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आर्याभिविनय

Svaamii Dayaananda Sarasvatii · 2005/11/26

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ओ३म्ह ।
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प्रार
भविनयः॥
niroin
بيعي
OYOOYOOYCOY YOOY
प्राकृतभाषानुवादसहितः
श्रीमद्दयानन्द सरस्वतीस्वामिना निर्मितः
सर्वलोकहिताय
अजमेरनगरे
वैदिकयन्त्रालये
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मुद्रितः
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संवत् १९६१
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आठवीवार
१०००
{ मूल्य 1)
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पृष्ठ २१ ३२ प्रतीक अग्निमीळे पुरो अग्निना रयिमन अग्निः पूर्वेभिः স্থানীয় স্কাৰ০ अतो देवा अवन्तु अदितिर्धारदिति अग्नेव्रतपत व्रतं० अहानि शं भवन्तु आयुर्यजेन कल्पतां० आवद॑स्त्वं शकुने इन्द्री विश्वस्य राजति इदं में ब्रह्म च क्षत्रं इषे पिन्वस्व० उद्गातेत्र शकुने उशिगसि कविः० उपहना इह गाव कों नः पाह्यहमो० जुनीती नो वरुणो० ऋषिर्हि पूर्वजा० ऋचं वाचं प्रपग्रे० कि स्विदासी० कि स्विद्धनं क उ० गणानान्त्वा गण० गयस्फानी अमी० चतुःस्रक्ति भि. जातवेदसे सुनवाम अकारादिक्रमण मन्त्रानुक्रमणिका। पृष्ठ प्रतीक ९ स्वमा पारे रजमो. ११ त्वं सोमासि सत्पतिः १२ त्वं नः सोम विश्वतो. १३ तद्विष्णोः परमंपदं० १९ त्वमसि प्रशस्यो तन्न इन्द्रो वरुणो. त्वं हि विश्वतो मुग्व० १०४ तमीळत प्रथमं० २३ तमतयोरणयन्० ६७ तदेवाग्निस्तदादित्य १०४ ! तदंजति तन्नजति १४४ : तनूपाअग्नेऽसि० ११४ तच्चक्षुर्देवहितंपुर ६७ , तमीशानं जगत २८ । तमीशानं जगत. १३८ | तेजोऽमि तंजोमणि २५ । यौः शान्तिरन्तरि० २६ देवकृतस्यैनस० देवो देवानामसि० ८१ । देवो न यः पृथिवीं. ११६ दृते दृछह मा० १२० न यस्य यावा. १३३ न यस्य देवा देवता ५० नमः शंभवायच० १२६ न तं विदाथ य इमा० ४५ / नेह भद्रं रक्षस्विने ११७ १८ १३९ ८७ १०७ २३ ४४ १०८ प्रतीक ४२ ८८ १५ २० ११८ १२४ ८५ ४३ ६ (२) पृष्ठ प्रतीक ३६ वसुर्वसुपतिर्हि. वयं जयेम त्वया० १०६ वायवायाहि दर्श० १३ विजानीयार्यान विष्णाः कर्माणि पश्यतः १७ विभूरासि प्रवाहणः० ११० विश्वतश्चक्षुरुन ८९ विश्वकर्मा विमना० १०९ वेदाहमतं पुरुषं० ११९ वैश्वानरस्य सुमता० १३२ शं नो मित्रः शं वरुणः० १४० शंनो भगः शम् नः ६४ शं नो वातः पवता. ६५ स्थिरा वः सन्त्यायुधा स वनमृद्दस्यहा० स पूर्वगा निविदा १४३ सह नाववत् सह नौ० १४ म पर्षगाच्छुक्रमकाय स नो बन्धुनिता० स नः पितेव मूनवे० ११३ समुद्रोऽसि विश्वव्यचा. १२३ सदमस्पतिमद्भुतं० १२० सामा सत्योक्तिः परि० १३६ सुमित्राया न आप० १२२ सेमं नः काममापृण. १४२ सोम गीभिष्ट्वा १२७ सोमरारन्धिनो हृदि ५६ हिरण्यगर्भः सम० पराणुदस्बमघवन्. परीत्य भूतानि परीत्या प्रतद्वाचंदमृतं० पावका नः सरस्वती पाहि नो अग्ने० पुरूतम पुरूणा ब्रह्म जज्ञानं प्रथमं. भग प्रणतर्भग सत्य भद्रं कर्णेभिः शृणु० भूभुवः स्वः सुप्रजा० भग एव भगवां० मशीदमिन्द्र इन्द्रियं० मा नावधीरिन्द्रमा मा नो महान्तमुत० मानस्ताक तनये मृळानो रुद्रो तनो. मेधां में वरुणा० यदङ्ग दाशुषे० यतो यतः समीहम० यस्मान्न जातः परो० य इमा विश्वा० यन्म छिद्र चक्षुषो० यजाग्रतो दूर० य आत्मदा बलदा० या ने धामानि पर० यां मां देवगणाः० यो नः पिता जनिता० यो विश्वस्थ जगतः० १०४ ७१ ८४ ६८ १४१ ४८ ४६ * ओ३म् * अथार्याऽभिविनयोपक्रमणिकाविचारः । सर्वात्मा सच्चिदानन्दोऽनन्तो यो न्यायक- च्छुचिः । भूयात्तमां सहायो नो दयालुः सर्वश- क्तिमान् ॥ १॥ चक्षुरामाङ्कचन्द्रेब्दे चैत्रेमासि सिते दले । दशम्यां गुरुवारेऽयं ग्रन्थारम्भः कृतो मयाः ॥ २॥ बहुभिः प्रार्थितः सम्यग्ग्र- न्थारम्भः कृतोऽधुना । हिताय सर्वलोकानां ज्ञानाय परमात्मनः ॥ ३ ॥ वेदस्य मूलमन्त्रा- णां व्याख्यानं लोकभाषया । क्रियते सुखबो- धाय ब्रह्मज्ञानाय सम्प्रति ॥४॥ स्तुत्युपास- नयोः सम्यक् प्रार्थनायाश्च वर्णितः । विषयो वेदमन्त्रैश्च सर्वेषां मुखवईनः ॥५॥ विमलं मुखदं सततं सुहितं जगति प्रततं तदु वेदगत- म् । मनसि प्रकटं यदि यस्य मुखी स नरास्ति सदेश्वरभागधिकः ॥ ६॥ विशेषभागी ह व २ आर्याभिविनयः ।। णोति यो हितं, नरः परात्मानमतीवमानतः । अशेषदुःखात्तु विमुच्य विद्यया, स मोक्षमा- नोति न कामकामुकः ॥ ७ ॥ व्याख्यान-जो परमात्मा, सब का आत्मा, सत् चित् अानन्दस्वरूप, अनन्त, अज, न्यायकारी, निर्मल, सदा पवित्र, दयालु, सब सामर्थ्यवाला हमारा इष्टदेव हे वह हमको सहाय नित्य देवे, जिस से महा कठिन काम भी हम लोग सहज से करने को समर्थ हों। हे कृपानिधे ! यह काम हमारा आप ही सिद्ध करनेवाले हो हम आशा करते हैं कि आप अवश्य हमारी का मना सिद्ध करेंगे ॥१॥ संवत् १६३२ मिती चैत्र सुदी १० गुरुवार के दिन इस ग्रन्थ का प्रारम्भ किया है ॥२॥ बहुत सज्जन लोग, सब के हितकारक धर्मात्मा विद्वान् विचारशील जनों ने मुझ से प्रीति से कहा तब सब लोगों के हित और यथार्थ परमेश्वरका ज्ञानतथा प्रेमभक्ति यथावत् हो इसलिये इस ग्रन्थका प्रारम्भकिया है ॥३॥ इस ग्रंथमें केवल दो वेदोंके मूल मन्त्रोंका प्राकृत भाषा में व्या- ख्यान किया है जिस से सब लोगों को सुखपूर्वक बोध हो और ब्रह्मज्ञान यथार्थ हो ॥ ४ ॥ इस ग्रन्थ में वेदमन्त्रों से सब सुखों की बढ़ाने वाली परमेश्वर की स्तुति प्रार्थना व उपासना तथा धर्मादि विषय का

,
प्राभिविनयः॥
वर्णन किया है ।।५।। जो ब्रह्म विमलमुखकारक, पूर्ण
काम, तृप्त, जगत् में व्याप्त, वही सब वेदों से प्राप्य है
जिस के मन में इस ब्रह्म की प्रकटता ( यथार्थ वि-
जान ) है वही मनुष्य ईश्वर के आनन्द का भागी है
और वही सब से सदैव अधिक सुखी है । ऐसे मनुष्य
को धन्य है ॥६॥ जो नर इस संसार में अत्यन्त प्रेम,
धर्मात्मा विद्या, सत्सङ्ग, सुविचारता, निर्वैरता, जितेन्दि-
यता, प्रत्यक्षादि प्रमाणों से परमात्मा का स्वीकार
(आश्रय ) करता है वही जन अतीव भाग्यशाली है,
क्योंकि वह मनुष्य यथार्थ सत्य विद्या से सम्पूर्ण दुः-
खों से छूटके परमानन्द परमात्मा की प्राप्ति रूप जो
मोक्ष उस को प्राप्त होता है और दुःखसागर से छूट
जाता है परन्तु जो विषय लम्पट, विचाररहित, विद्या,
धर्म, जितेन्द्रियता, सत्सङ्गरहित, छल, कपट, अभिमा-
न, दुराग्रहादि दुष्टतायुक्त है सो वह मोक्ष सुख को
प्राप्त नहीं होता क्योंकि वह ईश्वरभक्ति से विमुख है
॥ ७ ॥ इसलिये जन्म मरण ज्वरादि पीड़ाओं से
पीड़ित होके सदा दुःखसागर में ही पड़ा रहता है इस
से सब मनुष्यों को उचित है कि परमेश्वर और
उस की आज्ञा से विरुद्ध कभी नहीं हों किन्तु ईश्वर
तथा उसकी आज्ञा में तत्पर हो के इस लोक (संसार
व्यवहार ) और परलोक (जो पूर्वोक्त मोक्ष ) इन की
सिद्धि यथावत् करें यही मनुष्यों की कृतकृत्यता है ।
,

४ प्राभिविनयः॥ इस आर्याभिविनय ग्रंथ में मुख्यता से वेदमन्त्रों का परमेश्वर सम्बन्धी एक ही अर्थ संक्षेप से किया गया है, दोनों अर्थ करने से ग्रन्थ बढ़ जाता इससे व्यवहार विद्यासम्बन्धी अर्थ नहीं किया गया परन्तु वेदों के भाष्य में यथावत् विस्तारपूर्वक परमार्थ और व्यवहारार्थ ये दोनों अर्थ सप्रमाण किये जायगे जैसे ( तदेवाऽ- ग्निस्तदादित्यस्तद्वायुरित्यादि य० संहिता प्र०, इन्द्रं मित्रं वरुणमित्यादि० ऋ० सं०प्र० बृहस्पति ब्रह्म गणपति- वै ब्रह्म, प्राणो वै ब्रह्म, आपो वे ब्रह्म, ब्रह्मह्यग्निरित्या- दि शतपथ ऐतरेय ब्राह्मणादि० प्र० । और महान्तमेवा- मानमित्यादि. ) निरुक्तादि प्रमाणों से परब्रह्म ही अर्थ लिया जाता है । तथा मुखादग्निरजायतेत्यादि य० सं० प्र. वायोरग्निरियादि० ब्राह्मण प्र० तथा अग्नि- रग्रणीर्भवतीत्यादि निरुक्त प्रमाणों से यह प्रत्यक्ष जो रूप गुण वाला दाह प्रकाश युक्त भौतिक अग्नि वह लिया जाता है इत्यादि दृढ़ प्रमाण, युक्ति और प्रत्यक्ष व्यवहार से दोनों अर्थ वेदभाप्य में लिखे जायँगे जिस से सायणादिकृत भाष्य दोष और उस के अनुसार अंग्रेजी कृतार्थ दोष रूप वेदों के कलंक निवृत्त होजा- यँगे और वेदों के सत्यार्थ का प्रकाश होने से, वेदों का महत्त्व तथा वेदों का अनन्तार्थ जानने से मनुष्यों को महालाभ और वेदों में यथावत् प्रीति होगी। इस ग्रन्थ से तो केवल मनुष्यों को ईश्वर का स्वरूप ज्ञान ,

आराभिविनयः॥
और भक्ति, धर्मनिष्ठा, व्यवहार शुदि इत्यादि प्रयोजन
सिद्ध होंगे जिस से नास्तिक और पाखण्ड मतादि अ.
धर्म में मनुष्य न फसें । किञ्च सब प्रकार के मनुष्य
अति उत्तम हो और सर्वशक्तिमान् जगदीश्वर की कृपा
सब मनुष्यों पर हो । जिस से सब मनुष्य दुष्टता को
छोड़ के श्रेष्ठता को स्वीकार करें यह मेरी परमात्मा
से प्रार्थना है सो परमेश्वर अवश्य पूरी करेगा ।
इत्युपक्रमणिका संक्षेपतः सम्पूर्णा ॥
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ओ३म् तत् सत् परब्रह्मणे नमः ॥ अथार्याभिविनयः प्रारम्भः ॥ , ओं श नो मित्रः शं वरुणः शं नो भवत्वर्य- मा।शंनइन्द्रो वृहस्पतिःशं नो विष्णुरुरुक्रमः॥१॥ * ऋ० अ० १०६व० १८ मं० ९॥ व्याख्यान-हे सच्चिदानन्दानन्तस्वरूप, हे नित्यशुद्ध बुद्धमुक्तस्वभाव, हे अद्वितीयानुपमजगदादिकारण, हे अज निराकार सर्वशक्तिमन्, न्यायकारिन्, हे जगदीश, सर्वजगदुत्पादकाधार, हे सनातन, सर्वमङ्गलमय, सर्व- स्वामिन् , हे करुणाकरास्मत्पितः परमसहायक, हे स- निन्दप्रद, सकलदुःखविनाशक, हे अविद्यान्धकारनि- मूलक, विद्यार्कप्रकाशक, हे परमेश्वर्यदायक, साम्राज्य प्रसारक, हे अधमोडारक, पतितपावन, मान्यप्रद, हे विश्वविनोदक, विनयविधिप्रद, हे विश्वासविलासक, हे निरञ्जन, नायक, शर्मद, नरेश, निर्विकार, हे सर्वा- * यह संख्या इस भाग में सर्वत्र यथावत् जान लेना क्योंकि आगे केवल अङ्क संख्या लिखी जायगी। ऋ० १।६।१८ । ९॥ इनसे अष्टक अध्याय वर्ग मन्त्र जान लेना। , १ .

आग्र्याभिविनयः॥ हे , . न्तर्यामिन,सदुपदेशक, मोक्षपद, सत्यगुणाकर, नि- मल, निरीह, निरामय, निरुपद्रव, दीनदयाकर, परमसु- खदायक, हे दारिदयविनाशक, निर्वैरविधायक, सुनीति वर्धक, हे प्रीतिसाधक, राज्यविधायक, शत्रुविनाशक, हे सर्वबलदायक, निर्बलपालक, हे सुधर्मसुप्रापक, हे अर्थमुसाधक, सुकामवईक, ज्ञानप्रद,हे सन्ततिपालक, धर्मसुशिक्षक, रोगविनाशक, हे पुरुषार्थप्रापक, दुर्गुण नाशक, सिद्धिप्रद, हे सज्जनमुखद, दुष्टमुताड़न, गर्वकु- क्रोधकुलोभविदारक, हे परमेश, परेश, परमात्मन्, पर- ब्रह्मन् ! हे जगदानन्दक, परमेश्वर, व्यापक सूक्ष्माच्छे- द्य. हे अजरामृताभयनिर्बन्धनादे ! हे अप्रतिमप्रभाव, निर्गुणातुल, विश्वाद्य, विश्ववन्द्य, विद्वद्विलासक, इत्या- धनन्तविशेषणवाच्य, हे मंगलप्रदेश्वर ! आप सर्वथा सब के निश्चित मित्र हो, हमको सत्यमुखदायक सर्व दा हो, हेसर्वोत्कृष्ट, स्वीकरणीय, वरेश्वर ! आप वरुण अर्थात् सब से परमोत्तम हो, सो आप हम को परम सुखदायक हो, हे पक्षपातरहित, धर्मन्यायकारिन् ! आप अर्यमा, (यमराज) हो इस से हमारे लिये न्याय युक्त सुख देनेवाले अापही हो, हे परमेश्वर्यवन्, इन्द्रेश्वर आप हम को परमेश्वर्ययुक्त शीघ्र स्थिर मुख दीजि- ये । हे महाविद्यावाचोधिपते, हस्पते, परमात्मन् ! हम लोगों को ( वृहत ) सब से बड़े सुख को देनेवाले आप ही हो, हे सर्वव्यापक, अनन्त पराक्रमेश्वर, ८ आर्याभिविनयः ।। विष्णो! आप हमको अनन्त सुख देशोजोकुछ मागेंगे सो आप से ही हम लोग मागेंगे सब सुखों का देने- वाला आप के विना कोई नहीं है सर्वथा हम लोगों को आपका ही आश्रय है । अन्य किसी का नहीं क्योंकि सर्व शक्तिमान् न्यायकारी दयामय सब से बड़े पिता को छोड़ के नीच का आश्रय हम लोग कभी न करेंगे, आप का तो स्वभाव ही है कि अङ्गीकृत को कभी नहीं छोड़ते सो आप सदैव हमको सुख देंगे यह हमको दृढ़ निश्चय है ॥१॥ + प्रार्याभिविनयः॥ मूल मंत्र स्तुति विषय अग्निीले पुरोहितं यज्ञस्य देवमत्विजम् । होतारं रत्नधातमम् ॥ २॥ ऋ०१।।१।१॥ व्याख्यान-हे वन्द्येश्वराग्ने!आपज्ञानस्वरूपहोप्राप- की मैं स्तुति करताहूं,सब मनुष्यों के प्रति परमात्मा का यह उपदेश है, हेमनुष्यो ! तुम लोग इस प्रकार से मेरी स्तुति प्रार्थना और उपासनादि करो जैसे पिता वा गुरु अपने पुत्र वा शिष्यको शिक्षा करता है कि, तुम पिता वा गुरु के विषय में इस प्रकार से स्तुति आदि का वर्तमान करना वैसे सबके पिता और परम गुरु ईश्वर ने हमको कृपा से सब व्यवहार और विद्यादिपदार्थों का उपदेश किया है जिस से हम को व्यवहार ज्ञान और परमार्थ ज्ञान होने से अत्यन्त सुख हो जैसे सब का आदि कारण ईश्वर है वैसे परम विद्या वेद का भी आदि कारण ईश्वर है हे सर्वहितोपकारक ! आप पुरोहितम् ,, सब जगत् के हित साधक हो, हे यज्ञ देव ! सब मनुष्यों के पूज्यतम और ज्ञान यज्ञादि के लिये कमनीयतम हो “ ऋत्विजम् ” सब ऋतु वसन्त आदि के रचक, अर्थात् जिस समय जैसा सुख चा- हिये उस सुख के सम्पादक आप ही हो "होतारम् ,, आर्थ्याभिविनयः॥ सब जगत् को समस्त योग और क्षेम के देने वाले हो और प्रलय समय में कारण में सब जगत्का होम करने वाले हो “रत्नधातमम्, रत्न अर्थात्रमणीय ए- थिव्यादिकों के धारण रचन करने वाले तथा अपने सेवकों के लिये रत्नोंके धारण करने वाले एक आप हीहो। हे सर्वशक्तिमन्परामात्मन् ! इसलिये मैं बारंबार आपकी स्तुति करता हूं इसको आपस्वीकार कीजिये जिससे हमलोग आपके कृपापत्र होके सदेव आन्द में रहें ॥२॥ -- -- ११ पाराभिविनयः॥ →मूल प्रार्थना अग्निना रयिमश्नवत्पोषमेव दिवे दिवे । यशस वीरवत्तमम् ॥ ३ ॥ ऋ०१।१।३॥ व्याख्यान-हे महादातः, ईश्वराग्ने ! आप की कृपा से स्तुति करने वाला मनुष्य " रयिम् ,, उस विद्यादि धन तथा सुवर्णादि धन को अवश्य प्राप्त होता है कि जो धन प्रतिदिन "पोषमेव ,, महापुष्टि करने और स- कीर्ति को बढ़ाने वाला, तथा जिस से विद्या, शोर्य, धैर्य, चातुर्य, बल, पराक्रम और दृढांग धर्मात्मा, न्या. पयुक्त, अत्यन्त वीरपुरुष प्राप्त हों, वैसे सुवर्ण रत्नादि तथा चक्रवर्तीराज्य और विज्ञानरूप धन को मैं प्राप्त होऊं तथा श्राप की कृपा से सदेव धर्मात्मा होके अ. त्यन्त सुखी रहूं ॥३॥ , आयाभिविनयः ॥ → मूल स्तुति अग्निः पूर्वेभिऋषिभिरीड्यो नूतनैमत । स देवाँ एह वक्षति ॥४॥ ऋ० १।१।१।२॥ व्याख्यान-हे सब मनुष्यों के स्तुति करने योग्य ! ईश्वराग्ने ! "पूर्वभिः ,, विद्या पढ़े हुए प्राचीन "ऋषि- भिः ,, मन्त्रार्थ देखने वाले विद्वान् और "नूतनैः, वेदा- र्थ पढ़ने वाले नवीन ब्रह्मचारियों से “ ईड्यः ,, स्तुति के योग्य “ उत ,, और जो हम लोग मनुष्य विद्वान् वा मूर्ख हैं उन से भी अवश्य आप ही स्तुति के योग्य हो सो स्तुतिको प्राप्त हुये आप हमारे और सब संसार सुख के लिये दिव्यगुण अर्थात् विद्यादि को कृपा से प्राप्त करो, आप ही सब के इष्टदेव हो ॥४॥ के →io

भार्याभिविनयः॥
सत्यः
अमूल स्तुति
अग्निहोता कविक्रतुः मृत्यश्चित्रश्रवस्तमः ।
देवो देवेभिरागमत् ॥५॥
ऋ० १।१।१।५॥
व्याख्यान हे सर्वक् ! सब को देखने वाले
क्रतुः ,, सब जगत् के जनक अविनाशी
अर्थात् कभी जिनका नाश नहीं होता "चित्रश्रवस्तमः,
आश्चर्यश्रवणादि अाश्चय्यगुण आश्चर्यशक्ति प्रा.
श्चर्य्यरूपवान् और अत्यन्त उत्तम आप हो जिन आप
के तुल्य वा श्राप से बड़ा कोई नहीं है, हे जगदीश !
देवेभिः ,, दिव्यगुणों के सह वर्तमान हमारे हृदय
में आप प्रकट हो सब जगत् में भी प्रकाशित हों जिस
से हम और हमारा राज्य दिव्यगुणयुक्त हो वह राज्य
आप का ही है हम तो केवल आप के पुत्र तथा भृ.
त्यवत हैं ॥ ५॥

याभिविनयः॥ *मूल प्रार्थना यढङ्ग दाशुषे त्वमग्ने भद्रं करिष्यसि । तवेत्तत्सत्यमगिरः ॥६॥ ऋ० १।१।२।१॥ व्याख्यान-हे “ अङ्ग ,, मित्र ! जो आपको प्रा- त्मादि दान करता है, उसको भदं , व्यावहारिक और पारमार्थिक सुख अवश्य देते हो, हे “अंगिरः प्राणप्रिय ! यह आप का सत्यव्रत है कि स्वभक्तों को परमानन्द देना, यही आपका स्वभाव हमको अत्यन्त सुखकारक है आप मुझ को ऐहिक और पारमार्थिक इन दोनों सुखों का दान शीघू दीजिये जिस से सब दुःख दूर हों, हम को सदा सुख ही रहे ॥६॥ " cole- भाभिविनयः॥ १५ → मूल स्तुति वायवायाहि दर्शतेमे सोमा अरड्कृताः। तषां पाहि श्रुधी हव॑म् ॥७॥ ०१।१।३।१॥ व्याख्यान-हे अनन्तबल परेश वायो दर्शनीय ! आप अपनी कृपा से ही हम को प्राप्त हो हम लोगों ने अपनी अल्पशक्ति से सोम (सोमवल्यादि ) ओष- धियों का उत्तम रस सम्पादन किया है और जो कुछ भी हमारे श्रेष्ठ पदार्थ हैं वे आप के लिये “ अरङ्क- ताः , अलङ्कृत अर्थात् उत्तम रीति से हमने बनाये हैं, और वे सब आप के समर्पण किये गये हैं उनको आप स्वीकार करो (सर्वात्मा से पान करो) हम दीनों की दीनता सुनकर जैसे पिता को पुत्र छोटी चीज़ समर्पण करता है, उस पर पिता अत्यन्त प्रसन्न होता है, वैसे आप हम पर होओ॥७॥ + १६ र्याभिविनयः॥ मूल प्रार्थना पावका नः सरस्वती वाजेभिर्वाजिनीवती। यज्ञं वैष्टु धियां वसुः॥८॥ ऋ० १।१।६।१०॥ व्याख्यान-हे वाक्पते ! सर्व विद्यामय ! हम को आप की कृपा से “ सरस्वती ,, सर्वशास्त्रविज्ञानयुक्त वाणी प्राप्त हो “ वाजेभिः , तथा उत्कृष्ट, अनादि के साथ वर्तमान “वाजिनीवती,, सर्वोत्तम क्रिया विज्ञान युक्त “ पावका ,, पवित्रस्वरूप और पवित्र करनेवाली सत्यभाषणमय मङ्गलकारक वाणी आप की प्रेरणा से प्राप्त होके आप के अनुग्रह से परमोत्तम बुद्धि के साथ वर्तमान “वसः ,, निधिस्वरूप यह वाणी “यज्ञं वष्टु सर्वशास्त्रबोध और पूजनीयतम आप के विज्ञा- न की कामनायुक्त सदैव हो, जिस से हमारी- सब मू. र्खता नष्ट हो और हम महापाण्डित्य युक्त हो ॥ ८॥ में प्रार्याभिविनमः ॥ हैं मूल स्तुति पुरूतमै पुरूणामीशानं वाऱ्यांणाम् । इन्द्रं सोमे मचा मुते ॥ ९॥ ऋ० ०१।१।९।२॥ व्याख्यान-हे परात्पर परमात्मन्!प्राप"पुरूतमम्, अत्यन्तोत्तम और सर्वशत्रुविनाशक हो तथा बहुविध जगत् के पदार्थों के ईशान ( स्वामी ) और उत्पादक हो" वार्याणाम् ,, वर.वरणीय, परमानन्द मोक्षादि प- दार्थों के भी ईशान हो “सोमे,, और उत्पत्तिस्थान सं- सार आप मे उन्नप होने से “इन्द्रम् .. परमेश्वर्यवान आप को ( अभिप्रगाय ) हृदय में अत्यन्त प्रेम से गावै ( यथावत् ) स्तुति करें जिस से आप की कृपा से हम लोगों का भी परमेश्वर्य बढ़ता जाय, और परमानन्द को प्राप्त हों ॥॥ → -- १८ आग्र्याभिविनमः ॥ → मूल प्रार्थना:- तमाशानं जगतस्तस्थुषस्पति धियं जिन्व- मवसे हूमहे वयम् । पृषा नो यथा वेदसामसद्- वृधे रक्षिता पायुरदब्धः स्वस्तये ॥ १० ॥ ऋ० १।६।१५।५॥ व्याख्यान हे सर्वाधिस्वामिन् ! आप ही चर और अचर जगत् के ईशान (रचने वाले ) हो “धियं जिन्व- म्" सर्वविद्यामय विज्ञानस्वरूप बुद्धि को प्रकाशित क- करने वाले प्रीणनीयस्वरूप " पूषा ., सब के शेषक हो. उन अापका हम " नः, अवसे ,, अपनी रक्षा के लिये “हूमहे,, अाह्वान करते हैं “यथा,, जिस प्रकार से आप हमारे विद्यादि धनों की वृद्धि वा रक्षा के लिये अदब्धः, रक्षिता ,, निरालस रक्षा करने में तत्पर हो वैसे ही कृपा करके आप “स्वस्तये,, हमारी स्वस्थता के लिये "पायुः,, निरन्तर रक्षक (विनाशनिवारक)हो श्राप से पालित हमलोग, सदेव उत्तम कामों में उन्नति और अानन्द को प्राप्त हों ॥१०॥ " १९ प्राणाभिविनयः॥ * मूल स्तुति :- अतो देवा अवन्तु नो यतो विष्णुर्विचक्रमे । पृथिव्याः सप्त धामभिः ॥ ११ ॥ ऋ० १।२।७।१६॥ व्याख्यान-हे "देवाः .. विद्वानो! " विष्णुः .. सर्वत्र व्यापक परमेश्वर ने सब जीवों को पाप तथा पुण्य का फल भोगने और सब पदार्थों के स्थित होने के लिये, पृथिवी से लेके सप्तविध लोक "धामभिः ., अ- र्थात् ऊंचे नीचे स्थानों से संयुक्त बनाये तथा गायत्र्या- दि सात छन्दों से विस्तृत विद्यायुक्त वेद को भी बना- या उन लोकों के साथ वर्तमान व्यापक ईश्वर ने “यतः, जिस सामर्थ्य से सब लोकों को रचा है "अतः, (सा- मर्थ्यात् ) उस सामर्थ्य से हम लोगों की रक्षा करे । हे विद्वानो ! तुम लोग भी उसी विष्णु के उपदेश से हमारी रक्षा करो, कैसा है वह विष्णु ? जिस ने इस सब जगत् को “ विचक्रमे ,. विविध प्रकार से रचा हे उस की नित्य भक्ति करो ॥ ११ ॥ ole- आर्याभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना - पाहि नो अग्ने रक्षसः पाहि धूर्तेराव्णः । पाहि रीपत उत वा जिघाँसतो हेदानो यविष्ठ्य ॥१२॥ ऋ० १।३।१०। १५॥ व्याख्यान-हे सर्वशत्रुदाहकाग्ने परमेश्वर ! राक्षस हिंसाशील दुष्टस्वभाव देहधारियों से “नः.. हमारी “पा- हि., पालना करो" धूर्तेरराव्णः ,, कृपण जो धूर्त उस मध्य से भी हमारी रक्षा करो जो हम को मारने लगे तथा जो मारने की इच्छा करता है, हे महातेज बलवत्तम ! उन सब से हमारी रक्षा करो ॥१२॥ → -Dficies-

आरभित्रिय
२१
→ मूल स्तुति
त्वमस्य पारे रजसो व्योमनः
अवसे धृषन्मनः।
चकुषे भूमिप्रतिमा नमोजसोऽपः स्वः
परिभूरेष्या दिवम् ॥ १३ ॥
ऋ० १।४।१४। १२॥
व्याख्यान-हे परमैश्वर्यवन् परमात्मन् ! आकाश
लोक के पार में तथा भीतर अपने ऐश्वर्य और बलसे
विराजमान होके दुष्टों के मन को धर्षण तिरस्कार क-
रते हुए सब जगत् तथा विशेष हम लोगों के “अवसे,
सम्यक् रक्षण के लिये “त्वम् ,, आप सावधान हो रहे
हो, इस से हम निर्भय हो के अानन्द कर रहे हैं कि-
ञ्च "दिवम् ,, परमाकाश “भूमिम् ,, भूमि तथा “स्वः,,
सुख विशेष मध्यस्थ लोक इन सबों को अपने साम-
र्थ्य से ही रच के यथावत् धारण कर रहे हो “परिभूः
एषि,, सब पर वर्तमान और सबको प्राप्त हो रहे हो
"आदिवम् ,, द्योतनात्मक सूर्यादि लोक "आपः ,,
अन्तरिक्षलोक और जल इन सब के प्रतिमान (प-
रिमाण ) कर्ता आप ही हो, तथा अाप अपरिमेय हो,
कृपा करके हम को अपना तथा सृष्टि का विज्ञान दी-
-
जिये ॥१३॥

२२
आग्र्याभिविनयः॥
* मूल प्रार्थना
विजानीद्यार्यान् यच दस्यवो बर्हिष्मते रन्धया
शासंदवतान् । शाकी भव यजमानस्यचोदिता वि-
श्वत्ता ते सधमादेषु चाकन॥१४॥ऋ०१।४।१०।८॥
व्याख्यान-हे यथा योग्य सब को जानने वाले
ईश्वर ! आप “आर्यान् , विद्या धर्मादि उत्कृष्ट स्व.
भावाचरणयुक्त पार्यों को जानो “ये च दस्यवः, और
जो नास्तिक, डाकू, चोर, विश्वासघाती, मूर्ख, विपयल-
म्पट, हिंसादिदोषयुक्त उत्तम कर्म में विघ्न करने वाले,
स्वार्थी, स्वार्थसाधन में तत्पर वेद विद्या विरोधी, अना-
र्य ( अनाड़ी ) मनुष्य “ बहिष्मते ,, सर्वोपकारक यन
के विध्वंस करने वाले हैं इन सब दुष्टों को श्राप “र-
न्धय , (समूलान् विनाशय ) मूलसहित नष्ट कर दी.
जिये और “शासदव्रतान् ,, ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्र-
स्थ, संन्यासादि धर्मानुष्ठानव्रतरहित वेदमार्गोच्छेदक
अनाचारियों को यथायोग्य शासन करो ( शीघ्र उन
पर दण्ड निपातन करो) जिससे वे भी शितायुक्त हो
के शिष्ट हों अथवा उनका प्राणान्त हो जाय किं वा
हमारे वश में ही रहें "शाकी ,, तथा जीव को परम
शक्तियुक्त शक्ति देने और उत्तम कामों में प्रेरणा करने
वाले हो आप हमारे दुष्ट कामों से निरोधक हो मैं
भी “ सधमा० ,, उत्कृष्ट स्थानों में निवास करता हुआ
"विश्वेत्ता ते, तुम्हारी आज्ञानुकूल सब उत्तम कम्मों
की “चाकन,, कामना करताहूं सो आप पूरी करें॥१४॥

आराभिविनयः॥ → मूल स्तुति - न यस्य द्यावापृथिवी अनु व्यचो न सिन्ध- वो रजसो अन्तमानशुः । नोत स्वष्टिं मर्दै अस्य युध्यत एको अन्यच्चकृषे विश्वमानु- षक॥ १५॥ ऋ०१।४। १४ । १४॥ व्याख्यान-हे परमैश्वर्ययुक्तेश्वर! आप इन्द्र हो हे मनुष्यो ! जिस परमात्मा का अन्त इतना है यह न हो उसकी व्याप्ति का परिच्छेद (इयत्ता) परिमाणा कोई नहीं कर सक्ता, तथा दिव अर्थात् सूर्यादिलोक स- पिरि आकाश, तथा एथिवी मध्य निकृष्टलोक ये को- ई उस के आदि अन्त को नहीं पाते क्योंकि" अनु- व्यचः ,, वह सब के बीच में अनुस्यूत (परिपूर्ण ) हो रहा है तथा “न सिन्धवः ,, अन्तरिक्ष में जो दिव्यजल तथा सब लोक सी भी अन्त नहीं पासक्ते "नोत स्व- दृष्टिं मदे ,, दृष्टिप्रहार से युद्ध करता हुआ वृत्र ( मेघ ) तथा बिजुलि गर्जन आदि भी ईश्वर का पार नहीं पा सकते * हे परमात्मन् ! आप का पार कौन पा सके ? क्योंकि “ एकः ,,एक (अपने से भिन्न सहाय रहित) स्वसामर्थ्य से ही “ विश्वम् ,, सब जगत् को “श्रा- * जैसे कोई मद में मग्न होके रणभूमि में युद्ध करै, वैमे मेघ का भी दृष्टान्त जानना।

" आर्याभिविनयः॥ नुपक ,, आनुषक्त अर्थात् उस में व्याप्त होते और चकृषे ,, ( कृतवान् ) अाप ने ही उत्पन्न किया है. फिर जगत् के पदार्थ आपका पार कैसे पा सकें तथा ( अन्यत् ) आप जगत् रूप कभी नहीं बनते, न अप- ने में से जगत् को रचते हो किन्तु अनन्त अपने साम- र्थ्य से ही जगत् का रचन, धारण और लय यथाकाल में करते हो इससे आप का सहाय हम लोगों को सदेव है ॥ १५॥ 10 -- २५ श्राभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना उर्वो नः पाद्यंहसो नि केतुंना विश्वं सम- त्रिण दह । कृधीन ऊर्वाञ्चरथाय जीवसे विदा देवेषु नो दुवः ॥१६॥ ऋ० १।३।१०।१४॥ व्याख्यान-हे सर्वोपरि विराजमान परब्रह्म ! आप ऊर्ध्व सब से उत्कृष्ट हो, हम को कृपा से उत्कृष्ट गुण- वाले करो तथा उर्ध्वदेश में हमारी रक्षा हे सर्वपापप्र- गाशकेश्वर ! हमको “ केतुना ,, विज्ञान अर्थात् वि. विध विद्यादान देके " अंहसः,, अविद्यादि महापाप से "नि पाहि ., (नितराम्पाहि ) सदैव अलग रक्खो तथा "विश्वम् ,, इस सकल संसार का भी नित्यपालन करो, हे सत्यमित्र न्यायकारिन् ! जो कोई प्राणी " अत्रि- णम् ,, हम से शत्रुता करता है उसको और काम क्रोधादि शत्रुओं को आप सन्दह सम्यक् भस्मी- भूत करो ( अच्छे प्रकार जलाओ ) ( कृधी न ऊर्ध्वा- न् ) हे कृपानिधे ! हम को विद्या, शौर्य, धैर्य, बल, प- राक्रम चातुर्य, विविधधन, ऐश्वर्य, विनय, साम्राज्य, स- म्मति, सम्प्रीति स्वदेशसुखसंपादनादि गुणोंमें सब नर ,

२६
आर्याभिविनयः॥
,
देहधारियों से अधिक उत्तम करा तथा चरथाय,
जीवसे ,, सब से अधिक आनन्द, भाग, सब देशों में
अव्याहतगमन ( इच्छानुकूल जाना आना ) आरोग्य,
देह, शुद्ध मानसबल और विज्ञान इत्यादि के लिये हम
को उत्तमता और अपनी पालनायुक्त कगे “वि-
दा., विद्यादि उत्तमोत्तम धन “देवेषु,, विद्वानों के बीच
में प्राप्त करो अर्थात् विद्वानों के मध्य में भी ऊत्तम प्र-
तिष्ठायुक्त सदेव हम को रक्खो ॥ १४ ॥

अदितिोरदितिरन्तरिक्षमर्दितिर्माता सपि- ता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदितिर्जातमदिति नित्वम् ॥ १७ ॥ ऋ० १।६।१६।१०॥ व्याख्यान-हे त्रैकाल्याबाधेश्वर ! “ अदितियोंः,, आप सदैव विनाश रहित तथा स्वप्रकाशम्वरूप हो अदितिरन्तरिक्षम् .. अविकृत (विकार को न प्राप्त) अोर सब के अधिष्ठाता हो "अदितिर्माता ,, आप प्राप्त मोक्ष जीवों को अविनश्वर (विनाश रहित ) सुख देने और अत्यन्त मान करने वाले हो "स पिता, सो अ- विनाशी स्वरूप हम सब लोगों के पिता (जनक) और पालक हो और “स पुत्रः ,, सो ईश्वर आप मुमुत्तु धर्मात्मा विद्वानों को नरकादि दुःखों से पवित्र और त्राण (रक्षण) करने वाले हो “विश्वे देवा अदितिः,, सब दिव्यगुण (विश्व का धारण, रचन, मारण, पा- लन आदि कार्यों को करने वाले ) आप अविनाशी परमात्मा ही है पञ्चजना अदितिः ,, पंच प्रागा जो जगत् के जीवन हेतु वे भी आप के रचे और श्राप आभिविनयः॥ के नाम भी हैं “जातमदितिः , वही एक चेतन ब्रह्म आपसदाप्रादुर्भूत हैं और सब कभी प्रादुर्भूत कभी अप्रा- दुर्भूत (विनाशभूत) भी हो जाते हैं "अदितिर्जनित्वम् , वे ही अविनाशी स्वरूप ईश्वर आप सब जगत् के (ज- नित्वम्) जन्म का हेतु हैं और कोई नहीं * ॥ १७ ॥ * ये सब नाम दिव आदि अन्य वस्तुओं के भी होते हैं परन्तु यहां ईश्वराभिप्रेत से ही अर्थ किया, सो सप्रमाण जानना चाहिये ॥

आग्र्याभिविनयः॥
२९
+ मूल प्रार्थना
ऋजुनीती नो वरुणो मित्रो नयतु विहान् ।
अर्यमा देवैः सजोषाः ॥ १८ ॥
ऋ० १।६। १७॥१॥
व्याख्यान-हे महाराजाधिराज परमेश्वर ! प्राप
हम को “ ऋजु० ,, सरल ( शुद्ध ) कोमलत्वादि-
गुणविशिष्ट चक्रवर्ती राजाओं की नीतिको “ नयतु ,,
कृपा दृष्टि से प्राप्त करो, आप “ वरुणः ,, सर्वोत्कृष्ट
होने से वरुण हो, सो हम को वरराज्य, वरविद्या वर-
नीति देशो तथा सब के मित्र शत्रुतारहित हो हम को
भी आप मित्रगुणयुक्त न्यायाधीश कीजिये तथा आप
सर्वोत्कृष्ट विद्वान् हो हम को भी सत्यविद्या से युक्त मु.
नीति दे के सामाज्याधिकारी सद्यः कीजिये तथा आप
" अर्यमा , ( यमराज ) प्रियाप्रिय को छोड़के न्याय
में वर्तमान हो सब संसारके जीवोंके पाप और पुण्यों
की यथायोग्य व्यवस्था करने वाले हो सो हम को भी
आप तादृश करें जिस से "देवैः, सजोपाः, आप की
कृपासे विद्वानों वा दिव्यगुणों के साथ उत्तम प्रीतियुक्त
आपमें रमण और आप का सेवन करने वाले हों,
हे कृपासिन्धो भगवन् । हम पर सहायता करो जिस
से सुनीतियुक्त होके हमारा स्वराज्य अत्यन्त बढ़े॥१८॥

आर्याभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना - लं सौमासि सत्पतिस्त्वं राजोत वृत्रहा। त्वं भद्रो असि क्रतुः ॥ १९॥ ऋ०१।६।१९।५ व्याख्यान हे सोम, राजन् सत्पते परमेश्वर ! तुम सोम. सब का सार निकालने हारे प्राप्तस्वरूप, शान्ता- त्मा हो तथा सत्पुरुषों का प्रतिपालन करने वाले हो तुम्हीं सब के राजा “ उत .. और "त्रहा ,, मेघ के रचक, धारक और मारक हो भदस्वरूप भद्र करने वाले और "क्रतुः,, सब जगत् के कर्ता प्रापही हो॥१६॥ → आर्याभिविनयः॥ > मूल प्रार्थना --- त्व नः सोम विश्वतो रक्षा राजन्नघाय॒तः । न रिष्येत्त्वावतः सखा ॥ २० ॥ ऋ० १।६। २० । ८॥ व्याख्यान-हे सोम राजन्नीश्वर! तुम "अघायतः" जो कोई प्राणी हम में पापी और पाप करने की इच्छा करने वाले हो “विश्वतः, उन सब प्राणियों से हमारी रक्ष , रक्षा करो जिस के आप सगे मित्र हो "न, रिष्येत् ,, वह कभी विनष्ट नहीं होता किन्तु हम को आप की सहायता से तिल मात्र भी दुःख वा भय कभी नहीं होगा जो आप का मित्र और जिसके आप मित्र हो उस को दुःख क्योंकर हो ॥ २० ॥ → ३२ आर्याभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना तद्विष्णोः परमं पदं सदा पश्यन्ति सूरयः । ढिवीव चक्षुराततम् ॥ २१ ॥ ऋ० १।२।७।२० ॥ व्याख्यान हे विद्वानो और मुमुक्षु जीवो ! विष्णु का जो परम अत्यन्तोत्कृष्ट पद ( पदनीय ) सब के जानने योग्य, जिस को प्राप्त होके पूर्णानन्द में रहते हैं फिर वहां से शीघ्र दुःख में नहीं गिरते, उस पद को “सू- रयः ,, धर्मात्मा जितेन्द्रिय, सब के हितकारक विद्वान् लोग यथावत् अच्छे विचार से देखते हैं वह परमेश्वर का पद है किस दृष्टान्त से कि जैसे आकाश में चतु नेत्रकी व्याप्ति वा सूर्यका प्रकाश सब ओर से व्याप्त है वैसे ही “दिवीव, चक्षुराततम्, परब्रह्म सब जगह में परिपूर्ण एकरस भर रहा है वही परमपदस्वरूप परमा- त्मा परमपद है इसी की प्राप्ति होने से जीव सब दुः- खों से छूटता है अन्यथा जीव को कभी परमसुख नहीं मिलता, इस से सब प्रकार परमेश्वर की प्राप्ति में य. थावत् प्रयत्न करना चाहिये ॥ २१ ॥ , , आराभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना स्थिरा वः मन्त्वायुधा पराणुदें वीलू उत प्र- तिष्कौ । युष्माकमस्तु तविषी पनीयमी मा मर्त्यस्य मायिनः ॥ २२ ॥ ऋ० १।३ । १८।०॥ व्याख्यान-(परमेश्वरो हि सर्वजीवेश्य आशीर्द- दाति ) ईश्वर सब जीवों को आशीर्वाद देता है कि, हे जीवो ! “ वः ,, (युष्माकम् ) तुम्हारे लिये आयुध अर्थात् शतघ्नी (तोप ) भुशुण्डी ( बंदूक ) धनुष्, वाण, करवाल ( तलवार ) शक्ति (बरछी ) आदि शस्त्र स्थिर और “वीळू ,, दृढ़ हों किस प्रयोजन के लिये ? "पराणुदे,, तुम्हारे शत्रुओं के पराजय के लिये जिस से तुम्हारे कोई दुष्ट शत्रु लोग कभी दुःख न दे सके “ उत, प्रतिष्कमे ,, शत्रुओं के वेग को थामने के लिये “युष्माकमस्तु, तविषी पनीयसी ,, तुम्हारी बल- रूप उत्तम सेना सब संसार में प्रशंसित हो जिसे से तुम से लड़ने को शत्रु का कोई संकल्प भी न हो परन्तु "मामप॑स्य मायिनः ,, जो अन्यायकारी मनुष्य है उस को हम आशीर्वाद नहीं देते दुष्ट, पापी. ईश्वर भक्तिर-

३४
आर्याभिविनयः॥
हित मनुष्य का बल और राज्यैश्वर्यादि कभी मत बढ़ो
उस का पराजय ही सदा हो, हे बंधुवर्गो ! आओ
अपने सब मिल के सर्वदुःखों का विनाश और विजय
के लिये ईश्वर को प्रसन्न करें जो अपने को वह ई.
श्वर आशीर्वाद देवे, जिस से अपने शत्रु कभी न
बढ़े ॥२२॥

प्राभिविनयः॥
→ मूल स्तुति :-
विष्णोः कर्माणि पश्यत यतो व्रतानि पस्पशे ।
इन्द्रस्य युज्यः सखा ॥ २३ ॥
ऋ० १।२।७।१९॥
व्याख्यान-हे जीवो!,"विष्णोः,व्यापकेश्वर के किये
दिव्य जगत् की उत्पत्ति, स्थिति, प्रलय आदि को
को तुम देखो (प्रश्न ) किस हेतु से हम लोग जानें
कि व्यापक विष्णु के कर्म हैं ? ( उत्तर ) “यतो ब-
तानि पस्पशे., जिस से हम लोग ब्रह्मचर्यादि व्रत तथा
सत्यभाषणादि व्रत, और ईश्वर के नियमों का अनु-
धान करने को जीव सुशरीरधारी हो के समर्थ हुए
हैं। यह काम उसी के सामर्थ्य से है। क्योंकि "इन्द्र-
स्य, युज्यः, सखा,, इन्द्रियों के साथ वर्तमान कर्मों का
कर्ता. भोक्ता जो जीव इस का वही एक योग्य मित्र
है अन्य कोई नहीं क्योंकि ईश्वर जीव का अन्तर्यामी
है उस से परे जीव का हितकारी कोई और नहीं हो
सक्ता इस से परमात्मा से सदा मित्रता रखनी
चाहिये ॥२३॥

प्राभिविनमः ॥ → मूल प्रार्थना परां णुदस्व मघवन्नमित्रांन्त्सुवेदा नांवदं कृधि । अस्माकै बोध्यविता महाधने भवा वृधः सखी- नाम् ॥ २४ ॥ ऋ० ५। ३ । २१ २५॥ व्याख्यान-हे मघवन् परमेश्वयेवन् इन्द्र परमा- त्मन् ! “अमित्रान्,, हमारे सब शत्रुओं को “पराणु- दस्व,, परास्त कर दे । हे दातः ! “ सुविदा, नो, वसू , कृधि ,, “ अस्माकं, बोध्यविता ,, हमारे लिये सब ए- थिवी के धन सुलभ कर “ महाधने ” युद्ध में हमारे और हमारे मित्र, तथा सेनादि के “ अविता,, रक्षक "वृधः,, वईक “भव ,, आप ही हो तथा “बोधि, हम को अपने ही जानो. हे भगवन् ! जब आप हमारे रक्षक योद्धा होंगे; तभी हमारा सर्वत्र विजय होगा इस में संदेह नहीं ॥२४॥ →oice --- प्राभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना शंनो भगः शर्मु नः शंसौ अस्तु शं नः पु. रन्धिः शम सन्तु रायः । शं नः मत्यस्य॑ सुय- मंस्य शंसः शं नो अर्यमा पुरुजातो अस्तु ॥२५॥ ऋ०५।३।२८।२॥ व्याख्यान-है ईश्वर ! " भगः आप और आप का दिया हुआ ऐश्वर्य “शं नः ,, हमारे लिये, सुख- कारक हो और "शमु, नः, शंसो अन्तु,, आप की कृपा से हमारी सुखकारक प्रशंसा सदेव हो " पुरन्धिः, शमु, सन्तु, रायः ,, संसार के धारण करने वाले आप तथा वायु प्राण और सब धन आनन्ददायक हों " शन्नः, सत्यस्य ,, सत्य यथार्थ धर्म सुसंयम और जितेन्द्रिया- दिलक्षणयुक्त जो प्रशंसा ( पुण्यस्तुति ) सब संसार में प्रसिद्ध है वह परमानन्द और शान्तियुक्त हमारे लिये हो"शं, नो, अर्यमा ,, न्यायकारी आप " पुरुजातः अनन्त सामर्थ्ययुक्त हमारे कल्याणकारक होश्रो॥२५॥ >

आर्याभिविनयः॥
→ मूल स्तुति -
त्वमसि प्रशस्यो विदथेषु सहन्त्य ।
अग्ने स्थीरध्वराणाम् ॥ २६ ॥
ऋ० ५।८।३५ । २॥
व्याख्यान-हे “ अग्ने ,, सर्वज्ञ ! तू ही सर्वत्र "प्र-
शस्यः ,, स्तुति करने के योग्य है अन्य कोई नहीं
विदथेषु ,, यज्ञ और युद्धों में श्राप ही स्तोतव्य हो
जो तुम्हारी स्तुति को छोड़ के अन्य जड़ादि की स्तु-
ति करता है उस के यज्ञ तथा युद्धों में विजय कभी
सिद्ध नहीं होता है “ सहन्त्य ,, शत्रुओं के समूहों के
आप ही घातक हो “ रथीः ., अध्वरों अर्थात् यज्ञ और
युद्धों में आप ही रथी हो । हमारे शत्रुओं के योद्धाओं
को जीतने वाले हो इस कारण से हमारा पराजय
कभी नहीं हो सकता ॥ २६ ॥

भार्याभिविनयः॥
→* मूल प्रार्थना
तन्न इन्द्रो वरुणो मित्रो अग्निराप ओष-
धीर्वनिनो जुषन्त । शर्मन्स्त्याम मरुतांमुपस्थे
यूयं पात स्वस्तिभि सदा नः ॥ २७ ॥
ऋ०५।३ । २७।२५॥
व्याख्यान-हे भगवन् ! “ तन्न इन्द्रः मूर्य "व-
रुणाः .. चन्द्रमा, "मित्रः ,, वायु “अग्निः , अग्नि
"आपः" जल " ओपधि ,, वृक्षादि वनस्थ सब पदार्थ
आप की आज्ञा से मुग्वरूप होकर हमारा सेवन करें
हे रक्षक ! " मरुतामुपस्थे ,, प्राणादि पवनों के गोद
में बैठे हुए हम आप की कृपा से “शर्मन्त्स्याम ,, सु-
खयुक्त सदा रहैं " स्वस्तिभिः ,, सब प्रकार के रक्षणों
से “ यूयं, पात ,, ( आदरार्थ बहुवचनम् ) आप हमा-
री रक्षा करो किसी प्रकार से हमारी हानि न हो॥२०॥

গাশমান। →: मूल स्तुति - ऋषिर्हि पूर्वजा अस्येक ईशान प्रोजसा । इन्द्र चोष्कूयमे वसु ॥ २८॥ ऋ० ५।८।१७।४१॥ व्याख्यान-हे ईश्वर ! “ऋपिः ,, सर्वज्ञ “पूर्वजाः, और सब के पूर्वजों के एक अद्वितीय “ईशानः ,, ई. शनकर्ता, अर्थात् ईश्वरता करने हारे ईश्वर तथा सब से बड़े प्रलयोत्तरकाल में आप ही रहने वाले " ओ- जसा ,, अनन्त पराक्रम से युक्त हो, हे इन्द्र महाराजा- धिराज ! “चोकूयसे वसु ,, सब धन के दाता शीघ्र कृपा का प्रवाह अपने सेवकों पर कर रहे हो आप अत्यन्त आईम्वभाव हो ।। २८ ॥

সানিগ: ऋ०६।४।९।१२।। → मूल प्रार्थना - नेह भद्रं रक्षस्विने नावयै नोपया उत । गर्वे च भद्रं धेनवे वीरायं च श्रवस्यतेऽनेहसों व ऊतयः मु ऊतयों व ऊतयः ॥ २९॥ व्याख्यान-हे भगवन् ! “ रक्षस्विने, भदं, नेह पापी हिंसक दुष्टात्मा को इस संसार में सुख मत देना " नावयै ,, धर्म से विपरीत चलने वाले को मुख कभी मत हो तथा “नोपया, उत ,, अधर्मी के समीप रहने वाले उस के सहायक को भी सुख नहीं हो ऐसी प्रा- र्थना आप से हमारी है कि दुष्ट कोसुख कभी न होना चाहिये नहीं तो कोई जन धर्म में रुचि नहीं करेगा किन्तु इस संसार में धर्मात्माओं को ही मुख सदा दी- जिये तथा हमारी शमदमादियुक्त इन्द्रियां दुग्ध देने वाली गो आदि वीरपुत्र और शूरवीर भृत्य, "श्रवस्यत.. विद्या विज्ञान और अन्नाद्यैश्वययुक्त हमारे देश के राजा पार धनाढ्यजन तथा इनके लिये " अनेहसः ., नि- प्पाप निरुपद्रव स्थिर दृढ़ सुख हो “व ऊतयो व उत. यः ,, (वः युष्माकं बहुवचनमादरार्थम् ) हे सर्वरक्ष- केश्वर ! आप सर्वरक्षण अर्थात् पूर्वोक्त सब धर्मात्मा- ओं की रक्षा करने हार हैं। जिन पर आप रक्षक हो उन को सदैव भद्र कल्याण (परमसुख ) प्राप्त होता है अन्य को नहीं ॥ २६ ।। " ६ भाभिविनयः॥ → मूल स्तुति वमुर्वमुपतिर्हि कमस्यग्ने विभावसुः । स्याम ते सुमतावपि ॥ ३० ॥ ऋ०।६।३।४०।२४ ॥ व्याख्यान-हे परमात्मन् ! आप वसु अर्थात् सब को अपने में वसाने वाले और सब में आप वसने वाले हो तथा “वमुपतिः,, पृथिव्यादि वास हेतुभूतों के पति हो “ कमसि ,, हे अग्ने विज्ञानानन्द स्वप्रकाश स्वरूप, श्राप ही सब के सुखकारक और सुखस्वरूप हो, तथा “ विभावसुः , सत्पस्वप्रकाशक घनमय हो, हे भगवन् ! ऐसे जो आप उन “ते ,, आप की " मतौ ,, अत्यन्तोत्कृष्टज्ञान और परस्पर प्रीति में हम लोग स्थिर हों ॥ ३० ॥ सु.

४३ पार्याभिविनमः। → मूल प्रार्थना वैश्वानरस्य सुमतौ स्यामराजा हि कं भवे- नानामभिश्रीः । इतो जातो विश्वमिदं विचष्टे वैश्वानरो यतते सूर्येण ॥ ३१ ॥ ऋ० १।७।६।१॥ व्याख्यान-हे मनुष्यो! जो हमारा तथा सब जगत् का राजा सब भुवनों का स्वामी “कम् ,, सब का सुखदाता और “ अभिश्रीः ,, सब का निधि (शोभा- कारक ) है, “वैश्वानरो, यतते, सूर्येगा ,, संसारस्थ सब नरों का नेता ( नायक ) और सूर्य के साथ वही प्रकाशक है अर्थात् सब प्रकाशक पदार्थ उसके रचे हैं इतो जातो विश्वमिदं विचष्टे ,, इसी ईश्वर के साम- र्थ्य से ही यह संसार उत्पन्न हुआ है अर्थात् उस ने रचा है “वैश्वानरस्य सुमतौ, स्याम ,, उस वैश्वानर परमेश्वर की सुमतौ, अर्थात् सुशोभन ( उत्कृष्ट ज्ञान में ) हम निश्चित सुखस्वरूप और विज्ञान वाले हो, हे महाराजाधिराजेश्वर ! आप इस हमारी प्राशा को कृपा से पूरी करो ॥ ३१ ॥ , →-- पाराभिविनयः ॥ → मूल स्तुति :- न यस्य देवा देवता न मर्ता आपश्च न शवमो अन्तमापुः । म धरिका वशंसा मो दिवश्च महत्वान्नो भवत्विन्द्र ऊती ॥ ३२ ॥ ऋ० १।७।१०। १५॥ व्याख्यान हे अनन्तबल ! " न यस्य .. जिस प- रमात्मा का और उस के बलादि सामर्थ्य का “देवाः,, इन्द्रिय “ देवताः ,, विद्वान् सूर्यादि बुद्ध्यादि “न, मrः ,, साधारण मनुष्य "आपश्च न ,, आप, प्राण, वायु, समुद्र इत्यादि सब अन्त ( पार ) कभी नहीं पा सकते किन्तु “ प्ररिक्का ,, प्रकृष्टता से इन में व्यापक हो के अतिरिक्त, ( इन से विलक्षण ) भिन्न ही परिपू- र्ण हो रहा है, सो “ मरुत्वान् ,, अत्यन्त बलवान् इन्द्र परमात्मा “ त्वक्षसा ,, शत्रुओं के बल का छेदक बल से "क्ष्मः ,, एथिवी को “ दिवश्च ,, स्वर्ग को धारण करता है, सो " इन्द्रः परमात्मा ऊती, हमारी रक्षा के लिये “ भवतु .. तत्पर हो॥ ३२ ॥ , → भाभिविनयः॥ → मृल प्रार्थना :- जातवेदसे सुनवाम सोममरातीयता नि द- हाति वेदः । म नः पर्पदति दुर्गाणि विश्वा ना- वेव मिन्धु दुरितात्यग्निः ॥ ३३ ॥ ऋ० १।७।७।१॥ व्याख्यान-हे " जातवेदः ., परब्रह्मन् ! आप जा- तवेद हो, उत्पन्नमात्र सब जगत् को जानने वाले हो, सर्वत्र प्राप्त हो जो विद्वानों से ज्ञात सब में विद्यमान ( जात अर्थात् प्रादुर्भूत अनन्त धनवान् वा अनन्त ज्ञा- नवान् हो इस से आप का नाम जातबंद है ) उन आप के लिये " वयं, सामं, सुनवाम ,, जितने सोम प्रिय गुण विशिष्टादि हमारे पदार्थ हैं, वे सब अर्पित हैं, सो आप हे कृपालो ! “अगतीयतः ,, दुष्ट शत्रु जो हम धर्मात्माओं का विरोधी उस के “वेद , धनश्व- यादि का "नि दहाति ., नित्य दहन करो जिस से वह दुष्टता को छोड़ के श्रेष्ठता को स्वीकार करे तथा नः, हम को "दुर्गाणि, विश्वा ,, सम्पूर्ण दुस्सह दुःखों से “पर्पदति ,, पार करके आप नित्य सुख को प्राप्त करो " नावेव, सिन्धुम् ,, जैसे अति कठिन नदी वा समुद्र से पार होने के लिये नोका होती है; “दु- रितात्यग्निः , वैसे ही हम को सब पापजनित अत्यन्त पीड़ाओं से पृथक् (भिन्न ) करके मंसार में और मु- क्ति में ही परमसुख को शीघ्र प्राप्त करो ॥ ३३ ॥ ,

४३
भाभिविनयः॥
→ मूल स्तुति *
स वज्रभृदस्युहाभीम उग्रः सहस्रचेताः श-
तनीथ ऋभ्वा। चम्रीषो न शवमा पाञ्चजन्यो
मरुत्वान्नोभवत्विन्द्र ऊती ॥ ३४ ॥
ऋ० १।७।१०। १२॥
व्याख्यान-हे दुष्टनाशक परमात्मन् ! आप “वज.
भृत् ,, अच्छेद्य ( दुष्टों के छेदक ) सामर्थ्य से सर्वशिष्ट
हितकारक दुष्टविनाशक जो न्याय उस को धारण
कर रहे हो “ प्राणों वा वजः ,, इत्यादि शतपथादि का
प्रमाण है । अतएव “ दस्युहा ,, दुष्ट पापी लोगों का
हनन करने वाले हो “ भीमः , आप कीन्याय आज्ञा
को छोड़ने वालों पर भयङ्कर भय देने वाले हो । “स.
हस्रचेताः ,, सहस्रों विज्ञानादि गुण वाले श्राप ही हो
"शतनीथः ,, सैकड़ों असख्यात पदार्थों की प्राप्ति
कराने वाले हो "ऋश्वा ,, अत्यन्त विज्ञानादि प्रकाश
वाले हो और सब के प्रकाशक हो तथा महान् वा म.
हाबल वाले हो" न, चम्रीपः "किसी की चमू (सेना)
में वश को प्राप्त नहीं होते हो। "शवसा, पाञ्चजन्यः,
स्वबल से आप पाञ्चजन्य ( पांच प्रागों के) जनक
हो । “ मरुत्वान् ,, सब प्रकार के वायुओं के आधार
तथा चालक हो सो श्राप “ इन्द्रः ,, हमारी रक्षा के
लिये प्रवृत्तहों जिस से हमागकोई काम न बिगड़े॥३४॥

भारगांभिविनमः॥ * मूल प्रार्थना सेमं नः काममारण गोभिरश्वैः शतक्रतो। स्तवाम त्वा स्वाध्यः ॥ ३५॥ ऋ० १।१।३१ । ९॥ व्याख्यान-हे “शतक्रतो .. अनन्त क्रियेश्वर ! श्राप असख्यात विज्ञानादि यज्ञों से प्राप्य हो, तथा अनन्तक्रियायुक्त हो, सो श्राप “ गोभिरश्वैः ,, गाय, उत्तम इन्द्रिय श्रेष्ठ पशु सर्वोत्तम अश्वविद्या (विज्ञाना- दि युक्त) तथा अश्व अर्थात् श्रेष्ठ घोड़ादि पशुओं और चक्रवर्ती राज्यैश्वर्य से “सेमं, नः, काममाटण ,, ह. मारे काम को परिपूर्ण करो। फिर हम भी "स्तवाम, त्वा, स्वाध्यः ,, सुबुद्धियुक्त हो के उत्तम प्रकार से आप का स्तवन (स्तुति ) करैं । हम को दृढ़ निश्चय है कि आप के विना दूसरा कोई किसी का काम पूर्ण नहीं कर सकता, आप को छोड़ के दूसरे का ध्यान वा याचना जो करते हैं, उन के सब काम नष्ट हो- - जाते हैं ॥ ३५॥ --- आयाभिविनयः॥ → मूल स्तुति :- सोम गीर्भिष्ट्वा वयं वर्डयामो वचोविदः । मुमुळीको न प्राविश ॥ ३६॥ ऋ० १।६।२१ । ११॥ व्याख्यान-हे “सोम,, सर्वजगदुत्पादकेश्वर ! श्राप को " वचोविदः .. शास्त्रवित हम लोग स्तुतिसमूह से "वईयामः ,, सर्वोपरि विराजमान मानते हैं “मुमूळी. को,नः,प्राविश, क्योंकि हम को सुन्दर सुख देने वाले आप ही हो, सो कृपा करके हम को आप आवेश करो, जिस से हम लोग अविद्यान्धकार से छूट और विद्यासूर्य को प्राप्त हो के आनन्दित हों ॥ ३६

मामिपिनया॥
+ मूल प्रार्थना
सोम रारन्धि नौ हृदि गावो न यवसेष्वा ।
मर्य इव स्व ओक्य ॥ ३७ ।।
ऋ०।१।६।२१ । १३ ।।
व्याख्यान-हे “सोम , सोम्य सौख्यप्रदेश्वर !
आप कृपा करके "रारन्धि, नो, हृदि, हमारे हृदय
में यथावत् , रमण करो( दृष्टान्त ) जैसे सूर्यको कि-
रण विद्वानों का मन और गाय, पशु अपने २ विषय
और घासादि में रमणा करते हैं, * वा जैसे “मर्य
इव, स्व, ओक्ये ,, मनुष्य अपने घर में रमण करता
है वैसे ही, श्राप सदास्वप्रकाशयुक्त हमारे हृदय (प्रा-
त्मा ) में रमण कीजिये, जिस से हम को यथार्थ सर्व
ज्ञान और प्रानन्द हो । ३७ ।।
*
- दृष्टान्त का एकदेश रमणमात्र लेना।

प्राभिविनयः ॥ " * मूल स्तुति - गयस्फानौ अमीवहा वसुवित्पुष्टिवर्द्धनः । सुमित्रः सौम नो भव ॥ ३८॥ ऋ० १।६।२१ । १२॥ व्याख्यान-हे परमात्मभक्त जीवो ! अपना इष्ट जो परमेश्वर, सो “ गयस्फानः ,, प्रजा, धन, जनपद और सुराज्य का बढ़ानेवाला है तथा अमीवहा ,, शरीर, इन्द्रियजन्य और मानस रोगों का हनन विनाश करने वाला है “ बसुवित् ,, सब एथिव्यादि वसुत्रों का, जा- नने वाला है अर्थात् सर्वज्ञ और विद्यादि धन का दाता है “ पुष्टिवर्धनः ,, अपने शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा की पुष्टि का बढ़ाने वाला है "मुमित्रः, सोम, नो, भव ,, सुन्दर यथावत् सब का परममित्र वही है सो अपने उससे यह मांगें कि हे सोम मवजगदुत्सा- दक ! आप ही कपा करके हमारे मुमित्र हो और हम भी सब जीवों के मित्र हो तथा अत्यन्त मित्रता आप से भी रक्खें ॥ ३८॥ Scote ग्रााभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना :- त्वं हि विश्वतोमुख विश्वतः परिभूरसिं । अप नः शोशुचढघम् ॥ ३९ ॥ ऋ० १।७।५।६॥ व्याख्यान-हे अग्ने परमात्मन् ! “ त्वं, हि ,, तू ही “विश्वतः परिभूरसि ,, सब जगत् सब ठिकानों में व्याप्त हो अतएव श्राप विश्वतोमुख हो, हे सर्वतोमुख अग्ने ! आप स्वशक्ति से सब जीवों के हृदय में सत्यो- पदेश नित्य ही कर रहे हो, वही आप का मुख है हे कृपालो ! “अप, नः, शोशुचदघम् ,, आप की इच्छा से हमारा पाप सब नष्ट हो जाय, जिससे हम लोग निष्पाप हा के पाप को भक्ति और आज्ञा पालन में नित्य तत्पर रहें ।। ३६ ।। Sice-4-

हे
माभिविमपा॥
→* मूल स्तुति *-
तमीळत प्रथमं यजसाधं विश आरीराहुत-
मृजमानम् । ऊर्जः पुत्रं भरतं मृप्रदान देवा
अग्नि धारयन्द्रविणोदाम् ॥ ४० ॥
ऋ० १।७।३।३॥
व्याख्यान-हे मनुष्यो ! " तमीळत , उस अग्नि
की स्तुति करो ! कि जो “प्रथमम् ,, सब कार्यों से
पहिले वर्तमान और सब का मुख्य कारण है तथा
" यज्ञसाधम् ,, सब संसार और विज्ञानादि यज्ञ का
साधक ( सिद्ध करने वाला ) सब का जनक है,
"विशः, मनुष्यो ! उसी को स्वामी मानकर “प्रारी,
प्राप्तहोयो जिसको अपने दीनतासे कहते हैं, विज्ञानादि
से विद्वान् लोग सिद्ध करते और जानते हैं “ऊर्जः पुत्रं,
भरतम् ,, एथिव्यादि जगत् रूप अन्न का पुत्र अर्थात्
पालन करने वाला, तथा भरत अर्थात् उसी अन्न का
पोषण और धारण करने वाला है “सृप्रदानुम् ,, सब
जगत् को चलने की शक्ति देने वाला और ज्ञान का
दाता है; उसीको "देवा अग्निं धारयन्दविणोदाम, देव
(विद्वान लोग ) अग्नि कहते औरधारण करते हैं वही
सब जगत् को द्रविण अर्थात् निर्वाह के सब, अन्न ज-
लादि पदार्थ और विद्यादि पदार्थों का देने वाला है उस
श्राग्न परमात्मा को छोड़ के अन्य किसी की भक्ति
याचना कभी किसी को न करनी चाहिये ॥४०॥

मायामिपिनपः ॥ → मूल प्रार्थना -- तमूतौ रणयञ्छूरसातौ तं क्षमस्य क्षितयः कृण्वत त्राम् । स विश्वस्य करुणस्येश एको मरुत्वानो भवन्विद्र ऊती॥४१॥ ऋ० १।७।९।७॥ ऊतयः व्याख्यान- हे मनुष्यो ! “ तमूतयः ,, उसी इन्द्र परमात्मा की प्रार्थना तथा शरणागति से अपने को अनन्त रक्षण तथा बलादि गुण प्राप्त होंगे शूरसातौ ,, युद्ध में अपने को यथावत् “ रणयन् ,, रमण और रणभूमि में, शूरवीरों के गुण परस्पर प्री- त्यादि प्राप्त करावेगा " तक्षेमस्य, क्षितयः , हे शूरवीर मनुष्यो ! उसी को क्षेम कुशलता का “ त्राम ,, रक्ष- क “ कृण्वत ,, करो, जिस से अपना पराजय कभी न हो। क्योंकि, सः, विश्वस्य ,, सो करुणामय सब जगत् पर करुणा करने वाला एकः ,, एक ही है अन्य कोई नहीं, सो परमात्मा “ मरुत्वान् ,, प्राण, वायु, बल, सेनायुक्त “ ऊती ,, (ऊतये ) सम्यक् हम लोगों पर कृपा से रक्षक हो, जिस की रक्षा से हम लोग कभी पराजय को न प्राप्त हों ।। ४१ ।।

आाभिविनयः ॥ → मूल स्तुति - स पूर्वया निविदा कव्यतायोरिमाः प्र॒जा अं- जनयन्मनाम् । विवस्वता चक्षसा द्यामपश्चं देवा अग्नि धारयन्द्रविणोदाम् ॥ ४२ ॥ ऋ० १।७।३।२॥ व्याख्यान-हे मनुष्यो ! सो ही “ पूर्वया, निविदा ,, आदि सनातन, सत्यता आदि गुणयुक्त, परमात्मा था, अन्य कोई कार्य नहीं था, तब सृष्टि की आदि में स्व- प्रकाश स्वरूप एक ईश्वर प्रजा की उत्पत्ति की ईक्ष- रहता (विचार ) और निकृष्ट दुःख विशेप नरक और राब दृश्यमान तारे आदि लोकलोकान्तर रचे हैं जो ऐसा सच्चिदानन्दम्वरूप परमेश्वर है, उसी “ द्रविणा- दाम् , विज्ञानादि धन देने वाले को “देवाः,, विद्वान् लोग अग्नि जानते हैं, हम लोग उसी को भजे ।। ४२॥

मायाभिविनयः॥
+ मूल प्रार्थना ---
वयं जयेम त्वयां यजा वृतमस्माकमशमुदवा
भरै भरे । अस्मभ्यमिन्द्र वरिवः सुगं कृधि प्र-
शत्रूणां मघवन्वृष्ण्या रुज ॥ ४३ ॥
ऋ० १।७। १४ । ४॥
व्याख्यान हे इन्द्र परमात्मन् ! “त्वया युजा, वयं,
जयेम, आप के साथ वर्तमान प्राप की सहायता से
हम लोग दुष्ट शत्रुजन को जीतें, कैसा वह शत्रु ? कि
“श्रावृतम,, हमारे बलसे घेरा हुया। हे महाराजाधिरा-
जश्वर ! “ भरे भरे अस्माकमंशमुदा ,, युद्ध २ में ह-
मारे अंश (बल) सेना का " उदव ,, उत्तमरीति से
कृपा करके रक्षण करो जिससे किसी युद्ध में क्षीण
होके हम पराजय को न प्राप्त हों, किन्तु जिन को
आप की सहायता है उन का सर्वत्र विजय होता ही
है, हे 'इन्दमघवन्,, महाधनेश्वर ! “शत्रूणां, वृष्ण्या ,
हमारे शत्रुओं के वीर्य पराक्रमादि को "प्ररुज ,, प्र-
भग्न रुग्ण करके नष्ट कर द “अस्मायमिन्द्र वरिवः,
सुगं, कृधि ,, हमारे लिये चक्रवर्तीराज्य और साम्राज्य
धन को “मुगम,, सुख से प्राप्त कर अर्थात् आप की
करुणा से हमारा राज्य और धन सदा वृद्धि को ही
प्राप्त हो॥४३॥

সানিলিন।
→ मूल स्तुति *-
यो विश्वस्य जगतः प्राणतस्पतियों ब्रह्मणे
प्रथमो गा अविन्दत् । इन्द्रो यो दस्यूँ रधराँ
अवातिरन्मरुत्वन्तं संख्याय हवामहे ।। ४४ ॥
ऋ०
०१।७।१२।५॥
व्याख्यान-हे मनुष्यो ! जो सब जगत् (स्थावर )
जड़ अप्राणी का और “प्राणतः, चेतना वाले जगत्
का "पतिः, अधिष्ठाता और पालक है तथा जो सब
जगत् के प्रथम सदा से है और “ ब्रह्मणे, गा,
अविन्दत् ,, जिस ने यही नियम किया है कि ब्रह्म अ-
र्थात् विद्वान् के ही लिये प्रथिवी का लाभ और उस
का राज्य है । और जो “इन्दः , परमैश्वर्यवान् पर-
मात्मा, डाकुओं को “अधरान् ,, नीचे गिराता है तथा
उन को मार ही डालता है, “ मरुत्वन्तं, सख्याय, ह.
वामहे ,, आओ मित्रो भाई लोगो! अपने सब संप्रीति
से मिल के मरुत्वान् अर्थात् परमानन्द, बल वाले
इन्द्र परमात्मा को सखा होने के लिये अत्यन्त मार्य-
ना से गद्गद् हो के बुलावें, वह शीघ्र ही कृपा कर के
अपने से सखित्व (परम मित्रता) करेगा,इस में कुछ
सन्देह नहीं ॥१५॥

पारानिमियः॥ * मूल प्रार्थना मुळा नौ रुद्रोत नो मर्यस्कृधि क्षयहोराय नमसा विधेम ते । यच्छं च योश्च मनुरायेजे पिता तदश्याम तवं रुद्र प्रीतिषु ॥ ४५ ॥ ऋ० १।८।५।२॥ व्याख्यान हे दुष्टों को रुलाने हारे रुदेश्वर ! हम को “ मृड ,, सुखी कर तथा मयस्कृधि ,, हम को मय अर्थात् अत्यन्त सुख का सम्पादक कर क्षय- द्वीराय, नमसा, विधेम, ते ,, शत्रुओं के वीरों का क्षय करने वाले अत्यन्त नमस्कारादिसे आप की परिचर्या करने वाले हम लोगों को रक्षण यथावत् कर “ य. च्छम् ,, हे रुद ! आप हमारे पिता (पालक ) हो ह- मारी सब प्रजा को सुखी कर “योश्च,, प्रजा के रोगों का भी नाश कर जैसे “ मनुः ,, मान्यकारक पिता " आयेजे ,, स्वप्रजा को संगत और अनेक विध ला- डन करता है वैसे आप हमारा पालन करो।हे रुद्र भ- ८ मायाभिषिमयः॥ गवन् ! " तव, प्रणीतिषु ,, आपकी आज्ञा का प्रणय अर्थात् उत्तम न्याययुक्तनीतियों में प्रवृत्त होके “ तद- श्याम .. वीरों के चक्रवर्ती राज्य को आप के अनुग्रह से प्राप्त हों ॥ ४५ ॥ + मायाभिविनयः॥ → मूल स्तुति - देवो न यः पृथिवीं विश्वधोया उपक्षेति हि- तमित्रो न राजा । पुरः सदः शर्मसो न वीरा अनवद्या पति जुष्टेव नारीं ॥ ४६ ॥ ऋ० १।५।१९।३।। व्याख्यान-हे प्रियबन्धु विद्वानो ! “ देवो, न , ई. श्वर सब जगत् के बाहर और भीतर सूर्य के समा- न प्रकाश कर रहा है “यः, एथिवीम् ,, जो एथिव्यादि जगत् को रच के धारण कर रहा है और "विश्व- धाया, उपक्षेति ,, विश्वधारकशक्ति का भी निवास देने और धारण करने वाला है तथा जो सब जगत् का परममित्र अर्थात् जैसे “प्रियमित्रो, न, राजा प्रियमित्रवान् राजा अपनी प्रजा का यथावत् पालन करता है वैसे ही हम लोगों का पालन कर्ता वही एक और कोई भी नहीं “पुरः सदः,शर्मसदो न, वीराः,, जो जन ईश्वर के पुरःसद हैं (ईश्वराभिमुख ही हैं ) वेही शर्मसदः अर्थात् सुख में सदा स्थिर रहते हैं वा जैसे “न वीराः,, पुत्रलोग अपने पिता के घर में ग्रान- न्दपूर्वक निवास करते हैं वैसे ही जो परमात्मा के भक्त हैं वे सदा मुखी रहते हैं, परन्तु जो अनन्यचित्त होक

.
भाज्यामिपिनयः॥
निराकार सर्वत्र व्याप्त ईश्वर की सत्य श्रद्धा से भक्ति
करते हैं जैसे कि “ अनवद्या, पतिजुष्टेव, नारी ,, अ-
त्पन्तोनमगुगायुक्त पति की सेवा में तत्पर पतिव्रता
नारी (स्त्री) रात दिन, तन, मन, धन और अतिप्रेम
से अनुकूल रहती है; वैसे प्रेमप्रीतियुक्त होके आश्रो
भाई लोगो ! ईश्वर की भक्ति करें और अपने सब
मिल के परमात्मा से परमसुख लाभ उठावें ॥४६॥

भाभिषिमा Fire KATA मूल प्रार्थना सा मां सत्योक्तिः परि पातु विश्वतों को च यत्र ततनन्नहानि च । विश्वमन्यत्रि विशते यदेति विश्वाहापो विश्वाहोदेति सूर्यः ॥४७॥ ऋ०७।८।१२।२॥ व्याख्यान हे सर्वाभिरक्षकेश्वर ! “सा मा सत्यो- क्तिः, श्राप की सत्य आज्ञा जिस का हम ने अनुष्ठान किया वह “ विश्वतः, परि पातु, नः ,, हम को सब सं. सार से सर्वथा पालन और सब दुष्ट कामों से सदा एथक रक्खे कि कभी हमको अधर्म करने की इच्छा भी न हो “ द्यावा, च , और दिव्य सुख से सदा युक्त करके यथावत् हमारी रक्षा करे “ यत्र ,, जिस दिव्य सृष्टि में “ अहानि , सूर्यादिकों को दिवस आदि के होने के निमित्त “ ततनत् ,आपने ही विस्तारे हैं, वहां भी हमारा सब उपद्रवों से रक्षण करो, “विश्व मन्य०, आप से अन्य ( भिन्न ) विश्व अर्थात् सब जगत् जिस समय आप के सामर्थ्य से, ( प्रलय में )"निविशते. प्रवेश करता है (कार्य सब कारणात्मक होता है) उस समय में भी श्राप हमारी रक्षा करो “यदेजति जिस समय यह जगत् आप के सामर्थ्य से चलित हो के उत्पन्न होता है, उस समय भी सबपीड़ाओं से आप आभिविनया॥ हमारी रक्षा करें "विश्वाहापो, विश्वाहा,, जो२ विश्व का हन्ता ( दुःख देने वाला ) उस को श्राप नष्ट कर देश्रो, क्योंकि आप के सामर्थ्य से सब जगत् की उ. त्पत्ति स्थिति और प्रलय होता है, आपके सामने कोई राक्षस (दुष्टजन ) क्या कर सकता है ? क्योंकि आप सब जगत् में उदित ( प्रकाशमान ) हो रहे हो, परन्तु सूर्यवत् हमारे हृदय में कृपा करके प्रकाशित होओ जिस से हमारी अविद्यान्धकारता सब नष्ट हो ॥४७॥ →dio भााभिविनयः॥ + मूल स्तुति :- देवी देवानामसि मित्रो अद्भुतो वसुर्वमूना- मसि चारुरध्वरे । शमन्त्स्याम तव सप्रथस्तमेड- ग्नसख्ये मा रिषामा वयं तव ॥ १८ ॥ ऋ०।१।६। ३२। १३ ।। व्याख्यान-हे मनुष्यो ! वह परमात्मा कैसा है ? कि हम लोग उसकी स्तुति करें, हे अग्ने परमेश्वर ! आप “ देवो, देवानामसि ,, देवों ( परम विद्वानों ) के भी देव (परमविद्वान् ) हो, तथा उन को परमानन्द देनेवाले हो, तथा “ अद्भुतः , अत्यन्त आश्चर्यरूप मित्र सर्व सुख कारक सब के सखा हो “वसु०, ए. थिव्यादि वसुत्रों के भी वास कराने वाले हो तथा अध्वरे ,, ज्ञानादि यज्ञ में “ चारुः , अत्यन्त शोभा- यमान और शोभा के देने वाले हो, हे परमात्मन् ! सप्रथस्तमे सख्ये, शर्मणि तव , आप के अतिवि- स्तीर्ण, आनन्दस्वरूप सखात्रों के कर्म में हम लोग स्थिर हों, जिस से हम को कभी दुःख न प्राप्त हो और अनुग्रह हम लोग परस्पर अप्रीतियुक्तकभी न हों॥४८॥ श्राप के से हम

मा मिचिपा॥
*मूल प्रार्थना
मा नौ वधीरिन्द्र मा पर दा मानः प्रिया
भोजनानि प्र मोषीः। आण्डा मानौ मघवञ्छक
निर्भेमा नः पात्रां भेत्सहानुषाणि ॥ ४९ ॥
ऋ०१।७।१६।८॥
व्याख्यान हे इन्द्रपरमैश्वर्ययुक्तेश्वर ! “मा, नो,
वधीः ,, हमारा वध मत कर अर्थात् अपने से अलग
हम को मत गिरावै, “ मा परा दाः , हम से अगल
आप कभी मत हो “मा नः प्रिया०, हमारे प्रिय भोगों
को मत चोर और मत चोरवावै, "आण्डा मा०., हमारे
गों का विदारण मत कर, हे “ मघवन् ,, सर्वशक्ति-
मन् “ शक्र ,, समर्थ हमारे पुत्रों का विदारण मतकर,
मा, नः, पात्रा, हमारे भोजनाद्यर्थ सुवर्णादि पात्रों
को हम से अलग मत कर, “ सहजानुषाणि ,, जो २
हमारे सहज अनुषक्त, स्वभाव से अनुकूल मित्र हैं,उन
को श्राप नष्ट मत करो अर्थात् कृपाकरके पूर्वोक्त सब
पदार्थों की यथावत् रक्षा करो ॥ ४६॥

आभिविनयः ॥ → मूल प्रार्थना मा नौ महान्तमुत मा नौ अर्भकं मा न उक्षन्तमुत मा न उक्षितम् । मा नो वधीः पि- तरं मोत मातरं मा नंः प्रियास्तन्वौ रुद्र री- रिषः ॥ ५० ॥ ऋ०१ । ८।६ । ७ ॥ मानस्तोके तनये मा नै आयो मा नो गोपु मा नो अश्वेषु रीरिषः । वीरान्मा नो रुद्र भा- मिता धीहविष्म॑न्तः मदमित्वां हवामहे ॥५१॥ ऋ० १।८।६॥८१ मा व्याख्यान-हे “रुद्र " दुष्ट विनाशकेश्वर ! आप हम पर कृपाकरो "मा, नो, व०,, हमार ज्ञानवृद्ध व- योवृद्ध पिता इन को आप नष्ट मत करो तथा नो अर्भकम् ,, छोटे बालक शौर " उक्षन्तम् ,, वीर्य सेचन समर्थ जयान तथा जो गर्भ में वीर्य का संचन किया है, उसको मत विनष्ट कगे तथा हमारे पिता, माता और प्रिय तनुओं (शरीरों ) का "मा, गरिपः, हिंसन मत करो "मा,नस्तोके, कनिष्ठ, मध्यम और ज्ये- टपुत्र, “ आयो ,, उमर 'गोपु,, गाय आदि पशु “ अ- श्वेषु ,, घोड़ा आदे उत्तम यान हमारी सेना के शूगें ६६ " भाभिविनयः॥ में “ हविष्मन्तः ,, यज्ञ के करने वाले इन में, "भा- मितः .. क्रोधित और मा रीरिपः ,, रोषयुक्त होके कभी प्रवृत्त मत हो हम लोग आप को “सदमित्वा, हवामहे ,, सर्वदेव आह्वान करते हैं, हे भगवन् रुद्र प- रमात्मन् ! आप से यही प्रार्थना है कि, हमारी और हमारे पुत्र धनैश्वर्यादि की रक्षा करो ॥ ५० ॥ ५१।। →oicolee आरामिविनयः ॥ → मूल प्रार्थना उद्गातेवं शकुने सामं गायमि ब्रह्मपुत्र इव मर्वनेषु शंससि । कृपेव बाजी शिशुमतीरपीत्या सर्वतो नः शकुने भद्रमा वंद विश्वतो नःशकुने पुण्यमा वंद ॥५२॥ ऋ० २।८।१२।२॥ आवस्त्वं शकुने भद्रमा वद तृष्णीमामीनः मुमति चिकिन्डि नः । यदुत्पतन् वदसि कर्करि- यथा बृहईदेम विदर्थे मुत्रीराः ॥ ५३ ॥ ऋ०२।८।१२।३॥ व्याख्यान-हे “ शकुने , सर्वशक्तिमन्नीश्वर ! आप सामगान को गाते ही हो; वैसे ही हमारे हृदय में सब विद्या का प्रकाशित गान करो जैसे यज्ञ में महा पण्डित सामगान करता है वैसे आप भी हम लोगों के बीच में सामादि विद्या का प्रकाश कीजिये " ब्रह्मपुत्र इव सवनेषु ., आप कृपा से सवन ( पदार्थविद्याओं) की মামা। "शंससि ,, प्रशंसा करते हो वैसे हम को भी यथावत् प्रशंसित करो जैसे “ ब्रह्मपुत्र इव ,, वेदों का वेत्ता विज्ञान से सब पदार्थों की प्रशंसा करता है वैसे आप भी हम पर कृपा कीजिये, आप "वृषेववाजी..सर्वशक्ति का सवन करने और अन्नादि पदार्थों के देने वाले तथा महा बलवान् और वेगवान् होने से वाजी हो जैसे कि दृषभ के समान आप उत्तम गुण और उत्तम पदार्थों की दृष्टि करने वाले हो वेसे हम पर उन की दृष्टि करो " शिशुमतिः ., हम लोग आप की कृपा से उत्तम शिशु ( सन्तानादि ) को “अपीत्य,, प्राप्त हो के आप को ही भनें “ अासर्वतो नः शकुने, हे शकुने ! सर्व सामर्थ्यवान् ईश्वर ! सब ठिकानों से हमारे लिये भद्रम् ,, कल्याण को "श्रा वद ., कहो अर्थात् कल्याण की ही आज्ञा और कथन क- रो जिस से अकल्याण की बात भी कभी हम न मुनें “विश्वतो , नः श०.. हे सब को सुख देने वाले ईश्वर ! सब जगत् के लिये “पुण्यम् ,, धर्मात्मा के कर्म करने को “श्रा वद., उपदेश कर जिससे कोई मनुष्य अधर्म करने की इच्छा भी न करे और सब ठिकानों में सत्यधर्म की प्रवृत्ति हो “आवदंस्त्वं श०,, अच्छे प्रकार ६९ पाराभिविनयः॥ हे शकुने जगदीश्वर ! आप सब " भदम् ., कल्याण का भी कल्याण अर्थात् व्यावहारिक सुख के भी ऊ- पर मोक्ष सुख का निरन्तर उपदेश कीजिये “ तूष्णी- मासीनः सु० ,, हे अन्तर्यामिन् ! हमारे हृदय में सदा स्थिर हो मौन से ही “सुमतिम् ,, सर्वोत्तम ज्ञान देनी “चिकिद्धिनः ,, कृपा से हम को अपने रहने के लिये घरही बनाओ और आप की परमविद्या को हम प्राप्त हो “ यदुत्पतन्वद० ., उत्तम व्यवहार में पहुं- चाते हुए आप का ( यथा ) जिस प्रकार से “कर्करि- वदसि ,, कर्तव्य, कर्म, धर्म को ही अत्यन्त पुरुषार्थ से करो अकर्तव्य दुष्टकर्म मत करो ऐसा उपदेश है कि पुरुषार्थ अर्थात् यथायोग्य उद्यम को कभी कोई मत छोड़ो वैसे "बद्वदेम विदथे ., विज्ञानादि यज्ञ वा धर्मयुक्त युद्धों में “ सुवीरः ,, अत्यन्त शूरवीर हो के बहत् ( सब से बड़े ) आप जो परब्रह्म उन “ वदेम आप की स्तुति, आप का उपदेश, आप की प्रार्थना, और उपासना तथा आप का यह बड़ा अखण्ड साम्रा- ज्य और सब मनुष्यों का हित सर्वदा कहैं सुनें और आप के अनुग्रह से परमानन्द को भांगें ॥५२॥५३॥ ओ३म् महाराजाधिगजाय परमात्मने नमानमः ॥ ,

आर्याभिविनयः॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्याणां महाविदुषां
श्रीयुत विरजानन्द सरस्वतीस्वामिनां शिष्येगा
दयानन्दसरस्वती स्वामिना विरचित आर्या-
भिविनये प्रथमः प्रकाशः पूर्तिमागमत् ।
समाप्तोऽयं प्रथमः प्रकाशः ।।
-cole+

ओम् तत्सत्परमात्मने नमः ॥ अथ द्वितीयः प्रकाशः ॥ प्रो३म् महनाववतु सहनौ भुनक्तु । मह वीय्य करवावहै । तेजस्वि नावधीतमस्तु मा विद्विषावहै । प्रो३म् शान्तिः शान्तिः शान्तिः ॥१॥ तैत्तिरीयारण्यके ब्रह्मानन्दवल्ली प्रपा- ठक १०। प्रथमानुवाकः॥१॥ व्याख्यान-हे सहनशीलेश्वर ! आप और हम लोग परस्पर प्रसन्नता से रक्षक हों, आप की कृपा से हम लोग सदैव आप की ही स्तुति, प्रार्थना और उपा- सना करें तथा आप को ही पिता. माता, बन्धु, राजा, स्वामी, सहायक, सुखद,सुहृद् परमगुर्वादि जानें, क्षण- मात्र भी आप को भूल के न रहैं, आप के तुल्य वा अधिक किसी को कभी न जानें, आप के अनुग्रह से हम सब लोग परस्पर प्रीतिमान्, रक्षक, सहायक, ७२ माभिविनयः॥ परम पुरुषार्थी हों, एक दूसरे का दुःख न देख सकें, स्वदेशस्थादि मनुष्यों को अत्यन्त परस्पर निर प्रीति- मान् पाखण्ड रहित करें “सह, नौ, भुनक्तु,, तथा आप और हम लोग परस्पर परमानन्द का भोग करैं हम लोग परस्पर हित से आनन्द भोगें कि आप हम को अपने अनन्त परमानन्द के भागी करें उस आनन्द से हम लोगों को क्षण भी अलग न रक्खें "सह वीय, करवावहै,, आप की सहायता से परमवीर्य जो सत्य- विद्या उस को परस्पर परमपुरुषार्थ से प्राप्त हो "तेज- स्विनावधीतमस्तु ,, हे अनन्त विद्यामय भगवन् ! आप की कृपादृष्टि से हम लोगों का पठनपाठन परम वि. द्यायुक्त हो तथा संसार में सब से अधिक प्रकाशित हों और अन्योन्यप्रीति से परमवीर्य पराक्रम से निष्क- ण्टक चक्रवर्ती राज्य भोगैं, हम में सब नीतिमान् स- जन पुरुष हों और आप हम लोगों पर अत्यन्त कृपा करें जिस से कि हम लोग नाना पाखण्ड, असत्य, वे- दविरुद्ध मतों को शीघ्र छोड़ के एक सत्यसनातनमत- स्थ हो, जिस से समस्त वैरभाव के मूल जो पाखंडमत, वे सब सद्यः प्रलय को प्राप्त हों । “मा, विद्विषावहै और हे जगदीश्वर ! आप के सामर्थ्य से हम लोगों में परस्पर विद्वेष अर्थात् अप्रीति न रहै जिस से हम लोग कभी परस्पर विद्वेष न करें; किन्तु सब तन, मन, . , आग्र्याभिविमयः॥ धन, विद्या, इन को परस्पर सन के सुग्वोपकार में परमप्रीति से लगावें “ओ३म् शान्तिः,शान्तिः,शान्तिः,, हे भगवन् ! तीन प्रकार के सन्ताप जगत् में हैं एक आध्यात्मिक (शारीरिक ) जो ज्वरादि पीड़ा होने से होता है दूसरा आधिभौतिक जो शत्रु, सर्प, व्याघ्र, चो- रादिकों से होता है और तीसग आधिदैविक जोमन, इन्द्रिय, अग्नि, वायु, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, अतिशात, अत्युष्णतेत्यादि से होता है, हे कृपासागर ! आप इन तीनों तापों की शीघ्र निवृत्ति करें जिस से हम लोग अत्यानन्द में और आप की अखण्ड उपासना में मदा रहें, हे विश्वगुगे ! मुझ को असत् (मिथ्या ) और अनित्य पदार्थ तथा असत् काम से छुड़ा के मन्य तथा नित्य पदार्थ और श्रेष्ठ व्यवहार में स्थिर कर, हे जग. न्मङ्गलमय ! सब दुःखों से मुझ को छुड़ाके, सब सुखों को प्राप्त कर। हे प्रजापते ! (सुप्रजया पशुभिर्ब्रह्मवर्चसेन, परमैश्वर्येण,संयोजय)हे प्रजापते! मुझको अच्छी प्रजा पुत्रादि, हस्त्यश्वगवादि. उत्तमपशु, सर्वोत्कृष्ट विद्या और चक्रवर्ती राज्यादि परमेश्वर्य जो स्थिर परमसुखकारक उस कोशीघ्र प्राप्त कर।हे परमवैद्य (सर्वगंगाटथक्क- त्य नैरोग्यन्देहि ) सर्वथा मुझ को सब रोगों से छुड़ाके परम नैरोग्य दे महाराजाधिराज! जिससे मैं आप की सेवा में स्थिर होऊ (हे न्यायाधीश ! कुका- शुद्ध होके १० ७४ आभिविनयः॥ मकुलोभकुमोहभयशोकालस्येविषप्रमादविषयतृष्णा नेप्ठुर्याभिमानदुष्टभावाविद्याायो निवारय, एतेभ्यो वि. रुद्धपूत्तमेषु गुणेषु संस्थापय माम् ) हे ईश्वर ! कुकाम कुलोभादि पूर्वोक्त दुष्ट दोषों को कृया मे छुड़ाके श्रेष्ठ कामों में यथावत् मुझ कोस्थिर कर, मैं अत्यन्त दीन होके यही मांगता हूं कि मैं आप और आप की श्रा- ज्ञा से भिन्न पदार्थ में कभी प्रीति न करूं, हे प्राणपत, प्राणप्रिय, प्राणपितः, प्राणाधार, प्राणजीवन, मुराज्य- प्रद ! मेरे प्राणवाले आदि आप ही हो, मेग सहायक श्राप के बिना कोई नहीं है. हे महाराजाधिराज! जैमा सत्य न्याययुक्त अग्खण्डित आप का राज्य है, वैसा न्यायराज्य हम लोगों का भी आप की ओर से स्थिर हो आप के गज्य के अधिकारी किङ्कर अपने कृपाकटा- क्ष से हम को शीघ्र ही कर, हे न्यायप्रिय ! हम को भी न्यायप्रिय यथावत् कर, हे धर्माधीश ! हम को धर्म में स्थिर रख, हे करुणामय पितः ! जैसे माता और पिता अपने सन्तानों का पालन करते हैं वैसे ही आप हमारा पालन करी ॥१॥ JOS অালাশঘন अ- →: मूल स्तुति - स पर्यंगाच्छुक्रमकायमनगामस्नावर, शुद्ध- मपापविद्धम् । कविमनीषी परिभूः स्वयम्भू- याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः ममा- भ्यः॥२॥ यजुर्वेदे । अध्याये । ४० ८॥ व्याख्यान-“स, पर्यगात् ,, वह परमात्मा श्रा- काश के समान सब जगह में परिपूर्ण (व्यापक ) है, शुक्रम् ,, सब जगत् का करने वाला वही है कायम् ,, और वह कभी शरीर ( अवतार ) नहीं धा- रण करता क्योंकि वह अखण्ड और अनन्त, निर्वि- कार है, इस से देह धारण कभी नहीं करता, उस से अधिक कोई पदार्थ नहीं है इसी से ईश्वर का शरीर धारण करना कभी नहीं बन सकता। अबणाम् वह अखण्डेकरस अच्छेद्य, अभेद्य, निष्कम्प और अ- चल है इस से अंशांशिभाव भी उस में नहीं है, क्यों- कि, उस में छिद्र किसी प्रकार से नहीं हो सकता अस्नाविरम् ,, नाड़ी आदि का प्रतिबन्ध (निगेध ) भी उस का नहीं हो सकता अतिसूक्ष्म होने से ईश्वर को कोई प्रावरण नहीं हो सकता “शुद्धम् ,, वह पर- " সালমান मात्मा सदैव निर्मल अविद्यादि जन्म, मरण, हर्ष,शोक, क्षुधा, तृपादि दोपांपाधियों से रहित है, शुद्ध की उपा- सना करने वाला शुद्ध ही होता है और मलिन का उपासक मलिन ही होता है. " अपापविहम .. परमा- त्मा कभी अन्याय नहीं करता क्योंकि वह सदैव न्यायकारी ही है. " कविः ,, त्रैकालज्ञ, (सर्ववित्) म- हाविद्वान् जिम की विद्या का अन्त कोई कभी नहीं ले सकता, "मनीपी .. सब जीवों के मन (विज्ञान) का साज्ञा मब क मन का दमन करने वाला है, “प. गिभूः, सब दिशा और सब जगह में परिपूर्ण हो रहा है. सब के ऊपर विराजमान है. " स्वयम्भूः जिस का आदिकारण माता, पिता, उत्पादक कोई नहीं किन्तु वही सब का आदिकारण है, " याथातथ्यतो- न्व्पिदधाच्छाश्वताश्यः, समाभ्यः , उस इश्वर न अ. पनी प्रजा को यथावत सत्य, सत्यविद्या जी चार वेद उन का सब मनुष्यों के परमहितार्थ उपदेश किया है उस हमारे दयामय पिता परमेश्वर ने बड़ी कृपा से अविद्यान्धकार का नाशक, वेद विद्यारूप सूर्य प्रका- शित किया है और सब का प्रादिकारण परमात्मा ऐसा अवश्य मानना चाहिये ऐसे विद्यापुस्तक का भी आदिकारण ईश्वर को ही निश्चित मानना चाहिये, वि. द्या का उपदेश ईश्वर ने अपनी कृपा से किया है।

७१ भाभिविनमः ॥ क्योंकि हम लोगों के लिये उस ने सब पदार्थों का दान किया है तो विद्यादान क्यों न करेगा सर्वोत्कृष्ट- विद्या पदार्थ का दान परमात्मा ने अवश्य किया है तो वेद के विना अन्य कोई पुस्तक संसार में ईश्वरोक्त नहीं है, जैसा पूर्ण विद्यावान् और न्यायकारी ईश्वर है वेसा ही वेदपुस्तक भी है अन्य कोई पुस्तक ईश्वरकृत वेदतुल्य वा अधिक नहीं है अधिक विचार इस विषय का “ सत्यार्थप्रकाश ,, और "ऋग्वेदादिभाष्यभूमिका,, मेरे किये ग्रन्थों में देख लेना ॥२॥ → কাহাশিমিঃ। → मूल प्रार्थना दृते दृछह मा मित्रस्य मा चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षन्ताम् । मित्रस्याहं चक्षुषा स- वाणि भूतानि समीक्ष । मित्रस्य चक्षुषा ममी तामहे ॥ ३ ॥ यजु० ३६ । १८ ॥ व्याख्यान-हे अनन्तबल महावीर ईश्वर ! “हते,, हे दुष्टस्वभावनाशक विदीर्णकर्म अर्थात् विज्ञानादि शुभगुणों का नाशकर्म करने वाला मुझ को मत रक्खो ( मत करो) किन्तु उस से मेरे आत्मादि को विद्या सत्य धर्मादि शुभगुणों में सदैव अपनी कृपा- सामार्थ्य स्थित करो" दृछह मा ,, हे परमैश्वर्यवन भवगन् ! धर्मार्थकाममोक्षादि तथा विज्ञानादि दान से अत्यन्त मुझ को बढ़ा " अमित्रम्यत्यादि०, हे सर्व सुहृदीश्वर मन्तिर्यामिन् ! सब भूत प्राणिमात्र मित्र- दृष्टि से यथावत् मुझ को देवें सब मर मित्र हो जाय कोई मुझ से किञ्चिन्मात्र भी वैर न करे " मित्रस्या- हैं. चेत्यादि ,, हे परमात्मन् ! आप की कृपा से मैं भी निर्वैर हो के सब चराचर जगत् को मित्रदृष्टि से अपने प्रागावत् प्रिय जानूं अर्थात् मित्रस्य, चक्षुषत्यादि ., पक्षपात छोड़ के सब जीव देहधारीमात्र अत्यन्त प्रेम से परस्पर अपना वर्ताव करें अन्याय से युक्त होके किसी पर कभी हम लोग न वत्तें यह परमधर्म का सब मनुष्यों के लिये परमात्मा ने उपदेश किया है सब को यही मान्य होने के योग्य है ॥३॥ - आराभिविनयः॥ मूल स्तुति - तदेवाग्निस्तदादित्यस्तहायुस्तदं चन्द्रमाः । तदेव शुक्र तद्ब्रह्म ता आपः म प्रजापतिः ॥४॥ यजु० ३२ । १॥ व्याख्यान-जो सब जगत् का कारण एक परमे- श्वर है उसी का नाम अग्नि है (ब्रह्मह्यग्निः शतपथे) सर्वोत्तम ज्ञानस्वरूप जानने के योग्य, पापणीयस्वरूप और पूज्यतमेत्यादि अग्नि शब्द का अर्थ है “ आदि- त्या व ब्रह्म वायुर्वं ब्रह्म, चन्द्रमा व ब्रह्म, शुक्रं हि ब्रह्म, सर्व जगकर्तृब्रह्म ब्रह्म वे बहत, आपो वे ब्रह्मत्यादि .. शतपथ तथा ऐतरेय ब्राह्मण के प्रमाण हैं "तदादियः, जिस का कभी नाश न हा, और स्वप्रकाशस्वरूप हो, इस से परमात्मा का नाम आदित्य है," तद्वायुः ., सब जगत् का धारण करने वाला, अनन्त बलवान प्राणों से भी जो प्रियस्वरूप है. इस से ईश्वर का नाम वायु हे पूर्वोक्त प्रमाण से “ तदु चन्द्रमाः ,, जो आनन्दम्ब. रूप और म्यसेवकों को परमानन्द देने वाला है इस से पूर्वोक्त प्रकार से चन्द्रमा परमात्मा को जानना “त- देव . शुक्रम् ,, वही चेतनस्वरूप ब्रह्म सब जगत का प्राणानिधिनमः॥ कर्ता है " तद्ब्रह्म ,. सो अनन्त चेतन सब से बड़ा है और धर्मात्मा स्वभक्तों को अत्यन्त मुख विद्यादि सद् गुणों से बढ़ाने वाला है "ता प्रापः ,, उसी को सर्व- ज चेतन सर्वत्र व्याप्त होने से आप नामक जानना “स, प्रजापतिः ., सो ही सब जगत् का पति ( स्वामी) और पालन करने वाला है अन्य कोई नहीं उसी को हम लोग इष्टदेव तथा पालक मानें अन्य को नहीं ॥ ४ ॥ → आभिविनयः ।। ܐ2 → मूल प्रार्थना :- ऋचं वाचं प्रपद्ये मनो यजुः प्रपद्ये माम प्रा- णं प्रपद्ये चक्षुः श्रोत्रं प्रपद्ये । वागोजः महाजा मर्यि प्राणांपानी ॥५॥ यजु० ३६।१॥ व्याख्यान-हे करुगाकर परमात्मन् ! आप की कृपा से मैं ऋग्वेदादिज्ञानयुक्त हो के उस का वक्ता होऊं तथा यजुर्वेदाभिप्रायार्थसहित सत्यार्थ मननयुक्त मन को प्राप्त होऊं ऐसे ही सामवेदार्थनिश्चय निदि- ध्यासन सहित प्राण को संदेव प्राप्त होऊं "वागाजः वाग्बल, वक्तृत्वबल, मनोविज्ञानबल मुझ को प्रापदेवं अन्तर्यामी कीकृपामे मैं यथावत् प्राप्त होऊं “महाजः., नेरोग्यदृढ़त्वादिगुगायुक्त को में आप के अनुग्रह से सदैव प्राप्त होऊं " मयि, प्राणापानी., हे सर्वजन- बलशरीरजीवनाधार ! प्राण (जिससे कि ऊर्ध्व चेष्टा होती है) और अपान ( अर्थात् जिम से नीचे की चेष्टा होती है ) ये दोनों मेरे शरीर में सब इन्द्रिय सब धातुओं की शुद्धि करने तथा नैरोग्य बल पुष्टि मग्ल- गति कराने और मर्मस्थलों की रक्षा करने वाले हों उन के अनुकूल प्राणादि को प्राप्त हो के आप की कृपा से हे ईश्वर ! सदैव सुग्वयुक्त आप की आज्ञा और उपासना में तत्पर रहं ॥५॥ ११ प्रााभिविनयः॥ →* मूल स्तुति स नो बन्धुर्जनिता स विधाता धामांनि वेद भुवनानि विश्वा । यत्र दे॒वा अमृतमान- शानास्तृतीये धामन्नध्यैरयन्त ॥६॥ यजु. ३२ । १०॥ व्याख्यान- वह परमेश्वर हमारा “ बन्धुः ,, दुःख नाशक और सहायक है तथा “ जनिता ,, सब जगत् तथा हम लोगों का भी पालन करने वाला पिता, तथा हम लोगों के कामों की सिद्धि काबिधाता पूर्ण काम की सिद्धि करने वाला वही है सब जगत् का भी वि. धाता रचने और धारण करने वाला एक परमात्मा ही है अन्य कोई नहीं “धामानि वेदेत्यादि ,, “ विश्वाः, सब धाम अर्थात् अनेक लोकलोकान्तरों को रच के अनन्त सर्वज्ञता से यथार्थ जानता है वह कौन परमे- उबर है ? कि जिस से देव अर्थात् विद्वान् लोग (वि- द्वाघमो हि देवाः, शतपथ ब्रा०) अमृत, मरणादि दुःख रहित मोक्ष पद में ( अर्थात् ) सब दुःखों से छूट के सर्वव्यापी पूर्णानन्दम्वरूप परमात्मा को प्राप्त हो के परमानन्द में रहते हैं, तृतीयेत्यादि एक स्थूल (जगत् एथिव्यादि ) दूसरा सूक्ष्म ( आदिकारण ) सर्वदोषर- हित अनन्तानन्दस्वरूप परब्रह्म उस धाम में “ अध्यैर-

आर्याभिविनयः॥
यन्त .. धर्मात्मा विद्वान् लोग स्वच्छन्द (स्वेच्छा)
से वर्तते हैं सब बाधाओं से छूट के विज्ञानवान् शुद्ध
हो के देश काल वस्तु परिच्छेदरहित सर्वगत "धाम-
न् , अाधारस्वरूप परमात्मा में रहते हैं उस से
दुःख
सागर में नहीं गिरते ॥६॥

आयाभिविनयः॥
→* मूल प्रार्थना
यतो यतः ममीहमे ततौ नोऽअभयं कुरु ।
शं नः कुरु प्रजाभ्योऽभयं नः पशुभ्यः ॥ ७ ॥
यजु० ३६ । २२॥
व्याख्यान- हे महेश्वर, दयालो ! जिस २ देश से
आप " समीहमे , सम्यक चेष्टा करते हो उस २ देश
से हम को अभय कगे अर्थात् जहां २ से हम को
भय प्राप्त होने लगे वहां से सर्वथा हम लोगों को
अभय ( भयरहित ) करो तथा प्रजा से हम को सुग्य
करो, हमारी प्रजा सब दिन सुखी रहै. भय देने वाली
कभी न हो तथा पशुओं से भी हम को अभय कगे,
किञ्च किसी से किसी प्रकार का भय हम लोगों
को आप की कृपा से कभी न हो जिस से हम लोग
निर्भय हो के सदेव परमानन्द को भोगें और निरन्तर
आप का राज्य तथा आप की भक्ति करें।॥ ७॥

प्राभिविनयः ।। * मूल स्तुति वदाहमेतं पुरुषं महान्तमादित्यवर्ण तममः परस्तात् । तमेव विदित्वाति मृत्युमैति नान्यः पन्या विद्यतेऽयनाय ॥८॥ यजु०३१॥ १८ ॥ व्याख्यान-सहनशीर्षादि विशेषणोक्त पुरुष सर्वत्र परिपूर्ण (पूर्णत्वात्पुरि शयनाद्वा पुरुष इति निरुक्तोक्तेः) है उस पुरुप को मैं जानता हूं अर्थात् सब मनुष्यों को उचित है कि उस परमात्मा को अवश्य जाने उसको कभी न भूलें अन्य किसी को ईश्वर न जाने वह कै. सा है कि "महान्तम्., बड़ों से भी बड़ा उस से बड़ा वातुल्य कोई नहीं है "आदित्यवर्णम्.. आदित्यादिका रचक और प्रकाशक वही एक परमात्मा है तथा वह सदा स्वप्रकाशस्वरूप ही है किं च तमसः परस्तात् , तम जो अन्धकार अविद्यादि दोप उस से रहित ही है त- था स्वभक्त, धर्मामा सत्यप्रेमी जनों को भी अविद्या- दिदोषरहित सद्यः करने वाला वही परमात्मा है, वि- द्वानों का ऐसा निश्चय है कि परब्रह्म के ज्ञान और उस की कृपा के विना कोई जीव कभीमुवी नहीं होता। " तमेव विदित्वेत्यादि०, उम परमात्मा को जान के जीव मृत्यु को उल्लङ्घन कर सक्ता है अन्यथा नहीं क्योंकि “ नाऽन्यः, पन्था, विद्यतेऽयनाय ., विना पर-

আগাশাধন।
मेश्वर की भक्ति और उस के ज्ञान के मुक्ति का मा-
ग कोई नहीं है, ऐसी परमात्मा की दृढ़ आज्ञा है, सब
मनुष्यों को इस में वर्तना चाहिये और सब पाखण्ड
और जंजाल अवश्य छोड़ देना चाहिये ॥८॥

पाभिविनयः॥
.
→ मूल प्रार्थना *-
तेजोऽसि तेजा मयि धेहि । वीर्यमंसि वीर्य
मयि धेहि । बलममि बलं मयि धेहि । प्रोजो.
ऽस्योजो मयि धेहि । मन्युरमि मन्यु मयि धे-
हि । सहामि सही मयि घेहि ॥ ६ ॥
यजु० १९ । ९॥
व्याख्यान-हे स्वप्रकाश ! अनन्त तेज ! आप अ-
विद्यान्धकार से रहित हो, किंच सत्य विज्ञान तेजः
स्वरूप हो, आप कृपादृष्टि से मुझ में वही तेज धारणा
करो जिस से मैं निस्तेज, दीन और भीरु कहीं कभी
न होऊं । हे अनन्तवीर्य परमात्मन् ! आप वीर्यस्वरूप
हो, आप सर्वोत्तम बल स्थिर मुझ में भी रक्खें, हे
अनन्तपराक्रम ! आप ओजः ( पराक्रमस्वरूप ) हासो
मुझ मैं भी उस पराक्रम को सदैव धारण करो, हे दु.
ष्टानामुपरि क्रोधकृन् ! मुझ में भी दुष्टों पर क्रोध धार-
या कराओ. हे अनन्त सहनस्वरूप! मुझ में भी आप
सहनसामर्थ्य धारण करो अर्थात् शरीर, इन्द्रिय, मन
और आत्मा इन कं तेजादि गुण कभी मुझ में से दूर
न हों, जिस से मैं आप की भक्ति का स्थिर अनुष्ठान
करूं और आप के अनुग्रह से संसार में भी सदा मुखी
रहूं ॥६॥

८८ पारगांभिविनमः ॥ → मूल स्तुति परीत्यं भूतानि परीत्य लोकान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च । उपस्थायं प्रथमजामृतस्या- त्मनात्मानमभि मंविवेश ॥ १० ॥ यजु ३२ । ११॥ व्याख्यान-सब जीवों में ( अर्थात आकाश और प्रकृति से लेके पृथिवीपर्यन्त सब संसार में ) वह प- रमेश्वर व्याप्त हो के परिपूर्गा भर रहा है, तथा सब लोक, सब पूर्वादि दिशा और ऐशान्यादि उपदिशा, ऊ- पर, नीचे अर्थात एक कगा भी उस के विना अपर्याप्त ( खाली ) नहीं "प्रथमजाम् ., मुख्य प्राणी अपने अात्मा से अत्यन्त सत्याचरण, विद्या, श्रद्धा, भक्ति से ऋतस्य .. यथार्थ सत्यस्वरूप परमात्मा को " उप- स्थाय , यथावत् जान उपस्थित (निकट प्राप्त ) 'अ- भिसंविवेश ,, अभिमुख हो के, उस में प्रविष्ट अर्थात् परमानन्दस्वरूप परमात्मा में प्रवेश करके सब दुःखों से छुट उसी परमानन्द में रहता है ॥ १० ॥ - १ भारभिविनयः ॥ → मूल प्रार्थना *-- भग प्रणेतर्भग सत्यराधा भगेमां धियमुदवा दर्दनः । भग प्रनो जनय गोभिरश्वभग प्र नुभिर्नुवन्तः स्याम ॥ ११ ॥ यजु०३४ । ३६ ॥ व्याख्यान-हे भगवन् ! परमेश्वर्यवान् भग ऐश्वर्य के दाता, संसार वा परमार्थ में आप ही हो, तथा "भ- गप्रणेतः, आप के ही स्वाधीन सकल ऐश्वर्य है, अ. न्य किसी के आधीन नहीं, आप जिस को चाहो उस को ऐश्वर्य देओ, सो श्राप कृपा से हम लोगों का दारि- दय छेदन करके हम को परमैश्चर्य वाले करें क्योंकि ऐश्वर्य के प्रेरक आप ही हो । हे “ सत्यराधः ,, भग- वन् ! सत्यैश्वर्य की सिद्धि करने वाले आप ही हो, सो श्राप नित्य ऐश्वर्य हम को दीजिये, तथा जो मोक्ष कहाता है उस सत्य ऐश्वर्य का दाता आप से भिन्न कोई भी नहीं है, हे सत्यभग ! पूर्ण ऐश्वर्य सर्वोत्तम बुद्धि हम को आप दीजिये जिस से हम लोग श्राप के गुण और आप की आज्ञा का अनुष्ठान ज्ञान इन को यथावत् प्राप्त हों, हम को सत्यबुद्धि, सत्यकर्म और सत्यगुणों को “ उदवः ,, ( उद्गय प्रापय ) प्राप्त कर, जिस से हम लोग मूक्ष्म से भी सूक्ष्म पदार्थों को य- थावत् जानें “भग प्रनो जनय .. हे सर्वैश्वोत्पादक !

गाय,
आर्याभिविनयः॥
हमारे लिये ऐश्वर्य को अच्छे प्रकार से उत्पन्न कर,
सर्वोत्तम घोड़े और मनुष्य इन से सहित अत्यु.
त्तम ऐश्वर्य हम को सदा के लिये दीजिये, हे सर्वश-
क्तिमन् ! आप की कृपा से सब दिन हम लोग उत्तम २
पुरुष, स्त्री और सन्तान भृत्य वाले हों आप से यह
हमारी अधिक प्रार्थना है कि कोई मनुष्य हम में दुष्ट
और मूर्ख न रहै, न उत्पन्न हो जिस से हम लोगों की
सर्वत्र सत्कीर्ति हो निन्दा कभी न हो ॥११॥

पाराभिविनयः ॥ ११ → मूल स्तुति - तदेजति तन्नेजति तद्दूरे तदृन्तिके । तदन्त- रस्य सर्वस्य तदुमवस्यास्य बातः ॥ १२ ॥ यजु०१० ।५॥ व्याख्यान- "तद् एजति., वह परमात्मा सब जगत् को यथायोग्य अपनी २ चाल पर चला रहा है सो अ- विद्वान् लोग ईश्वर में भी आरोप करते हैं कि वह भी चलता होगा परन्तु वह सब में पूर्ण है कभी चलाय- मान नहीं होता, अतएव " तन्नेजति ,, ( यह प्रमाणा है ) स्वतः वह परमात्मा कभी नहीं चलता एकरस नि- श्चल हो के भरा है, विद्वान् लोग इसी रीति से ब्रह्म को जानते हैं, " तद्रे ,, अधर्मात्मा, अविद्वान्, वि. चारशून्य, अजितेन्द्रिय ईश्वरभक्तिरहित इत्यादि दोषयुक्त मनुष्यों से वह ईश्वर बहुत दूर है अर्थात् वे कोटि ३ वर्ष तक उस को नहीं प्राप्त होते इस से वे तब तक जन्ममरणादि दुःखसागर में इधर उधर घूमते फिरते हैं कि जब तक उसको नहीं जानते " तद्वन्तिके..स त्यवादी सत्यकारी सत्यमानी जितेन्द्रिय सर्वजनोपका- रक विद्वान् विचारशील पुरुषों के “ अन्तिके ., त्यन्त निकट है, किंच वह सब के आत्माओं के बी- च में अन्तर्यामी व्यापक होके सर्वत्र पूर्ण भर रहा है, -

१२
श्राराभिविनमः॥
वह अात्मा का भी आत्मा है क्योंकि परमेश्वर सब
जगत् के भीतर और बाहर तथा मध्य अर्थात् एक
तिलमात्र भी उस के विना खाली नहीं है वह अख-
ण्डैकरस सब में व्यापक हो रहा है उसी को जानने से
मुख और मुक्ति होती है अन्यथा नहीं ॥ १२ ॥

आयाभिविनयः ॥ ०३ → मूल प्रार्थना आयुर्यज्ञेने कल्पतां प्राणो यज्ञेन कल्पता चक्षुर्यज्ञनं कल्पताछ श्रोत्र यज्ञेन कल्पतां वाग्य- ज्ञेन कल्पतां मनो यज्ञेन कल्पतामात्मा यज्ञेनं कल्पता ब्रह्मा यझेनं कल्पतां ज्योतियज्ञेनं क- ल्पताछ स्वर्यज्ञन कल्पतां पृष्ठं यज्ञन कल्पता यज्ञो यज्ञेन कल्पताम् । स्तोमंश्च यजुश्च ऋक् च सामं च बृहर्च रथन्तरं च । स्वर्देवा अग- न्मामृता अभूम प्रजापतेः प्रजा अभूम वेट स्वाहा ॥ १३ ॥ यजु० १८।२९ ॥ व्याख्यान-( यज्ञो वै विष्णुः यज्ञो वै ब्रह्मेत्यायैत- रेयशतपथब्राह्मणाश्रु०) यज्ञ यजनीय जो सब मनुष्यों का पूज्य इष्टदेव परमेश्वर उस के अर्थ अतिश्रडा से सब मनुष्य सर्वस्व समर्पण यथावत् करैं यही इस मन्त्र में उपदेश और प्रार्थना है कि हे सर्वस्वामिन ई- श्वर ! जो यह आप की आज्ञा है कि सब लोग सब पदार्थ मेरे अर्पण करें इस कारण हम लोग “आयुः,, उमर, प्राण, चक्षु ( आंख ), कान, वाणी, मन, श्रा- त्मा, जीव, ब्रह्मा, वेदविद्या और विद्वान् ज्योति (सूर्या- दि लोक अग्न्यादि पदार्थ ), स्वर्ग (मुखसाधन ), पृष्ठ (एथिव्यादि सब लोक आधार ) तथा पुरुषार्थ. यज्ञ

লাগান।
(जो जो अच्छा काम हम लोग करते हैं ), स्तोम,
स्तुति, यजुर्वेद, ऋग्वेद, सामवेद, अथर्वेद, सहदथन्तर,
महारथन्तर साम इत्यादि सब पदार्थ आप के समर्पण
करते हैं, हम लोग तो केवल आप के ही शरणा हैं
जैसी आप की इच्छा हो वैसा हमारे लिये आप की-
जिये, परन्तु हम लोग आपके सन्तान आप की कृपा
से “ स्वरगन्म ,, उत्तम सुख को प्राप्त हों जब तक
जी तब तक सदा चक्रवर्ती राज्यादि भोग से सुखी
रहैं और मरणानन्तर भी हम सुखी ही हैं । हे महा-
देवामृत ! हम लोग देव (परम विद्वान् ) हों तथा अ-
मृत मोक्ष जो आप की प्राप्ति उस को प्राप्त हों “वेट
स्वाहा ,, आप की आज्ञा का पालन और आप की
प्राप्ति में उद्योगी हों तथा अन्तर्यामी आप हृदय में प्राज्ञा
करो अर्थात् जैसा हमारे हृदय में ज्ञान हो वैसा ही
सदा भाषण करें इस से विपरीत कभी नहीं, हे कृपा-
निधे ! हम लोगों का योगक्षेम (सब निर्वाह ) आप
ही सदा करो आप के सहाय से सर्वत्र हम को विज-
य और सुख मिले ॥ १३ ॥

श्राभिधिमयः॥ * मूल स्तुति - यस्मान्न जातः परोऽअन्योऽअस्ति यांवि- वेश भुवनानि विश्वा । प्रजापतिः प्र॒जयां सघर- राणस्त्रीणि ज्योतीधषि सचते स षोडशी॥१४॥ यजु० ८।३६॥ व्याख्यान-जिस से बड़ा, तुल्प वा श्रेष्ठ न हुवा न है और न कोई कभी होगा, उस को परमात्मा कहना जो “ विश्वा भुवनानि ,, सब भुवन (लोक) सब पदार्थों के निवासस्थान असंख्यात लोकों को आवेश प्रविष्ट हो के पूर्ण हो रहा है, वही ईश्वर प्रजा का पति (स्वामी ) है । सब प्रजा को रमा रहा और सब प्रजा में रम रहा है “त्रीणीत्यादि ,, तीन ज्योति अग्नि, वायु और सूर्य इन को जिस ने रचा है सब जगत् के व्यवहार और पदार्थविद्या की उत्पत्ति के लिये इन तीनों को मुख्य समझना " स पोडशी, सोलहकला जिस ने उत्पन्न की हैं इस से सोलह क- लावान ईश्वर कहाता है वे सोलह कला ये हैं-इक्षण (विचार)१ प्राण २ श्रद्धा ३ आकाश ४ वायु ५ अ- ग्नि ६ जल ७ एथिवी ८ इन्द्रिय ६ मन १० अन्न ११ वीर्य ( पराक्रम) १२ तप (धर्मानुष्ठान ) १३ मन्त्र ( वेदविद्या ) १४ कर्मलोक (चेष्टास्थान ) १५ ओर

प्राभिविनयः॥
लोकों में नाम १६, इतनी कलाओं के बीच में सब
जगत् है और परमेश्वर में अनन्त कला हैं उस की
उपासना छोड़ के जो दूसरे की उपासना करता
है; वह सुख को प्राप्त कभी नहीं होता किन्तु सदा
दुःख में ही पड़ा रहता है ॥१४॥

प्राभिविनयः ॥ * मूल स्तुति :- म नः पितवं सूनवेऽग्ने मूपायनो भव । ग- चंस्वा नः स्वस्तये ॥ १५ ॥ यजु० ३ । २४ ॥ व्याख्यान-( ब्रह्मह्यग्निः, इत्यादि शतपथादिप्रामा- एयाद ब्रह्मेवालाग्निाह्यः ) हे विज्ञानस्वरूपेश्वगग्ने ! आप हमारे लिये “ सूपायनः , सुग्व से प्राप्त श्रेष्ठोपाय के प्रापक, अत्युत्तम स्थान के दाता कृपा से सर्वदा हो तथा रक्षक भी हमारे आप ही हो. हे स्वस्तिद पर- मात्मन् ! मब दुःखों का नाश करके हमारे लिये मु. ख का वर्तमान सदैव कराया जिम से हमाग वर्तमा- न श्रेष्ठ ही हो " स नः पितव सनत्र ., जम करुणाम- य पिता अपने पुत्र का मुखी ही रग्वता हे वमे श्राप हम को सदा सुखी रग्यो, क्योंकि जो हम लोग बुरे होंगे तो उन श्राप की शोभा नहीं होना फिञ्च स- न्तानों को सुधारने से ही पिता की शोभा और बड़ाई होती है, अन्यथा नहीं ॥ ११ ॥ १३ ९८ आयाभिविनयः॥ → मूल स्तुति :- विभूरसिं प्रवाहणः । वह्निरसि हव्यवाहनः । श्वात्रोऽसिप्रचेताः । तथोऽसि विश्ववेदाः ॥ उ- शिगसि कविः । अङ्घारिरमि बम्भारिः । अ- वम्यूमि दुवस्वान् । शुन्ध्यूरंसि मार्जालीयः । सम्राडंमि कृशानुः । परिषद्योऽमि पव॑मानः । नमोऽमि प्रतक्का।मष्टोऽमि हत्यमदनः । ऋतधा- मामि स्वज्योतिः ॥ ममुद्रोऽसि विश्वव्यंचाः । अजोऽस्यकपात् । अहिरमि बुध्न्यः । वागस्यै- न्द्रममि मदोऽमि । ऋतस्य द्वारौ मा मा सन्ता- प्तम् । अध्वनामध्वपते प्र म तिर स्वति मेऽ. स्मिन् पथि देवयाने भूयात् ॥ १६ । १७ । १८॥ यजु० ५। ३१ । ३२ । ३३ ॥ व्याख्यान-हे व्यापकेश्वर ! पापविभु हो अर्थात् सर्वत्र प्रकाशित वैभवेश्वर्ययुक्त हो किन्तु और कोई नहीं, विभु आप सब जगत् के प्रवाहण ( स्वस्वनिय- मपूर्वक चलाने वाले ) तथा सब के निर्वाहकारक भी हो, हे स्वप्रकाशक सर्वरसवाहकेश्वर ! आप वह्नि हैं अर्थात् सब हव्य उत्कृष्ट रसों के भेदक आर्कषक प्राभिविनयः ॥ उशिक " तथा यथावत् स्थापक हो, हे अात्लन् ! आप शीघ्र व्यापनशील हो, तथा प्रकृष्ट ज्ञानस्वरूप प्रकृष्ट ज्ञान के देने वाले हो, हे सर्ववित् ! आप तुथ और विश्ववेदा हो, “ तुथो वै ब्रह्म ,, ( यह शतपथ की श्रुति है ) सब जगत् में विद्यमान प्राप्त और लाभ कगने वाले हो ॥ १६ ॥ हे सर्व प्रिय ! श्राप कमनीय स्वरूप अर्थात् सब लोग जिस को चाहते हैं, क्योंकि आप कवि पूर्ण विद्वान् हो तथा ग्राप अङ्घारि हो अर्थात् स्वभक्तों का जो अब (पाप ) उस के अरि ( शत्रु ) हो उस समस्त पाप के नाशक हो तथा "ब- म्भारिः, स्वभक्तों और सर्व जगत् के पालन तथा धारण करने वाले हो “अवस्यूगसि दुवस्वान् .. अन्नादि पदार्थअपने भक्तों धर्मात्माओं को देने की इच्छासदा कर- तेहो तथा परिचरणीय विद्वानों से सेवनीयतम हो,“शु. न्ध्युरसि, मार्जालीयः .. शुदग्वरूप और मब जगन् के शोधक तथा पापों का मार्जन (निवारगा) करने वाले आप ही हो अन्य कोई नहीं, “ सम्राडसि कृशानुः ,, सब राजाओं के महाराज तथा कृश दीनजनों के प्राणा के सुखदाता आप ही हो" परिपद्योसि पवमानः .. हे न्यायकारिन् ! पवित्र परमेश्वर सभा के आज्ञापक स- पय सभापति सभाप्रिय सभारक्षक आप ही हो, तथा पवित्रस्वरूप पवित्रकराक सभा से ही सुखदायक प. वित्रमिय आप ही हो, " नभोऽसि प्रतक्का .. हे निर्वि- १०० प्रामाभिविनयः॥ कार ! आकाशवत आप क्षोभरहित अतिसूक्ष्म होने से आप का नाम नभ है तथा प्रतक्का सब के ज्ञाता, सत्यासत्यकारी जनों के कर्मों की साक्ष्य रखने वाले कि जिम ने जैसा पाप वा पुण्य किया हो उस को वैसा फल मिले, अन्य का पुण्य वा पाप अन्य को कभी न मिले “ मृणोसि हत्यसूदनः,, मृष्ट शुहस्व- रूप सब पापों के मार्जक शोधक तथा हव्यसूदन, मिष्ट सुगन्ध रोगनाशक पुष्टिकारक, इन द्रव्यों से वायु दृष्टि की शुद्धि करने कराने वाले हो अतएव सब द्रव्यों के विभागकती आप ही हो इस से आप का नाम हव्यसूदन ,, है, "ऋतधामासि स्वातिः,, वन् ! आप का ही धाम स्थान सर्वगत् सत्य और यथार्थस्वरूप है, यथार्थ ( सत्य ) व्यवहार में ही प्राप निवास करते हा आप मुखम्वरूप पार सुख- कारक हा तथा " ज्यातिः ,, स्वप्रकाश और सब के प्रकाशक आप ही हैं ।। ११ ॥ "समुद्रोऽसिविश्वव्यचाः,, हे वगीयस्वरूप ! सब भून मात्र प्राप ही में 3 हैं. क्योंकि कार्य कारगा में ही मिले हैं, आप सब के कारण हो तथा सहज से सब जगत् को विस्तृत किया है इस से आप “ विश्वव्यचाः,, हैं, “अजोम्येकपात्,, श्राप का जन्म कभी नहीं होता, और यह सब जगत् आप के किञ्चिन्मात्र एक देश में है, आप अनन्त हो " अहिरसि बुध्न्यः आप की हीनता स्त्रः , . आर्थाभिविनयः॥ कभी नहीं होती तथा सब जगत् के मूल कारण और अन्तरिक्ष में भी सदा आप ही पूर्गा रहते हो "वा. गस्यैन्द्रमसि सदोसि.. सब शास्त्र के उपदेशक अनन्त- विद्यास्वरूप होने से ग्राप वाक् हो, परमैश्वर्यम्वरूप सब विद्वानों में अत्यन्त शोभायमान होने से प्राप ऐन्द्र हो, सब संसार श्राप में ठहर रहा है, इस से आप सदा ( सभास्वरूप ) हो, “ऋतस्य द्वाग मा मा सन्ता- तम् ,, सत्यविद्या और धर्म ये दोनों मोक्षस्वरूप प्राप की प्राप्ति के द्वार हैं उनको सन्तापयुक्त हम लोगों के लिये कभी मत रक्खो किन्तु सुखम्वरूप ही खुले रक्खो जिस से हम लोग सहज से आप को प्राप्त हों अध्वनामित्यादि, हे अध्वपते ! परमार्थ और व्यव- हार मागों में मुझ को कहीं वेश मत होने दे किन्तु उन मार्गों में मुझ को स्वरित ( आनन्द ) ही आप की कृपा से रहै किसी प्रकार का दुःख न ग्है ।। १८॥

प्राभिविनयः॥
> मूल स्तुति
देवकृतस्यैनमोऽवयजनमसि। मनुष्यकृतस्यै-
नमोऽवयजनभमि । पितृकृतस्यैनमोऽवयजनम-
सि । आत्मकृतस्यैनंसाऽवयनममि । एनस
एनसोऽवयजनममि । यच्चाहमनो विहांश्चकार
यच्चाविहांस्तस्य॒मव॑स्यैनसोऽवयनमसि ।१९।
यजु० ८।१३ ॥
व्याख्यान- हे सर्व पापप्रणाशक ! " देवकृतः०
इन्द्रिय विद्वान् और दिव्यगुणयुक्त जन के दुःख के ना.
शक एक ही आप हो अन्य कोई नहीं, एवं मनुष्य,
( मध्यस्थजन ) पितृ ( परमविद्यायुक्त जन ) और
"प्रात्मकृत०, जीव के पापों तथा एनम०,,पापों से
भी बड़े पापों से आप ही अवयजन हो अर्थात् सर्व
पाप से अलग हो और हम सब मनुष्यों को भी पाप
से दूर रखने वाले एक अाप ही दयामय पिता हो, हे
महानन्तविद्य ! जो मैंन विद्वान् वा अविद्वान हो के
पाप किया हो उन सब पापों का जाने वाला श्राप
कविना काई भा इस संसार में हमारा शरण नहीं
है, इस से हमारे अविद्यादि सब पाप छुड़ा के शीघ्र
हम को शुद्ध करो ॥ १६ ॥

आभिधिनयः॥
→ मूल स्तुति
हिरण्यगर्भः समवर्त्तताग्रे भूतस्य जातः प-
तिरेक ग्रामीत् । स दांधार पृथिवीं द्यामुतेमा
कस्मैदेवाय हविषा विधेम ॥२०॥
यजु० १३।४॥
व्याख्यान-जब सृष्टि नहीं हुई थी तब एक अ-
द्वितीय हिरण्यगर्भ (जो सूर्यादि तेजम्वी पदार्थों का
गर्भनाम उत्पत्तिस्थान उत्पादक ) है सो ही प्रथम था
वह सब जगत् का सनातन प्रादुर्भूत प्रसिद्ध पति है,
वही परमात्मा एथिवी से ले के प्रकृतिपर्यन्त जगत्
को रच के धारण करता है, “कस्मै ., ( कः प्रजाप-
तिः ! प्रजापति कस्तस्मै देवाय शतपथे ) । प्रजापति
जो परमात्मा उस की पूजा आत्मादि पदार्थों के सम-
पण से यथावत् करें, उससे भिन्न की उपासना लेश
मात्र भी हम लोग न करें, जो परमात्मा को छोड़ के वा
उस के स्थान में दूसरे की पूजा करता है उस
की और उस देश भर की अत्यन्त दुर्दशा होती है
यह प्रसिद्ध है, इस से चतो मनुष्यो ! जो तुम को सु-
ख की इच्छा हो तो एक निराकार परमात्मा की य-
थावत् भक्ति करो,
अन्यथा तुम
को कभी सुख न
होगा ॥ २०॥

प्रार्याभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना इन्द्रो विश्वस्य राजति । शं नोऽअस्तु हि- पढ़े शं चतुष्पदे ॥शं नो वातः पवता शंन- स्तपतु सूर्यः । शं नः कनिक्रददेवः पर्जन्यो:- अभिवर्षतु ॥ अहानि शं भवन्तु नः शथे रात्रीः प्रतिधीयताम् । शं न इन्द्राग्नी भवतामवाभिः शं न इन्द्रावरुणा रातहव्या । शंन इन्द्रापूषणा वाजसातौ शमिन्द्रासोमा मुविताय शंयोः॥२१॥ २२ । २३ ॥ यजु० ३६ मं० ८।१०।११॥ व्याख्यान-हे इन्द ! श्राप परमैश्वर्ययुक्त सब सं- सार के राजा हो, सर्वप्रकाशक हो. हे रत्तक ! श्राप कृपा से हम लोगों के “ द्विपदे,, जो पुत्रादि, उन के लिये परमसुखदायक हो तथा “चतुष्पदे,, हस्ती, अश्व और गवादि पशुओं के लिये भी परमसुखकारक हो जिस से हम लोगों को सदा आनन्द ही रहै ॥ २१ ॥ हे सर्वनियन्तः ! हमारे लिये सुखकारक शीतल मन्द और सुगन्ध सदैव वायु चले, ऐसे सूर्य भी सुखकारक तपे,तथा मेघ भी सुख काशब्द लिये अर्थात् गर्जनपूर्वक सदैव काल काल में सुग्वकारक वर्षा वर्षे जिस से आप के कृपापात्र मह लोग सुखानन्द ही में सदा हैं ॥२०॥हे क्षणादिकालपते ! सब दिवस आप के

भाभिविनयः ।।
नियम से सुखरूप ही हम को हों, हमारे लिये सर्व रा-
त्रि भी आनन्द से बीतें, हे भगवन् ! दिन और रात्रियों
को सुखकारक ही आप स्थापन करो जिस से सब
समय में हम लोग सुखी ही रहैं, हे सर्व स्वामिन् ! "इ.
न्दाग्नी,, मूर्य तथा अग्नि ये दोनों हम को आपके अ-
नुग्रह से और नानाविध रक्षाओं से सुख कारक हों
इन्द्रावरुणा रातहव्या ,, हे प्राणाधार ! होम से शु.
द्विगुणयुक्त हुए आपकी प्रेरणा से वायु और चन्द्र हम
लोगों के लिये सुखरूप ही सदा हो “इन्द्रापूषणा,वा-
जसातौ,, हे प्राणपते ! आप की रक्षा से पूर्ण आयु
और बलयुक्त प्राण वाले हम लोग अपने अत्यन्त
पुरुषार्थयुक्त युद्ध में स्थिर रहैं जिस से शत्रुओं के
सन्मुख हम निबर्ल कभी न हो “इन्द्रासोमा मुविताय
शंयोः ,, (प्राणापानौ वा इन्दाग्नी इत्यादि शतपथे
हे महाराज! आप के प्रबन्ध से राजा और प्रजा पर-
स्पर विद्यादिसत्यगुणयुक्त हो के अपने ऐश्वर्य का उ-
त्पादन करें तथा आप की कृपा से परस्पर प्रोतियुक्त
हो, अत्यन्त सुख लाभों को प्राप्त हों, आप हमपुत्र
लोगों को सुखी देख के अत्यन्त प्रसन्न हों और हम भी
प्रसन्नता से आप और जो आप की सत्य प्राज्ञा उस
में ही तत्पर हो ॥ २३॥

१६
आर्याभिविनयः ।।
॥
* मूल स्तुति :-
प्रतहोचेदमृतं न विहान् गन्धर्वो धाम बि-
भृतं गुहा मत् । त्रीणि पदानि निहिता गुहांस्य
यस्तानि बढ़ स पितुः पिताऽसत् ॥ २४ ॥
यजु० ३२ । ९॥
व्याख्यान-हे वेदादि शास्त्र और विद्वानों के प्रति-
पादन करने योग्य ! जो अमृत ( मरणादि दोषरहित)
मुक्तों का धाम (निवासस्थान ) सर्वगत सब का
धारण और पोषण करने वाला, सब की बुद्धियों का
साक्षी ब्रह्म है उस पाप का उपदेश तथा धारण जो
विद्वान् जानता है वह गन्धर्व कहाता है ( गच्छतीति
गं ब्रह्म तदरतीति स गन्धर्वः ) सर्वगत ब्रह्म को जो
धारण करने वाला उसका नाम गन्धर्व है तथा परमा-
स्मा के तीन पद है जगत् की उत्पत्ति, स्थिति और प्र-
लय करने के सामर्थ्य, तथा ईश्वर को जो स्वहृदय
में जानता है पिता का भी पिता है अर्थात विद्वानों में
भी विद्वान हे ॥२४॥

স্বায়ত্বশাসন। → मूल प्रार्थना *- द्यौः शान्तिरन्तरिक्षय शान्तिः पृथिवी शा- न्तिरापः शान्तिरोपंधयः शान्तिः । वनस्पतयः शान्तिर्विश्वेदेवाः शान्तिर्ब्रह्म . शान्तिस्सर्वछ शान्तिश्शान्तिरेख शान्ति मा मा शान्तिरधि ॥ २५॥ यजु० ३६ । १७॥ व्याख्यान-हे सर्वदुःख की शान्ति करने वाले ? सब लोकों से ऊपर जो आकाश सो सर्वदा हम लोगों के लिये शान्त (निरुपद्रव ) सुखकारक ही रहे. अ- न्तरिक्ष मध्यस्थ लोक और उस में स्थित वायु आदि पदार्थ, पृथिवी, एथिवीस्थ पदार्थ, जल, जलम्थ पदार्थ, ओपधि, तत्रस्थगुण, वनस्पति, तत्रस्थ पदार्थ. विश्वेदेव (जगत् के सब विद्वान् ) तथा विश्वद्योतक वेदम- न्त्र, इन्द्रिय, सूर्यादि, उन की किरण, तत्रस्थगुण, ब- ह्म, परमात्मा, तथा वेदशास्त्र, स्थूल और सूक्ष्म, चराऽ- चर जगत् ये सब पदार्थ हमारे लिये हे सर्वशक्तिमान परमात्मन् ! आप की कृपा से शान्त (निरुपद्रव ) स- दानुकूल सुखदायक हों मुझ को भी शान्ति प्राप्त हो जिस से मैं भी आप की कृपा से शान्त दुष्ट क्रोधादि उपदव रहित होऊं तथा सब संसारस्थ जीव भी दुष्ट क्रोधादि उपद्रव रहित हो ॥ २५॥ , ,

पारर्याभिविनयः॥
→* मूल स्तुति -
नमः शम्भवाय च मयोभवाय च नमः श-
डकराय च मयस्कराय च नमः शिवाय चशि-
वतराय च ॥२६॥ यजु० १६।४१ ॥
व्याख्यान-हे कल्याणस्वरूप, कल्याणकर !
आप शंभव हो, ( मोक्ष सुखस्वरूप और मोक्षसुख के
करने वाले हो) आप को नमस्कार है, आप मयोभ-
व हो, सांसारिक सुख के करने वाले आप को मैं न-
मस्कार करता हूं आप शंकर हो आप से ही जीवों
का कल्याण होता है अन्य से नहीं, तथा मयस्कर
अर्थात् मन, इन्द्रिय, प्राण और आत्मा को सुख क-
ग्ने वाले आप ही हो, आप शिव ( मंगलमय ) हो त-
था श्राप शिवतर ( अत्यन्त कल्याणस्वरूप और क-
ल्याणकारक) हो इस से आप को हम लोग बार-
वार नमस्कार करते हैं,( नमो नम इति यज्ञः शतपथे )
श्रद्धा भक्ति से जो जन ईश्वर को नमस्कारादि करता
है सो मङ्गलमय ही होता है ॥ २६ ॥

पाटाभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना *-- भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्ष- भिर्यजत्राः । स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवाछसस्तनूभियं- शेमहि देवहितं यदायुः ॥२७॥ यजु०२५॥ २१॥ व्याख्यान-हे देवेश्वर ! देव विद्वानो ! हम लोग कानों से सदैव भद्र कल्याण को ही सुनें अकल्याण की बात भी हम कभी न मुनें, हे यजनीयेश्वर! हे यज्ञ- कत्रो ! हम आंखों से कल्याण (मंगलसुख) को ही सदा देखें, हे जनों ! हे जगदीश्वर ! हमारे सब अंग उपांग ( श्रोत्रादि इन्दिय तथा सेनादि उपांग ) स्थिर (दृढ़ ) सदा रहैं जिन से हम लोग स्थिरता से आप की स्तुति और आप की आज्ञा का अनुष्ठान सदा करें तथा हम लोग आत्मा, शरीर, इन्द्रिय और विद्वा- नों के हित कारक आयु को विविधसुखपूर्वक प्राप्त हों अर्थात् सदा सुख में ही रहैं ॥ २७ ।।

ܘܕܕ आग्र्याभिविनयः॥ * मूल स्तुति ब्रह्म जवानं प्रथमं पुरस्ताहिसमतः मुरुची वेन वः । स बुध्न्या उपमा अस्य विष्ठाः म- तश्च योनिमसंतश्च विवः ॥२८॥ यजु० १३ । ३॥ व्याख्यान-हे महीय परमेश्वर ! आप बड़ों से भी बड़े हो आप से बड़ा वा आप के तुल्य कोई नहीं है " जज्ञानम् , सब जगत् में व्यापक (प्रादुर्भून ) हो सब जगत् के प्रथम ( आदिकारण ) आप ही हो, सू- र्यादि लोक “सीमतः,, सीमा से युक्त (मर्यादासहित) सुरुचः ,, आप से प्रकाशित हैं, “पुरस्तात् ,, इन को पूर्व रच के आप ही धारण कर रहे हो, (व्यावः ) इन सब लोकों को विविध नियमों से पृथक् २ यथा- योग्य वर्ता रहे हो, “बेनः ,, आप के प्रानन्दस्वरूप होने से ऐसा कोई जन संसार में नहीं है जो श्राप की कामना न करै, किन्तु सब ही आप को मिला चाहते हैं, तथा आप अनन्त विद्यायुक्त हो सब रीति से रक्षक आप ही हो, सो ही परमात्मा "बुध्न्यः ,, अन्तरिक्षा न्तर्गत दिशादि पदार्थों को "विवः, विटत (विभक्त) करता है वे अन्तरिक्षादि उपमा सब व्यवहारों में उप- युक्त होते हैं और वे इस विविध जगत् के निवास- .

१११
प्राभिविनयः॥
स्थान हैं, सत् विद्यमान स्थूल जगत् असत् अविद्या
चक्षुरादि इन्द्रियों से अगोचर इस विविध जगत् की
योनि आदि कारण आप को ही वेद शास्त्र और वि-
द्वान् लोग कहते हैं, इससे इस जगत् के माता पिता
आप ही हैं, हम लोगों को भजनीय इष्ट देव हैं ॥२८॥

११२
प्रााभिषिमयः॥
* मूल प्रार्थना
सुमित्रिया न आप ओषधयः सन्तु । दुर्मि-
त्रियास्तस्मै सन्तु । योऽस्मान् दृष्टि यञ्च वयं
हिष्मः ॥ २९ ॥ यजु०६ । २२ ।। ३६ ॥२३॥
व्याख्यान-हे सर्वमित्रसम्पादक ! आप की कृपा
से प्राण और जल तथा विद्या और ओषधी “ सुमि-
त्रियाः, (सुखदायक) हम लोगों के लिये सदा हो कभी
प्रतिकूल न हों और जो हम से द्वेष अप्रीति शत्रुता करता
है तथा जिस
दुष्ट
से हम द्वेष करते हैं हे न्यायकारिन् !
उस के लिये “ दुर्मित्रियाः , पूर्वोक्त प्राणादि प्रतिकूल
दुःखकारक ही हो अर्थात् जो अधर्म करै उस को
श्राप के रचे जगत् के पदार्थ दुःखदायक ही हों जिस
से वह अधर्म न करे और हम को दुःख न दे सकै
हम लोग सदा सुखी ही रहैं ॥ २६ ॥

प्राराभिविनयः॥ १३ → मूल प्रार्थना य इमा विश्वा भुवनानि जुह्वदृषिोता न्य- सीदत् पिता नः । स आशिषा द्रविणमिच्छ- मानः प्रथमच्छदवाँ॥ऽग्राविवेश ॥ ३० ॥ यजु० १७। १७ ॥ व्याख्यान-" होता .. उत्पत्ति समय में देने और प्रलय समय में सब को लेने वाला परमात्मा ही है ऋषिः ,, सर्वज्ञ इन मब लोक लोकान्तर भुवनों का अपने सामर्थ्य कारगा में होम (प्रलय करके ) "न्य- सीदत्., नित्य अवस्थित है सो ही हमाग पिता है फिर जब द्रविणा द्रव्यरूप जगत् को स्वेच्छा से उत्पन्न किया चाहता है उस “ आशिपा .. सामर्थ्य से यथा- योग्य विविध जगत् को सहजस्वभाव से रच देता है इस चराचर "प्रथमच्छत् ,, विस्तीर्ण जगत को रच के अनन्तस्वरूप से आच्छादित करता है और अन्तर्यामी साक्षीस्वरूप उस में प्रविष्ट हो रहा है अर्थात् बाहर और भीतर परिपूर्ण हो रहा है वही हमारा निश्चित पिता है उस की सेवा छोड़ के जो मनुष्य अन्य मृ- त्यादि की सेवा करता है वह कृतघ्त्वादि महादीपयुक्त हो के सदैव दुःखभागी होता है जो मनुष्य परमदया- मय पिता की आज्ञा में रहता है वह सर्वानन्द का संदे- व भोग करता है ॥ ३० ॥ १५ ११४ आराभिविनयः॥ → मूल स्तुति इषे पिन्वस्व । ऊर्जे पिन्वस्व । ब्रह्मणे पिन्व- स्व । क्षत्राय पिन्वस्व । द्यावापृथिवीभ्यां पि- न्वस्व । धर्मासि मुधर्म । अमेन्य॒स्मे नम्णानि धारय ब्रह्म धारय क्षत्रं धारय विशं धारय॥३१॥ यजु. ३८।१४॥ व्याख्यान-हे सर्वसौख्यप्रदेश्वर ! हम को “इषे,, उत्तमान के लिये पुष्ट कर अन्न के अपचन वा कुपच के रोगों से बचा तथा विना अन्न के दुःखी हम लोग कभी न हों। हे महाबल ! “ ऊर्जे,, अत्यन्त पराक्रम के के लिये हम को पुष्ट कर, हे वेदोत्पादक ! “ब्रह्मणे, सत्प वेद विद्या के लिये बुध्यादि बल से सदैव हम को पुष्ट और बल युक्त कर । हे महाराजाधिराज पर ब्रह्मन् ! " क्षत्राय ,, अखण्ड चकवर्ती राज्य के लिये शौर्य, धैर्य, नीति, विनय, पराक्रम और बलादि उत्त- म गुणयुक्त कृपा से हम लोगों को यथावत् पुष्ट कर अन्य देशवासी राजा हमारे देश में कभी न हों तथा हम लोग पराधीन कभी न हों, हे स्वर्गप्रथिवीश ! द्यावाएथिवीभ्याम् ., स्वर्ग (परमोत्कृष्ट मोक्षसुख) एथिवी (संसार सुग्व) इन दोनों के लिये हम को समर्थ कर, हे सुष्टु धर्मशील! तू धर्मकारी हो तथा धैर्य आभिविनयः॥ स्वरूप ही हो हम लोगों को भी कृपा से धर्मात्मा कर, "अमेनि.,तू निर्वैर है हमको भी निर्वैर कर तथा कृपा दृष्टि से “अम्म,, (अस्मायम्) हमारे लिये "नृम्णानि,, विद्या पुरुषार्थ, हस्ती, अश्व, सुवर्ण, हीरादि रत्न, उत्कृष्ट रा- ज्य, उतम पुरुष और प्रीत्यादि पदार्थों को धारण कर जिससे हम लोग किसी पदार्थ के विना दुःखी न हों, हे सर्वाधिपते ! ब्राह्मण ( पूर्णविद्यादिसद्गुणयुक्त ) क्षत्र (बुद्धि विद्य) तथा शौर्यादिगुगायुक्त "विश,, अ- नेक विद्योद्यम, बुद्धि, विद्या , धन और धान्यादि बल- युक्त तथा शूदादि भी सेवादि गुणयुक्त उत्तम हमारे राज्य में हों इन सब का धारण अाप ही करो जिससे अखण्ड ऐश्वर्य हमारा आप की कृपा से सदा बना रहे ॥ ३१ ॥ .

११३ ? प्राभिविनयः॥ → मूल स्तुति :- कि स्विदासीदधिष्ठानमारम्भणं कतमत्स्वि कथासीत् । यतो भूमि जनयन्विश्वकर्मा वि- द्यामोन्महिना विश्वचक्षाः ॥ ३२ ॥ यजु. १७ । १८॥ व्याख्यान-(प्रश्नोत्तर विद्या से ) इस संसार का अधिष्ठान क्या है ? कारण और उत्पादक कोन है ? किस प्रकार से है ? तथा रचना करने वाला अधिष्ठान क्या है ? तथा निमित्त कारण और साधन जगत् वा ईश्वर के क्या हैं ( उत्तर) यतः ,, जिस का विश्व (जगत् कर्म)किया हुआ है उस विश्वकर्मा परमात्माने अनन्तसामर्थ्य से इस जगत कोरचा है वही इस सब जगत् का अधिष्ठान, निमित्त और साधनादि है उसने अपने अ- नन्त सामर्थ्य से इस सब जगत् को यथायोग्य रचा और भूमिसे ले के स्वर्गपर्यन्त रच के अपनीमहिमा से “ो. त ,, आच्छादित कर रक्खा है और परमात्मा का अधिष्ठानादि परमात्मा ही है अन्य कोई नहीं, सब का भी उत्पादन, रक्षा धारणादि वही करता है तथा आनन्दमय है और वह ईश्वर “विश्वचक्षाः ,, सब संसार का दृष्टा है उस को छोड़ के अन्य काआश्रय जो करता है वह दुःखसागर में क्यों न डूबेगा?॥३२ ।।

प्रारभिविनयः॥
११७
→ मूल प्रार्थना
तनूपा अंग्नेऽसि तन्वं मे पाहि । आयुर्दा-
अग्नेऽस्यायुमें देहि । वर्चीदा अग्नेऽमि वर्चीमे
देहि । अग्ने यन्मे तन्वा ऊनं तन्मऽआएंगा
॥ ३३ ॥ यजु० ३ । १७॥
व्याख्यान-हे सर्वरक्षकेश्वराग्ने ! तू हमारे शरीर
का रक्षर है । सो शरीर को कृपा से पालन कर, हे म-
हावैद्य ! आप आयु ( उमर ) बढ़ाने वाले हो मुझ
को सुखरूप उत्तमायु दीजिये, हे अनन्त विद्यातेजयुक्त!
आप “वर्चः , विद्यादि तेज अर्थात यथार्थ विज्ञान देने
वाले हो मुझ को सर्वोत्कृष्ट विद्यादि तेज देशो पूर्वोक्त
शरीरादि की रक्षा से हम को सदा आनन्द में रक्खो
और जोर कुछ भी शरीरादि में “ऊनम्,,न्यून हो उस २
को कृपादृष्टि से सुख और ऐश्वर्य के साथ सब प्रकार
से श्राप पूर्ण करो किसी आनन्द वा श्रेष्ठ पदार्थ की
न्यूनता हम को न रहै, आप के पुत्र हम लोग जब
पूर्णानन्द में रहेंगे तभी आप पिता की शोभा है क्योंकि
लड़के लोग छोटी वा बड़ी चीज़ अथवा सुख पिता माता
को छोड़ किस से मांगे? सो आप सर्वशक्तिमान्हमारे
पिता सब ऐश्वर्य तथा सुख देने वालों में पूर्ण हो ॥३३॥

११८ . प्राभिविनयः॥ → मूल प्रर्थना विश्वतश्चक्षुरुत विश्वतोमुखो विश्वतो बाहु- रुत विश्वतस्पात् । सं बाहुभ्यां धर्मति संपत- त्रैावाभूमी जनयन देव एकः ॥ ३४ ॥ यजु० १७ । १९॥ व्याख्यान-विश्व ( सब जगत् में )जिस का चक्षु (दृष्टि ) जिस से अदृष्ट कोई वस्तु नहीं तथा सर्वत्र मुख, बाहु, पग, अन्य श्रोत्रादि भी हैं जिस की दृष्टि में अर्थात् सर्वहक् सर्ववक्ता सर्वाधारक और सर्वगत ईश्वर व्यापक है उसी से जब डरेगा तभी धर्मात्मा होगा अन्यथा कभी नहीं, वही विश्वकर्मा परमात्मा एक ही अद्वितीय है, एथिवी से लेके स्वर्गपर्यन्त ज- गत् का कर्ता है जिस २ ने जैसा २ पाप वा पुण्य किया है उस२कोन्यायकारी दयालु जगपिता पक्षपात छोड़ के अनन्त बल और पराक्रम इन दोनों बाहुओं से सम्यक् “पतत्रैः ,, प्राप्त होने वाले सुख दुःख फल दोनों से प्राप्त सब जीवों को “धमति,, (धमन-कम्पन) यथायोग्य जन्ममरणादिको प्राप्त करा रहा है उसी नि- राकार अज अनन्त सर्वशक्तिमान् न्यायकारी दयामय ईश्वर से अन्य को कभी न मानना चाहिये वही या- चनीय पूजनीय हमारा प्रभु स्वामी इष्टदेव है उसी से सुख हम को होगा अन्य से कभी नहीं ॥३४ ।।

१००
प्राभिविनयः॥
→* मूल स्तुति *-
भूर्भुवः स्वः, मुप्रजाः प्रजाभिः स्याछ मुवी-
रो वीरैः सुपोषः पौषैः । नय प्र॒जां मे पाहि ।
शम्य पशून्म पाहि । अर्थर्य पितुम्मे पाहि
॥ ३५ ॥ यजु० ३ । ३७ ॥
व्याख्यान-हे सर्वमङ्गलकारकेश्वर ! आप" भूः ,
सदा वर्तमान हो " भुवः ,, वायु आदि पदार्थों के
रचने वाले “ स्वः ., सुखरूप हो, हम को सुख दीजिये,
हे सर्वाध्यक्ष ! आप कृपा करो जिस से कि मैं पुत्र
पौत्रदि उत्तम गुण वाली प्रजा से श्रेष्ठ प्रजा वाला
होऊं, सर्वोत्कृष्ट वीर योद्धाओं से "सुवीरः ,, युद्ध में
सदा विजयी हाऊं, हे महापुष्टिप्रद ! आप के अनुग्रह
से अत्यन्त विद्यादि तथा सोमलता आदि अोपधि सु-
वर्णादि और नैरोग्यादि सर्वपुष्टि युक्त होऊ, हे " नर्य,,
नरों के हितकारक ! मेरी प्रजा की रक्षा आप करो,
हे “शंस्य ,, स्तुति करने के योग्य ईश्वर ! हस्त्यश्वा-
दि पशुओं का आप पालन करो, हे .
अथर्य ,,
व्यापक ईश्वर ! " पितुम् ,, धरे अन्न की रक्षा कर,
हे दयानिधे ! हम लोगों को सब उत्तम पदार्थों से
परिपूर्ण और सब दिन आप आनन्द में रक्खा ॥ ३५ ॥

१२०
आयाभिषिमयः॥
→ मूल प्रार्थना
किछ स्विहन क उ स वृक्ष आंस यतो द्या-
वा पृथिवी निष्टतक्षुः । मनीषिणो मनसा पृ-
च्छतेदु तद्यध्यतिष्ठभुवनानि धारयन् ॥३६॥
यजु० १७॥२०॥
व्याख्यान-(प्रश्न) विद्या क्या है ? बन और वृक्ष
किस को कहते हैं ? ( उत्तर ) जिस सामर्थ से वि-
श्वकर्मा ईश्वर ने जैसे तक्षा ( बढ़ई ) अनेक बिध
रचना से अनेक पदार्थ रचता है वैसे ही स्वर्ग ( सुख
विशेष ) और भूमि मध्य ( सुखवालालोक) तथा
नरक ( दुःख विशेष) और सब लोकों को रचा है
उसी को वन और वृक्ष प्रादि कहते हैं हे “ मनीषि-
णः ,, विद्वानो ! जो सब भुवनों को धारण करके सब
जगत् में और सब के ऊपर विराजमान हो रहा है उस
के विषय में प्रश्न तथा उसका निश्चय तुम लोग करो
" मनसा .. उस के विज्ञान से जीवों का कल्याणा
होता है अन्यथा नहीं ॥ २६ ॥

RADI पाराभिविनयः॥ →* मूल स्तुति : तच्चक्षुर्देवहितं पुरस्तांच्छुक्रमहात् । शरदः शतं जीवंम शरदः शत शयाम दः शतं प्रब्रवाम शरदः शतमीनाःस्फोम शरदः शतं भूयश्च शरदः शतात् ॥ ३७॥ यजु० ३६ । २४॥ व्याख्यान-वह ब्रह्म, चक्षुः., सर्वहक चेतन है तथा देव अर्थात् विद्वानों के लिये वा मन अादि इन्द्रि- यों के लिये हितकारक मोक्षादि सुख का दाता है “पुरस्तात् ,, सब का आदि प्रथम कारगा वही है शुक्रम् ,, सब का करने वाला किंवा शुद्धस्वरूप है प्रलय के ऊर्ध्व वही रहता है उसी की कृपा से हम लोग शत १०० लोग शत १०० वर्ष तक देखें, जीवं, कहैं, कभी पराधीन न हों अर्थात् ब्रह्मज्ञान बुद्धि और पराक्रम सहित इन्द्रिय तथा शरीर सब स्वस्थ रहैं. ऐसी कृपा आप करें कि कोई अङ्ग मेरा निर्बल (क्षीण ) और रोगयुक्त न हो तथा शत १०० वर्ष से अधिक भी आप कृपा करें कि शत १०० वर्ष के उपरान्त भी हम देखें. जीवें, सुनें, कहैं और स्वाधीन ही हैं ॥ ३७ ।। " उच्चरत्

१२
आर्याभिविनयः॥
→ मूल प्रार्थना -
या तं धामानि परमाणि यावमा या मध्य-
मा विश्वकर्मव॒तेमा। शिक्षा सखिभ्यो हविषि
स्वधावः स्वयं यजस्व तन्वं वृधानः॥८॥
यज० १७॥२१॥
व्याख्यान-ह सर्वविधायक विश्वकर्मन्नीश्वर ! जो
तुम्हार मुराचत उत्तम, मध्यम, निकृष्ट प्रावध धाम
(लोक ) हैं उन सब लोकों की शिक्षा हम आप के
सग्वाओं को कर यथार्थविद्या होने से सब लोकों में
सदा सुखी ही हैं तथा इन लोकों के “ हविपि ,, दान
और ग्रहया व्यवहार में हम लोग चतुर हों, हे “स्वधा-
वः,, स्वसामर्थ्यादि धारण करने वाले ! हमारे शरीरादि
पदार्थों को श्राप ही बढ़ाने वाले हैं “ यजम्ब ., हमारे
लिये विद्वानों का सत्कार, सब सज्जनों के सुखादि
की संगति, विद्यादि, गुणों का दान आप स्वयं करो,
आप अपनी उदारता में ही हम को सब सुख दीजिये
किञ्च हम लोग तो आप के प्रसन्न करने में कुछ भी
समर्थ नहीं हैं,सर्वथा आपके अनुकूलवर्तमान नहीं कर
सकते परन्तु आप तो अधमोद्धारक हैं इस से हम को
स्वकृपा से सुखो करें ॥ ३८ ॥

प्राराभिविनयः ।।
* मूल स्तुति :-
यन्म छिद्रं चक्षुपो हृदयस्य मनमा वातितृ-
ण्णं वृहस्पतिर्मेतबंधातु । शं नो भवतु भुवन-
स्य यस्पतिः ॥ ३९ ॥ यजु० ३६।२॥
व्याख्यान-हे मर्वसन्धायकेश्वर ! मेरे चक्षु (ने-
त्र) हृदय (प्राणात्मा ) मन, बुद्धि, विज्ञान, विद्या
और सब इन्द्रिय द्वेप, इन कं छिद्र, निर्बलता, गग, चा-
चल्य यद्वा मन्दत्वादिविकार इन का निवारणा (निर्मू-
ल) करके सत्य धर्मादि में स्थापन आप ही कगे
क्योंकि आप बृहस्पति ( सब से बड़े ) हो सो अपनी
बड़ाई की ओर देव के इस बड़े काम को आप अव-
उय करें जिस से हम लोग आप और आप की आ-
ज्ञा के सेवन में यथार्थ तत्पर हों. मेरे सब छिद्रों को
आप ही ढांके, आप सब भुवनों के पति हैं इसलिये
आप से बारंबार प्रार्थना हम लोग करते हैं कि सब
दिन हम लोगों पर कृपाहिष्टि से कल्याणकारक हों,
हे परमात्मन् ! श्राप के विना हमाग कल्याणकारक
कोई नहीं है, हम को आप का ही सब प्रकार का
भरोसा है सो आप ही पूरा करेंगे ॥ ३० ॥

आर्याभिविनयः॥ → मूल प्रार्थना विश्वकर्मा विमना आहिहांया धाता विधा- ता परमोत सन्दृक् । तेषामिष्टानि समिषा मंद- न्ति यत्रां सप्तऽऋषीन पर एकमाहुः ॥ ४० ॥ यजु० १७।२६॥ व्याख्यान-सर्वज्ञ सर्वरचक ईश्वर विश्वाकर्मा (वि- विधजगदुत्पादक ) है तथा " विमनाः ,, विविध ( अ- नन्त ) विज्ञानवाला है, तथा “अाद्विहाया,, सर्व व्या. पक और आकाशवत् निर्विकार अक्षोभ्य सर्वाधिक- रगा है, वही सब जगत् का धाता ,, धारणकर्ता हे " विधाता , विविध विचित्र जगत् का उत्पादक है तथा परम, उत ., सर्वोत्कृष्ट है " सन्हा ,, यथावत् सब के पाप और पुण्यों को देखने वाला है, जो मनु. प्य उसी ईश्वर की भक्ति, उसी में विश्वास और उसी का सत्कार ( पूजा ) करते हैं उस को छोड़ के अन्य किसी को लेशमात्र भी नहीं मानते उन पुरुषों को ही सब इष्ट सुख मिलते हैं औरों को नहीं, वह ईश्वर अपने भक्तों को सुख में ही रखता है और वे भक्त म- म्पक म्वेच्छापूर्वक “ मदन्ति ,, परमानन्द में ही रहते हैं दुःख को नहीं प्राप्त होते, वह परमात्मा एक अद्वि- तीय है जिस परमात्मा के सामर्थ्य में सप्त अर्थात पंच

प्राभिविनयः॥
१२५
प्राण, सूत्रात्मा और धनञ्जय ये प्रलयविषयक कारण-
भूत ही रहते हैं, वही जगत् की उत्पत्ति स्थिति और
प्रलय में निर्विकार आनन्दस्वरूप रहता है उसी की
उपासना करने से हम सदा मुख में रह सकते हैं ॥४॥

प्रार्णाभिविनयः॥
विस्तीर्ण मुखयुक्त
→: मूल स्तुति -
चतुः सक्तिनामितस्यं सप्रथाः । म नो
विश्वायुः मप्रथाः स नः सर्वायुः सप्रथाः । अप
देषोऽअपहरोऽन्यव्रतस्य सश्चिम ॥ ४ ॥
यजु० ३८।२० ॥
व्याख्यान-हे महावैद्य!सर्वगेगनाशकेश्वर ! चार
कोणे वाली नाभि ( मर्मस्थान ) ऋतु की भरी नैरोग्य
और विज्ञान का घर “सप्रथाः,
आप की कृपा से हों तथा आपकी कृपा से "विश्वायुः,,
पूर्ण आयु हो, आप जैसे सर्वसामर्थ्य से विस्तीर्ण हो
वैसे ही विस्तृत सुख से विस्तार सहित सर्वायु हम को
दीजिये हे ईश ! हम “ अपद्वषः ,, द्वेषरहित आप की
कृपा से तथा
अपह्वरः चलन (कम्पन ) रहित
हों, आप की आज्ञा और आप से भिन्न को लेशमात्र
भी ईश्वर न मानें, यही हमारा व्रत है इस से अन्य
व्रत को कभी न मानें किन्तु आप को “ सश्चिम
सदा सेवें यही हमारा परमनिश्चय है इस परमनिश्चय
की रक्षा आप ही कृपा से करें ॥४१॥

आरपाभिविनयः॥ > मूल प्रार्थना यो नः पिता जनिता यो विधाता धामानि वढ भुवनानि विश्वा । यो देवानां नामधा एक एवं तछ मम्प्रश्नं भुवना यन्त्यन्या ॥ ४२ ॥ यज १७। २७॥ व्याख्यान-हे मनुष्यो ! जो अपना पिता (नित्य पालन करनेवाला) जनिता (जनक ) उत्पादक "वि- धाता,, सब मोक्षसुग्वादि कामों का विधायक, (सि. द्विकर्ता ) "विश्वा ., सब भुवन लोकलोकान्तर धाम अर्थात् स्थिति के स्थानों को यथावत् जाननेवाला मब जातमात्र भूतों में विद्यमान है जो दिव्य सूर्यादिलोक तथा इन्द्रियादि और विद्वानों का नाम व्यवस्थादि क- रने वाला एक अद्वितीय वही है अन्य कोई नहीं, वही स्वामी और पितादि हम लोगों का है इस में शंका नहीं रखनी तथा उसी परमात्मा के सम्यक् प्रश्नोत्तर करने में विद्वान् वेदादि शास्त्र और प्राणी मात्र प्राप्त हो रहे हैं क्योंकि सब पुरुपार्थ यही है कि परमात्मा, उस की आज्ञा और उस के रचे जगत का यथार्थ से निश्चय ( ज्ञान ) करना उसी से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चार प्रकार के पुरुषार्थ के फलों की सिद्धि

१२८
आर्याभिविनयः ॥
होती है अन्यथा नहीं इस हेतु से तन, मन, धन और
आत्मा इन से प्रयत्न पूर्वक ईश्वर के साहाय्य से सब
मनुष्यों को धर्मादि पदार्थों की यथावत् सिद्धि अवश्य
करनी चाहिये ।। ४२।।
R

१२४
प्राभिविनयः ॥
→ मूल स्तुति *
यज्जाग्रतो दूरमुदति दैवं तद् सुप्तस्य तथैवे-
ति । दूरङ्गमं ज्योतिषां ज्योतिरेकं तन्मे मनः
शिवसङ्कल्पमस्तु ॥ ४३ ॥ यजु० ३४ । १॥
व्याख्यान हे धर्मनिरुपद्रव परमात्मन् ! मेरा मन
सदा शिवसंकल्प धर्म कल्याण संकल्पकारीही आप
की कृपा से हो कभी अधर्मकारी न हो, वह मन कैसा
है ? कि जागता हुआ पुरुष का दूर २ जाता पाता
है, दूर जाने का जिस का स्वभाव ही है; अग्नि, सूर्या
दि, श्रोत्रादि इन्द्रिय, इन ज्योति प्रकाशकों का भी
ज्योतिप्रकाशक है, अर्थात् मन के विना किसी पदा-
र्थ का प्रकाश कभी नहीं होता, वह एक बड़ा चञ्चल
वेगवाला मन आप की कृपा से ही स्थिर,शुद्ध, धर्मा-
त्मा, विद्यायुक्त हो सकता है “ देवम् ,, देव ( आत्मा-
का) मुख्यसाधक भूत, भविष्यत् और वर्तमानकाल
का ज्ञाता है, वह आप के वश्य में ही है उस को
आप हमारे वश्य में यथावत् करें जिससे हम कुकर्म
में कभी न फसे,सदैव विद्या, धर्म और आप की सेवा
में ही रहैं ॥ ४३॥

লাগান। ** मूल प्रार्थना - नतं विदाथ य हुमा जजानान्ययुष्माकमन्तरं बभूव । नीहारेण प्रारंता जल्प्यां चासुतृपं उक्थ शासश्चरन्ति ॥४४॥ यजु. १७।३१॥ लोग “ असुतृपः, व्याख्यान-हे जीवो ! जो परमात्मा इन सब भु- वनों का बनानेवाला विश्वकर्मा है, उस को तुम लोग नहीं जानते हो, इसी हेतु से तुम " नीहारेण ,, अत्य- न्त अविद्या से श्रावृत मिथ्यावाद नास्तिकत्व बकवाद करते हो इस से दुःख ही तुम को मिलेगा सुख नहीं, तुम केवल स्वार्थसाधक प्राणपोषण मात्र में ही प्रवृत्त हो रहे हो “उक्थशासश्चरन्ति , केवल विषय भोगों के लिये ही अवैदिककर्म करने में प्रवृत्त हो रहे हो और जिस ने ये सब भुवन रचे हैं, उस सर्वशक्तिमान् न्यायकारी परब्रह्म से उलटे चलते हो अतएव उस को तुम नहीं जानते, ( प्रश्न ) वह ब्रह्म और हम जीवात्मा लोग ये दोनों एक हैं वा नहीं? ( उत्तर ) “ यद्युष्माकमन्तरं बभूव ,, ब्रह्म और जीव की एकता वेद और युक्ति से सिद्ध कभी नहीं हो स- कती, क्योंकि जीव ब्रह्म का पूर्व से ही भेद है, जीव अविद्या प्रादि दोषयुक्त है ब्रह्म अविद्यादि दोषयुक्त आाभिविनयः॥ नहीं है इस से यह निश्चित है कि जीव और ब्रह्म एक न थे, न होंगे और न हैं किंच व्याप्यव्यापक आधा- राधेय, सेव्यसेवकादिसम्बन्ध तो जीव के साथ ब्रह्म का है, इस से जीव ब्रह्म की एकता मानना किसीम- नुष्य को योग्य नहीं ॥ ४४ ॥ , -

সামান
→* मूल स्तुति :-
भग एव भगवां२॥ऽस्तु देवास्तन वयं भ-
गवन्तः स्याम । तं त्वा भग सर्व इज्जोहवीति
सनो भग पुर एता भवेह ॥ ४५ ॥
यजु० ३४॥ ३८॥
व्याख्यान-हे सर्वाधिपते ! महाराजेश्वर ! श्राप
भग परमैश्वर्यस्वरूप होने से भगवान् हो, हे (देवाः)
विद्वानो ! " तेन ,, ( भगवता प्रसन्नेश्वरसहायेन ) उस
भगवान् प्रसन्न ईश्वर के सहाय से हम लोग परमैश्व-
र्ययुक्त हों, हे "भग ,, परमेश्वर सर्व संसार "तन्वा,
उन आप को ही ग्रहण करने को अत्यन्त इच्छा
करता है, क्योंकि कौन ऐसा भाग्यहीन मनुष्य है ?
जो आप को प्राप्त होने की इच्छा न करे, सो आप
हम को प्रथम से प्राप्त हों फिर कभी हम से आप
और ऐश्वर्य अलग न हो, आप अपनी कृपा से इसी
जन्म में परमैश्वर्य का यथावत् भोग हम लोगों को
करावें, परजन्म में तो कर्मानुसार फल होता भी है
तथा श्राप की सेवा में हम नित्य तत्पर रहैं ॥ ४५ ॥

प्राभिविनयः ॥ : → मूल प्रार्थना .. गणानां त्वा गणपतिछ हवामहे प्रियाणां त्वा प्रियपतिथे हवामहे निधीनां त्वां निधिपतिय हवामहे वसो मम । आहमजानि गर्भधमात्वम- जासि गर्भधम् ॥ ४६॥ यजु० २३ । १९ ॥ ho व्याख्यान-हे समूहाधिपते ! आप मेरे सब समूहों के पति होने से आपको गणपति नाम से ग्रहण क- रता हूं तथा मेरे प्रिय कर्मकारी पदार्थ और जनों के पालक भी आप ही हैं, इस से आप को मियपति मैं अवश्य जानूं, इसी प्रकार मेरी सब निधियों के पति होने से आप को मैं निश्चत निधिपति जानें वसो सब जगत् को जिस सामर्थ्य से उ- त्पन्न किया है उस अपने सामर्थ्य का धारण और पोषण करने वाला आप को ही मैं जानूं, सब का कारण आप का सामर्थ्य है यही सब जगत् का धार- गा और पोषण करता है यह जीवादि जगत् तो जन्म- ता और मरता है परन्तु आप सदैव अजन्मा और अ- मृत स्वरूप हैं, आप की कृपा से अधर्म, अत्रिया, दुष्ट- भावादि को " अजानि ., दूर फेंकं तथा हम सब लोग

प्रार्णाभिविनयः॥
श्राप की ही “ हवामहे , अत्यन्त स्पर्धा (प्राप्ति की
इच्छा ) करते हैं, सो आप अब शीघ्र हम को प्राप्त हो-
ओ जो प्राप्त होने में श्राप थोड़ा भी विलम्ब करेंगे तो
हमारा कुछभी कभी ठिकाना न लगेगा ।। ४६ ॥

*
माभिविनयः ।।
+* मूल प्रार्थना
अग्ने व्रतपते व्रतं चरिष्यामि तच्छकेयं त.
न्म राध्यताम्। इदमहमनृतात्मत्यमुपैमि॥१७॥
यजु० १।५॥
व्याख्यान-हे सच्चिदानन्द स्वप्रकाशरूप ईश्वराग्ने!
ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ, संन्यास आदि सत्यव्रतों का
आचरण में करूंगा सो इस व्रतको आप कृपा से स.
म्यक् सिड करें तथा मैं अनृत अनित्य देहादि पदार्थों
से एथक हो के इस यथार्थ सत्य जिस का कभी व्य.
भिचार विनाश नहीं होता उस विद्यादि लक्षण धर्मको
प्राप्त होता हूं इस मेरी इच्छा को आप पूरी करें जिस
से मैं साय विद्वान सत्याचरणी आप की भक्तियुक्त
धर्मास्मा होऊं ॥४७॥

भााभिविनयः॥ →* मूल स्तुति * य आत्मदा बलदा यस्य विश्वऽलपासते प्र. शिषं यस्य देवाः । यस्य छायामृत यस्य मृत्युः कस्मै देवाय हविषा विधेम ॥४८॥ यजु० २५। १३ ॥ व्याख्यान-हे मनुष्यो ! जो परमात्मा अपने लोगों को आत्मदाः प्रात्मा का देने वाला तथा प्रात्म- ज्ञानादि का दाता है जीवप्राणदाता तथा “बलदाः , त्रिविध बल-एक मानस विज्ञान बल, द्वितीय इन्टिी- बल अर्थात् श्रोत्रादि की स्वस्थता तेजोवृद्धि, तृतीय- शरीर बल महापुष्टि दृढाङ्गता और वीर्यादि वृद्धि इन तीनों बलों का जो दाता है जिस के “प्रशिषम् .. अनुशासन ( शिक्षामर्यादा ) को यथावत् विद्वान् लोग मानते हैं सब प्राणी और अप्राणी जड़ चेतन विद्वान वा मूर्ख उस परमात्मा के नियमों को कोई कभी उ- ल्लङ्घन नहीं कर मकता जैसे कि कान से मुनना, आंख से देखना इस को उलटा कोई नहीं कर सकता है, जिस की छाया-आश्रय ही अमृत विज्ञानी लोगों का मोक्ष कहाता है तथा जिस की अछाया (अकृ- पा ) दुष्ट जनों के लिये बारम्बार मरण और जन्मरूप महाक्लेशदायक है, हे सज्जन मित्रो ! वही एक परम प्रारणाभिविनयः॥ मुखदायक पिता है श्राो अपने सब मिल के प्रेम विश्वास और भक्ति करें, कभी उस को छोड़ के अ- न्य को उपास्य न मानें वह अपने को अत्यन्त सुख देगा इस में कुछ सन्देह नहीं ॥ ४८ ॥ १८ १३८ प्राराभिविनमः॥ → मूल स्तुति - उपहूता इहगाव उपहूता अजावयः । अथो- ऽअन्नस्य कीलाल उपहूतो गृहेषु नः । क्षमाय वः शान्त्यै प्रपद्ये शिव शम्म, शय्योः शय्योः ॥ ४६ ॥ यजु० ३।४३ ॥ व्याख्यान-हे पश्वादिपते! महात्मन् ! आपकी ही कृपा से उत्तम २ गाय, भैंस, घोड़े, हाथी, बकरी, भेड़, तथा उपलक्षण से अन्य सुखदायक पशु और अन्न सर्व रोगनाशक औषधियों का उत्कृष्ट रस "नः, हमारे घरों में नित्य स्थिर ( प्राप्त ) रख जिससे किसी पदार्थ के बिना हम को दुःख न हो, हे विद्वानो ! “वः,, यु. प्माकम् तुम्हारे संग और ईश्वर की कृपा से क्षेम कुशलता और शान्ति तथा सर्वोपदव विनाश के लिये "शिवम, मोक्ष सुख “शग्मम् ,, और इस संसार के सुख को मैं यथावत् प्राप्त होऊं, मोक्ष सुख और प्रजा सुख इन दोनों की कामना करने वाला जो मैं हूं उन मेरी उक्त दोनों कामनाओं को आप यथावत् शीघ्र पूरी कीजिये आप का यही स्वभाव है कि अपने भ- कों की कामना अवश्य पूरी करना ॥ ४९ ।। -feave সাগণবিমাঃ । + मूल प्रार्थना -- तमीशानं जगतस्तस्थुषस्पतिं धियजिन्वम- वसे हूमहे वयम् । पूषा नो यथा वेदसाममद- वृधे रक्षिता पापुरदंब्धः स्वस्तये ॥ ५० ॥ यजु० २५ । १८॥ व्याख्यान-हे सुख और मोक्ष की इच्छा करने वाले जनो ! उस परमात्मा कोही " हूमहे ., हम लोग प्राप्त होने के लिये अत्यन्त स्पर्धा करते हैं कि उस को हम कब मिलेंगे क्योंकि वह ईशान ( सब जगत् का स्वामी ) है और ईशन ( उत्पादन ) करने की इच्छा करने वाला है दो प्रकार का जगत् है अर्थात चर और अचर इन दोनों प्रकार के जगत् का पालन करने वाला वही है, धिपजिन्वम् ,, विज्ञानमय, विज्ञानपद और तृप्ति कारक ईश्वर से अन्य कोई नहीं है, उस को “अवसे,. अपनी रक्षा के लिये हम स्पर्दा ( इच्छा ) से आह्वान करते हैं जैसे वह ईश्वर पूषा ,, हमारे लिय पोपणप्रद है वैसे ही “वेदसाम्,, धन और विज्ञानों की वृद्धि के " रक्षिता ,, रक्षक है तथा “ स्वस्तये ,, निरुपदवता के लिये हमारा "पायुः,, पालक वही है और " अदब्धः ,, हिंसा रहित है इम- लिये ईश्वर जो निराकार सर्वानन्दप्रद है, हे मनुष्यो उस को मत भूलो, विना उस के कोई मुख का ठि. काना नहीं है ॥ ५० ॥ " १४० भाभिविनय →* मूल स्तुति मयीदमिन्द्रं इन्द्रियं दधात्वस्मान् रायौ म- घानः सचन्ताम् । अस्मांक सन्त्वाशिषः मत्या नः सन्त्वाशिषः ॥५१॥ यजु०२।१०॥ व्याख्यान-हे इन्द्र परमैश्वर्यवन् ईश्वर ! “ मयि ,, मुझ में विज्ञानादि शुद्ध इन्द्रिय, “ रायः , और उत्तम धन को "मघवानः ,, परम धनवान् आप“सचन्ताम् ,, सद्यः प्राप्त करो हे सर्व काम पूरण करने वाले ईश्वर! आप की कृपा से हमारी आशा सत्य ही होनी चाहिये, (पुनरुक्त अत्यन्त प्रेम और त्वरा द्योतनार्थ है) हे भग- वन् ! हम लोगों की इच्छा आप शीघ्र ही सत्य की. जिये जिस से हमारीन्याययुक्त इच्छा के सिद्ध होने से हम लोग परमानन्द में सदा हैं ॥ ५ ॥ L আলামিন * मूल प्रार्थना - सदसस्पतिमद्भुतं प्रियमिन्द्रस्य काम्य॑म् । सनि मधामयाशिष स्वाहा ॥५२॥ यजु० ३२। १३ ॥ व्याख्यान-हे सभापते ! विद्यामय न्यायकारिन् स- भासद् सभाप्रिय सभाही हमाराराजान्यायकारी हो ऐ- सी इच्छा वाले आप हम को कीजिये किसी एक म- नुष्य को हम लोग राजा कभी न मानें किन्तु आप को ही हम सभापति सभाध्यक्ष राजा माने, श्राप अ- द्रुत आश्चर्य विचित्र, शक्तिमय हैं तथा प्रियस्वरूप ही हैं, इन्द्र जो जीव उस को कमनीय (कामना के योग्य) आप ही हैं, “सनिम् ,, सम्यक भजनीय और सेव्य भी जीवों के आप ही हैं मेधा अर्थात् विद्या सत्यधर्मादि धारणा वाली बुद्धि को हे भगवन् ! मैं याचता हूं सो आप कृपा करके मुझ को देओ "स्वाहा,, यही स्वकीय वाक् आह कहती है कि एक ईश्वर से भिन्न कोई जीवों को सेव्य नहीं है । यही वेद में ई- श्वराज्ञा हे सो सब मनुष्यों को मानना अवश्य योग्य है ।। ५२॥ . →

१४२
भाभिविनमः ॥
** मूल स्तुति *
यां मेधां देवगणाः पितरश्चोपामते । तया
मामद्य मेधयाग्ने मेधाविनं कुरु स्वाहा ॥५३॥
यजु० ३२ । १४॥
व्याख्यान- हे सर्वज्ञाग्ने परमात्मन् ! जिस विज्ञा-
नवती यथार्थधारणावाली बुद्धि को देव (विद्वानों)
के वृन्द उपासते (धारण करते) हैं तथा यथार्थ पदा.
र्थविज्ञान वाले पितर जिस बुद्धि के उपाश्रित होते हैं
उस बुद्धि के साथ इसी समय कृपा से मुझको मेधा-
वी कर “ स्वाहा ,, इस को आप अनुग्रह और प्रीति
से स्वीकार कीजिये जिस से मेरीजड़ता सब दूर हो॥५३॥

प्राभिविनयः॥ मूल प्रार्थना -- मेधा मे वरुणो ददातु मेधामग्निः प्रजापतिः। मेधामिन्द्रश्च वायुश्च मेधां धाता ददातु मे स्वाहां ॥५४॥ यजु० ३२ । १५ ॥ व्याख्यान-हे सर्वोत्कृष्टेश्वर ! आप “ वरुणः , वर (वरणीय ) आनन्दम्वरूप हो कृपा से मुझ को मेधा सर्वविद्यासम्पन्न बुद्धि दीजिये तथा “ अग्निः विज्ञानमय विज्ञानप्रद “प्रजापतिः ,, सब संसार के अधिष्ठाता पालक, “ इन्दः ,, परमैश्वर्यवान् “ वायुः विज्ञानवान् अनन्तबल धाता ,, तथा सब जगत् का धारण और पोषण करने वाले आप मुझ को अत्युत्तम मेधा ( बुद्धि ) दीजिये* ॥ ५४ ॥ . * अनेक वार मांगना ईश्वर से अत्यन्त प्रोतिद्योतनार्थ सद्यः दानार्थ है बुद्धि से उत्तम पदार्थ कोई नहीं है उस के होने से जीव को सघ मुख होते हैं इस हेतु से बा. रम्बार परमात्मा से बुद्धि की ही याचना करनी श्रेष्ठ बात है ॥

१४४ पाभिविनमः॥ →* मूल स्तुति *--- इदं मे ब्रह्म च क्षत्रं चोमे श्रियमश्नुताम् । मर्यि देवा दंधतु श्रियमुत्तमां तस्य ते स्वाहा । ॥५५॥ यजु० ३२। १६॥ व्याख्यान-हे महाविद्य महाराज सर्वेश्वर ! मेरा ब्रह्म ( विद्वान ) और क्षेत्र (राजा, राज्य, महाचतुर न्यायकारी शूरवीर राजादि क्षत्रिय ) ये दोनों आप की अनन्त कृपा से यथावत् अनुकूल हों " श्रियम , स. वर्वोत्तम विद्यादिलक्षणयुक्त महाराज्य श्री को हम प्राप्त हो। हे "देवाः , विद्वानो ! दिव्य ईश्वर गुण परमकृपा आदि उत्तम विद्यादि लक्षण समन्वित श्री को मुझ में अचलता से धारण करात्रो उस को मैं अत्यन्त प्रीति से स्वीकार करूं और उस श्री को विद्यादि स- द्गुण वा सर्वसंसार के हित के लिये तथा राज्यादि प्र. बन्ध के लिये व्यय करूं ॥ ५५ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यागाां श्रीयुत विरजानन्दमरस्वतीस्वामिनां महाविदुषां शिष्येण दयानन्दमरस्वतीस्वामिना विरचित आर्याभिविनये हितीयः प्रकाशः सम्पूर्णः॥ समाप्तश्चाऽयग्रन्थः ॥

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आर्याभिविनय

Author
Svaamii Dayaananda Sarasvatii
Title
Aaryaabhivinay
File name
आर्याभिविनय
Text
OCR done
Citation
1904
Published
2005/11/26
Publisher
Vaidik Yantralaya, Ajmer
Language
Sanskrit
Pages
148
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
RELIGION THEOLOGY
DLI number
477036
Barcode
99999990172866.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
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