Sanmati Library, Jaipur

Yogavashishtha

2009/09

PDF Proofread

Front matter

मुदक-अनंत बाळकृष्ण घावे, श्रीसरस्वती मुद्रणालय,
५२१, गिरगाव-बबई.
प्रकाशक-त्रजवल्लभ हरिप्रसादनी,
कालबादेवी रोड-रामबाढी, बबई न. २

इस रातिसे यह ग्रंथ प्रस्तावना- वेदातविषे यह ‘योगवासिष्ठ' ग्रंथ बहुत प्रसिद्ध है. यह ग्रंथ मूल संस्कृतमें है. तिसके कर्ता वाल्मीकि ऋषि हैं. तिसपर कोई वि- बान्ने टीका करी है. यह ग्रंथ बहुत प्राचीन है. इसकी भाषा कोई परमार्थी साधु पुरुषने करी है; तिनका नाम ज्ञात नहीं है. ऐसा सुना है कि योगवासिष्ठकी कोई महात्मा पुरुष कहीं कथा करते थे, तहां इस भाषाके करनेवाले साधु श्रवणके वास्ते प्रतिदिन जाते थे. जब श्रवण करके, आश्रमपर आते थे तब जैसा सुनते थे, वैसाही व्याख्यानसहित लिखते जाते थे. ऐसे इस योगवासिष्ठ भया है, इसीसे इसकी भाषा अतिसुगम भई है, और वह साधु पुरुष अनुभवी थे इससे कहींभी सिद्धांतविरुद्ध वाक्य इसमें नहीं दीख पडते. भाषा पढनेवाले मुमुक्षुजनोंपर तिन कृपालु साधु पुरुषका बड़ा उपकार भया है. सब मिलिके, इस ग्रंथके षट् (६) प्रकरण हैं, सो सब छपे हैं, परंतु तिनकी बड़ी कीमत होनेसे सवको उपयोगी नहीं हैं. इससे मुमुक्षुजनोंको आरंभके दो प्रकरण अतिउपयोगी हैं ऐसे वि- चारके, ये दोनों प्रकरण बड़े अक्षरोंमें टाइपपर हमने छपाये हैं कि, इनकी कीमत लघु होनेसे सबको इसका उपयोग सहजमें होवेगा. इन दोनों प्रकरणोंमेंही इतना वेदांतसिद्धांत दिखाया है कि- जो कोई शास्त्ररीतिसे इतना श्रवण, मनन और निदिध्यासन करे, तो तिसे अवश्यमेव मोक्षकी प्राप्ति होते. वैराग्यप्रकरणमें इस जग- तकी असत्यता ऐप्ती स्पष्ट दिखाई है, कि, जिसके श्रवणमात्रसे (४) योगवासिष्ठे। पुरुषकी वृत्ति वैराग्यवाली होजाती है; और तिसकरके जगजा- लसे छूटनेकी तिस पुरुषको इच्छा होती है. परमानंदकी प्राप्ति और अनर्थकी निवृत्तिके अर्थ मुमुक्षुको विचारही कर्तव्य है क्योंकि, तिससे ज्ञान होता है, ऐसाइस ग्रंथके मुमुक्षुप्रकरणके "विचारवर्णनमें भलीप्रकार वर्णन किया है, जगतके तुच्छ पदार्थोकी प्राप्तिके अर्थ पुरुष बहुत वर्षांपर्यंत पुरुषार्थ करते हैं, तव वांछित पदार्थकी प्राप्ति होती है, जगतके कोईभी पदार्थ मोक्षके समान नहीं हैं. मोक्षकी प्राप्तिका मनुष्यजन्म हेतु है, इससे तिसकी प्राप्तिके अर्थ पुरुषको दृढ अभ्यास करना चाहिये. इस ग्रंथके विचारमें और अद्वितीयवोधक प्रक्रियाग्रंथोंका गुरुमुख- से श्रवण अपेक्षित है, क्योंकि,जो मुमुक्षुप्रकरणमें अठारहवें सर्गमें पृष्ठ १६३ पर कहा है कि-'पदपदार्थको जाननेहारा होवे । सो इस- को वारंवार विचारे तवतिसका दृश्य भ्रम नाश पावे.इस शास्त्र के वि- चारविषे और किसी तीर्थ. तप, दानआदिककी अपेक्षा नहीं. जहां. स्थान होवे तहां बैठे,जैसा भोजन गृहविषे होवे तैसा करे और वारंवार इसका विचार करै, तव अज्ञान नष्ट होजावेअरुआत्मपदकी प्राप्ति होते. इस ग्रंथमें बहुत पुनरुक्तियां दृष्टि आती हैं, परंतु सो दूषण नहीं है: ग्रंथको भूषण है, क्योंकि, जिससे इस शास्त्रका विषय दुर्बोध है, इससे एकही दृष्टांत वा सिद्धांतका वारंवार श्रवण अथवा विचार मुमुक्षुको दृढतानिमित्त उपयोगीही है. प्रकाशक सूचना. ar . समस्त वेदान्तानुरागी महाशयोंको विदित हो कि-यह योगवासिष्ठ ग्रंथ बहुत उत्तम है. इसमें छह प्रकरण हैं. सो सब छपे हैं। लेकिन उनकी कीमत ज्यादा होनेसे कोई २ धनाढयही लेते थे परंतु सब नहीं लेते थे, यह देख, कईएक हमारे सहयोगियोंने इसके मुमुधु तया वैराग्य ये दो प्रकरण छापे क्योंकि, यह दोनों प्रकरण सबको अत्युपयोगी हैं और कीमतभी कमती रक्खी है; परंतु उनके निकट उत्तम संशोधक न होनेसे इन प्रकरणों में ऐसा गोलमाल हो गया कि कथा तो उतनीकी उत- नही रही. लेकिन वैराग्यप्रकरणमें संस्कृत ग्रंथमें ३३ सर्ग थे तिसके २८ रहाये. और मुमुक्षुप्रकरणमें २० सर्गके १९ रहगये. और इसके प्रारंभहीमें एक ऋषीका नाम कारुण्य था उसका कारण होगया. और जो अग्निवेश्य ऋषि लोकमें प्रसिद्ध हैं कि, जिन्होंने समायणभी बनाया है, उनकेभी नाममें विकार होगया. अर्थात् अग्निवेश्यकी जगहपर अग्निवेष होगया और वैराग्यप्रकरण द्वितीय सर्ग पृष्ठ १० में अष्टमंत्रीकी जगहपर अपविशतिमंत्री करदिया, परन्तु नाम तो आठही लिखे. फिर नामों में भी बडाही गोलमाल करदिया. यानी धृष्टिकी जगहपर कुंतभासी, जय- तकी जगहपर शतवर्द्धन, भासकी जगहपर सुखधाम, वसिष्ठकी जगहपर जय और सुषेणकी जगहपर वामदेव होगया. और भगवानको वृन्दाका शाप होनेकी कथा साफही उडगई. औरभी बहुत विषयोंमें अनेक विकार होगये और भाषाभी बहुतही बिगड गई. ये मुख्य २ विषय हमने लिखे हैं; सब नहीं लिखे, क्योंकि बहुत विस्तार हो जायगा. सो अव हमने हमारे परममित्र सुमेरपुरनिवासी पण्डित रामभद्र शर्मासे शुद्ध कराके, प्रकाशित किया. महात्मा परीक्षक जन इस हमारी प्रतिसे जब उन प्राचीन प्रतियोंको मिलावेंगे, तब इसकी शुद्धता मालुम होजायगी. अब संपूर्ण सज्जनोंसे हमारी सविनय प्रार्थना है कि यदि दोपसे इसमें कोई अदि रहगई हो तो क्षमा कर, सुधार लेवें. हरिप्रसाद भगीरथजीका प्राचीन पुस्तकालय, कालकादेवीरोड, रामवाडी-मुम्बई. .

अथ योगवासिष्ठविषयानुक्रमणिका। ... ... ... ... ... ... ... ... सगाकरः विश्याः पृष्टांकाः सगांकाः विषयाः पृष्ठांकाः पैराग्यश्करणम् ॥ २८ जगद्विपर्ययवर्णनम् १ कथारंभवर्णनम् १ २९ सर्वातप्रतिपादनवर्णनम् २कथारंभवर्णनम् ३० वैराग्यप्रयोजनवर्णनम् ३ तीर्थयात्रावर्णनम् १० ३१ रामप्रश्नवर्णनम् ९७ ४ दिवसव्यवहारवर्णनम् १५ ३२ नभश्चरसाधुवादवर्णनम् ५ कार्यवर्णनम्... ३३ नमश्चरमहीचरसंमेलनवर्णनम् १०० ६ विश्वामित्रागमनवर्णनम् १८ मुमुक्षुप्रकरणम् । विश्वामित्रेच्छावर्णनम् ... २० १अकनिर्वाणवर्णनम् १०२ ८ दशरथोक्तिवर्णनम् २ विश्वामित्रोतिवर्णनम् ९ वसिष्ठसमाश्वासनवर्णनम् ३ असंख्यसृष्टिप्रतिपादनम् १०८ १. रामविपादवर्णम् . ११ रामसमाश्वासनवर्णनम् ४ पुरुपार्थापक्रमवर्णनम् १२ रामवैराग्यवर्णनम् .. ५पुरपार्थवर्णनम् १३ लक्ष्मातिरस्कारवर्णनम् ६ परमपुरपार्थवर्णनम् ११६ ३६ १४ जीवितनिन्दावर्णनम् ... ७ पुरुषार्थप्राधान्यसमर्थनवर्णनम् ११९ १५ अहंकारनिन्दावर्णनम् । ८देवनिराकरणवर्णनम् રરર Puy २ १६ चित्तदौरात्म्यवर्णनम् । ९कर्मविचारवर्णनम १२४ १७ तृष्णागारुडीवर्णनम् . १० मानावतरणवर्णनम १२७ १८ देहनैराश्यवर्णनम् ११ वसिष्टोपदेशवर्णनम ५३ १३१ १९ बाल्यावस्थानिन्दावर्णनम् १२ तत्त्वज्ञमाहात्म्यवर्णनम् ६० १३६. २० युवानिन्दावनम् १३ शमवर्णनम् १४० २१ स्वीनिन्दावर्णनम् 1 ११ विचारवर्णनम् २२ जरावस्थानिन्दावर्णनम् ७२ १५ संतोपवर्णनम् १५२ २३ कालापवादवर्णनम् १६ साधुसंगवर्णनम् ... १५४ २४ कालविलासवर्णनम् ७९ १७ पइप्रकरणवर्णनम्... १५७ २५ कालविलासवर्णनम् १८ दृष्टांतवर्णनम् २६ कालविलासवर्णनम् १९ प्रमाणवर्णनम् २७ सर्वपदार्थामाववर्णनम् १६७ २० आत्मप्राप्तिवर्णनम्... इसक्रमणिका समाप्ता। ... ... ... ... ... ... .. ... ... ... ... ... ... . ... १६९ ॐ श्रीपरमात्मने नमः। अथ श्रीयोगवासिष्टे वैराग्यप्रकरणप्रारंभः । प्रथमः सर्गः १ अथ कथारंभवर्णनम् । सत्-चित्-आनंदरूप जो आत्मा है तिसको नमस्कार है. सो कैसा है? जिससे यह सबभासत है अरु जिमविषे यह सर्व लीन होय है अरु जिसविषेयह सब स्थित है, तिस सत्य आत्माको नमस्कार है. ज्ञाता, ज्ञान, ज्ञेय, द्रष्टा, दर्शन, दृश्य,कर्ता, कारण और क्रिया, ये जिसकरके सिद्ध होते हैं, ऐसा जो ज्ञानरूप आत्मा है, तिसको नमस्कार है. जिस जिस आनंदके समुद्रके कणसों संपूर्ण विश्व आनंदवान् है अरु जिस आनंदकरिसर्व जीव जीवते हैं, तिस आनंद आत्माको नमस्कार है, कोई एक सुतीक्ष्ण अगस्तिमुनिका शिष्य होता भया तिसके मनमें एक संशय उत्पन्न हुआ, तिसको निवृत्त करनेके अर्थ अगस्ति मुनिके आश्रमको गया. जायकर, विधिसंयुक्त प्रणाम करि स्थित भया और नम्रभावसों प्रश्न करने लगा. सुतीक्ष्ण उवाच हे भगवन्! धर्मतत्त्वज्ञा सर्वशास्त्रोंके ज्ञाता! मुझको एक संशय है,सो तुम कृपाकरके निवृत्त करो.मोक्षका कारण कर्म है, कि ज्ञान है, कि दोनों हैं? याते जो मोक्षका कारण होय सो कहो [प्रथमः सर्गः योगवासिष्ठे। अगस्तित्वाच--हे ब्रह्मण्य ! केवल कर्म मोक्षका कारण नहीं और केवल ज्ञानसेमी मोक्ष प्राप्त नहीं होता.दोनोंकरके मोक्षकी प्रामि होती है, कर्म करके अंतःकरण शुद्ध होता है, मोक्ष नहीं होता; अरु अंतःकरणशुद्धिविना, केवल ज्ञानसेभी मुक्ति नहीं होती. अर्थात् शा- स्त्रका तात्पर्य, ज्ञानका निश्चय, अंतःकरण शुद्ध हुए विना ज्ञानकी स्थिति नहीं होती. ताते दोनोंकरकेमोक्षकी सिद्धि होती है. कर्मकरके प्रथम अंतःकरणकी शुद्धि होती है, बहुरि ज्ञान उपजता है; तवमोक्षकी सिद्धि होती है.जैसे दोनों पंखों करके, पक्षी आकाशमार्गको सुखेन उड़ता है, तैसे कर्म अरु ज्ञान दोनोंकरके मोक्ष सिद्ध होता है.हे ब्रह्मण्या इस अर्थके अनुसार एक पुरातन इतिहास है मोतू श्रवण कर. एक कारुण्यनाम ब्राह्मण अमिवेश्यका पुत्र था. सो गुरुके निकट जायकर, चार वेद पडङ्गसहित अध्ययन करता भया. अध्ययन करके घरको आवत भया और कर्मते रहित होयकर चुप रहा.अर्थात् संश- ययुक्त होय कर्महीते रहित भया.तब पिताने देखाजो यहकर्मते रहित होयकर स्थित भया है, ऐसा देखके, इसे कहत भया-- अग्निवेश्य उवाच-हे पुत्र! तू कर्मकी पालना क्यों नहीं करता ? औरतू कर्मके न करनेते सिद्धताको कैसे प्राप्त होवेगा? जिस करके तू कर्मते रहित हुआ है, सो कारण कहि दे. कारुण्य उवाच-हे पिताजी ! एक संशय मुझको उत्पन्न हुआ है, तिसकरके में कर्मते चुप रहा हूं, सो श्रवण करो. वेदने एक और कहा है कि--जब लग जीवता रहै तथ लग कर्मको करना.जो - अमिहोत्रादिक कर्म हैं, सो करताही रहै, अरु और ठार कहा है कि, धनकरके मोक्ष होत नहीं और कर्मकरके मोक्ष होत नहीं और पुत्रा- दिककरके मोक्ष होत नहीं; केवल त्यागते मोक्ष होता है, इन दानाक ---- १.] वैराग्यप्रकरणे-कथारंभवर्णनम् । (९) विषे मुझको क्या कर्तव्य है ? यह संशय है सो तुम कृपा करके नि- वृत्त करो; कि, क्या कर्त्तव्य है? अगस्तिरुवाच हे सुतीक्ष्ण! ऐसे जब कारुण्यने पिताको कहा, तब तिसका वचन सुन, अग्निवेश्य कहत भया- अग्निवेश्य उवाच हे पुत्र ! एक कथा मुझते तू श्रवण कर जो पहिले हुई है. तिसको सुनकर, हृदयविषे घरके आगे जो तेरी इच्छा होय सोय करना. एक सुरुचि नाम अप्सरा हती, सो जेती कुछ अप्सरा हती, तिनके विषे उत्तम थी. सो एक समय हिमालयके शिखरपर बैठी थी सो हिमालय पर्वत कैसा है, कि, कामनाकरके संपन्न जो हृदयमें बिचारे सो पावे. तहां देवता अरु किन्नरनके गण अप्सराओंके साथ क्रीडा करते हैं. और कैसा है, जहां गंगाजीका प्रवाह लहरी देत चला आवत है. सो गंगा कैसी है, कि, महापवित्र जल है जिनका, ऐसे शिखरपर सुरुचि अप्सरा बैठी थी, तिसने इंद्रका दूत अंतरिक्षते चला आवत देखा. जब निकट आया, तब अप्सराने कहा- अहो सौभाग्य देवदूत! तू देवगणमें श्रेष्ठ है, तू कहांते आया और कहां जायगा, सो कृपा करके कहि दे. देवदूत उवाच हे सुभद्रे ! तैंने पूंछा है सो श्रवण कर. अरिष्टनेमि एक राजर्षि था; वाने अपने पुत्रको राज्य देकर, वैराग्य लिया. संपूर्ण विषयोंकी अभिलाषा त्याग करके, गंधमादन पर्वतमें जायकर भयंकर तप करने लगा. अरु धर्मात्मा तिसके साथ मेरा एक कार्य था. सो कार्य करके, मैं अव इंद्रके पास जाता हूं, तिनका में दूत हूं, संपूर्ण वृत्तांत निवदन करनेको चला हूं. अप्सरोवाच- हे भगवन् ! वृत्तांत कौनसा है ? सो मुझसे कहो; मेरेको तू अतिप्रिय है; यह जानकर पूंछती हूंऔर जो महा [ प्रथमः सर्गः ! (१०) योगवासिष्ठे। पुरुष हैं; तिनसो कोई प्रश्न करता है, तब वह उद्देगते रहित होकर उत्तर देते हैं, ताते तूं कहि दे. देवदूत उवाच--हे भद्रे ! जो वृत्तांत है सो सुन. विस्तार करके मैं तुझको कहता हूं. वह जो राजा गंधमादन पर्वतमें तप करने लगा, सो बड़ा तप किया, तब देवतोंके राजा जो इंद्र हैं तिन्होंने मुझको बुलायकर, आज्ञा करी कि-हे दूत ! तू गंधमादन पर्वतमें जा और विमान, अप्सरा, नाना प्रकारकी सामग्री, गंधर्व, यक्ष,सि- द्ध, किन्नर, ताल, मृदंग--आदि बाजे संग ले जा, और वह गंध- मादन पर्वत कैसा है, जो नाना प्रकारकी लता--वृक्षोंकरके पूर्ण है, तहां जायके राजाको विमानपर बिठायके, इहां ल्याव. हे सुंदरि ! जब इंद्रने ऐसा कहा, तब मैं विमान अरु सामग्रीसहित तहां आया अरु राजासे कहा कि हे राजन् ! तेरे कारण विमान ले आया हूं तापर बैठके तू स्वर्गको चल और देवतानके भोग भोगु. जब मैंने ऐसे कहा तब मेरा वचन सुनकर, राजा बोलत भया. राजोवाच- हे देवदूत ! प्रथम स्वर्गका वृत्तांत तू मुझसे कह कि, तेरे स्वर्गमें दोष कहा ? अरु गुण कहा है? तिनको सुनके मैं हृदयमें विचारूं, पीछे जो मेरी इच्छा होवेगी तो आऊंगा. देवदूत उवाच-हे राजन् ! स्वर्गमें बड़े दिव्य भोग हैं सो स्वर्ग बड़े पुण्यसों जीव पाते हैं. जो बड़े पुण्यवाले होते हैं,सो उत्तम सुख स्वर्गको पाते हैं. जो मध्यम पुण्यवाले हैं सोमध्यमसुखस्वर्गको पाते हैं अरु कनिष्ठपुण्यवाले हैं सो कनिष्ठ सुख स्वर्गको पाते हैं. यह तो गुण स्वर्गमें सोतो तोसों कहे हैं और स्वर्गके जो दोष हैं सो सुन. हे राजन् ! जो आपते ऊंचे बैठे दृष्टि आवते हैं अरु उत्तम सुख भोगते हैं, तिनको देखके, तापउत्पत्ति होती है, क्योंकि, उनकी उ- स्कृष्टता सही नहीं जाती है. अरु जोकोई अपने समान सुख भोगते १.] वैराग्यप्रकरणे-कथारंभवर्णनम् । हैं, तिनको देखके, कोष उपजत है; कि-मेरे समान क्यों बैठे हैं ? अरु जो अपने नीचे कनिष्ठपुण्यवाले बैठे हैं तिनको देखके,आपको अभिमान उपजत है; कि मैं इनते श्रेष्ठ हूं और एक औरभी दोषहै,. कि-जव उसके पुण्य क्षीण होते हैं, तब तिसी कालमें उसको मृत्युलो- कमें गिराय देते हैं; एक क्षणभी रहने देते नहीं. हे राजन ! यह जो दोष कहे सो स्वर्गमें हैं. जो तैंने पूंछा सो मैंने गुण अरु दोष कहे. हे भद्रे ! जब इस प्रकार राजासे मैंने कहा तब मोंकोराजाने कहा कि-हे देवदूत ! इस स्वर्गके योग्य हम नहीं हैं. अरु हमको इच्छाभी नहीं है. हम उग्र तपकरेंगे, तपकरके, इस देहकोभी त्याग देंगे, जैसे. सर्प अपनी त्वचाको पुरातनजानिके, त्याग करता है.हे देवदूत! तुम अपने विमानको जहांते लायेहो, तहां लेजाओ,हमारे तो नमस्कार है. हे देवि! जब इस प्रकार राजाने मुझको कहा, तब विमान अप्सरा. आदि सबकोलेके, मैं स्वर्गमें गया अरु संपूर्ण वार्ता मैंने इंद्रसे कही. तब इंद्र प्रसन्न हुए अरु सुंदर वाणीकरके मुझसे कहत भये कि हे दूत! तू बहुरि जहांराजा है तहां जा.वह संसारते उपराम हुआ है. उसको. अब आत्मपदकी इच्छा हुई है. उसको साथ लेके, वाल्मीकी कि जि- न्होंने आत्मतत्त्वको आत्माकरि जाना है, तिनके पास ले जाय, मेरा संदेशा कहना कि--हेमहाऋषि ! इस राजाको तत्त्वबोधका उपदेश करना. क्योंकि, यह बोधकाअधिकारी है. काहेते कि, इसको स्वर्गकी भी इच्छा नहीं अरु औरकीभीवांछा नहीं. ताते तुम इसको तत्त्वबो- धका उपदेश करोजो तत्वबोधको पाय करके, संसारदुःखते मुक्त होवे.. हे सुभद्रे! जब इस प्रकार देवराजाने मुझसे कहा, तब मैं चला. जहां राजा था, तहां जाइ करिकै, मैंने कहा कि-हेराजन् ! संसारस- मुद्रते मोक्ष होनेके निमित्त वाल्मीकिके पास चल, वाल्मीकि तुझको उपदेश करेंगे, ऐसा कह, तिसको साथ लेकर, मैं वाल्मीकिके स्थानपर , [प्रथमः सर्गः (१२) योगवासिष्ठे। आय, प्राप्त भया. तिस स्थानमें राजाको विठाया अरु इंद्रका संदेश दिया. जोवहां वृत्तान्त भया सो सुन. हम और राजा जब वहां गये अरु प्रणाम कर बैठे, तव वाल्मीकिने कहा- हे राजन् ! कुशल है ? राजोवाच-हे भगवन् ! परमतत्त्वज्ञ ! और वेदातजाननेवा- लोंमें श्रेष्ठ! तुम्हारे दर्शन करके मैं अव कृतार्थ हुआ. अब मुझको कु- शल हुआ है अरु कछु पूंछता हूं. कृपा करके उत्तर कहना, जिससे संसारबंधनते मुक्ति होय. वाल्मीकिरुवाच हे राजन्! महारामायण औषध तुझसे कहता हूं सो श्रवण करके, हृदयविषे तात्पर्य धारण करनेका यत्न कर. जव हृदयविषे तात्पर्य धारेगा, तव जीवन्मुक्त होयकर विचरेगा. हे.'' राजन् ! वासिष्ठजीअरुरामचंद्रजीका संवाद है, तिसमें सव कथा मोक्षके उपायकी कही है. तिसको सुनके, जैसे रामचंद्रजी अपने स्वभावविपे स्थत हुए अरु जीवन्मुक्त होयके विचरे हैं, तैसे तूभी विचरेगा. राजोवाच हे भगवन् ! रामचंद्रजी कौन थे, अरु कैसे थे, अरु कैसे होकर विचरे हैं, सो कृपा करके कहो. वाल्मीकिरुवाच हेराजन् ! शापके वशते, हरि जो विष्णु तिनके छलकरके मनुष्यका देह धरासो अद्वैतज्ञानकर संपन्न है तौभी कछुक अज्ञानको अंगीकार करके, मनुष्यका शरीर धरे थे. राजोवाच-हे भगवन् ! चिदानंद रूप जो हरि हैं, तिसको शाप किस कारण हुआ, अरु किसने दिया, सो कहो. वाल्मीकि उवाच-हे राजन्! एक कालमें सनत्कुमार जो निष्काम हैं सो ब्रह्मपुरीमें बैठे थे अरु त्रिलोकीके पति जो विष्णु भगवान् सो वैकुंठते उतरके ब्रह्मपुरीमें आए, तब ब्रह्मासहित सर्व सभा उठके खडी हुई अरु सबोंने पूजन किया अरु सनत्कुमारने पूजन नहीं किया-तिसको देखकर विष्णु भगवान् बोलते भये कि-हे सनत्कुमार!

१.] वैराग्यप्रकरणे-कथारंभवर्णनम् ।
तुझको निष्कामताका अभिमान है, ताते तू कामकरके अवतार पा-
वेगा अरु स्वामिकार्तिक तेरा नाम होवेगा. जब विष्णुभगवान्ने ऐ-
सा कहा, तब सनत्कुमार बोले कि हे विष्णु ! सर्वज्ञताका अभिमान
तुझको है. सो तेरी सर्वज्ञता कोई काल निवृत्त होवेगी अरु अज्ञानी
होवेगा. हे राजन् ! एक तो यह शाप हुआ. औरभी सुन.
एक कालमें भृगुकी स्त्रीजाती रही तिसके वियोगसे वह ऋषि त-
पायमान हुए. तिनको देखके विष्णुजी हँसे तब भृगु ब्राह्मणने शाप
दिया कि- हे विष्णु ! मेरेको देख तैने हाँसी करी है, सो मेरी नाई
तूभी स्त्रीके वियोगसे आतुर होवेगा.
अरु एक समय जालन्धर और शिवजीका युद्ध होताथासोउसकी
स्त्री वृन्दा पतिव्रता थी इससे वह मरता नहीं था. यह देख, विष्णुजी-
घेजालंधरका रूप घर उसका पातिव्रत्य भंग किया, तो उसने शाप
दिया कि-जिससे तुमने मुझसे छल करके मेरा पातिव्रत्य धर्म ख-
ण्डित किया इससे तुम स्त्रीवियोग पावोगे.
तथा एक दिवस देवशर्मा ब्राह्मणने नरसिंह भगवान्को शाप दि-
या था सो सुन. एक दिन नरसिंह भगवान गंगाके तीरपर गये थे,
तहां देवशर्मा ब्राह्मणकी स्त्री थी,तिसको देखके, नरसिंहजी भयानक
रूप दिखायके हँसे, तिनको देखके, ऋषिकी लुगाईने भय पाय, प्राण
छोड़ दिये. तब देवशर्माने शाप दिया कि-तुमने मेरीत्रीका वियोग
किया, ताते तुमभी स्त्रीका वियोग पावोगे.
हे राजन् ! सनत्कुमार, भूगु, वृन्दा अरु देवशर्माके शाप करके
विष्णुभगवान्ने मनुष्यकाशरीरधरा, सो राजा दशरथके घरमें प्रगटे.
हे राजन् ! यह जो शरीर धरा है, अरुआगेजो वृत्तांत हुआहै, सो
सावधान होय, श्रवण कर,
इति श्रीयोगवासिष्ठेवैराग्यप्रकरणे कथारंभवर्णनं नामप्रथम सर्गः॥१॥

(१४) [द्वितीयः सर्गः योगवासिष्ठे। द्वितीयः सर्गः२। अथ कथारंभवर्णनम् । दिव्य जो देवलोक है अरुभूजो पृथ्वीलोक है अरु पाताललोक ऐसी त्रिलोकीको प्रकाशता है अरु अंतर वाहर आत्मतत्त्वकार पूर्ण है ऐसाअनुभवात्मकसेरा आत्मा है; तिस आत्माको नमस्कार है- हे राजन् ! यह शास्त्र कि, जिसका आरंभ किया है. तिसका विषय क्या है ? अरु प्रयोजन क्या है ? अरु संबंध क्या है अरु अधिकारी कौन है ? सो श्रवण कर, सत, चित् आनंदरूप,अचिंत्य, चिन्मात्र आत्माको जानता है सो विषय है. अरु परमानंदआत्माकी प्राप्ति अरु अनात्म अभिमान दुःखकी निवृत्ति, यह प्रयोजन इसमें है अरु ब्रह्म- विद्या मोक्ष उपायकर आत्मपदका प्रतिपादन है, सो संबंध है, अरु जिसको यह निश्चय है कि मैं अद्वैतब्रह्म अनात्म देहका साथी हुआ हूं सो किस प्रकार छद्रं ऐसा ज्ञानवान् है अरु मुमुक्षु है, ऐसाजो विकृति आत्मा है सो इहाँ अधिकारी है. यह शास्त्र मोक्षका उपाय है. परंतु कैसा है मोक्षका उपाय कि, परमानंदकी प्राप्ति करनहारा है.जो पुरुष इसको विचारे सो ज्ञानवान होवे.बहुरि जन्ममृत्युरूप संसारमें न आवे.हेराजन्! यह महारामायण जोहै सो पावन है.श्रवणमात्रसे सब पापका नाश कर्ता है जिसविषे रामकथा है सो प्रथम मैंने अपने भरद्वाज शिष्यको श्रवण कराई है, एक समय भरद्वाज चित्तको एकाग्र करके मेरे पास आया. तिसको मैंने उपदेश किया था. तिसको श्रवण करके, वचनरूपी समु- द्रते साररूपी रनको हृदयविषे धरके, एक समय सुमेरु पर्वतपर गया. तहां पितामह जो ब्रह्मा सो वैठे थे अरु भरद्वाजने जायकर प्रणाम किया, अरु पास बैठा अरु ब्रह्माजीको यह सुनाई. तब ब्रह्माने प्रसन्न होकर, भरद्वाजसे कहा कि हे पुत्र कछु वर मांग, मैं तुझपर २.] वैराग्यप्रकरणे-कथारंभवर्णनम् । (१५) प्रसन्न हुआ हूं, हे राजन् ! जब इसप्रकार ब्रह्माजीने कहा, तब परम- उदार जिसका आशय है, ऐसाजो भरद्वाज सो कहत भया कि-हे भूत- भविष्यके ईश्वर ! जो तुम प्रसन्न हुए हो, तो यह वर देहु कि, संपूर्ण जीव संसारदुःखते मुक्त होहिं अरु परमपदको पावहि, सो उपाय कहो. ब्रह्मोवाच हे पुत्र ! तू अपने गुरु वाल्मीकिके पास गमन कर बहुरि जो तिन्होंने आत्मबोधरूप महारामायण अनिंदित शा- स्त्रका आरंभ किया है तिनको सुनकर, जीव महामोह संसारसमुद्रते तरेंगे. शास्त्र महारामायण कैसा है ? कि, जो संसारसमुद्र तरनेको पुल है अरु परम पावन है. वाल्मीकिरुवाच हे राजन् ! इसप्रकार कह, आप परमेष्ठी (ब्रह्मा), भरद्वाजको साथ लेकर मेरे आश्रममें आये. तब मैंने भले प्रकारसों इनका पूजन किया. सो ब्रह्माजी कैसे हैं, कि, जिनकी सर्व भूतके हितमें प्रीति है सो मुझसे कहत भये. ब्रह्मोवाच-हे मुनिनमें श्रेष्ठ वाल्मीकि ! यह जो रामके स्व- भावके कथनका आरंभ तुमने किया है, तिस उद्यमका त्याग नहीं करना. इसको आदिते अंतपर्यंत समाप्त करना. यह मोक्षउपाय कैसा है, जो संसाररूपी समुद्रको पार करनेके जहाज है, इस करिके सर्व जीव कृतार्थ होवेंगे. वाल्मीकिउवाच-हे राजन्! इस प्रकार ब्रह्माजी मुझसेक- हिके, अंतन होगये, जैसे समुद्रते आवर्त (चक्र) एक मुहूर्तपर्यंत उठके, बहुरि लीन हो जाता है तैसे ब्रह्माजी अंतन होगये. तब मैंने भरद्वाजसे कहा कि हे पुत्र ! ब्रह्माजीने क्या कहा ? भरद्वाज उवाच हे भगवन् ! तुमको ब्रह्माजीने ऐसा कहा कि-हे मुनिश्रेष्ठ ! तुमने रामके स्वभावके कथनको उद्यम किया है, [तृतीयः सर्गः (१६) योगवासिष्ठे। तिसका त्याग नहीं करना, अंतपर्यंत समाप्ति करना.काहेते कि, इस संसारसमुद्रके पार करनेको यह कथा जहाज है, इसकरि अनेक जीव कृतार्थ होवेंगे अरु संसारसंकटते मुक्त होवेंगे. वाल्मीकिरुवाच हे राजन् ! जव इसप्रकार ब्रह्माजीने मु- झको कहा तव ब्रह्माजीकी आज्ञाके अनुसार मैंने ग्रंथ किया अरु भर- द्वाजको कहा-हे पुत्र! वसिष्ठजीके उपदेशको पायकर, जिस प्रकार रामजी निःशंक हो बिचरे हैं तैसे तूभी विवर.तब उसने प्रश्न किया कि- सरहाज उवाच-हे भगवन् ! जिसप्रकार रामचंद्रजीजीव- न्मुक्त होकर विचरे हैं, सो आदिसों क्रमकरके मुझसे कहो. वाल्मीकिउवाच-हे भरद्वाज ! रामचंद्र, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, सीता, कौशल्या,सुमित्रा, दशरथ, कृतास्त्र, अविरोध और व- सिष्ठ, कामदेव अरु अष्टमंत्री ये लोग जीवन्मुक्त होय विचरे हैं. तिन मंत्रियों के नाम सुन-धृष्टि १, जयंत २, मास ३, विभीषण ४, इंद्र- जित ५,हनुमंत ६.जय ७, सुषेण ८ ये अष्टमंत्री हैं सो निःशंक होय, चेष्टा करत भये हैं अरु सदा अद्वैतनिष्ठ हुए हैं. इनको कदाचित् स्व- रूपते द्वैतभाव नहीं हुआ, अनामयपदविषे स्थितिमें तृप्त रहे, जो केवल चिन्मात्र, शुद्धपद, परमपावनताको प्राप्त हुए हैं. इति श्रीयोगवासिष्ठेवैराग्यप्रकरणेकथारंभवर्णननामद्धितीय सर्गः॥२॥ तृतीयः सर्गः ३। अथ वीर्थयावावर्णनम् । भरबाज उवाच- हे भगवन् ! जीवन्मुक्तकी स्थिति कैसी है अरुरामजीकैसे जीवन्मुक्तहुए हैं,सोआदितलेकर अंतपर्यंत सव कहो.

३.] वैराग्यप्रकरणे-तीर्थयात्रावर्णनम् । (१७) वाल्मीकिरवाच हे पुत्र ! यह जगत् जो भासता है सो वास्तविक कछु नहीं उत्पन्न भया. अविचारकरके भासता है. विचार कियेते निवृत्त हो जाता है, जैसे आकाशमें नीलता भासती है, सो भ्रम करके है, जब विचारकरके देखिये तब नीलताप्रतीति दूर हो जाती है, तैसे अविचार करके जगत् भासता है अरु विचारते लीन हो जाता है. हे शिष्य ! जबलग सृष्टिका अत्यंत अभाव नहीं होता, तबलग परमपदकी प्राप्ति नहीं होती. जब दृश्यका अत्यंत अभाव होय जावे, तब पीछे शुद्ध चिदाकाश आत्मसत्ता भासेगी.कोई इस दृश्यको महाप्रलयमें कदाचित् अभाव कहते हैं, परंतु मैं तुझको तीनोंही कालका अभाव कहता हूं सो सत्शास्त्रकर इस शास्त्रमें श्रद्धासंयुक्त आदिते लेकर, अंतपर्यंत श्रवण कर अरु तिनको धार, तबतिसकी भ्रांति निवृत्त होय जावे, अरु अव्याकृत पदकी प्राप्ति होवे हेशिष्य! संसार भ्रममात्र सिद्ध है; इसको भ्रममात्र जानकर विस्मरण करना, सो मुक्ति है. अरु इसको बंधनका कारण वासना है. जीववासना- करके भटकता फिरता है. जब वासनाका क्षय हो जाय, तब पर- मपदकी प्राप्ति होते.वासनामें फिरता है, तिसका नाममन है. जैसे जल शरदीकी दृढ़ जड़ता पायके बर्फ होता है, पछि सूर्यके तापते गल- करजल होता है, तब केवल शुद्ध जल होयरहता है, तैसे आत्मरूपी जल है. तिसविषे संसारकी सत्यतारूपी जड़ता शीतलता है. तिस- करके मनरूपी बर्फका पुतला हुआ है. जब ज्ञानरूपी सूर्य उदय होवेगा, तब संसारकी सत्यतारूपी जड़ता, शीतलता, निवृत्त होजावेगी. जब संसारकी सत्यता अरु वासना निवृत्त हुई, तबमन नष्ट हो. जावेगा. जब मन नष्ट हुआ, तब परमकल्याणहुआ.ताते इसको बंध- नका कारण वासना है अरु वासनाके क्षय हुयेते मुक्ति है. सो वासना दो प्रकारकी है.एक शुद्ध अरु दूसरीअशुद्ध सोअपने वास्तविक स्वरू- [ तृतीयः सर्गः (१८) योगवासिष्ठे। पके अज्ञानते अनात्मा जो देहादिक, तिनमें अहंकार करना, सोजव अनात्ममें आत्म-अभिमान हुआ, तव नाना प्रकारकी वासनायें उप- जती हैं, तिसकरके घटीयंत्रकी नाई चक्र भमता है. हे साधु ! यह जो पंच भूतोंका शरीर तू देखता है,सो वासनारूप है.वासना है सोही चक्र है. जैसे मटके धागेके आश्रयतें खड़े होते हैं और जवधागा टूट पड़ा, तव मटका न्यारान्यारा होय पड़ता है अरु ठहरता नहीं है, तैसे वासनाके क्षय हुए पंचभूतोंका शरीर नहीं रहता. ताते सब अनर्थका कारण वासना है. अरु जोशुद्ध वासना है,तिसमें जगत्का अत्यंत अ- भाव निश्चय होता है.हे शिष्य! अज्ञानीकाजोनिश्चय है,सोवासना- कर बहुरि जन्मका कारण हो जाता है अरु ज्ञानीकी वासना है, सो बहुरि जन्मका कारण नहीं होती है जैसे एक कच्चा वीज होता है, दूसरा दग्धवीज होता है,तिसमें जो कच्चा है सो वहुरि उगता है अरू जो दग्ध हुआ है सो वहुरि नहीं उगता, तैसे अज्ञानीकी वासना है. सो रसरहित है, सो जन्मका कारण है अरु ज्ञानीकी वासना है सो रससहित है, सो जन्मका कारण नहीं. ज्ञानीकी चेष्टा स्वाभाविक गुण करके खडी होती है, और किसी गुणके साथ मिलकर अपने में चेष्टा दहीं देखता.खाता है,पीता है,लेता है, देता है, वोलता है, चलता है, विचार करता है,परंतु अंतर सदा अद्वैतनिश्चयको धरता है.कदा- चित् द्वैतभावना तिसको होती नहीं है. अपने स्वभावविषे स्थित है. ताते निर्गुण अरु अरूप है ताकी चेष्टा जन्मका कारण नहीं है जैसे कुम्हारका चक्र है,सोजवलग उसको फेर चढ़ावे, तवलग वह फिरता हे और जब फेर चढ़ावना छोड़ दिया, तब स्थीयमानगतिसे उतरता उतरता फिरके स्थिर रह जाता है, तैसे जवलग अहंकारसहित वासना होती है, तवलग जन्म पावता है; जव अहंकारते रहित हुआ तब वहुरि जन्म नहीं पावता है. हे साधु ! यह जो अज्ञानरूपी वासना ३.] वैराग्यप्रकरणे-तीर्थयात्रावर्णनम् । है, तिसको नाश करनेका उपाय एक ब्रह्मविद्या श्रेष्ठ है. ब्रह्मविद्या मोक्षउपायका शास्त्र है. जब इसते और शास्त्रमें गिरेगा तबकल्पपर्य- तहू अव्याकृत पदको न पावेगा, अरु जो ब्रह्मविद्या आश्रय करेगा सो सुखसों आत्मपदको प्राप्त होवेगा. हे भरद्वाज! यह मोक्ष- उपाय रामजी अरु वसिष्ठजीका संवाद है सो विचारने योग्य है; बोधका परम कारण है. ताते आदिसों अंतपर्यंत मोक्षउपाय श्रवण कर जैसे रामजी जीवन्मुक्त होय विचरे हैं सो सुन- एक दिन रामजी विद्या पढ़के, अध्ययनशालाते अपनेगृहमें आये अरु संपूर्ण दिन विचार करनेहीमें व्यतीत करदिया. बहुरि मनमें तीर्थ ठाकुरद्वारका संकल्प घर, पिता दशरथके पास आये. पितासों मिलके जो संपूर्ण प्रजाको सुखमें राखते थे अरु सब प्रजा तिसके निटक रहिके सुख पाई, तिन दशरथजीका चरण श्रीरघुनाथजीने ग्रहण किया.जैसे सुंदर कमलको हंस ग्रहण करे तैसे पिताका चरण ग्रहण किया. जैसे कमलके तरे कोमल तरियां होती हैं तिन तरियोसहित, कमलको हंस पकड़ता है,तैसे दशरथजीकी अंगुरीनको रामजीने ग्रहण किया अरु बोले कि हे पिता ! मेरा वित्त तीर्थ अरु ठाकुरद्वारके दर्शनको उठा है, तातेतुम आज्ञा करो, तो मैं तीर्थका अरु ठाकुरदारेका दर्शन कर आऊं. मैं तुह्मारा पुत्रहूं,तुमको पालना करनी योग्य है और आपसे आगे मैंने कभी कहानहीं; यही प्रार्थना अब करी है. ताते तुम आज्ञा देहु जो मैं जाऊं. यह वचन मेराफेरना नहीं. काहेते कि-ऐसा त्रि- लोकीमें कोउ नहीं है, जिसका मनोरथ इस घरते सिद्ध हुआनहीं है; सबका मनोरथ सिद्ध हुआ है. ताते मुझको कुपा कर आज्ञा देहु. वाल्मीकिरुवाच हे भरद्वाज ! इसप्रकार जब रामजीने कहा, तब वसिष्ठजी पास बैठे, तिननेभी दशरथसे कहा के-हे राजन् !

(२०)
[तृतीयः सर्गः
योगवासिष्ठे।
रामजीको आज्ञा देहु, सो तीर्थ कर आवें. क्योंकि इनका चित्त उठा
है ओर ये राजकुमार हैं, इससे इसके साथ सेना दीजे, धन दीजे, मंत्री
दीजे, ब्राह्मण दीजे, जिससे ये दर्शन कर आवें.
हे भरद्वाज ! जब ऐसे विचार किया, तब शुभ मुहूर्त देखकर,
रामजीको आज्ञा दीनी. जब चलने लगे, पिता अरु माताके
चरण लगे अरु सबको कंठ लगाइ, रुदन करने लगे तिनको मिल-
कर आगे चले. अरु लक्ष्मण आदि जो भाई हैं और मंत्री थे,
तिनको साथ लेकर अरु वसिष्ठ आदि जो ब्राह्मण विधिक जानने-
वाले थे, अरु बहुत धन, बहुत सेना यह सब साथ ले चले और दान-
पुण्य करके, जव गृहके बाहर निकसे, तव वहांके जो लोग थे अरु
स्त्रियां थीं तिन सबने रामजीके ऊपर फूल अरु फूलोंकी मालाबोंकी
वर्षा करी. सो वर्षा बर्फ बरसती है ऐसी दीखती थी, अरु राम-
जीकी जो मूर्ति है सो हृदयमें धर लीनी. इसप्रकार रामजी व-
हासे चले, तहां ब्राह्मण अरु निर्धनोंको दान देते देते तीर्थ जो
गंगा, यमुना, सरस्वती आदि देखे हैं, इनमें विधिसंयुक्त स्नान कर,
पृथ्वीके चारों कोन-उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिमको दान किया. अरु
चारों ओर समुद्र के स्नान किये, अरु सुमेरुपर्वतपर गये, हिमालय प-
र्वतपर गये अरु शालिग्राम, बद्रीकेदार-आदि गंगा स्नान किये
अरु दर्शन किये. ऐसे सब तीर्थ स्नान, दान, तप, ध्यान विधिसंयुक्त
यात्रा करत भये. जैसी जैसी जहां विधि थी तैसी तैसी तहां करी;
एकवर्षमें संपूर्ण यात्रा करके रामजी बहुरि अपने घरमें आये.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे तीर्थयात्रावर्णनं
नाम तृतीयः सर्गः ॥३॥

(२१) ४-५.] वैराग्यप्रकरणे-दिवसव्यवहारवर्णनम् । चतुर्थः सर्गः४॥ अथ दिवसव्यवहारवर्णनम्। वाल्मीकिरुवाच हे भरद्वाज!जबरामजी यात्रा करके अ- पनी अयोध्या आवत भये, तब नगरवासी लोग पुरुष और स्त्री फू- लनकी वर्षा करत भये.अरु जय जय जय शद मुखते उच्चारने लगे अरु प्रेमहास्य करने लगे और जैसे इंद्रका पुत्र अपने स्वर्गमें आवत है, तैसे रामचंद्रजी अपने घरमें आये. पहिले राजा दशरथको प्रणाम कर फिर वसिष्ठजीको प्रणाम कर, फिर सबसभाके लोगोंकोयथायोग्य मिले फिर अंतःपुरमें आवत भये.तहां कौशल्या आदिजोमाता थीं, इनको यथायोग्य नमस्कार किये और जो भाई, बांधव, कुटुंबी थे तिन सबको मिले. हे भरद्वाज! इसप्रकार रामजीके आवनेका उत्साह अष्टदिनपर्यंत होता रहा.वा समयमें कोई मिलने आवे, कोई कछु लेने आवे, तिनको दान, पुण्य करत बाजे बजत उत्साह हुआ. भाट-आदि स्तुति करने लगे. तदनंतर रामजीका आचरण हुआ सो सुन. प्रातःकालमें उठके स्वानसंध्यादिक सत्कर्म करते, बहुरि भोजन करते, बहुरि भाई-ब- धुको मिल, अपने तीर्थकी कथा करते.देवदारके दर्शनकी वार्ता कर- ते. इसप्रकारसों उत्साहकर, दिन-रातको बितावते थे. इति श्रीयोगवासिष्ठेवैराग्यप्रकरणे दिवसव्यवहारवर्णनं नाम चतुर्थः सर्गः ॥५॥ पञ्चमः सर्गः । अथ कार्यवर्णनम् । एक दिन प्रातःकालमें उठके, पिताजी दशरथको देखे सोजैसे इं- प (२२) योगवासिष्ठे। [ पञ्चमः सर्गः द्रका तेज है, तैसे तेजवान् देखा अरु वसिष्ठादिककी सभा बैठी थी तहां वसिष्ठजीके साथ कथा वार्ता रामजी करते होते, तहां एक दिन राजा दशरथ कहत भये कि-रामचन्द्र ! तुम शिकार खेलने जायबो करो. ता समयमें रामजीकी अवस्था वर्ष १६ में थोरेके म- हिना कमती थी. तब राजकुमार रामजीके साथ लक्ष्मण अरु श- त्रुघ्न भाई थे, भरत ननिहारेको गये थे. फिर तिनके साथ. स्नान संध्यादिक नित्य कर्म करके, भोजन करके शिकार खेलने जाते. त- हाँ जो जीवनको दुःख देनेहारे जानवर देखते तिनको मारते. अरु और लोगोंको प्रसन्न करते. इसप्रकार दिनको शिकार खेलते, रा. त्रिको निसान वजाते अपने घर में आवते. ऐसे करते केतेक दिन वीते, तामें रामजी अपने अंतःपुरमें आय सबका त्याग करके ए- कांतमें चिंतन करत वैठि रहते. हे भरद्वाज! जेतीकछु राजकुमारकी चेष्टायें सोसवको रामजीने त्या- ग कर दीनी थीं, जैते कछुरसयुक्त इंद्रियोंको विषय हैं, इनको त्यागके शरीरते दुर्बल जैसे होगये. मुखकी कांति घटगई. पीत वर्ण होगया. जैसे कमल सूखके पीतवर्ण होय जाता है तैसे रामजीका मुख पीला होगया.अरुजैसे सूखे कमलपर मैंवरे बैठते हैं, तैसे सूखे मुखकमलपर नेत्ररूपी भँवरे भासने लगे. सोहू शोभा होवन लगी. अरु इच्छा नि- वृत्त होय गई. जैसे शरत्कालमें ताल निर्मल होता है, तैसे इच्छारूपी मलनते रहित चित्तरूप तालहू निर्मल होगया.तैसे वासना निवृत्त होते दिन दिनपै शरीर निर्मल होगयाअरुजहां बैठेतहांचिंतासंयुक्त बैठेर- हि जावें, उठे नहीं अरु बैठे तव हाथपै चिवुक घरके बैठे. जब टहलुए मंत्री वहुत कहर्हि, कि हे प्रभो! यह स्नानसंध्याकासमय हुआहे सोअब, उठो तव उठकर, स्नानादिक करहिं, अरु हृदयमें न विचारहिं.जेती क- छुखाने, पीने, बोलने,चलने, पहिरनेकी क्रिया है, सो सब विरस होय

.
वैराग्यप्रकरणे-कार्यवर्णनम् । (२३)
गई. ऐसे रामचंद्रजी भये. तब लक्ष्मण अरु शत्रुघ्नहू रामजीको
संशयसंयुक्त देखके, तिसप्रकार हो बैठे. तब-
दशरथ यह वार्ता सुनके रामजीके पास आय बैठे अरु देखे तब
महाकृशहोगये हैं इस चिंताकरके आतुर हुए, कि-हाय २ इनकी क्या
अवस्था हुई है ! इस शोकके लिये रामजीको गोदमें बैठाये अरु पूँछ-
नेलगे. कोमल सुंदर शब्द करके बोले कि हे पुत्र! तुमको क्या दुःख
प्राप्त भया है जिसकरके तुम शोकवान हुयेहो? तब रामजीने कहाकि-
हे पिता ! हमको तो दुःख कोऊनहीं है ऐसे कहिकै चुप होरहे. जब
केतक दिवस इसप्रकार व्यतीत भये, तब दशरथ शोकवान् हुए अरु
सब स्त्रियांभी शोकवान भई. अरुराजा व मंत्री मिलके विचार करने-
लगे, कि-पुत्रका किसी ठौर विवाह करना अरु यहभी विचार किया
कि-यह क्या हुआ है?जो मेरे पुत्र शोकवान होय-रहते हैं. तब
वसिष्ठजीसे पूछा कि हे मुनीश्वर ! मेरे पुत्रशोकमें क्यों रहते हैं ? तब-
वसिष्ठजीने कहा कि हे राजन् ! महापुरुषको जो क्रोध होता है
सो किसी अल्प कारणकर नहीं होता अरु मोहभी अल्प कारण-
कर नहीं होता अरु शोकभी अल्पकारणकर नहीं होता. जैसे पृथ्वी,
जल, तेज, वायु व आकाश जो महाभूत हैं सो अल्पकार्यमें विका-
खान नहीं होते. जब जगतकी उत्पत्ति प्रलय होता है तब विकार-
वान् होते हैं, तैसे महापुरुष अल्पकार्यमें विकारवान नहीं होते. ताते
हे राजन् ! तुम शोक करने योग्य नहीं अरु रामजी जो
शोकवान हुए हैं सोभी किसी अर्थके निमित्त होयँगे, पीछे इनको
सुख मिलेगा, तुम शोक मत करो.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कायवर्णनं
नाम पञ्चमः सर्गः॥५॥

(२४) [ पठः सर्गः योगवासिष्ठे। षष्ठः सर्गः६। अथ विश्वामित्रागमनवर्णनम् । वाल्मीकिरुवाच हे भरद्वाज ! ऐसे वसिष्ठजी अरु राजाद- शरथ विचार करतेथे तिसकालमें विश्वामित्रजी अपने यज्ञके सहायके अर्थ आवत भये. राजा दशरथके गृहमें आयकर, पौरियासों कहत भये कि-राजा दशरथसे कहो कि-गाधिके पुत्र विश्वामित्र वाहर खडे हैं. तव इसमें और बड़े पौरियाकोजाय कहा कि-हे स्वामी ! एक बड़ेत. पस्वी बारपै आय खडे हैं उन्हें हमसे कहा है कि-राजा दशरथके पास जाय कहो, कि-विश्वामित्र आये हैं. सो सुनके संपूर्ण मंडलेश्वरकर पूज्य जोराजा दशरथ सवनसहित अपने सिंहासनपर बैठे हैं और जो बडे तेजकर संपन्न हैं, तिनसे कहा कि-विश्वामित्रने हमसे कहा है कि दशरथ पास जाय कहो, कि-गाधिके पुत्र विश्वामित्र बाहर खडे हैं. हे भरद्वाज ! जब इसप्रकार बड़े पौरियाने राजासों कहा तव राजा सुनकर सुवर्णके सिंहासनसे उठ खडे हुए अरु चरणोंकरके चले. एक ओर वसिष्ठजी और दूसरीओर वामदेवजी.अरुसुभटकी नाई मंडले- श्वर स्तुति करत चले.जवजहांते विश्वामित्रजी दृष्टि आयेतव तहां- ते प्रणाम करने लगे. जहां पृथ्वीपर शीश राजाका लागे तहां पृथ्वीभी हीरामोतीकी सुंदर होय जावे. इसप्रकार शीशनमावत नमावत राजा दशरथ विश्वामित्रके आगे चलेअरुवडीजटाशिरपरते काँधपर परी है, ऐसे विश्वामित्र अमिकी नाई प्रकाशित हैं अरु शरीर सुवर्णकी नाई प्रकाशता है, अरु हृदयमें शांति, कोमल स्वभाव जाननेमें आवे ऐसे अरु महातेजवान, सुंदरकांति अरु शांतिरूप अरु हाथमें बाँसकी ल- कड़ी अरु महाधैर्यवान, ऐसे विश्वामित्रको प्रणाम करत राजा दशरथ चरणोंके ऊपर जाय गिरे.जैसे सूय सदाशिवके चरणोंपर जाय गिरे थे, (२५) ६.] वैराग्यप्रकरणे-विश्वामित्रागमनवर्णनम् । तैसे मस्तक नमाय कर, कहा कि मेरे बडे भाग्य हुये जो तुह्मारा दर्शन हुआ है. हमारे ऊपर तुमने बड़ा अनुग्रह किया है. हमको बड़ा आनंद प्राप्त हुआ है जो अनादि, अनंत है,आदि, मध्य, अंतते रहित अविनाशी है, ऐसा जो अकृत्रिम आनंद है, सोतुमारे दर्शन कर मु- झको प्राप्त हुआ दृष्टिमें आवताहै. हे भगवन् ! आज मेरे बडे भाग्य हुए हैं, जो में धर्मात्माके गिननेमें आऊंगा.काहेते कि-जोतुम मेरे कुशल निमित्त आये हो. हे भगवन् ! तुझारा आना हमारे लक्ष्यमें नहीं था अरु तुमने बडाअनुग्रह किया है. जैसे सूर्य कोई कार्य करनेको पृथ्वी- पर आवें, तैसे तुम मुझको दृष्टिमें आवते हो, अरु सबते उत्कृष्ट दृष्टिमें आवते हो. काहेते कि-तुममें दो गुण हैं एक तो क्षत्रियका स्वभाव तुझारेमें है अरु दूसरा ब्राह्मणका स्वभावभी तुझारेमें भासता है. अरु शुभ गुणकर संपूर्ण होः हे मुनीश्वर!तुम क्षत्रियमेंते ब्राह्मण भयेहो. ऐसी कोईकी सामर्थ्य नहीं देखी. अरुतुह्मारा शरीर प्रकाशवान् दी- खता है अरु जिस मार्गसे तुम आये हो अरु जिस मार्गमें तुम दृष्टि करत आये हो, तहां तहां अमृतवृष्टि करत आये हो, ऐसा दृष्टि आता है. हे मुनीश्वर! तुम आये सो तुलारे दर्शन कर मुझको बडालाभ है. हे भरद्वाज ! इसप्रकार राजा दशरथ विश्वामित्रसे बोले अरु व- सिष्ठजी आयकर, विश्वामित्रको कंठ लगायके मिले. और जो मंडले- श्वर राजा थे सो बहुत प्रणाम कर, इसप्रकार सब मिले. तब विश्वा- 'मित्रको राजा दशरथ घरमें ले आये. जहां राजसिंहासन था, तहां आनकर बिठायाअरुवसिष्ठ, वामदेवको बिठाये. और राजा दशरथने विश्वामित्रका पूजन किया, अरुअर्घ्य पादार्चनं करके प्रदक्षिणाकरिके चहुरि वसिष्ठजीने विश्वामित्रका पूजन किया अरु विश्वामित्रने वसिष्ठ- जीका पूजन किया; ऐसे अन्योन्यपूजन हुआ इसप्रकार पूजन करके सब अपने २ आसनपर यथायोग्य बैठे...

[ सप्तमः सर्गः , २६) योगवासिष्ठे। तब राजा दशरथ बोले कि हे भगवन् ! हमारे बड़े भाग्य हैं जो तुह्मारा दर्शन हुआ. जैसे कोऊ तप्तको अमृतप्राप्ति होवे अरु जन्मां- घको नेत्र प्राप्त होवें, सो आनंद पावे, जैसे निर्धनको चिंतामणि प्राप्त होवे, अरुआनंदको पावे अरु जैसे किसीका बांधव मरा होय, सो वि- मानपर चढ़ा हुआ आकाशते आवे, उसको जैसा आनंद प्राप्त होवे, तैसे तुमारे दर्शन कर, मैं आनंदको प्राप्त हुआ हूं. हे मुनीश्वर ! तु- मारा आना जिसके अर्थ हुआ है, सो कृपा करके कहो. अरु जो तुलारा अर्थ है, सो पूर्ण हुआ जानो. काहेते कि-ऐसा पदार्थ कोई नहीं है, जो तुमको देना कठिन है. सव कछु मेरे विद्यमान है. जो तुह्मारा अर्थ है सो निश्चय कर, जानने योग्य होय रहा है. जो कछु तुम आज्ञा करोगे सौ में देऊंगा. इति श्रीयोग० वैरा० विश्वामित्रागमनवर्णनं नाम षष्ठः सर्गः ॥ ६॥ सप्तमः सर्गः ७। अथ विश्वामित्रेच्छावर्णनम् । वाल्मीकि उवाच हे भरद्वाज ! जव इसप्रकार राजा द- शरथने कहा, तब मुनिनमें शार्दूल जो विश्वामित्र, सो बहुत प्रसन्न भये, अरु रोम खडे हो आये. जैसे पूर्णमासीके चंद्रमाको देखके क्षीरसागर प्रसन्न होता है, तैसे प्रसन्न होकर, कहत भये कि-हे राजशार्दूल ! तुम धन्य हो ! ऐसा क्यों न होवे ? जो कि-तुझारेमें दो गुण श्रेष्ठ हैं. एक तोरघुवंशी हो, दूसरा वसिष्ठजी तुझारे गुरु हैं, तिनकी आज्ञामें चलते हो. ताते हे राजन् !जो कछु मेरा प्रयोजन है सो तुमारे आगे प्रगट करता हूं, श्रवण करो- दशरात्र यज्ञका मैंने आरंभ किया है, सो जब यज्ञको करने लगताहूं, तवराक्षस मारीच अरु सुबाहु उस यज्ञको ७] वैराग्यप्रकरणे-विश्वामित्रेच्छावर्णनम्। (२७) तोर डारते हैं, जहा जहां मैं जायकर यज्ञ करताहूं, तहां तहां आय- कर,अपवित्र जोरुधिर अरुमांस अरुअस्थि सो डारते हैं, सो स्थान यज्ञ करनेयोग्य नहीं रहता.और बहुरि में और ठौर करने लगता हूं, तहांभी उसी प्रकार अपवित्र कर जाते हैं. तिनके नाश करनेके नि- मित्त मैं तुम्हारेपास आया हूं. कदाचित् ऐसे कहो कि-तुमभी तो समर्थ हो; तो हे राजन् ! मैंने यज्ञका आरंभ किया है, तिसका अंग क्षमा है,जोउसको मैं शाप देऊं, तो वह भस्म होजावे, परंतु शाप को- धविना होत नहीं. अरु क्रोध कियेते यज्ञ निष्फल होजाता है, अरु जो मैं चुप हो रहूँ तो वह राक्षस अपवित्र वस्तु डार जाते हैं, ताते मैं तुम्हारी शरण आया हूं,मेरा कार्य करो.हे राजन् ! तुम्हारेजोरामजी पुत्र हैं, सो कमलनयन काकपक्षसंयुक्त हैं, इससे यह जो बालक दू- सरो साथ रहे है तिसको मेरे साथ देहू,जो राक्षसोंको मारे; तब मेरा यज्ञ सफल होय. और तुमको ऐसा शोक करना नहीं चाहिये कि- मेरा पुत्र बालक है. यह तो बड़े इंद्रके समान शूरवीर हैं, इनके समीप वह राक्षस ठहर न सकेंगे. जैसे सिंहके सन्मुख मृगके बच्चे ठहर नहीं सकते, तैसे तुम्हारे पुत्रोंके सन्मुख राक्षस न ठहर सकेंगे.ताते मेरे साथ उनको तुम देहु. जो तुम्हाराभी धर्मरहै अरु यशभी रहै. मेरा कार्यभी होवे. इसमें संदेह नहीं करना. हे राजन् ! ऐसा पदार्थ त्रिलोकीमें कोई नहीं जोरामजीका किया कछु न होवे इसीते मैं तुझारे पुत्रोंको लिये जाता हूं. यह मेरे करसों ढांप रहेंगे. अरु इनको कोई विघ्न मैं होने न देऊंगा अरुजो तेरे पुत्र वस्तु हैं सो मैं जानता हूं; और वसिष्ठजीहू जानते हैं और जो ज्ञान- वान त्रिकालदर्शी होवेगा, सोभी इनको जानता होयगा.और कोईकी सामर्थ्यता नहीं है जो इनको जानसकै. ताते तुम इनको मेरे साथ देहू जो मेरे कार्यकी सिदि होय.

[अष्टमः सर्गः (२८) योगवासिष्ठे। हे राजन् !जोसमयपर कार्य होता है, सो थोरे करनेसेभी बहुत सिद्धि पाता है.जैसे द्वितीयाके चंद्रमाको देखके, एकतंतु (धागे) का दान किया होय सोभी बहुत है, पीछे वस्त्रका दान किय तौभी तैसा कार्य सिद्ध नहीं होता, तैस समयपर थोडा कार्यभी बहुत सिद्धिको देता है अरु समयविना बहुत कार्यभी थोरे फलको देता है. ताते आप मेरे साथ रामजीको दीजे. सुबाहु मारीच ए बडे दैत्य हैं. सोआयकर मेरा यज्ञ खंडन करते हैं.जव रामजी जावेंगे, तव वह भाग जायँगे.रामजी के आगे खडेन होय सकेंगे. इनके तेजसे वह सब अल्पवल हो जायेंगे.जैसे सूर्यके तेज- करके तारागणका प्रकाश छिप जाता है, तैसे रामजीके दर्शनसे वह स्थित न रहेंगे.जैसे गरुडके आगे सर्प नहीं ठहर सक्ते, तैसे रामजीके आगे राक्षस न ठहर सकेंगे देखकर भागजायँगे. ताते तुम मेरे साथ देहु जो मेरा कार्य होवे अरुतुम्हारा धर्मभी रहे. रामजीके निमित्त सं- देह मत करना-वह राक्षसोंकी सामर्थ्य नहीं जो रामजीके निकट आवे अरु मैं भी रामजीकी रक्षा करूंगा. वाल्मीकि उवाच हे भरद्वाज!जब विश्वामित्रने ऐसा कहा तब राजा दशरथ सुनकर चुपरहेअरु गिरपडे,एकमुहूर्त पर्यंत पडे रहे. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे विश्वामित्रेच्छावर्णनं नाम सप्तमः सर्गः॥७॥ अष्टमः सर्गः ८। अथ दशरथोक्तिवर्णनम्। वाल्मीकि उवाच हे भरद्वाज ! एक मुहूर्त पीछे राजा उठे अरु महादीनसे होगये अरु महामोहको प्राप्त होय गये. धैर्यते रहित होकर, बोले कि- ८.] वैराग्यप्रकरणे-दशरथोक्तिवर्णनम् । (२९) राजोवाच-हे मुनीश्वर ! तुमने क्या कहा ? रामजी अभी तो कुमार हैं. शस्त्रविद्या, अस्त्रविद्याभी सीखेनहीं हैं, अभी तो फूलनकी शय्यापर शयन करनेवारे हैं, वह युद्धको क्याजानें ? अंतःपुरमें स्त्रिय- नके पास बैठनेवाले हैं,राजकुमार बालकनके साथ खेलनेवाले हैं और कदाचित् रणभूमि देखीहू नहीं है. भृकुटीको चढ़ायके, कदाचित् युद्ध भी नहीं किया. अरु कमलकी नाई जिनके हाथ हैं अरु कोमल जि- नका शरीर है, वह राक्षसके साथ युद्ध कैसे करेंगे? कहूं पत्थरका अरु कमलकाभी युद्ध हुआ है ? रामजीका वपुकमलसमान कोमल है अरु वह राक्षस महाक्रूर पत्थरकीनाई हैं उनके साथ इनका युद्ध कैसे होवेगा? हे मुनीश्वर ! मैं नव सहस्र वर्षका हुआ हूं; अब दशवांसहस्र लगाहै, वृद्धहुआहूं. यह वृद्धावस्थामें मेरे घर पुत्र हुवे हैं सो चारोंके मध्य रामजी कमलनयन, कछु षोड़श वर्षके हुए हैं. अरु मुझको बहुत प्रियतम हैं. अरु मेरे प्राण हैं. रामजीबिन मैं एक क्षणभी रहि नहीं सक्ता. जो तुम इनको ले जाओगे, तो मेरे प्राण निकल जायगे. मैं मृतक हो जाऊंगा. हे मुनीश्वर ! केवल मेराही ऐसा स्नेह सो नहीं है. उनका भाई जो लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न,अरु उनकी माता जो हैं, इन सबहीके प्राण रामजी हैं. जो तुम रामजीको ले जाओगे, तो हम सबही मर जायगे. वियोगकरके जो हमको मारने आये हो तो ले जाओ. हे मुनीश्वर ! मेरे चित्तमें रामही व्याप रहे हैं ! तिनको मैं तुमारे साथ कैसे देकं ? मैं उनको देखते देखते प्रसन्न होता हूं जैसे पूर्णमासीके चंद्रमाको देख- कर, क्षीरसमुद्र प्रसन्न होता है, अरु चंद्रको देखकर चकोर प्रसन्न होता है अरु स्वातीके मेघ बूंदको देखकर, पपीहा प्रसन्न होता है, तैसे रामजीको देखकर, मैं प्रसन्न होता हूं. तबरामजीके वियोगकरके मेरा जीवन कैसा होयगा? हे मुनीश्वर ! मेरेको रामजी जैसे प्रिय तैसे स्त्रीभी नहीं अरु धनभी ऐसा प्रिय नहीं,अरुराज्यभी ऐसा प्रिय नहीं [अष्टमः सर्गः (३०) योगवासिष्ठे। और पदार्थभी मुझको कोई रामके समान नहीं है. ऐसे रामजी प्यारे हैं. हे मुनीश्वर ! तुमारे वचन सुनके मैं बड़े शोकको प्राप्त हुआ हूं. मेरे बडे अभाग्य आये हैं, जो तुह्माराआना इस निमित्त हुआ है. तुझारे बचन सुनकर जैसे कमलके ऊपर पत्थरकी वर्षा होय ऐसी व्यथा मेरे- को होती है अरु पत्थरकी वर्षाते जैसे कमल नष्ट होजाते हैं तैसे तु- झारे वचनसे मेरी नष्टता होजायगी. जैसे बड़ा मेघ चढ़ आवे, तामें बड़ा पवन चलै तब मेघकी गंभीरताका अभाव होय जाय, तैसे तुझारे वचनते मेरी बडी प्रसन्नताका अभाव होयजाता है.जैसे वसंत ऋतुकी मंजरी, ज्येष्ठ आषाढमें सूख जाती है, तैसे तुमारे वचन सुन, मेरे हृद- यकी प्रसन्नता जर जाती है. हे मुनीश्वर ! रामजीको देनमें मैं समर्थ नहीं हूं.जोतुम कहो तो एक अक्षौहिणी सेना मेरी है, सो बड़े शुर- वीरोंकी है, जिसको शस्त्रविद्या, अस्त्रविद्या,मंत्रविद्या, सब आवती है, और सबै युद्धमें चतुर हैं. तिनके साथमैं तुझारे संग चलता हूं, वहा जायके मैं उनको मारूंगा. अरु हस्ती, घोडा, रथ प्यादे ऐसी चतुरं- गिनी सेनाको साथ ले जाओ. अरु जो तुझारे यज्ञके खंडनहारे हैं तिनका नाश करो. अरु एकके साथ मैं युद्ध न कर सकूँगा. जो कदा- चित् यज्ञखंडनहार कुबेरका भाई अरु विश्रवाका पुत्र रावण होवे तो उसके साथ युद्ध करनेको मैं समर्थ नहीं. हे मुनीश्वर!आगे मेरेमें बडा पराक्रमथा, वैसा त्रिलोकीमें कि- सीको नहीं था. जो मेरे निकट मारनेको आता, तो वाको मैं मार देता अब मेरी वृद्धावस्था हुई है अरु देह जर्जरीभावको प्राप्त हुआ है, इस कारण रावणके साथ युद्ध करनेको मैं समर्थ नहीं हूं. हे मुनीश्वर ! मेरे बडे अभाग्य हैं जो तुझारा आना इसनिमित्त हुआ है. अब मेरा वैसा पराक्रम नहीं. में रावणसों काँपता हूं, केवल N मैंही नहीं कापता; इंद्रादिक देवता सब रावणसे कापते हैं. अरु वैराग्यप्रकरणे-वसिष्ठसमाश्वासनवर्णनम् । (३१) राक्षस सब उसके वशमें वर्तते हैं. अब किसीको शक्ति नहीं है जो राव- णके साथ युद्ध करै, इस कालमें वह बड़ा शूरवी " हे मुनीश्वर! जब मेरी समर्थताभी नहीं रही, तो राजकुमार राम- जी कैसे समर्थ होवेंगे ? अरु जिन रामजीको लेने तुम आये हो सो रोगी हो रहे हैं, उनको चिंता ऐसी आय लगी है, जिससे वह महा- दुर्बल होगये हैं. अरु अंतःपुरमें एकांतमें बैठे रहते हैं. खाना, पीना इत्यादिक जो राजकुमारकी चेष्टा हैं, सो सब उनको विरस होगई हैं, अरु मैं नहीं जानता कि उनको क्या दुःख प्राप्त हुवा है. जैसे कम- ल सूखके पीतवर्ण होजाता है तैसे उनका मुख होगया है. उनको युद्ध करनेकी समर्थता नहीं. अरु उन्होंने अपने स्थानते बाहरकी पृथ्वीभी नहीं देखी है, सो युद्ध कैसे करेंगे? हे मुनीश्वर! वह युद्ध करनेको समर्थ नहीं है, अरु हमारे प्राण वही हैं. जो उनका वियोग होवेगा तो हमारा जीवना नहीं होवेगा. जैसे जल बिना मछली जीवती नहीं है, तैसे हम रामजी बिना कैसे जीवेंगे अरु जो राक्षसके युद्धनिमित्तक हो तो हम तुझारे साथ चलें अरु रामजी युद्ध करनेको योग्य नहीं. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे दशरथोक्तिवर्णनं नामाष्टमः सर्गः॥८॥ नवमः सर्गः ९। अथ वसिष्ठसमाश्वासनवर्णनम् । वाल्मीकिरुवाच हे भरद्वाज ! जब इसप्रकार राजा दश- रथने कहा, तब महादीन जैसे मोहसहित अधीर्यवान् वचन सुनकर कोषसों विश्वामित्र कहत भये.

[ नवमः सर्गः - (३२) योगवासिष्ठे। विश्वामित्र उवाच-हे राजन् ! तुम अपने धर्मको सुमिरण करो. यह प्रतिज्ञा तुमने करी है कि “जो तुझारा अर्थ होवेगा सो पूर्ण करूंगा; और पूर्णहुआ जानना ऐसा तुमने कहा है अब तुम अपने धर्मको त्यागते हो और जो तुम सिंह होमृगोंकी नाई भागते हो तो भागो; परंतु आगे रघुवंशमें ऐसा कोई नहीं हुआ. जैसा चंद्रमाके मंड- लमें शीतलता होती है, अमि निकसता नहीं है, तैसे तुमारे कुलविषे ऐसा कदाचित नहीं हुआ, अरु जो तुम करते हो तो करो, हम उठ जायेंगे. काहेते कि-शूने गृहते शूनेई जाताहै परंतु यह तुमको योग्य नथा, अरु तुम वसते रहो, राज्य करते रहो, जो कछु होवेगा सो हम समझ लेयगें, अरु जो अपने धर्मको तुम त्यागते हो तो त्याग दो. वाल्मीकिरुखाच-हे भरद्वाज! इसप्रकार जब अत्यंत क्रोधवा- र होकर, विश्वामित्र वोले, तब इनके क्रोध करने से सकल पृथ्वी काँ- पने लगी अरु इंद्रादिक देवताभी भयको प्राप्त हुने; कि-ये क्या हुआ ? तव वसिष्ठजी वोले. वासिष्ठ उवाच- हे राजा! इक्ष्वाकुके कुलमें सव परमार्थी हुए हैं और तुम अपने धर्मको क्यों त्यागते हो? हमारे सन्मुख तुमने कहा है, कि-"जो तुह्मारा अर्थ होवेगा, सो मैं पूर्ण करूंगा." अब तुम क्यों भागते हो ! रामजी साथ दो, अरु यह तुमारे पुत्रको रक्षा करेंगे. जैसे सर्पते अमृतकी रक्षा गरुड करते हैं, तैसे तुझारे पुत्रकी रक्षा यह करेंगे, अरु यह कैसे पुरुष हैं, सो श्रवण करो. इनके समान वल किमीका नहीं, ये साक्षात् वलके मूर्ति अरु धर्मात्मा है, साक्षात् धर्मकी मूर्ति हैं.अरु ऐसा तपस्वी कोऊ नहीं है अरु तपका खानि है. अरु इनके समान कोऊबुद्धियार नहीं है अरु इनके सम.न कोई शूरभी नहीं है. अरु अच-विद्यामेभी इनके तुल्य कोऊ नहीं है. काहेते कि-जो दक्षप्रजापतिकी दो पुत्री थीं, एक जया अरु दूसरी सुप्रभा, ९] वैराग्यप्रकरणे-वसिष्ठसमाश्वासनवर्णनम् । (३३) सो ये ऋषिको दीनी हैं अरु जया थी तिसमें दैत्योंके मारने निमित्त पांचसौ पुत्रोंको प्रगट किये थे, अरु सुप्रभाके भी पचिसौ पुत्र भये थे सो सब दैत्योंके नाशनिमित्त उत्पन्न किये थे सो स्त्रियां इनके विद्यमान मूर्ति धरके स्थित हुई हैं. ताते इनको जीतनेको कोऊ समर्थ नहीं है. जिसके साथी विश्वामित्र हो सो त्रिलोकीमें काहूसों नहीं डरे. ताते इनके साथ तुम अपने पुत्र दो, अरु संशय मत करो, कि- सीकी सामर्थ्य नहीं जो इनके होते तुम्हारे पुत्रको कछु कोऊ कहि सके. इनकी दृष्टिसे देखनेते दुःखका अभाव हो जाता है, जैसे सूर्यके उदयते अंधकारका अभाव हो जाता है तैसे. हे राजन् ! इनके साथ तुम्हारे पुत्रको खेद कहां होवे ? तुम इक्ष्वा- कुके कुलके होअरु दशरथ तुम्हारा नाम है. सो तुम्हारे जैसे धर्मात्मा जब अपने धर्ममें स्थित न रहें तो और जीवते धर्मकी पालना कैसे होयगी? जो कछु श्रेष्ठ पुरुष चेष्टा करते हैं, तिनके अनुसार और जीव करते हैं. जो तुमसरिखे अपने वचनकी पालना न करेंगे तब और सों कहा बनेगी ? अरु तुम्हारे कुलमें ऐसा कबहुँ नहीं हुवा; ताते अपने धर्मको त्यागना योग्य नहीं. तुम अपने पुत्रको दो. अरु जो तुम उनको भयकरके शोकमान होवो तौभी ना मति कहो. और मूर्तिधारी काल आयकर स्थित होवे तौभी विश्वामित्रके विद्यमान र- : हते तुझारे पुत्रको कछुहोवे नहीं, इनके विद्यमान रहते मराभी नर जी उठता है. तुम शोक मत करो; अपने पुत्रको इनके साथ दो. अरु जोन दोगे तो दोऊ प्रकारका तुम्हारा धर्म नष्ट होवेगा; एक धर्म यह है कि- जो कूप, बावली, ताल कराये होयँगे तिनका जो पुण्य है, सो नष्ट होजावेगा; अरु तप, व्रत, यज्ञ, दान स्नानादिकका जो पुण्य है अरु क्रियाहँ तिनं सबका फल नष्ट होजावेगा और तुह्मारा गृह निरर्थ होय जावेगा. ताते मोह अरु शोकको त्यागो अरुअपने धर्मका स्मरण करो.

. (३४) योगवासिष्ठे। [ दशमः सर्गः रामजीकोइनके साथ दे दो तुम्हारे सव कार्य सफल होवेंगे. हे राजन् ! जोइसप्रकार तुमको करना था, तो प्रथमही विचारकर कहना था. काहेते कि-विचारविना काम करनेका परिणाम दुःख होता है. ताते इनके साथ अपने पुत्रको देदो. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे वसिष्ठसमाश्वासन- वर्णनं नाम नवमः सर्गः ॥९॥ दशमः सर्गः १०॥ SS अथ रामविपादवर्णनम् । वाल्मीकिरवाच हे भरद्वाज ! जब इसप्रकार वसिष्ठजीने कहा, तव राजा दशरथ धैर्यवान होकर मृत्योंमें जो श्रेष्ठ भृत्य था, वाको बुलायकर, कहत भये कि- हे महावाहु ! लक्ष्मणसह रामजीको. ले आओ. तब इनके साथ जो चाकर अंदर वहार आवने जानेवारा था अरु छलते रहित था, सो रामकी आज्ञा लेकर, रामजीके निकट गया और एक मुहूर्त पीछे पीछा आया. अरु कहत भया कि-हे देव ! रामजी तो बड़ी चिंतामें बैठे हैं. मैंने रामजीसे वारंवार कहा कि अव चलिये, तब वे कहते हैं कि-चले हैं. ऐसे कहि कहि चुप हो रहते हैं. हे भरद्वाज ! इसप्रकार जब राजाने श्रवण किया तव कहा कि- रामजीके मंत्री अरु टहलुए सव वुलावो. सेवक सवको बुलाय निकट लाये. तव राजा आदरसों कोमल सुंदर बचन युक्तिसे कहत भयो कि हे रामजीके प्यारो ! रामजीकी कहा दशा है ? और ऐसी दशा क्योंकर हुई है ? सो सव कमकरके कहो. भृत्य उवाच हे देव हम कहा कहें ?' जेते हम कछु दृष्टि आवते हैं सो सब आकार अरु प्राण देखनेमात्र हम हैं, अरु मृतक हैं, काहेते कि हमारे स्वामी रामजी वडी चिंताको प्राप्त हुए हैं.

१०] वैराग्यप्रकरणे-रामविषादवर्णनम् । (३५) हे राजन् ! जिस दिनसे रघुनाथजी तीर्थ कर आये हैं तिसी दिनसे चिंताको प्राप्त भये हैं. जब उत्तम भोजन हम ले जाते हैं और पान- करनेका पदार्थ और पहरनेका पदार्थ अरु देखनेका पदार्थ और कछु लेजाते हैं, सो सुखदाई पदार्थ रससहित तिसे देखके, किसीप्रकार प्रसन्न होते हमने नहीं देखा. ऐसे चिंताके विषे वे लीन हैं कि-देखते- भी नहीं अरु जो देखते हैं तो क्रोध करते हैं अरु सुखदाई पदार्थका निरादर करते हैं. अरु अंतःपुरमें इनकी माता,नानाप्रकारके हीरेअरु मणिके भूषण देती हैं, तो उनकोभी डार देते हैं, नहीं तो किसी निर्धनको दे देते हैं. प्रसन्न किसी पदार्थ होते नहीं हैं, सुंदर स्त्रियां खडी विद्यमान होती हैं, नानाप्रकारके भूषणनसहित महामोह करने- हारी निकट होइकर, प्रसन्न करनेके निमित्त कटाक्षहुसहित लीलाक- रती हैं, तौभी विषवत् जानते हैं, उनकी ओर देखतभी नहीं. जैसे पपीहा और जलको देखताभी नहीं. जब अंतःपुरविषे होके निकसते हैं, तब उनको देखकर, क्रोधवान होते हैं, हे राजन् ! और कछु उनको मला नहीं लगता.किसी बड़ी चिंता विषे मम हैं, और तृप्त होकर, भोजनभी नहीं करते,क्षुधावंत रहते हैं. और न कछु पहरने खाने पीनेकी इच्छा रखते हैं; न राज्यकी इच्छा न किसी इंद्रियहूके सुखकी इच्छा है.महा उन्मत्तकी नाई बैठे रहते हैं. अरु जब कोई सुखदाई पदार्थ फूलादिक ले जाते हैं, तब क्रोध क- रते हैं, हम नहीं जानते कि-क्या चिंता उनको भई है. एक कोठरीमें पद्मासन करि अरु हाथमें मुखघर बैठे रहते हैं अरु जो कोऊ बड़ा मंत्री आयके पूंछता है, तब उससे कहते हैं-कि तुम जिसको संपदा मानते हो सोई आपदा है, जिसको आपदा जानते हो सोआपदा नहीं है अरु नानाप्रकारके संसारके पदार्थ जो रमणीयकरके जानते हो, सो । सब झूठे हैं. याहीमें सब डूबे हैं.ये सब मृगतृष्णाके जलवत हैं तिनको । सत्य जान, मूर्ख जो हरिण सो दौरते हैं अरु दुःख पाते हैं. " [दशमः सर्गः (३६) योगवासिष्ठे। हे राजन् ! कदाचित् बोलते हैं तो ऐसे बोलते हैं और कछुउनके उरमें सुखदायी नहीं भासता है.अरु जोहम हँसीकी वार्ता करते हैं तो वे हँसते नहीं हैं. जिस पदार्थको प्रीतिसे युक्त लेते थे तिस पदार्थको. अब डारि देते हैं अरु दिनदिनपै दुर्बल हुये जाते हैं अरुजव अंतः- पुरमें स्त्रियों के पास बैठते हैं, अरु वे नानाप्रकारकी चेष्टा रामजीको प्रसन्न करनेके निमित्त देखावती हैं,उनकोभी देखके प्रसन्न नहीं होते. अरु जैसे मेघकी बूंदोंसे पर्वत चलायमान नहीं होते हैं, तैसे आप चलायमान नहीं होते हैं. अरु जो बोलते हैं तो ऐसे कहते हैं कि-न राज्य सत्य है, न भोग सत्य है, न जगत् सत्य है, न मित्र सत्य हैं। मिथ्या पदार्थके निमित्त मूर्ख बड़े २ यत्ल करते हैं. जिनको सत्य जानते हैं अरुसुखदायकजानते हैं सो बंधनका कारण हैं और कहा कहिये ? जो कोई उनके पास राजा अथवा पंडित जातेतिनको देखकर कहते हैं कि यह पशु हैं, आशारूपी फांसीसे बांधे हुये हैं, हे राजन् ! जो कछु भोग्य पदार्थ हैं तिनको देखकर, उनका चित्त प्रसन्न नहीं होता, अरु देखके क्रोधवान होते हैं. जैसे पपीहा मारवाड़में आवे अरु मेघकी बूंदहू देखता नहीं है अरु खेदवान होता है, तैसे रामजी विषयते खेदवान होते हैं. हे राजन् ! इनकरके हर्षवान नहीं होते, ताते इम जानते हैं कि-इनको परमपद पानेकी इच्छा है. परन्तु कदाचित मुखते सुना नहीं है. अरु त्यागका अभि- मानभी कदाचित् सुना नहीं. कबहूं गाते हैं अरुबोलते हैं तब ऐसे कहते हैं कि-हाय ! हाय !! मैं अनाथ मारागया हूं, अरे मूर्ख ! तुम संसारसमुद्रमें क्यों डूबते हो? यह संसार परम अनर्थका कारण है. इसमें सुख कदाचित्भी नहीं है। इससे छूटनेका उपाय करो. हे राजन् ! ऐसाभी कभी हम सुनते हैं, अरु किसीके साथ बोलते नहीं हैं-नमंत्रीके साथ, न अपने अंतःपुरनकी स्त्रियोंके साथ, १०] वैराग्यप्रकरणे-रामविषादवर्णनम् । (३७) न माताके साथ बोलते हैं, किसी परमचिंतामें मम हैं. अरु किसी पदार्थकर आश्चर्यवार नहीं होते. जो कोऊ कहे कि-आकाशमें बाग लगा,तिसमें फूल फूले हैं, तिनको मैं ले आया हूं, तिसको सुन- करभी आश्चर्यवान् नहीं होते. सब भ्रममात्र देखते हैं. न किसी पदार्थसे उनको हर्ष होता है, न किसी पदार्थसे उनको शोक होता है. किसी बड़ी चिंतामें मम हैं, सो किसीको चिंता निवारनेमें हम समर्थ नहीं देखते हैं. वे तो पिताके समुद्रमें मग्न हैं. हे राजन् ! यह चिंता हमको लगरही है कि-रामजीको न खानेकी इच्छा है, न पहिरनेकी इच्छा है, न डोलनेकी, न देखनेकी इच्छा रही है, और न किसी कर्मकी इच्छा रही है. ताते मृतक न हो जावें ऐसी हमें चिंता है. अरु जो कोऊ कहता है कि-तुम चक्रवर्ती राजा हो, तुह्मारो बड़ा आयुर्बल होइअरु बड़े सुखको पाओ. तब तिसका वचन सुन उसको कठोर बोलते हैं. हे राजन् ! केवल रामजीहीको ऐसी चिंता नहीं; किंतु लक्ष्मण अरु शत्रुघ्नकोभी ऐसी चिंता लगरही है! रामको देखकर, कोऊ उनकी चिंता दूर करनेहारा होवे तोकरे, नहीं तो वे बड़ी चिंतामध्य इब रहेंगे. किसी पदार्थकी इच्छा उनको नहीं रहती है. हे राजन् ! अब कहा कहते हो ? तुझारे पुत्र रामचन्द्र अब अतीत हे रहे हैं. एक वस्त्र उपरना ओढ़कर बैठे हैं. ताते सोई उपाय करो. जिससे उनकी चिंता निवृत्त होवे. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे रामविषादवर्णनं नाम दशमः सर्गः ॥१०॥ .

(३८) योगवासिष्ठे। [ एकादशः सर्गः एकादशः सर्गः ११॥ अथ रामसमाश्वासनवर्णनम् । विश्वामित्र उवाच हे साधु ! जो रामजी ऐसे हैं, तो हमारे पास विद्यमान लाओ, हम उनका दुःख निवृत्त करेंगे.हे राजा दशरथ ! तुम बडे धन्य हो, कि-जिनका पुत्र विवेक अरुवैराग्यको प्राप्त भया. हे राजन् ! हम तुलारे पुत्रको परमपदकी प्राप्ति करावेंगे. अभी सब दुःख उनके मिट जायेंगे. हम वसिष्ठादि जो वैठे सो एक युक्तिकर उपदेश करेंगे; तिसकरके उनको आत्मपदकी प्राप्ति होवेगी; तब वह दशा तुझारे पुत्रकी होवेगी; जो लोष्ठ, पत्थर अरु सुवर्णको समान जानेंगे, अरु जो कछु तुझारे क्षत्रियकी प्रवृत्तिका आचरण है सो करेंगे, अरु जो हृदयमें प्रेमते उदासी होवेंगे.ताते हे राजन् ! उस करके तुह्माराकुल कृतकृत्य होवेगा. ताते रामजीको शीघ्र बोलावहु- वाल्मीकिरुवाच हे भरद्वाज! ऐसे मुनींद्रके वचन सुनकर, राजा दशरथ,मंत्री अरुनौकरोंसे कहत भये कि-रामजी, लक्ष्मण अरु शत्रुघ्नको लेआवो जब राजा दशरथने ऐसा कहातब मंत्री अरु मृत्यने रामजीके पास जायके कहा, तब रामजी आये. सो आवत आवत राजा दशरथ अरुवसिष्ठजी अरु विश्वामित्रको देखे, कि-तिनके ऊपर चमर होयरहे हैं;अरुबडे मंडलेश्वरबैठे हैं. तिनदेहू रामजीको देखे, जो शरीरते कृश होय हैं जैसे महादेवजी स्वामिकार्तिकको आवत देखे तैसे रामजीको आवत राजादशरथ देखते हैं. तहां रामजीने आयकर राजा दशरथजीके चरणोंपै मस्तकलगाय नमस्कार किया फिरतैसेई वसिष्ठजीको अरु विश्वामित्रको नमस्कार किया. बहुरि सभामें जो ब्राह्मण वडे बडे बैठे थे, तिनकोहू नमस्कार किये अरु जो बड़े बड़े मंडलेश्वर बैठे थे तिनने उठकर, रामजीको प्रणाम किया; फिर

वैराग्यप्रकरणे-रामसमाश्वासनवर्णनम् । (३९)
राजा दशरथने रामजीको गोदमें बैठाया अरु देखकर मस्तक चूमा,
अरु बहुत प्रेमपुलकित होय रामसों कहत भये कि-हे पुत्र केवल
विरक्तता कर परमपदकी प्राप्ति नहीं होती है किंतु वसिष्ठजी गुरु हैं,
तिनके उपदेशकी युक्तिकर परमपदकी प्राप्ति होयगी.
श्रीवसिष्ट उवाच-हे रामजी ! तुम धन्य हो अरु बडे शूर
हो, जो विषयरूपी शत्रु तुमने जीते हैं. जो विषय अजीत हैं अरू
दुष्ट हैं ताको तुमने जीता. ताते तुम धन्य हो ! धन्य हो !!
विश्वामित्र उवाच
कमलनयन राम ! तुम अपने
अंतरकी जो चपलता है, तिसको त्याग करके, जो कछु तुम्हारा
आशय होय सो प्रकट कर कहो. हे रामजी! यह जो तुमको मोह
प्राप्त हुआ है, सो कैसे अरु किस कारण हुआहै ? अरु केताक है?
सो कहो. अरु जो अब कछु तुमको वांछित होय सो कहो, हम
तुमको तिसीपदमें प्राप्त करेंगे, जिसमें दुःख कदाचित् होवे नहीं और
आकाशको चूहा काटि नहीं सकता है, तैसे तुमको पीडा कदाचित्
न होवेगी. हे रामजी ! तुम्हारे संपूर्ण दुःख नाश कर देयेंगे, तुम
संशय मत करो. जो कछु तुम्हारा वृत्तांत होय सो हमसे कहो.
वाल्मीकिरुवाच हे भरद्वाज ! जब ऐसे विश्वामित्रने
कहा सो सुनकर रामजी बहुत प्रसन्न भये अरुशोकको त्याग दिया.
जैसे मेघको देखके मोर प्रसन्न होते हैं, तैसे विश्वामित्रके वचन सुन
रामजी.प्रसन्न हुये अरु उन्होंने अपने हृदयमें निश्चय किया कि
अब मुझको उस पदकी प्राप्ति होवेगी.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे रामसमाश्वासनवर्णन
नाम एकादशः सर्गः॥१॥

[द्वादशः सर्गः (४०) योगवासिष्ठे। द्वादशः सर्गः १२। अथ रामवैराग्यवर्णनम् । वाल्मीकिरुवाच---हे भरद्वाज ! ऐसे मुनीश्वरके वचनको सुनके रामजी बहुत प्रसन्न होयके वोले. श्रीराम उवाच हे भगवन् ! जो वृत्तांत है सो तुम्हारे विद्यमान कम करके कहता हूं. इन राजा दशरथके घर में जो मैं उत्पन्न भया हूं, बहुरि क्रमकरके वड़ा हुआ हूं, उपवीत पाया हूं अरु चारों वेद पढ़कर, ब्रह्मचर्यादि व्रत पाया हूं; तापीछे एक दिन पढ़के मैं घरमें आया, तब मेरे हृदयमें बात आयरही कि-तीर्थाटन करूं अरु देवदारमें जायके देवनके दर्शन करूं तव मैं पिताकी आज्ञा लेकर ती- र्थको गया. अरु गंगाआदि संपूर्ण तीर्थों में स्नान किया; अरुशाल- ग्राम अरु केदारआदि ठाकुरके विधिसंयुक्त दर्शन किये अरु यात्रा करके इहां आया फिर उत्साह हुआ. तव मेरे मनमें विचार आया, कि-प्रातःकाल उठके स्नानसंध्या दिक कर्म करना, बहुरि भोजन करना. ऐसे इसप्रकारसों केतेक दिन व्यतीत भये, तब मेरे हृदयमें विचार उत्पन्न हुआ सो विचार हृदय- को खेंच लेगया. जैसे नदीके तटपर तृण लता होते हैं, तिसको नदीका प्रवाह खेंच लेजाता है, तैसे मेरे हृदयमें जो कुछ जगत्की आस्थारूप तृणलता थी, सो विचाररूपी प्रवाह ले गया. तव मैं जा- नता भया कि राज्य करके क्या है ? अरु भोगते क्या है ? अरु जगत् क्या है ? सव भ्रममात्र है. इसकी वासना मूर्ख रखते हैं. यह स्थावर-जंगमरूपी जितना कछु जगत है सो सव मिथ्या है. हे मुनीश्वर ! जेते कछु पदार्थ हैं,सो मनसों हैं सो मनभी भ्रममात्र है. अनहोता मन दुःखदायी हुआ है. मन जो पदार्थ सत्य जानकर १२] वैराग्यप्रकरणे-रामवैराग्यवर्णनम् । (४१) दौड़ता है अरु सुखदायक जानता है, सोमृगतृष्णाकेजलवत है. जैसे मृगतृष्णाको देखकर, मृग दौरता है अरु है नहीं; सो मृग दौरते दौ- रते थकके पड़जाता है; तौहू जल तिसको प्राप्त नहीं होता तैसे मूर्ख जीव पदार्थको सुखदायी जानकर, भोगनेका यत्न करता है,अरुशा- तिको नहीं पाता है; तैसे- हे मुनीश्वर ! इंद्रियनके भोग सर्पवत हैं जिनका मारा हुआ जन्ममरणको पाता है. जन्मते जन्मांतरको पाता है. भोग अरु जगत् सब भ्रममात्र है. तिनविषेजो आस्था करते हैं सो महामूर्ख हैं, ऐसा में विचार करके जानता हूं जो सब आगमापाई हैं. इसलिये यह जो आवतहू हैं अरु जातेहू है. ताते जिस पदार्थका नाश न होय, सोप- दार्थ पावनेयोग्य है, इसीकारणते मैंने भोगका त्याग किया है. हे मुनीश्वर ! जेते कछु संपदारूप पदार्थ भासते हैं, सो सब आपदा इनमें रंचकहू सुख नहीं है. जब इनका वियोग होता है, तब कंट- ककी नाई मनमें चुभता है. जब इंद्रियको भोग प्राप्त होता है, तब रा- गदोषकर जलता है, अरु जब नहीं प्राप्त होता तब तृष्णाकर जलता है ताते भोग दुःखरूप है; जैसे पत्थरको शिलामें छिद्र नहीं होता, तैसे भोगरूपी दुःखकी शिलामें रंचकभी सुखरूपी छिद्र नहीं होता है. हे मुनीश्वर ! विषयकी तृष्णामें बहुत कालको जलता रहा हूं. जैसे हरे वृक्षके छिद्रमें रंचक अमिधरा होय, तब धुवाँ होय थोराथोरा ज- लता रहता है, तैसे भोगरूपी अग्निकरके मन जलता रहता है. यहां विषयमें सुख कच्छह नहीं अरु दुःख बहुत है. इनकी इच्छा करनी सोई मूर्खता है जैसे खाईके ऊपर तृण अरु पात होता है, तिसकर खाई आच्छादित होय जाती है, तिसको देखके, हरिण कूद पडता है अरु दुःख पाता है, तैसे मूर्ख, भोगको सुखरूप जानके भोगनेकी इच्छा करता है, जब भोगता है तब जन्मते जन्मांतररूप खाईमें जाय पड़ते हैं, अरु दुःख पाते हैं. .

(४२) योगवासिष्ठे। [त्रयोदशः सर्गः हे मुनीश्वर ! भोगरूपी चोर है; सो अज्ञानरूपी रात्रिमें लूटने लगता है अरु आत्मरूपी धन है, तिसको ले जाता है, तिसके वियो. गते महादीन रहता है. अरु जिस भोगके निमित्त यह यल करता है सो दुःखरूप है, शांतिको प्राप्त नहीं होता. अरु जिस शरीरके अभि- मान करके यह यत्न करता है, सो शरीर क्षणभंग होता है अरु असार है. जिसको सदा भोगकी इच्छा रहती है, सो मूर्ख अरु जड़ है, इसका बोलना चालनाभी ऐसा है. जैसे सूखे वाँसके छिद्रमें पवन जाता है अरु पवनके वेगकर शब्द होता है,तैसे वह मनुष्यकी वासना है. जैसे थका हुआ मनुष्य मारवाड़के मार्गकी इच्छा नहीं करता, तैसे दुःख जानकर, मैं भोगकी इच्छा नहीं करता हूं. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे रामवैराग्यवर्णनं नाम द्वादशः सर्गः ॥ १२ ॥ त्रयोदशः सर्गः १३ ॥ अथ लक्ष्मीतिरस्कारवर्णनम् । राम उवाच-अरु यह जो लक्ष्मी है सो परम अनर्थकारी है. जवलग इसकी प्राप्ति नहीं होती तवलग तिसके पानका यल होता है. अरु अनर्थ करके प्राप्ति होती है. अरु जबप्राप्ति हुई तबसव गुणका नाश कर देती है. शीलता, संतोष, धर्म, उदारता, कोमलता. वैराग्य, विचार, दयादिक गुणोंका नाश करती है. जब ऐसे गुणोंका नाश हुवा, तव सुख कहांते होय? परम आपदा प्राप्त होती है. परमदुः- कारण जानकर, मैंने इसका त्याग किया है. हे मुनीश्वर ! इसमें गुण तबलग है, जबलग लक्ष्मीकी नहीं प्राप्ति भई.जब लक्ष्मीकी प्राप्ति भई तव सव गुण नाश होजाते हैं. जैसे वसंतऋतुकी मंजरी हरि- १३] वैराग्यप्रकरणे-लक्ष्मीतिरस्कारवर्णनम् । (४३) यल तबलग रहती है जबलग ज्येष्ठ, आषाढ़ नहीं आया, जब ज्येष्ठ आषाढ़ आया तब मंजरी जरजाती है. तैसे लक्ष्मीकी प्राप्ति भई तब सब शुभ जरजाते हैं, अरु मधुर वचन तबलग बोलता है; जबलग लक्ष्मीकी प्राप्ति नहीं होती है. जब लक्ष्मीकी प्राप्ति भई,. तब कोमलताका अभाव हो कठोर होजाता है. जैसे जल पतला तबलग रहता है जबलग शीतलताका संयोग नहीं होय. जब शीतलताका संयोग होता है तब बर्फ होकर; कठोर दुःखदायकहो. जाता है, तैसे यह जीव लक्ष्मी पाकर जड़ हो जाता है. हे मुनीश्वर ! जो कछु संपदा है सो आपदाका मूल है; काहेते कि जब लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है तब बड़े सुखको भोगता है; अरु, जब तिसका अभाव होता है तब तृष्णाकरके जलता है, जन्मते जन्मांतरको पाता है. लक्ष्मीकी इच्छा है, सोइ मूर्खता है. यह तो क्षण- भंग है. याते भोग उपजता है अरु नाशभी होता है जैसे जलसे तरंग उपजते हैं, अरु मिट जाते हैं, अरु बिजुली स्थिर नहीं होती है तैते भोगह स्थिर नहीं रहते हैं. अब पुरुषों शुभ गुण तबलग हैं, जबलग तृष्णाका स्पर्श नहीं किया,जब तृष्णा भई तब शुभगुणका अभाव होय जाता है जैसे दुधमें मधुरता तबलग है, जबलग उसका सर्पने स्पर्श नहीं किया,जब सपने स्पर्श किया, तबदूध है सो विषरूप होजाता है हे मुनीश्वर! लक्ष्मी देखने मात्रहीमें सुंदर है, अरु जब इस्की प्राप्तिः हुई तब सद्गुणका नाश कर देती है. जैसे विषकी लता देखने मात्रको सुंदर है अरुस्पर्श कियेते मारडालती है, तैसे लक्ष्मीकी प्राप्ति हुए.. आत्मपदते मृतक होता है. अरु महादीन होय जाता है, जैसे तबलग किसीके घरमें चिंतामाण दबी रही, ताको खोदकर लेवे नहीं, तबलग दरिद्री रहता है तैसे अज्ञानकर ज्ञानबिना महादीनजैसा होय रहताहै,. आत्मानंदको पायनहीं सकता-आत्मानंदके पानेका जोमार्ग है,तिसके [त्रयोदशः सर्गः (४४) योगवासिष्ठे। नाश करनहारी लक्ष्मी है.इसकी प्राप्तिते जीव महाअंध हो जाता है. हे मुनीश्वर ! जब दीपक प्रज्वलित होता है, तब उसका बड़ा प्रकाश दृष्टि आता है, जब दीपक बुझ जाता है, तव प्रकाशका अभाव हो जाता है.अरु काजरकी समक्षतारह जाती है जो वारंवार वासना उपजती थी सो रहती है. तैसे जव इस लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है तब बड़े भोग उसको भुगवाती है, अरु तृष्णारूप काजर उसते उपजता रहता है,जव लक्ष्मीका अभाव होता है तब वासना तृष्णाकी समक्षता छांड जाती है. तिस वासना करके अनेक जन्मको घाताहै.शांतिको कदाचित् नहीं प्राप्त होता. हे मुनीश्वर! जबजिसको लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है, तव शांतिके उप- जावनहारे गुणका नाश करती है.जैसे जवलग पवन नहीं चलता, तव- लग मेघरहता है;जव पवन चला कि--मेघका अभाव होजाता है तैसे लक्ष्मीकी प्राप्ति हुए गुणका अभाव होता है,अरुगर्वकी उत्पत्ति होती है, हे मुनीश्वर जो शूर होके अपने मुखते अपनी बड़ाई न कहै सो दुर्लभ है अरु समर्थ हो किसीकी अवज्ञा न करे, सबमें समबुद्धि रखे सो दुर्लभ है. तैसे लक्ष्मीवान् होकर शुभगुणसंयुक्तहो सोभी दुर्लभ है. हे मुनीश्वर !तृष्णारूपीजो सर्प है तिसको बढ़ानेका स्थान लक्ष्मी रूपी ध है, सो पीता पवनरूपी भोगका आहार करती कदाचित् अधाता नहीं अरु महामोहरूप उन्मत्त हस्ती है तिसको फिरनेका स्थान पर्वतकी अटवीरूपी लक्ष्मी है अरु गुणरूपजो सूर्यमुखी कमल है तिसकी लक्ष्मी रात्रि हैअरुभोगरूपी चंद्रमुखीकमल है, तिसकी लक्ष्मी चंद्रमा है. अरु वैराग्यरूप जो कमलिनी है तिसके नाश करनेहारी लक्ष्मी वर्फ है. अरु ज्ञानरूपी जो चंद्रमा है तिसका आच्छादन करनेहारी लक्ष्मी राहु है. अरु मोहरूपी जो उलूक है तिसकी यह रात्रि है. अरु दुःखरूपी जो विजुरी है .

१३-१४ ] वैराग्यप्रकरणे-जीवितनिन्दावर्णनम् । (४५) तिसको लक्ष्मी आकाश है. अरु तृष्णारूपी जो लता है तिसको बढ़ानेहारी लक्ष्मी मेघ है, अरु तृष्णारूप जो तरंग है, तिसकी लक्ष्मी समुद्र है. अरु भोगरूपीजोपिशाच है,तिसकी लक्ष्मीस्थान है. अरु तृष्णारूपी भँवरको लक्ष्मी कमलिनी है. जन्मके दुःखरूप. जलको यह लक्ष्मी ताल है. हे मुनीश्वर ! देखनेमात्र यह सुंदर लगती है अरु दुःखका कारण है. जैसे खड्गकी धार देखनेमात्र सुंदर होती है अरु विचारूपी मे- घका नाश करनेमें लक्ष्मी वायु है. हे मुनीश्वर ! यह मैंने विचार कर देखा है. इसमें सुख कछुहू नहीं अरु संतोषरूपी मेघका नाश करनहारा यह शरत्काल है. अरु इस मनुष्यों गुण तबलग दृष्टि आवें जबलग लक्ष्मीकी प्राप्ति नहीं भई. जब लक्ष्मीकी प्राप्ति होती है तब शुभ गुण नाश पाते हैं। हे मुनीश्वर ! लक्ष्मी ऐसी दुःखदायक जानकर, इसकी इच्छा मैंने त्याग दीनी है, यह भोग मिथ्यारूप है. जैसे बिजुरी प्रगट होय छिप जाती है, तेसे यह लक्ष्मीह प्रगट होय छिप जाती है. जैसे जल है सो हिम है, तैसे लक्ष्मीकी ज्योति है सो हिम मूर्ख जडके आश्रयते है, इस्को छलरूप जानकर मैंने त्याग किया है. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे लक्ष्मीतिरस्कारवर्णनं नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥ चतुर्दशः सर्गः १४॥ अथ जीवितनिन्दावर्णनम् । 1 श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर !जैसे कमल पत्रके उपर जलकी (४६) योगवासिष्ठे । [ चतुर्दशः सर्गः बूंद नहीं रहती है, तैसे आयु क्षणभंग है. जैसे जलके तरंग होयके नाश पाते हैं, तैसे आयु होयके नाश पाती है. सुनीश्वर ! पवनको रोकना कठिन है सोभी कोऊ रोका है, अरु आकाशका चूर्ण करना अतिकठिन है, सोभी कोऊ चूर्ण कर धार, अरु विजुलीको रोकना अतिकठिन है, सोभी कोऊ रोके है, परंतु आयु स्थिर होवे नहीं. जैसे शशाके सींगसों कोऊ मार नहीं सकता अरु कांचके ऊपर जैसे मोती नहीं ठहरता है, जैसे तरंगकी गांठ नहीं परती है, तैसे आयुभी स्थिर नहीं रहती है. आयु तो बिजुलीके चमक जैसी है. सो होती है अरु मिटभी जाती है, अरु जो आयु पायके आप अमर हुआ चाहे, सो महामूर्ख जानना अरु जो क्षणभंगुर शरीर पायकर, भोगकी वांछा करता है, सो महाआ- पदाका पात्र है, तिसको जीनेते मरना श्रेष्ठ है. जीनेकी आशा मूर्ख करते हैं, सो अपने नाशके निमित्त करते हैं, जैसे स्त्री जो गर्भकी इच्छा करती है, सो अपने नाशके निमित्त करती है. · अरु जो ज्ञानवान् पुरुष हैं, जिनकी परमपदमें स्थिति है अरु तिसकर तृप्ति पाये हैं, तिनका जीना सुखके निमित्त है, तिनके जीनते औरका कार्यभी सिद्ध होजाता है. तिनका जीना चिं- तामणिकी नाई श्रेष्ठ है. अरु जिनको सदा भोगकी इच्छा रहती है और आत्मपदते विमुख हैं तिनका जीना किसी सुखके निमित्त नहीं है. वह मनुष्य नहीं, गर्दभ है. अरु जैसे वृक्ष, पक्षी पशुका. जीना तैसे तिसकाभी जीना है. हे मुनीश्वर ! जिस पुरुषने शास्त्र पढ़ा है अरु पानेयोग्य पद नहीं पाया, तव शास्त्र उसको भाररूप है जैसे औरका भार होता है, तैसे पढ़ानेकाभी भार है. अरु पढ़के विचारचर्चा करता है और तिसके सारको नहीं ग्रहण करता तो यह विचारचर्चाहू भार है. . , १४] वैराग्यप्रकरणे--जीवितनिन्दावर्णनम् । (४७) हे मुनीश्वर ! मन जो है, मोआकाशरूप है. सोमनमें जोशाति न 'आई, तो मनहू उसको भार है. अरु जिसने मनुष्यशरीरको पाया है, उसको अभिमान नहीं त्यागता है तो यह शरीरभी उसको मारहै, यह शरीरका जीना तबही श्रेष्ठ है जब आत्मपदको पावे, अन्यथा उसका जीना व्यर्थ है. और आत्मपदकी प्राप्ति अभ्याससे होती है. जैसे जल पृथ्वीते खोदेते निकसता है, तैसे अभ्यास कर आत्मपदकी प्राप्ति होती है. अरु जो आत्मपदते विमुख होय,आशाकी फांसीमें फँसे हैं सो संसारमें भटकते रहते हैं. हे मुनीश्वर ! संसारसागरमें देहरूप लता फेनवत् क्षणभंग है, इसको पायके, जो अभिमान करता है सो मूर्ख है.जैसे बिल्ली चूहाको पक- डनेके लिये पड़ी रहती है, तैसे उनको नरकमें डालनेके लिये, घरमें पड़ी रहती है, जैसे अंजलीमें जल नहीं ठहरता,तैसे आयु चली जाती है. ऐसी क्षणभंग आयु अरु शरीरको पायकर जो भोगकी तृष्णा क- रते हैं, सो महामूर्ख हैं सो मृत्यु के मुखमें परेहुए जीनेकी आशा करते हैं. जैसे सर्पके मुखमें मेढ़क पड़ता है, सो मच्छरको खानेकी इच्छा करता है, याते सो महामूर्ख है, तैसे यह पुरूष मृत्युके मुखमें परा हुआ भोगकी वांछा करता है सो महामूर्ख है. अरु युवा अवस्था नदीके प्रवाहकी नाई चली जाती है, बहुरि वृद्धावस्था प्राप्त होती है, तामें महादुःख प्रगट होते हैं अरु शरीर जर्जर होय जाता है, फिर मरता है. इकक्षणहुं मृत्यु इनको विसारती नहीं है, सदाई देखत रहता है, जैसे महाकामी पुरुषको सुंदर स्त्री मिलती है, तब उसको देखनेका त्याग नहीं करता, तैसे मृत्यु मनु- व्यको देखे बिना नहीं रहती है. हे मुनीश्वर ! मूर्ख पुरुषका जीना दुःखके निमित्त है. जैसे वृद्ध मनुष्यका जीना दुःखका कारण है, तैसे अज्ञानीका जीना दुःखका . , [ पञ्चदशः सर्गः (४८) योगवासिष्ठे। कारण है. उसको बहुत जानेते मरना श्रेष्ठ है. जिस पुरुपने मनुष्य- शरीर पायकर, आत्मपद पानेका यत्न नहीं किया तिसने आपही आफ्ना नाश किया है, सो आत्महत्यारा है. मुनीश्वर! यह माया वहुत सुंदर भासती है, अरु आखिर नाशको पाती है. जैसे वृक्षको अंतरते धुन खाय जाता है अरु बाहरते बहुत सुंदर दीखता है,तैसे यह पुरुष वाहरते सुंदर दृष्टि आता है अरु अंतरते इसको तृष्णा खाय जाती है.जो पदार्थको सत्य अरु सुखरूप जा- नकर, सुखके निमित्त आश्रय करता है सो सुखी नहीं होता है, जैसे नदीमें सर्पको पकड़के पार उतरा चाहे, सोपार नहीं उतरता है, वह मूर्खता करके डूवेईगा; तैसे जो संसारके पर्दाथको सुखरूप जानकर आश्रय करता है, सो सुख नहीं पाता संसारसमुद्रमेंही डूब जाता है, हे सुनीश्वर ! यह संसार इंद्रधनुपकी नाई है. जैसे इंद्रधनुष बहुत रंगका दृष्टिमें आता है अरुतिसते अर्थसिद्धि कछु नहीं होती है, तैसे यह संसार भ्रममात्र है इसमें सुखकी इच्छा रखनी व्यर्थ है. इस प्रकार जगतको मैंने अस्तरूप जानकर निर्वासना होनेकी इच्छा करी है, इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यमकरणे जीवितनिंदानिषेध- वर्णनं नाम चतुर्दशः सर्गः ॥ १४ ॥ पञ्चदशः सर्गः १५॥ अथ अहंकारनिन्दावर्णनम् । श्रीराम उवाच-हे मुनीश्वर ! यह जो अहंकार उदय हुवा सोअज्ञानते महादुष्ट है. अरुयही परमशत्रु है. इसने मेरेको भार प्राप्त किया है अरुमिथ्या है.जेते कछु दुःख हे तिन सबकी खानि अहंकार है. जवलग अहंकार है तबलग पीड़ाकी उत्पत्तिका अभाव कदा: चित् नहीं होता है।

(४९) १५.] वैराग्यप्रकरणे-अहंकारनिंदावर्णनम् । हे मुनीश्वर!जो कछु मैंने अहंकारसों भजन किया अरु पुण्य किया है अरु जो लिया दिया है और कछु किया है सो सब व्यर्थ है, इस- कर परमार्थकी सिद्धि कुछ नहीं है. जैसे राखमें आहुतिधरीव्यर्थ हो जाती है, तैसे जानता हूं अरु जेते कछु दुःख हैं तिनका बीज अहं- कार है. इसका नाश होवे, तब कल्याण होवे. ताते तुम इसका उपाय मुझको कहो, जिसकर अहंकार निवृत्त होवे. हे मुनीश्वर ! जो वस्तु सत्य है, तिसका त्याग करनेमें दुःख होता है अरु जो वस्तु नाशवान् अरु भ्रमकरके दीखती है, तिसका त्याग करनेते आनंद है. अरु शांतिरूप जो चंद्रमा है तिसको आच्छादन करनेका अहंकाररूपी राहु है. जब राहु चंद्रमा ग्रहण करता है तब उसकी शीतलता अरु प्रकाश टैंप जाताहै, तैसे जब अहंकार उपजता है तव समता वैंप जाती है जब अहंकाररूपी मेघ गर्जके बरसता है तब तृष्णारूपी कटकमंजरी बढ़ जाती है, सो कदाचित् घटती नहीं. जब अहंकारका नाश होवे, तब तृष्णाका अभाव होवे. जैसे जबलग मेघ है तबलग बिजुरी है. जब विवेकरूपी पवन चले तब अहंकार- रूपी मेघका अभाव होयके बिजुरी नाश पाती है. जैसे जबलग तेल अरु वाती है तबलग दीपकका प्रकाश है; जब तेल बातीका नाश होता है, तब दीपकका प्रकाशभी नाशपाता है. तैसे जब अहंकारका नाश होवे, तब तृष्णाकाभी नाश होता है। हे मुनीश्वर! परमदुःखका कारण अहंकार है. जब अहंकारका नाश होवे, तब दुःखकाभी नाश होजाय. हे मुनीश्वर! यह जो मैं राम हूं सो नहीं अरु इच्छाभी कछु नहीं. काहेते जो मैं नहीं तो इच्छा किसको हो ?.अरु इच्छा होइ.तो यही होइ, जो अहंकारके रहित पदकी प्राप्ति होवे जैसे जिनेंद्रको अहंकारका उत्थान नहीं हुआ,तैसा में होऊं, ऐसी मुझको इच्छा है..

[पञ्चदशः सर्गः (५०) योगवासिष्ठे। हे मुनीश्वर ! जैसे कमलको वर्फ नाश करता है. तैसे अहंकार ज्ञानका नाश करता है. जैसे पारधी जालसों पक्षीको वंचन करता है, तिसकर पक्षी दीन होजाते हैं. तैसे अहंकाररूपी पारधीने तृष्णा- रूपी जाल डालके जीवको बंधन किया है, तिसकर महादीन होगया है. जैसे पक्षी अन्नके कपको सुखरूप जानकर चुगनेको आता है, फिर चुगते फिरते जालमें वध जाता है; तिस बंधनकर दिन होजाता है; तैसे यह पुरुष विषयभोगकी इच्छा कियेते तृष्णारूपी जालमें बँधके, महादीन होजाता है. ताते हे मुनीश्वर ! मुझको सोई उपाय कहो, जिसकर अहंकारका नाश होवे. जव अहंकारका नाश होवेगा तव मैं परमसुखी होऊंगा. जैसे विंध्याचल पर्वतके आश्रयते उन्मत्त हस्ती पड़े गर्जते हैं, तैसे अहंकाररूपी जो विंध्याचल पर्वत है तिसके आश्रयते मनरूपी उन्मत्त हस्ती नानाप्रकारके संकल्पविकल्प- रूपी शब्द करता है. ताते सोई उपाय कहो जिसकर अहंकारका नाश होते.सो अहंकार अकल्याणकामूल है.जैसे मेघका नाश करनहाराश- रत्काल है, तैसे वैराग्यका नाश करनहाराअहंकार है.मोहादिक वि- काररूप जो सर्प हैं, तिनको रहनेका अहंकाररूपी विल है, अरु अहं- कार कामी पुरुषकी नाई है. जैसे कामी पुरुष कामको भुगतता है अरु फूलों की माला गलेमें डालके प्रसन्न होता है, तैसे तृष्णारूपी तागा है; अरु मनुष्यरूपी फूलके मणके हैं, सो तृष्णारूपी तागेके साथ गुँथे हैं. सोअहंकाररूपी कामी पुरुषगलेमें डालता है अरु प्रसन्न होताहै. हे सुनीश्वर! आत्मारूपी सूर्य है तिसका आवरण करनहारा मेघ- रूपी अहंकार है. जब ज्ञानरूपी सूर्यउदयका काल आवे, तव अहंकार रूपी बादलका नाश होजाताहै अरुतृष्णारूपी तुषारकाभी नाश होवे. हे मुनीवर ! यह निश्चय कर मैंने देखा है, कि जहां अहंकार है, तहां सब आपदाआय प्राप्त होती हैं जैसे समुद्रमें सब नदियां आयके .

वैराग्यप्रकरणे-रामविषादवर्णनम् । (५१) प्राप्त होती हैं, तैसे अहंकारमें सव आपदाओंकी प्राप्ति है. ताते सोई उपाय कहो जिसकर अहंकारका नाश होवे. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे अहंकारनिंदावर्णनं नाम पंचदशः सर्गः ॥ १५॥ षोडशः सर्गः १६॥ अथ चित्तदौरात्म्यवर्णनम् । श्रीराम उवाच-हे मुनीश्वर ! यह जो मेरा चित्त है; सो काम, क्रोध, लोभ, मोह, तृष्णादिक दुःखकर जर्जरीभाव होगया है अरु महापुरुषके जो गुण वैराग्य, विचार, धैर्य और संतोष, तिनकी ओर नहीं जाता; सर्वदा विषयकी गिरदमें उड़ता है. जैसे मोरका पंख पव- नके लगे ठहरता नहीं, तैसे यह चित्त सर्वदा भटकता फिरता है अरु इसको लाभ कछु प्राप्त नहीं होता.जैसे श्वान द्वारदारपै भटकता फिरता है तैसे यह चित्त पदार्थके पानेके निमित्त भटकता फिरता है और प्रा- सकछु नहीं होता, अरुजो कछु प्राप्त होता है तिसकरि तृप्त नहीं होता. अंतर तृष्णाहि बनीरहती है. जैसे पिटारेमें जल भरिये; तासों वह पू- र्ण नहीं होता;क्योंकि छिद्रते जल निकस जाता है अरु पिटारा शू- न्यका शून्य रहता है, तैसे चित्तको भोगपदार्थ प्राप्त होता है, तासों संतुष्ट नहीं होता है सदा तृष्णाही रहती है. हे मुनीश्वर! यह चित्तरूपी महामोहका समुद्र है तिसमें तृष्णारूपी तरंग उठतेही रहते हैं. सो कदाचित् स्थिर नहीं होते. जैसे समुद्रमें तीक्ष्ण वेगकर तरंग होता है, सो तटके वृक्षको लगता है अरु जलमें बहे जाते हैं तैसे चित्तरूपी समुद्रमें विषय बहि जाते हैं. वासनारूपी तरंगके वेगसों मेरा जो अचल स्वभाव था, सो चलायमान हागया है, सो इस चित्तसों मैं महादीन हुआ हूं. जैसे जालमें पड़ा पक्षी होजाता है तैसे चित्तसे, धीवरकी वासनारूपी जालमें बँधा हुआ [ षोडशः सर्गः (५२) योगवासिष्ठे। दीन होगया हूं. जैसे मृगके समूहते मूली मृगी अकेली खेदवान होती है, तैसे मैं आत्मपदते भूला हुआ चित्तमें खेदवान हुआ हूं. हे मुनीश्वर! यह चित्त सदा क्षोभवान् रहता है; कदाचित स्थिर नहीं होता. जैसे क्षीरसमुद्र मंदराचलकरके क्षोभवाद हुआ था, तैसे यह चित्त संकल्पविकल्पकर खेद पाता है. जैसे पीजरेमें आया सिंह पीजरेमें फिरता है तैसे वासनामें आया चित्त स्थिर नहीं होता. हे मुनीश्वर! इस चित्तने मेरेको दूरसे दूरडाला है. जैसे भारी पव:- नसों सूखा तृण दूरसे दूर जा पडता है. तैसे चित्तरूपी पवनने मुझको आत्मानंदसे दूर डाला है. जैसे सुखे तृणको अमि जलाता है, तैसे मोको चित्त जलाता है. जैसे अमिसे धूम निकलता है तैसे चित्तरूपी अमिसे तृष्णारूपी धूम निकलता है, तिसकर मैं परमदुःख पाता हूं. यह चित्त हंस नहीं बनता है. जैसे राजहंस दूध अरु जल मिलेको भिन्न भिन्न करता है, तिसकी नाई में अनात्मामें अज्ञानकरके ए- कसा होगया हूं. तिसको भिन्न नहीं कर सकता हूं. जब आत्मपद पानेका यत्न करता हूं तब अज्ञान प्राप्त करने नहीं देता. जैसे नदी- का प्रवाह समुद्रमें जाता है तिसको पहाड सूधे नहीं चलने देता है. अरु समुद्रकी ओर जाने नहीं देता है. तैसे मुझको चित्त आत्माकी ओरसेरोंकता हैसो परमशत्रु है. हे मुनीश्वर! ताते सोई उपाय कहो, जिसकर चित्तरूपी शत्रुका नाश होवे. यह तृष्णा मेरा भोजन करती रहती है. जैसे मृतक शरीरकोखान अरुश्वाननी भोजन करते हैं तैसे आत्माके ज्ञानाविना में मृतकसमान हूं जैसेवालक अपनी परछाहीको बैंतालमानकर भयको पाता है. सो जव विचार करके समर्थ होता है तव वैतालका भय पाता नहीं तैसे चित्तरूपी वैतालने मेरा स्पर्श किया है तिसकरके मैं भयको पाताहूं ताते तुम सोई उपाय कहो, जिससे चित्तरूपी वैताल नष्ट होय जावे.

, १६.1 वैराग्यप्रकरणे-चित्तदौराम्यवर्णनम् । (५३) हे मुनीश्वर! अज्ञानकरके मिथ्या बैताल चित्तमें दृढ़ होरहा है ति: सके नाश करनेको मैं समर्थ नहीं हो सकता. अनिमें बैठना सोभी मैं सुगम जानता हूं और चलके बड़े पर्वतके ऊपर जाना, सोभी मैं सुगम जानता हूं, अरु बडे वज्रको पीसड़ालना यहभी मैं सुगम मानता हूं, परंतु चित्तका जीतना महाकठिन है ऐसा मैं जानता हूं, चित्त सदाई चलायमान स्वभाववाला है. जैसे थंभके साथ बांधा हुआ बानर कदाचित् स्थिर होय नहीं बैठता, तैसे चिच वासनाके मारे स्थिर कदाचित् नहीं होते है. हे मुनीश्वर ! बड़ा समुद्रका पान कर जाना सुगम है अरु अमिका भक्षण करनाभी सुगम है और सुमेरुका उल्लंघन करना सोभी सुगम है, परंतु चित्तको जीतना महाकठिन है; जो सदा चलरूप है. जैसे समुद्र अपना द्रवस्वभावका कदाचित् नहीं त्याग करता अरुमहाद्रवीभूत रहता है, तिसकर नानाप्रकारकेतरंग होते हैं, तैसे चित्तभी चंचलस्वभावको कभी नहीं त्यागता है. नाना प्रकारकी वासना उपजती रहती हैं. अरु बालककी नाई चंचल है, सदा विषयकी ओर धावता है. कुहूं पदार्थकी प्राप्ति होती है परंतु अंतरते सदा चंचल रहता है, जैसे सूर्यके उदय हुए दिन होता है अरु अस्त हुए नाश पाता है, तैसे चित्तके उदयहुए त्रिलोकीकी उत्पत्ति है अरु चित्तके अस्तहुए लीन होजाती है. हे मुनीश्वर ! किसी समुद्रके जल गंभीर है, तिसमें बडे सर्प रहते हैं सो जब कोऊ समुद्रमें प्रवेश करे, तब वह सर्प उनको काटता है, तिनको विष चढ़ जाता है तिसकरके बड़ा दुःख पाता है, दृष्टांत सुनिये-चित्तरूपी समुद्र है अरु वनवासरूपी जल है, तिसमें छलरूप सर्प है, जब जीव उसके निकट जाता है तब भोगरूपी सर्प उसको काटता है, तब तृष्णारूपी विष पसरता है, तिसकर मरते हैं. हे मुनीश्वर! जो भोगको सुखरूप जानकर, चित्त दौडता है, सो भोगदुःखरूप है. जैसे तृणसों खाई आच्छादित होय जाती है, ति-

[ षोडशः सर्गः
(५४)
योगवासिष्ठे।
सको देखकर, मूर्ख मृग खानेको दौडता है, तब खाई में गिर पड़ता
है अरुदुःख पाता है. तैसे चित्तरूपी मृग, भोगका सुख जानकर भाग-
नेको लगता है, तब तृष्णारूपी खाईमें गिर पड़ता है अरु जन्मान्तर
दुःखको भुगतताहै.
हे मुनीश्वर ! यह चित्त कबहूं बड़ागंभीर हो वैठता है, और जव
भोगकोदेखता है, तब तिनकी औरचीलकी नाईं गिर पडता है. जैसे
गीदड पक्षी आकशमें चढ़ा फिरता है, सोजब पृथ्वीपर मांसको देख-
ताहै,तब तहांते आय पृथ्वीपर बैठता है अरुमांसको लेता है,तैसे यह
चित्त निराला उडता है जब विषय देखे तब आसक्ति पाय विषयमें
गिर जाता है,अरुयह चित्तवासनारूपी शय्यामें सोता रहता है,अरु-
आत्मपदमें जागता नहीं. इस चित्तके जालमें मैं फँसा हूं, सो कैसा
जाल है ? तामें वासनारूपी सूत्र है अरुसंसारकी सत्यतारूपी ग्रंथि है.
अरु भोगरूपी तिसमें चारा है, इसको देखके में फंसा हूं, कबहूं पाता.
लुमें अरु कबहूं आकाशमें, वासनारूपी जेवरीकर घटीयंत्रकी नाई
वधा हूं. ताते हे मुनीश्वर! तुम सोई उपाय कहो कि, जिसकर
चित्तरूपी शत्रुको जीतों.
अब मुझको किसी भोगकी इच्छा नहीं अरु जगत्की लक्ष्मीमु-
झको विरस भासती है. जैसे चंद्रमा बादलकी इच्छा नहीं करता अरु-
चतुर्मासमें आच्छादित होय जाता है. ताते मैं भोगकी इच्छा नहीं
करता और जगतकी लक्ष्मीको मैं नहीं चाहता,अरु मेरा चित्त है सो.
परम शत्रु है.
हे मुनीश्वर ! महापुरुष जो जीतनको यत्न करते हैं सो जब चि.
तको जीते, तव परमपदको पावें ताते मुझको सोई उपाय कहो कि,
जिसकर मनको जीतो सवदुःख इसके आश्रयते रहते हैं, जैसे पर्वत
पर वन है सो पर्वतके आश्रयते रहता है.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे चित्तदौराम्यवर्णनं
नाम षोडशः सर्गः ॥ १६ ॥

१७.] वैराग्यप्रकरणे-तृष्णागारुडीवर्णनम् । (५५) सप्तदशःसर्गः १७ । तृष्णागारुडीवर्णनम् । श्रीराम उवाच-हे ब्रह्मन् ! चैतन्यरूपी आकाशमें जो तृष्णा- रूपी रात्रि आई है तामें काम, क्रोध, लोभ मोहादिक उलूक वि चरते हैं. जब ज्ञानरूप सूर्य उदय होवे तब तृष्णारूपी रात्रिका अ- भाव होजावे, जब रात्रि नष्ट होती है तब मोहादिक उलुकभी नष्ट हो जाते हैं, जब सूर्यका उदय होता है तब बर्फ उष्ण हो पिघल जाता है, तैसे संतोषरूपी रसको तृष्णारूपीउष्णता सुखाती है. बहुरितृष्णा कैसी है ? जैसे शून्यवनमें पिशाचिनी अपने परिवारसहित फिरती रहती है अरु प्रसन्न होती है. सो वन अरुपिशाच कैसा है? आत्मप- दते शून्य जो चित्त सो भयानक शून्य बन है, तिसमें तृष्णारूपी पिशा- चिनी है अरु मोहादि उसके परिवार हैं उनको साथ लेकर फिरती है. हे मुनीश्वर ! चित्तरूपी पर्वत है, तिसके आश्रयते तृष्णारूपी नदीका प्रवाह चलता है अरु नानाप्रकारके संकल्परूपी तरंगोंकोप- सारता है. जैसे मेघको देखकर मोर प्रसन्न होता है, तैसे तृष्णारूपी मोर भोगरूपी मेघको देखके प्रसन्न होता है, ताते परमदुःखका मूल तृष्णा है. जब मैं किसी संतोषादि गुणका आश्रय करता हूं, तब तृष्णा तिसको नाश करदेती है. जैसे सुंदर सारंगीको चूहा तोर डार- ता है, तैसे संतोषादि गुणोंको तृष्णा नाश करती है. हे मुनीश्वर! सबते उत्कृष्ट पदमें बिराजनेका मैं यत्न करता हूं तब तृष्णा विराजने नहीं देती. जैसे जालमें फंसा हुआ पक्षी आकाशमै उ- इनका यत्न करता है, परंतु उड़ नहीं सक्ता है, तैसे मैं अनात्मपदमेंते आत्मपदको प्राप्त नहीं हो सक्ता. स्त्री, पुत्र अरु कुटुंबने जाल बिछाया है, तामें फँसा हूंसो निकल नहीं सक्ता, सो आशारूपी फाँसीमें बँधा हुआ, कबहूं ऊर्ध्वको जाता हूं; कबहूं अधपातको प्राप्त होता हूं सो [सप्तदशः सर्गः (५६) योगवासिष्ठे। घटी-यंत्रकी नाई मेरी गति है, जैसे इंद्रका धनुष मेघमें मलीन होता है, सो बड़ाअरु बहुत रंगसों भरा है. परंतु मध्यते शून्य है, तैसे तृष्णा मलिन अंकरणमें हाती है सो वडी है, अरु गुणरूपीरंगते रंगी है, देखनेमात्रको सुंदर है, परंतु इससे काम्यसिद्धि कछु नहीं होती. हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी मेघ हैं, तिनते दुःखरूपी बूंद निकलते हैं. अरु तृष्णारूपी काली नागिन है, उसका स्पर्श तो कोमल है, परंतु विषयके पूर्ण है तिसके डसेते मृतक होजाता है, अरु तृष्णारूपी बादर है, सो आत्मरूपी सूर्यके आगे आवरण करता है. जब ज्ञानरूपी पवन निकले तब तृष्णारूपी बादरका नाश होवे, अरु आत्मपदकासाक्षात्कार होवे अरुज्ञानरूपी कमलको संकोच करनहारी तृष्णारूपी निशा है, अरु तृष्णारूपी महाभयानक काली रात्रि है जिसकर बडे धीरजवान्भी भयभीत हैं. अरु नयनवारेकोभी अंध कर डालती है. जब यह आवती है, तव वैराग्य अरु अभ्यासरूपी नेत्रोंको अंध कर डालती है. इसीसे यह सत्य असत्यको विचारने नहीं देती. हे मुनीश्वर! तृष्णारूपीडाकिनी है,सो संतोषादिक पुत्रोंको मार डालती है.अरु तृष्णारूपी कंदरा है,तिसमें माहरूपी उन्मत्त हत्ती गर्ज- ते हैं, अरु तृष्णारूपी समुद्र है, तिसमें आपदारूपीनदीआय प्रवेश कर- ती है. ताते सोई उपाय मुझको कहो, जिसकर तृष्णारूपी दुःखते छूटों. हे मुनीश्वर! अमिसौभी ऐसादुःख नहीं होता अरु इंद्रके वज्रकरभी ऐसा दुःख नहीं होता; जैसा दुःख तृष्णाकर होता है. सोतृष्णाके प्रहा- रसों घायल बड़े दुःखको पाता है. तृष्णारूपी दीपक परा जलता है; तिसमें संतोपादि पतंगजर जाते हैं. जैसे जलमें मछली रहती है. सो जलमें कंकरी, रेती-आदिकोंको देख, मांस जानकर वह मुखमें लेती है, ताते उसकी अर्थसिद्धि कछु नहीं होती. तैसे तृष्णाभी जो कछु पदार्य देखती है, तिसके पास उडती है अरु तृप्ति किसीकर नहीं १७] वैराग्यप्रकरणे-तृष्णागारुडीवर्णनम् । (५७) होती. अरुतृष्णारूपी एक पक्षिणी हैं, सो कबहुं कहुंउडजाती हैं अरु स्थिर कबडूं नहीं होती; तैसे तृष्णाभी कहूं किसी पदार्थको, कबहूं किसीको ग्रहण करती है; परन्तु स्थिर कबहूं नहीं होती. अरुतृष्णारूपी वानर है. स्थिर कबहूं किसी वृक्षपर रहता है, कबहूं किसीके ऊपर जाता है,स्थिर कबहूं नहीं होता है. जो पदार्थ नहीं प्राप्त होता तिसके निमि- त यल करता है. तैसे तृष्णाहू नानाप्रकारके पदार्थोंका ग्रहण करती है. अरु भोगकर तृप्त कदाचित् नहीं होती. जैसे घृतकी आहुतिकर अनि तृप्ति नहीं पावे, तैसे जो पदार्थ प्राप्तियोग्य नहीं है, तिसक ओ. रभी तृष्णा दौड़ती है और शांतिको नहीं पाती है. हे मुनीश्वर! तृष्णारूपी उन्मत्त नदी है, तिसमें जो बहाया पुरुष, ताको कहां कहा ले जाती है.कबहूँ तो पहाड़की बाजूमें लेजाय, कब- हूं दिशामें लेजाय, परंतु इनको ले फिरती है, तैसे तृष्णारूपी नदी है,सो मुझको ले फिरती है. अरु तृष्णारूपी नदी है, इसमें वासनारू- पी अनेक तरंग उठते हैं. कदाचित् मिटतेनहीं हैं अरु तृष्णारूपी न- टिनी है अरु जगतरूपी आखाड़ा तिसने लगाया है; तिसको शिर ऊँ- चाकर देखता है अरु मुर्ख बडे प्रसन्न होते हैं. जैसे सूर्यके उदय हुए सूर्यमुखी कमल खिलके ऊंचा आता है, तैसे मूर्ख तृष्णाको देखकर प्रसन्न होते हैं. तृष्णारूपी वृद्ध स्त्री है जो पुरुष इसका त्याग करता है तब वाके पाछे लगी फिरती है, कबहूं इसका त्याग नहीं करती अरु तृष्णारूपी रस्सी है, तिसमें जीवरूपी पशु बाँधे हुए हैं, तिसकर भ्रमते फिरते हैं अरु तृष्णा दुष्टिनी है. जब शुभ गुणोंको देखे, तब तिनको मार डालती है. तिसके संयोगते मैं दीन होजाता हूं. जैसे पपीहा मेघ- को देखकर प्रसन्न होता है अरु बूंद ग्रहण करने लगता है, और मेवको जब पवन ले जाता है, तब पपीहा दीन होजाता है. तैसे तृष्णा शु. भगुणका नाश करती है तब मैं दीन हो जाता हूं, .

[सप्तदशः सर्गः (५८) योगवासिष्ठे। हे मुनीश्वर ! तृष्णाने मुझको दूरते दूर डारा है, जैसे सूखे तृणको पवन दूरते दूर डारता है, तैसे आत्मपदते दूर परा हूं. हे मुनी- श्वर ! जैसे भौंरा कमलके ऊपर जाता है. कवहूं नीचे बैठता है, क- वहूं आसपास फिरता है अरु स्थिर नहीं होता, तैसे तृष्णारूपी भौरा संसाररूपी कमलके नीचे ऊपर फिरता है, कदाचित् ठहरता नहीं है; जैसे मोतीका बाँस होता है तिसते अनेक मोती निकसते हैं तैसे तृष्णारूपी वाँसते जगतरूपी अनेक मोती निकलते हैं, ति- सकर लोभीका मन पूर्ण नहीं होता है. तैसे तृष्णाते मन पूर्ण नहीं होता. दुःखरूपी रलका तृष्णारूपी डब्बा है, तिसमें अनेक दुःख रहते हैं. ताते सोई उपाय कहो, जिसकर तृष्णा निवृत्त होवे. यह तृष्णा वैराग्यसों निवृत्ति पाती है और किसी उपायकर निवृत्ति नहीं होती है. जैसे अंधकारका नाश प्रकाशकर होता है और किसी उपायकर नहीं होता; तैसे तृष्णाका नाश और उपाय- सों नहीं है. अरु तृष्णारूपी हल है, सो गुणरूपी पृथ्वीको खोद डारता है, अरु तृष्णारूपीलता है, सो गुणरूपी रसको पीती है अरु तृष्णारूपी धूर है,सोअंतःकरणरूपी जलमें उछलके मलीन करती है. हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी नदी है, सो वर्षाकालमें बढ़ती है, फिर घट जाती है. तैसे जब इष्टभोगरूपी जल प्राप्त है तव हर्षकर वढ़ती है, जव भोगरूपी जल घटजाता है, तब सूखके, क्षीण होजाती है. हे मुनीश्वर ! इस तृष्णाने सुझको दीन किया है, जैसे सूखे तृणको पवन उडाता है, तैसे यह मुझको उड़ाती है. ताते सोई उपाय तुम कहो, जिस कर तृष्णाका नाश होवे अरु आत्मपदकी प्राप्ति होवे अरु दुःख नष्ट होवे अरु आनंद होवे. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे तृष्णागारुडीवर्णनं नाम सप्तदशः सर्गः ॥ १७ ॥ .

१८.] वैराग्यप्रकरणे-देहनैराश्यवर्णनम् । (५९). अष्टादशः सर्गः १८० अथ देहनैराश्यवर्णनम् । श्रीराम उवाच-हेमुनीश्वर! यह जो अमंगलरूप शरीरज-- गत्में उत्पत्ति पाया है, सो बड़ाअभाग्यरूप है, सदा विकारवान् मांस- मज्जाकर पूर्ण है, सदा अपवित्र है, इसकरके में कछु अर्थसिद्धि होना नहीं देखता. ताते तिन विकाररूप शरीरोंकी इच्छा मैं नहीं रखता.. यह शरीर नअज्ञ है, न तज्ज्ञ अर्थात् यहन जड है, नचैतन्य है.. जैसे अग्निके संयोगकरके लोहा अभिवत् होता है,सो जलाताभी है,. परंतु आप नहीं जलता; तैसे यह देह नजडहै,न चैतन्य है.जड इस कारणते नहीं कि, इसते कार्यभी होता है, अरुचैतन्य इस कारणते. नहीं कि, इसको आपते ज्ञान कछु नहीं होता; ताते मध्यमभावमें है,. काहेते जो चैतन्य आत्मा इसमें व्याप रहा है सो लोहमिकी नाई जानता हूं अरु आपते अपवित्ररूप अस्थि, मांस, रुधिर, मूत्र विष्ठा- करि पूर्ण अरु विकारवान्, ऐसा जो देह है सो दुःखका स्थान है अरु इष्टके पायेते हर्षवाद होता है अरु अनिष्टके पायेते शोकवान होता है, ताते ऐसे शरीरकी मुझको इच्छा नहीं. यह अज्ञानकरके उपजता है. हे मुनीश्वर ! ऐसे अमंगलरूपी शरीरमें जो अहंपना फुरता है सो दुःखका कारण है. इस संसारमें स्थित होकर, नानाप्रकारके शब्द क- रता है,अरु मौन कबहूं नहीं धरता है, अरु अहंकाररूपी बिलाडा देहमें रहा हुआ अहं, अहं करता है. चुप कदाचित् नहीं रहता है. हे मुनी- श्वर! जो किसीके निमित्त शब्द होवे सो सुंदर है, अन्यथा शब्द व्यर्थ है. जैसे जयके निमित्त ढोलका शद सुंदर होता है तैसे अहंकारते रहित जो पद है सो शोभनीय है और सब व्यर्थ है. अरु शरीररूपी नौका भोगरूपी रेतीमें परी है इसको पार होना:

[अष्टादशःसर्गः (६०) योगवासिष्ठे। कठिन है. जब वैराग्यरूपी जल वढ़े अरु प्रवाह होवेअरु अभ्यासरूपी पतवारीका बल होवे, तब संसारके पाररूपी किनारपै पहँचे. अरु शरीररूपी बेडा है; अरु संसाररूपी समुद्र और तृष्णारूपी जलमें परा है, अरु वडा प्रवाह है; अरु भोगरूपी तिसमें मगर है, सो शरीररूपी वेडाको पार लगने नहीं देता. जव शरीररूपी बेडाके साथ वैराग्यनदी वायु लगे अरु अभ्यासरूपी पतवारीका वल लगे तब शरीररूपी वेडा पारको पावे; हे मुनीश्वर ! जिन पुरुषोंने ऐसे वेड़ेको उपायकर आपको संसारसमुद्रते पार किया है, सो सुखी भये हैं, अरु जिनोंने नहीं किया, वे परमआपदाको प्राप्त होते हैं। सो इस वेडेकर उलटे डूबेंगे. जैसे वेडेमें छिद्र होवे; और वामें जल प्रवेश कर आवे, तब वह डूब जाता है, अरु तिसमें जो मच्छ है सो खा जाता है, सो इहां शरीररूपी बेडेका तृष्णारूपी छिद्र है, तिसकरके इहां संसारसागरमें डूब जाता है अरु भोगरूपी मगर इसको खाता है. अरु यह आश्चर्य है कि वेडा अपने निकट नहीं भासता है अरु मनुष्य सो मूर्खताकरके आपको बेडा मानता है, अरु तृष्णारूपी छिद्रकरके दुःख पाता है. अरु शरीररूपी वृक्ष है, तामें भुजारूपी शाखा हैं अरु अँगुरी इसके पत्र हैं अरु जंघा उसके स्थंभ हैं अरु वासना इसकी जड है अरु सुख दुःख इसके फूल हैं अरु तृष्णारूपी कन है सो शरीर- रूप वृक्षको खाता रहता है, जब इसको श्वेत फूल लगे तव नाशका समय पाता है; कारण जो मृत्युके निकटवर्ती होता है, बहुरि शरीररूपी इसके टास हैं अरु हस्त पाय इसके पत्र हैं अरु गिटे इसके गुच्छे हैं अरु दांत फूल हैं, जंघा स्थंभ हैं अरु कर्म जलकरके वढ़जाता है. जैसे वृक्षते जल निकसता है, सो चिकटा है, तैसे जल शरीरके द्वारा निकसता है अरु तृष्णारूपी विषते पूर्ण सर्पिणी रहतीहै अरु जो कामनाके लिये इस वृक्षका १८.] वैराग्यप्रकरणे-देहनैराश्यवर्णनम् । (६१) आश्रय लेता है, तब तृष्णारूपी सर्पिणी तिसको डसती है, तिस वि- षसों वह मरि जाता है. हे मुनीश्वर ! ऐसा जो अमंगलरूपी शरीर- वृक्ष है, तिसकी इच्छा मुझको नहीं है. यह परमदुःखका कारण है. जबलग यह पुरुष अपने परिवारमें बँधा हुआ है तवलग मुक्तिः नहीं होती, जब परिवारका त्याग करे, तब मुक्ति होते. देह, इंद्रिय, प्राण, मन व बुद्धि, ये इसके परिवार हैं. इनमें जो अहंभाव है उसका.. त्याग करे तब मुक्ति होवे. अन्यथा मुक्ति नहीं होती. हे मुनीश्वर ! जो श्रेष्ठ पुरुष हैं सो पवित्रही स्थानमें रहते हैं, अ-- पवित्रमें नहीं रहते. सो अपवित्र स्थान यह देह है. इसमें रहनेवाला, भी अपवित्र है अरु अस्थिरूपी इस घरमें लकडे हैं. रुधिर, मूत्र, वि- छाका इसमें कोच लगाया है और मांसकी कहगील करी है अरु अ- हंकाररूपी इसमें श्वपच रहता है अरु तृष्णारूपी श्वपचिनी इसकी स्त्री है। अरु काम, क्रोध, मोह और लोभ इसके बेटे हैं. आंत अरुवि- छादिककरि पूर्ण भरा हुआ है. ऐसा जो अपवित्र स्थान अमंगलरूफ शरीर तिसका मैं अंगीकार नहीं करता. यह शरीर रहे, चाहे मत रहे. इसके साथ मेरा अब कछु प्रयोजन नहीं. हे मुनीश्वर ! एक बड़ा घर है. तिसमें बड़े पशु रहते हैं सो घरको उड़ाते हैं. सो गृहमें कोऊ जाता है तब सींगोंसों मारने लगते हैं. अरु. धूलभी उसके ऊपर गिरती है सो शरीररूपी बड़ागृह है. तिसमें इंद्रि- यरूपी पशु है, जब इस गृहमें पैठसा है, तब बड़ी आपदाको प्राप्त. होता है. तात्पर्य यह है कि जो इसमें अहंभाव करता है,तिस इंद्रिय- रूपी पशु विषयरूपसींगोंसे मारते हैं अरुतृष्णारूपी धूलइसकोमलीन करती है. हे मुनीश्वर ! ऐसे शरीरको मैं अंगीकार नहीं करता. जिसमें सदा कलह पडेही रहते हैं, तिसमें ज्ञानरूपी संपदा प्रविष्ट नहीं होती. ऐसाजो शरीररूपी गृह है, तिसमें तृष्णारूपी चंडीत्री (६२) योगवासिष्ठे। [अष्टादशः सर्गः रहती है; सो इंद्रियरूपी द्वारसों देखती रहती है, सदा कल्पना करते रहती है. तिसकरकेशमदमादिरूपसंपदाका प्रवेश नहीं होता-तिस घर एक शय्या है,जब उसके ऊपर विश्राम करता है,तव कछुक मुख पाता है; परंतु तृष्णाका जो परिवार है सो विश्राम करने नहीं देता.सो सु- घुसिरूपी शय्या है,जब उसमें विश्राम करता है तब कामक्रोधादिक रु- दन करते हैं। अरु एचंडी स्त्रीका जो परिवार,काम,क्रोध,लोभ और मोह इच्छा है सो उठाइ देते हैं, विश्राम करने नहीं देते. हे मुनीश्वर! ऐसा दुःखका मूल जो शरीररूपी गृह है तिसकी इच्छा मैंने त्याग दीनी है. यह परमदुःख देनहारा है. इसकी इच्छा मुझको नहीं है. हे मुनीश्वर! शरीररूपी वृक्ष है. तिसपर तृष्णारूपी कौवानी आय स्थित भई है. सो जैसे कौवानी नीच पदार्थके पास उड़ती है, तैसे तृष्णारूपी कौवानी भोगरूपी मलिन पदार्थके पास है, वृक्षको बहुरि तृष्णा बंदरीकी नाई शरीररूपी वृक्षको हिलाती है, स्थिर होने देती नहीं. अरु जैसे उन्मत्त हस्ती कीचमें फँस जाता है अरु निकस नहीं सक्ता अरु खेदवान होता है, तैसे अज्ञानरूपी मदकरके उन्मत्त हुआ जीव शरीररूपी कीचमें फंसा है, सो निकस नहीं सक्ता है. परापराही दुःख पाता है. ऐसे दुःख पानेवारा शरीर है, तिसका मैं अंगीकार नहीं करता. हे मुनीश्वर ! यह शरीर अस्थि, मांस और रुधिरकरि पूर्ण है सो अपवित्र है जैसे हस्तीके कान सदाही हिलते हैं तैसे इसको मृत्यु परा हिलाता है. कछु कालका विलंब है; परंतु मृत्यु इसका ग्रासकर लेवेगा. ताते में इस शरीरका अंगीकार नहीं करता हूं. यह शरीर कृतघ्न है, भोग भुगतता है और बड़े ऐश्वर्यको प्राप्त करता है परंतु मृत्यु इससे सखापन नहीं करता है जब जीव इसको छां- डकर परलोकको जाता है,तवअकेलाही जाता है और शरीरको छोड . १८.] वैराग्यप्रकरणे-देहनैराश्यवर्णनम् (६३) देता है जीव इसके सुखानिमित्त अनेक यल करता है, परंतु संगमें सदा नहीं रहता. ऐसा जो कृतन शरीर है, इसका मैंने मनसों त्याग किया है, जो यह दुःख देनहार है. हे मुनीश्वर ! और आश्चर्य देखो, जो उसीका भोग करता है, तिसके साथ चलता नहीं, जैसे धूरकरके मार्ग भासनेते रह जाता है, तैसे यह जी जब चलने लगता है, तब शरीरके साथ क्षोभवान होता अरु वासनारूप धूरसंयुक्त चलता है, परंतु दीखता नहीं कि, कहां गया ? जब परलोकको जाता है तब बडा कष्ट होता है, काहे कि, ते शरीरके साथ स्पर्श किया है. हे मुनीश्वर! यह शरीरक्षणभंगुर है जैसे जलकी बूंद पत्रके ऊपरसे गिरती है, सो क्षणमात्ररहती है, तसे शरीरमी क्षणभंग है. ऐसे शरीरमें आस्था करनी सो मूखा है. अरु ऐसे शरीरके ऊपर उपकार करनाभी दुःखके निमित्त है, सुख कछु नहीं है; और जोधनाढ्य शरी- रसों वडे भोग भोगते हैं,अरु निर्धन थोडे भोग भोगते हैं,परंतुजरावस्था अरु मृत्यु दोनोंको होते हैं इसमें विशेषतः कछु नहीं शरीरका उपकार करनाऔर भोग भोगना,सोतृष्णकरके उलटा दुःखका कारण है जैसे कोऊनागिनी घरमें रखके, उसको दूध पिलावे, तोभी आखिर उसको काटके मारेगी, तैसे जीवने तृष्णारूपी नागिनीके साथ सखाई करी हैं, सोमरेगी; क्योंकि नाशवंत है. इसके निमित्त जो भोग भोगनेका यल करना सो मूर्खता है. जैसे पवनका वेग आता है अरु जाता है, तैसे यह शरीर नाशवंत है, इससों प्रीति करनी, सो दुखका कारण है; सव जीव इसकी आस्थामें बाँधे हुए हैं, इसका त्याग कोई विरलेनेही किया है. जैसे कोऊ विरला मृग होता है, सो मरुस्थलके जलकी आस्था त्यागता है और सब परे भ्रमते हैं. हे मुनीश्वर! बिजलीका अरु दीपकका प्रकाश भी आता जाता.

[अष्टादशः सर्गः - (६४) योगवासिष्ठे। दीखता है, परंतु इस शरीरका आदि अंत नहीं दीखता है, कि, कहांते आता है अरु कहां जाता है? जैसे समुद्रमें बुवद उपजता है अरु मिट जाता है तिसकी आस्था करनेते कछु लाभ नहीं, तैसे इम शरीरकी आस्था करनी योग्य नहीं. यह अत्यंत नाशरूप है, स्थिर कदाचित् नहीं होता है जैसे विजुरी स्थिर नहीं होती, तैसे शरी- रभी स्थिर नहीं रहता; इसकी मैं आस्था नहीं करता. इसका अभि- मान मैंने त्यागा है. जैसे कोऊ सूखे तृणको त्याग देता है, तैसे मैंने अहंममता त्यागी है. हेमुनीश्वर ! ऐसे शरीरको पुष्ट करना, सो दुःखके निमित्त है. यह शरीर किसी लिये आनेयोग्य नहीं, जलानेयोग्य है. जैसे लकडी जलायेबिन और काममें नहीं आती है, तैसे इस शरीरमें जड अरु गुंगा जलानेके अर्थ है. हे मुनीश्वर ! जिस पुरुषने शरीररूपी काष्ठ- को ज्ञानामिकर जलाया है, तिसका परम अर्थ सिद्ध भया है अरू जिसने नहीं जलाया, सो परम दुःख पाता है, हे मुनीश्वर ! न मैं शरीर हूं न मेरा शरीर है, न इसका मैं हूं,न यह मेरा है; अब मुझको कामना कोऊ नहीं है. मैं निराशी पुरुष हूं. अरु शरीरके साथ मुझको प्रयोजन कछु नहीं है, ताते तुम सोई उपाय कहो कि, जिसकरके मैं परमपदकी प्राप्ति पाऊं. हे मुनीश्वर | जिस पुरुषने शरीरका आभिमान त्यागा है, सो परमानंदरूप है और जिसको देहका अभिमान है, सो परम दुःखी हैं जेते कछुदुःख हैं, सोशरीरके संयोगकरि होते हैं; मान, अपमान, जरा, मृत्यु, दंभ, भ्रांति, मोह, अरु शोक आदि सर्व विकार देहके संयोगकरके होते हैं जिनको देहमें अभिमान है तिनको धिकार है और सव आपदाभी तिनको प्राप्त होती हैं जैसे समुद्रमें नदी आयकर प्रवेश करती है, तैसे देहाभिमानमें सर्व आपदाआय प्रवेश करती हैं; जिसको देहका आभिमान नहीं सो पुरुषनमें उत्तम है अरु वंदना १८] वैराग्यप्रकरणे-देडनेराश्यवर्णनम् करनेयोग्य है, ऐसेको मेरा नमस्कार है. अरु सर्व संपदाभी तिसको प्राप्त होती हैं. जैसे मानससरोबरमें सब हंस आय रहते हैं, तैसे जहाँ देहाभिमान नहीं रहा, तहाँ सर्व संपदा आय रहती हैं. हे मुनीश्वर! जैसे बालक अपनी छायामें बैताल कल्पना करता है अरुतिसकरके भय पाता है, जब इसको विचारकी प्राप्ति होती है. तबबैतालका अभाव होजता है. तैसे अज्ञानकरके मुझको अहंकार- रूपी पिशाचने शरीरमें दृढ आस्था बताई है, ताते सो उपाय कहो, जिसकर अहंकाररूपी पिशाचकानाशहोवे अरु स्थितिरूपी फॉसी टूटे हे मुनीश्वर ! प्रथम मुझकों अज्ञानकरके संयोग था, सो अहंका- ररूपी पिशाचका थातिसते अनंतर शरीरमें आस्था उपजी है. जैसे बीजते प्रथम अंकुर होता है; और फिर अंकुरते वृक्ष होता है, तैसे अहंकारते शरीरकी आस्था होती है, हे मुनीश्वर ! इस अहंकाररूपी पिशाचने सब जीवनको दीन किये हैं. जैसे बालकको छायामें बैताल भासता है अरु दीनताको प्राप्त होता है, तैसे अहं- काररूपी पिशाच अविचारते सिद्ध है अरु विचार कियेते अभावको प्राप्त होता है. जैसे प्रकाशकर अंधकार नाश होजाता है; तैसे विचार कियेते अहंकार नाश होजाता है. हे मुनीश्वर! जो शरीरमें आस्था रक्खी है सो शरीर जलके प्रवा- हकीनाई स्थिर नहीं होता; ऐसा चल है, जैसे बिजूरीकी चमक स्थिर नहीं होती अरु गंधर्वनगरकी आस्था व्यर्थ है, तैसे शरीरकी आस्था करनी व्यर्थ है. हे मुनीश्वर! ऐसे शरीरकी आस्था करके अहंकार करते हैं अरु जगतके पदार्थनिमित्त यत्न करते हैं. सो महामूर्ख हैं. जैसे स्वम् मिथ्या है तैसे यह जगत मिथ्या हैतिसको सत्य जानकर जैसे इसको यल करता है सो अपने बंधनके निमित्त करता है.जैसे घुरान गुफा बनती है सो अपने बंधनके निमित्त है अरु पतंग दीपककी इच्छा करताहै सो अपने नाशके निमिच है तैसे अज्ञानी जो अपने देहका (६६) योगवासिष्ठे। [ एकोनविंशः सर्गः अमिमान कर, भोगकी इच्छा करता है सोअपने नाशके निमित्त है. ! हे मुनीश्वर ! मैं तो इस शरीरका अंगीकार नहीं करता. इस शरीरकी अभिमान परमदुःख देनहारा है, जिसको देहाभिमान नहीं रहा तिसको भोगकी इच्छाभी न रहगी. ताते मैं निराश हूं अरुप- रमपदकी इच्छा है जिसके पायेते बहुरि संसारसमुद्रकी प्राप्ति न होवे. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैरग्यप्रकरणे देहनैराश्यवर्णनं नामाष्टादशः सर्गः॥१८॥ एकोनविंशः सर्गः १९ । worshim अध बाल्यावस्यानिंदावर्णनम् । श्रीराम उवाच-हेमुनीश्वर! इससंसारसमुद्रमें जिसने जन्म पाया है तिसे बाल्यावस्था इसको प्राप्त भई है सोभी परमदुःखका मुल है. तिसमें परमदीन होजाता है. अरु जेते अवगुण इसमें माय प्रवेश करते हैं सोभी कहता हूं. अशक्तता,मूर्खता,इच्छा,चपलता,दीनता, दुःख अरु संताप, ऐते विकार इसको आय प्राप्त होते हैं यह बाल्या- वस्था महाविकारवान है अरु बालक पदार्थकी और धावता है, एक वस्तुका ग्रहण करना चाहता है. स्थिर नहीं रहता है फिर औरमें लग जाता है जैसे वानर ठहरके नहीं बैठता अरु जो कोऊ ऊपर कोष करता है. तब अंतरते परा जलता है अरु बडीबडी इच्छा करताहै तिसकी प्राप्ति नहीं होती. फिर महादीन हो जाता है. जैसे कदली बनका हस्ती सांकरसों वांघाहुआ दीन होजाता दीन है, तैसे यह चैतन्य पुरुष बालकअवस्थाकरके दीन होजाता है. जो कछु इच्छा करता है सो विचारविना करता है तिसकरके दुःख पाता है अरुयह गुंग अवस्था है तिसकरके कछु सिद्धि नहीं होती.कोऊ पदार्थकी प्राप्ति १९ ] वैराग्यप्रकरणे-बाल्यावस्थानिन्दावर्णनम् । (६७) होती है तिसमें क्षणमात्र सुखी रहता है, बहुरि तपनेलगता है. जैसे तपती पृथ्वीपर जल डारिये तब एक क्षणभर शीतल होती है. फिर उसी प्रकारसों तपती है तैसे वहभी तपता रहता है, जैसे रात्रिके अंतमें सूर्यउदय होता है तिसकरके उलुकादि कष्टवाद होते हैं तैसे इस जीवको स्वरूपके अज्ञानकरके बाल्यावस्थामें भ्रष्ट होता है। हे मुनीश्वर ! जो बाल्यावस्थाकी संगति करता है सोभी मूर्ख है, काहेते कि-यह विवेकरहित अवस्था है अरु सदा अपवित्र है और सदापदार्थकी ओर धावती है. ऐसी मूढ़ अरु दीन अवस्थाकी मुझको इच्छा नहीं.इस अवस्थावाला पुरुष जिस पदार्थको देखता है तिसकी ओरधावता है अरु क्षणक्षणमें अपमानको पाता है जैसे कूकर क्षणक्षण- में द्वारकी ओर धावता है अरु अपमान पोता है, तैसे बालक अपमा- नको प्राप्त होता है अरु बालकको सदा माताअरु पिताका भय रहता है; बांधवका सदा भय रहता है अरु आपते बडे बालकका भी भय रहता है अरु पशुपक्षीहूका भय रहता है.हे मुनीश्वर! ऐसी दुःखरूप अव- स्थाकी मुझको इच्छा नहीं. जैसे सीके नयन चंचल हैं अरु नदीका प्रवाह चंचल है, इसतेभी मन अरु बालक चंचल है, ऐसे में जानता हूं, अरु सब चंचलता बालकते कनिष्ठ हैं. बालक सबते चंचल हैं: जैसा मन चंचल है, तैसा बालकभी चंचल है. मनका रूप बालक है. हे मुनीश्वर ! जैसे वेश्याका चित्त एक पुरुषों नहीं ठरता; तैसे बालकका चित्त एक पदार्थमें नहीं ठरता, कि,इस पदार्थकरके मेरा ना- शहोवेगा, ऐसा विचारभी तिसको नहीं अरु इसकर मेरा कल्याण हो- वेगासोविचारभी नहीं. ऐसेही परा चेष्टा करता है अरु सदादीन र- हता है अरु सुख दुःख इच्छा दोष करके तपायमान रहता है. जैसे जेठ और आषाढमें पृथ्वी तपायमान होती है, तैसे बालक तपताही शांतिको कदाचित् नहीं पाता.

(६८) योगवासिष्ठे।
[एकोनविंशः सर्गः
अरु जब विद्या पढ़ने लगता है, तब गुरुसों बड़ा भयभीत
होता है. जैसे कोऊ यमको देखके भय पावे और गरुड़को देखके
जैसे सर्प भय पावे, तैसे भयभीत होजाता है.जब शरीरको कोऊ कष्ट
आय प्राप्त होता है, तब बड़े दुःखको प्राप्त होता है. परंतु दुःखके
निवारणमें समर्थनहीं होता अरु सहनकोभी समर्थनहीं.अंतरते परा
जलता है अरु मुखते कछु बोल सक्ता नहीं. जैसे वृक्ष कछु नहीं बोल
सक्ता अरुजैसे इस तिर्यक् योनिवाले दुःख पाते हैं अरु कहिनहीं सक्ते,
अरुदुःखका निवारण नहीं करि सक्ते, न संहार कर सक्ते. अंतरते
परे जलते है,तैसे बालक गूंगा मूढ हुआ दुःख पाता है. हे मुनीश्वर!
ऐसी जो बाल्यावस्था, तिसकी जो स्तुति करता है, सो मूर्ख है.
यह तो परमदुःखरूप अवस्था है,इसमें विवेक विचार कछू नहीं.
एक खानेको पाता है अरु रुदन करता है, ऐसी अवगुणरूप अवस्था
मुझको नहीं सुहाती है. जैसे बिजुरी अरु जलके बुदबुदे स्थिर नहीं
रहते तैसे बालकहू स्थिर कदाचित् नहीं होता.
हे मुनीश्वर ! यह महामूर्ख अवस्था है इस अवस्थावाला कबहुं
कहता है कि हे पिता ! मुझको बर्फ का टुकडा भूनि दे.कबहूं कह
ता है-मुझको चंद्रमा उतार दे, ये सब मूर्खताके वचन हैं. ताते ऐसी
मूर्खावस्थाको मैं अंगीकार नहीं करता. जैसे दुःखका अनुभव बाल
कको होता है, यह हमारे स्वप्नमेंभी नहीं आया. तात्पर्य यह कि-
बाल्यावस्थामें बडा दुःख है. यह बाल्यावस्था अवगुणका भूषण है
सो अवगुणकरके शोमती है ऐसी नीच अवस्थाको में अंगीकार नहीं
करता इसकी स्तुति करनी सो मूर्खता है इसमें गुण कोई भी नहीं है,
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे बाल्यावस्थानिंदावर्णन
नामैकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥

२०] (६९) वैराग्यप्रकरणे-युवानिन्दावर्णनम् । विंशः सर्गः २०॥ अथ युवानिन्दावर्णनम् । श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर !दुःखरूप बाल्यावस्थाके अन- तर जो युवा अवस्था आती है, सोनीचते ऊंची चढ़ती है,सोभी उत्त- म गिनेके निमित्त नहीं है, अधिक दुःखदायक है. जब युवा अवस्था आती है, तब कामरूपी पिशाच आय लगता है. सो कामरूपी पि- शाच युवाअवस्थारूपी गडेलेमें आय स्थित होताहै, चिच फिराता है अरु इच्छामें पसरता है। जैसे सूर्यके उदय हुये सूर्यमुखी कमल खिल आताहै अरु पँखुरीनको पसारता है, तैसे युवाअवस्थारूपी सूर्य उदय होता है तब नानाप्रकारकी इच्छा स्फूरती हैं, अरु कामरूपी पिशाच इसको स्त्रीमें डार देता है, तहां परा दुःख पाता है जैसे को- ऊको अमिके कुंडमें डारि दिया होय अरु वह दुःख पाये, तैसे काम- के वश हुआ दुःखको पाता है. हे मुनीश्वर ! जो कछु विकार हैं सो सब युवाअवस्था आयके, प्राप्त हुए हैं. जैसे धनवानको देखके निर्धन सब लोक धनकी आशा करतेहैं, तैसे युवाअवस्थाको देखकर सब दोष आय, इकट्ठे होते हैं. अरु जो भोगको सुखरूप जानकर भोगकी इच्छा करता है सो परम. दुःखका कारण है जैसे मद्यका घट भरा हुआ देखनेमात्रमें सुंदर ल- गता है, परंतु जब उसका पान करे तब उन्मत्त होय जाय,तिस उन्म- चता करके दीन होजाता है अरु निरादरको पाता है तैसे यह भोग देखने मात्रमें सुंदर भासता है परन्तु जब इसको भोगता है तबतृष्णा- कर उन्मत्त होजाता है अरु पराधीन होय जाता है. हे मुनीश्वर ! यह काम, क्रोध, लोभ, मोह, व अहंकार ये सब जो चोर हैं, सो युवारूपी रात्रिको देखकर लूटने लगते हैं अरुआत्मज्ञा- [विंशः सर्गः (७०) योगवासिष्ठे। नरूपी धनको चोर लेजाता है, तिसकरके यह दीन हुआहोता है- रह पुरुष आत्मानंदके वियोगकरके दीन हुआ है. हे मुनीश्वर ! ऐसी जो दुःख देनेहारी युवाअवस्था तिसका में अंगीकार नहीं कर- ता. अरु शांति जो है, सो चित्त स्थिर करनेके लिये है सो चित्त युवा- अवस्थामें विषयकी ओर धावता है.जैसेवाण लक्ष्यकी ओर जाता है, तब उसको विषयका संयोग होता है सो विषयकी तृष्णा निवृत्त नहीं होती अरु तृष्णाके मारे जन्मते जन्मांतररूप दुःखको पाताहै. हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःखदायक युवाअवस्थाकी मुझको इच्छा नहीं है- हे सुनीश्वर ! जेते कछु दुःख हैं सो सव युवाअवस्थामें आय- कर प्राप्त होते हैं. काम, क्रोध, लोभ, मोह,अहंकार, चपलता इत्या- दिक जो दुःख हैं, सो सब युवाअवस्थामेंही स्थिर होते हैं. जैसे प्रलय कालमें सव रोग आय स्थिर होते हैं तैसे युवाअवस्थामें सब उप- द्रव आय मिलते हैं और क्षणभंगुर है. जैसे बिजुरीका चमका होके मिट जाता है, जैसे समुद्र में तरंग होते हैं अरु मिट जाते हैं, तैसे युवाअवस्था होके मिट जाती है. जैसे स्वप्नमें कोई स्त्री विका- रकरके छल जाती है तैसे अज्ञानकरके युवाअवस्था छल जाती है. हे सुनीश्वर ! युवाअवस्था जीवकी परमशत्रु है जो पुरुष इस शत्रुके शस्त्रसे बचे हैं, सो धन्य हैं. इसके शस्त्र काम, क्रोध हैं जो इनते छूटा है, सो वज्रके प्रहारकरकेभी छेदा न जावेगा. जो इनकरके वांधा हुआ है सो पशु है। हे मुनीश्वर युवावस्था देखनेमें तो सुंदर है परन्तु अंतरते तृष्णा- करके जर्जरीभूत है.जैसे वृक्ष देखने में तो सुंदर होय अरु अंतरते घुन लगाहुआ है, तैसे युवावस्था जो भोगके निमित्त यत्न करती है सो भोग आपात रमणीय है. कारण यह कि, जबलग इंद्रिय अरु विष- यका संयोग है, तबलग अविचारित भला लगता है, अरु जब वि- १ २०] वैराग्यप्रकरणे-युवानिंदावर्णनम् । (७१) योग हुआ तबदुःख होता है. ताते भोगकरके मूर्ख प्रसन्न होते हैं अरु उन्मत्त होते हैं. तिनको शांति नहीं होती. अरु अंतरते सदा तृष्णा रहती है. स्त्रीमें चित्तकी आसक्ति रहती है. जब इष्ट वनिताका वियोग होता है, तब तिसके स्मरणसे जलता है. जैसे वनका वृक्ष अमिकरके जलता है तैसे युवावस्थामें इष्टवियोगकरके जीव जलता है. जैसे उन्मत्त हस्ती सांकरकरके बंधन पाता है, तब स्थिर होता है, कहूं जाय नहीं सक्ता; तैसे कामरूपी हस्ती है, तिसको साकररूप युवा- अवस्था बंधन करती है अरु युवावस्थारूपी नदी है, तिसमें इच्छा- रूपी तरंग उठते हैं सो कदाचित् शांतिको नहीं पाते हैं. अरु हे सुनीश्वर ! यह युवावस्था बड़ी दुष्टहै. कोऊबड़ा बुद्धिवान होवे अरु सदा निर्मल प्रसन्न होवे; एते गुणकरके संपन्न होवे, तिसकी बुद्धिकोभी युवावस्था मलिन कर डालती है. जैसे निर्मल जलकी बड़ी नदी होवे, अरु जब वर्षाकाल आवे, तब मलीन होय जावे, तैसे युवावस्था बुद्धि मलीन हो जाती है. हे मुनीश्वर ! शरीररूपी वृक्ष है, तिसमें युवावस्थारूपी वल्ली प्रगट होती है; सो पुष्ट होती है, तिसपर चित्तरूपी भँवराआय बैठता है; अरु तृष्णारूपी तिसकी सुगंधकरके उन्मत्त होता है अरु सब विचार भूल जाता है. जैसे जब प्रबल पवन चलता है, तब सूखे पत्रको उड़ाय लेजाता है अरु रहने नहीं देता; तैसे युवावस्था आवती है, । तब वैराग्य संतोषादि गुणोंका अभाव करती है अरु दुःखरूपी कमलका युवावस्थारूपी सूर्य है.युवावस्थाके उदयतेसबदुःख प्रफुल्लित हो आते हैं, ताते सब दुःखका मूल युवावस्था है. जैसे सूर्यके उदयते सूर्यमुखी कमल खिल आते हैं, तैसे चित्तरूपी कमल संसार- रूपी पंखुरी अरु सस्यरूपी सुगंधकरके खिल आता है. अरु तृष्णा- रूपी भौरा तिसपर आय बैठता है अरु विषयकी सुगंध लेता है। -- [विंशः सर्गः . (७२) योगवासिष्ठे। हे मुनीश्वर ! संसाररूपी रात्रि है, तिसमें युवावस्थारूपी तारागणं प्रकाशते हैं. कारण यह जो शरीर युवावस्था करि सुशोभित होता है अरु युवावस्था शरीरको जर्जरीभाव करके होआती है. जैसे धानका छोटा वृक्ष हरा तब लग रहता है, जवलग उसको फूल नहीं आया; जब फूल आते हैं, तब सूखनेको लगता है,अरु अन्नके कण परिपक्व होते हैं तब अन्नके छोटे वृक्ष जर्जरभावको पाते हैं, उसकी हरियाली नहीं रह सक्ती- तैसे जबलग जवानी नहीं आई, तवलग शरीर सुंदर कोमल रहता है. जब जवानी आई तव शरीर क्रूर हो जाता है. फेर परिपक्व होकर क्षीण होजाता है. अरु वृद्ध होता है. ताते हे मुनीश्वर ! ऐसी दुःखकी मूलरूप युवावस्था है तिसकी मुझको इच्छा नहीं. जैसे समुद्र बड़े जलकरके पूर्ण है, तरंगको पसा- रता है अरु उछलता है तोभी मर्यादाका त्याग नहीं करता.ईश्वरकी आज्ञा मर्यादामें रहनेकी है अरु लोककी मर्यादा मेटके चलती है, अरु इस अवस्थावालोंको अपना विचार नहीं रहता.जैसे अंधकारमें पदार्थका ज्ञान नहीं होता, तैसे युवावस्थामें शुभ अशुभका त्याग नहीं होता. जिसको विचार नहीं रहा तिसको शांति कहांसे होवे ? सदा व्याधितापमें जरा रहता है. जैसे जलविना मच्छको शांति नहीं होती, तैसे विचारविना सदा पुरुष जलता रहता है. जब युवावस्थारूपी रात्रि आती है, तब कामपिशाच आयके गर्जता है. तिसकरके इसको यही संकल्प उठते हैं. जो कोऊ कामी पुरुष आवे, तिसके साथमें यही चर्चा करे-हे मित्र!वह कैसी सुंदर है? अरु कैसे उसके कटाक्ष हैं ? सो किस प्रकार मोंको प्राप्त होय ? हे मुनीश्वर ! इस इच्छाके साथ वह सदा जरता रहता है. जैसे मरुस्थ- लकीनदीको देख मृगदौरता है अरुजलकी अप्राप्तिकरके जलता है,ते- सेकामी पुरुष विषयकी वासनाकरकेजलताहै अरुशांतिनहीं पाता है. , २०.] वैराग्यप्रकरणे-युवानिंदावर्णनम् । (७३) हे मुनीश्वर ! मनुष्यजन्म उत्तम है, परंतु जिनकी अभाग्य है तिनको, विषयते आत्मपदकी प्राति नहीं होती. जैसे चिंतामणि कोईको प्राप्त होवे, तो तिसका निरादर करे और उनको जाने नहीं और डारि देवे, तैसे जिन पुरुषोंने मनुष्यशरीर पाय कर, आत्म- पद नहीं पाया, सो बड़े अभागी हैं. अरु मुर्खताकरके अपने जीव- नेको व्यर्थ खोय डारते हैं अरु युवावस्थामें परमदुःखका क्षेत्र अ- पने निमित्त बोता है अरु जेते विकार युवावस्था में हैं, सो आयके इसको प्राप्त होते हैं. मान, मोह, मद इत्यादि विकारोंकरके पुरुषा- र्थका नाश करता है, हे मुनीश्वर ! ऐसे युवावस्था बड़े विकारको प्राप्त करती है. जैसे नदी वायुसों अनेक तरंग पसारती है, तैसे युवा- वस्था चित्तके अनेक कामको उठाती है. जैसे पंखी पंखोंकर, बहुत उड़ता है, जैसे सिंह भुजाके बलसों पशुको मारनेको दौड़ता है, तैसे चित्त युवावस्थाकरके विक्षेपकी ओर धावता है. हे मुनीश्वर!समुद्रका तरना कठिन है. काहेते कि-तामें जल अ- थाह है अरु विस्तारभी बड़ा है अरु तिसमें मच्छ, कच्छ, मगर बड़े देहधारी रहते हैं. ऐसे दुस्तर समुद्रका तरना सो मैं सुगम मानता हूं, परंतु युवावस्थाका तरना महाकठिन है; कारण यह कि, युवावस्थामें निर्दोष रहना कठिन है; ऐसी संकटवारी जो युवावस्था है, तिसमें चलायमान नहीं होते सो पुरुष धन्य हैं अरु वंदना करनेयोग्य है, हे मुनीश्वर ! यह युवावस्था चित्तको मलीन कर डारती है. जैसे जलकी बावरी है, तिसके निकट राख काटे रहे होय, सो पवन च- लनेते सब आय बावरीमें गिरें, तैसे पवनरूपी युवावस्था दोषरूपी धूर काटनेको चित्तरूपी बावरीमें डारके, मलीन कर देती है. ऐसे अवगुणकरके पूर्ण जो युवावस्था, तिसकी इच्छा मुझको नहीं है. हे युवावस्था। मेरेपर यही कृपा करनी, जो तेरा दर्शन नहीं होवे; तेरा आफ्ना में दुःखका कारण मानता हूं. जैसे पुत्रके मरणका संकट (७४) योगवासिष्ठे। [एकविंशः सर्गः पिता शोष नहीं सकता, अरु सुखका निमित्त नहीं देखता; तैसे तेरा आना में सुखका निमित्त नहीं देखता. ताते मुझपर दया करनी, जो अपना दर्शन न होवे. हे मुनीश्वर ! युवावस्थाका तरना महाकठीन है. जोकोऊ यौवन- वान् हो, सो नम्रतासंयुक्त होने, और शास्त्रके गुण, वैराग्य, विचार, संतोष, शांति, इनकरके संपन्न होवे सो दुर्लभ है. जैसे आकाशमें वन होता आश्चर्य है, तैसे युवावस्थामें वैराग्य, विचार, शांति और संतो- प पाना यह बड़ा आश्चर्य है. ताते मुझको सोई उपाय कहो, जिसक- रके युवावस्थाके दुःखकी मुक्ति हो जाय अरु आत्मपदकी प्राप्ति होय. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे युवानिंदा- वर्णनं नाम विंशः सर्गः ॥२०॥ एकविंशः सर्गः२१॥ अथ स्त्रीनिंदावर्णनम्। हे मुनीश्वर ! जिस कामविलासके निमित्त स्त्रीकी वांछा करता है, सो स्त्री अस्थि, मांस, रुधिर, मूत्र और विष्ठाकरि पूर्ण है; इसीकी पूतरी बनी हुई है. जंत्रीकी बनी पूतरी होती है, सो तागेसों अनेक चेष्टा करती है; तैसे यह अस्थि-मांसादिककी पुतरीमें कछु और नहीं है.जो विचारकर नहीं देखतातिसको रमणीय दीखती है. जैसे पर्वतके शिखर दूरते सुंदर अरु निकटते असार हैं, पड़े पत्थरही दीखते हैं, तैसे स्त्री वस्त्र अरु भूषणसों सुंदर मासती है अरु जो अ- गको भिन्न भिन्न विचार कर देखो तो सार कछु नहीं है. जैसे नाग- नीके अंग बहुत कोमल होते हैं, परंतु उसका स्पर्श करो तो काटके मार दारती है, तैसे जो कोई स्त्रीको स्पर्श करते हैं, तिनको नाश कर २१.] वराग्यप्रकरणे-स्त्रीनिंदावर्णनम्। (७५) डारती है जैसे विषकी बेलिदेखनेमात्र सुंदर लगती है, परंतु स्पर्श कि- येतेभारारती है,जैसे हस्तीको जंजीरसेबांघो तब जिस बारपैरहता है,तहांही स्थिर रहता है, तैसे अज्ञानीका जो चित्तरूपी हस्ती है, सोकामरूपी जंजीरसे बंधा हुआस्त्रीरूपी एक स्थानमें स्थित रहता है; वहांते कहूं जाय नहीं सक्ता और जब हस्तीको महावत अंकुशका प्रहार करता है. तब बंधनको तोरके निकस जाता है, तैसे यह विचरूपी मूर्ख हस्ती हैसो महावतरूपी गुरुके उपदेशरूपी अंकुशका वारंवार प्रहार पाता है, तब सोभी निबंधन हो जाता है. हे मनीश्वर ! कामी पुरुष जो स्त्रीकी वांछा करता है सो अपने नाशके निमित्त करता है, जैसे कदलीवनका हस्ती,कागज़की हस्तिनी देखकर, छल पायके बंधनमें आता है,ताते परमदुःख पाता है; तैसे परमदुःखका मूलस्त्रीका संग है हे मुनीश्वर! जैसे वनके दाहकी अमिः सबको जलावती है, तैसे स्त्रीरूपी अमितिससे अधिक है काइते जो. उस अभिके स्पर्श कियेते तप्त होते हैं, और स्त्रीरूपी अमि तो स्मरण मात्रमें जलाती है.और जोसुख रमणीय दिखाता है सो आपातरमणी य है.जबस्त्रीके सुखका वियोग होता है,तब मुद्देकी नाई होजाता है. तिस काल (स्त्रीसंयोगकाल) में भी शव (मुही) जैसा हो जाता है.. हे मुनश्विर! यह तो अस्थि, मांस, और रुधिरका पिंजरा है, सो. अमिमें भस्म होजायगा अथवा पशुपक्षीको खानेका आहार होयगा. जिसको देखकर पुरुषप्रसन्न होताहै,तिसके प्राणआकाशमें लीन हो- जाते हैं,ताते इस स्त्रीकी इच्छा करनी सो मूर्खता है जैसे अमिकीवा- लाके ऊपरश्यामता है,तैसे स्त्रीकेशीशऊपर श्याम केश हैं; जैसे अमिके स्पर्श कियेते जलता है,तैसे स्त्रीके स्पर्श कियेते पुरुष जलते हैं.ताते जल नदोनोंमेंतुल्य है.हेमुनीश्वर!इस पुरुषको नाश करनहारी स्त्रीरूपी अमि 'है, जो स्त्रीकी इच्छा करते हैं सो महामूर्ख अज्ञानी है.सोअपने नाशके.

[एकविंशः सर्गः (७६) योगवासिष्ठे। निमित्त इच्छा करतेहैं. जैसे पतंग अपने नाशकेनिमित्त दीपकी इच्छा करते हैं, तैसे कामी पुरुषअपनेनाशके निमित्त स्त्रीकी इच्छा करते हैं। हे मुनीश्वर! स्त्रीरूपी विषकी बेलि है,अरु हस्त पावके अग्रतिसके पत्र हैं, अरुभुजा डाली हैं, और अस्थिरूप गुच्छे हैं, नेत्रादिकइंद्रिय तिसके फूल हैं अरु कामीपुरुषरूपी मोरे आय बैठते हैं अरु कामरूपी धीवरने स्त्रीरूपी जाल पसारा है, तिसपर कामी पुरुषरूपी पक्षी आय फँसते हैं. कामरूपी धीवर तिसको फंसायकर परमकष्ट प्राप्त करता है. ऐसे दुःखके देनहारी स्त्रीकी जो वांछा करते हैं, सो महामूर्ख हैं. हे मुनीश्वर स्त्रीरूपी सर्पिणी है, जब तिसका फुकारा निकसता है, तबतिसके निकट कमलफूल जब जल जाते हैं, ऐसी स्त्रीरूपी सर्पिणी है तिसका इच्छारूप पुकारा जब निकसता है तब वैराग्यरूपी कमल जल जाते हैं अरु जब सर्पिणी इसती है तब विष चढ़ताहै और स्त्री- रूपी सर्पिणीकी चितौनी करी तब अंतरते आपही विष चढ़ जाता है. हे मुनीश्वर जैसे व्याध छलकर मच्छीको फंसाता है, तैसे कामी पुरुष मच्छीवत् सुंदर स्त्रीरूपी जाल देखके फँसता है, और स्नेहरूपी तागेसों कामी पुरुष बंधन पाय,खेंचाया चलाजाता है.फिर तृष्णारूपी छूरीसों काम मार डारता है.हे मुनीश्वर! ऐसे दुःखके देनहारी स्त्रीकी मुझको इच्छा नहीं. अरु कामरूपी पारधी है, तिसते रागरूपी इंद्रि- यसों जाल बिछाय कामी पुरुषरूपी मृगकोआसक्त कर डारता है.अरु स्त्रीतो स्नेहरूपी डोरी है; तिसकर कामी पुरुषरूप बेलसों बँधा है अरु स्त्रीका मुखरूपी जो चंद्रमा है तिसको देखकर, कामी पुरुष रूप कम- लिनी खिल आती है; जैसे चंद्रमुखी कमल चंद्रमाको देखकर प्रसन्न होते हैं और सूर्यमुखी नहीं होते, तैसे यह कामी पुरुष भोगहूकर प्रसन्न होते हैं अरु ज्ञानवान प्रसन्न नहीं होते हैं. जैसे नकुल सर्पको विलमेंते निकासके मारता है, तैसे कामी पुरुषको स्त्री आत्मानंद-

१.]
(७७१
वैराग्यप्रकरणे-सीनिंदावर्णनम् ।
मेंतेनिकालके मार डारती है. जबस्त्री के निकट जाता है, तब उसको
भस्म कर डारती है. जैसे सूखे तृण अरु घृतकोअनि भस्म करडारती
है, तैसे कामी पुरुषको स्त्रीरूपी नागिनी भस्म कर डारती है.
हे मुनीश्वर! स्त्रीरूपी जो रात्रि है, तिसका स्नेहरूपी अंधकार है,
तिसमें काम-क्रोधादिक उलूक अरु पिशाच हैं. हे मुनीश्वर ! जो स्त्री-
रूपी खड्गके प्रहारते युवारूपी संग्रामते बचा है, सो पुरुष धन्य है, ति-
सको मेरा नमस्कार है.स्त्रीका संयोग परमदुःखका कारण है, ताते मु-
झको इसकी इच्छा नहीं. हे मुनीश्वर ! जो रोग होता है, तिसके अनु-
सार औषधि करता है, तब रोग निवृत्त होता है. अरु कोऊ कुपथ्य
दिये वाका प्रबल होता है अरु रोग बढ़ जाता है, ताते मेरे रोगके.
अनुसार औषधि करो.
सो मेरा रोग सुनिये जराअरु मृत्यु यह मुझको बड़ा रोगहै, तिस-
केनाशकी औषधि मुझको दीजिये और स्त्रियादिक जो भोग हैं, सो
सब इस रोगके वृद्धिकर्ता हैं जैसे अनिमें घृत डारिये, तब वह बढ़ जाती
है,तैसे भोगसों जरा-मृत्युआदि रोग बढ़ते हैं, ताते इसरोगकी नि-
तिका औषध करो, नहीं तो सबका त्याग कर वनमें जाय रहूंगा.
हे मुनीश्वर! जिसके स्त्री है तिसको भोगकी इच्छाभी होती है और
जिसके स्त्री नहीं तिसको स्त्रीकी इच्छाभी नहीं जिसने स्त्रीका त्याग
किया है तिसने संसारकाभी त्याग किया है, सोई सुखी है. संसारका
बीज स्त्री है, ताते मुझको स्त्रीकी इच्छा नहीं, मुझको सोई औषधि.
दीजिये जिसते जरा मृत्यु आदि रोगोंकी निवृत्ति हो.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे स्त्रीनिंदावर्णनं
नामैकविंशः सर्गः ॥ २१ ॥

[दाविंशः सर्गः (७८) योगवासिष्ठे। हाविंशः सर्गः २२। अथ जरावस्थानिंदावर्णनम् । श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर ! बाल्यावस्था तोमहाजड है अरु अशक्त है और जब युवावस्था आती है, तव बाल्यावस्थाको अ- हण कर लेती है.तिसकोअनंतर वृद्धावस्थाआती है,तब शरीर जर्जरी- भूत होजाता है अरुबुद्धि क्षीण होजाती है; बहुरी मृत्युको पाता है. हे मुनीश्वर ! इसप्रकार अज्ञानीका जीवनाव्यर्थ है, कछु अर्थकी सिद्धि नहीं होती है.जैसे नदीके तटपर वृक्ष होते हैं सो जलके प्रवाह करके जर्जरीभूत होजाते हैं, तैसे वृद्धावस्थामें शरीर जर्जरीभूत होजाता है, जैसे पदलों पत्र उड़ जाता है, तैसे वृद्धावस्था में शरीर नाशपाता है. जेते कछु रोगहैं, सो सब वृद्धावस्थामें आय प्राप्त होते हैं, अरुशरीर कृश होय जाता है.अरुस्त्रीपुत्रादिक सब वृद्धका त्याग करदेते हैं जैसे पक्के फलको वृक्ष त्याग देता है, तैसे वृद्धको कुटुंब त्याग देता है, अरु देखरहँसते हैं. जैसे बावरेको देखते हँसके बोलते हैं कि इसकी बुद्धि सब जाती रही,जैसे कमलफूलनके ऊपर बर्फपड़ता है अरुकाल जर्ज- रीभूत होते हैं, तैसे जरावस्थामें पुरुषजर्जरीभावको प्राप्त होता है.अरु शरीर कुवरा होजाताहै,केश श्वेत होजाते हैं शक्तिक्षीण होजाती है. जैसे चिरकालका बड़ा वृक्ष होता है, तिसमें धुन होता है, तैसे शक्ति कड रहती नहीं. हे मुनीश्वर! और हू सब प्रकृति क्षीण होजाती है, परंतु एक आ- सक्तिमात्र रहती है, जैसे बड़े वृक्षपै उलूक आय रहते हैं तैसे इसमें “क्रोधशक्ति आय रहती है; और शक्ति सब क्षीण होजातीहै. हे मुनी- श्वर ! जरावस्था दुःखका घर है. जब जरा अवस्था आती है. तब सब दुःख इकठे होते हैं; तिनकर महादीन होजाते हैं अरु युवावस्थाका जो कामका बल रहता है, सो जरामें क्षीण होजाता हैअरुइंद्रियोंकी २२.] वैराग्यप्रकरणे-जरावस्थानिंदावर्णनम् । (७९) आसक्ति घट जाती है, तिसते चपलताका अभाव होजाता है. जैसे पिताके निर्धन हुवे पुत्र दीन होजाता है, तैसे शरीर निर्बल हुवे इंद्रि- यहू निर्बल होजाती हैं और एक तृष्णा उन्मत्त हो बढ़ जाती है. हे मुनीश्वर !जब जरारूपी रात्रि आती है, तब खाँसीरूपीगीदड़ी आय शब्द करती है अरु आधिव्याधिरूपीउलूक आय निवास करते हैं.हे मुनीश्वर! ऐसीजोनीच वृद्धावस्था है, तिसकी मुझको इच्छा नहीं. यह देह जरा आयेते कूबरी होय जाती है. जैसे पक्के फलनसों वृक्ष झुक जाता है, तैसे जराके आयेते देह कूबरी होजाती है. जो युवावस्था में स्रीपुत्रादिक चाहते थे, अरु टहल करतेथे, सो सब उसको त्याग देते हैं. जैसे, वृद्ध बैलको बैलवारा त्याग देता है, तैसे इसको बंधु त्याग देते हैं, और देखके हँसते हैं अरु अपमान करते हैं. तिनको ऊंटकी नाई भासता है. हे मुनीश्वर! ऐसी जो नीच अवस्था है तिसकी मुझको इच्छा नहीं अब जो कछु कर्तव्य मुझको कहो सो में करूं. इस शरीरकी तीनों अवस्थाओंमें कोऊ सुखदाई नहीं है, क्योंकि, बाल्यावस्था महामूढ़ है अरु युवावस्था महाविकारवार है अरु जरा- अवस्था महादुःखका पात्र है. बाल्यावस्थाको युवावस्था ग्रहण कर लेती है अरु युवावस्थाको जरावस्था ग्रहण कर लेती है अरु जरा अवस्थाको मृत्यु ग्रहण कर लेता है. यह अवस्था सब अल्पका- लकी हैं. इनके आश्रयकरके मेरेको कहां सुख होना है? ताते मुझको सोई उपाय कहो, जिसकर इस दुःखसे में मुक्त होजाऊँ. हे मुनीश्वर! जबजराअवस्था आती है, तब मरनाभी निकट आता है. जैसे, संध्याके आये रात्रितत्काल आयजाती है औरजो संध्याके आये दिनकी इच्छा करते हैं सोमहामूर्ख हैं, तैसे जराकेआयेजीवनकी आशारखनी सोमहामूर्खता है हे मुनाश्वर! जैसे बिल्ली चितौनी करती है, जो चूहा आवे तो पकर लेऊ, तैसे मृत्यु चितवती है कि जरा (८०) योगवासिष्ठे। [दाविंशः सर्गः अवस्था आवे तो में इसका ग्रहण कर लेऊँ अरु जरा अवस्था मानो कालकी सखी है. रोगरूपी मशालेकर शरीररूपी मासको सुखाती है तब काल जो इसका स्वामी है सो आयकर, भोजन करलेता है, अरु शरीररूपी घर है, तिसका स्वामी काल है. जब काल घरमें आवे, तब तिसके आगे तीन पटरानी आती हैं.पहिली अशक्तता; दूसरी अंगमें पीड़ा, और तीसरी खासी सो शीघ्र श्वासको चलावती हैं अरु श्वेत केश होते है सो चमरकी नाई झुलते हैं ऐसी जो कालंकी सहेली हैं सो प्रथमही आई प्रवेश करती हैं अरु जरारूपी कलगी शरीरको बनाती है तब जोवाका स्वामी कालहेसो आय प्रवेश करताहै हे मुनीश्वर!जो परमनीच अवस्था है सो जराकी है सो जब आती है तब शरीर जर्जरीभूत कर देती है, कॅपानेको लागती है अरु शरी- रको निर्बल कर देती है अरु क्रूर कर देती है जैसे कमलपर वर्फकी वर्षा होवेअरु जर्जरीभूत होय जाय तैसे शरीरको जिरीभूत करडारती जैसे बनमें बाधिन आयके शद करती है अरु मृगका नाश करती है. तैसे खासीरूपी बाधिन आपक मृगरूपी बलका नाश करती है. हे मुनीश्वर ! जब आती है तब मृत्यु प्रसन्न होती है. जैसे चंद्र- माके उदयते कमलिनी खिल आती है तैसे मृत्यु प्रमन्न होती है. अरु यह जरा अवस्था बडी दुष्ट है बडे बडे योद्धा हुए हैं तिनकोभी इसने दीन कर दिया है.यद्यपि बडे शूरभावोंने संग्राममें शत्रुओंको जीते हैं, सो उनकोहूजराने जीतलिये हैं अरु जिन्होंने बड़े पर्वत चूर्ण करडारे हैं तिनकोहू जरापिशाचिनीने महादी कर न दिये हैं यह जरारूपी जो राक्षसी है, तिसने सबको दीन कर दिये हैं सो सबको जीतनेवारी है. हे मुनीश्वर! यह जराशरीरको अमिकी नाई लगती ह.जैसे अमि वृक्षको लगता है अरु धूम निकलता है, तैसे शरीररूपी वृक्षमें जरा- रूपी अमि लगके, तृष्णारूपी धुवा निकसताहै जैसे डब्बेमें बड़े रत्न २३.1 वैराग्यप्रकरणे-कालापवादवर्णनम् । (८१) रहते हैं, तैसे जरारूपी डब्बेमें दुःखरूपी अनेकरत रहते हैं, अरु जरा- रूपी वसंतऋतु है, तिसकरके शरीररूपी वृक्ष दुःखरूपी रसकरके पूर्ण होता है जैसेहस्ती सांकरसों बँधा हुआ दीन होजाता है तैसे जरारूपी सांकर करेकबघाहुआ पुरुषदीन हो जाता है, अरु अंगसब शिथिल होजाते हैं. बल क्षीण हो जाता है. अरुइंद्रियांभी निर्बल हो जाती हैं अरुशरीरजर्जरीभावको प्राप्त होता है; परंतु तृष्णा नहीं घटती है; नित्य बढ़ती चली जाती है. जैसे रात्रि आती है तब सूर्यमुखी कमल सब मूंद जाते हैं तब पिशाचिनी आय, विचरने लगती है अरु प्रसन्न होती है, तैसे जरारूपी रात्रिके आयेते सब शक्तिरूपी कमल मूंद जाते हैं अरु तृष्णारूपी पिशाचिनी प्रसन्न होती है. हे मुनीश्वर!जैसे गंगाके तटपर वृक्ष रहते हैं, सो गंगाजलके वेग- सों जर्जरीभूत होजाते हैं, तैसे जो आयुरूपी प्रवाह चलता है, तिसके वेगकर शरीर जर्जरीभूत हो जाता है. जैसे मांसके टुकड़ेको देख,आ- काशते उड़ती चील नीचे आय ले जाती है, तैसे जराअवस्थामें शरी- ररूपी मांसको काल ले जाता है. हे मुनीश्वर ! यह तो कालका प्रास बना हुआ है. जैसे सुंदर वृक्षको हस्ती खायजाता है तैसे जरा अव- स्थावारे शरीरको काल देखके भोजन कर जाता है. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जरावस्थानिन्दानिरूपण नाम द्वाविंशः सर्गः ॥ २२ ॥ . त्रयोविंशः सर्गः २३॥ अथ कालापवादवर्णनम् । श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर ! संसाररूपी गर्त है, तिसमें अ. ज्ञानी नर गिरा है.सोसंसाररूपी गर्तअल्प है अरुअज्ञानी तो बड़ा हो [त्रयोविंशः सर्गः (८२) योगवासिष्ठे। गया है। संकल्प-विकल्पकी आधिक्य ताते वडे हैं अरु जो ज्ञानवान् पुरुष हैं सो संसारको मिथ्या जानते हैं. फिर संसाररूपी जालमें फँ- सते नहीं हैं, अरु जो अज्ञानी पुरुष हैं सो संसारको सत्य जानकर,सं- सारकी आस्थारूपी जालमें फँसता है, अरु संसारके भोगकी वाछा करता है सो ऐसे-जैसे दर्पणमें प्रतिर्विव देखकर वालक पकरनेकी इच्छा करता है,तैसे अज्ञानी संसारको सत्य जानकर जगत्के पदार्थको वांछा करता है, कि यह मेरेको होवे; यह मेरेको नहीं होवे अरु यह जो सुख है सो नाशात्मक है. अभिप्राय यह कि, जो आते हैं अरु जाते हैं सो स्थिर नहीं रहते हैं। इनका काल ग्रहण करता है. जैसे पक्के अ- नारको चूहा खाय जाता है, तैसे सब पदार्थोंको काल खाता है। हे मुनीश्वर !जेते कछु पदार्थ हैं, सो कालग्रसित हैं, बड़े बड़े सुमेरु जैसे गंभीर बलवारे पुरुषोंको पास कालने किये हैं। जैसे सर्पको नकुल भक्षण करजाता है, तैसे बड़े बलीका ग्रास काल करजाता है, अरु जगतरूपी एक गूलरका फल है,तिलका जो मजा है, सो ब्रह्मा, दिक हैं,सो फलका जो वृक्ष है अरु तिसकाजो वन है सोब्रह्मरूप है, तिस ब्रह्मरूप वनमें जेते कछु बन हैं सो इसका आहार है, सवका, भक्षण काल करजाता है. हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है; जो कछु देखनेमें आता है, सो सव इसने पास कर लिया है तव औरकी कहा कहानी है? और हमारे जोवड़े ब्रह्मादिक तिनकाभी काल ग्रास करजाता है, जैसे, मृ. गका ग्रास सिंह कर लेता है और काल किसी करके जाना नहीं जाता. छिन, घरी, प्रहर, दिन, मास और वादिककर जानिय सो काल है और कालकी मूर्ति प्रगट नहीं है, ऐसा अप्रगटजप है अरु किसीकी स्थिति होने नहीं देता, अरु एक वेलि कालने पु- सारी है और तिसकी त्वचा रात्रि है अरु फूल तिसका दिन है अरु जीवरूपी भौरे तिसपर आय बैठते हैं, २३. ] वैराग्यप्रकरणे-कालापवादवर्णनम् । (८३) हे मुनीश्वर! जगरूपी गूलरका फल है, तिसमें जीवरूपी मच्छर । बहुत रहते हैं, तिस फलका भक्षण काल कर जाता है. जैसे अनारका भक्षण तोता करता है, तैसे काल भक्षण करता है. अरुजगवरूपी वृक्ष है अरुजीवरूपी तिसके पत्र हैं,तिसका कालरूपी हस्ती भक्षण कर जा- ता है अरु शुभअशुभरूपी भैंसेनको कालरूपी सिंह छेदछेदके खाता है। हे मुनीश्वर ! यह कालमहाक्रूर है, सो किसीपर दया नहीं करता, सबका भोजन कर जाता है. जैसे मृग सब फूलनको खाय जाता है,ति- सके कोऊ रहता नहीं है, परंतु एक कमल उसते बचे हैं. सो कमल कैसा है?शांति अरु मैत्री तिसके अंकुर हैं अरु चेतनामात्र प्रकाश है,इस का- रणंतेवह बचा है, सो कालरूपी मृग इसको पहुँच नहीं सकता. इस- से प्राप्त हुवा कालभी लीन होजाता है और जेता कछु प्रपंच है, सो सब कालके मुखमें है. ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, कुबेर आदिकर सब मूर्ति कालकी धरी हुई हैं: फिर तिनकोभी अंतर्ध्यान करदेता है हे मुनी- श्वर ! उत्पत्ति, स्थिति अरु प्रलय सब कालते होते हैं. अनेक महा- कल्पकाहू ग्रहण करलेता है, अरु अनेक बेर करेगा, अरु कदाचित होनहारीहू नहींः जैसे अमि घृतकी आहुतिनसो तृप्त नहीं होता, तैसे जगत् अरु सब ब्रह्मांडका भोजन करतेहू काल तृप्त नहीं होता, अरु इसका ऐसा स्वभाव है, जो इंद्रको दरिद्री कर देता है अरु दरिद्रीको इंद्र कर देता है और सुमेरुको राई बनाता है अरु राईका सुमेरु करता है। सबते बड़े ऐश्वर्यवारेको नीच कर डारता है.सबते नीचको उंचा करें डारता है, अरु बूँदको समुद्र कर डारता है अरू समुद्रको बूंद करता है ऐसी शक्ति कालमें है। अरु जीवरूपी जो मच्छ है, तिसको शुभाशुभ कर्मरूपी रेसों छेदता रहता है। फिर कैसा है ? जो कालकूपका चक्र है, जीवरूपी हंडीको शुभ अशुभ कर्मरूपी रस्सीसों बांधकर ले फिरता है. फिर कैसा है ? जीवरूपी वृक्षको रात्रि अरु दिनरूपी कुल्हारा कर छेदता है.

(८४) योगवासिष्ठे। [त्रयोविंशः सर्गः हे मुनीश्वर ! जेता कछु जगदिलास भासता है, सो सवका ग्रहण काल कर लेवेगा अरुजीवरूपी रत्नका काल डव्वा है,सो अपने उद- रमेंडारता जाता है और खेल करता है, अरुचंद्रसूर्यरूपी गेंदको कवहूं उर्ध्व उछालता है, कबहूं नीचे डारता है, अरु जो महापुरुष है सो उत्पत्तिप्रलयमें जे पदार्थ हैं, तिनमें स्नेह किसीके साथ नहीं करते; तिसका नाश करनेको काल समर्थ नहीं. जैसे मुंडोंकी माला महा- देवजी गरेमें धरते हैं, तैसे यहभी जीवोंकी माला गरेमें डारता है. हे मुनीश्वर ! जो बड़े बड़े बलिष्ठ हैं, तिनकोभी काल ग्रहण कर लेता है। जैसे समुद्र बड़ा है, तिसका वडवानि पान करलेता है और जैसे पवन भोजपत्रको उड़ाता है, तैसा कालका वल है. किसीकी सामर्थ्य नहीं, जो इसके आगे स्थित रहे: हे मुनीश्वर ! शांतिगुणप्राधान्य ओ देवता हैं, अरु रजोगुण- प्राधान्य जो बड़े राजा हैं अरु तमोगुणप्राधान्य जो दैत्य राक्षस हैं, तिनमें कोऊ समर्थ नहीं, जो इसके आगे स्थित होवे. जैसे टोकनी में अन्न अरु जल धरके अमिपर चढ़ाय दियेते फिर उछलते हैं सो अन्नके दोन कड़छीकरके कबहूँ ऊर्ध्व और कवहूं नीचे जाते हैं, तैसे जीवरूपी अनेक दाने जगतरूपी टोकनीमें परेहुए रागद्वेष- रूपी अमिपै चढ़े हैं अरु कर्मरूपी कडछीकरकेकवहूं उर्व जाता है, कवहूं नीचे जाता हैः हे मुनीश्वर ! यह काल किसीको स्थिर होने नहीं देता. महाकठोर है, दया किसीपर नहीं धरताः इसका भय मुझको रहता है, ताते सोई उपाय मुझको कहो, जिसकारके मैं कालतें निर्भय होजाऊं. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालापवादनिरूपणं नाम त्रयोविंशः सर्गः।

२४.] वैराग्यप्रकरणे-कालविलासवर्णनम् । (८५) चतुर्विंशतितमः सर्ग. २४॥ • अथ कालविलासवर्णनम् । श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर ! यह काल बड़ा बलिष्ठ है. जैसे राजाके पुत्र शिकार खेलने जाते हैं, तब बनमें बडे पशुपक्षी दे- खते हैं और मारते हैं, तैसे यह संसाररूपी बन है, तिसमें प्राणीमात्र पशु-पक्षी हैं. जब कालरूपी राजपुत्र तिसमें शिकार खेलने आता है तब सब कालरूपी राजपुत्र तिसकोही मारता है. हे मुनीश्वर ! यह काल महाभैरव है, वह सबका पास कर लेता है. प्रलयमें सबका प्रलय कर डारता है,अरुइसकी जोचंडिका शक्ति है, तिसका वडा उदर है, अरु कालिका सबका ग्रास करती है, पीछे नृत्य करती है, जैसे वनके मृगको सिंह अरु सिंहिनी भोजन करते हैं, और नृत्य करते हैं. तैसे जगतरूपी बनमें जीवरूपी मृगका भोजन करके काल अरु कालिका नृत्य करते हैं. बहुरि इनते जगतका प्रादुर्भाव होता है। नानाप्रकारके पदार्थनको रचते हैं. पृथ्वी, बगीचे बावरी-आदि सब पदार्थ इनहीते उत्पन्न होते हैं अरु सुंदर जीवकीहूं उत्पत्ति इनते होती है और एक समयमें उनका नाश भी कर देती है सुंदर समुद्र रचके, फिर वामें अनि लगाय देती है अरु सुंदर कमलको बनायके फिर वाके ऊपर बर्फकी बरसा करती है, इत्यादि नाना पदार्थनको रचिके तिनका नाश करती हैं: जहां बडे स्थान बसते हैं तिनको उजड करडारती है फिर उजाडमें बस्तीकर घरती है अरु नाशभी करती है स्थिर रहने किसीको नहीं देतीः जैसे बागमें बानर आयके, वृक्षको ठहरने नहीं देता तैसे कालरूपी वानर किसी पदार्थको स्थिर रहने नहीं देता. हे मुनीश्वर ! इस प्रकारसों सब पदार्थ कालसों जर्जरीभूत होते हैं.

(८६) योगवासिष्ठे। [पंचविंशः सर्गः तिसका मैं आश्रय किस रीतसों करूं ? मुझको तो नाशरूप भासता है, ताते अब मुझको किसी जगत्के पदार्थकी इच्छा नहीं, इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालविलासवर्णनं. नाम चतुर्विंशतितमः सर्गः ॥ २४ ॥ . पञ्चविंशतितमः सर्गः २५॥ अथ कालविलासवर्णनम्। श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर ! इस कालका महापराक्रम है- इसके तेजके सन्मुख रहनेको कोऊ समर्थ नहीं. क्षणमें ऊंचको नीच कर डारता है अरु नीचको उंच कर डारता है, तिसका निवारण कोऊ कर नहीं सक्ता. सब इसीके भयके परे कंपते हैं. यह महा- भैरव है, सव विश्वका पास कर लेता है, अरु इसकी चंडिकारूप शक्ति है सो बलवान है. नदीरूप है, तिसका उल्लंघन कोऊ नहीं कर सक्ता है अरु महाकालरूप काली है,तिसका बडा भयानक आ- कार है, अरु कालरूप जो रुद्र है, तिनते अभिन्नरूपी कालिका है सो सबका पान कर लेती है, पीछे भैरव अरुभैरविनी नृत्य करते हैं. सो वह कालकालिका कैसी है ? जिसका आकाशमें बडाशीश है; अरु जिसके पातालमें चरण हैं, दशोदिशा जिसकी भुजा हैं, सप्त समुद्र जिसके हाथमें कंकण हैं, संपूर्ण पृथ्वीरूपी तिसके हाथमें पात्र हैं, तिसके ऊपर जीव हैं सो भोजनयोग्य हैं, हिमालय अरु सुमेरु पर्वत दोनों कानमें बड़े रत्न हैं; चंद्रमा, सूर्य जिसके लोचन हैं, अरु सब तारागण वाके मस्तकमें विंदु हैं, अरु हाथमें त्रिशूल मुशल-आदि शस्र है अरु जिसके हाथमें तंद्रा फांसा है, तिसकरके जीवोंको मारती है. ऐसी जो कालिका देवी है, सो जीवका ग्रास करके महाभैरव

२५.] वैराग्यप्रकरणे-कालविलासवर्णनम् ।
(८७)
जो रुद्र है, तिनके आगे नृत्य करती है अरु अट्ट अट्ट' ऐसा शब्दक-
रती है अरु जीवका भोजन करके उनकी रुंडमाला गलेमें धारण करती
है; सो भैरवके आगे नृत्य करती है. अरु भैरव कैसे हैं? कि जिनके
सन्मुख रहनेकी शक्ति कोऊमें नहीं है अरु जहाँ उजार हैतां छिनमें
बस्ती करडालते हैं अरु जहां बस्ती होवे तहां छिनमें उजार करते हैं.
इसीते तिनका नाम दैव कहते हैं अरुतिनको कृतांतभी कहते हैं. का-
हते कि, बड़े २पदार्थ होते हैं अरु तिनका नाशभी करते हैं अरु स्थिर
किसीको रहने नहीं देते; तिसते तिनका नाम कृतांत है अरु नित्यरू-
पीहू यही हैं. जो इस आदि धरा है सोई करताअरु कर्मरूप है. काहेते
कि-परिणाम जिसका अनित्यरूप है, इसीते इसका कर्म नाम है; सो
कैसे नाश करता है? जब अभावरूपी धनुष्य हाथमें धरता है तिसकर
रागदोषरूपी बाण चलता है, तिस बाणते जर्जरीभूत करके, नाश
करता है अरु उत्पत्ति-नाशमें उसको यत्नभी कच्छ करना नहीं पडता
है. इसका यह खेल कैसा है ? जैसे बालक मृत्तिकाकी सेना बनाता है,
फिर उठायकर, नाशभी करदेता है, तैसे कालको उपजावने अरु नाश
करनेमें यल करना नहीं पडता है. हे मुनीश्वर ! कालरूपी धीवर है.
तिसने क्रियारूपी जाल पसारा है, तिसविषे जीवरूपी पक्षी पडे फंसते
हैं, सो फंसे हुए शांतिको नहीं प्राप्त होते हैं. हे मुनीश्वर ! यह तो
सब नाशरूप पदार्थ हैं. इनमें आश्रय किसका करना, जिसकरके सुखी
होवे स्थावर जंगम जगत् सब कालके मुखमें हैं. यह सबनाशरूपमु-
अको दृष्टिमें आवे हैं, ताते जो.निर्भय पद होय सो मुझसे कहो.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालविलासवर्णनं
नाम 'पञ्चविंशतितमः सर्गः ॥२५॥

(८८) योगवासिष्ठे। [षविंशतितमः सर्गः षड्विंशतितमः सर्गः २६ । कालविलासवर्णनम्। श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर! जेते कछु पदार्थ भासते हैं सो सव नाशरूप हैं, ताते किसकी इच्छा करूं और कौनको आश्रय करूं ? इनकी इच्छा करनी मूर्खता है. अरु जेती कछु चेष्टा अज्ञानी करता है सो सब दुःखके निमित्त है अरु जीवनेमें अर्थकी सिद्धि कछु नहीं है. काहेते? जो वालकअवस्था होती है, तब मूढता रहती है; वि- चार कछु नहीं रहता. अरुजव युवा अवस्था आती है, तवमुर्खताक- रके विषयोंको सेवते हैं अरुमान-मोहादिविकारोंसे मोहहीजाते हैं। तामें भी विचार का नहीं होताअरु स्थिर भी नहीं रहते; फिरदीनका दीन रहिके, विषयकी तृष्णा करता है; शांतिको नहीं पाता है. हे मुनीश्वर ! आयुष्य जो है सो महाचंचल है अरु मृत्यु तो निकट है, वाको अन्यथा भाव नहीं होता है. हे मुनीश्वर ! जेते कछु भोग हैं, सो रोगही हैं अरु जिसको संपदा जानते हैं, सो आपदा है अरु जि- सको सत्य कहते हैं सो असत्यरूप है अरु जिन स्त्रीपुत्रादिकोंको मित्र जानते हैं, सो सव बंधनके कर्ता हैं अरु इंद्रियें जो हैं सोमहाशत्रुरूप हैं. सो सब मृगतृष्णाके जलवत् हैं अरु यह देह है सो विकाररूप है अरु मन महाचंचल है और सदा अशांतरूप है अरु अहंकार जो है सो महानीच है. इसनेही दीनताको प्राप्त किया है, इसकरके जेते कछुपं. दार्थ इसको सुखदायक भासते हैं, सोसव दुःखके देनेहारे हैं, तिसक- रके इसको कदाचित् शांति नहीं होती; ताते मुझको इनकी इच्छा नहीं यद्यपि देखने मात्र सुंदर भासते हैं, तोभी इसमें सुख कछु नहीं. सो पदार्थ स्थिर रहनेका नहीं. जैसे समुद्रमें नानाप्रकारके तरंग भासते हैं. सो सव वडवामिकरके नाश होते हैं तैसे यह पदार्थभी नाशको पाते हैं तो मैं अपनी आयुविषे कैसे आस्था करूं ?

२६] वैराग्यप्रकरणे-कालविलासवर्णनम् । (८९). हे मुनीश्वर!वडे समुद्र जो दृष्टि आते हैं अरु सुमेरु-आदि बड़े पदा- र्थ हैं सोसव नाशको पाते हैं,तबहम सरीखेकी कहावार्ता है? और बडे वडे दैत्य राक्षसहू होके, नाश पाय गये हैं, तो हमसरीखेकी कहा वार्ता है? अरु देवता, सिद्ध, गंधर्व हुए हैं सो सब नाशको पाते हैं तिनकीनाम संज्ञाभी नहीं रहती तव हमसरीखेकी कहा वार्ता? पृथ्वी, जल अरुदाह- कशक्ति धरनहारे जो अनि अरुपवन हैं सो वीर्यसहित सब नाश होय जायँगे, कछु इनकी सत्ताभी न रहेगी, तो हमसरीखेकी कहा वार्ता? अरु यम, कुवेर,वरुण, इंद्र, वडे तेजवारे हैं सोसब नाश पावेंगे तोहम सरीखेकी कहा कहनी है?और तारामंडल जो दृष्टि आतेहैं सो सब गिर पडेंगे-जैसे सूखे पात वृक्षते वायुसों गिरजाते हैं, तैसे तारेगिरते हैं, त- वहमसरीखेकी कहावार्ता! हे मुनीश्वर! ध्रुवजो स्थिर भासताहै सो भी अस्थिर होयगा अरु चंद्रमा अमृतमय मंडलका दृष्टिमें आता है, और सूर्य अखंड मंडल है जिनका ऐसाजोप्रकाशसंयुक्त दृष्टि आताहै सो सव नाश हो जावहींगे, तो हमसरीखेकी कहा वार्ता है ? औरकीह कहा वार्ता है ? यह जो बडे ईश्वर जगतके अधिष्ठाता है तिनकामी अभाव हो जाता है. परमेष्ठी जो ब्रह्मा हैं, तिनकाभी अभाव हो । जाता है; हरि जो विष्णु सोभी हरे जायँगे; महाभैरवरूप जो रुद्र, सोभी शून्य हो जायेंगे, तो हमसरीखोंकी कहा वार्ता करनी ? अरु काल जो सबका भक्षण करनेहारा है, सोभी टूक टूक होके नाशको प्राप्त होवेगा, अरु कालकी स्त्री जो नीती है सोहू अनीतिताको प्राप्त होवेगी. अरु सबका आधार जो आकाश है, सोभी नाश होजायगा; तो हमसरीखेकी कहा वार्ता ? अरु जेता कछु जगत् अर्थकरके सिद्ध होताहै सो सब नाश हो जावेगा; को- उहू स्थिर रहनेका नहीं तब हम किसकी आस्था करें ? अरु किसका आश्रय करें ? यह जगत सब भ्रममात्र है, अज्ञानीकी इसमें आस्था होती है और हमारी नहीं है. कि. जगभ्रम कैसे उत्पन्न भया है

(९०) योगवासिष्ठे।
[षड्विंशतितमः सर्गः
अरु मैं इतना जानता हूं कि, संसारमें इतने दुःखी होते हैं, सो
अहंकारने किये गये हैं.
हे मुनीश्वर!इसका जो परमशत्रु अहंकार है, इसकरके भटकता
फिरता है। जैसे जेवरीमें वाँधा हुआ पतंग कबहूं ऊर्च, कवहूं नीचे
जाता है; स्थिर कबहूं नहीं रहताः तैसे जीवहू अहंकार करके कवहूं
ऊर्व और कवहूं अधःजाता है,स्थिर कवहूं नहीं होता.जैसे अश्वारू-
ढ रथके ऊपर बैठके सूर्य आकाशमार्गमें भ्रमता है, तैसे यह जीव
भ्रमता है स्थिर कदाचित् नहीं होता. हे मुनीश्वर! यह जीव पर-
मार्थ सत्यस्वरूपते भूलाहुआ भटकता है अरु अज्ञानकरके संसा-
रमें आस्था करता है अरु भोगहूको सुखरूप जानकर,तिसमें तृष्णा
करता है और जिनको सुखरूप जानता है,सो रोगसमान है और
विषकरके पूर्ण सर्प जैसे हैं, सो जीवके नाश करनहारे हैं और
जिनको सत्य जानता है सो असत्य है. सब कालके मुखमें बसे हुए हैं.
हे मुनीश्वर! विचारबिना अपना नाश आपही करता है, काहेले
कि, इसका कल्याण करनेहारा बोध है जो सत्य विचारवोधके शरण
जाय तो कल्याण होवे और जेते पदार्थ हैं सो स्थिर कोऊ नहीं:
इनको सत्य जानना दुःखके निमित्त है. हे मुनीश्वर ! जब तृष्णा
आती है, तव आनंद अरु धैर्यको नाश करदेती है,जैसे वायु मेघका
नाश कर डालता है, तैसे तृष्णा नाश कर डालती है. ताते मुझको.
सोई उपाय कहो, जिसकर जगतका भ्रम मिट जावे अरु अविनाशी
पदकी प्राप्ति होवे. इस भ्रमरूप जगत्की आस्था में नहीं देखता,ताते.
इच्छा चाहे तैसी करो,परंतु सुख दुःख इसीको होते हैं सोहोंगे:मि-
टनके नहीं.भावे पहारकी कंदरामें बैठो, भावे कोटमें बैठो; परंतु जो
होनेका है सो मिथ्या नहीं होते है इस निमित्त यत्ल करना मुर्खता है.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे कालविलासवर्णन
नाम पदविंशतितमः सर्गः ॥२६॥

(९१) २७. 1. वैराग्यप्रकरणे-सर्वपदार्थाभाववर्णनम् । सप्तविंशतितमः सर्गः२७। अथ सर्वपदार्थाभाववर्णनम् । श्रीराम उवाच-हे मुनीश्वर! यह जो नानाप्रकारके सुंदर पदार्थ भासते हैं, सो सब नाशरूप हैं, इनकी आस्था मूर्ख करते हैं, यह तो मनकी कल्पना करके रचे हुए हैं. तिनमें किसकी आस्था करूं? हे मुनीश्वर! अज्ञानी जीवका जीना व्यर्थ है; काहेते?जोजीनेते उ- नका अर्थ सिद्ध कछुनहीं होता.जब कुमारअवस्था होती है, तब मूढ़ बुद्धि होती है तिसमें विचार कछु नहीं होता. जब युवावस्था आती. है, तब कामक्रोधादिक विकार उत्पन्न होते हैं, तिसकरके सदा ढापेर- हते हैं जैसे जालमें पक्षी बँध जाता है अरु आकाशमार्गको देख नहीं सक्ता है, तैसे कामक्रोषादिककरि टँपाहुआ विचारमार्गको देख नहीं सक्ता.जब वृद्धावस्था आती है, तब शरीर जर्जरीभूत हो जाता है अरु महादीन है बहुरि शरीरकोभी त्याग देता है. जैसे कमलके ऊ- पर बर्फ पड़ता है, तब तिसका भौंरा त्याग करता है, तैसे जब शरीररूपी कमलकोजराका स्पर्श होता है,तब उसको जीवरूषी भौंरा त्यागदेता है. हे मुनीश्वर ! यह शरीर तबलग सुंदर है, जबलगवृद्धावस्था प्राप्त नहीं होती. जैसे चंद्रमाका प्रकाश राहुदैत्यने आवरण नहीं किया तब- लग रहता है, जब राहुदैत्य आवरण करता है, तब प्रकाश नहीं रहता है, तैसे जराअवस्थाके आये युवाअवस्थाकी सुंदरताजाती रहती है. हे मुनीश्वर । जराके आयेते शरीर कृश होजाता है अरु तृष्णा बढ़, जाती है. जैसे वर्षाकालमें नदी बढ़ जाती है, तैसे जराअवस्थामें तृष्णा बढ़ जाती है अरु जो पदार्थकी तृष्णा करता है सो पदा- भी दुःखरूप है: तृष्णाकरके आपही दुःख पाता है. हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी समुद्र है, तिसमें चित्तरूपी बेड़ा पड़ा है.

( ९२) योगवासिष्ठे। [सप्तविंशतितमः सर्गः रागदोषरूपी मच्छ कवहूं ऊर्ध्व जाते हैं, कवहूं नीचे आते हैं, स्थिर कदाचित् नहीं रहते. हे मुनीश्वर ! कामरूपी वृक्ष है, सो वृक्षमें तृष्णारूपी लता लगती है, तिसमें विषरूपी फूल हैं, जब जीवरूपी भौंरा तिसके ऊपर बैठता है, तब विषरूपी वेलिसों मृतक हो जाता है. हे मुनीश्वर ! तृष्णारूपी एक बड़ी नदी है, तिसमें राग- दोषादिक वडे मच्छ रहते हैं, तिस नदीमें पडेहुए जीव दुःख पाते हैं अरु जो संसारकी इच्छा करता है, सो नष्ट होजाता है. हे मुनीश्वर ! उन्मत्त हस्ती अरु तुरंगके समूह ऐसा जो रणरूपी समुद्र तिसको तर जाते हैं, तिसकोभी मैं शूर नहीं मानता परंतु जो इंद्रियरूपी समुद्र, तिसमें मनोवृत्तिरूपी तरंग उठते हैं, ऐसे समुद्रको जो तरजाताहै, तिसको शूर मानता हूं, जिसके परिणाममें दुःख होवें, तैसी क्रिया अज्ञानीजीव आरंभ करते हैं और जिसके परिणाममें सुख है, तिसका आरंभ नहीं करते हैं, और कामके अर्थको धारण करते हैं, ऐसे आरंभ कियेते शरीरकी शांति और सुखकी प्राप्ति नहीं होती. ऐसेही कामनाकरके सदा जलते रहते हैं, अनात्म पदार्थकी तृष्णा करते हैं, सो शांतिको कैसे प्राप्त होवें ? हे मुनीश्वर! यह तृष्णारूपी नदी है, तिसमें वड़ा प्रवाह है, तिसके किनारे वैराग्य अरु संतोष दोनों वृक्ष खड़े हैं, सो तृष्णानदीके प्रवाहते वे दोनोंका नाश होता है. हे मुनीश्वर ! तृष्णा बड़ी चंचल है, किसीको स्थिर होने नहीं देती. अरु मोहरूपी एक वृक्ष है; तिसके चहूँफेरे स्त्रीरूपी वेलि है, सो विषकरके पूर्ण है, तिसपर चित्तरूपी भौरा आय वैठता है, तव स्पर्शमात्रते नाश पाता है, जैसे मोरका पुच्छ हिलता रहता है, तैसे अज्ञानीका चित्त चंचल रहता है सो मनुष्य पशुसमान है. जैसे पशु दिनको जंगलों जाय, आहार करते चलते फिरते हैं, अरु रात्रिको आय, घरमें खूटासों बंधन पाते हैं। , २७. ] वैराग्यप्रकरणे-सर्वपदार्थाभाववर्णनम् । (९३) तैसे मुर्ख मनुष्यहू दिनको घर छोड़के व्यवहारमें फिरते हैं अरु रात्रि- को आय, अपने घरमें स्थिर होते हैं, ताते परमार्थकी सिद्धि कछु नहीं होती, जीवना वृथा गमाते हैं: बाल्यावस्थामें शून्य रहते हैं अरु युवा अवस्थामें कामकरि उन्मत्त होते हैं, सो कामकरके चिचरूप उन्मत्त हस्ती स्त्रीरूपी कंदरामें जाय स्थिर होते हैं, सोभी क्षणभंगुर हैं. बहुरि वृद्धावस्था होती है, तिस करके शरीर कृश होजाता है, जैसे बर्फते कमल जर्जरीभावको प्राप्त- होता है, तैसे जराकरके शरीर जर्जरीभावको प्राप्त होता है अरु सब अंग क्षीण होजाते हैं अरु एक तृष्णा बढ़जाती है. हे मुनीश्वर ! यह पुरुष महापशु है, सो आकाशके फूल लेनेकीइ- च्छा करता है, जैसे बड़े पर्वतपर चढ़कर आकाशका फूल लेने की इच्छा करता है, सो फिर बडी कंदरा अरु वृक्षमें गिर पडता है तैसे यह जीव मनुष्यरूपी पर्वतपर आय रहा है अरु आकाशके फूलरूपी जगत्के पदार्थनकी इच्छा करता है, सो नीचेको गिर पड़नको है सो रागदोष- रूपी कंटकवृक्षमें जाय पडेगा.हे मुनीश्वर !जेते कछु जगत्के पदार्थ हैं सो सब आकाशके फूलकी नाईं नाशवान् हैं इनमें आस्था करनीसो मू- खता है यह तो शब्दमात्र जैसा है तिसते अर्थसिद्धि कछु नहीं होती.अ रु जो ज्ञानवान पुरुष हैं, तिनको विषयभोगकी इच्छा नहीं रहती, का.. हेते जो आत्माके प्रकाशकर इसको मिथ्या जानते हैं हे मुनीश्वर ! ऐसे ज्ञानवान पुरुष दुर्विज्ञेय हैं, हमको तो स्वप्नमें भी नहीं भासते हैं और यह विरक्तात्मा दुर्लभ है, जिनको भोगकी इच्छा नहीं है सर्वदा ब्रह्मकी स्थितिकरके भासते हैं, ऐसे पुरुषको संसारकी इच्छा कछु नहीं रहती; काहेते जो यह पदार्थ सब नाशरूप हैं, हे मुनीश्वर ! पर्वतको जिस ओर देखिये तहां पत्थरोंकरके पूर्ण दृष्टि आता है अरू पृथ्वी पूर्णमृत्तिका करि दृष्टि आती है अरु वृक्ष काष्ठकरि पूर्ण दृष्टि .

(९४) योगवासिष्ठे। [सप्तविंशतितमः सर्गः आता है. समुद्र जलकर पूर्ण दृष्टि आताहै; तैसे शरीर, अस्थि, मांस- कर पूर्ण भासता है. ये सब पदार्थ पांच तत्त्वकरि पूर्ण हैं और नाश- रूप हैं, ऐसा रूप ज्ञानी जानके, किसीकी इच्छा नहीं करता. हे मुनीश्वर ! यह जगत् सब नाशरूप है, देखते नाशको पाता है, तिसमें मैं किसका आश्रयकरके सुख पाऊं? जव युगकी सहस्र चौकडी होती है, तब ब्रह्माका एक दिन होता है, तिस दिनके क्षय हुएते सब ज- गत्का प्रलय होता है, बहुरी ब्रह्माहू कालकर नाश होजाता है अरु ब्रह्माहू जितने होगये हैं, तिनकी संख्या नहीं होती. असंख्य ब्रह्मा नाश होगये हैं, तो हमसरीखेकी कहा वार्ता करनी है ? हम कोऊ भोगकी वासना नहीं करते, क्योंकि सव चलरूप हैं; कछु स्थिर रहनेके नहीं, सब नाशरूप हैं, इनकी आस्था मूर्ख करते हैं, तिनके साथ हमको कछु प्रयोजन नहींः जैसे मृग मरुस्थलको देख, जलपान करनेको दौडता है, अरु शांतिको नहीं पाता, तैसे मूर्ख जीव जगत्के पदार्थनको सत्य मानकर, तृष्णा करता है, परंतु नहीं पाताः काइते कि सब असाररूप हैं: अरु- जो स्त्री,पुत्र कलत्र भासतेहैं, सो जवलग शरीर नष्ट नहीं हुआ तब- लग भासते हैं। जव शरीर नष्ट हो जायगा तब जाननेमें भी न आवेगा कि, कहाँ गया अरु कहांते आया था? जैसे तैल अरु वत्तीकर दीप- क प्रकाशता है, तव बड़ा प्रकाशवान् दृष्टि आता है. पाछे जब बुझ जाता है, तव जाना नहीं जाता कि, कहां गया तैसे बत्तीरूप बांधव हैं और तिसविषे स्नेहरूपी तेल है, तिसकर शरीर भासता है जवश- रीररूपी दीपकका प्रकाश बुझ जाता है तब जाना नहीं जाता कि, कहां गया. हे मुनीश्वर ! यह वंधुका मिलाप है सो जैसे तीर्थया- त्राको सँग चलेजाते होवें, सो सब एक क्षणमें वृक्षकी छायाको नीचे वैठते हैं; फिर न्यारे न्यारे हो जाते हैं। तैसे बांधवोंका मिलाप है:

२८.] वैराग्यप्रकरणे-जगद्विपर्ययवर्णनम् । (९५) जैसे उस यात्रामें स्नेह करना मूर्खता है,तैसे इनमेंभी स्नेह करना मूर्खताहै हे मुनीश्वर ! अहंममताकी जेवरीके साथ बाधे हुए घटीयंत्रकी नाईं सब भ्रमते फिरते हैं, तिनको शांति कदाचित नहीं होती. देखने मात्र तो चेतन दृष्टि आता है, परंतु पशु अरु बंदर इनते श्रेष्ठ हैं, जिनकी संमति देहइंद्रियनके साथ वाँधी हुई है, अरु आगमापायी है. इन्होंमें आस्था रखनी सो महामूर्खता है उनको आत्मपदकी प्राप्ति होनी कठिन है. जैसे पवनकर वृक्षके पान टूटके उड़ जाते हैं फिर उनको वृक्षके साथ लगना कठिन है, तैसे जो देहादिकके साथ बांधे हुए हैं तिनको आत्मपद पाना कठिन है. हे मुनीश्वर ! जब आत्मपदते विमुख होता है तब जगत्के प्रमको देखता है अरु जब आत्मपदकी ओर आता है, तब संसार इसकोब- ड़ा विरस लगता है, और ऐसा पदार्थ जगत्में कोऊ नहीं कि, जो स्थिर रहेगा. जो कछु पदार्थ हैं, सो नाशको प्राप्त होते हैं, ताते मैं किसकी आस्था करूं? और किसका आश्रय करूं ? सब नाशवंत भासते हैं, वह पदार्थ मुझको कहो, जिसका नाश न होवे. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे सर्वपदार्थाभाववर्णनं नाम सप्तविंशतितमः सर्गः ॥२७॥ अष्टाविंशतितमः सर्गः २८॥ अथ जगद्विपर्ययवर्णनम् । श्रीराम उवाचहे मुनीश्वर ! जेता कछु स्थावर जंगम ज- गत् दीखता है; सो सब नाशरूप है, कछुभी स्थिर रहनेका नहीं. जो खाई थी सो जलकर पूर्ण हो गई है अरु जो बड़े जलकरके समुद्र पूर्णदीखते थे, सोखाईरूपढे गये अरु जो सुंदर बड़े बगीचे थे, सो आ- काशकीनाई शून्य होगये, अरुजो शून्य स्थान थेसोसुंदर वृक्ष हुएवन (९६) . योगवासिष्ठे। [अष्टाविंशतितमः सर्गः कर दृष्टि आते हैं. जहांबस्तीथी तहाउजार होगई हैअरु जहां उजार थी तहां वस्ती हो गई है. अरु जहां गढ़ले थे; तहां पर्वत हो गये हैं अरु जहां बड़े पर्वत थे, तहां समान पृथ्वी हो गई है. हे मुनीश्वर ! इसप्रकार पदार्थ देखते २ विपर्यय हो जाते हैं स्थिर नहीं रहते. बहुरि किसका आश्रय करूं ? किसके पानेका यत्न करूं ? यह पदार्थ तो. सव नाशरूप हैं: अरु जो बड़े बड़े ऐश्वर्यकर संपन्न थे अरु जो बड़े कर्तव्य करते थे, और बड़े वीर्यवान् बड़े तेजवान हुये थे, सोभी मरणको प्राप्त हो गये हैं, तवहमसरीखेकी कहा वार्ता है? सब नाश होते हैं, तव हमारेभी घड़ी पलमें चल जाना है, रहना किसीको नहीं. हे मुनीश्वर ! यह पदार्थ चंचलरूप है, सो एकरस कदाचितहू नहीं रहता; एक क्षणमें कछुहोजाते हैं, दूसरे क्षणमें कछु हो जाते हैं. एक क्षणमें दरिद्रीहोजाते हैं,दूसरे क्षणमें संपादनवार हो जाते हैं. एकक्षणमें जीवते दृष्टि आते हैं, दूसरे क्षणमें मर जाते हैं एक क्षणमें मरेभी जी उठाते हैं. इस संसारकी स्थिरता कवहूं नहीं होती. ज्ञानवान् इसकी आस्था नहीं करते. एक क्षणमें समुद्र के प्रवाहके ठिकाने मरुस्थल हो. जाते हैं अरु मरुस्थलमें जलके प्रवाहहो जाते हैं ! हे मुनीश्वर ! इस. जगत्का आभास स्थिर नहीं रहता. जैसे, बालकका चित्त स्थिर नहीं रहता, जैसे नट स्वांगको घरता है, सो कवहूं कैसा, कबहूं कैसा; सो एक स्वांगमें नहीं रहता, तैसे जगत् पदार्थ अरु लक्ष्मी एकरस नहीं रहते. कवहूं पुरुष स्त्री हो जाता है; कबहूं स्त्री पुरुष हो जाती है; अरु मनुष्य पशु हो जाता है; पशु मनुष्य होजाता है और स्थावरका जंगम अरुजंगमका स्थावर हो जाता है। मनुष्य देवताहो जाता है और देवतामनुष्य हो जाता है. इस प्रकार घटीयंत्रकी नाई जगतकी लक्ष्मी स्थिर नहीं रहती. कबहूं उर्वको जाती है; कबहूं अ- योभागको जाती है, स्थिर कवहूं नहींरहती; सदा भटकती रहती है- - ९८] . वैराग्यप्रकरणे-जगदिपर्ययवर्णनम् । (९७) हे मुनीश्वर!जते कछुपदार्थ दृष्टिमें आते हैं, सो सब नष्ट होजानेके हैं.कैसेहू स्थिर रहनेके नहीं. ये सब नदियाँ हैं सो सब वडवामिमें लय होय जायगीतैसे जेते कछु पदार्थ हैं सो सब अभावरूप वडवामिको प्राप्त होवेंगे. अरु बडे बलिष्ठहू मेरे देखते लीन होगये हैं अरुजोबडे सुंदर स्थान सो शून्य हो गये हैं अरुजोसुंदर ताल, बगीचे,मनुष्य करि संपूर्ण, ऐसे स्थान सो शून्य होगये हैं,अरुजोमरुस्थलकी भूमिका सो सुंदरको प्राप्त भई है अरु घट पट हो गये हैं,वरके शाप हो जाते हैं शापके वर हो जोते हैं इसप्रकार हे विप्र ! जो जगत् दृष्टिमें आता है कवहूं संपदा,कबहूंआपदा दृष्टिमें आवती है अरु महाचपल दृष्टि आव- त हैं. हे मुनीश्वर!ऐसे सब अस्थिररूप पदार्थ हैं,तिनका विचारबिना मैं कैसे आश्रय करूं अरुकिसकी इच्छा करूं ? सबनाशरूप हैं. और- जो यह सूर्य प्रकाशकर दृष्टिमें आता है,सोभी अंधकाररूप होजा- यगा अरु अमृतकर पूर्ण जो चंद्रमा दृष्टिमें आता है, सोभी शून्य हो जायमा अरु सुमेरु आदिक जो पर्वत दृष्टि आते हैं,सो सब नाश हो- 'यँगे और सब लोक नाश होजायगे ताते हे मुनीश्वर! और किसीकी क्या कहनी है ? ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, जो जगत्के ईश्वर हैं, सोभी शून्य होजायगे, तो हमसरीखेका कहा वार्ता कहनी है? जेता कछु जगत् दृष्टि आता है सो स्त्री, पुत्र, बांधव, ऐश्वर्य, वीर्य, तेजकरके नाना प्रकारके जीव जो भासते हैं, सो सब नाशरूप हैं, बहुरि मैं किस पदार्थका आश्रय करूं और किसकी इच्छा करूं? हे सुनीश्वर !जो पुरुष दीर्घदर्शी हैं, तिनको तो सब पदार्थ विरस होगये हैं, वे किसी पदार्थकी इच्छा नहीं करते. काहेते? तिनको सब पदार्थ नाशरूप भासते हैं और अपनी आयुको बिजुरीके चमत्कार- वत् देखते हैं, जैसे बिजुरीका चमत्कार होता है, तैसी शरीरकी आयु है, जिसको अपनी आयुष्यकी अप्रतीति होती है, सो किसीकी इच्छा. ,

(९८) योगवासिष्ठे । [अष्टाविंशतितमः सर्गः
करते नहीं.जैसे किसीको बलिदानके अर्थ पालते हैं, तब वह खाने,
पीने, भोगनेकी इच्छा नहीं करता तैसे जिसको अपना मरना सन्मुख
भासता है, तिसकोभी किसी पदार्थकी इच्छा नहीं रहती.ये सब पदार्थ
आपही नाशरूप हैं, तो हम किसका आश्रयकर सुखी होवें ? जैसे
कोऊ पुरुष समुद्रमें मच्छके आश्रयकरके कहे कि मैं इसपर बैठके
समुद्रके पार जाऊंगा अरु सुखी होऊंगा. सो मूर्खताकरके बही मरे-
गा. तैसे जिस पुरुषने इस पदार्थका आश्रय लिया है अरु अपने
सुखके निमित्त जानता है सो नाशको प्रास होवेगा.
हे मुनीश्वर ! जो पुरुष जगतको विचारता रहता है, तिसको
यह जगत् रमणीय भासता है अरु रमणीय जानके, नानाप्रकारके
कर्म करता है अरु जो नानाप्रकारके संकल्पोंकरके, जगत्में भटकते
हैं, कबहूं ऊपर, कवहूं नीचे आते हैं अरु स्थिर नहीं रहते; तैसे
यह जीव भटकते फिरतेहैं. स्थिर कवहूं नहीं रहते. अरु जिस पदा-
र्थकी इच्छा करते हैं, सो कालके ग्रासरूप हो गये हैं, जैसे बनमें अमि
लगती है तब सब इंधनादिकोंको जारती है, तैसे जेते कछु पदार्थ
हैं, सो सब इंधनरूपी हैं, जगत् वनं है, तिसको कालरूपी अनि लगी
तिसने सबको ग्रस लिया है.बहुरि जो इस पदार्थकी इच्छा करते
सो महामूर्ख है, अरु-
जिनको आत्मविचार प्राप्त है,तिनको यह जगत् भ्रमरूप भासता
है, अरु जिसको आत्मविचारकी प्राप्ति नहीं है, तिसको यह जगत्
रमणीय भासता है अरु जगतको देखते नाश हो जाते हैं स्वापुरीकी
नाई संसारकी मैं कैसे इच्छा करूं ? यह तो दुःखके निमित्त है. जैसे
मिठाईमें विष मिलाया है, तिसका भोजन करनेवाले मृत्युको प्राप्त
होते हैं. तैसे विषय भोगनेवाले पुरुष नाशको प्राप्त होते हैं.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे जगद्विपर्ययवर्णन
नामाष्टाविंशतितमः सर्गः ॥ २८ ॥

२९.] वैराग्यप्रकरणे-सर्वातप्रतिपादनम् । (९९) एकोनत्रिंशत्तमः सर्गः २९। अथ सर्वातप्रतिपादनम्। श्रीराम उवाच-हेमुनीश्वर! इस संसारमें भोगरूपी अमिल. गी है,तिसकरके सबजलते हैं जैसे तालमें हाथीके पाँवसों कवर कमल- चूर्ण होजाता है, तैसे भोगसों कचर, मनुष्य दीन होजाते हैं तैसे काम क्रोध दुराचारसों शुभ गुण नष्ट होजाते हैं, जैसे कंटारीके पत्तेमें अरुफ- लमें काटे होजाते हैं, तैसे विषयकी वासनारूपी कंटक आय लगते हैं. हे मुनीश्वर!यह जगत् सब नाशरूपी है,किसी पदार्थका स्थिर रहना नहीं है वासनारूपी जाल अरु इंद्रियरूपी गांठी हैंतिसमें पुरुष का- लसों आय फँसा है, सोबडे दुःखको प्राप्त होवेगा. हे मुनीश्वर ! वास- नारूपी सूतमें जीवरूपी मोती गुथे हुवे हैं अरु मनरूपी पटवा आय, गुथकर चैतन्यरूपी आत्माको गलेमें डालता है. जबवासनारूपी तागा टूट पडा तब यह भ्रमभी निवृत्त होगा. हे मुनीश्वर ! इसको भोगकी इच्छा है सो बंधनका कारण है, भोगकी इच्छा करके भटकता है, शां- तिको प्राप्त नहीं होता है, ताते मुझको किसी भोगकी इच्छा नहीं. न राज्यकी इच्छा है, न घरकी और न बनकी इच्छा है. न मरनेकरके दुःखमानता हूं,न जीनेकरके सुखं मानताहूं.किसी पदार्थका सुख नहीं. सुख जो होना सो आत्मज्ञानकर होना है; अन्यथा किसी पदार्थकर होता नहीं जैसे सूर्यके उदयहुएविनाअंधकारका नाश नहीं होता, तैसे आत्मज्ञानबिना संसारके दुःखका नाश नहीं होता, ताते सोई उपाय मुझको कहो, जिसकर मोहका नाश होकर मैं सुखी होऊ. . हे मुनीश्वर ! भोगको भोगनहारा जो अहंकार है, सो मैंने त्याग दिया है, फिर भोगकी इच्छा कैसी होवे ? हे मुनीश्वर ! इस विषयरूप सर्पने जिसका स्पर्श किया है, तिसका नाश होजाता है, अरु सर्प - ।

(१००) योगवासिष्ठे। [त्रिंशत्तमः सर्गः जिसको काटता है, सो एकवेर इसको मार डालता है अरु विषयरूपी सर्प जिनको काटते हैं, सो अनेकजन्मपर्यंत मारतेही चले जाते हैं, ताते परमदुःखका कारण विषयभोग है, याते विषयरूपी परमविष है, अरु वज्रकरके शरीरका चूर्ण होना सोभी मैं सहूंगा; परंतु विषयका भोगना मरेसों कैसेहू सहा नहीं जाता.यह मुझको दुःखदायक दृष्टिमें आता है तातेसोई उपाय मुझको कहो, जिसकर मेरे हृदयते अज्ञानरू- पी अंधकारका नाश होवे, अरु जो न कहोगे तोमैं अपनीछातीपर धीरजरूपी शिला धरके बैठ रहुंगा, परंतु भोगकी इच्छा न करूंगा. हे मुनीश्वर ! जेते कछुपदार्थ हैं, सो सब नाशरूप हैं जैसे विजुरी- का चमत्कार हो, छिप जाता है अरु अंजलीमें जल नहीं ठहरता, तैसे विषयभोग अरु आयुष्य नाश हो जाते हैं, ठहरते नहीं. जैसे कंठकीर मच्छी दुःख पाती है, तैसे भोगकी तृष्णा कर जीवदुःख पाते हैं ताते मुझको किसी पदार्थकी इच्छा नहीं, जैसे किसीने मरीचिकाके ज- लको सत्य जान, जलपानकी इच्छा करी और दौडा सो जल पाता. नहीं, ताते मैं किसी पदार्थकी इच्छा नकीं करता. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे सर्वांतप्रतिपादन नामैकोनत्रिंशत्तमः सर्गः ॥ २९ ॥ त्रिंशत्तमः सर्गः३०। अथ वैराग्यप्रयोजनवर्णनम् । श्रीराम उवाच-हे मुनीश्वर! संसाररूपीगढ़ेमें अरुमोहरूपी कीचमें मूर्खका मन गिरजाता है, तिसकर बड़ा दुःख पाता है, शांत वान् कवहूं नहीं होता, जब जरा अवस्था आती है, तब सर्व शरीर जर्जरीभूत होकर काँपने लगता है, जैसे.पुरातन वृक्षके पत्र पवनकर [520 ३०.] वैराग्यप्रकरणे-वैराग्यप्रयोजनवर्णनम् । (१०१) हिलते हैं, तैसे जराअवस्थाकर अंग हिलते हैं, अरु तृष्णाकी वृद्धि हो जाती है. जैसे नीमका वृक्ष ज्यों ज्यों वृक्ष होता है, त्यों त्यों कटुता बढ़ती है, तैसे तृष्णा बढ़ती है. हे मुनीश्वर ! जिस पुरुषने देह इंद्रियादिकनका आश्रय अपने सुख निमित्त लिया है, सो मूर्ख संसाररूपी अंधकूपमें गिरता है, निकस नहीं सक्ता अरु अज्ञानीका चित्त भोगका त्याग कदाचित् नहीं करता है. हे मुनीश्वर ! जगत्के पदार्थमें मेरी बुद्धि मलीन हो गई है. जैसे वर्षा कालमें नदी मलीन होती है, जैसे मार्गशीर्षमासमें मंजरी सूख जाती है, तैसे जगतकी शोभा देखते विरस हो जाती है. जैसे जगतका पदार्थ मूर्खको रमणीय भासता है, जैसे पानीका गढ़ा तृणकरि आच्छादित होता है अरु मृगके बालक तिस तृणको रमणीय जानकर खाने जाते हैं,फिरगिर जाते हैं तैसे यह मूर्ख भोगको रमणीय जान भोगते, गिर परे हैं फिर महादुःख पाते हैं. जैसे मृग मृगतृष्णाकर उड़ता है, सो सुखी नहीं होता,तैसे यह मृगतृष्णारूप संसारके पदार्थनके ऊपर मनरूपी मृग उडनहार कैसे सुखी होवे ? हे मुनीश्वर !जगत्के पदार्थनसों मेरी बुद्धि चंचल होगई है; ताते सोई उपाय कहो, जिसकर पर्वतकी नाई मेरी बुद्धि निश्चल होवे. पद कैसाहै?किजिससे परमानंदके यलमें रहतेहैं अरू निर्भय,निराकार पद, जिसके पायेते संसार कुछभी नहीं रहता है, बहुरि पाना कछु नहीं रहता है; तैसे संपूर्ण जगतकी नाना प्रकारकीरचना सब दव जाती है; तिस पदके पानेका उपाय मुझको कहो. हे मुनीश्वर ! ऐसे पदते मेरी बुद्धि शून्य है, ताते मैं शांतिवान् नहीं होता.यह संसार अरुसंसा- रके कर्म मोहरूप हैं इसमें पडेहुए पुरुषशांतिको प्राप्त नहीं होते, अरु- जनकादिक संसारमें रहेहुये कमलंकी नाई निर्लेप रहते हैं, तैसे शांतिवान संसारमें निर्लेप रहते हैं, सो जैसे कोऊ कीचसों पूर्ण होय अरु कहे कि-मुझको कीचका स्पर्श नहीं हुआ,तैसे राजाके विक्षेपरूपी

का
,
(१०२)
योगवासिष्ठे। [त्रिंशत्तमः सर्गः
कीचमें पड़ेहुए शांतिवान् कैसे निर्लेप रहे हैं, तिसकी समुझ कहा है?
सो कृपा कर कहो. अरु तुम जैसे जो संतजन हैं सोविषयको भोगते.
दृष्टि आते हैं अरु जगतकी चेष्टा सब करते हैं, सो निर्लेप कैसे रहते
हैं, सो युक्ति कहो. जैसे तुम जलकमलवत् रहते हो सो कहो. यह
बुद्धि तो मोहकरि मोही जाती है. जैसे तालमें हस्ती प्रवेश करता
है और पानी मलीन हो जाता है, तैसे मोहकरि बुद्धि मलीन हो जा-
ती है. ताते सोई उपाय कहो. जिसकर बुद्धि निर्मल होवे. यह संतोष-
में बुद्धि स्थिर कवहूं नहीं रहती. जैसे, मूलसों कुल्हाडेकर काटा वृक्ष
स्थिर नहीं होता, तैसे वासनासो कटी बुद्धि स्थिर नहीं रहती हे
मुनीश्वर ! संसाररूपी विधूचिका मुझको लगी है, ताते सोई उपाय
कहो, जिसकर दृश्यका नाश होवे. इसने मुझको वडा दुःख दिया
है. अरु आत्मज्ञान कब प्रकाश होय ? जिसके उदय हुए मोहरूपी
अंधकारका नाश होवे. हे मुनीश्वर ! जैसे वादरसों चंद्रमा आच्छा-
दित हो जाता है, तैसे बुद्धिकी मलीनताकर में आच्छादित हुआ हूं,
ताते सोई उपाय कहो, जिसकर आवरण दूर होवे अरु-
जो आत्मानंद सो नित्य है, जिसके पायेते वहुरि पाना कछु नहीं
रहता, इसते संपूर्ण दुःख नष्ट हो जाते हैं अरु अंतरशीतल होजा-
ता है ऐसा जो पद है, तिसकी प्राप्तिका उपाय मुझसे कहो, हे मुनी-
श्वर ! आत्मज्ञानरूपी चंद्रमाकी मुझको इच्छा है, जिसके प्रकाशकर
बुद्धिरूपी कमलिनी खिलं आती है अरु जिसकी अमृतरूपी किर-
नकर वृत्ति तृप्त होती है, सो कहो. हे मुनीश्वर ! अब मुझको गृहमें
रहनेकी इच्छा नहीं, अरु वनविषे जानेको भी इच्छा नहीं: मुझको
तो इसी पदकी इच्छा है, जिसके पायेते भीतर शांति होय जाय.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे वैराग्यप्रयोजनवर्णननाम
त्रिंशत्तमः सर्गः ॥३०॥

३१.] वैराग्यप्रकरणे-रामंप्रश्नवर्णनम् । (१०३) एकत्रिंशत्तमः सर्गः ३१॥ अथ रामप्रश्नवर्णनम् । श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर!जो जीवनेकी आस्था करते हैं, सो मूर्ख हैं जैसे पत्रपर जलकी बूंद ठहरती नहीं, तैसे आयुष्यहू क्षणभं- गुर है,जैसे वर्षाकालमें दर्दुर बोलते हैं, तब उनका कंठ चंचल सदा फरकता रहता है तैसे आयुर्दाय छिन छिनमें चंचल हो जाती है. जैसे शिवर्जाके कपालमें चंद्रमाकीरेख कछुसी है, तैसा यह शरीर है. हे मुनी- श्वर जिसको इसकी आस्था है, सो महामूर्ख है, यह तो कालका पास है, जैसे विल्ली चूहेको पकड लेती है, तैसे सबको काल पकड लेता है जैसे विल्ली चूहेको सँभाल करने नहीं देती, तैसे सबको का- ल अचानक ग्रहण कर लेता है अरु किसीको भासता नहीं. हे मुनीश्वर ! जब अज्ञानरूपी मेघ आय गर्जता है, तब लोभरू- पी मोर प्रसन्न होयके नृत्य करता है, जब अज्ञानरूपी मेघवर्षा करता है, तव दुःखरूपी मंजरी वढने लगती है अरु लोभरूपी बिजुरी छिन छिनमें नष्ट होय होजाती है अरु तृष्णारूपी जालमें फँसेहुए जीवन- रूपी पक्षी परे दुःख पाते हैं, शांतिकी प्राप्ति नहीं होती. हे मुनीश्वर! यह जगतरूपी बडा रोग लगा है तिसके निवारण करनेका कौनसा पदार्थ है ?जो पानेयोग्य है. जिसकर भ्रमरूपी रोग निवृत्त होवे सोई उपाय कहो. यह जगत् मूर्खको रमणीय दीखता है. ऐसा पदार्थ पृथ्वीपर अरु आकाशमें अरु देवलोकमें अरु पातालमें । कोऊ नहीं, जो ज्ञानवान्को रमणीय दीखे. ज्ञानवानको सब भ्रम । रूप भासता है अरु अज्ञानी जगतमें आस्था करता है. हे मुनीश्वर! चंद्रमामें जो कलंक है तिसकर शोभा सुंदर नहीं लगती. जब कलंक दूर हो जाय तब सुंदर लगे; तैसे मेरे चित्तरूपी चंद्रमामें काम- रूपी कलंक लगा है तिसकर उज्ज्वल नहीं भासता. ताते सोई उपा- य कहो, जिसकर कलंक दूर होजाय.

योगवासिष्ठे।
[ एकत्रिंशत्तमः सर्गः
हे मुनीश्वर ! यह चित्त बहुत चंचल है. स्थिर कदाचित् नहीं हो-
ता. जैसे अनिमें डारदिया पारा उडजाता है, तैसे चित्तभी स्थिर नहीं
होता. विषयकी तरफ सदा धावता है; ताते सोई उपाय कहो जिस-
कर चित्त स्थिर होवे और संसाररूपी वनमें भोगरूपी सर्प रहते हैं.
सो जीवको दंश करते हैं. तिससों वचनेका उपाय कहो अरु जेती क-
छु क्रिया हैं, सोरागद्धेपके साथ मिली हुई हैं ताते सोई उपाय कहो
जिसकर राग-द्वेषका प्रवेश न होय-तैसे यह संसारमें परे हैं तिनको
तृष्णारूपी जलका स्पर्श न होय ऐसा उपाय कहो. जिससे इनको
राग-द्वेषका स्पर्श न होय. अरु मनमें जो मननरूपी सत्ता है, सो
मुक्तिसों दूर होती है; अन्यथा दूर नहीं होती. सो निवृत्तिके अर्थ
आप मेरेको मुक्ति कहो और आगेजिसको जिस प्रकार निवृत्ति हुई
है.सो कहो. अरु जिसप्रकार तुझारे अंतरमें शीतलता हुई है सो क-
हो. हे मुनीश्वर ! जैसे तुम जानते हो सो कहो अरुजो तुह्मारे विद्य-
मान वह मुक्ति नहीं पाई, तव में तो नहीं जानता. तो मैं सब
त्यागकर निरहंकार हो रहूंगा. जवलग वह मुक्ति मुझको न प्राप्त हो-
गीतवलग में भोजन नहीं करूंगा अरु जलपानभी नहीं करूंगा अरु
स्नानादिकक्रियाभी नहीं करूंगा. संपदाका कार्य भी नहीं करूंगा औ-
र आपदाका कार्यभी नहीं करूंगा.निरअहंकार होऊंगा,और ये न
मेरी देह और न मैं देही. सव त्याग करके वैठि रहूंगा. जैसे कागज-
के ऊपर मूर्ति चित्रित होती है, तैसे हो रहूंगा. श्वास आते जाते आ-
पही क्षीण हो जायँगे. जैसे तेलविना दीपक बूझता है तैसे अर्थवि-
ना देहनिर्वाण होय जायगा. तब महाशांतिको प्राप्त होऊंगा.
वाल्मीकिरवाच हे भरद्वाज! ऐसे कहि करि रामजी चुप
होय रहे. जैसे वडे मेघको देखके मोर शब्द करके चुप होजाते हैं.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे रामप्रश्नो नाम
एकत्रिंशत्तमः सर्गः ॥ ३१ ॥

३२.] वैराग्यप्रकरणे-नभश्चरसाधुवादवर्णनम् । (१०५) द्वात्रिंशत्तमः सर्गः ३२॥ अथ नभश्वरसाधुवादवर्णनम् । वाल्मीकिस्वाच-हेपुत्र!जब इसप्रकार रघुवंशरूपी आका- शके रामचंद्ररूपी चंद्रमा बोले, तबसवही मौन होगये अरु सबके रोम खडे हो आये.मानो रोमहू खडे होकर रामजीके वचन सुनते हैं अरुजे- तेकछ सभामें बैठे थेसो सब निर्वासनारूपी अमृतकेसमुद्रमें मम होगये वसिष्ठ,वामदेव,विश्वामित्र-आदिजो मुनीश्वरथे और जेते जयंत,धृष्टि आदिक जो मंत्री थे और राजा दशरथ अरुजेते मंडलेश्वरथे और जे- तेचाकर नौकर थे और माता कौशल्या-आदिक सब मौन होगये अ- र्थात् यह तो अचल होगये अरुपींजरेमें पक्षी जो थे, सोभी मौन होगये अरु बगीचे पशुआदिथे सोभी मौन होगये अरु चारातृण खाते रहि गये अरु जो पक्षी आलयमें बैठे थे,सोभी सुनकर मौन होगये अरु आ- काशके पक्षी जो निकट थे, सोभी स्थिर होगये अरु आकाशमें जो देव, सिद्ध,गंधर्व, विद्याधर और किन्नर थे सोभी आय सुनने लगे अरु फूलोंकी वर्षा करनेलगे, सब धन्य धन्य शब्द करने लगे. और फू- लोंकी वर्षा भई सो मानों बर्फकी वर्षा होतीअरुक्षीरसमुद्रके तरंगउ- छलते आवते होंय, अरु मोतीकी मालाकी वृष्टि आवत होय और जैसे माखनके पिंड उडते होंय, इसप्रकार आधी घडीपर्यंत फूलनकी वर्षा भई अरु बड़ी सुगंध आय पसरी. अरु फूलोंपर भौरे फिरने लगे और वडा विलास तिस कालमें होरहाअरु नमो नमः' शब्द करने लगे. सिद्धा ऊचुः-हे कमलनयन रघुवंशी! आकाशमें चंद्रमारूप आपरामजी ! तुम धन्य हो तुमने बडे श्रेष्ठ स्थान देखे हैं अरु बहुत प्रकारके वचन सुने हैं;याते जैसे आप बचन कहे हैं,ऐसे वचन कबडूं नहीं सुने.ये वचन सुनके हमाराजो देवतानकाअभिमान था,सो सब निवृत्त भया. आपका अमृतरूपी वचन सुनकर, हमारी बुद्धि पूर्ण होगई है, योगवासिष्ठे। [त्रयस्त्रिंशत्तमः सर्गः हे रामजी ! जैसे वचन तुमने कहे हैं, ऐसे वचनं बृहस्पतिहू कहनेको स- मर्थ नहीं,तुझारे वचन परमानंदके करनेहारे हैं, ताते तुम धन्य हो. इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे नभश्चरसाधुवाद- वर्णनं नाम द्वात्रिंशत्तमः सर्गः ॥ ३२ ॥ त्रयस्त्रिंशत्तमः सर्गः। अथ नभश्वरमहीचरसंमेलनवर्णनम् । वाल्मीकिरवाच-हेभरद्वाज ! ऐसे वचन देवता कहके, विचार करत भये, कि-रघुका कुल पूजने योग्य है; तिसमें रामजीने. बडे उदार वचन मुनीश्वरके विद्यमान कहे हैं अब जो मुनीश्वरका उ- तर होयगा, सोभी श्रवण करना चाहिये. जैसे फूलोंके ऊपर भौंरा स्थिर होते हैं, तैसे व्यास,नारद, पुलह, पुलस्त्य आदि सब साधु स- भामें आय स्थित भये. तब वसिष्ठ, विश्वामित्र-आदि मुनीश्वर उठके खडे हुये अरु तिनकी पूजा करने लगे. प्रथम पूजा राजा दशरथ करी; फिर नाना प्रकारसों सबने उनकी पूजा करी और यथायोग्य आसनके ऊपर बैठे. सो कैसे हैं ? जोनारद बहुत सुंदर मूर्तिबारे हा- थमें वीणा लेयके बैठे अरुश्याममूर्तिव्यासजी आयबैठे और नाना- प्रकारके रंगसों रंजित वस्त्र पहिरे हुए, मानो तारामें महाश्याम घटा आई है, ऐसे अरु दुर्वासा, वामदेवे, पुलस्त्य अरु बृहस्पतिके पिता अंगिरा, अरु भृगु, और मैं हूं तहां था.और ब्रह्मर्षि,राजर्षि, देवर्षि, देवता, मुनीश्वर सब आयके सभामें स्थित हुए. किसीके बडी जटा हैं, कोईने मुकुट पहरे हैं, किसीने रुद्राक्षकी माला पहरी है, किसीने मोतीकी माला पहरी है, किसीके कंठमें रत्नकी माला पहरी है और हाथमें कमंडलु, मृगछाला, किसीके महासुंदरवन ऐसे बड़े र तपस्वी आयके वैठे. तामें कोऊ राजसी स्वभावके, कोऊ सात्विक स्वभावके ऐसे बडे वडे आये अरु सब विद्वान् वेद पढ़नहारे प्राप्त हुए. और P .

३३.1 वैराग्यप्रकरणे-नभश्वरमहीचरसंमेलनवर्णनम् । (१०७)
किसीका सूर्यवत, किसीका चंद्रमावत, किसीका तारावत् ऐसे बड़े
प्रकाशवारे, पुरुषार्थपर यत्न करनेहारे,सो. यथायोग्य आसनपस्थित
भये, और मोहनी मूर्तिरामजी अरु दीन स्वभाववारे हाथजोरके, स--
भामें बैठे, तिनकी सब पूजा करत भये. वे सब कहते हैं कि-
हे रामजी ! तुम धन्य हो, और-
नारद सबसे विद्यमान कहत भये कि हे रामजी ! तुमने बडेवि-
वेक अरु वैराग्यके वचन कहे सो सबको प्यारे लगे; सबके कल्याण
करनेहारे हैं और परमबोधके कारण हैं. हे रामजी!तुम बडे बुद्धिमान
उदारात्मा दृष्टि आवते हो. अरुमहावाक्यका अर्थ तुमते प्रगट होता
है ऐसा उज्ज्वल पात्रसाधुमें और अनंतमें तपस्वीमें कोऊक होते हैं अरु
जेते कछु मनुष्य हैं सो सबपशुजैसे दृष्टि आते हैं क्योंकि, जिसको
संसारसमुद्रके पार होनेकी इच्छा है और जो पुरुषार्थपरयत्न करते
सोई मनुष्य हैं. हे साधो वृक्ष तो बहुत होते हैं, परंतु चंदनका वृक्ष बि-
रला होता है, तैसे शरीरधारी बहुत हैं, परंतु ऐसा कोळ होता है और
सव अस्थिमांसके पुतरे साथ मिलहुए भटकते फिरते हैं. सो जैसी
जंत्रीकी पुतरी होती है, तैसे अज्ञानी जीव हैं और हस्तीतो बहुत हैं,
परंतु जिसके मस्तकौते मोती निकसता है, सो बिरला है तैसे मनुष्य
तो बहुत हैं, परंतु पुरुषार्थपर यत्ल करनेहारे कोऊ होते हैं. ऐसे पात्रको
थोरे अर्थ कहाभी बहुत होजाता है, जैसे तेलकी बूंद थोरीजलमें डारी,
विस्तारको पाती है तैसे थोरे वचनसो आपके हियेमें बहुत होतेहैं आ-
पकी बुद्धि बहुत विशेष है अरु दीपक जैसी प्रकाशवारी है अरुवोध-
का परमपात्र है और कहनेमात्रते आपको शीघ्र ज्ञान होवेगा अंरु
हमारे विद्यमान आपको जान होवेगा, ऐसा निश्चय करि जानना.
इति श्रीयोगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणे नभश्वरमहीवरसंमेलन-
वर्णनं नाम त्रयस्त्रिंशत्तमः सर्गः ॥ ३३ ॥
समाप्तमिदं योगवासिष्ठे वैराग्यप्रकरणम् ॥१॥

श्रीपरमात्मने नमः। अथ श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणप्रारंभः। प्रथमः सर्गः। अथ शुकनिर्वाणवर्णनम् । वाल्मीकिस्वाच हे साधो ! ये जो वचन हैं सो परमानंद- -रूप हैं अरु कल्याणके कर्ता हैं. इनमें श्रवणकी प्रीति तव उपजती है जब अनेक जन्मके वडे पुण्य आय इकट्ठे होते हैं. जैसे कल्पवृक्षके फ- लको वडे पुन्यसों पाते हैं, तैसे जिसके बड़े पुण्य कर्म इकडे आय होते हैं, तिसकी प्रीति इन वचनोंके श्रवणमें होती है; अन्यथा प्राप्ति नहीं होती. ये वचन परमबोधके कारण हैं। हे भरद्वाज ! इसप्रकार जब नारदजीने कहा तव विश्वामित्रजी बोले- विश्वामित्र उवाच हे ज्ञानवानोंमें श्रेष्ठ रामजी! जेता कछु जाननेयोग्य था सो तुमने जाना है,इसते जाननाऔर नहीं र- हा अरु तिसमें विश्राम पावनेनिमित्त कछुक मार्जन करना है. जैसे अशुद्ध आदर्शकी मलिनता दूर करी होय,तव मुख स्पष्ट भासता है, तैसे कछु उपदेशकी तुमको अपेक्षा है.हेरामजी ! तुम्हारे जैसे भग- वान् व्यासजीके पुत्र शुकदेवजी भये हैं, सोभी वडे बुद्धिमान थे ति- न्होंने जो जाननेयोग्य था सो जाना है अरु विश्रामके निमित्त तिन- कोभी अपेक्षा थी सो विश्रामको पाय शांतिवान् भये हैं. श्रीराम उवाच-हे भगवन् ! शुकदेवजी कैसे बुद्धिमान् अरु (१०९) :.१.].. मुमुक्षुप्रकरणे-शुकानिर्वाणवर्णनम् । ज्ञानवान् थे ? उनको कैसी विश्रामकी अपेक्षाथी? फिर वे कैसे विश्रा- मको पावते भये, सो कृपा करिके कहो. श्रीविश्वामित्र उवाच हे रामजी! अंजनके पर्वतकी नाई जिनका आकार है, ऐसे जो भगवान् व्यासजी वे स्वर्णके सिंहासनपर- राजा दशरथके पास बैठे हैं अरु सूर्यकी नाई प्रकाशवान जिनकी कां- ति है तिनके पुत्र शुकदेवजी हैं सो सब शास्त्रोंके वेत्ता थे, सत्यको सत्य जानते थे, असत्यको असत्य जानते थे, सो शांतिरूप और परमानंद- रूप आत्मामें विश्राम नपाते तब उनको विकल्प उठा कि, जिसको मैंने जाना है सोन होवेगा. काहेते कि, मुझको आनंद नहीं भासता है, सो संशयको धरके, एक कालमें व्यासजीसुमेरु पर्वतकी कंदरामें बैठे थे,तिनके निकट आयकर, कहत भये कि, हे भगवन् ! यह सं- सार सव भ्रमात्मक कहांसे भया है? वाकी निवृत्ति कैसे होयगी? और आगे कोईको इसकी निवृत्ति भई है, सो कहो. हेरामजी! इसप्रकार जव शुकदेवजीने कहा, तब विद्रतशिरोमणि जो वेदव्यासजी हैं, सो तत्काल उपदेश करत भये. तब शुकदेवजीने. कहा कि, हे भगवन् ! जो कछुतुम कहो हो, सो तो मैं आगेसों जा- नता हूं, इसकर मुझको शांति प्राप्त नहीं होती. हे रामजी!जब इसप्रकार शुकदेवजीने कहा तब सर्वज्ञ जो वेदव्या- सजी हैं, सो विचार करतभये, कि, मेरे वचनकर इसको शांति प्राप्त न होवेगी; क्योंकि अब पितापुत्रका संबंध भासता है. ऐसे विचार करके व्यासजी कहत भये, कि हे पुत्र! मैं सर्वतत्त्वज्ञ नहीं. तु राजा जनक- के निकट जा, वेसर्वतत्त्वज्ञ हैं अरु शान्तात्मा हैं, उनसों तेरा मोह. निवृत्त होवेगा. हेरामजी! जब इसप्रकार व्यासजीने कहा, तब शुकदेवजी उहांसो. चले तब जो मिथिला नगरी राजा जनककी थी, तिसमें आ- [प्रथमः सर्गः -- " ११०) योगवासिष्ठे। -यकर राजा जननके द्वारपै स्थित भये. तब द्वारपालने जायकर राजा जनकको कहा, कि व्यासजीके पुत्र शुकदेवजी आय खडे हैं. तब राजाने जाना, कि-इनको जिज्ञासा है. तव कहाखडे रहो. तदा खड़ेही रहे. इसीप्रकार द्वारपालने जाय कहा. तव सात दिन खडे रहते बीत गये, तब राजाने फेर पूंछा शुकदेवजी खडे हैं, कि चलते रहे हैं? तबद्वारपालने कहा कि, खडे हैं तबराजाने कहा आँगनमें ले आओ; तब आँगनमें ले आये. वहांभी सात दिन खडे रहे. बहुरि राजाने पूछा कि-शुकदेवजी हैं? तब द्वारपालने कहा कि-खडे हैं. तव राजाने कहा अंतःपुरमें ले आओ; उनको नानाप्रकारके भोगाओ. तब अंतः- पुरमें ले गये, वहां स्त्रियनके पास सात दिन खडे रहे तब राजाने बार- पालसे पूछा कि, तिनकी दशा कैसी और आगे कहांदशा थी? तब द्वारपालने कहा जो आगे निरादर करके न शोकवान हुएथेअरु अ- व भोगकरन प्रसन्न हुए हैं, इष्ट-अनिष्टमें समान हैं. जैसे मंद पवनक- रके मेरु चलायमान नहीं होवे, तैसे यह वडे भोगका निरादरकर च- लायमान नहीं भये. जैसे पपीहाको मेघके जलबिना, नदी तालाब- आदिके जलकी इच्छा नहीं होती,तैसे उनको किसी पदार्थकी इच्छा नहीं तव राजाने कहा इहां ले आओ. तब सो ले आया. जव शुकदेवजी आये, तब राजा जनकने उठके खडे होय प्रणाम किया, फिर दोऊ बैठ गये तब राजाने कहा कि हे मुनीश्वर! तुम किसी निमित्त आये हो ? तुमको कहा वांछा है ? सो कहो किसकी -प्राप्ति में कर देऊ? श्रीशुक उवाच-हे गुरु ! यह संसारका आडंबर कैसे उत्प- न हुआ है और फिर कैसे शांत होवेगा सो तुम कहो. विश्वामित्र उवाच: हे रामजी ! जब इसप्रकार शुकदेव- जीने कहा तब राजा जनकने यथाशास्त्र उपदेश जो कछु व्यासजीने

१.].. सुमुक्षुप्रकरणे-शुकनिर्वाणवर्णनम् ।
कहा था, सोई कहा. बहुरि शुकदेवजीने कहा कि-हे भगवन् ! जो कछु
रूप कहोहो, सोई हमारे पिताजीने कहाथा अरु सोई शास्त्र कहते
हैं और विचारसों मैंहू ऐसे जानता हूं,कि, यह संसार अपने चित्तमें
उत्पन्न होता है अरुचित्तका निर्वेद हुए भ्रमकी निवृत्ति होती है. फिर
विश्राम मुझको नहीं प्राप्त होता है.
जनक उवाच हे मुनीश्वर! जो मैंने कहा है अरु जो
तुम
जानते हो, इसते और उपाय कछु है ऐसा जानना नहीं अरुकहनाभी
नहीं. यह संसार चित्तके संवेदनकर हुआहै. जब चित्त फुरनेते रहित
होता है, तबभ्रम निवृत्त हो जाताअरु आत्मतत्त्व नित्य शुद्ध है, अरु
परमानंद स्वरूप है. केवल चैतन्य है. तिसका अभ्यास करो.तब तुम
विश्रामको पावोगे अरु तुम मुक्तस्वरूप हैं काहेते कि, तुम्हारा यत्न
आत्माकी ओर है, दृश्यकी ओर नहीं; ताते तुम बडे उदारात्मा हो,
हे मुनीश्वर ! तुम मोको ब्यासते अधिकजान,मेरे पास आये हो; और
तुम मेरेसेभी अधिक हो; काहेते कि, हमारी चेष्टा बाहिरते दृष्टि आ-
बती है और तुम्हारीचेष्टा बाहरते कभी नहीं अरु अंतरते हमारी
कछुभी नहीं.
विश्वामित्र उवाच हेरामजी ! जब इसप्रकार राजा ज-
नकने कहा, तब शुकदेवजी निस्संग, निष्पयल, निर्भय होकर चले.
सुमेरु पर्वतकी कंदरामें जाय निर्विकल्प समाधि दश सहस्र वर्ष ताई
करी. बहुरि निर्वाण हो गये. जैसे तेलबिना दीपक निर्वाण होजाता
है, तैसे निर्वाण होगये जैसे समुद्रमें बूंद लीन होजाते हैं, जैसे सूर्यका
प्रकाश संध्याकालमें सूर्यके पास लीन हो जाता है, तैसे कल्पनारूप
कलंकको त्यागकर ब्रह्मपदको प्राप्त भये.
इति श्रीयोगवासिष्ठे समाप्रकरणे शुकनिर्वाणवर्णन
नाम प्रथमः सर्गः॥१॥

, ( १९२) योगवासिष्ठे। [द्वितीयः सर्गः द्वितीयः सर्गः२ अथ विश्वामित्रोक्तिवर्णनम् । विश्वामित्र उवाच हेराजा दशरथ! जैसे शुकदेवजी शुद्ध बुद्धिवारे थे, तैसे रामजीभी हैं जैसे शांतिके निमित्त उनको कछुक मा. र्जन कर्त्तव्य था, तैसे रामजीको विश्रामके निमित्त कछुक मार्जनचा- हिये, काहेते कि-आवरण करनहारे भोग हैं; सो इच्छा तिनते निव- त भईहै अरु जो कछु जाननेयोग्य था सोजाना है; अब हमको कछुक युक्ति करनी है, तिसकरके उनको विश्राम होवेगा जैसे शुकदेवजीको थोडेसे मार्जनकरके शांतिकी प्राप्ति भई थी, तैसे इनकोभी होवेगी. हे राजन् ! अबरामजीको भोगकी इच्छा स्पर्श नहीं करती. जैसे ज्ञानवान्को आध्यात्मिक--आदिदुःख स्पर्श नहीं करते तैसे रामजीको भोगकी इच्छा स्पर्श नहीं करती भोगकी इच्छा सबकोदीन करती है, इसकाही नाम बंधन है,अब भोगकी वासनाका क्षय करना इसकाही नाम मोक्ष है,ज्यों ज्यों भोगकी इच्छा करता है, त्यों त्यो लघु हो जाता है अरु ज्यों ज्यों भोगकी वासना क्षय होती है, त्यों त्यों गरिष्ठ होता है. जवलग इसको आत्मानंद प्रकाश नहीं होता, तव विष- यकी वासना दूर नहीं होती; जब आत्मानंद प्राप्त होता है, तब विषयवासना कोऊ नहीं रहती जैसे मरुस्थलमें लताकी उत्पत्ति नहीं होती, तैसे ज्ञानवानको विषयवासनाकी उत्पत्ति नहीं होती. हे साधो ! ज्ञानवान् जो विषयभोगका त्याग करता है, सो.कि- सी फलकी इच्छा करके नहीं करता; स्वभावसेही ज्ञानवान्की विष- यवासना उठजाती. है. जैसे मूर्यके उदय हुए अंधकारका अभाव हो जाता है, तैसे रामजीको अब किसी भोगपदार्थकी इच्छा रही नहीं, अव विदितवेद हुए हैं. अब आप विश्रामकी इच्छा चाहते हैं, ताते जो कहें, सोई करो, जिसकर विश्रामवान होय.

२.] मुमुक्षुप्रकरणे-विश्वामित्रोक्तिवर्णनम्। हेराजन् ! यह जो भगवान् वसिष्ठजी हैं, इनकी युक्तिकरके शांत हो- वेंगेअरु आगेभी सोरघुकुलके गुरु हैं,इनके उपदेशद्वारा आगेभीरघु- वंशी ज्ञानवान् भये हैं. जोसर्वज्ञ हैं अरु साक्षिरूप हैं और त्रिकालज्ञ हैं और ज्ञान के सूर्य हैं, इनके उपदेशकर रामजी आत्मपदको प्राप्त होवेंगे. हे वसिष्ठजी ! वह ब्रह्मका उपदेश तुम्हारे स्मरणमें है क्योंकि, जब तुम्हारा हमारा विरोध हुआ था,तब उन्होंने उपदेश किया और जो सब ऋषीश्वर अरु वृक्षकरि पूर्ण हैं, ऐसा जो मंदराचल उस पर्वतमें आयकर ब्रह्माजीने संसारवासनाके नाशनिमित्त उपदेश किया था अरु तुम्हारा हमारा विरोध था; तिसके निमित्त अरु और जीवोंके कल्याणनिमित्त, जो उपदेश किया था,अब वही उपदेश तुम रामजीको करोयेभी निर्म- ल ज्ञानपात्र हैं अरु ज्ञानभी वही है अरु विज्ञानभी वही है अरु निर्मल युक्ति वही है, कि, शुद्धपात्रमें अर्पण होवे; अरु जिसमें पात्रबिना उपदेश नहीं सुहाता है अरु जिसमें शिष्यभाव न होवे अरु विरक्तता न होवे; ऐसा जो अपात्र मूर्ख होवे, तिसको उपदेश करना व्यर्थ है. अरु जोविरक्त होवे अरु शिष्यभाव न होवे, तउभी उपदेश नहीं कर- नाअरु दोनोंकरि संपन्न होवे तब करना. पात्रविना उपदेश व्यर्थ होता है अर्थात् अपवित्र होजाता है, जैसे गौका दुध महापवित्र है परन्तु श्वानकी त्वचामें डारिये, तब वह अपवित्र हो जाता है; तैसे अपा- त्रको उपदेश करना व्यर्थ है. हे मुनीश्वर! जो शिष्य वैराग्यकरि संप- न होता है अरु उदार आत्मा है, सो तुम्हारे उपदेशके योग्य है, तुम कैसे हो कि वीतराग हो, भय अरु कोधते रहित हो परमशांतिरूप हो सो तुम्हारे उपदेशको पात्र रामजी हैं. वाल्मीकिरुवाच-इसपकार जब विश्वामित्रने कहातब नार- द अरु व्यासादिकने साधु साधु करके कहा अर्थात भला, भला, कहा. तब राजा दशरथके पास बडे २ प्रकारके साधु बैठे हुए थे.

[तृतीयः सर्गः (११४) योगवासिष्ठे। वसिष्ठ उवाच-ब्रह्माजीके पुत्र वसिष्ठजीने तिनसे कहा- हे मुनीश्वर! जो कछु तुमने आज्ञा करी है, सो हमने मानी है. ऐसा समर्थ कोऊनहीं जो संतकी आज्ञा निवारण करे हे साधो! जेते कछु राजा दशरथके पुत्र हैं, तिन सबके हृदयमे जो अज्ञानरूपी तम है सो में ज्ञानरूपी सूर्यकर निवारण करूंगा. जैसे सूर्यके प्रकाशकर अंध- कार दूर होता है. हे मुनीश्वर ! जो कछु ब्रह्माजीने उपदेश किया था सो मुझको अखंड स्मरण है सो उपदेश करूंगा; जिसकर रामजी निःसंशय पदको प्राप्त होवेंगे. वाल्मीकिरुवाच-इसप्रकार वसिष्ठने विश्वामित्रसे कहा, ताके अनंतर मोक्षका उपाय सब रामजीको कहत भये. इति श्रीयोगवासिष्ठेमुमुक्षुप्रकरणे विश्वामित्रोक्तिवर्णनं नाम द्वितीयः सर्गः ॥२॥ तृतीयः सर्गः ३॥ अथ असंख्यसृष्टिप्रतिपादनवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच हे रामजी! कमलज जो ब्रह्माजी, तिन्होंने मुझको जो कछु जीवके कल्याणनिमित्त उपदेश किया है, सो भले प्रकार मेरे स्मरणमें आता है, सो अब तुमको कहता हूं. श्रीराम उवाच हे भगवन् ! कछुक प्रश्न करनेका अवसर आया है. अब एक संशयको दूर करो, मोक्षउपाय जो कहते हो, सो सब तुम कहोगे, परंतु यह जो तुमने कहा कि,-शुकदेवजी विदेहमुक्त होगये तो भगवान् व्यासजीजो सर्वज्ञ हैं सोविदेहमुक्त क्यों न हुये ? वसिष्ठ उवाच--हेरामजी ! जैसे सूर्यकिरणसों त्रसरेणु उड़त ३] मुमुक्षुप्रकरणे-असंख्यसृष्टिप्रतिपादनवर्णनम् । (११५) देख पडती हैं, तिनकी संख्या कछु नहीं होती. तैसे परमसूर्यके संवद- नरूपी किरणनमें त्रिलोकरूपी त्रसरेणु हैं सो असंख्य हैं और अनंत होकर मिट जाते हैं अरु और अनंत होते हैं और अनंत त्रिलोकी ब्रह्मसमुद्रमें होवेंगे; तिनकी संख्या कछु नहीं- श्रीराम उवाच-हे भगवन् ! जो आगे व्यतीत होगये हैं और आगेजोहोवेंगे तिनकी संख्या केती है?अरुवर्चमानको तो जानता हूं. वसिष्ठ उवाच-हे रामजी! अनंतकोटि त्रिलोकीके गण उ- पजे हैं, अरु मिटगये हैं अरु कई होवे हैं अरु कई होगे, गिननेकी संख्या कछु नहीं. काहेते कि,जीव असंख्य हैं अरु जीवजीवप्रति अप- नी अपनी सृष्टि है जब यह जीव मृतक हो जाते हैं तब उसी स्थानमें अपने अंतवाहक संकल्परूपी पूरविषे इसका बांधव भास आता है, अरु इसी स्थानों परलोक भास आता है. पृथ्वी, आप, तेज, वायु आकाश, पंचभूत भासते हैं. अरु नानाप्रकारकी वासनानके अनुसार अपनी अपनी सृष्टि भास आती है. बहुरि जबउहांते मृतक होता है, तब वही सृष्टि भास आती है, नामरूपसंयुक्त वही जाग्रत् सत्य होकर भास आती है. बहुरि जब वहांते मरता है तब इस पंचभूत सृष्टिका अभाव होजाता है और अवर भासती है अरु तहांके जो जीव होते इ तिनकोभी इसीप्रकार अनुभव होता है इसीप्रकारं एक एक जीवकी सृष्टि होती है अरु मिट जाती है तिसकी संख्या कछु नहीं, तब ब्रह्माकी सृष्टीकी संख्या कैसे होते? जैसे जो पुरुष फेर लेता है अरु तिसको सब पदार्थ भ्रमते दृष्टि आवते हैं. अरु जैसे नौकामें बैठे हुए नदीतटके वृक्ष चलते दृष्टि आते हैं.जैसे नेत्रके दोषकर आकाशमें मोतीनकी माला दृष्टि आती है, जैसे वनमें सृष्टि भासती हैं तैसे जीवको भ्रमकरके यह लोक परलोक भा- रता है. वास्तवते जगत कछु उपजाही नहीं एक अद्वैत परमात्मतत्त्व (११६) योगवासिष्ठे। [तृतीयः सर्गः अपने आपविषे स्थित है, तिसविषे द्वैतभ्रम अविद्याकरके भासता है, जैसे वालकको अपनी परछाहीमें बैताल भासता है अरु भयको पाता है, तैसे अज्ञानीको अपनी कल्पना जगद्रूप होय भासती है. हे रामजी ! यह व्यासदेव बत्तीसवेर मेरे देखने में आये हैं। तिनमें दश तो एक आकाररूप हैं अरु एकही जैसी क्रिया अरु एकही जैसे निश्चय हुए हैं. अरु दूसरे दशभी समानही हुये हैं अरु वारह विलक्षण आकार, विलक्षणक्रियाचेष्टावारे हुये हैं. जैसे समुद्रमें तरंग होते हैं, तामें कई सम अरु कई विलक्षण उपजते हैं, तैसे व्यास हुये हैं. अरु सम जो दश हुये हैं. तिनमें दश व्यास यही हैं अरु आगेभी अष्टबेर य- ही होवेंगे बहुरि महाभारत कहेंगे. वहुरि नौमीवेर ब्रह्मा होकर विदेह मुक्त होवेंगे अरु हमभी होवेंगे अरु वाल्मीकिभी होवेंगे अरु भृगुभी होवेंगेअरुबृहस्पतिके पिता अंगिराभी होवेंगेइत्यादिक औरभी होवेंगे हे रामजी ! एक सम होते हैं, एक विलक्षण होते हैं, अरु मनुष्य देवता, तिर्यगादिकजीव कई वेर समान होते हैं, कई बेर विलक्षण होते हैं. कई जीव समान आकार आगे जैसे कुल क्रियासहित होते हैं,अरु कई संकल्प कर उडते फिरते हैं. आना, जाना, जीना, और मरना स्वप्नभ्रमकी नाई दीखता है. अरु वास्तवते कोऊ न आता है, नजा- ता है, न जन्मता है, न मरता है. यह भ्रम अज्ञानसों भासता है। विचार कियेते कछु निकसता नहीं. जैसे कदलीका थंभ देखने में बडा पुष्ट आता है, फिर खोल देखो तो सार का नहीं निकसता,तैसे ज- गद्मम अविचार करके सिद्ध है, विचार कियेते कछु भासता नहीं, हे रामजी! जो पुरुष आत्मसत्तामें जागा है,तिसको द्वैतभ्रम नहीं भासता है, वह आत्मदर्शी सदाशांतआत्मा परमानंदस्वरूप है अरु सब कालनाते रहित है. ऐसे जीवन्मुक्तको कोई चलाय नहीं सक्ताऐ से जो व्यासदेवजी हैं तिनको सदेहमुक्ति अरु विदेहमुक्तिकी कोउ L- मुमुक्षुप्रकरणे-पुरुषार्थोपक्रमवर्णनम् । (११७) कलना नहीं. सदा अद्वैतरूप है. हे रामजी! जीवन्मुक्तको सब सर्वात्मा पूर्ण भासता है अरु स्वस्वरूप भासता है. स्वरूपसार शांतिरूप अमृतकरि पूर्ण है, अरु निर्वाणमें स्थित है. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे असंख्यसृष्टिप्रतिपादनं नाम तृतीयः सर्गः ॥३॥ चतुर्थः सर्गः ४॥ अथ पुरुषार्थोपक्रमवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच-हे रामजी ! जीवन्मुक्ति अरु विदेहमुक्तिमें भेद कल नहीं जैसे स्थिर जल है, तौभी जल है, अरु तरंग फिरते हैं, तौभी जल है, तैसे जीवन्मुक्ति अरु विदेहमुक्तिमें भेद कछु नहीं. हे रामजी !जीवन्मुक्ति अरु विदहमुक्तिका अनुभव तुमको प्रत्यक्ष नहीं भासता. काहेते, जो स्वसंवेद्य है, अरु तिनमें जो भेद भासता है, सो असम्यग्दीको भासता है. ज्ञानवान्को भेद कछु नहीं भासता है.जो वायु स्पंदरूप होता है सोभी वायु है, अरु निष्पंदरूप होता है सोभी वायु है, उसके चलते निश्वयविषे भेद कछु नहीं, पर अवर जीवको स्पंद होती है, तो भासती है अरु निष्पंद होती है तो नहीं भास- ती है तैसे ज्ञानवान् पुरुषको जीवन्मुक्ति अरु विदेहमुक्तिमें भेद कछु नहीं. वह सदा अद्वैत कलनाते रहित है. जबजीवको उसको शरीर भासता है, तब जीवनन्मुक्त कहते हैं, जब शरीर अदृश्य होता है, तब विदेहमुक्त कहते हैं, अरु उसको दोऊ तुल्य हैं. हे रामजी ! अब प्राकृत प्रसंगको सुनो, जो श्रवणका भूषण है कि जो कछुसिद्ध होता है सो अपने पुरुषार्थकर सिद्ध होता है, पुरुषार्थवि- ना सिद्ध कछु नहीं होता.और जो कहते हैं कि, जो दैव करेगा सोहोवे- [ चतुर्थः सर्गः (११८) योगवासिष्ठे। गा सो मूर्खता है. यह चंद्रमा हृदयको शीतल अरु उल्लासकर्ता भासता है. सोइसमें शीतलता पुरुषार्थकर हुई है. हेरामजी । जिस अर्थको प्रा- र्थना करे अरु यत्न करे तिसमें फिरे नहीं तो अवश्यकर जरूर पाता है, और पुरुषयल किसका नाम है सो श्रवण करो. संतजन अरु सत्यशास्त्रके उपदेशरूप उपायकर तिसके अनुसार चित्तका विचरना हो सो पुरुषमें यल है. तिसके इतर जो वेष्टा करता है, तिसका नाम उन्मत्त चेष्टा है, अरु जिस निमित्त यत्न करता है सोई पाता है. एक जीव था, सो पुरुषार्थपर यत्न करते इंद्रकी पदवी पाई, त्रिलोकीका पति होय सिंहासनपर आरूढ हुवा. हे रामचंद्र ! आत्मतत्त्वमें जो चैतन्य स्पंद, इस स्पंदरूप होकर, स्फूर्ति है, सो अपने पुरुषार्थकर ब्रह्माके पदको प्राप्त भई है, ताते देखो जिसको कछु सिद्धता प्राप्त हुई सो अपने पुरुषार्थकर हुई है. केवल चैतन्य जो आत्मतत्त्व है तिसमें चित्तसंवेदन, यही स्पंदरूप है, यह चैतन्य संवेदन अपने पुरुषार्थकरके गरुडपर आरूढ हो, विष्णुरूप होता है: अरु यह चैतन्यसंवेदन अपने पुरुषार्थकरके रुद्ररूप भयो है अरु अद्धा गमें पार्वतीको धरे रहे हैं अरुमस्तकमें चंद्रमाको धरे हैं अरु नीलकंठ परमशांतरूप हैं, ताते जो कलु सिद्ध होता है सो पुरुषार्थकर होता है. हे रामजी ! पुरुषार्थ करके सुमेरुका चूर्ण किया चाहै, तौभी कर सका है. जैसे पूर्वदिनमें दुष्कृत किया होय अरु अगले दिनमें सुकृर करे, तव दुष्कृत दूर हो जाता है. जो अपने हाथद्वारा चरणाम तभी ले नहीं सक्ता, पुरुषार्थ करे तो वही पृथ्वी खंड खंड कर नेको समर्थ होता है। इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे पुरुषार्थोपक्रमो नाम चतुर्थः सर्गः ॥ ४॥ .

५.] मुमुक्षुप्रकरणे-पुरुषार्थवर्णनम् । (११९) पंचमः सर्गः ५। अथ पुरुषार्थवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच---हे रामजी ! जो चित्त कछुवाछा करता है अरु शास्त्रके अनुसार पुरुषार्थ नहीं करता सो सुखसोन पावेगा. उसकी उन्मत्त चेष्टा है अरु पुरुषार्थभी दो प्रकारका है-एक शास्त्र अनुसार है और एक शास्त्रविरुद्ध है. जोशास्त्रको त्याग कर अपनी इच्छाके अनुसार विचारता है सो सिद्धताको न पावेगा; अरु जो शास्त्र के अनुसार पुरुषार्थ करता है, सो सिद्धताको प्राप्त होवेगा, अरु दुःखभी न होवेगा. अनुभवते स्मरण होता है अरु स्मरणते अनुभव होता है, सो दोनों इसहीते होते हैं. दैव तो कछु न हुवा. हे रामजी ! और दैव कोऊ नहीं. इसका किया इसको प्राप्त होता है: परंतु जो बलिष्ठ होता है सो तिसके अनुसार विचरता है, जो पूर्वके संस्कार बलि होते हैं तो उसको जय होती है. अरु जो विद्य- मान पुरुषार्थ वलि होता है तब उसको जीति लेते हैं. जैसे एक पुरुपके दो बेटे हैं अरु जो तिनको लडावता है, तो दोनों विषे जो बली होता है, तिसकी जय होती है,परंतु दोनों उसके हैं; तैसे दोनों कर्म इसके हैं,जो पूर्वका संस्कार बली होता है तो इसकीजय होतीहै. हे रामजी! यह जो सत्संग करता है अरु सत्शास्त्रहूका विचार करता है. बहुरि पक्षीकी नाई संसारवृक्षहूकी ओर उडता है, तो पूर्वका संस्कार वली है. तिसकरि स्थिर हो नहीं सक्ता, ऐसे जानकर तुम पुरुषप्रयत्लका त्याग नहीं करो,जो पूर्वके संस्कारते अन्यथा नहीं होता पूर्वका संस्कार बलीभी होते. परंतु जब सत्संग करे अरु सत्शास्त्रहूका दृढ अभ्यास होवे, तो पूर्व संस्कारको पुरुषप्रयल जीत लेता है;जैसे पूर्वके संसारमें दुष्कृत किया है, आगे सुकृत किया है तो अगलेका ( १२०) योगवासिष्ठे। [पंचमः सर्गः. अभाव हो जाता है; सो पुरुषप्रयत्न होता है. सो पुरुषार्थ क्या है ? अरु तिसकर सिद्ध क्या होता है ? सो श्रवण करके ज्ञानवान् जो संत हैं अरु सत्शास्त्रजो ब्रह्मविद्या है, तिसके अनुसार प्रयत्न करना, तिसका नाम पुरुषार्थ है, अरु पुरुषार्थकरके पानेयोग्य आत्मा है, जिसकरि संसारसमुद्रते पार होवे. हे रामजी ! जो कछु सिद्ध होता है, सो अपने पुरुषार्थकरि होता है, दूसरे देव कोऊ नहीं. जो शास्त्रके अनुसार पुरुषार्थको त्यागकरि कहता है कि-जोजोकछु करना है, सो दैवकरैगा, सो मनुष्यमें ग- ईभ है, तिसका संग न करना; उसकी संगति दुःखका कारण है. इस पुरुषको प्रथम तो यह कर्त्तव्य है कि अपने वर्णाश्रमविपे शुभ आ- चारको ग्रहण करे अरु अशुभका त्याग करे, बहुरि संतका संग, अरु सतशास्त्रका विचार करे और तिसके विचार करे अपने गुणदोपहूका विचार करे कि दिन अरुरात्रिमें शुभ क्या करता हूंअरु अशुभ क्या करता हूं,आगे गुण अरु,दोषहका साक्षीभूत होकर जो संतोष,धीरज वैराग्य, विचार अरुअभ्यासगुण हैं, तिनको वढावे. अरुजोदोष वि- परीत हैं, तिनका त्याग करे जब ऐसे पुरुषार्थको अंगीकार करैगा, तव परमानंद आत्मतत्त्वको प्राप्त होवेगा. ताते-- हे रामजी ! वनके घायल हुए मृगकी नाई नहीं होना, जोघास, तृण, पातको रसीला जानके पार चुगता है; तैसे स्त्री, पुत्र, वांधव औरधनादिकविषे मम हो रहना, सो नहीं होना; इनते विरक्त होना. दंतकेसाथ दंतहकोचबाय करि, संसारसमुद्रको पार होनेका यल क- रना. अरु वलते बंधनको तोडिकरि निकस जाना, जैसे सिंह वल- करके पिंजरेमेंते निकस जाता है, सोई पुरुषार्थ है. हे रामजी ! जिसको कछुसिद्धताकी प्राप्ति हुई है, सो अपने पुरु- पार्थकर हुई है, पुरुषार्थविना नहीं होती जैसे प्रकाशबिना पदार्थका , मुमुक्षुप्रकरणे-पुरुषार्थवर्णनम् । (१२१) ज्ञान नहीं होता. जिन पुरुषोंने अपना पुरुषार्थ त्याग दिया है; अरु दैवके आश्रय हुये हैं; कि, हमारा दैव कल्याण करेगा, सो न होवेगा. जैसे पत्थरसों तेल निकासा चाहे, सो नहीं निकसता; तैसे उनका कल्याण दैवते न होवेगा. हे रामजी! तुम तो दैवका आश्रय त्याग कर, अपने पुरुषार्थका आश्रय करो. जिसने अपना पुरुषार्थ त्यागा है, तिसको सुंदर कांति लक्ष्मी त्याग जाती है. जैसे वसंतऋतुकी मंजरी वसंतऋतुके गयेते विरस हो जाती है तैसे उनकी कांति लघु होजाती है, जिस पुरुषने ऐसा निश्चय किया है, कि हमारा पालनेहारा दैव है, सो पुरुष ऐसा है, जैसे कोऊ अपनी भुजाको सर्प जानके भय, पायके, दौरते हैं और जानते नहीं कि, यह अपनी भुजा है; तैसे अपने पुरुषार्थको त्यागके दैवका आश्रय लेता है; अरु भयको पाता है. पुरुषार्थ नाम उसका है, कि, संतहका संग अरु सत्शास्त्रोंका विचार करके,तिनके अनुसार विचारना. जोतिनको त्यागके, अपनी इच्छाके अनुसार विचरते हैं,सो सुखको नहीं पायेंगे; नसिद्धताको पावेंगे.अरु जो शास्त्रके अनुसार विचरते हैं, सो इहांभी सुख पावेंगेअरु आगेभा सुख पावेंगे, तैसेई सिद्धताको पावेंगे. ताते संसाररूपी जालविषे नहीं गिरना, सो पुरुषार्थ है.संतनहूके संग अरु सत्शास्त्र के अर्थ हृदयरूपी पात्र लिखना;बोधरूपी लेखनी करनी अरु विचाररूपी स्याही करनी जब ऐसे पुरुषार्थकरि लिखेगा, तब संसाररूपी जालमें न गिरेगा. हे रामजी जैसे यह आदिनीति हुई है, जो पट है सो पटही है, जो 'घट है सो घटही है; घट हैसो पट नहीं और पट है सो घट नहीं, तैसे य- हमी नीति हुई है कि,अपने पुरुषार्थविना परमपदकी प्राप्ति नहीं होती. हे रामजी! जो संतहकी संगति करता है अरु सत्शास्त्रभी विचा- रता है अरु उनके अर्थमें पुरुषार्थ नहीं करता, तिसकरि सिद्धताप्राप्त [ षष्ठः सर्गः १२२) योगवासिष्ठे। नहीं होती; तैसे अमृतके निकटही बैठा होवे अरु पान कियेबिना अमर नहीं होता, तैसे अभ्यास किये बिना सिद्धता प्राप्त नहीं होती. हे रामजी! अज्ञानी जीव अपना जन्म व्यर्थ खोते हैं. देखो-जव वालक होते हैं, तव मूढ़ अवस्थामें लीन रहते हैं. युवा अवस्थामें विका- रहूको सेवते हैं, अरुजसमें जर्जरीभूत होते हैं, इसीप्रकारजीवना व्यर्थ खोते हैं, अरु जो अपना पुरुषार्थ त्याग करके, दैवका आश्रय लेते हैं, सो अपने हंता होते हैं,सुखको नहीं पायेंगे. हे रामजी!जो पुरुष व्य- वहारविपे अरुपरमार्थविषेआलसीहुये हैं अरु परमार्थको त्यागके, मूढ़ होरहे हैं, सो दीन हुए हैं मानों वे पशु हैं,अरु दुःखको प्राप्त हुये हैं; यह मैंने विचार करके देखा है; ताते पुरुषार्थका आश्रय करो. सत्संग अरु मन्शास्त्ररूपी आदर्श करके अपने गुणकरके दोषको देखके दोपका त्याग करो; अरु शास्त्रका सिद्धांत जो है तिसका अभ्यास करो, जब दृढ़ अभ्यास करोगे, तब शीघ्रही आनंदवान होगे. वाल्मीकिरवाच-जब इस प्रकार वसिष्ठजीने कहा तव सायंकालका समय हुआ; सब स्नानके निमित्त उठके खड़े भये और परस्पर नमस्कार करके अपने २ घरको गये; बहुरि रात्रि व्यतीत भये, सूर्यकिरणके साथ आय स्थित भये. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे पुरुषार्थवर्णनं नाम पंचमः सर्गः॥५॥ षष्ठः सर्गः६। अथ परमपुरुषार्थवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच हे रामजी! इसका जो पूर्वका किया पुरुषार्थ है, निसका नामदैव है और दैवकोऊनहीं,जब यह सतशास्त्रका विचार कर पुरुषार्थ करे, तव पूर्वके संस्कारकोजीत लेता है. पुरुष जिस इष्ट को पानका इस शानद्धारा यल करेंगे तिसको अवश्यमेव : - मुमुक्षुप्रकरणे-परमपुरुषार्थवर्णनम् । (१२३ । पुरुषार्थते पावेगा; अन्यथा कछु नहीं होता, न हुआ है, और न हो- वेगाः पूर्व जो कोऊ पाप किया होता है, तिसका फलजबदुःख पाता है, तव मूर्ख कहता है कि-हाय देव ! हाय कष्ट ! हाय कष्ट ! हे रामजी! इसका जो पुरुषार्थ पूर्वका है, तिसका नाम दैव है और दैव कोऊ नहीं; और जो कोऊ दैव कल्पते हैं, सो मूर्ख हैं;अरु जो पूर्व- जन्मके सुकृत करके आया होता है, वहीं सुकृत सुख होयकेदेता है- जो पूर्वका सुकृत बली होता है तो उसहीकी जय होती है.जो पूर्वका दुष्कृत बली होता है अरुशुभका पुरुषार्थ करता है; सत्संगअरु सत्- शास्त्रहका विचार श्रवण करता है, तो पूर्वके संसारको जीत लेता है. जैसे प्रथम दिन पाप किया होवे; दूसरे दिन बडा पुण्य करे, तोपूर्वका पाप निवृत्त होजाताहै तैसे जब इहादृढ़ पुरुषार्थ करे, तो पूर्वके संस्का- रको जीत लेता है. ताते जो कछु सिद्ध होता है, सो इसको पुरुषार्थ- करके सिद्ध होता है, कि, एकत्र भाव करि प्रयत्न करना इसीका नाम पुरुषार्थ है. जिसका यल एकत्र भाव होयके करेगा. तिसको अवश्यमेव प्राप्त होवेगा- जो पुरुष और दैवको जानके, अपना पुरु- पार्थ त्याग बैठा है, सो दुखको पावेगा, शांतिवान् कबहूं न होवेगा- हे रामजी ! मिथ्या दैवके अर्थको त्यागके, तुम अपने पुरुषार्थका अंगीकार करो. जो संतजन अरु सत्शास्त्रहके वचन अरु युक्तिके साथ यल करके आत्मपदको अभ्यास करके प्राप्त होना इसीका नाम पुरुषार्थ है. प्रकाश करके जैसे पदार्थहका ज्ञान होता है, तैसे पुरुषार्थ कर आत्मपदकी प्राप्ति होती है. जो पूर्वके कियेसे बडा है; पापी होता है अरु इहां दृढ़ पुरुषार्थ कियेते उसको जीत लेता है, जैसे बड़ा मेघ होता है, अरु तिसका पवन नाश करता है अरु. जैसे वर्षदिनहूका क्षेत्र पक्का होता है अरु बर्फ तिसका नाश कर. देता है, तैसे पूर्वका संस्कार पुरुषप्रयलकरके नाश होता है.

[ षष्ठः सर्गः
(१२४)
योगवासिष्ठे।
हे रामजी ! श्रेष्ठ पुरुष सोई है, जाने सत्संग अरु सतशास्त्रद्वारा
बुद्धिको तीक्ष्ण करके, संसारसमुद्र तरनेका पुरुषार्थ किया है अरु जि-
नहू सत्संग अरु सत्शास्त्रद्वारा बुद्धि तीक्ष्ण नहीं करीअरु पुरुषार्थको
त्याग बैठे हैं, सौ पुरुष नीचते नीच गतिको पावेंगे.अरु जो श्रेष्ठ पु.
रुष हैं, सो अपने पुरुषार्थ करके परमानंदपदको पायेंगे जिसके पायेते
बहुरि दुःख नहीं होता अरु जो देखनेकरि दीन होते हैं अरु सत्संग-
ति अरु सत्शास्त्रके अनुसार पुरुषार्थ करते हैं, सोउत्तम पदवीको प्राप्त
होते दृष्टि आते हैं. हे रामजी ! जिस पुरुषने पुरुषप्रयत्न किया है,
तिसको सव संपदाआय प्राप्त होती है अरुपरमानंदकरिके पूर्ण होरहते
हैं. जैसे रत्नहकरि समुद्र पूर्ण है,तैसे वह परमानंदकरके पूर्ण हुए हैं. ता-
ते जो श्रेष्ठ पुरुष हैं, सो अपने पुरुषार्थद्वारा संसारके बंधनते निकस
जाते हैं, जैसे केसरी (सिंह) अपने वलसों पिंजरेते निकस जाता है.
हे रामजी ! यह पुरुष और कछु न करे तब यह करे कि-अपने
वर्णाश्रमके अनुसार विचरे अरु सार पुरुषार्थ करे. जो संतई अरु
शास्त्रहका आश्रय होवे तिसके अनुसार पुरुषार्थ करे, तब सव
बंधनतेमुक्त होवेगा अरु जिसने अपने पुरुषार्थका त्याग किया है, कि
सी और दैवको मानके कहता है कि वह मेरा कल्याण करेगा, सो
जन्ममरणको प्राप्त होवेगा.
हे रामजी!इस जीवको संसाररूपी विचिका रोगहै, तिसको दूर
करनेका उपाय मैं कहता हूं. संतजन अरु सत्शास्त्रहके अविषे दृढ
भावना करनी; जो कछु तिनहूते सुना है, तिसका वारंवार अभ्यास
करना और सब कल्पना त्यागके एकान्त होके तिसका चिंतन क-
रना, तव इसको परमपदकी प्राप्ति होवेगी, अरु दैतभ्रम निवृत्त हो
जावेगा, अद्वैतरूप पडा भासेगा, इसकाही नाम पुरुषार्थ है,
इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे परमपुरुषार्थवर्णने नाम षष्ठःसर्गः॥६॥

७.] मुमुक्षुप्रकरणे-पुरुषप्राधान्यसमर्थनवर्णनम् । (१२५) सप्तमः सर्गः ७। अथ पुरुषार्थप्राधान्यसमर्थनवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच-हे रामजी ! अन्य पुरुषार्थकरके इसको आ- ध्यात्मिक-आदि ताप आय प्राप्त होते हैं; तिसकरि शांतिको नहीं पाता. तुम रोगी नहीं होना; अपने पुरुषार्थद्वारा जन्ममरणके बंधनते मुक्त होवो और कोई दैव मुक्त नहीं करनेका; अपने पुरुषार्थद्वारा सं- सारवंधनते मुक्त होना है. जिस पुरुषने अपने पुरुषार्थका त्याग कियाहै अरु किसी और दैवको मानिकरि, तिसके परायण हुआहै,तिसका धर्म अर्थ, और कामनष्टहोजावेगा,अरुनीचतेनीच गतिको प्राप्त होवेगा. हे रामजी!शुद्ध चैतन्य जो इसका अपना आप है, अरु वास्तव- रूप है, तिसके आश्रयजो आदिचित्तसंवेदन स्फूर्ति है, जो अहंमम सं- वेदन होके, फुरने लगती है बहुरिइंद्रिय अहंस्फूर्ति है जब यह स्फुरना संत अरु शास्त्रके अनुसार होवे, तब वह पुरुष परमशुद्धताको प्राप्त होता है. अरु जोसंत और शास्त्रके अनुसार न होवे, तब वासनाके अनुसार भावअभावरूप जो भ्रमजाल है तिसविषे परा घटीयंत्रकी नाईं भटकता है, शांतिवान् कबहूं नहीं होता. हे रामजी ! जिस किसीको सिद्धताप्राप्त तब अपने पुरुषार्थ- कर हुई है, बिन पुरुषार्थ सिद्धताको प्राप्तन होवेगा जब किसीपदार्थ- को ग्रहण करना होता है, तब भुजा पसारिये तो ग्रहण करना होता है. अरु जो किसी देशको प्राप्त होना होवे सो जब चले तबजाय पहुँ-. चिये, अन्यथा नहीं होता, ताते पुरुषार्थविना सिद्ध कछु नहीं होता. जो कोऊ कहता है, दैव करेगा सो होवेगा,सो मूर्ख है. हे रामजी और देव कोऊ नहीं, इस पुरुषार्थका नाम देव है. यह देवशब्द मूर्ख- हीका चलाया है, जो किसी कष्टके साथ दुःख पाया,तिसको कहते, हैं, दैवका किया है, सो और तो दैव कोऊ नहीं. हुई है, [ सप्तमः सर्गः ११२६) योगवासिष्ठे। हे रामचंद्र ! जोअपना पुरुषार्थ त्यागके, दैवके आश्रय हो रहेगा, सो सिद्धताको प्राप्त न होवेगा,काहेते कि अपने पुरुषार्थ विना सिद्ध- ता किसीको प्राप्त नहीं होती. अरु बृहस्पतिजीने जो दृढ पुरुषार्थ किया है तब सवदेवतावोंके राजा इंद्रके गुरु हुयेहैं अरुशुक्रजी अपने पुरु- पार्थद्वारा सर्व दैत्यनके गुरुहुये हैं, अरु और जो समान जीव हैं तिन- विषेजिप्त पुरुपने प्रयत्न किया है सो पुरुष उत्तम हुवा है. जिसको जाते सिद्धता प्राप्त भई है,सो अपने पुरुषार्थकरि भई है अरुजिन पुरुषोंने सं- तअरु शास्त्रहूके अनुसार पुरुषार्थ नहीं किया, सो मेरेदेखते देखते बड़े राजा अरु प्रजाअरु धनने और विभूतिते क्षीण हो गये हैं, अरु न- रकहू विषे परे जलते हैं. जिसकरके कछु अर्थसिद्धि होवे,तिसका नाम पुरुषार्थहै.अरुजिसकरके अनर्थसिद्धिहोवे,तिसका नाम अपुरुषार्थ है. हे रामजी !इन पुरुषको कर्तव्य यही है, कि- सत्शास्त्र अरु संतहू- का संग करि बुद्धि तीक्षण करे अरुशुभगुणोंको पुष्ट करे, दया, धीरज, संतोष वैराग्यके अभ्यासकरके बुद्धि तीक्ष्ण करे, अरु तीक्ष्ण बुद्धि करके, इसको पुष्ट करे. जैसे वडे तालते मेष पुष्ट होता है, वहुरि वर्षा करके मेघ तालको पुष्ट करता है, तैसे शुभ गुणकरके बुद्धि पुष्ट होती है अरु पुष्टबुद्धिकरि शुभगुण पुष्ट होते हैं. हे रामजी ! जो बाल्यावस्थाते लेकरिअभ्यास किया होता है,उस- को शुद्धता प्राप्त नहीं होती है. अर्थात् दृढ़ अभ्यासविना शुद्धता प्राप्त नहीं होती है,जो किसी देश अथवा तीर्थ जाना होवे,तवमार्गविषे नि- रलम होयके चला जावे,तोजाय पहुंचेगा अरुजव भोजन करेगा तव श्रुधा निवृत्त होगी; अन्यथा नहीं होवेगी अरुजव मुखविषे जिह्वाशुद्ध होवेगी तब पाठ स्पष्ट होवेगा, गूंगासों पाठ नहीं होता.ताते जो कछु कार्यसिद्द होता है,सो अपने पुरुषार्थकर मिद्ध होता है, चुप होरहनेते, कोऊ कार्य सिद्ध नहीं होता. अरु सवही गुरु बैठे हैं, इनहूते पूंछ ७.] मुमुक्षुप्रकरणे-पुरुषार्थप्राधान्यसमर्थनवर्णनम् । (१२७) देखो आगे जो तुम्हारी इच्छा हो सोकरो, अरु जो मुझसों पूछो तो मव शास्त्रका सिद्धांत कहता हूं जिसकरि सिद्धताको प्राप्त होवेंगे. हेरामजी!संत जो हैं ज्ञानवान पुरुष अरु सत्शास्त्र जो है ब्रह्मविद्या इनके अनुसार संवेदन अरु मन अरु इंद्रियोंका विचारना होवे. अरु इसते विरुद्ध होवेतिसते वय॑रखना तिसकरके तुमको संसारका राग दोष स्पर्श नहीं करेगा, सवते रिलेप रहोगे, जैसे जलते कमल निर्लेप रहता है. हे रामजी ! जिस पुरुषहूते शांति प्राप्त होवे, तिसकी भली- प्रकार सेवा करिये; काहेते कि, उसका बड़ा उपकार है,जो संसार- समुद्रते निकासि लेते हैं. हे रामजी ! संतजनभी वही हैं अरु सत्शा- स्त्रभी वेही हैं, कि, जिनके विचार अरु संगतिकरि संसारते चित्त उप- रत होवे, मोक्षका उपाय वही है,ताते और सबकल्पनाओंकेत्यागके अपने पुरुषार्थको अंगीकार करहु तब जन्ममरणका भय निवृत्त होजावे हे रामजी! जव यह वांछा करता है अरुतिसके निमित्त दृढ पुरु- पार्थ करता है, तब अवश्यमेव तिसको पावेअरुजोबडे तेज अरु वि- भूतिकरके संपन्नतुमको दृष्टि आते हैं अरु सुनते हैं.सोअपने पुरुषार्थ- करि भये हैं अरु जोमहाकनिष्ठ सर्प, कीटआदिक तुमको दृष्टि आवते हैं, तिनने अपने पुरुषार्थका त्याग किया है, तब ऐसे हुवे हैं. हे रामजी! अपने पुरुषार्थकोआश्रय करो नहीं तो सर्प, कीटादिक नीच योनिको प्राप्त होवेंगे. जिस पुरुषने अपना पुरुषार्थ त्यागा है और किसी दैवका आश्रय घरा है,सो महामूर्ख है. काहेते कि, यह वार्ता व्यवहारमेंभी प्रसिद्ध है.अपने उद्यम कियेविना किसी पदार्थकी प्राप्ति नहीं होती,तो परमार्थकी प्राप्ति कैसे होवे? ताते दैवको त्याग करि संतजन अरु सत्शास्त्रोंके अनुसार यत्न करहु, परमपद पानेके निमित्त जो दुःखहीते मुक्त होवेहु. हेरामजी! जो जनार्दन विष्णुजी हैं, सोअ- बतार धरकर,दैत्यको मारते हैं अरु अवर चेष्टाभी करते हैं; परंतु पापका [अष्टमः सर्गः (१२८) योगवासिष्ठे। स्पर्शउनको नहीं होता काहेते, जो अपने पुरुषार्थकरके अक्षय पदको प्राप्त हुए हैं. तुमभी पुरुषार्थका आश्रय करो अरु संसारसमुद्रको तरि जावो. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे पुरुषार्थप्राधान्यसमर्थन- वर्णनं नाम सप्तमः सर्गः ॥७॥ अष्टमः सर्गः ॥ अथ देवनिराकरणवर्णनम् । वशिष्ठ उवाच-हे रामजी ! यह जो दैवशब्द है सो मूखोंने कल्पा है.जोदैव हमारी रक्षा करेगा, हमको दैवका आकार कोऊ दृष्टि नहींआवता,न कोऊ दैवका काल है, न दैव कछु करताही है; मूर्ख लोग देवदैव ऐसे कहते हैं और दैव तो कोऊ नहीं इसके पूर्वका कर्मही देव है हे रामजी! जिन पुरुषोंने अपने पुरुषार्थका त्याग किया है,अरु जो देवपरायण हुये हैं, कि-देव हमारा कल्याण करेगा, सो मूर्ख है, काहेते जो अमिविषे यह जाय पडे अरु दैव इमको निकासि लेवे, तब जानिये कि, कोऊ दैवभी है, सो तो नहीं.अरु जो दैव करता है, यह स्नान, दान, भोजन आदिहका त्याग करि तूष्णीं होय वैठे, आपही दैव कर जावैगा, सोभी इसके कियेबिना नहीं होता, ताते. और देव कोऊ नहीं. अपना पुरुषार्थही कल्याणकर्ता है. हे रामजी! जोइसका किया कछु नहीं होता अरु दैवही करनेहारा होता, तो शास्त्र अरु गुरुका उपदेशभी नहीं होता, सोसत्शास्त्रकेउप- देशकरके अपने पुरुषार्थद्वारा इसको वांछित पदवी प्राप्त होती है; ताते और जो कोऊ दैवशब्द हैं, सोव्यर्थ है. इस भ्रमको त्यागकरके संत शास्त्र के अनुसार पुरुषार्थ करे, तब दुःखहूते मुक्त होवेगा-हे रामजी! और दैव कोऊ नहीं, इसका पुरुषा जो है स्पंद, सोई देव है.

म 4] मुमुक्षुप्रकरणे-देवनिराकरणवर्णनम् । (१२९) हेरामजी! जो कोऊ और दैव करनहारा होता, तो जब इस शरीरको त्यागता है अरु शरीर जब नाश हो जाता है, क्रिया शरीरसों कछु नहीं होती; काहेते जो चेष्टा करनेहारा त्याग जाता है, तब दैव होता तो सभी शरीरसों चेष्टा करावता. सो तो चेष्टा कछु नहीं होती. ताते जानना कि, दैवशब्द व्यर्थ है. हे रामजी ! पुरुषार्थकी वार्चा है सो अज्ञानी जीवोंकोभी प्रत्यक्ष है. जो अपने पुरुषार्थबिना कछु होता नहीं. गोपालभी जानता है कि-जो मैं गौवोंको चराऊ नहीं, तो भूखीही रहेंगी. ताते दैवके आश्रय बठि नहीं रहता. आपही चराय ले आता है. हे रामजी !और देवकी कल्पना भ्रमकरके परे करते हैं और दैव तो हमको कोऊ दृष्टि नहीं आता. हस्त, पाद,शरीर, दैवका कोऊ दृष्टि नहीं आता. अपने पुरुषार्थकरि सिद्धता दृष्टि आती है. अरु जो कोऊ आकारते रहित दैव कल्पिये तो नहीं बनता; काहेते कि, निराकार अरु साकारका संयोग कैसे होवे? हे रामजी! और देव कोऊ नहीं, अपना पुरुषार्थ दैवरूप है. जो राजा ऋद्धिसिद्धिसंयुक्त भासते हैं, सोभी अपने पुरुषार्थकरि हुए हैं. रामजी! यह जो विश्वामित्र हैं इन्होंने दैवशब्दका दूरहिते त्याग किया है सोभी अपने पुरुषार्थकरके क्षत्रियते ब्राह्मण हुप हैं अरुऔर जो बडे विभूतिवार हुवे हैं, सोभी अपने पुरुषार्थकरि दृष्टिआवते हैं. हे रामजी! जो दैव पढे विना पंडित करे तो जानिये दैवने किया,सो तो पढे बिना पंडित कहूं नहीं होता, अरु जो अज्ञानी तेज्ञानवान होते हैं सोभी अपने पुरुषार्थकरि होते हैं ताते और देव कोऊ नहीं मिथ्या भ्रमको त्यागकरि, संतजन अरु सत्शास्त्रहूके अनुसार संसारसमुद्र तरनेका प्रयत्न करो तुझारे पुरुषार्थ विना और देव कोऊनहीं. जो और देव होता तो बहुत बेर क्रियाबलभी, अपनी क्रियाको त्यागके सोई १७-१८ [नवमः सर्गः (१३०) योगवासिष्ठे। रहता, आपे दैवही पडा करेगा, सो ऐसे तो कोऊ नहीं करता, ताते अपने पुरुषार्थविनाकछु सिद्ध नहीं होता. अरु जो इसका किया कछु न होता, तो पाप करनेहारे नरक न जाते अरु पुण्य करनेहारे स्वर्गन जाते, परंतु पाप करनेहारे नरकमें जाते हैं अरु पुण्य करनेहारे स्वर्गमें जाते हैं ताते जोकछु प्राप्त होता है, सो अपने पुरुषार्थकरि होता है. हे रामजी !जो कोऊ और देव करता है, ऐसा कहे तिसका शिर काटिए अरु देवके आश्रय जीता रहे तो जानिये कि कोऊ दैव है सो तोजीवता कोऊरहे नहीं. ताते दैवशदको मिथ्या भ्रमजानके संतजन अरु सदशास्त्रहूके अनुसार अपने पुरुषार्थकरि,आत्मपदविषे स्थित होउ इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे दैवनिवारणवर्णनं नाम अष्टमः सर्गः ॥८॥ नवमः सर्गः ९॥ अथ कर्मविचारवर्णनम् । श्रीराम उवाच-हे भगवन्! हे सर्व धर्महूके वेत्ता! तुम कहते हो कि, और देव कोई नहीं परंतु ब्राह्मणभी दैव है ऐसा कहते हैं और दैवका किया सब कछ होता है अरु सुखदुःखके देनेहारा दैव है यह लोकविषे प्रसिद्ध है. श्रीवसिष्ठ उवाच-हे रामजी! मैं तुमको ऐसे कहता हूं, कि जिस करि तुम्हारा भ्रम निवृत्त होजावे; इसहीका कर्म किया हुआ है. शुभ अथवा अशुभ तिसका फल अवश्यमेव भोगना है, सो दैवकहो, पुरुषार्थ कहो और, दैव कोऊ नहीं अरु कर्चा, क्रिया, कर्मआदिकहू विषे तो देव कोऊ नहीं और कोऊ दैवका स्थान नहीं रूप नहीं तो दूसरा देव क्या कहिये ? हे रामजी! मूर्खहके परचावननिमित्त देवशद कहा है जैसे आकाश शून्य है तैसे देवभी शून्य है.

२.] मुमुक्षुप्रकरणे-कविचारवर्णनम् । (१३१) श्रीराम उवाच हे भगवन् ! संवधर्महके वेत्ता तुम कह- ते हो कि-दूसरा दैव कोऊ नहीं सो आकाशकी नाई शून्य है सोतु- म्हारे कहनेसेभी दैव सिद्ध होता है. तुम कहते हो कि, इसके पुरुषार्थ का नाम दैव है अरु जगतविषेभी दैवशब्द प्रसिद्ध है. वसिष्ठ उवाच-हे रामजी ! हम ऐसे तुमको कहते हैं जिस करि दैवशब्द तुम्हारे हृदयसो उठि जावे; अर्थात् शून्य होजावे. देव नाम अपने पुरुषार्थका है अरु पुरुषार्थ नाम कर्मका अरु कर्म नाम वासनका है, वासना मनते होती है, अरु मनरूपी पुरुष है. जिसकी वासना करता है सोई इसको प्राप्त होता है. जो गांवको प्राप्ति होनेकी वासना करता है, सो गांवको प्राप्त होता है; जो पत्तनकी वासना करता है, सो पत्तनको प्राप्त होता है तातें दूसरा दैव कोऊ नहीं. पूर्वका जो शुभ अथवा अशुभ दृढ पुरुषार्थ किया तिसका परिणाम सुख, दुःख अवश्य होता है और तिसीका नाम देव है. हे रामजी! तुम विचार कर देखो कि-अपना पुषार्थ कर्महते भिन्न नहीं तो सुख, दुःख देनेहारा अरु लेनेहारा देव कोऊ नहीं हुआ. क्योंकि, यह जो पापकी वासना करता है अरु शास्त्रविरुद्ध कर्म कर- ता है, सो किसकरि करता है ? पूर्वका जो उसका दृढ पुषार्थ कर्म, तिसकरि यह पाप करता है. अरु जो पूर्वका पुण्य कर्म किया होता है, तो यह शुभमार्गविषे विचरता है. राम उवाच हे भगवन् ! जो पूर्वकी दृढ़ वासनाके अनुसार यह विचारता है, कि, मैं क्या करूं, मुझको पूर्वकी वासनाने दीन किया है, अब मुझको क्या कर्तव्य है ? वसिष्ठ उवाच-हे रामजी ! जो कल इसकी पूर्वकी वासना दृढ़ होरही है, तिसके अनुसार यह विचरना होता है अरु जो [ नवमः सर्गः -- योगवासिष्ठे। सो अपने पुरुषार्थकरके पूर्वकेमलिन संसारको शुद्ध करते हैं, तिनके मल दूर हो जाते हैं. सदशास्त्र अरु ज्ञानहूके वचनअनुसार दृढ़ पुरु- पार्थ करो, तव मलिन वासना दूर हो जावेगी. हे रामजी! पूर्वके मलिन कर्म कैसे जानिये अरु शुभ कर्म कैसे जानिये सो श्रवण करहु जोचित विषयकी ओरघावे अरुशास्त्रविरुद्ध मार्गकी ओर जावे अरु शुभकी ओर न धावे, तो जानिये कि, पूर्वका कर्म कोऊ मलिन है, अरु जो संतजन अरु सत्शास्त्र के अनुसार चे- या करे अरु संसारमार्गते विरक्त होवे, तव जानिये कि. पूर्वका कर्म शुद्ध है. ताते हे रामजी ! तुमको दोनोंकरके सिद्धता है. जो पूर्वका संस्कार शुद्ध है, ताते तुम्हारा चित्त शीघ्रही सत्संग अरुसत्शास्त्रहूके वचनको ग्रहण करी लेवेगा अरु शीघ्रही तुमको आत्मपदकी प्राप्ति होवेगी अरु जो तुम्हारा चित्त इस शुभमार्गविषे स्थिर नहीं हो सके तो दृढ पुरुषार्थकरि संसारसमुद्रते पार होवो. हे रामजी! तुम चेतन हो,जड़ तो नहीं अपने पुरुषार्थका आश्रय करो.मेराभी यही आशीर्वाद है जो तुम्हारा चित्त शीघ्रही शुभ आचर- ग विषे स्थित होवे अरु ब्रह्मविद्याका जो सिद्धांतसार है, तिसविषे स्थित होते. हे रामजी ! श्रेष्ठ पुरुषभी वही है, जिसका पूर्वका संस्कार यद्यपि मलिनभी था;परंतु संत अरु सत्शास्त्र के अनुसार दृढ़ सो सिद्ध- ताको प्राप्त भया है अरुजो मूर्ख जीव हैं तिनहूने अपना पुरुषार्थ त्या- ग किया है, ताते संसारते मुक्त नहीं होता, पूर्वका जो कोऊ पापकर्म किया होता है तिसके मलिनताकरके पापमें धावता है, अपना पुरु- पार्थ त्यागनेते अंध होजाता है अरु विशेषकर धावता है. जो श्रेष्ठ पुरुष है तिसको यह कर्तव्य है कि, प्रथम तो पांचों इंद्रियां वश करनी,शास्त्रअनुसार तिसको वर्तावनी, शुभ वासनादृढ़ करनी, अशुभका त्याग करना.यद्यपि त्यागनी दोनों वासना हैं. प्रथम ३०.] मुमुक्षुमकरणे-ज्ञानावतरणवर्णनम् । (१३३) शुभ वासनाको इकडी करनी अरु अशुभ त्याग करनी. जब शुद्ध वासनाकरके कषाय परिपक्क होवेंगे अर्थात् अंतःकरण जब शुद्ध होवेगा, तिस हृदयविषे संत अरु सत्शास्त्रका जो सिद्धांत है, तिसका विचार उत्पन्न होवेगा और ताते तुमको आत्मज्ञानकी प्राप्ति होवेगी. तिस ज्ञानद्वारा आत्माका साक्षात्कार होवेगा.बहुरि क्रिया ज्ञानकामी त्याग होजावेगा. केवल शुद्ध अद्वैतरूप अपनाआप शेष भासेगा. ताते हे रामजी ! और सब कल्पनाका त्याग करि संतजन अरु सत्शास्त्रहूके अनुसार पुरुषार्थ करो. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे कमविचारवर्णनं नाम नवमः सर्गः ॥ ९ ॥ दशमः सर्गः १०॥ अथ ज्ञानावतरणवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच हे रामजी ! मेरे वचनको ग्रहण करो, सो वचन बांधव जैसे है, बांधव कहिये जो तेरे परममित्र होवेंगे अरु दुः- सहूते तेरी रक्षा करेंगे. हे रामजी ! यह जो मोक्षोपाय तुमको कहता हूं तिसके अनुसार तुम पुरुषार्थ करोगे तब तुम्हारा परमार्थ सिद्ध होवेगा अरु यह चित्त जो संसारके भोगकी ओर धावता है, विस भोगरूपी खांडविषे चित्तको गिरने मत देहु, भोगको विरस जानिके त्याग देहु, वह त्याग तेरा परममित्र होवेगा, अरु त्यागभी ऐसा करहु जो बहुरि भोगहूका ग्रहण न होय. रामजी! यह मोक्षोपायसंहिता है, चित्तको एकाग्र करके इसको श्रवण करो.तिसकरि परमानंदकी प्राप्ति होवेगी.प्रथम शम अरु दमको धारि, अर्थात संपूर्ण संसारकी वासनाका त्याग करहु अरु उदारताक- रके तृप्त रहना, इसका नाम शम है. अरु दम अर्थात बाह्य इंद्रियको [ दशमः सर्गः (१३४) योगवासिष्ठे। वश करना. जब इसको प्रथम धारोगे तव परमतत्त्वका विचार आय. उत्पन्न होवेगा. तिस विचारते विवेकद्वारा परमपदकी प्राप्ति होवेगी, जिस पदको पाय करि, बहुरिदुःख कदाचित् न होवेगा, अविनाशी सुख तुमको आय प्राप्त होवेगा ताले जो कछु मोक्षोपाय यह संहिता है तिसके अनुसार पुरुषार्थ करहु, तव आत्मपदको प्राप्त होवोगे पूर्ण जो कछु ब्रह्माजीने हमको उपदेश किया है, सो तुमको कहते हैं. श्रीराम उवाच हे मुनीश्वर ! तुमको जोब्रह्माजीने उपदेश किया था, सो किसकारण किया था अरु कैसे तुमने धारा सो कहो. वसिष्ठ उवाच हे रामचंद्र ! शुइ चिदाकाश एक है अरु अनंत है, अविनाशी है, परमानंदरूप है, चिदानंदस्वरूप है, ब्रह्म है तिसविषे संवेदन स्पंदरूप होइ है, सो विष्णु होइ करि स्थित है, सो विष्णुजी कैसे हैं? जो स्पंद अरु निष्पंद विषे एकरस हैं. कदाचित् अन्यथाभावको नहीं प्राप्त हुए. जैसे समुद्रविषे तरंग उपजते हैं, तैसे शुद्ध चिदाकाशते पदकरके विष्णु उत्पन्न हुए हैं. तिन विष्णुजीके स्वर्णवत् कर्णिकावोंवाले नाभिकमलते ब्रह्माजी प्रगट भये हैं. तिन ब्रह्माजीने ऋपि, मुनीश्वरसहित स्थावर जंगम प्रजा उत्पन्न करी, तिस मनोराज्य करि ब्रह्माजीने जगतको उत्पन्न किया. तिस जगतके कोनविषे जो जंवूद्वीप, भरतखंड है, तिसविषे मनु- व्यको दुःखकरि आतुर देखि कार, ब्रह्माजीको करुणा उपजी. जैसे पुत्रको देखि, पिताको करुणा उपजती है. तब तिसके सुखनिमित्त ब्रह्माजीने तप उत्पन्न किया, कि, सुखी होवे अरु आज्ञा करी कि, तप करो. तवतप करत भये, तिस तप करि स्वर्गादिकहूको जाय प्राप्त होने लगे; तिन सुखनको भोग करि, बहुरि गिरहिं, तब दुःखी रहे. ऐसे ब्रह्माजी देखि करि, सत्यवाक धर्मको प्रतिपादन करत भये, ति- १०.] मुमुक्षुप्रकरणे-ज्ञानावतरणवर्णनम् । (१३५) नके सुखके निमित्त आज्ञा करि तिस धर्मकी प्रतिपादना करि लोक- हूको सुख प्राप्त होने लगे; तहां केताक काल सुखभोग करि; बहु- रि गिरहिं; तब दुःखीके दुःखी रहे; बहुरि ब्रह्माजीने दानतीर्थादिक पुण्यक्रिया उत्पन्न करके, उनको आज्ञा करी कि, इनके सेवनेकरि तुम होहुगे. जब वह जीव उनको सेवने लगे. तब बडे पुण्यलोकहूको प्राप्त भये, अरु तिनके सुख भोगने लगे. बहुरि केताक काल अपने कर्मके अनुसार भोग भोगि गिरे; तब तृष्णाकरि बहुत सुखदुःखके अनुभव करते भये. अरु दुःखकरि आतुर हुवे; तब ब्रह्माजी देखत भये, जो जन्म अरु मरणके दुःखकरि महादीन होते हैं, ताते सोई उपाय करिये जिसकरि उनका दुःख निवृत्त होवे. हे रामचंद्र ! ब्रह्माजी विचारते भये, कि, इसका दुःख आत्मपद बिना निवृत्त नहीं होनेका; ताते आत्मज्ञानको उत्पन्न करिये, जो यह सुखी होवें. इसप्रकार विचार करि, आत्मतत्त्वका ध्यान करते भये. आत्मतत्त्वके ध्यानते संकल्प किया; तिस ध्यानके करनेते जो शुद्धतत्त्वज्ञान है, तिसकी मूर्ति होकरि मैं प्रकट भया. सो मैं कैसा हूं? ब्रह्माजीके समान हूं. जैसे उनके हाथविषे कमंडलु है, तैसे मेरे हाथविषे कमंडलु है; जैसे उनके कंठविषे रुद्राक्षकी माला है, तैसे मेरे कंठमें भी रुद्राक्षकी माला है; जैसे उनके उपर मृगछाला है, तैसे मेरे ऊपर मृगछाला है; इसप्रकार ब्रह्माजीका अरु मेरा समान आकार है, अरु मेरा शुद्धज्ञानस्वरूप है, मुझे जगत् कछु नहीं भासता. सुषुसिकी नाई जगत् मुझको भासता है, तव ब्रह्माजीने विचार किया कि, इसको मैंने जीवोंके कल्याणनिमित्त उत्पन्न किया है; अरु यह तो शुद्धज्ञानस्वरूप है,अरु अज्ञानमार्गको उपदेश तब होवे, जब कछु प्रश्न उत्तर होवे, तब मिथ्याका विचार होवे. हे रामजी! जीवोंके कल्याणनिमित्त मुझको ब्रह्माजीने गोदमें वि- (१३६) योगवासिष्ठे। [दशमः सगः छाया अरुशीशपै हाथ फेरा, तिस करि मैं शीतल होगया. जैसे चंद्र- माकी किरणकरिशीतता होती है तैसे मैं शीतल भया. तब ब्रह्माजी मुझको जैसे हंसको हंस कहे, यों कहा कि-हे पुत्र! जीवोंके कल्याण- निमित्त एक मुहूर्तपर्यंत तुम अज्ञानको अंगीकार करो. श्रेष्ठ पुरुष जो सो दूसरहूके निमित्तभी अंगीकार करते आये हैं जैसे चंद्रमा वहुत. निर्मल है, परंतु श्यामताको अंगीकार किये हैं तैसे तुमभी एक मुहूर्त अज्ञानको अंगीकार करो- हे रामजी! इसप्रकार मुझको कहिकरि ब्रह्माजीने शाप दिया कि-"तू अज्ञानी होवेगा.” तब मैंने ब्रह्माजीकी आज्ञा मानि शाप- को अंगीकार किया. तब मेरा जो शुद्ध आत्मतत्त्व अपना आप था, तिसते मैं अन्यकी नाई होता भया,मेरी स्वभावसत्ता मुझको विस्मर- महो गई अरुमेरामन जागि आया.भाव अभावरूपजगत मुझको भा- सने लगा. अरु आपको मैं वसिष्ठ जानत भया अरु ब्रह्माजीका पुत्र यो जानत भया. अरु नानाप्रकारके पदार्थसहित जगत् जानत भया अरुतिनकी ओर चंचल होत भया,तब मैं संसारजालको दुःखरूप जा- नि करि, ब्रह्माजीते पूछा भया कि हे भगवन! यह संसार कैसे उत्पन्न भया अरु कैसे लीन होता है! हे रामजी! जब इसप्रकार पिता ब्रह्मा जीसों प्रश्न किया, तब भली प्रकार मुझको उपदेश करत भये; तिसकरि मेरा अज्ञान नष्ट होगया.जैसे सूर्यउदय हुवे तम निवृत्त होजाता है, तैसे मेरा अज्ञान निवृत्त होगया, अरु मैं शुद्धताको प्राप्त भया.जैसे आदर्श- को मार्जन करता है अरु शुद्ध हो आवता है, तैसे मैं शुद्ध हुआ. हे रामजी! मैं ब्रह्माजीसेभी अधिक होता भया, तब मुझको पर- मेष्ठी ब्रह्माजीने आज्ञा करी कि-हे पुत्र! जंबूद्वीप भरतखंडमें जावो तुमको सृष्टिपर्यंतविषे अधिकार है, तहां जाइकरि, जीवोंको उपदेश करहु, जिसको संसारके सुखकी इच्छा होचे, तिसको कर्ममार्गका ११.] मुमुक्षुप्रकरणे वसिष्ठोपदेशवर्णनम् । (१३७) उपदेश करना; तिसकरि स्वर्गादिक सुख होवें. अरु संसारते विरक्त होवे और जिसको आत्मपदकी इच्छा होवे, तिसको ज्ञानउपदेश करना, ताते तुम अव भुवोकविषे जाहु. हे रामजी ! इसप्रकार मेरा उपदेश अरु उपजना हुवा है अरु उसप्रकार आना हुवा है. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे ज्ञानावतरण नाम दशमः सर्गः ॥१०॥ एकादशः सर्गः १११ अथ वसिष्ठोपदेशवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच-हे रामजी ! इसप्रकार पृथ्वीविषे मेरा आना भया. में कैसाहूं? जाको आत्मज्ञानकी वांछा होवे सो पूर्ण करिवेके लिये ब्रह्माजी मुझको उत्पन्न करत भये. श्रीराम उवाच-हे मुनीश्वर ! तिस ज्ञानकी उत्पतिते अनं- तर जीवनकी शुद्धि कैसी भई, सो कहो. वसिष्ठ उवाच हे रामजी !जो शुद्ध आत्मतत्व है तिसका स्वभावरूप संवेदन स्फूर्ति है; सो ब्रह्माजीरूप होकर, स्थित भई है. जैसे समुद्र अपनी द्रवताकरके तरंगरूप होता है, तैसे ब्रम्हाजी भये हैं. वहुरि संपूर्ण जगत्को उत्पन्न किया अरु तीनों काल उत्पन्न किये, तब केताक काल व्यतीत हुवा; अरु कलियुगआया; तिसकरि जीवों- की बुद्धि मलीन होगई, अरु पापविषे विचरने लगे, शास्त्र वेदकी आज्ञा माननेते रहगये. इसप्रकार धर्मकी मर्यादा छिपगई अरु पाप प्रकट भया. जेती कछु राजधर्मकी मर्यादा थी, सो सब नष्ट होगई अरु अपनी इच्छाके अनुसार जीव विचरने लगे, ताते कष्ट पानेलगे, तिनको देखकर,ब्रह्माजीको करुणा उपजी, तिस दयाको पारि करि भूलोकविषे मुझको भेजा अरु कहा कि हे पुत्र! जायकरि, तुम धर्मकी मर्यादा स्थापन करो अरु जीवनको शुद्ध उपदेश करो. जिसको [ एकादशः सर्गः योगवासिष्ठे। भोगहीकी इच्छा होवे,तिसको कर्मकांडका उपदेश करना. और जप, तप, स्नान, संध्या यज्ञादिकका उपदेश करना.अरु जो संसारते विर- कहुआ है अरु मुमुक्षु है, जाको परमपद पानेकी इच्छा है, तिसको ब्रह्मविद्याका उपदेश करना. हे रामचंद्र! जिसप्रकार ब्रह्माजी मुझको आज्ञा करिभूमिलोकविषे भेजते भये, तैसेही सनत्कुमार नारदकोहू कहते भये, तब हम सब . ऋषीश्वर इकट्ठे होकर, विचारते भये, कि, जगत्की मर्यादा किस प्रकार होवे अरु जीव शुभमार्गविषे कैसे विचरहीं ? तब हमने यह विचार किया, कि-प्रथम राज्यका स्थापन करना जो जीव तिसकी आज्ञा अनुसार विचरही. प्रथम दण्डकर्ता राजा स्थापन किया. सो कैसा राजा? जो बड़ा वीर्यवान् अरुतेजमान, वड़ा उदारआत्मा भया- तिसराजाहको हमने आध्यात्मिक विद्याका उपदेश किया, तिसकरि परमपदको प्राप्त भया. जो परमानंदरूप अविनाशी पद है, सो ब्रह्मउप- देश तिसको भया, तव सुखी भये. इस कारणते ब्रह्मविद्याका नाम राजविद्या है. तव हमहून वेद, शास्त्र, श्रुति,पुराणकरिधर्मकी मर्यादा स्थापन करी, सो जप तप, यज्ञ, दान, स्नान आदिक क्रियाको प्रगट कीनी. अरे जीवो! तुम इसके सेवनेकरि सुखी होवोगे, तव सव फ- लको पारि करि, तिनको सेवने लगे, तामें कोऊ विरला निरहंकार- हृदय शुद्धताके निमित्त कर्म करता था. हे रामजी ! जो मूर्ख हैं सो कामनाके निमित्त मनमें फूलके कर्म करते हैं. सो घटीयंत्रकी नाई भटकते फिरते हैं. सो कबहूं ऊर्ध्व अरु- कवहूं नीचे आते हैं और जो निष्काम करते हैं तिनका हृदय शुद्ध होता है, फिर सो ब्रह्मविद्या के अधिकारी होते हैं, ताके उपदेशद्वारा आत्मपदकी प्राप्ति होती है इस प्रकारसों जीवन्मुक्त हुवे हैं, कई राजा प्रसिद्ध हुवे हैं, सोराजाओंकी परंपरा चलावते हमारे उपदेशद्वाराज्ञा- - मुमुक्षुप्रकरणे-वसिष्ठोपदेशवर्णनम् । ( १३९) नको प्राप्त भये हैं और राजा दशरथह ज्ञानवान् भये हैं और तुमभी इसी दशाको आयके प्राव हुए हो,सो तुम सबते श्रेष्ठ हुए हो. जैसे तुमः विरक्त आत्मा हुए हो,तैसे आगेहु स्वाभाविक विरक्त आत्मा भये हैं सो स्वभावकर देह शुद्धिकर हुये हैं। इसीकारणते तुम श्रेष्ठ हो. जो कोऊ अनिष्ट दुःस्त्र प्राप्त होता है, तिसकर विरक्तता उपजती है, सोतुम- कोनहीं भई,तुमको सब इंद्रियनके विषय विद्यमान हैं, तैसे होते तुम्हा- रेको वैराग्य हुआ है, ताते तुम श्रेष्ठ हो. हे रामजी! जो श्मशान-आदिक कष्टके स्थान कहे तिन ठिकानोंमें सबको वैराग्य उपजता है. "कछु नहीं! मरजाना है!" तिनमें जो कोऊ श्रेष्ठ पुरुष होता है, सो वैराग्यको दृढ कर रखता है और जो मूर्ख है सो फिरविषयमें आसक्त होजाता है, ताते जिनके अकारण वैराग्य उप- जता है सो श्रेष्ठ है. हे रामजी! जो श्रेष्ठ पुरुष है, सो अपने वैराग्य अरु अभ्यासके बलकरके संसारबंधनते मुक्त होजाते हैं, जैसे हस्ती बंधनको तोरके अपने बलसों निकस जाता है, तब सुखी होता है तैसे वैराग्य अभ्यासके बलकर बंधनते ज्ञानी मुक्त होते हैं. हे रामजी ! यह संसार बडा अनर्थरूप है; जिस पुरुषने अपने पुरुषार्थकरके बंधनको नहीं तोडा, तिसको रागदेषरूपी अमि जलाता है, अरु जिन पुरुषोंने अपने पुरुषार्थकरके शास्त्र और गुरुकोप्रमाण- करके ज्ञान साधा है सो उस पदको प्राप्त भये हैं तिनको आध्यात्मिक आधिदैविक,आधिभौतिक तापजलाय सक्ता नहीं. जैसे वर्षाकालमें बहुत वर्षा के होते वनकोदावानल जलाय नहीं सक्ता तैसे ज्ञानीको आध्यात्मिक-आदि ताप कष्टको नहीं देते. हे रामजी! जिन श्रेष्ठ पुरुषोंने संसारको विरस जानकर, त्याग किया है, तिनको संसारकापदार्थ गिराय नहीं सक्ता अरु जो मूर्ख तिनको गिराय देते हैं, जैसे अंध्यारी चलत पवनके वेगसों वृक्ष गिर जाते हैं परंतु कल्पवृक्ष गिरता नहीं. तैसे हे रामजी! श्रेष्ठ पुरुष वही है [एकादशः सर्गः , (१४०) योगवासिष्ठे । जिसको संसार विरस होगया है, सो केवल आत्मतत्त्वकी इच्छा करके तिसपरायण भये हैं तिनकोही ब्रह्मविद्याका अधिकार है सोई उत्तम पुरुष है. हे रामजी! तुमभी तैसे उज्ज्वलपात्र हो. जैसे कोमल पृथ्वीमें बीज बोते हैं तैसे तुमको मैं उपदेश करता हूं और जिसको भोगकी इच्छा है और जो संसारकी ओर यल करता है सो पशुवत् है. श्रेष्ठ पुरुष वही है, जिसको संसार तरनेका पुरुषार्थ होता है. हे रामजी! प्रश्न तिनके पास करिये, और तिनको जानिये किये मेरे प्रश्नका उत्तर देनेको समर्थ हैं और जिसमें उत्तर देनेकी सामर्थ्य दीखनेमें नहीं आवे, तिससों प्रश्न करना नहीं और उत्तर देनेको जो समर्थ देखिये और तिसके वचनमें भावना नहोय. तवभी तिससा प्रश्नन करिये. काहेते कि, दंभकर प्रश्न करनेमें पाप होता है, और गुरुभी उपदेश तिनको करता है, जो संसारते विरक्त, अरुकेवल आत्मपरायण होनेकी श्रद्धा होवे; अरु आस्तिकभाव होवे, ऐसा पात्र देखके, उपदेश करे, हे रामजी! जो गुरु अरु शिष्य दोनों उत्तम होते हैं, तव वचन शोभते हैं. तुम उपदेशके शुद्ध पात्र हो, जेते कछु गुण शिष्यके शास्त्रमें वर्णन किये हैं सो सव तुम्हारेमें मिलते हैं. और मैं उपदेश करनमें समर्थ हूं, ताते कार्यशीघ्र होवेगा. हे रामजी! शुभगुणसाथ तुम्हारी बुद्धि निमल हो रही है. मेरा जो सिद्धांतका सार वचन है सो तुम्हारे हृदयमें प्रवेश कर रहेगा. जैसे उज्ज्वल वस्त्रको केशरका रंग शीघ्र चढ़ जाता है, तैसे तुम्हारे निर्मल चित्तको उपदेशका रंग लगेगा. जैसे सूर्यके उदयते सूर्यमुखी कमल खिलते हैं तैसे तेरी बुद्धि शुभगुणकर खिल आई है. हेरामजी! जो कछुशास्त्रका सिद्धांत आत्मतत्त्व मैं तुमको कहता हूं, तिसमें तुम्हारी बुद्धि शीघ्र प्रवेश करेगी. जैसे निर्मल जलमें सूर्यकी कांति प्रवेश करती तैसे तुम्हारी बुद्धि आत्मतत्त्वमें शुद्धता करके प्रवेश करेगी. हे रामजी! मैं तुम्हारे आगे हाथ जोडके प्रार्थना करता हूं कि, जो है ११.] मुमुक्षुपकरणे-वसिष्ठोपदेशवर्णनम् । (१४१) • कछु मैं तुझको उपदेश करता हूं, तिसविषे तुम आस्तिकभावना करियो जोइन बचनकर मेराकल्याण होवेगा,अरु जो तुमको धारणा न होवे तो प्रश्नमत करना,जो शिष्यको गुरुके वचनमें आस्तिक भावना होती है, तिसका शीघ्र कल्याण होता है,ताते मेरे वचनमें आस्तिक भावना करिये और जिसकर तू आत्मपदको प्राप्त होवेगा सो मैं कहता हूं.प्रथ- मतोजो अज्ञानी जीवमें असत्य बुद्धि है तिसका संग त्याग कर, अरु मोक्षद्वारके जो चार द्वारपाल हैं, तिनसों मित्रभावना कर जब ति- नसों मित्रभाव होयगा, तब वह मोक्षदारमें पहुंचाय देयँगे; तबआत्म- दर्शन तुमको होवेगा. सो द्वारपालोंके नाम श्रवण करो शम, संतोष, विचार और सत्संग, ये चारों द्वारपाल हैं; जिन पुरुषोंने इनको वश कि- या है, तिसको यह शीघ्र मोक्षरूपी द्वारके अंतरकर देते हैं. हेरामजी! जो चारों वश न होवें तो तीनको वश करो अथवा दोको वश करलो अथवा एककोवश करो.जो एकवश होवेगा, तोचारों वश हो जायेंगे इन चारोंका परस्पर स्नेह है, जहां एक आता है तहां चारों आके रहते हैं. जिन पुरुषोंने इनसों स्नेह किया है सो सुखी भये हैं, और जिनने इनका त्याग किया है, सो दुःखी भये हैं. हे रामजी! यद्यपि प्राणका त्याग होवे तोभी एक साधन तो बलकरके वश करना, एकके वश कियेते चारोंही वशी होयँगे. अरु तुम्हारी बुद्धिमें शुभगुणोंने आयके निवास किया है, जैसे सूर्यमें सब प्रकाश आये हुवे हैं तैसे संतने अरु शास्त्रनेजो निर्मल गुण कहे हैं, सो सब तुम्हारेमें मिलते हैं. हे रामजी! अबतुम मेरे वचनके अधिकारी भये हो. जैसे चंद्रमाके उदयते चंद्र- मुखी कमल खिल आते हैं, तैसे शुभगुणकर तुह्मारी बुद्धि खिलआईहै. हे रामजी ! सत्संग अरु सत्शास्त्रद्वारा बुद्धिको तीक्ष्ण कियेते शीघ्र आत्मतत्त्वमें प्रवेश होता है, ताते श्रेष्ठ पुरुषवही है, जिसने संसारको विरस जानके त्याग किया है; अरु संत अरु सत्शास्त्रके वचनद्वारा आत्मपद पानेका यल करता है, सो अविनाशी पदको प्राप्त होता है. ।

[ बादशः सर्गः ( १४२) योगवासिष्ठे। और जो संसारका त्याग करके, संसारकी ओर लगे हैं, सो महामूर्ख जड़ हैं, जैसे जल शीतलता करके बर्फ हो जाता है, तैसे अज्ञानीमू- र्खताकरके आत्ममार्गतेजड हो रहे हैं. हे रामजी ! अज्ञानीके हृदय- रूपी विलमें दुराशारूपी सर्प रहता है, सो कदाचित् शांति नहीं पाता अरु आनंदसों कवहूं प्रफुलित नहीं होता. अरु आशा करके सदा सं- कुचित रहता है, हे रामजी ! आत्मपदके साक्षात्कारमें विशेष आव- रण आशाही है. जैसे सूर्यके आगे मेधका आवरण होता है, तैसे आत्मतत्वके आगे दुराशा आवरण है. जव आशारूपी आवरण दूर होवे, तब आत्मपदका साक्षात्कार होते. हे रामजी ! आशातव दूर होवे, जव संतकी संगति अरु सत्शास्त्रका विचार होवे. हे रामजी! संसाररूपी एक बड़ा वृक्ष है, सो वोधरूपी खगकर छेदा जाता हैं जव सत्संग अरु सत्शास्त्रकर तीक्ष्ण बुद्धि होवे, तब संसाररूपी भ्रमका वृक्ष नष्ट हो जाता है. जब शुभ गुण होते हैं, तब आत्मज्ञान आके विराजता है. जहां कमल होते हैं, तहां भौरेआके स्थित होते हैं. तब शुभ गुणोंमें आत्मज्ञान रहता है. हे रामजी ! शुभ गुणरूप पवनकर जब इच्छारूपी मेघ निवृत्त होता है, तव आ- मरूपी चंद्रमाका साक्षात्कार होता है. जैसे चंद्रमाके उदय हुवे आ- काश शोभता है, तैसे आत्माके साक्षात्कार हुवे तेरी बुद्धि खिलेगी. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे वसिष्ठोपदेशो नाम एकादशः सर्गः ॥११॥ द्वादशः सर्गः १२॥ अथ तत्वज्ञमाहात्म्यवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच-हे रामनी! अब तुम मेरे वचनके अधिकारी हो.काहेते कि, तप, वैराग्य, विचार, संतोष-आदि जो शुभ गुण संत १२.] मुमुक्षुप्रकरणे-तत्त्वज्ञमाहात्म्यवर्णनम् । (१४३.) अरु शास्त्रके कहे हैं, सो सब तुम्हारेमें मिलते हैं, ताते तुम मेरे वचन- को सुनो, रजतमगुणको त्याग कर, शुद्ध सात्विकवान होकर सुनो. राजस जो विक्षेप अरुतामस जो लय निद्रामें होता है सोदोकात्याग करके सुनो.जेते कछु जिज्ञासु गुण शास्त्रमें वर्णन किये हैं, तिन सबकर तुम संपन्न हो अरु जेते कछु गुरुके गुण शास्त्रमें वर्णन किये हैं सो सब मेरेमें हैं. जैसे रत्ननकर समुद्र संपन्न है तैसे में संपन्न हूं. ताते मेरे वचनके तुम अधिकारी हों और मूर्खको मेरे वचनका अधिकार नहीं. हे रामजी!जैसे चंद्रमाके उदयते चंद्रकांतमणिद्रवीभूत होती है, तव तामेंते अमृत झरता है और पत्थरकी शिला है तिसते तामें द्रवीभूत नहीं होता है, तैसे जो जिज्ञासु होता है तिसको परमार्थ वचन लगता है अरु उपदेश करनेहारा ज्ञानवान् न होवे तो उसको आत्माका साक्षात्कार नहीं होवे. चंद्रमुखी कमलिनी निर्मल होय अरु चंद्रमा न होय तब प्रफुल्लित नहीं होती. तैसे तुम मोक्षका पात्र हो अरु मैं भी गुरु हूं; मेरे उपदेशकर तुम्हारा अज्ञान नष्ट हो जावेगा. मैं मोक्षका उपाय कहता हूं जब तिसको तुम भले प्रकार विचा- रोगे, तब जेती कछुमलीन मनकी वृत्ति है तिसका अभाव होजायगा. जैसे महाप्रलयके सूर्यकर मंदराचल पर्वत जल जाता है;ताते हे रामजी! वैराग्य अरु अभ्यासके बलकर इस मनका अपने विषे लीनकर शांता- स्मा होवहु. तुमने बाल्यावस्थासों लेकर अभ्यास कर रक्खा है, ताते तुम्हारा मन उपशम पायके, आत्मपदको प्राप्त होवेगा है रामजी! स- त्संग अरु सवशास्त्रद्वारा जिन्होंने आत्मपद पाया है, सो सुखी भये हैं, फिर तिनको दुःख नहीं लगता. काहेते, जो दुःख देहाभिमानकर होता है, सो देहका अभिमान तो उन्होंने त्याग दिया है, तैसे जिसने देहका अभिमान त्याग दिया है, अरु देहका आत्मताकरके बहुरि ग्रहण नहीं करता ताते सुखी रहता है. हे रामजी! जिन्होंने आत्माका बल घरके, विचारद्वारा आत्मपदको पाया है, सो अकृत्रिम आनंदकर (१४४) [ बादशः सर्गः योगवासिष्ठे। सदा पूर्ण हैं,सब जगत् तिनको आनंदरूप भासता है अरु जोअसम्य- ग्दर्शी हैं,तिनको जगत् अनर्थरूप भासता है.हेरामजी!संसरणरूपजो यह संसारसर्प है, सो अज्ञानीके हृदयमें दृढ होगया है, सो योगरूपी गारुडमंत्रकरके नष्ट हो जाता है अन्यथा नहीं होता.और सर्पका विष है सो एक जन्ममें मरता है अरु संसाररूपी जो विष है, तिसकरके अनेक जन्मपायके मरताचलाजाता है,शांतिवान् कदाचित नहीं होता हे रामजी!जिन पुरुषोंने सत्संग अरुं सत्शास्त्रके वचनद्वारा आ- सपदको पाया है सो आनंदित भये हैं अरु अंतरबाहिर सब जगत् इनको आनंदरूप भासता है. अरु सब क्रिया करनेमें आनंदविलास. है. और जिनने सत्संग अरु सत्शास्त्रका विचार त्यागा है अरुसंसा- रके सन्मुख हैं तिसकर तिनको संसार अनर्थरूप है. सो ऐसा दुःख देता है कि,जैसे सर्पके दंशते दुःखी होते हैं अरुशस्त्रकर घायाल होते हैं अरु अनिमें पारेकी नाई जलते हैं अरु जेवरीके साथ बँधजाते हैं अरु अंधकूपमें गिरनेते कष्ट पाते हैं तैसे संसारमें मनुष्य दुःख पाते. हैं, हे रामजी । जिन पुरुषोंने सत्संग अरु सत्शास्त्रद्वारा आत्मपदको नहीं पाया, सो ऐसे कष्ट पाते हैं, जो नरकरूपी अनिमें जरते हैं,अरु- चिके विष पीते हैं, पाषाण वर्षाकर चूर्ण होते हैं, कोल्हमें पीस डारते अरु शस्त्रसाथ कटते हैं,इत्यादिक जो बडे कष्ट हैं सो तिनको प्राप्त नहीं होते हैं हेरामजी ! ऐसा दुःख कोऊ नहीं जो इस जीवको प्राप्त नहीं होता. आत्माके प्रमादसों सब दुःख होते हैं, अरु जिन पदार्थों- को यह रमणीय जानते हैं, सो चक्रकी नाई चंचल हैं कबहूं स्थिर नहीं रहते. सन्मार्गको त्यागकर जो इनकी इच्छा करते हैं, सो महा दुःखको पास होते हैं,अरु जिन पुरुषोंने संसारको विरस जाना है और पुरुषार्थकी तरफ दृढ भये हैं, तिनको आत्मपदकी प्राप्ति होती है, हे रामजी! जिन पुरुषोंको आत्मपदकी प्राप्ति भई है, तिनको फिर दुःख नहीं होता और तिनके दुःखजो नष्ट नहीं होते, तो ज्ञानकेनि-

१२.]
मुमुक्षुप्रकरणे-तत्त्वज्ञमाहात्म्यवर्णनम् । (१४५)
मित्त पुरुषार्थ कोऊनहीं करता. जोअज्ञानी हैं तिनको संसार दुःखरूप
है। अरुज्ञानीको सबजगत आनंदरूप है. अपने आपही है, उनकोभ्रम
कोऊ नहीं रहता. हे रामजी! ज्ञानवान्में नानाप्रकारकी चेष्टाभी दृष्टि
आती हैं, तौभी सदाशांतरूप हैं,अरुआनंदरूप है,संसारका दुःखकोऊ
नहीं स्पर्श कर सकता, काहेते कि, तिसने ज्ञानरूपी कवच पहिरा है.
हे रामजी !ज्ञानवान्कोभी दुःख होता है. बडे बडे ब्रह्मर्षि अरुरा-
जर्षि बहुत ज्ञानवान् भये हैं, सोभी दुःखको प्राप्त होते हैं, परंतु दुःखसों
आतुरनहीं होते; क्योंकि जो ज्ञानवान्ने ज्ञानका कवच पहिरा है ताते
कोऊ दुःख स्पर्श नहीं करता, सदा आनंदरूप है जैसे ब्रह्मा, विष्णु
और रुद्र, नानाप्रकारकी चेष्टा करते जीवको दृष्टि आवते हैं, अरु
अंतरते सदा शांतरूप हैं इसप्रकार औरभी जो ज्ञानवान् उत्तम पुरुष हैं
सोशांतरूप हैं, तिनको कर्ताका अभिमान कोऊनहीं फुरता हे रामजी!
अज्ञानरूपी जो मेघ है तिसकर मोहरूपी कुडाला वृक्ष है, सो ज्ञानरूपी
शरकालकरके नष्ट होजाता है, ताते स्वसत्ताको प्राप्त होते है अरु सदा
आनंदकर पूर्ण है. हे रामजी! जो कछु क्रिया करते हैं, सो तिनको
विलासरूप है, अरु सबजगत् आनंदरूप है अरु शरीररूपी रथ, इंद्रि-
यरूपीअश्वऔर मनरूपी रस्सी, तासों अश्वको खेंचता है, अरु बुद्धि-
रूपी रथवाही है, तिस रथमें यह पुरुष बैठा है, अरु इंद्रियरूपी अध
इसको खोटे मार्गमें डारते हैं. अरु ज्ञानवान्के इंद्रियरूपी अश्व है सो
ऐसे हैं कि, जहां जाते हैं. तहां आनंदरूप हैं किसी ठौरमें खेद नहीं
पाता. सब क्रियामें उनको विलास है, सर्वदा आनंदकर तृप्त रहते हैं.
इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे तत्त्वज्ञमाहास्यं नाम
द्वादशः सर्गः ॥ १२॥

(१४६) योगवासिष्ठे। [त्रयोदशः सर्गः त्रयोदशः सर्गः १३॥ अथ शमवर्णनम्। वसिष्ठ उवाच हे रामजी ! इसी दृष्टिको आश्रयकर जो हृदय पुष्ट होवे, बहुरि संसारके इष्ट अनिष्ट कर्मकर चलायमान न होवे जिन पुरुषोंको इसप्रकार आत्मपदकी प्राप्ति भई है सो परमआनंदित भये हैं, शोकके कर्ता नहीं हैं. न याचना करता है. उपाधिते रहित परम शांतिरूप अमृतकर पूर्ण होय रहे हैं, सो पुरुष नानाप्रकारकी चेष्टा करते दृष्टि आते हैं, परंतु कछु नहीं करते. जहां उनके मनकी वृत्ति जाती है, तहां आत्मसत्ता भासती है, सो आत्मानंदकर पूर्ण होय रहे हैं. जैसे पूर्णमासीका चंद्रमा अमृतकरि पूर्ण रहता है, तैसे ज्ञानवान् परमानंदकरि पूर्ण रहता है हे रामजी ! यह जो मैंने तुमको अमृतरूपी वृत्ति कही है इसको जब जानोगे तव तुमको साक्षात्कार होवेगा. जब जिसको आत्मज्ञानकी प्राप्ति होती है, तब सब दुःख नष्ट होजाते हैं, जैसे चंद्रमाके मंडलमें अंधकार नहीं होता तैसे ज्ञानी. को अशांति कबहू नहीं होती और जोकछु क्रिया करता है, तिसमें दुःख पाता है. जैसे कंकरके वृक्षमें कंटककी उत्पत्ति होती है, तैसे अज्ञानीको दुःखकी उत्पत्ति होती है. हेरामजी ! इस जीवको मूर्वताकरके बड़े दुःख प्राप्त होते हैं. ऐसा अद्भुत दुःख और कोऊ नहीं, अरु किसी आपदाकरके ऐसा नहीं होता, जैसा दुःख मूर्खताकरके पाते हैं ऐसा दुःख कोऊनहीं हेरामजी! हाथमें ठीकरा ले, चांडालके घरकी भिक्षा ग्रहण करे और आत्मतत्वकी जिज्ञासा होवे, तौभी और ऐश्वर्यते श्रेष्ठ है, परंतु मूर्खतासों जीवना व्यर्थ है, तिस मूर्खताको दूर करने को मोक्ष उपाय मैं कहताहूं. हे रामजी! यह मोक्ष उपाय परमबोधका कारण है, कछुक बुद्धि संस्कृत होवे अर्थात् जोपदपदार्थ के जाननेहारी होवे अरु मोक्षउपाय १३.] मुमुक्षुप्रकरणे-शमवर्णनम् । (१४७.) शास्त्रको विचारे, तोतिसकी मूर्खता नष्ट होजावेगी.अरुआत्मपदकी प्राप्ति होवेगी. जैसा आत्मबोधका कारण यह शास्त्र है, तैसे और शास्त्र त्रिलोकीविषे कोऊ नहीं नानाप्रकारके दृष्टांतसहित इतिहास हैं जामें, तिसको जव विचारोगेतब परमानंदको प्राप्त होवोगे. अज्ञानरूपीति- मिर नाश करनेको ज्ञानरूपी शलाका है. जैसे अंधकारको सूर्य नाश करता है तैसे अज्ञानको यह शास्त्रका विचारनाश करता है.हे रामजी! जिसप्रकार इसका कल्याण होता है सो श्रवण करो गुरु जो ज्ञानवान है सो शास्त्रका उपदेश करे अरु अपने अनुभवसों ज्ञान पावे. जब गुरु अरुशास्त्र और अपना अनुभव येतीनोंइकडेमिलें तब इसका कल्याण होवे.जवलग अकृत्रिम आनंदको प्राप्त नहीं भया,तबलग दृढअभ्यास करे. तिस अकृत्रिम आनंदको प्राप्ति करनेहारा में गुरु हूं.जीवमात्रका मैं परममित्र हूं ऐसा मित्र और कोई नहीं. हमारी संगति जीव जो आनंद प्राप्त करनहारी है, ताते जो कछु हम कहते हैं सो तुम करो. हे रामजी! यह जो संसारके भोगहै,सो क्षणमात्रके हैं. ताते इनको त्याग काहु और विषयके परिणाममें दुःख अनंत हैं, इनको दुःखरूप जानकर, त्याग देवे अरुहमसरीखे ज्ञानवानोंका संग करो और हमारे वचनके विचारते तुम्हारे सब दुःख नष्ट होजायेंगे. हे रामजी! जिसपु- रुपने हमारे संग प्रीति करी है, तिसको हमने आनंदकी प्राप्ति कर दीनी है, जिस आनंदते ब्रह्मादिक आनंदित भये हैं और ज्ञानवानहू आनंदित भये हैं, सो निर्दुःख पदको प्राप्त भये हैं. हे रामजी! श्रेष्ठ पु- रुष सोई है जाने हमारे साथ प्रीति कीनी है, जिसने संत अरुशास्त्रके विचारद्वारा दृश्य को अदृश्य जाना है अरु निर्भय हुवा है आत्माका प्रमाद जीवको दीन करता है. अज्ञानीका हृदयरूपी कमल तबलग सकुचा रहता है, जबलग तृष्णारूरी रात्रि होती है.जब-ज्ञानरूपी सूर्य उदय होता है, तब तृष्णारूपी रात्रि नष्ट होजाती है, अरु हृदयरूपी कमल आनंदकर खिलि आते हैं. .

[त्रयोदशः सर्गः (१४८) योगवासिष्ठे। हे रामजी ! जिन पुरुषोंने परमार्थको त्यागा है; अरु संसारके. खान-पान आदि भोगोंमें मम हुवे हैं, तिनको तूमेढ़क जान,जैसे की- चमें मेढक पडा शब्द करता है, तैसा वह पुरुष है. हे रामजी! यह सं-- सार वडा आपदाका समुद्र है, तामें जो कोऊ श्रेष्ठ पुरुप है, सो सत्संग अरु सच्छास्त्र के विचारकरके संसारसमुद्र उलंघता है अरु परमानंदको प्राप्त होता है.आदि, अंत और मध्यरहित निर्भय पदको प्राप्त होता है. अरु जो संसारसमुद्रके संमुख हुवा है, सो दुःखते दुःखरूप पदको प्राप्त. भया है, कष्टते कष्ट और नरकते नरकको प्राप्त होता है. जैसे विषको विष जान तिसका पान करता है,सोविष उसको नाश करता है,तैसे जो पुरुष संसार असत्य जानके, बहुरि संसारकी ओर यल करता है अरु मृत्युको प्राप्त होता है. हे रामजी! जो पुरुष आत्मपदते विमुख है अरु आत्मपदको कल्याणरूप जानता है अरु आत्मपदको अभ्यासका त्याग कर संसारकी ओर धांवता है; सो जैसे किसीके घरमें अमिलगी, अरु तृणका घर, अरु तृणकी शय्या कारके शयन करता है, सो जैसे नाश- को पावे तैसे जन्म मृत्युको प्राप्त होवेंगे. और संसारके पदार्थ देखकर, राग दोपवान् हुवे हैं सो सुख विजरीका चमका जैसा है; क्योंकि,जो. होके मिटजावें, स्थिर नहीं रहें तैसा संसारका दुःख आगमापायी है.. हेरामजी! यह संसार अविचार करके भासता है,अरु विचार किये-- ते लीन होजाता है. विचार कियेते लीन जो न होता, तो तुमको उप- देश करनेका काम नहीं था सो तो विचार कियेते लीन होजाता है.. इसी कारणते पुरुषार्थ चाहिये, जैसे हाथमें दीपक होवे अरु अंधकूप- में गिरे सो मूर्खता है,तैसे संसारके भ्रमके निवारणहारे गुरु शास्त्र वि- द्यमान हैं, तिनको शरण न आवे सो मूर्ख है. हे रामजी ! जिन पुरु-- पोंने संतकी संगति अरु सच्छास्त्र के विचारद्वारा आत्मपदको पाया है, सो पुरुष केवल कैवल्यभावको प्राप्त भये, अर्थात् शुद्धचैतन्यको प्राप्त हुवे हैं. अरु संसारभ्रम तिनका निवृत्त होगया है.

१३.] मुमुक्षुप्रकरणे-शमवर्णनम् । हेरामजी! यह संसार मनके स्मरणते उपजा है, सो इसका कल्या- 'ग बांधवकरके नहीं होता है; अरु, धनकरकेभी नहीं होता है; प्रजाक- रकेभी नहीं होता है अरु तीर्थ अरु देवदारकरकेभी नहीं होता है. ऐश्वर्यकरकेभी नहीं होता है, एक मनके जीतनेते कल्याण होता है. हे रामजी! जिसको ज्ञानी परमपद कहते हैं और जिसको रसाय- न कहते हैं, जिसके पायेते इसका नाश नहीं होय अरुअमर होवे अ- रु सव सुखकी पूर्णता होवे, इसका साधन शमता अरु संतोष है, इन- कर बान उत्पन्न होता है सो आत्मज्ञानरूपी एक वृक्ष है, तिसका फू- -ल शांति है अरु स्थिति इसका फल है. जिस पुरुषको यह ज्ञान प्राप्त हुवा है, सो शांतिवान् हुवा है; सो निर्लेप रहता है, तिसको संसारका भावाभावरूप स्पर्श नहीं होता है.जैसे आकाशमें सूर्य उदय होता है, तब जगतकी क्रिया होती हैं, फिर जब सो अदृश्य होता है. तब ज- गवकी क्रियाभी लीन होजाती हैं जैसे तिन क्रियावोंके होने न होनेमें आकाश ज्योंका त्यों है, तैसे ज्ञानवान सदा निर्लेप है, तिस आत्म- ज्ञानकी उत्पत्तिका उपाय यह मेरा श्रेष्ठ शास्त्र है, हेरामजी! जो पुरुष इस मोक्षोपाय शास्त्रको श्रद्धासंयुक्त पढ़े अ थवा सुने तो वाही दिनसों मोक्षका भागी होय रहे. अरु मोक्षके चोर द्वारपाल हैं सो हम तुमको कहते हैं. सोइनमेंते एकहू जब अपने वश होय तब मोक्षदारमें इसका शीघ्र प्रवेश हो, सो चारोंका नाम कहों सो सुनो. हे रामजी ! यह शम इसको परमविश्रामका कारण है अरु यह संसार जो दीखता है, सो मरुस्थलकी नदीवत् है, इसको देखकर मूर्ख अज्ञानरूपीजो मृग है सो सुखरूपी जल जानकर दौड़ता है अ- रु शांतिको नहीं प्राप्त होता जब शमरूपी मेवकी वर्षा होवे, तब सुखी होवे. हे रामजी ! शम परमआनंद है अरु शम परमपद है और शिवपद है. जिस पुरुषने शम पाया है सो संसारसमुद्रते पार हुवा है, तिसको पुत्र मित्र होजाते हैं. हेरामजी!जबीचंद्रका उदय होता है, तव [त्रयोदशः सर्गः (१५०) योगवासिष्ठे। अमृतके कण फूटते हैं अरु शीतलता होती है. तैसे जिसके हृदयमें शमरूपी चंद्रमा उदय होता है, तिसके सब ताप मिट जातेहैं अरु परम शांतिमान होता है.हे रामजी ! यह शम देवतावोंके अमृतसमा- न है, वही परम अमृत है. शमकरके इसको परम शोभा पास, होती है. जैसे पूर्णमासीके चंद्रमाकी कांति परम उज्ज्वल होती है, तेसे शमको पायके, उसकी उज्ज्वल कांति होती है. जैसे विष्णुके दो हृदय हैं, सो एकतो अपने शरीरमें है, दूसरा संतोंमें है, तैसे इसके दो हृदय होते हैं, एक अपने शरीरमें है, दूसरा शमभी इसका हृदय होता है. ऐसा आनंद अमृतके पान कियेतेह नहीं होता अरु लक्ष्मी- की प्राप्तितेभी नहीं होता जो आनंद शमवानको होता है. हे रामजी! प्राणहूतेभी प्रिय कोई होवे, सो अंतर्ध्यान कर फिर प्राप्त होवे, तैसा आनंद नहीं होवे ऐसा आनंद शमवारको होवे तिसके दर्शनकरभी आनंद प्राप्त होता है, अरु ऐसा आनंद राजाकोभी नहीं होता जोबाहरते श्रेष्ठ मंत्री होता है अरु अंतरते सुंदर स्त्रियां होती हैं तिनकरभी ऐसा आनंद नहीं होता, जैसा आनंद शमसंपन्न पुरुषको. होता है. हे रामजी! जिस पुरुषको शमकी प्राप्ति भई है, सो वंदना करके योग्य है,अरुपूजने योग्य है,जिसको शमकी प्राप्ति भई है,ति- सको उद्वेग नहीं आवै अरु लोकहूते उद्वेग नहीं पात्रे, उसकी क्रिया अमृतसमान है अरु वचनभी उसके अमृतकी नाई मीठे हैं, जैसे चंद्र- माकी किरण शीतल अरु अमृतरूप हैं, सो सबको हृदयाराम है, तैसे संतजनोंके वचन हैं जिस पुरुषको शमकी प्राप्ति भई है,तिसकी संग- ति जब इस जीवको प्राप्त होती है, तब सव परमआनंदित होते हैं. हे रामजी! जैसे पालक माताको पायके आनंदित होता है, तैसे जिसको शमकी प्राप्ति भई है, तिसका संग कर जीव अधिक आनंद- वान होता है. जैसे किसीका बांधव मराहुआ फिर आवे और इसको आनंद प्राप्त होवे,तिसतेभी अधिक आनंदशमसंपन्न पुरुषको पायके.

१३.] मुमक्षुश्करणे-शमवर्णनम् । (१५१) होता है. हे रामजी ! ऐसा आनंद चक्रवर्ती राज्यके पायेतेभी तिसको नहीं होता अरु त्रिलोकीका राज्यपायेतेभी नहीं होता.जिसको शम-. की प्राप्ति भई है तिसकेशत्रुभी मित्र हो जाते हैं, तिसकर कछु भयभीत नहीं होता अरु सर्पका भयभी तिसको नहीं रहता,सिंहका भयभीति- सको नहीं रहताऔरहू किसीका भय नहीं रहता. सदा निर्भय शांत- रूपरहता है. हेरामजी! जोकोऊ कष्ट आय प्राप्त होवे और कालकी अमि आय लगे, तौभी सो चलायमान नहीं होता,सदा शांतरूप र- हता है. जैसे शीतल चांदनी चंद्रमामें स्थिर है तैसे जो कछु शुभ गुण अरु संपदा हैं, सो सब शमहृदयमें आय स्थिर होते हैं. हे रामजी! जो पुरुष आध्यात्मिकादि तापकर जलता है, तिसके हृदयमें शमकी प्राप्ति होवे, तब ताप मिट जाते हैं. जैसे तप्त पृथ्वी व- पा करके शीतल हो जाती है, तैसे उसका हृदय शीतल होजाता है. जिसको शमकी प्राप्ति भई है, सोसब क्रियाओंमें आनंदरूप है, तिसको दुःख कोऊ नहीं स्पर्श करता. जैसे वशिलाको बाणवेध नहीं सक्ता, तैसे जिस पुरुषने शमरूपी कवच पहिरा है, तिसकोआध्यात्मिकादि ताप वेध नहीं सक्ता; वह सर्वदा शीतलरूप रहता है. हे रामजी! तपस्वी, पंडित, याज्ञिक और धनाढ्य पुरुष पूजा और मान करने योग्य हैं, परंतु जिसकोशमकी प्राप्ति भई है सो सबसे उत्तम है, सोसवको पूजनेयोग्य है. उसके मनकी वृत्ति आत्मतत्त्वको ग्रहण करती है,अरुसबक्रियाओंमें शोभती है,जिस पुरुषको शब्द,स्पर्श,रूप रसऔर गंध ये इंद्रियोंके विषय इष्ट अनिष्टमें राग दोष नहींहोता तिस- को शांतात्मा कहते हैं, हेरामजी!जो संसारके रमणीय पदार्थों में ब- ध्यमान नहीं होताअरु आत्मानंदकर पूर्ण है, तिसकोशांतिवादकहते हैं.वाको संसारके शुभ अशुभकर मलीनपनानहीं लगता,सदा निर्लेप रहता है, जैसे आकाश सबपदार्थोते निलेप है,तैसे शांतिवान् सदा [चतुर्दशः सर्गः (१५२) योगवासिष्ठे। निलेप रहता है. हे रामजी ! ऐसा जो ज्ञानी पुरुष है, सोइष्ट विपयकी प्रातिमें हर्षवान होतानहीं अरु अनिष्टविषयकी प्राप्तिमें शोकवान हो- तानहीं अरु अंतरते सदाशांत रहता है; उसको कोऊदुःख स्पर्श न- हीं करता. अपने आपमें सदा परमानंदरूप रहता है. जैसे सूर्यके उदय हुवे अंधकार नष्ट हो जाता है, तैसे शांतिके पाये सर्व दुःख नष्ट होजाते हैं और सदा निर्विकार रहते हैं. हे रामजी! सो पुरुषसव चेष्टा करते दृष्टि आते हैं ,परंतु सदा नि. गुणरूप है; कोऊ क्रिया उनको स्पर्श नहीं करती. जैसे जलमें कमल निर्लेप रहता है, तैसे शांतिवान् सदानिर्लेप रहता है,हे रामजी ! जो पुरुष बडे राजसंपदाको पायकर अरु बडीआपदाको पायकर, ज्योंका त्यों अलगरहता है, सोशांतिवान् कहिये. हे रामजी! जो पुरुष शां- तिते रहित है, तिसका चित्त क्षणक्षण रागदोषकर तपता है अरु जि- सकोशांतिकी प्राप्ति भई है, सो अंतर वाहिर शीतल है अरु सदा ए- करस है. जैसे हिमालय सदाशीतल रहता है,तैसे वह सदा शीतल रहता है. वाके मुखकी कांति बहुत सुंदर हो जाती है.जैसे निष्कलंक चंद्रमा होवे,तैसे शांतिवान् पुरुष निष्कलंक रहता है. हे रामजी जि- नको शांति प्राप्त भई है, सो परम आनंदित हुवे हैं, परमलाभ तिनको प्राप्त होते हैं ज्ञानी इसीको परमपद कहते हैं. जिसको पुरुषार्थ करना है,तिसको शांतिकी प्राप्ति करनी चाहिये.हे रामजी जैसे हमने कहाहै तिसक्रमकरके शांतिका ग्रहण करोगे, तव संसारसमुद्रके पार पहुँचोगे. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे शमनिरूपणं नाम त्रयोदशः सर्गः ॥ १३ ॥ चतुर्दशः सर्गः १४॥ अथ विचारवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच हे रामजी! अब विचारका निरूपण सुनोः .

१४.] मुमुक्षुप्रकरणे-विचारवर्णनम् । (१५३) जब हृदय शुद्ध होता है, तब विचार होता है अरु शास्त्रार्थविचारद्वारा बुद्धि तीक्ष्ण होती है.हे रामजी! अज्ञानरूपी जो वन है, तिसमें आ- पदारूपी बेलिकी उत्पत्ति होती है. तिसको विचाररूपी खड्ग करके काटोगे, तव शांतआत्मा होवोगे.अरु मोहरूपी हस्ती है,सो जीवके हृदयकमलका खंड खंड करडारता है. अभिप्राय यह कि, जोइष्ट अ- निष्ट पदार्थमें रागदोपकर छेदा जाता नहीं, जब विचाररूपी सिंह प्रगटे तव मोहरूपी इस्तीका नाश करे. तब फिर शांतात्मा होते. हे रामजी ! जिसको कछु सिद्धता प्राप्त हुई है, सो विचार अरु पुरु- 'पार्थकर भई है, जो राजा होता है सो प्रथम विचार कर पुरुषार्थ करता है; तिसकर राज्यको प्राप्त होता है; बल, बुद्धि अरु तेज, चतुर्थ जो पदार्थका आगमन अरु पंचम पदार्थकी प्राप्ति होती है, सो पांचोंकी प्राप्ति विचारकर होती है. अर्थात जोइंद्रियोंका जीतना अरु बुद्धिसो आत्मा व्यापिनी अरु तेज पदार्थका आगमन इनकी प्राप्ति विचारसों होती है. हे रामजी ! जिन पुरुषोंने विचारका आश्रय लिया है, सो विचारकी दृढ़ताकरके जिसकी वांछा करते हैं, तिसको पावते हैं, ताते विचार इसका परम मित्र है. जो विचारवान् पुरुष है, सो आपदामें मम नहीं होता. जैसे तुंबी जलमें डूबती नहीं, तैसे वह आपदामें डूबता नहीं. हे रामजी !वह विचारसंयुक्त जो करता है, देता है,लेता है सो सब क्रिया सिद्धताका कारणरूप होती हैं, धर्म, अर्थ, काम आर मोक्ष ये विचारकी दृढ़ताकरके सिद्ध होते हैं. विचाररूपी कल्पवृक्ष है, ति- समें जिसका अभ्यास होता है सोई पदार्थकी सिद्धिको पाता है. हे रामजी! शुद्ध ब्रह्मका विचार ग्रहण कर, आत्मज्ञानको प्राप्त होहु. जैसे दीपकसों पदार्थका ज्ञान होता है, तैसे पुरुष विचारसों सत्य अस- स्यको जानता है जिन्होंने असत्यको त्यागकर सत्यकी ओर यल कि- या है,तिनको विचारवान् कहते हैं.हे रामजी! संसाररूपी समुद्रविषे आपदारूपी तरंग चलते हैं. जो विचारवान पुरुष हैं सो संसारके भाव- - [चतुर्दशः सर्गः (१५४) योगवासिष्ठे। अभावमें कष्टवान नहीं होते हैं, जो कछु विचारसंयुक्तक्रिया होती है, तिसका परिणाम सुख है, जो विचारबिना चेष्टा होती है, तिसकर दुः- ख प्राप्त होता है. हे रामजी! अविचाररूपी कंटकवृक्ष है, तिसते दुःख रूपी कंटक पडे उत्पन्न होते हैं अरु अविचाररूपी रात्रि है, तिसमें तृ- ष्णारूपी पिशाचिनी आय विचरती है. जब विचाररूपी सूर्यका उदय होताहै तब अविचाररूपी रात्रि अरुतृष्णारूपी पिशाचिनी नष्ट होतीहै हे रामजी! हमारा यही आशीर्वाद है कि, तुम्हारे हृदयसों अ-. विचाररूपी रात्रि नष्ट होते. विचाररूपी सूर्यकरके अविचारित संसा- रदुःखका नाश होता है, जैसे बालक अविचारकरके अपनी परछा- हीको वैताल कल्पके भयको पाता है अरु विचार कियेते भय नष्ट हो जाता है, वैसे अविवार करके संसार दुःखको देता है, और सत्शास्त्रको युक्तिकर विचार कियेते संसारभय नष्ट हो जाता है. हे रामजी ! जहाँ विचार है तहां दुःख नहीं है, जैसे जहां प्रकाश होता है, वहां अंधकार नहीं रहताहै, जहां प्रकाश नहीं तहां अंधकार रहता है; तैसे जहां विचार है, तहां संसारभय नहीं है अरु जहां विचार नहीं, तहां संसारभय रहता है. अरु जहां आत्मविचार होता है, तहां सुखको देनेहारे शुभ गुण आय स्थित होते हैं. जैसे मानस- सरोवरमें कमलकी उत्पत्ति होती है, तैसे विचारमें शुभगुणकी उत्पत्ति होती है. जहां विचार नहीं तहां दुःखका आगमन होता है, हे रामजी ! जो क । अविचारकर क्रिया करते हैं सो दुःखका कारण होता है, जैसे दूहा बिलको खोदके, मृत्तिका निकासता है, सो जहां इकट्टी होती है, तहां बेलिकी उत्पत्ति होती है, तैसे अ- विचारकर यह पुरुष मृत्तिकारूपी पापक्रियाको इकट्ठी करता है. ति-- सते आपदारूपी बेलि उत्पन्न होती है. अरु अविचाररूपी घुनका खाया सूखा वृक्ष है, तिसको सुखरूपी फल चाहते हैं. तेऊ नहीं निकसते हैं सो अविचार किसका नाम है। जिसकरके शुभक्रिया नहोवे अरु जिसकर शास्त्रानुसार क्रिया न होवे, तिसका नाम अविवार है.

(१४.] मुमुक्षुप्रकरणे-विचारवर्णनम् । (१५५) हे रामजी! विवेकरूपी राजा है अरु विचाररूपी प्रजा है. जहां वि- वेकरूपी राजा आता है, तहां विचाररूपी प्रजा तिसके साथ फिरती है. अरु जहां विचाररूपी प्रजा आती हैं, तहां विवेकरूपी राजाभी आता है. जो पुरुष विचार करके संपन्न है, सो पूजनेयोग्य है; तिसको सब कोऊ नमस्कार करते हैं. जैसे द्वितीयाके चंद्रमाकोसबनमस्कार करते हैं, तैसे विचारवानको सव नमस्कार करते हैं. हे रामजी! हमारे देखते देखते अल्पबुद्धिहू विचारकी दृढ़ताते मोक्षपदको प्राप्त भये हैं; ताते विचार सबका परम मित्र है. विचारवाले पुरुष अंतरवाहिरशी- तल रहते हैं, जैसे हिमालय पर्वत अंतर वाहिर शीतल रहता है,तैसे वहमी शीतल रहते हैं, देखो, विचारकरके ऐसे पदको प्राप्त होता है. जो पद नित्य है अरु स्वच्छ है, अनंत है, परमानंदरूप है. तिसको पायकर, तिसके त्यागकी इच्छा होती नहीं, औरके ग्रहणकी इच्छा नहीं होती है, उनको इष्ट-अनिष्टविषे सव समान है. जैसे तरंगके होने- में अरु लीन होने में समुद्रसमान रहता है,तैसे विवेकी पुरुषको इष्ट-- अनिष्टविषे समता रहती है अरु संसारभ्रम मिट जाता है आधाराधे- यते रहित केवल अद्वैत तत्त्व उसको प्राप्त होता है, हे रामजी! यह जगत अपने मनके मोहते उपजता है अरु अविचा- रकर दुःखदायी दीखता है.जैसे अविचारकरके बालकको बैताल मा- सता है, तैसे इसकोजगत् भासता है. जब ब्रह्मविचारकी प्राप्ति होते. तब जगभ्रम नष्ट होजावे. हे रामजी! जिसके हृदयमें विचार होता है, तहां समताकी उत्पत्ति होती है जैसे बीजते अंकुर निकस आता है, तैसे विचारतेसमता होय आती है. अरु विचारवान पुरुष जिसकी ओर देखता है, तिस ओर आनंददृष्टि आता है, दुख कोऊ नहीं भासता है. जैसे सूर्यको अंधकार दृष्टि नहीं आता, तैसे विचारवारको दुःख हष्टिमें नहीं आता,जहां अविचार है तहादुःख है. जहां विचार है, तहां सुख है. जैसे अंधकारके अभाव हुवे वैतालके भयका अभाव योगवासिष्ठे। [ चतुर्दशः सर्गः हो जाता है, तैसे विचार कियते दुःखका अभाव हो जाता हे रामजी! संसाररूपी दीर्घ रोगहै; तिसका नाश करनेका विचार बडा औषध है. जिसको विचारकी प्राप्ति भई है, तिसके मुखकी का- ति उज्ज्वल हो जाती है.जैसे पूर्णमासीके चंद्रमाकी उज्ज्वल कांति हो- ति है, तैसी विचारवान्के मुखकी उज्ज्वल कांति होती है.हे रामजी! विचार करके इसको परमपदकी प्राप्ति होती है, जिसकरि अथसिद्धि होवे तिसका नाम विचार है.अरु जिसकरि अनर्थसिद्धिहोवेतिसका नाम अविचार है.अविचाररूपी मदिरा है,जो इसका पान करता उन्मत्त हो जाता है,तिसते शुभविवार कोउनहींहोआता.शास्त्रकेअ- नुसार जो कछुक्रिया है, सो ताते नहीं होती,ताते अविचार करि अर्थ सिद्धि नहीं होती. हे रामजी!इच्छारूपी रोग है,सो विचाररूपीऔषध करके निवृत्त होता है. जिन पुरुषोंने विचारधारा एरमार्थसत्ताका आश्रय लिया है,सो परम शांत होजाते हैं. अरु हेय उपादेयवुद्धि तिनकी नहीं रहती. सव दृश्यको साक्षीभूत होकर देखते हैं,अरु संसारके भावअभावविषेज्योंके त्यों रहते हैं अरु उदयअस्तते रहित निःसंगरूप हैं.जैसे समुद्र जलकरि पूर्ण है तैसे विचारवान् आत्मतत्तकरि पूर्ण है जैसे अंधकूपविषेपडाहुवा पुरुषहस्तके वलकरि निकसता है,तैसे संसाररूपी अधंकूपमें गिराहुवा विचारके आश्रय होकर,विचारवान पुरुष निकसनेको समर्थ होता है. हेरामजी!राजाओंको जो कोऊ कष्ट आय प्राप्त होता है, तब वह विचार करके यत्न करते हैं, तब कष्ट निवृत्त हो जाता है. ताते तुम वि- चार कर देखो कि किसीको कष्ट प्राप्त होता है सो विचारते मिटता है. तुमभी विचारका आश्रय करके सिद्धिको प्राप्त होहु.सो विचार इस- कर प्राप्त होता है,जो वेद अरु वेदांतके सिद्धांतको श्रवण और पाठ कर, भले मुकार विचारोगे वत विचारकी दृढताकर आत्मतत्त्वको प्राप्त होवोगे. जैसे प्रकाशकर पदार्थका ज्ञान होता है, तैसे गुरुअरु १४.] मुमुक्षुप्रकरणे-विचारवर्णनम् । (१५७.) शास्त्रकेवचनकर तत्त्वज्ञान होता है.जैसे प्रकाशमें अंधको पदार्थको प्रा- ति नहीं होती है, तैसे गुरु अरु शास्त्रसों जो विचारशून्य होवे तिनको आत्मपदकी प्राप्ति नहीं होती. हे रामजी! जो विचाररूपी नेत्रकर संपन्न है, सोई देखते हैं अरुविचाररूपीनेत्रते जो रहित हैं सोअंघ हैं. हे रामजी! ऐसा विचार करे कि, हम कौन हैं अरु यह जगत् को- न है? अरु इसकी उत्पत्ति कैसी हुई है ? अरुलीन कैसे होता है। इस- प्रकार संत अरुशास्त्रके अनुसार विचार करो, सत्यको सत्य जानो अरु असत्यको असत्य जानो. जिसको असत्य जाना है,तिसका त्याग करो अरु सत्यमें स्थित होवो, इसीका नामविचार है. इस विचारकर आत्म- पदकी प्राप्ति होती है.हे रामजी! विचाररूपी दिव्यदृष्टि जिसको प्राप्त भई है, तिसको सब पदार्थका ज्ञान होताहै, विचारसों आत्मपदकी प्राप्ति होती है, तिसको पायेते परिपूर्ण होता है, फिर शुभ-अशुभविषे संसारमें चलायमान नहीं होता, ज्योंका त्यों रहता है, जबलग प्रारब्धवेग होता है, तबलग शरीरकी चेष्टा करे, बहुरि शरीरको त्याग, कर केवल शुद्धरूप हो जाता है. ताते- हेरामजी! ब्रह्मविचारको आश्रय कर. संसारसमुद्रको तरजावो.जो कोऊ रोगी होता है, सो एता रुदन नहीं करता, जेता रुदन विचार- रहित पुरुष करता है. जिसको कष्ट प्राप्त होता है, सोभी एता रुदन नहीं करता. हे रामजी ! जो पुरुष विचारते शून्य है, तिसको सब आपदा आय प्राप्त होती हैं जैसे सब नदी स्वभावसों समुद्रमें आय प्रवेश करती हैं, तैसे अविचारमें सव आपदा आय प्रवेश करती हैं. हे रामजी ! कीचका कीट होना सो भला है अरु गर्तका कंटक होना सोभी भला है अरु अंधरे बिलमें सर्प होना सोभी भला है, परंतु विचारते रहित होना सो भला नहीं.जो पुरुष विचारते रहित है अरुः मोगमें दौरता है, सो श्वान है.

(१५८) योगवासिष्ठे। [पंचदशः सर्गः हे रामजी ! विचारते रहित पुरुष बड़े कष्टको पाताहै, ताते एक क्षणहू विचारते रहित नहीं रहना.विचारसों दृढ़ होकर निर्भय रहना कि,मैं कौन हूं? अरु दृश्य क्या है? ऐसा विचार करके सत्यरूप आत्माके ज्ञानकर दृश्यका त्याग करना. हे रामजी ! जो पुरुष विचारवान है, सो संसारभोगमें नहीं गिर जाता अरु सत्यमें स्थित होता है विचार जव स्थिर होता है तब तिसते तत्त्वज्ञान होता है तिस तत्त्वज्ञानते विश्राम होता है, विश्रामते चित्तका उपशम होता है अरु चित्तके उपशमते सब दुःख नाश होते हैं. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे विचारनिरूपणं नाम चतुर्दशः सर्गः ॥१४॥ पंचदशः सर्गः १५॥ अथ संतोषवणेनम् । वसिष्ठ उवाच हे अविचारशत्रुके नाशकता रामजी ! जिस पुरुषको संतोषप्राप्त भया है, सो परम आनंदित हुवा है. अरु त्रिलोकीका ऐश्वर्य उसको तृणकी नाई तुच्छ भासता है. हे रामजी! जो आनंद अमृतपान कियेते नहीं होता और जो आनंद त्रिलोकीके राज्यकर नहीं होता, तैसा आनंदसंतोषकानको होता है हेरामजी! इच्छारूपी रात्रि है अरुसो हृदयरूपी कमलको सकुचाय देती है और जवसंतोषरूपी सूर्य उदय होता है, तब इच्छारूपी रात्रिका अभाव हो जाता है. जैसे क्षीरसमुद्र उज्ज्वलता करके शोभता है, तैसे संतोष- चान्की कांति सुशोभित होती है. हे रामजी! त्रिलोकीके राज्यकी इच्छा निवृत्त न भई सो दरिद्री है अरु जो निर्वन है और संतोषवान् है सोसबका श्वर है जो अप्राप्त बस्तुकी इच्छा न करै अरुप्राप्त होई इष्ट अनिष्ट रागदोषन धरे इसका नाम संतोष है. संतोषही परमपद है संतोषवान् पुरुषसंदा .

१५.] मुमुक्षुप्रकरणे-संतोषवर्णनम् । (१५९) आनंदरूप है अरु आत्मस्थितिसों तृप्त हुवा है तिसको और इच्छा कछु नहीं स्फुरती. अरु संतुष्टताकर तिसका हृदय प्रफुल्लित हुवा है. जैसे सूर्यके उदय हुवे सूर्यमुखी कमल प्रफुल्लित होता है, तैसे संतोषवान् प्रफुल्लित हो जाता है. जो अप्राप्त वस्तु है तिसकी इच्छा नहीं करता अरु जो अनिच्छित प्राप्त भई है, तिसको यथाशास्त्र क्रमकरके ग्रहण करता है, तिसका नाम संतोषवान है. जैसे पूर्णमासीका चंद्रमा अमृ- तकर पूर्ण होता है, तैसे संतोषवान्का हृदय संतुष्टताकरके पूर्ण होता है अरु जो संतोषते रहित है, तिसके हृदयरूपी वनमें सदादुःख अरु चिंतारूपी फूल फल उत्पन्न होतेही हैं. हे रामजी! जिसका चित्त संतोषते रहित, तिसको नानाप्रकारकी इच्छा होती है; जैसे समुद्रमें नानाप्रकारके तरंग होतेहैं. संतुष्टात्मा परम आनंदित है. तिसको जगत्के पदार्थमें हेयोपादेय बुद्धि नहीं होती. हे रामजी ! जैसा आनंद संतोषवानको होता है, तैसाआनंद अष्टसि- द्धिके ऐश्वर्यकरकेभी नहीं होता अरु अमृतके पान कियेतेभी नहीं होता. संतोषवान् सदाशांतिरूप है और सदा निर्मल रहता है. इच्छा- रूपी धूर सर्वदा उडती थी सो संतोषरूपी वर्षाकर शांत होगई है, तिस कारणते संतोषवान् निर्मल है. हे रामजी! संतोषवान् पुरुष सबको प्यारा लगता है. जैसे आँबका परिपक्व फल सुंदर होता है अरु सबको प्यारालगता है, तैसे संतोष- वान पुरुष सबको प्यारा लगता है, अरु स्तुति करनेयोग्य है. जिस पुरुषको संतोष प्राप्त भया है, तिसको परमलाभ भया है. हे रामजी! जहाँ संतोष है, तहां इच्छा नहीं रहती है अरु संतोषवान् भोगमें दीन होकर नहीं रहता. वह उदारात्मा है. सर्वदा आनंदकर तृप्त रहता है, जैसे मेघ पवनके आयेते नष्ट हो जाता है, तैसे संतोषके आयते इच्छा नष्ट हो जाती है अरु जो संतोषवान् पुरुष है, तिसको देवता ऋषी- (१६०) योगवासिष्ठे। [पोडशःसर्गः श्वर, सव नमस्कार करते हैं, अरु धन्य धन्य कहते हैं, हे रामजी! जब इस संतोषको धरोगे, तव परमशोभा पावोगे. मुमुक्षुप्रकरणे संतोषनिरूपणं नाम पंचदशः सर्गः ॥ १५॥ इति श्रीयोगवासिष्ठे म षोडशः सर्गः १६॥ अथ साधुसंगवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच हे रामजी ! औरजेते कछुदान-तीर्थादिक साधन हैं, तिनकर आत्मपदकी प्राति नहीं होती, साधुसंगकर आत्म- पदकी प्राप्ति होती है.साधुसंगरूपी एक वृक्ष है; तिसका फल आत्म- ज्ञान है. जिस पुरुपने फूलकी इच्छा करी है,सो अनुभवरूपी फलको पाता है हे रामजी ! जो पुरुष आत्मानंदते रहित है सो सत्संगकर आत्मानंदसों पूर्ण होता है अरु अज्ञानकरके जो मृत्युको पाता है, सो संतके संगते ज्ञान पायकर अमर होता है, अरु जो आपदाकरके दुःखी है, सो संतके संगकर संपदाको पाता है. आपदारूपी कमलका नाश करनहारा सत्संगरूपी वर्फकी वर्षा है, मत्संगसों आत्मबुद्धि प्राप्ति होती है, तिसकर मृत्युते रहित होता है और सवदुःखते रहित होता है अरु परमानंदको प्राप्त होता है. हे रामजी! सत्संगतिकर इसके हृदयमें ज्ञानरूपी दीपक जलता है तिसकर अज्ञानरूपीतम नष्ट हो जाता है अरु वडे ऐश्वर्यको प्राप्त होता है; वहुरि किसी भोग पदार्थकी इच्छा नहीं रहती अरु वोधवान् होता है. सवते उत्तम पदमें विराजता है. जैने कल्पवृक्षके निकट गयेते वांछित फलकी प्राप्ति होती है,तैमे संसारसमुद्रके पारउतारनेहारेसंतजन हैं. जैसे धीवर नौकाकरके पार लगाता है, तैसे संतजन युक्तिकरके संसा- मुमुक्षुप्रकरणे-साधुसंगवर्णनम् । रसमुद्रते पार करते हैं, अरु मोहरूपी मेधका नाश करनहारा संतका संग है सो पवन है; जिनको देहादिक अनात्मसों स्नेह नष्ट भया है अरु शुद्ध आत्माविषे जाकी स्थिति है, तिसकर तृप्त भये हैं. बहुरि संसारके इष्ट अनिष्टने जाकी चलायमान बुद्धि नहीं होती, सदासम- ताभावमें स्थित रहे हैं, ऐसे संसारसमुद्रके पार उतारनेमें फूल जैसे अरु आपदारूपी वेलीको जडसमेत नाश करनहारे हैं, हे रामजी! संतजन प्रकाशरूप हैं; तिनके संगते पदार्थकी प्राप्ति हो ती है. जो अपने पुरुषार्थरूपी नेत्रते हीन हुवे हैं, तिनको पदार्थकी प्राप्ति नहीं होती.जिन पुरुषोंने सत्संगका त्याग किया है, सो नरकरूपी अ- मिमें लकड़ीकी नाईं जरेंगे, अरु जिन पुरुषोंने सत्संग किया है तिन- को नरकरूपीअग्निशानाश करनहारा सत्संगरूपी मेघ है हे रामजी! सत्संगरूपी गंगा है; जाने सत्संगरूपी गंगाका स्नान किया ताको बहुरि तप, दान आदि साधनका प्रयोजन नहीं वह सत्संगकरके परमगतिको पास होनेका है, ताते और सब उपाय त्यागकर, सत्सं- गको खोजना. जैसे निर्धन चिंतामणि आदिकधनको खोजता है,तैसे मुमुक्षु सत्संगको खोजता है. आध्यात्मिकादि तीन तापनसों जलता है, तिसको शीतल करनेहारा सत्संग है. जैसे तपी हुई पृथ्वी मेघकर शीतल होती है, वैसे सत्संगकर हृदय शीतल होता है. हे रामजी! मोहरूपी वृक्षका नाश करनहारा सत्संगरूप कुल्हाडा है; सत्संगकरके यह पुरुष अविनाशी पदको प्राप्त होता है, जिस पदके पायेते और पावनकी इच्छा नहीं रहती, ऐसा सबते उत्तम सत्संग है; जैसे सत्र अप्सरानते लक्ष्मी उत्तम है, तैसे सत्संगकर्ता सबते उत्तम है; ताते अपने कल्याणके निमित्त सत्संग करना तुमको योग्य है. हे रामजी! ये जो चारों मोक्षके द्वारपाल हैं, सो तुमको कहे.जिन पुरु- षोंने इनके साथ प्रीति करी है, सो शीघ्र आत्मपदको प्राप्त होंगे और जो इनकी सेवा नहीं करते, सो मोक्षको प्राप्त नहीं होते हे रामजी इन २१-२२ योगवासिष्ठे। [ षोडशः सर्गः चारों ते एकहू जहां आता है,तहां तीनों औरहूआय जाते हैं.जहांस- मुद्र रहता है,तहांसब नदीआय जाती हैं, तैसे जहां शम आता है तहां संतोष, विचार अरु सत्संग ये तीनों आय जाते हैं जहांसाधुसंगम हो- ता है, तहांसंतोष, विचार अरुशम ये तीनों आय जाते हैं जहां कल्पवृ- क्षरहता है तहां सवपदार्थ आय स्थित होते हैं. अरु जहां संतोष आता है तहां शम, विचार और सत्संग ये तीनों आय जाते हैं.जैसे पूर्णमा- सीके चंद्रमामें गुण कला सव इकट्ठी हो जाती हैं,तैसे जहां संतोष आता है, तहां और तीनों आय जाते हैं. अरु जहां विचार आता है तहां संतोष, उपशम अरु सत्संग, ये आय रहते हैं.जैसे श्रेष्ठ मंत्रीसों रा- ज्यलक्ष्मी आय स्थित होती है, तैसे जहां विचार होता है तहां और भी तीनोआते हैं.ताते हे रामजी!जहांचारों इकट्ठे होते हैं,तहां परम श्रेष्ठजानना.ताते हेरामजी! चारों नहोहिं तो एकका तो अवश्य आ- अयं करना,जब एक आवेगा, तब चारों आय स्थित होवेंगे.मोक्षकी प्राप्ति होने के ये चार परमसाधन हैं, और उपायसों मुक्ति होनेकी नहीं. ॥श्लोकः॥ संतोषः परमो लामः सत्संगः परमंधनम् ॥ विचारः परमं ज्ञानं शमश्च परमं सुखम् ॥ १॥ हे रामजी ! यह परम कल्याणकर्ता, सो इन चारों करि संपन्न है,तिसकी ब्रह्मादिक स्तुति करते हैं, ताते दंत लगाय इनका आश्रय करके मनको वश कर ले. हेरामजी! मनरूपी हस्ती विचाररूपी अंकुशकरके वश होता है अरु मनरूपी वनमें वासनारूपी नदी चलती है, तिसको शुभ अशुभ दोकि- नारे हैं अरु पुरुषार्थ करना यह है कि,अशुभकी ओरते रोकके शुभकी ओर चलना. जत्र अंतर्मुख आत्माके संमुख वृत्तिका प्रवाह होवेगा,तब तुम परमपदको प्राप्त होवोगे.हे रामजी! प्रथम तो पुरुषार्थ करना यही १७.] मुमुक्षुप्रकरणे-पप्रकरणवर्णनम् । (१३) है कि-अविचाररूपी उँचाईको दूर करना जब अविचाररूपी उँचाई दूर होगी, तब आपही प्रवाह चलेगा. हे रामजी! दृश्यकी ओर जो प्रवाह चलता है, सोबंधनका कारण है जब आत्माकी ओर अंतर्मुखी प्रवाह होवे, तब मोक्षका कारण होय जाय, आगे जो तुम्हारी इच्छा होवे सो करो. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे साधुसंगनिरूपणं नाम षोडशः सर्गः॥ १६ ॥ सप्तदशः सर्गः १७॥ अथ षट्पकरणवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच हे रामजी! येजो मेरेवचन हैं सोपरम पावन हैं. जो विचारवान शुद्ध अधिकारी है, तिसको ये वचन परमबोधका कारण हैं. जो पुरुष शुद्ध पात्र हैं, सो इन वचनोंको पायके,शोभते हैं और वचनहू उनको पायके शोभा पाते हैं. जैसे मेषके अभावते शरद- कालमें चंद्रमा अरु आकाश शोभते हैं, तैसे शुद्ध पात्रमें ये वचनशो- मते हैं, अरु जिज्ञासु निर्मल वचनकी महिमा सुनके, प्रसन्न होता है, हे रामजी! तुम परमपात्र हो अरु ये मेरे वचन परम उत्तम हैं,यह महारामायण मोक्षोपायक शास्त्र है, सो आत्मबोधका परमकारण है. अरु परमपावन वाक्यकी सिद्धता है, अरु युक्तियुक्तार्थवाक्य है, अरु नानाप्रकारके दृष्टांत कहे हैं, जिनके बहुत जन्मके पुण्य आय इकट्ठे होते हैं, तिनको कल्पवृक्ष मिलताहै. सो फलकर झुक पडता है, तब तिनको यह शास्त्र श्रवण होता है, अरु नीचको इनका श्रवण पास नहीं होता है. उसकी वृत्ति इनके श्रवणमें नहीं आती है. जैसे धर्मात्मा राजाकी इच्छा न्यायशास्त्रके श्रवणमें होती है अरु जो पापात्मा राजा है, तिसकी इच्छा नहीं होती, हे रामजी जैसे पुण्यवा- (१६४) सप्तदशः सर्गः योगवासिष्ठे। नकी इच्छा इसके श्रवणमें होती है, अरु अधमकी इच्छा नहीं होती. जो कोई मोक्षोपायक इस रामायणका अध्ययन करेगाअथवा निष्का- म-संतके सुखते श्रद्धायुक्त श्रवण करेगाअरु आदिते लेकर,अंतपर्यंत एकत्रभाव होकर विचारेगा, तब तिसका संसारमम निवृत्त होजा- वेगा. जैसे जेवरीके जाननेते सर्पका भ्रम दूर हो जाता है, तैसे अद्वै: तात्मतत्त्वके जाननेते तिसका संसारभ्रम नष्ट हो जावेगा, इस मोक्षोपायक शास्त्रके बत्तीस सहस्र श्लोक हैं,अरु षट् प्रकरण हैं. प्रथम वैराग्यप्रकरण है, सो वैराग्यका परमकारण है. हे रामजी! मरुस्थलमें वृक्ष नहीं होता, परंतु वडी वर्षा होवे तव तहां वृक्ष होता है, तैसे अज्ञानीका हृदय मरुस्थलकी नाई है, तिसमें वैराग्यरूपी वृक्ष नहीं होता, परंतु यह शास्त्ररूपी जोवडीवर्षा होवे,तिसकर वैराग्यरूपी वृक्ष' उत्पन्न होता है, तिसके एक सहस्र पांचसौ श्लोक हैं. तिसके अनंतर- मुमुक्षुब्यवहारप्रकरण है, तिसमें परमनिर्मल वचन हैं. तिनकरके जैसे मलीन मणिमार्जन कियेते उज्ज्वल होआती है, तैसे यह वचनते मुमुक्षुका हृदय निर्मल होता है अरु विचारके बलते आत्मपद पाने- को समर्थ होता है. तिसके एक सहस्र श्लोक हैं, तिसके अनंतर- उत्पत्तिप्रकरण है तिसके सप्तसहस्र श्लोक हैं.तिसमें बड़ी सुंदर कथा दृष्टोतसाहित कही है, जिस विचारतजगतका सत्यताभाव मनते चला- यमान रहता है, अर्थात् जो जगतका अत्यंत अभाव जान पडता है. हे। रामजी! इस जगत्में जो मनुष्य, देवता,दैत्य, पर्वत, नदी-आदि स्वर्ग- लोक, पृथ्वी, आप,तेज,वायु आकाश-आदि स्थावर जंगम भासताहै, सो अज्ञानकरके हैं, अरुइसकी उत्पत्ति कैसे भई है? जैसे जेवरीमें सपी होता है अरुशीपमें रूपा है अरु सूर्यके किरणमें जल दीखता है,आका- शमें तरुवर दीखता है और जैसे दूसरा चंद्रमा दीखता है. जैसे गंधर्व- नगर मासते हैं, मनोरथकी सृष्टि भासती है अरु संकल्पपुर होता है अरु सुवर्णमें भूपर्ण होता है समुद्रमें तरंगहोते हैंआकाशमें नालता दीखती १५.] मुमुक्षुप्रकरणे-षट्प्रकरणवर्णनम् । (१६५) जैसे नौकामें बैठते किनारे वृक्ष पर्वत चलते दृष्टि आते हैं अरु बाद- रके चलते चंद्रमा घविता दीखता है और थंभमें पूतरी भासती है, भविष्यत् नगरते-आदि लेकर, असत्य पदार्थ जैसे सत्य भासते हैं, तैसे सब जगत् आकाशरूप है, अज्ञानकरके अर्थाकार भासता है. सो अज्ञानकरके उत्पत्ति दीखती है, अरु ज्ञानकरके लीन होजाता है जैसे निद्रामें स्वप्नसृष्टिकी उत्पत्ति होती है अरु जागेते निवृत्त हो जाती है; तैसे अविद्याकरके जगतकी उत्पचि होती है अरु सम्यक् ज्ञानकरके निवृत्त होजाता है; सो अविद्या कछु वस्तुहू नहीं,सर्व चिदाकाशरूप है, सो शुद्ध है, अनंत है, परमानंदस्वरूप है. तिसमें न जगत उप- जता है, और न लीन होता है; ज्योंकी त्योंआत्मसत्ता अपने आ. पविषे स्थित है,तिसमें जगत् ऐसा है-जैसे भीतमें चित्र होता है,जैसे थंभमें पुतरियां होती हैं अरु हुवे बिना भासती हैं, तैसे यह सृष्टिमनमें रही है, वास्तवते कछु बनी नहीं. सब आकाशरूप है. जब चित्त- संवेदन स्पंदरूप होता है, तब नानाप्रकारका जगत् होके भासता है अरु जब निस्पंद होता है तब जगत् मिट जाता है. इसप्रकार जगतकी उत्पत्ति कही है. तिसके अनंतर- स्थितिप्रकरण है; तिसमें जगतकी स्थिति कही है. जैसे इंद्रका : धनुष आकाशरूप है और अविचारकरके रंगसहित भासता है जैसे सूर्यकी किरणोंमें जल भासता है, जैसे जेवरीमें सर्प भासता है सो सब सम्यग्दृष्टिकरके निवृत्त होता है, तैसे अज्ञानकरके जगतकी प्र- तीति होती है, सोमनोराज्य करके जगत् रख लेता है, सो कछ उत्पन्न हुवा नहीं है, तैसे यह जगत् संकल्पमात्र है. जबलग मनोराज्य है, तवलग वहनगर होता है.जब मनोराज्यका अभाव हवा, तबनगरका अभाव हो जाता है. जबलगअयान होता है, तबलग जगतकी उत्प- ति होती है, जब संकल्पका लय हुवा तब जगत्का अभाव हो जाता है. जैसे इंद्र ब्रह्माके पुत्रहूकी दश सृष्टि संकल्प करके स्थित भई, तैसे -- [समदशः सर्गः योगवासिष्ठे। यह जगदभी है; कोऊ पदार्थ अर्थरूप नहीं. हे रामजी ! इसप्रकार स्थितिप्रकरण कहा है, तिसके तीन सहस्रश्लोक हैं. तिसके विचार- करके जगतकी सत्यता जाती रहती है. तिसके अनंतर- उपशांतिप्रकरण है; तिसके पंचसहस्र श्लोक हैं. तिसके विचारेते अहंतत्त्वादिक वासना लीन हो जाती हैं जैसे स्वप्नते जागते वास- ना जाती रहती है, तैसे विचार कियेते अहंतादिक वासना लीन होजाती हैं. काहेते, कि, उसके निश्चयमें जगत् नहीं रहता. जैसे एकः पुरुष सोया है, तिसको स्वप्नमें जगत् भासता है और उसके निकट जो जागृत पुरुष है, तिसको स्वनका जगत् आकाशरूप है। जब आकाशरूप हुवा तब वासना कैसे रहे ? जब वासना नष्ट भई, तब मनका उपशम हो जाता है. तब देखनेमात्र उसकी सब चेष्टा होती है. और इसके मनमें अर्थरूप इच्छा नहीं होती. जैसे अमिकी मूर्ति देखने-- मात्र होती है, अर्थाकार नहीं होती, तैसे उसकी चेष्टा होती है, हेराम- जी ! जब मनते इच्छा नष्ट होती है, तब मनभी निर्वाण होजाता है. जैसे तेलते रहित दीपक निर्वाण होता है, तैसे इच्छाते रहितः मन निर्वाण होता है. इसप्रकार उपशमप्रकरण है. तिसके अनंतर- निर्वाणप्रकरण है.जो शेष है तिसमें चौदा हजार पांचसौ श्लोक हैं. परमनिर्वाण वचन कहे हैं, अज्ञानकरके चित्र अरु चित्तका संबंध है,. सो विचार कियेते निर्वाण होजाता है. जैसे शरत्कालमें मेषके अभा- वते शुद्ध आकाश होता है, तैसे पुरुष विचारकरके निर्मल होता है, हे रामजी ! अहंकाररूपी पिशाच है, सो विचारकरके नष्ट होता है, जेती कछु इच्छा स्फूर्ति है, सो निर्वाण हो जाती है. जैसे पत्थरकी शिला फुरनेते रहित होती है, तैसे ज्ञानवान् इच्छाते रहित होता है तब जेती कछु जगतकी यात्रा है सोइसको होय चुकती है, जो कछु करना है सो कर चुकता है. हे रामजी शरीर होतेही वह पुरुष अशरीरी हो. जाता है अरु नाना प्रकारका जगत् उसको नहीं भासता. जगतकी .

१८.] मुमुक्षुप्रकरणे--दृष्टांतवर्णनम् । (१६७) नेतीते वह रहित होता है, अहंतत्त्वादिक तमरूप जगत् तिसको नहीं भासता है, जैसे सूर्यको अंधकार दृष्टि नहीं आता, तैसे उसको जगत् दृष्टिमें नहीं आताअरु ऐसे बडे पदको प्राप्त होता है जैसे सुमेरु पर्वतके किसीकानेमें कमल होता है, जिसके ऊपर भौरा स्थिर रहते हैं, तैसे ब्रह्माके किसी कोनपैजगत् तुषाररूप है अरु जीवरूपी भौरेतिस- पर स्थित हैं. वह पुरुषअचिंत्य चिन्मात्र है. रूपअवलोकन, मन तिस- का आकाशरूप होजाता है तिस पदको वह प्राप्त होता है, जिस पदकी योग्य उपमा कहनेको ब्रह्मा, विष्णु और रुद्रभी समर्थ नहीं होते, ऐसे अनुपमताके सदृश कोऊ नहीं है. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे षट्मकरणविवरणं नाम सप्तदशः सर्ग ॥ १७॥ अष्टादशः सर्गः १८॥ अय दृष्टांतवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच-हे रामजी ! यह परमउत्तम वाक्य है, उस: को विचारनहारा उत्तम पदको प्राप्त होता है. जैसे उत्तम खेतमें उत्तम बीज बोयेते उत्तम फलकी उत्पत्ति होती है, तैसे इसको विचारनहारा उत्तम पदको प्राप्त होता है. यह वाक्य युक्तिपूर्वक है और युक्तिते रहित ऋषिवाक्यभी हो, तो तिसको त्याग करिये और युक्तिपूर्वक वाक्यका अंगीकार करिये. हे रामजी ! जो ब्रह्माके वचन युक्तिते रहित हों तब तिनकोभी सूखे तृणकी नाई त्याग करिये, अरु बालकके वचन युक्तिपूर्वक हों तो तिनका अंगीकार करिये और पिताके कूपका खारा जल होवे तो उसका त्याग करिये और निकट मिष्ट जलकाप होवे तबति- सका पान करिये. तैसे बडे अरु छोटेका विचार न करिये युक्तिपूर्वक योगवासिष्ठे। . [अष्टादशः सर्गः वचनका अंगीकार करना. हे रामजी ! मेरे वचन सब युक्तिपूर्वक हैं अरु बोधके परमकारण हैं. जो पुरुष एकाग्र होके, इस शास्त्रको आ- दिते अंतपर्यंत पढे अथवा पंडितसों श्रवणकरके विचारे, तब तिसकी बुद्धि संस्कारित होते. प्रथम वैराग्यप्रकरणको विचारेगा, तव वैराग्य उपजैगा. जेते कछु जगत्के रमणीय भोग पदार्थ हैं, तिनको विरस जानेगा अरु किसी पदार्थकी वांछा न करेगा. जब भोगमें वैराग्य होता है, तब शांतिरूप आत्मतत्त्वमें प्रतीति होती है जब विचारकरके बुद्धि संस्कारित होवेगी तब शास्त्रका सिद्धांत बुद्धिमें आय स्थित होवेगा और ससारके विकार रहित बुद्धि निर्मल होवेगी. जैसे शरत्कालके बादलके अभाव हुवेते आकाशसवओरत स्वच्छ होता है, तैसे बुद्धि निर्मल होवेगी. बहुरि आधिव्याधिको पीडा उसको न होवेगी.हे रामजी! ज्योज्यों विचार दृढ होवेगा, त्यो त्यों शांतात्मा होवेगा; ताते जेते कच्छ संसारके यत्न हैं, तिनका त्यागकर,इस शास्त्रको वारंवार विचारते चैतन्यसत्ता उदय हो- वेगी,त्यों त्यों लोभ--मोहादि विकारोंकी सत्ता नष्ट होवेगी. ज्यों ज्यों सूर्यउदय होता है, त्यो त्यों अंधकार नष्ट होता है; तैसे विकार नष्ट होवेगा तब तिस पदकी प्राप्ति होगी. जिसके पायेते संसारके क्षोम मिट जायेंगे. जैसे शरत्कालमें मेघ नष्ट हो जाता है. तैसे संसारके क्षोभ मिट जाते हैं, हे रामजी ! ज्ञानवान् पुरुषको संसारकेरागदोष वधि नहीं सकते. जैसे जिस पुरुषने कवच पहिरा होय, तिसको वाण वेध नहीं सकते, उसको भोगकी इच्छा नहीं रहती; जव विषयभोग विद्यमान आय रहें तब तिनको विषयभूत जानके बुद्धि ग्रहण नहीं करती अर्थ जानकर वाहर नहीं निकसती, अंतरात्मामेंही स्थित रहती है, पतिव्रतास्त्रीअ- पने अंतःपुरते बाहर नहीं निकसती तैसे ताकी बुद्धिअंतरतेबाहर नहीं निकसती हे रामजी! वाहरते तो वहभी प्रकृतिजन्यकी नाई दृष्टि ज १८.] मुमुक्षुप्रकरणे-दृष्टातवर्णनम् । आता है जो कछु अनिच्छित प्राप्त होते हैं, तिनको भोगता हुवा दृष्टिमें आता है, और अंतरते उसको रागदोष नहीं फुरता. हे रामजी! जेता कछु जगतकी उत्पत्ति प्रलयका क्षोभ है,सो ज्ञा- नवानको नष्ट नहीं कर सकता.जैसे चित्रकी बेलिका आँधी चलाय नहीं सकती तैसे उसको जगतका दुःख चलाय नहीं सकता अरुसं- सारकी ओरते जड हो आता है.वृक्षकी नाई गंभीर होजाता है अरु पर्वतकी नाई स्थिर होजाता है अरु चंद्रमाकी नाई शीतल हो जाता हे रामजी सोआत्मज्ञानकरके ऐसे पदको प्राप्त होता है, जिसके पायेते और कछु पानेयोग्य नहीं रहता.आत्मज्ञानका कारण यह मोक्षोपाय शास्त्र है,जामें नानाप्रकारके दृष्टांत कहे हैं.जो वस्तु अपरिच्छिन्न होवे अरु देखने नआई होतिसका न्याय देखने में होवे तिसकोविधिपूर्वक समुझावे उसका नाम दृष्टांत है.हे रामजी!यह जगत् कार्यकारणरूप अरु आत्मा जगतकी एकता कैसे होवे, ताते जो मैं दृष्टांत कहूंगा, तिसका एक अंश अंगीकार करना,सब देशकर अंगीकार नहीं करना. हे रामजी! कार्यकारणकी कल्पना मूर्खने करी है, तिसके निषेधके निमित्त मैं स्वप्न दृष्टांत कहूं हूं, सो समुझनेते तेरे मनका संशय नष्ट हो जावेगा. दृक् अरु दृश्यका भेद मूर्खको भासता है,तिसका दूर कर- नेके अर्थ स्वादृष्टांत कहूंगा, तिसके विचारनेकरि मिथ्या विभाग कल्पनाका अभाव होता है. हे रामजी! ऐसी कल्पनाका नाशकर्ता यह मेरा मोक्षउपाय शास्त्र है,जो पुरुष आदिते अंतपर्यंत विचारेगा सो संसारी होवेगा-जो पदपदाथको जाननेहारा होवे सोइसको वारं- चार विचारे,तब तिसका दृश्य भ्रम नाश पावे. इस शास्त्रके विचार- विषे और किसी तीर्थ,तप,दान आदिककी अपेक्षा नहीं जहां स्थान होवे तहां बैठे. जैसा भोजन गृहविषे होवे तैसा करे अरु वारंवार इसका विचार करे, तब अज्ञान नष्ट होजावे अरु आत्मपदकी प्राप्ति होवे. हे रामजी ! यह शास्त्र प्रकाशरूप है. जैसे अंधकारविषे पदार्थ Bahan [अष्टादशः सर्गः (१७०) योगवासिष्ठे। नहीं दीखता अरु दीपकके प्रकाशकरि चक्षुसहित देखता है,तैसे शा- स्ररूपी दीपक विचाररूपी नेत्रसहितहोवे तब आत्मपदकी प्राति होवे. हे रामजी ! आत्मज्ञान, विचारविना वरशापकार प्राप्त नहीं होता, जब विचारकरि दृढ अभ्यास करिये, तब प्राप्त होता है तातेमोक्ष- उपाय जो परमपावन शास्त्र,तिसके विचारतेजगभ्रम नष्ट होजावेगा. जगत्के देखते देखते जगद्भाव मिट जावेगा.जैसे सर्पकी मूर्ति लिखी होती है अरु अविचारकरके तिसते भय पाता है, जब विचारकरि देखिये तव सर्पभ्रम मिटजाता है, सो सर्पका आकार दृष्टि आता है, परंतु उसका भय मिटजाता है. तैसे यह जगत्भ्रम विचार कियेते. नष्ट होजाता है अरु जन्ममरणका भय नहीं रहता.हे रामजी!जन्मः मरणका भयभी बड़ा दुःख है,परंतु इस शास्त्रके विचारते नष्ट होजा- ता है. जिन्होंने इसका विचार त्यागा है सो माताके गर्भविषे कीट होवेंगे, अरु कष्टते नहीं छूटेंगे अरु विचारवान् पुरुष आत्मपदको प्राप्त होवेगा.अरु जो श्रेष्ठज्ञानी अनंत हैं तिनको अपनारूप भासता है; कोऊ पदार्थ आत्माते भिन्न नहीं भासता. जैसे जिसको जलका ज्ञान हुवा है, तिसको लहरी, आवर्त सब जलरूपही भासते हैं, तैसे ज्ञानवान्को सब आत्मरूप भासता है, अरु इंद्रियहूके इष्ट-अनिष्टकी प्राप्तिमें इच्छा दोष नहीं करता, सदा एकरस मनके संकल्पते रहित शांतरूप होता है.जैसे मंदराचल पर्वतके निकसेते क्षीरसमुद्र शांतिको. प्राप्त भया, तैसे संकल्परहित यह पुरुष शांतिरूप होता है, हे रामजी और जो तेज होता है, सो दाहक होता है,परंतु ज्ञान- रूपी तेज जिस घटविषे उदय होता है सो शीतल शांतिरूप होता है, बहुरि तिसविषे संसारका विकार कोऊ नहीं रहता जैसे कलियुगविषे शिखावाला तारा उदय होता है, सो कलियुगके अभाव हुवे नहीं उदय होता, तैसे ज्ञानवान्के चित्तमें विकार उत्पन्न नहीं होता. हे रामजी ! संसारभ्रम आत्माके प्रमादकार उत्पन्न होता है, सो -- MAK N १८.] मुमुक्षुप्रकरणे-दृष्टांतवर्णनम् । (१७१) आत्मज्ञानके प्राप्त भये यलबिनाशांत होजाता है. फूल,पत्र काटनेमेंमी. कछु यत्ल होता है; परंतु आत्माके पानेमें कछु यल नहीं होता. काहेते. कि, वोघरूपी करके जानता है,हेरामजी!जोजाननेमात्रज्ञानस्वरूप. है, तिसमें स्थित होनेका क्या यल है ? आत्मा शुद्ध अद्वैतरूप है अरु. जगत् भ्रममात्र है. जो पूर्व-अपर विचार कियेते जिसकी सत्यता न. पाइये तिसको भ्रममात्रजानिये, अरु पूर्व-अपर विचार कियेते सत्य होवे तिसका रूप जानिये सो इस जगतका सत्यता आदि अंतविषे. नहीं है, ताते स्वप्नवत् है, जैसे स्वप्न आदि अंतमें कछु है नहीं, तैसे. जाग्रत्भी आदि अंतमें नहीं है, ताते जाग्रत् स्वम दोनों तुल्य हैं: हे रामजी ! यह वार्ता बालकभीजानता है, कि, आदिअंतमें जि- सकी सत्यतान पाइये, सो स्वप्नवत् है. जो आदिभी न होवे अरु अं. तभी न रहे,तिसको मध्यमेंभी असत्य जानिये. तिसविषे यह दृष्टांत कहे हैं. संकल्पपुरीवत् ध्याननगरकी नाई, स्वमपुरीकी नाई, वर शापकरके जो उपजता है तिसकी नाई, औषधीते उपजेकी नाई, इस. पदार्थकी सत्यता न आदि होती है, न अंतमें होती है अरु मध्यमें जो भासता है, सोभी भ्रममात्र है. तैसे यह जगत् अकारण है अरू कार्यकारणभाव संबंधमें भासता है, तो कार्यकारण जगत् भया अरु आत्मसचा अकारण है, जगत् साकार है अरु आत्मा निराकार है. इस जगत्का दृष्टांतजोआत्मविषे दूंगा तिसका तुम एक अंशग्रह- ण करना जैसे स्वप्नकी सृष्टि होती है, तिसका पूर्वापर भाव आत्मतत्त्व- विषेमिलता है. काहेते कि, अकारण है अरु मध्यभावका दृष्टांत नहीं मिलता.काहेते कि, उपमेय अकारण है तो तिसका इसके समान ह- धांत कैसे होवे? ताते अपनेबोधके अर्थ दृष्टांतका एक अंशग्रहण कर- ना, हेरामजी ! जो विचारवान पुरुष हैं, सोगुरु अरु शास्त्रके श्रवण- करके सुखबोधके अर्थ. दृष्टांतका एक अंशग्रहण करते हैं हेरामजी !

(१७२) योगवासिष्ठे। [अष्टादशः सर्गः तिनको आत्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है. काहते कि, सारग्राहक होते हैं, अरु जो अपने बोधके अर्थ दृष्टांतका एक अंश ग्रहण नहा करते अरू वाद करते हैं, तिनको आत्मतत्त्वकी पासि नहीं होती; ताते दृष्टांतका एक अंशग्रहण करना सर्वभावकरके दृष्टांतको नहीं मिलाना अरु पृ. थक्को देखि करि, तर्क नहीं करना. एक अंश दृष्टांतका आत्मबोधके निमित्त सारभूत ग्रहण करना जैसे अंधकारमें पदार्थ परा होवे, सो -दीपकके प्रकाशसों देख लेना.जो दीपकके साथ प्रयोजन है और ऐसे नहीं कहना कि, दीपक किसका है ? अरु तेल बाती कैसा है? अरु किस स्थानका है? दीपकका प्रकाशही अंगीकार करना. तैसे एक अंश दृष्टांतका आत्मबोधके निमित्त अंगीकार करना. हेरामजी! जिसकरि वाक्यार्थसिद्धि न होवे,तिसका त्याग करना; कि, वचन अनुभवको प्रकट करेतिसका अंगीकार करना.जो पुरुष अ- पने बोधके निमित्त वचनको ग्रहण करता है,सोई श्रेष्ठ है अरुजीवादके निमित्त ग्रहण करता है सोचोगचूंच है, वह अर्थको सिद्ध नहीं कर- ता.जो कोउ अभिमानको लेकर कहता है,सो हस्तीकी नाई शिर- पर माटी डारता है, तिसका अर्थ सिद्ध नहीं होता; अरु जो अपने जोधके निमित्त वचनको ग्रहण करता है अरु विचारकरि तिसका अ- भ्यास करता है,तब वह आत्मशांतिको पाता है. हे रामजी! आत्मप- दके पानेके निमित्त अवश्यमेव अभ्यास चहिताहै-जबशम, विचार,सं- तोष अरु संतसमागमकरिबोधकी प्राप्ति होवे, तब परमपदको पाता है. हेरामजी! जिसका दृष्टांत कहता है, सो एकदेश लेकर कहता है.सवमुख कहनेकरि अखंडताका अभाव हो जाता है अरजोसर्वमुख दृष्टांत मुखकोजानिये, सो सत्यरूप होता है, ऐसे तो नहीं. आत्मा सत्यरूप है, कार्यकारणते रहित शुद्ध चैतन्य है तिसके लखानेनि- मित्त कार्यकारण जगतका दृष्टांत कैसे दीजिये, यह जगत्का जो , (१७३) १९.] मुमुक्षुप्रकरणे-प्रमाणवर्णनम् । दृष्टांत कहता है सो एक अंश लेइ कहता है; अरु बुद्धिमानकी दृष्टां- तके एक अंशको ग्रहण करते हैं जो श्रेष्ठ पुरुष हैं सोअपने बोधके निमि- त्तसारको ग्रहण करते हैं अरुजिज्ञासुकोभी यही चहिता है कि अपने वोधके निमित्त सारको ग्रहण करे अरु वाद न करे. जैसे क्षुधार्थीको चावल पाक आय प्राप्त होवहि, तब भोजन करनेका प्रयोजन है, अरु उसकी उत्पत्ति अरु स्थितिका वाद करना व्यर्थ है. हे रामजी! वाक्य सोई है जो अनुभवको प्रकट करै, अरु जो अ- नुभवको प्रकट करै तिसका त्याग करना; जो स्त्रीका वाक्य होवे अरु आत्मअनुभवको प्रत्यक्ष करे तिसका ग्रहण करना.अरु परमगुरु वेदवाक्य होवे और अनुभवको प्रकट न करे तिसका त्याग करना. जबलग विश्रामको नहीं पाया, तबलग विचार कर्तव्य है; विश्रामका नाम तुर्यपद है; जब विश्रामकी प्राप्ति होवे,तब अक्षय शांति होती है, हे रामजी! जो तुर्यपदसंयुक्त पुरुषहै, तिसका श्रुति स्मृतिउक्त कर्म- हूके करनेकरि प्रयोजन सिद्ध कछु नहीं होता अरु न करनेकरि कछू पाप नहीं होता. सदेह होवे, भावे विदेह होवे; गृहस्थ होवे, भावे विरक्त. होवे; तिसको कर्तव्य कछू नहीं. वह पुरुष संसारसमुद्रते पार हुवा है. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणे दृष्टांतनिरूपणं नामाष्टादशः सर्गः॥१८॥ एकोनविंशः सर्गः १९. अथ प्रमाणवर्णनम् । हे रामजी ! उपमेयको उपमाकरि जानता है, सो एक अंशको ग्रहण करि जानता है, तब बोधकी प्राप्ति होती है, अरु जो बोधते रहित है, सो मुक्तिको प्राप्त नहीं होता, वह व्यर्थ वाद करता है. हे (१७४) योगवासिष्ठे। [एकोनविंशःसर्गः रामजी! शुद्ध स्वरूप आत्मता जिसके घटविषेविराजमान है, तिस- को त्यागकार और विकल्प उठता है; सोचोगचंचु है अरु मूर्ख है. हेरामजी! जो अर्थ प्रत्यक्ष है, सो प्रमाण मानने योग्य है और जो अनुमान,अर्थापत्तिआदिप्रमाणसों तिसकी सत्ता प्रत्यक्षकरिहोती है. जैसे सब नदियोंका अधिष्ठ.नंसमुद्र है, तैसे सबै प्रमाणहुका अधि- छान प्रत्यक्षप्रमाण है.सोप्रत्यक्ष क्या है? सो श्रवण करहु. हे रामजी! चक्षुरूपी ज्ञानसंमत संवेदन है, तिस चक्षुकरके विद्यमान होता है, तिसका नाम प्रत्यक्षप्रमाण है, तिस प्रमाणहको विषय करनेहारा जीव है,अपने वास्तवस्वरूपके अज्ञानकरि अनात्मरूपी दृश्य बना है. तिसविषे अहंकृतिकरके अभिमान भया है. अभिमान सब दृश्य है, ताते हेयोपादेय बुद्धि भई है, अरु रागदोपकरके परा जलता है, आपको कर्त्ता मानकरि बहिर्मुख हुवा भटकता है. हेरामजी !जब विचारकरके संवेदन अंतर्मुखी होवे, तब आत्म- पद प्रत्यक्ष होता है अरु निजभावको प्राप्त होता है. परिच्छिन्न भाव नहीं रहता,शुद्ध शांतिको प्राप्त होता है.जैसे स्वप्नते जागतेस्वप्नका शरीर अरु दृश्यभ्रम नष्ट होजाता है, तैसे आत्माके प्रत्यक्ष हुएते सब भ्रम मिट जाता है, अरु शुद्ध आत्मसत्ता भासती है. हेरामजी! यहजो दृश्य अरु द्रष्टा है सोमिथ्या है,जोद्रष्टा है सो दृश्य होता है अरु जो दृश्य है सो द्रष्टा होता है, सो यह भ्रम मिथ्या आकाशरूप है. जैसे पवनमें स्पंदशक्ति रहती है, तैसे आत्मामें संवेदन रहती है. जब संवेदन स्पंदरूप होती है, तब दृश्यरूप होके, स्थित होती है. जैसे स्वप्नमें अनुभव सत्ता दृश्यरूप होके स्थित होती है, तैसे यह दृश्य है ताते सब आत्मसत्ता है, ऐसे विचारकरि आत्मपदको प्राप्त होवो अरु जो ऐसे विचार करके आत्मपदको प्राप्त न होयसको तब अहंकार जो उल्लेख पुरताहै तिसका अभाव करो, पीछे जो शेषरहेगा सो शुद्ध , २०.] . . मुमुक्षुप्रकरणे-आत्मप्राप्तिवर्णनम् । (१७५) बोध आत्मसत्त्वा है. जब शुद्ध बोधको तुम प्राप्त होहुगे, तब ऐसे चेष्टा पडी होवेगी, जैसे जंत्रीकी पुतरी संवेदनविना चेष्टा करती है, तैसे देहरूपी पुतरीका पालनहारा मनरूपी संवेदन है. तिसबिना पडी रहेगी, परंतु अहंकृतिका अभाव होवैगा; ताते यलकरके तिस पदके पानेका अभ्यास करो; जो नित्य शुद्ध शांतरूप है. हे रामजी ! और दैवशब्दको त्याग करि अपना पुरुषार्थ करो अरु आत्मपदको प्राप्त होहु. जो कोऊ पुरुषार्थमें शूरसा है सोआत्म- पदको प्राप्त होता है, अरु जो नीच पुरुषार्थका आश्रय करता है, सो संसारसमुद्रमें डूबता है. इति श्रीयोगवासिष्ठे ममुक्षुप्रकरणे प्रमाणनिरूपणं नामैकोनविंशः सर्गः ॥ १९ ॥ विशतितमः सर्गः २०॥ अथान्ममाप्तिवर्णनम् । वसिष्ठ उवाच हे रामजी!जब सत्संगकरके यह पुरुष शुद्ध बुद्धि करे, तब.आत्मपद पानेको समर्थ होवे. प्रथम सत्संग यह है कि, जिसकी चेष्टा शास्त्रहूके अनुसार होवे,तिसका संग करे,तिसके गुण- हको हृदयविषे घरे, बहुरि महापुरुषके शम-संतोष-आदिक गुणोंका भी आश्रय करे.शमसंतोषादिककरि ज्ञान उपजता है. जैसे मेघहूकार अन्न उपजता है,अरु अन्नकरि जगव होता है अरु जगत्ते मेघ होता. है,तैसे शम-संतोषभी हैं,शमादिक गुणकरि ज्ञान उपजता है अरु आ- त्मज्ञानकरि शमादिक गुण आय स्थित होते हैं. जैसे बड़े तालकरि मेष पुष्ट होता है अरु मेधकरि ताल पुष्ट होता है,तैसे शमादिकगुण- (१७६) योगवासिष्ठे। [विंशतितमः सर्गः नकरि आत्मज्ञान होता है अरु आत्मज्ञानते शमादिक गुण पुष्ट होते हैं. ऐसे विचारकरकेशमसंतोषादिक गुणोंका अभ्यास करहु. तव शीघ्र हीआत्मतत्त्वको प्राप्त होवोगे हेरामजी!ज्ञानवान् पुरुषको शमादिकं गुण स्वाभाविक आय प्राप्त होते हैं अरु जिज्ञासुको अभ्यासकरके प्राप्त होते. हैं अरुजैसे धान्यका पालन स्त्री करती है, उंचाशब्दकरती है जिसकरि पक्षियोंको उडावती है, जब इसप्रकार पालना करती है, तब फलको पाती है, तिसकरि पुष्ट होती है, तैसे शमसंतोषादिकके पालने करि आत्मतत्त्वकी प्राप्ति होती है. हेरामजी!इस मोक्षोपाय शास्त्रकोआदिते लेकर, अंतपर्यंत विचारे तब मांति निवृत्त होते. धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष सर्व पुरुषार्थकर सिद्ध होते हैं,परंतु यह मोक्षउपाय शास्त्र परमकारण है,जो शुद्ध बुद्धि वान पुरुष इसको विचारेगा,तिसको शीघ्रही आत्मपदकी प्राप्ति होवेगी शाते इस मोक्षउपाय शास्त्रका भलीप्रकार अभ्या करो. इति श्रीयोगवासिष्ठे मुमुक्षूप्रकरणे आत्मप्राप्तिवर्णनं नाम विंशतितमः सर्गः ॥२०॥ समाप्तमिदं योगवासिष्ठे मुमुक्षुप्रकरणं द्वितीयम् २ । ग्राम सलेमाबादके, हरिप्रसादके बैन ॥ शोध्यो पण्डित रामभद्रने, श्रीसुमेरपुर ऐन ॥१॥ पुस्तक मिलनेका ठिकाना- हरिप्रसाद भगीरथजीका--- 'प्राचीन-पुस्तकालय ' कालकादेवी, पोष्ट नंबर २, मुंबई. 7

No text on this page.

Yogavashishtha

Author
Not Available
Title
Yogavashishtha
File name
Yogavashishtha
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2009/09
Publisher
Bombay, Sarasvati Press
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
Sanmati Library, Jaipur
Classification
Vaidik sahitya
DLI number
345462
Barcode
99999990233803.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
Rights
Copyright permitted
VMLT id
VfZT0ghwq6t
Download PDF

Yogavashishtha