकार भूल नहीं रही थी। हात जैसे विद्युत का हो, अधर-पल्लव गुलाव के दलों से कोमल और रसीले । आँखें बड़ी-बड़ी कजरारी। कभी पलक खोलती, कभी मंद लती। कभी मेरी क़मीज़ का बटन खोलने लगती, फिर आप ही बन्द कर देती । कभी मेरी गोद में आकर चुपचाप विचार-लीन हो जाती। उस दिन मैंने कह दिया- "मुझे इन बातों से क्या मतलव ? किशोर मेरा बाल-सखा है।" वह एक तेवर के साथ वोली-"अरे हटो, मुझसे बनते हो ! इस ‘मामले में कोई सगा नहीं होता । मैं भी तो दूर के नाते तुम्हारी बहन लगती थी। फिर मेरे घर दिन मर में दस चक्कर क्यों लगाते थे? बड़े ‘भाग्य थे, जो तुम्हीं को मिल गयी। वरना कौन जानता है, तुम मुझे 'किस घाट का पानी पिलाते। झूठ कह रही हूँ ? ही-ही-ही-ही!" अम्बिका के आँसू थम नहीं रहे थे~~ये स्मृतियाँ भगवान की पुनर्मिलन : ६३ अप्रतिम मृप्टि है । मरुभूमि में प्याम से विकल मानव जब छटपटा उठता है, तब ये स्मृतियां ही तो नयनों के माध्यम से झरना वनकर निम्सरण कर उठती है। इन बातों का परिणाम यह हुआ कि उस दिन मैं उमी का होकर रहा, जबकि किशोर ने मेरे लिए कई चीजें वनवाई थी, महीनों उलहना देता रहा था। पही विशोर, जो अब माथ-माथ चल रहा था, बोला-"पागल हो रहे हो ! यह क्यों नहीं सोचते कि भाभी ने साथ ही कितना दिया ! गदा ही वे बीमार बनी रहती थी । स्वय तुमने कहा था-"मैं तो तग ना गया उसकी बीमारी से !" दमगान की ये बातें अम्बिका श्मशान में ही छोड प्राया था। वह समय विचार-विमर्श का था भी नहीं । फिर जो लोग अधिकारी थे, वे समय और संयोग पाकर अधिकारपूर्वक कह भी रहे थे । माता पडित ने कहा था-"यह बहू नहीं थी, देवी थी। दस वर्ष चीत गये उसे मेरे घर आये हुए, लेकिन हंसी के सिवा आज तक में उसका बोल ही नही मुन पाया । वह जव से चली गई है, जान पडता है, इस घर की सारी शोमा तिरोहित हो गई है।" और अम्बिका की मां चारपाई पर पड़ी बोल उठी थी-"वह तो आयेगी, पर ऐसी भला क्या प्रायेगी ' मुझे तो वही विटिया भी इतनी स्यारी नहीं, जितनी बहू थी।" फिर महीनो याद जव अम्बिका का चित्त कुछ साधारण स्तर पर पाया, तब किशोर से उसने श्मशान से लौटते समय कही हुई बात के उत्तर मे कह दिया- "तुम उसे कैसे जानते किशोर, जब मैं ही उसे पूर्णरूप से नहीं समझ पाया था।" उत्तर के साथ वह मन-ही-मन सोचने लगा-'मैं उस पत्नी को नारी नही समझता, जो अपने पति की भूख शान्ति करने में समर्थ हो, " ६४ : पुनर्मिलन स्वामी के इधर-उधर भटकने के अवसरों पर जो उसकी सुरक्षा का समर्थ माध्यम न बन पाये । पशु को तो बांधकर ही रखा जाता है । आदमी के अन्दर जितना पशुत्व होता है, योग्य पत्नी उसका शमन और मांगली- करण बनकर रहती है। अपनी छवि-माधुरी से, सर्वस्व समर्पण के नाना प्रकारों से, हास-परिहास, मान-मनुहार, क्रीड़ा-कौतुक-यहाँ तक कि तर्क-वितर्क के प्यारे और स्नेह से भीगे हुए विविध प्रयोगों से।' फिर वह किशोर को अपनी बगिया में ग्राम खिलाने ले गया। तभी एकाएक एक प्रसंग में वह बोल उठा----"उसकी देह छूट गई है, देह के नाते छूट गये हैं; तन छूट गया है। तन की माँग और प्रेरणा की मनुहार छूट गई है। एक तरह से वह मेरा मन ले गयी है। मन की सारी क्रीड़ा, स्वच्छन्दता और कल्पना की सारी उड़ान ले गयी है और छोड़ गई है अपना एक जागृत इतिहास, जो अब मेरे लिए एक स्वप्न बन गया है । तुम नहीं जानते किशोर की मृत्यु का सबसे बड़ा दंड क्या होता है ! किशोर को इस प्रकार की बातें सुनने में मज़ा बहुत अाता था। इसलिए उसने कह दिया-~~"हाँ, भई जानता तो नहीं हूँ।" तव अम्बिका बोला--"जानता मैं भी नहीं था किशोर । पर कल जब मैं वरोठे में खड़ा था, पिताजी द्वार पर रामेश्वर अवस्थी से बात करते-करते कहीं वोल उठे-- "मृत्यु किसी की सिफ़ारिश नहीं सुनती और धूस भी नहीं लेती। जव वह आ जाती है तो फिर किसी तरह पिंड नहीं छोड़ती।" "हाँ, बात तो सही है ददुग्रा । जो आदमी मर गया सो मर गया। वह फिर लौट नहीं सकता।" उत्तर में रामेश्वर चाचा बोले-"मगर मैं कहता हूँ कि लौट सकता है।" फिर वे छप्पर के नीचे बैठकर बड़ी देर तक बातें कहते रहे । एक दिन पंडित रामेश्वर अपने खेत की नाली साफ़ करते-करते वहीं से सिर उठाकर बोल उठे थे, फावड़े का वेंट उनके हाथ में था।
कमर में पांच पुनर्मिलन : ६५ उन्होंने फावडा वही छोड़ दिया। गमछा उनके कन्धे पर था, धोती थे। फिर वे पास मा गये । नंगे सिर, देह पर कोई वस्त्र नहीं; कन्धो और मुजाओं पर कहीं-कही मिट्टी लगी हुई थी। पमीना चमक रहा था। पास ग्राकर दोनों हाथ लागी से पोछ- पाकर उसके बूट में बंधी चुटकी भर तम्बाकू होठ में दया ली और बोले- "मैंने मे बच्चे को देना है, जिसने पूर्वजन्म का घर-द्वार बतला दिया है, गडी हुई दौलत बतला दी है।" अम्बिका स्थिर दृष्टि से उन्हें देखने लगा। फिर वे आगे बढकर बोले-"उसे अपने पुराने माता-पिता के पास ले जाया गया तो उनसे उसने और भी ऐसी गुप्त बातें की रि सव-के-सव स्तम्भित हो उठे। उसने बतलाया कि यहाँ एक डब्बे मे अशर्फियां रगी हुई थी और डब्बा वाल्टी के अन्दर रखा गया था। माता रो पड़ी और उसकी विधवा बहू के मुंह से एक चीख निकल गयी । थोडी देर बाद जब लोग स्थिर हुए तो पिता बोले- वेटा, तो फिर लौट पामो न अपने इसी घर में?" "मगर बच्चा-सो-बच्चा।" रामेश्वर तम्बाकू एक ओर पिच्च से थूकते हुए बोले-"उसका भोलापन कही जा सकता था ! फिर इस जन्म के पिता का प्यार भला वह कैसे भूल सकता था ? एकटक उन्ही 'की ओर घूमकर देखने लगा । मानो उस भगिमा के द्वारा कह रहा हो --"अब मैं वेटा किसका ? तुम्हारा कि इनका ।" पास खडे हुए उस बच्चे के पिता से न रहा गया। बोला-"ऐसा कैसे हो सकता है ! अब तो यह छुन्ना मेरा है।" अम्बिका और किमोर एक-दूसरे को देख रहे थे। रामेश्वर बोले-"जब उसने यह उत्तर दिया, तो पूर्व पिता का चेहरा मफेद हो उठा ! पहले तो उससे कोई उत्तर न बन पडा। पर फिर कुछ सोचता हुआ वोला-"हां भई, ऐसा कैसे हो सकता है ! अब छुन्ना आप ही का है।"
६६ : पुनर्मिलन - आँसू पोंछती हुई पूर्व-माँ को अब भी सन्देह बना हुआ था । ससा उसने प्रश्न कर दिया-“उस जन्म में, जब तुम मेरे बेटे थे, तव तुम्हारा नाम क्या था वेटा?" छुन्ना ने कह दिया था-"अम्मा, मेरा असली नाम मनोहर था।" आँखें आँसुत्रों से तर थीं, फिर भी पूर्व माता के प्रानन पर पुलक- हास दौड़ गया । बोली-"और प्यार का नाम ?" बड़ी-बड़ी आँखों के पलक एक बार बन्द करके फिर उनको खोलते हुए उत्तर दिया- "प्यार का नाम था-मुन्ना।" सारा परिवार स्तब्ध-विस्मित, पुलकित और गद्गद् हो उठा। क्रम- क्रम से सवने उससे बातें की। प्रश्नों की झड़ी लग गयी। अन्त में शेप जीवन की साध लिए हुए, सास की ओर देखती हुई पूर्वपत्नी ने पूछा- "अम्मा, आपकी प्राज्ञा हो तो मैं भी दो वाते कर लूं।" "ज़रूर-ज़रूर।" उस माँ का उत्तर था। विधवा की आँखों में आँसू टपक रहे थे और कण्ठ बाई हो उठा था । अव वह सोच रही थी~ "प्रात्मा तो वही है, शारीर न सही।' फिर वह विधवा नारी उसे अपने निजी शयन-कक्ष में ले गयी, जिसमें उसके स्वामी का चित्र टँगा हुआ । उसको देखते ही बच्चे ने अपना पूर्ववित्र पहचान लिया । बोला-~"यह मैं हूँ।" विधवा ने उसे भुजवन्धन में लेकर छाती से त्रिपका लिया। बारम्बार वह उसका मुख चूमती रही। वच्चा इस नये अनुभव से घवरा उठा, तो वह रोने लगा। तभी एकाएक उस नारी को मूर्छा आ गयी। छुन्ना का रुदन सुनकर उसके पिता, घर के लोगों के साथ, उसी कक्ष की ओर दौड़ पड़े।
पुनर्मिलन : ६७
तद दा छुन्ना प्रांगन की ओर चल दिया । तुम्न वह पिता के
पाम जा दहाहा
पिर पिता-पुत्र पर नोट प्रा।
अम्बिका ने पूछा-"रि?"
गन्दर ने बना दिया-जिर ही दिन बन विषा मन्यु
हो गयी। उसनेमा रिनी प्रकारनंग नही मग।"
.- मिलन : एक बलिदान . या मृत इतिहास की आँखें पत्थर से भी अधिक कठोर और निर्मम होती हैं । ढाई सौ वर्ष पूर्व राजस्थान में सम्राट आलमगीर के गुप्तचर, जोध- पुर के महाराज अजीतसिंह की खोज में, इधर-उधर विचर रहे थे । डंके की चोट पर यह घोपणा चारों ओर प्रसारित कर दी गयी थी कि जीवित किसी भी अवस्था में, जो कोई भी, महाराज अजीतसिंह का सिर लाकर सामने उपस्थित कर देगा, उसे पाँच हजार दीनार पुरस्कार में दिये जायेंगे। उधर महाराज सिरोही क्षेत्र की ऊँची-नीची असम पर्वतीय कन्दराओं में छिपे हुए छद्यवेश में अज्ञात जीवन बिता रहे थे। यचपि इसी समय उनके लव्धकीति सामंत वीर दुर्गादास जालीर के दुर्ग को घेरे हुए थे। अज्ञातवास के जीवन में भेद खुल जाने की चिन्ता तो रहती ही है, कप्ट भी कम नहीं होता। ज्येष्ठ मास की धूप तप रही थी और लपट के तमाचे खाते हुए महाराज अजीतसिंह, एक कन्दरा में बैठे, एक मृग का आमिप पका रहे थे। कहते हैं, उनके वदन पर जो धोती थी, उसमें थिगड़े लगे हए थे। भूख के कारण उनके प्राण व्याकुल थे, आँच के निकट रहने से मुख तमतमा गया था । आँखें लाल हो रही थी और वदन से पसीना टपक रहा था! इतने में शंका के साथ कुछ ग्राहट पाकर वे चौंक पड़ें- "कौन ?" तभी एक सामंत ने आगे बढ़कर कह दिया--"देखता हूँ महाराज मिलन : एक वलिदान : ६६ कष्ट मे है।" ऐमे संकटकाल में सहानुभूति की बात सुनकर महाराज की बाँ, बल गयी । मुस्कराते हुए बोले-"तो फिर कठिनतम प्रश्न हल किये बना जीवन का कोई महत्व भी नहीं होता ठाकरां।" गोविन्दसिंह वृद्ध थे, उनके केश पक गए थे। महाराज की बात सुनकर ममर्थन के स्वर मे मिर हिलाकर उन्हें कहना ही पड़ा~'वेगक- चशक।" उपयुक्त प्रासन के प्रमाव की बात सोचकर कुछ संकोच के माथ महाराज बोले-"खड़े रहने से काम नही चलेगा, आप विराज ही न जाय यहाँ ?" मामंत गोविन्दसिंह अपने साथ एक परिचायक लाये थे। तब तक वह पीछे छिपा खड़ा था। अब उसने प्रागे बढकर शिष्टाचार के साथ कहा--"श्रीमान ये मझिली गढी के स्वामी श्रीमंत गोविन्दसिंह हैं । इस समय ये एक शुम ममाचार के साथ पधारे है।" परिचायक इतना कहकर शिष्टता के साथ पृथक हो गया । गोविन्द सिंह बोले-"महाराज मैं वादगाह आलमगीर का मनसबदार रहा हूँ। बादशाह की ओर से मुझे बदनौर के किलेदार रहने का भी सौभाग्य प्राप्त रहा है । पर अब वह दुर्ग वीर दुर्गादास के अधिकार मे आ गया है और महाराज यह जानकर प्रसन्न होगे कि सम्राट आलमगीर का दक्षिण में निधन हो गया है !" आँखें मूदकर महाराज मन-ही-मन कहने लगे-'मैया, तेरी करणा !' फिर प्रमन्नता से पुलकित होकर बोले-"मच्छा. दुमत ने वदनौर का दुर्ग भी ले लिया !" और कुछ सन्देह के सा- "मानमगोर क्या सचमुच मर गया ?" "हां महाराज, ऐसा ही हुआ है ।" महाराज अजीतसिंह को आश्चर्य हुमा मौर नवन मुंबर उन्होंने फिर मन-ही-मन कह लिया--'मया, तेरी करणा!'
७० : मिलन : एक बलिदान
तब तक अवसर देखकर गोविन्दसिंह बोल उठे-..-"अव मेरा कोई
अवलम्बन नहीं रह गया महाराज । दो रोटी का सहारा हो जाता, तो
बड़ी दया होती।"
महाराज अजीतसिंह हँसे विना न रह सके । वोले---- "यहाँ मुझे दो
क्या, एक रोटी भी खाने को नहीं मिली और जानते हो कितने दिन
से ?" फिर हाथ की अंगुलियाँ उठाकर कह दिया--"चार दिन से !
फिर भी आप बैठे ठाकराँ । मृग के आमिप से मैं आपका सत्कार करने
के लिए तत्पर हूँ।"
महाराज का इतना कहना था कि गोविन्दसिंह के साथ आयी हुई
एक महिला तथा कुमारी आपस में कुछ खुसफुसाने लगी।
इतने में महाराज हाथ जोड़कर बोल उठे-.-"अपराध क्षमा हो
माता जी। स्थिति के विधान से आप लोगों की ओर मेरा ध्यान नहीं
गया !
"यह महाराज का बड़प्पन है।"
"बड़प्पन न कहकर आप इसे संकटकालीन धर्म क्यों न कहें ? आप
देख ही रही हैं । इस कन्दरा में स्थान की कितनी कमी है ? फिर भी
आप इधर निकल पायें।"
महिला हंसने लगी । कुमारी के मुख पर रूमाल पा गया और
महाराज संकुचित हो उठे।
महाराज का शील-सौजन्य देखकर कुछ साहस के साथ महिला
बोली-"महाराज अपनी ही कहेंगे या मेरी भी कुछ सुनेंगे !'
स्तब्ध से होकर महाराज बोले-"याज्ञा माताजी ?"
महिला ने गम्भीरता के साथ कह दिया--"मैं अगर आपको कोई
वस्तु भेंट करूँ, तो वह आपको स्वीकार करनी पड़ेगी।"
महाराज
ने
कुछ सोचकर उस तरुण कुमारी की ओर दृष्टि डालते
हुए संक्षेप में उत्तर दिया--"अवसर देखकर।"
महिला बोली-"अवसर देखकर ही मैंने ऐसा प्रस्ताव किया है
मिलन : एक बलिदान : ७१ महाराज।" महागज ने कुमारी की पोर दृष्टिक्षेप करते हुए सकुनाते-राकुचाते उत्तर दिया-"देखा जायगा।" महिला बोली-"और भी एक बात है महाराज, प्रापको ग्राज ही यहाँ से दूमरी जगह प्रस्थान कर देना है । सम्राट की सेना के एक गुप्त- घर कोपम कन्दरा का पता चल गया है । सैनिको का दल किसी समय भी यहाँ पा सकता है।" पाश्चर्य के साथ महाराज ने पूछा--"हो मरता है । पर यह समा. चार मापको मिला कसे माताजी?" महिला बोली-"महाराज को कदाचित् ज्ञात नहीं कि मैं युद्धवीर मिह को बहन हूँ, जो महाराज के...!" कुछ मोचते हुए महाराज चोच में ही बोल उठे-"मैं समझ गया माताजी । लेकिन विना किसी आधार के हम जायेंगे यहाँ ?" इतने में गोविन्दसिंह ने कह दिया--"महाराज मैं बडे बोल नहीं बोलता; लेकिन कभी-न-कमी ऐमा अवसर प्रा जाता है कि प्राधार को नवीन चेतना और प्रयोग को आवश्यकता होती है । फिर महाराज यह क्यो भूल जाते है कि राजारोदा मे हमारे एक सम्बन्धी रहते है। आज की रात हम वहाँ निश्चितता के माथ बिता सकते है।" महाराज ने उनर दिया-"अच्छा तो फिर पहले भोजन कर लिया जाय घार उसके बाद प्रस्थान हो।" तभी महिला ने कह दिया-"महाराज भोजन कर ले, हम लोग तो भोजन करके चले हैं।" महाराज बोले-"ऐमा कैसे हो सकता है ? थोडा-बहुत प्रसाद तो लेना ही पड़ेगा।" हाथ जोडकर महिला बोली-~-"हम लोगो को तो आप क्षमा कीजिये।" गोविन्दसिंह ने कह दिया-"मैंने माजरी आपको अपना प्रति- ७२ : मिलन : एक वलिदान पालक मान लिया है। मैं आपकी आज्ञा तो क्या, एक सामान्य इच्छा भी नहीं टाल सकता।" लगभग छः घण्टे वाद, जव गोविन्दसिंह महाराज अजीतसिंह को साथ लेकर राजाखेड़ा में, अपने सम्बन्धी कुलवन्तसिंह के यहां पहुंचे, तो गढ़ी के बाहर ही एक स्थान पर वृक्ष के पास ऊँट से उतरकर गोविन्द- सिंह बोले-"महाराज यहाँ थोड़ी देर ठहरने की कृपा करें, मैं ठाकरा को लेकर पाता हूँ इतना कहकर वे झट गढ़ी के अन्दर जा पहुंचे। सारी बात सुनकर कुलवन्तसिंह ने कहा--"ठाकरां, नापको विदित ही है कि मैं महाराजा अजीतसिंह का अनुचर ही नहीं, भक्त भी हूँ। लेकिन इस समय महाराज को अपने यहाँ ठहराना मेरी सामर्थ्य के वाहर है।" - आशा के विपरीत कुलवन्तसिंह का उत्तर सुनकर गोविन्दसिंह का मुख आवेश से रक्त-वर्ण हो उठा। वे फेंट में तलवार डाले हुए थे। सहसा उसके मूठ पर उनका हाथ जा पहुँचा । उन्होंने दाँत पीसते हुए उत्तर दिया--"कृतघ्न कहीं के । महाराज के सम्मान में इस तरह का उत्तर देते हुए तुमको लाज नहीं आयी । कान खोलकर सुन लो, महा- राज आप ही के यहाँ ठहरेंगे। मैंने उनको आश्वासन दिया है और मेरा आश्वासन अपना एक अर्थ रखता है।" कुलवन्तसिंह अब वृद्ध हो गए थे । श्वेत दाढ़ी की गाँठ के ऊपर हाथ फेरते हुए शान्त भाव से उन्होंने उत्तर दिया-"क्रोध युद्ध का क्रियात्मक धर्म है । किन्तु विचार-विमर्श के समय क्रोध करना अनुभव हीनता और बचपन का लक्षण है, ठाकरीं । आपको विदित होना चाहिए कि हमारी गढ़ी में आज कई दिन से सम्राट आलमगीर के एक सेनापति ठहरे हुए हैं । उनके साथ सेना के कई योग्यतम अधिकारी हैं। आप समझते हैं, महाराज के पाने का समाचार उनको नहीं मिलेगा ! यह असम्भव है। मैं महाराज के प्राणों को संकट में नहीं डाल सकता।"
मिलन : एक वलिदान : ७३ तब गोविन्दसिंह ने यह दिया-"मच्छी बात है, तो मैं महाराज को मवेग मे लाऊंगा।" इस प्रकार महाराज अजीतसिंह ने रात को उस गढ़ी में गान्ति- पूर्वक विश्राम किया। गढी का राजकीय भवन । महाराज गद्देदार पलंग पर लेटे हैं । दीवार के बीच में लगी गिरौं एक रस्मी के महारे घूमती जाती है और तीन गज लम्या पंखा पूर्व से पश्चिम को पोर चलता और लौटता जाता है। चारों कोनो पर चन्दन के चूरमे की वत्तियां जल रही हैं। अमन्द सुदास मे महाराज का सायन-कक्ष मुरमित हो रहा है । कक्ष के बीच एक दंड में लगे हुए गीगे के कमल मुगोभित है, जिनमे जलती हुई मोमबत्तियां जगमगा रही हैं । इतने मे द्वार पर बैठी एक दामी ने होठो पर तर्जनी लाकर संकेत करते हुए धीरे से कहा-"महाराज विश्राम कर रहे हैं राजकुमारी। राजकुमारी ने यद्यपि मन्द स्वर में उत्तर दिया--"तो क्या हुआ? मैं उनके विश्राम में कोई विघ्न डालने तो पायी नहीं हूँ। मैं तो उनको एक गुप्त सन्देश देना चाहती हूँ।" दामी ने राजकुमारी को रूपरामि देवकर कठिनाई से मुस्कराहट रोकते-रोकने, अपरी पर दांत जमाकर, गम्भीरता से उत्तर दिया- "मुझे सब मालूम है । कल प्रात.काल देना वह सन्देश । अब आज कुछ नहीं हो सकता।" महाराज सोच रहे थे-"पानी वरमे-चाहे न बरसे, लेकिन आकारा में धुंधले नोले मेघ, जान पड़ता है, छाये ही रहेंगे। ऐसे संकट काल में राजकुमारी दुर्गावती का यह पावन प्रणय | कुछ समझ में नहीं आता मंया ! एक नि:श्वास! इतने में एक अपरिचित नारी का स्वर उसके कान में जा पड़ा-- "तुम अपनी मीमा से बाहर जा रही हो द्वार-रक्षिका।" 1 ७४ : मिलन : एक बलिदान महाराज सोचने लगे-'विल्कुल नया स्वर है, राजकुमारी दुर्गा- वती के सिवा भला और किसका हो सकता है ? कितना अच्छा हुया कि मैंने द्वार बन्द नहीं करने दिये ! "माना कि राजाज्ञा ही मेरी सीमा है राजकुमारी ! लेकिन उसके परिपालन में मैं पूर्ण स्वतंत्र हूँ। मैं आपको किसी प्रकार अन्दर नहीं जाने दे सकती।" दुर्गावती ने अपना नाम न बतलाकर उत्तर दिया "लेकिन तुमको मालूम नहीं द्वार-रक्षिका, राजाज्ञा से भी एक बड़ी वस्तु होती है, राजेश्वर की सुरक्षा । तुमने अगर मुझे अन्दर न जाने दिया, तो विवश होकर मुझे अपनी शक्ति का प्रयोग करना पड़ेगा।" --'निश्चय ही यह राजकुमारी दुर्गावती का स्वर है । प्रेरणा विमोहित महाराज एकाएक उठ बैठे और बोले-"कौन ?" राजकुमारी ने आगे बढ़कर उत्तर दिया--"महाराज मैं हूँ दुर्गा- वती।" महाराज ने वहीं से कह दिया-"दुर्गावती को आने दो द्वार- रक्षिका।" पास पड़े हुए मोड़े पर बैठने का संकेत करते हुए महाराज बोले- "अायो राजकुमारी।" दुर्गावती ने मोढ़े पर बैठते हुए कहा-~~-"महाराज मैं पहले आ नहीं रहीं थी। लेकिन माता जी ने कहा---यह समय संकोच का नहीं है बेटी । यह तो एक राज-धर्म का पालन है। फिर जिनका साथ तुम्हें जीवन भर देना है...... | महाराज क्षमा करेंगे । मैं उनकी पूरी बातें आपसे कह नहीं पाऊँगी।" रूप की माया वड़ी विलक्षण होती है। राजकुमारी ने जब यह बात बीच में ही तोड़ दी, तो महाराज विमुग्ध होकर बोले-.--"इतना ही बहुत है। बहुतेरी बातें विना कहे ही प्रकट हो जाती हैं राजकुमारी । अब कहो, इतना धर्म-संकट लेकर तुमने पदार्पण किया कैसे ? यहाँ जव स्वयं - मिलन : एक बलिदान : ७५ - मैं एक अतिथि के रूप में है, तब मेरी ममझ में नहीं प्राता, मैं तुम्हारा स्वागत फैसे करूं ?" राजकुमारी घबरा उठी और एक संभ्रम के साथ बोली-"महागज में एक प्रावश्यक काम मे चली प्रायो । सम्राट के मेनापति को मालूम हो गया है कि श्रीमान यहाँ टहरे हुए हैं।" महाराज पहले तो कुछ सकपका गये, फिर नाम के माय बोले- "तुम चिन्ता न करो राजकुमारी। मैया हमारी मव तरह मे रक्षा करेगी।" "इसका तो मुझे विश्वाम है महाराज | "तो बम, मुझे यही मूचना आपको देनी थी।" "बहुतेरी सूचनाएँ बढी प्राणदायिनी होती हैं राजकुमारी।" दुर्गावती मोट से उतरकर बडी हो गयी। वह जब चलने लगी तो महाराज पलंग से नीचे उतरकर उसके पास पावर बोले-"तो तुम लौट जानोगी राजकुमागे। इतनी जल्दी !" रोमांचित राजकुमारी महाराज की ग्रोर एक-टक देखती रह गई। एकाएक उमकी प्रायों में प्रानन्दाच छलक प्राय । महाराज ने प्यार के माय उन कंट में लगाते हुए कह दिया--"युद्ध और प्रेम में कुछ भी वजित नहीं होता राजकुमारी ।" जागरूक दुर्गावती एक झटके के साथ महाराज के वक्ष मे दूर हटकर बोली-"इसी रात भर में श्रीमान को अपनी मनाएं बुला लेनी हैं । ऐम मकटकाल में महागज की ऐमी प्रेरणा ! ......!!" "मिलन के प्रादान-प्रदान का कोई समय नहीं होता राजकुमारी ! जीवन का अर्थ है क्षण-क्षण का प्रानन्द और सौरव।" और कथन के साय महाराज ने स्वयं ही द्वार बन्द कर लिया। दुर्गावती बोली-"महागज ने आज चार दिन बाद भोजन पाया है और कर्तव्य तो वटा निमम होता है । इसलिए क्षमा करें महाराज, इस ममय राजधर्म का पालन मुझे ऐसी अनुमति नहीं देता कि मैं...!"
७६ : मिलन : एक वलिदान कथन के साथ नमित दुर्गावती का सिर महाराज के कण्ठ से जा लगा । उसने दृढ़ता से कह दिया---"मुझे क्षमा कर दें महाराज।" दूसरे दिन प्रात:काल होते-होते राजाखेड़ा का वह क्षेत्र युद्ध-भूमि बन गया । महाराज अजीतसिंह को अपने साथियों और सेनाओं के साथ एकाएक पालकी से कूदकर नारी वेश में ही तलवार उठानी पड़ी। इस युद्ध में महाराज की प्राण-रक्षा जब संकट में जा पड़ी, तब दुर्गावती ने भी अपनी सम्पूर्ण शक्ति उत्सर्ग कर दी। पर मुग़ल सेना अत्यधिक थी। महाराज प्रजीतसिंह का बचना दुष्कर था। वरछा और तलवार का जो भी अाक्रमण महाराज पर होता, कुमारी दुर्गावती वीच में पड़कर उसे अपने ऊपर ले लेती । वरछा घुस जाने के कारण जब महाराज के पैर से वहुत-सा रक्त निकलने लगा तभी दुर्गावती ने अपनी साड़ी फाड़कर उसे कसकर बांध दिया। इतने में वीर दुर्गादास की सशक्त सेना ने आकर गढ़ी को घेर लिया और थोड़ी ही देर में "हर हर महादेव" के घनघोर नाद से क्षेत्रीय गगन मण्डल गूंज उठा। महाराज अजीतसिंह का जय-जय नाद होने लगा। काल के चरण जहाँ पड़ते हैं, वहाँ कुछ-न-कुछ होकर ही रहता है। महाराज अजीतसिंह के प्राण तो बच गये; इस युद्ध में उन्हें विजय मी प्राप्त हुई, किन्तु जव अजीतसिंह खोजते-खोजते दुर्गावती के पास पहुंचे, तब तक वह चेतनाशून्य होने लगी थी । समक्ष बैठा देखकर जब दुर्गावती ने लक्ष्य किया, महाराज की आँखों में आंसू आ गये हैं, तब वह बोली- "महाराज रोएं नहीं, यह मेरी यात्रा का समय है; महायात्रा का !"
No text on this page.
उपहार विमला खाना परोस रही थी। कमल बैठा पत्र लिख रहा था। वह लोचता था कि जब इसे समाप्त कर लूँगा, तभी उलूंगा। देर ही क्या है ! कुछ भी तो और अधिक नहीं लिखना है । बस यही दो-तीन-हाँ, दो ही पंक्तियाँ और लिखने को हैं कि फिर मैं हूँ और भोजन । और विमला मन-ही-मन झुंझला रही थी कि जब तक मैं गाक पकाऊँ, तब तक तो ग्राफत मचा दी; दो-दो मिनट में विकल हो-होकर पूछते रहे कि कितनी देर है-कितनी देर है ? और अब, जब मैं खाना परोसने लगी, तो 'माया, आया; वस अभी हाल पाया' कह रहे हैं मगर भाते नहीं ! बस, इनकी यही प्रकृति मुझे अच्छी नहीं लगती। कितनी तकलीफ़ होती है खाना पकाने में ! बनाना पड़े, मालूम हो जाय । और मालूम क्या हो जाय खुद भी तो न खा सकें उसे । फिर भी किती तरह जो मर-अप के वना भी लूं, तो यह हाल है इनका कि मुझे ही वेबकूफ बनना पड़ता है । कुछ कहो, नो झट जवाब दे बैठेंगे कि फिर बेकार वनाती हो-मैंने तो हजार वार कहा कि महाराजिन रख.लो।" मैं भी बैठी रहूँगी, इसी तरह । जब बुलाना व्यर्थ है, तो बुलाया ही क्यों जाय ? न, मैं अव उन्हें नहीं बुलाऊँगी। नहीं-नहीं, किसी तरह नहीं। "अरे सुनती हो?" विमला को ही लक्ष्य करके कमल ने कहा था। लेकिन विमला ने सुनकर भी नहीं सुना । उसने कोई उत्तर नहीं दिया। वह क्यों उत्तर दे? किसका उत्तर दे ? किसे उसके उत्तर की अपेक्षा है ? जब कहते- उपहार : ७६ वहते हार गई, तव नही पाये । और अब इतनी देर के बाद भी, वही में वहते है-मुनती हो? कौन सुनती है ? कोई नही सुनती ! क्यों मुने कोई ? क्या पड़ी है उसे, जो सुने? वह नहीं सुनती है। कोई नही मुन रहा है। कोई सुनने क्यो लगा? वह मुनती तो है, मगर नही सुनती । हो, नहीं सुनती। कमल अब उठकर उसके पास चला पाया। वह चला तो पाया, पर निकट वडा रहकर वोला-"कुछ लोग प्रा गये हैं । उनसे इमी समय दो बातें कर लेनी है। वेचारे बडी दूर से आये हैं । मुझरो यह नही हो मरता कि उन्हें बरंग लौटा दूं। कुछ वक्त देना ही पड़ेगा । कुछ ऐसी ही नावश्यवाना है । समझती हो न? तुम अब खाना खालो। मुझे शायद देर ही लग जाये । शायद क्या, बलि देर लग जाना निश्चित है ।" विमला ने पहले तो चाहा कि वह चुप रहे । अब भी उनकी इस बात का कोई उत्तर न दे। स्न्तुि वह वास्तव में इस प्रकार की नारी नहीं है। परिस्थिति और कारण को लेकर नियोजित मर्यादा की अवमानना करना उमकी प्रकृति के प्रतिकूत है । वह प्रतीत में उलझी रहती है, क्योकि उसी का प्रमाव रोकर भविष्य को देखती है। किन्तु वर्तमान की उपेक्षा उसे स्वीकार नहीं होती। प्रतएव उसने कहा-"किन्तु ध्या दस-पांच मिनट के लिए उन्हे रोक नहीं सकते ? वे लोग क्या इम समय तुम्हारा भोजन करना भी रोक देना चाहेगे ? तुम्हारी असुविधा का क्या उन्हें कुछ भी खयाल न होगा?" कमल ने लक्ष्य किया, विमला खुद भी भूखी है। समय भी तो अधिक हो गया है । ऐसी परिस्थिति में भी उसने भोजन बनाया है । कितनी देर से वह प्रतीक्षा में बैठी है और अब, जबकि मुझे उसके साथ बैठकर खाना चाहिये, तब मैं उससे इस प्रकार का प्रस्ताव कर रहा हूँ। उसने एक बार फिर जो विमला के उत्तप्त प्ररुण मुख की और ध्यान से देखा, तो उसे अपना प्रस्ताव सर्वथा अप्रीतिकर प्रतीत हुआ।
८० : उपहार वह लोट पड़ा। लौटते हुए कह गया--"अच्छा तो में अभी आया । उन्हें कमरे में आदर के साथ विठा आऊँ और साथ ही दस मिनट तक और अधिक प्रतीक्षा करने की अनुमति ले आऊँ ।" "योः ! तुम आये होमेरे राधाकान्त वाबू - यह डेपूटेशन लेकर अच्छा । लेकिन, यार बहुत दिनों में मिले हो; और फिर इस डेपूटेशन के साथ । खैर, मैं अभी पाया। मैंने अभी तक भोजन नहीं किया है। कुछ इतने आवश्यक कार्यों में लगा रहा कि भोजन करने तक को समय पर न उठ सका। अभी जा ही रहा था कि पता चला, आप लोग तशरीफ़ लाये हैं।" कमल ने उल्लास-मुखरित स्वाभाविक ढंग से कहा । "अच्छा तो कर पायो भोजन; लेकिन यार अकेले-ही-अकेले भोजन कर लोगे !" राधे वावू ने हास के मृदुल दोलन में, साधारणतया कह दिया---उसी प्रकार, जैसे कोई भी मित्र दूसरे से ऐसी स्थिति में प्रायः कह देता है। "अच्छी बात है, मेरा सौभाग्य ! चलो, तुम भी चलो।" कमल के उत्तर के साथ उसका हादिक उल्लास भी मिश्रित होकर फूट निकला। "ऐसे मैं नहीं जाता । इस तरह तुमको तो कुछ मालूम न होगा, किन्तु दूसरी आत्मा को जो आकस्मिक कष्ट होगा, उसे मैं कैसे सहन करूँगा? न यार कमलेश, मुझे इस समय भोजन नहीं करना । मैं तो यों ही कह उठा था ।” राधे बाबू कहते-कहते गम्भीर हो उठे। कमल ने लक्ष्य किया, यह राधाकान्त एक समय कितना चटुल था ! क्लास भर इसके मारे परेशान, बल्कि एक प्रकार से आन्दोलित रहता था । और आज देखता हूँ कि इस कालान्तर में वह कैसा विवेकशील बन गया है। तव उस राधाकान्त के प्रति कमल पहले अजेय आदर-भाव से देख- कर रह गया, फिर कुछ सोच-समझकर वोला-"नहीं रावे, असुविधा की कोई बात न होगी । कम पड़ेगा तो बाजार से कुछ और मँगवा लूंगा। चलो-चलो; अब तुम्हें चलना ही पड़ेगा।"
उपहार : ८१ "मेरे एक मित्र भी खायगे विमला! बडे जवरदस्त आदमी हैं। इच्छापत्र से सफलता इनके चरण चूमती रही है । मुझे इनका क्लाम- फलो रहने का गौरव प्राप्त हो नुका है। पर मुझे पता ही न था कि जेल जा-जाकर भी यह शंतान बजाय दुर्बल पड़ने के इतना मोटा पड़ जायेगा ! दवती क्या हो, वज़न में तीन मन मे कम न होगा। यह जो कुछ भी तुमने बना रखा मैं तो समझता हूँ, केवल दमके लिए भी काफी न होगा।" कमल ढूंढ-ढूंढकर ऐसे शब्दों का प्रयोग कर रहा था, जिनसे विमला को पता चल जाय कि उसका यह मित्र ऐसा-वसा साधारण व्यक्ति नहीं है । वड़ा पादमी तो यह है ही, साथ ही उमका घनिष्ट मित्र भी है। तब विमला ने स्वामी के इम घनिष्ट मित्र को केवल एक दृष्टि से देखकर साडी को सिर पर, प्रागे तक, कुछ और विसरा लिया । दो थालियों में भोजन जैसा परोसकर रखा था, उसे पूर्ववत् न रखकर उसमे थोडा-थोडा कम कर लिया; क्योकि आकस्मिक आतिथ्य और समय- अममय के जलपान के लिए जो मिष्ट और मलौने साय-पदार्थ उसने बना रखे है, उनका भी उपयोग उभे अब करना है। बाजार से ही कुछ मॅगाना पड़ा, तो फिर गृहस्थी को मर्यादा ही क्या रही। तुरन्त उसने कहा-"पाइये।" कमल अपने साथ राधे को लेकर भोजन करने बैठ गया । वह भोजन कर रहा है और साथ ही साथ कुछ सोचता भी जाता है। यो निरन्तर उसे कुछ-न-कुछ सोचना ही पड़ता है। बात कम, काम अधिक-यही उमको प्रकृति है। किन्तु जब कोई मित्र अाया हो और साय में बैठा भोजन कर रहा हो, तब भी मौन ही बने रहना तो पधिर उनम या पावश्यता, प्रीतिकर या शोभन प्रतीत नही होता । मानो इनी बार को लक्ष्यकार कमल ने कह दिया-"और कहो राधे, अच्छी तरह से न? किसी प्रकार की कोई असुविधा या कष्ट या और क्या नहं'' ८२ : उपहार अन्तिम शब्द कहते-कहते.कमल राधे के मुंह की ओर देखकर हँस पड़ा। "देखता हूँ, तुम वहुत बड़े आदमी हो गये। तुमने इतना वैभव अजित कर लिया कि तुम्हें देखकर मुझे ईर्ष्या होती है; तो भी तुम्हारा वह असाधारण सारल्य ज्यों-का-त्यों वना है !" राधे भोजन करते हुए अपनी ये वातें इतने मन्द क्रम से करता जाता है कि न तो उसकी आहार गति प्रतिहत हो पाती है, न वार्ता विनोद में ही किसी प्रकार की अरोचक यति का संयोग ही हो पाता है । साथ-ही-साथ वह कभी-कभी विमला पर भी एक दृष्टि डाल देता है । "तो तुम्हारा खयाल यह है कि काल-गति से हमारी प्रकृति भी बदल जाती है। लेकिन भई राधे, मैं ऐसा नहीं मानता। जीवन के प्रकम्पित अवधान हमारी गति बदल सकते हैं, हमारे प्राचार-व्यवहार की रूपरेखा को भी उलट-पुलट डालते हैं। मानता हूँ। किन्तु किन्तु हमारी नैसर्गिक प्रकृति पर उनका अनुशासन कभी चल नहीं सकता, क्षणिक परिवर्तन करने में भले ही वे यदा-कदा सफल होते रहें।" राधे कमल की इस बात को सुनकर मुस्कराने लगा। तव कमल उसके इस हास की यथार्थता को लक्ष्य करके वोला--- "जान पड़ता है, मेरे साथ तुम्हारा मतभेद पूर्ववत् वना है।" विमला दोनों को वातें करते छोड़कर भण्डार में चली गई थी। लौट आकर उसने दो-दो कटोरियों में मिष्टान्न और नमकीन पदार्थ दोनों थालियों के निकट रख दिये । तव उसी समय एक कटोरी से कुछ खुरमे एक साथ उठाकर मुंह में डालने के पूर्व राधे बोला-"तुम्हारे गार्हस्थ्य-जीवन के इस सफल स्वरूप के लिए मैं तुम्हें बधाई देता हूँ कमलेश !" कमल हँसने लगा, बोला--"अच्छा यह बात है ! धन्यवाद।" फिर विमला की अोर उत्फुल्ल लोचनों से देखकर कहने लगा -"सुनती हो विमला, राधे तुम्हें वधाई दे रहा है।" विमला चाहती तो उत्तर में कुछ कह सकती थी। किन्तु वह कुछ उपहार : ८३ वह न सकी । हाँ, विकल्प में थोडी मुड़कर, कढाई में रखे हुए शाक को एक कटोरे में संभालकर रखने में व्यस्त अवश्य हो गई। राधे ने उस ममय न तो विमला को कुछ कहने का अवसर दिया, न कमलेश को । अब वह उसकी उसी बात पर आ गया, जिस पर उसे मतभेद था । वह बोला-"हाँ, तुम्हारी उम वात को तो मैं भूल ही गया था, प्रकृति-परिवर्तन के सम्बन्ध में जो तुमने अभी कही थी।" "हा-हां यहो । मैं जानना चाहता हूँ, इस विषय में तुमने क्या अनु. भव किया है, तुम्हारे विचार क्या है ?" क्मत ने कहा ही था कि राधे बोल उटा-"असल बात यह है कमलेश भाई, कि मनुष्य की प्रकृति ही को पहले ज़रा समझ लेने की जरूरत है। क्या उसको प्रकृति है, और क्या अप्रकृति, वास्तव में इसी का समझ लेना प्रावश्यक है। लोग प्रायः कहा करते हैं, फलां प्रादमी तो बिलकुल ही बदल गया। लोग उसको रूपरेमा, उसके प्राकार-प्रकार को देखकर ही प्राय. इस तरह की बाते कह डालते है । पर परिस्थितियों के कुचक्र में घूमते और छिन्न-भिन्न होते हुए उमके क्षण-क्षण के जीवन को देखकर वे यह नहीं सोचते कि प्रकामा सदा प्रकाश ही रहता है । यह बात दूसरी है कि कोई प्रकाश दिन पा हो, कोई निमा का। अब यहां प्रश्न यह है कि दिन का प्रकाश तो प्रकाश है और उसे ससार स्वीकार करता है; किन्तु जो प्रकाश रजनी के अन्तर से फूटा हुआ है, वह प्रधकार क्यों है ?" तब तत्काल उत्तरग मानस से कमलेश बोल उठा-"वण्डरफुल कितनी अच्छी बात तुमने अनायास कह डाली ! वाह विमला ने उसी समय एक बार राधे के उस तेजोमय मुख की पोर दृष्टिक्षेप किया। थोड़ी देर से उसकी छाती के भीतर भूकम्प-कालीन रत्नाकर की भांति जो एक भीम विस्फूर्जन हो रहा था, राधे के इस चयन को लेकर और फिर एक बार उसकी पोर देखकर प्राप-से-प्राप वह बिलकुल शिथिल-ध्वस्त हो उठा । जिम व्यक्त प्रतीत ने भाज अभी उसके मन-प्राण तक को बार बार स्तम्भित, विकल-विकम्पित कर-करके ।
८२ : उपहार , अन्तिम शब्द कहते-कहते कमल राधे के मुंह की ओर देखकरहँस पड़ा। "देखता हूँ, तुम बहुत बड़े आदमी हो गये। तुमने इतना वैभव अजित कर लिया कि तुम्हें देखकर मुझे ईर्ष्या होती है, तो भी तुम्हारा वह असाधारण सारल्य ज्यों-का-त्यों बना है !" राधे भोजन करते हुए अपनी ये बातें इतने मन्द क्रम से करता जाता है कि न तो उसकी अाहार गति प्रतिहत हो पाती है, न वार्ता विनोद में ही किसी प्रकार की अरोचक यति का संयोग ही हो पाता है । साथ-ही-साथ वह कभी-कभी विमला पर भी एक दृष्टि डाल देता है । "तो तुम्हारा खयाल यह है कि काल-गति से हमारी प्रकृति भी बदल जाती है। लेकिन भई राधे, मैं ऐसा नहीं मानता। जीवन के प्रकम्पित अवधान हमारी गति वदल सकते हैं, हमारे प्राचार-व्यवहार की रूपरेखा को भी उलट-पुलट डालते हैं। मानता हूँ। किन्तु किन्तु हमारी नैसर्गिक प्रकृति पर उनका अनुशासन कभी चल नहीं सकता, क्षणिक परिवर्तन करने में भले ही वे यदा-कदा सफल होते रहें।" राधे कमल की इस बात को सुनकर मुस्कराने लगा। तब कमल उसके इस हास की यथार्थता को लक्ष्य करके बोला- "जान पड़ता है, मेरे साथ तुम्हारा मतभेद पूर्ववत् बना है।" विमला दोनों को वातें करते छोड़कर भण्डार में चली गई थी। लौट पाकर उसने दो-दो कटोरियों में मिष्टान्न और नमकीन पदार्थ दोनों थालियों के निकट रख दिये । तव उसी समय एक कटोरी से कुछ अरमे एक साथ उठाकर मुंह में डालने के पूर्व राधे बोला--"तुम्हारे गार्हस्थ्य-जीवन के इस सफल स्वरूप के लिए मैं तुम्हें बधाई देता हूँ कमलेश !" कमल हँसने लगा, बोला-"अच्छा यह बात है ! धन्यवाद । फिर विमला की पोर उत्फुल्ल लोचनों से देखकर कहने लगा-"सुनती हो विमला, राधे तुम्हें वधाई दे रहा है।" विमला चाहती तो उत्तर में कुछ कह सकती थी। किन्तु वह कुछ - उपहार: ८३ यह न सकी । हां, विकल्प में थोड़ी मुड़कर, कढाई मे रखे हुए गाफ को एक कटोरे में संभालकर रखने में व्यस्त अवश्य हो गई। राधे ने उस समय न तो विमला को कुछ कहने का अवसर दिया, न कमलेग को। अब वह उसकी उसी बात पर आ गया, जिस पर उसे मतभेद था । वह बोला-"हां, तुम्हारी उस बात की तो मैं भूल ही गया था, प्रकृति-परिवर्तन के सम्बन्ध में जो तुमने अमी कही थी।" "हाँ-हां फहो । में जानना चाहता हूँ, इस विषय में तुमने क्या अनु- भव किया है, तुम्हारे विचार क्या हैं ?" कमल ने कहा ही था कि राधे बोल उठा-"असल बात यह है कमलेश भाई, कि मनुष्य की प्रकृति ही को पहने जरा समझ लेने की जरूरत है । क्या उसकी प्रकृति है, और क्या अप्रकृति, वास्तव में इसी का समझ लेना यावश्यक है । लोग प्रायः कहा करते हैं, फलां पादमी तो बिलकुल ही बदल गया। लोग उमकी रूपरेखा, उसके आकार-प्रकार को देगकर ही प्राय. इस तरह की बातें कह डालते है । पर परिस्थितियो के कुचक्र में घूमते और छिन्न-भिन्न होते हुए उमके क्षण-क्षण के जीवन को देखकर वे यह नहीं सोचते कि प्रकाग मदा प्रकाश ही रहता है । यह बात दूसरी है कि कोई प्रकाम दिन फा हो, कोई निगा का। अब यहां प्रश्न यह है कि दिन का प्रकाश तो प्रकाश है और उसे ससार स्वीकार करता है; किन्तु जो प्रकाश रजनी के अन्तर से फूटा हुआ है, वह अधकार क्यो है ?" तय तत्काल उत्तरग मानम से कमलेश बोल उठा--"वण्डरफुल कितनी अच्छी बात तुमने अनायास कह डाली । 11" विमला ने उसी समय एक बार राधे के उस तेजोमय मुख की ओर दृष्टिक्षेप किया। थोड़ी देर से उसको छाती के भीतर भूकम्प-कालीन रत्नाकर को भौति जो एक भीम विस्फूर्जन हो रहा था, राधे के इस याथन को लेकर और फिर एक वार उसकी ओर देखकर प्राप-से-पाप वह बिलकुल मिथिल-ध्वस्त हो उठा । जिस व्यक्त प्रतीत ने पाज अभी उसके मन-प्राण तक को बार-बार स्तम्भित, विकल-विकम्पित कर-करके - वाह
८४ : उपहार
एक अव्यक्त अभियोग से अतिशय अस्थिर किंवा विमूढ़ कर डाला था,
निमेप मात्र के इस वैकल्पिक उपायन से उसके पराभूत चित्त की सारी
दुर्वलता वात-की-बात में निष्प्रभ प्रशान्त हो उठी।
भोजन करके दोनों मित्र उठ खड़े हुए।
रात के ग्यारह बजे हैं । कमलेश सो रहा है । पास ही विमला भी
लेटी हुई करवटें बदल रही है । कुछ स्वप्न उसके मानस-पट पर उतर
आये हैं।
"तुम्हारी यह आदत अच्छी नहीं है, मैया !"
"कौन-सी ?"
"पूछते हो, कौनसी !"
"लो, जब मालूम नहीं है, तब क्या पूछना भी गुनाह है ?"
'हाँ, है गुनाह ; मैं तुम से भैया जो कहती हूँ।"
वह चुप रह गया। उसका मुख यकायक उतर गया । कोई वात वह
फिर न कह सका । तव वह चलने लगी। कुछ उद्विग्न होकर अपना
तिरस्कार अपने ऊपर लादकर ।
किन्तु उसी समय उसने सुना, वह कह रहा है..-"मेरी इस बुरी
आदत के अनुभव करने का अवसर न तुम्हें अब कभी मिलेगा विमला !
मैं यहाँ से चला जाऊँगा।"
वह लौट पड़ी। अपनी मर्यादित गम्भीरता से विचलित होकर वह
बोली--"सचमुच, क्या तुम कानपुर छोड़ दोगे ?'
"छोड़ना ही पड़ेगा विमला; क्योंकि मनुष्य की प्रकृति बदल नहीं
सकती।"
उत्तर में वह कुछ कह न सकी थी । यद्यपि उन निर्वाक, निस्पन्द
निष्ठुर क्षणों ने उसके इस जीवन को ही व्यर्थ कर डाला, तो भी उन
क्षणों को वह फिर कमी पा न सकी-ग्राज तक न पा सकी !
।
उपहार: किन्तु वह या कितना दृढ प्रतिज्ञ! उसने कानपुर छोड़ ही दिया । यद्यपि उसने कोई अपराध नहीं किया था-एकमात्र यही पादत थी उसकी कि वह मुझे देखकर पुलकित हो उठता था। इसके उस हास्य- मुखरित प्रानन को उद्दीप्त पाना, उमकी उल्लास-दृप्त अांखें, अपना प्रान्तरिक भाव प्रकट करने का लोन सवरण न कर सकती थी। मुहल्ले की बात टहरी । वह कभी अपनी ममियों के साथ निकलती कभी मां-मामी के साथ । इन सबके साथ निकलने पर भी यह उसको और एक बार देखे विना मानता न था । फलतः एक अदम्य बहिरमिनुवी लग्ना से वह बिलकुल संकुचित तथा अभिभूत हो उठती थी। बस, यही उसका अपराध था-और उनसे संलग्न यही उसकी अमुविधा ! और उसके बाद यह प्राग का दिन है । "तुम्हारे गार्हस्थ्य जीवन के इस सफल स्वरूप के लिए मैं तुम्हें बधाई देता है।" उसने कहा था-- और मेरे गार्हस्थ्य जीवन का यह कैसा सफल स्वरूप है ! गिन्तु जो प्रकाश रजनी के अन्तर से फूटा हुआ है, वह अन्धकार क्यों है? कौन कहता है कि वह अन्धकार है ? क्या अद भी रिसी में इतना माहम है कि वह उसे अन्धकार वह सके ? विन्तु यह बात तो तुमने अपने आपको देखकर कह हाली है. यो- कि तुम एक प्रकार के अकल्पिन स्वप्न हो । विन्तु यह तो एका कविता हुई। और इस विमला के भीतर जो नारी है, वह तो मी उन प्रकार की निगे कविता नहीं है। उमका एक गरीर है, एक हृत्पिड । कमो उमे छूकर देखते, तो जान पाते कि बाहर में प्रकारामयी भला मारनेवाली इस विमला के भीतर का अन्धकार अमी तक पूर्ववत् स्थिर है । अपने स्थान में वह टस-मे-मम नहीं हुमा है। अभी तक उमरे भीतर की गर्वित नारी उसी प्रकार तृषित प्रतृप्त है, जैसी कभी पहले थी । उमने प्रकृत स्वरूप का सांगोपाग अर्थ किया ८६ : उपहार ही नहीं जा सका-यहाँ तक कि वह अभी तक मां भी नहीं हो सकी ! फिर भी तुम उसके गार्हस्थ्य जीवन का साफल्य देखने चले थे ! प्रोः ! इस परिवार का अन्तरंग न देखकर उसके वाह्य स्वरूप पर तुम ऐसे मुग्ध हो उठे कि एक वधाई भी उसे दे डाली! किन्तु तुम्हारी यह बधाई तो उन्हीं के लिए थी। मेरे साथ उसका सम्बन्ध क्या ? न, यह वधाई मेरे लिए नहीं है, नहीं है। किन्तु ठीक तो है । उन्होंने कह डाला था-"सुनती हो विमला ? राधे तुम्हें वधाई दे रहा है।" "लेकिन उनके कहने से भी वधाई मेरे लिए कैसे हो सकती है ? वह उनके लिए थी, हाँ उन्हीं के लिए। तो क्या वास्तव में वे वधाई के पात्र हैं ? क्यों भला? क्या वे बधाई के पात्र केवल इसलिए हैं कि मेरे जीवन की यह धारा भी उन्हीं के साथ-साथ प्रवाहित हो रही है। तो तुम सोचते हो कि यह विमला अभी तक इसमें समर्थ है कि उसकी संगति का योगमात्र किसी को भी वधाई का पात्र बना सकता है ? उफ़ तुम ऐसा क्यों मानते हो राधे भैया ? क्या तुम अपनी प्रतिज्ञ भूल गये ? क्या तुम्हें याद नहीं रहा कि तुमने किसी को कुछ कहा था कहा था कि मेरी इस बुरी आदत के अनुभव करने का अब तुम्हें कम अवसर न मिलेगा ! ''तो फिर इतने दिनों के बाद तुमने यह अवसर क्यों दिया: झर झर झर ! ये आंसुओं के बूंद हैं कि सुधार्णव के मोती ? प्रोः ! जीवन के ये दस वर्ष यों ही बीत गये । युग पलटा, कि भूकम्प आये, कितनी रिम-झिम रातें, कितनी शारदी निशाएँ, वि वासन्तिक दोलन आये और गए, किन्तु राधे की छाया भी कहीं न पड़ी। और एक युग के बाद, जान-बूझकर भी नहीं, अनायास वे जे कुटीर में आ ही पड़े, तो यह विमला, यह मूर्त कालिमा अपने-अ उपहार : ७ न कर दोष देनी है उमे, जो दिवाकर की मांति वरेण्य और मनस्वी है ! "तो तुम मुझमे बोले क्यों नहीं ? कुट विस्मय और कुछ दुलार प्रोत-प्रोत होरर तुमने मुझे निकट पाकर, मेरा नाम लेकर पुकाग क्यों नही? तुम्हारी मुद्रा इतनी गम्भीर क्यों बनी रही ? एक चार. मी मिर उठाकर तुमने मुने, ध्यान से देगा क्यों नहीं ? तुम मुझमे छूटकर जानोगे यहाँ ?" ये अमृत के बंद मागत रूप में क्यों मा रहे हैं ? यो करने में वूद तो निरन्तर या माने हैं; त्रिन्तु इस प्रकार अमृत-बूंदों को वह कहाँ से लाएगा ! और उनके नियाव के माय यह नि.स्वन कैसा है ! ये रदन की मिमवियाँ हैं कि निझर की उत्ताल मिमालानी का अजय मुमरित महोल्लाम। गो! तुम रोती हो विमला ! यकाया उठवर भट में विद्युत प्रकाश प्रस्फुटित कर कमल विमला के पर्नेग पर प्रावर उममे मिथिन होकर बैठ गया। फिर उनके मिर की कुन्तलरागि, वेणी और उसके अन्तिम टोर नक अपना वाम हस्त फेरते हुए बोला-"रोती क्यों हो विमला ? बनलायो । में जानना चाहता हूँ, क्या मुम्मे कोई अपराध हुमा है ? प्रव विमला प्रामू पॉछकर, स्थिर होकर, बंट गई। उमा एक हान अब भी कमल के हायों में या। उसके न्द्र गम्भीर मुम की प्रत मगिमा देवकर कमल यकायक स्तम्य हो उठा। उसी ममय विमला वोली-"अपगध ?" तुम अपराध की बात पूछने हो ?" "तो इम राधे को तुम अन्दर क्यों ने प्राय ? किमसे पूछकर ले मा?"
५ : उपहार कमलेश अवाक् हो उठा । तुरन्त तो वह कोई भी उत्तर न दे सका। किन्तु क्षण-भर के बाद वोला-"वह मेरा एक मित्र था, चिर-परिचित मित्र । उसका स्वागत-सत्कार करना मेरे लिए आवश्यक था किन्तु वह कोई भी हो, उसके सम्बन्ध में इतना सोचने की आवश्यकता ही क्या है ?" "वह क्यों आया था ?" "एक प्रस्ताव लेकर।" "क्या उत्तर दिया?" "उसकी बात मान लेना ही मैंने उचित समझा । स्वदेश के पीछे. उसने अपना जीवन उत्सर्ग कर रखा है। उसे निर्विरोध सदन में जाना चाहिए । उसके पक्ष में मैंने अपने-आपको रोक लिया है।" "जी-4-नउ-त्सर्ग कर-र-खा है !" विमला ने अतिशय मन्द स्वर में अटक-अटककर इस तरह कहा कि कमल उसकी अपरूप मुद्रा को देखकर चकित-स्तम्मित हो उठा । क्षण-मर रुककर वह बोला--- "बात क्या है विमला ? मैं जरा साफ़-साफ़ जानना चाहता हूँ।" "वह मेरा शत्रु है । मेरी जीवन-धारा को उसने व्यर्थ ही में विकृत करने की चेष्टा की है । मुहल्ले के नाते से मैं उसकी वहन होती हूँ। फिर भी जान-बूझकर उसने मेरी अवहेलना की। मैं इसे कैसे सहन कर सकती हूँ ?" . "अरी पगली-~~यह मेरी ही भूल है! लेकिन तुम जानती हो विमला, मैं कुछ ग्राज का नया भुलक्कड़ नहीं हूँ। 'खैर, मुझे इसका दुःख है । चलते-चलते वह अपनी सोने की घड़ी तुम्हें भेट-स्वरूप दे गया है । उसने कहा भी था - 'यह घड़ी मेरी बहन को दे देना।' तुम उसे ले लो अमी। वह मेरे कोट की भीतरी जेब में पड़ी है।" और विमला सोचती है-यह उपहार है कि मृत्यु !
इन्द्रजाल दिलीप ने देपा, अनु झट से दौडरर उसके निकट नहीं प्रायो, वरन खम्भे की प्रोट में पड़ी हो गयी। क्षण भर उमने दिलीप की मोर देखा, फिर उस दृष्टि-विम्तार को ममेटती हुई वह यकायक विमनस्क हो उठी। दिलीप को प्रनीत हुमा-अनु लगा गयी है । वह अब दूसरे की हो गयी है । विवाह के पश्चात् उसका गौना नी हो गया है। फिर भी वह अपनी दृष्टि में उगे ग्रहण करता हो चला गया। किमी प्रकार उमको पोर से अपने पापको विलग कर लेने की भावना वह स्वीकारन कर सका। वह बराबर मोचता ही रहा-'वही तो अनु है; अब तक वैसा ही भोला मुग बना है, वही दिमोहक छवि-माधुरी । कही कुछ भी तो नही बदला है। हां, इतना परिवर्तन मले ही हो गया हो कि उसकी कुन्तल-राशि की मध्यरेखा पर, भाल के उत्तर प्रान्त मे, थोड़े सिंदूर बिन्दु मोर झलक उठे है । साथ ही पैरो की अंगुलियों में श्वेत मलियां भी और आ गयी हैं । किन्तु ये सब तो बाह्य परिवर्तन है । दिलीप को उत्तसे कोई प्रापत्ति नहीं हो सकती। अनु जो उसके पास झट से पा नहीं सकी, एक बार उसे देखकर ही ठिठुक कर रह गई, अपने इस मनोभाव से क्या स्पष्ट रूप से यह नहीं प्रकट करती कि उसके मन-प्राण मे अब भी वह उसी प्रकार भूतित है, किमी भांति उसे बाहर नहीं फेंक सकी है। और अनु? उसके मन में एक बार पाया कि वह भागकर पीछे लोट जाय, या और वही आकर छिप रहे। दिलीप को उसका वोध तक न हो सके।
६० : इन्द्रजाल किन्तु एक बार जो उसने उसे पाया, तो उसके पैर भूमि से चिपक गये । नतमुखी होकर वह जैसी खड़ी थी, वैसी ही खड़ी रह गयी। लौट पड़ने की बात को लेकर उसका अन्तःकरण तत्पर न हो सका । वह सोचती रह गयी-~-दिलीप, माना कि उसका कोई नहीं है, तो भी वह अभी तक उसका 'दिलीप दद्दा' तो बना ही है । क्या ऐसा भी कभी सम्भव हो सकता है कि वह अपने ऐसे 'दद्दा' से लजाकर छिप रहने को तैयार हो जाय ! दिलीप के लिए जैसी यह अवहेलना की बात है, वैसी ही स्वतः उसके लिए भी अशिष्टतापूर्ण । विमल मन के लिए लिप्सा~अमर्यादित, अवैध और अनियन्त्रित लिप्माजैसे वर्जित है, वैसे ही अप्रीतिकर, अशिष्ट, अशोभन और तिक्त उपेक्षा-भाव भी तो सर्वथा अनुचित है, क्षुद्रता-द्योतक। अनु की माँ अकस्मात् एक नवागत को प्रांगन में देखकर पहले तो एकदम विस्मयाकुल हो उठी, फिर क्षण-भर में ही उसे पहचान कर विपुल उल्लास से बोलीं--"यानो लल्ला, बैठो।" और एक छोटी-सी मचिया बैठने के लिए उन्होने दिलीप के आगे कर दी। - दिलीप कभी पन्द्रह वर्ष का था और तहसील के हाईस्कूल में पढ़ता था । बड़े दिन की छुट्टियों में घर आया था। ढेरों संतरे, सेब, केले, काजू- किशमिश, पिस्ता-अखरोट अपने साथ लाया था। संध्या का समय था। अनु उस समय उसके घर में ही, उसकी मां के पास बैठी हुई, उनसे बनियाइन वुनना सीख रही थी। दिलीप को पाया जानकर वह उठ बैठी और बोली--"चाची, अब मैं जाती हूँ।" अनु ग्यारह वर्ष की हो गई थी और गाँव के स्कूल में पढ़ती थी। बचपन से ही वह दिलीप को दादा कहती आ रही थी। इससे भी पूर्व उस समय-जव दिलीप सात वर्ष का था और गाँव के स्कूल में पढ़ता था-अनु उसके आगे नंगी खेला करती थी। दिलीप स्कूल से लौटता,
इन्द्रजाल
६६
अनु दूर से उसे देखकर दौड़ पड़ती और उसके पैरो तक लटकती धोती
को छूती हुई उससे लिपट जाती। अनु कनक-वर्णा थी और शरीर से भी
बहुत स्वस्थ रहती थी। रास्ते-चलते पड़ोसी तक उसे गोद में लेकर
विलाने में सुख पाते थे। दिलीप के कोई वहन न थी, न उसके घर में
कोई और छोटा बच्चा। वह भी पडोस को अनु को दुलराने सिलाने में
बड़ा मुस अनुभव करता था।
हाँ, तो अनु को अपने घर लौटता हुमा जानकर दिलीप मो से कहने
लगा-"अम्मा, अनु जा रही है।"
अनु चल खडी हुई थी। दिलीप को मां ने कहा-"अरी, क्या
चली ही गई अनु ?"
अनु खड़ी हो गई और वही से बोली-"नया है चाची ?"
"अरी सुन। बड़ी शरमीली बनी है।"
अनु लोट पड़ी। एक बार उसने दिलीप की ओर देखा, एक बार
चाची को। फिर नीचे की ओर मुंह करके चाची के पास पाकर सही
हो गयी।
चाची ने ढेर के ढेर फल और मेवे अनु की पोती के छोर में भर कर
वाच दिये। वह लौटकर जाने लगी। चाची ने उमको ठुड्ढी उठा कर,
वाम कपोल पर प्यार की एक हलकी चपत-सी जमाकर कहा-"ठगिनी
कही की !" फिर मन-ही-मन सोचा, विचारकर स्थिर किया कि इसके
साथ दिलीप का व्याह हो मकता, तो कितना अच्छा होता!
अनु और भी सजा गई। कुछ बोलो नहो, चलती ही गई। फिर
दिलीप जब तक पढने को चला नहीं गया, अनु चाची के घर नहीं
प्रायी।
दिलीप चाची की चरण-धूलि मस्तक पर लगाकर मचिया पर बैठ
.
गया।
चाची ने पहले तो आशीर्वाद दिया । बोलीं-"सदा सुखी हो
लल्ला।" फिर पूछा-"कव पाये ?"
१२ : इन्द्रजाल "कल पाया हूँ चाची। दस दिन की छुट्टी है।" दिलीप ने नपे-तुने शब्दों में कह दिया। वह इधर-उधर देखता रहा। उसके जी में पाया कि वह उठकर तुरंत चल दे, किन्तु कुछ सोचकर थोड़ी देर बैठ लेना ही उसने उचित समझा। अनु कहीं चली गयी थी। चाची भीतर जाकर कुछ खोजने लगीं। आँगन के एक कोने में तुलसी का पेड़ है। दिलीप खड़ा होकर उसके निकट जा पहुंचा। वह देखते लगा कि मिट्टी का एक दीपक रक्खा है, जिसमें अधजली बत्ती पड़ी है और थोड़ा-सा जमा हुआ घी उसे ढंके हुए है । उसे स्मरण हो आया कि अनु नित्य इसी दीपक से तुलसी की आरती करती है। वह सोचने लगा.~-मनुष्य का जीवन भी एक दीपक है। वत्ती बदल जाती है, किन्तु दीपक वही बना रहता है। घी हुआ या तेल, जब कम पड़ जाता है, तभी और छोड़ दिया जाता है। यों दीपक और जीवन, दोनों के लिए स्नेह की अपेक्षा है। स्नेहाभात्र यदि कभी पास न टिक सके, तो वत्ती आज है और सदा रहेगी। किन्तु जव स्नेह चुक गया हो, तव वत्ती कैसे टिक सकती है, कब तक टिक सकती है ! वह जल जायगी और दीपक में उसका शरीर भर, कुछ देर के लिए, रह जायगा । फिर तो वायु का एक झोंका ही उसे चिरशान्त कर डालेगा। जीवन के भीतर . जो वत्ती पड़ी है, जिसे हम चाहें कह डाले कल्पना की रानी या स्वप्न की प्रतिमा-तभी तक ज्योतित रहेगी जब तक स्नेह रहेगा । और जब वह स्नेह ही नहीं रह गया, तब वह प्रभा, प्रकाश कहाँ दृष्टिगत होगा! दिलीप के मन में आया-तो क्या अनु के जीवन-रूपी दीपक में, बत्ती के रूप में, सचमुच कोई दूसरी प्रतिमा है ? चाची एक कटोरे में कुछ मिष्टान्न ले आयी, एक गिलास में गरम दूध, दूसरे में जल । फिर भीतर जाकर बोली-"कहाँ गई री ! - - ! अनु !"
अनु बोली-"यह बंटी हूं अम्मा ।" चाची ने वहीं में यह दिया--"अरी, अपने दट्टा के लिए पान तो लगाकर देना।" पहले ही अनु ने अपने को वहुन संभालकर उत्तर दिया था। वही कठ का प्रार्द्रभाव न प्रकट हो जाम । अब मां का यह प्रादेश पाकर तो उसका सारा संयमही मंग हो गया। विचार-लोन, पद, प्रांमू निकल ही पड़े। मिठाई खाते हुए दिलीप वोला--"और कहो चाची, अनु को ममुराल कंसी मिनी?" "अब जैमी कुर है, प्रच्छी ही है सल्ला। कहने को बत्तिस, लेक्नि अमल में चालिस तक की उम्र है। चंदोवा वालों से माफ हो गया है। यो खाने पहनने के लिए मभी कुछ है; मोने के गहने हैं, घर में गाय-मम हैं, दूध-घी की कमी नहीं है।" चाची ने इस तरह पहा कि बाहर के व्यावहारिक मंतोप के माय भीतर की व्यथा, दूध के गाय पानी की भांति, किमी प्रकार मिल न मकी, वान गगा-यमुना के माकम्मिक मिलन की मो शुभ्र-श्याम मार्ग पृथक पृथक् नलक उठी। दिलीप ने पहना चाहा--'चलो, व्याह हो गया, पह बहन अच्छी बात हुई। किन्तु फिर चाची के शुष्क, विपण मुग और उनके नत्रा- लोन अंत.नि.मृत निवाम को लक्ष करके वह कुछ कह न मका। राधा जव मे पान लगा रही है, यही मानती है कि इन पानी में नाय उमका जग भी मम्बन्ध नहीं है । जमे ये निर्जीव पान हैं, बैंग हो उनके माय टमी अंगुलियों का अचेदन म्पर्म है : चाहे चना अधिक हो जाय, चाहे वत्या; वह कुछ नहीं जानती। वह पर जान्ना नही चाहनी। दशं प्राय ही वयो? ज्या इमान की टन या प्रान को फिर पूछने है कि कमी गमुगल मिली, मुम. का मिला है, प्रो' या न मिला ! मान नो, मुझे, वृछ भी नहीं मिला, दो या तुम उगी पनि .६४ : इन्द्रजाल कर दोगे ? या मान लो, सब कुछ मिला है, तो इन सब बातों को जान कर तुम करोगे क्या? दिलीप जलपान कर चुका है और अनु उसे पान देने जा रही है। नमित दृष्टि है उसकी। मोतियों से गुंथे हुए उसके कानों के रिंग डोल रहे हैं। धीरे-धीरे पग धरती हुई वह आ रही है। नेत्रों को ऐसा संयत, ऐसा अविचल, बना रखा है उसने, जैसे दिलीप की ओर देखना उसके लिए वजित है, पाप है। निकट आकर उसने पान अपनी मां के हाथ में दे दिये । माँ ने चाहा कि कह दे दद्दा को ही क्यों नहीं देती; किन्तु अनु की मुद्रा की ओर देखकर उसने उसके हाथ से पान लेकर दिलीप को दे दिये। दिलीप अब इस घर में कभी न पावेगा। अनु तो खैर, दूसरे की हो ही चुकी, लेकिन चात्री भी बदल गई हैं। न, अब उसे इस घर में कमी नहीं आना होगा; क्योंकि गोस्वामी तुलसीदासजी ने बड़े अनुभव से यह दोहा रचा था- आवत ही हरपै नहीं, नैनन नहीं सनेह; तुलसी तहाँ न जाइये, कंचन बरसे मेह । पान लेकर दिलीप वोला-"अव चलूंगा चाची।" चाची ने अप्रकृत विस्मय का भाव प्रदर्शित कर कहा- "जायोगे ? अच्छा। " दिलीप चाची के पैर छूकर चल दिया। चाची ने पुनः पूर्ववत् आशीर्वाद दिया--"सदा सुखी रहो !" दिलीप चलता ही गया, उन्मथित-सा, विमूढ़-सा । लौटते किसी की ओर देखा तक नहीं। अनु पान देकर भीतर चली गई थी। किन्तु जब उसे प्रतीत हुना कि दिलीप जा रहा है, तो वह तुरन्त लौटकर खंभे की नोट में खड़ी हो गई। दिलीप चला गया, चाची रसोई बनाने में लग गई। राधा धीरे- इन्द्रजाल : ६५ धीरे बाहरी द्वार तक जा पहुंची। जिम प्रकंपित विवेक मे उमने अपने- पापको चारों ओर से सीच-सांचकर बांध रखा था, प्रच्छन्न प्यार के एक ही झोंके ने उसे विकल्प म्प से ऐमा नकमोर डाला कि किसी भी प्रकार वह अपने पापको प्रकृतिस्थ न रप सको। द्वार पर सही होकर यह मामने की ओर देखने लगी। परों के चप्पलों तक लटरती और दोनों प्रोर चक्कर दे-देकर घूमती हुई धोती की चुन्नट, जानुपर्यन्त प्रावृत खादी श्वेत कमीज पौर मिर पर छल्लेदार केग-राशि। जहां तक दृष्टि-पथ में उत्तरोतर धुंधले हो रहे इस दृश्य को अनु को प्राय ग्रहण कर सकी, अनु सडी रही । अन्त मे जब दिलीप का पृष्ठ भाग उमकी दृष्टि से सर्वथा लुप्त ही हो गया, तो यह फिर मीतर लोट पायो । उसके मन में पाया कि दिलीप अगर उगका कोई नहीं है, तो यह मंसार मिथ्या है, जीवन मिथ्या है फही कुछ भी सत्य नहीं है । समी व्यर्थ है। । दिलीप की मां कह रही थी-"अब मुझमे मोर न सहा जायगा मुन्नू । वह जब अच्छी तरह थे, तब तू पढ़ रहा था। मेरी बडी इच्छा थी कि उसी ममय बहू पा जाती और वे इम प्रांगन में उनके पायल की मनकार मुनकर अपनी साघ पूरी करते । मैं उनसे कहती-कहती हार गई, पर उस समय तुम पिता-पुत्र किसी तरह न माने। मैं समझती थी, ऐसी जल्दी क्या पडी है ! एक-दो वर्ष और सही । पर मेरा वह धीरज ही मेरे लिये अभाग्य बन गया और वे चलते-फिरते एक दिन चलते चने । "प्रय हंसते-खेलते पड़ोस के बहू-बेटो को देखती हूँ, तो ऐमा जान पड़ता है कि यह सब धन-दौलत कुछ नहीं है। जब कोई इसका मोग करने वाला न होगा, तो यह सब बेकार है। "मैं तेरे लिए कोई चीज़ नहीं हूँ. मेरी इच्छानों का कोई मूल्य नही । जान पड़ता है और तो सब चला ही गया है, तू भी अब अपना नहीं रहा है।"
६६ : इन्द्रजाल . उनकी आंखों में आंसू भर आये। दिलीप बड़ा जिद्दी है । उसने तय कर लिया है कि वह अविवाहित रहेगा। अनु ने उसे भुला दिया है। वह उसे भुला सकती है। वह नारी है, हिन्दू-नारी। वचपन में उसका व्याह हुआ था। तब वह जानती भी न थी कि दिलीप उसका कोन है । वह अपने माता-पिता से मुंह खोल कर क्या कहती, कैसे कहती ? उसके बाद उसके बाद वह कर ही क्या सकती थी? किन्तु दिलीप ने पुरुष का हृदय पाया है। अनु उसकी होकर भी दूसरे की हो कर रह सकती है, तो क्या दिलीप उसी का होकर, फिर किसी का न होकर, नहीं रह सकता? प्रेम कोई विनिमय नहीं है। वह तो उत्सर्ग का प्रतीक है । अनु ने उसे मुला दिया है, तो क्या इसीलिए दिलीप के लिए उचित है कि वह भी उसे भूल जाय ? न, दिलीप से ऐसा हो नहीं सकता । वह जीवन को क्षण-भंगुर मानता आया है। प्रेम के आगे वह ऐसे तुच्छ जीवन को कुछ भी महत्व न देगा। जिस प्रकार अब तक चल रहा है, उसी प्रकार चलेगा। दिन चल रहे हैं । दिलीप डाक्टरी पढ़ रहा था। वह अव एम ०. बी० वी०, एस० होकर पा गया है । देहात छोड़कर अब वह कानपुर नगर में रहता है। उसके साथ सिर्फ उसकी मां है और कोई नहीं। उसकी मां नित्य सवेरे तांगे पर बैठकर गंगा नहाने जाती है। दोपहर को जब लौटती है, तो दिलीप भोजन करने या जाता है। महराजिन उम समय तक भोजन की सारी सामग्रियां तैयार कर रखती है। माँ उसे पास विठालकर खिलाती है । दिलीप मां से इधर-उधर की बातें करता है । वह कभी मुस्कुरा उठता है, कभी कोई ऐसी बात भी कर देता है कि मां या तो उलझन में पड़ जाती है, या दिलीप को भला बुरा कहने लगती है । दिलीप चुपचाप उन बातों को सुन लेता है। एक दिन की बात है। जान पड़ता है, नवम्बर मास का वह दिन जीवन के सभी साधारण दिनों की अपेक्षा कुछ नवीन था, उसकी कोई - इन्द्रजाल:६७ विशेषता थी। तभी तो दिलीप मां की उस यान को मुन कर कहने लगा-"अच्छा तो अम्मा, मैं भव बाह करना चाहता है। पूछो, विमवे माय नो बनाऊ।" 'दिलीप अब भी नटग्वट वालक बना हुया है। वह अपनी मां तक में ठठोली करता है । देपो तो, वह कमी बात कर बैठा ! निमने अपने जीवन के अट्ठाईस वर्ष यो हो हंसते-मेलने बिता दिये, नां पते- महंत हार गई, अन्य प्रात्मीय-जन ममभा-सममा कर घर गये, किन्तु दिलीप ने किमी की बात न मानी । और पाज यही दिनीर पता है मां मे टोली करने ! दुष्ट कही का-गंतान !' मां के मन में पाया और गया। वह दिलीप की पोर तापनी रही। उसके चिर विषण्ण, चिर-पीडित मन-प्राण में दिलीप का यह क्यन विपावन तीर यी तरह जा लगा । दिलीप के लिए यह नयी बात नहीं है । इसी तरह मालूम नहीं कितनी बार वह नागे यानं तय कर चुका है, किन्तु दो दिन में ही फिर पलट गया है । नया उमकी मां इतनी नादान है कि वह दिलीप की इस बात को सत्य मान कर सरगित प्राशा में लहरा उटेगी? न, दिलीप टिठोली ही कर रहा है । किन्तु यह वात, मच पूछो तो, मवंगाधारण के लिए टीम हो मकती है। टटोली वह समझे, जो उसका अभ्यासी हो । दिलीप की मां उमरी यान को ठठोली क्यो समझे यह नो मां का हृदय है । कोई और होता, नी यह एक बार ममझ लेती कि यह मय शाब्दिक मृग-तृप्या है, एक प्रकार या वाक्छन । विन्नु वह तो मां है। किसी भी प्रकार अपने दिलीपनी किमी बात को वह अपरप नहीं देखना चाहती। उमा दिलीप अनी प्रबोध याला ही बना हुअा है। अभी उसी अवस्था हो कया है। प्रमी तो वह बच्चा है । कौन जाने निश्चित मन से ही वह म प्रकार की बात उठा रहा हो ! मो ने पर-उधर भूल-मटव कर मोचा, ग्थिर किया। उसकी - इन्द्रजाल न मुद्रा वात-की-बात में आशा के उज्ज्वल आलोक से उद्दीप्त हो - . दिलीप इसी समय पूछ बैठा--"तुम कुछ बोलीं नहीं । अम्मा !" माँ ने कहा-"मालूम नहीं, कितनी बार तू इसी तरह की बातें र-करके मुझे परेशान कर चुका है। इसीलिए तेरी इस बात का .श्वास जाता रहा । तू चाहे सच भी कहे, तो भी मुझे शंका बनी ही हती है । मैं अभी तक यही सोच रही थी कि क्या यह सम्भव नहीं हो कता कि तेरी इस वार की बात सच निकल आये ?" "सचमुच अम्मा, अब मैं विवाह कर लेना चाहता हूं।" दिलीप उसकी ओर स्थिर दृष्टि से देखकर वोला-"किन्तु जब तुम उसे स्वीकार कर लो, तव।" अब मां को बोध हुआ कि जो वात उठाई जा रही है, वह निरा- धार नहीं है । तब वह बोली-"मुझे स्वीकार क्यों न होगा ? यह कैसी बात अाज तूने कही ?" प्रकार में कुछ विस्मय भी झलक उठा। दिलीप बोला-"जिसके साथ मैं विवाह करना चाहता हूँ अम्मा, वह विधवा है। उसके जीवन को अभी तक किसी ने छू नहीं पाया है । कभी वह बड़ी भाग्यशीला थी; किन्तु विवाह होने के साथ ही, जब संसार की दृष्टि में वह सौभाग्यवती हुई, मालूम नहीं, कहाँ से उसके लिए सर्वथा अभाग्य सिद्ध हुअा। जिन्दगी के साथ मौत का मेल कहीं सम्भव होता है ! सुना है, अब वह विधवा हो गई है । वह एक दुखिया नारी है अम्मा । संसार उसे अभागिनी कहता है । मैं उसके साथ विवाह करके एक बार उसे सौभाग्यवती-रूप में देखना चाहता हूँ।" माँ बोली-“यह मैं कुछ नहीं जानती । मैं तो वह चाहती हूँ; ऐसी वहू, जिसे पाकर मैं तुझे सुखी देखू, तेरे उजले भविष्य को देखू । अब मुझे यह नहीं देखना है कि वह वहू तू कहाँ से, किस तरह, क्या सोचक उठा लाया है ! वात के - इन्द्रजाल : ६६ -यह मां है दिलीप ! इने मां कहते हैं। तू समझता है कि मां के लिए संस्कृति प्यारी है, समाज प्यारा है ! लेकिन तूने यह क्यों नही सोचा कि मां के लिए पुत्र पुत्र है । उसके पागे संस्कृति और समाज कोई चीज नहीं है । वह तो अपने भविष्य की ओर देसती-अपनी एकमात्र प्राशा की ओर टकटकी लगाकर निहारती रहती है। दिलीप मां के उत्तर से चरम पाह्लादित हो उठा। दिलीप फाडूंद-स्टेदान से प्रोरया(इटाया)एक तांग पर सवार होकर पाया था। उगने कमी औरया देसा न था। वह समझता था, एक माधारण करना होगा। किन्तु नहर पार करने के बाद जैसे-जैसे वह मागे वड़ता गया, वैमे-ही-वैगे उसे प्रतीत हुमा, यह तो एक गुशोभित कस्बा है । राडक के दोनी पोर पक्के, सुशनुमा मकान और वंगले हैं। पुष्प- वाटिकाएं और लताएं उनकी शोभा अपने-माप वतला रही है। तहमील के निकट से याभार की ओर मुदकर उसने एक प्रादतिये के यही पूछा- "यहां कोई मानन्दीप्रमाद अवस्थी रहते थे? घर के जमीदार और मम्पन्न व्यक्ति थे।" उत्तर मिला-"हाँ ! अब यह तो नहीं रहे, उनकी मुसम्मात है। उधर आगे चलकर, इसी सड़क पर वह जो पीपल का पेड़ दिखाई पडता है, उसी से लगी हुई दक्षिण की ओर जो गली गई है, वही उनका मकान है।" दिलीप तांगे पर बैठ गया। तांगा उमी ओर चल दिया। थोडी देर में दिलीप एक फाटक के अन्दर था। नौकर ने दिलीप का मन्देश भीतर जाकर वहा । फिर तुरन लोट पाया और बोला- "बहजी ने आपको वही बुलाया है।" दुमंजिला पपका मकान है । साफ-मुधरे कमरे । दिलीप जीने की सोनियों से पता चला गया। प्रागे उसे एक कमरा मिला । उसमें एक.
१०० : इन्द्रजाल - पलंग विछा हया था । खादी की श्वेत चादर अपनी उज्ज्वलता से यह प्रमाणित करती थी कि वह अभी ताजी निकाली गई है। दो वजने का समय था । दिलीप ने देखा, अनु जमीन में शीतल- पाटी पर बैठी हुई है ! ग्रोह, कितनी कृश हो गई है ! न वह मांसल देह-यष्टि है, न वह मदिर लावण्य । जैसे सब कुछ खो गया है। जिस अनु को वह देखने आया था, मानो वह और थी। न, यह अनु नहीं हो सकती कदापि नहीं। दिलीप अपने-अापको स्थिर न रख सका, उसकी आँखें भर आयीं। कमरे के द्वार पर वह खड़ा-का-खड़ा रह गया । अनु वोली--"खड़े क्यों हो ? श्राझो, इधर निकल आयो।" दिलीप अनु के पास जिस संकल्प को लेकर आया है, उसकी गति कहाँ है ? कहाँ गया उसका वह अविचल उत्साह ? कहाँ गये उसके वे उत्फुल्ल लोचन, जो अनु के अंतस्तल को भेदकर उसे चरम विलोड़ित कर डालेंगे? मनुप्य कितना अभिमान करता है अपनी संलग्नता का ! सोचता है, वह असम्भव का अस्तित्व ही न रखेगा; इस शब्द को चूर- चूर करके वह सदा के लिए नष्ट कर डालेगा। किन्तु यह नहीं सोचता कि अदृप्ट के एक ही कशाघात से मनुप्य का सारा दर्प, सारा अहंकार, धूल में मिल जाता है। मनुप्य के समस्त अनुप्ठान और संकल्प उसके एक संकेत मात्र से तुच्छ बन जाते हैं। दलीप पलंग पर बैठ गया। कुछ पूछ भी नहीं सका । पूछने या बोलने को इस दलीप के पास क्या कुछ था नहीं ? उसके मन में आया कि वह कहे, तुम्ही को देखने-सुनने चला पाया हूँ अनु । किन्तु अटूट विश्वान-गर्भित वाणी का यह कथन किसी प्रकार उसके ध्वस्त कंठ से फूट न सका । फिर उसने स्थिर किया कि वह पूछे- क्या हाल-चाल है अनु?
६.जाल किन्तु यह तो एक प्रकार का व्यंग्य हुग्रा, हाल-चाल क्या उनसे अब तक छिपा रह सका है, जो वह ऐसा प्रश्न कर रहा है ? छिः ! अपनी अनु मे वह इस प्रकार का प्रश्न करे ! यह तो एक प्रकार की अवहेलना होगी उसकी, एक प्रकार की प्रवंचना। न, यह दम तरह का प्रश्न नहीं कर सकता। अनु सिसक-सिसककर रो उठी । तब स्थिर होकर, संभलकर, दिलीप ने कहा--"रोमो मत अनु । माज इतने दिनों बाद भी मैं यही मानता हूँ कि मैं होऊँ या तुम, पोई भी हो, मभी अपने कर्म-फल के ही अधीन हैं । कोई कुछ नहीं करता। जो कुछ भी होता है, हमी अपने आप करते हैं, या किये हुए का पाते हैं । तब हम रोये क्यो ?" पूर्व-पत्नी से उत्पन्न दो छोटे बच्चे कही मेल रहे थे । वे मी समय या पहुंचे और अनु की गोद में पाकर बैठ गये। दोनो लड़कियों थी। बड़ी बोली-'काए को लोती हो मम्मी ? ना लोग्रो, ना लोनो।" यह धोती के छोर मे विमाता के प्रांन पोछने लगी। छोटी वोली- 'मम्मी, जे कोन है नन्ही-सी तर्जनी दिलीप को और उठाकर, भोली जिज्ञामा से, पौतुक मरी चितवन में। अनु वोली-"यह तेरे मम्मा है लल्ली। देव, फलये मेवे लाये है। जा-जा उनकी गोद में जाकर बैठ।" दोनों खिलौने पहले दिलीप की अोर देखकर रह गये फिर मुम्बराये । उछलकर एक दिलीप मी गोद में धंठ गया, दूसरा उसके कंधे पर। जीवन में पहली बार दिलीप ने अनुभव किया-यही ससार का स्वर्ग है, प्रानन्द कादबिनी यही वहती है। मानवात्मा वा चरम उत्थान यही होता है । यही वह स्थल है, जहाँ मनुष्य अपने प्राधा-स्वप्नो को चरितार्य होने देखकर अनुभव करता है कि देवराज इन्द्र का मुखोपभोग भी मेरे इस मुम के प्रागे तुच्छ है ।
१०२ : इन्द्रजाल X बच्चों के साथ देर तक दिलीप खेलता रहा। X रात पायी। साथ बैठकर अनु ने दिलीप को भोजन कराया। बच्चे सो गये । वार्तालाप का प्रवाह फिर फूट निकला। "तो तुम कल ही चले जायोगे? और भी दो-एक दिन रह नहीं सकते ?" अपलक दृष्टि से दिलीप की ओर देखती हुई अनु बोली। "हाँ अनु", दिलीप टहलता और फ़र्श की ओर देखता हुआ, आर्द्र कंठ से कहने लगा--"मैं नहीं जानता था कि मैं खुद इतने दिनों तक स्थिर रह सकूँगा।" फिर थोड़ा रुककर उसने कहा---''मैंने यह भी नहीं सोचा था कि कभी ऐसा भी ममय पा सकता है, जब मैं तुमसे मिलकर तुम्हारा इस तरह समाचार लेने पाऊँगा।" फिर कुछ गम्भीर होकर बोला-"यह ठीक है कि एक जीवन की आहुति देकर प्राप्त की गई साधना के महत्त्व को इस प्रकार व्यर्थ कर डालना कोई उत्कर्ष नहीं है। इसके सिवा मैं यह भी मानता आया हूँ कि बादर्श जीवन तो त्याग और तपस्या का ही प्रतीक होता है । तो भी मैं इतना जानता हूँ अनु कि यह उत्सर्ग, यह समर्पण, हृदय से ही फूटकर सदा नहीं निकला करता । इस चाह के भीतर संस्कृति की एक गहरी पाह भी छिपी रहती है। मनुष्य अपने को चाहे तो भूल सकता है। किन्तु उसकी अपने को भुला देने की यह कामना, अपने हृदय का यथार्थ चित्र अंकित करते समय, यह कभी नहीं देखती कि उसकी अमुक रेखा संस्कृति और समाज के लिए सर्वथा अप्रीतिकर, अवांछनीय और अशोभन है, इसी कारण मंद है, धुंधली; और अमुक नितांत स्वाभाविक, सब प्रकार से अनिवार्य होने के कारण चरम अपेक्षित है, इसलिये उद्दीप्त । क्या पुलकित रोम-रोम का अकल्पित उल्लास, क्या चिर-शांत समाहित आशा- लता पीर क्या अथुविगलित विदर्ण चेष्टा, उसके लिए सदा समकक्ष ही रहती है।" .
कुछ प्रावेश में प्रापर, कुछ उत्तेजित होकर अनु बोली-"तो का तो मीधा-सादा पर्य यह है कि तुम मुझसे नहीं, मेरे शरीर से पना नाता रखते पाय हो । जान पड़ता है, मेरे प्रेम को नुमने इतना बूल-काय समझ रवग्वा है कि तुम इम गरीर को छोडपर अलग ने उसे प ही नहीं पाते ! मैं समझ नहीं पाती दिलीप, प्रापिर तुम चाहते ना हो?" "मैं एक बार यही जान लेना चाहता हूँ अनु कि हमारे बीच में यह - मम्मति और समाज के प्रातंक की दीवार पडी है, उसे हमाग यह म उल्लंघन करने में जो ममर्थ नहीं हो रहा है उसका कारण क्या है ? -उमके आधार में क्या है ? मैं यह स्पष्ट रूप गे जान लेना चाहता कि हम लोगों में से किमने अपने आपको धोया दे रवग्या है ? मैं नहीं निता कि हमारा परीर और प्रात्मगत धर्म ग्राज कुछ और है और ल पर और । मैं आज और कल के अन्तर गे परे पहुँन गया है। जो जि जिमी है, मैं तो उगे उमी के पास देखने पर विश्वाम रखता हूँ। यो नही हो पाती, मोजते-मोजते, उमका पता लेने पर मैं उने छोटना ही जानता। अपने और जगत् के कल्याण के लिये, दो तटपती हुई आत्माग्री के विच्छेद, विभ्रम और विरोध को ध्वम करने रहने में ही मैंने पनी गार्थकता मानी है। में युरियादी हूँ अनु। विश्ववद्य हिन्द- स्कृति की दुर्बल वृत्तियों के विघ्वग का ग्बग्न देगने-देखते पान में चल पने विवेक को मानता हूँ यार विमी को नहीं।" इम फ्धन के प्रारम्म में दिलीप नतमुप था, मध्य में उगका मन्ना नन हो गया पीर अंत तक पहुंचते-पहुंचते एका पदमनीय मालोर उमफे मानन पर ज्योतित हो उठा । अनु प्रब प्रचार हो उठी। उसके नेय भर पाये । [फान कर अनेक ती उममी मादी की श्वेत माटी को भिगोने लगे। दिलीप उसके निबट जाकर बैठ गया। अनु उमी गोद में गिरकर गिमकने लगी। दिलीप पने रूमान से उनके प्रामू पोछता हुअा कहने लगा-"रोग्रो मत ग्रन, १०४ : इन्द्रजाल " जीवन इस तरह खोने की चीज़ नहीं है।' अंत में कुछ संभलकर अनु बोली-~-"मैं अब तक तुम्हारी ही रही । मैंने उसके साथ छल किया था। उन्हें सदा धोखे में रक्खा था । मैं अभागिनी हूँ कि अब तक किसी की न वन सकी। पर अव मैं तुम्हारी वगी; किन्तु..." और उस 'किन्तु' को लेकर अनु फिर सजलनयन हो उठी। किसी प्रकार यह प्रकट न कर सकी कि अब एकमात्र निर्वाण की ओर वह देखना चाहती है और दूसरी ओर नहीं। उस रात को अनु के मन-प्राण तक में प्रविष्ट होकर दिलीप ने नये जीवन का अनुभव किया । उसके प्राणों को प्राण मिले, जीवन को जीवन । वह अपने संसार के निर्माण में लीन चिर-लीन हो गया। बड़े उल्लास के साथ वह घर लौटा। -- किन्तु-फिर उसी दिन सायंकाल अनु का स्वर्गवास हो गया । सुचना मिलने के बाद दिलीप एक दिन अनन्त आकाश की ओर देखते- देखते विमूढ़ हो उठा। उसके मानस-पट पर एक ओर इस संसार के प्रति चरम उपेक्षा चारों ओर से पाकर एकत्र हो उठी, दूसरी ओर कभी- कभी उसके मुख पर, नाना प्रकार के, अप्रकृत हास की अपरूप मंगिमाएँ झलकने लगीं। विविध प्रकार की मुद्राओं में वह सोचने लगा- 'तो क्या अनु सचमुच कल्पना थी, एक स्वप्नमाला? क्या स्वतः उसे भी यह बात नहीं था कि वह कहाँ जा रही है ? क्या उस दिन का वह समर्पण भी एक वाक्छल था ? पति के साथ छल करके जव उसकी संतुष्टि नहीं हुई, तब क्या मेरे साथ भी उसने उसी प्रकार का प्रयोग किया ? तो क्या स्वामी को एक वार खोकर फिर उसने उसे पा लिया था? और फिर, क्या इसीलिए वह अन्तर्धान हो गयी ?' सोचते-सोचते वह थक गया। दिन-भर के उपवास और असीम मनोमंथन से जब वह अत्यन्त श्रांत-ध्वस्त हो गया, तो एक बार उसके .
मन में पाया वहीं कुछ नहीं है, में स्वत: भी कुछ नहीं है । सब धोखा है-इन्द्रजाल। वर्ष-के-वर्ष बीत गये है। किन्तु आज तक दिलीप के लिये अनु एक- इन्द्रजाल ही बनी है । विस्मयाकुल हो-होकर सदा वह यही मोचता है- तो एकन्यार खोकर भी करा फिर उमने म्वामी को प्राप्त कर लिया था?
उर्वशी आज जब जीवन-विपंची की मृदुल तरङ्ग-ताल क्रमशः मन्द पड़ने लगी, तो मैंने अपने सुहृद गोपालदादा से कहा-"अायो चलें, कहीं घूम आयें।" . सावन के दिन हैं। नित्य ही श्यामधन इठलाते वलखाते हुए आते- आते बरस पड़ते हैं। मयूर बोलने लगते हैं और मेरा छोटा-सा छौना नारायण चकित-विस्मित मनसा-लहरी हिलोरता हुआ, वातायन से झाँकने को दौड़ा पाकर, मेरे पैरों की धोती में लिपट जाता है। झमाझम पावस के इन भन्दालोक-पूर्ण दिनों में इधर-उधर घूमना मुझे सदा से बहुत अच्छा लगता आया है। गोपाल दादा ने ज़रा-सा मुसकराकर अन्तर का अनन्त उल्लास मुलफाते हुए कहा-"अच्छा तो है । चलो, वृन्दावन चलें।" 'तो फिर कल सवेरे की गाड़ी से चलना तय रहा।" कहकर मैं अपना पनडव्वा खोलने लगा। जीवन-भर चेप्टा कर-करके थक गया कि बाहर चलते वक्त साथ रहनेवाली चीजों को पहले से, इतमीनान के साथ, तरह से एकत्र करके, ट्रकों के भीतर सुरक्षित रूप से रख लूँ। पर मैं इस बात में कभी सफल नहीं हुआ; सदा मुझसे कुछ-न-कुछ छूटता ही आया है। गोपाल-' दादा मेरी इस प्रकृति से अपरिचित नहीं हैं । फिर भी उनसे रहा नहीं गया । वोले-~~-"अभी काफ़ी समय है। साथ रखने की सभी आवश्यक चीजें पहले से ठीक करके रख लो। फिर वहाँ आवश्यकता पड़ने पर 'अरे' । । दांत टूट गन्द से कोई तीर न मार देना!" मेरे ये गोपालदादा बड़ी हमोड तबीयत के हैं। अपने प्रेमी जनों की बहुत याद रखते हैं । उनरा प्रेमी संसार है भी बड़ा विस्तृत । उनके गांव में एक 'मलयू पंडित रहे हैं, जिनको नाक में मुंघनी सुड़कते रहने का मर्ज है। बात-बात में 'तीन ममनलेव' बने रहने की उन्हें प्रादत है। 'समझ' शब्द का प्रशर जन्दी बोलने में कमी-कभी 'न' भी उच्चारित होने लगता है । मुंपनी सूंघते हुए जब वे 'तीन ममलेब' कहने लगते हैं, तो उनकी रूपरेषा ऐमी मनमोहक हो जाती है कि गोपालदादा उन्हें अपलक देगत हप मूर्तिवत स्थिर रह जाते हैं ! ऐसे ही एक लाला विशोरीलाल नाम के धंद्य भी मेरे गांव में रहते हैं। उनकी अवस्था प्रय सनायन-प्रट्ठावन की हो चुकी है। गये हैं नो वया हुप्रा; कृत्रिम दांतो से उनकी मुप-छवि मे कोई प्रार नहीं प्राने पाया है । वेश याकुन न्वत हो गया है तो क्या हुमा, सप्ताह में दो वार मिजाब जो लगा लेते हैं ! वृष्णवर्ण मे यदि कही स्वशिम लालिमा मी माला जाती है, तो उन्हें असह्य व्यया होने लगती है। पापको जीवन-मंगिनी यी मृगु हए अभी येवल दस वर्ष हुए हैं, ईश्वर की दया से प्रापके नानी-नतिनी भी हेमनी खेलती है। मापी देवीजी की प्रवस्था भी अधिक नहीं, केवल ५-७ वर्ष आपसे अधिक थी, फिर भी उनके निधन हो जाने का प्रापको अत्यधिक दुस है । अकमर प्रेमी लोग प्रापर पाम प्राकर, मुंह लटकाकर, जय कहने लगते है- "चात्री के न रहने से तो आपका घर ही बिगड गया ! उनकी मृत्यु मे गचमुच पापको वटा मदमा पहुँचा। देगो तो, प्राधी देह बिला गई।" तव ग्राप भट रो रोने लगते हैं ! रोते-रोते ग्राप हिबरियां भरन तगते है। दन लालाजी को ग्ला म्लाकरमानन्द उपलब्ध करने का श्रेय गोपालदादा को प्राप्त है । तो दगी प्रकार के व्यक्ति इन गोपालदादा के प्रेमी जन है। हो, तो मैंने गोपालदादा से कह दिया-"मैं चेष्टा तो मी ही फरूंगा कि प्राथम्या वस्नुप्रो में से कोई वस्तु छूटने न पाये, पर यदि + १०८ : उर्वशी -- कोई ऐसी वस्तु छूट जाय, जो यहाँ बैठकर सोचने की दृष्टि से तो अना- वश्यक है, पर वहाँ परदेश में आवश्यकता पड़ते समय सम्भव है, आवश्यक हो जाय, तव तो लाचारी होगी वन्धु ।" दादा हंसते हुए बोल उठे-"यह तुमने अच्छा वहाना ढूंढा !" मैंने उत्तर दिया-"वहाना नहीं दादा, सचमुच, यह वात मैं अपने अनुभव से कह रहा हूँ।" वे बोले-.-"अच्छा-अच्छा। तुम चलो तो सही; तुम्हारा वाहर निकलना तो हो।" - वृन्दावन में, सड़क के किनारे के एक तिमंज़िले मकान में, हम लोग ठहरे हुए हैं। तीन दिन से बरावर पानी बरस रहा है। कभी-कभी बीच-बीच में, घंटे-माध-घंटे को पानी रुक भी जाता है; परन्तु फिर भूरी- भूरी काली-काली जलद-बालाएँ, झीनी-झीनी पारदर्शिका साड़ियाँ पहने, हँसती-इठलाती, इकट्ठी हो-होकर नर्तन-गति के ताल-ताल पर सहसा बरसने लगती हैं । मेरे कमरे के दरवाजों पर एक खूब धनी लता, खंभों पर फैलती और दूसरी मंजिल के छज्जे को आच्छादित करती हुई, उसकी छत तक जा पहुंची है । उसकी हरी-हरी पत्तियों के बीच-बीच दुग्ध. फेन से खिले हुए पुष्प मंद-मंद मुसकरा रहे हैं । नन्हें-नन्हें बूंद उन पर कुछ क्षणों तक तो स्थिर रहते हैं, पर जब सनसनाती हुई पुरवैया झोंके देती हुई आ पहुँचती है, तो पुप्पों और पत्तियों पर छाये हुए वे मोती एकदम से झड़ पड़ते हैं। बड़ी देर से मैं मोतियों के इस क्षण भंगुर जीवन का अध्ययन कर रहा हूँ। प्रात.काल अभी-अभी हुआ है। पाठ नहीं वजे हैं। गोपालदादा कल मथुरा चले गये हैं । इस समय में यहाँ अकेला हूँ। जिस मकान में मैं ठहरा हुआ हूँ. उसमें सब मिलाकर दस-पंद्रह व्यक्ति ठहरे हुए हैं । मेरे कमरे के बगबर ही एक जौहरीजी, अभी परसो मे ही, मपत्नीक मा हिरे है। दन जौहरीजी की पत्नी. जान पडता है. द्वितीय विवाह की है । उनका वय अभी बीम-बाइम वर्ष का होगा। परन्तु जौहरीजी की अवस्था चालीम के लगभग है। जौहरीजी की उम नवपत्नी का नाम को नो में भला क्या जान मरता, परजौहरीजी ठहरे ग्राजाद तबीयत के पुरप, नन्दा नाम लेकर पुकारते हुए मैंने कभी-कभी उनका बोल मुन लिया है । चन्दा भीतर से चाहे जैसी हो पर उगा कंट स्वर मुझे बहुत प्रिय लगा। यह कुछ ऐमा मृदुल, प्राण-प्रद, पौर मुघा-मिस्त-मा जान पडा कि जय में यह इधर पावर टहरी है, तव में मेरे कान उघर ही रहढे लगे है। और यम यही-मला ममझो या धुरा - मेरे इस जीवन का अमंयम है । जो चीज मधुर है-गुन्दर है, वोगन है, प्रिय किंवा प्राणोन्मादिनी है, उमकी और में सटम्य या अन्यमनम्ब होकर मुझमे रहा नहीं जाता। मैं कम ती बया काहें! मुझे पनी बजाने पा गौक है। और वंगीयाले पी नीलाभूमि में पाकर उगती वन्दना में भी न बजाऊँ, यह मे हो सकता है । मिन्य ही प्राय. गत को ग्यारह बजे जब सामाग्कि पुष्प अगाध निद्रा में नीन हो जाते है, मैं अपनी यमी यी नान ट्रेडने बैठ जाता है। जर ने पाया है, यह यमी ग वृन्दावन में अनेक स्थलो पर बजा-बजाकर मैं अपने इष्टदेव यो रिभा चुका है। कल जैसे ही मैं वची बनाकर पनग पर जाने को आगे बढा कि जोहरीजी का नौकर, एफ छोग, मेंगे ही और ग्राना हमा दियाई पडा । तुरन्त टार्न उटायर मैंने उसका जगन्न प्रयाग जो उसके मुग पर छोड दिया, नो वह एकदम मे चौधिया गया । निकट प्राने पर मैंने उममे पूछा-"क्या है रे ? कमे दधर यह मेरे और भी निस्ट पारर धीरे में रहन लगा--"मालकिन पहली है, प्राज बडी जल्दी यमी बजाना बन्द कर दिया ।" मैंने पूछा-"जोहरीजी क्या कर रहे है। वह बोला--"वे तो नीद के स्वर्गटे ले रहे हैं। इतनी गत तक " ११० : उर्वशी ! कभी जगते हैं कि आज ही जगेंगे ! मैंने कहा--"अच्छा मालकिनजी से कहना, इतनी जल्दी तो नहीं वंद की; लेकिन यदि उनकी इच्छा और सुनने की है, तो फिर भी मैं सेवा के लिए तैयार हूँ।" छोकरा चला गया और मैं फिर वंशी बजाने वैठ गया। बड़ी देर तक मैं वंगी बजाता रहा। ऐसा जान पड़ता था, मैं नहीं बजा रहा हूँ, कोई और ही मेरी वंशी में बैठकर उसे इच्छानुसार वजा ‘रहा है। फिर तो मुझे इतना भी बोध नहीं रहा कि मैं कहाँ हूँ, क्या हूँ, और क्या कर रहा हूँ ! कितना समय, कुछ पता नहीं। अकस्मात् सुनाई पड़ा.---"अरे उठ, अरे प्रो कदुग्रा, ज़रा-सा उठ तो सही।" जान पड़ता है कदुप्रा नाम का वह छोकरा उठ बैठा । स्पष्ट सुनाई पड़ा, चन्दा कह रही है-"जा, उन बाबूजी से कह दे--क्या भोर ही कर देंगे? तीन तो वजा दिये!" कदुग्रा आँखें मलता हुआ मेरे निकट आकर यही कहने लगा। उत्तर में मैंने कह दिया--"हर्ज़ ही क्या है ! भोर भी हो जाता, तो क्या होता !" मन एक मिठास से भर गया है। नाना प्रकार की मधुर कल्पनाएँ मन में ना रही हैं। ऐसा जान पड़ता है, यह बन्दा मुझमे जरा भी दूर नहीं है। मेरे जीवन में जो कुछ भी प्यास है, सरसता की समस्त निधियों, आकर्पण के समस्त उपकरणों और आत्मदान के निखिल साधनों से यह नारी उसकी पूर्ति में तत्पर है। चाहूँ तो अभी स्वयं प्रभात हो जाऊँ, अथवा इस रात को ही कमी न समाप्त होने दूं ! जानता हूँ, मैं यह सब क्या सोच रहा हूँ! यह भी सोच रहा हूँ कि यह मिठास तभी तक है, जब तक मन की इस तैयारी के साथ गीली-गीली कल्पना का मधुर सम्बन्ध है । जीवन की वास्तविकता के साथ जव इसका सम्बन्ध होगा, तब 'स्थिति दूसरी होगी।
पर चिन्ता की कोई दान नहीं है । दम स्थिति के लिए मुनम किमी प्रकार का मय नहीं है । चन्दा यदि मुन्मे कोई प्रागा रचती है, तो मैं उसकी पूर्ति करने में डूंगा नहीं। भविश्य मुझे कहां ले जायगा और समाज की दृष्टि में मैं क्या बनूंगा, दमको ते करने की जिम्मेदारी मेरे कार नहीं है । मुनमें कही कोई प्रभाव है, तो मैं उमे अवस्य पूरा पगा; मेरे द्वारा यदि क्लिी प्राणी के जीवन में तृप्ति का नचार होता है, तो में उनको किनी प्रकार विमुख नहीं वर्षगा। पलंग पर लेटा दुप्रा करवट बदल रहा है। धूप निरल पायी है। यातायन में गीलन ममीर के मौके हर-हर करते हुए प्रा-प्राकर उन्मद प्रानन्द विनर रहे हैं । मिग्हाने नाक में रगाहमा हरिम-निनोना प्ररना मुग्न नीचे दी पोर रिज, हिलता-हिलता विनकुल मजीव-मा प्रतीत होता बड़ा प्यारा लग रहा है। एकाएक मेरी दृष्टि उम नाक मे रगी वंगी पर पटक गयी। काष्ठ-निर्मित एक निर्जीव पदारं का भी, अवसर पर, हिनना महत्व है ! यही गोयता दृप्रा ट ने मैंने उने चूम लिया और होठी गेसमावर भरपी इंडने लगा। सभी दम ही मिनट हप हॉग हिन्दुना मेरे निकट प्राकर कहने मा-"मानग्नि इटनी हैं. प्रापको मेरे हाथ का बना हुमा नोजन पाने में कोई आपत्ति नो न होगी ?" यगी उठाकर मैंने जहाँ-की-नही रप दी। व नोचने लगा. . 'मरे । मेरे इन गुप्क जीवन में पगए। यह प्रनिनः नग मृदुल प्रानन्द-मा पोलनंदाली चन्दा नुन अंग कौन हो' कही में भाग नुम' और निने दिनों के लिए पना बोला-"क्या कहते है यानी" मैं फिर प्रवीर हो उठा ई जीवन-नर में प्रश्न कर-करके हार गया मिरी प्रियतमा नंदरानी मुन्ने नदा हमार वाने का, कनी में ११२ : उर्वशी उसकी अप्रसन्नता का कारण न बनें, कभी मैं इस योग्य बन जाऊँ कि वह मुझसे किसी विशेष वस्तु की याचना करे और मैं उसे तुरन्त पूर्ति का रूप देकर उसके आगे एक सफल पति का गौरव प्राप्त करने का सौभाग्य लाभ करूँ ! .. किन्तु कभी ऐसा हो नहीं सका। तो क्या यह चन्दा मेरे लिए नंदरानी से भी अधिक प्रिय होना चाहती है ? आखिर इसके इस प्रस्ताव का अर्थ क्या है ? क्यों वह मुझको भोजन कराना चाहती है ? मैं उसके लिए क्यों इतने आकर्पण की वस्तु हूँ ? उसके सीमित जीवन के लिए मैं क्या कोई असीम रेखा हूँ? उसके जीवन-वृत्त के लिए मैं क्या कोई केन्द्र-विन्दु हूँ ? और फिर, नया उसको इतनी स्वतन्त्रता है कि वह पर-पुरुष के साथ ऐसी निकटता स्थापित कर सके ? क्या उसके जीवन में अब भी कोई सूनापन है ? अथवा जीवन को वह एक प्रयोगशाला मानती है ? आखिरकार उसकी स्थिति क्या है ? रह गयी वात मेरी तृप्ति की। मैं क्यों उसके इस प्रस्ताव पर इतना मोहित-उन्मत्त हो उठा हूँ ? सम्मान-दान शिष्टाचार का एक अंग है । तब ऐसी क्या खास बात है कि मैं अपने अन्दर इन नाना कल्पनाओं का जाल बुन रहा हूँ ! क्या नारी किसी को अपनी श्रद्धा इसीलिए देती है कि वह उसके साथ अपने हृदय का मेल चाहती है ? सोचता हूँ, सम्भव है, यह सब मेरे ही मन का खेल हो- एक प्रमाद । किन्तु कुछ हो, जव फड़ जम ही गयी है, तो एक बार कौड़ी फेंके विना मैं मान नहीं सकता। मैंने कह दिया---"उनसे कह देना कि हाँ, आपत्ति है, बहुत बड़ी आपत्ति है ! लेकिन उसे मैं उन्हीं को बता सकूँगा।" 'न! मैंने सोचा-~~ 'यह मैं क्या कह गया । मैंने कहा--"अच्छा यह सब कुछ न कहना । कहना, सिर्फ आज ही को नहीं, सदा के लिए हो, तो स्वीकार है। ''अरे न, यह भी नहीं । कहना परदे की ओट से ही- यदि आवश्यक हो तो-~-मैं उनसे दो बातें करना चाहता हूँ, तभी कुछ निश्चित रूप से बता सकूँगा।" फदुमा अव की वार चला ही गया; अन्यथा मैं इस उत्तर को भी कुछ बदल देता । मुझे अपना यह उत्तर भी कुछ जंया नहीं। ऐमा जान पड़ा, जमे यह भी अमी यसंयत ही है। फिर सोचा-'हाय मैंने क्या कहला भेजा !' कामना की कोई सीमा नही है जीवन में। गति-ही-गति की लाली चारों ओर देख पडती है । 'अभी पौर-प्रमी पौर' के ही थावतंन इस छोर से उम छोर तक फैले हुए हैं । कही भी इति नहीं है, थाह नहीं है । हाय री जीवन की यह तृष्णा! मेरे हृदय में भी कमा द्वन्द मचा हुआ है ! नापने देगा? एक और 'अरे बस, चुप-चुप !' है और दूसरी मोर 'यह नहीं वह'--'ऐमा नही वैमा । परन्तु नाई मेरे; मैं सचमुच दयनीय मी तो हूँ। करूं तो क्या कह ! मैंने अपना ऐमा ही संसार बना रया है। मैं तो जीवन को एक प्रवाह मानता हूँ। मी ममय कदुपा फिर मेरे सामने या सडापा। एकाएक मेरे मुंह से निकल गया--"अभी नही, घंटे भर बाद ग्राना। तब जो यहेगा, सुनूंगा।" में नित्य कर्म से प्रमी निवृत हुअा हूँ। दो वीदे पान भय मुरती के मुंह में दबाकर सोचता है-'कितना अच्छा होना, यदि मैंने पल ही यह भगड़ा न पाना होता ।' कहला दिया होता-'अव तो सोने जा रहा है। फल फिर बजेगी वंशी; माज अब नहीं ।' उतर शुप्प ही रहता, तो मी उचित यही था। अपने राम तो अव मिश्रित किंवा लिप्त से तटस्थ ही बढ़त भले ! जीवन को इरा मध्याह्न बेला में पौर अधिक ममत्य के प्रलोभन की ऐसी अावश्यकता ही क्या है परन्तु यह विचार मी कितना भ्रममूलक है ! क्या जव कभी जो पुध नो इन निखिल जगत् में हुमा करता है, मन में मनुष्य प्रावग्यकता- ही प्रावग्यकता देगा करता है ? जब मन की दुनिया में पदार्पण करने को बेला माये, तब नो क्या वह उपयोगिता की ही जमूर्ति की अर्चना करने बैठे?
११४ : उर्वशी तब फिर जो उपयोगी नहीं है, क्या उसका अस्तित्व विश्व में किसी मूल्य का नहीं गिना जा सकता? क्या वह इतना नगण्य है ? अच्छा तो फिर इसका निश्चय करने का अधिकार किसने अपने सिर पर बांध रखा है कि संसार में यह उपयोगी है; और यह अनुपयोगी ? और उसका दृष्टिकोण किस प्रकार निर्धारित किया जायगा ? मानता -अर्थशास्त्र और समाज-नीति के वटखरे इसीलिए बने हैं। और समाज की दशांति-रक्षा के लिए शासन-व्यवस्था के रूप में राजनीति का न्याय-दंड भी हमारे ऊपर है। किन्तु मैं तो मनुप्य की कामना को. इन सबके ऊपर मानता हूँ। मैं दंड भोगने को तैयार हूँ। -'नहीं भाई अधीर न होयो । ऐसी कोई बात नहीं है । और यदि कहीं किसी प्रकार हो भी, तो तुम्हारे लिए तो उससे मुक्ति का भी मार्ग!''क्या ही अच्छा होता, यदि गोपालवावू भी इस समय यहाँ उपस्थित होते ! लेकिन वे होते कैसे ? मैं किसी को अपने जीवन का माझीदार नहीं बना सकता । पहले मैं हूँ, उसके बाद जगत है। पहले मेरा अधिकार है, उसके बाद किसी और का । पहले मैं जिऊँगा, पहले मैं आगे पाऊँगा, पहले मैं हूँ, मैं...।' देर तक यही सब मन-ही-मन सोचता रहा । सुचित्त होकर अभी मैं बैठा ही था कि कदुना ने पाकर कहा--- "मालकिन आपको बुला रही हैं।" उस समय मैं नंगे-बदन बैठा हुआ था। रेशमी चादर मैंने वदन पर डाल ली। मुंह में दो बीड़े पान दवाकर कदुग्रा के साथ ही मैं बगल के कमरे में, चन्दा के आगे, जा पहुंचा। पास ही कुर्सी पड़ी थी। उसने ज़रा सकुचाते शरमाते हुए अपनी नतमुखी दृष्टि से कहा-"प्रायो, विहारी वावू नवयौवन की उन्मद उल्लास-लहरी अभी वैसी ही सजग है, जैसी !
बंदर कोती की मन्दिर डान्हा करती है। मांगनी पटली दर्ग
अंगुलियां हैं, पान मीनातिन हुदै, प्रार। दिनन्दित
नवनाविद निक नोनी अंगाई पटे हैं। स अन्दीप
की मामोहन का, दो दवा देने में प्राई की।
परसोनिन डियाग चला मग पहायान पनि
का ! और मंग विहान नानाम ईका ? #
परिनिराकर विनिन्दिन-मा बमल होरहा!
मी दुरी पर देसामयाद रब हटवा,
सुन्दरी पीटर की वन में हारी मदद कन्दा उहा लो-
"प्रामु पहकाना न हो।"
इन्दा ध-प्रदा; पहाबाद लो"
काम करती टु दह मुकगंद नगी।
मा- रही बाद माना, कह गई। र इनका मटता हूँ,
कहीं टकर है।"
"श्रो दिन हो न?" अहम उन स्टोदी
दरोडा-का हमारी डालकर बन्नुन,
छोटी टंबुन र न्द दिस; कटुमा निनान गनी न रन गया।
प्रद चन्दा उड्ने मनी'यी शिनाय को-जो प्रारम्न
इनारियर र कानपुर के करेंट गाउट-विनर उनकं है प्रा
जानते है?"
"मली दह।"
"इनका विवाह का है, जहां दृद्रा !"
"दर में। प्रोट्टो ! प्रछी बाद प्राई। यम-बम, यह दुनी
दंदा या दही । पान्दुमममम दो।"
"हां, उहद काप्री, समना कामा?" हटे हुए उसे रट
मुहार मला पड़ी। मांडर का कनान बाहर दिनकरन ना।
११६ : उर्वशी मैंने कहा--"उस समय तो मैं छोटा-सा था। आज इतने दिनों वाद आपने पहचानकर मुझे झकझोर डाला!" "हाँ बहुत छोटे-से थे, वहुत ही छोटे-~-दूध के दांत भी न गिरे हो ! क्यों?" "तो भी कम-से-कम पाँच-सात वर्ष तो हो ही गये होंगे।" "और वह गुलाव-जल से भरी हुई पिचकारी सव-की-सव, खाली करके शराबोर करने वाले भी शायद आप न थे; कोई और रहा होगा! क्यों?" मेरे मन में एक प्रश्न उभर रहा था- क्या यह विश्व इतना मधुर है ? वह बोली-~-"अब तो ठंडा पड़ गया होगा, खा लो जरा-सा । नुकसान न करेगा।" - जिन दिनों की बातें यह चन्दा कह रही है, मेरे वे दिन बड़े सुख के थे, बड़े रसीले ! आज जब उन दिनों की बातें, वे प्यार-भरी स्मृतियाँ, मैं मुलाए बैठा हूँ, या कम-से-कम भुलाने की चेप्टा में रत रहता हूँ, तव तरुणजीवन-मदिरा के इस उतार में उन उन्मद-रागों को छोड़कर मेरे सोये हुए मानस में यह स्पंदन, यह हलचल मचा देने वाली चन्दा, तुम यह क्या कर रही हो ?--सोचते हुए मेरे मानस में हिलोरें उठने लगी। वह बोली-"न तो नाश्ता शुरू करते हो, न कुछ उत्तर देते हो ! यह क्या बात है ! बिहारी वावू ?" पुरानी स्मृतियाँ फिर हरी हो पाई हैं । कुछ मूर्तियाँ सामने खड़ी हैं और जैसे मैं उनमें हँस-बोल रहा हूँ। एक, दो, तीन, चार-अनेक हैं। उनकी अपनी-अपनी पृथना-पृथक् सीमाएँ हैं । वे मेरी मर्यादा से बहुत दूर हैं। सब तरह से मेरे लिए दुर्लभ । सोचता हूँ, हो सकता है कि फिर भी उनसे मिलने का अवसर न मिले। यह भी जानता हूँ कि वे क्षण । फिर दुबारा लौटेंगे नहीं। किन्तु वर्तमान के प्रति विरक्ति भी कहा माता हूँ ! में देवता नहीं हूं। मैं मनुष्य है; नो नी अाज २ नमान का। क्या मैं उन दात ही न कह ? क्या उनके प्रश्नों का उत्तरी न दं? मैंने उमर दिदै । मैंने वाने की। मुम्बराहनी मेरे होठों पर पायी । मिठाम भी मेरे मन में घृली। प्रसादय-प्रन्नान मेरे गन्मुल माय।"मेरे यहाँ ग्यों नहीं पाते? या मुनने मिलना नी भारती म्वीकार नहीं ? ... नो तुम्हारे बहुत निकट हूँ-दिल राम्ने में पहनी हैं। एक दिन के लिए क्या स्टेशन पर स्कर ठहर नहीं नकने ?'... 'मंग और तुम्हाग नाता तो वैमा दूर का नहीं है । वे मंगे ननद होती है । उनको नी माय ले प्रायो न? मेरे यहां एक दिन म माना उनको चलेगा नहीं।' पचानों दाते हैं । विम-विगतो याद करें ! मन उनी कमी बिगेप महब नहीं दिया । वे मद बहुत मन्मन्न हैं। मैं उनके नान समानता का व्यवहार निना नहीं माना या । पमे का अनाव सदा कारता रहा । हाय मल-मसकर रह गया है। राने करवटें बदलने कीती हैं। प्रांद मूज-मूट गई है। प्राक्रिम में काम का हनं हा है और परिणाम में हॉट वानी पड़ी है । मदा जलता ही रहा हूँ। पाटनी वह उसन मान नहीं हो पायी है। मेरे मौन रहने पर फिर वह बोनी-"अच्छा, न अटेगी और छ । अरे! नुम तो प्रानू पोछने लगे !" अप-भर व्हलर, अपने उनहते हुए हृदय यो मन करती हुई चन्दा कहने लगी--'दुम क्या केवल नुम्हारेही हिम्मे में पड़ा है बिहारी दार, जो उन ममाल नहीं सकते ? तुम मेरी पोर मी नहीं दकने । मेरे दुग्म की भी कहीं कोर्ट मीमा है ?-दया वही कोई मर्ग थाह नक पहुंच माना है ! लेकिन में नो गेती नहीं है, बल्कि हेमोड' नाम में प्रसिद्ध हो रही है।" प्रानू पोछ, जगन्ना स्थिर हो, हाय-मुंह धोकर में नाम्ना करने बैठ गया।
११८ : उर्वशी "मेरी व्यथा की कथा न पूछो विहारी बाबू, उसे मेरे अन्तर में यों ही छिपी पड़ी रहने दो।" कहते कहते चन्दा के नयनों से मोती झरने लगे। । मैंने कहा-"तो फिर जाने दो उन बातों को। व्यर्थ में अपने को क्यों और अधिक व्यथा पहुंचाई जाय !" पर चन्दा के मन का उद्वेग तो छाती फाड़कर बाहर निकला पड़ता था । बोली-~-"परन्तु अव तुमसे कहे विना, जान पड़ता है जी न मानेगा।" मैं उसे इकटक देखता रहा। तब कुछ रुकती हुई वह बोली- "च्याह तो मेरा कहने भर को ही हुआ है। पति का सुख नारी के लिए क्या वस्तु है, मैंने आज तक नहीं जाना और अब वह अन्तर्यामी ही जानते हैं, आगे भला क्या जान सकूँगी। 'चार विवाह किये बैठे हैं। एक तो रोते-कलपते चल वसी। उसने तो नया जीवन पाया। दो में से एक मकान पर है, एक अपनी मां के यहाँ आज दो वर्ष से पड़ी हुई है । चौथी मैं हूँ ! शरीर उनका देखते ही हो, मूखकर कैसा काँटा हो गया है ! मदिरा इतनी अधिक पीते हैं कि एकदम बेहोश हो जाते हैं। कभी-कभी मेरे मुंह में बोतल लूंसने का उपक्रम कर बैठते हैं ! किसी के समझाने का कोई असर नहीं होता। समझाते समय तुरन्त अपनी ग़लती मान लेंगे; ज्यादा परेशान करोंगे तो रोने लगेंगे; पर एकान्त पाकर फिर ढालने लगेंगे। उनकी बातें सुनो तो आश्चर्य से चकित हो जायो । कहते हैं--"चार दिन की ज़िन्दगी के लिए अब इसे क्या छोड़! जब तक मैं हूँ, तब तक 'मय' भी साथ चलेगी, फिर जब मैं ही न रहूँगा, तो 'मय' कहाँ से आयेगी, किसके पास आयेगी ! वही मेरा प्राण है-जीवन है। अच्छा तो मनुष्य का जीवन भी क्या एक किस्म का नशा नहीं है ? नशा नहीं है, तो एक-दूसरे को क्यों नोचते-खसोटते हो ? झोपड़ियां जलाकर महल खड़ा करने की साथ नशा नहीं, तो फिर क्या है ? दुनिया को धोखा देकर, उसकी आँखों में धूल झोककर, ससार के जो समस्त व्यवमाय-वाणिज्य अहर्निग तुमुल- नाद के साथ चल रहे है, उनके मूल में भी तो एक नगा ही है । तो फिर यदि मैं भी अपने नदी में मस्त रहता हूं, तो क्या बुरा करता हूँ?" इस समय मैंने देखा-चन्दा का मुस निमंत वणिम पालोक से एक- वारगी ज्योनिमय हो उठा। भीतर का अवसाद अस्ताचल गमनोन्मुखी भगवान् दिनकर की अन्तिम रश्मि की भांति, अंतरिक्ष में लीन होते हुए भो, चन्दा के मुस पर झिलमिल-झिलमिल होने लगा। अपनी अधीर, किन्तु लजीली आंखों से मेरी पोर इकटक देखते हुए उमने कहा-"एक- दो नहीं, उनकी सभी बाते विचित्र है, बिहारी बाबू ! एक दिन उन्होंने बनलाया कि यह मैं अच्छी तरह से जानता हूं-संसार में जिसे 'सुख' कहा जाता है, वह मेरे द्वारा इन सोने की पुतलियो को नहीं मिलेगा। केवल मन से ही नहीं, शरीर से भी मैं कितना जर्जर हो रहा हूँ, सो देखती ही हो ? परन्तु मैं अपनी इच्छाप्रो के लिए विवश हूँ। मेरे तरुण जीवन का जब प्रभातकाल था, तब अपनी प्रथमपत्नी को मैंने भतुल सौदर्यशालिनी के रूप में पाया। वहुत बडी साध के साथ मैंने उसका अपने प्यार का नाम रखा-प्रियंवदा । और प्रियंवदा मेरे जीवन मे प्राण- मयो होकर रही । मिश्री की डलियां जैसे ऊपर से उज्ज्वल और चम- कीली होती है और भीतर से एकदम मोठी-रमवंती; वमी हो मेरी प्रियंवदा थी। परन्तु थोडे दिनो मे, देखते-देखते,वह मरालिनी उड गयी। उमको शान्ति-क्रिया भी न हो पायी थी कि विवाह के तीन प्रस्ताव मेरे पास मा गये, प्रपनी रुचि के अनुसार मैंने तीनों को देख-देखकर व्याह लिया। अब ये मेरी रमा, मेनका और उर्वशी हैं । क्या बताऊँ, उस समय मुझे एक जिद-मी सवार हो गयी थी । मन मे प्राया- -~-'तुमने यदि मुझसे एक को छीन लिया, तो देख लो, मैं फिर वैसी ही तीन रखता हूँ। तुम्हारे राज्य में यदि मैं चूं करने की, विनय-प्रार्थना की, कोई सुनवाई नहीं पाता, तो फिर तुम्हारे विधान को मैं भी जैसा चाहूँगा, ठुकराऊंगा।' जानता हूँ, यह एक प्रोर प्रतिक्रिया है--विकृति, दूसरी पोर प्रज्ञान ।
१२० : उर्वशी , यह एक व्यक्तिवादी अहंभाव है । समाज की व्यवस्था इसको सहन नहीं कर सकती। समाज व्यक्ति को इतनी स्वतंता नहीं दे सकता । राज- कीय विधानों से इसे रोका जा सकता है; रोका ही जाना चाहिये। किन्तु वह व्यक्ति का, समाज की आधुनिक व्यवस्था के प्रति, एक विद्रोह भी तो है। जो लोग दुःख के अगाध को केवल ईश्वर की रचना के नाम पर सदा सहन करते और घुल-घुलकर मरते हैं, उनकी अपेक्षा इस तरह का व्यक्ति फिर भी वीर और साहसी है। मैं इस कार्य को निन्द्य मानकर भी उसके साहस की प्रशंसा ही करूँगा। मैं तो मानवमात्र की तृप्ति का समर्थक हूँ, विरोध और कुत्सा मेरे मन में जरूर है इसलिए कि प्रतिहिता की यह पूर्ति है वही भयानक । इसे हम न्यायोचित नहीं मान सकते और समर्थन हम इसका नहीं कर सकते। दोनों ओर देखकर अन्त में मुझे प्रसन्नता ही हुई ! तब मैंने हँसते हुए कहा-"तो तुम्हारा नाम उन्होंने उर्वशी रक्खा है ! उनने प्राधा हँसकर आधा शरमाकर नतमुखी आँखों से कह दिया----- "अव जैसा समझो।''अच्छा, क्या, यह नाम तुमको पसन्द है ?" राय न देकर मैंने पूछा-"क्या कर रहे हैं इस समय ? याहाँ हैं ?" वह वोली-~~"मो रहे हैं। दो-तीन बजे तक उठेगे।" मैंने कहा--"हाँ; कहती जानो।" मैंने देखा, वह अपने भीतर छिपे हुए मनोभावों की तह-सी खोल रही है। कहने लगी- "हम तीनों साथ-साथ रह चुकी हैं । हमने यह अनुभव किया कि इनमें प्रेम की ज्वलंत प्राग है । ऐसी बात नहीं है कि यह हममें से किसी को जरा-सा भी कम चाहते हों ! पर मैं तुम्हें कैसे समझाऊँ बिहारी बाबू कि क्या इसका अर्थ यही नहीं कि वह किसी को भी नहीं चाहते ? कम-से-कम मैं तो ऐसा नहीं समभती। यदि मनुष्य हृदय से साफ़ हो, उसके भीतर कोई चोर न हो, तो वह अन्यायी भले ही कहला ले, पर दयनीय अवश्य होगा । परन्तु मेरी पूर्ववर्तिनी दोनों बहनें रंभा । और मेनका-इन वानो को यथार्थना नही ममगनी। मैं गमभागमभा. कर हार गयी। पर वे कहती है-'नारी अपने मन को साम्राजी होती है। उसे तो अपने पति का पूरा मनोराज्य चाहिये।' उनका कहना भी मैं कैसे कहें कि ठीक नहीं है ? पर मैं कम-से-कम अपने दृष्टिकोण में ऐमा नहीं समझती। मैं तो समझती हूँ किनारी को पति का केवल प्रात्मावलंब चाहिये । हृदय के एक कोने में छिपी पड़ी रहने भर को भी यदि पति स्थान दे दे, या नारी पति से पाले, तो फिर उसको और कुछ न चाहिये । सो सच जानो बिहारी वायू, मेरे दुस-मुस का जोड है-~-मेरे लिए दोनों एक-से हो गये हैं, उन्होने परस्पर समझौता कर लिया है।" मुझे ऐसा बोध होने लगा कि यह नारी नहीं, देवी है-जगतरित, माय ही मुझे अपने पाप पर भी एक प्रकार की क्षुद्रता प्रतिबिंबित होती हुई देख पड़ी। कोई कानो मे कहने लगा – 'क्यो बिहारी, तुमने अब तक जो कुछ पढ़ा-लिखा है, जो कुछ भी विद्या-शुद्धि अजित की है, इग नारी ने अपने मात्रालोक से उसे कमा सिविल और निर्जीव करके छोड दिया है ।' उमी दिन में गोपालदादा को साथ लेकर मयुरा होता हुआ गागरा जा पहुँचा। रान को ग्यारह बजे जब में अपनी वंशी बजाने बैठा तो चन्दा मी मारी बातें मेरी वनी के स्वर्ग मे निकलकर मूर्तिमान हो उठी। गोपालदादा योले-"अाज तो बड़ी तैयारी के साथ बना रहे ही यार । वो वाद यह रंग देव पड़ा। जीवन-रमाल की डात पर फिर कोई कोयलिया तो नहीं बोल गयी" दमी समय किमी ने नीचे मे आवाज दी-"यहां कोई बिहारी बाब ठहरे हैं—बिहारी वाव । उनके नाम कनार है।" मैं चट-मे नीचे प्राकर पहले लिमाफा पाडकर नार पढने लगा। उममे लिगा था- जन्हे कालग हो गया है। नरन्ल पायो।
१२२ : उर्वशी ऊपर पाने पर गोपालदादा ने पूछा- "किसका तार है ? कहाँ से आयाई ?" मैंने तार उनके हाथ पर रख दिया। देखकर उन्होंने पूछा--"यह चन्दा कौन है बिहारी ?" में कुछ क्षणों के लिए एकदम से अस्थिर हो उठा। अंत में मैंने कहा-"अव यह सब इस समय इतनी जल्दी में तुम्हें कैसे बताऊँ ? अच्छा उठो झट से, मुझे स्टेशन पहुंचा पायो। रास्ते में बाकी सब बताऊँगा। मैं इस समय अपने को एक भयानक अाँधी में पा रहा हूँ। एक व्यथा, एक हलचल, एक उन्माद मेरे चारों ओर चक्कर लगा रहा है। - - जोहरीजी के अच्छे होने में कई दिन लगे। डाक्टरों का आना-जाना पहले कई दिनों तक जारी रहा। चारों ओर घबराहट, सावधानी, चिन्ता और मूकता का ही राज्य रहा । रुपया पानी की तरह वहता था । जिसने जितना मांगा, चन्दा ने तुरन्त दिया । रातें बैठे-ही-बैठे वीततीं। प्रत्येक प्रातःकाल एक चिन्ता लेकर उपस्थित होता। प्रत्येक रात एक सन्नाटे के साथ कटती । दो दिन के बाद विश्वास हो चला कि जोहरीजी वच जायेंगे । चिन्ता की कोई बात नहीं है। चन्दा की आँखें सूज गयी थीं। यह विल्कुल .सो न पाती थी। मुझसे कभी-कभी ज़ोर और ज़बरदस्ती का भी उसने प्रयोग किया । मैं चाहता था, उसको आराम दूं, किसी तरह उसको, पूरी नींद न सही, एक झपकी ही लग जाय । पर वह मुझको अधिक-से-अधिक आराम देना चाहती थी। मेरा कहना था कि सारी जिम्मेदारी मेरी है । मैं जीहरी साहब को अच्छा कर लूंगा, तुम चिन्ता मत करो। उसने उत्तर दिया-"तुम्हारी जिम्मेदारी कुछ नहीं है। मैं अपनी चीज़ को तुम्हारे हाथ में कैसे सौंप हूं? भाग मेरे फूटेंगे, सेंदुर मेरे माल . , का जायगा, चूड़ियां मेरी फूटेंगी और संमार मेरा नष्ट होगा; मापको .. . क्या?" मैं तब अवाक रह गया। मकान काफी बडा था। नौकर भी पांच-सात । रात और दिन में अलग-अलग काम करनेवाले । लेकिन नहीं, मेरे पाराम से सम्बन्ध रमने- वाले कार्य चन्दा स्वयं करती। सोने के लिए मेरा पलंग वह स्वयं विछाती। समय-समय पर पान-दारवत, नाश्ता और भोजन का प्रबन्ध वह स्वयं करती। नौकरी से कान तेते शग मी स्वयं उपस्थित रहती। रात को औटाया हुआ गरम दूध पिलाने के लिए गिलास लेकर वह स्वयं मामने उपस्थित हो जाती। मैंने हरचन्द कोशिश की, हर तरह से सम- झाया, पर उमने एक न सुनी । चिन्ता और घबराहट के उस वातावरण मे उसके इस प्रतिरंजित प्रातिथ्य और शिष्टाचार की जब मैं मत्संना करने लगता, तो वात-की-वात में भीतर का अगोचर भाव उसके होठों पर आ जाता । वाणी फूट पडती-"जरा सुनूं तो सही, वयों यह अनु. चित है ? कैसे तुम इमको अतिरंजित कहते हो ? बडी हिम्मत हो, तो कह दो-"तुम मेरे साधी नहीं हो! कह दो-मेरा तुम पर कोई अधि- कार नहीं !" तब मुझे उसका अनुरोध मानना ही पड़ता । मैं इन बातो को और बडाना नही नाहता था। इसका सबसे वडा कारण यह था कि उस समय उसी घर मे जो एक प्राणी जीवन और मृत्यु की लड़ाई लड़ रहा था, वह हमारा प्रात्मीय था। उसकी मगल- कामना के लिए हम लोग एक विशेष कार्यक्रम में बंधे हुए थे । हमारी यहमंत्री सर्वथा नयी थी। हम लोग अभी एक-दूसरे से अच्छी तरह विचार- विनिमय भी नहीं कर पाये थे। हमारी मान्यताप्रो को अभी एक-दूसरे के साथ टकराने का अवसर ही नहीं मिला था । हमारी मांसो का सम्बन्ध प्रमी सर्वथा अलग-ही-अलग था। मेरे भीतर अतृप्ति की आग थी, उसके फलस्वरूप प्रांखो में मोह और आकर्षण का नशा था। हमारी वाणी एक शिष्टाचार-एक मर्यादा की सीमा रेखानो के भीतर-ही- १२४ : उर्वशी - 'भीतर चल-फिर सकती थी। हमारा क्षेत्र सीमित था, किन्तु हमारी कल्पनाएँ असीम थीं। हमारा लक्ष्य बहुत दूर था, किन्तु हमारा पथ सुनिश्चित और सीमित । हमारी कामनाएँ नवीन और अनोखी थी, किन्तु उनका रूप अधखुला, बहुत कुछ कल्पित था-बहुत कुछ अनिर्णित । भविष्य हमारे लिए अथाह समुद्र में तैरने का प्रयोग था। जीवन हमारे लिए अकल्पित घटनामों से भरा, घात-प्रतिघातों से आच्छन्न, संकटों और सतरों का एक निमंत्रण था । हमारे भीतर प्रश्न उभरते थे, पर उन्हें वाणी का रूप दे पाने में हम समर्थ न थे। भीतर से हम भरे हुए, तयार और सजग थे, किन्तु ऊपर हमारे संस्कृति, मर्यादा और शिप्टता का ऐसा एक आवरण चढ़ा हुआ था कि हम टम-से-मस न हो सकते थे । बोलते हम थे, किन्तु हमारे बोलों की शब्दावली परिस्थितिजन्य बाता- वरण की एक मांग होती थी। सुनते हम थे, किन्तु हमारे कानों पर उत्तरदायित्व की एक विद्युतशक्ति का प्रभाव था। वह हमको केवल सुना सकती थी, हमारी वाणी-हमारा अन्तःस्वर-ग्रहण न कर सकती थी। मानो फ़ोन का स्वर ही हम प्राप्त कर सकते थे, अपना स्वर उसे दे नहीं सकते थे। किन्तु चन्दा की स्थिति ऐसी न थी। वह रात-दिन काम में लगी रहती । नौकरों से काम लेने में वह पूर्ण दक्ष थी। दवा लाने की बात होती, तो अच्छी तरह समझा देती"देखो, एक शीशी मिलेगी। वह एक खूबसूरत खोल के अन्दर होगी । खोल को दूकान के बाबू के सामने उन्हीं ने खुलवाकर देख लेना, शीशी खाली न हो । कार्क मोम से खूब जमा होगा। देख लेना, खुला हुमा न हो । नोट के वाक़ी रुपये और पैसे ठीक तरह से गिन लेना। रास्ते में होशियारी से लाना। हाय से कहीं छोड़ न देना।"..'काम बिगड़ जाने पर डांट बता देती-बड़े लापर- वाह हो। पिटने का काम किया है । अरे, इतना तो ख्याल किया होता कि जिसकी सेवा से तुम्हारी जीविका है, वह मृत्यु-शैया पर है । भगवान् ही बचाये, तो बच सकता है ! तुम्हारी जरा-सी भूल से उसकी जान जा मानी है।" किन्तु मान के वक्त जब से छुट्टी का अदमर देवी, तो दन- दिलामा देने में भी न चकती। कली-"मूल नुमने हो गयी थी। पादमी में हो ही जाती है। लेकिन मंकट के समय प्रादमी को मामूली तौर में कुछ वादा होमियार रहना पड़ता है ।" फिर साध्य को नन करके कहती- दोपहर के ग्वाने में जो पूरियां दी हैं, ने दे दो महागज। दिन-मर ने दौड़ने में वीना है।" इस प्रकार क्रोध और दया, अनुदामन और पुरस्कार गकी दिन-चयां के मुन्य अंग बन गये थे। अनेक वार दंपने में पाया कि कोई एक वार को नौकर ने कहा गया है, प्रादेगात्मक होने के कारण स्लाई और उग्रता में मरा हुआ है। परन्तु उसके बाद ही दिना प्रमंग पा गया कि दूसरा दायर मुनी कहना पड़ा, जिसमें पराममं, मम्मति और मंगोपन की दात है। मुग पर गन्मारना के स्थान पर माह और प्रमन्नता की नलक है, ग्रामों में एक महयोग, महृदयता और अभिन्नता का नाव । यह देवार में पकिन हो उठा। अपने प्राने अनेक बार पूछकर देखा है-ऐमा दो नहीं है कि मर मन पर इस रमनी की जो छाप पट्ट रही है दमका कारण दल यह हो कि उसने प्राकृष्ट हैं और टमीलिए उसने मुझ गुन्-ही-मन मिन्ट रहे हों। जो माद मेरे मन में सायर म्यान मा लेते हैं उन अनि में बहन मजग न्हवा है। माधारणतया में उन्हें गन्य नहीं मानता एक अनुमति को अपने भीतर यों ही नहीं रख लेता हूँ। मगंगात्र ने पिचल जानवाला प्रानी में नहीं हैं। न प्रादायाना में अधिक मावधान हैं. न इचिन में अधिक तटन्य । प्रत्येक थिति बगे प्रच्छी नन्द मानकर हो उसके विषय में प्राना मत निर्धारित करता हूँ। धीरे-धीरे नंबट-गात समान हो गया । नीमरे दिन जोहर्गी ने अयि मोल दी। मामन चन्दा अम्बित दी। बोले-"नुमने मुलं दवा ही लिया चन्दा ।" पर उस समय डाक्टर विश्वान भी अस्थित थे। बोल उठे-"दन ज्यादा बातचीत न कीनि। अनी भार वनडोर बटन 1 १२६ : उर्वशी fiy । ईश्वर को हजार-हज़ार धन्यवाद है कि उसने आपको बचा लिया।" इसके बाद डाक्टर विश्वास तो अनार का रस, थोड़ा-सा गरम दूध और एक मिक्स्चर देने की व्यवस्था करके चले गये । मैं भी अपने कमरे में आ गया । थोड़ी देर में चन्दा ने आकर कहा- "नींद आ गई है। परन्तु ज्वर शायद या जायगा । डाक्टर साहब जाते समय कह गये है ज्वर हो पाना स्वाभाविक है । चिन्ता का कोई कारण नहीं है। आप को चाय अभी तक नहीं पायी न ? अभी भेजती हूँ।" और इन्हीं शब्दों के साथ वह लौट पड़ी। मैंने कह दिया-"लेकिन सुनिये, मैं आज इस तरह वाय नहीं पिऊंगा । आज आपको नी मेरे पास बैठकर चाय पीनी पड़ेगी।" चन्दा व्हर गयी। घूमकर कुछ मेरी ओर बढ़कर बोली--"लेकिन आप तो जानते हैं, मैं चाय नहीं पीती।" मैंने पूछा--"क्यों, चाय से प्रापको ऐसी नफ़रत क्यों है ?" वह वोली-'यह समय वहस करने का नहीं है। मकान की सफ़ाई ठीक तरह से अभी नहीं हुई। रामदुलारे साग लेकर अभी तक लोटा नहीं । धोबी के यहाँ से कपड़े आ गये हैं। उसको विदा करना है। बीस काम है। काम के समय'" और फिर वह लौट गयी । आज शाम को जब डाक्टर विश्वास जौहरीजी की स्थिति पर पूर्ण संतोप प्रकट करके चले गये और मैं फिर भी उनके पास उपस्थित बना रहा, तो उन्होंने चन्दा से प्रश्न किया--"अापको मैंने नहीं पहचाना । सबेरे नी आप मौजूद थे। मैं पूछता-पूछता रुक गया था।" चन्दा ने उत्तर दिया--"ये मेरे वन्धु हैं, साथी और मित्र हैं। सब तरह से अपने प्रात्मीय हैं। इनकी सहायता न मिलती, तो मैं बड़ी कठि- नाई में पड़ जाती। रहते कानपुर में हैं। इधर अपने एक मित्र के साथ घूमने के इरादे से आ गये थे। कुछ दिन यहाँ रहकर आगरा चले गये थे। तार देकर इन्हें बुलाना पड़ा।" मैंने देखा, चन्दा ने मेरा परिचय देने में कहीं कुछ छिपाया नहीं, मैंने कहा- संकोच नहीं दिया। मैंने यह भी अनुनय किया कि उनके मुग्म का नाव भी कुछ बदला नहीं । यहाँ ना कि गम्भीरता की एक हलकी छाया नी उम पर लक्षित नहीं हुई। हो, यात गमाप्त करते हुए उमने एक बार मंगे और देख लिया । में उस समय जोहरीजी के मनोभावों का अध्ययन पर रहा था । गरीर और मुग को देगार मेरे मन पर उनकी जो छाप पड़ रही थी, उसके अनुमार मैं गोचने लगा--'मचमुच इन प्रादमी ने जीवन की ऊंची-नीची घाटियां पार की है। प्रांगों के नीचे पलों की तराइयां कुछ गहरी और श्याम हो गयी हैं।' उम ममय चन्दा भीतर चली गयी । बाद में मालूम हो गया कि दवा पिलाने के लिए मोदी का गिलाम लेने गयी थी। इस बीच में जोहरीजी बोले-"मैं इम कृपा के लिए प्रापका तन हैं।" [..-"चन्दा मे प्रारकी प्रगंमा मुनकर बहुत पहले से प्राप में मिलने को उत्सुक था । संयोग ने ऐमा प्रबमर भी मिल गया।" जौहरीजी उठकर बैठ गये । मिरहाने कई तकिया एक साथ रबर उन्ही के महारे बैठना चाहते थे। भाव देवार पंतान पड़ी हुई तश्यिा तब मैंने दटार सिरहाने रख दी। इमी ममय चन्दा मा पहुंची। बोली..."जाइये, आपकी चाय ठंढी हो रही है।" जौहरीजी के हाथ मे तब तर ग्रीगे के गिलास मे दवा की बूराक थी। पीते-पीते जरा-सा मुंह विदोन्ते फिर स्माल मे होठो को पोछते हुए कहने लगे--"हां माहब, जाइये पाप लोग चाय पीने । मेरा इस्तीफा तो मजूर होते-होते रह गया।"पान देना चन्दा । कई दिन बाद प्राज मूरन देखने को मिली है।" ऐमा जान पड़ा, जैसे बिजली के लोक करते हुए तार पर हाथ पड़ गया है । उनको पोर ताक्ता रह गया । चन्दा ने जूठे गिलास को अलमारी मे रख दिया। इसके बाद वह मेरी ओर देखती हुई जोहरी साहब के पलंग के दूसरी पोर जा पहुंची। वहां कुरमी पर वैठती हुई बोली -"ठाकुरजी के मन्दिर से प्रसाद पाया है। आपको रख पाई हूं। पर माप तो...!"
१२८ : उर्वशी "हाँ मई, मैं तो अब ठहर ही गया हूँ। आप लोग अपनी दिनचर्या में क्यों विघ्न डालते हैं ?" कहकर जौहरीजी ने तश्तरी में सामने रखखा हुआ पान उठाकर मुंह में रख लिया। साथ ही हाथ में लगा हुआ कत्था पनवसने में पोंछते हुए पुन: वोले-"जागो उर्वशी, वाबू साहब को चाय पिला पायो।" मैं वरावर इस बात को लक्ष्य कर रहा था कि जोहरीजी अपने कथन में यह भाव प्रकट किये विना नहीं रहते कि वे अपने ही घर में इस समय एक तीसरे व्यक्ति की स्थिति रखते हैं। वे इस भाव को न भूल सकते हैं, न छिपा सकते हैं, न उदारता और संयम के साथ उसको परिप्कृत करके प्रकट कर सकते हैं। चन्दा बोली-"आपको तो चाय से कोई खास दिलचस्पी भी नहीं है ! फिर क्यों आप उसके पीछे पड़े हैं ? इसके सिवा विहारी बाबू आप चाय पीने में सदा किसी-न-किसी के साथ की प्रतीक्षा ही करते हो, यह बात भी नहीं है । एकान्त में इनको छोड़ने का अर्थ आप जानते हैं। जरा- सी सेहत जान पड़ने के बाद मुंह खोलते ही कैसे उद्गार निकाल रहे हैं, यह आप देख ही रहे हैं। ऐसी दशा में मेरा यहाँ से उठकर आपके साथ वैठकर चाय पीना...?" विना एक शब्द बोले मैं दूसरे कमरे में आकर एक कुरसी पर बैठ गया । सामने एक टेविल पर ट्रे में चाय थी। किन्तु मन में चाय के पानी से भी अधिक कोई और चीज खौल रही थी। अपना मूल्य अपनी ही दृष्टि में खो गया था। उर्वशी के साथ मेरा क्या सम्बन्ध है ? क्यों मैं उसके पीछे पड़ा हूँ ? केवल रूप का मोह, केवल वासना-पूर्ति की मिथ्या कल्पना हो तो इसका मूल कारण है । फ़िर उर्वशी की अपनी भी सीमाएँ |----और वे आज मेरे लिए सर्वथा नयी भी नहीं हैं। और ये जोहरीजी खूब हैं । जीवन को तिनके की भाँति उड़ाते और वहाते हैं, परवा नहीं, जहाँ चाहे वहाँ पहुँच जाय । कोई चिन्ता नहीं कि अन्त कहाँ है। सभी उनके लिए मान्य है। बुरा-भला कुछ नहीं । न परिवार का ध्यान है, न उर्वशी : १२६ समाज का । ईश्वरपर भी क्या प्रास्था होगी? केवल एक व्यक्ति ही व्यक्ति का प्रश्न है, चाहे जिस प्रकार वह सन्तुष्ट हो। और इसमें समयं वे इसलिए हैं कि रुपया उनके पास है । पूर्वज छोड़ गये है। कुछ न कुछ खुद उन्होंने भी बढाया ही है। ऐसे आदमी का समाज के लिए क्या उपयोग है ? दो स्त्रियां और है ! रम्भा और मेनका । पता नहीं वे किस दशा मै हो । जसा इस चन्दा का जीवन है, उनका भी होगा। लेकिन यह चन्दा भी प्राग्विर क्यो ऐसे आदमी के पीछे अपना जीवन उत्सर्ग कर रही है? क्या रस है उसके जीवन मे? ऐसे आदमी के प्रति उसके मन मे, प्रेम कैसे रहता है ? इसी के लिए उसने अांखें सुजा ली ? इसी के लिये वह रोई ? स्वास्थ्य की कोई चिन्ता नहीं की? विश्राम उमने जाना नहीं होता कैसा है ? क्या यह सब प्रात्म-प्रवंचना नही है ? ग्रादि से लेकर अन्त तर जीवन का क्षय-ही-क्षय क्या इसमे नही लक्षित होता? अरे । कब कप मे चाय ढाली, कव उसमे दूध और चीनी मिलाई और कब से प्याला सामने रखे बैठा हूँ ? ध्यान पाते ही चाय जो मुंह से लगाई तो देसा ठण्डी हो गई है। एक ही धूंट पीकर प्याला रख ? दिया । इसी समय चन्दा आ पहुंची। मेरे पीछे खडी हो दोनो कन्धों पर हाथ धरकर बोली--"मैं जानती थी, तुम अकेले चाय पी न सकोगे। तमी जी न माना तुम्हें देखने चली आयी।" और कथन के साथ ही प्याले को छूकर देसने लगी, फिर चिल- पिलाकर हंस पडी। बोली-"वाह खूब रही। चाय अाखिर ठंढी कर डाली ! अच्छा, कोई चिन्ता नहीं । मैं फिर बनवाती हूँ।" वह कमरे से चली गयी। चलते समय साडी सिर से नीचे गिर गयी थी। लहराता केश-पाश सिलसिलेवार पतली पडती हुई गुंथी चोटी और वाये कन्धे से लेकर कटिपय्यन्त खुला हुआ देह-भाग अर्धाश में चिपकी कचुकी-सहित एकदम स्पष्ट झलक गया । साड़ी का अंचल फर्श को भी दो कदम छूता हुअा चला गया । तब वात-की-बात मे सारी उदासीनता १३० : उर्वशी तिरोहित हो गई। कुर्सी से उठकर खड़ा हो गया और कमरे भर में इधर-से-उधर टहलने लगा। एक बात यहाँ कहने से छूट गयी है। पहले उन पर ध्यान नहीं गया था। इसी समय उसे लग कर पाया हूँ। यह कमरा वास्तव में किसी अतिथि को वैठाकर स्वागत-सत्कार करने के लिये नहीं है। यह तो वास्तव में चन्दा का शृङ्गार-प्रसाधन का अपना विशेप कमरा है। टेविल के सामने बड़ा-सा दर्पण लगा है और उसके इर्द-गिर्द पोमेड स्नो, हेयर-अॉयल, कंघी आदि सामग्री यथाविधि लगी है। चारों ओर दीवारों पर कुछ दृश्यचित्र भी हैं। मेरी समझ में नहीं आया, आखिर चन्दा ने मेरी चाय का प्रवन्ध इस कमरे में क्यों किया। उस समय मुझे जान पड़ने लगा, जैसे मैं किसी भूल-भुलैयों में पड़ गया हूँ। जिस और आगे बढ़ता हूँ, उधर ही आश्चर्य की टक्कर खाकर लौट आता हूँ। सबसे बढ़कर रहस्य मुझे इस चन्दा में देख पड़ता है। ज्यों ही इसके सम्बन्ध में मैं कोई सम्मति स्थिर कर पाता हूँ, त्यों ही यह उसे आमूल नष्ट कर देती है । कभी-कभी तो मुझे अपने सम्बन्ध में भी भ्रम होने लगता है। मैं सोचता हूँ, मैं इसके पीछे पागल तो नहीं हो गया हूँ ! आखिर क्यों मैं इसके संकेतों पर नाच रहा हूँ ! यकायक दर्पण के सामने मेरी दृष्टि जा पड़ी। मुझे ऐसा जान पड़ने लगा, जैसे यह दर्पण केवल प्राकृति का नहीं, मन के प्रत्येक स्तर का भेद खोल देने में समर्थ है। ऐसा न होता, तो मुझे अपने विषय में उपर्युक्त आशंका क्यों होती ! टेविल के दक्षिण योर एक पाराम कुर्सी पड़ी थी। मैं उसी पर विराजमान हो गया। पायों पर मैंने दोनों पैर फैला दिये । सोचने 'चन्दा आ ही रही होगी। देखना है, अबकी बार क्या रूपक ले आती है। किन्तु पता नहीं कैसे मेरी आँखें झपक गयीं। कहाँ चली गई चन्दा, कहाँ छुट गये जौहरीजी? कुछ पता नहीं। गाढ़ निद्रा में संसार । - -- - के मारे माया मोह अन्तर्धान हो जाते हैं। हो सकता है कि चन्दा ने अल में इस कमरे में प्रावर एक मिनट के अन्दर जिम मधुर मोहक रहस्य-लोक की सृष्टि कर दी, टमी से मोहाच्छन्न होकर मुझे निद्रा-रूपी महामाया ने अपने अंकपाश में निबद्ध कर लिया हो। सम्भव है, मेरे कन्धों पर दोनो हाथ रखकर उसने केवल सर्ग के द्वारा मुझे मम्मोहित कर निद्रा-लोक में छोड़ दिया हो । प्रयदा यह भी हो सकता है कि दिन मग जागरण की मचित थकान अभी पूरी न हुई हो और मन को घोडी-नी रमानुमति के कारण प्रकारान्तर में जो तृप्ति मिली हो, उमी का यह फन हो। जो नी कारण हो मुझे निद्रा आ गयी और में मो गया ! अन ने जब मेरो पनि दुली, नो में क्या देखता हूँ नि कमरे की चिकना पर्दा खुल रहा है और मुम्बराती चन्दा कह रही है-"चाय तो गर दूसरी बार भी ठढी हो गई। पर यह अच्छा हा कि पापको दो-ढाई घण्टे की नीद आ गई। अब झटपट म्नान कर नीजि । भोजन का समय हो गया।" म अनाचाकर बड़ा हो गया। सम्पद था कि स्नान लिए चल ही देना, किन्तु मेरे मुंह ने निकल गया-"अगर तकलीफ न हो तो बंगी, एक कप चाय तुम मुझे पिला हो दो।" घूमकर वह बोली-"अच्छा ! यह अच्छी सलाह आप लोगों ने कर रकमी है। आप भी मुझे उर्वगी कहने लगे । खैर मैं चाय तो अभी भेजती हूँ। पर मुझे भय है कि इस बार भी आप कही सो न जाय !" वह चली गई । मैं फिर यथास्थान वैठ गया। मिठास जो भीतर जमा हो रही थी, जान पड़ा, अब कुछ और घनीभूत हो गयी है। चन्दा नी माज अन्य दिनी की अपेक्षा कहीं अधिक प्रसन्न थी। किन्तु मैग आशंकालु मन बारम्बार यही कह रहा था कि वही कोई ऐसी वस्तु मचिन हो रही है, जिसमा विस्फोट ज्वालामुखी से भी अधिक नपार होला। हम सब मिलकर उस घटना की सृष्टि कर रहे हैं। थोड़ी देर में चाय की वही दे फिर सामने आ गयी, विडयो १३२ : उर्वशी रखकर अन्त में स्वयं मैंने चाय ठंढी कर डाली थी। परन्तु इस वार मुझे इस विषय में अधिक सोचने का अवसर नहीं मिला । क्योंकि चन्दा भी दत्काल सामने आ गयी । प्याले में चाय ढालने के लिए मैंने हाथ बढ़ाना चाहा कि देखा, वह स्वयं चाय ढाल रही है। मैं चुप था और मन-ही- मन सोच रहा था कि इसी समय क्यों न इससे स्पष्टरूप से कह दूं कि जोहरीजी की तवियत अच्छी हो ही रही है। अब मुझे भी विदा होने की अनुमति मिल जानी चाहिए। किन्तु चन्दा ने मेरा प्याला तैयार करने के साथ ही अपने लिये भी दूसरे प्याले में चाय ढाल ली। मैं सोचने लगा कि इससे पूर्व उस अवसर पर जव मैंने इससे अपने साथ चाय पीने का प्रस्ताव किया था, तो इसने अस्वीकार कर दिया था। परन्तु आज मेरे आग्रह किये बिना ही वह स्वयं ही जो इसके लिए तैयार हो गई, इसका क्या कारण है ? कारण की छानबीन मैं अपने भीतर-ही-भीतर करने लगा। ज्यों ही उसका प्याला तैयार हो गया, त्यों ही प्रसन्नता से वह वोली- देखिये, मेरी चाय आपकी अपेक्षा अधिक गहरी है।" जनर में मैंने धीरे-से कह दिया--"तवियत की बात है।" उस समय चन्दा ने अपना प्याला होंठ से लगा लिया था। धीरे-धीरे वह उले सिप कर रही थी। मेरी वात के उत्तर में वह मुस्कराने लगी। बोली-"चात वास्तव में तबियत की ही है। अन्यथा आप जानते हैं, मैं चाय बहुत ही कम पीती हूँ।" मैं इस विपय को बढ़ाना नहीं चाहता था । यदि ऐसी बात न होती तो इस अवसर पर मैं यह कहे विना न चूकता कि दुनिया में ऐसे बहुतेरे आदमी हैं, जो समझा करते हैं कि उन्होंने अपने आपको अच्छी तरह समझ लिया है । परन्तु वास्तव में दुनिया उन्हें क्या समझती है, अथवा दुनिया में उन्होंने अपने आपको किस रूप में उपस्थित किया है, इसका ज्ञान उन्हें नहीं होता। और जब तक किसी व्यक्ति को इस बात का ज्ञान नहीं होता कि दुनिया को उसने अपने कार्य-कलाप से । समझने दिया है, तब तक उसका यह दावा व्यर्थ है कि उमने पने आपको अच्छी तरह समझ लिया है। क्योकि पादमी की पहचान मके कार्यों से होती है। यदि ऐसा न होता, तो पापी-मे-पापी और टात्मा भी अपने विषय में यह समझने से कमी न चुकता कि वह क महापुरुप है। फिर मैंने पूछना चाहा कि क्या इसका यह अर्थ नहीं है कि इसी प्रकार वन को भी आपने अभी तक बहुत ही कम पिया है ? किन्तु यह प्रश्न भी में कर नही सका। धीरे-धीरे मैं चाय पी रहा । मुझे चुप देखकर अब उससे भी चुप नहीं रहा गया। बोली-"प्रार छ बोल नहीं रहे हैं, क्या बात है, कुछ तो बतालाइये।" मैंने देखा, अब मुझे कुछ कहना ही चाहिये । परन्तु ऐमी पोई बात मैं हन मका, जो मेरी प्रेरणा से भिन्न होकर कृत्रिमता से लदी होती। तना ही मैंने कह दिया-"सच बात तो यह है कि कई दिनो मे मैं मको समझने की चेष्टा मे हूँ। परन्तु अभी तक मैं कुछ समझ नहीं चन्दा ने प्याला खाली कर दिया । कुर्सी से उठकर अब वह दर्पण के मने जा खड़ी हुई । एक क्षण अपना मुख देखकर साड़ी में सिर को कती हुई विलकुल नववधू-सी बनकर वोली-"मैं इस समय कोई गम्भीर उत नही सुनना चाहती।" मैंने लक्ष्य किया कि चन्दा की मुद्रा इस समय कुछ म्लान हो गयी । मैं अभी उसकी ओर कुछ और देर तक शायद देखता रहता, परन्तु ह घूमकर वातायन के पास जाकर सही हो गई और बाहर का दृप्य सने लगी । विपय बदलने की दृष्टि से मैंने पूछा-"अाज तो जौहरीजी नेपथ्य दिया गया है न? सिर लचाये हुए वह बोली- "पथ्य देकर ही में यहां मायी थी।", अब उसका सिर साडी में पूर्ववत् आवृत था । पर अब साड़ी' नः कन्धे से पा लगी। केवल यह जानने की इच्छा से कि १३४ : उर्वशी देख क्या रही है, मैं उसके पास थोड़ा अन्तर देकर खड़ा हो ही रहा था कि तुरन्त घूमकर वह मेरे दायें ओर हो गयी और एकदम से सीधा प्रश्न कर बैठी-"अच्छा विहारी बाबू, आप तो मुझे सदा के लिये भूल ही चुके थे। उस दिन मैंने ही आपको उस घटना का स्मरण दिलाकर पुनः प्रापसे जो यह निकटता स्थापित कर ली, इस पर आपके मन में कभी कुछ प्राया ?" वान कहते-कहते उसको प्रसन्न मुद्रा कुछ ऐसी झलक उठी कि मैं उसे देखता रह गया। मैंने कह दिया-"हाँ, इसमें तो दूसरा मत नहीं हो सकता । पर यहां हग यह क्यों भूल जायँ कि आज भी हम दूर-ही-दूर खड़े हैं । निकटतम होने की सम्भावना आज भी तो नहीं है। मैं तो वल्कि कहने ही वाला था कि अब मुझे विदा होने की अनुमति दें, तो अच्छा हो।" तत्काल उसकी मुद्रा गम्भीर हो उठी। वोली-"अगर मैं ऐसा जानती..." उस समय वह और आगे कुछ कह न सकी। दूसरे दिन सायंकाल की बात है। हम लोग जौहरीजी के कमरे में वैठे हुए चाय पी रहे थे । अन्य अवसरों की अपेक्षा आज की बैठक काफ़ी गरम थी। इसका एक कारण यह भी था कि दोपहर को ही दो नौकरों के साथ रम्भा आ गयी थी। वह वय में उर्वशी से कुछ अधिक है । शरीर से भी कुछ अधिक मांसल । वर्ण श्वेत गुलाब का-सा । नयनों में घना काजल अाँज रक्खा था। यों भी उसके नयन असाधारण रूप से बड़े हैं । कानों में लटकते झूमरों के स्थान पर सफेद मोतियों से जड़े टॉप्स । भाल पर लाल टिकुली सदा लगाये रहती है। परिधान रंगीन न होकर श्वेत रहता है। वातें करने की अपेक्षा सुनती अधिक है। उर्वशी ने जब मेरा परिचय कराया, तो वह हाथ जोड़कर बोली-"आप सब तरह से अपने ।
वधु हैं । ऐने अवसर पर आप न मा जाने, दोन गोगों के की रक्षा कैसे होती ?" मैंने देखा, उबंगी के भीतर जिम स्थान का तिर दन्त टिका वंग रहता है, इसमें वहाँ एक अटूट निष्ठा का दिवान है। जो कुछ भी इसे प्राप्त है उमको यह पूर्ण मानती है। दमती-दटतो या पुरे. अरे का बहाँ जमे कोई प्रश्न ही नहीं है। प्रमाद के म्यान को गनीय और तृप्ति ने अधिकृत कर रखा है । उसको इस म्प में देखकर मेरे भीतर श्रद्धा उत्पन्न हो पायी। मैंने उनर मे कह दिया--"कृतज्ञता के हनने चडं दम्म का पात्र में नहीं हूँ। रक्षा की है जौहरोजी की अपनी जीवन-यक्ति ने । हम लोग ती उमके रास्ते चलते एक पथिक को भांति अपनाये हुए माधन हैं। माना कि माधनो के अभाव में मनुष्य असहाय हो जाता है । किन्तु फिर ममाज और है किस दिन के लिये" जौहरोजी मेरी और देखकर मुस्कराने लगे । अन्तर का द्वार मानते हुए बोग-"खूब । एक मित्र तो ऐमा मिला, जो बात-बात में ईश्वर की दुहाई नहीं देता । मनुष्य के सारे प्रयत्न, माहम और होमलो को ये लोग पहले एक जगह गिरवी रख देते है, उसके बाद मुंह मोलते है। मैं तो इनसे ऊब गया हूं।" कल दोपहर को जब से चन्दा के टपकते हा यामू देखे हैं, तब से भीतर-ही-नीतर एक जहर-सा मर गया है। बारम्बार घूम-फिरकर एक ही बात अन्त करण से फट पड़ना चाहती है । यह धर्म क्या चीज़ है जी' क्या यह इमलिय है कि मनुप्य अपनी स्वनन्य इच्छाम्रो का गला घोटकर जिये? प्रतएव जौहरोजी को दात मुझे अत्यन्त प्रिय मालूम हुई; यद्यपि मैं यह जानता हूं कि उनका जीवन प्रतिक्रियानो में गरा हुअा है । कुछ स्थिर होकर रम्मा के कन्धे से लगार चन्दा योली-"चलो, तुम्हारे मन का एक प्रादमी तोमारे वर्ग में मिला । पर हम तो १३६ : उर्वशी टहरी । न हमारे संस्कार ऐसे हैं, न हमारी सीमाएँ ऐसी कि हम इच्छानों को उछालकर चल सकें।" संभव था किचन्दा इस सिलसिले में आगे भी कुछ कहती, किन्तु उसी क्षण उटती हुई रम्भा बोल उठी-"याप से भेंट खूब हुई भाईजी। अभी तो आप कुछ दिन रहेंगे ही। फिर बातें होंगी।" "कहाँ ? कल ही आप जाने की अनुमति मांग रहे थे। अच्छा हुआ जो तुम आ गयीं । अब अपनी बहिन की अनुमति पाये विना तो जा नहीं सकते ।"-~कहती हुई चन्दा बजाय मेरी ओर देखने के जौहरीजी की योर देखने लगी। तब जैसे अधिकार और अहंकार के स्वर में जौहरीजी बोले-"जी, अभी परसों आपसे परिचय हुआ है और आज ही आप चले जाना चाहते हैं। और इजाजत मांग रहे हैं उनसे, जो घड़ी-दो-घड़ी की बातचीत के बाद अपने वनाव-शृंगार की ताज़गी के लिए मैदान छोड़कर भाग खड़ी हुआ करती हैं। अभी मेरी और आपकी बातें तो हुई ही नहीं। इतमीनान से बैठने का भी मौका नहीं मिला। अभी आपको कम-अज़-कम तीन हफ्ते और रहना है । चाहे इस कान से सुनिये, चाहे उस कान से । 'आपको चिम्टो की एक दर्जन बोतलें मँगवा देना रम्भा रानी। समझती हो कि नहीं ? अच्छा, मैं अब आराम करूंगा भाईजान ।" चन्दा खिलखिलाती हुई हँसने लगी। दरवाजे से गुजरती हुई वह मेरे आगे चल रही थी, एक वार वीच में ठिठककर चोली-"अभी इतमीनान से बैठने का मौका तो पाया ही नहीं। इस बात का क्या अर्थ हुया, सो जानते हैं ?" मन में पाया कि पूछ लूं-'अर्थ लगाते समय पुरातन संस्कारों की दुहाई तो न दोगी?' किन्तु फिर यही सोचकर इस बात को टाल गया कि जाने भी दो। अपने को इतना सस्ता न बनायो ! आज रात को मैंने फिर वंशी बजाई। कई दिनों से न तवियत में उत्साह था, न वैसा वातावरण । आज चन्दा ने भी याद दिलायी थी।
कहा था-"यह वंशो बेचारी क्या कहती होगी !" मेरे मुंह पर पाते. आते रह गया-जो मपनों में चन्दा देवा करती है । उसने फिर पूछा -"वोने नहीं बिहारी वावू ?" मैंने कहा--"जाने भी दो । वह कुछ नहीं कहती। कहेगी क्या ? मनुष्य जब अपनी वात कहते डरता है, अपना हृदय खोलते संकुचित होता है और रात-दिन अपने नाम के ही खेल खेलते रहने में धर्म और प्रादों की रक्षा मानता है जो चेतन प्राणी है, तब वंशी वेचारी क्या करे ? वह तो फिर भी जह-पदार्थ ठहरी।" दृष्टि में अन्तर पड गया, मृकुटियो पर तनाव आ गया। कपोलों पर लाली दौड गयो, निचला होंठ हिल उठा, मुंह खिडकी के बाहरी दृश्य की ओर से हटकर एकदम से मामने आ गया। कुछ खिचाव-सा शरीर भर में व्याप्त हो गया । एक ऐठन-मी झलक पडी । बोली-"क्या मतलब ?' मेंने धैर्यपूर्वक कहा- "बैठो तो बतलाऊँ, क्या मतलब है। बचपन की एक घटना का स्मरण हो पाया है।" वह सामने बैठ गई। मैंने कहना शुरू किया-"मैं उन दिनो गाँव में रहता था। घर मे माता-पिता बहन के अतिरिक्त बडे भाई भी थे। हम लोगो का एक कच्चा घर था। दरवाजे पर दो बैलो की जोडी 1 एक नीला बैल उममे वड़ा तेज था, सुन्दर भी। डील-डौल मे काफी ऊंचा और तगडा; पर सोग बहुत छोटे । चाल मे जैसा तेज, प्रकृति मे वैसा ही उन । एक बार नौकर ने दोनो के आगे दाना छोडने मे जरा-सी भूल कर दी। पहले उसने दूसरे बैल के आगे दाना छोड़ दिया । पर उसके आगे घर के भीतर से दाना लाकर छोड़ने मे उससे कुछ देर हो गई। उसके बाद जब वह उसके भागे दाना छोडने को आया तो उसने एक अद्भुत दृश्य देखा । एक ओर वह नीला बैल दूसरे बैल की जगह डटा हुआ उसके प्रागे का दाना साफ कर रहा था, दूसरी ओर उसी ढेर मे खून छितराया हुअा था। ध्यान से देखने पर पता चला कि उसने अपनी वह रस्सी तोड़ डाली है, जिसमें वह बंधा हुमा था, जो उसके नथुनों के भीतर से होकर गर्दन की भोर जाती थी । भूसे और दाने के उस ढेर पर उसके नथुनो से अब १३८ : उर्वशी भी खून टपक रहा था। उसने यह भी देखा कि रस्सी तोड़ने में उसके नथुनों से भीतर घाव हो गया है। "बड़े भैया उस समय जीवित थे। वे उस वैल को बड़ा प्यार करते ये। उन्होंने जब यह हाल सुना तो वे तुरन्त उसके पास आये। उसकी पीठ ठोंकी। गर्दन को हाथों से सहलाया और उसका मत्था चूम लिया। नौकरों को बुलाकर डाँटते हुए वोले-"अगर तुम मेरे इन दोनों हाथों के भावों (सेंटीमेंट्स) की इज्जत नहीं कर सकते, तो तुम आदमी नहीं हो और अधिक मैं तुमको इस समय कुछ नहीं कहना चाहता।" मैं उस समय वहाँ उपस्थित था और मैंने स्पष्ट देखा था, उनकी आँखों में अश्रु भर आये थे। सुनकर चन्दा स्तब्ध हो उठी। मैं भी चुप हो गया। दो मिनट बाद मैंने मूकता भंग करते हुए कहा- “मतलव यह कि आज हमारे समाज में ऐसे कितने व्यक्ति हैं, जो अपना अधिकार स्थापित करने में उस वैल की भी समता कर सकें, जो विवेक में सर्वथा हीन कोटि का था। 'मत- लब यह कि जो व्यक्ति अपने जीवन से असंतुष्ट होने पर भी दम घोंट- घोंटकर रहता है, विद्रोह नहीं करता, वह उस वैल से भी गया-गुज़रा है ! मतलब यह कि "।" मैं अभी और भी कुछ कहने जा रहा था कि चन्दा ने कानों पर हाथ रखकर कहा-"वस कीजिये बिहारी वावू; इसके आगे कुछ मत कहिये । कहने की जरूरत नहीं है।" दूसरे दिन की बात है । मैं जोहरीजी के साथ चाय पी रहा था । आज हमारी गोष्ठी में चन्दा नहीं थी । प्रातःकाल से ही उससे भेंट नहीं हुई थी। पूछने पर मालूम हुअा था--कुछ तबियत खराब है, शैया से उठी नहीं। रम्भा से नया परिचय हुया था। पर वह बात कम करती थी। जौहरीजी आज कुछ और स्वस्थ थे। उन्हीं से देर तक बातें होती रहीं । घुमा-फिराकर बारम्बार इसी विषय को समझाना चाहते थे कि उन्होंने ये तीन बीवियाँ क्यों रख छोड़ी हैं। मैं इस सम्बन्ध में आलोचना करना नहीं चाहता था। मुझे अब विदा लेनी थी। चलते-चलाते किसी । ।
तरह की कटुता में अपने बीच उत्पन्न नही करना चाहता था। सयोग मे रम्भा ने एक बात कह दी। वह बोली-"मुझको तो श्राप देय ही रहे हैं । मुझे न वडी बहू मे कोई शिकायत है, न छोटी से । वन्कि छोटी के बिना तो मेरा जीवन ही मूना हो जाता।" किन्तु वात का कुछ उत्तर न रेकर मैं चुप ही रहा । चुप तो रहा, किन्तु बात के एकाकीपन को लेकर किंचित् हास मेरे मुव पर प्रा ही गया । जौहरीजी ने इसको लक्ष्य किया। तपाक से बोल-बको मत, सब सम- मता हूँ। यह सरासर चापलूसी है, जिमने मैं नफ़रत करता । असल वात कुछ और है । मैं यह स्वीकार करता हूँ कि इन लोगों में कभी-कभी घोर वलह भी हुआ है। माथ ही में यह भी क्यो न कह दूं कि यदि ये पर- स्पर सद्भाव ही रखती है, तो भी यह अपवाद है । साधारणतया ऐसा नहीं होता । खैर, इस विषय को यही छोड़ दीजिये । मै मानता हूँ कि समाज की दृष्टि में मैं किसी प्रकार निरपराध नहीं ठहर सकता। लेकिन मैं दूसरा उदाहरण आपके सामने रसता हूँ। मेरे एक मित्र हैं। पहले एक हाईस्कूल में हैडमास्टर थे। अब वह स्कूल इन्टर कालेज हो गया है और वे उसमें प्रिंसिपल है । नाम जानकर क्या कीजियेगा ! कल्पना कीजिये, उनका नाम श्रीकृष्ण है। उनका विवाह हुए बारह वर्ष हो गये । दो-तीन मंतानें भी है । बडा लड़का नौ वर्ष का है और स्कूल में पढ़ रहा है। छ और चार वर्ष की दो लडकियां और हैं। पत्नी और उन बच्चों को त्यागकर प्रभी दो महीने पूर्व उन्होंने एक कश्मीरी युवती के साथ विवाह कर लिया है । वौलिये, पाप क्या कहते हैं ? उनको जाति से बाहर कर दीजियेगा? जाति में रहकर ही उन्हें क्या मिल जाता? जाति उनके लिए क्या करती है ? मैं तो समझता हूँ कि स्वतंत्र विचार और इच्छा. मस्ति रखनेवाले व्यक्तियो की एक अलग जाति होती है । और मैं भी उमी जाति का हूँ। समाज के नियमो का दम्भ में खूब जानता है। अगर मैं केवल मेनरा के साथ विवाह करने बाद भी इसी रम्मा को प्रेमिका के रूप में रखता, तो ममाज की दृष्टि में क्या अपराध करता? फिर मेरी अपनी एक अलग स्थिति भी तो है। मैं सोच-समझकर चलने का माती कमी नहीं रहा। पैर जिधर पड़ जायें, उमी और मेरा पय रहा १४० : उर्वशी . है। प्रिंसिपल साहब पर जिम्मेवारी इस बात की है कि वे बच्चों के 'भरण-पोपण का खर्च देते रहें। सो उन्हें देना ही पड़ेगा। इसके बाद कुछ नहीं । जीवन में जब तक रस है, आकर्पण और तृप्ति है, तभी तक उसके साथ हम अपना सम्बन्ध मानते हैं। उसके बाद सब वेईमानी है।" रम्भा इस पर विगड़ उठी । बोली- "यह वेईमानी नहीं सरासर वैईमानी है। मनुष्य का यदि यही रूप मान्य हो, तो वह जानवरों की कोटि में चला जायगा । मैं इसका कभी समर्थन नहीं कर सकती।" इसी समय द्वार का पर्दा हिला और चन्दा सामने आ पहुंची । दृष्टि पड़ते ही मैंने लक्ष्य किया, आँखों पर लाली छायी हुई है । मुख पर उल्लास के स्थान पर गम्भीरता की छाप है । ऐसा जान पड़ा, मानों कई दिनों की बीमारी के बाद उठी है । एक बार यह भी सोचा कि हो-न-हो, चन्दा ग्राज रात-भर सोई नहीं है। भीतर-ही-भीतर जैसे रोती रही है । जल के विना जैसे मछली तड़पती है, इसकी रात भी पलँग पर व्याकुल हो- होकर करवटें बदलते, रोते-कलपते वीती है । इसी समय रम्भा ने पूछ दिया -"कैसी तबीयत है ?" और कथन के साथ ही बदन पर हाथ रख दिया । ऊपर से अन्दर की स्वस्थता का भाव प्रकट करने की इच्छा से चन्दा के अधर थोड़े खिलने को हुए, किन्तु फिर आप ही रुक गये । बात टालती हुई.सी एक वार भृकुटियों पर बल देकर बोली - "तंबीयत को क्या होना है ! रात को नींद ज़रा देर-से पायी । इसलिए'.." रम्भा और चन्दा की बात से जौहरीजी के कथन के ताव पर कोई प्रभाव नहीं पड़ा। वे बिना रुके अपनी बात कहते ही गये । हाँ, वीच में एक बार ज़रा-सा चन्दा की ओर देख-भर लिया। इसी क्षण जौहरीजी बोले-"समर्थन की परवाह करके मैं बात नहीं करता। जानवरों की कोटि में जिन्दगी की जो ताज़गी है, मैं उसे मनुष्य के लिए आवश्यक मानता हूँ। मनुष्य का कोई गुण जानवरों से 'मिल जाता है, यह कह देने से हो न तो मनुप्य जानवर हो जायगा-न जानवरों में इस गुण की अधिकता होने के कारण वह गुण ही अवगुण ।" रम्भा बोली-"तुम्हारे पास एक ही राग है-भोग। तुम नहीं ।
जानते, त्याग भी कोई चीज है। मैं तो त्याग में भी एक तृप्ति देखती हूँ। तुम नही देख मक्ते, न देखो । मैं देखती हूं।" जौहरीजी मुस्कराने लगे । बोले-"यह तुम्हारा निजी स्वर नही है। इसके अन्दर तुम्हारे मस्कार बोल रहे हैं ।" "तुम निजत्व को मंस्कारों से परे देखते हो।" रम्भा बोली-"मैं नहीं देखती। लेकिन हमारे विहारी भाई तो कुछ बोल ही नहीं रहे । केवल तमाशा देख रहे है ।" वात पूरी करती हुई इस बार वह भी मुस्कराने लगी। जोहरीजी बोले--"हाँ मई, यह क्या बात है ? अाप व्यों चुप हैं ?" मैं कुछ कहने जा ही रहा था कि चन्दा बोल उठी—"धे इस समय दूसरे लोक मे हैं। घर की याद हो आई है आप लोग इन्हे जाने ही नहीं देते।" अथ रम्भा से न रहा गया । वोली-“यह तुम्हारा मेरे साथ अन्याय है बहूरानी । मैं इन्हे दस दिन तो नहीं जाने दूंगी।" मुझको भी एक धक्का लगा । स्पप्ट जान पडा कि चन्दा मुझे विदा करना चाहती है। तब भीतर-ही-मीतर सचित हुई सारी मिठास एक कड़वाहट के रूप में परिणत हो गयी। सोचने को विवश हो गया कि भय कोरी बनावट थी। काम निकल जाने के वाद ससार मे ऐसा ही होता है । चन्दा विश्व की इम रचना का अपवाद नहीं है । कभी-कभी भीतर जो एक मात्विक भावना उभर उठनी थी कि क्यो अपने को इस तरह गिराया जाय, उसको बल-मा मिला। फलतः मैं सोलह पाना आदर्शवादी बन गया। शान्त गम्भीर भावना से मैने कह दिया -"नहीं, अब और रकना मेरे लिए सम्भव नहीं है। आज ही सायकाल की ट्रेन से चला जाऊंगा। "पर जो विपय इस समय यहाँ विवाद के रूप में उपस्थिन है, उसके प्रति अपनी सम्मति भी मापसे प्रकट कर देना चाहता हूँ।"ग्राउ बहु-विवाह और विवाह-विच्छेद को लेकर हमारे देश में जो घटनाएं हो वे वास्तव में उस जड़ता के विरोध मे हैं, जिससे मात्र हनन बुरी तरह बंधे–बल्कि जकडे-हुए हैं। विवाह की प्राधुनिर परिणीने हमारे जीवन को निर्जीव कर रक्खा है । क्षमा कीजिना, इस कित १४२ : उर्वशी - की समीक्षा बैज्ञानिक दृष्टि से करना चाहूँगा ! अगर हम यह जान लें कि पुरुप और नारी का सम्बन्ध जितना मानसिक है, शारीरिक उससे किसी प्रकार काम नहीं है ; तो इस विद्रोह में हमें पीड़ित मानवता के चीत्कार और जागरण के ही चिह्न मिलेंगे। दो में से कोई भी एक दूसरे को तृप्ति नहीं दे पाता, तभी वह उसके लिए असंतोप और अतृप्ति का कारण बनता है और अतृप्ति देकर भी जो संस्कृति मनुप्य को कोरे त्याग का उपदेश देती है, वह अाधारहीन, दुर्वल और अन्दर से खोखली है। जब मनुप्य उसका निर्वाह नहीं कर पाता, तभी वह साथी के प्रति अविश्वास का पात्र बनने को विवश होता है।" रम्भा इसी क्षण बोल उठी-"परन्तु आपने मानसिक तृप्ति की बात भी तो साथ-साथ कही थी। मैं उसी को प्राध्यात्मिक मानती " मैंने कहा--"हाँ, वह ---"हाँ, वह मानसिक तृप्ति भी आकर्पणों से होती है। उसका सम्बन्ध सौन्दर्य-भोग के साथ है। ऐसा भी होता है कि कोई नारी किसी परपुरुष के गुणों पर ही मुग्ध होकर कभी उसका सान्निध्य चाहती हो, केवल उसकी संगति । पर आज की विवाह-प्रथा की सर्वस्व स्वाहामयी परिपाटी ने इसको भी दुर्लभ कर दिया है। ऐसा भी होता है कि एक सेक्स शरीर से ही किसी प्रकार हीन, असाधारण या अति साधारण होकर विरोधी सेक्स के अयोग्य बन गया हो। ऐसी दशा में दूसरे को अपना सायी नुन लेना उसका एक स्वाभाविक मानवीधर्म हो जाता है। पर आज की विवाह-रीति ने उसको भी कलुप का रूप दे रखा है। जिस समय विवाह-प्रया का आविष्कार समाज की एक अनिवार्य आवश्यकता की पूर्ति का कारण बना, उस समय का समाज एक तो आज के समाज से नितान्त भिन्न था, दूसरे उस समय विवाह-प्रथा में भी ऐसे प्रतिवन्ध न थे। आज के इन प्रतिवन्धों ने ही इस विद्रोह की सृष्टि की है। इसलिए जब तक समाज का यह संगठन ध्वस्त नहीं होता, तव तक ग्रादर्श-विवाह-सम्बन्धों की कल्पना करना केवल स्वप्न देखना है।" रम्भा से न रहा गया। वह बोली-"क्षमा कीजियेगा, यह सोलह पाना वस्तुवादी दृष्टिकोण है।" मैंने देखा, उस समय चन्दा का मुख वात-की-बात में उज्ज्वल हो .
No text on this page.
१४४ : उर्वशी मैं नहीं जानता था, वह ऐसी दृढ़चरित्र रमणी है। मैं तो उसके लिए कुछ और ही सोचता था-कुछ और ही। आगरा आकर जब मैं गोपालदादा से मिला तो कई दिनों तक मेरी स्थिति जलहीन मछली-सी हो गयी। गोपालदादा ने मुझसे सारा हाल-चाल जानना चाहा । पर मैं सब गोल कर गया । सदा मैंने यही उत्तर दिया-"प्रात्मीय लोग हैं और अच्छी तरह हैं। कोई खास बात नहीं है।" इस यात्रा ने मुझे जड़ बना दिया है। जितना आनन्दित हुआ, उससे कहीं अधिक दुःखी। जितनी मिठास इसने मुझे दी, उससे कहीं अधिक कटुता । जीवन में अब एक ऐसी उदासीनता छाकर रह गई है कि सारा विश्व विल्कुल व्यर्थ जान पड़ता है। किसी काम में जी नहीं लग रहा है। मकान, दरवाजा, गली, सड़क, शहर, इप्टमित्र, परिचय और आत्मीयता मेरे लिए कहीं कुछ अर्थ नहीं रखती। जान पड़ता है, सारा विश्व मानवता के नाते एक महाशून्य है । एक छोर से दूसरे छोर तक सन्नाटा-सा छाया है। घरों और वस्तियों के स्थान पर समाधियाँ वनी हैं। केवल कुत्ते और सियारों के स्वर सुनाई पड़ते हैं - केवल सर्पो की लपलपाती जिह्वाएँ और हिंसक जन्तुओं की नाना भयावनी चेप्टाएँ मैं देख रहा हूँ। परन्तु अाज अभी-अभी चन्दा का यह तार मुझे मिला है- "जौहरीजी एक अभिनेत्री के साथ कश्मीर की सैर को गये हैं। तुम फ़ौरन चले पायो, अगर मुझे जीवित रखना चाहते हो।" उर्वशी द्वारा हिमालय होटल, मसूरी। -