Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Jambuswamicharitam

Rajmall, Pandit · 2011/08

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मामिकधम्ब-वि०-अमामन्यमामापाः पचर्षिशतितमो सम्पर
पबितराजमल्लविरचितम्
जम्बूस्वामिचरितम्
अध्यात्म-कमलमार्तण्डश्च
सशोषक
भीजगदीशचन्द्रशासी एम० ए०
प्रकाशिका
मा०वि०-अनग्रन्यमाला समितिः
भाभिन १९९५
मूर्म पाप्याम्

मापूराम प्रेमी
मंत्रीमा नियमाडा
याग, समा
.
.
मुद्रा
रघुनाप दिपाली रेसाद,
मत पिरिंग प्रेस,
नेपाच पिरमा ४

।
जिनवाणी भरत प्यारा मुसालजी पल्व उम्मरसिंहजी
[भाम्ने रस प्रम्पसमा स्पषी काम मुन १ १) सिमीर सो
समस पपीता माने भषिक प्रचार किया है।]
मम्मनिषि-३ गुमाइ सन १८५८

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प्रस्तावना कवि राजमल्ल दिगम्बर-परम्परामें रानमन्छ अथवा रापमछ नामके कई विद्वान् हो गये है। प्रस्तुत लिशान् परित राममठ अपवा कवि राजमडके मामसे प्रख्यात पे। भाप अपने मामके साप स्पागनबषगपपप विधानिशारद' विशेषणफा प्रयोग करते हैं। कवि रानमछकी रचनामोंक उपरसे मालूम होता है कि बाप चैमागमके बो मारी बेचा एक मनु मनी विद्वान् पे। बापने जैन बाध्ययमें पारंगत होने के लिये कुन्दकुद समतमन, नेमिचद्र, अमृतचन्द्र लादि पिशनकि यो विशाल सया सूक्ष्म पिसे बप्पयन भौर बाडम किया था | प० रापमठ फेल माचार-शामके ही पडित म थे, बल्कि मापने बप्याम, काम्प और न्यायमें मी कशमता प्राप्त की पी, पह वापको विविध रचनायोस स्पर मालम होता है। ५० बम सप मपन विषयमें कोई परिचय मही देते । इसम्पेि भाप कहाँके यनेबारे , नापके गुरुका क्या नाम पा इत्यादि बातों को गामफारीसे हमें सपा पंचित हो एना पड़ता है। मटी- सहिताको प्रशस्तिमें एक स्थानपर वाप अपनेको हेमचन्द्रको भाषा- का विशन् करकर उडेल करते हैं। इससे केवल इवना पाव (२) होता है कि वार हेमसनकी मानायके पे। पर ये हेमचन्द्र कौन पे इसका कुछ पता नहीं पता। रासमहकी कृतियाँ पास वनेक वर्ष पूर्व बस.प. गापादासनी बरैयाको क्लासे बैन निशानों में पचाम्यायो माम प्रयके पठन-पाठनका प्रचार जा, उस समय रोगोंकी या मान्यता हो गई कि यह मन्ध अमृतचन- सूरिकी रचमा है। परमा छाटीसहिता के प्रकारामें बानेपर यह पारमा र्सया नछ सिद हुई। और पत्र तो यह और मी नियम- पूर्वर्क का ना सकता है कि पाप्यापी, मगसहिसा, जम्मूस्यामि परित वीर वप्पारमकमतमान- ये चारों ही इसियों एक ही दिन प. राजमापकी। पचाप्यापीके मगापरणमें प्रत्यकार पपाप्यायीको 'प्रथराम' के भामसे उल्लेख करते है और इस स्वारमा सिसनमें प्रेरित होते इस प्रयको पॉप गप्पार्पोमें सिम्बनेकी प्रक्षिा की गई । दुर्भाग्यसे 14 अपाकिसोरापमा भी मिमममनरावी हो पायस मारक स्वा न पड़ते हैं, मनपा और पुपर पनाम मक इमारमको परिचय पान मसारी श्या और भिती पपिने बर्ग महिलाले प्रथम में बहुत प्रधीहै।--- हेमचाना में तम मिनाम्लो मी मित तिमी ।इस विषयमों यामही पालकवि सम्म एक मानिन्। माफ्ले मोहेम बाल्पिपियनशिर मातानि फामा पान मान पान पारित प्रमात्र होम म्य-संहिता विपन्न सूचित किया है। बजे परस्प बात निम्ती मुनिका बहुत मिलाप पास्पबामपरी बारिश पर प्राचीन सीमाभिकी भूमिका (परिमाप्रबमाम)। १५ - ।

(३) यह समस्त प्रन्य उपाय नहीं होता। मितना उपलम्ब है उसमें केवल दो प्रकरण मिसे है -एक दम्पसामान्यनिरूपण जिसमें ७७० क है, और इसरा व्यमिशेषनिरूपण निसमें १११५ लोक है । दूसरा प्रकरण अधा है। इन दोनोंफो मिलाकर लगभग पौने दो अन्याय कहा जा सकता है। पचाम्यायो करिकी सर्वोचम प्रौद्र रचना प्रतीत होती है। जीवोंको मुगम उजिसे धर्मका पोष करनेक ठिये ही कषि इस प्रन्धकी रचना करनेमें प्रेरित हुए हैं। इसमें प्रतिपाय विषयको शका-समाधानके रूपमें उपस्थित करके विषयको मात ही मुन्दर बौर सरम्हपमें रक्सा गया है। ब्रम्य, गुण, पाय, उत्पाद, म्यय, धौल्य प्रमाण, नय वादिसबंधी द्रम्यानुयोगको चको प्रत्यकारने मनेक रस्त आदि देकर तार्किक रिसे खूब ही प्रस्फुटित किया है। विशेप करके कविका म्यवहार और निमयनयका समन्वय करना, सदा वादि गुसि स्वात्मानुभूतिकी पताका प्रति- पादन करना चाहि, कविकी मौरिक प्रतिमा, समर्पता दौर बनुमर- पद्धताको मोतित करता है। निस्सन्देह पचाभ्यायो अपने उगको एक बनोठी ही रचना है। कपिको दूसरी रचना पाटीसहिता है। यह माघार-शासका १बामम्मम्माम मी इम्पसामान और प्रतिसपर निस्सना सिमे वो मम ममा परिन र परे। इसी तय बाप्पाचीम भी प्रमधमान्य और सम्बनिस्पनिकल ममा मम्म बप्यार समपाप समाई। रोऽपि योगः भोप्रमोद मुममोपा। विशप्तौ तस तत्रावमुपकमा श्रेष्ान्।1-41 सानुभूविसनाबायल) सन्ति भदायको पुषा । सानुभूति विग्रमासा मार्गप्पारयो पुष २-11 ग्रन्थ है। कपिने इस रचनाको वनुमिए पौर नगीन पार सुपित किया है। इसमें सात सर्ग हैं। इसकी पप-सच्या मगमग १६००है। यह प्रप मप्रसास-शापतस मगरगोत्री सार दाके पुत्र सपके अधिपति 'फामन' नामके धनिकके लिये बनाया गया था। कपिने फाममके पशका विस्तृत वर्णन करते हुए, फामनके पूर्वजोंका मूह निवासस्थान रोकनि ' नगरी बताया है। इन फामनने सय ही मेण्ट मगरफे 'ताम् नामक विद्वानको कृपासे धर्म-लाम किया था। कविने इस मैराट मग- रके मिमाव्यमें एकर डाटी-सरिताको रचना की है। छाटी-सहितामें करिने बैराट नगरका और इस मगरके स्वामी अकबर बादशाहका विस्तृत वर्णन किया । यह सब ऐतिहासिक पर्णम छाटी-सहिताके कपामु-वर्णन मामके प्रथम सर्गमें उफ्लम्व होता है। वपन सममि प्रन्पकारमे वाठ मूहगुण, सात म्यसन सम्यग्दर्शन पौर भातकके गाय मतोंका विस्तारपूर्वक बणन किया है। मपमें सम्पन्द निक वर्णन करनेके लिये दो सर्ग मोर मांसाशस्तके लिये एक स्वतंत्र की रचना की गई है। मपमें भनेक ठरण उक' रूपमें पाये जाते है ना विशेष करके ऋषिके गोम्मसार-सटीक पारि सिमान्त-मयोंके और कुन्दकुन्द बाचार्यक बप्पाम-मन्याने निशा विस्वत मापनको सूचित करते हैं। की एबमझने छाठी १"दम र पीचन पम्ब से देख मौ प्रोमोर बोपमपुर रोब ४ मौके प्रसपालिसी समय बिमा मत्सा ऐसी रामपानी भी और ग्राम प्रमोगा पुन पेसमै पमा मापन भिदिया मित्र १९ सहिताको वि० स० १६११ में बासिन-शुका दशमी रमिवार के दिन समाप्त किया था। कवि रानमछकी तीसरी रथमा जम्बूस्वामिभरित है। यह प वि० स० १९९२ में चैत्र बदी ८ के दिन पुनर्मम नक्षत्र में बनाकर समाप्त किया गया था । मर्यात् यह काम्य गटी-सहिवासे नौ वर्ष पूर्व बन चुका था। उस समय बर्गलपुर (बागरे ) में कवर पाद शाहका राम्प था । इसमें भी कपिने भगा (पगतई) जातिके शिरोमणि बाबर और हुमा बादशाहका वर्णन करते हुए पादशा वक वरका समिस्तर वर्णन दिया है, धौर अकबरके 'बेनिया 'कर पौर मपको बन्दी करानेका उष्लेस किया है। कारने इस काम्पको अमपाल बातिमें उत्पन्न गर्गगोत्री साधु ( साहु) टोउरके किये बनापा था । ये सार टोग्र महाउदारता, परोपकारिता, दानशीलता, विनयसपमता मादि सर्व गुणों से सम्पम थे। ये भटानिया (कोट) नगरफे एनेपा, कामासपी कुमारसेनको वाम्नायके थे । करिने डाटी-संहिताको तय यहाँ मी साा टोडरके गश भाविका विस्तृत वर्णन किया है। साधु टोररको करिने बैणवमतानुयायी गदमाश सा और अरमानी-पुत्र ठाकुर णमगछ चौपरीका प्रियपात्र, तया टकसाबक काममें मात दक्ष बताया है। एक बारकी बात है कि मे साधु टयार सिदक्षेत्रको यात्रा करने मधुगौ माये । पापर बीचमें भस्मामाका स्तूप (निसहीस्थान ) बमा हवा पा, बोर उनके चरणोंमें निपुरर मुनिका स्प या । १ ज मयंपाष पुराम नाम है। मध्यतिन बर्ममारे पस पान मावस वा भासपास वम्य मोश जानेबारे अनेक मुनिपों सस भी मौजूद थे। इन मुनियों के एकही पाच, कहीं बार, कही दस और करी बीस इस तरह बने हुए पं । साहु टोडरको इन स्पोंग पीर्ण-शीर्ण भवस्थामें देखकर इनका मीर्णोबार करनेकी प्रबल भावना जागत । फलत टोरने पुम न वीर शुम कम देसफर मत्पम्त उत्साहपूर्वक इस पवित्र कार्यका समारम कर दिया। साः टोरने इस पुनीत कार्यमें बहुत-सा पन म्यप करक + १ स्तूपोंका एक समा मोर १५ स्तूपोंका दूसरा समय, इस तर कुल ५११ स्पोका निर्माण कराया । तथा इन स्तूपोंके पास ही १२ घरपाठ मादिकी मी स्थापना की। यह प्रतिष्ठाका कार्य व सं० १५१. में भ्येष्ठ शुमा १२ को गुममारके Pन नी पी म्यतीत होनेपर हि ममपूर्वक निर्मित सानन्द समाच हवा । साघु टोडरने चतुर्विष सपको मानित किया । सक्ने परम बामन्दित होकर टोडरको वासादि दिया पार गुस्ने उसके मस्तकपर पुप्प-सरि की । तपथात् साा यारने सभा सो होकर शाबा की रानमासे प्रार्थना की कि मुझे मम्मामि पुण्णके पुननेकी बड़ी उत्कण्ठा है, सो वापसा करके इस कपाको विस्तारसे करिये । इस प्रार्थनासे प्रेरित होकर कमि रानमाने नम्भूस्वामिचरितका रचमा की । इस काम्यमें कुल १३ औ मिनकी पच-ससा सब मिडाकर मामग २१ के है। मान पाता है कि कामिने नमामि परितको बागरेमें एकर ही बनाया था। कपिने कपमुस्-र्णन नामक में वागरेक मामा बालिका वर्णन भी दिया है। काम्पमें पैराम्पकी प्रधानता है। कहाँपर पुरका वर्णन करते समप पीरस

मी मा गया है। बीच बीचमें धर्मशाम, और कहीं कही नीति मी
भाती है । सम्फुमारके साप जो उनकी मियों और विभुचरके सवार
हुए हैं, ये पात रोचक है, और ऐतिहासिक ठिसे भी
महत्व है।
कषि रायमल्लकी पोपी पति वभ्यारमकमळमार्चण्ड है। इस
प्रथम पार परिछे, जिनमें सब मिलाकर २५० सोफ सख्या है।
पहिले परिच्छेदमें मोक्ष और मोश्चमार्गका लक्षण, सरेमें व्रम्पसामान्य,
सीसरेमें द्रष्यविशेष और चौपे परिच्छेदमें सात तल धौर नौ पदा-
पोका वर्णन है। कविने इस प्रन्पका काम्य 'करार उम्लेस किया
है, और इसके पठन करमेसे सम्पग्दर्शनकी प्राप्ति होना बताया है।
ममतचन्द्रसूरिके बारमस्याति समयसारकी तय यहाँ भी धके
मादिम चिदरममाषको नमस्कार करके, ससार-सापकी शान्तिके
लिये करिने अपने ही मोहमीप कर्मक माश करनेके लिये इस
शामकी रचना की है। प्रन्धकारने मन्यमें फुत्दकुन्द वाचार्य वीर
१ बीरको बोध देते हुए लिया
कमोग्य पात्रधर्ममा मुक्त रहा।
पर मामासयता मान्ममा गोपनबर।
पेपरवत पूर्व पूर्व मनासारे।
पहाति विना पुर विश्वायम्ममपीमसान् ।
सम्मामिचरित (-1
२ रमापके लिये मपिनुपाते पा सामरत मिमोदी
भवरान साहित्यमें मोर घिरचन सदिसमें पाई एकसय तारक
सर्वमान्य पस-सरिस्वकी बहुव मालको है। गमा भार अनुपश्रीमा
भी हितोपोमम
माइमी तर मम्म प्रसाभार मी तुम्कामा सम्पन्न
करनेसे इस विषय प पोर से सम्वो है।
।

(८) ममतपत्रसरिको स्मरण किया है। करिने इस छोटेसे प्रत्पमें बाम- स्याठि समयसारके उगपर बनेक छद, धर्मकार मादिसे सुसभित वप्पास्मशासकी एक अति सुन्दर रचना करके सचमुच चैन साहि- स्पके गौरवको विंगत किया है। कपि राजमलको इन पार हतियोंमें, जैसा ऊपर कहा या चुका है मयूस्वामिचरितको रचना वि० स० १६५२ और गटीसंहिताको रपना । स १९११ मेंई। शेप दो फ्रन्थोंके समयके विषयमें प्रत्यकारने स्वप कुछ मी उस मही किया । परन्तु माश्म होता है कपिकी सर्वप्रपम रचना जम्बूस्वामिपरित है, और इसी रचनाके उपरसे होने 'कपि' की प्रस्याति प्राप्त की । इसके बाद किसी कारणसे कविको भागरेसे और नगरमें बाना पका, और माँ जाकर एकाने जम्मूसामिचरितके नौ वर्ष बाद पाटीसहिवाका निर्माण किया । बम्बूस्वामिपरितके कई पच मी वाटीसहितामें पक्षराध अपना मुल परिवर्तनके साप उपउम्प होते है। पंचाम्पायी और वयात्मकमकमार्पण कविको इन रचनामोंकि बावका को हतियाँ मान पाती हैं। मापस होता है जैसे जैसे कवि राम- महस्पा और विचारों में प्रत होते गये पैसे से उनकी रवि बयामकी और बाती गई। फम्त उन्होंने अपने बारम कम्पाणके मिय इन रोमों मपोका निर्माण किया । बब इन गोनोंमें समपरे कि पचाप्पायी पहिले बनी थे, और उसके सक्षिप्त सारको छेकर 14 गमोरगावे मौसदिखा और चाम्पीमा८समान पर पर जानेका मनपसमियम मान पका भयभीतम- सम्मन्न पचाम्पत्य रूपमा चामरिकमबान पदयो।

वम्यारमकमम्की रचना की हो, अथवा या मी संभय है कि पहिले अप्पारमकमकी रचना से मुकी हो तथा फविने पघाभ्यायीका निर्माण भारभ कर दिया हो और भसमयमें ही में काम-धर्मको प्राप्त हो गये हों। इन पार कृतियों के अतिरिक्त सभय जान पड़ता है कि करिने पौर भी रपमामोंका निर्माण किया है और उन रचनाओंमें किसी एक गपकी रसिक होनेका मी अनुमान है। जैन-साहित्य में जम्मूम्यामीका स्थान दिगम्बर और क्षेसाम्पर परम्परामें अमूस्सामीफा माम बहुत महत्मके साथ लिया जाता है। महापौर स्वामीके निर्वाण पक्षात् गौतम, मुघर्मा वोर जम्यूस्वामी इन तीन केवलियोंका होमा दोनों ही वाला- योको माग्य है । इसक माद ही दोनों सम्प्रदायोंकी परम्परामें भेद पाया जाता है । Pगम्पर-परम्परामें नम्बूस्वामीके पश्चात् विष्णु, नन्दी, अपराजित, गोवर्धन वीर भववाहु, तथा श्वेताम्बर-परम्परामें प्रमग, गप्पमन, यगोमत्र, बार्यसमूतबिनम और भद्रवा इन पाँच प्रतकेलियोंके माम जाते हैं । जो कुछ भी हो, नम्पूस्वामी दोनों संप्रदायोंमें अन्तिम केवठी स्वीकार किये गये हैं भार इसी कारण दिगम्मर धौर मेताम्बर दोनों विशन् इनफा जीवनपरित लिखने में प्रवृत्त एए है। श्वेताम्बर बायपमें सर्वप्रथम पपमा (प्रकीर्णक) साहित्पमें बम्बू पपमाका नाम भाता है। वेतामर बन कान्फरेन्सधारा प्रकाशित जैन-मयावपिसे विदित होता कि चम्पपनाकी या प्रति रोक्न काछेन पूनाके महार ( मोगरकर इन्टिट्यूर ) में मीन्द्र ।। इसके कर्ताफा माम भवित है। भोकके कॉसममें 'पत्र १५ साइन ५' ( किया जाता 13 चैम- सिसा हुआ है। इसके पश्चात् म्य वापर पितानोंने मी नमूस्वामि- परितका निर्माण किया है परन्तु इनमें कलिकाम-सा हेमचन वाचाय और जपशेखरसरिका माम विशेप महत्वका है। हेमचन्द्र १२ वी शतदिके प्रसिद वाचार्य हो गये हैं। नोने अपने परि शिए पछि बारिके पार बम्पायोंमें जम्मूस्वामीका परित लिसा । गयशेमरत्रिका समय 8 स० ११३६ ।। ये कविपक्रयताक मामसे प्रसिन हो गये हैं। इन्होंने ६ प्रकरणोंमें ७२६ शोक प्रमाण नखामिचरित नामक काम्पकी रचना की है। दिगम्बर-साहित्पमें भी प्राकृत मौर सस्कृत भाषामें कई जम् स्वामि-चरित होमेका बनुमान प्रभापसिमें प्राकृत सरकत वार गममें मिले हुए नौ अमूस्वामि- परित भौर कपानोंका उल्लेख किमा गया है और उनमें पाँच मन्पकर्तामोके तो माम मा रिये। ये नाम निम प्रकार हैं- 4 सगरदन, मुबनकाति, पपसन्दर, समसमर्प मौर मानसिलाइन सब प्रधकर्ताओंका विशेष परिचय नहीं दिया गया है। मुगनकी- सिके विषयौ लिसा है—'मुक्कासि सकसचम्के शिष्य प' । पबपि मुवनकीर्ति प्रेताम्बर बाम्नापम मा हो गये। परन्त प्रस्तुत मुक्न कीति हिंगम्बर-परम्परा के हो मरम होते हैं। प्रो देबर (y bar) ने सकाचन्द्रका समय १५२० स मिला है। समगत मुगन- कार्तिने इस काम्पको विक्रमकी सोसमी शतानि में लिया है।परप्रति राभनपुरमें मार है। Pगम्बर बाम्नापमें कपि राममायके वतिरिक मिनदासने मी हिन्दी सागर नमामि चरितकी रचना की है। समवत पे पिनास वही प्रमबारी लिमास है चो सकसकार्तिक (११) शिष्प थे । इस पुस्तकको निनदासन किसी सस्कृत काम्यक माधारसे रचा है । इसमें बौर पं० राजमष्ठक जम्मूस्मामीफे कयानको कुछ वसकपा मेद मी पाया जाता है। जम्बूस्खामीकी फया सम्हाप-भरतक्षेप्रमें मगघ नामक देश है। उसमें श्रेणिक नामका राजा राम्य करता था । एक दिन राना श्रेणिक समामें बैठे हुए ये । पनपाख्ने श्राफर विपुलाघठ पर्वतपर वर्धमान स्वामीके समवशरणके धानेका समाचार दिया । श्रेणिक सुनकर परम मानन्दित हए और उन्होंने अपने सैन्य, कुटुम्ब आदिफे साथ मगवान्का दर्शन करनेके म्येि प्रयाण फिपी । श्रेणिक वर्षमान स्वामीको नमस्कार करके बैठ गये और उन्होंने तत्वोपदेश सुननेकी बमिपमा प्रकट की। श्रेणिकने तल्लोपदेशका अषण किया। इसनेमें कोई मोमय देव भाकाश मार्गस भवतरित होता था रहिगोचर हुमा । श्रेणिक राजाके द्वारा इस देषके विपममें पूरी मानेपर गौतम स्वामीने उचर दिया कि इसका नाम दिमाग है और यह वफ्नो धार देवांगनायोंके साथ यहाँ १५ पुस्तकको मुन्सी नामाम मेले सन् १९ २ मारमें पाया पा। इसीके माधारसे मास्टर दीपबरीने इथे दिली गप किसूरवमें २ हेमचा भाचार्यश्री पानुसार महातीरी का प्रये किम से हुए सैनिक मामि पचरम परते हुए प्रसनचन मुनि पर सो लियो पाप मते। दमें उसी मापसे चाले ए मेषिक राय उस मुनिको पबना करके समपसरपमै पचम्म यौवम सामीसे रच मुनि लिपपमें प्रहम। गौतम कामी स प्रश्न रसमें पोवनपुरके पासोमा तप नमो प्रसवचन मोर पसारी मामले से पुरी गाने रिस्परसे पते। पमा मात ऐकोनि पारमा परिसाल रेमा पाहिये।

। (१२) बन्दना करनेके किये बापा है। या भारसे सात दिम स्वर्गसे पप कर मध्यकम उत्पन होकर उसी भबसे मोक्ष प्राप्त करेगा। प्रोणिकने इस देवके विषपमें विशेष जाननेकी बमिता प्रगट की। गौतम स्वामी करने मो -" इसी देशमें पर्षमान नामक एक नगर है। उसमें भार्यक्सु नामका एक प्रामण पत्ता पा। उसकी मीका नाम सोम- पामा या। इस दपतिके भाषदेव भौर ममदेव नामके दो पुत्र हए । इन दोनोंने विधाम मति निपुणता प्राप्त की। कुछ समय बाद भार्यबम कुछ रोमासे पारित हुमा और परलोक सिधार गया । सोमशर्माने भी पतिक नियोगसे अस्पन्त दुसी होकर पितामें प्रवेश करके अपने प्राणोंका स्यप्ता किया । कुछ दिन बीतने के परचात् उस मगरमें सौधर्म मामके मुनिका बागमम बा। मुनिमे धर्मका उपदेश दिया। मापदेखने मी स धर्मका भवण किया और सुनकर मुनिसे दीक्षा मेने को मिठाता प्रकट की। मापदेव दीपिस्त होकर तपस्या करने भगे। कुछ समय बीतनेपर एक दिन सौधर्म मुनि संपसहित वर्षमान मगरमें पपारे । भाषदेवको अपने कनिष्ठ भाताके उपर काणा उत्पम हई। के गुरुकी बाबा मेकर मदेवको बोष देनेके म्पेि परे । उस समय मदेव बपमे सिरके उत्सबमें सम्म ये। मबापने चपने म्पेष्ठ भाताको मुनिके पेयमें देखकर उसका बहुत बार किपा । मदेमने धर्म-प्राण करमेक परमात् मुनिको बाहर किया । स मुनि मार करने बगे, उस समय पर होगोंके साप मदेव मी उनके पीछे पीछे चले। घोरे पोचरपति पम्पमित्वरितम पति कपन मारम सेवा है। ले पूर्वध माग समय नही पवा। मन मोर बसेयर ऐनाव मनुसार मातरेलीमो माईसमम मपात बागौ। श्रये ममाम कपरले पने बार पिटना पापभान ना माजा माम रेक्ती वा। - (१३) समयमें दोनों बने गुरुम पास पहुँचे गये। यह देखकर सब मुनि मावदेवकी प्रशसा करने लगे। मषदेवको उपापान्तर म होनेसे दीक्षा लेने के लिये बाध्य होना पड़ा। कुछ दिनों पधार सौपर्म मुनि फिर वर्षमान नगरमें बाये । मपदेव अपनी सोका विचार करके नहीं एक निनालपमें पहुंचे। यहां उन्होंने एक अर्निकाको देखा। उससे उन्होंने अपनी पीक सम्धको कुशम्-पार्दा पँडौ । मनिकाने मुनिक विचको चष्णयमान देखकर उन्हें पर्ममें स्थिर किया बोर फा कि मापको भी मैं ही हूँ। मदेव मोपस्थापना पूर्वक पारित्रमें फिरसे तत्पर हुए । मन्समें दोनों माई मरकर सनत्कुमार स्वर्ग देव हुए । मावन स्वर्गस म्युत होकर पुरीकिणी मगमें पदन्त नृपतिके घर सागरपन्द्र नामका, वीर भाव गीतशोका नगरीम महापम पावत के घर शिवकुमार मामका पुत्र हुआ। ये दोनों मुगा होकर मोगोंके भोगनेमें मम हो गपे । एक बार पुणकिणीमें कोई मुनि पपारे | सागरचन्द्रने मुनिका उपदेश श्रमण किया । पचात् मुमिने उन दोनों भाईयोंके पूर्वमयों का वर्णन किया। सागरचन्द्रने संसारके मोगोंसे विरत होकर बिनाशा प्रहण की। स्पधात् वपने माईको बोध करनके लिये सागरचत्र मौतशोका नगरीमें गय, भार १६-भागमें भी सेताम्बर भोर दिगम्बर-परमराम पु मर प्रपा बागपताम्बर बगुनार विस समय मगदत्त (भारत) मे महाभ पेप सीमिरे भाये रस सब बीमावरम बारस भरतम को महान परिव हो सावधि हो भने और र पापी मुनि इमपर भरचा मान ले । मात मिसे मामधे सदित पितो पात गते है, भौर उसे किसी ग्य गो पात पर एक्षित प्रते।

(१४) उनें दसकर शिवकुमारको जातिस्मरण हो वाया। शिवमारन अपने माता पितासे दांशा सेनेकी बनुमति मांगी, परन्तु उन्होंने दोशाय बनुमति न दी। शिषकुमार ११० ० पर्पतक घरमें तप अर्या करते हुए पन सगे। अन्तमें सागरचन्द्र और शिवकुमार दोनों जीन प्रमोदर स्वर्गमें गये। शिवकुमार तपधरणके प्रमासे विपुन्भाती नामका यह देव एभा है। तापपात माणिक रामाने सिमालीकी चार देवियोंके विषयमें विशेप जाननेको विज्ञासा प्रकट की। गतम स्वामीन करा कि पापुरी नामकी नगरीमें सूरसेन नामक कोई सेठ राता था। इसक चार नियों पी। पापोरपसे सेठका शरीर रोगमस्त हो गया। प वफ्नी लियोंको मारने पीटने टगा वोर उमें नाना प्रकारके कुत्सित पचन बोलने मगा। मिर्योने अति दुसित कर अधिकाफे प्रत प्राण फिौ। मे रोगियों मरकर इसी वर्गमें विपुम्मालीको देखियो । श्रेणिक रानाक रिपुषरके विषयमें प्रश्न करनपर गौतम स्वामाने कहा कि हस्तिनापुरके सबर नामके रामाके विधुवर नामका पुत्र एषा । विपुधरने सब विवादों में पुराना प्राव को पी। एक पर्मि- निपा ही ऐसी र गई पी जो उसने नहीं सीमी थी। रामाने नि- परको बहुत समझापा, पर उसन चोरी करना न छीन। विषधर राबगर नगरमें जाकर कामम्ता पेस्या के साथ रमण करते आए समप म्भतान करमे मगा। गौतम स्वामीने का क पा विपुम्माडी देव रामगृह नगरी महास नामक सेटके पुत्र होगा, और उसी मक्स मोश मालेगा। या रुपन से ही या पा कि इनमें एक पक्ष यहाँ भाकर नृत्य करने गा । श्रेणिकके इसके नाचनेका कारण पूछा तो गौतम स्वामीने उत्तर दिया कि यह यक्ष बासका मु माता था । पह सप्त प्पसनमें बासक था । एक बार पा नएमें दम्य हार गपा और प्रम्पको न दे सकनेके कारण इसरे जुआरीने इसे मार मारकर अधमरा कर दिया । रासने इसे वन्स समप नमस्कार-मत्र मनाया, निसके प्रमानसे मर मरकर यझ बा । मक्ष यह सुनकर हर्पस तत्प करहा है कि उसके भाता गईसके वतिम केसीका जन्म होगा। यहाँस, पाच पसे, मसली जम्मूसलामीका परित भारम होता है। वईसके पर जम्मूकमारका अम हुमा । सम्बकुमार मुवा हुए। उनकी श्रीमत सेठोंकी धार फन्याक साय सगाई हो गई। उन्होंने मोमप दायीका वशमें करक मपनी वीरता प्रकट की। पम्फुमारने एक बार एननून नामके विचाधरको पराजित करके मृगाक विपापरको सहायता की, निससे सकिने अपनी पुत्रीका मेणिक रानाके साप निबार किया। पथात् जम्मषमार सौधर्म नामक मुनिसे, गो भषयका नीर था, भवान्तर सुनकर राम्पको प्रत हुए । सम्ममारने माता पितासे प्राग्या ठेनेको अनुमति मांगी । माता पिताने बात समझापा, पर जम्मूकुमार न माने । अम्तमें पिताको नादाको शिरोधार्य करके उगोंमे सिह करनेफे एक मिमा दीक्षा मे नफा निभप किया। मए टार-बारसे गपूषमारका शिवार हो गया। चारों विपाने अनेक हार-मासे उम्मकुमारफो पिक-मोग मोगमेके लिये भारत ति फिपा, पर मेरके समान बोड और सपेमें वहाँ विपुपर चोर मी पर गया । पारी मालविवादिता पुमो वीर । बिजुबर तपा बम्फुमारका यात रोचक संवाद मा । अन्तमें म्यू स्वामीफी विजयई। उन्होंने मिन-दीक्षा प्राण की। साथमें निपु- बरको मी उपदेश म्गामा मी अनेक लोगोंके साथ दीक्षितामा जन्तमें ये भोनों भनेफ मुनियोंके साप विपुगवछ पर्वतपर निर्वा- णका पारे। मूल ममियों मन्तमें कुछ शद मा प्रतिपकि विषयमें भी विस ठेना उचित है। जम्बूस्वामिभरित दोणके सरके इचेवाले मैनमदिरकी प्रतिके उपरस संपादित किया गया। इसक सिये इसके प्रेषक बान् पमा- मासमा वमवासको भनेक पन्यवा। इस प्रतिके उपर कोई सत् नहीं है। फिर मी यह प्रति प्राचीन मास होती है। यह बीचसे कई स्पर्मपर अतित मा है। बहुत प्रयत्न करनेपर मो इस पुस्तककी इसी कोई प्रति न मिनसे, सौ एक मौर सो मी वार प्रतिके वापारसे प्रन्धका सम्पादन करना पड़ा है। मूल प्रतिके बो पाठ वटर पान परे, ठमें मूल पाठमें रखकर कोहकमें शुम पर दिया मन मोर नक्सारमै सम्मान पिपरा नाम रामराव और मावाम परिवी मातापामारमा पर मोचण बयामा वन विमा होता है। इन ममामि रिपुचरकी बम ममम फोरम माम बावा।(4 एबम सम्मामिपम भी- ममरिमुख- N: --प्रभास नाम माध, जैन, इस तम १० किया पा)ले बधिरचनामार मेहनतीमा प्रमबीचमे बो उपाए उम्मरमरच मतपत्त कमाल पानिमाम मुदि- सिमि, मन अमितमपरिमार्यो एमालेबम्मूला परिमार्थी मचा मोर कामरिकी समाजाम मौत सामावर पाया।

(१७) गया है। इसकी बोर अभ्यारमकमहमारको प्रेस कापी नावेप्ते (शोलापुर ) के अध्यापक प० चन्द्रवी शरीके द्वारा तैयार कराई गई थी। मन्यात्मकमलमाणिकी दो ही प्रतियाँ उपम्प हो सकी । एक सरस्वती-भवन वईको भौर दूसरी प्रति प• मायराम प्रेमीजाके पास की। सरस्वती-मषनकी प्रतिके लेखकने उसकी मांगरफर इन्स्टिट्यूटको स० १६६३ पैशास मुदी १३ शनिबारफे दिन लिग्मी पई प्रतिके वापारसे नकम की है। माश्म नहीं मूग प्रतिके इतनी प्राचीन हानेपर भी पह प्रति इतनी भामुर फ्यों है। समय है नकल करनेमें सक महाशयकी पा हो। दूसरी प्रति स० १८११ श्रावण प्णा पष्ठीके दिनकी मिसीई है। इस प्रतिके ऊपर रबरको मोहर मारी है, मिसपर — भारफ श्री महेमरकीरतीची, सवाई जयपुर समत् १९३९ ' खुदा गुमाए । दुर्भाग्यसे या प्रति मी पुद नही है। इस प्रतिके सक सुरेन्द्रकीर्वि मारक है । या मिनदास परि सकी बार मासिके वापारसे शीतामें सर्पमुख नामके छात्र के छिये, जिस समय इन्दापती नगरी म्पसनहरि (1) तृपका सभ्य था, पानायके मन्दिरमें लिखी गई है। इस प्रतिमें गमग दो परिक्षेदोंके उपर टिप्पणी मी है । माछ्म नहीं पा वपूरी रिप्पणी साप प० रायम्छकी है सपना किसी दूसरे पिशन्की । इन दोनों प्रतियों के पास बास पाटोतरोंको पुरनाटमें दे रिया गया है। बुनिताबाग, वारदेन नगदीसपन्द्र ९.१.२६

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मम भीषीवपगाय पण्डितराजमल्लविरचित जम्बूस्वामिचरितम् बीपी (ती)रुतपरमानदापात्मयतुष्टयं ष युपाः। निगति पस्प गर्मागुत्सममिह त तुपे पीरम् ॥ १ ॥ पहिरतरंगमंग संगतिः समाषपर्यायैः। परिणममानः शुदः सिद्धसम्हाऽपि यो भियं दिशतु ॥२॥ परिप्रमोशारिरिनिर्जयापधिचिरस्य शय्याधयनाशनादपि । पर्व उपाधीसगुणांय पारसंशयीन मीयापदि पा मुनिमयी ॥२॥ रने करालीप पिधुन्मती वमी यदातरं स्पास्पदमादिभारती । पदापसार्यो पदवीं वर्ष या मनोम्मुमे मै पदमावनोतु सा ॥४॥ अयास्ति विष्ठीपविरसुवोरयो दयान्मितो गमरनंदनंदनः । मकमरा भीपरशोमिवोमियो नक्कल नामवयार्यतापिया५ मस्ति स्म पापापि विभाति माति परा बगवाभिपया प्रपिम्पाम् परंपराश्रिय भूपतीनां महान्यपानामपि माननीपा ॥६॥ बामा ममामि तोपहर महादरम् । बपिति नियममापि मात्रममिव समास । पसरवायम् । २ या यम विननिगपारि म मुखनामुमोपवेपिनाम् । प्पा मारा विशेष मुनिगरिए अपेदिवायाम् ।।

२ सम्स्वामिचरिते- वाम मावापपि भातमन्मनः समेकछमीकृतदिग्वधूवरान् । माश्चित नासमिहानभूममा कनीन्द्रादी छसदिंदुकीर्ति ॥७॥ अतः स्वपित् कृतसादसमास माननीयो पिपिपपिभिवाम् । पषा कपा मावरचमाभिता प्रकाश्पते मन्निरया निरंतरम् ॥८॥ मुभी वरपाविसाहिरमनभिनित्य पमनसा- रिलीचोऽपि समदनारियसनां क्षोणी कसभापताम् । हर्गमकासो दिगगनमर्स फ्रीरन् यये पिसा स्पापासापासमौसिविस्तरस्यापीप सम्पपप ॥९॥ तपमोऽमनि मानुमानिय गिरराकम्प ममग्स भूपेभ्य फरमाएरमपि पर्न यमान् मनेम्यापिकम् । अनारसकरमवापतरसा मात्सर्यमम्पेरथा महापासवया भात्तमहरमामा हुमाउनुपः॥१०॥ वत्सना मिपमहान समरसादकावपो सुमि भीमस्साहिरफम्परा परमविः साम्राम्परामदपुः। वेमा'ममयो बसम्म्पसनमम्पासाराखानस समारीन् दावि स्म निर्दयमना उन्मत्य मूगादपि ॥ ११ ॥ शशीव दीप्तः किस अक्षयपि यः कमासापर्याप समुपस।। बालीबुम्मप्रवरिता भासमानाम मामाभूति स्नमरिख पर विधा। सत्यरातिपरिरमवधिवि पवन म- मिमाम्मगियामासा पूर्वप्रवासानामापहिरनम् - स्थामुखपणनम् वदापि नम्रीकृतभूमिपालक कपालमासापमिभिप पिटिपाम् ।। १२ ॥ वता माधोपनमाभिता पय स्तता रन् संगरसंगतः क्षणात् । नियोऽपि फंदर्पमपमपारव दिपप पापिन वापसंझक ॥ १३ ॥ गमावपानातिरयादिपपु यो मंत्रासिदुर्गदमिण कारिपु। सिसस छसो भक्तिम्पत्ताभिता पर्म स्मेंसादिक्रममाप्रसंमषम् ॥ १४ ॥ सम्माषकासादया मसंगा पवा वा दुजेनभिराकराः। सदन नामापि न पृथत मया लघुपाणी ननु पौरुपं वियत् ।। १५ ।। अपास्ति विपिपरि पिप्रक्रफ सत्यपातिलसीरवधिप्राम् । अवारणस्वममवाप रेसमा किमतं मम ममानमानस ॥ १६ ।। जगम (म) गामी गुमरातमध्यगा मृगापिपाइप्पपिकः ममावत । मद्रसुवो परिगनस्तदानीमितस्तना याति पररायमानः ॥१७॥ १ पाम् । ५ मध्यर। एम्मेषु । ४ापीन सिन् । तिल. डिग्रिनस्वारिभ्याम् ।

? सम्सामिचरिते- तताऽपि प्रस्मा गिरिगारान्ति मिता पर्म पिन बंपन क्षणात् । महादया मंअवसादिपाइताः प्रपतृरापमिपिसनिपानके ॥ १८ ॥ न यस दिम्मिनपस्य स्मृवां सहस्रसौरि मामि भूषम् । मुवापि निनामवमानपानमा पसबम्भारमराविमाप्रमा१९॥ अपि ममास्मरविसंहको गिरेरपानिपा सनिपितः समस्सर। कदापि कनापि न मेरिती यतस्ततोऽस्ति दुर्गो पसिना हि दुजय' अनेन सोऽपि क्षणमागायनेकसी रुवमर्मरा भिवः। पिसंप्य पादिरघुनापबचपा परं पिपः कसिकौतुकादिप ॥२१॥ मनापुर कपिद)रिपया पपीनिषेः परं तट कोटिमटा नटेत । सतास्य मन्य नइचोऽप्यपूयव प्रादार्षिकममफमाननम् ।।२२॥ मित रूपागेश्प मिदारिवारिता (जा!) पसाशनाकवि पानमम्मितः । वाऽपिक मारवपा पुरक्षिवा अगस्वयं प्रासमगादनासः ॥२॥ क्यापिपीश्प्युरवपीरकर्मणि दयालता पास्प निसर्गवाऽभवत् । फर्मम पुगपत्रपपा रसाः स्फुटमपिन्स्पषिप्रा मावारिशकय:२४ मपासयामास ममा ममापविरसग्दर पदसंग्मरसम् । मसंग्सपाया मरासप भिवामराने सबंदिसः ॥२५॥ कर न मन भगवोऽविद्फर परंतु सौ यदि योपिता मृदुम् । मदं म भार वापि परणादपि दिर्पमानिए नवाज्यमा २६ समाच गुरू स्वप भमियामि स पापमोपरम्परापरम् । भराप मषः सरितापपया पपासपीभीमदफारस्प १२५ चनमापन शास्पतीम मिर्म कापि निसर्गत दिस(वरिपाविम मनेन वपवादस्वमनसः सुषमरामः किल पविभुना ॥२८॥ राप्रमः।३ पाता। बरास संपा।

फयामुलपर्णनम् ममादमादाय मन प्रपर्वव कुषममगपु यतः ममतपीः। सताऽपि मप तदपपकारणं निपारयामास विदोपर सरि॥२९॥ असपता स्तातुमलं न माया समानदानादिएणानसम्म्पत्त । वतीस्प दिम्माप्रवयाधित सम पयाधितो पा भलमनसिस्थिसम् चिरं चिरंनीष पिरापुरापती मनाधिपः सवसमनिमानिमम् । ययामिनदुरमुपामुपापिपं फलामिरेन पग्या मुदा मने ॥३१॥ भयाभिपानामिर राजपचन महानिहास्ति नगरापिपाधिप । पनापिठ मनुत स्म मपति समस्तपस्वाकर आगराएपया ३२ यदीयशाल मूपिसासवामया दिवं दिनु मुरनिम्नगामिप । शिसोपपादपरमार नपन् पपुस्तदुप पदमारुराइयत् ॥ ३३ ॥ यदभ्रमभ्रमिसीएमंदसीविस्मलदारापादादिः । पद पकाराघरदक्षिमापने समीतमीतोऽप्र यतस्विरोपति ॥३४॥ मानामनीसमाफीर्ण सरिता ससिलरिन । सपापरतिगमारतमिमाम्मिमि ॥ ३५॥ मानिम महामार्ग रस्नालकमापितम् । गनाधादिपनापतियादाभिरिव दुपटम् ।। ३६ ॥ पंकभाननसंपारर्दपंत कममातिम् । सन्नपुररणकारांसेरारपिन कचिन् ।। ३७ ।। सदासादिषिमासापेक्षिनरमृतास्पदम् । महाफारफराइतमममदापानम्म् ।। ३८ ।। सोपासिणिवपुषः पातस्परिप सस्पितम् । महामोत्पानि पनि नीस्वा गरद्भिरात्मन ।। ३९ ।। मम । नम्पर पाये मम इति पारिता अमूम्सामिपरित- भिमनामानि पद्भवपापणानि पहनि । अंतरीपीणि तानीय सरस्वत्नि पृथनि र ॥४०॥ सीपस्थितमातुंगामालमिराप्लुतम् । पतमिमिः ममुहीन पटपस्पर नामितम ॥४१॥ रामनीविमहापागादत्तपापथगामिनाम् । निग्रात्साघुरगामा संग्रात्सारसग्राम् ॥ ४ ॥ चर्विस महावीभ्योऽप्यंतरीप्यम्वताऽपरा । इति कधिनमद् भ्राता भ्रमावतमिन भिसम् ॥ ४३ ॥ राधा यम भक्ति बदमानं नि दिनम् । बणयामि कर्य पर्ने नगरम पहाणम् ।। ४४ ॥ पर रिपहियपाज नीपस्मै मसतास्मता । तापदप पार कनकादिमिरामसम् ।। ४५॥ जास्पमाम्मनदाफार सोपाध्याय ससिकम् । गापताकिमरामिण निपम्प पिपुराधिपः ॥ ४६॥ दुम पय्यन्तम्भागमपर्णपिवं निद । रम्प पसाव्यमापनन्दनाटिपनरिर ॥४७॥ गमदवसमारदनिता मुनिम्मृतम् । परपणमपे रस्नः मिरिकारित मुभम् ॥ ४८॥ पटिगंगमागेपु मभ्यर्ग रपयारुतिम् । ग्यापिरिमानश्च सुमरिर सनितम् ।। १९ ।। मिनपस्परागः सर्गिः गुरिर समन्वितम् । तसम्पमिनावपश्य पूर्व रत्नमयः सतः ॥५०॥ पास्निमवार न्। पथिमि चिनितम् ।

पा मुग नम ७ मन्माभिपरपागप मिनामागिपनगर । गंधामि गर्न मनिं गा ॥१॥ गरिमामि मन परपनिाप । नाग्निापान पगिगानिर्माण ॥२॥ भगना मापारिमागिनाभि मा । भूपमा पाभाग भाररगतिमि गमम् ।। ५३ ।। पपिहागिरमानमुरार पर पग्म । गमित पमध्यानारपार ॥५॥ पापियामरा TR पूर्ण निम्ममरनपा ॥५॥ (पास) मागमा भग्नानापूपम्पार पपा पगापगरमापरिन्ति पार माया गरि । पापगलिगानि गापिसगाप गार गरम पानि भीमान राम ||॥ पना मनपरिज पापावर affrगांधरा गm frulink friमरनापारदी- गणmzier 13॥ PHIRErrorism पानमा ITTEN नगरे । Numr Fertiful ८ जम्सामिपरिते- तपाईपीः मीतिरसामृवात्मा स भावि नानारासार दाः। कर्य कयायां भरमोत्सुकास्यादुपासफा कप वयप पदे ।।५९|| श्रीमवि कासय मापुरगमाऽप पुप्फरे घ गम । सोराचार्यममृवी समन्वये पर्वमानेऽय ॥ ६० ।। उत्पा परममसयकीर्तिदेवास्तवः परं पापि । भीगणमाः मरिमहारकसमकवात् ॥ ६१॥ वस्पासचमदयादिमिवानुमान भीमातुकीविरि मावि पिचर। गपावपमिसिसम्मपदापसार्यान् महारको एनपारुम्पपरपुः ।। ६२ ।। तस्पामम्पिममिरदनोहरिनु सौम्पा सदादपमपी ससदशमास । बममतावरणनिर्मिसपारसनी भारको पिमपतेश्य हमारसेनः।। ६३।। ग्यानातकशमा परमविभि प गर्गोऽभपस् कायसंपमपानियां (१)प नगरे फार्मति मान्ना परान् । भीसाघुर्मदनास्यया वदनमो भावा स मास् मपी स्वरा मिनपर्मधर्मनिरवः भीस्पर्षदारयः ॥ ६४।। वस्त्रा पुनरवोदपागमामैकामणिः भीपासपिरसापुसाघुगदिवः सर्पः सर्म सापुभिः । रेसा यस्म रिरामते पुरि क्यारम महामसिना भमभीमसदानमानपषसो मैनेज्य पर्फे रतः ॥६५॥ १चदिवाणमपि उपाय। २ क्या प्राम।

फपामुसवर्णनम् ७० ॥ वटामोऽस्त्यम विम्यास श्रीसाघुटोरा सुपीः । महोदारी महामागी महिना असदीपः ।। ६६ ॥ स्यायः साघुसमामध्ये पियामान् पर्मतत्पर । देवशासयहां प मत्सहा विनयान्वितः ॥ ६७ ॥ परपा पोपकाराप सक्तिस्स्पाग घ यस्य धी । विधं च पर्वकार्येषु विसर्माणादिषु ॥ ६८॥ रागी पर्मफल पर्मे इसमें सदिपर्ययः । रिमुख परदाराम सन्मुखा दानसंगर ॥१९॥ सगुणांवपि पा पाली भूफा दोपशवप्पपि । नात्मोत्कर्पमिषा पाग्मी स्वमऽपि न दुराशय स्मिा हुनौकेन सरकापपिपी सम । विषपुमादिसपूर्णकापि लक्षायत ।। ७१ ॥ रुपाला सवमीरपु ममशासप पुदिमान् । दक्षा सोपानप धापपु माधरः ।। ७२ ॥ नम्प मापा यया नाना कोसुभी शोमनानना । साची पवियता पेपं भगदानुगामिनी ।। ७३ ।। वयाः पुमाखप संति माया मानारिपशवः। उप्रापापि सदापा निपश्पकारिण ॥ ७ ॥ प्रापिदासधिरं नीपासप ग्यायान् गणरपि । सतपाप्पुमत मंच दिदीप पिम्पिरममसा ॥ ५ ॥ मानाग्यधिरापुः स्पारिभीपाऽप्यदिनीपप । कणाऽप्यप्रपया दार्य मम्ममास्टुम्न रिन् ।। ७६ ।। नाम जम्म्यामि चरित- पर्दा मावरपस्पस्तृतीया रूपांगर । विशुगर्यमामामिमहानेर मणिर्पया ॥ ७७ ।। एता परगार्णा मध्य भीसाघुयारा । म्यापणितोऽपि य पूर्व सपा मध्यतऽधुना ॥ ७८ ॥ मयकता मापुरी मपराया तायमः । पामाप सिक्षेत्रस्पचत्यानामगमत्सुसम् ।। ७९ ॥ तस्याः पपन्तस्माग हा म्यान मनीदरम् । मापिमि समासीनं पूर्व सिदास्पदापमम् ।। ८.॥ समापश्पस्स पमात्मा निसास्पिानमुत्तमम् । मस्परमिना गम्सामिना मध्यमोदिमम् ॥ ८१ ॥ दवा पिपुथरा नाता मनिः स्पाचाग्रात् । अवस्वस्पर पादान्त स्थापित परिभिः ।।८२॥ ततः कपि महासस्वादुमसंसारमारमः । सभिपान तया माप्य पदसाम्पं सम वषु' ।। ८३ ।। उर्फ च- कोसान्सटिगियरा मा मा संमपा मम्मपरिसस्स । तर पर मायद तून सुसम्पसापग्गिारवा ।। ८४॥ ववा पृतमहामाहा मानवारिणः । सापुरत यपास्थान नगमुस्तभ्यो नमो नमः ।। ८५ ॥ व: म्बानानि पो हितमा पार्ने प्रयुक्तिः । स्पापिवानि यपानार्य प्रमामन यामिद ॥८६ ।। १ बसि बसि मम्बमादि पति का पारः। पायपिटलापमा मत मनपुश्मन। परवा परोस समसामप्रमोवायम् ।

कामगा नम १७॥ नो समिपम रविनागरपिान मन परम । पिमितिर मानना ए पणापगम् ॥७ ममारिपिगमरम्पाणा परिणापन । मरानो स्तरमाप नागना गारपापिता ॥८॥ म पपान्पा नापमुनमुन्गुर । पापणा भी प्राणि समर गपपा (पमनगमप नरम् ।। पना प्यारागपापाम पराग परिमान । मारपरगानरम पानापानान ।।..॥ मम्मामानागिरमपान्यामाग्पन । माननगगरानिमा गापार ||..॥ मदारता मापा मगरस गर । पारगामगारदानाम ||२|| मारगर पारिति । गाव मामी भार पर EMA MALI متر رسانتا ماه ها بها ويحشرعيط ۸۰ ۱۱ Hist-alitaaye नान TRI..॥ د.در ومن 1 ملما للبرلمار! | 12. Mati ataum अ.. IFAI -- .

समूस्वामिचरिते- यस्पोदयारया जेतारदपा स्पारकर्यचन । पदमाप दपामापो पटवे चिदपेऽपि ॥९॥ बदस म्यास्पया पास्प पापा रामसरपया। एक समनानां यावता (1) तत्परपरा ॥९९ ॥ वन्मिन्पात परिस्मभ्यमादा पमममीप्मुमिः। सम्पत्य मायपदिय मस पर्मतरासि ॥१०॥ स पर्यः कपिता ईमा निश्चयापसारतः। वत्र सास्माभिवपापः स्पादितीयः पराभिवः ॥ १०१॥ मास्मा पैतन्पमार्यस्वष पापामगापरा। स्वानुभूस्पकगम्पस्थात्म यमा पारयाधिकः ।।१०२ ।। स पपासादि मुद्धात्मा स एव परम तपः । स एव दपने शानं पारि मुसमभुवम् ॥ १०३ ॥ स एप संवर मोक्ता निर्भरा चाटधर्मणाम् ॥ फिमा विस्वरमापि वस्फर्स सकिरात्मनः ॥१०॥ पप तपासमा सन् कादिषन्मोहोदयात। म्पापहारिकपप स्पानिरीदाऽपि पति ।। १.५॥ माझापत्सिंभ काश्मिाम इवारिनिश्चयात् । पिपासुभन्दूरस्पाऽप्यापमाणोस्ति वहुणात् ॥ १०६ ।। तया साखा सदष्टि। सास्मोत्पमसमावे। वस्मसाप्येषु संपादिः परवरूप मापत ।। १.७॥ वप रागादिकल्पास्मा गनुपग्रामषिवनात् ॥ प्यावहारिफपमें स्पासा प्रमापिनि ।। १०८॥

कथामुषणनम् फपापादिपु दुर्व्यानरचनार्य तदर्यमान् । आपूजादिकं पम्छेदासानादिमिः क्रमाव ॥ १०९ ।। एफाल्पाविप पधासम्पपर्यन्तेषु च मंत्रप्र । समवा स्पात्स्यवस्वस्प या स्वप दुखमीरुका ॥ ११०॥ रिसादपिरति मोकं प्रतं वद्धिमिर्ष मवम् । देशवः सर्मदा पचे भाषकाऽणु यतिमहत् ॥ १११ ॥ वलक्षण तु सक्षिपादस्पमार्ण पयागमम् । नाम मिस्तरवः मोफ इवा संपन्षमाप्रतः ॥११२ ।। पस्फर्स चास्प धर्मस्य मान्दादिमहादयः । सपै पासवल्लभ्य पान्यार्थिन कुडंपिन ॥ ११३ ॥ पासपमफसः सोऽयं स्तूपान्पमिनपत्पतः। कारयामास पुष्पा पन न निवार्यते ॥ ११४ ॥ यसकते पन देने केपिदमकवयतः । वायायमसी दध पया सादु महोपपम् ॥ ११५ ॥ शीर्ष शुभदिन लगे मंगसद्रम्पपूर्वकम् । सास्सा( स समारंमं तपान् पुण्पमानिद ॥ ११६ ॥ वोऽप्येकामचिन सामधानवपानिनम् । महादारवया शमिन्ये पूर्णानि पम्पमाम् ॥ ११७ ॥ शवाना पंच पापै गर्द पापिषपदिश्च । स्तुपाना वस्समीप प दाद द्वारिकादिफम् ॥ ११८ ॥ संपत्सर गवामानो शवाना पारर्म प्रमात् । शुदखिशमिरम्दैप सामिक पति स्फुटम् ।। ११९ ॥ पम्प दुषः । येडरपिरमासः ।

जम्मामिपरिने- शुभ ग्पष्ठ महामास भज पर महादय । द्वादश्यां पुपमारे स्पान पीना प नापरि ॥ १०॥ परमाइपर्यप पूर्ण स्थान कायममममम् । स्वत्रं रुकमगिरः साक्षात् मसमिशरिएनम् ।। १२१॥ पूनपा म ययाति मरिम प्रनिष्ठिवम् । पर्तिपमासय समायाम भीमवा ॥ १२२॥ ववायाधीश्या पूर्व परमानदनामिनाम् । एरणा सन दचानि दपा ममानि मस्तक ॥ १२३॥ सवापिपर्दपामास पोत्सारः मुश्यना । पपेन्दुदमनादादिते पयसापिकम् ॥ १२४ ॥ मप मध्यसमै स्पिस्थाइमसीकतारदपम् । पृाति स्म स भूपुर समवस्फयानम्म् ॥ १२५ ।। सूर्य परापधराय पदकक्षा माापियः। पदाणाप पर वीरें कपापारिमारप'॥ १२६ ॥ सवामनुप्रामामाय बापयर्ष ६ मै मनः। मम्सामिपुराणस्प शुभपा एदि वर्तते ।। १२७ ।। कर भेयामि वन क्पं प्राप्त मविरम् । प फेरसमुत्पाप पुसम्म मुलपम्पपम् ।। १२८॥ कर्य विपुषरा नाना मिमित्तादर निः । सेन सारे एनीनी स्पायस पय मिनिपम् ॥ १२९ ॥ मापसगै सिमापाप सहिष्ण। पस्त महास्माना न स्ससंथा समापितामा १३ ॥

कयामुसवर्णनम् १५ क तस्कया क्ययममपिस्तरात् । पया पासैरपि मायो नाग्य स्पाप्टपमृतितः ॥ १३१ ॥ इत्युक्त्वा युक्तिवामिनः स्पितो पार्षयमीन सः। माघु माघुमिराना साधा मक्किमि लया ॥ १३२॥ ततः शीघ्रमुपासी मल्ल प्रोगाच मिष्टाह। मध्पेसम गुरूणां वा रुपया लगमिता यता ॥१३॥ सम्पापि सघाांय कपलं न क्रमादिर। पयसाऽपि लघुमुदो गुणानादिमिस्तया ॥ १३४ ॥ गरीरनग्रा मात्वा सरादेशितस्स्वपम् । मन्यया वाशी रंफ: फर्य पाचासवां दौ॥ १३५ ॥ मृगारिरिति नाना स्यादुतकर्पो न गजदिपाम् । मप्र दापावतारपि माप माता कियत् ॥ १३६ ॥ तिम प्रभयेना य निसगाव सजना । पारापरायद येपो रुपाम्मुशिशिरं पच ॥ १३७॥ पवित्रीकुरुवे नि निर्यापयवि वचप। पुण्यसस्पादिक मृत सदास्तां हदि मनिष्ठम् ॥ १३८ ॥ दुर्मनाऽप्यघमो वा पदिक्रियायै स दुष्टपीः । यतोऽप्पनुदव नम्र पर सन्मानिवाऽपि च ॥ १३९ ।। भवेत्सापुरसाघुर्वा पिवनयानया । स्पष्ट मुस्तार कार्य सर्पः स्वार्य समीइताम् ॥ १४ ॥ यदि सवि गुणा पाण्यामधीदायादया ममात् । सापयः साधु मन्पन्व का भीतिः मठपिदिपाम् ॥ ११ ॥ पाम तोचि । ममम् ।

सम्मामिचरित- मप साधूनमाध्य मनिपिडापपाम्पाम् । मम भ्रान्ता ममादाटा समर्ष स्मसिन मयि ।। १४२ ॥ मक्स्पा कपित रिविपन्मयाप्पत्पमपसा । स्वानुमूस्यादि वस्स परीपाटनुर्माय ॥ १४३ ॥ इत्याराधिनसाकिदि पंपगुरुन् नपन् । मम्ममामिफयाम्पामादास्मानं तु पुनाम्पहम् ॥ १४ ॥ सीमास्मा पिशदास्मा पिपी रुपनर्मित । मतः परं य(च) का संज्ञा सा मदीया न सवतः ॥ १४५ ।। पजानाति न तमाम यमामापि न पायवन् । प्रति मनाचयानाम कप फर्च निपुग्पर्व ॥ १४६ ॥ मपासमपालनिस्सापको बम्पनिमपान् । नाना पपायमानतादर्नवस्पपिपिदै ।। १४७ ॥ पन्पास्ते परमात्मवत्तममर्स प्रत्पममत्पक्षतः सासारस्वानुमरगम्पमासा मिति में सापकः । सारे सजनमा म ममनतया प्रसामिावर्या- समानवमुम्बामृताम्मुसरसीसाथ ईम्पो नम ॥ १८ ॥ इतिभागम्यूम्मामिचरिते मगरपश्चिमवीपकपेपदेशानुसरित- स्पासानपगपपपरियाविशारदपशिवरायमचपिरपिते साधुपासारमासापुटोसमम्पर्धित कपा मुसवर्णनो नाम प्रपम सर्ग ।

अय द्वितीयः सर्ग सम्परतरत्न ममतामयाम्पो पोवायमानं निपवजनानाम् भीसाघुसापासवि दोररस्य पासास्मजस्पासिलचर्मणे ॥१॥ इस्पाशीपाव। मीनामेयं मिनं मंद पृषतीर्थमपतकम् । मनिव निर्मिवाक्षेपकर्माण घ भगायम् ॥ १॥ नौनांतरीपनिकरैः परित' परीव स्वापसपासमवावपपारणीऽसौ । गंगोषषामरसगीमित एप नंपु- दीपीषिराम इव रामवि मम्पपी ॥२॥ तमासमाकार से स्पाझरवाश्यम् । उस्सप्पिण्यपसपिम्पोर्घटीर्यपामिनास्पदम् ॥ ३ ॥ गगासिंधुनदीम्पाप पद्मरीकतरिनाम् । मिमपार्द्धनंग मिस्मा गताम्पा सपणापुपो ॥४ द्विवक्ता अपमापा स्याद्वितीया सुपमा पता । सपमा दुप्पमान्तान्या सुपमावा प दुःपमा ॥५॥ पान्तरोपनियोः परित परत समाचसापामावपफ्तारमोनी । गोषनामरमिरमित एवम्- पोधिएन राति मप्पवती मदिवाय--1 म्यः। ४ । २ गम्म्म्मामिचरि- - पषमी दुपमा मया समा पष्टपतिद्धापमा । भेदा इमानसपिम्पा रस्सपिम्पा विपर्यया ॥६॥ उस्सपिम्पमसपियो कासी सांवमिदामिमी। स्पित्युत्सप्पारसीमा सामान्चयामिपानकी ।। ७ ।। काठमपरिम्रांस्पा पद्समा परिपचन । तावमी परिपर्चेव तामिस्रनरपेसरत् ॥ ८॥ पुरा स्यामपसप्पिा क्षेपेस्मिन् मरताय । मध्यम म्मरमामित्य प्रयते मयमा सा ॥९॥ सागरोपमकोगनो काटी स्याप्यतुराता । पस्प कामस्य परिमा सदा स्पितिरियं मद्य ॥१०॥ देरावरहरूमाप या स्पितिः समास्पिता। सा स्पितिर्मारत युगारमे स्म भापत ॥ ११ ॥ सदा स्पितिमनुप्पाणां विपन्पोपमसमिता । परसास्राणि पापानामुमपा पप्पा स्मृतः ॥ १२॥ मनास्थिपनाः सौम्पाः सुंदरकारपारकः । निएसकनकमाया दाम्पन्त नरोत्तमाः ॥ १३ ॥ सकट पुणस परी ममता कांगहौ। कर प्रसम्म पता समबतिस्पणम् ॥१४॥ एवं पुष्पादयाब्वरुपारम्पसंपदः । ररर्पत पिर सीभिः मरा इस मुरासप ॥५॥ महासत्ता मार्या पारका मामसः । मानुमागास सर्षे मीर्यंत मागदपाः॥१६॥ सावधमिवामी। नौ।।।५। मलमा श्रेणिकमहारानसमवसरणगममवर्णनम् वेपामाहारसंमीविर्मायवे दिपसैसिमि । कमलीफसमाप्रं च दिम्याम पिप्पणति ॥१७॥ निर्व्यायामा निरातका निहारा निरामयाः । निादास्त निरापाप जीपति पुरुपायुप ॥ १८॥ सियोऽपि तापदायुप्पास्तापत्सपरचयः । फल्पामपु संसक्ताः फल्पबत्त्य इसोपसाः ॥१९॥ पुरुपप्परक्तास्वास्त व वास्वनुरागिणः। यामजीपमसंश्लिष्टा सवे मोगसंपदः ॥२०॥ स्वमानसुदरं रूप स्वमायमधुरं पर । समारपतुरा घरा ते स्वगायुपोमिम ॥ २१ ॥ रुप्यारगृहातार्यमापसूपाम्परादिपम् । मोगसाधनमेवा सर्पकस्पतरूपम् ॥ २२ ॥ मैदर्गपवासातवमर्दशुक्पसमाः। नित्यासाफा पिरानंद फत्तापपदपादपाः ।। २३ ॥ कासातुमारसमताप्रसामम्पती । कल्पगुमास्वदा वैपी फर्पतऽभीष्टसिदये ॥ २४ ॥ मनामिपिवान् भोगान् यस्मासुम्पकतो नृणाम् । कल्पपंसि पास्वनिरुताः फरपपादपाः ॥ २५ ॥ मयत्तूपरिम्पानगम्पोतिरीपांगकार । भामनाममायांगा नपा सिपाखिनः ॥ २६ ॥ पर इनि देशीभाषाये। १ मपति । मारिन् । नियरित्य। -सानामिन । पारि । माया प्रसावा. पर्दिता ।

- २० चमूस्लामिचरिते- इति स्वनामनिर्दिा पुर्वतायप्रियाममी । संझाभिरेन विस्पटास्वता मासिमवन्पत ।। २७ ।। वया मुक्ता चिर मोगान् सम्पपरिपास्मान् । स्वापुरते रिलीव ६ पना इन शारदाः ॥ २८ ॥ नृमिफारममामण तत्कागस्पधुतने मा। भाविवाद सतुं स्पस्या के दिर्ष यात्पननसः ॥ २९ ॥ इस्पापकासमदानसपिम्पा रणिता मना । ससहरुसमा नपा सिपिरपावपार्यताम् ॥ ३०॥ तता पपाममं वस्मिन् काले गएनि मदताम् । यावास वृतवृषायुम्भरीरोत्सपवृतिपु ॥ ३१ ॥ मुपमासतमा फासी दिवीय समपर्वती। सागरापमकोटीना विस: कोव्यारस्य समितिः॥ ३२ ॥ वदास्य (वदास्मिन् ) मारते L मध्यमोगरा स्थिति। भापत स्म परी भूर्ति दबाना फरसपादपै ॥ ३३ ॥ सदा मा हिमामा दिपस्पापमजीरिन । परसाहस्रपापोवरिपरा शुमपष्टिताः ॥ ३४ ॥ फसापरफसास्सर्पिदाम्पोस्स्नास्मिवाम्मसाः । दिनदयेन वेनति पार्डपम्पोषमाम् ॥ ३५ ॥ पो पिपिस्तु निापी हरिपर्पसमो मकः । वता पेण कामेऽस्मिभवसर्पत्पनुम्मात् ॥ ६ ॥ प्रहरीणादासगीर्यादिमिपाः प्राफना पदा । मपन्पमागभूमीना मर्यादाविरभूचदा ॥ २० ॥ गया। नियमः। चन्द्रमारपमा प्रयोगा।

श्रेणिकमहारागसमक्सरणगमनपणनम् २ ययापसर संमातस्तृतीयः फासपर्ययः । अपर्ती सरामब स्वा मर्यादामसपपन् ॥ ३८ ॥ सागरोपमकोटीनां फोव्यौ दो लम्पसंस्पिसी । कालेऽस्मिन् भारले पर्प मा पस्पोपमायुपः ॥ ३९ ॥ गम्यूविममिवोच्यापा: मिययश्यामविप्राः दिनान्तरेण संपाता पोपीफसमिवासना ॥४०॥ तवस्वतीयकासेऽस्मिन् म्पविक्रामत्यनुममात् । पत्योपमाएमागस्थ पदास्मिन् परिभिप्पच ॥ ४१ ॥ वदा कुलकरा नाना प्रतिश्रुत्पादय प्रमात् । पतृदय भान्स्पर कर्ममपूर्णपरत् ।। ५२ वदा कर्मपुरा सरों म्परहार परचत । मस्पप्रभूपरावामनुसंख्य ममा इन ॥ १३ ॥ फास प्रोत्पस्प पापस्प मपषएपादयः प्रमात् । नायन्वय यथा नामिराम इलपरस्प ॥४॥ वस्पैम पाले मसदा पामिकापुरस्तिपः । मादुरासममोमाग सोडा. सन्दमरासना ॥ ४५ ॥ नमानीरध्रमारल्पअमृम्भम्मामा पप । पागमूसामध्यरारम्पः समपनले ॥ १६ ॥ रिपुदंनो मापाना पता रमिर पना । सोपसा पदिना नागा र साहिता ॥७॥ मममनून रिसियापार जोमसोपारा mrtmi २२ चप्लामिचरिते पनापनपनमान: महता गिरिभिचयः । मत्याप्रोममिनावनः मतृष्टाः प्रविशमः ॥ ४८ ॥ पमा प पाववान् कसांपोपान फापिनाम् । पनापनासिमुकामः कणराही समीरणः ॥४९॥ पातका मधुरं रेणरमिनंप पनागमम् । मकस्माचारपारममावन पिसिना सम् ॥ ५० ॥ यमिपक्नुमिपारम्पा गिरी मासु पया। सकपारं प्रपर्पतः मसरदारिनिर्धरात् ॥ ५१ ।। पनंती पधर्मकस्प्पारा पपोपराः । दव इस भोकार्ताः कल्पमपरिक्षय ।। ५२ ॥ विपुमटी नमोरंग पिपिप्राकारमारिणी। मविक्षपविांगी नृस्पारंममिपावनोत् ॥ ५३ ।। वरितप्रसंसक्त फसापसमहामसः । कपिपकर्मपर्म्य पामरायिवम् ।। ५४ ।। वदा मसपरोन्मकाः सकाफसरपक्षणा। मही निर्यापपामासर्दिगाफरफराप्मतः ॥ ५५ ॥ गुणानाभिस्प सामग्री प्राप्प ट्रम्पादिसमणम् । संसायंकरावस्पाममृत्पा कगिसासिवः ॥ ५६ ।। भनेर भनिनादानि मेमा विरसं तदा । सस्पान्पाएपग्यानि मानामेदानि सर्वतः ।। ५७ ॥ प्रमाना पूर्वमाताकासादपि प वारसान् । मुपानि यपाकासं फसदापीनि परमोगरे ॥८॥ १ मरिष्ठसमाम् । १ मा मरगति इति वा पार।

श्रेणिकमहारायसमवसरणगमनवर्णनम् नातिधष्टिरषष्टि वासीस्किन्तु मम्पमा । प्रष्टिस्वत्सर्नपान्याना पसाराप्तिरपिस्टुता ।। ५९ ॥ पष्ठिकाकलमग्रीदियरगोप्पफाय । इपामाफपादमादारनीरारपरकास्तपा ॥ ६ ॥ तिलावस्पी ममास सर्पपो पान्य मारपी। समापारकीरानमापनिप्पारायणाः॥६१।। हालस्यप्रिपुटी पति पान्यभेदास्विम मताः । सामुम्मा सफासाः मनाभीमनातर ॥ ६२ ।। उपमागपु पापंप सत्स्तप्यपु वा ममाः । वदुपापमनानानाः सता मूसह ॥ ६ ॥ कल्पद्रुमपु फास्पैन मसीनपु निरामयाः। पुगस्प परिरस्मिसमपागलाः ॥ ६ ॥ सीमायामननासा (पा) पासदीगरसंभया । जीरनापापसंतीविम्याइनीरवपेतसः॥६५ ।। पुगमुग्न्पमुपासीनों नामिमनुपपश्चिमम् । से पिनापपामामरिति दीनगिरी नरा ॥६६ ।। भोगमा पमराप नापानापा स्निा द्रुपे । कन्नदापिमिरास्न्पमविस्मापरपुष्पा ।। ६७॥ इमपिदिवा देर तरभदा समत्पिना । मालामि पमनमामिराापनीर नाऽधुना ॥ ६८ ।। गरिय। नामे || बनी I her'EिTI मरम्..प्रभा।

२१ सम्पूस्वामिचरिते- किमिमे परिचम्या किवा भोम्पफसा इमे। फमेग्रीनिमऽस्मान्मा निगृणन्त्पनुपान्ति मा ।। ६९।। अमीपासपनप प्यमी सणामकार। फसनप्रतिसा मोवि पिवविध मिवीभवः ॥४०॥ पवेपासफ्पागा स्पादिनियोग्य कर्य जमा। किमिमे सैरसंग्रामा न येवीद मदाप नः ॥ ७॥ स्पमेम सर्वमप्येतदेस्सि नामेनमिनकाः । पणमा पपमपास्ववी ही प्रसीद ना ।। ७२ ॥ इति कर्सम्पवामानविविस्तिदार्यकान् । मामे (मि भपमिस्पषमा म्यामार पुनः सवान् । ७३ । इमे कल्पवरूपादे दुमा पपफसानवाः । युप्मानपाचगणवि पुरा कल्पनुमा यवा || ७१ ॥ मदकास्वदिम पोम्पा कार्या न धान्तिरण पर। ममी प परिहर्वम्या दरवो विपक्षकाः ॥ ७५ ॥ इमाप फापनौपप्या संवादियो मवाः । पवाः समाग्यममा म्पंगनायैः संस्तवम् ॥ ७६ ॥ समावमपुरात दीर परेलरमका । रसीहस्प मपावम्पा दन्वैपनीय पीग्विाः ।। ७७ ॥ गमहम्मस्पसे वैन मृदा निर्विवानि प। पाचाणि विविधान्पेषो स्वारयादीनि दयामुना ।। ७८ ॥ इस्पायुपायकवने। मीत्या सक्तस्प मनुम् । मेमे (ज) स्वार्थिवां दृषि ममाः कासोषितो पदा ॥ ७९ ॥ समानुपएसमय।

भणिकमहाराजसमवसरणगमनवर्णनम् २५ मभाना दिवकहता भागभूमिस्पितिरयुती । नाभिरामस्ववाभूतो मेमे फल्पतरुस्थिविम् ॥ ८० ।। तस्यादाफस्पाण मरुदग्या समं पदा । पपारिधि पुराश्यपु पाकीसनभासनात् ।। ८१ ॥ सतपापि महादेवानयोध्याय पुरी म्यपुर ग्रामपचनसीमादि सरै पा घरास्वदा ॥ ८२ ॥ ववममृति क्षेत्रस्मिन् पचते फर्ममूरिति । अपस्पविरमेव स्याकालयकपरिभ्रमात् ॥ ८३॥ सागरोपमकोटीना कोटि स्पाचदमस्थितिः । तुर्पपमपष्ठयाय भेदास्तपाप्पमी प्रमात् ।। ८४ ॥ तपोकसम्पकस्तुर्यों फालः स्पाम्किषिदनक। दापत्वारिंभदम्दाना सामाणि स्नैिप सा ।। ८५ ॥ वादौ तुर्यसम्य पृपमस्वीर्यवेन् । ववम्मति मासस्प मागश्प प्रकटोऽभवत् ॥ ८६ ।। दवोत्सेप घरीरस्य पनुः पंपन पतम् । उस्कपेण मनुष्याणां पंचपिचविसापिकम् ॥ ८७ ।। मापुमपाणमानावं पूर्माणो रिरुत्तमम् । मध्पर्म म निकट घ रिझर्य परमागमात् ॥ ८८॥ तप्रतीपकराः सर्प पश्चितिसम्प्पया। मापते पंचकल्याणमासपूनर्दिरमा ॥८९।। व पिन्महात्मान पालनम्पियमादिर। मालावीन्दिपसांसपास्त निगाास्ता नुमा श्यम् ॥ ९ ॥ मामानुर मापनमारना Ata बम्स्यामिपरिते- -- फेचिरसम्परत्वपूर्माणि प्रवानि पारप मापियाः । सायसिटिप संमति मुलमंगिनः ॥ ९ ॥ परे प्रवानि समाप्य सम्पासेन पिना सपि । चापि मियापागा प्रेमयकमुसं ययुः ॥ ९२॥ कैपिस्सम्परस्परिकार प्रवेनापि परिप्यताः। भद्रा दानरति माप्य मोगभूमौ प्रांति हि ॥ ९३ ।। परे पूर्व दि बदायुः परपादुस्समदर्शनाः । सत्पाभदानती मनपनापुोगम्मतम् ।। ९४ ॥ विभागेषु ससका माणिवर्गेपु निर्दमाः । पर्मात्पराश्ससा दुशा दुख बने पवंस्पमी ।। ९५ ।। रा दुस्स्पाम्प धर्म दुसैम्प माणिना महत् येन पर्मस्प सामग्री सर्वापि विफमीरवा ॥ ९६ ।। इतस्पे वर्षकासीऽसौ पंपा स्पापमोषयोः । तस्माभिगपर्व सझिाकर्मणिविनामवा ।। ९७ ॥ अपि पास्मिन् महामागाश्यक्षिणा दायत स्मृताः। कास्वपिरचय रसाश्चापि नप स्मृताः ॥ ९८ ।। मिपटियसमाते महापुरुषगोबरा । नापते यत्र निरिंगा साप कामातुर्पक ॥ ९९ ॥ सर्वत्र पनप मश्वसति सतपारिणः । दभावपरापिस्सविदेशमपिना ॥ १० ॥ 1। अपच ।। दिमागण्या घेणिकमहाराबसमवसरणगमनबर्णनम् २७ यस्पाश्च सदाचाराः पूनादानादिवत्परा । एकादिकं ययाशक्ति प्रविमारस्पं नवं दधु ॥१०१ ।। फिलेकादशसमास्मप्रवनानिह फश्पन । त्यकागार सनिर्षिण्णस्विष्ठत मनिषषपा ॥ १०२ ॥ भागीपासमयावास सो अन प्रमाननः । फनापिनमा न स्याङ्घक्तं पार्सरिनामिह ।। १०३ ॥ फिन्त दुरावसर्पिण्या फासदोपादिह कपिन् । मादुर्मति पाखंरास्तयापि च नृपसविः ॥ १०॥ गवायापरसप्पिण्यामुत्सपिण्यो वयेर च । मसमपशोटियार स्पादेका सरसप्पिणी ॥ १०५ ।। अवश्य भाषिनी सर्प भूस्वा पापि गता पुरा । अनवानवम पापि पत्सरे परमासरत् ॥ १०६॥ वदा भवत्पनानां मादुर्माया पसादिक। सीमान कासयमस्य मर्नु भयो म कमन ।। १०७॥ पया स्वयं स्वमाराई पन्ति भरदिप्यत । क्या फारपरिभ्रात्या दम्याणां च प्यरस्पिति ।।१०८॥ तपया तत्र दुरापमपिम्पा या ययागमम् । दीपेशामुपसर्गो हि मानों पात्मनाम् ॥ १० ॥ मानमगार पफर्म नापत मावा। इत्यादि पापाज्नया सनि रापामगापरा ॥११०॥ दिमा माणिवपापेप दुमपानधरणम् । पागार्य भपस हिंसा मन्यने दुर्पियो दिमाः॥ १११ ।।

२८ अमूस्वामिचरिते- एकमेवार्य प्रम ना नानास्ति फायने । सति मेदाविनः पिरमादेवमवादिनः ॥ ११२ ॥ मत पप- "विश्वतश्चमुस्त विश्वतो मुस्लो विश्वतो वारुत विश्वतः पाद संबाहुम्पा पमति संपतभैयारामी मनयन् देव एक एप" ॥१॥ सर्रयानित्यमेवचर्व कैपिज्जार्यया । भाव पवारमादि सर्वमेकान्वमादिनः ॥ ११३ ॥ पस्सचसणिक सर्व पपा मुम्बकम बारिवः। इवि बौदादया चित् षणिककाम्बादिनः ॥ ११४ पंचवारमा वसं नीना नास्तीह कश्चन । ववो पा न मोलोस्ति पसः कापासिका इति ॥ ११५ ॥ मानाना यदि पर्मामा संवानोमोदनात्मकः । मोमो वापः स मीपस्प पते दुर्रम पर ॥ ११६ ।। इस्पादि पायो पोकास्तेषामंतर्मिदास्मकाः । पिगरसपिम्पा मार्यते नान्पदा कपित् ॥ ११७॥ स्पादादगर्भिणी पीयानी सिदान्तपतिः । पयेष पनसारेण संरिवार मताद्रपा ॥ ११८ ॥ निग्रहस्पानमेवेपा पुरस्काइपवे कपिः । सस्पो विवक्षितो पाप्यस्वप दिम्मात्रदोभरा ॥ ११९ ॥ बिलिनियम। माराम लरन्ति पश्यतेप्रमा इदिगम्बनिचादि-11 समहरविलय 10-111 मेणिकमहाराबसमवसरणगमनपणनम् २९ मपि पां कलिंगानि नानारूपाणि सर्वच । पिशूलादिमयमस्मैम्किवानि भरत्पहो ।। १२० ।। एकदंती दिदरी व विदरी पापि कश्वन | इसः परपसोऽपि महारण्ये पशूपमा ॥ १२१ ।। इतिममृति याति कलिंगानि हलिंगिनाम् । नाममाप्रतया तानि समा सक्तु न कश्चन ॥ १२२ ।। असं वर्णनया पास्प यम पापा समसका। एमवे यवना भूपाः सायो म्यापिपारिवाः॥ १२३ ॥ इदमप्र समापूर्व विर्य परमाथिमि । मैना पर्म सर्ण यापदिस्मार्यों न महात्मभिः ॥ १२४ ॥ यपाप्मावापि सीपये मात्पर्माप्नद स्वतः न जहावि तपा साघुः धुः शुन्योऽपि पर्मम (वा) ॥१२५।। १४ दिग एप महामवासनभिधीयते उपवर-नार- परमसभेवान् । तर बिसी सशितो प्रती पापापी पम्मान परिपती सासुवरोमान् एवं निरतत् पुरीवर रमतेषणपोलो विपद नेपथभिशापना गरी महापरस्पयो बरफ प्यते । मम्मूग प्रिनाम्पालाप्रपामा प्रामे राई भोपिय लिन रिमा दिवामित सिउमियां मुगामार वितरिमा तु प्रमा रेस मुच्यते ।म एपापफमरकानुश्मामो संपापा मम पना लि पण वामनपामनयनमामो प्यायी समस्या समारो। तु परीभिः। एते पपवारोमी बन्नमारमापनेकनिनः पमार्पोमानापारेषण स्परनिराको पग मानिन तपा यागामिनारमेयम् । गुमरमाता रिम्पासाहपुरमयम १५ पम्म्मामिचरिते- उधर- "एप लोक बहुमानमापित' म्मार्निवन विस्पेिन कर्मणा। पापवस्तविकृतीममस्मन सोमपति दर्य न योगिन" ॥१॥ इति म्पारणिता सोमं सुपर काम महानिह। शंपा लिपिस्तु सर्पोऽपि रिया परमागमात् ॥ १२६॥ पदा पर्यफागस्य संपमापाप्रतिष्ठने । वा स्यात्तीर्पनापस्प यथा पारस्प निर्गतिः ॥ १२७ ॥ वारसपोपस्स मादुप्तिस्वयंस रि। पपास पर्वमानस्प पावान्मीसं गतासया ॥ १२८ ॥ सपर्मा प सपा प जम्पूनामास्वारसी। पापापष्टि पर्प स्पामगरभिद परम् ॥ १२९ ॥ वती पपाम पिष्णुनैदिमिमाऽपगमितः । गीपर्टना मठमाहुरित्याधापा माापि ॥ १३० ।। पदनमाापिपास्थानानां पारगा इमे । पासपमागमेवेषा कात्म घरदक्षतम् ॥ १३१ ॥ विधासमाठिसाचार्यो मरिया मपसादया। नागसेनम सिदायों प्रतिपणस्तपा प॥ १३२ ।। रिमयी इद्धिमानंगदपा पर्मादिनमतः । सेनप दसपूर्णमा पारधा पपपाम्मम् ॥ १२॥ भषीत पक्षममदानायता पाससमा । सदाप्पास्मादितवाना पूर्णोपटस एव ३५॥ १ पताम्बासम्म पारिता एप प्रमगामापसौभाममा भिरबम्बबाद मामलपिम्प ।१ पाम् ।

भेणिकमहाराजसमवसरणगममवर्णनम् ३१ wwwm सतो नापनामा प नयपासे (सो) महातपाः । पहिय ध्रुवसेनप कसाचार्य इवि फमात् ॥ १३५ ।। एकादोगपियानो पारगाः स्युर्मुनीश्वरा । विश्वद्विशवमन्दानामेवेपी काससग्रहः ॥ १३६ ॥ सदा तत्वोपदशस्य मागविनिरिष्यति। करस्थनीरमन्यापास्माक मित्रविशारदः ॥ १३७ ॥ समद्रय यामद्रो भद्रबाहुमहायशाः । सोहार्यत्पमी या प्रयमांगाम्पिपारगाः ॥ १३८॥ समानां शतमा स्पाकासाष्टादशमिः । मदा सत्यापदेशश्य मागशिनारशिप्पत ॥१९॥ वसाऽपि दीपमानोऽसौ श्रेपमाप्राऽपविष्ठवे । दोपात्पषमकासस्य दीयते पुदयो नृणाम् ॥ १४०॥ वा दुपमकामऽस्मिन् ममार्ण मिनदेशिवम् । शुदपर्पसासाणामेकरित्रविसग्ग्यपा ।। १४१॥ वता यारमाः स्पान्मन पर्ययोपया। देशापपिं रिना परमसपिपियोपयोः ॥१४२ ।। मादीणां चापि सर्वसामभावस्तपस' सेवे।। नापि देवागमस्वप क्न्याणानाममारव ॥ १४३ ।। कायिकृषिस्फपिरपुरदेवायंचन । भागपति पुनस्व सनि मोक्तं निनागमे ॥ १४४ ॥ समातए मनुप्पाणामापूर्वपशव मतम् । विंशत्पपिकमेपद पर मपुः स्मृवम् ॥ १४५॥ माणाम् ।

१२ सम्पूस्वामिपरिते- भमादा शरीराणां निः स्याप पवितणम् । पर्मस्यापि प पस्मिरिपोस सर्व पदेशतः ॥११६॥ वाप्यस्ति निरामा सम्पपस्पदपमादितः। सायिकंप मचा या फरासिनो मिनाः ।।१४७॥ उप- "परम परमे णिपदं परम रिदिप प सम्नकासस साइपसम्माचा पुण अस्प मिणा पली मि॥१॥ महामतानि संत्पस्मिन् देशताऽणुनवानि च। दुर्समानी पाथिदाराणस्पानसप्तम् ।।१५८॥ पिापि भत्रका' पियादानादिवत्पराः। पीपपाससंपूर्णा स्मर्गे गसत्यनारदम् ॥ १४९ ॥ इत्यादीनि प कापाणि निति या पांगिनाम् । जासोपदेशव साऽयं फासो एम्पमसंघका ।। १५०॥ पर्यन्वे पास्प पर्तिपिटाचा वभिगपते । संपतोऽप्यसबुदीना इदिसमर्पणसमम् ॥ १५१ ।। पापिनि दुपमयसप्रस्मिन् श्रीप्रमेप्पति पापरे । पष्ठे एम्पमापासपे पल्पमाणमस्तपम् ॥ १५२ ।। इपिस्सर्पविष्ट देवे भूपोऽपि पहा । स्पास्कसकीवि विस्म्यावी हसासपिपीपमः ॥ १५३ ॥ १र्म सबमे मिला प्रथम दिवार । पाविससम्ममत्व पुत्र का मिप्रभ तमिन् । व पवारविमपि गति सेन मृता।

श्रेणिकमहारामसमवसरणगमनवर्णनम् सस्प क्रिया समस्वास्ता: ममापीगकरा स्मृता। वासामोशमाऽपि न समो मोऽपि के वयम् ॥१५४ ॥ तारता पातमः सर्वे पिसीयते सप यथा । साकर्ममया सर्व: स्यात्मपा पिझपाध्यया ॥ १५५ ॥ मपचनमेनं प पपी मसति दुएमी । मन्पे माणिपिनाशाय केले कासनोदितः ॥ १५६ ॥ मय प्रापि पर साक्षादम्युछिमममारवा। यस्मादेका मनिनो पियवे भागलिंगवान् ।। १५७ ॥ एका चाप्यापिका तप ययक्तिवापारिका । समानि धारकश्चैको मनपर्मपरायण ॥ १५८ ॥ मयान्यपुः फलकारमा प्यायत्येमं स पापधीः । म चाप्या पदावापा परो नास्ति करात ॥१५९ ॥ एवं भुत्लापमाः फेरिजएनिप्ठ्रया गिरा। मनिमविश्य दनाध्य स्पादक परपर्मितः ॥ १६०॥ "रालि पर्मिणि पर्मिष्ठाः पाप पापा सम सपा माधास्वदनुमति पया रागा तथा ममाः।" ॥१६॥ इत्याकर्पा स पापात्मा पापा माराप निन्याम् । पपाकयपिदर्य दंग्य स्पाचयाप रिपीयवाम् ॥ १६ ॥ . मार्यभाला। माग्रे मोमदेशपसिनामोशी रतिक्षेप गनोलि। -- चम्पामिचरित- तवी भूपामया फपिपल पापा मनस्तदा । यवपापपसंदपा मिलायमति स्म सः॥ १६३ ॥ प्रमास्माता पिगदात्मा तपापासझसपनि ॥ स्वामिममाऽस्तु तिष्ठान भाषानापि सकता ॥ १२४ ।। पपानापं मिपानझा प्रसारितसरदया। मानुपाम स भाग्यस्य प्रास मग्रार शुद्धपीः ।। १६५ ॥ पारस स वायद मारिता भूपकिंकर।। मा मा संवेवि दुसर्मपापातायतरिम ॥ १६६ ।। अयं च प्रयमा ग्रासो मागपंपापितस्वया। क्ष्यः मतिरिनं सारपानद्रामामिभंसनम् ॥ १६७ ॥ उक्तमा दुरागरिमनिरागमकापितः । सर्न विशपयामास क्लासम्पतिरादिकम् ॥ १६८॥ भूनमवस्समापर्म दएकासारपेप्टिवम् । भन्पपानपर्ममपिरिय पापत्रिपा पम् ।। १६९ ॥ शनि निस्पित्य छात्रा नीरनामापरिप्पुनः । स्परस्ता पाणिपुटाहारं सारपाना मरन्मनि ॥ १० ॥ पापम्मी पनुर्णापि मनापाकापोगन । स्पात्मा (क्त) मारई सर्प मुनिना मममीरुमा ॥ १७१ ॥ साभ्यापिच्या माला मुक्त सापादिः सः । सईम्पनाविपा पिर्ध सापपानतया पृतम् ॥ १७२ ।। सनीफ भापपापि एक ससम्बनारिपिम् । मनिमारमागम्या सिरक सरीरक ॥ १७३ ।।

श्रेणिफमहाराजसमपसरणगमनयर्णनम् ३५ घस्वाराऽपि महास्माना लम्पसम्परत्वमिका । अमात्यकारीराम्ब निमि' याम्पत्यसंभयम् ॥ १७४ ॥ सदासनवरं तम मूर्ध्नि रामाऽपसन्पमि। सनाऽप्यनवरं नस्पतिहि सपाटारिकम् ।। १७५ ॥ दपिदुग्पतापाय सर्वे गारसपर्यया । क्षणाय विसीयंत पापांशादिव सपद ।। १७६ ॥ मता दुःपम पमास्प पाठ कालः प्रवर्तष्ठ । रिनष्टमागसंपत्का दुष्टश्चान्नयसंमः ॥ १७७ ॥ तत्र पाशवर्षाणां परमार्जिनादितम् । स्तिक धपुरुस्सेपमुकण नृणां मवम् ।। १७८ ॥ मध्य तया जपन्यं च विनयं परमागमात् । तददापुरीरपु सिरश्चापि सरपयम् ।। १७९ ।। यया दुलाहरा सर्वे वियश्च वया नरा । फरापारारमानारी भूरध्रप निरासिनः ।। १८० ।। नरा पत्कलपसापा पियस्त न विरोपिनः। तिर्यपापि मरापूरा पुर चस्पानिमम् ॥ १८ ॥ इस्ता परस्पर पापा: फर्स मार्दति निर्दया । पममुदरमाराव दृएमालपपारतः ॥ १८२॥ मपा विस्वादाविरष सत्र पनि पपता । संपां नमगिकी इप्या प्रनमें याति न पिम् ।। १८३॥ इत्प वपसासाणामग्भिनिसम्पर । पाला गछति अन्ना इस दुप्फमपास्त ॥ १८५॥ साम्। भूमरिमा ।

जमूस्वामिचरिते- वत मसपोप्रान्य मापी कासस्वभावतः । पर्पवि सप्तसप्तारं फारीपाम्पादयः ममात् ।। १८५ ॥ इस्पमेकोनपपाश्चरिन यादुपदवः । मरादास्ताकरी मीमो रूफर्मात्मको भमेत् ॥ १८६ ॥ दासप्तविमीपरानो दंपतीमियुन वदा । वापिफारिमिर्पित गहरादिपु ।। १८७ ।। क्षेपममार्यसस्मिन् रुधिर्म मस्मसानपेत् । महभिमै तु केनापि फर्नु पर्प न पान्पया ॥ १८८ ॥ ततपिपाबनिनिस्पा शेपमापारविष्ठने । भूतपूर्वो मया सोऽपमित्पमित्यपनवश्वाः ।। १८९॥ एवं पद समया या पर्वते पारिणामिका मनुसोमैक्सिीमैन वस्र्ष मरवाश्यम् ॥ १९० ॥ समापिस्ति) मगपा देसो मिसम्पावी गनि सारवत् । निस्पप्रमुदिता यत्र ममा भागैः स्वास्समाः ॥ १९१ ॥ पसाकासीपवाचाम्पा स्वेनिया या शिवा । मीमता यप पर्पतो मोवि मचा इस दिपाः ।। १९२ ।। न सति फरापापा पत्र रामन्मवीः मनाः। सदा सुखसानिध्यातपो नाप्पनीतयः ॥ १९३ ॥ पस्प सीमापिमागेषु धात्यादिप्रसपर। समफसमामिन्या मांति पा इस क्रियाः ॥ १९ ॥ पत्र मासिवनोपरि सापर्वती शुभापसी । शासिगाप्पोऽनुमम्मेवे दर्पती वोरणभियम् ॥ १९५ ।। गर्थमा । फागोपनाः।

मेणिकमहारामसमवसरणगमनवर्णनम् १७ मंदगपबारा पूताः शालिममा फसानवाः । रुवसंराषिणो या छोदवतीय पक्षिणः ।। १९६ ॥ यम पशुपादेषु या पीत्कारहारिषु । पिपति पथिकाः स्पैर रस मुरसमैक्षरम् ।। १९७ ।। यत्र पवयकापा. फाम सवि भसाशपाः । तपापि मनवावा रवि रसपत्तया ॥१९८ ।। अनतापसिदो या पाप्पा स्वर्णसंमृताः। मांति तीरवरम्णया निरुदीप्णा बहुमपा ॥ १९९ ॥ पिपंका प्रात्यप स्पष्ण टिसरत्तय । मसम्याः ममोग्याम मिचित्रा यम निन्नगाः ॥२०० ।। सरसा धीरेप दरेष रु इसा पिहरवे । यम कंठविलासमपृणासशकसाइला ॥ २०१॥ पनेषु पनमागा मदाासिततोपना। भ्रमंस्पपिरवं यस्मिमासामिप दिग्गमान् ॥ २०२॥ यम श्रृंगाप्रससमकदमा दुर्दमा मुत्रम् । उस्सर्नति पा रप्दमा स्पसप स्पलपधिनीम् ॥ २० ॥ सर्गावाससमा पुर्यो निगमाः इसनिमाः। निमानस्पर्दिनी गहा ममा यम सरोपमाः ॥२०४॥ यम भंगस्वरंगपु गमप मइपिफिया। देवपारुप्पमम्पु सरम्स मससंग्रह ॥ २०५।। गां गणा यथाकालमासगमा सवस्मना । पोपपंति पयोमि सौर्मन या घने समाः ।। २०६ ।। १ मा २ पद।

२८ अम्मामिपरिते- - निसर्गमुमगा नाणे निसगपतरा नरा । निसगससितागपा पाया यम ॥ २०७ ।। यम सत्पात्रदानपु मीसिः पूजामु पाताम् । शक्तिरात्यविध भीम मापप र रतिनृणाम् ॥ २०८ ॥ दभस्पास्पकदमम्ममाम्ना गमा पुरम् । या रामन्पर्क शहामत दिपिराटिल || २०९।। पपाम्रलिासापायकमनः भावकुम । सदा संमाम्पत पारै मतपत्र नमस्तसम् ॥ २१० ।। मिनमासाठशिमर रोपितकने । किफिमाकानगंगापार प्रनार शवपा ममत् ।। २११ ।। शापावापनस्याना नारीणा मुम्बमानः । पारपुरीकार्ना सरसा भियमापान् ॥ २१२ ।। पत्रीणां सौदर्य वर्भ व मुरनिय । प्रस्तपकिवा मन्य तस्युम्न्मपितक्षणा ॥ २१ ॥ यत्र तापमिकवानपमपिमतन । सार दुनित्पा को उन्नति काकिनः ।। २१७ ॥ वम रामापिरानोऽय राजत श्रेणिका सपः। निर्मिताशेपप्पामराषितपादयः ॥ २१५ ।। सवाप्रप मुसल्माणि नास वर्गपित पनि । तस्मारिम्माप्रमपान सत्य सासटिई यया ॥ २१६ ॥ - पातरम पर। पामि। ताकि पत्रमा मेवरवा महाली अपूरत । भारपानाम् समा।

थेणिकमहायमसमपसरणगमनवर्णनम् ३९ निरस्पस्य रसनीसा मूर्टना पितायताः । कामकृष्णसमगस्प शिभषो नु विजृमिता ॥ २१७ ॥ नेप्रमूंगे मुखाम्न सस्मिाभूत्तरकसरे । पचे स्म मधुरां गाणी मकरंदरसोपमाम् ॥ २१८ ॥ नप्रयादितयं रेने ससक्त तस्य कर्णयो । सुभती वाधिमाभित्य शिक्षित सूक्ष्मदर्भिवाम् ॥ २१९ ।। उपर्कठमसौ दधे हार नीहारसच्छनिम् । तारानिकरमास्यन्दारिच सपायमागतम् ॥ २२० । पक्षास्पसेन पृपुना सोऽपादनपर्षिवाम् । मेरानिमवयसमा शारदीमिम पदिकाम् ॥ २२१ ।। माटोबासिनो मैस्मन्यस्य शिरसान्तिक । पाहूतस्यायसौ नीसनिपपापिष रेमनुः ।। २२२ ॥ सरिदापर्चगमीरा नामिमध्येऽस्य निर्वभौ। नारीरक्करिणीरापे पारिसानप सुवा ।। २२३ ।। रसनामष्टिव सस्प कटिमटलमाममौ । हेमपेदीपरिसिप्तमिम मम्छमस्पसम् ॥ २२४ ॥ अब्दयममास्त स्म स्पिर पृच मुसार्वम् । रामामनोगमासोनवमलीला समदान् ॥ २२५ ॥ परणद्विवयं सोऽपादारक्त प्रदिमान्वितम् । मिव भियानपायिन्या सपारीम स्थलाम्पुभम् ।। २२६ ।। मर पुष्परस एपमा । २ मशस्वस्त । सामेन । ४ मिनिट। ५ नमनामारस्तम।

१० गम्स्वामिचरिते- स्पसपमुम्पपा मपिता भुतसंपदा । सरप्पन्द्रिकपरेन्दोमूर्विरानंदिनी शाम ॥ २२७ ।। पदनास्यममाणेषु पर पानीपमागवा । वस्य पी। सर्वमाता दीपकर म्पटीप्पच ॥ २२८ ॥ सकमा सकलो पिदान् पिनीतारमा मितन्द्रिप । राम्पसदमीच्यसा सस्पतामगमस्कृती ।। २२९ ।। अनुराग सरस्सस्पा कीर्यो प्रणयनिनवाम् ॥ सस्म्या पासम्पमातन्बन्धिपा मूर्ध्नि सोऽभवद ॥ २३० ॥ पस्स म्पसत्मवापाम्नी सदर्परिपका कणाद । ममयुमस्मसात्सर्ने दरवरी तृणा ॥ २३१ ।। पस्प पाइये शनस्पणमति महीपराः। पभीगपरिवाकरी भ्रमरा इस इसनेयम् ॥ २३२ ॥ सीध्यममानवः पूर्व सनयाप्युपसगवः । वीपसरूपमाप पलायुनरफस्य ॥ २३३॥ पपामारपिगुदा सम् कासमम्पिप्रसादतः । सम्पसापन: सोऽयमासीकमोतकस्यपीः ॥ २२४ ॥ वपपारच वस्य विधेयं तत्तपानका । मामिपमात्रस्वाभाकं रिस्वरवा मया ॥ २३५॥ वस्प पत्नी तु मानाऽऽसीपसनति पक्षिावा । सपीसमुपर्माश्या सम्पममनसासिनी ।। २३६ ।। संस्र्पत पुरवासिन्पापियार भवसासा। कसप्रपंतपारमाने पैर मत स्म सः ॥ २३७ ।। व इतिहमाम् ।

अणिकमहाराणसमवसरणगमनवर्णनम् रूपयोपनसापण्यगुणपारितरगिणी ! सामूत्सरिदिामोपेश्छन्दानुगामिनी ।। २३८ ।। ममतं यत्समीपं सा विमर्ति स्म स्मरातुरा । वदासीकत्समष्टीय ससक्तका रतफर्मणि ॥ २३९ ॥ अयान्येपर्मराम्यानमासीन हरिचिऐरे । नमकोटिकिरीटाग्रैर्नृपैरासेपित भृश्यम् ।। २४० ।। निर्मरभीरसकाशयसबामररामिमिः । मीग्यमान समामध्ये गिरीन्द्रमिव निमसम् ।। २४१ ॥ इंदुविम्पसमाकारसितण्मापससितम् । भैणि माराने दव पनपालका ।। २४२ ॥ से पाप मणम्पादानाप मिनपान्वितः । देवापर्यपद किंचिद् द मन्यसता मया ।। २४३ ॥ तत्समै सम्माऽपीर पर्नु शुश्या न पचन । सयाप्पललतामय पाग्य पच्मि नराधिप ॥ २४४ ॥ भीग्दमानताथस्य मावनिमगलुरा । समरसृविसस्थासीदिपुलापसमस्वः ॥ २१५ ॥ पर्णपामि किमाई भीमातिापणालिनी । या सेम्प नापमा' विपरा इस मग ॥ २४६ ॥ सभ मधुमिवामांपरेलापानानुकारिणी । घंटा मुस्सरपामास भगतसामरनिनाम् ।। २४७॥ पातिक महान् सिंपणादाऽभूस्समुत्पित । नारा निमदीमारपाप मुरसारण ॥२४८॥ माने ।।

०२ मम्बूस्वामिचरित- दवान मनदमादमानितानि तिरादषन् | यतरप गए महानानकनिम्म्यनः ॥ २४९ ॥ संवा संसरः (१) सार्थ यमन निवृतरः। इसीर घापप ची फणीन्द्रभमन धनन् ।। २५० ॥ पिटरान्पमरपानामासन प्रचपिर । मलमाणीव तन साई मिनमयात्सम || २५१ ।। पुप्पोनसिमियातनुः समंतारमरभूताः । पसमासाकरेदीसगिसत्कर्माकरः ॥ २५२ ॥ विसा मसचिमासाम्पम्रागे पचमारम् । बिरनीस्वमूसाक शिघिरी मस्तापमा ।। २५३ ।। इति ममादेमातरमकस्मासुबनोदरे । फससम्मानपूर्णेन्दुर्जगदम्भिमगीरपन् ॥ २५४ ॥ तमैरावणमासः सहस्राक्षाऽपुवचराम् । पधाकर इवाकलपंफनी गिरिमस्व ॥ २५५ ॥ दाक्षिदनान्पस्प मत्पास्पं च दाटकम् । सर पति र पस्मिमम्मिन्यका सरा पति ॥ २५६ ।। दार्षिशरमसपास्तस्पास्तारत्ममितपत्रिकाः। सप्यायवेप देपानी नचरमस्तत्समा' पर ।। २५७ ।। नृस्पति ससपस्मररकामा सप्लिमभुष । पपपिचतुमनश्पक (1) प्रमडाइरान् ।। २५८ ॥ सार्सा सहासभेगारग्समापसपान्मितम् । पश्मयः कापटीपापं मस्प पियिो सराः ॥२५९॥ पाषापयनिय तोप मासा ।

अणिकमहारामसमवसरणगमनवर्णनम् १३ प्रपाण मुररामस्प नदुरप्सरस पर । रक्तकंठाम निर्यो मानिनपतमपम् ॥ २६० ॥ वतो दाचिदिवाणां पृतना पहुकतनाः। प्रसमुर्पिससम्मप्रचामरा प्रक्षतामराः ॥ २६१ ।। मप्सर इमारतकुचपकायुग्मः । सदस्पफजयम लसंवनयनात्पल || २६२ ॥ नमासरसि रांगस्वच्छपारिणि शारिणि । घसस यामरास्ता सायन्त स्म नापिनाम् ॥ २६३ ॥ पद्रनीलमयाहाग्यरुचिमिचिदातवम् । स्मामामांति पिमरामास पौवासिनिममपरम् ॥२६० ।। पपरागरुषा म्याप्त काचिदपोमवर्स पमी। सांम्परागमिधामध्यनुरंजिदिस्मुखम् ॥ २६५ ॥ कचिन्मरकतच्छायासमानांतममाममः। सपलमिरीमोपर्मसपर्यंतसस्पिदम् ॥ २६६ ॥ सन्म्या मुरुधिराकारा ससवंगुषमपणाः। सपामरसियो रजुः कत्परस्प इपिर ॥ २६७॥ मासा मराणि पश्त्राणि परपुरषानुपापताम् । रेम मधुलिका माला भनुम्येय मनामुमः ॥ २६८॥ मुरानम्मापाने पूमासापरी दपन् । मपठोठालकलोसौ पमा देवागापुपि ॥ २६९ ॥ तत्र दिष्यांगनास्पपिारस्पादिपान।। सधापवैनमारत्म मर्म पिपरमियम् ॥ २७० ॥ , सेना।साम्म जानि। मप ।

१ ६ नसामिपरित- वाभापतरू रज पर्यंत मिजगत्पद'। रुपन्मार्ग दियभाना धुन्वन् प्राः स पायुभि २९१॥ छत्र धरलं रूपिमत्कास्पा पद्रिीमनयनुचिरी लक्ष्मीम् । प्रेश रुप पभमन्न्नं सां निपजगतां पस्युः ॥ २९२॥ पया पापरिव मीषिमासा प्रकोणना समिति समवात् । मिनन्त्रपर्यतनिपपिपला रास्करगभिरटिधूता ॥ २९३ ।। मनी किमंगविरमपंटी किमिदमाता सविरोपती । इति स्म शर्मा ननुत पतती सा पामरासी भरविंदराम्रा।।२९४॥ सुरदुदुमया मधुरम्बनयो निनदति वा म नमापिपरे । जम्मनागमनकिमिभन्मदिभि भिसिमि परपीमितपदतप २९५ प्रमपा परिवा मिनटारमा भगवा सफा समपापिस्तुवे ला सास परापरमर्पमना किमयातमीपनि पानि रिमा२९६ दिम्पमापनिरस्प एस्साम्नान्मेपरगानुरुति निरगपात् । मम्पमनागतमारतमाऽनमावदप पपर तमाऽरि॥ २९७॥ इस्पटामिा प्रवीगरैरनिता मिननिनः । विपुमादी स्थिया देव देवरपिष्ठिता ।। २९८ ॥ भपि तप विमुगति पियों पर परसरम् । जन्मसवानर्सस्कारापरमामा पिरापिनः ।। २०९ ॥ कपिचकामपपापसमावस्मादिराधिनः। नापि त मिमियो भेजस्तस्सानिम्पप्रमापत ॥ ३.०॥ वपमा करिणी दुग्मं दोगपीर परेशावर। मातृपुरघा नया सिंहीमामनति मृगामकोः ॥ ३.१ ॥ प। । सूचया सपानमः ।

भेणिक्महायजसमवसरणगमनवर्णनम् यम दईरफा नागफणार्या प रुतासनाः। आभयतीह छायायै पायाः सान्द्रद्रुमेप्षिय ॥ ३०२॥ दुमा सर्वेऽपि सर्प फसटा दतमासिन । आनंदादिष नृत्यसि पाहाछास्लाफरायताः ॥ ३०३ ॥ मीरया फससपमाः पादुपकारच सामवम् । विवे ममपृष्ठ सुरुवानामिरांकुरा ॥ ३०४ ।। सपिध्या माषीर्या सर्मामयविनाशका । दीप्पंवेतितरामप ममाना सुखोतये ॥ ३०५ ॥ दुर्मिक्षादीवयी नार्थ याति म्लादपि क्षणात् । पुण्यस्योदयादेव वमो ने यया पिमा ॥ ३०६ ।। इस्पापतिशमाः सर्षे संति युगपजिनीधिनः । दोस्तानुलेखसी नहुँ ना शामि समिति ॥ ३०७ ।। इति अस्वा पनी भूपी पनपासमुसादिर। आनंदामुवससितदेहोऽमूक्तिनिर्भर ॥ ३.८ ॥ अपोस्याय पस्तूर्णमासनास्समुसे विमोः। गस्पा सप्तपदं यायप्रिपा पक्रं नमस्क्रियाम् ॥ ३०९ ।। सानुमन्मासपवोन्तापुरपौरपुरागमैः । पाम्पामियां पुरोषाय ससमाऽभूनम मवि ।। ३१० ।। गरोमकि परी सन्मन्र्मन्धर्मपमारनाम् । समस्या परमोचस्प मगमदंदनायिौ ॥ ३११ ॥ अय सनायुपी लाममावन्नन्नम्पिनि स्पनः । आनंदपटयो मेरे दप्पान सनयन् विशः ।।१२।।

नम्बूस्वामिचरिते- सुरैरादयासोक्प पिमीरास्थानमंसम् । सुरभिसिमिरारम्मपरार्दिरपनाशवम् (1) ॥ २७१ ।। एकयोमननिस्वारमभूदास्पानगीश्चितुः । हरिनीसमहारनपटि मिलसपसम् ॥ २७२ ।। मुरेन्द्रनीसनिर्माण समावदा बभौ । मिमगस्तीमुसासोकमंगलादर्भविभ्रमम् ॥ २७३ ॥ संस्पानमयसम्पास्य सम्पानं को जापयेत् । मुभीमा नपारोऽभूमिर्माणे यस्य कर्मठः ॥ २७ ॥ वयाप्यन्यते किंपिदस्प भीमासमुच्चयः । अवेन पन समीति भेमे मम्यास्मना मनः ॥ २७५ ॥ पंपवर्गमपाशासिरस्नपशिमिराषितः । वस्य पर्पतमामे प्रीपासः परिष्कः ॥ २७६ ॥ पवसष्यपि विलस्परेमस्वमानसपिवा।। वोरणानां करस्पचिरस्नमासा मिरमिरे ॥ २७७॥ तवाशरावर किंचितसा पठानिमिता। रेम मध्येपु पीपीना मानस्वभा समुश्विाः ॥ २७८ ।। मपिष्ठिता विरेस्ते मानस्वमा मनोसिदा में दादीशिवा पार्न स्वमपंस्पाय दुधाम् ॥ २७९ ॥ "मानस्मा सरासि प्रबिमसनसमस्थाविका पुप्पमाटी। प्रारी नाटपमासा दिखममुपपन पेदिकातर्षमाणाः । म्मरकरणम् । २० श्रेणिकमहाराजसमवसरणगमनवर्णनम् १५ शासा फल्पमार्णा सुपरिमृवपर्न स्तूपाम्यापसीप । प्राकार स्फाटिकामसुरमुनिसमा पीठिकाग्रे स्वयंमः ॥२८० तत्र भिमेससस्यास्प मूर्ति पीठस्प मिस्स्वी । स्फरन्ममिषिमागासरपितामरकाम्फे ॥ २८१ ॥ पसयामरसंपावपविषिपनिमागस । सैरिपासरो पुर्वषा सेम्पमाने चले पृथौ ॥ २८२ ॥ पाणिमरसाया मस्पर्दिनि मार्दिक। स्वप्नीफेननीकाश स्फटिकटिते कचिम् ॥ २८३ ।। शुचौ स्निग्धे मृदुम्पः मिनाघिस्पर्मपारने । पर्यवरचिवानकमंगसाम्यसंपति ॥ २८१ ।। मिमेलनांकित पीठ सपा गपटी बमौ । पर प्रक्षोरपनायस्प सस्या सर्वातिशायिनी ॥ २८५ ।। पपा सर्मार्थसिदिर्या स्पिवा प्रिदिपर्मनि । वपा गंपरटी दीमा पीठस्पापितसं बमौ ॥ २८६ ।। मुर्गपप्पनिाश्वासा समनीमासमारिणी । नानामरणदीमांगी या पप्रिप दिपते ॥ २८७ ॥ तस्पा मध्य रेम पीठ नानारत्नपाकीणम् । मेरो भंग न्फर्माम पम साझीदेवादिचदै ॥ २८८ ।। विप्टर तदर्सचरे मगवानसवीर्यकत् । पभिरंगुस सन मरिमा पृष्टतपसम् ॥ २८९ ।। बासीन वर्मिदापाः परिपरुमाग्यया । पुप्पाष्टिं मर्पती नपामार्गे पना इस ॥ २९० ॥ सिगा । रप पर।

जम्यूम्पामिचरिन- -~- समानावरू रज पर्यंत मिजगन्पन'। रुपन्मार्ग दिपनाना धुन्वन् माया स पापुमि २९१ ।। एवं पपर्म रुचिमत्तरिया पाठीममयद्रुपिरा ममीम् । प्रपा रकम शमृन्नन से चिदपमगतां पम्प ॥ २०२ ॥ पप' पयापरिप पीधिमामा मणिमाना समिति समैनान् । मिनेन्द्रपर्यंत निपरियता फरास्कररापिरमूदिता ॥ २९३ ॥ जैनी फिमंगपुतिरुमर्मती फिदिमासा निरोपतती । इति म्म की ननुत पवती सा घामरासी भरविंदराम्रा।२९॥ मुरदंदुमया मयुग्मनपा निनाति तदा म्म नमापिपर । मलटागमगिभिरुन्मदिपि निमिमिा परीसितपदतय २९५ प्रभया परिता मिनदेररसा मगनी सकमा समरापिस्तृतः () रुप स चराचरमप॑मनाः किमपाहतमीरपि पानि मिमी।२९६ दिप्पपडापनिरस्प मुसाम्मान्मेपरानुरुतिं निरगपत् । मम्पमनोगतमोरतमाश्नमवदप यथा तमोऽसि ॥ २९७ ॥ इस्परामिा प्रवीरैरन्निता भूमिनशिन'। विपुसादौ स्पिता देव देसंगरपिष्ठिना ॥ २९८ ॥ अपि सम विसंमवि मिपा पैरं परस्परम् । भन्मसतानर्सस्कारापदकापा पिराधिनः ॥ २०९ ॥ कचिचत्यसपर्यायस्वमावत्यादिरापिनः । नापि ते गिक्रिया मेस्तत्सानिध्यममावतः ॥ ३० सपपा फरिणी दुग्मे दाम्पीय परिवारका । मातारपा नया सिसीमाम वि मृगाः ॥ ३०१॥ स्मार। ६ सूर्मच। ३ स्थलगा।

भेणिकमाराजसमप्रसरणगमनवर्णनम्
१७
na-
या दरका नागफणायां ष तासना ।
माभयवीर छायायै पाया सान्द्रुमप्विर ॥ ३०२ ।।
दुमाः सर्वेऽपि सर्व फसा दसशालिन ।
मानंदादिर नृत्यवि पायाखाकरापवाः ॥ ३०३ ।।
मोरया फरुसपनाः स्वादुपकाश्च सांपवम् ।
रिपंते सर्पभूपृष्ठ मुकवानामिमांडरा' ॥ ३०४ ॥
सर्वोपच्या महावीर्याः सर्मामयविनाशकाः ।
दीप्पवेतितरामथ प्रमानो मुग्नवरे ॥ ३०५ ॥
दुर्मिक्षाटीतयो नाभ यांवि मनापि क्षणात् ।
पुण्पम्यावयादव तमो नेश यया रिभोः ॥ ३०६ ॥
इस्यापतिसया' सर्प संति युगपजिनशिनः ।
बोस्सानुलंसदो वक्तुं नार ममापि समिति ॥ ३०७ ।।
रति अत्ता पपी भूपी चनपासमुसादिए।
मानंदामृतससिक्तदोऽभूभक्तिनिर्भरः ॥ ३०८ ।।
मपोत्याप नृपस्तूणमासनास्समुलं विमा।
गत्या सप्तपद यानप्रिपा घर्क नमस्कियाम् ॥ ३०९ ॥
सानुमन्यासमतोतापुरपौरपुरागमः।
माम्यामिग्यां पुरोपाप ससोऽहमं मति ॥ ३१० ॥
गरीमति परां वन्नन्दमन्पमपमापनाम् ।
स भूस्या परपोचस्पै मगपदंदनापिपी ॥ ३११ ॥
अय सनापुपे सोममातन्पन्नम्पिनि मन ।
आनंदपगी मदे दप्पान पनयन् दिमः ॥ ३१२॥

१८ जमूस्वामिचरिते मतस्येऽय महामागी मंदाफा भेणिय नृपः। मारस्त्यश्वपादाविरयंफरपा एताभितः ॥ ३१३ ॥ रेन प्रचसिवा सेना सवानकायुपनि । बेसन पारिपेः प्रहदसरस्पयनपीषिकाः ॥ ३१४ ।। वया परिवः मापस्स मिनास्पानमरपम् । पसर्पलमया दिशु मितमातेडममसम् ॥ ३१५ ॥ परीस्प पूनयन्मानस्वभान्साम्या वत परम् । साता लता पर्न भास पनानां प पवृष्टयम् ।। ३१६ ॥ दिवीपक्षास मुस्कम्प पनान् कल्पद्रुपापसीम् । स्तूपान् मासादमासाम पश्यन्विस्मयमाप सः ॥ ३१७॥ ततो दारिदेवा संभ्राम्पग्निः प्ररेशिवा । भीमरपस्य पैदपी सोऽपश्यत्स्वर्गमिस्परीम् ॥ २१८ ।। ततः प्रदक्षिणीइन् पर्मचकमनुष्टयम् । समी पा प्रगयामास प्राप्प प्रषमपीठिकाम् ॥ ३१९ ॥ तवो दिवीयपीठस्वान् रिमारप्टौ महाणमाम् । सौर्षयामास संमीवर प्र्गपादिपस्तुमिः ॥ ३२० ॥ मध्ये गंपटी दिदिपाराः हरिपिटरे । नदयारसमूर्द्धस्पमि मिनमैक्षत ॥ ३२१ ॥ पसरचामरर्सपावलीम्पमान महावनम् । मपवभिपर मेरमिक पामीफरविम् ।। २२२ ॥ इस्यापरमतीहारम्भ्रिाम मिनेवरम् । स नि प्रदक्षिणीकृस्प मम मगदुम्म् ॥ ३२३ ॥ १ पाना पतः विषपवा।।३।

येणिकमहरामसमवसरणगमनवर्णनम् ४९ इसाप पापकानां च्यापा पाम्पेष्टया प्रसम् । पूनान्ते मणिपत्य महानिदिजान्वसौ ।। ३२४ ॥ नमस्तुभ्यं नमस्सुम्य नमस्तुभ्यं मास्मन । मम्मम्नमालाभिरिस्यान गिरीपतिम् ॥ ३२५॥ व मिनः कामभिजवा स्वर्मामारहार । पर्मचमी पर्मपसि फर्मारातिनिर्म्युमन ॥ ३२६ ॥ वर दर्यासन मावि पिचभर्तुर्मरदगम् । रुवपत्तरियादोर न्यग्रोऽयं मृगापिपः ॥ ३२७ ॥ वायं मयसच्छालस्तुगाऽशाकमाधिपः । ससम्ापासभिवान्पासि स्वत शिप्यानिवाभिवान् ॥ ३२८ ।। पापी पामरवासा यसरुरिक्षप्य पीजिताः। निर्धनवीच निाममागी बै सागसां नृणाम् ॥ ३२९ ॥ स्वामामति परिवः मुमनाञ्जसया दिन । दृष्टया स्वर्गलक्ष्म्पैर मुक्ता भुमिदमः ॥ ३३०॥ देवदंदमयमामी निनति नमास्पिताः । पापयति मयोत्सार निर्मिवासिलफर्मणा ॥ ३३१ ॥ शानदर्शनार्याणि पिरतिः शुद्धवचनम् । दानादिसपपवि सायियस्तम पदयः ।। ३३२ ।। उपप्रितयपाभाति सा मिन तापकम् । सकासपनरिभ्रामि लक्ष्म्या कीरास्पलायितम् ॥ ३३३ ॥ वर दाममोत्सर्परिदमाफम्पते सद् । पुम्पामिपेफमभार संबयनिरिसाभिव' ।। ३३४ ॥ सर पापमसरी दिप्प' पुनावि नगा मन । मारपतमसी पुन्यस्वरमानाशकापमः ॥ ३३५ ।। पूरमनन् । ४ ५० उम्यूस्वामिचरित- मानमपविर्य पिप पयवेस्सीचराक्रमात् । पया जानं तपैरामस्सायिक घर दर्शनम् ।। ३३६ ।। वि ममानतापीश पचनास्ता भमस्तमौ । अनवपीर्यताशक्तस्वन्यापारम्पं परिस्फुटम् ।। ३३७ ॥ रागादिपिचकाठप्पम्पपापादिवा तर । सिरविः मुसमास्मास्य म्पनच्यात्पविक विमो ।। ३३८॥ प्रवकछपं वोय या स्पष्टता वर्मत् । मिथ्यात्वर्दमापापा फदिस्ते यपार्यताम् ।। ३३९ ॥ संसाऽपि सम्पया शेपास्त्वयि नार्वक्रियारुवः । कुतात्प बसिदिम्पसप पोलि निरर्यकम् ॥ ३४० ॥ पर्म माया गुणा नाय भवतोऽनसपा मवाः । साना भवानीश न स्वातुमसमस्पपी ॥ ३४१ ॥ मगर्दवमामिप्दुस्प मिष्टपाविगमनम् । मतः भीमरपारंमे स्पोष्ट मीविषन्नृपः ॥ ३४२॥ सम्पपीपेन बर्षे समपमपिगवे मारवे तम देखें। नाना पिस्पावकीर्वाहि गपि ममपेनापसंपभिपाने । वापि श्रीगिरा रामगृह इति महारागपानी पुरेस्मिम् । सूपा भीभेणिकामादिपुसगिरिगिरी पदमानस्प भूमौ ॥३४२n इति मोगस्वामिचरिते मगमणपत्रिमताकरोफ्देशान सरितस्पानगरपपरिचानिशाए पण्टितयनमाड- साधुपासात्मजसाषुटोरसमम्पषित मेणिक महाराबसमवसरणगमनवर्णनो नाम दितायोपिधार।

अथ तृतीयोऽध्याय मीयात्स टोटा साघुः साधुपासांगन' कवी । दानमुदिस्तु यस्पो श्रेयांसनापमीपवं ॥ झ्याशीर्वाद ॥ समय मवदुःसाना हरि तीर्यनायकम् । भमिनदन च वंदामो वदित प्रिदर्शश्वरै ॥१॥ ववो निभूतमासीन प्रपदकरकमले । सदम्पपाकर भर्तु प्रोपमामलापुके ॥२॥ भक्स्पा भेणिकम्पेन पिनयानवमौलिना। विद्यापनमकारीत्य व जिनामुना गुराः ॥ ३ ॥ भगवन् मामिणमि पीरशस्तस्वरिस्वरः । मार्गो मार्गफर्स पापि दीरफ् तस्य निदापर ॥ ४ ॥ परमभावसितापितं मगमानववीर्यकन् । तवं मपंचयामास गंभीरवरया गिरा ॥५॥ भयुक्तरस्य ममाम्मे पिकवि र फाप्पभूत् । दर्पण किमु भाषाना रिमियाऽस्ति मकानत ॥६॥ वासाप्ठमपरिस्र्यदि सींगपु समुदया। मस्पएकरणा पर्णा एखादस्प रिनिर्ययु ॥७॥ स्फद्विरियतासमतिपनितसनिम । मस्पष्टार्यका निरगार नि सायंसपान मसात् ॥ ८॥ समिहिमपति म समिती भोपामममितमोपनियाममम्मम् । सरि सम पाागराधर्षित पिमि स्तमा पिए प्रपपिपए प्रयापूर्व पप : इति समायो।

५२ पभूस्वामिपरिते- रिमसामवरणापि सिविताऽसीद सरस्वती । महापसामपिनया हि यागनाः चिसंपदः॥९॥ भूषु भेणिक तत्वान् पक्ष्पमामाननुक्रमात् । मीनादीन कासपर्यवान् गौतममायनीचदा ॥ १० ॥ भीमामीरापाभवपन्पो किस संपरम निर्नरणम् । मोमस्वत्वं सम्पम्दसनसोपपिपयमखिर्स स्पात् ॥११॥ माभरपन्पमपुरिदं पुष्पं पापं सभापवा न पृथक् । तस्मामो दिएं सल तस्वाता श्रिणा सम्पर ॥ १२ ॥ पोरा दम्पापदेश: स्पा द्रम्पसभणपोगवः। उम्पत नाम किंचस्स्सागुमपर्पपपस्यवः ॥ १३ ।। सठसणस्वमारवाजीपा स्पान दम्पसंगका। पुनसमापि वपागार इम्पमित्पमिसप्पवे ॥ १४ ॥ पर्मापापिहान कारश्चापि तथाषिपा। पस्तारोऽपि प समाचे द्रम्पसबास्मका पृय ॥१५॥ भस्तिकायस्पमारत्मात्संवि पंपास्विकापिकाः। प्रदन्चमपयामामास्वासस्प नास्ति कापता ॥१६॥ मीमादीनां पदार्याना पापात्म्यं वरममिप्यत । सम्परमानं हि वम्मान भटान दर्शन मवम् ॥ १७॥ कर्मादाननिदानानां मापाना प निरापना । पारि तलयं पिदि मुनस्संग कर्मभावनात् ॥ १८ ॥ १ मापुस्। १पादिम्दन स्प्यात समात्मन ।। पुरमिनिरपतिमु सम्मर मावि त यमि मनमो।

मावदेवसानाकुमारनामस्मर्गगमनवर्णनम् सम्पन्दर्शनमादौ स्मादाभ्यं पप्तिरता परम् । यस्मादानशून्यस्य मानस्यामानवा मता ॥१९॥ उऊप- "भीमादीसाणं सम्म स्वमप्पणो । दुरमिणिषेसपिस पाणं सम्म सु होदि सदि ममि " ॥२०॥ झापा पूरे हि (पश्यादि) पारिश्र माकं पार्थक्रियाकरम् । कियमाणं तु सस्य स्यादचारिभरपसः ॥२१॥ वसमानामेदेपा राप्यं लक्ष्म ययागमम् । अस्वित्यादिम सामान्यामानादिस्मै विशेषतः ॥ २२ ॥ सपया सा भीषोऽस्ति स पानापापसानका। निस्पा स्वतम सिदत्वासच कायापयावसः ॥ २३ ॥ स पासरम्यावदेशी स्यादनवरणमानपि । स्पाचा वस्प म्पपोस्पादौ फपिदिविपर्ययैः ॥२४॥ घेक्नासतणो जीवो पिचपासणादि । माता द्रष्टा प क प मौका देममाणकः ॥२५॥ गुणवान् कर्म निर्मक्कापटुवग्यास्यभाषक । परिणतोपसंहारमिसम्या मदीपपत् ॥ २६ ॥ माप माणी पतुरष क्षममा पुरुपस्तपा । प्रमानास्पविरास्मा पहाभानी तस्प पपया ॥२७॥ सम्पाते सति सम्बामपति गुर्व तस्य विमा विक्री मेवमामिभतिभानुभूतिपमानो विप्रः पचासतमानपोपाप्यारा राय ज्योतिन्छारपपगाय मनुस्पस्थापनापविमानाधि पपपि शान्ति वापि न मत दिना मिप्यार । प्रसाद प्राती ४२.

जम्म्यामिपरिते- - यता मीपस्पनीरप नीमिप्यसि प जन्मम् । तता नीलाऽपमानात सिट स्पारतपरसः ॥ २८॥ भम्पामम्पी वया मक्त इति नीपनिपादिवः । भरिप्पस्सिटी भम्य मुरगोपलसनिम ॥ २९॥ ममम्पस्तु विपक्ष: स्पार्दपपापाणसनिमः। मतिमारणसामग्री न तस्पास्ति पदाचन ॥ ३०॥ कर्मपननिर्मक्तसिगाभिसरासपः। सिदी निरमना मात मातानतमुम्मादपः ।। १ ।। इति भीरपदार्पस्वे संसपेण निरुपितः । ममीपतरामप्पेबमपपानवपा मम् ॥ ३२ ॥ मनीपरक्षण व पपपैर मर्पयत । पर्मापर्मी प साकास कासः पुस इस्पपि ॥ ३३ ॥ भीपपनसयीयः स्पानत्यपनाकारणम् । धर्मद्रम्यं वषिएमपर्म: स्पिस्युपग्रहः ॥ ३४ ॥ पपा मस्स्पस्प गमनं पिना नामसा भगन् । न पामा परपस्पेन वया पर्मोऽस्त्पनुग्रहः ॥ ३५ ॥ वरप्टापा पपा मपै स्पापपत्पपिनं स्वतः । नपा मेरयस्पैनमय प स्पिविकारणम् ॥ २६ ॥ १ म्तमानापियो न ससस्पसाबमनपराइम एष । मन कतिपणे ममय रचरन माल बर पारिति । R! मस्तमानात् । बायप्रति पत्र प्रापमानो का भरिका न तम्मेवारीमापानसिपालापापानिमोतिकी मार न समिति मतस्पमित एव । वन मम्ममा सपरिमापन मम ममसानिा। एक--11...।

मावदेनसानकुमारनामस्मगगमनवणनम् ५५ तथैयापर्मकायोऽपि नीयपुद्गलयाईयोः । नियत्युदासीना न सय प्रेम स्पितेः ॥ ३७॥ जीरा ीना पदार्यानामगाइनलक्षणम् । पपदाकाशमस्पर्शमम् व्यापि निष्क्रियम् ॥ ३८ ॥ गर्वनासपण कालो पर्चना प परामया । यया स्यगुणपर्यायै परिणत्वयोमना ॥ ३९ ॥ पया लालचस्प भ्रमणऽपः शिला स्वयम् । पचे निमित्तामर कासाऽपि करितो भुपै ॥४०॥ म्पहारास्पकाकागपुरम्पकासमिनिर्णयः । मुम्पे सत्येर गौणस्प पाहीकादः माविता ॥४१॥ सकासो लोकमारैः स्वैरणभिनिषित स्पितेः। या योन्पमसकीर्ण रत्नानामिय रातिभिः ॥ ४२ ॥ मदेचमचपापागादापाऽप कीर्तित । भपाः पधास्विकायाः स्यु भामापपितारमयः ।। ४२ ॥ पपिर्मरियकासपदार्या भूविनिता। मूर्तिम पद्मद्रयं वस्प भेदानितः शृणु ॥ १४ ॥ १ धर्मापमा पुनप्रतिस्थिनिधिपरिगिग इम्प्रनामपर पुर्वमा तिम बार रिक्याम्पसमा गालि सति मापन सम. और पाणिमित्रम्पोपमा बम निमितपति, एमपी र पर परमम्मा, मोरगममा ममापामगार-सा बसपमा निगरा-सात मन्यात्म्य पमी दिन मरने पर स्थानभूमानीतले पुरमा बत्मारा पी।सनष८। प्रदिप्यारमेन नाममममममुस्ता या चम्बूस्सामिपरित- वर्गपरसस्पश्त्रयोगिनः पनसा मवा। पूरणासनावप समाप्ठान्नयनाममाः ॥ ४५ ॥ संपाणुमेदवो देपा प्रसस्य म्पपस्पिीत। सिम्परक्षात्मकाना संघात संप इप्यते ॥ १६ ॥ दपणुकादिमहाकपपव तस्य विस्वरः । णपातपवमोग्योस्नापपोदो दिममेदभार ॥४७॥ सुस्मसूक्ष्मास्वया सूक्ष्मा स्पस्यूसास्मशः परं । स्पसम्मका स्पसाः स्पसस्पसाश्य प्रसाः ॥ १८ ॥ सुस्मनुस्मोऽशुरफा स्पादरम्मो रक्ष्य एम प । सूक्ष्मास्तै कार्मणपा प्रदेषानवयोगतः।। ४९ ॥ सम्म स्पर्धा रसो गपः सूक्ष्मस्पूछो निगपा । मपासपस्म सस्पेपामिन्द्रियग्रामवेसणाव ॥५०॥ स्पृसममा पुन:पारायाग्योस्लावपादप । पाशुपत्तेऽपि सहार्परुपस्मादपिपावकाः ॥ ५१ ॥ प्रदम प्रसादि स्पारस्पुसमेदनिदर्भनम् । स्भूतस्पूत पृषिम्पादिप संपामकीर्विवः ॥ ५२ ॥ माभपाऽपि दिपा मोक्तो मापदम्पपिभदवः । माया भीपास्पकी मार स पापुदा परस्पतः ॥५३॥ पूचीस्मरयम वारपार । म मात्र पर पारामिम । - । - मनुमध्ये समानुort पर मरान कामे । बत्तु भतुमचार अनुसार परममिमा बपतिसमिनिपालपणे पापाई कस्मत। म । रणसिम्पपिविषय मामिसब । पमाछा पापा । दिनुस्मस्पमिला ।

मादेवसानकुमारनामस्वर्गगमनमर्णनम् मिथ्यावं प कपायाम योगोऽपिरतिरेव च । मागाअवस्य विोया मेदाश्पामी पयागमात् ।। ५४ ॥ सत्सु मापामप्याभु योग्याः फार्माणनर्गणा । गच्छवि कर्मपर्यायैः स प द्रष्यामः स्मृतः ।। ५५ ।। मामापूर्वको पन्पो दिरिमा सोऽपि पूर्णचन् । माभिवानां यतो पप प्रत्यादिममेदवः ॥ ५६ ॥ माभपस्य निरोपो य स सपर चदाइव । पापी मानदि स्यास्पर कार्माणरोपवः ॥ ५७ ।। निर्मरा प दिपा मोका सविपाकाषिपाक्व । अम संबरपूर्ण या निर्मरा सोऽम्पले पुरैः ॥ ५८॥ मापदष्यात्मिका देपा निर्मरा तत्वादिनाम् । वपाषा शुद्धमाषः स्यातर्मनिर्भरणं परा ॥ ५९॥ {सोमस्यांवर मोक्ष रुस्नकर्मक्षये सति । मानानंदादिपर्माणामापिर्मावास्मः स्वतः ॥ ६॥ गमो माषा हि पुण्यस्प पापस्यागुम एप प । पूर्को प्रवादिस्मात्मा तद्विपक्षा परः स्मृतः ॥ ६१॥ पदस्य मिनेशने तत्वानि भेणिकं मति। अधीर्णमेपरातिथिस्सासामीमयं तदा ॥ १२ ॥ पिन रपेर्दिघा भूता किमागरएप तसे । राष्ट्र लक्ष्मी विरागस्प मिनस्पानवरेभयम् ॥ १३ ॥ मादापसालाप सम्मा।

चम्सामिपरिव- यस्मामरापीसो पीमान् विस्मपा गत | पमा स्वामिनं यः किमिदं पवेऽधुना ।। ६४ ॥ पृष्ट प्रत्यार पशो रामाने आणि मति। विद्युन्मासीवि पिस्पावा देनाऽप स्पान्मार्दिक ॥६५॥ पतसमिनारीभिः स सम पमातुरागवः । भगमदंदना सास भी समागवस्तदा ।। ६६ ।। विस्मितः सप्तम पारि दिवसम्पुस्ता मनावकः । भुवमप्पति भम्पारमा परपौगी मविप्पति ॥ ६७ ॥ भस्पेति सदची भूपा भूपा भक्तिपरायणः । मीवा पिशापयामास भगत बगगुरुम् ॥ ६॥॥ रुपासागर मा म्यामिन् यसपाके मयुक्तिवः । पमासमायुपः पो पदा स्पात्मिदिपासाम् ॥ ६९ ॥ वदा पदारमासा स्पाम्माना कगरसपिनी । दानिर्भपातम्या मदात पशुपाः ॥ ७० ॥ दमोम्पा दि बरामस्प विमर्प वपुः। स्पतऽध्यसताक्षीप वरूपं पिप्रकारणम् ॥१॥ इत्यदः संनयमांत निराइर्मन् निनोभमाम् । बाप पिटराषिष्टी गंमीरवरया गिग ॥ २ ॥ राममस्प पापच सर्व पिप्रारंपदं मृणु ॥ संपगपर्टन तुनिचेंदवननक्षमम् ।। ७२ ।। वपया पगप म रम्पत मासिर । पनपाम्परिम्पादिपणे मागर पर्णित ॥ ७॥ परममा सहमति ।। मगपुरा गुमाया। नने परिप्रभामा मावदेवसानस्कुमारनामस्वर्गगमनवर्णनम् वकदेशिम्पाप्त पर्दमानामिर्प पुरम् । मनोपरनरामीभिः रामित परिमादिभिः ।। ७५॥ धतुर्गोपुरसयुक्त विशालं झालयोटिवम् । मुंदरीमिः समाफर्णेि दिन्पभूपपिरादिमिर ।। ७६ ।। वर पिमा यसस्पेय पदमार्गानुरागिणः । मासिकार प्रेयसे हिंसा कुतीहषमापमाः॥ ७७॥ एन्पवे पसरस्वत्र गोगमामानरादयः। मिप्पोपकारसंछमरम्भिर्दुष्पपगामिमिः ।। ७८ ॥ मय तम पसेकश्चिदिमो मदविदांवरः । सपर्मकर्मनिष्णावो नाम्नार्याचमुरीरिव ॥ ७९ ॥ वस्य मार्या सवी नाना सामशमा पवित्रता । सीवपैक्पति सामी मर्नुभन्दानुगामिनी ॥ ८० ॥ वयोः पुभारमूर्ता दो पुष्पदवानिमोपतो । मानापो मापदेवश्च द्वितीया मपदेवः ॥ ८१॥ प्रमादपीविनौ शाखदम्पाकरणादिषु । निदानादिषिकिस्सति देय व स छन्दसि ।। ८२॥ ग्पाविःसंगीवगानेषु काम्पासंकरने प। फिमप्र बनोकेन विपाम्मे पारगामिन ।। ८२ ॥ पापरफो धपादेषु माननिमानकोपिदो। मपि चास्पवनही मिपी पुष्पमुखामिम ॥ ८ ॥ इत्यं पलं सुपर्दन्वो पाग निरुपदनम् । ज्येष्ठो दावशीपा सपुदादशपर्पकः ॥ ८५॥ पासूगोलाबाकोभतिवचरि कम।

अम्मूतामिचरिते- मावरे पूरी दुष्टकोपार्मिवपाकता । मावस्वावस्वकार इसी महाय्याषिमपीरिकः ॥८६॥ इसम्यासपरीरः स गमस्कासनासिकः । जीर्णोपामश्च सोंग यासनाष्पाइसीरुवाः ॥ ७॥ मानिनायत फर्म तहिपाको दि दुस्तरः। स्माद् संमोग्पते पप्पं तत्पाक दुलपानिय ॥ ८८ ॥ मस्पेवि पीमवा त्पाग्या पिपया मिपसंनिभा। पर्मामृतं प पानीयं निर्विकारपदमदम् ।। ८९ ॥ मस्पंवदुस्विवो पिमो मीपनापापरिपुवः । मनिटो पसिते बगै सिवानानि पैवगमत् ।। ९ ॥ परियोगातु शीकार्वा सोममापि वलिया। गाच पिताया रे न सार्पमपीपिणत् ।। ९१ ।। मृतपोर्मातृपिभोरण मावो तो दुम्समामनौ । पोकसंवापसंतप्तौ संसपतरणारी ॥१२॥ वा भिरास्मीयैः साम्नै पतियोपियो । क्या शोफ रिसध्या कवमन्तो पितुः क्रियाम् ॥ ९३ ॥ संर्पणं यपानाम सर्प रुस्पा बिमस्सरौ । पूर्वनस्सबकाप सोपती ममवस्तदा ॥ ९ ॥ इस्पं दिनगणैः कैशिपातेऽय मुनिपुंगपः । मागवस्तम सौपर्मो नाना पर्मपा शमी ।। ९५ ।। सर्पसंगविमुकात्मा वामावरमेदतः । योमातस्तमोऽपि समा यतश्च मप्तिभिः ॥ ९६ ॥ मेरा वीमेना। पापा ममः। मोप्री।

मावदेवस्नकुमारनामस्वर्गगमनमर्णनम् निाको जिनसभार्ये सर्शको प्रतपरिपुतौ । दयाल' सर्वमीप निर्दय कर्मधावने ॥ ९७ ॥ स्पाहादी कुमप्तवान्त तेमस्ती मानुमानिव । सौम्य अभीप समगि पीरो मेरुरिवोन्नतः ।। ९८ ।। मरदायामिवताना स्पाग्गैनो जलदापमः । पर्मोपदेशनीरण पापिता मन्पचातका ॥ ९९ ॥ सर्वसघाएकोपेतोऽधितो निमितेन्द्रियाः । पानामझानसपमी गणी गुणनिपिः शमी ॥ १० ॥ समः समीप मिच नीमिते मरणे सम । समो लामे सलामे च समी मानापमानयो ॥१०१।। रनमयपरो पीरो तपसालकवविग्रहः। अमर्स सापपानम सयममविपासने ॥१०२।। पेलापानपि माय करुणारसपूरितः । मनियामास भैने धर्म श्यामयम् ॥ १०३ ॥ मो मो मम्पमना पूर्व प्रमुन धर्ममचमम् । स्वगापबगेयाला प्रेतोफ्यशरण गुमम् ॥ १०४ ।। संसारेऽभ सं न स्पादासथिदिवौकसाम् । कर्मापीनतमा दर्भ वदप नाम् । ।। १०५ ।। तयाप माइमाहात्म्पात्मत्यस्तमितलोचन । ससारी मनुत सौल्प संसको पिपयप्पी ॥ १०६ ॥ मिले। र सम्मानमववामित्राने ति स्नाय।पा।

६२ चम्मस्वामिचरिते- मनिस्येपु शरीर पुत्रपौमादिकपुष । सपत्सपासप्रपु निस्पत्वं मनुवे हरम् ॥ १०७ ॥ दुलपीमपु मागेपु रमवे स्थमुलाया। सदियोगे व दुम्सार्स सीदस्पेन पशुयपा ॥ १०८ ॥ सर्ण कामी भणे सोमी सणे कृष्णापरायणः । सर्ग मोगी पर्ण रोगी स्वामिए इसापरत् ।। १०९॥ रागदेपमपीस्य भूपस्वप जास्मकः । दुर्योन्य धर्म पनावि पन गति प्रनेत् ॥ ११ ॥ कदापिभारको मूत्ता वा दुप्फर्मपाकतः । असावनादासस्वारयते सागरापपिः॥ १११ ॥ कापि विपम्गवि माप्य मन्मनीचइसेऽयमा । दुःस्वार्ना प साश्व पीरिवोऽयं भ्रमस्यहो ॥ ११२ ।। वती मास्पिरा पवापि मम्पगवियतुएपम् । पिना सम्यमलोपामतुरनवशः ॥ ११३ ॥ भवः मुसापिनानेन माणिना पर्मसंग्रहः। कम्पोअश्यमेवापममर्स मिनमापितः ॥ ११ ॥ इमा निरुपया पार्च प्रश्नमागर्मो सनः। भुस्यास्प मापदेवस्प फैपितं वयं वदा ॥ ११५ ॥ सवा निर्षिन्मपिचेन तेन संसारमीरणा। रिमती एमपासौ मुनि सौपमसाकः ॥ ११६॥ स्वामिन् मापस मामप निमन ममाम्मुपी । पयाफपंपिदास्मीयं समे मुखमम्पयम् ॥ ११७ ॥ मिन

माक्देनसानाकुमारनामस्वर्गगमनपर्णनम् ६३
वो नाय कृपां कृत्वा दीक्षा मे दहि निर्मसाम् ।
सर्पसंगपरित्यागसक्षा भवनाधिनीम् ॥ ११८॥
अलैतमायदेवस्य पाप्पामागर्भित पच ।
नाच पाषं सोपो मनिस्तत्मीणनक्षमाम् ।। ११९ ॥
निर्विष्णोऽसि यदा पत्स मत्या भोगांश्च रोगवत ।
क्या दीक्षा ग्रहाणानु रागिभिर्दुर्दरामिमाम् ।। १२० ॥
गुरुपदेशवो मनं धैर्पमालम्म्य शुदपीः ।
निशल्पो मापदवोऽसौ प्रषवाज दिजीचमा ॥ १२१ ॥
ववमभूति योगीश्चः साक्षादाचयमी पया।
ससंयमापिरोपेन पिमार्प महीवले ॥१२२ ॥
गीरणा गुरुणा सार्द गम्छमकल्मपः ।
पोरसमं तप कुर्मन् स सम' मुखदुम्सया ॥ १२३ ।।
स्वाध्यायल्यानमैकार्य ध्यायभिा निरंतरम् ।
सम्दप्राममयं वषमभ्यसन् पिनयानतः ॥ १२४ ॥
पन्योऽस्म्या तार्योऽस्मि यन्मया मातमुत्तमम् ।
मैन पर्ममिति माझी मन्यमानः कवार्यताम् ॥ १२५ ॥
मयान्यपुः स सौपर्मः धरिः संपसमन्वित।
गिरमागतो भूयो पर्दमानापिय पुर ॥ १२६ ॥
मापदेयो मनिस्वम स सस्मार पिगुदपीः ।
पर्व मनुमा भ्राता पुरेप्रस्मिमिति चितयन् ॥ १२७ ।।
ममदेव इति म्रपाठी चिम स्पाहिपयांपपी।
स्पास्मरितमनानाना दुम्भुधिस्वपवसः ॥ १२८ ॥

६२ सम्पूस्वामिपरिसे- मनित्यैपु शरीरेषु पुप्रपौत्रादिकपुष । सपत्सयकसपु नित्पतं मनु बाई ॥१०७ ॥ दुम्सपीजपु मोगेषु रमव स्पमुस्खामया । वदियोग प दुम्साः सीदत्यव पश्र्वया ॥१०८॥ सर्ण कामी सण सामी क्षण सुप्मापरायण । भण मोगी सर्ण रागी मूवापिष्ट इमाचरत् ॥ १०९ ॥ रागदपमपीसूप भूयस्तम नगत्मा । दुर्मोय कर्म बन्नाति येन तागतिं प्रभम् ॥ ११ ॥ कदापिमारका भूस्पा वा दुर्मपाक्त । मसातनादास्वायत सागरागपिः ॥ १११ ॥ कापि तिर्यम्गति माप्य मन्मनीसभ्यगा । दुसाना न सासरप पीडिताऽयं भ्रमत्याहो ॥ ११२ ॥ वो नातिस्परर क्यापि मध्येगविपशुष्टयम् । पिना सम्पनम्मोपात्तैमैतरनंवत्र ॥ ११३ ॥ मतः मुसाधिनानन माणिना पमसंपदः । कम्पोसम्पमेयापममतं मिनमापितः ॥ ११ ॥ इमा निरुपमा वा प्रशर्मागर्मी मुनेः। भुस्पास्स मावदेवस्स कंपित हदयं वदा ।। ११५ ॥ वतो निर्षिण्णपिचन न संसारभीरमा । किती घरवासी सनिः सौपमसंपक ॥११६ ।। स्वामिम् भापस मामप निमव मामुपी । पवाकयचिदात्मीयं समेयं मुखमम्पपम् ॥ ११७ ।। मिया भावदेषमवदेवसानकुमारस्वर्गगमनवर्णनम् ६५ सस्याने निषेश्याशु नमस्कृत्य पुन पुन । भरण्ये भरणे वनोपनिष्टो गुरसंनिधौ ॥ १४० ॥ योगिना भ्रात्मन्येन धर्मपदयादिदानवः । समावित' पुनः पार मपदर इतरित ॥१४१ ॥ नियत कुशलं भ्रातः संयमे वपसां पये । एकाग्रमितने घ्यान माने स्वात्मसमद्धये ॥ १४२॥ मनि' माह महामाज सानप भ्रायर प्रति । समापानपरा पत्स मटकामा पय विदम् ॥ १४३ ।। किमेवास्मिन् यो मामि भूर्त मा षवेधुना । रश्यते मंरपारभो भानस्त्पदसतो यतः ॥ १४४ ॥ पचनालंकृत सौम्यं वपुः परममुन्दरम् । करे ककणमेवचे दृश्पत पारसपानाम् ॥ १४५॥ माकप्य गरोक्पि भपदेना नतानना। पत्स्मित स्वसदारमुपाय ग्रीस्या युवः ।। १४६ ।। स्वामिमप्र पसदिमो नाम्ना दुर्मर्पणः स्मृतः । नागदेमी प मार्यास्य इसशीसगुणांकिवा ॥१७॥ वपो गरमपुपी मयाप पिपादिता । आशामादाप पंधर्ना बेदमाक्यसमक्षकम् ॥ १४८॥ मनि मार वत' भुस्पा मुक्तिसगर्मिता गिरम् । भातर्प जगत्पस्मिन् दुर्समें न किमप्पो ॥ १४९ ॥ पर्यादैन्न पद नणां सर्वसंपरसमनितम् । पाकिस्पं पायमिन्म नृपस्प प पिशेषतः ॥ १५०॥ पसरणे सापुरम्पयसिन्।१।

सम्पामिचरिते- एकशो पोषयाम्पनं परमोपेक्षपानपि । नवी गस्वापि तदा मियत मे मनोरयः ॥ १२९ ॥ भारोपदश्चत् मतिबुद कयंचन । रिक्ती भरमागेभ्यो निश्चित स भोन्मुनिः ॥ १३ ॥ पिवपिस्मवि पिच स्त्र मापदेवो मुनिस्तथा । माधिभिपद्गुरा पालमादामादानुकाम्यया ॥१३१ ॥ दीयवा भगरमाझा मी भ्राषियापन । पदकसाय कारुण्यासत्मसादकस्मये ॥ १३२ ॥ पर्व मसादपिस्या स्मारु नस्पागमन्सनिः । भरदेपणे रम्प कपिपरिमार ॥ १३३ ॥ अनवरं दवर्गसौ प्रावगेई सरिस्मितः । मरपारंबरा रितारणभीपिरामिवम् ॥ १३४॥ मंमसावां पनावश्य परिरीजवादिसपम् । पिठलासमाका पा (a ) दोसितममम् ॥ १३५ । पारम्पपूर्णनारीमिा रुवगानमहात्सपम् । मंदिमि स्तूपमान प दिवाक्पैरसरुवम् ॥ १३६ ।। मावीईदादिएप्पैश्य पासित गपशासिमि । सत्करपिमिभप भीसीपवितं मुषम् ॥ १३७ ।। पनिनापि युवा सार्य मावदेवा मुसयत । मपिसबसपा प्राप्तस्वम प्रावग्रहांगणे ॥ १२८॥ तो ष्ण समुस्ताप सूर्णमम्माम विपिम् । प्रभपातारपामास भपदेषी नवानवा ॥ १३९॥ मार गुपये कमाये बयि पास्पद।

भावदेयमयग्यमानस्युमारम्पगमनवर्णनम् सबै स्थान निरम्पार नमान्य पुन' पुन । परम्प धरणे तपोपरिए गुरमनिया ॥ १४० ॥ यागिना भ्रात्मन्पेन पमएदपाटिदानवः । समापित' पुनः पार मपत्र इरित ॥१४१।। नियत इससे भ्राव सयमे तपसा चये । पकायसिन ध्यान मान म्यारमसमझने ॥ १४२ ।। सनि मार मरामाम सानंर भ्रावर प्रति । समाधानपरा पत्स मटकाया यय लिदम् ।। १४३ ॥ किमतस्मिन या मानि मूर्त मा पतवऽधुना । दृश्यते मंटपारमा भ्रातस्त्वदसती यस ॥ १४४ ॥ पचपारनं साऱ्या पपू परममुन्दरम् । रेषणमतत रयत पास्सापाम् ॥ १५ ॥ मारण्यँट गुरोमार्य मबदनी नताननः । पम्पिच स्वसदायमुनाम पोरया युतः ।। १४६ ।। स्वामिना पसदिमो नाम्ना दुमपण' स्मृव । नागदमी व मार्यास्प मुसीसाणांकिता ॥ १४७॥ वयान गरम्पुपी महाप विनाहिता । मामामादाप पपना पदपाक्यसमक्षफम् ।। १४८॥ मनि मार व भूत्वा मुक्तिसंगर्मिता गिरम् । भावजिगस्पस्मिन् दुर्समें न किमप्पो ॥ १४९॥ पर्मदिन्दै पदं नां सर्वसंपरसमन्वितम् । परिव पादयकिन्न नृपत्वं प विश्पत ॥१५॥ मरने सामालिन् । थे।

जम्मामिपरिते-
सम्माणि पासप्मा स्पमिनार्दिपा ।
रस्नप्रपमयी पम: स मिपा निनदशित ॥ १५१ ।।
नरस्त्र प्राप्प दुप्पाप्य यो न धर्म ममाररन् ।
मन मन्ये सपा वस्प जन्म प्राप्तमपि पम् ।।१५२ ।।
पीरमा पाक्यामृत पूर्व प्राप्तं मुनिमहोदपः।
ममयी प्रवान्युपः भारस्पाग्रीषदा ॥ १५३ ॥
संग्रहीनवनाश रिमप्ता मुनिनायका ।
स्पामिमा शो मऽप लपा माप रूपापर ।। १५४॥
रिमप्तरजमस्पर प्रादपर्मानुरागतः ।
सनि स शुदमार निासारप नपास स' ॥ १५५ ॥
तवर्षापर्प पसंदपपाल मनिपुगप ।
विष्ठत या सापों पतिहटसमन्धित ॥१५६ ॥
तत पारमनाः कपिदिनाप्पनुमति सुने ।
पलुस्तमनुगच्छंत प्रभपस्य वध्यतः ।। १५७ ।।
तत्सास्वमिमादाय फियार पपापपम् ।
गस्मा पुननमरुत्स म्पाइप प्रामापयुः ॥ १५८॥
मार्दमाऽनुमा माता दन सामनीगमत् ।
गो गछ गराराका प्रवीमिति गौरमात् ॥ १५९ ॥
गनिनामाणि न दायमारिसावपातम् ।
पमममिपा पन्यदक्षता संपमारिकाम् ॥१६॥
परमेम गवा दूरे ारतरऽपि प।
समर कणसी म्पाहमीभूतपेवसः ॥ १६१॥

मावश्यमापसानाकुमारस्वर्गगमनवर्णनम् ६७ स्मार स्मारं पुनश्चिते नागपरमायुमम् । मूभिष पद पत्र प्रस्स्वसद्गविनिभ्रमम् ॥ १६२ ।। विचित्सोपायमालोच्य व्यामादरे महुर्सः । ग मिगमिपया भारदेष प्रति सहादर' ।। १६३ ॥ स्वामिन् स्परस्पयं पक्षा गतिममिसः पुरः। पीरार्य समा चास्वा प्रत्या या सार्यव ॥ १६४ ॥ इतः पश्य तराग मा पफमासीपिरानिवम् । आर्नु स्व मरालस्य यप्रायां वस्पतु पुरा ॥१६५ ॥ कपिमं पानने पश्य नानानोफासावम् । इप्पावचयाया च यमानम्मतरादरात् ।। १६६ ।। सय स्पस्सी कपानाप चन्द्ररश्मिरिपोज्पसा । पत्र पकग्नेलाप तस्ए सर्वेऽस्मदादयः ॥ १६७ ॥ इस्यादिनिपिपासापरास्माईत पदमपि । भवदी न शशाकापमोरितु तन्मनो मनाक् ॥ १६८॥ नापि पश्पति नेपाभ्यां ना किंपिरिपतपेन्मुनिः। पपसापि न हुफार पददा पाइसझ्या ॥ १६९ ॥ प्रमादयं मगन्दी भापतगुरुसनिपी। पुरै पमरयम्पेवा पोरी पपमारिन ।। १७०।। समस्त मुनिमुरिय शेम सऽपि सपना । पन्यासि समाभाग यनानीनोऽनुमः सणाम् ॥ ११ ॥ मता भरत्या मणम्पाश गुरुं सॉपमसम्मकम् । उपरिटी पयास्पाने भारदेपा मुनिस्नदा ॥ १७२।। मेण्ग माम पम पम परका नम्बूस्वामिचरिते- इतिकर्तव्यतामूर। पर्याइसितपतस । पितयामास पिचे से भगदेवा नपादेशः ।। १७३ ॥ निास्पाय यां यामि किंवा महामि संपमम् । इति संभपदोसायां क्षणं नास्पापि तन्मनः ॥ १७४ ॥ उदाहस्पायशिष्टं यत्कार्य फस्पानपा समम् । कौतपा दुर्समाम् मोगान् सेनामीति पयेप्सिवान् ।। १७५ ॥ पदमावं तु में गिरी पर्वते स्वमनीपिवम् । कस्पाइ कययाम्पम नीरयापवमानसः || १७६ ॥ दं पदं मनीपाना दुर्दरं मासामपि । भस्मारता पराकारदा कामरमंग ॥ १७ ॥ अव प्रेम करोम्पप गुरुवाक्पमसूक्षणात् । मपं स्पष्टो मम भ्राता मामूलुवापरायणः ॥ १७८ ॥ पिमृश्पीमपपमेऽपि फुत्पारुत्पपिचपत । समस्पा रुतर्योऽसौ दीक्षामादामपतः ॥ १७९ ॥ चितिव तेन पिधे से समस्येन पिमृश्यवा । ममिप्यामि पुनर्गेई यपाकासमता परम् ।। १८० ॥ विमृश्यैवस्सएपः स भवदमो नताननः । मवादीन्सुनिशिश्य पपा पूर्वविएिवम् ॥ १८१ ॥ सुन परोपकाराय पदफस महावप। मपि दीने पो हत्या देीि दीक्षा स्माईतीम् ॥ १८२ ।। शिवो मनिना सूर्ण सावपिकानपभुपा । गापपमपि दुसर्प स्मामिमार्य दिनोपमः ॥ १८३॥ परिवाहिया मारण।

जम्सामिपरिते- मपिष्टः स ददर्शननिनषत्साह पम् । रसुमवारणीपर्व मनमालाभिराततम् ।। १९५॥ मणिमुकाममोर भूपित सपमा भूभः । यावापागनामिश्ष कवगानमास्सिमम् ।। १९६ ।। भिः परीस्पाप मस्पा व पंदित्या प्रतिमा पिमाः। उपविष्टा यपास्पान मवदना नाना मुनिः ॥ १९७।। वम पेत्यासय सयावा सापिंफा या प्रवान्यिता । चर्मास्थिभपसोगी मुनि पा रद वम् ॥ १९८ ॥ समापानं सुन तस्य सपम तपसि तव । ध्यान पान च स्वाध्याप क्या कधिदिसीरिवम् ।। १९९ ॥ मनिनापि यपापीयं वलशर्स तदा । साम्नर वा सारिश्य प्राकमवासराहना । २० ॥ आर्षे पूनमभूवा ही पिदांसी सरिताउदी । दिमस्पायरसीः पुषी पिस्पावो सर्पसम्मसी ।। २०१ ।। व ग्पापाननपोन्पादन इति स्मृतः। मरदेपो सधीपाश्म माम्मी पदरिदापर ।। २०२ ॥ पावने पेटिमानासि हि मे समयपिम् । कक विश्वस्तौ दो का रूपा पापुना उपाः ।। २०३ ॥ सोप बदाम्पमाकम्प निम्किारा सुचेष्टिवा । पन्पो वा एनिनापी दी जावी असादिसम्पियः ।। २०४ ।। भुत्तेवनमदनीऽसाइकषानसममसम् । उद्गिरभिम सार्वमात्मा कठावर ॥२५॥ मति। विन्यप्रपोलम पृष्ट्वा

भावदेवभवदेवसानत्तुमारस्वर्गगमनवर्णनम्
मार्य पद किमप्यन्यस्पृच्छामी महादरात् ।
न संदनवचो दुष्प मातामपि संमतम् ।। २०६ ।।
नाना नागषम् पासीनवदषपिपादिवा ।
सा विना पविना पाता यावदयामरकपम् ।। २०७॥
वि भाषां विफारः स शादो मपरस्त्रया।
पश्चाचाप मुस्या मिया फंपिवयेप वा ॥ २०८ ॥
नून मनिपद त्यक्तमयमिमावि मूपी ।
स्यक्तधैर्यातिफामाषा दुसास्मरपीरित ॥ २०९ ॥
अवा धर्मानुरागादि पालम्पोऽय मपाघुना ।
ययाकधित्सद्वाक्पमिनाक्तैरमृतोपमैः ॥ २१० ॥
मय बेस्सस्मरश्चार्य मोगानिम्छवि सर्पवः ।
एव प मे भूयात्मापतिधपि गरीयसि ।। २११ ॥
विपित्येति क्रियामांवा सीचे सामानवता ।
विनयेनानसा मूर्वि भारतीय पियंवदा ॥२१२॥
स्वामिमीय महामार पन्पोऽसि त्वं मगत्तये ।
पारिभ यतया प्राप्त दुप्पाप मावामपि ॥ २१३ ॥
स्वं पूरपब्रिदिपेशानां मनि परमपावनः ।
सपसपभिमानस्त्व मोक्षम्मीस्सयपरः ॥ २१ ॥
वारुम्पप्रपि महामोगान्फम्वोस्स्पकुमति ।
ममवाऽन्यम भो सौम्य मुरसोकेऽपि दुर्समान् ।। २१५ ॥
मारंभ मधुरामासा पिपाके फटुकाः स्फुटम् ।
सासनिमा भीगा सप-भागापहारिणः ॥ १६ ॥

७२
चम्बूस्ामिचरिते-
समामृतं परित्पम्प पिमिच्छवि पीः ।
पश्चाश्मानं समादच त्यक्ता माम्मनद सा ॥ २१७ ॥
स्ममोपपगेयाः यम मुफ्ता का नरफ प्रोत् ।
सक्ता जनपरी दीक्षा भागान् कामयतमः || २१८॥
इस्पादिपिरिर्यापपः प्रवियोपरिपायकैः ।
मापित स तया गारसञयामूदपासवः ॥ २१९ ॥
पृश नागवम् याम स्वया रिपिस्सपासना ।
मामेपाम्पक्षद पश्य वाममोगापिता मनः ॥ २२० ।
मपुस्तस्पाः कमिस्थानं भरद्वारमपापनम् ।
सर्स खासाविस पृसि फासिंगसहर्ष शिरः ।। २२१ ॥
स्तमारपयसंपन्न वीभत्सा पपस्वन ।
गर्वाकारी पोसा दो मुहागिन गनुपी ।। २२२ ।।
किंचा पतरासाप सबैपार समततः ।
शुप्पासी समा वस्पाः पविती प पयोषरौ ।। २२३ ।।
सापिसारात्ममधा झै नरारिम इसेपया ।
चमास्थिपूवसांगी निष्कामा व्रतत्परा ॥ २२४ ॥
पिन्दुदरमिदं पन्या स्मार सारं पुन' पुनः ।
समापन सपा पीर कासाऽप ममिवा पृपा ।। २२५ ।।
मदर न किमप्पस्ति नूनं यापिस्टीरक।
अवायवा पिरग्या नि वचपाइरु ॥ २२६ ॥
वपसा पन प्राप्त स्वगर्मालम्सानि च ।
किपा पिपपरभिः साम्यामासनिबन्पने ॥ २२७॥

भावदेवमकोमसानकुमारस्वर्गगमनवर्णनम् ७३ --- कामिन्पादिमाभागा मुकाछिया धनवन । यवस्वप्रानुरागन कि मुन दुलदापिना ।। २२८ ॥ युत्ला मनिरिमा वाच निगवां कामिनामसात् । पिस्कुभिवात्मानमापष्ठज्जापराऽभवत् ॥ २२९ ॥ वस्पाः प्रशसन चक्र प्रविबुद्धमना मनि । मयदेमोमिसयागादिव कातस्त्ररामसः ॥२३०॥ पन्य स्वमप नाफासीवाम्युचरण मम । निमग्नव शवावते मोगापतत मृशम् ।। २३१ ।। इत्युक्वाय गता नगाभि शल्या मनिसमियो । सकपात्रो भ्रमारतें समतीतमिरादिव ॥ २३२ ॥ नत्ताय मुनिनाप नमुपविश्य ययासन । ययाचं स्पवृक्षान्त तस्मै सर्नमधीकयत् ।। २३३ ॥ दोपस्याफ्नं त्या ततपत स संयमी । नाव: साक्षान्मुनिमता कमर्णा मापशुदिव ॥ २३४ ॥ यारमध्यानरवोऽप्यासीचद्रागल्पनिनर्मिधः। चप उर्मभमस स भ्रामा सार्धमविष्ठपद ॥ २३५ ॥ निसा सशरीरेऽपि ससूरा मुक्तिसगम । सहिष्ण धृत्पिपासादिदुःसानो सममावता ॥ २३६ ।। परिमिप्रहमपर्णलामालामसमः शमी । निंदास्तुतिसमा पीमान् नीविच मरण सम' ॥ २३७ ।। प्रमादरम्यानयमा सोपे सम्पपलिया मोपचाफ्ना ।

जम्मूतामिचरिते- मंत समापिना मृत्यु समाप्प विमलापस । पमितं मरणं प्राप्त दाम्पा चश्मयागव ॥ २३८॥ सवस्वाय स्वर्गे दी सनकुमारसाफ । भभूता दिपिमा रामन् सप्तसागरजीनिती ॥ २३९ ॥ वष दिम्पाप्मरामागान् मानी मुसमासः। बामपि प्रवमात्म्यापुप्रामार्यमसानप ॥ २४०॥ यस्य पमस्प माराम्पाचौ नावारमरकरी । सर्पमा श्रमससिदपै सम्प सन्निनिरन्तरम् ।। २४१ ॥ इतिश्रीसम्मामिचरिते मगरदीपश्चिमतीर्थकरोप शानुसरित- स्पाशदानबगपनिपारिशरदपण्वियनमधीरपिठे सापुपासारमसाधुटोहरसमम्पर्धिते मानदेषमयदेम सामकुमारसमागमनवर्णना नाम वृतम्प परिण। १ मा निविपासमा मात्रपरिमन पग्रिपंचामसम्ममा मन मम । मामा मान पाम्पस्टिममा प्रतिमा पमित्र।

अथ चतुर्थपरिच्छेद
उग्रायातकशात्या भीपासातनय रुती ।
पर्दवां यरर' साघ्र रसिफोन फयामृत ।।
प्रत्याशीर्याद ।
समति मुमति वंदे मतवावश्चातये ।
पचममं प्रिपा नौमि पनाम पपापवम् ।। १ ॥
अप वाभ्यां मुखाम्भोपिममाया मगपापिप ।
निर्वाहिया निम' कास' सप्तान्पायुप्यसमित ॥२॥
एकदाप वपोरासन् भूपासपन्धिनोऽमला ।
मणपवनसा मदा निशापाय प्रदीपपत् ॥ ३
मामा पाप्पभवन्म्साना मरिस्पलगामिनी ।
पुपर तत्सपसंपन्मिसक्ष्मीविशेपमीरका ॥ ४॥
मपप बदा बाससवपी फत्पपादप।
वदिपागपारावतः साध्यसमादपत् ॥ ५ ॥
पपुकाविस्वपारासीत्सपो मंदायिवा सदा ।
पुम्पातपमिक्लप तापा काविष्टचे ॥६॥
वापासास्य वदामस्वकावी पिस्छापा गवौ ।
दष्ट्मक्षमाः सर्षे सनकुमारकल्पमा ॥७॥
वादन्यात्परिप्राप्ता दैन्यं पत्परिवारकाः।
वरौ पसवि शास्त्राचा विचपाम पति किम् ॥८॥

जम्बूस्वामिचरित-
मामन्मवा यदाम्पा हि समाप्तं मुसमामरम् ।
सचदा पिंटिव सौ दु'सीभ्यमिपागमत् ॥ ९॥
अप सबपिनो दमास्तामुपस्प यपोषितम् ।
वयोरिपादनाशाय पुष्पसं पचन जगुः ॥१०॥
मा पारी पीरतामेर डीवायो चार किम् ।
जन्ममृत्युमरावंकमयानां का न गारर ॥११॥
सापारणी भवस्पपा सपो मम्युतिदिन।
पौरायुपि परिक्षीण न पाएं समवे क्षणम् ॥१२॥
निस्पासाकोऽप्पनाखाको दिखाफ प्रविभासत ।
पिरामारपुम्पदीपस्य समंवादपकारित ॥१३॥
पया रविरभूत्स्वर्गे पुण्यापापादनारतम् ।
तपनामारविय क्षीणपुष्पस्य नापते ॥ १४ ॥
न कर्म परिम्गनिर्मालापा सहमन्मना ।
पापातप तपस्पन नंताानिस्सनारपि ॥ १५ ।।
फंपत हदय पूर्फे चरम कल्पपादपः ।
गतसि भीः पुरा पश्चापनुष्णया सम मियाः ॥ १६ ॥
प्रस्पासमपुरेप या स्म्प पिदिमौकसाम् ।
न तस्स्यापारस्पापि मस्पन पुरया: स्मितम् ॥ १७ ॥
पयोविठस्प भूपस्म निदिपाश्वमय पर।
तथा पावा एसा स्वर्गे मवारम्पदयाऽप्पपम् ॥ १८॥
तस्माम गरयः भोक रुपान्यारवपाक्निम् ।
ज्यानां च मति पर्व पुवामाया पानन ॥ १९ ॥

भायदेशभषदम्प्रझात्तरस्वगगमनयणनम् त्य नत्मतिबामादि धयमासम्न्य घायनों । घरपामासतु मति जैन मुम्बपद ॥ २० ॥ निरुदन्दिपरूपाणि ग्रतान्यादानुमक्षमा । क्पपापस्तभावत्वानच्छाराधो दिवायसाम् ॥ २१ ॥ वनः कवलमिम्पारा मनजिनवम्मनाम् । पूना सप्रत्पपिम्पानामापे मारविशुदग ।। २२ ।। वस्मत्पद्रुपमूलस्था मापुग्न ममाहिती। पतिमाप्यानपान ध्यानग्यापारलंपिनी ॥ २३ ॥ नमस्कारपदान्यूरने स्मग्नी निभयाति। पारीहत्य फरा साक्षाभणादापना गरी ॥ २४ ॥ ननदीप मरापरी विदा परनिग्गन । उत्मणिम्परमपिम्पा फासभरिनजिन ।। २५॥ दिनमापार्शनो दुनानामनार । सदा नागपा नत्पदस्पमपारन ॥ २६ ॥ रिप्णनां मतिरिष्णना मम्मान नगरप रत्सनिस्वाना रम्प मांगमापनामिनाम ॥२७॥ मभूमिति मगान पनपान्यसपनिन । मग गपपन नव नाना प पूपमारनी ॥ २०॥ पर मामा मपागमा मायानमारम । पर पर समामांना त्पन गसम्पद ।।। २९ ।। मरामि पप सनन पगार मग्नरम् । त्य नपत्यनारीगो पापि गाना गम् ॥३०॥ httu evyan inter

जम्मूस्यामिचरित-
अपि या महामानमानसा रमिरे मृत्रम् ।
फसईसरपस्तूर्ण गारंवीप हि सपनः ॥ ३१ ।।
समपा पा यत्र याप्पा पारिजलाधना।
धन पनानि मार्गेपु निपानानि पद पद ॥ ३२ ॥
ग्रामा यप्र विरानंद पुरदरपुरापमा ।
नराः सुदरपापा नाप्पश्चाप्पविसदराः ।। ३३ ।।
फिमा पर्णयदिद्वान् पप्र सौम्पं निरवरम् ।
विषया वीर्यपानां दिन सममिवागवम् ॥ ३४॥
तत्रास्ति मावी नामा रम्पा . पुणरीकिणी ।
झवसयोननायामा नपयोगनपिस्वता ॥३५॥
यापरनरानीभी रामत भूपिरचमा ।
म्नातिका यप्र पाता पासश्चाप्पंपरं सृपत् ॥ ३६॥
भैनपपरता या भाषफा मुनयस्तया।
रमंद प्रववीपु मरामा मानसेप्रिय ॥ ३०॥
वप इवि घोरप्रसमा यत्र तपापनाः ।
पापापानप निर्मीत सवसंगविममिवाः ॥३८॥
या धर्मक्षयं त्वा पनसाङ्तिरमाया ।
मायत माणिनां पश्यतपापिनप्पसंधिनाम् ॥ ३९ ॥
कपापिस्सम्परस्पापसी रस्नगर्भावनियमा।
सामस्वर्गादिसौरम्याना मा नि भणिकम च ॥ ४० ॥
समभपाऽस्ति नानापि नम्रदता बसान्पितः।
फेरम न रहास्तट्स पनमय वपुः ॥ ११॥

भावरेरमपदेयमापोतरगगमनपणनम् ९ मलत्यस्य मतापाम्नी सारुमक्षमका पर । अगादव पलायन दानिमारत ॥ ४२ ॥ वस्य पत्नी तु नाम्ना स्यात्परदा पापना । प मयस्य धनुयष्टिरिस सादपरानिवा ।। ४३॥ भारदसर साध्य दवाऽभूताप दिवि । वन च्युता नपा पुर सनाव स्वायुप सप ॥ ४५ ॥ वना पभिरानात परमानदरदनात् । नाना सागरासारिन्दरददन ऋमान् ॥ ४५ ॥ भपि नव दमस्ति पीतशफा पुरी रा । पंदा पाटिता पप्र भिसपा भांति शांतिभिः ॥ १६ ॥ पर नाप ममानाय भिपी स्वनिरिम्मम् । मपत्नीधानिता यानि रिमुगा रनम्माणि ॥४७॥ या मीराममग ममनि नरपारना । पारा पनिाम मार्द रियापि मनाए॥ ॥ dyAILArt समीक्षा Catdai Mutu Ret-1 । Omne ८० जम्मूस्वामिचरिते- कदाचिसकेसौ पा रफन्त रमणैः सह । योफ्यनवीयीपु फामुक्या पर्यटति च ।। १ ।। वनास्ति बसायी महापयामिपानमः । यस्प तमीमपी फीतिविस्मृता अपनप्रयं ।। ५० ।। निर्धानां च नमाना स्पादपीपः सर्वसंपदाम् । पर्दवमिवाना रस्नानामपिपा स्मृतः ।। ५१ ।। पदसणावमुपायाम पतिश्चैकान्तिीयकः । दार्षिशस्कसासामा भूपानो सपिवक्रम ॥ ५२ ॥ पण्णवतिसहसाणा पापि वलमा स्मृतः । मम्निनीना समस्साई सहस्रशिरिमोदितः ॥ ५३ ।। तम काचिन्महादनी मनमाछा नाना मवा । रक्कमविपी सासीरिम्पोपपपपफिमः ॥ ५४ ॥ वार्मेऽभववारासौ मनदरचरी'मर । क्रमालम दिन सप पुमानमनि भूतल ॥ ५५ ॥ वा भन्मास्सरस्वस्प रुची सदितमिमा । पाचकम्पो याफार्म दच पर्णादिकपा ॥ ५६ ॥ सूपाणां निनदेस्सप पपिरीकवदिमयम् । गायटीमगठाहीवि नृत्यति स्म परतिपः।। ५७ ॥ मासमा पप समे मप्राप मुमममीमच मत्व निपया। . समाविमापतिपुरीतबगामधारयम्वनिमयरमी मापटपमयपत्रमावरस्थगगमनवणनम ८१ पटुप्पारणदाश्च गपपपादिसम्मुतिम् । नरा कुमुमसमिभवनठवचर्मिता ॥ ५८ ॥ नय पुत्रानन पकी निरीक्ष्य मृदमायया । पानवादी यथानद नभत्माप्य रसायनम् ॥ ५० ॥ तनावकज्य या वधूवर्गममारिन । नाना भिरमार न सम्पावधाभिधानम् ।। ६० ।। ननधप पय पानदिमाप दिन दिन । यया चाननमी नन फन्गभिधतऽनिमम् ॥ ६ ॥ अमर पानुरफस्य फरलं न नदा मरन् । किनु यानरक्षण हननालिन मननरपि ।। ६० ।। मानातकपागमारष्टवलममानित । पराठ मरनाखाणि नदयानुगतानि वै ॥ ६३ ।। वती नम्रपियार्या सगीतमापि नाफ। पद पारगृणापना भूभागदरणक्षपः ॥ ६४ ॥ मारिना-य मन्याभि मम नम्छमपरभि । नरिणानटपुतन परमान्सरमरिणा ॥ ६ ॥ गनन म्म मागध्मौ मम सामनमपिभि । निनिता नामांतिरिरिका ।। ६६ ॥ दानिहीतगार्टीभि रमा म्प गुभानन । पितापनान प्रीति पग्निान ॥ १७ ॥ निगरा पाना भानो प पानिप्पताम् । चायना परस्पररिराणि ॥ril ८२ चम्बूस्वामिचरिसे- कविस्कपिस्पगाप्ठीपु विमायरसपु ष । फपिस्त्रीगदिससायो चिकीर सा योपनैः।। ६९ ॥ पनोपपनपीपीए सरिता पुलिनपुर। सरग्सु नलीगये कासाभिरगमन्मुदम् ।। ७० ।। भारिंगनं दवा लीगा कयाट्रिककमणि । नासां स्मितपयसश्च रनमाना सामाः ॥ ७ ॥ कदाचिन्मानिनी मुग्पा कापना मणयास्मिफाम् । नयति स्म ययापायमनुनप नयात्मक ॥ ७२ ।। फपिस्पातय गत्वा मिनपिम्यानपूनपत् । पारिर्गपादिसामरया मारगुदपा च पारन ॥ ७३ ।। कपिटर्म भूणाति स्म गुरम्पा मुम्भकारकम् । स्पं प्रिपफुमारासो पोपनऽप्यगमन्मुदम् ॥ ७॥ मंतर पुरीकिम्पामस्ति सागरपदमाः। मारवयरः साध्य भागसागरमध्यम ॥ ७५॥ अवान्पगुः समायाततिराप्तिर्मनिसचमः । पतिमावि जगत्सव यस्य शानचतुष्ये ।। ७६ ।। सम्पारजनास्तम पटनायें बन पप । पीप मागरपदाऽपि नगाम मनिसनिपा ॥ ७ ॥ तता नागरिफा धर्म पापविनयान्विताः । स्त्रीय सागरपदस्थ पुषणवि स्म मतिरम् ॥ ७८ ॥ क्वोत्रादी निस्तम विमृश्पारपिपापा । शृणु पम्स महामाग पच पूर्पभमानपम् ।। ७९॥

भाष भवइमप्रझातरस्पर्गगमनयर्णनम्
AB
जम्पद्वीपध्य क्षत्रऽस्मिन भारत परतान्विते ।
दमऽ मग रम्ये वधमानाभिघ पुर ।। ८०॥
युना दिनपुषा स्याता वदविद्या पिदारौ ।
मयमा भावग्वाम्या द्वितीया भवयफ ॥ ८१ ।।
अयस्ता स सोयममुनिना मनियापितः ।
मारवस्तप नीघ्रमग्रीठामीफ' ।। ८२ ।।
मरदवा मधूभ्रावा नप्तस्तिष्ठति सपनि ।
"न्ध गन मियान्याला स्वाधिफाराममनन ।। ८३ ।।
धमानुरागत साध्य भावदा मुनिस्तदा ।
धातर पाधिमु ना म्यानगाय पुन ममी ।। ८४ ॥
मता अमापार नीयमानाऽप्पवक्रनाम् ।
मनन्याभप चलनारान ही नमार मुदपा । ८५॥
नतादिनान नि मन्या यनतत्पर ।
पर मुनिमानिध्यापारियझनिधि पुन ।। ८६॥
कमापिरनरं काम पारि घरमा गुराम् ।
भंन ममापिपरण मापन पृणपुम्पन 100
ना मनतपागम्य नती र गिरे जमत ।
नागदनप्यायो नानी पूर्णनगरम् ॥ ८॥
नसमा दिन्यभागार ना निन्नत्वनीम्न ।
पनाभिनागनान रम्पान गारमागरमतम् ॥1॥

८१ जम्मामिचरित- -- स्वापुर सवश्युत्ता नदवनृपासप । जावस्त मानदेवी य स ल सागरचंद्रमा ॥ ९० ॥ मपदयपरस्वष पपवतिमाननि । नाना शिवकुमाराऽसाराजस्त्री मानुमानिय ॥ ९ ॥ भवानिपाण माप्प स्वीपां भपस्मृतिम् । पुससारमागप चिरक्त स भरिप्पति ॥ ९२ ॥ माकई उमारा सा मुनिमाम्यागानग्म् । ससारासारखा मला नाता पर्मपरायण ॥९३ ॥ भाा जगदिदं छत्स्नं मन्ममृस्युमरास्पदम् । भप सारः फिमस्ताति चिंतयामास सचम ॥९४ ॥ साराऽस्पम दयापों मना मसिमुलपदः । स चन्द्रियकपायाणां दुर्मट दमनसम ॥५॥ पापा स पर मीपन स्वात्मन मुसामिाता । इति सागरचन्ताऽसौ निश्चिाय पिदावर ॥ ९६ ।। ववस्वस्प मन पान दीक्षा नग्राद माविद । सारचिव भूपासनि शल्प सरमन्तप ।। ९७ ।। सत समससासासा रिपुमिप्रसमा नमी । समः पिदपन सौप मीरित मग्ण सम ॥९८॥ पायाभ्यंतरवा पा तपमान यकार सः। परीपापसमाप न पचास समापित ॥ ९९ ॥ १ दमयने। मनमोवपतिपरक्यानरमपरिगतिमिहयाम्पत्र- पोमा पाई तप । प्रातपिपीनवासमा पर मुममच्चामपुचरम् ।

मावदेवमयाझोत्तरस्वर्गगमनवर्णनम् ८५ झमात् कुर्मन् विहारं स पारणद्धिविराजितः । समाप्त भुतसपूर्णो वीतचाको पुरी राम् ॥ १० ॥ सप मध्याकासऽसौ कतर्यापयशुद्धिमाए । पारमार्यमनौदत्या (त्यं) रिनार्प यथाविपि ॥ १०१ ॥ रानसोपसमीपस्य कस्पपिष्ठिनो गृह । नवकाटिरिशुदः स ग्रास जयाा शुदपी' ।। १०२ ॥ सनिदानस्य माहात्म्यारत्नप्टिरभूचदा । नमीमार्गास्मधाराभिर्दा पुम्यगृहांगणे ॥ १०३ ॥ अपसाफ्य मना सर्व नाषकाः परसरम् । नमः किमिद तूणे मात पिपास्प मात् ॥ १०४ ।। परस्परमियादाद व फोलामाऽभनि । नव शिवकुमारोऽपि भुसमानितितकम् ॥ १०५ ॥ आनदात्वाचापि सापस्पाप्रप निरीक्ष्य तम् । मनीश विस्मय माप किंपिधिपतियत् ॥ १०६ ॥ म स्वापि मया रो मुनीशीध्ये भातर । महा में मनानादि सस्कारासूरमन्मनः ॥ १०७ ॥ प्रणम्यन मुनि गत्या संषयविशावय । रवि पिचे चिंतयामास वावग्माता मपस्मृति ॥ १०८ ॥ वया सर्प सदामायि पच पूनमसास्थितम् । नूनं मम म्यठो भावा तपस्याऽय महामुनिः ।। १०९ ।। भनेनम तदा पर्मे स्थापिताजमनुप्रात् । सन पुम्पादयेनेव माता सौम्यपरंपरा ॥ ११ ॥ पद तमिम विमि म समर ।

८ जनस्वामिचरित- - अक्वा सनामारास्थान् मामागाननतम् । प्राप्त किया जन्म चास्पठे सरसंपदाम् ॥ ११ ॥ शामुम मम भ्राता गतिमचाये रुपापर | स्मरन मांतर प्राइस्तत्समीपप्रामचदा ।। ११२ ॥ मात्रामपुट' साऽप रा त सनिबरम् । मुमृछ मनिपालस्थः प्रमादारगदापि ॥ ११३ ॥ पत्रपती तु तप्युला बगावागतः क्षणात । मादुटिरस्थितिवाप्पामा पिससाप महीपति ॥ ११४॥ या पुम किमवाद लयापारि निश्पकम् । फिमन कारणं वत्स बद पाफ्यमभीवितम् ॥ ११५ ॥ पापितकांताविनाठा कंपमाना ससानसात् । भासामवासमाापति मप सता यथा ॥ ११६ ।। काचिन्मुग्पापि प्रेमाच्या विभीवा नमसगम । सापावयाप म्पत गविधि कालम् ॥ १७॥ कापिन्मभ्पावितासम्पारद्धा कामरस स्फुटम् । सदिमागमयावाम पनि स्म स्मरातुरा ॥१८॥ प्रचिौरा रसमा प यासाप मुमीपम । स्मारं स्मारे गुणांस्तस्प स्पिना पिप्रापितन सा ॥ ११९॥ सर्षे पारजनामापि पाठीमतपवस । सर्ण यापदसौस्पिस्पादभं पानं च नाददुः ॥ १२ ॥ एवं सम महान् पोय माऽमनि स्वस | हानो इम्पपदार्पस्स मीतिः फेा न मायत ।। १२१ ।। अभयम्।

मावदेवभक्देवप्रयोत्तरस्वर्गगमनवर्णनम् वदो ययाफयपि यमनीताऽवपानंताम् । छमारः मतिमुदाऽभूत्सास्रांशुरिमाइनि ॥ १२२ ।। पृष्ट' संघः कुमारोऽसौ पथ मळभषक्षण । ययाशु यपार्यत्वं अमद माक्यमुचमम् ॥ १२३ ।। वतावादीदिमृश्यासौ गुपमाफूतमात्मनः । सार मंपिपुप्राय नाम्ना सवर्मामनियम् ॥ १२४ ॥ चिंताग्दगार्तानां मित्रं स्यान्परमपिपम् । यता युक्तमयुक्त पा सर्प तम निवेपत ॥ १२५ ।। पिपाई मवभागभ्यः सप्रस्वास्मि मवान्धित । नानापानिपतावदु स्वमीमैर्दुरुत्तरात् ॥ १२६ ।। वदाकव समादाय कमिम्मत्पर्य वप । समें समपरस्पान फपित रस्मम्मणा ॥ १२७ ॥ स्वामिमसौ समासममम्पनीमा पिभुदरम् । पियस मन्पमान सन्साम्राज्यं वृणपषित ॥ १२८ ॥ सपयाप निरकास्मा सर्वमागपु निस्पृह । न पास्प लनवापीश मूर्णा स्याग्जीवन धन ॥ १२९ ।। अप स्वारमस्पम्पास्तवपदी विदार। सर्प यमुपादय पचि अनो पविषषा ॥ १३० ॥ न फनाप्यन्यवाफ मयत समृदिमान । रागपास्यमाचारपसोऽपम्नाचम् ॥ १३१ ॥ सौमतं प्राप्तवराम्यः संस्कारापूर्वमन्मन । निसल्प सांगीरपु प्रामाभिपुरसञ्चयम् ।। १३२ ॥ ममोह।

जम्बूस्वामिचरित-
-
भाफद परभक्षी निप्टुरं वमघातवत् ।
म्यग्र पतममस्कार न घफाराचरप्रतम् ॥ १३३ ।।
अर्ण पपपुरस्पासीदि म्यामारामासिनि ।
मपदभुसमागमपधु पदमारली पलाद ।। १३४ ।।
गनदं प रा मत्पमनपरुणास्सन ।
पिसाप पीपाछी का पिपिदैवपपिवम् ।। १३५ ।।
भन्यपा चिंतित कार्य पारसपपर्वज्यपा।
यपा गारिनमध्यस्म पदपतः करिणा इव ॥ (३६ ।।
ब(दिस्यप ससवाप परविन्पनत्यशः ।
भंग पुरजन' सार्च मनमाना गता वदा ॥ १३७ ।।
पुष नापि वएन पाठिवस्व स्वर्नपय ।
प्रनगरमा मनिधे पियते नप संप्रति ।। १३८ ।
खात्यावस्पा पप पस्स पर मनपापद मात् ।
दं कार्यमसमापि घटच न फवाचन ॥ १३९ ॥
नवा संस महामागान दिम्पानपरतुसमान ।
भानफ्स्सस्सा साम्राग्यपदसंस्मितः ॥ १०॥
उत्पाटिक पितुपापं मांगीरकार सः।
कुमार प्रविसाप च ददी कामसपा गिरा ॥ १४१ ।।
मात मनपान्मून पंभ्रमेव व जमिः ।
चतुगविमरा स्थित स्वापि न नियतम् ॥ १४२ ॥
फदापिधारका मुस्ता भवति विपना नरा।
मन स्वासये मृस्मा स्पारंपीय मान्पफ ॥ १५३ ॥

मापदेवमयदेवमातरस्वगगमनवणनम् पुषः कोऽपि न कस्यापि पिता वा न मुतस्य वै । उन्मयति निमज्जति जीवा जलतरगवत् ॥ १४४ ।। नपं सूक्ष्मा पित साध्वी सन्निमत्याजियवा यत । पई स्यरत्या भिवान्यष पण्पदारर परसा ॥ १४५ ॥ कर्नया नाम विपास क्षण थाऽनवपानत । उकामिसारिका तुल्या फारण दुस्वसफट ॥ १४६ ॥ मागा मनगमागामा: सयमाणापहारिण । स्त्रमन्द्रमामयचात तारुण्य पिपयास्पदम् ।। १४७ ।। द मस्पक्षता मान प्रत्यभिज्ञानकारणम् । स्पास्साधी यति राज्यभी फय त्यक्ता मार्षिभि ॥१४८ ॥ भूपतऽप पुरावृत्त भीमता मानसापना । त्यमा सोगसाम्राज्यं तपश्चकुर्विमुक्तये ॥ १४९ ।। पर वाव समाधानमर्स माग्यरमाग्यकैः। मापात मधुरै रम्पम्पिाक कदुरि ॥ १५० ॥ से धर्मो यम नापर्मस्वत्पद यम नापट । वम्झार्न यम नाहान वत्सुख या नासुस्वम् ।। १११॥ भुत्या पुत्रपसमक्री प्रमसंदर्भगर्भितम् । निषिकाय वा प्रामः मुतस्पापि मनीपितम् ॥ १५२ ॥ १ पवित्र । पिलो' लो। ३ परस्तिनापम्पध्मे पतमापसे भी निम्नमेनपाम्यते। सपो बाकपालमुत्र नमुन। लगाने मप्र नमी सा गनिमत्र मापति ।

सम्सामिपरित-
न्न स्वामहितापासी निविष्णा मचमीरकः ।
उग्र तपः समादाय गंवात परमा गतिम् ॥ १५३ ॥
मानमपि महामारामाप घरणीपति ।
भूना निर्धार कारुम्मे मपि यथान्यभरीरिषु ॥ १५ ॥
पातयकनिष साम्प पयासाचय समितम् ।
सपा त तपस सिदिमम भावत्कदर्षनम् ।। १५ ।।
वस संमस्यिता भूत्वा र पुत्र पयप्सितम् ।
उम्र सपायवादीनि यथानाक्त समापर ॥ १५६ ॥
रागर्दपी न विपत यपारमम मनन किम् ॥
स्पाता पदप समातठानन बनन किम् ।। १५७ ।।
इस्पाटि पिनाम्य भत्तासी करुणास्पदः।
क्षण साधयमी तपा निस्तरगसम्मत् ।। १५८ ॥
वना मृदुगिरीराप इमारः करुमादिव ।
एपमस्तु परिप्पा पपा सात मनीपितम् ॥ १५० ।।
कुमारस्वपिनान्ननं सनसंगपरासस ।
ब्रमचायकरसाऽपि मुनिपचिष्टव ह ॥ १६०॥
अफामी कामिना मध्प स्पिता पारिजपप्रवन् ।
मा वानस्प माहात्म्पं दुसभ्यं मावामपि ॥ १६ ॥
कनिकांवर फट्पन्श्य पदारन ।
पंचान्तरम्प मासान्त स्म समलमावनम् ॥ १६२ ।।
प्रागई मदमारं कवचरिवरमितम् ।
मावच मिधपानीत मिश्रण सम्मणा ॥ १६३ ॥

मायदेवभयदेववक्षाधरस्वगगमनवर्णनम् वा तीव्रतपावडो दममानं विसाक्य वै । मारझाषादया नटा प्रादुरासम त पुन ॥ १६४ ॥ एवं पपयत् पष्टिसहस्राणि तपस्यना । नीवानि पापमीवन मारण महात्मना ।। १६५ ॥ सापुरते वसा जावा ययामाता माहामुनि । त्परत्या चतुर्विषाहार मास्पषिधी जिद्रिय ॥ १६६ ॥ स्वस्वप'फसान्मूनमणिमादिगुणान्वित । समाचर मुरन्दाऽभूद्विपुन्माली तामपया ॥ १६७ ।। आयुन्ममाणपस्यासीपसागरसंख्यकम् । मागदव्याऽपि वियन्त पतस प्राणवण्ठमा ॥१६८ ॥ सोऽयं प्रत्यक्षती राजन रामत दिपि दपराद् । नास्प फातिरभूछा सम्यक्त्वस्याविशापित ॥ १६९ ।। अप सागरचन्द्रामा यो मुनियतवत्पर । सन्यासन वपुस्त्पस्या प्रतीन्द्रस्तष साऽभवत् ।। १७० ।। सोऽपि नानाविष सौरम्प मुक्तं पपाससमयम् । मनोमिसपित रम्यं निषिनं च ययाप्सितम् ।।१७१ ।। पमात्सुस उर्स श्रीसं पर्मास्सना हि सपद । इति मस्या सदा सम्या पमा प्रयत्नत ॥ १७२ ॥ इतिर्धा जम्बूस्वामी चरित्र मगरम्भापश्चिमतर्थक्राप शानुसरित म्पावादानवगविशार पतिराममस्मविरचित साधुपासासनयश्रीसाघुरसमम्पति माक्देवमकदेवमोचरागमनपर्मना नाम चतुर्थ सर्ग ।

अथ पचम सर्ग
अजन्तु मगलं निर्त्य पविभनिनापिपाः।
भीसाधुटाररस्पास्य साघुपासात्मनस्प नै ॥ १ ॥
प्रत्याशीपारा
मपा पार्षराषिर्ण पंविघ्नाघशान्तप ।
पन्प्रममा नौमि चन्द्ररापिपाश्रयम् ॥ १ ॥
भवावः भगिकी नम्र पृच्छति स्म गणाधिपम् !
"मा सम्पप्रतापि कृत पुष्पादिशागताः॥२॥
भासा भासराणीश पद संमपपिरिम।
नवापाप गणमाना पिनयमापा हि मागिन ॥३॥
शृणु भमिक देषऽस्मिनगरी स्पारपंपापुरी ।
नपाप मरसनास्ति भीमसामग्रना परः॥४॥
मस्प भावपतमा स्पस्वासो नामान्पप भृणु।
जयभवा मुभद्रा प पारिणी च यथामती ॥५॥
भाभिमागान मुक्ति स्म पिर यारपएमादयः ।
पुनःपालीरितः पापस्वीमसलनसमम ॥६॥
नमः पापादयादय स्पाझपपमपं वपु ।
युगपरसपरागाणो सभिपातमिरामवत् ॥ ७॥
मासा भास आपापर मसादरमगदरी ।
मंभिमठी मारापुरसपस्तस्प पामचन् ॥ ८॥

अथ पचम स
फुमन्तु मगम निरपं चतुपिशमिना
भीसाघुग्रडरस्पास्म साधुपासारम
मुपा पारापिप्णु चंद विनाय
पन्द्रसममई नौमि पन्द्रराचिर्पश्य
भयाव भणिका नम्रः पृच्छति स्म
"मा दम्पपतत्रापि कृत पुष्पादित
भासो मातराणीश पद संभपपिपि
नोपाप गपत्राना पिनयनाचा हि
शृणु भणिक देशस्मिनगरी स्यारम
नप्रापः मरसनाऽस्ति भीमवामप्रती
नम्प मापाश्चत्तम्मा स्पुस्तासो नामा
मयमा मुमशप पारिणी प पश्चाम
भाभिमागान एनक्ति स्म पिरं यापट
पुनावादीरित पापस्वावसहर्समर ॥
मनः पापादपादन स्पाटामयमर्प वपु ।
युगपन्सबरागाणा समिपावमिमनन् ।
फासा भासः पप जमावरमर्गरी ।
मपिमती महापापुरसयस्तस्य पामयम् ॥ ८
रोक्का

बच्छिभित्र समादय मातपूर्वमिनामुना ।। ३१॥ भनधासादिविपासु दुष्कर नास्य किंचन | निषायति स्पचिचऽसौ गपी गस्वा पिनदि । मातम्तना नसरे भूपस्पान निरठितम् । स्माफयं म्पपापन्निरानीसाप निजालयात । पपवान मीरफमासा ममुर्व स्थितवानित ॥ ३७॥ मांगान माफ्तु ममामाऽसि या स्व मम मा भतिः । पथप्मितान मागान् मेल पापिदार फलनादियान(फप)३९। यस्मिचिगन भ्य ताण ममक्षत ॥१०॥ यम्बूस्वामिमातकर्मोत्मवशशयविनोदयर्णनम् यपदृष्टभूतं गाय मान विज्ञानमफन्न । एभवानुभूतत्वाभ्यास कर्पताऽनिनम् ।। ३२ ।। भन्यपश्चिमयामास दुर्दमाएपुटिमान | शिक्षित न मया चौपमक सर्वगुणाम्परम् ॥ ३३ ।। नै मन परिश्या तप्र सफरवत्मियः ।। ३४ ।। नतम्बादाय रत्नानि महापानि मनीपपा । गच्छन् दृष्टः स कनापि रस्नादपावरनन्पफ ॥ ३५ ॥ युत्मा पम्ततोऽनाठीढगारानीपा सहि ॥ ३६॥ नीता पापयित रामा सानव सौम्यपा गिरा । पप चार्यमिद निपं कस कस्य कन स्वया ॥ ३८॥ पतिपिासमं लाप तन्मुम ममालय । नई पार्य मानिधमिरामप्र पम्मम् । पारण परापान सपसंतापपारणम् ।। ४१ ॥ मिष।

जम्मूस्वामिचरिते-
-
चतमाऽपि सवस्तूणे निमिष्णा भरमीवितः ।
मायिकामवमादाप निययुः समबन्पनात् ॥ २० ॥
पयागर्म सपस्ती संतपुस्मा गुमाश्या ।
मन्यास मरण रुला दम्या प्रामाचरऽभपन || २१ ।।
विपुन्मामिमुरम्यास्प समावास्ता इमा नृप ।
मार्या माणसमा रम्पा नानासासम्पाम्पिमभ्यगाः॥ २२ ॥
भृत्या पमकपामना भणिका सुदमाठपी ।
मना म्यापारयामास पुनः पर समीशिवम् ।। २३ ॥
म्मामिमप स्वया माक्तं पिगुन्मासिमरस्य यत् ।
सिम पिएपरणासी तपस्तीन ग्रीप्यप्ति ॥ २४ ॥
पामि पिएचरी नाना कुअम्पा किएसी महान् ।
कर्ष पारस्पमापमा मविप्पति कप मनि ॥ २५॥
पतचं रुपां कस्पा शह मन्नािं पर ।
मम्पास भातुमिच्छामि त्वचा पर्मफमाप्तये ॥ २६ ।।
ननामानिनेपाना रूपागारिपपानिपिः ।
मणु भणिक पमम्प मागत्म्प परमाग्रुतम् ॥ २७ ॥
भयाप मगप वन विपत नगरं पान् ।
मिनागपुर नाम्ना म्ममाकापुरापमम् ।। २८॥
नमामि मम नान्ना यूपा गदेरमरित ।
नम्य मायाम्नि श्रीपणा कामयष्टिः प्रियंपदा ॥ २९॥
नपा: मनरनाम्ना पिदान रिएनरो नृप ।
मितिवाः मकसा रिघा पर्टमानहमारवः ॥३०॥

जम्बूस्वामिजासकर्मोस्मयशशनमिनोदवर्णनम् ययष्टमतं गाय मान विज्ञानमेकन्न । बच्छिसिव सणादन झालपूर्वमिमामुना ॥ ३१ ॥ मनभानादिविषामु दुप्पर नास्य पिंचन । भवानुभूतत्वाभ्यास फुर्वताऽनिश्चम् ॥ ३० ॥ मन्याश्चितयामास दुर्दयादृष्टपुद्धिमान । शिमिस न मया चौयमफ सर्वगुणास्पदम् ॥ ३३ ॥ निघापति स्वनिधऽसौ गरी गत्वा पितद । नाचन प्रपिच्या वप्र तस्फरवत्मियः ॥ ३४ ॥ ननपादाय रत्नानि महायानि मनीपया। गच्छन् द स कनापि रत्नाप्पावरनल्पक ॥ ३५॥ पासस्तना सस्स भूपस्यान निरनितम् । भुस्सा भूपस्ततोऽभाटीदगागनीपता मरि ॥ ३६॥ "त्याकर्ण्य स्वपापभिरानीवाऽपि निमालयान् । पैर्यवान पीरकमासी म मुसं स्थितरानिव ॥ ३७॥ नीना पापयितु गमा सामंर साम्पया गिरा । पत्र पार्यमिद निपं कम पम्प रुन मया ॥ ३८॥ भोगान मान सम्मासि या स्प मम फा भनि । पपप्मितान मोगाम् राम पापिदादफनारिबान (कदप)३९ । यत्किचिलम पाक तत्मुलम ममालप । यमिचिद्रापत तुभ्यं तवाण समक्षन ॥४०॥ पाप मानिमिरामप्र दुम्मम् । मा कुमप्प मामान ससंतापारणम् ॥४॥ रहातमि।

जम्म्यामिचरित-
भुत्यापीदे पचस्वयं नासावपश्चम ययौ ।
सर्कराति पया पथ्य सम्पराप न रापते ।। ४२
तत. मत्युचरं पायं ददौ चौर्यरत अठः ।
आ चौर्यस्प रानस्प भेदाऽस्त्पप्र महानिति ।। ४३ ।।
राग्यस्प ममिवा लक्ष्मीः चौर्यस्पाममिवा पसा।
सुस्पता न तपोरामीचमा प्रामा गुणस्त्पर्य ॥४४॥
मेरपीय पिन' मक्ति हत्यारत्यासमीतकः।
अगात्परास्मसी दुष्टा नाना राम पुरम् ॥ १५॥
सबास्ति सस्मरस्मरा वश्या कामसवामपया ।
मासकासा तया साथै मांगान मुक मनापितान ॥ ६ ॥
पौर्येणाभितं दम्पमनायासादानिशम् ।
पयाकाम स बइयाय ददाति स्म म्परातुर ॥ ४७ ।।
इति मन्नात्तरं माप्म निगर्व भगर मुम्नात् ।
शुतोप श्रेणिको यूपा भूयः मन्नापताऽभवत् ॥४८॥
मगरन यस्खया माक्तं पिन्मासिकपानफम् ।
सप्तम बामर सगादपमप्पति मतस ॥१९॥
स्प पुम्पबवः मम मन्मना भूपयिप्पति ।
पृष्टः कर्मन समापान मगाठ मगोपविः॥५०॥
मा गमता राजन रानवे श्रीसमान्मतः ।
भारासामिप भी जनमकतत्परः ॥५१॥
तस्प मार्या मुस्सापा नामा मिनमवो स्मृता ।
धर्ममार्विमहासाची सद्विपम मुसाहरा ॥ ५२ ॥

जम्बूस्वामिमातफर्मोत्सवशैशवविनोदवणनम् ९७ वस्पा गर्ने महापूवे पुण्पादनवरिप्पवि । सम्पम्दर्भनपूतात्मा सक्तिमा मषिष्यति ॥ ५३॥ मय कश्चिन्महायतो नननिदानरः । मिनाक्पमुपारैः परिप्लामिवसाचन ॥५४॥ मप नाय मय स्वामिन् मप फेबसलोपन । स्वत्मसादास्कृतार्योऽस्मि माप्तं पुण्यफस मया ॥ ५५ ॥ पन्यमेतस्कुल इलाग्य यत्रोत्पत्स्पति करसी। मानुमानिस मात्पस्मिन् केबसमानमानुमि ॥५६ ।। स एप पापना देशस्वदन नगरं शुभम् । वर्स सट्टा पूतं यत्र धर्मपरंपरा ।। ५७ ॥ नर्वपिस्पाय पसाऽसौ स्वासने स्थितमान् सदा । भेगिका पृष्यति स्मैततिमिद हि मा बिमा ॥ ५८ ॥ म्पानहार गणापीया रामानं आणि प्रति । नगररेय भी राजमासीदणिकमुता पर ॥ ५९ ।। पनदसा नाम्ना सौम्पा साम्पा श्रीपनटापम । वस्प माया समाख्याता नाना गोप्रमती गुमा ।। ६०॥ सापाल्पा(दक्षासौम्पस्प फैपर्स भयसापि च । स्पष्ठ पुमस्तयोरासीसाऽविपुटिपान् ॥ ११ ॥ सत स्पापसपीमाप मिनदास इवीरित । ॥ ६२॥ सयामप्ये कनिष्ठय या मिनदासः समास्यया। दुर्दैवयागता मून स्यास्सम्यसनातरः ॥ ६३ ॥ H H ---- ९८ सम्स्वामिचरित- पसंमचि पिपन्मर्ष सर्व गपिका फषीः। पूर्व मावि पापात्मा निपकर्म फराति च ।। ६५ ।। इमाचौर्यादिकं सममिरामुभ प दुम्मदम् । किमप्र पहुनाक्तन स स्यास्सपझियामयः ।। ६५ ॥ महो प्रसिदिसॉकस्मिन् पवादममवादय । एकस्मादपसनामष्टाः माता दुःखपरंपराम् ॥ ६६ ॥ मर्प सः समस्तु म्पसनैलोसमानस । अप को पा परबश्च दुम्से पविष्यति ।। ६७ ॥ एवं पौरमनाः सर्वे भानन्तीह परस्परम् । दुचनं पदंवि सास्तस्प पिक्षादिहतये ॥ ६८ ॥ मपान्पपुर्दिन वन फीरता पूतममसा । पारित कांचन वापपापमास्ति स्वसपनि ॥ ६९ ॥ सवस्वेन ग्रीवोऽसौ प्तकारेण शपुणा। स्वरित देश में म्यं यस्याप परामितम् ॥ ७० ॥ तताऽसा निष्ठासापराकुमाऽप्त्परामितः । पारपमुचरमात्र स उक्तानसममसम् ॥ ७१ ।। पाप पर्न म स्पात्माणावपि पसरमा। बपपन्पादिर्क सपमनिएं इरु सबन्नः॥ ७ ॥ मृमम् निनदासनार्फ सपिय' इपिताऽमपन् । हामी मास्वर्ग मामानय से सस्तव ॥७३॥ ममा १ मेडति इति वारा। सरित! ४ समौक्ति । ५ रासयमित।

अम्ब्लामियातकोत्सपशेशमविनोदवर्णनम्
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नान्या गतिवित्रीय मानीहि त्व सुनिश्चितम् ।
परस्पर विवादाद मात कालाला महान् ।। ७४ ।।
दुहन बन रुऐन सप्रियण प्रकोपतः ।
वस्य पापोदयाप्चैव जिनदासोऽसिना एवः ॥७५ ॥
मूति स समालाक्य सापरापात्पापित।
सवः पारजना सर्षे द्रष्टुं वागता क्षणात् ॥ ७६ ॥
रासीऽपि वप्रैत्य या तं भ्रावर निमम् ।
क्षणादारुविधाऽपि निन्य यत्नास्मसपनि ॥ ७७ ।।
मानीया शस्त्रयोऽपि तचिकित्सादिस्वर ।
क्यापि न समापान मदम्प दुगत्मन ॥७८।।
रदिवे दुपारी मतीकारा पालिसः ।
निसगवः खसे सि रुवाप्पुपरुवियया ।। ०९॥
व प्रतिमापमानेतुं पर्ममापदति मवन् ।
आरासम वत्सीस्या मैनम्ममपीपदत् ।। ८०॥
भ्रातपास्मिन् मया मीयो मिप्पामति अठः।
भ्रमीवि मार्ख परातरनतम ॥ ८ ॥
मिध्यावं पिपपा यागा: पपापा पन्पोवर।
मप्र प्रतादि म सोपट्यपि गर्दिवम् ।। ८२ ।।
गवादिम्यसनानिां मून स्पाइपयनम् ।
रहामप्र मातीय कर्मासात समायेत् ।। ८३ ।।
तषयाम्पसनो प्राव प्राप्त एवफल माद ।
न्न रिदि परपापि वीयर्स परिप्पवि ॥ ८॥

मायामिपरिवे-
भारासापरेनं विभुत्ताभूगरमीकका।
ग्रुप पर्मपीयप निनदासा गदावर ।। ८५ ॥
आरास समरिय मिनदासना पप ।
मन पदनिष्ट कम तत्मय मामफात् कृतम् ।। ८६ ॥
गोऽयं म पपा काला मयस्प म्पसनाने ।
अप मां रुपया भ्रात सापरापं समदर ॥ ८॥
स नन्मनि पधुस्त्वं पया सरितकारक।
परलाकऽपि धर्मात्मन् सहायी मर सपया ॥ ८८॥
मासाम्पद भत्ता तहप परणास्पदम् ।
सापन पर्मकार्यस्य पति पचे स्म शुदपीः ॥ ८९ ।।
मानवानि वस्पाता ग्रादितानि मनीपिणा ।
सन्यासन तता मृत्वा पताऽभूस्पुण्यपामतः॥९॥
नति स्म ववश्वासी निमुम्पास्मदयो मूप ।
मंत्पकासिनी मन्म मर्दश सनविप्पति ।। ९१॥
मारास पुमा निर्सद भपिप्पति ।
पिएन्मालिपर सोम्प जम्नामोऽस्योनसी ।। ९२ ॥
ववश्चापि परं भूप ममस्वामिछपानकम् ।
कपयिष्यति पुदीन्द्रा सस्युभ्यामनातच ॥ ९३ ।।
मुस्खा भीमगमहापर्य मदित भणि नृप ।
पमामाप्सित सबै यहीकऽस्मिन् परावरम् ॥ ९४ ॥
साम्यं गंतुकामीऽसौ प्रारम्भ स्तवन ततः ।
गयपपादिसदाक्पैर्मगावगुणानपि ॥ ९५ ॥

जम्मूस्वामिनासकोसवशैशवविनोदवर्णनम् १०१ AMAN- मय देव महादेव केपलमानसोपन । पारारिनिपे नद सर्वभूतहितकर ।। ९६ ॥ भय देमामिदर स्वं पतिकर्मचिनापरुन् । मोहमठोपमठस्त्य पर्मर्षियकः ॥२७॥ यथा स्वंभरण स्वामिभस्ति भिमगवामपि । सथा मे भरणं भूयापावस्स्यो त्यस्समा विमा ॥९८॥ इति सूत्वा मगामासौ भेणिका नगरं मति । कर्मन मिनोदितं धर्म कर्ममर्मनिर्माणम् ।। ९९ ।। राम्प हवि भूपासे स्मिते फासागमस्कियान् । सामिपः श्रेष्ठी राम्पकार्यपुरंधर ॥१०० ।। मार्या मिनमवी सस्प सातेर शीलभासिनी । पर नासंकता स्मरपि निभपिता ॥१०१॥ वो दंपती मिया स्यावा म्हादी सलसस्थिती । मागाम्भिमध्यगौ चापि अनपर्मपरायणी ॥ १०२॥ मयान्या मुर्स मुप्ता ससस्य भामिनी। निशाया पधिमे मागे संदर्भ समारसीम् ॥ १०३ ॥ पश्यति स्म शुम पूर्व नम्फउपदमकम् । भ्रमरासीसमासी संशोभि नपनमियम ॥१०४॥ निमा म्पसनग्मासा शासित प शाइसम् । सारमिदं सरा पश्यन् सपस ध पपानिपिम् ।। १०५ ॥ यपादातीमिभि समा मावा म परेदयत् । आकर्य भीमवीमाकासाऽमिनंदव ॥१.६ ।।

१०२ जम्बूस्वामिचरिते- पपानंदरम' केकी नंदति स्म पनागमे । अर्य सूर्ण समुत्याय नमहर्षन् पुनः पुन' ।। १०७॥ माष्टुं स्वप्नफसं पासौ प्रविष्टा भिनमदिरे । सबसपा मिनेभादीनपिस्वा पिशुदपीः ॥१०८ ।। मणम्प प मनीठानं पच्छवि स्म विश्चापतिः । सामिपप निश्वामागे पपिम मम मार्यया ॥१.९॥ भनया सस्ससादाश काषित्वमापली शुभा। स्पा फर्स यपानाप शाह समानसोचन ॥ ११०॥ मयापाप सनिः सप्नफसान्यस्मान्पयवभिगदे (१)। कामदेवसमा धजा स्पामम्फलार्धनात् । स पालोकारमदीपाग्नेः सपुल्यसि कर्मेन्धनम् ।। ११२ पासिपमेमणाबासी भविष्यति सक्ष्मीपतिः। स्पात्तमलाकरासोकाष्पपापीपदाधा ॥ ११ ॥ पापोपिदर्भनामेष्ठिन् ममाभिमुचरिष्यति । भम्पाना मुससमाप्त्यै मर्पियवि धर्मामृतम् ॥ ११४ ।। भुस्पा पर्मफसान्पुषैर्मूला सानन्दमानस । मनिन्द त्रिपा नस्पा भेष्ठी सहमागवः ॥ ११५ ।। अनंतरं दिममध्यस्था विपुन्मासी मुराचमः । मर्मापाने ससकान्दा श्रीमत्पाः पूर्वपुम्पव ॥११६ ॥ सवस्वपिनमारभ्म सासीरिमनमवी तदा । साससांगीप मदगी सस्पेदा नीमका ।। ११७ ॥ १मा मात् एमपरः ।

नमूसामिगातकर्मोसबाशयविनोदवर्णनम् आपहिस्वनगरपु शायिस्यान्मृदुमापिणी ॥ वयापि शुशुमत्यय रलगर्मापनियया ॥ ११८ ।। पिचमी भेगमायासा वस्या गर्भ स्थित भिती। घरमांगिनि सपापापर्मितापास्तदादर ।। ११९॥ भयास्या दाइदा नाव: शुभ सर्वोऽपि समदः। दरशासगरुणां हि पूनापां मीविरुषमा ॥ १२० ॥ निनपिम्पप्रविष्ठायां निष्ठापा पुण्यफर्मण । जीपस्पालपोदार दान चम पदापि ॥ १२१ ।। सं सरे पूरयामास भष्टी मदिवमानसः। कतारसार स सस्पीरान् सहारः पुमन्यन ।। १२२ ॥ नरमामानतिषम्य मुखं सा मुपूर्व मुनम् । तमस्तिनं महापूतं यथा मापी समारिपम् ।। १२३ ॥ उसम फागन मास सितपक्ष शुम दिन । गरिणीसंस्थित पन्द्र तयापप्ति मिनिमम ॥ १२४ ।। मन्मोत्सप रुतस्तन धष्ठिनानंदनामिना । पघुगरमपंथ नया पौरननः सा ॥ १२५ ।। नभप स्वर्गे पुष्पहारमा । पपुरावा मुनीता'प मुर्गपा पुष्परमि ॥ १२६ ।। सरपापि पनुर्दिष्ठ मपसारमहानिः। भूपत परपान धारण करणपिय ॥ १२७ ॥ नगुर्गीनं मीतमा फामिन्या ममिनभुर । प्पामृत्प पागन्ति माणसाफा ॥ १२८ ॥ १३ मम्म।

१०१
नम्बूस्वामिचरिते-
दुसर्मणिमाणिर्य मात्राम ग्रांगणम् ।
सस्केन पर्मित समय कपिनापि मोजसा ॥ १२९ ॥
दानं मयासस्वस्य भेष्ठिना न पनक्षय ।
दखिो न प सम्पावत्परं पामे दाखिवा ।। १३०॥
इति कल्याणमासामिासित सलवा गुमः ।
मम्मामीति नाम्नापि स्पाने पिमा सपना ॥ १३१ ॥
पाम्पी निमोभिवास्तस्प भेष्ठिना दिसतय ।
पखने मदने पास्प संस्कारे कीनिअपि प॥ १३२॥
ततोऽसौ स्मितमावन्नन्संस्मन् मणिमिषु ।
पिनोमदं सवानापे पस्पामृतपिष्टिकः ॥ १३३॥
जगदानंदि नेपाणामस्सो परममितम् ।
कसीग्म्पस सदस्पासात मिनो यपा ॥ १३४ ॥
एपस्मिवममदस्प मुखेन्दो पंपिकामसम् ।
सेन पिभोर्मनस्वीपमसपिर्पतेतराम् ॥ १२५ ॥
पीठमपा सरस्वस्या समस्या सिवपिम्रम ।
कीविवस्या विकासोऽस्प मुख मुपास्मयोऽभमत् ॥ १३६ ॥
स्ससत्पदं परिन्द्रनीसभूमिपु सपरन् ।
स रमे बसपा करम्मैरुपारमिम ।। १७ ।।
रत्नपरिष पिकीय स पयामिकरं समम् ।
पिनोमनसि सोपपातन्नन् ससिवाहविः॥१३८॥
ममाना दपदानन्द एणराहानिमिनि।
कीर्तिम्पारस्नापरीतांग स बी पासपद्रमाः ॥ १३९ ॥

सम्मूस्लामिमातकर्मोत्सवशेशविनोदवर्णनम्
बासारस्पामतीवस्य तस्यामधिर गया।
कौमार देपनापानामचिंतस्प मजिस ॥१४० ॥
पु कति मिया पाणी मपुरं वस्प पीलिवम् ।
जगन पीविमासनः सस्मितं च मनस्पितम् ॥ १४१ ।।
साश्य सफ्सास्तस्प पढी पटिसुपाययुः ।
दारिप नगपतो नंदनस्य जगत्पतः ॥ १४२ ।।
रिपपिपपरस्पास्म विद्या परिणा सपम् ।
ननु जन्मान्तराभ्यासः स्मृति पुष्णावि पुष्पलाम् ॥ १४ ॥
फसामु कशिस ग्राम्य मिवपिपासु पाटबम् ।
फियामु कमठौ च स ममें शिक्षया पिना ॥ १४४ ॥
मामयं सफर्स वस्य प्रस्पक्ष मा ममारमूद ।
येन रिचस्प सीपस्य याचस्पत्यादसहर' ।। १४५॥
पया ययास्प मर्पत गुणांचा बापा समम् ।
वमा दयास्प मायावती पषुता पागमन्मुठम् ॥ १४६ ।।
परमायुरपास्पासूपरम पिता मः।
मारोम्यं सामाम्प सौदर्य प मिशप ॥ १७ ॥
पलापिछिपिसस्पानं गपचादिकमागमम् ।
अम्पस्तपूर्वमम्पस्य सयमम्पासयन् परान् ॥ १५८ ।।
दापिपित्यसकारमस्ताराविपिपपनै ।
कवाषिनारपन गाठी चिपाप कठागमै ॥१४९ ॥
कदापित्पदगाष्ठयामा काम्पगाष्टपिरन्पदा ।
पापा सम मिजस्पायमिरन्पदा ॥ १५० ॥

जपूस्वामिचरिते- करिचिट्टीवामिनृस्पगोष्ठीमिरफदा । कदाचिदापगोष्टीमिर्षीणागोष्ठीमिरन्यता ॥१५१ ।। करिपिरस्पण नटती नटपटकान् । नाटयन परतासन सयमागानुपायिना ।। १५२॥ कदापिस्फोन्दुमन्दाकिन्माश्टामयम् । गंपन्य समी सं समाकर्णयन यशः ॥ १५३ ॥ फरामिणीपिकामासु सर्म पयाकुमारकर । जसप्रीदारिनोर्दन रममाण ससंपरम् ॥१५॥ सारप मसमासाप सार मसमिता। वारमैप्रक प्रीन् जसास्फासावारः ॥ १५५ ॥ पदापि वनस्पर्दिवरुशोमाषित मन । चनकी समातन्मन् पपस्परन्मित भिशुः ॥१५६ ।। इति कासामितान् कीरा मिनीदपि स निम्भिम् । मुसं स्पाइएपपीयो जम्प्रस्वामी प्रमारकः ।।१५७॥ इति सुगनपतीनामर्षनीयामिगम्य' सकपगुणमणीनामा पूर्णविः सा नृपतिकमारनिम्पिकाममोगा- नरमत चिरमस्मिन्पुष्पगो सपः॥ १५८ ॥ नारासीतरसा दपन मुगपिरां यहस्पसासंगिनीम् माम्पा दासनमष्टरीमिप या तो हारयाएं । म्पोम्नामन्यमयागु परिवपकांचीकसापान्वितम् रनम्मी नृपगारकासमः श्रीन् यपन्दुः शिशुः॥ १५९।। माम् ।बमापः।

जम्बूस्वामिनातकर्मो सकौशवविनोदवर्णनम् १०७ पस्मारपुम्यरिपाकवी विवि सुरा संनन्दि सोसाय परं यस्माधान पीवी नरररास्तायफराश्यक्रिणा। मापन्त बलमत्रफसममुसास्तरिणा विष्णव सेम्यो धर्ममाातरु महविभिपमास्किमन्यः परे ॥१६॥ इविनी जम्मूस्वामिचरित्रे मगनपश्चिमतीर्थकरोपदशानुसरित- स्पासवानगपगपरिशारदपण्डितरावमस्टविरपिते साधुपासातनयभीसाधुटोडरममम्पर्धिते जम्मूसामिमातकोत्साशशमविनोदवर्णनो माम पषम सर्ग ।

मथ पष्ठ सर्ग मीयात्स दौडर साधुर्यस्य कति समु मसा। पिस्वता गरि पूर्णेन्दारिप ग्यात्मा मुचारदी ॥१॥ इस्पाशीवार मुलिपि मरिपावार पर्मतीर्यस्य नायकम् । पीवर समापदे यस्प पार मुशीवसाः ॥१॥ मपास्प योपने पूर्णे मपुरासीन्मनादरम् । मास्पेन अशी.-.-किं पुनः घरदागमे ॥ २ ॥ निएतानकपण कामपं निरामयम् । सीरोस्पसवर्ग दिम्ब... -1॥३॥ पर कोटि दपान सौरमस्प। मरीचरसासेम समणानामस ॥४॥ PM --- -- पर्व मेम माठिसम्पषिम् ॥ ५॥ यममय- इननमीभितु पिदोपगमहाका नास्य दौम्य -मकरगापर॥ बदस्य ताप गावं परमौदारिकाइयम् । माम्मुदनिम्भप .. मसारणम् ॥ ८॥ H - MAH सम्पूस्वामिक्ससके लिहस्तिषशवर्णनम् १०९ मानान्मानममाणानामन्यूनापिकयां भितम् । संस्थानमापमस्पासीचरर्स समवतः ॥९॥ पदीयरूपलावण्पयौवनादिगणानमः। आकश जनवानेब{गा नान्यम रेमिरं ॥१०॥ आसारय तस्य सादर्य सर्गः परिननलिया। विदा मन्मयफाण्टन पव स्मरपीडिताः॥११॥ कारिधदन द्रष्टुं पील्यमाणा मुहहु । प्रीव्यासपिधा स्यान्मुम्भा कामातुरा सप्ती ॥ १२॥ सम्पारस्पापि वारुम्पाभवयौमनसासिनी । काचित्कामापिना दम्पा निश्वसती रिरंसया ॥ १३ ॥ पापित्मौरा रसभा च पण्डिता शास्त्रदशन । स्मरती वद्गुणानम स्थिता चित्रापितर प ॥ १४ ॥ कापिदावापन स्पित्मा गृहकार्यपराइसम्वा । माप्तुं ताभन न्न साभिसापानुलसिता ॥ १५॥ कापिकिंमिछल नीला निःसरी ससपनः । मरति स्म महावीप्पा या तस्य गमागमः ॥ १६ ॥ पारिवानापास सापासापि मिसम्मिता । कापसमयोदय चितवि स्माघर पयि ॥१७॥ शामिमन्मांतरऽपी भवार तरसम परम् । इति स्म निदानन सामपिपयानपा ॥१८॥ इस्पादिफामदासापादिराम्यामीहताः। ना सर्ग नामोऽप्पर पणिर्नु न समः परि ॥१९॥ दमामा ।

अमूसामिपरिते- साहिरं पैको या स्याम्पसदीपकः । न च मदं पुपा सास्राणि कुसहिपाम् ॥ २० ॥ कषिप्र विधानाया भुत्ला सद्गुणसंपदः । दारकामाः ससात्मीयो कन्पो सास्कंठिताः स्पपम् ॥ २१ ॥ पफ्स्तम पिठानापा पसपीमिनमाक्तिकः। भष्टी सागरदचास्य माया पपारती श्मा ॥ २२ ॥ दुीिता स्पाचपानाना पपधीश्च पचानना । दिम्पसौदर्यपयास्ति भरतारुम्पशासिनी ॥ २३ ॥ पनघोपरस्तष पवन प मणिग्नरः ॥ भार्याकनकमासाम्प्या वस्यासीच्यामनानना ॥ २४ ॥ नामा कनकभी पुत्री तारासीकमस्वना । वातसौपर्णवर्णामा साकर्णापतपनुपी ॥ २५ ॥ माग्यो यमपणा अष्ठी वासीदगिनां पतिः । कांता पिनपमासास्प सम्पान्तर्यामिपानका ॥ २६ ॥ आस्ममासाचपोर्नान्ना विनयभीरितीरिवा। कामपामर वनंगी समक्ष्मपिपिवा ॥२७॥ तुर्यस्तम पमिमचा विषये श्रीसमन्वितः ॥ स्पादिनपमती वस्प मार्ग सापी पवित्रता ॥ २८ ॥ स्पीरिवि विस्पाता क्योरासीस्मता परा। परवबिम्पापरात्री पृपुपीनपोषग ॥ २९ ॥ मपि वा साचवलोऽपि वरम्पो नपपोपनाः। मन्पपाना सामों मागिप्पत स्मरम्पवेः ॥ ३० ॥ १ परमेय पुनो एकपी । इति दियो।

जम्मूस्वामिवसतकादितियशवर्णनम् www सतोऽपि वितितं नैश्य पणिमर्यानिधि । इस्पमेनापित कार्य कतम्पमय सर्पया ॥ ३१ ॥ चस्पाराऽपि परामृश्य दवः भीघ्र समागताः। वो टाकामास्त फन्पास्ता अम्बुसमामिने ॥ ३२ ॥ अथैकापमिश्याशु निमत से समक्षत । भागास भाा भष्ठिन् पन्यासि त्व मगत्प्रय ॥ ३३ ॥ यसरे महापूत पुत्रोऽदिपपापनः । मम्मस्वामीति रिसम्पातसंसोश्यफशिलामणिः ॥ २४ ॥ अयास्मत्मार्थना सार्या प्रमापो कुरु सर्पतः । यसमन्दनयोग्या मु(स्पारस्मदा कुमारिकाः ॥ ३५ ॥ दचास्ताः भपसेऽस्मामिः फन्पा स्युस्तदरोपिता । अम्म्स्वामीति सद्भर्वा मां प्रीतिरुचमा ॥ ३६॥ युप्माभिः सममस्माकं मैत्रीमानः परसरम् । यया भूस्पा अपमीता पपमाशापरायणा ॥३७॥ समभय पयस्वा मुम्मा अप्ठी मर्द घन् । सस्मिवान्तापुर गस्पा मध निनमती प्रति ॥ ३८॥ माननद पदो पोन्मप्रायापिता सती । मायः पुपास्सम नार्यः सामिमापाः स्वमानवः ।। ३९ ।। सदाऽपि तसा मीत्सा भष्ठी तानवदत्मपी। मी यप्सित कार्य हर्षि यूपमुत्तमम् ॥ ४०॥ अयासपत्तापायां निश्चित्पादाममसा । ससरकारपुरस्कारा मग्मस्म म्यालयं मवि ॥ ११ ॥ पूनापपिर्व।

अम्मूसामिधरिते- मय मेमसगीति: स्पापंचानामपि सपम् । एकनीक्रियवे निस्पं सामग्री वा प्रस्याम् ॥ ४२ ।। पनपान्पमपर्णादिवसासंकरणानि च । नीपन्देज्म महामौल्प दत्ता के सारपानकै ॥४३॥ सवमग्नचिमादि सर्ने निष्पाप भनम् । परस्पर समाइती पघुवर्गो यतस्तत ॥४४॥ इस्पदाहसमारंभे पस्नारोऽपि बणिग्नरा । सोत्साहाः सपकार्येषु माताश्चानन्दशसिनः ।। १५॥ भय प्रत्पनरामेय पसंवा समुपस्विता । दिन मीनि पाणि चिन्मममिनमानि च ॥ १६ ॥ आवपर्व दपानोऽसौ प्रफछन्दीपरागत् । ममनः स्वपशामामा न्पपान्मूभि स मार्परः ॥ ४५ ॥ कोफिसासापाचास पन पत्र पिरामवे । मानप्रेरकमाणेष हन्तुं मा कामिना इसम् ।। १८ ॥ प्रससार परागोपि दिए सास यम में । मन्ये कामठफनय क्षिप्तमों रिमादितम् ।। ४९ ।। पुष्पपरिवाष्टा पंल्या पत्रासिमासिका। बने भ्रमति पदेव धूमसा स्मरदविन ॥ ५ ॥ मदानिसो भनौ या सुगन्पाच मुधीतसा । पैन मानपना मन माननीमिः परामिवम् ॥ ५१ ॥ पत्रानोकवक रेम सुवर्षपकासके। स्फटितस्प दो मार्स पिणे नून पियोगिनाम् ।। ५२ ।। १.।

सम्यूनामिबसतकेमिस्तिवशवर्णनम् रजः किंशुकपप्पाणि यमारकनामीनि प। दर्प दिशार्यानो विवाः प्रचलिसा इन ॥ ५४ ।। एपषिप मपी रमे इमारः सह दारकै। रम्पास पनपीपीपु मधुः कापि (प्प) परस्त्वपम् ॥ ५५॥ वा परिजनाश्चापि रमवे सकलमका । कस्पापरननीयीपु क्रीडामारमपप्सिवम् ॥ ५६ ॥ पश्यात्स्नानार्थमाजग्मुः सर्ने सप्र असाये। मास्वाय गतकामास्ते परतः सासप प्रति ॥ ५७ ।। संविस्तम समावा मियासरापमापणे। मर्ष गममपी यान मंगादानाय पतिर ।। ५८ ।। तत्र तूर्ममिकमानमान्कप्लफसोऽभनि । नईदुभिनादेव भाप्रानंदपिपायिमिः ५९ ॥ भुस्या कामासापान बिम्पति स्म महागमः । मिपमसंग्राममरास्यः पट्टेभी रामसमवः ॥ ६ ॥ मिस्वासौ मुलछारंपमध्यसन झापवान् । सरहरमदापिष्टभ्रमरासीनिरामिवः ॥ ६१ ॥ दुरासदो महामची स पसूम निपादिनाम् । मीमापीकारनादेश्च प्रासितः सगणाग्रणी ।। ६२ ।। अंमनाद्रिसमा दती परकर्णप्रममनः । स्थूसकाप कतसिामी नगरापापपादयत् ॥ ६३ ।। दतानसीज्य दतावनन् पृयिपीवरम् । गुदादरेन तमापरुतिरन् पारिसपपम् ॥ ६४ ॥ ८ मम्मामिपरिते- रजवान पनं सर रोग्यातिरिमीपण । परिन्दन दरम्मानि ममान्मसमिवस्तात ॥ ६५ ॥ मानगम्पमुमवीरनारंगनिफरापिनम् । समासवासारिकदवानपिरामितम् ।। ६६ ।। सहीशाम्मा गमिः पिभुमेन्दरिहाततम् । दासारुपकलरदारिमीफ्लसमृवम् ॥ ६७ ॥ मातीपंपांववष मुपान्दमपिमिः । पारपारामपछीमिः रमणीय मनोरमम् ॥ ६८॥ नागबलीमहामही पित्लपकमपटमः। पल्लनिवं नमीमार्गे श्रीसंगविक्सरपि ॥ ६९ ।। पसासरंगमातीनां फसे पुप्परमंकवम् । रामादनीनासिकेरपूगीफससपन्निवम् ।। ७० ।। परिवारपाकीर्ण मोफिसाइसमिसनः । फिमम पहुनीतन श्साय पतिदीरपि ॥ ७१॥ तसर लिया इन्ती बमभ्रमपविा क्षणात् । पचा पुष्पवर सामिपपैमस्नि मनः॥ २ ॥ पतस्ववा पसार्यवस्वा केपिनपारा। पावरत समादाय न पुन: सन्मुखं ययुः ॥७३॥ *चित्रामापरिमाण पर्याइसिववसः। पमा समासम्म्प सापपानाः पदं दपुर ।।७४॥ माम्यमय किमभाहो विपन्यो मय मपि । नसमा सन्यसं गन्तुं पापमापा देविन: ।। ७५।।

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जबूस्वामिचरिते- सारी इमारस्प यूपा विम्मयता गत । सासनस्यामागे नीवरानय नीतिमित् ॥ ८॥ समसभमनाश्यायालायां इन पुनः पुन'। शप्पोपरिग सरत्न पूजयामास भक्तितः ।। ८८ ॥ पन्योऽसि स्व मामाग तया नागो मभीरुतः । सावी मिनमती पन्पा यद्गमें सत्समाऽमनि ।। ८९ ॥ अय इंदभिनादेस्त सादै नृपसवैति । पर प्रवेशयामास दंविना शिरसि स्पिवम् ॥१०॥ भस्पावराचवमापि वाम्पा नीव स्पसपनि । पिदम्पामर्मिता साक्षात्सन्मंगसपुरस्सरम् ॥९॥ सिंहासने निवभ्याए बिनपानतमस्तको। पितरी पृण्वो मई वस्नहादिवपापो॥९२ ।। इस वे वनौ बस्स निनवा गमय्यपम् । इति चिक्षमार व स्मशती मृदुपाणिना ॥ ९॥ ते पुत्र पप सौम्यं कदलीदछसमिमम् । गिरीन्द्रसमो नागो निनिवस्त कर्य स्पया ॥९॥ विस्मयस्य पर कार्टि सदमानो स्पसपनि । वस्पनी सं यावस्पश्यवौ वो मताननम् ॥ ९ ॥ पमा पुम्परिपाकाई नमस्सामिछमारकः । मान्पा रामसमामध्ये वरपम्प पियवा धुपैः॥१६॥ पति प्रोगस्वामिचरित्रे भगवीपरिचमतीर्थकरोफ्देशानुसरित स्पाशदानवगरपपरिपाविशाए पणितपसमविरचित सामुपासासवसापुटोरसमम्पर्पिते बस्वामि- बसतकेमिस्तिषशवर्मना नाम पष्ठा पर्वः।

अय सप्तम पर्व । मगत अयसे घाम भीसममुखोद्भवाः । भीसापा टाटरस्पास्प साधुपासांगजस्प में ॥१॥इस्पाचीवाद । अपांस तीर्यपार हरि दुखसंवत । मामपूज्यं च पन्द सर्पनिनोपमान्तय ॥१॥ अर्यादा समामध्य स्थित राम सुमिष्टर । भानमन्मासिमपालनिपप्पपरणांमुझे ॥ २॥ पदभिर्भरसकाबपापरासीपिराजित । मामात्पादिरामीपरामन्पफ्समन्वित ॥३॥ मीसपा सत्समीप प जम्पम्नामिनि सस्थित । निर्मित वदपु कान्त्या भूपाना तमसा पपे ॥ ४ ॥ समाफम्माममामार्गालगत सपराधिपः । पपाऽप्पास्माभितभाभिदिशावरं पिभूपपन् ॥ ५॥ दिप निमानमारुतो रणदपंगपरकतम् । प्याममार्गे तन स्पाप्प समुर्णि सणादिर ।।६।। स्पिसारादीसतोऽप्प रानानं भगिफ प्रति । ममपानुदन पारप नमसारपुरस्मरम् ॥७॥ नाना सामगोप रामने गिरिगलम'। रामन त परयर मारिणपरा नग सम्वृस्वामिचरिते- मूपरे वा विध्यमि सफसममिरात्मस्वम् । नाना म्योमगविश्चाइमसहायपराफम ॥९॥ निमिवाण मया पार्वा या विप्रास्पदफारिणी। भोवम्पा सा स्वया भूप कम्पमाना मयाघुना ॥ १० ॥ अस्त्पन्पतो गिरीधानो नाम्ना मै मण्याचसा। मस्य दतिमदिग्मागे फेरसा परिहास्पया ॥ ११ ॥ मृगांकस्तम सूपोऽस्ति यशस्वी पकसानिभिः। मामिनी तस्प नानापि वियवे मासती सता ॥ १२॥ सा स्पसा मम मो रामन् स्पाप्माणमंदिया । कांपनामा मुवन्नंगी रोमरानीविरामिता ।। १३ ॥ या विधासमती नाना सवा स्यादनयो गुमा । कपिसासा सा निर्मिता पिपिनाधुना ॥ १४ ॥ माकोतमिनासाक्षी पप्पीनपयोपरा । संवसकनकप्णया कांस्पा कविः स्पापधी ।। १५ ।। अपान्पेगोकास्यः सीकी पिचापरापिपः । प्रति स्म मनीशान मभपो मूर्विमानिए ॥ १६ ॥ रुपावारिनिपे स्यामिम् शी मे संभ्रपमिद । अस्मभ्याः पविर्भापी भरिता का भूतसे ॥१७॥ माकद पपस्वप्पमुमार मनिनायकः । माग्पमिप दिवपर्क मसरापनांशुभिः ॥ १८॥ पुरे रामटर रम्प भेणिोऽस्ति महीपतिः। विधापरस्पास्त्पत्पण्या: परिमेता मरिष्यति ॥ १९ ॥ १सोसा जम्बूसामिविजपवर्णनम् भुत्वा मनियच पप्पं मृगांपा ररुष मनम् । तवस्तामन्पस्मै दा स तूपेक्षापरा:ममन् ॥ २० ०॥ भयो पिपापिनापोऽस्ति रत्नघूमः समाम्यया । सद्दीपपसन् स्वमहिम्ना मानसा || २१ ।। मार्पयामास मारपर्य कन्या तां पठाननाम् । मृगौच न ददौ तस्मै मनिराम्पमर्मययन् ॥ २० ॥ सवस्सनाविरुष्टन पदररण कापिना। स्वामी मन्पपानन कन सस्य रिरुपम् ।। २३ ॥ मला मैन्यं पनु सम्मं पिषसं तम्प पन । सन पापारमना वम मेत्य सपानि निधता ।। २५ ॥ सोऽप्पदासिवा देनस्तस्प यारान समूटियम् । पनपान्पसमामीणग्राममणिपिरामिन ॥ २५ ॥ रछिमानि बनान्यस्प दुगा'पापि पिगरिता । आसामाासनास सस मम्मसासव ।। २६ ॥ अस्तस्तत्वासत साऽपि मृगांर पसीनता भित। अपिगै समामीन मागान रसनि पस्नतः ।। २७ ॥ मृतांत सरपरतत्तपत्र विपतऽधुना । मानादन्पप पा पति पुरस्ताकि मरिष्यति ॥ २८ ॥ भय नम धपि सारपानाम सपनि'। रिपाम्पनि म संग्राम भी दिन हि पपापर्म ॥२९॥ पाप सापपपम्प सामुग्पत पगार । परे पाणास्पपसप नान्पपा गौरन ॥३०॥ गाय ।। -

१२.
जम्मूस्लामिचरिते-
मावां म पने मामाः किंतु मानपनं मात् ।
माणस्पागे यश्चस्तिष्ठेव मानत्यागे तो यमः ॥ ३१॥
से इष्टवारियर्स पूर्ण पूर्ण ममास्तदारे ।
पसार्यवि पिना पुदं पिक वानास्पमसीमसान् ।। ३२ ।
ये तु भै विपायाशु युद्ध वि पीपनाः।
मृतास्तत्रैव नो ममा पन्यास्त हि यशस्विनः ॥ ३३ ॥
रामन् रुवायोपंपस्वमा गतुमुपमी।
मावश्यकमिदं कार्य पिम्योऽपिता मम ॥ ३४ ॥
वयाप्यालोक्य मापकं दशनं स्थानमुचमम् ।
अति गदि पापि स्पिवोग सणमात्रतः ॥ ३५॥
मतः स्पा समे पापदविमानं न मे मन ।
रामभानापपस्माशु यया गच्छामि वेगवः ॥ ३६॥
इस्युक्स्मा स नमोगामी स्वरित मस्यामपतः ।
अपससामीत्पपीपाच पो विपापर मवि ॥ २७॥
विष्ठ विठ मर्ण पावनमेसजो नरापिपः ।
भेणिकाज्य महासतो निर्मिवासिसमायः ॥२८॥
पतुरंगवणेपेतो मामों मामविः ।
सप्तांगराम्पपूोगस्तेप्रसी यशसा पप ॥ ३९ ॥
भुस्वा बाइपारोक्तं सगी पिस्सिवमानसः।
अपादीचं समापाय पुक्ति पातलं ॥ ४ ॥
पुक्तमुक या पास साप्पोरिवरि यद ।
परस्मेरपसमावि पुरस्पामासनियंपनं ॥४१॥

जयस्वामिपिनपत्रणनम् १२१ पपीमनसव दूर तत्स्थानं तिष्ठतेऽधुना। सम गंतुं न समयत का कया पीरकर्मण ॥ ४२ ॥ अपि भूगारा यमं वे मटा म्पोमचारिणः । फर्य साम्प भरपाद गुप्माफ सा रहा ॥ १३ ॥ ययार्मकः करस्फालप्रीत जलसंस्थिव । भवीरछतीन्दुवि हि तया युप्मस्पनल्पितम् ॥४४॥ अपमा (अप) स्पास्पद पंवदनाामना पया। मांशु पसफ्छ भारत नया स्पामगदुपम ॥ ४५ ॥ यदि पपिदवियोपादास्पन फनफापस (1)। वपय घटव न्न युप्मदीया समदविः ॥ १६ ॥ पिना नागा पपानाय यया फमिचितीति । रत्नभूम तथा नर्नु युप्पदीया मनारपः ॥ १७ ॥ पर्मिस्पादिपा भूमिष्टान्नानां सहस्रम । सन रिपापरणापर्ययास्पप्रतिमारसं ॥ १८ ॥ मोपीरुताप सापि मारण पसिना । पारदर्यया जल्प मनिशान्तारिदः॥ १९ ॥ मा पद पिचापते पापमिस्पमनातपरिश। सुन यमपापादा पी सायन्पा रमापर्म ।। ५०॥ क्षणामितरा नानः गगा प्यासगतिस्तदा । भीमूद इसातम्या दर्मित नपरारयम् ॥ ५१ ।। श्रेणिरामप' धुम्मा मारा-परन्नृप । बास्पद दुरत्यं निशिरमानमः ॥५२ ।।

१२२ सम्सामिचरित- भूपोमूपः परामृश्य सेदमाप परापतिः । किंचित म शक्येव दुर्घटे तप धर्मगि ॥ ५३ ॥ नापि तम गमस्सूणे न समो दावमचरम् । पुम्मकाष्ठापिस पा राजो दोसापते मनः ।। ५४ ॥ बदमापसरे पीरो मम्मस्वामिङमारकः । को साम्नम सानंद गंमीरवरया गिरा ॥ ५५ ॥ समामिभवत्तियस्का स्वत्पसादात् मसिदपति । मास्वारे सासशिस्तबंधाप वमोपाः ॥ ५६ ॥ कार्यस्य सापनाया माशोऽपि मरिप्पति । पुनर्मुष्पदीया सा सम्भिवा सर्मवश्वम्।।। ५७ ।। पक्कं ममहमारेग मुस्मानंदमपरिपत् । भेणिका भरपाति स्म भोक व सष्टिमत् ॥ ५८॥ वयोव मराई सानदो मगपापिपः । पर्व परतापपर्मस्प मर्यादा स्पाइपिप्लंखा ।। ५९ ॥ मास्मसम्म पुनर्मातपिप मन्पामरे भय । फन्पालामः पदार्येषु समियेपु पश्चयः ॥ ६ ॥ मास्तमा घ सपा पीर फसानां हि परंपरा । गतम्यं स्वरित वा नाप भेयी विसंबन ॥ ६१॥ मादशिवाइमारोऽसौ मुपैनानदशामिना । असापपसको निमीको गेमपतः ।। ६२ ॥ अपीमाप सगापी नाम्ना म्पोमगवि मति । मम्म्मामिङमारोऽसाघुस्सुको पारकर्मणि ।। ६३ ।। समय।

जबूस्वामिविजयपणनम्
१२३
मो सगन्द्र विमानस्मिमात्मीय मां निवेश्य ।
स्वा नपस्त्व तमाशु पत्रास्त रत्नचूलक ॥ ६४ ॥
शुत्ता घिमास्पदं पारपमिदमार संगापिप' ।
गतेनापि स्वया सम सम्प किमयामक ॥६५॥
वारदर्य स्वसमस्यधापरय मृगशावक ।
पारवाभिमुखं गमन् (दो नायाति कयरी ।। ६६ ॥
तापदः पर सौम्यं लसन्सौदर्यरामित ।
याप्दाकरासोऽसौ कृतांता नामिति ॥ ६७ ।।
तामणगणा सर्षे सन्त्वरम्पपु शाहलाः ।
पारम स्पारमलउम्पाला प्रचंडी दारपाना ॥६८॥
वामदाडपरं पत्त सोऽप्पभ्रगणाम्बर ।
पारपंनिला काऽपि न पायादतिदुर्दरः ।। ६९ ।।
वापदायु समाराग्यं पस' संपटन मप ।
पारशा न पापस्य नोदस्यप गरीयस ॥७॥
नारायण सासामिर्मम जैनपर्पपत् ।
पारोपित्स्यालाणां नापतिमनरं मन ॥१॥
वार मूलगुणाः स संति धेयापिपापिन ।
पारदर्षसी न रापानिमस्पसाररत पणा ।। ७२ ॥
गॉरर तापदगास्तु माणिन इनकादिन ।
पारम मापने देपासीति दी दुसरी ।। ७३ ॥
मम पन्गन तारस्पदर पासमामिन ।
रत्नगमस्प राणे पारमा नमर्गहत ॥७॥

१२१ जम्मामिचरित- विधपपरं पाय गमन मया मगाद स | मतामसिना पपिपयान मग्बनिप्पति ॥ ७५॥ मी मा प्पामगर्न मान यापदादिम्य पदापन ! पम्फरिप्यामि पासा तसं उपसि सोपव ॥ ७६ ॥ कनि न सदस्य इति प बदति । मारत्तममप्यानेऽप्रमागन् परमपि ।। ७७ ॥ मतपत मारण भुपेदं मगपापिप । भरीव पति विपनं मातमन्पीरपस्तदा ।। ७८॥ पदक्त मरता म्पामपारिमा समतत । पकाकी बर नावाऽपि पामाध्य किरिप्पनि ॥ ७९ ॥ मन पक्ष सपक्षाऽपि प्रनिपसपिताऽसिस । मगन ना (न) ला मि इस पारापर्दन सा ॥ ८॥ इन पन जगस्सर इन मापि मिनयमः । मनापन नीता प्रर्यरा दवपार ।। ८१ ॥ वायु प्रपामयापम न गिरीन्द्र मारामनं । पिध्यामाने पर रनन्या पापकारनन् ।। ८२ ।। न पम्मा मपरिवान पपा मर्योदपे हमः ! भप पापिनटापता मन्मयशामिनः ॥ ८॥ या न झोपामिना दम्प मपः कर्मोदयात। कधिन्मापानम माऽपि नीता पनि समांमसा ।। ८१॥ डीसामावाय मीश मरसावदिवफरा। मिक्षया संभमानाऽपि पूम्मः स्पाम्मरनापा ८५ ॥

चम्बूस्वामिविजयवर्णनम्
१२५
मर्यकाऽप्पबरस्थायी मकवेस्तमसा पय ।
वपस्तोर्म पिघुन्यानो नादेति किस भानुमान् ॥ ८६ ।।
भूकंप पदवाफ्येषु यत्परीसासम पयः ।
य कार्यसापनायालमेकोऽपि प समायते ।। ८७ !!
इत्यादिकां रखामाला रपिता श्रेणिकन ।
पारयामास पा मूर्तीि सादरातम म्पामग' ॥ ८८॥
मामपा स्पापपामास सगा दिव्य पिमानके।
मम्प्रस्तामिछमार तमनीपम्पपलान्वितं ।। ८९ ।।
प्पाममार्गों सदा यान गछति स्म त्वरामि ।
श्रीघ्रमापप्सित स्थान पपा मेगात्मनो जप ॥९० ॥
मयाने स स पाऽपि मतस्य भणिकस्तदा ।
घरगपलापतः सार्प सभटाटे ।। ९१ ॥
पर्यः प्रस्थानससिन्या नेदुरामदनि सना ।
समालम्वनिता कामातवानाः सिग्नटिना ॥ ९२ ।।
समता रपपपाणां पीतापापिते ।
मस्तिय गमेन्द्राणी शम्दात तदापरन् ॥ ९३ ।।
परंगरससामापा सपम' पार्टिनरमा ।
मतम्य धाणा भूपा रस्नममिगीपया ॥ ९५ ॥
पान् गमपयांपा रम स भपतन ।
गिरीणामिर मपात सपारी सापानिमि ॥१५॥
पातन्मदममासारमिन भिपदषिः।
मनस्य ददिरपम् गरिष सनिन्नर ॥९६ ॥

१२६ गम्बूस्वामिचरिते- मयस्वपेरमा रेमुस्तुंगार मुंगारितांगना। सांनसायावपाशीवाश्वसत इस सूपरा ॥ ९७ ॥ धम्मवंगमा रहर सम्मा: सम्भपकेदनाः। कुसीसा सापावाः समाः परसवर्णने ॥९८॥ गमरूपगवा रेशुद्धर्मवा पिस्वकार मदीपोग्नटनेपमा दर्पाः संदीपिता इस ॥ ९९॥ कोसेपनियादीनपाराः सादिनी पर। मूवीस्प समोपानसर्ग सौ पराक्रमा॥१०॥ पन्धिनः पुरनारापसंमृवेयुपपो पर। पनमाया माशालाकोटरस्पैरिवाहिमिः ॥१०॥ रपिनो स्यकव्यास संश्वोषितोवयः। समाममाषितरणे मास्पिता नापिका व ॥१०२॥ मटा स्परस भेला सतिसक्नुमका। समुत्सानिमावासिपाणयः पदसणः ॥१०॥ मस्फुरत्स्फुरदसौपा मया सदार्षिवा परे । मौत्पाक्षिा इमानीला सोरसा मेपाः समुस्मिता ॥१४॥ करवाकरासा करे स्माऽमपोऽपरा। पम्पन् मुस्वरस तस्मिन् ससौंदर्य परिमाधिपान् ॥ १०५॥ करा शिव सम्पत्तोऽप्यमाटा। ममिमिस्सरिवानेन स्वामीसत्कारगौरम् ॥ १०६॥ मागकुटपदानो सामनानि प्रवस्पिरे । पादाविशास्तिनीयरयकम्पापरिणिः ॥१०७॥ १ बाध्य ।। पचास्या। ४ दी। ५ सवानि । wि प्रायोति किमान्याकार।

जम्मूस्मामिवियपर्णनम् पर्मकपटास्ते रस्नादामौलयः । सलीस सोफपालानाममा मुखमिनागता ।।१०८॥ परिवेष्टय नैरतर्य पार्थिना पृथिषीवरं । रात्सपलसामग्री दर्यवा यपायपम् ।। १०९ ॥ रेणवस्तदासीयस्तरोनाः खपिनः । सणपिग्निवर्समेलो प्रपलहमरांगणा ॥११० ।। समुद्रसपायर्भटासापर्महीपरा' । भयाणका पृति प्रापुमननपरपीदमे ॥ १११ ।। रिरुपकमिदं युदमारम्प मगपभिना । एभर्पपददुर्गरा सरिणः ममना यया ॥ ११२ ॥ घर पादाममापी रयफय्यापास्ति। ममाग्निरीपुरापष्टय सपताफ रथं प्रभा' ॥ ११३॥ भने नननर्मुसा पिरैजु पुरपियः । पाहातरिय मोरथमदाम्पस्तीरममप ॥ १४॥ पुरांगनामिरल्मुचा सुमनाऽअसपापनन । मौपानापनम्यापिरष्टिपात मम प्रभो ॥१५॥ पूरा परिपुरा पधारमम प पिपिनाघुना ॥ दास रहिपतमसम्पमिर तममम् ॥ ११६ ।। सिमिदं ममपीमात्युमित पारिपमर्म । पिमुन पिनगरमगा मस्पया रिनेमन ॥ ११७ ॥ रपिदनाएगानस्पर्गदनिशिगधिनान | सपनागानगंमत्तान् पिरान ममरसत ॥ १९८॥ न।

जमूस्मामिचरिते- सविळखाममूने रिसीनमधुपावसी । पिसारप सस्वकनीना सस्मार मियापितां ॥ ११९।। पच्छापास्सफमास्सुंगान् सर्पसंमोग्यसंपदः । मार्गदुमान् समदासीरस नृपाननुलवः ॥ १२० ।। सरस्वीरगनाऽपश्यत् सरामरमसा सवाः । मुमहिमाका मधुरमुरवि वन्मती (0) ॥१२१ ॥ पसरणभिरारम्भे दोपा मन्ये नमस्पसी । करुणा देवी पीक्ष्य पम पयकामिनी ॥ १२२ ॥ गांगणानयापम्पदाप्पदारण्पपारिण। सीरमपानिकामर्स सरत्तीरप्टोकिवान् ॥ १२॥ सौरमेयान् समंगाग्रसमुत्स्वावस्यसापुमान् । मृणासानि पक्षासीप किरमान्पश्य दुर्मदान् ॥ १२४ ॥ बास्सक क्षीरसंतोपादिन निर्मवपिनाम् । सोमपचापरस्पर पर कोर्ट कवात्प्सतां ॥१२५॥ पति एबमामातुमियोपसमिनानवान् । मुपक्रकमिसानम्र कसमक्षेपमैसत ॥ १२६ ।। नौदस्य फर्मयोगीवि नृणां पातुमिगोपर्व । पश्यति स्म स भूपासी समन्पपरिसवा ॥ १२७ ।। सारवसिवनीसाम्माः मरेणुभिवस्वनीः । शवदंग्मृती पश्यत् स्पसीस्पो धर्मवी सिपः ॥ १२८॥ परिगीवसनाटीष्टिवा समरती। पातिगोप्यो भोरस्प मुई वेवटिकाः ॥ १२९ ॥ मागेमिः । १ समान् । बोन धीमति वा ।

जपूस्वामिविपणनम्
मुगपिमुस्सनि भासामरराफुलीकता।
मनास्प मा सालीनां पालिका कुममामिन ॥३०॥
मप्पस्थापि तदा ती वताप सरणिर्सप ।
न्न वीयमतापाना माध्यस्प्पमपि सापकं ।। १३१ ।।
नृपोगनामुम्बाम्नानि यमसिंदुभिरारम् ।
मुनाफसदीभूनरिसराहारिम्पर्ण ॥ ३२ ॥
महामवयुपा परप्राइमर सुरानिय ।
पारका फरमापा द्वसं जग्मुर्मसाया ।। १३३ ।।
अभूनपूरमुबूतमानिधानपरधनिम् ।
थुम्ला बलप गस्तिर्यमा पनगाघरा ॥ १३४ ।।
पममामादिमा निर्यदरसामा ननिरान् ।
मुग्मः मुरिमन्नांग मुरम इस पण ॥ १३५ ।।
मोपमनादाम्पं म्पादौ किम केगरी ।
नमस्पर्य रिस्पा पनीर दमपन् । १३६ ।।
मरमा रममाणमुत्पत्पाभानिग पतन् ।
म्प र एर पई पृष्टरमूनिमारकाममान ॥ १३७ ॥
पापाण मिग्रिनपा पनाताम्रिताण ।
गुरी गनारनि मन्पदाम माहिपा रिमा ॥ १३८ ।
पग्ध (पर) रोनसापमा सुद्धा पृगाः ।
रिसमा पंपानांगा पारम्प सुगपन ।। १३९ ॥
पगार साना पगा पुनररमा।
पिनारिंपारणपापसापादिता ॥५॥

यम्सामिपरिते- रवि मसा पनस्पय माणा प्रमसिता मृतम् । प्रत्यासपि चिरादीयः सैम्पशाम मसमलि ॥ ११ ॥ ववापि इसष्टम्प साऽभ्यर्ग पवनाश्वा । सासरिघटे पीरो दिमाममकरोस्कवी ॥ १४२ ॥ सवस्वो प समुहीये मवस्पे फरसा मति । पिसभाम फियत्वास नाम्ना करसम्बर ॥ १४३ ॥ पूजयामास ममीशस्वप बि मिनेशिन | मनीनपि महामस्पा तव मस्पातमुपवः ॥ १४४॥ किपदररे दवो गस्नाऽविटभीमगपापिपा । यषममापरीपाप सेनासामंवर्सगुवः। १५५ ।। मप वारद्धवं पाप फेरा नगरी मति । जबूस्वामिङमाराऽसौ नीवी पिपापरेण य ॥ १४६ ॥ घिमिर्द मी सगापीर महाकोशामासम् । साक्षात्कारी स्वमनासि शो नः सप्तपरिष्ये ॥ १७ ॥ वोभावीममापापी हमारे प्रति प्रभपाद । से सेना स्पिता पास रस्नघूसस्प परिपा॥ १८॥ यो मपामामि पिपासूत् पूग्ये सपारिनाभार । फन्पायामामहामानर्मगमन्योऽस्ति रोपपान् ॥ १४९ ॥ बहासिवस्तु पेनापं देखा सपि कोपन । मृगांको यनयानीवा दुर्ममाभिस्प विष्ठति ॥ १५ ॥ अमय्पी निर्मितापशापयोऽय सगेपरः । विपापरापिनावेस्तै संसम्पपरापुमः ॥ १५१ ॥ 1

मम्स्यामिरिमपपर्णनम्
सगादवदवा भुवा इमारो ग्यमिताऽमनन् ।
पया प्रमित वस जग्गस जसपोगन ।। १५२ ।।
रस रस रिमानं मा वारदम्पामगते क्षणात् ।
यामधा रलयूलस्य इस्पामि पसमुदाम् ॥ १५३॥
तनो सिमानामग्य असनामीभिगन् ।
पापभितस्तत मैन्यं कौतुपेनसाली ।। १५ ।।
दर्द द इमारं वं मंदर पारसनिमम् ।
ममरपु पफित किंपिन् पिपस्सन्सनिपा मयः ॥ १५५ ।।
मी देवाधिनायोऽपमायाना लीलया सव।
दानवाऽप्पपिनायो रा पामेदेनाध्परागत ॥१५६ ॥
उष्टुं पा सैन्यमस्मारमामगाम मपीपनि ।
भय पग्विन्मरामागा समीरान् विपणिपति ॥१५७॥
मारिनु रम्नगमम्प पदद पगाथा ।
मारमात्परगरम्य सरसहापपिया पिमु ॥१५॥
अप पचिपापा दर दादामिपाणम ।
भारनम्पन पानादापातु ग्रस्तपम् ।। १५९ ।।
भए पभिमानपी पूना पेपपर। नरः ।
मारदाप पापा पारपागिनमा ॥ १६०॥
एर मम्मन्पमारण नानारामए पदमारपि।
भम्पमापिरमाग गो गानाति राणा ।। १६१ ॥
मपारागग्ग निर्मागोवा रामकर।
मगि मम नाम्गार मगम्याय निरादप ॥ १२॥

१३२ अम्मामिचरिते- भर देता मृगफिन पाठयित्वाय मैपितः। सत्स एक्सुमिच्छामि नस साम्पर सपा ।। १६३ ।। भूस्था दरपरा दास्पस्वस्यास्याने गती जयात् । मर्ग नसोचागन मापोपत्स पिचक्षणः ॥ १६४ ॥ देन कश्चिमरा बाग्मी सदारि स्पिवानिह । रस्तुमिणवि साम्नैर युप्मस्सदर्जनात्मक ॥ १६५ ॥ शुस्मा रत्नशिलरचापि वदप भुतिपेशस । मंश मामय () नमित्यर्थ मस्सरी सगः ।। १६५ ॥ माशामादाप दास्पेन वत्समीप मोधितः । मपूस्वामिछमारास्म्यो यसकांस्पा पुरएमिः ॥ १६७ ॥ प्रमिष्ट स दिदीप मा विग्मभिरिव भूतछ । सरे वैमा सगेशानां विरसुन् ससकातिमिः ॥१६८ ।। रप्ट्या व रत्नपसोऽप सण पिस्मपमाप सः। कप संभापि दूतस्वमस्प कोविमतः स्मत ॥ १६ ॥ पकिपिपिर्व पाम नमसारफिपादिकम् । न व पाट पापं पा स्पीपये तन स्वममन् ॥ १७ ॥ भूनं कमिदपूर्णोध्यं का था मानपोऽपमा । परीक्षा करीमापातो मनसस्पापि गौरपाद ।। १०१ ॥ विवपमिति पमा रनचूसः मारकम् । भागवतं वा दशातिकम मम सभिपी ॥१७२॥ भुतामोपलपारप रस्नप्प लगे प्रति । नीविमार्गे समाभिस्य वा पियोपयितुं भपात् ।। १७३ ॥ पी।

जमसामिरिजपरणमम् १३३ म् नाहि दुराग्रारमिदामुत्र पदमरम् । मपनरवर नगाधीश महादुर्गविफारण ।। १७४ ।। सवि थापिस्सासाणि सुसमानि पद पद। सानपैर कि साम्प नेति रिवाना पय ॥ १७५ ।। अप पठससामान्मारस पहसि । इदममविनासाय॑ रयतवादनम् ।। १७६ ।। पत पाम्मिन् भवापन नंतर पसारिन । रिपत पायोऽमसं पपति पयापपम् ।। १७७ ॥ पप नानारिप पिपिपरसपापम । सम्परूपमनानाना मीरा दुरष्टप स्मना ॥१७८॥ उक्त - "अयमतिमरितम्पनाया वृद्धपारिपतरापरिगा। मनीपरा मंतर पिपान मारप पाप्पिनि मानना " "पिभनित्यानं मना मिपासा नित्यं गिर पानि नाम्प माप । नपापिपामा भयाघमाया गपाप गप्पन पारी " भर्म ममापि मन्नाप नम्म पापम्पमपर। नस्मारगरममन्पानि मारम्परा मिनि ॥ १७९ ॥ मतपरिनामना निप्पपारिभिन । मेमनारमनीराना मपास पपपमणान् ॥ १८॥ रम्नपम नगापार मरिमारपरा पर। पग्निाप्पुपपारा शामा मसादिन ॥ १८ ॥ Mira ।

१३१ गम्सामिचरिते- पया दर्पसमावेशपते रापणादयः । स्मा चापापनापामा मृत्ता पा दुर्गविं ययुः ॥ १८२ ॥ इर्य कन्पा ददावादी भेणिकाय मीमृते। भववेऽप कपं दातुं सोऽपिवा दुर्पोमयात् ।। १८३।। न पार्य क्षात्रधर्मोऽस्ति संगरापस्पसायनम् । भीमनस्य को पीमान् कः पिबेपुर्यपोमिपम् ॥ १८४ ।। वस्मसीद सगामी प्रमादं मा पिपेहि भो। गति दविद पाम्प पक्तम्यं न लया कचित् ।। १८५ ॥ इवि मुक्तिपापुप्पैफिता पाविधीयताम् । मासामुष्णवरी मेने विशीष सगस्वदा ॥ १८६ ॥ ववस्तामणा सोमास्किचिस्पस्फरिवापरः । म्पसकोपानसम्मार्ग स्वगो पापमुदीरयत् ।। १८७ ।। दूतमन्योऽसि रे पास यस्तमम्पागवो सहे। अयप्पाऽसि तवा नान्या गविस्स्पार भठस्प ॥१८८ ॥ मस्तावेऽनुषित पापं पिसदं पैरवर्पनम् । पदम सनसे दून स्वामिकाविनापत् ॥ १८९ ॥ पाप्पापाच्य न परिस स्पै न पेस्सि प पसाबसम् । कर्स पारकाऽसि पाट (1) नाटयनिय ॥ १९० ॥ मानमासिनु नालं यया रोऽपि कौशिकः। पापासप तया इत नास परमिदं पपः॥१९१॥ जीरका किस दमादि भेत्तुस्साहवे मुठा। मृगांर भणिया ना मामारापपितु पूपि ॥ १९२॥ तास.

जयस्यामिविषयवर्णनम्
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पप पिपायरा दत श्रेणिका भूमिगापरः ।
माश्यालसापर्ये सुन्यता न पदाचन ।। १९३ ।।
आल्फानासनाल साल पार्षयमी मर ।
मया सा युपिमर्य स सर्योऽप्यापानु पंगत ॥ १९ ॥
इत्पुरता रत्नपम स स्थिता निभृतमानस ।
समुद्र र गीरा निस्तरंगाऽपनामः ॥ १९५ ॥
भय निर्पोपपदास्यम्य जम्पमारक ।
पमसाननापत पंरा दोर्दररिषम ॥ १६ ॥
रत्नगल ग्बगापीर पारपाक्त समस्मरान् ।
दर्पामारमा पन्य तरस नुपापितम् ।। १०७ ।।
पानास्पाऽपि पियामृटना भूगोवरण स ।
रापण पसादर युद्धना सा सैन्पः॥ १९८ ।।
पायसम्पापि रिपत रिपामित्वमनसा ।
मापि मर्मरिना पारश भूपी पनिर ।। १०० ।।
मापदं सपम्नम्प नानापन मन ।
परिनाम्नदिपानापमुन्मानामिना भग २००॥
मनम्नलिमारम्पा नम्पयामी गनित ।
म्हरमानी नादिषि शिE ||२०१॥
पारद सागा मा पारगाराम।
नाम इपारण नानाय पमदिरम् ।। २०२ ॥
मतममृति पुटम्प मारमा म्पान्यानरः ।
परता प्रसार: म्पास्माता माप ॥२.३॥

जम्मूस्पमिचरिते-
कियकार्स इमारण योदारो पसनामिनः।
मातिप्प पमगास्म नीता दातमिझमै ॥ २० ॥
पौरप पक्किममाौराहास्पिनारमारके।
भय पम किमप्यसर्पदस्पामरणैरिम ।। २०५ ॥
अप म्पोमगतितिा दो मिया योसुमुपती ।
इमारस्यार्पयामास पाणे निषित स्मवा ॥ २०६ ।।
मयामीयलमारं स नानाकाशमतिस्वदा ।
भपिम्म विमान में पावपारिस मात् ।। २०७॥
भुवं वन इमारेण पापा शशेण संदितम् ।
न स्पिद भूविरंधस्प पारप पापि सगोदितम् ।। २०८ ॥
मदम स्विवेनापि किं किस माणरक्षया ।
मटानामाच न्नमस्ति पेचमवदपुः ।। २०९ ॥
पकं रि-
"प्रमवारी) म नारी शूरस्प मरणं हमम् ।
वातश्चापि वर्ग सक्ष्मी निस्सास्य हण मग " ।। २१०॥
दिदीपेविवरी वस्य हस्ते स्वङ्गस्ता वदा ।
दारितारिपसैसिप्पा यमागोग मिस्वरी ॥ २११ ।।
पत्र इस्पिहारं स सहपाणि मारक।
पत्रारिमस्तकस्वोमी म्पपवयुषि मयः ।। २१२ ।।
मसिईवभरापा हर्षन्चोनमारकम् ।
स निरर्पघ्र बावा रत्नघूसस्प सैनिका ॥ २१३ ॥

जम्यामिनिस्पपर्णनम्
यमपापस्य सम्पाप रामांभाऽपि न मियत ।
निनितम्मरमन्यपु किपपोगपातरपि ॥ २१४ ॥
पुद इति समास्मिन् सारपानवपार।
म्पाह वपुरवा काऽपि न माफ मामम ||२१५ ॥
यया विग्मफरा ति संवमस जरान् ।
समतापस्तया साप भयान रिपसंतिम् ॥ २१६ ॥
मपापारासरे देवात्म्नचिचप्र परिणा।
मृगाकस्प परणार गत्वा स निरदितम् ॥ २१७ ।।
देव फभित्समायाना भरपुग्पपिपास्नः ।
बसन्पमदारण्य मसरारानमापमः ॥ २१८ ॥
अपना युदं परस्पप निमृत सपति स्पिन |
रंत मनस्ति (म्पनति) नारीणा दुनयानपरिया ॥ २१ ॥
स पुस्मारपीपाय मिपा पा पूर्वमन्मनः ।
मरमपमाननापि तमा) मतिमानिए ।। २२० ।।
अपना धरणास्साय कपिराप्रणीभट।
सम्पादनादन पादपोरा मपागमन ।। २२१ ॥
पपम्पन परणय फणगापना गर्ने ।
रोमापिता मृगौलदस्तारिप मिशित ॥ २२२ ।।
मलन स ससा मानातिर गमम् ।
पानापरपमानपान मगरि ॥२३॥
मदा मंगापमपम शामनान्मृगमणः।
पराप नगन्य निमगाम पुगी ॥ २५ ॥

बम्बूस्वामिपरिते- - वतो दुमिनिर्योपै रस्नघूसोऽप्यनिद्रिवः । मासिका कोपामिना पोर्ट रुताव: कोपिता किम । बम दाम्पाप सेनाभ्पामारम्भ युदसुतणम् । हासकारफर गैई कतमीपणनिासनम् ॥ २२६ ।। दक्निो दैविमिः सार्पमश्वैरला स्थै रया। यमाख पशुपः सर्षे लगाभापि सगै समम् ।। २२७ ।। यापासर्पोऽपि समामो पारमावस्सदानपी। मास्वा वान तापमाप्युरेष्टुं समा पपम् ।। २२८ ।। कपिचिवीयो या गणितवारिपिः। दपोनरसमिमा नापक रिपून् पान् ॥ २२९ ॥ पत्रोस्थिते सुरास्तावादपर रनसि स्पिन । पनुष्टंकारनादन माता मविमटैर्मटः ॥ २२० ॥ सेमिका भरोतमन्नपूर्णमिणदिवेऽपरे । दिन रात्रीयो स्माय गगर्ने पमुपायते ॥ २३१ ।। मापते स्म मटो या मिषस्वभामदेषनात् । रखो रवांगवीकारपेटाटकारिवैर्गमः ॥ २३२ ॥ कपिद्नाना पीलारी हुकारोऽप पनुष्मवाम् । मठ्यपारे रेकारमा मापर्वते कपित ॥ २३३ ॥ कैमिनट परमय मा निर्मिस्म सगरे । गमैर्गमा रवैर्मपा रबार पहेम पचयः ॥ २३ ॥ पमा विभा।

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बम्पूस्वामिभरिते- - सामन्मदरमावेन सिरस्पनमतापत् । भस्वामी महाबाहु पिनेटर समरांगण ॥ २४५॥ बनसहननोपैदा दुर्मया मारकर्मणि । मयापूमान्मृगांक सशस्विपं सीपमादरात् । २५६ ।। कोऽयमापतिको ममौ पेगास्केन परामिवः । मममीत्सभिवः सोऽयं न स्त्र पत्सि कप प्रभो ॥ २४७॥ पिपापीली ममाप्यो रत्नचूसीऽयमात्मा । मलामिकमारेण पाणैरिवो मपम् । विमानामिमानीता पदर स्पसमपनरे ।। २४८ ॥ गारं स निगडीवस्तु दोर्पनर्प गता मुभम् । पदे मिन् सैनिकास्वस्य नेश' स विमोरिभम् ।। २४९ ॥ सस्ते स्वनटे म्दा मानीवार सामिनोन्ति । सर्ने गसितपानाभास्वरपुरेत्स चौमसः ॥ २५० ।। वो मृगांकरिपामृापक मपजपारपम् । सर्प पिपापरास्ता धमछमारकम् ।। २५१ ॥ पन्पासिस महामात स्पनिर्मितमन्मप। सापपर्मस्प पामत्पमप मा नया रुवम् ॥ २५२ ॥ नदुरानवाणि गभिवानीप पारिपः। मृदंगपत्यादीनि सैन्य रिसस्पतः ॥ २५३ ।। बंदिशंदमपारार्थ परानपासिनः । पर्णपेवा महावीर्य मारस्य अपापहम् ॥ २५४ ॥ गिदिनमा

सम्स्वामिविनयपर्णनम्
व्योमगविश्व सानंदाकारयामास तत्मणे ।
मीविपर्पनमत्येव जयस्वामिमृगोक्यो ॥ २५५ ॥
भयो सपा कुमारेण मानुपिपाहुना ।
सासाएमिवान् स्या सीडया सपराधिपान् ॥ २५६ ।।
एक एष सदा सेम्पो धर्मो सौख्यममीप्मुभिः ।
पदिपाफाकुमारेण भयभीः किंफरीरुवा ।। २५७ ॥
इति मानमूस्वामिपरिये मगधीपरिचमतौर्यकपिदेशानुसरित
स्पायदानवपगपपपविपाविशारदपण्डितरानमछविरचिते
साधुपासारमयसाधुटोहरसमम्पर्पिते निर्वितरण-
भूविपावरप्रतिबसम्म्परपूस्वामिति
वयवर्णन माम समम सर्ग ॥८॥

अयाष्टम सर्ग पिनयति सदास्य पठिव स्मपुरोपसो । मागमिर मिहि त मानि भीसाघुटोरर ॥१॥ इत्पाशीवाद। बिमसं बिमसमान संखो पिमहाभपः। मन्दामगाम पानवमीपोच्य (नान्तपीयोग्य) देनदयभाये अयापश्यछमारा स पीमत्सामापापनिम् । मापयामास कारम्पादनिस्पा संसृतिस्पितिम् ॥ २॥ पदो परन्सिपोगादुप्मीमा पर इपिन् । वति दम्प गुणापेक्ष धीवर न समागतः ॥३॥ परिष्टो माननिय पिगिर्या संमृतिस्थिविम् । अमी हुर्पोपमानापा मुस्पा मा दुर्गतिं ययुः ॥१॥ सीकरिपपासता' फेदसं मृविमएस्तवः । म्पयमेत्य पर्वगम पयागादहिरोपिपि ॥५॥ मी कपंपिसमाप्त....माथापि म शांव... । (प्रत्यु) त दप्माय वे चायन्त पिपपाः सवः ॥ ६ ॥ मापाक कटु पस्स रिपाकस्प वरोः फम्म् । सादु भीम मपितांति॥७॥ अप पहिमपाचाना संमाता ष स स्पवः । न्यापातये । अपस्कराः स्मृताः ॥८॥ पुदिनापुरमइनिधि। त .

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अम्मूम्मामिभेणिकममाराचरामगृहप्रवेशवर्णनम् १२१
इदमत्रोषित किंपियत्या निसर्गतः।
मावानसहप कार्य
दुसरत् ॥९॥
पर किंतु माविमं यदमी शानशामिना ।
फेधिचानपि सेवते परलोफणि.
महो कोपि ग्रहो मोसो दुस्स्याम्पो मावामपि ।
यस्यानमारती ममुरास्मीय मनुवे परम् ॥ ११ ॥
(मृगा) मरीधिको पाई पारस्पान मसाशपा।
तवा क्या समझानादीदत विषयात्मुखम् ॥ १२ ॥
यया पक्ष्य. के कंसर्फ कायमसी।
सया विषयात्सौख्य मिपोषसमस तवः ॥ १३ ॥
पया पा पवित्पर्यपिपने लिपवि द्ववम् ।
वया दृष्मापास्पर्पमाः स्पादिपयोन्मतः॥ १४ ॥
अयषासमले मन पाठपेन यापेतः ।
हतापि परादे निम्नता स्वात्मनो शिवम् ॥ १५ ॥
मापि पववा गर्ने पया कि वेन पनुपा।
एखवा विपपादीम वर्तिक शनेन माहशाम् ॥ १६ ॥
मानवापि मयाकारि हिंसाफमे माचरम् ।
वकेवर्स प्रमादादा यदेता यषमयम् ॥१८॥
मामान्वेऽपि न सम्प' माणी कमिदिवि अविः ।
मया पाप्रसासास्व दवा निर्दयतसा ॥ १९ ॥
भाफसोदयमेवैवस्वत कर्म शुभाशुभम् ।
अस्पत मान्यषा फर्नुमावीर्यापिपतीनपि ॥२०॥

जम्म्मामिचरिते-
पत्स्फाटिको ममि म्यच्छ स्वमारादिवि भारतः।
सोऽप्युपापिपसादर रक्तपीवादिको प्रमत् ॥ २१ ॥
तपाय पिरस्समायोऽपि जीवोवीनियसोरम्पवान् ।
पद मानादिनानास्पदपादिर कर्मणाम् ॥ २२ ॥
कुमासाबनामित्यमास्त यापहमारफः ।
संसकस्तारदुरस्त रत्नचूसादिभिनृपैः ।। २३ ॥
ओ दम्पामयस्साच गुणा निर्माणसमणाः।
मस्स्पनिर्वचनीयोऽयं गुणबाम गुणस्त्वयि ॥ २४ ॥
पस्पर परसाहाय्याजपोशप मदोदताः।
मसहायबलस्पार निर्विष्णो पिमपीमनन् ।। २५ ॥
पिना पूछमं कोऽत्र फसिवा पावि नप्रवाम् ।
प्रत मबारः सौम्य का विमित्य शमं अमेत् ।। २६ ॥
इत्यासापे पिपस्वेषां स्मामी रस्नभिसदिपाम् ।
कप गगनगत्सास्पो खगमाकस्मिः स्पतः॥ २७ ॥
स्वामिन् नम्छमार स्वं यारपुदेसि पीहा ।
भनेनापि मगफिन रुवं वावस्थपौरपम् ।। २८ ॥
वन पनि स्वामिन् सक्यवे स्वपुरोऽघुना।
पर पीरैरपि स्याध्य भुतमध्यभवो मया ॥ २९ ॥
सुस्वा वग्नावकोपर स रस्नपूछीभवत् कुपः।
असहिष्णुरविकांवो मिथ्यावादाविमारवः ।। ३० ।।
न वत्सरामपान्न्न दुम्समाप सगापिपः ।
पन्मुपाईकवस्ता मृगाकरगर्भसमात् ॥ २१ ॥

बम्यूमामिग्रेणिकमहारामरामगृहप्रवेशवर्णनम् १५५ उतध-- "नागुणी गुणिन मेचि गुणी गणिपु मत्सरी । गुणीच गुणिरागी च निरसः कोऽप्यहो मसन् ॥ ३२॥" मा म्पोमगवे पीमन् परमं न मृपा पय । म्बाप्पै रचिव वभ्यामुत सरसश्रियम् ॥ ३३ ॥ स्वामिमहमारेण फेवर्स निर्जिवो बसा। ममस्पेऽपि मदीयोऽप प्रवरसमरिक्रमात् ॥ ३४ ॥ नामविप्यदर्य वीरपैक संग्रामसंकटे । पटकारिप्याम्पा नून वद्रस्यस्त्यमंमसा ॥ ३५ ॥ रुव भग्दोष निवारापनसापने । पदातयाऽप्पल इतुं स्वासो मामका ममी ॥ ३६॥ पसपानबमे सजो पयागादुपहास्यवाम् । परिम्नापि तो दोनो पिसतो न वापरा ॥ ३७ ।। यया पारिधिरहनदी सायको निहवे शिवे । मापर्व माप लपीऽपि मृतोऽपि न तथा शिव ॥ ३८॥ गौरमं किंध पदस्ति युप्मदादिपु सप्रितम् । नएं न किंपिदपापि पिचमानवपारयोः॥ ३९ ॥ तारपिष्ठत्तमारोसा मध्यस्यः फौढफी पया । सासातारीष गुप्माभिर्युटपप विधीयताम् ॥ ४०॥ पापप रत्नशिल गुम्बन मृगांमुहप धुरम् । पपिताश्री पनस्सूर्ण मते घमघम न पिम् ॥ ११ ॥ मरमा -

११२
सम्मामिचरिये-
-
मस्तस्नु ममा यत्नपूस स्वयादिवम् ।
रेनो (नासह) सल्पवे प्रमा पिदि प्यामिमापि मा॥४२॥
मधुनय मापुरमारपोरुपित पुन ।
पिस मा कांसी (कापी) क्षामास्पिनसा मनसगर ॥ ४३ ॥
कावराणां पिपिप स्वीस्वः सारसासिका।
मा हिमतिय नियमो पापग्मीपनम् ॥ १४ ॥
इवि मियो पापसंदमात्स्पाता पोर्ट सम्पती ।
कमारस्तु पपास्याने वस्यो पापंयमीप सः॥ ४५ ॥
निवित बदमारेण किमत्र भियसभुना ।
मूपार्दपोपपामार्प माध्यस्यं मम सुंदरम् ॥४६॥
पाग्यामि मृगांक पेपरसस्यापि सापकम् ।
स्पापवस्वदिपप्तीस्मि विपक्षी रत्नकः ॥ ४७ ।।
रनपसे निपिप्रमभयम्म स्पाच (तुगौ) औरणम् ।
स्वारमोत कि पुप्मावि पिकापारापिवो रिपुः ॥ ४८ ॥
मपानम्य इमार मन्यमानो पमा गुरम् ।
रत्नसागांको दौ संसग्नौ ममता रण ॥४९॥
नेहा संग्राममेर्यप सन्मर्स दयाईयो ।
समदास्ते मया स सापमाना रण पुनः ॥ ५० ॥
पूर्पणमसं पदं पायोपि सैनिमः।
मा रौरमाकार चिम्मो गताः क्षमात् ।। ५१ ।।
कपिदर्य समासम्म्प विम महारयम् ।
भिवै प्रदोष पाववीधरमरसम् ॥ ५२ ॥

यम्भूस्यामिश्रणिफमदारामराजाप्रपेदापर्णमम् १५७ नागस्वम सा नागा भरारनिपादिन । असितारापतिः पद्यापि पदातिमा ॥ ५३॥ फारयामासर्पदं साफारी परस्परम् । रनपुर मृगांकी दापिर रामणरायगी ।। ५४ ॥ सरासारस्तदा पुद द्वाभ्यां कृतमिरातणम् । न फाऽप्पप ट्यामप्प मिवा पाय पराजिता ।। ५५ ॥ सन्दा रत्नचूनासो मापागदमचीवरत् । मगोपस्वस्तिपापाग सावपानाऽभरपदा ॥ ५६ ॥ पांशुभिः सकर्म सन्य स पर पाएसं वदा । पापम्यायण मर्गापाऽती अमाम तणतो रन ॥ ५७ ॥ अय रत्नमिलनायस्वदा पानमकीलया । प्रग्यासित मृगांकस्प सन्प स सगादपि ॥ ५८ ॥ मांका नम्रपा पग्निापपदितस्ततः । इत्यादि मपिर माऽपि परिणा युयुप भूधम् ।। ५९ ॥ नागपस्विता पद्गा पगा पसवचरा । रस्नमम खगेशानो सतपदपाऽममन् ॥१०॥ नवासी रिमपीमून्या पदमा सपने । इन्सले गैतुकामार्थप पारितः स्वामिना मनम् ।। ६१ ।। रे र क यासि स्वं नीस्वैन मृगसाउनम् । मपि रिपति भूपीठ का हि नमविक्षमः ॥ ६२ ॥ कसम पमर्दस्पमादातुं मणिमुत्तमम् । कामपकमादिहात्मानं को या प्रा? समीहवे ।। ६३ ।। मारा।

जम्बूस्सामिपरिते-
पाणिना पा महामहे फपासयिमृमिछति ।
सरमा पा सिंचरपाया कालाप मुल प्रमत् ।। ६४ ॥
सपा स्वं मामविफम्प भई यास्पसि सपनि ।
इदमेर माधि प्रीत्या नापती यतः ॥ ६५ ॥
पदस्पर्ष कुमारेस्मिन् जम्मस्वामिनि सगरे ।
सन्मसीभूप सन्तस्पी पार्द्ध रस्नशिस्तस्वरा ।। ६६ ॥
अपोपाच इमारोऽसौ रत्नचूख सर्ग प्रदि ।
पापम्प पर पूर्व विषय किमयापरै ॥६॥
वत सन्सिमस्सार्य सैनिकाय महामनन् ।
दान वस्पना सम्जो फलै सग्राममुपदी ॥ १८ ॥
सतो युबमस्टोर इपीर पनप दारुणैः।
नानारिफर्महावीक्ष्णैरन्पोन्म अपाक्षिणाः ॥ ६९ ॥
समीप रत्नपूसोऽसौ नागा सामिन प्रति ।
न्यक्कत वमरिण माकरण वक्षणाद् ॥ ७० ॥
पुना कोपोपरका सममिवाण ससमें सः।
मानाम सदा पेगाकमारो मारिभिः॥१॥
पुनस्तामरपावेन एवो रत्नशिलो पदा।
तदा से मार स पर मग्रार माहुना ॥ ७२ ॥
पावन्मोक्त स ममोवि पर रस्नपिसा सगः ।
पापदगादारण सिप्तो पाणा मादिपो ॥ ७ ॥
वन बाणेन वपाईसंरित वीएपविना ।
न्पपश्चद्रमा रुप विपुयावादिष दुवम् ॥ ७४ ॥

जम्मूसामिश्रेणिफमहाराजराजगृहप्रवेशावर्णनम् ११९ --- वाताम्पूर्णमानार्ग नाग पीय मगेपर। ममारपतवारासो इंतहस्तम कापवान् ।। ७५ ॥ वापज्जम्मूङमारेण क्षणादुवीर्य दंतिन । इत्या मुष्ठिमहारण पाविस पृपिवीत ।। ७६ ॥ त्वतमानपना साध्ये नीबमारोप्य दंतिनि । रस्नयूस समरिण पठाग्दा लगापिराः ॥७॥ पदसौ ससपे पूर्ण मृगाकं पंचनाम्यात् । भ्यने पानि भरकाले पयादिलो पनात्यये ।। ७८ ।। पुप्यष्टि मरास्तेनुः इमारमयसिनः। विषो दुमिनादन प्रर्यवो नमीङ्गण |॥ ७९ ॥ पर्नयममारा स त मिदचादयः । हा पुण्यनुमात्स्माद फस सर्ग हि संपदः ॥ ८॥ भय मवेशयामामा कुमार केरमा मवि । सौर्यप्रिकमानागांकरदिक्षितीपरा ॥ ८१ ॥ पदाप परमानंद लगा पामगविस्तदा । स्तोतु न शश्यते सरों निरवचपवया मया ॥ ८२ ॥ मप पौरखियस्तष पीनस्सनमरानवाः । पिक्षिपुर मुमनान्युः हमारमनुरागतः ।। ८३ ।। काभित्पौरांगनास्वप्र ममयम परस्परम् । कामिचन्मंगमानीति गावि स सदानिवा ॥ ८४ ॥ सले दषय मामागु नाना मम्छमारकम् । इण्या निर्मिता जैन रत्नघूसखगापिप ।। ८५॥

२५० चम्बूस्वामिचरिते- काचिदति पन्पोभीपापिरतर जपी। मस्माई येन सौमार्य रक्षित निनसा रिपून् ॥ ८६ ॥ मही मिनमती पन्या साहासस्य भामिनी । दक्षमासान् पया गर्ने प्रयाय सिंहविक्रमः ॥८॥ पन्यः स भेणिको म्पो यस्यैवारमयेचम । एकापलं सहसाणा मया मानानये ॥ ८८॥ अप्पापममापीया धीमा पणिमतेः रुवाम् । पापम् स्वामी मगामाभु वारर्ण नृपमपनः ।। ८९ ।। पण धीमाविधायित्वं नि मणिमौक्तिक। द व इयारासौ मर्म सस्पी स तुकी ॥ ९०n दवा मन पनर्गमन् भपिश नृपमंदिरे । मावबम् मगदानई मौन्दर्य (म्प) मुपागमः॥ ९१ ॥ नीस्ता प्रम मकस्व प्रिर्या सन्मग्ननादिकाम् । पितो टासपबके ममयादीवमस्सर ॥१२॥ सर्व यसरनोम्यं मृमि भामनम् । मृगोऽपर्पयापास सकये सामिनः पुर॥ ९३ ॥ सके मम्हमारेण नानाम्यमनसम्भवम् । मोमन सानु समिएं पूर्व पुष्पफसादिमत् ॥ ९४ ।। सत करतानंदमादिपरपि । भाषिनी मी मृगकम प्रीत्या सत्तारगौरमात् ।। ९५ ॥ भप मार्यसमें स्पिस्ता पार काणापर' । पारामया मापासे रत्नपूर्स सगेपरम् ॥६॥ दरममा चितम् ।

नम्बूस्वामिभेणिक महारावरानगाप्रमेशवणनम् १५१ मपि प कोमसासापै मुक्तिसंदर्मगर्मिः। सगे संवोपपामास कुमारो मारगौरवः ॥ ९७ ॥ जयपरामयो स्पातां कुर्यता गुदमाइपे । पिपाद वग मा कापीधर्म पुसा निसर्गवः ॥ ९८ ॥ गम्छ ग यथास्पान स्यसमन्यपि निर्भयात् । चटितम परीपारेः स्वीयैः स्वीयमुसाप्तये ॥ ९९ ॥ अबादीद्रत्नपसोऽपि कुमार प्रति मार्दवान् । स्मामिन् गत्वा त्सया सार्षे द्रष्टुमिणमि भेणिकम् ॥ १० ॥ स्वित्वा व हमारेण फेभिदासरेप । वतो विमानमाला प्रस्पिवः भेमिकं प्रति ॥ १०१॥ मतम्येऽस्मिन् मृगांकोऽपि मतस्प सकसपका। मादापोहादित कन्पो वो विनासपती सवीम् ॥ १०२ ॥ तयाः सा समादाय रत्लषष्ठोऽपि मधिमान् । पसवि स निमानः स्वैरमा पंचशः रामः ॥ १०३ ॥ म्बगो गगनगत्याल्पो सदा निर्मरमानसः। भनगास मार सं स्वपिमानमपिष्ठितः ॥१०॥ असंघर्दिया पर निमानपोमगा इमे । किमतदिवि यूपासैरास मीक्षिा ममाम् ॥ १०५ ॥ ६ सर्षे सइमाराम संसद फुरसापसम् । पपास्ति मणिको भूपो राममरसमरितः॥ १०६ ॥ भयोवीर्य विमानानि स्थापयिस्ला नमोङ्गगे । मानवाः थणिकं स से मृगांकादया सगाः ॥ १०७ ॥ मा.

१५२
जम्मूसामिचरिते-
भणकोऽपि ततस्तूणे समुत्थाय निमासनात् ।
मासिसिंग कुमार वसलका परमादरात् ।। १०८॥
साघु साधु मया प्टी यषिरादपि मा मरन् ।
सपि ऐ महान् हो मावो मे हदि समति ॥ १० ॥
वो गगनगस्पामपस्तमुखांवमधीकपत् ।
ययाच पोरग वषया श्रेणि मति ॥ ११०॥
वतीसी वर्मपामास संमया स्तिसमया ।
वचमाममिशिएं
पायोमगविः स्वगम् ॥ १११ ॥
एप देर मृगोऽयं वदी व सनया निनाम् ।
एपास्म मावी माया नाना स्पान्यासतीसवा ॥ ११२ ।।
एप ररनपिसी नामा म्पावो पिचापराप्रणी।
निर्मिती पाहमारेण दुर्मया मातापि ॥ ११ ॥
असे तन्मुलायामा म मे नितिं पराम् ।
पया पट्टीदर्य सिंधुदियाप सहापसा ॥ ११४ ॥
सति पर्ष इमारस्प श्रेणिकप साहुः ।
निसगोन्ममापितं राशि परुवा न किम् ।। ११५ ॥
परिणीताप मृगांरस्य तनपा सा परीचिता ।
पा विमासपवी नाना प्रतिस्प पिता ॥ ११५॥
दवोदास्पाणे वृत्तं तेनु सगेवरा ।
कामिन्यो गमगामिन्पो गायति मम समंगसम् ॥ ११७ ।।
मैत्रीपात्री इयोपापि रस्नपसमृमाकपा
मिपा कारापितस्तेन भणियन महाभसा ॥ ११८॥

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जम्मूस्वामिपरिवे- - पापंक्ति निरीक्षस सरस्वीरपु मदार । स्पत्तालंबिनी माछा यया (म) समनसा तयि ॥ १३०॥ इसमझयुर्ग पश्य पकाराक्षि पिससवाम् । गर्व स्वट्दन पीरुप पन्द्रोदयपिकया ॥ ११ ॥ पातम्पनिमारादै गण मेरानुकारिणीम् । रट परमप्रीत्या पश्चाऽपि मिय पिप ।। १३२॥ ममरी पिनरों पश्य मुग्ने ध्वनुमानसीम् । तप मतसाम्पा सरमाना मुफोरकै ॥ १३३ ॥ महिरपदानि पदप पश्य पनांतरे । स्वगुणस्टोपस्पाणि सिसितान्यतराणि ॥ १३४ ॥ द्रावदी बन पश्य ककिफकारपाइसम् । सेमारममपाकीर्ग पनागममुक्पा ॥ १३५ ॥ इवः पश्य सरामासिं प्रफलेन्दीपरानने । शाममानो दिरेफेम स्वताननमिहासपा ॥ १६ ॥ मयि पठमिती गठीमसमाचरा नप । स्वम्मृाफरसंस्पर्दो हती स्पदरिवि ॥ १३७ ॥ कवि कातिलपमेवान् पश्प मुमनसा पपान् । समसामादमादाप दमवः मिपाचमाम् ।। १३८ ॥ विममृविमागाणां धार्मा सम्पमपम् । मिपाप भणिको सूप माप रामराई पुरम् ।। १३९॥ वाप्पुपपने पीमान् क्षण तस्पा ससनिन्छ। हप मुनि नाम्ना साप, पर्मवत्परम् ।। १४० ॥

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मय सप्तम पर्व।
इस्पापीर्वाद
मनतु मामरावध म्पमायो भयानये ।
पर्मे धर्मपरी रागस्वप भीसाधुग्रेटर ।। १
भर्मनावं स्तुरे पर्वतीय पर्पसिये।
धोतिनाय पुनौमि घोतिये चाटकर्ममाम् ॥ १ ॥
भप गम्छमारण पिति निममानसे ।
क्वा पुम्पादयादेवन्मया सम्म योपनम् ॥ २ ॥
वत्सरे ममपात्रष्टुमागती मुनिसनिषौ ।
व प्रणम्पापविद्यम विनयावनवानना ॥३॥
मी मने रूपमा विचिदी में सशमिदे ।
कोणे इतः समापावा फरमाणम्पपिपाकता ॥२॥
जन्मावरस्प पनि शामिच्छामि स्वन्मुखात् ।
स्वसपेसापर स्पामिन् निस्पर इस सपो॥५॥
पत्रौ मिमे समान भीरने मरणे समः ।
स्तुविनिदासमः सौम्पो बास्पांपा परिपंदने ॥ ६ ॥
सं निस्वारी भरापर्वात्य एमे मकरस्सका।
नीपम्मुफस्वमवासि पाठः सर्पमतूप ॥७॥
ममोगाप सनिर्नामा सौपर्मो पर्मदेषक ।
मृण पस्त पदेवाऽप पत्ता पूर्वमन्मनः ॥ ८॥

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गमूसामिचरिते-
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सुपतिस्तप नामापि समाविष्ठ मतिष्ठान ।
जैनपपसरामासि सुम्पिनु पदपदीपम ॥ २० ॥
माया रूपमती स्प नाम्ना पर्मसमन्विता ।
पहनदा मुनीसाठ्या सॉन्दपगुणमासिनी ॥ २१ ॥
मापदनचरा उपायान् याऽप भूस्वाऽमरी दिदि ।
मुत्या सागरगंदम सोप तस्य मुताऽभनि ।। २२॥
सौधर्म इति नाम्नापि रामा मपातः स पंधुना ।
क्रमादि समासाप जाता निवपञ्चानबित् ॥ २३ ॥
छमारापस्थपा पापिष्टमहम्दीपर।
मयान्यपुर स पापीया सुपविष्टः कसरत ॥२४॥
समवादिसति भूमि प्राप्ता पीरस्प दितुम् ।
पर्डमानमुलाचा भुस्वा पर्योपदयनाम् ।
सपयोत्पमनिदी मांगेम्पम परान्मुसा ॥ २५ ॥
मामपामास से चित्र संसारासारता घसाम् ।
मणिकत्पादनादीना मारिसमुदसभिमाम् ॥ २६ ॥
दीला मग्रार नैवी स्वर्गमुकिमसमदाम् ।
सर्वसंगरिएकात्मा हानपे पाटकर्मणाम् ॥ २७ ॥
दिरसे कविमिर्मितुः भूतपूर्मोऽभवन्मुनिः ।
गगपरस्तुर्पो जावो पर्दमानमिनपिनः ।। २८ ।।
सोपर्मोऽपि तभा पपाहील्य ते गणनायकम् ।
भावमपंगनिद बनाम महामनि ॥ २९ ।।
मास्सोऽप्यमपचस्प पंपमो गणनायक।
सोभं मुपम्मनामा स्पा ममदापराऽधुना ॥ ३०॥

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नम्बूस्वामिचरिते- - समस्थप पत्स बयोसीनानुसारिणी । ई दीक्षाभम साम्प दुर्दर मातामपि ॥ १२ ॥ मप बस्सयातला पवे वप चेतसि । पकस' सारे गस्या हरु कर्त्य मयादिवम् ॥ १३ ॥ घुर्ग समाप समापण्पाप गौरवात् । समापानवमा रुता संतम्यं प परस्परम् ॥ ४॥ पमााण नेप्रेमी दीक्षा कमलकराम् । एप पम' समानापास्स्सीकवा पूर्वपरिमिः॥४५॥ भुस्पा मम्पूछमारोऽसौ माक्त सीपर्ममरिणा। पिसयामास स्म विनिम्यं मयाघुना ॥ ४६ ।। पेस्सपनि न गमध्यम स्पास्मादिह । परारामापिसीप स्यास्स म भेयस्करः सवः ॥ १७ ॥ सवामपं दिगंतम् मया सास्मासय मपात् । पधादागत्य दीमा तो शरीप्यामि तपोन्निवाम् ॥ १८॥ निपिस्पेवममरुत्स गुरु सीपमेसंदकम् । मम्मस्वामिकमारा सा भगामाशु निमासपम् ॥ ११ ॥ गत्वाय त्वरितं वप पाती मिनमती पति । निपता स्मपित्तीस्था सो वामप्पपीकवत् ॥ ५० ॥ मावभून पिमानी निर्षिण्णाश मरादिति । इस पाणिग्रहारं कर्तम्मं मपच (दि मया) शुपि ॥ ५१ ॥ पकपे भवमाप्रेण माता मिनमवी सती । पपननरिता गादिमदग्भव पपिनी ।। ५२॥

जम्बूस्वामिपरिणफ्नोत्तयवर्णनम् मो पुत्र किमास्पा पनसंपावनिष्ठुरम् । कारणं किमकस्मास्त्पादन कार्यनिदर्शने ।। ५३ ।। मनोचरमदानेन समापानविकीर्पया । कषितानि कुमारेण मनिवाफ्यानि तानि मै ॥ ५४ ॥ भुत्वा मिनमती तस्माचनावरगार्षिकम् । पर्मदिवपा किंचित्समापानमुपाददे ॥ ५५ ॥ साहासाग्रतः सरे गांव गदति स्म । घरमांगी छमारीऽयं मैनी दीक्षा निघृक्षति ।। ५६ ॥ आवासो विनम्पैतन्मर्ण प्राप्तः क्षणादिसि । महामाहोदयादेव राहाकारं रमिति ॥ ५७ ॥ सवा कर्यचित्सीपायैरुत्यिवोऽपि पणिपवि । विलसाप ययात्यये सया को वर्णयेत्तयिः ।। ५८ ॥ मासेन सस्सिम फपिदाग्मी मिचक्षण । मेपिवस्वत्को मोक्तुं वार्दिवचादिसपनि ॥ ५९ ॥ मादिएस्स्परिवं गस्वा स सदेशार मुपीः। समै निवेदयामास यपासर्वसमक्षकम् ।। ६० ॥ मो दुर्देवमस्माक याप्मत्समसज्जनाः । मातामापि मनमाप्ता विघ्नकर्मोदयादिर ॥ ६१ ॥ आफदं वयस्तीक्ष्ण दुस्खद अक्षपातमत् । भष्टिनस्व महामीवेश्चत्वारोऽपि पश्चपिरे ।। ६२ ।। दुर्मति स्म गुवामाता मणं विस्मिवमानसा । किमन्यम मारोऽयमई कर्चुमिच्छति ॥ ६३ ।।

१२२ सम्मामिचरित- वारत्स एव संपृष्ट' श्रेष्ठिमिसमाइमः। पत साम्प पपस्वप्य कारणं किमिदाम मा ।। ६४॥ स सैदशहराभादीपातर्यतरया गिरा । मी स्वामिकमाराऽयं वितीपुपपचारिप ॥६५॥ निश्पपात्कापमागम्पी निसा दुम्पमीरकः । सस्पही सक्तिकामिन्या जनी दीक्षा ग्रहीप्यति ।। ६६ ॥ मुस्ता व पणिनां नापाः सणागतवा गवाः। पोपपिई स्तन्यास्था ययुर्मामाभिमासयम् ॥ १७ ॥ वा गस्ता समाप मीवाश्याप्पनुसितम् । वान्पाइसन्नीरत्वं न महशतत्रिपा ॥ ६८॥ पुभि पम्हमारोऽयं स्पते मागनिसरः। मताम्पादातुमीत पम्पूर्वाणि मुक्तपे ॥ ६९ ॥ वरतातु पपाकर्म का नो सनिस्तु समितम् । मरवीना सपद्वारे भषाप परोऽपरः ॥ ७० ॥ निसम्पैवत्पिवर्षाप पपी कपिवा वदा । ममावादा कपिदै माणिालेर योगिराट् ॥ ७१ ॥ वात मा पद दुर्गाचर्मत गरी मपि । माणविभूपि न कदम्पा प्रमानिमहात्ममिः ॥ ७२ ॥ एक एष पवा देयः सर्पदोपरियनिवा। मादिति व (स) दास्पाटो पर्मबैको महास्मनाम् ॥ ७३ ।। तथा सम्मारोऽयं मर्वा को हिमामकः । नापरः कश्चिदेवावी नियमो मे निसर्गवः ॥७॥ विी पाई। मामि।

जबूस्वामिपरिणयनोस्सयवर्णनम्
१६३
पिग्मीगान्विपयोत्पमानिन्द्रमासोपमानिह ।
पसौ गच्छवि दीसाये पयं तूपपती रवा ॥७५ ॥
अय पदापिनी सेयं मागसंपदनीची।
मस्माक माम्पसयोगादय स्पास्पति सपनि ॥ ७६ ।।
मदि मोगांवरायस्प पर्मणो मे मिपाक्त ।
पारिवो पहुगोपापैरयं गवा तपोषने ।। ७७ ।।
सदापि न मनस्वापो मरिता मे मुनिश्चयात् ।
नान्पया अपपवे कर्नु याध्य तपिप्पवि ॥ ७८ ॥
मसमम पाहोन तात पाचपमी मव ।
सर्पया पविरेको मे नम्भूस्वामिछमारकः ॥ ७९ ॥
मुस्ता सागरवचास्य भेष्ठी पुप्रिपघस्तविम् ।
सबै निवेदयामास स संदेशारे प्रति ॥ ८ ॥
मुत्वा पयोहरचापि गत्या भेष्ठिनिमासये ।
मगाद सर्वतस्सवं यया कन्याकयानकम् ।। ८१॥
मय पारश्यतां गभान् मानुरस्वार भिवः ।
महो न क्षमफा द्रष्टुं संवः परविपचयः ॥ ८२ ॥
इति फर्वम्पा सोसासो पणिक्पतिः ।
गस्या पति इमार व पिप्तिमकरोस्कृती ॥ ८३ ॥
एकमेप दिन परस पिचारानंतर धन ।
सपा वामिः सास्थानं कर्वप्य बैंकमा किष्ठ ॥ ८४ ॥
मामकी मार्थना पुष मामोपी विधेहि भो।
पश्चापद्रोपते तुभ्यं तचषया विपीयवाम् ॥ ८५ ॥

बम्बूस्वामिचरिते-
निरीहोऽपि हमारः स पितुरत्याग्रहाचदा ।
सयेस्राप पाव सं मा पिपादी: स्वचेतसि ॥ ८६ ॥
सवो मांगल्याणि पचानां भेष्ठिना सहे।
नेदुरानंदभेर्यश्च परिवाशामुम्मा ममात् ॥ ८७ ।।
फसगीवानि कामिन्यो गापंसि स्म मुदान्निवा ।
संप्रस्वमूगनेप्रास्ताः पीनोमवपयोपराः ।।८८॥
दाहोचिवसामग्री या कापन मसिविता
वया सा पपासासारवास कुमारकः ॥ ८९ ॥
प्नननिर्मापसपैश्च दिदै सन्दफै ।
पठनिस्वपशीमार्न मुस्यग्निर्तकीमनः ॥ ९० ॥
पौरांगणादिसष्ठापमानः पद पदे ।
माप मम्मूछमारश्य पार्दिदचस्प सपनि ॥ ११ ॥
उत्तीर्प सुरगातूर्णमुपरिटश्यकिकाम् ।
मपगमीरनिस्तानी पीरो मंदरफठपत् ।। ९२ ॥
अचानीतामिरस्पर्यमदास्प व कवी ।
करपामनिच्छाऽपि मेदिपिपशास्स हि ।। ९३ ॥
पिसानंतर सर्प सरस्नादिपारनम् ।
दत्त सागरदचापर्दानीपं पदरोपितम् ।। ९४ ॥
पहलमानि सणानि पिपिप्राणि वि (प) खाणि प।
पराया दुनिया (८) भ्यो मणिमुकामगाएकान् ॥ ९५ ॥
सत्कपरममिभाणि ऊपादीनि स पद ।
पत्यकामनयानादिरनि पणिमो ददुः ॥ ९६ ॥

--- सम्बूस्थामिपरिणयनोत्सववर्णनम् १६५ स्त्यपषनपान्यादिवासीदासादिफ वया । पदुपम यो फिपिचसर्व स्वामिन ददु ॥ ९७ ॥ वदादाय स फन्पामि संपदपसनांबलः । रनन्या साफांतामि नामिपमहात्मरै ।। ९८ ।। पदनिदिदेश्य त्मदिनकीमने । मासरे माप स्मापिनम्यूकुमारफः ॥ ९९ ।। पचपाप्युचिव विपिपत्सासगिफ्मुत्तमम् । वस्स विनयान्न्नर्माणासाऽप्युपाददे ।। १०० ।। या फश्विचष दानीया साऽपि दानेन मीणितः । प्रभयाोऽपि यः कश्चित्सकव स या फिस ॥ १०१ ।। मिनमत्यापि सोस्साहात्स्यायों बहुमानिया । ययास पहलादि वाम्यो दवं समातितः ॥ १०२ ॥ सन्मानिताश्च ते स ( वाः सर्गः ) माता निमनिमगृहम् । निद्रापूर्मि (मि) सनप्राश्य पम्मुः पनोपता ॥ १०३ ॥ सा वामिा कुमारश्य रहस्यक मंदिर । स्पापिवस्सु मपस्पासीमनः मम्मितमोपनैः ॥ १० ॥ अय खसरस दीपपु दीपिकापरस्तप । सत्साम्पमय्यापां स्पिवस्वामिः सासको ॥१०५ ॥ सप पायमीमाश वस्पा स्वामी विरक्तिवः । संस्पिन पापि तन्मध्ये पमपर्म मसे पया ॥ १०६॥ नापि वक्ति न पायव मुरूपास्वपि वास में । स्थिता स्पिरतरः स्मामी निम्तरगसमदरम् ॥ १.७॥ , गरिम- योषितः । सीमा १६६ उम्स्वामिचरिते- वाराणां निफरा रेन तदा पानी निर्मषः । पामिनाकामिनीमपासताकदवर ॥ १०८॥ भय दास मरीपु वसति स्म स्मरानला । मत्युपायैरसपदप सामिसापा रिसंसया ॥ १०९ ।। सममकं तत स्पिसा वामि कामातुरात्ममिः । मई मदमयासाप हमेतीभिः परस्परम् ॥ ११० ॥ कामामामिरामिप ताम्सादिदित्सया । मारम्पा स्मासंपेश नानागारमाध्या ॥ १११ ।। दनपत्काएकी कापिषत्र पारमिपास्वनी । रापितफसाकारा पापनामामृता परी ॥ ११२ ॥ सचिमामि मुर्गमीरी दमयंती स्पलादिर। काचिदम्दपोप्लास पच स्म निमसीसपा ॥ ११३ ।। कापिदरासादिनर्मगर्म प मममित् । पष'पोप नबामा स्वामिनं मवि सस्मरा ॥ ११४ प्रचित्रकोणीसामिाससाफने समीहत । पापमापरिणासापैः काचिकांव पिमावि ॥ ११५॥ कापिठागौम गायंती परम (म) अनिमिमितान् । काचित्पति पदरापारमित स्मामिना मनः॥ ११६ ॥ इस्पादिपिपिपमावर्डपपस्पा स्वपापम् । म समास्वाश्वतत्रापि सम्पना माहिद मनार ।। ११७॥ पतिमुरूवाषिपाफात्स्वामिमममार' सपमुस्पानिपाना मारमावंगसिंह।

जम्बूस्वामिपरिणयनोत्सवयर्णनम् कुवपरिणयफर्मा पर्मविपिरका विषयमिरवताः स्यात्समासभमभ्य ॥११८॥ इति प्रारम्बूस्वामिचरित्रे मगपझोपभिमतीर्थकरोपदेशानुसारित स्याहादानवगपपपविषाविशारदपडितरानमश्चमिरविते साधु पासारमनसाधुटारसमम्पर्धिते अम्ब्सामिपरिणय- नोत्सवमर्णनो नाम नबम पर्व ।

अथ दशम पर्व। मपस्पारामिता सम्पग्मारवी परमष्ठिना । साघुपासांगमस्पास्य भपस साघुयार ।।१।। इस्पानीपादः। हर्ष कुंभ्यादिसदर्य पमतीर्थविमायकम् । अरं पारिपिनामाप दे सकिरप्परम् ॥ १॥ अप वासां पतमा रसा पंचपुरिफिपाम् । निवि विदारो अम्प्रस्वामी तदर्षन् ॥२॥ हा पिगवानमवन्मोहरमोदयादिक्ष । यस्पमारानु मते जीया दुर्म बि सीरुपनम् ॥ ३ ॥ तपा परीपिका पार्नु मृगा पापति पापिया। तपा माणिगणपापमिदैपाय मुसम् ॥ ४ ॥ पया कपनं कमावरी नसरे पर। ममानन् स्मरपुम्पी मनुवे हि परं परम् ।। ५ ॥ तत्मोमर्प पपिरावा सापी: स्वात्ममुम्बाप्तये । निर्विपक्षमपा निस्पमम्यापापयतीन्द्रिपम् ॥ ६ ॥ इदं स्वाइप मुसामासे परं पापापुर सरम् । अंपापुरनिस्पं च तदप हि मारपमिः ॥७॥ न बापालकि पिरिभर विम रिएलिदास कुस्तमेष दस . पनि माम्ना चम्यूस्वामिमार्याचतुफकयात्रिपुचरागमनवर्णनम् १६० मापा(त्मानिदमानानो मना महापरापत । पिपयेषु समासक्त मुखं पदवि मूरपीः ॥ ८॥ किं पास्मिन्सुले ममो जीरो मजवि दुर्गवो । योपिस्पारे पदो यया पायरया मृग ॥९॥ आशीर्ष पदस्पन्ये दंदशकविश्चपकम् । प्रया वै क्दा मन्यै पदयो योपिदासा ॥ १० ॥ यासामर्पमिसाल ददमते हि कामका । समस्कामापिना दग्पाः भरापागा इच ।। ११ ॥ असारेऽपि वधूफाये मोसमंत भगः कयम् । स्परावादीन्द्रियसौख्य हि सीदसि पस दुर्मदा ॥ १२ ॥ यदभ गर्दिस किंपित्तरसर्वे सीइटीरक । पोंम्भावसमाससंमृत कीकसोचये ॥ १३ ।। संदरं पापि यदस्तु पूत मा पभिसर्गतः । मासंसर्गवो नून याति दुर्गपा क्षणात् ॥ १५ ॥ पालकोसानासमिमाः सर्गम योपिवः । मन्य माणिषिपंपाय धापा पाशा निनिर्मिवाः ॥१५॥ एवं संचितयमास्ते यापस्स्वामी स्पनेवसि । वापरलोषाच पपभीस्वास्तिस्रोऽपि यः मति ॥ १६ ॥ महोऽस्मिन् निर्गणे पुंसि कि हवेनापि पाटुना । पाणाहुति किं पो मन्मपस्पापि सर्पश ॥१७॥ १ मपिपि मारय मा विषमस्मेति पिपर स्पर्ष 1 पति पति इति । पुरीष ।

सम्सामिपरिते- पर्याप नर्तनेनापि गानन पपिर न हि। कावर किं पाणन किं सक्षम्पा रुपण पा॥ १८॥ सस समीक्षकारीर पर्वते ग्राहमानपम् । माम तप फर्म त्पत्वा पुन समीठ ॥ १९ ॥ पपा कपिमरी मनः सिदम स्वसपनि । स्पक्मामानारममादादा मिमिक्षामरस्पहा ॥२०॥ तपसा पसं सोम्प तत्सर्गे पा महीवसे । भासं पापि न मानादि नूनमध्यक्षता जर ॥२१॥ पर्य रैमासमा नाय सपेवस्पर्गसमिमम् । पपुर्दिम्य गो सपद् दुसमं स्मितः परम् ॥ २२ ॥ सर्व समापीनगुस्सुम्प सपा की समीदव । वम सा पाप्पट नो पा विवकरदितस्तपम् ॥ २३ ॥ सस्पः कपान पैक रम्यं विमिनम् । सारपानदपा भाम्मे युप्मामिषम्यां यदि ॥ २४ ॥ मृण्मति स्म प वास्तिस्रो सामाः समारकाः। पपभीरपदस्साम्पा पनवचकपानकम् ॥ २५ ॥ पवाम ऐमिका पश्पिदनदचा नानाप्पयतु । तस्प मापा यपानाप्नी पवते स्म मुदानिता ।। २६ ।। तयागावः मुतापैकी नाना पै सबछा बसी । अप्पकाकी स निप्मावा पाचार्य क्षमा समी ॥ २७ ॥ भय देवसमाचस्प हासिकस्म पृता पमः। माया सस्पीयपा समे एनरामपक्षणात् ।। २८ ।। पति विना नम्मूस्वामिमार्याचतुष्करपाभिपुवरागमनवर्णनम् १७१ हासिकेन वा पश्चाद्दामा मुसे वरम् । परिणीठा परा सास्मै पदेनापि सकामिना ॥ २९ ॥ पोग्वाम्दमिता सेयं पष्टिपर्पमितः स्वयम् । वया साद रविझीरो हमास्ते स कामुकः ॥ ३० ॥ बयाऽन्येनिधीय सा फासकी कामिना सह । कचित्मणपफ्रोपाजावा मानमपिष्ठिवा ॥ २१॥ वानुनेनुकामोऽसौ स्वपियां तो प्रसादयन् । उपाप गलिक कामी पादुवाश्य पदामिति ॥ ३२ ॥ मिय पिये पदमाशु सन्मसीयूय मां मति । कोपस्प कारणं किं स्यादपास्मारिपये मपि ॥ ३३ ॥ पदत्यवं मृक्स्यापि सानुकूलेऽपि भवरि । मा मा स्पस करणेति सानदत्मोपचासिनी ॥ ३४ ॥ बस स्वया मिपणापि मरोफर्मवा धठ । समानाभिन्नता प्रीतिं तक्षणममानवा ।। ३५॥ ठच- पानीयं र रसा भीतं पराम सादरं रसः । रसो गुणयुवा माया मिप्रश्चानवरो रसा" ॥ ३६ ॥ इस्पाकमे स मार्योसमषे पाप मियंपदः । पद प्रिपे मया पाच कर्तय॑ स्मन्मनीपिवम् ॥ ३७॥ मासिवानुनपनेह साप पापापा सुमा। नंदन समस नाना पावन पुनिश्ययात् ।। ३८ ॥ रात्री।

१७२ जम्मूस्वामिचरिते- भुस्वति कंपमानासौ शरिफर पुनरवयीन् । पद सग्घे मादुष्टमेवकम दप कपम् ।। ३९ ॥ किभेपस्त नापि दर्भयस्त मिपे मम । ने बिकापेमपिश्य मंदश्चापि प्रपर्वते ॥ ४० ॥ पासिक सा (मिपा) मादीपुतिसदर्मया गिरा। इस तस्मिन्पराभेया मापीमि भूव (1) पया॥४१॥ सस्पस्मिन् सूनका चिर्च पास्प॑वि ममोदात् । है सर्वेऽप्पस्प दासस्पे फरिप्पति न साप ॥ ४२ ॥ मतोऽयं सर्पमा पम्पो नूनं मर्तनिरि मत् । मारिते सप्र ते सर्षे स्वापीनाः स्यु मुलापहाः॥ १३ ॥ एवं पपनैरीपरमस्ससन्मानसोऽपि मा। किंपिकाणिकस्वम हासिक पुनरबबीत् ॥ १४ ॥ मुग्म निरपराप मारयामि भुर्व कपम् । भपि परस्पास्य मोरारं रिनमान्वितम् ॥ ४५ ॥ यदि पा मारिते त्यस्मिन् रामो दंग्मयो मरेत् । पापमापापि ते सर्प दोर्प दास्पति सत्वरम् ॥ १६ ॥ पुनर्ससिता साये मरि रामिक प्रति । भने सर्वधा मर्वरन्यथा नापयो मुखम् ।। ४७ ॥ भवः परं तु महमें ये मविप्पति मूनवः। दिले ते करिष्यति निर्षि पुसमापयाः ॥ २८॥ अप्पुपायं च बणि यया वस्प पहले। नापि स्पतिमीति स्मामापि गप्पति पापा || १९ ॥ 1 प्रोसम्हारिनन मदोऽपि प्रबदते इति मुमापित। भरवा।

चम्बूस्वामिमार्याचमुककथाविपुचरागमनवर्णनम् १७३ पदासौ लांगेस मंद मंदं पाइपति स्फुटम् । वदा स्वमप्यतः पश्चादायातीय घेगवः ॥ ५० ॥ सरगतीपः प्रावोदादसितास्ति । मारपैनमनायासाथयार्ववियेष्टितम् ॥ ५१ ॥ एर कसे न भूपासो दर वास्पति से चित् । नापि षघुजना सर्वे युष्मोपापहा मनाः ॥ ५२ ॥ मार्योक मविपापासौ कामांपा हासिक' रुपीः । क्यास्पिति पधपोच सामापास्प पृयग्मन ॥ ५३ ।। पालिंग्यामिमलीभूय संदृष्टासी स्वमानसे । कामकलिं सया चक्रे मिया मुरतिपण्डिया ।। ५४ ॥ मय वत्सनुना सर्वमाकर्णिवं पपादितम् । यसेनोपन पत्तं समक्षमनुरक्तयो ॥ ५५ ॥ मावस्त्याय मागेव मागाद सवसा मुता। हासिफस्वदन मावो तुफामः स्मनदनम् ॥ ५६ ।। पृष्ठम्यापि यावत्स अनकस्तष गणति । सापचपदनेनाशु सेने संपावि इसम् ॥ ५० ॥ मय गत्वा वदर्भासो पामरमात्ममं परम् । मूलान्स दिणि मासिक्षेत्रं इलास्पवः ॥ ५८ ॥ रखाप शापिकीमादीद्रे रे पुत्र महासठ। भ्रात्या (एकर मनमर्पच्छ फरापि किम् ।। ५९ ॥ म्।।मीवरमा।

जम्मामिचरिते- माप पुम मी वात मीणस्वास्सस्यसपदम् । मोन्मूल्स रापपिप्पामि नाश्यात्ममुसाप्तप ।। ६० ॥ समाकम्प पवस्वस्प पिप्राप्युक्त स्वपुदितः। सिदं स्यमसि रे पुत्र नम्मं फांसति रे जर ॥ ६१ ॥ उसानेपी स पुमापि पचयोचे समूदपार । सावत्र पस्स्मरस्पानु रामी पजसि त्वया ।। ६२ ।। इस्पाप मा मुसचाई पुर्ष पछिवि माविनम् । मुसार्य कविया सार्ड वात दिसबरशी ॥ ६३ ॥ [प्रपाक्यास्स मूसाप्रप मावा भविमुदा क्षणात् । दुराग्राही स्पर्य पासे नेतुं भक्या न मार्दवम् ॥ ६॥ मारपएवं सदस्स्सामी बङ्मारफः । स्मापीनाः संपदस्पस्था संदिग्पाः पुनरीहत ॥६५॥ एवसर्व फपार भुत्ता मोपाय पीपनः । निरीहोऽपि पवा पक्कि पर्मास्पान मृपांगिराद् ॥ ६६ ॥ मियाः कपानकं चौर महापरिपापम् । सापपानवपा भाम्प मपसीमिमपादिवम् ॥ ६॥ विष्यास महारम्पा मृतार्थको मदंगम । मर्यापूरमरेमेव नर्मदा मसि सोऽप्पगात् ।। ६८ ॥ वाचकडेपर पश्चिममाणापि पायसः। मनगाचसोकस्यो सीलप: पिभिवाधिवा ॥ ६९ ।। तलाकोपरमिटा।

पम्बूस्वामिमार्याचतुककथामिपुचरगमनवर्णनम्
मध्येमसं यथाषावस्पतिवोऽसौ महांधुपौ ।
काफस्वस्पिभितमासरससंम्पमानसः ॥ ७० ॥
मसिर्व वदपुस्तूणे मस्स्यायैर्नसपारिमि ।
फाफेन गंतुमारम्भमहीनेन महाम्मपौ ॥ ७१ ॥
रहीयाहीय यावस्स म्योग्नि पश्यति दिमुलम् ।
स्पान ग्राम तर धेत विभामार्य न किंचन ॥ ७२॥
कियतकास स पंम्रम्य पविसोज्य महार्ण ।
मास्पैकककमित्युपस्वा पराका पचतां गत ॥ ७३ ।।
पया सन्मासष्टम्मैन माता पापदनीशी ।
तपाई न मषिष्यामि कोवा कविरपुभयाः ।। ७४ ॥
भोक्तारं घाघुना भोगान् युष्परसस्पर्धसंभरान् ।
सत्पाकान्मां निमग्मतमुदरको मानुषौ ॥ ७५ ।।
प्रविन प्रविजस्तं सत्पपभोकयानकम् ।
नकभीरयोपाच कर्या कौतूासापहाम् ।। ७६ ॥
कैसासे पर्वत रम्ये कपिश्चैकोऽमपस्किल।
वैश्योगादया पेपुर सम्भूगमपिष्ठितः ॥ ७७ ॥
पविस्माय वदो वेगास्वरसरितपिया।
मकामाने जर्मन् मृत्वा मातः स्वगाषिपः ॥ ७८॥
एकदा स सनि मत्ता पमा स भावरम् ।
मनिस्सूपे यया सापपिसानपठपा ॥ ७९ ॥
पुरा मन्पनि निषेश समासीतपिरुत्तम ।
फैसासाथ पवित्वाशु मृत्ला जातो वगः शुमात् ॥ ८॥

जमूस्वामिचरित-
भुस्पेविषचन रम्पं पापन मनिनोदितम् ।
निश्षिकाय खगेनारा स्पापिर्व पदि दुर्षिया ॥ ८१ ॥
यत स्यानाकपिमृत्ला मावा विपापरो मरः ।
मनं वा स्वगो मृत्या दपोश भपिता सणाम् ॥ ८२ ॥
अवएप मपापश्यं कर्तम्य मरणं परम् ।
तत संगसम्यग्रात् पविरमाय क्यारिपम् ।। ८३ ॥
विमृश्य पैकवाध्यादीस्स्सगो निममियां प्रति ।
पया मनीपित स्पस्प मागपावस्य सूचकम् ।। ८४ ॥
मिपे सर्प हि समाप्प स्वर्गमासादिकं फसम् ।
कपस सिष्यप्रात्पावेनाश पिकपा ।। ८५॥
भर्नर्मपा समाकर्म पिसापाविसिवा ।
भार्या विपापरस्पोम्पैकिंग दीनमानसा ।। ८६ ॥
काव फांव मामास वृपा मरणमिग्छसि ।
पिपापरोऽसि नाप स्व दुर्गम किमतः परम् ।। ८७ ।।
गठम्याप मियापाप सगास्पपात सः ।
मृत्वा दुर्ध्यानयागेन पावो रकाननः कपि ॥ ८८ ॥
सस्पो यया स्वगो मूसों समता स्पापीनसपदः ।
मृवपापन्मयो मावस्तपास्माकीयनापका ॥ ८९ ॥
मातामयापि महारम्पास्स्पक्ता सर्चा हि सपदः ।
भाविपस्ताः समीदव प्राप्त तपसा न पा ॥९॥
जम्मामी तदाकर्म सर्व कनकभिपादिवम् ।
पारागाधरं प्पामादेक किंपितांवरम् ॥ ९१ ॥

चम्मूस्वामिमार्याचतुष्ककपा-पिपुवरागमनबर्णनम् १७७ विप्पाडौ पलमान्कश्चिदासीत्कामासुर: कपिः। असहिष्णुः कपीन् सर्वान् इन्पमानो बनेवरान् ॥ ९२ ।। भाव जास स्वयार्पाया स्वपुप्रमपि इन्पत । एकाकी मुरसझी कई (कामो! ) बनातके ॥ ९३ ॥ मपैकदा वापोऽपि मावो न मायते सदा । देपादपृदिमगाझोप्या स्थिती पृतसा ॥ ९४॥ वा झमेण मातोऽसौ पुषा स्मरातुरः कपिः। (स) मार्यो मन्पमानव मातरं रंतुसपमी ॥ ९५ ।। न केनापि तस्पिप्रा बानरेण सम(मीति)क्षवः । समयूतरूपा वेन एवं नीवो पगादिः ॥ ९६ ॥ स्काररक्कास्पश्च विमीपणः । सोऽपि देवैर्नखाप जावकोपोचकपिम् ॥ ९७ ॥ वदा वो मिय ती पुरसत्रणम् । नसर्दवामिपावैस्तैमर्मरौ ननकात्मनी ॥ ९८ ॥ मी वृदफपिउँगावपसा सपा कोपपरः पृष्ठौ निमीकस्तरण कपिः॥ ९९ ॥ वारपापदिनस्ति स्म पानरं पृदमेन वम् । -निमयीमूस्पा म्पावृधः सए प्रति ॥ १०॥ मय पिपासया पूर्ण वपासंधुप्फतालका। समविटो मसे मीपचोये सर्पकिसे ।। १०१ ॥ पीवाय फळप वोयं वदो निम्सर्तुमसम । आतुरो रिपपापु मृतस्तम इपीर्यया ॥ १०२ ।। ..

मम्सामिचरित- सवा नाई भगाम्पम संसार प्रियपादिनि । निर्मम विषयपूचका को मां हि समयरेत् ।। १०३ ॥ इस्पचरमसादेप कनकभीरभीरभूद । बिनपभीस्ववीयार या फयाकोपकोमा ॥ १०४ ॥ एका कश्मिारिदा हि ससनामास्ति उपषिम् । मध्पेननं स प्रत्यूप पावि काष्ठादिश्वये ॥ १५॥ वपन्मनमानीप सिक्रीयाप ययार्थतः । केभेन पत्मनं वस्प मपेस्साववरादपात् ॥ १६ ॥ एकदा बहुमूस्पस्पासम्म किरियोपिकम् । मामनादपनि स्पादे स्पकमाप्रकम् ॥ १०७ ववो निमृस्प दीनोमो मार्पया समई क्या । आपदलादिदेतीस्वङ्मौ निक्षिप्तपानिए ॥ १०८॥ मय कभित्पबासी च साध्यसाचा मानने। रनमार सुनिक्षिप्प गवस्तीर्यादिकेषु सः ॥१०९ ॥ चननं भ्रमवा न , पौरयोगवा । नितिन प सवोऽन्यत्र सोमाचा विमृश्पवा ॥ ११०॥ मस्या रममे ग्रहीप्यामि प्रपनन । इत्मानंदमनाइबासा माणे सासपनि ।। १११ ॥ गस्पा गेहे दरिद्राऽप्ती मार्यो प्रवि निमेश्यम् । रनमार मया मान मिपे पुम्योदयादिह ॥ ११२॥ स्पापि वप कावारे मया पाप प्रयत्नवः । सस्पं बानीदिति माम्पमा पनि करिषित् ।। ११३ ॥

चस्मामिमार्या चतुष्ककया-विपुषयगमनवर्णनम् १७९ भुस्वाश्पर्परवी मार्या जाता रोमांधिवा क्दा । मद्र ववास्तु हे कांव विरंजीवी स्वक मम ॥ ११ ॥ यव ममोदिव मप्रमपश्य क्रियतां लया। संपितो सका पूर्व योऽसौ संमृन सक्षताम् ॥ ११५॥ सोपि वय सस्पाप्यो रत्नमरि मुकौशलान् । स्वमा प सयापूर्व र्याप कर्म सांपवम् ॥ ११६ ॥ मामामि दरिद्रेण मोमार्योंदिर्व पचः । पर बरं स्वपोकं यस्कवि मैदगपशासिनि ॥ ११७ ॥ वतस्वी दंपती स्याता कायादरसमौ । पदनाछिरसा नीत्या विझीय व इसिमरौ ॥ ११८ ॥ एवं म्पतीपमान कास कियति पानयोः। देवारत्नपति सोऽपमागतस्तप्र फानने ॥ ११९ ॥ ययास्पाने निरीक्ष्याय न सम्म रत्नमारकम् । ववश्वोपमपान् जावा या तम निरीक्षणे ॥१२०॥ पिरालम्म बनेक्षेन रत्नमार स्पपुष्पवः । नीपोस्वाय गवः सोध्य सानंदास्स्सालय मवि ॥ १२१ ॥ मो पुम्पपश्चाठमीरममापि समानतः। विनाप्यन्यमानेन कप सम्पा सुखादिर ॥१२२ ।। एकदोघाव्य ईभ द रिकं यापत्स पश्यति । त्या रस्पा शिरा स्पीपं गेदिवि स्म मरोभमः ॥ १२ ॥ रत्नमांटेन बना मम पूर्णोऽपि स्पः । सचिवोऽपि पिनप्टी स्पेन साई सदुप्फवाद ।। १२४ ॥

१८० बम्स्वामिचरिते- पंथितोऽम्पा नून दुपन पिपाकिफना । पवी सम्पमपि स्याम दानापाप न मुक्तय ॥ १२५ ॥ स्वपक्षी संमवे नेव महमी मातामपीच यः । पपाचापपरो मर्म संसमत्स भपियति ।। १२६ ।। मम्मस्वामी निशम्पसदिनयभीकथानकम् । मोचे रूपांतर म्पामादाय मस्युचरमदम् ॥ १२७ ॥ आसीनिम्बर कशिपसम्पदच इवीरितः । पाणिग्याप भगामाशु कांतारं मर्म दुर्गमम् ।। १२८ ॥ दुदैनाचत्र सममो गा दुर्मदमीपण । ई पगि कापास्ताव इस निर्दयः ।। १२९ ॥ तीवो पणिमा नायः प्रपसायभिवस्वतः । पटमारापमासम्प स्थित विरासतः ॥ १३०॥ तम माराहमसं वस्तवावं म्पकइयम् । सिवासि प वर्णन सददर्ष पणिग्परा ॥ १३१ ॥ पितितं नन पिच स्त्र कि कर्तम्प ममायुना । पगते पतिप्प घडरिष्ये पवसंडा ।। १३२ ।। विवपभिवि पाबस्स स्थिवा पीरवया पणि । सावरूपस्प भूमागेऽनगर एबानो ॥ १३३ ॥ फंपमानाध्य वन्नीवरवर वम छुपके । पावामीनाव निर्गता मीपणापः ॥ १३४ ।। यार पणिमी दुख मानापत सकते। पिताम्पाइसपिचस्प काममा पातुर्ममसा ॥ १२५ ।।

जम्यूस्वामिभार्याघसुप्फकया विपुषरागमनवर्णनम् १८१
नागोऽय रोपपानत्य पटमुत्लासपमी ।
भात्मकपपसेनेह ध्वनति स्म महाद्रुमम् ॥ १३६॥
स्पिसस्ता स्टापासे फ्युवा मासिकसमनः।
' एकस्वस्योन्मुखस्यास्पे मघुबिंदुरपीपवत् ।। १३७ ।।
से वेन निति मे यया उम्पं मनीपितम् ।
उत्तम स्पानमवेतन्मया माप्त पदमिति ॥ १३८ ॥
यविरे स्वग फपिस्सघरम्पोमवर्मनि ।
एटमा दूरस्य वमुचीर्य विमानादिस्यबीपदत् ॥ १३९ ।।
रेरे म लगेशोज स्वामुदतुमर्म स्वर ।
माम सममासम्म नि सरस्वाशु सकटात् ॥१४०॥
अस्वापादीत्स मृगत्मा प्रसास्वादसोलप ।
अपीलस्व सगेच त मन्मुस सपतन्मधु ॥ १४१ ॥
वारस्सलन विष्ठामि भीम्ये घाई यथास्पिन ।
मधुर्विदुरसामाषाचतो निःसरणेन किम् ॥ १४२ ॥
भूपमपि कपामांव सगा मयाऽनदस्मपी ।
रे मानमिनोऽसि मर्तुमिच्छसि किंठात् ॥ १४३ ।।
नेससे मरण पार्षे स्पितं ते दुनिपिचतः ।
बिंदुमात्रस्प सोभेन मा यादि यममदिरम् ।। १४४ ॥
मासकोसाइसेनार्स यदि मीवितमिम्छसि ।
मार्सवपस में बाई विसंवाऽनुषितसम ॥ १४५ ।।
इत्पादिपिपिपम्पिोंपितोऽपि संगशिना ।
नागमम्मार्दप मो रसनेन्दिपपरिव ॥ १४६॥

૧૮૨ जम्मूस्वामिचरिते- भाकद बमस्तस्य मर्नुकधामस्प षः । पियापरो जगामाशु सत्परं स्वास्फर पति ॥ १४७ ।। थप प्राप्त स पंचस्प सरपासवपीरिता । पासीमय मादि सहाकारं रयमिति ॥ १४८॥ पपीपवदेरासौ सम्पदा पणिक्मवः । युम्ममूपासंछिमपटारोासमनित ॥ १४९ ।। पांच अपवमा मक्षिवाऽमगरेण सा। कामरूपेण सेनाही सम्पदची पणिग्यथा ॥ १५० ॥ वपाई न मिशासाक्षि मुसरेचस्प इतने । काससम्म मामीमे पियाम्पास्माइयो ममन् ॥१५१ ।। निम्ग सामिवाफ्यात्सा विनयभीः मुभीरपि । भयोबाप का दुर्गा सभी स्मशालिनी ॥ १५२ ॥ अपैका समायात मादकासा मनाहरः। नामीमहीमार्ग पुभकाण मवात् ।। १५३ ।। परिवाणि सर्वाणि परिपूरैमहीवसे । निए मामारसंभस्तपापियनदेषकर ॥ १५ ॥ गमनागमनाम्पा च कर्दमीभूतमूतमः । महादुर्दिनतमस्तोमविरातिदिवाकरः ॥ १५५ ।। मप विष काम पवमान महीवसे । सास अपानांवा निगवा एकप विसात् ।। १५६ ॥ सेन पर्यन्ता रप्ये ददसूकीप्रविमीपणः । मंमनामाप्रतिमीमरसयमजिहांपस कपः॥ १५७ ॥ भरमा स्थानसम्म ।

चम्बूस्वामिमार्याचतुष्करया-विपुवरागमनवर्णनम् १८३ कृष्णसर्प तमालोस्प फारस्म पुर स्थितम् । वास्ते कफसासोऽय भीवचिंतातुरो भयात् ॥ १५८ ॥ मीषिष्ये कर्य देय केनोपायेन सांपवम् । पिंतपमिति सद्गादिवेश नइलाहये ।। १५९ ।। नागोपि वमनुमाप्य छिद्र छिरभवान्मिवे । पार्वानामो कास्या माणिनां प्राणिसकटे ॥ १६० ॥ वाप्पग्रे स्पिव मुक्त्वा फसास सरीसृपः । गति स्म तवोऽम्पने वकटुम्पमिक्षया ॥ १६१ ।। पिस्तत्र विसे रष्ट्या न स विसेशप । मक्षिवस्वैः क्षुपाक्रांत सप्य पहुभिर्यपा ॥ १६२ ।। वयाप मामका सामी विवेकरदियो जरः। मस्पग्रास त्पनलक्ष्मी पयभ्रप्टो भपिप्यति ॥ १६३ ॥ भुस्वा मम्पहमायेऽसौ पाक्प सपभियोदिवम् । रूपे वत्मवियोपाय रम्प किंपिकावरम् ॥ १६४ ।। बासीत्स जम्मुको पमिदा पिम्पावतसे । एकदा विमारी मगाम नगरांतरम् ।। १६५ ॥ वत्र मरहम मृत ष्ट्या स हर्षित । भप संपत्स्पवे भून प्यास्त्र मे मनोरयः ॥ १६६ ॥ विपिस्पा ममिय: स तहसीपर्दपमर । मक्षयन्पिशितं तस्य नामासीदमनीं गताम् ॥ १६७ ॥ मुक्ति मोति पापं । इति रिवोपरे । १ः । १ समी। मापन।

बमसामिपरित- भावाकाध्य संभारे ए' पौरमनसिंह। वदस्यिपमराचिर्पद नि सहमपि न समः ॥ १६८॥ विवाम्पासिता सोऽयं विवि म निम इदि । मप में मरणं मन समाप्त देपयागत ॥ १६९ ।। भय पोरजना कारिपचस्प कमव्य पपा । पुग्छई प एनावि स्म सिरोपपिपिया अधीः ॥ १७ ॥ चिविव मम्मुकना मीपिप्प पैदा भनार । समापि कपिदै म नष्ट म किमप्पो ॥ ११ ॥ मय कमिटिस्वस्म रदानुत्लाप पाश्मना । नीरमागमद्रो सस्य पक्षीकरणासवः ॥१७२ ।। मपिवयवदा सीपि देवानीम्प कपन । शापोऽपि प्रदार्पज्य भून यामि पनविरम् ॥ १७३ ॥ पिवपमिति बपाशु मानार्मारिका क्षणात् । मसितष मृगासोऽसौ रसनापभी यया ।। १७ ॥ तपाई न भविप्पामि पिपांपा म पीः । मिये जानीहि मामा रहिमानुत्सपे पवेत् ॥ १७५।। मामभर्क पीकपिरायत्या कर सदरेत । न परीक्षाक्षम पैदपोऽपि वप सम्मतम् ॥ १७६ ।। इत्वं नानापिकारापी संसापैस्तत्र पापियाम् । न पचास मनस्वस्प मनागपि महात्मनः ॥१७॥ मीवर परासको नाता विपुपरी नगः । निपि कापसागराभिर्गवश्वोरकर्मणे ॥ १७८ ॥ १ उमाका

चम्नस्वामिमार्याचसुष्ककथा-विधुवरागममवर्णनम् १८५
सौप सोपं भ्रमभर चिंतयंस्तसरक्षणात् ।
सोमासो देषास्मनिष्ठौ दुष्टधीः स्वल ॥ १७९ ।।
अम्यागारं मारस्य प्राप्तश्पेवि म्पचिवपद् ।
भादौ रत्नानि गृहामि कि पा पश्यामि कौतुक्म् ॥ १८ ॥
पघूमरदयोरेम मिय सनत्सकौतुक्म ।
भूमोम्पेकाग्रतो नून ततो मुष्णामि वदनम् ॥ १८१ ॥
इति निधित्प पिचे से शुभपुर स्पाइपारपि ।
पार्यो रिपुचरो नाम्ना दस्पकर्मरवोऽपि यः ॥ १८२ ।।
मुस्ता योर्यपा पत्त पृात भरफन्ययाः ।
परमामयपदा माव सोअप रिपुचरस्वदा ।। १८३ ।।
मो पैर्यमहो पै पणितुं केन शक्यते ।
यपुगोऽपि मनायै नापि मिभ पधूमनैः ॥ १८ ॥
मावर कुमारस्प माता सा दुलरिया ।
गमागमो करोति स्म प्याकुसा त पर्मेनि ॥ १८५॥
पश्पति स्म महामोहाइमादारं मुहर्सहः।
हिनावमय किं पानि पर्तमानमयाम किम् ।। १८६ ॥
शामिनीकठपाये किमपवक्तिमुवाऽपमा ।
पति सक्षपदोलायामामा दुसिता सती ।। १८७॥
हव्यपार्षेऽय सलीन तस्कर सददर्श सा।
मगादीजीवमीवा प फ कोस्स्य पानिवि ॥ १८८॥
वतो पिपुरोजादीन्मावर्मा गएछ साम्पसम् ।
मा निपुषरो नाम्ना पौरोऽस्मीद परावस ॥ १८ ॥

जम्मूतामिपरिते-
पौर्यकर्म करोम्पम निस्पं स्वमगर पसन् ।
अवा हवं मावर्षहुशोऽपि महापनम् ॥ १९०।।
मपिर्व स्परादेव सरनादि मया ।
धिमा पहुनोसन यापदप पिपीपते ।। १९१ ।।
भयोराप मारस्प मावा पिणपर प्रवि।
पस्स पद्रोपवे सुम्यं सदाम ममासपात् ॥ १९२ ॥
बदो पिएचरणोतं पाप निनमी मति ।
मातर्मन्यस्स में पिन्वा म स्पाइप पनानने ॥ १९३ ॥
किन कौतूस वन्मया एमनम् ।
पपुमी न मना मिम कटारपापिताम् ॥ १९४ ॥
कारण हि किममाही मावराविती पद ।
मतस्सं म ससा पर्यादा भावा या वय ॥१९५॥
भुस्पा मिनमवी मोष पैपमासम्म त मदि।
भ्रातरफोऽस्वि पुषी मे मुप्रीवासदीपकः ॥ १९६ ॥
मोगवाहितीपप तपो परिणदिरकपी।
आस्पोदयमस्पास्ति निपमस्वपसे धपम् ।। १९७ ॥
भ्रामिनीमसौ दीक्षा ग्रहीप्पवि न सपपा ।
वहियोगागरेण में पन अवसरताम् ।
नीपयेवोऽधुना प्रावमावास्मि पसरवसा ॥ १९८ ।।
प्रष्ट पुनोत्सर्व देवाइमिा सह संगमम् ।
सबसहुमदारं पाइलाई रिसोय ॥१९९ ॥
भुत्वा मिनमतीबाप चावा घराणिको महान् ।
ॐ मावर्मपा माव सर्पमतकवानाम् ॥ २० ॥

नम्यूस्वामिमार्याचतुफाया-विपुचरागमनबर्णनम् १८७ मा पिमीस्त्वं ससाध्येऽस्मिन् कार्ये कार्यपिदा मया । ययाकर्यचिचत्पाधै मधु मां हि प्रवेशप ।। २०१॥ मोहनं स्वंमन मं व पापि मचीफरम् । यपाएपर्ट किषिचस्स देसया फ्रिये ॥ २०२ ॥ मम चेदपवनसरोमालीमधुव्रतम् । स्पवर्ष न करोम्पम पदेयं मे गविर्डपम् ॥ २०३ ॥ एवं कवप्रतिशोऽसौ यापदास्ते परिः स्मयम् । । गस्ता मिनमसी सम सहारे भनकै स्थिता । २०४॥ अस्पः कपाटस्प युगलं वर्जपत्पपि । नोपाय प्रीरया किंरिग्यासुकनिपिस्तदा ॥ २०५ ॥ मेरदंद्रसपाटप नीवासः सनुना तदा । माधीदानपरा माता मसमा मणुता सती ॥ २०६ ॥ या मम्छमारण विज्ञप्ता विनयादो। स्वरित पद मो भ्रातः किमागमकारणम् ॥२०७ ।। उपे मिनमती पुन त्वयि गर्मस्थितेऽगमत् । मनुमोऽध्य मामको प्रावणिग्या निदेषके ॥ २०८॥ इदानी स समाफर्य पुत्रोदामहोत्सनम् । दादप्पागो द्रष्टु युष्मसंदर्शनोसक।। २०९ ॥ भुस्मा मिनमतीवाश्पम् मम्मङमारक । मानयस्वाशु भो मावरागते मम मातमम् ॥ २१० ॥ पुषस्पा समादाय मामा नीवः समभपात् । दस्पपिपुष्परो नाम्ना तत्समीप समागतः ॥ २११ ।।

- १८८ सम्बूस्वामिचरिते- यामामातुसमासोश्य मम्मस्सामी मगौरवाद । मारिसिंग मास्नापसंकादस्पियो त्वरा ॥ २१२ ॥ पृच्छति स्माप स्वामी मार्गादिधलं परम् । एवापस्म दिनेपूरा स्पित मानुस स्वया ॥ २१३ ॥ अत्मा पिपुषरोवादीमागिनयपिया खदा। पाणिग्पस्य कसे सौम्प भून पत्र मया स्थितम् ।। २१४ ॥ दक्षिणस्यो दिषि माग्य समझ मसपापलम् । पटीराविद्यमाकर्णिमनोर्तुगमनादरम् ॥ २१५ ॥ भगम्मे हि सिसदीप रख देशमुभवम् । अपि स्पशाराम मैनप्सोकपरिमृतम् ।। २१६॥ चांग कमारसंझप कोपोगं कायाम् । कापीपुर मुफस्सिा कांपनाम मनोहरम् ॥ २१७ ।। कवसं च समासाप सवे पर्ववसमवम् । महाराष्ट्र प पैदर्मदे नानापनादितम् ॥ २१८॥ विचित्रं नर्मदावीर बम विध्यपर्वतम् । पिम्पाटीं समलप्प ववश्वसिमानाम् ॥ २१९ ॥ याहीरदश घर मृगुफ पानट महन् । पम श्रीपासम्पासा पास भेटिना एका ॥ २२० । पारण नमर पाप पिर्णिपनगर स्फुटम् । इत्याटिकौतुकानपी परे रुवमानाम् ॥ २२१ ।। पमिमा सौराष्ट्रदेषं संयमानाम् । अनिष वीपंकणी पंपाल्पाणपावनम् ॥ २२२ ॥ यमार्यपादिभगए मेमिनापी निनपर। स्पक्त्वा रामीमती मापी रुताव तपपिरम ॥ २२३ ।।

चम्यूस्वामिमार्माचतुष्कफया-मिपुचरागमनवर्णनम् १८२ संपर संवि साय वर को वर्णकमिः। पवो मुक्तिमगाभेमिः पदुवश्चपिभूपणः ॥ २२४ ॥ मिछपास विशालं च ग सर्मुदायसम् । साटय महारर्प सर्षसपत्समन्वितम् ॥ २२५ ।। पिपई गिर सौम्यं देई मासमसझफम् । पारियाप्रमर्मस्याम देध मैनासयादिसम् ॥ २२६ ॥ रचरस्पामयो दृष्टा मया चाफमरी पुरी । चैनपैन्यासयात्री मुनिदेर समाभिवा ॥ २२७ ॥ पापीरं कराट प सिंधुदेवसमस्वाम् । एमानेसपा पार किं दूर म्यरसापिनाम् ॥ २२८ ॥ सवा पूर्व दिशामागे कमौज गौरदेशकम् । मंर्ग वर्ग कसिंग घ भासपरमनुप्रमात् ।। २२९ ।। गाणारसी कामरूप पानहमादराम् । यपदाएं मया पूर्व तस्स कम्यते फियत् ॥ २३० ।। रवि रिविपकप सदिपेफी स भूपन् परपरिषयमीव कामिनीमध्यसम्प । पदमिरतरितो परिवार्य पकिपिद नपति जगवि पूपः स्वामिमम्पङमार' ॥ २३१ ॥ इति मौजम्मूस्वामित्ररित्रे मगममा पश्चिमतार्यकरोपदेशानुसरित स्याशदानपपगमपपविषाविशारदपशिवराजमविरपिते साधुपासारमवसाधुटोरसमम्पर्थिवे मार्गाचतुष्ककपा- विपुषरागमनवर्णनो माम दशम पर्ष n८॥

अय एकादश पर्व ।
धर्मराटिमसादादै सऽभीष्टा मरतु त।
साधुपासांगमस्याही सर भीसाघुटीर ॥१॥ इस्पाधीपादः।
महिं मोहमहामापविमष्ठमा हरे।
मुनिमुखसमाप्नावसमवापासविकम् ॥१॥
मप मिपुपरीमादीन्मया मातुससंघका।
मार्दवोडापमिस्व जम्प्सामिनमनसा ॥२॥
मो नम्म्मार मै मामागा मोदयः।
कामदयसमा दीप्स्पा पीपाडनिसमा बसी ॥ ३ ॥
रिमरश्मिसमः सौम्पो पसाभ महीवसे ।
मेस्पदीरपीरस्त्वं गंभीरप समदपत् ॥ ४ ॥
भानुमानिस देनस्सी कंगवलामछायपः ।
शरणागव महाराम रक्षण समपंगरः ॥ ५॥
दुर्सम भीमसामनी नानीति स्म परावसे ।
सा सवापि स्वपा माता पूर्पोपार्मिवपुग्यता ॥६॥
दुसम पैतई पस्नुनावं समारवः ।
मोक्न सकिन पापियवासस्पपि भोगने ॥७॥
परेपी मीमन नास्ति माक्ने पछिस्तु पर्ववे।
दप प्राप्प न संगीत या स देन पिता ॥८॥

नम्मूस्वामिविपुबरकयाचतुकवर्णनम् - १९१
पवा पा संवि कामिन्यः कामोत्साही न वियो।
मप फामोयमस्वस्प कामिन्पो न पदाचन ॥९॥
पका पादानशक्तिमेरे द्रष्यं न पर्वते ।
मप पेद्रस्वगहे द्रष्ये दानशक्तिर्न मायते ॥१०॥
देवाचदुमय माप्य यो न सके स ममीः ।
पचमगजमोति बप्पासवं नरः ॥ ११ ॥
सस्प हेवास्वप कश चिकीर्पसि पिचक्षण।
सर्गि निर्विघ्नं पूर्ण वस्तुसं स्वपुरस्थितम् ॥ १२ ॥
तस्परमा वपसा मून वा सापिफमीरसे ।
श्मावं ते मात्र न परीताराम कचित् ॥ १३ ॥
एक मानके रम्य पच्मि रोवीसपे ।
मागिनेय महाभाग सापमानतया भृणु ॥ १४ ॥
वपया करमा कमिदासीस्सौरस्पर्मपरम् ।
पये नने रम्मे भलवि म दुमान् पान्॥१५॥
एकदा भ्रमवा वन मा पक्टे स्वितः।
मासादिवो पपास्वादु ग्रीषया संबमानपा ॥१६॥
पागनि सन्येप लिगवा करभैण प।
स्वादिर्व मक्षिकामासान्मधुर्विदं वयैककम् ॥ १७ ॥
पितयामास पिचे स रसास्मादपपीतः।
वृक्षस्पास्यार्यशालायां सापिकं वदामिष्यति ॥ १८ ॥
निमिस्पेवि मासीमावर्मशाला मपक्रमे ।
गर्नु पुनः पुनश्मीर्मशासां मवि रुपावरः ॥१९॥

१९२
नम्बूस्वामिचरिते-
किंबह मस्ससंस्वा एका पे पवमसौ ।
मर्मरांगी महासामानभूम फरमो पया ॥ २०॥
वषा सं मारिमामा स्पस्वा प्राप्त हि संपदम् ।
चिर्पिसि तपभोगमनानेन मिमोरिव ॥ २१ ॥
पम्स्वामी ववो पाचम्भे पिपुपरे पति ।
ममीचरमदं विपिप्पण माम कयांवर ॥ २२ ॥
एको पणिसुवः कश्चितपकापरवोऽभवत् ।
पकदा म्पासाया गवो देवावरं सवः ।। २३ ।।
मार्गे पिपासितः सोऽयमभूस्काननसंकट |
स्माचदा जमममाप्प पापाचापेन पीरितः ॥ २४ ॥
निम्सुवोधगया गेहादरण्ये पवितोऽधुना ।
न मामीवि मस पेन्म मरण स्यादिनिश्ययात् ॥ २५ ॥
पिवमभिति पापस्स भास्ते पमिम्पनांतरे ।
मपितस्वापचमस्मैश्चौर्यधर्मपरायणः॥ २६ ॥
सवा पीकपिपासाम्प पीरिवाऽसौ पणिम्परा ।
म नास पद पसष्पाप बरोरपः ॥ २७ ॥
ता सप्तः स मद्रासीत्समम बनावरे।
पप: पीस्था करोति स्म भिाया हाने तया ॥२८॥
भव नामदयस्य स पिंचयामास वसि ।
सरसभ दर पन्मया पीवममसा ॥ २९ ॥
बद्धत्स्समनिमा विदि मातुस माग संफ्यम् ।
महाविप मेहो मवेदन यापन ॥ ३०॥

चम्बूस्वामिविपुचरकपाचसुप्फवर्णनम्
इवि भस्वा कुमारस्य पार्यो पिपुपरस्तदा ।
भावो निरुधरस्तूणे मिथ्र्यकांतादिमादिपत् ॥ ३१ ॥
मप विएस्परो वस्पर्मायया मालम य' ।
निरस्वोऽपि को काचिदपरामप्रसीत्पुनः ॥ ३२ ॥
एक कमिनिमदो हमेपी मिपारतः ।
वस्य मिया प्रयास्प (स्ति) पुषली नवयौमना ॥ ३३ ॥
सैकदादाय स्मर्णादि वादपि निर्गता ।
विद्यद्रवमस मोक्नु स्पेच्छया कामसपटा ॥ ३४ ॥
गच्छवी सापि न केनचिकृमिवा क्षणात् ।
रमिता मापिना वेन पाटुपाक्यकता नपात् ॥ ३५॥
वारिश्यापदः माकोमलया गिरा।
संदरि स्वयि प्यायां मपि स्पात्मापर्पनम् ॥ २६ ॥
न मानीमो पिघालाक्षि कारण सप फर्मणि ।
किया जन्मांवरापदो स्नेहोऽपाप्पमधिप्यते ॥ ३७॥
सागादीपदिय संस्था पर्वते तर वसि ।
क्दा स्पमेम मे मर्वा नान्यमान्यापः पचित् ॥ ३८ ॥
ववस्वी दपती माती स्नायू (दो) परस्परम् ।
कामलीग सहवी यफ सुरवप्रियौ ।। ३९ ॥
पवम्मति कासोभाकियानावरस्वयोः ।
एकदा सापि सम्मा स्यात्सार्दमन्मैन कामिना ॥ ४०॥
भप दाम्पो र रक्त सा ग्वसस्स्मरासिनी।
निर्सना निर्षमा पापा मापामिप्यामिसिनी ॥ ११ ॥

सबूसामिचरिते- मनस्पन्पदपस्यन्यत्फाप इति पापितः । मही नापि न कर्तप्पा पिपाससाम परिव ॥ १२ ॥ एकदा प्रयमा मारपिवपामास दुटपी। निराहामि कप पनमनया मायया सा ॥ ४३ ॥ सापाप' स गवा पीघ्र दसरसकसमिपिम् । श्रीपाविण मारोइम्प दुश्परित तया ॥ ४ ॥ वसरसफ मदाी मृणु सापर्पकारिणीम् । रापी कापिस्समागत्य रमते मामी भएम् ॥४५॥ भय पर्ष कपिल समा पढे निशीपिक। वदा वे सर्वसाम स्पादिस्परस्मा स सोमन् ॥ १६॥ अपाम्चात निधीपेऽम मानभेष स्पितस्तदा। या पूर्णोपपविस्तस्पा द्रष्टुं तपरिव सपम् ॥ १७ ॥ अपागता माका सस्पा दिवीपोपपतिःभनेः। सदकास्सा समुत्पाप सस्समीप गवेस्वरी ॥१८॥ पन नीता मराम्रो पापकामातुरेण सा । वापचमामवस्तूणे प्रीतुं वसरमका ।। ५९॥ तम कोसाासे मावे सा दुरा कपटान्विता । पुनापुव्य मुप्पाप पूर्मोपपविसभिपौ ।। ५०॥ आगतास्ते महारौदास्तसरक्षकमृत्पा। छःोज गरे तिष्ठदिटो पा करोऽपरा ।। ५१ ॥ दितीयोपपतिगामाबाम्पपर्यतु भो। न माने पूर्णमानोगो (नांगो) निद्रयाई पुर्णितः ॥ ५२ 11---

सयूस्वामिविपुच्चरकथाचतुष्कवर्णनम्
स्वोऽमुतस्तवो दृष्ट्या पयः पूर्वपतिः ठः ।
सोज येनोक्कमेववत्सायं चेति पदमपि ।। ५३ ॥
सं नीत्पाराम स्वस्थान घावयसः पदे पदे ।
यष्टिमष्टिमहारैप महानिर्दयमानसा ॥ ५४ ॥
मप सा चिंतयामास मम श्रेयः पसायनम् ।
मन्यथा निग्रहोऽस्माक मामिप्यवि न संशय ॥ ५५ ॥
रिमृश्येवि तपा मार शिक्षितः स्वीपमाया ।
मप दो दंपती मृता गर्नु सार्दै समुपवौ ॥ ५६ ॥
नीस्वाय यद्गो किंपिनासंफरणादिकम् ।
रचम पहुमूल्य प नारेणामी पपास सा ॥ ५७ ॥
मार्गेशापा नदी प्राप्य पतिमन्योपदचदा ।
मिये रखादिक म ददस्मासु पिकया (फिवा) ॥५८ ॥
समचीर्य गते पारे स्थापयामि मनिषसम् ।
एका मस्यिते स्पाने नखासकरणादिकम् ॥ ५९॥
पमादागत्य स्वरूप त्यामारोप्य अपरनवः ।
मंगादचारपिप्पामि निभस्यूस्तया प्रिये ॥ ६० ॥
सर्प पूर्वापि विपासान्मन्पमाना वयैप सा ।
ददी सादिकं तस्मै मवीता पति दिवः ॥ ११ ॥
सा स्वयं नापिका मूता वस्थापक्तिट कपिन् ।
बीमत्सा निसपा या गफिनीर मपकरा ॥ १२॥
मयातीय गत पारे तस्पाश्पोपपविर्मपाद ।
नागवा पुनरबासी मेतुमेकाकिनीमिमाम् ॥ ६ ॥

A Pra गम्बूस्वामिचरिते- साराच रे महापर्व मा मुक्ता गर्ने सपा । तेनोको सस बम विस व पापठालिनि ।। ६५॥ एतस्मिमवरे कमिग्मगुका सम्पागव । उत्पुमा पासपमाशु मोससर्ट मुख दमन् ।। ६५॥ मसादुष्प (प) सिवं मस्स्पमे घटना स मम्मुकः । भारति म मासामान्मुपस्ता मांस मुले स्पिवम् ।। ६६ ।। सातुर्माति यावत्स मत्स्पागादारिमध्यगा । मांसर्पिमितो टूदा नीस्पागात्काननविरे ॥ ६७ ॥ उमभ्रष्टं समासोक्प मार्क दैपपिवम् । सा कामिनी मासोर परिर्वमन्यमानसा ॥ ६८ ॥ भरिचार्य रुतं ये तमपुरुन दिना । पुरस्मा स्वापीनमतत्परायचं समिणता ॥ ६९ ।। पार स्पिवादों मर्मभिदपनं तदा । त्पपापि कि त मर्से पम्पास्मानं मुनिभिवा ॥ ७० ॥ मयं निर्यग् न मानाति वाग्यापापं दिवादिवम् । त्वं विदग्पा समर्वारं इतना पान्परवामपत् ॥ ७ ॥ तर्मयभिनि तो सुपस्पा प्रतॊगास्पीयसपनि । सदा सामीमुखी माता नारी सम्मापरा यया ॥७२॥ तपा त्वमपि मा गच्छ मागिनपादास्पदाम् । त्यपाला इस्वस्मिता सक्ष्मीमिमन् दर स्पिवामो ॥७३॥ अब मपामारीतो परको भूतिपयसाम् । मसरामनग्योतिरायोतिवनिमाम्पः ।। ७४ ॥

जम्मूस्वामिविशुधरकयात्रतुष्कवर्णनम् १९७ आसीदणिक्मृतः फमिदाइनष्पमसायवान् । एकदा पातमारुप सोऽगाडीपांतर कचित् ।। ७५ ॥ सनै पस्तु समिक्रीय रस्नमक समग्रहीत् । वः स्वग्रामविश्य चपास पणिर्मा पर ॥ ७६ विवपमिति स्व घिर्ष कार्यसदारमीदिवम् । रस्व सस्याप्य तल विसाकय मर्सड ॥ ७७ ॥ पैसाइसमित माप्प पिक्रिये मान्मणिम् । प्रदीप्पामि गमा पादि विमिर्म पस्तु मुदरम् ॥ ७८ ॥ वतो नृपसमा मूत्वा यास्यामि निमपत्तनम् । भिया प सोमपा पूर्णो मंमिमृत्यादिसेपित ॥ ७९ ॥ वापि स्गो स्पिस्मा जीविप्पामि मुर्स यया । मलय पुप्रपोमादि पश्यन् योपिरम सस्मितम् ॥ ८०n एवं पिवयवस्तस्प यापद्रस्नमपीपवत् । रस्तादम्मी प्रमादादा दुर्देरादा महाम्रमा (1) ॥ ८१ ॥ मोपीभूतास्ततस्तस्प निविवाय मनोरपाः । न रश्पसे महारस्न फार प्रवा ॥२॥ वाई न मपिप्यामि मातुल लमनो मो। स्पस्पा पर्मफर्स सौस्प दुम्स अनामि समवि ।। ८३ ॥ इस्युचरमदानेन स्वामिना कपिदेन है। निरस्वो मातमो नामा पौरो रिपुचरोऽमनन् ।। ८४ ॥ पुनराह कयामेका दस्युम्पुिपरस्वदा । इतोऽपि मुरजी नूनं करोति मधुरम्पनिम् ।। ८५ ॥

चमूसामिपरिते- वपया पातुफः कामिनिष्ठाऽप्यासीदनुपरः। माना समहारीवि विध्याा संरसन्निति ॥ ८६ ॥ बनेकदा वो पन्या उमरी पाणसंहतः । पारि पाई रुपामांतः समागरछन् जसामय ॥ ८ ॥ देवासीऽपि मृता मिष्ठी दएः सर्पण वाणात् । मप साऽपि पनुवान्मृतमारा मनगमः ।। ८८ ॥ मृर्वत मीयेपु गमामेष्ठापि स्फुटम् । गवस्तम गोमायुः थुपितः कामनादित ॥ ८९ ॥ पतित पापि पीपाशु गर्न भिष्ठे सरीसृपम् । पनुपापि स हांगी मावा सीमासरस्सया ।। ९०॥ पिवति स्माय गोमाया गराऽयं मृवो मागन् । मापिप्यामि पन्मास यापदन मनिमम्म् ॥ ९१ ॥ सती पासैकपर्यवमा नरफलेवरम् । वताऽप्यकदिन यापत्सर्प मातास्मि निमिवम् ।। ९२ ॥ इम पपास्पिताः सविन मरादयः । वामदप मपा भीग्या ग्यापदा गुण एव हि ॥ ९३ ।। इति व भक्षमाणोऽसौ गोमाय पापपाकवः । मृतस्मुतभारापावाचालस्फाटेन दुखिवा ॥ ९४ ॥ पपा बहुसस पान् गोमायुर्मत्युमागमत् । तथा स्वमैहिक सौख्य सक्स्मा मा गण हास्मताम् ॥ ९५ ।। मातुसो वा भुत्ला प्रोप मम्मारक । किंपिकपातरं रम्प प्रतिमाश्यदिदिस्सया ॥ ९६ ॥ 4 मिमोतिमासकी।

मम्बूस्वामिविपुचरफपाचतुष्कवर्णनम् एका कर्मकर पमिदासीदविदाखिसान् । पनादिन्मनमानीय विक्रीय कुरुवेशनम् ।। ९७ ॥ अपेदा महामार नीत्वा स्रूपे कपेचन । मवस्ये षव मध्याह खालय मति यस्नसः॥ ९८॥ मारामांवोऽय पापात्मा तप्तवालम वृष्णया । सण मुप्पाप शांतः समपमारस्वरोरप ॥९९ ॥ मुस स खममद्रासीभिश्या फर्मकारक । साम्राम्पपदमासं स्वात्मानं समपश्यत ॥ १०० ।। आसीन मिटरे रम्पे मणिमौक्तिकमपिते । पाषामरसंपावैपाग्यमानं मर्सः ॥१०१॥ पंदिग्दमयाराम स्तूयमान मनोहरै । फापि गौरवमध्यस्य कालकेसिरसाइसम् ॥ १०२ ॥ गमापादिपरीमारैएिते राममंदिरे | मनावर स पादाम्पा वारितो यष्टिमष्टिभिः ॥ १०३।। मार्पया स्वस्प पिस पापीरितया बसात् । उत्पितो मागका स पिवयामास फर्मरुद ॥१०४ ॥ प्य सहमी साम्राम्प एएनएं क्षणादपि । बदन्माम फसमादि स्पमसाम्राम्पसभिभम् ।। १०५ ॥ मानीहि क्षणिक सबै सपमाणापारि । मस्पति माम को पीमान् मनो दुम्सासयं ब्रमेत् ।। १०६ ॥ सक्स्वा स्पास्मोस्यिवं सौम्म मन्ममृत्यविनाशकन् । नमस्खामिकां मुस्था प्रोपे विपुपर मपीः ॥ १०७॥ १युक्तीन वा

२०.
सम्पूस्वामिचरिते-
यामिनीपमिमे मागे तुर्य पापि कथानकम् ।
एक कमिटी मिशी कसानिशानकोपिदः ॥ १०८॥
आसीदप सुपिम्पाती पपानामा हतासी।
मपैकदा पस्पान ननर्च परफॉप्ससात् ॥ १०९ ॥
मतपीमिः समाकीर्णः सासंपारिमिरप्पसौ ।
वन्नृत्य पश्यता राका मसममनसा सदा ॥ ११०॥
टच स्पर्णादिक वाभ्यः पासादिकं वया ।
राम प्रसाद नीस्वा ते सुपपुस्वप निद्रया ।। १११॥
रमन्यो जागरूकस्पानुमतमा नय ।
मप सोपु पर्नतश्यादिमनप्पति ॥ ११२ ॥
नटपर्यस्तदा वस्पो मारमंग स पापपीः ।
भानवा विविध वन पंपफलपियापिपा ॥ ११३।।
नीस्मा हेमादि सर्पस गमाय नीदर ।
यमोस्पर्म व तेन नीस्वा सर्पसममसा ॥ ११५ ।।
गंतुफामो वस्तूमै जाग्रनिर्नर्तकीमने।
पौरस्वनामिपुतस्वनींवा सूपस्य समिपिम् ॥ ११५ ॥
या सप्टन स्पेन सर्व पौरोपित हि यत् ।
तहत मागिनपाहो बम्स्वामिन्माहामते ॥ ११६ ॥
मागासामाप सोप्पारस्पा पदापन ।
अम्वामी निधम्पैन्न्पावणेकं कविरम् ।। ११७ ॥
किपिस्कमोठरे रम्प मोबाष प्रतिभान्वितः।
बारामस्पां भरिस्पायी भूपाऽप्यासीन्माचरः ॥ ११८॥

समूस्वामिविपुचरकयाचतुषवर्णनम् २०१ मारपया सोकपालोऽसौ राम्यमारखुरंधरः । वस्प राशी सु नाम्ना स्यामदपट्टा मनोरमा । कंदर्पस्प पनुटिजिंगीपोरिस पते ॥ ११९ ॥ मवान्पेतः स भूमीशो नगामाशु स्वलीलया । मालेटकक्रियासको पन्यारंतु वनांवरे ॥ १२० ॥ मांवरे महाराशी रामस्वस्प मनोरमा । प्रामुकी रंकामासीत्कामपाणैर्निपीरिता ॥ १२१ ॥ दव कोयिस्समाइप विदग्पाममिसारिकाम् । पिचस्प गमावं सानुद्वीमवेदयत् ॥ १२२॥ मावो प विमानीहि वसापां सोमक्षमाम् । कातरी पिते कामे स्पयि तस्परमानसाम् ।। १२३ ॥ वर्ष मे धरण भूयाः सोयवा मदनुग्रहे। मानयस्माशु गत्ताप सुंदर तरण नरम् ॥ १२४ ॥ वत सोचे महापापा दती सारसिक पपः । मय्पभ सानुमाया मा दौस्थ्य पर इंदरि ॥ १२५ ॥ माहयामि स्पार्कमिनिष्फाममपि योगिनम् । का कपा नरकीटानां घमासापयर्विनाम् ॥ १२६ ।। मंवरे देपयोगादे स्पसौपस्यितया तया । ए कापि युगा पीपा पर्यटेस्तम सीख्या ॥१२७ ।। नाना पंग इति म्यात सर्णकारा रोका। अयमेपाधितो रंतु तया पत्यपसक्षित ॥ १२८ ।। मा त मृगीमाली दी प्रत्यार घुमती । एनमानय सोपापीरनस्प रुदे मम ॥ १२९ ॥ मृमरवरा पति

२०२
चम्सामिचरिते-
अवस्प सा तदादचाती मायान्विवा सती।
आनयामास पगात्स्यिता पत्र मनारमा ॥ १३० ।।
सा राशी रंतुषमा यापभीस्ता ससपनि ।
सय्यावस समायामा सस्मरा मुरतोत्सपा ॥ १३१ ।।
तापरमादमासा भूपाऽप्पन समागतः ।
पृधावपत्रसप्छापा पीपमानः अपामरः ॥ १३२ ॥
आगग्छ वमासात्म रामान स्वर्णकारकः ।
म्पाइताऽभूनयाांव कपमाना मासहः ॥ १३३ ॥
गापपिस्पा सपा कौशस्माद्यपक ।
सन्मस्वीयूय पासा मामीतः स्ससपनि ॥ १३४ ॥
कामासक्तः स मीशा पन्मार्स स्थिववानिद ।
मनोरमा मुखामोमर्गपरम्पमपुत्रस ॥ १३५॥
मीपनस्प त सत्र प्रासमा प्रयत्नवः ।
मुकोसिएगदेय मिपति स्म मनारमा ॥ १३६ ॥
एम पामस्स पभास विष्टस्तत्रातिदुस्लिवः ।
पाररोगी महापापाग्माता दुर्गपपासितः ॥ १३७ ।।
मम पापा नीपाइप ममासिवे बसे।
थंग प्रणासिकाद्वाराभिर्गस्पागास्सरिपटे ॥ १३८ ।।
तत्री सबमारिष पृष्टः सापर्पमानसे ।
कासिम्बत पाइ मा कचिमसपिभम् ।। १३९ ।।
बंगनीकमही सोका मस्सीन्दापसोफनाम् ।
मोक्न पातासान्पाभिनीवाल परमादरा ॥ १४० ॥

जम्स्वामिनिपुधरकथाचतुष्कवर्णनम्
२०३
२०३
पतष गनुकाम मा ज्ञात्वात्मीयगृहन्मुखम् ।
पपर्ण्यमत्पतं कोपामावास्तु ताः सलाः ।। १४१ ॥
निसर्गदापि यत्सत्य न पंदवि कदाचन ।
किं पुनः फारण प्राप्य सपया म्पणकारक ॥ १४२॥
वक्यापि मादेन काग्छर प्रति ।
बागवर्षगनामासौ फपायपिपास्महा ।। १४३ ॥
वमानातेमहायवः सौरम्पमादरान् ।
एगदम्यसंयोगै धीमनांगोऽभपपया ॥४४॥
भयेकदा गतस्तप्र पीपा कार्यपधादिए।
रामसौपसमीपस्यो हटा साऽपि तया सिया ॥ १४५ ॥
वयेर सम्मरा साचे षंगमुपिश्य संभया ।
पागच्छागष्ठ भी भूयोऽप्यको मम सपनि ॥ १४६ ।।
पंगेनोक्तमस स्नास्वापकीयः स्वसेऽधुना ।
परमात स्वगृहाइस मिस्मरामि न वक्षणम् ॥ १४७ ।।
मपापि न तन्मार्ग-५ याति समवः।
रुपसर्गाधन्यता नाविमृश्यं करोम्यवः ॥ १४८ ॥
पदभाई ममिष्यामि पुलशस्य देवो ।
विर्यगादिगविवादो भाषिद्धरसमापनम् ॥ १४९ ।।
पामपिवेनासं मानुस स्वमति भो ।
नामाक्ष्य मुर्स ममे समापानचवैरपि ।। १५० ।।
भास्पा रिएषरी दस्थ कुमारं समानसम् ।
स्तुति पाक मुनिर्षिण्ण सोऽप्पासममयः सत ॥ १५१ ॥

२१० मम्मामिपरिते- ववस्वत्पाम पखाणि एस्णानीय निमान्वयात् । फ्टसानीप पायापार क्षणादप पिपक्षण' ।। ५०॥ तुमार रिम्भ व परित मणिषष्टितं । संपपनमस्पर ससारस्प मादिपः ।। ५१ ॥ वारसयुम्म प न्यस्हतं कर्णया स्थित । पुरमरपस्पन धपुग्ममिनामुना ॥ ५२ ॥ कचसोपा रुस्वन फराम्पो स्वस्प स्लीण्या। पंचमष्टि यपानापमानमभापरमिति ॥ ५३ ॥ सांगीफरावि स्म एरोरादा फ्रमात् । शदान्मसगुणान्सबानपा विधसिसमिवान् ॥ ५४॥ पायवानि पंपैर स्मृताः समिवयस्तथा। इद्रियाणां निरीपर पमपति प्रकीरिवः ॥ ५५ ॥ सामर्थका गुणी मुरम्पा पागम्यकसस्किया। मसत का मार्क शुदपारिपारिमिः ॥ ५६ ॥ अहिंसाप्रसिदपर्य यतीना मानमर्मनम् । माशुभारनी अपन पैराग्पादिविवाद ॥ ५७ ॥ दादिमागम पिरागाणामनुपमः। गन्स्पादिक्रिया पापि फीम्या न यवीरैः ॥ ५८॥ कापास्सर्गेण भातम्य स्थितिमामनमेकपः । कस देहसिदपर्य न भागा पदाचन ॥ ५९॥ पसे ममाणाः प्रोका प्रमणाना मिनेश्वरः। संयुचरणाभापि महापरीक्किाः ।। ६ ॥

चम्भूस्वामिनिर्माणगमनवर्णनम्
सर्षेऽप्यामरण नीता पासनीया समधुमिः।
पतत्समुदित सर्व निमित स्या मनिव्रवम् ।। ६१ ।।
इत्युकं गुरुणा सेन गुरुणा सद्गुणैरपि ।
भुस्मा मम्छमारोऽसौ सर्प जमाह शुदपीः ॥ ६२ ।।
तको भयमपाराव चफु सर्वेऽपि समुदा ।
णिकममुला सूपा स पौरगनास्वथा ॥ ६३ ॥
सवा केषित मूपालाः पदसम्पन्लपिताः।
पर्सनयो नून पपामावस्मस्मकाः ॥ ६४ ॥
फेचिन्माइसेस्ता लीपन कदापिता ।
भारकस्य प्रवान्पुरैस्वेपि जन सादराम् ॥ ६५॥
मप निझुघरो दस्थविरको मपमोगवः ।
सर्पसंगपरित्पागछसम प्रदमग्राहीत् ।। ६६ ॥
सार्प पंचमपपुरासीस्म सपमी ।
दस्यकर्मरतः सी प्रममादिसुसंशिकः ॥ ६७ ॥
मवः परं मनिषिणः सोनरासो पणिम्पर।
सकतम गां स्पक्त्वा सोऽयन्सनिकुंज ॥ ६८॥
मममाशांतिका पार्ने मावा मिनमती धवः ।
संसारासारवा मस्सा स्पादार्यिका (या) प्रवान्विता ॥ ६९ ।।
पघभीममुसा बनी पीक्ष्य संमृतिसंस्थितिम् ।
मुप्रमा गणिनी नत्सा पद्धवि म पो मान् ॥ ७० ॥
प्रणम्माशु तस सर्वान् सौधर्मादिसनीपरान् ।
जग्मः मणिकपापा प्रतिसपसमत्सकाः ॥ १ ॥

-- viram २०१ अम्वामिचरिते- मी स्वामिमाही मात्र पन्पोऽसि त्वं भगमये । मात्रा का फपा नाय व पूम्पत्रिवीरपि ॥ १५२ ।। संसारमण्ये पारं मामाऽसि तं मामवे । पर्मकल्पतरोम्स र भेचा कममृताम् ॥१५३ ।। इत्यादिस्वरनं हत्वा वेन पिपुवरण । निक्षेपमात्मवचा गदिदं तस्करादिकम् ॥ १५॥ वातरे दिमासीस्माप्रकपर्णा सुमासरा । मम्मामारसत्यकै रागैवरिमाम्मानिः ॥ १५५ ॥ पिस्सएपस्त पानससीनमानसाः। कापोत्सर्गपरा भम्पा पम्पा परमादराद ॥१५६ ।। कपिधीमग्मिनेशाना पूर्मा गर्ने समुपताः । गंपधूपादिसामग्री सीडर्माणा पमस्तराम् ।। १५७ ।। मतो मंगादेति स्म भानुभानुदयापसाव । सामिन बप्डमोक्षपापमय गर्मस्तिभिः ॥ १५८ ॥ पत्मसादान्महासमा समति मुखमम्पुतम् । सकपक्रपर पैप सम्पो पर्मः स पामि ॥ १५९ ।। इति श्रीगमूस्लामिचरित्रे मगवझीपधिमतीर्थकरोपदेशानुसरित स्पातानबपगपपपरिचाविशारदपणितणनमनिरपिते साधु पासामनसापुटोग्रसमम्पति मिपुपरकाया- चतुफानो नाम एकामा पर्न ।

अथ द्वादश. पर्व। विषमस्तु सदा तुम्य जनशासनभासनात् । साधुपासांगमस्यास्प सर भीसाघुटाटर ॥ १ ॥ इस्पाशीपाद । नर्मि नमस्मराधीन पचकल्याणमागिनम् । नेमि पर्मरयस्पेष नेमि नौमि नगगुरम् ॥ १॥ अय प्रमावसमये यदभूपऐष्ठिनी गरे । समस्यामि तदेवोच्चैर्यपारचमनुक्रमात् ॥ २ ॥ नेश वस्य कयासमोपीणिको नृपः । मानसेन समोकं स्त्रवो गत्मा नृपालपम् ॥ ३ ॥ क्षण पैसक्ष्पमासाथ सान्द्रावधान्नृपः। पर्मदपा पुनः सोऽप सातपानंदनिर्मरः ।। ४ ॥ नदुदुमयस्वप भेणिकस्पाझया ददा । समानसाम्राम्पपवाराप्तिर्मयापा ॥५॥ महगानफनादेव म्पाप्ता मूलसपस्वदा । फस्पाणेप्मेप तीयेशी म्पोममार्गे ययामरैः॥६॥ थागत भगि भूपः सात्मकः भष्ठिनो गरे। महादः सटुम्बध मंदिढं सामिपंकनम् ॥ ७ ॥ नमस्मादिशमिनिर्षिकारामिरस्परे। मीरं पैराग्पमान सामिन सोऽम्पमित्रपत् ॥ ८

जस्वामिचरिते-
माला स भूपयामास स्वामिन भूपणादिमिः ।
मानमपि विराग सं मावशुदपर्वमास्मनः ॥ ९॥
पदनाविरंग पनि समामिना पमो।
पया मेरौ मिनभस्म सूर्पनेपामरेचिना ॥ १० ॥
सभेसर शिरस्क्स्प शोमामापाविशायिनीम् ।
स्वयंमराम सकभीवामिन्पा इस संखुवम् ॥ ११ ।।
तमा सानुमवित्ला भूपवि: भेष्ठिना सा।
पिषिकायां सास्वाम्पा स्मापपामास स्वामिनम् ॥ १२ ॥
पन गर्नु सापक स्वामिन वपसकते ।
सर्वः परिजनस्तत्राममदीक्षिदमादरात् ॥ १३ ॥
सबकार्याम्पतीस्पापि पापंती मनसंहतिः।
पदामिन द्रामामगाम सकौतुश्चत् ॥ १४ ।।
मुकमा पतुमोऽसौ सिदिसौम्पाभिशापवान् ।
पन्योऽयमिति सर्वेऽपि ममपस्व परस्परम् ॥ १५ ॥
हासकारो महानासीचदा रामगरे पुरे ।
कपिचरमाससका सम्भारिप दु:खिताः ॥ १५ ॥
मनांतरे समायावा मावा मिनमवी सती।
सपासमाको गद्द पामिनस्पति ॥ १७ ॥
प्रतील मगं पावत्युष मो मावर मवि ।
शति दीनगिरं मीरादुहिरवी सम्पा ॥ १८ ॥
नपरेशमिवासोक्य न वापध्मनः ।
विससाप महामोहा सपोडां गिरहिरन् ॥ १९ ॥

जम्मूस्वामिनिर्माणगमनवर्णमम्
२०७
A
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स नाय मन्महामाण हा कंदर्पकसर ।
मनाया पपमपाो निनाप्पागाकता कयम् ॥ २० ॥
पिम्देवं यन दरखास्य वपस पुदिरुस्का ।
पश्यना म मादास तत्कारुण्यमकुर्वता ॥ २१ ॥
मयापि मा रुपानाय प्रसीद कुरु मादषम् ।
रस्त भोगामभोगाभामित्यूपुस्ताः मिपास्वदा ॥ २२ ॥
रेमुर्पय फय नाय ला रिना दीनवृत्तयः ।
पया पन्दार रापिरिति दनिगिरम पाः ॥ २३ ॥
तम सोपायमासम्प पदनादिदपैरपि ।
पलनिनमती नीवा तामियतनतां तदा ।। २४ ॥
सारपाना बदा मोचे मावा मिनमसी सती ।
मारपराग्यमारु पापिन मावि मभपात् ॥ २५ ॥
दं वन पर्वत्स दसीगर्भफोमसम् ।
खड्गपारानिम पुप दिममवरं सपः ॥ २६ ॥
मंगधग्रसिता पटियपा यादि म्पमस्तक ।
नया वपी पिमानीहि तस्मादप्पतिरिकाम् ॥२७॥
पर्ने भूमपर्न पाल कर्य शापि दुस-म् ।
बाहुमरखीपक कृत्वा गामिप्पसि कर्ष निनाम् ॥ २८ ॥
अप्पासा (क) परिस्पग्य पितरी फापनामयी।
रिना गा () दुखिता कस्पा क्पं यासि पनातर ॥ २९ ॥
इमा परमासाऽपि वामृत दुरिमाः ।
एकारियो म पामते भारन्पा पिपा र ॥ ३०॥

२.८
चम्स्वामिचरिते-
इत्यादिपाहुपासापरिसपंवीमिषाराम् ।
मावरं प्रति मानव ममस्सामी सामयः ॥ ३१॥
मावा भोई महीहि तं कावरस्वं परिस्पन ।
भाषयामस्रमेयेमामनिस्पा संमृतिस्पितिम् ॥ ३२ ॥
भादौ पपिर्क सौम्म मावरफ्तानि मया ।
पपीपि पतस्तदिन समीडामा पयम् ।। ३३ ॥
सर्गेऽपि यन्मामागैर्नागात्तृप्तिमपं मनः ।
एमिः समनिमर्मत्यै स क मिाप्नुयात् ॥ ३४ ॥
न मान पिपतो पारानमम नारक पुर।
वियपापि नरपाई भूस्वा प्रस्वा पुनः पुनः ॥ ३५ ॥
उई च-
"कवि न कवि न पारान भूपविभूरिभूतिः
कवि न कवि न गाराना भावोऽस्मि कीटा।
नियतामिवि न कस्पाप्पस्वि सौस्प न दुग्ल
जगति दरससे किं मुदा किशुपा पा ॥१॥"
इति प्रभृत्तिपापयपियश्चिवरमृतोपमः।
मावरं मतिमीप्पाश निरगात्स निमासपात् ॥ ३६॥
गणमनुग्न रेने बासौ पिमुसा प्राद ।
गुटपनसम्दी महामम इस दुवम् ॥ ३७॥
स्तुति म पदा सर्वेऽप्पासममम्पन्नः।
वमाय मन्पमान त पई साम्राम्पसमिमम् ॥ ३८ ॥

जम्मूस्वामिनिर्वाणगमनवर्णनम् २०९ भयानदसमायुक्त श्रेणिकादिनुपादिमि । भिषिकायो स्थिवो नीवो हस्तादस्वै स काननम् ॥ ३९ ॥ फसपुप्पसमाफीर्णमफासेऽपि फसोदयम् । पदा वस्काननं रेम किंचिन्मृष्टविश्पकम् ॥ १० ॥ अनिमीदूतभावाप्रेमसमान रितस्तव । सम्प्रस्थामिछुमारस्यागम नृत्पमिनावनोत् ।। ४१ ।। वस्य मुनिमानम्प गुरूं सौधर्मसंमकम् । उपपिष्टो ययास्यान कुमारोऽमिमल मुनेः ॥ ४२ ॥ उत्तमांगे म चिन्मस्य इदमसीतास्वफम् । वेन मम्छमारेण बिनसो मनिरादरात् ॥ ४ ॥ छपसागर सच मामटर ममार्णपात् । नानादुखशवावनिमर्जत योनिए ।। ४४ ॥ अप में करुणां कृत्वा देश दीला मापदाम् । पानी समूहा सर्पः कर्मनिर्पसनसमाम् ॥ ४५ ॥ सम्पानड स शुदारमा गुरोः सर्पसमलतः । अंगादुचारयामास भूपणानि विरक्तपीः ॥ ४६॥ वारत्पुप्पसमो मुक्ताः सकिरीटानकाटितः । वीकता पसादेव मन्मयस्य भरा इस ॥४७॥ मातिपन्मुट मुभो इसया रत्लनिमिव । मानौमत्सोमपाश निर्भपान्मारम्पतेः ॥४८॥ वतोऽप्पचारयामास शरागत्पापलकवान् । मुद्रिकादीदस सहस्तनिर्मितानेगव स्फटम् ॥ ४९ ॥ 17

चमूसामिपरिते-
सतस्तस्पान पस्राणि सल्मानीय निमानयात् ।
पठसानीप मापापाः समादेश विपक्षण ।। ५०॥
सुभाट परिम्भ प परिव मणिरष्टिवं ।
पपनमस्यप संसारस्प मादिपः ॥ ५१ ।।
मत' सयुग्मे प न्यावं कर्णयोः स्पिन ।
मुटदररपस्पर पम्युग्ममियामुना । ५२ ॥
कपमारः तस्तेन फराभ्यां स्वस्प स्लीण्या।
पचमुष्टि पयामायमाममनोपरमिति ।। ५३ ।।
सतांगीकरति म एरारासतममात् ।
श्वान्ममाणासवानष्टावित्रमितमिनान् ॥ ५४॥
महानतानि पंपैम स्मृता समितयस्वया ।
दिपाणां निरीपय पति प्रकीचितः ॥ ५५॥
मोगमको गुणा सम्प' पारारभ्यासलिया ।
अपसर्व मतः मा शुद्धमारिपारिमिः ॥ ५६ ॥
महिसाबवसिटपर्व पतीनों मानवर्मनम् ।
मासुकापना अपम पैराग्यादिविपदये ।। ५७ ॥
दलकाष्ठादिमागम रिरागामामनुचम-1
गन्स्पादिमिया पापि पम्पा न पतीवर ॥ ५८॥
कापास्सगेण मोक्तम्प स्पिविमोमनमेकश ।
करम दासिनचर्य न भोगावं कदाचन ।। ५९ ॥
पते मसगुणा मोकाः भमभाना मिले।
संस्पृचरणामापि समाधवरातिया ॥ ६ ॥

नम्बूस्वामिनिर्वाणगमनषर्णनम् सऽप्पामरण नीत्या पासनीया समभुमिः। एवस्समुदि सर्प निमित स्पान्मुनिद्रवम् ॥ ६१ ॥ श्त्यकं गुरुणा स्वन गुरुणा सद्गुणैरपि । अत्ला मम्मङमारोऽसौ स मग्रार सदमीः ॥ ६२ ।। वती मपमयारा घः सपि संसदा । गिफममुस्ता भूपा सर्षे पौरननास्वया ।। ६३ ॥ वः पिन पासाः गुदसम्पपत्तपिसाः। पवर्मनमो भूनं यपामातस्तसपकाः ॥ ६४ ।। केचिन्मोरावस्तप क्लीपस्वेन करपिता । भारकस्प मवान्यस्वेऽपि मगृह' सादरात् ॥ ६५ ।। मप बिगुपपरो दस्युर्मिरका मबमोगतः । सर्पसंगपरिस्पागलक्षण प्रमिग्रहीत् ।। ६६ ।। सा पंप पौरासीत्स सपमी। दस्पकर्मरतः सः अमबाविससमिः॥६७ ॥ भवा पर सुनिषिणः सोमासो पणिबरः। सकसमें गा स्यात्या सामन्मनिईनरः ॥ ६८॥। समभाताविका पार्षे माता मिनमवी वा । संसारासारतो मत्या स्पादार्यिका (याः) प्रवान्निवा ॥ ६९ ॥ पपीपमुसा पषो पीक्ष्य संमृतिसस्पिविम् । मुममा गणिनी नता गृहवि स वपा मात् ॥ ७० ॥ प्रणम्याशु वत सर्पन सौपर्यादिनीपरान् । भग्न भणिकभूपापा प्रतिसपसमुस्सुका ॥ ७१ ।।

२१२ जम्मूस्वामिचरित- रुवा मन्यमान' स म्पास्मानं सग्रवान्वित । स्तोपासपिपिस्तर स्पिती बापपपी पने no.॥ पपाक्ति समापाप सेऽपि विपुषराप । नीत्वापराससंम्पाम तस्युर्पानारमपिनः ॥ ७३ ।। सिदभार समाप्त पठिस्वाय मामुनिः। मत्स्यशोऽनप मार्गे पारणाप तापमः ॥ ७४ ॥ विमनामा रम्प पुरे शामात् मसपत । भो पुण्यपदार्पोऽयमापावा मूर्तिमानिन ।। ७५ ॥ मागच्छंत तमालाक्ष्य पूरादानम्रमस्तकाः। मणः भारकाः सर्ने भयाऽ रीतमस्सराः ॥ ७६ ।। कपिरिवमिदासस्य सममरः सरिस्मयम् । पाऽयू (द) प्राग्रणीः पूर्व सोऽयं जावा पुनीवरः ॥ ७॥ आ देवस्स पैपिम्य कर्मणा रसपाकतः । पेचि विर्य मावि मानादन्पा मारतः ॥ ७८॥ कपिानरसा प्रकार प्रतिग्राहिमस्मका । वस्पुर्मस्ताः म्ममीपवर्मार्गासाकनवलपराः ॥ ७९ ॥ पदति स्म ननाः फेषित् म्पामिमम रूपा कुरु । पवित्रीकरु ना बम्म परणाम्ममरणमिः ॥ ८ ॥ विष्ठ विद्याप मोजमसामिन्महामुने । मामुकाम गृहाणाप निरपर्य मरस्या (सपा) पिवम् ।। ८१॥ माग महामिहाग माम् । कपुराग्विं मम्मा मिपः पिदिवोमतः॥ ८२ ॥ बाक्ति पा सम्म ।

मम्बूवामिनिषाणगमनवर्णनम् २१३ - कापिदवे ययस्योऽय मन्मपाकारमिग्रा । संकरांगः कय हर्यातपा हुफ्फरममसा ।। ८३ ॥ भगमददनाव्याजाकाचिदाशी(रा)भिरीसतम् । कामदेवनिम देषमकाममपि स्थामिनम् ॥ ८४ ॥ इत्पादिपिविभागपः सपदस्सुमनेप्मपि । अगादपिस्यहत्यासी जिनदासस्य सपनि ॥ ८५ ।। नफोठिविशुदं स मनासारमत्पश्चः । अपानाविशापित्वात्पपाथर्य तदगणे ॥ ८६ ॥ नीत्मापार स शुदात्मा निरीहापि समीदया। कर्यापपसंदिपवासानुमने मुनि ॥ ८७ ॥ फमादाप मनस्यांव पार्ष सौधर्मसन्मनेः। समता मुतपासिदपै निर्माणस्य महौजसः ॥ ८८ ॥ मय सौधर्मसाप मना कतिपयैदिन । मादुरासीत्स्त्रमापात्य कालशानममसा ॥ ८९ ॥ पादरसेऽस्य सार्थयादिनाऽभवपर्मणः । परति स्म वपयोगं मम्प्स्वामी मरामनि ॥ ९॥ तपोजमननन()मा फराति म स सादरात् । पेगादास्मविशुद्धापर्पमधिसंख्या पुररामरम् ॥ ९१ ।। द्वितीयमपमौदर्य परति म तपो माद । एकप्रासादिकं मौदनं समस मी ॥ १२ ॥ विपाय सपसंम्यादि पपालम्पमापक। एचिसंरस्यानमेववीप तप भासद ॥ ९३ ।। 1 अप्रेमस्या

अम्यूस्वामिचरिते-
समापरस्तपस्तुर्य रसाना परिपनम् ।
पीकाणी निपपाय मरोदेकस्प विर्य ।। ९४ ।।
शून्यागारपनापदो पफार यसति पत्री ।
तपोदा पंचम नान्ना विविक्तसपनासनम् ।। ९५ ।।
पष्ठसं समास्यातं कायलेधामिर्प वा ।
महापसर्गमैत्रासंफर्म मुमनीषिभिः॥९६ ॥
इदं पार्म वा पोरा परीति स्म ईसया ।
नमस्सामी महागीर्यों पैर्यस्पैकपद मात् ॥ ९७ ।।
मम्वरं तप मोर मापमिर्च पदादिमम् ।
मार स्पीकरोति म सम्पान्पमिपानकम् ॥ ९८॥
निमयादात्ममषु मोसमार्गेप्यनुस ।
पिनप धमकापीद स यथास्त्र परमेष्ठिप ॥ ९९ ।।
नानिफमा मुनीशानो नमस्कारक्रियादिप ।
पैयारस्प तप माकं ततृतीयं मुखपदम् ।। १०० ।।
पुदस्वारमातुन स्पारम्पासात् परम वः।
माप्पाप निथपामाद पर्यमकरोन्मुनिः ।। १.१॥
परीरापापिभदपु ममतपरिपर्मनं ।
म्पन्सगोम्प नपस्वाप पनर्म एनिना रुवम् ॥ १०२ ॥
नतोऽम्पनुचरप्पानं तपः पष्ठमनुचरम् ।
कम्मारिवानिगन परपवन्यापजनम् ।। १०३ ।।
परित्याम्पंवर गर्द तपा मुक्तिकारणम् ।
म निर्विनगमनाः सर्व निरविपारमादद ॥ १० ॥

नमूस्वामिनिर्वाणगमनवर्णनम् २१५ अप्पमिम्पकम्पम मातमावसरूपतः । यसो गुप्तिप्रयेणोर्याम्मनोयोगनिग्रहात् ॥ १०५॥ कपापारिचम मे पदका पापमो । धृत्या मशममः यस सन्मुस योदुमदस ॥१०६ ॥ मन्मयस्प मियामारादति मागेष निम्नवा । प्रमारिवो भटो मारी ईसया पेन निर्जितः ॥ १०७॥ द्वादशोगमाापिपाचारिपेः पारगः सुपी । द्रम्पमापादियेदेन नेकपार्यमपरकः ॥ १०८॥ एसमष्टादशाबानो म्यतिक्रांता इस क्षण । सम्स्यामिनि पोरोन वप हुर्षति नैकमा ॥ १०९।। सपोमासे सिते पसे सप्तम्पा च शुमे दिने । निर्वाण प्राप सौपी विपुसापहमस्वकात् ॥ ११०॥ धनवमुखपापोपौ निमम मममूपितम् । अनवदर्भनमान समई नौमि भेपसे ॥ १११ ।। वप्रेणानि यामार्पम्परपानपवि प्रमोः। उत्पम केबसमान नम्सामिमुनस्तदा ॥ १२॥ नष्ट मोहरिपो शानदशनावरणसपे । आसीत्पपासनस्सस्प शाम पीर्याश्वः क्षयम् ॥ ११३ ॥ तवा केपसपनार्यमानग्मुसिदशामयाः। सास्सारा सपरीपारा निगपादिसमनिताः ॥ ११४ ॥ प्रणमुखि परीस्याप सामिन प्रिनगगुरुम् । उम्पर्मपनपाराममुष्परंवाऽमरापिपा ।। ११५ ॥

सम्मामिचरिते-
पूनपिस्ताय सामाया सुप्तुमा परमादरात् ।
गपपपादिसाचैरनीपम्प भरभरा' ।। ११६ ॥
मय मघरमदर्पदर्पसपा प्रमा।
भय करसमाट मकाशितमगत्तय ॥ ११७ ।।
स्वस्वति बहुश स्तारै स्पिकरम्नि मिनम् ।
यपुर्देगा निम पाम मन्पमानाः कवायुवाम् ॥ ११८ ।।
रिमाप वतो भूमौ भिवो गंपही मिना ।
मगपादिमहादशमयुरादिपुरीस्तपा ॥ ११९ ।।
इनन् पर्मोपद सकसमानसोपनः।
पशवमप स्विवस्त निनापिप ।। १२० ॥
ततो मगाम निर्याम फेवसी विपुसापसात् ।
कमाएकपिनिर्मुकः शासवानवसौस्पमा ॥ १२१ ॥
ततोऽनवरमपासार्मापासा मुनीवर ।
मर्व सल्लेखना हत्या पठेऽभूमिपि दवराट् ॥ १२२ ॥
नाना मिनमती सापि कस्वा सम्वनां शुमाम् ।
अमाचरे सुरेन्द्रागिणता पोपिकसिंग ।। १२३ ॥
ववो पपपवमस्ता पामपूज्पमिनासये।
सूत्वा पंपापुरे तप देनीमावा मार्दिकाः ॥ १२४ ।।
मक रिपुपरी नाना पर्पयमा सन्मुनिः।
एकाद|गमिषागामपीवी मिदमदपः॥ १२५ ॥
मवान्पगुः स निःसगो मुनिपंधवः।
मपुरापी महापानमनप्पममन्मदा ॥ १२६ ॥

जम्मूस्वामिनिर्वाणगमनवर्णनम् २१७
सदागम्यत्स पैस(रक्त्य मानरस्ताच मिस ।
घारोपसर्गमेवेपो स्पय द्रष्टुमिरातमः ॥ १२७ ॥
मनपीपम्मारीवि कापिचदनदेवता ।
मुने पंचदिनान्यत्र स्पावष्य न स्पयाधुना ॥ १२८ ॥
आगत्य सप्त () यात्रापै स्ववादपस्स्विा ।
या पापी करिप्पति युप्मा, सामसा ॥ १२९॥
अतस्वैसत्परिस्पग्य स्मानमन्पत्र गम्पताम् ।
दुनिमिर्च स्पमंतिमाः सपमध्यानसिदये ॥ १३० ॥
रस्पुरत्या सा गता पूर्ण पंडमारी निजालयम् ।
उपे पिपुग्घर माझो मुनिमपिश्य साम्यव ॥ १३१ ॥
महो पदगणा यूर्य मा ऊतु इयक्रियाम् ।
निप्पमादवया घात स्थानादन्पप्र गम्पदाम् ॥ १३२ ॥
अस्पैवन्मुनयः केबिहाधुनिभकिवाक्षया ।
यस्व गवे दिपानाये नेयं कारोपितफिया ॥ १३३ ॥
पिम्पों कीशो पर्मः स्वामिभि किवामिपः ।
उपसर्गसहो यागी मसिद परमागमे ॥ १३४ ॥
ममस्पा ययामाम्य भाविकर्मशमागमम् ।
तिष्ठामो पयमपैप रमन्यां मौनइचयः॥ १३५ ॥
निशम्यवदपस्तेपा तस्यौ भिएषरो सनि ।
नई योग प्रवियप्प मौनमासम्प पीरपीः ॥ १३६ ॥
वतोऽपवमसा म्पाप्तमात्रामास्प दुरीसमा ।
गि मिपत्सुमायावो सपकास र समात् ॥ १३७॥

जम्मूसामिपरिसे- मनावरे समायावा भूतमेवाध राससा । इवाऽवम पार्यता भीपमारुविषारकाः॥१३८ ।। चिन्मसकदशा देवभूफनिमाः परे । कवि सम्यकारा सतीक्ष्णा नसपनः ॥ १९ ॥ फतकारादिरस कमिकतोप्रतिभपानकाः । नमस्पश्चाग्यस्पुष्पैर्मोससंगनितस्ततः ।। १४० ॥ सप भीपिवसंसिसकपासाफितपाणपः। निर्यमापिभीमास्या पदास्पिसंपयाः ॥ १४१ ।। रस्कासा म्याददानास्पा कविदस्तानमदमाः । उमस्परामामास्व संत इन सीसया ॥ १४२॥ शाणन यानं मारयेवि पधान्विताः । सहंकाररपै रौदा रापावटापराः परे ॥ १४३ ॥ मोमाम्फाल्प महान तापेव फक्तिमीपणाः । भरयन महामार्गे फपिस्सपासमिईयाः ॥ १४४ ॥ इत्यादिषिरिपोपाः पापाः पापभियारवाः । पापसगै त मुनीना पक्नुमतमं ॥ १४५ ॥ ना पिएरपरा पीरा पापपरायणः । मितपमिनि पिस से शुदा दादशयारनाः ॥ १५६ ॥ नीपनामा परिन्यम्प हवा सन्पासमादरात् । माधिमकरस्य न मन्यमानः स्पिरोऽभवत् ।। १४७॥ मता पया म्पपन्यपि मुनयः सस्पषतस । उपमगमा माता मानसंमतिमसणाः॥१८॥ माया। भगा।

नम्नूस्वामिनिर्वाणगमनवर्णनम् स्वाध्यापनिरताः फेरिस्पेचिदपानापसपिनः । केषिकर्मपिपाफमा तस्परुरिमाचप्ला ॥ १४९ ॥ धर्मः सर्वमुस्ताकरो दिकरो पर्मे युपामिन्नते पर्मेणैर समाप्पवे निममुख पमाय सम्मै नमः । पर्मामास्ति पर सहमरा घर्मस्य मुल दया वस्मिन् भीमिनपर्मधर्मनिरवैर्पमविर्यिताम् ॥ १५० ।। इति श्रीवम्बूस्वामिचरित्रे मगवीपश्चिमसीर्यकरोफ्देशानुसरित- स्यायदानवपगपपपरियाविशारदपणितरानमछविरचित साधु पासामुससा टोडरसमम्यर्पित बम्बूस्वामि निर्वाणगमनवर्णनो नाम प्राश पर्ष ।

अथ त्रयोदश पर्व।
भूयास्स धर्मण मम्पसमामी निकर्मवा भितः ।
साधुपासांगमस्यास्य वर भीसाघुटार ॥ १ ॥ इत्पाधीर्मावः ।
पार्वनायमई नौमि इवारं विनफर्मणाम् ।
पर्दमानं भुनानापि प्रमाणाप निमाभवम् ॥ १॥
अपोपसर्गसंपूती त प निगुरसरादयः ।
मनपी मानपामामुरिमाः पारधमापनाः ॥२॥
मनित्या धरणा पेन संसृवेभानुविनम् ।
पकतर्षितर्न परमन्पर्व प वकः परम् ॥ ३॥
मराम्यासनम दे संबरो निर्मरा तवा ।
मोकसंस्पा तपा गोपिधुर्ममी पर्म एष प॥४॥
संगमनापर्पमा तस्वाचिंतनम् ।
मनुभेसाः स्मवास्वाम दादमानुपूर्वता ॥ ५॥
ये यावा पांति पास्यति यमिनः पदमम्पपम् ।
हादसेवाम ताः सर्पा मारपित्या प्रमाणनाः ॥ ६ ॥
मन्मत्वं सर्वमेवदतनावं परापरं ।
वैमारिकस्समावस्याकर्ममो रसपाकसात् ॥ ७॥
भाफसाइयमेतत्कर्मवीमादिपरसवः ।
सभिर्माण कर होके निस्प पवितुर्मावि ॥ ८॥
मता फर्मोदपानावाः पर्याया बपुराइयः ।
स्मानुमत्यैकमात्रस्वामिभास्व समर्मगराः ॥ ९॥

जम्बूस्वामिविणुचरसमिसिदिगमनमर्णनम् २२१ प्रमाणादागमायापि स्थानमूते समक्षसः । वेपामनिस्पसंसिदौ फो विमुमेन मगरमपीः ॥ १० ॥ कलारधि सास्रांशुरुदस्पा महीतले । कस्तापर्षि वया जीना उत्पयत पतुर्गती ॥ ११ ॥ पपा सास्फस पर्क पिस्टिमनुस्वर । मानश्पकं पवत्पेसचया वनुमृतोऽप्पमी ॥ १२ ॥ भीविवं पपसं सोने मलबुद्दसभिमम् । रोगै समाभिवा मोगा गराफात हि योपनम् ॥ १३ ॥ सौन्दर्य पक्षणपसि संपदो निपदंतकाः । मधुर्विदूपमं पुसा सौम्य दुरूपरंपरा ॥ १४ ॥ इंद्रियारोग्यसामर्थ्यचसान्पम्रोपमानि च । स्न्द्रमालसमानानि रामसौपपनानि प॥१५॥ पुत्रपौषकसमादि मिप्रापमसम्मनाः । संपावरचपसम्पाप एनष्टा इन क्षणम् ॥ १६ ॥ इस्पधुर मगरस नित्ययास्मा सनासनः । मत मशिन कचऱ्या ममत्त बपुरादिपु ।। १७ ।। ॥ बनिस्पानुप्रेक्षा ॥ भ्रमवाऽस्य भगाव मार्गविपतएपे । पमाराविहीवस्य न कोऽपि क्षरणं भवेत् ।। १८ ।। यषा म्याप्रसीवस्प मुगभावस्प कानने । पुण्योदपार कमिमिदं न समोशना ।। १९ ।। १ दिमुन् ।

२२२
नस्वामिचरिते-
मणिमादिगणपना वपामपि दिमौकसाम् ।
दिना प्रविरेपासीका फयान्परिणाम् ॥ २० ॥
मणिमंत्रोपमादीनि तापस्सर्माणि संस्पही ।
पानझकरासाऽसौ पमो नायावि सन्मुखम् ।। २१ ।।
रुपान्तन गृहीतोऽसौ इपितेन यदा तदा ।
नमसगेशापैः सम मातुं न शक्यते ॥ २२ ॥
मत्तेस्पसरग वि परम्म मैनपासनम् ।
उपादेमवया सन्निहीवयं प्रपत्नत ॥ २३ ॥
ओत परणं सिदाः सापना शरण मिपा ।
परणं वस्ममीवम पर्मः सर्प पीमताम् ॥ २० ॥
मस्पेवि पीपनैरेका पर्मः कार्यः स प दिया ।
म्पबहारात् क्रियारूपा निपपादास्पदर्शनम् ॥ २५ ॥
॥मशरणानुप्रेक्षा ॥
ट्रम्प सेष सपा कासो मा मापस्वयैव प।
पतस्सोपपदानापाव संसार पंपपा स्मृतः ॥ २६ ॥
सापस्स दम्पर्ससारो सालो समार्पदर्शिमिः ।
कर्मनाधर्मस्मण पुरसादानसतण ॥ २७ ॥
प्रहरीवापासहीवाम मिमाश्चापि निसर्गवः ।
चिर्पट पसाबमा सोकेप्रस्मिमिपिताः स्फुटम् ॥ २८॥
वदिविसवमीवन पापीह पुनसा ।
कर्मनोममायेन नास्पा पारामनवना ॥ २९ ॥
मकोग्सिवाः पुनश्चापि पुन वा पुनस्वबा ।
पर सादिकः सर्बो इम्पसंसार सम्पते ॥ ३०॥

जम्मूस्वामिविषुपरसर्वार्थसिदिगम्नवर्णनम् २२३ सोऽप्पनेनैव भीमेन कवर्षो मनता। क्षेममाकादेशः स्याचवाणुप्रीमतोगिनः॥२१॥ हानिरिक्रमाझ्याप्तो मन्मना मृस्युनायया । कनकाद्रिमहाकपाः सस्पष्टौ मध्येदेशकाः ॥ ३२ ॥ विरम्याता गोस्वनाकारैमन सोकस्प मप्पगा। अय इस्वदारम फश्मिजीपी पिपक्षित ॥ ३३ ॥ वारचानष्टदेशांश्च नीस्वोत्पमो निमोदरे । एकापुः सोथिवे काले मुस्पोत्पमो स अपित ॥ ३४ ॥ एक धमविक्रम्य तौरोस्पयते पुनः । एवं अमात्परिपम्प तमेकैक प्रदेशफम् ॥ ३५ ॥ पित्समर्थते मीपे मृत्वा मृत्वा पुन पुनः । यारता सर्पलोफस्प सर्पदेशाः मपरिवाः ॥ ३६॥ मपंत्येकिन जीवन मन्मना मृत्युना तया। क्दा समदिवः सोऽयं मप्रससारसमण ॥२७॥ सोप्पपश्यं कवोऽनेन पूर्णो पाराननंतः। निरंशः समपः काल सापि संसदपते मिनः ॥ ३८ ॥ भगो पर्यटदो पदगस्या गुदस्प मानवः । भपोस्सापसोभ्या देहादीनां समारतः ॥ ३९ ॥ सम्मानयमिपानौ दो काठमदौ ययामम् ॥ ४० ॥ १वत्र का जापारमपम देता निरपवावा मचा खि खी नानामपि मयोगिय मन पर्षे प्ररेणा रिलता साम्पमापरिवा- परिपवना पौण बोचामपदेशमिना स्वरे प्ररेण भलिता सोपान प्रविन पितारास्वितारनेति । तत्वापारमावि.॥

२२१
चम्मस्वामिभरिते-
उपयोस्सर्पिणीकालो यापवएममाणकः।
सोऽप्यपसर्पिणीकासस्वावानेव मिनागमे ॥४१॥
कोटीकोव्यी दशाम्दाना पादीणा स्पस्य संस्म्पया।
प्रमाण सप्र अस्पदवि पिचदर्शिना ।। ४२॥
वस्पामारभ्य मानायामायकस्मिभिपके।
सम्पमन्मा यदा कश्चित् भस्मारभकस्तदा ॥ १३ ॥
मुपस्या स्वायुपपाकासं मृत्लोस्पमाप अपित् ।
तस्यां दिवीयेऽस्मिश्चदुस्पमो ममेच्दा ॥ ४५ ॥
अविकांता निरंभः स समयाकमाणका
पियाज्य फमा सद्भिर्नान्पारण मा पषिद् ५५ ।।
यापंव समयास्वस्या भम्पमाना निरंकार।
नीताः सर्वेऽपि भीपेन भन्मना मृत्युना पवे ॥ १६ ॥
वदार्य मसितः सर्वः पाससमृविरिष्यते ।
साप्पनुमतपूर्मस्प पीपस्पानवाः स्फुट ॥४७॥
भगो नीरस्प पर्याय साम्पशवश्व पर्मसात् ।
नारकश्यापि विर्यम्मा देनश्पति पतुर्विपः ॥ १८॥
पस्सराणां पतिपदमपा दिपि मारक।
उस्कणाकण सामाणि दप स्पितिः ॥ ४२ ॥
वा पदो नरा पश्चिममामी स्थिविमनाचा ।
मुसामिावा मृतपाय भ्रम्पेव पवस्वतः ॥ ५०
पदा व दैवयोगात्स स्पिति पाति वारी ।
प्रारंमकस्तदा पो नान्पषा मपससवः ॥ ५९॥

विपुवरसपिसिदिगमनवर्णनम्
२२५
नयन्यस्पितिवां यारंव समया स्मृता ।
वाता पारानसफो (क) मृवा भावः पुन पुन' ॥ ५२ ॥
वन सापिकमफन ततोऽप्पपेन सापिफम् ।
समयन पदापु स्पार्दमानं शरीरिणाम् ॥ ५३॥
तदाप्यप फ्रमो मेया नान्पया तदतिश्पात् ।
झपाटीनाऽधिपत्यापि नोल्लैग्य पदापन ॥ ५४॥
पर्द्धमान
प्रमादापु
सर्वोत्कर्षे यदा मरन् ।
परपासा मपससारो दयनारफपास्तदा ॥ ५५ ॥
एवं विपग्मनुष्याणां स्थितिरामहर्विरी ।
मपम्पान्सफर्पण प्रिपत्यापमसंमिता ।। ५६ ॥
मपारम्प नपन्यादा पूरस्सपपापिषम् ।
पुनर्पप्या प्रसादापुरतास्वर्पता प्रजेन् । ५७ ॥
नावानपीन स स युक्तः समरापगन् ।
उपयत मरसमारस्वतारिदार ॥५८॥
साऽप्यनने जीवन मरीता पनाम।
हर निपनिगादादा सणाप्पटना मनम् ॥ ५९ ।।
पारा भारस्प पर्याप' परिणामगुणासः।
म पाशुदप श्राप दिपा स्पामपपागत ॥६॥
पदम्पापा कर्म मानापाररण सर ।
मदिरा निरिणी माता शुद म नन्मिन' ॥ ६१ ॥
मायाप पम् मारा नीरम्प निषिप ।
गति रिपा पपा मॉम्प्पनादिपम् ॥ १२ ॥

२२६ जम्मूस्वामिचरिते- वमोपाभपयुक्तिस्वादादे परिपर्धनम् । शुदे माग सस्पत्याचमास्ति सरसंगपत् ॥ ६३ ॥ स्पिसेरम्पवसायानो स्थानानी मुसस्पया। पविवानि धनु'स्यानोंकासंस्यातमाप्रवः ॥ १४ ॥ एवमप्यपसायानामनुमागोषितसक्षणाम् । पतिवानि प पदस्पानसोंकासस्पातमात्रमः ॥ ६५ ॥ ठीकासंस्पावमापाणि योगस्मानानि संभपया । पविवानि पतास्यानैदानिम्मादिति ॥६६॥ अतश्पामनवाः स्पर्मेदास्ते प निरंशाः । ग्रुष्टोऽनुस्कटप मघन्पोऽप्पमपन्यका ।। ६७॥ सर्मा नपम्पादारम्प यापतएवा नपन् । मीरा सर्वानिमा मागामारसंसार इस्पर्य ॥ ६८॥ "परमतो मंदगदा मादिगदे समर्मवि सिदिपकस्तो । दोग्ण वि गंपूर्ण आदिगद समेदि दिपक्सो॥१॥ कवे नित्पनिदादा मबसंसारपपतः। पसोऽपि माइसंसारा माता मदरनंततः ॥ ६९ ॥ पंपमघरसंसार मता मोसमुसापिना। नि संसार निमारमान प्रिपाप्यारापमंत मा॥७०॥ ॥ इति संसारामुप्रेसा ॥ . प्रयागमय भारिपनमन किती। पिसमाश्विन संपतिनाया। मोम्मरमरमरप्रीता , विपुषरसपिसिद्रिगमनवर्णनम् २२७ एको द्रष्पस्पमापत्पादनादिनिपना सतः। पर्यापार्यादनेकत्लेऽप्यस्प चिपमाप्रतः ॥ ७ ॥ एकाकी भ्रमसे दीनो मोरकर्मावत: भठा । कदापस्तिर्यगालोकादशेपूरिवोभतः ॥ ७२ ॥ कदायिभारकं दुःलमेफाकी सहते नरः । नकोऽपि वा सामथ्र्य र्यापानदिति क्षणम् ॥ ७३॥ एकाच स्वर्गसौम्यानि संके पुण्योदयादि । तिपक्सेऽपि नरपेऽपि सहायपरिवर्मिसः ।। ७४ ॥ उस्पयतेऽध पचत्वं याति नीवो दभिए । सदापि प्रपोमादि मिमभिषसजनाः ॥ ७५ ॥ ये कसमादयस्वेन नापि सार्दै पर्व दधुः। प्रसस्यानरकापु दुसयोनिसतास्मम ॥७६॥ एकाकी भ्रमते माणी नानालिशोधपीरिवाः । न सध्यशेऽपि तमाहो सगं पापदिति स्फुटम् ॥ ७७ ।। एकस्तपोसिना इस्वा कर्माराती: स्वपौरुषात् । कैमसझानसानाम्प निर्ममं पदमजते ॥ ७८ ॥ इस्पेकस्य परिवाय मंतोः संसारमोसयो। सापपानपयादेपो मोक्षोऽनवसुतात्मकः ॥ ७९ ॥ ॥ इति एकवानप्रेक्षा ॥ अपपीपि पिभिमश्पेनीया ससत्यवे आये। सक्षणादप्यता स्सुस्त पं सीयाः सवादयः ॥ ८॥ सापारी।

२५० मम्स्वामिपरिते- मिभ्यासापायाश्च योगा बिरवयस्वया । संति मानाभवस्पैर भेदार भीमिनदेशिवा ॥ १०२॥ एमिरेतु पीवानामाभावीर प्रसाः। यया सपिपोतस्प बारिमध्ये स्मिवस्य प॥ १०३॥ तवार्पामाममदानं भयान वा बदन्यया । मिथ्यास्त्र मोम्पो पास्ताच भेदादनेकपा ॥ १.४॥ सामान्पादेकमेरेवन्मिप्यास्प नाविस्यवः । निक्षेपात्पपा पदा मेकासंस्म्पावमाश्वः ॥ १०५॥ एकमेकांवमिथ्या दिवीर्य पिपरीक। वतीय विनयसुर्य संभयोषस्तु पंपमम् ॥ १०६ ॥ उक-- " ऐतिमुददरसी विपरीमो म तापसो विमी। इंदी पिय संसपिदो मरिमो पेप भण्माणी ॥१॥ पतेा सक्षणं पापियं परमागमात् । पदासस्पावहोकार स्यु सम्पास्ते मुदपगापरा ॥ १.७॥ फपस्यास्मानमेवाम पायादिवि दार्शिवाः। पंचम्धिविसंल्पाका मोरकर्मोदयोन्नया: १.८॥ कापी मानाम माया प सोमश्वैवि पदाधिपः। प्रस्पक ते नवा स्मु(म्यानपिन उदारता ॥१९॥ दिवीप तपतुष्क स्पादमस्यास्म्यानसमकम् । मस्पाम्यानं सृतीय स्पाचुर्य संगमनारूपया ॥ ११० ।। एसो मुदती बियो समारो रिका सोपि र संचवितो मत्ती सामनी मोम्ममा परी ।

विपुहरसपिसिदिगमनवर्णनम् २३१ एवं समिसिता मंगः पाया पोरक्ष स्मृताः। नोकपापास्वया या सस्यया नप तथपा ॥ १११ ।। स्पो रत्परवी पैर धोको मीविस्वयैर प। राप्साशीनरलीवदामोचिवाः क्रमात ॥ ११२॥ एरमेकीकवाः सर्वे पश्चितिसंख्पकाः। कर्मामरस्प करतान्महान विपापिना।। ११३ ।। भपिरविस्तु मिस्यावा सर्पतो दादास्पया । भंवर्मवा कपायेषु पृयगप्युपदेषिता ॥ ११४ ॥ इंदिपाणि प पंपैप मनः पष्ठमदारवम् । वेपामनिग्रहासोक्ता पोग विरतिरिस्पपि ॥ ११५ ॥ पंपस्यापरमीपाना पठस्यापि प्रसस्य च । माणापरीपर्ण हिंसा पोग सा पवि संमिता ॥ ११६ ॥ धर्मः सास्मानमस्पास्य प्रमादोनपपानवा । देवी कर्मामपस्यास्प भेदा पपवन स्मवा ॥ ११७॥ उतर- निकता वहा कसाया इदियणिा तहेस पणगी प। पतु पर पणमेगेम शेवि पमादा पण्णरसा ॥१॥" योगश्चास्ममदेवानां परिस्संदाखिपा मसः। मनोवासापरूपाणां पर्गणानां विपाकवः ॥ ११८ ॥ सोपि सस्यादिरूपेण मिपते नेकपा मुफो। मौदारिकादिमदेव कापयोगोऽप्यनेका ॥ ११९ ॥ दिमाया पाच इनिन्मिाणि मक्या सर मपन्ति प्रवाह “ 2૨૮ गभूमामिपरित- - मीरापंपन्द्रिपाणी मिमरस्पाणि निपपान । पन कापरपामीर ममरा (न्या) पिसपठ ॥८१॥ पप गगाइपा मारा मारफोदयात्मस्य । पिगमामाप सरें भिमायतन्परूपतः।। ८२ ।। भारम्यानगुणम्पानपम्यानान्पपि ममात्र । पागम्मानानिमिमानि मापनः सर्वयाप्पत ॥ ८ ॥ पापम्परमापाना म्पानानी पनि प। मिमममममस्यम्पादनपानीर पिहात्मन ॥ ८॥ पपापमनम कामापग्म्याम्पनन । विपिनान्गर नाप भिमान्यात्पपरपात् ॥ ८५ ॥ मनाप्पाणात पितुन्पदमा स्पिना सा । पशापारगामिडनादन्प म्ममारत ॥८६॥ गरपारि पगा सम्पाप्रपोरिचारिणगाः । प्रनामापाप गरे पटरा गुणानपः ॥८॥ नापानिपाणि पापणमम्प्पया । नारयामा पिमानि पिरिणतः ॥ ८८ ॥ सापरा पारावधानादप प्रपात | मागाप नीरम्प न ममति मिनिपपान ॥ ८९ ।। मम पापायगशामामापः। मुरा निमारमा पानपनापन परम ।। ९.॥ परमप गडाप पात्रप प्रभा। पग-विपि पम..॥

विपुषरसपिसिपिगममवर्णनम्
२२९
ra
॥ इति वन्यपानुप्रेक्षा॥
मशुपि सर्पदेशोऽयं शुकशोणितयोनिमः ।
ममम्मासासाकीर्णः का कया पायमस्वप ।। ९१ ॥
पर्चापूनसमाकीर्ण धर्मपदास्पिसंचपम् ।
प्रावर्तिमानीहि बीमसलयिवापक ॥९॥
परिफपिस्मदरं पस्तु पूत पा पभिसर्गतः ।
पपु संसर्गवो नन क्षणादराषितां यत् ॥ ९४ ॥
मसे मांसमन्मन काष्ठप्पेनोपललिताः ।
समें रागादयो मापा पाश्चाशुचिमदिरा ॥ ९॥
रागसमापया मूनं मिदश्वेऽपि दिवौकसाम् ।
शुषि वस्वनी पा रस्मो पितात्मनाम् ॥ ९६ ॥
मसश्कर स शुद्धास्मा पिटपो सपपर्मितः ।
मिश्धसपि शचि साक्षात् स्वतोऽनवयमात्मकः ॥ ९७ ॥
यदि पा दर्शनमानपारिभागि गुपीन्पही।
सम्यक्पदीपमध्याणि वन्मसापगमादिवः ॥ ९८ ॥
अशुधिस्स परित्सम्य क्षुपिणा मनीपिमिः।
चैतन्यमाणः सोऽपमयमर्यो निस्पणे ॥ ९९ ॥
॥श्पनुचिलानुप्रेक्षा॥
माभयः स दिपा प्राको मापदम्पमिमेदवः ।
वा रागादयो मापा कर्मागमनदेयः ।। १०० ।।
वस्मानापामो यो रागमापा परीरिमाम् ।
सदेवो फर्मम्मेण मामो म्यामा स्मृतः ॥ १०१॥

२५० पस्वामिचरिते- मिथ्या व पायाश्च योगा विरतपस्वबा । संवि मायामपस्पेह मेदाः भीमिनदेषिताः ॥ १०२ ॥ एमिरेस्त पीवानामाभनवीर प्रसाः। यवा समिछपीवस्य पारिमध्ये स्वितस्प प॥१०॥ वस्वायांनाममदान प्रदान पा वदन्यया । मिप्यास्त्र प्रोग्यवे पाबस्वपच मेदादनेकपा ॥ १०४ ॥ सामान्यादेकमेवैतम्मिध्यात नाविरूपवा । विशेषात्पंथपा यहा सोकासंसपावमामतः ॥ १०५॥ एकमेकांवमिप्यास्वं द्वितीय विपरीवर्फ । दवीपं पिनपस्तुर्ये सायोशस्त पंपमम् ॥ १०६ ॥ “ पर्यत्पुरदरसी पिवरीमो पंम वापसो पिणी । इदा नि प संसपिदो मरिमो पैप भण्माणी ॥१॥ पकपा सम माहरिशय परमागमात् । यदासस्पावसोया स्पः मुहम्पास्ते पुदपगीपरा ॥ १०७॥ पत्यास्मानमेपार पायादिवि दर्भिवाः। पपिंचविससम्पाका मोहकर्मोदयोमबाः ॥ १०८ ॥ कोपो मानश्प मापा प सोमपेवि पदापिः। प्रत्पर्क बनवा स्यु(साजिवपिन पदारताः ॥ १०९॥ द्वितीय तथ्यतर्फ स्पादमस्यासम्पानसंधम् । प्रस्पाम्पाने वतीयं स्पासुर्य सम्पसनारम्पया ॥ ११०॥ १ पन्तो पारी विपनो तारो पिया लोप्रचयि मत्थी कमी ॥ गोम्मटोपिभीमा...

विपुवरसपिसिदिगमनमर्णनम् एक समिमिता मंगा कपापा पोटभ स्मृता । नोक्पायास्तपा या सस्पया नप वपया ॥१११ ।। हास्पो रत्परती और शोफो भीतिस्तयेमप। शुप्सासीनरकारदामोरेभिवा फ्रमात् ॥ ११२ ॥ पपमेकीकवार सर्प पंचर्षिविसंस्पकाः । कर्माभयस्य कसैतान्महानर्थमिपापिनः ॥ ११३ ॥ मपिरविस्तु विस्पाता सर्वधो दादास्यया । मंसता कपायेषु पृषगप्युपदेशिवा ॥ ११४ ॥ इंद्रियाणि च पंपैम मनः पष्ठमुदाइतम् । वेपामनिग्रहालोका पोरा मिरविरित्पपि ॥ ११५ ॥ परस्पापरमीमाना पठस्पापि प्रसस्प प। मामापरोपणं हिंसा पोरा सा पेवि संमिता ॥ ११६ ॥ पर्मः सास्मानुयस्पास्प प्रमादोनरपानवा । देवा' फर्माममस्यास्प भेदाः पंचवध स्मवा ॥ ११७ ॥ एकच-- "पिका पहा कसाया इंदियणि तोच पभगो य । पापा पणमेगेग रौति पमादा हु पण्णरसा ॥ १॥" योगश्चास्ममदेशानां परिसंदसिपा मता। मनोपामरूपाणा पर्गणानां निपातः ॥ ११८॥ सोऽपि सस्पादिरूपेम मियते नेकपा पुपैः। औदारिकादिभेदेष कापयोगीश्पनेकपा ॥ ११९ ॥ माम्ना पाय इनिश्चिार प्रकार। बापत पो भवन्ति प्रमादरामपंचरण । पोन्मापारम्पार ॥

२३२ चन्वामिचरिते- उछप- "कम्मरण एकदम मा त हार दुरिए। से पुण महपिपा गादाससप मसंखसोग पा॥१॥" तारतम्यास्पक मल्प (य) निकटोरुटमध्यम । निरपपापो दिदिवम्ये मागमात् ॥ १२॥ समें ईप रिनानीपादाभयं परमार्थता। एका निराममा सास्मा ग्रामो शुदावविकः ॥ १२१ ।। ॥ इति पाश्वानप्रेक्षा ॥ माभपाणी निरोपरी यः संपरा मोम्पव पुपैः। दम्पमापरिमदेन सोऽपि दैविप्पमानवे ॥ १२२ ।। पनधिन पायाणां निमा स्यात्यष्टिनाम् । वनाधिन पुग्पेठ संपरो भापसमा ॥ १२३ ॥ 'पदसमिदीरातीमो पम्माणुपापरीसाममी य । पारि बहुमेया गायमा मापसपरपिसेसा ॥१॥" कर्ममामामयी भाषा रागातीनाममारत । तारतम्पनपा सोपि मोग्यत दम्पसार ॥ १२ ॥ १र्मती कम मात्र होलिपि। गरिमापातापान मसा। मोम्मासारणमने .ापनितिगुमय परेशापामय। बारिक मेमसम्पा मारपिता मनपरे।

पिचरसार्यसिदिगममवर्णनम्
२५१
-
-
मयमेकर सदा सभ्यः सैबरो मोससापनम् ।
अप मानिनामतः शुदः सेम्पमिदात्मक ॥ १२५ ।।
॥ इति स्वरानुप्रेक्षा ॥
निर्मरापि दिपा मेया मापदम्पपिमेदनः ।
मपि पैदयस्यानैः स्यावाः सम्यगुणझमाः ॥ १२६ ॥
मात्मनः गुदमारेन गसस्पेवपुराकवम् ।
गायकरस कर्म सा सपनारनिर्मरा ॥ १२७ ॥
मास्मनः गुदमापस्प तपसोऽविनयादपि ।
या पावा पूर्वपदानां कर्मणा दम्पनिर्नरा ॥ १२८ ।।
पपाका समागस्प दस्ता फर्मरसं पयत् ।
निर्मरा सर्पमीपाना स्पास् सविपाकसक ॥ १२९ ।।
इस मिथ्यारनामेव यदा स्पाइपपरिका ।
मुक्तये न तदा मेया मोहोदयपुरग्सरा ॥ १३० ॥
सरिपाका मिपाका पा सा स्यात्सपरपतिका ।
निर्भरा पुरशामेप नापि मिप्यारा कपित् ॥ १३१ ॥
निर्मरासतर्ण भाला मोक्षसिदिममीप्ममिः।
सौरमेण शुद्धास्मा सपिवम्पस्तदंगव ॥ १२ ॥
॥ इति निर्गनुप्रेशा ॥
भयो पेपासनाकारा मापे स्यागमठरीनिमः।
मृदंगसरसपाने ठीकस्पेवि प्रिपा स्थिविः ॥ १३३ ।।
पापास्तु पापपाफेन पयंत ऐनादिमिः ।
सप्तम्पभ्रेप्पोमागे नारका नारकर सह ॥ १२४ ॥
कपिस्पुम्पोदयेने स्वर्गेपु मुम्नसंपद ।
नवो दिप्यमीगाम सागरागपिमीपिनः ॥ १३५॥

२५१
चमूस्वामिचरिते-
पिस्तौस्प कवितासं मप्पो कपिापम् ।
प्राप्नुवति ऋविधा पुम्पपापपपीकता ।। १३६ ।।
सोकामे पाप पाम मनुप्यक्षेप्रसंमिवम् ।
मनवमुखसपमा सिदा पत्र पसंस्पा ॥ १३७ ।।
एक्चोकार्प माया तन्मलस्यं धिपासप ।
इस्पा मोरगापैप सापपंतु मार्पयः ॥ १८ ॥
॥ इति कानुपेशा ।।
बोभियोंपनमित्युकमनन्पमनसास्मनः ।
दुसमा सालिनीपाना पोपिदुर्सम इप्यते ।। १३९ ।।
मनवानतमीगाना समानादिवनस्पती ।
निःसरवि बता कपिदवेऽनविश्पनासि ।। १४०।।
दवा कफपीपी पप्पीहायिकादिपु ॥ १४१ ॥
उत्पपवे वा देगा दुर्गवो सम्पसनिमिः ।
चवः कम्प्रतमाचे हि मापपासुकर्ममाम् ॥ १५२ ।।
दीन्द्रियादिषु पापं विरुधामिन दुर्गती ।
पर्यावस्त्रे सवारुपास्माप्पदै मामिभिः कचित् ।। १५३ ।।
मायोपोतका जीना संस्पत्र पापो यतः ।
पापडासमाम मन्मानि मरणानि प ।। १४४।।
सम्पापाटादयामय जाप्ते दलिजाम्यहो।
भवस्वदोsपि निम्सस्य इण्यापपेन्द्रियोऽभवत् ।। १४५।।
व कपकपंपिदै सही मपति पानमः ।
प्राप्पार्पोऽस्मिन्नुस्पचिर्दुमा मृणाम् ॥ १६ ॥
हवाप्पाइस जन्म दुर्सम जैनपर्मणि।
प्राप्त प्यार मुसंपूर्ण बपुरारोग्यमेव ॥ १४७॥

पिपुवरसार्यसिदिगमनवर्णनम् २३५ वयोचरं मुष्पाप्य प्राप्यते दैपयोगवः । समापि मिपापानो धर्मबुदिस्तु दुर्समा ॥ १८ ॥ मामायां पर्मदीप दुर्सभं धर्मपाटर्य । माप्त वस्मिमपि माया दुर्समा गुरुदेश्चना ।। १४९ ॥ मासौ तस्यां पापा निग्राश्यातिदुर्तमः। सवि पस्मिन् मपत्पेष संपमा फर्मनाचकत् ॥ १५० ॥ सम्षे वस्मिमपि मा ( महा?) कासाम्पियशीकवा । शुदवन्परूपस्प पोपिसामस्तु दुर्समाः ॥ १५१ ॥ "सओषसमविसोही देसणपामोगकरणसदी य । पचार वि सामण्णा करणं सम्माचलुचस्स ॥१॥" इदम रिवात्पर्य पिोय परमाधिमिः। दुसमे गोपगमेऽस्मिन् प्रमादो दस्युरर हि ॥ १५२ ॥ ॥ इति मोभिदुईमानुप्रेक्षा ॥ पर्मपम्दस्स्वनेकार्येऽप्येकार्य प्रस्पयत्यहो । यस्मापदे पर भी नीचे पदादपि ॥ १५३ ॥ पर्मो वस्तुस्त्रमा स्पारकर्मनिर्मसनसमः । वौष शुरुचारि साम्पमारपिदास्मनः ॥ १५४ ।। म्पबारेण आत्मोको पर्म संपमसंघक । सर्वमाणिदपासूसस्वपा भीससमन्मितः ॥ १५५ ॥ बालमिनारमा देवनापायोग्रभागमाल । पलकोप्रति सम्मान र सम्पत्त्युचस्व । ऐम्मावारी ६५ ॥

चमूवामिचरिते-
पित्सौरम्प कणिस मपठाके करियम् ।
मागवि नृतिमा पुम्पपापवचीकताः ॥ १३६ ।।
मोहान शायत पाम मनुष्योपसमितम् ।
अनंतमुम्नमपमाः सिदा या पसस्पदी ॥ १३७ ॥
एतष्ठाकाप मारला व मदस्थ सिपासप ।
वा मा रगापैश्च सापर्यंत मार्पपः ॥ १३८ ।।
॥ इति सोकानुशा॥
पोपियोंपनमिस्पुक्तमनन्पमनसात्मनः।
दुखमा सा हि मीपाना बोपिर्सम इप्यते ।। १३९ ।।
मननानवमीवानां सपानादिपनस्पती ।
निम्प्तरंति तत कपिन्द्रतेऽनतऽप्पनाहसि ॥ १४०।।
चत कर्यकपीपदै पभ्मीकायिकादिए ॥ १४१॥
उस्पर्धन तथा दवाव दुर्गवी मम्पसनिपिः।
वता पवमाच हि मापपाष्टर्ममाम् ॥ १२ ॥
दीन्द्रिपादिपु मापं विरापापिन दुर्गवो ।
पर्यासत्य तवा मारमाप्पद माणिभिः कपिट ।। १३ ॥
मापाप्रयासका मीया सस्पष पारा यकः ।
तपामवासमाषण अन्मानि मरणानि प ।। १४५।।
सम्पापाष्टावधापर्य मावे दालनान्यो।
भास्तवोपप निम्मस्य कम्पास्पैनियाऽभवत् ॥ १४५ ।।
मता कपकपपिई सड़ी मावि मानवः।
त्राप्यापसोस्मि नुत्पचिर्समा नृणाम् ।। १४६ ॥
तपाप्पुषाइ मन्म दुर्समें ममर्मणि ।
माप्तऽप्पामु मुसंपूर्फ पपुरारोम्पमेव ॥ १४ ॥

विपुषरसर्वार्थसिदिगमनषर्णनम् २३७ प्रपतिशास्समदायुसेक सौरम्प निरतरम् । दर्समें पापपुण्पाना सर्व पापामगावरम् ।। १६६ ।। मायरस यतमप्यस्वा समाप्प परम पपु । समानपत्पाप गंदावः परमा गति ।। १६७॥ नमस्तस्मै नमस्तस्मै नमोऽनतमुखात्मने । नमयानंतवीर्याप परमानमानवे ।। १६८।। शताना पपसंख्याका ममवादिमुनीभरा। मसे सटसना फस्या दिन जग्मुर्यपापर्य ।। १६९ ।। म स्वामिमिनेशस्य परिप्रपिदमुत्तम । मैनागमानुसारण मोकमत्पपिपा पपा ।। १७० ।। पदप समलित किंपित्ममादास्चारद मम । सरम्पननसंध्यादि तत्वम्प जगनुते ॥ १७१ ।। अपार पाविगंभीर मरासदातिदुस्तर । पान सुपति सामान्यी विदानपि माहीवसे ॥ १७२ ॥ नपस्वामियदुत्तम मारुत भूमी तपा या जनः । पंपासारिविज्ञासापगानणीप दारापम् ।। स स्पात्सौम्पनिषतर्न पल पुपा मास्वति निपनि । इौर फरणापरा निपमुम्ब पांणस्ति रम्पा यदि ॥ १७३। पति परिममुपपपिद भीमपुनाना मन । नानापियारिमपिवपतिमाग्पिर्ममापनं । वा स्याहापुण्यफर्मनिपुणा दि म्पर्पभूरि । स्परत्यापभरममनमुरमापस्यार पपाम्पदम् ॥ १७४ ।।

२३१
सम्वस्वामिचरिते-
दिपा सोऽप्याभमानदात् रास्पचमिनाईयो ।
प्रिया सार्थनमानपारिवारसमदतः ॥ १५६॥
वसमापि तवा पर्मस्तपासक्षणसममान ।
वचमादी समा या मादयामरसत्यवाह ॥ १५७ ।।
चौघं सपम एरानुतपस्त्यागस्वपोचपम् ।
माचिन्पमपा प्रर्य नमप मुटुफरं ॥ १५८॥
भोभषा पाये सम्पर ( सम्पर) निस्पोपकारकं ।
पिवा मावा र बश्य देवपापगिनामिा ।। १५९ ॥
मस्वैवि पीपन कार्या धर्मगुदि सनावनी ।
नमिता कापि नेवम्पा स्पपारिया ॥ १६० ॥
सर्यपापि दिष्ठः शून्पा पिना पर्मेण प्राणिनाम् ।
पस्यैतत्स्यहित कार्य पाएकवपाप्यमम् ॥ १६१ ॥
पति धर्मानुप्रेक्षा
॥ इति पदणानुप्रथा ||
एवं पिवयवस्वस्म इदि हावसमापनाः।
ममावमिप तपासामोरं पाप्युपसर्गरम् ॥ १२ ॥
हाग्निम पिदारमान साहस्पैमानता ।
रिपुबर समान्य जमवि म्म परीपान् ।। १५२ ।।
म्यतीव चौपसर्गेश निरिएबरो महान् ।
म्य म्याग्नि पथदिस्पो बगाएम इवा(बापुवः ॥ १४॥
प्रावकारीय समाते मांस्पसलेसनारिपौ।
परिधारापना इस्सागमस्सपिसिरिक ॥ १५ ॥

अथ प्रशस्ति शम्दापर्यषात ययेद पावि पूर्णताम् ॥ पया फस्पाणमासाभिपर्दचा साघुयररः । वप सबसरेऽस्मिन् यौनृपविक्रमारिस्पगता सवत् १६३२ पर्षे चैत्र मुदि ८ बासरे पुनर्गमुनक्षत्रे प्रोजर्गसपुरदुर्गे प्रोपातिसाहिनछा- दौनकरसाहिबर्तमाने ग्राम काशसमे माथुरगले पुष्करगण मोहाचार्यान्वये मारमधीमयस्तिदेवा । तपो माारकोगुणमाम् रिदेवा । तत्पो भारकथीमानुपातिमा । तत्पा मारफश्रीकु- मारसेननामधेयास्तरामायेऽतकाम्पसे गर्गगोप्रे मयनियाकोउपास्तम्य यापकसाधुग्री (म)न्दन तद्भाता सापुत्रीलाम् मार्या सरी तया पुत्रप्रय । म्येष्टपुत्र साहुरूपया तस्प मार्या निनमती । तस्य पुत्रप्रय । प्रथमपुत्र साधुनसरप । तस्य मार्ग गापो तस्य पुत्रप । प्रथम सादलोरचा भायो प्यारी । वस्प पुत्र सम्हगरीयस मार्या इमीर) रास्प पुत्रा पत्र । प्रथम साहोमगन मापी गरीब रामपुश हो। दुरगन तृतीपपुनः हरिपश सादजसमपपुर- रितीयसाधुभारम्य तस्प मापी मानी वस्प पुत्र साधुभानसास मापी का असपतृतीयपुर सापुमोरप तस्य मार्या मागमता तम्य पुरापम् । प्रथम पुर मा मोगाठ मार्पा पारो पुत्र सायपर साधु पोहप । दितीयपुग्न मारपम मापा सापुगपपरितापपुर ૨૧૮ सम्स्वामिचरिते- पठनीयं पाठनीय शास्त्रमेतन्मनीचर। मंदसामिपरिमाप रोपिमननसमम् ॥ १७५ ॥ संवम्म शारदे देवि यदा गदि मया । न्यूनापि भपेकिषिरममावाविठोपा ॥ १७६ ॥ मंदसामी मिनापीयो म्यान्मंगससिदमे । मनवा सपि मो मम्मा भीपाराविमकवसी ॥ १७ ॥ पति भौचम्बूस्वामिचरिते भगर परिषमताकरोपदेशानुसरित स्यापदामपणापपरिचाविशारदपतितासमक्षविरचिते सामुपासाममसापुटोडरस्मम्पर्धिते मुनितिर सर्विसिनिगममवर्णनो नाम प्रयोश पर्व ।। इति पमूस्वामिचरितम् समासम् ।।

अथ प्रशस्ति शमारर्यपणस यपेद मावि पूर्णवाम् ।। तया फ्ल्याणमासामिपर्दवा साघुटोग्रः। अप सरसरेऽस्मिन् मौनुपविक्रमादिस्पगताम्दसबर १५३२ वर्षे क्षेत्र मुदि ८ वासरे पुनर्ममुनक्षत्रे श्रीअर्गलपुरदुर्गे श्रीपातिसाहिना- दोनअकवरसाहिप्रमर्चमाने श्रीमस्काष्टासधे मापुरगळे पुष्करगण मेहाचार्यान्वये भारफीमम्पीसिंदेवा । सपो मारकत्रीगुणमद्रस् रिदेवाः । तत्पो मारकश्रीमानुकाचिदेवा । तपा मारकग्रीक- मारसेननामधेयास्तदामायेऽप्रोतकान्वये गर्गगोत्रे मटानियाकोछनास्तम्प पावसामुधी (म)म्दन तद्भावा साधुमीवासू तयाा सरो तयो पुत्रत्रय । ज्येष्ठपुत्र साहरूपचंद तस्य भार्या जिनमती । तस्प पुत्रश्य । प्रपमपुत्र साधुनसरप । तस्प मार्पा गानो तस्य पुत्राय । प्रथम साहोरचा मार्ग प्यारी । तस्य पुत्र सहगरीक्दास मार्या हमारदे तस्प पुत्रा पत्र । प्रथम सहोमराज मापी गरीषदासपुत्री गी। दुरगन तृतीयपुत्र हरिवंश सहजसरथपुत्र- द्वितीयसापुर तस्प मार्मा ममानी तस्य पुत्र सापुचोमसाह माया मो नसरपवतीयपुत्र साभुचौहपः तस्य मार्या मागमती तस्य पुत्ररूपम् । प्रथम पुत्र' साधुमोबास मार्ग पर पुत्र प्राचंद साधु चौहप । दितीयपुत्र बारपदास मार्पा साधुरूपादितायपुत्रः २१० प्रशस्ति सापुरापमा मार्या पिये तस्म पुत्र साहलयम भार्या पादनदेसर रूपपदवतीयपुत्र' सापुधापासा मार्या घोपा वस्प पुत्र साधुटोराः तम्प मार्ग कसूमी तस्प पुत्रत्रय । पुत्र साधुभीनमदास तस्य बासमती । साधुटोरितापपुत्र मोहमतस तसार्या मधुप। साधुटोरर तृतीयपुत्र पिरपाती रूपांगद एतेषां मध्ये परमसुमायकसापुत्री- टोररेम सबूस्वामिचरित्र कारापित । दिसापित च कर्मसपनिमितम् ।। विसित गगादान।

अध्यात्मकमलमार्तण्डः प्रथम परिच्छेद' मणम्प भाव विशद चिदात्मक, समस्तववार्यपिद स्वमार्यवः । प्रमाणसिद नपर्युक्तिसपुत, विमुकदापोपरणं समंवतः ॥१॥ नत्या परमात्मानम् । पत्र मालपाधारमवारमः।"भाव सलमा वाभिमानास्मान्ममु" मम । निर्मकम् । भयरपदोपहिवम् । बिना एक बारमा लस्से बप निवारमानसस्पमित्पर्य । ५वल मारवाल। बोओं पचम्बपतितासातमा मानो मबन तलमुपले मत पम्पो पारणे निस्सोक्ते स्मर्ष लेनालस्तत्वापः । मनमेष पाखापा । वला फरमासपदार्च । मत्र उत्पन बीमादिपरा या । नमसमेन प्रयोगामियपदिक मानता मोक्षप्राप्तेरपुजवात् । नपत्याने तम्-देवो प्रयाने नाच नाती विषय क्या । प्रमो पनि सम्म बसमा प्रमति ।। समस्वामहेतालापपास्वान् येति यताति समस्तवाला नित्यम् । सामिप्रापरलोमतो पा। प्रमापा ममयपशारिमि सिन्द परमात्माम्पम् । “सप्पपिपरम मित्फ्लाबिमापनारम्बयपनिपुणमधोमो पारस्मिस्त्वमेव मानवमनमापये नग रमते पागोषत्वामिमाय इलामति प्रापयति प्रमाणवेशानिति मगर पुत्रियों ने विचित्रमयानो संमोगाम् अपना मना पमादीन्य पुचमत्तत्र सर्वत्र संयुत दुषम् । १ धारि पत्तोपानम्माषरनमा पर्वतश्योपस्व पाहावालसचिस्पधमतमोर पर परमारमनप्याला भात बोया परक्यारम्नाम्प पवारचन, नागर शानावरमापनावरानिमु पुटिव सेपारस्पतम्। सम्मान पमियम् ।। समर्मविप्रमपविपनदिदत्वारिसरापावरवमिति । नवरा समततो मगोपाहायोगमा ममाम्मेति मोरबम् । ।

२१२ चम्पामामठमार्तण M मनन्दपम समप पन्ट्रैिप, इगदिदापावसमतनम् । पुरे पपगमणिपनुपर्दुत, पदापवायं ममतापशान्तये ।।२। मुम्मन्, नमास्तुसम्म भगरम भारवि, मसापान मोहिरिम् । पर मसालदिर वलनिर्णप, पपाषा निर्दय स्वसनिदेश मोहा संवाननीं मगनमसदा उम्पकर्मापाच- सतवाननमूर्तिमनमिन सल *भापीव न वाप। पारसोभेगमुक्का गरगमपुवासपरिवारविष । गासप्यारमकमणिपरपरिम्म्यापनान्य पितोऽस्तम् ॥ ४॥ यम् । वा पुममममसमाचारसोमत' eact अगर म पुरयाति पच्मत प्रोधि प समरजिता मरत्व एमबम् । समारोप सराहायक पर रोषि" । प्रतिषण । बनिय सितारमारिदिन पापम् । सरिता कान्ति प्रोत पित सवार पवनार पियामास्मरतिमा ५ मि । बरस मोबस अभियमुनरीदिनु राममनिष । .मानामा पर मनिमलराम् । मानास्वने। मा. पम् । बपिन् प्रत्तनियमम् । १५ मनामगरेन । राममायामासर्फ । कर्मचा- कामेम्पतिः । माहस होमगार विमा परिब मुरबा।" मासुमनाम् । १ सयात् । पम् । मापसरथममत थपि । *भयान xिसवरिष्माकम् एपि।

मोक्षमोक्षमार्गलाणमतिपादक प्रथम परिच्छेदः २१३ मोक्षः स्वात्मपदभस्पिवनिपिपरिषे कर्मपर्यायानि- साधकालविवादिमसवरगुणोविरस्या यथारन् । । १मा इति सरने। ममत म्पर कर । मस्परममा । पानपारि पुषस्वविदिचारः । ममोबपनभयानामपटम्मेनारमप्रदेसपरित्तदनमारमप्रदेशचम्- ममोरग्मिय पातवितईमार्च रयान मक्तीस्पर्षः । पूर्वबिरा सासामुसानिन भुतक्षेधिनाभम्माजासूम पर्ममान मगति प्रमोट छायाने मातीन स- धुतपरस्थानमा पुष धर्मप्पा मोरनीयम् । भरभेऽपिरतिपने दम्मामराम उपांतपाय पनि पुषस्थानमनुराये पृषालविवापिचार नाम प्रयम कम्पान न छापनादिना । ममा मारिपन्देन छोपाप पूर्णविर ।परामिनः " पति पवना रतपिरिचारमपि प्रापम् । ततीवरूपाचगुणम्मा भवन्ति नापि । ममा छापागसम्देन पाश्चिमात्र तपासमिवियप्तिपमानुप्रतापरोप समचारिवारिसमकारबविधेपमूसोधी प्रायस्वेन मापात् मामन समसावपर एप परमानि इविवापि पवनः सरीर व इग्निपरनिसिरस्परमन । समन् (म्पमावर्तवरात् । भवन निजामा पपपपम्पसमाधमा सामान बन्दरमा उदारमोफसपेपरम्पुरनिराकरमात्मन रपसम्म प्रापमान मोष' स्मात् । भव पारपारमनः सात्ममरेशभितषिविविध सामान्यूनतम पनि स्म-मस्र - भामन्यामप्ररेणानो सिवे नियमापन यापनासक पाममुराया सरमम्बार सम्म तिने विविध मानापार लिपिरिपान डिम्पपरस्पयादिम्पपरिपानमा सम्मात् । पूमा मोरयामानापरम- वापसमावबंपरेलमापनिमाम्य पनि को पवस्व महानि स्पर्मानित भप व मनुष्यभरपगारपरीरहना सान्। भय परमरितामिलने रममा स्यात् । तत् सम्मिन् सम्मान से नवमात्रे । रित सिमपारण- मारितान्। 'एमपरिवनिरामा पानमान्नमुनासिबमनानामा ततो नि त रितवान् । 'नागमो मान" इतमा मिनतरामविधा निपाप है गुभाष नेगमुनिपने राति (सत पार सामोरादपनगुमोति स्मारिवामपन समनमर सीबारात स्पा

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हरेऽ परंगमणिपनुमते, पदायतच भरतार्पशान्तय ||२मर
सम विनासम्म 'समया पश्याचारसमसिमसा"cl
बरमा समधुमपात पाठति प्रयोतिमेचे मनदिर
तमाम् ।"पुर्व सरम्यान पोषित बमोम हिप मागी
पति"। इतिपयवाद । एमवीन मिलमति
पानिय मामिलामनामनाथरामचरित तंतरपर
मातम शिपिविरामविधतामस बम me
मममम् । वास्तवमा HIT
परम् । अभिन् प्रो। १५त्तविषम् । १३म्भावसारेमा11gil
प्रगति मोहम्पयामेन बाँचान रिमुचा रहिवास"
२१२
अभ्यारमममसमानत
मनन्तम समर्प पीन्द्रिप, कलादिपोदामावस्ससाणम् ।
नमाऽस्नु दम्प नगदम मारवि, प्रसाईपापुरमा निस्ि
व मसावि तपनिणय, यथास्पाम विदर्भ सममित व
या सैतानपवीं पापनमसदा दम्पकौघातु-
स्तत्ताननविपनमिप स्खल भापीते न वल।
माइमामप्रसका वगमयुवास्म परिपारप्पुतिम
गयत्तापात्मत्रघुमणिपरपरिग्म्यापनान्म पितोऽस्तम् ।।
बालभारम् । वर्गपुनमलभाषागतोमर
मोगल अभिनपति स्वारमिलामा
परवा मुरम् । वाम् ।
रेल पलममृत स्थापि ।
* मा एम।x aiनायम् इयपि ।

मोक्षमोक्षमार्गक्षणप्रतिपादक प्रथम परिमोद २१५ तत्वार्यानो समापार धुरषिगमसमुत्पावसपमपानी यस्सम्परत पदंति म्यपारणनयात्कर्मनाशापशान्तेः॥७॥ एपाश मिसमा रगपगमपरिवारिसामान्यरूपो अन्पपत्किंपिदार्मावि पहुगुणिणचिसक्ष्म परं वत् । पर्म पापर्ममाकापरसमसगंगदम्पजीपांतरोणि प्रमाइति मम्बी।पितु निष्पा प्रमाप इति मम्मन्ते । समिकर्म इति प्रेमाननिय विपवरच तो सब सैनिका बहुमममपि नियन्तु मनिभुता- पचादि सूमि भाचारिपुष्म् | १८ मनुमिति रममनुमान तामातुमान ममानात् । मत्र परेचप्रमान मतिभुनदर मोदप्यम् । निवर्ष परोक्ष पति गुपये त्रिपनौनियानि परामि प्रभचारिक र पारिसमा गुस्सोयरिक परे । मविभुष्यमातरमतमोपममम पर प्यते । म बामदमपेत महम्म बास्मनः उपपते पयादर्प उत्सऐपम् । इदिवामिनिम्नमिव क्त् । भुवमानन्त्रिपल रविवारयाद । पापमोपमानापापसमाता भूस | रपित तत् गुमा. स पुनिन र ते नितिमिरचय सेन पुर। गुनिःसन्मानिमियमयुषम् । १ नमवाताचे पदाम्पाना पा सम्मान प्रो मममम मम पमु स्परपम्पोत्पारस्तरेख सम्म विद सत्यमति पामिति । पापा उप पतिपम्मो पानोपपतिः कपषम इतर सम्मलत्रये परिपहातमिति । । प्राविकोप्रम् मिज पाम परिनिह हदि मावः । ५ मनाया रिमादिसामानास्प। वि निबन। . घदछमारमातम् । प्रति- माति । ९ मारो गुमिग्रे इम्पावत देय गुप्यरर तस्मिन् पुषतामाबाद मिति। 1 प्रबर्वन् ।विम् । ११ मन्वन् । एभत्र रखपम्पम्पमा र पये की तिच्यो इमरापो रिवि मेदिपः । १४ मुनेमा महारो गमः संनय बरिमन् वम्मुलन ठप धर्म मुबमा काला स्पर्प । १५ जोपोन्वये मलेस्मिन् तबीयतरम् अपमामिति । पण समाप्रपरसब मुखमय रोवर पनि ।

२११ अभ्यामकमसमावणे स्यारण्यात्मापसम्म परमसमरसीमारपीपीप्त पलप्मानादिमागापरकरणतनाः संरराभिर्भरायाः ॥ ५ ॥ सम्पमझानाच मिवयमपि युतं मोक्षमार्गों पिमक्का- स्स स्वात्मानुमतिर्मयवि प षविद निम्याचलरहे। एव पसास्मा निम्पभिसमये स्मात्मैवस्व निसीय या निर्भेदोस्ति पूयपस नियमविरोन्मोतमा मोति पास्मा ।६। यसपटानं मिनीतरय नेपममनात्समर्मागावपाध्या- त्पत्पशापानुमोना कतगुणयणिनिणांतियुक्तं गुणाम्पम् । सम्पमतमरित्रापि प्रतिस्थापनममत्र । लरनमारम्यान पारिवानि माझमापः । निवयत्तस्त्रिाव मारमा एल । वपुष-सम्मासमानार परम मोक्पस पार बाये। विधायदो साधिपामोनिया गप्पा एम्पबामित्व ४ रविरहिवाची) ५सतीमारमपमाधिया और सपक तिवापो । । तामेवाणिव दलको नभान पुरिमिर्मियोऽनि । ९ पुना निस्केन । प्राप्रम् । १ प्रामाति । मिनाधिकरणबपानिपात्यत् । १४ मम्मी मन्नाजन्माचविचार । १५Aविवियनमा सम्मा मात्प्रमाण सरिन् । ११ गाषिप्रतिपरिमिक्वरवात् । १. मनोति मापोत मातीत्वा मास्मा वमवसमा विममपपोत प्राप्तक्षयोपाम गमपेपमा प्रधीपावर प्रतिनिया शनि । “प्रसव"वि अधिमान पचोखायामात्र प्रत्य ममान मपति | पिपिरिमन्नारनित - ब FAN मन्कत ना परदे । पम् । विमानस्म त सामानो मनि । सपनामको पनि तानिपता मषितम्याम्किी । परमनप्पुम्म मनियामनिधि तिलनि संसारनामे प्रस्थान पमिनिकन पम्मलेमा प्रवामिनिमम्म् । सम्मान पवार मन भनेपालमा राजपाप्यामिति । मोमो-वेचन परिस्लामा xभूतबार।

मोक्षमोक्षमार्गसक्षणप्रतिपादक प्रथम परिच्छेद २१५ वत्यार्याना स्पभाषाद धुरविगमसमुत्पादलक्ष्मप्रमाना वस्सम्यक्त्त मर्दति म्यपारमनयाकर्मनाशोपशान्ते ॥ ७ ॥ पपोज मिर्मसमो गमगीपरिप्रादिसामान्यस्पो मन्यैपकिंपिदार्मावि पहुराणिगुणचितक्ष्म 'परं वत् । पर्म चापर्ममाकापरसमुस्वर्गदम्पमीनतिरोणि प्रम्प इति मम्पते । वितु भनिनः प्रमा वि मायन्ते । निर्थ पति प्रेमी पनि पियरच तयोः संग सनि डुमबमपि निराध मतिमुता- पचादि सूचपित मवाप्पादियुतम् । १८ मिनिममममुमान तमाचनुमान मापात् । पत्र पोषाप्रमान मतिमुखदर बोसम्यम् । विमान परोक विम्यते भनिनोनिमानि फ्यमि प्रभसारिक मारिसम्पात् गुस्मरेतारिका । मतिमुपावरमयोपामश्च पर उप्यो । तत्पी पालमपास मवस मात्मनः सत्पते मानव तस्परोपम् । पनपानिनिनिमित्त वत्। 'मुवमाननिगल विमापात् । चापमोपमापाचाफ्स्पभाषा अर्भूयः | १९ रविव क्त् गुम- च गुपिनस्पत्य मितिविपर्व देव पुर्व। २ गुतियारिमिराम्य पुषम् । नाता परमानापा । तमेव मेम विवमसन पर समु पारसमेनोपारस्तदेव मनि प्रमति पामिति । २ नासाना उप शांतिम्पसमो वा मासोपतिः पयोपपम प्रपत्र सम्बाला परिणामिति । एमविदोऽम् मित्र प्राय सरीराविमिन इति माग । ५ निशाना रिमाविणामाबस्म । दौति नियम। . बारम्पाएवात्सर्वम् । प्रति- माति । पामिनो अम्बाधरन देय पुचारर तस्मिन् पुचतामायामा मिति।। प्रपतत् ।विहम् । १२ पापम् । १५का रुपमहोमपातः सो.परेपा विजयी परापमो रिवि मेरियनेपः ४ मुबाचे नाम मच संस्प बस्मिन् सम्मुत्तमर्व पत्रपदम र मुखमश्चम कम्मरले बा । १५ पोत ममे परिमन् वीतरम् प्रणम्पमिति । पपरा मन । माप्रमत्सब मुणधर्म और पति ।

२१६ वम्पारमकमममाणे मंचः स हि भिर्भ परपरिणतिरप्यात्मकर्मप्रमासा ।। ८ ॥ निमिस्पेवीद सम्पम्पिगतसकप्ताग्माइमापः स भीष । सम्पमाप्टिमरेभियपनयकपनात्सिदकत्सम किंचित् । पपास्मा स्वास्मवर स्तिमिवनिसिसभेदकतानी पमाति साभात्सद्राष्टिरेपापमप विगतरागम मोकपूम्यः॥९॥ युग्मम् मीपानीमादिसल मिनरंगदिव गौवमादिप्रयुक्त पग्रीनादिमत सदपतमिपुर्यादिगीत यपापन् । उस्मानं तयैर सपरमिदमलं उम्पभावार्यदलम् सदादिममुक्त म्यवहरणनयास्समिटुक्त गादि ॥१०॥ स्सात्मन्पेसोपयुक्तः परपरिणविमिचिगुणग्रामवी विचित्पर्यायभवापिंगमपरिणवस्वादिकल्पारसीरः। सा स्पात्सचिंद्रः परमनेयेगवत्वादिरागी फपंपि- वेदास्मन्यव ममाप्यवसकसनयो पास्तमानपूर्णः ॥ ११ ॥ प्रेममममहादिपरिवति ।।भिये मोबात का समा। बिनबोष गरि कवितमिति। तख पैतम्यनिमियपर. प्रचुर सानसोपच पुप्रियम् । पारिमिप्नपूर्णमसम्म पषितामिति । -- स्वापाचा गौत देवितमिति । - विकरेन तयालयोन समस्त मिति नतमा मन्दम्योपमानित नसावारिधिमा देखनाच । दब मालम्बोममतिपन पतला बार व पमिति रतन समझातन्त्र । म मनके सिवाना भपति । सरकार म मावना विप्रमादिभाव बेला यो मेपणास्रोपामा पिनमो मन वन परिक्तवादिति । ९ मरामर ।। सानिया प्रायम् । 11 सितम्।११पारमित ।

मोसमोझमार्गमणप्रतिपादक प्रथम परिच्छेद २१७ घ मिस्सपिना ननु समसैमये सममत्सत्वसः स्या- दक महेम दयामा तदस्विससमयाना घ निर्मातिरम । दाम्पाममारिभादिवि मतिरि “पभैर शक्तियात्स्या- संमिन्मी हि षोपो रुधिरविषियमा संघी सदंगर ॥१२॥ पर्योपारादिरूप गैरेंगमयुतं सच्चरिम च भाक्त दम्पानुष्टानरनुस्तदनगतमरारागभार कर्यचित् । मदानानुभाषपञ्चमितकपायमस्वभानो मामा नीवस्प सः स्यात्परमनपगतः स्यापरिप सरागम् ।१३। सात्मझान नितीना 'गुण इष पणिनि त्यसरमपंपा राग कथिम पुदो खलु फयमपि पी पुटिमा स्पान तस्य । प्रेमा शानमन ।। मन्निति पितरें। ४ समा समान समयः काम पनि समममपस्तम्मिन् । ५ भनम् । । समस्तान्मसिदतानाम् । . निधरमेव । ८ सनरम्नाभ्यामेष । पिपा भैरस्लेन दिन् मदन मानमात्रे। ११ प्रदा। १५ वर्ष। १४ भदा । १५ सम्म पतमे।। परिषमाचार नगरपरिजनरोगीमान् मारिपादन सार पवमसि एपमा पाषाणारा स्परिक परिमय तोम्म सम्पपपतन् । 1. सनशानमगुलाम् । १८ सम्पपरिवम् । १९ सरित सन् भविभाग मायामिनि मेरिनी। ३ पस्पायमोनुरान भपिरान प्रमारतस्य । १. मला बम भरपिालप्रमा। एरपमिसः जापान पस स्वोस्प समारो बा१४ा मार। २५ एमम्मगरिषमा पनि परितम् । १६ मत मौना ममानः । १. स्पट ना सिरप मतारण नारी मनापामामुग्लिागीमा प्रमारय दिना प्रारमरप्री सभार प्रसारमारनी। १८ भामा निर्मिती पापेमुनो। 4 मभारा पी पन् ।

२१८८ अप्परमझमझमार्तणे प्रस्मस्थाच हि गौण यविपररूपमा स्पादिमापनदि पापारि पिराग पदिखल निगमसीपि सातादिगिम् ॥१४॥ इति श्रीमदप्यात्मकमसमार्तण्यामिषाने झाबे मोक्षमोक्षमार्गमनण- प्रतिपालका प्रपम परिमोद । बापनम् । र म माया प्रेमी दिपरतो या। ५ वात् पावरा बारित्रम् ।

द्वितीय परिच्छेद 'मीयामीमामाभवपन्पो किस संपरम निर्मरण । मोलस्वरस सम्पम्वर्धनसहापपिपपमलिसं स्यात् ॥ १ ॥ *यामांतर्गत पुष्प पापं स्वभापवो न पृप । वस्मामाविष्ट मल ताशा रिणा सम्पन ॥२॥ भीमममी दम्म वन वदन्य मति मोलान्ता । पिपलपरिणामाः पित्सयागैगाम विममनमाः ॥ ३ ॥ दाम्पनापनिपनानि सदास्मैकानि स्मात्मस्पितानि सदकारणपन्ति नित्यम् । १ मामय बबर तोर्मपर्वत मन्वयवामिति भामतम् । २शनारिमेनाममा बेला सा मार बस्वासो बीररादिपरीतोऽनीमा २ वागीययो । पानीलाम्पामने । ५ 8मागुममागमतारमन नामरा, भारमचा नव मात्रप्रवेशासपेसम्म कामा । माननिरोपम्ममा सका। सोहनामो नि । सर्वनिम्मोही मोवा का बोधपुरम्मो समान | V मामलमुना मोगमा पुनः चित् मानिसमोना लिम- नयति माता । वास्स पर्याय बनो मन्ति वा तानि इम्पामि । पाप- मिनमा असत बापा सम्मो पर्व वानि रामभनि । १लसात्मनि विवापिसाबस्थितीहर्ष। "पती को मत्लामिभारते (२-११)पिते। मानपदपुरि थपि ।

२५ अभ्यारमझमम्मान -- पफम संस्पिवयष्यपि मिमसाम- मक्ष्पाणि तानि कपयामि यथाशक्ति ॥ ४॥ गुणपर्यपैयाम्मे विगमापावापुषस्वनवापि । सहसमिति च स्यादाम्यामेरे पस्तु मत्पदा ॥ ५ ॥ अन्नपिनः किस नित्या गुणाप निरीणावपयो (पा) पनषिः। दम्पाभया पिनासमादुर्मारा स्वस्तिभिः क्षात् ॥ ६ ॥ सर्वेष्वनिशेषण हि मे द्रम्पपु च गुणाः प्रपत्र । व सामान्पगुणा र पया सदादि प्रमाणत: सिदम् ॥ ७ ॥ यस्मिीय निपमितपस्तुनि ममा इदमिति पिज्जाः । मानादयो पपा से द्रम्पमतिनियमिनी विषेपगुणाः॥८॥ पविरोकिणो पनित्यास्तस्मासे म्यवन्मयापापि । ते पर्याया विविपा उम्पावस्थाविशेपपोषार ।। ९॥ एकानेकदम्पाम्पेकानेकपदेशसपिमः । दम्पमपर्यायान्पो देशारस्पविरे सु वस्मादि ॥ १ ॥ परमात्र तिमपि भामिनिम्तमान शान्ति । स्पपिया किम्मत पालमप। गुस्से तिम्रो प्रतिको महतरालेचे गुनाः पवन पवः समावीमालमतमा परिमिरियमः । गुमाव पा पुस्पा सेल सवाति मुपसाराममिति । पत्र मनुस्मो wिait ४ मा स् माविमगत रामममिवापान भावान्तवातरफ- समुत्पात । तथा पूर्वनिमम सका। बारिपारिवामियसमा यो गाभावात् गुपति बारामतीति सस्तव मयो प्रो एवं गा । ५ोसम्म मामाभ्याम् । योमरम्मतरेण बा। पुनम् मuter मिया मिला मामला साया पलमा ममतामा परिमापति पोदा मेते। इम्बमाभोवती

दम्यसामान्यलक्षणसमुपोतको द्वितीय परिच्छेन
२५१
या दम्पान्तरसमिति विनय पस्तमदासपिण्ड ।
नैसर्गिकपर्याया दम्यज इति शपत्र गदित स्पात् ॥ ११ ॥
इप्यान्वरसयागादुत्पमा दगसंषया दयम ।
पमारिकपर्याया द्रम्पम इति नीरपुनमयाः ॥ १२ ॥
एफस्य गुणस्य दियऽनंतांशा प्रमाणतः सिदाः ।
तो शनिवृदिर्या पाया गुणात्मका स्युस्त ॥ १३ ॥
पर्मगरण हि य भारा धर्मासात्मका (लि) इम्यम्य ।
दम्पतिरनिरपसाम्त पयायाः स्तमारगुणतनमा १४॥
अपदाप्यनिमित्ताप परिणामा भपति सम्पेर ।
पपदारण हित सिमारगुणपर्या (प) या पारंप ॥ १५ ॥
फैमिस्परपयपिगमपति ट्रम्प पुरति ममफार्म ।
मन्पः पपपमपनर्मगरण नापत दम्पम् ॥ १६ ॥
पहिरंतरगसापनसार सति पथा स्रादिषु ।
म्पारस्पान्तरा हि प्रादुर्भार पगदिएम मनः ॥ १७॥
मनि फारण पपाम टप्पारस्पतिर हि मनि निपमान ।
प्रारम्यारिगपा निगम र मसिना न सा ॥१८॥
प्रारम्पासिंगपेप्युमरपपापममुत्यादति।
उमपारम्पाप्मापि प नागप्पपमुराग नमिन्यम् ॥१॥
मदरम्प गप गुण गत्पपाप पाणानिया ।
नपापमामि गरै दप्प प्रमाण मिरम् ।। २० ॥
धाम्पामादरिनामा पिमा 'प्पागपिदिनि नपन ।
पुगपत्मन्नि रिपि पारम्प नगरमिति नान् ॥ २१॥

२५२ वप्पामकमरमार्तण मनिनामागो पिगमप्रादुर्मापभुषप्रयाणा प। गणिगुणपर्यापागामेन पषा फिवः सिद्धम् ॥ २२ ॥ स्सीपायपास्किस सविवि द्रम्प पवामित गदिवम् । परकीयादिर वस्मादसदिति कस्मै न रोपवे दिवम् ॥ २३॥ एक पर्पयमातेः सममदेभैरमेदवो उम्पम् । यमिगणमेदाभिपमादनकपपि न हि विरुदपेव ॥ २०॥ निस्पं विकासगौचरपर्मस्पास्मस्पमिावस्तदपि । सणि कामपिमेवात्पर्यापनयादमाणि सनी ॥२५॥ इति श्रीमदम्पास्मकमध्माण्डामिषाने थाने म्पसामान्म- मणसमुतको शिवीय परिच्छेद ।

तृतीय परिच्छेद । मीरा दन्य ममितिविपर्य वाणा'मरपनन्ताः पपायास्त गणिगुणभरास्त च गुदा पटा । मस्पः स्युस्तदखिलनयापीनमय स्वरूपम् नेपा पल्प परमगुरुता च किंपिग्म पर ॥१॥ माणेनीवति या हिनामितपरी भारिप्पनी पर भीगा सिद वा मक्षणलारमाणास्तु मतानिनः । मारदम्परिमदता हि पाहुपा मंना फसपिपत सासान शुटनप मप रिममा भीपम्प ने पतना ।। २॥ मम्पातीनमदनास्तदनुगनगुणामदरागापि भारा एतद दि सर्प चिदभिदपिगमार्नवागन्यादिएन । मरम्मिमेर पुलिस पर इति दिपया मापन माणमाना मम मम पनि पररमतिपुतः कापि पर न मामः ॥ ३॥ नीपरम्पं यपान विपिपपिपिपुतं सरदमा पार मार रमपमान परिणमनि पा पदमाम सारन् । मारापपारिशला परि मा रिगमदयानिर्मिमदन मापदम्प दि गुद परिपपपि पा पातितापि न पन् । मम्म्पानीमा पुगपनि रिभरामिनिषा म गामान्या स्थिपा परिणपनमानापदरभदा ।

२११ अपात्मकमम्मातणे निस्पामानादिमाप्रापिदवगमकरा मुक्तिमाप्रमभिमाः श्रीसपणास्ते समुदिवपुपा पारमयसस्य तस्मात् ॥ ५॥ मुक्ती कर्मप्रमुको परिणमनमः। सास्मभर्मेपु शुभ दोभेम स्वकीयाएरुसणगुणतः सागमास्सिदसस्मात् । मुक्तः सुदास्मनो हि ममिविरिषयास्ते गणानां स्पमावा स्पर्पापा' स्पुष शुदा मनननिगमस्पास्तु सदय झर्न ॥६॥ संसार मसिटे परसमपपति माणिनो कर्ममाजी मानास्यादि कर्मोदयसमुपचमाभ्यां सयामविप्ता वा। ये भाषा कापमानादि(१)समुपशेमाम्पो सम्पपस्मादया हि पुरिभुत्पादिवामाः इमविदरगपारिपग(त्यादपथ ॥ ७ ।। पक्षाएपादि पैतदि समसपरिणामाप संस्पातिरिका । समें बमारिकास्ट परिणविमपुपा धर्मपर्यायसंशाः । प्रत्पमादागमादा पनुमितिमतिवा समपार्षति सिद स्वस्मस्माता ममेवाम गठसकसम्मोहमानिरच्यः॥८॥युग्म मास्यासमपादशमपयपरिमविनीवववस्य तस्मा स्पयाप स्पादपस्पान्तरपरिणविरिस्पास्मात्पन्वरादि। म्यात्मा स दिपाको मिममसमसभेदादि सर्पगीत- पिवम्यास्तिपदी नपरिममनो रोपनीयः सदा ॥ ९॥ फमापापे परमरपुपः किंधितून उरीरं स्वास्माधानां तदपि पुरुपाकारसस्पानस्पम् । निस्यं पियनमिति पा कमिमं मूर्तिपम्यम् पिस्पयाय बिमसमिति चामेपर्वमान्यर्यगम् ।। १०॥ १ समुम्पसमाचास्पदबोपी।

द्रम्पविशेषप्रापकस्तृतीय परिच्छेद २५५ पे दहा देहमामा गनिपु नरफतिर्यम्मनुप्पादिफामु स्मात्मांशाना स्वदेशाकतिपरिणतिरित्यात्मपर्याय एव । दम्पात्मा चैत्यशुदो मिनपरगदिव कर्मसंयोगता तो देपावस्यांवरयेचदिधरमपुपि स्पादिरहँन्तरश्च ॥ ११ ॥ एकापात्मान्नपात्स्पास्परिणविमयता मारमदास्पिपात: पर्यापायामयादै परसमयरतत्वानी मसन । मैदशानाभिदास्मा स्पसमयमपुपो निर्विकल्पास्समापः स्वात्मविश्वासरात्मा विगवसकसफर्मा स पेत्स्पादिगुदः ॥१२॥ कर्ता भोका यषित्परसमयरतः स्यादिपीना हि शव वागादीनां हि पर्वा स समसनपता निश्चयात्स्याप माका । शुदाम्यार्थिादा स परमनयत स्वास्ममागारराति संक्त पैसान कर्यघिरपरिणविनपवा भेदारपाप्यमद ॥ १३ ॥ मैदमानी करोति ससमपरत इत्यात्मपिशानभाषान् संक पैताप शषपदपरमपद पर्वत साऽपि यानन् । वामसमर्माणि मनावि समसपरिणामानिपत्त ष मीना पीनकेन तिष्ठत्स तु परमपदे पन कवा प तपाम् ।। १४ ।। शुदाशुटा हि भाग ननु युगपदिवि संफतस कर्य स्य रादित्यापदपोसतमसारिक मरवपपार्या मिरुदम्यभागद । इत्यारका हिसे पम सलु नपपसासुत्पालऽपि सिद पामेन समारादि करणरमा भीषवश्यम्य भाषान् ॥१५॥ सम्मोहसत स्युस्तादपमनि() मारमणामाग्गुिदा मागवत्पाएतादयभरपरिणामामणाना शुदा । बोरा हत्त्वा।

२५६
बयात्मकमळमार्तण
इस्पेष पीक्तरीत्या नयनिममनवो पोप इस्पास्ममापान्
र त्या पिशदि बहुपरिवनतो मायका शुद्धिरस्ति ।। १६ ॥
सायासक्तपिचो विपपमुसरतः संयमादिम्पपेवा
मीरः स्यास्पूर्यपटाशुमपरिमतिमान् कर्ममारप्रवाहा ।
दानेम्पादौ मसक्ता भुतपठनरवस्तीवर्सहशमुक्की
स्पापासीरमापः गुमपरिणतिमान् सद्विपीनां पिपावा ॥१७॥
शुदात्मशानदक्षा भुवनिपुणमविर्मावदी पुगपि
पारिभादिममा निगससकालिममागो मुनींद्रः ।
सासारस्टापयोगी स इति नियमषापापपाति सम्प
कर्मचार्य सुस्त स्यामपभिमननवी सदिकल्याऽपिकल्पः ॥१८॥
दम्पं मूर्विमदाम्यया हि तदिदं स्पापसा संमवा
मूर्तिपापि रसाविधमपुपी प्राथाय पंपन्द्रियः।
सपमागमत समक्षमिति भो लिंगम्प पोमान्मिवा
चदम्य गुणालपर्ययपुतं संसपतो परम्याम् ॥ १० ॥
शुद्धः पुनमा एकपरमाणु समया मूर्विमा
म्नाभाभिसरूपगपरससंसर्मादिपमोम य ।
मनापाप भगाव नममिवि दम्प दिपेतस्पर्प
सर्वे शुद्धपमा पुदिव पवाविगै सरूपया ॥ २०॥
रूसम्निम्भगुण मदनगणसपिम्ही गुमान नग
ममवाप्पपमपपीलिमपिई दम्प परादे तत् ।
पपापापिनीसिता हि गणितास्सस्पातदनी पिपिः।
मम्पातीनसम प्रमाद्रपति पानवमदनी प्रिपा ॥ २१ ॥

दम्पयिशेषप्रदायकस्मृतीय परिच्छेद
२५७
शुदवाणुसमामितानिसमय तय पाणी स्थिता
पचार किल रूपगपरससंम्पर्श पनागिन ।
मूटप्पगुणाम पनाममया भेदमस्तु है ।
पना परिणामिनाऽपि नियमादाम्पात्मका सर्वदा ॥ २२ ॥
पपायः परमाणमाम इति मदानपाम्या महि
मलम्निम्पगुण प्रदेशषपमा शुद्ध मूर्त्यास्मन ।
दम्पस्पति विभक्तनातिमथनास्स्यादव स प्रिया
मुस्पतिमिदनफ्पा भरति सापीति मागास्मफ ॥ २३ ॥
सदा बन्प मापस्थमा सस्थानभदमंतमसम् ।
जपानपमाणाः पुगलरस्तारगुदपर्याया ॥ २४ ॥
उदणी पलुम्पगपग्समम्पनाम ये निग्निता
मा शिविपा मिदो हिररितात्पीता पपाम्रादिरन् ।
मदात्परिणामस्मणपमा गन्तर सरपना
पसाणा परिणाम एप गुणपयाप म गट रिम ॥ २५ ।।
नपाणी परम पिताप रसम्पसनगपागम (1)
पंचदिनपंफादरपः पपापम्पा प य ।
परति मदा भरति निपमानना प नगामापा
पपाप अतिरिम्प इति नागा परमाध्यम (0) ॥ २६ ॥
पागणुमति मगमगुदम्पमापण प
पपमा रूपगंपरमगाम मनन्यपाः।
पाप मभित भिसामनुपायाप मापन.पा
पर्यणगानिकित पाशुदाम पापा ॥२७॥

२५८
मप्यात्मकममारणे
-
खोकाकाममितपदेपरप्पो पर्मास्यको संस्पितो
नित्यों देवगणमईपरदिवो सिद्धौ सतार सौ ।
पमापर्मसमास्यापिति वपा शुदो मिकाले प्रपद
स्पाता हौ गणिनापय मकवयामि दम्पपोस्वयोः ॥ २८ ॥
गुटा वेसगुणाइप पर्यपगणा एतदि सपै समम्
दम्पं स्पामिपमादलममा धर्म पपर्म प तत्
पोषाः किम सामाप्रगगिता पिंटीवपुः सर्य
पपापा पिमसः स एप गुणिनोऽपर्पस्य धर्मस्प प ॥ २९॥
पर्मदम्पगुणो हि पुनमपितोषिपदवण्यपोरात्ममा
गममारपतीनिमिषगतिस्तं तपोरेप यस् ।
मत्स्यानो हिसादिपनापति पौदास्पैन सपन
मस्पर सहदस अपवनयोगस्पास्मसकारपि ॥ ३०॥
विटमारबताश्य पदमवितोऽपादास्पभाष नप
दस पपिरस्य मागेपटवायाया पपारास्पिते ।
पर्मों पममपारसस्प गठमादास्पमदिष्टः सदा
अदाय सादर मदनपा स्पिस्पास्मन्कारपि ॥२१॥
पापापात्र परिणपनमदरसलपी सारपनेप
पर्मानाप सोपागुरुम्पएणव स्मात्मपर्मेषु मापद
सिदाम्मपापा प्रविसमयमय पपपा म्पाझ्याण
भुसा पोरमसंशा परिणविपपताऽनादिवसुमारात् ।। १२ ।
गानलसपननमनादिपरसामानिमास-मात्मा
लिपिमा कपिटम्मरित धिस तदपपपीर समन्पपात् ॥३२॥

दम्पविशेपप्रज्ञापफस्तुतीय परिपोदः २५९ पारस्स्वाकायदेशेष सफलचिदपिचत्तसचास्ति निस्सा वारदा सासंद मिनररगदितास्तमाहिये प्रदेशा' । स सेऽलोफसमा गगनमभिदपि स्वात्मदेउपु नष मेदार्याचापलंमाद्विसिपमपि च वीव पाध्यत देवा ॥ ३ ॥ मेवातीसमदेशा गगनगणिन इत्याभिधास्तप पमा सत्पपाच तत्वं गगनमिति सदाकाउपर्म विशुदम् । दम्पाणां पारगार विवरति सम्देवदि यस म्पमारा रौ स्वास्मधर्मात्मतिपरिणमर्न पपपर्यापसंगम् ॥ ३५ ॥ गगनानाशना पिडीमार समापना भए । पपीपा द्रप्पात्मा गुदा नमस' समाग्म्यान' ॥ २६ ॥ मान दम्य प्रमाणामति स ममपाणु किस दम्परूपी साकमदेशस्थित इति निपमारसापि ममामः । संम्पातीवाम सर्ने प्रपगिवि गणिना निमर्प पासवान मानः पामोलिप:म्पारसमपपटिकारामगदि मसिद ॥२७॥ पप्प पामाणमा गुणगणारित पाभिन शुदमार सादगासस फपपति निनपा निपपादम्पनी॥ दम्पाणामात्मना सस्परिणपनमिदं पाना ना घरम्पार्य प पर्पः म्पगुगपरिणतिपमपाप एप' ॥ २८॥ पपापा प्रप्पास्मा गुट नामाणुमार पनि गीत । मानामा सभामम्पाना ग्लराविरिष प पर ॥ ३९॥ पपाप मि नारामती पा शरशयारप मापनपसनारपार पनदिन पम्पिा ममता २६ अध्यात्मकममाणे वस्पाः स्पाप परस्वमतदपरस्त मानमयाम्बित तस्मान्माननिधपती दिममयारितिकामास या ॥१०॥ एन म्पपति कास निमपञ्चसम्म गावि पर्याय । पदा कर्यपिदिति तदिपारगीपं यपोकनपपादः॥११॥ भस्तिस्व स्पाप पण्मामपि सल्छ गणिनां रिचमानसमागाद पंचाना देशपिंगत्समयपिरस्तिानो हि फायस्पमम । सूक्ष्मागोमोपचारात्मपयपिरहिवस्पापि हनुत्पसलाव धमत्तं न मदेशमयपपिरहिवत्यादि कासस्प अषत् ॥ २॥ इति श्रीमप्यारमझमम्मानण्डाभिषाने शाजे द्रम्मरिशेपग्रवारम्वतन्य परिमो ।

चतुर्थ परिच्छेद । माषा मानका ये परसमपरता कममा प्राणमाज: सर्वांगीणाम सर्ने युगपदिवि सदापर्विनो सोकमामाः पे सत्यापैरिसस्ते स्सयमनुमिविवाऽन्येन पानहिकास्त मत्समझानगम्पाः समुदित इति भावायना मापबन्धः॥१॥ एवेपो स्युमतस अवमुनिकयिता नाक्यो मर्त्य वाम न्मिप्यास्त्र ससित वदनिरविरपि सा यो प्रचारिप्रमावः। कालप्प स्पातपापः समसपरिणतो दौ च चारिप्रमोहर योगा स्पादात्मदशमयपपसनवापास्मनाकापमार्गः ॥ २॥ घस्वारा प्रत्ययास्ते मनु कयपिदि भाषामा मापर्षप चकत्वाइस्तुतस्ते पत मविरिवि पेचम भक्तिर्दपाः स्पात् । एकस्पापीर पोर्दानपपनभाषात्मशक्तिर्दयादै पनि स्पाइकरप स्पगुणगणवसासाचकश्पति सिदे ॥३॥ मिथ्यातापारममा प्रपमसमय एपाथरे हवमा स्पः पश्चारकर्मवर्ष प्रविसमसमपे वो परेवा यषित् । नम्यानां कर्मणामागमनमिति वदावे हि नानाभा स्पा दायस्पा स्पारस पा स्पितिमिति उपपर्यंतमेपो नयोभित् ॥en पखादी मेहमारी म परमिा रमीभ्यागमस्पैर इस रिस्पासिप पः । स्थितिरपि वर वारण हेतुः स एन ।

२६२
वामझममारणे
सर्वेयर कपायानपरमिह निदानानि कर्मागमस्प
पपस्यापीह धर्मस्मिविमविरिवि पापभिदानानि मावात् ।।५।।
सिदाः काम्मणपर्मणाः सपमिमा रागादिमा किस
सामानापरणाविकर्मपरिणाम मावि मीमस्य हि।
सांग मवि सुक्ष्मकासमनिर्थ तुस्पमदेशस्पिवाः
स्पारदम्पाभव एप एफसमय बन्ययान्वयः ॥६॥
प्रतिस्पित्पनुमागप्रदेशमेदाम्पतर्निपा पः।
मकपिपदेशमन्पो योगात्स्मा पायवापान्पो ॥ ७॥
युगपपोगकपापो पिकमपटकंपचिता स्पाताम् ।
पोऽपि पवर्मा स्पादेवमविनिपततिता भेदः ॥ ८॥
स्पागो भाराप्रपा मिनपरगदितः संपरो मापसंयो
मदमानारम स स्पास्तसमयपस्वारसम्पः कपचित् ।
मा भुटास्मीपसम्पः स्त्रसमपनपा निर्मग्र मावसंवा
नाना भेटानपा स्पाकरमपिगतः पापनाशप्रसिदः॥९॥
एका गदा हि मामा ननु कपमिति जीपस्प यात्मबोपा
दागाम्पः संबर: स्पारस इति स्वल सपा निर्मरा मारसका।
माषम्यपस्तवम्त पतिरिति यदि तमेव पकिईयो स्पा
स्र्पोपा हि कम म्पपमिा विगतेर गप्पेत नपं ॥१०॥
मामंगामाष गमति रमा पूर्वपदामिा मनम् ।
नाप्यागणनि नम्प पपा तथा गुदमाववस्वो दी ॥११॥
पिपिद्दमानामिनिस्सात्समापितापापि ।
फर्मागपननिरोपस्सलाम इम्पसबरा गीः ॥ १२॥

समतपनवपदार्थप्रतिपादकमतुप परिवेदः २६३ गुदादुपयोगादिर निश्चयतपसश्च सपमादेर्या । मसति पुरा पदं किस कर्मपा द्रम्पनिर्मरा गदिवा ॥ १३ ॥ पोलो मसित एव हि सयापि संमत्यवे ययाकि । पारम्परिभदादिपिपः स स्यात्समारप्पासः ॥ १४ ॥ सरोक्तष्टविदियोंपमती कत्मकर्मलपोतुः । सास मारमोक्षः कर्मक्षपना मिशुदिरय प स्यात् ।। १५ ।। परमसमापिपसादियोपावरणादिसकसफर्माणि । विधम्पो मिभीमपति स द्रम्पमोल श गीत ॥१६॥ देनकन गसेतकर्ममिचदिश्च देशवः सर । स्पाभिर्मरा पदार्यों मीलस्वौ सर्वसी योमिरिवि ॥१७॥ अममापर्युक्ता ये नीरा पुण्यं भत्यमेदाचे । सकौः पापं वद्रम्प दिवीयं च पौरासिकम् ।। १८ ॥ ये भीमा परमास्पपीपपटमा चास पिप निर्मलं नानाभ्यास्मपयोगभानु कषिर्त ट्रम्पादिमिंग स्फुटम् । मानन्ति ममिवेशच समयसतो यो पार्यतः भदया वे सदरप्रियता मावि निपपासंपावमाहा स्वत ॥ १९ ॥ मर्याभाषपसानपवन सिदा स्पर्प मानव स्वयममसिपादकाम अग्ग निप्पभस्मा किस । मो निशाः परमार्यत तिरिय सुमार्पपाम सतो मम्मे काम्पपिदं फव न पिदुपा दाममलन हि। इति श्रीमाप्यामकममार्तणमिधाने शाले स्मतत्तनबपदार्थप्रतिपा कमतर्प परिमोद । इति सम्यहमकमळमाण समाप्त ।

एतदधिकमपि उपलभ्यते मूलप्रतो
कम्माणं फसमेक (का) फज (एकी) णाणफममेक (मपमंकी)।
पैदयदि जीररासि (सी) पदणभाषेण तिमिण ॥१॥
सम्म स्वछ कम्मर्स पापरफार्य (पा)
तस्स (सात) जगुर्च (द)।
पारिपिदिकता (पाणिचमविता) माण विन्दति से मीनाता
तबाणेसण कास समय गुपदि शुचमम्गेण ।
प्पो मारााण समय पथरलो पणामी ममा ॥३॥
पर्यवि मसपपरी पूर्ण समाण सममीवाण ।
ससाण परमोण प माजी पजया समे॥४॥
पण्णादि (परिणमदि) भेण दमासे (वफास)
वं मयादि (सम्पयचि) पण्णवदि ()।
वमा पम्पो (म्म) परि)गदी मादा पम्मी मुगेसम्मो ॥ ५॥
मानार्मममृचिर्भवति ममि भूषा पुष्पपंपमापा ।
मानास्सौभाग्पमुषिपुसमतिपका मापिदार्पस्प सिदिः।
मानास्पीरिधिमा मपविनयगुणैानवो पुदियोगी
शानार्गस्पनाशसिदपविपद वानवा मुमसिदम् ।। १ ।।
दावि मदनबिर्मानस तापदेप
भ्रमपति वनुमार्मा प्रास्तापदेव ।
म्सयवि गुम्हष्णा राक्षसी वायदेव
फरवि हदि मिमोफी वाक्यमंत्रो न यावत् ॥ २॥

(२) शायो पारयितुं मसेन हुसफ पप्रेण सूर्यातपो नागन्तो निशिताशेन समदो दणेन गोगदमाः। प्पापिपमसंग्रौप रिविप्रप्रयोगैपिंप सवस्पोपपमस्ति शासपिहित मुर्खस्प नास्त्पापपं ।। ३ ।। शान मददपार तेनैव मापति तस्य को पेपः । अमृतं यस्य दिपायवे वस्प पिफिस्सा कय क्रियते ॥४॥ वप प्रशस्तिका वर्षे वेदाम्पिसिदीन्दु (१८४४) मिस अममे (1) भापणे मासि पर्ने रुप्म पसे हि पष्ठयां निनपिमलकरापार्श्वनापस्प गरे। वृन्दारत्या नगर्यो म्यसनारिनुपे भीमरेन्द्रादिकीति नाना भारफेन्द्री पुपपविमहिवाभु लिसंस्लाविमागरात् ॥ ९॥ मिनादिदासस्प विपश्चिताऽभ पुस्ताददाच लिपीरुवं मे भीमाचपाहानतया पादं यष्लेखित नदिपुरिशोच्यम् ॥ २॥ विपपिम्मत्रसमुष्ठास्याप्यपनार्य लिपीत मया ।

(२) सीक निम भिमापोचर मिश्चिमेतीम परमसमाधि २५ २५ २५१ २५. पसायो इम्बरमा । पर्पः परम्नुमात्र पूर्वनचारियमे पंचाचाराविप प्रारनियमनुभाग प्रधम्म मात्र विपर प्राविनि प्रोष प्रमाणात बहिरवण्याबम भाषा मानध मकानीपत मिन्चालायाम मुस्तामुनी मोमोहित एक मोहान्यामप्रोस पोहानाही २ ३ पृष्ठ श्लोक २५२ पानाम्यो PY तिमिनिमा २१म्दो बन्द समा २५९ या प्रकारेपः २५ ९दानस २५. | दा रेसमुकमा २५१ पराक्पात मम्माहि ११ देण्टसम्वभिता २४. प्रदेऽम् १५३ एममा मुक्ता सविभाष पवार सपी सच पुषा २५ साम्रो. २.५ अम्बगामात बपिपेष सातारी मिा प्रर्मचर्पा. मपि २४२ संमतपरेषा PY संपरपेषु २९ संवरेज प्रमित २१. पादपछि २५५ मेहम्बनामारे २५, सामवाने मन २५५ लामामुल्य २५८ | स्वांप्रमाण उपपपोपाय पाषा परमात्म पारम्प पाइम्पावत्तमिव

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यस्वामिचरिते- इतिकर्तभ्यतामूर पर्याइसितवतस । चिवपामास पिचे से मनदो ननादरः ॥ १७३ ॥ निास्पाप मायामि किया गृहामि संयमम् । इति संशयदोसायां पर्ण नास्यापि तन्मनः ॥ १७४ ॥ उदास्पावशिष्टं यतार्य रुत्वानया समम् । कांक्या दुसमान मोगान् संमामीति यपप्सितान् ॥ १७५ ॥ इदमा त म विचे पर्तते समनीपितम् । कस्पाने कपयाम्यप्र प्रीदयारतमानसः ॥ १७६ ॥ पदं पदं मनीशाना दुर्दर मातामपि । मस्मारमा पराकार दया कामरमंगः॥ १७७॥ अप प्रेम कीम्या गुरुवाक्पमसूक्षणात् । असे ज्येो मम माया मामूलग्नापरायणः ॥ १७८ ॥ विमृश्पीमयपक्षेऽपि स्यारुस्पषिश्चपवः । सभस्पः रुवपर्योऽसौ दीक्षामादामुपवः ॥ १७९ ॥ चिंतित न चिचे से समस्पेन पिमृत्यवा । गमिष्यामि पुनर्गेर ययाकालमतः परम् ।। १८० ॥ विमृश्पैवत्सण्या स ममदेवो नवाननः । अमादीन्मनिमविश्य यया पूर्वषिचपिवम् ॥ १८१ ॥ मने परोपकाराप पदकस महातप । पपि दीने रूप कस्पा देहि दीला स्पमाईतीम् ।। १८२ ॥ विशावो मुनिना पूर्ण सापपिडानपापा । गीपयमपि दुसमय सामिमायं दिनोचमः ।। १८३ ।। सविषादिया। मारा।

मारवमयसानकुमारस्यगगमनपणनम्
.
दीक्षामादानुफामाऽपि पिषत सामिलापवान् ।
निरागा भवितत्पस्मै दीक्षा दी मामुनि ॥ १८४ ॥
अपादापापि नयी दीक्षा सरममक्षस ।
दग्प स्मरानटनति इति गत्यमपाग्यत् ॥ १८५ ।।
मुग्पा सपूर्णतागण्या पूणन निमाननाम् ।
"प्पाम्यां पा दीना मृगामी तो मुमस्मराम् ॥ १८६ ।।
पनस्तनभरानम्रो काममा पसापराम् ।
मामृत पिरम्पाप्ता स्तियसी सासः ॥ १८७ ।।
पर बिनयतस्तम्यामममरिउन्नपारया ।
स्वाध्यायं पानमप्पतग्नानमामीसपा यनम् ॥१८॥
मयकदा स सोचमा गणी सयसमनिन ।
सिगरमागता भूया पदमानाभिए पुर ।। १८ ।।
पापापानमा स्पिना गरें"पि सपना ।
पापासगंण शार्प शदा पप्पानमिदप ।। १० ।।
पारणम्य हम प्यानादनप्राम पनाम स ।
पपदरगगिमी मापा र ममम ॥११॥
पर्यग्न्यपि पर मपिनानि प म गम्मर ।
भप समामि फांना मा मानपरा गावयम् ॥ १.२॥
मारपनमधमा री पामपापिर ।
पम्पीमिर पिना नाप मामृगे सिरागम् ॥ १० ॥
पिनपपिनि पागा प्रसार ग्रामपरिमन ।
गोपागाणा भानु मनामी पर्गिगनाम् ॥ १.४॥

Jambuswamicharitam

Author
Rajmall, Pandit
Title
Jambuswamicharitam
File name
Jambuswamicharitam
Text
OCR done
Citation
1936
Published
2011/08
Publisher
Bambai, New Bharat Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
304
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
DLI number
314104
Barcode
99999990312251.00
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Digital publisher
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