Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Anu Vart Ki Aur Bhag 1
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अणुव्रत की ओर
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प्राचार्य श्री सुससी एवस समारोह में प्रभिमन्दन में
अणुव्रत
की ओर
प्रथम माग
मार-य विना मन्दिर
पीकानर
भूमित्र
मुनि श्री मगराबनो
सम्पादक
मुनि श्री महेन्द्र कुमारमी 'प्रपम'
पप सम्पादक
श्री सोहनसाल माफरणा
पपर्मभी प्रमुखत समिति विस्ती
१९६१
आत्माराम एण्ड संस
दिस्सो, मयपुर० पालन्धर • मेरठ
ANOVUIT KI OR
by
Vani Bhn Mabondraber Pratham
RI
(ोन श्वापर वेरापंथी महासमा माता के सौगम्म से प्राप्त)
प्रामक
रामनान पूरी संचालक
मात्माराम एक सस
पारमारी मेट रिस्ती
माई हीरामेट पामगर
पौड़ा रास्ता अमपुर
बेगमपुन रोर मैप
योमेनमार मला
एयरा..
प्रथम स्मरण
मम मदिरा
रिल
COPYUQUT ATHA RAM A ROXB, DELIJ .
भूमिका मार सनपभम साईबार गप पूब भगवान् श्री महावीर न मागतयप + पूर्वी पचम स पाच प्रणुवों मा सम्पग रिया मा । गौतम बुद्ध ने मगमग उनी युम में और उसी प्रचत मे पंचमीमा माग दिया पा। सम्मम पूष म पसार भारतवर्ष की पश्चिमी सीमामो म ही मही टकराए अपिन, कानानरम पे समुद्रो पार भी पहुंच गए। भरवत-प्रान्दोलन सामोप मारमयप के पश्चिमी पंचम सरस्थान में महर्षि मूपन्य प्राचार्य पी गुप्तमी के मुख मे सटा पार रेप की मुविस्तृत सीमामों तक पहुंचा। पूब के मोपों म माना महावीर पीर मुरा का भी सन्देश परिचम म प्रतिम्मानित होकर पुन हमारे कानों में पानो उत्तर और रमिए के नोपों म मामा मालसर्प एमे पुग्पों को मा मेरा करता रहा है को गिती हुई ममार की पूरी को धारण करक रसत है। माम्दोमन के साथ सबका मनस्व गा। उसकी पर्चा मोगीयों म पनी पौरतोसमा तमा बिमान समानों में चमी । रमे पनता का सहयोग मिमा पौर जमनेवायों का भी। पेस के प्रामीण दम पोर ममि हए तो या के विपारक पौर साहिबार भी। पान्दोनम की प्रन्तिम परीक्षा बुषिजीपी मोपों म हुई पौर यह यहाँ बरा उतरा। 'मरगुबत की पोर' पान्दोमन का पाप प्रतिबिम्ब नहीं कर सके अन्तर का प्रतिदिऐमे मेलकों सी पपिनी में माषिभूव हुपा है जिनकी पनी प्टिम को मेबार अन्तर को पाग करने में मम है। प्रगुत-पादासन एक रिचार भन्नि है । यह प्रस्पा निमाग का माविम विचारों में देखता है। बिमा १२ वर्षों में प्रग्गुबत-पामोनन ने इन में क्या दिया यह किसी मौतिक बरस में मी मा पा मकला पोर नया सोल-माप मस्पा का विषय ही बन ममता है। यह प्रमूर्न निर्याग । यो कोटिकाटिनामों के मन में प्रमग इपा है । यह विचार-निर्माण गर्मप में परिणत भी टिमोपर हो रहा है। मंतिम्ला गद प्रसासन में पापा है पिच कम्ममा रहा है योगना पायर्याय में माया है तबमरौं पौर मागारो और रचनारमा सस्थागों में पा रहा है। नैतिकता घमको चामे याने में परसुवा-माम्दोमन देश में प्रपना निरूपम स्थाम रखता है। ऐसे पमियाम की हेम में पमिमार्य प्रपेशा बी पो म मविर मम्पुरम कोही अपना ऐप बमार पामे बर। प्रसार-पान्दोमन न इस प्रोमा को पर्याप्त रूप से पूरा । मुनि महेनमारगी प्रथम में प्री गिधार मुश्वानो को एक मूत्र में पिरोपर एक बहसम्म हार बना दिया है। विचार एकसमापी सम्पत्ति होते है। उन्हे मंजोकर रिमी मुरमित मजूपा में रस रिया आता है तो मे गुप-युप के मिए प्रेरणा दीप हो जाता है। मुनि महेन्दमारगी ने मणुगत पान्दोमन प्रचार प्रमार मे बहन सारे मौसिक कार्य किये है। साहित्य में भी पापोतम पो मान्यता विमान म उनी मृमाम पीर ग्नमा भम अपूर्ण है। एक मुम मा या माहित्पाराको पान्दोलन में साम्प्रदायिक याप पातीपीठेर पार प्रभाव नही मयता पा। भूमि मरेग्नपारजी ने प्रान्ति की इस दुर्मेच रोगार कोटाम मिा सारिपसारो परकारी हवा प्राम्य विचारों में मस्तिष राण मापा । परम विस्तृत वर्मा की। उनकी पानामा का मुग्गिम्य समापान दिपा पार उन प्राोनन के प्रति प्रमाणित पिया । सिमी पयपुर सस ससनक पौरपमरना उनके गर्यक्षेत्र दे। अपने पाप में समनि पूप, पापा और पीरा भी परवाही। दरखाने मरवान पर पूमकर जन-मम्परा जो उगान मार्म पपनाया हसर्पमा नगीन और रन पारम मामा परिपायक पा। पारपरि तिरस्कारका समय में समझ माने पामा मपि ममें सफल हो साता। उनकी योग्यता पपा कार्य-निष्टा को रेपर मनीं मीप अग हाने । एक गर ये मन-पिरले गुप्रमिय रिपार और साहित्यकार श्री जनेमारली पर पाप। नेयमारवी ने प्रथा--पार पार नितम मापारों में प्राता महामुनि पोमारगी न मि मा म ना पिा-पापा नम्बर माना।
. मैनेतामारणी मे बहा-मापकी पार्यक्षमता के प्रति भरे मन में होती है। काम ! मैं भी एसा पर्मण्य होता। एस ही एक प्रसग पर काका कामेनकर मे कहा-पाप मेरे घर पर पाए इसम मन सापुपों के प्रति मेरी मदा नदी । मेरा अब तक का अनुभम यही पाकिम सापु समको अपने यहाँ ही गुमाकर गुम होते हैं। प्रस्तु, उनके पक्विा सम्पर्क के कटु पौर मपुर संस्मरों का एक नम्बा पौरा है और किसी दिन यह प्रणुप्रत इतिहास का एर प्ररणार पप्पाम बनपा । तदनन्तर मुमि मोहनमानजी 'साम' पारि पौर भी पनेको मुनियों मे इस क्षेत्र में कार्य किया और कर रहे है। इस कार्य पसी का परिणाम मा कि प्ररणवत्त-भान्दोमन बहुत पीपदी रेप के मुग्गिीवी मोर्मों की मेखिनी और वाणी का विषय बमा । पिचमे मो मुभि महेमकुमारवी प्रबम' हस्तलिखित 'बय ग्मोसि' पत्रिका का कमान्मर ग स सम्पायन करते रहे हैं। उन्होंने दो मणुवन विशाक भी निकासे । 'अणुवत की पोर' में अधिकांश मेखक ही है वो उक्त वियपाकों मे लिए पए है तथा कुछ भम्प भी। दुम मिमाकर , नियमों का यह संकसन प्रणवत साहित्य में धीवर्ष पोर बन-मानस के पि एक मैतिक पापेय होमा ऐमी प्रामा है। २८ पून १ } -मुनि नगरान
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सम्पादकीय माहिम मनुष्य की निरुपम सम्पत्ति है। साहित्य ही भूत को बतमा स मोर यतमानको भविष्य से बोड़ता है। सहयों वर्ष पूर्व ममुप्प ने मो मोचा पार के मनुष्य को विरासत मेस में मिमता है और पार मनुप्म यो मापता है यह साहित्य के माध्यम से माने पानी पारी की विरासत बनता है। एक युम बाह भी पा पर मनुष्य लिबरे का प्रारी नहीं पा । मुसस्प परम्परा मही अपना मान प्रबसी पीड़ी को रेसा पा। माहिम की यह पारा नाना को म हर एक युग में बम्पी हो रही है और मनुप्प इससे उपाव होता ही रहा है। पापत मान्योमन एक तिक-प्रबाह है। रक्त का संचार से हर एम. समान में प्राणायक होता है नैतिकता का मंचार भी जीवन के हर म्पबमाय मोर मुग के पार चरण में प्रपेक्षित है । साहित्य ही उम मैतिक विपुत् का माफ तत्व है। 'भमुमत की भोर' से मोगों को नैतिक प्रेरणाएं ही नहीं मिलेंगी का एक युग की स्थिति का गौरा भी मुम-युग में देवा पेगा। चिन्तन पौर मनन की प्टि में भी उससे पाठकों को बहुत मामापी उपमम्म होगी। प्रस्षत साहित्य परवा पर्याप्त ममुरा हो चुका है। प्रनों विवेचनामा पृतने प्रकार में मा पुगी पर बह संकलन अपने प्रकार का है। एकाति में रेम पनेकानेक विचारों के विचार इसकी प्रपनी पिपता है। प्रणुपर्छ पर पब तक रस्म में बिना सिखा गया इसमप्र इस काम में नहीं पा सका है। जिन् मुनिजनों में मैडम में रितना लिया है उमझा बता संकमा कामों में प्राने मोम्प है। इसर पिवानों ने पो पर तक निमा उसमें से भी प्रस्तुत संकान में हुने हए लेखी मिए पा सके। कुछ एक बातामों क मापों को भी सेन्हाव करमेनोपप दे दिया गया है ताकि सर्वसाधारण के लिए उनके प्रणुपत सम्बन्धी विचार सरा सुनम पस। 'अनुमत्त की पोर' के मेक केवल मापा-दुधि से ही नही मिले गएं ।
- उनमे तनस्पी चिन्तन भी प्रस्तुत पिमा पया है। ऐसा मगता है माचार्य श्री तुमसी का हमार्प उपरेप पब एक समारबर्मन का म्प ने हार एक रन की गगम भाषा मी तो यही है कि पहले वह मार्प परेशो केस में मोपाही बना पार तत्तापाप तापी ममीपियों के पिम्तन का विषय होकर रन बना । बहुत सारे सेय विचार सामग्री की रि से भी मन है । शिवानी महरि माये परतपादोलन के पहनों पर प्रकार गमते हए अपमा पभिमत मत करते नीमन पुगि १ कार्य में मुराव से पाएं हमारे सामने पाती-विचारों की मनुसरतासकारीमता पौर प्रभारी प्रबसता पा प्राममणीतला में दोनों परम्पपए सरा से बनी मापी बोबीवन-पर को प्रास्त नहीं बनने देती। हमारे प्राचीन इपियो र एक ऐसा विचार रखाकमा सारिपार (नारे दबस में बारित हुए है हमारे पाचरण म मा किन्तु हमने उसका विपरीत पर पह ममाया दियो सपिचार हमें मिमे दूसरे को नहीं देने चाहिए । एकपायाम रिचा म पारंगत स्पषित मपनी विधा दूसरे को नहीं बतलासा पाई उसक प्रपसान के साथ उसकी पिया मी पो म आमाप्ती गाए । रस तरह हमारे समार में मार मार विणा संकोच हवा मया । पपपाति पामित च-मीच की मेड पाममा भी विचार अनुसरता को बस पहुंचाती रही। मम्पश्यता का नाम भीप पातक नही पा । इस उप पिचारों की कोर पौमता के कारण भीषम गुपि का मार्प मगर होता गया। दूसरा रिपार पापारय मार्गनिकों ने हमारे सामने यह रमाइममे भी मर्पिपार पाउनमा पविभाषिक रिम्नार करना चाहिए । मित जीवन में उरें पारित कर हो प्रसारित मा पाहिए पह पाप ग्रहोंने पही लाभानीर-दपन पा जीरन-नूप पाो पापार प्रबमा मर्म रहा हो पारपारप रागनिकजीवन-सामने सामने परमपमे । इमोहपा माथि NिIC मार का बस मिता फितु प्रापार पनमगोर और गौण बमना गया। इम तराहा निवामों के प्रसार पी जबरदस्ती भी रही। कहाप में पाप पौर दूसर हाप में मस्त की यहाँ स्थिति बनी बस विपार-प्रसार या पात्रहही प्रमुख था। प्रमुखत-पान्दोलन के बारे में घर में सावता हूँ तो य दोनों मापाएं वहाँ मगर नहीं पाती है। साम्प्रदायिक प्रापहमही महीं है इसलिए विधार-पनुवारता को स्पाम नहीं मिलता। विचारों को जीवन में उतारने का और भाषमा-प्रसार हरप-परिवर्तन का सिद्धान्त प्रपमावा बाता है इससे उसमें प्राचार-प्रभाव पीर माक्रममपीलता का भार पनप नहीं पाता । ये दोनों पाम्दोमन सर्वोपरि मेष्ठ पहन बो इसके विकास का मेगा कित करते है। प्रसिय विचारस भी मैनेन्द्रकुमार मणुव्रत-मान्दोनम की उर्वस्विता म्पक्त करते हुए मिबसे ।-प्रणवत यानी बस का प्रारम्भ । यह कोई ऐसा पावर्ध नहीं है बिसे अभ्यबहारी कहकर टाम पिया बाए । सारा म्पबहार इसके मात्र टिक सकता है बल्कि देनेमे कि म्परहार उससे पुष्ट बनता।बोबन बन्द नहीं होता प्रस्तुत म्पपस्थित होता है । पम्तर-बियेप यह मनुध नहीं है जो हमारी जीवन बेतना को क्षत-विक्षत करता होगह वो उस्टे पैतम्म को स्वस्म परता है। यह कमी प्राण वेग को कुष्ठिन करने बामा मही बनता है बल्कि यह उसे तर्गत करता है। राष्ट्रपति ग राम्रप्रसाद पान्दोमन प्रारम्भ से ही उसके प्रत्येक कार्य क्रम में गहरी समिचि मेवे रहे हैं। उन्होंने प्रान्पोमन को व्यक्तिगत जीवन से मम्मुर्राष्ट्रीय म्पबहार तर मावश्यक व भारतीय संस्कृति से अनुप्राणित माना है। से एक स्माम पर मिसते-मही कारण है कि पिचारपीम मोग पर बीवन के पाप्मारिमक पहलू पर विचार करने का प्रापहरहे । बिससे शानिक प्रगति के साप-साप मानष पाप्मास्मिक तत्वों को भी अपने दैनिक जीवन में मौर अन्तर्राष्ट्रीय म्पबहार में प्रहण करने का प्रयत्न करे । इसी गाय की प्राप्ति के लिए प्रयुक्त-मान्दोमन इस दिशा में कार्यों से प्रशंसनीय कार्य कर या है। इसके लिए पारोमन के मेता प्राचार्म मी तुमसी का दूसरे सपस्पमण यमाई के पात्र है। पणुप्रत-पायोमन भगवान महावीर मौर मम्म बैन मुनियों तप' मारतीय सम्तों के प्रारों से अनुमारिसत हुमा है इसलिए पाशेलन के प्रयार तमा एसके प्रापर्ण भारतीय सांस्कृतिक परम्परा से सपा मनाम है और उस समझने प्रपा ससके पालन करने में हमारे लिए प्राधिक कठिनाई नही होनी पाहिए। बननेता भी जयप्रकापनारायण की माम्पता कि भूगान प्रौर मणुगत माम्दोलन की प्रवृत्तिपा एसी वो इय-परिवर्तन हारा पहिमा समान की गर रचना में प्रसर हो रही है जिसे कायम करने के लिए म मारिष प्राय प्रसफर ही दरीस पाते है। पी पयप्रमपमारायण का यह मुरा अभिमत है कि हमारे पारर्म पी मोर बहन के लिए पाचार्य तुमसी म बहुत मुबर पर्यश्म रखा है। योजना मागोम के सदस्य श्रीमन्नारायण प्रामोसनकी गतिविधियों में बहुत रस मेते हे। इम पाम्बोमन मे गन प्रामावादी है और समावणारी समारम्यवस्था की रचना में इमे सहायक मामते है। ये मिलते 1-प्रारम-विस्वास समाई साप मंतिक नियर्मों का पामन र पाने मुट्ठी भर प्पपित भी सामाजिक वातावरण को प्रभावित किया बिना मही प सरते । काप की मुख्ता कारण प्राप पवाय ही मेगा पार जम जनमा जीवन इतमा प्रमागमान हो उठेना कि विश्वमर को इसकी पमुभूति हुए बिना नहीं रहेगी । इम मान्दोमन म पूरा परिषय भार ममे ही प्रमिक मोनों कोन हो परन्तु मगर रेग में भोरे भी मुस प्ररपुबती हुए तो रंग की उम्नति मावस्यमापी है। परबत-पादोतन मानव-मस्तिकमी उपर मही। बस्कि यह सबरीय रेन । मुझ प निवास है कि अणुवत-पारोमन मोर्चा के मैतिक स्तर को मा रखने में सफल होया मोर ठोम मीर पर गमापारी समारनगरमा पी रचमा में सहायक बन सकेमा। में भागा कला रियर पामोमन किन प्रतिक्रिन जीपमता यायेगा। पवियर पौवामापण गर्मा 'नवीन पाम्दोमन को गरमी से पूर्व भारत इप्टारों द्वारा उपरिष्ट तत्वदी पमिनर मात्ति मानते हुए मितने :-शुनि पर प्राचार्य श्री तुननी द्वारा प्रागम णि मया भाषा पान्दोवन हमारे देश के नैतिक पुनरग्गीयन की रिशा में एक मंपतमर एवं पापरयक परण निक्षेप है। माखरप के प्यों ने सहसों वर्ष पूर्व मानव समान के उत्ताना उसके मैतिक विलास का जो तत्व युरियम हदयंगम एवं पापरसंयम कर लिया पा उमी सनातन तत्व की भभिनव भासि यह पान्दोसन है। प्रस्तुत पुस्तक प्रणुव्रत-पान्योतन के इतिहास उसकी पार्यनिक पृष्ठभूमि नबीन समान-रचना में उपयोगिता पावि विविष पहसुपों पर प्रकाप गतती है। मेरा पनुमान बा कि उपसम्म सामग्री एक ही पाकार में समा गायेगी पर उसको बहुमता ने ऐसा होने नही दिया। इस संग्रह को दो भागों में विममत करना पड़ा। प्राचार्य भी तुलसी को मुर केस में पाकर वो मैं कतहरयाही निस्तु मेरे लिए या भी पीरखास्पद है कि मुझे मुनि मी मगरागजी का सवत मार्म-वर्षम मिलता रहा है । मुनि श्री पाम्दोलन के विचार और कालबोनों पों + विकास में पार्निश यलमीस रहे है। माम्दोतन की प्रत्येक रिसा में मका मूस्वमान् गोग रहा है। प्रस्तुत उपक्रम भी उनके मार्म-वर्षन का है सुपरिणाम है। २५ १ परेषन्दन स्मृति भवन नयावागार, रिस्सी } --मनि महेन्द्रामार 'प्रथम' अनुक्रम २ गुनत भारतीय मामि प्रयोग -~णपति रामसार पार पौरमपुत --भीमप्रकापमापयाम एपिराप ! एक म्योति पीस.म.रेवर वालाचीन कामाम्पस मनुष्य एकरीन प्रो.भीमनारायण मदम्प पोरना भायोग मामोहन बफ पहन -श्री पियासी महिये सारा-पारोमन -ग.मिरप्रसाद एम.ए.ग. मिर प्रम्पप इविहास विधान दिल्ली विपरिधान बातीतेपातीबते -मीनकुमार मनुरत भाव-पस्तिकातील --परिपरीको मम्पारक भबमारतराईमा, पम्बई शाहपापा और प्रभात ---श्री रामसेबर पीबाप्पण म.मम्मारक मापार गम्मिमा भामराम की माता का प्रमोप पाय -स्वामी श्री प्रेमपुरमी नको रेखाएं -पी विधानात मंगवाम विधपनी बप्य प्रदेश भाभीर प्रप्तार -भीमागरम सागातीनामपर भरान २० १८ प्रमोशन की प्रावश्यता --श्री गोपीनाप 'प्रमन प्रम्यम बन सम्पर्क समिति दिस्सी प्परित का पुख-विकास और सामाजिक सम्मति - रविकर शर्मा Anा की पोर महान् मम -थीमारियाम मैन परिस्थिति का तकाबा -पी सक्ष्मीनारायण मारतीय प्रवत-पापोलन की पृष्ठभूमि -पीपमित्र मनुव्रत-पालोमन -कवियर भी बालापा सर्मा 'नबीन' अनुक्त प्रौर सांस्कृतिक पलयन –धी नेमकुमार मनुव्रत और नैतिक पुनमचान -मी पिप्णु प्रभाकर अपुरत-भाग्योसन : एक सम्पपन -श्री रामपोपास विधामकार तत्कामीन सम्पारक नपभारत टाइम्स अपनी और पानी का प्रतीक-प्रगुबत-पायोतन -पी मातापीन भपरिया सम्पारक हिन्दी टाइम्स प्रत्रत प्रौर -सूमी सुपारानी मोहिनी एक महत्वपूर्ण प्रान्दोलन -पी किरमान बर्मा तत्कालीन सह सम्पारक हिनुस्वान सामाधिक प्रति में प्रतों का महत्व -श्री हरिमाऊ उपाध्याय वित्तमंत्री राजस्थान प्रमुवत समाम्माधिका प्रायोतन भी पोमालाल गुप्त सह सम्पादन हिन्दुस्तान मनात मारम विद्यालय का मुख्य कार -श्री श्यामप्रकासपीक्षित सम्पादक समान मपरित का संहारक म प्रौर प्रमुखत -भी सरपरेप पिचामकार ७१ ८७ .
प्रमुखत राम
--श्री यसपान न or
सम्पास बीवन साहित्य
हमारे यो भनुपौर प्रवा-मामीमन -श्री मुद्राराक्षत ११२
सम्पारक प्रयुक्त
मास-माग्दोलनमोप -पीमती रमिता माप एम. ए.
भारतीय प्रहति भौर प्रणात
-~-पी प्रमाण माती एम ए.बी.टी. १२४
-~-प्रो. धीमती निवेशौसिंह एम. ए. १२८
प्रत एकाधि
मणुक्त भारतीय सस्कृति का प्रतीक -राप्पति ग• रानप्रसार मानव-समार की स्थिति ऐसी गंगामेस स्यों हो कि मैत्री बंप सहन पौर स्पामायिक माष पर बोर देने की बात परे। किन्तु इम एभर मौर कटु सत्य से हम प्रति नहीं मीच सकते कि समाज और संसार की स्पिति मास्सम में ऐसी है कि समाज के विभिन्न प्रगों और राष्ट्रों के मीप मैत्री का मारा गाना मायापक पान पड़ता है। इस बात को देखकर पार भी देर होता कि पचपि कई शताब्दियों से मानव-समान विज्ञान की उन्नति और भौतिक साधनों के विकास के कारण काफी भामे वा चुका है। दुर्भाग्य से यह भौतिक प्रगति एकांगी ही क्योकि मानव उसी गति से पीवन के प्राम्यास्मिक पम की उन्नति महीं कर पाया है। यही नही इम यह भी कह सकते है कि कुछ समय से पाम्मास्मिक तत्वों की मबहेलना हुई है। जानिक प्राविकारों के बहुत भामे या गाने से मानब म प्राति के सापों पर पतमा पधिकार कर दिया है कि विभिन्न प्रकार के विनासकारी सस्थास्क उसके हाथ मग गये है। चिन्ता का वालानिक कारण यही है कि यपि राष्ट्रों में पारस्परिक मनमुटाव बना हा प्रौर युर के कारणों को दूर कर स्पायी शान्ति की स्पापना नहीं की पा सकी तो मानी पुरा इतना भयंकर होमा कि उससे मानव-समार का अस्तित्व मौर पामुनिक सम्पता दोनों ही संकट में पापापेंगे। यही कारण है कि पिचारमीम मोम प्रब बीवन के प्राप्यारिमक पहम् पर विचार करने का मारह कर हे पिससे पेशानिक प्रपति के साग-साप मानम प्राम्मारिमक तत्वों को भी अपने दैनिक जीवन में पौर प्रतीय म्पपहार में पहस करने का प्रयत्न परे। इसी चस्म की प्राप्ति के लिए अणुवत प्राबोमन १ मातीमोर , व रिसा में माँ से प्रसनीय कार्य कर पा है। इसके लिए पाम्दोमन नेता पाचार्य यी दुतधी तवा दूसरे सरस्पपण बाई के पार है। पपुरत- पाम्दोमन भगवान् महापौर और अन्य जैन मुनियों द्वमा मातीम सों के पारों से अनुमालितहमा है, इसलिए मान्दोमा के प्रयाय नपा पसरे पार्स मारतीम सासतिक परम्परा के मर्ममा अनुम पार से समझा पारा सो पातमरने में हमारे लिए पथिक कठिनाई नहीं होनी चाहिए। मा पौभाम्प का मिपम कि इस विचारणाराको गतेरे विरेपी मोप मी स्वीकार करम है। सभी नोप मास्वीकार करते है कि संधार की सबसे मही भाषश्यामा लामो पान्ति की स्थापना है। यह गाय भी प्राप्त किया पा सकता है पाकि प्रत्येक पक्ति, पाहेपपिसी भी पद का कामरिसे पौर किमी भी पर्म का अनुपामो हो अपने मन में दूसरे के प्रति मंत्री की भावना का संचार करे और उपके पनुसार निकपीमा में भाषरण करे । दृष्टि से रेपा मापे तो यह मारना पड़ेगा कि इस महानु मपास में छोटे से छोटे और मो से बोले मक्ति का सहोम भूस्थयात राम र मोन मानव समाज के हास्प है पौरव समय हमें इधरों की चिन्ता र पपने अपने पामार पौर पबहार को उन्नत करने की भोर प्यान देना चाहिए। इसमें म्पक्ति और समष्टि दोनों का हित सन्निहित है। पिपायों में मानार्म पी तुलसी के कगार पर्सन मुझे प्राप्त हुए मोर मरे परम मुमने कर पार को बाब मानापम मुझे मार मिता, पता मेरे परमा प्रभाव पाक प्रणुषक-पान्दोमन का प्रपर्वत परम पार उस काम को बनाने के लिए अपना समय पार भाषाम भी तुमसी रेप के लिए क्याम्पसमबरमा को समरिनामकोई प्पत्ति और मकोई रेप रमति कर सकता है पर पिरोपर ऐसे समय में परम सत्यता प्राप्त कर अपना पर स्वयं सम्मासने मग म । ती भाषा और भनिभाता और भी भाषिको पाली ममिए पापड माम्दोलनमा प्रवर्तन एक महत्वपूर्ण काम हुपा । पोर में पाया या मह मिथिरिन पारा यावा मापा ममे पी भपिक प्रतिक प्रात मातीय सहतिका प्रतीक साप बढ़ता ही बावेगा। या सन्तोष की बात है कि प्राचार्यगी कास और रेस की परिस्पिति को हमेशा सामने रखकर कार्यक्रम निर्धारित करते है और पो भिन्न-भिन्न मेसी के मोम । जिनकी भिन्न-भिन्न समस्याए होती है उन सबमें पुसकर भिम्न-भिन्न रीति से संगठित स से समाचार पौर चरित्र को प्रोत्साहन देने का काम किया पा रहा है। यह काम तो धर्मपुरुषों का ही हमेशा से पा है और पार भी है। बिना प्रघर मर्माचार्यों का चाहे किसी भी धर्म प्रपया पंप के क्यों नहीं हों; नोर्गों पर परता है, सतना दूसरों का नहीं। पान की स्थिति में यह मत्पन्त पावरपक पार महत्त्वपूर्स काम हो रहा है, जिसकी सफलता प्रत्येक विचारधीसम्पक्ति चाहता ऐसा । में यह पाया करता हूं कि यह प्रयास पब म्पक्ति की मुभकामनामा और मैत्रीपूर्न भावनामों से पुष्ट होकर मानव-समान के लिए फस्याणकारी प्रभाष का सपारण करेगा। मैं पौर पपिक करने की मावश्यकता नही सममता, पर्योकि बात बहुत सरम है मार कहने-सुनने की अपेमा विश्वास करने पौर बीवन में उतारने की पधिक है। मैं इस पालोमन की सफलता की कामना करता हूं और मेरी या प्रार्थना कि संसार के समीण भार मानव-समार के सभी प्रेम इस समावना से प्रेरित हों और पान्ति स्पापना में योगगन रें।
२ पहिसक समापना के लिए भूदान प्रौर प्रणुव्रत --श्री चयनकामनारामल हम भारतीयों के सम्मुख बहुत-मी पारिवारिक समस्याएं है मेकिन उनसे बार सामाजिक पौर राष्ट्रीय भी है। हमें संगर्स स्माई से बाहर निकल कर समान-हित पा चिन्तन करना चाहिए। समान से बाहर हम मोपो के पीपन का कुछ भी अस्तित्व नहीं है। बाहर गो कृष होता है उसका असर हमारे पर भी म्पूनापिक मात्रा में पड़ता है। संकीर्ण गृति को घोड़कर म्यापक वृत्ति को अपनाना हमारा प्रमुस कसम्म हो पाता है। अगर हम अपना एप्टिकोण पापक मही रसमे तो राष्ट्र की कुछ ऐसी महत्वपूर्ण पटनाएं, पो पटित हो सकती। हमारा प्रस्तित्व परस्म मिय गौ। संकीर्ण स्मार्प के प्रतिरोप में ससार के कोने-कोने में ग्रिोहात्मक घटनाएं पटी है जिनका परिणाम पुरा हो रहा है। पर समय पा पया है कि म्यापारी वर्ग सिर्फ मनायन ही अपना परम धर्म या पाम्प म बमा । उसे सोचना चाहिए कि व्यापार पोठि के साप-पाप समान में गाम्ति की मी अभिवृरिहो । प्रपन स्वार्थ या साम के मामे समार का हित महीं भूसना चाहिए। व्यापार ा ताप पन 'पौर पस्नुपी के विनिमय दारा सिर्फ पपने स्मार्प और मायापरवा की पूर्ति नहीं, बलि सारे समार की समुषित पारयाता की सम्पूर्ति होना चाहिए। भान पापार में पो पनतिगता अपनाई पासी है मौर पहना कि बिना मूठ बोम म्पापार पप्त हीमही सावा दिमाम निरापार और पबमाय पो पम्माहारिफरप्टि ऐ समु. लियर मा है। हम अपने को वामिरहो, पर पर्यावरण मे विमरम दर इते है । पिसी भी पर्म में पमरप पोपम्म हिमा परमोहन पारिको उम्प ४ मुबान पोर प्रबुद्धत स्वाम नहीं सभी की इष्टि में ये सब इस है। बितने पार्मिक सम्प्रदाय है उनके पीधे एप ही भावना है-पानद एक का नहीं सपका । सम्प्रदार्यों की अपनी भाषाएं विपार एवं पर प्रयास भिन्न भिन्न है पर बनसामारण के हित मी मापना सब प्रेष्ठठम उपदेशित है। पर प्राग हम प्रपने इस परम उपाय को भूत गये हैं और पोषण तथा संग्रह को सब कुछ मान बैठे है । इसी परिस्थिति में ही मिनोवा ने पम्यारम के भूम सिमान्तों पर प्राधारित अपनी मन्ति का श्रीगणेश किया है। उनकी शान्ति सत्याग्रह प्रेम पोर इएम-परिवर्तन की है। स्म पीर रस की प्रान्तियों के समाम हिंसा और रफा-रमित नहीं क्योंकि हरप-परिवर्तन के बवाम चक्ति के बल से पिसे हुए परिवर्तनों के कारण कोई स्थायित्व नहीं है पौर भसमामता परत पता मादि भी ग्यों की त्यों मौजूद है। पार हमारे लिए मह सौभाग्य की बात है कि माचार्य विनोबा भावे एवं पापा तुमसी सी विम्य विभूतियां हमारा पप प्रम कर रही है। पोनों महापुरप मानरमा क प्रतिष्ठापन द्वारा समता सहिष्णुता समापित करना चाहते है तपा पोषण का भन्न पाहते हैं। भूवान पौर भग्गुबत-मान्योनन की प्रवृत्तियां ऐसी है पो हपय परिवर्तन द्वारा पीसक समाग की नब रचना में प्रप्रसर हो रही है जिसे कायम करने के लिए इस पापि प प्रायः प्रसफम ही पीस पड़ते हैं। अपने पेट की निर्मनता देखने से पता बसता है कि कितना प्रसीम एर समाज में व्याप्त है। निर्मनों के साथ कितना अमाप हो रहा है। इन्हीं मन्पार्यो एवं पोपणों के कारण ही सोपित वर्ग के कुछ नबोरित भेवा एक्स-रवित कान्ति की एम्बुमि बगाने तमा सोपों को मन महीन एवं उनकी प्रवृत्तियो समूम मष्ट कर देने के लिए मोर्गों को पालाम कर ऐ है। प्रयुक्त पान्दोलन मी सरिय पावोमन का एक सहयोगी ही है। इससे भी देश-विदेश के प्रायः सभी विचारक पौर नेता परिचित हो ही मये है। हमारे प्रारम् की भोर पाने के लिए प्राचार्य तुमसी ने बहुत सुन्दर क्रम रखा है। बिनोवाणी पौर वृतधीची समी पाति और मर्ग के लिए है, रो! सरका भमा पाहते हैं। पापाप तुमसीबी से बम्बई में पार्वामाप करने पर उनके उज गोंदी ममक मिती । उनका माना है कि जब सारी हिंसक पक्तियां माती मोर एकत्रित हो सकती है, तब पहिंसा पक्तियां की एक ही साली।पौर सबके सामूहिक प्रयास पौर मयल से प्रबस ही हिंसक समार की प्रपना पूर्य हो सकेगी। सपो मिमका काम करने में सीघ्र सफलता मिसेसरी। हमारे सामने यह प्रश्न प्रयास हो पाता है कि किस पति केशारामा हिव हो सकता है, सोपण मिट सस्ता है? क्या प्ररभर पोरस को मिटा सकती है? नहीं, शिसम भसम्भय है । यह मनवा र रुकती है। पनुष की पान्तरिक शक्ति के रामा कार्य पूरा हो सकता है। विमान हाय मोरय पसम्भव है। पैसा कि पाचार्य तुमसीहा कि पति-पक्ति से समा परिवर्तन होपा मोर पर सम्पत्ति नहीं सुदरेगा तब तक महीं होगा। ध्यान से पाबारे तो भी इस बासा में कितना समय पर है। समार का मम बस्तिही है। म्यक्ति से समुदाय समुराप से समार का रूप सामने माता समान यो प्रतिविम्ब सा मनुप पेपा सर समार बनेगा और फिर पैसा छमार बना रहेगा सा-बैठा परिजन पनुप्यों में भी माता वेगा । प्रस्तु, सर्वप्रथम प्यक्ति-सुपार पर बोर ला दिए। मापार्य तुमसी यह भी मानक समय-सफ्नी पारम-डिरें। या पार पच्चाप्रपर बसत पारम-पदिकरतो आन्ति की परा पावरपया महात्मा पानी भी समार-मुबार पर व्यक्ति मुधार पर पोर रे ये साम्पमारी मारि शान्तियां पाए सूमार की पोता। माता मान्तरिक मार नहीं पा र कम नहीं हुया राम सुगार तो माणिक पौर सामविक मनायेया। गमावरिश पर समान भारत नामपर हम पान्तरिक घुमार को प्रापमिया महीले तो हमारा मार्य माहीपणापास अमेरिका स पाविस मार भी पर मानता परपन्ना, पहियता प्रवृत्तीला पुंगीवारिता प्राविपिपी मानिसी प में मार दियमान है। विधारस्यातायरी पार भी सरियामा एक वप से अमिषापार का बोलबाला हो है। शनिक पधमाना पाई। यस्तु सक्ति मोर पंसा पर भागतिरोष पनि ही ए हो एमाहाभारिपन F" - मूराम प्रौर प्रबन चाहिए कि उक्त देशों के समान वृदिन माने से बचाने समा समाज में सबस पुषस न पाने देने के लिए उचित मात्रा में स्याम पौर निस्वार्थ भावना को बीपन में उतारें। महारमानी ने मी म्पक्ति को केन्द्र मानकर उसने सुपार पर भोर दिया है मौर रावतल के स्पान पर मोकतन्त्रको स्थापित करने की प्रपनी नक सूझ दी है। राजनीति पौर कानून की वर्षा विष्ठप हुप्रा करती है। मानार्य भी तुमसी तो राजनीति पर कानून की एसे धयों में मालोचना करते है। ये कहते है किया कामून किसी स्मार्मी को निस्वार्थी मा पर-स्थाी बना सकता है? कानून एक दिवामात्र है। इसलिए परनीति और कानून के परे माचार्य बिनोमा पार पाचार्य तुमसी के मार्म का अनुसरण करना चाहिए । मिस मन्ति से पौर विचारों में परिवर्तन नहीं प्रामा मह कान्ति नही। हिंसा पर पामारित पनि सय परिवर्तन भी सम्भव नहीं। उसके मिए तो प्रेम और सदभावना का सहारा लेना होगा। क्रान्ति कोई महीं। मर-मर समाज में सिविमाचार हुमा तब-तब परवारों एवं महापु हाप विचारों में व्यन्ति ताई मई। पर्म पौर नीति में से प्रबर्म पौर पनाति को निकाल फेंका गया। समाज का सुपार किया गया । धर्म प्रार मीति समाज + मनुस्म बनाई पई। समान में एक नया विपर्यय हुमा । पार्मिक सांसारिक और सामायिक जीवन के बीच की दीवार तोड़ी गई। महात्मा गांधी विनोबा भाने पोर मानार्म तुमसी मी ऐपी ही मप्यात्मनिष्ठ अन्ति की स भोपणा लिए है । मनावस्यक एवं समाज हित के लिए पाता भदियों का मन्त करना इन्होंने मी प्रावस्यक सममा। भगवान् गुरु का धर्मचक्र प्रवर्तन' या पार्मिक मन्ति मी सर्वोदय मा समाय-मार का दिसा-संकेत पा। अणुक्त माग्दोमन भी मैविक कान्ति का एक चिर प्रतीक्षित पर है ऐसे संगठित रूप से काम होना चाहिए, जिससे सारी समस्याएं साप-साथ इस हो जायें। भूगन-मान्दोमन का कार्य सिर्फ भूमिहीनों को भूमि बाटने तक ही नहींपर मरे मान का स बनाने का मैमेतिक कार्य है। भूमि की समस्या तक ही इम कला इसका क्षेत्र या अभिप्राय महा। जिस पर महात्मा मनत की और पालीका १३.का 'नम पाग्योसन' मम की सीमित नहीं रहा बहको स्पतवया की मांग का एक महत्वपूण पान्दोमम पा । पातवारियों को भगाने सनस्याचार को सामने माने या परतल माखोर्यों की भीसा को भयाकर उनमें पारमनाम साने उषा स्वतन्त्रता के मार्ग पर अग्रसर होने का एक पप पा। हमारा भुवान पायोमन भी इसी तरह महार है। हमारा माप सर्वोत्य का है । एकापी नहीं मरिक सांपी है। सम्पत्तिमान पौर परशुभम् पान्दोमन की भी भावना एकही है। एक समान हकको उमेरे लिए बाप्प करता है, प्ररित करवा सीप वाहमा इमरा संसह काही त्याम्प बनाना और मोष से पान सरप देने को नही बसि स्माग सम्प समार लिए पोर ने की मापना प्राशित करता है। पणुबक-मानसिन परिसह मान को पापा भूल मानता है। इस मनुमार पह ही हिंसा की बा । पाहा सण यहाँ भोपण पर हिंगा माले पाप मौर। मापसे ३ एक चिराग ! एक ज्योति ! --तात्कालीन प्रेस प्रप्यम भी प.म.पर बीवन के कई पहसू होते है। मनुष्य को अपने घरीर परिवार, उसकी भाषिक स्पिति पौर साम ही साप नतिक बीवन-विकास की सामना की फिकर करनी पड़ती है । पहले परिवार के लिए इन्सान चिन्ता करता है उसका विमाम परेचान एका पार पामे बनकर समाज की फिसर करता है। यह सब इसलिए कि जिससे वह अपने निजी परिवार समान के भीवन को सम्मान सके । परन्तु मनुष्य पच नहीं उसका जीवन सामे-पीने तक ही सीमित नहीं है। उसमें पशु को प्रपैमा रोपाते विशेप स से है एक पो भास्म-स्फूरणा पोर खरी दिने पुरि। इसके उपयोम से ही ममुप्प का बीयन मनता है मामे उसे बनाना है। अपुषत--प्रारम-स्फुरणामा सन्देषी बन-बन तक पहुंचाया है। म मोग सोते है कि भाषिक विकास हुमा वो सब ठीक हो जायेगा पर बस्तुत बात ऐसी महीं है। दुनिया में म्यावाठर मो मोग है, के म तो परिवार को घोर सकते है और न उसके मोह को उसकी याद को ऐसी हालत में कोई पर मार्ग पूराने की पसरा है। प्राचार्म भी तुमसी ने कम्णा बुद्धि से हमें वह रास्ता दिखाने के लिए प्रयुक्त-भान्दोलन शुरू किया है, जो बीवन के मैतिक स्तर को ठीक करता है। जिस तरह बमोण के एक कोण के ठीक हो जाने पर बाकी वीन कोर स्वत ठीक हो जाते है उसी तरह पीवन के नैतिक पक्ष के ठीक हो पाने से उसके प्रग्याम्प पार भी सत' सुपर पावे है। सवा-पैसा जीवन का लक्ष्य नहीं है। इससे प्रादमी न गिळा है म पाया है। यही कारण है भारतीय संस्कृति ने सये-पैसे पर कमी पोर नहीं दिया। भारत की यह सोसतिक विशेषता रही है। हमारे मस्तक यब उन पपिनों के चरणों में भरे है जिन्दमि मामद-पाति को पाने से भागे से पाने की ।
ममुवती पोर कोशिश की निमनि एपे-पैसे ये इमारत बनाने के प्रयल करने मनाय सदा मसिम-विकासबारा मानवीवनको उन्नत करने पी पप्टा की। गांधीजी के पास क्या पा? पाचार्य मी तुलसी के पास कौल से स्मये। हम उनके पापे मुफ्ते क्यों ? क्योंकि उन्होंने उम एक मैतिक कोस को ही मिमा जिसके हारा हमारे जीवन का बहुमुखी विकास होने वाला है। हम भी सो इस मोर हम क्या कर सते!? पहमा म रपने में कठिनाई पर महसूस होती है पर यह कसी ही है जैसे सर्दी के मौसम में वाताव में परमपी शिक्षा । मनास्वमार ही पपिक है पविक काटि- मानों से बचने का। इटियों का प्रमाण सहन ही पटमा नहीं चाहता। हमारा दिमाग बन गया है कि रुपये-पैसे के बिना काम नहीं पस समता पर निष्ठा के सामने सरे-पैसे ा मार्पण पोर कठिनाइयों का मय रहो पाता है। मूर के निकलने पर प्रदेश माग पड़ा होता है और उसके पस्त होवे हो पारों पोर पापसार मपनी पारर फैमा ताई परस्त रस हासत में भी मति हमें कोई घोटा-सा रीपक मिस पाये वो अपना पस्ता रेप पर है। माचार्य भी तुमसी के प्राणुत्र-मानोमन रेस में हमें एक पिएप पिा है एक म्पोधि दी है उसे मकर हम पार प्रतिष्ठा तिमिरान बातावरण में मंतिपय माप्त कर सारे रमको रोपनी में समपना पाम निकास पठाहर एक मन में पति पी . उसको वामृत कर प्रत्येक म्पत्ति विकास पर सस्ता है। पार पपरको सिलान-पिनाने व मन मोपासाने के लिए उप-राकी कोपि हो हो है पर पर तो मिटने मामा है । पन मारत और अमर प्रारि म टिममे पामे नही है। पिराकान-सी पीर है पो इन सो पाने पर भी बनी एती है पोर पो इनके माने है पामै भी पी। पापीर मारम इल है। उस पीर को है विट पर शरीर कम पाई धाप संसार रिला एमा। उसे मन र एमजे की बात को ममः। भारतीय अपियों में रानी मारम-गरम को मोगार समापापही तर एक चिराप ! एक प्योति सरीर का प्रश्न है उसे बिनाने-पिमाने की कोशिव कला माम् पर मीत बनाने पैसा मयता है भारत में इसमें संगोपन करने बताया कि पय तक इन्सान पारमा की भोर नहीं देखता तब तक उसमें ब पा में कोई मन्सर महीं पर पार निमा ने इस पही तत्त्व को मुमा दिया है और यह भौतिक-समृधि की पोर भाग रही है। भब हामत यह हो गई है कि हम दिन रात राम कृष्ण मुरुम महावीर का पाप करने पर हमारा व्यवहार इतना नीचे बसा पा रहा है कि वे महा पुस्प हमें देखें तो क्या कहेंगे ? उनकी प्राओं में प्रोसू के सिवा कृष नहीं दिखाई बैगा पौर फिर यहाँ पात्रों में मासू हो वहाँ माप्ठीवर कसा? हमारे बोमने पौर दिनभर के माचरण में किवना मन्तर मा मया है। मणुपत-पाम्बोमन उस पन्वर को पाट देना चाहता है। प्रणुप्रत न पार्षिक पनि रिम पर हम सब मिम ऐ है । इस पुष्प अवसर पर प्राचार्य भी तुमसी की सिमा को हदय से साकार करें, इस स्माल को मेकर कि इसमें बहुत बड़ी वास्त मरी है। संकपों पौर प्रों की प्रसीम सक्ति हमें उस मंच पर ने पायेगी यहाँ न हमारा पिनास होगा पौरन समाज र परिवार का । प्रयुपत- प्रान्दोनम की यह ममनकारी मानना ऐपमर में 12 मेरी सिर से यही प्रार्थना है।
४ मणुक्त एफ ईश्वरीय देन -मो.भीमनारापम सरस्म मोगा पापोय स्पराग्य प्राप्ति के बारस समस्त बर्मों का कार्य एवं म्पहार हमारी संसति पम्प नहीं रहा है। पिसौ म पिसी स में यहां बुराई पुस मा है। प्राचीन नाम से ही हमारी संस्कृति स्पाम पार पम की पोतक रही है। मोगों में सन्ने दृष्टिकोण से चिन्तन परना घोर भोग पौर निमारा पप पर पग्रसर होता मारम्भ कर दिया है । म या मानवाई पन-मन में फैसी हई इस प्रमानगीय भावना के परिर्वतन में भगुव-पादोमन मा सफल प्रयास है। सबरोबरी बात तो यह है किभार के पमाने में बारी-बड़ी बातें बनाने बामे ता मान होते है परन्तु उनके हारा किये जान बामे कार्य बहुव होन पौर घाटे होते है। मान प्रस्तु-भक्ति का युग है। संसार पोरे पट मा वर्ग मानरमान को पान्ठि पौर मुबका मार्ग प्राप्ति करने में प्रयत्नशीम है। परन्तु मोपों को सन्ने भों में मुष पा शान्ति प्राप्त होगी या नही यह एक समेहपुम बात है। पाचार्य श्री तुमपी पीरम की घोटी पर महत्वपूर्ण बातोशलिए पापी मापा में हमारा ध्यान उस भोर पापित किया है। पे व्रत यपि सरपरी तौर पर देपन से नाम मासूम पाते है परन्तु इनमें म्पति-पक्ति की भावना को बरस गनने की मारी शक्ति छिपी हुई है। यह समझने की वीर है । सब पतों को बोगार पर एम भीत को पापन में सवार में वापस पुष हो सकता है। हमारे देश के पौर विरोगों मूलभूव सिवान्तों में पड़ा पावर है। मिल पपिपी माप टेगोरपनानुसार हमारे देश का मगर दिनमर पार्य करम पार न को भगनीठन करताही एक लिपी मगर रिम भर कार्य करनेबार पनको परार पीता रेसिपिगम रेषा है। पार भारतवर्ष में ऐम भी मुम्न पाररिहारपसे गोरेप के विभिन्न मार्यो पार वर्षों में पूम-युम कर पाम चिन्तन एवं स्याम मी भाषना प्रस्फुटित मनुश्त एक विसीयम १॥ परते ६ पौर मन-मन को पपने मैतिक पुनरुत्पान के लिए पाद्वान करते है। यह हमारे लिए पौरपास्पद बात है। इमे यह नि:समेह मानना पड़गा कि मोग त्यागमप पीवन को अपनाने में प्रसन्नता का अनुमा करते हैं। जैसा कि मने प्रस्मस देशा पिस प्रमार मोम पपने पाप प्रावती-जीवन को प्रगीकार करते हैं। रम के नेतामों में त्याग मिा पौर उसके फास्सम हमें प्रामारी मिली । श्याम का फल परा मीठा होता है मह भी हमने रखा । परन्तु स्वयम्य प्राप्ति के बाद हमारे पास रमाम काको कार्यक्रम नहीं रहा । मेरा स्पाम है कि देश के भावी मेवानों को परि पमी से स्याप की प्रेरणा दी गामे को भारत का भागी पिसा होमा ? पर ममी मत्यन्त सुस्पष्ट दिवाई रे सावा है। पाचर्म थी तुमसी पारा प्रबतित प्रणवत-पादासन एक अन्तिकारी पादोमन है । माम तो उसका अगुव्रत है भाव छोटे बों को मेना। सेफिन से मह याद रखना चाहिए कि छोटे-छोटे कामों के करन से ही पम्त में पोस बड़े काम सरमतापूर्वक किये पा सकते हैं। वर्तमान समान में ऐसी कई दुराइयां ६ दिनके कारण देश में दूपित पाताबरण फैम गया है। पोग्बामारी, वित- पोरी प्रदानों में भूठी मवाही देना सप सम्पभिर्यो मिए पक्षपात करना पारि पुणों से भारत का मस्वर पार मीमा हो गया है। इम फर्मक को मिटाने के लिए सिर्फ मापण देन मेय मिसन प्रस्ताव पास करने से काम महामेमा । इसलिए यह जरी है कि जनता के पीप रपनारमक कार्य किया पाय पोर लोगों का परिध चा ग्यने की कोमिचकी पाये । राप्दृपिता महरमा पान्धी ने अपना रचनात्मक कार्यक्रम देश के सामम इसी दृष्टि से रखा पा। इन दिनों भाचार्य पिनोरा पाने का भूदान पा सम्पत्ति दान पाम्रोमन सामाणिक पोर प्राषिक दृष्टि के पप्तामा एक वा नैतिक और माम्मारिमक मादोनन मी है। प्राचार्य श्री तुलसी के प्रावत-पाम्दोमन को भी में सी दृष्टि से देखता ईस पातानन में बहुत प्रभावित पापोंकि पा बीवन की छोटी सपोटी प्राणायक बातों पर जोर देता है। मामारणतय बीरन के छोटे कार्यों के प्रति हम अपने अपने उत्तरगयित्व को भूम पाते ही पोरे कार्यों में ही की दिलचस्पी रिचाते तप्प यह कि पर १४ मनुवाकोमोर हम अपने पीपल की छोटी बातों को मोर म्मान नहीं ले र महान मार्यों में सफल नहीं हो सकी। ममुखन-पान्दोलन में सम्मिलित होने वाले पति पत मेवे है। प्रत उनके दैनिक जीवन के पावहारिक पहमुमो को परे है । साथ ही साप ये सस्य, पहिसा प्रचार्य जपर्य के पासन की भी पपन मेते है। ल प्रतिक्षामों में भूस प्रप्टाचार, अस्पृश्यता पौर मासि पोपण के नियम भी सम्मिमिव ।। जनता का मैतिक स्तर ऊंचा उठाने के लिए इन सामायिक पारिक उपायों के प्रति हमारा पान प्ररिक मित होना चाहिए । पान हम हमारे पष्ट के साविक बीवन के निर्माण में पुटेर : मेकिम हमें या समझ मैना पाहिए कि मैतिक पोजनामों के बिना सिर्फ भाषिक योजनाएं प्रभावणामी नहीं बन सकती । म प्रयुषत-पान्दोमन को मैतिक संपोजन का एक प्रान्तिकारी परम मानता हूँ।मतिक विकास की योजनाओं के बिना हमारी पारिफ मोरनामों मोत सूत्र पापये एता मेरा विश्वास है। परवत पैसे पाम्रोमान में संस्या की प्रपेया मुस-विकास पर मान एपना पावश्यक है। मुझे यह पाकर प्रसन्नता हु कि भरगुपत-पारोमन का दृप्टिकोण ऐसा ही है। पारमविश्वास , सन्चाई सापतिक नियों का पालन करणे पाते मुट्ठी भर पक्ति भी सामारिक मातावरण को प्रमा वित यि बिना नहीं रह सकते । कार्प को मुरता के कारण प्राण प्राय ही फेमपा पोर मन-मन सा जीवन विमा प्रकापमान हो उटेया कि विपर को इसकी पनुभूति हुए बिना नहीं ऐगी । इस मानोमन का पूण् परिचय पान भने ही पपिक लोगों को न हो परन्तु अपर रेस में कोई भी मुर प्रगुती हुए तो देश की उन्नति पर पम्भाषी है। परगुप्रत-पालोतन मानप-मस्तिक पीपर महीं है बलि पर परीय रेन है। मुझे हर रियाम है। अणुबत-पादोसन तीनों मनिक स्तर को पा राने में पफम होगा पोर टोम मार पर समापारी सहारपरस्पा की पना मैं पापा बन गोगा ।म मारा करलाई किपर प्रामोसन लि प्रतिलिपी पकाता पायेपा।
प्रान्दोलन के अप्ठ पहलू -श्री शिवानी मपरि मापे परमा-मता के पस्तिस्स में बो संपटन या समुशाय बनता , वह पड़ा यमनकारी होता है। परमान स्पर्म मंगल होता है यह स्मार्प की बात को नहीं होती । अहिंसा पीर सयम की गगा में गोता लगाने के लिए इतना विधान मन समुराय यहाँ इकट्य हुमा है, इसलिए मुझे कहना चाहिए कि पह समुराम ममम भी भोर एम्-एक परम्प महा पहा है। पहिसा मौर सयम के माचरण से अधिक मावनिक कार्य प्रौर क्या हो सकता है ? प्रत मपम या परमार्थ का पो पम बतमान बन या है, पापुम का संकेत है और हमें इसके प्रसार के लिए प्रयास करना चाहिये । भाचार्य श्री तुमसौगी इसके लिये प्रयत्नमीन है। उनमें मन सामार्थ का मनुमन किया है। विवा, त्पाप पौर वानिकवा से पषिक उनमें एक पौर पेप्टवा है प्रसारण स्नेह के मोत है। यह हमारे लिए गौरमका विपम है। मानव-यीवन का सर्वोच्च प्पेय पीवम-मुखि है। मैं इसी म्पेय की पूर्ति के लिए प्रणव-पान्दोचन को एक प्रावस्यक पौर उपयोगी कार्य मानता है। कई भाइयों ने मुझे बताया कि मावत के मूल में सम्प्रदाय सिद्धि के तत्व है। बहो सक मैं जान पाया हूँ इसके पीछे यह भावना नहीं है। अगर सम्पराय-सिति मिए मी प्रणवत-प्रान्दोलन पैसे लोकोपयोगी कार्यक्रम को पचाया पाये वो कोई खतरा पाने पासा नहीं है। उस प्रयास से मानम-बीवन की पुति ही होगी। बीपन-मुरिक कार्य में मुस्थत दो भाषाएं हमारे सामने प्रावी विचारों की मनुपरता-संकोषसीमता पार प्रचार की प्रममता मा पामरा पीमता । मेरोनो परम्पराएं सदा से पनी प्रापी पो बीवन-पप को प्रशस्त - प्रमुखत की पोर नहीं बनने देती। हमारे प्राचीन अपियों में एक ऐसा विचार रमा किषो सद्विचार हमारे हाय में प्रकुरित हुए है ये हमारे पाचरण में प्राये, किन्तु हमने उसका विपरीत म यह ममाया कि जो सविचार हमें मिले है ये पूसरे को मही देते पाहिए । एक म्यायाम विधा में पारंगत व्यक्ति अपनी विधा दूसरे को मारी बतमायेया पाहे उसके पयसान के साप उसकी विधा भी क्यों म समाप्त हो बाये । इस तरह हमारे समाज में जान पौर विधा का संपोष होता नगा। इसी तरह पाति प्राधित उप-नीच की भेद मावना भी विचार-पनुदारता को बम पहुंचाती पी। पस्पृश्यता का भाव भी कम पार नहीं था। इस तरह विचारों को संगोपनीतवा के कारण पीपन-सवि मा मार्म ममम्म होता गया। दूसरा दिपार पाश्चात्य पानिकों ने हमारे सामने यह एया कि इमो को सनिपार पहण किये है उनका प्रपिराधिक विस्तार करना चाहिए । रिन्तु पीरम में उन्हें प्राचरित परसेही प्रसारित करना चाहिए, यह पापह रहनि नहीं रखा । मारतीय-दर्पन का जीवन-मूग पा 'माचार प्ररमो पर्म हा यहाँ पादचात्य दानिक इस पीपन-गूग को सामने रणार चमे। इससे हमा मह कि विचार प्रसार को बल मिमा चिन्तु प्राचार-पय कमगोर पौर पौण बनता पया। इसी तप हो सिमान्तों के प्रसार की पबम्ती भी पी। एक दाप में पारण पोर दूसरे हाल में पस्त्र को यहाँ स्पिति बनी रहो विचार प्रसारमा पापह ही प्रमुख पा। पणुपत मामोसम के बारे में घर में सोचता वो पे रोनों पापाएं वहाँ मसर नहीं पाती है। माम्प्रदायिक भाग्रह यहां नहीं है इसलिए विचार-मनुसरता को स्पान नहीं मिमता । सद्विचारों को जीवन में उतारने पा पार भावना मसार में हाय-परिवर्तन का मिसान्त पपनापा पाग है इमने उसमें माचार भमार पोर मामगधीमता पा मार पनप नहीं पाता । ये दोनों पायाप्तन के सरि भेष्ठ पाम है यो इस रिसाम का मपस मोत क्ण है। इन मापापों की तर परिवार भी हमारे सामने १३ पौर रनरी भी ।
माम्दोलन के श्रेष्ठ पात एक परम्परा है। भारत का प्राचीन भोकचीवन सुखी । मोक-संम्या कम पी इसलिए भीवन-कलह भी कम पा। बाबम-कमह की कमी के कारण बीवन-सन्तुलन बना रहता था। इस स्थिति से म्पति को सोचने समझने पौर चिन्तन करने का अवसर मिलता था। इस तरह यहाँ का मोम्पीमन एक योगी की तरह पा और यहां की संस्कति योगी-सस्कृति भी। पश्चिम की संसाति सचोग की संसति है। यहां की बनता में बीवन सन्तुमन नहीं है। प्रा बहो मषिक साधनों मोर मुस-सुविधामों की अपेक्षा रहती है मौर उस प्रपेक्षा-पूर्ति के लिए यहाँ नाना प्रयोग पमते हैं । यह प्रायोगिक संसति है। मध्यपूर्व के रेगिस्तानों में प्रवासी संसति और एक गाम-संस्कृति है, जिसे हम बगमी बातियों की संस्कृति कह सकते है। इस तरह पाच संस्कृतियो हमारे सामने माती है। पांचों समतियों में ही बीवन-मुखिक कुछ म कुछ पनुष्य तत्व मिल सकते हैं। हमें उन प्रमुमतार्मों को प्राण कर बीवन-पूटि के पप में पागे बढ़ना चाहिए। इसी तरह मनुष्य के पपिराध बीवन में भी रो पाषाएं और पांच सबिमाएं है। मन गरीर और पारमा के मयोग से म्पक्ति का निर्माण होता है। मन का समाष रगोगुण शरीर का समाव तमोगुण भौर प्रारमा का स्वभाव मुक्ति है। ग्भोगुग्ण भौर पमोगुण का मत हुए बिना जीवन-मुक्ति मही होती मत इन दोनों भाषामों को मिटाने की मावश्यकता होती है। इस प्रकार पांच सुगिमाए–पहिंसा सरप अस्तेय ब्रह्मचर्य पौर मपरिपड है, मो बीवन-मुधि मूत ठत्व है। इस तर म भनुमब छिया है कि प्रस्युवत-पाचोमन मिचार-मनुषारता पार मात्रमणभीमता से परे प्रवारमक माम्दोलन है, जिसकी भीवन-वृद्धि के निए महठी पावस्यकता है। मैं पापा करता है कि यह माम्बोसन अधिकाधिक प्रसारित होगा पौर माचार्य श्री तुमसी मा मिण्द् म्पत्तित्व इस पुनीत कार्य में सफलता प्रान करेगा। 1 ૬ सवहितकारी प्रावत-माम्बोसन • शिरपसार, एम.ए.री• सिप मम्यमलािस विभाग, किती विरिणामय में मतस सम्पापी मार रनरापिसी सम्प्रदाय विशप से सम्पन्न नहीं एा है। परन्तु पर तक उसे जीवन में धारण नहीं किया जाता धर्म सापक नही हो समता प्रत धर्म के लक्षणों की स्पष्ट परिभाषा और नपर पूर्णरूपेण बपना पेरा पा समार के उभर के लिए निवात मावस्या है। जब-जब समान बिग सस हो जाता है और उसका पठन होने समता है तो एव अमनति ा मूल पारण समागमे पक्तियों की धर्म के प्रति उपेक्षा होती है। मरिमपार तिघीम होगा है तो उसके परिवारों की धर्म प्रति निष्ठा होती है पार पपने पाचरण में पर्म भूष मनों का समुचित पबहार परलेशन म उम्नति मा पप प्रवर्णन महापुरप करते है पोर उनका मत मथना परेप जमता को ममरण करने के लिए होता है। हमारे समान में किहीं कारणों मे साधारण जन-ममुराप का प्टिकोण पाप्यात्मिक म पर प्पानहारिकही मया है पीर प्रति उमटी पोर ही है जिसका प्रमाण यही है कि परिपुर मोम में मनुष्य कम्पहीन हा जाता है मार पात म्पका ही माम्य ममममा है। दो संस्था या माणुस समारकी इम दुर्मति पा मान करावा है उनके मिशत पान पारष्ट करलाई सपा सराधार पर बस दता है वह पढ़ा योग्य है । पाराय यी तुमसी तथा तेरापंथ समार के मुनियों मे को पसुपत-मामोनम का प्रचार प्रारम्भ पिसा है पानाप्प है पौर मरम्पापी होन योग्य भी। पर्म के पांच दिगिट मास मीमा मात्र प्रवेप पर्व पर परि पहा इनमें म प्रारीपनी माता महना पार पप्पपरायणतामिए रहितकारी प्रमुखत-पासोमन ११ याप्त है और यदि कोई मनुष्य इन पांचों को अपने माचरण का घोतक बनाने तो यह पूर्णस्सेण सम्प पौर शिप्ट बन जाता है। महात्मा गांधी में अपने बीरन में इन नियमों का पामम किया और जनता को इनका पासन करने के लिए बम रिमा । पूर्व कान से प्राय तक सभी महापुरुर्पो धर्म प्रवर्तकों और प्राचार्यों न पाहे जिस देश मा काम में हुए हों इन नियों को मो-मस्याण कारी माना है और इनका प्राचरण करने के लिए पूर्ण वन दिया है। पारकल के सहारमक हिंसापूर्ण संसार में वहाँ पम्प अधिकारापहरण और दूसरों का समन करमा ये ही मुख्य रस्म हो गये है हिंसा सस्य प्रम्सेय मा अपरिग्रह का प्रचार करना और प्रत्येक व्यक्ति को इन नियों के पालन के लिए प्रेरित करना एक मह्यम् कार्य है । पशुवत इन नियमों के पालन का ही पान्दोसन है और इसके प्रवर्तक यह प्रपाल करते है कि विपेप वर्गों के स्त्री-पुस्प इन महा नियमोंरेमापीन भनेक उपनियों का पालन करें, जिनसे उनका स्वयं प्रापरण बने पौर में समान विरोधी कार्यों केा न बनें। पहिंसा सम्बन्धी उपनियमों में कतिपय ऐसे भी है जिनसे कदाचित् पुछ मोग सहमत न हों या अनेक रेमों में उनका पूर्ण पासन न हो सके। फिर भी यह मानना पड़ेमा कि पूर्व अहिंसक होने के लिए इन उपनियमों पर चमना निवाम्त भावस्पक है । अहिंसा का पुजारी सस्य पौर प्रवीर्य को धोकर नहीं पन समता महिसारे लिए इन गे निमों पर पूर्णतया स होना गरी है। इसीलिए इस पान्दोमन ने इन रो नियों पर भी विशेप बम दिया है। प्राचार्य पौर प्रपरिग्रह सम्बन्धी उपनियम बहुत ही म्यापक और एक गर्म निषेप में मैतिकता माने में विशेप पहायक होंगे। हमारा म्यापारी दस बम कमाने के मिए पासकम अनेक ऐसे नपार्यों का मामय सैता है पो समाव के लिए पातक है। नित्यप्रति जनता इन समागमोही परमार्यो के हीन समाज पहिवार पौर मनुष्य पातक उपोषों का पिकार बनती पापी है, परन्तु उनका यह मापार कम नहीं होता है। परि ममत के ताप इस समुपाय में नैतिकता की धारणा उत्पन्न हो पाये और यह अपने परिणत प्रापरण से हट पाये तो रेस पार समार । का विधेप पस्पारण हो सकेगा। इस दृष्टि से मनुष-प्रावोसन के कार्य भी २. ममुश्व पोर रेप से सभी को सहमत होना चाहिए और इसकी सफ्मता के लिए प्रार्पना परली पाहिए। हमारा समार सम्नत हा उसमे मतिर पावरण के प्रति भरा गायत हो और बह प्राम्मारिमा उम्मति की भोर भारत हो यह हमारी प्रमितापा है। इसके लिए सर्वामीण प्रयल परना होमा । अश्व-प्राम्योतन में इसी पिा म पर प्रदर्शन किया है । इसके सदुपोग को पुष्ट करना होगा पौर ऐमी पने सस्पाएं पनानी होगी जो निस्वार्थ पौरमपरिह प स देश और समाज की सेवा पर सौर पुम जन-समुदाय में उपायों के प्रति पास्पा पोर पका उत्सम्म परस। ममत्रत-पायासन फसे-फुसे यह मैरी हार्दिक कामना है।
७ बातो से माती मले -पीनेगामार प्रतक विमा पसना ऐमी यात्रा है जिसमें मानो दिशा मही हैन मंगिम है।सको मटकना कह मान है । समाव से ही मनुष्य में माना विकल्प उरले है। बहसर भी पनना चाहा है, उपर भी पसना पाहता है। बह पाना है पिनसमें इम्पाए भनेक है और ये परम्पर पिरोपी तरह। एसी प्रवस्था में एकही उमे सहारा है कि यह संकल्प प्राप्त गरे। पत उस मकस्म का नाम है पिसहम कर्ता नहीं रह सकते । अपने पम्प मा वो हमी तोर मी सकते हैं। अक्सर होता है कि मन का बनाया मकाम हमारे निकट एक निरस्प रह जाता है, प्रदि सकप में बम होता है प्राता का पोर महम् ता मायावी बस्तु है। यामी पपने सकस्मों को वोग्न के बहाने उस महम् में हम नयनये सरस्प हो कर सकते है किन्तु वत संकल्स में वाकर प्रत दवा नहीं। बह विवेक की मावा मिसको प्रत का मुख देकर इमन प्रटम कर दिया है। ऐसा प्रत हमारे पास है वो साफ है कि संघट के समय हम सहारा नहीं यमायमे । गए पाती । मौर हम बहा ने गाती है। चाों के ग पोर पारेग हमें मतमोर गमना चाहते हैं। मोपी म पाप ही सोचिये द्य पत्ता क्या करे ? बह तो पर-उबर पता ही ए सकता है माम मामन वो नमसे हो नही समता पर मामी के सामने तो मक्ष्य है।बह पर-उपर मटक प्रौर मटक्या ही ऐ तब तो उसकी ममुप्यता ही पसिय पती है। मफिन समे बना है और बाते बमना बनकर किसी प्येय तक पानना है सो यह भमा से सम्मम हो सकता है जब तक कोई निश्चित संकेत उसके पास न हो । प्रत म उस वही रिमा-कित मिमवा है। उसके सहारे निप्प पैच होनी है पीर गति अमित पति न कर प्रगति बनती है। - २१ १२ पातकी मोर मगुवर यानी बन का पारम्म । यह कोई ऐसा प्रादी नहीं है जिसे पम्पबहारी कहकर टाम रिपा पाये। सारा म्पबहार इसके साप कि साता है बस्ति रेसने दि महार उससे पुष्ट बनता है। पौषम बम्द मही होता प्रत्युत परिपत होता है । अन्तर विवेकमा कुछ मही है मोहमारी बीन पेतमा को क्षत-विक्षत करता हो यह तो उम्रे ठम्य को स्वस्थ करता है। कभी प्राण देम मोष्ठिर करने वाला नहीं बनता है कि यह उसे स्थ करता है। यहाँ बेठापनी पारी है। बहुत से मान लियं मये विधि-निरेष पसर जीवन के देव को मूपित करते हुए देन गाते है । पश्चिम की मोर से पूर्व १५ रिपकर भारतवर्ष पर यह पाप हा है। पश्चिम मी प्रगति पिपनी से एताग्रियों में मारपर्यकारक रही है। क्या विचारकों की राय में इस कारण पीवन म प्रति उनका मुगा भाष है। नियमों के बम्पन से उसे पापा नहीं मया है। इसलिए यह दुतकर रठ सकी पार पाएँ पोर या सभी । रते हुए पश्चिम के प्रामे पूरपति पौर स्तम्प एह गया है। परिषम पति और पाप से परामित होना परा है। इसलिए माना जाता है कि जीवन की या पति पहा नाना नियमों और निषों से रस वाया भाविकाम को दृष्ठित परल बासी पर परिपूर्णतारी पोर से जाने वाली मही है। या पावनी प्रमगत नहीं है पोर इसीमिए पुम हमें बनके पारम्भ से परमा है प्रदि किसी पाड्मन्यता में से परे विचार को नही माना चाहिए। ऐसी पारिता ता का भी माती मग्नि मरि मुक्त किया निर्णय हो तो बह तिमी प्रकार पोरन से हानि नहीं करेमा प्रश्न उत्पी साधेपा। जीवन अपना का हमारे द्वारा पर्व पर-वार मपम्पम हुमा का है। बहसपाना पारी है। सोचिये मिनिारा यदि नदी पाया ना हो वा या दो। ऐमी मनी सापर महीं पहुए सम्वीन पिपपपीगी पसाती है। यह सही है कि मरी स्पर्य पपना निारा बनाती पासती है पत पीपरन्यवाहको मी तपरिमाराले पाते हैं और मूगर मष्ट होने की सम्भावना से पापे एपले बावोसेबाटीने सप्ट ही पार दो प्रकार की जीवन पत्तियों देखी जाती है। उनके नीचे रो तत्तबार पर दो वर्णन सो हो मये है। किन्तु प्रश्न तत्वबाव का नहीं अपितु बह वो तात्कासिक है। प्रत्यक्ष व्यवहार का प्रश्न है कि इन परस्पर समयों को क्या प्रापार ? योमबाप का समर्थन हासिक सप से ही हो सकता है। भोप को नितान्त निपेण मानकर यहाँ चर्चा करने की प्रावश्यकता नही है। माग सामने रखकर सोये गति पर चमने को ही निपम मान मिया बाये वो क्या समार की दो परिकल्पना सम्भव है ? स्पष्ट है कि समम के बिना मोग ही ममि है। मनमानापन बनाने की प्रसमर्पता से मानप पौषम का पारम्म है। पनु को ही इसकी है। मीमिए पहा यह रावा है उसे अपन रहते है । लेकिन मनुष्य को समान में रहना पाया है। समार यानी यहाँ परम्पर निर्वाह है बहाँ मापसी मावान-प्रदान की कम परनीति है। प्रश्न उमी पापमीपन की भाषमता में से उत्पन्न होता है । नागरिकता पौर सामारिकता पमप नहीं साठी पयर पावमी मन को रोक-माम न सके। यह रोम-पाम पर कानून के बस स भी की पा सकती है, पर इसीसे बह पूरी सफर पौर सार्पक नहीं होती। सिपाही की यरह से ही पोर पोरी मकर पायेगा तो समाज में दो ही बर्म ए बायेंगे। एक अपराम करने की मूरिमा चाहने वालों का दूसरा उस मुविधा को बसाद पपने हाप में रखना चााने मानों का । यह स्मिति मानम के पौर उसकी संस्कृति के लिए धोमानमक महीं है। पद स्वेच्छा में से प्राप्त होता है यानी उमसे रो पोर से राम होता है। अपराब मार से पौर बमन की मापस्मकता से। दमन राप्रपराध न होने की रीति-नीति अपराम प्रति हो कमी काट नहीं पायेपी । ममता से देखें तो बमम से अपराम की वो गह में और निचली ही गई है। पौर ससमी बन सती ही है। प्रत रिचार रन बड़ों को काटने का ही उपाय है। प्रणवत का पारदोलन के प में प्राचार्य तुलसीमी के मेक्ल म प्रचार हो रहा है। यह एक नैविक मान्दोमम है। जैसे बादी से माती जमती है मतिक मान्योतन म स ही पक्ति से पक्ति में सुभग पैदा होनी चाहिए । मनुष्य का परित्र मूम अधिष्ठान है उस पर ही समान- निर्माण मा समान सन्ति समी - - २४ मनात मी पोर होगी पौर उम माम्दोतनी सापळा पही नहीं है कि पोर-पामारी न शिरत न हो बलि मतिर पानमन को यहां तक पाना है कि मीर का पानी पिरीय कानून म्पक्ति में पीर समाज में पटना गागृत और ग्यमन्त पिरो और जम के गोर स मनवाया बाने बागा कानून मनाप पर हो पाये । पर मुर मार रिम-मानम के लिए असहनीय हो राय और पान पत्र में विज्ञान का पोर बम का उपयोम कोरी पूर्वतासने मय पाक पर स्वयं मारम-गास्वा हो पोर प्रवामित अनुभव करने की भाषश्यकता में कोईभए गाये। प्रणुपत-पामोमन दो सपा स-सासिन पनि मारम-मामिन ममान- व्यवस्था को उरम में मामे के समय को सदा पपने समम पम्पित करके ८ अणुव्रत भाव-क्रान्ति का प्रतीक -पौमिकर विरी सम्पारक-पभारत साम्स, अम्बई मावत बैनमर्म के अनुसार गृहस्प पर्म का एक मंय है। नपर्म का मूम सियाम्म है-पहिंसा । अहिंसा को गृहम्प-बीवन में प्रतिष्ठित करने कमिए मिम पों की पावरयकता के प्रणुव्रत रहे जाते हैं। समय के साप इन पो म कोई मौमिक अन्तर नहीं पाता । विषकमीन जैन मापार्य समय-समम पर जनता को बताते है कि वह अपनी ममस्या समाबाना किस प्रकार इन प्रतों का पालन करे। जैनाचाय थी तुमसी अपने अनुयायियों को जिनकी मल्या हमारे देश में नगण्य महीं। प्रणुव्रतों म पूरी निप्य रखन की मनाह रते है। समाह दो पन्य नापार्य भी देते हैं, किन्तु भाषाय भी तुमसी मे अपन प्रग्गुबत सम्बन्धी मिचारों के प्रचार के मिर कमठ प्रचारकों का यो सगटन बना मिया है मा सनकी मौतिक मूझ एवं विभिप्टता का पोतक है । इस संमठा को देखकर ही मोम परणयव प्रचार को 'भारोमन की कोटि में स्वीकार करते हैं। प्रचारकों में केबस जैन मुनि ही नही कोट्पपीछ गृहस्थ मी है। जो सय भणप्रती न हो उनके प्रचार का प्रभाव पा महीं सकता प्रत गाव में बनी गृहस्मों को भी प्रपत-पादोमन सगठन में स्थान पाने के लिए अपने प्रापरण को पुपारने की पोर एक सीमा पर त्याग करने की पावश्यकता हुई । ममाव-हित की दृष्टि से पान्दोलन का प्पक्तिपत म्पबहार-युवि से सम्बन्धित यह पहम् काफी महल का है । मो महान प्रमुखत प्रपारक बने है उन ममी के मारे म्पसार मुराहो गये इस प्रकार का कोई पापा करना यपपि मम्भव म हो वो भी प्रान्दोमन का महत्व कम नहीं हो पाता । विचार मौर म्पपहार-विके इस प्रायोजन के प्रति लोगों में मोड़ी मी निष्ठा पाहाबाना एक उत्तम नमण है। मन की भूमि म एक बार यह माष पपी बीच पड़ा तो बार में यह पता मुस भी बन सकता है। ए २६ मयत की और हिमा हमारे हाप पार पाम पपा पासपी हिमामों में नहीं पड़ती। वसपार, बम्प पीर तोप में मी बह मही रहती । उसका निवास स्थान मन में है। प्रणवत-माम्योनम का गेय यहाँ की मन-मुटि है । जिस मन में भोप स परहेज रपने की प्रवृत्ति पर स में भी बम पायेगी उसमें धीरे-धीरे हिंसा के प्रा फरने मानका भी कम होती जायेगी और जब भोग का स्वाग रपाग में मेमा सब हिंसा का स्पाम सम्पूर्ण पहिसा मे सैदी । भोग और हिंसा का पट सम्बन्ध है। परशुवती मोम पो मर्मारित रखने के लिए स्वयं सार होता सपा दूसरों को भी तैयार करने की चेष्टा करता है। इस प्रकार पा हिमा गो मारित करने का प्रयास करता है। मानव-पर्म के प्रचार के लिए इसमे उत्तम मार्ग हो ही गया सम्वा है? पगुरत-पाम्दोलन नमर्म के ही नहीं संसार के सभी धर्मों के अनुरम है । पोमाराम धीमा में अपने को मेरों में सामोद माना है। सामवेद भाष प्रपान है। परि रिसी के भीतर मापनम्ति हो जाये तो उसे प्रान्ति के अनुपात में पास्तविर मान प्राप्त होकर पता है। सामवेद का गप्प ही भारान्ति है। योगीरान पीकृपा भी माव-प्रान्ति पर इतना बल देते है कि पपने पारा भावनास्ति उतान करने बामा धामवेद मानते हैं । भसात-माम्बोमन भी तो मार-प्रान्ति पर ही प्रमिक बस बसा है। माष पमुष गवसे तो पाहार परिवर्तित हनहीं मरते । सम्मान पौन है? वह है जो गितको माने। मिन' गरा पप-प-गीस। जीत मि पर ? राम-नेप भारिपरमिन' मैं शिवाम करने का पर्व ही है-राम-प के पराजित करन वी बांधनीयता में निगम पाना। हमारे समापों पारण कामनाएं बताई है। गीता में पूरा वा ना एक मात्र कारण काम को माना गया है। पल-पारमोना मनुष्य पीपामनामों पर पंप एपने का प्रानोता है। यही कारण ! प्राचार्य श्री तुममी द्वारा मेरापिर पग-मम्मपी ममम गवावस्पा में होते हुए भी मिम म्मिी विचारणीम पनि ८ नम्पई में मापा उरोही परनी पोर पुप पााप्टरने में मम हो गया।
६ शासन-व्यवस्था प्रौर प्रणुव्रत -श्री रामतेषा भीवास्तव स. सम्पारम-बमारत हाम्स, बम्बई पाप्यात्मिक सुखानुभूति के लिए ही नहीं भौतिक एम माषिक उन्नति की मत्सना का प्राधार भी नैतिकता से परे नहीं माना या ममता । रामराम्य का पर्याय मपि प्रगावन्न हो। वो हमें प्रगा के पाचरण को ऊंचा उठाना ही होगा, मम्पपा प्रना के लिए, प्रवाशाय प्रमा के पासन की परिमापा ही परसमी होगी। इससे पासन की सोकप्ट प्रगति का मापार ही नष्ट हो जायेगा। विधा के विकास से राजनैतिक चेतना हीप्त करना सम्मय हो सकेगा इसमें पन्दा नहीं पितु सयम पीर सामना का पाठ पढ़ाये बिना मम्मे संस्कारों का पीगारोपण पातुका से तुम निकालने जैसा हो होमा । अब प्रथा ही ईमान पार न होगी तो प्रथा के प्रतिनिधिया पाए संचालिस पासव कहाँ तक सन्द एवं सम्मप रहित रह सकेपा ? मन राजनैतिक चेतना पागृत करने के साम साब पार माता का नैतिक स्तर उठाना कहीं अधिक पारी है। रमक भक्षक नगर्ने यह मठिकमा के निकाय द्वारा ही सम्भव हो सकता है। इस पोर बो भी सस्था या पार्मिक मम्माम मायनिक तपा सार्वभौमिक गोम देकर सम- सर होते। उसके प्रभाव को एप्ट्रीयता का मन ही माना जायेमा । प्राचार्य श्री तुमसी का प्रावत-मायोजन ऐसा ही एक ममिभव प्रयास है, यो मानव की सुप्त प्राध्यारिमक पेतमा को जगाकर उसे भोपन के हर पहर में सरमाधरण के सोपान की प्राप्ति करता है । मणुपती की तीन भेणियो!-- (१) प्रवेधक अणुवती (२) प्रमुवी २० २८ प्रमात की मोर (१) मिसिप्ट प्ररणुपती ये मितान्न स्वाभाविक पोर रिणामोग्मुख पीवन की अंगियो ही है। पहने की पापयकता नहीं कि जनता पर प्रवेशक मणुषवी होगी तो उसके प्रतिमिमि पपुश्ती पार पामक मिगिप्टाणुवती हो गमे । मंगल का मनोरम्स है मी ऐम ही विशिष्ट सामों के हाप में पासन-पन सौपना वारि मामन र परम माय की प्राप्ति सम्भव हो। राम मरि मिशिष्टाणुपती ममम्त गुणों से सम्पन्न न हाठे तो रामराग्य की मान्यनामा पापार होम कहो स मिमता ? पर्म के मूलभूत सिसामु समस्त मानव-ममार में समान ही है और पार्य तो यह है कि जिस पम या सम्पराम में इन सितारों का हास होम ममता है या इनकी उपेक्षा की जाने लगती है उसमा पम्त मी पनियाप हो पाता है। मत पम को स्थापित प्ररान करन के लिए उसक मूसापार को ठोम बनाये रसमा प्रत्यावस्यक ही नही अपरिहार्य होगा। प्रयुक्त-मानोनन के वाण पाचार्य मी तुलसी में गर्म की रिसिप्टता का उम्मयन पो पिया है मामर-मर्म की समानता को चरितार्य करने के लिए पमूस्य परणा-मोट भी प्रस्तुत कर दिया है। प्ररपुबती होने पर कोई भी पौषमम्मी प्रपने धर्म का पूर्ण माता और पोपा बन साता है इनमें सम्देह नहीं। साथ ही वह अन्य पारेपपिप्परो प्राप्त र मानव-वर्मपा प्रबल ममर्पक भी बन सरकार मौर एमे म्पति कप में पावन-मूग का माना पाना ममा पिम प्रिय पोर नुसकर म होगा? मरास विश्वाम है कि भणुग्न-मानोमन की समता राष्ट्रीय उत्थान भी मपसे बड़ी सफलता होगी पोनि रापदी ममस्त बुरा पो पौर प्रमाण पभियोपों पर निराकरण इन प्रों के पारण पलेरी सम्मर हा माता ।। पमा ममस्त मन-ममुराप मणुगत गिगानों को स्वीकार कर मे कोरम में मम म देश लिए पमिम पी पारपाना तो ऐगी ही नही पौर गमा पी पण परिपी मीठो ममम्माम् । पाय | हरिमप्रापे पब कि भारत पानी प्राचीन परममि राइनो पवन केम में पुन' प्राची पातन-मस्या और प्रात पिन में चमकाये पौर पश्चिम उस ज्योति को पाकर निहाम हो रठे। प्रणु- पर्मो का भय फिर माता रहेगा मौर मानव को समनारमक पक्ति और क्षमता का मया पार सीखने को मिलेमा । जैम-समुवाम का कठोर सामनामम जीवन यदि इस कार्य में प्रारों की अपेक्षा ममिक भीम्रतापूर्वक सफलता प्राप्त कर दो इसमें कोई प्राश्पर्य नहीं।
१० मानव जीवन की सार्थकता फा एफ प्रमोघ उपाय -वामी मी प्रमपुरोगी विमान विश्व के प्रत्येक प्राणी का पेप-दुस-निवृत्ति एवं मुत्र प्राप्ति। इस रास्य की सिसि ही उनकी समस्त बप्टापों का जमना पाई। इसकी पूर्ति के लिए ही उनकी पारीरिक मामसिक ऐनिपिक भारिपारी प्रतियां होती है। विदेशी पौर रिचारपीम होने पाभिमान रखनेासा यानर प्राणीसोपपने सम्प की सिर करने के लिए मन्यों को माप प्रप्ट करने पर उतारता है अपने सुम्मा उप को दूर करने के लिए दूसरों को प्रपार दुपापर में बोव ए सनिक भी पापा-मी नहीं सोचता भरने पापको मुवी बनाने के लिए पम्पों का मुन घीनन में तार रहता है तो भूर बोमने में मिपावापौरन पोरी परने में ही पामाता र नियुक्ति एवं मुख प्राप्ति के सापों मनुषित पार्यों रामपहकरने में तन मन पन पन पारिकी शक्ति का पय प्रार प्रमाण म करता रहता है तथापि म तो यदुर होता पौर न मुरा ममोप भाना ही पठा।। दुल हटाये हटता नहीं प्रापुर बिना पुलाये ही दुर पौर गणपम मान न मान बारवे और मुन होइगर गुमाने पर, हबार प्रयम कान पर भी दूपतिदूर भागता फिरता है पवित् प्राप्त होगा मी है ना उममे पार भी मरिक सुप-मोग पो ताममा को टीम रूप में दीप्त कर एक परकारे में प्रमीम हो जाता है। उम रागिर मुगामान " तृप्ति होती तो पमम पो उमटी शिपम-भोग को बासना ठीन हो जाती है पौर पमन्तोष की प्रागनी प्रमाणपण भागती है। एम प्रभार पाह, पपा पपिरत प्रयत करते-करखे भरपर सोप पोप शे पाने पर भी पर सफलता के न दुर्मम ही नहीं, पमम्मा मासूम नहर को नई विधारणा पनि समेहरले सको मुम्मम है रसि गायों की मानापमान के पारण म समय में किपे गाने पासे मानव-वर ही सामाका एक प्रमोप पाप मरे प्रपल ही गमत हाँ पत प्रपन से म्यादा पानकारी रखमे मात किसी सम्बन पुस्प को सम्मति मेनी चाहिए। अपने सन्देह का समाधान पाइने बानी अपनी शिसा को शान्त करने के मिए विज्ञानमा सम्पन पुस्प की सोच में भब बह पति अपने चारों पोर एप्टि गमता है तब उस प्रायः सभी मनुप्य मपन समान ही पिताप से संतप्त प्राधा-कृष्णा की प्राम में मन-मुमसते विषय-वासना मे मिलन मुख की सोग में हसाये कुत्ते की भाति पर-उपर मारे-मारे फिरते प्रशान्ति के स्त्रों के द्वारा उत्पीडित काम-कोप प्रादि से कम एप सामर में निमम और प्रगाम्त राम ही दीखते। यो समर्षय पान्त इपय । उमें देखकर उमें नूग प्रावासन मिलता है कि भवत्य यह सरगन मरी पिरामित पुल निवृत्ति एवं मुख प्राप्ति स मुझे मिमा पर्योकि सायं उससे मिल चुके है। उपरोक्त गिद्धामु म्यक्ति उन विज्ञानवान् सम्बन के समीप पहुचकर प्रार्थना करता है- 'मपन् । किन उपार्यों से प्रापने अपने निमिडलों की एक परम मुछ की प्राप्ति कर रखी है ? क्या कोई और भी कर सकता है? पविहां वो भाप सन साधनों की मुझ पर पमुकम्पा कोगिये। उसके उत्तर में प्रणव का उपदेश येत हुए उन समझवार समम ने कहा-'पुष पाप का फल पाप के न गने पर दुख नहीं रह सम्ता पार पाप होता है हिंसा प्रसस्य मस्तेप मामयं तपा परिपह से । सप्रयोबन मा निप्पयोगम किसी को भी सत्ताला हिंसा है। प्रमुक पात के बारे में पपन मन का वो पाप हो उसके विपरीत मोमना पसत्य है । दूसरों पी पनुपयोपी भौगों को भी उनकी प्रसम्नता पूर्वक प्राशा के बिना ही अपने उपपोम में घाना या साने का संकल्प करना स्टेम (चोरी) है। तो तपा मास्त्र-मर्याचा के विख्य विपर भोगमा मनापय है। मोम्प परााँका नागायन तरीकों से तमा यस्रत से भ्यापा बटोरमा परि महाल पाचों से या इनमें से किसी एक गे से भी पाप पैदा होता रहता है। पाप पैरा होने ही म पाये इसलिए हिंसा के विस्य पहिमा प्रसस्प के विष्य सत्य स्वेय के निम्न प्रस्तेय प्रापर्य के पिम्स एपर्य भोर परिपह वेशित परिणम्, बर मा. पनाम, मापनी माप करते रहना चाहिए। - पषत की और अपने माराम, लिए भी पम्प मापन में मैममाष भी विप्न महोन पाये इस बात का ता पम्प को अपने तन मन पन पै पाराम पहुंचाने मा पनि मर प्रपाम से पहना पहिसा है ।सा वेशा मुना समय है जैसा ही गोमन पी भरसक पैदा करते पना सरप है। जिनके पास प्रापायवा से पगिष्ट भोग्य सामग्री है, सम नी र रानी-यूपी से तो मेना मही तो न सेना प्रस्तेय है। पम्प स्त्री या पुष्पों पर बासना मरीडाप्टि न करना पर्व है। गीन- नियहि के उपयोगी पापों का अपभी पापायकवा से पपिक और मरों की भाषापना का पोपण करके संग्रह म परला प्रपरिणह है। पापों का पपागति पामती प्रश्न नाता है। इस परगुनत के मनुप्यम से पम्म- पम्मानर का पाप निवृत्त हो पाता है और नया पैरा होने नहीं पाता । उचित तो यह है कि माता अनुष्ठान तन मन मगरला पाहिए । सदर साम-देन में मब काम में, सब निमित्त से पार सय प्रबरपा में परिंगा प्रादि पापा पतों पा पासन करना महापत माना गया है परन्तु मतमाम युग के सोर्गों के लिए पह गायनरी पर परशुवत का भारेम है । प्रगमनमा पातर तो पाबाप-पर सभी को भरना पलारी मारिए । प्रणामी निणाप हापाना है। पाप के पमायम कर जाम पर, पाप रे फम इतनी पत्पन्त निनि प्रपन प्राप हो जाती है। दुग मे मा हुमा मुग पुगपूर होने ही सा पुटिन हो उठना। कहीं बाहर मे इमाना नहीं पाता क्योंकि अभी रे पाम प्रारम-स्वरूप में विधमान ही है। रिपमान मुष भी पाप पाग सपाहत होने के कारण प्रतीत नहीं हो पा पा पाप माराकार। मनाकुन हुमा स्पर्य मामिल हो पाता है। बस भी मैं मानव जीवन की मानना है यही मानर-पीपन की एपमता का प्रमोप पाप है। मगर कोई पगुणा बन पपने पावन रे प्रपाम प्पेय पो सा पोरसपा महाती बमन 17ौमाप प्राप्त करें। इघ उत्तरमा एमावार प्रातरण गरम मे उम निजामु परिती निमामा पान हो गई। माती भासा मे च महापती जीवन की रेखाए -श्री मिभीताल गमवान बित्तमात्री मध्यप्रदेश पिन के लिए रेखाएं प्रपेधित है। बिना रेखा के चित्र नहीं बन सकता। चित्रकार कितना हो सिरहस्त क्यों न हो विना रेसा यह चिप नहीं बना सकता चाहे यह विभकार ईस्वर भी क्यों न हो? इसी तरह जीवन-मुपारी सुरुमात से पूर्व उसका सुन्दर चित्र बना होपा रेखाएं मीपनी होंगी। रिना रेसामों के बीवन में ताकत महीं मा सकती यह पक्तिमामी महीं होता उसमें दुपयों का सामना करने की पक्ति नहीं होती। प्रत बीवन की रेखाएं। यह पावस्यक है कि प्रों की रेखाएं बीवन में विर्षे पौर हम उन पर अपने जीवन की कलम को घमायें । पाप का हिन्दुस्तान पान से यस वर्ष पूर्व दिनुस्तान से भिन्न है । पहले यहाँ रामा राम्म करते थे अंग्रेजों का शासन वा । मब यहो जनवा का राम्य है, पत पौर प्रषिक परी है किहमारे देशवासियों के गीवन में प्रत पाएँ । मे बुराइमां से पये करें पौर विसुर मागरिक बीवन का निर्माण करें। उमके पीवन में मुठ न हो पोरी करने का इरारा न हो पा की वृत्ति न हो। उनके जीवन में प्रस्सिा हो सेना का व्रत हो। प्रणुप्रव-पान्दोसन मेरी एप्टि में भाव की राष्ट्रीय प्रायस्पाता है। मुझे इससे मतमय नहीं कि पान्दोमन किस शास्त्र से सम्पन्न रखता है। हमें यहाँ उसके अन्दर की कठोर बास्तविकता को देखना है। प्राग जीवन में व्रतों की रेखाएं नहीं है। इस तरह जीवन की कमबोरियों से ही तो संसति का पतन होता है। यह उत्थान और पतन की परम्परा बसी प्रा दी है। भारत में मनुमतीऔर मग-वर संतति का उत्सान हुपा है यह भोग के सहारे नहाँ त्याग की सक्ति हमा। भार पावन में स्पाम बोना है, उसकी रेखाएं सारनी है। बिना पुरपाई मापना पौर कठोर प्रतिमा के बीमत में पाप का सतरमा सम्भव नहीं। अपर यह इतना सरल होता तो प्राचार्यनी को इतना पुरपाई नही करमा पाता पार पशुपतियों की संख्या पार हमारों नहीं मातों होती। में पाप-प्राम्दोमन को पक्ति प से मेकर समष्टिम्प तक रेसता हूँ। मेरी यह निश्चित मान्यता किमरे सभी सी-युप्प पाबास-पर रहें जीवन में उतारेंगे तो बान का एक बहुत का काम होगा । मेटिन पो पाम्दोलन की मोर मुग नहीं, निसने यापना नही की रातों पर से परामता है? मेरे मन में पति मना है पिनाम है सामना नहीं है फिर भी माt के प्रति मया है। पम्याईकी पोर माने दीपको उम पोर में जाने की उमाना है। मानी मन्तला को भाश्मों के गमा सना भी अपना एमनापौर मोमिए यहाँ प्राया भी है। बहुत से मोग पाहते है पत पोर पापारा पहपरले उमरिस म भन्नरमा नही हाती। पर्ष या पर्व पर पहले नही अपमी दुरी प्रतिपों को खाते मारी और पारम-नियमन रागानही मार्ग पर चलते हैं पदवीन गमझते हैं। यह पमव ।। रिमी के प्रति परिणाम राना परिमा नहीं। महिना यह पारण, सिम उम पाग-पड़ीम पामे निर्भय हो गये। मेरे सोमी को यह विरान हा सामिपरिजमापन हूँ। मोहाप सनरा प्सिौ मीता का पनि होने वाला नहीं है। पही मबगेनी पहिगा है। हिन्दुगतान पार यह पोपणा साबिर पुर मही करेगा मित्र ऐना पो मन पर-अप में प्रस्तोगी पा राहत मिनी मी पपार यदि स्म और ममेरिता पोपणारा नमार पोलिमिपी माय पापातावरण बनेगा । महलों मी गालि । नेपाहे पोमें प्रगरला में भागु भी न तो या पाहर नही पना-मारमा पर पुष परेमा बाम गराई पार नहीं पाचन मानरमो धमार भीषन को रेखाएं सेवा के लिए इसान बनाकर बाहर निकामेगा यो कठोर व्रती हगि मौर भयंकर प्रमोमन से भी रिगमेवाम न होने । इम गिर मये, हमारा पतन हो गया यह कहत सुनतातो दुख होता है। मैं यह मानने को बिसान तैयार नहीं कि हमारा इतना पतन हो गया है। में मंतिक पतन दुध कमजोर भवरम हो गया है। भार हममें दुराई का सामना करने के लिए एक सिपाही की-सी शक्ति नहीं है। प्राचार्य भी तुमसी मे ऐसे समय में प्रमुबतों की मौनिक विचारपारा रखी है। मेरी दृष्टि में वही सन्पा सापक शानी सन्त और महात्मा है जिसका पिक पन्तरग की यमाता को पता है। मेरी यह निश्चित मान्यता है कि बिना इन बातों को अपमाये देसवासियों के प्रति पम्पा पैदा नहीं हो सकती। पाप अपनी इच्छामों को भी बढ़ा प्रौर परया भी पैरा करें, यह दोनों एक साप सम्मब नहीं है । फरणापय से पैदा होगी सिर्फ कहने से नहीं । प्राचार्य भी तुलसी के बर्तन मौर मणुपती बन्नुमों के मिमने की उतष्ठा ने मुझे यहाँ मा समा किया है ।म प्राधा रखता है कि पाप प्रणुप्रयों को विचारों तक ही सीमित नहीं रहये न माचार तक मे पाये। पबरों की एक-एक मात बीवन में उतर गई तो निश्चित सममिय इन हमारीपों के प्रमाण से हमारा देध स्पानियों का महपियों का नन नापरियों का वेध बनेमा पौर एक बार फिर बह प्रारम-मो से पपमगा उठेया । म समझता है कि प्रणुपत भान्दोमम से हमें बड़ा पापक नाम मिमेमा । परपुप्रव-पान्बोतम हमें सन्मार्ग पर मे पाता है इन्सानियत की परिचाता है और हमारे मुह की तरक्की में उसका महान् योग है।
अर्जुन का प्रश्न और प्रणुपतवार
सम्पारम-गरमीत
पौसा में मन मे भीड़प्प से एक प्रश्न पूपा है-
'प्तिमस्य का भाषा समापिस्वस्यमब
स्तिपीहिमभापत दिमन्तात रिम ?'
है न ! समाधि में स्थित स्थिर बुद्धि पाने पुष्प का मपण' क्या है?
स्पिर युधियाने पुस्प से मान बोलता है? बसा है? से पलता है?
ऐसे ना ना, पकना पूमना मनुष्य की बात साभारस मिाएं
जिनकी मोर किसी का ध्यान पसी नहीं पाया पर इन महर प्रिपामों में भी
मनुप्प
रिला मान रिये पाखिला है बस्तुत मनुष्य प्रारमन
का पक्तिक प्रतिषण
मिरता है। मनुष्य पाई किसी भी स्पिति को
गों न पहनाये उस रस पद से दैनिक जीवन की हम फोटोयोटातों
की महत्ता में कोई कमी नहीं मावी है।
प्रवीलिए भीडपण के मुख से पोपी, सिमा समापिस्प पारि महारम्य
मुनकर अर्जुन ने उनसे पूपा पार्वपर। या पवारपे कि विधि
पाने म्पक्ति का सापाप पाचरण सा होण?
म देता नहीं मानता रीता में जिसके लिए पोपी स्थितनुदि सना
पिरप भारिपी मझाएं पण प्रयुक्त
पीई मताकि पश्चि होगा
है सिम सपमा मा योगी प्रपरा स्थितप्राणी पसमा
पाणापर्म गुरुपरमोन यो समान प्रति पमापनमारी होने का एक
होता है और समार दी चीनीपी मोटी-कावी परिस्थितियों के प्रति
पार्मम पदारपीन पी पिता में माने मन्त्रमुप मनुभव करने का
य भईन का प्रश्न पौर प्रमुबतबार समर्षक होता है । उनको कम्सना का मार्ग पुस्प महाप-बीबम में गृहम ए कर, रण में प्रस्म-शस्त्र उठाकर, उस्लास के घरों में उल्मसित होकर भी समाधिस्प कहे पान का पधिकारी है। उनके मान उनके कर्म और उनकी भक्ति की योपनयी पी इन पासामों को मस्सल सत्ता नहीं मानता बस्किम उनको एक दूसरे का मन्योन्यामयी मानता हूँ। अपने इस विश्वास के कारण में इस प्रश्न का यह रत्तर भी दे देना पाहमा जिसे धामण ने दिया है । पीकृष्ण ने उसके उत्तर में कहा है- प्रमहाति या वामान् सर्वान् पार्प 1 ममोपतान् । प्रात्मम्येबास्मना तुष्प स्थितप्रज स्तबीयत ।। पिनुमिना मुप विमतस्पृहः। बौतरागमम मेम' पितमी मुनि पच्यते ॥ समालमिस्नेह सत्ताप्प सुभाशुभम् । मामिलवति न मि तस्य प्रशा प्रतिष्ठिता ।। प महरते पार्य कर्माग्ङ्गानीम सर्षभ । इनिपासीमियाम्प तस्य प्रज्ञा प्रतिष्टिता॥ विपया विनिवर्तन्ते निराहारस्य हिम। रसबर्ग रसोम्मस्प पर निवर्तते ॥ पततो प्रपि कौन्तेय । पुनपस्प विपश्चित । इगिपापि प्रमायोनि हरन्ति प्रसम तामि सर्वाधि संयम्प पुक्तप्रासीत मत्पर। बो हि पस्पेगिद्रपाणि तस्म प्रहा प्रतिष्ठिता॥ प्पायतो विषयाम्पस मा स्तेपुपचायते। संपात्तंचायते कामाकोमोभिनायते॥ कोषागमति संमोह समोहात्स्मृतिषिप्रम। स्मृति पार दुरिमायो मुनिनामात्मनायति ।। रामोपरिपतस्तु विषयानिमियश्वरम्। भारमनस्वैरियारमा प्रसारमपिमध्यति ।। मम ॥
अर्जुन का प्रश्न पोर मणुव्रतवार -पीडामबम दम्पार-वनीत मीता में प्रन ने भीरपण से एक प्रश्न पूछ है- 'स्पितास्य का मापा समाधिस्पस्य ! स्पितमी किममार्पत किमासीत प्रमेत पिम् । हैन । ममाभि में स्थित बिर युधि पाते पुरप का ममम्म क्या है? स्पिर पुजि पामे पुरुप कस पवन पोमता है ? 2से बेटवा से पनवा? ऐमे रना बेला पमना मना मनुष्य की बहुत सापारण पिाएं । मिनी पौर रिमी का मान बस्ती मही माता पर इम सहन विधाओं में भी रिसे मनुष्य बिना पान रिपे पारित करता है मस्तुव ममुप्म के प्रकार मन का पक्तित्व प्रतिषण निपरा करता है। मनुष्य चाहे किसी भी स्पिति को पोंग पहप बाये उसके उस पर से रैनिक जीवन की ल पोटी-पोटी बातों की महत्ता में कोई कमी नहीं पाती है। मीनिए श्रीकृष्ण के मुख से योगी स्पिवमा समापिस पारि महााम्प मुनकर मम मै उनसे पूणा दिपायबर ! मह बजाये विधि पाते पति का सापारण पाचरण कैसा होता है? में ऐसा नहीं मानता कि पीता में जिसके लिए मोपी स्पिनर समा- पिरप पारिपी ममाएं पण में प्रयुक्त की है, वह कोई मौलिक पक्तिोला १पति म ममममा पास योगी पर स्पिवयप की पसना मा पार पुरष । पोन तो रामार के प्रति पसायनारी होने का समर्मक हमा और न मार पीबी-मीची मोटी-मरगी परिस्पिटिरों प्रति परमय पार पीन पी नि में अपने अन्न मुप के पनुमा करने से . मन का प्रश्न पौर प्रगुप्तबार समर्षक होता है। उनकी ग्रामसना का पावर्ष पुरुप गृहस्प-बीवन में गृहस्प ए कर, रण में पस्त-मस्त्र उठाकर उस्मास के क्षणों में उस्लसित होकर भी समाधिस्प कहे पाने का अधिकारी है। उनके शान उनके मर्म मौर उनमी मक्ति की मोपत्रयी की इन साचामों को मैं स्तव पत्ता नहीं मानता बस्ति में उनको एक दूसरे का भम्योग्याभयी मानता हूँ। अपने इस पिएमासकारण मैं इस प्रश्न का वह उत्तर भी देना चाहूंगा, गिसे भीकृष्ण मे दिया है । भीक ने उसके उत्तर में कहा है- प्रबहाति परा लामाम् सर्वान् पार्ष | मनोपताम् । प्रात्मम्येबास्मना तुप स्विताच स्तबोध्यत॥ सुषमहिप्नमना सुरेषु विगतस्पृहः। बीतराममय कोष स्मितमी र्मुनि इध्यते॥ सवानमिस्नेह तत्तत्माप्य भुमामुमम्। माभिमावति न मि तस्य प्रया प्रतिष्ठिता ॥ पदा सहने पाये हर्माननीय सपना इमिपागोगियाम्म तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥ विपया बिनिवर्तन्ते मिरहारस्प रहिन । रसबर्ग रसोभ्यस्य पर निवति ॥ मततो एपि कौन्तेय । पुनस्यात्य विपचित । इमियापि प्रमागीनि हरन्ति प्रसम मम ॥ तामि सर्वारिष सयम्म पुप्तमासीत मत्पर। बमे हि पस्येतियागि तस्य प्रहा प्रतिष्ठिता॥ म्पामतो विपपास सङ्ग स्तपूपजायते। संगावंबायते कामारकोपोमिबापते ॥ कोषामति समोर संमोहास्मतिविप्रम। परिमाशो पुरिमानाप्रपामति ।। रागोपविमुक्तस्तु विषपामिगिपरन् । प्रारमयाविषयारमा प्रसारमपिपश्यति ॥ स्मतिमा १५ माती पोर प्रन । रिम काल में या पुरुष मन में स्थित सर्व कामनार्यों को माग देता है, साल में पारमा से ही प्रारमा में संतुष्ट हमा सिर दुनियाता रहा पाता है। सपा चौकी प्राप्ति में गम रहित है मननिसका मोर मुखों की प्राप्ति में जिसकी स्पृहा रहा है या सिके राम मय प पारिनप्ट हो परे हो एसे मुनि को स्पिर मुद्धि कहते है। यो पुष्प सर्पक माहित नापा होता! पापुन पौर प्रमुम पातावरण में मप्रसन्न होता है और मरेप करता है नमकी दुधिस्सिर एपित। पैसे कपुपा अपने अंगों को समेट नेता है । पुस्प पर सब पोर से अपनी हदियों को विपयों से समेट मेना है उसको बुरि स्थिर होती है। इग्रियों परिपपों को न पहरण करने वाले पुष्प के भी मन विपर निवृत हो पाये। परन्तु उसका राग नियुक्त नहीं हो पाता । स्पिर दुरि पुस मह है जो पप में भी गुल हो गया हो। हे मग ! मन परले दुरिमान पुस्य के भी मन को यह प्रममा स्वमार वामी मियां समातार से परमेठी। इसनिए मनुप्प को चाहिए कि मम्पूर्ण नियों को पत्र में से समाहित पितहमा मरेगरण स्पि हो पाकिमिम पुस्स की इनिया परा में होती उसकी ही दुरि थिर होती है। हेपन | मन माहित इगियों को पा में करके मार न होने कारण मनरेडारा विषयों का चिन्तन होता है और पिपयों का निस्तनपने पाले पुष्प की न रिपर्यों में माना हो जाती है पार पामति से उन विपयों की पाममा उत्पन्न होती पोरमना में दिन पहले से भोप रसन्न होता है। मोष परिष वाम होता है पार पनि स्मरण-गति प्रमित होती है रम्भिक प्रमिव हो पाने स मान-सिमामार होता है मौर पति पर होने ने मनुप्प पाने पर मापन से गिर जाता है। परनु मातीम पनपण पामा पुरष पमप रह पान पमपी हरमियों ारारियों से भोगता हुप्रा पमरण पी प्रसन्नता को प्राप्त प्रमका प्रश्न और प्रमुखतबार होता है। गीता में प्रन के प्रश्न के उत्तर की समी पवश्य पुरानी कही ना धासी है पर पर्युन का प्रश्न भाग भी सम्म संसार के लिए पूर्ववत् अपने स्थान पर बना है कि मानव को कैसे बना बैठना चाहिए मिससे कि उसकी इन भिमामों से देश राष्ट पपा मानवयाति की प्रतिष्ठा परपरा म पार ! मेरा ऐसा विचार है कि प्राचार्य तुमसीहारा संचामित पशुवत इस प्रश्न का उत्तर है। प्राय के युग में मस्तुत समान का एक ऐसा विकरामस्प व्यक्ति पर का मया है और पप्टि की ऐसी प्रबहेलना दृष्टिगोचर हो रही । पैसे कि म्पष्टि मर ही बायेगी । पर पप्टि केयन इसलिए नहीं मरने वासी है कि समष्टि का मापार वही है । म्पक्ति के न हमे स समार नहीं रहेगा। प्रत इम सामासिक पावन के प्रति कितन भी भाग क्यों न हो पब म्पति का पापरस कमक्ति ऐसा तो समाग कमी निकरक हो ही नहीं सकता। पाचार्य तुमसी का पान्दोलन समान के नारे न गुमन्य करके समान की फाईगोपन में लगा है। कहना चाहिए ममार के पुनस्वार का मही एकमाल सही मार्ग है। इस युग में जबकि सारा बम परस्पर पिपि वैमनस्य मोर हिंसा में बमा या म ममार के हर सदस्य के लिए मामश्यक है कि मामपमा मतम्य प्रपमा पर्म पर अपना कर्म-पप पहबाने और मानव-वाति दो बीवित रखने के लिए कोई ऐसा काम न करे जिससे हम पानि में प्राहुति परे । इसके लिए निरषय ही कोप वेप रान माविमो ममस्कार करना होमा पौर महत सहिष्णुता से दूसरे के निशारों को समझकर 'ता' वेलना सीखना होमा ग्यका सम्मास करना होमा और उसे कार्यप में परिणत करना होपा । चीन की एकमा है कि एक राममन्त्री का परिवार पाठपग पा पौर उसके परिवार के सभी म्यक्ति या प्रेमपूर्वक रहत पे। पब यह रामममी प्रति सा हो गया और उसकी मृत्यु के दिन निकट प्राये तो एक दिन पपा ने पूषा-प्रातिर इसने यो परिवार में इतना पौहार्द तुमने से बनाये रखा? भरीर पति बर होन के कारण परमन्त्री कुछ मोस न सका। उसने कार पर प्रगत की पोर एक घन सिरिया-- - सहिपापा। पर- पाचारों को समम्मे की बटारमा मौर उसे किसी प्रकार देस न पहुंचन पाये इसकी प्टा करना बस्तुब दो ऐसे गुण है कि पनि कहाँ प्रम्पास हो जाये तो फिर मनुष्य देवता हो पाये। अपन परीफ में एक प्रमह परमात्मा की उक्ति पाई है-'परि में चाहता कि सब एक मवावमम्मी हाँ वो में दूसरे मत पैदा ही म करता। इस नाना-कपिणी मामा-पारमारिणी दुनिया का दुनियापन ही मामात में है और इस मामाल में प्रषिक से अधिक समन्वपदकर अपने को सम पम में छा मेना ही मामर-डिप्रपरा मानर पर्म का सबसे 40 गुण है। मा गुण अभ्यास में ही उम्भव प्रयास-समास से ही सम्भय है, संकाय विचार से ही सम्भव है और प्राचार्य तुनसी विचार और संगम तक मंगुती पका कर म्यक्ति को समाप के विशाल प्रापण तक पहुंचाने का बो प्रयास कर उसकी चिनी भी प्रपंसा की पारी बारी है।नरसी भात का बप्पर न तो हने पहिये ये पौड़ पपई मागे बोर पा धानना ही प्रस्तुत और पौर पौडों की महिमा है और वस्तु बही गुगण ममातन-रिक पार्मिकोंपर्म माण। पही महनीपा पंचपीन! जिस पर भारत की परराष्ट्र मीति पापारित है मार ही मायागी का जीमन न पा जिसे पाराम बाबा कहते है। प्राचार्य तुमसी के प्रपात को मपक्ति कसमार + पति स्यमहार का पाकरण भागार माम मरापम परीर के लिए मही कहा या ममता कि पान पड़ेगा पार या नहीं परमेय स्वयं ऐसी ही पनि पुप पममम प्रा बाये और पहारसोबाप ठो मानव बोने का स्वार हो पाये । रिन मुख होप न मान भावार्य तुमची प्राचार्य -ग। मपवान् करे पर प्रापीर और पप-अपन में पहनराधम भी रोही पार पम मही मार्म परपस में समर्थ हो पाये।
मान्वोत्तम की मावश्यकता --भी पोपीनाब प्रपन पम्पल-बम सम्पक समिति रिश्ता पराषत-मादामन की पावश्यक्ता क्या है यह प्रश्न अक्सर पूछा गाता है। पिन कुरीतियों पार दुर्गाबहार को दूर करने के लिए प्रणुबत माम्बोजन बमापा गया उनसे तो कोई कार नहीं करवा परम्तु कमी-कमी यह करा जाता है कि पार भी सस्पाएं तो पाम कर रही है इस सपा के प्रसम बताने की क्या भावपाता है? इससे भी इन्कार नहीं किया जा सकता कि देश में बहुत-सी पन्धी पनकी संस्थाएं बन रही है और उनका प्रभाव भी है। इसलिए यह प्रश्न गम्भीर हो पाता है पिपराव-मान्वानम अपना काम अलग पोंचमाये? इस प्रश्न का उत्तर देने से पाने इस माग्योसन की रपरेना बता देना बहुत प्रारम्यक है । यह मान्नतिन राजनैतिक नहीं पति मैतिक है पोर इसे नैतिक कहते समय भी एक बात पर ध्यान रखना चाहिए कि इसकी वृप्ति पन्तरंगमुषी है। पात्म-सुधार के पारा जगत्-मुबार इसका लक्ष्य है। प्रणबती के लिए भारम-चिन्तम मार पास्म-निरीक्षण प्रति भावपया है। इसलिए समनंतिक संस्थानों में और इसमें तो मुस्प मेद या है कि रागर्नतिक संस्थाएं बहिरंग मुसी होती है । सपित का बहाना सापाव का बना है और अपने प्रमुख को बहाना उनका मुस्प मय होता है । इसीभिए रामनतिक पार्टियां पसपात बहुत परती है। प्रपना बुरा प्रारमी हो तो भी उसका साप दो दूसरे पक्ष मा मनुष्य चाहे अन्धा मी हो परस्तु से गुप कहो। यह पब राजनैतिक पार्टियो करती है, बस्ति उनको करना पश्वा है। प्रब नन पाटियों को में बो रागनैतिक नहीं पामिक। सब अपन-अपने धर्म को घेष्ठ वतात है मौर धर्म बब सम्प्रदाय का रूप धारण कर देता है ४१ ४२ प्रपतको मोर तो इसमें भी पसपाट पुर हो जाता है। इसलिए उन संस्थापों मोर प्रयुषा- मागेमन में भी एक मौलिक भर है। घर में देश को उस सस्था को मेवा है बिममें महात्मा गांधी के सबसे प्रषिक पर सबसे बो अनुपायी पाये जाने के यानो भूदान की मस्सा जिसकी मागगेर पापाय विनोबा भावे जैसे तपस्सी के हार म है। इस समय इस मंम्पा पा पपिपतर शोर रान पर है। भूपान मम्पनिशन श्रमदान पार पामदान एस्पारि मर शानदारीपतु पणु बत मान पर नहीं बलि स्माप पर जोर रिया गाता है। यह एपगारीक- सा भे, फिर भी मेव पर। हमारे देम में एक संस्था मारत भेषक समार भी है। इसका नाम रचनात्मक । परन्तु बहिरपमुखी है। इन सब संस्थानों के कार्यक्रम पार माय पर विचार करने के पार पशुपत-पाहोलम की पावरपरता प्रवीन होती। माँ तो एग्य-म्पपस्मा मी नतिमता रखने के लिए ही है परन्तु कानून के परिये पो नैतिकता कायम होती है उमरी गई गत मगपूरा नहीं होगी। हर शामन समान की कममोरियों पर स्पापित होता है। पार्थ समारतोपासनहीन ही हो पाता है परन्तु यह विषप पौर है। मुझे हो पाना पा जिस समार को मासन की पावस्यता महोबा पार समान ही हो सस्ता और माग समारमा पाबार पादर्स म्पक्ति की कामना पर पापारित ।।स हिमाल से मसुनव-मानोनन पोर मोश्य समार का मन मापार एकहो।। मुझे दुरकिइम पारोसन का विरोर करने वामे भी मौरी और गम्होंने बहुत दीप पारों में पापोगना की है। कोई पशुवती पार से पिर गाये यह तो हो सम्मा। परन्तु इससे पसुपत-आसन पर क्या रोपारोपण हो समता है? जैन समारमा म्पपिस स्पान मापना नहीं रखते इसमें पैन मिशन्तों रा या दोप? हिलू ममर पासस्यमय जीवन बिवाम तो इसमें पीता पपा पर मुमतमान समानता विवादों के पिता को इस्माम का पार पुना ? बोबो रासनविकरन गिन पापार पर पापम है मरे मानने मासे परे म उन पारयों पर कही बस पाठे!! सिवात प से पणुषत पान्दोमन एक महिमारमक माम्ति 1ोठा है। पर कोई इसमी तब प्रामोजद की प्रायत्यता - प्रतिमाएँ म ने सके तो पोपी प्रतिमाएं भी बी मा सहनी है। विद्यापियो के लिए इतना बाकि वह या पार प्रतिमाएं में लिपब म पियेंगे अपने विवाद में करारखाव म होने देंगे, हिसारमा काम न करे और नाम न करें। मापारी रिक्वन रेमे और ईमानदारी से सौवा करने पूरे मापतोन पौर मसनी मास ने की प्रविनाए हैं। सरकारी कर्मचारी रिश्वत न सेने मोर धिपूर्वक काम करने की प्रतिमा कर में पार मगदूर प्रपन हितों के लिए प्रपल करते हुए भी पूरी मेहनत करने का प्रण कर में तो हमारा देस गए ऊंचा उठ सकता है।
व्यक्ति का प्रण विकास और सामामिक तम्लप्सि -रमिकर "पुर पित पार पुर भीवन नामों को परमेसर पपना हार देकर उठाठा है। पारमा का समाधान सम्मों से नही होता।" प्राय मागासालिया प्रचार का युग है। प्रशासन सम्भापाप रिमप्ति पारि उसके प्रभिकार्य प्रेम रितनी पुस्तः पत्रिकाएं पार प्रापित होती है, उतमी शापर कमी नही होता पी। मेकित पाकामा दिउससे मनुष्य का पीयम पुराना है उसको प्रमिक जान हासिन हुमा है, उसकी वृद्धि प्रति मेशी बनी है, मानसिक पुणों का प्रषिक विकासापा-मात्मरमा सरला ही होगा । इवना प्रसयत स्थानी र पस्सिद चत मपपुफ्त मानक कमी पापा कह नहीं सकते। मापा में मसर क देश में बारसम्म बसा रोखता है। जानकारी संग्रह का नाम सित्ता मही है। ताकि मुपसता अनम बात है पौर पिक्षित होना मतप । दो मा मापा पाहित्य का उपयोग ही घोर दिरा गाये ? परतो बिनम पमुपद स्थिति में मामय-ममाग बना पापेमा। पैसा प्रस्ताव नहीं है। पमुमो की मापा नहीं होती। हमारे पास माषा है। किम रसका गस्य क्या होना पाहिए, यह स्पष्ट मामने रखना है। बिना पनों के सिवाना पौर बिना कुछ किये दूसरों के उपयोग में माना सबको महाँ समता'। 1 Hany wordt do bot Athly tho soal, but good tiro comforteth the band in puro conscience preth great dincu la tho sigtet of Goch To touch without Yords ud to be a reful without action for among men are mapable of this ४ । मेव का पुरु-विकास और सामाविक गति इस विधान के युग ने हिसम ग्निासकारी प्रस्त्रों का निर्माण किया है। की प्रष्मिा स्व से पहत्त, वृत्तम की मोर पती है। छोटी हिंसा से म महीमा तो बरी हिंसा का सहारा लिया बाता है। महिंसा का भी एक बान है। उसमें भी योग होती दी है। उसके भी प्रयोग हुए है। उम सबकी नबीन करमा प्राय मानबता-प्रेमियों का परम पुनीत एष प्रावश्यक कर्सम्म । भूदान-या उसीका एक प्रयोग है। उससे अहिंसा का मास्न मन रहा है। उस विचार की बुनियाद पर बहसग है यह एप सरप विचार है। हर गुप्म में एक ही पारमा है और यह पमिल है। सारा मानव-समाज एक है पर हम सबमा पीयन भी प्रभिन्न है। उसमें जाति के धर्म कर्म के धन मेकरमा गलत है। विचार का उगम हमारा मस्तिक होता है। उसकी अनुभूति का स्पन माय हवय है। विचार की छानबीन की कसौटी सत्य ही होना चाहिए और सकी प्राप्ति प्रात् बीवन में अनुभूति पयपूर्ण होनी चाहिए। प्रम ही सी सस्प को पीवन में माने का माध्यम हो सकता है। मनुष्य की यह दोनों क्तियां मस्तिष्क मौर एस सिक्के के दो पहसू की तरह एक ही है । तीसरी स्ति इनियों की होती है। सरीर का उपयोग भी पक्ति का साधन बनता है। । तीनों भक्तियां मेरी बहाँ इसका मान है और स्पीकार्य है वहाँ बो धक्ति उत्पन्न होती है, उसकी कोई तुमना नहीं हो सकती। भारमल का विरोपण करना हमारी मुखिये परे की बात है मेकिन उसकी साली का प्रम्पास पौर उनुभव बहुतों ने पिया है । हर मनुप्प के भम्बर राई के सात टोक्ने गाला पौर मनाई केबमा पानम्र प्रास्यासन पवना पावापी देने मामा कोई बैठा । यह कौन नहीं कहेगा ! इस यम के निमित्त मनुर्यो की इन भारों पक्तियों का प्रदर्शन हो रहा है। मौतिक तत्वों को भी नैविक और पात्मिक मूल्यों पर में माना माहिसा की बास सूरी होती है। हमारे पाच बीवन में मो परारें पही --ब-प्रमी, पासक-सासित पोपक-सोपित बुद्धिजीबी प्रमजीपी इस्पारि के गलत मनारिमक है अनैतिक है। हिया की पोर मे पाने बासी है। मनुष्य को प्रपिक सार्की, कप पापी प्रमारी तथा सम्ण बनाने वाली है।
मनुप्रतकी पोर । इनमें किसी को भी पान्ति समाधान मुख नहीं मिल सकता । पर्ष ही मानमीप-सक्ति का दुरुपयोग पौर हास होता भायेवा । रसके सच्च स्वरप का पन पौर उसके प्रपूर्ण गुणों को सक्ति का नोप ही होता बता पायेगा। मे मार यो दुर्पपस्ता हिंसा अन्याय अत्याचार, गोषण दीखता है उसका सपाय निकाने बिना मनुष्य और समान मुखी नही हो सकी। परिस्मितियों का परिणाम मनुष्य पर पड़ता है। पनुन परिस्थितियों में मह विकास कर सम्म्ण है, प्रतिकूमता में उसके विकास में बाबाएं माती है। पार यह बात तो बहुतों के प्यान में पाती है कि मनुष नहीं दिया है परिस्थितिमा बिगड़ी है। इसलिए परिस्थितियों को परमने की हर कोमिम पर पोर रिया पाता है। हमारा भी लिमास मनुप्य के प्रमोसन में है। तेप्नि हम यह भूम नही करो कि मनुष्य में पल प्रन्याया हो । पुरे भाव भी हमारे में रहते हैं। इसलिए पापस्यकता इस बात की है कि मनुष्य की पपायों को प्रकट किया पापे । उनका उपयोग हो और उसके प्रमुहम परिस्पिति बने। पग मह हो कसे ? माहिर है गोरी प्रप्रिया से होगा। मनुष्य को मी रमझी मुपायों से मापने का बन देना होगा पौर समार में भी पनुगमता नानी होगी। विधार-परिवर्तन हप-परिवर्तन ममाम-परिवर्तन पीपन-परिवर्तन पसतए इसकाम है। भारत में प्रमक महापुम्पो ने सरम कीमोग में पहिमा की उपासमा में पपने जीवन समर्पित किये। पारे समाग को ग्नके उन प्रयोगों में अनुप्रासित किया । पदि मान भी कोई महापुम्प ल तत्वों का सहारा लेकर काम हाता हमा मायेपमा पाया है तो कौन-सी नवीन बातमीनता कार्यरमों में होती है। समार के सामने बो प्रारम् उपस्थित हो । उनको प्राप्त करने के लिए पाप बो पार्यकम से है उसौमें पापकी पसौटी होती है। मान-पन पैसा ही एक कार्यक्षम है पिसमें मानवताप्रिय प्रत्य के उपासका पार पहिंसा के पुगरिया कसोटी होगी । हमारा हरा-मोटापन इमी पर प्रसारमट होने मासा है। हमारे रियास की पहपई को मापने का मापा ही यह भूधन बनने पाता है।
४. व्यक्ति का पुण-विकास और सामाजिक यम्मति मनुप्प में पुष गुण पम्मगाव होते है पौर दुष यह माता (Acquire) है। उसका भी कोई नियम नहीं हो सकता। अपना-अपना परीमण करके समको तय करना होता है। मिसास के तौर पर मोचीगी में महिंसा यन्मगाव थी। यानी चमके जीवन स्वभाव में यह महराया से एकाप हो गई दी। बापर्य के लिए उन्होंने कम्नि परिमम थ्यिा वा मह उमकी कमाई हुई निधि पी। इस तरह अपने-अपने मन्तकरण को स्टोमना होता है मुस-विकास के निए । गुग्ण प्रात्मा के मौर दुर्पण परीर के ऐसे भी भेव किये पाते है। इस पर घे इसमा स्पष्ट है कि गुण विकास भिना पारमन्नमम असम्भव है। प्रारम- पर्यन के सामने कोई पुर्पण नहीं टिकता । प्रणुपत को मी में उभी यात्रा का एक सामन एक रास्ता मानता । ।कम्प दो मनुष्य को बड़े ही करने चाहिए। उनको हासिल करने के लिए अपनी-अपनी सुविधा पामर्प और वृत्ति अनुसार उपाय पत्तियार करम परते है। रिष्ट संपस और चमरो हासिम करने के उपार्यो में बिरोब मापा तो एक दिन में प्राप्त भी हो सकेंगे। कमी कभी पैसा मी भास हो सस्ता है कि एक मनुष्य मा सत्य समझता है दूसरे के मिए यह प्रसस्प समम्म पाये। यो हमारे लिए प्रमय हो वह दूसरों के लिए सत्य हो । मेकिन मेरे लिए पमा सरप है यह मैं जान सकता ह। दूसरों केपारण भूम हो सकती है लेकिन उसमें यरि मानपारी पौर निष्ठा के साप गरम होता गया तो प्रम महीं होगा । मणुपत में हम छोटा नहीं है ममे ही उसको हासिल करने के उपाय घोरे-मोटे हों। अक्सर मनुप्प-स्वभाव में कुछ बातों के लिए प्रषिक मात होता है और गुपके लिए कम या नगम्य । सिट मोगों की बात हम नहीं करते मेकिन जो सापक है, उनको तो छोटी से छोटी प्रति र संस्कार की पोर बड़ी सावधानी से बना होगा उसके मुबार की कोषिष्ट कामी होगी। हम मोर्गों +रोगीवन में म मासूम फितमे मई के संस्कार हमारी एमार पर मामों की एवं सापियों की मसापपानी के कारण पनपते रहते हैं। उन पर रोक भपाने का प्रारम्भ होना चाहिए। पीनी वानिकी औकही मिना है- "चरितवान् पुष्प का जीवन सरल होता है, फिर भी पनाकर्पक नहीं होता।
मरत की पोर मह पारा होगा। फिर भी उसमें एक पान होती है। पासप्ट होगा। फिर भी ससमें सन्तुलन होता है। यह पानता है कि महान् कार्यों की सिसिका पस्य छोटे प्रमों को मन्त्री तय करने में होता है।" भारतवर्ष में पनेक महर्षिों में अपने डेम से पारमोम्मति के लिए सामनाए की है। प्राचीन काल में यह एक परम्परा ही पोहता है-अपि मुनियों की। पिसे पापण्यारपबान उसके पितन में से प्रष्ट मा पारस पौर उप निपर निकले । गिनका गगत गहरा प्रसर भार इस देश के रहने पामों पर। इसरा या प्रसर रन समार-नेतापों का इम पर है मिनोंने समार की प्परस्पा समार की पना उसमें पाये जाने पामे मनुर्त प्रविम रिमिन्म वत्त मनोवैज्ञानिक तरल पारिका चिन्तन किया जिसकी मिसान प्रनेक मारप में पान हमारे सामने है। दुनिया का ई हिस्सा इनके पसर से पता नहीं है। पूगीपार समाजबार साम्पबार जनतन्त्र पापि के प्रयोग माग सच हो ऐहै। हमारे देश में भी उनका प्रसर है। पारपात्य सम्पता के साप यह पापा । सौभाम्पमस इस देश में एक ऐसा पुरप पैरा एमा निसमें इन दोनों का परसुत समम्बय समा। गौपीनी की रेप को परि कोई सीन पी वो बह यह पी हि पक्तिगत रम्नति समारो साथ (Iadiridoal progress to relation to Soelty) Fiat THT TT गई, सेवाही सामना बन गई। पाग मी बिस बीच की हमको बसरत है वह यही कि हम म्पति और समारको पमिम्म मार कर परें । म्मति का पतम यन्तित मी कायम ये पौर समार लिए ही यह निये । प्रप्यारम पार म्पबहार में प्रस्तर कम हो पिरोमामास पतई न हो। पुरम्पबहार ही सन्चा पप्पारम बन पाये। मदिर पार पुकान का विरोष मिट वाप। 1 Tho Ifo of the moral man plain and yet not opattractive it to amplo ed yot foll of prece it la cury and Tot methodical Ho knon that the accomplishment of great things copabts for doing little thione well.
४२ व्यक्ति का मुस-विहान पौर सामायिक गन्नति सुपारवार और समाज परिवर्तन प्रय हम मुरुप प्रश्न पर पाते हैं। उसर भूमिका की एप्टि से उत्त-चिन्सम कर मिया । अपने देश में सुधारवादियों की कमी नहीं रही। मोगों को पानी बातें सिखाने बाम हर समय इस देश में ऐ है। पार्कों का मन कराने के लिए भनेक यह यहां के लोग अपने-अपने पुरोहितों से कराते रहते हैं। पाप की शसना ही टूट पाये सारा जीवन पुष्यमय बन पाये बेसा कम होता पाया है। इस देश में धर्म को भी प्रपत्य से प्रपन्य पाप का साधन बनाने की नौबत मार पाई। बैक यही पमा राहत के समय दीसती है। बर कोई वर्ग या प्रवेश प्रकास बार मुफम्प या रोग से प्रस्त होता है पो तुरन्त समका म्यान उनकी मदद करने की पोर जाता है । बमह-ममह सहायता शिविर (Relief Camps) नुस परते है।कम्णा गुण उत्तम , मेकिन इम के पर उतर कर पयनीय ही बन पाता है। यह मही सोचा माता कि मेसी मुमीवत भी गा कहाँ है ? उसी का तान क्यों न किया बापे? पान भर्म मन्त्री दाते है, मेकिन देवस रात पौर सुपार तक सीमित रहकर निकम्मे ही मही वमवे उस्टे समागक विकास में बारम भी बनते हैं। प्रमीर से मापने रया-धर्म के नाम पर पो दान करा गिया तो गरीब को पोसी मरतो मित माती है और अमीर को पथ पौर समा- पान भी मिल पाता है, मेकिन उससे पाप उसके परिप्रहको स्वीकृति मी देते ६मोर नसके संग्रह करमे के सब नागायर पनसिक पोपणमन्य उपार्यों को भी सहन करते हैं। पर परि पही पान इस बात में बदल दिया मापे कि पान बोड़ा देता है देना सभी है क्योंकि यह समार का ही है, सबको सबमें बांटकर बाना है, 'राने सम विमाम -- ममीरी परीजी का भेद मिटान की विधा में मा एक कदम होता है पो सारे मूस्यों को, समान को व्यक्ति को यवन देने की शक्ति रखता है। इसका नाम प्रापिक सामानिक प्रान्ति हुमा । साम्यवादी मोमों का कहना है कि ये सुपारवानी मोग पर्म का नाम मैकर परीयों के कम में रोड़ा गतते पते हैं। इनके कामों से शान्ति सती है इसमें का सराप है। सुपारपारी भूतया से प्रमित होते हैं। पीटी को भी भाय-चकर सिमामे ठकका कार्यक्रम इसीलिए भठाते हैं पर मानवीय समस्यामा ममुखत की पौर की नहाई में नहीं पाते, समार की समस्याओं की पाक महीं पाते । पो मी मोगा-बहुत सेना का काम हो मापे उसीमें समाधान मान मते है। मैं इसे उतरला जो महामवा च म पो परोपकार होता है। मम्मि इतना पर पाना चाहता है किससे मावि-विकास पार समान-कास पोनों पूर्तता की रिशा में पाप अधिक नहीं या पाते । प्रपम हो सकाम भावना बड़ी कारट बनती है। पप की मासमा में परोपकार होता है। दूसरे समान में उससे त्याग की वृत्ति महीं पनपती । निष्काम-वृधि से समार की सेवा प्रार पपने मिए एम से कम मेने की त्याम-मृति बिना ममुप्प का विकास असम्भव है। समार भी तब तक पारे नहीं बनेगा पर ताकि पापछी स्मार्प कायम पे । पाप बहुत बड़ी बात इस बात की है कि जिन गुणों का विकास हम पक्ति के मिए परी मानते हैं, बड़े प्यापक स्वम्प में समान भी से कम करे और यह महीं होगा पर तक कि हम सबके स्वार्थ एक नहीं होते है। पार तो चारों पोर सत्ता है, पोपस है रिपमा स्पषी है। एक सरे की पैर से पैसे मेरी जेब में से पापा इसी की तासीम सत्र सौमने की कोधिप में मनुष्य है। मुट्ठी मर मोग दूसरों पर शासन करते है इसीकी पोजनाएं सर्वर बनती इती है। परीकी देकारी मिटने के नाम भपकर बनती पापी है। एक दूसरे की होर ही सगी है।कोहमी से पन पर भी पर एक पाये बहन की कोधिर में लगा है। मह सब से मिरे ? सारा समार एक पर कैसे बने । यहाँ स्पा की नमा सहयोग हो सता की जगह मार्गरम हो, सब समान हों पर कोई किसी के घोपम की मोगमा म बनाना हो। बाहिर यह रसो नियम पापार पर हो सकता है, यो परको टिकाये पता है। पर में प्रेम का सूपही एक ऐसा मगार माम्पम होवा। गोताको एकस्म बनाये रपता है। उसोसे यहां दूसरे सारे समुण संस्कार पनप साठे 1 भारतीय समान रचना की ईट परिवार-संमौरन है। यह संस्था हमारी संसति जितनी ही प्राचीन है। इसलिए पर म्याप को हम बजरी मानते 11 मेकिन उसी म्पाय को पर से बाहर मही मात करते । मासपे इसी गाय से पूग्य विमोगारी मे भूगन-पान का कार्यहम देश को दिया है । इसमें प्रेम का रमणका पहिया परित का पुरस-विकास और सामामिक रम्नति का केबस पक्तिगत पहम ही नहीं है बस्कि पूरे समाज को भनुप्राणित परले की पक्ति निहित है। पिछले पांच वर्षों में हमने देखा कि बिस बमीम से मोग इन चिपके रहत पे हि माई-माई में सिरफुटाई होती पी नही बमीन पाव बिनोवा ने हमा पानी सूर्य की रोशनी की तरह बहा दी है। मोमों के दिमामों में बम मारी परिवर्तन प्राया है। पूसरों का भी हक है। पूरे गांव को एफ होपर तम्नति करनी है। प्रपनी म्पषस्था अपनी योजना प्रपना कारोबार जरा करना है मी सराम्प प्राप्त होगा। इस देश में पाव सारे सग्मन भार भी मौर। दुर्गन भी है। सम्बनों भी सम्बनता को समिप होना पड़ेगा पौर संपठित भी । यो देश में अनेको संगठम है, पम-विपक्ष है लेकिन सम्पनों का गुगों का ऐसा कोई संमठम नहीं है बेसी सम्भावना भी नहीं है। मेकिन यह हो सकता है कि राष्ट्रीय पैमाने पर कुछ कार्यकम ऐसे हो सकते है, जिनमें देश की अच्छी पक्तियां एक राय होकर सहित स्म से गुट मन्ती है। हमारी रष्टि में भूगन एक ऐसा कार्यक्रम निसमें मग्मनता को सम्मि पौर मिलि होने का पूरा अवसर मिसता है । यदि यह हुमा तो गाव बस्ती रेप पी मरीबी वेकारी और मुसी गर्ने र हो सकती है। मानव मान की विस-कसह की ज्यादा से रक्षा हो सकती है। मुझे मालूम नहीं भरावत' में संसम्न भाइयों में से कितने इस बात से सहमत हॅमि और कितने समय । वैसे ही भूदान-पत्र में संनम्न कार्यकत्ता प्रणुपत पी को शक्ति है उसका उपयोग विना करते होंगे सो भी कहना कठिन है। दोनों एकरूप, एकरस होकर पापे बरें तो दोनों अस्प सफल होगा । परमेश्वर से यही प्रार्थना है कि यह हमें पैसा बना रे।
१५ नतिकता की पोर महान् कदम -श्री माईश्याम र. ए., पी.टी. प्रामुनिक युग को बो पैमाने पर पसने बामे उचोमों पौर नये-नये रिकार्ग का युप कहा पाता है। एक-एक उपोमपति यानी मिस मामिक बीसियों मिषों की गंडमा का प्ररमक्ष या परोक्ष रूप से स्वामी है पीर उसके मीचे पीस-तीस हगार तक कर्मचारी मौर मौकर काम करते है। उन मिर्मों में बनने वासी बीनों की संख्या माखों प्रौर करोगें तफ होती है और बबन भी हजारों पौर ममतों मन तक पहुंच पाता है। इसी प्रकार नैतिक पतन भी इस युप में व्यक्ति मत सामूहिक या सरकारी स से बो पैमाने पर हो हा है। इस मैतिक पतन को हिंसा फूठ बोरी मैमुन और परिग्रह के पचि मो मेरों में बांटा गया है। पचार मर में होने पामे सभी चोटे-बरे पुरे काम इनकी गिनती में मा पाते है। एटम बम तथा हापड्रोजन बम से वाणे भावमिर्यो को मारने से मेकर पार किसी को मामी कर रखा मन दुखाना भी हिंसा है। सरकारी नीति से नेफर पर या दुधन पर मोसा गानेवास्ता घोटे से धोरा भू मी भूठ है। बोबो रस हाप कर पाना इलमपस के माचों पों की चोरी कर पाना और सरकारी बफ्तर से एक कागज या पेन्सिस सार निगी काम मैं नाना चोरी । म्पभिचार के पोबो प्रर्गे पर होमे मासे म्मभिधार से मकर पसी की पोर पुष्टि से रेसमा मात्र यहाँ तक कि स्सस्त्री से भी सेमोग करमा पामचर्य है। पौर परेपो सामाग्र्यो मा ग्पनियों का निर्माण करता और अपने घर में पायापुरष काम काम की बस्तुपों का संग्रह कला परिपड है। पहले भी इस प्रकार होने पाने पाप मा मनैतिक कार्य कम गरे पर पायो इम्मानी रिमाप निद मयेगये प्रमैतिक कार्यो काम फेवर पारिपार ही कर पा है परन म पर इस तए मुमम्मा रखा है या रमको सिता की मोर महान् काम ऐसा म देता है कि कानूनी तौर से या बाहरी तौर से काम प्रनैतिक दिखाई भी नहीं देते है। इसको नैतिक पतन की पराकाष्ठा या पोरी और सीमागोरी मकहा पाये तो और क्या पर? इस नैतिक पतन का फम विश्व भर की बनता में फैला हमा दुध है। त विविध मैतिक पानों से मोर्गों को कप्ट पौर दुध है पर मे स्पर्म प्रत्यक्ष या परोपा स्म में इन पापों मा नैतिक पतन के कार्यों को किसीम रिमी स्प में मरने या कराने के निम्मेदार है।हम पौरों के कार्मों की शिकायत करते है रोमा रोते पौर भमा-बुरा कहा पर अपने कामो की पोर म्यान नहीं देते । हमें अपनी बड़ी स बी बुराइयो दिखाई ही नहीं देती। अनैतिकता के इस महा सामर में माम मुख इनेमिने ग्यक्तियों को छोपर समी नमे है । इस प्रनैतिकता के मिए कोई ममिमुग को दोप देता है काई सरकार का तो कोई बनता को । कोई मस्त्रिों मा पासन प्रणामियों को कोई पर्म-म्पबस्पा को तो कोई सामाजिक परस्पा को । कोई पूंजीपतियों को दो कोई मगारों को पौर कोई गोमादमियों को हो कोई अनसापारण हो । पर सब बात तो यह है कि हम दोपी है। इस सम्यापक पनैतिकता का इनाम क्या है ? इसका इसाप और रोग- पाम कौन करे ? सरकार इसे से रोके और जनता इसे बन्द करम के लिए क्या करे? इस गन्दगी को कौन साफ करे। मान विस्मीयमे म पटी बांगने का प्रश्न नहीं है प्रश्न प्रतिकता मी महारानव को काम करने का । सब तरफ इस प्रनैतिकता के मिग्य पाबा उठ ही पौर माहि माहि हो रही है । मन्पकार में दो एकहुगमू की चमक यात्री को मार्ग दिखा सकती है और एक तारा उसका पप-अपसक बन सकता है । फिर यह तो पो ही हर्षे पौर माया देनेवामी बात है कि प्राचार्य श्री तुमसी न इम पनैतिकता के रिरुप मारत में करम उठाया है। प्रशाम-म्तम्भ बनकर म सिर्फ स्मयं रास्ता ही दिखा रहे है परन मेवा पौर प्रयुपा बनकर अपने संकलो गिप्प-सापुर्यो के माप इस महा- दामर को बप में करने के लिए दैयार हुए हैं। उन्होंने इस काम को म्यवस्पित रंप से करने के लिए प्रस्पत-पादोमन का प्रपन रिया है पीरब इस माम्हासन ममुक्त की पोर को अपनी सरेस में संचारित कर ऐ है । र एक प्रणपती को पात सी प्रविशाएं करमी पाती है या या कहो कि प्रत मेने पाते है जिनमें नये पौर पुराने बहुत से पापों को पा अनैतिक कार्मों को म करने का समय होता है। प्राम्हरोनन कार्य के अनुमय के बाद प्यारह मूत्री कार्यकम बनाकर पनसामारण के लिए मणों को और सुगम बना दिया है । पर पहने नियम मितने कठोर के पे उठने ही सरस है । फिर भी नियों की कठोरता केमिस्त कहीं-कहीं से भागार माई है। पान देश की प्रमुख पावस्यकता मन तिकया को दूर करता है । उसे दूर करता है और कसे दूर करता है इन बातों की तरफ विरोप प्यान पने पी पापस्यकता नहीं है, गितमी कि मावश्यम्ता इस प्रावोसन को बम मा सहयोग देने की है। सागनिक म से एक तपस्सी के मेतृत्व में पनवा का या एक बड़ा कदम है। इससे भी बड़ी बात यह है कि इस माहोमन को सफल बनाने के लिए प्राचार्य श्री तुलसी के सैकड़ों पिप्प पार टोमियों में पेट कर देश के कोने-कोने में इस माम्दोलन का सन्देश पापा रहे हैं। कहा जाता है कि अब तक इस प्रान्दोमन के... सबस्प बन चुके हैं। मह बड़ी मच्ची बात है। प्रमुखत-पान्योलन का महत्व बताया हमारे मनतिक जीवन को पुर करेगा । बमवा को एप मुख देगा और इसके सदस्यों को माध्यात्मिक सम्नति के पप पर पामर करेगा । हमारा पर्वमान पीपन महान् मनारि मनन्त जीवन का एक पत्यम्त छोटा-या मार्य है । उस जीवन के किसी भी समय में हम भी सुपार मार्प परपस पावभी पाया है। इस पान्दोसन की तुलना मोरम री-अममिस्ट मूपमेंट पार पाचार्य बिमाषा मा के भूदान-पन्न भावोतन से की पा सस्ती है। परमादोचन प्रमी प्रपनी शिपु प्रस्मा में है। इसकी हर प्रकार से सा देखभास मोर संपर्डन पी पापापाता है। प्राण है कि पाचार्य श्री सुनसा प्रभावमासी म्पपितत अनुशासन मार देखरेख में यह पान्दोलन दिन दूनी और रात चौगुनी उन्नति परेपा ।
। परिस्थिति का तकाजा -पी सक्मीमारापण मारतीय पर कोई सामामिक मुण प्रभावम्म बनकर तीव्रता पारणा कर लेता है तो उस काम में उसका भावम्स ही महत्वपूर्ण पौर विशिष्ट बन पाता है। सरप वापरावि मुर्गों में पो पुण सामान्य एवं बो दोष असामान्य माने पाठे हॉग के पाय के युग में उनटे स्प में माने जाते है। धर्मराम का 'मरो पा परोमा' भीम का कटि के नीचे गदा प्रहार' प्रादि दोप प्रसामाम्प माने गये पे बमि पाण ऐसे दोप इतने सामाम्म हो गये हैं कि इन्हें राजनीति समाननीति मोक-यवहार मादि में प्रतिप्य तक प्राप्त हो गई है।पोरी मूठ गागागी, भोगावेही भार पसामाग्य दोप नहीं प्रतिष्ठित रोप मामे बावे। उस रोग पाच पाने की भयक मेंहदी सस्ती बानकर पर मैने परीगरी तो पता चमा कि मह तोहपाने पार की है। मैं वापस उसके पास गया तो उसने कहा 'मह तो दुकानदारी है हम चाहे जितना मुनाफा में। भापको बहरत हो तो बरीदो। ऐसा करना ही होता है इत्याविनत्यादि । ऐसी प्रतिष्ठा पाग प्रसत्यादि पुर्गुणों को प्राप्त हो पा है। यह तो बहुत छोटा गुफानकार वा। हर क्षेष एवं हर कारोवार में यही पाया जायेया। मत्यन्त माना, पर भक्त एवं एम्बम पुरप भी भर पा स्मास में जाकर फस्ट का पैसा बिन में पोरता है तो यह यही मानता है-'हमने कोई मनत काम मही किया है। यह तो तरीका ही ४ । पौर रिम मयूर करने पासे भी यह माम ही है। ऐसी स्थिति भार है, फिर भी यह निराशाजनक महीं है क्योंकि स्वने बोपो, अवगुणों पाहि पाप मह जन-सामाग्य नो चिलाफ ही शिकायत करता है वो मामना चाहिए कि उसके मन में ही तो मी एक ऐसी बौर ममी है वो इसको सोनित करती एती है। पुर इनका भिगार होत हए भी उसके बिना प्रयुक्त को और पर बही सिकायत करता है तो इसके मानो उसका हार्द ममी साबित । पौर पानी पर सिर्फ पारी काई मर मा मई। यही हाई उसकी सर विषमरिको बागृत करता है ममे ही परिस्थिति माचारी या मोह उस मुरि म चमने मरे। प्रमी मह ऐसा निमण नही बना जो भीतर की इस सुमन को गेम का प्रावरण माने या प ही बना है। परि मान के धम-फरेष पौर मूठ के भीतर हम महराई से देतोपवा पसेमा किन सबके सामनता का घई प्रभी कायम है। निसनेह मह प्रविकार पम्प नहीं है, प्रभावधानी मही है पीर मपुसक-सा बन गया है कि प्रस्तित्वहीम पर प्रमी नहीं हुआ है। एक होता है ऐसा पापी बो प्रवाह में रहकर पाप रखा ही पाता है और एसी समता मही रख पाता जिससे कि यह उसका मुकाबला कर सके। दूसरा होता है ऐसा पापी जिस प्रन्तर मर मा होता है और कोई पपटिव ए गिना यह बदम ही नहीं सकता । यपपि एसा पापी कभी गरम भी सम्वा है स्पोकि यह मनुष्य है तवापि यह पपवादात्मक स्थिति है सर्वसामान्य नहीं । प्रथम प्रकार के पानी का परिवर्तन ऐसी प्रश्नावारमा स्मिति नहीं मानी पा सम्वी क्योंकि यह प्रबाह पवित होता है वो ऐसा पापी कि उसरा पन्चर साबित होता है परिस्थिति में से उसे यदि कोई बार तो यह फौरन सही पह पर पर जाता है। पार समाग की स्पिति इसी तरह की उसके साबित हाई को स्पर्य करकेमो से बना सकेया नही उसका मसीहा साबित होमा । पिन मह केवम उपदेस या तत्व-विधान से होने मामी पीर नहीं है। किसी म्पत्ति के हाई को स्पर्प परम के लिए, उसे पाव करने के लिए सामने पासे का हर भी एसा ही प्रमाणशासी होना पाहिए, यो अपने को सो सपाही में सामने पामे को भी मोह। इसके लिए समझ पात्तर में केस कपणा ही होनी चाहिए और यह भी ऐसी कपणा बोकेपन सहानुभूति तक ही पीमित मण। ऐसा म्पति सामनवापेको सहर ही मोर देता है यह निम्दिन पीयन का अनुभव है। प्रपनी तपस्पा से सैगा में पटगहन से बह सामने पाने केराको पाय कर देता है एप विकारों में उम प्रमाति भी। मनि पर सिमत रोपनी पस्तु । समाधि क्षेत्र में इतने ही प्रपाल कामे परिस्थितिका तामा 0 । नहीं होते एकमपित ही पर्याप्त महीं होता। इसलिए सन्त महारमा, मसीहा इतने हप, मेकित प्रमा। पतित बनने की परम्परा बसती ही रही। हर समय समान पवित पने पोर कोई मसीहो उसे मार बचा से यह परम्परा तो पमी मापी है। वव उस परिस्थितिकी चिन्ता करने की जरूरत ही पया ! 'मा यदा हि मस्य मानिर्मगति भारत ! हमारी मदद के लिए है ही । मेकिन उस जमाने में व मयानक दोष म्पमित-यक्ति तक ही सीमित राते थे एक मसीहा मा एक (त-महात्मा काफी हो जाते थे। परन्तु या पे दोप सामाजिक बम गये है तो उसका मुकाबमा भी सामायिक स्म से ही करना होगा। समाज के हार्य को जगाने के लिए समूहमत तपस्या से करनी होगी । ऐसे समाज के मुकाबमे समर्थ और प्रतिकारमान झई वामा समाम ही ना करना होगा । इसका पर्व है संघ महारमा मा मसीहा सिर्फ एक वन गान से ही काम नहीं चमेगा । दूसरे शब्दों में समान पापी बने और उसका उदार दूसरा कोई एकाध पक्ति ही करे, तमा ही अब पाफी नहीं होने वाला है । समाग को ही यह मार अपने ऊपर मिमा होगा। इसका मतलब है पर एसे प्रयत्न व्यक्तिमत नहीं समूहगत सामाविक स्म से ही करने होंगे । पर हम यह कहते है कि समाज पाप के मर्त में हो इसके यह मानी नहीं कि पूरा समाच पाप के गर्त में होता है। बहुमन समार की मह स्मिति होती है। पल्पसन प्रमात्र ऐसा पर भी पावा है--पपपि को ठीक रेवा नहीं सीपी पा सकती। सार यह कि ममुसंचयबत् ऐसे बन का संयम करके सम्पूर्ण समाप के हाई को बगाने का कार्य सामूहिक प्रपस्नों हारा किया पाना परस्पम्माषी है विस बहुजन समाग में हम दोप-वाहस्य पाते है यह भी सम्पूर्ण पोप-निष्ठ नहीं होता। मा सामात्रिक प्रमों में उसका भी पह कार सश्मि प स मिन बावा है। इस तरह एक ऐसी सामागि प्रतिरोप भक्ति परी हो सकती है भो सम्पूण समाज को मोगरे । निसन्देह उसके लिए पामार है दुनियाद है तपस्या और सेवा ही पा समान के हार को सक्रिय कर सके। ऐसे समूह का इसकी दीक्षा पक्विमत प्रमलों के द्वारा देकर एक साभारिक पक्ति पानी की पा सकती है।
8 मतपत कीमोर इस विषन प्रकाश में प्रब बैन परिवारों की संस्था की समूहस्यापित का उपयोग एवं महत सहन प्टियोपर हो सस्वाभाव सापु, सन्त या महारपामों में पम्भ भूछ पारिकाही कोतवामा है।मि तब भी हमाण मानना है कि जैन परिवाना पानुपापियों में एम्म ओंग मुठ का ऐसा सामा पीकरण प्रमी नही पा है। पचपि विवादिता का प्रावस्म उनमें है और वह उनके विकास में एक मक्ति में बात मारक फिर भी रमकी पति मरिनये रूप में अंगठित रूप में काम में साईपाये वो यह प्रभावपासी बन सकती है, ऐसा हम मानते। इसका हमें सिर्फ समेत ही महाँ करना पा। हमें कहना यह कि ऐसे साभाविक प्रबलों में अंग समान किस प्रकार मोगरे पता है या पर पहपान मे । उसका पासुत प्रभाव प्रमी उस बमाव पर है। ऐसी बमातों को ऐस परिसानक प्ररित करते रहे पो सामूहिक प्रपत्नों में वृद्धि हो सच्ची है । किन रसके लिए मूलभूत परिबर्तन हप्टिकोण कार्य एवं परति पादि में करना होगा पर धर्मोपवेस एवं विपातन से पाम नहीं चलेगा। ऐसे सामाजिक प्रपरनों की भावरमाता एवं उपपोविका के बीच पर इम भरपुरव-पानमन को रेलवे सोगव भामा नगर पाती है पाकिम सानों की मरम्मत परम्परा में से निकली हुई या पीरन समाग तक ही अपने को सीमित नरके, पंप विप रहीमपने कोम बापर मो काम इस पारोमन मे स्टरमा, मह उमरी प्रगतिमीमा एवं उपयोगिता को ही प्रकट करता है। यह प्रति यहीं नाम पर भीतर पैटी हुरे दिवादिता का मी प्रतिरोप मदिर सी वो एसपी वैगस्मिता में वृद्धि ही होगी। देश सर्वतोऽगु मी-प्रस्प पेग मैं निरति 'प्रमुख एवं सांस में विराति 'महावत है प्रति हिमादि रोपों से मम पपन साया हारा हर पर से स्ट पाना- यह रिमा भिरमसही मागवत है और पाहे पिठना हो मेपित पिसी भी पंप में सम पूटना-ऐसा रिमा पिरमण प्रयुक्त हमाता है। यह है गवत-शत । इम पापार मो मेकर गुपत पापे महा। बस्तुम यह बौर मप्यम मार्म के ही समय है। मनुष्य के रसाम, सेना, गुण पारियो धीमा नहीं हो सकती सैपिम म्पहार-या में पुष मर्यावाए मा पाती है। यही पर परिस्थितिका तामा ५ हार वत्व पहस कर भराभध-भान्दोगन ने मप्पम मार्य पहण करके समय-सूच कसा ही रिहाईबर दोष सर्व-सामान्य एवं मुण प्रसामान्य बन जाते है तब ऐसा ही मध्यम मार्म काममाव हो सकता है। इस दृष्टि से मरणुपत-आन्दोलन साममिक भ्यावहारिक एवं रिक्षक प्रान्दोमन है। इसीलिए उसमे इनी तोक- प्रियता भी पारण करनी है। समय की पुकार की प्रतिपनि उसमें हप्टिगोचर हुई, यह स्पष्ट ही है। जैसा कि हमने व्यर कहा है इसने चैनेतरों में प्रवेश करणे प्रगति की सीपी मापी है उसी तपसमा मागे महकर महिपाद पर भी कठोर प्रहार उसके द्वारा होमा नसकी व्यापकता एवं गाई के लिए अनिमार्य है। माति, वर्ण सम्प्रदाय धर्म मत देश के वन्यनों से रहित होकर पराकम करने की उसकी ममता तभी अधिक प्रमावधानी हो सकती है। भेफिन यह तो हुमा यसका बीवनामृत पर प्रान प्रयाब पैठी पर्व साधारण दोप-प्रवृत्ति को मिटाने के लिए उसको यो पाम करना है उस सिए मावस्यक है, उसमें ऐसी मरमात्मकता बो मन-बीवन से मोतप्रोत हो । तादि मकारारमक (मंगेटिय) सरस्म है। सकारात्मक (पपिटिय) सम्म विए उसके सार ऐसे कार्यकम का पुराना बारी है जो समागमत हो । माद समार में स्थित 'स' को मात करत भिए उसका भी हाईदुमत होगा गरी है पौर यह हार-वृत्ति तभी सामाबिक प में कार्य-प्रबरण हो सकती है बब उसका कार्यक्रम भी पैसा बने । ऐसा कार्यश्म यो समाज की स्णा का मालाम करे, समे मीकरणायुक्त हो और सामायिक स्म में उस कम्णावृत्ति को पापत करे। रचनात्मक पक मुधार पर है। बह दो प्रमायम्माषी है ही मेकिन प्यान रखने की पावहिवन पनात्मक काम कभी पर्याप्त नहीं होते । न पन-नीमन का मापार पसरी है भोर जन-जीवन ठमी पापार दे सवा है जब मन-बीमन से सम्बन्धित कोई भीषित समस्या हाल में भी भाये। प्रणुप्रत-पान्दोमन नब समात्र निर्माण में अपना पूरा हिस्सा ३ एक उसकारा 'प्रों की प्रसाभाम्पवा दोषों को सामान्यवा' बाप्ती मार की स्थिति बरखने में भी पूरा योम मिमै, यही हम सबकी माहाशा है।
मपावत-आम्दोलन को पृष्ठभूमि --भीममित पाचार्य विनोबा में एक वार हाबा सत्व और हिंसा पर एफएमा समाज बनाने की कोमिय करता है निमर्म जाति पाति महो जिसमें किसी को पोपण करने का मोशन मिम जिसमें पश्वि-म्पत्ति को सर्वानी निकाय कल का पूरा मवसर मिले। प्राग मेक इसी प्रकार के विचार पाचार्य तुमसी में 'परमुखत माग्दोलन र तरारे में मत किये, महिला के प्रभार हाय पिपर-मैत्री पौर विपर-धान्ति का प्रचार करता । पशुपती के विचार प्रभार में मिम्म-मिम्म प्रदक्षियों का पद पानसम्म मिलेमा । एक विशेषता मिमेपी सिप प्रा में पाना दुर्मम है ।मह मह कि भगवत-प्यास्था की पून मिति निषेधारममता पर पापारित है। प्रस्तुत महा मी गया कि निपेण हो पषिक पिपुर पा करता है। भारत का इतिहास सासरी किरप से धर्म प्रणालोप पा है। पर्म की पृष्ठभूमि पर ही भारतीर पार समिण हमा है । भर्म परायो पारण किया पापे । भार का युग मौतिवादी मुर है । विज्ञान कस गुम में भारतीय रामनिमें रे किसी प्रत्यार को पूरा स्वीकार नहीं किया। उनमें परस्पा में गोपन का मुरूम मम नि पम् प्राप्ति या । परम्परा पे पती पाई हममुग्स मारलीम जति सरेप हो पहिसारमा म में पही। मिस प्रकार पिनुपित से पहा पर बादामी प्रमर मनि-मति मिलने से समान एक मत प में बाहर स्पष्टि से समष्टि का रुप पारमा करता है। मान-सन की मालाम में प्रस्तुपा ममार से परिपत है। यह मामय पान इय मोरपिाना पाता है कि वह भाल पप में प्रत होतापा, मानित बों की भोर से सामान पैौर उनने बचने का प्रपल रखा रहे।
प्रमुख-माम्योतन की पृष्ठभूमि न सबका भरस रूपेण प्रयल प्रांवों के पासम से हो ससा है। प्रगुबतों का अर्थ है, ऐसे प्रत मो जीवन के प्रतिदिन के व्यवहार में हिंसा सुखवा, मौर सालिता की भावना का संचार करें तथा जीवन के नैतिक स्तर को ना करें। माग यह व्रत कुनीम की पद काये परन्तु बाद में निश्चम ही फादायक है। इस विचारधारा के प्रणेता एवं प्रवर्तक भारतीय संस्कृति के मर्म पाचार्य पी तुमसी मे पार के इस भौतिकवादी मुम में मानव-मस्याण का पो नीरा उठाया है यह निरुपय ही महान् है । मानवीय इतिहास प्राभ्यात्मि- तापोर भौतिकता का संकलन है। ग्राम्यात्मिकता की परमाया में मानव ने मैतिकता को प्रहण किया और उसी मैतिक विकास का सक्रिम संचालन प्रणुपत-पान्दोमन कर रहा है। बनता के शिखरे हुए मैतिक स्तर को पा उठाने का प्रयास ही पविनम्प प्रयत्न है। भार हपय-परिवार की प्राथमिक प्रापरपसा है उस प्रावश्यकता दी पूर्ति के लिए यह एक प्रबल प्रणिया है। मान परि मामब-संसार के वास्तविक रूस की झांकी रेखनी है और भविष्य में उसके मुसरित म्म का प्रास्वादन मेना है तो परिण-निर्माण के पतिरिक्त दूसरा कोई मार्म महीं । माग मह निर्षिबाव सरम है और सभी विचारकों मे एक पावाम से इस इकाई को पहचाना है कि म्यक्ति पूर बने मौर अपने परिम को पार बनामे। पार की सबसे बरी पावस्मरता परिण में सुधार करता पाव हमारे सामने समस्याओं का रेर मगा मा है । मानव-जीवन की नैतिक गंवसा ममती मा रही है। ऐसे समय धन-पन की भावना को मारम स्प में परिवर्तन करने की परख है। उनमें मैतिक पापों का एकत्रीपरण हो पाप ऐसी प्रावस्यान्ता दीन ही है योकि म्यक्ति ही समष्टि का निर्माण का है। मानवीय कुप्रपाों के विस्थ मलिक संपर्प ही उसका मूम मापार है। पार प्रारम-विश्वास मता एवं सताके प्रभाव मानब परित होता पना पा पा है । भगवान् महावीर के पत्रों में किसने मारपमिव भाव निस्ति । कि पारमा से पारमा का सम्प्रेषण करो। इसी नाम को मेकप, नैतिक विस्वास पर व्यक्ति-विकास पपुवत-प्रान्दोसम का प्रमुख पापार है। माधुनिक भारी पुग में हमारा यह पहला मौर अन्तिम माय बन गया १२ प्रमुख की प्रोर है'चायो पीसो मौर मौर सामों । बीन की सुख-सुविधाों-मोगरिमासी सामग्री का परमरियम करना एक बार पहले भी इसी विचार-प्रवाह ने सेवान्तिक स्प पारण दिया था और बार्मिन के नाम से हमारे सामने माया । उस समय भी हमने इसी वास्तविकता को पहरामा । भार फिर पातिकमा प्रप्टाचार पारिन मानम पर पावरण गत रखा है। परन्तु वह पावरण पर पारेर तक नहीं पाए सफ्वा । संसार परिवर्तनशीन है। परिपनपीस संसार में परिवर्तन प्राय होता है । युग प्रवाह है। पिप देना है। पुप संपर्प प्रिय है । संपर्प पीवन का मन बन पह संभ भौतिक- पार पर प्रध्यात्मगार का है।पार मानव की पणा पोषनीय है। मोतियापार में फमा मानव अपनी वास्तविया को भूते का सम-रेव पार परिवर्वनम पाने परिवर्तन क्या होगा परिवर्तन पार युम का नारा है ।पार के इस मतियारी युग में शिर-म्यवस्मर के मूम मापार 'सत्य' को हम भूम रहे है। उसी रिस्प प्रकार की पोर पशुवस्-मानो मन का काम है। पान की प्रान्त पारणामों को निमम सिर करने के लिए मारमा पापी का नाम भरने देना पर्याप्त होगा। पनि सत्य का प्रण पार पहिसा का मापन मेकर सामागिल और प्रष्ट्रीय प्रमों को हल किया है। हमने मनुभव किया कि माप का पाप्रा पार पहिमा में साला परहार , सूप ।। पास्त्रीम होते हुए भी माननीय परि पार नहीं प्रागों को सिंडातों में मार बम्परार मैं सार साहिप सुरमा रे वो भीगन समार राष्ट्र एवं सिको गुममा बम मिलेगा । इम पुर में एक काम हो हपा कि हरयों में मारे भार पास हुए मार न भागों में सबसमारमा पक्ति भी से।भार मामभ्यना फिर से रमपना कार से ही है। मर और-वीरे पारम भरारी होना मी प्राचार्य तुरासी के मेनरव में रागी एसी माया होने लगी है। पिताध में भपपर भी सव-पिशव फराहो मान को निमीन मटन मानोपान पोर योजना भी पारस्यावा है। पणप्रक-मानोमन पाक्षिक प्रदियों के लिए एक गुहा चुनौती है।
प्रपुष-मायोसन की पृष्ठभूमि पनैतिकता, मनाचार मौर प्रश्टाचार की यहन ममा को दूर करने मामा विम्म प्रकाध ! पार विश्व का कायाकम्प सस्प पहिसा मस्तेम ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह के प्रमों के पामन पर मिश्मयात्मक रूप से हो सकता है इसी मुस भूत मापार को मेकर प्रणवत-पान्दोमन कार्यक्षेत्र में तप है। व्यक्ति ही समष्टि है और प्रथामिकता हिंसा दुरापार, प्रशान्ति छोपण सबके लिए यह एक प्रमोप मन है। नैविक विश्वास के सहारे सम-चन के पय को भसमोर कर उससे उत्तीपन में मानवता का विष पहचाना हो मणुषत-भावोसन की प्रमुख पृष्ठ-भूमि है । प्रयुक्त-भान्दोलन का मुस्प ध्येय मानव-मामर की दुप इमों को दूर करना है। वमी हम बीमन की प्रार प्रतिमा सापना और शाम मैं भूति कर सकेंगे। यान्तिकारी हप्टिकोण पर्वतोमुखी शान की प्रेरणा बागृत करता इपा एक पात्मा एकहदय एक मारना एक मार मौर एक छमन के रूप में है। पीपन की स्थितियां ही जीवन को प्रेरणा देती है। मनुष्य की परिस्थिति ही इतिहास निर्माण प्रौर मुग परिवर्तन के लिए मनुष्य को प्रेरित करती है। मार्स ने कहा है--अपना इतिहास सय मनुष्य ही यमाता है। मनुष्य चिन्तन पीम मारणी है। वह वन मोवाका सम्पूर्ण सामबस्प है। मा से उसका पिर निर्मित होता है और मनस्तत्व से उसके मस्तिक की पटिया होती है। मनुष्य के भीतर एक कोई भौर मनुप्म है भो प्रमाों में भी सन्तुष्ट और समृमियों के बीच मी से प्याकुम रहता है । इसका माहार राम पेटी नहीं बल्कि भाव पौर विचारों का सौन्दर्य है। पोषन की परिधि में पो भी उपकरण प्रये करते हैं उनका एक उपयोग तो स्मृत मनुष्य करता है और दूसरा पर मुश्म ममुप्प को स्पूत मीतर निहित है। हमारी संसति रेस सापारपरनों में हबारों मर्पो से नमी मा पी।पह सस्कृति विसकी प्राचारमिना ई-मेगा स्याम पौर स्मेह की प्रवृति पौर जिसने यहां के सामानिक सुगठन को कौटुम्मित बीवन को इतनी पतामियों तक जीवित और सबम बना रखा है। पार का समाज भाषना का प्रतीक मर ए यया है। उसके प्रमों में कमा का सौम्पर्य है प्ररणा का समीप सर्प नहीं। इस दिशा में भी १४ प्रश्नको मोर पणुबन-पान्तोसन प्रप्रसर है। विर में पान्ति का सामाग्य स्मापित हो सके, परस्पर सौहार्द की सर मावना को पणा पृषी पर सर्व मापा पा सके पीर ऐसे ममयुग का दर्शन के सके यहाँ गोपण न हो उत्पीडन न हो रचना न हो इस दिशा में प्राचार्य तुलसी की विश्व को पणुप में एक अनुपम देन है। मानर पिरों की तुप्ति मनिवार्य है। वनस्सामाविक मांगों में एक मांग स्पना-अपित की भी है।पमा मानव के ऐसठे हैं जिन्हें पहन कर प वास्तविकता के कठोर मार्ग पर बसन के योग्य होता है। स्पना मानव कएस गर्म पान है पिम्हें पहमकर मह वास्तपिता के पौत्र पीठ को महम कर सकता है। मत्सना उसका ऐसा मुदगुरा बिस्तर है मिस पर ग जापान की मठोर यात्रा से पक कर पियाम करता है। इसके बिना मानन का पीमा मसमीप हो पाता है। यह उपके प्रमानों की पूर्ति का धान है। शिव की प्रतिम मुग्यता के सम्बन्ध में मनुष्य के सिवाय उसकी पना यक्ति के समय यह प्रशस यत्म मान पर प्रामारित है। परनाम से ही मनुष्य पारिफार, कता पौर साहित्य रसला के योग्य हुआ है । मानव की ऐसी कसना मनित कसापोंप में प्रकट होती है। जीवन में कठिनाइयों पर वियप पाने के प्रमोम्म पारित मूठ मार मानी का पम्पापी बन जाता है। पागलपन पठिनाइयों का सामना मर सकने का ही परिणाम है। मान मानब मोठिमीप्रपामों में भापारजाइयों में मा पिरा। मानर को मटिमाइयों का साहसपूर्वक सामना करने की धमता सत्य पहिया अस्टेप ब्रह्मपर्य पौर अपरिग्रह के पामित मा की पोर सिंह करता हमा प्रयुक्त-पासोमन मार एक निर्देशक स्प बरहा है।
स्वामी परणा मणुक्त माहोलन कविवर भी बालहप्प सर्मा 'नवीन' मुनि प्रमर पापार्य श्री तुमसी द्वारा प्रारम्भ किया गया प्रणवत-पान्दोसन हमारे देश के नैतिक पुनरागीवन पी विधा में एक ममममम एम पावश्यक चरण निक्षप है। भारतवर्ष के प्रष्टापों न सहों वर्ष पूर्व मानव-समाज के उत्थानमा उसके मैतिक विकास का बो तत्व बुडिंगम हायगम एवं भाषरणगम कर लिया पा उसी सनातन तत्त की प्रभिनव प्रावृत्ति यह माम्दोमन है । इस प्रकार के पान्दोलन पनेक स्मों में भार देश में बात ऐ है । प्रहाचा मारणी ने मानव सेवा समाज की स्थापनाकामणेशभर सामाजिक नैतिक विकास की प्रेरणा प्रान की है। पि विनोबामा का भूदान मान्दोलन मी इसी मैतिक निकास की चेष्टा कर रहा है। प्राचार्य भी तुमसी का मरावत मान्दोलन मी देष की मात्मा को पौर इस देश की समस्या को समीर प से स्पर्म करता है। बस की पारमा मानो मान एक मन्ने गलियारे में प्राकर पटक गई है । इसी देश की क्या सभी मानवारमा । पौर-- पार पाये मनियारे में हिठका बा पतिकापस पबिपुरनमान इतपुर पचन गछिया संप्रम रत-मन-मन । प्रार्थना प्रानर मा, बा संशय की दुणुमी बगी, पब तई प्रमा समर्ष मा, ऐसा को प्रमोहिमी सनी। पर सतरा पतिमान हमा, बयब हो पपे गातात, चासोरहवास मित मन्तर का सार हा बाप्पान । पर ऐसी स्थिति हो गई दब प बिनोगा ये तुमसीगणी ये प्रमाण परणानन्द इम बोरन का मिना समान सनेश देने के लिए हमारे पौष प्रकट हो गये।
माको पोर , मानव-पार की इस समस्या निष्ट इस प्रकार के समुपगमन (app roart} को मैने सनातन कहा है। हम अपने मन को पौर पपना दुरिको या मात पभी रीति से सममा रेमी है कि मामय की पर्तमान ममस्थानी रपरेखा हम पर पेन केन प्रकारेण बीवन-यापन सोकसेही पर पोपन मानन मरले हुए नौ मानो हम किसी वस्तु की कोर में रहते हैं। बोन किन बात की? म बात की किपीवन रसमय भानन्दमय उस्मासमय निरलसपर्ममय, मैत्री ममतामय पाता हित पार सम्मय बने । पौर हम पीपन में न जाने पपा ११ पणा प्यो प्रसत् पार पुरता लिप्सा पा-उतरी थापा पापी । इस प्रकार हम अपने में मात्र पाठेप प्रसत् निम्मगा पत्तियों के पास है. पर हम रमको मतियमित करने के प्रथिनापीका भानव-समान की समस्या हम भयभीतर-मार को पान दोन ऐपौर पाहवे कम मनोविकारों से मिल पाये। एक बाप में परि करें तो यो कई कि माग को मानव-समस्याएं और प्रषिक रिकाम की (Father Erodution) समस्या है। या पिर मिथर बनु और पाये से पार बह पौर भाये नही गावापौर टोनही उठता है वो मानवता का बिनाप हो सकता है। मानाको पौर पषिक विकसित होना ही होगा इनके प्रतिरिक्त उसके लिए गायबर नहीं। मानव के निमन मपनि पौर पथिक विकास के लिए यह मापाया महीकि रसके पारीरिकर में पाई मारिप-गारभीय (Dlologieat) परि पतन हो। सीतारे तीन हार के पुतले में ही महामान मानों पर परा पाम पानत है। राम पग, चिनदेव नपागात वीपीट, पानी-यै मग पो मेनोप होते हुए भी निरिद्रियान् हते पे, पो सार तीन हरि बाते ही तो प्रतः पार हम मौनिक रिकाम के लिए प्रपन नहीं करना हमारा यह सारे तीन हाप का हम महामानहातमी भोर मार पहली पोर में मे पामे में सदा मम है। हमारे पूर्व अवतारी पुष्प एमबापाप प्रमाए।
. प्रमुवत-पाग्योलम तब प्रश्न है कि मानव-समार विकमित कसे हो? कोई माने पाहे न माने मार्म नही है और हमारे पूर्वन हमें रिक्षा पये है । भमा तर पान पौष स्पाग शान्ति प्रपिानशा भूसरमा भमोसुपता प्रचापस्य मारय मारम-मिनि प्रह पारि गुणों को जीवन में माए बिना काम बमने का नहीं। लोग कह ठो !-पनी सामाविक होपालो सब ठीक हो पायेगा। क्पा मनमुच मा सामाजिकबा बरस पया है वहां महामानों का माविर्भाव होने मगा है ? नही माई ! सामूहिक परिवर्तन सामानिक नम-निर्माण की पावश्यकता से मुझे इम्कार नही । पर उस न सुनो को समान मबन की ईट है।बह है 'पक्ति' । पक्ति पा परिवर्तन प्रावश्यक है और यही हमारा माग प्राणन तुमसीगणी विनोबा पादि करते हैं। प्रयुपत-एक घोटा-सा व्रत गीवन में अंगीकार करो। उसे निमामो । तुम देखोगे कि परिपतन पाएम्म हो पया है। 'स्वस्पमप्यस्म धर्मस्प पायवे महतो मया' । मेरी समझ में यही प्राचार्य श्री तुलसी का सन्देध है । कुम्हार, नहार चमार, पापारी बामण सर एक भरपुपत के हारा एक छोटे से इतके सहारे जीवन में पौर इस प्रकार समार में परिर्वतन मा सकते हैं। हमारे पुराण पुस्पोत्तों ने यह तत्तापगम कर मिया पा। इसी कारण से राम-धाहित्प पर बस देवे पे। प्राचार्य भी तुमसी ने मह भगुव्रत-पान्दोमन बनाकर हमारे समान का पत्र प्रार्थन किया है। मैं उमें एक नैतिक ज्योति-गिया मानता है। में उनके सत्-मंचरणमीन प्रमक निरलस चरणों में अपनी प्रणामाम्मति पपित करता हूं।
मणुव्रत और सांस्कृतिक उम्नयन -~-मोगमार उत्लान तो नैतिक ही होता है। पाए सा तसा यस पर बार या मारमी के पास बन-सम्पत्ति कर पाए तो उसको सही मर्प में मनुष्य का उत्पान महाका माते। मनुष्य काया मही! म पदार्थ है, न उसे बाहर की दूसरी पीगॉ के मान में मापा पा सकता है। यह तो भात्मवान् है। मदर की पा साइम मार प्रापि में ही रसका सही मान और ग्राम । घरे १ माघम सम्पत्तिा उत्पारन के परिमाण से जीवन के माना निलम पार करते हो हो हो सता है पम्बन तो सही बह दहा मिए मोनही है लेकिन भारतवर्ष को तो ये बिमस ही नहीं चाहिए । यहाँ की संहति इस प्रकार की महीनयानी साममिक या परसव-पास है। या मनुष्य के भूत तक पाती है और उसके पम्पम्तर से पुई है। परापत में प्रथाम बत है। व्रत का पर्व मनुष्य को माना समारम्मों से माना है। मामूली तौर पर मारमी महा शिखरा पवा है। पारों तरफ की बार उसे सताती है मौर ममी बह पा सेना पाहता है। ऐसे मह दुख भी नहीं पाता पित नाम पाता है। पापों को बुमी छोड़ने से मनुषका यही हाल होने पाता है। पानी के पोते में पैसे मामू पर मामा मा हिरण मन्त्र में प्यास नहीं एमा पापा कम माग र मर पाता है ये ही नियमों में महोइए और माग हुए मामी का हाम होना बाबहा पाल र हैपौर रमादयधारता है अन्त ममप पाता है कि बहसानी हार है। पह मुट पुल है मोर प्रपमे सतरा सब-इप गए। बत इमी के खिलाफ तारमी है। यानी उससे हमें हर मिमता है। मी पाम किनारे न हों तो सहनकर मूल पाएमा, रतनहीं पा सकेगी, से हो त अगि मामी इन्शों को मारे नहीं पारणा को एक प्रमुखत और सांस्कृतिक रनयन स मस्तित्व का वेग निप्पल पमा पाएमा पौर यह प्रषिक चिया मागे मही गा सफेमा । इस तरह प्रत बीवन को सफल पौर उन्नत करने का उपाय है । मोम कहते है कि धर्म में नकार होता है। मह न करो यह म चाहो वह न खो पौर पर काम न करो। धर्म में इस तप के मिपेवावेस बहुस मिमत है पर मानम सोग मे ऐसी सीमामों और मारामों को पसन नहीं रख। व मानते है भीषन ऐसे एकता है, प्रशस्त महीं होता। पर यह प्रान्त पारणा है। नकार नो रेखा है जिसके अन्दर बा भिरता है। ऐसा पो मूग्य है बो क्षेत्रहीन है वही रेखा के बिना हो सकता है। इस प्रकार की निपेम-रेशापों से पपकर कोई शून्म ही बन सकता है सफल नहीं बन सकता । पसंयत म्पबहार से कमी किसी को सम्पन्नता नहीं मिमी है। सयम में होन्यापूर्वक मन को रोकना होता है। यह मही है कि बाहरी प्रकुम नाम नहीं करवा मेकिम मंबुस यदि मौतर का भी न हो तो ऐसा निरकृय प्रासी सप अपन मिए पम्त में मार सस्प हो गाता है। कहाँ तो यह एमे मुक्त बनना चाहता है पर फल यह हाता है कि इस प्रकार मह प्रपन को प्रतिपय मन्मन में और चारों भोर से नाग मा मनुमय कर पाता है। पण अपात् स्वत्सास । कहा है-स्वस्पमप्यस्य मर्मस्प नापते माता भयात् इस तरह प्रत का स्वम्पारम्भ भी हमारे विकत बीवन का मही दिशा में मोग सवा है। एर सम्पठायो पादमी को और उसकी इन्धामों को सर्वतय समतग होने का मोम देकर उसे मुना घोड़ला बाहती है। यह उसे अपने पपिहार की चेतना देती है और बताती है कि उसका प्रपिकार प्रमित पार पसीम है। इस प्रेरणा के बल पर पाना चाहता है पौर मुखोपमोप की सब मामपी पषिकाधिक प्रपन लिए बटोरना चाहता है। इस प्रपन में यह मरों के म मुम या किमी प्रकार की नीति पनीवि कर्वपापम्प पी पारणा पर प्रटकना नहीं चाहता । निसनामी प्ररणा में से भूब तरक्की हुई है। मधीन बनी। मौर उनसे पड़ाषा मात तयार हो या मेकिन यह कहना कठिन है कि उमस मारमो का मास कम इमाया सुसया है। कारण उसम पादमी प्रपन अनुमतको प्रार मिए पाता है मौर इसमें मरे के साथ अपने सम्बाप की स्निायता का विचार नहीं रखता है। अपने अधिकारों के पीधे दूसरे के अधिकारकाम्पान नहीं रलता है पानी परिकार को भारसा में मरम्प की भावना को दो रेता है। दूसरी तरफमा संसति है जो बन कम्म पर देती । जिसमें मामी की निगी उन्नति दूसरे से पिरोपी नहीं होती। ऐसे मह सामाजिक और पार्य गनिक होती है। पप्टिके ऐसे संस्कार में ही समष्टि का मुख हो सकता है। पार कि राजनीति का दूसरे सम्मों में मधिकारपरापम्मता का भाव सबके मों में छाया मा है जब भाषामक है कि कोई पापाय म्हवी गो इस मीषिका से मादमी का मारकरती । पादमी यों अपने से दूर पमा जाता है पौर पर अपने लिए प्रजननी-सा हो जाता है। लेकिन जैसे इपित में लिया है-'मादमी मारी दुनिया को भी पा जाए तो उससे क्या होता है पर यह अपना पापा मोठे। मनुष्य जाति कुछ ऐसे ही संकट में है। नियों को दो उमने बहुत सारा पा लिया है मेकिन अपने में बहनोई-मी लगती है। सब है कि उमर पन्तर में एक मन्बम-सा मचा। मानव जाति के विषारक और चिन्तक नाम सब नही चिन्तित है और पाना चा पेहै कि कहाँ है ? हातमी प्रगति वहां हमें गम पई है पर वो मया स्पर्म नही मरफ है। उमम हर पड़ी मुर के मा फटने की विभीपिका पाई पठी है। प्रारमी म्पस्न पाहै मेकिन पस्त मी रहना। पिचारक मानो फिर से सोसार पा पकि उनके और उनकी प्रगति प्रापार में सही पाया नहीं ये पौर सही मूम्म नहीं थे। मसती यामी की पौर मुषार को भी रा में ही हाना है। पमती मम्मता के महनहाने पत्ते पर भी चाहे गर हे माहक नपते हों पर तमा पन पुसी पौर मम्पता का सारा महाग रहने माना है कारण पा उपकी मानब सत्य की गहराण में से पानी सुपा नही बीच रही है। रमम ममम और मिनिमम है। पापापक हि सामाजिक और सार्वजनिक-समिनिरपीपन का मून में उस सत्र से पोका पाए भो मासिक और सारेसिक है। जो यही पही परमता मही ऐ पा मानना को एक मानता हो और उसके सामुरापि प्रमुखत और सांस्कृतिक समयम या प्रेमी-पय विग्रह का निवास धर्मस्प मानता हो जो इस तरह मान के परम्पर समर्प की बगह चमके पापसी सहमोप को मात्रार देता हो यो म्पा की जयह स्नेह का सबार करता हा । मेरा मानना है कि मनुष्य की पन्तरारमा में यह मालोन मम्भीरता 8 पन या है। मह भी मेरा विश्वास है किसमे से एक ऐसी उरान्तिमा जन्म मिमेगा जिसके मामे इतिहास में प्रसिब होने बानी रामनैतिक क्रान्तिपो निस्सार पान पड़ेंगी। राष्ट्रीय सरकारों की उपल-पुषन का महत्त्व उसके सामन पोका एपाएगा। हर देस के मम्मीर विचारमीस मोर्गों में इस इप्ट शान्ति के तत्व उपन ऐ है और कोई नहीं कह सकता कि का ये पुटकर एक होकर ए नया प्रकास जगत को देन में समर्थ हो जाऐंगे। भाषण-पादोमन भी मुझे उस विधा का एक प्रयल प्रतीत होता है। उसके प्रतिष्ठाता पौर संचामक में तेज है और बम है। मंगठन की उनमें क्षमता है। पस्त स्मार्प मी बनके पास नहीं है । अनुयायियों की काफी संध्या उनके पीछे है। इस तरह यह प्रान्दोमन प्यान सींचता पार पासा बाता है। मनुपापियों का समुपाय अपने में मितमा पुरा और कम्पधीस होगा सतना ही पान्दोमन पमझेगा । सबस बही कमाटी उस समूह की निसर्गनधीमता है। परनतिक रस पक्ति के प्रतीक इसीलिए नहीं होत कि उनमें विसर्मन पीतता का यह पुण नहीं हावा । उनमें प्रामह पौर प्राहरण होता है। ने से ग्यादा बींचते हैं। भारम्भिक धर्म ऐसे में विसमनपीस समूह को लेकर चमक । पीये मे मम्प्रराम बन मए, यो धर्म को प्रमाणित उपना न करने पे बिना उसे रसग माते । बिसर्गन की प्ररमा पार्मिकता पा सक्षए है। पसके प्रभाव में समूह बन की बमह निर्ममता के प्रतीक हो जाते थे। प्ररगुवा-पान्योतन मानव-मविप्प में हमारी प्रास्मा को पुष्ट करन मामा है। उसकी मतिनिधि के सम्बन्म में में सरा रस्सुक पौर विमामु रहा हूँ। उसमें निर्माण की सम्भावनाएं है।
अणुवप्त मोर नतिक पूनस्रयाम ---श्री विषप्रमावर भाग के विधान के युग में मंतिकमा सापेश है पौरपा इमनिए कि विमान स्पर निरपेम नही है। विज्ञान गति समता है लेकिन रिमा नहीं। चममें पक्ति है लेकिन कि नहीं। भक्ति की पति की जीवन में पनिवार्यता पर उसकी सत्ता स्वतण नहीं है। उमी पनिवारंवा किसी के सहारे और मा सहारा है भारमबद का। यह एक परत मापार है। पवन यही कुप भी नही है । सय समता नहीं । म नारी की हाली सब जामवेगिसमे कहा था कि यह मा परमार विपाकर सोने को समय है। उत्तर रेने पाने में उत्तर रिमा पा कि सारा ऐतारने के लिए सम्म मेकिम गित तरह पाता है उधी उप मोटर पाना भी उस साक पर मोटर पनामे पो स्तम्न है जमे ही उसके इस पापार से मारी के प्राण संकर में परमाए। पही से समता की मिरलेषवा ममाप्त हो गई, लेकिन उसकी भमिमार्यता पर कोई पांच पाई हो तो कोई बात नही। करवा इसी स्थिति को पहिसा भी कहा जा पाया है। सिम्पला प्राकांपा को खतापामा हिंसा है पौर संपम प्रति सागपाती इसरे का ध्यान रखना पहिमा है। इसी भावना में मे उपमता है। प्रतबिना मंगम मारवानी पोर मरेका म्यान रखने की गाव मम्मत ही महीं हो सकी है। पारी बात ये इस बाहरी पतिाप पारोपित नहीं किये जा सकते । सभी पस्याणकारी हो सपा स्वत पूर्ण हो क्योति पारम-मबम में से पाये। पारम-पाचा प्रारमशान से ही सम्मर दो माता है। इमभिए मारम भान पिना पनहीं है । विज्ञान भी उसके बिना पमुहै। नही पात परतीनि के गरे में नही पा सकती है। उममे नियम है पर । - अनुप्त मौर मैतिक पुनरवान उसके पीछे गो मक्ति है और यह सर्मा की पति है प्रति सुद हिसा है गोंकि यहाँ स्पर्श है यहाँ सयम नहीं है। मंयम नहीं तो प्रारम नाम मा? पारम-मान नहीं ता विद्या कोन देगा। फिर तो मटना ही परमा। सा विमान पौर राजनीति भान भटक ही रहे है। और मि पनि दोनों के पास है नममिए रिशाहीन शक्ति पत् िप्रसयत पक्ति को पुष कर सकता है वही पार हो रहा । नैतिक पराममता सर्पा हिमा कुम भी कहिए तुमार भात मोमिए परनी सम्वता का प्राधिक विसर्गन स्याग है। रागनीति का सम्म इसी त्पाप मापार पर हुपा पा । मेरिन पान वही गरनीति विनर हिमा बन पायोंकि उसमें स्पर्वा का बय हो गया है और यह इसलिए मम्मय हुआ कि इमने श्याम को दूसरे के लिए मान लिया है परपि बह प्रसन में अपने ही मिए ह । कोकि पन्तत गितना पुद मच्चा-परा हम करने है उसकी बिया + पीप मो शक्ति होती है वह अपनी ही मुरक्षा की भावना में से उपरती है। बक उसके परिणाम का प्रभाष दूसरों पर भी पाता है। यह समाई मेफिन यही साई पब म्यापक बनता है तब परमार्थ बन पाता है। स्वार्थ पीर परमा की विमानन-रेखा गत पाही नहीं है मोंकि सास प्पकिन कहीं मुक्त नहीं है । मेशिन पर वह पपने स्व को इसरों के म में ममा नेता है वो सपौर पर का एकीकरण गाता है। यह स्थिति तमी सम्भव हो सकती है पर पात्म-बान और निदान दोनों का समन्वय हो। प्रमति के सिए पति और रिशा दानों की पाई मेकिन यह प्रश्न का प्रस्त नहीं है। विहान पौर राजनीति पौर कोता पर्यनीति पयोधि भाग की राजनीति अन्तत पर्यनीति ही है, इस हमको स्वीकार नहीं करो । उनका कहना है कि प्राय गो प्रसराचार और पनविकला है, उसका मूम प्रभाव-मूबई। बात ठीक मान भी पाती है क्योंकि हिंसा में मोह तोही मरे ही यह पैसे से हो या फिमी पौर प्रकार की मता म । पैस में गी गस्ति है। विमान ने उसकी भक्ति को पौर मी माया पौर मोह के कारण यह परेशों में बाहर केन्द्रित हो गया है। इस माह पीछ मपुक्त को मोर विहान प्रति बुधि की पपित है। इस कारण कुछ सर्व सम्मान है और पुष मबहारा । पब ऐमा है तो लिएर हिंसा है क्योंकि इसमें एक मोर पूणाt मोह है मोम है और दूसरी पोर ईप्यो प्रतियोष समा गोर। गिरीप यहाँ तक महीं है या प्रामे है और इसके निराकरण में है। यह स्मिति से मिटे ! निरनर स्पर्धा से तो यह मिटेगी नहीं। मर्य सम्पन्न के नाम से भी इसका निराकरण नही होगा । इसके लिए तोबो सर्व सम्पन्न गर्ने सम पति का प्पान पोरकर रिशा पा सहारा लेना होगा। मपदि उन्हें समाथिए रवान करना होगा। परमार्थ पीर स्माय में कुछ को रम्भ की भावना रिपाई देती है। उसका कारण पैसा कि पास बता रेवत यही है कि परपूसरों के लिए समझ लिया जाता है पर पक्ति या समझ मेगा कि माग में उसी का भना है या उसमें मरम्म पेप ऐगा पौर म पौरा। पॉपितमन मोह देना नमकी मुरमा का प्रश्न । मैतिकता इस प्रकार से प्रात् 'म के पातर पर निर्भर करती है। 'म पमग उघ नही है मोच है यह मानव है । प्रणबत-माम्दोमन का मुम्म मापार भी बहो तर हम समम पापे है यही स्पान्तरपामार मान म ने प्रप्यपार को मनुष्य की भूमि को भारत से मिटाना चाहता है। मा युति को सही दिशा देने के लिए गुणों का विधान करता है। अपने पर नियन्त्रण रखने की भावना बात करता है। प्रवक्या है मनप-मतग उनका गया स्म। पाप बहुत पर्ष महीं रखता। तत्त की बात पो पारम-शाम द्वारा अपने पर नियत्रण रखने की है। वह मारना इम पालोमन पीछे मामिए रसको उपादेयता प्रदिप है। मेक्नि पर्त इस पावना को बहण करने की है। इसके बिना हम परि पर्डन एक सण, एक पत्र बनकर रह पायेया । प्रापार की मप्यता की पुकार मई नही है। पुप-यूम में मंतिम्ता भौर प्रतिस्ता में संघर्ष हुपा है। यही मपर्प पार भी है और इस बात की भोपसा करता है कि मनुष्य में इस भावना सो पाप नहीं किया। इससए इस प्रामोसन के संचामपामार और भी बामाता है किसिमता पान बन जापे तमता रामकी बात है। यह ।
प्रगत र विक पुनरपान ७ पा समझने की पक्विई पता पोरन की नहीं। पोंकि शिपिविषामो पा बाहम्प पीर पटिमवा उसी गाय की हत्या कर देते है जिसके लिए उनका जन्म होता है। ऐसा होपा भी इसके संचालक भाचार्य पी तुलसी के पत्रा में 'भरघुपतीनब मानस की पन्तर-वृत्तियो को मानने में समय हो गया। उनका या स्वप्म कि 'पवन की मोर पर प्रहिसक समार की रचना को बहुत सम्भव है निश्चय ही पूरा हो सकता है, पर हमी या यह सर्त पूरी हो । मही ता नैतिकता क्या है और क्या नहीं है, इसी बाम में मकर रह जायेंगे । सब मोमो या भूठ मत बोलो यह कहना है पर इसके साप इस बात को भी हम न मना कि ऐसा करना है किवना कठिन । 4 साप्प नहीं है सावन समाज-म्पबस्था का परिवर्तन अनिवार्य न हो पायक प्रमाण है। भाग के प्रप्टापार में पीयि युग में प्रस्तुगत-भादोलन का समर मरणा सम्म मामय के मुख में पमुठ मरने जैसा है। एक पोर महा मणुबम के पीछे मनुष्य की बुद्धि विर को समूम मप्ट कर देने की धमकी दे दी है। वहीं प्रयु बत-भादोतन पीछ मनुप्म का विवेक मानवता की खालिए सम्नर हो पख है। पति हो नियक का या सर ममी क्षीण हो पर उसका होना ही प्रासार भविष्य का मूषक है।
२० प्रावत-ग्राम्योलन एक अध्ययन श्री रामगोपालविणार समकालिक सम्पारक भवभारत टाइम्म मगमप चार वर्ष है हमारे देम में प्रभूषव-पाम्दोलन की पम पी इम पान्दोलन की प्रथा रेप के नेताओं विषारी और समाधार पर्षों में तोकीही, पिपों में भी पूष निधारकों पौर समाचार पनों में दम पालो- मन को मानम-समारो लिए कि नाम है। तमा होने पर भी हमारे रेस के प्रवेक पति पौर मन ऐमे । यो इस मादामन को सन्देह पबना रपेका की रष्टि से देखते हैं। भी नौब एसा करने ससा करने का कारण प्राप' प्रशान पोर मीठा पर पापारिक। समोने या वो पह माती मावि वमन ही नहीं कि परपुबन है क्या और श इस माम्बोजन को एक सम्प्रपाम विशेष प्राचार्य मुनियों मा साधुओं rat प्रारम्भ गिमा पमा पामर से उपैया पार नही मि से देखना प्रारम्भ कररिया। मत माती भांति कमरमा काहिमामामोमन है क्या पार मे पनामे मातों का इसे पप्ताने + मूत्र में गश्म पमा यस रिमी मर्म मिपण प्रणा सम्माम विपैप से सम्बर होने के कारण किसी वस्तु को प्रमाण मान न की उपेक्षा कर देने की प्रवृति युरियन हैमही पाय पाठक भी है। सत्म मापण भापि सापार के एसे प्रेम को सभी भयों में मम्मिलित! पौर निकामिण प्रमानिक मनुष्य भी नही कर सकता। परनु परिकार पति म सर्वसम्मत पार सर्वसम्मानित भाषा उपरेप की पोररी प्रपने भाग वन कारण मूरमे समे किसे, रसके पर्म पर सम्पदाम से भिन्न मात-मायोजन : एक प्रमपन पर्म वा सम्प्रदाय का कोई उपदेशक या दुरपर या है तो वह अपनी ही हामि करेगा उस दुर की या उपवेधक की या ससके धर्म या सम्प्रदाय की महीं। कोई किसी मूम्दर तथा मुमन्धित पुष्प की मोर से अपनी मा तथा ना केवल इस कारण नहीं मोर सेता कि यह परावे ममीचे में विस रहा है। हम पौष्टिक तमा स्वास्थ्यवर्मक मन्न का केवल इस कारण परिस्पाम नहीं कर देते कि मह हमारत में उत्पन्न मही हुमा । पुरानी कहावत है बातावपि प्रहीत मुक्तमुक्त मनीषिभि । पावत पान्योलम का प्रारम्भ मगमग चार वर्ष पूर्व स्वाम्बर जैनधर्म के पतर्गत तेरापंथी सम्प्राय रे प्राचार्य श्री तुलसी ने फिमा पा पोर इसमें उनका उदएप तेरापंथी सम्पराव का विस्तार करना महीं अपितु पाति गर्म देस और धर्म का मेर-मार म रब हुए मानवमात्र को संयम-पप की भोर पासप्ट काना पारस पावोसन की मोर मैनेवर सम्पनों के भी बहुसंख्या में पाइष्ट होने का प्रपान कारण मही है कि इसमें प्रतिपारित पाचारों का सम्पन्न धर्म-विषप मा सम्प्रदाय निक्षेप से न होकर मानवमात्र स्पारण से है। कोई भी मनुष्य पर किसी कार्य का पारम्भ करता है, तब सभापत पार पनिमार्य सेण अपने ही सापनों से करता है।पीचे उसकी सफलता प्रषा उस कार्य के गुणों से प्राकृष्ट होकर मन्म मोप भी उसके सहायक बन बाते है। पसी प्रकार तेरापंप के प्राचार्य श्री तुमसी ने भी स्वभावत इस वत का उपवेश पहमे-पहन पपने ही शियों को किया पौर प्रपन ही पियों द्वारा उसका प्रचार करवाया। पीछे नेतर सम्बन मी उबर प्राकृष्ट हो गये। प्रणवत में जिन प्राचारों का पालन करने की प्रतिमा ती मोर्गों से मिलाई पाती है सब हित प्रपमा मैरिक धर्म में भी यम' नाम से पहात काम से अपमित है 'सस्पार्मसास्तेय ब्रह्मपपीमरिमहा यमा' । पमी पाच मापारों के पासन की प्रविशा प्रसुवतिर्मों से विभिन्न पर्यों में करवाई पाती है। भेद केसम्म इतना है कि मार उपत सूम-वाय में इन पांचों प्रापारों का निर्देश मृग-माम स्म में कर दिया पया है पीर प्रभुपत की प्रविमानों की मापा पार के मोठ-म्पबहार को देखकर उसको सुपारने की प्राणायामों के अनुसार मातीमोर बनाई गई है। मनुषव का ममप मम वेरापंप से ही महीमा भनेक परनामा से सप हो सस्ता है। मानार्म भी तुमसी ने पो उपरेप और मिन प्रापरणों का प्रचार भनुन के नाम से प्रारम्भ किया नही मरेप पोर सम्हाँ विचारों का प्रचार, पमय उसी समय महात्मा गांधी के पिप्य बिनोग मारे म सोश्य' नाम से किया। सर्जरव ग्रानोमन सम्बन्ध विनोबा भाव के माष पोगा पाता है। परन्तु वस्तुत' रसके विकास में पापीनी के एक भय मिप्य • मभूमाता मे भी रखना ही योग दिया था यह बात समर मोरा भाने भी मानते है। पर पांचों निगमों का सूचक पाप गव करके तो यह गानामा ही है कि माता का मूल हिवर्म में भी है। अन्य मौ भनेक पाय पोर लोक भारि इस विचार की पुष्टि में लिपा सन्त। एक तो है-'ति ममा रमोस्तेप पौर मिमिपनि पीरिचा सस्परपीडो र म मनम् । पाच यमों के पतिरिक्त पोष-संवोप तप मापानेसर प्रणिपानानि मिपमा वास्य में जो निमम पिनापे गये। मी यों की साधना में सहायता के लिए है। पर जिस प्रकार महसवमाश पमा लिपपुरतों का सम्माम रेगम राम से नही, उसी प्रकार हमाप सुना है कि इस पारोमन रितार में परि कामेवर साधु और सम्पासी मो समयको पाएँ पो इसमा विस्तार तो पीम होमा ही यो सोप बरसकीर्णतावर पास्ट नहीं होते गनो संघय और साता भार भी हो पायमै । निसनराम नुमान कोम्मिाबित करने में प्रोक मावहारिक कठिनाइया है परन्तु र यल करक दरकिया मामला है। जिस पठिनाया * भय से कार्य प्रारमन करमा परमिता वो नहीं है। "प्रारम्मते , बतु निम्नामेन मी, प्रारम्प विनिहता पिरनन्धि नमः । पिन पुम पुनरपि प्रविड्म्यमान, प्रारराय मुसपमा परिपत्रवि कपनी भौर करमो का प्रतीक-प्रणुव्रत-पाम्दोलन --पो मातादीन मगरिया सम्पारक हिम्बी साम्स प्राकार की नीतिमा में परेर पस काहिनुर पौर तारों के मान कमी रात की रौनक बनाकर उसका मूर निवार देंगे इसमें कहीं मक नहीं और यह मी सही है कि नक्षत्रमासामी दीपावली रानी विभावरी की तमिम राग्य परिभि से बाहर भी उस प्रशास-राग्य की एमी कसा है जैसी की निशा-महिपी की पासन-व्यवस्था में कही न मिसे । माना प्राने पामे मंगस प्रभाव की प्रपुर प्रमा का नमूना तन पर मोर फिर ये वारे । पामोक के इन पप्रा की सबसे बड़ी पासियत यह है कि प्रकास-मोक की पर्चा दो पेपर है-कहते नहीं है। उना सामोपांग है इनका करना कि कहना बहुप उममें से चमकता रहता है । सामना--पोति से स्वयं को सुसगाकर प्रकाश का पैमाम 4ठ है ये। उषा कान की प्रस्णामा सबेरे की तारगी बन गोमा की सिमती हुई मुमन सम्मा पचियों का कप्तरप पीर भामरण की जिन्दगी मानो प्रकार के महीय सितारों के प्रिय परिणाम है। इसी तरह हम कहना चाहे हि भावों के पो-बो स्परप परिण-पा की मुक्ता-मामा परि मैतिक उत्पान के पर गम्म करने की जरख रखा है। सस्प और अपरिपा महान् सम्म पे-स्वर्ग से भी बड़े । मेकिन समास मह है कि इन्हें बीवन की सार्वजनिक भूमि पर उताग से मापे तागत दुख इए, महावीर स्वामी हुए मौर गालीगी हए । उन पुष-पुरों ने कहा कम किया म्यादा पौर इसलिए जनता मे-को-भावना में उनको माय के स्वर्ण सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया और उनकी नापी । पाम भी इन्सानियत राम पुष्प-पुरोको स्मृति में कमता का प्रर्प बना रही है। इसमें गक नहीं कि महान् पियानों की प्रमृतमयी नुपू से मरे मान् मन्त्रों का इतिहास यान १ . मगाव की पार 7 मीरप-रित है । महाकाल के विराट प्वाने में महराते जीवन-सागर सोमनों बर्ष मपने के मार प्रादमी की दुनिया को संस्कृति सी दिव्य मरिण और रन पदो के मनाई मोती मिमे है बिारों वर्ष पामे से पान सर यह प्रश्न प्रान ही बना हुमा है कि पदों को मोक-मार्ग के दोनों बार प्रमों की पार मी तरह से मपापा बाये? इसमें दो मत नहीं हो पाम मोपनीवना हिम्मा बनकर ऐ किन्तु से हो बताये-कसे ? मन-पान्दोमन रे प्ररक पावार भी तुमसी ने एक परीमख पुरुकिमा है। प्राचाप भी तुमसी पोजन विध्य मुनि यो मगरारको सम्पूर्ण भक्ति म प्रनुपत के प्रतियों की माता पिरोने में ममे इए। माँ का हमने समम्म है-पपुवती-मंग की स्थापना म पाचार्य पीकी मबरिया यह है कि प्रत्येक ममुरती संसार पौर मास्थ की मर्यारामों में रहता हा भी धीमे-धीमे नियम निर्मम पीर सरन मात्र से नमवापूर्णक याल का प्रा सत्य पोर परिप्रह के मसि-बार मा का पाब होने की योग्यता प्राप्त कर सके । इसीलिए पायप प्रणबको-सबक नियमों की मुदिप धर्म की प्रतियों में पक्षित रखा गया है। ऐसा कि रिसे साधारसमम प्रण कर सके। सांसारिक परिस्मिों की सीमास स्वीकार में हमें प्राचार्य मी के पापहारिक सन्तुलन का सवार दृष्टिकोण साफ रिसाई ना । प्राचार्य श्री का रहना है कि भार म्पति मौर समार के जीवन में भप्यपार, मनैतिकता पौर मिथ्या का बहुत म्यारा मोसमाना हो गया। स्माई पीर परिग्रह म पारा पुरी तय फैम का है। रममे पारा सभी सम्भव होया पर कि पश्यि प्रापार और नैतिकता की रोशनी सेबीपन को अपमप करे । पाचार्य पी को कहीं समेह नही । सफलता पार सफलता की निगाह से चर्म रो मापना भी नहीं चाहते। क्योंकि ये सिरपी पौर पीठगी है कर्म निष्कामषमा उनका समाष बन की है। लेकिन हमारी माम्पता यह है कि प्राचार्य भी की मारिपहनी पपास उन सबके लिए है जिनके पास परिसह- मंग्रह का कभीमबरम होने वाला मामरापहा सापाचार्य भी अपना ताम्मुफ उन पफ्ना सनामा साफ है । यो मनमान् महागीर महा कमनी पौर परती का प्रतीक-प्रपषत-मामोतम पौर अभी पिपले विनों हमारे सामने बो पापीनी ने कहा एवं किया यही वो पापाय पो तुमयी चाहते हैं। गांधीजी की स्पष्ट पार पी सिके रोगपत्ति मिप्य सही मायने म इस्टी बनें। पाचार्य श्री पाहते है कि अपरिपही बनने का प्रमलहरें भणपती मा पाचरण ठीक करें। लेकिन इन प्रयत्नों का परिणाम पकान पाता है। कितने गांधीपारी बन-बर ट्रस्टी हुए ? सर्योदय के साबमामार में मिलने साबक पाम प्रारमी के उपय की भाषा में सोच सके? भगवाम् पुर से मेकर पार तक के पार्भवादी प्रयोगों मे गहरन हिताय के मक्ष्य की कितनी मचिम की? शोषण कितना कम हमा और विषमता कितनी पटी ? पापसगाव पवार देना चाहेमा कि सिमान्तों की पूर्णता का क्या पपराम पनुयायी पस रिम्प रहे मुक्ति पर जितना पमना चाहिए पसे नहीं। तो फिर उन सिवान्दों की नबनुपी-हार काम क मगाय सोमा की पीर म्यादा है, यह कह गाए दो नापस नहीं होना चाहिए। प्रप्टाचार मिटे, मिताधारी झा अधिकाधिक मो-प्रिय हो सका मा पाधिकामिक का परिप स्फटिकाम हो पिषमता नष्ट हो पौर पत्ति एवं धमार रेपोष प्रापसी हिंसा भावना कम हो तना उसकी यमह प्रेम सद्भावना पह योम और पारस्परिक सहायता की प्रवृत्तियां फैमें से कौन महीं चाहेगा? किन्तु माचार की सतह पर किया गया प्राचार्य मी तुमसी का पस्युबत-पान्योतन प्रयोग मानवमात्र के सामने धर्म के सेंग के प में मस्पित है। प्राचार्य पीधि मिा पन के बरेय राहगीर है उनके पासान में तीव्रताप ऐप निर्ममता पार पानात जैसी कोई अधिक परप बीर नहीं हो सकती तो मी हमाप निश्चित मत है कि प्राचार्य भी की हुनौती अपनी मुड्स और प्रिय मुनिमापा मैं सबके प्रति है कि बोरखापारी न करें और अनुचित मायोरी की तरफ मुखातिब न हों । क्या मर्षे है इसनिपर्मो का? यही कि मनुप्प सौ रोटी या पांच सौपने कर रयाप और तपस्या की प्रटूट परम्परा पामे सुवर्ण-मंरित अमृत सिमान्तों को पातन करने का म करने के बजाय मुनि गुमरन पपूत धमों को पोड़ा-बहुत गोपन में उतारने का प्रया पल करे। पातक माहि-पान करेसा या प्यासा पठा ऐसा कोरको ज्योति १२ प्रवृधव की पौर । चाहिए-मुस्प के स्मृतिय चाहिये । अपि-परिपाटी पौर महावीर पुन के माचार्म पी तुमसी पैसे मट्ट सिप्पयों को सत्पन्पर्वा का विमुर स्टमिप चाहिए। युग कामपा पकाकर पूरा मोहरे सकन पी समता रखने पास मस्य पौर अपरिग्रह जैसे सिताम्तों को पनपन तक पहला देने के लिए पिवमा अनवरत प्रम्यवसाय शिवनी प्रक्रिम तपस्या पितनी निर्माणान्ति और विना हिमामय सार्म चाहिए, इसे बताने की बात नहीं। पोषपुर के प्रणव-सम्मेमन में हमन भाचार्य श्री का यह महासन्रेप मुना गिसमें उन्होंने पपुवतियों को समय का महासम्रेस रिया । कौन हो सपता है निर्मम । बही भो समता पराप से ग्रन्म हो गोनोम कामगीत होकर सावरह के पायर्पक नामों को पराभूत कर मके पौर नि पार के मरिर नृत्य मुमा न सके । ममय नही हो सकता है को पानम्र और व्रत का माने मानामुनि विराट मीपिका एक हिम्मा दुर हो चुका हो । प्रस्म 'स्व' की समस्त सीमानों को बोरकर पनन्त बहाणा माप से हो? पहले से नहीं भपाठार करने से ममयरस माम्यारिमा सस्प की पात पानेनिय पर मपन को पगरती पने पाता प्ररयेत म्पति तना मी परे कि उसे हरकारी कानून पर रन पे या सिबमरौरन म पोरवागारमारे, मनुषित पते पनोपान न करे तपा मन मैतिक कोर का ईमानदारी से पालन करता ऐ वो भी बहुत बड़ा काम हो । निम्तु पहा मी प्रान करन का है। पापीनी में इसी पद के ग्या में बने सत्पादियों दी सपना माचार्य श्री स्वयं माफिमस्या का मोह नहीं विवामिरी पाहो है। सोना पौर सौ टपका मोना । क्या हम प्राणा परें कि प्रपती प्रपने हयों की निगोरियों में स्वर्ण-मणि-मुमता के गाय पसाती मंप + निपर्मो पी सीप रल-राशि को करने की मारियों में पिरोकर ममामा पुन करेंगे। पाचार्य पी पपने पप पर बरे वा हे। सना उमरा समान नहीं पना पनि पाना नहीं । उमरी मपित निषित, मात्र स्पष्ट है दुरिपा करनी पौरपनीका प्री-प्रत-पाग्दोलन ५ नही पौर म संभय । समी चाहये कि पापाय प्रीप सुरु यिा गया मोग- हिवाय प्रयोग सफल हो -म महाया में मर अपना-अपना पोम। मानववा परीमण पर परीमरा किया जा रही है। माया म पएक मैतिक महायज्ञ गोपण पार रिपमता की समाप्ति के बाद परिग्मेद है। भाषाय भी मे पति मान पाने व प्रतीक है।
२२ अणुव्रत प्रौर भूपान -मुपी सुमारागी मोदिनी परपुवत मूदान मान्दोलन रोनों की प्रान्तिकारी विचारपारा अपने अपने हप्टिकोण से एक ही सामाणिक और प्राषिक मन्ति का प्रतिपादन कर रही रोगों का मान पौर बोगों की साधना म दोनों की सेनी एक ही मनो- शामिक पार पार्शनिक सिमान्त पर प्रामारित है। दोनों मानपीम प्रान्तरिक रिकाम की पानी को भागे बढ़ाने में रेत की समानान्तर पटरी समान हुत गति से सहयोग दे रही है। अषत युरिया हम परिकार पर बम देवा है तो भूबरामयशपय में स्नेह की सरिता प्रवाहित करणे मानपके मषि मिन्न सम्बयों को हारने के सफल प्रयास में है। भरणुगत पौर मूवान दोनों पर विचार करने से मात हो जायेमा मि माणु प्रत का प्रमतरण हो हाहै तो भूदान का पारोहण । एक प्रकार स्पना के पानाम से नीच उतर रहा है। पम्यान से प्रस्फुटित होकर पर वितरित बिग में म्पाप्त स्वार्षमय प्रकार के बिनाम के लिए माम्तरिक मानवीय पिम्पासास से ऐसे ही कितने प्रीप्त प्रकाओं म पारिपरि पा करेगा मौर म सभी भीम प्राणों सम्मिनन है वो एक विसम्मापी असीमित विम्य-प्रकार संसारण में प्रकृति के प्रमुमणु में म्पाप्त हो पाएगा तो सारे संसार से पुल मुसीबत, बल-कपद, भोपा मारी फरेब का राग्य समाप्त होकर मुन-पाति पार भानन्द का वातावरण सत्पन्न हो पाएमा । अनुमत पौर मुहान पोनों ही मानव की प्रमुप्त पक्तियों को सर्प से। दोनों का ही मूमापार मौतिक न होकर पभाविक है।रोगों की एक निश्चित प्रसना पौर मुप मापा है। दोनों सस्म महिला प्रेम को मामय के विकास का एक- मात्र सापम सीकार करते है। प्रस्तर केवम इतना ही एक मोतिष-स्तर .
अनुप्रत पार पान ए से भौतिकी की मोर भार दूसरा ममौतिकी सीमा से मानहारिफ मौतिकी मोर पड़ रहा है। मानवीय विकास के लिए इन दोनों पतियों का प्रबतरण पौर प्रारोहण प्रयत्यम्भावी है। भर तक इन दोनों पाए की गतियों का समन्बय होकर भानषी विकास की परम्परा सम्पारित नहीं दी जाएगी तब तक उसका विकास एकामी ही रहेगा। चाहे पति का पक्तिमत सीमा के भीतर प्रसीमित विकास हो प्रपमा समान का विस्तृत क्षेत्र में सौमित विकास । दोनों की साधना सीमित मस्तित्वको असीमित शमित से मोम की पोर ही में जाती है। विकास की परम्परा को स्वीकार किये बिमा सापना के बारा विश्व की उसरे भवमों के विकास पी सम्मानना ही नही रह पाती और अब हम एम पार निकास की परम्परा स्थी कार कर देते हैं तो फिर हमें विकास के हाप रेवत्व पौर स्वर्ग के प्रबतरण की कल्पना के इस पुप्पी पर साकार होने में कोई सन्देह नहीं पाता है। कुछ मोर्गों का यह भ्रम है कि विकास के साथ साप भी हो तगा रहेगा' इस स्पन पर कोई महत्व नहीं रखता। मास्तर में विकास के साथ हास ममा रहने माता सिमान्त प्रमणीस है। विकास से गो कमी भी हास के चिन प्टिगोचर होठे है, में विकास में रह गई किसी कमी के परिणाम माम है। विकास का मभाव ही हास कि विकास के पतिरिक्त उसकी कोई मति है । पायित्व की संझा का नाम ही हका हुमा विकास है। प्रणुव्रत और भूरानया इसी विकास की उत्तरोत्तर वृशि के मिशन्तों को भीषन में पालन करम के लिए सतत प्रपलपीम है, चाहे दोनों भिन्न-भिन्न संस्थामी सारा मंचामित हो रहे हों पर पास्तव में दोनों एक दूसरे से पमिम्न। यह बात प्रत्येक मापक के अनुभव में पाता है। परगुप्रत पौर मूरान रोनों एक ही सास्तु के दो प्रभिन्न पार्य है। दोनों का गप्प सोपणमिहीन समाज की स्थापना करना है। मानों पाचोमों की विचारपारा के पक्तियों के साथ उसके प्रवर्तकों का महान् प्रारिमः रयाप सम्मि मित है। दोनों का प्रापार प्रपिकतम त्याग और पवित्रता पातोपासमार्च है।रोनों भौविक स्मृति को पौवन में पक्तिगत रूप से स्वीकार करने पम में मत पर की अमृत मही है अपितु मिष्य को प्रपिक से अधिक भौतिक मुविधाों से समरखना चाहते हैं। सावा बीवन और उन विचार, यही दो सिमान्त इन पान्दोमनों के प्राग है। मानस को एटम पवित्र करने के लिये तिरसत म्पक्तियों के प्रति सहानुभूति और प्रेम की समानार्थो ना उत्पन्न हाना और अपनी स्नेहममी पारा में उन्हें निमम कर मेने की प्रथम राष्ठा संगोये रसमा प्रति पापापा है। पुग्गा का उपचार प्रणा रन से मा तिरसव का उपचार तिरस्कार पपा परिष्कार करने से नहीं होगा। उनके साथ हमें अपने ममीपारा को सम्मिलित करना होगा। हमसे गो पणा करते है, पहें भी हम अपने दम का स्ना देना होगा। पुंगीवार और भौतिक साम्यवार दोनों ही मामी विकास में गायक है। साम्ययोग प्रेमपोम पोर पहिसावत ही मानवी विकाम के मार्ग है। यपपि मनुप्प पाति को विकास की कठिनतम पाटियों पौर निकटवर पहारिया में से होकर गुगरला पोगा पर सापकों को कमर कस कर हर प्रकार सा भूस्य भन के लिए पार पना होगा। हम एय-परिवर्तन की प्रतिमा में विस्मास रखते हैं। हम किसी ऐमे स्पापी पपगुण का अस्तित्व स्वीकार नहीं करते जिसको गुण की प्रपिया में स्पातरित किया मा सके। मिस वर्तमान मेपर्प में विचार वही मुस्म पारग। अगर हम माम्पारिक विचारधारा वारा मस्मैक मक्तिमा प्पान ममार-स्पा के प्रति मानव विकास की सापना के प्रति पाकपित कर सवा कोई कारण नहीं कि भार मा पातमगार समून मष्ट म हो जाये प्राक और भय से प्राधान्त पावावरण पिरको पाम्ति सनसमोस। पाप्यारिमा विभारपाय कामा पतनार मस्तुबत भूरान फूला है रसते नैनिता का विकास होगा। भार देम हर रिचारसाम् को इन मेत्र में पाये मारमार्य करने की परमन्त पापापाता है। इस हर ऐसे मुक्ति का पो इम सत्र में माना चाहें हरव स पास्मा से साया करते है। ।
२३ एक महत्वपूरण माम्बोसन ---भी करतात बर्मा तरकालीन सह-सम्पावक, हिमुस्तान मागिरान भीप्स ने प्पामोहयुपत प्रम को उद्घोषन करते हुए एक पाम पर कहा था- परा पा हि धर्माप पनानिति माप्त। मम्मुत्वाममपमस्म वास्मान तमाम्यहम । परिमाणाप तापूना विनामापनमस्ताम् पर्म स्थापनाप सम्भवामि पुने मुगे॥ उनके इस कथन की रप-विवष्य के इतिहास से पग-पग पर पुष्टि होती । युर महावीर पंकर, मुहम्मद ईसा स्वामी रामदास गुरु नानक सामी दयानन्द सरस्वती मार अपनी मां के सामने महारमा गांधी इस बात के प्रत्यक्ष प्रमाण है। इनके पबतरण कास में वैप में प्माप्त विकृत परिस्पितियों और उनके निवारण के लिए हुए इनके कार्यक्रमाप इसकी यमार्पता के प्रस्ट प्रतीक है। इसमे भी बाकर इनके भवतरण की शरमा। हिंसा के मयंकर म्यापार के समय पर पौर महावीर का नास्तिकता के प्रवाह के समय में कर का सामाणिक पतन की परिसीमा पर मुहम्मद का गुणा के पानाम्पकात में ईसा का पवनों के पराप्य काल में स्वामी रामवास पोर पुर मानक का भारतीय मंसति पर पापचारप संसति के मकर माम्मएकाम में भूपि रयामन्दका पौर पासता क पमिणपगम्य पतुर्दिक पतन-काम में महारमा पापी का पवतरण ऐसी घटनाएं है पो प्राति की मुसोषित यौगना रा प प्रतीत होती है। महापुरपा की महमा की कसी के स्म में पान एक पोर प्राचार्य विनोबा पौर दूसरी मोर नाचार्य तुमसी हमारे सामने विद्यमान है। महारमा गोपी में 50 ८ अमातीमोर अपनी पपस्मा एवं सरप पार पहिंसा के बम से देय होमवारे सम्बम से मात कण्या मितु मोपण पोर पखिता के पमिपाप मे मुक्ति रिसार रामराग्यमापिध कामे की मपनी सपनाको माारसपमहीपा। उनके पपूरे सूटे इस काम को प्राचार्य विनोबा ने भूपाम गप में अपने हाग में मेकर उसकी पूर्ति करने के लिए अपने प्राणों की बागी नया दी है। जिस समय महारमा मामी ने पूरणी भर मिट्टी से नमक बनाकर पतिवानी ब्रिटिम साभाग्य की सत्ता को पुनौती दी थी तो नोयों में इसप मजाक उड़ाया पा। समिल हम भार व हे किनिधि पाभाग्य गहा मायब पीर मजाक गाने पाले रब मगाइ सिकार मन पपे है। इसी प्रकार पाचार्य पिनाका के वाम की कम्पना को लोगों में एक सपा पम्पपारिक स्पना की मंशा री पौ मेकिन यह सम्मारिक कासना मान जिस प्रकार सागर रप धारण कर पीपौर देश का सारा मावावरण माग भूगन के साथ ही सम्पत्तिान पुप राम पार पमरान पारिसे रिस प्रकार राप्त हो रहा है नमम स्मो माम की पूर्ति में कोई मुंगापस नही ए पाती। दूसरी और इसी के समानान्तर पाचार्य पी दत्तची कामतिक उत्थान का प्रायोजन |पि हम मारो नये किन्तु सरियों की गमता और इससे भी गार पिचम महापुर बम्प परिस्थितियों से बच में प्रतिकता का प्समा पोरापमा ककोई भी क्षेत्र सा महीमो मम पचा हो। पार लोगों के लिए पैसा ही परमेश्वर हो गया है। उसके लिए अपम्प मे मपम्म अपरला एक पाबारम्प-सी बात पर है। हमारारों में मामूली से मापूनी काम लिना रिपत पिये पूरा नहीं हो पाता। मेले मातों के मन में तो मका को नम ही मरी। रमे पामे भी इसके प्रम्पानी समान एक सामान्य भीर मानो मन पसे है मार हमारी सरकार प्रयासर निवारण के प्रपों को प्रममता नही मिल पा रही है। पोबार सरसरी रिपानों में ही सामाम्प प्यापार-पसाय में है। देश में किसी भी चीन का गुर स में मिलना पसम्म माप हो गया। और तो और पीपप मी पीयों में भी मिमा कामों के पीस माष सिनमार करने में सको निमिषाहर एक महत्वपूर्ण प्रामोसन ए नहीं होती। पहने प्राय सहर ही पुराइयों का केन्द्र मान बाते में किन्तु प्रय से मार भी इनसे पछूते नहीं मचे है। सीपी साधी प्रामीण महिलाएं नक समाये हुए वेत (वनस्पति) को पके साप ममाकर उसे मुसभी के रूप में परिवर्तित करने में इवनी निपुण हो गई है कि उस पी का मुस-प्रमुर की जांच के लिए बनी मशीनों की पकड़ में प्राना मी कठिन हो पाता है। हम मर्पपा अनैतिक म्यापार को रेसने निक भाव से करती है कि उसमें निहित अनैश्मिता का उनके द्वषय को परा भी मामास महीं होता । या भवस्था मार ममी क्षेर्मा में है और हामत भी प्रत्यन्त चिन्तनीय है। जब तक किमी म्मक्ति में पुराई को बुरा मानने की चेतना बनी रहती है तब तक उससे यह पासा पती है कि अपनी कमजोरी पर हानी होवे ही मपुराई से यह प्रपना पीक्षा गुमा मेया। लेकिन नब प्रसद् को प्रसप् मानन की भावना ही मूम्प हो जाये तो यह एक भयाणा स्पिति हो पाती है। उसमें उसके ग्वार की पम्माषना मप्ट प्राय हो पाती है। दुर्भाम्प से भतिकता की प्टि से पान हमारे समाप की बहुत कुछ ऐसी ही स्पिति है। कोई भी राष्ट्र जिसकी मैतिक पापार भिमा कमजोर हो अन्य क्षों में कितनी भी नम्ननि करल पर पन्तत बह टिक नहीं समठा । ऐसी दशा में देश में नैतिकता की भावना मागृत कर इसको अपने जीवन में म्पनहत करने के मिए प्रारम्भ पिए गए भाचार्य पी तुलसी के इस परबत-पान्दोलनमा मारी महत्व ह । पापाय भी के सम्पक मनुयामी रेप भर में फैमकर पिविष क्षेत्रा में इस माम्मोप्पन का प्रचार पर ऐ१ पौर उसमे पन्हें काफी सफलता भी मिस पी बताई जाती है किन्तु वह प्रचार पर भी बहुत सीमित है। अपने देस के नैतिक नपान में विश्वास रखने बामे रेम के प्रत्येक विचारवान् म्पति को बिना किसी जाति एष धर्मक भव भाव के हम प्राम्बोसन को प्रपमाकर उसमी पूर्ति में योग देमा पपमा पुनीत कर्तप समझना चाहिए, मौ बह म्यापक स्प पारस कर सकेगा और तभी एमको लक्ष्य-सिटि मम्भव हो सकेगी।
२४ सामाजिक प्रगति में द्रों का महत्व -श्री हरिमा साम्मम्म वित्तमंत्री राम माग रेस में सबसे बड़ी पायाममा दो वार्ता की। अमनपो प्रत्येक नागरिक के पीपरतर तमा समान में पती भाषिक मिपमा में समानता साने की पौर पूसरी-मम्म प्रौर मार का निर्माण मैतिक सिम्तों के मापार र करने की मार के युग में बहुत से लोगों की पर माम्मा है जिममारी रपनाको प्रमापित करने मामी मर्म-गौर हमाम् है। खसिए मानव जाति का इतिहास रेसने है प्रवीणोता कि माना यो मोरने में माविक पस्तिमा में बात भाम मिया माता के भूत में सुपी मापमा प्रस्त है और उसी की प्राप्ति के लिए प्रयास करता है। मास्सरिक सूप अपने पीजन के मुब में महीपा दोषरों की सुचना एवं सापना में निहित है। अपने म्पमितपत स्वार्थ को पोरकर इसरों के हित मापन में ही मेरा हित है यमममने मी पो मनोवृति है मीशिवाt। दम्पत्तियों परस्पर सम्मम्मको रिपर से पानी प्रणा का माम माधि है। नीति और विस्तारोनों ही समान में महत्वपूर्ण स्थान रमते ।। पहा पूर्षि के लिए सपा में पों का रिकास हुमा । तर पमिमाम है कि हम सिौ एपई र पौर सी के लिए पता को अपने बीवन में अपनाते है। यह बात भी निविकार है एर नियमों बिमा समार का जीवन पन नहीं समाताप हमारे पोरी मुखि होती है। प्रमुख माग्दोलन के मापार पर हम प्रतिमा समाप्रति मप्ता अपने जीवन के सम्मान में विचार करें इन रिमों में हमारा जीवन रिना पायेगा। मतों से हमारे जीन में परि सामायिक प्रतिमा का महरा कोई प्रभाव नही पड़वा तो उस प्रकार के प्रत मेने से कोई माम नहीं । अनिच्या प्रथया मोफ मार से लिए हुए ब्रतों मा भी बीवन में काई साम नहीं होता। इसलिए बातों को अपनी इपास ही बहस करना चाहिए। इसरों पर प्रभाव गनकर किसी से कोई कार्य पूरा ना ही हिसा है। इसी कारण हिंसा को पुरा मानते है इसलिए पल्प पार पहिंसा के प्राचार पर बतों को पता से पालन पसे हुए मारे गाँ। ये मत हमारी मारमा विकास के साफ-साव समाग की भी उन्नति और प्रमति करते है इसी भावना के साप इन बों को हम निमाएं। मुम में मौतिकता बारों मोर फैल रही है। ऐसे समय में यदि धर्म का प्रावध कैचा नहीं रखा गया तो जीवन ठीक म्प में नहीं वह सोसा। मैतिकता माने है प्यक्ति पिस पण अपने मुख पौर स्मार्षको सोचता है इमा का भी सोचे । ऐसा होने से घोपण उत्पीड़न माविस मिट पाते। स्पराग्य होन पर को प्रकार के प्रमोमम भी हमारे सामने पाए, नैतिक दृष्टि से पराविा भी भाई अनुक्तमान्दोलन की भाषमा यह है कि इन छोरे- मोटे पतों जरा इनका सन्मूलन किया जाए । दूसरे के सुख पौर स्वार्थ का स्यात म करने की मापना हिसा है। इसमिए पक्ति दूसरे के सुख और स्मार्च को भी ले । सबभुम बिस किसी महापुष्प के मन में यह स्पना माई होगी वास्तव में पारा महान् हा हागा । कर पाई, किसके पाई, माइम नहीं मानते । भगवान् मााीर पनमें से एक पिन्हनि इसे मागे झापामा पहिसा का विचार करता हूं तो इससे का उपात होताई पर जन धमाय पौर बन गर्मियों ने पहिसा कायो रुप पपनाया यह पहिसा महावीर की पहिया नहीं पी उसमें जीव-यया का प्रापाम्प रहा। महावीर की हिंसा में निर्मयता का मामा । मारने की अमा उपमें भरने का भाव भषिक पा क्योकि यह केवल बीर की ही महीं भी महापौर की भी। महका निरपन उसके पीधे था । प्रारनिर्भय भाव पि-सा ममा है। उसे प्रष्ट करीबिए। यह पावना अमाइसे समार मैं बिन समस्याओं को मारकर इस करना पाखे है, मस्त पो तो उसके लिए मर भी सके। मैं इसे ही निर्भय कण है। साप ममतौर अपरिग्रह मारि पत इससे वो हुए हैं। परिणाया मन, पो किसी के पाम है बास्वप में उस मकेमे के बारा पैवा किमा हुमा है यह कदापि मही। उसमें वो नपाने समाज के कितने पक्तियों का परोम-पपरोक्ष मोप पातिए परित के प्रोसे के परिभम का फम है ही नहीं। अपरिपाकी सापना की तरफ भी व्यक्ति को मान देना है। पिस देनी से समाज का स्तर विषम भौरमोरा पूर्ण वनवा या हा! इसघे सगठा समान कहीं भस्मीभूत न हो जाये। इससे पपने मिए प्रपरि का सहारा भेना होगा। समिपमता पार असन्तुमन की बैतरणी को पार करने के लिए हिन्द्र-पास्त्रों के सपक के अनुमार भपरिसह गाय को पूरे समान है । यदि उसकी पूंछ को मसूती से पा समठो निाय ससा पार पा सध्य। माम राजनतिक पाति प्रौर भाषिक सरा सामाजिक समानता का पुस है। बनवा की भावना यो म्यों माती मौर मिठी मा पी। स्योरपां पर वन-युप के मूस्य पदमवे पाऐ। पौर सामाजिक तमा पारित स्पिति में मेवर पावा पाहा। पहले पहा पीपल के पास प्रत्पैक काम में गिरण पर पौर दिया पातापापौर समाचार पर समाग रचना की मापी मार्ग पर वर्ग मोर भवनमहीनया पर पोर दिया जाता और मोम्मवा मोर र मोपता पर नहीं बसि समता मापार पर ममार-रचना पी मोर प्रवृत्तिका पी। पहले यस्तु पो मोगों तक ही सीमित गती दी तो उसका गुण और पंप्रता पराकाष्य पर पहुंच पाती थी । पर पहुगन ममार में उस सिम्तार भी पोर प्रवृत्ति होती है गे गुण योग्यता पार भेटवा की पोर से प्याम हट नावापौर विस्तार पीवर पसा जाता है। इस समय हमारे देश में ऐसा ही होगा। बहवन समार को मुख पुषिपा पहुंचाने की पुन पौर सामाजिक एवं पापिक समता सपोर टीव गति प्रमाण करने के कारण परितमानमा सामारिक परिष की पोर पान मम पापा और इस देमलेस सनी हमारे देश और समाज का परिवार भौषा हो गया है। सभी घोर स्नि देशों पौर पर मेवामों का प्यान है उनमें भाचार्य गुममी का मी गानएष मम्प्रदाप + पाराव किर सामागितप्रति में बों का महत्व १५ पाहिमा प्रेमी प्टिविमु विधान पार सहानुभूति म्यापक है भो कि एक पहिसा प्रेमी के लिए सर्वपा योग्य है । प्रमुवती संघ की स्थापना करके रोने यह रिबता दिया कि ये केवल जैन समार के ही नहीं बल्कि सारे हिन प्रमार पौर मानव-समाज के हिदपी है। प्रवाह मोर हवा का ससकर बसना और सस्ती पाहवाही मना भासान है मगर प्रवाह पौर हमाको अभीप्ट पिणा में मोड़ना महान पकठिन कार्य है। पो ऐसे कठिन कार्य कसे ही युम-नेवा होते पौर पानाते हैं । भाचार्य भी में हम युग-मेवा की झलक रेह ये है। उनका यह कार्य दूसरे सम्प्रदायों के प्राचार्य के लिए भी प्मान मे योग्य है।
२५ प्रणुन्नत समाज शुद्धि का मान्धोलन -मी शोभातात गुप्त सह सम्पायर हिमुस्तान पात प्रवाह के साथ समाज में अनेक पराइयो प्रचमित हो पाती है। प्रत्येक युग म इम पुराइयों से समाज को मुक्त करने का प्रयत्न होता प्रामा । । ममार मंसोमन का यह कार्य निरन्तर पाते रहना चाहिए, मन्या समार में रिपमता सम्पबस्पा प्रणाम्ति पीर मडम पैदा हो जायेगी उसकी प्रति का माग पनवड हा पापेगा। ममाग म्पमितों से मिलकर बमता ईपौर इसलिए अगर समारा संशोबन ममोप्ट हो यो यसकी शुष्मात म्पम्तिों से ही होनी चाहिए । पति समान में पता है और प्रत्येक मक्ति का पापरण किसी न किसी सरसे ममार को प्रभाषित करता है। पक्ति समाज में से हुए सम्माचारी जीवन नही पिता जमवा। उसका भपमा प्यक्तिगत प्रापरणम प्रसार मिममित परमा पाहिए, निमो एमागका प्रनिष्ट महो। प्यक्ति और समार अभिन्न है । एक दूसरे के हित में और मनपा निरोप नहीं है। क्या पक्ति को समान दी पिता में अपने को भून माना चाहिए, यह प्रश्न ही नहीं उमा । म्पति का विकास बोपनीय है किन्तु उमा लिए मामाजिक निपढे । पालन करना होगा। प्रनुम सामारिक वातावरण में ही म्यक्ति का शिकाम सरलतापूर्वर मम्मय हो सकेगा। इसलिए मस्तिका भारम-विकास के लिए भी सामाजिक बातावरण को बच्चा बनाने में पाग मा चाहिए । हमारे पूर्वश मे महरे पिम्मम पार अनुगमन रेसा मनुष्य माचार मिर य मूममूत नियम निरित किये नियम भारतीय मसन के ।
मत समान-रिका प्रायोजन भूम प्रापार है। इस देश में सदियों से मनुष्य गावि को यह पाठ मिझाया गावा पा है कि उसे पहिसा सरम प्रस्तेम नमय पौर मपरिग्रह का पानन करमा पाहिए । भारत की भूमि में मिठने मी पम पनप है सम सबने इन मममूत सिमान्तों पर बम रिया है। उनका अनुसरण म्पक्ति पार समार दोनों कनिए कस्यासकारी प्रिय होगा। किन्तुल निमर्मों का पातम मासान नहीं है। यह भाग की धार पर घमने जैसा है। अहिंसा का पालन करल बासा मनुप्प मात्र के प्रति ही नहीं बल्कि असार के सब पीरों के प्रति प्रेम और कम्णा परतेमा। यह राग और उप से मुक्त होगा। सरप मोसने से सामारिक दृष्टि स हानि हा महती है यह समझ कर भी सत्य का परियाग नहीं करेमा । वह दूसरे का मन हरपने की मेष्टा मही करेमा । बह सांसारिक भोम-विमास को बीवन का परम भक्प मही समझेगा कि संयम से काम लेगा। इनियों के बीमूव न होकर उन्हें अपने बप में रखेगा बह अपनी इमामों और पापापातापों को सीमित रखेगा । धन-सम्पत्ति का एक जगह मचय पूसरी चमह ममापनी स्थिति नरसन्न करता है। प्रमौरी पार गरीबी का एक साथ प्रस्तिष पर्वमान पपम्ति का मूल कारण है और उसे अपरिपड की मावना से ही साम्त किया जा सकता है। भाषस्यता से अधिक मतों का संग्रह भी एक प्रकार से सामागिह पोरी ही मानी जानी चाहिए। पपर समान में इन नियमों पर बनने वाले लोग अधिक संम्पा में हो तो इस पृषी पर ही सर्प उतर पा सकता है। तेपपत्र के प्राचार्य भी तुमसीगी के सम्पर्क में पामे का मुझ परसर मिमा है। उनोने प्रणुणव-ग्राम्दोलन का मूगाव दिया है कि मैं समाम गणेषम का ही एक समानता है। उन्होंने पहिमा सस्य पस्वप समय मौर प्रपरि गह-इस पाच मूलभूत सिद्धान्तों की प्रागारचिता पर प्ररपुवत-माम्बोमन को आग किया है। उसके अन्तर्गत समान ध एसे मियम मिर्धारित किये। निम परिसामान से समापौर म्यक्ति के जीवन में मैतिमया और साधार की वृद्धि होगी पार पप का गिरा हुमा बरित मा उटेया । प्राचार्य श्री नसीपी ने पार की परिस्पितियों को ध्यान में रखते भए १ प्रभास की और मणुगत के नियमों को म्पबहारोपयोगी बनाने की पेप्टा की। इसलिए उनि इन नियमों को मणुगत प्रभाव नए नियमों का नाम दिया है। किन्तु भर में गणित का कितना मोत भय हुमा है यह ससार गाम पुका है । प्रगुपत रिवने में ममे ही घोर रिवाई किन्तु उनमें मनुष्य के जीवन पर प्टिकोस में परिवर्तन लाने की असीम सम्भावनाएं छिपी है । इसलिए पशुपत मा, गह सममार किसी का उसका महत्व कम नहीं प्रापमा पाहिए। परत-पादोसन पार की प्रने सामाणिक दुपयों पर प्रहार करता है। पार पापारिक घर में कितना असत्य मनीति और प्रप्टाचार प्रविष्ट हो गया है । कीक मूल्य पर मुरमस्तु मिलता दुसम हो मया है। रिसोरी पौर चोरगारी का बोलवाता है। मृत्युभोग ऐन पास पीर पर-विवाह पैसी प्रनिष्टकारी समाजिक कुरीतिमा प्रचमित । परापोरी गुमायागी, नपीसी बस्तुमा पा सेवन प्रारि गुमसन पर किये हुए है। प्रमुखत-मायोजन इन मर एपार्यो का निषेध करता है। पाएमासूत का समर्मन मरवा मौर परेशो का पोपक है। इन सबके लिए प्रत्येक घममार भावमी इस मान्दोमम का समर्थन करेगा। इस पान्दोमन रे मनेर पक्तिमा बीबम को प्रभाषित किया। पहनि पार्षिक पनि रामार भी पापों का पामन लिया है। प्रत का पर्व हो। संकास होता है। भोप धर्म मौर नीति की सीभी पह पर बसने का संकल्प को मुरुम ममे ही उनकी तम्या मोड़ी हो सस्ती किन्तु उनका पीपल दूसरों के लिए प्रकार का काम देता है। पन्त में उनकी पया फोपी-मूमेमी पौर या दुनिया पार से प्रपिक पन्छी बार ऐपी।
२६ प्रणुव्रत पात्म विद्यालय का मुख्य द्वार -श्री पामप्रकास मित सम्पादक समाय पाय न केवल हमारा देश पक्कि सारा विश्व भौतिक सुखों की पौर में सरम को बिमकुम मूमठा पाया है। प्रत हमारी भारतीय संसति पौर परम्परा की बस्तु रही है। हमने सदा त का सम्बन्म मारमा से माना है और उस भास्मिक संकल्प को पूरा करने के लिए बड़े से पो पार दिए हैं। प्रार हमारी संसशि बीपित है और उसका सारे विषय में मान है। विरोधों को विपारस यब उसकी ममता के यस्य का बोपते है तो वह मून में हमारे मात्मिक संकल्प की पता ही मिलती है। पान परिस्पितिजन्य निरामा पौर भ्रामक मिगम्तों का प्रचार हमें कुछ समय के लिए ऐसा अनुमब करने के लिए पाम करता है कि हम दुर्गम | विषम ६ मत पागे नहीं बढ़ सकते है। .मगुवत हर्म उस परिस्थिति में एक मार्ग दिखाता है, हमें बम और पाण प्रदान करता है, ताकि हम अपने संकस्पों को अपूरा न धो बस्कि उमको पूरा करके पीवन मदय पर पहुंचे। परमृत की मात करने पर मापारण्ठया मोप दो प्रकार के उत्तर देते हैं। उनका कहना होता है हिये भरगुपत के प्रमिकांच नियमों को अपने पीरन में उखार कमोर उन पाचरण में किसी भी नियम की प्रबहेमना नहीं होती है। उनके जीवन एतापनीय है। हर एक को उनसे स्पर्श करनी चाहिए, जितुत के विचार से सम्म उनका जीवन एक ऐसे दुर्ग के समान है, जिसकी रमा + सभी सामन होते हुए परकोट म होने से पो न दुगने मेणी में पा समता है और न उन साबों की एभा पर सफ्वा है यो उमके पी से भी परिस मुल्य रखा है। मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि संपस और बत १७ १८ प्रमुखत बीमोर के बिना जीवन रेमाचार-विचार कमी भी बरस समये है। कठोर को निप्यही एप ऐसा कपच होता है यो परिस्थितियों भावात से हमारी रसा करता है। इसलिए प्रणवत के निपर्मो को व्रत के रूप में ही पालन करना वयस्कर होगा। एफ मोग इस प्रकार के भी मिर्मी यो समम बठे है कि पजनीति में बती पावन का मिलना असम्भव मही वो दुफर ममस्य है और भार परनीति जो हर म्पपित की बात रोटी बन पई है। ऐसे गोर्यों से हमारी वन एक प्रार्षना है कि अपने देश के व विवेपों को एनीतिमों के जीवन पर एरिहात हम रेय किप्रधिकांश नीतियों में पीवन में मांस मरिरा को रेप समय है । म प्रापरहा की मुख्ता ने मन की तरह चमके जीवन कीरमा की और यो रो परम पाये समर सरप और हिंसा को मानकर चमे प्रमर हो पुरे । हमें पार है जब प्रष्ट्रीय कांग्रेस के नेताओं मे पुर में सहयोग देने पनिापय किया तो महारमा गांधी मे इस संस्था से अपने दो मानय कर मिया रिसे ये २५ बयों पपने रक्त से सींचो पाये। उनके सिवान्तों की कीमत गिनती पा करमा ये अपना परम धर्म समझने में बिना विमा रापनपने कविस से पनप हुए, मैणि प्रमसेगा में ममे रहे। पार हम उन्हें न बम प्रमर मान। यमि उन लीमिमा गिनियों में स्थान है जिनका माप विश्व भी है। तो हम यह महफि रागनीनि या प्पबमाम या कोई प्रग्य परिस्थितियां प्रणवत से मैम नहीं पाती है, वो गम हमारी अपनी ही पमगोरी है जिसे हम मान भार प्रमहेश परिमें प्रारमा मिस को काम करना पड़ता है वो हम ममम कि हमारा प्रस्तित्व ही मही या । गरे बार मरि हम मह सोनार संगोप करता पाएँ रिबनता की सेवा लिए ही हमने बीवन म सिवानों के माष ममता पिया है तो हम अपने पो पोवाऐ हॉमे । हमारे से पनता पी कोई मेगा को हो पाती है, यदि हम प्रादपों को अपने अनुाम बनाते है । भरगुत नियमों का पालनहर एक म्पत्ति कर सकता है पाहे पर पमोर हो मा मरीन प्पषमायो हो पा रिमान रानीति हो या अपने गाम-मापे में ही ममा राने अप्रत प्रहम विद्यालय का मुस्मार मामा पस्त मस्ति । यह वो मैतिर पागृति का व्रत है। ऐसा कौन राजनीतिक या पनपति है यो नैतिक गामति के बिना मुख प्रौर भास्ति की कल्पना करेगा। मतिक पाति हमारी प्रमुन समस्या है। माय हर प्लेटफार्म पर रोटी कपड़े का मुस्प प्रस्म होता है । येकारी का भी प्रान उसी से भाषाशिम सम्बम्पित है मेक्नि नैतिक बागृति की पावस्यकता को स्वीकार करते हुए मी उस विधा में जो प्रपल किए था ऐहै ये समस्या को देखते हुए अपर्याप्त है। में तो यहां तक कहने को तैयार हूं कि मदि हमारी मैतिक बया में सुधार हो पाये तो फिर कोई पूसरी समस्या नहीं रहेगी और इसी प्रकार मरि विराम के मोर्गों का नैतिक स्वर कंचा हो जाये तो फिर हमें मुरकी विभीपिका से हमेशा के लिए छुट्टी मिम पायेगी। पाच मिस रिस मौतिक उन्नति की मोर तीन गति से बड़ा पा रहा है उसने मारतवर्ष को भी उसी होर में घसीट रखा है। लेकिन हम यह न भूम बा कि मौतिक उन्नति बास्तविक पान्ति बसुस नही है । यह तो पास्मिक उन्मति में ही है। इसका महमर्प नहीं कि हम प्रकर्मप्प बन पायें भकिन इसका यह मर्च मसम्म है कि हम सत्य को तिमामि देकर मानवता की पस्पि भस्म पर फर्मप्यता के नुत्य का ग न करें । मूठ मोसकर, पोरवागारी करके मासों की सम्पति ट्ठी परके कोई प्यक्ति अपनी कर्मप्यता का पारर्म उपस्थित नहीं कर सकता है। उससे अच्छा तो भाई को सपाई पौर ईमानदारी से रोग केवन पार पैसे ही कमाता है और कभी-कभी यह भी नहीं। इसी प्रकार किसी देश की उम्मति पौर समृमि इस बात से प्रकट , प्रमाणित नहीं होती है कि उसके पास कितने साल विसामकाय पोर बमवर्षक है या कितनी मरिनों के मकानों में यहाँ की जनता रह रही है। मम्दन में पमपान, म्यूमाफ में दोपहर का भोजन और पेकिंग में विमाम, समृद्धि के ममण नही । गोंकि सृष्टि की रिणामता और गति को देखते हुए यह गति-गति नहीं मानी जा सकती है। सभी उम्नति व समृमि वो इस बात में है कि हम अपनी इमामों और वामनामों पर नियंत्रण रखने में कहा ना सफल हुए।
प्रबुबा की मोर यह समझ मेने के बाद हम मनुबत का नमत्कार दिखाई पड़ा है। प्राचार्य पौतुमसी न इस मान्दोमन माथीगणेप कर इसे को गति प्रदान की है उसकी माप-तीस संस्था या क्षेत्र से नहीं की जा सकती है। पिछले साम में पर्मीनिकता की गहरी नि म सोनेवासों में से तिने बाग और पिनों न प्रपना पीरन बनाया इसका महामोसा करना कठिन है कि सना प्रबाय कहा जा सकता है कि हम जिस प्रकार म पिरे गए थे उसमें परसुवा एक प्रभाग म्याति बन कर पाया और उसने म बम रेगासियों को गति मिदमो केमोगी को भी मारपित किया और पाभी सौपने कोपियों म पना यहाँ भी इसका प्रयोग छिया पाए । प्रस्तुत के परम पहिसा प्रचार्य ब्रह्मण्य पौर मपरिसा के नियमों में हम विपके तमाम रमना की रिमिनवार्यों पनर चिपी एने पानी एकारमाता का रर्पन को इसलिए विस्म की पनता का पापित होना मापचरनक नहीं। मेरापो दिपाय किया दिन पर नहीं जबकि विप मेता पन्ही सिमों पर एकमत होकर बीरन निमम की मोर पप्रसर होमे । मौतिक सम्मति की कापि मारिमा उम्नठि प्रकापपुष्य में रिलीन हो वासमी । यह नियणामों का पार बम-अपंच हिसा पारि पुराइयों का पुरा समाप्त होगा। इस सभ्यता मोर कतिक बाम्पपिरस्परो समरमर सी प्रारिमक विचारो प्रपना एबम बनायेंगे रिखको भूनकर भाग हम भटक ऐ है। अन्वत रस विधा का प्रथम पाठ है-उस विणसर का मुम्मारप्राइस हम सब इसमें प्रवेश करें।
२७ अणु शक्ति का सहारक रूप और माणुव्रत --सत्परम पितासंचार प्रसुवार या परमाणुनाव का प्राचीन बजानिक रूप पाहे जो या हो प्रार की पणुमक्ति के प्रयोग की पैमानिक सम्यामनाएं चाहे पो हो परन्तु साधारण मानव ही नहीं प्रसापारस पक्तियों के सामने भी यह प्रश्न एक बिष्ट समस्पा वन करना हो गया है कि प्ररण-पाक्ति यपि संहार का निमित्त बम गई तो मान के मानव का पमा बनेगा ? रामपानी में भारतीम वैज्ञानियों का राष्ट्रीय सम्मेमन विस चिम्तायुक्त वातावरण में हुमा है, उसकी प्पनि उसके वीन मुख्य भाषणों में प्रत्यम्त स्पष्ट स्प से सुनने में पा रही थी । यह बिस्तायुक्त पावागरण पार के मानव की उस चिन्ता का सूचक मामो भगु-गति के संहारक प के कारण सारे ही संसार में व्याप्त है। दो हजार से अधिक मारतीय प्रतिनिधियों के प्रभाषा निदेषों के भी ८० प्रतिनिधि उसम सम्मिमित इए । रंगप रायमराने की भाग मी नियम की प्रतिप्य है। इसलिए 'सूफ प्राफ निगरा' प्रिन्स फिनिप के सम्मेलन में पपारले को बहुत महत्त्व दिया गया। इन विदेशी प्रतिनिधियों की उपस्थिति के कारा सम्मेमन को सहर में पन्तर्राष्ट्रीय प्रतिप्य एष पौरव प्राप्त हो पया । हमारे मोकप्रिम महान् मता पर प्रधान मत्री श्री बबाहरतान नेहरू सदा ही परषु सक्ति के सहारक रप विस्य बेताबनी रेत रहते है। इस सम्मेमन में भी उमदेवारनी को देने में मही चूके। पीडित मानवता की पुकार शानिकों के सम्मुम उपस्पित करते हुए महम पी में कहा- रिझान को प्रापिातिक उन्नति के साथ-साथ मामा हाय मन और पारमा की पोर भी प्टिपात परता चाहिए और अपनी उम्मति माप उमका वाममेस आना बाहि । विज्ञान ने पिएर और ममार १०२ मगत हो और म पो परिसदन लिए उनका रेखते हुए हम भार एक नई सम्बता की प्रमात बता में है या यह पुरानी सम्पता के सत्याकाम में मा दोर्मों में। पमा हर्ने इस पोर पम पौर रफान के रूप में अपने चारों पोर एक नई पपस्मा दी प्रसन-गीका नबर पा ही है या पुरानी म्पमस्या की मरण पेदना । मानब समान के सामने विज्ञान के दो पहलू हमेशा विषमान पर है। पहा एक मोर विज्ञान की यह मप्प पार प्रेरणाामी प्रमति मबर पाती है। बहा कभी कभी मम और मामा के प्रान्तरिक हास पार पतन के समय भी दीदने मप है, सामायिक रचे में पराल पाती है और मामणीय तथा पदीय व्यक्तिरम में संघटन का प्रमाय प्टिपोषर होने समता है। हम संहा केस में शिान पी मर्यकर तस्वीर भी पडे ।। मानव को प्राप्त मही सापन पोर में ही पम्तियां ऐस मिनास के लिए अलर की जा रही है, जिसे दुनिया ने भी नहीं देता। श्री मेहन मे विमान के संहारक सपा भवान विष पपित करते हुए मो पतावनी , पर मरि समय एवे समुषित पान न दिया गया तो पार के मानरमो मतिम मतप सामना करना होगाप्प होना पड़ेगा। पारबहानिकों ने पम पौर स्मन का पप्पा पपा माप सीके पार पर अपना हाथ नमकी मोर पसारमा मुमरिया है। अपने एक हाथ पर सम्मोक पार सूर्पसोफीतने की पाकासाएं प्रगट र पालो मरे हाप से उसने सिम-विममी बनने का सपश्म गुरूपिया हुपा है। अपनी इस प्राकामा की पूतिरे लिए विमान के सहारकप का सहारा ना मरने पुष्पिपूस पटना है। मही कारण है कि प्रणुमषित समाविष्कार प्रार मानर के लिए पुष पामीर मीपम्प प्रमिशाप बन गया है। प्रगमों पार गगन पमों है बम परीसप पर तन पाठक निर हो है है तर या परपमा करना कठिन मरी होमा गति Eि मर-संहार के मिरा लिपा पपा मा एसयोग सा संभावर होया ? बापान , नामामाकी पौर दिराधिमा में रिए मय प्रामुपमा प्रयाग के पार रसपी महारस पति को कोपनासायापाषा।
मा-भक्ति का संहारकम पीर प्रमुखात मयुक्त गष्ट्र प्रमेरीका मोर स्स की प्रतिमलिता से पैदा हुई बिमापिका सारे जपत् पर पापी हुई है। इससम भी उस बिमीपिका को मौर अधिक प्रम्बसित करने एवं भयानक मनामे में सक्षम है। इसमें सन्देह नहीं कि एक पोर निमस्त्रीकरण तमा संहारक सामों पर नियंत्रण रखन की पौर दूसरी पोर अणु-शक्ति के मानव हित के लिए उपयोग करन की मी पर्चा पम ही है। परन्तु मह पर्वा नकारखाने में तूती के समान है। इस समय तो प्रस्तु सक्ति का दुरुपयोग संहारक साधनों की सृष्टि करन पौर दूसरों पर प्रपनी पास जमाने के लिए ही किया जा पाई। मेहरू बी न मययुग के प्रभाव के प्रष्ट होने को मिमको प्रसम्बना कहा है यह हमारी विनीत सम्मति में बिनाय से भयभीत मानम के कपहने की प्रामाय है ? न केवम पुरानी सम्पता का ही मिस्तु नई सभ्यता का भी उससे बिनाश होना निश्चित है। प्रम यह है कि इस प्रयम्सम्मानी पो यमा से बाय? यह कहा था सकता है कि वो प्रायम्मानी है वह व से सती है । परन्तु दिन प्रति दिन के म्यबहार में हम रखते और अनुभव करते है कि मृत्यु को प्रायम्भारी मामते हुए भी उसको टासने की हर प्रभर की कोशिम की जाती है। गफ्टर च मा हकीम पर अन्तिम पण तक विस्वास रखा जाता है कि यह रोपी को कोई सारे देया विससे रोमी को मृत्यु-मुन से बचा निमा पायेगा । पाया का तार पन्तिम नए तक टूटता नहीं है । म तो रोगी ही प्रामा त्पामता है और न पसरे सगे सम्बन्धी ही निराप्त होते हैं। मन्तिम भए तक मृत्यु को परास्त करने की कोसिस की बाठी है।बकि हम पति के जीवन में पायापार का यह भम्प स्मरेसते तब मानव समाज के बीवन के सम्बन्ध में निराप होना कोई मर्प मही रहता है। मोर से पोर निराशा पी काती पटामों में पमनानी पासा की विपुषा पर हमारी रष्टि मगी ही एनी चाहिए । पपाह मागर में नाव के उप्पटमे या टूटने पर गो पवित उसपे विपय रहता है उसके प्राणों की रक्षा फिमी म किसी प्रकार होती गाती है। इसी प्रकार बायें प्रोर विनाप मा सहार की ताम-सीसा होने पर भी मनुष्य को जीवन की प्राणा नहीं रमापनी चाहिए। - ।
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डिकाहारक सपौर अन्वत CA पूमते फिरते । । सन्तप्रवर विनोगा पार पापाप धीतृतमी प्रपने रंग से अपना काम करने में मन्न है। प्राचार्य विनोबा का भूदान प्रपणा मशन मानक के अन्दर पो कुछ भी नेक है, उसको माला पाता है और कोबपाकर मानवता को बबामे केमिए प्रयत्नशील है। इसी प्रकार प्राचार्य तुलसी का मनुव्रत-पादोलन मानव में समुणों और सपतियो को पंचा र मानव बर्म की जमाने के लिए प्रयत्नशीम है। दोनों का माध्यम बह न को प्राथनिक परिस्थितियों में उनमार मानवता के पक्ष में रिक्षित यह माया सस्ता है कि केवल दोम्पत्ति, चाहे कितने ही महान् क्यों म तिने संसार को अपना इतने बरे रेप को पैसे सुपार सकते है ? साधारण मनुप्म के लिए इस प्रस्म की कीमत हो सकती है परन्तु सुधार का सम्रेम सेपर मयट होनबाले सुमारक के लिए इस प्रश्न का कोई नहीं है । मुमारक माग अकेला ही अपने मिशन में मन पाया है और यह उसकी कमी मी परवाह नहीं रखा कि फिटने सोम उसका साप देते है। पैसे पाग सन्त बिनोबा पार सन्द हुनसी मानवता का सन्देश सुना हे । पैसे ही पार से मममम महिपार वर्ष पहले महावीर मौर र मानवा के चबार की पुनी रमापे चे । ईसा मार मुहम्मर मे पर अपना पैगाम सुनाना भुस पिया मा तो किसानों ने उनका साथ रिमा बा । राम पौर प्ण का साब पोवासे कितने ? पीकपा को घराी प्रत्यन्त विपरीत परिस्पितियों में पौर प्राम' पोले ही अपना कार्य करना पड़ा। यहां तक कि महामारत के युर में भी ११ प्रसोहिणी के वियोनिस पक्ष के साथ पे, उसकी सेना की संम्मा केबस सात प्रमोहिणी मी मोर गोने इस सर्त के साप प्रमुन का पारपी बनना स्वीकार मिला बा कि उसकी पारी मारष सेना विपक्ष में देनी और स्पर्म कोई हरिपार हाथ में म सेपे । संस्था का कम सुमारक महापुस्म के लिए कोई पर्व नहीं रखता। महावि पीय के पदों में परमाही बसता है। पापाय मीतुमती प्रसार यह मोपमा कर पुरे कि परसु-पक्लिो नहार इस युग में परि माना की रक्षा होनी सम्भव है दो बारे पषत की प्रोर परतुओं का ही हो सकती है। पाप की पासुरी मामठा पार पाठी महत्वाकांमा सीमा को नाप गरे । उसकी भूषवनी गई प्रपने पेट में सब-इव मर मेन के बाद भी उसका पात होमा सम्मन प्रचीन नहीं होवा । अपने पेट में सब-कुछ समाने के लिए वह हिसा स्तेप व परिपह पारि सरपरले पर पतार हो पाता है । म कपट ईप्यो प भात प्रतिपात प्रादि का प्रारम्न उसकी इन प्रवृत्तियों से ही इमा है। इन प्रषियों पर कोई मी निपभए सपाकर निःस्मीकरस सम्मेलनों में मार गिपषस समाने की पए की पाती है सब पत्तों पीने के समान मिरपा सिम होती। "मुह में राम बमन में पूरी की नीति का भवतम्बन करनेवासा पान का पन्तर्राष्ट्रीय राबमीविल इसी कारण अपने किसी प्रयरन में सफल नही होता । इसम सन्देह नही मिपान के मानव की सत्प्रधियों का ग बहुत कम पया है। विज्ञान मे सारे ही सार को पार सारे मानव समाग को एक पर मौर एष परिवार का-सा स्म २ दिया है। मुलित मा है कि उसकी पत्प्रवृत्तियों के साच-साथ उसकी पत्तियों का रापरा भी इसी प्रकार कसकर विष म्यापी पर मया है। किसी भी एक 20 में की गई गई एकाएप सारे विष पर छा जाती है और मानव-समार भी उसका दुष्परिणाम भोगना पाता है। इसी कारण प्रान किसी भी सवपि को सफल बनान के लिए पामे पी भपेमा कहीं प्रपिक कठोर एक मोर प्रसन्न करने की प्रपेठा है। पारपार पर बोगन पर्वत उदयन का समय बिमामा दो पपठारी पुरुष होन के माते ये संपल मार से उसको मार रख सकते में परम्तु रामके सिए साम-योपास का सहयोग सेना रनके लिए पापाय हो पपा का। परी प्रकार मासिकरम के लिए पीएम + निए बानर सेना पा रह योग प्रास ता पनिवार्य हो गपापा । सापक प्रपना तुमार मियी प से अपने लिए मरों मे कोई अपमान रखते हुए भी पर इसरों सिप काम करणा पुरता है नब यह प्रायम्पर हो गाता है कि मरे इसमे तन मन पमा पूग्ण महलोप प्रगान करें। पात्र या विमान मि बिस्पापितों के पापों में पहपर पामर रे महार मा निमित्त बन पण, असा पाय fe मक्ति का हारकप और मात पौर सापनों की कोई ममी महीं है। उनकी पपार पाक्ति का मुकारता केवल विबाम पौर संकस की महान् शक्ति से ही किया या सकता है। अपुरत पादासन दे प्रबर्दा पाचार्य पीदुससी सस विपास पार साम्प के ऐसे प्रतीकपा इसरों में भी निरन्तर उस शिपास पौर संकल्प का पंग करते हवे है। पूषा मे मो में से अपनी पति का संचार कर उसमें दूसरे मोह को अपनी पार पांचने की प्रार्पस शक्ति पैदा कर देता है वैसे ही प्रणुव्रतों की प्रति भी एक दूसरे दो पापित करन की ममता पपन में रखती है। यह काम म बाहेया कि परपुबतों की इस पक्ति पारों पोर संचारो और यह मानम में रस पित को मर वे गिसके सम्मुख प्रणु मक्ति का सहाररस पौण पा पाए। हमारी विनीत सम्मति में हमारे प्रधान मंत्री पी कार में विशाम सम्मेमन म एमित शानियों से को पापा की है उसको पूरा करन का शामिल निषितप से सम प्रस्तुतियों पर रिन्होंने प्राणुबाँ की दीक्षा र अपमे का पाचार्म पीतुतसी का मनुगामी बनाया है । क्या ये पपने प्रदान मंत्री की म प्रामा को पूरा कर सके।
२८ अणुवस्त बनाम प्रणुमम -प्रो पापात व सम्पास बीवर साहिब प्रस्तुबती-संप के प्रति मेरी स्तिषसी उसकी स्थापना के समय मे ही दी है। पान पश्चिमी सम्यता प्रपनी पूरी शक्ति के साथ हमारे यन-सहन हमारी विपारपारा व हमारी संस्कृति प्रापि सब पर प्रमुख गम ही है । पीरन के मूस्य उमम परम रिपे है। हमारी प्टि अन्तर्मुखी होने की अपेक्षा बहिनी पषिक हो गई है । हम दूसरों के पोपों को विस का वार बनाकर रखते है पर पपने दाप हमें प्टिमोचर नहीं हावे। पस्तिक सार्व-सापना में सोफमा समप्रिहिन की भावना से दबा दिया है। भारत प्राप्मारिमा रस रहा है । इस भूमि पर समय-समय पर, पनेक अपि-मापि संत सापु, बर्म प्रमार हुए है. मिहोने कहा कि मानवी पिरस मीनिक उपमम्मियों में नहीं है बस्कि पारिमा रम्नति में है । महाने पर भी कहा है कि यह दुनिया एक मापा गास है। इसमें भी कममप पेमा बह बास्तमित मुन पौर शान्ति पायेमा को उसके दसरस में पसगा पा पार्शवन मटमला पेपा । पश्चिमी सम्पता ने हमें और हमारे समार को मौनिकता प्रेमी बना दिया है। मनुष्य की सफमता पाकि एक समय में उसकी पारिमा उम्मति के पापार पर पानी पानी पी पार इस बात से प्रारी पाने तपी उमने विमा पाया पौर समाया है। हमारी समूषी दृष्टि ही परम मई है यह निपिता से पश्चिमी सभ्यता बीरेन । पार प्रपनी सुरक्षा के लिए सदसए के मौपस सहारारमा प्रस्त्र पत्रों मा निर्माण हो पा है। इससे महापुट परि नमें हुई प्रकम्पनीष पन-बन पीहमि रेल के हैं। फिर भी तीमरे महापुर यादम भाग में मेरफ्ते प्रमुखत बयाम भमुबम रिखारते है। प्रतेक बहा देश मपन बचाय की तमारी में प्रयुगम हाईगेनन बम मगह पान प्रादि की भरपूर पबस्पा कर या है। उनकी माम्पता है कि पाय साई यस मा बस की नहीं बस्तिहमा की होगी । भरती पर थमने बानी मनायें पुरस्कार प्रारि भय विप नाम के सिम नहीं होंगे । वही राष्ट्र विनयी होगा विसर पास हागिन बम बरा प्रग्पुबम की शक्ति होगी। हिरागिमा पर एर मम मिरा कि मगमा सरम । हमारे व्यक्ति मरे पौर हजारों वर्षों उरणले तो इससे क्या ? मानम के इस संहार पर भाव की सभ्यता बीती पोर पोपण करती है। अपनी प्रातरिक मता को मिपान के लिए मापाहरी उपरों का सहारा मेने के लिए प्यक्तियों पौर राणे भाषा करती है। नेकिन इसके विपरीत हमने देखा कि एक महापुरप भाया मिसका म्यक्तित्व हिमालय के ममान उन्म एक और गंगा की नमगारा की मांति पवित्रना। भारत की प्राप्पारिमक परम्परा का यह प्रनम्य पुजारी बा । उसने भपमा सर कंपा फिमा नही सर यो समय-समय पर हमारे धर्म-प्रमका प्रौर पर्माचार्यो ने पापिया पा। नएने कहा कि सब उत्कृष्ट म पनि गोई है वा बह पात्मिक बम है। मानव उमे अपने भीतर पंपा कर मे तो उसके भागे न बन्दूक पर समती है न तोप न अनुगम म हागिन बम। उसन इस बतमा प्रपन पम्दर विकसित किया और भारत भूमि पर उसका सफल प्रयाग करके रिक्षा विपा । उसका एक ही नाराभा-मानाना मुखी ऐ पोर उमके प्रस्थ - मरप महिंसा पाएपर्य अपरिग्रह पारि म्यारह महापत। पसने भारत को समाही पित्र-स्त्र से पम्प की रक्षा ममे ही हो जाये मानवता की रक्षा पदापि नहीं हो सस्ती । मही बात उसम दुनिया में रही। अपने पारिमा बम म म युग-पुरप न उस महान् सामाग्य की या उताए दी गिमके विषय कहा गावा पाकिमा विस्तार इलमा पनिषदि उस पर भी मूर्यास्त महा होगा। पाव संपर्ष गे रिचारपायमों का है। एक परिचम से माई है मौर का प्रमुखत को मोर काती है कि पीयन का वास्तविक मानम बाने-पीने व मौर उड़ाने में है। दूसरी करती है कि नहीं पीना वास्तविक पानन भोप में नही स्पाग में है असंयम म मी संपम में है मूड में नहीं सत्य में है और मौतिक उपणियाँ में मही अपरिग्रह में है। पहली का प्रतीक है प्रणबम प्रौर दूसरी का प्रतीक प्रान्त । भार संपर्प इन्हीं दो रिचारपायों के बीच हो पाई। हमारी निश्चित पारणा है कि प्रारमपम के समान दूसरा बस नहीं है। पर तक इस बम की प्राप्ति नही होगी मामय मुस पार पान्ति मे मही गए सकता। प्रणवत पौर प्रपती-पके प्रति मेरी ममिचि इसलिए रही है कि मामय को पात्मिक दृष्टि से सपत बनाने के लिए अपनपीस है। मनुष्य की मानर पर बोर देवे । पौर चाहते है कि हम पर अपनी निमाह मपने अन्दर गर्म मपने रोषों का दर्शन पार उन्हें दूर करने की मामम्मर प्टा करें । सपो मेय. (क) पाति वर्ण रेप और पर्म का मेरमा म एल ए मानममात्र मी सरापार की पोर भापकाला। (ब) मनुष्य को महिमा सरम प्रचार्य जपर्य अपरिग्रह भारि बलों का पती बनाना। (प) पाप्मारिमस्या के प्रकार दाग पृहस्थ जीवन के मैतिक रवर का चाकरना। () महिमा के प्रचार रा पिय-ममी मिनमाम्ति का प्रमार करना। मेरे विचार से में रेस्प बाब म्पाप पार इनमें सपमुषमा नाता है। परगुपती-मेप की सब बड़ी रिऐपना यह है किबह किमी मे मी परमार पोरकर पीर होन की प्रेरणा मही करता । यह कहना है कि तुम प्यारी हो पर परने पगार को पपने काम को और उमसे भीगार पपने जीपन से पुनीन बनामी । रिना तुम्हारा जीपन विगुर होमा उतने ही मुम वगामी बनोगे । पार्टी रामा हुए और मिट गये। पीर मोवों में बायो - ममवत बनाम प्रणाम पराकम रिसाये। उनके नाम इतिहाम के किसी कोने में मने ही पोएं किन्तु उन्हें कोई महीं जानता । मेफिन राम कृष्ण महागीर, युर ईसा मुहम्मद पर्पस्त कम्पयूस प्रारि का स्मरण कर मोग पन्य होते हैं। मोट-मीमन पर मार भी इन महापुरपों का प्रमाव है और यर तक मानवता भीवित रहेगी य सब प्रमर रहे। पाब दुनिया में तिने धर्म है सबके मूल उद्देस्य एक है । सेकिन कालान्तर से उनके स्म में अन्तर पा पाता है। उससे मी बार वाव यह है कि पर्मों का पासन उसकी प्रिट के अनुसार नहीं बस्ति सी केस में दिया जाता है। हम उस्सप कर उपवास रखते है पर कितने है बो उनको भावनामों को समझ कर करते है। प्रणवती-सपको एक गिरोह संस्मारे प में रखा ममापौर यह मुम है। कारण कि विधि विमाम नियम-उपनियम में रखकर अधिकांस संस्था निर्माण हो पाती है। उनके पाने नियमाविक का पालन इन्ना भाषश्यक और महत्व का हो जाता है कि मूल भावना उनके हाप में निगम गाती है। प्ररपुपती-संप को इससे नग्मुक्त रखकर उसके संयोग ने बड़ी दपिता का काम किया है पर मम्प धर्मों के मिस दोपका हमने नम्मेन पिया है उससे इस संबको भी बचाना होगा । को भी नियमादि से गये है उनका विषपूर्वक पासन हो सरिकेम्प में नहीं। ऐसा एक बटी भी मिल मया वो बह एक साथ के बराबर होया पौर यह प्रावती-संप की भगा को पा रखेगा।
हमारे दो २९ सत्र भौर मणुक्त प्रावोसन -श्री महारामस सम्पारक मनुखत बह एक पारयुग की बात तो है ही कि हम जो कमी प्रपनी मैतिक पौर प्राप्मारिमा प्रवृत्तियों । कारण ही पंसार परमे पस्तित पे किसी एथे पान्दोमन की बात पसाए पो रेम के नैतिक पुनम्मान की बात कह । कितनी मगीर बात है कि एक प्रोरतो यह समय पा पर हम और हमारा तिहास मैतिकता की सबसे अनूठी मिसाल हुमा करता था और एक यह समय है कि बगाय इसके कि हम दूसरों को किसी पच्छी बात की प्रेरणा सय इस बात की उम्रत महसूस करते है कि मपने मतिः पुननिर्माण के लिए कोई उपाय करें। मह कटु सन्चाई सायर इससे भी प्रपोभनीय बात हमारे बीवन की पौर दूसरी नहीं हो सकती है कि नित भीग की हम कभी दूसरों को रिया करन पे मार हम रमी वीयरे लिए अपने पाप वरस थे। कभी हमने पहिसा की यह मिसाम भी पेप पी पी रिसने सार संसार को तब म पारा बार-बार यह बताया किसानको मारने से प्यारा प्रया किमी मरते एसान को जिन्दगी रे देना । भी हमने सपाई, ईमानगरी माप पौर ऐसी ही हर पार की मी पावती की पी निकेबस हम ही रत भेटी की पदापार से पुपमाम हुए थे बलि तमाम रधिग्ण पूर्वी एमिया और यही वन रिपोरपीय यों तक मौनों में उससे ग्युसहामी का हिस्सा पापा पा । सी पापमाना भी पा पर हमसे मोग सीराने पाठे नाम पैसे रिपारमोम देशों तक से मार सिहयस्य पो इम्पान को एम्सान मै सन्चो बीमा प्राकमा सिखाता पार फिर बार में एक ऐमा समय था पा र हमने न पान मे हमारे गे पोर प्रभात प्रामौतन अपने तमाम पञ्चे पुणों को मोटी-मोटी चीजों के बरमे अपना मुक कर दिया । गिसी ने पहा कि यह इमे रपमा देमा और हमने उसके हाथ मपन माई भी बिम्दगोरी। दिखाने का कि वह हमें शिसत देगा और हमने उसके हाथ अपनी भस्मत च दी। मिमीन महा कि वह हमै भपन पार का एक हिस्सा रेमा पार हमन उसके हाप अपनी दमाम बौद्धिक कमाई को पर दिया। जैसे किसी पञ्चे कुन में कोई विसासी पौर फिनसर्व किस्म का नाका पैरा हो गाम तो रस एम की म मर्याग ही बाकी रहती है और न उसकी सम्पत्ति उसी तरह पाने क्या मगरियो पाई हमारे सामने रि भपनी हमा सास से सपोई विपसत पी एक एक मनी यातको हमन सोनों हापों बेचना मुरू कर दिया और भार हम देखते हैं कि हम विमास कमाम है हम विभकुस भिचारी की तरह सामी हापों दूसरे की पोर ऐसे देख रहे है बैंसे कोई सपना पूर्ण पराब पी पाने पार किसी नामे में पा मिरता है पौर फिर हरण पसने पामे को कातर होकर दावा है कि शायद कोई उसक हास पर रहम वाकर उसे निकास से मदमी से। मरागी मण के मस में जब नासी गिरता है वो हमें उसे देखकर सहानुभूति नहीं होती बस्कि मक्सर हम उसकी पोर शिकायत की निगाह स रेखते हुए स्वरा भावे ।।मौ तहबा कोई सणारा प्रपनी ऐयापी म प्रपमा उमाम बापसार र मिजारी हो पाता है वो सोप उसे भीष भी मध्ये मन से नहीं देना पाहले । ठीक यही हालत पार करती हसन । अपने पुरखों की सबसे कीमती माई को हमने अब साया | प्राग हम अंगान की तरह मोरों के सामन हर पसार ये है कि कोई में प्रदा यस्ता बाभो । हमारे विश्वविपासमों में क्या होता है? यह समाम रिस पोर मह तमाम रसार यह सा है ? यह सिर्फ इस बात का सबूत है कि इमारी बेर वो इतनी सानी हो चुकी है कि उसमें एक बड़ी नहीं मिलती पौर पर हम कोमिम करते है कि अपने कपो उतार कर उएक भार सही तरह मा सापर कोई मन्हा पैसा चिरापमया हो भनी भी धान का, मी माता का। ।
मातीमोर बाहम रिमपिपासों में कर किसी पास मसले पर बोर करते दो हमारी दुरान पर बार-बार किसी विरेपी विद्वान का नाम ही गयो पावा पार हम प्रप्रेमी तो पासामी से पड़ते । संस्कृत क्यों पर नहीं पाते । भार क्या रिसर्च मेवाम पिपापी बार-बार अपनी पीमिर्गार पाने पर विरोपी गिानों के भाप येडकर गौरा अनुसरण है। इसका कारण सिर्फ एक है हम पुर बंगाम हो के अपने ऐपाश तरी , अपनी या हरकतों से पौर इसीलिए हम बारपार बीर सिए वरमते है किसी और को मोरकर हम पो कभी सपाई का नमूना ये सपाईको पुनम गुणों की तप पार करते है। हम गो कभी ईमानरारी म्याय पौर या सी प्रवृत्तियों के पहले प्रतिष्ठा के पास हम दुर अपने पाप ही प्रापस में एक दूसरे के साथ मानी परते हैं, रगावामी करते हैं एक दूसरे से नावे । मफरत करते। एक दूसरे की पीर पपस्वी विमाने की कोतिर करापमाने का पविहास तो यह काला है कि किधी संस्कृति का सबसे पहमा गुण होना चाहिए रसको निरन्तर प्रतिधीमता । प्राबिर हमने किस मायनी में प्रमति दी है। होना पो यह पाहिए था कि प्रपर भी हमारे बीच पास में ही पावर निपटारा होपापा करवा पा पो मार प्रतिकार करणे हम इस स्विपि तक मा पाते कि अश्याप की कोई गाइप बम पती। हमारे देश में कोई म्यायालय जैसी भीर नहीं है क्योंकि दो प्रत्याय नहीं रखा होमिए तो परासि समर मार हम यह गात गी दूसरे रेम सामने ह मक्ते को हमारी रमत एसके सामने गितमी रबी हो पाती । नेपित इसके विपरीत हमें पिकनिक पुनसमान की बाते मोपली पर ही है।ण में ऐसे मामोर पसाने पाएगो मोमों को नतिकता या है पहा । और इसस भी पीस पात्र मा नि पामोनो बार कोई ऐमी वा मुनने को तैयार नहीं हो हाहै। मही पहा हमें मोगमा ममोपन करना होगा अपने विचार में।
- हमारे से प्रापोर मनुव्रतमामोतन सोम सुन हो ऐ मैतिता की बात भार उनको प्रमान में भी माना चाहते है, लेकिन मैतिक मूल्यों और माराों को दूसरी भोर से होता बनाने माने वर मी हमारे बीच इतने मणिम भागए है कि मिन पोड़े से इम्सानों में मन्तर की पोड़ी-सी सफाई बन भी हो उसके लिए जीवन का इतमा बटिम बाम-सा फैमा हुमा है कि अपने दिल की सचाई और ईमानदारीमा विकास करने का उन्हें मौका ही नहीं मिम पा रहा। पाए हम परा मौर करें कि समाज में से कौन से तत्व यो हमारे बीच प्राधी बातों पौर मच्छे कामों के होने पर विकास करने में पाषाएँ 40 करते है। इस मोर से बातें ध्यान में माठी है। यों तो किसी जमाने में गोपीने भी उनकी पोर लोगों का ध्यान सींचा बा और उसमे पहले दयानन्द सरस्वती ने काफी परसे तक उम तत्वों से संपर्प करने की कोशिध की पी मैफिन भाग के एक प्रपली बात मेरे मन में सबसे पानी है। प्रयुक्त पान्दोलम- देश में मविक मर्यारामों की प्रतिष्ठा के लिए अपनी समूभी पौखिक प्रप्रिया का प्रयोग करने बाता माग्दोत्तम । षि यह प्रायोमन हिन्दुस्तान में बड़े पैमान पर मैतिक मूपों को पुन स्थापित करने का एक मजबूत कदम है और यही एक ऐसा काम है पो सीधे तौर पर इसी एक काम को प्रमुखता रेकर पुरु पाहै इसलिए इसी की भोर म्यान पाता है। इस माम्दोमन मे इन रोपातों की तरफ बराबर लोगों को मुतबम्मेह करने का प्रपस्त किया है और अपने हर परम के साप समार को इन बातों से पामाह भी किया है कि मही दो बातें १नो हमारे दमाम मैविक प्रयत्नों को मिट्टी में मिधा देती है। पहली बात है अपने पारिमक विकास के प्रभाष की । बहुमा ग्यारा पो लिभोग पारिमा विकास की बात को बरबास मानत हुए रेवे पए है मौर यह पारा देर की बात है। पपरको माहिम पीर येपो मोग एसी बात परो पो सोचा या ममता वा मेकिन वाग्गुष की बात तो यह है कि मच्चे मासे विशनों के मुंह से भी यह प्रासर मुना गाता है कि प्रारिमा विकास का कोई सास प्रपं मही हो माता क्योंकि भास्मा नाम की पीर हो जब उसकी बात भगत कीमोर की मान । यही पात सब से मान सरकार सारित होता है। मोन पमापारी होना पाहल है और यथार्थवाद की उस झोंक में या मन पावे। निपास्मिक विकाम अपनर मानवीय समम्बों की सम पन्तण निरोपवामी की उपसा कर पाते।पा समापं की भूमि में पैरा पहर होती है मेक्नि मी काया मानसिक हुमा परती है। एक उदाहरण से इस बात को स्पष्ट मिा पा सकता है। दो इम्मान भारी है। मनरा किसी सम्पत्ति का भी हो समता है और विधी रिस्ते का भी पौर मह दोनों ही मारण यमाई मफिन इसके बागपूर उन कामों में पोनमा रिता कायम हुमा भमर का पा भौतिक सचाई होकर मानसिक सबाई है पोर इसीलिए गरी है कि जब भी हम मना के बारे में कुछ सोच हमें इसबारमो प्यान में रखना होगा कि यह एक मानसिक मपाई भार फिर उसके प्रतिकारके लिए भी हम मिमी भौतिक सापनकी खा किसी मानमिक सापनकी पोरही प्यान देना होगा । मसमन् मगग प्रत्रिम प से इस बात को कर होगा निपटाया मही या मावा कि किसी को सम्पत्ति का मार के अनुसार हिस्सा लिया पाये बकिपर यह मुमकिन होगा जो भगा होता ही नहीं। मया तो भी समाप्त होपाबा हम भगा करनेजाम की मानशिक बितिमा पप्पयन करो तो मनुरम कार्यवाही करें बाहे या उपचार मोटि काही प्रमा संतोष की। मैतिक निपमान भी मामाविक मोनाएं यही कपी है तो पगर किसी प्ररेग के पपिकार के गरे में पुर करते है तो उसका निपटारा भी होगा जर पादेयों के मोम राम जमीन की बात पोहर सपमानवीय भावी * पोर मौर करेंगे या मसाप कि उस बमीतको नून से सीपार पाने से बेहतर पिंगा रिया गारे । यही है परिस्थितियों केगरे में पास्मिक पवन से पतब सरयों की उपयोपिया । भरघुपत माम्रोसन पाहे घोटी समस्या हो पपनाही, मास इसी पग्रिाम में पुरके सामने पेप दूसरी बात है गन पीरिने मपरक होती मादी गावी हमारे यो प्रा और ममतत-मामोत्तम है। मामी को मोती पहनता है वह पृरामा मा पतमून पहनता है यह भया । बो औरत बानों को माकी की तर पगार राक एण रोतकर सेनी है मा पापुनिक पीरो बोटी काएर ममाम्नान करल पाती है या पुरानी और दकियानूस । यो आइमरम के सोफ पर बैठकर मेरेसिन मनगमौर एनिमायब टेनर पसी फिष्मी नायिकामों के नबरे पर महम करता है वह पप-रेट और गो मकापतारसूत्र का पम्मपन करता है वह पकियानूम । इम बात न हमारी जिमी की माम्पतामों को इस कार बाना है कि हम हर एमी चीर को इस मानन सने है बो किमी परम्परा म हमें बोड़ती हो । ममार पर कोने में म नए बहार का प्रसर हो रहा है। हम ग्रामोद्योगों को भरमग्ग देन की बात करते सचिन पातर इन पामोद्योगों में हम पै.सन परम्नी करते है। प्रामोद्योगों की दुकान में एक भस्म भी ऐमा नहीं बता को प्रामीस मस्कारों को पापानने पाता हो । भोप यहां इमलिए मही बात कि मामीस बस्नुमा को सरीरकर प्रपन जीवन में प्रामीण पवना को मान्यता बस्कि वहाँ भी सोपासी नगर से गात कि फैमन की मईपी मिल सकेंगी। पाल तोम फासीसी रिवालों के मारन बनवाते थे और पान चीया पारिवासियों की पामियां पापुसर हो रही है इसलिए महीं कि मोर्मों में पारिवामियों की कर की बल्कि इसलिए किमोर्गो का उमम नया पंधान पीला रानी कि वह पानी बार एक प्रोर मारीरिक नम्नया को विाया रा सम्मा है इसरो भोर फांसीसी के यमाय गौर हिनुम्वानी हो गई। गारीका गमत है। पारिवामियों की पोगा हम सब मम्मता को मराहने के लिए पहनते है वो नवत अपना ही अपमान करते है कि पादिय मियों का भी अपमान करते है बमई में एमी फिल्म बनने मगी। बिनम नापिकाए मगरिनों या देहाती महयिों का प्रमिमय करती है और मगरिनों की उपन्यावावर मिना म्माउरके ही गौती पहनती मा फिर ऐसी पोगा पानती है कि भार परगा। या मही बात है कि प्रषिकांग मारिन पूरी दपपो परीबी के कारण नही पहल पाता मकिन फिल्मों में पा प्रबनुमा पलारा इसलिए होता किम वाम गरीर प्रशान ११ प्रपातकीमोर । का प्रामा पाकर बार-बार पिपर देखते हैं। फिल्मों में मापिका इसमिए प्रमूरे रुपा नहीं पानी लि निकी भूमिका ये निमावी है परे पर पहनती । बलि मिलिए कि पूरे कपड़े पामार उनका भर ममता पार सोलुप प्रकृतिक उसमें रस मेटे है। अभी विमोगा का एक नया पाहबान हुमा पा- अस्मीत पोस्टर मनापो । इनके गिरोष में पपी प्रचार मिटम ने सिला मि मोप तस्वीरों में हीरोइनों को कम कपा माले हुए बमाप नाम पर एनपर करणे पर हिमुस्तान में करोड़ों भारत इतनी मात्र frमर्थनम्नता का पीबन बिना। मात गोरवार है । मेरिन एक बात पर गौर करनेकी ।मो भरोग पौर कपो महीं पहन सकता उस हार पर कोई परमीम पेप्टाएँ करे तोमरपा करेंगे र पिसी का पनाम होपा कि हम उसे । रस यही बदाम इलिटर की बात थी। यह ठीक १ करोगे सोग प्रनम्नवा र जीवन बिताते हैं, पर उनकी पतनवा की हम फैसन मान कर हरमान प्रापित नहीं कर समतउसी वए पोस्टरों से भी दम नही पमित कर सात कि कोई नम भूरत हमारे संसारों पर मान मानिस्ता के नाम पर गाने। प्रासंगित मातीपी पहनो कारही। मह एक समाहरणमारी मई माग्मनामों का। मा नई मान्यताए हमार का कोमोजता कर यी है, हम दिनभनि एमी पागों को उपेभित करते नाणे को समान में मुपरी प्रवृत्तियों को प्रपर देसी है । मह पानिपता हमारे पन में ही नहीं हमारी मा [मारे संगीत प्रौर हमार साहित्य एक कोमी प्रायमा राहो मी पौर में पाणी है। प्रणवन-भादौनम मे पहा नोों की यह बताना पाराममरिया गार बहो उसने मोपों में 1 मारिमा विकास परमीपर बल दिया पो मोगों को अपन सही-मानव कार्मों की पारमान परावासने पाहो एरा मोर प्रतिभावान भाषाग उठाई हैरी मानव संसारों की मचाई की तरफ भी प्यारा लिया है यो - हमारे रोपण और प्रयुक्त-ग्रामोहन ११६ हमारी प्रपनी ऐतिहासिक विरासत को हम मौटया सके। पारस सिर्फ इतनी है कि अपने पारों पोर पसे पूपित बाताबरण पौर दूपित प्रवृतियों को हम पहचानें और पीवन के मारयन्तिक हिव को समझने की कोसिप करें। इसके पार तो हम सभी पाएंगे कि प्रायोजन मोई सिप न होकर किसी मा का कावाट पाहै।
प्रणुव्रत-पाम्पोसन का उद्देश्य -प्रीमती रमिता बागय एम.ए. अपने प्राचीन इतिहास के पृष्ठों को परि हम पमट कर देखें तो भात होमा दिपार मे मामों पर्ष पूर्व भारत के इपि-महपि और प्रप्टामों में मानव के मंतिक उत्पान के मिरा मामोमन पत्ता ५ । अनेक माधु-सम्न और पर्म-अवकों ने जन-स्याण के लिए प्रारिमक सन्नति पर यम दिया था। इमरी मोर मान की पारचात्य सम्पना सापो पीपी पीर मोम तापो की संस्कृति में विपनाम रखती है। वह प्यक्ति की ममता 7 मुम्प ग्मने मंसार में क्या पौर रिलना पाया इमसे भाका मा ममा है। इस पाने की प्रापा-पापी में विजान नपेपरगा पो बिमाग की पार मार दिया। यहीमा मास प्रमाण । विश्व-पुर के बार मरे जनमहारफ तागा पौर पर तीसरे की तमारी से भी उनकी शामों की पूर्ति होती नहीं रिलाई रेती। अपनी पुरणा माम पर मनुषौ मीर बम बमों में अधिक से अधिक पनि संचप करना चाहो । मप पूपी ती पार पी पापचाप मम्पना मामब-महार प्रायोजनों पर ही पनप रही है। पपमा-पमा बनीमत मुमा पली प्राशासारी मम्नाम मरि पास में है तो भी यह मय बाप रत्पान है। अनमी उस्मान तो सैनिक गति में है। हमारे यहाँ पही मन्त्री पाटी मानी गई है। इसका कारण है कि मनुष्य पी दम्पाएं मनाम पपपपिमिठ होनी । मुन मोम की सारी वीरें अपने म बटोर मेना चाहती है । रम नुप भीग म को मी म्पमपान इन इम्पापों से मास ना है। पाहे उनमे इमरों का भगाना मे भयानक पनिट ही गयों न हो ? पार भी नहीं परिषम में नामो-पीसो पार मारणामापी सम्बता पा प्रबार मारेप प्रारिमा रम्ननिको महत्व दिया गया। १६.
प्रमुखत-भागोनमा गाय १२१ मात-बादामन भी मी विमा में प्रयलमीत है। यह मानामन बना है? इमो समय क्या है? यह मानना पागम्यक है। मगुपन-आन्दोलन का प्रारम्म मगमग प्राट पर्प पहन बनाम्बर जन धम के अनर्गन ठेरापम्बी मम्प्रदाय पापाय पीनुनमी ने दिया पा । उनका समय नरापन्धी सम्प्रदाय का विस्तार करना मही पा परम् गाति पण का मे प्रिय बिना मानव-माग को मयम के पब की घोर भारप्ट करना पा। यही कारण है कि एक बड़ी मामा म मेनर मग्यनों म मी प्रमका अपनाया है। इसमें प्रनिपारिन पारामा ममन्य म मा विशष मम्प्रदाय से महोकर मानव-मात्र कमायाग में है। परमुखन में गिन प्राचारों के पामन की प्रतित्रा प्रती मागों में कां गाती है रिफर्म में मी 'नियम' नाम म प्रचलित है। "मरयाहिमा म्ठेय पर्यापरिपहा यमा ल पार्यों पाचारों के ही पामन की प्रतिमा प्ररगुबती म कराई जाती है। मेर है तामेबस ना ही किन पार्षो पापारों गा निम मूत्र रूप में महाकर प्रतिमामास में है और इन प्रनित्रामों की भाषा मोषबहार के प्राम बना दी है। मरगुवन का मूम हमें बैरिक धर्म में दिखाई दता है। पाप समान के प्रगत मापि यामम् मे पनी प्रतिज्ञापों का मूमम्प ममप मापा के अन्तर में पार्य-ममाग बस नियमों में उमेश पिया है। यहां ल पाच नियमोकप्रनिरिएत पौष सन्तोप ठप बाभ्यायम्बर प्रणिपानानि नियमा" म यो नियम ११ भी इस मापमा लिए माषा माने गए है। मेयम पार पहिमा भारतको रामामूस्य निपिापा बाद धर्म में भी मुम्प म्प में मानी गई है। महमा गान्धी केमिष्य प्राचाय पिनाबामा ने भी विचारों का प्रचार मर्योरम माम में रियाम सब धमों सबमाम्प मौनिक पादों का समम्मय प्राचार्य भीनुनमी के अगुवन मावोमन में महम ही मिन गाने पारण किमी भी एम के अनुयायी भी इसमें प्ररने पम पा हीप शिवाईमा । यहीामकी मप्रियता सामाग्रम हो माना है १२२ प्रमुफ्त कीमोर प्रगुणत प्रानोसन हमारे रमिक गीवन से सम्बप रखतापामगार पार पम्प पर नहीं, अपने पर ही प्टि रखने की चेतावनी देता है। अपनी बामनामों का पटामो, जीवन का नियमबर बनामो दूसरों के सम्माण की कामना करा अपने प्रविकारों को बाहते हो तो अपने गर्वयों पर भी प्यान दो। तुम्हारा यह कम्य है कि परि तुम सुन पाहो हो वो इसरों के मुत्र में बापक मत बनो मारिपातों में परबत-पायोतन के मूम सिवात पा पावे है। इस प्राम्दामन में सरका प्रवेश पाठि धर्म रंग सप भार वर्ग मेर भाष बिना हो सकता है। मानव- मारो इसे अपनाने का परिकार है। पापाय मी तुससी इम व्रत-निष्ठा के द्वारा मान्मापी सनातन समस्या दो मुममाना चाहते है। उसके दो सापन !-पाग पार पपरिण । त्याग का प्रयोगन-स-नियन्त्रण की समठा मानव-मात्र में बो पौर परिमाका प्रयोगन-मुर्गा या ग्मार को पाने याने मापनों में बचा पाये पर्दे छोड़ा पाय। पसुवा-पान्दोमन पह मानता मितिरिक्त संगा पर तुमारा परिकार मही है। परिकार पेप्टा स गो भी तुमने लिया है, पसको दूसरे हित पा प्पान रखने हुए स्पाम रो। पोपण ना मिट पायेगा तो मन का सच्चा स्प हमारे सामने पापमा। गोपग से पविता मि पाती। पम्पायरे पोलार हमारण प्रारम-सन्ताप पारमान्ति रमी नहीं मिल पाती। पान्ति बिना परिष सिराम ना मिमना असम्भव है । इसीमिए पात्रता मान्दोलन चरित्र को मुत्य मानकर मपम पर ही पति बत देता है। म त मा गएप पारम-मुनि कोही भावना है। ऐहिक माम पा म्परस्पानिए इन पत्तों को मानकर नहीं पसना चाहिए । परमुक्त की सबसे सी बिगेपना पाहि किसी को सम्माम मा पारी मेने के लिए नहीं माना है। उमा गय है या नहीं। यह नहीं प्रपन को पुनीत माये। पर पशु पारस्पाण नसा स्पा पार पनमा स्याण सामूहिप में ममार यस्पारण प्रौर मामारि पस्याण रेम की समृद्धि का पिम्ह है। सिना जीवन रिमुर रोमा उनना ही पपिए पार पामी बनेंगे। पत्र ।
प्रात प्रामोवन का गोश्य का उपय है, जीवन परिष बने निकम्मरहार म सन्चाई और प्रामारिएक्शा भामा प्रणुपत नियम हर म्पक्ति को उसकी परिस्पितियों के अनुमार ही मैतिकता का उपरेधले हैं। यदि गाटर लिए यह यह बताते है कि पर मोम स मरीनों को पुषिमा में मत गमो ता मापारी को भी यह बताने में पीम नहीं है किम कम प्रोमो म परिकास दर दूसरों स तो । एक पार भोर को चोरी करने से रोक्स है तो दूसरी पोर पास का भूम मेने से भी। परिया माम्दोमन सफल हसा तो इसमें विचित् भी सन्देह नहीं कि उसस राष्ट्र की उम्मति में भारी सहयोग मिलेगा।
भारतीम सस्कृति और परण व्रत ~~भी समस्त मारती एम. एबीटी पार विस में प्रसान्ति तथा प्रमन्ताप मर्षण म्पाप्त । मानव-समान मत वो महायुगे की विपित्रामों में इलना पस्न कि यह तृतीय महापुर की पास से ही भयभीत प्रतीत होता है, मॉरिवह जानता है कि परि तीमरा मापुर कहीं पा वो मान-कति का इतमाम पौर नाम होगा कि मानयता को कही और गरण मेनी पोनी । कोरिया र पुर में जिमी मीपड ताएं हुई, पाय भी यह वर्णनका विषय है। मनार के बोबो राष्ट्र प्रमलगी कि नीमरा महामुर म माये । विभिन्न राष्ट्रों में विभिन्न गान्ति सम्मेलन हो । पौर मास्ति के मारे भी पग-वन तपापे पाप है, किन्तु पानि तो बाहरम मिमने पानी मही । इसके सिए तो भीतरी प्रपल और मिरमर सापना की पारमता है। धान का पन नीयत इतमा निम दम्नपूर्ण पोर पनाविक हा कि हमारे प्रत्येक पार्म में सर्व-भावना म्याण है। भारलौर भकति मानिनावादी न होकर मापारिमा प्टिकोण से माण। हमारे पर्म-पास्त्रों में मानव दम्पों में मैं एक पर भी है 'पारमन' प्रतिमानि परेपान ममाचरेत् । अर्थात् मनुष्य को ऐमा कोई भी पार्म नहीं करना चाहिए, यो उम पम पम नहीं समता। भारतीय मसति ममार मिना ही मनुष्य का धर्म है। पारमों में पा-'हठे दहमा मित्रस्प मा मर्याणि भूतानि समोसन्ताम् । मिबस्पाई पम्पा मणि प्रवानि ममोरो। मिस पशुपा मर्माणि भूतानि ममीवान पा ममार के मा प्राप्पी मौका मित्र को हष्टि से देने । म सपा हम मर मित्री प्टि में सबको । मितापी भावनानिए विमान की नाबमा मापापात समुप्प का परहार सम्म मार्यों के माप सिवामपूर्ण मी पर मिना - भारतीय संस्थति और प्रभात १२१ नहीं हो सकती। मित्रता के लिए मेकोष कायरता तया भय की भाषना पातक है। इसीलिए उपामक तथा सापक मदा निर्भय होन की कामना करते हुए पर मामता है-'अभय मिपावभयममिभावमय माना मय परोम । समयं न मभयं रिमान सर्मा पाण मम मि मान्नु। प्रात् मुझे मित्र पमित्र परिचित मगरा इन सबमे निर्मयता हो । यहा तक कि दिन पौर रात भी मरे लिए निर्भमत्ता का पार पेन से हा। यही नहीं मनुष्य विपापों तक मे निमयता का पराम मांगते हुए महना है-'प्रमय न दुर्ववतरिनामयं पावा-पृषी उम इम । प्रभम पाचारमये पुरम्नारमय मुत्तमरामपं नातु । प्रवि हमें अन्तरिम (पाकाम) पूमो पृषी मोम प्रमय नोक का बरपान मिसे। यहाँ पर किसा गिाए भी मरे लिए निर्भपता का मनेश। पीस, पामे सरमा नीच मर भोर से हमें निर्मम होन का हो पर मिल । इस प्रकार हम रेखा है कि वह पश्चिम प्रमापुष भौतिकता की पोर बागापौर मामा हाते हुए मी पपने कार्यों से बामन बनन का प्रयत्न कर पा है वहाँ पूर्ण के पात्र हम मानवमान को 'मनु' के अनुसार मानव बनने का सम्म देपारका सबम बहा रस्म पार प्रमिपाप यही है कि हमारे सम्मुख प्रावग तो देवता बनन का किन्तु वास्तव में हम मानम कहनामे में भी पपिसानी है। हमार बीवन का प्रावर्ण वो यह मा कि हम सारा पीवन सपा उम्मत विचारवान् बनें किन्तु प्रान हमने अपनी प्रापश्यन्तामों को नाममा मिपा है कि मा जीवन पिम मा गम्भी बन पुको पौर हम सम्पता की दौर में किमी प्रम्प देस पीपे एने में अपना पपमान समझते हैं। पाम हमारा पोरन मशीन के समान निवि बन जो पौरहम सारा रिम परिश्रम करो मषिक से अधिष प्रर्ष-मंचय करने पा प्रयल करते हैं। माधीनी में हमारा प्यान नैतिकता की पोर प्रापित किया। उनके बारम के एक-एक कार्य में पारिया प्रारम-चिन्तन तमा पाम्पारिमाया की पवित्र भावनाएं प्टिगोचर होती है। मर्य मेषसमूगर जैसे पश्चिमी पिशान् मारतार सम्पना को मस्तक मुभान हुए मारणमा यगोगान रखे हुए नही पाये।
१२१ भगवतीमोर मगुबती-मक प्रतिष्ठापक प्राचाप भी तुसमी ने मंसार की पुरमा अपनी इन पणिों से देवा पौर गाने फिर से प्राचीन परम्परा की यार हमें रिनाई। भारतीय संस्कृति में यम और नियमों का महत्व उस्लेखनीय है। मनुस्मृति के मनुमार-'यमान् ममेव सतत म नियमान् समान् पुष यमाम्प भयारणो नियमान् केबनान् भवन् । प्राव मुग्मिान् मनुष्य को चाहिए कि यह मदा यमो का मेपन करे, केबत नियमों का नहीं। जो पति बम नियों ना ही सेवन करता है वमा यों पर प्यान नहीं देता मह संसार म सम्मानि को प्राप्त मही होता पपितु भौगति पर्वात मंसार में गिरा बना है। उक्त यम पनि बताए गए पौर नियम भी पांच ही- पाच पम ल प्रकार ! बाहिमा सरपास्तेम पत्रपपिरिपहायमा । पर्वाद पहिमा (बर रसाम) मरप (सरप मानना सत्य बोममा मौर मस्प हो करना) पस्लेम भाव मन बचन कर्म है पोरी का स्पाम समपर्य पाव उपम्रेमिय का ममम अपरिपा पात् प्रापन्त मनोमुपता स्वस्वाभिमान राहिल होना--न पर पर्यों का मेडन मनुष्य को प्रणाम परला पाहिए। मी प्रकार नियम भी पपिसाए -गौष मायाप ठप स्थाप्यापार प्रामियानानि नियमा। भाव मार-मानादि में परिमना मनोप-तम्या प्रसन्न होकर नित पम एमा मम्तोप नहीं किन्तु पुरपा विमा हो सके उतना कसा हानि-नाम में हपंग धोकम करना नप-कर सेवन मे मी मर्मत को ना पनुप्यन साम्पाय-पाना पड़ाना पिर प्रापिपान-परका भक्ति पिप से मारना को प्रपित एपमा- पार निपम पाताते।। म मरारामी मारा अनुसार पाचार्य श्री नमी न यि महापुर के परिणाम समाप पा सभी स्तवता प्राप्ति के पापा ममी १ माघ १.४। . पोय सापन पारे। , योग तापन पाटेपू. १२।
भारतीय स्वति और प्रवती १२७ हुई प्रतिश्वा चोखामारी तथा रिश्वत पो बसकर अपना कर्तम्प मान मि के एम्पार फिर से मानवता का पालान करें और उसे अपने कसैम्प प्रति मासम्म करें। से तीन वर्ष पूर्व में रिस्ती पपारे और उन्होंने रायमानी की जनता को तवा उनके माम्पम मेरेम तमा विदेस मी ममता को उनसे कम्प से परिचित कराया। पांच यमों प्रति महाबों कमाघार पर उन्होंने मैन धास्त्रानुकूम मणुक्तों के लिए मानवता को पुकारा। महावतो तमा प्रस्बतों को ससमावे हए उन्होंने स्पष्ट किया कि बम-मापारण के मिए महाबों का पूर्सतया पासन परला मम्मद नहीं । इमसिए में उनके पिता मी पंग का पामन कर सके उतना प्रयल करने में कभी न पू। माना-मार्ग कठिन होता है पौर उसके लिए निरवर कप्ट और तपस्या की प्रारम्पकवा गती है। मांसारिक सामों के सिए प्राचार्य भी तुमसी ने प्रपती-मंच का मिपान बनात हुए चौरासी नियमोपनियमों का मस्स किया जिनको पामन करने में ममी सापक प्रयत्मसीम हसाते। मरगुबती-सप मा उसकी विचारधारा के समन्म में देश तपा विप में उत्साहजनक प्रतिनिया हुई, जिसका मर्सन मणषत साहित्य से प्राप्त किया था सकता है। प्राग पापस्यकता इस बात की है कि हम प्रारम निरीक्षण तथा सापना के जीवन के लिए अपने प्रापको प्रस्तुत करें। जप तक जन-जीवन में पायरण सपा परम्प की भावना उन्नत नहीं होगी तब तक गाय में मफमता मिलने की पूर्ण पापा नही है। बम तक इमारा मैतिक स्तर का नहीं होगा तब तक समाव का स्तर उन्नत नहीं हो मम्ता। यह ठीक है कि पाम रोटी के प्रश्न ने मम्प सब प्रश्नों को पराभूत कर दिया है और 'सय गुणा काचनमा पयन्ति' रे भनुसार सभी समस्या पार्पिक ममम्पार्मों का प्रेग बनकर रह गई है घिन्तु पैसे की होड़ में मका प्टिकोण ही ऐमा भिम हो गया है कि हमारा पारिवारिक तपा सामाजिक जीवन भी उसके प्रभाव स पसूना नहीं ए ममा है। प्राचीन परम्पराए मा प्रत्य-बिम्बाम मामानितिमा तमा दम्म बहुत दुध छिन्न-भिन्न होते माप। मानव प्रपतिचीत इप्टिकोण म पसुपारी तवा यपार्पवादी बन पाई। पावार की नीव को पोनसा मिस १२५ प्रमती पोर करण के प्रपलों में भौतिकवारी प्रयल निरन्तर गुटे हुए। ऐसी स्थिति में ससार फिर से भारतवर्ष की प्रारपि समाए बैठा है। एमिपा मार रहा है। पोप के बदन से एमिया के घोटे-छोटे पेग मुक्त होने पा रहे है और इस बात की मामा है कि योम का पारम्परिक मुटबासी का वातावरण उमे एक से गत में पकेगा कि मानव का पुननिर्माण होमा । अमरीका के पार खानों में रिम प्रविरिन मनती हुई मुरमामग्री तवा उमा म्यापारिक ाष्टि कोण से पुर के सपने देखन को दिया करते रहते है। पर हमारे ममों में मानेगा सनह तवा परिनाम का पानाबरम बना रहेगा तब तक हम एक राष्ट्रमन नही अनेकों ऐग संघ बनाम तो भी मानवता का गुणस्माण होने बासा नही। प्रत्येक बिमार प्रस्त प्रश्न का निबटाराम तक दमवम्बी भापार पर हाना बता हम मन्पर में हो ठोकरें बाते सेंपे। इसलिए हमें पपगार मे प्राय की मोर पमने मिा प्रमनपास होना चाहिए। 'तमसो मा योनिर्ममय मृत्योर्मामृतं गमय' प्रभाव पापकार से प्रकार की मोर तमा मृत्यु में अमरता की पीर से चमो। हमें निरामपारिता को पोरकर पासा का संबम मेकर बनना है । मार्म की नमन मा संकट हम हमारे मन निर्माण के लिए प्रपलसान करें यही हमारी हारिस भावना और धा होती पाहिए।
एक दृष्टि गुव्रत -मो.मीमती निरखी ठिह एम० ए. पार का युम भौतिकता का मुम है। चारों पोर इसी मा प्रमाण दीड "ता है। जीवन का एप्टिकोण ही बदम गया है । प्रत्येक म्यक्ति भौतिक सुन पनों की उपम्मिमोही परम पीवन का परमोहरम समझता है। हमें तो र्फ बाप गावावरा में ही उममकर मरमा पा रहा है महम पपने मनम - सपने म बमम फिर भीतर की तो बात ही दूर है। मनुप्य प्रपन मापका वर्य नही पहमान पाया है कि उसके पाम मारमवर्मन * हेतु समय नहीं। भी पास मूद एकही पोर बस पमे गा रहे है परिणति पी पोर भी किसी 1 प्यान मही गा पाता। हमारे जीवन का नोपय क्या है और उसकी प्राप्ति गर्ग कौन है? हम इससे मर्दपा पनभिन्न है। राष्ट्रीय सामाजिक तमा बपरितक जीवन से मापारिमकता का सर्वबा मोप हो रया है । एक पमा युम पा मया है मक सर्वमापारण तो इसे मनाया और प्रनगम सममन ममा है। फिर भी भारत माता की भूमि में पृय ऐमी पति है कि सर्परा महा प्रप्यारम वर्णन एवं चिन्तन के तापों का प्रादुर्भाव होता रहता है।म धर्म का भी भारत के राष्ट्रीय तमा बार्मिक इतिहास में एक महरवपूर्ण स्थान है और परि पार ही सामनता को या सम्पाए पप पर मे पाना चाहता है तो कुछ प्रस्वाभाविक नही परन् साप्य है। बनतामर तेरापन्थी सम्प्रदायक माया प्राचार्य भीतुममीने प्रगुपनी की स्थापना कर जिस म्यापक दृष्टिकोण को अपनाया है रसरी प्रसा करने का नाम संगरण में नही र सती । साम्प्रशमिकतामी मंकीर्ण परिपि में मुक्त पर मातिक पानोपन एफ कम्ति है और मुझे पूर्ण विकास है कि भारमा सवत मानव-समाम इसका अमिनन्दन करेगा यदि इमरामुचारम प्रचार किया गया । प्राणुगत के नियमों को देखने से यह सप परिमसित होता.... है कि यह लिपिहीन ठिक एवं मामारि मान्दोलन है। समरे नियमों में पातमोर यह पामास मिमता कि प्राचार्य महापय को जीवन प्रस्पक भाका म्यावहारिक ज्ञान है तपा वमी पर प्रापारित पै मिमम है मो मुगमता से जीवन में प्रवेश पा सकते है। महिमानों के लिए जो पिप नियम ! मी सर्वमा प्रचंपनीम है सपा उमो गीवन को उम्पायर की भोर से जाने वाले है। पुस्प पौर मारी जीवम म्पी रप के दो पहिए है पीर दानों का कहना पारराया है। रसा एवं मास्मप्म की मूर्ति मारी मपरित पन भी सपा प्ररेणा पती मोर इम नियमों का यदि प्रमया पामम दिया पाप वो गाईम्प्य बीवन पूर्पतया दुमी हो मरवा है परना पृषी पर मर्न निर्माण की नस्सना माकार रूप धारण कर साती है। इन नियमो के पामन से नारी स्मातरम्प को भी कोई पापात नहीं पाता कि उसे वो एक पति मिमती है। बापू के सत्प पार महिमा सिमान्त काही मु-वर समारोस पगुचत के नियमों में हो पाया है। मनोमामिक पिकोण से मारमरर्धन का वाही महत्व है सपा निर्माण का यही प्रमम सोपान है। इस पहलू पर भी गोर रिया पमा वा मेरा विसास है कि इसके प्रसार से सामाजिट उत्पान एर राष्ट्रीय निर्माण को गत बड़ी पक्ति मिसेगी पौर हम अभीए की प्रापर रममा पूरा