University Liberey Allahabad

Ath Vedanj Prakasaha

Shreepandityoudhistirmimansaken · 25.07.06

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SAMROcta ओ३म् अथ वेदांगप्रकाश सीरी तत्रत्यः तृतीयो भागः वाराणसी म्बा नामिका दीख पाणिनीयाष्टाध्याय्यां द्वितीयो भागः श्रीमत्स्वामिदयानन्दसरस्वतीकृतव्याख्यासहितः श्री पण्डित युधिष्ठिर मीमांसकेन संशोध्य टिप्पणीभिरलंकृतः पठनपाठनव्यवस्थायां पंचमं पुस्तकम DIVISIT प्रकाशक- - LAN आर्य साहित्य मण्डल लि०, अजय प्रथमावृत्ति संवत् २०१०वि०. Tama ---

प्रकाशक:-
आर्य साहित्य मण्डल लिमिटेड,
अजमेर.
STO
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-
म० मथुरा प्रसाद शिवहरे
दि फाइन आर्ट प्रिटिंग प्रेस, अजमेर.

दो बातें - इस लघु पुस्तिका को व्याकरण अध्ययन करने वाले छात्रों के समक्ष उपस्थित करते हुये हम हर्प का अनुभव करते है। यह इन्हीं 'छात्रबन्धुओं को व्याकरण के प्रारंभिक किन्तु प्रौढ सिद्धान्तकौमुदी के अर्थ को हृदयंगम कराने एवं सदा स्मृतिपथ में बनाये रखने के लक्ष्य से ही प्रस्तुत की गयी है। व्याकरण के छात्रों की संस्कृत-साहित्य में विशेष गति न होने के कारण लच्छेदार उन्हीं संस्कृतपंक्तियों में सूत्र, वार्तिक तथा परिभा- षाओं का व्याख्यान करना 'झोऽन्तस्य झोऽन्तोऽर्थ.' कहावत को चरितार्थ करना होगा । अतः राष्ट्रभाषा में ही समझने में सुगमता होगी यह अनुभव किया गया। तदनुसार तत्तत्प्रयोगो के सम्बन्धित सभी साधनिकाओं को संक्षिप्त पर सुस्पष्ट भाषामयी पंक्तियों से यथा- संभव सरलता से समझाने का प्रयास किया गया है। प्रतिपाद्य विषय की कठिनता से इसमें साहित्यिक भाषा का प्रयोग संभव नहीं यह सभी सहृदय विद्वान् मान ही लेगे । प्रयोगों के अर्थ तथा साधनिका कौमुदी की प्राचीन टीका बालमनोरमा-तत्त्वबोधिनी के आधार पर ही प्रस्तुत की गयी है। आधुनिक व्याख्यानों की छाया से भी यह अस्पृष्ट है। रा० म०प्र० खण्ड में निर्धारित अंश-स्त्रीप्रत्ययान्त का विवरण इसमें दिया गया है। यदि विद्यार्थियो ने इसको अपनाने में उत्साह दिखाया तो अग्रिम भागों का भी इसी क्रम से प्रस्तुत करने के लिये हम कृतसंकल्प हैं। इसमें हमारे अनवबोध, अनवधान तथा मुद्रण आदि में जो कुछ भी त्रुटि आ गयी हो उसके लिए हम आपकी सहानुभूति पूर्ण क्षमाकांक्षी है। सस्कृत साहित्य का लधु सेवक- लेखक -

विषयानुक्रमणिका
प्रकरणनाम
पृष्ठाङ्क
-
१३--१६
१६-२२
२२-२६
२६-५२
१ सज्ञाप्रकरण
२ अच्सन्धि प्रकरण
३ हल्सन्धि प्रकरण
४ विसर्ग सन्धि प्रकरण
५ स्वादि सन्धि प्रकरण
६ अजन्त पुंल्लिगप्रकरण
७ अजन्त स्त्रीलिग प्रकरण
८ अजन्त नपुंसकलिग प्रकरणा
६ हलन्त पुंलिग प्रकरण
१० हलन्त स्त्रीलिंग प्रकरण
११ हलन्त नपुंसकलिग प्रकरण
१२ अव्यय प्रकरण
१३ स्त्रीप्रत्यय प्रकरण
५२-५६
५६-६३
६३-६६
१६-१००
१००-१०७
१०७-११०
११०-१३५

॥ श्रीरामभद्रः शरणम् ॥ स-साधनिका सिद्धान्तकौमुदी-पयोगसूची ( सूत्र-वार्तिक-परिभाषा-भाषानुवादसहिता) अथ संज्ञाप्रकरणम् नाम नाम हरेः पादौ ग्राह ग्राहं गुरोः पदे । सगृह्णामि प्रयोगांस्तान् कौमुदीयान् समानपि ॥ टीकयन् भाषया तन्न्या सूत्रवार्तिकवृत्तिकाः । शाब्दिकांस्मारयाम्यस्मात् प्रीयतां मे रमापति.॥ श्रा ये-'श्रा ये मित्रावरुणा' इस ऋचा मे 'निपाता श्रायुदात्ताः' से 'श्रा' यह उदात्त है, 'यत्' शब्द 'फिषोऽन्त उदात्तः' इससे अन्तोदात्त है। उसके आगे के जस् सुप् होने के कारण 'अनुदात्तौ सुप्पितौ' से अनुदात्त है। त्यदाद्यत्व पररूपत्व तथा शीभाव ('जसःशी') होने पर श्राद् गुण' से गुण । 'एकादेश उदात्तेनोदात्तः' से एकार उदात्त हो गया। अर्वाड 'अर्वाड यज्ञः संक्राम' इस ऋचा मे प्रथम अकार अनुदात्त है। 'अर्वन्त- मञ्चति' इस अर्थ मे 'ऋत्विग०' सूत्र से अञ्चति को सुप्-उपपद मे क्विन् प्रत्यय हुअाअथवा 'ऋ गतौ' धातु से 'नमिपद्यति' सूत्र से 'वनिप्' और गुण से सम्पन्न 'अर्वन्' शब्द से 'धातो:' से अन्तोदात्त हुअा। 'वनिप्' पित् है, अतः 'अनुदात्तौ सुप्पितौ' से अनुदात्त हुआ। 'अञ्चति' का अकार भी 'धातो' से उदात्त है। "उपपदमतिड' से समास करने पर 'समासस्य' से उदात्त होने पर 'अनुदात्त पदमेकवर्ज' से प्रथम अकार अनुदात्त है। 1 २ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची । । क-वोऽश्व:-'क' यहाँ 'किमोऽत्' से हुये अत्-प्रत्यय का अकार 'तित्स्वरितम्' से स्वरित है । 'व' यह 'अनुदात्त सर्वमपादादौ' से अनुदात्त है। 'अश्वाः' यहाँ अशि को 'क्वन्' करने पर निरवर से श्रायुदात्त है । सहिता मे तो 'एकादेश उदात्तेनोदात्तः से अोकार उदात्त है। तथा च 'क' यह ह्रस्व स्वरित 'वो' मे के श्रोकार रूप उदानपरवाला है। स्थानां न ये ऽरा-'येऽरा' मे एकार दीर्घस्वरित है, वह 'रा' इत्याकारात्मक उदात्तपरवाला है। शतचक्रं यो ह्या के प्रोकार कम्पत्वरित है, वह 'ह्य' इस अकारात्मक स्वरितपरक है-इत्यादि स्थलो मे अनुदात्त भाग स्पष्टत. सुनाई देता है । अग्निमीले पुरोहितम्-'अग्निमीले यहाँ अन्तोदात्त अग्निशब्द का 'अम्' से उत्पन्न पूर्वरूप एकादेश भी उदात्त ही है। यहाँ 'ईले' यह पूरा पद 'तिडतिडः' से अनुदात्तस्वर है। एवं च अग्निमीले ये दो पद संहिता मे 'उदात्तादनुदात्तस्य स्वरितः' से 'ईले' का ई स्वरित है। यहाँ का ए 'स्वरितात्०' सूत्र से प्रचयरूपा एकश्रुति है। पलिक्नीः, चख्ख्नतुः, अग्निः, घ्नन्तीत्यत्र-वर्गों ( क, च, ट, त, प ये ५ वर्ग हैं) के श्रादि के ४ अक्षरों को पॉचवा अक्षर पर मे रहने पर मध्य मे 'यम' नामक पूर्व के सदृश वर्ण प्रातिशाख्य ( वैदिक व्याकरण) मे प्रसिद्ध है। उदाहरण मे 'क, ख, ग, घ से त वर्ग के ५वॉ वर्ण 'न' परे रहने पर मध्य मे जो वर्ण पूर्वसदृश दीखते है वे 'यम' है । दधीत्यस्य हरति शीतलं-षष्ठं सान्द्रम्-'नाझलौ' श्राकार सहित श्राच् और हल परस्पर सवर्ण नही होते है। अतः 'दधि हरति' यहाँ धि के इ को 'हरति' के ह अकारस्थानिक परे रहने पर भी यण नही होगा, 'दधि शीतलं' यहाँ 'इ-श' के समान स्थानिक होने पर भी सवर्णदीर्घ नहीं, इसी प्रकार 'षष्ठं सान्द्र' दधि-शब्द से परे रहने पर तथा 'ऋ-तृ' के स्थान के होने पर भी यण् अथवा 'ऋत्यकः' से प्रकृतिभाव नही होगा।

, साधनिकासहिता विश्वपाभिः-'विश्वपा-भिः' इस स्थिति मे श्रा को समानस्थानिक ('अकुहविसर्जनी- याना कण्ठः' से ) होने से ह मानकर 'हो ढ' से ढत्व नही होगा। यद्यपि आकार वर्णसमाम्नाय ( १४ सूत्र 'श्राइउण' आदि) मे पठित नही है, तथापि 'नाज्झलौ' सूत्र मे आकार का प्रश्लेप कर ( न नाच-हलौ) देने से अच और हल मे सवर्णता निषिद्ध हो गई। अथाऽच्सन्धिप्रकरणम् सुद्धयुपास्य., मद्ध्वरिः, धात्रंश , लाकृतिः-सुधीभिः सुधिया वा उपास्यः-अर्थात् विद्वानों से या विद्वानो के पूजने योग्य ( भगवान् ) इस प्रकार तृतीया व षष्ठी तत्पुरुष समास करने पर 'सुपो धातुप्रातिपदिकयो.' से सुधी शब्द के आगे रहनेवाली 'भिस्' या 'श्राम' के लोप होने पर 'सुधी ४ उपास्य' इस स्थिति मे 'इको यणचि' 'तस्मिन्निति निर्दिष्टे पूर्वस्य' सूत्रो से अच् से अव्यवहित पूर्व- वर्ति इक के स्थान मे यण की प्राप्ति होने पर 'स्थानेऽन्तरतमः' से सदृशतम श्रादेश-ईकार के समान स्थानीय य-कार के होने से सुध् य x उपास्य.-ऐसा होने पर-'अनचि च' अच् से परे यर् को द्वित्व विकल्प से होगा, अच् पर मे रहने पर न होगा -- से धकार को विकल्प से द्वित्व होने पर, यहाँ 'स्थानिवदादेशोऽनल्विधौ' आदेश स्थानिवत् होगा, किन्तु स्थानी अल् (अक्षर ) के श्राश्रय से कार्य कर्तव्य होने पर न होगा-से यकार को अच मानकर द्वित्व निषेध की शंका नही कर सकते, 'अनल्विधो' से स्थानिवद्भाव निपिद्व है, फिर भी 'अचः परस्मिन्पूर्वविवौ' पर को निमित्त मानकर हुये अच् स्थान का आदेश स्थानिवत् होगा स्थानी अच् से पूर्व का कार्य-कर्तव्य होने पर-से स्थानिवद्भाव की प्राप्ति के कारण 'श्रनचि च' से प्राप्त द्वित्व का निषेध होने पर 'न पदान्त-द्विवचन-वरे-यलोप-स्वर-सवर्णानुस्वार-दीर्घजश्च- विधिषु' परनिमित्त अजादेश को स्थानिवद्भाव नही होता है पदान्तादिविधि मे से द्वित्व हो ही जाता है । 'झला जश् झशि' से प्रथम धकार को द-कार होने पर-'सयोगान्तस्य लोप:'-'अलोऽन्त्यस्य' से यकार के लोप('श्रदर्शनं लोप') प्राप्त होने पर-'यणः प्रतिपेधो वाच्यः' वार्तिक से लोपनिषेध होने पर-'यणो मयो द्वे वाच्ये' वार्तिक मे मयः यह पञ्चमी और यणः यह षष्ठी-इस पक्ष में मय से पर में रहने वाले यकार को भी द्वित्व होने पर ४ रूप होंगे-एक सिद्धान्तकौमुदी प्रयोगसूची ध और एक य, दो ध-दो य, दो ध-एक य और एक ध-दो य । इसी प्रकार इक् मे उ-ऋ-ल की सन्धि समझनी चाहिये । वहाँ व् -र-ल ये यण होगे। द्वित्वादि यथोचित स्थान मे पूर्ववत् है। पुत्रादिनी त्वमसि पापे-पुत्र-शब्द मे 'अनचि च' सूत्र से विहित वैकल्पिक द्वित्वका नादिन्याक्रोशे पुत्रस्य' पुत्र शब्द को द्वित्व न होगा, आदिनी शब्द परे रहते तथा श्राक्रोश (क्रोध ) व्यक्त हो-से निषेध हो जाता है । आक्रोशे किम् ? पुत्लादिनी सर्पिणी-'तत्त्वकथने द्विर्वचनं भवत्येव' जहाँ यथार्थ कहना है कि पुत्र खानेवाली सापिनी है वहाँ तो द्वित्व होगा ही-से द्वित्व हुश्रा। पुत्रपुत्रादिनी त्वमसि पापे!-'तत्परेच' वार्तिकसे आदिनी-शब्द परवाले पुत्र शब्द आगे रहने पर 'अनचि च' से प्राप्त द्वित्वका निषेध हो जाता है । पुत्रहती पुत्रहती, पुस्त्रजग्धी, पुत्रजग्धी-'वा हतजग्धयोः' वा० हत-जग्ध शब्द परे रहते तद्वित्व विकल्प से होगा। इनन्द्र', इन्द्रः राष्ष्ट्रम्, राष्ट्रम्-'त्रिप्रभृतिषु शाकटायनस्य' ३ आदि संयुक्त वर्ण परे रहते यर का द्वित्व विकल्प से होता है--से न्द्र-ष्ट्र मे ३ वर्ण संयोग होने से न्-ए का द्वित्व। अर्कः, ब्रह्मा-'सर्वत्र शाकल्यस्य' सभी स्थलो मे शाकल्याचार्य के मत मे द्वित्व नहीं होता। दात्रम् पात्रम्-'दीर्घादाचार्याणा' दीर्घ से आगे रहनेवाले यर् का द्वित्व कुछ प्राचार्यों के मत से ही द्वित्व का निषेध है,) नहीं होता। हर्यनुमवः, हर्यनुभवः, नथ्यस्ति नास्ति-'अचो रहाभ्या द्वे' अच् से परे रेफहकारों से परे स्थित यर् का वैकल्पिक द्वित्व होता है । लोपारम्भफलं तु-'आदित्यं हविः' इत्यादौ--'हलो यमा यमि लोपः' हल से पर मे रहनेवाले यम् का वैकल्पिक लोप होता है यम् परे रहने पर। इस लोपशास्त्र आरंभ करने का प्रयोजन 'श्रादित्यं हविः' इस प्रयोग मे एक यकारवाला रूप है, अन्यथा 'दित्यदित्यादित्य'-से ण्य करने पर दो यवाला ही रूप रहेगा।

साधनिकासहिता नेह-माहात्म्यम्'-यहाँ 'यमा यमि' इस प्रकार (य आदि को य श्रादि ही) यथासख्यविज्ञान से मकार का लोप नहीं होता। हरये, विष्णवे, नायकः, पावकः-'एचोऽयवायावः' एच् को क्रम से अय-श्रव अाय-श्राव होगे अच् परे रहते-से अयादेश होने परम्-व के उच्चारण- सामर्थ्य से 'तस्य लोपः से लोप न होकर हरे-ए='हरये' बनता है। अत एव 'हलन्त्य से प्रकृत मे प्रयोजन न होने से इत्सज्ञा भी न होगी। ए, ओ, ऐ, औ के स्थान मे होनेवाले अय् अव्-श्राय-श्राव् के ये चार उदाहरण है। गोविकारो 'गव्यम्', नावा तार्य 'नाव्यम्-'वान्तोयि प्रत्यये' यकारादि प्रत्यय परे रहने पर श्रो-ौ को अव तथा प्राव होते है, 'गोपय’-'नौवयो'-से गो-यत् , नौ-यत् । गव्यूति:- 'गोयूँतौ छन्दस्युपसंख्यान' 'अध्वपरिमाणे च' वार्तिको से गो के श्री को अव हुआ । 'वान्त' यहाँ पर बकार के पहले तथा 'गोयूतौ छन्द०' यहाँ छकार के पहिले वकार का प्रश्लेप करके 'लोपो व्यो' से वकार लुप्त होने पर भी वकारान्त अादेश होगा, फलत: वकार का लोप न होगा। लव्यम् , अवश्यलाव्यम् - 'धातोस्तन्निमित्तस्यैब' इस नियमविधि से यादि प्रत्ययनिमित्तक धातु सम्बन्धि एच् को ही वान्त आदेश होता है, 'लूञ्-छेदने' धातु । तन्निमित्तस्यैवेति किम् ? श्रोयते-औयत--'श्रोयते--ौयत' स्थलो मे यादि प्रत्यय ( यक् ) होने पर भी उक्त नियम से आदेश नहीं होता है । तेतुं शक्यं क्षय्यम्, जेतुं शक्यं जय्यम्-'क्षय्यजय्यौ शक्याथे से शक्याथ मे क्षय्य जय्य रूप ही रहेगे, यह निपातन है। शक्याथें किम् । क्षेतु जेतु योग्यं क्षेयं पाप जेयं मनः-'यं जेय' इन प्रयोगों में तो 'अर्हे कृत्यतृचश्च' से योग्यार्थ मे 'यत्' प्रत्यय है। क्रय्यम् , ऋयमन्यत्-'क्रय्यस्तदर्थे' से खरीददार लोग खरीदे इस बुद्धि से फैलाई वस्तु क्रय्य हे, यह भी निपातन है । 'क्रेय' मे (खरीदने योग्य) तो 'अर्हे कृत्यतृचश्व से यत् होता है। हर एहि-हरयेहि, विष्ण इह-विष्णविह, श्रिया उद्यत:-श्रियायुद्यतः, गुरा उत्क:- , ६ , सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची गुरावुक --'लोपः शाकल्यस्य' अवर्ण पूर्ववाले पदान्त य-व को विकल्प से लोप होगा। लोपपक्ष मे पुनः परसवर्णादि सन्धि न होगी, यतः 'पूर्वत्रासिद्ध' से लोपशास्त्र त्रैपादिक होने से प्रसिद्ध हो जाता है अर्थात् सन्धि करने के प्रसंग मे य व रहते है । 'कानि सन्ति' 'कौ स्त:'-यहाँ प्रसधातु के 'श्नसोरल्लोपः' से विहित अल्लोप के स्थानिवद्भाव (अ होने) से यण तथा श्राव् आदेश क्रम से प्राप्त होते है, पर 'न पदान्त०' से पदान्त विधि मे स्थानिवद्भाव का निषेध होने से यण तथा आवादेश नही होते है। उपेन्द्रः, रमेशः, गजोदकम् , कृष्णधिः, कृष्णद्धिः, कृष्णदुर्द्धि, तवल्कार --'श्राद् गुण' अवर्ण से अच् परे रहते पूर्व पर के स्थान मे गुण (अ-ए-श्रो) होगा। उप-इन्द्र रमा-ईशः गङ्गा उदक-मे 'ए अो' हुये कृष्ण x ऋद्धि-ऐसी स्थिति मे 'श्राद् गुणः' से गुण-अ सदृशतम होने से होगा, वह 'उरण पर.' से र-पर होकर अर आया । 'अचो रहाभ्या द्वे' से पाक्षिक द्वित्व करने पर 'झरो झरि सवर्णे' से विकल्प से प्रथम धकार का लोप होगा। एवं च द्वित्व न करे लोप भी करे तो १ धवाला, द्वित्व तथा लोग करे तो २ धवाला, द्वित्व करने पर लोप न करने पर ३-धवाला इस प्रकार तीन रूप हुये । यहाँ पहले के ध को 'झला' से जश्त्व होगा। 'ऋलुवर्णयोर्मिथः सावर्ण्य वाच्यम्' वार्तिक से लुके आगे अच् रहने पर भी अल् (र-प्रत्याहार मे र-ल है, र-पर से ल-पर भी सिद्ध है) गुण हुअा। 'यणो मयो द्वे वाच्ये' वार्तिक मे 'यणः' को पञ्चमी और 'मयः'को षष्ठी-इस पक्ष मे क-कारका द्वित्व होगा, लको 'अनचि' च से वैकल्पिक द्वित्व होगा, अतः केवल ल द्वित्व वाला, केवल क-द्वित्व- वाला ल-क दोनो द्वित्ववाला, और दोनो द्वित्व रहित, इस प्रकार ४ रूप होगे। वही श्लोक मे संगृहीत है । 'द्वित्वं लस्यैव कम्यैव नोभयोरुभयोरपि । तवल्कारादिषु बुधैयं रूपचतुष्टयम् ॥'

.. साधनिकासहिता कृष्णैकत्वम् , गङ्गौघा, देवैश्वर्यम् , कृष्णौकण्ठ्यम् ,-'वृद्धिरेचि' अवर्ण से एच परे रहते वृद्धि (श्रा-ऐ-ौ) होगी। उपैति, उपैधते, प्रष्टौह -'एत्येधत्यूठसु' अवर्ण से एजादि एति-एधति-जल् परे रहते पररूपगुणापवादवाली वृद्धि होगी। उपेतः, मा भवान्प्रेदिधत्,-'अवेहि'-यहॉ एजादि इण-एधधातु न होने से वृद्धि नही होगी । 'पुरस्तादपवादा अनन्तरान् विधीन् बाधन्ते, नोत्तरान्' इस न्याय से यह वृद्धि अव्यवहितोत्तरशास्त्र पररूप ( 'एङि पररूपम् ) का ही अपवाद है, न कि 'श्रोमाडोश्च' से विधीयमान पररूप का। अतः 'अवैहि' यह वृद्धि अशुद्ध ही है । अक्षौहिणी सेना-'अक्षादूहिन्यामुपसख्यानम्' वा० अक्ष शब्द से जहनी शब्द परे रहने पर वृद्धि-ौ। स्वैर; स्वैरी, स्वैरिणी-स्वादीरेरिणो' वा० स्व-से ईर-ईरिन् परे रहते वृद्धि । प्रौहः, प्रौढः प्रौतिः-'प्रादूहोढोब्येषैव्येषु' वा० से प्र-से ऊह ऊढ-ऊढि परे रहते वृद्धि। प्रोढवान–'अर्थवद्ग्रहणे नानर्थकस्य ग्रहण' इस परिभाषा से-जोकि 'ब्रश्चभ्रस्ज' सूत्र मे 'राजि' से अन्य 'भ्राजि' के ग्रहण से ज्ञापित है-वार्तिक मे क्त प्रत्ययान्त अढ ही गृहीत है, नकि क्तवतुप्रत्ययान्त ऊढवत् का एकदेश, अतः यहाँ वृद्धि नहीं होगी,गुण । प्रेषःश्रेष्यः-हस्वोपध इषधातु को घञ ण्यत् करने पर लघूपध गुण होने पर एष-एष्य बनेगा, अब प्र४ एप-एष्य ऐसी स्थिति मे पररूप न होकर 'प्रादूहो' से वृद्धि (ऐ) होगी। प्रेषः प्रेष्यः-दी|पध 'ईप उञ्छे ई-गतिहिंसादर्शने' धातु तो होकर प्रेष-प्रेष्य ही बनेगे। सुखातः, तृतीयेति किम् ? परमत:-'ऋते च तृतीयासमासे' वा० तृतीया समास मे अकार से ऋत शब्द परे रहते वृद्धि 'उरण' से (रपर-बार)। तृतीयातत्पुरुष के अतिरिक्त कर्मधारयादि समास मे परम xऋतः-आदि स्थलों मे गुणादि ही होगे। , - सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची प्रार्णम् , वत्सतरार्णम् , कम्बलार्णम् , वसनार्णम् ऋणार्णम् , दशाणे देशः, नदी च दशार्णा-'प्र-वत्सतर-कम्बल-वसनार्ण-दशानामृणे' वा०६ शब्दों को ऋण शब्द परे रहने पर वृद्धि । प्राईति, उपार्च्छति-'उपसर्गादृति धातौ' अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि धातु परे रहते वृद्धि-से वृद्धि हुई। यहाँ यद्यपि 'अन्तादिवच्च' सूत्र से 'उपार! के रेफ को पदान्त मानकर 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' से विसर्ग प्राप्त होता है, तथापि 'उभयथ । 'कर्तरि चर्षिदेवतयो' इत्यादि निर्देश से अन्त- वद्भाव से पदान्तरेफ का विसर्ग नही होता है। उपसर्ग पद से ही धातु का श्राप होने पर भी 'धातोः' यह कथन योगविभाग से पुनः वृद्धि का विधान करता है, जिससे 'मृत्यक:' सूत्र से प्राप्त पाक्षिक भी प्रकृतिभाव यहाँ पर नहीं होगा। प्रार्षभीयति-प्रर्षभीयति, प्राल्कारोयति-प्रल्कारीयति, उपऋकारीयति, उपर्कारीयति- 'वासुग्यापिशले 'अवर्णान्त उपसर्ग से ऋकारादि सुब्धातु परे रहते विकल्प से वृद्धि । सावर्ण्य होने से लवर्ण का भी ग्रहण हुआ। 'अति' मे तपर होने के कारण दीर्घ ऋकारान्त धातु के योग मे वृद्धि नही होगी, प्रेजते, उपोषति, उपेडकीयति, उपैडकीयति, प्रोघीयति, प्रौघीयति-'एडि पर- रूपम्' अवर्णान्तोपसर्ग से एडादि धातु के परे रहने पर पररूप होता है । यहाँ 'वा सुपि' का अनुवर्तन कर वाक्यभेद से अर्थ करना चाहिए, इससे एडादि सुब्धातु परे रहने पर पररूप विकल्प से होगा। केव भोक्ष्यसे १ अनियोगे किम् १ तवैव-'एवे चानियोगे' वार्तिक से 'एव' के अनिर्धारणार्थ मे पररूप होगा। निर्धारण मे तो वृद्धि ही होगी। शकन्धुः, कर्कन्धुः, कुलटा। सीमन्तः केशवेशे, सीमान्तोऽन्यः, मनीषा, हलीषा, लागलीषा, पतञ्जलिः, सारङ्गः पशुपक्षिणोः, साराङ्गोऽन्या, मार्तण्ड.- 'अचोऽन्त्यादिटि' अच् के मध्य मे जो अन्त्य वह आदि है जिसको वह 'टि' कहाता है। 'शकन्ध्वादिषु पररूपं वाच्यम्' वा० से टिभाग (मनीषा-पतञ्जलि मे अस् तथा अत् , अन्यत्र श्र) को गुण होगा।

६ साधनिकासहिता पररूप होगा। 'सीमन्तः केशवशे' वा० से पररूप, 'सीमान्त' यहाँ तो सीमा का अंत अर्थ होने के कारण सवर्णदीर्घ । 'सारङ्गः पशुपक्षिणोः' यहाँ तो पररूप, उत्कृष्टागवाला इस अर्थ मे तो सवर्णदीर्घ । स्थूलोतु , स्थूलौतुः, बिम्बोष्ठः, बिम्बौष्टः, समासे किम् ? तवौष्ठः-'श्रोत्वोष्ठयोः समासे वा' वा० से वैकल्पिक पररूप । 'समासे' कहने से व्यस्त स्थलो मे पररूप नहीं, वृद्धि। शिवायोनमः, शिव एहि-शिवेहि-'श्रोमाडोश्च' अवर्ण से परे अोम्-श्राड के योग मे पररूप । शिव xश्राxइहि इस स्थिति मे धातूपसर्ग का कार्य अन्तरङ्ग होने से सवर्ण दीर्घसन्धि पहले ही नही कर सकते, अतः इस रूप की सिद्धि 'श्राद् गुणः' से नही होगी। किन्तु श्रा-इहि का गुण, अन्तादिवद्भाव से ए मे भाड्त्व । पटत् इति-पटिति । अदिति-'अव्यक्तानुकरणस्यात इतौ' ध्वनि के अनुकरण मे अत् से इति परे रहने पर पररूप एकादेश, अत् को पररूप-इ। 'एकाचो न' वा० से अदिति मे पररूप नही । पटत्पटेति, पटत्पटदिति –'नामेडितस्यान्त्यस्य तु वा' प्रामेडित को पररूप न होगा, अन्त्य तकार मात्र को विकल्प से होगा । 'डाचि बहुल द्वे भवतः' वार्तिक मे बहुल शब्द होने से द्वित्व । 'तस्य परमानेडितम्' से दूसरे बारके कथन को श्रामेडित संज्ञा है। 'झला जशोऽन्ते' पदान्त मे झल को जश्त्व होता है-से त् को द् । दैत्यारिः, श्रीश , विष्णुदया, अचि किम् ? 'कुमारी शेते', अक किम् ? हरये- 'अकः सवर्णे दीर्घः' इस सूत्र की व्याख्या मे 'सवर्ण अच्' आगे रहने पर इसलिये कहा गया कि 'कुमारीxशेते' यहाँ भी कोई सन्धि कार्य न हो। 'नाझलौ' से सावर्ण्य का निषेध केवल वर्णसमाम्नाय (१४ सूत्र) मे श्रूयमाण वर्णो का ही, न कि दीर्घ-ई और शकार का, यतः ग्रहणक ('अणुदित्सवर्णस्य') शास्त्र सावर्ण्य के विधि और निषेध - सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची ('तुल्यास्य' 'नाज्झलौ') के पहले अनिष्पन्न था। सूत्र मे 'अक:' इसलिए कहा गया कि हरे ऐ इस स्थिति मे दीर्घ न प्रसक हो। होतृकार:, होतकारः, होलुकार', होतकारः-'ऋति सवणे ऋ वा'। 'तृति सवर्णेल वा' यहाँ सवर्ण होने से विकल्प से ऋ भी होगा। यहाँ दोनो विधीयमान ऋ-लु नृसिंहवत् विलक्षण है। पक्ष मे 'ऋत्यक:' भी। हरेऽव, विष्णोऽव-'एडः पदान्तादति' पदान्त एड् से अत् परे रहते 'पूर्वरूप । गोअग्रम् , गोऽयम्-'सर्वत्र विभाषा गो' लोक तथा वेद मे एडन्त गो को अत् परे रहते विकल्प से प्रकृतिभाव पदान्त मे। प्रकृतिभाव के विकल्प होने से पक्ष मे पूर्वरूप हो जाता है । चित्रग्वग्रम् , गो-एडन्त-कथन से चित्रगु-अग्रम् को प्रकृतिभाव न होकर यण् । पदान्ते-कहने से गो-अस् (प ए. व.) पूर्वरूप ही हुआ। गवानम् , पदान्ते किम् ? गवि--'अवड् स्फोटायनस्य' अच् परे रहते पदान्त मे गो शब्द को 'अवड्' आदेश विकल्प से होता है । डित् होने से अन्त्य को। 'पदान्ते' क्यो १ गोxडि इस अवस्था मे पाक्षिक भी 'श्रव' आदेश न हो। गवाक्ष --व्यवस्थित विभाषा (कचित् हागा ही, कचित् नहीं होगा) से । गवेन्द्र.-'इन्द्रे च' गो-को इन्द्र परे रहते अवड । एहि कृष्ण ३अत्र गौश्चरति, हरी एतौ, नित्यमिति किम् ? 'हरी एतौ'--'प्लुत- प्रगृह्या अचि नित्यम्' 'लुत और प्रगृह्य अच् परे रहते प्रकृति से रहने है। यहाँ णकार के उत्तरवर्ती अकार 'दूराद्धृते च' से प्लुत है। हरी-एतौ 'इददें'-से प्रगृह्य है । नित्य-'हरी एतौ' श्रादि लक्ष्यो मे 'इकोऽसवणे' से विधीयमान ह्रस्वयुक्त न हो-इसलिये कहा गया है । चक्रि अत्र, चक्रयत्र, पदान्ता इति किम् ? गौयौं-'इकोऽसवर्णे शाकल्यस्य ह्रस्वश्च' पदान्त इक् विकल्प से प्रकृत्या रहेगे असवर्ण अच् आगे रहने पर हस्व भी होगे। अन्यथा यण् । 'पदान्ता' इसलिये कहा गया कि 'गौरी xौ' यहाँ यह ह्रस्वयुक्त प्रकृतिभाव न हो। वाण्यश्वः, पार्श्वम्-'न समासे' वा०, 'सिति च' वा० 'पर्वा णस् वक्तव्यः' वा० से समास मे तथा स-इत् वाला प्रत्यय श्रागे रहने पर भी प्रकृतिभाव नहीं। - , साधनिकासहिता ब्रह्म ऋषि, ब्रह्मषि, पार्छत् , सप्तऋषीणाम् , सप्तर्षीणाम्- 'त्यकः' परे रहते अक् प्रकृत्या होगा । वैकल्पिक प्रकृतिभाव है । यहाँ भी पदान्तवाले अक् । 'पार्छत्' मे 'बा' पदान्तवाला नहीं। समास मे भी यह प्रकृतिभाव होता है। अभिवादये देवदत्तोऽह भोः, आयुष्मानेधि देवदत्त३–'वाक्यस्य टेः 'लुत उदात्तः 'प्रत्यभिवादेऽशूद्रे' शुद्रेतर के विषय मे प्रत्यभिवाद वाक्य के टि-भाग को प्लुत होगा। अभिवादये गार्यह भोः, आयुष्मती भव गार्गि-'स्त्रियाँ न' वा० से प्लुत नही । नेह-आयुष्मानेधि-नाम वा गोत्र का उच्चारण जहाँ हो वही प्लुत होता है-इस विवरण से यहाँ प्लुत नही । आयुष्मानेधि भोः३, आयुष्मानेधीन्द्रवर्मइन् , आयुष्मानेधीन्द्रपालित३-'भो- राजन्य-विशा वेति वाच्यम्' वा०से तीनो स्थलो मे क्रम से ग्लुत । सक्तून् पिब देवदत्त३-दूराद्धृते च' दूर से बुलाने मे टिभाग को ग्लुत । हेश्राम, राम है३–'हैहेप्रयोगे हैहयो.' है-हे- के प्रयोग मे दूरसे बुलाने मे केवल इन्ही को प्लुत होगा। देवदत्त, देवदत्त, देवदत्त३, गुरो. किम् ? वकारात्परस्याऽकारस्य मा भून् , अनृतः किम् ? कृष्ण३–'गुरोरनृतोऽनन्त्यस्याप्येकैकस्य प्राचाम्' दूर से बुलाने मे वाक्य के ऋ से भिन्न अनन्त्य गुरु वर्ण को विकल्प रोप्नुत । 'गुरोः' से 'देवदत्त मे वकारोत्तर अकार को न हो। 'अनृतः क्यो-कृष्ण मे कका- रोत्तरवर्ति ऋ को न हो । 'एकैक' कहने से एक साथ सबको ग्लुत न होकर क्रम से होगा। इस सूत्र मे 'प्राचा' इस प्रकार योग (सूत्र) विभाग किया जाता है । इससे फलत. सभी प्लुत विकल्प से होते है-यह अर्थ हुआ। सुश्लोकःइति, सुश्लोकेति, वत्किम् ? अग्नी३ इति, चिनुहि३ इति, चिनुहीति-- 'अलुतवदुपस्थिते' 'उपस्थिते' = अनार्ष 'इति' शब्द, परे रहते ग्लुत श्रालुतवत् होगा, अतः सन्धि हुई । यहाँ 'वत्' (जैसा) न कहने से अप्लुत का विधान हो जायगा और प्लुत का निषेध होगा तथा च 'प्लुतप्रगृह्या' से विहित प्रगृह्याश्रय प्रकृतिभाव मे 'अग्नी३ इति' इस प्रकार प्लुत का श्रवण ही न होगा, यह अभीष्ट नही है । ।

१२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची चिनु हि३ इदम् , चिनु हीदम्-'ई चाक्रवर्मणस्य' चाक्रवर्मणाचार्य के मत से ई-कार प्लुत अच् परे रहते अप्लुत-सा हो जाता है । अर्थात् सवर्ण- दीर्धादि सन्धि कार्य हो जाता है, 'विभाषा पृट'-से हि प्लुत है। हरी एतौ, विष्णू इमो, गङ्गे अमू , पचेते इमो, 'मणी वोष्ट्रस्येति-'ईदूदेविवचनं प्रगृह्यम्' ई-ऊ-ए-अन्त द्विवचन प्रगृह्य होगा। 'मणी वोष्ट्रस्य लम्बेते' इत्यादि प्रयोगो मे इव-शब्दार्थक वा-अथवा व-शब्द अव्यय समझना चाहिये, न कि इव-शब्द । रामकृष्णावमू प्रासाते, मास्किम् ? अमुकेऽत्र-'अदसो मात्' अदस् के मकार से परे ई-ऊ प्रगृह्य होगे। यहाँ 'मात्' न कहने से पिछले 'ईदू- देत्' सूत्र से एकार की भी अनुवृत्ति होकर 'अमुकेऽत्र' इत्यादि स्थलो मे प्रगृह्यसंज्ञा-प्रकृति भाव हो जायेगे, 'मात्' कहने से अदस् के मकारोत्तर मे कही 'ए' कार होता नही, अतः एकार का अनुवर्तन ही नहीं होगा। अस्मे इन्द्राबृहस्पती--'शे' एकारान्त आदेश (वेदमे) प्रगृह्य होगा । इ इन्द्र', उ उमेशः, प्रा एवं नु मन्यसे, श्रा एवं किन तत्, ईषदुष्णम्-अोष्णम्- 'निपात एकाजना' एक अच् प्राङ् भिन्न प्रगृह्य होता है। 'अनाड्' कहने से अङित् निपातभूत श्राकार ही प्रगृह्य होता है । डित् वाला श्राकार तो प्रगृह्य नहीं है, अतएव थोड़ा गर्म अर्थ मे श्राxउष्णं = प्रोष्णम् ही बनेगा गुण, प्रकृतिभाव नही । डित्-अडित् का संग्रह- ईषदर्थे क्रियायोगे मर्यादाभिविधौ च यः । एतमातं डितं विद्यद्वाक्यस्मरणयोरङित् ।। अहो ईशा:-'श्रोत्' श्रोकारान्त निपात प्रगृह्य है । विष्णो इति, विष्ण इति, विष्णविति,अनार्ष इति किम् ? 'ब्रह्मबन्ध वित्यब्रवीत्- 'सम्बुद्धौ शाकल्यस्येतावना' सम्बुद्धिनिमित्त वाला ओकार अवैदिक इति शब्द आगे रहने पर विकल्प से प्रगृह्य होगा। सूत्र मे 'अना' न कहने पर 'ब्रह्मबन्धोx इति' इस स्थिति मे पाक्षिक प्रकृतिभाव होता। उ इति, विति–'उञ.' उकार को इति परे रहने पर पाक्षिक प्रगृह्य सज्ञा तथा प्रकृतिभाव हो जायगा । पक्ष मे यण् हुआ। न साधनिकासहिता १३ ॐ इति, विति-'ॐ' उञ को इति परे रहने पर दीर्घ अनुनासिक तथा प्रगृह्य ऊँ आदेश विकल्प से होगा । पक्ष मे यण् अथवा प्रगृह्य उही बना रहेगा। किमु उक्तम्, किम्युक्तम्--'मय उओ वो वा' मय से परे रहनेवाले उञ् को अच् परे रहने से व-कार विकल्प से होगा। पक्ष मे "निपात एकाच' से प्रगृह्यता होगी । वकार विधायक शास्त्र त्रैपादिक है-'मोऽनुस्वार' से परे है, अनुस्वार की दृष्टि से वकार विधि असिद्ध है। अर्थात् अनुस्वार नही होगा। सोमो गौरी अधिश्रितः, मामकी तनू इति, अर्थग्रहणं किम् ' वृत्तावान्तरोपसंक्रान्त मा भूत्' वाप्यश्व:-'ईदूतौच सप्तम्यर्थे' सप्तमी के अर्थ मे पर्यवसन्न ई और ऊ प्रगृह्य होगे । यहाँ 'गौरी-तनू' की सप्तमी का 'सुपा सुलु' से लुक् है । 'अर्थ' इसलिये कहा कि समास मे अर्थान्तर से युक्त स्थल मे न हो, जैसे 'वाप्यश्वः' यहाँ वापी शब्द वाप्यधिकरणक द्रव्य का बोधक (लक्षक) है। केवल सप्तम्यर्थ मे पर्यवसन्न नही है। दधि, दधि, अप्रगृह्यस्य किम् ? अग्नी-'अणोऽप्रगृह्यस्यानुनासिक' प्रगृह्यभिन्न अण को अवसान मे अनुनासिक विकल्प से होगा। अप्रगृह्य कहने से 'ईदूदेद' से प्रगृह्य 'अग्नी' यहाँ अनुनासिक न होगा। अच्सन्धि समाप्त। हल्सन्धि प्रकरण हरिश्शेते, रामश्चिनोति, सच्चित् , शाद्भिञ्जय-'स्तोः श्चना श्वः' सकार-तवर्ग को शकार-चवर्ग से योग होने पर शकार चवर्ग होगा। स्-श् तथा स्-च के योग मे स्को श् । त् और न् को चवर्ग से योग मे श्श्रुत्व-च तथा ञ् हुये। विश्नः, प्रश्नः-शात्' शकार से परे रहनेवाले तवर्ग को श्चुत्व (चवर्ग) न होगा। यह अपवाद है, अतएव सकार को शकार से ही और तवर्ग को चवर्ग से ही योग हो-ऐसा यथासंख्याश्रयण अभीष्ट नहीं । रामषष्ठः, रामष्टीकते, पेष्टा, तट्टीका, चक्रिण्ढौकसे-'टुना ष्टु' सकार-तवर्ग को षकार-ट्वर्ग से योग होने पर षकार टवर्ग होगा, स्-ष, स्-ट, प्-त, त्-ट, तथा न्-ढ के योग मे ष्--ट्-ट्-ण हुये। षट सन्तः, षट्ते, पदान्तात् किम्' इट्टे, टोः किम् ? सर्पिष्टमम्-'न पदान्ताटोरनाम्' पदान्त टवर्ग से पर मे रहनेवाले नाम् से अतिरिक्त सकार तवर्ग को सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची ष्टुत्व न होगा । यह भी अपवाद है। सूत्र मे सकार तवर्ग को 'अनाम्' यह विशेषण है। ‘पदान्तात्' यह टवर्ग का विशेषण है। पदान्तात् न कहने पर ईट् ४ ते इस स्थिति मे ष्टुत्व बाधित हो जायगा जो कि अन- भीष्ट है। 'टवर्ग से परे' न कहने से सर्पिप्रतम इस स्थिति मे तकार को टकार न होकर अनिष्ट रूप बनता। षण्णम्, षण्णवतिः, षण्णगर्य:--'अनाम्-नवति-नगरीणामिति वाच्यम्' वा०सूत्र मे नाम के साथ नवति-नगरी शब्द को जोड़ना चाहिये, जिससे नाम् नवति नगरी से भिन्न स्तु को ष्टु न होगा। अर्थात् इन तीनो स्थलो पर ष्टुत्व होगा । प ४ नाम् इस स्थिति मे 'स्वादिष्वसर्वनामस्थाने' से पदसंज्ञा होने से षकार का जश्त्व डकार होने पर 'प्रत्यये भाषाया नित्य' वा० से डकार को (अनुनासिक) णत्व होने पर उससे परे रहनेवाले (१० ब०) नाम् को 'ष्टुना ष्टु.' से ष्टुत्व (ण) होता है । इसी प्रकार षट् ४ नवतिः षट् ४ नगर्यः स्थलो मे भी ष्टुत्व निषेध न होगा। सन्षष्ठ:--'तो. घिः' तवर्ग को षकार आगे रहने पर टुत्व न होगा। यथासख्या- श्रयण न होने से 'टुना ष्टुः से प्राप्त ष्टुत्व का यह निषेध है। अन्यथा सन् x षष्ठः मे न कोण हो जाता। वागीश., चिद्रूपम् --'झला जशोऽन्ते' पदान्त मे झल को जश् होगा। अन्त- वर्तिविभक्ति मानकर वाक्-ईश आदि लक्ष्यो मे पदान्तत्व है। एतन्मुरारि , एतद्मारिः, चतुर्मुखः-'यरोऽनुनासिकेऽनुनासिको वा' पदान्त यर् को अनुनासिक वर्ण पर मे रहने पर विकल्प से अनुनासिक होगा । पूर्वोक्तरीति से पदान्त यर द का अनुनासिक म से योग है, अतः सवर्ण न् अनुनासिक हुआ। स्थान तथा प्रयत्नो से सदृशतम स्पर्श (क से लेकर म तक २५) वर्णो मे लब्धावकाश (कृतकृत्य) यह अनुनासिक-विधि चतुर x मुख इस स्थिति मे रेफ को अनुनासिक णकार नही करेगी। तन्मात्रम्, चिन्मयम्-'प्रत्यये भाषाया नित्यम्' वा लौकिक प्रयोग में अनुनासिक प्रत्यय (मात्रच -मयट ) आगे रहने पर नित्य ही अनुनासिक होगा। कथं तर्हि 'मदोदग्राः ककुमन्तः' इति ?-'मदोदग्राः ककुद्मन्त' (खु.) यहाँ तो ससाधनिकासहिता यवादि गण मे दकारान्त 'ककुद्' का निपात होने के कारण द् को अनुना- सिक नहीं हुअा, अन्यथा नकारान्त का ही निपात करते । तल्लय. विद्वाँल्लिखति-'तोर्लि' तवर्ग को लकार पर मे रहने पर परसवर्ण आदेश होगा। परवर्ण लकार का सवर्ण लकार ही है, दूसरा नही । विद्वान् ४ लि- खति मे नकार को अनुनासिक (यवला द्विधा) लकार ही होगा। उत्थानम्, उत्तम्मनम्-'उदः स्थास्तम्भोः पूर्वस्य' उद् से परे रहनेवाले स्था और स्तम्भु को पूर्वसवर्ण होगा । 'श्रादेः परस्य' से पर के आदि भाग सकार को पूर्व (त्) का सवर्ण, अघोष महाप्राण सकार को उसी प्रकार का थ होगा। 'झरो झरि०' से पाक्षिक लोप । लोपाभाव के पक्ष मे उत्थ्थानम् 'खरिच' इसकी दृष्टि से थकार (उद. स्था०से विहित) असिद्ध है। वागधरिः, वागहरिः-'झयो होऽन्यतरस्याम्' झय के पर मे रहनेवाले हकार को विकल्प से पूर्वसवर्ण होगा। घोष नादवाले महाप्राण-सवृतकण्ठ हकार को उक्तगुण वाला वर्ग चतुर्थ घ डा। तच्छिवः, तशिवः, तच्छलोकेन, तश्लोकेन, अमि किम् ? वाक्श्च्योतति- 'शश्छोऽटि' पदान्त झय से पर मे रहनेवाले शकार को ( उससे आगे) अट् परे रहते छ विकल्प से होगा। तद्-शिव. इस स्थिति मे श्चुत्व से दकार को ज होनेपर 'खरि च' झल् को चर होगा खर परे रहनेपर-से ज को च हुआ । 'छत्वममीति वाच्यम्' वा० तच्४ श्लोकेन यहाँ भी छ हो इसलिये सूत्र मे अट के स्थान मे अम् कहना चाहिए । वाक् च्योतति इस स्थिति मे अम् से अतिरिक्त च आगे होने से छत्व न होगा। हरि वन्दे, पदस्येति किम् ? गम्यते--'मोऽनुस्वार.' मकारान्त पद (हरिम्) का अनुस्वार होगा हल परे रहते । पद न होने से गम्यते के म को अनुस्वार न हुआ। यशांसि, प्राक्रस्यते, झलि किम् ? मन्यते-गम्यते-'नश्चापदान्तस्य झलि' अपदान्त न तथा म को झल् परे रहते अनुस्वार होगा। आगे झल न हे ने से इन दो- मन्यते-गम्यते स्थानो मे अनुस्वार न होगा। अङ्कितः, अनिता, कुण्ठितः, शान्तः, गुम्फितः । कुर्वन्ति-'अनुस्वारस्य ययि १६ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची परसवर्णः अनुस्वार को परसवर्ण होगा यय् परे रहते-से तत्तद्वर्ग का ५वा अक्षर हुअा। कुर्वन्ति यहाँ के न-कारको 'रषाभ्या नो णः समानपदे' से प्रकृत अनुस्वार को बाधकर ण-कार के प्राप्त होने पर 'षाभ्या' से परसवर्ण ('अनुस्वारस्य०' ) के पर होने से णत्व प्रवृत्ति के अवसर पर अनुस्वारस्थानापन्न न-कार के श्रसिद्ध होने के कारण णत्व नही होगा। त्वङ्करोषि-त्वं करोषि, सँय्यन्ता-संयन्ता, सँव्वत्सरः-संवत्सरः, यल्लोकम् यं लोकम्-- 'वा पदान्तस्य' पदान्त अनुस्वार को यय् परे रहने पर परसवर्ण विकल्प से होगा । अनुस्वार को य-व-ल परे रहते विकल्प से अनुनासिक य व ल होगे। सम्राट--'मो राजि समः क्वौ क्विाप्रत्ययान्त राजति पर मे रहने पर सम् के मकार को म ही होगा (अर्थात् 'मोऽनुस्वारः' से अनुस्वार न होगा) । किम् मलयति-किसलयति--'हे मपरे वा' म को पर मे रखनेवाले हकार पर मे रहने पर म् को म् ही विकल्प से होगा। कि य ह्या-किं ह्यः, कि हलयति-किं ह्वलयति,किल हादयति-किंह्लादयति- यवल- परे यवला वेति वक्तब्यम्' वा० य व ल पर मे रहनेवाले हकार पर मे होने पर म् को विकल्प से अनुनासिक य-व् ल होगे । 'यथासख्यमनुदेशः समानाम्' उद्देश्य और विधेय समसख्याक हो तो विधि उद्देश्य-संख्या नियम से ही होगी । (अर्थात् ३ उद्देश्य ३ विधेय हो तब क्रम से १-१, २-२, ३-३, विधि है)। किन्हु ते-किं हूते-'नपरे नः नकार को पर मे रखनेवाले हकार पर मे रहने पर मकार को विकल्प से नकार होगा, पक्ष मे 'मोऽनुस्वार। प्राषष्ठः, प्राक्षष्ठः, प्रापष्टः, सुगण्ठषष्ठः, सुगण्टबष्टः, सुगराषष्ट:-'ड्योः कुक्-टुक् शरि' कार णकारको कुक्-टुक् अागम विकल्प से होता है शर परे रहते । कुक्-टुक (क्-ट) के असिद्ध होने से जश्त्व न होगा (अर्थात् दोनों शास्त्र त्रैपादिक है, उनमे कुक्-टुक् शास्त्र पर है, अतः जश्त्व करने के समय क्-ट नही रहेगे) 'चयो द्वितीयाः शरि पौष्करसादेरिति वाच्यम्' वा अर्थात् पाचो वों के प्रथम अक्षरो को तत्तद्वर्ग के द्वितीय अक्षर पौष्करसादि श्राचार्य के मत से होगे । ख्- वा क्-ट् विकल्प से हुये ।

२ साधनिकासहिता षट्सन्तः, षट्सन्त:--'डः सि धुट्' ड (चा-ट) से पर मे रहनेवाले सकार को विकल्प से धुट् (ध् ) आगम हो। टित् होने से सन्तः के श्राद्यवयव हुश्रा, चव से त् हो गया। सन्सः, सन्सः-'नश्च नकारान्त से पर मे रहने वाले सकार को धुट विकल्प से होगा। पूर्ववत् प्रक्रिया। सन्छम्भुः, सञ्च्छम्भुः, सञ्चशम्भु, सञ्शम्भुः-'शि तुक्' पदान्त नकार को शकार परे रहते विकल्प से तुक् (त्) का आगम होगा। 'शश्लोऽटि' से विकल्प से छ होगा। पक्ष मे 'झरो झरि सवर्णे' से तुक वाले त्-जो श्चुत्व से च बना है-उसका लोप, सर्वत्र न् को श्रुत्व, तुक् छ-च लोप विकल्प । 'अछौ अचछा अचशा अशाविति चतुष्टयम् । रूपाणामिह तुक्छत्वचलोपाना विकल्पनात् ।' इस प्रकार चार रूप बनते है। प्रत्यङ्डात्मा, सुगरणीशः, सन्नच्युतः-'डमो ह्रस्वादचि ङमुगिनत्यम्' ह्रस्व पर मे रहनेवाला जो डम् वह अन्त में है जिस पद का उस से पर मे रहने वाले अच् को डमुडागम (डण न ) नित्य होगा। सँस्स्कर्ता-संस्स्कर्ता-'समः सुटि' सम् को रु होगा सुट् श्रागे रहने पर । 'अलो' से म् को रु होगा, 'अत्रानुनासिकः पूर्वस्य तु वा' इस रु प्रकरण मे रु से पूर्व को अनुनासिक विकल्प से होगा। 'अनुनासिकात्परोऽनुस्वारः' अनु- नासिक के न होने पर रु से पूर्व से पर मे अनुस्वार का आगम होगा। सर्.xस्कर्ता इस स्थिति मे रेफ से पूर्व जो स है उसके पर मे अनुस्वार (संर Xस्कर्ता) होगा। 'खरवसानयोर्विसर्जनीयः' से रेफ को विसर्ग होगा। 'विसर्जनीयस्य सः खर पर मे रहते विसर्ग को स होगा। इसके अपवाद 'वा शरि' से विसर्ग विकल्प होगा। इस सूत्र से पाक्षिक विसर्ग के श्राने पर-'संपुंकाना सो वक्तव्यः' वा० सम् पुम् कान् इनके विसर्ग को सकार होगा। 'समो वा लोपमेके' इस भाष्य के अनुसार सम् के मकार को लोप विकल्प से होगा। लोप का भी रुप्रकर णस्थ होने से अनुस्वार-अनुनासिको से एक सकारवाला २ रूप । रुत्वपक्ष मे २ सकारवाला । वहाँ भी 'अनचि च' से सकार द्वित्व होने पर ३ सकारखाला २ रूप । अनुस्वार से पर मे १८ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची रहनेवाले सकार को द्वित्व 'अनचि च' से । अनुनासिकवाले १-२-३ सकारवाले रूपो मे 'शरः खयः' से खय् (क-कार ) का द्वित्व होने पर ६ रूप (अनुम्वारवाले रूपों मे अनुस्वार का भी द्वित्व होने पर १२ । २ अनुस्वार-३, १ अनुस्वार ३, इन ६ का क द्वित्व से १२ । अनुनासिकपक्षे ६।) इस प्रकार १८ का तद्वित्व होने पर (अचो रहाभ्या द्वे से) प्रथम तकार को 'यणो मयो द्वे वाच्थे' से पुनः द्वित्व होने पर १ त, रत, ३त, ५४ । 'अणोऽप्रगृ'-से तकारोत्तरवर्ति श्राकार की अनुनासिकता के विकल्प से १०८ रूप होगे। पुस्कोकिल-पुंस्कोकिलः, पुंस्पुत्र-पुंस्पुत्र:--'पुम खय्यम्परे' अम् परवाला खय् परे रहते पुम् को रु होगा। अनुनासिकादि । 'सम्पुम्'-से स । पुंक्षीरम्-'अम् परवाला खय्' कहने से 'क्षीरं' मे क-रूप खय् अम् परवाला (ष-अम् मे नही) नही, रु न हुआ । 'मोऽनुस्वारः' से अनुस्वार । पुंदासः–'खय् परे'-कहने से यहाँ रु न हुअा, अनुस्वार, द खय् नहीं । पुंख्यानम्-'ख्यानादेशे न' वा० ख्याञ् आदेश ('चक्षिडः ल्याज) पर मे रहते पुम् के म को रु नहीं । अनुस्वार । शाह्नि श्छिन्धि, शाङ्गिश्छिन्धि, चक्रि स्त्रायस्व, चक्रि स्वायस्व । 'नश्छव्यप्रशान्' अम् परवाला छव् परमे रहते नकारान्त पद को रु होगा, प्रशान्-शब्द को रु नहीं-से शान्-िचक्रिन् के न को रु, अनुनासिक अथवा अनुस्वार, रु को विसर्ग, विसर्ग को स, स को श्चुत्व से शकार । 'चक्रिन्'-मे श्चुत्व मात्र नहीं। पद को' कहने से हन्ति के न को रु नही हुआ। 'हन्' पद नही । सन्सरु:-'श्रम् परवाला छव' पर मे न होने से 'सन्' के न को रु नही । सरु -खड्ग की मूठ। प्रशान्तनोति-सूत्र मे 'अप्रशान्' कहने से प्रशान् के न को रु नही । न पाहि-न पाहि, न: पाहि,-नृ पाहि, नृन्पाहि-'नृन्पे' नृन् के न को रु विकल्प से होगा पकार परे रहते । रु, अनुनासिक अथवा अनुस्वार, 'खरवसा'-से रेफ , को विसर्ग, 'कुप्वो पौ च' कवर्ग तथा पवर्ग NE साधनिकासहिता १६ (कख, पफ) परे रहते विमर्ग को क्रम से जिह्वामूलीय तथा उपध्मानीय(-) होगे सूत्र मे 'च' कहने से विसर्ग भी। वासः क्षौमम्-'कु'वो.'-यह विधि इस विसर्ग को "विसर्जनी' से सत्वविधि का ही अपवाद है, न कि 'शरि विसर्जनीय.' से विधीयमान (उदाहरण मे के) विसर्ग का, यत 'येन नाप्राप्ते यो विधिरारभ्यते स तस्यापवादः' जिसकी अवश्य प्राप्ति मे जे प्रारभ किया जाता है वह उसीका बाधक है-प्रकृत स की प्राप्ति मे 'कु'वो'-स को ही वाधता है । काँस्कान् कांस्कान् कस्कः कौतस्कुतः सर्पिष्कुण्डिका धनुष्कपालम्-'कानामेडिते' कान् के नकार को रु होगा आमेडित (तस्य परमामेडित) परे रहते-से न को रु, 'सम्पुकाना' से रु को स, अथवा 'कस्कादिषु च' कस्कादि गण मे इण् से पर मे विसर्ग को ष, तथा प्रकार से परे विसर्ग को स होगा- से स-प । कम्कादि आकृति गण है। विकल्प से अनुनासिकानुस्वार । स्वच्छाया, शिवच्छाया-'छे च' ह्रस्व को छकार परे रहते तुक् आगम हो संहिता (परः सनिका) मे-से तुक्, कित् अन्तावयव, श्चुत्व इसकी दृष्टि से असिद्ध (८-४-४०) है, अतः जश्त्व से द अनन्तर 'खरिच' असिद्ध होने से पूर्व मे श्चुत्व से ज, ज को चर्व से च । श्चुत्व असिद्ध होने से 'चोः कु. से कुत्व नहीं। आच्छादयति, माच्छिदत्-'अाङमाडोश्च' श्राङ् तथा माङ् (श्रा-मा) को छ परे रहते तुक् होगा। पदान्ताद्वा' से विकल्प का यह अपवाद है। पूर्ववत् जश्त्वादि । चेच्छिद्यते-'दीर्घात्' दीर्घ से छ परे रहते तुक् होगा । यह दीर्घ को ही होगा, 'सेनासुराच्छाया-ही ज्ञापक है, सूत्र ही मे छ को तुक होता तो छ को 'खरि च' से चर्व होकर 'चाया' बन जाता । लक्ष्मीच्छाया-लक्ष्मीछाया-'पदान्ताद्वा' दीर्घ पदान्त से छ परे रहते विकल्प से तुक् होगा। जश्त्वादि पूर्ववत् । इति हल्संधि ॥ अथ विसर्गसन्धि । विष्णुस्वाता-विष्णु-सु, 'ससजु'-से रु, "खरवसा से विसर्ग, 'विसर्जनीयस्य सः' से स । २० सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची कः सरु:, 'घनाघनः क्षोमणश्चर्षणीनाम्'-'शारे विसर्जनीयः' शर् को पर मे रखने वाले खर परे रहते विसर्ग को विसर्ग ही होगा। दोनो स्थान मे स-क्ष शर्परक खर है। सत्य तथा जिह्वामूलीय (क्रम से) नही । हरि शेते हरिश्शेते-'वा शरि' शर् परे रहते विसर्ग को विसर्ग ही विकल्प से होगा-पक्ष मे विसर्ग को 'विसर्जनी'-से स, श्चुत्व । राम स्थाता, रामः स्थाता, हरि स्फुरति, हरिः स्फुरति-'खपरे शरि वा विसर्ग- लोपो वक्तन्य.' वा. खर को पर मे रखने वाले शर परे रहते विकल्प से विसर्गलोप होगा। 'स्था स्फु' खर्परक शर हैं । लोपाभावपक्ष मे 'वा शरि' से विसर्ग करने पर सविसर्ग एक सकार वाला, विसर्ग को स होने (विसर्जनीयस्य सः) पर दो सकार वाला-इस प्रकार ३ रूप होते है। कः करोति का करोति, क खनति कः खनति, क पचवि क. पचति, का- फलति का फलति-कुवो के पौच' से जिह्वामूलीयोपन्मानीय तथा 'च' से पाक्षिक विसर्ग है। पयस्पाशम् यशस्कल्पम् यशस्कम् यशस्काम्यति-'सोऽपदादौ' विसर्ग को स होगा अपदादि क-पवर्ग परे रहते, 'पाश-कल्प-क-काम्येष्विति वाच्यम्' वा० ये चार परे रहते स होगा | पाश-क निन्दार्थक है । ईषद् असमाप्त मे कल्प है। काम्यच् कृत् है । प्रातः कल्पम्-'अनव्ययस्येति वाच्यम्' वा० स अव्यय के विसर्ग को न होगा। प्रातर अव्यय है। गी। काम्यति-'काम्ये रोरेवेति वाच्यम्' वा० काम्य प्रत्यय परे रहते रु-स्था- निक विसर्ग को ही स होगा। यहाँ गृ धातु को इत्व-रपर जो हुआ है उस रेफ का विसर्ग है। सर्पिष्पाशम् सर्पिष्कल्पम् सर्पिष्कम् सर्पिष्काम्यति-'इणः ष' इण से परे विसर्ग को उपर्युक्त विषय मेष होगा । स नहीं । नमस्करोति, नम करोति, नमः करोति । पुरस्करोति-'नमस्पुरसोर्गत्योः' गति संज्ञक नमस् पुरस् के विसर्ग को कवर्ग पवर्ग परे रहते स होगा । 'साक्षा- प्रभृतीनि च' 'विभाषा कृषि' कृ के योग मे नमस विकल्प से गति है। पक्ष मे जिह्वामूलीय । 'पुरोऽव्ययम्' से पुरस को नित्य गतिराशा है ।

" साधनिकासहिता २१ पू: पुरौ पुरः प्रवेष्टव्याः-गति नहीं है, विसर्ग को स न हुश्रा। निष्प्रत्यूहम् आविष्कृतम् दुष्कृतम्-'इदुदुपधस्य चाप्रत्ययस्य' इ उ उपध (अलोऽन्त्यापूर्व उपधा) वाले प्रत्यय भिन्न विसर्ग को ष होगा । अग्निः करोति, वायुः करोति,--'अप्रत्ययस्य' कहने से सुप्रत्ययवाले विसर्ग को ष नहीं। मातुः कृपा--'एकादेशशास्त्रनिमित्तकस्य न षत्वम् ,' (कस्कादिषु भ्रातुष्पुत्रस्य पाठात् ) वा० एकादेश वाले के विसर्ग को पन हो-'ऋत उत्' से उ ऋ तथा अ के स्थान मे एकादेश है। अन्यथा 'भ्रातुष्पुत्र' शब्द को कस्कादि गण मे षत्व के लिये नहीं पढते, 'इदुद-से ही ष हो जाता। मुहुः कामा - 'मुहुस प्रतिषेधः' से ष का निषेध हो जाता है। तिरस्कर्ता तिरः कर्ता-'तिरसोऽन्यतरस्याम्' तिरस् के विसर्ग को स विकल्प से होगा क-4 वर्ग परे रहते। द्विष्फरोति-द्विः करोति-'द्विस्त्रिश्चतुरिति कृत्वोऽर्थे' कृत्योऽर्थ (१बार रबार आदि) में विद्यमान द्वि-त्रि-चतुर के विसर्ग को ष विकल्प से होगा। चतुष्कपाल:-'कृत्वोऽर्थे' कहने से यहाँ विकल्प न होकर 'इदुदु- से नित्य ष। सर्पिष्करोति सर्पि. करोति, धनुष्करोति धनुः करोति-'इसुसोः सामर्थ्य' इस् उस् के विसर्ग को घ विकल्प से होगा अपेक्षा मे। तिष्ठतु सर्पिः, पिब त्वमुदकम् -'सामर्थे' ( अपेक्षा मे ) कहने से यहॉ सर्पि को पिब की अपेक्षा न होने से प न हुआ। सर्पिप्कुण्डिका धनुष्कपालं-'नित्य समारोऽनुत्तरपदस्थस्य अनुत्तर पदवाले इस् उस् सम्बन्धी विसर्ग को समास मे नित्य ष होगा। परमसर्पि:कुण्डिका-अनुरपदस्थ-कहने से यहाँ उत्तरपदस्थ विसर्ग को ष नहीं। अयस्कारः, अयस्कामः, अयस्कंसः, अयस्कुम्मः, अयस्पात्रम्, अयस्सहिता कुशा-अयस्कुशा, अयस्कर्णी-'अतः कृकमिकसकुम्भपात्रकुशाकर्णीष्वनव्ययस्य' अकार से पर मे रहने वाले अव्यय से भिन्न, उत्तरपदस्थ न हो-ऐसे विसर्ग को समास मे नित्य ही सकारादेश होगा कृ-कमि-कंस-कुम्भ-पात्र-कुशा- कर्णी शब्द पर मे रहने पर ।

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची गी:कार:--सूत्र मे 'अत:' कहने से कृ का रूप धागे होने पर भी स न हुआ। स्वः कामः-'अनव्ययत्य' से यहा (स्व अव्यय है) स नही । यशः करोति- समास मे' कहने से यहाँ स न हुआ। परमयश.कार:-उत्तर पदस्थ न हो-कथन से प्रकृत विसर्ग को स नहीं। अधस्पदम्, शिरस्पदम्-'अधश्शिरसी पदे' अध और शिर शब्दो के विसर्ग को स होगा पद-शब्द पर मे रहने पर। अधः पदम्, शिरः पदम्-उक्तसूत्र मे भी समास मे ही सत्व-विधि है, अतः यहाँ स न हुआ। परमशिरः पदम्-अनुत्तरपदस्थ विसर्ग ही को स है; न कि उत्तरपदस्थ को। भास्कर:-'अतः ' सूत्र से ('अतः' से तपरग्रहण है ) स न होने के कारण इस शब्द को कस्कादि गण मे पाठ किया गया। इति विसर्गसन्धि । शिवोऽर्य --'स्वौजस' इत्यादि से सु-प्रत्यय लाने पर 'शिवस् अर्यः' स्थिति मे 'ससजुपो रुः पदान्त स को एव सजुप शब्द को भी रु होगा। 'झला' से जश्त्व का अपवाद है। 'अतो रोरप्लुताद'लुते' प्लुत से भिन्न अत् (तपरग्रहण) से परे रहने वाले रु को उ होगा 'लुत से अतिरिक्त ह्रस्व अकार पर मे रहने पर। ('भोभगो' से प्राप्त यत्व का अपवाद है) रुत्व को उद्देश्य बनाकर उत्व की विधि-सामर्थ्य से उत्व के प्रति रुत्व की असिद्धि ( त्रैपादिक होने से ) नही होती। शिव उ अर्च्य बनने पर 'प्रथमयोः पूर्वसवर्ण:' अक् को प्रथमाद्वितीया सम्बन्धि अच् पर रहते पूर्वसवर्ण दीर्घ एकादेश होगा-की प्राप्ति मे 'नादिचि' अवर्ण से इच् परे रहते पूर्वसवर्ण दीर्घ न होगा। 'श्राद्गुणः' से गुण-श्रो करने पर 'एड. पदान्ता'-से पूर्वरूप । देवा अत्र--'अता रो' मे तपरग्रहण होने से उ न हुआ, किन्तु 'भोभगो' से यत्व, 'लोपः शाक'-से यलोप । श्व आगन्ता-'अति' मे तपर होने से उत्व नही, वही यत्व-यलोप । एहि सुस्रोत ३ अत्र स्नाहि-सुस्रोतस् सान्त शब्द है, 'दूराद्धू' से विधीयमान प्लुत के असिद्ध (पादिक) होने से रु (सुस्रोतस् के स-स्थानिक) अत् से परे है, 'अग्लुतात्' विशेषण सामर्थ्य से अब प्लुत की असिद्धि नही मानी जायगी। तपरग्रहण दीर्घ को हटाकर ही शान्त हो जाता है, प्लुत को नहीं हटाता ।

साधनिकासहिता तिष्ठतु पय अ३ ग्निदत्त-'अप्लुते' न कहने पर पयस् के स को रु होने के बाद उस रु को उ हो जाता, यहा 'गुरोरनृतो' से अकार 'लुत है । शिवो वन्द्यः-'हशि च' अप्लुत अत् से पर मे रहनेवाले रु को उ होगा हश् पर मे रहने पर-शिवस्-के स को रु, उ, गुण । प्रातरत्र, भ्रातर्गच्छ---रु मे उ-अनुबन्ध (इत्) वि शष्ट का ग्रहण होने के कारण इन दोनो रेफो ( प्रातर-भ्रातर ) को उ नही। देवा इह, देवायिह–'देवास् इह' स्थिति मे स् को 'सस'-से रुत्व, 'भोभगो- अघोअपूर्वस्य योऽशि' भो-भगो-अघो-अ पूर्ववाले रु को य आदेश होगा अश् पर मे रहते । लोपश्शा'-से विकल्प से यका लोप । देवास्सन्ति-'अशि' कहने से यहाँ देवास् के स के रु को य न हुअा। किन्तु विसर्ग वा सत्व । ( यद्यपि यहाँ यत्व प्रसिद्ध होने से 'खरव'-से विसर्ग हो जाता है, अत 'अम्' कहने की आवश्यकता नही, तथाऽपि उस विसर्ग को स्थानिवद्भाव से रु मानकर यत्व हो ही जायगा। यह अल्विधि नही है, उकारविशिष्ट रेफ समुदाय का ग्रहण होने से स्थानिवद्भाव होगा ही)। भो अच्युत मोयच्युत-भोस् भगोस् अघोस्-सकारान्त निपात है, स को रु, रु को य करने पर 'व्योलघुप्रयत्नतरः शाकटायनस्य' पदान्त वकार-यकारो को लघूच्चारण व-य विकल्प से होगे अश् परे रहते । जिसके उच्चारण मे जीभ के अग्रभाग मध्य एवं मूल आदि ढीले हो जाते है वे लघूचारण है। 'श्रोतो गार्ग्यस्य' अोकार से परे पदान्त अलघुप्रयत्नवाले यकार का नित्य ही लोर होगा। अलघु पक्ष मे य-लोप। लघुप्रयत्न पक्ष मे यकार घटित। तोयम्-'पदान्त' कहने से यहाँ के य का लोप नहीं। स उ एकाग्नि:--'उनि च पदे' अ-से परमे रहने वाले पदान्त यकार वकार का लोप होगा उञ् परमे रहने पर । सस् ४उ, सरु ४ उ, सय ४ऊ, स उ, ('ससजुषो रु:' 'भोभगो अघो अपूर्वस्य')। तन्त्रयुतम्-सूत्र मे 'पदे' कहने से 'तन्त्र उतं' को अय् श्रादेश, यहाँ य का लोप न होगा । 'उत' वेञ् धातुका 'वचिस्वपि' से सम्प्रसारण उ होने पर सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची बना हुश्रा रूप है । यदि प्रतिपदोक्त चादि पठित उञ् ही का ग्रहण अभीष्ट 'है तो 'पद' डमो ह्रस्वात्-सूत्र के लिये है । भो देवाः, भो लक्ष्मि, भो विद्वद्वन्द, भगो मनस्ते, अघो याहि, देवा नम्या', देवा यान्ति–'हलि सर्वेषाम्' भो-भगी-अघो तथा प्रकार से परमे स्थित लघूच्चारण व अलघूच्चारण यकार का लोप होगा हल परे रहते सभी प्राचार्यों के मत से। 'भो भगो' से रु के स्थानापन्न य का इससे लोप हुआ। देवायिह, देवा इह-हल परे रहते-कहने से यहाँ नित्य य-लोप न हुआ। किन्तु 'लोपः शाक'-से पाक्षिक लोप हुश्रा। अहरहः, अहर्गणः-'रोऽसुपि' अहन को रेफादेश होगा सुप आगे न रहने पर। 'अहन्' से विधीयमान रु का अपवाद है। 'नित्यवी'सयोः' से द्वित्व, अहन् अहन्, रत्व, 'स्वमोनपुंसकात्' से सु-लुक् द्वितीय न् को 'अहन्' से रुत्व, 'खरवसा' से विसर्ग । 'अह्ना गणः' अहन् ('सुपो धातु' से लुक्) केन को रत्व । अहोभ्याम्-'असुपि' कहने से यहाँ रेफ न होकर 'अहन्' से रुत्व, 'हशि च' से उत्व, गुण। अहोरूपम् , गतमहो रात्रिरेषा-'रूपरात्रिरथन्तरेषु रुत्व वाच्यम्' अहन को रुत्व होगा रूप-रात्रि-रथन्तर परे रहते-से रुत्व, उत्व-गुण पूर्ववत् । अहोरात्रः अहोरथन्तरम् -एक देशविकृत (रात्रि) होने पर भी अभिन्नता मानकर रुत्व, उत्व गुण । रथन्तर=सामविशेष है। अहर्पतिः गीपतिः धूप॑तिः-'अहरादीना पत्यादिषु वा रेफ: वा० से विकल्प से रेफ, पक्ष मे 'कुग्योः' से विसर्ग-उप-मानीय । पुना रमते, हरी रम्य , शम्भू राजते-रो रि' रेफ का रेफ परे रहते लोप होगा- से 'पुनर हरिर शम्भुर' का रेफ लोप, 'दलोपे पूर्वस्य दीर्घोऽणः' ढ-र को लोप करने वाले (ढ-र) अक्षर परे रहते पूर्व अण् को दीर्घ होगा- से ३ना स्थलो मे दीर्घ । तृढः, वृढः-'श्रणः' कथन से 'तृद-ढः, वृढ-ढः' यहाँ ऋ को दीर्घ नही । (तृहू-वृहू धातु हिंसा-उद्यम अर्थवाली है, उससे 'क्त' करने पर 'हो ढः' से साधनिकासहिता २५ ढत्व, 'झषस्त'-से त को ध, ध को ष्टुत्व से ढ, 'ढो ढे' से पूर्व ढका लोप करने पर ये रूप बनते है।) अजर्घाः, लीढः-'पूर्व' कहना उत्तर पद न होने पर भी पूर्नमात्र को दीर्घार्थ है। (गृधु अभिकाक्षायाम् के यड् लुगन्त लड् के म० पु० ए०व०) यहाँ अजर्घर र स्थिति मे 'रोरि' से पूर्व रेफ लोप होने पर दीर्घ हुआ, २रा 'लिह. श्रास्वादने' के क्त प्रत्यय का रूप है। मनोरथः-मनस् रथ:-यहाँ 'सस'-से रु, तदनन्तर 'हशि च' से उ तथा 'रो रि' से रेफ लोप की भी प्राप्ति होने पर 'विप्रतिषेधे पर कार्यम्' समबल वाले शास्त्रो मे विरोध आने पर, बाद के शास्त्र का कार्य होना चाहिये-से र-लोप प्राप्त होने पर 'पूर्वत्रासिद्ध' से 'रोरि' (८-३-१४) के असिद्ध होने से उत्व तथा गुण हुश्रा । एष विष्णुः, स शम्भुः-'एतत्तदोः सुलोपोऽकोऽरनसमासे हलि' ककार रहित एतद्-तत् शब्दों का जो 'सु' उसका लोप होगा हल पर मे रहने पर, किन्तु नञ्-समास मे नही-से दोनो स्थलो मे सु का लोप हुआ। एषको रुद्र:-'अकोः' से ककारयुक्त एतत् के सु-लोप न होकर 'सस'-से रु, 'हशि च से उत्व, गुण । असशिशव:-'अनसमासे' इस निषेध के कारण स् को 'स्तो:'-से श्रुत्व हुश्रा। एषोऽत्र-'हलि' से अच् श्रागे रहने पर लोप न हुश्रा, रुत्व 'अतो रो-से उत्व, गुण तथा पूर्वरूप हुश्रा । सेमामविद्धि-'सोऽचि लापे चेत्पादपूरणम्' सस्- शब्द के सु का लोप होगा अच् परे रहते यदि लोप होने पर ही पाद पूर्ण होता हो-से सु का लोप होकर स-इमाम मे गुण हुआ। सैष दाशरथी राम:-यहाँ भी सु-लोप होकर स-एष मे वृद्धि हुई । स इत्तेति, स एवमुक्त्वा-'लोपे चेत्' कथन से पादपूरणार्थ यहाँ लोप अनपेक्षित होने से सन्धि न हुई । यहाँ तो सु को रुत्व, 'भोभगो' से यत्व, 'लोपः शा-से य-लोप हुआ। 'सोऽहमाजन्म-शुद्धानां'-'लोप होने पर ही इस अवधारण के कारण यहाँ तत्- १ २६ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची शब्द का सुलोप न होकर सु का रुत्व 'अतोरो' से उत्व, 'श्राद्'-से गुण 'एड.' से पूर्वरूप हुआ । पञ्चसन्धि समाप्त ।' अजन्त पुंल्लिङ्ग रामः-राम-शब्द अनेकार्थक है 'गन्धर्व शरभो रामः' अमर से पशुविशेप का वाचक राम शब्द अवयवार्थ (अव्युत्पन्न) रहित है। तव 'अर्थवदधातु- रप्रत्ययः प्रातिपदिकम्' धातु-प्रत्यय-प्रत्ययान्त वर्जित तथा अर्थवान् शब्द प्रातिपदिक कहाता है-से प्रातिपदिकसज्ञा, ततश्च सुबुत्पत्ति । जब कि 'रमन्ते योगिनोऽस्मिन्निति' अर्थ मे अधिकरण मे घञ् करने पर-'कृत्तद्धि- तसमासाश्च' कृदन्त तद्धितान्त और समास भी प्रातिपदिक है-से प्राति- पदिक संज्ञा । प्रातिपदिक राम शब्द से प्रथमा एकवचन की विवक्षा मे राम-सु इस स्थिति मे 'उपदेशेऽज'-से उ की इत्सज्ञा 'तस्य लोपः' से लोप, स् को 'ससजु'-से रुत्व, 'खरवसा'-से विसर्ग। रामौ-राम शब्द से प्र. द्वि० व० की विवक्षा में 'राम राम औ' इस अवस्था मे 'सरूपाणामेकशेष एकविभक्तौ' एक विभक्ति मे जो समान रूप अनेक है उन मे से एक ही बचेगा-से 'राम औ' बनने पर 'प्रथमयोः पूर्वसवर्ण.' अक् को प्रथमा द्वितीया सम्बधि अच् परे रहते पूर्वसवर्णदीर्घ एकादेश होगा-की प्राप्ति होने पर, 'नादिचि' अवर्ण से इच् परे रहते पूर्वसवर्ण दीर्घ न होगा-से निषेध, 'वृद्धिरेचि' से नृद्धि । रामा:-राम शब्द से प्र० ब० व०, राम-जस् , 'चुटू' प्रत्यय के श्रादि के च- ट-वर्ग इत् होते है-से ज की इत्सज्ञा-लोप, 'न विभक्तौ तुस्मा. विभक्ति स्थित तवर्ग स तथा म इत् नही होते है-से स् को 'हलन्त्य' से इत्त्व नही, 'राम-अस्' इस स्थिति मे 'अतो गुणे' यह शास्त्र 'पुरस्तादपवादा अनन्तरान् विधीन् बाधन्ते नोत्तरान्' परिभाषा-पहला अपवाद अव्यवहित आगे की विधियो का बाधक है, न कि उस से भी आगे का-से 'अक: सव'-का ही बाधक है, न कि 'प्रथमयोः'-का। अतः-पूर्वसवर्णदीर्घ, स् को रुत्व-विसर्ग। हे राम हे रामौ हे रामाः-'एकवचनं सम्बुद्धि.' प्रथमा के एकवचन को सम्बोधन कहते है-'एड् हस्वात् सम्बुद्ध एडन्त तथा ह्रस्वान्त अङ्ग से साधनिकासहिता परे हल का लोप होता है, यदि वह सम्बुद्वि सम्बन्धी हो, से 'रामस्' मे स् का लोप । और २ वचन पूर्ववत् है। हे कतरत् (कुल-एडन्त और हम्वान्त-ये दोनो ( 'सम्बुद्धि' से पाक्षिप्त ) अंग का विशेषण हैं, अतः यहाँ कतर् शब्द से सुको 'अद्ड् डतरादि.' से 'अत्' अादेश विहित हुश्रा है। ह्रस्वान्त अग से आदेश न होने से त्- का लोप न होगा। हे हरे, हे विष्णो,–'एङन्त' न कहने से यहाँ पर, पर और नित्य होने से 'हस्वस्य गुणः' से गुण (ए-श्रो) करने पर हस्व से 'सु' पर न रहा तो उसका लोप न होता । रामम्-द्वितीयैकवचन मे 'राम-अम्' इस स्थिति मे 'श्रमि पूर्व.' अक् से अम् सम्बन्धि अच् परे रहते पूर्वरूप एकादेश होगा-से पूर्व (म-मे-के अ-का) रूप होगा। रामौ रामान्--द्वि००वचन मे राम-शस् इस अवस्था मे लशक्वतद्धिते' तद्धित से अतिरिक्त प्रत्ययों की श्रादि मे रहने वाले ल-श-कवर्ग इत् ( लोप होने वाले ) होते है। राम-अस् बनने पर 'प्रथमयो' से पूर्वसवर्ण दोर्ष, 'तस्माच्छसो नः पुंसि' पूर्वसवर्ण दीर्घ करने पर जो शस् का स उसको न होगा-से न् , 'अटकुप्वाड्नुम्व्यवायेऽपि' अट् कवर्ग पवर्ग श्राङ् नुम् इन -जो कि व्यस्त (पृथक-पृथक ) तया यथासम्भव सम्मिलित-से व्यववान ( रुकावट) होने पर भी र-प से पर मे स्थित न को ण होगा-से णत्व प्राप्त होने पर 'पदान्तस्य' पदान्त न को ण न होगा-से निषेध । रामेण-'यस्मात्प्रत्ययविधिस्तदादि प्रत्ययेऽङ्गम्' जो प्रत्यय जिससे विधीयमान हो तदादि ( वह आदि है जिसका) शब्द स्वरूप उस प्रत्यय श्रागे रहने पर 'अंग' कहाता है। विकरणविशिष्ट (भव-भविष्य) की भी 'श्रङ्ग' संज्ञा के लिये 'तदादि' कहा । 'स्त्री इयती' यहाँ स्त्री शब्द से 'इयत्' प्रत्यय परे रहते 'स्त्रियाः' से अङ्गकार्य 'इयङ' न हो-इस लिये 'विधि' कहा, अब तो 'इदम्' को 'किमिद-' से बतुप का विधान है। प्रत्ययविशिष्ट अथवा उससे भी अधिक की अङ्ग सज्ञा न हो इसलिये 'प्रत्यये (परे रहते ) कहा।

२८ सिद्धान्तकौमुदी प्रयोगसूची 'टाडसिडसामिनात्स्याः' अकारान्त अङ्ग से परे 'टा-डसि-डस्' को 'इन आत् स्य' होगे-से राम-इन, गुण, 'श्रट .' से णत्व । रामाभ्याम्-तृ० द्विव०-राम-भ्याम्-'सुपि च' यादि सुप् परे रहने पर अदन्त अङ्ग को दीर्घ हो-से दीर्घ । रामैः-राम-भिस्-'श्रतो भिस ऐस्' अकारान्त अङ्ग से परे 'भिस्' को 'ऐस्' होगा-से ऐस् ( अनेकाल है सर्वादेश) करने पर वृद्धि, रुत्व-विसर्ग। रामाय रामाभ्याम् रामेभ्यः-राम-डे-श्रवस्था मे 'डेयः' अदन्त अङ्ग से परे डे को 'य' श्रादेश होगा, 'सुपि च' से दीर्घ । य को स्थानिवद्भाव से सुप्त्व । 'कष्टाय क्रमणे' आदि निर्देश से सन्निपातपरिभाषा ('जो जिसके अाश्रय से अस्तित्व पाता है वह उसका विघातक नहीं होता' प्रकृत य अदन्त अङ्ग के आश्रय से आकर उसी अदन्त को श्रादन्त नही बना सकता है ) अनित्य मानी जायगी। राम-भ्यस् स्थिति मे 'बहुवचने झल्येत्' झलादि बहुवचन सुप् परे रहने पर अदन्त अङ्ग को एकार होगा-से एत्व, स्को रुत्व-विसर्ग । राम-स् , राम-स्य, इत्यादि स्थलों मे ए न हो इसलिए 'बहुवचने' कहा। रामाणाम्-यहाँ 'राम-श्राम् वा राम-नाम्' स्थिति मे ए न हो इसलिये 'झलि' कहा । 'पच-ध्वम्' यहाँ ए न हो इसलिये 'सुप् परे' कहा। रामाद्-त् रामाभ्याम् रामेभ्यः-राम-डसि, 'टाडसि' से श्रात् , सवर्णदीर्घ 'झला जशो' से जश्त्व । 'वाऽवसाने' अवसान ( श्रागे वर्ण का अभाव ) मे झल को विकल्प से चर् होगा-से त् । 'अनचि च' से त्-द् द्वित्व विकल्प । रामस्य-राम-डस् 'टाङ-' से स्य, 'अनचि च' सद्वित्व । 'खरि च' से (पहले स को) चवं करने पर भी अल्पप्राण होने से 'त' न होकर अान्तरतम्य (सादृश्य) से 'स' ही होगा। रामयोः-राम श्रोस् , 'ओसि च' श्रोस् परे रहते भदन्त अड्ग को एकार होगा-से रामे-अोस् , अयादेश, रुत्व विसर्ग। रामाणाम्-राम-श्राम् , 'हस्वनद्यापो नुट्' ह्रस्वान्त नद्यन्त तथा श्रावन्त अड्ग से परे अाम् को नुट् आगम होगा-'श्राद्यन्तौ टकितौ' से टित् साधनिकासहिता होनेके कारण श्राद्यवयव । राम-नाम् , 'नामि' नाम् परे रहते अजन्त अडग को दोर्घ होगा । 'अट्'-से णत्व । संनिपातपरिभाषा के कारण पर होने पर भी 'सुपि च' से दीर्घ नही। यहाँ तो श्रारभसामर्थ्य से परिभाषा अनित्य है। रामे-राम x डि, 'लशक्व'-से डकार की इत्सज्ञा, लोप, गुण । रामयोः, रामेषु-राम सुप् , 'हलन्त्य' से पलोप, 'बहुवचन' से एत्व, 'अपदान्त- स्य मूर्धन्य!' 'इएकोः' तथा 'श्रादेशप्रत्यययोः' इण कवर्गों से परे पदान्त से भिन्न श्रादेश तथा प्रत्ययावयव जो सकार उसे मूर्धन्य (ष) आदेश होगा-से षत्व । ‘इएकोः' कथन से 'रामस्य' मे षत्व न हुश्रा । 'श्रादेश- प्रत्यययो.' कथन से 'सुपीः सुपिसौ सुपिसः' मे धातु (पिस गतौ) सम्बन्धि स कोष न हुअा। 'अपदान्तस्य' कथन से 'हरिस्तत्र' मे स कोष न हुआ। परमसर्वत्र-परमभवकान्-'सर्वादीनि सर्वनामानि' सर्व आदि है जिसके ऐसे शब्द-स्वरूप 'सर्वनाम' कहाते है। 'द्वन्द्वे च से द्वन्द्व मे संज्ञा निषेध के कारण तदन्त की भी यह संज्ञा होती है यह ज्ञापित होता है, केवल गणपठितों को ही संज्ञा होती तो द्वन्द्व मे प्राप्ति न होने से निषेध व्यर्थ होता ! तथा च उक्त उदाहरणो मे 'सप्तम्यास्त्रल' से सप्तम्यन्त सर्वनाम से विधीयमान त्रल् , 'सर्वनाम्नामकच् प्राक् टे' से अकच भी सिद्ध होते है। सर्वे-(सर्वनामसंज्ञा प्रयुक्त विशेष कार्य वाले रूप ही दिये जाते हैं ) 'जसः शी' अदन्त सर्वनाम से परे 'जस्' को 'शी' होगा। यहाँ 'अनेकाल शित्सर्वस्य' से अनेकाल होने से सर्वादेश । 'अर्वणस्तृ' श्रादि स्थलों मे 'नानुबन्धकृतमनेकाल्वं' इत्सज्ञको को लेकर अनेकाल्त्व न माना जायगा- से यहाँ भी 'शी' अनेकाल नही (श-इत् होने से) हो सकता, ऐसा नही कह सकते, सर्वादेश होने से पहिले 'लशक्व'-से श को इत्सज्ञा होती ही नहीं । गुण। सर्वस्मै-सर्वस्मात्-(द)-'सर्वनाम्नः स्मै' अदन्त सर्वनाम से परे डे को स्मै होगा- से स्मै । 'सिडयोः स्मास्मिनौ' अदन्त सर्वनाम से परे डसि-कि को स्मात्-स्मिन् होगे-से सि को स्मात् हुश्रा ।

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची सर्वेपाम्-सर्व-श्राम् , 'ग्रामि सर्वनाम्न. सुट्' अवर्णान्त से परे सर्वनाम को विहित 'श्राम्' को 'सुट' अागम होगा, टित्त्वात् 'श्राद्यन्तौ-' से श्राद्यवयव, 'बहुवचने-' से एत्व, 'आदेश' से पत्व । सर्वस्मिन्-'डसिडयोः-से डि को स्मिन् । ये ३५ सर्वनाम है-- सर्व, विश्व, उभ, उभय, डतर, इतम, अन्य, अन्यतर, इतर, त्वत् , त्व, नेम, सम, सिम, पूर्व, पर, अवर, दक्षिण, उत्तर, अपर, अधर, स्व, अन्तर, त्यद्, तद्, यद्, एतद्, इदम्, अदम् , एक, द्वि, युष्मद्, अस्मद्, भवतु, किम् । उभको-उभशब्द दो का वाचक है, अत एव नित्य द्विवचनान्त है। उसका यहाँ पर पाठ 'अव्ययसर्व'-से अकच प्रत्ययार्थ है, एक-बहुवचन न होने से 'शी-स्मै श्रादि विशेष कार्य होगे नहीं। ( स्वार्थादि मे) क प्रत्यय करने से यह रूप न होगा-कारण उभ शब्द से क करने पर द्विवचन (ौ) व्यवहित ( क से ) होने के कारण 'उभादु'-से अयच होकर 'उभयको' बनेगा। 'उभयोऽन्यत्र' वार्तिक मे कहा गया कि द्विवचन से अतिरिक्त स्थलो मे-उभयतः, उभयत्र-वत् 'अयच् ' होगा। उभये-उभय शब्द को द्विवचन नही-है, ये दो मत है ( कैयट हरदत्तो के)। उभ-से जस् परे रहते 'उभादु दात्तो नित्यम्' से विहित 'तयप् ' स्थानीय 'अयच्' स्थानिवद्भाव से तयप् होने से 'प्रथम चरम'-से सर्वनाम संज्ञा विकल्प से प्राप्त हुई तो सर्वादि मे पाठ होने के कारण जसादि विभक्ति की अपेक्षा न होने से अन्तरङ्ग होने के कारण ( विकल्पविधि जस् विभक्ति सापेक्ष होने से-'अल्पापेक्षमन्तरङ्गम्' 'बहुपेक्षं बहिरङ्गम्'-न्याय से बहिरङ्ग है ) नित्य ही सर्वनाम संज्ञा हुई । जस् को शी ( ई), गुण । अन्तरायां पुरि-'अन्तरं बहियोंगोपसंव्यानयो' इस गण सूत्र मे 'अपुरीति वक्तव्यम्' वा० पू:-शब्द विशेष्य होने पर अन्तर शब्द की सर्वनाम संज्ञा निषेध कहना चाहिये-से सर्वनाम न रहने पर ( स्त्रीत्व विवक्षा मे टाप ) 'याडापः' से 'डेराम्'-से श्राम् । याट, साधनिकासहिता ३१ पूर्वे-पूर्वा:--'पूर्वपरावरदक्षिणोत्तरापराधराणि व्यवस्थायामसंज्ञायाम्' इन सात शब्दो को व्यवस्था ( अवधि की अपेक्षा= किससे पूर्व किस से पर-इस रूप से ) तथा असज्ञा (किसी का नाम नही होना) मे सर्वनामसज्ञा सर्वादि गण मे पाठ होने से सर्वत्र जो प्राप्त है वह जस् परे रहते विकल्प से होगी। सर्वनाम होने पर 'जसः शी' से शी, ई, गुण । न होने पर 'चुटू से ज् इत् , पूर्वसवर्णदीर्घ, स् को रुत्व-विसर्ग । दक्षिणा गाथका:-'व्यवस्था' न कहने से 'चतुर कत्थक' इस अर्थ मे भी सर्वनाम संज्ञा, तथा शी होकर 'दक्षिणे' बनने जाता। उत्तरा. कुरवः-'असज्ञाया' कथन से 'उत्तर' सज्ञा होने के कारण सर्वनाम न हुआ तो 'जसः शी' भी न लगा । रामवत् । स्वे-स्वा:-'स्वमज्ञातिधनाख्यायाम्' ज्ञाति (बन्यु), धन से अतिरिक्त ( जाति. धन प्रात्म-अात्मीय-ये ४ अर्थ है, स्व-शब्द के ) के वाचक स्व-शब्द को प्राप्त सर्वनाम सज्ञा जस् मे विकल्प से होगी से होने के पक्ष मे शी, गुण, अन्यथा पूर्वसवर्ण दीर्घ । रुत्व-विसर्ग । स्वा:-ज्ञाति तथा धन के वाचक होने पर सर्वनाम न होने से 'प्रथमयो.' से पूर्वसवर्ण दीर्घ ही होगा। अन्तरे-अन्तरा वा (गृहा.) अन्तरे-अन्तरा वा (शाटका:)---'अन्तरं बहियोगोप- सव्यानयो' बाह्य (बाहरके) तथा अन्तरीय वस्त्र के अर्थ मे 'अन्तर' को प्राप्त सर्वनामसज्ञा जस् मे विकल्प से होगी-सज्ञा होने पर 'शी', गुण । अन्यथा पूर्वसवर्ण दीर्घ । रुत्व-विसर्ग। पूर्वस्मात्-पूर्वात्, पूर्वस्मिन्-पूर्वे-'पूर्वादिभ्यो नवभ्या वा' पूर्व-पर-अवर- दक्षिण-उत्तर-अपर-अधर-स्व-अन्तर-इन नवो से असि-डि में स्मात्स्मिन् विकल्प से होगे । न होने के पक्ष मे 'टाडसि' से 'श्रात्' तथा डि-मे 'लशक्व' से ड की इसज्ञा तथा लोप के पश्चात् गुण । त्वकपितृक मकपितृक:-'न बहुव्रीहौ' बहुव्रीहि समास करना अभीष्ट होने पर सर्वनाम सज्ञा न होगी। बहुव्रीहि मे समास से पहिले अलौकिक विग्रह वाक्य मे ही संज्ञा न होगी, अन्यथा उस विग्रहवाक्य मे श्रूयमाण - ३२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची 'अकच् अव्ययसर्वनाम्ना-से विहित ) का समास भी श्रवण होगा-इस विवरण से सर्वनाम न होने से क प्रत्यय करने पर 'त्वकं पिता यस्य सः, अहक पिता यस्य सः' अर्थ मे 'प्रत्ययोत्तर'-से युष्मत्-अस्मत् के मपर्यन्त को त्व-म आदेश करने पर 'त्वक मत्क' बनेगा । 'अकच्' करने पर तो 'त्वकत्' 'मकत्' बनेगा। सर्वो नाम कश्चित् , तस्मै सर्वाय देहि, अतिसय देहि, अनिकतरं कुलं, अतितत्- 'सज्ञोपसर्जनीभूतास्तु न सर्वादयः' वा० नाम तथा विशेषण होने पर सर्वादि शब्द 'सर्वनाम' नहीं होते है-से चारो प्रयोग नाम तथा विशेपण होने से ङ का स्मै कतर को अद्ड् अादेश तथा अतितत् मे त्यदाद्यत्व और 'तदोः स. से सभाव न हुये। मासपूर्वाय-'तृतीयासमासे' से मास से पहला (मासेन पूर्णः) इस तृतीया समास मे सर्वनामता नहीं। मासेन पूर्वाय-'समासार्थवाक्येऽपि न' विवरण से यहाँ भी सर्वनामता न होने से डे को स्मै न हुआ। वर्णाश्रमेतराणाम्-'द्वन्द्व च' इन्द्व समास मे सर्वनाम सज्ञा नहीं। यह निषेध समुदाय का है, न कि प्रत्येक का । सर्वनाम से विहित आम् को ही सुट- इस व्याख्यान के कारण तदन्त विधि से सुट् न होगा। वर्णाश्रमेतरे वर्णाश्रमेतरा:-'विभाषा जसि' जस् को आधार मानकर (जसः शी) शी के कर्तव्य मे द्वन्द्वसमास मे सर्वनाम सज्ञा विकल्प से होगी। वर्णाश्रमेतरकाः-शो-के प्रति ही विकल्प है, अतः अकच नहीं, किन्तु निन्दा मे क प्रत्यय ही। प्रथमे प्रथमाः द्वितये-द्वितयाः नेमे नेमाः- 'प्रथमचरमतयाल्पाकतिपयनेमाश्च' ये शब्द जस् के विषय मे विकल्प से सर्वनाम होगे। होने से शी, गुण । सूत्र मे 'तय' प्रत्यय है अतः 'प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणम्' से द्वितय लिया गया। द्वितीयस्मै-द्वितीयाय । एवं तृतीयः-'विभाषाप्रकरणे तीयस्य डित्सूपसंख्यानम्' डकारेत् विभक्तियों मे तीय प्रत्ययान्त की विकल्प से सर्वनामता।

३ १ साधनिकासहिता पटुजातीयाय-अर्थवान् के ग्रहण मे अनर्थक को नही लिया जायगा ('अर्थ वद्ग्रहणे नानर्थकस्य ग्रहणम्' प०) से 'जातीयर' समुदाय के एकदेश अर्थरहित 'तीय' की सर्वनाम सज्ञा नहीं होगी। निर्जरः, निर्जरसौ, निर्जरसः, निर्जरसा, निर्जरसे, 'निर्जरस:-'जराया जरसन्य- तरस्याम्' जरा को जरस् आदेश विकल्प से होगा अजादि विभक्ति परे रहते (सु, भ्या, भिस , भ्यस् , सुप्-को छोड़कर अन्यत्र सभी स्थलों पर)। पद और अङ्ग के अधिकार मे जिसको जो विहित है वह उसको और वह अन्त मे है जिस (समदाय) को उसको भी होगा ('पदाङ्गाधिकारे तरय च तदन्तस्य च' प०)। निष्क्रान्तो जराया ('निरादयः क्रान्ताद्यर्थे' से समास, 'गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य'-से ह्रस्व) इति निर्जरः = बुढापा से रहित-देवता । अनेकाल होने से 'अनेकाल'-से सर्वादेश प्राप्त होने पर निर्दिश्यमान ('जरायाः'-सूत्र मे प्रत्यक्षश्रूयमाण) को ही श्रादेश होगा ('निर्दिश्यमानस्यादेशा भवन्ति' प०)-से जर-भाग को ही हुश्रा । यद्यपि निर्जर जरा-शब्दान्त नही (पुंल्लिंग मे ह्रस्व होने से) है, तथापि एकदेश मे विकार को प्राप्त उस से भिन्न नही ('एकदेशविकृतमनन्यवत्')। यह आदेश वैकल्पिक है, अत एक पक्ष मे रामवत् चलेगा, जरसादेश होने पर भी हलादि विभक्ति परे रहते रामवत् रूप होगे। 'निर्जरसिन निर्जरसात् निर्जरसै निर्जरस्य'-वृत्तिकार के मत में-'विप्रतिषेधे परं कार्यम्' मे अपरं =अभीष्ट कार्य करना चाहिये-यह अर्थ मान कर जरसादेश से पहिले 'टाडसि' से 'इन-अात् करने पर संनिपातपरिभाषा (अदन्तान के आश्रय से उत्पन्न 'इन-अात्-ऐसों' का अजादिविभक्ति होने से जरसादेश के निमित्त होकर अदन्त को विकृत करना) को अनित्य मानकर जरस् अादेश करने पर ये रूप बनेगे। डस् को स्य करने पर अजादि विभक्ति न होने से जरस् अादेश नही होगा, यही एक रूप रहेगा। (पर यह सब भाष्य-विरुद्ध है-अनुपादेय है)। पाद' पादौ पादाः, पादं पादौ पद पादान्, पदा, पादेन-इत्यादि-'पद्दन्नोमासह- निशसन्यूषन्दोषन्यकञ्चकन्नुदन्नासञ्छस्प्रभृतिषु पाद दन्त नासिका मास .

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची हृदय निशा असृज् यूष दोष यकृत् शकृत् उदक श्रास्य-इनको पद्- दत्-नस-मास -हृद्-निश्--असन्- यूपन्-दोषन्-यकन्--शकन्-उदन् अासन्-ये अादेश शस आदि विभक्तियो मे विकल्प से होगे । ५ वचनो मे रामवत् । शस् मे पाद को पद्-अस , रुत्व विसर्ग । पक्ष मे रामवत् । दतः दता, दद्याम्-दन्त शब्द सुट मे रामवत् । शस आदि मे दन्त को 'पद्दन्नो' से दत् श्रादेश, 'सुडनपुंसकस्य' सुट-ये ५ वचन 'सर्वनामस्थान' कहाते है, नपु सक के नहीं । 'स्वादिष्वसर्वनामस्थाने' कप् प्रत्यय (५वे अध्याय के अंत मे ) तक के, सर्वनामस्थान भिन्न स्वादि प्रत्यय परे रहते पूर्व 'पद' कहलाता है-से दत्-अस स्थिति मे दत् को पदस ज्ञा प्राप्त होने पर-'यचि भम्' यकारादि तथा अजादि कप-प्रत्यय तक के, सर्वनामस्थान भिन्न स्वादि प्रत्यय परे रहते पूर्व 'भ' कहाता है । इस प्रकार दोनो की प्राप्ति पर-'श्राकडारादेका सज्ञा (१-४-१) यहाँ से लेकर 'कडाराः कर्मधारये' (२-२-३८) से पूर्व एक को एक ही संज्ञा होगी जो पर तथा अनवकाश (अलब्ध स्थान) हो-से शस आदि अजादि विभक्ति परे रहते पूर्व को भसंचा। इसी प्रकार के हलादि वचन परे रहते पूर्व की पदसज्ञा है। प्रकृत दत्-अस् मे दत् भ है । अतः 'झला जशोऽन्ते' नही लगा। इसी प्रकार टा मे भी। भ्याम् आदि हलादि वचनो मे पूर्व की पदसज्ञा होने से 'झला जशोऽन्ते' से जश्त्व-द् । मासः मासा, माभ्याम्-माभि-मास शब्द को शस् तथा टा परे रहते 'पद्दन्नो- मास' से मास श्रादेश, स् को रुत्व विसर्ग । भ्याम्-भिस मे मास आदेश होने पर पद होने के कारण 'ससजुषो क' से स को रुत्व, 'भोभगो'-से यत्व, 'हलि सर्वेषाम्' से यलोप । यूष्णः यूष्णा--'पद्दन्नो'-से (यूष = जूस) यूष को शसादि मे यूषन आदेश । यूषन्-- स इस स्थिति मे 'अल्लोपोऽन:' अङ्गका अवयव सर्वनाम- स्थानभिन्न यकारादि तथा अजादि-स्वादि पर मे है जिस 'अन्' को उसके श्र का लोप होगा-से षकारोत्तर वर्ति अ का लोप होने पर- 'रषाभ्या नो णः समानपदे' एक पद मे स्थित रेफ-षकारों से पर में रहने साधनिकासहिता वाले न को ण होगा से णत्व, स का रुत्व-विसर्ग। टा मे भी अ-लोप णत्व । यहा 'अचः परस्मिन् पूर्वविधौ' 'पूर्वस्मादपि विधि.' पूर्व से पर मे होने वाली विधि मे भी स्थानिवद्भाव है-इस पक्ष मे अ-लोप को स्था- निवद्भाव (अ) होने से प से परे न नहीं रहा कि णत्व हो । तब 'अट्कु'वा'-से णत्व समझना । 'पूर्वत्रासिद्धे न स्थानिवत्' से णत्व (रपाभ्या'-८-४-१) पूर्वत्रासिद्ध सम्बन्धि होने से स्थानिवद्भाव का निषेध नही होता-कारण 'तस्य दोपः सयोगादिलोपलत्वणत्वेपु स्थानिवद्भाव- निषेध का बाध है स योगादिलोप-लत्व-णत्व के कर्तव्य में । यूषभ्याम् यूषभिः यूषभ्यः-यूपन् से हलादिवचन परे रहते पद संज्ञा होने पर 'न लोपः प्रातिपादिकान्तस्य' प्रातिपादिक संज्ञक जो पद है तदन्त नकार का लोप होता है-से नलोप । नलोप असिद्ध (-२-७) होने से 'सुपि च' 'अतो भिस ऐस्' 'बहुवचने'-से क्रम से दीर्घ-ऐस-एत् न होंगे । यूष्णि-यूषणि-'विभाषा ङिश्यो.' भसंज्ञक अन् के प्रकार का विकल्प से लोप होगा ङि-शी परे रहते-से अलोप विकल्प स० ए० वचन मे । 'ककुद्दोषणी' 'पदंघ्रि' 'स्वान्तं हृन्' 'आसन्य प्राणमूचुः' 'दक्षिणं दोनिशाचर'- 'पद्दन्नो'-सूत्र मे 'प्रभृति' क अर्थ सादृश्य है, तथा च सु-श्रादि प्रत्यय परे रहते भी दोषन्-पत्-हृत्-श्रासन आदेश होगे-यह ऊपर प्रदर्शित भाष्यादि प्रयोगो से सिद्ध है। दोष-शब्द पुनपुंसक है । शस् का सादृश्य सु आदि मे सुप् होने से सहज है। द्वथह्नः-'द्वयोरहोर्भवः' समास में 'अहोऽह्न एतेभ्यः' सर्वादि से परे अहन् को अह्न आदेश होगा-से 'बहू' । यण् । अकारान्त है । सु का रुत्व-विसर्ग । दयहि-द्वयहनि द्वयढे, व्यह्नि-व्यहनि व्यढे, सायाह्नि-सायाहनि सायावे,-'सख्या- विसायपूर्वस्याहन्नन्यतरस्या डौ' सख्या-वि-साय पूर्व मे है जिस अल-शब्द को, उसको डि परे रहते अहन आदेश विकल्प से होगा-से अहन् होने पर 'विभाषा डिश्यो' से भसंज्ञक अ के लोप विकल्प से दो रूप । अहन् न होकर 'अहोऽ-से अह्न आदेश, इ, गुण । विगतम् अहः-व्यह्नः, अह्नः साय: (अवसान) सायाह्न:-यह विग्रह है ॥ इति अदन्तः॥ - ३६ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची विश्वपा:-विश्व पाति-इति विश्वपा-स् रुत्व विसर्ग । श्राबन्त न होने से 'हल्डया- प' में सु-लोप न होगा। विश्वपौ विश्वपाः-'दीर्घाजसि च' दीर्घ से जस् तथा इच् परे रहते पूर्वसवर्णदीर्घ न होगा। दृद्धि । यद्यपि 'नादिचि' से यहाँ दीर्घ निषेध हो जाता है, जस् मे तो पूर्वसवर्ण होने पर भी वही रूप बनता है जो 'अक. सवर्णे'-से, फिर भी गौरी शब्द से श्रौ जस् मे इस 'दीर्घात्' की आवश्यकता है, औचित्य से पहॉ भी यह सूत्र उदाहृत है। विश्वपः विश्वपा-शस् मे विश्वपा अस्-इस स्थिति मे 'आतो धातोः' आकारान्त जो धातु (पाधातु) तदन्त भसंज्ञक अङ्ग का लोप होगा, 'अलोऽन्त्यस्य' षष्ठी से निर्दिष्ट आदेश अन्त्य अल् को होगा-से आ का लोप । रुत्व विसर्ग। विश्वपाभ्याम् । एवं शङ्खध्मादय:-यहॉ पदसज्ञक अङ्ग होने से अा-लोप नही। यथाश्रुत प्रत्यय योग । शङ्खधमति =शख को फूकता है-शङ्खध्मा, आदि श्राकारान्त (ध्मा) धात्वन्त शब्द भी विश्वपावत् । हाहान्-'अातो धातोः' मे धातु न कहने पर 'हाहा शस्' मे भी श्रा लोप हो जाता, अब तो 'प्रथमयोः' से दीर्घ, 'तस्माच्छसो'-से न । हाहा–टा मे 'चुटू' प्रत्ययादि च-ट वर्ग इत् है-से इत्सज्ञा लोप, सवर्ण दीर्घ । हाहै-'डे' मे 'लशक्क'-से ड की इत्सना लोप, 'वृद्धिरेचि' से वृद्धि । हाहाः-डसि-डस् मे अनुबन्ध लोप के अनन्तर सवर्णदीर्घ, रुत्व विसर्ग। हाहौः-ौस् मे 'वृद्धिरेचि'-से वृद्धि, रुत्व-विसर्ग । हाहे-डि-मे 'श्राद्गुण' से गुण । अन्य रूप विश्वपावत् हैं । क्वः-श्न:-क्त्वा-भा ये दोनो प्रत्यय है, इनके श्रा का भी शस् मे लोप होता है, अतः 'श्रातो धातोः' इस सूत्र का 'श्राता' ऐसा विभाग कर कहीं कहीं धातु भिन्न भसजक श्रा का लोप होता है-अर्थ है । इति श्राद्न्त ।। हरिः हरी-सु मे रुत्वविसर्ग । औ मे 'प्रथमयोः' से पूर्वसवर्ण दीर्घ । हरयः-'जसि च' ह्रस्वान्त अङ्ग का गुण होता है जस् परे रहते-से हरि मे के इ को गुण-ए । अयादेश, रुत्व-विसर्ग। हे हरे-हस्वस्य गुणः' ह्रस्व का गुण होगा सम्बुद्धि परे रहते-से गुण । 'एडहस्वात्'-से सुलोप। , ३ - साधनिकासहिता हरिम् हरी हरीन्-'अमि पूर्वः' से पूर्वरूप, द्वि०व० मे पूर्वसवर्णदीर्घ, शस् मे पूर्वसवर्णदीर्घ के बाद 'तस्माच्छसो नः'-से न । मत्यै-'शेषो ध्यसखि' नदीसंज्ञक से अन्य ह्रस्व इ-उ वर्णान्त शब्द 'सखि' को छोड़कर “घि' कहाता है। सूत्र मे शेषः-अर्थात् अनदीसज्ञक-इस लिये कहा गया कि मति-के इस अवस्था मे 'डिति ह्रस्वश्च से नदीत्व- पक्ष मे भी घिसज्ञा होकर नदीत्वप्रयुक्त 'पाट्' तथा वृद्धि, इधर 'घेडिंति' गुण होकर 'मतौं' बन जाता। 'आकडारादेका सज्ञा' से ही 'मत्यै' यहाँ नदीसंज्ञा पक्ष मे घि- सज्ञा न होगो, अतः सूत्र मे शेष शब्द स्पष्टार्थ है। वातप्रम्ये-'ह्रस्व इ-उ'-न कहने पर वातप्रमी को घिसंज्ञा होकर ऊ मे 'वातप्रमये' बन जाता। वास्तव मे यण् । मात्रे--'इ-उ' इसलिये कहा कि ड मे 'मातृ' शब्द को भी घि सज्ञा होकर गुण अ- रपर होकर 'मातरे' ऐसा अनिष्ट रूप बनता । हरिणा-'प्राडो नाऽस्त्रियाम्' घि से परे आड (टा) को 'ना' होगा स्त्रीलिङ्ग से अन्यत्र-से ना आदेश, ‘अटकु'-से णत्व । मत्या स्त्रीलिङ्ग से अन्यत्र इस लिये कहा गया कि यहाँ 'ना' न हो। हरये-'घेडिति' घिसज्ञक अग को ड-इत् वाले सुप् परे रहते गुण होगा- से गुण-ए, अयादेश। सख्ये-यहाँ भी गुण न हो जाय इसलिये 'घे: कहा, सखि घि नही है। हरिभ्याम्-'ङ इत् वाले सुप्' इसलिये कहा कि यहाँ भी गुण न हो जाय । पटव-'सुप्' इसलिये कहा गया कि घि सज्ञक पटु शब्द से 'वोतो गुण' से डीए परे रहते गुण न हो जाय । डी डित् है पर सुप नहीं। हरे:- 'घेर्डिति' से हरि डसि-ङस् मे गुण करने पर 'ङसिङसोश्व' एङ को ङसि ङस् सम्बन्धी अ परे रहते पूर्वरूप एकादेश होगा-से पूर्वरूप, रुत्ववि- सर्ग। 'उपदेशे से डसि का इ इत् है। हयो:-अोस् मे यण् । रुत्वविसर्ग । हरीणाम्-हरि-आम्, 'हस्वनद्या'-से नुट्, 'अट्'-से णत्व । हरौ होः हरिषु-हरि-डि, 'अच्च घेः' इत् उत् (तपर) से पर कि को औ, , - ३८ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची तथा घि (हरि-के इ) को अ अन्तादेश होगा, वृद्धि । सुप् मे 'प्रादे- शप्र-से षत्व। प्रामणी:-'हल्डथाब्भ्यो दीर्घात् सुतिस्यपृक्तं हल्' हलन्त से परे, तथा दीर्घ डी और श्राप से परे स्थित 'सु-ति-सि' रूप अपृक्त = ('अपृक्त एकाल प्रत्ययः') अकेला हल् लुप्त होगा। सूत्र मे 'हलन्त तथा डी श्राप से परे' न कहने से 'ग्रामणी' के (यह तीनो मे नही) सु का भी लोप हो जाता। निष्कौशाम्बि अतिखट्व:-'दीर्घ' डी श्राप न कहने पर 'निष्क्रान्त कौशाम्ब्या' 'खट्वामतिक्रान्तः' (कौशाम्बी से निकला हुना, खटिया का अतिक्रमण किया हुआ) 'निरादयः क्रान्ता' से 'अत्यादयः-से समास करने पर 'गो- स्त्रियोरुपसर्जनस्य' से ह्रस्व हो जाने पर सु का लोप हो जाता। यहाँ दोनो उदाहरणो मे क्रम से डी-आप है। अमैत्सीत्-सूत्र मे 'सु-ति-सि' ऐसा हल का विशेषण न देने पर यहाँ त् से परे स्थित स् का लोप (हलन्त से परे होने से) होता, तिप के साथ मे कहने के कारण विभक्ति रूप सिप ही लिया जायगा, न कि अभैत्सीत् मे का सिन् । बिमर्ति-'अपृक्त' न कहने पर रेफ से परे स्थित ति का लोप होने लगता, कहने पर तो 'त् इ-ति' अपृक्त न होने से लुप्त नहीं होता। बिभेद -'हल् लुप्त होगा' न कह कर 'अपृक्त वर्ण का लोप' कहने पर 'भिदिर' के लिट् मे तिप, स्थानापन्न ‘णल' के अ का ( हलन्त से परे होने से ) लोप होता। राजा-'हल्याब्भ्यः' मे हल-न कहने पर 'राजन् स्' इस अवस्था मे नान्त उपधा को दीर्घ कर संयोगान्त स का लोप करने से ही 'राजा' बन पाता, पर संयोगान्त लोप त्रैपादिक होने के कारण असिद्ध होने से न-लोप न होता । 'हलक्याप' से सु लोप तो षष्ठाध्यायस्थ होने से प्रसिद्ध नहीं । सखा-'अनङ सौ' सखि रूप अङ्ग को 'अनङ' आदेश होगा सम्बुद्धि भिन्न सु परे रहते, डित् होने से ('डिच्च') अन्त्य को 'सखन् स्' इस स्थिति मे 'सर्वनामस्थाने चासम्बुद्धौ नकारान्त उपधा ('अलोऽन्त्यात् पूर्व उपधा')को साधनिकासहिता ३१ दीर्घ होगा सम्बुद्धि से अतिरिक्त सर्वनामस्थान परे रहते-से सखान् स् बनने पर 'हल्डयाप ' से सु-लोप, 'न लोप:'-से न-लोप। हे सखे-हस्वस्य गुणः' से गुण, 'एड हस्वात्'-से सुलोप । सखायौ सखाय. सखायं सखायौ-'सख्युरसम्बुद्धौं' सखि-अङ्ग से परे सम्बुद्धि से अतिरिक्त सर्वनामस्थान णिद्वत् (ण इत्-सा) होगा-से औट तक णिद्वत् हुये। 'अचो णिति' जित् और णित् परे रहते अजन्ताङ्ग की वृद्धि होगी-से सखि के इ की वृद्धि = ऐ हो कर 'एचोऽयवा'-से आय। विभक्ति योग पूर्ववत् । सखीन्-पूर्वसवर्ण दीर्घ और 'तस्माच्छसो'-से शस के स को न । सख्या संख्ये-'ध्यसखि' से 'घि' न होने से तत्प्रयुक्त कार्य नही, यण् । सख्युः-ख्यत्यात्परस्य'-खि-ति शब्द तथा खी-ती शब्द-जिनका कि यणादेश हो चुका है-से परे रहने वाले उसि डस् सम्बन्धी अ को उ होगा-से ङसि-डस् के अको उ। रुत्व-विसर्ग। सख्यौ-डि परे रहते 'श्रौत्' इत् उत् से परे रहने वाले डि को ौ होगा। यण् । सुसखा सुसखायौ सुसखायः-शोभनः सखा = (अच्छा मित्र) सुसखा-अनज तथा णिद् भाव अगसम्बन्धी होने से ‘पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च' परिभाषा से सखि शब्दान्त सुसखि शब्द को भी अनड णिद्वद्भाव। सुसखिना सुसखये-'असखि' से घिसज्ञा निषेध 'सुखखि' मे न प्रवृत्त होगा, यतः यह समुदाय 'सखि' नही है । अतः टा मे ना-भाव, डे मे गुण । सुसखेः २-डसि और डस् मे 'घेडिति'-से गुण करने पर यणादेश न होने के कारण 'ख्यत्यात्' से डसि डस् के अ को उत्व न होगा, अपितु 'डसि- डसोश्च' से पूर्वरूप । सुसखौ-'अच्च घेः' से औत्व, घि को अ अन्तदेश । वृद्धि । अतिसखा-अतिशयित. सखा, यहाँ भी अनड् णिद्वद्भाव, घिसंज्ञा, सुसखिवत् । परमसखा परमसखायौ-'परमः सखा यस्य' इस विग्रह मे सखिशब्द गौण होने पर भी उसको 'अनड्' णिद्वद्भाव होंगे, भाष्यकैयट प्रामाण्य से । अविसखि:-सखीमतिक्रान्तोऽतिसखि:- यद्यपि यहाँ 'प्रातिपदिकग्रहणे लिङ्गवि- . सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची शिष्टस्यापि ग्रहणम्' परि० से सखीशब्दान्त से भी 'राजाहस्सखिभ्यष्टच्' से टच (अ) होकर 'अतिसख' (रामवत्) होना था, पर यह परिभाषा अनित्य है, अत टच नहीं। यह हरिवत् चलेगा। अनङ् णिद्वद्भाव न होंगे, यहाँ सखीशब्द समास होने के बाद 'गोस्त्रियोरुपसर्जनस्य' से ह्रस्व हुश्रा है । यह सखि-शब्द लाक्षणिक ('गोत्रियोः'-शास्त्र से सिद्ध) है। 'लक्षणप्रतिपदोक्तयोः प्रतिपदोक्तस्यैव ग्रहणम्' परि० से 'अनड्सों 'सख्यु- रसबुद्धौशास्त्रो मे प्रत्यक्ष उक्त 'सखि' ही लिया जायगा । पत्या पत्ये-'पतिः समास एव' पति शब्द समास में ही घिसंज्ञक है-से घि । न होने से नाभाव तथा गुण नहीं। यण् । पत्यु. २-‘ख्यत्यात्परस्य' 'खि-ति से परे डसिडस् के अ को उ । रुत्व-विसर्ग। पतीनां-'हस्वनद्यापो'-से नुट्, 'नाम' से अङ्ग को दीर्घ । पत्यौ-केवल 'श्रोत्' से डि को श्रौ, यण् । भूपतिना भूपतये-उक्त सूत्र से समास मे घिसज्ञा होने से नाभाव तथा 'घेर्डिति' से कति-कवि कतिमिः कतिभ्यः कतीनां कतिपु--'कति' नित्य बहुवचन है । 'बहु- गणवतुडति सख्या' ये ४ सख्या कहाते है । 'डति च' डतिप्रत्ययान्त सख्या षट् कहाता है-से कति (डत्यन्त) 'पट्' कहाता है । ('प्रत्ययस्य लुक्लुलुप:' लुक् श्लु लुप्-शब्दों से कृत प्रत्यय का लोप इन्ही नामो से पुकारा जायगा।) 'षड्भ्यो लुक्' षट् से परे जस्-शस् का 'लुक्' (लोप) होगा-से जस-शस् का लोप । 'प्रत्ययलोपे प्रत्ययलक्षणम्' प्रत्यय लुत होने पर भी प्रत्ययाश्रित कार्य होगा-से 'जसि च' से गुण प्राप्त होने पर 'न लुमताङ्गस्य' 'लु' जिनमे हो उन शब्दो ( लुक् श्लु लुप् ) से लुप्त होने पर प्रत्यय को निमित्त मानकर अन का कार्य (गुण आदि) न होगा- से गुण नही । भिस -भ्यस् अाम्-सुप् यथापूर्व । त्रयः श्रीन त्रिमि. त्रिभ्यः३ त्रयाणाम्-त्रि बहुवचनान्त ही है । त्रि-जस् , 'जसि च' से गुण, अयादेश, रुत्व-विसर्ग। 'स्त्रयः' त्रिशब्द को त्रयादेश होगा श्राम् परे रहते-से त्रय-अाम् 'हस्व-से नुट्, 'नामि' दीर्घ । अटकु-से णत्व । गुण श्रयादेश।

2 साधनिकासहिता परमत्रयाणाम्-अङ्गाधिकारस्थ होने से त्रिशब्दान्त से भी 'पदाङ्गाधिकारे तस्य च तदन्तस्य च परि०-से त्रयादेश होगा। 'परमाश्च ते त्रयश्च' कर्मधारय । प्रियन्त्रीणाम्-'प्रियाः त्रय. यस्य' बहुव्रीहि समास मे तो अन्य पदार्थ प्रधान होने से एकद्वि-बहुवचन भी है, प्रियत्रि शब्द के रूप हरिवत् होगे ऐसा कतिपय विद्वान का मत है। प्रियत्रयाणाम्-वस्तुतः त्रय आदेश होगा, 'गौणमुख्ययोमुल्ये कार्यसम्प्रत्ययः' यह न्याय पदकार्य मे ही लगेगा। इसी से 'प्रियतिस्त्रा' यह भाथ्योदाहरण (गौण मे भी तिन आदेश) सगत होता है। त्रिषु-'श्रादेश'-से षत्व । द्वौ-द्वौ द्वाभ्यां३ द्वयोः२-द्विशब्द नित्य द्विवचनात है। 'त्यदादीनाम:' त्यद् आदि शब्दो को अकार अन्तादेश होता है विभक्ति परे रहते-से द्वि के इ के स्थान मे अ, द्व-ौ वृद्धि। रामद्विवचनवत् । 'विपर्यन्तानामेवेष्टिः' वा० अकार अन्तादेश त्यद् से लेकर द्वि तक ही है । भवान् भवन्तौ भवन्तः-द्वि तक ही क्यो १ भवतु भी त्यदादि मे पठित है। भवत् स् -स्थिति मे 'उगिदचा'-से नुम् , सु का हल्ड यादि से लोप, भवन् त्-मे त का 'सयोगान्त' लोप, 'अत्वसन्तस्य-से उपधादीर्घ भवान् , यहाँ भी 'त्यदादि' से त को अकरने पर भवा' ऐसा अनिष्ट रूप बनता । श्री-जस् मे भी भवत् को अ-पररूप नुम् होले । द्विःद्वी द्वयः, अतिद्विः-नाम तथा विशेपण बनने पर द्वि को त्यदादि मानकर अ नहीं होगा । सर्वादि के अन्तर्गण कार्य होने से 'सज्ञोपसर्जनीभूतास्तु न सर्वादयः' वा० से निपेध हो जाता है। अतः यह द्वि किसी की सज्ञा है, हरिवत् रूप होगे। इसी प्रकार 'द्वौ अतिक्रान्तः अतिद्वि:-यह भी उपसर्जन होने से सर्वादि नहीं है । हरिवत् । परमद्वौ--'परमौ च तौ द्वौ च' कर्मधारयसमास-यहाँ प्राधान्य है, अड्गाधिकारस्थ होने से तदन्त को भी अहोगा। औडुलोमिः औडुलोमी उडुलोमाः, औडुलोमिम् औडुलोमी उडुलोमान्--'उनि लोमानि यस्य स उडुलोमा-तस्यापत्यमोडुलोमिः', (नक्षत्र रोमवाले का सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची पुत्र) । 'बाह्वादिभ्यश्च' से अपत्यार्थ मे इञ , एक द्विवचन मे हरिवत् रूप है। बहुवचन मे 'लोम्नोऽपत्ये बहुष्वकारो वक्तव्यः' लोमन् शब्द से बहुत अपत्य (सन्तान) विवक्षित होने पर अकार कहना चाहिये-से अ इञ का अपवाद है। णित् आदि प्रत्यय पर मे न होने से 'तद्धितेष्व- चा'-से आदिवृद्धि न हुई । केवल ब० वचनों मे रामवत् है । इति इदन्त । वातप्रमीः वातप्रम्यौ वातप्रम्यः, वातप्रमीम् वातप्रम्यौ वातप्रमीन, वातप्रम्या वातप्रमीभ्याम् ३, वातप्रम्ये वातप्रम्यः२ वातप्रम्याम् वातप्रमी वातप्रन्योः२ वातप्रमीषु-'वातं प्रमिमीते इति वातप्रमी' (भेडिया) यह 'वातप्रमी' इस उणादि सूत्र से माङ्को ई प्रत्यय, वह कित्-ऐसा निपात है । रुत्व विसर्ग । श्रौ जस मे 'दीर्घाजसि च' से पूर्वसवर्णदीर्घ का निषेध । यण् । 'अमि पूर्वा' से पूर्वरूप । शस् मे पूर्वसर्णदीर्घ, 'तस्माच्छ'-से न । टा मे यण् । डे मे यण् । डसि-डस् मे यण , रुत्व विसर्ग । श्रोस् मे यण् । अाम् मे यण , दीर्घ होने से 'हस्वन' से नुट् नही । डि मे ड को 'लशक्व०' से इत्संज्ञालोप, सवर्णदीर्घसन्धि । ययी-पपी के भी ऐसे ही रूप बनेंगे। ययीः पपी:~-यान्त्यनेन इति-ययीः=मार्ग, पाति लोकम् इति पपीः = सूर्य । 'या-पो. किवे च' उणादि० या तथा पा धातु को ई प्रत्यय होगा वह कित् । 'श्रातो लोप-से श्रा-लोप प्रकृतिभूत या-पा को द्वित्व भी होगा-से निष्पन्न है ये शब्द । सु का रुत्व विसर्ग वातप्रम्यम् वातप्रम्यः वातप्रमिय–'मीञ् हिंसायाम्' इति मीधातु से क्विप करने पर बनने वाले वातप्रमी शब्द के अम् शस् तथा डि मे आगे वक्ष्यमाण 'एरनैकाचा'-से (इकारान्त धातु होने के कारण) यण । प्रधी शब्द के जैसे रूप होगे। उसको इन तीन विभक्तियों मे विशेष विधि यण् । बहुश्रेयसी-बह्वयः श्रेयस्यः (बहुत से प्रशस्त स्त्रिया) यस्य सः-बहुव्रीहि, 'ईयसुन्' अत । 'उगितश्च' से डीप । 'स्त्रियाः पुंवद्'-से बहु शब्द को पुंवद्भाव । 'गो-स्त्रियोरुप'-से अन्त्य ई को ह्रस्व-'ईयसो बहुव्रीहेर्नेति वाच्यम्' वार्तिक से नहीं होता। 'इल्डथा'-से दीर्घ डयन्त होने के कारण सुलोप ।

साधनिकासहिता ४३ हे बहुश्रेयसि-'यू स्न्याख्यौ नदी' ई ऊ अन्त नित्य स्त्रीलिग नदी कहाते है। 'प्रथमलिङ्गग्रहण च' वा० समास से पूर्व मे स्त्रीलिंग शब्द को समास के अनन्तर विशेषण होने (स्त्रीलिंग न रहने) पर भी 'नदी' कहना चाहिये- से नदी सज्ञा, 'अम्बार्थनद्योह्रस्वः' अम्बाथ (पर्याय) तथा नद्यन्तो का ह्रस्व होगा सम्बोधन मे-से ह्रस्व । बहुश्रेयसीन्-पूर्वसवर्ण दीर्घ होने के अनन्तर 'तस्माच्छसो'-से न । बहुश्रेयस्यै बहुश्रेयस्याः२--डे परे रहते 'श्राएनद्याः' नद्यन्त से परे डित् वचनो को श्राट् अागम होगा-से प्राट् , 'श्राटश्च प्राट् को अच् परे रहते वृद्धि होगी-से वृद्धि-ऐ । डसि-ङस् मे भी प्राट् , वृद्धि-श्रा होगी। बहुश्रेयसीनाम्-'ह्रस्वनद्यापो नुट्' से अाम् को नदी होने से नुट् श्रागम । बहुश्रेयस्याम्-डि परे रहते 'डेराम्नद्याम्नीभ्य. नद्यन्त श्राबन्त तथा नी शब्द से परे डि को आम होगा-से आम् तथा श्राट् , वृद्धि-श्रा, यहाँ अाम् को 'हस्वनद्या'-से नुट् का, श्राट् पर होने से बाधक है। अन्य रूप ईप्रत्ययान्त वातप्रमीवत् है। अतिलक्ष्मी:-डयन्त न होने से 'हल्ड याब्भ्यो'-से सुलोप नही । रुत्व विसर्ग। 'लक्षेमुट्' से ई प्रत्यय तथा उसको मुट् आगम, औणादिक । लक्ष्मी का अतिक्रमण करने वाला (लक्ष्मीम् अतिकान्त.)। कुमारी-कुमारीमात्मन इच्छति, (अपने को कुआरी चाहता है ) वा कुमारी- वाचरति (कुवारी जैसा श्राचरण करता है) क्यजन्त अथवा श्राचारविबन्त से कर्थ मे क्विप । 'हलङयाप ' से सुलोप । कुमायौं -कुमाय:-श्रौ परे रहते 'अचिश्नधातुभ्रुवा बोरियडवडौ' प्रत्ययान्त को, इ-3 वर्णान्त धातु को, भ्रू-इस अङ्ग को भी इयङ तथा उवड होंगे अजादि प्रत्यय परे रहते । डित् होने से अन्तादेश । सादृश्य से इ को इयड (उ को उवड) प्राप्त होने पर 'एरनेकाचोऽसंयोगपूर्वस्य' धातु का अवयवरूप संयोगपूर्ववाला नही जो तदन्त जो धातु, तादृश धात्वन्त अनेकाच् अंग को यण होगा अजादि प्रत्यय परे रहते-से यण् । हे कुमारि-'अम्बार्थनद्यो' से नदी होने से ह्रस्व ।

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची कुमार्यम्-कुमार्य:-श्रम् और शस् मे पूर्वरूप तथा पूर्वसवर्ण दीर्घ के अपवाद भूत इयड् का भी अपवाद रूप 'एरनेकाचो'-से यण् । कुमार्य कुमार्याः २-'श्रापनद्याः' से डिद् विभक्तियो मे श्राट् , 'श्राटश्च' से वृद्धि । कुमारीणाम्-श्राम् मे 'हस्वनद्यापो' से नुट्, 'रषाभ्या'-से णत्व । कुमार्याम्-'डेराम्'-से अाम् । प्रधीः प्रध्यौ २ प्रध्यः प्रध्यम् प्रध्य.-प्रकृष्ट ध्यायते-इति प्रधीः, किम् । कृदन्त होने से 'कृत्तद्धित'-से प्रातिपदिकता, सुबुत्पत्ति । ड्यन्त नहीं। रुत्व- विसर्ग। सभी अजादि वचनो मे 'एरनेका'-से यण् । उन्नी:-उन्नयति इति उन्नीः-सुका रुत्व-विसर्ग। अर्थ-उन्नति करनेवाला । उन्न्यौ-यहाँ संयोग (न् ) रहने पर भी धात्ववयवरूप (नीधातु-उत् उपसर्ग) सयोग न होने से 'एरनेकाचो-से यण् । हे उन्नी:-'नदी' न होने से 'अम्बार्थनद्यो' से ह्रस्व नहीं । उन्न्यम्-अजादि विभक्ति परे रहते सर्वत्र ‘एरनेका'-से यण । उन्न्याम्-डिमे 'डेराम्नद्याम्नीभ्यः' में 'नी' होने से अाम् । यण् । ग्रामणी-ग्राम नयतीति ग्रामणी.= लबरदार, ग्रामनेता, 'अग्रग्रामाभ्या नय- ते? वाच्य.' से णत्व । रुत्व-विसर्ग । यह भी नी-शब्दवत् है। नीः नियौ नियः, नियम् निय., नियाम्-'एरनेकाच'-सू०मे 'अनेकाच् अङ्ग को यण होगा' न कहने पर नी-ौ यहाँ भी यण होता, एकाच होने से यण् नही, किन्तु 'अचि श्वातु'-से इयड होता है। अम् शस् मे भी पर होने से इयड होगा, न कि 'अमिपूर्वः' 'तस्माच्छसा'। डि मे 'डेराम्'-मे नी हाने से श्राम, इयड्नी। सुश्रियौ यवक्रियो-'एरनेकाचो'-मे 'असंयोगपूर्वस्य' न कहने पर इन दोनों स्थानो मे भी यण हो जाता, यहाँ श्रिन्-क्रीञ् धानु संयोगपूर्व है, अतः 'अचि नु'-से इयड्। शुद्धधियो परमधियो–'गतिकारकेतरपूर्वपदस्य यण नेष्यते' वा. गतिसंज्ञ (प्रादि) तथा कारक से अतिरिक्त पद पूर्व मे होने पर यण् नहीं-से दोनो स्थानो मे इयड्। .

साधनिकासहिता दुर्धियः, वृश्चिकमियः- यद्यपि 'दुर्' गति है, तथा 'वृश्चिकात्' यह अपादान कारक है, अत यहाँ यण होना चाहिये, नकि इयड् , तथाऽपि 'दुःस्थिता धीः येषा' इस विग्रह मे 'दुर' यह ष्ठा (स्थिता) के प्रति गति है, नकि 'धी' के प्रति, ('उपसर्गाः क्रियायोगे' 'गतिश्च') एवं 'वृश्चिक मे अपा- दानत्व भी विवक्षित नही, किन्तु-सम्बन्धमात्र अथवा 'वृश्चिकसम्बन्धिनी भी ऐसा उत्तरपदलोप है। सुधियो सुधिय -'न भूसुधियो.' भू तथा सुधी शब्दो को अजादिविभक्ति परे रहते यण ('एरनेकाचो'-से) नही, किन्तु सुधी को इयड् । सु० गति है, अतः प्रतिपद निषेध है। सखा, सखायौ, सखाय.-'सखायमिच्छति सखीयति' सखीय शब्द से क्विम् । मित्र चाहने वाला। एकदेश में विकृत (रूपान्तर को प्राप्त) अभिन्न-सा है-वा० से सखिशब्द मे जैसा अनङ् तथा णिद्वद्भाव । हे सखीः!-ङयन्त नहीं, सखी-सु, रुत्वविसर्ग । सखायम् सखायौ-अम् परे रहते 'अमि पूर्व. ' से 'एरनेका'-पर होने से प्राप्त होने पर उससे भी पर होने के कारण 'सख्युरसम्बुद्धौ' से णिद्वद्भाव । सख्यः-शस् मे 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः' का अपवादभूत 'एरनेकाचो' से यण। सखीः-सह खेन(=आकाश से वा खकारसे साथ है) इति सखः, सखमिच्छतीति सखीः, सुका रुत्व विसर्ग। सुखीः-सुखमिच्छति इति सुखी:, रुत्वविसर्ग । ('क्यचि च' से ई)। सुती:-सुतमिच्छति इति सुती, डयन्त न होने से सुलोप नही-रुत्वविसर्ग। सख्यौ सुख्यौ सुत्यौ-तीनों मे अजादि विभक्ति परे रहते ‘एरने से यण् । सख्युः सुख्युः सुत्युः-तीनों स्थलों मे डसि-ङस् के अ-को ‘ख्यत्यात्परस्य' सू० में खि-ति तथा दीर्घ खी-ती का भी ग्रहण होने से, उ, स को रुत्वविसर्ग। लूनीः क्षामीः प्रस्तोमी:-'लूञ् छेदने' धातु के क्य-जन्त से क्विप का रूप । सु का रुत्वविसर्ग । 'वै क्षये' यह क्यच्-क्विप् मे का रूप । 'स्त्यै ष्टयै शब्द- संघातयो' धातु, क्यच् क्विम् । यण 1o सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची लून्युः क्षाम्युः प्रस्तोम्युः-इन तीनो के डसि-ङस् के अ परे रहते यण ('एरनेकाचो'-से) निष्ठा-त को 'ल्वादिभ्यः' 'क्षायो मः' तथा 'प्रस्त्यो- रन्यतरस्याम्' से म , अत यह नत्व-मत्व 'ख्यत्यात्'-की दृष्टि से (पा- दिक होने से) असिद्ध है, अतः 'ख्यत्यात्' से उ, स को रुत्वविसर्ग। शुष्कीः शुष्कियौ शुकिया-शुष धात्, क्यजन्त शुष्कीय से विप् । अल्लोप यलोप । रुत्वविसर्ग। अजादि विभक्तियो मे 'अचिभु'-से इयड , सयोग पूर्व होने से 'एरने'-नही लगा। पक्की: पक्कियौ पक्किय:-पचधातु, 'पचो वः' से निष्ठात को व, क्यजन्त से क्विप् । अजादिवचनो मे इयङ् , सयोगपूर्व होने से यण् नहीं। शुष्किय पक्कियः-डसि-डस् मे भी इयड् रुत्वविसर्ग । यहाँ भी 'शुष्क' में 'शुपः कः'को असिद्ध मानकर उत्व प्रसग नही, ‘ख्यत्यात्'-कृतयणादेश डसि डस, के अ को ही उ करता है। प्रकृत मे इयड् , यण नहीं । शम्भु-हरिवत् है अर्थात् घिसंज्ञक है । जस्-सम्बुद्धिगुण, नाभाव, डिद्ववचनो मे गुण आदि होगे। इसी प्रकार विष्णु वायु भानु आदि है । क्रोष्टा--क्रोष्ट-'तृज्वत् क्रोष्ट' सम्बुद्धि से अतिरिक्त सर्वनामस्थान परे रहते क्रोष्ट शब्द तृच् अन्त (ऋकारान्त) सा हो जाता है-अर्थात् क्रोष्टु क्रोष्ट होता है । 'ऋतो डिसर्वनामस्थानयोः' डि तथा सर्वनामस्थान परे रहते ऋदन्त अन को गुण होता है-की प्राप्ति पर-'ऋदुशनस्पुरुदंसोऽनेहसाञ्च' मृदन्त तथा उशनस् पुरुदंस अनेहस् को अनड् (अन्) होगा सम्बुद्धि भिन्न सर्वनामस्थान परे रहते । डित् होने से अन्त्य को, क्रोष्टन् स्-स्थिति मे 'अप्तृन्तृचस्वस नप्तृनेष्टुत्वष्टक्षत्तृहोतृपोतृप्रशास्तृणाम्' अप् तृन् तृच् स्वस नत नेष्टु त्वष्टु क्षत्त होतृ पोतृ-प्रशास्तृ-इनके उपधा को दीर्घ होगा सम्बुद्धि से अतिरिक्त सर्वनामस्थान परे रहते-से (तृजन्त होने से) उपधादीर्घ, क्रोष्टान् स् , 'इल्डया'-से सुलोप, 'नलोप:'-ससे न लोप । 'नष्त्रादिग्रहणं व्युत्पत्तिपक्षे नियमार्थम्'--'अप्तृन्'-मे 'तृच' कहने से ही ननादि ७ सातों को दीर्घ हो जाता तो नप्तादि शब्दों का ग्रहण 'उणादि से साधनिकासहिता निष्पन्न तृन् वा तृजन्त संज्ञा शब्दो को दीर्घ हो तो केवल इन्ही सातों को हो, पितृभ्रात्रादि को न हो' इस प्रकार नियमार्थ है। क्रोष्टारौ क्रोष्टार क्रोष्टार कोष्टारौ-कोष्ट औ- 'तृज्वल्क्रोष्टु' से तृज्वद्भाव (ऋदन्त), 'तोङि'-से गुण अ (रपर), 'अतृन्'-से दीर्घ । सुट् मे इसी प्रकार । क्रोष्टून्-'प्रथमयो'-से पूर्वसवर्ण दीर्घ, 'तस्माच्छसो'-न् । सर्वनामस्थान न होने से तृज्वद्भाव नहीं। क्रोष्ट्रा क्रोष्ट्रे - 'विभाषा तृतीयादिध्वचि' अजादि तृतीया श्रादि विभक्ति परे रहते क्रोष्टु शब्द विकल्म से तृवत् होगा-से क्रोष्ट्र श्रा, यण् -र । डे मे भी । क्रोष्टुः २-डसिडस् मे क्रोष्ट अस् इस स्थिति मे 'त उत्' दन्त से डसि- डस् के अ परे रहते उ एकादेश होगा-से उ (रपर), क्रोष्टुर् स् 'रात्सस्य' रेफ से परे संयोगान्त स का ही लोप होगा, अन्य (ऊर्क आदि मे क्) का नही-से स लोप । 'खरवसान-से रेफ को विसर्ग । क्रोष्टूनाम् श्राम् मे 'हस्वनद्या'-मे परशास्त्र तृज्वत्'- होने से तृज्वन्द्भाव प्राप्त होने पर 'नुमचिरतृज्वद्भावेभ्यो नुट् पूर्वविप्रतिपेधेन' वा० 'नुम्', 'अचि र ऋत.' से विहित रेफ, तृज्वद्भावो को बाध कर नुट ही होगा-से नुट् , 'नामि' से दीर्घ । क्रोष्टरि कोष्ट्रो:-क्रोष्ट इ, 'ऋतो ङि'-से गुण श्र (रपर)। श्रोस् मे यण्-रेफ । 'पक्षे हलादौ च शम्भुवत्'-तृतीयादि से तृज्वद्भाव वैकल्पिक होने से क्रोष्टु शम्भुशब्दवत् उकारान्त है, घिसंज्ञक है । हलादिविभक्तियो मे तो उकारान्त शम्भुवत् ही रूप होगे। इति उदन्त । अथ ऊदन्त । हूहूः हूतौ हूतः, हुहुम् इह्नौ हूहून्-गन्धर्वविशेष वाचक रूढ शब्द है । सु मे रुत्व विसर्ग । औ मे 'दीर्घाज्जसि च' से पूर्वसवर्णदीर्घ निषेध, यण् , जस् तथा श्रोट मे भी। अम् मे 'श्रमि पूर्व.' से पूर्वरूप यण् का अपवाद है । शस् मे 'प्रथमयो.'-से पूर्वसवर्णदीर्घ, 'तस्माच्छसो'-से न । हे अतिचमु-चमूम् अतिक्रान्त -अतिचमूः, (सेना का अतिक्रमणे करने वाला) 'प्रथमलिङ्गग्रहणश्च' से 'नदी' प्रयुक्त कार्य होंगे। 'अम्बार्थनद्योह्रस्व:-' से हस्व।

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयागसूची अतिचम्वै अतिचम्बा:-'श्राएनद्या' 'श्राटश्च' श्राडागम तथा वृद्धि । अतिचमूनाम् , अतिचम्वाम्-'हस्वनद्या'-से नुडागम । 'डराम्'-से श्राम् । खलपूः-खलं पुनाति इति, विप । सुको रुत्व-विसर्ग। खलप्बौ खलप्वः–'अचि श्नुधातु'-से उवड के प्राप्त होने पर 'श्रो. सुपि' धात्ववयवरूप सयोग पूर्व वाला नही जो उवर्ण तदन्त जो धातु, तादृश उवर्णान्त धात्वन्त अनेकाच् अङ्ग को यण होगा अजादि सुप परे रहते । प्रकृत पूञ् धातु है । 'गतिकारकेतर'-वा० से कर्मकारक पूर्ववाला होने से यण् । , एवं सुल्वादयः-इसी प्रकार सुष्टु लुनातीति सुलूः, इसको भी अजादि वचनो मे 'गति' पूर्वक होने से यण होगा। लूः लुवौ लुव.- ( -सूत्रार्थ मे 'अनेकाच् अङ्ग' कहने से 'लू.' (लू धातु = काटना) यहाँ एकाच हाने से यण न होकर उवड्। उल्लूः उल्ल्वौ, उल्लव:-उत्कृष्ट लुनातीति-यहाँ संयोग होने पर भी धात्ववयव रूप संयोग न होने से यण् हुश्रा (उत्, लूञ्-धातु) कटमः कटग्रुवौ कटवः-'संयोग पूर्व वाला नहीं' (असंयोगपूर्वस्य) कहने से यहाँ यण् न होकर उवड हुअा। 'प्रू गतौ' धातु । परमलुवौ-वार्तिक मे 'गतिकारक' कहने से यहाँ दोनो न होने से यण नहीं, उवड् 'अचि भु' से। लुलुवतुः-'लुलू अतुस्' इस अवस्था मे यण न हो इसलिये कहा गया कि 'सुप' परे रहते, यहाँ तिड् है। उवड् । स्वभू. स्वभुवौ स्वभुवः-स्वस्मात् भवतीति स्वभूः, अपादानकारक पूर्ववाला होने से प्राप्त है यण् , 'न भूसुधियोः' से निषेध होकर उवड्। वर्षान्वौ वर्षाव:-'वर्षाभ्वश्च' वर्षाभूके ऊ को यण होगा अजादि सुप परे रहते । 'न भूसु'-का अपवाद है। वर्षासु भवति-इति वर्षाभूः मेढक । हम्मतीति दृम्भूः-'दृभी-ग्रन्थे धातु है, अर्थ ग्रन्थ-रचना करता है । 'अन्दूदृम्भू'- इत्यादि उणादि सूत्र से निपातित है। रुत्व विसर्ग। इम्म्वौ-हम्भवः, दम्भूम् इम्म्वौयहॉ ऊकार धात्ववयव नहीं, अत: 'अचि भु' से ४ साधनिकासहिता ४९ , उवड् , तथा 'श्रोः सुपि' से या नहीं, किन्तु 'इको याचि' से यण । इम्मम् दृम्भ्वौ--अम् मे यणपवाद 'अमि पूर्वः' से पूर्वरूप । दृम्मन्--शस में यण का अपवाद 'प्रथमयोः पूर्वसवर्णः'। 'तस्माच्छ-' से न । अन्यरूप हूहूवत् है। हन्भूः-'हन्' नकारान्त हिंसार्थक अव्यय, भूधातु से विवप् , सर्प-वृक्षविशेष कपि, अर्थ है । रुत्वविसर्ग । 'नश्चापदान्तस्य' से अनुस्वार पदान्त होने से नही। इन्भ्वौ इन्श्व-'न भूसु' से यण् निषेध होने पर 'इन्करपुन:पूर्वस्य भुवो यण वक्तव्या' वा. हन्-कर-पुन.-पूर्ववाले भूको यण होगा, यम्। खलपूवत् चलेगा। रभ्वः, पूनः पनवौं पुनर्वः-करम हाथ से उत्पन्न नख, पुनर्मू दुबारा उत्पन्न तथा दुबारा विवाह करनेवाली स्त्री। 'पुनभू यौगिके पुंसि,' 'पुनर्भूदिधिषू' इत्यमरः । कारम्वौ कारभ्व.--यहाँ भी 'कर' ही कार ( प्रज्ञादि होने से स्वार्थ मे अण् है, अतः उक्तवार्तिक से यण् । दृग्भः, काराभू-अॉख से उत्पन्न, जेल से उत्पन्न, दोनों स्वयम्भवत् । करमः करवा , उवड होगा। धाता--'दुधाञ् धारणपोषणयोः' ब्रह्मा । धातृ-अनड्, धातन् दीर्घ (अप्तृन्-से) सुलोप, नलोप । हे धातः-'ऋतो डि' से गुण (धातृ-अर् ) हल्ड्यादि से सुलोप, रेफको विसर्ग। धातारौ धातार --'तो' से गुण, 'श्रप्तृन्' से दीर्घ । धात गाम्--श्राम् मे 'हस्वनद्या' से नुट् , 'नामि' से दीर्घ, 'ऋवर्णान्नस्य गत्वं वाच्यम्' से न कोण। नप्ता नप्तारौ--नप्ता-नाती, यह शब्द भी धातृवत् चलेगा। उद्गातारो-उद्गातृशब्द श्रोग्णादिक तून् या तृजन्त का नप्तादि में समावेश न ने पर भी भाष्यप्रयोग से दीर्घ ।

, , सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची पिता--पातीति पिता-'ऋदुशनस्' से अनड्, 'सर्वनामस्थाने-' से दीर्घ सुलोप, 'नलोप:-' से नलोप । पितरौ पितर:--ौणादिक शब्दों को व्युत्पन्न मानने के पक्ष मे 'अप्तृन्' से नियमन (दीर्घ नप्त्रादि को ही होगा) के कारण यहाँ दीर्घ नहीं। पितरम् पितरौ--'ऋतो ङि' से गुण सर्वनामस्थान ( सुट) परे रहते । शसादि मे धातृवत् है। जामातृ भ्रातृ श्रादि ऋकारान्त शब्द भी इसी प्रकार चलेगे। ना नरौ नरः--नृशन्द मनुष्यवाचक है। सु परे रहते 'ऋदुशनस्' से अनङ 'सर्वनामस्थाने' ते दीर्घ । हल्ड्यादि से सुलोप । नलोप । द्वि-बहुवचनों मे 'ऋतो ङि' से गुण (अर् ), विभक्ति योग । हे न.---संबोधन मे 'ऋतो' से गुण, हल्ङ्यादिलोप, अर् (गुण) के रेफ को विसर्ग । नृणाम् नृणाम्--प्राम् मे 'हवनद्या' नुट्, 'नृच' नृ को नाम् परे रहते विकल्प से दीर्घ, अन्यथा 'नामि' से नित्य दीर्घ होता । 'ऋवर्णान्नस्य' से णत्व । कोः किरौ किरः, तीः तिरौ तिर:-'कु-विक्षेपे' 'तु प्लवनतरणयोः' धातु है, इनके अनुकरण (सदृशोच्चारण) मे 'प्रकृतिवदनुकरणम्' ५० से पाक्षिक धातुत्व का अतिदेश (सादृश्य ) होने से 'ऋत इद्धातोः' से इत्त्व रपर (इर् ) किर-तिर् सु इस स्थिति मे 'वोरुपधा' से दीर्घ । सु का हल्ड्यादि लोप, खरवसा से रेफ को विसर्ग। द्विबहुवचनादि सभी रूप गोर्शन्दवत् । का क्रौ क्रा, कम् क्रौ ऋन्, का क्रे--इत् न करने पर ('प्रकृतिवद'-अनित्य है, अतः अनुकरण कृत को धातुत्व नहीं तो 'ऋत'-नहीं लगेगा) सुका रुत्व विसर्ग । 'ऋदुशन' मे 'ऋत्' तपर होने से अनङ् श्रादि नहीं । अजादिवचनों मे 'इको यण' से यण-र । गमा शका-गम्लु-शक्तृ गति तथा शक्त्यर्थक धातु के अनुकरण मे ऋतृवों के सावर्य होने के कारण ऋग्रहण से लु भी गृहीत होगा, अतः 'ऋदुशनस' से अनङ, दीर्घ-सुलोप नलोप । गमलौ गमलः । गमलं गमलौ गमृन् । गम्ला, गम्ले-'ऋतो डि-' से गुण लपर (अल् , 'उरण रपरः' में 'रा से र-ल गृहीत है) शस मे 'प्रथमयो' से पूर्व- साधनिकासहिता सवर्णदीर्घ, तृको दीर्घ न होने से ऋ, 'तस्मात्'-से न, टा-डे मे यण (ल)। गमु शकुल् - डसि डस् मे 'ऋत उत्' से उ लपर, डसि-डस् के स को 'सयोगान्तस्य लोपः' से लोप । सेः सयौ सयः। स्मृतेः स्मृतयौ स्मृतयः---इ = कामदेव, इ के साथ इस अर्थ मे (इना सह वर्तत इति, 'वोपसर्जनस्य' से सह को स, गुण ) 'से.,' सु का रुत्व-विसर्ग। इसी प्रकार 'स्मृतः इः येन सः स्मृतेः' अजादि वचनों मे अय आदेश । गौः गावौ गावः-गो सु । 'गोतो णित्' गोशब्द से परे सर्वनामस्थान णिद्वत् (ण इत् है जिसका ऐसा ) होगा, 'अचो मिणति' अजन्त अङ्गकी वृद्धि होगी अित् तथा णित् प्रत्यय आगे रहते-से वृद्धि, रुत्व विसर्ग। श्री-जस मे अावादेश। गाम गावौ गा:-अम्-शस् परे रहते 'श्रौतोऽशसोः' ('श्रा-श्रो=ौता' श्रोकार से अम्-शस सम्बन्धी अच् परे रहते श्राकार एकादेश होगा- से श्रा। शस के स का रुत्व-विसर्ग । 'अचिनवम् असुनवम्-ऊपर 'शस्' के साथ का 'अम्' सुप् ही लिया जायगा, न कि तिड् , ये दोनों प्रत्युदाहरण है, चिञ् सुन् के लड् उ० पू० ए० व० मे अचिनो श्रम्, असुनो-अम् यहाँ 'श्रौतोऽम्-' से श्रा न होगा। गबा गवे गो. २-'टा-डे' मे अवादेश । इसि-डस् मे 'डसिडसोश्च' से पूर्व- रूप, स को रुत्व विसर्ग। सुद्यौः सुद्यावौ सुधाव:--सु शोभना द्यौ. यस्य सः= अच्छे श्राकाशवाला दिवस । सुद्यो-सु इस अवस्था मे 'श्रोतो णिदिति वाच्यम्, विहितविशेषण च' श्रोकारान्त से विहित सर्वनामस्थान णित् होगा, (विशेषण से युक्त अोकार से भी) णिद्वद्भाव, 'अचोऽणिति' वृद्धि, सुका रुत्व-विसर्ग । अजादि सुट् मे (अम् को छोडकर ) वृद्धि, श्रावादेश । सुधाम्--'श्रौतोऽम्शसो'-अात्व 'अमि पूर्वः से पूर्वरूप । हे भानो हे भानवः-भानुशब्द से 'हस्वस्य' से गुण ओ होने पर ('एड्- हस्वात्' से सुका लोप होता है) यहाँ 'श्रोतो'-से वृद्धि की सम्भावना ५२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची नहीं, यतः यह सु उकारान्त से विहित है, श्रो-से नहीं । जस् परे रहते 'जसि च' से गुणा करने पर भी उक्त युक्ति से वृद्धि नहीं। स्मृतौः स्मृतावौ स्मृतावः। स्मृताम् स्मृतावौ स्मृताः--3 शिव । उः स्मृतः येन सः-स्मृतो-सु-श्रोतो णिद्वत्' से णिद्वद्भाव 'अचो' से वृद्धि, सु का रुखविसर्ग । अजादि वचनों में वृद्धि आवादेश। 'श्रौतोऽम्शसोः' से अम्-शस् मे आत्व । राः रायौ रायः, रायम् रायौ रायः, राया राभ्याम्-रै-धन | रै-सु 'रायो हलि' शब्द को श्राकार अन्तादेश होगा हलादिवचन परे रहते-से प्रात्व, सुका रुत्व-विसर्ग। अजादि वचनों में आयादेश । ग्लौः ग्लादौ ग्खावः, ग्लावम, ग्लावौ ग्लाव:-ग्लौ -चन्द्र, सु मे रुत्व-विसर्ग। अजादि वचनों मे श्रावादेश। हलादि मे यथाश्रुत विभक्ति योग, सुप् मे षत्व । अजन्तपुंलिंग समाप्त । স্বল্পীৰিাময रमा रमे रमा:-रमा-लक्ष्मी, रमु धातु से पचाद्यच् , स्त्रीत्व विवक्षा मे 'अजा- द्यतः'-से टाप् । हल्डयादि से सुलोप, श्री मे 'श्रौड श्रापः' श्रादन्त अगसे परे श्रौ को शी होगा । 'लशक्व'-से इत्, लोप, गुण । जस् मे सवर्णदीर्घ । हे रमे हे रमे हे रमाः–'सम्बुद्धौ च श्राप को ए होगा सम्बोधन मे गुण, ह्रस्वात्'-से सम्बुद्धि-लोप। रमाम् रमे रमाः-'अमि पूर्वः' से पूर्वरूप,शीभाव-गुण, शस् मे पूर्वसवर्णदीर्घ । रमया रमाभ्यां रमामि:-'श्राडि चाप' श्राड (ग) और श्रोस् परे रहते अाबन्त अङ्ग को ए होगा अयादेश । भ्याम्-भिस् मे यथाश्रुत । रमायै रमाभ्यां रमाभ्यः-'याडाप:' श्राप से परे डिद्विचनों (डे डसि, डसू डि) को याद अागम होगा, टित्-श्राद्यवयव, वृद्धि-ऐ । रमायाः रमाभ्यां रमाभ्यः । रमायाः, रमयोः रमाणाम् । रमायाम् रमयोः रमासु- डसि-डस् को याद , सवर्णदीर्घ, स को रुत्व-विसर्ग । अोस् मे 'श्राडि चाप:' से ए, अयादेश रुत्व-विसर्ग । पाम् में 'हस्वनद्यापो' से नुट , 'अटकु'-से णत्व । ङिमे याट् 'राम्'-से अाम् । - .

साधनिकासहिता ५३ सर्वस्यै, सर्वस्याः २, सर्वासाम्-सर्वा डे-इस स्थिति मे 'सर्वनाम्नः स्याद्- स्वश्च' आबन्त सर्वनाम से परे स्थित डिद् वचनों को स्याट् आगम होगा और श्राप को ह्रस्व भी होगा-याट का अपवाद है, टित्-श्राद्यवयव को। वृद्धि, ह्रस्व । सर्वासाम, सर्वस्याम सर्वयोः सर्वासु-श्राम् मे 'श्रामि सर्व'-सुट् । टित्वात् अाद्यवयव । (यद्यपि 'सर्वा' को सर्वनाम मे पठित न होने से सुट दुर्लभ है, तथाऽपि सर्व के अ, तथा श्राप के श्रा को जो सवर्णदीर्घ एकादश हुश्रा है, उसी को पूर्वान्त से सर्व मान कर सुट्) । डि मे 'डेराम्'–से अाम्, स्याट् तथा ह्रस्व । उत्तरपूर्वस्यै-उत्तरपूर्वायै-'विभाषा दिक्समासे बहुव्रीहौ' विकल्प से सर्वनाम सज्ञा । होने पर स्याट और ह्रस्व न होने पर याट् । उत्तरपूर्वायै- ऊपर 'दिडनामान्यन्तराले' से प्रतिपदोक्त दिक्समास विवक्षित है, अन्यत्र 'या उत्तरा सा पूर्वा यस्या मुग्धायाः सा'-इस बहुव्रीहिसमास मे सर्वनामसंज्ञा विकल्प से भी नही । याट । अन्तरस्यै शालाय, अन्तरायै नगर्यै-'अन्तरं बहि' से बाह्य अर्थ मे सर्वनामसंज्ञा होने से स्याट , (अवकाश अवधि श्रादि अर्थो मे नहीं)। उसी गणसूत्र मे 'अपुरीति वक्तव्यम्' से नगरी के विशेषण होने पर सर्वनाम नहीं। याट । द्वितीयस्यै द्वितीयाय, द्वितीयस्या. द्वितीयाया , द्वितीयस्यां द्वितीयायाम्- 'विभाषा द्वितीयातृतीयाभ्या' इन से परे डिद्वचनों को स्याट तथा प्राप् को ह्रस्व विकल्प से होगा। पुलिंग में 'तीयस्य द्वित्सूपसख्यान' वा० से यह सूत्र गतार्थ है। शेष रमावत् । 'तृतीया' भी इसी प्रकार । अम्ब हे अक्क हे अल्ल-'अम्बार्थनद्योहस्वः' से सम्बोधन मे ह्रस्व, एड् ह्रस्वात्' से सु लोप । हे अम्बाडे हे अम्बाले हे अम्बिके !-'असंयुक्ता ये ड-ल-कास्तद्वता ह्रस्वो न' वा. संयोग ('हलोऽनन्तराः संयोग') नहीं ऐसे ड-ल-क घटित को हस्व नहीं, 'सम्बद्धौ च' से ए । सम्बुद्धिलोप । जरा जरसौ, जरसाम्-'जराया जरसन्य'-से अजादि वचनों में जरसादेश । श्री सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची में 'शी' विधायकशास्त्र से 'जराया'-पर शास्त्र होने से जरस् । संनिपातपरि- भाषा अनित्य है। ग्राम मे भी 'हस्वनद्या'-से 'जराया'-पर है। पक्ष मे रमावत् । हलादि वचनों मे भी रमावत् । 'जरसी' इति केचित्--यहाँ 'विप्रतिषेधे परं कार्य मे पर-शब्द के इष्ट का भी वाचक होने से पहले 'शो' करने के अनन्तर संनिपातपरिभाषा को अनित्य मानकर जरस् मानते हैं, यह भाष्य विरुद्ध है । (यद्यपि जरस् को स्थानिवद्- भाव से "प्राप्' मानकर शीभावादि विधियाँ प्राप्त होते हैं, इसी प्रकार नस् निश् पृत् मे। पर अल्विधि होने से स्थानिवद्भाव नही, अथवा श्राप मे श्रा-का प्रश्लेष कर आकाररूप पा ही सर्वत्र 'अाडि चापः' आदि विधियों मे विवक्षित है)। 'अतिखटवा' 'निष्कौशाम्बिः'-'हल्डया'-सूत्र मे भी 'श्रा-प्राप् , डी ई' ऐसा प्रश्लेष से ही प्रारूप श्राप से तथा ईरूप डी से परे सु-ति-सि का लोप मानने से इन दोनों उदाहरणोंमे सुलोप नहीं प्राप्त होता । अतः 'हल्ड या'- सूत्र मे 'दीर्घात्' का ग्रहण अनपेक्षित है। 'अतिखट्वाय-यहाँ के स्वतःसिद्ध श्रा-मे 'आप' को स्थानिवद्भाव से मानकर 'याडापः' से याद नही होगा-यतः याट श्राबन्त अङ्ग से विहित है। यह अदन्त अग की चतुर्थी है। नसः। नसा नोभ्याम् । निशः । निशा--'पद्दन्नो' से शसादि मे नासिका को तथा निशा को निश् अस् , रुत्व विसर्ग । भ्याम् । भ्याम् मे नस् के स् को रु तथा रुको उ, गुण। निड्भ्याम् निमिः-'ब्रश्चभ्रस्जसुजमृजयजराजभ्राजच्छशा ष' ब्रश्च श्रादि सातों को तथा छ-श अन्तवाले को भीष अन्तादेश होगा झल परे रहते एवं पदान्त मे। 'स्वादिष्व'-से म्यामादि परे रहते पद होने से श् को ष, ष को 'झला'-से जश्-ड । निट्सु निटसु-सुप् परे रहते 'डः सि'-से धुट विकल्प से । ड-ध को चर्व । ट् त् । निज्म्यां निज्मि:-'वश्व'-सूत्र मे कुछ विद्वान् 'धातोः' की अनुवृत्ति मानकर साधनिकासहिता छ-श का विशेषण बना देते है। निश् धातु न होने से केवल (ष नहीं) जश्त्व से ज्। निशु निच्छु--निश् सु, जश्त्व से श को ज, सु को श्रुत्व-श, ज को चढ़-च, 'शश्छोऽटि' से छ पाक्षिक है। पृतः, पृता पृद्धयाम् । गोपा विश्वपावत्-'मासपृतनासानूना मॉस्पृत्नवो वाच्या: शसादौ वावा० से शस् श्रादि मे पृत् । भ्यामादि मे जश्त्व । पक्ष मे तथा सुट मे 'पृतना' रमावत् । अर्थ सेना। मतिः, मतीः, मत्या--यह प्रायः हरिवत् । स्त्री होने से शस् मे 'तस्माच्छसो' से स को न तथा टा-मे ना नही, रुख-विसर्ग । टा आदि मे यण। मत्यै, मतये, मत्याः मतेः, मत्यां मतौ-'डिति ह्रस्वश्च' इयड् उवड के योग्य स्त्री-शब्द से भिन्न नित्य स्त्रीलिङ्ग ई-ऊ तथा हस्व इ उ स्त्रीलिंग मे डित् वचन परे रहते विकल्प से नदीसंज्ञक होंगे, 'अाएनद्याः' से प्राट् वृद्धि । पक्ष मे 'घेडिति' से गुण अयादेश । डसिडस् मे भी प्राट् वृद्धि-श्रा, यण । पक्ष मे गुण 'डसिडसो'-से पूर्वरूप, रुत्वविसर्ग । डि को श्राम, यण् । मे 'अच्च घे.' से अत्वसनियोगशिष्ट श्रौ। श्रुति स्मृति आदि शब्द भी इसी प्रकार। तिनः तिस्त्रः तिसृणाम्-'त्रिचतुरोः स्त्रिया तिसूचतस' स्त्रीलिङ्ग मे त्रि-चतुर, शब्दों को तिसु-चतस आदेश होंगे विभक्ति परे रहते । 'अचि र ऋतः' तिस-चतसको रेफादेश होगा अच् परे रहते । केवल बहुवचन । 'ऋतो'- से गुण, 'प्रथमयो.' से पूर्वसवर्णदीर्घ, 'ऋत उत्' से उ का यह रत्व अपवाद है । अाम् मे 'नुमचिर-से नुट् , 'न तिसूचतस्' इनको नाम् परे रहते दीर्घ नहीं । 'वर्णान्न'-वा० से गत्व । प्रियत्रिः 'प्रियन्त्रयाणाम्'- प्रियाः त्रयः, त्रीणि वा यस्या:-इस बहुव्रीहि समास मे प्रियत्रि-शब्द मतिवत् । श्राम मे 'वेस्त्रयः' से त्रयादेश आग होने से तदन्त मे भी होगा, नुट् , गत्व । प्रियतिसा प्रियतिकौ प्रियतिसः, प्रियतिसम्-'प्रियास्तिस्रो यस्य सः'-इस विग्रह में प्रयत्रि शन्द पुल्लिङ्ग होने पर भी समासघटक त्रि-शब्द स्त्रीवाचक + ५६ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची होने से 'तिसु' श्रादेश, 'ऋदुशन'-से अनङ्, 'सर्वनाम' से दीर्घ, सुलोप- नलोप । औ आदि में 'ऋतो डि' का अपवाद 'अचिर' से रेफ । अम् मे भी 'गुणदीर्घोत्वानामपवादः' यह पूर्वरूप का भी अलक्षण है, रत्व । प्रियत्रि कुलम्, प्रियतिस प्रियतिसृणी प्रियतिसृणि,प्रियतिसृणा प्रियतित्रा-'प्रिया- स्तिस्रो यस्य तत्कुल' विग्रह करने पर नपुसक मे सु-अम् का लुक होने से न लुमता'-से प्रत्ययलक्षण कार्य (तिस आदेश)नही । 'न लुमता' के अनित्यत्व पक्ष मे तिस आदेश, अजादि वचनों मे 'रत्वात् पूर्वविप्रतिषेधेन नुम्' वा० रत्व को बाधकर नुम्-से नुम् (न्) णत्व । (ब०व० रत्व 'शि' को सर्वनामस्थानता होने से नान्तलक्षण दीर्घ ) 1टा में नुम्, तृतीयादि मे पुवद्भाव ('तृतीयादिषु'-) विकल्प में रत्व । द्वे २ द्वाभ्याम् ३ द्वयो.२-'त्यदादि'-से अ, स्त्रीत्वविवक्षा मे ('अजाद्यतः'. श्राप शी, गुण । केवल द्विवचन । रमावत् । गौरी गौर्यो गौर्य:, हे गौरि । गौर्यै--गौर शब्द से गौरादित्वात् डोप , 'यस्येति च' से अलोप | सु का हल्डयादि लोप । औ-जस् मे यण् । सम्बोधन मे 'अम्बार्थ'-से ह्रस्व । डे आदि मे नदीकार्य प्राट् श्रादि । बहुश्रेयसीवत् । सखी सख्यौ सख्य,-'प्रातिपदिकग्रहणे-से अनडादि की प्राप्ति पर 'विभक्तो लिङ्गविशिष्टाग्रहणम्' प० से निषेध होता है। हल्ल्यादि-से सुलोप गौरीवत्। लक्ष्मी-डयन्त न होने से सुलोप ( हल्ङयादि-से ) नहीं। तरी-तंत्री श्रादि शब्दों मे भी सुलोप नहीं । स्त्री-हे स्त्रि-हल्ल्यादि से सुलोप । 'अम्वार्थ'-से ह्रस्व । खियो स्त्रिया-'स्त्रियाः' स्त्री शब्द को इयड (इय् ) होगा अजादि प्रत्यय परे रहते, ङित्त्वादन्त य को। विभक्ति योग । स्त्रियम्-स्त्रीम्,स्त्रियो, स्त्रियः-स्त्री:--'वाऽम्शसो' अम् तथा शस् में इयड् विकल्प से होगा । पक्ष मे 'अमि पूर्वः' पूर्वरूप । शस् में भी पक्ष में पूर्वसवर्ण दीर्घ । स का रुत्व-विसर्ग। लिया। स्त्रियै । स्त्रियाः २। त्रियोः २ स्त्रीणाम, खियाम् खियोः स्त्री-डिद् .

साधनिकासहिता ५७ विभक्तियों मे नदीत्व प्रयुक्त श्राडागम-वृद्धि तथा इयड्। अाम् में नुट, णत्व 'अटकुप्वा'-से । डि मे 'श्राम्' 'डेराम्'-से। अतिखि अतिथियौ प्रतिस्त्रयः । हे प्रतिस्त्रे हे अतिस्त्रियौ हे अतिस्त्रयः। अति. स्त्रियम्-अतिस्त्रिम्, अतिथियौ, अतिस्त्रियः प्रतिस्त्रीन् । अतित्रिणा। प्रतिस्त्रये । प्रतिस्त्रेः । अतिस्त्रियो. २। अतिस्त्रौ । प्रतिस्त्रीणाम्-स्त्रियमतिक्रान्तः अतिस्त्रिः, 'पु०) 'अत्यादयः'-से समास, गोस्त्रियो'-से हस्व, सु का रुत्व-विसर्ग। प्राङ्गा- धिकारस्थ होने से तदन्त मे भी इयड् , पर जस्-टा-डे-ङसि-डसू-श्राम् डि, इनमे तथा सम्बोधन मे 'घि' होने के कारण इयङ् से परशास्त्र होने से गुण, ना-भाव, गुण (घेर्डिति-से), नुट , अत्व श्रौत्व होगे। अम् और शस् मे विकल्म से इयड् 'वाऽम्शसो' से । अतिस्त्रि प्रतिस्त्रिणी अतिस्त्रीणि । अतिस्त्रिणा। अतिस्त्रिणे अतिस्त्रये, अति- स्त्रिणः २ अतिस्त्रेः २ अतिस्त्रिणोः २ प्रतिस्त्रियोः २-नपुंसक मे-स्त्रियम् अति- क्रान्तमतिस्त्रि (कुलम् ) 'स्वमो'-मे सुलोप । श्रौ मे 'नपुसकाच्च' से शी, 'इकोऽचि'-से नुम् णत्व । जश्शस् मे शि, उपधादीर्घ । डे डसि डस् अाम् ङि अोस् मे विकल्प से 'तृतीयादिषु'-से पुवद्भाव घि-कार्य, श्रोस् मे इयड् । अतिस्त्रीः,अतिस्त्रिया,अतिस्त्रिय-अतिस्त्रये, प्रतिस्त्रिया-प्रतिस्त्रेः२, अतिस्त्रीणाम् । अतिस्त्रियाम्-अतिस्त्री-स्त्रीलिंग मे 'स्त्रियम् अतिक्रान्ता अतिस्त्रिः (काचित् स्त्री) मतिवत् है। 'डिति ह्रस्वश्च' मे 'अस्त्री' की अनुवृत्ति दीर्घ को हो 'नदी'. का निषेध करती है, न कि ह्रस्व को। अजादि मे इयड् पूर्ववत् । श्रीः श्रियो श्रियः-डयन्त नही, सु को रुत्वविसर्ग । श्रजादि विभक्तियों मे इयड्। हे श्री , श्रियै- श्रिये, श्रियाः-श्रियः-'नेयडुवङ्-स्थानावस्त्री' इयड् उवङ् आनेयोग्य ई-ऊ नदीसज्ञक न होंगे, स्त्री-शब्द को छोड़कर। अत: 'अम्बार्थ'-से सम्बोधन मे ह्रस्व नहीं । डिद्वचनों मे 'डिति ह्रस्वश्च' से नदीत्व पक्ष में प्राट्-वृद्धि, पक्षमे केवल इयङ् , विभक्तियोग । श्रीणाम्-श्रियाम, श्रियाम्-त्रियि-'वाऽमि' इयड उवड् के योग्य ई-ऊ 'श्राम्' में 'नदी' विकल्प से होंगे-पक्ष मे नुट , णत्व। पक्ष में इयङ् । डि मे नदीत्वपक्ष में 'डराम्'-से श्राम् , अाट् , इयङ्, पक्षमे इयड् । .

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची प्रधी, प्रध्यम्, प्रध्य -वृत्तिकार हरदत्त के मत से लक्ष्मीवत् रूप । ( यतः जो शब्द पदान्तर समभिव्याहार के विना भी स्त्रीलिङ्ग बोधक है वह नित्य- स्त्रीलिङ्ग है। स्त्रीलिङ्गेतर लिङ्गका अवाचक ही नित्यस्त्री-इस कैयट के मत मे पुवद् रूप है । नदीत्व प्रयुक्त सबुद्धि ह्रस्व श्राडागमादि स्त्रीलिंग मे भी नही। 'प्रकृष्टा धी:' इस विग्रह मे लक्ष्मीवत् ही रूप है।) श्रम् और शस् मे 'ऐरनेका'-से यण् लक्ष्मी से विशेष है। सुष्टु धी:-सुधीः श्रीवत् । ग्रामणी. पुवत् । धेनुः मतिवत् । क्रोष्ट्री क्रोष्ट्रयौ क्रोष्ट्रय -'स्त्रिया च' स्त्रीवाची क्रोष्टुशब्द तृजन्तवत् रूपवाला है । 'ऋन्नेभ्यो डीप' कारान्त नकारान्त शब्दों से स्त्रीलिङ्ग मे डीप होगा-से ई, सुका हल्डयादि लोप, अजादि वचनों मे यण् । वधू गौरी- वत् । भ्रः श्रीवत्, (उवङ्) । हे सुभ्र-'नेयडुव'-से नदीत्व का निषेध होने से 'अम्बा'-से ह्रस्व नही । 'हे सुभ्र' यह भट्टिकाव्य का प्रयोग प्रामादिक है। 'खलपू:' पुवत् 'नित्यस्त्री' न होने से। पुनर्मू , हे पुनर्भु, पुनवौं पुनर्वः। पुनर्वम्, पूनर्मूणाम्-'इन्करपुन'-से यण उवड का बाधक है, अत. नदी होने से 'अम्बा'-से सम्बोधन मे ह्रस्व । 'हस्वनद्या'-से आम् मे नुट् 'एकाजुत्तरपदे णः' एक अच् वाला उत्तर पद है जिसको उसको समास मे पूर्वपदगत निमित्त (रेफ) से पर मे स्थित, प्रातिपदिकान्त नुविभक्ति मे स्थित न को नित्य ही ण होगा-से णत्व । समानपद न होने से 'अटकु'-से न होगा। वर्षाम:, कैयटमते-हे वर्षाभू -मतान्तरे-हे वर्षाभु–'नित्यस्त्री' के लक्षण मे मतभेद से नदी सज्ञा मे मतभेद होने के कारण 'अम्बार्थ' पक्ष में नहीं लगता। वर्षाम्वौ वर्षाभ्वः -- 'वर्षाभ्वश्व' से यण् । स्वयम्भूः पुंवत् । स्वसा स्वसारी स्वसार:-'न षट्स्वस्रादिभ्यः'-षट्सज्ञको तथा स्वस श्रादियों से डीप ('ऋन्नेभ्यो'-से) या टापू नहीं होते। 'स्वसा तिखश्चतस्रश्च ननान्दा दुहिता तथा । याता मातेति सप्तैते स्वस्रादय उदाहृताः॥' ये स्वसादि है। 'असृन्तृच्स्वस्'-से दीर्घ सुट् में । . - साधनिकासहिता ५९ माता, मातृः यह पितृवत् है। शस् मे स्त्रीलिंग होने से 'तस्माच्छ'-से न नही । पूर्वसवर्ण दीर्घानन्तर रुत्व विसर्ग । यौ गोवत्, राः पुंवत्, नौः ग्लौवत्-'श्रोतो णि द्वत्' से णिद्वद्भाव वृद्धि । 'रायो हलि' से श्रात्व । नौ नौकारान्त है,रुत्व विसर्ग । इत्यजन्त-स्त्रीलिङ्ग । अजन्त नपुसकलिङ्ग ज्ञानम्, हे ज्ञान, ज्ञाने, ज्ञानानि-'अतोऽम्' नपुंसकलिंग अदन्त अग से परे सु तथा अम् को 'अम्' होगा । 'अमि पूर्व' से पूर्वरूप । संबोधन मे ज्ञान-सु, सु को अम्, पूर्वरूप, 'एड्ड्स्वा'-से हल्मात्र (म्) का लोप । श्री मे-'नपुसकाच्च' क्लीब से परे श्री को शी होगा। ज्ञान-ई, 'यस्येति च' भ-सज्ञक ('यचि भम्') के इवर्ण तथा अवर्णों का लोप होगा ई और तद्धित परे रहते से ज्ञान के अ का लोप प्राप्त होने पर 'पौडः श्या प्रतिषेधो वाच्यः' वा० औ के स्थानापन्न शी परे रहते 'यस्येतिच' से प्राप्त लोप का निषेध कहना चाहिये। गुण । 'जश्शसोः शिः' वलीब अग से परे जस् शस् को 'शि' होगा, 'शि सर्वनामस्थानम्' 'शि' सर्वनामस्थान है। 'नपुसकस्य झलचः' झलन्त तथा अजन्त क्लीब को 'नुम्' श्रागम होगा सर्वनामस्थान परे रहते । 'सर्वनाम'-से नान्त उपधा का दीर्घ । शेष रामवत् । धन-वन आदि इसी प्रकार । कतरत्-कतरद् कतरे कतराणि-'अ डतरादिभ्यः पञ्चभ्यः' डतर, डतम ( दोनों प्रत्यय हैं, अत 'प्रत्ययग्रहणे तदन्तग्रहणं' से तदन्त का ग्रहण) अन्य, अन्यतर, इतर-इन से-जो कि नपुंसकलिङ्ग है-परे सु और अम् को श्रदड्' (अद्)अादेश होगा-'डे:' ड-इत् प्रत्यय परे रहते 'भ' के टि-भाग ( कतर के अ) का लोप होगा। 'वाऽवसा'-चर्व विकल्प । श्री-जस् मे ज्ञानवत्। पञ्चमः-'भ का लोप' कहने से 'पञ्चन्' के 'डट' को 'मट होने पर 'स्वा- दिष्व'-से पद होने से 'नलोप:'-से न लोप होकर उक्त रूप बनता है। अन्यथ यहाँ भी टि-अन् का लोप होकर अनिष्ट रूप हो जाता।

६० सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची हे कतरत्-'टि' (अ) का लोप होने से 'प्रथमयो.' तथा 'एङ्-हृस्वात्'-से पूर्व सवर्ण दीर्घ एव सम्बुद्धि लोप नहीं होंगे। कवमत्, अन्यत्, अन्यतरत्, इतरत् । अन्यतमम्-ये चारो उपरोक्त 'अद' अन्त हैं। अन्यतम शब्द से अद नहीं, 'अतोऽम्' से अम् ही होगा। यह अव्युत्पन्न ( प्रकृति प्रत्ययभाग रहित ) प्रातिपदिक है । एकतरम् -'एकतरात्प्रतिषेधो वक्तव्यः' वा० एकतर से (डतरान्त होने पर भी) सु अम् को अदड् नही होगा, 'अतोऽम् से अम् ही होगा। अजरम्, अजरसी-अजरे, अजरांसि-अजराणि । अजरसम्-अजरम्, अजरसी- अजरे, अजरांसि-अजराणि-बुढापा रहित ( कुल )। सु को 'अम्' श्रादेश करने पर सन्निपात-(अदन्त को आश्रय करके आया 'अम्' अदन्त को बिगाड़नेवाले जरस आदेश के प्रति निमित्त न होगा) परिभाषा से जरस् नही । औ के शी-भाव होने पर जरसादेश-विकल्प से दो रूप । जस् को शि । पर होने से जरस , पश्चात् झलन्त होने से 'नपुसकत्य'-से नुम् । अजरन् स इ, 'सान्तमहत सयोगस्य सकारान्त संयोग, तथा महत् का जो नकार, उसकी उपधा को दीर्घ होगा सर्वनामस्थान परे रहते । 'नश्चापदा'- से न को अनुस्वार। पक्ष मे 'नपुसकस्य'-से नुम् । उपधा दीर्घ, णत्व । अम् मे 'स्वमो' से प्राप्त लुक् (लोप) के अपवादभूत 'श्रतोऽम्' से अम् को बाध कर पर होने से 'विप्रतिषेधे' से जरस् , तब श्रम् का सन्निपातपरिभाषा से लुक् न होगा। अन्य रूप पुंवत् । हन्दि,हृदा हजथाम् | उदानि उद्गा। उभ्याम् । श्रासानि । श्रास्ना आसभ्याम् । मांसि । मांसा मान्भ्यां हृदय उदक अास्य शब्दों को 'पद्दन्नो' से शसादि में हृत् उद् श्रासन् । शस् को शिभाव, हृद्, नुम्, 'नश्चापदान्त'-से न को अनुस्वार एव उस को परसवर्ण । उदानि मे शस् को शि, उदन् , 'सर्व- नाम' से दीर्घ । टा मे उदन् , अल्लोप । भ्याम् मे पद ात् 'नलोपः' । श्रासन् , शि दीर्घ । टा-मे श्रासन् , अल्लोप । भ्याम् में नलोप । 'मास- पृतना'-श्रादि से शमादि मे मास् , शि । टा-मे यथाश्रुत । भ्याम् में 'मान्स' यहाँ संयोगान्त लोप | लोप के प्रसिद्ध होने से नलोप नहीं ।

साधनिकासहिता 'मोस्पचन्या उखाया.'-इति भाष्यम् । 'पद्दन्नों में 'प्रभृति' प्रयोग से शसाद्यति- रिक्त मे भी पत् श्रादि आदेश होंगे। अतः 'मासस्य' पचनी' इस विग्रह में डस् का लुक् , 'नलुमता' अनित्य है, अतः मास् आदेश । मास पकाने- वाला पात्र। श्रीपं । श्रीपाय-अर्थ-सम्पत्तिवाला कुल । 'ह्रस्वोनपुसके प्रातिपदिकस्य.' अजन्त को नपुंसक मे हस्व होगा-से 'श्रीपा' के श्रा को ह्रस्व । ज्ञानवत् । डे मे सनिपातपरिभाषा के कारण 'पातो धातोः' से 'पो के श्रा का लोप न होगा। वारि वारिणी घारीणि । हे वारे ! हे वारि !--'स्वमोनपुंसकात्' नपुसक अङ्गसे परमे स्थित सु-अम् का लुक् होगा-सु-अम् का लोप । 'इकोऽचि विभक्तौ' इगन्त नपुसक को नुम् अागम होगा, वारि औ-शी, नुम्, एत्व । जश-शस को शि, नुम्, 'सर्वना'-दीर्घ, णत्व । सम्बोधन मे 'नलुमता' के अनित्यत्व पक्ष मे 'हस्वस्य गुणः' से गुण । वारिणा । वारिणे । वारिण २। वारिणोः । वारीणाम्-नुम् की अपेक्षा पर होने से 'श्राङो-से नाभाव, णत्व । 'घोङिति' से गुण प्राप्त होने पर 'वृद्धयौत्त्वतृज्वद्भावगुणेभ्यो नुम् पूर्व विप्रतिषेधेन' वा० वृद्धि, श्रौत्त्व, तृज्वद्भाव, गुण को बाधकर नुम् । अाम् मे 'नुमचिर' से नुट् , 'नामि' से दीर्घ, णत्व। श्रोस् मे यण को बाधकर नुम्, णत्व। हलादि वचनों मे हरिवत् । अनादये, अनादिने, इत्यादि, शेष पारिवत्--अनादि, आदिरहित ब्रह्म । 'तृतीयादिषु भाषितपुस्क पुवद् गालवस्य' समान अर्थ मे पुल्लिग मे भी प्रयुक्त इगन्त नपुसक शब्द टा श्रादि अच् परे रहते गालवनाचार्य के मत मे (विकल्प से) पुंवत् होगा-से डेमें पक्षमे गुण अयादेश, पक्षमे नुम् । पीलुने ( पीलुर्वृक्ष , तत्फल पीलु )-यहा पीलु वृक्षत्व तथा फलत्व जातिवाचक है, भिन्नार्थक होने से पुवद्भाव नहीं, नुम् । दना, दध्ने, दनः, दध्नो २, दध्नि दधनि, शेषं वारिवत् । एवमस्थिसक्थ्य- क्षीणि-दधि-दही । 'अस्थिदधिसक्थ्यदणामनडुदात्तः' अस्थि दधि सस्थि अक्षि शब्दों को अनड् (उदात्त) टादि अच् परे रहते होगा, वपन्, ६२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची 'अल्लोपोऽनः' से अलोप सर्वत्र । डि मे 'विभाषा डिश्योः' से अल्लोप विकल्प । अस्थि हड्डी, सक्थि जॉघ, अक्षि अॉख, इसी प्रकार । अतिदध्ना-अतिदधि-दही का अतिक्रमण किया हुश्रा (कुल श्रादि)। विधि अंगसम्बन्धि होने से दधिअन्त को भी टा श्रादि मे अनड्। अल्लोप । सुधि सुधिनी सुधीनि । हे सुधे ! हे सुधि ! सुधिया-सुधिना, सुधियां-सुधीनाम्- सुधि-सुबुद्धिवाला (कुल)। पर होने से इयड को बाधकर नुम् । समानार्थक (पुन्नपुंसकों मे) होने से टा आदि मे पुंवद्भाव विकल्प, पक्ष मे इयड्-नुम् । श्राम् मे नुट दीर्घ । पक्ष मे 'न भूसुधियोः' यण निषिद्ध है, इयड्। प्रध्या अधिना--प्रधि प्रकृष्टबुद्धि वाला (कुल)। पुसमानार्थक होने से टादि मे विकल्प पूर्ववत् । 'एरनेकाचो' से यण् । नपुंसक मे नुम् । मधु मधुनी मधूनि ! हे मधो! हे मधु ! एवमम्ब्वादय:--मधु-मद्य, पुष्परस, (वसन्त-चैत्र पुलिंग)। सु-अम् का लुक् । ौ को शी नुमादि पूर्ववत्, 'न लुमता' के अनित्य होने से सम्बुद्धि मे गुण विकल्प । 'एड ह्रस्वा-' सुलोप । स्नूनि, सानूनि--सानु पर्वतनितम्ब । 'मासपृतनासानूना मास्कृत्स्नवो' से स्नु- विकल्प, शि, नुम्, उपधा दीर्घ । प्रियक्रोटु, प्रियक्रोष्टुनी, प्रियकोष्टूनि, प्रियक्रोष्ट्रा, प्रियक्रोष्टुना, प्रियक्रोष्ट्रे, प्रियको टवे, प्रियक्रोष्टुने,प्रियक्रोष्टूनाम्--अर्थ:-सियार को प्यार करनेवाला (कुल)। जश्शर को शि होने पर शिके सर्वनामस्थान होनेसे प्राप्त नुम् को बाध कर पर होने के कारण तृज्वद्भाव प्रास होने पर 'वृद्धयौत्वतृज्व' वार्तिक से नुम् । टादि मे पूर्वोक्त रीतिसे पुवद्भावविकल्प, पक्षमे तृज्वद्भाव, यण-। टामे पुवद्भाव तथा नपुसकता मे भी (नुम् से पर होने से ) ना-भाव । डे आदि मे तृज्वत्त्व पुवद्भाव तथा पाक्षिक नुम् से ३ रूप । श्राम् मे 'नुमचिरे' त्यादि से नुट ही होगा। दीर्घ । सुलु सुलुनी सुलूनि,सुल्धा,सुलुना-सुलु अच्छी तरह काटनेवाला, लूञ् । क्विबन्त, 'हृस्वो नपुसके' से ह्रस्व । श्री आदि मे 'ओ: सुपि' से प्राप्त यण को बाधकर पर होने से नुम्, शी, पूर्ववत् । तृतीयादि मे पुवद्भाव विकल्प, पुवत्पक्ष में लू ह्रस्व न होने से घि नहीं, 'श्रोः सुपि' से यण । नपुंसक पक्ष मे नुम् । .

1 साधनिकासहिता धातृ धातृणी धातृणि, हे धातः ! हे धातृ ! धात्रा, धातृणा-दधातीति धातृ- रचनेवाला। स्वम् लुक् , 'न लुमता' से अनड ('ऋदुशन-') निषेध । बौ आदि मे शी श्रादि, नुम्, 'ऋवर्णा' से णत्व । शि, नुम्, दीर्घ, णत्व । 'नलुम' के अनित्य पक्ष मे सम्बुद्धि निमित्तक गुण-अर् । तृतीयादि में प्रवृत्तिनिमित्तैक्य के कारण पुवद्भाव पाक्षिक। एवं ज्ञातृ-कादयः । प्रद्यु प्रद्युनी प्रचूनि, प्रधुनेत्यादि--प्रकृष्टा द्यौः यस्मिन् तत् प्रद्यु =अच्छा अाकाश- वाला (दिन श्रादि)। 'एच इग्घ्रस्वादेशे' श्रादेश किये जाने वाले हस्वों ('हस्वो नपु'-से ) में एच् को इक् ही होगा, श्रान्तरतम्य से श्री को उ। स्वम् लुक् , शी-नुम् । शि, नुम्, दीर्घ । यहाँ तृतीयादि मे निमित्त साम्य होने पर भी प्रद्यो' से 'प्रद्यु' भिन्न होने के कारण पुवद्भाव नही। प्ररि परिणी परीणि, प्ररिणा प्रराभ्यां प्ररामिः, 'प्रराणाम्' प्ररीणाम्-प्रकृष्टो राः यस्य तत् प्ररि = बहुत धनवाला । बहुव्रीहि मे सिद्ध प्ररै को नपुसक ह्रस्व इ । सुट मे वारिवत् रूप | टादि मे प्रद्युवत् पुंवद्भावनिषेध । नुम् णत्व । भ्यामादि मे एकदेशविकृत अभिन्नवत् है-मान कर 'रायो हलि' से प्रात्व । आम् मे 'नुमचिर' वा० से नुट एव प्रात्व-ऐसा माधव का मत है। वस्तुगत्या तो सन्निपातपरिभाषा (हस्वान्त के श्राश्रय से आया हुआ नुट उसको बिगाडकर श्रा करने मे कारण न होगा) से श्रात्व नहीं, 'नामि' इस सूत्रारभ सामर्थ्य से उपरोक्त परिभाषा तो बाधित होती ही है-यह दूसरी बात है। सुनु सुनुनी सुनूनि, सुनुना, सुनुने इत्यादि--सु नौः यस्येति (बहुव्रीहि) सुनु = सुन्दर नौकावाला । हस्व-उ । स्वम् का लोप । नुम् । प्रद्य मे प्रदर्शित युक्ति से पुवद्भाव नहीं। अजन्त नपुंसक समास । हलन्तपुंल्लिग लिट लिड् लिही लिहः, लिहम् लिही लिहः, लिहा लिड भ्याम, लिट्सु लिटसु-- लिड्--प्रास्वादन करनेवाला, 'हो ढः' हको ढ होगा झल परे रहते तथा पदान्त मे । 'हल्डया' से सुलोप । ह-को ढ, जश्त्व चवं । टा तक यथा- श्रुत विभक्ति योग । भ्यामादि मे 'स्वादि' से पद होने से 'झला' से -- .

६४ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची जश्त्व । सुप् मे हको ढ, जश्त्व से ड, 'ड. सि धुट्', चवं से ड को ट। धुट के ध् को भी 'खरि च' से त् । पक्ष मे ह को ढ, जश्त्व,चव,धुट नही। उपदेशे किम् ? अधोग् । दामलिट-अघोग (दुह् का लड्) दुह लिया । दाम- लिट् = रस्सी चाटनेवाला (बछिया) तथा ऐसे को अपने लिये चाहनेवाला। 'उपदेशे दादेर्धातोघः' उपदेश (पाणिन्युच्चारण ) काल मे दकारादि धातु के ह को घ होगा झल परे और पदान्त मे। 'उपदेश' कहने से दुह् के ह को (अधोग-यहा) घ हुअा। 'दामलिहमात्मन इच्छति' इस अर्थ मे 'दामलिट्' उपदेश मे दकारादि (लिह ) न होने से घ न हुआ। इह तु न-गर्धप-'गर्दभ' कहनेवाला। गर्दभमाचष्टे गर्दभयति, विप् , 'हल्ड्याप्' से सुलोप, 'एकाचो बशो भए झषन्तस्य स्ध्वोः' धातु का अवयव जो एकाच (द ) झष अन्त वाला है उसके अवयव बश् के स्थान मे भष् होगा स-ध्व परे रहते तथा पदान्त मे । भष ( द को ध) म को जश्त्व-ब चत्व-पू। तेनेह न-दुग्धम् दोग्धा-दुह के क्तप्रत्ययान्त का रूप तथा तृजन्त का रूप । यहा दोनों स्थानों मे 'एकाचो' मे 'झलि' की अनुवृत्ति करने पर (ध- आगे होने से ) द को भष् (ध) हो जायगा, जो कि अनभीष्ट है। अतः 'झलि' की अनुबृत्ति न होगी। धुक्-धुग दुहौ दुहः । धुक्षु । क्विबन्त दुह से सु का लोप होने पर 'दादे' से ध होने पर दुध झषन्त एकाच धातु हुश्रा, धातु का अवयव नहीं, तो दु को भष् (धु) व्यपदेशिवद्भाव (धातु मे धात्ववयव का गौण व्यवहार ) से होगा, जश्त्व-चत्वं । औ-जस् आदि अजादि वचनों मे कार्यविशेष नहीं । सुप् मे घत्व, भषू भाव, घ को जश्त्व, 'आदेश'-से षत्व, चत्वं (ग को क्)। ध्रुक् ध्रुग् ध्रुट् ध्रुड् । द्रुहौ द्रुहः । ध्रुग्म्याम् ध्रुभ्याम् । ध्रुक्षु ध्रुट्त्सु ध्रुट्स- ध्रुक् = हत्या करना चाहनेवाला । वा द्रुहमुहष्णुहष्णिहाम्' इन चारों को झल परे रहते तथा पदान्त मे ह को घविकल्प से होगा । घत्व-पक्षमे भष-(द्रु को ध्रु) करने पर जश्त्व चवं विकल्प | पक्ष मे 'हो ढः' से दत्व, भषभाव, जश्व, चत्व-विकल्प । अजादिवचनों में यथाश्रुत । भ्यामादि मे घत्व-दत्व विकल्प, ५ साधनिकासहिता भष्भाव, जश्व । सुप में घत्व पक्ष में धुक्षुवत् । ढत्व-पक्ष में भष, जश्त्व, धुट, चत्वं, ड को भी चवं । धुडभाव में त् नहीं। एवं मुहष्णुहष्णिहाम्-मुह = मोहनेवाला, ष्णुउद्गार करनेवाला, ष्णि = प्रीति करनेवाला, इनको भी विकल्प से घत्व-ढत्व, जश्त्व-चर्व । विश्ववाट -विश्ववाड् विश्ववाहो विश्ववाह । विश्ववाहम् विश्ववाहौ विश्वौह. । विश्वौहा-इत्यादि-विश्व का वहन करनेवाला परमात्मा । 'विश्वं वहति' इस अर्थ में 'वहश्च' से शिवप्रत्यय । 'अत उपधायाः' से वृद्धि, उपपद समास । विश्ववाह से 'सु' का 'हल्डयाब्' से लोप । 'हो ढः' से ढत्व, जश्त्व, चत्वं विकल्प । औट तक यथाश्रुत । 'वाह ऊ' शस मे भसज्ञक वाह को सम्प्रसारण ('इग्यणः सम्प्रसारण' यण के स्थान में प्रयुज्यमान इक्) ऊठ् होगा-विश्व ऊ अाह बनने पर 'सम्प्रसारणाच'सम्प्रसारण से अच् परे रहते पूर्वरूप एकादेश होगा, 'एत्येधत्यूठसु' से (ऊट होने के कारण ) वृद्धि (श्रो)। स् का रुत्व विसर्ग । टा श्रादि अजादि मे भी सम्प्रसारण आदि । अनड्वान्, हे अनड्वन् , अनड्वाही अनड्वाहः, अनडुहः, अनडुहा, अनुहु- द्याम् इत्यादि-अनड्वान्-बैल । अनडुह , सु-'चतुरनडुहोरामुदात्तः' इन दोनों शब्दों को सर्वनामस्थान परे रहते (उदात्त स्वरवाला) 'आम्' होगा। मित्, अनड्वाह् स्-'सावनडुह.' अनडुह शब्द को नुम् होगा । अनड्वान् ह स्। 'हल्ल्यादि' से सुलोप, ह. का सयोगान्त लोप । नुम् विधिसामर्थ्य से 'वसुत्र' से द नहीं हुआ। नुम् अाम् का उपजीवक होने से दोनों मे बाध्यबाधकता नहीं। सयोगान्तलोप असिद्ध होने से 'नलोप.'-नही। 'अम् सम्बुद्धौ' चतुर् अनड्डह को सम्बोधन मे 'अम्' होगा, अाम् का अपवाद है । नुम्, सुलोप, सयोगान्त लोप । अौट तक 'श्राम्' विशेष है । शस् आदि अजादि मे यथाश्रुत । भ्याम् आदि इलादि मे 'वसुसंसुध्वं. स्वनडुहा द' सान्त वस्वन्त 'स्रस्' श्रादि को पदान्त मे 'द' होगा। सान्तेति किम् ? विद्वान्, पदान्त इति किम् ? स्वस्तम्, ध्वस्तम्-विद्वस् स् इस स्थिति में 'अत्वसन्तस्य' से दीर्घ 'उगिदचा' से नुम् सुलोप-संयोगान्त लोप से बना विद्वान् शन्द सान्त वस्वन्त न होने से 'द' नहीं। पदान्त कहने से क्तप्रत्यय स्थल में संसादि होने पर भी 'द' नहीं हुआ। १ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची तुरापाट् तुरापाड् , तुरासाहौ, तुरासाह , तुरापाड्भ्याम् इत्यादि-तुरापाट्- इन्द्र । तुरासा सु स् का हल्ड्यादिलोप । ह को ढत्व जश्त्व करने पर 'सहेः साडः सः' सारूप सहि (षट् अमर्षणे धातु) के स को मूर्धन्य (ष) श्रादेश होगा अर्थात् पदान्त में, श्रौट तथा अजादि वचनों मे पद न होने से षत्व नहीं, यथाश्रुत विभक्ति योग। सुद्यौः सुदिवौ सुदिव., सुदिवम् सुदिवौ, सुयुभ्याम् सुद्युभिः-सुद्यौः-शोभन अाकाश से युक्त ( दिवस) 'दिव औत्' दिव इस प्रातिपदिक का 'औ' आदेश होगा सु परे रहते व के स्थान मे औ, यण् , स् का रुत्व विसर्ग । अग सम्बन्धी विधि होने के कारण दिव-शब्दान्त को भी। यहाँ सुलोप अल्विधि (व् रूप हल से पर होने से ) होने के कारण 'श्री' को स्थानि- वद्भाव न होगा, अत सु का लोप नहीं । अजादि वचनों में दिव अविकृत है। हलादि मे 'दिव उत्' दिव को अन्तादेश उ होगा पदान्त मे, व को उ, दि के इ को यण। चस्वार. चतुरः, चतुर्मिः, चतुभ्यः २, चतुर्णाम् चतुर्यु-चतुर्-शब्द अर्थ ४, केवल बहुवचनान्त । 'चतुरन'-से जस् मे 'आम्' चतुर के उको 'आम्' के श्रा के परे रहते व् (यण्) । जस् के स् को रुत्व विसर्ग । शस्त्रादि मे यथाश्रुत विभक्तियोग । ष-बहुव० में 'षट्चतुर्व्यश्च' “पट्' सज्ञावाले शब्दों से तथा चतुर से पर मे स्थित 'अाम्' को 'नुट् अागम होगा। णत्व, 'अचो रहा'-से द्वित्व । चतुर् सु; इस दशा में 'खरवसा-' से र् को विसर्ग प्राप्त होने पर रोः सुपि' सप्तमी बहुवचन मे 'रु' को ही विसर्ग होगा और रेफ को नही इस नियमविधि से प्रकृतरेफ का विसर्ग नहीं । 'प्रादेश'-से सुको षत्व (रेफ-इण मे है)। 'अचो-' से ष-को वैकल्पिक द्वित्व प्राप्त होने पर 'शरोऽचि' अच् पर मे रहते शर को द्वित्व नहीं। प्रियवस्वाः, हे प्रिय चत्व , प्रियचत्वारौ प्रियचत्वारः। गौणत्वे तु-प्रियचतुराम्। प्राधान्ये तु-परमचतुर्णाम् -अर्थ=४ प्रिय है जिसको। 'प्रियाः चत्वारो यस्य' इस बहुव्रीहि समास मे 'प्रियचतुर्-सु' 'चतुर्-के उसे अागे अाम् श्राङ्ग होने से तदन्त को भी। यण, सु का हल्डयादिलोप । रेफ को ६७ साधनिकासहिता विसर्ग । सम्बोधन मे 'अम् सम्बुद्धौ' से अम् । सुलोपादि पूर्ववत् । सुट में यह अाम् ही विशेष है। 'षट्चतुभ्य॑श्च' यहाँ बहुवचन निर्देश से 'श्राम' मे स्वप्राधान्य मे ही नुट होगा। कमल कमलौ कमलः। कमल्षु-अर्थ = कमल वा लक्ष्मी कहनेवाला । सु को हल्ङयादिलोप । प्रौरों मे कोई विकार नही । सुप मे ल इण होने से 'श्रादेश-' से षत्व। प्रशाम्यतीति-प्रशान् , प्रशामौ प्रशामः,प्रशान्भ्याम्-शान्त होनेवाला । 'मो नो धातोः' मकारान्त धातु को न होगा पदान्त मे । सुलोप, 'नलोप:-' नहीं लगता, यह नत्व प्रसिद्ध है । अजादि वचनों मे कोई विकार नही । पद होने से भ्यामादि हलादि वचनों मे नत्व । कः को के, कम् को कान् , सर्ववत्-अर्थ = कौन। 'किमः क.' किम् को 'क' आदेश होगा विभक्ति परे रहते, शी श्रादि सर्ववत् होगा। अयम् इमौ इमे, अनेन आभ्याम् एमि , अस्मै श्राभ्याम् एभ्यः, अस्मात् आभ्यां एभ्यः । अस्य अनयोः एषाम्,अस्मिन् अनयोः एषु--अर्थ= यह । इदमो मः'इदम् के म को म (त्यदाद्यत्व का अपवादरूप) होगा सु परे रहते । 'इदोऽय पुंसि' इदम् के 'इद्'-भाग को 'अय' होगा सु परे रहते । हल्ड्यादि से सुलोप त्यदायत्व अ, 'अतो गुणे' 'अय-अ' दोनों अ को १ पररूप श्र। इद औ-'दश्च' इदम् के द को म होगा विभक्ति परे रहते । जसू मे सर्वनाम- कार्य-शी । 'अनाप्यकः' क रहित इदम् के इद् भाग को 'अन्' होगा टा से सुप तक परे रहते । त्यदाद्यत्य, पररूप, अन्, अन श्रा, इनादेश, गुण । 'हलि लोप ' अककार इदम् के इद् का लोप होगा हलादि प्राप्' परे रहते । अलोऽन्त्यपरिभाषा से द् का लोप प्राप्त होने पर-'नानर्थकेऽलोऽन्त्यविधि- रनभ्यासविकारे' वा० अभ्यासविकार से अतिरिक्त स्थल मे अर्थ रहित मे अलोऽन्त्य-परिभाषा नही। प्रकृत मे इद् के द् का अनर्थक होने से पूरे का ही लोप । 'प्राधन्तवदेकस्मिन्' एक ही ( वर्ण) मे क्रियमाण कार्य प्रादि में जैसा तथा अन्त मे जैसा माना जायगा, प्रकृत मे बचा अ श्रदन्त होने से 'सुपिच' से दीर्घ । भिस् मे 'नेदमदसोरकोः' अककार इदम् तथा अदस .

अकच् , 'इदक सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची के भिस् का 'अतो भिस ऐस्' से ऐस् न होगा। 'बहुवचने-से एत्व रुत्व- विसर्ग । उ मे त्यदाद्यत्व, 'सर्वनाम्नः'-से स्मै-यह नित्य होने से पहले होगा, अनन्तर 'हलि लोप' होगा। भ्यस् मे 'बहवचन-से एत्व । डसि मे त्यदाद्यत्व पररूप, लोप (इद् का), स्मात् । डस् मे भी उक्त प्रक्रिया, स्य। अोस् त्यदाद्यत्व, पररूप, अनादेश (अनाप्यक -से), 'श्रोसिच' से एत्व, अयादेश। अाम् मे त्यदाद्यत्व-पररूप, 'श्रामिसर्व-से सुट्, एत्वपत्व ('वहुबचने' 'आदेश' से) ङि मे अत्व-पररूप, स्मिन् , इद् लोप । सुः मे अत्व-पररूप, लोप एत्व-षत्व । ककारयोगे तु-अयकम् इमको इमके,इमकम् इमको इमकान्, इमकेन इमकाभ्याम् इमकैः इत्यादि-अर्थ= यह । 'अव्ययसर्वम्नामकच् प्राक् टे: से को भी तन्मध्यपतितन्याय से 'इदमो म:' से म-अय् , सुलोप । औ-श्रादि में 'दश्च' से म । जस् मे शी । भ्याम् तक रामवत् । ककार सहित होने से अनादेश-लोप तथा ऐनिषेध नही । एनम् एनौ एनान् । एनेन एनयोः २-'इदमोऽन्वादेशेऽशनुदात्तस्तृतीयादौ' अन्वादेश ( उक्त का पुनरुपादान ) का विषय इदम् को अनुदात्त अश् आदेश होगा तृतीयादि मे। 'द्वितीयास्स्वेनः' द्वितीयाविभक्ति टा और ओस् परे रहते इदम् तथा एतद् को 'एन' आदेश होगा अन्वादेश मे। सुगण् सुगणौ सुगण , सुगण्ठसु सुगण्ट्सु सुगरासु । सुगाण् सुगाणौ सुगाणः, सुगाण्ठसु सुगाण्ट्सु सुगाणसु-अर्थ = गिननेयाला । सु का हल्ड्यादिलोप । सुप तक विशेष कार्य कोई नहीं, यथाश्रुत विभक्तियोग । सुप मे 'ड्रो कुक टुक शरि' से टुक् विकल्प, 'चयो द्वितीयाः-से ट को ठ विकल्प । सुगाण में भी यही प्रक्रिया । उसमे अदन्त गण धातु से णिच-अल्लोप- क्विप्-लोप-'अनुनासिकस्य'-से दीर्घ । राजा हे राजन् । “परमे व्योमन्' चर्मतिल ब्रह्मनिष्टः-अर्थ राजा। पर होने के कारण हल्ल्यादिलोप से पहले 'सर्वनाम' से दीर्घ, तब सुलोप। 'नलोपः'-से न का लोप । सम्बोधन मे नलोप प्राप्त होने पर 'न डिसम्बुद्ध योन का लोप न होगा कि और सम्बोधन मे । ङि मे वेद (व्योमन्) ही मे 'सुपा सुलु'- , साधनिकासहिता ६९ - से डि का लोप, प्रकृतसूत्र में डि मे नलोप-निषेध सामर्थ्य से 'न लुमता'. से प्रत्ययलक्षणनिषेध न होगा। तब समासस्थल मे 'चर्मतिल' आदि मे भी प्रत्ययलक्षण मानकर न-लोपनिषेध प्राप्त होने पर 'डावुत्तरपदे प्रतिषेधो वक्तव्य' वा० डि के विषय मे उत्तरपद परे रहते 'न डि' से प्राप्त नलोप निषेधका प्रतिषेध कहना चाहिये। न-लोप । ब्रह्मनिष्ठ मे भी इसी प्रकार । राजानौ राजान., राजानम् राजानौ राज्ञः, राज्ञा राजभ्याम् राजमिः, राजे राजभ्य राज्ञः २ राज्ञो राज्ञाम् , राज्ञि राजनि-सुट् मे 'सर्वनाम'-से उपधादीर्घ । शस् श्रादि अजादि वचनों मे 'अल्लोपोऽन:' से जकारोत्तर के अका लोप, श्चुत्व । ( यहाँ अल्लोप को स्थानिवद्भाव मानकर श्रुत्व निषेध नहीं कर सकते, 'पूर्वत्रासिद्धे न स्थानिवत्' से निषिद्ध हो जाता है। 'असिद्धं बहिरङ्गमन्त- रङ्गे' प० से अन्तरङ्ग श्चुत्व करने मे बहिरङ्ग अल्लोप असिद्ध होकर अबना रहेगा तो श्चुत्व कैसे हो ? 'यथोद्देश सज्ञापरिभाषम्' इस यथोद्देशपक्षमे षष्ठाध्याय के 'वाह ऊठ' सूत्र मे ज्ञापित इस परिभाषा (असिद्धं-वाली) के प्रति श्रुत्व अन्तरङ्ग होने पर भी पादिक होने के कारण प्रसिद्ध होने से निर्बाध प्रवृत्त होता है ।) भ्यामादि हलादि वचनो मे पदसज्ञा ("स्वादिषु'. से) होने से न लोप होने पर 'सुपिच'-'अतो भिस'-'बहुवचने' ये विधियाँ प्रास होती हैं तो 'न लोप: सुप्स्वरसंज्ञातुग्विधिषु कृति' सुविधि, स्वरविधि, कृत् मे तुक् विधि इनमे नलोप प्रसिद्ध होता है, अन्यत्र ( सवर्णदीर्घ यणादि-मे) 'राजाश्वः' इत्यादि मे असिद्ध नहीं-से प्रसिद्ध होने से दीर्घादि नही होते। ङि 'विभाषा डिश्योः' से अल्लोपविकल्प, लोप होने पर श्रुत्व । प्रतिदीव्यतीति-प्रतिदिवा प्रतिदिवानौ प्रतिदिवान , प्रतिदीना प्रतिदीन्नेत्यादि- अर्थ = क्रीडादिकरनेवाला। प्रतिदिबन्--सु, 'सर्वनामस्थाने-से सुट् मे उपधादीर्घ, सु-नलोप । राजवत् । शसादि अच् मे 'अल्लोपोऽ'-से अ-लोप करने पर 'हलि च'रेफ एवं वकारान्त उपधा को दीर्घ होगा हल परे रहते । यहाँ 'अचः परस्मिन्'-से स्थानिवद्भाव 'नपदान्तद्वि'-इत्यादि से निषिद्ध होने के कारण, प्रवृत्त नहीं होता, जिससे दीर्घ होने मे बाधा नहीं रही। यज्वा यज्वानो यज्वानः । यज्वनः। यज्वना-यज्वभ्यामित्यादि । ब्रह्मणः ब्रह्मणा ब्रह्मभ्याम् इत्यादि--अर्थशास्त्रविधिसे जिसने याग किया है।

७० सिद्धान्तकौमदी-प्रयोगसूची यज्वन् और ब्रह्मन् शब्दों का सुट् मे उपघादीर्घ-सु-न-लोप श्रादि राज- वत् । शसादि हलादि में अल्लोप प्राप्त होने पर 'न संयोगाद्वमन्तात्' वकार मकारान्त संयोग से पर में रहने वाले श्र का लोप न होगा। प्रकृत 'ज्व' वकारान्त संयोग है । ब्रह्मन् मे मकारान्त संयोग है। वृत्रहा हे वृत्रहन् वृत्रहणौ वृत्रहणः । वृत्रहणम् । प्रहण्यात् । प्रघ्नन्ति । वृत्रध्न । वृत्रघ्ना-इत्यादि एवं शाङ्गिन् यशस्विन् अर्यमन् पूषन्-अर्थ = इन्द्र । वृत्रहन् सु, 'इन्-हन्-पूषार्यम्णा शौ' इन चार शब्दों की उपधा को शी ही परे रहते दीर्घ होगा, अन्यत्र नहीं । ऐसा निषेध आने पर 'सौ च' इन आदियों की उपधा को, सम्बुद्धि से अतिरिक्त, सु परे रहते दीर्घ होगा, दीर्घ, सुलोप, नलोप । संबोधन मे सुलोप मात्र । 'एकाजुत्तर-' से णत्व । शसादि अजादि वचनों मे अल्लोष करने पर 'हो हन्तेफिन्नेषु' जित् और णित् प्रत्यय और नकार परे रहते हन्ति के 'ह' को कुत्व ( नाद- महाप्राणादि साम्य से घ) होगा-प्रकृत मे न कार पर मे है । यहा णत्व की शंका करते है-'हन्तेः' उपसर्ग मे रहनेवाले, निमित्त (र-ष ) से परे स्थित हन्ति के न को णत्व होगा-से प्रहण्यात् मे णत्व । 'अत्पूर्वस्य' हन्ति के अ-पूर्वक न को ही णत्व होगा-से 'प्रघ्नन्ति' यहा 'हन्तेः' से प्राप्त णत्व वारित हुा । 'हन्तेरत्पूर्वस्य' इस सूत्र को विभाग कर व्याख्यान करने का यही फल है कि 'अनन्तरस्य वा'----इस न्याय को बाधकर 'प्राति- पदि' “एकाजु-''कुमति च' इन सबसे प्राप्त णत्व को बाधना। न-कार परे रहते कुत्व विधि सामर्थ्य से अल्लोप को स्थानिवद्भाव नही, वृत्रघ्न:-श्रादि । यशस्विन् यहा 'अस्माया' से विनि प्रत्यय है, इन् नही, तथा च 'सौच' इसमे इन् श्रादि को दीर्घ विहित है, अर्थवत्परिभाषा से विन् का एकदेश अर्थरहित इन् गृहीत कैसे हो ? कहते है 'अनिनस्मन्- रणान्यर्थवता चानर्थकेन च तदन्तविधि प्रयोजयन्ति' प० अन् इन् अस मन् इनका उच्चारण अर्थवान् तथा अनर्थक भी तदन्तविधि का प्रयोजक होता है। अर्यम्णि अर्यमणि । पूष्णि पूषणि-डि मे विभाषा डिश्योः' से अल्लोप- विकल्प से दो रूप। - साधनिकासहिता ७१ मघवान् मघवन्तौ मघवन्तः । हे मघवन् । हे मघवन्तौ हे मघवन्तः । मघवता मघवद्याम् इत्यादि । अर्थ = इन्द्र । 'मघवा बहुलम्' मघवन् शब्द को विकल्प से 'तृ' (ऋ इत् ) अन्तादेश होगा। मघवत् सु 'उगिदचा सर्वनामस्थाने चाधातोः' धातुभिन्न उक्-इत् वाले को तथा नलोपी अचति को भी नुम्' श्रागम होगा सर्वनामस्थान परे रहते । मघव न् त् सु, हल्डयादि-सयोगान्तलोप, उपधादीर्घ, सूत्र मे 'बहुलं' कथन से दीर्घ करते समय संयोगान्तलोप प्रसिद्ध न होगा। सुट् मे तृ श्रादेश तथा नुम् अागम विशेष है, नुम के न् को अनुस्वार और परसवर्ण स्मरणीय है। सम्बुद्धि मे 'असबुद्धौ' निषेध के कारण उपधादीर्घ नही। शसादि मे नुम् नही । भ्यामादि मे जश्त्व । तृत्वाभावे-मघवा मघवानौ मघवानः। मघोनः । असन्तानां किम् ? मघवतः, मघवता। स्त्रियां-मघवती। अतद्धिते किम् ? माघवनम् । मघोना मघव- भ्यामित्यादि-तृत्व न करने पर नान्त होने से सुट मे उपधादीर्घ । सुमे सुलोपनलोप । राजवत् सुट मे। शसादि में-'श्वयुवमघोनाम- तद्धिते' अन्नन्त भसज्ञक श्व-युव-मघव-इनको तद्धितभिन्न प्रत्यय परे रहते संप्रसारण होगा। व को उ, 'सप्रसारणाच्च'-से 'अन्' के अको पूर्वरूप, गुण । रुत्वविसर्ग । टा मे भी सम्प्रसारण पूर्वरूप गुण । अन्नन्त कथन से तु आदेश वाले को सम्प्रसारण नहीं। इन्द्रपत्नी इस ---अर्थ में 'योगादाख्यायात्' से डीए । 'साऽस्य देवता' से मघवन् शब्द से अण, आदिवृद्धि, यहा तद्धित प्रत्यय परे रहने के कारण सम्प्रसारण न हुआ । भ्यामादि में 'रवादि' से पद होने से नलोंप । शुनः, शुना श्वभ्यामित्यादि-श्वन् कुत्ता। सुट् मे राजवत् । शसादि अजादि वचनों मे श्व के व को उ-सम्प्रसारण, पूर्वरूप । भ्यामादि मे न लोप । यून: । यूना युवभ्याभित्यादि-युवन् = जवान । सुट् मे राजवत् । शसादि मे व को 'श्वयुव' इत्यादि से संप्रसारण, यु० उ० अन्-अस् , सवर्णदीर्घ । पूर्वरूप रुत्वविसर्ग । टामे भी संप्रसारणादि । भ्यामादि मे न-लोप । अर्वा । हे अर्वन् ! अर्वन्तौ, अर्वन्तः। अर्वन्तम् अर्वन्तौ अर्वतः। पर्वता अर्व यामित्यादि-अर्वन् = घोडा। सुलोप, नान्त उपधादीर्घ नलोप।

७२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची सम्बोधन में सुलोप । 'अर्वणस्त्रसावनमः' नञ् से रहित (अनर्वा नही) श्रर्वन्-इस अंग को 'तृ' यह अन्तादेश होगा सु परे नहीं अर्वत् । 'उगदिचा' से ( तृ-मे ऋ इत् ) नुम्-(मित्, न्)। अर्व न् त् औ । 'नश्चापदान्त' से अनुस्वार, 'अनुस्वार०' से परसवर्ण। सुट् मे यही प्रक्रिया । शसादि अच् मे विभक्तियोग मात्र । भ्यामादि में पद होने से जश्त्व । अनमः किम् ? अनर्ग यज्ववत् । पन्थाः, पन्थानौ, पन्थानः । पन्थानम् , पन्थानौ, पथः । पथा, पथिभ्याम् इत्यादि-अनर्वा = घोडे से अतिरिक्त । 'अर्वणः' सूत्र मे 'अनमः' कथन से यहाँ त नहीं। अनर्वा अनर्वाणौ अनर्वाण:--इत्यादि यज्ववत् चलेगा। 'न सयोगाद्वम-' से शसादि अच् मे अल्लोप नहीं। पथिन् = मार्ग । 'पथिमथ्यभुक्षामात्' पथिन् मथिन् ऋभुक्षिन्-इनको श्रा-कार अन्तादेश होगा सु परे रहते। सूत्र में श्रा. आत् ऐसा प्रश्लेष है। अतः यह अननुनासिक शुद्ध है। पथि-श्रा-स् , 'इतोऽत्सर्वनामस्थाने' पथि आदि के इ के स्थान मे अ अन्तादेश होगा सर्वनामस्थान परे रहते । पथ-श्रा स , 'थोन्थः' पथि मथि के थ के स्थान मे न्य आदेश होगा । सवर्णदीर्घ, सुका रुत्व विसर्ग । पथिन् श्रो, थिके अ, थ को न्थ श्रादेश, 'सर्वनाम' से नान्तोपधादीर्घ । सुट मे यही प्रक्रिया। शसादि मे 'भस्य टेर्लोपः' भसज्ञक ('यचि भम्' ) भसशक पथ्यादि की टि (इन् ) का लोप होगा। भ्यामादि मे 'नलोप:' से नका लोप है। इको मन्थाः, ऋभुक्षाः । सुपथी । सुमयी नगरी । अनृभुची सेना । सुपथि वनम् । हे 'सुपथिन, हे सुपथि, हे सुपथी, सुपन्थानि । सुपथा सुपथे। सुपथि- भ्याम् इत्यादि-मथने का दड। पथिन् वत्-प्रात्व, प्रत्व, स्थादेश, रुत्व विसर्ग । ऋभुक्षिन् = इन्द्र । श्रात्व, अत्व, रुत्वविसर्ग । सुपथी अच्छे मार्गवाली नगरी। सुमथी-प्रशस्त मन्थन दण्ड से युक्त । 'न्नेभ्यो डीप' से डीप । भ होने से टिलोप । हल्डयादिलोप । अविद्य- मान ऋभुक्षा ( इन्द्र वा स्वामी ) वाली। प्रक्रिया उपरोक्त है। सुपथिन् =प्रशस्त मार्गवाला जंगल । 'स्वमोनपुं' से लुक् , अात्वादि प्रत्यय- साधनिकासहिता ७३ लक्षण मान कर नहीं हो सकता, 'नलुमता' से निषेध हो जाता है। नलोप । संबोधन मे 'संबुद्धौ नपुंसकाना नलोपो वा वाच्य.' से नलोप विकल्प से २ रूप । श्रौ मे शीभाव, भ होने से टि (इन्) का लोप । जश्शस् को 'शि' भाव । उसकी सर्वनाम संज्ञा होने के कारण इत्त्व ('इतोऽत्' ), थ को न्य श्रादेश, नान्त होने से दीर्घ । टा आदि अजादिवचनों मे टिलोप, भ्यामादि मे नलोप । पञ्च पञ्च । सङख्या किम् । विग्रुषः । पामानः 'शतानि 'सहस्त्राणि । पञ्चमिः। पञ्चभ्यः २ । पञ्चानाम् । पञ्चसु-(पचन् ) अर्थ पाच । 'ष्णान्ता षट्! षान्त तथा नान्त संख्या 'षट् । 'षड्भ्यो लुक्' से जश्शस का लोप । उक्त सूत्र मे संख्या न कहने से 'विप्रुष' (बिंदु अर्थ) 'पामन्' (चर्मरोग) शब्द षान्त नान्त होने के कारण यहाँ भी जश्शस का लोप प्राप्त होता। शतसहस्र शब्दों से जश्शस को 'शि' करने पर 'नपुस' से नुम् , 'सर्वनाम से दीर्घ । सहस्र मे 'अटकु' से णत्व विशेष । यहा नुम् करने पर शतन्- सहस्रन् नान्त सख्या बन गयी तो जश्शस का लोप नही होता, सर्वनाम- स्थान को उपजीवन कर प्रवृत्त नुम् उसी का विघातक नहीं बनता अर्थात् संनिपातपरिभाषा के कारण । भिसादि में पद होने से नलोप। अाम् में 'षट्चतुर्थ्यश्च' से नुट् , 'नोपधाया:' नान्त उपधा को दीर्घ होगा नाम् परे रहते-दीर्घ, नलोप । परमपञ्च । परमपन्चानाम् । प्रियपञ्चा। प्रियपश्चानौ । प्रियपञ्चानः। प्रियपञ्चाम् । एवं सप्तन्-नवन् दशन् -श्रर्थ श्रेष्ठ पाच । 'पड्भ्यो' तथा 'षट्चतु' दोनों भाग होनेसे तदन्त में भी प्रवृत्त होते हैं । प्रियपञ्चा-पाच प्रिय है जिसको । अन्यपदार्थ प्रधान बहुव्रीहि मे जश्शस-लुक् तथा ६ मे नुट् नहीं। सुट् और हलादि वचनों मे राजवत्, शसादि अजादि में अल्लोप करने पर न को श्रुत्व से ञ, पहले अनुस्वार को परसवर्ण से ञ, इस प्रकार ' पञ्ज' । सप्तन् श्रादि भी इसी प्रकार । अष्टौ २। परमाष्टौ २। अष्टामिः । अष्टाभ्यः २ । अष्टानाम् । अष्टासु । प्रात्वा- भावे-प्रष्ट भष्ट । शेष पञ्चवत् । गौणत्वे त्वात्वामावे राजवत् । प्रियाष्टनः ।

७४ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची प्रियाष्ट्रना । इत्यादि । प्रियाष्टाः । प्रियाष्टाभ्याम् ३ । प्रियाष्टाभिः। प्रिया- ष्टाभ्यः ।। प्रियाष्टासु-पाठ । 'अष्टन ा विभक्तौ' अष्टन को श्रा होगा हलादि विभक्ति मे। न् को श्रा। 'अष्टाभ्य औश' श्राकार किये अष्टन् से परे जश्शस को औश हो। लाघव से 'अष्टभ्यः' कहना छोड 'अष्टाभ्यः' कहना जश्शस में भी श्रात्व को ज्ञापित करता है । अष्टन् को श्रात्व वैकल्पिक है, 'अष्टनो दीर्घात्' यहा 'दीर्घ' ग्रहण इस विकल्प को ज्ञापित करता है। शित्त्वात् सर्वादेश । परमाष्टौ मे भी स्वप्रधान होने से तदन्त मे भी। हलादि मे न् को श्रा, सवर्णदीर्घ । अाम् मे पहले नुट कर हलादि मानकर श्रात्व। श्रात्वाभाव पक्ष मे 'षड्भ्यो' से जश्शस् का लुकू । गौणता मे (प्रिय है पाठ जिनको-बहुव्रीहि ) आस्वाभाव मे प्रायः राजवत् ('प्रियाष्टनो राजवत्सर्व हाहावच्चापर हलि')। शम मे अल्लोप को स्थानिवद्भाव (अ) मानने से ('अच परस्मिन् पूर्वविधौ' मे 'पूर्वस्मात् अपि परस्य विधौ' ) ष्टुत्व नही। अथवा परिभाषा को कार्यकाल पक्ष ( जहाँ अवसर मिला वहा प्रवृत्त होना) तथा यथोद्देश पक्ष (जिस विधि सूत्र मे पठित हो वहीं प्रवृत्त होना ) दो होते है। प्रकृत कार्यकालपक्ष मानकर 'असिद्धं बहिरङ्गमन्तरङ्गे' प० से अल्लोप अङ्ग-भ- संज्ञाद्यपेक्ष होने से बहिरङ्ग है, ष्टुत्व अल्पापेक्ष होने से अतरङ्ग है। श्रत अल्लोप के असिद्ध होने से ष्टुत्व नहीं । जश्शस मे भी कल्यमान प्रात्व प्रधानता मे ही, गौणता मे नही। इसलिये 'प्रियाष्टन्' को हलादि वचनों मे ही वैकल्पिक प्रात्व है । जश्शम् मे आत्व न होने से 'श्रौश्' भी नहीं। प्रियाष्टन्-सु, हलादि होने से प्रात्व, रुत्वविसर्ग। भुत्, मुद्, बुधौ, बुध । बुधा मुद्याम् । भुत्सु-बुध समझनेवाला। सुप् का हल्ड्यादि लोप। प्रत्ययलक्षण से स अथवा पदान्त मानकर 'एकाचों से भए । जश्त्व-चत्वं । अजादि वचनों में यथाश्रुत विभक्तियोग । हलादि में स्वादिष्व' स पद होने से भष। युङ युञ्जौ युञ्जः। युञ्जम् यञ्जौ युजः । युजा युग्भ्याम् इत्यादि । असमासे किम् । सुयुक् सुयुग सुयुजौ सुयुजः । युक्-युड = योग देनेवाला । 'ऋत्विग्द- धृस्रग्दिगुष्णियुजिक्रुञ्चा च' ऋत्विग् दधृक् स्त्रक दिक् उष्णिक, अञ्च .

साधनिकासहिता ७५ युज् ( केवल अर्थात् निरुपपद) और ऋञ्च, धातुत्रों से क्विन् प्रत्यय होगा। 'लशक्व' और 'हलन्त्यं' से क और न इत् है । वि में इ उच्चारणार्थ । 'कृदतिड्' सन्निहित धात्वधिकार में निङ् से अतिरिक्त ( क्विन् ) प्रत्यय 'कृत्' है । युज् व् । 'वेरपृक्तस्य' अपृक्त व का लोप हो । 'कृत्तद्धित' स प्रातिपदिकसज्ञा, सुप् । 'युजेरसमासे' युज् को सर्वनामस्थान में, समास न होने पर, नुम् होगा। यु-स् , सुलोप और सयोगान्तलोप (ज् का) 'क्विन्प्रत्ययस्य कुः' क्विन् प्रत्यय जिससे विहित है उसको कवर्ग अन्तादेश हो पदान्त मे । युन् के न को कवर्ग मे अनु- नासिक ड् । औ मे 'नश्चाप' से नुम् के न् को अनुस्वार और परसवर्ण यह परसवर्ण (अ) असिद्ध होने से 'चोः कुः' से कुत्व नहीं । श्रौट तक यही प्रक्रिया । शसादि मे नुम् नहीं । भ्यामादि हलादि में कुत्व ( ज को ग्)। सुयुक् में समास होने से नुम् नही, 'चोः कुः' चवर्ग को कवर्ग होगा झल और पदान्त मे । चत्वविकल्प । अजादि मे यथाश्रुत विभक्तियोग । युक् = समाधानकर्ता । यह 'युज-समाधौ' धातु है, 'मृत्विग'---'युजिर' इकार घटित का ग्रहण है। अतः 'युज' को क्विन् नहीं। 'चोंः कुः' से कुत्वमात्र ,नुम् नहीं। खन् खजौ खञ्ज । राट् राजौ राजः । रासु, राट्त्सु । एवं विभ्राट । देवेट, देवेजी देवेजः । विश्वसृट-ड विश्वसृजौ विश्वसृजः। परिमृट-ड-खञ्ज = ठीकसे नहीं चलनेवाला, 'खजि-गतिवैक्लव्ये'। 'इदितो' से इ-इत् होने से नुम् , 'नश्चा'-से अनुस्वार, उसको परसवर्ण ञ् । हल्ड्यादि से सुलोप, ञ्ज में ज का सयोगान्तलाप । राट् (राजदीप्तौ) शोभा देनेवाला। सुलोप 'व्रश्च-से षत्व जश्त्व-ड्, चव निकल्प । सुप्मे धुट ('डःसि' से) विकल्प से,उसको चत्वं । विभ्राट् का अर्थ और साधन राट् वत् । देवेट्= देवता को पूजनेवाला। 'देवान् यजति' 'वचि'-से संप्रसारण इ-गुण, व्रश्चादि से पत्व, जश्त्व और चवविकल्प, सुलोप। विश्वसृट-संसार के स्रष्टा । यह भी पूर्ववत् वश्चादिमे पठित है । परिमृट् शुद्ध करनेवाला। सिद्धि देवेट्वत् । विभ्राक-विभाग। विभ्रारभ्याम्-इत्यादि। परिवाट परिव्राजौ परिव्राजः- विभ्राक्-प्रकाशमान । यहाँ 'चोः कुसे कुत्व (श्च'-से पत्व तो राजिसाहचर्य - उ०, सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची से 'टु भ्राज दीप्तौ' फणादिवाला ही लिया जायगा ) यह 'एजु श्रेज़ भ्राज़ दीसौ' वाला है। परिबाट-संन्यासी । 'परौ बजेः षः पदान्ते' परि के उपपद मे बजि से क्विप तथा दीर्घ होगा, पदान्त मे षत्व भी होगा। ब्रज के ज को षत्व, जश्त्व, चवं विकल्प । विश्वाराट विश्वराजौ विश्वराज । विश्वाराड्भ्याम् इत्यादि-विश्वाराट् = सर्वत्र देदीप्यमान । 'विश्वस्य वसुराटोः' विश्वशब्द को दीर्घ अन्तादेश होगा वसु और राट् शब्द परे रहते । राज के ज को 'बश्च'-से षत्व जश्त्व, चर्व विकल्प । सुलोप । औजसादि मे पदान्त न होने से दीर्ध नही। भ्यामादि मे पदान्त होने से दीर्घ । भृट भृड., भृजौ भृजः । ऋत्विग् ऋत्विक् , ऋत्विजो ऋत्विजः-भृट्= पाककरनेवाला । भृस्ज स् , हल्ड्यादि लोप, 'स्को संयोगाद्योरन्ते च' पदान्त मे तथा झल परे रहते जो संयोग तादृश संयोगादि 'सक' का लोप होगा। स्ज् के सलोप, ब्रश्चादि से षत्व जश्त्व चर्व। औ-जस् में भृस्ज के स को श्चुत्व-श, उसको जश्त्व-ज | ऋविग -होम करनेवाला। सुलोप, 'ऋत्विग्-से ऋतूपपद यज से क्विन् , ('वचिस्वपि'-य को इ- संप्रसारण) 'क्विन्प्रत्य'-से कुत्व पदान्त मे । कई ऊर्ग ऊजौं ऊर्ज:-ऊर्क - बलवान् । सुलोप, 'ऊर्ज बलप्राणनयोः' 'चोः कुः' से ज को कुत्व ग, चर्व । अजादि मे यथावत् । स्थ त्यौ त्ये, त्यम् त्यो त्यान्, सः तौ ते-स्थ -स:-वह। त्यद् को (द्-को 'त्यदादीनाम:' से अ, 'अतो गुणे' से पररूप । त्य-स् , 'तदोः सः सावन त्ययो' त्यदादियों के अादिवाले त-द कारों को स हो जाता है स परे रहते । त्य-के त् को स् । रुत्व विसर्ग । त्यदाद्यत्व और पररूर सर्वत्र । विभक्तियोग यथावत् , जस् मे सर्वनाम-कार्य शी। तद् स् त्यदाद्यत्व, पररूप । स-भाव । रुत्व विसर्ग । जस् मे शीभाव । गुण । परमसः परमतौ परमते, नेह त्वम्-परमसः- उत्तम वह । त्यदादि से अत श्रादि अाज होने से तदन्त मे भी प्रवृत्त होते है। अतः 'तदोः सः' से सभाव भी तच्छन्दवत् । 'त्यदादीनाम:' श्रादि से त्वसत्वात साधनिकासहिता ७७ 'द्विपर्यन्तानामेवेष्यते' इस वार्तिक से सर्वादिगण मे द्वि से भागे पठित युष्मदादि में नहीं। त्यद् त्यदौ त्यदः, अतित्यद् अतित्यदौ अतित्यदः-त्यद् = किसी का नाम है। 'त्यद्' को अतिक्रमण करनेवाला 'अतित्यद्' हल्ङयादि से सुलोप । यहाँ सज्ञा होने से अत्व तथा सत्व नहीं, 'सज्ञोपसर्जनीभूतास्तु न सर्वादयः' से संज्ञा और गौण प्रयोग सर्वनाम ही नहीं। दकारान्त शब्दवत् । यः यो यै, एषः एतौ एते, अन्वादेशे तु-एनम् एनौ एनान् , एनेन, एनयोः२- यः=जो। एषः = यह । यद् त्यदादि होने से श्र, पररूप, रुत्वविसर्ग। सववत् । एतद् , त्यदादित्व अ, पररूप, त्यदादित्व अ, पररूप, सर्ववद् । केवल सु में 'तदो स' से सभाव, 'आदेश'-से मूर्धन्य ष, रुत्व-विसर्ग। गृहीत का पुनर्ग्रहण रूप अन्वादेश मे 'द्वितीयाटौ'-से एनादेश, अम्में पूर्व (अमि पूर्वः) रूप। त्वम्, अहम्, 'स्व स्त्री-अहं स्त्री' ति परमत्वम् , परमाहम् अतित्वम् ,अत्यहम्- त्वम्-तू । अहम्-मैं । 'डेप्रथमयोरम्' युष्मद् अस्मद् से परे स्थित डे तथा प्रथमा-द्वितीया को 'अम्' अादेश होगा। सु को 'अम्' युष्मद् अम् अस्मद् अम् , 'मपर्यन्तस्य' 'त्वाहौ सौ' युष्मद् और अस्मद् के मपर्यन्त भाग को 'व' और 'अह' श्रादेश, सु परे रहते होगा, त्व-अद्- अम् , अह-अद्-श्रम्। 'शेषे लोप' प्रात्व और यत्व के विभक्ति से अतिरिक्त विभक्ति परे रहते युष्मद् अस्मद् के अन्त्य 'द' का लोप होगा त्व० अ० अम् , अह-अ-अम्, 'श्रतो गुणे' से पररूप 'अमि पूर्वः' से पूर्वरूप । शका -स्त्री को कहते समय त्व अम् , अह अम्-इस स्थिति मे 'अमिपूर्व' पर शास्त्र होने पर भी उसको बाधकर अतरग होने से टाप होना चाहिये। उतर-युष्मद् और अस्मद् को कोई लिंग ही नहीं, अत: स्त्रीत्व विवक्षा मे भी टाप नही । अथवा 'शेषे लोपः' से 'अद्' का ही लोप होगा, यह लोप पर होने पर भी, अन्तरंग पररूप करने पर ही प्रवृत्त होता है, लोप (त्व-अद्-अम् , अह-अद्-अम्, स्वद्-अहद् के अद्-लोप ) के अनन्तर अदन्त ही न रहा (त्व अह, बचा) कि टाप हो। परमत्व-परमाह-यहाँ 'डे-प्रथमयो'-इत्यादि विधियों निमित्तभूत .

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची अंगसम्बधि होने से तदन्त से मी होंगी। इसी प्रकार 'त्वाम् अतिक्रान्त:- माम् अतिक्रान्तः' गौण प्रयोग मे भी वे सब ( अम्-त्वादेश-शेष लोप) विधिया होंगी। युवाम् , अावाम् , भाषायां किम् ? 'युव वस्त्राणि', मपर्यन्तस्य किम् ? साक- च्कस्य मा भूत् युवकाम् । श्रावकाम् , त्वया-मया-इत्यन्न 'व्या' 'म्या' इति मा भूत्, युवकाभ्याम्-श्रावकाभ्याम् , इति च न सिद्धयेत्, यूयम् वयम् । परम- यूयम्-परमवयम् , अतियूयम्-अतिवयम्-'युवावौ द्विवचने' युष्मद् और अस्मद् के मपर्यन्त भाग को 'युव-श्राव' होंगे विभक्ति परे रहते । युव अद् श्राव अद् । 'प्रथमायाश्च द्विवचने भाषायाम्' प्रथमा द्विवचन परे रहते लोक मे युष्मद् अस्मद् को 'श्रा' अन्तादेश होगा । द् को श्रा, पररूप- सवर्ण दीर्घ अम्-पूर्वरूप । 'भाषाया' कथन से 'युव' वेद मे श्रात्व नहीं । शका-युष्मद् अस्मद् पूरे पर ये आदेश होते तो भी ये ही रूप बन सकते थे। उत्तर-'अव्यय'-से अकच करने पर तदनतर समूचे पर युवाव आदेश करने से 'तन्मध्यपतित. तद्ग्रहणेन गृह्यते' न्याय से 'युवाम्-श्रावाम्' ही बन जायेंगे, अकच का श्रवण न होगा। अब तो टि से पहले अकच से युष्मकद् औ-अस्मकद् औ, 'डेप्र'-से अम् , युवावादेश मपर्यन्त को, 'प्रथमाया'-से द् को प्रात्व । 'मपर्यन्त' कथन का एक और प्रयोजन- 'त्वमावेकवचने' से युष्मद्-अस्मद् के पूरे स्थान पर त्व आ ( तृतीया एक वचनमे ) म० श्रा, 'योऽचि' से अ (त्व-म घटक ) को यत्व करने पर 'ल्या म्या' अनिष्टरूप होंगे। किंच, भ्याम् मे 'टि' के पूर्व अकचू करने पर समस्त पर युवावादेश करने पर 'युष्मदस्मदो'-से आत्व करने पर ककारघटित का श्रवण तन्मध्यपतित-न्यायसे न होगा । जस् को 'डे प्रथम'- अम् 'यूयवयौ जसि' से यूय-वय अादेश ( मपर्यन्तको) करने पर, शेष का लोप, पूर्वरूप करने पर 'यूयं-वय' बनेगे । ययवय-विधि अग सम्बन्धि होने से तदन्त को भी, इसी प्रकार 'अतियूर्य'-गौण मे भी यह आदेश । त्वाम्, माम्, युवाम् , अावाम, युष्मान् , अस्मान् -द्वितीया मे-'त्वमावेक- वचने एक के के कथन मे युष्मद् अस्मद् के मपर्यन्त को त्व-म-होंगे से साधनिकासहिता ७६ , 'द्वितीयाया च' युष्मत् अस्मद् को आकार होगा से द् को श्रा। त्व अ० श्रा० अम् , म० अ-श्रा० अम् पररूप, सवर्णदीर्घ 'अमि पूर्व.' से पूर्वरूप । युवामावाम् पूर्ववत् । शस् मे–'शसो न' युष्मद् अस्मद् से परे शस. को 'न' होगा। अम् का अपवाद है। युष्मद् अस -अस्मद् अस. 'द्वितीयायाच' से प्रात्व, 'न' शस् के स् का सयोगान्त लोप । त्वया । मया । युवाभ्याम् । आवाभ्याम् । युष्माभि । अस्मामिः-तृतीया मे युष्मद् श्राअस्मद्-श्रा । योऽचि' युष्मद् अस्मद् को य आदेश होगा, आदेश (प्रत् आदि) के अतिरिक्त स्थल मे, अजादि विभक्ति परे रहते । द को य,एक वचनमे मपर्यन्त को त्व-म, पररूप । भ्या मे 'युष्मदस्मदो- रनादेशे' युष्मद्अस्मद् को 'श्रा' होगा. अनादेश मे, हलादि विभक्ति परे रहते । युवाव, द् को श्रा, पररूप, सवर्णदीर्घ । भिस में भी श्रात्व, सवर्णदीर्घ, रुत्व विसर्ग । तुभ्यम्-मह्यम् । परमतुभ्यम्-परममह्यम् । अतितुभ्यम्-अतिमह्यम् । युवाभ्याम् श्रावाभ्याम् । युष्मभ्यम्-अस्मभ्यम् -चतुर्थी मे-युष्मद् ए, अस्मद् ए । 'तुभ्यमह्यौ डयि' युष्मदस्मद् के मपर्यन्त को डे परे रहते तुभ्य- मह्य आदेश होंगे। 'डे-' से अम्, शेषलोप, 'अमिपूर्वः' से पूर्वरूप । तुभ्यमह्य भाग होनेसे तदन्त मे तथा गौण मे भी होंगे । द्विवचनपूर्ववत् । 'भ्यसो भ्यम्' भ्यस् को 'भ्यम्' व 'अभ्याम्' आदेश होंगे। पहला तो शेपेलोप मे अन्त्य (द् का) लोप पक्ष मे ही। इसमे एत्व प्रसक्त होने पर 'अंगवृत्ते पुनर्वृत्तावविधिः' ५० अग मे एक कार्य प्रवृत्त होने पर दूसरा अगकार्य न होगा । अतः लोपकार्य होने पर एत्वकार्य नहीं होगा। 'अभ्यम्' दोनों पक्ष में ठीक है-'द्' मात्र का लोप होने पर झलादि न (अभ्य) होने से एत्व नही । पररूप । टि 'अद्' के लोपपक्ष में अदन्ताङ्ग न (त्व-म् ) होने से एत्व नहीं । त्वत्-मत् । युवाभ्याम्-श्रावाभ्याम् । युष्मत्-अस्मत् । पंचमी मे--'एकवचन- स्य च' युष्मद् अस्मद् से पचमी के एक वचन को 'अत्' होगा अनेकाल होने से सर्वादेश, युष्मद् अत्, अस्मद् अत् । त्व-मादेश, शेष (अद्) सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची सवर्ण दीर्घ । लोप, द्-मात्र लोप पक्ष मे तीन अकारों का पररूप । भ्याम् मे पूर्ववत् । भ्यस् मे 'पञ्चम्या अत्' युष्मद् अस्मद् की पंचमी के भ्यस् को 'अत्' होगा। शेषलोप । तव । मम । युवयोः । आवयोः । युष्माकम् । अस्माकम्-षष्ठी में-'तवममौ डसि' युष्मद् अस्मद् के मपर्यन्त को तव-मम होगा डस् परे रहते, 'युष्मदस्मद्भया डसोऽश्' इनसे परे स्थित डस को 'अश्' होगा, शित्, सर्वादेश । शेषलोप, पररूप । श्रोस में 'युवावी' से युवावादेश, योऽचि' से द को यत्व। पररूप । ( यहाँ 'प्रात्वयत्वनिमित्तेतर' न होने से शेषलोप नही) रुत्व-विसर्ग। 'साम श्राकम्' युष्मद् अस्मद् से परे 'साम्' ( सुट किये श्राम्-सर्वनाम होने से) को 'प्राकम्' शेषलोप । त्वयि । मयि । युवयोः। आवयोः युष्मासु । अस्मासु-सप्तमी मे-युष्मद् इ अस्मद् इ, मपर्यन्त को त्व-मादेश, द को यत्व, पररूप। द्विवचन पूर्ववत् । युष्मद् सु, अस्मद् सु, 'युष्मदस्म' से द् को प्रात्व, अतित्वम् । अत्यहम् । अतित्वाम् । श्रतिमाम् । प्रतियूयम् । अतिवयम् । अतित्वाम् । अतिमाम् । अतित्वान् । अतिमान् । अतित्वया। अतिमया । अतित्वाभ्याम् । अतिमाभ्याम् । अतित्वाभि । अतिमामिः। अतितुभ्यम् । अतिमह्यम् । अतित्वाभ्याम् । अतिमाभ्याम् । अतित्वभ्यम् । अतिमभ्यम् । अतित्वत् २। अतिमत् २। अतितव । अतिमम | अतित्वयोः अतिमयो। अतित्वाकम् । अतिमाकम् । अतित्वयि । अतिमयि । अतिस्वयोः। अतिमयोः । अतित्वासु । अतिमासु (क)। अतियुवाम् ३ । अत्यावाम् ३ । अतियुवान् । अत्यावान् । अतियुवया । अत्यावया। अतियुवाभ्याम् ३ । अत्यावाभ्याम् ३ । अतियुवामिः । अत्यावाभिः । अतियुधभ्यम् । अत्यावभ्यम् अतियुवत् २। अत्यावत् २। अतियुवयोः २। अत्यावयोः२। अतियुवा- कम् । अत्यावाकम् । प्रतियुवयि । अस्यावयि । अतियुवासु । अस्यावासु (ख)। अतियुष्माम ३। अत्यस्माम् ३ । अतियुष्मान् अत्यस्मान् । अतियुष्मया । अत्यस्मया । अतियुष्माभ्याम् । अत्यस्माभ्याम् ३ । अतियुष्मामि । अत्य स्मामिः । अतियुष्मभ्यम् । अस्यस्मभ्यम् । अतियुष्मत् २। अत्यस्मत् २ । अति- ६ साधनिकासहिता युष्मयोः । अत्यस्मयो।। अतियुष्माकम् । अत्यस्माकम् । अतियुष्मयि । श्रत्य- स्मयि । श्रतियुष्मासु । अत्यस्मासु । तुमको अतिक्रमण करनेवाला, मुझको अतिक्रमण करनेवाला । इसी प्रकार 'तुम दोनों को और तुम तीन या इससे अधिकों को अतिक्रमण करनेवाले' इत्याद्यर्थ है। अतिक्रमण करनेवाले भले ही एक दो या इससे अधिक हो, समासघटक युष्मद् तथा अस्मद् के वाच्य एक हो तो 'त्व-म', दो हो तो 'युव-श्राव', श्रादेश होंगे । किन्तु अतियुष्मद् तथा त्यस्मद् के एक दो अथवा अधिकार्थवृत्ति होने पर भी सु, जस, ऊ, उस-ये प्रत्यय परे रहते त्व-अह, यूय-वय, तुभ्य-मह्य और तव-मम ये श्रादेश होंगे। ये चार विधियों पर होने से तथा पूर्वविप्रतिषेध ('विप्रतिषेधे सूत्र मे 'पर' इष्टवाची होने से कहीं पूर्व कार्य ही प्रवृत्त होगा ) से अपने विषयों (सु-जसादि ) मे युव और आव तथा त्व-मो को बाध कर अावेंगे। युष्मान् अस्मान् वा अतिक्रान्तौ अतिक्रान्त:- इस विग्रह मे युष्मद् अस्मद् के स्वय द्विवचन एक मे न होने के कारण युव-श्राव और स्व-म नही होगे। तथा सुजसादि उक्त चार स्थलों से अतिरिक्त वचनो में त्व-म आदेश और शेष लोप होकर बननेवाले रूप 'क' तक है। प्रक्रिया पूर्वोक्त ही है। यहा 'त्वा मामतिक्रान्तः अति क्रान्तौ अन्तिक्रान्ताः' इस प्रकार विग्रह करके अन्यतम अर्थ में प्रयोग होता है। 'युवाम् अावाम् वा अतिक्रान्तः अतिक्रान्तौ अतिक्रान्ताः' इस विग्रह में उपरोक्त ४ स्थानों से अतिरिक्त स्थलो में युव-श्राव आदेश होकर 'ख' तक के रूप बनते है । 'युष्मानस्मान् वा अतिक्रान्त. अति- क्रान्तौ अतिक्रान्ता'-इस विग्रह में उक्त ४ स्थानों को छोड़कर रूप दिये गये है। यहा सर्वत्र 'डेप्रथम' 'प्रथमायाश्च' 'द्वितीया' 'शसो न' 'योऽचि' 'युष्मदस्म' 'भ्यसो' 'एकवच' 'पञ्चम्या' 'युष्मद' 'साम'-ये सब विधियों यथास्थान होगी ही। श्रीशस्त्वाऽवतु मापीह दत्तात्ते शर्म मेऽपि सः । स्वामी ते मेऽपि स हरिः पातु वामपि नौ विभुः॥

से ८२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची सुखं वा नौ ददात्वीशः पतिर्वामपि नौ हरिः । सोऽव्याद्वो नः शिव वो नो दद्यात्सेव्योऽत्र वः स नः॥ पदात्परयोः किम् ? त्वां पातु-मां पातु (१)। अपादादौ किम् ? वेदैरशेषैः सवेद्योऽस्मान् कृष्णः सर्वदाऽवतु (२) नेह-'इति युष्मत्पुत्रो ब्रवीति । इत्य- स्मत्पुत्रो ब्रवति' (३)। तेनेह न-श्रोदनं पच तव भविष्यति (४) इह तु स्यादेव-शालीनां ते श्रोदनं दास्यामि (५) इति । 'पदस्य 'पदात्' 'अनुदात्तं सर्वमपादादौ"युष्मदस्मदोःषष्ठीचतुर्थीद्वितीया- स्थयोर्वानावौ' पद से परे, पादादि मे न रहनेवाले, षष्ठी चतुर्थी तथा द्वितीया युक्त युष्मदस्मदों को 'वा-नौ' आदेश होंगे। 'बहुवचनस्य वस्नसौ' उपरोक्तविध युष्मद् और अस्मद् को बहुवचन मे 'वस्-नस्' होंगे। 'तेमयावेकवचनस्य उक्तविध युष्मदस्मदों के ६-४-के एकवचन मे 'ते- मे' आदेश होंगे । 'वामौ द्वितीयाया:' द्वितीयैकवचनान्त युष्मद् और अस्मद् को त्वा और मा श्रादेश होगा। 'त्वा-मा' (२ के १ वचन मे ) २-४-६ के २-३ वचनों मै 'वा-नौ, वा-न' ४-६ के १ वचन मे 'ते में होते हैं। ‘पद से परे' कहने से (१) उदाहरण मे त्वा नहीं हुआ। (२) अस्मान् पादादि मे होने से 'न' नहीं । 'युष्मद्'-मे 'स्थ' शब्द से श्रूय- माण विभक्तिवालो से ही 'वा-नौ' होंगे, (३) मे नही हुआ । 'समानवाक्ये निघातयुष्मदस्मदादेशा वक्तव्याः 'एकतिड वाक्यम्' वा० से (४) मे दो तिड् (२ वाक्य) होने से आदेश नहीं । (१) यह ठीक उदाहरण है, चतुर्थी के १ वचन मे 'ते' हुआ। अन्वादेशे तु-धाता ते भक्तोऽस्ति । धाता तव भक्तोऽस्ति इति वा । तस्मै ते नमः' इत्येव-'एते वानावादय आदेशा अनन्वादेशे वा वक्तव्या' वा. 'अन्वा- देशे तु नित्यं स्युः । ये ४ अादेश अन्वादेश के अभाव मे ऐच्छिक है। अन्वादेश मे नित्य है। पूर्व वाक्य और उत्तर वाक्य इन दोनों के उदाहरण है। उत्तरवाक्य के 'य इन्द्रो वज्रबाहुः' इत्यादि पूर्वाध है, अतः किंचि कार्य विधान के लिये उपात्त का पुनरुपादानरूप अन्वादेश होने से 'तस्मै तुभ्य' नहीं होगा।

साधनिकासहिता - हरिरत्वां मां च रक्षतु। कथं त्वां मां वा न रक्षेत् । हरो हरिश्च मे स्वामी- 'नचवाहाहैवयुक्ते' च-वाह-अह-एव-इनके योग मे वानावादि आदेश नहीं होंगे। 'च' के तथा 'वा' के योग होने से 'त्वा 'मा' के स्थान मे 'त्वा' 'मा' नहीं हुआ। सूत्र मे 'युक्त' कहने से युष्मद् अस्मद् से साक्षात् योग रहने पर ही अन्वादेश का यह निषेध है, परपरा से योग होने पर आदेश हो जाता है। 'हरिश्च' यहाँ 'च' हरि हरों के समुच्चायक है, अस्मत् से साक्षात् सम्बद्ध न होने से 'मे' हुआ। चेतसा त्वां समीक्षते, मक्तस्तव रूपं ध्यायति, बालोचने तु-मक्तस्त्वा पश्यति चक्षुषा-'पश्याथैश्वानालोचने' अॉख से देखने के अतिरिक्त अर्थवाले धातुओं के योग मे ये अन्वादेश नही होंगे। यहाँ 'समीक्षते' ज्ञानसामान्यार्थक होने से 'त्वा' नहीं। यहाँ परम्परा से सम्बन्ध होने पर भी यह निषेध लगेगा, अतः ध्यायति' से 'तव' का साक्षात् सम्बध न होने पर भी 'ते' नहीं। तीसरे वाक्य मे देखना होने के कारण 'त्या' आदेश हुआ। 'भक्तस्त्वमप्यहं तेन हरिस्त्वां त्रायते स माम' "त्वा-मा' वा (१) अग्ने तव, देवास्मान् पाहि, (२) अग्ने नय (३) अग्न इन्द्र वरुण (४) सर्वदा देव रक्ष न:' एवं 'इमं मे गङ्गे यमुने'--'सपूर्वायाः प्रथमाया विभाषा' जिसके पूर्व में कोई शब्द विद्यमान हो-ऐसे प्रथमान्त से पर मे स्थित युष्मद् अस्मद् को अन्वादेश विकल्प से होंगे । 'तेन' से युक्त 'हरिः' और 'त्रायते' से युक्त 'स:' प्रथमान्त होने से अन्वादेश का विकल्प है। 'सामन्त्रितम्' संबोधन में जो प्रथमा तदन्त 'अामन्त्रित' कहाता है। 'आमन्त्रित पूर्वमविद्यमानवत् (१) आमन्त्रित अविद्यमानवत् (नही जैसा) है, अतः 'तव-अस्मान्' को 'ते नस्' नही। (२) 'नय' को उदात्तत्व तथा (३) मे सर्वानुदात्तत्व नहीं, 'अग्ने' दोनों जगह अविद्यमानवत् है और दोनों उदाहरणों मे 'तिडतिका तथा 'आमन्त्रितस्य च' मे विद्यमान पूर्वपद की अपेक्षा है। (४) में 'देव' अविद्यमानवत् है, तथाऽपि 'रक्ष' को लेकर 'न:' हुअा है। इसी प्रकार 'इम'-मंत्र मे यमुने मे पहले 'गगे' को अविद्यमानवद्भाव होने पर भी उसमे पहले स्थित 'मे' शब्द को लेकर 'आमन्त्रितस्य च से सब अनुदात्त है।

८४ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची । हरे दयालो नः पाहि, अग्ने तेजरिवन् , यूयं प्रभवो देवाः शरण्याः, युष्मान् मजे, वो मजे इति वा-'नामन्त्रिते समानाधिकरणे सामान्यवचनम्' समानविभक्तिक विशेषण परे रहते विशेष्य (हरि) अविद्यमानवत् नहीं है। अतः 'ना' हुअा। इसी प्रकार 'अग्ने' अविद्यमानवत् न होने से पदसे परे मिलने के कारण 'तिड अनिडः' से अनुदात्त (तेजस्विन् ) है। 'विभाषित विशेष- वचने' बहुवचनान्त विशेष्य समानविभक्तिवाले 'श्रामन्त्रित' विशेषण परे रहते विकल्प से विद्यमानवत् है। अतः उत्तरवाक्य मे अन्वादेश मे भी विकल्प से युष्मान् को 'व' हुआ। सुपात्-द्, सुपादौ, सुपादः, सुरादम्,सुपादौ, सुपदः, सुपदा, सुपाङ्गयाम् इत्यादि- अच्छे पैरोंवाला । 'सख्यासुपूर्वस्य-' से सुपाद के अ का लोप हुा । सुका हल्ड्यादि लोप । चत्वं विकल्प । श्रौट तक कोई विकार नहीं। शस् से 'पादः पत्' पात्-शब्दान्त जो भसज्ञक अङ्ग है उसके अवयव 'पात्' को 'पद्' आदेश होगा। रुत्वविसर्ग । एवं च अजादि,वचनों मे श्रादेश होगा, हलादि मे यथावत्-विभक्तियोग । अग्निमत् अग्निमद् अग्निमथौ अग्निमथा, अग्निमनयाम्-इत्यादि-अग्नि को मथने- वाला। 'मन्थ विलोडने अग्नि मनातीति अग्निमथ् । सु मे जश्त्व- औ-श्रादि मे यथाश्रुत । भ्याम् श्रादि मे जश्त्व । (फिर सुप् मे चल)। प्राक् प्राञ्चौ , प्राञ्चः, प्राञ्चम् , प्राञ्चौ, प्राच , प्राचा प्रारभ्याम्-इत्यादि-अच्छी तरह चलनेवाला । 'अन्चु गतिपूजनयोः' 'क्विन्' प्रत्यय ऋत्विगादि से। उसका सर्वापहारी लोप, 'हलन्त्य' से 'न' का, 'लशक्व-' से 'क' का, 'वर- पृक्त-' से 'व' का। 'इ' उच्चारणार्थ है । 'अनिदिता हल उपधायाः क्डिति' हलन्त तथा 'इ' इत् नही है ऐसे अगों के उपधाभूत 'न' का लोप होगा कित् और डित् प्रत्यय परे रहते । 'अञ्चु' घटक न का लोप । 'उगिदचा' से (अञ्चु मे उ इत् ) नुम् । 'सयोगा-' से 'च' का लोप । नुम् के न को 'क्विन्प्रत्य-' से कवर्ग-ड् । सुलोप । औ मे नुम् के न को 'नश्चाप-' से अनुस्वार, अनुस्वार को 'अनुस्वा-'से परसवर्ण ञ् ।ौट तक यही प्रक्रिया । शस्मे 'अचा' लुप्तनकार अञ्चति के भसंज्ञक अ का लोप होगा ('अनिदि- , चव साधनिकासहिता से नलोप ) 'प्र-च अस्' दशा मे-'चौ' लुप्ताकारनकारवाला अञ्चति के परे रहते पूर्व अण् को दीर्घ होगा। भ्याम् आदि मे 'चोः कु. से कवर्ग-ग (जश्त्व)। प्रत्यङ् प्रत्यञ्चौ प्रत्यञ्च , प्रत्यञ्चम् प्रत्यञ्चौ प्रतीच , प्रतीचा-प्रति से युक्त अञ्चु को क्विन् । 'अनि-' से न लोप । सुप् । 'उगिदचा-' से नुम् । सुलोप । च का सयोगान्तलोप। नुम् के न को कुत्व-ड्। औट तक प्राड् मे उक्त प्रक्रिया। शस् मे असर्वनामस्थान होने से नुम् नहीं। प्रति-अच् शस् इस अवस्था मे यण अन्तरङ्ग होने पर भी यण् निमित्तभूत 'अच्' वाला अ 'अचा' से विनाशोन्मुख है । अतः 'अकृतव्यूहाः' से यण नही होगा । का लोप, 'चौ' से इ का दीर्घ । टा मे भी अ-लोप, दीर्घ । अमुमुयङ् अमुमुयञ्चौ अमुमुयञ्चः। अमुमुयश्चम् अमुमुयञ्चौ अमुमुईचः । श्रम- मुईचा अमुमयग्म्याम् इत्यादि-इसके प्रति चलनेवाला । अदस् अञ्च । ऋत्विगादि से क्विन् । 'अनि-' से नलोप । अदस अच् विष्वग्देवयोश्च टेरघुञ्चतावप्रत्यये' विष्वग्-देव शब्दोंके तथा सर्वनाम के भी 'टि'को 'अद्रि' आदेश होगा, अविद्यमान प्रत्यय (क्विबादि)वाले अञ्चति परे रहते । अदस् अस् भाग (ट) को अद्रि, अदद्रि अच् , यण् -अदबूच् । 'अदसोऽसे- दुदो म:' स् अन्त मे नहीं हो ऐसे अदस के द से परे को उ तथा ऊ होगे एव द को म भी होगा। अन्तरतम होने से ह्रस्व को ह्रस्व उ दीर्घ को ऊ । अदबूच् स , 'उगिद-'से नुम् । सुलोप । च का सयोगान्तलोप । नुम्के न को कुत्व-ड् । प्रथम द को म, तदुत्तर अ को उ, दूसरे द (यूवाले) को म, तदुत्तर रेफ को उ करने पर अमुमुयड् । श्रीट तक प्राड वत्, उत्व-मत्व यण विशेष है। शस मे अमुमु इ (अद्रिवाला) अच् अस् , 'अचा' से अलोप, 'चौ' से पूर्व इ को दीर्घ । टा मे भी यही क्रम । भ्यामादि मे यण (अद्रिवाले इ को 'अच्' परे होने से) 'चो कु:' से कुत्व, जश्त्व । शसादि में मु-ई मे उ अमिद्ध (मुत्वविवि त्रैपादिक है ) होने से यण नही । अदमुयड , पक्षे अदाङ्, विष्वग्देवयोः किम्-अश्वाची, अञ्चतौ किम्- विष्वग्युक् , अप्रत्यये किम्-विष्वगञ्चनम् , तेन अयस्कार:-मतान्तर से 'अदसः' मे अवयवपष्ठी नहीं, अपितु स्थानपष्ठी, तथा च 'अलोऽन्त्यस्य' से अदस. ."

सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची द्-अ (द) का अन्त्यवर्ण स दकार से पर मे नही (अ का व्यवधान है) है, 'अद्रि होने पर तो इ द से परे नहीं (रेफ व्यवहित) है । अत 'अन्त्यबाधेऽन्त्यसदेशस्य' प. अन्त्य को श्रादेश बाधित हो तो अन्त्य के समीपवाले को होगा। तथा च अद्रि वाले द्-र को ही मुत्व होगा, अदस् के को नहीं। और एक मत मे तो 'अः सेः स्थाने यस्य' अर्थात् 'त्यदादी- नाम से जहाँ अन्त्य स को अ होगा वहीं यह 'मुत्व' है। तथा च यहाँ मुत्व ही नहीं । 'विष्वग्देवयोः' न कहने पर 'अश्वम् अञ्चति' इस स्थल मे भी 'अद्रि' होता। 'अञ्चति परे रहते' न कहने पर 'विष्ठक को युज् के योग मे भी 'अद्रि' प्राप्त होता। 'प्रत्यय अन्त मे न हो ऐसा अञ्चति' न कहने पर भावार्थकल्युट् परवाले अञ्चको भी अद्रि हो जाता। 'अप्रत्यये कहना यह ज्ञापित करता है कि अन्यत्र 'पातु' कहने से तदादि (धातु श्रादि मे है जिसका ) का ग्रहण है । इसी से अतः 'कृकमि-' मे कृधातु तदादि (अण्-धात्वादि है ) मानकर ही 'अयस्कारः' मे सत्व हुश्रा। नही तो केवल अयस्कृत्-इत्यादि मे ही सत्व होता। उदछ उदञ्चौ उदञ्चः। उदीचः । उदीचा उदग्भ्याम् इत्यादि। सस्यड्सम्यञ्चौ सम्यञ्चः । समीचः । समीचा-उत्कृष्ट गति करनेवाला । किन् , नलोप, नुम्, सयोगान्त लोप । कुत्व पूर्ववत् । श्रौट तक पूर्ववत् । शसादि अच् में 'उत ईत्' उत् से परमे रहनेवाले, न-कार लुप्त है ऐसे अंचति के भसज्ञक अ को 'ई' होगा । भ्यामादि में 'चोः कुः' से कुत्व जश्त्व । 'समः समि' अप्रत्ययान्त अञ्चति परे रहते सम्के स्थानमे 'समि' आदेश होगा । क्विन्नादि पूर्ववत् । शसादिमे 'अचः' से अलोप होने पर 'चौ'से दीर्घ। सघ्रयङ । तिर्यड तिर्यञ्चौ तिर्यश्चः । तिर्यञ्चम् तिर्यञ्चौ तिरश्वः । तिरश्चा तिर्य- ग्भ्याम् इत्यादि-साथ चलनेवाला । 'सहस्य सध्रिः । अप्रत्ययान्त अञ्चति परे रहते 'सह' को 'सध्रि' आदेश होगा। क्विन् आदि । 'तिरसस्तिर्यलोपे' अकार लुप्त नही ऐसे अञ्चति अप्रत्ययान्त परे रहते 'तिरस्' को 'तिरि आदेश होगा। किन्नादि । शस् मे 'अच' से अलोप होने पर ('तिरि' ।

साधनिकासहिता नहीं) श्रुत्व (अञ्च के अच् के च के योग मे ) रुत्व-विसर्ग। टा आदि अच् मे भी अलोप श्चुत्व । भ्यामादि मे अका लोप न होने से 'तिरि' श्रादेश-यण् । 'चोः कु' कुत्व । जश्त्व । प्राङ् प्राञ्चौ प्राञ्चः। प्राञ्चम् प्राञ्चौ प्राञ्चः। प्राञ्चा प्राड्भ्याम् इत्यादि। प्रा- घु, प्राक्षु, प्रार्छ । एव पूजार्थे प्रत्यड्डादयः-पूजा करनेवाला । 'नाञ्चेः पूजा- याम्' पूजार्थक श्रञ्चति की उपधाभूत न का लोप ('अनिदि'-से ) नहीं होगा, न-कारलोप न होने से नुम् नही (नलोपी अञ्चति को ही नुम् ) क्विन् । प्राञ्च , सु, हल्ड्यादि लोप । सयोगान्तलोप । अनुस्वारपरसवर्ण हटने से नकार को 'क्विन्प्रत्य' से कुत्व-ड् । श्रौ आदि मे यथाश्रुत विभक्ति योग। शसादि मे नलोप न होने से 'अच: से अ-लोप नहीं। रुत्वविसर्ग। भ्यामादि मे 'स्वादिष्व'-से पद होने से अञ्च के च का सयोगान्तलोप, श्रञ्च् मे के अनुस्वारपरसवर्ण के हटने से न को 'विवन्प्रत्य' से कुत्व ड्। सुप् मे 'ड्णो कुक्' से कुक् , 'चयो द्वितीया'-से पक्ष मे ख। वह दोनों वैकल्पिक होने से ३ रूप । 'आदेश'-से मूर्धन्यादेश। पूजार्थ मे प्रत्यड आदि भी इसी प्रकार चलेगे । क्रुङ क्रुञ्चौ क्रुञ्चः। क्रुडभ्याम्-इत्यादि । पयोमुक्-पयोमुग् पयोमुचौ पयोमुचः- कुटिल व अल्प 'क्रुञ्च कौटिल्याल्पीभावयोः' । 'ऋत्विग्' से नलोपाभाव क्विन् भी निपातित है। सु-का हल्ङयादि लोप, च का सयोगान्तलोप । न को 'क्विन्प्रत्य'-से कुत्व (ड्)। अजादिवचनों मे कोई विकार नही । भ्यामादि हलादि वचनों मे पद होने से च का सयोगान्तलोप और न को कुत्व । पयोमुक् मेघ । 'मुब्तृ मोक्षणे' क्विप् । सुलोप । 'चोः कु. से कुत्व, चवं जश्त्व । अजादि वचनों मे कोई विकार नही। हलादि मे कुत्व, यथोचित जश्त्व। सुवृट्-सुवृडसुवृश्चौ सुवृश्चः । सुवृश्चा। सुवृट्स-सुटसु-अच्छी तरह करटनेवाला । 'अोव्रश्चू छेदने' । क्विप् । 'अहिज्या'-से सप्रसारण (ऋ)। सुप । सुलोप । 'वश्वभ्र'-से च को पत्व । सू (जो कि श्चुत्व से श् है) को 'स्कोः सया'-से लोप । ष-को चत्व-जश्त्व । अजादि मे यथावत्। हलादि मे जश्त्व। सुप्मे 'डः सि'-से वैकल्पिक धुडागम, चत्वं ।

-- सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची महान् महान्तौ महान्तः। हे महन् ! । महतः। महता महङ्गयाम्-इत्यादि- 'वर्तमाने पृषबृहन्महजगच्छतृवच्च' उ० सू० । पृषद् बृहत् महत् जगत्- ये ४ शब्द निपातित है। इनका शतृप्रत्ययान्तवत् कार्य होगा। 'उगिद'- से नुम् । महन्त स-सान्तमहत:'-से न से पूर्व अ का दीर्घ । सुलोप, सयोगान्त-त्-लोप। औट तक नुम्, अनुस्वार-परसवर्ण । उपधादीर्घ । 'सान्त'- मे 'असबुद्धौ' कहने से सबोधन मे दीर्घ नही । शसादि मे कोई विकार नहीं। भ्यामादि मे जश्त्व। धीमान् धीमत्तौ धीमन्तः । हे धीमन् । अज्ग्रहणं नियमार्थम् । तेन स्वत्-ध्वत्- इत्यादौ न । गोमान् गोमन्वौ गोमन्तः । इत्यादि-बुद्धिमान् । मतुबन्त । तद्धि- तान्त होने से सुप् । धीमत् स्-'अत्वसन्तस्य चाधातोः' 'अतु' अंत मे है जिसका, उसकी उपधा को दीर्घ होगा-धातु से अतिरिक्त 'असू' अन्त की उपधा को भी दीर्घ होगा सबुद्धिभिन्न सु परे रहते । पर तथा नित्य नुम् ('उगिदचा'-) को भी बाधकर पहले वचनसामर्थ्य से दीर्घ,तब नुम् । सु का हल्डयादि लोप । त् का सयोगान्तलोप। औट तक 'उगिद'-से नुम्, अनुस्वार-परसवर्ण । निपेध होने के कारण सबोधन मे दीर्घ नही ।त् का सयोगान्त लोप । शसादि मे ‘महत्' जैसा । 'उगिदचा' सूत्र मे 'अच्' का ग्रहण (कथन) 'धातु को 'उगित्' होने का कार्य होता हो तो 'अञ्चति' को ही होगा और धातु को नहीं' इस प्रकार नियम के लिये है । अतः 'सन्सु ध्वन्सु'-(गतौ) उगित् धातु है, उनसे क्विप करने पर 'अनिदिता'-से न-लोप करने पर सुबुत्पत्ति, सु का इल्डयादिलोप, 'वसुत्रसुध्वस्व'-से दत्व, चवं से 'सत्-ध्वत्' बनते है । नियम न करने पर यहाँ भी उगित्कार्य- नुम् हो जाता। 'अत्वसन्त'-मे 'अधातोः' यह अत्वन्त का विशेषण न होने से अत्वन्त धातु होने पर भी दीर्घ होगा । 'गोमन्तम् इच्छति, वा गोमानिव अाचरति' इस अर्थ मे 'क्यच्' अथवा 'श्राचारविप्' अन्त से कर्तरि क्विप् , य-अ-लोप करने पर सुबुत्पत्ति । दीर्घ, नुम् । सुलोप पूर्ववत् । भवान् भवन्तौ भवन्तः । भवतीति भवन्-श्राप । 'भातेर्डवतुः'उ० सू ० भा- धातु से 'डवतु' प्रत्यय होगा। डवतु डित् होने से भ-संज्ञक न होने पर भी साधनिकासहिता 8 'भा' के 'श्रा' कालोप, भवत् सु, 'अत्वसन्त'-से दीर्घ, 'उगिदचा' से नुम्, सु का लोप, संयोगान्त लोप ('त्' का)। शत्रन्त 'भवन्' अत्यन्त न होने से दीर्घ नही । भूधातु के लट् को शत, शप् , गुण, अवादेश, पररूप, भवत्- सु, नुम् , सुका हल्डयादि लोप, सयोगान्तलोप । श्रौ आदि मे पूर्ववत् । ददत् ददतौ ददतः । जक्षत्-दु जक्षतौ जक्षतः । दीध्यत् । वेव्यत्-देता हुआ। खाता हुआ । दाञ् तथा जक्ष धातु के शत्रन्त मे रूप है। यहाँ भी उगिद'- से नुम् प्राप्त होने पर 'उभे अभ्यस्तम्' (अष्टाध्यायी में) षष्ठाध्याय के द्वित्व प्रकरण मे जो द्वित्व विहित है वे दोनों मिलित 'अभ्यस्त' कहाते है। 'नाभ्यस्ताच्छतुः' अभ्यस्त से पर मे रहनेवाले शतृ को नुम् नही होता है। सुको हल्डयादि लोप । 'जक्षित्यादयः षट् ' जक्ष-जाग-दरिद्रा-चकासु-शास- दीधीड-वेबीड-ये सात धातु भी अभ्यस्त संज्ञक हैं। अतः 'जक्ष' के शतु के रूप मे 'उगिद०' से नुम् नहीं। सुलोपादि पूर्ववत् । दीधी-वेवी ये दोनों वेद मे ही प्रयुक्त होते है, ये यद्यपि ङित् होने से प्रात्मनेपदी हैं, अतः शानच ही होना चाहिये, तथापि 'व्यत्ययो बहुलम्' से परस्मैपद होने से शतृ । नुम् निपेध । सुलोप । गुप्-गुब् गुपौ गुपः । गुब्भ्याम्-इत्यादि-'गुपू रक्षणे' रक्षा करने वाला। क्विप लोप । सुलोप । चवं-जश्त्व । भ्यामादि मे पदत्वात् जश्त्व । ताडक् , ताहग तादृशौ ताहश:-अर्थ वैसा । 'त्यदादिपु दशोऽनालोचने कञ्च' त्यदादि उपपद रहने पर ज्ञानसामान्य अर्थ से अतिरिक्त अर्थ वाले दृशि धातु से कञ् प्रत्यय होगा। 'च' से क्विन भी होगा। 'श्रा सर्वनाम्न' सर्वनाम को अाकार अन्तादेश होगा दृग् दृश वतु परे रहते । तद् दृश क्विन्, तद् के द् को श्रा, सवर्णदीर्घ, तादृश्-सुबुत्पत्ति। सु का हल्ड यादि लोप । “क्विन्प्रत्य'-के प्रसिद्ध होने से 'श्चभ्र-' से षत्व, उसको जश्व से ड, ड का 'विप्र'-से तुल्व-ग, चवं विकल्प । श्रो श्रादि अजादि म यथाश्रुत । विद् विड् विशौ विशः । विशम्-प्रवेश करने वाला । विश प्रवेशने 'क्विप' विश् स, हल्डयादिलोप । 'ब्रश्च'-से श को प, प को जश्त्व से ड, चत्वं विकल्प । अन्यत्र यथाश्रुत । भ्यामादि मे पदला जश्त्व । सुप मे वा धुट ।

६. उसको कुत्व सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची नक्-नग नट-नड् नशौ नशः । नरभ्याम-नड्भ्याम् । इत्यादि-नही दीखनेवाला- 'णश् अदर्शने ।' नश् सुप् । सुका हल्ड यादि लोप । 'ब्रश्च'-से नित्य षत्व प्राप्त होने पर 'नशेर्वा' नश् को कवर्ग अन्तादेश विकल्प से होगा पदान्त मे | जश्त्व-चत्वं विकल्प । पक्ष मे षत्व, जश्त्व-चत्वं । अजादि मे यथा- वत् । भ्यामादि मे कवर्गादेश, पक्ष मे 'ब्रश्च'-से षत्व और जश्त्व । तस्पृक् घृतस्पृग् घृतस्पृशौ घृतस्पृशः । स्पृक्-घृत को स्पर्श करनेवाला । 'स्पृशोऽनुदके क्विन्' उदकशब्द से अतिरिक्त सुबन्त शब्द परे रहते स्पृश -धातु से क्विन् होगा। घृतस्पृश शब्द से सुप् । सुका हल्ड यादि लोप । कुत्व असिद्ध होने से पहले 'प्रश्च' से षत्व, उसको जश्व से ड, से कु ग । चर्व विकल्प । मामादि मे भी ग। 'क्विन्प्रत्ययस्य' यहाँ क्विन्प्रत्यय जिससे हो' इस प्रकार बहुव्रीहिसमास करने से निरुपसर्ग स्पृश् से क्वि । इससे भी अब बहुव्रीहि मानने के कारण (क्विन्नन्तत्व की योग्यता से ) कुत्व । षत्व-कुत्व चत्वं । दक् दधम् दधषौ दधषः। दरभ्याम्-इत्यादि । रनमुट रत्नमुड रनमुषो रत्नमुषः-प्रगल्भ होता है। 'ऋत्विग्दधृक्' से क्विन् । द्वित्व ('दधृक्' के रूप मे ) तथा अन्तोदात्तत्व निपातित है। दधृष् स् । हल्डयादिलोप । जश्त्व से पको ड, कुत्व से ग । चत्वं विकल्प । भ्यामादि मे जश्त्व । रत्नमुष् सु, सुलोप । जश्त्व चत्वं । रत्न चुराने वाला। रत्नं मुष्णाति-इति रत्नमुट् । षट् षड् षड्मिः। षड्भ्यः २ । षण्णाम् । षट्स षट्सु-छ:-अर्थ । बहु- वचन मे ही। षप् -जस तथा शस का 'षड्भ्यो लुक्' से लोप । जश्त्व- चत्वं । श्राम् मे 'षट्च'-से नुट् , 'न पदान्ता- सूत्र से ष्टुत्व ('नाम्' के न को ण) ट को 'यरो'-से प्राप्त वैकल्पिक अनुनासिक के अपवाद 'प्रत्यये'- वा० से नित्य अनुनासिक (ण)। सुप् मे वैकल्पिक धुट , चत्वं परमषट् । परमषण्णाम् । गौणत्वे तु-प्रियषषः। 'प्रियपषाम्-मुख्य छः । र प्रधानता मे 'षट'-यह विधि अंगसबन्धी होने से तदन्तविधि । अन्य- पदार्थप्रधानता मे (प्रियाः षट येषां ते ) जस् को रुत्व विसर्ग । रत्नमुट जैसा । अाम् मे 'षट्चतुभ्य॑श्च' यहा बहुवचन निर्देश से स्वप्राधान्य मे ही नुट , गौणता मे नहीं ।

साधनिकासहिता दीर्घ । पिपठी पिपठिषौ पिपठिषः । पिपठीाम् । पिपठीषु, पिपठीःषु-पढना चाहने वाला। पठितुमिच्छति-(पठ-व्यक्ताया वाचि'-से इच्छार्थक सन्, द्वित्व, हलादि शेष, अभ्यास का इत्त्व, सन् को इट, षत्व, सनाद्यन्तत्वात् धातुत्व । पिपठिष-से किम् । अल्लोप) कृदन्त होने से 'कृत्त'-से प्राति- पदिक सज्ञा, सु का हल्ल्यादि लोप । पिपठिस -के स को 'ससजु'-से रुत्व । ( यहा पत्वविधि 'आदेश-' त्रिपादी मे 'ससजु०' से पर होने के कारण असिद्ध होने से धातु से विहित सन् के स को रु ही होगा)ोरुपधाया दीर्घ इकः' रेफ और वकारान्त उपधारूप इक् को दीर्घ होगा पदान्त मे । दीर्घ । विसर्ग (खरव०' से)। अनादि वचनो मे पद न होने से रुत्व नही, पत्व । पामादि मे रुत्व, 'वॉस' से उपवादीर्घ । सुप् , मे रुत्व, विसर्ग, विसर्ज-' से सत्व, उसको बाध कर 'वा शरि' से वैकल्पिक विसर्ग। 'नुविसर्जनीयशळवायेऽपि' नुम्-विसर्ग-शर्-इनमे प्रत्येक से व्यवधान होने पर भी इण् और कवर्ग से पर मे स्थित स को मूर्धन्यादेश होगा। पिपठीस-सु, इस दशा मे द्वितीय स को उक्तसूत्र से षत्व, प्रथम स को ष्टुत्व से प। विसर्गपक्ष मे सु को पत्व । निस्स्व-निस्से-'नुविस०' मे प्रत्येक से व्यवधान ही विवक्षित है, नकि 'यथासभव' । अतः 'णि सि चुम्बने' के लोट तथा लट् के मध्यमपुरुषैक वचन में द्वितीय स को षत्व नही । यहा नुम् स्थानिक अनुस्वार और स से व्यवधान है, प्रत्येक से नहीं । नुम्ग्रहण नुम्स्थानिकानुस्वारोपलक्षणार्थम् । तेनेह न-सुहिन्सु । पुस-'हिसि हिंसायाम्' धातु । सुहिन्स् मु ( स० बहुवचन), प्रथमसकार को सयोगान्त लोप, यहा न् पदान्तस्थ होने से उसको 'नश्चा० से अनुस्वार नहीं । ऐसे ही पुंस -सु, प्रथम सकार को संयोगान्त लोप । दोनों स्थली मे क्रम से नुम् और अनुस्वार से व्यवधान होने से पत्व प्राप्त होता है, पर 'नुम्- स्थानापन्न अनुस्वार' से व्यवधान होने पर ही पत्व होगा-ऐसे ही प्रकृतसूत्र के भाष्य मे व्यान्या किया है। इसी से 'शर' कथन से ही केवल अनुस्वार का सग्रह हो जाने से (अनुवार शर में पठित है) भी नुम् कहने की आवश्यकता हुई । , ६२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची चिकीः चिकीर्षों चिकीर्षः। चिकीर्षु-करना चाहनेवाला। चिकीर्ष स्, स. का हल्ड्यादि लोप । 'रात्सस्य'-से (षत्व प्रसिद्ध होने से ) स का लोप, रेफ का विसर्ग। म्यामादि मे भी पद होने से स का लोप । सुप मे 'रोः सुपि' से नियम न होने के कारण 'खरव-'से रेफ का विसर्ग नही । पत्व । दो दोषौ दोषः । दोष्णः। दोष्णा । दोषः । दोषा-हाथ । 'दमेडौंस्' उ० सू० 'दमु' (उपशमे) को डोस प्रत्यय, डित् होने से टि लोप । 'आदेश-' से मूर्धन्य (ष) आदेश । दोष , सु, हल्ड्यादि लोप । षत्व ('श्रादेश' ) असिद्ध होने से 'श्रोस' के स को रुल (ससजु० से) तथा विसर्ग । औ श्रादि में कोई विकार नही । शस मे 'पद्दन्नो'-से 'दोषन्' श्रादेश, अल्लोप, 'रषाभ्या-'से णत्व ( रुत्व-विसर्ग )। टा मे भी दोषन्नादेश । न होने पर यथाश्रुत विभक्ति योग । विविट -विविड् विविक्षौ विविक्षः। तट-तड् तक्षौ तक्षः-प्रवेश करना चाहनेवाला । 'विश प्रवेशने' सन्नन्त से क्विप् । विविक्ष सु-हल्ड्यादि लोप । प ( मे के) को संयोगान्त लोप । 'ष ढोः कः-' के असिद्ध होने से 'व्रश्च-' से श् (विश-के) को ष, जश्त्व चवं । औ अादि मे यथाश्रुत । 'तनू तनकरणे' से क्विा । सुलोप 'स्कोः सयो-' कलोप, ष को जश्त्व से ड, चवं विकल्प । गोरट गोरड, गोरक्षौ गोरक्षः । तक्तग। गोरक्-गोरग-गो रक्षा करने- वाला । 'रक्ष पालने' क्विप् , सुलोप । 'स्को:-से क लोप । प को जश्त्व- चत्वं विकल्प । अजादि मे विकार नहीं । तक्ष रक्ष धातुओं से णिच् ( 'हेतुमति च' से)। क्विप् , 'णेरनिटि' से णि लोप और क्विप् लोप । तक्ष, सुलोप । यहा सयोगान्त लोपापवाद भूत 'स्कोः सयोगा-'से कलोप, णिलोप के स्थानिवद्भाव के कारण, नही प्रवृत्त होता । 'पूर्वत्रासिद्धे न-' से स्थानिवद्भाव का निषेध, 'तस्य दोषः सयो- गादिलोप- अपवाद के कारण नहीं होता। तथा च सयोगान्त (द. के ए का ) लोप । जश्त्व-चत्वं । तक्ष वत् ही गोरक्ष की प्रक्रिया है। पिपक पिपम्। विवक् । दिधक-'डुपचष् पाके' पकाना चाहनेवाला। सन्नन्त का रूप है। पिपक्ष से सु, सुलोप। 'स्को'-से क लोप के प्रति कुत्व साधनिकासहिता (पच के च को 'चोः कु') असिद्ध होने से संयोगान्त-प का लोप । झल पर मे न होने से 'ष' की सत्ता मे प्रवृत्त कुत्व की निवृत्ति, पर पदान्तत्वात्कुत्व । जश्त्व, चव॑विकल्प । 'वच परिभाषणे' बोलना चाहनेवाला । सन्नन्त का रूप-विवक्ष -सु, सुलोप, संयोगान्तलोप । 'दह भस्मीकरणे' जलाना चाहनेवाला । सन्नन्त का रूप । दिवक्षस । सुलोप-सयोगान्त-प् लोप । पूर्ववत् । सुपी सुपिसौ सुपिसः । सुपिसा सुपीाम् । सुपीःषु सुपीष्प -अच्छा चलने वाला । 'पिस गतौ ।' सुपिस - मु, मु का हल्ड्यादि लोप, म का रुत्व, 'वोरु' से दीर्घ, विसर्ग । अजादि मे यथाश्रुत। स्यामादि में पद- त्वात् स को रुत्व । सुप मे 'वों' से दीर्घ, खरबमा'-से विमर्ग, 'नुम- विसर्जनीय-' से पत्व । 'विसर्जनीयस्य-' से सत्व, ष्टत्व, पक्ष् वा शार से विसर्ग। एव सुतः । विद्वान् विद्वांसो विद्वांसः । हे विद्वन् ' विद्वांसम् विद्वांसी बिदुपः। विदुषा विद्वद्भ्याम् इत्यादि-अच्छी तरह खण्डन करनेवाला। 'तुम वएदने' सुतुम् स् , सुलोप, रेफ, उपधा दीर्घ । विसर्ग सुपीवत् । विद ज्ञान विदा शतुर्वसुः' विद् के लट्से विहित शतृ को 'वमु' अादेश होगा । विद्वम सु, उगित्त्वात् नुम् । 'सान्तमहतः-से दीर्घ, सुलोप । स को गयोगान्त लोप । इसके असिद्ध होने से न-लोप नहीं है । सुट नुम् 'मान्त से दीर्घ, 'नश्चाप-' से अनुस्वार । शसादि अच् मे-'वभाः सम्प्रसारणम' वस्वन्त भ का सम्प्रसारण होगा। विद्वस के व को उ, 'सम्प्रसाराच' से पूर्वरूप । प्रत्ययावयव हाने से वसु के स का पत्त्र । रुत्व-विमर्ग। भ्यामादि मे 'वसुत्र सु०' से दत्व । सुप में दत्व चत्व । सेदिवान् सेदिवांसौ सेदिवासः । सेदिवांस संदिवासी संदुषः । सैदुपा मंदिव. झ्याम् । इत्यादि-'पद्नु विशरणगत्यवसादनेषु' । (भाषाया मदनरातः से लिट् को क्वसुः) सेदिवस सु, उगिन् , नुम्, 'सान्तमहतः'- दार्ग, सुलोप । सका सयोगान्त लोप । मुट में नुम् , दीर्घ, न को अनुस्वार । शम मे 'वसोः सप्र-' से भाविसम्प्रसारण से 'श्रार्धधानुकस्येवलादेः' से वलादित्व न रहने के कारण 'श्रकृतव्यूह' परिभाषा (इट-निमित्तीभूत मे ६४ . . सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची वलादित्व विनाशोन्मुख है-ऐसे को निमित्त मानकर कार्य (इडागम) न होगा ) से इट नहीं, व को उ, पूर्वरूप (व के अको), टा मे मी। रुत्व-विसर्ग। भ्यामादि मे 'वसुन-से दत्व । सुहिन सुहिसौ सुहिसः। मुहिन्भ्याम् । सुहिन्सु-अच्छी तरह हिंसा करने वाला । सुहिन्स् सु, सुलोप, स का सयोगान्तलोप । 'सान्तमहतः'- मे सकारान्त सयोग प्रातिपदिक का ही लिया जाता है, न कि धातु का। महच्छब्द का साहचर्य ही कारण है। अतः यहाँ दीर्घ नहीं। अजादि- वचनो मे 'नश्चापदान्तस्य से अनुस्वार । भ्यामादि मे पदत्वात् स् का संयो- गान्त लोप, अतः न् को अनुस्वार नहीं । सुप् मे 'नश्च' से वैकल्पिक धुट । ध्वत् ध्वद् ध्वसौ ध्वसः। ध्व: याम् एव सत्-स्खलित होनेवाला। 'ध्वसु स्रस्ववस्रसने' क्विप् । अनुस्वार असिद्ध ('नश्चा'-पा० ) होने से 'अनि- दिता-' से नलोप । सु-लोप, 'वसुत्र सु'-से द। चत्वं विकल्प । अजादि मे यथाश्रुत । भ्याम् मे स् को द, नलोप । सत् भी इसी प्रकार । पुमान् । हे पुमन् । पुमांसौ पुमांसः। पुसः । पुंसा पुंभ्याम् पुंमिः । पुसु- पुरुष । 'पुसो डुसुन्' उणादिसू० । 'पूञ् पवने' पुस शब्द से सुबुत्पत्ति। 'पुंसोऽसुड्' सर्वनामस्थान विवक्षित होने पर पुस् को 'असुड्' होगा । '' केवल उच्चारणार्थ है। पुंस, असुड सु, डित्त्वादन्तादेश। अब हलादि वर्ण न होने से अनुस्वार भी नहीं। पुमस् सु, उगित् होने से नुम् । 'सान्त०' से दीर्घ । सुलोप । स का संयोगान्तलोप । 'असंबुद्धौ' कहने से सबोधन मे दीर्घ नही। असुङ । पुमस श्रो, 'नुम्' 'सान्त'-से दीर्घ । नुम् के न् को अनुस्वार । सुट तक यही प्रक्रिया । शस मे असर्वनामस्थान होने से असुड् नही। पुंस अस । रुत्वविसर्ग। अजादि में यथाश्रुत । भ्यामादि मे पद होने से स का सयोगान्त लोप, नुम् न् को अनुस्वार-परसवर्ण-म्। सुप् मे अनुस्वार । नुम्स्थानिकानुस्वार न होने से मूर्धन्यादेश (ष) नहीं । उशना उशनसौ उशनसः । १-हे उशनन्, २-हे उशन, ३-हे उशनः । उशनो- भ्याम्-इत्यादि-शुक्राचार्य । उशनस, सु, 'दुशन' से अनड्, (अन्), साधनिकासहिता ६५ उशनन्-सु, नान्तोपधादीर्घ । सुलोप । नलोप । अजादि वचनों मे यथा- श्रुत । सबोधन मे 'अस्य सम्बुद्धौ वाऽनड नलोपश्च वा वाच्यः' वा०।१ अनङ् करके नलोप न करने पर, २ अनड् तथा नलोप, ३ अनङ् नहीं, स् का रुत्व-विसर्ग। भ्यामादि मे रुत्व, उत्व, 'हशि च' से गुण । अनेहा अनेहसौ अनेहसः। हे अनेह , अनेहोभ्याम् इत्यादि--काल । अनेहस. सु । अनङ्। सुलोप, उपधादीर्घ, नलोप । अजादि वचनों मे यथाश्रुत। सम्बोधन मे ( हल्ड्यादि लोप) स का रुत्व-विसर्ग । भ्यामादि मे रुत्व उत्ख, गुण। वेधाः वेधसौ वेधसः। हे वेधः । वेधोभ्याम् इत्यादि-ब्रह्मा। वेधस् सु, असन्त- त्वाद् ('अत्वसन्त०' ) दीर्घ, सुलोप । रुत्व-विसर्ग । सबोधन मे सुलोप और रुत्वविसर्ग । भ्याम् मे पूर्ववत् । सुवः सुबसौ सुवसः । पिण्डं असते इति पिण्डग्रः-पिण्डग्ल:-अच्छी तरह पहननेवाला। 'वस अाच्छादने' क्विप् सुवस सु, सुलोप, स को रुत्व विसर्ग । 'श्रत्वसन्त-' के विवरण मे 'धात्ववयव से अतिरिक्त जो अस्' कहने के कारण यहा दीर्घ नहीं। 'असु-ग्लसु अदने' से 'पिण्डग्रस . पिण्डग्लस' सकारान्त है और सुवस के जैसे चलेगे । असौ प्रसको असकः। अमू श्रमी । अमुम् अमू अमून् । अमुना प्रमूभ्याम् ३ अमीमिः । अमुष्मै अमीभ्यः ३ । अमुष्मात् । अमुल्य प्रमुयोः अमीषाम् । अमुष्मिन् अमुयोः अमीषु-अदम शब्द से सु परे रहते त्यदाद्यत्व प्राप्त होने पर 'अदस ौ सुलोपश्च' अदस को ौ अन्तादेश होगा सु परे रहते और सुलोप भी होगा। स को श्रो, वृद्धि । सुलोप । 'तदोः सः-' से द को स। श्रौत्वप्रतिषेधः साकन्कस्य वा वक्तव्यः सादुत्वं च वा० 'अव्ययसर्व०' से विहित अकजन्त से श्रौत्व का विकल्प कहना चाहिये तथा 'तदोः सः' से विहित 'स' से परे अकारको उकार भी विकल्प से कहना चाहिये। अदकस् सु, स् को ौ तथा सुलोप, द को द को स । औत्वाभाव पक्ष मे अदकप्त सु, द को स, स से परे अ को उ, त्यदायत्व पररूप, रुत्व- विसर्ग । औत्व के पक्ष मे स से आगे उ 'संनियोगशिष्टाना सह वा प्रवृत्तिः को शी, ६६ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची सह वा निवृत्तिः' न्याय ( एक साथ मे जिनका विधान है, वे साथ ही मे प्रवृत्त या निवृत्त होते है।) से औत्व निषेध और उत्व एक साथ विहित होने के कारण, नही होता। औ मे त्यदाद्यत्व पररूप से अदौ, 'अदसो-'से मत्व और ऊत्व । जस मे त्यदायत्व पररूप, जस, गुण-अदे । 'एत ईद् बहुवचने' अदस के दकार से परे ए को ई होगा द को म भी होगा बहुवचन मे। यहा-त्यदाद्यत्व पररूप सपादसप्ताध्याय गत होने से उसकी दृष्टि मे 'अदसो-'पादिक शास्त्र प्रसिद्ध हो जाता है, अत पहले त्यदाद्यत्व पररूप, अनन्तर उत्व मत्व । अदस श्रम्, त्यदाद्यत्व-पररूप, अम् को पूर्वरूप । द को मुत्व । औट औवत् । शस मे त्यदाद्यत्व-पररूप, 'प्रथमयोः'-से पूर्व सवर्ण दीर्घ । स को 'तस्माच्छ'- से न् , मूत्व । टा मे त्यदाद्यत्व-पररूप, द को मुत्व, 'घि' सशा, ना-भाव 'न मुने'-'ना' के कर्तव्य पर तथा किये जाने पर भी 'मु' ('अदसो-' त्रैपादिक) असिद्ध नही। भ्याम् मे त्यदाद्यत्व पररूप, 'सुपिच' से दीर्घ, दा को मू । त्यदाद्यत्व पररूप 'नेदमदसोरको.' से भिस को ऐस न होगा। अदभिस 'बहुवचने' से एत्व, ‘एत ईद्-' से ईत्व द को मत्व । डे मे त्यदाद्यत्व पररूप, D को स्मै, उत्वमत्व, षत्व । भ्यस में त्यदाद्यत्व पररूप, एत्व । ईत्व मत्व । त्यदाद्यत्व पररूप, डसि को स्मात् उत्व मत्व पत्ब । त्यदाद्यत्व पररूप, डस को स्य, उत्व मत्व षत्व । अोस में मे त्यदाद्यत्व पररूप, 'श्रोसि च' से एत्व अयादेश, उत्व मत्व, रुत्व-विसर्ग। श्राम् मे त्यदाद्यत्व पररूप, सुडागम, एत्व, ईत्व, मत्व, षत्व । डि मे त्यदायत्व पररूप, स्मिन्, उत्व-मत्व षत्व । सुप् मे त्यदाद्यत्व पररूप, एत्व, ईत्व-मत्व, षत्व । इति हलन्त पुंल्लिग प्रकरण । हलन्त स्त्रीलिङ्ग उपानत्-द् उपानही उपानह । उपानद्भ्याम् । उपानत्सु-पादरक्षा । (जूता)। 'णह-बन्धने' कर्म मे क्विप् । उपानह सु । 'न हो धः' नह के ह को ध होगा झल् परे रहते और पदान्त मे। सुलोप । ध् को जश्त्व-चव भ्यामादि मे ह. को ध, जश्त्व । सुप् मे धत्व चत्वं । - ७ साधनिकासहिता ७ उष्णिक-ग उष्णिहौ । उष्णिग्भ्याम-उष्णिक्षु । एक छद । 'ष्णिह प्रीतौ' उत्पूर्वक ष्णिह से 'त्विग्०' से क्विन् । निपातन से उद् के द्का लोप तथा ब्णिह के ष को 'धात्वादेः ष स:' से जो सत्व भया है- उसको षु । क्विन्नन्त होने से 'क्विन्प्रत्य०' से कुत्व (घ) जश्त्व-चव । भ्या- मादि मे भी पदत्वात् घत्व, जश्त्व । सुप मे कुत्व-चर्व, श्रादेश' से पत्व । धौः दिवौ दिवः । शुषु । (१) गीः गिरौ गिरः । एव पू.-स्वर्ग-आकाश । दिव्- सु, 'दिव श्रौत्' व को श्रौ, यण् । रुत्वविसर्ग । सुप् मे 'दिव उत्' से उत्त्व, यण , षत्व । (१। वाणी अर्थ । 'गिर निगरणे' सु, सुलोप । 'वों-' दीर्घ, रेफ को विसर्ग । 'पृ' धातु से विप, ‘उदोष्ठ्य०' से रपर उत्त्व, पुर् सु, 'वो' से दीर्घ । सुलोप । रेफ को विसर्ग चतस्रः । चतसृणाम्-चार ( स्त्रीलिंग)। बहुवचनान्त । 'त्रिचतुरोः०' से चतसृ श्रादेश। जस् । यण-र । रुत्व-विसर्ग। चतसृ-श्राम्, 'हस्व.' से नुट। 'न तिसू.' दीर्घ निषेध । 'ऋवर्णान' से णत्व । का के काः । सर्वावत्-'किमः कः' से कादेश, 'अजाद्य०' से टाप , सु का हल्ड्यादि लोप । औ-श्रादि मे शीभाव श्रादि सर्वावत् । इयं इमे इमाः। इमाम् इमे इमाः । अनया प्राभ्याम् ३ आमि।। अस्यै । अस्या. २॥ अनयो। आसाम् । अस्याम् पासु-इदम् सु । 'य सौ' इदम् के द को य होगा सु परे रहते । त्यदाद्यत्व के बाधक 'इदमो म' से म को म् । सु का लोप । औ मे त्यदाद्यत्व पररूप। टाप् । 'दश्च' से द को म । इमा औ, शी, गुण । जस मे त्यदायत्व-पररूप । टाप् । 'दश्च से म, पूर्वसवर्णदीर्घ । रुत्वविसर्ग । विभक्ति परे रहते त्यदाद्यत्व पररूप, टाप सर्वत्र मत्व । अमि पूर्वः' से पूर्वरूप । शस् मे अत्व पररूप टाप् मत्व, पूर्वसवर्णदीर्घ, रुत्वविसर्ग । इदम् टा, अत्व पररूप, टाप्रभृति सर्वत्र अजादि मे 'अनाप्यकः' से इद् को अन् । अन् श्रा-श्रा, 'श्राडिचाप' एत्व, अयादेश । भ्यामादि हल मे सर्वत्र इद् का लोप । इदम् भ्याम्, इद्लोप, म को अत्व पररूप टाप् । मिस मे भी इसी प्रकार । इदम् ए, श्रत्व पररूप टाप , स्याडागम, ह्रस्वता, इद् लोप, वृद्धि । इदम् डसि और डस् मे अत्व पररूप टाप, स्याडागम, ह्रस्वता, इद् लोप रुत्व-विसर्ग ।

, सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची इदम् श्रोस् , इद् को अनादेश, अत्व पररूप टाप् 'अाडि चापः' से एत्व, अयादेश रुत्वविसर्ग। इदम् अाम्, अत्व-पररूप, टाप् , सुट, इद् लोप । इदम् इ, अत्व पररूप टाप् , 'डेराम्०' से अाम् , स्याट् श्रागम, ह्रस्व, इद् लोप । सुप् मे इदम् सु, अत्व-पररूप-टाप् , इद् लोप । अन्वा देशे तु एनाम् एने एनाः । एनया । एनयोः-अन्वादेश मे 'द्वितीयाटौ से एनादेश टाप , रमावद् । नक स्नग खजौ खजः । स्नग्भ्याम् । सक्षु-'सृज विसर्गे' 'ऋत्विग ० से क्विन् , १ सेपर मे 'अम्' श्रागम निपातित है। सज्-सु,सुलोप। कुत्व,जश्त्व-चव भ्यामादि मे कुत्व-जश्त्व । सुप् मे कुत्व, चत्वं । पत्व । कप यांग मे क्ष। स्या त्ये त्याः । एवं तद् यद् एतद्-त्यद् सु, अत्व पररूप, टाप् 'तदोः सः- से स, सुलोप। श्रौ मे अत्व पररूप टाप गी, गुण । जस मे अत्व पररूप टाप्-पूर्वसवर्णदीर्घ। रुत्व-विसर्ग । सा-या-एपा सुप् मे तद् यद् एतद् के रूप है। सर्वत्र त्यदाद्यत्व पररूप टाप् सुलोप, 'तदोः सः०' तद्- एतद् मे स, एतद् मे 'आदेश' से मूर्धन्यादेश, सर्वावत् अन्य रूप । वाक् वाग वाचौ वाचः। वाम्भ्याम् । चाक्षु-वाणी । 'क्विब्वाच'--इत्यादि से क्विप् और दीर्घ, वाच सु, सुलोप । 'चोः कुः' से कुत्व । जश्त्व चत्वं । भ्यामादि मे कुत्व जश्त्व । सुप् में कुत्व, पत्व । आपः । अपः। अभिः । अद्भ्यः २ । अपाम् । अप्सु-जल । बहुवचनान्त । 'अप्तृन्०' से दीर्घ । प्राप् जस । रुत्व-विमर्ग । शस में सर्वनामस्थान न होने से दीर्घ नहीं । रुत्व- विसर्ग । भिस में 'अपो मि' अप को त होगा भकरादि प्रत्यय परे रहते। जश्त्व। रुत्व-विसर्ग। दिक् दिग दिशौ दिशः। दिग्भ्याम् । दिक्षु-दिशा। "ऋत्विग'--क्विन्, सुलोर। 'नश्च' से ष ('दिश् शान्त होने से )। उसको जश्त्व-ड्। उसको 'क्विन्प्रत्य०' से कुत्व ग, चत्वं विकल्प । भ्यामादि में भी कुत्व ग्। सुप मे कुत्व चत्व, षत्व । हग दृशौ दृशः। त्विट स्विड विषौ विष। विड्भ्याम् । स्विट्सु-त्विटसु-श्रॉख । दृक् सु, सुलोप, जश्त्व चवं । 'त्यदादिपु०' मे दृश् से क्विन् विहित ६६ साधनिकासहिता होने से उपपद न होने पर भी 'क्विन्प्र०' से कुत्व (बहुव्रीहिस्वारस्य से)। शकारान्त होने से यहाँ भी 'व्रश्च०' से षत्व जश्त्व-ड, कुत्व, चवं ग-क । विट् षकारान्त, दीप्ति अर्थ। त्विप क्विबन्त, सुलोप, जश्त्व चत्वं । भ्या- मादि मे जश्त्व । सुप् मे 'डः सि०' से वैकल्पिक धुट चवं । सजूः सजुषौ सजुषः । सजूाम् । सजूष्षु सजू'घु-साथमे प्रीति व सेवन करने वाला। 'जुषी प्रीतिसेवनयो.' । 'सहस्य स सज्ञाया' से सह को स, सुलोप । 'ससजुषो.' से रुत्व, 'वो' से उपधादीर्घ । 'खरव०' से विसर्ग। अन्यत्र यथाश्रुत । भ्यामादि म रुत्व तथा उपधादीर्घ । सुप् मे, रुत्व उपधादीर्घ, रेफ को विसर्ग, विपर्ग का विसर्ज' से स, 'नुविस०' से शर् से व्यवधान होने के कारण सुप् के सको पत्व, पूर्व सको ष्टुत्व से ष । पक्ष में 'वा शरि' से विसर्ग को विमग, इस पक्ष मे भी सुप् के स को ष । आशीः आशिषौ अाशिषः। श्राशीाम्-शुभाशसन । 'श्राशास. क्वावुप- संख्यानम्' उपधा का इत्त्व । 'शासियसि०' से स कोष । सुलोप । षत्व प्रसिद्ध होने से रुत्व (प्राशिस् के स को ) 'वोरुप०' से उपधादीर्घ । विसर्ग । स्यामादि मे रुत्व, दीर्घ । असौ अम् अमूः। अमूम् अमू अमः । अमुया अमूभ्याम् अमूमिः । अमुष्यै प्रमभ्याम् अमभ्यः २। अमुष्याः २ अमुयोः २। अमूषाम् । अमषु-अर्थ यह । सु मे पुंवत् 'अदस०' से औ, सुलोप । ओ मे लदाद्यत्व पररूप, टाप , औ को शी, गुण अदे, 'अदसोऽ०' से ऊत्व और द को मत्व । जस् मे अत्व पररूप टाप् पूर्वसवर्णदीर्घ ऊत्व मत्व । रुत्व विसर्ग। अम् मे अत्य, पररूप, टाप् , ऊत्व, मत्व, 'श्रमि पूनः' से पूर्वरूप । औट शस् औ-जस्वत् । टा मे श्र, पररूप, टा, 'श्राडि चापः' से ए, अयादेश, उत्व मत्व । भ्याम् मे अ, पररूप, टाप ,ऊ, म । भिस् मे भी। अदस् ए, अपररूप, टाप, 'सर्वनाम्नः०' स्याट् ह्रस्व, वृद्धि, उत्व मत्व, षत्व । भ्यस् मे भी भ्यावत् । डसिडस् मे, अत्व, पररूप, टाप, स्याट् ह्रस्व, उत्व,मत्व,षत्व, रुत्व विसर्ग। अोस मे अत्व पररूप टाप् , 'श्राङि- चाप ' ए, अयादेश, मुत्व । अाम् मे अत्व पररूप, टाप सुट् , अत्व १०० सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची मत्व । स कोष । डि मे अ पररूप टाप् , डि को श्राम्, स्याट् हस्व, मुत्व षत्व । सुप् में अत्व पररूप टाप् मूत्व। षत्व ॥इति हलन्त स्त्रीलिंग। हलन्तनपुंसकलिङ्गप्रकरण स्वनडुत्-द् स्वनडुही स्वनड वाहि । पुनस्तद्वत् । शेषं पुवत्-अच्छे बैल- वाला घर (बहुव्रीहि समास-'सु अनड्वाहो यस्य तत्' कुलं, गृहवा) स्वनड्डह, सु । सु और अम् का 'स्वमोर्नपु०' से लुक् (लोप ) । 'वसुलसु' से दत्व, चलविकल्प । श्रौ को शी। 'जश्श्सो शिः' से शि, सर्वनाम स्थान होने से 'चतुरनडु०' से आम् ( आ ), 'नपुसक०' से नुम्, 'नश्वाप' से अनुस्वार । टा आदि मे 'स्वनडुहा स्वनडुद्भ्याम्' इत्यादि पुलिंग के समान रूप। 'अहः' विमला विमलदिवी विमलदिवि--निर्मल श्राकाशवाला दिन । 'विमला द्यौः यस्य तत्' । विमलदिव सु, सुलुक् । 'दिव उत्' से व को उत्त्व, यण । औ में अन्तर्वति ('विमलद्यु' मे विमल के श्रागे की) विभक्ति को लेकर पूर्वपद ( विमल ) की तरह उत्तरखण्ड (दिव ) को भी पदसंज्ञा प्राप्त होनेपर ('दिव उत्'से उत्त्ववारणार्थ) 'उत्तरपदत्वे चापदादि. विधौ प्रतिषेध' वा० समास में उत्तरखण्ड की पदसंज्ञा कर्तव्य होने पर अन्तर्वतिविभक्तिलोप मे प्रत्ययलक्षण का प्रतिषेध कहना चाहिये पदादि मे विधि को छोड़कर अर्थात् उत्तरखण्ड को पद नहीं मानना चाहिये किंतु समुदाय को ही पद मानना चाहिये । प्रत्ययलक्षण न होने से (उत्व नहीं) 'नपुंस०' से ौ को शी। जस मे शि, झलन्त न होने से नुम् नहीं। अपदादिविधौ किम् ? दधिसेचौ--दही का सेक। वार्तिक में 'अपदा'-इत्यादि न कहने पर यहा 'सात्पदाद्यो: से षत्व-निषेध पद न होने से नहीं हो पाता, 'पदादिविधि को छोड़कर' कहने से प्रकृत पदादि में षत्व का निषेध हो जाता है। सेच् मे 'चोः कुः' से कुत्व, पदान्त मे विधि होने से, सेच् को पदसंज्ञा नहीं होने के कारण, नहीं होता। वाः वारी वारि । चत्वारि--वार् जल । सु-अम् का लुक् । रेफ को विसर्ग । औ मे साधनिकासहिता १०१ शी, जस् को शि । चतुर् नित्य बहुवचनान्त । उससे जश्शस् को शि, शि सर्वनामस्थान होने से 'चतुरन०' चतुर् को 'श्राम्' मित्त्वात् अन्तावयव । किम् के कानि---अर्थ 'क्या' । किम् से सु-अम् को लुक होने पर 'प्रत्ययलोपे० से प्रत्ययलक्षण मानकर कादेश 'न लुमता०' से निषेध के कारण नहीं होता । सु-अम् को छोड अन्यत्र कादेश, श्रौ को शी-गुण । जस को शि नुम् । “सर्वनाम-से दीर्घ । इदम् इमे इमानि । एनत् एने एनानि । एनेन । एनयो'-अर्थ यह । सु- अम् को लुक् ।ौ मे त्यदाद्यत्व पररूप 'दश्च' से द को म, 'नपु सकाच्च' से ो को शी, गुण । जश्शस् को शि, अत्व, पररूप, द को म, नपु ०' से नुम् , सर्वनाम से दीघ । 'अन्वादेशे नपुंसके एनद्वक्तव्यः' वा० अन्वादेश मे एनत् आदेश होगा इदम् और एतद् को अम् परे रहते । स्वमो०' से अम् का लोप । औट-शसों मे, एनत् के त् को त्यदाद्यत्व पररूप,श्रादि पूर्ववत् । ब्रह्म ब्रह्मणी ब्रह्माणि । हे ब्रह्मन्-हे ब्रह्म--अर्थ वेद, तप, ब्रह्म । स्वम् को लुक् । 'नलोप१०' से नलोप । श्रौ को शी, 'अटकु०' से णत्व । जस् मे शि, सर्वनामस्थानता, उपधादी, णत्व । 'सम्बुद्धौ नपुसकाना नलोपो वा वाच्यः' से वैकल्पिक नलोप । सुलोप । अहर्भाति । अह्नी अहनी अहानि । अहोभ्याम् अहोमिः । दीर्घाहा निदाघ । हे दीर्घाहो निदाघ, दीर्घाहानौ दीर्घाहानः । दीर्घाह्ना दीर्घाहोभ्याम्-अहः दिन । अहन् के सु-अम् का लुक् । 'रोऽसुपि' से अहन् के न को रेफ सुप् परे नहीं। यहा रेफ के स्थान मे 'अहन्' से रु होने पर 'हशि च' से उत्व तथा गुण हो जाता । शीभाव । औ मे 'विभाषा डिश्योः' से विकल्प से 'अ' का लोप । जस को शि, सर्वनामस्थानता, उपधादीर्घ । भ्यामादि हलादि मे 'अहन्' सू० पदान्त मे अहन् के न को रु होगा, 'हशि च' से उत्व । गुण । भिस् मे भी। स् को रुत्व विसर्ग । यद्यपि 'अहः अहोभ्याम्' इत्यादि स्थल मे रत्व तथा रुत्व 'नलोपः' की दृष्टि से असिद्ध होने से न-लोप प्राप्त होता है, तथापि 'अहन्' इसकी श्रावृत्ति (२ बार उच्चारण) करके एक से न-लोपाभाव का निपातन, १०२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची दूसरे से 'स' की विधि मानने से उक्त रूप बन जाते है । अहन् शब्दान्त से भी रत्व तथा रुत्व ('रोऽसुपि' तथा 'अहन्' से), पदाधिकारस्थ होने से, होंगे। 'दीर्घाणि अहानि' यस्मिन् सः' दीर्घाहन् सु, नान्त उपधादीर्घ । हल्ड्यादि से सुलोप, 'अहन्' से रुत्व, 'भोभगोअघोश्र०' पूर्ववाला होने से यत्व, 'हलि सर्वेषा' से य-लोप । यहा सुलोप करने पर 'प्रत्ययलोपे० से प्रत्ययलक्षण मानकर 'रोऽसुपि' में 'सुप् परे रहते "र' नहीं-इस निषेध के कारण 'र' न होकर 'अहन्' से रु होना चाहिये था, पर 'अहन्' के प्रसिद्ध होने से नान्त उपधादीर्घ होगा। सम्बोधन मे सुलोप करने पर 'अहन्' से रुत्व, 'इशि च से उत्व । गुण । ौ तक सर्वनामस्थान होने से नान्तोपधा दीर्घ । टा में 'अल्लोपो०' से अल्लोप । झ्यामादि मे रुत्व, उत्व, गुण । दण्डि दण्डिनी दण्डीनि । स्त्रग्वि सग्विणी स्रग्वीणि । वाग्मि वाग्मिनी वाग्मीनि- अर्थ-दण्ड माला तथा पाणी से युक्त । 'अत इनिठनौ' से इनिप्रत्यय । दण्डिन् सु,स्वम् का लुक् । नलोप । यो में शी। जस् को शि, सर्वनाम- स्थानता, इन्हन्पूपा०' से उपधा दीर्घ । 'अस्मायामे वास्रजो विनि.'से स्रग्विन्- मतुबर्थकविनिप्रत्ययान्त । स्रज की अन्तर्वनि विभक्ति को मानकर पद होने से 'ज' को कुत्व-'ग' । यहाँ 'इन्' अनर्थक होने पर भी ('विन्' के एकदेश 'इन्') 'अनिनस्मिन्' मे 'इन्' से अतिरिक्त स्थल मे अनर्थक का ग्रहण न होगा- कथन के कारण जस् को शि करने पर दीघ के लिये ग्रहण होगा। 'अटकु०' णत्व । वाग्मिन् 'वाचो ग्मिनिः ग तद्धित होनेसे(लशक्क०) इत् नही वाच के च को जश्त्व, कुत्व वाग्मिन् से सुप । दण्डिवद् रूप । बहुवृत्रह बहुवृत्रघ्नी बहुवृत्रहणी बहुवृत्रहाणि | बहुपूष बहुपूष्णी-बहुपूषणी बहु- पूषाणि । बह्वर्यम बह्वयम्णी बह्वर्यमणी बह्वर्यमाणि-बहुत इन्द्र,सूर्य और अर्यमा (सूर्य) वाला युग वा मन्वन्तर । बहुव्रीहि समास। बहुवृत्रहन् सु, सुलुक् । नलोप। सर्वनामस्थान न होने से उपधादीघ नहीं। श्री को शी, 'विभाषा डिश्योः'से वैकल्पिक अल्लोप । होहन्ते से हको कुत्व-घ । अल्लोपाभाव पक्ष मे एकाजुत्तर० से णत्व । जस् मे शि, इन्हन्-' उपधादीघ', णत्व । बहुपूषन् सु, सुलुक् , न लोप । ौ को शी, विभापा'से विकल्प से अल्लोप, रषाभ्या-' से णत्व, अल्लोपाभाव में भी णत्व । जस् को शि, सर्वनामस्थानता, साधनिकासहिता १०३ उपधादीर्घ । णत्व । बह्वर्यमन् सु। सुलुक् । नलोप । औ मे शी, 'अट्-' रो णत्व । बहुपूषवत् । असक्-ग असूजी असृञ्जि । असानि । असृजा अना, असृग्भ्याम, असभ्याम्, इत्यादि-रक्त । सुलुक् । पदान्त मे कुत्व । 'ऋत्विग-' से क्विन् विहित है, 'क्विन्प्रत्ययस्य-' से कुत्व पदान्त मे । जश्व । चवविकल्प । औ मे शी। पदान्त न होने से कुत्वादि नहीं । जस मे शि, नुम् 'नश्चाप-' से अनुस्वार, 'अनुस्वार-'से परसवर्ण ञ । शसादि मे 'पद्दन्नोमास्०' से विकल्प से असन्, , शस् को शि, नान्तोपधादीघ । टा मे असन् पक्ष मे अल्लोप । असन्नभाव पक्ष मे भ्यामादि मे कुत्व जश्त्व, असन्-पक्ष मे नलोप । ऊर्क ऊर्ग ऊर्जी ऊर्जि । बहूजि बहुर्जि-बलवान् ।'ऊर्ज बलप्राणनयोः' सुलुक , 'चोः कः' से कुत्व । चवं विकल्प । औ मे शी । जस को शि, झलन्त होने से नुम्-मित् अन्त्याच (ऊ) से पर मे होने से 'नरज' का संयोग है। बहूर्क (बहुव्रीहि समास) उर्क वत् ही है प्राय । जश्शस को शि, झलन्तत्वात् नुम् अाने पर 'बहूर्जि प्रतिपेधो वक्तव्यः, अन्त्यात् पूर्व नुममेक इच्छन्ति' वा० । अर्थात् बहूर्ज मे ऊ से परे नुम् का निषेध है, अन्त्यवर्ण (ज) से पूर्व मे नुम् विकल्प से होगा । यहा नुम् पक्ष मे श्चुत्व प्रसिद्ध होने से 'नश्चा' से अनुस्वार तथा उसको परसवर्ण ञ् । त्यत् त्यद् त्ये त्यानि | तत्-तद् ते तानि । यद् ये यानि । एतत्-एतद् एते एतानि । अन्वादेशे तु-एनत्-त्यद् तद् एतद् के सु अम् को पररूप । अदन्तवत् रूप है। सर्वनाम कार्य-शी-स्मै स्मात् सुट् स्मिन् विशेष है। एतत् के अन्वादेश मे 'एनत्' रूप होगा। द्विवचन आदि मे त्यदा- द्यत्व-परला आदि कार्य। बेभित्, बेमिद् बेमिदी बेभिदि-ब्राह्मणकुलानि । चेच्छिदि---अत्यंतविदीर्ण होने- वाला । सुलुक् । जश्त्व-चवं । श्रौ मे शी। जश्शस् को शि। 'अतो लोप' से अल्लोप को रथानिवद्भाव होने से झलन्त नहीं रहा। अतः नुम् नहीं। 'बेभिद्य' में 'ध' के आगे स्थित अ के लोप को स्थानिवद्भाव से अमान कर अजन्तत्व प्रयुक्त नुम भी नहीं कर सकते, 'अनल्विधौ' से स्थानिवद्भाव का निषेध हो जाता है। । लुक, श्रौ मे त्यदाद्यत्व, सिद्धान्तकौमदी-प्रयोगसूची गवाक् गवाग गोत्रक गोअग गोऽक गोऽग् गवाड गोअङ गोड्-'अञ्च, गति- पूजनयो.' इन् दो अर्थो मे गत्यर्थ मे 'अनिदिता०' से न् (जो कि अनु स्वार पर सवर्ण से ञ् बना है) का लोप होता है, पूजार्थ मे तो 'नाञ्च पूजाया' से न का लोप नही । 'अच्' श्रागे रहते 'अवड स्फोटायनस्य से अवड, सवर्णदोघ 'सर्वत्र विभापा गो' से प्रकृतिभाव, 'एड. पदान्ता- दिति' से पूर्वरूप। सभी रूपों मे सु-अम् का लुक् । कुत्व । गत्यर्थ मे चर्व- विकल्प से २-२ रूपों से ६ । पूजार्थ में अञ्च के च को सयोगान्त लोप । न् को कुत्व से ड् अवडादि से ३ अम् मे भी ये ही ६ रूप बनेगे । गोची । गवाञ्ची गोअञ्ची गोऽञ्ची । गवाचि गोअञ्चि गोऽञ्चि-नौ को शी। गत्यर्थक मे-'अनि' से नलोप, 'अच' से अल्लोप से एक ही रूप । पूजार्थ मे-शी, अवड, सवर्णदीघ । प्रकृतिभाव । पूर्वरूप से ३ रूप । जश्शस् मे शि, शि को सर्जनामस्थानता, गत्यर्थ में भी 'उगिदचा' मे नुम्, न को अनुस्वार परसवर्ण ञ् , पूजार्थ मे नलोप नही, श्रत. ३ रूप समान ही है। गोचा, गवाञ्चा गोअञ्चा गोऽञ्चा, गवाग्भ्याम् गोअग्भ्याम् गोऽग्भ्याम् गवाड्भ्याम् गोश्रङ भ्याम् गोऽङ भ्याम् । गवाक्षु गोअक्षु गोऽड्क्षु, गवार्ड गोअडषु गोड्षु गवाक्षु गोअक्षु गोऽक्षु-टा मे गत्यर्थमे लुप्तनकार होनेसे 'अच' से अल्लोप से एकही रूप । पूजार्थ मे नलोप न होने से अलोप भी नहीं। अवड्-प्रकृतिभाव-पूर्वरूप से ३ रूप । भ्यामादि हलादि मे गत्यर्थमे-नलोप चको-जश्त्व, कुत्व, अवड् प्रकृतिभाव पूर्वरूपसे ३ रूप। पूजार्थ मे च को सयोगान्त लोप, न् को कुत्व ड् । अवड् प्रकृतिभाव पूर्वरूप से ३ रूप । सुप् मे पूजार्थ मे 'नाचे' से नलोप निपेध, च् को सयोगान्त लोप, न् को कुत्व-ङ । अवड्, प्रकृतिभाव, पूर्वरूप, 'ड्णोः कुक्'-से कुक्। 'अप- दान्त-से सुप् के सु को षत्व । कुगागमाभाव मे भी अवड् प्रकृतिभाव पूर्वरूप तथा षत्व से छः रूप । गत्यर्थ मे नलोप करने पर, (अञ्च ) के च् को कुत्व ग् । चत्वं, मूर्धन्य ष। अवड् प्रकृतिभाव पूर्वरूप । 'चयो द्वितीया'-वा० से पाक्षिक 'ख' से और ६ रूप (गत्यर्थ-पूजार्थों मे मिला- कर ) नही हो सकते, क्योंकि 'चयो-' की दृष्टि मे 'खरिच' असिद्ध होने से क ही नहीं है कि उसको ख होता।

साधनिकासहिता तिर्यक् तिरश्ची तिर्यच्चि , तिर्यड् तिर्यञ्ची तिर्यञ्चि-जानवर । 'तिरः अञ्चतीति' इस विग्रह मे अत्विगादि से क्विन् । गत्यर्थ मे नलोप 'अनिदिता-'से । तिरस् श्रच्-सु अम् का लोप । तिरस् को 'तिरि' अादेश, यण 'क्विन्प्रत्य-' प्रसिद्ध होने से 'चोः कुः' से कुत्व । जश्त्व-चव । तिरस् अच् औ, शी, भत्वात् अ-लोप । 'तिरसस्तियलोपे' मे 'अलोपे' कहने के कारण तिरि- आदेश नही । श्चुत्व । जस् मे शि, सर्वनामस्थान होने से नुम् । अनुस्वार- परसवर्ण, तिरि, यण । पूजार्थ मे भी स्वम् को लुक् ॥ नलोप नहीं । श्र- लोप न होने से तिरि श्रादेश, च को सयोगान्त लोप, नको कुत्व ड् । प्रौ को शी, तिरि, यण् । जस् को शि । यण । यकृत यकृती यकृन्ति, यकानि, यक्ना यकृता-यकृत् (लिवर )। स्वम् को लोप । जश्त्व-चव । श्रौ को शी। जस् को शि। झलन्तत्वात् नुम्, अनुस्वार-परसवर्ण । शस् को शि, 'पद्दन्नो-'से विकल्प से यकन्नादेश । शि सर्वनामस्थान हाने से नान्तोपधा को दीर्घ । टा मे यकन् पक्ष मे अल्लोप । शकृत् शकृती शकृन्ति । शकानि । शक्ना । शकृता-मल । यकृद्वत् रूप । शस् मे विकल्प से शकन्नादेश । टा मे अल्लोप शकन्-पक्ष मे। ददत् दढती ददन्ति, ददति-देता हुआ। रूप प्रक्रिया पूर्ववत् । जस् मे शि 'नाभ्यस्ताच्छतुः' से नित्य नुम् का निषेध प्राप्त होने पर-'वा नपु सकस्य' अस्यस्त से पर मे स्थित जो शतृ तदन्त नपु सक को नुम् विकल्प से होगा ।अनुस्वार परसवर्ण । पक्ष मे केवल शि। तुदत् तुदन्ती तुदती तुदन्ति-व्यथित करता हुआ । स्वम्लुक् औ मे 'आच्छीन- द्योनु म्' अवर्णान्त अंग से पर मे जो शतृ का अवयव है, तदन्त अंग को विकल्न से, शी और नदी परे रहते, नुम् होगा। अनुस्वार-परसवर्ण । जस में यकृद्वत् । भात् भान्ती भाती मान्ति । पचत् पचन्ती पचन्ति । दीव्यत् दीव्यन्ती दीव्यन्ति- 'भा-दीप्तौ' 'डुपचष् पाके' 'दिव क्रीडादि' इन तीनों के शत्रन्त रूप । भात्-सु-अम् का लोप । श्रौ को शी, 'आच्छी'- से विकल्प से नुम् । जस् को शि, 'उगिदचा-' से नुम् । अनुस्वार परसवर्ण । पचत् से स्वम् का लोप। औ को शी, 'शप्श्यनोनित्यम्' शप् और श्यन् के अकार से पर १०६ सिद्धान्तकौमदी-प्रयोगसूची मे स्थित जो शतृ का अवयव तदन्त को नित्य ही ('अाच्छी-'के अपवाद) नुम् होगा। यहाँ शप् है । जस् को शि, सर्वनामस्थान होने से नुम्- अनुस्वार परसवर्ण । दीव्यत्-सुलुक् । ौ को शी, 'शपश्यनों' से (श्यन् से प्रागे शत होने से) नित्य ही नुम् । अनुस्वार परसवर्ण । जस् मे पूर्ववत् । स्वप स्वब् । स्वपी स्वाम्पि स्वपि । स्वपा स्वद्याम् स्वनि-अच्छे जल- वाला सरोवर । 'सु श्रापः यस्मिन् तत्' स्वप से स्वम् लुक । चत्वं जश्त्व । श्री को शी। जस् को शि करने पर शि के सर्वनामस्थान होने से 'श्रप्तृन्'-से दीर्घ । झलन्त होने से नुम्, अनुस्वार परसवर्ण । यहाँ यद्यपि नुम् नित्य तथा पर भी है, अतः दीर्घ से पहले होना चाहिये । तथापि प्रतिपदोक्त ('अपतॄन्'-मे अप् शब्द को उच्चारण करके विहित ) होने से पहले दीर्घ । 'निरवकाशत्व प्रतिपदोक्तत्व' । अर्थात् अन्यत्र लक्ष्य मे जिसे अवसर प्राप्त नहीं उसे ही प्रतिपदोक्त कहते है-इस पक्ष मे नुम् ही होगा, ( नुम् करने पर फिर अ उपधा न होने से) दीर्घ नही। दीर्घ- विधि 'श्रापः' में सावकाश है। भ्या-भिस् मे 'अपा भि' से त, जश्त्व । धनुः धनुषी धषि । धनुषा धनुाम्-एव चतुर्हविरादयः। धनुप । 'धन धान्ये' से 'अर्तिपू' से उस् । प्रत्ययावयव होने से 'श्रादेश.' म को पत्र । धनुष-स्वम् का लोप । पत्व असिद्ध ('ससजु'-की दृष्टि मे 'श्रादेश'-यह) होने से 'ससजु'-से रुत्व । विसर्ग । श्रौ को शी । जस् को शि, 'नपुसक'- से नुम् । 'सान्तमह'-से दीर्घ, 'नुमविसर्ज-से षत्व । 'नश्चा' मे अनुस्वार, परसवर्ण । भ्यामादि मे षत्व प्रसिद्ध होने से 'ससजु-से रुत्व । इसी प्रकार चक्षुः, हवि श्रादि पकारान्तो के रूप। पिपठीः पिपठिषी पिपठिषि । पिपठीाम् इत्यादि-पढना चाहने वाला कुल । पिपठिष्-स्वम् को लुक्, पत्व प्रसिद्ध होने से रुत्व । 'वोरुप०' से दीर्घ । विसर्ग । प्रो को शी। जस् को शि, 'नपुस'-से नुम् नहीं होगा, कारण 'पिपठिप' के अकार का, 'अतो लोपः' से जो लोप हुअा है उस अल्लोप का स्थानिवद्भाव के कारण अब झलन्त नही रहा। अल्लोप को स्था- निवद्भाव मान कर अजन्त-लक्षण नुम् भी नहीं कर सकते, 'स्थानिवद्भा-' सूत्र में 'अनल्विधौ' कहने के कारण अल्लोप को (प्रकृत मे नुम् मित् होने साधनिकासहिता १०७ से अन्त्य अच्से पर और उसी का अन्तावयव ष के आगे के स्थान मे होगा-अतः अल्विधि ही रही) स्थानिवद्भाव नहीं है । भ्यामादि हलादि मे स को रुत्व । 'वोरुपधाया-' से दीर्घ । पयः पयसी पयांसि । पयसा पयोभ्याम् । इत्यादि-दूध व जल । स्वम् का लुक् । पयस् के स को रुत्व विसर्ग। औ को शी। जम् को शि, नुम्, 'सान्तमहत:'-से दीर्घ, अनुस्वार । भ्याम् आदि हलादि में स को रुत्व, 'हशि च से उत्व, गुण। सुपम् सुपुसी सुपुमांसि-अच्छे पुरुपवाला कुल । स्वम् का लोप । सुपुस् के स् को सयोगान्त लोप । श्रौ को शी। जस् को शि, शि सर्वनामस्थान होने मे 'पुंसोऽसुड्' सुपुमस् इ, नुम्, 'सान्तमहतः' से दीर्घ । 'नश्चा- पदा-से अनुस्वार। अदः अम श्रमूनि-यह । अदस् स्वम् का लुक् । रुत्वविसर्ग। श्री को शी मे त्यदा- द्यत्व पररूप, गुण, अदसोऽ०' से ऊत्व-मत्व । जस को शि, त्यदाद्यत्व पररूप । अजन्त होने से नुम्, उपधादीर्घ, ऊत्वमत्व ।। हलन्त नपुसकलिंग समाप्त ।। अव्यय प्रकरण १ स्वर् । २ अन्तर् । ३ प्रातर् । ४ पुनर् ५ सनुतर् । ६ उच्चैस् । ७ नीचैस् । ८ शनैस् ९ ऋधक् । १० ऋते । ११ युगपत् । १२ श्रारात् । १३ पृथक् । १४ ह्यस्। १५ श्वस् । १६ दिवा। १७ रात्रौ । १८ सायम् । १६ चिरम् । २० मनाक । २१ ईषत् । ५२ जोषम् । २३ तूष्णीम् । २४ बहिस् । २५ अवस २६ समया। २७ निकषा। २८ स्वयम् । २६ वृथा। ३० नक्तम् । ३१ नन । ३२ हेतौ। ३३ इद्धा । ३४ श्रद्धा । ३५ सामि । ३६ वत् । ३७ ब्राह्मणवत् । ३८ क्षत्रियवत् । ३६ सना। ४० सनत् । ४१ सनात् । ४२ उपधा । ४३ तिरस्। ४४ अन्तरा । ४५ अत्तरेण । ४६ ज्योक् । ४७ कम् । ४८ शम् । ४६ सहसा । विना। नाना । ५२ स्वस्ति । ५३ स्वधा । ५४ अलम् । ५५ वषट् । श्रौषट् । वौषट । ५६ अन्यत्। ५७ अस्ति। ५८ उपांशु। ५६ क्षमा । ६० विहायसा। ६१ दोषा। ६२ मृषा। मिथ्या। ६३ सुधा । ६४ पुरा । ६५ मिथो। मिथस् । ६६ प्रायस् । ६७ मुहुस् । ६८ प्रवाहुकम् । प्रवाहिका । ६६ आर्यहलम् । ७० अभीष्णम् । ७१ साकम् । सार्धम् । ७२ नमस् ।

१०८ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची ७३ हिरुक् । ७४ धिक् । ७५ अम् । ७६ श्राम्। ७१ प्रताम् । ७८ प्रशाम् । ७६ प्रतान् । ८० मा। माड । ८१ च । ८२ वा । ८३ ह । ८४ अह । ८५ एव । ८६ एवम्। ८७ नूनम् । ८८ शश्वत्। ८६. युगपत् ६० भूयस् । ६१ कूपत् । लूपत् । कूवित् । ९२ नेत् । ६३ चेत् । चण। ६४ कच्चित् । ६५ किञ्चित् । ९६ यत्र । ६७ नह । ६८ हन्त । ६६माकिः । माकीम् | नकिः । नकिम् । आकिम् । नज। (ख)६ यावत् । तावत् । १००वै। द्वै। न्वे । १०१ । १०२ श्रौषट । वौपट । स्वाहा । १०३ स्वधा । वषट् । १७४ तुम्। १०५ तथाहि । ६०६ खलु। १०७किल । १०८ अथो । अथ।। १०९ सुष्टु । ११० स्म । १११ श्रादह । ११२ अवदत्तम्। ११३ अहयु। ११४अस्तिक्षीरा । २१५ अ ।श्रा ।इ। ई। उ । ऊ । ए। ऐ। श्रो। औ। ११६ पशु । ११७ शुकम् । ११८ यथाकथाच । ११९ पाट । प्याट् । अङ्ग । है । हे । भो। अये। १२०० । १२१वियु । १२२ एकपदे । १२३युत् । १२४ातः। 'स्वरादिनिपातमव्ययम्' स्वर् आदि है जिनको ऐसा समुदाय और निपात भी अव्यय कहलाते हे। अव्यय अनेकार्थक होते है। अत। शिष्टप्रयोग ही प्रमाण है । १ स्वर्ग । २ अतर् मव्य । ३ प्रात काल । ४ फिर से। ५ अन्तर्धाम । । ६ ऊँचा या महान् । ७ अल्म । नीचे। ८ धीरे से । ६ सत्य । १० छोडने मे । ११ एक साथ । १२ दूर और पास । १३ भिन्न । १४ गतदिन । १५ श्रानेवाला दिन । १६ दिन । १७ रात । १८ सायकाल । १६ देर । २० थोडा। २१ थोड़ा । २२ मौन । २३ मौन । २४-२५-बाहर । २६ समीप । २७ समीप । २८ अपने से । २९ व्यर्थ । ३० रात । ३१ निषे धादि । ३२ निमित्तादि । ३३ प्रकाश । ३४ स्पष्ट तथा निश्चय । ३५ अर्ध। ३६ सादृश्य ३॥ ३९नित्य तीनोका । ४२भेद । ४३अन्तर्धान | ४४ बिना। ४५ वजेन । ४६ अधिककाल । ४७ सुख जल तथा सिर । ४८ सुख । ४६ अाकस्मिक । ५० दोनों वर्जनाद्यर्थक है । ५२ मगल । ५३पितरों को देने मे। ५४ बस । ५५ तीनों देवताओं को देने मे । ५६ अन्य । ५७ है। ५८ एकान्त मे कथन । ५६ सहन । ६० श्राकाश । ६१ रात । ६२ दोनों असत्य । ६३ व्यर्थ । ६४ प्राचीन काल, निरन्तर, अासन्न भविष्य वाला।

साधनिकासहिता ६५ दोनों एकान्त मे । ६६ बहुलतासे । ६७ पुनः। ६८ समकाल मे। ६६ बलात् । ७० पुनः पुनः।७१ दोनों साथ के अर्थ में । ७२नमस्कार । ७३ वर्जन । ७४ धिक्कार। ७५ शीघ्रता। ७६ अगीकार । ७७ ग्लानि । ७८समानार्थ मे । ७६ विस्तार । ८०निषेध मे २ । इति स्वरादिनिपात।८१ समुच्चयादि । ८२ विकल्पादि । ८३ प्रसिद्धि । ८४ आश्चर्य । ८५ अवधारण। ८६ ऐसा। ८७ निश्चय । ८८ निरंतर । ८६ एक साथ । ९. फिर। ६१-३ नो प्रश्नादि । ६२ शंका मे । ९३-२नो यदि । ६४ इष्ट प्रश्न । ६५ थोड़ा। ६६-जहा । ६७शुरूमे । ९८हर्षादि । ६६-६ वर्जन।(ख)६६-२ साकल्यादि। १००वितर्कादि । १०१ दान मे । १०२ स्वाहा तक ३ देवताओ को हवि देने मे । १०३ पितरों को देने मे । १०४ तू । १०५ निदर्शन मे । १०६ निश्चय । १०७ऐतिह्य । १०८ प्रश्न-मगल बाद आदि । १०६ अच्छी तरह । ११० अतीत श्रादि । १११ उपक्रम हिंसा निन्दा। ११२ दान। ११३ मै । ११४दुधवाली गौ । ११५-१० अ आदि सम्बोधन,वाक्य,अादि । ११६ठीक । ११७ शीघ्रता । ११८ अनादर मे । ११६-७ सम्बोधन । १२० हिंसादि । १२१ अनेक रूप अर्थ। १२२ अकस्मात् । १२३ निन्दा । १२४ यहा से । १-अम् । आम् । तसिवती। २ तेनेह न-पचति कल्पम् । पचतिरूपम्। स्मारं स्मारं। जीवसे । पिबध्यै-'तद्धितश्चासर्वविभक्तिः' जिससे सब विभक्ति न उत्पन्न होती हो ( अर्थात् एकवचन ही उत्पन्न होता हो) वह तद्धितान्त अव्यय होता है । अनभिमत (उभय शब्दादि) अव्यय न हो इसलिये परिगणन है । १-स्वीकार आदि । 'तेनैकदिक, तसिश्च' से तसि- प्रत्ययान्त, 'तेन तुल्य'-से विहित वति-प्रत्ययान्त भी अव्यय हैं। २- थोडा पकाता है। मधुर पाक करता है। यद्यपि ये दोनो शब्द असर्व- विभक्ति तद्धितान्त है, तथाऽपि परिगणित न होने से अव्यय नहीं। 'कृन्मे- जन्तः' कृदन्त जो मान्त तथा एजन्त अव्यय होता है । स्मृधातु से 'श्राभी- क्ष्ण्ये णमुल च' से णमुल , 'अचो णिति' वृद्धि, 'उरण-से र-पर (आर) 'नित्यवीप्सयोः' मे द्वित्व । यह मान्त कृदन्त होने से अव्यय । 'तुमसे- सेनसे-- से 'असे' प्रत्ययान्त है जीव से। एजन्त कृदन्त होने से अव्यय है। 'तुमर्थे–' से शध्यै प्रत्ययान्त । यह भी एजन्त होने से अव्यय है ।

११० सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची कृत्वा । उदेतोः। विसृपः-'क्त्वातोसुन्कसुनः क्त्वा तोसुन् तथा कसुन् प्रत्य. यान्त अव्यय होगा। 'समानकत' से कृ-धातु से क्त्वा । उत् उपसर्ग से युक्त इण्-धातु से 'भावलक्षणे ण् से तोसुन् प्रत्ययान्त । 'सृपितृदोः कसुन्' से कसुन् प्रत्ययान्त है। अधिहरि । तत्र शालायाम् । विहितविशेषणान्नेह-अत्युच्चसौ। वगाहः। अव गाहः । पिधान ! अपिधानम्-भगवान् पर। विभक्त्यर्थ मे 'श्रव्ययीभावश्च से अव्ययीभावसमास भी अव्यय सज्ञक होता है । 'अव्ययादाप्सुपः' अव्यय से विहित श्राप और सुप् का लुक्लोप) हो जाता है । तत्र से विहित श्राप का लुक हो गया । स्त्री लिङ्ग है यह दिखाने के लिये 'शाला' शब्दका प्रयोग किया गया। 'उच्चै अतिक्रान्तः' इस विग्रह मे 'अत्यादयः क्रान्ता.' से समासः । 'अच्यया०' सूत्र मे 'अव्यय से विहित' कहने से 'अत्युच्चैसौ' मे सुप् का लुक् नहीं हुआ, 'उच्चैः' का अव्यय होने पर भी 'अत्युच्चैसौ' यह समास अव्यय नहीं है। यद्यपि अव्यय सज्ञा मे तदन्त विधि है, तथापि गौण मे नहीं, प्रकृत 'उच्चैः' अन्योपसर्जन होने से गौण है, अतः अव्यय नही। 'वष्टि भागुरिरल्लोपमवाप्योरुपसर्गयो. । श्राप लैव हलन्ताना यथा वाचा निशा दिशा ।।' आचार्य भागुरि अव अपि रूप उपसर्गों के प्रकार का लोप मानते है। इसी से अव-अपि के अका पाक्षिक लोप हुआ । हलन्त शब्दों से 'प्राप्' भी होता है-ऐसा मानते है, जिस से 'वाच्' तथा 'निश्' शब्द से श्राप करने पर वाचा-निशा, ऐसा भाबन्त हो जाते है । अव्यय का स्वरूप प्रतिपादक अथर्व श्रुति का वचन है-"सदृश त्रिषु लिङ्गेषु सर्वासु च विभक्तिषु । वचनेषु च सर्वेषु यन्न व्येति तदव्ययम् ॥" जो तीनों लिङ्ग सभी विभक्ति और वचनो मे विकृत या भिन्नरूप न हो वह अव्यय है। इत्यव्ययप्रकरणम् ॥ स्त्रीप्रत्यय प्रकरण अजा । अजादिमिः स्त्रीत्वस्य विशेषणान्नेह पञ्चाजी । अजा। एडका । अश्वा । चटका । मूषिका । बाला । वत्सा ।१-होडा । मन्दा । विलाता । २-सम्फला मस्त्रफला । ३-सत्पुष्पा । प्राक्पुष्पा । प्रत्यक्पुष्पा ।४-शूद्रा । पुयोगे तु शूदी साधनिकासहिता १११ . , अमहत्पूर्वा किम् ?-महाशूद्री । ५-कुन्चा । उष्णिहा। देवविशा । ६-ज्येष्ठा । कनिष्ठा । मध्यमा । ७-कोकिला-बकरी । 'अजाद्यतष्टाप' 'अज' आदि है जिन शब्दो के, तथा अदन्त शब्दों से स्त्रीत्व द्योत्य (प्रकटनीय) होने पर टाप् प्रत्यय होगा। अदन्त से पृथक् अजा, आदि शब्दों को कहने का प्रयोजन 'वयसि प्रथमे' 'जातेरस्त्री-' इत्यादि आगे कहे जानेवाले डी और ङीप को, जो कि अदन्त टाप के अपवाद है, वारण करना है । 'चुटू' तथा 'हलन्त्य' से ट और प का इत्संज्ञा-लोप । अजादि स्त्रीत्व का विशेषण है, अत 'श्रजादिगत स्त्रीत्व जहाँ द्योत्य है' कहने से 'पञ्जाजी' यहाँ (पञ्चानाम् अजाना समाहारः-) समास का अर्थ समाहार का स्त्रीत्व द्योत्य होने के कारण टाप न होकर 'तद्धितार्थ'-इत्यादि से द्विगुसमास, 'अकारान्तो'-इत्यादि से स्त्रीत्व, 'द्विगो:' से डीए होगा। भेड़ा । घोडी। चिरैई । चूही । बालिका । १ तीनों प्रथमावस्थाबोधक हैं।२ समृद्धफल वाली लता, मशक जैसा फलवाली लता। 'सम्भस्त्राजिनशण- पिण्डेभ्य फलात्' वा० सम् भस्त्र अजिन शण पिण्डपूर्वक फल शब्द से टाप् । ३ 'सदकाण्डप्रान्तशतैकेभ्यः पुष्पात्' वा० सत् अच् ( अञ्चु ) काण्ड प्रान्त शत एक-इन से परे पुष्प शब्द से टाप , 'पाककर्ण'० इत्यादि से डीए नहीं होगा। ४ 'शूदा चामहत्पूर्वा जाति:' वा० शूद्र जाति वाच्य हो 'महत्' शब्द पूर्व मे न हो-ऐसे शूद्र शब्द को स्त्रीलिंग में टाप, होगा । 'पुंयोगादाख्यायम्' 'शूद्रस्य स्त्री' इस अर्थ मे डीप ही होगा। 'महत्' शब्द पूर्व मे होने पर तो जातिलक्षण डीष् होगा अर्थ-क्षत्रिय से शूद्रा मे उत्पन्न जो 'उग्रा' मे ब्राह्मण से उत्पन्ना स्त्री ।५ पाक्षविशेष । छदो विशेष । मरुद्गण ।६ ज्येष्ठादि ३ नों शब्दो को पुयोग (ज्येष्ठस्य स्त्री इत्यादि ) मे भो टाप ही होगा । ७ कोयल, जाति मे भी टाप् । १ अमला २ की । ३ दण्डिनी । ४भवती । ५ भवन्ती । पचन्ती। दीव्यन्ती । तेनेह न-७ उखासत् ८ पर्णध्वत्-१ बिना जडवाली । 'मूलान्ननः' वा. नञ् से पर मे रहनेवाले मूलशब्द से 'पाककर्णपर्णपुष्पफलमूल' से डीए न होकर टाप् ही होगा । २ करने वाली-'ऋन्नेभ्यो डीप' सू० ऋदन्त और नान्तो से स्त्रीलिंग मे डीप होगा । ३ दण्डवाली-नकारान्त होने से ११२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची डीप । ४ श्राप । 'उगितश्च' सू० उक् इत् है ऐसे प्रातिपदिक से स्त्रीलिग मे डीप होगा। सर्वादि मे पठित 'भवतु' अव्युत्पन्न प्रातिपदिक है। उसका उ इत् है। ५ पाक करती हुई और होती हुई। भूधातु के शतृ के रूप मे तथा पचधातु के शतृ के रूप। डीप । 'शाश्यनो'-से शप अन्त होने से नित्य नुम् । श्यन् का उदाहरण ६ दीव्यन्ती = खेलती हुई। ७ कुण्ड से खिसकनेवाली। 'उगिदचा' मे उगित्कार्य अचुधातु को ही होगा- इस नियमन के कारण यहा डीप नही। विवबन्त । ८पत्ते से गिरनेवाली। यहा भी डीप नही । प्राची। प्रतीची-पूर्व और पश्चिम दिशा। ये दोनो रूप अञ्च -धातु के होने से उगित् के कारण डीप होगा । नलोप, 'अचः' से अलोप । 'चौ' से दीर्घ । अतिसुस्वरी । अतिधीवरी । शर्वरी-स्नान किये का अतिक्रमण करनेवाली। (सुत्वानमतिक्रान्ता)। धीवानमतिक्रान्ता, धारण करनेवाले को अतिक्रमण करनेवाली। शर्वरी रात्रि । 'वनो रच' वन् (ड्वनिप , क्वनिप् ,वनिप -३नों) अन्तवाले तथा तदन्त (वन्नन्तान्त) वाले प्रातिपदिक से स्त्रीलिंग मे डीप होगा,र अन्तादेश भी होगा। 'प्रत्ययग्रहणे यस्मात्स विहितस्तदादेस्तदन्तस्य ग्रहणम्' ५० प्रत्यय कहने से अर्थात् प्रकृति प्रत्यय समुदाय का तथा उसके मध्यवर्ति का भी ग्रहण होगा। 'सुयजोड्वनिप' ड्वनिप (वन्) के न को र । धीवरी मे क्वनिप , यहा भी अतिधीवन् डीप , न को र । शर्वरी मे 'शृ हिंसाया' से 'अातो वनिप' । डीप न को र। प्रवावा ब्राह्मणी। १ राजयुवा-हटानेवाली । 'अोण-अपनयने' धातु से 'अन्ये- भ्योऽपि दृश्यते' से वनिप , 'विड्वनोरनुनासिकस्यात्' रण को श्रा, अवा- देश, अवावन् । ङीप रत्व प्राप्त होने पर 'वनो न हश इति दक्तव्यम्' वा० हशन्त धातु से विहित जो वन् तदन्त और तदन्तान्त प्रातिपदिक से डीप तथा र न होगा। राजवत् रूप । १राजा को लडा चुकनेवाली । 'राजनि युधि नः' क्वनिप । वन्नन्तान्त है डीब और र नहीं । बहुधीवरी । बहुधीवा-'बहुव्रीहो' वा० बहवो धीवानो यस्याः सा । मे ङीब् रत्व विकल्प मे होगा । न होने पर राजवत् रूप । .

साधनिकासहिता ११३ द्विपदी। द्विपात् । १-द्विपदा ऋक् । एकपदा--दो तथा एक चरणवाली । 'पादोऽन्यतरस्याम्'-पाद्शब्द जो कृतसमासान्त ('सख्यासुपूर्वस्य' से पाद के अतवाले अका लोप) है,तदन्त प्रातिपदिक से डीप विकल्प से होगा। डीप , भत्वात् “पादःपत्' से पत्। १-दौ पादौ यस्याः सा । एकः पादो यस्याः सा । 'टाबृचि' ऋचा वाच्य हो तो पाद् अत से टाप होगा। पञ्च । चतस्त्रा-'न षट्स्ववादिभ्यः' षट् सज्ञकों से डीप-टाप नहीं। 'पड्भ्यो लुक' से जश्शस् का लुक् होने पर न-लोप हो जाने पर भी 'णान्ता षट् से षट् संज्ञा के प्रति 'नलोप सुप्स्वर०' से न-लोप असिद्ध होने के कारण ('पञ्चन् नान्त है) 'न षट्' से डीप टाप का निषेध हो जाता है। पञ्चन् मे नान्तलक्षण डीप तथा चतसु मे अदन्त लक्षण डीप प्राप्त था। सीमा। सीमानौ-अर्थ-सीमा-अवधि । 'मनः' मन् अन्त से भी डीप नहीं होगा । राजवत् रूप है। बहुयज्वा बहुयज्वानौ--बहुत यज्ञ करनेवाले जिस शाला मे हो वह । 'अनो बहुव्रीहे'। अन् अन्तवाली बहुव्रीहि (बहवो यज्वानो यस्या सा) से डीप नही होगा। राजवद्रूप। सीमा, सीमे सीमानौ । दामा, दामे दामानौ । बहुयन्वा, बहुयज्वे बहुयज्वानो- दाम-रस्सी । 'डाबुभाभ्यामन्यतरस्याम्' 'मन 'अनो.' इन दोनों सूत्रों से कथित मन्नन्त (ौणादिक मनिन् प्रत्ययान्त) और अन्नन्त से डाबू विकल्प से होगा । सीमन्-शब्द से डाप, टिलोप। सुलोप। 'मनः' से भी डीप निषेध । सु-मे राजवद्रूप । श्री मे शी तथा गुण, विकल्प से । पक्षमे नान्तो- पधादीर्घ । दाम-स्त्रीनपुंसक है। दोनों लिङ्गों मे श्री को शी-गुण । स्त्री- लिंग मे पक्ष मे मनिन्नन्त होने से उपधादीर्घ। बड्डयज्वन् से डाप टिलोप, सु का हल्ड्यादि लोप । श्रौ मे डाप पक्ष मे शी । पक्ष मे नान्तोपधादीर्घ । बहुराज्ञी बहुराज्यौ । बहुराजा, बहुराजे,बहुराजानौ--बहुतसे राजोंवाली(नगरी)। 'अनो बहु.' से डीप निषेध । डाप विकल्प से। विकल्प से डीप के लिये-'अन उपधालोपिनोऽन्यतरस्याम्' अन्नन्त उपधालोपी बहुव्रीहि से डीप विकल्प से होगा। बहुराजन्-ङोप , अल्लोप, सुलोप । श्रुत्व । नौ में -- ११४ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची , , यण् । डाप तथा नान्त पक्षों मे सु मे एक ही रूप । डाप -ौ मे शी गुण । नान्त मे उपधा-दीर्घ । सर्विका । कारिका-सभी (सर्वा)। करानेवाली, अथवा श्लोक विशेष । 'प्रत्यय- स्थात् कात्पूर्वस्यात इदाऽप्यसुप' प्रत्ययगत क से पूर्व के अकार (हख) को इ होगा 'आप' परे रहते, वह 'श्राप भी सुप से परे न हो । सर्व- शब्द से स्त्रीत्वविवक्षा मे टाप , सवर्णदीर्घ । 'अव्ययसर्वनाम्नामकच् प्राक् टे' से अकच (अक्) सर्वका, इत्त्व । कृधातु को ण्वुल, 'युवोरनाको' से अक् , 'अचो णिति' से वृद्धि (क को पार ),कारक से टाप इत्त्व । सुलोप। (१) अतः किम् ? नौका । (२) प्रत्ययस्थात् किम् ? शक्नोतीति शका। (३) असुपः किम्? बहुपरिव्राजका नगरी। (४)कात् किम् ? नन्दना । (५)पूर्वस्य किम्? परस्य मा भूत्-कटुका । (६) अत इति तपरः किम् ? राका । (७) प्रापि किम् ।। कारकः-१-नौ शब्द से स्वार्थ मे क प्रत्यय, टाप , 'क' से पूर्व में अ नही। २-शक्लु-धातु का क है, प्रत्ययगत नहीं । ३-'बहवः परिव्राजकाः यस्या' समास मे 'सुपो धातुप्रातिपदिकयो:' से बहु-शब्द से श्रागे का सुब- लुक होने पर सिद्ध बहुपरिव्राजक-शब्द से आप जो है वह लुप्त सुबपेक्षया ("प्रत्ययलोप०' के अनुसार) पर है । ४-क-से पूर्व का अ नहीं । ५-कटु- शब्द से स्वार्थ में क है, 'पूर्व के अकार को' कहने से 'कटुक' के द्वितीय क से आगे 'इ' नहीं हुआ। ६-अत् मे सपर न होता तो 'रा' के श्रा को इ होता । ७-'श्राप परे रहते' कहने से यहाँ इ नही । मामिका । नारिका-मेरी । मनुष्यों को आवाज 'नरान् कायति' देनेवाली। 'मामकनरकयोरुपसंख्यानम्' वा. मामक तथा नरक शब्दों के क के पूर्व अकार को इत्व कहना चाहिये। पूर्वसूत्र से अप्राप्त था । दाक्षिणात्यका। इहत्यिका-दक्षिण के पास मे उत्पन्न । यहाँ उत्पन्न । 'दक्षिण- 1 स्याम् अदूरे' विग्रह में 'दक्षिणादाच से' आच् । 'तद्धितश्चा०' से अव्यय । भव आदि अर्थ मे 'दक्षिणापश्चात्पुरसस्त्यक्' से त्यक् । 'कितिच' से आदिवृद्धि, दाक्षिणात्य शन्द से टाप, स्वार्थिक क प्रत्यय, 'केऽणा' से साधनिकासहिता त्य के आगे टाप के श्रा-को ह्रस्व । फिर टाप् । 'त्यक्त्यपोश्च' वा. त्यक् तथा त्यप अंत मे भी प्रत्ययस्थ क से पूर्व अ को इ कहना चाहिये । इहत्यिका मे 'श्रव्यमात्यप' से त्यप., क, इ, टाप । । यका । सका । यकाम् । तकाम्-जो । वह । 'न यासयो।' यत्तद् के अको इ नही होगा । 'अव्ययस०' से अकच् अन्त स्त्रीलिंग का रूप है । त्यदा- द्यस्व, टाप , सुब्लोप । 'तदो स:-' से त को सा। सूत्र मे 'या-सा रूप प्रथमान्त का अनुकरण ही विवक्षित नही-यह दिखाने के लिये अन्य दो उदाहरण अव्यय हैं। अधित्यका । उपत्यका-पर्वत की ऊपर की तराई । नीचे की तराई । 'स्यकनश्च निषेधः' वा० उपाधिभ्या त्यकन् श्रासनारूढयोः' से विहित त्यकन् प्रत्य- यान्त के कात्पूर्व अ को इ नही। जीवका। भवका-जीये । हो। श्राशीर्वाद मे जीव-भूधातु से 'आशिषि वुनश्च न वा० से विहित जो वुन् , जिसको कि 'युवोरनाको' से 'अ' हो जाता है, उस अ को भी इ नही होगा। देवदत्तिका । देवका-देवदत्त शब्द से स्वार्थिक कप्रत्यय । टाप । इत्व । 'अनजादौ च विभाषा लोपो वक्तव्यः' से दत्त-शब्द का पाक्षिक लोप करने पर 'उत्तरपदलोपे न वा० से इत्त्व का निषेध । क्षिपका । ध्रुवका । कन्यका । चटका-फेकने वाली । स्थिर । बालिका । गौरैया। 'क्षिपकादीना चन' क्षिपका आदि शब्दो का भी इत्त्व नहीं होगा। तारका | तारिका-नक्षत्र । 'तारका ज्योतिषि' वा० नक्षत्रवाचक मे इ नही । अन्यत्र-तारनेवाली' श्रादि अर्थ में इत्त्व होगा। वर्णका । वर्णिका-प्रोढना । 'वर्णका तान्तवे' वा तन्तुत्रों से बने इस अर्थ मे इत्त्व नही होगा। ग्रन्थविशेष आदि अर्थ मे इत्त्व होगा। वर्तका । उदीचा तु-वर्तिका-पक्षिविशेष । 'वर्त्तका शकुनौ प्राचाम्' वा० पक्षिविशेष के अर्थ में प्राचीनों के मत मे इत्त्व नही, अर्वाचीनों के मत में तो इत्त्व। अष्टका । अष्टिका अन्या-श्राद्धविशेष । 'अष्टका पितृदेवत्ये' वा० पितृदेवतार्थक क्रिया वाच्य होने पर इत्त्व वहीं, अष्टाध्यायी-श्रादि अर्थ में इत्त्व होगा।

. सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची सूतिका, सूतका, पुत्रिका, पुत्रका, वृन्दारका, वृन्दारिका-प्रसवकरनेवाली, पुत्री, देवस्त्री। 'सूतकापुत्रिकावृन्दारकाणा वेति वक्तव्यम्' वा० सूतकापुत्रका- वृन्दारका शब्दों मे अ विकल्प से होगा। 'वेति'-'वा-अ-इति' यह पद- च्छेद है। क से पूर्व को अकारादेश विकल्प से होगा। पुत्र-शब्द को शार्गरवादि होने से डीन , स्वार्थ मे क प्रत्यय, 'केऽणः' से ह्रस्व, टाप । इसी इ को अ। सूतका वृन्दारका शब्दों मे 'प्रत्ययस्थात्'-से प्राप्त नित्य इत्त्व का विकल्प है। आर्यका, आर्यिका | चटकका,चटकिका-पूज्या,गौरेइया । 'उदीचामातः स्थाने यकपूर्वाया' य तथा क पूर्ववाला स्त्रीप्रत्यय सबन्धी श्रा के स्थान मे जो अ,क से पूर्ववाले उस अ को इ विकल्प से होगा आप परे रहते । आर्या-चटका शब्दों से स्वार्थिक क, 'केऽण' से हस्व आ को। फिर से टाप । इत्त्व विकल्प। श्रात किम् १ सांकाश्यिका । यकेति किम् १ अश्विका-'श्रा के स्थान मे' कहने से साङ्काश्यका-शब्द मे यकार से धागे के श्रा को इत्त्व विकल्प से न होकर नित्य ही होगा। अश्वा-शब्द से स्वार्थिक क ह्रस्व, टाप् । यहाँ श्रा के स्थानापन्न होने पर भी अ को इत्त्व विकल्प न होकर नित्य ही होगा। यह अ य-क पूर्व नहीं। स्त्रीप्रत्ययेति किम् ? शुभयिका । सुनयिका । सुपाकिका-'स्त्रीप्रत्यय के श्रा' कहने से 'शुभयका' में इत्व नित्य ही होगा । यहाँ तोश्रा 'या-प्रापणे' धातुसम्बन्धि है। 'धात्वन्तयकोस्तु नित्यम्' वा०। (अच्छी नीतिवाली । अच्छी तरह पकी) धातु के अन्तवाले य तथा क से आगे के अ कोइ नित्य होगा। 'नय-पाक' यहाँ य-कं धातु सम्बन्धी होने से 'प्रत्ययस्थात्' से नित्य इत्त्व । अनेषका,परमैषका,श्रद्वके,परमद्वके,'स्विका'-'परमस्विकेति', निर्मस्त्रका,निर्भस्त्रिका, एषका, एषिका, एतिके, एतिकाः, अजका । अजिका । ज्ञका, शिका, दुका, द्वकाद्विके । निस्वका, निस्विका-'भस्त्रैषाज्ञाद्रास्वा नपूर्वाणामपि' भस्त्रा-एषा-अजा- ज्ञा-द्वा-स्वा इनके नम्पूर्व के भी अ को इ विकल्प से होगा। विधि भाग होनेसे तदन्त से भी। एतत् शब्द को टि से पहले 'अव्यय-से अकच् , एतकद सु, 'तदो:-' से सत्व, 'आदेश-' से 'श्रादेश- से षत्व, त्यदायत्व, पररूप, टाप, सवर्ण- दीर्घ, हल्ङयादिलोप, एषका, नञ् समास, नलोपो-से न का लोप । 'तस्मा , साधनिकासहिता न्नुडचि' से नुट । इसी प्रकार 'परमा चासौ एषका' कर्मधारय । इन दोनों स्थानों मे श्राप , न और परमा के आगे के लुप्स('सुपो धातुप्रातिपदिकयोः से) सुप से परे होने से इत्व नहीं होगा, यतः 'प्रत्यय-'मे 'असुपः' यह निषेध है। न दुके अदके, परमे च ते द्वके च, यहाँ भी टाप लुप्त सुप से परे है, अतः इत्व नहीं। सज्ञा (नाम) और उपसर्जन मे सर्वनाम संज्ञा न होनेसे स्वार्थिक क करने पर ही इत्व विकल्प,प्रकृतसूत्र का उदाहरण है ।इसीप्रकार विशेषणीभूत स्वशब्द। आत्मीयवाची स्वशब्द को अकच् होकर स्त्रीत्वविवक्षा मे टाप करने पर 'स्विका-परमस्विका' ऐसा नित्य ही इत्व। भस्त्रा-मसक, निर्गत (मस्त्राया. निर्गता) अर्थमे इत्व विकल्प। एतच्छन्द के अकच् अन्त का रूप। इसी से इत्त्व विकल्प । सूत्र मे 'भस्त्रैषा'-इस प्रकार कृतषत्व के ग्रहण के कारण द्विवचनादि मे ('स' न होने से) इत्त्व-विकल्प नहीं, 'प्रत्य- यस्था-'से नित्य इत्त्व । इसी प्रकार अज-अादि उदाहरणोंमे भी इ-विकल्प । गङ्गाका, गझिका । अज्ञाता अखट्वा अखटिचका। अखटिवका, अखट्वाका- 'प्रभाषितपुस्काच्च' जो पुंलिंग का विशेषण न हुआ हो, उससे विहित, श्रा के स्थान के अ को इ विकल्प से होगा। गगाशब्द से स्वार्थिक क क परे रहते श्रा को ह्रस्व ('केऽण' से), इत्त्व विकल्प । 'अविद्यमाना खट्वा यस्या' इस बहुव्रीहि मे अज्ञाताद्यर्थक क परे रहते आ को ह्रस्व करने पर (बहुव्रीहि में पुंलिंग का भी विशेषण होने से प्रभाषितपुंस्कता नहीं) नित्य ही इत्त्व । शैषिक कप करने पर 'केऽणः' के अपवाद 'न कपि' से हस्व निषेध, पर 'प्रापोऽन्यतरस्या' से ह्रस्व विकल्पता मे यहाँ के टाप् अभाषित- पुस्क से विहित होने के कारण तत्स्थानिक हस्व को इत्त्व विकल्प से होगा। गङ्गाका । उक्तपुंस्कात्तु-शुभ्रिका-'पादाचार्याणाम्' अभाषितपुंस्क से विहित श्रा के स्थान मे स्थित श्र ('केऽण.' से) को श्रा विकल्प से होगा। भाषित- पुंस्क से तो नित्य ही इत्त्व होगा। शुभ्रा क, हस्व, टाप् , इ । कुरुचरी । उपसर्जनत्वान्नेह ( १ ) बहुकुरुचरा, नदट्-नदी । वक्ष्यमाणा । (२) सौपर्णेथी। (३) ऐन्द्री। (४) औरसी। (५) ऊरुद्वयसी । ऊरुदनी । अरुमात्री । (६) पञ्चतयी । (७) आक्षिकी। (८) लावणिकी (९) याशी। (१०) इत्वरी-कुरुदेश मे चलनेवाली। बहुत से कुरु में (देश) चलनेवाले . ११८ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची हैं जिसमे । 'टिड्ढाणद्वयसज्दघ्नमात्रच्तयप्ठकठकञ्चरपः' अनुपसर्जन (विशेषण नहीं ) ऐसे टित्, ढ, अण्, अञ, द्वयसच् , दघ्नच् , मात्रच , तयप, ठक, ठञ् , कम, क्वरप् , एतदन्त अदन्त प्रातिपदिक से स्त्रीत्व विवक्षा मे डीप होगा। 'चरेष्टः' से (कुरुषु चरतीति) अधिकरण उपपद रहते ट प्रत्यय, टित्वात् डीप् । १-उपसर्जन होने पर तो अदन्तत्वात् टाप् होगा। टित् प्रत्यय, प्रातिपादिक तथा धातु रूप से ३ प्रकार है। नदट पचादिगण पठित प्रातिपादिक है, अर्थ नदी है। वक्ष्यमाणा-वच- धातु के कर्मणि लुट् से 'लुट् सद्वा' से शानच, 'स्यतासी लुलुटो।' से स्य, कुत्व तथा षत्व । मुगागम,णत्व । टाप् । यद्यपि यहाँ लुट् स्थानापन्न आदेश टित् तथा उगित् होने से डीप प्राप्त है, पर 'लाश्रयमनुबन्धकार्य नादेशा- नाम्' प० अर्थात् लुट्स्थानापन्न अादेश स्थानिवद्भाव नहीं प्राप्त करता। २-सुपर्णीकी पुत्री (सर्पविशेष) । 'स्त्रीभ्यो ढक्' से ढक् , 'आयनेय' इत्यदि से एय आदेश । डीप । ३–इन्द्रदेवताक अथवा इन्द्रसम्बन्धी। 'साऽस्य देवता' अथवा 'तस्येदम्'से अण् , डीप । ४-उत्समुनि सम्बन्धी अथवा प्रवाहसंबन्धी । 'उत्सादिभ्योऽञ' -जाँघ प्रमाणवाली । 'प्रमाणे द्वयसज्दघ्नमात्रचः' (ऊरु प्रमाणम् अस्याः) से परिमाण अर्थ मे द्वयसच्, दध्नच , मात्रच्-प्रत्यय । डीप । ६–'पञ्च अवयवा यस्या' ऐसे विग्रह में 'संख्याया अवयवे तयप तथप , डीप । ७-जुश्रा खेलनेवाली। 'अक्षर्दीव्यतीति'अर्थ में 'तेन दीव्यति खनति जयति जितम्' से ठक्, आदि- वृद्धि, ठ को इक् 'यस्येति च' से अकारलोप, पाक्षिक से डीप् । ८-नमक बेचनेवाली। 'लवणं पण्यम् अस्याः' अर्थ में 'लवणाह', 'ठस्येकः' से इक् , लावणिक से डीप । ९-जैसी। 'त्यदादिपु दृश' से कञ्, 'श्रा सर्व- नाम्न' से यच्छन्द को श्रा । डीप । १०-कुलटा। 'इण गतौ' 'इएन- शजिसर्तिभ्यः क्वरप ' 'हस्वस्य पिति कृति' तुक् । इत्वर शब्द से डीप । चौरी । स्त्रैणी। पोस्नी । शाक्तीकी । (१) श्राढयङ्करणी । (२) तरुणी । तलुनी- चौर्य करनेवाली । 'छत्रादिभ्यो णः' से ण । 'चुरा शीलम् अस्याः' अर्थ में 'ताच्छीलिके णेऽपि' वृद्धि । डीप् । स्त्रीसम्बन्धी तथा पुरुष संबंधी। 'स्त्री पुंसाभ्या०' से नञ् और स्नञ् । आदिवृद्धि, (णत्व) 'नस्नजीकक्ख्यु- साधनिकासहिता स्तरुणतलुनानामुपसंख्यानम्' डीप 'यस्येति च' से अलोप । शक्ति नामक श्रायुधवाली । 'शक्तिः प्रहरणं अस्या' अर्थ में 'शक्तियष्टयोरीकक्' से ईकक् , अादिवृद्धि । डीप । १-गरीब धनी बनाया जाता है इससे । 'प्राढ्यसुभग'-इत्यादि से कृञ् को ख्युन् । 'युवोरनाको' से ख्युन् के यु को अनादेश । 'अरुर्द्विष.' से मुम् । गत्व। डीप । भलोप । २- युवती । तरुण-तलुन शब्द से उपरोक्त वार्तिक से डीप । गार्गी । द्वीपे भवा द्वैप्या। दैव्या--गर्ग की कन्या । 'गर्गादिभ्यो य से या , आदिवृद्धि । 'यस्येति च से गं के अ का लोप । 'यत्रश्च' यअन्तसे स्त्रीलिंग मे डीप होगा । 'हलस्तद्धितस्य' हल से परे उपधाभूत य का लोप । यहाँ अल्लोप आभीय होने से प्रसिद्ध है , अतः य उपधा है। द्वीप मे उत्पन्न । 'अनपत्याधिकारस्थान्न डीप' वा० अपत्याधिकार (तस्यापत्यम्' अधिकार) मे विहित से भिन्न यजन्त से डीप नहीं होगा। 'द्वीपादनुसमुद्र यत्र' से यञ् । प्रादिवृद्धि । 'यस्येति च टाप । देवता का पुत्र अर्थ मे 'देवाद्यअौ' से यञ, श्रादिवृद्धि श्रादि । दैत्य से टाप । वार्तिक मे 'अधिकारस्थ' न कहने से यह यञ् भी अधिकारस्थ नहीं, प्राग्दी- व्यतीय है। अतः डीप हो जाता । यहा यञ् अपत्यार्थक तो है, अपत्या- धिकारस्थ नहीं। गाायणी। नौहित्यायनी । कात्यायनी-गायपुत्री । लोहितपुत्री । कात्यायन- पुत्री । 'प्राचा फ तद्धितः' यअन्त से ष्फ विकल्प से होगा स्त्रीलिंग मे, वह प्रत्यय 'तद्धित' माना जायगा। 'षः प्रत्ययस्य' प्रत्यय की श्रादि ष इत् होगा। फरहा। 'प्रायनेयीनीयियः फढखछपा प्रत्ययादीनाम्' प्रत्यय के श्रादिभूत फ ढ' ख छ घ्-इनको क्रम से प्रायन एय् ईन् ईय् इय होंगे। श्रायन् । तद्धितत्वात् प्रातिपदिक । वक्ष्यमाण 'षिद्गौरा-से डीए । णत्व-गाायणी मे। 'सर्वत्र लोहितादिकतन्तेभ्य' लोहितादि शब्दों से कतशब्दान्त यजन्त से नित्य ष्फ होगा । लोहितादिगर्गादि यअन्त से ष्फ । इसी प्रकार कत की पुत्री-यञ्फ श्रादि पूर्ववत् । कौख्यायणी । मायहकायनी । (१) पारायणी-कुरु और मण्डूक की पुत्री 'कौरव्यमाण्डूकाभ्या च' इन दो से ष्फ होगा। 'कुर्वादिभ्यो एयः' श्रादि- १२० सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची वृद्धि प्रादि । 'ढक्च मण्डूकात्' अणू । आदिवृद्धि । ष-इत् लोप श्रायन् । डी । १-असुर की पुत्री । 'श्रासुरेरुपसख्यानम्' वा० श्रासुरि शब्द से भी फ होगा। 'असुरस्य अपत्यं स्त्री' अर्थ मे 'अत इञ्' से इञ , आदि- वृद्धि, आसुरि से डफ, ष इत्, प्रायन् , भलोप, णत्व, षित्त्वात् डीए । कुमारी । वधूटी। चिरण्टी । अतः किम् ? शिशु:-अप्राप्तयौवना । युवती। 'वयसि प्रथमे' प्रथमवयो वाची अदन्त से स्त्रीलिंग मे ङीप् । 'वयस्यचरम इति वक्तव्यम्' वा 'अन्तिम वय से भिन्न वयोवाची अदन्त से-ऐसा कहना चाहिये। तभी इन श्रागे के शब्दों मे डीप होगा-वधूट-चिरएट शब्द यौवनार्थक है । डीप । 'अदन्त से' कहने से शिशु शब्दसे डीप न हुश्रा । त्रिलोकी । त्रिफला । ज्यनीका सेना-तीन लोक । हरड़, बहेड़ा, श्रॉवला । तीन अग्रभागवाली सेना । 'द्विगो: अदन्त द्विगु से डीप, 'त्रयाणा लोका- काना समाहारः विग्रह है । त्रिफला त्र्यनीका मे 'अजाद्यतः' से अजादित्वात् टाप। सर्वत्र 'अकारान्तोत्तरपदो द्विगुः स्त्रियामिष्टः' अकारान्त उत्तर पद वाला द्विगु स्त्री लिंग मे होगा। पञ्चाश्वा। द्विबिस्ता। द्वयाचिता |द्विकाम्बल्या। परिमाणान्तातु-न्याढकी। तद्धि- तलुकि किम् ? पञ्चाश्वी-पाच घोड़ों से खरीदी हुई। दो बित्ता ('सुवर्ण- बिस्तौ हेम्नोऽक्षे' अमर) । सोना पिघलाती है। परिमाण विशेषों को ढोती है । दो कबलों (वून का सौ पल) से खरीदी है। दो फसेरी पकाने वाली। 'अपरिमाणबिस्ताचितकम्बल्येभ्यो न तद्धितलुकि' । परिमाण अन्त वाला नहीं ऐसे, तथा बिस्त प्राचित कम्बल्य अत द्विगु से डीप न होगा, तद्धित लुक् होने पर । 'पञ्चभिरश्वैः क्रीता पञ्चाश्वा' अर्थमे 'आदि०'इस अधिकार मे 'तेन क्रीतम्' से ठक् , उसका 'अध्यर्ध०' से लोप । इसी सूत्र के कारण 'द्विगोः' से डीप न होगा। अपि तु टाप् । 'द्वौ बिस्तौ पचति' अर्थ मे 'वद्धितार्थ०' से द्विगु। 'सम्भवत्यवहरतिपचति०' से ठक् का अध्यर्ध०' से लुक् । टाप। 'द्वौ आचितौ ('अाचितो दश भाराः स्युः') वहति' अर्थ मे 'श्राढकाचित०' से ख, उसका लुक् । टाप् । 'कम्बलाच्च संज्ञाया' से यत् । 'तेन क्रीत' से ठक् । लुक् । टाप् । 'द्वावाढको पचतीति' विग्रह मे प्राग्वतीय ठञ् , 'अध्यर्ध, से लुक्।

साधनिकासहिता १२१ 'द्विगो.' से डीप । श्राढक परिमाणविशेष है, अतः डीप का निषेध नहीं है। 'तद्धित लुक् होने पर न कहने से 'पञ्चानाम् अश्वाना समाहारः' यहाँ भी डीप न होता। द्विकाण्डा क्षेत्रमक्ति । क्षेत्रे किम् ? द्विकाण्डी रज:-दो दंडवाली खेत । दो दण्डनापवाली रस्सी । 'काण्डान्तात् क्षेत्रे' क्षेत्र के विषय मे काण्ड अन्त- वाला जो द्विगु है, उससे डोप न होगा तद्धितका लुक् होने पर । 'द्वे काण्डे प्रमाणम् अस्याः क्षेत्रभक्तेः द्विकाण्डा' अर्थ मे 'प्रमाणे द्वयसच् ' से विहित मात्रच् का 'प्रमाणे लः द्विगोनित्य' वा० से लुक् । सूत्र मे 'क्षेत्रे' न कहने से उसी प्रमाणार्थक मात्र के लुक् होने पर, यहा भी डीप नही होने पाता । द्विपुरुषी, द्विपुरुषा वा परिखा । (१) कुण्डोनी । स्त्रियां किम् ? कुण्डोधो धैनु- कम्-दो पुरसा बडी खाई । 'पुरुषात्प्रमाणेऽन्यतरस्या' परिमाण मे जो पुरुष- शब्द तदन्त द्विगु से ङीब विकल्म से होगा तद्धितलुक् होने पर। 'द्वौ पुरुषौ प्रमाणम् अस्या' अर्थमे विहित मात्रच का 'प्रमाणे लः द्विगोनित्य से लुक् , 'अपरिमाण' से नित्य डीन्निषेध होने पर इस से विकल्प । १-कुंड जैसा थनवाली । 'कुण्डमिव ऊधो यस्याः' अर्थ मे 'उधसोऽनड्' अधस् अतवाली बहुव्रीहि से अनड् श्रादेश होगा स्त्रीलिंग मे । 'ङिच्च' से स् को अन् । पर रूप । 'डाबुभाभ्या०' से वैकल्पिक डाप् , 'अन उपधा०' से वैकल्पिक डीप् , तथा दोनों के अभाव मे 'ऋन्नेभ्यः०' से प्राप्त ङीप का 'अनो बहु०' से निषेध प्राप्त होने पर 'बहुव्रीहेरूधसो डी' 'ऊध' अन्त वाली बहुव्रीहि से स्त्रीलिंग मे डीष होगा। 'अल्लोपोऽनः' से अ का लोप । 'स्त्रीलिंग में न कहने पर गोसमूहार्थक-'धैनुक' के विशेषणीभृत कुण्डोधः (नपु०) से भी अनड् प्राप्त होता । अनड् भी 'स्त्रियों' वा० से स्त्रीलिंग ही मे प्रवृत्त होगा। ब्यूनी। प्रत्यू नी । अयूबाः -दो थापानी । अतिशयित धनवाली । 'संख्या- व्ययादेडर्डीप' संख्या तथा अव्यय श्रादि वाले ऊघस् अंतशब्द से स्त्रीलिंग मे डीप (डोषपवाद) होगा। 'द्वे ऊवती यस्या०' अर्थ मे अनङ् । डीप , अल्लोप । अतिशयितम् ऊधो यस्याः-विग्रह । अनड्, डीप , अल्लोप, १२२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची यह डीप अत एव अनड भी बहुव्रीहि समास मे ही होंगे, अन्यत्र 'अधः अतिक्रान्ता' हि तत्पु० मे नहीं। द्विदाम्नी । उद्दामा वडवा । द्विहायनी बाला--दो रस्सी से युक्त । रस्सी से छुटी घोडी। दो बरस श्रायुवाली। 'दामहायनान्ताच्च' संख्या आदि मे है ऐसी, दाम अंत वाली और हायन अतवाली बहुव्रीहि से डीप होगा।'द्वे दामनी यस्याः द्विदामन डीप् , अल्लोप । यहा 'डाबुभा०' से डाप् , 'अन उपधा०' से डीप , 'अनो बहुव्रीहे.' से डीप-निपेध भी प्राप्त थे । 'संख्याव्य०' से अव्यय की अनुवृत्ति यहा न होने से 'उद्दामा' यहा डीप नहीं। नान्त है । 'द्वौ हायनौ यस्याः' अर्थ मे डीप् । भलोप । त्रिहायणी। चतुर्हायणी । द्विहायना, निहायना, चतुर्हायना शाला-३ बरस, ४ बरसवाली। त्रिचतुर्व्या हायनस्य गत्व वाच्यम्' 'वयोवाचकस्यैव हायनस्य डीब्णत्व चेष्यते' वा० त्रि और चतुर शब्दों से परे हायन कोण होगा, पर श्रायु बताने वाले हायन शब्दको ही डीब तथा णत्व होगा। २ ३-४-कक्षावाली हॉल । यहा के 'हायन' श्रायुवाचक न होने से डीब और णत्व नहीं, टाप् । सुराज्ञी नाम नगरी । वेदे तु-शतमूर्नी-अच्छे राजा वाली। सौ सिर वाली। 'नित्यं संज्ञाछन्दसोः' अन् अन्तवाली बहुव्रीहि से-जो उपधालोपी है-ङीप् हो संज्ञा और छन्द ('अन'- का अपवाद है) मे। राजन् और मूर्धन् में अल्लोप (उपधालोप) है। अथो त इन्द्र केवलीविंशः । 'मामकी तनू'। भागधेयी। पापी । अपरी । समानी प्रार्यकृती । सुमङ्गली । भेषजी । अन्यत्र केवला। मामिका---'केवल-मामक- भागधेय-पापापर-समानार्यकृत-सुमङ्गल-भेषजाच्च' इन नौ शब्दों से डीप होगा संज्ञा और छन्द मे । सुलोप। छन्द मे 'सुपा सुब्लुक०'से सप्तमी का लुक । ये सभी उदाहरण वैदिक है। लोक मे असंज्ञास्थल मे टाप ही होगा। 'मामिका' मे 'मामकनरकयो'- वा० से इत् । अन्तर्वस्नी । पतिवत्नी । (१) 'अन्तरस्त्यस्यां शालायां घटः' । गर्भवती । जीवत्पतिका । अन्तर्वत्-पतिवत् ये दोनों शब्द निपातित हैं। 'अन्तर्वत्पति- वतोनुक' इनको स्त्रीलिंग मे नुक् न,कित्त्वादन्तावयव । 'भृन्नेभ्यो डीप 'से साधनिकासहिता १२३ डीप । १-प्रयोग प्रत्युदाहरण है। मतुव् गर्भिणी मे ही निपातित है । इस वाक्य मे 'तदस्या०' से मतुप नही । पतिमती पृथिवी-जीवभर्तृका मे ही 'वत्' का निपातन है। राजा से युक्त पृथिवी-इस अर्थ मे वत्त्व नही, मतुप डीप । वसिष्ठस्य पत्नी । गृहस्य पतिः । गृहपत्नी-पत्युनों यज्ञसंयोगे' पतिशब्द को नकारादेश होगा यज्ञ के साथ स्वामित्व (फलभोक्तृत्व) सम्बन्ध होने पर । यज्ञादि मे दम्पती को एक साथही अधिकार शास्त्रतः प्राप्त है। 'ऋन्नेभ्यो'- से डीप । 'विभाषा सपूर्वस्य' पतिशब्दान्त-पूर्व मे शब्द के साथ रहने- वाले-प्रातिपदिक को 'न' विकल्प से होगा । गृहपति-शब्द पतिशब्दान्त तथा पूर्व मे गृह शब्द से युक्त (सपूर्व) भी है । डीप । दृढपत्नी। दृढपतिः । वृषलपत्नी । वृषलपतिः । पत्नियो । पत्नियः। सपूर्वस्य किम् ? गवां पतिः स्त्री--पुष्ट पतिवाली। शूद्र की स्त्री। 'दृढः पतिः यस्याः' इस बहुव्रीहि मे भी विकल्प से न होगा। यद्यपि यहाँ 'पति' अन्यपदार्थ प्रधान बहनीहि होने से उपसर्जन हो जाता है, तथापि 'अनुपसर्जनस्य' यह अनु- वृत्ति पत्यन्त का विशेषण है, न कि पति का। इसी प्रकार 'यज्ञसयोगे' की अनुवृत्ति भी नही होगी। शूद्रों को यज्ञाधिकार नहीं है, वहा भी विकल्प से 'न' होगा । यद्यपि विग्रह वाक्य ('वृषलस्य पतिः') मे सपूर्व तथा यज्ञ- संयोग भी नहीं है, तथापि ब्राह्मण स्त्री मे यज्ञादिस्योगादि से पत्नी शब्द जो व्युत्पादित हैं उसी का यहा गौण प्रयोग है । अथवा 'पत्नीव पाचर- तीति' आचार किबन्त से कर्तरि क्विप से पत्नी शब्द निष्पन्न हो जाता है। पर ऐसे पत्नी शब्द को अजादिवचनों मे इयड होगा। 'सपूर्वस्य' कहने से 'गवा पतिः' (गायों की रक्षिका) यहा 'न' नही हुश्रा । सपत्नी । एकपली । वीरपत्नी--सौत । 'नित्य सपल्यादिषु' सपत्नी श्रादि शब्द सिद्ध होने के लिये नत्व नित्य होगा। 'समानः पतिः यस्या.' बहुव्रीहि मे समान को 'स' निपातित है। इस गण मे समान, एक, वीर, भात, पुत्र-यह शब्द है। पूतक्रतायी । वृषाकपायी । अग्नायी । (१) कुसितायी। (२) मनावी मनायी। मनुः-पवित्र यज्ञ करनेवाले की स्त्री। लक्ष्मी व गौरी। अग्नि देवता । .

- १२४ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची १-दोनों देवता विशेष । 'पूतक्रतोरै च' पूतक्रतु को ऐ श्रादेश और कीप. भी होगा । 'इथ त्रिसूत्री पुयोग एवेष्यते' वा० (इसी प्रकरणपठित ३ सूत्र) पूतक्रतु की स्त्री। 'तु' के उ को 'ऐ' । आयादेश। 'वृषाकप्यग्निकुसित- कुसिदानामुदात्तः' इनको उदात्त ऐ आदेश होगा और डीप भी होगा, आयादेश । बृषाकपि की स्त्री ऐ, आयादेश । इसी प्रकार अग्नि-कुसित- कुसिद-इनको ऐ और डीप आयादेश । 'मनोरो वा' 'मनोः स्त्री अर्थ मे मनुशब्द को श्री तथा डीप , अथवा उदात्त ऐ और डीप । श्राव और आय । ऐ-ौ के अभाव मे एतत्सनियोग-शिष्ट डीप भी नहीं। मनुः । एनी, एता । रोहिणी, रोहिता-श्वेत । चित्र-लाल । 'वर्णादनुदात्तात्तोपधात्तो न' जो अनुदात्तान्त और तकारोपध है तदन्त अनुपसर्जन ( अविशेषण) प्रातिपदिक से विकल्प से डीप होगा और त को न आदेश भी होगा। डीप होने पर ही नत्व होगा, यतः यह संन्नियोगशिष्ट (दोनों एक साथ विहित) है एत-रोहित वर्णवाचक है । नत्व-डीप । रोहिणी मे णत्व । 'येण्या शलल्या' अनुदात्तात् किम् १ श्वेता। शितिः स्वी-तीन अवयव सफेद है जिसकी, ऐसी शल्यमृग की सूई सी रोवॉ। ऊपर 'अनुपसर्जन' वर्ण का विशेषण न होकर वर्णान्त का विशेषण है । अतः 'त्रीणि एतानि यस्या अन्यपदार्थ प्रधान बहुव्रीहि मे भी एत शब्द के उपसर्जन होने पर भी 'इयेणी' यह समास अनुपसर्जन है । डीप नत्व । 'पूर्वपदात्०' से णत्व । 'घृतादीना च' फिट-सूत्र से 'श्वेत०' शब्द घृतादि होने से अन्तोदात्त है। डीप -नत्व नही । शिति काला व सफेद । 'वर्णा' में 'अतः' की ('अजा- यतः' से) अनुवृत्ति होने से शिति अदन्त न होने से लीप नत्व नहीं पिशङ्गी पिशङ्गा । असिता। पलिता । असिक्नी पलिक्नी । 'अवदाता'--लाल। काला। 'पिशङ्गादुपसख्यानम्' वा० से तकारोपध न होने के कारण इस वार्तिक से डीप का विकल्प से विधान है। असित-पलित=काला और सफेद । अनुदात्तात तकारोपध होने से प्राप्त ङीप -नत्व का 'असित- पलितयोन' वा० से निषेध है। 'छन्दसि कमेके' वा वेद मे असितपलित के त को जीप के साथ 'क' आदेश को कतिपय आचार्य चाहते हैं। विशुद्धार्थक(वर्ण नहीं) होनेसे तोपध होने पर भी 'अवदात' से टाप् ही होगा।

, साधनिकासहिता १२५ कल्माषी । सारङ्गी। अनुदात्तान्तात् किम् ? कृष्णा । कपिना--नानारगवाली। मिश्र रंग की। काली। लालकाली । 'अन्यतो डी' तकारोपध से भिन्न वर्णवाचक अनुदात्त अन्तवाले प्रातिपदिक से स्त्रीलिंग मे डीप होगा। फिट् स्वर से कृष्ण-कपिल अन्तोदात्त हैं, अत: टाप । नर्तकी । गौरी। अनड्वाही-अनहुही--नाचनेवाली । गौरी-अथवा पार्वती । बैल की स्त्री दोनो । 'षिद्गौरादिभ्यश्च' ष इत् है जिनकी और 'गौर' श्रादि शब्दों से डीप होगा। 'शिल्पिनि ब्वन्' से षित् प्रत्यय ('षः प्रत्यय- स्य' से ष लोप ) है। 'श्रनडुहः स्त्रियाम् श्राम् वा' वा० गौरादिगण में पठित अनडुह को इस वार्तिक से श्राम् विकल्प और डीए है। मरसी-दष्ट्रा--स्त्री मछली । दान्त । 'सूर्यतिष्यागस्त्यमत्स्याना य उपधायाः' अङ्ग की उपधाभूत य का लोप होगा, वह यदि सूर्य तिष्य अगस्त्य मत्स्य का अवयव हो । गौरादित्वात् ङीष्, उक्तसूत्र से यलोप, 'यस्येति च' से अ (य के श्र का ) लोप । 'मातरि षिच्च' से डामहच को षित् करने से ही डीए प्राप्त था ही, फिर भी 'मातामही' को गौरादिगण में पाठ करना 'षित् को डीए अनित्य है' यह ज्ञापित करता है, अत. 'दाम्नीश' इत्यादि से दंश कोष्टन्-प्रत्यय से निष्पन्न दंष्ट्र-से षित् होने पर भी टाप ही हुश्रा। जानपदी । जानपदा । कुण्डी । कुण्डाऽन्या । गोणी । गोगाऽन्या। स्थली । स्थलाऽन्या | भाजी । भाजा । नागी| नागा। काली। काला। नीली। नीला। नीली । नीली गौः । नीली नीला। कुशी । कुशा । कामुकी। कामुका । कबरी। कबरा-जीविका। देश मे उत्पन्न । बर्तन विशेष । जलाने योग्य । बोरा । किसी का गोणा नाम है । स्वाभाविक जमीन । बनायी भूमि । व्यजन विशेष । पाकविशेष । स्थूल | गज । सर्प। काली। भयकर। नीलरग। नीली से रगा हुश्रा । ओषधि । प्राणि । नाम । लोह विशेष । शडकुविशेष(वैदिक प्रयोग)। सभोग की इच्छा रखनेवाली। धनादि चाहनेवाली। केशों का समूह । चित्ररग वाली। ये सब क्रम से अर्थ है । 'जानपक्ष्कुण्डगोणस्थल- भाजनागकालनीलकुशकामुककबराद् वृत्त्यमत्रावपनाकृत्रिमाश्राणास्थौल्य. वर्णानाच्छादनायोविकारमैथुनेच्छाके शवेशेषु' इन ग्यारह प्रातिपदिकों से क्रम से वृत्ति (जीविका) श्रादि अर्थो मे डीए होगा। इनसे अतिरिक्त १२६ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची , अर्थों मे इन्हीं प्रातिपदिकों से टाप होगा। 'नील्या अन्वक्तव्यः' वा०, से नीला । नीलशब्द अोषधि-प्राणिवाचक से ही ङीष् । 'नीलादोषधौ' प्राणिनि च' वा० । 'सज्ञाया वा' वा० डीविकल्प । शोणी। शोणा । मृद्वी । मृदु । उतः किम्। शुचि । गुणेति किम् १ (१) श्राखु । (२) खरुः = पतिंवरा कन्या। पाण्डुः--लाल । सुकुमारी। पवित्र । १-चूही । २-पतिका वरण करनेवाली। श्वेत वर्णवाली । 'शोणात्प्राचाम्' शोण शब्द से डीए विकल्प से होगा। पक्ष मे टाप् । 'वोतो गुणवचनात्' उत् अतवाले गुणवाचक शब्द से विकल्प से डोप होगा। 'उत् अतवाले' कहने से गुणवाचक होने पर भी 'शुचि' से वैकल्पिक भी डीप नहीं । यह औणा- दिक इ प्रत्ययान्त है । 'गुणवाचक'-कथन से उदन्त होने पर भी 'श्राखु से डीप नही . 'खरुसयोगोपधान्न' वा० खरु-शब्द और संयोगोपध ('हलो- ऽनन्तराः०' 'अलोऽन्त्यात्पूर्व ०') से भी 'वोतो.' से डीप नही। 'पाण्डु मे सयोगोपध-(ण्ड होने से डीप नहीं। बह्वी । बहु । रात्रिः । रात्री । शकटिः । शकटी । अक्तिन्नर्थात् किम्-अजननिः । पद्धतिः । पद्धती-बहुत । रात । गाडी। अनुत्पत्ति । मार्ग। 'बह्वादिभ्यश्च' बह्वादिगणपठित शब्दो से विकल्प से डीए होगा । 'कृदिकारादक्तिनः' गणसू० 'कृत्' के इकारान्त प्रातिपदिक से डीए विकल्प से हो, पर 'क्तिन्' अन्त स नही। रात्रि रा-धातु से औणादिक त्रिप प्रत्यय से निष्पन्न । 'सर्वतोऽक्तिन्नादित्येके' गणसू० कृत् के इकारान्त प्रत्यय तथा अकृत् इकारान्त से भी डीप वैकल्पिक है। शकटिं अव्युत्पन्न प्रतिपादिक है। 'स्त्रियों क्तिन्' इस अधिकार मे 'आक्रोशे नज्यनि' से निष्पन्न 'अजननि' यद्यपि विशुद्ध क्तिन्नन्त न होने से उससे डीप प्राप्त होता है, तथाऽपि अब 'अक्तिन्नर्थात्'-कहने से क्तिन्नर्थक होने के कारण यहा डीष निषेध हो जाता है। क्तिन्नन्त होने के कारण अप्राप्त ङीष् का वैकल्पिक विधान करने हो के लिये 'पद्धति' शब्द का बहादिगणा में पाठ किया गया है। गोपी गोपालिका । अश्वपालिका--अहीर की स्त्री । गो तथा अश्व पालन करने वाले की स्त्री । 'पुंयोगादाख्यायाम्' जो पुरुष वाचक नाम पुरुष के सम्बध (दाम्पत्य) से स्त्री का वाचक है, उससे डीए । 'गोपस्य स्त्री' इस अर्थ मे कीए । 'पालकान्तान' वा० उक्त शब्द 'पालक' अन्तवाला हो तो की साधनिकासहिता न होगा। टाप् । इसी प्रकार 'अश्वपालक की स्त्री' अर्थ मे टाप्। 'प्रत्यय'-से इत्व । सूर्यस्य स्त्री देवता सूर्या । देवतायां किम् १ सूरी । कुन्ती, मानुषीयम् --सूर्य की देवता जाति की स्त्री । 'सूर्याद्देवताथा चाब्वाच्या' देवता जाति की स्त्री मे पुरुषसम्बन्ध से विद्यमान सूर्यशब्द से 'आप' कहना चाहिये। 'देवता' कहने से ये दोनों मनुष्या होने के कारण डीए । 'सूर्यतिष्या०' से य-लोप 'यस्येति च से अ-लोप । इन्द्राणी । हिमानी । अरण्यानी । यवानी । यवनानी । मातुलानी । मातुली । उपा- ध्यायानी । उपाध्यायी । उपाध्याया। उपाध्यायी। आचार्यानी। श्राचार्या अर्याणी। अर्या। क्षस्त्रियाणी। क्षत्रिया । योगे तु-अयौं । भत्रियो । कय ब्रह्माणोति- इंद्र की स्त्री । बर्फ का ढेर । बडा जगल। खराब जौ। यवनों की लिपि । मामी। अध्यापिका। प्राचार्य की स्त्री। स्वयं गुरु पानी । मालि- किन वा वैश्यक्षत्रिय जातिवाली । वैश्य की स्त्री । क्षत्रिय की स्त्री। 'इन्द्र वरुण भव-शर्व-रुद्र-मृड-हिमारण्य यव-यवन-मातुलाचार्याणामानु' इन शब्दों को श्रानुक् श्रागम होगा । इन्द्र से मृड तक के शब्दों को तथा मातुल और प्राचार्य शब्दों को तो पुयोग मे ही प्रानुक् आगम होगा। 'अन्यतो डीए' से सिद्ध ही है । हिम अरण्य यव यवन-इनसे तो श्रानुक् (आन्) श्रागम और डीए भी होगा । 'हिमारण्ययोमहत्त्वे' महान्- इस अर्थ मे प्रानुक्-डीए । 'यवादोषे वा० से प्रानुक्-डीए । 'यवना- ल्लिप्याम्' वा० से। 'मातुलोपाध्याययोरानुग् वा' वा० इन दोनों मे श्रानुक् का ही विकल्प है, डीए तो पुयोगलक्षण (मातुलस्य स्त्री, उपा- ध्यायस्य स्त्री-अर्थ मे) होगा ही। 'यातु स्वयमेवाध्यापिका तत्र वा डीषे बाच्यः' जो अपने पढाती है (उपाध्याय की स्त्री नही है) इस अर्थ मे विकल्प से डीए होगा, पक्ष मे टाप । 'श्राचार्यादणत्वं च' वा० श्राचार्य की स्त्री इस अर्थ मे श्रानुक्-डीए , तथा 'अटक प्वाड' से प्राप्त णत्व नहीं होगा। 'अर्थक्षत्रियाभ्या वा स्वार्थे' वा० पुयोगाभाव मे भी अर्य तथा क्षत्रिय शब्दो से श्रानुक् तथा डीए पाक्षिक होंगे । णत्व । अर्य की तथा क्षत्रिय की स्त्री-इस अर्थ में डीए मात्र होगा। 'ब्रह्माणी' यह तो 'ब्रह्माणम् , १२८ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची । श्रानयति (अन प्राणने)' इस अर्थ मे 'वएट ! से अण् प्रत्ययान्त है। (आनुक् नहीं)। 'टिड्ढाणञ्'-से डीप । वस्त्रक्रीती । क्वचिन-धनक्रीता । (१) अभ्रलिप्ती चौः। अल्पास्यायां किमा चन्दनलिप्ता अङ्गना-वस्त्र से खरीदी हुई । 'क्रीतात्करण पूर्वात् ' क्रीत शब्द अत में है ऐसे तथा करण आदि में है ऐसे अदन्त शब्द से स्त्रीलिग मे डीप होगा । वस्त्रेण (करण अर्थात् वयणरूपी क्रिया का साधन) क्रीता- अर्थ मे डी हुआ । 'कर्तृकरणो कृता बहुल' मे 'बहुल' ग्रहण से ('बहल' कभी प्रवर्तक कभी निवर्तक, और कही विकल्पक श्रादि भी होता है) टाबन्त (क्रीता) प्रकृति सुबन्त से समास करनेसे धनकीता मे अदत शब्द ही नहीं रहा कि डीप हो । १-थोडे बादलों से घिरा श्राकाश । 'क्तादल्पाख्यायाम्' करण प्रादि वाले क्त प्रत्ययान्त अदन्त से स्त्री लिग मे अल्पता 'अभेरीष- च्छन्ना' द्योतन करनी हो तो डीए होगा। 'अल्पता द्योतन' क्यों १ चन्दन पोती हुई स्त्री-यहा पर्याप्त चन्दन होने से-टाप् । ऊरुमिन्नी। नेह-बहुक्रीता । दन्तजाता । पाणिगृहीती । पाणिगृहीता-जॉघ असंयुक्त है जिसकी । जिसने बहुतों को खरीदा। जिसको दात उत्पन्न हुआ है । पत्नी। दासी । 'बहुव्रीहेश्चान्तोदात्त्' बहुव्रीहि जोक्त प्रत्य- यान्त तथा अन्तोदात्त अदन्त है उस से स्त्रीलिग में डीप होगा। 'जरू भिन्नौ यस्याः' बहु० समास है, 'भिन्न' क्तान्त है और 'जातिकालसुखा- दिभ्यः-' से निष्ठा का परनिपात तथा अन्तोदात्त है। डीप । 'बहवः क्रीता यया' यह भाष्योदाहृत प्रत्युदाहरण है। 'जातान्तान' वा० 'दन्ता जाता यस्या:' यहाँ जात शब्द अन्त मे रहने से उत्तवार्तिक से डीप नही, टाप । 'पाणिगृहीती भार्याया' वा० स 'पाणिः गृहीतः यस्याः' अर्थ मे डीप् । जो शास्त्रविधि से परिगृहीत नहीं है वैसी दासी श्रादि पाणि- गृहीता है। सुरापीती । सुरापीता। अन्तोदात्तात् किम् ? वस्त्रच्छन्ना-मदिरा पियी हुई। वस्त्र से ढकी । पिछले 'बहुव्रीहे०'-से प्राप्त नित्य डीए इस 'अस्वाङ्ग- पूर्वपदाद्वा' अस्वाङ्ग (अद्रव, मूर्तिमान्-श्रादि अगले कहे जानेवाले ) है पूर्व पद उससे परे जो क्त प्रत्ययान्त, ऐसे क्तान्तान्त बहुव्रीहि से विकल्प ह साधनिकासहिता १२९ से ङीप होगा। 'सुरा पीता यया' यह बहुव्रीहि क्त प्रत्ययात-पीता-अन्त- वाली है। 'अनाच्छादनात्' से अनुदात्त अंत वाला होने से-वस्त्रच्छन्ना- मे विकल्प से भी डीए नहीं। अतिकेशी । अतिकेशा। चन्द्रमुखी। चन्द्रमुखा। सयोगोपधात्तु (१) सुगुल्फा । उपसर्जनात् किम् ? (२) शिखा । (३) सुस्वेदा । (४) सुज्ञाना । (५) सुमुखा शाला। (६) सुशोफा । (५) सुकेशी, सुकेशा वा स्थ्या। (८) सुस्तनी सुस्तना वा प्रतिमा-केशों का अतिक्रमण करने वाली । चॉद जैसे मुखवाली। १-सुदर घुटनेवाली । २-चुडी। ३-दुर्गध रहित पसीना वाली। ४-अच्छे ज्ञानवाली। ५-सुदर अग्रभागवाला हॉल् । ६-बहुत फूली हुई। ७-सुन्दर बालों से युक्त मार्ग। ८-सुन्दर स्तन जैसे अवयव से युक्त । 'केशान् अतिक्रान्ता' इस तत्पुरुष समास मे 'स्वाङ्गाचोपसर्जनाद- संयोगोपधात्' संयोग उपधा नहीं,ऐसा एव अन्य का विशेषण, जो स्वाङ्ग- तदन्त श्रअन्तवाले प्रातिपदिक से विकल्प से डीए होगा-से पाक्षिक ङीष् । पक्ष मे अदन्तत्वात् टाप् । 'चन्द्र इव मुख यस्याः' मे भी इसीसे डी विकल्प। स्वान की परिभाषा-'अद्रवं (१) मूर्तिमत् (२) स्वाङ्गं प्राणिस्थमविकारजम् (३)। अतत्स्थं तत्र दृष्ट च तेन चेत्तत्तथा युतम् ।। अर्थात् नहीं पिघलनेवाला, श्राकार से युक्त, प्राणि मे नहीं रहनेवाला, विकार से उत्पन्न नहीं, उसमे रहने वाला नहीं पर वहाँ दीखता हो, प्राणिस्थ स्तनादि अवयव से युक्त प्रतिमादि वस्तु प्राणिवत् दीखती हो, ये 'स्वाङ्ग कहाते है। 'सु गुल्फो यस्याः' यहाँ संयोग उपधा (ल्फ-उपान्त्य वर्ण- उपधा) है, अतः डीए नही । केवल 'शिखा' किसीका विशेषण न होने से डीए नहीं। ३-४-५-६ उदाहरण द्रव-अाकाररहित-प्राणिगत नही तथा विकार (रोग) से उत्पन्न (फूलना) होने से स्वाग न होने के कारण डी नहीं । ७ वे उदाहरण मे केश अब प्राणीमे नही रहने पर भी प्राणी में दीखता है-यह भी स्वाङ्ग है, विकल्प से डीए। ८प्राणिस्थ स्तन से युक्त (स्वाग) होने से डीप विकल्प। तुङ्गनासिकी-तुङ्गनासिकेत्यादि । सहनासिका। अनासिका। (१)स्वगी स्वङ्गेत्यादि । (२) सुपुच्छी सुपुच्छा । (३) कबरपुच्छी मयूरी । (४) उलूक पक्षी शाला । (५) उलूकपुच्छी सेना-उन्नत नाक से युक्त । नासिका से युक्त । नाक से हीन ।

१३० सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची १-अच्छे अवयववाली। २-अच्छी पूंछवाली। ३-नाना रग की पूंछवाली मोरिनी। ४-उल्लू के पॉख जैसे पार्श्व भागवाली हॉल। ५-उल्लू के पिछले भाग जैसे पृष्ठ भाग वाली सेना । 'नासिकोदरौष्ठजड्डा- दन्तकर्णशृङ्गाच्च' नासिका उदर अोष्ठ जङ्घा दन्त कर्ण शृग इन (उपसर्जन- भूत नासिकादि अंतों) से डीप विकल्प से होगा। इनमे नासिका-उदर- को अगले 'नक्रोडादि'-से अनेकाच होने से प्राप्त डीप निषेध का बाध हो जाता है। श्रोष्ठ श्रादि ५ का 'असयोगोपधात्-'से प्राप्त डीप निषेध का बाघ है। आगे आनेवाले 'सहनञ्'-सूत्र इस 'नासिको'-का बाधक है। वह सह तथा नञ् पूर्ववाले से डीए निषेध करता है । १-'अङ्गगात्रकण्ठेभ्यो वक्तव्यम्' वा० यहाँ सयोगोपध (ग) होने से डीपू निषेध प्राप्त था। अतः यह वचन है। (भाष्याद्यनुक्त होनेसे डीषन्त प्रयोग ठीक नहीं-ऐसा प्रामाणिकों कामत है। इस वार्तिक की आवश्यकता ही नहीं, अनुक्तों का भी संग्रह बोधक 'नासिको-'सूत्रगत 'च' से ही कार्य हो जाता है-ऐसा भी कतिपयों का कथन है) २-'पुच्छाच्च' वा० संयोगोपध होने पर भी पुच्छात से वा डीष होगा। ३-'कबरमणिविषशरेभ्यो नित्यम्' वा० कबरादि पुच्छान्त से नित्य डीप् । ४-'उपमानात्पक्षाच्च पुच्छाच' वा० से डीप् । कल्याणक्रोडा । सुजघना । सकेशा | अकेशा । (१)विद्यमाननासिका-मगल है' भुजों का मध्य ('न ना क्रोडं भुजान्तरम्' अमर) जिसका। मुंदर जॉघवाली। केशों से युक्त एवं हीन । १-(अच्छी)नाकवाली। 'न क्रोडादिबह्वचः' क्रोडादि से ( यह १ गण है, जिसमे क्रोड शब्द पहला है) तथा अनेक अच् वाले स्वागों से डीप न होगा। दोनों उदाहरणों मे टाप् । 'सहनविद्यमान- पूर्वाञ्च' सह-न-विद्यमान-इन पूर्व पदों से युक्त शब्द से भी डीप नहीं होगा। क्रमशः उदाहरण ३ । टाप् । शूर्पणखा । गौरमुखा । संज्ञायां किम् १ ताम्रमुखी कन्या-रावण भगिनी का नाम-सूप जैसे नखवाली । गोरा मुंहवाली, यह भी किसी का नाम है । लाल मुंह वाली-यह यौगिक शब्द है। 'नखमुखात् संज्ञायाम्' 'स्वाङ्गा'-से प्राप्त डीए नख मुख अन्तवाले प्रातिपदिकों से सज्ञा में नहीं होगा। टाप्। नाम न होने पर 'तानं मुखं यस्याः' इस अर्थ मे डीप होगा। ?

साधनिकासहिता १३१ प्राडमुखी । 'दित्यवाट् च मे दित्यौही च मे'-'दिक्पूर्वपदान् कोप' दिक् है पूर्वपद जिसका ऐसे स्वाग अंतवाले प्रातिपदिक से पर मे डी को डीपू होगा। रूप मे समान होने पर भी स्वर मे विशेषता है। 'प्राकमुख यस्या' अर्थ मे पूर्व सूत्र से प्राप्त डोष का डीप होगा। 'वाह'सू० वाह अन्तवाले प्रातिपदिक से डीए होगा। यह वैदिक (रुद्री) उदाहरण है। यहाँ 'दित्यं वहतीति' अर्थ मे छन्द मे शिव प्रत्यय होकर उपधावृद्धि आदि होने के अनन्तर दित्यवाह शब्द से डीए । सखी। अशिश्वी। (१) 'श्रा धेनवो धुनयन्तामशिश्वीः।' (२) तटी। (३) वृषली । सत्यन्त किम् ? शुक्ला । सदित्यादि किम् ? देवदत्ता-सखी। विना संतान वाली । 'सख्यशिश्वीति भाषायाम्' सखि शब्द तथा अशिशु शब्द से डीप का निपातन होता है लोक मे । सूत्र मे 'इति' का अर्थ सजातीयता है, तथाच वेद मे भी क्वचित् डीष होता है। १-यह वैदिक उदाहरण है। २-किनारा । ३-शद्र की स्त्री। 'जातेरस्त्रीविषयादयोपधात्'जाति का वाचक-जो नियत स्त्रीलिंग नहीं, और य उपधा नहीं जिसका-ऐसे शब्द से स्त्रीलिंग मे डीए होगा। 'श्राकृतिग्रहणा जातिः' एकरूप प्राकार से जो पहचाना जाता है वह 'जाति' है। तट-शब्द जल समीप प्रदेश विशेष का वाचक है, अनियत स्त्रीलिंग एव य उपधा नही, तट त्रिलिंग है-श्रतः डीए । 'असर्वलिंगत्वेन सत्येकस्या व्यक्ती कथनाद् व्यक्त्यन्तरे कथनं विनापि सुग्रहा जाति:' 'यह वृषल है' ऐसा एक व्यक्ति का परिचय कराने पर उसके पुत्र कलत्रादि मे विना कहे वृषलत्व का बोध हो जाय और वह शब्द सभी लिग मे नही हो (नपुसकलिंग मे 'वृषल' नहीं है)-वह भी जाति है यह दूसरा लक्षण है । इसके अनुसार 'असर्वलिंगत्वेन' कहने से शुक्लत्व (शुक्ल शब्द त्रिलिंग-विशेष्याधीन है)जाति नही,अतः डीपू नहीं। एक व्यक्ति का परिचय कराने पर भी व्यक्त्यन्तर मे बिना बताये परिचय न होने से 'देवदत्ता' जाति नहीं, डीप नही । श्रौपगवी । कठी। कलापी । बढुची । 'ब्राह्मणी' । (१) जातेः किम् ? मुण्डा। (२)अस्त्रीविषयात् किम् ? बलाका । अयोपधात् किम् ? क्षत्रिया-उपगु की कन्या सन्तान । कठ से प्रोक्त वेद को पढ़नेवाली। वशम्पायन की शिष्या ।

१३२ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची । ऋग्वेद पढ़नेवाली । ब्राह्मण की पुत्री । 'तस्थापत्यं-' से 'उपगो अपत्यं' अर्थ मे अण, आदि वृद्धि, औपगव, 'टिड्ढाण' से प्राप्त डीप को बाधकर पर होने से गोत्र च चरणः सह' अपत्यप्रत्ययान्त तथा शाखाध्येतृवाची शब्द जातिकार्य-डीप को प्राप्त होगा-से डीप् । 'कठेन प्रोक्तमधीतेअर्थ मे 'कलापिवैशम्पायनान्तेवासिभ्यश्च' से प्रास णिनि का 'कठचरकाल्नु से लुक् , ततः तदधीते' से प्राप्त अण को 'प्रोक्ताल्लुक्' से लुक् । तदनन्तर इस 'गोत्र च'-से डीप् । 'बहवः ऋच. अध्येयाः यस्याः' अर्थ में 'ऋक्पूरब्धः- से 'अनूचबद्दचावध्येतर्येव' से समासान्त अ। उसके बाद डीम् । 'ब्रह्मणः अपत्यम्-' इस अर्थ मे श्रण, 'ब्राझोऽजातौ' से टिलोप न होने पर श्रादि- वृद्धि, ब्राह्मण । स्त्रीलिङ्ग मे जातिलक्षण डीप को बाध कर शार्गरवादि गणमें पाठ होने से 'शावाद्यो डोन्' से डीन् ।१-माथा मुंडी हुई । 'जाति' कथन का प्रयोजन 'मुण्डा' मे डोप न होना । क्योंकि यह प्राकृतिव्यग्यता- असर्वलिंगता-गोत्रचरणरूपी जातिलक्षणों मे श्राता ही नही। २-पक्षि विशेष । 'जातेरस्त्रीविषयात्-'मे 'जो नियत स्त्रीलिंग नहीं कहने से 'बलाका' नियतस्त्रीलिंग होने से डीप नही । 'य उपधा नहीं' कहने के कारण 'क्षत्रिया' मे डीप नहीं। हयी। गवयी। मुकयी। मनुषी । मत्सी-घोड़ी। गोसदृश जाति । पशुविशेष । 'योपधप्रतिपेधे हय-गवय-मुकय-मनुष्य-मत्स्यानामप्रतिषेधः' वा० इन शब्दों का य उपधा होने पर भी डोष होगा। मनुष्य शब्द से स्त्रीलिंग में डोष् , 'हलस्तद्धितस्य' से य-लोप, 'यस्येतिच' से य-के अ-लोप । 'मनोर्जातावत्र्यती धुक्च' मनुशब्द से अपत्यार्थ अञ्यत् प्रत्यय होंगे, प्रकृति (मनु) को षुक भी होगा, यदि जाति गम्य हो । 'मत्स्यस्य डयाम्' वा० मत्स्यशब्द के य का लोप होगा डी परे रहने पर ही, 'यस्येति च' अ-लोप । पोदनपाकी । शङ्कुकर्णी । शालपर्णी । शङ्खपुष्पी । दासीफली । दमली । गोवाली- ये सभी वनस्पतिविशेषों का रूढ नाम है। 'पाक-कर्ण-पर्ण-पुष्प-फल-मूल- वालोत्तरपदाच्च' पाक आदि उत्तरपद हैं जिनके, ऐसे जातिवाचक शब्दों से-जो नियतस्त्रीलिंग भी हो-डीए होगा। दाक्षी। औदमेयी। मनुष्येति किम् ? तित्तिरित-दक्ष की कन्या। उदमेय की साधनिकासहिता १३३ कन्या। 'इतो मनुष्यजाते.' इत् अन्त मनुष्य जातिवाची शब्द से स्त्रीलिंग मे डीए होगा। 'दक्षस्य अपत्यं स्त्री' इस अर्थ मे 'श्रत इञ्' से इञ्। आदिवृद्धि। डीए । 'यस्येति च' से दाक्षि के इ का लोप । ('गोत्रं च चरणैः सह' से जातिवाचक है) 'उदमेयस्य असत्यं स्त्री' अर्थ मे 'अत इञ्' 'यस्येति च' से अल्लोप । श्रादिवृद्धि, औदमेयिशब्द से डीए। इ-लोप । मनुष्य जाति-कहने से पक्षिवाचक 'तित्तिरि' से डीप नहीं। कुरूः । अयोपधात् किम् ? अवयु ब्राह्मणी । अलाब्बा । कर्कन्ध्वा । कृकवाकुः । ज्जुः । हनु-कुरुक्षेत्र के राजा की पुत्री । अध्वर्यशाखाध्ययिनी । लौकी । बैर। मुर्गी। रस्सी । कपोल । 'ऊडुनः' उकारान्त अ-योपध मनुष्यजाति वाची शब्द से स्त्रीलिंग मे अङ् होगा। 'कुरुना-'से विहित एय को 'स्त्रियामवन्ति' से लुम् । कुरु-ऊ सवर्ण दीर्घ । अयोध-कहने से अध्वर्यु शब्द से ऊड्नहीं। 'अप्राणिजातेश्चारउज्यादीनामुपसख्यानम्' रज्ज्यादि सदृश(अर्थात् उकारान्त) रज्जु से अतिरिक्त प्राणिजाति से भिन्न शब्द से ऊइ होगा। अलाबू-कर्कन्धू स्वयम् ऊ दन्त है, यहॉ (तृतीयाका रूा है)ऊ विधान का फल 'नोड् धात्वोः' से विभक्ति के उदात्तत्व का निपेष करना है। प्राणिजाति से तो-कुकवाकु- मे-ऊडू नहीं होगा। (यह प्रत्युदाहरण है)। रज्जु-हनु आदियों से-वार्तिक मे निषेत्र के कारण-ऊङ् नहीं। वाहूः। सज्ञाया किम् ? वृत्त बाहु:-कसीका नाम | गोल हाथ हैं जिसके। 'बाहन्तात्सज्ञायाम्' बाहु अंतवाले प्रातिपदिक से स्त्रीलिंग में ऊङ् होगा सज्ञा मे । 'सज्ञामे' कहने से 'वृत्तौ बाहू यस्याः' इस अर्थमे जड़ नहीं होगा। पर । श्व-पंगु । सास । 'पङ्गोश्च' पगुशब्द से स्त्रीलिंग मे अड् होगा। 'श्वशुरस्योकाराकारलोपश्च' वा. 'श्वशुर' मे शु तथा र के उत्तर मे रहने वाले उ-अ का लोप होगा। चकार से-जो कि समुच्चमार्थक है-ऊड्। पुंयोगलक्षण डोष (श्वशुरस्य स्त्री' अर्थ मे प्राप्त) का अपवाद है । यद्यपि श्वभ्रूशब्द से सुप् होना ('डपाप्रातिपदिकात्' मे ङी तथा प्राबन्त प्राति- पदिक से स्यादि विहित है-नकि ऊन्न से) सभव नहीं, तथापि 'प्राति- पदिकग्रहणे लिङ्गविशिष्टत्यापि ग्रहणम्' परिभाषा से सुबुत्सत्ति। रुत्व विसर्ग । करमोरूः । सहि नरूशोरू.। लक्ष योरू वामोरू। सहि तोरूः। सहोरू-:

१३४ सिद्धान्तकौमुदी-प्रयोगसूची करभ ('मणिबन्धादाकनिष्ठ करस्य करभो बहिः') जैसी जॉघवाली। अच्छी तरह जुटी जॉघ वाली । खुर जैसी जॉघ, मृदुत्वादिलक्षण से युक्त जॉघ, सुन्दर जॉघ, हित से युक्त तथा भार सहने वाली जॉघ है जिसकी । 'ऊरूत्तरपदा- दौपम्ये' उपमानवाचक पूर्वपद है तथा उत्तरपद ऊरु है जिस प्रातिपदिक का उससे स्त्रीलिंग मे अड् होगा। 'सहितशफलक्षणगमादेश्च' पूर्व में इन शब्दों से युक्त अरु उत्तरपद वालों से असादृश्य में भी जड होगा। 'सहितसहान्यो चेति वक्तव्यम्' वा. इन से युक्त ऊरु शब्द से भी ऊङ होगा। उपमानवाचक न होने से वार्तिक से सग्रह किया गया। कद्रूः। कमण्डलूः । संज्ञायां किम्? कद्रुः। कमण्डलु.-नागमाता। मृगविशेष । 'सज्ञायाम्' कद्रु-कमण्डलु शब्दों से सज्ञा मे स्त्रीलिंग मे ऊड होगा। संज्ञा न होने से आगे के दोनों कद्रु कमडलु मे ऊड नही। शाझरवी । वैदी। नारी-शृङ्गरू की कन्या। विद की कन्या। मनुष्यस्त्री। 'शारिवाद्यो डीन्' शारिवादि के जो अञ का अकार, तदन्त जाति- वाचक से डीन होगा। पुयोग मे तो डीप ही होगा। 'नृनरयोवृद्धिश्च' वा० नृ से डीन् । वृद्धि ऋ को पार (रपर)। नर शब्द से डीन् , न के श्र को इसी वार्तिक से, वृद्धि-श्रा । रेफोत्तर श्र-का 'यस्येति च' से लोप हो जाता है। श्राम्बष्ठ्या। कारीषगन्ध्या। शार्वराक्ष्या। पौतिमाया । श्रावट्या-अम्बष्ठ की पुत्री। गोबर सी गन्धवाले की कन्या । शर्कराक्ष की पुत्री। पूतिमाषकी कन्या। अवट की पुत्री । 'यडश्चाप्' यडन्त से स्त्रीलिंग मे श्राप होगा। 'अम्बष्ठस्यापत्यं स्त्री' इस अर्थ मे 'वृद्धकोसला-'से न्यड्, वृद्धि | श्राम्ब- ष्ठ्यसे श्राप । 'करीपस्येव (गोबर की सी) गन्धो यस्य' करीषगन्धि की कन्या सन्तान-अर्थ मे अण् , उसको 'अणिजो-से ध्यड्। 'पाद्यजश्चाब्वाच्यः' वा षकार से परे जो यञ् तदन्त से भी आप होगा। 'शर्कराक्षरय, पूतिमापस्य च अपत्य स्त्री' अर्थ में 'गर्गादिभ्यो या ' से यञ् । श्राप । 'श्रावटयाच' 'अवटस्य अपत्यं स्त्री' अर्थ में गर्गादि यत्र । 'यस्येति च'-से अलोप । आदिवृद्धि-श्रावट्य से प्राप् । युवतिः । बहुथुवा । युवती-युवती (जवान स्त्री)। बहुत से युवक जिस (शाला)

साधनिकासहिता
पर हो । मिश्रण करने वाली। 'यूनस्तिो युवन् शब्द से ति प्रत्यय होगा
और वह तद्धित कहायगा। लिंगविशिष्ट परिभाषा से ही प्रातिपदिकत्व सिद्ध
होने पर तद्धित' का अधिकार आगे के लिये है। अनुपसर्जन (अविशेषण)
से ही ति होगा। 'बह • युवानः यस्याः अर्थ में उपसर्जन होने से ति
नहीं। 'यु-मिश्रणे' लट् से शत, शब्लुक् , उवङ्-डीप् से 'युवती' ।
कौमुदीयप्रयोगाणा सम्बद्धाः
सूत्रवार्तिकाः ।
व्याख्याता राष्ट्रभाषाया समासेन ससाधनम् ॥
परीक्षार्थिहितार्थं वै कृतेय कृतिरादरात् ।
अप्यते भगवत्पादे यत्करोषीति शासनात् ॥
इति श्रीजितेन्द्रियाचार्योद्भावितं सिद्धान्तकौमुदीस्त्रीप्रत्ययान्तविवरणम्।

Ath Vedanj Prakasaha

Author
Shreepandityoudhistirmimansaken
Title
Ath Vedanj Prakasaha
File name
Ath Vedanj Prakasaha
Text
OCR done
Citation
2010
Published
25.07.06
Publisher
Acharaya Sahataya Mandal Limited Ajmar
Language
Sanskrit
Pages
139
Library
University Liberey Allahabad
Classification
Sanskrit
DLI number
485596
Barcode
5990010098749.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
VeRyJjnA6f4
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