Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Madya Nishedh [ Nashe Ka Vyasan ]
Front matter
No text on this page.
मद्य-निषेधः
नशे काव्यसन
चन्द्रसेन
शारदा प्रकाशन, महरौली, नई दिल्ली-३०
-
सस्करणः प्रथम
१९९०
तीस रुपये मात्र
हिन्दगान रिटा, पानीपुर गेड
किसी-110032
१६/एस-3, अंसारी ऐड, दरित्र
नई दिल्ली-११०००२ सारा प्ररित
MADYA MUSICDIS : NASIC KA VYASAN by Chandi. Son
क्रम
मद्य-कपा, मद्य-दोष:
प्राचीन भारत में मद्य-निषेध : १३
भरार द अल्कोहर का वैज्ञानिक परीक्षण :
अफीम-परसादि
No text on this page.
मद्य कथा बौद्ध ग्रन्यो में एक मद्य कथा इस प्रकार वणित है : एक दिन प्रभु संसार के सब जीवों पर दृष्टिपात कर रहे थे। उन्होने देखा कि एक राजा जिसका नाम सर्वमित्र है खूब मद्य सेवन कर रहा है। उसके साथ उसके मन्तिगण और प्रजाजन भी मद्य के प्याले कण्ठ से उतार रहे हैं और महा पापाचार हो रहा है । प्रभु ने कहा, हाय ! हाय !! इन मनुष्यों पर यह कैसा अभिशाप है ? भद्य पीने में तो मधुर है परन्तु इसका परिणाम कैसा भयानक है ! इन सब का विवेक नष्ट हो गया है, यह अनाचार क्यों कर रहे हैं ? यदि यह राजा सुधर जाय तो शेष प्रजाजन भी सुधर जायेंगे। ऐसा विचार कर प्रभु ने ब्राह्मण का रूप धारण किया । उनका रंग स्वर्ण की भांति दीप उठा। उन्होंने बल्कल वसन और मृगछाला शरीर पर धारण किये और एक सुराही में मद्य भर कर अपने कंधे पर लटका ली। इस भेस में वे सर्वमिन के सम्मुख जा पहुंचे। उस समय राजा अपने दर- दारियों के साथ मद्य-चर्चा में लीन था। उन सब ने प्रभु के तेज को देखकर मस्तक झुकाते हुए करबद्ध प्रणाम किया। प्रभु ने जल्द गंभीर स्वर में कहा, "देखो, पुष्पों से आच्छादित इस सुराही में ऊपर तक सुगन्धित मधुर मद्य भरी हुई है, तुम मे से कौन इसका खरीदार है ? यह सुराही कण्ठहार की भांति सुसज्जित है, देखो तो, कैसी प्रिय है। बताओ तुम में से कौन इसका मूल्य दे सकता है ?" राजा के नेव उस सुराही पर अटक गये, उसने करवद हो प्रभु से माहा, "आपका तेज प्रभात के सूर्य की तरह चमक रहा है, पूर्ण चन्द्रमा की मद्य-निषेध : नशे का व्यसन , नाई आपकी शोभा है, और आपका दिव्य वेश मुनियों-जैसा है, आपको हम किस नाम से सम्बोधित करें?" प्रभु ने उत्तर दिया, "थोड़ी देर बाद तुम मुझे जान जाओगे कि मैं कौन हू, परन्तु पहले मुझ से इस सुराही के खरीदने का सौदा करो। कम- से-कम तुम तो परलोक की व्याधियों और कष्टों से नहीं डरते होगे ?" राजा ने निवेदन किया, "श्रीमान की सभी बातें अद्भुत हैं, मैंने आज से पहले ऐसा व्यवहार कभी नहीं देखा। अपनी वस्तु के दोषों को कोई प्रकट नहीं करता । हे देव, कहिये इस सुराही में क्या पदार्थ है और आप इसे बेचने का नाट्य क्यों कर रहे हैं ?" प्रभु बोले, "सुनो, राजन ! इसमें न जल है, न मेधों की अमृत-बूदें हैं, न यह किसी पवित्र स्रोत को पुनीत धारा है, न इसमें सुगन्धित पुष्पों का सार मधु है, न पारदर्शी घृत है, और नही दूध है जो शरद चन्द्र-किरणों की मधुरिमा से युक्त हो। नहीं, नहीं, इस सुराही में पिशाचिनी मद्य है। इस मद्य के गुण सुनो : जो इसका पान करेगा उसे अपनी सुध-बुध न रहेगी, वह नशे में मतवाला होकर भोजन के बदले विष्ठा भी खा सकेगा। ऐसी यह मद्य है, इसे खरीद लो, इतनी निकृष्ट यह सुराही विक्री ही के लिये है। "इस पदार्थ में तुम्हारा समस्त ज्ञान और विवेक नष्ट कर देने की शक्ति है, जिससे तुम अपनी विचारधारा पर अधिकार न रख कर एक धनपशु की भांति व्यवहार कर सकोगे। तुम्हारे शनु तुम्हारी दशा की हसी उडायेंगे। तुम इसे पीकर खूब नाच भी सकते हो, गा भी सकते हो। यह मद्य अवश्य तुम्हारे खरीदने योग्य है । इसमें एक भी अच्छा गुण नहीं है। "इसके पीने मे तुम्हारी लाज-भावना जाती रहेगी। तुम नंगे भी रह सकते हो । लोगों का समुदाय यदि तुम पर यूके, तब भी तुम्हें बुरा प्रतीत होगा। वे तुम पर गोवर, कीचड, कंकर-पत्यर उछालें तब भी तुम न जान सकोगे। ऐसी मध को मैं तुम्हारे पास बेचने के लिए लाया हूं। "जो स्त्री इसका सेवन करेगी,वह मदाय होकर अपने माता-पिता को रस्सियों से बांध कर और कुबेर सरश पति को भी ठकरा कर पतन के मद्य-निषेधे नशे का व्यसन : गड़े में प्रसन्नता से जा गिरेगी। ऐसी यह मद्य है। "इसने अनेक सम्पन्न परिवारों को नष्ट किया है, सुन्दर स्वर्ण शरीरं कोचिताओं पर जला कर भस्म किया है, राजमहल और सम्राटों को धुर में मिलाकर पददलित किया है, फिर भी इसकी तृष्णा नहीं बुझती। ऐसे प्रलयकारी है यह मद्य! "इसे जिह्वा पर रखते हो मन मलिन हो जाता है, जो ऐंठ जाता है। खूब हंसो, खूब बको, कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। उसमें असत्य भाषण करने का साहस आ जाता है, वह सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझने लगता है । इस मदान्ध करने वाली वस्तु के स्पर्श-मान से ही पाप लगता है, बुद्धि मलिन होती है, कष्ट और व्याधि वढती हैं। यह समस्त अपराधों की जननी है, उज्ज्वल मन का भयानक अंधकार है, जिसको तीक्ष्ण ज्वाला शीतल हृदय पर सदैव धधक-धधक कर दहकती रहती है । जो इसके प्रभाव में होकर अपने माता-पिता, स्त्री, भगिनी, भ्राता और बच्चों का हंसते- हंसते वध कर सकता है. ऐसी यह मद्य है। है प्रजा के राजा, यह पेय तुम्हारे प्रतापी कण्ठ से नीचे उतरने योग्य है, तुम इसे खरीद कर पान करो। "इस मद्य को जरा देखो तो, इसका माणिक की भांति हल्का लाल रंग है । सुन्दरियों को उंगलियों का स्पर्श पाते ही इसकी मादकता और भी तीन हो उठती है । इसे पीकर मनुष्य पशु बन जाता है, यह नरक की खान है।" प्रभु ने मद्य का यह बखान करके चारो ओर देखा । सब स्तब्ध थे। उस नीरव दरबार में एकाएक गर्जन हुआ, राजा ने तेजी से उठकर अपने मद्य-पानों को दीवार से टकरा कर चूर-चूर कर डाला । और "हाय ! पिशाचिनी, मायाविनी मद्य, तू जा! जा ! मुझे छोड़ !" कहकर प्रभु के चरणों में गिर पड़े।
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन मद्य-दोष क्लिटनवेन क्राफट ने शराब का वर्णन इस प्रकार किया है, "मैं आग हूं, मैं भस्म करती हूं और नाश करती हूं। मैं रोग हूं और असाध्य हूं। मैं चिन्ता हूं, राजाओं को चमकीली पोशाक, प्रतिष्ठित पुरुषो के भारी-भारी वेश, सजीली रानियों के रेशमी वस्त्र मेरी अमिट भूख मिटाया करते हैं । मेरा नाश जब भयंकर ऊंचाई पर पहुंच जाता है तब मैं थोड़ी देर के लिए सुलगती हू । मेरी ज्वाला अचानक घधक उठती है और सर्वस्व को भस्म करना शुरू कर देती है, यहां तक कि कुछ भी नहीं छोडती । मैं अग्नि का समुद्र हूं, कोई जिह्वा मुझसे प्यास नही बुझा सकती। मैं वह अग्नि हूं जो कभी जल से शान्त नहीं होती।" पाश्चात्य सभ्यता ने संसार को जो सबसे भयानक वस्तु दी है, वह शराब है। यह शरीर और आत्मा दोनों ही के लिए समान रीति से घातक है । गत महायुद्ध में एक करोड प्राण युद्ध के द्वारा, डेढ़ करोड़ महामारी के द्वारा, २ करोड़ शराब के द्वारा नष्ट हुए। भारत में ज्यो-ज्यों पाश्चात्य सभ्यता वढी है, मदिरा का प्रचार व्यापक होता गया है। अमीर और गरीब सभी इसके चंगुल मे फंसे हैं। पश्चिम में मद्य के विरोध मे अब भारी आन्दोलन प्रारम्भ हो गया है। अमेरिका ने शराब का सार्वजनिक प्रयोग त्याग दिया है । वहां के वैज्ञानिकों और डाक्टरों ने आन्दोलन मचा रखा है कि शराब उनके देश और राष्ट्र का, उनके समाज का सत्यानाश कर रही है। विद्वान् लोग सर्वसाधारण को चेता रहे हैं कि मद्यपान से बल घटता है, पुरुषार्थ कम होता है, शरीर में रोग प्रवेश करते हैं और आयु कम हो जाती है । शराब मांस को गला डालती है। इससे दिमाग खराब हो जाता है, बुद्धि मलिन हो जाती है। अन्य योरोपीय राष्ट्र भी समस्त संसार से इसको नष्ट कर देने का उद्योग कर रहे हैं। इंग्लैंड के प्रख्यात महामन्त्री मिस्टर ग्लेडस्टन ने एक बार कहा था-' -"मनुष्य-जाति पर असयम द्वारा जितनी विपत्तिया पड़ी है, उतनी बड़ी-से-बड़ी तीन ऐति.
मा: निधनशे का व्यसन “११० म हासिक विपत्तियां अर्थात् युद्ध, महामारो और अकाल द्वारा भी नहीं पड़ी।" कुछ दिन पूर्व ब्रिटेन और भारत के डाक्टरों ने मिलकर एक विज्ञप्ति, निकाली थी, जिसका अभिप्राय यह था : १. यह वैज्ञानिक रीति से निश्चित हो गया है कि शराब, कोकिन, अफीम और अन्य मादक द्रव्य विप हैं। २. भारत-जैसे गरम देश में इनका थोड़ा भी व्यवहार स्थायी रूप से हानि- कारक है । ३. बहुत दशाओं में शराब संतान के लिए हानिकारक है। ४. प्लेग, मलेरिया और क्षय को रोकने में शराब व्यर्थ है। ५. यही बात अन्य नशों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है। कलकत्ते के प्रसिद्ध डाक्टर सर लियोवर्ड रॉजर्ज ने वर्षों पहले कहा था कि "बंगाल के जिगर के फोहे के ७० फीसदी रोगियों का कारण शराब का पीना ही है । स्त्रियों में यह रोग बहुत कम पाया जाता है, क्योंकि वे शराव नहीं पीती । मुसलमानों मे भी यह रोग कम है क्योंकि बंगाल में हिन्दू ही ज्यादा शराब पीते हैं।" अमेरिका के प्रसिद्ध चिकित्सक और मेडिसन रिसर्च ऐशोसियेशन के भूतपूर्व सभापति डाक्टर हार्वी वेली कहते हैं-"औषध-सत्त्वसार के पारंगत सभी विद्वान जिन्होंने शराब के प्रभाव का अन्वेषण किया है, एक- मत से सहमत हैं कि शराब पौष्टिक पदार्थ नहीं है। यह एक निरा विपला पदार्थ है, इसलिए व्हिस्की और ग्राण्डी दोनो ही ओपधि की श्रेणी में से अलग कर दी गई हैं।" योरोप के अस्पतालों में ४०-५० वर्ष पहले शराब का औपधि को मांति बहुतायत से प्रयोग होता था। चीर-फाड के बाद बहुत-से अस्पतालो में ग्रान्डी हृदय को उत्तेजना देने के लिए काम में साई जाती थी, पर अब इसका प्रयोग बन्द कर दिया गया है । आस्ट्रेलिया के एक अस्पताल में सन् १८९१ में १००० पौंड से अधिक मूल्य की शराब रोगियों पर यचं की गई पी। उसी अस्पताल में सन् १९१४ में केवल ४ पोड मूल्य की शराब बर्ष की गई।
१२ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन : शराब पाचन-शक्ति को नष्ट करने वाली, सनक और दीवानापन लाने वाली, कलेजा, गुर्दा, आमाशय और रक्त स्नायुओं को भीतर-ही- भीतर घुलाने वाली, अस्वाभाविक रीति से रोग-जंतुओं को शरीर में पहुंचाने वाली है, जिससे शरीर-अवयव और ज्ञान-तन्तु बिगड़ जाते हैं। निमोनिया, श्वास, क्षय, शोष आदि सांघातिक रोग उत्पन्न होने लगते हैं और फिर पुश्तैनी हो जाते हैं । शराब काम-शक्ति को असाधारण रीति से प्रबल कर देती है । संयम की शक्ति जाती रहती है। यह जनन-शक्ति को भी नष्ट कर देती है । इसका परिणाम यह होता है कि बांझ और नपुंसकता के रोग उत्पन्न हो जाते हैं और मनुष्य शीघ्र ही निर्वीयं और वृद्ध हो जाता है । अल्पकाल ही में उसकी समस्त इद्रियां बेकार हो जाती हैं। शराबियों में प्रतिशत २७.१ मस्तिष्क- रोग से, २३.३ अपच रोग से और २६.६६ फेफड़े के रोग से मरते हैं। भारत के पागलखानों में ६० प्रतिशत पागल मादक द्रव्य सेवन करनेवाले हैं । बढती हुई वेश्या वृत्ति का मुख्य कारण सुरापान है। मादक द्रव्यों से बेहोश करके कितने ही दुराचारी अनेक दुष्कर्म करते हैं।
प्राचीन भारत में मद्य-निषेध शुक्वाचार्य पहिले व्यक्ति थे जिन्होने मद्यनिषेध की आवाज उठाई थी। मनु ने मद्यनिषेध के लिये अत्यन्त कठोर नियम बनाये थे। उनका कहना था कि किसी भी राजा के राज्य में शराबी होना भयंकर कलंक है। जो शराब पीते थे उन्हें राज्य का त्याग करना पड़ता था। उनके सिर पर एक तिकोनी टोपी रहती थी जिससे उन्हें पहचाना जा सकता था। वे जब तक प्रायश्चित नही कर लेते थे उन्हें समाज और मित्रों से बहिष्कृत रखा जाता था । वे कोई भी धार्मिक कृत्य नही कर सकते थे। मनु को इतनी ही दण्ड व्यवस्था से सन्तोष न था । जो स्त्री शराब पीती थी वह गृहणी के पद से च्युत कर दी जाती थी, उसकी मृत्यु के उपरान्त उसका एक भी मृतकर्म नहीं किया जा सकता था। मृत्यु-समय ब्राह्मण उसे श्राप देते थे कि तू अगले जन्म में गीदड़ अथवा अन्य किसी नीच पशु-योनि में जन्म ले । जन्म न ले तो नरक में पड़ी सड़ती रहे । मनु ने इन नियमों को कागज पर लिख कर और विधान बना कर ही नहीं छोड़ दिया था, बल्कि तत्परता से पालन कराया था। यदि किसी विद्यार्थी को शराबी अपने हाथ से छूकर भोजन की भिक्षा दे देता था तो विद्यार्थी को वह भोजन खाना वजित था, उसके खा लेने पर उसे दण्डित किया जाता था। यदि किसी कल्लाल से ऋण-धन लेना होता था तो उससे शराब की बिक्री का रुपया नहीं लिया जाता था, उस रुपये को छू लेने पर भी दण्ड मिलता था। मनु देव-पूजा में सोमरस आदि मद्य-पदार्थों द्वारा अर्चन को भी अपराध समझते थे। इस- लिये सोमरस का बेचने वाला नीची श्रेणी में (शूद्रों में) गिना जाने लगा। मनु के बाद अमस्तम्ब और गौतम ने भी मद्यनिषेध के लिये कठोर से कठोर नियम बनाये थे। अपस्तम्ब ने तो यह घोषणा कर दी थी कि तमाम १४ मद्य-निषेध : नशे का ध्यसन मादक द्रव्यों का पीना यजित है । और जो कोई भी शराब पीयेगा उसका एकमान प्रायश्चित यही है कि यह इतनी अधिक गरमागरम शराब पिये फि पीते-पीते उसका प्राणान्त हो जाय। गौतम का सिद्धान्त था कि एक शराबी ब्राह्मण शराब पीने के पाप से केवल मृत्यु के बाद ही मुक्त हो सकता है। शराबी को शराब का त्याग करके प्रायश्चित करना पड़ता था जिसमें उसे पहले तीन दिन तक गरम-गरम दूध, गरम पो और गरम पानी पीना पड़ता था। उसे सांस भी गरम हवा में लेना पड़ता था। मनु ने लोगों के इस अन्यविश्वास को कि मद्य-अर्चन से देवता प्रसन्न होते हैं अथवा हमारे प्राचीन धर्म ग्रन्थ मादक द्रव्यों के पीने का निषेध नहीं करते हैं दूर करने की बहुत पेष्टा की पी। उन्होंने सतापूर्वक मा. सेवन को बुरा व्यसन कहा। प्राचीन काल में दस प्रकार को शरावों का वर्णन है जो इन पदार्थों से बनाई जाती थी--(१) खाड (२) महुआ के खिले हुए फल (३) आटा {४) राब, शीरा (५) टंका वृक्ष के फल (६) जुजुबे वृक्ष के फल (७) कारागुरा वृक्ष के फल (8) रोटफल वृक्ष के फल (8) अंगूर (१०) ना- रियल वृक्ष का दूध । पुलस्त्य ऋषि इन नामों से पृथक बारह नाम और गिनाते हैं। (१) पनस मद्य । इसके मनाने की विधि मत्स्यसुक तन्त्र में लिखी है, कच्चे पनासा को एक पान में रख कर नित्य कच्चे दूध की धार उस पर डालो, उसमे थोड़ा कच्चा मांस बारीक करके प्रति तीसरे दिन मिलाते जाओ । इसमें भाग की हरी पत्तिया भी डालो। खाने का चूना बुरको। और जब यह भली-भाति सड़ जाय तब छान कर सुराहियों में भर कर रक्खो। (२) मधुका : शहद से बनती थी। (३) तला : ताड़ से बनती पी। (४) ऐक्षवा (५) सैरा: काली मिर्च से बनती थी। (६) आरिष्ट्र (७) सुरा (6) वारुणी (8) पंष्टी आदि।
श्री बुद्ध को अहिंसा और मद्य-निषेध बौद्ध काल से पहले ब्राह्मणों का सर्वत्र मान था। वे जैसा कहते थे राजा-रंक सभी उसे मानते थे। वे यज्ञों मे पशु-बलि और मद्य का भी उपयोग करते थे। बुद्ध ने हिंसावृत्ति को कुरा बताया। उसने मद्यपान को दोष कहा। उसके असंख्य शिष्यो ने इन आज्ञाओं को शिरोधार्य करके उनका प्रचार किया। चन्द्रगुप्त मौर्य ने अपने शासन मे मांस खाना, मद्य पीना, बुरे आचरण करना, असत्य बोलना अपराध घोषित कर दिये थे। कौटिल्य ने मद्यपान की दूकानों पर उत्तम स्वादिष्ट भोजन रखवा दिये । जब कोई व्यक्ति मदिरालय में पहुंचता था तो उसे पहले सुगन्धित फूलों के बीच मे सजाकर भोजन-पान पेश किया जाता था। ये भोजन प्रत्येक ऋतु के अनुसार अलग-अलग प्रकार के होते थे, और इनका मूल्य बहुत ही सस्ता होता था। वह व्यक्ति इस पान को ही ग्रहण करता था और शराब का व्यसन उससे छूटता जाता था। ब्राह्मणों को तो मद्य छूने मे भी दण्ड दिया जाता था। जो धनिक व्यक्ति शराब की दुकान पर आता था, उसकी सम्पत्ति, उसके कण्ठहार, कुण्डल, भंगूठी आदि आभूषणो को जाच की जाती थी। यदि वह चोरी की सिद्ध होती तो दुकानदार को भी उस आभूषण के मूल्य के बराबर अर्थ-दण्ड दिया जाता था। सम्राट अशोक ने चन्द्रगुप्त के कार्य को पूर्ण रूप से पूरा किया। वह स्वयं भी मद्य पीने वालों की निगरानी रखता था। उसने अपनी राजसत्ता का प्रयोग बौद्ध धर्म के नियमों का पालन कराने में किया। उसने अपने शासन के तीस वर्षों मे मद्यपान का बहुत कठोरता से दमन किया। आज हिन्दुओं में जो इतनी शुद्धता और पवित्रता देखने में आती है यह उसी का परिणाम है। यह सुधार इतनी दृढता से किया गया था कि अशोक के वाद संकड़ों वर्षों तक भी मद्य-पान लोक-प्रचलित नहीं हो सका । जब सन् ३६६ ईस्वी मे प्रसिद्ध चीनी यात्री फाहियान भारत में आया तब उमने बहुत प्रसन्न होकर अपनेयाना-विवरण में यह लिखाकि 'इसदेश केनिवासी १६ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन न जीव हत्या करते हैं न मद्य अथवा मादकपदार्थ का सेवनकरते हैं । वेमुत जीवों का व्यवसाय भी नहीं करते । मद्य कोकोई दूकान मुझे नहीं दीखो।' दूसरा प्रसिद्ध चीनी यात्री हुनस्यांग भारत में सन् ६३० ई० में आया था और १६ वर्ष तक यहां रहा, वह लिपता है कि मैंने राजा हर्ष से लेकर साधा. रण किसान तक के जीवन का समीप से अध्ययन किया है, मैंने सवको शुद्ध, पवित्र और मितव्ययी पाया । यह सब युद्ध के अहिंसा धर्म का प्रताप था। बुद्ध ने कहा कि वेश्या और सुरापान दोनों ही अप्रिय हैं, दोनो ही त्याज्य हैं । वेश्या घन का और सुरा परिवार का हरण करके मनुष्य को ऐसा बना देती है कि उसका मूल्य शून्य जितना भी नहीं रह जाता। मनुष्य-समाज के कल्याण के लिए नैतिक तथा सामाजिक दृष्टि से इस अभिशाप का अन्त करना ही चाहि । संसार मे मदिरा मनुष्य मात्र की प्रसिद्ध शन है। "मनुष्यो, तुम सिंह के सम्मुख जाते भयभीत न होना-वह पराक्रम की परीक्षा है, तुम तलवार के नीचे सिर झुकाने से भयभीत न होना-वह बलिदान की कसौटी है, तुम पर्वत-शिखर से पाताल में पड़ने से भयभीत न होना-वह तप की साधना है, तुम दहकती ज्वालाओ से विचलित न होना-वह स्वर्ण-परीक्षा है, पर सुरा देवी से सदैव भयभीत रहना,पयोकि यह पाप और अनाचारों की जननी है।" जिस राजा के राज्य मे सुरा देवी आदर प्राप्त करेगी वह राज्य काल- वैदि पर नष्ट होगा। यहां न औषधि उपजेंगी, न अनाज होगा, न वृष्टि होगी, न सृष्टि । यह महा हिंसा है। मुस्लिम राज्यो में मद्य-निषेध: अव से हजार वर्ष पहले नवी शताब्दी में अरब का प्रख्यात सौदागर सुलेमान जब भारत मे आया तो उसने देखा कि भारत में कही भी शराब की दूकान नहीं है । उसने यह बात बड़े आश्चर्य से अपने याता-विवरण में । लिखी है। बादशाह जहांगीर ने शराब-खोरी के विरुद्ध मोषणाए जारी की थी।
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन १७ पहला योरोपियन यानी वास्कोडिगामा जब भारतीय तट पर जहाज से उतरा तब उसने भी भारत को शराब से रहित पाया। अलाउद्दीन खिलजी को एक दिन अपने पापो, दुष्कर्मों और क्रूरता पर इतना पश्चात्ताप हुआ था कि उसने इन सबको जड़ को शराब समझा। वह बहुत शराब पीता था। उसने तुरन्त ही सेवकों को माता दी कि मेरी शराब की सुराही लाओ। सुराही सामने आने पर उसने बड़े क्रोध से उसे जमीन पर दे मारा। इसके बाद उसने महल के तमाम कीमती प्याले और सुराहियों को मंगवाकर अपने सामने तोड़ डालने की आज्ञा दी । इतिहास. फार लिखता है कि बदायू दरवाजे पर कीमती और लजीज शराब को वहा दिया गया और बर्तनों को तोड़-फोड़कर नष्ट कर दिया गया। उस स्थान में ऐसी कीचड़ हो गई जैसे कि मैंह बरसने के बाद हो जाती है। वहीं पर बड़े-बड़े गड्ढे खोदे गये और शराब पीने वालों को उनमें गाड़ दिया गया। उन पर ऐसी क्रूरता की गई कि बहुत-से तो तुरन्त मर गये। इस घटना से लोगों ने शराब पीती छोड़ दी। अकबर ने शराब के विरुद्ध आदेश कर दिये थे । कुरान मे शराब पीने की आशा नहीं है। हिन्दू, पारसी, ईसाई सभी को धर्म-पुस्तकों में शराब की निन्दा लिपी है । जिस प्रकार शराबी मनुष्य हिन्दू धर्म मे आर्य या द्विज नहीं कहा जा सकता, उसी प्रकार शराबी मुसलमान शरम की रू से मुसलमान नहीं कहा जा सकता। मुगल सम्राट् औरंगजेब के समय में प्रसिद्ध फांसीसी डाक्टर बनियर ने जो औरंगजेब के दरबार में बहुत दिन रहा था, स्पष्ट लिखा है कि दिल्ली में शराब को एक भी दूकान न थी। वह लिखता है, "मदिरा जो हमारे यहां भोजन का प्रधान अंग है, दिल्ली की किसी भी दूकान में नहीं मिलती। जो मदिरा यहां देसी अंगूर को वन सकती है,वह भी नहीं मिलती, क्योकि मुसलमानों की कुरान और हिन्दुओ के शास्त्रों मे उसका पीना वर्जित है। मुगल राज्य में भी जो मदिराशीराज वा कनारी टापू से आती है, अच्छी होती है। शोराजी मदिरा ईरान से खुश्की के रास्ते-'धन्दर अब्बास' और वहा से जहाज द्वारा सूरत में १८ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन : पहुंचती और फिर वहां से दिल्ली आती है । शीराज से दिल्ली तक मदिरा आने में कई दिन लगते हैं। कनारी टापू से मदिरा सूरत होती हुई दिल्ली आती है। पर यह दोनों मदिरायें इतनी महंगी होती हैं कि इनका मूल्य ही इन्हें बदमजा कर देता है। एक शीशी पन्द्रह या अठारह रुपये में आती है। जो मदिरा इस देश मे बनती है, जिसे ये लोग 'अकं' कहते हैं वह बहुत ही तेज होती है ।यह भभके से खीचकर गुड़ से बनाई जाती है और बाजार मे नहीं बिकने पाती। धर्म के विरुद्ध होने के कारण अंग्रेजों व ईसाइयो के अतिरिक्त इसे कोई नही पी सकता। यह अकं ठीक वैसा ही है जैसा कि पोलण्ड के लोग अनाज से बनाते हैं और जिसे परिमाण से ज़रा भी अधिक पी जाने से मनुष्य बीमार पड़ जाता है । समझदार आदमी तो यहां सादा पानी पियेगा, या नीबू का शरबत, जो यहां सहज ही मिल जाता है और जो हानिकारक नहीं होता। इस गर्म देश में लोगो को मदिरा की आवश्य- कता नहीं होती। मदिरा न पीने और बराबर पसीने आते रहने के कारण यहां के लोग सर्दी, बुखार, पीठ का दर्द आदि अनेक रोगो से बचे रहते हैं।" मुगलों के राज्य का पतन कुछ बादशाहों की बढती शराब-परस्ती ही थी। इतिहास में इसकी एक झलक मिलती है : बहादुरशाह के पोते मुहम्मदशाह दिल्ली के तख्त पर राज्य करते थे । यह वह समय था जबकि नादिरशाह ने भारत पर आक्रमण किया, वह पश्चिम के मार्ग से भारत के प्रान्तो को लूटता हुआ दिल्ली तक आ धमका। उसने दिल्ली के निकट पहुचकर बादशाह को लिखा, "दो करोड़ रुपये दो वरना दिल्ली की ईट से इंट बजा दूगा।" जब यह दूत दरबार में पहुंचा तो बादशाह शराब पी रहे थे और शेरें तथा गजलें गाई जा रही थी। बादशाह स्वयं अपनी कवितायें सुना रहे थे, और अमीर-उमराव उन्हे 'क्लामुल्मुलूक लूकुलक्लाम' कहकर झुक झुककर सलाने अदा कर रहे थे। दूत ने खत दिया तो वादशाह ने वजीर से कहा, 'पढो क्या है ?' वजीर ने पढ़ा और कहा, "हुजूर ऐसे गुस्ताखी के अल्फाज हैं कि जहाँपनाह के सुनने काबिल नही।"बादशाह ने कहा, 'ताहम पढो।' खत सुनकर कहा, "क्या यह मुमकिन है कि यह शख्स दिल्ली की इंट-से-इंट मद्य-निषेध नशे का व्यसन बना दे?" खुशामदी दरबारियों ने कहा, "हुजूर, कतई नामुमकिन है।" तव बादशाह ने हुक्म दिया, "यह खत शराब की सुराही मे डुबो दिया जाय और इसके नाम पर एक-एक दौर और चले?" जब दौर खतम हुमा तो दूत ने कहा, 'हजूर बन्दे को क्या इरशाद है।' बादशाह ने हुक्म दिया, "पांच सो अशर्फी और एक दुशाला इसे इनाम दिया जाय।" दूत चला गया और नादिरशाह तूफान की भाति दिल्ली में घुस आया। उसने तीन दिन तक कत्लेआम किया और असख्य हीरे-जवाहरात लूट ले गया। वह तख्तेताऊस भी लूट ले गया। इस लूट में उसे तख्त के अलावा दस करोड़ का माल मिला था।
शराब व अल्कोहल का परीक्षण शराव अस्वाभाविक रीति से गेहूं, मक्का, ज्वार, चावल, महुआ, जो, अंगूर और खजूर के रस से सड़ाकर बनाई जाती है। इसमें अल्कोहल का प्राधान्य रहता है। २०६ औंस शराब में ७० औंस तक अल्कोहल रहता है। यह अल्कोहल भयानक विष है। यदि अल्कोहल थोड़ा भी एक मनुष्य को दिया जाय तो वह उसे मारने को काफी है। यदि जल में सौवां भाग अल्कोहल मिलाकर उसमे मछली को डाल दिया जाय तो वह मर जायगी। यदि अडे की सफेदी को उसमें डालो तो वह तुरन्त सिमट जायगी तथा कड़ी हो जायगी। हम अपने दैनिक जीवन में अनेक तरल पेय पदार्थों का उपयोग करते रहते हैं, जैसे दूध, पानी, लेमन, सोडा, बरफ, काफी, कोको आदि। इनमे अल्कोहल नहीं होता। इसके सिवा दूसरी श्रेणी के पेय हैं जैसे बीयर, विस्की, घर की बनी शराव, विलायती शराब, स्प्रिट,साड़ी, दारू आदि ये सब नशा करती हैं क्योकि इन सब में नशे की जीवात्मा 'अल्कोहल' होता है। अल्कोहल के परीक्षण का साधारण उपाय यह है कि मद्य को किसी रवायी में रखकर नीचे हल्की आंच जलाओ तो रकाबी भभक उठेगी। भक से जल उठना मत्कोहल का प्रमाण है। किमी भीतरल पदार्थ को उबाला जाय तो उसफीभाप बनने लगेगी। पानी २१२ एफ० डिगरी तक गरम करने पर भाप बनने लगती है। अल्कोहल केवल १७२ एफ० डिगरी में ही भाप बनकर उड़ने लगता है। यदि हम पोड़ी-सी शरार को एक कांच के गिलास में रखकर गरम करें मह तो यह तुरन्त गरम होकर गिलास के मुंह पर लो बनने वोयी- चाक पानी की भाप लो बनकर जल नहीं सकती, और शराब में अन्य पदाथा का मिश्रण नहीं है. इसलिए वह ली अल्कोहल को प्रमाणित करती। पानी का तनिक भी अंश उसमें होता तो वह लौ को जलने से अवश्य रोकता। अस्कोहल के सही माप का एक यन्त अल्कोहोलोमीटर भी आता है। आबकारी विभाग में घनत्व की माप भी की जाती है, और यही सही जांच है। आबकारी विभाग अल्कोहल की वस्तुओं पर चुंगी प्रूफस्प्रिट के हिसाब से लगाते हैं । आधा पानी आधा अल्कोहल से प्रूफस्प्रिट बनती है। प्रफस्प्रिट में अनुपात से पानी का वजन ५०.७६ और अल्कोहल का वजन ४६.२४ प्रतिशत होता है। दोनों समान वजन हों तो प्रूफस्प्रिट नहीं बन सकती क्योंकि अल्कोहल का घनत्व पानी से हल्का होता है । क्षेत्रफल के हिसाब से प्रूफस्प्रिट में अनुपात से प्रतिशत ५७.०६ भाग अल्कोहल और ४२.६४ प्रतिशत भाग पानी होता है ।। यदि पनत्व ०.६८८५ हो तो उसमे ६.७५ खालिस अल्कोहल और १४.७३ प्रतिशत प्रूफस्प्रिट का वज़न होगा। इससे यह सिद्धान्त निकला कि प्रूफस्प्रिट बालिस अल्कोहल से दूनी से थोड़ी ज्यादा होती है, और खालिस अल्कोहल की शक्ति में प्राधी से भी कुछ कम होती है। जिस तरल पदार्थ में २ प्रतिशत प्रूफ स्प्रिट होती है उस पर आबकारी चुंगी नहीं लगती, इससे अधिक पर लगती है। अल्कोहल में कितना पानी है इसका साधारण परिमाण इस प्रकार किया जा सकता है। दो चीनी के प्यालों में पोडी-थोड़ी बारूद भरो। उनमें से एक में पानी-मिली अल्कोहल छिड़क दो। दूसरी में खालिस अल्कोहल छिड़क दो। दोनों के नीचे भाच जलाओ। दोनों जलेंगे। लेकिन (१) में अल्कोहल अंशै तो जलकर नड़ जायगा, पानी का अंश बारूद में समा हुआ रह जायगा और वह गोली मालूम होगी। (२) में अल्कोहल जलेगा पर चूकि उसमें पानी का अंश नहीं है २२ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन इसलिए वह जलकर बारूद को भी जलाना शुरू कर देगी और यारूद गरम और सूखी मालूम होगी। अब हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि अल्कोहल कहां से आती है। अल्कोहल प्राकृतिक रूप में किसी भी पदार्थ मे नहीं बनती। वह रासायनिक विधि से सडाकर पैदा की जाती है और उससे शराब बनती है। जैसे जो से बीयर, अंगूरों से वाइन, सेव से साइडर, नास्पाती से पेरी, शहद से मीड इत्यादि। इन शराबों की उत्तमता का यदि हम इसलिए बखान करें कि ये इतने सुन्दर फलों से बनी हैं तो यह मिथ्या है । क्योकि दोनों के गुण भिन्न-भिन्न होते हैं। जिस प्रकार पानी, पानी की भाष, पानी की बरफ एक ही वस्तु की बनी होने पर भी भिन्न-भिन्न गुण रखती हैं इसी प्रकार शराब को भी समझना चाहिए। शराब फैसे बनाई जाती है : शराब किस प्रकार सड़ाकर बनाई जाती है इसका हम विस्तारपूर्वक वर्णन करते हैं। जौ की शराब जो से बीयर बनाई जाती है। सबसे पहले अनाज को माल्ट किया जाता है, जिसकी विधि यह है : जौ को पौद में जब किल्ले (अंकुर) फूट भाते हैं तब उसमे रासायनिक परिवर्तन आरम्भ होता है । इस शिशु पौदे में स्टाचं बहुत अधिक मात्रा मे होता है, यदि जो की ऐसी पौदी को छाया सुखाकर सावधानी से रखा जाय तो बहुत दिनो तक उसका यह गुण बना रहेगा। जब पौदा नमी को जब करने लगता है तब यह बढ़ना आरम्भ होता है, और कुछ समय तक स्टाचं ही रासायनिक परिवर्तन से एक प्रकार की शक्कर वनकर इसे पोषक तत्त्व देता है। नीचे की नोक फैलकर जड हो जाती है, पत्तिया पनपने लगती हैं। फिर ज्यों-ज्यों पौदा बड़ा होता है, स्यो-त्यो पतियो द्वारा हवा में से और जड़ों द्वारा जमीन में से भोजन लेने मद्य-निषेध नशे कायसन'२३ लगता है। विकास होने पर जड़ें नीचे जमीन में धानी जाती हैं और पत्तियां ऊपर ताजी हवा और रोशनी मे फैलने लगती है। स्टाचं बहुत ही शक्तिशाली पदार्थ है, यह तेज गरम पानी अथवा रासायनिक क्रिया से ही घुल सकता है । स्टार्च को रासायनिक उपायों से शक्कर बनाकर बाजार में ग्लूकोज नाम से बेचते है। ग्लूकोज एक पोषक तत्त्व है, बच्चों और मरीजों के लिए पथ्य है। यह कई प्रकार के होते इस बात से हमें ज्ञात हुआ कि जो में 'जी को शक्कर' एक महत्त्वपूर्ण वस्तु है । इस शक्कर से ही शराम बनती है। शराब बनाने के लिए पहले जो का माल्ट बनाते हैं, क्योकि सूखे जो में से स्टार्च को शक्कर के रूप में बदल देने की यही एकमात्र विधि है। अकेले सूखे जो से शराब नही बन सकती। माल्ट विधि की चार क्रियाएं है-१. भिगोना, २. ढेर करना, ३. किल्ले फूटमा और ४. सुखाना। जौ को एक बर्तन में डालकर उसमें पानी भर देना चाहिए जिससे वे डूब जायं। ४८ घंटे तक डूबे रहने चाहिएँ। जो पानी को जब फरेंगे और फूल जावेंगे। इन जी को पानी में से निकालकर ढेर बना देना चाहिए । गीला ढेर बनने से थोड़ी गरमी पैदा होगी, और उनको गरमाई पहुंचेगी, इसी गरमाई से उनमें किल्ले फूटेंगे। किल्ले फूटने की आसानी के लिए ढेर को धीरे-धीरे फर्श पर फैला देना चाहिए और उलट-पुलट करते रहना चाहिए, थोड़े दिन बाद ही कुल्ले फूट आवेगे। जब कुल्ले पूर्णतया फूट आयं, तव और अधिक अंकुर न बढ़ने देने चाहिएं। उनको फिर भट्टी की मंदी आच से गरम करके सुखाना चाहिए। आंच इतनी ही हो कि वे थोड़ा सूख जामं, बहुत सूखें नहीं, जले महीं, स्टार्च नष्ट होवे नहीं। माल्ट की सारी विधि बन्द कमरे में होनी चाहिए, खुली धूप में नहीं। शराब के कारखानो में माल्ट करने के कमरे बहुत लम्बे होते हैं और वे खुले नहीं होते। ऐसे माल्ट हुए जौ में पाचक-शक्ति कम नहीं होती। बच्चों और मरीजों को डाक्टर लोग माल्ट अनाज की रोटी खाना बतलाते हैं। क्योंकि
२४ मध-निषेध : नशे का व्यसन
..
उनकी पाचन-शक्ति कमजोर होती है। ऐसा अनाज मुंह की राल को
उत्पन्न करता और उसके अभाव को पूर्ण करता है। भोजन खूब चबाकर
निगलने का नियम इसीलिए है कि उसमें मुंह की लार का बहुत-सा अंश
मिलकर पेट में पहुंचे। माल्ट किया हुआ अनाज पाचन-शक्ति को सुधार
देता है।
माल्ट करने से जो का वजन २० प्रतिशत घट जाता है। १०० किलो
वजन ८० किलो ही रह जायगा। क्योंकि २ प्रतिशत भिगोने में (घुलने
वाला पदार्थ पानी में घुल जायगा), २ प्रतिशत फर्श पर सुखाने में (कार्बन
द्विोषित उड़ जायगी),४ प्रतिशत अंकुरों अथवा कुल्लों के घिसने अथवा
छीज जाने मे और १२ प्रतिशत भट्टी की आंच से भाप बनकर उड़
जाने
मे कम हो जाता है।
सन् १९२१ में अमेरिका में २,०००,००० एकड़ भूमि पर जो की
खेती शराब बनाने के लिए होती थी, जिसमें ६,०००,००० Cwts. जो
पैदा होते थे। और १६,०००,००० Cwts. जो बाहर अन्य देशों से खरीदे
गए थे।
१२.०
जो मे प्रतिशत निम्न पदार्य होते हैं:
जल (water)
PTATIT (Dextrin & Sugar)
FT (Starch)
ऐस्बुमिनेट्स (Albumenoids)
ऐश (Ash)
२.
काष्ठप (Voody fibre)
पर्ण (Fats)
परामबनाने में माठ विधि करनी पड़ती -मास्ट को कुषमना.
मापना. पमाना. गाकरता, समाना, साफ करला मराब माना और
मद्य-निषेध :मशे का व्यसन २५ समुद्र गुद्ध करना। मयने में १७५° डिग्री फारेनहाइट गरम पानी प्रयोग में आता है, इससे स्टार्च की शूगर अच्छी तरह बनने लगती है। बड़ी-बड़ी मशीनों में पूरे चार घंटे तक एक धान की मथाई होती है, यहां तक कि स्टार्च की शक्कर बन जाती है । जौ को अलग निकालकर पशुओं को चारे के काम में ले लेते हैं और स्टार्च की शक्कर के तरल पदार्य को पकाकर शराब बनाते हैं। माल्ट बनाने में जो २०% कम हो गया था। अब मथने में जो पृथक होने से ५०% और कम हो गया। उस शक्कर के तरल पदार्थ फो बड़े-बड़े टैकों में भरकर सड़ाते हैं। सड़कर उसमें फेन पैदा होते हैं। शराब के कारखानों मे बहुत दूर तक फैले हुए तरल पदार्थ के ऊपर ये फेन भाति दीखते हैं । इन फेनो को सावधानी से उत्पन्न करके उनको एक बर्तन में संग्रह किया जाता है। इन फेनों से शराब चुआई जाती है। ये फैन कई प्रकार के बनते है । तरल पदार्थ की नीनी तह में भी फेन उत्पन्न होते हैं, इनकी बनी शराब कुछ कमजोर होती है। ऊपरी सतह के फेनों की शराब ही प्रायः सर्वन बनाई जाती है और श्रेष्ठ समझी जाती है। फेन एक बार ही नहीं आते, वह एक बार उतार लेने पर दूसरी बार और तीसरी बार भी आते हैं। एक प्रकार से उस तरल पदार्थ की यह पौध है, इसमें बहुत सावधानी रखनी पड़ती है। जितने अधिक फेन आयेंगे उतना ही अधिक सडान समझना चाहिए । टकों में अनुकूल टेम्प्रेचर रखने के लिए यन्त्र लगे रहते हैं। सड़ान का रासायनिक काम यह हुआ कि शक्कर की अल्कोहल और कार्बन द्विमोषित दो चीजें बनी। फेन का फारमूला यह है :- C6H1206+Yeast=2 (CGHS HO) +2 (Co.) Sugar Alcohal Carbon Dioxide २६ मध-निषेध : नशे का व्यसन ज्यों-ज्यों फैन बनते हैं, कार्यन द्विओपित हवा में उड जाती है और अल्कोहल रह जाती है। इस प्रकार शराब में खालिस अल्कोहल ही है। शराब और डवलरोटी कुछ लोगों को यह दलील है कि जो की डवल रोटी भी इसी प्रकार खमीर उठाकर बनाई जाती है, जब उसमें हानि नही तब शराब में क्यो है ? हम अभी बता चुके हैं कि शराब मे, माल्ट और सड़ने मे ७० प्रतिशत जो यम हो चुके है और फेन लेने में तो और भी कमी हुई होगी, तब यह निश्चय मान लेना चाहिए कि डबल रोटी के एक पैसे के टुकड़े में जितने पोषक तत्त्व मिले होगे उतने पाच रुपये के शराब के गिलास में भी न होगे। पश्चिम के एक प्रसिद्ध केमिस्ट वेबेरोम लीविंग ने एक बार कहा था कि हम इस बात को गणित द्वारा प्रमाणित कर सकते हैं कि खाने की मेज पर पड़ी हुई छरी की नोक पर ही इतना पोषक तत्व पाया जा सकता है जितना नो गुनी सबसे अच्छी 'बवेरियन यीयर' में भी नहीं होता। आधी पौंड रोटी में २८६ ग्रेन नसों को पुष्ट करने वाला पदार्थ रहता है। आधा पिन्ट दूध मे १७६ ग्रेन पौष्टिक तत्त्व रहता है। आधा पिन्ट बीयर में केवल २० ग्रेन ही पौष्टिक तत्त्व रहता है। एप्रीकल्चर हाल मन्दन में पहली नेशमल श्रीवर्स एग्जीबिशन के अवसर पर बरटन शराव का एक पीपा दिखाया गया था जिसमें शराब का भाग-विभंजन दिखाया गया था। पीपे मे ३६ गैलन अथवा १४४ क्वार्टसं शराब का विभंजन इस प्रकार: १३० क्वार्ट जल (Water) अल्कोहल (Alcohal) ३॥ , डेक्सट्रीन (Dextrin &c) २ शूगर (Sugar) gegfaat (Albumenoid) इसमें आप देखेंगे कि भोज्य पदार्थ केवल पिछली दो वस्तएं ही हैं। ७॥ " "
मद्य निषेध जो का.व्यसन २७
रोटरी और बीयर में अब यह भेद हुमा कि रोटी में वे सब गुप कायम हैं
जो प्रकृति ने अनाज के पौदे मे दिये घे जयकि बीयर में से
और सड़ाने में रासायनिक परिवर्तन होने पर जाते रहे।
पात को प्रमाणित करते हैं कि रोटी में पौद के गुण कायम हैं।
एक तश्तरी में पोहे-से जो अथवा गेहूं कुचल कर रखो, तश्तरी को
गरम करो। अनाज पहले काला पड़ेगा और फिर जलने लगेगा और यदि
तेज आंच बराबर जारी रहे तो यह जलकर कोयला हो जायगा। अब इन
कोयलों को और भी तेज आंच से जलामो। धीरे-धीरे कालापन चला
जायगा, क्योंकि अधिक टेम्प्रेचर की वजह से कार्वन हवा को ऑक्सीजन
से मिलकर कार्वन हाइमाक्साइड बन गया। अब तमाम कालापन मिट
पायगा सब वे दाने सफेद भस्मी हो जायेंगे। इस भस्मी में अनाज के
खनिज क्षार मिले हैं। अम इसी प्रकार रोटी को जलाइये तो अन्त में
उसको भी सफेद भस्मी में वही धनिज क्षार मिलेंगे। दोनों एक ही चीज
हैं। दोनों के गुणों में कोई सब्दीली नहीं हुई। इससे यह बात प्रमाणित हुई
कि अनाज को रोटी बनाने से अनाज के पौष्टिक तत्त्व नष्ट नहीं हुए।
रोटी और बीपर का भेद इस प्रकार है:
रोटी
पानी प्रतिशत
३७.०
Albumenoid
शपकर
Fat
खनिज
स्टार्च
"
४७.४
"
१००.०
२८ मद्य-निषेध: नशे का व्यसन वीयर प्रतिशत ८३.१२५ " . पानी Albuminoid शक्कर खनिज Extractive अल्कोहल १.७७० ०.४१२ ८.१६० ५.८६० " " -- ग्रीक, तुर्क शराब उसी में से बन सकती है जिसमें स्टार्च या शक्कर होगी। प्रकृति के दिये हुए मधुर और पके हुए फलों को नष्ट करके हम शराब बनाते हैं जो भयंकर नशा है। यहां हम एक तालिका देते हैं जिससे यह प्रकट होगा कि कौन कैसी शराब बनाते हैं । कोन जाति बनाती-पोती है नामशराब किससे बनाते हैं हिन्दू, मलाया निवासी अर्क चावल, सुपारी (छालिया) राकी पावल ताड़ी नारियल, ताड़ी मराठे बोजा Eleusine Corocaps घीनी शमशू पावस जापानी सासे घायल संवा Macropipco मैपसीकम्म पुलर Agave दक्षिणी अमेरिकन माका, ज्वार वातारी कोमिस पोड़ीका दूध कगी, पोम (प्र.) पोरका माम् केनियागी मेरेमोनियन तामा बार, कोहनी पैसेफिक टापू मध-निषेध :नशे का व्यसन २६ इनके अलावा शराब भी जैसे करन्ट, रसभरी, सहवर्व, गूजवेरी, मादि विभिन्न देशों में बनाई जाती है परन्तु किसी भी फल में प्रकृति ने अल्कोहल प्रदान नहीं किया, मनुष्य ने उन्हें सड़ाकर अल्कोहल उत्पन्न किया है। सड़न अंग्रेजी कोप में वाइन का अयं अंगूरों का सड़ा हुआ रस है । इसके बाद इसमें और भी अपं सम्मिलित कर लिये गये। प्राचीन काल में रस और शरबत को शराब समझते और कहते थे। इस रस और शरबत से नशा नहीं होता था, बल्कि मन और शरीर पुष्ट होते थे। आजकल रस और शरयत शराव से भिन्न वस्तु हो गये हैं और जो जितनी अधिक बढ़िया शराब पीकर नशा करता है वह उतना ही अमीर समझा जाता कुछ लोग कहते हैं कि घर की बनी शराब से नशा नहीं होता, क्योंकि इसमें अल्कोहल कहां से आया, हमने तो मिलाया नहीं। अल्कोहल या स्प्रिट मिलाई नहीं जाती, वह तो सड़ान से स्वत: रासायनिक रूप में उत्पन्न होती और बनती है। हम इस बात को प्रयोग द्वारा बतलाते एक चौड़े मुंह की बोतल में दो बड़े चम्मच शक्कर डालो और बोतल का एक तिहाई भाग गुनगुने पानी से भर दो। खूब हिलाओ। फिर उसमें पोड़े से सूखे फेन या ताजे फैन डालफर और हिला दो। ऊपर से बोतल का मुंह कार्ड बोर्ड से ढक दो। इस बोतल में तीन ही चीजें हैं, स्प्रिट या अल्कोहल नहीं है । कुछ ही घंटों बाद उसमें अल्कोहल पैदा होने लगेगी। यह अल्कोहल कहां से आई ? सड़ाव से 1 सड़ने के बाद शक्कर की अल्को- हल और कार्वनडाइआक्साइड बन गई। यदि हम बोतल को और भी १-२ घंटे तक देखते रहें तो उसमें सड़न की गंध आने लगेगी और छोटे-छोटे बबूसे उठते हुए नजर आयेंगे। यदि हम ढक्कन हटाकर एक .
३० मद्य निषेध : नशे का व्यसन या बत्ती जलाकर एकदम अन्दर ले जावें तो वह बुझ जायगी। इससे यह प्रमाणित हुआ कि बोतल में साफ हवा नहीं है, बल्कि कार्बन डाइआक्साइड है जिसने बत्ती को बुझा दिया। अब इस बोतल का थोड़ा मिश्रण डिस्टि- लिंग यन्द्र में डालकर परीक्षण करें तो अल्कोहल भी प्रमाणित हो जायगी। ऐसे ही फेनों को एकत्र करके भट्टी मे चुआ कर शराब बनाते और फिल्टर करके बोतलों मे भरते हैं जैसा कि अगले प्रकरणो में वर्णन किया जायगा। ८०.० ७८.० अंगूरी शराब शराम बनाने के लिए अंगूर जैसे श्रेष्ठ फल को भी नष्ट किया जाता है। शराब बनने पर अंगूर के बहुत से गुण नष्ट हो जाते हैं। यहां हम अंगूर और वाइन (अगूर की शराब) के गुण अलग-अलग लिखते हैं : पानी पानी खार खार ०.२ Albumen Albumen ०.३ चीनी १३.० चीनी ३.५ Cellulose अल्कोहल १७.५ Tartaric acid Refuse ०.५ ०.७ ०,८ १००.० अंगूरों में भी प्रकृति ने अल्कोहल नहीं दिया। अंगुर सर्वप्रिय फल है और उसकी अनेक जातियां हैं। योरोप मे दो हजार प्रकार के अंगूरों की पोद होती है। और सभी देशों में लोग इसे जानते हैं । कवियों ने इसकी तुलना में अपनी कविता को रंग दिया है । अंगूर का कोई भाग व्यर्थ नहीं जाता, यह देखने में आकर्षक, खाने में स्वादिष्ट, और गुणों में पोषक तत्व है । कावुल से परे इसे सुखाकर मुनक्के और किसमिश बनाते हैं, और वहां मद्य निषेध : नशे का व्यसन ३१ के निवासियों का यही भोजन है। यह ऐसी जमीन में पैदा होता है, जहां अन्य पौद नही हो सकती। खूब रोशनी हो, पहाड़ी प्रदेश की ढालू और दरदरी मिट्टी हो। अंगूर के पौदे को जितना प्रकाश और हवा मिलेगी उतना ही वह पनपेगा। अंगूर की ऊपरी तह पर खुर्दबीन से फेन के सूक्ष्म परमाणु देखे जा सकते हैं। ये परमाणु यदि अन्दर को तह तक पहुंच सकते तो अगूर में स्वतः अल्कोहल होती परन्तु अंगूर छिलके में बन्द रहता है उसमें न पानी प्रवेश कर सकता है न हवा, इसलिए ऊपरी सतह पर रहने वाले परमाणु अन्दर प्रवेश नहीं कर पाते। छिलका कट जाने अथवा फट जाने से जिन अगरों में ये प्रवेश कर लेते है वे अंगूर सड़ जाते हैं । शराव बनाने के लिये पहले अंगूरों को मथ कर रस निकालते हैं । यह रस प्राचीन समय मे पैरो से कुचल कर निकाला जाता था, अब मशीनो से निकाला जाता है । इस रस को मस्ट कहते हैं। मस्ट मे अंगूर के समस्त गुण और पोषक गुण उपस्थित रहते है। फिर इसे सड़ाते और फेन उत्पन्न करके शराय चुआते है । सड़ने पर उसके सभी गुण नष्ट हो जाते हैं और फिर अंगूर-अगूर नहीं रह जाता। दुनियां में शराब बनाने के अनेक बड़े-बड़े कारखाने हैं। पेरिस की नुमायश में दुनिया के प्रत्येक भाग से ६५०० कलाल अपनी-अपनी शराबों ३५००० भिन्न-भिन्न नमूने लेकर आये थे। यदि हम अंगूरो का ताजा रस निकाल कर पियें तो वह एक शक्ति- शाली पेय है । अंगूरो के रस को बहुत दिनों तक रखने और सड़न से बचाने के कुछ उपाय हम यहा बतलाते हैं:- १. उसे थोडी गरमी पहुंचाई जाय (६० या १४० डिग्री फरेनहाइट से ऊपर तापमान को गरमाई मे उसमें सडन नही होगी।) २. उसे ठंडक पहुचाई जाय। (५ या ४० डिग्री फरेनहाइट से कम तापमान की ठंड में उसमें सडन नहीं होगी।) ३. उसका शवंत बना कर रखा जाय, या उसे पकाकर सुखा लिया ३२ मध-निषेध : नशे का व्यसन जाय। ४. उसमें इतनी शक्कर मिलाओ कि वह गाढ़ा शरवत हो जाय । ५. उसमें सड़न रोकने वाली चीजें मिलाई जायं, जैसे salicylic Boric, sulphurous, Beozaic and cinnamic acids, ६, रस के सार को अलग कर दिया जाय । ७. उसे भूछित करके रख दो जहाँ वायु का प्रवेश न हो। प्राचीन काल में लोग इन उपायों को भली-भाति जानते थे, और जहां तक हमारा विश्वास है वे इन्ही उपायों से रखे हुए रसो का पान करते थे। इनमे अल्कोहल न होने की वजह से इन्हें शराब नहीं कहा जा सकता। अव भी किहीं पाश्चात्य देशों में विना सड़ाव की प्राराब बनाई जाती है। उसमें रस को थोड़ा गरम करके, जिससे उसमें फेन के परमाणु मर जाय, हवा बन्द बोतलो में भर कर रख देते हैं। ऐसी शराब धामिक व्यवहार में लाई जाती है। मेससं फेन्क रिट, मण्डे एण्ड कम्पनी, केन्सिगटन ने इसी प्रकार की शराब बनाकर बहुत बड़ा व्यवसाय फैला लिया था। वे डाक्टरी शराव भी बनाते हैं जिसमे अल्कोहन नहीं होता। स्वीटजरलैंड में 'सेन्स- अल्कोहल-वाइन कम्पनी' ने बिना अल्कोहल की शराब बना कर अपने देश में इसी को पीने की लोगों से प्रेरणा की है। ऐसा ही प्रयत्न Ararat, victia, austrlia ने भी किया है। वहां इस प्रयल के सफल होने की पूर्ण माशा है क्योंकि वहां अंगूर बहुत पैदा होते हैं। इन देशो में ऐसी शराब बनाने के बहुत बड़े कारखाने हैं, अंगूरो के ढेरो को मशीन में कुचल कर रस निकालते हैं, फिर इस रस को नितार कर गरम करते हैं, गरम करके हदावन्द बड़ी-बड़ी जारों में रख देते हैं जिससे इनमें सड़न न हो। एक वर्ष बाद इसे खोल कर फिल्टर करके बोतलो में भर कर बाजार मे बेचते हैं। इनका विज्ञापन ही यह होता है--"Grape Juice the best drink", मर्यात 'श्रेष्ठ पेय-अंगूर का रस'। यहां हम एक प्रयोग मूछित करने का बतलाते हैं : एक साफ बोतल में पोड़ा ताजा दूध भरो और गरम करो, यहां तक मध-निषेध : मरो का ध्यसन ३३ कि वह उबलने लगे । बोतल में से भाप निकलेगी, भाप के साथ बोतल की हवा भी निकलेगी गरमी से बोतल के या दूध के परमाणु मर जायेंगे। दूध गरम करने से पहले, ऊनी या रूपेदार कपड़े के दो-चार छोटे टुकड़े चूल्हे पर गरम होने को रख देने चाहिएं। ये अच्छी तरह गरम तो हो जायं किन्तु जो नहीं। गरम होने से इनकी हवा निकल जायगी तथा इनके परमाणु भी नष्ट हो जायेंगे। जब दूध उबल रहा हो, तब इन गरम कपड़ों के टुकड़ों को दूध की बोतल में डाट की तरह भर दो और बोतल को ठंडा होने के लिये रख दो। कपड़ों की हाट के मार्ग द्वारा हवा बोतल में प्रवेश कर सकती है, पर इसके सब परमाणु कपड़े में ही अटके रहेंगे, अन्दर दूध में महीं जा सकेंगे। इस प्रकार दूध एक-दो वर्ष तक मीठा और स्वादिष्ट बना रह सकता है। पर इतना ध्यान रखिये कि दूध को प्रतिदिन एक बार थोड़ा सवाल देना चाहिए। यह सत्य है कि दूध नित्य उबाले जाने से एक दिन अवश्य गाढ़ा हो जायगा, परन्तु यह विगड़ेगा नही, सड़ेगा नही । इसे आप चाहें जब पी सकते हैं, वही स्वाद रहेगा। हम अपने घरों में एक-दो दिन भी दूध को सुरक्षित नहीं रख सकते क्योकि हवा के परमाणु उसमे पहुंचकर उसे बिगाड़ देते हैं। शराव बनाने का थोड़ा हाल हमें ज्ञात हो चुका है । शराबों में अल्को- हल की मात्रा एकसी नहीं होती, ६ प्रतिशत से २४ प्रतिशत तक होती है। Ciaret शराब में सबसे कम अल्कोहल होती है इसलिए वह सबसे कमजोर शराब होती है। Part और Marsala शराब सबसे तेज होती हैं। जिस शराब मे १४% से अधिक मल्कोहल होती है, उसे तेज समझ लेना चाहिये । क्योंकि सड़ाव में से १४ प्रतिशत अल्कोहल बन चुकने पर फेन बनने बन्द हो जाते हैं। ब्रिटिश वाइन जैसे औरज वाईन, रसभरी वाइन आदि इनमें १० से १२ प्रतिशत अल्कोहल होता है। सेव की Cider, और नाशपाती की Ferry: शराब में से १० प्रतिशत तका अल्कोहल होता है।
३४ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन । चुआना सभी प्रकार की अल्कोहली शराब चुआ कर बनाई जाती हैं । अर्थात सड़न के बाद उस पदार्थ को भाप द्वारा पानी बनाते हैं। चुआमा अथवा अर्फ खीचना अति प्राचीन पद्धति है। कहते हैं कि सबसे पहले यह पद्धति चीनियों को ज्ञात थी। चीनियों से और लोगों ने सीखी। प्रसिद्ध रासाय- निक आबूके सिस को एक ऐसा अर्क तैयार करना पड़ा जो जीवन को अमर बनाने वाला था, उसी अर्क के लिये उसने इस पद्धति को चलाया। प्राचीन भभके का आकार-प्रकार बहुत ही भद्दे ढंग का था। ज्यों-ज्यों सभ्यता बढती गई त्यों-त्यों नये रूप बनते गये । आधुनिक काल में ये भभके मशीन की शक्ल में बनाये जाते हैं जिसमें आख मीच कर अकं खीच सकते हैं । बारम्बार आग ठीक करने और ठडा पानी बदलने का झंझट नहीं करना पड़ता। आयरलैंड और स्काटलैंड में इन यन्त्रों द्वारा अल्कोहल और ईथर दोनों ही खीची जाती हैं। तेज अल्कोहल और ईथर में से स्प्रिटें खींची जाती हैं। स्प्रिट खीचना बहुत सावधानीऔर फुर्ती का काम है । Coffey के कारखाने मे इस प्रकार की आधुनिक मशीन लगी हुई है जिसमे दो अथवा अधिक आंच एक ही साथ खिंच जाती हैं। Coffey की भट्टी एक स्टैंडर्ड भट्टी मानी जाती है। इस भट्टी में ६५ डिग्री से ६७ डिग्री तक की एकसी स्प्रिट तैयारहोती रहती है । चुआने के बाद शराब तैयार हो जाती है। उसे फिल्टर करके हवा-बन्द बोतलों मे भर कर रख देते हैं। पुरानी होने पर व्यवहार मे लाते हैं, जितनी पुरानी होगी उतनी ही 'अच्छी मानी यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन एक पिन्ट बीयर पीये तो एक वर्ष मै दो गैलन अल्कोहल उसके पेट में पहुंचेगी। । जाती है। १. यहा Pि: कामपं पौषध मे प्रयोग आने वाली वस्तु 'सार' है। जलाने की स्प्रिट इममे भिन्न होती है।
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ३५ बहुत-सी स्प्रिट इस प्रकार बनती है : (१) ब्रान्डी: यह वाइन से अपवा वाइन के बचे हुए तलछट और मसालेसे बनती है । एक हजार गलन वाइनमें १००-१५०गलन तक वाइन स्प्रिट निकल आती है । (२)रम : रमशक्कर को जोश देकर और सड़ाकर बनाई जाती है। शक्कर के झाग और मैल में पानी मिलाकर, सड़ा कर खींचने से साधारण रम तैयार होती है। (३) विस्की और जिन :: इन्हें अनाज को सड़ा कर बनाते हैं, लेकिन बालू, शक्कर, शक्कर का मैल और घुकन्दर की जड़ से भी बनती हैं । सो पौंड माल में चालीस पौंड प्रूफ स्प्रिट बैठती है। एक बुशल माल्ट अनाज में दो गैलन प्रूफ स्प्रिट बैठती है। आठ दुशल सड़े हुए माल्ट में बींस गैलन प्रूफ स्प्रिट बनती है। प्रान्डी को डाक्टरी उपयोग में इसलिए लाते हैं कि इसके गुण डाक्टरी उपचार में आ सकने योग्य हैं । और इस बात की चेष्टा की जा रही है कि प्रोटी के गुण और उपचार सर्वत्र समान हो जायं जिससे डाक्टरों और मरीजों को 'अल्कोहलशक्ति' का निर्धारित ज्ञान हो सके। और भी कुछ पदार्थ हैं जो ब्रांडी के समान ही लाभ करते हैं और जो अल्कोहल के दोष से रहित हैं । डाक्टर जे० जे० रिज वेहोशी, धड़कन और ददों को हरने के लिये प्रांडी के बदले में इन उपायों का प्रयोग बताते हैं : १. पानी, जितना गरम पिया जा सके, थोड़ी शक्कर मिलाकर या ऐमा ही चूस-चूस कर चूंट-घूट पीजिये। ठंडा पानी भी चुस्की ले-लेकर पी सकते हैं। यह दिल की चाल को बढाकर ठीक करता है। २. अदरक-६ माशे अदरक को कुचल कर दो छटाक उबलते हुए पानी में डालो, और उतार कर छान लो। फिर थोडी शक्कर मिलाकर गरम-गरम घूट पीसो। ३. पोदीने को कुचल कर उबलते पानी मे डालो। छान कर थोडी शक्कर मिलाकर गरम-गरम घूट पीजिये।
३६ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन अल्कोहल और पानी अल्कोहल देखने में पानी के समान है, परन्तु इसके गुण उससे सर्वथा भिन्न हैं । पानी का जो उपयोग हो सकता है, वह अल्कोहल का नहीं हो सकता । यदि पानी का घनत्व १ मान लिया जाय तो अल्कोहल का घनत्व .८०६५ होगा। इससे यह सिद्ध हुआ कि पानी से अल्कोहल हल्की और पतली है। एक कांच की ट्यूब में थोड़ा अल्कोहल भरों और किसी हल्के रंग से रंग दो। एक दूसरी ट्यूब में थोड़ा पानी भरो और इसमें पहली ट्यूब में से धीरे से अल्कोहल डालो। अल्कोहल पानी मे डूबेगी नहीं, पर यदि उसे हिला कर मिलाओ तो मिल जायगी। चूंकि एक चीज हल्की है दूसरी भारी, इसलिए एक पिन्ट अल्कोहल और एक पिन्ट पानी मिलकर एक क्वार्ट नहीं हो सकेंगे। ऐसा १०० क्वार्ट मिश्रण बनाने के लिये ४६ क्वार्ट पानी और ५५ क्वार्ट अल्कोहल मिलाना पड़ेगा। यों तो ४६ और ५५ मिलकर १०४ होते हैं । परन्तु वह मिश्रण १०० ही बनेगा। दोनो तरल वास्तव में एक-दूसरे में घुले हैं, मिले नहीं। यदि हम कांच के एक गिलास मे बराबर-बराबर मात्रा मे अल्कोहल और पानी मिलावें और अच्छी तरह मिला दें तो हमे तीन बातें दीखेंगी- १. छोटे-छोटे बबूले निकलते नजर आयेंगे। पानी मे हवा मिली रहती है, और अल्कोहल के मिश्रण से हवा के बबूले बनने शुरू होते हैं । २. दोनों में मिलने से गरमी उत्पन्न होगी और गिलास छूने से कुछ गर्म प्रतीत होगा। ३. दोनों तरल पदार्थ बराबर-बराबर हैं फिर भी गिलास मे उन्होने दूनी जगह से कम जगह घेरी है। सर पदार्थ अपने-अपने कार्य मे अच्छे हैं। परन्तु विपरीत कार्य करने मे वे विप के समान हो जाते हैं। पानी पेट और अतरियो के लिये अच्छी /मद्य-निषेध : नशे का व्यसन. ३७ चीज है और वह दिन-भर में बहुत-सा हमारे पेट में पहुंचता है, परन्तु यह फेफड़ों के लिये हानिप्रद है । यदि यह फेफड़ों में रम जाय तो कुछ ही मिनटों में मृत्यु हो जायगी | carbon dioxide पेड़ों के पनपने के लिये जीवनमून है, पर यदि कोई जीव या जानवर इसमे सांस ले तो वह समाप्त हो" जायगा। अल्कोहल भी ऐसी ही चीज है, यह हमेशा भयानक और खतरनाक है। इस बात को सदैव ध्यान में रखना चाहिये कि अल्कोहल जितनी भी अधिक पी जायगी उतनी ही अधिक यह विप है। अल्कोहल मे यह विशेषता है कि वह किसी भी वस्तु को सख्त और बेघुलो बनाये रखेगी। हम अजायबघरों और मेडिकल कालिजों मे बड़ी- बड़ी कांच की जारों में भरे हुए जानवरों, पक्षियों और मनुष्य-शरीर के हिस्सों को अल्कोहल में डूबे हुए देखते हैं। ये चीजें कई वर्ष तक बिना बिगड़ी बनी रहती हैं । एक बार एक डाक्टर ने कहा था "कि यदि तुम किसी मृतक शरीर को चिरकाल तक रखना चाहते हो तो उसे अल्कोहल मे डुबो कर रखो, पर यदि तुम जीवित शरीर को मारना चाहते हो तो उसे अल्कोहल पीने को दो।" पांच कांच की ट्यूबे लो, एक में मछली, दूसरी मे मांस, तीसरी में रोटी, चौथो में शक्कर और पांचवी में मुनक्के डालकर उनमें अल्कोहल भरकर डाट कस दो, और बहुत दिनों तक रखा रहने दो। आप जब भी देखेंगे सब चीजें ज्यों-की-त्यो पायेंगे, वे घलेंगी नहीं। इससे सिद्ध हुआ कि यदि हम भोजन में अल्कोहल का व्यवहार करें तो यह भोजन के पचने में बाधा डालती है। दो ट्यूबो में नमक डालो। एक में पानी और दूसरी में अल्कोहल भर दो। थोड़ी देर बाद देखने से पता लगेगा कि पानी ने नमक को घोल दिया है, अल्कोहल ने नहीं। इसी प्रकार शक्कर को भी देखो । गाकर पानी में पुल जायगी, अल्कोहल मे नहीं। कांच के दो गिलास लो, एक में पानी भरो दूसरे में अल्कोहल, दोनों ३८ मय-निषेध :नशे का ध्यसन .. में मिधी को एक-एक हली को रंगकर तागे से लटका दो। ध्यान से देखने पर मालूम होगा कि पानी ने रंग भीधोला है और मिधीभी। किन्तु अल्को- हल ने रंग को पोला, मिश्री को नही। अल्कोहल भोजन को पचने से रोकती ही नहीं यल्कि वह घुले हुए भोज्य रस को अनग भी कर देती है। एक गिलास मे नमक का घोल बनाओ । पानी को गरम करके उसमें नमक पोलो, यह घुल जाय तब और डाली, जव तक घुलता जाय तब तक घुलाते रहो, जब पुसना बन्द हो गाय और नमक तली में घुला बैठने लगे, तब घोलना बन्द कर दो। ऐसे घोल को ठंडा करके नितारकर दूसरे गिलास में से लो। अब यदि इस भोल में थोड़ा अल्कोहल हालो तो देखोगे कि घुला हुमा नमक असग होकर नीचे गाद की भांति बैठ गया है। जो काम पानी ने किया था उस काम को अल्कोहल ने विफल कर दिया है। दो गिलास और लो। एक में अल्कोहल भरो और दूसरे में पानी । दोनों में अंडे की सफेदी डालो। अल्कोहल में अंडे की सफेदी सिमटकर कड़ी हो जायगी, पानी में वह थोड़ी पुलेगी। पानी में गरम करके अंडे को पकाते हैं, तब भी वह कड़ी तो हो जाती है परन्तु सुपच्य रहती है। मंद को धीमी आंच से इतना पकाना चाहिए कि वह अधिक कड़ा न हो जाय। बहुत तेज १८० डिग्री फारेनहाइट और २१२ डिग्री फारेनहाइट पकाने से यह कड़ा और अपच्य हो जाता है । इन प्रयोगों से यह प्रमाणित होता है कि अल्कोहल पानी की तुलना मे भोजन नहीं अपितु विप है। वह पचे हुए भोजन में भी बाधा डालता है। प्रकृति ने हमें पानी दिया है और हमें जब जव प्यास लगती है तब-तब हम पानी पीते हैं, अन्य पेय उसकी बराबरी नहीं कर सकते। अधिक पानी पीना पेट को निर्मल और शुद्ध ही करता है। जिस प्रकार प्रकाश और अंधेरा, गरमी और ठंडक, आग और पानी एक-दूसरे के विपरीत और शव है, उसी प्रकार अस्कोहल और पानी परस्पर विपरीत और शव हैं। जिस प्रकार हवा हमें जीवित रखने के लिए आवश्यक है उसी प्रकार मद्य-निषेध : नशे का व्यसन पानी भी आवश्यक है। बिना पानी हम जीवित नहीं रह सकते। मनुष्य- शरीर के अगभग ६० प्रतिशत अवयव यानी रगों और पुट्ठों के लिए पानी परमावश्यक है । हड्डी में २२ प्रतिशत, नसो में ७६ प्रतिशत, रक्त मे ७० प्रतिशत, अंतड़ियों के रस मे ६७ प्रतिशत पानी का अंश रहता है। यदि हमें पेय पदार्थों में केवल पानी ही मिलता रहे तो हमारा शरीर कभी रोगी मही हो सकेगा। एक बार मैराण्डा पहाडियों की एक खान में चार आदमी और एक लड़का कैद करके बन्द कर दिये गये। उन्हे जाने को कुछ नहीं दिया गया, केवल पानी का एक स्रोत उसमें बहता था। इनमे से एक मादमी के पास चोरी से शराब की एक बोतल छिपी रह गई थी। दस दिन के बाद जय उन्हे छोड़ देने के लिए निकाला गया तो पता चला कि उस व्यक्ति ने पानी को छुआ भी नहीं, शराब ही पी, वह आठवें दिन ही मर चुका था। शेष सबमे पानी-ही-पानी पिया और वे जीवित निकले। अल्कोहल एक विष है अल्कोहल पानी के विपरीत ही नहीं, बल्कि एफ तीन विष है। भोजन में यह गुण होना चाहिए कि वह शरीर का पोषण करे, नसों को बढ़ावे और शक्ति उत्पन्न करे। लेकिन विप मे यह गुण नहीं होते। भोजन जीवन देता है, विप जीयन लेता है । डाक्टर लेथवे विष की परिभाषा इस प्रकार करते हैं-"जो पदार्य जीवित शरीर की नसो की चेतन शक्ति को नष्ट करता है अपवा जीवन का हास करता है यह विप है।" अल्कोहल के विषैले प्रभाव इस प्रकार है : १. नशा करती है। मस्तिष्क में और व्याकुलता उत्पन्न करती है, मस्तिष्क के विकास को रोकती है. ज्ञान तन्तुओं को समेटती है। २. नसों और पुट्ठों की छोटी सेलों को नष्ट करके उनका बढ़ना रोक देती है।
४० मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ३. माक्सीजन के प्रचार को रोकती है जिमसे चरबी बढ़ने लगती है। कुछ लोग कहते हैं कि शराब नशा करती है इसलिए इसे विष कहते हैं, परन्तु शराब तो सोसायटी की एक दिलचस्प चीज़ है यह विप नहीं हो सकती। किन्तु हम वैज्ञानिक प्रयोग द्वारा इसकी अन्य विषो से तुलना करके बतायेंगे कि यह घातक विष है। पार ट्यूवों मे बरावर कच्चे अंडे की सफेदी डालो। एक ट्यूब में Nitric acid और दूसरी मे Carbolic acid, तीसरी में Carrosive Sublimate और चौथी में अल्कोहल भरो। सबको हिला-हिलाकर रख दो। थोड़ी देर बाद देखोगे कि सब में अंडे को सफेदी एक ही तरह से जम गई है। यद्यपि चारों पदार्थ भिन्न भिन्न गुणों वाले हैं परन्तु सवका रासायनिक प्रभाव एक है। इससे यह सिद्ध हुआ कि अल्कोहल भी शेष तीनों जैसे गुण रखती है। ये तीनों चीजें विप हैं। इसलिए अल्कोहल भी विप हुई। पौधों और पशु-पक्षियों पर अल्कोहल के अनेक प्रयोग करके देखे गये हैं और बराबर यह प्रमाणित हुआ कि अल्कोहल विष है। अमेरिकन डाक्टर सर बी० डब्लू० रिचर्डसन ने एक बार महूसा मछली पर यह प्रयोग किया । क्यूगार्डन्स के तालाबविक्टोरिया रेजिया में पानी काटेम्प्रेचर ८० डिग्री फारेनहाइट रखा जाताहै, उसमे मड्सा मछली पलती है । पानी मे दो वर्तन लिए गये, प्रत्येक में १००० ग्रेन तालाब का पानी भरा गया। एक बर्तन में एक ग्रेन अल्कोहल डालकर अच्छी तरह मिला दी गई। फिर दोनों मे एक-एक महूसा मछली डाली गई । अल्कोहल का तत्काल प्रभाव देखने में आया, दो मिनट मे ही मछली की हरकतें जो एक मिनट मे ७४ गिनी गई थीं बन्द हो गई, और वह नीचे बैठाती गई। वह बहुत सिकुड़ गई पी। पाच मिनट के बाद वह बिल्कुल दो मे गिर पड़ी और जड़वत् हो गई । इसे तुरन्त निकालकर, एक-दूसरे वर्तन मे जिसमे खाती टैक का पानी भरा पा, डाला गया और २४ घंटे तक उसी में पड़ी रहने दी गई, पर वह अच्छी नही हुई। जबकि दूसरे बर्तन वाली मछली यराबर एक-सी मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ४१ हरकत करती और खेलती रही। इससे यह प्रमाणित हुआ कि १०००३ पानी में अल्कोहल का १वां भाग भी जीवन के लिए कितना भयानक है। डाक्टर रिचर्डसन कहते हैं कि मडूसा पर यह प्रयोग मैंने अनेक प्रकार से करके देखा, मनुष्यों पर भी करके देखा, प्रत्येक अवस्था में अल्कोहल का विषला प्रभाव हुआ। डाक्टर जे. जे. रेजे ने वनस्पतियों पर अल्कोहल के प्रयोग किये थे। उन्होंने बीजों को अल्कोहल और पानी के समीप रखा और धूप, रोशनी तथा खाद की एक-सी व्यवस्था की। परन्तु अल्कोहल ने उन्हें पनपने नहीं दिया, अधिक अल्कोहल के कारण वे मर गये । डाक्टर एफ० डब्लू० डेव- ल्यन ने प्याज पर प्रयोग करके देखा । उन्होंने प्याज को पानी और अल्को- हल दोनों मिलाकर बोया । अल्कोहल ने प्याज को बढने नहीं दिया। यदि अल्कोहल अधिक डाली गई तो प्याज बिल्कुल ही मर गई। मालू और गेहूं पर भी इसी प्रकार के प्रयोग किये गये और सबका एक ही परिणाम रहा। सहन में सेजो १४ प्रतिशत से अधिक अल्कोहल सत्पन्न नहीं होती, सो भी इसी कारण से, क्योकि जब १४ प्रतिशत अल्कोहल बन चुकती है तब वह फेनों की सेलों को मार देती है। अल्कोहल के विष होने का सबसे मुख्य प्रमाण तो यह है कि वह भारती है । अल्कोहल पर आज तक जितनी पुस्तकें लिखी गई हैं, वे सभी इसे विप सिद्ध करती हैं । ब्रिटिश मेडीकल एशोशियेशन के सम्मुख अपना निबन्ध पढते हुए डाक्टर आचंडाल रेड ने कहा पा कि मेरी दूसरी तजवीज यह है कि अल्कोहल एक विष है और इससे प्रति वर्ष अनेक मृत्यु होती हैं, मुझे आशा है कि मेरी इस तजवीज पर वाद-विवाद नहीं किया जायगा प्रयोकि सभी व्यक्ति अपने दैनिक जीवन में इसका अनुभव करते हैं। बीमा कम्पनियों ने इसके आंकड़े भी दिये हैं। मैं तो एक ही बात दोहराऊंगा कि जो अधिक सुरापान करते हैं वे अधिक विष पीते हैं।" डाक्टर एवर्ट, सीनियर फिजिशियन एट सेन्ट जार्जहोस्पिटल, ने अपने लेक्चर में कहा था कि "अल्कोहल का नाम उन विषों में सबसे पहले वर्ष ४२ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन है जिन्हें जनता अधिक-से-अधिक खा-पी सकती है।" डाक्टर प्रोफेसर सिम्वुड हैड स्पष्ट कहते हैं कि "मैं बहुत फाल से इस बात का अनुभव करता माया हूं कि अल्कोहल केवल शारीरिक विष ही नहीं है बल्कि वह रोग-उपचार में जब अन्य औपचारिक विषो के साथ दिया जाता है तब वह उन सब विषों के प्राकृतिक गुणों को नष्ट कर डालता है और उन्हें और भी अधिक कातिल विप बनाफर रोगी को स्वस्थ करने मे बाधा डालता है।" स्वर्गीय डाक्टर नारमनकर ने हिसाब लगाकरबताया था कि "अल्को. हल के उपचार और आश्रमण से एक वर्ष मे ४०,००० व्यक्ति मरे थे। यो प्रति वर्ष १७०० मृत्यु की खानापूरी तो सरकारी रजिस्टरो में भी दर्ज होती है।"पुराने कुछ पत्रों की सूचनाएं देखिये :- Daily Chronicle-(२७ जनवरी १८६६) "वाल्टर लेघ पंम्बर- टन, मायु ४५ वर्ष, एक बीमा कम्पनी के इन्सपेक्टर, एक होटल के कमरे में भरे पाये गये। ज्यूरी ने अधिक शराब पीने का परिणाम निर्णय किया।" Daily Chronicle-(२ फरवरी १८६६) "एटवई जी० टामसेट, एक ट्रेन में मरे पाये गये । हाक्टर निकल ने पोस्टमार्टम करके बताया कि अधिक शराय ने इन्हे मार डाला।" Westminister-(२६ मार्च १९०२) "एक ६ वर्षीय लड़का जिसका नाम थोमस टरने था, अपने पिता की रखी हुई शराम पखने के विचार से पीते ही मर गया।" इसी मे दूसरा समाचार यह भी था,संध्यवार्ट में एक मग मजदूरने होड़ में माकर तीन गिल 'नीट मान्डी' पी ली।पीते ही मर गया।" Daily Chronicle-(२५ मई १८६६) "मिस्टर जी० पी० च्याट, इंग्लर के कोरोनर मे घोषणा की है कि १० में से हैं मृत्यु जिनकी मैंने छानबीन की मल्कोहल के कारण थीं।" Western Daily Mail-(२३ षन १८६६) "मिस्टर मार० ० मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ४३ राइस को एक तीन वर्ष के बच्चे मेरी-खान-ईवान्स की मृत्यु को जांच करते समय ज्ञात हुआ कि उसने अपने पिता को शराव रसोई में खेलते हुए पी ली थी।" Daily Chronicle--(४ नवम्बर १८६६) "डाक्टर ए० एम्ब्रोस ने एक ३१ वर्षीय अध्यापिका एलिजाबेथ की लाश की जांच करके ज्यूरी को बताया कि अल्कोहल के विप से यह मृत्यु हुई है।" Daily Chronicle-(११ अक्टूबर १९०४) "न्यूयार्क शहर में पिछले ११ दिनों के अन्दर २५ आकस्मिक मौत हुई हैं। जांच करने पर पता चला कि एक दूकानदार ने दूकान उठाने के लिए विस्की को सस्ती बेच दिया। लोगों ने खरीद कर पी। पुलिस ने पता चलाया कि वह विस्की लकड़ी की सेलों में बनाई गई थी जिससे इसमे तकड़ी की अल्कोहल फा संशया गया था। यह विस्की चोरी से बनी थी। काफी दौड़-धूप के बाद बनाने वाले पकड़े गये हैं।" सन् १९२१ की बम्बई के एक शराबी रईस की घटना है : "एक प्रख्यात करोड़पति का इकलौता पुन करोड़ो की सम्पदा और 'एफ १८ वर्षीय सगर्भा स्त्री को छोड़कर मरा । मृत्यु के समय उसकी आयु २४ वर्ष की थी। उसका शरीर काला, रूखा और अत्यन्त घृणित हो गया पा। मुख से साफ शब्द नहीं निकालता था, गद्गद् वाणी से हकलाकर बोलता और उसका प्रतिक्षण प्रत्येक अंग कांपता था।" सन् १९२३ की एक शराबी राजा की घटना इस प्रकार है : "....... के अत्यन्त सुन्दर राजा २६ वर्ष की मायु में मर गये। उनका शरीर पीला हल्दी के समान हो गया था, नेन भी पीले थे, जिगर और गुर्दे फूलकर सूख गये थे, एक-एक बूंद पेशाव कष्ट से उतरता था, भारीर सूखकर हड्डी का ढांचा रह गया या, दस्त दो-चार दिन तक म उतरता पा । फेफड़ा गलकर सह गया था। पांच-पांच मिनट में जुवान ऐंठती थी और वे शराब के सिवा कुछ न पीते थे, वे बचने के लिए मातुर थे, पर चीख-चीख कर प्राण निकल गये।"
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन अल्कोहल का प्रयोग अभी तक हमने यही देखा है कि अल्कोहल बनाने में अनेक खाद्य- पदार्थों को नष्ट किया जाता है और यह भयानक विष है। अब प्रश्न.यह उठता है कि अल्कोहल किसी प्रयोग में आ भी सकती है मा नहीं? इस• लिए हमें इसके गुणों का भी परीक्षण करना चाहिए। अल्कोहल भी काम मे आती है । यह विष तो अवश्य है परन्तु भोजन बना लेने पर । वैज्ञानिक प्रयोगों में यह बहुत अच्छी वस्तु हैं । अल्कोहल के विरुद्ध जितने भी आन्दोलन चले हैं सभी ने इस नशीली चीज को पीने और भोजन बना लेने का विरोध किया है, पर बाहरी उपचारो का नहीं। विज्ञान हमें बताता है कि अल्कोहल जीवित शरीर के बाहरी प्रयोग में मा सकता है, अन्दर नहीं। . अल्कोहल और पानी में भेव : अल्कोहल पानी ०१७२° डिग्री फारेनहाइट पर २१२° डिग्री फारेनहाइट पर उबलती है। उबलता है। जमती नहीं। जम जाता है। • आसानी से आच पकड़ लेती है। नहीं जल सकता। • आंच को भडकाती है। माच को बुमाता है। •ईपर की गन्ध माती है। गन्धरहित होता है। जलने योग्य है। जलने योग्य नहीं है। • चमड़ी को जलाकर झुलसा देता चमड़ी को शीतल और ताजा बनाता है। • जीवन के लिए अनावश्यक है। जीवन के लिए आवश्यक है। बीजों को मार देता है। बीजों को उपजाता है। भोजन को घोलती नहीं। भोजन को मुलायम बनाता है। . .
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ४५ . विष है स्वयं भोजन है। • नशीली है। नशा नहीं है। • शरीर को हानि पहुंचाती है। शरीर को लाभ पहुंचाता है। • मल को रोकती है। मल को निकालता है। • किसी भी भोजन में पैदा नहीं होती। भोजन मे मिला रहता है। ०प्यास पैदा करती है। प्यास बुझाता है। अल्कोहल में राल, चमड़ी, गोंद,कपूर आदि चीजें, घुल सकती हैं इस- लिए इससे वार्निश, पालिश और सैन्ट तैयार होते हैं । बाजारों में जो उड़ने वाले बठिया संन्ट बिकते हैं उनमें अल्कोहल ही उड़ती है। अल्कोहल में बहुत-सी चीजों को डुबोकर रख सकते हैं। स्कूलों, कॉलिजों, अस्पतालों और म्युजिमों में जो मरे हुए जानवर तथा अंग रखे रहते हैं, ये अल्कोहल के कारण बिगड़ने नहीं पाते। अल्कोहल का दूसरा सुन्दर उपयोग ईयर बनाना है । ५ भाग तेज अल्कोहल और ९ भाग तेज गन्धक के तेजाब को गरम करो तो भाप को नली द्वारा किसी बर्तन में संग्रह करते जाओ, यही ईथर है । ईथर बनाना बहुत ही नाजुक है, सावधानी से बनानी चाहिए। क्लोरोफार्म जो शस्त्र-चिकित्सा मे मनुष्य समाज के लिए सबसे अधिक उपयोगी वस्तु है, अल्कोहल से बनता है। अल्कोहल मे बलीमिंग पाउडर मिलाकर चुआ लो। फिर इसे शुद्ध कर लो, और दुबारा चुआओ। ऐसा कई बार करो। यही क्लोरोफार्म है। और इसी प्रकार कीअन्य औषधियां जो डाक्टरी काम में अधिक उप- योगी साबित हुई हैं सब अल्कोहल से बनती हैं । तीसरी खास चीज अल्कोहल से Methylated Spirit बनती है जो नित्य बहुत काम मे आती है। मथेलेटेड स्प्रिट में ६० प्रतिशत अल्कोहल और १० प्रतिशत Wood Spirit होती है । इस Wood Spirit में Paraffin या मिट्टी के तेल का अंश होता है, इसलिए स्प्रिट पीने के काम मै नही आती है । अल्कोहल से टिंचर भी बनते हैं । अल्कोहल मोटर और ४६ मद्य-निषेध :नशे का व्यसन मोटर-साइकिलों मे पेट्रोल के बदले में भी काम आ सकती है। संसार में तरल पदार्थों में सबसे प्रधान पानी है, पानी के बाद दूध, दूध के बाद गन्धक का तेजाव, तेजाब के बाद अल्कोहल है। अल्कोहल अनेक रूप में अनेक प्रकार से बनती और व्यवहार मे आती है। पाठकों में से बहुत कम अल्कोहल के इस विस्तृत क्षेत्र को जानते होंगे। यहां हम अल्कोहल के तीन फारमूले बताते हैं : (i) Methyl Alchohal or Wood spirit-CH3 HO (ii) Ethyl Alehohal-C2HS HC (iii) Amyl Alchohal or Potato Alchohal-CsH11 HO' तीनों प्रकार की अल्कोहतों को टीन की प्लेटों में रख कर नीचे आंच जलाओ तो तीनों जलने लगेंगी। पहली का धुमा रंगरहित होगा, दूसरी मे थोड़ी चमक होगी, तीसरी मे अधिक चमक और धुआं होगा। यह सब कार्बन की कम-ज्यादा माता के कारण है । इनमें से पहली और तीसरी पीने में व्यवहृत नहीं होती, दूसरी होती है। अब भोजन और अल्कोहल की तुलना देखिये : भोजन अल्कोहल १. एकसो माता सदैव एकसा ही १. एकसा प्रभाम करने के लिये प्रभाव करती है। प्रतिदिनमानाबढानी पड़ती है। २. स्वाभाविक आहार मावा से २. इसकी आहारइच्छा कभी तृप्त अधिक लेने की इच्छा नहीं नहीं होती, बढ़ती ही जाती होती। ३. अचानक भोजन न मिलने ३. इसका अभ्यास हो जाने पर स्नायुमंडल डूबता पर फिर एक बार न मिलने पर नही। स्नायुमंडल डूब जायेगा। ४. खाना देर तक खुला रखा जा ४. अल्कोहल खुली नहीं रह सकता है। सकती। ५. खाना शरीर मे जमा होता ५. अल्कोहल शरीर मे जमा नहीं होती।
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ४७ सकते। ६. भोजन में पोषक तत्व हैं। ६. अल्कोहल में नहीं। ७. भोजन स्वस्थ शरीर का आहार ७. अल्कोहल रोगी अवस्था में है। काम में लाते हैं। ५. चिकित्सक स्वस्थ अवस्था में ८. चिकित्सक स्वस्थ अवस्था में भोजन त्यागने की सम्मति अल्कोहल कभी न पीने देगा। नहीं देगा। ६. खाली पेट में भोजन कर सकते ६. खाली पेट अल्कोहल नहीं ले हैं। १०. युवावस्था में खूब खाओ। १०. युवावस्था में अल्कोहल छूना भी नहीं चाहिये। ११. भोजन खाने के पश्चात ११. पीने के बाद सरूर होता है। कभी सरूर नहीं होता। २२. भोजन की मात्रा, मांस १२. अल्कोहल की मात्रा मांस- पेशियों की बढ़ती के अनु- पेशियों के क्षीण होने पर सार बढ़ती है। बढ़ती है। पानी भोजन है भोजन का अधिक अंश पानी है। इससे शरीर के बहुत से अवयव बढ़ते और बनते हैं। शरीर में निम्न परिमाण से पानी होता है : Bones 24% Skin 72% Fatty Tissues 30 Brain 75 55 Muscles 76 69 Lungs 79 Marrow 70 Kidneys 83 Blood 79 Intestipal Juice 97 Bile 86 Tears 98 Pancreatic Juice 88 Gastric Juice 99 Chyle 93 Salıva 99.5 Lymph 96 Sweat 99.5 Cartilage Liver ४८ मद्य-निषेध: नशे का व्यसन एक स्वस्थ युवा आदमी चौबीस घंटों में चमड़ी, फेफड़े और गुर्दो के द्वारा ८० से १०० औंस तक पानी खोता रहता है । इस कमी की पूर्ति के लिये प्रतिदिन ३ से ५ पिन्ट तक पानी की आवश्यकता है । अल्कोहल इस कमी का सूक्ष्माश भी दूर नही कर सकती। प्रकृति ने पानी के सिया अन्य कोई पदार्य इस कमी को पूरा करने के लिये नहीं बनाया। यदि हम प्यास बुझाने के लिये दूध, कोको, काफी, चाय, लेमनेड आदि पीते हैं तो इन पेय पदार्थों में जो पानी मिला है, वही प्यास को बुझाने में सफल होता है अन्य अवयव नहीं। यह कहा जा सकता है कि जितना पानी निकल जाता है उतना पानी तो हम कभी पीते भी नहीं। परन्तु यह बात नहीं है, हम जितना असली पानी पीते हैं उतना तो पोते ही हैं, परन्तु अप्रत्यक्ष रूप मे भी भोजन आदि के द्वारा भी कुछ पानी पेट में पहुंचता है । नीचे हम भोजन में पानी का अंश बताते हैं : Oat meal Butter Barley meal Haricar Beans Lentiles Maize Peas Wheaten flour Rice Figs Bacon Chcese Bread Walnuts Fresh Eggs Fowl Lean mcat Water cress Pears Vegetable Marrow Lattuce 5% केमा 10 मछली 14 बालू 14 भर 14. Persnips 14 Beat root 14 सेब 14 Peaches 15 Gooseberries 17 Milk 22 Oranges 34 Cabbages 40 Carrots 44 Tomatoes 72 Mushrooms 73 Onions 73 Celery 93 Sea kale 94 Rhubarb 94 Cucumber 96 74% 74 75 80 81 82 83 85 86 86 86 89 89 89 90 91 93 93 95 96 मद्य निषेध : नशे का व्यसन : ४८ यह न समझ लेना चाहिये कि ऊपर यणित पानी का अंश इन पदामो मे पानी के रूप में ही है । यह भिन्न-भिन्न अंगों और अवयंघों के.सूत्रों में आवद्ध है। अब यह भली-भांति प्रकट हो जाता है कि पानी जीवन कैसीय कितना अधिक सम्बन्धित है । पानी अगों का निर्माण करता, उन्हें पुष्ट करता और स्वच्छ करके, उनके मल को निकाल कर वाहर फेंक देता है। शरीर के प्रत्येक भाग से-नसों में से, रक्त नालियों में से, अन्तड़ियों में से, मेदे में से, पेट में से, मस्तिष्क में से मल छटता रहता है । सभी अंग नित्य स्वच्छ होते रहते और मल को त्यागते रहते हैं। यदि वह मल न निकले तो हम बीमार पड़ जायं । एक मात्र पानी ही इस मल को बहाकर शरीर से बाहर करता है । अधिक मलावरोध से मृत्यु तक हो सकती है। हमारे शरीर मे से प्रतिदिन यदि ३ पिन्ट पानी निकलता हो तो इसमें 11 औंस मल जरूर मिला होगा। अल्कोहल इस क्रिया को नहीं कर सकती। बल्कि वह शरीर के प्रत्येक अवयव को अवरोध कर देगी। शराबियो के गुर्दे प्रायः रोगी और बढ़े हुए होते हैं। ये गुर्दै झुरींदार और खुरदरे होते हैं। इनका रंग पीला जर्द होता है। स्वस्थ गुर्दे का रंग गहरा लाल होगा। यह सम्भव नही कि प्रत्येक शराबी का पहले गुर्दा ही बिगड़े, क्योंकि शराब पहले किसी और अवयव को भी पकड़ लेती है और फिर धीरे-धीरे वहां तक पहुंचती है। हमारे शरीर से चौबीस घंटों मे हमारे फेफड़ों से १२ औंस पानी सांस की भांप द्वारा निकलता है। इस पानी में फेफड़ो का मल कार्बन द्विओपित के रूप में मिला रहता है। शरीर का दूषित पानी पसीना बनकर भी निकलता रहता है । समस्त शरीर में दो लाख श्वेत-प्रन्थियां हैं। परिपूर्ण शरीर में पसीना बहने की नाली चौथाई इंच लम्बी होती है। शरीर की सब नालियों को मिलाकर लम्बा रख दिया जाय तो इनकी लम्बाई १० से २० मील लम्बी तक हो सकती है । चमड़ी में से भाप बनकर प्रतिदिन दो पौंड पानी उड़ता है। यदि चमड़ी इतनी क्रिया नहीं कर पाती तो इस क्रिया ५० मद्य निषेध : नशे का व्यसन का भार फेफड़ों और गुर्दो पर आ पड़ता है। जिस प्रकार फेफड़ो और रक्त के लिये ताजा ह्वा को आवश्यकता है, उसी प्रकार चमड़ी को ठीक क्रिया मे रखने के लिये शरीर के भीतर और बाहर स्वच्छ और अधिक पानी की आवश्यकता है । इस तमाम पानी का सिंचन, जो गुदो, फेफड़ो और चमड़ी के द्वारा वाहर निकलता है, रक्त में से होता है, क्योकि रक्त- वाहिनी नालियो में रक्त इन तीनो अवयनों के पास से होकर गुजरता है। इम प्रकार रक्त निरन्तर व्यय होता रहता है, इस व्यय की पूर्ति शरीर में पानी को अधिक मात्रा में पहुचाने से हो सकती है। इसीलिये पानी को आहार मे गिना गया है। शरीर में निम्न भागो में रक्त की कमी इस प्रकार देखी जा सकती है : १. फेफड़े अधिक पानी अधिक कारबडिओक्साइड २. चमड़ी अधिक पानी थोड़ी कारबनविओक्साइड थोड़ा मल ३. गुर्दे अधिक पानी अधिक मल थोड़ी यूरिक एसिड प्यास हमे प्यास उस समय लगती है जब शरीर में से प्रतिदिन भाग मल बाहर निकल चुकता है । अधिक शारीरिक परिश्रम करने वाले मजदूरो को प्यास अधिक लगती है क्योकि शरीर मे से पानी जल्दी-जल्दी खर्च होता है। अधिक नमक पाने से भी प्यास अधिक लगती है। प्रत्येक अवस्था मे प्यास लगने पर सदैव विलकुल शुद्ध और निर्मल जल पीना चाहिये। जितना श्रेष्ठ जल होगा उतना ही श्रेष्ठ रक्त बनेगा, जितना श्रेष्ठ रक्त होगा उतना ही श्रेष्ठ शरीर और मस्तिष्क का विकास होगा।
मद्य-निषध नशे का व्यसन यदि हम शरीर के किसी स्थान पर चमड़ी के ऊपर अल्कोहल मे हूबा हुआ ब्लाटिंग पेपर रख दें और उसे दवा,तो थोड़ी देर में ही उस स्थान पर झुर्रियां पड़ जायेंगी और वह लाल हो जायगा । अर्थात अल्कोहल चमड़ी के छेदों में प्रवेश करके रक्तवाहिनी नालियों में पहुंच गई। इसी- लिये रोगी जिसे शराब का अभ्यास नहीं है, अल्कोहलके उपचार से सुधरने को अपेक्षा बिगड़ जाता है क्योंकि अल्कोहल शरीर के परमाणुओं को समेट कर गतिहीन बना देती है। अल्कोहल ने ज्यों ही रक्त में प्रवेश किया कि उसने तुरन्त स्वाभाविक क्रियाओं को बिगाड़ना आरम्भ किया। वह पहले नसों के जोड़ों को निर्जीव करती है, जिससे मांस-पेशियों पर नसों का अधिकार कम हो जाता है। परिणाम यह होता है कि रक्त की गति धीमी 'पड़ जाती है और रक्त ज्यों-ज्यों चमड़ी के समीप आता है, त्यों-त्यों शराब पीने वाले के चेहरे पर उत्तेजना और लाली झलकती है । यही क्रिया मन को चेतनाहीन और मान कर देती है। दिल पर अल्कोहल का क्या प्रभाव पड़ता है ? डाक्टर पारस और डाक्टर वूलोविज ने सबसे पहले इसका परीक्षण किया था। उन्होंने पानी और अल्कोहल की अलग-अलग खुराक पर एक स्वस्थ और हृष्ट-पुष्ट आदमी को रखा। अल्कोहल के दिनों में दिल को चाल बहुत बढ़ गई थी।यो, स्वस्थ अवस्था में २४ घंटों में दिल की धड़कन १००,००० होनी चाहिये। दिल को दो कोठरियां होती हैं, जिनमें ६ औंस रक्त का प्रवाह रहता है । यह रक्त इतनी तेजी से माता-जाता है कि यदि खुली हवा में यह छूटे तो ५ या ६ फिट की दूरी पर जाकर पड़े। दिल को यह परिश्रम ? फुटकंचा ११६ टन बोउठाने के समान पहता है। एक ओंस अल्कोहल से ४२०० अधिक धड़कन होती हैं, दो औंस से ८,६०० और तीन औंस से १२,९००। इस अधिक धड़कन का यह अर्थ हुआ कि दिल को अधिक परिश्रम रना पड़ा। और यह परियम निरपंक होता है। इससे शक्ति का म्पप बढ़ता है। गटर लोग जानते हैं कि दिस की चाल बढ़ जाने से रक्त के ५२ मद्य-निषेध :नशे का ध्यसन प्रवाह में कमी आ जाती है। शरीर के प्रत्येक अवयव के लिये एक कोष होता है जिसमें रिजर्व शक्ति जमा रहती है । यह शक्ति तब काम आती है जब मूल शक्ति में कमी होती है। इसी प्रकार दिन के कोप में भी रिजर्व शक्ति होती है। अल्कोहल के प्रयोग से यह शक्ति वर्ष होने लगती है। निरन्तर शराब पीने वाले व्यक्तियों का यह कोष खाली हो जाता है, कोप का एक पूरा नाम कमा हाताह इसा प्रकार PIN .. रक्त की सेलो में और भी अति सूक्ष्म सेसे होती हैं जो ओक्सीजन को खींचती हैं । अल्कोहल इन सेलों को सिकोड़ देती है जिससे वे ओक्सीजन खींचने मे कम समय होने लगती हैं। यदि अधिक अल्कोहल प्रयोग किया जाय तो वे बिल्कुल ही ओक्सीजन ग्रहण न कर सकेंगी। जितनी कम ओक्सीजन मिलेगी, उतना ही शरीर निर्वस होता जायगा, रक्त में रही पदार्थ एकत्र होते जायेंगे। इससे रोग उत्पन्न होगे। डाक्टर फेंक चेसायर ने मेंढकों पर यह प्रयोग करके देखा, उन्होंने अनेक मेंढकों को टांग, दिल और सिर के बल अल्कोहल में रखा और खुर्दबीन से उनकी क्रियाओ का परीक्षण किया। सब का यही परिणाम निकला। पचन पर अल्कोहल का प्रभाव पुरानी कहावत है कि रक्त ही जीवन है। माद रक्त शुद्ध और पुष्ट है तो शरीर भी पुष्ट और स्वस्थ है। रक्त का आधार भोजन है। प्रत्येक भोजन का रक्त बनता है। रक्त से मांस, मज्जा, अस्मि इत्यादि शरीर के अवयव पोषित होते हैं। भोजन रक्त बनने से प्रथम एक क्रिया करता है जिसे पचन कहते हैं । मुंह, दांत, कष्ठ, पेट, लीवर और अन्य छोटे अवयव इस क्रिया के कर्ता हैं। कुछ लोगो का विश्वास है कि अल्कोहली पेय पदार्थ पचन-क्रिया को :
२. पेट का रस, मद्य-निषेध : नशे का व्यसन शक्ति देते हैं। यह उनका भ्रम है। शराबी भोजन के बाद शराब पीकर कुछ गर्माई प्रतीत करता है और भोजन का भार पेट पर रखा मालूम नहीं होता, इसी आभास से वह शराब को पाचक समझता है। शराय पाचन- क्रिया को और भी दवा देती है। पचन का अर्थ यह है कि भोजन तरल पदार्थ में बदलकर रक्त रम जाय । रासायनिक विधि, गर्मी और क्रिया इन तीन बातों से रमत बनता है । इस विधि के लिए चार प्रकार के रस चाहियें: १. मुंह की लार, जो स्टार्च की शक्कर बनाती है। जो भोजन में क्षार उत्पन्न करके उसे पचने योग्य करता है। ३. लीवर का रस, जो मल और अपच पदार्थ को निकालकर बाहर करता है। ४. मेदे का रस (Pencreas), जो इन तीनों के बचे हुए कार्य को पूर्ति करता है। इन सब रसों की क्रिया का यह काम है कि ये भोजन को रक्त बना दें । हम जितना भोजन करते हैं, हमें अपनी खुराक की उतनी ही मात्रा नहीं मान लेनी चाहिए। हम भली प्रकार जितना भोजन पचा सकें, वही मात्रा होती है। अधिक भोजन से हानि होती है क्योंकि आंतों को इससे 'निबटने के लिए अधिक शक्ति और श्रम करना पड़ता है। बाजार में बहुत- से बने हुए खाद्य-पदार्थ बिकते हैं, जिनमें उपरोक्त रसों की भांति काम करनेवाले परमाणु रहते हैं। जो शरीर में उन रसों के न रहने पर भी वैसा हो प्रभाव करते हैं। इन पदार्थों का सेवन करनेवाले की अंतड़ियां अपने स्वाभाविक कार्य को भूल जाती हैं और वे भविष्य में अपना प्राकृतिक कार्य करने के योग्य नहीं रहतीं। शरीर के इन चारों पाचक रसों में कितना यानो अंश रहता है, यह इस गणना से ज्ञात होगा:
५४ मद्य-निषेध : नशे का म्यसन महको मार पनि क्षार 994.1 2:3 36 अन्य पदार्थ 10000 पेट का रस पानी Papsin Salt Hydrochloric acid Potassium chloride Calcium chloride Phosphates of Calcium, Magnesium and iron 994.4 32 1.5 02 05 0.1 0.1 1000 मीवर का रस Water 8592 Bilin 91.5 Fat 92 Cholesterin 23 Mucus & colouring matter 298 Salts 77 10000 Water Pancreatin, Amylopsin Trypsin'inorganic salts 9805 127 6.8 मंदेका रस 10000 मद्य-निषेध : नशे का व्यसन पेट में भोजन पहुंचने पर मांसपेशियों का कार्य शुरू हो जाता है। कोई भोजन देर में रस बनता है, कोई जल्दी । औसतन ३-४ घंटे का समय लगता है। यहां हम इसको एक तालिका देते हैं कि कौन भोजन कितने समय में पचकर रस बनने लगता है : घण्टे १ १ ३ १ रोटी उबले आलू मोजन घण्टे भोजन उवले चावल गौमाम का कवाब Boiled Trie उबला भेड़ का मास कच्चे सेव उबली गाजर उबली मलमन मछली १॥ भेड़ का कबाब उबला साबूदाना उबलीकॉह मछली उवली सेम उबली सलजम खजला आल का शाक २॥ | उबले अंडे (सहत) हंस का कबाब उवला Gelatine उबली मुर्गी का कबाब उबला भेड़ के बच्चे का मांस २॥ उबला करमकल्ला उबला गो माम कढी उबली कुरी २॥ २॥ | पनीर ३॥ २॥ | भुने हुए अंडे ४॥ २॥ सूअर का कबाब ३ ५॥ शराब पीने से भी पेट का रम बनता है, लेकिन यह रस सुपाच्य नहीं होता। अमल में इस रस मे Pepsin बहुत ही कम बनती है क्योकि रम को Pepsin सेलों को धोने में खर्च हो जाती है, और नई Pepsin बनने में अल्कोहल बाधा देती है । इसलिए शराब पीकर जो पेट का रस एकदम बढ़ता है, वह पचने की क्रिया नहीं है। शराब धीरे-धीरे पेट की रस-प्रथियो को क्रियारहित कर देती है। जेनेवा यूनीवसिटी के विख्यात प्रोफेसर डाक्टर एल. रेविलियोड और डाक्टर पालबिनेट ने इस बात को बहुत खोज की है । वे कहते हैं कि ५६ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन । शराब पीने वालों का पेट अन्दर की ओर सिकुड़कर मौजे की शक्ल का हो जाता है । उसमें चर्बी बढ़ जाती है। इसी प्रकार के प्रमोग डाक्टर बीयू- मोन्ट ने किये थे और एक पुस्तक छपाई थी, जिस पर एक नोट डाक्टर एन्ड्र कूम्बे ने लिखा था जो सम्राज्ञी विक्टोरिया के चिकित्सक थे और चलजियन्स के राजा-रानी के परामर्शदाता थे । डानटर बीयूमोन्ट एक ही साइन लिखते हैं कि "शराब पीने वालों को पेट की एकन्न-एक शिकायत धनी रहेगी।" डाक्टर मुनरो ने एक प्रयोग करके यह स्पष्ट कर दिया है कि पानी भोजन को गलाता है और अल्कोहल इसके विपरीत करती है । यह प्रयोग इस प्रकार या गौ मांस को बारीक कूटकर किमाम करके तीन बोतलों मे डाला,इनमें थोड़ा-थोड़ा 'पेट का रस' भी एक बछड़े के पेट में से निकालकर मिलाया गया । अब पहली योतल में पानी, दूसरी में अल्कोहल और तीसरी में पीली धाराब (Paleale) डालकर हिलाकर रख दिया गया। सब का टेम्प्रेचर १०० डिग्री रखा गया। तीनो में पेट की भांति निम्नलिखित क्रिया हुई : मांस मे किसमे । चौथे घटे बाद आठये घटे बाद दसवें घटे बाद মিষ प्रभाव पहसी बोतल पचन क्रिया बारीक रेशे मन | घुलकर रस बन पेट का रस गये और पानी प्रभाव प्रभाव आरम्भ गया दूसरी बोतल रंग धुंधला हो मांस में अब भी मांस ऐंठ कर पेट का रस गया, मांस में त्रिया नहीं हुई । सिकुड़ गया, और अल्कोहल | क्रिया नहीं हुई पेपसिन तल में बैठ गई। तीसरी बोतल [ मांस पर रूएं जरा-सा मांस पेपसिन तल जमकर वादल-से मे बैठ गई पचन और बन गये क्रिया नहीं हुई पेट का रस कम हुआ पीली शराब मद्य-निषेध : नये का ध्यसन ५७ यह क्रिया बिल्कुल मनुष्य शरीर-क्रिया जैसी थी मयोंकि डाक्टर मुनरो ने शरीर-यन्त्र जैसे ही यन्त्र लगाये थे। इससे यह स्पष्ट है कि पीली शराब में अल्कोहल का अंश थोड़ा भी होते हुए पपन-क्रिया नहीं हुई। 'पेट के रस' में पेपसिन एक अंश है, इसे भी अल्कोहल ने निकालकर अलग कर दिया। सर विलियम राबर्ट स ने पेट पर अल्कोहल के अनेक प्रयोग करके देखे थे, उनका कहना है कि ५ प्रतिशत शेरी' और १० प्रतिशत 'बरटन एल' शराब निश्चय ही पचन-क्रिया को रोकने में समर्थ होती है। येल यूनीवसिटी के डाक्टर चिटेन्डन और मेन्डेल कहते हैं कि २ प्रतिशत अल्को- हल पचन-क्रिया को सदैव नष्ट कर देगी। हाक्टर ई० लेबोरडे अमेरिका के एक मासिक पत्र 'जर्नल याफ फारमेसी' में अपने प्रयोग का परीक्षण इस प्रकार लिखते हैं, कि मैंने एक बोतल में मांस को चार घंटे तक ४० डिग्री के टेम्प्रेचर पर २ प्रतिशत अल्कोहल डालकर रखा । पानी ने जब- जब पचन क्रिया आरम्भ की, अल्कोहल ने उसे तुरन्त रोक दिया। रायल मेडीकल सोसायटी एडिनबर्ग के भूतपूर्व प्रेसीडेन्ड डाक्टर जेम्सम्यूरहोवे इस प्रकार कहते हैं, 'कुछ व्यक्ति भोजन के बाद शराब पीते हैं मोर समझते हैं कि यह पाचन करेगी, परन्तु यह सब घोषा है क्योकि जिस प्रभाव को वे पाचन-क्रिया अनुभव करते हैं वह पेट की नसों पर अल्कोहल की गर्मी और नशे की सुरसुराहट है। अल्कोहल निश्चय ही बदहज्मी पैदा करती है। मदिरा जब पहले-पहल पी जाती है तो आमाशय उसे बाहर फेंक देता है और उल्टी हो जाती है। अल्कोहल पेट में पहुंचने याद तुरन्त ही रखत मे मिलनी शुरू हो जाती है, और चूकि रक्त बहुत तेजी से नसों का दौरा करता है, इसलिए अल्कोहल भी तेजी से नसों पर प्रभाव डालने लगती है। लीवर (जिगर) पर इसका प्रभाव बहुत ही बुरा होता है क्योंकि लीवर की सेलें अत्यन्त कोमल होती हैं, वे इसकी गन्ध-मात्र से ही मुझने लगती हैं। सेलों के निकम्मे होने से लीवर अपना काम करने में असमर्थ होने लगता है। तेज ५८ मद्य निषेध : नशे का व्यसन या अधिक शराब पीने वालों का लीवर सिकुड़कर ऐंठ जाता है। शरीर में लीवर सबसे बड़ा अवयव है । स्वस्थ लीवर का वजन ५० से ६० औंस तक होता है । वह चिकना और लाल होता है। शराबियों का लीवर खुरदरा, काला और मुड़ा हुआ होता है। शराबियों को मदेव लीवर की बीमारी हो जाती है । वे व्यक्ति जिन्हें शराब बनानी या वेचनी पड़ती है और जिन्हें शराब पीने के सरल साधन प्राप्त हैं, वे शीघ्र मर जाते हैं। डाक्टर सर बेनजामिन वार्ड रिचार्डसन रक्त मे अल्कोहल के प्रभाव का इस प्रकार वर्णन करते हैं: "अल्कोहल का प्रभाव रक्त पर भयानक और नाजुक है, क्योंकि जय सूक्ष्म सेलें मर जाती हैं तो स्वाभाविक त्रिया बन्द हो जाती है और स्वा- भाविक शरीर का पोषण रुक जाता है। शरीर में रक्त को ये सेलें लाखो होती हैं। यदि इन सेलों को ऊपर-नीचे रखकर एक पाई के बराबर गोलाई मे चुना जाय तो एक इंच ऊंचाई मे १२००० सेलें रखी जा सकती हैं। यदि इन सेलों को बिछा दिया जाय तो कई स्क्वायर गज जगह घिरेगी। ये सेलें रक्त के लिए ओक्सीजन ग्रहण करती रहती है। इसलिए इनमें से एक भी शरीर को तन्दरुस्ती के लिए बहुत कीमती है। कुछ लोगों का ख्याल है कि 'पोर्ट वाइन' का माणिक-जैसा लाल रंग होता है, इसलिए यह अवश्य रक्त को बढ़ाती होगी। परीक्षण करके देखा गया कि यहख्याल भी मिथ्या है। एक छोटा चम्मच Animal Charcoal मे आधा वाइन गिनास 'पोर्ट वाइन' मिलाओ और उसे फिल्टर होने के लिए रख दो। वाइन फिल्टर होकर पानी की भाति निकल जायेगी। वाइन का लाल रंग चारकोल मे मिल गया परन्तु किसी भी पदार्थ के गुणो में तब्दीली नहीं हुई। तब फिर वह २-४ बूद रंग भला क्या रक्त लाल करेगा?
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ७ " ७ " " ८ " " ८ " " " " " " " " किस शराब में कितना मादक द्रव्य होता है : बीयर ५ प्रतिशत बरमथ १५ प्रतिशत एल ऋयूडीम्यूथी पार्लर काकटेल्स हार्ड संड ६ बिटर्स कूट वाइन कीमनल ४२ रम ४५ मस्केरल ब्रान्डी शैपन १० जिन सैनटर्न १२ व्हिस्की ५० शेरी १४ वोडाका पोर्ट १४ एसिथ ६० शरीर की गर्मी पर अल्कोहल का प्रभाव हमारे भोजन का परिणाम मांस, रक्त और मज्जा का बनना और शरीर की गर्मी को सही टेम्प्रेचर में रखना भी है । प्रत्येक व्यक्ति जानता है कि हमारा शरीर गरम है। संसार के प्रत्येक भाग, घ वों और भूमध्य रेखा के निवासियों की शरीर गरमी का एकसा ही परिमाण है । हमारे शरीर में गरमी होने का प्रयोग Water Hammer यन्त्र से करके देखा जा सकता है । इस मन्त्र में पानी की थोडी-सी बूदे होती हैं, हाथ मे मुट्ठी बांधकर पकड़ने से पानी की बूदें भाप बनकर ऊपर को उड़ती प्रतीत होती हैं। साथ ही मुंह में जीभ के नीचे थरमामीटर लगाकर देखिये तो रेम्प्रेचर में कोई घटी-बढी नही होगी। इससे यह ज्ञात होता है कि हमारे शरीर में गर्मी बनती और निकलती रहती है। स्टार्च वाले भोजन जैसे चावल,आलू, साबूदाना, अरारोट, रोटी और गकरसार जैसे, गन्ने से चीनी, अंगूरों से ग्लूकोज, दूध मे लेकटोज, मधु (शहर) से लिवूलोज आदि लेने से शरीर की गरमी ठीक बनी रहती है।
६० मद्य निषेध : नशे का व्यसन अल्कोहल शरीर की प्राकृतिक गरमी को बाहर फेंकने की क्रिया करती है। एक औंस स्टार्च में एक औंस शराब से अधिक गरमी है, और शराब पचास गुणा अधिक महंगी पड़ती है। नीचे लिखी वस्तुओं में शक्कर इस प्रकार होती हैं : गन्ने की चीनी में प्रतिशत गुड़ में ७६.० अजीर में ६२.५ घेरी में १८.१ " खुर्मानी में " आडू में नाशपाती में ६.४ यह गरमी भोजन के कारवन में से आती है। कारवन जलता रहता है, यही गरमी है । निम्न फारमूसे से आप देखेंगे कि शक्कर से अधिक कार्यन अल्कोहस में है: ETHYL ALCOHAL C2 HS HO Sugar Ci2 H22 O11 कार्वन ५२.१७४ कार्वन ४२.१०६ हाइड्रोजन ओरसीजन ३४.७८३ ओक्सीजन ५१.४.२ दम हिमार से अस्कोहल गराम की गरमो के लिए यहुत ही लाभकारी होनी चाहिए, परन्तु ऐसा नहीं है। शराब पीने वाला गरमी को प्रतीत अपार करता है, परन्तु यह गरमी धोका है। सबटर विज ने इसके अनेक प्रयोग किये हैं। ये कहते हैं कि मत्कोहम पीने से माराम-सा सगता है, यह पेट और परीकी रसन्मातियों को फंसाती है। इस पर्पज में गरमी पारों भोरपियरती है, बियरकर वह भागती है। इस भागने को गरमी गमा निजामासागर गिने १२६ प्रयोगों मोपरमामीटर द्वारा परिया है। रात पोरी मामा नै नो टेम्प्रेचर कम नहीं किया। बीप मद्य निषेध : नशे का ध्यसन दर्जे की माता ने ०.३ से ०.६ तक कम किया और अधिक माता ने कई डिग्री कम कर दिया। जो साधारण मात्रा में शराब पीते हैं उनका टेम्प्रेचर एक डिग्री कम रहेगा। प्रोफेसर रेमसन कहते हैं कि .05 से २ डिग्री तक टेम्प्रेचर कम रहता है, यद्यपि गरमी-सी लगी रहती है। डाक्टर सर बी० डब्लू० रिचर्डसन अपने प्रयोग को इस प्रकार वर्णन करते हैं: "एक गरम खून के पशु का शराब पिलाकर चेहोशी की हालत में एक कमरे में रखा गया, इस कमरे का टेम्प्रेचर १० डिग्री कम कर दिया गया। उसी के साथ इसी कमरे में एक अन्य पशु कोशराब पिलाये भी रखा गया। दोनों सोये रहे। पहला सोकर उठा ही नहीं, मर गया। दूसरा स्वस्थ रहा।" समुद्र में सर्दय रहने वाले गोतेखोर तथा व्हेल मछली आदि जस- जन्तुओं के शिकारी जिन्हें सदैव पानी और ठंड में रहना पड़ता है, कभी शराब नहीं पीते। एक बार रूस में फयेराइन दी ग्रेट के शासन काल में एक बड़ा भारी जल्सा हुआ, और उसमें प्रत्येक व्यक्ति को शराब पीने की खुली छुट्टी दे दी गई। सबने मनमानी पी। प्रात:काल देखा गया कि हजारो व्यक्ति शरीर की गरमी कम हो जाने की वजह से सुन्न हो गये और मर गये। मस्तिष्क पर मल्कोहल का प्रभाव समस्त शरीर का राजा और नियन्त्रणकर्ता मस्तिष्क है । प्रकृति ने इसे सबसे ऊपर सावधानी से ढककर रखा है । हम कुछ भी देखें, अनुभव करें, विचारें, जानें, ये सब क्रियाएं मस्तिष्क करता है। यह मस्तिष्क इतना समझदार और उत्तरदायित्वपूर्ण भार ग्रहण किये है कि हम जव सो जाते हैं सब भी यह शरीर को ज्ञान देता रहता है । यदि सिर में चोट लग जाती है और हम बेहोश पड़े होते हैं सब भी मस्तिष्क शरीर के अन्य अंगो को गति का संचालन करता रहता है। यदि मस्तिष्क में सांघातिक चोट लग जाप और वह बिल्कुल ही निर्जीव हो जाय तो शरीर की सभी क्रियायें बन्द हो जायेंगी भोर प्राणी मर जायेगा। .
६२ मद्य निषेध : नशे का. इसलिए मस्तिष्क बहुत महत्त्वपूर्ण अंग है। लोग समझते हैं कि अल्को. हल मस्तिष्क को सहायता प्रदान करता है, किन्तु यह गलत है। प्रोफेसर केपलिन और डाक्टर लोडर प्रन्टन अपने प्रयोगों के परिणाम में कहते हैं, "कि अल्कोहल का शारीरिक प्रभाव अद्भुत है क्योकि वह ज्यों-ज्यों प्राणी की गति को हीन बनाता है त्यों-त्यों वह इन्हें सतेज और अधिक कर्मशील अनुभव करता है।" इसके और भी प्रयोग किये गये हैं। साक्टर जे. जे. रिज ने स्पर्श-ज्ञान, तौल-ज्ञान, दष्टि-ज्ञान और निणय-ज्ञान परअलग-अलग परीक्षण किये और सभी को दूपित पाया। ये प्रयोग बहुत विस्तृत हैं और इनकी सम्पूर्ण विधि वणित है। साढ़े तीन माशे अल्कोहल पीने के बाद स्पर्श-ज्ञान में ५ प्रतिशत कमी हुई। तौल-ज्ञान में २८ प्रतिशत कमी हुई। रष्टि-ज्ञान में ६ प्रतिशत कमी हुई। और निर्णय ज्ञान में १४ प्रतिशत गलती हुई। प्रयोग काल मे निम्न इन्द्रियो का इस प्रकार ह्रास हुआ:- १. हायों की मजबूती में कमी। २. दृष्टि की तेजी मे कमी। ३. निर्णय मे यथार्थ ज्ञान की कमी ४. विचारो के दौड़ान मे कमी। ५. नसो की तेजी मे कमी। ६. स्वयं नियन्त्रण-शक्ति मे कमी। अधिक मात्रा देने से उन्हें नशा हो गया। बेहोश होने से पहले शराबी इधर-उधर झूमता, बहकी बातें करता, अन्तरिक्ष में कल्पना देखता और पागलो-जसी चेष्टाएं करता रहता है। पूरे प्रभाव मे मस्तिष्क शून्य और चुप होकर पड़ रहता है। अमेरिका में एक शराव नियन्त्रण बोर्ड है। जिसके रक्षागृह में शराव की व्याधियों से पीड़ित व्यक्ति आश्रय पाते हैं । सन् १९१५-१६ काल में ६० प्रतिशत व्यक्ति मस्तिष्क रोग से पीड़ित । मस्तिष्क एक ऐसा केन्द्र है जहां हृदय, फेफड़े, स्नायु, ज्ञान-तन्तु और रोढ़ की संचालन शक्ति स्थिर है। इसलिए जिस व्यक्ति का मस्तिष्क प मद्य-निषेध- नशे का व्यसन धीरे- ठीक क्रिया में नहीं रहता, उसे हम पागल कहते हैं। शराब कंठ से उतरते ही शान-तन्तुओं द्वारा मस्तिष्क पर प्रभाव करती है, दस मिनट बाद ही वह उसमे हलचल उत्पन्न कर देती है, मस्तिष्क में विचारों को तांता लगा जाता और पीने वाला व्यक्ति अपने को बहुत ही व्यस्त समझता है । धोरे स्नायुमंडल मे विपला प्रभाव उत्पन्न होकर संज्ञा नष्ट होने लगती है। जिसका परिणाम होता है, कि (१) इच्छा-शक्ति प्रभावहीन हो जाती है। (२) वाणी काबू से बाहर हो जाती है। (३) चालीस प्रतिशत व्यक्ति आत्मघात करते हैं । (४) विवेक ओर ज्ञान नहीं रहता, (५) कार्य-शक्ति का ह्रास हो जाता है 1 (6) पाप वासना प्रवल हो जाती है। मांस-पेशियों पर अल्कोहल का प्रभाव शरीर के बल का माप उसकी मांसल पेशियां हैं । मनुष्य का पराक्रम, शौर्य और वीरता सब कुछ मांस-पेशियों पर निर्भर है । पेशिया जितनी रद्ध और पुष्ट होंगी, उतना ही मनुष्य शक्तिवान समझा जायगा । मासपेशियां दो प्रकार की होती हैं: १. जो अपनी इच्छा से कार्य करती हैं। जैसे, बांहों को। २. जो अपनी इच्छा से कार्य नहीं करती। जैसे, दिल और पेट की। दोनों प्रकार की पेशियों का संचालन मस्तिष्क करता है। दोनों का परस्पर गहरासम्बन्ध है, और इनका शक्तिशाली बनना परमावश्यक है। अल्कोहल पेशियों पर भी बुरा प्रभाव डालती है। डाक्टर सर बी० डल्लू० रिचर्डसन ने मेंढ़कों पर प्रयोग करके देखे थे, जिसमे अल्कोहल ने पेशियों को टेढ़ा करके सिकोड़ दिया। डाक्टर जे. जे. नौरिस, डाक्टर प्रो. डेस्ट्री और प्रो० पिलिन सबने प्रयोग करके देखा है कि २० ग्राम अल्को- हल से एक व्यक्ति की पेशियो की शक्ति एक दिन मे २२३३० किलोमीटर से घटकर १५६३५ किलोमीटर. रह गई। पहलवान लोग सराव से बचे ६४ मद्य-निषेध : नशे का यसन अल्कोहल और जीवन इस बात को सभी स्वीकार करेंगे कि अल्कोहल और शराव जीवन का दुखमय अन्त करती हैं। वह मनुष्य को मतवाला, पागल, जीवन रोगी बनाकर मृत्यु के द्वार तक ही नही ले जाती बल्कि अनेक घरों में कंगाली, दरिद्रता और सर्यनाश की पूर्णाहुति भी करती हैं । शराब जीव के लिए तनिक भी आवश्यक नहीं । कुछ लोग इसे आनंद और भोग-विलास के लिए पीते हैं, कुछ संग-सोहबत के प्रभाव में पीने लगते हैं, परन्तु सभी इसके भयानक चरित्र को जानते हैं। संमार में मद्य का जबरदस्त चक्र है। स्काट लोग विस्की पीते हैं, अंगरेज और जरमन बीयर पीते हैं। लेटिन लोग वाइन पीते हैं । पूर्वी अफीका निवासी जिन पीते हैं। चीनी अफीम पीते हैं । आधुनिक अमेरिकन कोकीन पसन्द करते हैं। कुछ खास व्यक्ति घास रसों को सड़ाकर पीते - यह सब इसकी मादकता की महिमा है। इस मादक विष को हमे विद्वानों की इन सम्मतियो में ढुंढना चाहिए: "अल्कोहल जो प्रमात्मक आनन्द, क्रिया और शक्ति प्रदान करने वाला पदार्थ है, कय में दफनाये जाने योग्य है। किसी कवि, चिकित्सक धर्म-पुरोहित और चित्रकार ने इससे प्रबल शैतान को नहीं देखा । -हाक्टर बी० डम्लू रिचर्डसन एम० डी०, एफ० आर० एस० "अल्कोहल डाक्टरी के लिए भी योग्य नहीं है । भोजन भी नहीं है।" -सर विक्टर होसले एफ० भार० एस० "मैं कहता हूं कि देश को नष्ट करने में मल्कोहल प्रबल योदा है।" -सर वमगम बार्ट,एम. "अल्कोहल मस्तिष्क को नष्ट कर देती है।" -ई. मेकडोवेल कासप्रेय, एम० ही०, एफ० आर० सी० पी० "शरीर को बल्कोहल से कभी लाभ नहीं हो सकता।"
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन
---सर एन्ड क्लार्क वाट, एम. डी०
"शराबी और शराब बेचने वाले जब इच्छानुसार पीते हैं तब समाज
और राजनीति दोनों ही के संगठन को नष्ट करते हैं।"
-प्रेसिडेन्ट रूजवेल्ट
"शराब शरीर की पची हुई शक्तियों को भी उत्तेजित करके काम मे
लगा देती है, फिर उसके खर्च हो जाने पर शरीर काम के लायक नहीं
रहता।"
-सर फ्रेडरिक स्ट्रीक्स पार्ट, (सम्राट् जार्ज के गृह-चिकित्सक)
"जिनके अधिकार में बिजली और भाप की मशीनें रहे, उन्हें शराब
के चंगुल में जरा-सा भी फंसने का मौका देना अति भयानक है।"
--मि० डेनियल्स (अमेरिका के जंगी जहाजों के मंत्री)
अफीम अफीम एक महत्त्वपूर्ण औषध है, पर यह तभी अच्छी है जब तक इसे चिकित्सारूप में लिया जाय । संसार के प्रसिद्ध और अनुभवी चिकित्सकों की भी यही सम्मति है कि रोग की प्रत्येक अवस्था में अफीम हुवमी असर रखती है, बढ़ते हुए सांघातिक लक्षणो को रोकती है और विशेषकर ददं की वेदना को हरने मे तो वेजोड़ वस्तु है परन्तु साथ ही साथ इसका स्वा- भाविक प्रभाव नसों को सुस्त कर देना है। इससे हमें यही समझ लेना चाहिए कि अफीम औषध ही है, और यह नित्यप्रति व्यवहार में लाने वाली गिजा नही हो सकती। यदि हम इसके अभ्यासी बनते हैं तो हमारे स्नायुमण्डल का सदैव के लिए निर्जीव हो जाना अवश्यम्भावी परिणाम है । अफीम मस्तिष्क को मंद करके ज्ञान-तंतुओ को मूछित कर देती है। जब मस्तिष्क चेतनाहीन होता है, तब श्रवण शक्ति, स्वादेन्द्रिय और दष्टि पर भी उसका हीन प्रभाव पड़ताहै । पीनक उसी अवस्था का नाम है, जब मस्तिष्क और ज्ञान-तंतुमो का सम्बन्ध भिन्न-भिन्न हो जाता है । अफीम से ये रोग लग जाते हैं : १-कब्ज होता है। २–पाचन शक्ति नष्ट हो जाती है। ३-श्वास रोग ! ४-~मद बुद्धि । ५-चिड़चिड़ापन । राजपूताने में अब भी ब्याह-शादी, दावतो और आदर-सत्कार में ठाकुर लोग अफीम घोल कर पिलाते हैं । गुजरात के काठियावाड़ प्रदेश में पहले इतनी अफीम खाई जाती थी कि अफीमचियोको विष्ठा से पशुओं की रक्षा के लिए जंगल मे आदमी नियत किये गये थे। ऐतिहामिक रष्टि से पूर्वीय देशो मे अफीम का प्रचार पिछली सदियों में ही बढा है और इसका कारण पश्चिमी व्यापारी हैं जिन्होंने पूर्व में ।
मद्य-निषेध: नशे का व्यसन ६७ मादक द्रव्यों का व्यवसाय करके उसे बहुत ही लाभदायक व्यापार दिखा दिया। इस ध्येय को लेकर मादक द्रव्यो की समस्या और भी विस्तृत होती गई है और प्रत्येक नगर में दुकानदारों ने मनुष्य की नैतिक दुर्बलता की ओट मे इसे पूर्ण रूप से स्थायी बना दिया है। मिलो मे तथा अन्यन्न दिन-भर काम करने वाली मजदूर मातायें अपने बच्चों को चुपचाप पड़े रहने के लिए अफीम पिला देती हैं। जिन देशो में अफोम नहीं मिल सकती वहांदूसरी कोई नशीली वस्तु दे देती हैं । शहरो मे ही नहीं, गांवों में भी खेतो पर काम करने वाली माताएं बच्चों को अफीम देती हैं । बूढी और समझदार स्त्रियाँ इस अभ्यास को अपनी बहुओं को भी सिखा जाती हैं। एक बार एक अंग्रेज डाक्टर ने नागपुर के समीप एक गांव का निरीक्षण किया, वहा एक हिन्दू बूढी दादी अपने पोत्र अफीम दे रही थी। डाक्टर ने इस पर आपत्ति की, परन्तु बुढिया ने अधिकारपूर्वक उत्तर दिया, "इससे यह रोयेगा नहीं, चुपचाप पड़ा रहेगा, साथ ही इसके हरे-पीले दस्तों में भी लाभ होगा।" एक दूसरा बच्चा जिसका पेट बढ़ा हुआ था और शरीर पीला था, बाहर से खेलता हुआ अन्दर आया,डाक्टर ने उसे देखकर पूछा, "क्या इसे भी शिशुअवस्था मे अफीम दी गई थी ?" बूढी ने उसे अधिकारपूर्वक उत्तर दिया, "हा, पर इसकी भूख न जाने कहाँ चली गई है, यह कभी भूखा ही नहीं होता। आप डाक्टर हैं, इसकी पाचन शक्ति को ठीक करिये न?" डाक्टर को ताड़ना देने पर भी वह अफीम को बुरा नहीं मान सकी। उस गाव के दूसरे भाग में ईसाई लोग भी रहते थे, डाक्टर ने यहां के बच्चों को इस पापविप से मुक्त पाया। उनकी माताओ ने बताया कि अफीम देने का हम विचार भी नही लानी, हमारे बच्चे बिल्कुल स्वस्थ हैं। वे समय पर सोते और समय पर जागते हैं। हमने उनका दैनिक क्रम इस ढग पर डाल दिया है कि वे अपने खिलौनों से घटों खेलते रहते हैं, उन्हें रोना और चिल्लाना नही पडता । यद्यपि इन लोगो को भी खेतों में अधिक समय देना पड़ता था। इन उदाहरणो से गरीबी और अज्ञानता के मूढ ६६ मद्य निषेध:नशे का व्यसन कारण प्रकट हैं। एक कहावत प्रसिद्ध है कि अफीम बच्चों को शक्ति प्रदान करती है, युवको को नष्ट करती है और बुड्ढों को सहारा देती है। यह बात सत्य भी हो तब भी अन्धविश्वास की ओर धकेलने वाली है। अफीम की लत पारस्परिक सहयोग, उठने-बैठने और संग-सोहबत से पड़ती है । जहाँ दस- पांच अफीमचियो का संघ हुआ और एकाध उपचार की चर्चा हुई कि अफीम का आनन्द और उसमे रखकर मधुर स्वप्न देखने का असत्य प्रलोभन नये ग्राहकों को फांस लेता है । फिर वे उसमें हमेशा के लिए तरते रहते हैं । यूनानी और वैद्यक मे अफीम का प्रयोग बिल्कुल सही अवस्थाओं मे होता है, लेकिन अताई चिकित्सक इसका प्रयोग निर्भय होकर प्रत्येक अवस्था मे करते रहते हैं । ठंड, सर्दी और मलेरिया के आक्रमण से बचने के लिए इसका प्रयोग करने में अब डाक्टरों का विश्वास नही रहा। गरीब आदमी अपनी भूख मारने के लिए और सर्दी के दिनों में बच्चे को गरम रखने के लिए अब भी अफीम व्यवहार में लाते हैं। लेकिन अफीम की सबसे अधिक खपत इन उपचारों मे नही होती बल्कि वहाँ होती है जहा अफीमचियों की सोसायटी और पीनक में भूमने की लालसा अधिक रहती है । डाक्टर कर्नल आर० एन० चोपड़ा जिन्हें भारत सरकार ने अफीम के शिकारों की दुर्दशा जांचने के लिए नियुक्त किया था, लिखते है कि अफीम- चियों की सोहबत ने अफीम का प्रचार बढाया है। आसाम में अफीम की लत बुरी तरह लोगों में लगी हुई है। यद्यपि इस प्रान्त का जलवायु मलेरिया-उत्पादक है। ब्रह्मपुत्र के प्रान्तों मे भी अफीम का अधिक प्रचार है, जबकि वहा का जलवायु मलेरिया-उत्पादक नहीं है। उड़ीसा में अफीम की बेहद खपत होती है, यहाँ पहाडी जिलो में तो प्रकार है पर नीचे के जिलो में बिल्कुल भी नहीं है। कर्नल चोपड़ा इसका कारण अफीमचियो की सोबत ही बताते हैं। पंजाब के वियय में भी गको यही धारणा है। कहते है कि मुसलमानोमे अफीम का अधिक सेवन किया जाता हैक्योकि कुरान में शराब पीना वर्जित है । लेकिन पूर्वी बंगाल (अव बंगला देश) में मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ६६ जहाँ मुसलमानों को ही आवादी है अफीम की खपत कम है क्योकि वहां अफीमी सोसाइटी का संसर्ग नहीं है । वहुत-से लोग गहरी नीद सोने के लिये अफीम की मात्रा लेते हैं । हांगकाग में व्यापारी और दुकानदार लोग पहले तो अफीम खा लेते हैं और पीछे से 'जिन' (शराब) की योड़ी मात्रा पीते हैं जिससे उनकी आंखों में अफीम की पीनक नहीं दिखाई देती, ग्राहको को उनके अफीम-सेवन का आभास नहीं मिलता। अब हमे इस प्रश्न पर विचार करना चाहिये कि अफीम की लत कहां तक लाभदायक है और कहा तक भयानक है । तम्बाकू और चाय भी तो इसी श्रेणी के विष हैं। कुछ लोग वर्षों तक अफीम खाने के अभ्यासी रहे हैं और तम्बाकू भी पीते रहे हैं, फिर भी उनमें कोई खास बुराई देखने को नहीं मिलती। ऐसे लोग काम करते रहने के योग्य तो होते हैं पर उनके ज्ञान-तंतु सर्वथा नष्ट हो चुके होते हैं। तम्बाकू पीना उतना हानिप्रद नहीं है जितना अफीम लेना । तम्बाकू के अभ्यास को तो छोड़ा भी जा सकता है, पर अफीम का चस्का छूटना कठिन है । और जो लोग इसे छोड़ देते हैं, उन्हे रोग, चोट और अन्य भाकस्मिक दुर्घटनायें अनायास ही अपनी चपेट मे ले लेती हैं । अफीम छोड़ने के लिए अधिक-से-अधिक मानसिक शक्ति की आवश्यकता होती है । अफीमची को पारिवारिक सुख कदापि प्राप्त नहीं हो सकता। ब्रिटिश फौज में यदि कोई सैनिक अफीम का सेवन करते देखा जाता है तो उसे नौकरी से बरखास्त कर दिया जाता है, क्योंकि उसकी वफादारी सन्देहमयी हो जाती है। भारत के गांवो की अनेक मृत्यु सरकारी रजिस्टरों में दर्ज होती हैं और ये मृत्यु मधिकतर अफीम का परिणाम होती हैं । अफीम को विक्री के लिए रजिस्टर माइसेंस दिये जाते हैं और महीने में बेचने की तौल भी सीमित है फिर भी दुबका-चोरी से मनो अफीम विकती है। आसाम में एक भिखारी युवक जो अफीम का बजेरित शिकार था और जो अपने पैरो खड़ा भी नही हो सकता था, कमर में एक मटमला थैला लिए फिरते देखा गया, इसके पते मे वही अफीम थी जो सरकारी होती है औरह से वह बेच रहा था। कलकत्ते में ७० मद्य-निषेध : नशे का व्यसन अफीम को सबसे बड़ी दुकान हावड़ा पुल के समीप है, उस दुकान पर सब से अधिक बिक्री शाम को होती है जबकि हजारो आदमी अपनी नौकरी पूरी करके जल्दी-जल्दी कदम बढ़ाये स्टेशन की ओर ट्रेन पकड़ने जाते हैं और झट से पैसे फेंककर अफीम की पुड़िया जेब मे डालते हैं । आजकल भारत मे अफीम बनारस एजेन्सी में सरकार की कड़ी निगरानी में बोई जाती है और तयार होती है। फिर भी इसके विषम परिणाम को सरकार ने अनुभव किया और वह प्रति वर्ष इसकी काश्त के लाइसेंस देनेमे कमी करती गई। सन १९२० २१ में काश्त के लाइसेंसो की संख्या ४३११५१ थी और वह घटते-घटते सन् १९२५-२६ में २८१६६४ ही रह गई । पहले १८६६८६ बीघा जमीन मे काश्त होती थी, वह ११३६६१ बीघा ही रह गई। इस कमी का कारण कुछ तो सरकार की नीति में परिवर्तन और कुछ पहले स्टाक का बचा पड़े रहना था । सन् १९२०-२१ मे १४३४० मन अफीम पैदा हुई,सन् १९२४- २५ मे २८२५४ मन और सन् १९२५-२६ मे केवल १३०३० मन हीहुई। हिन्दू धर्म मे अफीम की काश्त करना वर्जित है,लेकिन सरकार काश्त- कारों को पेशगी रुपया देकर प्रोत्साहन देती रही है। ३१ अक्तूबर १९२६ मे अफीम के लिए ७००६१० रुपये, भांग के लिए ८६०० रुपये और सिंचाई के कुओ के लिए १०३४८ रुपये पेशगी दिये गये। फसल पकने पर पौदो को डोडों मे छेद करके उसमे से दुध को बर्तनो मे सग्रह किया जाता है। एक डोर्ड में से थोड़ा-थोड़ा नित्य दूध निकलता है। जब तक वे दूध देकर सूख न जाये तब तक दूध निकाला जाता है। सूखे डोडे बाजारों में पोस्त के डोडे के नाम से बिकते हैं । पोस्त इन्ही में से निकलती है। यह दूध कुछ सूख जाता है तब इसे कच्ची अफीम कहते हैं। काश्तकारो से कच्ची अफीम को एकत्र करने में भी बहुत सावधानी और निगरानी रखी जाती है, अप्रैल से जून तक तमाम माल गाजीपुर सरकारी अफीम फैक्टरी में पहुंचाया जाता है । यह फैक्टरी हिन्दुस्तान मे सब से बही है। सन् १९०७ से जबकि चीन को अफीम जानी वाद हो गयी इसमें ज्यादा अपोम ।
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ७१ नहीं बनती। फैक्टरी में कच्ची अफीम को बडे-बड़े चौकोर होदो में इकट्ठा करके सड़ाते हैं। कुछ दिन बाद उसके ऊपर काली पपड़ी जम जाती है इस पपड़ी में बुलबुले उठने लगते हैं। फिर उसे पकाते हैं । पकाकर धूप में सुखाते हैं । जो कर्मचारी इस काम को करते हैं उन्हें धुए और परमाणुओं को गन्ध के कारण प्रति दस दिन अवकाश लेना पड़ता है। सारी निर्माण- विधि पर कठोर नियंत्रण है । प्रत्येक कर्मचारी की बहुत बारीकी से आते- जाते तलाशी ली जाती है। गाजीपुर में अफीम चार प्रकार की बनती है : एक तो योरोप के लिए, जो हाई कमिश्नर लन्दन की संरक्षता में डाक्टरी औषध के लिए भेजी जाती थी। दूसरी भारत के लिए ही डाक्टरी औषध के रूप में व्यवहार करने के लिए पहली से थोड़ो भिन्न वनती है। तीसरी, आवकारी विभाग के लिए बनती है जो भारत मे सर्वसाधारण के खाने मे आती है। और चौथी, उन देशों के लिए बनती है जहां इसका सेवन खाने मे नहीं, पीने मे करते हैं। गाजीपुर का रासायनिक विभाग अफीम का सत (मारफिया) भी निकालता है। आसाम में सबसे अधिक अफीम का प्रचार है । यद्यपि वहां के सभ्य व्यक्ति तथा अफसर लोग भी इस भयकर अभ्यास को कम करने की चेष्टा करतेर हे हैं, परन्तु किसी ने भी सफलता प्राप्त नहीं की। फिर भी सन् १९२१ और उसके बाद जो सफलता मिली, तो वह महात्मा गांधी तथा कांग्रेस-नेताओ को। महात्मा गांधी ने अगस्त १९२१ में आसाम का दौरा किया था और जनता को समझाया कि वे जब तक मादक द्रव्यो का सेवन न त्याग देंगे, तब तक स्वराज्य नही ले सकेंगे। महारमा जो मानते थे कि इस अभ्यास को तोड़ना आसामवासियो के लिए कितना कठिन है, फिर भी उन्होने उनको बारम्बार यही कहा कि "तुम लोग अवश्य इन वस्तुओ को छोड़ सकते हो। अफीम छोड़ना बहुत ही सहज बात है, ईश्वर में विश्वास रखो।" बहुतो ने इस उपदेश को हृदयंगम किया और अफीम को पुरानी लत को छोड़ दिया 1 अगस्त से नवम्बर तक सैकड़ों नवयुवकों ने उत्साहित होकर मादक-द्रव्य निषेध का कार्य अपने हाय मे लिया।
७२ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन आसाम की भयानक स्थिति के बाद उड़ीसा का नम्बर है । उड़ीसा मे भी अफीम का अभिशाप है। अब से दो-ढाई सौ वर्ष पहले उड़ीसा बहुतं ही वैभवशाली देश था, अंग्रेजों ने प्रारम्भ में यही से बड़े-बड़े व्यापार किये थे। परन्तु अफीम की लत ने उसे अब नष्ट कर दिया है। एक तो वहां वैसे भी भयकर बाढ़ें आती और खेत मे खड़ी फसलो तथा धन-जन को बहा ले जाती हैं। उड़ीसा को उन्नत करने के लिए उसे बिहार प्रान्त में सम्मिलित कर दिया गया था फिर भी उसे विशेष लाभ नहीं हुआ। एक बार इंडिया भाफिस को आशा से एक अफीम जांच कमेटी उडीसा में बैठी थी। इसमें एक भी सदस्य योग्य नहीं था। उसका निम्नांकित नं० २ प्रश्न देखिये: (२) (i) किसी शारीरिक व्याधि के लिए प्रयोग पर लोग विश्वास करते हैं ? अगर ऐसा है तो किन व्याधियों पर? (ii) क्या लोग इसके शक्तिवर्धक पदार्थ होने पर विश्वास करते (iii) क्या अफीम गठिया के दर्द और अन्य रोगों के आराम करने में बाहरी प्रयोग में आती है ? किन-किन रोगों इन प्रश्नों से साफ प्रकट है कि अफीम की खपत के आधार क्या हैं । कमेटी ने ऐसा कोई प्रश्न नहीं किया जैसे, आपकी राय मे अफीम व्यवहार में माने के अमली क्या कारण हैं ? इसके प्रमाण में आप क्या विवरण पेश करते हैं ? कमेटी का आगे चलकर पांचवां प्रश्न यह था- (५) क्या लोगों को शारीरिक विशेष ध्याधियों को रोकने के लिए, अपवा शक्तिवर्धक पदार्थ के रूप में, मादक द्रव्य की थोड़ी माना लेना आवश्यक है? सातवां प्रश्न अफीम की खुराक के सम्बन्ध मे था- (७) क्या आपको कोई ऐसा उदाहरण ज्ञात है जिसमें अफीम अधिक मद्य निषेध : नशे का व्यसन : मानसिक तथा शारीरिक क्रिया में नुकसान हुआ हो? यह प्रश्न इस बात के समर्थन का सकेत करता है कि जो व्यक्ति डाक्टरी उपचार के सिवा से अफीम का शौक करते हैं, उन्हे अफीम हानिप्रद नहीं है । बालासोर के एक डाक्टर के पास बीम प्रश्न दो दिन के अन्दर-अन्दर उत्तर देने के लिए भेजे गये। यह डाक्टर बहुत ही व्यस्त अफसर थे और वे प्रश्नों पर भी विचार करने के लिए यथेष्ट समय चाहते थे। इन डाक्टर महोदय ने जो उत्तर जल्दी में दो दिन समाप्त होने पर भेजे थे, उनमें से एक तो उनके भाव से विल्कुल ही विपरीत लिखा था। एक अमरीकन मिशनरी को, जिन्हें मादक द्रव्यो का विशेष अनुभव और शान था, इस कमेटी के समक्ष गवाही देने के लिए पेश किया गया,पर उन्हें यह कहकर इन्कार कर दिया गया कि आप देर से आये हैं। मिस्टर सी० एफ० एन्द्र ज, जिन्हें भारत के गांवों का विशेष शान है और डाक्टर चोपड़ा, दोनों की यही सम्मति है कि देश के कल्याण के लिए अफीमी सोसाइटियां नष्ट होनी चाहिये । यही एकमात्र उपाय अफीम छुड़ाने का है। कोकीन कोकीन दक्षिणी अमेरिका के पोल प्रदेश मे कोका के पेड़ से बनती है। यह अफीम से भीवनती है । भयानक प्रभावलाने तथा सुन्न करने में कोकीन सब नशीसे बढ़कर है। इसका प्रभाव आनन्दयुक्त मुस्ती होता है, पर अन्त में मस्तिष्क, शरीर और आत्मा के तेज का इससे नाश होता है। भारत में सम्पट नर-पशु इसे पान में रखकर खाते हैं। इसका प्रचार भारत में १९१४ से बढा है। यद्यपि सरकार को इस पर कही प्टि है फिर भी चोरी-छिपे लाखों रुपयों को विकती है। कोकीन के नशे से क्षण-भर एक आनन्द का अनुभव होता है, पर जब नगा उतर जाता है तब उमे मालूम होता है कि यह घोर नरक में गिर गया। धमे भय, भ्रम, भूल, अनिद्रा, मन्दाग्नि, शूल आदि रोग लग जाते ७४ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन हैं । उसको आयु नष्ट हो जाती है। पेटेन्ट दवाइयों मे बहुधा दूषित द्रव्यो, जैसे अफीम, कोकीन, मद्य आदि का ससर्ग रहता है। सिर दर्द की टिकिया जो अधिकतर काम में लाई जाती है, प्रायः उनमें काफीन फेनेस्टीन होता है, यदि उनकी माना भूल से अधिक ले ली जाय तो बहुधा मृत्यु हो जाती है। अमेरिका के प्रसिद्ध डा० ओलीवरचैनडेल होलास का कहना है, "यदि ये सब दवाइयां समुद्र में फेंक दी जाये तो इससे मनुष्य जाति का उतना ही फायदा हो सकता है जितना कि मछलियों का नुक्सान।" भांग, गांजा और चरस भाग दक्षिणी और मध्य भारत में लाइसेन्स लेकर बोई जाती है। उत्तर मे पंजाब से लेकर आसाम तक हिमालय की तलेहटी मे जंगली भांग बहुत लगी रहती है। इस जंगली भांग पर भी नियन्त्रण रखने की चेष्टा की जा रही है । भांग के तीन रूप होते हैं, चरस, गांजा और भांग । मादा पौधे का फूल खिलने से पहले ही उसके डोडे मे से चरस तयार होता है । यह पजाब होकर मध्य एशिया से आता है। गांजा भी ऐसे ही बनता है, पर यह उतना तेज़ नहीं होता। यह बगाल के नौ गांव में लाइसेन्स लेकर बनाया जाता है और इसके बेचने का सर्वाधिकार 'नोगाव गाजा कल्टीवेटर्स कापरेटिव सोसायटी के हाथों मे है । अहमदावाद के समीप भी लाइसेन्स लेकर गांजा बनाया जाता है। किन्ही-किन्ही प्रान्तो में जहा वरस पी जाती है, वहा गांजे की मनाही है । भांग हरी-हरी पत्तियो की बनाई जाती है और यह घोटकर पी जाती है। भांग अफीम जैसी भयप्रद नहीं होती। चरम और गाजा मतवाला बना देते हैं और पीने वाले की वृत्ति हिंसक हो जाती है । चरस के पीने वाले प्राम पागल हो जाते हैं । वर्मा मे भाग को लोग अधिक नहीं जानते । दक्षिणी भारत में इसे कम व्यवहार करते हैं। सबसे अधिक खपत सिंघ में होती है । सन् १९२६. २७ मे यू०पी० सरकार ने बहुत अधिक नाजायज चरस पकड़ी थी।
का अनुभव करता है। मो-ज्यो नशा बढ़ता है, वह स्वप्न देखता, कल्प- की सत भी शहरी युवक-युवतियों मेखब बढी चदी है। चरस या hashish है। मैंड्स (Mandrax) नामक एक कृत्रिम दवाई तो बहुत ही लोक- प्रिय हो रही है। सभवत: इमलिए कि यह घोडी कीमत में सहज प्राप्य है। यह एक आनन्दप्रद उत्तेजना उत्पन्न करती है। ये नशीली दवाइयों अधिक मद्य-निषेध : नशे का व्यसन इसकी खरीद का मूल्य ६ ० से १० २० प्रति किलो था और बेचने का भाव १२० १० प्रति किलो। भाग की पौध साल मे एक बार होती है । पौध दो प्रकार की होती है.--- नर और मादा। नर पोधा मादा से छोटा होता है और इसमे धन के पत्ते नही लगते । पौध में तीन चीजें होती है . १ पतली शाखाए । २. चिकने रोज {जिनमे से तेल भी निकल सकता है।) ३ पसेव (रतूबत जो पक्षियो और फूलो के सिरो पर रहता है । यह तोमरी चीज ही आबकारी को आमदनी है। पौधे मे से तीनो चीजें बनती है। १. गांजा--मादा पौध के फलो से गाजा बनता है। २. परसपसेव की बनती है, जैसे अफीम बनती है । इसमें पौध के मूल अवयव सबसे अधिक होते हैं। ३. भांगनर और मादा दोनों पौध की पतियो को सुखाकर बनती ये पदार्थ अति सूक्ष्म मात्रा मे भूध को बढाने वाले, तथा सूक्ष्म मात्रा में नीद और खमारी को लाने वाले हैं । खुमारी की अवस्था में मनुष्य मुख नाओं में उडता और विवेकहीन होकर अनर्गल मकने लगता है। उसका स्नायु मंडल ढीला पड़ जाता है, और वह अनेक रोगों का शिकार बना रहता है । इन वस्तुओं के सेवन करने वाले सिडी, दीवाने, क्रोधी और आवारागर्द हो जाते हैं। आजकल LSD आदि गालियां तथा अन्य नशीली दवाइयों के सेवन का प्रयोग बहुत बढ़ रहा है। मार्जुआना (maryuana) भी युवको मे प्रिय ७६ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन तर सिगरेट में लपेट कर या चिलम मे पी जाती हैं, पान में डाल कर तथा गोलियों के रूप में भी सेवन की जाती हैं। कुछ लोगो को इनका इन्जेक्शन लेने की लत पड़ जाती है। दिल्ली विश्वविद्यालय के कालेजों तथा होस्टलों में इन मादक द्रव्यों के सेवन की एक भारी समस्या उत्पन्न हो गई है। भारत में बढ़ती हुई हिप्पी कल्ट ने यह व्यसन बहुत बढ़ा दिया है। 11
तम्बाखू
दम्बा कमेरिका की देन है। यह सम पदमहो देवा ।
वनाति के भौगोलिक AT PEREATER hainik
इसे पीने को बहुत प्राचीन पति पो । पहिपमानिमामों भी
सीखा। परन्तु और भी गहरी हानमोग करने से यही परिrthaniil
है कि योरोप अथवा एशिया में सम्बाकू पर नही होता काम
श्यूबा के टापू मे सोगों को गमका के पत्तों में सपना Halfvीत
देखा था। डामटर पारसेपोमरा अपगे इतिहाantasthital
के पास किसी टापू में उन्होने लोगों को एक
गली गतिमा
पीते देखा जिसे वे राम्बार माहरो थे।
योरोप में समरो प्रमग स्पेनिसी गोमतो-हमhamtel,
को पौद शौकिया बोई थी, परातु मुवि मा at amar Hilar
मनारडेस ने एमा दिन इसमें भारी उभारणी की naturtी।
परन्तु और भी अनुसंधाग करणे परभा II.
धारों के योग्य नहीं है।
सम्बापू की पौध में लिए गजामौतमाम Bual
फिर भी सम्मापू की भिPr-fir जातियों में ftir fitti-fitinी
जमीन और भायोहपा का होगा HINEntrt infiml
तम्यापू', जो परिणामी देशो मा ufna lot fittilim
सिगरेट संसार-गर में काम fu+intenmMur with
फुट कंपा होता है। मी तिithsMIERIER Itant
दरा इंघ महोती। thatantra
७८ मद्य निषेध : नशे का व्यसन हल्का गुलाबी होता है । तम्बाखू की कच्ची पौध को कोई नहीं खाता । जब पौध पकने लगती है, तभी उसे तोड़ लेते हैं, पूरा पकने से वह खाने के योग्य नहीं रहता। क्योकि पूरा पकने की क्रिया में उसके समस्त गुण पत्तियो मैं से निकलकर बीजों मे सग्रहित होने लगते हैं, यदि बीज ही बनाना हो तव तो पौध को पहले तोड़ने की आवश्यकता नही । पत्ती जितनी अधिक मोटी और भारी होगी उतनी ही अधिक उसकी कीमत होगी और वह उतना ही अधिक नशीला होगा। परशियाके शीराज तम्बाजू की बहुत.प्रशंसा की जाती है। तम्बाखू की स्थायी रूप से खेती सबसे पहले अमेरिका मे होनी आरम्भ हुई थी। सन् १६०७ ईस्वी में जेम्सटाऊन नगर मे विरगिनिया कोलानी' में तम्बाखू बोया गया। आठ वर्ष बाद उसके बोने मे और भी विस्तार किया गया । तेरह वर्ष के बाद सन् १९२० में तम्बाखू व्यापार की महत्त्वपूर्ण वस्तु बन गई। और इसकी इतनी प्रतिष्ठा हुई कि १०० पाड तम्बाखू के बदले एक क्वारी कन्या व्याह ली जाने लगी। सन् १६२० में ही ऐसे ६० व्याह रजिस्टर मे दर्ज किये गये थे। अगले वर्ष सन १६२१ मे यह भाव बढ़ गया अर्थात् १५० पौंड तम्बाकू के बदले एक क्वारी कन्या दी जाने लगी। इस वर्ष ६०विवाह हुए थे। ये विवाह नीच और अर्द-शिक्षित जातियों में हुए थे। शीघ्र ही धूम्रपान को प्रया फैलने लगी। अंग्रेजों ने इसे कलापूर्ण ढंग से पीना आरम्भ किया। उन्होने एक नली वनाई, उममे तम्याक को चूर्ण फरके दवा-दयाकर भरा और फिर मुलगार पिया। दवाकर भरने से सम्बा जल्दी नही जम जाता, धीरे-धीरे कश रियता है । और भी अधिक गौक से पीने वालों ने पत्तियों को नसों और गर्द मिट्टी को साफ करके पूरे में मुगन्ध डालकर पिया। इग्न में सबसे पहले महागनी एलीजायेप के शासन काल में सर तम्बापू को येष्ठ उपहार समाकर इमे एलीजायेप को भेंट लिया। रानी ने उसे गार स्वीकार किया, उन्होंने इसके दो-तीन घट ही पिसे ऐकि उनके पेट में होने लगा और गट यामयावारियों । पाल्टर रेसे ने मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ७६ में कानाफूमी होने लगी कि सर वाल्टर ने निश्चय ही महारानी को विप. पान कराया है, परन्तु वे कुछ ही घंटे के बाद स्वस्थ हो गई। डाटर रिचर्डसन तम्बाखू पीने पर निम्न परिणाम बतलाते हैं। १. गीली भाप बनती है। २. कार्वन बनती है। कार्वन गले में तथा गले और कलेजे की नालियों में जम जाती है। ३. अमोनिया उत्पन्न होता है जो अधिककाल तक पीते रहने से जिह्वा को फाड़ डालता है, गले को खुश्क करता है जिससे प्यास बढती है और तीव धूम्रपान की इच्छा जाग्रत होतो है : अमोनिया रात को भी दूपित करता है। ४. कारबोनिक एसिड (कोयते का तेजाब) उत्पन्न होता है, जिससे सिर दर्द, अनिद्रा और स्मरण शक्ति का ह्रास होता है । ५. निकोटीन प्रवाहित होती है। निकोटीन एक तीव्र विप है, इसकी एक बूद खरगोश के मुंह मे डालो तो वह तुरन्त भर जायगा। कुत्ते को जीभ पर दो बूद डालो तो वह भी मर जायगा । निको. टीन को कबूतर की टांग से छुआ दो तो वह चार मिनट के अन्दर मर जायेगा । डाक्टर बोडे ने बिल्ली को जीभ पर एक बूद डाली तो वह पांच मिनट मे उसी क्षण मर गई। हरी-हरी पत्तियो को पीसकर मनुष्य-शरीर की त्वचा पर मालिश करें तो विपना प्रभाव होगा। और भी सूक्ष्म विष हैं जैसे : कोलिडीन, ग्रंसिक एसिड, कार्बन- मोनक्साइड, फरफुरल और एक्रोलीन कोलिडीन जहरीला क्षार है, जिससे स्नायु दुर्बल हो जाते हैं और चक्कर आने लगते हैं। प्रसिक एसिड ज्ञान- तन्तुओ को मलीन कर देता है। सिर में भारीपन रखता और मन में अरुचि पैदा करता है। कार्वन मोनक्साइड दम घोटकर मार डालने वाली मैस है । इसका प्रभाव यह होता है कि सांस जल्दी-जल्दी चलने लगती है, हृदय की गति तेज हो जाती है, रोमांच और ऐंठन होती है । आँखो की ८० मद्य-निषेध : नशे का व्यसन पुतलियां फैल जाती हैं और ठंडा पसीना, ठंडा बदन और बेहोशी पैदा करती है । फुरफुरल भी मस्तिष्क के ज्ञान-तन्तुओं को ढीला कर देने वाला विष है, जिससे बाद में आचार और शुद्ध विचार नष्ट हो जाते हैं । एको- लीन एक गैस है जो मन मे चिड़चिड़ाहट पैदा कर देती है। अब यह प्रश्न उठ सकता है कि इतने विष रहते तम्बाखू पीने वाले दीर्घ काल तक कैसे जीते रहते हैं ? बात यह है कि यदि विष को सम्पूर्ण माना शरीर में एक साथ पहुंच जाय तब तो ऐसा होना सम्भव है। परन्तु ४ प्रतिशत ही विष रुधिर में प्रवेश कर पाता है शेष वापिस निकल जाता है । यह ४ प्रतिशत भी एक साथ ही प्रवेश नहीं करता, धीरे-धीरे करता है। थोडा-थोड़ा करके पहुचने से शरीर को उसके सहने का अभ्यास हो जाता है। इसलिए वर्षों मे वह विष अपनी मात्रा पूरी कर पाता है और तब अनेक रोगों को उत्पन्न करके मनुष्य के प्राण समाप्त करता है। डाक्टरो ने प्रयोग करके देखा है कि तम्बाखू सेवन करने वाला व्यक्ति जीवन के १०-१५ वर्ष अवश्य ही तम्बाखू की भेंट चढायेगा। इन हानियों से परिचित होकर तम्बाखू का परित्याग किया जाने लगा। रानी एलिजाबेथ ने अपने राज्य मे तम्बाखू का पूर्णनिषेध करने की आज्ञा प्रचारित कर दी थी। उसके बाद दूसरे शासक जेम्स-प्रथम ने तम्बाखू के विरुद्ध प्रसिद्ध पुस्तक Counterblast to Tobacco लिखी। उन्होने लिखा था कि "तम्बाखू नेत्रों के लिए घृणास्पद, नाक के लिए दुर्गन्धित, मस्तिष्क के लिए हानिप्रद, फेफड़ो के लिए शनु और इसका धुआं जीवन- अधकार का अथाह समुद्र है।" पोप अर्बन अष्टम ने तम्बाखूपीना अपराध करार दे दिया था। टर्की के अमुरथ चतुर्थ नेधूम्रपान करने वालो कोमृत्यु- दण्ड दिये थे । कुस्तुन्तुनिया मे ऐसे व्यक्ति की नाक मे नली को आर-पार खेदकर बाजारो मे घुमाते थे। मास्को के ग्राम ड्यूक ने धूम्रपानी को पहले माधिक दण्ड और फिर दुबारा मृत्यु-दण्ड नियत किया था। फारस के बादशाह ने अपने राज्य में तम्बाप का आना वजित कर दिया था। अबी. सोनिया के राजा किंग जॉन ने मूंघने वाले की नाक काटने और पाने तथा - मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ८१ पोने वाले की गर्दन उतार लेने की दण्ड-व्यवस्था की थी। फिर भी धूम्र- पान रुका नहीं। विश्व के मेघ के समान यह प्रतिपल समस्त संसार में माच्छादित होता रहा और आज अपने देश भारत मे तीन-चार वर्ष के बच्चे सिगरेट और हुक्के के कश का आंख मीच कर आनन्द लेते हैं। भारत में इसका प्रचार अकबर के शासन बढ़ा। अग्रेजी सभ्यता ने इसे और भी सुलभ कर दिया, क्योकि हुक्के और चिलम को झन्झट न रही और सिगरेट अथवा बीड़ी चाहे जहा चलते-फिरते पी सकते हैं। तम्बा का व्यवहार इतनी प्रचण्डता से बढा है कि अन्य सारी मादक वस्तुओ की बिक्री इससे बहुत ही पीछे है । गत योरोपीय युद्ध के समय हिसाब लगाया गया था कि संसार-भर में तम्बाखू की खेती की कीमत ६२५,००००,००० रुपये थी। भारत में प्रति वर्ष ढाई लाखटन तम्बाखूखर्च होता है । जिसका मूल्य लगभग तीन अरब रुपये है। लगभग ३५ प्रतिशत व्यक्ति तम्बाखू सेवन करते हैं । बंगाल, मद्रास और बर्मा मे इसकी खेती प्रति दिन उन्नति पर है। दस लाख एकड़ जमीन पर यह वोया जाता है और ५ करोड़ रुपये से अधिक मूल्य का विलायत से आता है। वर्मा और मद्रास मे सिगरेट के बड़े-बड़े कारखाने हैं। जबलपुर और म०प्र० मे वीडियो के घर-घर कारखाने हैं । बम्बई में पत्तो की बीडियो का अधिक प्रचार है । राजपूताने मे देशो और काबुली दो प्रकार की तम्बाखू होती है, उसमें गुड मिलाकर भांति-भांति के हुक्के, नरेली और चिलमो में लोग पीते हैं । कलकत्ता. बनारस, लखनऊ, दिल्ली आदि शहरों मे सुगन्धित वस्तु मिलाकर सुरती, मुश्की, अवरी आदि नामों से उसकी गोलिया बनाते और सोने के वकंचढा पर वेचते हैं । अमेरिका, इग्लैंड, और मिश्र से प्रति वर्ष ४ करोड़ रपये से अधिा सिगरेटें भारत मे आती हैं। लगभग एक करोड़ रपये का तम्बाप गगग विदेशो मे जाता है। भारत की ६० करोड़ जनसख्या में कई अरव पर का नम्बासू फूका जाता है। प्रति गनुप्य १० रुपये साल से अधिक पड़ता है। इसके साथ यदि एक मनुष्य एक महीने मे एक माचिस भी मर्च ८२ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन करे, तो साढ़े सात अरब माचिसे होती हैं, अर्थात् सत्तर करोड़ रुपये प्रतिवर्ष। बहुत आदमी प्रति दिन सौ-सौ वीड़ियां और ५०-४० चिलम तक पी जाते हैं। यदि प्रति आदमी २५ बीड़ी गिनें और बीस पंसा उनका मूल्य समझें तो प्रति वर्ष ७२) रुपये होते हैं। यदि वह आदमी ४० वर्ष तक बीड़ियां पीता रहा, तो २८८० रुपये की वीड़िया और २५० रुपये की दियासलाई, इस प्रकार कुल ३१०० रुपये उसने फूक डाले । इस प्रकार इस रकम पर सूद दर लगाइये और सोचिये कि यदि कुल भारत में २० करोड़ मनुष्य भी तम्बाखू सेवी हुए तो ५०० अरब रुपया से सधिक तम्बाखू की भेट जाता है। भारत में १० लाख से अधिक बीघे जमीन में तम्बाखू बोई जाती है, इतनी जमीन में यदि अन्न वोया जाय और दो बार बुआई करने से उसमे से प्रति बीघा २ टन अन्न भी हो, तो २० लाख टन से अधिक अन्न उत्पन्न हो सकता है। प्रति दिन आधासेर के हिसाब से एक-एक मनुष्य को ५ मन अन्न एक वर्ष को काफी होता है। इस तरह १ करोड़ से अधिक मनुष्यों का पेट भर सकता है। तम्बाखू एकाध मात्रा लेने मे तो दर्द की पीड़ा कम करने वाला है । परन्तु अधिक मात्रा मे लेने पर घुमेरो, बेहोशी, नशा, मृगी, उन्माद और मृत्यु भी हो जाती है । धूम्रपान का इतना अधिक व्यापक प्रचार होने का कारण यह है कि इसे सेवन करके व्यक्ति कुछ देर के लिए चिन्ताओ और भार से मुक्त हो जाता और आरामअनुभव करता है । हमे सच्ची मुक्ति तो अपने कार्य के करने पर ही मिल सकती है। हमें अपनी बुद्धि से अपना उत्तर- दायित्व भार जो ईश्वर ने हमे मनुष्य-शरीर देकर दिया है, प्रतीत करना और उमका निरालस्य भाव से अकृत्रिम रीति से पालन करना चाहिए। हमने देखा है कि पक्षियो को पालतू और न उहने देने योग्य करने के लिए तम्बाखू खिलाया जाता है। एक वृद्ध की मृत्यु हो गई। मरने से एक दिन पहले वह डाक्टर के मद्य-निषेध : नशे का व्यसन हम बहुत छोटे- पास गया था। उसके घर वालों ने साश को पोस्टमार्टम के लिए सरकारी जांच करने भेजा।यहाँ चार डाक्टरों ने परीक्षाको,उसके कलेजे में तम्बाकू का धुआं और विष ठसा हुआ पा, इसी कारण से मृत्यु हुई। वह बचपन में ३-४ वर्ष की आयु से ही तम्बाखू पीने लगा था। वास्तव में। छोटे बच्चों को आजकल बीड़ी-सिगरेट पीते देखते हैं। जो बच्चे अपन बड़ों के अथवा माये-गये मित्रों तथा मेहमानों के लिए हुक्का भरकर उनके सामने पेश करते हैं, वे दुवका-चोरी से एक-दो कश खींच कर चिलम का स्वाद चख लेते हैं। और फिर बड़े होने पर तो वे भी सबके सामने पीने लगते हैं। उनके अभिभावकों की भी यही धारणा होती है कि हुक्का उनके घर की शान और दस-पांच आदमियों की मण्डली में पीने की बड़े-बूढ़ों की वंश परम्परागत देन है । बिरादरी के सरपंचों की संतान हुक्का पीना अपना गौरव समझती है। शहरो के लड़के मुंह मे सिगरेट दबाकर चलना, उसके कश बीचकर धुएं को उड़ाना अपनी प्रतिष्ठा और अमीरी समानते हैं। सिनेमाओं ने छोटे-छोटे बच्चों में कुचेष्टाओं का बहुत प्रचार कर दिया है, जिसमें से सिगरेट पीना भी एक है। सिनेमा हाल में १०-१२ वर्षके बच्चे को फिल्म की चेष्टओं का बखान करते और सिगरेट का कश लगाते देखिये तो हमें यही प्रतीत होता है कि भारत की नस्ल की यही भर जवानी है। वह धुएं को इस अभ्यास से छोड़ेगा कि बड़े-बड़े भी उतनी नफासत न सीखे होंगे। बच्चों की धारणा हो जाती है कि बिना पान खाये और सिगरेट पिये हमे कोई बड़ा और बुद्धिमान नही समझेगा। हमने अनेक परिवार ऐसे देखे है जो बहुत दरिद्र हैं । जब उनके पास तम्बाखू के लिए पैसा नहीं रहता, वे अपने छोटे बच्चे को लेकर किसी अमीर व्यक्ति के पास जा बैठे। उस व्यक्ति ने बच्चे को चीज़ खाने के लिए एक पंसा दिया, उन्होने पैसा अंटी में लगाया और वच्चे को लेकर बाजार चले । उस पैसे से तम्बाखू की एक गोली खरीदी जाती है। एक बार एक साठ वर्ष के मरीज ने डॉक्टर को बुला भेजा। डॉक्टर ने उसकी परीक्षा करके कहा कि मैं तुम्हारा इलाज तब कर मकता हूं जब भय-निषेध : नकशेव्यसन तुम तम्बाकू पीना छोड़ दोगे। रोगी ने कहा, "तम्बाकू छोड़ना असम्भव है।" डॉक्टर चले गये । रोगी ने दो दिन तक डॉक्टरके पास आदमी भेजा, पर वे नही आये, उन्होंने यही कहा कि पहले उससे तम्बाखू छुड़ाओ, नहीं तो वह मर जायगा। पर रोगी तम्बाखू न छोड़ सका। उसने पच्चीस वर्ष की अवस्था से तम्बाखू सेवन आरम्भ किया था और अभ्यास यहां तक बढ गया कि एक क्षण को भी मुंह खाली नहीं रह सकता था। जीम के नीचे तम्बाखू की पत्ती दबी ही रहती थी। चौथे दिन जब वह मरने लगा और डॉक्टर ने उसे कह दिया तुम आज मर जाओगे, अव भी तम्बाखू छोडो तो औपघ अपना असर करे। उसने लड़खड़ाती जुबान से उत्तर दिया कि डॉक्टर को निकाल दो। जब वह ठंडा होने लगा तब उसने चिल्ला-चिल्ला कर कहा, "मेरी जीभ के नीचे तम्बाखू की पत्ती रख दो। मेरे मुंह में सोना न डालना, गगा जल न डालना, तम्बाखू की पत्ती डाले जाना।" तम्बाकू खाते-खाते ही उसके प्राण निकले। एक बार एक प्रोफेसर ने एक विद्यार्थी को सिगरेट पीते देख लिया। वे उस विद्यार्थी को बहुत प्यार करते थे, उन्होंने उससे कहा, अब कभी सिगरेट न पीना। विद्यार्थी न माना और नित्य पीता रहा। प्रोफ़ेसर को इस बात से बहुत दुःख हुआ। उन्होने उसके पिता के पास पहुंचकर इसकी शिकायत की। पिता ने तनिक भी विस्मित न होकर उत्तर दिया, "अच्छा तो है, मैं बूढा हो चला। वह अब पीना न सीखेगा, तो मेरे पीछे सभा सोसा इटी और जाति बिरादरी मे उठ बैठकर सग कसे निभायेगा।प्रो. साहब, हुक्का ही जाति बिरादरी की नाक है, जिसका हुक्का बन्द, उसे जाति से अलग समझना चाहिए।" प्रोफ़ेसर साहब निराश होकर लौट आये। दिल्ली के एक करोड़पति सेठ के बहुत ही नाजुक और लाडले बेटे रानि के समय कमरे मे गद्दे पर सिगरेट पी रहे थे। मलमल का कुरता और बारीक धोती हवा से इधर-उधर फहरा रही थी। वे निन्द्रा वस्था में होकर सिगरेट का आनन्द लूट रहे थे कि उन्हें नीद सी आ गई। सिगरेट का हाथ उनके सीने पर आ पड़ा। कुरता जरा-सा सुलग कर मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ८५ जलने लगा, सीना भी जला। पांच मिनट में ही सब कुछ हो गया, भाग दौड़ मच गई, नौकर चाकर आये, डॉक्टर को फोन किया गया। परन्तु छटै मिनट ही उनकी मृत्यु हो गई। उनका नाजुक दिल हल्का-सा धाव नही सह सका। बच्चों का प्रवल शनु यह धूम्रपान है। यह उनकी शारीरिक और मानसिक उन्नति को रोकता तथा उनके आचार को दूषित करता है। फ्रांस के सिपाहियों की नस्ल अब छोटी हो गई है, क्योकि वे पचास वर्ष पहले बहुत धूम्रपान करते थे। टर्की के सैनिक तम्बाखू और अफीम के के कारण से ही कद मे छोटे हो गये। धूम्रपान रोकने से आर्थिक सुधार तो होगा ही, नैतिक सुधार भी होगा। यदि एक परिवार में एक व्यक्ति तम्बाखू के ऊपर दस पैसे या पंद्रह पैसे प्रति दिन व्यय करता है, तो उतने धन से प्रति मास वह अपने घर के या बच्चो के लिए कोई वस्तु खरीद कर ला सकता है। धूम्रपान का अभ्यास निश्चय ही व्यथं और दूसरों के लिए अपनी शान दिखाने के लिए है। इसका गुण कुछ भी नहीं। एक बार एक ऑफिसर की स्त्री ने बाजार से एक वस्त्र खरीद लाने के लिए कहा। ऑफिसर एक महीने तक भी उमे नहीं खरीद सके, क्योकि उनके पास रुपये नहीं थे। और वेतन महीने की चार तारीख को मिलता था और उसी दिन उसका सब बंटवारा हो जाता था। वेतन आया, पर खेद है कि वह वस्त्र खरीदने की उसमें गुंजायश न रही। पत्नी ने विगढ़ कर घर का काम धन्धा बन्द कर दिया और कमरे में पड़ी रहतीं। धीरे-धीरे यह छोटी-सी लड़ाई सव पर प्रकट हो गई, क्योकि केवल बीस रुपये का तो प्रश्न था । एक मिन ऑफिस से लौटते समय उनके साथ हो लिए। ऑफिस और कोठी का फासला एक ही फाग था, इस बीच में पैदल आते-आते उन्होंने चार सिगरेट पीली। मित्र ने कहा, "क्या तुम अपने सिगरेट के खर्च का अनुमान कर सकते हो?" उन्होंने आश्चर्य से पूछा, "क्यों ?" इसलिए, कि तुम इसे त्याग कर चालीस रुपये महीने बचा सकते हो। अपनी पत्नी के लिए पैसे दो वस्न ९६ मद्य निषेध : नशे का व्यसन खरीद कर ला सकते और लड़ाई मिटा सकते हो । मिन ने भत्र्सना से उत्तर दिया । ऑफिसर ने उन पर घृणापूर्वक दृष्टि डाली और मिन को अन्दर आने को विना कहे ही कोठी में घुस गये। एक पंसारी को सिगरेट पीने की धुन थी। एक डॉक्टर ने उसे छोड़ने की सलाह दी। पंसारी ने सिगरेट पीना तो छोड़ दिया, किन्तु जितने पैसों की नित्य पीता था, उतने पैसे गुल्लक में डालने लगा। तीस वर्ष के बाद उसने जमीन खोद कर उस गुल्लक को देखा। उसके आश्चर्य की सीमा न रही उसने उस द्रव्य से शहर से बाहर एक मकान बनवा लिया और आज कल यहां स्वच्छ हवा मे आनन्द से रहता है। इस आर्थिक लाभ पर हम आंख मीच कर कह सकते हैं कि यह ठीक है । धूम्रपान का रुपया धुएं में उड़ हो तो जाता है जिससे न किसी का पेट पलता है, न यस्त्र बनते हैं, न किसी की रक्षा होती है। उससे दुःख ही दुःख मिलता है। अमेरिका में सन् १८९० में ६००,०००,००० रु० का तम्बाखू फूंका गया, और ३०३,०००,००० रु० का मांस खाया गया। धूम्रपान भोग विलास की भी वस्तु नहीं है । विलास की वस्तु तो वह है जिससे हमें आनन्द प्राप्त हो और नुकसान कुछ भी न हो। हम एक सप्ताह के सिगरेटों के पैसे जोड़ कर अपने बच्चे का एक जोडा जूताखरीद सकते हैं । उसका कोई वस्त्र बना सकते हैं। बच्चे को सजा कर और उसे मुखी देखकर हमें कितना आनन्द होगा, यही गृहस्प का विलास है। तम्बाखू का सब से पहला प्रभाव भूख कम करना है। दूसरा प्रभाव मांस कम करना है। एक किसान ने पचास वर्ष की आयु मे हुक्का पीना एक दम छोड़ दिया। पूछने पर उसने गर्व से कहा, "मैंने अपना जीवन दस वर्ष और बढ़ा लिया है।" डॉटरी राय है कि तम्बाखू किसी भी रोग की औषध नहीं । जो दो. धार उपचार हैं भी वे सत्य नहीं हैं। लोग इसे दांतो के दर्द की असीर दवा बतलाते हैं। दांतों का दर्द सम्बाध दांतो के नीचे दबाने से मुग्न हो मद्य-निषेध : नशे का व्यसन जाता है, जड़ से नहीं जाता। बल्कि यह कहिये कि इसी प्रकार उन्हें दस- पन्द्रह दिन दांतों के नीचे दबाना पड़ा कि वे तम्बाखू के अभ्यस्त हुए। एक बार एक मित्र के घर एक मन्त्री, एक डॉक्टर और एक केमिस्ट चाय पीने आये। मित्र ने उनसे तम्बाखू प्रयोग का कारण पूछा । मन्त्री और डाक्टर के उत्तर को छोड़ कर केमिस्ट का उत्तर हमारी बात की पुष्टि करता है, उसने कहा, कि दो वर्ष पहले मेरे होठ गल गये थे तब से तम्बाखू लिया था। उनसे फिर पूछा, कि जब होठ अच्छे हो गये तब भी अब तक क्यों लेते हैं ? केमिस्ट ने उत्तर नहीं दिया, ये झुंझलाकर उठकर चल दिये। डॉक्टर सौल्ली कहते हैं कि तम्बाखू नसों को सुन्न कर देता है, जीवन को मूछित कर देता है, और निर्बलता को बढ़ाता है । यह वास्तव में कलेजे को धीरे-धीरे जलाता है। उसके पीने वाला साक्षात् सूली पर पड़ा हुआ अपने दुर्भाग्य को चूमता है। तम्बाखू का पीना अधिक हानिकारक है या खाना? अधिकांश पीने में अधिक हानि है। क्योंकि गले की नसों में होकर मस्तिष्क और जिगर दोनों दिशाओं में फैलता है । मस्तिष्क मे अधिक विष फैलने से 'मस्तिष्क- ज्वर' हो जाता है। सरकारी अस्पतालों और पागलखानों में ऐसे केस देखने मे मा सकते हैं । विद्यार्थियों को, जिन्हें मिन संसर्ग से सिगरेट पीने का चस्का लग जाता है, शीघ्र ही अपनी स्मरण शक्ति के ह्रास का अनुभव होने लगता है, वे पहले की भांति पाठ याद नहीं कर सकते। फिर भी ये धुमो उड़ाना नहीं छोड़ते । डॉक्टर गोजस कहते हैं-"तम्बाय अध्ययन का बन्द द्वार है।" डाइंग के विद्यापियों का अथवा अध्यापकों का, जो तम्बासू पीते हैं, काम करते समय हाथ कांपने लगेगा। उनकी ड्राइंग में कंपकंपी अवश्य चितित होगी। उनकी रष्टि में भी अन्तर आ जायगा। सम्बाखू मस्तिष्क को तुरन्त ही मलिन कर देता है। अनिद्रा, आंखों के आगे तारे से दीखना, दिल का शीघ्र पवड़ा जाना, प्रत्येक कार्य में निरुत्साही होना ये समस्त दोष तम्बाखू की अवश्यम्भावी देन हैं। डॉक्टर रिचार्डसन कहते हैं जो माता-पिता तम्बाकू का सेवन करते हैं, ८८ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन उनको सन्तान अवश्य ही मानसिक और शारीरिक दुर्बलताओं का शिकार होगी।" एक अन्य प्रतिष्ठित चिकित्सक की राय है कि "मैंने आज तक एक भी ऐसा तम्बाखू सेवी माता-पिता नही देखा जिसको सन्तान का स्नायु मण्डल कमजोर न हो । उनका मस्तिष्क भी दुर्वल होता है ।"फ्रांस और अमेरिका में ऐसे अनेक प्रयोग देखे गये हैं जो बच्चे जितनी अल्पावस्था में तम्बाखू सेवन करने लगते हैं उतनी ही जल्दीउनका पतन होता है। एक बड़े डॉक्टर का यह अनुभव है कि सिगरेट पीने से प्रत्येक मनुष्य का ह्रास होता है। ज्यों-ज्यों धूम्रपान का सेवन संसार मे बढ़ रहा है, हमें निम्न बीमारियां भी बढती नजर आती हैं : मुख-दर्द (अचानक ही मुंह का दुखना), अपच, गठिया का दर्द और मसिक रोग। छोटे बच्चों पर सम्बाखू का शीघ्र प्रभाव पड़ता है। वास्तव मे सिगरेटों ने हमारे सामा- जिक, नैतिक और राजनैतिक जीवन मे दुर्बलता ला दी है। प्रसिद्ध फ्रेंच डॉक्टर जी० सेसने ने नौ से पन्द्रह वर्ष की आयु वाले ३८ धूम्रपानी बच्चों का निरीक्षण किया। इन बच्चो का रक्त प्रवाह बहुत क्षीण था और उन्हें हृदय रोग हो चुका था। पाचन शक्ति बिगड़ गई थी, और उन्हें अल्कोहल पीने की इच्छा होती थी। पारी का बुखार आने लगा था, रक्त के लाल कण नष्ट हो गये थे। नाक से खून गिरता था। रात को भरपूर नीद नही आती थी और मुंह का स्वाद बिगड़ गया था। डॉक्टर ने इन बच्चों से तम्बाखू छड़ाया और वे ६ महीने के बाद बिल्कुल स्वस्थ हो गये। युवावस्था में धूम्रपान की सबसे अधिक प्रचुरता होती है। ज्यों-ज्यो अवस्था बढ़ती जाती है, नसो मे सुस्ती जल्दी-जल्दी आती है और तम्बाखू का सेवन अधिक होता है । हृदय पर इसका बहुत बुरा प्रभाव पड़ता है, स्नायु मण्डल ढीला हो जाता है। इच्छाशक्ति नष्ट हो जाती है । इच्छाशक्ति हो सदाचार की कुजी है, जिसमे इच्छावित नही, उसको इन्द्रियां वश मे मही, वह सदाचारी नहीं, संयमी नहीं । इच्छाशक्ति मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति है, इसी के सहारे जीवन के दुःख सुख कटते हैं । जीवन एक नौका है मद्य-निषेध :नशे का व्यसन ८६ जो पानी में डूबती और उतराती रहती है, इच्छाशक्ति ही उसका खिवैया है यह एक प्रकार की मानुषीय आशा और शक्ति का संवित सुरक्षित कोष है, यही उसका भाग्य है। अमेरिका के सरकारी अस्पताल के बड़े सर्जन कहते हैं---"तम्बाखू दिलेरी को कम करता है, शरीर को कमजोर बनाता है और खून को मुपाता है।" एक बार एक विद्यार्थी ने स्कूल में तम्बाखू खाना सीख लिया । गर्मी की छुट्टियां होने पर उसे अपने पिता के साथ दुकान पर शारीरिक परिश्रम का कार्य करना पड़ा । वह अब पक जाता था, तब पिताजी की नजर बचा कर थोड़ा तम्बाखू खा लेता था और फिर काम में लग जाता था। परिणाम यह हुआ कि वह प्रतिदिन पीला पड़ता गया और बीमार होकर खाट पर पड़ गया । पिता ने डॉक्टर को बुलाना चाहा, पर असली भेद खुल जाने के भय से उसने पिता को बारम्बार डॉक्टर लाने से रोका। जब वह मृत्यु समीप ही आ गया तब डॉक्टर ने आकर नब्ज देखी। उसकी शक्ति मर चुकी थी और दिल की चाल बढ़ गई थी। उसी शाम को उसका हार्ट फेल - हो गया। एक युवक महाशय एक कन्या को अपनी शादी के लिये देखने गये। वे सिगरेट बहुत पीते थे। कन्या के पास जाते समय उन्होंने अपनी जेबों को खूब झाड़ कर साफ कर लिया था और उनमे सेंट लगा लिया था कि कहीं सिगरेटो की गन्ध न रह जाय । कन्या सुशिक्षित थी और उसे किसी ने यह बात बता दी थी। उसके सामने जब युवक महाशय पहुंचे तो उसने उनके होठों को तीक्ष्ण दृष्टि से देखा। युवक ने होठों पर तुरन्त उगली फेरी और रूमाल से पोछ लिया। कन्या ने हंसकर कहा, "होठो को फ्लोस सिगरेट पीने के अभ्यास को नहीं छिपा सकती। और वह तुरन्त यहां से चली गई।" युपक महाशय को उस कन्या के न मिलने का कई वर्ष तक सैद रहा, क्योकि उससे विवाह हो जाने पर वे कलेक्टरी की उम्मेदवारी में आ सकते थे।
१० मद्य-निषेध:नशे का व्यसन : एक प्रसिद्ध शराबी व्यक्ति ने शराब और सिगरेट बिल्कुल छोड़ दी। जब उसके मित्रों ने इस पर आश्चर्य प्रकट किया तो उसने कहा, "इसमें आश्चर्य क्या है । मैंने हृदय से जब चाहा तय छोड़ दो, और मेरा विश्वास है कि मनुष्य अपनी इच्छा शक्ति से सब कुछ कर सकता है। परन्तु एक बात मेरे अनुभव मे आई कि शराब तो मुझ से अनायास ही छूट गई किन्तु सिगरेट छोड़ने में कठिनाई हुई। मैं सिगरेट को इतना कठिन नहीं समझता था। पर मैंने उस कष्ट को भी अपनी इच्छा शक्ति से सहन किया और वह भी त्याग दी। अब मैं मानों स्वतन्त्र हूं।" एक नवयुवक को सारे दिन सिगरेट पीने की बुरी लत थी, सिगरेट न मिलने से वह बेहोश होने लगता था। उसकी नव-विवाहिता सुन्दरी मे अपने पति से एक दिन कहा, "मैं आपके इस अभ्यास को पसन्द नहीं फरती, तुम्हारे पास आने से मुझे पपकर आने लगते हैं क्या तुम मेरे लिए सिगरेट नहीं छोड़ सकते?" युवक को अपनी पत्नी अति प्रिय थी, उसने उत्तर दिया कि "शायद मैं छोड़ सकूँगा।" उसने उसी समय से सिगरेट पीना बन्द कर दिया, पर उसे अत्यन्त कष्ट हुआ, वह बेहोशी में भी अपनी उंगलियों को होठों से लगाकर सिगरेट पीने का संकेत करता था, उसकी पत्नी ने द्रवित होकर सिगरेट मुलगा कर दे दी। पीते ही होश में आ गया। उसने पत्नी से कहा, तुम अब मुझे सिगरेट न देना, मुझे इतना तो विश्वास है कि मैं मरूंगा नहीं और यो चाहे जितना कष्ट सहने के लिए में तैयार हूं। कदाचित तुम्हारे प्रेम वश ही मैं इस लत से स्वतन्त्र हो सकू। तीन महीने तक वह सिगरेट से संघर्ष करता रहा, उसे खांसी उठने लगी, कफ गिरने लगा, स्नायु मण्डल सुन्न हो गया, प्रत्येक समय बेहोशी और आंखो के आगे अंधेरा रहने लगा। उमके मागे संसार के भूतं प्रेत सिगरेट से लेकर नाचने और उसे पेश करने लगे। जब उसने सिगरेट पीना भारम्भ किया पातव भी उसे इसी प्रकार के उपद्रय सहने पड़े थे। पर उसे सदैव अपनी प्रिय पत्नी का ध्यान रहता था, परोक्ष में भी उसे अपनी पत्नी की मपुर और मुस्कराती मूर्ति सिगरेट न पीने का आदेश करती हुई दोष मद्य-निषेध : नशे का व्यसन ६१ पड़ती थी। उसे कुछ भी नहीं सूझता था, उसकी कुछ भी अभिलापान थी, वह केवल अपनी पत्नी की इच्छा को पूरी करना चाहता था। अन्त में एक दिन उसे प्रातःकाल सोकर उठते ही बहुत शांति का अनुभवहुआ। उसने अपनी पाशविक वृत्ति पर विजय पा ली थी। उसका सिगरेट पीना सर्वया के लिये छूट गया। इस पटना से हम प्रत्येक स्त्री के आकयंग में सुधार की आशा करते हैं। एक बार एक किसान ने कहा कि मेरे शरीर में तम्बाखू का इतना अधिक असर हो चुका है कि मेरे पास मच्छर और मक्खी नहीं आ सकते। वे मेरी शरीर गन्ध से दूर भागते हैं, और यदि वे मेरे शरीर से चुपट जायें तो मेरे पसीने से मर जायेंगे। डॉक्टर लोग तम्बाखू पीना दमे के लिए साभदायक बताते हैं। परन्तु इससे दमे की जड़ नहीं जाती। एक बार मेडिकल बोर्ड के निमन्त्रण पर इंगलैंड में तम्बाखू के दोषों पर एक निबंध लिखा गया जिस पर पांच सौ पोंड पारितोपिक दिया गया था। इस निबंध फा कुछ सार इस प्रकार है: १---तम्बाखू का प्रयोग अप्राकृतिक है, क्योंकि कोई भी नवचर पशु. इसे नहीं परता। २-पहले पहल जब मनुष्य इसे पीता है तो वह बीमार हो जाता है यदि वह पहले पहल किसी फल को खाये और चाहे वह फल उसे रुचिकर न भी हो तब भी वह उसके खाने से बीमार नहीं होगा। ३--यह आनन्ददायक वस्तु नहीं है । आनन्ददायक वस्तु हानि नहीं करती। ४.---अकेले इंगलैंड में १२,०००,००० पौंड वार्षिक मूल्य का तम्बाकू, उहाया जाता है। और इसके साज सामान सहित, २०,०००,००० पौंड वार्षिक ध्यय होते हैं। ५-यह गन्दी आदत है। ९-यह दांतों को बिगाड़ देती है।
६२ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन .. ७. इससे अनेक रोग शरीर में प्रवेश करते हैं । यह शारीरिक विकास को रोक देता है । बचपन में खाने से स्वाद शक्ति जाती रहती है । सूंघने, सुनने और देखने की शक्ति भी कमजोर पड़ जाती है। गले मे पाय हो जाते हैं। दिल कमजोर हो जाता है । पाचन शक्ति बिगड़ जाती है । स्नायु- मण्डल छिन्न-भिन्न हो जाता है, हाथ कांपने लगते हैं । इच्छा शक्ति नष्ट हो जाती है । मनुष्य सशय और पशोपेश में पड़ा रहता है। मनुष्य भोज और स्मरग-शक्ति खोकर पशु के समान हो जाता है। पेट और होठो के नीचे नासूर हो जाते हैं। धूम्रपानी के घाव देर मे अच्छे होते हैं। यह समय को नष्ट करता है । इससे शराब पीने की इच्छा होती है। ८. इसके कारण मकानों में आग लग जाती है जिससे जन-हानि भी होती है। ६. तम्बाखू दिमाग को अचेत रखता है और मनुष्य लापरवाह हो जाता है। उपरोक्त विवरण निःसन्देह सत्य है । अमेरिका की प्रसिद्ध Harpers दुकान सिगरेट को राख झडने के कारण जलकर भस्म हो गई, जिसमे दो लाख पौंड की हानि हुई थी। दूसरा उदाहरण आग लगने का इससे भी भयानक है, इसमें ६ घर, २ जहाज और १०० से अधिक मनुष्य जलकर भस्म हो गये थे। जब हम तम्बाखू खाते हैं तब हमे बार-बार थूकना पड़ता है। यह थूक कहां से आया? मुंह मे लार का बहना ही पूक है । हम जब खाना आदि खाते हैं तब यह लार तुरन्त जीभ के नीचे ग्रन्थी में से निकल कर बहने लगती है और भोजन पचाती है। तम्बाखू खाने और थूकने से यह लार कम हो जाती है, इसी से अपच और भूख न लगने की शिकायत बनी रहती है । तम्बाखू खाकर हम कितना थूक देते हैं, जरा इस पर विचार तो करिये। खूब तंम्बालू खाने वाला एक दिन में ३ पिन्ट लार थूकता है। दूसरे डॉक्टर बतलाते हैं कि ६ महीने में थूकी हुई लार का वजन मनुष्य के अपने वजन के बराबर होता है। तीसरे डाक्टर कहते हैं ATM- - माय- निधनो का व्यसन कि जो मनुष्य प्रत्येक पांच मिनट में चाय के चम्मच पतिनाथूफता है, नई अपने शरीर से पचास वर्ष में टन शक्ति खो अमेरिका में सन् १९०० में प्रति वर्ष और १०००,३००,००० सिगरटें खर्च होती थीं। एक व्यक्ति खुब सिगरट पीता था और वह सुधारवादियों का मजाक उड़ाकर कहा करता था कि मैं इतनी पीता हूं फिर भी मुझे क्यों नहीं कुछ होता। एक दिन सुना गया कि उसे लकवा मार गया है, पहले उसको दष्टि जाती रही, फिर बोलना बन्द हो गया, फिर गर्दन मुड़नी बन्द हो गई, हाथ उठने बन्द हो गये, धीरे-धीरे सभी अंगो का संचालन बन्द हो गया और वह एक हो सप्ताह में मर गया। आखों के एक बड़े भारी विशेषज्ञ डॉक्टर का कहना है कि 'तम्बाखू आंखों का शत्रु है । यह आंखों को ले बैठता है और श्रवण शक्ति को कम फर देता है। यदि वे किसी भी अवस्था में पहुंच कर तम्बाखू त्याग दे तो उनका रोग अच्छा हो जाएगा। मिस्टर प्लाइमाऊथ इंगलैंड के प्रसिद्ध धकील थे, उन्होंने लगातार तीस वर्षों तक तम्बाखू खाया भी और पिया भी। उसको दृष्टि लगभग नष्ट हो चुकी थी और पिछले दस वर्षों से सिर मे गूंज मनी रहती पी। उनके मित्रों ने तम्बाकू छोड़ देने की प्रार्थना की। उनके बार-बार कहने पर उन्होंने तम्बाखू छोड़ दिया, परिणाम यह हुआ कि ६३ वर्ष की अवस्था में भी वे देखने और सुनने लगे। उनको शिकायतें मिट गई। सिगरेट और बोडी के कारखाने में काम करने वाले मजदूरों को अनेक ऐमे रोग लग जाते हैं । एक डॉक्टर का कहना है कि मेरे अस्पताल मे ऐसे अनेक केस आते हैं। उन कोआराम होने में साधारण रोगियों की अपेक्षा पूना समय लगता है। एक बार एक सिगरेट के कारखाने से पचास मजदूर एक अचानक बीमारी हो जाने के कारण अस्पताल में लाए गये। पता चला कि सिगरेट का मन्तिम फिनिश देते समय (जो उन्हें दात और जीभ के द्वारा करना पड़ता था)उन सबको एक-मा ही अछुत ज्वर हो गया था।
.६४ मद्य-निषेधः नशे का व्यसन जर्मनी में एक कारखाने में काम करने वाले व्यक्ति पीले और कमजोर बने रहते है। उनमें से दस प्रतिशत बूढ़े होते होगे नहीं तो शेष वृद्धावस्था आरम्भ होने से पहले ही मर जाते हैं। स्त्रियों को आयु आधी ही रह जाती हैं। इन परिणामों से हमे जान लेना चाहिए कि जिस वस्तु के कारखाने में इस प्रकार की तकलीफें होती हैं उस वस्तु में अवश्य ही दोप है । गठिया और मृगी तम्बाखू के अवश्यम्भावी परिणाम है। तम्बाखू से आवाज खरखरी और भारी हो जाती है। संगीत के प्रेमी गवैये न तम्बाखू खाते हैं, न ही पीते हैं । मधुर कण्ठ वाले प्रसिद्ध गर्वये तम्बाखू से बचे रहते हैं। एक आदमी के मुह में हर समय सिगरेट लगी रहती थी। कई वर्ष व्यतीत हो गये परन्तु उसके सेवन में कमी नहीं हुई। एक दिन वह सहक पर चलते-चलते गिर पड़ा। यह छाती पर हाथ रखे हुए या और चिल्लाता था। लोगों ने देखा कि कपड़ो के नीचे एक भारी फोड़ा हो रहा है। उसके विप ने इस समय उसे अचेत और अशक्त बना दिया था। उसे अस्पताल ले गये पर पहुंचते ही वह मर गया। तम्बाखू खाने, पीने और संपने का एक ही अर्थ है, हल्का नशा होना। इसीलिए इसका व्यवहार किया जाता है। परन्तु यह प्रत्येक अवस्था में स्नायुमण्डल को निर्बल और सुस्त कर देता है। रक्त का प्रवाह ठीक- ठीक नहीं बहता । पसीने निकलने के छिद्र बन्द हो जाते हैं, मल अंतड़ियों में चिपक जाता है। जब शरीर में मल पदार्प और अशुद्ध पानी रुकने लगेगा तो अवश्य कोई रोग उत्पन्न होगा। बहुत से व्यक्ति भोजन के बाद तम्बाखू पीते हैं जिससे वे समझते हैं कि भोजन के पचने में सहायता मिलती है। परन्तु वास्तव में यह बात नहीं है। यह नसों को केवल गरमा देता है, जिससे अंतड़ियां खाक हो जाती हैं और मल को बाहर फेंकने में अशक्त हो जाती हैं। एक परिवार में तम्बाखू का बहुत ही प्रचार था, छोटे बड़े सभी मद्य-निषेध : नशे का व्यसन सगे। बड़ा लड़का एक दिन घोड़े पर घूमने जा रहा था, हाथ में सिगरेट पी कि दौरा आ गया और गिर पड़ा, गिरते ही मर गया । गृहपति जिसकी अवस्था चालीस के लगभग यो, दौरे में ही मरा। स्कूल में पढ़ने वाले सड़कों को भी मलास में बैठे-बैठे दौरे मा जाते थे। एक बार एक सहके फो दौरा माया, मास्टर ने इसकी जांच की तो देखा कि मुंह में तम्बाखू भरा हुआ है। उसे बहुत मना किया गया परन्तु तम्बाखू नहीं छोड़ा। भरी जवानी में चौबीस वर्ष का होकर वह भी मर गया। एक पालियामेंट के सदस्य बहुत ही प्रतिष्ठित थे, उनकी बहुत धाक जमी हुई थी, किन्तु चालीस वर्ष की अवस्था तक पहुंचते-पहुंचते उनका रंग फीका पड़ गया, उनमें न पहले जैसा भोज था, न वाकपटुता, न चुस्ती। वे बन्द कमरे में पड़े सिगरेट फूका करते थे। डॉक्टर ने परीक्षा करके कहा कि तुम सिगरेट छोड़ दो तो बच जाओगे। पर उन्होंने कहा, कि मैं सिग- रेट के बिना ही मर जाऊँगा। अन्त में वे बेहोश और पागल होकर मर गये। एक मोर सम्भ्रान्त व्यक्ति सिगरेट पीते-पीते पागल हो गये थे, वे रात को छत पर चढ़कर चिल्लाते, 'परमारमा मुझे यह क्या हो गया?'एक दिन उन्हें आवाज माई 'तम्बापू । तम्बाकू । तम्बाख. उस दिन से उन्होंने तम्बाखू छोड़ दिया और वे अच्छे हो गये। एक युवक ने विवाह किया, और विवाह-शनि से ही धीमार रहने लगा, उसे हृदय रोग, मृगी, उन्माद, हिस्टीरिया जैसे दौरे आने लगे । स्त्री ने समझा कि मेरे कारण ही ये रोगी हुये हैं, उसने डरते-डरते पति से कहा, आप किसी अच्छे डॉक्टर को दिवाइये न । पति ने एक मामूली वैद्य से अपनी परीक्षा कराई । उसने रोग को भली-भांति न समझ कर कहा, 'मुझे तम्बापू की गंध आती है क्या तुम्हें किसी ने विप दिया है ? युवक समझ गया। उसने उसी दिन से तम्बाखू पीना छोड़ दिया । और शीघ्र ही स्वस्थ हो गया। एक प्रोफेसर साहब को गांव में रात बितानी पड़ी, वे जिस कमरे मैं सौर्य उसमें गृहपति ने रात भर हक्का गुडगुड़ाया। प्रातः होने पर उसने - ६६ मद्य-निषेध : नशे का व्यसन देखा कि मेहमान उठते ही नहीं है । उन्हें बहुत हिलाया डुलाया गया, पर वे न उठे। लोगों ने समझा मर गये। दौड-धूप मच गई। गांव मे एक वैद्य रहते थे वे आये, उन्होने नाड़ी देखी और कहा, 'गड़बड़ मत करो' अभी मरे नहीं हैं।' पर वे बेहोशी का कारण न समझ सके । उन्हें कमरे से निकाल कर नीम के पेड़ो की छाया मे खुली हवा में रखा गया। थोड़ी देर मे उनकी मु. जाती रही। उन्हे अपने कण्ठ में कड़वी चीज अटकी. सी जान पडी। उन्होने कई वार जोर लगाकर खकार थूकी तो काला धुआं निकला। और जीभ पर तम्बाखू का स्वाद मालूम पड़ा। उन्होने पूछा कि मेरे कमरे मे रात कौन सोया था, गृहपति ने कहा कि मैं ही था, मैं रात मे कई वार हुक्का पीने उठा था, पर किसी गैर आदमी को अन्दर नही पाया। प्रोफेसर साहब खिलखिलाकर हंस पड़े और बोले-'बस- वस, तम्बाखू से मुझे बेहद घृणा है । मैं इमी के धुएं से वेहोश हुआ था।' इसके विषैले धुएं का परिणाम अवश्य ही भयानक है । अब आप कल्पना कीजिए कि यदि कोई बच्चा दस वर्ष की अवस्था तम्बापू पीने लगे तो पांच वर्ष बाद उसके कलेजे मे कितना विष जम जायेगा और उगको दस वर्ष बाद क्या दशा होगी । वह निश्चय ही पागल और मूढ बुद्धि हो जायेगा । परीक्षण करने से ज्ञात हुआ कि तम्बाखू सेवन करने वालो पर टाइफाइड ज्वर और हैजे का शोघ्र प्रभाव होता है। एक रियासत के प्रधान मन्त्री टाइफाइड से बीमार हुए और छः महीने तक स्वस्य न हो सके। डॉक्टरो ने कहा आप योरोप जाइये और सिगरेट न पीने का प्रण करिये । मन्त्री महोदय योरोप गये परन्तु उन्होने तम्बाखू पीना न छोड़ा। वे बिना पिये वेचन होने लगते थे परिणाम यह हुआ कि वे वहां जाकर और भी अशक्त हो गये। डॉक्टरों ने समझाया और तम्बाखू को हानि बतलाने के लिए पुस्तकें पढने को दी पर वे न माने । आखिर डॉक्टरों ने उनकी चिकित्सा बन्द कर दी और वे और भी रोगी होकर भारत लौट आये। तम्बाखू पीने से समप भी कितना व्यर्थ जाता है यह भी सोचिए।
मद्य-निषेध : नशे का व्यसन दो घण्टे नित्य ही इस काम मे पर्ष हों तो एक वर्ष में ६० दिन खर्च हुए। दस वर्ष में डेढ़ वर्ष वर्ष हुमा, पचास वर्ष में साढ़े सात वर्ष घ्यर्थ गंवाये गये, और आर्थिक व्यय का तो हिसाब और भी अधिक है। अमेरिका में एक व्यक्ति की अभी मृत्यु हुई है जो 75 सिगरेट नित्य पीता था। उसकी मृत्यु का कारण निकोटाइन विप था। मिस्टर मिम्स समस्त दुनिया का हिसाब लगाकर बतलाते हैं कि प्रति वर्ष 1000,000,000 रु. के तम्बाखू का सेवन किया जाता है। वंज्ञानिक आधार पर यह बात मानी गई है कि पीने और खाने दोनो क्रियाओं से प्यास लगती है। मुंह और गला खुश्क हो जाता है, और पानी पीने से भी प्यास कम नहीं होती। डॉक्टर हम्फे ने तम्बाखू का ध्या- पक प्रचार देख कर कहा था, "वन मानुष भी इसे खाना पसन्द नहीं करेगा, फिर ये बुद्धिमान आदमी इसे क्यों खाते हैं ? यह न तो पोषकतत्त्व है, न पाचक है, न मानसिक और शारीरिक शक्ति को बढ़ाने वाला है, यह तो हमारा प्रबल शत है जो नसों को काट डालता है- पेट को नष्ट कर डालता है, प्यास को बढ़ाता है।" जिस भूमि में तम्बाल को सेती होती है वह शीघ्र ही शक्तिहीन हो जाती है, उसमे उर्वरा शक्ति नहीं रहती। इसीलिए जहां पहले तम्बाखू के खेत लहलहाया करते थे। वे भू भाग भव सुखे बंजर पड़े हैं, क्योंकि ताबाखू के विप ने उनका सत्यानाश कर हाला है । जो व्यक्ति तम्बाखू खाता और घुकता है वह अपने इर्द-गिर्द ६० फीट तक तम्बाखू को गन्ध फैलाता है। x "दारू, भाग की तरह तम्बाखू भी खराब है। जो शराब को खराब मानता है, वह सिगरेट, तम्बाखू कैसे पी सकता जानशून्य हो जाते हैं। वे बिना आज्ञा के दूसरों के घरों में तम्बाखू पीते जग भी नहीं शमति।" - महात्मा गांधी "चुरुट, तम्बाखू पीने से बुद्धि नष्ट होकर मनुष्य की अधर्म में प्रवृत्ति x x । तम्बाखू पीने वाले
मद्य निषेध : नशे का व्यसन
हो जाती है। यह एक ऐसा नशा है, जो कई अंशो में शराव से भी बुरा
--टाल्सटाये
"तम्बाखू पीने से हाजमा सुधरता है, यह विचार बिल्कुल गलत है।
ऐसे हजारों रोगी आते हैं जिनकी पाचन शक्ति तम्बाखू के व्यसन से
विगड़ गयी है।"
- डॉक्टर मसी
"तम्बाखू, शराब, चाय आदि नशीली और विषली चीजो में शरीर
को पोषण करने वाला गुण जरा भी नहीं है । कमजोरी और अकाल मृत्यु
के सिवा और कोई नतीजा इससे नहीं होता।" डापटर टी०१० निकोलस
"तम्बाखू से शरीर के भीतरी भाग विगड़ कर सूज जात हैं। यह
भयकर विप है इसमें जरा भी सन्देह नहीं।"
ऑक्टर अल्माट
को ५० वर्ष तक जीना हो, वह तम्बाखू पोने के कारण
४० वर्ष ही जियेगा.'
--डाक्टर शाप
-
"जिस पुरुष
No text on this page.
No text on this page.