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Mitakshara Satik Acharadhyaya Ka Mulsahit Bhasha Anuvad

Pandit, Durgaprasad · 2012/08

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भूमिका भगवान् याज्ञवल्क्यजीने संसारमें मर्यादास्थित रखने और सर्वसाधारणकेउपफारदृष्टिले भनेका- नेक प्राचीन भाचाया और महर्पिगणोंके मतलेकर मिताक्षरा नामक धर्मशास्त्र माचार,व्यवहार,प्राय- श्चित्तकाण्ड नामक तीनभार्गोमें निर्माण कियाथा- यह याज्ञवल्क्यस्मृति, भारतवासी मात्र चतुर्वणों का मुख्य धर्मशास्त्रहै और इसीके अनुसार यहां केलोगोंके धर्मसम्बन्धी समस्तकार्य होते चलेभाते हैं- इस भाचाराध्याय नामक प्रथमरंखडमें गर्भाधान से लेकर मरण पर्यन्त के समस्त संस्कार चतु- धों और विविध जातियोंकी उत्पत्ति ब्राह्मण भाटि चतुर्वर्णों और ब्रह्मचर्यादि चतुराश्रमों के धर्माः चरण,साधारण शिक्षा,भाठप्रकार के विवाहों के लक्षण,भक्ष्याभक्ष्य पदाका विवेक, दान लेने देने की विधि,सर्वप्रकारके श्राद्धोंका निर्णय,नवग्रहोंकी शांति,राजाभोंके धर्म प्राचारादि अनेक विषय विस्तारपूर्वक वर्णन कियेगये हैं- परन्तु यह विस्तृत ग्रंथ संस्कृतमें होने के कारण सर्व साधारण के देखनमें नभाताथा' इस कारण भारत देशनिवासी पुरुषों के उपकारार्थ इस यंत्रालयके अध्यक्ष ने बहुत सा धन पारितोपिक की रीतिपर देकर आगरा निवासी मर्यादाप्रियपण्डित श्रीदुर्गाप्रसादजी से श्लोकका उल्याकराय स्व यंत्रालयमें मुद्रितकराया- माशाहै कि धर्मसम्बन्धी कामोंमें सर्वसाधारणको यथादर्शक होनेके सिवाय भापाग्रंथोंकेभंडारमें यहभी एक अपूर्वयंथ होगा और मर्यादाप्रियवंधुगण इसे मादर पूर्वक स्वीकार करेंगे। द०मालिक मतवा मवयमखवार लखनऊ हज़रतगंज मिताक्षरा स० आचाराध्याय का सूचीपत्र । अर्यप्रमाण HARI रलारु मल प्रमाण भागय प्रयोजनोक धिकोक्ति ६ o 0 0 0 0 0 0 . . ८ . ० ० ६ 0 . २८ २ a . . ० 0 0 . 4 0 ६४ ए . श्लोक भाधय प्रयोजनीक मूल ঘটান্ধায়গা। अर्थ धर्म को यम से प्राची, लोश निन्दित कामनकर साकाहाना ॥ १३ अर्थ २ धन पायो प्रादि भित्र लाभ श्रेष्ठ ३५१ ए (न)। निर्मतज्ञान का पिर नयोन धर्म की उत्पति भाद्वारा देहादि भाभश्यकता ६ नष्ठिक प्रमचारीके फर्मधर्म । निलंपागमा र द्रप्याँको शुद्धि छिडको आदि से। १८३ (प) पढाने घोग्य नियों के संचा। २८ अर्थ २ पाँकी माग्या रानाकी यो. धनश सय विप्रफुलझायोगदास को यो समायों को यो । पुननिया का पह पुरकी कामना में देवज में सामदेवरसे। प्रापित भतृका जिसका वियर्मेद्दा ।। परिका हिसकरनेवासी जिते दिया स्त्री प्रत पच महायज्ञ प्यार दपय पर १०२से धनी दोनों की भाजन विधि १०तक पशु मारने का दोप प्रयोदान दीपदान यवदान भादि अनेक दानों का प्रया ॥ २०६ २० पार्षश पाटुकी समस्त घिधि २२४ से घिवेदन कर्म पूर्व । (२४प्त सपाटु भार सपिड़ी अनेक भाइयो के जुदेहाजाने मर ॥ प्रेतक्रिया - पुत्रों के न हाने कोई गात्री शाद मी मनमर के एकोट्टियार पार्यण का निर्णय पाकचारभेदोका पनापन। पितरों को अधिक तृप्ति भौच २५० से विषाक्षे २६० पितृ देयगाओं नया पितरोका है . १ भी हिटु निर्णय फलसाधक। पुरोहिरा और यज्ञादि कर्म ३१२ से ०और समधी दान॥ ३१६सक 70 पुरुषार्थ को प्रधाना सयो | ३४८ से+ सयोग से ३५07 (व) धोन या गर्भ में अपने पाप का नाथ और स्त्रियों को प्रियायें। १३ अझदारीफे दिइनदण्ड और सुगालाआदि। परी ब्रह्मचारीको भिता भागने की ३० शों भानन नियमनिर कर्म ।। ३३ एक प्रमचर्य के निसर्जन का नान रुदक्षिणा दान माझमुहत में रटिफर धर्म भर्य काम रनका विचार ।। ११४२ 'पड छाटेकीमान्यतापर्यंत 1१५ यासी पुन कोईर माय ६८ पहुये मनुष्य ने श्राद्ध और धनों का निर्णय (भ) भत्तानहानेममयमैजुदीनहोजाया द भक्ष्यमासाका । भदि धरतो शुद्धि करने के प्रकार पाच या सmn १७ पर्य२ १८० भमिदान - लेख्य एव विधि ३१० से ० सनद (म) मंगलाचरण मृतभा पुरुषकाधर्मदूसरामिाह . माय विक्त आदि पहार जातकोअनुनाम उ पत्ति। मार्ग चलाये पिसको याच ३ कर मार्गदेना। माह का त्यागी मुनिहीतारे।। १८० मुरदातादि सलग्न शुद्धि मार्गस्थान पुदि अादि चाडातौं । ४ स्पर्णहुये की शुद्धि वायु से १९६ मगलकार्य के निमित्ताम विशेष +देना युगमेद दान। २०२ मध २ मोदिनका निश्चय शोर एको ट्रिष्ट पादा के काल ५. २५५ अर्थ - . . . ० ८७ . . . परतफा ऐ० . o T । 1 ६०८ . . + + a ७ १८० O 0 D . २०२ .

मिताक्षरा स०आचाराध्याय का सूचीपत्र । प्राथय प्रयोजनीक लोक मूल पप्रमाण अधिकाति आधय प्रयोजनोक श्लोक मल अर्यग्रमाण अधिकाति । . * . . अर्थ * + ० . क . . पर्य २ . . २ ५१ . . .. 0 . te . १० . + . .. CO o ८२ 0 . ० R मांसादि व्योंके यादों की विद्यार्थीको भिवाति अता में पुलस्य को व्यवस्था । येद पढने को अवधि सोनों महागणपत्यादिकल्पः॥ २६३२ यणं को। मन्चियोंके लक्षण राज्यका येद-शास्त्र आदि सब साधा से पिवार उपधाशोधन । ३११ रण भी विद्याओं का नित्य पाठ मन्त्र की रक्षा मन्त्री का भेद करने के फल । ४८तफ नहीं होने ॥ ३४३ अर्य२ ३४३ मिाह करना पर शेसी स्वीसे (य) करना। अर्थ योगीपसर याचमत्कापियाँ | यरके ऐसे लवण तिसको ने धर्म घूझा। कन्या देना। ५ पर्चर योगीपयरने काले मृगशाले देश निश्राह में दिये और पाये हुये में चालादि । पर्य धनका चर्चा-पर परोचा। योगीयनी आदि धूतों का मग मियाह करने हेतु तोनि नहीं करना विशाहों के अनुकल्प पहिली यानकाल और यानके सम्बन्ध रंतो के अनुसार 10 से पूक्त के गुणों के भी काल । ३४० ऐ० शियाहोके पाठभेद द्राक्षादि से ३४० याजवल्पयोयणास्त्रको परिभाषा एनसयोंके तहण और विधि (शाक उत्तम मध्यम प्रधम दण्ड ३R ऐ० पर्य प्यभिचारिणीकाधिकारहरन॥ ३४५ प्यभिचारमेशुद्धिार गर्भधेत्याग पिया करने के फल स्त्रियों की रामा के स्वाभार्थिक सक्षण ३०८ मे २ रहा सेवन भारीरक। 13१०तक धर्ण सफर प्रतिलोम बातों को। राजाको प्रायोदिको मादि ३०८ ये + उत्पत्तिसत घेहिक प्रादि । २ विद्याचा का भयह करना। ३१० पजिीप परपाक्ष चि धादि राजा को दुखदायफ ध्यसन इनका विचार। ६० पठारद १८॥ घेद पडनेकोमर्यादें चोरसमय। ४३ राजा को समाग राज्य की रक्षा करनी पिहा हुये रतने पन्नो को +ोहदे मामयामी आदि। ये राम का निवासस्यान - दुर्ग ३३१ २० विद्याविधीनकोप्रतिग्रहनहीलेना २०१ निर्मा-ध्या के लक्षण विद्यादान सब दानों या फल रणसामयिक धर्मा.. देना है। राजा को पाठो प्रहर धन्धे ३१ मे 20 ३२६० द्धि अदुको समस्त विधि दा और चारों का भेजनाः -दर ३३२सक ३१२सका विधनकाराधिने फेजारण: 20 पर्थ र या चारों के सचण।। पिनापक रेनु - निम्न में. राजाका स्पभाष और प्रजा को ३३३ से, ऐ० प्रासानेवाले स्था शार रचा धादिपालन विधि ३३(तक पियनज्ञापफ प्रायर]- मे रामाशापयाय - प्रजा पीड़ा ३३४ में | मे० पायरया में मर राज्यपालन का फल ३४ाक निपनगान्तिरे लिये विनायक से + বালানি বগধনিধিত্ব वपन शादिसम चादि ० विनयरियोग्क्रम। (च) चिश्मानिग पनदान शमन हाँशभिगदर प्रणामपादि. २ समें भरना पर्य 0 . ० - ० 0 . + , . . D Rre a D on २.० 0 ० . .

२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। टहलें करीजाती हैं तब उनसेवाटहलोंको भक्ति और सेवाकरनेवालेको भक्तजनकहते हैं सो यह संसारही मेरा देहहै इसकी सेवा टहलें सबकोई करो-यात् इसकी रक्षा और बढ़वारी में मर्यादापूर्वक तत्पर वनेरहकर अपने घर और देहों के भी धन्धे मर्यादापूर्वक साधनकरो परन्तु जोकोई भिन्नमर्यादा होकर अपनेघर वा देहों के धन्धे साधनकरतेहें वे मेरीभक्तिसे रहितकहलाते हैं इसीलिये उसजगत्कर्ता ने मुनीश्वरोंके हृदयमें निर्मलबुद्धिरूपापही विराजमानहोकर नानाभांतिके मर्यादप्रचारक शास्त्र भी निर्माणकरवाये हैं कि इनशास्त्रोंकीमर्यादा अनुसार जो कोई संसारका आचरण राखेगा वही मेरा भक्तकहलावेगा-और वह आचरण उसका मेरी भक्तिरूप होकर दिनोंदिनबढ़वारी पावेगा जिसके बढ़वारी पानेसे उसमेरे भक्तको संसारकी सारीही सम्पत्तें मिलनी सुगमहोजायँगी १॥ नज्ञायतेजगद्रीतिविनाशास्त्रैःपुरातनैः। तस्मादियाज्ञवल्कीयमतरीतिःप्रकाश्यते २ ॥ भक्ष-नहीं जानिये है जंगत्की रीति विनापुरातनशास्त्रों के तिस्सेही याज्ञवल्क्य के मतकीरीतिको प्रकाशकरियेहै २॥ अभि०- अर्थात् यद्यपि संसारका वर्तावा सब कोई कराकरताहै पर उस बतीचे की रीति तो प्राचीनशास्त्रों के देखेविना नहीं जानीजाती है तिसकारणसे याज्ञवल्क्य मुनिकेमतसे जो रीति निर्मितकरीगईथी उसे प्रकाशितकरतेहैं २॥ अधि०-यद्यपिसंसारकी बहुधारीत और पृथ्वीआदि दृश्यपदार्थोंका स्वरूप,आ- कार,डोल और मनुष्योंकी प्रकृतिबोलचाल श्रादि यहसबवातें परिणाम पाकरवारह वारह वर्षीपीछे पलटकरकुछ औरही और भांतिकी होजायाकरती हैं-क्योंकि- सारा संसारही परिणामवान् कहाता है फिरयह वस्तुसंसार से वाहरतो हेहीनहीं-सो यह परिणामभी कुछवारहवर्षपीछे इकट्ठाएकही दिनमें नहीं होजाताहै अर्थात् निरन्तर दिनोंदिन किंचित् किंचित् परिणाम प्रतिक्षण होता रहता है परवह प्रतिक्षण हो- ताहुआ किसीको मालूम नहींहोता किंतु वारहव वीतजानेपर जवकोई बुद्धिमान उससमयसे वारहवर्प पहली दशाओंको ध्यानलगाकर यादकरता है और अपनी ज्ञानदृष्टि से शोचता है तब उसे दिखाईदेता है किजो वस्तु अथवावा” या मर्याद पहिलेकुछ अन्यथाथीं वह अवकुछ अन्यथाही प्रतीतपड़ती हैं इसीप्रकार : वर्षमै पौना और ६ वर्षमें आधा और तीनवर्ष में चौथाईभाव उसका प्रकट होजाता है- इसपरिणामके लिखने का यह अभ्यन्तर है कि बहुधा शास्त्रोक्तरीते मर्यादेंभी परि- णामपाती हैं उनमें बहुतेरी तीनष्टाग्निवत्प्रलोप होजाती हैं। और बहुतेरी भस्माग्नि यत् निगूढ़ होजाती है बहुतेरी धूमाग्निवत् निरुडहोजाती हैं ३वहुतेरी निर्धूमाग्नि वत् चमत्कृत रहती हैं बहुतेरी प्रदीप्ताग्निवत् सदाही प्रकाशकरा करती हैं इनमें मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । पूर्वोक्तोंके स्थान बहुतेरी नवमर्यादेंभी प्रतिपक्षी होजाती हैं किभाव जिनका चिह्नभी पुरातनोंमें न मिलताहो बहुतेरी रीते नवसंचरितभी ऐसीहोती हैं किजो प्राचीनोंसे सम्वन्धित और उन्हींके आधीनहोती हैं-इनकारणों से बहुधा.लोगोंको भ्रमउत्पन्न होजाताहै सो वह उनकीबुद्धि भ्रमताभी शास्त्रों के देखनेसे मिटसक्ती है और शास्त्र भी दोप्रकारके होते हैं एकतोप्राचीन दूसरे नवीन तहां थोड़े मनुप्यतो प्राचीनोंपर अभिरुचि रखते हैं और वहुधा नवीनोपर परन्तुऐसे मनुष्य तो बहुतही थोड़े देखने में आते हैं कि प्राचीन और नवीन दोनोंपर अभ्यास रखते हों-और संसारकी निर्वि- काररीति तथा निर्मल मर्यादेतभी जानीजातीहैं कि जब नवीन और प्राचीन इनदोनों प्रकारके शास्त्रों का पालोकन और विचार करे और उन दोनों के मध्य अन्तरको समुझे क्योंकि नवीनभी प्राचीनों केही अनुसार और आधीनहुश्रा करते हैं केवल किसी वातीमें परिशोधनकी रीति से अन्तर होजाताहै-इसहेतुसे याज्ञवल्क्य मुनिके मतसे,जो प्राचीनरीतैं उनके धर्मशास्त्रमें लिखी हैं उन्हें प्रकाशित करते हैं कि सब लोग उनको देखें और नवीनों में जो उनका आशयहै उसको समुझै २॥ योजानातिजगद्रीतिंकुशलःकुलवानपि । परेपधिनमनोह वेश्या:किनमहाशयाः ३॥ • भक्षा-जो जानताहै जगत्की रीतिको कुशल और कुलवान्भी है औरों के धन मन क्या हरनेको वेश्यानहीं महाशय होती हैं ३॥ अभिल-इसजगत्में आकर जो कोई जगतकीरीति मर्यादको विधिपूर्वक जानताहै वहीप्राणी कुशल कहिये चतुरोंमें चतुर और कुलवानोंमें कुलवान्भी वहीहै-अर्थात् धन जनसे हीन भी जगत्की रीतिको जाने तो वहचतुर और कुलीनहै और जो धन जनसे संयुक्तहोकर जगत्कीरीतिको न जाने वह अज्ञानी और अकुलीन कहाताहे- क्योंकि यद्यपि उसमें धनोपार्जनकी अनेक चतुराइयां भी हों परन्तु परायाधन और पराया मन हरलेने को क्या वेश्या बड़े मनवाली नहीं हैं अर्थात् इनदोनों वातोंकी चातुर्यतामें तो वेश्याभी बड़े उत्साह और मनवालीहोती हैं-सोई किसीभाषा कविका वचन भी दोहाहै कि-जानत जो जगरीतिको सोइनर चतुरकुलीन । परधन परमन हरनको वेश्या परम प्रवीन ३॥ योगीश्वरंयाज्ञवल्क्यसंपूज्यमुनयोऽब्रुवन् । वर्णाश्रमेतराणांनोब्रूहिधर्मानशेषतः १॥ अक्ष-योगीश्वर याज्ञवल्क्यको अच्छे पूजिकर मुनिलोग बोलतेभये-वर्ण पाश्रम इतरोंके अशेपधर्म हमसे कहो १ ॥ अभि०-योगवालों में ईश्वर कहिये मान्य और समर्थ ऐमेयाज्ञवल्क्यमुनीश्वरका पूजन कहिये सत्कार मनसे वाणीसे कर्मसेभीकरिके सामश्रवा आदि मुनिलोगयोले कि हमसेवोंके और आश्रमीके और इतरकहिये अनुलोम प्रतिलोमजातं जो मू:- ४ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । चसिक्त आदि वर्णसंकर कहलातीहें इनसबकेधाचरणोंको निश्शेष वर्णनकरो ॥ अधि०-अनुलोम प्रतिलोम जातोकी उत्पत्ति आगे इसीशास्त्र में श्रावेगी और जो धोकामाचरण मनिलोगोंने ऊपरपंचाहै सो वहधर्मभी छःप्रकारकाहोताहै और धर्म- शास्त्रकी स्मृतियोहारा जानाजाताहे जैसे वर्णधर्म राश्रमधर्म ३वर्णाश्रमधर्म गु- धर्म शनिमित्तधर्म साधारणधर्म-इनःप्रकारोंमेंसेही एकरके सहसोंभेदहोनेसेधर्म के लाखौं किरोडोलक्षणहोतेहे(दृष्टांत)जैसे ब्राह्मणादि तीनिवर्णोको संध्याअादि कर्म नित्यही करना उचितहै-या जैसे ब्राह्मणको मयकदाचित्भी न पीनाचाहिये-या जैसे शद्रको तीनोंकी सेवाइत्यादि नानाभेद एकवर्ण धर्मकेहोते, १ दूसराआश्रमधर्म सो वह आश्रम चारप्रकारकाप्रसिद्धहै ब्रह्मचारी २ गृहस्थी ३ वानप्रस्थ जोस्त्रीसहित वन मेंतपकरे ४ संन्यस्त ये चारों केवल गृहस्थोंमेंसेही होजातेहेंजोकोई इनचारोंको क्र- मसे विधिपूर्वक सेवनकरताहै वह परमगतिको पहुँचताहै सोइनचारोंके भिन्न धर्म- जैसे-ब्रह्मचारीका धर्म स्वाध्याय कहिये वेदकापढ़ना नियम शुश्रूषाआदि अनेकल- क्षणहोतेहैं जोआगे इसीशास्त्रमें श्रावेंगे १ ऐसेही गृहस्थीका धर्मदमदान यज्ञादि अनेकलक्षणवाला होताहै यहभीश्रागे इसीशास्त्रमेश्रावेगार ऐसेही वानप्रस्थकाधर्म नियमसे बन रहिकर स्त्रीसहित तपकरतानादि३ ऐसेहीयतीकहिये संन्यासीकाधर्म शम अभयसत्वकी संशुदि ज्ञानयोगमें आरूढ़ होनाआदि जोकोई जिसमाश्रम का सहारालेकर उसके अधिकारोंका विधिपूर्वक बर्तावाकरता है वही आश्रमधर्मा कहलाताहे कलियुगमें वानप्रस्थका चिह्नभी दिखाई या सुनाईनहींदेताहै-ब्रह्मचर्यका चिह्नकही २ कल्पित देखपड़ताहे पर कलियुगमें उसकीभी नास्ति है संन्यस्ताश्रम जिसकाहोना कलियुगनिषेध परवहबहुधावर्तमानहै तथापिउसमें स्वाभाविकधर्मों का होनानहीं दिखाईदेताहे-गृहस्थाश्रम यहसबसे उत्तमहे क्योंकि यह भिक्षादेकर सबके फलमें साझीहोजाता और वहतीनों आश्रमइसकी अाशा किया करते हैं पर इसकी उत्तमता उसीअवस्था में होसक्तीहे जो धर्मशास्त्रोंकी रीति अनुसार आचरण हो २ तीसरावर्णाश्रमधर्म जिसमेंवर्ण और श्राश्रम इनदोनोंके लक्षणहोते हैं जैसे वर्णसे ब्राह्मणहै और आश्रमउसने ब्रह्मचर्यकालिया या गृहस्थका-या वर्णसेक्षत्रिय अथवा वेश्यहे और पाश्रमउसने ब्रह्मचर्य या संन्यस्तकालिया इत्यादि दोनों बातें जिसमें हो और उसकेलिये ढाकेकादंड आदिजोमर्याद नानाभांतिकी उचित होती तिनको वर्णाश्रम धर्मकहते हैं ३ चौथागुणधर्म उसको कहते हैं किजेसे वर्णसे तो कोईजातिका मनुप्यहो वहकिसी दूसरेवर्णका गुण धारणकरै या देवयोगसे पावे तो उस गुणसंबंधी जोमर्यादें होतीहों वहभीउसको करनीचाहिये उन्हींमर्यादीको गुणधर्मकहतेहैं (दृष्टांत) जमे कोईजातिका मनुप्यहो अभिपेकआदि गुणोंसेसंयुक्त राजाहोनेपर उसको अपन मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। जातीधकि सिवाय प्रजाकी रक्षाआदि भी करनाचाहिये(दूसरादृष्टांत)जैसेजातिअथवा कर्मसे या पाश्रमसे वह भिक्षुकहै इसकारण राजकर देनेसे मुनाफ़है पीछेवहीमनुष्य व्यापार आदि वैश्यजाति काजो गुणहै उसको अङ्गीकारकरै तो उसगुणकाधर्मयहभीहै कि उस व्यापारके लाभमेंसे राजकर देव ४ पांचवानिमिचधर्म जोनिमित्तकहिये हेतुसे क- रनाप.(दृष्टान्तजैसे)जो करनाउचितथा वहनहीं किया अर्थवाजो न करनाउचितथासो कियाउसकाप्रायश्चित्त अथवादण्डादि जोकछप्रतिकारहोताहेतिसकोनिमित्तधर्मकह- तेहैं५-छठासाधारणधर्म बहकहलाताहै कि जोएकसूतसे सबको करनाउचितहो अर्थात् चाहेकिसीजातिया किसीवर्ण या किसीयाश्रमका मनुष्यहो( दृष्टांत)जैसे किसीजीवकी हिंसानहींकरना किसीको पीड़ानहींदेना चोरीनहीं करना असत्यनहीं बोलना औरोंके धनप्राणोंकी रक्षासे अपनी सामर्थ्य होते हुयेगई नहींकरना इत्यादि नानालक्षण एक साधारण धर्मकेहोतेहैं ६ यद्यपि इसशास्त्रके आचरणसे धर्मअर्थ काममोक्ष इनचारों की प्राप्तिहोतीहै और इनचारोंकेही लक्षण इसमें आवेंगे तथापि धर्मकी प्रधानतासे धर्मशास्त्र इसकानामहै-अर्थात्-धर्मनामहै मर्यादोंका सो इनचारोंकी मर्यादें इसमें मिलतीहैं क्योंकि मर्यादाविना कोईकाम नहींहोता इसहेतुसे सर्वथा धर्मही सबमें मु- स्यहै सो उसधर्मको उन सामश्रवाआदि मुनियोंने याज्ञवल्क्यजीसे पूँछा-और एकउस कोभी धर्मकहतेहैं कि जिस्से परमगति मिलसकै सो यहभी यहीधर्महे जो ऊपरलिखचु- के कुछइसमेंयाउसमें अंतरनहींहै केवल अज्ञानियोंकी समुझका अंतरहै अर्थात्जो परमगति मिलनेकी मर्यादें हें वहभी उन्हीं मर्यादोंमें मिलरहीहैं जो संक्षेपतासे ऊपर कहीगई हैं-हाँ-केवलइतना अंतरहै कि जो और सब संसारीधंधों के परिसाधन करने कीरीत मर्यादैहोतीहैं उनकानामती धर्महै और जो परमगति मिलनेके उपकारीधंधों के परिसाधन करनेकी मर्यादेहोती हैं तिनको परमधर्म कहते हैं अर्थात् वहसवधर्मोसे वडाधर्महै इस्से उसेपरमधर्मकहते हैं परन्तु-जोध्यानलगाकरशोचौतौ धर्मकाकोईभी दूसरारूप नहीदेखपड़ता अर्थात् वधर्मएकहींहै फिरवही अनन्त और असंख्यलक्ष- णवालाहै इसकारणसे कि कहींउसकीशाखा देशभेदोंसे बढ़जातीहैं-कहींमनुप्योंकी जा- तिभेदसे-कहीं कर्मभेदसे-कहींप्रकृतिभेदसे-कहीं गुणभेदसे-कहीस्वरूप श्राकार श्रा- चार यादिभेदसे शाखाबढ़जाती हैं-कहींकालभेदसे विस्तृत होजाती है-और वहधर्म पशुपक्षी श्रादि सवजीवोंमें होताहै क्योंकि वहधर्म परमात्मा विश्वरूपीका चित्प्रति विवरूप होताहै इसहेतुसे वायुकेतुल्य अतिसूक्ष्मरूपी और अदृश्यमान होकर सारे विश्वमें फैलारहाकरताहे-देखोजोहाथी आदि प्रबलजीवोंके हृदयमे धर्मकीछाया का निवासनहींहोवे तो क्षणमात्रमें वह अनेक मनुष्योंको फाडडालें क्यों अपनेऊपर म- नुष्यको चढ़ाकर उसकीइच्छाके अनुसार अंकुशके वशहोकरचलें-देखोपक्षीजाति में मिताक्षरा साचाराध्याय । को या बड़ामलीन और हिंसक और चंडालपक्षी कहलाताहै इससे कि वहबहुधा प- मियाँको मारकर भक्षणकरताहै परंतु जो ध्यानलगाकर शोचौ तो उसमेंभी धर्मका पास है क्योंकि जीवोंका भक्षणकरना यहतौउसका जातीधर्म स्वाभाविकहे सो क्यों- करछुटे-परंतु जिसस्थलपर किसी द्वितीयधर्मका औचित्ये देखता है तहाँवह कोया भी धर्मनीतिकी रीतिसेही कामकरताहै अर्थात् जिससमय गाय.स आदिपशुओंकी आँखों या कानों या गुदामेसे मेल अथवाकीड़े काढ़करखाताहै उससमयकी चतुराई उसकीदेखो कि ऐसीसुहातीरचोंचलगाकर मेलकोनिकासलेताहे कि उसपशकीयाँख में चांचकाधका या चोटकिंचित्भी नहीं लगनेदेताहै-अबकहो कि जो उसकौयामें धर्मद्याया नहींहोती तो अचानक चोंचके झटकासे आँखेंफोड़देता या कान और गु- दामसे मेलफेवदले मांसभीनोचकर खानेलगता क्योंकि मांसउसका श्राहारहै परंतु वहस्वार्थीकाक इसधर्मको जानताहै कि (नहिधर्माऽभिरक्तानां लोकेकिञ्चनदुर्लभम् ) किंतुजोप्रापी धर्ममर्यादमें तत्परवने रहते हैं उनको संसारमें कुछ भी दुर्लभनहींहै-- र्थात जो आजमइसकी आँखफोड़ डालोंगा तो मुझेइसमेलका निकालना दुर्लभहो जायेगा क्योंकि ये पशमझे अधर्मीजानिके फिर अपनेपास कदाचित् नहींयानेदेखेंगे इस्से उलटी मेरेहीस्वार्थकी हानिहोजायगी अर्थात् यहभीएक धर्मकालक्षणहे कि जो कोईजीव किसीमे अपनास्वार्थसाधाचाहे तो ऐसीरीतिसे कामनिकाले जिस्से उसको पीड़ा नहीं पहुँचे(दृष्टान्त )जेसे कोमा मैलको निकालताहै ऐसेही सब जीवोंकी धर्म- मर्यादाको अपने अनुमानसे जानलो और यहजानो कि यह सारासंसार केवल एक धर्मरूपी बंधनमें फंसाहुआ खड़ाहे-जिससमय कोई जीव या कोईदेश या कोईकाल या कोईवस्तु अपनी नियत मर्यादाको छोड़देतीहै उससमय जोजो उत्पात उठाकरते है वे सन धर्म के लक्षणहें इसहेतुसे उन मुनियोंने धर्माचरणकी मर्यादपंछी जिनसे सृष्टिका कल्याण योर बढ़वारीहो १॥ मिधिलास्थासयोगीन्द्रः क्षणंध्यात्वाऽनवीन्मुनीन् । यस्मिन्देशेमृग-कृष्णस्तस्मिन्धर्मनिरोधत २ ॥ मक्ष-मिथिला में बेटाहुआ वह योगीन्द्र क्षणभर ध्यानकरिके मुनियों के प्रति बोलताभया-जिसदेशमें कृष्णमृग हो तिसमें धर्माको समुझो २ ॥ पनिल-मिथिलानाम नगरी में विराजमान यह योगीन्द्र याज्ञवल्क्य एकक्षणमान मनमें ध्यानसे शोचकर मुनियांसे बोला कि जिसदेशमें कृष्णसार मग अर्थात् काला हिरण होनाहे किंतु स्वाभाविक अपनी प्रकृतिसे फिरता है तिस देशमें उन धम्माको जाना जो हम न्यागे कहेंगे २॥ : पवि०-उमदशमें उनधमाको मममी अर्थात् जिनधर्म को हम अब कहते हैं उन को श्रवणकिये पीछे जो समुभनमें सदेह शेपरहजाये तो वहां जिसदेशमै कालामग मिताक्षरा,स० श्राचाराध्याय । होताहै तहां आंखोंसे देखकर समुझलेना क्योंकि सुनीहुई वार्ता प्रत्यक्ष देखेविना नि- श्चित नहीं होती है अर्थात् उसदेशमें इनधींका सदैवही आचरणहोतारहताहै-का- लाहिरण कहनेका यह अभिप्रायहै कि जहां कालामृग होताहै वहदेश यज्ञादि धर्म कोकेलिये उत्तम और पवित्र गिनाजाताहै और कालहिरणका होनाभी यहनहीं है कि,किसी ऐसे देशमें पालकर वाँधाजाय जहां वह न.होताहो अर्थात् उसकी स्वाभा- विकउत्पत्ति.यज्ञेश भगवान्कीइच्छासे होतीहो सो वह देश यह भरतखण्डसंबंधीही निश्चितहै किन्तु कोई और नहीं-सोई मनुसंहितामै बहुधा देशों के सीमा चिह्न भी लिखे हैं-तथाच-सरस्वतीपद्वत्योर्देवनद्यार्यदन्तरम् । तन्देवनिर्मितंदेश ब्रह्माव तैप्रचक्षते १ कुरुक्षेत्रञ्चमत्स्याश्च पाञ्चालाःशूरसेनकाः। एपब्रह्मर्पिदेशोब्रह्मावर्ता- दनन्तरः २ हिमवद्विन्ध्ययोर्मध्यंयत्नाग्विनशनादपि । प्रत्यगेवप्रयागाच मध्यदशेः प्रकीर्तितः ३ आसमुद्रात्तुवैपूर्वादासमुदात्तुपश्चिमात्। तयोरेवान्तरंगिर्योरार्यावर्तवि- 'दुर्बुधाः ४ कृष्णसारस्तुचरतिमगोयत्रस्वभावतः । सज्ञेयोयज्ञियोदेशो म्लेच्छदेश- स्त्वतःपरम्५इतिमनः-इनपांचों इलोकोंका यहभावहै कि सरस्वती और हपद्धतीइन दोनों देवनदियोके बीचमें जो देशवसता हे उसको देवनिर्मितदेश और ब्रह्मावर्तभी कहते हैं अर्थात् ब्राह्मणादि वर्गाके रहनेका श्रावर्त कहिये घेरायहनामहै-कुरुक्षे- और मत्स्य पांचाल शूरसेनक इनदेशोंको ब्रह्मार्पदेशकहतेहैंयेसबदेश ब्रह्मावर्तसे अनन्तर कहियेमिलेहुये औरपासमें हैं-उत्तरमें हिमालय और दक्षिण में विंध्याचल इनदोनोंके वीचमें पश्चिम सीमा कुरुक्षेत्रसे लेकर पूर्वसीमा,प्रयागताई जो वीचका देशहै वहमध्यदेश कहलाताहै-ऐसेही पूर्वसमुद्रसे लेकर पश्चिम समुद्रतक उत्तर दक्षिण उन्हींदोनो हिमालय और विन्ध्याचल पहाड़ोंके बीचवीचका देश आर्यावर्त कहलाताहैइस आर्यावर्त्तकेही बीचमें वह ब्रह्मावर्त आदि भी सबभागये-कृष्णसार मृगभी जहां इनदेशों में स्वाभाविक अपनी इच्छासे विचरता है वहदेश यज्ञकरने योग्यहै पहजानलो २॥ पुराणन्यायमीमांसाधर्मशास्त्रांगमिश्रिताः। वेदाःस्थानानिविद्यानां धर्मस्यचचतुर्दश ३ ॥ अक्ष०-पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, अंगोंसे मिलेहुये वेद,विद्याओ के धर्म केभीचतुर्दशस्थान ३॥ अभि-अर्थात् प्राचीन रीतिके अनुसार ब्राह्मण आदि तीनिवर्णोकालघु अवस्था सेही पहले पहल एकधर्म तो यहीहै कि-पुराणोको न्यायशास्त्रको मीमांसाशास्त्रको धर्मशास्त्रको और वेदके ६ अंगोकरके सहित वेदको पार लोकमें प्रसिद्ध विद्याश्री के १४ स्थान और धर्मके भी १४ स्थानोंको पढ़ें और सीख ३॥ अधि०-वेदके ६ अंगोकेनाम-यथा- शिक्षा २ कल्प व्याकरण ४ निरुक्त छंद 7 - -- मिताक्षरा साचाराध्याय। ज्योतिष ॥ विद्याओंके १४ स्थान यद्यपि लोकहीमें सब प्रसिद्धहें परंतु उनकेनाम योगविद्या, जलविद्या, अस्त्रशस्त्रविद्या गानविद्या, वैद्यविद्या, वाजिविद्या, चित्रविद्या,. यंत्रविद्या, विश्वकर्मविद्या, नटविद्या, दास्यविद्या, आदि सब शंखस्मृतिमें कहेहैं और यद्यपि वह १४ विद्यायें क्षत्रिय वैश्य मादिजातोंके कामकीहैं परंतु ब्राह्मणको उन स- घोंका पढ़ना सीखना इसहेतुसे उचितहै कि ब्राह्मण सबको शिक्षादेनेवाला गरुहै इस- लिये यद्यपि उसको उन विद्यायोंसे कोई पेशाकरनेकी अपेक्षानहीं भी हो परंतु पहले आप सीखेगा तब पीछे औरोंको सिखलासकैगा और गुरुकहलायेगा नहीं तो कोरे बाबाजी अर्थात प्राचीन शास्त्रोंकीरीति अनुसार यह क्रमहै कि शद्रजातें केवल अ- पने २ कामकी विद्यासीखें-और वैश्य अपनी और शूद्रकी विद्याओंको भी जाने क्यों- कि जो शूद्रकी विद्यायोंको न जानेगातौ उनसे क्योंकर अपनेकामोंको वनवासकैगा- क्षत्रियको ब्राह्मणके समान अपनी और वैश्यकी और शूद्रकी और ब्राह्मणकी भी विद्याओंका सीखना आवश्यकहै ३॥ मन्यत्रिविष्णुहारीतयाज्ञवल्क्योनोंगिराः। यमापस्तम्बसम्वर्गःकात्यायनहस्पती ४ ॥ । पराशरव्यासांस्खलिखितादक्षगौतमौ । शातातपोवसिष्टश्चधर्मशास्त्रप्रयोजकाः५॥ अक्ष-मनु, अत्रि, विष्णु, हारीत, याज्ञवल्क्य, उशना, अंगिरा, यम, आपस्तंव, सम्वत,कात्यायन, वहस्पति? पराशर, व्यास, शंखलिखित, दक्ष, गौतम,शातातप, वसिष्ठ, यहसब धर्मशास्त्रोंके संग्रहकरनेवाले हुये, ५॥ अभि०-याज्ञवल्क्यजीने अपना नाम सबके संगमें मिलाकर इसहेतुसे कहाहै कि धर्मशास्त्रका निर्माणकरनेवाला केवल मेंहीं नहीहूं अर्थात् मनुको आदि लेकर इतने यह सब और इनके सिवाय और भी अनेकों मुनिलोग धर्मशास्त्रोंके बनानेवाले पहले से भी होते चलेवायेहैं-और धर्मशास्त्र के ग्रंथों या बनानेवालोंकी बाहुल्यताका वहीं कारणहे जो पहले इलोककी अधिकोक्ति में लिखा कि देश जाति काल श्रादिभेदोंसे धर्मकी अनंत शाखा और परिणामहोजातेहैं किंतु वह सदा और सर्वत्र एकसा नहीं होताहै ॥५॥ अब यहाँ पहले थोड़ेसे परमधर्मके लक्षण जतलातेहें सो देखो नीचे ॥ देशेकालउपायेनद्रव्यं श्रद्धासमन्वितम् । पानप्रदीयतेयत्नत्सकलंधर्मलक्षणम् ६ ॥ मक्ष देशमै कालमें उपायसे जो द्रव्य श्रद्धापूर्वक पात्रमें दीजियेहै सो यह सब मभि०-देशके कहनेका यह अभिप्रायहे कि जैसे जहाँ कालामृग होताहे उस देश में बैठकर दानकरना यह श्रन्यदेशोंकी अपेक्षा अधिक फलदायक है फिर कालेमग- वाले देशमें भी जहाँर उत्तम तीर्थ प्रयाग कुरुक्षेत्र यादि प्रसिद्धहें या राजद्वार भोर धर्मके लक्षणहें ६॥

मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। है गोशाला आदि उनमें करना यह भी एकधर्मकाही लक्षणहै-ऐसेही कालके कहनेका यह अभिप्रायहे कि जोर समय दानकेलिये लोकमें प्रसिद्धह जैसे संक्रांति आदि पर्दै या पाणिग्रहणका समय या पुत्र जन्मका समय या प्राणांत समय प्रादि इनमें दान करना यह भी एक लक्षण धर्मकाही है-उपायसे कहनेका यह अभिप्राय है कि दान करनेके लिये जोर विधि शास्त्र में या लोकमें प्रसिद्धहों उन संपूर्ण विधियोंसे दानकर- ना यह उपायपूर्वक दान कहलाताहै सो यहभी एकलक्षण धर्मकाहीजानो-ऐसेहीद्रव्य कहनका यह अभिप्रायहै कि उसद्रव्यका दानकरना जो अपनेसत्य परिश्रमसेकमाया हो या ब्राह्मणत्व के कारणसे कहीं प्रतिग्रह आदि में पायाहो सो यह भी एकलक्षण धर्मकाहीहे अर्थात् परसंबंधी धनकादानकरदेना धर्मका लक्षणनहींह-श्रद्धा समन्वित कहनेका यह अभिप्राय है कि श्रद्धा जो आस्तिक्य बुद्धिहे तिसकरके सहित दानका करना किंतु नास्तिकताका प्रवेश बुद्धिमें न होने देना यहभी एकलक्षण धर्मकाहीहै- पान में कहनेका यह अभिप्रायहै कि दान देनेयोग्य जो सुपात्र कोईहोवै जिसकीसुपा- व्रताकेलक्षण आगे इसीशास्त्रमेंयावेंगे ऐसेकोदेना किंतु अयोग्यकोनदेना सो यहभी एकलक्षण धर्मकाही जानो-प्रदीयते यह कहनेका अभिप्राययहहै किन्दीयते का अर्थ तो दीजिये है इतनाही होताहै अर्थात् देना सोवह देना एकऐसाभी होताहै कि कोई वस्तु किसीकोदेकर फिर उसके लौटारलेनका अधिकारवनारहे और इलोकमेंप्रदीयते लिखाहे तहां (प्र) उपसर्ग इस प्रकर्पताके लियेहे कि अतिशय करके बिल्कुल्लिही दे दियाजावे जिसके लौटारलेनेका अधिकारनवाकीरहै अर्थात् वहधनदूसरेका कहलाने लगे किंतु चाहदानपत्रके द्वारा या संकल्पवाक्यके संबंधसेही दियाजावे सोयहभीएक लक्षण धर्मकाहीहै इत्यादि और भी नानाप्रकारके लक्षण जो शास्त्रोंमें जातिगुणयाग होम आदि लिखेहोते हैं सोसब परमधर्मके लक्षण, ६॥ भधिः-परमधर्मका लक्षण मनुस्मृतिमेंभी लिखाहै कि(धृतिःक्षमादमोऽस्तेयं शोच मिन्द्रियनिग्रहः।धार्विद्यासत्यमक्रोधो दशकन्धर्मलक्षणमितिमनः) अर्थात् परमधर्मके दशलक्षण होतेहैं एकतौ १धृति जिसको धीरज या संतोप कहते हैं। दूसरा २ क्षमा जो अपनी सामर्थ्य होतेहुये भी दूसरेकीवात सहलेना ३ दम किंतु बाहरली इंद्रियों कोचंचलतासे रोकलेना ४ अस्तेय अर्थात् किसीकाधन विनादिय नहीं हरलेना या चुराना ५ शौच अर्थात् नित्यक्रिया ६ इंद्रिय निग्रह अर्थात् इंद्रियोंको कुभोगों से रोकना ७ धीः अर्थात् शास्त्रोक्त ज्ञानकीधारणा बुदिवनीराखना ८ विद्या. सत्य बोलना १० अक्रोध अर्थात् क्रोधकी वार्तापरभी क्रोध न करना-ये दशलक्षण पर मधर्म के हैं (अन्यत्रापिपड्विधम् ) यथा (पादानमतिःकृष्णेमातापित्रोउचपूज नम् । श्रदायलिगर्गवांग्रासः पड्विधर्मलक्षणम्) अस्थायः दानकरना तो सुपा- .

। 'मिताक्षरास आचाराध्याय। त्रोंकोही १, परमेश्वर में वुदि वनीराखना २ मातापिताकी सेवाभक्ति राखना ३ पुण्यमें श्रद्धाराखनी ४ बलिवैश्वदेव नित्यकरना ५ गो ग्रास निकालना ६ ये भी छः प्रकारके लक्षण परमधर्म केही होते हैं ॥६॥ श्रुतिस्मृत्तिस्सदाचारस्स्वस्यचप्रियमात्मनः । सम्यक्संकल्पजःकामोधर्ममूलमिदंस्मृतम् ७ ॥ मक्ष०- श्रुति-स्मृति-सदाचारअपनी आत्माका प्रिय भी-सम्यक्संकल्प जातका- मना- ये धर्म के मूल कहे हैं ७॥ अभि०-श्रुति कहिये वेद-स्मृति कहिये धर्मशास्त्र-सदाचार कहिये सज्जनों का आचार अर्थात् जिस आचरणको अच्छे प्रमाणिकलोग करतेहों सो-और अपना आत्माकहिये मनबुद्धि तिसमेंजो बात समावे अर्थात् जहांएकही कामकी दो मर्या- दें लिखीही यालोकमें प्रसिद्धहों जैसे जनेऊकरना ब्राह्मणके पुत्रको गर्भकालसे और जन्मकालसे भी पाठवेंवर्ष में लिखाहै और दोनोरीत धर्ममर्यादसे उचितहैं तहाइन दोनों से जोकोईसी एकरीति अपने मनंबुद्धिमें अच्छीमालूम हो तिसकेअनुसार कामकरना सो यह अपनेयात्माका प्रियकहलाताहै और जनेऊ यहएक दृष्टांतमात्र यहांपरलिखाहै किन्तु ऐसेसहस्रोंकाम संसारमेंहोतेहैंकि जिनमें दुभाँतितिभाँतिकीरीते होतीहँतिनमेंथपने मनबुद्धिका विचारहोताहै और जिसमेंएकहीरीतिहो उसमेंभीफिर' अच्छेलोगोंका आचार अर्थात् बर्तावा प्रमाण होताहै-चौथी-सम्यक्संकल्पकामना उसे कहते हैं कि सम्यक्नामहै अच्छेका और संकल्पनामहै मनकेविचारका कि ऐसा. काम करनाचाहिये सो मनकाविचार दो प्रकारका होताहै एक तीवुरा दूसराअच्छा तिसमें अच्छेसंकल्पसे जो कामनामनमें पैदाहुईहो कि अपने या ओरोंके कल्याण चाला अमुफकाम इसउपायसे करनाचाहिये तिसको-सम्यक्संकल्पजातकाम-कहतेहैं सोयेचारोंबातें धर्मकीमूलहें अर्थात्वेद १ धर्मशास्त्र २ सदाचार ३ सम्यक्संकल्पज कामना ४ इनचारोंसेही धर्मकी मूल वस्तु पहिचानी जातीहै ७॥ भवि०-ऊपर लिखाहे कि एकरीति में भी अच्छेलोगोंका वीवा प्रमाणहोताहे तिसकायह अभ्यन्तरहै कि किसी र केवलमर्यादामें भी अपनीवुद्धिके श्रमसे गड़बड़ भालासाप्रतीत होताहै इससे कि उसएकही परिनियमित मर्यादाको कोईतो सुरीति से याचरणकरतेहैं और कुछलोग कुरीतिसे-तहांपर अच्छेसत्पुरुपोंकी सुरीतिको प्र- माणमानिकर आपभी अंगीकारकर इसका एकसंभूत और संदृष्टदृष्टांतहै जेसे-प्रातः- क्रियामध्येशोचविधिमें दिशाजानेकी केवल एकही मर्यादा शास्त्र में लिखीहकि पहले जंगलजाफर उत्सर्गकर्मसेनिपटे फिरपीछे मुखमंजनदंतधावनकरे और इसीएकमर्यादा के बर्तावामध्ये कुरीतियोरसुरीतिवालेदोनामांतिकेलोगयद्यपिथोड़ेबहुत सर्वत्रहोतेहैं परन्तु-विशेषतरएक अच्छाचातुर्वण्योपित शहरजो यहांसे पश्चिमोत्तरकोणमें समीप- - मिताक्षरा स० आचाराध्याय । ។ हीवसताहै वहांके निवासीबड़े धनाढ्य और गुणवान् और कुलवानोंकी भी यहरीति है कि सारेनगरके पुरुष और स्त्रियां भी बालकसे बड़े पर्यंत शहरके बाहरशीचको जातेहैं घरोंमेंशौचस्थान नहीं बनाते यहकहते हैं कि हिन्दूको घरमें मलीनता करना अनुचितहै वहुधारातिविरातिकी आवश्यकताकेलिये जो किसीर ने बनारक्खाहे सो भी घरकेअन्दरनहीं किंतुवाहरड्योढ़ीके आगे चबूतरापर पत्थरआदिखड़ेकरवालिये हैं परंतुजात्तेवेभी बाहरहे-और सफाईके धर्मकानूनसे सरकारी रक्षकछूटे रहतेहें इस हेतुसे बहुधादूरजाने पड़ताहै-इससेशीतकालमें चिल्लाजाड़ेकेमारे दिनके दशग्यारह बजेतक शौचकोजातेहैं तबखेतों और कूपोंपरपर्वसीपड़तीह- एकदिनकासंयोगहै कि एक विदेशी विद्वान् विज्ञानी दो घटिकादिन चढ़ेपरकूपके समीपवेठिकर मुखमंजन करनेलगा उसको वहांकेलोगोंने देखकर टोका कि आपऐसे ज्ञानीहोकर ऐसाअनु- चितकरतेहो कि अभी आपशौचकोगये नहीं और कुल्लाकरनेलगे- उसमहात्माने उत्तरदिया कि हम एकाहारीरहते हैं इससेशोचतो दोचारघटिकादिनचढ़े आवेगातव तकयासी मुखकैसेबैठेर, मुखमंजन तौदोघड़ीके तड़के हमकरचुकतेहैं तबयहांशीचको आतेहैं ाजनिद्राने दिनचढ़ेआँखखोली सो हमसीधे यहांचलेश्राये और कुल्लाकि- या तब तुमनेजाना किन्तु हम पूछतेहैं कि जवशौचको जायँगे तब क्या फिरकुल्लानहीं करेंगे और मुखमंजन तो चित्तकी शुद्धि और प्रसन्नताका हेतुहै जो मुखमंजन विना हमशौचकोचलेजाते तो चित्तकीमलीनता और अप्रसन्नतासे प्रथम तो उत्सर्गभी भलीभांति नहींहोता और बारम्बार मलीन मुखसे थूकनापड़तातो वहवात क्याय- च्छीथी-इतना निर्णयसाथ समुझानेपर भी वहसवलोग एक मुखहोकर उस विदेशी बिज्ञानीकोही उलटेकायल करनेलगे और तालीपीटकरवोले कि वाह २ पण्डितजी आपभलेज्ञानी मिले हमारेयहां यहरीति नहीं है कि उत्सर्गसे पहले कुल्लादांतोनिकरै परंतु प्रापभलेपदेही कहोकौनसे शास्त्रमें लिखाहकि जंगलपीछेजाना और मुखपह- लेधोना-तब उनमहात्माने फेर उनकुविचारियोंको समझाया कि हांठीकहे शास्त्रमे व- हीबातहै कि जो तुमकहतेही परंतु किसकेलिये कि जिसेउठतेके साथही शोचबाधाका तीव्रवेग वेदनासहितहोआवै और वहतत्कालचलाजाय-और जिसको उठेपीचे श्रा- धी घड़ीकाभी विलंब होजानेकी संभावनाहो तिसको यह उचितहै कि तत्कालखटा सेउठतेही चाहतैसा शीतहोपर आधेकपालताई सब छिद्रोंसहित मुखमंजनकरे और मनेन्द्रियकोभी प्रक्षालनकरै तब पीछे किसीसे वार्तालापकरै क्योंकि जो पहले किसी से बोलेगा तो वासीमखमेंसे मलीनलार जो छूटेगी सो घुटनीपरेगी-इस्से यह जानी कि शास्त्रजोहें सो बुद्धिवोध्यहोते हैं क्योंकि शास्त्रों में प्रत्येकशिक्षाकी समस्या मात्र लिखीहोतीहै इसीसे शास्त्रों में बुद्धिकाविचारतो सारहे और विचारविना शास्त्रका अ.

१२ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय. क्षरभी अपारहै-इतनानिर्णय साथसमुझाने परभी उन कुविचारियोंने तानादिया कि जो सब लोग तुमसेही ज्ञानीहोजावें तौ शीघ्रही सवशास्त्र उलटे होजावे हम तुम्हारी इस कपोलकल्पनाका प्रमाण नहीं मानते और तुम्हारे कहनेपरभी शास्त्रसे विरुद्धभी नहीं करसक्ते हैं यह तुम्हाराज्ञान तुम्हीको फलदायकहो-तव उनमहात्मानेकहा कि तु- मलोगनकी यहशास्त्रबुद्धिहीव्यर्थहै क्योंकि जब दशग्यारहवजेताई तुमलोग यहां शौ- चको आतेही तभी मुखमंजनकरतेहो तो निश्चित्तहुआ कि क्या यहशास्त्रबुद्धि जिस्से एक तो उदर में मलकाबोझदावेहुये घर या दुकानपर बैठेरहते हो दूसरे वासीमुख भी नहीं धोतेही तीसरे जो ऐसेही तुमशास्त्रपर आरूढ़हौ तौ शास्त्रमें शौचजाना भी प्रातःकालकहा है सो क्यों नहीं करते हो चौथे तुमलोगों ने जो निजदरवाजे आगे शौचस्थान बनाये हैं यह भी शास्त्रसे अनुचित है क्योंकि पितर तो रोजरोज और देवता पाके दिन पानिकर गृहस्थीके दरवाजेपर विश्राम इसहेतुसे करते हैं कि न जाने आजकुछ हमारे नामका इसघरमें होताहो सो वह उसदुर्गधिको देखकर उलटे फिरजाते हैं इसके सिवाय संसारीमनुप्य जो अपनेइष्टमित्र किसीआवश्यकतासेआते या जोकोई उसमार्गमें जातेाते हैं वैसव नाक सकोड़कर थूकते और दुर्नामता देते 'जाते हैं इस्से मार्गनिर्मलता धर्मजो प्राचीन और सनातन, उसकीमर्यादाअनुसार शौचस्थान का बनानाभी घरके किसीऐसे कोणमें उचितहोता है कि जहां किसीकी दृष्टिनहीं पहुंचे-इतनावाद विवादहश्रा परउन कुविचारियों से अपनीकुटेव अबतक नहीं छोड़ीगई-हेजिज्ञासो अब उसवातके सिद्धांतपर दृष्टिधरनी चाहिये कि यद्यपि वह एकहीरीति शास्त्रमेंलिखी है परन्तु श्रात्माजो मन बुद्धि चित्त अहंकाररूप चतुष्ट- यतिसकाप्रिय (प्रसन्नता) सोउस लिखीहुई रीतिसे न होसकी तबउन महात्माने अपने विचारके अनुसार उत्सर्गसे पहलेही मुखमंजन नियतकिया और यथार्थमें य- ही धर्मका लक्षणहै-और उन उक्तलोगोंकी शास्त्रबुद्धि यद्यपि शास्त्रोक्त है परन्तुधर्म के लक्षणमें गिनती न रही अर्थात् अधर्म औरमलीनता निश्चितहोगई क्योंकि उन्हों- ने शास्त्रोक्त आचारका विचार करना नहींजाना-अवउस ऊपरलीवात को शोचौ कि वे महात्माती अच्छेलोगोंकी गिनतीमें हैं १ औरवेलोग कुविचारी हैं २ इनदोनोंमें से जिस किसीका पाचरण-तीसरे ज्ञानवान् जिज्ञासुओं को अपने आत्माके वीच प्रियमालूम हो तिसके आचरणको आपभी सीखें धर्मकीमूल पहिचाननेके और भी उपलक्षण ग्रंथांतरमैलिखेहे-यथा(अद्रोहश्चाप्यलोभश्चदमोभूतदयातपः । ब्रह्मचर्य ततःसत्यमनुक्रोशःक्षमाधृतिः) अर्थात्-एकतो १ अद्रोह किंतु किसीका द्रोहनहींकरना २ अलोभ किंतु अपने परिश्रमके यथोचित फलके सिवाय रथालोभका न करना३ दम किंतु बाहरली इंद्रियोंकी चंचलताका रोकना ४ भूतदया ५ तप६ ब्रह्मचर्य ७ मिताक्षरा साचाराध्याय । १३ सत्य ८ अनुक्रोश अर्थात् किसीकी मूर्खताया पीड़ा या अप्रतिष्ठा आदिको देखसुनि कर अपने चित्तमें केश मानकर दयापूर्वक जोकुछ मुखसेकहै या मनमें विचारकरै सो अनुक्रोश कहाताहे ९ क्षमाकिंतु दूसरेकी प्रबलता या कुवाक्यों को अपनी सामyके होनेपरभी सहलेना १० धृति अर्थात् धीरज संतोप ये भी दशलक्षण सनातन धर्मकी मूल कहलाते हैं-सो ये दुशीलक्षण मनुष्यको मिलने बड़े दुर्लभहोते हैं किंतु इनका साधनकरना बड़ा कठिनहै और जिस मनुष्यमें ये सब लक्षण पायेजायँ उसे यहजानो कि यहसाक्षात् आपही धर्मकीमूर्ति है ७॥ इज्याचारदमाहिंसादानस्वाध्यायकर्मणाम् । भयन्तुपरमोधर्मोयद्योगेनात्मदर्शनम् ८॥ भक्ष०-पूजा आचार दम अहिंसा दान स्वाध्याय कोंका परमधर्म यही है कि जिसके योगसे आत्मदर्शनहो॥ अभि०-ऊपरलिखेहुये पूजाआदि अनेककर्मीका परमधर्मसिद्धांतरूप केवल इतनाही है कि जिसके करनेसे प्रात्माका दर्शनहोसकै अर्थात् आत्माशब्दके यद्यपि अनेक अर्थहें परन्तु यहां उनमेंसे एकमुख्यहै किंतु आत्माशुद्ध निर्मल ज्ञानको कह- ते हैं सो ऐसाशुद्ध और निर्मलज्ञान जिसकामके साधन करनेसे मिलसकै बस वही काम परमधर्म रूपहोता है फिर उसमें कुछ देशादिक लक्षण जो बहुधा ऊपर कहेगये हैं उनका नियम नहीं होता क्योंकि वे सववातें उपकरणमात्रहें जैसे कूप खोदने और उसमैसेजलकीप्रवृत्ति करनेके भाम, टोकरा. खंता, पंप, फाउड़ा, रस्सी आदि अनेक उपकरणहोते हैं सो उनकानियम और आवश्यकता भी तभीतक रहतीहै कि जबतक उसमें जलकाझरना सोत अच्छीतरह जारीनहीं होता ८॥ अधि०-अर्थात् धर्मके नानाप्रकारके चिह्न लक्षण देश जाति आदिभेदोंसे जो वा- रम्बार वर्णन कियेजाते हैं सो इसलिये हैं कि धर्मजिज्ञासु की बुद्धि उनमें सवोरको फैले और फैलनेपाछे सवोरसे इकट्ठीहोकर निर्मलज्ञानका विम्वरूपी होकर हृदय में प्रकाश करनेलगे॥ चत्वारोवेदधर्मज्ञा पर्पत्त्रविद्यमेववा । सावृतेयंसधर्मःस्यादेकोवाध्यात्मवित्तमः ९॥ प्रक्ष०-वेद-धर्म-के जाननेवाले चारयह पर्पत अथवा विद्यसमूह यहपर्पत होती है यहपर्पत् जिसवातको कहेहै या अध्यात्मवित्तमपुरुप एकही जोकुछ कहेहै वहीधर्म होताहै ६॥ अभिः यहवात कि चार ब्राह्मण वेद और धर्मशास्त्र के जाननेवाले एकत्रवे उसको पर्पत किंतु सभाकहतेहें-अथवा विद्य जोतीन विद्याओंको जाने और धर्म- शास्त्रभी जानतेही ऐसे मनुष्योंका समूह यहभी सभाहोती है तीनविद्या यर्थात् शि- ४ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । क्षाशास्त्र १ राजनीति शास्त्र २ श्रान्वीक्षिकी जिसे तर्कशास्त्र कहते हैं ३ अथवा ये तीनविद्या कि प्रथम अपनेकुल जातिकी समस्तविद्या १ दूसरी वर्तमान समयके रा- जाकी सारी विद्यायें २ तीसरी उसदेशकी विद्याकि जहांकी किसी वार्ताका निर्णय या जिसदेशके मनुप्यका कोई निर्णयकरना हो यह ऊपर कहीहुई दोनोंप्रकार की पर्षत जो कुछ निर्णयकरके कहें वहीधर्म कहलाता है-और वहभीधर्महै किजोएकही पुरुष अध्यात्मविद्यााजाननेवालोमें बड़ा चतुरहो और धर्मशास्त्रको जानताहो वह अपने मुखसे विचारकर कहै ६ ॥ भधि-निर्णयकरके योरविचारकर मुखसे कहनेका यह सिद्धांतहकि धर्म केवल वहीनहीं है किंजो धर्मशास्त्रोंके कानूनमें लिखाहोताहै अर्थात् कोईवा" या किसी पद या मुकद्दमेका ऐसा विचारकरनेको पानिपडै कि जिसकाचिह्नभी शास्त्रों में न पाया जाय तब उसवाती या पदका वही धर्महै जो ऊपरली पर्पत्कहें कितु इस आग्रह से उसका त्याग वा उपेक्षा उचितनहींहै किधर्मशास्त्र में तीकुछ लिखा नहीं अब हमक्या करें-और वेद वा धर्मके जाननेवाले ब्राह्मण यह एक उपलक्षण है अर्थात् वैसे विद्या- वान् ब्राह्मणोंके अभावमें और प्रकारके ब्राह्मणभी ग्राह्य हैं-ब्राह्मणोंके अभावमे अन्य- वर्णभी ग्राह्यहें-देश जाति कालके अनुसार सर्वत्र सबको अपनी योग्यताके अनुसार धर्म निरूपण करने का अधिकार होताहै सोई अनंतरोक्त श्राठवें श्लोक में कहचुके हैं। (इत्युपोद्घातप्रकरणम्)इन इलोकोंमंसारेशास्त्रकासिद्धांतरूप आशयकथन करके अब आगेवर्ण आदिकोंके धर्मकहनेके लियेवर्ण विनिश्चय॥ ब्रह्मक्षत्रियविट्शूद्रावर्णास्त्वाद्यास्त्रयोहिजा । निपेकाद्या श्मशानातास्तेपांवैमंत्रत क्रियाः १० ।। भक्ष०-ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य शूद्र येवर्णहें इनमें पहले तीनों द्विजकहातेहें उनतीनों के गर्भाधानसे लेकर उमशान ताईकी सारीक्रियायें वेदमंत्रों से होती हैं कितु शूद्रकी वेदमंत्रोके विना १०॥ अवनीचेइनकी सबक्रियाओंकी संख्या और अनुक्रम कहतेहैं। गर्भाधानमृतोपुंस सवनस्पंदनात्पुरा । पप्ठेऽष्टमेवातीमतोमास्यतेजातकर्मच ११ ॥ पक्ष०-ऋतुकालमैगर्भाधान-गर्भचलनेसेपहलेपुंसवन-छठे वा थाठवैमासमैसी- मंत-गर्भमसेनिकल जानेपर जातकर्मकरै ११॥ पभि-द्विजातीलोगोंका सबसेपहला कर्म गर्भाधान होताहे सो स्त्रियोंका ऋतुकाल जोप्रसिद्धहै और उसकीनियमविधि आगेइसीशास्त्रमें कहेंगे उसनियमके भीतर श्वेद मंत्रोंकी विधिक्रियासे गर्भधारणकरें १-इसपीछे दूसराकर्म पुंसवन नामहोताहे उसको उससमयसे पहले करलेनाचाहिये कि जवउदरमै गर्भफरकने लगताहे २-तीसराकर्म सीमंत और उन्नयनमी उसीकेसाथ होताहे सोये दोनों गर्भधारण समयसे छठे पोर मिताक्षरा साचाराध्याय । १५ आठवें मासमेंकरे ३-चौथाजातकर्मजो नालछेदनादिक्रियाकहाती हैं सोवालकपदा, होनेपर करै ४॥११॥ मंधि० (सकृत्सुसंस्कृतानारीसर्वगर्भपुसंस्कृता)इसदेवलऋपिकेवाक्यका यह अर्थी- शहै कि सीमंत और उन्नयन येदोकम यद्यपि प्रत्येकगर्भ में करनेउचितहें परंतु एक वार सबसेपहलेगर्भमैतौ अवश्यहीकरनाचाहिये-इसलिये उन्होंने इसअद्धामें यहक- हाहै कि-जो स्त्रीएकवारश्रच्छीरीतिसे संस्कारकरीजावे वहसभीग में संस्कारवतीवनी रहतीहै-स्त्रीक्षेत्ररूपहे यहदोनोंकर्म खेतकाकमाना और नलावना सीचना आदि सं. स्कार, जैसे जिसखेतकीधरतीको किसान एकवारअच्छीतरह कमालेताहै वहधरती फिर सदाको फलदायकवनीरहती है और जो हरसाल उसीतरहकमातारहै तो और भी अधिकफलती फलती है ऐसेही स्त्रीका हिसाब है ११॥ अहन्येकादशेनामचतुर्थेमासिनिष्कमः । पढेऽन्नप्राशनमासिचूडाकार्यायथाकुलम् १२ ॥ मक्ष-ग्यारहवें दिवस नामकर्म-चौथे महीना निष्क्रमकर्म-छठेमास अन्नप्राशन- चूडाकर्म अपनेकुलके अनुसारकरै १२ ॥ अभि०-जन्मकेदिनसे ग्यारहवें या बारहवें दिवस नामकरण किंतु दसठनि दप्टोन आदि भापामें प्रसिद्धहै जिसदिन वालककानाम धराजाताहे सो वह नाम दादा या नाना या कुलदेवता या गुरुकुलकी संप्रदायसे संबन्दकरकेधरै यह पाँचवां कर्म है ५- चौथेमहीनामें निष्क्रम अर्थात् वालकको बाहरनिकासना और सूर्यकेदर्शन कराना यह कठाकर्महे ६-छठेमहीनामें अन्नप्राशन किंतु वालकको अन्नचटोना यह सातवां कर्महै ७- आठवांकर्म चूडाकहिये मुंडनहै सो जैसी जिसके कुलमें रीतिहो तैसाकरे किंतु किसीके वर्षभीतर होजाताहे किसीके तीसरी में किसीके पाँचवीं या सातवी में किसीके स्थानभेदसे अमुक तीर्थआदिमें होताहै,१२॥ एवमेनःशमयातिधीजगर्भसमुद्भवम् । तूप्णीमेता क्रिया.स्त्रीणांविवाहस्तुसमंत्रकः १३ ॥ अक्ष०-इसप्रकार वीज और गर्भसे उत्पन्नभया एनस् जोपापहै सो नाशको पहुँ- चताहे-इतनी क्रियायें स्त्रियोंकी चुपके होतीहें और विवाह उनकाभी मंत्रोंसे १३॥ अभि०-इसप्रकारकहिये पूर्वोत्तरीतिसे गर्भाधानादि संस्कारकोंके करनेसे यह फलहोताहै कि माताके गर्भरक्तमें जो बवासीरादि रोगरूपीपाप या पिताके बीजमें कोई कुष्ठादि रोगरूपीपापहो सोनाशहोजाताहै अर्थात् वर्णसंकरत्वादि पापनहीं नाशहोतेहैं किंतु केवल रोगमात्र जो पीछे पुत्रकेभीशरीरमें होजातेहैं-यह इतनीपूर्वो- तक्रियायें स्त्रियोकीभी अर्थात् कन्याकीभी होती, परंतु मंत्रोंके विनाही चुपचाप हु- आकरती हैं ऐसेही शूद्रोंकीभी चुपचाप परंतु द्विजातीकी स्त्रियोंकाविवाह मंत्रोंसेही होताहे और शूद्रकाविवाहभी मंत्रों विना १३॥

१६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । अब नीचे ब्रह्मचारीके नियम कहनेकेलिये जनेऊका प्रारंभकरते हैं। गभीष्टमेऽष्टमेवादेब्राह्मणस्योपनायनम् । राज्ञामेकादशेसकोविशामेकेयथाकुलम् १४ ॥ अक्ष०-गर्भसे आठवें अथवा जन्मसे आठवेवपमें ब्राह्मणका उपनयनहो क्षत्रियों का ग्यारहवें में बैश्योंका बारहवें मेंहो और एक यहकहतेहैं कि अपने २ कुल आ- म्नायके अनुसार हो १४ ॥ अभिक-एक यहकहते हैं अर्थात् थोड़ेसेआचार्य ऐसाकहते हैं कि कुलरीतिके अ- नुसारहो परंतु यह वाक्यनिर्मूलहै क्योंकि थोड़ेत्रोंका कहना प्रमाणमेंनहीं आता है- और गर्भ अथवा जन्मसे जो अवधिहे वह तीनोंवर्णमें लगतीहै और दोनों अवधि मैंसे जिसएकके अनुसार वनसक्ताहो या जो कोईसी.एक अपनेमनभावे उस्से करे १४-सो यह उपनयन कहिये यज्ञोपवीत कर्म नववां है १४॥ उपनीयगुरु शिप्यमहाव्याहृतिपूर्वकम् । वेदमध्यापयेदेनं शौचाचारांश्चशिक्षयेत् १५ ॥ पक्ष०-यज्ञोपवीतकरिके उस शिष्यको अपनेपासरखकर गुरुसातमहाव्याहतियों सहित वेदपढ़ावै और शौचके प्राचारभी सिखावै १५॥ अवनीचे शौचके प्राचारोंको कहते हैं। दिवासंध्यासुकर्णस्थब्रह्मसूत्रउड्मुखः । कुर्यान्मूत्रपुरीपेचरात्रौदक्षिणामुखः १६ ॥ . अक्ष-दिनमें दोनोंसंध्याओंमे कानपरधरेहये ब्रह्मसूत्रको उत्तरमुख बैठाहुआ मू- व और पुरीप इनदोनोंको करै-जोरात्रिकरै तौ दक्षिणमुख वैठके कर १६ ॥ अभि०-किंतु शंका या लघुशंका करनाचाहै तौ दाहिनेकानपर जनेऊरखकर जो दिनहो या सॉझ सवेरेका,संध्याकालहो तो उत्तरमुख और रात्रिसमय होय लौ दक्षि- पमुखवैठे और मार्गादि तथा राख आदि स्थानोंको छोड़कर बेठे १६॥ गृहीतशिश्नश्चोत्थायमृद्भिरभ्युद्धृतै लैः गंधलेपक्षयकरशौचंकुंव्दतन्द्रितः १७॥ अक्ष-फिरइन्द्रियथांभकर उठिके भरेधरेहुये जलोंसे निरालसीहोकर गन्धि और लेपकाक्षयकरनेवालाशौचकरै १७॥ अभि०-इंद्रियाँभकर उठना इमलिये है कि बिनायाँभे मूत्रकीछिटकारोंसे जंघो आदिअशुद्ध होजायँगी-ौर उठना इसलियेकहाहै कि उसीजगह विष्ठाकेऊपर जल को नहीलेवे यहभी बड़ामैलापनहै मक्खियोंके उड़ने भिनभिनाने और जलके छोटे मलकेऊपरसे उछलाने आदि कारणोंसे-भरेहुये जलसे इसलिये कहाहै कि नदी यादि बहते जलमें शौच न करै क्योंकि उसमेंसब लोगस्नान और पानभी करते हैं 'और यहभी कि जल वरुणात्माहे और पंचमहातत्त्वोंमेंगिनतीहै इस्सेवडादोपहै कदा- चित्कोई यहकुतर्कणाकरे कि लोटामभी वहीबरुणात्मा जलहै तहांयह वातहै किसी कारण से शौचकेजलको पहले जुठारलेते हैं तबलेजातेहैं-गंधलेप-काक्षय करनेवाला मिताक्षरास आचाराध्यायो १७ यहवात कि यहांतक निरालसी होकर शौचकरैकि दुर्गधि अथवालेप शेषनहींरहै,१७, मधि-शौचलिये पीछेउस वामेहाथसे लोटाकोभी नहींळूवै और अधोवतीको भीनहींळूवे.किंतुऐसी बुद्धिमानी और चतुराईसे कामसाधै कि दाहनेहाथ से पहले कांछलगा करपीछे उसीसेलोटा को उठाले और वामेहाथको सबसेदूर कियेहुये उठ आ गीनिये शौनमान में मिनिला वस्त्र ओढ़ने या, पहरनेका नहीले जान जापानमा नाम नहीं सामन19॥ अन्तर्जानु शुचौदेशउपविष्टउदङ्मुखः । प्राग्वावानेणतीर्थेनदिजोनित्यमुपस्टशेत् १८ ॥ समक्ष, अंतर्जानु होकर शुचिदेश में उत्तर वा पूर्वमुख बैठकर वाह्मनाम तीर्थ से *द्विजाती.पुरुष नित्य आचमनकरे 500 मंभि- अंतर्जानु अर्थात दोनोंघंटों के बीचमें हाथोंकोकरले-शुचिदेशमें अर्थातपं- वित्रभूमिपर किंतु जहां थूक खंखारआदि कुछनहो और इसी उपलक्षण से जूता या खाट पीढ़ीआदिसेभी अलग वैठकर दिजातीकहियेब्राह्मणंआदि तीनोंवर्णका मनुष्य प्रतिदिनपूर्व या उत्तरमुख बैठके आचमन करे सो केसेकरै कि बाह्मतीर्थ जो अँगूठाके पास हथेलीका स्थानहै तिसपर जलंधरके तीनवार श्राचमनले १८ ॥ " :अवनीचे तीर्थोके नाम और स्थानचिह्न भी लिखतेहैं । कनिष्टादशिन्यंगुष्ठमूलान्ययंकरस्यच । प्रजापतिपित्ब्रह्मदेवतीर्थान्यनुक्रमात् १९॥ पक्ष-कनिष्ठा १ आदेशिनी २.अँगूठाकामूल ३ हथेलीकाआगा-४ ये:क्रमसे चारोंतीर्थ प्रजापति पिटरब्रह्म ३ देवतीर्थ ४ कहातेहैं 60 अभि.न्ये चारोंतीर्थ हाथकी हथेलीमेंही इसभेदसे होते हैं कि कनिष्ठा सवसे.छो- टी उँगली तिसकी जड़के निकट हथेलीपर प्रजापति नामतीर्थ १ इसी प्रजापतितीर्थ को ऋषितीर्थभी ग्रंथांतरमें इसीको मेनुप्य तीर्थ,या नृतीर्थ भी कहतेहैं इसीसे ऋपि- योका तर्पण कियाजाताहै १-आदेशिनी तर्जनी किन्तु अँगूठाके समीपकी उँगली ति. सकी मूलके निकटहथेलीपर पितृतीर्थ कहाताहै इसीसे पितरोंको जलदियाजाता -है२-अँगूठाकी जड़के निकटहथेलीपर ब्रह्मतीर्थ होताहै यह आचमनका स्थानहै इसी ..जगह जलधेरके आचमनकरना अनंतरोक्त १८ के श्लोक में कहचुके हैं३-हाथका अग्रभाग अर्थात् उँगलियोंकी जड़के निकट हथेलीपर देवतीर्थ कहाताहै इससेदेव तर्पण किया जाताहै १६॥ पद्भिस्तुप्रतिस्थाभिहीनाभिःफेनवुवुदैः २०॥ र पोछकर फेन बुलबुलाओंसे रहित ऐसे ..२०॥ -अठारहके श्लोकमें जो आचमन करना लिखाथा उसकी विधिकहतेहैंकि मिताक्षरा स० आचाराध्यायः। ब्रह्मतीर्थ में धराहुआ जलतीनवार पीकर फिर अँगूठाके मूलभागकी गुद्दीसे दोबार मुखको पोंछकर-ऊपरंलीकायाके नाक कान आदि छिद्रोंको जलस्पर्शकरै-धे जलभी कैसेहो कि प्रकृतिस्थहीं किन्तु जैसे तालाव नदी आदिमें स्वयंभूतहोतेहैं और फेंना था 'बुलबुला आदि विकारोंसे बिगड़ेहुचे नहीं निर्मलहों-अर्थात् कोई अमीर अपनी-अ- मीरासे यह चाहै कि गलाव आदिके खींचेहुये जलोंसे. याचमन या संध्यावंदनकरलें क्योंकि वेभी जलहें और बड़ेकीमती हैं सो नहीं प्रकृतिस्थांजलते. करैः२० ॥ हत्कंठतालुगाभिस्तुपासण्यद्विजातयः शुदघेरनस्त्रीचादश्चसकतस्पृष्टाभिरंततः:२१ : अक्ष हृदयकंठ तालमें पहुँचेहुये जलोंसें यथोक्त संख्याके कमसे द्विजातीलोग शुद्ध होवें-स्त्री-शूद्र ये भी एकबार तालुमें पहुँचेहुये जलसे शुद्धहोवें २१॥ अभि-यथासंख्य कहिये बाह्मण तोहदयतक पहुँचेहुये जलसे और क्षत्रियकंठ तक पहुँचेहुये से और वैश्य तालुताई पहुँचेहुये जलसे शुद्धहोताहै ऐसेही स्त्री और शूद्र यह तालुतक पहुँचेहुये जलसे शुद्धहोतेहैं परंतु एकहीवार पीनेसे और इनके लिये कुछ तीर्थकाभी नियम नहींहै कि कोनसे तीर्थ में धरके पीवें ऊपरकहेहुये द्विजाः तियोंको तीनवार आचमन और ब्रह्मतीर्थका नियमहै- और जो नियम इसमें स्त्री: और शूद्रका लिखाहै वहीं द्विजातीके विना जनेऊवालेलड़के का है २१॥ स्मानमव्दैवतैमैत्रैर्माजनमाणसंयमः । सूर्यस्यचाप्युपस्थानंगायच्या प्रत्यहंजप२२ 'अक्षा स्नान वरुणके मंत्रोंसे मार्जन प्राणायाम सूर्यके सन्मुख उपस्थान गाय: त्रीका जप- ये सब बातें जैसी संध्याकी पुस्तकमें लिखा हैं उसीरीतिसे द्विजातीलोग, प्रतिदिन कियाकरें:२२॥ गायत्रीशिरसासार्दजपेयादतिपूर्विकाम् । प्रतिप्रणवसंयुक्तांत्रिरयंप्राणसंयमः:२३: अक्षः ऊपरकहीहुई गायत्रीकों (आपोज्योतिः) इत्यादि शिरसेकरके सहित सात , व्याहतियों पूर्वकांप्रत्येक व्याहतिमें प्रेणवे लगीहुईको-तीनिवार मनमें जपै, इसरीति से कि मुखेनाकमें निकलनेवाली वायुको रोककर सो यह प्राणायाम कहाताहै- इसकी विधि संध्यामें विस्तारसे कही हैं।२३ ॥ .... २४॥ पाक्ततपर प्राणायाम करके और वरुणं देव- की ऋचा किंत मार्जनके मंत्रसे शरीरको छोटादेकर प्रातःकाल ताराओंकी उदयभाव घिसे पहले र अर्थात् जंवत्तक तारास्तान होगा उदयताई पूर्वमुखखेडाहो अथवा वैठे तिसपीछे करै-ये सारी बात जैसी एक संध्याकी कहीं ऐसेही दोनों संध्याकालमें करे २४/२५ ॥...

मिताक्षरा स० आचाराध्यायां, १९ मधि-संध्याविधिकी पुस्तकमें यद्यपि संध्याकरनेका प्रचार मध्याह्नकाभी लिखाहे परन्तु यह धर्मशास्त्रकावाक्य सबके ऊपर प्रमाणहोताहै क्योंकि धर्मशास्त्र जिसवातकी आज्ञादेदताहै वहवातचाहै दूसरेविषयमेंनहींभीहो तो भी कर्त्तव्यहोतीहै और जोबात धर्मशास्त्रमें पाईनहींजावे और किसीद्वितीय विषयमें कहीहो तौभी निर्मूलसीहोती है अर्थात् धर्मशास्त्रमें संध्यावंदन-दोहीकालका आवश्यकहै-परन्तु यहवात सत्य है कि (अधिकस्यअधिकंफलम्) किंतु पुण्यकर्मका अधिककरनाभी कुछ दोष नहींहै-तथापि गृहस्थीको उतनाही नियमलेनाचाहिये जितना आवश्यकहो और सुखसाध्यहो जिस्से उसकी कोईसी जीविका ऑदिकामोंकी हानि नहींहोनेपावै क्योंकि जीविकाआदिका- मोंकी हानिसे पीछेसवधर्मकीहानि होसक्ती है क्योंकि धनके विना कोईसाभी धर्मनहीं सधिसक्ताहै-ऐसाधर्म-मी अधर्मकी गिनती में होजाता कि जिसएकहीकाम के व्यसन से अनेककामोंकीहानि होजाय इसीलिये धर्मशास्त्रउतनीही आज्ञादेताहै कि जिस्सेम- नुष्यकाकल्याणहो-धर्मशास्त्र संसारकेकल्याणकेही लियेहोताहै-और (अधिकस्य अधि कॅफलम्) इसवातका यह सिद्धांतहे कि जोसत्कर्म जिसमनुष्यसेसधिसकनेयोग्यहो वह जो कुछ अधिककरैतो अधिकलकाभागीहो अर्थात्तपसंबंधी सत्कर्मकोवानप्रस्थ और नैष्ठिकब्रह्मचारी नियमसेभी अधिकसाधैं तो अच्छीवातहै नैष्टिकब्रह्मचारीकीचर्चा आगे ४६ केश्लोकमें आवैगी-और४६ केपहिले अनेकइलोकोंमें साधारणब्रह्मचारी के नियम लिखे हैं उसकोभी, नियमसे.सिायकरना नहीं चाहिये क्योंकि वहसाधारण ब्रह्मचर्य केवल विद्यासंग्रहका हेतुहै फिर विद्यासंग्रहकरनेवाला नियमोंसे भी अधिक तपकरनाचाहेगा तो विद्यासंग्रहमें हानि होजायगी और विद्याकीहानिसे उसके सारे जन्मकी हानि-और गृहस्थीको उनकामों में अधिकताका अधिक फल होताहै कि जिस्से उसके सौख्य ओर सुकीर्तिकी वृद्धिहो-और तपसंबंधी नियमों में अधिकता जो गृहस्थीको करनी भी उचितहै जो उसकी यह रीति है कि जिस घरके दशपांच पुरुपामें मुखिया एक वडांबढाहै कि उसको धनोपार्जनकी.चिंतानहीं है वह घरबैठे, हुये चाहै तितनो अधिक नियम साधो जैसे त्रैकालिक संध्या एक दृष्टांतहे और जो युवान्हें वे धन उपार्जनकरैं और वालक विद्योपार्जनकरें और सबके सवछोटे बड़े उ. स मुखिया बड़ेवढेकी आज्ञामें तत्पर रहिकर घरके पालन योग्यधन-उसके आगे लाकर धरैं और वह बड़ाबूढा भी उनसवोकी यथोचितरक्षा और पालनमे तत्पर वारहकर अपने नियम और धर्मको साधै तो उस एकहीके पुण्य प्रभावसे सारे कु- टुम्बको पुण्यफल पहुँचताहै और किसी भॉतिके कल्याणमें हानि नहींपड़ती है जैसे वृक्षकी केवल एकमूलमें पानीभरदेने से सारे वृक्षकी चोटीताई ठंढकपहुँचकर फल, फूल, शाखा, पत्रों आदिसे अमित संपन्नताहोतीहै-जो कदाचित् रक्षकी जड़को छोड २० मिताक्षरा स० आचाराध्याय।। पल्लव सींचेजायँ तो उस वक्षकी संपत्तिमै हानि पड़जाय-ऐसीही कुल रक्षकी व्यव- स्था है २५॥ ततोभिवादयदृद्धानसावइमितिब्रुवन् २५ ॥ अक्ष-तिसपीछे बड़ोंको यह कहताहुना अभिवादनकरैकियह अमुकनामामहूं २६ अभि-तिसपीछे अर्थात् सवेरे सॉझ दोनों संध्याओंके पूर्वोक्त नित्यकर्मोंसे निपटे प्रीछे जुदी जुदी दोनों वेलामें पिता, माता, गुरु आदि बड़ेबढ़ोंके सन्मुख जाकर अ- भिवादनकर अर्थात् यह कहताहुआ कि यह मैं फलानाहूं प्रणामकरताहूँ २६ ॥ भवि० में फलानाहूं इस प्रकार नामसुनादेनका यह हेतुहै कि अँधेराहो या ओट हो या उन बड़ेवूढ़ोंकी मददृष्टिहो जिस्से वे अपनेको न चीन्हें और न चीन्हनेसे किसी और के धोखेमें या उनकी क्रोध प्रकृति के कारणसे न जानिये उनके मुखसे क्या कु- वाक्य निकलजावे तो अशीशके बदलेमें शापहोजावै-दूसरा यह हेतुहै कि वे बड़े बूढ़े जिसस्थानमें विद्यमान एकांतमें जाने किसदशामें धैठहैं या किस्से बातचीत कररहे हो जहाँ अपनेको पुकारे विना चलाजाना उचितनहीं है इस्से नाम कहदेने में वे उ- चितसमुझंगे तो पास बुलावेंगेयावहींसे अशीशकहदेंगेयाकुछ और उत्तरदेवेंगे२६॥ गुरुंचैवाप्युपासीतस्वाध्यायार्थसमाहितः । माहूतश्चाप्यधीपीतलब्धतस्मैनिवेदयेत्॥ हितंतस्या. चरेनित्यंमनोवाकायकर्मभिः 'अक्ष-फिर पढ़नेके लिये भी समाहितचित्त होकर गुरुके समीप जावे-ओर गुरुके मुखसे पुकाराहुआ संथालेवै पहला पढ़ाहुआ गुरुको सुनादेवै, और मन बाणी कर्म से उस गुरुकी नित्यही भलाई आचरणकरै २७॥ मभिः-समाहितचित्त अर्थात् चंचलता छोड़दे-पुकाराहुआ अर्थात् गुरुपर श्रा- पही प्रेरणा न करै कि शीघ्र संथादेदो अलगबैठा अपना पाठकरतारहै संथाके लिये बुलानेपर पासजावे-और शुदवाणीबोले किंतु गुरुके सन्मुख जाकर गलेसे हिचकी नहीं लेनेलगै इत्यादि और भी शिष्टाचार अपनी बुद्धिसे जानो २७॥ रुतज्ञाद्रोहिमेधाविशुचिकल्पानसूयकाः भध्याप्याधर्मत साधुशक्ताप्तज्ञानविनदाः २८॥ अक्ष-कृतज्ञः अद्रोही मेधावी शुचिः कल्पः अनसूयकः साधुः शक्तः प्राप्तःज्ञा- नदः वित्तदः-इतने लक्षणवाले जो शिष्यहों वह धर्मके अनुसार पढ़ाने योग्यहें २८॥ -- अभि०-इन ग्यारह लक्षणोंका यह भावहै कि-कृतज्ञ जो कियेहुये उपकारको न भूलै १ अद्रोही-दयावान् २ मेधावी बुद्धिमान जो ग्रंथके समझने और यादरखने में समर्थहो ३ शुचि जो भीतरले चित्त और बाहरली क्रिया और आचरणों से शुद्धहो ४ कल्प उसे कहतेहैं जिसका शरीर आधि और व्याधिसे रहितहो ५ अनसूयक जो दोपके ढाँकने और गुणाके प्रकटकरनेका स्वभाव रखताहो किंतु निंदक न हो ६ साधु :२७॥ T - . मिताक्षरा स० आचाराध्याय। जो चाल चलनका अच्छाहो ७ शक्त जो शुश्रूपाकी शक्तिवालाहों ८ प्राप्त उसे क- हतेहैं जो ठीक विश्वासका पात्रहो और विक्षिप्त न हो : ज्ञानद जो विद्यापाकर और को पढ़ावै किंत विद्याको छिपावै नहीं'१० वित्तदजो धनदेनेवालाहो ११ ये लक्षण जिनमें सब या आधे पर्दे भी हों ऐसे शिष्य तो अवश्यही धर्मके अनुसार पढ़ावने योग्यहें किंतु विद्यासवहीको देनीउचितहे परइनको तो अवश्यहीदेना यह भावहे २८॥ : दंडाजिनापवीतानिमेखलांचैवधारयेत् । ब्राह्मणेपुचरेद्रेक्ष्यमनियेप्वात्मवृत्तये २९ ॥ • अक्ष०-दंडअजिन उपवीत मेखला इनकोधारणकर और अनिंद्य ब्राह्मणोंमें अपनी वृत्तिकेलिये भिक्षाको याचरणकरे २० ॥ मिमि-दंड जोमनुस्मृति में तीनोंवर्णके ब्रह्मचारियों के लियेढाकेयादिकाष्ट के जुदे२ कहेहें-अजिनकहिये कृष्णमृगछाला आदि-उपवीत कहिये जनेऊ जो तीनोंव- का जुदा कपास आदिका कहाहे-मेखला जो मुंज आदिके बनायेहुये कहेहें ये ची- जातिलक्षण पहिचाननेके चिह्नहें तिनकोधारणकरे और शुद्धब्राह्मणोंके घरजाकर भिक्षा अपने आजीवनके लिये माँगै-ब्राह्मणके घरयह उपलक्षणमात्र है किंतु असं- 'भवता में द्विजातीमात्र तीनोंवर्णकी भिक्षालेनी २६ ॥ 1. अधिः-यह ऊपरले कईइलोकोंसे ब्रह्मचारीका प्रकरण वर्णनकररहेहैं सो यह ब्रह्म- चर्य जनेऊहोने पीछे वालापन सेही धारण कियाजाता है और इसका अभिप्राय के- वलविद्या संग्रहकरनाहै अर्थात् ब्रह्मचर्यके नियमोंसे शरीरकी रक्षा करताहुआ और संसारकी मर्याद शिष्टाचारी आदि सीखताहुआ विद्या संग्रहकरे तब पीछे दशवां संस्कार जो विवाहहै तिसकेहोनेका अधिकार उसकोहोता है इसलिये यह ब्रह्मचर्य का प्रकरण वर्णनकिये पीछे विवाहका प्रकरण कहेंगे-और ब्रह्मचर्य की धारणामें जो भिक्षावृत्तिलिखीहै सोकेवल निर्वाहकी रीतिहे अर्थात् भिक्षाका मांगना यहवात कुछ धर्म संबंधी नहींहै कि भिक्षामांगे विनाधर्म पूरानहीं होता किंतु भिक्षाका मांगना परम निदितहे-योर जो कि यहवात कहतेहैं कि ब्राह्मणका कर्महे सोयहभी कहनास्थाहै यहवात ऐसे मूर्ख कहतेहैं जिन्होंने शास्त्रनहींदेखा है क्योंकि शास्त्रमें ध्यान लगाकर देखोकि भिक्षा ब्रह्मचारीके लियेलिखीहे चौर ब्रह्मचारी ब्राह्मण, क्षत्रिय,वैश्य इनतीनों काही बालकहोताहे और तीनोंका भिक्षा मांगनेकी मर्यादं जुदीर इस उलोकमै और इससे नीचेके उलोकमें विशेप प्रत्यक्षकरके कहाहे सोदेखो-जो यहकर्म ब्राह्मणकी जा- तिकाहोता तो तीनोंकेलिये क्योंलिखते-अर्थात् ब्रह्मचारी होनायह उपलक्षण केवल विद्यार्थीकाहै चाहेवह किसीवर्णका विद्यार्थीहो-सोउस विद्यार्थीकाभी भिक्षामांगना कुछधर्मकी गिनती नहींहे कि भिक्षामागे बिना विद्यानहीं पढ़सक्ता अर्थात् यहवात पियोंने केवल इसनिर्वाह के लिये लिखीथी कि पहलेसमय में विद्याके पढ़ानेवाले ६ २२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय।' थोड़ेथे. और दूरदेशों में जानेपर मिलसक्तेथे और विद्यार्थीलोग अनेक वर्षांतक उनकेपास विदेशमें रहकर विद्या संग्रहकरतथे और ऐसेमाता पिता धनवान् कुछ सवही नहीं होतेहैं कि उनकेलिये वपोतक घरसे खर्च भेजाकरें योर घरके खर्च नमिलनेसे सहस्रोंलड़के विद्यापढ़नेसे रुकजाते केवलवेही लड़केथोडे बहुतपढ़ते कि जिनकोघरसे खर्च मिलसक्ता इसलिये धर्ममर्यादों के वक्ता मुनीश्वरोंने प्रजाका कल्याण विचारकर धर्मशास्त्रों में विद्यार्थीको भिक्षामांगनेकी मर्याद लिखदई क्योंकि लिखीहुई वातपरकोई निंदानहीं करसक्ता वरन उत्साह देसक्ताहे इसकारणसे विद्या- लोग मांगनेकीलज्जाको छोड़कर द्रव्यके नहोनेपर भिक्षारत्तिकी सहायतासे पढ- नानहीं छोड़ेंगे इसलिये भिक्षारत्तिको उनकाधर्म निश्चितकिया कि विद्याकी बढ़वारी बनीरहै-सोई विद्यार्थी के लिये अवतकभी वह परिपाटी बनरहीहै और विद्यार्थीको देने से पुण्यभी बड़ामारीहै किंतुऐसे विद्यार्थीकोदेना अधिकपण्यहै किजिसविद्याकेपढ़ने से पीछेवह विद्यार्थी उसविद्याकद्वारा सौपचासमनुष्योंका पालनकरसकै चाहेकोईविद्याहो और विद्यार्थीकादेना कुछइसकानामनहींहै किवहलोटालेकर जवदरवाजे आगेावै तबचुटकीभर आटादेदेना अर्थात् जैसीयोग्यताकाविद्यार्थीहो या जैसीयोग्यताअपनी होतसादेना औरवर्तमान समयकीरीतिके अनुसारदेनेमेधर्म और पुण्यभी अपरिमित होताहै अर्थात् चुटकीआदिका देनायेपहले समयकीरीतेधी अवइसकालमें विद्यार्थी भीऐसे २ प्रतिष्ठितहैं कि मांगनहींसक्ते परंतजोदेनेवाले हैं वे विनामांगेही सैकड़ों और हजारोंरुपया विद्याकेउपकारमेंदेते हैं किंतुदेनाकुछयहीनहीं है फिउसकेहाथमेंही देवैतव देनाकहावै अर्थात् देनेके अनेकप्रकारहें किंतुचा, विद्यार्थियोंको प्रसादकीरीति सेदेवै यामासिककीरीतिसेदेव यापस्तक और विद्याकेस्थान आदिकीरचनामें लगावै या पढ़ानेवालोंकी पालनाकरै अर्थात् कोईतरहका उपकारजोविद्यासे संबंधरखताहो वह विद्यार्थीकी भिक्षाकहलाती है-इससमय मे विद्यार्थियों के भिक्षासंबंधी उपकारों में जैसाकुछ उद्योग और द्रव्यका उठाना धर्मज्ञ सरकार अँगरेजी गवर्नमेंट और उसके शभचितकलोग करतेहैं सोयह सनातनधर्मकी परमप्रवेधिहै-परंतु शास्त्रोंके सिद्धांत में यहकहींनहींपायाजाता कि विद्यापढ़ने पीछेभीगृहस्थीधर्म धारणकरके भिक्षामांगे २६ भादिमध्यावसानेषुभवच्छब्दोपलक्षिता । ब्राह्मणक्षत्रियविशांभेक्ष्यचर्यायथाक्रमम् ३०॥ भक्षा- आदि में मध्यमें अंतमें (भवत्) शब्द से उपलक्षित करीहुई भैक्ष्यचर्या यथाक्रमसे ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्यकीहोती है ३० ॥ अभि०-यथाक्रमका यह अभिप्राय है कि जो ब्राह्मणकापुत्र ब्रह्मचारीहो और वह किसीकेघर भिक्षामाँगनेजायती (भवत्)शब्दकोयादिमेंहीलगावै अर्थात् इसप्रकारसे कहकि(भवतिभिक्षादेहि)इस(भवत्)शव्दको आदिमें जोड़नेसेसुननेवालीने भटसमुझ Au .

. m मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २३ लिया कि यहकोईब्राह्मणकावालकहै-ऐसही जोक्षत्रियकापुत्र ब्रह्मचारीहोतोमध्यमेल- गावै-जैसे (भिक्षांभवतिदेहि)इसयावाजकेसुननेसे जानागया यहकोईक्षत्रियकाबालक है-ऐसेही वैश्यकापुत्र ब्रह्मचारीहोतो अंतमेलगावै-जैसे (भिक्षादेहिभवति) इस्सेसुनने वालीस्त्रीने झट पहिचाना कि यहकोई वैश्यका बालकहै ३०॥ अधि०-२६ के श्लोकमें जोदंड अजिन उपवीत मेखला जुदेजुदेसवके जतलायेथे वे तौआँखोसे देखकर जातिपहिचाननेके चिह्नथे और इसश्लोकमें जो भवत्शब्द काभेदहै सोआँखोंसे बिनादेखेभी आवाजहीसुनिकर वर्णजातिका पहिचाननाहै३०॥ कृताग्निकार्यो जीतवाग्यतोगुनुज्ञया । अपोशनक्रियापूर्वसत्कृत्यानमकुत्सयन ३१॥ । मक्ष०-अग्निकार्य कियाहुया ब्रह्मचारी वाणीको रोकहुये गुरुकीअनुज्ञासे अपो- शन क्रियापूर्वक अन्नका सत्कारकरके उसकीनिन्दा नहींकरताहुआ भोजनकरै ३१ ॥ "अभि०-पूर्वोक्तविधिसे मिक्षालाकर उसेगुरुको दिखलौकर और आज्ञापानेपर अग्नि कार्य करचुकाहो ऐसा ब्रह्मचारी अन्नकी अपोशनक्रिया अर्थात् (अमृतोपस्तरण मसि) इत्यादि वेदऋचासे अन्नको सत्कार पूजादेकर उसकी निदाको न करताहुना भोजन करै ३१॥ -अधि०-गुरुका दिखलाना-कदाचित् गुरुकहींगयाहोतो गुरुकीस्त्री या पुत्रादिजो घरमें मुख्यहो उसेदिखलाकर और आज्ञालेकरभोजनकरै ३१॥ - ; ब्रह्मचर्येस्थितोनकमन्नमद्यादनापदि । ब्राह्मण काममश्नीयाच्छ्राद्धेव्रतमपीडयन् ३२॥ ।' अक्ष०-ब्रह्मचर्य में स्थितब्रह्मचारीविना आपत्कालके एक ग्रन्नको न भोजनकरै-वा- ह्मणचाहे श्राद्धमें व्रतकोपीडा नहींदेताहुया भोजनकरै ३२॥ भभि०-अर्थात् किसीएकअन्न इकल्लेकाभोजन न करें जैसे केवल चाँवलरोधखाये उनकेसाथको दालनोरघी मीठाकुछनहींहै-या चर्वण चावलिया इसकायह अभिप्राय है कि इसप्रकारसे ब्रह्मचर्यकी साधनामें भंगहोजाताहै क्योकि वैद्यकशास्त्रकेमतसे यह विरुद्धभोजन कहलाताहै अर्थात् इसदशामें रोगउत्पन्नहोजाताहे फिरउसमें ब्रह्मचर्य नहीवनसकता परन्तु जोकोई बिपत्तिकाल पानिपडैतो उसमें लाचारी है एकयन्नसे भी निर्वाहकरले-और जो ब्रह्मचारी ब्राह्मणहो इसकारणसे उसेकोई श्राद्धमे जिमा इसप्रतिज्ञासे कि में केवल मिठाईही या दूधही या सहतही अपनेपितरोकी तृप्तिहेतु जिमानाचाहताहूं और वहब्राह्मण ब्रह्मचारी अपनीप्रसन्नतासे एकहीअन्नजीमि प्रा. वैतौ कुछचित्तानहीं परन्तु अपनेव्रतको पीडानहीदेवै अर्थात् कोई ऐसा अन्ननहो जो ब्रह्मचारीको खानाउचित नहींहै-यहां अन्नशब्दकाअर्थ घृत,गुड़, मांस आदि जोकुछ खानेकी वस्तुहोतीहै उनसबका वाचकहे ३२॥ मधुमासांजनोच्छिष्टशुक्तस्वीप्राणिहिंसनम् । भास्करालोकनाइलीलपरिवादादिवर्जयेत् ३३ ॥ - २४ । मिताक्षरा स० आचाराध्याय। अक्ष.-मधुमांस,अंजन,उच्छिष्ट,शुक्त, स्त्री,प्राणिहिंसा,भास्करालोकन,अश्लीलप- रिवादनादि औरभी यहसव वर्जितकरें ३३॥ 'अभिः-मधुकहियेमदिरा और सहतभी-मांस-अंजनअर्थात् कज्जलादिसे आँखों और तैल सुगन्धादिसे गात्रकालेप-उच्छिष्ट कहिये जूठागुरुके सिवाय-शुक्तकहिये निठुरवचनौरमाड़ादिअन्नमेलकारसभी-स्त्रीकाभोग-प्राणिहिंसाकिंतुकिसीजीव कामारना-भास्करालोकन अर्थात्सूर्यकोउदयहोते और अस्तहोतेहुयेदेखना-अश्ली- लकहिये असत्यबोलना परिवादकहिये परायेगण अवगुणकाव्याख्यान और आदि शब्दसेवबातेंभी लेनीकिजो इसमेंनहींकही अन्य स्मृतियों में हास्यगंधमाल्य आदि बर्जित हैं इनसबका परित्याग रक्खे यह ब्रह्मचर्यके नियम, ३३ ॥ सगुरुयाक्रियाःहत्यावेदमस्मैप्रपच्छति। उपनीयददद्वेदमाचार्य-सउदाहृतः३४ ॥ अक्षा-जोगर्भाधानसे आदिलेकर जनेऊताईकी सवक्रियायेंकरके इसब्रह्मचारीको वेदपढ़ाताहै सोगुरुहे और जो केवल जनेऊमात्र कराकरवेदपढ़ाता है सो आचार्य कहलाताहै ३४॥ एकदेशमुपाध्यायऋत्विग्यज्ञरुदुच्यते । एतेमान्यायथापूर्वमेभ्योमातागरीयसी ३५ ॥ -- अक्ष-वेदकाएकदेशकहिये एकविभागजोपढ़ाता है सोउपाध्यायकहाता है जो यज्ञादिकर्मकराताहे वहऋत्विक्कहलाताहे यहचारोंजो३४१३५ के श्लोकमें कहेग- ये सोयथापूर्व मान्यहोते हैं अर्थात चौथे से तीसराअधिक-तीसरे से दूसराअधिक- दूसरेसे पहलासबसेबड़ाहै- और माताइनचारोंसेही अधिकपूज्यहोतीहै ३५॥ अवनीचब्रह्मचर्य्यवनाराखनेकीअवाधिकहतेहैं। प्रतिवेदंब्रह्मचर्यदादशाब्दानिपंचवा । ग्रहणान्तिकमित्येकेकेशान्तश्चैवपीडशे ३६ ॥ 7 अक्षवेदप्रतिबारह या पांचवर्षे ब्रह्मचर्यराखै-एकयहकहतेहैं कि ग्रहणकरसकने के अन्तताईराखे-औरकेशान्तसोलहवेंवर्षौकरै ३६॥ अभि-वेदप्रति अर्थात् एक २ वेदकेपढ़नेमेवारहर वर्षे अथवा जोइतनीसामर्थ्य नहो तो पांच २ वर्षे ब्रह्मचर्यसाधे- अर्थात् जो एकहीवेदपढ़े तौ बारहअथवा पांच- औरजोदोवेदपढ़ेतौ २४ अथवा १०जोतीनोंवेदपती ३६ अथवा १५ वर्षब्रह्मचर्य साधे-और कोई मुनीश्वर यह कहतेहैं कि बारह और पांचका नियम नहींहे ग्रहणां- तिक अर्थात् जबतक वेदकाग्रहण करसकै तभीतक ब्रह्मचर्य राखे-नीर केशांतकर्म जिसकानाम गोदानकर्म भी कहतह-गोदान कहनेका यह अर्थहै कि गो संज्ञावालोंकी भीहे.तिनकादान किंत कटवाना सोई केशांतका थर्थहै कि केशजोवालहें तिनका अंतहोना-सो इसकर्मको गर्भसे लेकर सोलहवें वर्षमें करैयह अवधिव्राह्मण ब्रह्मचा- रीकोहै क्योंकि नाठवेंवर्प मैं जनेऊभया उससेद्वनी वर्षामें केशांतहा यह केशांत मिताक्षरा साचाराध्याय । २५ कर्म ब्रह्मचर्यके वीचहीमें संभक्तिहै क्योंकि उसकी अवधिवहुत कहचुके इसकी थो- डीहै-ऐसेही क्षत्री और वैश्य ब्रह्मचारीकी अवधि अपने २ उपनयन से दूनीजानो- सोई मनजीने स्पष्टकरके कहदियाहै कि केशांत:पोडशेवब्राह्मणस्यविधीयते। राज- न्यबंधोविंशवैश्यस्यद्वयधिकततः) अर्थात् ब्राह्मणका केशांत सोलहवेंवर्पमें करिये है राजन्यबंधु का बाईसवेंमें वैश्यका चौवीसमें ३६ ॥ पापोडशादादाविंशाच्चतुर्विंशाच्चवरसरात् । ब्रह्मक्षत्रविशांकालभोपनायनिक परः ३७॥ अक्ष०-ब्राह्मण,क्षत्रिय,वैश्य इन्होंके उपनयन सम्बन्धीकालकी परमअवधिसोलह वाईस चौवीस वाँसे पहले रहै ३७॥ अभि०-अर्थात् आठ और ग्यारह और वारहकी अवधिजो उपनयनकी कहचुके हैवह परमउत्तम है परन्तु जब किसीकारणसे उस अवधि पर न होसका तो केशांत कीकहीहुई अवधिके भीतरभीतर मध्यमकाल और भीहै तिसमेंहोना चाहिये अर्था- त् इससे आगे नहीं ३७॥ अतऊर्दूपततेतेसर्वधर्मबहिष्ठताः । सावित्रीपतितावात्यावात्यस्तोमाइतेकतो. ३८॥ . . अक्ष०-इस्से उपरांत येतीनों व्रात्यस्तोमक्रतुके विना पतित होजाते हैं सब धी से बाहर गिनेजाते, सावित्रीसेभी पतित और व्रात्यकहलातेहैं ३८॥ , अभिल-किंतु ऊपरकहाहुआ उपनयनका मध्यमकालभी जवउल्लंघजाताहै तब ये तीनों द्विजाती पतितहोतेहैं और सर्वधांसे बाहर अकिसीधर्म संबंधीकर्मके श्र- धिकारी नहीं रहते और सावित्रीपतित अर्थात् गायत्रीकी मंत्रदीक्षा देनेयोग्य नहीं रहते और व्रात्यकहिये संस्कारहीन गिनेजाते हैं किन्तु केशांतकी अवधि पीछे उप- नयनकरने परभी असंस्कृतदोप लगताहै परन्तु ब्रात्यस्तोमवतुके विना-अर्थात् ला- चारीअवस्थामें जो केशांत अवधिकेपीछेही उपनयनकरनापडै तीव्रात्यस्तोमनामयज्ञ करके फिरउपनयन करतो धर्मकर्मीके अधिकारी बनेरहतेहैं ३८॥ अवनीचेद्विजाती शब्दका अर्थ कहतेहैं। मातुर्यदयेजायंतेद्वितीयमोंजिबंधनात् । ब्राह्मणक्षत्रियविशस्तस्मादतद्विजास्स्मृता. ३९॥ अक्ष०-जिसकारण ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य येतीनों पहले तो मातासेजन्मलेतेहैं फिर दूसरा जन्म उनका मौजीबंधनकर्म से कहाता है इसलिये ये तीनो द्विज अर्थात् द्वि- जन्मा कहलातेहै क्योंकि इनका जन्म दोवार भया ३६ ॥ यज्ञानांतपसांचैवशुभानांचैवकर्मणाम् । वेदएवद्विजानीनानिश्श्रेयसकर परः ४० ॥ प्रक्ष-द्विजातियोको यज्ञोका औरतपोका और शुभकर्मों काभी परम कल्याणकर- नेवालावेदही हे ४०॥ अभि-ौतकहिये वेदोक्त और स्मार्त्त कहिये धर्मशास्त्रोक्त ये दो प्रकारके यज्ञ ... ७ २६ मिताक्षरा साचाराध्याय । होतेहैं तिनका और तपजो चांद्रायणादिशरीरसे कियेजातेहैं और शुभकर्मजो उप- नयनादि संस्कार होतेहैं इन सबका परम कल्याणकारी द्विजातियोंकेलिये निस्संदे- ह वेदहे- वेदके उपलक्षणसे धर्मशास्त्रभी समुझना क्योंकिधर्मशास्त्रकी मलवेदहै और श्रुतिस्मृतिका स्वाभाविक जोड़ामनुसंहितामें कहाहे इसीहतसे इस४० के श्लोक में श्रौत और स्मार्त दोनोंभांतिके यज्ञोंका वहुवचनहे इसलिये द्विजातियोंको श्रुति और स्मृतिकहिये धर्मशास्त्र ये दोनों अवश्यपढ़ने चाहिये क्योंकि पूर्वोक्त सब यज्ञादिक इन्हींदोनोंसे जानेजाते, ४०॥ सोईनीचे उसकापाठकरनेका माहात्म्य और फल आठ श्लोकोंसे कहते हैं । मधुनापयसाचैवसदेवांस्तर्पयेहिनः। पितृन्मधुघृताभ्यांचऋचोऽधीतेचयोऽन्वहम् ४१ ॥ अक्ष-जो द्विजाती ब्रह्मचारी या गृहस्थी होकर प्रतिदिन ऋग्वेदोंका पाठकरै तो बहु देवताओंको सहत और दूधसे तृप्तकरै-और पितरोंको भी सहत और घृतसेतृप्त करै-अर्थात् केवल पाठमात्रके करनेसेही यह फल मिले जो सहतदूध-या सहत घृत से संतृप्तकरनेवालेको मिलता है ४१॥ यपिशक्तितोऽधीतेयोऽन्वहंसघृतामृतैः । प्राणातिदेवानाज्येनमधुनाचपितस्तथा १२ ॥ अक्ष-जो कोई यजुर्वेदोंका पाठ शक्तिके अनुरूप प्रतिदिन करताहै वहघृत पोर अमृतों से किंतु अतिस्वादुवाली वस्तुओंसे देवताओंको-और तैसेही पितरोंको भी सहत और अतिस्वादुवस्तुओं से प्रसन्नकरै ४२॥ सतुसोमघृतैर्देवांस्तर्पयेद्योऽन्वहंपटेत् । सामानितृप्तिकर्याचपितॄणांमधसर्पिपा ४३ ।। मक्ष-जो कोई सामवेदोंका दिनप्रति पाठकर सोभी अमृत और घृतोंसे देवता- ओंको संतर्पितकरे-और पितरोंकी भी तृप्ति सहत और घृतसे करै ४३ ॥ भभि.-ऊपरलेतीन श्लोकोंमें जो वेदका वहुवचन अर्थात् ऋग्वेदों यजुर्वेदों सा- मवेदों ऐसा लिखाहै उसका यह अभिप्राय है कि वेद एकहै परंतु रोजरोज समस्तका पाठ होसकना असंभवहे इसलिये उसके अंगभेदोंका बहुवचन कहाहै ४३ ॥ मैदसातर्पयेदेवानथयोंगिरस-पठन् । पितृवमधुसर्पिभ्यामन्वहंशक्तितोदिजः ४४ ॥ पक्ष-द्विजाती दिनप्रति अपनी शक्तिके समान अथर्वागिरसका पाठकरताहुया देवताओंको मेदासे और पितरोंको सहत घीसे संतर्पितकरताहै ४४॥ अभि०-अपनी शक्तिके अनुसार यह ऊपरले चारों उलोकमें समुझना अर्थात् जितना पाठ मनुप्य से होसके अपने छुटकारे के अवकाश में और मेदा जो मनुप्य या अन्यबड़े जीवों के मांस और हड्डी इनदोनों के विचारे में घृतके तुल्य तप एक प्रकारकी धातुहोती है और शरीरकी सातधातामसे चौथी धातु कहाती है जिसको वमा भी कहते हैं और अभक्ष्यकी शङ्का नहीं करनी क्योंकि प्रथम तो समर्थकोदोप -- मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २७ नहीं यहवाक्य मनुष्यपरंभी संभवितहै फिर देवतातो अग्निमुखहें अन्यथा(जीवो जीवस्यभोजनमिति ) श्रीमद्भागवतेपि (अहस्ताश्चसहस्तानामित्याद्यपितत्रैव ) अर्थात्जो मांसग्राह्यहै तो वसाभीग्राह्यहै और जहां मांसत्याज्य है तहाँ वसाकाभी त्यागहै (किञ्च वारुण्यादिभिरिंद्रादिदेवाभोगिनःप्रसिद्धाः) ४४॥ वाकोवाक्यपुराणंचनाराशंसीश्चगाधिकाः। इतिहासांस्तथाविद्या शत्याधीतहियोऽन्वहम्४५॥ मांसक्षीरोदनमधुतर्पणंसदिवौकसाम् । करोतिवृप्तिकुयीञ्चपितृणांमधुसार्पपा ४६ ॥ अक्ष०-वाकोवाक्य १ पुराण २ नाराशंसी ३ गाथिक इतिहास ५ तैसेही विद्याओं को जो कोई प्रतिदिन शक्तिअनुसारपढ़ताहै ४५ वहमनुप्यमानो-मांस,दूध,भात, सह- त इनसे देवताओंकीप्तिकरताहै-और पितरोंकीभीप्ति सहतघीसेकरै है ४६ ॥ भभिः-बाकोवाक्यनामकहिये स्मृतियादि धर्मशास्त्र १ और पुराण जिनमें पुराने वृत्तांत होतेहैं २ नाराशंसीसे रुद्रदैवतमंत्र-और गाथिक शब्दसे इंद्रगाथा यज्ञगाथा आदि टीकाकारोंने कल्पितकियेहैं परन्तु रुद्रदैवत्य और इंद्रगाथाआदि ये सववेदके- ही अंशांशहें और वेदोंकोपहलेही कहचुके तो दूसरीबारकहना असंभवितहै क्योंकि वहपाठकरनेका प्रकारक्रमसे नीचेकोउतरताचलाआताहै इसलिये याज्ञवल्क्यमुनिका कथनसंसारपक्षमें घटता निश्चितहोताहै-इसकारण से नाराशंसी शब्दका अर्थनर सम्बन्धी आशंसाकहिये स्तुति अर्थात् जिनग्रंथों में राजाआदिसत्पुरुपोंके याचरण वृत्तांतलिखे होतेहैं उनकापाठ किंतुविचारना क्योंकि वेभी ईश्वरकीविभूति गीतामें कहेहैं उनके आचरणटत्तांतोंके विचारनेसेमनुप्यकी बुद्धिशुद्धहोजाती है और वैसेही आचरणकरनेका उत्साहबढ़ाने में निपुण होजाताहै ३ चौथेगाथिकशब्दसे गानविद्या का अभ्यास क्योंकि यहगांधर्वीविद्याभी ईश्वरकी विभूतिभागवतमें निश्चितहै ४ इति- हासमहाभारत आदि प्रसिद्धहें ५ तैसेही विद्याशब्द से चौदह विद्यायेंजो जलविद्या आदि प्रसिद्ध ६-इनसारीचीजों से जिसकिसी वरतको अपनीशक्तिके समान जो कोई प्रतिदिनपढ़ता और विचारताहै४५ वहछिआलीस४६के श्लोकमें कहेहुयेफल का भागीवनताहै ४६॥ तेतृप्तास्तर्पयंत्येनं सर्वकामफल्लै शुभैः । ययंक्रतुमधीतेऽसौतस्यतस्यामुयारफलम् १७ ॥ अक्ष०-चेपूर्वोक्त देवता और पितरभी संतर्पितहुयेभये इसपाठक को सारे शुभ कामोसे तृप्तकरतेहैं-जिस२ यज्ञका पाठयहकरताहे उसी उसकाफलपाताहै-अर्थात्वेद मेंसे जिसयज्ञकी विधिकापाठ करै तौ उसीयज्ञके करनेभरेका पूराफल पावै ४७॥ अभि.-सर्व शुभकामोसे तृप्तकरनेका यह अभिप्रायहै कि जिन २ शुभकामों की विधिका विचारवेदमेसे अथवा पूर्वोक्त किसीशास्त्रमेसे नित्यकरतारहेगा तो अवश्य- ही नित्यकेश्राराधन प्रभावसेकोईशुभकाम उस्से वनियावैगा-शुभकाम अर्थात् अपने २८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। यासंसारककल्याणकाकरनेवाला अच्छाकाम जिस्सेमनुष्यकी सुकीर्तिबढ़तीहै-सोईपि- छले अहामें प्रत्यक्षकहदियाहै कि जिस २ ऋतुकापाठ किंतु आराधना करैगा उसी का फलपावेगा-यहां ऋतुशब्दका अर्थकेवलयज्ञहीनहीहैकिंतु क्रतुकामनाको मनकेसं कल्पको और काम या कार्यकोमीकहतेहें तौयहांकतुकेअर्थसे वहसभीकामअपेक्षित जोवेदके सिवाय और सवशास्त्रया विद्याओंके ग्रंथों में उनकामोंके प्रकारलिखे होते हैं इसीलिये याज्ञवल्क्यजीने वेदकोआदिलेकर संसारके सभीशास्त्र और सभीविद्याओं का विचार करनेमें उत्साह देकर पीछेसे यह कहाहै कि जिस २ऋतुकाआराधनकरै- गा उसीउसका फलपावैगा-सोई इसवातको जो कोई समुझाचाहौवह ४१ से लेकर ४८ कश्लोकोंताई पाठश्लोकोंको देखलो ४७॥ त्रिर्वितपूर्णष्टथिवीदानस्यफलमश्नुते । तपसोयत्परस्येहनित्यस्वाध्यायवाहिजः ४८॥ पक्ष-नित्यस्वाध्यायवान् द्विजातीधनसे भरीहुई एथिवीको तीनवार दानकरनेका फल और परमतपस्याकरनेकाभी फल इसीसंसारमें भोगताहे ४८॥ भभि०-किंतुदान चा तपकरनेबिनाही उतनाफल पाताहे यहनित्यस्वाध्यायकरने का उत्साहबदानकी प्रोत्साहताहै-यहांस्वाध्यायका अर्थकेवल वेदहीका नहीहै अर्थात् स्वकहिये अपनाअध्याय किंतु अपनापाठजो द्विजातीकी तीनोंजातोंका पढ़नाअपनी अपनीजाति वा कर्म या पेशाकंनुरूप उचितहो-अर्थात् जोपूर्वोक्तवेद आदिपाठौके करनेमें समर्थनहोतो केवलअपनाजाति या कर्मजीविका संबंधीपाठको अवश्यकरके नित्यकरतारहैतो वहभी दानतपके तुल्यफल भागीहोताहै ४८॥ अधिः-विदितहोवेकि १४ केश्लोकसे लेकरयहांताई यहसवप्रकरण ब्रह्मचारीके धीमध्येकहाहे और ब्रह्मचारीका उपलक्षण केवलविद्यार्थीमं घटताहै क्योंकियहब्रह्म चर्यकेवल विद्याग्रहणकरनेताई होताहै फिरपीछे विवाहकरके गृहस्थीहोना कहाहेइस कारणसे यहपूर्वोक्त लक्षणतोसामान्य ब्रह्मचारीके जानो-और दूसराब्रह्मचर्य वहकह- लाताहै कि जोकोई विवाहकरके गृहस्थीनहींवने अर्थात् इसीब्रह्मचर्यको निरंतर अ- पनीजीवन अवधि ताई वनारखे सोवह नैष्टिक ब्रह्मचारी कहलाताहे उसकी मर्याद नीचके उलोकमें कहते ४८॥ नैष्टिकोब्रह्मचारीतुवसेदाचार्यसन्निधौ । तदभावेऽस्यतनयेपन्यांवैदवानरेपिवा ४९ ॥ अक्ष०-नैष्टिक ब्रह्मचारीती प्राचार्य केसमीप वासकर उसके न होनेमें उसकेपुत्रके समीप या पत्नीके समीप अथवा अग्निके समीप ४६॥ अभिल-किंतु पूर्वोक्तरीतोब्रह्मचर्यको साधताहुया विद्यापढ़ेपीछे जो विवाहकर- ना नहींचाहे नष्टिकहोनाचाहे तोवहनपने प्राचार्यहीकेनिकट वासकरतारहै प्राचार्य .. M मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २६ के अभावमें उसकेपुत्रके निकट औरपुत्रकेभी, अभावमें गुरुपत्नीकेनिकट ओरगुरुपत्नी केभी न होने में अग्निका सेवनकरै ४६॥ अननविधिनादेहंसाधयनविजितेंद्रियः । ब्रह्मलोकमवाप्नोतिनचेइजायतेपुनः,५० ॥ अक्ष-इसकहीहुई विधिसे वह नैष्ठिक ब्रह्मचारी इंद्रियोंकोजीतहुये और देहको साधताहुआ जोनाचार्यआदिके समीप वसकर जीवनअवधिके कालकोविताताहे सो वह ब्रह्मलोकको पावताहै और फेर कदाचित्भी यहांजन्म नहींपाताहे ५०॥ व्यक्तिः०-अब इसकलियुगसंबंधीसमयमें ब्रह्मचर्यकीमर्यादा भस्माग्निवत् होगई है किन्तजैसेराखमें अग्निदवारहतीहै इसप्रकार केवलग्रंथों में दवीपड़ीहै अर्थात्दोनों प्रकारोंमेसे एकप्रकारकाभी ब्रह्मचर्य अब कोईनहीं करसक्ता केवलनाममात्र शेपहे परंतु पूर्वोक्त बृह्मचर्यका अनुकल्पमात्र केवल एकदोघटिकामेही जनेऊ के दिवस करलेतेहैं कि जिसकी अवधि १२ और २४ और ३६ अथवा ५ और १० और १५ वांकीकहीहै-किंतु जो यथार्थदृष्टिसे, विचारकरके देखौतौ हमारीवुद्धिसे यही निश्चितहातोहै कि ३६ के श्लोक में जिनएकप्रकारके ऋपियोंने ब्रह्मचर्यकी अवधि को विद्याकेग्रहणांतिकसमयतक निश्चितकिया है। वे लोगबड़े, दूरदर्शीथे ( इति ब्रह्मचारिप्रकरणम् ) अब आगेबिवाहका प्रकरण वर्णनकरते हैं। वह विवाह दशयां संस्कार कहलाता है। गुरवेतुवरंदत्त्वास्नापीततदनुज्ञया । वेदव्रतानिवापारंनीत्वा भयमेवया ५१॥ मक्ष०-वेदको या व्रतोंको वा दोनोंको पारपाकर पुनि गुरुको वरदेकर उसकी श्रा- ज्ञासेस्नानभी करै ५१॥ अभि०-जोकोई ४९ । ५० इनदोउलोकोंकी मर्यादाअनुसार(नकिट) होनानहींचाहे किंतुब्रह्मचर्यका विसर्जन करिके बिवाहकरनेकी इच्छाकरेती पूर्वोक्त रीतोसे वेदको पद कर या ब्रह्मचारीके नियमोंकोही पारउतरकर या दोनोंमें सिद्धार्थहोकर अपने गुरुको चरकहिये निजइच्छाके अनुसार कुछधन देकर और उसकी आज्ञालेकर स्नान अर्थात् ब्रह्मचर्यके विसर्जनका जो स्नान कहलाताहे उसकोविधि सहितकरे ५१॥ अधि०-वेदको या नियमोको या दोनोंको यह कहनेसे प्रकट होताहे कि जिस्से नि. यम नहीं साधेजायँ वह केवल वेदहीको पढ़े या जिसकी बुद्धि और समुझ मंदहोंने से वेदपढ़ने में सिद्धार्थ न होसक्तीहो वह केवल नियमोंकाही साधनकरै अथवा उच्च- प्रारब्धीहो वह दोनों बातमें सिद्धार्थता पैदाकिये पीछे गुरुके परिश्रम और साफल्य सम्बन्धी दक्षिणादे और स्नानकीआज्ञामांगे-और जिसे दक्षिणा देनेकी सामर्थ्य नहीं हो वह बिना दियेभी उसकी आज्ञालेकर स्नानकरै और पीछे जबकभी अपने को शक्तिहो तब उद्धार करदे-ओर वेद शब्दसे केवल वेदहीका पढ़ना सम्भवित नहीं है " . -- ८ - ३० मिताक्षरा स० अाचाराध्याय।। अर्थात् वेदके संज्ञोपलक्षणमात्र से सारी विद्याओंका पढ़ना संभवित है किंतु संसार की कोईसी विद्यापढ़े वह वेदही कहलाताहै क्योंकि घेदसंज्ञा ज्ञानमात्रकी होती है किंतु जिसकिसी विद्यासे कुछ जानाजाय वही वेदहै ५१ ॥ अविधुतब्रह्मचयोंलक्षण्यास्त्रियमुहहेत् । अनन्यपूर्विकांकांतामसपिंदायवीयसीम् ५४॥ अक्ष-अविप्लुत ब्रह्मचारी लक्षणी स्त्रीको विवाहै अनन्य पूर्विकाको कांताको अस- पिंडाको यवीयसीको ५२॥ अभि०-ब्रह्मचर्यका मुख्यअर्थाश केवल वीर्यकी रक्षामात्रमेंघटताहै इसलिये अवि- प्नुत कहिये अस्खलित ब्रह्मचर्य अर्थात् जिसने अपनेवीर्यका विध्वंसनहोने दियाहो 'ऐसाब्रह्मचारी स्नानकपीन्द्रऐसीस्त्रीकोविवाहैजो लक्षणवालीहो तहाँलक्षणभी दोप्रकार केहोतेहैं किंत एकतौ वाहरले दूसरेभीतरले तिनमेवाहरलेजो मनुसंहितामें कहें कि खीकेरोमाकेश दाँतमादिसूक्ष्महों किंतु मोटेवालमोटेलोम बड़ेदाँतनहीं-और भीतरले लक्षणोंकी परीक्षा यद्यपि आश्वलायनजानेकही है परंतु उसका लिखना,अब समयके अनुरूपकुछ आवश्यक नहींहै क्योंकि वे मर्यादें अवनष्टाग्निवत् होगईहैं-पनि अनन्य- पूर्विकाहो अर्थात् सगाई आदि दानकरनेसे या उपभोगसे किसीदूसरे पुरुपके परिग्रह वाली नहोचुकीहो।और कांताकहिये कमनीयाहो जो विवाहनेवालेके मन औरनेत्रोंको कामनाके अनुसार आनंद देनेवाली ऐसीसुंदरहो क्योंकि आपस्तम्ब ऋपिनेभा निज शास्त्र में कहा कि जिस विवाहिता स्त्री पतिकामन और नेत्र विंधेरहतेहैंउसमें ऋद्धि सिदिभी भरीरहती हैं-असपिंडा कहिये अपनी सपिंडानहोसपिंडा और असपिंडाका विस्तारार्थनीचे अधिकोक्तिमें देखो-यवीयसी कहिये-छोटीसी अर्थात्अपनेसे अवस्था और डील डोलमें भी थोडीहो-और स्त्री हो अर्थात् नपंसकी नहीं क्योंकि नपुंसक पुरुप जैसेहोताहे तेसेही विरली स्त्री भी नपुंसकी होतीहै सो नहीं इसलिये पहलेसेही किसीयुक्तिसे भेद लेलेचे ५२॥ अधि०-यहाँपर सपिंडताका स्वरूप वर्णनकरतेहैं कि क्या वस्तुहै और कैसे जानी जाती इसलिये कि इसका आगे भी बहुधा काम आवेगा-तहाँ पिंडकहतेहैं गाव अ. थीत् देहको और पिंड शब्दसे पहले जो (स) लगिरहाहे सो वह सकार एकताको प्रतीतकरताहे अर्थात् सपिंडकहिये एकहीसा शरीर जिनकाहो उन्हें सपिंड या सा- पिंख्यकहतेहैं (दृष्टात ) जैसे पुत्रकी सपिंडता पिताके साथ क्योकि पुत्र भी पिताकेही देह से निकलाहे इस्से इनदोनोंका देह एकहीसा जानौ कुछ अन्तर नहीं-ऐसेहीपि- ताके शरीरकी सपिंडता कहिये एकता उसके पितासे मिलरही है तो इस हेतुसे पोता की सपिंडता दादेसेभी निश्चित हुई ऐमेही परदादासे भी इसीप्रकार सहस्रों पीढ़ी ताई ऊपर.और नीचेकोभी सपिंडता हुया करती है- परन्तु विवाहादि व्यवहारोंके 1 मिताक्षरा साचाराध्याय। ३१ वर्तावामें केवल सातही पीढ़ी ताई मानीजाती है और सातपीढ़ीके उपरान्त उसी कुलके मनुष्य केवल गोत्री कहलाते हैं क्योंकि सपिंडता तो निरत्त होगई परन्तु गो- वही बनारहैगा- ऐसेही उस पुत्रकी सपिंडतो मातासेभी होती है क्योंकि माताकेभी उदरमेंसे जन्माहै और माताकी सपिंडता उसके नानासे होतीहे क्योंकि वहभी अपने पिताके शरीरमेंसे निकलीहै तो इस हेतुसे धेवताकी सपिंडता नानासेभी निश्चितहुई इसीप्रकार परनाना आदिसेभी ऊपर और नीचेकोभी माता पक्षकी सपिंडता कहलाती है परन्तु विवाहादि व्यवहारोंके वर्तावामें केवल पांचही शाखतक मानीजातीहैपाँचके पीछेवेभी नानाके गोत्री या माता कुलके गोत्र कहलाते हैं सोयह पाँचपीढ़ी माताको आदि लेकर गिनीजाती हैं जैसे माता १ नानार परनाना३ इत्यादि औरंभी जानो-ऐसे- ही संतानभेदकी सपिंडताभी होतीहै अर्थात् अपनेपिताकेभाइयोंसे और पिताकीबह- नौसेभीसपिंडता कहीजातीहै क्योंकि जिसदादाके शरीरमेंसे अपना पिता निकलांउसी के देहमेंसेचचा और फूभाभी पैदाहुईहै इसहेतुसे जैसे अपने आत्माकीसपिंडतापिता केसाथमानीगईथी तैसेही चचा और फूमासेभी अपनेआत्माकी सपिंडता निश्चित हुई-इसीप्रकार माताके कुलमेंभी संतानभेदसेमामा और मौसीसे भी अपने आत्माकी सपिंडता माताकेही तुल्यनिश्चितहुई ॥अभीतक सपिंडताकाप्रयोजनसिद्धनहींभया क्योंकि ऊपरजो वर्णन कियाउसमें केवल शरीरोंके संबंधमात्र जानेगयेउन्हीं संबंधोमेसे मुख्यसपिंडता उसेसमुझौ कि जिनसनुप्योंकेजन्मकाप्रारंभ एकसाथहुआहोऔर एक साथकहनेका यह अभिप्राय नहींहै कि एफघड़ी या एकदिन या एकमास या एकवर्ष में जन्महुआहो-अर्थात् यह सिद्धातहै कि तुल्य पीढ़ीके मनुष्योंसे जन्म जिनकाहुआ हो वे सापिंड्य ठीकहें फिर चाहे उनकी अवस्थामें दश वीसवोकी छुटाई बडाई भी हो परंतु चे तेल्य साप्तिब्यकहाते हैं (दृष्टांत) जैसे एकपुरुपकी दश संतान हुई वे दशों भाई बहनें परस्पर तुल्यसापिंड्यहें फिर उनदशोंके जदीज़दी संतानें पैदाहुई तो जैसे एकपिताकी संतानोंमें सपिंडता हुईथी तैसेहीउनचचेरे और ममेरे या फुफेरेभाईबहनों में परस्पर सपिडता सगेकेहीतल्यमानीजायगी-फिर उनसतानोंकी संतानें जो होवेंगी उनमें यद्यपि दो पीढ़ीका अंतर पड़गया परंतु सपिंडता सगोंकेही तुल्य परस्परकही जायगी-इसी हिसाबसे नाना और दादाकी संतानों में परस्पर तुल्यताहै-मामा और फूमाकी संतानोमें परस्पर भाई वहनके नातेसेतुल्यताहै-मौसी और चचा संतानों मैं भाई बहन के नाते से 'तुल्यताहै-फिर उन संतानों की संतानें जो होंगी उनकी भी परस्पर तुल्यताहै इसीको तुल्य सपिंडताकहतेहैं इससपिंडतामें विवाहका संबंधहोना अनुचितहै-इसीलिये ऊपर श्लोक और उसके अर्थ में कहाथा कि असपिडाहो- और इसीहेतुसे पतिके साथ पत्नीकी भी सपिंडताहोतीहै क्योंकि उन दोनोंका भी + ३२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। जन्म एकसाथ प्रारम्भ होताहै अर्थात् कन्याका पिता और बरका पिता यह दोनों संबंधी तुल्यं पुरुपकहातो, यद्यपि वे भिन्न भिन्न कुलों के दोनों पुरुप हैं और चाहें उनदोनोंकी अवस्था में छुटाई बड़ाई भी दशा वीसवर्षकीहो परंतु वे तुल्यअवस्था के गिनेजाते हैं-इसीहेतुसे भाइयोंकी भार्यानोंसे भी देवर और जेठकी सपिडता गिनी जाती है क्योंकि वेभी तुल्यपढ़िीके मनुप्योंसे पैदाहुईहैं-इसीहेतुसे भावज और ननँद की भी सपिंडता गिनीजाती है क्योंकि उनके भी जन्मकीतुल्यता एकसी पाईजातीहै- ऐसेही जहां२ जिसके जन्मकी तुल्यतापाई जोवे उसके साथ उसकी सपिडता गिनी- जायगी सो यहसपिंडता सातपीढ़ीकेअंतरताई पिताकेवंशमें और पाँचपीढीके अंतर ताई माताके वंशमें जहांतक पाईजाय तहाँ विवाहके संबंध का निषेधहै क्योंकि यह मनुष्यका शरीर (गर्भापनिपत्) के प्रमाणसे (पाट्कौशिक) कहाताहै अर्थात् छःप्रकार की मींग इसके भीतर होती हैं किन्तु तीन तौ पितासे और तीनमातासे अर्थात् हा- ६१ और नसोंकेबंधान २ और मज्जा ३ ये तीनवस्तु पिताकेवीर्यसे-त्वचा १ मांस २ रुधिर ३ यह तीन माता के रक्तसे बनती हैं तव शरीर उत्पन्न होताहै-इसी कारणसे पिता और माता दोनोंके वंशभरमें सारेमनुप्योंके शरीर संबंध मिले रहते हैं (सन्देह) बड़े आश्चर्यकी बात है कि इसरीतिसे तो सारे संसारमें एक जाति मात्रके मनुष्यों का शरीर संबंध मिलाहुआ होसक्ताहै फिर विवाह किसघरमेंकरें (उत्तर) इसीलिये उसकी अवधि सात और पाँच पीढ़ीकी नियतकरदीगईहै ५२॥ मरोगिणीभ्रातृमतीमतमानापंगोत्रजाम् । पंचमारसप्तमादू_मातृत पितृतस्तथा ५३॥ भक्ष०-अरोगिणीको भ्रातावालीको और पांचसातसे पीछेभीअसमानार्पगोत्रजा कोमातासे तथा पितासेयादि लेकर ५३॥ अभि०-अरोगिणी अर्थात् उसकेशरीरमें कोई ऐसारोग नहो जिसकी असाध्यता से वेद्यसेभी उपाय न होसकै किन्तु साध्यरोगकाहोना कुछ अवगुणमें गिनतीनहीं है भाईबालीभीहो क्योंकि न जानिये पीछे उसका अपनी पुत्रीका पहलाफल गोदलेनेके लिये माँगनेलगे तो धर्मके अनुसार उसको नाहींनहीकरनीपड़ेगी और दूसरामुख्य सिद्धांतयहीहै कि जोउसके भाईहोगातौवंशकी स्थितिबनीरहेगी और बंशकेवनेरहने से अपने को वनेविगड़े समयपर प्रत्येक भाँतिकी सहायता पनीरहेगी-तैसेही वरकी माताको प्रादिलेकर नानाकी पाँचपीढ़ियोंके उपरांत और पितासेलेकर सातकेउप- रांतभी अर्थात् सपिंडताके निवृत्त होजानेपर भी असमानार्पगोत्रजाहो किन्तु जहां स्त्री के पिता कुलका(मा)ओर गोत्र ये दोनोंवरके समतुल्यनहीं ऐसेघरमें पेदाईहो तिसे विवाहे ५३॥ मधिः-संदेहभला जब (पाप)कहिये ऋपिप्रवर और गोत्र जिस्से वंशकी प्रसिद्धि - मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय।। जानीजातीहै इनदोनोंकाभानिपेधकरदिया तवसपिंडता जो पूर्वश्लोकमें कहीथी उसके कहनेका क्या प्रयोजनथा(समाधान)शास्त्रकेसंमतसे सपिंडतातौ शूद्रजातिको भी वचा- नी चाहियेइसलिये उसको साधारण भावसे पहले ५२के श्लोक में कहकर-पीछे इस ५३ केश्लोकमें त्रैवर्णिक जातोंका विशेष दिखलाया कि उन द्विजातियोंको प्रवर-और गोत्रभी बचानाचाहिये-यद्यपि क्षत्रिय औरवैश्यके गोत्र और प्रवरोंकाअभावकहीं हो तहां उनके पुरोहितके गोत्र और प्रवरमानेजाते हैं यह आश्वलायन ऋषिकासम्मत है- और जहां कहीं अज्ञातभाव के धोखे से ऐसा होजाय तहां उसका प्रायश्चित्त भी यह कहाहै कि(मातुलस्य सुतामूदा मालगोत्रांतथैवच ॥ समानप्रवरांचैव कृत्वाचा- द्रायणंचरेत् अर्थात् धोखेसे मामाकी बेटीको विवाहिलेवैया माताके गोत्रभरकी कन्या विवाहिलेवै तौ चांद्रायणका प्रायश्चित्त करैतवनदोपहोवै और अरोगिणीके उपल- क्षणसे कन्याके शरीर भरमें कोई साभी अंग भंगनहो किंतु लूली लुंजी अंधी कानी आदि न हो और कोई अंग अधिकभी नहो जैसे पडंगुली आदिौरभी जानो-हाँ-जो घरके देहमें कुछ अंग भंगहो या कुछ अधिकांग हो तो कन्याकी भी अंगभंगता या अंगाधिक्य अंगीकारकरनाचाहिये अर्थात् परस्परदोनोंका एकसाजोड़ायुग्ममिलाना धर्ममर्यादाके अनुसार संसूचितहै सो इसकाविशेषभाव आगे५५के श्लोकोभीकहेंगे कि जिस्से पीछे कोईसा उत्पात न उठनेपावे क्योंकि उत्पातों के उठनेसे धर्मकी हानि होतीहै और धर्मकीहानिसे मनुष्यों के कल्याणोंकाविनाशहोजाताहै कल्याणोंकेविनाश में कुलका नाश होजाताहै इससे इसपर विचार दृष्टि बनीराखनी श्रेयस्करी है ५३॥ दशपुरुपविख्याताच्छ्रोत्रियाणांमहाकुलात् । स्फीतादपिनसंचारिरोगदोपसमन्वितात् ५४ ॥ अक्ष० -दशपुरुपोंसे विख्यात श्रोत्रियोंके महाकुलसे कन्यालेनी चाहिये- परन्तु संचारीरोग और दोपोंसे समन्वित ऐसे स्फीत कुलसेभी न लेवै ५४॥ अभि०- दशपुरुषोंसे विख्यात अर्थात् जिस कन्याके पिताकी पांचपीढ़ी पिछली प्रसिद्धहों और कन्याकी माताकीभी पांचपीढ़ी नाना के वंशमें नामीहों-और कन्याके पिताका वंश श्रोत्रिय अर्थात् वेद आदि विद्याओं से पांडित्य वालाहो-और महाकुल का यह अर्थ है कि पुत्र पौत्र आदि कुटुंब तथा पशु दास दासी धन ग्राम आदि समू- दिसे सम्पन्नहो तिसकुलकी कन्या ग्रहणकरै-परन्तु ऐसे सम्पन्न कुल में भी जो कदा- चित् कुष्ठ आदि या मृगी आदि रोग जो एक दोके होनेसे घरभरके मनुप्यों के होजा. ते हैं तिनकी बहुताइत हो-या दोप जो पिता के वीर्य और माताके रक्त द्वारा संतानोंके भी होजाते हैं तिनकी बहुताइतहो अथवा वे दोष जो क्रियाहीनत्व और निःपुरुपत्व आदि मनुजीने कहे हैं उस कुलमें वहुधाकरके हों तो उस कुलकी कन्या ३४ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । नहीं लेवे क्योंकि कन्याके द्वारा होकर इस कुलमें भी फैल जावेंगे और मनुके कहेहुये दोपोंके होनेसे लोकापवाद और असौख्यकी भीति है ५४॥ अधि० कन्याके कुलका विशेषण जो श्रोत्रिय शब्दहै तिसकाभाव केवल यही नहीं है कि वेदादि विद्यासे सम्पन्नही उसी कुलकी कन्या ग्रहण करीजाय क्योंकि जो यही भावहोवे तो अश्रोत्रिय कुलकी कन्या विना विवाही बैठीरहें उनको कोई अंगीकार नहीं करै- अर्थात् वह ओनिय शब्द एक साधारण विशेषण है सो इसलिये कहा है कि जो वर श्रोत्रिय कुलका पुत्रहो और आपभी श्रोत्रियहो तो उसको कन्याभी श्री- त्रिय कुलकी ढूँढ़नी चाहिये सोई आगे ५५ के श्लोकमें कहेंगे और इसी हेतुसे क- न्याकामी पढ़ी लिखी होना संभवितहै क्योंकि धर्मशास्त्रने कन्या और वर दोनोंकी एकसी तुल्यता सर्वथा निश्चित करी है और ऊोक्त श्रोत्रिय शब्द जो कन्या कुलका विशेपणहै तिसके साधारण भावसे यह तात्पर्य है कि कन्याकाकुल मूर्ख न हो किंतु विद्यावान्हो और विद्याकाकुछ नियमनहीं है कि कौनसीविद्या अर्थात् किसीप्रकारको विद्याकरके बहकुल श्रुताध्ययनसंपन्नहो और (किसीप्रकारका)यहसिद्धांतहै कि उसके कुल में जिसविद्याका अधिकार या परिपाटी या प्रचार उसकेपेशाके अनुरूप या कुलके अनुसार उचितहो तिसविद्यासे संपन्नहोतो उसको श्रोत्रिय कुलकहना और समझना चाहिये-हाँ-इतनीवात अवश्य पाईजाती है कि जवकन्या और वरकी सर्वथा समता और तुल्यता निश्चित होचुकीतौ कन्याकेभी कुलमें वहीविद्या होनी चाहिये कि जिस विद्याका अधिकार वरकेघर हो यहवात अतिउत्तमहै इनसब वातोंको अगलेश्लोक में नीचेदेखकर निश्चय करलो ५४ ।। एतैरेचगुणैर्युक्त सवर्णःश्रोत्रियोवरः । यत्नात्परीक्षितःपुंस्त्वेपुवाधीमानुजनप्रियः ५५ ॥ भक्षा-इतनेही गुणोंसेयुक्त सवर्ण और श्रोत्रियवरहो-यनसे पुंसत्वमें परीक्षाकिया हुश्रा युवा धीमान् जनप्रियहो ५५॥ अभि-इतनेही गुण जो ऊपर कन्याकेलिये कहेगये उनसे युक्तहो और जो दोप कन्याके निमित्तमें गिनायेगये तिनसे रहितहो और सवर्ण कहिये तुल्य वर्णका वरहो अर्थात् जिसवर्णकी कन्याहो उसीवर्णका वरहो और श्रोत्रिय कहिये पढागनाहो सो वह ऐसाबरभी-पुंसवनपुंसत्वके मध्ये युक्तिपूर्वक परीक्षाकरलियाजावे पुनि युवा अव- स्थावालाहो किंतु अतिवालक या अतिरदनहो और बुद्धिमान्कहिये लोकव्यवहार और शास्त्र व्यवहार में निपुणहो-फिर जनप्रियहो अर्थात् चातुर्य वा मन्दमुसकानि सहित मधुरवाणीकी बोलचाल नघता आदिसे मनुप्योंकी दृष्टि में प्रियहो ऐसे वरको कन्यादान करें ५५॥ मथिल-उपरकहाहुासवर्णशब्द जो वरकाविशेपणहै उस्से केवल ब्राह्मण क्षत्रिय मिताक्षरा स० आचाराध्याय । ३५ आदि जातिमात्रकीहीतुल्यतानहींसमुभनी किंतु सभीवांतोंकी तुल्यनोग्रहणकरनी- र्थात् जो कन्यागोरीहो तौवरभीगोरा या कन्याश्यामवर्णहो तोवरभी श्यामवर्णहो-या कन्याकी जन्मकुंडली में राजयोगादि कोईउत्तमयोगहोतोवरभीउत्तमयोगवालाढूँढ़ा, चाहिये अथवा कन्याकेजन्ममेंकोईग्रहदूपितहोतीवरमेभीकोईदोपदाचाहिये-या-क- न्याकेकुलमेंकोईदोपहो तोवरभी कुलदूपितकाढूँढाचाहिये-या-कन्याकेशरीरमकोईदोष . हो तोवरकेदेहमेंभी कोईदोषढूँढाचाहिये-जोकन्याधनवानकीवेटीहोतोवरकाभीधनवा- नघरदेखाचाहिये इत्यादि नानाप्रकारकीबातें जोरकन्यापाईजातीहों सोसभीवातेंव- रमेंभी केवल एक(सवर्ण)शब्दकेविशेपणसे ग्रहणकरनीचाहिये तबसर्वथासौख्य और सौभाग्यकी रद्धिहोतीहै अन्यथा समतासेविपरीत ऊँचनीच लक्षणहोनेमेंदुःख और दुर्भागताका निवासहोजाताहै इसीसवर्णशब्दके आशयसे जोकन्यावडेनगरमें जन्मी और पालीगईहोतोवरभी बड़ेनगरमेंढूँढाचाहियेअर्थातशहरकीकन्याको छोटेग्रामों में नहींबिवाहै-परंतु जोकन्यायामकीरहनेवालीहो तोवरकानियमनहींहै किंतु चाहै वरया- मीणहो या नागरहो इसमें दोनोंशुभहैं परंतु शहरकीकन्या ग्रामीणवरकोनहीदेव-देखो धर्मशास्त्रने कोईवातसंसारकीऐसीनहींछोड़ी जिसकानियम और मर्याद न वाँधीहो प- रंतु विवाहसंबंधकेमध्ये किसीभीलक्षणसे यहनहींपायाजाताहै कि कन्यादानअपनेसे अधिकोच्चकुलमैकरना सर्वथा समताकहतेचलेातेहैं क्योंकि सुख और सुकीर्ति स- मतामेंहीमिलतीहै सोईनीतिशास्त्रमेंभीकहाहै कि बैर और प्रीति और विवाद और व्यवहार और विवाहसंबंध इतनीबातें अपनेवरावरवालेकेसाथकरै तौ उसमेंकोईतर- हकीहानि या उत्पातनउठै-इसकालमें किसीरजातिवालेलोग अपनाइसी बड़प्पन गिनाकरतेहैं कि कन्यादानअधिकोच्चकुलमेंकरै सो यहरीति अपने कान्यकुब्ज समूह में बहुधा पाई जाती है और इसीहतुसे इससमूहको अधिक धन देनापड़ताहै-यद्यपि कन्याके निमित्त अधिक धनकादेना शास्त्रकासम्मत है और अतिउत्तमहै परंतु उस अवस्था में कि जो अपनी श्रद्धा और उत्साहसेदेवे पुनि दिये पीछे भी वह धन वहां जायकर कन्या और वरकेहीभोगमें लगै तब सुकृतहोता है-परंतु जहां दियेहुये धनको वरका पिताअपनाहक निश्चय करके सवअपनी वगलमें दावताहे और निज लोभ या उच्चताके अभिमानसे बधूके शरीरमेंसेभीबाभूपण उतारलेताहैतहांदेनेवाला तो इसहेतुसे नरकभागी होताहै कि क्योंउसने जानिबूझकर ऐसेअधम कुलमें कन्या दानकरीजो वर और वधूको लक्ष्मीनारायणकी मूर्तिनहीं समझते अर्थात् जिसवधू और वरकापूजा रूपसे सत्कार करना लिखाहै धर्मशास्त्रमै तिसका आभूपण उता- रने आदिसे अपकार करते हैं और वे अपकार करनेवाले भी नरकको जाते हैं-त- थाच-(स्त्री धनानि तु ये मोहादुपजीवति वान्धवाः । नारीयानानिवस्त्रंवातेपापायांत्य मिताक्षरा स० पाचाराध्याय। धोगतिम्) अर्थात् जे कोई वांधव मोहसे स्त्रियोंके धनोंको छीनकर भोगते हैं या स्त्रि- योंके वस्त्र और सवारी आदि अपने खर्चमें लाते हैं वे पापीलोग नीचगतिको जाते हैं-इसी एक श्लोकके प्रमाण और दृढ़ताके मध्ये औरभी पचास श्लोक स्मृतियोंके विद्यमानहें परन्तु यहांपर लिखनेसे विस्तार होजाता इससे वे यथाक्रमसे जहांतहां लिखे जावेंगे- और विवाहमें जो कुछ वस्तु या रोकधन या सवारी आदि दियाजाता है वह यथार्थ में कन्याके निमित्तका होताहै क्योंकि कन्याके सौख्य और भोगोंके लिये दिया जाताहै परन्तु वरभी उसधनका मालिक इसहेतुसे कहाताहै कि वह उसकन्या का मालिकहै तो उस धनकाभी मालिकहै-और वरका पिता केवल उतनेही धनका अधिकारी है कि जो उसे उसकी पूज्यताकी रीतिसे दियाजावै-परन्तु वह पिता वैवा- हिक सारे धनका मालिक अपनेको इसतर्कणासे निश्चित करताहै कि मैंने पुत्रका पालन और विवाह किया इसमें मेराधन लगा-सो यह उसका वृथा अनुमानहै क्यों- कि पुत्रके साथ जोकुछ पिता करताहै सो केवल विवाहका धनहरने सेही नहीं उद्धार होसक्ताहै अर्थात् विवाहका धनतो एक तुच्छवस्तुमें गिनती है-और पुवती अपनी जीवन अवधि भरमें भी पिताका बदला नहीं देसकैगा बल्कि पिताके मरेपीछेभी जो कुलकरे सो सब थोड़ाहै- और पिता जो पुत्रकी पालना आदि करताहै सो कुछ उसके ऊपर अहसानमें गिनती नहीं करसता क्योंकि जो संसारमें रहकर अपना वंश कक्ष और सुकीर्ति चाहेगा तो सब कुछ करना पड़ेगा इससे वैवाहिक धनके अधिकारी कन्या और वरही होतेहैं बल्कि पिताको तो उस धनके सिवाय और कुछ अपने पा- ससे उन दोनोंको सत्कारकी रीतिसे देना चाहिये सोई मनुऋषिका वाक्यहै सोदेखो पांच श्लोकोंमें यथा(शोचंति जामयो यत्र विनश्यत्याशुतत्कुलम् । नशोचंतितुयन्ता वर्द्धते तदि सर्वदा जामयो यानि गेहानि शपत्यप्रतिपूजिताः । तानि कृत्याहतानीव विनश्यति समंततः २ तस्मादेताःसदा पूज्या भूपणाच्छादनाशनैः। भूतिकामेनरैनि- त्यंसत्कारेपूत्सवेपुच ३ पितृभिर्धाभिश्चैताः पतिभिर्देवरेस्तथा । पूज्याभूपयितव्या अबहुकल्याणमीप्सुभिः ४ यत्रनार्यस्तुपूज्यंते रमतेतत्रदेवताः। यत्रेतास्तुनपुज्यते सर्वास्तत्राफलाः क्रियाः५)इनपांच उलोकोंका यह अर्थहे कि जिसघरमें वे स्त्रियां जो (जामी) अर्थात् नवोढ़ा बहू बेटी भगिनी पत्नी आदि किसी कारणसे परितापों करके शोकित रहा करती हैं यह कुलशीघ्र नाश होजाताहै- और जहां वे (जामी) स्त्रियां शोक या शोच नहीं पाती हैं वह घर सदेव फला फूला होकर बढ़ताहै १ जिन घरोंकी वे (जामी स्त्रियां अपना सत्कार न होने और अपकारके पानेसे शाप दिया करती हैं वे घर सब थोरसे ऐसे नाश होजाते हैं कि जानो महाभयंफरी पिशाचरूपिणी - त्याने विनाशे हो- कृत्या उसे कहते हैं कि जो तीक्षणमंत्र विधानों सहित वीरोंके स.

मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। ३७ हारेसेघात फेंकीजाती हे २.तिसी कारणसे यह (जामी) संज्ञा वाली स्त्रियां ऐश्वर्यके चाहने वाले मनुष्योंको नित्यके सत्कारोंमें और विवाह आदि उत्सवोंमें अच्छे भो- जन वस्त्र आभूषणोंसे सदाही सत्कार पूजा करिवे योग्यह- सदाही इस हेतुसे कहाहै . कि भूत भविष्यत् वर्तमान तीनों कालमें स्त्रियोंकी पूज्यता प्रसिद्ध है ३ अपना बहु कल्याण चाहनेवाले पिता चचा भाई पति देवर इनसों करकेही स्त्रियां पूज्यहें श्रा- भूपणोंसे भूपित कराइवे योग्यहैं ४ क्योंकि जहां स्त्रियोंका पूजा सत्कार होताहै तहां देवतावासकरतेहैं और जहाँ ये नहीं पूजीजातीहैं तहाँ सारेहीकाम निप्फलहोजातेहें- यहाँ पूजा शब्द सत्कार और प्रतिष्ठाका वाचक है किंतु कुछ पोडशोपचारसे अपेक्षा नहींहै । इस बात के भावको आगे ८२के श्लोकमें योगीन्द्र याज्ञवल्क्य भी कहेंगे- और व्यवहाराध्यायमें (स्त्रीधन) का निर्णय विशेषकरके कहेंगे तहाँ सर्वथा निश्चित है कि जो वैवाहिक धनहै सो वर और वधूकाही होताहै-परंतु इस योग्यताके आग्रह से किसी वरको यह अधिकार नहीं है कि वह अपने पिताके हस्तगत वैवाहिक धनको मांगे और झगड़ाकरै क्योंकि वह शिक्षा केवल उस पिताकेही लिये दृढ़तारहे कि वह अपने पुत्रको समर्थ और सुमार्गी समुझे तो उसधनको और कुछ अपने धनमेंसेभी सत्कारकी रीतिपूर्वक अपने हाथसे लेकर पुत्र और वधू दोनोंको सौंपदे-अथवा उन्हें बालक या उड़ाऊ समुझे तो उस धनको अपने द्वारा वर और वधूके सौख्यमें लगा और जो आप धन पात्रहो तो कुछ अपने धनमेंसे भी किसीप्रकारसे उनके सौख्यम लगावै यह वर वधूके सत्कारकी मर्यादहै-अथवा जो आप असमर्थहो तो उस वैवा- हिक धनको निस्संदेह शिवनिर्माल्य समुझकर अपने स्वार्थ में न लावे-और जो देव- योगसे उसके आगे भी कोई कन्या विवाहने योग्यवैठीहो और वह इसहेतुसे उसधन को व्ययकरनाचाहै तो भी उसमेंसे आधा अपने पुत्रके संबंधसे लेकर उस कन्याके विवाह में लगावै क्योंकि उस पुत्रको भी अपनी भगिनी के कार्य में जैसा पेदाकरके लगानायोग्यथा तैसा इसमेंसे भी देनायोग्यहै-परंतु आधा जो विशेपतर वधकेनिमित्त में गिनाजाता है उसपर दुर्नीति नहीं करै-और जो कदाचित् वह उस आधेपर भी दुईष्टि करे तो उसवधू अथवा बधूकी वाल्यतासे उसके पिता, माता धादिको अधि- कारहै कि वे उसमें हाथ नहीं लगानेदें-ऐसे ऐसे सिद्धांतोंसे सर्वथा यही निश्चितहे कि कोई कन्याका पिता अपनी बेटी और जामाको निज इच्छापूर्वक चाहो लाख रुपयेका धनदेदेवै कुछ इस वातका निषेध नहींहै परंतु ऐसे ढंगसेन देव जो दिये पीछे वहधन उसकी कन्या और जामातृके सौख्यमें न लगसकै अर्थात् जो कुलके क्रय विक्रयके प्रकारसे दिया लियाजाताहै वह सर्वथा अनुचित है क्योंकि (प्रथम) तो धर्मशास्त्र से विरुद्ध इसहेतुसे निश्चितहोताहै कि शास्त्रमें इसवातकी आज्ञाकहीं मिताक्षरा साचाराध्याय। भी नहीं पाई जाती है कि कुलका क्रय विक्रय कियाजाचे (दूसरे.) इस क्रय विक्रयके अनुसार देनेसे वह धनदाताकी कन्याके अधिकारसे दूरहोजाताहै इसीहेतुसे बहुतेरे लोभी और निर्मादलोग अपनीपुत्रवधू के आभूषणको भी उसकेशरीर से छल्ला छल्ला तकउतार लेते हैं पश्चात् कन्यापिताअपनी पुत्रीकीदया अथवा लोकलाजके लिये फिरपहनाकर भेजताहै उसकोभी विवाहसे आधागौनेकाहक वताकरलेलेते हैं तब कन्यापिता फिर तीसरी वार भी देता है परंतु ऐसे सामर्थ्यवान् और धनाढ्य पिताथोड़ेहोतेहैं जो बारम्बार फटेकोसीतेहैं-इस्सेकन्याकेपिताकोपहलेसेही इसवातका विचार और प्रबंध और प्रतिज्ञादृढ़ करलेनीउचितहै कि जो कुछमेंदेताहूं सो सबमेरी कन्याके निमित्तका समुझाजाय (तीसरे)इसी क्रय विक्रयके बंधनसे यहबड़ा लाञ्छनहै कि धनकेअभावमें बहुधाकन्यायें अधिक अवस्थाकी होजातीहैं उनके संबंधका ठिकाना नहींलगता और इसवातसे जो कुछ दोषउत्पन्न होते हैं सो संसारमें सबको विदितह और शास्त्रमेंभी पागेवढ़कर ६३ के श्लोकमें देखो क्या लिखाहै-यद्यपि ऊपर लिखे हुये गुणदोष कुछसभीमनुप्यों में नहींहोते परंतु जिसवातकी बाहुल्यता होती है वही गिनती में आयाकरती है और यहवात कुछ किसीकी निंदास्तुति के लिये नहीं लिखी गईहै अर्थात् केवलसार्वलोकी कल्याण वा हितकीदृष्टिसे संदर्शितकरीहै-और जो निंदा समुभीजाय तो लिखनेवाला सबसेपहले उनलोगोंमें गिनतीहै और वेही गुण दोप इसमेंभी आद्योपांत भरेपरे, फिर ऐसाकौन है जो अपनी निंदा अपनेहाथसे लिखेगा. परंतु कारण इसमें इतनाहै कि भले मनुष्योंकी यह परिपाटीसनातनसे चलीआई है कि उनको जवकभी किसीस्थलपर किसीहेतसे सद्धर्म अर्थात् द्वितयलोक सुखदायक वार्ताका निर्णयकरना पड़े या उसनिर्णयमें साक्षीभूत होनापडै तहां अपने और प. रायेका पक्षपात छोड़कर अपने शत्रुके भी गुण प्रकाशित करै किंतु शत्रुता तो वैरके स्थानपर होगी और यहअवसर उसकेगुण कहनेकाहे इसमें अपनी धर्मनीतिसे उस के गुणोंका लोप न करनाचाहिये-ऐसेही अपने अथवा अपने गुरुयोकेभी दोपकहने का अवसरहो तहां निस्संदेह दोपकहने उचितहें इसमें स्पष्टवक्ता दोपभागी नहींहो- सक्ताहै-तथाच (शत्रोरपिगुणावाच्या दोषावाच्यागुरोरपि। सनिःसन्दर्मकथने विनात्म परपक्षयोः)इसीपचपनके श्लोकमें यह जो कहाहे कि यमपूर्वक पुंसत्व नपुंसत्वक मध्ये परीक्षाकरै तिसका यहभाव है कि प्रत्यक्षप्रकारोंसे परीक्षाकरना तो सर्वथा अनुचित हे परंतु जहांकहीं इसवातकी आवश्यकता श्रानिपड़े तहांकेलिये नारदजी का कहा हुमा यहुउपाय है कि-जिसमनुप्यकाबीजजलके ऊपर तैरनेलगे नहीं तिसकोपुंस जानो और जिसकामूत्र (हादि) हो अर्थात् मृत्रकीधारसे धरतीमें विशेष गडहलाहो- जाय तिसकोपुंसजानो और जिसके मूत्रम फेनाबहुतउठे उसकोपुंसजानी-और जिस t मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। ३६. पुरुषमें यहकहेहुये लक्षणउलटेहों तिसको नपुंसकजानो-तथाच(यस्याप्सुप्लवते वीजं, हादि मूत्रंचफेनिलम् । पुमान्स्याल्नक्षरेतैविपरीतैस्तुषंढकः ५५॥ यदुच्यतेद्विजातीनांशूद्राद्वारोपसंग्रहः। नैतन्मममतंयस्मात्तत्रात्माजायतेस्वयम् ५६॥ अक्ष-जो कहिये है द्विजातियोंको शूद्रसे दाराका उपसंग्रह नहींहै यह मतमेरा जिस्से उसमें आत्मा प्रापही उत्पन्नहोवैहै ५६ ॥ भभि०-द्विजातियोंके लिये जो मनुस्मृति शास्त्रमें शूद्रकुलसेभी स्त्रीका संग्रहणक- रना कहतेहैं सो यह मेरा संमतनहींहै क्योंकि उस शूद्रास्त्रीके उदरमें यह द्विजातियों का आत्मावीर्यरूपहोकर आपही जन्मलेताहै सो यहमेरी समुझसे अनुचितहै ५६ ।। मधि०-इस्से पहलेजो ५२।५३१५४ । ५५। इनचार श्लोकोंबिवाहकीमुख्य रीति.कहचुके हैं सोवह मुख्यविवाहभी तीनप्रयोजनों से कियाजाता है अर्थात् एक तो केवल स्त्रीके भोगमात्रकी वांछासे अर्थात् जिसकेपुत्र तो विद्यमानहे और भार्या नष्ट होगई ऐसामनुप्य जो विवाहकरना चाहे तो भोगमात्रकी वांछा १ दूसरा कोई प्रकारका धर्मसाधन करनेकी आकांक्षासे कि जो धर्मस्त्रीविना नहीं होसक्ताहो २ ती- सरापुत्र पैदाकरने की अपेक्षासे ३ तहां जो पुत्रके प्रयोजनसे कियाजाताहै सोभी दो प्रकारका होताहै एक तौ (नित्य) जो गृहस्थीमात्रको संतानकी अपेक्षा सबहीको अ- वश्यहुआकरतीहै दूसरा(काम्य)वहकिजो ठेठकर पुत्रहीकेअर्थसे,विवाह करनाचाहै- तिसमें (नैमित्तिक)संतानकी अपेक्षामें तो विशेषकर सवर्णासेही विवाहकरना मुख्यहै और यद्यपिसभी प्रयोजनोंमें सवर्णामुख्य हे परन्तु जब सवर्णाकालाभ नहीं होसक्ता हो तौ (काम्य) संतानवाला और भोगमात्रकी वांछावाला असवर्ण से भी विवाहकरै सोयहमुख्य विवाहका (अनुकल्प)कहलाताहै उसअनुकल्पके मध्ये मनुऋपिने ब्राह्मण लिये चारोंवर्णकी कन्या लेनीकहीं। और क्षत्रियकेलिये ब्राह्मणी छोड़कर तीनवर्ण कीकहीं वैश्यकेलिये ब्राह्मण क्षत्रियको छोड़कर दोवर्णकीकहीं और शूद्रकेलिये केवल शूद्रकीही कन्यालिखी अर्थात् अपनेसे उत्तमवर्ण की नहीं इसलिये याज्ञवल्क्यजीने ऊपर निषेधकिया है ब्राह्मणादि तीनवोंको अपनेसेहीन वमभी (अनुकल्प) वि- वाहमें शद्रकीकन्यासे विवाह न करनाचाहिये परन्तु शेपवर्गीकी कन्याकेलिये याज्ञव- ल्क्य भी नीचेके इलोकमें याज्ञादेते हैं सो इसहेतुसे आज्ञादेते हैं कि किसीप्रकार से सृष्टिकी बढ़वारीमें न्यूनतानहींहोनेपावै परन्तु वहाज्ञा ऐसीनहीं है कि जैसे वर्तमान समयके बहुधा उत्तम वर्ण चांडाली पर्यंत भौविना विवाहेही घेरलेते हैं और उनको कोईप्रकार का दंडनहीं दियाजाता है ५६॥ तिस्रोवर्णानपूर्यणदेत्तथैकायथाक्रमम् । ब्राह्मणक्षत्रियविशांभार्यास्वाशूद्रजन्मनः ५७ ॥ अक्ष-यथाक्रम से पहले पहले से लेकर ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य,जातों को तीन मिताक्षरा साचाराध्याय। दो एक वर्षों की भार्या और शूद्रजन्मा को अपने वर्णकी भार्या उचित है ५७ ॥ अभि. ब्राह्मणको तीनवर्णकी भार्या इसक्रमसे कहींहैं कि ब्राह्मणीके अभाव में क्षत्रियकन्या और क्षत्रियाके न मिलनेमें वैश्यकन्या-ऐसेही क्षत्रियको सवर्णाके अभाव में वैध्यकन्या और वैश्यको केवल सवर्णा ५७ ॥ अधिः-अनुमानसे प्रतीतहोता है कि मनुजीने जो द्विजातियों के लिये शूद्रकन्या से भी विवाह करना लिखाथा तो उस समयमैं शूद्र भी कुछ उज्ज्वल गिनेजाते होंगे किन्तु अबकीसी मलीनता उनमें न होगी पर पीछे पीछे याज्ञवल्क्यजी के समय में मलीनता का प्रवेश उनमें अधिक होगया इससे उन्होंने निषेध करदिया और जो कुछ हो सो हो-परन्तु अब उन दोनों ऋषियों की कही हुई यह मर्यादें जो ऊपर ५६ । ५७ के उलोको में कही हैं सो सव (नाग्निसंज्ञक) होगई इससे इनका प्रचार उठगया ५७ ॥ अव नीचे पाठप्रकारके विवाहों के लक्षण और उनके फलभी भिन्न कहते हैं। ब्राह्मोविवाहमाहूयदीयतेवाक्त्यलकता । तज्जापुनात्युभयतःपुरुपानेकविंशतिम् ५८ ॥ अक्ष०-वह(ब्राह्मविवाह)कहलाताहे जिसमें वरकोबुलाय कर अपनीशक्तिकेननु- सारकन्या को अलंकृत करके दानकरते हैं उसविवाहसे पैदाहुईपुत्र संतान दोनोंमोर से इक्कीसपुरुपों को पुनीत करताहे-अर्थात् पिताआदि दशपहले और पुत्रादि दश पिछले इक्कीसवां आप ५८ ॥ अपि०- यह (ब्राह्मविवाह) सबसेउत्तमहै किंतु पाठ बिवाहोंमें यही मुख्यहै और वर्तमान समयमै सर्वत्रतीनों वर्णके मनुप्योंमें यहीरीति प्रधानहै और आचरण करी जाती है-परन्तु याज्ञवल्क्यजी यही कहकर चुपकेहोगये कि शक्तिके अनुसार कन्याको अलंकृत करके दानकर अर्थात् कन्यापिता कीशक्तिकोही प्रधानरक्खा फिजैसी उसकी शक्ति योर सामर्थ्यहो तैसावन आभूपण आदिदेव-परन्तुयह इतना शब्द अपनेमुख सेनहीं काढ़सके कि चाहै उसके पासहो या न हो परसमधीके बड़प्पनके अनुसार पह- ले करारकरके पीछेबहुत कुछदेवै तब उसविवाहको (ब्राह्मविवाह ) कहें ५८ यज्ञस्थविजेदेवमादायार्पस्तुगोदयम् । चतुर्दशप्रथमज पुनात्युत्तरजश्चपद५९ ॥ अक्ष-यज्ञमस्थित ऋत्विज को कन्यादेना देव-और दोबैललेकर (ब्राह्म) पहलेसे जन्मा चौदह पिछलेसे जन्मायःको पवित्रकरता है ५९॥ अभिः यज्ञकरातेहुये प्राचार्यको यथाशक्तिसे अलंकृतकरी कन्याका दानकरदेना यह (देवविवाह) कहाताहै-योरबरसे दोबैललेकर कन्यादानकरना यह (भाविबाद) कहलाताहे-इनमेंदेव विवाहकी पत्नीसे पेदाहुन्या पुत्र पहली पिछली १४ पीढीको और (मार्पविवाद ) की भाासे जन्माहुआ पुत्र ६ पीढ़ियोंको पवित्र करता है ५९॥

मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । अवि०-(दैवविवाह)का यहयर्थहै कि देवताओंकीरीति अनुसार (माविबाट) का यह अर्थहै कि ऋषियोंकीरीति अनुसार-तहां ऋपियोंकी रीतिमे जो दोवैल वरसेलेने कहे सोउस अवस्थामै कि जबकन्या पिताकेपासकुछनहो सो वहयेलोंका लेनाकुछ यह नहींहै कि सदेह बैलहीउससे लियेजावें अर्थात् शास्त्रवक्ता का यह सिद्धांतहै किकुछ थोडासाद्रव्य उसमेलेकर कन्याकेवस्त्र याभूपण आदिका प्रबंध उसीद्रव्यसे करके कन्यादान करदेवै सोउसद्रव्यके लेनेका नियमनिश्चय करनेकेलिये वेलकहें किजि- तने मूल्यसे दोवैलासक्तेहो उतना उससेलेवै-इसमेंभी यह तर्कणाहै किदोवेल २०) रुपयेसेभी आजातेहैं और विरलेवेल दोसौ २०० रुपयेके भी होते हैं फिर इसकाक्या नियमहोसत्ताहै-तहां परमसिद्धांतयहीहै कि जैसे मूल्यके वैल खरीदसकने की साम- र्थ्य वरमेंहो उसीकेअनुसार उससेले और उसमेसे एक कपर्दिकाभी अपने स्वार्थमें नहींलगावै क्योंकि जो अपने स्वार्थमें लगावेगा तौकन्याके विक्रयकरनेका दोपभागी होजावेगा-और यह मर्याद केवल इसीनिर्वाहके लियेकहीहै कि कोई प्रकारसे किसी निर्धनकी कन्याकुमारी नहींरहने पावै-और यहरीति कोईनिईन करें तो इसमें उसकी निदानहीं है किंतुप्रशंसामें गिनती है उनलोगोंकी अपेक्षासे कि जो निर्द्धनतासे कन्या घरमै बैठी राखते हैं-अन्यथा साक्षात्कार वैलोंका जोड़ालेना यह सर्वथा अनुचित और असंभव है ५६॥ इत्युक्ताचरतांधर्मसहयादीयतेऽर्थिने । सकाय पावयेनज पट्पड्वंश्यान्सहात्मना ६०॥ अक्ष०-साथ मिलकर दोनों धर्मका आचरण करो यह कहकर जो अर्थीको कन्या दीजिये है सो (कायबियाड) है उससे जन्मा पुत्र आप सहित छेछेवंशियों को पवित्र करताहै ६०॥ पनि०-जवकोई अर्थी किसी कन्यापितासे अपने ग्रापकन्या मांगताहै उससे यह प्रतिज्ञा ठहराली जातीहै कि यहकन्या और तुमदोनों मिलकर परस्पर प्रीतिपूर्वक धर्म के अनुसार आचरण करना अर्थात् कोईसी लोकविरुद्ध या शास्त्रसे विपरीत अनीतिनहीं प्रकटहो-सोइसको (काय) विवाह अर्थात् (प्राजापत्य) विवाह कहते हैं इस विवाहकीभार्याका पुत्रअपनी आत्माको आदिलेकर छे पीढ़ी पहली और छे पिछलीके पुरुपोंके पापधोदेताहै ६०॥ भासुरोद्रविणादानाद्गांधर्वःसमयान्मिय । राक्षसोयुद्धहरणात्पैशाच कन्यकाछलात् ६१ ॥ मक्ष-द्रविणलेनेसे(मासुर)परस्पर संमतिसे(गांधर्व)युद्ध में हरनेसे(राक्षस) कन्याछल से पैशाच ६१॥ अभि०-कन्याकापिता द्रव्यलेकर विवाहकरदेवै सो(भासुर)विवाहकहाताहै क्योंकि द्रव्यलेकर कन्यादेना या द्रव्यदेकर भायालेनी यहदोनों लक्षण असुरोके प्रसिद्धहें- सिद्धहे ६१॥ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । कन्या ओर वर परस्पर अपने अनुरागसे विवाह ठहराले सो(गांधर्व)विवाहकहाताहै क्योंकि यहरीतिगंधर्वोकी प्रसिद्धहै-युद्धकरके कन्याछीनलावै और उस्से विवाहकरले सोयह (राक्षसी)विवाह कहाताहै-सोवतीहुई या किसीभाँति भूलीभटकी कन्याको छल करलेजाव और विवाहकरै सो(पैशाच)विवाहहोताहै क्योंकि यहदुनौति पिशाचोंकी प्र- अवसवर्णा और परवर्णा कन्याओंके विवाहमें विशेपलक्षण कहतेहैं। पाणिर्लाह्यःसवर्णानुग्रहणीयात्क्षत्रियाशरम् । वैश्याप्रतोदमादद्यावेदनेत्यग्रजन्मनः ६१ ॥ अक्ष-सवर्णोंमें पाणिग्रहणउचितहै-क्षत्रियाशरथाँभै वैश्याप्रतोदलेवे-यहरीति अग्रजन्माके विवाहमें ६२॥ अनि०-सवर्णा अर्थात् जिसजातिकावरहो उसीजातिकी कन्याहो तौसवर्णास्त्री कह- लातीहै सो अपनीअपनी जातिकी सवर्णा कन्याओंकेविवाहोंमें पाणिग्रहण करना किंतु कन्याका हाथवरको थाँभना उचितहै जैसीकुछरीति संसारमें प्रवर्तितहै-परंतुजहाँपराये वर्णकी कन्यासे विवाहस्वीकार हुआहो जैसा ५७ के इलोकमें कहचुकहें तहाँउस वि- वाहमें कन्याका हाथपकड़ने का अधिकार वरकोनहीं है-अर्थात् हाथपकड़ने के पलटे · कुछविशेषताहे सोकहते हैं कि क्षत्रिय कन्याजव अपनेसेअग्रजन्माजो ब्राह्मणहैतिससे विवाहकरे तो हाथर्थंभावनेके स्थानमें उस ब्राह्मणकेहाथसे थामीहुई छड़ी,लाठी,वेत आदिको दूसरीभोरसेपकडलेवै-ऐसेहीवैश्यकीकन्या अपनेसेवड़ाक्षत्रिय या ब्राह्मणता से विवाहकरे तो उस वरके हाथका थांभाहुआ प्रतोद पैना चावुक सो थाँभलेवै६२॥ अधिः-याज्ञवल्क्यजीने ५७ के इलोकमें द्विजातियोंको शूद्रासे विवाहका निषेध कियाथा इसलिये उसके विवाहका विशेष लक्षण भी इस श्लोकमें नहींकहा-परंतु म. नुजीने उसका भी विशेष लक्षण कहाहै कि शूद्र कन्या अपनेसे उत्कृष्ट जो वैश्य और क्षत्रिय और ब्राह्मण इनतीनों द्विजातियों में किसीकेसाथ विवाहकरै तौ पाणिग्रहणके स्थानपर बरके काँधेका पटका दुपट्टा आदि जो कुछ वस्त्र तिसका एक अंग अर्थात् झूट किनारा थाँभले-तथाच (वसनस्यदशाग्राह्याशूद्रयोत्कृष्टवेदने) यद्यपि इसवातसे कुछ प्रयोजन अब नहीं है परंतु ज्ञानमात्रके लिये लिखीगईहै ६२॥ अब यहबात कहतेहैं कि कन्याको दानकरनेका अधिकार किस किसकोहे। पितापितामहोत्रातासकुल्योजननीतथा । कन्याप्रदःपूर्वनाशेमरुतिस्थापर-परः ६३॥ प्रक्षा-पिता, दादा, भ्राता, सकुल्यकहिये कुलका कोई प्रधान तैसेही माता-कन्या देनेका अधिकारी पहले पहले के नाशमैं पिछला पिछलाहे जो प्रकृतिस्थहो ६३॥ अभि.-प्रकृतिस्थ अर्थात् अपनी शुद्धि बुद्धिमें सावधानहो किंतु सिड़ीया विक्षिप्त और अशक्त न हो ऐसा पिता कन्याके देनेका अधिकारी है जो पिता नाशहोजावे या मिताक्षरा साचाराध्याय । ४३ जीवताहो पर विक्षिप्त आदि दोपोंसे विवाहकरसकनेमें असमर्थहो तो कन्याके दादा को अधिकारहै-जो दादा भी नहो या वैसाहो तो कन्याका भाई अधिकारीहै-जो भाई भी नहो या वैसाहोती उसकुलमें जोकोईप्रधान गिनाजाताहो या अप्रधानभीसामर्थ्य वालाहो तो यहभार उसकेऊपर निश्चितहै-जब ऐसाकोईभीनहोतौ मातापरइसवात का भारहे ६३॥ अधि०-अशक्त या असमर्थ कहनेका केवल यहीसिद्धांत नहींहै कि वे अपनेशरीर सेहीअसमर्थहों अर्थात् जो धनसेहीनहै वहभी प्रकृतिस्थोंमें गिनतीनहींहै किंतु जो उसका उत्तरोत्तर अधिकारीकोईभी धनवान्हो वहीप्रकृतिस्थ कहलावेगा-ौर ऊपर केकहेहुये जो पांचयधिकारी हैं उनका कुछ यह भी नियमनहीहै कि वे कन्यापिता के साझेमरहतेहों या न रहतेहां-अर्थात् चाहेवेपांचकेपांचोअपनाखाने कमानेकाव्यवहार जुदारखतेहों या चाहे उनकेघरकी धनसम्पत्तेंभी विभागता में प्राचुकीहों जो पहले सवकी एकथी-परन्तु इसकन्यादान के अधिकारभार में ऐसे समुझे जायँगे कि जानो सबके सब एकहें ६३॥ अप्रयच्छन्समाप्नोतिभ्रूणहत्यामृतावृतौ । गम्यंत्वभावेदातृणांकन्याकुर्यात्स्वयंवरम् ६४ ॥ • अक्ष-वह न देतोहुआ ऋतुऋतुमें भ्रूणहत्याको प्राप्तहोताहै-दाओंके अभाव में कन्यायापही गम्यवरको करै ६४॥ अभि-कन्यादान में जिससमय जिसका अधिकारहे सो कन्याका विवाह न करै तो एक २ ऋतुकाल मासिकधर्म होनेसेएक २ गर्भहत्याकाभागी सदा होतारहताहै-जिस कन्याका विवाहकरनेवाला कोईभीअधिकारी नहींरहाहो वहकन्या आपही किसी ग- म्यवरको वरे-गम्यकहनेका यह आशयहे कि जो बरउसके गमनयोग्यहो अर्थात्जैसे वरकोउसके अधिकारी उसेदेसक्तेथे वैसाही वरकन्या अपनेआपढूंढ़े सो उसवर के लक्षण पहले ५५ के श्लोकमें कहचुके ६४॥ अधि०-अपने आप ढूंढनेका यह सिद्धांत नहीं है कि वहकन्याअपने मनसे किसी वरकोविचार लेवे या कहींग्रामांतर में ढूंढ़ती फिरै-किंतु अपने नष्टभत अधिकारियों के शुभचिंतक इष्टमित्रोंसे कहकर उसवस्तीके पंचों और नरेशोंमें यहयात प्रवेशित करवाकर अपनेयोग्यवर ढुंढवावै-और इसीअाशयसे उनपंचोंवा नरेशीकोभीयहसंस- चितहै कि इसप्रकारकी कोईकन्या उनकी वस्तीमें विनाविवाही नहीं रहनेपावै अर्थात् केवल यहीनियम नहीहै कि जवकन्याउनके पास निजप्रार्थनाका प्रवेश करवावे तभी उसके लिये वरदंदाजाय-किंतु-उनको प्रजारक्षाके नियमोंअनुसार सदाही यह योग्यह कि वे इसप्रकारकी श्रनाथकन्याओं के विवाहोंमें प्रबंधकरतेरह और प्रबंधका करनाके- वल यहीनहींहै कि उसके लियेवरढुंढवाकर चुपके होरहेअर्थात् प्रार्थनाया विनाप्रार्थना मिताभरा स० पाचाराध्याय। वाली ऐसी अनाथकन्याओंके पास जो धन नहींहोवे तो उसविवाहकेयोग्य कुछ धनभी उसस्थान औरसमय और शक्तिऔरयोग्यताके अनुसारसंचित करदेव(अथवा )जहां किसी हेतुसे धनकाउपस्थित होना दुर्लभ समुझाजाय तब निस्संदेह आर्पविवाह की रीतिसे उपकार करवावें और इस उपकारमे उनको वैसाही उद्योगकरना सूचित है । कि जैसे गृहस्थी अपनीसंतानोंके मंगलमेंउत्साह रखताहे(भेदर) इसकहेहुये आशय से यह योग्यतापाईजातीहै कि इसप्रकारका धनसंचयभी थोड़ा बहुतप्रत्येक वस्तीके अधिष्ठाताके उपायसे संग्रहपाकर किसीधनपात्रके आश्रयभूत रहकरसदेव द्धिपाया करै जिस्से तत्काल किसीनबीन उपकारमें बहुधोपाय न करना परे-इसीआशयसे उन पंचों वा नरेशोंकी योग्यताभी सब ओरसे आकार्पत होकर देशकेराजापर आरूढ़हो- तीहै क्योंकि जिस किसीअापत्ति में फंसेहये दीनदखियाका रक्षाकरनेवाला कोई भी नहीं होताहै उसकारक्षक राजा हुआ करताहै जिस्से राजाप्रजाका स्वामीहे-तथाच(न- कोपिरक्षितायस्यदीनस्यापदगतस्यच । तस्यैवनपतिःपातायतोभूपःप्रजाप्रभुः) (भेद ३)ऊपरके भेदमेंकहेहुयेधनसंचयका होना कुछवडीसीकाठिन्यता नहीं है क्योंकिप्रथम तौ अनेकरीतेंउसकी लोकप्रसिदहें कि जिनसेवहुतेरे संसारीकामोंके लिये उपकारी धनकासंचय कियाजाता है फिर.एकपुण्यार्थी धनकासंचयहोना क्यावड़ीवातहे कदा- चित् उनरीतोंसे असंभवता समुझीजातीहो सबसेसुगम यहरीतिहै कि जो चातुर्वर्ण्य मनुष्योंके विवाहोंमें वरकेहाथसे कुछधनसंकल्प यथाशक्ति कियाजाताहै वहधनकन्या के ग्रामवासीविनोंको वर्तायाजाताहै उसधन के दानकरनेका परमसिद्धांत तौ यही है कि वर और कन्या इनदोनों के जन्मभरकी कुशलक्षेमके हेतुसे पुण्यकियाजाता है कि इसपुण्यके प्रभावसे यहदोनों फूलतेफलते रहैं परन्तु बहुधालोग उस्से अपनानाम भी समझते हैं सोभीसत्यहै किंतुयथार्थता उसकीपुण्य और प्रतिष्ठादोनोंपर पहुंचती है-और जब अवश्याभाव करकेदियाजाताहै तो एकऐसीरीतिसे देना कि जिस्से वह पुण्य और प्रतिष्ठारूपी रक्ष उनकासदा सर्वदा हराफरा दृष्टि में आयाकरे तो क्या अच्छीवात है किंतु वहीधन एकत्र उस बस्ती में संचितहोता रहे और साहुकारे की रीति से उसका व्याजभी बढ़ता रहै और हरसाल उक्तमार्गसे संग्रह भी होता- रहै तो इसप्रकारसे अनेकों लक्षरुपया प्रत्येकवस्ती में संचितहोजाय औरआवश्य- कता पर कामायाकरै (भेद ४)और कदाचित् विप्रकुल अपने मनमेंइस बातकादुःख मानताहो कि वहधन हमाराहक्क सो क्योंकर एकत्र संचित कियाजाय तहां प्रथमतो उनको इस अभिमानसे प्रसन्नता धारणकरनी चाहिये कि हमाराकुललोक रक्षाकाहे- तु निश्चित कियागयाहै अर्थात् वहधन एकत्र संचितहोनेपर भी ब्राह्मधन कहलावै- गा और उसमेंसे किसी उपकार में लगाना भी उनकी आज्ञा विना नहीं हो सकेगा -- मिताक्षरा स० आचाराध्याय। ४५ अर्थात् जबवहीं विप्रकुल अपनेहस्ताक्षरकरदेवैगा कि इतनाद्रव्यब्राह्मधनमसे अमु- क उपकारमें दियाजावै तवकोई हाथ लगासकैगा-और यहकैसी वडीवातहै कि उसी विप्रकुल मेंसे जबकिसी एकपर कन्यादान आदिकोई सी विपत्तियानि पड़ेंगी तब उसमेंसे सबकी संमति और आज्ञासे उसकाबेड़ा पारकियाजायगा किन्तु कुछयही नियमनहीं है कि केवल अनाथ कन्याओंकेही उपकारमें लगै-और जब विप्रकल में ऐसा सुखदायी प्रबंध और लोगदेखेंगे तो वेभी उनकीदेखा देखी लोकलाज के लिये ऐसे नानाभांति के प्रबंधवांधेगे जिससे कोईमनुप्य किसीभांति दुःखीनहीं रहनेपावै तो सर्वथा इसवातके मुखिया विप्रही गिनेजायँगे और विप्रकुलको जो बड़प्पन या आचार्यकी पदवीमिली थी तो इन्हींवातोंसे कि पहले माप शुभकामों का आचरण करते और औरोंसे करवातेथे- शोचनेकी वातहै किजब किसीने पांचरुपये के पैसेवर केहाथसे सङ्कल्प कराये और एकर या दोराने कुछमनुष्योंके हाथ आये तौदोदिन के पान तमाखूखानेसे क्याफल सिद्धिहुई अथवा कहीं कालांतरमें किसी अमीरने क- दाचित् विप्रोंके हज़ारघरकीवस्तीमें हजारका संकल्पकिया और घरपीछे १)आगया तौभी क्या बडी वातहुई (भेद ५)कदाचित् देनेवाला यहसंकोचमानै कि मैं वित्रीकोदे- ता तो पुण्य और प्रतिष्ठाथी एकत्र संचितकरनेमेक्याहै सो यहसंकोच उसकाथा है क्योंकि पुण्यकी श्रोरसे तो उसकी यह विशेषताहै कि वहांती दो २ पैसे कुछन्नादमी चाटिके फिर ज्योंकेत्यों और इसमें जोधनकी वृद्धिहोयगी सोभी लौटकर उन्हीकेपर- म कल्याणोंमें लगेगी और सदैवकाम भावेगी और यहबात सबकोई जानताहै कि दाताकापुण्य उसदानमें अधिक होताहै कि जिस्से किसीको अधिक आराम निकले फिर इस्सेअधिक आराम और क्याहोगी कि एकवारकादेना सदा सर्वदा कामाया करे और प्रतिष्ठाकी ओरसे यह बड़प्पनहै कि वहां तो अपनीशक्तिके अनुसार जितने विप्रोंके हाथपरधरा उतनोंने कुछवाह वाहकरी और जिनकेहाथ कुछनाया उन्होंने आगे औरपीछेभी निंदाकरी और यहाँ जिसकिसी धनाढय साहूकारके खजानेमें वह रुपयाजमाहुआ और विप्रकुलके जोप्रधान और प्रतिष्ठितसब मिलकरके जमाकराने गये उनके सन्मुख उसकानाम लिखकर जमाकिये गये और प्रमाणके लिये उसकी दूकान या कोठीमागे दो पंक्तिका प्रसिद्धपत्र चिपटायागया कि अमुकमासमें अमुक मनुष्यके पाँच या पचास रुपये (ब्राह्मधन) में चढ़े तो इस्सेअधिक प्रतिष्टा क्याहोगी (भेद ६)इसप्रकारके धर्मसंबन्धी प्रयोजनोका प्रबन्ध वहलोग करसक्तहें कि जोसंप्रति सभाओं का प्रकाश नानानामसे करतेहैं-और जो यह इनबातोंमें उद्योगन करसक्तेही तो इस्सेमागे और क्या शतघ्नीका बाँधना उनके जिस्से कियाजायगा किन्तुधर्मशब्द के विशेषणवाली वस्तुतौ धर्मसंवन्धी कामों में सहायताकरनेसेही यथानाम तथागुण मिताक्षरा साचाराध्याय । होसक्तीहै अन्यथा धर्मकोई ऐसीवस्तुनहीं है कि जिसकी मूर्तिके ध्यान या नामके या- राधनमात्रसे कुछकाम चलसक्ताहो किन्तुधर्मशब्दसे द्वितयलोकी मर्यादोंका भाव पाया जाताहे उसमेंभी पहले यहलोक और पीछे परलोकहोजो इसलोकका प्रबन्ध अच्छा करसकेगा तो परलोकभी सुगम होजायंगा परन्तु किसी प्रथलकी दीहुई तीन वातोंके विना न करसकनमेंभी उनका क्यादोपहै सो उनतीन बातों में एक तो जो कुछ शुभचिंतकताके प्रकारसे सभावाले कहें उसको और लोगप्रमाणकरें दूसरी जो उस वार्ताका उत्पादनकरे वह किसी प्रकारका दण्डपासके तीसरी निर्लोभता जिसमें कछ अपनास्वार्थ नहीदेखें-इनवातीका अधिकार जैसे सभासदोंके लिये उचितहे तैसेही प्रत्येक जातिकी विरादरीमें जो मुखियाहों उनकोभी उचितहै कि जो मनुष्य उनकी विरादरीका विवाह योग्यकन्याके विवाहमें अधिक उपेक्षाकरै वह उनकेद्वारा ज्ञातिदंड का भागीहों और जो वेही उसको दंडदेनेसे उपेक्षाकरें तोवेभी उसग्रामकी सभाहारा शिक्षापाने के योग्य निश्चित कियेजायँ( भेद७)इसी ६४ केश्लोकमें विवाहकी उपेक्षासे भ्रूणहत्याका पाप निश्चितहुआ और उसीआशयसे उपेक्षावाला दंड्य निश्चितहोचु- का-फिर जव विवाहकी उपेक्षा इतनीबड़ी समुझीगई तो द्विरागमनकी उपेक्षाको इस्से भी सहस्रगुण समुझनी चाहिये क्योंकि विवाहके नहानेमें अविवाहित या अविवाहि- ताको एकप्रकारके संतोपकी धारणा बदिबनी रहतीहै और विवाहके होजानेपर दोनों को एकप्रकारका उत्साह उत्पन्न होजाताहे फिर जवऐसी दशापर द्विरागमनके बंधनसे उचित अवस्थाके उपरांतभी पाँच२ सातर वोका वियोग करदेना तो यह अपराध सर्वथा उनके अधिकारियोंकाही प्रत्यक्षहै कि जो इसआग्रहसे उपेक्षा करतेहैं कि जब बिवाहसे आधाखर्च हाथावै तब यहवातहोयाइसाग्रहसे कि अब समवर्पका प्रारं- म्भहोगया जब फेर विपमआये तब दोवर्पके अंतरसेहो-तहां प्राधेखर्चका आग्रह तो सर्वथा निरर्थकहै क्योंकि जब निर्धनतासे विवाहकीही उपेक्षा अनुचितहै तो द्विरा- गमनमें धनकी क्या अपेक्षाहै प्रथम तो वातक विवाहके उद्योगमें चिंतारही जबदेव- योगसे उसबातका ठिकानालगा तब करेकरायेपर फेरकुओंमें डालदिया कि प्रवफेर प्राधाखर्च मिले तो यहविवाह विवाहोंकी गिनती श्रावे नही तो ढोलोसे खालगई फिर क्या इस्से फलसिन्दिहुई कि आपतौ दोनोपक्षी भ्रूणहत्या के भागीहोना और जिन दोनोंके सोस्यकेलिये धनलगायाथा वे दोनों यापको संतापित होतेरहे और गुरुपोंके सन्मुख यद्यपि कुछ कहतेनहीं परन्तुवेभी उनको अपराधी निश्चित करतेहैं यहबात उस भ्रूणहत्यामे भी अधिकहुई-और कानकी अवधिका जो आग्रह यद्यपि ज्योतिपचिद्याम नियतहे सो यह फछ यधिकप्रमाणके योग्यनही है क्योंकि धर्मशास्त्रने विवाह संबन्धी कोईसी छोटीमोटीभी बातकीआज्ञा और नियमको कहनेसे नहींछोड़ा 'मिताक्षरा साचाराध्याय। फिर इतनी बड़ीबात जो विवाहसे आधीगिनी जाती और घंटाघोषसी प्रसिद्धहै उस की किंचित् समस्याभी नकरता जो प्रमाण योग्यहोती-और जोयहवातकहोकिज्योति पभी एकप्रकारका शास्त्र है क्या उसकीवात प्रमाण योग्यनहीं होसक्ती है तिसका यह सिद्धांतहै किज्योतिपमें चोरोंकेलिये चोरीकरनेकेभी मुहर्तलिखे, अपघातियोंके लिये किप्तीके घातकरनेकेभी मुहूर्त्तलिखेहें तो क्या उसमुहर्त्तकें लिखेहोनेसे चोरीकरनेकी प्रमाणता या वधकरनेकी प्रमाणता धर्मशास्त्रमेंभी मानलीजायगी अर्थात् ज्योतिपमें यहवातहै किचाहै कोईअच्छा अथवा खोटेसेखोंटा कामभीकरनेचले और मुहूर्तबूझै या कोई ऐसानवीन कामकरनेचलै जिसकामुहूर्त लिखाहुनहींहै उसकाभी मुहूर्त ज्योतिपीको शुभाशुभनक्षत्रोंकेअनुसार फहदेनापरैगा तो क्या वहवात धर्मसंबंधी स- मझीजायगी-और भलाजो लोकाचारसे प्रमाणभीकरौ तो किसकेलिये वहद्विरागम- नका कालपरिमाणहै कि जिनके अतिवाल्यअवस्थामै विवाहहोजाते हैं उनको वतिक पिताकेघर निवासकरनाहोताहै जब गमनाकियाजाताहै तव विषमवर्षे लीजातीह-प- रंतु जिनके पूर्ण अवस्थामै विवाहहोतेहैं उनके लिये यहपरिमाण अनुचित और अ- संभवहै और भलाजो उनकेलियेभी कोईलीकपीटनाचाहै तो उनविपमयोका अनु- कल्प विषममाससं सूचितहै उसन्यायसे कि जैसे यज्ञोपवीतमें (ब्रह्मचर्य)का अनुकल्प एकघटिका दोघटिकामात्रमें होजाताहै-कदाचित् यहकहो कि हमारीबुद्धितौ ज्योतिष के ऊपर आरूढ़है जयकोई ज्योतिपका विधिनिषेधपायाजाय तभी अनुकल्पमें बुद्धि जमै और मनको संतोपाव-तहाँ-पित्र्यगृहेचेकुचपुप्पसंभवस्तदानदोपःप्रतिशुक्र संभवः-यह ज्योतिषकाबाक्य जोसारेलोकमें घंटाघोपवत्प्रसिद्धहै तिसका यह भावा- र्थहै कि जो कन्या पिताकेघरमें कुच और पुष्पवतीहोनेलगे तो गौनेमें जो सन्मुख शुक्रका बड़ादोपगिनाजाताहै.सो उसकन्याकैलिये वहदोपनहीं है अर्थात् ऐसीकन्या कागौना शुक्रकेसन्मुखभी निःसंदेहकरी-अवकहो कि जोशुक्र केवल कोईमहीनोंका महिमानहोताहै किंतु कुछमहीनोपीचे वह सन्मुखसे हटजाताहै तिसपीचे गौनाहोस- ताथा परंतु उतनेमहीनोंकेलियेभी ऐसीकन्याका निवासपिताकेघरमें उचितनसमझा गया इसलिये ज्योतिपनेभी यह कहदिया कि निःसंदेह शुक्रकेसन्मुखभेजदो कुछदोप नहींहै-फिर भला धनकेाग्रहसे अथवा विषमवीकेयाग्रहसे तीनवर्ष या पाँच या सात या नौबर्पताई ऐसीकन्याकाराखना ऐसाहे या नहीं कि जैसे कोईकिसीपक्षीकोपर वशपीजरामें बंदकरै-अब ध्यानधरनाचाहिये कि गौनेकेविचारमध्ये सम और विपम का भेद यह एक साधारणभावसे लोकाचारकी रीतिहे कुछ धर्मशास्त्र विहित नहींहै और यद्यपिलोकाचारकेहेतुसे पीछे२ ज्योतिपमेंग्रथितहुई औरप्रमाणपाईगई तथापि जिनयुग्मवोका दोपमानते हैं तिनकेन्नागे सन्मख शक्रकादोप बड़ाप्रवलहे तिसका 'मिताक्षरा स० आचाराध्याय। कुछअनुकल्पभीनहींरक्खा किंतु समूलउसका परिहारकरदियागया. उस परिहारकी अपेक्षासे यद्यपि समवर्षीकामी परिहारहीउचितहै कुछ अनुकल्पकी आवश्यकतानहीं रही परंतु लोकाचारकीदृष्टिसे युग्मवोंकेचीच विपममासौंका अनुकल्पहोना यह स- चौपरिउत्तमहै-इन सवकारणोंके सिद्धांतसे द्विरागमनकी उपेक्षावाला उस्से दशगुण दंडनीयहै कि जोकुछदंड विवाहकीउपेक्षामें उचितहोताहो ६४॥ सकप्रदीयतेकन्याहरस्तांचोरदंडभाक् । दत्तामापहरेत्पूर्वाञ्छ्रेयाश्चेदरमाव्रजेत् ६५ ॥ भक्ष०-एकबारकन्या दीजियेहे उसको हरनेवालाचोर दंडकाभागीहै-दीहुईको भी हरलेवे जो पहलेसे श्रेय वरावै ६५ ॥ मभिक-शास्त्रका यह नियमहै कि कन्याएकहीवार दानकरीजातीहै उसे जो कोई पिता देकर फिरहरै वह चोरकेसमान दंडदेनेयोग्यहे-परंतु जो पहलेवरकी अपेक्षा विद्या कुटुंब आदि विशेषताओंसेयुक्त ऐसा कोईबर हाथाजावै तौ उस दीहुईको भी नदेवै किंतु उस दूसरेको विवाहिदेव तो वह दंडकेयोग्यनहींहै-परंतु यहबात उसी अवस्थामें होसक्तीहै कि जब पहलेवरमें कोईसा पातकयोग या प्रवलरोग या कुछ दुराचरण उसकाप्रकटहो अन्यथा श्रेष्ठवरके मिलनेसेही नहीं होसक्तीहै क्योंकि जब यहीवात निश्चितहुई तो एकसेएकअधिक श्रेष्टवर प्रतिदिन हाथआसक्तेहें-सो यहदे देनाभी सप्तपदीके सातवेंपदसे पहले२ नियतहै अर्थात् जय सातवांपदपराहोजाय तब उसवरकेदोष प्रकटहोनेपरभी दूसरेको नहीं देसक्ताहै ६५ ॥ अनारख्यायदोपदंडउत्तमसाहसम् । अदुष्टांतुत्यजन्दंड्योदूपयंस्तुमृपाशतम् ६६ ॥ अक्ष०-दोपको न कहकरदे तहांउत्तम साहसदंड-अदुष्टाको छोड़ताहुआभी दंढ्य हे-मृपा दूपण देताहुआ एकसौसे ६६॥ अभिल-जोकोई नेत्रोंसे दिखाईदेनेयोग्य कन्याके किसीदोपको कहेविना कन्यादान करताहै वहपिता उत्तम साहसनामका दंडदेने योग्यहे-और जोकोई अदोपा कन्याको लेकर पीछेत्यागनेलगै वह वरभी उत्तम साहसकी संस्थावाला दंडदेने योग्य होताहे या जोकोई विवाहसे पहलेही अदोषा कन्याको महारोगादि कुदोपोंका भुंठा दृपण लगाताहै वहवर एकसौ १०० पणका दंडदेने योग्यहै ६६ ॥ भथिल-उत्तम साहसदण्डका परिमाण एकहजार १००० पणका मनुजीने कहाहै और याज्ञवल्क्य योगीश्वरने १०८० पणका कहाहै और पएका परिमाण जोसमुझा चाहोतो इसयाचाराध्यायके अंतमे ३६४ केइलोकमें देखना परन्तु यहबातभीस्मरण वनीराखौ कि यहपणको और उत्तमसाहसको थादिलेकर परिमाणीका जाननाकेवल ज्ञानमात्रकैलिये उचितहै अन्यथा इनसे संप्रति कुछकाम नहीं चलसक्ता क्योंकि ये प्राचीन व्यवहारोंके प्रकार कहेहुयेहें श्रीरतुलापरिमाण या मुद्रापरिमाण अपनी भाव- मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। श्यकता पर वर्तमान राज्यसेअपेक्षा रखताहे और यद्यपि उसके हिसाबकी परिगणना करिके वर्तमान समयके मुद्रातथा तुलामानसे तुल्यताभी करलीजासक्तीहै परन्त इस्से कोईसीफल सिद्धिनहींहै जोइतनाबड़ा तुपकंडनकरी क्योंकि जो दंडइसश्लोकमैकहे हैं वेभी राजद्वारके आधीन हैं और यद्यपि कदाचित् कोई स्थल ऐसाभी पानिपड़े कि राजहारसेभिन्न किसीप्रकारके मनुष्योंके आधीन यहवार्ताहो तहांभी वे मनुष्य उसी मुद्रा अथवा तुलामानसे दंडकरेंगे किजो उनके वर्तावामें प्रारहाहो-हाँ केवल इतनी बातहै कि जवशास्त्रके अनुसार दृष्टिकरेंगे तब इतनाध्यान करनेवेंगे कि शास्त्रमें इस विषयपर इतने पण लिखेहँ हमें भी उसके अनुसार चलना चाहिये जिस्से इसदंडके विचारमें हमसे कुछ अन्याय न होजावे-परन्तु उस अनुसारतामेभी कुछ यही नियम नहींहै कि जोकुछ लिखाहो वही दंडसर्वत्रहोसक्ताहो अर्थात् दण्डके विचारमें पहलेती विचारकरने वालेका बलावल फिर अपराधका बलावल फिर अपराधीका वलावल फिर देशकाल शक्तिव्यवहार व्यवहारकाहेतु इनसबके बलाबलका निर्णयकरलिये पीछेजोकुछ सवकी संमति या एकहीप्रधानकी बुद्धिमें समावै सो कियाजाताहै ६६ ॥ अक्षताचक्षताचैवपुनर्भूःसंस्कृतापुनः । स्वैरिणीयापतिहित्वासवर्णकामतःश्रयेत् ६७॥ अक्ष-अक्षता और क्षताभी पुनः संस्कारकरीहुई पुनर्भ-और स्वैरिणीजोपतिको छोड़कर कामसे सवर्ण के आश्रयहो ६७॥ अभि-दोप्रकारकी(पुनर्भू)होतीहैं एकतौ क्षतादूसरी अक्षता तिनमें क्षतातो वहकिजो विवाहपहले किसीपुरुपके संसर्गसे दूपितहो और अक्षतावह किजो पुरुपदूपित नहो परंतु संस्कार दूपितहो किंतु पहलेभी किसीके साथसगाई आदिकुछसंस्कार होचुका हो जैसा ६५के श्लोकमें पिछले अद्धाकाभावहै कि सातवें पदसे पहले औरको देदेवे यह दोनोंप्रकारकी कन्या जवकिसीके साथ विवाहीजाती हैं तब(पुनर्भ)कहलातीहें यह (पुन ) भीजो पतिको छोड़कर कुमार अवस्था में कामके हेतुसे सवर्ण अर्थात् जाति- मात्रके मनुष्यका आश्रयले रहे वह स्वैरिणी कहलातीहै ६७॥ भपुत्रांगुर्वनुज्ञातोदेवरःपुत्रकाम्यया । सपिंडोवासगोत्रोवावृताभ्यक्तऋतावियात् ६८ ॥ भक्ष-यपुत्राको पुत्रकी कामनासे गुरुयोंसे श्रनुज्ञापायाहुया देवर या सपिंडया सगोत्रघृतकालैप कियेहुये ऋतुकालमें गमनकरे ६८॥ मनिल-अपुत्राका यहनियम नहींहै कि विधवा या सधवा किंतु साधारण वाक्यमे विधवा और क्लीवादिभार्या इसकाभावहे ऐसीअपत्राकेपुत्र उत्पादन करनेकी कामना से गुरुकहिये पितामाता पुरोहित आदिकी सुसंमतिपूर्वक आज्ञामिलनेपर देवर अपने सारेशरीरमें घृतका लेपकरिके केवल ऋतुकालमें गमनकरे-स्वकीय देवरके अभाव में १२ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। सपिण्डदेवरहो सपिण्डदेवरके अभावमें सगोत्रदेवरहो-सपिण्ड और सगोत्रका लक्षण ५२ केश्लोककी अधिकोक्तिमें निश्चितहै ६८॥ भधि-इसश्लोकमें कहीहुईवा (संदिग्धधर्म) मेंगिनतीहै क्योंकि याज्ञवल्क्यजीके वचनका स्पष्ट अर्थतो यही है जो ऊपरलिखागया-और यद्यपिसमयका प्रतिपालकरने केलिये इसइलोकका-अनुकर्षभी कियागयाहै कि (यस्याघिवेतकन्याया वाचासत्येकृ- तेपतिः। तामनेनविधानेननिजोविंदेतदेवरः) अर्थात जिसकन्याकेविवाहकी वाचासत्य होचुकीहो कि यहअमुकवरको बिबाही जायगी सो वाचासत्यहोना सगाईको कहते हैं किसीदेशमें उसीको वररक्षाकहतेहैं कहीं रुकावानिकहतेहैं इसदशाकेउपरांत वहपति मरजाय जिसको सगाई दीगईथी तौउसीका छोटाभ्राता उसकन्याको उसीविधिसे वि- वाहलेवे जो विधि उसकेलिये विवाहमें होनी उचितथी-इसाशयके अनुकर्पसे उस ऊपरली वार्ताको भी वाग्दत्ता कन्याका विषय निश्चय किया है परन्तु यह अनु- कर्प ऐसा है कि जैसा जल तैल विंदुन्याय क्योंकि वह विषय.और है यह और है उसमें क्षेत्रजसन्तान का विषयकहा है इसमें विवाहका विषयकहा है दूसरे यह वात कि वाग्दत्ता कन्याके संतान उत्पादन करना यह असंभव है और वाग्दत्ता का विवाह जोछोटेभाई से कहा तो इसकाकुछ आश्चर्य नहीं है क्योंकि वाग्दत्ता उस मरेहुये की पत्नी नहीं कहसक्ती है भला वाचासत्य होना यहतौबहुत छोटीवात इससे कुछ विवाह नहीं कहलासक्ताहै परन्तु ६५ केश्लोकमें उत्तराई में सप्तपदीके छठे पद ताईभी वहकन्या किसी अन्यवरको देदेनीकही है जो पहलेकी अपेक्षा दूसरा श्रेष्ठ आजावै-इससे यह अनुकर्पतो उसमें कोईप्रकारसे घटतानहीं है क्योंकि जो वाग्दत्ता कन्या देवरको विवाहीजातीहै वहउस देवरकीही भार्या औरउससे जो संतानहोतीहै सोभी उसी देवर की संतानकहातीहै मरेहुयेकी क्षेत्रजनहीं कहाती और वह देवर उ- सका देवर नहीं कहासत्ता क्योंकि उसमरेहुयेका भार्यात्व उसकन्यामें केवलनाममा-- त्र उत्पन्नहुआ था कुछउसकी भार्यानहीं होगईथी (भेदर) यद्यपि ऊपरका लेख सबसत्य है और शास्त्रकी विधि वही है जो याज्ञवल्क्यजीने कही परन्तु सिद्धांतउसका . इतनाहे किंवह विधिलोक विरुद्धप्रत्यक्षहै इससे उसकाप्रचारनहीं है तथापि वहलोक विरुद्धता सार्वलोकी और सार्वदेशी नहींहै किंतथद्यापि किसीकिसी देश बिभागमें उत्कृष्टजाता और बहुधा शुद्रजातों में प्रचारभी पायाजाता हे परजहांनिंद्य है तहां अनुचित है ६८॥ भागर्भसंभवाद्गन्छेरपतितस्त्वन्यथाभयेत् । भनेन विधिनाजातःक्षेत्रजोत्यभवेत्सुत्तः ६९॥ भक्ष०-गर्भके संभवताई से पीछे या अन्यथा गमनकर तो पतितहोवे-इसविधिसे भवासुत इसका क्षेत्रज होवे ६६ ॥

मिताक्षरा स० आचाराध्याय। अभि.-ऊपरले अर्सठके श्लोकमें कहीहुई विधिसे जोपुत्रउत्पन्न होवे सो उसंपति काक्षेत्रजपुत्र कहावै जिसकीवह भार्या है-परन्तु वहगमन करनेवाला देवरजो गर्भ होजाने पीछेभी गमनकरै या अन्यथा कहिये गुरुत्रोंकी आज्ञाविना याशरीरमै घृत कालेप कियेविना या ऋतुकाल विनाती वह पतित कहिये पातकीहोवे ६६॥ “अधि०- घृतकालेप इसलिये है कि परस्पर देहका सौख्यनहीं व्यापै किंतुकेवल गर्भके प्रयोजन की आवश्यकता है ६६ ॥ हताधिकारांमलिनांपिंडमात्रोपजीविनीम् । परिभतामधावाय्यांवासयेद्व्यभिचारिणीम् ७ ॥ भक्ष०-व्यभिचारिणी को अधिकारसे हनिमलीन पिंडमात्र भोजनवती परिभूता नीचे शयनवाली करिके वासकरावे ७०॥ अभि०-जोस्त्री व्यभिचार करनेलगै उसको इसप्रकार से घरमें वासदेवे अधिकार से हीन अर्थात् जो घरकी मालकियत का अधिकार पालनपोपण देनालेना आदि स्त्रियों के प्राधीन होताहै सोउसके आधीन न रक्खे-और मलीनाकहिये वस्त्राभूषण आदिश्रृंगार सेभीहीन करदेवे-और पिंडमात्र कहियेशरीर और प्राणोंके बनेरहने यो- ग्य साधारणभोजनदेवै-परिभूता कहिये धिक्कारादिसे असत्कारकरीहुईधरतीमेंशय- न करावै-इसप्रकारकीदशा सहितघर में राखै किंतुघरसे वाहरनहीं निकालदेवै७०॥ अधि-यहदशा इसलिये है किजिससे व्यभिचारसे वैराग्यहोजाय परन्तु इससे अधिककोईसी पीड़ाअथवा शरीर दंडनहीं देवै क्योंकि स्त्रियों केलिये वड़सेबड़े अप- राधपरभी चाहे किसी अवसरमें घरसेवाहर विसर्जनभी करदेनाप. परंतु देहदण्ड या प्राणदण्ड यह किसी अवस्थामें नहीं उचितहे-तथाहि (महताचापराधेनदंडःस्त्री- पांविसर्जनम् ) सोइसकाविशेष प्राशयमागे ७२ के श्लोकमें कहेंगे ७०॥ सोमःशौचंददावासा गंधर्वश्चशुभांगिरम् । पावकःसर्वमेध्यत्वमेध्यवियोपितोह्यतः७१ ॥ मक्ष०-इन्होंको सोमतौ शौचदेताभया और गंधर्वशुभवाणी-अग्निसर्वमेध्यत्वदेता है इस्से स्त्रियाँ मेध्य हैं ७१ ॥ भाभ-स्त्रियोंको विवाहसे पहले कुमार अवस्थामें चंद्रमा गंधर्व अग्नि येतीनोंभो- गतेहैं तहाँचंद्रमातौ शौचदेताहै इसीहेतुसे स्त्रियोंकेलिये अधिक शौचविधि पुरुषों के समान नहीं कहीहै-और गंधर्व इनकोभोगकरके मधुरवचनों का बोलनादेते हैं-य- ग्नि इनको सर्वमेध्यत्व कहिये पवित्रतादेताहै अर्थात् जिसवस्तुको ये वें वह इनके छूनेसे पवित्रहो इसकारणसे स्त्रियाँ सदाही पवित्र हे ७१ ॥ व्यभिचाराहतोशुद्धिगर्भेत्यागोविधीयते । गर्भभर्तृवधादीचतामहतिपातके ७२ ॥ भक्ष-व्यभिचारसेऋतुशुद्धि-गर्भमैत्यागकहियेहे-गर्भ और भर्तीके वध आदि में भी-तैसेही महापातकमें ७२॥ 1 . ५२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। अभि०-व्यभिचारकी संभावनाहोनेसे मासिक रजोदर्शनमें स्त्रियाँ शुद्धहोजाती हैं परंतु व्यभिचारसे गर्भहोजाने में उनकात्यागकरदेना उचितहै और गर्भका वध कहिये गर्भपातन और अपने भर्ताका मारडालनाआदि अपराधों में भी त्याग-तैसेही महा- पातक ब्रह्महत्या आदि करनेवालीका भी त्याग कहते हैं ७२॥ अधिः-भर्नाकामारडालना आदि-इस(भादि)शब्दसे शिष्यत्रादि का गमनभीलेना सोई व्यासजीने कहाहै कि(चतस्रस्तपरित्याज्याःशिष्यगागुरुगाचयापतिघ्नीचविशे- पेणमुंगितोपगताचया)अर्थात् चारस्त्रियाँये भी त्यागकरने योग्य हैं एकतौ शिप्य क- हिये नोकर चाकर आदि से गमनकरनेवाली दूसरी गुरुकहिये अपने बड़ोंसे गमन करनेवाली तीसरी विशेषकर पतिकावधकरनेवाली जिसका चर्चाऊपर आयाथा चौथी जंगितोपगता अर्थात् जुंगितकहिये प्रतिलोम जातें जो चमारादि प्रसिद्धहैं तिनसे गमन करनेवाली ७२॥ अवयहबातकहते हैं कि पुरुषको दूसराविवाह किस २ दशापरकरना चाहिये। सुरापीव्याधिताधू वन्ध्यार्थप्न्यप्रियंवदा। स्त्रीप्रसूइचाधिवेत्तव्यापुरुपहेपिणीतथा ७३ ॥ अक्ष०-सुरापीनेवाली १ व्याधिमती २ धूर्ता ३ वंध्या ४ अर्थनाशिनी ५ अप्रिय- वचा ६ तथा स्त्री पैदाकरनेवालीभी ७ पुरुपविरोधिनी - अधिवेत्तव्य हैं ७३ ॥ अभिल-ये आठस्त्रियाँ अधिवेदनयोग्य हैं अर्थात् ऐसी स्त्रियाँ जिसके घरमें हो वह पुरुप दूसराविवाह निःसंदेहकर इसदूसरे विवाहकोही(मधिवेदन)कहतेहैं-याठों के स्पष्टलक्षण एकतौ जो मदिरापान करतीही १ व्याधिता जो बड़ेप्रवलरोगोंसे ग्रसी- हो २ धर्ताजो छलकरतीहो ३ वांझ ४ अर्थनी जोधन या वड़ेप्रयोजनों का नाशक- रदेतीही ५ अप्रियंवदा जो कटुकवचन शस्त्रकेसमान कहतीही ६ वारंवारकन्या पैदा करतीहो ७ पतिसे बैरकरतीहो - १७३॥ अपिल-इनलक्षणोंके कहनेसे यह सिद्धांतहै कि इनकहेहुये अवगुणों के अभावमें पुरुपको दूसरा बिवाहकरने का अधिकारनहीं है-और यद्यपि अवगुणोंके होनेपर उ- सको अधिकारतो यहाँतकहै कि जो इनमें से एकभी अवगुणहोतो द्वितीय भार्याका संग्रहकरसक्ताहै परंतु इसमें इतनी विचार दृष्टि अधिकहै किजो वहएक अवगुणउस पुरुषकी सत्पात्रताके अनुसार असह्यहों तो उसस्त्रीकी संमति बिनाभी अधिकारीहे अन्यथा जो वही अवगुण उसपुरुपौभीहो या उसकीप्रकृति और कुपात्रताके अनुसा- रसाहो तो उसस्त्रीकी संमतिबिनाकरनेका अधिकारी नहीं है-इसके सिवाय कोई कोई अवगुण उनयाठमेंमे ऐसाभीहै कि जिसकेहोनेपर सदाही उसथवगुणवतीकी प्रसन्न- ता या संमति लेलेनी उचितहै क्योंकि वह अवगुण सदेवहीं ईश्वरके आधीनहे उसमें कुछस्त्रीका अपराधनहींहै जैसा बहुत कन्याओंकाहोना इसमें जोत्री अपनी प्रसन्नतासे मिताक्षरा साचाराध्याय। ५३ अभिलापा पूर्वकसंमति देदेवै कि तुम दूसरा(अधिवेदन )करो तबकरनासुफलहै-अन्य- था जहाँकई अवगुण एकत्रहोजायँ तहाँकुछ प्रसन्नता या संमतिका नियम नहीहै-परंतु किसी अवगुणरूप कारणके विनाही जव कोई पुरुष(अधिवेदन) करना चाहे तिसका निषेध और करनेवालेका दंडभी ग्रागे ७६ केश्लोकमें कहेंगे ७३ ॥ अधिविन्नातुभर्तव्यामहदेनोऽन्यथाभवेत् । यत्रानुकूल्यंदंपत्योस्त्रिवर्गस्तत्रवर्द्धते ७४ ॥ अक्ष:-अधिविनाभी भरने योग्यहै अन्यथा महान् एनस्होवे-जहाँ दोनोंदंपत्यमें अनुकूलताह तहाँ तीनोंवर्ग बढ़ेहैं ७४॥ "अभि०-(मधिविन्ना) पहलीभार्या कहातीहे कि जिसकेऊपर दूसरीसौत आईहोसो वह(अविविन्ना)उसदूसरीके श्रावनेसे कुछ निरादर योग्य नहींहै किंच जैसे पहले उसका पालनपोपण होताथा तैसेही अवभी दानमान सत्कारोंसहित करनाउचितह अन्यथा जो पहलेके समान नहीं करैतौ वडापापहोवे और उसीपापसे उसकुटुंबीकी सर्वथाहानि होती है क्योंकि त्रिवर्ग जोधर्म १ अर्थ २ काम सौख्य और कामना ३ इनतीनोंका जो(वर्ग)कहिये समूह सोवह ऐसात्रिवर्ग नामका ऐश्वर्य उसीघरमेंहोताहै और बढ़ता है कि जिसघरमें स्त्रीपुरुपदोनोंमेंपरस्पर अनुकूलता अर्थात् प्रीतिभाव और प्राज्ञा- कारित्व दोनोंका दोनोोरसे होताहै ७४॥ अधि०-इस वार्ताकेमध्ये मनुजीनेभी अपने शास्त्र में बड़ेउत्साहसे कहाहै सो उनके कहे तीनश्लोक हमलिखतेहे-यथा(संतप्टोभार्ययाभत्तीभत्री भार्यातथैवच । यस्मिन्नेवकु लेनित्यंकल्याणंतत्रवैध्रुवम् ॥ यदिहिस्त्रीनरोचेत पुमांसनप्रमोदयेत् । अप्रमोदात्पुनः पुंसः प्रजनन प्रवर्तते॥स्त्रियांतुरोच मानायां सर्वतद्रोचतेकुलम्। तस्यान्त्वरोचमानायां सर्वमेव नरोचते)इनतीनोंका साधारण भावसे यहअर्थहै कि जिसकुलमें निरंतर भर्ती तो निजभार्यासे संतुष्ट और भार्या अपनेभ से संतुष्ट रहाकरतीहो तहाँ निश्चयकर कल्याणका निवासघनारहताहै-जोस्त्री वस्त्राभूपण आदिसे अच्छीभाँति शोभितनहीं होतीहै वहस्वामीको प्रहर्पनहीं देसक्तीहै पुनि उसीयप्रमोदके हेतुसे पुरुपकी संतति नहींहोती और न बढ़तीहै-स्त्रीके आभूपण श्रादिसे शोभावती कातिका प्रकाश घरमें होनेसे वह साराहीकुलप्रकाशित होताहै-पुनिउसी के चमत्कृत नहींहोने और निज भतीकी उपेक्षामें वहसाराही कुलमलीन होजाताहे-यह मुनीश्वरोंका सिद्धांत ऐसाठीक और यथार्थ मिलताहै जो सारे संसारपर भिन्न २ दृष्टिकरनेसे तद्रूपप्रतीत होजाताहे कि जहाँ वहवातहतहाँ वहीफलहे और जहाँ वहदशाहे तहाँ वही तद्रूपहे ७४॥ मृतेजीवतिवापत्योयानान्यमुपगच्छति । सेहकीर्तिमवाप्नोतिमोदतेचोमयासह ७५ ॥ -जोनारी पतिकैमरेपीछे ओर जीवतेहुयेभी अन्यपुरुपके समीप नहींजातीहै सो इसलोकमें सुकीर्त्तिको पावती और परलोकमें उमानाम भगवतीके साथक्रीड़ा अक्ष.- मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। करतीहै-अथवा इसीलोकमें सुकीर्तिको पायकर उमानाम जो कीर्तिकहिये प्रशंसा और कांतिकहिये शोभा और शांतिकहिये क्षेमइन सबकेसाथ आनन्द करती है ७५ ॥ भाज्ञासंपादिनींदक्षांवीरसंप्रियवादिनीम् ।त्यजन्दाप्यस्तृतीयांशमगव्योभरणस्त्रियाः ७६ ॥ अक्ष-आज्ञासाधिनी १ दक्षा २वीरसू ३ प्रियवादिनीट ऐसीस्त्रीको त्यागताहुना तिहाईदेने योग्य निर्धनभीस्त्रीका भरणमात्र ७६॥ अभि०-आज्ञाको तत्काल साधन करनेवाली १ दक्षाकहिये अतिचतुरा जो बुद्धिके विचार सहित कामकरै २ वीरसूपुत्रवाली ३ मधुरखोलनेवाली ४ इनचारों लक्षणवा- लीको छोड़कर जोकोई द्वितीयभार्याका संग्रह करलेवे तो उसके सारेधनमेंसे तिहाई दण्डराजा उसकीभार्याको दिलावे और जो वह निर्धनहोवे तौभी उसभार्याके पालन मात्रका अन्नवस्त्र दिलवायाजाय ७६ ॥ अवस्त्रियोंके धर्मकहते हैं। स्त्रीभिर्भर्तृवचःकार्यपधर्मःपरःस्त्रियाः। माशुद्धःसंप्रतीक्ष्योहिमहापातकदूपितः ७७ ।। पक्ष-स्त्रियोंकोभत्ताका कहाकरना यह परमधर्म स्त्रीका है जो भर्ता महापातक से दूपितहो तो शुद्धिहुये पीछेसेप्रतीक्षा करिवेयोग्यहे-अर्थात् जैसीआधीनी उसकीपहले राखतीथी तैसीही प्रायश्चित्त आदिहोजाने अथवा अवधि बीतजाने पीछेभीकरे७७॥ अवशास्त्र विधिसे बिवाहकरनेका फलकहते हैं। • लोकानत्यदिवःप्राप्तिःपुत्रपौत्रप्रपौत्रकैः । यस्मानस्मास्त्रियःसव्या कर्तव्याश्च सुरक्षिताः ७८ ॥ पक्ष-जिस्से लोकानन्त्य और दिवःप्राति पुत्रपौत्र प्रपौत्रों करके है तिसहेतुसे स्त्रियांसेव्यहें और सुरक्षित कर्तव्य, ७८॥. मभिः-जयस्त्रियों में यहबड़ाहेतु निश्चित हुआ कि उनकेहोनेसे दोबस्तुओं का लाभहोताहे एकतो लोफमें (मानंत्य)अर्थात् पुत्र पोता परपोता श्रादिसे वंशकी स्थि- तिदूसरा (दिवःप्राप्ति) अर्थात् अग्निहोत्र श्रादि गार्हस्थ्य कर्मधर्मोके प्रभावसे स्वर्गका मिलना तो इसी कारणसेस्त्रियोंका विवाहद्वारा संग्रह और भोगभी संतानकी अपेक्षा से करनाउचितहेऔर धर्मकीअपेक्षासे उनकीरखवालीभी अच्छीरीतिसेकर्तव्यहै ७८॥ मधिल-रखवाली का अधिकार यद्यपि यथायोग्य सबकोहोताहे परन्तु उसकी मु- ख्यता जो विशेषकर तीनमनुप्योंके ऊपर आरूढ़हे तिनकाकाल नियम कहते हैं कि- (पितारक्षतिकोमारेभीरक्षतियोवने। पुत्रस्तुस्थविरेभावेनत्रीस्वातंत्र्यमर्हति) अर्थात् कुमारअवस्थामें पितारक्षाकरताहे यौवन अवस्थामें पतिरक्षाकरताहे और रखापनमें पुत्रोंको रक्षाका अधिकारहै क्योंकि स्त्री किसीभी अवस्थामें स्वतंत्रहोनेयोग्य नहीं है सोई इसमर्यादको आगे ८५ के इलोकमें कहेंगे(अन्न)इसीइलोकमें यहबातभी कहींगई कि स्त्रियोंका संग्रह और भोगभी अमुकामुक हेतुसे करना उचितहै फिर इसबातसे क्या सिद्धांत निकला क्योंकि यहवातसबकोईजानताहै कि स्त्रियोंकेसंग्रह और भोगसे .

. मिताक्षरा साचाराध्याय। यहफलहोताहै फिर स्थातुपकंडन से क्याहाथाया (उत्तर) ठीकहै इसवार्ता अपने अपनेफल और लाभको मूर्खसे मूर्खभी पहिचानताहे परन्तु इसअपार संसार में एक यहवातवड़ी अद्भुतहै कि संगतिकाप्रभावहुये विना नहींरहता और यद्यपिमजेहुये पक्के मनुष्यपरवह अपना असर बहुधानहीं करसक्तीहै तथापिउसकी यहतीव्रताहै कि एक प्रकारकेगेरूबिगाड़ा निहंगलोगोंकी संगतिसेसहस्रोंघर ऊजड़होजाते हैं क्योंकिअपने अपनेपरिकर और समूहकी बढ़वारीसबकोई चाहताहै इसलिये वहलोग अतिशयभाव से गृहस्थीलोगोंके थोड़ीअवस्था के मनुप्योंको प्रपंच वार्ताकी प्रेरणापूर्वक बहकाकर अपने में मिलालेतेहैं किंतु अपना चेलावनाकर ऐसे दूरदेशोंमेंलेजाते हैं कि जहांउन के पिताश्रादि पक्षीलोग पताभी नहींलगासक्ते हैं कि वह कहांगया दश २ पंद्रह २ वर्षातक रोतेहुये ढूंढ़ते फिरतेहें जहां कहीं झूठाभी पतासुनते हैं मोहके हेतुसे दशमं- जिलपरभी दौड़ेजातेहैं जववहांसे किसीअन्यदेशकी खबरपातेहैं वहांभगेजातेहैं और माथापीट २ कर बूझते फिरतेहैं तौभी पतानहींलगता अथवा किसीका दोचार या दशपांच वर्षमें सच्चापताभी मिलगया और वह दुःखीपिता उसकेपासतक पहुंचभी गया तो उसने उसे देखतेही सूखाउत्तरदिया कि जाओ यहांतुम्हाराकुछकामनहीं जि- तनावह समुझाताहै सारीबातें उसकीकाटदेताहै कि किसका पिता किसकीमाता किस कीस्त्री हमें तो इनसेकामहै औरयद्यपि बहकालेजाने चालाऊपरकी दिखावट के लिये उस्से प्रपंचरूपसे कहता है कि जाओ परन्तु उसने वर्षोंसे पहले सिखाकर पकाकर दिया और उसकोचत्तकी वृत्ति अपनेमें फांसरक्खीहै इस्से यह वनावटकी आज्ञाभी उसदुखियाकी कामनाको पूरीनहींकरसक्ती-बहुतेरे ऐसेभीहैं कि मरेमें गिनतीहोचुके परन्तु बहुत बीपीछे किसीमंडलीके साथ या एकल्लेही देहकीचेष्टाको कुंरूप किये और तोबालेकर भीखमांगतेहुये उसीजन्मभूमिपर पाटिके उनमें बहुतेरे तो ऐसे हैं कि वह चाहतेहैं कि अवघरकेलोग हमको अपनेमेंमिलाले परन्तु वहघरवाले उसको भ्रष्टजानिकर पासनहीं खड़ाहोनेदेते-और बहुतेरोंको घरवालेभी यहबात चाहते और कहतेहैं कि यह अपनी दुखियास्त्रीके समीप बसै तो अच्छीवातहै परन्तु वहउलटा और भलेहुये दुःखको यादिकरा और मुँहफेरि चलेजाते हैं इसप्रकार से सहस्रों प्र- तिष्ठितलोगोंकी बहूवेटीअपना साराजन्म रोरोकर दुःखमें वितातीहैं कि जिनको वे विवाहिकर या गोनाहोनेसे पीछे तत्कालही छोड़कर चलेगये-बहुतेरे ऐसे भी होते हैं कि उसी अपने नगरके किसी भगमा वस्त्रवालेके फंदेमें फँसगये.और घरको छोड़कर उनके पास रहने लगे और दिनरातगांजे या चरसकी चिलमें उनकी भरनेलगे और घरकेलोग जिन्होंने बड़ेदुःखोंसे पैदाकिया पाला व्याहशादीमें धनलगाया वे अपने घरका कुतार और उसकी वाल बनिताका दुःख देखरकर सन्तापित होते हैं और वे ५६ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । धूर्त उनके पुत्रसे उन्हीं के देखते हुये चेलापने से सेवाटहलें करवाते हैं बहुतेरेऐसे हैं कि अपने घरके घरही में रहते और घरमें करीकराई रोटी विनकमाईकी खाते हैं और घरके लोगोंके कहने से घरकाकाम एकपत्ताभी उठाकर इधरसे उधर नहींधर- ते परन्तु बाबाजीकी चाकरीमें आठोपहर तत्परवने रहते और वहुधाउनकी माँग बूटी और चिलमोंमेंभी शामिल होजाते बल्कि जोहाथ लगजाताहै तौकुछ घरसे भी उठाकर बावाजीकी भेटकरि बातेहैं और यद्यपि चाहें किसीसमय प्रानिकर घर हीमें पडरहतेहैं परन्तु बाबाजीकी दीहुई शिक्षाके अनुसार अपनी विवाहितासे कभी दुखसुखकीवातभी नहींबूझते-और यद्यपि बाबाजी आपचाह सो कुकर्मकरि बातेहों परन्तु नौसीखतरको यहीशिक्षा देतेहैं कि स्त्रीका प्रसंग मतकरना नहींती सिदिहाथ नहींावेगी-बहुतेरे इसप्रकारसे शिक्षादेते हैं कि तेरेएकसंतान होचुकी अवयहस्त्रीतरी माता तुल्यहोचुकी-ऐसी कुशिक्षामोसे गृहस्थीका कच्चावालक घरकेलोगोंके हाथसे जातारहताहै तभीउसकाघर उजडसा होजाताहे और वाबाजी वहुधाथोड़ी अवस्था के मनुष्यको इसलिये बहकातेहैं कि प्रथमतो थोड़ीअवस्थाका मनुष्य सेवाटहलें- च्छीतरह करसताहे दुसरे जैसे कच्चीमट्टीको कुम्हारचाहै तैसा तोडमोड़सक्ताहै तैसेही कच्चे वालकको जो कुछ समुझाया सिखलायाजाय सोसब उसकी समुझमें शीघ्रबैठ जाताहै इससे वहउनके ढवमंशीघ्र श्राजाताहै-फिर क्योरेप्रश्नकर्ता क्यातूनहींजानता है कि जवग्रहस्थीके कच्चेवालकोंको बोटीसी अवस्था हितपूर्वक समुझाकर यहवात सिखलाई जायगीतौ पीछेवे क्योंकर किसीधर्तके फंदेमें फंसजायँगे-या-क्योंकर अपनी 'पत्नीयादि घरकेलोगोंसे निर्माही होजायँगे क्योंकि जवधुतीकी सिखाईहुई वातउनके कच्चेपनमें ऐसीपकी जमजातीहै तोक्या उसकञ्चहृदयमें अपने पितामाताकी सिखाई हुई धर्मकीशिक्षा उनके हृदयमेनही जमजायगी-फिर क्योंकर तूकहताहै कि इस ७८ केश्लोकमै कहीहुई(मर्याद) केवलस्थातुपकंडनहे-परन्तु कारणइसमें इतनाह किकञ्चा पालक पहले जिसके फदेमें फंसजाताहै उसीकी शिक्षाउसके हृदयमेंजमजातीहै इस लिये गृहस्थीको यह उचितहै कि अपनेलड़कोंको किसी गेरू विगाड़ाकी संगति में न जानेदे क्योंकि ये केवलगेरूही विगाडानहीं होते किन्तगृहस्थी के घर विगाडाभी होतेहैं-हा-इतनीबात आवश्यकहे कि जो कुछ अपनी शक्ति अथवाश्रद्धा बनिभाये सो अपना हाथ उठाकर ईश्वरहेतुसे उनकोदेघाले पर इससेऊपर उनकीकोईसी शि- क्षाको अपनेभी कानमेनलावे-क्योंकि उनकीकोईसी भी शिक्षाऐसे नहींहै कि जिसमें किसीको अपने बाधीनकरलेनेका सिद्धांतनहींपायाजाय अर्थात् यद्यपि वे अपनेमत्त्व से बहुधाकिसीको यह नहीं कहते कित हमारा चेलाहोजाय परन्तु नानाप्रकारकी वा- तोंकाजाल ऐसाफैलाते और दिखलाते और सुनातेहैं कि जिसको देखसुनकर एकबार . मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । ५७ कैसाहीचतुर और विद्वान्हो उसकाभी मन फिरजाताहै कि ये बावाजीपूरेसिद्ध दिखा- ईदेतेहे कदाचित् ऐसाबानक वनिावे कि इनसिहजीकी संगतिमें सदैव अायाजाया करों या इनकोहीअपने स्थान परठहरालूं तो नजानिये इनसेकोईसी सिद्धि मुझोमिल जाय जिससे मैं त्रिलोक विजयी होजाऊं या मेरी अमुक कामना पूरी होजाय-इसप्र- कार जब उनकी संगतिकरनेलगताहै तब कमरसे महीनों अथवा वर्षांताई उसको वहीपट्टीदियेजातेहैं जिससे सबको छोड़कर यह मेरेही आधीनहोजाय और मुखसे कहनेकी यहवातहै कि बहुतेरे मुखसेभी कहतेहैं कि तू चेलाहोजाय तो तेरेकोपरमसि- दि मिलेगी या जो मुखसे नहीं कहते वे अपनेचेलाओंसे या खुशामदीसाधकलोगोंसे कहलवातेहैं अर्थात् उसजालमेंसेकोईही बड़भागी ऐसाहोता है कि जो संगतिकरनेपर भी फंसनेसे वचजाय नहीं तो जो दरिद्रीहें वेधनकेलिये सिद्धिचाहकर फँसतेहैं कोई शत्रकी विजयमांगतेहैं जो धनवान्हैं वे धनकी वृद्धियाकोई केवल संतानकोई मंत्रकी सिद्धिया सोनेचांदीकी रसायनकावनाना आदि नानाप्रकारके लालच जो अपनेमें वे 'बताते या दिखलाते तिनकेहेतुसे उनके जालमें फंसे बिना नहींवचसक्ते इससे गृहस्थी को यह योग्यहै कि अपनीसंतानोंको उनकीसंगतिसे वचावें और छोटीसीअवस्थामें धर्म शास्त्रकी शिक्षाको सिखलाकरपहलेही पक्काकरदेवें जिससे पीछे उनको कोई सा दुःखदायीरंगन लगनेपावे७८ पोटश निशा स्त्रीणांतस्मिन्युग्मासुसंविशेत् । ब्रह्मचार्येवपाण्याद्याश्चतस्त्रश्चवर्जयेत् ७९ ॥ अक्ष-स्त्रियों का ऋतुकाल सोलहरात्रोंकातिसमें युग्मानोंमें सम्यक् प्रवेशकरै तो ब्रह्मचारीहो किच पर्व और चार पहली भी बचावे ७६ ॥ अभिः-स्त्रियोंके गर्भधारणकरने योग्य जो ऋतुकालहै सो रजोदर्शनकेदिनसे १६ रात्रिपर्यंत होताहै इसकहेहुये कालमें युग्माकहिये समरानोंमें पुत्रकी कामनासेस्त्री प्र- संगकरै-रात्रिकहनेसे दिनका निषेधनिश्चितहुआ और यद्यपि सोलहदिनकी अवधि ताई जितनी समरात्रै प्रानिपरें उनसवोंमें गमनकरनापहातक उचितहकि जो उन्हीं समरात्रोंके दिना श्राद्धादि कोईयज्ञभी पानिपडै जिसमें ब्रह्मचर्यसे रहनाउचितहो तथापि गमनकरनेसे ब्रह्मचर्य खण्डित नहींहोता परन्तुप अर्थात् पूर्णमासी अमा- वास्या कृष्णाष्टमी कृष्णचतुर्दशी इनमैसे कोई पर्व जो उनयुग्मारात्रों में पानि पड़े तो बचावे और पहलीचारराāभी अवश्यभावसेवचाचे तो वहब्रह्मचारीही कहाताहै७६ ॥ अधि०-इसअधिकोक्ति में विशेषकर मनुजीकी कहीहुई मर्यादिश्लोकों सहित लिख- तेहैं कि पहलीचाररात्रों में संगम किसहेतुसेवार्जितहे-तथाच (नोपगच्छेत्प्रमत्तोपिस्त्रिय मार्तवदर्शने।समानशयनेचैवनशयीततयासह १-रजसाभिप्लुतांनारीनरस्यह्यपगच्छतः प्रज्ञातेजोवलंचक्षुरायुश्चैवप्रहीयते २ तांविवर्जयतस्तस्यरजसासमभिप्लुताम् ।प्रज्ञाते .

५८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । जोवलंचक्षुरोयुिश्चैवप्रवर्धते) ३ इनतीनौकायहअर्थहै कि-मनुष्य चाहतैसाकामकी पी- डासे व्याकुल होकर प्रमतभी हो तथापि रजोदर्शनके दिनसजो चाररातनिपिद्ध कह- लातीहं तिनमें स्त्रीसंगमकोनजावे और उसकेसमीपमें निजशय्याभीनहींविछावअर्था- त् छूने और संभापण आदिसेमी वचे १-क्योंकि उसरजस्वलानारी के समीपजानेसे ही उसकी अग्निसे पुरुपकी इतनीहानि होतीहैं एकतौ बुद्धिभ्रष्टहोतीहै-शरीरकातेज और उत्साहमाराजायहै-बलपराक्रमनष्टहोजाताहै-नेत्रोंकीदृष्टिमंद होजातीहै-क्रम २ से आयुभी क्षीण होतीजातीहै-उसेरजस्वलाको बचावतेहुये पुरुपकी प्रज्ञातेज बल दृष्टि प्रायये सबै दिनोंदिनबढ़ते हैं ३-इसलिये यह नियम उचितहैकि-ऋतुकालाभि गामीस्यात्स्वदारनिरतःसदापर्ववर्जवजेच्चैनांततोरतिकाम्यया-अर्थात संतानपैदा करनेकेमनोरथवाला पुरुष ऋतुकालके भीतर २ संगमकर और सदाअपनी दारामही रतिरक्वै किन्तु परदारगामीनहो अथवा जिसको संतानकी अपेक्षा नहीं है परन्तुबह अपनीदाराकीप्रीतिकोउल्लंघननहींकरसक्ताहो तो ऐसापुरुषकेवल भोगमात्रकीअपेक्षा से १६ दिनकपीछेभी सुखसंगमकरे परन्तु यहनियम इसमेंभी है कि पाको बचावै४- ऋतुःस्वाभाविकःस्त्रीपराित्रयःपोडशस्मृताः।चतुभिरतरैसद्धिमहोभिःसद्विगहितैः ५ तासामायाश्चतस्रस्तुनिंदितेकादशीचया । त्रयोदशीचशेपास्तुप्रशस्तीदशरात्रयः ६ अर्थात् लियोंकोस्वाभाविकऋतुकालकी जो सोलहराकही सोउनचारदिवसोंकरके सहितहे कि जो सत्पुरुषोंकरके विशेपानिदित -तिनसोलहमसे पहलीचारराने और ग्यारहवीं तथा तेरहवीं रातिभी निंदितहै शेषदशरातें शुद्धहेंद-युग्मासुपुत्राजायन्तेलि चोऽयुग्मासुरात्रिषु । तस्माद्युग्मासुपुत्रासिंविशेदातवेस्त्रियम् ७-पुमान्पुंसोऽधिकेशुक्र स्त्रीभवत्यधिकेस्त्रियाः।समेऽपमान्पलियोवाक्षीणेऽल्पेचविपर्ययः--अर्थात् उनअच्छी देशरातोंमें भी यहभेदहे कि समरातोंके संगममें पुत्रहोते हैं विपमरातोमें कन्याहोतीहैं तिसहेतुसे पुत्रकोकामनावाला ऋतुकालकेभीतर युग्मरातोमेस्त्रीसंगमकर और कन्या फी कामनावाला अयुग्मरातोंमें परन्तु यहव्यवस्थास्त्रीपुरुप दोनोंकावर्यितुल्य होनमें होमतीहे ७-अन्यथाजोवीयतुल्य नहींहो तो विषमरातों के संगमसेभी पुत्रहोसक्ताहे उनन्यस्थामै कि जबसंगमसमय पतिकावीजयधिकहो और जो पुत्रनहो तो पुरुप के थाफारवाली कन्या-ऐसेही समरातोकेसंगमसेभी कन्याकी उत्पत्तिहोसक्तीहै कि जव मंगमके समय स्त्रीका शोणित थधिकहो पतिकावीर्यथोडाहो और जो कन्या नहींहो तो स्त्रीकेयाकारवाला पुत्रहो-परन्तु जहांदोनोंकाही वीर्यथोड़ाहोकर तुल्यहोताहे तहां नपुंसक पैदाहोताहे-अथवाजहां दोनोंके वीजमें अधिकताहो और समविपम रातोंका कुछफेर होजाय तहां कन्यापुत्र दोनोपेदाहोते हैं और जहांदोनीकाही वीर्य क्षीण या अतिशय यल्परहजाताहै तहांगर्भकीसंभावनानहींरहतीहे --यागेजो परमेश्वरकरता मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । ५६ है सोहोताहै क्योंकि उसकीइच्छाका अभ्यंतरपाया जाना यह असंभवहे इसलिये कि परमेश्वर में तीन शक्तिबड़ीविलक्षण होती, अर्थात् वह प्रभुनहोनेवाली बातको कर- सक्ताहै १ और होनेवालीको तत्काल मेटसक्ताहै २ और अन्यथाहोनेवालीको किसी औरही प्रकारसेकरसक्ताहै३-तथाहि(कर्तुअकर्तुअन्यथाकर्तयःशक्यःसईश्वरः)अर्थात करनेको न करनेको अन्यथा करदेनेकोसमर्थहो सोईश्वरहै-परन्तु तौभी मनुष्यकोउस- की इच्छाके भरोसे बैठारहना और उपायका न करना यहदुःखदायक हुआकरताहे- इसलिये जो कोई पुत्र की कामनारखनेवालेहों और उन विषम रातोंमेंभी संगमकरना चाहैं तो धातोंके बढ़ानेवाले उत्तम औषधों या आहारोंसे अपने वीजको वढावें और धातोंकेसुखानेवालीवस्तु रुक्ष अथवा थोडेभोजनादिउपायोंसे स्त्रीकेवीर्यकोघटाकर संगमकरैं तो भी पुत्रहोसक्ताहै सोइसकाभाव अवदेखोनीचे अस्सीकेश्लोकमें ७६ ॥ - एवंगच्छन् स्त्रियंक्षामामांमूलंचवर्जयेत् । सुस्थइन्दौसकरपुत्रलक्षण्यंजनयेत्पुमान् ८० ॥ ?, मक्ष ०-इसप्रकार सुस्थचंद्रमामें क्षामास्त्रीको गमनकरतेहुये मघामूलको भी वर्जि- तकरै तौ एकही वारमें लक्षण्यपुत्रको पुमान जन्मावे ८० ॥ . अभि०-ऊपर७९ के इलोकमें कहहुये प्रकारसे रजकसखजानेपेक्षामास्त्रीका संगम करै क्षामाकहिये हीनवीर्यवाली सो वह क्षामता,उसकी रजस्वलाके चारोंदिनतक य. थोचित नियमोंसे होतीहै जो कदाचित् नियमोंसे भी न हो तो जैसा अभी ऊपर अ- धिकोक्तिकेअंत में कहचकेहैं उनप्रकारोंसे क्षामताकरनीचाहिये पुत्रकीकामनासे और मघामल दोनक्षत्रजो निपिदहें इन्हें बचावे और वह संगम ऐसीलग्नमेंकरे कि जिस में चंद्रमाग्यारहवे या त्रिकोण आदि शुभस्थानों में पड़ाहो आगे शुभयोग और पुन- क्षत्रहों ऐसी विधि सहित एकही रात्रिके संगमसे अच्छेलक्षणवालावलवान पुत्र पैदा होवे-परंतु ऐसापुत्र उसी पुरुषके होसक्ताहै कि जिसने बालापनसे तरुणाई पर्यंत अपने वीर्यका विध्वंस किसीहेतुसे न होने दियाहो८०॥ । अधि०-पुत्रसेागे संसारमे कोईवस्तुउत्तम नहींहै जिसकारणसे बड़ेप्रतापी और , बलवान् शूरवीर भी कि जो संसारमें सबसे अपनी जयजीति चाहाकरते हैं वेभी के वलपत्रसे पराजय चाहाकरते हैं अर्थात् सभीलोग यह अभिलाप कियाकरते हैं कि मेरा बेटा मुझसे भी सहस्रगुण ऊँचाहो-तथाच (नचपुत्रात्परंलोकोकिंचिदस्तियतः पुमान्। सर्वेभ्योजयमन्विच्छेत्पुत्रादेकात्पराजयः)८०॥ यथाका भवेद्वापिस्त्रीणांवरमनुस्मरन् । स्वदारनिरतश्चैवस्त्रियोरक्ष्यायत स्मृताः ८१॥ अक्ष-या स्त्रियोंके बरको यादिकरताहुआ यथाकामीभीहो किंच स्वदार निरतहो जिस्से स्त्रियां रक्षा योग्यकही हैं ८१॥ अभिल-स्त्रियोके बरका यादिकरना यहकिजो किसीसमय इन्द्रने वरदान कियाथा ६० मिताक्षरा सा आचाराध्याय । किजो पुरुष तुम्हारी काम अभिलापाको उलाँघेगा सोपातकी होवेगा-इसलियेजो पु. रुप इसबरके प्रतिपालके हेतुसे यथाकामी होनाचाहै अर्थात् निजभार्याकी अभिलाप का विध्वंसनकरनाचाहैन्या-आपही ऋतुकालके पछिभी संगमकी कामना रखनेवाला होतो वह ऋतुके १६ दिवसके पीछेभी अपनी इच्छाके अनुरूप सुख संगमकरै परंतु यह प्रतिज्ञाहै कि अपनी दारामेंही प्रीतिरखकर परदारासे बचतारहे क्योंकि जिस- लिये ७८ के श्लोकमें स्त्रियोंकी रक्षाकरनी कहचुके हैं-सो वह रक्षारखवाली इसीरीति से होसक्तीहै कि पुरुष आप यथाकामी होकर परदारा गमनको बचावे ८१॥ अधि०-स्त्रियोंकी बिशेप रक्षाकी अपेक्षासेमनु ऋपिभी कहते हैं कि-निंद्यास्वष्टासु- चान्यासुस्त्रियोरात्रिषुवर्जयन् । ब्रह्मचार्येवभवतियत्रतत्राश्रमेवसन् - अर्थात्-ऋतु- कालकीपहलीचार और प. चार इनाठ निंदित रातोंमें और इनके सिवाय ग्यार-, हवीं तेरहवीं में भी याजो कोई औरभी निंदितहोतीहों तिनमेस्त्रीसंगमको बचातेहुये पुरुषचाहै तहाँ वसताहुआभी स्त्रीसंगम करनेसे ब्रह्मचारीही बनारहताहै-और चाहै तहाँ बसताहुआ इसकहनेसे यह निश्चितहुआ किजो मनुष्य अपने ब्रह्मचर्यकीरक्षा वनीरखनाचाहै वह चाहैतहाँ विदेशमें जानेपरभी भार्या अपनेसाथ लेजावेतो उसका ब्रह्मचर्य रहसक्ताह और स्त्री रक्षाभी यथोचित गिनतीमें आसक्तीहै-और यद्यपि यह(सहगामिल)कुछदश पाँचदिनकी साधारण यात्राके लिये परिनियमित नहींहै परंतु इसनियमका होनादोनोंकेहीलिये फलदायकहै इसीहेतुसे श्रीमहाराणी सीताजी और द्रौपदीआदि सत्कुलकी स्त्रियोंने महानिर्जनवनमें भी जानेपर अपने २ पतियोंका पी- छानहींछोड़ा था-और पहले ऋपीश्वरलोग तो सदैवही अपनी भार्याको कोशमात्र कीयात्रामें भी साथलेजाते थे क्योंकि वह तपोवरिष्ट ऋपिलोग बालहत्यासे बहुत डराकरतेथे सोई यहश्लोककहा है कि-सुस्नातायाश्चभार्यायाःसन्निधियोधिगच्छति । पुरु पोबालहत्यायाः पापंत्रामोत्यसंशयम्-अर्थात्-जोकोई पुरुप मासिकऋतुसे स्नानकरी । हुई भाव्के समीप नहींजाता हे वह निस्संदेह बालहत्याके पापको पहुंचताहे ८१॥ भतभातृपितृज्ञातिश्वभूश्चशुरदेवरैः । बंधुनिश्चस्त्रियःपूज्याभूपणाच्छादनाशनः ८२ ।। मक्ष -भर्ती भ्राता पिताजाति के लोग सासु ससुर देवर बंधुजन इनसबोंकरके स्त्रियां आभूषण बस्त्र भोजन पुष्प सुगंधिआदि से सत्कारके योग्य हे ८२॥ इसका विशेषभाव १५ के श्लोककी अधिकोक्तिमेंकह चुकेहें। संयतोपस्कराइतादृष्टाध्ययपराङ्मुखी । कुर्यात्श्वशुरयोःपादबंधनभर्तृतत्परा ८३ ॥ भक्ष०-अभि०-संयतोपस्करा अर्थात् घरकीसूप चालनीयादि सामग्रीसव जहांकी तहां ठौरठीकराखनेवाली-दक्षाकहिये अतिचतुराघरके कामों में-हृष्टाकहिये प्रसन्नमुखी- व्ययपराङ्मुखी अर्थात् खर्चसैमुँह फेरेहुये रहनेवाली किंतुसबकामकरै परन्तुखर्चकी मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। ६१ वार्तामै घरकेवड़ोंके आधीनरहे इसप्रकार अपनी मर्यादोंको वाँधेहुये भ में तत्पर बनी रहकर सासु और ससुरकी पादवंदना करतीरहे ८३॥ क्रीडांशरीरसंस्कारंसमाजोत्सवदर्शनम् । हास्यपरगृहेयानंत्यजेत्प्रोपितभरीका ८४ ॥ क्रीडाको शरीरके संस्कारोंको समाज और उत्सवके देखनेको हासबिला- सको पराये घरजाने को प्रोपितभर्तृका छोड़दे ८४॥ अभि०-दैवयोगसे जिसकिसी स्त्रीकापति विदेशमें निवासकरै वह इतनीवातों को न करै एकतौकीड़ा चौपड़ शतरंजगेंद अादि-शरीरके संस्कार उबटनाशिरगूंधनाया दि-समाजमेला आदिका देखना-उत्सव किसीके विवाहादि में तमाशा का देखना- हाँसी पराये घरकाजाना ८४॥ रक्षेकन्यांपिताविन पति-पुत्रास्तुवार्धके । अभावेज्ञातयस्तेपानस्वातंत्र्यंक्वचिस्त्रियाः ८५ ॥ अक्ष०- कन्याके विवाहसे पहलेपिता रखवालीकर-पीछेविन्ना जो विवाहिताहै तिस की रक्षाभ करे भर्ताके अभाव और दृद्धापनमें पुत्ररखवालीकरें-इनतीनोंके नहोने में इन्हींतीनोंके जातीलोग रक्षाकरें-स्त्रीको स्वतंत्रता कभीनहींहै ८५॥ पितृमातृसुतभ्रातृवश्रश्वशुरमातुलैः। हीनानस्यादिनाभ गर्हणीयाऽन्यथाभवेत् ८६ ॥ अक्ष०-पिता माता पुत्र भ्राता सासुससुर मामा इन्होंकरके रहितनहोवे विनाभर्ती के अन्यथा निंदाहोतीहै-अर्थात् जिसका भतीनहींहोवह भर्त्तासेहीनस्त्री पिता आदि से रहित अर्थात् जुदीनहोवे किंतु उनकेवशमें वनीरहै क्योंकि इससे विपरीततामेंनिं- दित हुआ करतीहै ८६॥ पतिप्रियहितेयुक्तास्वाचाराविजितेंद्रिया । सेहकीर्तिमवाप्नोतिप्रेत्यवानुत्तमांगतिम् ८७ ।। अक्ष०-पतिके प्रियकार्यमें और हितकार्य में लगीहुई श्रेष्ठ आचरणवाली विशेष कर इन्द्रियोंको जीतकर वशमें रखनेवाली सोवहस्त्रीइससंसारमें सुकीर्तिको और पर- लोकमें अतिउत्तम गतिको पावतीहै ८७ ॥ अवनीचेके श्लोकमै ऐसेपुरुपका धर्म कहतेहैं कि जिसके कईभार्याहों ।। सत्यामन्यांसवर्णायांधर्मकार्यनकारयेत् । सवासुविधौधय॒ज्येप्टयानविनेतरा ८८ ॥ अक्ष०-सवर्णास्त्रीकेहोतेहुये असवर्णासे धर्मसंबंधी कामनहींकरावै जिसके सवर्णा ही कईस्त्रियांहोंती ज्येष्ठाकोछोड़कर औरोंको धर्मकार्यमें नहींलगावै॥८॥अब उ- सका धर्मकहते हैं कि जिसकीभार्या शांतहोगईहो ॥ दाहयित्वाग्निहोत्रेणस्त्रियंवत्तवतीपतिः। प्राहरेविधिवदारानग्नाचैवाविलंवयन ८९॥ अक्ष०-वृत्तवती स्त्रीको अग्निहोत्रसे दाहकरके पतिविलंब न करताहुआ विधिव- त्दाराओं और अग्नीनकोभी बाहरणकरै ८६ ॥ अभि०-पहले कईश्लोकोंमें वर्णन करीहुई शुभाचरणवाली स्त्री मरीहुईको उस.

६२ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। का पति अग्निहोत्र नामश्रीत अग्निसे जो श्रुतिवेदमंत्रोंसे सदाघरमें स्थापित रहा करतीहै उसीको गार्हपत्य अग्निभी कहतेहैं तिससे दाहकरे-अथवा जिसकेघरमें इस वेदोक्त अग्निहोत्रकी स्थापना नहींहो तो वहस्मार्त अग्निसे दाहकर स्मातअग्निके लक्षण समुझाचाहोतो आगेवढ़कर ६७ केइलोकमें देखौउस अग्निसे या इससेदाह कियेपीछे शीघ्रही वर्षमात्रके अंतरसे वहपति फिर विवाहकी विधिसे स्त्रीका आहरण किंत आकर्षणकर-ग्राहरण या आकर्पण कहनेका यह अभिप्रायहे कि इस द्वितीय स्त्री संग्रहको परिश्रम और उपाय पूर्वकभी करै क्योंकि द्विजातीमात्रकोइस्से उपेक्षाकरनी अनुचित्तहै परन्तु उसके लिये कि जिसके उस मृताभाव्के सिवाय द्वितीया नहींहो और संतान भी नहींहो या संतानके होनेपर भी जिसकी मनोरत्ति विषयवासना से विकृतहोसक्तीहो या जिसको यज्ञादि कर्मकरनेकी कामना शेपहो सोतत्काल बाहरण करे और अग्नीनका मी बाहरणकरे अर्थात् अग्निकी स्थापना गृहस्थीमें भार्या के बिना असंभवहै क्योंकि जिसअग्निको साक्षीभूत करके विवाह कियाजाता है वहीय- ग्निगृहस्थीके घर में स्थापित करीजातीहै और निरंतर उसकी रक्षाकरीजातीहै उसीसे प्रतिदिन के अग्निहोत्र हवनपाकयज्ञ वैश्वदेव थादिसब होतेहैं फिर वही अग्निउस विवाहिताके मरनेपर उसकेदाहके साथ विसर्जन होजातीहै-अब ऐसाघरपृथ्वीपर क- दाचित् कहींद्रंदनेसे मिलसत्ताहो ८९॥ इतिविवाहप्रकरणम् ॥ द्विजातीलोगों के गर्भाधानसेलेकर विवाहताई दशौकीका विधान पूराहोचुका परंतु दशवांकर्म जो विवाहथा तिसमें कईप्रकारकी भायोकहीथीं उनसे जोसंतान- त्पन्नहोवेंगी तिनका जातिभेद अवनीचेकहते हैं कि किसभार्याकीसंतान कौनजाति में गिनीजाती है। सवर्णेभ्य सवर्णासुजायतोहसजातयः । अनिंद्यविवाहे पुपुत्राःसंतानबर्दनाः ९०॥ अक्ष-सवर्णपरुपासे सवणोभायांत्रोंमें सजातीपैदाहोते हैं किंच अनिंद्यविवाहों में वंशकेवढ़ानेवाले पुत्रहोते हैं ६० ॥ अभि०-चारोंवों के भिन्नर पुरुष और अपनेश्वर्णकी विवाहिताभार्याओं में जो संतान पैदाकरतेहैं वेसंतानें उनकीसजातीहोती हैं अर्थात जो जाति मातापितादोनों कीहो उसीजातिके वे पुत्रकहाते हैं परंतु इतनाविशेष इसमें और है कि सवर्णा विवा- हिंताभी पाठप्रकारके विवाहोंके अनुकूल पाठप्रकारकीहोती हैं इसीलिये कहते हैं कि उनमें पहले चारविवाहजो अनिंद्यहं जिनका चर्चा ५८1५८ के इलोकोंमें याचकाहे उन विवाहों को सवर्णाभायात्रा में संतानकेवढ़ानेवालेपुत्र अर्थात् वंशकोउज्ज्वलतासे प्रसिद्धकरनेवाले होतेहैं-और पिछले चारप्रकारकेविवाह जो निंदाकेयोग्य, जिनका चर्चा ६०६१ के इलोकोमेश्रायाहे उनबिवाहोंकी सवर्णाभार्याओंकीभीसंतान वंशको मिताक्षरा स० आचाराध्याय मलीनकरनेवाली होती हैं ६० ॥ यह तो ठोकर वाँकी उत्पत्ति कहीगई-यवनीचे- अनुलोमजातोंकी उत्पत्तिकहते हैं। विप्रान्मूख़्वसितोहिक्षत्रियायाविशास्त्रियां । अंबष्ट शूद्रयांनिपादोजातःपारसवोपिया ९१ ॥ भक्ष०-ब्राह्मणसे क्षत्राणीमें (मूदीवसिक्त) होताहे-वैश्यानी में (अंबष्ट) शूदिनी में उत्पन्न भयो (निपाद) या (पारसय) कहाताहै ६१॥ अभि०-ब्राह्मणसेविवाहिता क्षत्रियकन्याकेउदरमें जोपत्रहोताहै वह मूर्धावसिक्त क्षत्रीजाति कहाताहे-ब्राह्मणसे विवाहिता वैश्यकन्याके उदरमें जो संतानहोती है वह (संवष्टवैश्य)जातिकहलातीहै-ब्राह्मणसैबिवाहिता शूद्रकन्याकेउदर में जो संतानहोतीहे वह (निरादनामशूद्र) जातिहोती है-देशकेविकल्पसे अथवा कालके विकल्पसे उसीको (पारसबनाम) शद्र भी कहते हैं ६१॥ अवि०-यद्यपि क्षेत्रजसंतानकीउत्पत्ति जिसकीविधि ६८/६६ के दोउलोकोंमें कही थी उसकाजातिभावभी माताकीजातिकेसमान निश्चितहै इसमें यहतर्कवादहै किजब यहाँपर कहीहुई विवाहितास्त्रियोंकीसंताने माताकेसमानजातिवाली निश्चितहोनेपर भी मूर्धावसिक्तयादि कलंकरूप विशेषणवाली कहलाई तो उसक्षेत्रजसंतानमें भी कोईसाकलंक विशेषणहोनाचाहियेथा-तहाँयहहेतुहे कि वहबात निंद्यविवाहोमेंगिनती नहींहोसक्तीहै क्योंकि वह विवाहकाप्रसंगहीनहीं है अर्थात् यह केवल शास्त्रसंमतसे नियोग विधिपूर्वकशिष्टसमाचारकहाहै फिउसमेंकलंक या किंतुलगानेका क्याअव- सरहै-और उसकीमाताकेसमान जातिकहना यहभी एकबुदिभ्रमहै क्योंकि माताके समान जातिकहना उसअवस्थामें होसक्ताहै कि जहाँ माताअन्यजाति पिताअन्य जातिकाहो- उसकागर्भाधान स्वर्यात्पुरुपके अथवा जीवत्पुरुपके कनिष्ठभ्राता या सपिंडभ्राता या सगोत्रभ्रातासे कहा सो ये तीनों उसीस्वर्यात् या जीवत्पुरुपकी जातिसे दूसरीजातिनहीं हैं क्योंकि जो भाईकीजाति सो उसकीजातिहै उसकीवह भा- योथी इनकीभाभीहै फिर उसकीसंतानमें माताकीजातिकहना परमश्रसंभवहै क्योंकि वहसंतानक्षेत्रज उसीपुरुषकाकहाताहै और उसीका दायभाग भी पाताहै कि जिस मरेहुये या जीवत्पुरुपकी भायीमेंगर्भाधानहु इसहेतसे जिसका वहक्षेत्रजकहलाया और जिसकादायभागभीपाया उसीकेसमतुल्य उसकीजातिभी प्रत्यक्षभावसेनिश्चित है फिर उसकीजातिकलंक अथवा कितुलगसकनेका क्याअवसरहै-कदाचित् उसको (गोलक)या(कुण्ड)कहनाचाही सोयहवातवडीदरहै क्योंकि (गोलक)संतान वहीकहलाती है कि मुख्यपिताकेमरेपीछे जारपुरुपकेवीर्यसेपैदाहो-ऐसेही(कुण्ड)वहीकहलातीहै जो मुख्यपिताकेजीवतेहुये जारपुरुपके वीर्यसेपैदाहो और फिर जारपुरुपकी जातिकाभी नियम सर्वत्रनहींहोसक्ताहे कि वहकौनजातिथा याहै इसहेतसे (गोलक) और (कुण्ड) ६४ मिताक्षरा स.याचाराध्याय। इनदोनोंकाजन्म जारपुरुष और व्यभिचारिणीखीसे होताहै यह निषेधका प्रसंगहे और वह विधिकाप्रसंगहै इसका उसवातसे किंचित्भी संसर्गनहीं है-यद्यपि वहक्षेत्र- जसंतानकीमर्यादा सर्वदेशव्यापिनी या सर्वलोकव्यापिनी या सर्वजातिव्यापिनी या सर्वकालव्यापिनी नहींदेखपड़तीहै और यद्यपि इसशास्त्र में केवल देवरोंके नियोगसे क्षेत्रज संतानका जन्मकहाहै परंतु अन्यशास्त्रोंकेसंमतसे देवरोंकेअभावमें पुरोहित आचार्य ऋपि ब्रह्मचारी आदिसेभी बीजलेनाकहाहै जैसे धृतराष्ट्र पांडुविदुर ये तीनों भाई वेदव्यासजीके नियोगसे चित्रांगद और विचित्रवीर्य राजाकक्षेत्रजसंतान और क्षत्रीजाति बड़ेप्रतापीप्रसिद्धहें-अद्यापिवर्त्तमानमें किसी २देशविभागके त्रैवणिकमें यहाँतक प्रत्तिदेखीसुनीजातीहै कि भानजेकाभी वीजलियाजाता है और उनकी संतानें मुख्यपितामाताकी जातिमें उसीसमान गिनतीमें रहतीहैं कि जानो अपने मुख्यापिताकवीर्यसे जन्मपायाहो और कोईप्रकारकाकलंक या किंतु लोकप्टिसेभी उनमें नहींलगता क्योंकि वेलोग इसवामि केवलशास्त्रविधिपर आरूढहैं 69॥ वैश्याशूद्रयोस्तुराजन्यान्मादिप्योगौतुतौस्मृतौ । वैश्यात्तुकरणःशूद्राविन्नास्वैपविधिस्मृतः ९२ ॥ अक्ष-वैश्यानी शूदिनी दोनोंमें राजन्यजातिसे माहिप्य उग्रदोनोंसुतकहेहैं वैश्य पुरुपसे शुदिनीमें करण होताहै यह विधिविवाहितायोंमें कहीहै ६२॥ अभि-विवाहिता वैश्यकन्याके उदरमें क्षत्रीपतिसे माहिप्यनाम जातिका वैश्य पुत्रहोताहै-बिवाहिता शूद्रकन्याके उदर में क्षत्रीपतिसे उग्रनामजातिका शूद्रपुत्रहोता है-विवाहिता शूद्रकन्याके उदरमें वैश्यपतिसे करणनामजातिका शूद्रपुत्रहोताहे-यह विधि जो ६०1१18२ इन तीनश्लोकोंमें कहीगई सो सव विवाहितास्त्रियोंकी कही है अविवाहिताका कुछनियम नहीं है ६२ यहाँतक तीनश्लोकोंमें वर्ण और अनुलोम जातोंकीव्यवस्था कहचुके-अवनीचे प्रतिलोमजातोंका वृत्तांतकहते हैं-अनुलोम तौ उसेकहतेहैं कि जो उत्तमजातिकावीर्य हीनजातिके क्षेत्रमेंपडै सो ऊपरकहचुके और प्रतिलोम उसकोकहतेहैं कि जो हीनवर्णकाबीज उत्तमजातिके क्षेत्रमें बोयाजाय सो यह प्रतिलोमकहिये उलटाजन्म जैसा नीचेकहते हैं। ब्राह्मण्यांक्षत्रियात्सूतोवैया देहिकस्तथा । शूद्राजातस्तुचांदालःसर्वधर्मवहिप्ठतः ९३ ॥ मक्ष-ब्राह्मणीमें क्षत्रीसे सूत और वैश्यसे वैदेहिक तथा शुद्रसेउत्पन्नभया चांडा- ल जो सर्वधर्मी से बाहरकियाहै ६३॥ अभि-यह प्रतिलोमजातिकाजन्म बिवाहितामेंनहीं है क्योंकि जहाँ ५७के श्लोक में विवाहीकाअनुक्रम कहाथा तहाँ प्रतिलोमविवाह नहीं कहे हैं-इस्से यह निश्चित हुआ कि विनाविवाहिता घेरीहुई व्यभिचारिणीब्राह्मणािमें क्षत्रीजातिके पुरुपसे जो पुत्रहो वह (सूतनाति)कहलावै-याऐसीब्राह्मणीमें वैश्यजातिसे पुत्रहो वह (वैदेहिक)जा- मिताक्षरा स० आचाराध्याय। ति कहलावै-या ऐसीब्राह्मणीमें शूद्रसेजोपुत्रहो वह (चांडाल) मेंगिनाजाताहै और सव धर्मकाँसे पतितहोताहै अर्थात् वह शूद्रकीभीजातिमें गिनतीनहीं है ६३॥ क्षत्रियामागधवैश्याच्छूद्राक्षत्तारमेवच । द्रादायोगवैश्याजनयामासवैसुतम् ९४ एकार्य:-क्षत्राणीस्त्री वैश्यपुरुषसे (मागधनाम)जातिकापुत्र-औरशूद्रसे (क्षत्तारनाम) जातिकापुत्र-और शूद्रसे वैश्यानीस्त्री (प्रायोगव) नामजातिकापुत्र पैदाकरतीभई-यहदो इलोकोंमेंकहेहुये सूतवैदेहिक चांडाल मागधक्षत्ता (मायागेव) छःजाते प्रतिलोमजहोती हैं इनकी जीविकारत्ती पर्वसमयके अनुसार विशेषकर प्रौशनसनाम शास्त्र और मनुशास्त्रमेंभी शिल्पकम्मी के द्वारा कहीहें सोई उनजातेोके मनुष्य अबतकभी उन्हीं कामोंको अपनी जातिके अनुसार करते चले आते हैं ६४ ॥ अब संकर्णि संकरसे जात्यंतर कहते हैं अर्थात फिर उनजातोंसे जो जातें बढ़ींतिनका व्योरायद्यपि विस्तार होनेसे अपार सागरहै परन्तु संक्षेप करके थोड़ासा निदर्शन मात्र नीचे कहते हैं । माहियेणकरण्यांतुरथकारःप्रजायते । असत्संतस्तुविज्ञेयाःप्रतिलोमानुलोमजाः ९५॥ भक्ष-माहिप्य जातिके पुरुपसे करणी जातिकी स्त्रीमें (रथकार) पैदा होताहे-अ- सत् और सत्भी समुझने चाहिये जो प्रतिलोम और अनुलोमसे पेदाहुये ६५॥ अभि०-(दृष्टांत) जैसे क्षत्रीने वैश्यानीमें माहिप्य जातिका पुत्र पैदा कियाथा और वैश्यने शूदिनीमें करणीजातिकी कन्या पैदा करी तिस करणी स्त्रीमें उस माहिप्य पु- रुपने जो संतान पैदाकरी उसकी (रथकार) नाम जातिहुई इसकाभी यज्ञोपवीत आदि सव संस्कार करना चाहिये क्योंकि (शंख) जी कहते हैं कि क्षत्री और वैश्यके अनुलो- म वंशसे जो रथकार पैदा होताहै तिसको पूजा दान उपनयन आदि संस्कार किया और शालोत्तरी अादि घोड़ा की विद्यारथका हांकना और स्थानोंकी रचना आदि राज मिस्त्रियोंकी विद्यापढ़ना और इन्हीं कामोंसे जीविका करनेका अधिकारहै-इसी दृष्टांतके अनुसार ब्राह्मण क्षत्रीसे उत्पन्न भया जो (मूविसिक्त) और क्षत्री वेश्यसे - त्पन्नभया जो(माहिष्य)इनके अनुलोम संकरसे जो जात्यन्तरपैदाहोवे उसकोभी द्विजा- तित्व लक्षणसे सब संस्कारोंका अधिकार समुझना चाहिये इसीप्रकार जो नानानाम की जातें होती हे तिनके विशेषभेद और नाम अन्य स्मृतियों में पायेजाते हैं इनसबों में जोर अनुलोम जाती और अनुलोम मार्गोंसे पैदाहुई हों उनको अच्छी समझनी चाहिये और जोरप्रतिलोम कहिये उलटीजातों और उलटेमार्गोंसे पैदाहुई ही उन्हें उनसे हीनसमुझनी चाहिये ६५॥ यह तौ जातोंकी हीनता कहीगई अव इन्हीं जातों की उत्की कहते हैं कि कोनरसी जाति किस प्रकारसे और कितनेर कालके अंतर से फिर अपने मुख्य वर्णमें शुद्धहोकर मिलजाती है । जात्युत्कोंयुगेज्ञेयःपंचमेसप्तमेपिवा । व्यत्ययेकर्मणांसाम्यपूर्ववञ्चाघरोतरम् ९६ ।।

। ६६ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। मक्ष -जातिका उत्कर्प यगपांचवें चा सातवेंजानिये कमाके व्यत्ययमें भी समता और पूर्ववत् (अधरों) वा (उत्तरों) का न्यूनाधिक भाव जानिये ६६॥ भभि० -जातें जो मर्दावसिक्त श्रादि चारोंवोंसे उत्पन्न भईथीं तिनका उत्कर्ष क- हिये उत्तमता अर्थात् ब्राह्मणादि वर्णोकेसमान होजाना सो पांचवें या सातवें युगमें कहिये जन्ममें और (पाप)शब्दके विकल्पसेछठाजन्मभी गिनतीमें लेनासो इसकी व्यवस्था इसप्रकारसे लगाई जाती है कि जैसे पूर्वोक्त इलोकोंके अनुसार ब्राह्मणके वीजसे शूद्राके गर्भ में निषादी जातिकी कन्या पैदाहुई थी सो वह कन्या ब्राह्मण कोही विवाही गई और उस्से फिर कन्याभई तो यह दूसरा जन्म हुश्रा या इसीको दूसरा युगकहो सो यह दूसरी कन्याभी किसी ब्राह्मणको विवाही गई फिर उस्से जो तीसरे जन्मकी कन्याहुई सोभी किसी ब्राह्मणको विवाही अर्थात् इसीप्रकार निरन्तर जोक न्या होतीगई सो ब्राह्मण कोही विवाहीगई तो छठेजन्मकी कन्या जो संतान पैदाकरे गी सो वह सातवें जन्मकी संतान ठीकर ब्राह्मणवर्णकी पदवीको पहुँचेगी अर्थात् ब्राह्मणवर्णकी गिनतीमें आकर ब्राह्मणोंमें मिलजावेगी परन्तु जो वीचमें कुछ अन्तर पड़कर किसी और जातिको विवाही जाय या और जातिसे पैदाहो तो यह उत्कर्प नहीं हो सकताहै-ऐसेही ब्राह्मणके वीजसे वैश्यानीके गर्भमें अंबष्टाजाति कन्या हुईथी वह भी इसीक्रमसे पांचवेंजन्मकी कन्या बठेजन्म की संतानको ब्राह्मण वर्ण पैदाकरैगी- ऐसेही ब्राह्मणके बीजसे क्षत्राणीके गर्भ में मूवसिक्ताजाति कन्याहुई थी वहभीइ- सीक्रमसे चौथजन्मकी कन्या पांचवेंजन्मकीसंतानको ब्राह्मणवर्ण पैदाकरेगी-ऐसेही क्षत्रियके वीजसेशूद्रा के गर्भमें उग्राजाति कन्याहुईथी वहभी इसीक्रम से क्षत्रियको विवाहीजाकर छठेजन्मकी संतानको ठीकर क्षत्रियवर्ण पैदाकरेगी-ऐसेही क्षत्रियके वीजसे वैश्यानी के गर्भमें माहिप्या जातिकन्या हुईथी वहभी इसीकम से क्षत्रियको विवाही जाकर पांचजन्मकी संतानकोठीक रक्षत्रियवर्णपैदाकरेंगी-ऐसेही वैश्यके वी- जसे शूद्राकेगर्भ में करणीजाति कन्याहुईथी वहभी इसीक्रमसे वैश्यको विवाहीजाकर पांचजन्मकी संतानको ठीकर वैश्यवर्ण पैदाकरेगी-ऐसेही और भी सर्वत्र अपनी बुद्धिसे विचारकर समझलेना-यहांतक प्राधेश्लोकका अर्थ पूराहुया अब पिछले अदाका अर्थ कहते हैं कि-कोंके व्यत्ययमें अर्थात् जीविका रत्तिककर्मी में उलटा पुलटी होजानेपर भी पांचवें याठे यासातवें जन्ममें जातिकी समताहोजातीहै कि- तु जिसहीनवर्ण के कर्मसे जीविकारत्ति करताहै उसीजातिका होजाताहै जैसेब्राह्मण अपने कामोंसे निर्वाह न करसकने में क्षत्रियका कर्म करनेलगै उससेभी निर्वाह न होनेमें वैश्यकी वृत्तिकर उससेभी निर्वाहन होने में शूद्रकीत्तिकरै-ऐसेही क्षत्रिय अप- ने कर्मसे निर्वाहनहो सकनेमें वैश्यकीत्ति करै उससेभी निर्वाहनहोने में शूद्रकीवत्ति मिताक्षरा स० आचाराध्याय । ६७ करै-ऐसेही वैश्यभी अपनेकामसे निर्वाह न होने में शूद्रकीरत्तिकरै-यहअनुकल्प जी- विका दृत्तिका यद्यपिशास्त्रोक्तहे और इसीकोकों का व्यत्यय कहतेहैं परन्तु यह भी उचितहै कि जब अपनायापत्काल कटिजावै तवउस नीचत्तिको छोड़कर अपनी मुख्यत्ति फिर करनेलगै-और जोआपत्काल कटिजानेपर भीउसनीचरत्तिको नहीं छोड़े और उसत्तिके करतेहुये जिसपुत्रको पैदाकरै वहपुत्रभी उसीटत्तिको करनेलगै फिर उसपुत्रका पुत्रभी उसीयत्तिकोकरें तो इसीकर्मसेइसव्यवस्थामें जो ब्राह्मणने शूद्र वृत्तिकरी होती सातवेंजन्मका संतान ठीकर शूद्रपैदा होताहै-जोब्राह्मणने वैश्यत्ति करीहो तो छठीसंतान वैश्य पैदाहोताहै जो ब्राह्मणनेक्षत्रियको रत्तिकरीहो तोपांचवीं संतान क्षत्रिय पैदाहोताहै-जोक्षत्रियने शूद्रकीटत्तिकरीहो तौछठीसंतान शूद्रपैदाहो- ताहै-जो क्षत्रियने वैश्यकी रत्तिकरी होती पांचवीं संतान वैश्य पैदाहोताहै-जो वैश्य ने शूद्रवत्तिकरी हो तो पांचवींसंतान शूद्रपैदाहोता है-यहांतक तीनपाद अर्थात् पौन श्लोककाअर्थहोचुका अब चौथेचरणकाअर्थकहतेहैंकि(पूर्ववच्चाधरोत्तरम)यधरवाले और उत्तरवालेइन्होंका नीचहोना या ऊंचहोना पूर्वोक्त श्लोकके उत्तराईके अनुसार जानो(जैसे) मूविसिक्ताजातिकी कन्या में क्षत्रिय वैश्यशूद्रोंकी पैदाकरीहुई संता- ने औरअंवटा जातिकी कन्यामें वैश्यशूद्रों की पैदाकरी हुई संतानें और निपादीक- न्यामें शूद्रसे पैदाहुई संतानें येसब (मधर ) कहातेहैं इनको प्रतिलोमज भी कहते हैं- (तैसेही) मूवसिक्ताकन्या अंबष्टाकन्या निपादीकन्या इन तीनों में ब्राह्मणकी पैदा करीहुई संतानें और माहिल्या कन्याउया कन्याइनमें ब्राह्मणकी पैदाकरीयाक्षत्रियकी पैदाकरी संतानें और करणीकन्या में ब्राह्मणकी पैदाकरी या क्षत्रियकी यावश्यकी पैदाकरी संतानेंये सब(उत्तर)कहातेहें इनकोयनुलोमजभी कहते हैं ऐसेही और भी अपनीवद्धिसे समझलेना इनमेंजो अधरजातिकै गिनायेवहनीचे हैंजो(उत्तर )जाति केगिनाय वहऊंचेहें जैसेपहले९५ के श्लोकके पिछलेश्रद्धामें प्रतिलोम और अनुलो- मोसे परस्पर पैदाहुये न चेऊचे कहेथे ६६॥ इतिवर्णजातिविवेक प्रकरणम् ॥ यहांतक मनुष्यको जन्मसंस्कार विद्यासंग्रह विवाह और संतान यहसब करके पूरा गृहस्थी बनादिया और उसकीजातेभी निश्चित करदीगई-श्रवउस गृहस्थीको दिनी दिन जोकछ कामधंधा जिसरीतिसे करनाचाहिये कि जिससेउसका कल्याणहो और कोईसी हानिनहीं होनेपावे सोमर्यादें अवनीचे कहतेहैं। कर्मस्मातविवाहाग्नौकुर्वीतप्रत्यइंग्रही। दायकालाहतेवापिनीतंवैतानिकाग्निपु ९७ ॥ मक्ष-गृहस्थी अनुदिनु स्मार्त्तकर्मीको विवाहकी अग्निमें या दायकाल परहरी हुईमकरे-श्रीतकर्म को वैतानिक अग्नियोंमें ९७॥ भभि०-स्मृतियोंके कहेहुये वैश्वदेव विधिप्रादिकर्म स्मार्त कहलातेहँ तिनको और मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । लौकिक जो अन्नपाक आदिकर्म प्रतिदिन कियेजाते, तिनकोभी गृहस्थी जो घरका धनीहो सो विवाहकी अग्निमेंकरे अर्थात् जिसअग्निके हवनकर्मको प्रत्यक्ष करके विवाह कियाजाताहै वही अग्नि उसकेघरमें सदेव रक्षापूर्वक रक्खीजाती है तिसमेंकरे किन्तु और कहींसे अग्निलाकर न करै अथवा किसहितु से वह अग्निनहीं हो तो उसअग्निमें करें जोघरका हिस्सावांट होनेकेसमय अपनेवांटमें पाईहो अथवाजिसके घरमै ऐसीअग्निभीनहो तोवैश्यकेघरसे या किसीसत्कुल धनपात्रकेघरसेया भाड़मैसे ल्यायकर अग्निसंस्कारकी विधिसे संस्कारकरके उसमें उन कोकोकरेजो ऊपरकहे- और श्रोतकर्म जो वेदोक्तरीतों से अग्निहोत्र श्रादि कर्म होते हैं तिनको(वैतानिक) नाम शाहवनीय श्रादि अग्नि जो वेदकी विधिसे स्थापन होती हैंतिनमें करे ६७॥ शरीरचिंतनिर्वयंसतशोचविधिजिः । प्रातःसंध्यामुपासातदंतधाचनपूर्वकम् ९८॥ एकार्थः-द्विजाती गृहस्थी शंकालघु शंकाआदि शरीरकी चिंतासे निपटकर यथोक्त शौचविधि कियाहुया दन्तधावन पूर्वक स्नान आदि करिके प्रातःकालकी सन्ध्या उपासनाकरै ६८॥ अधिo-दंतधावनमंत्रश्च(आयुर्वलंयशोवर्चःप्रजाःपशुवसूनिच । ब्रह्मप्रज्ञांचमेधां चत्वनोदेहिवनस्पते) इति यद्यपि शास्त्रांतरमें कहींकहीं ब्रह्मचारीकेलिये दंतधावनका निषेधपाया जाताहै और उसीके अनुसार श्रीमत्परमहंस परिव्राजक विज्ञानेश्वरभ- द्वारक मिताक्षराकार भी यहांपर प्रमाणदेते हैं कि गृहस्थीको दंतधावन सहित संध्या श्रादिकर्म करनेकी श्राज्ञादेने के लिये यहाँपर दुसराकर संध्याकाचर्चा कियागया है क्योंकि संध्याकी चर्चा यद्यपि ब्रह्मचारीके प्रकरणमें पाचुकीथी परन्तु वहांपरदंतधा वनका च नहीं पायाथा इसहेतसे कि ब्रह्मचारीको दंतधावन करनानिषेध है तथा पि इसप्रमाणके देनेपरभी कोईसाहेतु नहींलिखतेहैं कि क्यों उसको दंतधावनका नि- पेधहे फिर विनाहेतुकी वार्ताकाप्रमाण क्योंकर मानाजाय-और जो योकहोकि यहभी एकधर्मकालक्षणहै तौजिसमें शौचिताकी विशेषता पाईजाय ऐसेधर्म लक्षणका विना हेतुकेभी प्रमाण होसक्ताहे और जहांप्रत्यक्ष भावसे मलीनता पाईजाती है तिसको विनाहेतुके प्रमाणकैसे करसके-इससे प्रत्यक्षभाव में दंतधावन का करनाही ब्रह्मचा- रीकेलियभी धर्मका लक्षण प्रतीत होताहे और नकरना अधर्मका लक्षणहै और जो यहकहो कि जो करना धर्मकेलक्षणमे गिनतीहोता तो क्या याज्ञवल्क्यजी याज्ञानहीं लिखसक्थे-हम कहतेहैं किजो उन्होंने आजा नहीं लिखी तौ निषेधभीती नहींलिखा है कि वहदंत धावनको नकर और दूसरे यहवात कि जैसे इसवातका चर्चा उन्होंने वहाँपर नहीं लिखा तैसेही औरभी अनेकबातें तच्छ समझकर नही लिखीह क्योंकि जब ब्रह्मचारीकेलिये प्रातःकालकी शोचविधिकरनालिखा तो उसकेसाथमें दंतधावन मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । आपही समझलियागया फिर उसको भिन्नलिखनेकी क्या पावश्यकता थी शौचकहने मेंउसके उपयोगी सभीकाम आगये-और जिनऋपियोंने दंतधावनका निपेधलिखा है उनकें लिखनेकाहेतु और अभिप्राय केवलइतना तो साधारणभावसे पायाजाताहै कि विद्या संग्रहकरनेवाला ब्रह्मचारी नृत्य गीत सुगंधि उचटना अंजन आदिकामोंमें यहाँ तक उपेक्षाकरदेवे कि वहअच्छीतरह दंतधावनभी नकरै अर्थात् जोदातौनिअनायास हाथलगजावे तो करलेवे नहींती आवश्यकतापूर्वक ढूँढतानहींफिरै क्योंकि उसकेर्दैढ़ने और करनेमें विलंब लेगैगा उसविलंबसे गुरुकी सेवा और विद्योपार्जनमें हानिपड़ेगी इसहेतुसे विद्यासंग्रहमें उत्साह और उत्कर्पादिखलानेकेलिये और नृत्यगीत उबटनत अंजन तेल प्रादि संस्कारोंसे मन हटानेकेलिये निषेध लिखाहै कि इनकामोंको यहां तकछोड़देवे कि दातौनिका करना जो बड़ा आवश्यक और शौचधर्मकी गिनतीम है तिसकोभी नकरै तौ दोपभागी नहीं होसक्ता परन्त तौभीदातौनिका करना यह ऐसा कामनहींहै कि जिसकेकरनेसे ब्रह्मचारीका ब्रह्मचर्य जातारहे या वहपापभागीहोजाय इसीलिये याज्ञवल्क्यजी ने इसकी विधि या निषेध दोमेंसे एकभी नहींलिखा क्योंकि विधिती शौचकर्मकी आज्ञाकेसाथ आपही पाईगई(दृष्टांत) जैसे किसीने कहाकि रोटी करौ तहांयहभाव नहींहै कि केवल रूखीरोटी करलो किंतुरोटी कहनेसे दालभाततर- कारी भादि उसके उपयोगी सभी पदार्थ समुझे गये-यौर निषेधको इसलिये नहीं लिखा कि वहनिषेध निर्विकल्प आज्ञापूर्वक नहींहै किंतु उसमें केवल साधारण हेतुहै जो ऊपर नृत्यगीत आदिके निदर्शनमै लिखागया फिर ऐसे वृथा तुपकंडनकी क्या आवश्यकताहै जो निष्प्रयोजन वातकोलिखें और ग्रंधकाविस्तार बढ़ावें इससेउसकी इच्छारही कि जैसा अवसरदेखै उसके अनुसारकरै या न करै ९८॥ हुत्वाग्नीन्सूर्यदैवत्यानजपेन्मंत्रान्समाहितः । वेदार्थानाधिगच्छेञ्चशास्त्राणिविविधानिच ९९ ॥ भक्ष०-अग्नीनको होमिकर सूर्यदेवत्य मंत्रोंकोजपै पुनि समाहितहुआ वेदकों को अधिगतहोवे थोर विविध भौतिके शास्त्रोंकोभी हो || भभि०-अग्नीनको पहले होमिकर यह असंभवहै इसलिये सूर्यदेवत्य मंत्रोंको यह ८६कश्लोकमेंजोप्रातःकालकी सन्ध्या दन्तधावन पर्वककहीथी तिसकेसाथ जुड़ा य. त्प्रोतःसन्ध्याको उपासनकर और सूर्यदेवत्य मंत्राको जो संध्याकीविधिमें होते हैं तिन्हें जपै-तिसपीछे श्राहवनीय आदि अग्नि जो जिसके घरमें कोईसी स्थापितहो तिसकोया प्रौपासन अग्निको होमिकर स्वस्थाचित्तहुये पीछे वेदके अर्थकहिये पदार्थ जो निरुक्तकल्प व्याकरणादि प्रसिद्द हे तिन्हें श्रवण मनन निदिध्यासन प्रकारो से समुझे और अनेकभांतिके संसारीशास्त्रोंकोभी सुने और विचारे अधवापढ़े यहप्रातः काल का धंधाकहा ६६ ॥ अव कुछेक दिनचढेका धंधाकहते हैं। १८ 1 - - । मिताक्षरा साचाराध्याय। उपेयादीश्वरंचवयोगक्षमार्थसिद्धये नात्वादेवानपितश्चैवतर्पयेदयेत्तया १०० ॥ एका -(योग) कहिये मुकद्दमा श्रादिकोईसा अपनाउपाय(क्षेम)कहिये रक्षासंबन्धी काम जो अपने धनजन आदिसे अपेक्षितहो-(भर्थ),कहिये धनका लाभकरना ऐसे २ कामोंकी सिद्धिकेलिये ईश्वर जो कोई नगरकाराजा या प्रधान साहूकार आदि समर्थ तिसकेपासभी जावै-वहाँसे आकर फिर स्नानकरिकैदेवताओं और पितरोंकोभी तर्प. ण और पूजनकरै १००॥ वेदाथपुराणानिसेतिहासानिशक्तितः । जपयज्ञप्रसिद्धयर्थविद्यांचाध्यात्मिकीजपेत् १०१॥ एका वेदत्रयी अथर्व पुराण इतिहास और अध्यात्मिकी नाम वेदांतविद्या इन सवोंको या किसी कित्तीको बहुत अथवा थोड़ार अपनी सामर्थ्यके अनुमानसे जप यज्ञ आदिकामोंकी सिद्धिकेलिये जपै १०१॥ यलिफर्मस्वधाहोमस्वाध्यायातिथिसक्रिया । भूतपित्रमरब्रह्ममनुष्याणांमहामवा १०२, । मक्ष बलिकर्म १ स्वधाकर्म २ होमकर्म ३ स्वाध्यायकर्म ४ अतिथिसत्कार ५ यहपॉचोकमसे-भूतयज्ञ १ पितृयज्ञ २ देवयज्ञ ३ ब्रह्मयज्ञ ४ मनुष्ययज्ञ ५ महायज्ञ कहाते हैं १०२॥ भभि०-यहपाँचो महायज्ञ गृहस्थीको रोजरोज करने उचितहोतेहैं और इलोकमें जो क्रमलिखाहै सोतो केवल संख्यामात्र जानलेनेके लियेहै और इनके करनेका क्रम जैसाविधिके ग्रंथोमें होताहै वहठीकहै इनमेंसबसे पहले ब्रह्मयज्ञ उसेकहतेहैं कि (ब्रह्म) जो परमात्मा तिसके नामसे वेदपाठ गीतापाठ उसके नामोका जप वेदांतपाठ था उसकेनामसे कुछदेना सो सब ब्रह्मयज्ञमें गिनाजाताहै १-देवतर्पण या देवपूजन वैश्व देव होमयादि जो कुत्र देवताओंके नामसे कियाजाय वह देवयज्ञ कहाताहै २-तर्पण या श्राद्ध भोजन दानादि जो कुछ पितरोकेनामसे कियाजाय या पिर संहिता का पाठही कियाजाय वह पितृयज्ञ कहाताहै ३-भूतयज्ञ जो भूतप्रेत प्राणियोके नामसे सिद्धान्नका बलिदान कियाजाता है ४-नृयज्ञ जो पूर्वोक्तयज्ञोके पीछे आयेहुये अतिथि अभ्यागतोको जिमायाजाय या शक्तिके अनुसार कुछ देदियाजाय ऋपितर्पणभी इसी नृयज्ञमें गिनती है ५॥ अधिः-इनको पंचमहायज्ञ कहते हैं यह यज्ञ यद्यपि नित्य किये जातेहैं परंतुकिसी कामनासे नहींहोसक्ते हैं किंतगृहस्थीको पाँचपाप जो अवश्यभावसे बिनाकियेमी रोज रोजलगतेहै तिनकीशांति और शरीरअथवा कुटुम्बकी निर्मलताके निमित्तमेकियेजाते है-पाँचपाप एकतौ गोखली मोगरी कुल्हाड़ी खल्लडमादि कूटनेके कामोंसे जो जीव जंतुमरतेहैं १-दूसरेचकी सिलवटा आदि पीसनेकेकामोंसे जो जीवनाश होतेहैं २- तीसरेचूल्हा अँगीठीनादि अग्निकैकामोंसे ३-चौथेजलकेकामोसे -पाँचवें बुहारी -- - - मिताक्षरा साचाराध्याय। ७१ और लीपापोतीआदिसे ५-इसीलिये संन्यासीलोग सवधंधे छोड़देतेहैं कि किसीधंधेमें जीवनहींमारजायँ-ऊोक्त पंचयज्ञोंके करनेवालेलोग वर्तमानमेंभी बहुधा सहस्र में पाँच पायेजाते हैं और ऐसेतो वहुताइतसेहोंगे कि जो एकही या दोतीन यज्ञोंको थोड़ा या बहुत अपनी शक्तिके अनुसार करते हैं-हिंदूलोगों में अत्यंत दयाभाव होनेका यहीहेतु है-जिसदिन कलियुग अपना कालका प्रभाव फैलावेगा और यह नैतिक पं. चकर्म इनसे किसीहेतुसे जातेरहेंगेतव इनमेंभी कठोरता अन्यजीवोंकी हिंसातौ कछ गिनतीमें भी नहीं प्रासक्ती किन्तुनर हिंसामें भी प्रवृत्तिहोजाना कुछ आश्चर्य नहीं है और अद्यापिसबलोग एकसे नहीं हैं किन्नु जिनमें इनकामोंका संसर्ग नहींहै उनकी प्रकृति और कठोरता को देखाचाहिये परंतु जो सृष्टिकर्ता को यह अनर्थ करना अं- गीकार नहींहै तो इनसे इनकर्मीका छूटना भी बड़ादुर्लभहै आगे उसकी ईश्वरता वही जाने कि वह किसवातम राजीहै या किसवातमें नाराज १०२॥ देवेभ्यश्चहुतादन्नाच्छेपाडूतवार्लिहरेत् । अन्नभूमोश्वाडालवायसेभ्यश्चनिक्षिपेत् १०३ ॥ अक्ष-देवताओं के अर्थहोमे हुये अन्नसे शेपमेंसे भूतवलि हरै-अन्नको भूमिमें श्वानचांडालकाकों के लियेभी छोडै १०३ ॥ भनि०-ऊपरके श्लोकमें कहेहुये यज्ञोंका थोड़ासा प्रकार भी सूक्ष्मभावसे कहते हैं कि गृहस्थी अपनी रसोई में सिद्धहुये अन्नको ब्रह्मयज्ञ किये पीछे इन्द्रादि-देवताओं केनामसे अपनी गृह्योक्त विधि सहित अग्निमेंहोमै फिर उस्से बचेहुये अन्नमें से भू- तवलि भी करै इसपीछे अपनी शक्तिके अनुसार कुछ अन्नलेकर कुत्ता चांडाल कीया आदिजीवों के लिये भी धरतीमें धीरेसे रखदेवै १०३॥ मधिल-आदिशब्दसे कीड़े और पापरोगी कुष्ठी आदि पतित इनके लियेभी रख देवे-सोई मनजीने कहा है कि-(शुनांचपतितानांचश्वपचांपापरोगिणाम् । वायसानांकृ मीणांचशननिक्षिपद्धवि) यर्थात्-कुत्ताओं पतितो चांडालों पापरोगियोंकाकों कीडा- ओंके लिये भी धीरेसे धरतीमें छोडदेवे-यह सवेरेसॉझ दोनों समय कर्तव्यहै १०३॥ भन्नपितृमनुष्येभ्योदेयमप्यन्वहंजलम् । स्वाध्यायंचान्यहंान्नपचेदनमात्मने १०४ ।' ऐ०-पितरो वामनुष्यों को भी अन्न और जलभी अनुदिन दातव्य है स्वाध्याय भी अनुदिनकरै केवल अपनेलिये अन्नको नहीं पफावै-अर्थात् देवता आदिके नामसे पकावे-यन्नके अभावमें कंदमूल फलादि कुछदेवै यहभी नहींहो तो जलही देवे-और स्वाध्याय कहिये अपना पाठनिरंतर करना इसलिये कहाहै कि भूलैनहीं १०४।। बालस्ववासिनीद्धगर्भिण्यातुरकन्यकाः । सन्भोज्यातिथिभृत्यांश्चदंपत्यो शेपभोजनम् १०५॥ ऐ०-चालक और त्ववासिनी कहिये विवाहिताकन्या जो पिता के घरमेंही धूढा गमिणी-भातुर जिस्से भूख न थेंभतीहो (कन्याअविवाहिता)अतिथि जो पहिले T + मिताक्षरा साचाराध्याय। किसी तिथिमें अपने यहां न अायाहो ऐसा कोई जातिहो-भृत्य नौकर चाकर आदि इनसवोंको तृप्तिपूर्वक जिमायकर पीछे घरका धनी स्त्री पुरुष दोनों जने वचेहुये अन्नको भोजन करें १०५॥"7" अधिक अतिथिका निराश फिरजाना यह गृहस्थीको वडाअपराधहै-तथाच (अ तिथिर्यस्यभग्नाशो गृहात्प्रतिनिवर्तते । सतस्मैदुप्कृतंदत्वा पुण्यमादायगच्छति) अर्थात् अतिथि जिसकेघरसे आशातोड़कर लौटजाताहै तिसको वह अपनासंचित पाएदेकर और उसके संचितपुण्यकोलेकर जाताहै-इसमें कुछसन्देहनहीं इसीसिद्धांत के श्राशयसे यह भी निश्चितहै कि जो अतिथिका सत्कारकरताहे वह गृहस्थी उस अतिथिको अपने संचित पाप देकर उसके संचित पुण्यको हरलेताहै-इसीसे अच्छे सज्जन गृहस्थीलोगोंके घरमें विछावना चटाई आदि धरती बैठनेको २ जल स- त्कारकेलिये ३ सूनृता कहिये सत्य मधुरभाषिणी यथार्थ वाणी मनहरनेकेलिये ४जो कुछभी और न हो तो यहचारवस्तु तो सदैवही वनीरहती हैं जिनसे आयेगयेकास- कारहो जिससे उनका पुण्य लेकर पाप बांटदियाजावै-तथाहमनुः (पानिभूमिरुदक वाक्चतुर्थांचसूनृता । एतान्यपिसतांगेहे नोच्छिद्यन्तेकदाचन:०५॥ भापोशननोपरिटादधस्तादन्नतातथा । अनग्नममृतंचैवकार्यमन्नंदिजन्मना १०६ ॥ ॥ F एका०-भोजनकरतेहुये द्विजातीको पहले (पापोशन) नाम कर्मकी भोजनविधि से अन्नकोऊपर और नीचेसेभी अनग्न और अमृतकल्प भी करलेनाचाहिये१०॥ सलत्यभिक्षवेभिक्षादातव्यासुबतायच । भोजयेचागतान्कालेसखिसंबंधिवांधवान १०७॥ पक्ष०--भिक्षुको भिक्षा दातव्यहै और सुव्रतकेलिये सत्कारसे-समयपर आये हुये सखा सम्बन्धी वान्धवोंको भी भोजनकरावे १०७॥ अभिल-साधारण भिक्षुको साधारण भिक्षादेवै और सुव्रत कहिये, ब्रह्मचारी.या यती तिसको सत्कार सहित देवै अर्थात् स्वस्ति शब्द उच्चारण करवाकर जल दान. सहित उत्तम भोजनदेवे-ऊोंक्त साधारणभिक्षाका परिमाण एक ग्रासमात्रका कहा है और ग्रासका परिमाण मयूरके अण्डामात्रका कहाहै सो यह मन्दभिक्षाहै-और ४ ग्रासमात्रके परिमाणको एक (पुष्कल) कहते हैं इतना जो कुछ अन्न दियाजावे सो मध्यमभिक्षाहै-बारपुष्फल अर्थात् सोलहयासका एक (हन्त) कहलाताहै इतना जो. कुछ दियाजावै यहपूराआहार और उत्तमभिक्षा कहलाती है-जोइससेत्रिगुणादियाजा तिसकी (भम) संज्ञा कहते हैं यहभी किसी अतियाहारीका आहारहै-यह शातातप स्मृतिका प्रमाणहै यहांतक आधेश्लोकका अर्त्य होचुका-भोजनके समयपर आयेहुये सखा कहिये अपने प्रेमीमित्रसम्बन्धी जिनसे अपने लड़का या लड़कीका सम्बन्ध हो- बान्धव शब्दसे अपने सम्बन्धियों के सम्बन्धी जहांतक नाते रिश्ते में कोई हों - . मिताक्षरा स० आचाराध्याय। ७३ उनको भी जिमावे-भोजनके समयपर आयेहुये कहनेका यह अभिप्रायहै कि इनकहे हुये मनुष्यों से कोई मनुष्य जो अपने उसी नगर या उसीमुहल्ले या उसी मकानके घेरामें रहनेवाला है कि जहां अपना निवासहै और वह साधारणभावसे मिलनेको या किसी कामकेहेतुसे अपने भोजनके समय सन्मुख पाजावे तो उसकोभी भोजनकरावे यहभी एकसत्कार और प्यारकीमर्यादा है इस्सेअपना और विराना जानाजाता है- अन्यथा विदेशी नातेदारका आनातौ बिनाभोजनके समयपरहोगा तोभी उसकेलिये रसोई फिर वनवाईजायगी उसकेलिये भोजनका समयकहना यह असंभवहै १०७॥ महोक्षवामहाजंवा प्रोत्रियायोपकल्पयेत् । सत्क्रियान्वासनंस्वादुभोजनंसूनृतंवय १०८ ॥ मक्ष०-महोक्ष यामहाजको श्रोत्रियकेलिये उपकल्पितकरै-सक्रियाकरै स्वादुभोज- नदेवै सूनृत वचनकहै ,१०८ ॥ मभिः-बड़ेलको (महोक्ष) कहतेहें बड़ेवकराको (महाज) कहतेहैं.सो यहदोवस्तु एक उपलक्षणमात्र कहाहै किंतुवारशन्दोंके विकल्पसे और पशुभी समुझलेने अर्थात् जोकोईसा उत्तमपशु अपनेघर पालरक्खाहो उसको अपने घरायेहुये श्रोत्रियकहिये वेदपारग ब्राह्मणकेनामसे उपकल्पितकर इसकाभाव नीचे अधिकोक्तिमें देखो सो यह वातकवकरै कि पहले उसआयेहुये श्रोत्रिय अथवा श्रोत्रियके उपलक्षणसे और कोई अपनामान्यभी समझना ऐसाजोकोई बहुतदिनोंपीछे अपनेघरमावे तिसकापहलेती सत्कार किंतु कुशलक्षेमका वूझना बातचीतसे खातिर्दारी करना बैठनेकोऊँचा आस- नदेना हाथ पैर धुलाना कुल्ला और स्नानकरवाना श्रादि यहसव सत्कार करै-फिर अन्वासनका यहअर्थहै कि जबतक वहनबैठे तवतक आपभी खड़ारहै जब उसको आसनपर बैठारलेवे तवपीछे आपभी उस्सेनीचाबैठे-फिर स्वादुकहिये मीठे और श्र- पेक्षित प्रियभोजन करवावै-तिसपीछे सूनृतवचन अर्थात् हमापके आगमनसेधन्य और बड़भागीहुये जो आपने इसघरको अपनेचरणोंसे पवित्र किया और भी देश काल कार्यकारणके अनुरूप जैसाउचितहो सोकहे-यहसव कियेपीचे वीचमेंही अथवा चलतेसमय पूर्वोक्तपशु उपकल्पितकरै १०८ ॥ अधि०-उपकल्पितकरना केवल देदेनेकाही अर्थनहींहै किंतु यातौ पहिलेसेही उस- केनामसे कोई पशु संकल्पिरक्खाहो कि वहावेंगे तो उनकी भेंट कियाजायगा तोभेंट- होकरदेवै अथवा पहलेसेनहीं परउसीसमय यहविचारमेंआयाकि इनकी भेंटकुछकरना उचितह तो कोईसापशु जो अच्छासमुझाया जैसा देनाचाहा उनकेसाथकिया-इसके सिवाय जिसको देनेकीसामर्थ्य तो नहीं है क्योंकि उसके एकही या दोपशुह उन्हींसेघर कापालन होताहै तो लोकाचारकी सुघड़भलाईके लिये उनपशुओंके पासउनकोलेजा करखड़ाकरै और यहकहै कि यहसब संपत्तियापहीकीहै इसमेंसे जो कुछ प्रापकीइच्छा ७४ 'मिताक्षरा स० आचाराध्याय.। मेंासोलेजाइये इतनाकहनेपर वहउंसकीशुश्रूषाअंगीकारकरआशीर्वाददेकर और उसमेंसे कुछनलेकर चले जायेंगे-परंतु इसमें इतनीढ़िता औरभीहै कि वह श्रोत्रिय जोलालचीहोगा और संसारके शिष्टाचारको नसमुझकर उस कहनेसे किसीवस्तुपर लोभदृष्टि करनेलंगे तो फिर देदेनाभी उचित-यह पशुदानकी मर्याद यद्यपि अद्यापि कहीर देश और कालकी अपेक्षासे पाईजाती है परंतु प्रवर्तित समयसे विपरीतहे- पहले समयमें इसकी प्राधान्यता इसहेतुसे लिखीगईथी कि उससमयमें बहुधा ताण की बहुताइतसे।पशुधन को उत्तम गिनाकरते थे और उसधनसे प्रजाका अच्छा पा- लनहोताथा इसीसे उसधनका अधिकार हुआ करताथा उससमयमें एकगऊया भैस का देना लेना ऐसाथा कि मानो लेनेवाले ने एक ग्राम पाया हो सिद्धांत इसका केवल इतनाहैकि जो अपनेपास कुछ और वस्तु रत्नवस्त्रादिक या रोकदेनेकोनहो तौ कोईसा पशुही अर्पणकरदेवे जो इसकोभी नदेसक्ताहो तो यह कहकर हाथजोडदेवै कि यह सवसंपत्ति तुम्हारीहै-यद्यपि उपकल्पितकरनेका अर्थ कुछ और भीहै और वह बड़ी दूरपहुँचताहे परंतु त्यातुंपकंडनसे क्या हाथ त्राताहै १०८ ॥ प्रतिसंवत्सरन्त्वया स्नातकाचार्यपार्थिवाः । प्रियोविवाह्यश्चतथायज्ञप्रत्युविज पुनः १०९॥ अक्षः-संवत्सरपीचे अर्घदेवे योग्यहें स्नातक भाचार्य पार्थिवप्रिय विवाह्यऋत्वि- क् तैसेही ऋत्विजलोग यज्ञोंमेंभी १०॥ अभि०-हरसाल यहसबलोग मधुपर्क भोजन आदिसे सत्कारकरिवे योग्यहें-एक तौ स्नातक जोतीनप्रकारके होतेहें विद्यास्नातक १व्रतस्नातक २ विद्यावतस्नातक ३ जैसा ब्रह्मचारी प्रकरणामें कह चुके हे-याचार्य जैसा ३४ श्लोकमें कहचके हैं पार्थिव राजा जिसके लक्षण आगे आचाराध्यायके अंतमे कहेंगे-प्रिय जोकोई अपना प्रेमी हो-विवाह्याजामाताआदि जोकोई अपने घर या कलमात्रमें विवाहेहो-ऋात्वजिसके लक्षण मनुसंहितामे कहेहैं और वहवेद विधिकी रीतिसे १६ प्रकारकेऋत्विजहें-और इनके सिवाय आश्वलायन ऋपिके प्रमाणसे चचा मामा श्वशुरादि जो कोई अपने संबंधीही तिनको भी-परन्तु ऋत्विज वर्षकेभीतरभी कि जबकभी यज्ञके हेतुसे यावे सत्कार करिवे योग्यहे १०६॥ , अधिर-ऊपरके लोगोको हरसाल जो कहा तिसका यह अभिप्रायहै कि जो लोग आपही किसीहेतुसे आतेजाते बनेरहे और बीचउनका सत्कारहोतारहे तो इसवात की कुछ आवश्यकता नहींहै परन्तु जिनका आनाजाना न होसक्ताहो उनकोतो अव- श्यही सालभरपीचे एकबार किसी वहानासे बुलाकर,सत्कारकरदियाकरौ क्योकि जो ऐसा नहींकरोगे तो कईवर्षों के व्यतीत होजानेपर स्नेहमें रूक्षता पडजायगी उस रूक्षताके प्रभावसे वहलोगभी ऐसेहो जायेंगेकि जानोकोई गैरहो फिर जवकभी तुमको r मिताक्षरा स० आचाराध्याय ७५ उनकी सहायता अथवा मेलमिलाप किसीहेतुसे चाहना पड़ेगा तब कदाचित् भी वह तुम्हारे साथी नहीं होसकेंगे याजोहोभी सकेंगे तो तुमको बडासापरिश्रम और दामों काभी व्यय करनापडैगा तो भी.वह मेलमिलाप ऐमा समुभाजायगा कि जैसे किसी विपत्तिसेगैरों की खुशामद करीजातीहै इसलिये इस शिष्टाचारसे कदाचित् भी मुह मतफेरो-और ऐसेही वे लोग जवतुमको किसीहेतु अथवा संवत्सरके अंतरसे यादि करें तब उनके पासजानेसेभी मुहमतफेरौ इसमेचाहै कुछ तुम्हारीहानि भी होती हो परस्नेहको मत सूखने दो १०६ ॥ भध्वनीनोऽतिथिय श्रोत्रियोवेदपारगः । मान्यावेतीगृहस्थस्यब्रह्मलोकमभीप्तत. ११०॥ । ऐ०-अध्वनीन जो बटोहीहै वह अतिथि जाननाचाहिये चाहे कोईहो-जोवेदपारग है वह श्रोत्रिय कहनाचाहिये-यहदोनों उस गृहस्थीमानके मान्य होतेहैं जो ब्रह्मलोक की इच्छा करनेवाला है-अर्थात् जो गृहस्थीनरककी इच्छाकरता हो वह चाहो इनको मानो या मतमानो-और श्रोत्रिय अथवा वेदपारग पर्याययह केवल किसीयोग्यविद्या- मात्रकोनिदर्शनहै-ौरब्रह्मलोक अथवा नरकयहदोनोंभीइसीदेहसेसंभवितहें ११०॥ परपाकरुचिर्नस्यादनिद्यामंत्रणाहते । वाक्पाणिपादचापल्यंवर्जयेच्चातिभोजनम् १११।। ऐ०-अनिंद्य के आमंत्रण विना पराये पाकमें रुचिनकरै-किन्तु निन्दित मनुष्यके नौतामें भी जीभ नहीं ललचावै और अनिंद्यके निमंत्रणसे.मुखभीनहीफेरै-और वा. पीकी चपलता जो अनृत भाषण या सभामेंकहने योग्यबात नहीं-हाथोकी चपलता मटकाना या तालीपटकाना श्रादि-पावोंकी चपलता उछलना या निरर्थक दौडकर चलना आदि इनवातोंको छोड़ देवै ओर अतिभोजन भी नहींकरै क्योकि अतिभो-। जनसे प्रथम तौ शरीरमें शिथलता अधिक होजातीहै उससे वह कोईकाम उत्साहसे नहीं करसक्ता और कामोंके न करने में सर्वथा हानिहै और देहकोदाव पीडादेकर काम करनेसे वात पित्त कफ सम्बन्धी अनेकरोग होजाते हैं इससे सूक्ष्म भोजनकरे-इसके वाय गौतमस्मृति के प्रमाणसे नेत्रमुख लिंगेन्द्रिय यादिके विकारोकोभी न करै १११॥ अतिथिश्रोत्रियंतृप्तमासीमांतमनुव्रजेत् । अह-समासीतशिटैरिटैश्चवन्धभि ११२॥ ऐ-पर्वोक्त अतिथि और श्रोत्रियके भोजन से तृप्तहुये पीछे चलतेसमय अपने ग्रामकी सीमा ताई पीछे२ साथ जाकर पहुँचाइआवै तिस पीछे कुछ दिन शेपरहेपर शिष्टो और इष्टों और बंधुजनों सहित वैठकर शाल चर्चा या लोक चर्चा करे-शिष्ट उनको कहतेहै जो अच्छे आचारवाले इतिहास पुराणादिके जाननेवालेहो-इष्ट अपने प्रियमित्रादिक जोधर्मज्ञहो-बंधु अपनेनाते गोतेके सम्बन्धी आदि जो कोई अनुकूल वार्ताके वक्ताहों ११२॥ उपास्यपश्चिमांसध्याहुत्वाग्नीस्तानुपास्यच । भृत्यै परिस्तोभुक्तानातितृप्त्यायसविौत् ११३ ॥

७६ मिताक्षरा साचाराध्याय। ऐ०-पिछली सांझकी संध्याको उपासना करिके और साँझकी अग्नीनको भी होमिकर और उपासना करिकै पुनि १०५ श्लोकमें कहेहुये सब भृत्यवर्ग सहित साधारण तृप्तिसे भोजनकरिके और चकारके ध्वन्यर्थसे घरके लाभखर्चकी चिन्तासे निपटारा करिकै तवसोवै ११३ ॥ अधि०-६८ के इलोकमें प्रातःसंध्याकी विधि कहकर यहांताई १५ इलोकोसेसा- रे दिनभरका धंधावतलाया और इसश्लोकमें सायंकालके संध्याआदि कामोंकीविधि कहकर सोनेकी आज्ञादेचुके अबआगे-दूसरेदिनके प्रभात ताईका क्रमबतलाकर पीछे गृहस्थी की और साधारण मर्यादोंको कहेंगे ११३।। ब्रा मुहूर्तेचोत्थायचिंतयेदात्मनोहितम् । धर्मार्थकामान्स्वेकालेयथाशस्तिनहापयेत् ११४ ॥ पक्ष-ब्राह्ममुहूर्त में उठकर अपने हितका चितमन करै धर्म अर्थकाम इन्होंको अपने २ नियतकालपर यथाशक्तिके अनुसार त्यागैनहीं ११४॥ भनि-चारघडीकेतड़के ब्राह्ममुहूर्त कहलाताहै उसमें पहलीराति कासोया था उठकर अपनाहित जो कुछकाम पहलेप्रारम्भ कररक्खाहो या पागेकोकरनाहो तिनको उसीसमय खाटपर बैठाहुआ पहले शोचविचारलेवे कि उसमें यों करनाउचितहै और उससमय वेदशास्त्र सम्बन्धी संशयरूप गाँठोंकोखोललेवे क्योंकि उससमय चित्तसा- वधान होताहै फिरधर्मअर्थ कामसम्बन्धी नित्यकेधंधोंको जैसा जिससमय करनाकह- चुके, अपनीशक्तिके अनुरूप करनेसे चूकैनहीं११४॥ विद्याकर्मवयोवंधुवित्तैर्मान्यायथाक्रमम् । एतैःप्रभूतै.शूदोपिवार्धकमानमर्हति ११५।। अक्ष.-विद्या १ कर्म २ अवस्था ३ बांधव ४ वित्त ५ इनसे संपन्नलोग यथाक्रमसे मान्यहें इनवढीहुई चीजोंसेयुक्त शूद्रभी वृद्धावस्थामें मानके योग्यहै ११५॥ अभिः--विद्या. यहसामान्य वचनहै कोईविद्याहो जिस्से कुछअपना या परायाभला होसक्ताहै ऐसापुरुष सबकामान्यहै १ कर्मयहभीसामान्य वचनहै इसलिये श्रौतस्मात कर्मोको आदिलेकर नानाकर्म और इसीउपलक्षणसे पुरुषार्थपूर्वकपेशा सम्बन्धीकाम भी कि जिनसेमनुष्यको उत्तम प्रसिद्धिहोतीहो इनमें यन्त्रादि निर्माताभी आसक्तेहैं (दृष्टांत) जैसे एकघड़ीसाजहै २ अवस्थामें जो जिस्सेअधिकहो वहभी उसकामान्य है ३ बांधवजनों की सम्पन्नता जिसकेघनीहो वह साधारणोंका मान्यहै ४ वित्तकहियेग्राम यानस्थानरत्नादि धनसंपत्तै जिसकेघनीहों वह औरोंका मान्यहै ५-यहपाँचौ यथा- क्रममे मान्यहोतेहैं इनपाँचौ या इनमेंसे किसीर अतिबढ़ेहुये पदार्थसे सम्पन्नशूद्रभी रखापनमे मानके योग्यहै ११५॥ अधि०-दापन केवल उसीका कहना यहबात इसहेतुसे असंभव देखपड़तीहै कि रहापनसे पहले २ इन पदार्थोंका बड़प्पन उसका निष्फल गया इसलिये इस अर्थ -- . : मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। ७७ को इस रीतिसे.लगाना चाहिये कि उक्तंपदार्थोंसे संपन्न शद्रभी योरोंके वृद्धापनमें माननीयहै किंतु जो और लोग बड़ोंकी गिनती हों वे भी उसका सत्कारकरें और गौतमजीकी स्मृतिमें जो यह कहाहै कि अस्सी'८० वर्षकी अवस्थावाला शूद्र भी श्रेष्ठहै सो यह वचन केवल उन शूद्रोंके लिये कहाहै कि जो पूर्वोक्त पदार्थोसे संपन्न नहींहों और ऊपर अभिप्रायार्थमें जो पाँचौका यथाक्रम लिखाहै उसका भावार्थ यद्य- पि यहीहै कि पहला २.श्रेष्ठहै परंतु यह निर्विशेष नहींहोसक्ता किंतु किसी अवसरकी अपेक्षा पिछला २ भी पहले २ से श्रेष्ठहोसक्ताहै यह वार्ता जो व्यवस्थापूर्वक लिखी जावै तौ विस्तारहै इसलिये सिद्धांतसे इन पाँचोकी मान्यतामें परस्परका व्यवहार ठीक निश्चितहोताहै ११५॥ ."वृद्धभारिनृपस्नातस्वीरोगिवरचकिणाम् । पंथादेयोनृपस्तेपांमान्यःस्नातचभूपतेः ११५ ॥ ऐ०-बढ़ा-भारी जो वोझलिये आताहो-राजा-स्नातक जो विद्या और वेदोक्त व्रत इन दोनों में संसिद्धहो-स्त्री-रोगी-बर जो विवाहकरने जाताहो-चक्री जो गाड़ी लिये आताहो इनको पंथादेना उचितहै किंतु इनको आतेदेख आप मार्गछोड़दे-और राजा उनका भी मान्यहै किंतु राजाका पंथवोझ और गाड़ीवाले सभीको छोड़नाचाहिये- परंतु स्नातक राजाका भी मान्यहै-जिसराहमें यह बढ़े आदि परस्पर इकट्ठहोजावें तहाँ ऊपरले ११५ के श्लोकमें कहीहुई वातोंका भी विवेककरलेना चाहिये यह शि- टाचारकी मर्यादाहै-इनके सिवाय वालक मत्त उन्मत्त पतित आदिका भी ध्यानराख- ना उचितहै ११६॥ अबनीचे वर्णोके प्रधान कोंका वर्णनकरतेहैं। इज्याध्ययनदानानिवैश्यस्यक्षत्रियस्यच । प्रतिग्रहोधिकोविप्रेयाजनाध्यापनेतथा ११७॥ अक्ष०-इज्या १ अध्ययन २ दान ३ वैश्यके क्षत्रियके भी ब्राह्मणमें प्रतिग्रह४अ. धिक तथा याजन अध्यापन भी ११७॥ अभि०-इज्या कहिये पंचयज्ञ आदि यज्ञोंका करना १ अध्ययन पढ़ना २ दान करना ३ यह तीनों काम ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य इन सबके साधारण हैं परंतु ब्राह्मण में यह तीन कर्म अधिकहें-प्रतिग्रह दानका लेना १ याजन यज्ञोंका कराना २ अध्या- पन पढ़ाना ३ इसीसे ब्राह्मण पट्कर्मा कहातेहैं ११७॥ अधि०-इन छः कामोंमेंसे पहले तीन काम तो धर्मकी साधना संबंधीहें और पि- छले तीन जीविकाके हेतुम है-सोई मनुनेकहा कि(पण्णांत कर्मणामस्य त्रीणि कर्माणि जीविका । याजनाध्यापनेचैवविशुद्धाचप्रतिग्रहात्) परंतु इसमें प्रतिग्रहभी शुद्धजाति से लेना कहाहै पतितसे नहीं-और आपत्काल या ब्राह्मणके अभावमें विद्या पढ़ना और जातिसे भी ब्राह्मणको कहाहै-ब्राह्मणकी प्रेरणासे क्षत्रिय और वैश्यको पढ़ाना भी उचितहै ११७॥ . २० । - .. ७८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। प्रधानक्षत्रियेकर्मप्रजानांपरिपालनम्। कुसीदकपिचाणिज्यपाशुपाल्यविशःस्मृतम्,११८॥ ऐ०-प्रजाका पालनकरना यह कर्म क्षत्रियका प्रधान है यही, उसका,धर्म संबंधी कामहै यही जीविकाका भी हेतुहै-और वैश्यके जीविका संबंधी प्रधान काम कुसीद कहिये व्याज बहा करना खेती वाणिज्य पशुपालना ११८॥ “शूद्रस्पद्विजशुश्रूपातयाऽजीवन्धणिग्भवेत् । शिल्पैर्वा विविधजीवद्विजातिहतमाचरन् ११९ ॥ ऐ०-शूद्रका प्रधान काम द्विजातियोंकी सेवा नौकरी आदि उससे निर्वाह नहीं होतेहुये बणिक कर्म करै अथवा नाना भाँतिके शिल्प कर्मोंसे द्विजातियोंका हित क- रताहुआ जीवै जैसे राजगीरी आदि ११६॥ प्रधिः-याज्ञवल्क्यजीने एकनिदर्शन मात्र कहदियाहै परंतु देवल ऋपिने अपने शास्त्रमें शूद्रके कामोंकी कुछ गणना भी करीहै-तथाच (शूद्रधर्माद्विजाति शुश्रूपा पाप वर्जन कलत्रादि पोपणं कर्पण पशुपालन भारोहहना पणव्यवहार चित्र कर्म नृत्यगीत वेणुवीणा मुरज मृदंग वादनादीनि) अर्थात् द्विजातीकी सेवाके सिवाय पापसे वचना भार्या आदि कुटुंब का पोषण-कर्षण कहिये हल चर्प और गाड़ी आदिका जोतना- पशुओंका पालना-भारका उठाना ढोना आदि-यापण दुकानदारी-व्यवहार लेन देन- चित्रकर्म शिल्पकाम किन्तु लोहा लकड़ी ईट वस्त्र आदिका बनाना-नृत्य नाचना-गीत गाना-और बाँसुली वीणा मुरज मृदंग आदि सब बाजाओंका बजाना आदि औरभी ऐसे २ काम यहशूद्रजातिके कर्महें ११६॥ भारति शुचिर्भूत्यभर्तीश्राद्धक्रियापरः । नमस्कारेणमंणपंचयज्ञानहापयेत् १२०॥ ऐ०-ऊपरलीबातों के होनेपरभी शूद्रकोऐसाहोना उचितहै कि केवल अपनी भार्याम रति करै-मनसे शुद्धहो-अपने भृत्यवर्गका पालनकरै-श्रादकरै-क्रियासे भी शुद्धरहे-केवल नमःइसमंत्रसे पंचयज्ञोंके करनेसेभी न चकै नमःजिसके नामके अंत में लगालियाजाताहे तिसका यही मंत्रहोजाताहे जैसे गणेशायनमः सूर्यायनमः-परन्तु वैश्वदेवकर्मको शूद्रकरै तो इसीलौकिक अग्निमें करै किंतु वैवाहिकमें नहीं यह विवेक है १२० ।। यहचारौ वर्णकेजुदे २ धर्मकहे अवनीचे साधारणधर्म कहतेहैं कि जिनका करना या न करना सबजातोको एकसाहीहोताहै ।। अहिंसासत्यमस्तेयंशौचामंद्रियनिग्रहः। दानंदमोदयाक्षांति सर्वेषाधर्मसाधनम् १२१ ॥ ऐ०-अहिंसा किंतु किसीको पीड़ा नहीदेना-सत्य अर्थात् ठीकबोलना और जिस्से किसीको पीड़ा नहींपहुंचै-अस्तेय कितु बिनादीहुई वस्तु चोरीआदि के टैंगोंसे नहींलेना-शौच शरीरकी और चित्तकीभी शुद्धता-इंद्रियनिग्रहः ५ ज्ञानइन्द्रिय ५ कर्म इंद्रियइनका जो २ विपय या कामनियतहै वहीकरना उस्से अधिक या विपरीत नहींदान कितुदीनको कुछ देना जिस्से उसका दुःख दूरहो-दम अर्थात् मनवुद्धि ।

७६ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । चित्तअहंकार इनचारोंको अपनेवश में बनाराखना-दया किंतु दुखीकीरक्षा में तत्पर- ता-कोई अपना अपकारकरै उसकोभीसहलेना और चित्तविकार नहींलाना सोयह (क्षांति है इन धर्मोकी साधना सबकेलिये तुल्यहै १२१ ॥ वयोवुद्धयर्थवाग्वेष श्रुताभिजनकर्मणाम् । पाचरेत्सदृशीवृत्तिमजिह्मामशठांतथा १२२ ॥ मक्ष बयस् १ बुद्धि २ अर्थ ३ वाक् ४ वेप ५ श्रुत ६ अभिजन ७ कर्म ८-इन्हीं के सदृशअजिमातथा अशठा रत्तिको आचरण करै १२२॥ भाभ०-इनकेसदृश उत्तिका आचरणकरना यहबात कि अपनेगुणोंकी सत्ता और हैसियतके अनुरूप कोई कामकरै याचाहै या कोईबातकहै किंतु अपनी सत्ता और है- सियतसे बढकर या गिरकरभी कुछकाम न करे और मुखसेभी न कहै अर्थात् वयस् जो अवस्थाहै सोतीनप्रकारकी होतीहै तिसमें दृष्टांत जैसे बूढ़ाअपनेयोग्य पहरैया खावै और गुरुतावालीवात कहे किंतुवालक या तरुणोंकीसी भांति छछोरपनसेनहीं ऐसेहीवालक अपने मुँहके अनुरूपयोले या करे किंतु बूढ़ों या युवानोंकीसी भांतिनहीं १ बुद्धि जिसमें जैसीहो उसीके अनुसार वोलैयाकरै २ अर्थशब्दके दो अर्थहैंएक तो धनसंपत्तै जिसकेपास जैसीहो उसके अनुरूपकाम अथवाबातकरै दूसरे अर्थ प्रयो- जनको कहते हैं किंतु जहां जैसा प्रयोजनदेखै उसके अनुसारकरै अथवा कहे ३ वाक् चाणी और वार्ताकथनको कहते हैं कितु जहांजैसीवार्ता का कथन या चर्चा होरहाहो उसीकेअनुसार वोलै या न बोलै ४ वेपकहिये लिवासवाना किंतु जिसकिप्तीने किसी हेतुसे जहाँजैसाबाना धारणकियाहो या जिसकाजैसा स्वाभाविकचलाआताहो उसकी भी लाजपालन करनीचाहिये मसलप्रसिद्धहै कि जैसाकाल काछियै तैसानाचनाचिये (दृष्टांत) जैसे एकनापितहै किसीहेतुसे कोतवालहुश्रा उसको वहक्षत्रिय वेपलेनेसेडा- कुओका पीछाकरनापड़ा ऐसेस्थलपरचाहोमृत्युभीहोजावे परउसवानेकीलाजनिवाह- ना यहीएक धर्महै उत्तरोक्त स्वाभाविक का (दृष्टांत) जैसे किसी (निर्दनवर) केसाथकोई नापित ऐसीचमकीली पोशाक पहनकरजावेजोउसबरकी पोशाककोलजातीहोतो यह कहाजायगा कि उसनेअपने स्वाभाविकवाना और पेशासभी तथाउसअवसरके प्रयो- जनसभीविपरीतकिया और इसीहेतसे वहदंडनीय निश्चितकियाजायगा-ऐसेहीकिसी राजकुमार या राजा आदि किसीप्रतापीका खवासी जो उसकासहगामी होकरमलीन कपड़े पहनती वहभीदंडनीयहै या घसियारा जो मुंशियाना वेषवनायेहुये घासवेचै तो वहभादंडनीयहै इत्यादि ५ श्रुतअर्थात् पुरुपार्थकेदेनेवाले शास्त्रोंकापढ़ना या सुनना पाइकर जहांतक होसक्ताहो उसकीलाजपालनकरै६अभिजन कहियेवंश कित जिस कुलमें जैसैआचारसे सुकीर्तिहोसक्तीहो उस्सेऊँच नीचनहीं ७ कर्मकहिये आजीवन पैशा संबंधी काम जिसने जैसा धारण कियाहो उसकी मर्यादोंके अनुसार आचारकरे । भक्ष०- मिताक्षरा स० आचाराध्याय । (दृष्टांत)जैसेकोई ब्राह्मण अथवा साधुहै वह वनियांकी दूकानकिये बैठाहै जवसरकारी आवश्यकतासे सब दुकानोंसे (रसट) मांगीजायउसकोभी उस पेशाके अनुसार देनेसे इनकारकरना अनुचित है ऐसे ऐसेनानाप्रकारके(दृष्टांत)एकएकपेशेमें संभावितहतिनको अपनी बुद्धिसेजानों ८-इनकहेहुये आचारोंमें यहउत्कर्षाहै कि उक्तरीतिसे करनेपरभी अजिमा १ और अशठा २ यत्तिवनीराखै अर्थात् उनन्याचारों में कटिलताकहिये - कड़पन और १ मत्सरतानाम चुगलीचाई २ का प्रवेशनहोनेदेवै-यह धर्मभी सबलोगों के साधारण १२२॥ यहांतक जो २ कर्म धर्म वर्णनकिये गये सो सबस्मार्त कहलाते, अर्थात् स्मृतियों कीरीतिसेहैं-अब नीचे कुछेकौत कर्मोको कहतेहैं कि जिनके करनेकेप्रकार श्रुति जो वेदहें तिनसे जानेजाते हैं पहले समय के ऋपिलोग बहुधा उन्हींकर्मों का आचार कियाकरतेथे॥ त्रैवार्षिकाधिकानोय सहिसोमंपिवेविज । प्राक्सौमिकी क्रिया कुर्याद्यस्यानंवार्पिकंभवेत् १२३ ॥ -जो त्रैवार्षिक या अधिक अन्नवाला द्विजातीहो सोई सोमपीवे-जिसके वा- पिक अन्नहो वे वहप्राक्सौमिकी क्रियाओंकोकरे १२३॥ भभि०-जिसकेघरमें तीनवर्पके उठावयाग्य अन्नहोवे या इससेभी अधिक वहीद्विजा- ती सोमपीवे अर्थात् सोमयज्ञको वहीकरै किंतु इससे थोड़ेअन्नवालानहीं क्योंकि उस यज्ञमें अन्नरसके अधिकारसे अधिक अन्नकी अपेक्षाहै इसीहेतुसे जोकोई थोड़ेअन्न वाला सोमपान करताहे वह करनेपरभी उसके फलको नहींपाताहै यहदोपभी ग्रंथां- तरोंमेंकहाहै परन्तु यहदोपभी काम्य सोमयज्ञकेलिये निश्चितहै कि जोकिसीकामना से कियाजावे और नेत्तिक अवश्यभावसे कर्त्तव्यहो उसकेलिये कुछनियम नहींह किंतु जहाँजैसा संभवहो-जिसके घरमें एकवर्षके जीवनयोग्य अन्नहोवेवहद्विजाती प्राक्सौ- मिकी क्रियाओंकोकरै अर्थात् सोमसे पहले जिन क्रियाओंका करना उचितहै तिन्हीं कोकरे सोवेक्रियाये यहहैं-अग्निहोत्रकर्म वेदोक्तदर्शकर्म वेदोक्त जो अमावसकेदिन होताहै-पूर्णमासकर्मवेदोक्त जोपूनोपरहोता है पशुकर्म वेदोक्तजोपाण्मासिक अयन कालपर होताहै-चातुर्मास्य कर्मवेदोक्त जो देवशयनमें होताहै-इस वातसे यहभी नि- श्चितहुआफि सोमकरनेका अधिकारउसीकोहै कि जोपहलेइनकर्मीकोकरलेवे१२३॥ प्रतिसंवत्सरंसोम.पशु प्रत्ययनंतथा।कर्तव्याययणेष्टिभंचातुर्मास्यानिचैयहि १२४॥ ऐ० -सोमयज्ञ वर्षयर्षपीछे संवत्सरके पलटनेपर-पशुयाग के महीनापीछे अ- यनके वदलनेपर उत्तरायण दक्षिणायनमें सदैव-तथैव याययपोष्टि जिसे आग्रयण कर्मभी कहतेहैं सोभी अयनके बदलनेपर-चातुर्मासिक कर्मभी हरसाल देवशयनमें होतेह-इनचातुर्मास्य कर्मामें प्रतिमाम एकएक चारपर्वै बड़ीप्रतिष्ठितहैं उनमें जोयज्ञ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। होतेथे तिनकेनाम-वैश्वदेवः १ वरुणप्रद्यासः २ शाकमेधः३ शुनासीरीवः४।१२४॥ एपामसंभवेकुर्यादिष्टिवैश्वानरींद्विजः। हीनकल्पनकुर्वीतततिद्रव्यफलप्रदम् १२५॥ ऐ०-इनपूर्वोक्त सोमयाग आदि (नित्य )यज्ञोंकी असंभवतामें द्विजाती (वैश्वानरी इष्टि)कोही करदेवे-यहउनके नहो सकनेकाहीन अनुकल्प कहाहै-परन्तु धनके होनेमें इस (हीनकल्प) को नकरै क्योंकि धनके होतेहुये हीनकल्प फलका देनेवाला नहींहै- और फलप्रदनाम काम्ययागजो कामना सहित कियाजावे उसकोतो कदाचित्भीधन केहोतेहुये हीनकल्पसे नहींकरै १२५ ॥ भधि०-ऊपरकी पंक्तिमै (नित्ययज्ञों) का चर्चा आयाहै अथवा जहाँ कहीं औरभी (नित्य)या नैत्तिकशब्द आयाहो उसकायहभावनहीं है कि वहकामरोजरोज कियाजावै अर्थात् नित्यया नैत्तिक उसेकहतेहैं कि जिसमें कुछकामनाकी अपेक्षातौ नहींहै परंतु करना उसका अवश्यभावसे कहाहै और चाहै वह रोजके करनेवाला कामहो जैसे संध्यावंदन अथवा पाक्षिक या प्रतिमास करनाकहाहो जैसे दर्शपौर्णमासकर्म अथवा पाण्मासिक जैसे अयनपीछे-अथवा बार्षिक जो संवत्सरपीछे परन्तु यहनियम जहाँ होकि यहकाम हमेश उसीनियत अवधिपर कियाजायसो(नित्य)है-और (काम्य) केवल वहींहै किजो किसीकामनासे जवचाहे तब कियाजाय १२५ ॥ चांडालोजायतेयज्ञकरणाच्छूद्राभिक्षितात् । यज्ञार्थलब्धमदददासःकाकोपिवाभवेत् १२६ ॥ ऐ०-शूद्रसे भिक्षा किये हुये धनसे यज्ञकरने से चांडाल जातिमें जन्मपाता है- यज्ञकेनामसे पायेहुये धनको नहींलगानेसे भासनामपक्षी जिसे शकुंतभी कहतेहे सो जन्मांतरमें होताहै अथवा काकभी १२६ ॥ अधि०-भास अथवाकाकयोनिमें रहनेकाप्रमाण मनुजीने सौवर्षोंका कहाहै-यथा (यज्ञार्थमर्थमिक्षित्वायः सर्वन्नप्रयच्छति । सयातिभासताविप्रः काकतांवाशतं समाः) अर्थात् जो ब्राह्मण यज्ञकनामसे धनकी भिक्षालायकर सवरानहींलगाता वह सौवर्ष- ताई भास यहा काकयोनिको जाताहै १२६॥ अब तपोविशिष्ठ भिक्षुक आदिग्रहस्थी विनोंके गुणकर्म कहते हैं। कुशलकुंभीधान्योवाच्याहिकोश्वस्तनोपिवा । जीवेद्वापिशिलोंछेनश्रेयानेपांपरःपरः १२७॥ कुशूलधान्य १ कुंभीधान्य २ वा-त्र्याहिकधान्य ३ था अश्वस्तनधान्य ४चाहैशिलों- यहीसे जीवे इनमें पिछला २ श्रेष्ठहै १२७॥ - (कुशूल) बुखारी जिसमें अन्नधराजाता है इतने अन्नवाला गृहस्थी (कुशलधान्य) कहाताहै १(कुंभी) यद्यपि ऊँटनी और हाथी काभीनामहै परन्तु यहांपर (कुंभी)डिहरिया डिहरामटेला जो मिट्टीके बनाकर नाज धराजाताहे इतने अन्नवाला गृहस्थी (कुंभीधान्य ) कहलाता है २ या ( ज्याहिकधान्य ) जिसकेघरमें तीनदिनका . - भाभ.- २१ मिताक्षरा साचाराध्यायः। नाजही ३ या (अश्वस्तनपान्य ) जिसकेघरमें केवल एकदिनका हो ४ यहचारौचाहै शिलोवत्ति जिसे लौकिकमें शिल्ला चुगनोकहतेहैं उससेही जीवें परन्तु इनमें पह- ले से पिछला २ अधिकश्रेष्ठहै-इसहेतुसे कि जो संतोपसे तपस्यामें तत्परवनारहे और संचयकी तृष्णासे किसीसे द्रोहनहीं बांधै १२७ ॥ अधिक- यद्यपि एक और तीनदिनके लक्षणसे टीकाकारोंने (कुंभी) कोछेदिन और (कुशूल ) को वारहदिनके अन्नवाला निश्चितकियाहै परयह योजनाअसंभवहे क्योंकि बुखारीमें कईमासके उठावेका नाज आसक्ताहै फिर १२ दिनका नियमकसे कहें-डिहरामेंभी एकमहीनेसे अधिकउठावे कानाज भासताहे फिर ६ दिनकानियम कैसेकहें- इसकेसिवाय उसके कुटुंवकी गुरुता लघुतापर दृष्टिकरने सेभी १२ या ६ दिनका नियम असंभव है इसकेसिवाय मूलश्लोक में १२ या ६ दिनका चिह्नमी नहीं पायाजाता-इसके सिवाय वह नियम अंगीकार करलेने परभी यह असंभवता है कि जवआज १२या ६ दिनका मौजूद है तोकल्हको ११ या ५ दिनकारहजायगा पोंको १० या ४ दिनका रहजायगा फिर इसनियम कोकैसे मानसकें इसकेसिवाय १२ या ६ या ३ या १ दिनों के अन्नसंचय का उपाय शिलोंछत्ति निर्णय सहित वतलाते हैं सोभी यह असंगत इसहेतुसे होता है कि वह शिलोंचरत्तिका संचयभी केवल पाण्मासिक श्रावणी अपाढ़ी अर्थात् रवी और खरीफ़की फसलोंपर दोबार होसक्ता है फिर उनपरिनियमित दिवसों के उपरांत चे बारहमास कैसे काटेंगे इस्से प्रत्यक्ष प्रतीत होताहै कि यह टीकाकार की खींखा खाँची तुपकंडनहे-निर्लेपवक्ता या- ज्ञवल्क्यजी ने साधारण भावसे एक निदर्शनमात्रजो इसीश्लोक में कहा है तिसका यह सिद्धांतहै कि जिस चोथे पदवाले को एक दिन का अनकहा तिसके घरमें चाहै दोचार दिन कामी अन्नहो तो भी वही वातहै-तीन दिनवाले केघरमें चाहै दश पाँच दिनकाहो तो भी वही वातहे-कुंभी धान्यवाले के डिहरामै चाहेचार पाँचमनभीहो तो भी वही वातहै परछ:दिनका कहना निपट असंगतहै-कुशूल धान्यवाले की युखारीमें चाहै वीस पच्चीसमन भी होतौभी वही बातहै पर बारहदिन का कहना निपट असंगत है-और शिलोंछसे कहने का यह सिद्धांतहै कि यह चारों प्रकारके संचयवाले किसी ऐसीवृत्तिसे जीविकाकरें जिस्से किसीसे द्रोहनही करनापडै सो उस किसीप्रकार का निदर्शनमात्र एक शिलोवत्तिकहदीहे कि चाहै शिलोकसेही जीवै पर किसीसे द्रोह नहींकरै परंतुयह नियमनहींहै कि केवल शिलोंछके सिवाय और कुछनकरै-सोईमन- संहितामें कहाहै कि(श्रद्रोहेणैवभूतानामल्पद्रोहेणवापुनः। यात्तिस्तांसमास्थायवित्री जीवेदनापदि।कुशूलधान्यकोवास्यात्कुंभीधान्यकएवचा ) अर्थात्-आपत्काल के विना प्राणियोंके अद्रोहसे अथवा अद्रोहकी असंभवता में थोड़े द्रोहसे जो कोईसी वृत्ति मिताक्षरा स० आचाराध्याय । होसक्तीहो उसमें आश्रित होकर ब्राह्मण अपना कालक्षेपकरै-यद्यपिऐसी सौम्य वृत्तिसे विशेष धनका संचयहोना कठिन है-इसीलिये तीसरे अडामें कहते हैं कि चाहै केवल बुखारी मात्र नाजवाला होकेरहेया इतनाभी उसत्तिसेन होसक्ताहो तो चाहे केवल डिहरामात्र नाजवाला होकरहै-परंतु कुछ इसबात का निषेधनहीहै कि अद्रोहके द्वारा भी इस्से अधिक धनका संचय नहींकरै क्योंकि पहले १२३ के श्लोकमें त्रैवार्पिकसे भी अधिक अन्नवालेको उत्तमता कहचु (भेदर) औरजोकि इसी १२७के श्लोक में थोड़े२ अन्नवाला बहुत २ वालेसे श्रेष्ठ कहागयाहे तिसका यह हेतु है कि गृहस्थी ब्राह्मणोंमें भी दो भेदहोते हैं सोई देवलऋपिने यह कहाहै कि(द्विविधोगृहस्थोयाया- वरः १ शालीनश्च २ तयोर्यायावरः प्रवरः याजनाध्यापन प्रतिग्रह रिक्थसंचय वर्ज- नात् १ पट्कर्माधिष्ठितः प्रेप्यचतुप्पदग्रहग्राम धनधान्ययुक्तोलोकानुवर्तीशालीनः २) अर्थात् दोप्रकार का गृहस्थी ब्राह्मण जिसमें एकतौ(यायावर) नामसो वह दूसरे से उ- त्तमहै क्योंकि वह यज्ञकराने आदि की जीविका भी नहीं करता पढ़ानेकी जीविका भी नहीं करता प्रतिग्रह जो दानहै सोभी नहींलेता धनका संचय भी नहीं करता है क्योंकि इनकामों में औरोंसे द्रोहकरनापड़ताहै इसलिये इन्होंने अपने निर्वाहके वेही चारप्र- कार साधारणभाव से रक्खे हैं कि जिनका चर्चा इसी १२७ के श्लोक मूल या उसके अर्थमें कहाहे और थोड़े२ अन्नवाला इसलिये उत्तम समुझागयाहै कि जहाँतक थोडा संचय और थोड़ी तृष्णा करैगा तहाँतक द्रोहभी थोड़ा करना पड़ेगा-दूसरेप्रकार का रहस्थी ब्राह्मण,जो (शालीन) नाम कहलाताहे वयद्यपि उनसे मंद कोई प्रकारसेभी नहीं होसक्ता, परंतु उसे केवल इसलिये सामान्य कहा गयाहै कि उसको जीविका की तृष्णा से बहुधा द्रोहकरने पड़ते हैं क्योंकि वे पट्कर्म प्रधान जैसे अस्मदादि हमतुम सभी जो लोकानुवर्ती किन्तु यह ग्राम धनधान्य यान पशु सेवक आदिसे संपन्न होते हैं सोई इन शालीन संज्ञक गृहस्थोंके कर्म धर्मोको ११७ के इलोकसे कहचुके है-परंतु इनमें भी चारभेद होते हैं तहाँ एकतौ इनछःकामों से जीविका करते हैं-याजन यज्ञा- दिकों का कराना १ अध्यापन पढाना २ प्रतिग्रह दानलेना३ कृषी खेतीकरना४ वा- णिज्य व्यापार करना ५ पशुओंसे जीविका ६ इनकामोंमें से चाहेकोई सा एक दो कामकरै चाहै सबके सब कामोको करै परवह एक प्रकारकी गिनतीमे है १-दूसरे इन्हीं कामों में से तीन काम किन्तु याजन १ अध्यापन २ प्रतिग्रह ३ से-तीसरे याजन १ अध्यापन २ इनदोसे ३-चौथे इनमें से पाँचकामों को निंद्य समझकर केवलपढानेकी- ही जीविका करते हैं ४-सोई मनुजीने स्पष्टकहाहै कि (पट्कमकोभवत्येपांत्रिभिरन्यः प्रवर्तते। द्वाभ्यामेकश्चतुर्थश्च ब्रह्मसत्रेणजीवति)१२७॥ इतिगृहस्थधर्मप्रकरणम् ॥ इसप्रकार गृहस्थीके स्मार्त और श्रीलकर्मोंको कहकर अब स्नानसे लेकर जो २ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । विधि और निषेध और मानस संकल्परूप व्रत स्नातकके लिये आवश्यक होते हैं सो कहते हैं। नखाध्यायविरोध्यर्थमीइतनयतस्ततः। नविरुद्धप्रसंगेनसंवोपीचभवरेसदा १२८॥ ऐ०-स्वाध्याय के विरोधी धनकी वांछानहीं करै और जहाँ तहाँसे भी नहीं अर्थात् किसी एक प्रतिष्ठित मार्गसे और निज श्रमोपार्जित विद्याके आश्रयसे धनकी बांचा करै-विरुद्ध प्रसंगसे भी धनकी वांछा नहींकरै किन्तु जैसे ब्राह्मण को अयाज्य का य- जन करानाआदि या सबोंको किसीसे घुसलेनाआदि यानृत्यगीतादिजोविरुद्धप्रत्यक्ष हैं और सदा संतोपी भी हो किन्तु लाभके न होने भी धीरज बनाराखै १२८ ॥ राजातेवातियाज्यभ्यासीदनिच्छेदनंक्षुधा। दंभिहैतुकपाखण्डिवकवृत्तींश्चवर्जयेत् १२९ ॥ ऐ०-क्षुधासे पीड़ितहुआ स्नातक राजासे या शिष्योंसे या याज्यजो यजनकराने योग्यहों तिनसेही धनलेनेकी इच्छाकरे-औरदंभीहै तुक पाखंडी वकटत्ती इनसेयहां तकबचै कि जो वनिपरै तौमखसे भी न वोले १२६ ॥ अधि०-इसवातकोमनुजीने विशेपतासे कहाहै कि (पाखंडिनोविकर्मस्थान्वैडालव- तिकान्शठान् । हैतुकान्वकटत्तींश्चवाङ्मात्रेणापिनार्चयेत् ) अर्थात् पाखंडियों १ विकर्मस्थों २ बैडालवतिौं ३ शठों ४ हैतुकों ५ वकटत्तियों ६ को वाणीमात्रसे भी सत्कारनहीं करै-शास्त्रोक्तसे सिवायनया आश्रम कल्पना करनेवाला पाखंडी -जिस कामका निषेधहै तिसका सेवनकरनेवाला विकर्मस्थहै २-बैडालव्रतीमें इतने अवगु- ए होतेहैं धर्मध्वजी सदालोभी छामिकछलिया लोकदांभिक हिंसावान् सबसेमिलाप और सभीसे अभिमान यहवैडालव्रती है किंतु विलावके से लक्षणवाला ३ सर्वत्र अकड़पन राखनेवाला शठहै ४ कुतर्कसे सर्वत्र संशय आरोपित करनेवाला हैतुक है ५ वगुलाभगत सोबकवृत्ती है ६-दंभी अथवालोकदांभिक उसे कहते हैं जो लोक रिझावे के लिये कर्मोंका अनुष्ठान करै-धर्मध्वजी जोजीविका के लालचसे नखजटा आदि धारणकरै-इनसवोंसे मुखसेभी न बोलै यह कहनेका यह सिद्धांत है कि आप ऐसा न होजाय १२९॥ 'शुक्लांबरधरोनीचकेशाश्मश्रुनख शुचिः । नभार्यादर्शनेऽश्नीयान्नैकवासानसंस्थितः १३० ॥ ऐ०-स्नातक पुरुप शुक्लांबरधारी हो अर्थात्सुपेद उज्ज्वलवस्त्र पहिरै-और नीच केशश्मश्रुनखहोवै अर्थातशिरऔर डाढाकेवालोंको मुड़ाये हुयेनखौंकोकाटेहुये निर्मल बनारहै और शुचि कहिये मनसे तथा शरीरसेभी शुद्धबनारहै-भार्या के दर्शन किंतु संगम समय या उसकेपास बैठाहुआ कुछभोजन नहीकरै-और एकवस्त्रसेभी भोजन नकरै-योर संस्थितहयाभी भोजन नहींकरै-अर्थात् लिखनेपढ़नेआदि किसी धंधेके लिये नियत बैठकमें बैठाहुया नहींखाने लगे किंतु भोजनकोलये चौकायादि नियत- मिताक्षरा साचाराध्यायः। स्थानों में जाकरखावै-और एकवस्त्रसे कहनेका यह सिद्धांत नहीहै कि बहुतसे कपड़े पहनेहुयेखावे अर्थात् केवल एकधोतीसेही नहीं बैठजावे किंतु दूसरावस्त्रकांधेपर मैं- गोछाभी रखलेवे जिस्से वामेहाथसे मक्खीयादिभी उड़ासकै या कदाचित् दूसराहाथ भी जठाहोजावे तो उसमें पोंछकर शुद्धकरसके १३०॥ अधि०--यहां १२८ के श्लोकसे जो प्रसंग चलाहै यद्यपि विवाह और गृहस्थीके धोपीछे कहागयाहै परन्तु यहप्रसंग स्नातकपुरुपकाहै और स्नातक उसे कहते हैं कि जो विद्या और ब्रह्मचारीके नियमोंका पारपाकर शास्त्रोक्त विधिसे स्नानकियेपीछे गृहस्थमें पायाहो फिर चाहे उसका विवाहभी हुआहो या न हुयाहो कुछ इसवातका नियमनहींहै परन्तु संज्ञा उसकीस्नातकहोचुकी इसलिये उसकोवह वातभीअब करनी उचितहें कि जिनका निषेध ब्रह्मचारीके लिये कियागयाथा-सोई गौतमजीने कहाहे कि(स्नातको नित्यंशुचिः सुगंधिःस्नानशीलः) अर्थात्स्नातक पुरुप नित्यंप्रति, नख- वाल आदिसे शुद्धवनारहै किंतु नख या वालोंको रखावैनहीं और चंदनानुलेपनधूप सक्यतर फुलेल तैलपुप्पमालायादि सुगंधवस्तुओंसे सुगंधारहै और स्नानशील होवे अर्थात उवटनाआदि प्रकारोंसेभी स्नानकरनेमें प्रत्तिराखै-सो यहबातें सवघर में कुछऐश्वर्यहोनेपर संभवितहैं अर्थात् यहबातें कुछ ऐसी नहीं हैं कि जिनकेनकरने से वहमनुष्य अधर्मीगिनाजाय कितु जिसकोप्रभुनै अपनेअनुग्रहसे कुछऐश्वर्य दिया हो वहइसरीतिसेस्है और जो कोई असमर्थहोवह अपनी शक्तिके अनुसारेचले क्योंकि जो शक्तिसे अधिकया शक्तिसेगिरकर कोईसाकामकाँगा या कोईसी चाल चलेगा तो वहमनुष्य १२२ उलोकमें कहीहुई मर्यादासे प्रतिकूल गिनाजायगा-इसी लिये यह स्मृतिभी कहीहे कि (नजीर्णमलवद्वासाभवेच्चविभवेसति) अर्थात्-धनसंपत्तिहोने परभी फटे और मैलेवस्त्रोको न धारण करे-किंच-धनसंपत्तिके न होने में जीर्णयामलीनवस्त्रों का पहिरना कुछ अधर्मनहीं है-ऊपरऐक्यार्थमें भार्याकेसमीप भोजनकरनेका जो नि. पंधकिया तिसका यहकारण है कि उसकेसमीप भोजनफरनेसे जो संतान पैदाहोती हैं सो तेजोवलवीर्य पराक्रमग्रादिसे हीनहुया करतीह-सोईश्रुतिमीप्रमाणहे कि (जाया या अंतेनानी यादवीर्यवद पत्यंभवति) इसकसिवाय लोकदृष्टिसेभी एक ऐसागूढ हेतु है कि वह इस्से भी विलक्षण है-अर्थात् जो कोई पुरुप ऐसाईंगडालेगा उसके लिये यह बड़ीहानि है कि जो भार्या उसके नेत्रों के संकेतमात्रसे श्राज्ञामानिकर सबकामों का यथावत् साधनकरती हे वहभी उसकी यह प्रकृतिदेखकर ऐसी शिरपर चढ़जायगी कियागेको उसे तुच्छसमुझकर कोईसी श्राज्ञाभी यथावत्नहीं साधन करसकेगी १३०॥ नसंशयंप्रपद्यतनामस्मादप्रिययवेत् । नादितनानृतं चैवनस्तन.स्यान्नवाईपी १२१॥ २.

-- - मिताक्षरा स० आचाराध्याय । अक्ष-अकस्मात् संशयको न पहुंचे अप्रियनहीबोले अहितभीनही अनृतभीनहीं स्तेननहींहोवै वार्द्धपीनहीं १३१ ॥ अभि-अकस्मात् कहिये विनाकारण किसी संशयरूपकाममें जो प्राणीको विपत्ति देनेवालाहो नहींकूदै (दृष्टांत) जैसे व्याघ्रकेसन्मुख या चोरबटमारोंके सन्मुख या प्रदीप्त अग्निकेसन्मुख या अगाधजल में इत्यादि और भीजानो-अकस्मात् विनाहेतु कोई अप्रियवचन जो किसीको बुरालगे अपनेमुखसे नहींकाढ़े-अहितवार्ता जो किसीके या अपनेही कल्याणमें हानिकरसक्तीहो अकस्मात् मुखसेनहींकाढ़े और न ऐसाकोई कामकरै-अनृत जो असत्यहो या जिस्से कुछउत्पात पैदाहोनेकी शंकाहो अकस्मात् मुखसेनहींकाढ़े और न ऐसाकोई कामकरै-स्तेनकहिये चोरनहींहोवे कितु विनादिये किसीकी कुछवस्तुनहींलेवै-चार्द्धपीउसेकहतेहैंजोनिपिद्धद्धिसे जीविकाकरै सो वाईपी की रत्तिनहींकरे (दृष्टांत) जैसे कसाईआदि किसी जीवघातीको धनदेकर व्याजखाना मुर्दैकाकफन खरीदकरवेचना आदि और भी अपनीवुद्धिसे जानलो १३१॥ दाक्षायणीब्रह्मसूत्रीवेणुमासकमंडलु । कुर्यात्प्रदक्षिणंदेवमृद्गोविप्रवनस्पतीन् १३२ ॥ ऐ०-दाक्षायणी अर्थात् दाक्षायण जो सुवर्णहे तिसका धारणकरनेवाला-ब्रह्मसूत्री अर्थात् यज्ञोपवीत धारणकरनेवाला-वेणुमान् वाँसको लियेहुये-कमण्डलु जो लोटाहे तिसको लियेहुये कहीजाताहुया इतनी चीजोंको प्रदक्षिणा करकेजाचे एकतौ देवता मृत्तिका गो विप्र वनस्पतीनको १३२॥ अधि०- सुवर्णका धारणकरना सुवर्णादि पंचरत्नी या नवरत्नी माला आदि श्रा- भूषणों का उपलक्षण है परन्तु अनुकर्प केवल इतनाहै कि जो और कुछ न होसकै तो सुवर्ण अवश्यभावसे शरीर में राखै क्योंकि यहवस्तु बडेपवित्र रत्नो में गिनती है जिसके शरीर में किसीप्रकारसे मालाकुंडल मुद्रिकायादि कोई चिह्न सुवर्णकाहोता है वह किसीप्रकारसे यपवित्र नहींहोसक्ता अर्थात् जोभीड़ भटक्का में किसी मलीन कोभी छूजावे तो अशुद्धनही होसक्ता दूसरेवद्धि का प्रकाश बनारहता है तीसरेदरि द्रकीवाधाउसको नहींसतासक्तीहै चोथेकिसी संकटदशाभी वहकाम देसताहे पांचवें शरीरकी शोभा और प्रतिष्य भी है और ब्रह्मसूत्रका यह सिद्धांत नहीहै फि पहिरेहुये कहींजाये क्योकि पहिरना तो सदेवही उचितह फिर उसको क्या कहेंगे कितु तात्पर्य इसका इतनाहैकि जो कहींजावै तौ पहिरेहुये के सिवाय कोई यज्ञोपवीत अपने पास बंधारक्खै न जानिये किसदशामें टूटजाने या अशुद्धहोजानसे उसके बदलनेकी जरू- रत पानिपडै या अपने किसी हितूको देनेकी आवश्यकता आनिपड़े तो फिर तत्काल कहाँ मिलसक्ताहै-बॉस कहनेका यह भावहै कि कहींजावै तौ लाठी लकडीलिये विता खाली हाथ नहींचलाजावैन जानियेकोई दुर्जन या कुकर व्याघ्रादिमिलजावे तो इस्से मिताक्षरा स० श्राचाराध्यायों ८७ वहाभरोसाहे-लोटा कहनेका यह प्रयोजनहै कि जो कहींजावे तो लोटाको अवश्यही लेजावै न जानिये कहीं दिशा शौचकी जरूरतहो या जलपानकी आवश्यकताहो अ- र्थात लोटा विनाधर्म और प्राणोंकी भी हानिमें संशयहोताहै-इस प्रकार जातेहुये मार्ग मैं जहाँ कहीं देवता या देवताका स्थान राष्टिमावै उसको दाहिने देकर निकलै-मृत्ति- का कहनेका यह सिद्धांतहै कि जो कोई एथ्वी खेड़ा आदि प्रकारोंसे ऊंचीहो उसको या किसी उत्तम मृद्विकार वस्तुको अर्थात् स्वर्णादि नाना धातु भेद और गैरिकमनः- शिला आदि नानाभाँतिके उपधातु भेद जो पृथ्वी धातुमें गिनती तिनकी राशि दे- खकर श्रद्धासहित हाथजोड़े और दाहिने देकर निकलै क्योंकि ये वस्त भी परमऋद्धि सिद्धिरूपहोतीह-तथैव गऊ और ब्राह्मण कहीं दृष्टिआवे उसको भी दाहिने देकर निकलै-वनस्पतीका यह सिद्धांतहै कि जो जो रक्ष वृक्षोंमें बड़े उत्तम या पवित्रगिने जातेहैं जैसे आम, केला, पीपल आदि इनको भी दाहिने देकर निकलै (भेद ३) श्रवके समयके विरले अश्रद्धक लोग अपनी चतुराईसे यह भी कहनेलगतेहें कि इन वातोंसे क्या होताहै किंतु यह्वातें सिर्फ फ़जूलगोई या निरर्थक आचारमें गिनती हैं परंतु जो विचारदृष्टि से सूक्ष्म ध्यानलगाकर देखो तो यही निश्चितहोताहै कि उन- को परमेश्वरने केवल उदरभरने मात्रकी चतुराईदी होगी क्योंकि उस जगत्कर्ताको सवतरहकी सृष्टिरचना करनी अंगीकारथी फिर जो ऐसे लोग नहीवनाता तो उसकी ईश्वरतामें न्यूनतापड़जाती-उनसे यह भी बूझा चाहिये कि जो सबकी बुद्धि ऐसीही होजावे तो सृष्टिकी बड़ाई और छुटाई कैसेजानीजाय और किसलिये कोई किसीक चड़प्पन या प्रतापकी गुरुताकोमाने और जो यही ढंग चलजावे तो क्रमर से सारा संसार ऐसी चतुराईकी गरमीसे पिघलकर पानीहोजावे फिर कोई किसीकी बड़ाई या छुटाई को न मान-विद्या देनेवालेको किसलिये गुरु या उस्तादकी पदवीमें समझते है जैसे और तैसा यह भी एक मनुष्यहै वल्कि दामलेकर विद्यादेनेवाला और नौक- रौंकी गिनती में आजावे-पिता किसलिये ईश्वरके समान समुझाजाता है जैसे और तैसा वह भी एक मनुप्यहै-राजा किसलिये ईश्वरका अंश मानाजाताहे जो पंचतत्व औरों में सो उसमें हें-कदाचित्कहो कि राजाका भय बड़ा प्रबलहोताहै इस्से उसका बड़प्पन लाचार मानाजाताहै तहाँ यह भी ध्यानकरनांचाहिये कि भय वस्तु केवल समक्षभावमें होतीहै कि जो उसके सन्मुख कहेंगे कि त ईश्वरका अंश नहीं है तो यह दंडदेवैगा परंतु परोक्षभावमें या हृदय कोष्टमें कि जहाँ इसमयकी संभावना नहीं है तहाँ किसलिये उसको साक्षात् ईश्वरका धेश समझतेह-कदाचित्कहो कि हदयका अभ्यंतर किसको मालूमहोसक्ताहै कि तुम उसको ईश्वर तुल्यमानतेही या नहीं तहाँ सीधासा एक प्रत्यक्ष प्रमाणहै कि जब कोई राजा या राजाधिराज बादशाह किसी मिताक्षरा साचाराध्याय राजापर चढ़ाई और विजयकरिके उसको पकड़लेताहै उस समय उसका मारडालना भी उसको सुगमहै क्योंकि उस्से किसीतरहकाभय उसको नहींहै बल्कि उसे जीवतां बनाराखने में खटकाभीहै परंतु वह विजयकत्ती वादशाह उसको इसीहेतुसे बंध नहीं करताहे कि राजा ईश्वरका अंशहोताहै और इसीसे वहअवध्य भी होताहै-अब कहो कि उस्से क्या उसको भयकी संभावनाथी जो वैधनहीं किया केवल नजरबंदरखकर सर्वथा सत्कारपूर्वक उसके सब खचों और सेवक वा सवारी आदि आरामोंका प्रबंध करदिया इस्से ठीकर निश्चितहुना कि उस विजयकर्ता के हृदय में भी विश्वासहे कि यह राजा साक्षात् ईश्वरका अंशहे इसका अंपकारकरना मेरेलिये अधर्महे और जो यह विश्वास उसके हृदयकेभीतर नहींहोता तो तत्काल उसे अपना शत्रु और वाधक समुझकर मरवाडालता-और यह प्रत्यक्षहै कि जो कोई अन्यायी राजा ऐसा अन्याय कर बैठताहे वह प्रथम तौ सारे संसारमै अन्योयी प्रसिद्धहोकर दुर्नामता पाताहै दू- सरे इसी अधर्मके प्रभावसे वहं शीघ्र नष्टहोजाताहै-इस सारे कथनका सिद्धांत केवल इतनाहे कि ईश्वरने जिसकी जितनी गुरुता यो लघुता अपनी ईश्वरतासे निर्माणकरी है सो यथावत् सबको कहनी और माननी भी चाहिये जिससे उसकी ईश्वरताकी वि. लक्षणता प्रकटहोतीरहै-अब जो तुम यह कुतर्ककरनाचाहो कि मनुष्यादि सृष्टिकी वात भिक्षहे पर माटीर सब एकसी और वृक्षर सब एकसे इनमें उत्तमता या मध्य- मता थाहेती इसकुतर्ककाउत्तरसिवाय इसकुतर्कके और कुछध्यानमेनहीं यासक्ता कि इस बुद्धिकेागे स्त्रीरभी सवएकसी होंगी फिर भार्या और भगिन्यादिकाभीभेद रथाहै क्योंकिवेहीपंचतत्व और वेही दश इंद्रियाँ और वेही सातधातु सबकेशरीरमें होती हैं- सुनो भगवद्गीताका विभूति अध्याय या उस प्रकारके अन्य शास्त्रोंकेस्थलभी तुमने देखहांगे या सुनेहोगे-जड़ और चैतन्यपर भी कुछ प्रारूढता नहींहै यद्यपि जगत्कर्ता अपनी चिच्चक्तिरूपसे सर्वव्यापी प्रत्यक्षहै इसमें कुछ संदेह नहीं तथापिजिसजीवमें या जिसवस्तुमें या जिसदेशमें या जिसकालमें उसकी चिच्छक्तिरूप सत्ताका प्राधि- क्य विशेपहे वहविशेप माननीयहे अर्थात् जिसजाति याजिसभेदमें जोवस्तुकुछ उ- त्तम सोर सब ईश्वरकी विभूति तो इस व्यवस्थासे उसकी विभूतिका सत्कारकरना यह भी एक उसीका सत्कारहै और यही सत्कार उसकी भक्तिभावमें गिनतीहै सोई देखौ इसका प्रमाण मर्यादापरिपाटी के प्रारंभमें सबसे पहले श्लोक और उसकी अधिकोक्तिमें क्या कह चुके (भेद३) कदाचित् अबतक भी तुम्हारी बुद्धि नहीं जमतीहो तो अब तुम अपनीही बुद्धिके अनुनार समुझौ और ईश्वरकी ईश्वरता को दूरकरौ केवल संसारपर दृप्टिंडालकर ऐसे स्थानों में जाकर तमाशा देखौ कि जहांकही जंगीफौजोंकी याद होरही हो उसमें नानाप्रकारके संकेत ऐसेभी होते -- मिताक्षरा स० आचाराध्याय ।। ८९ हैं कि जो बोलीके साथही तत्काल बंदूकको बामे हाथके.सहारासे छातीमें चिपटीहुई वामे कांधेके ऊपरतक खड़ी करलेना या दोनों हाथोंका मिलाना या पैरोंकापैतरावद- लना आदि अनेक वातें ऐसीहोती हैं जिनकाकाम युद्धके समय कुछभी नहीं पड़ता क्योंकि यहके समयकी कयानद जुदी सिखाई जाती है औरपीछे सिखलाई जाती है और यह एकप्रकारकी साधारण कवाप्रद जो सबसे पहले अभ्यास कराई जाती है सोऐसीहै कि जैसेगानविद्यामें पहले सरगम आदि स्वरोंका अंभ्यासकराना या वाद्य विद्यामें पहले जुदे२ वाजेको अपनी तालका मिलाना जैसे सितारमें डिडडा आदि शब्दोंसे अभ्यास कराना या लिखने पढ़नेमेंपहले वर्णमात्रके हिज्जे करवाना आदि- शोचौ पर्वोक्त चतुराईके आगे ये सारी बातें स्था, परन्तु सिद्धांतमें एकभी यथा नहीं है इन सबके प्रयोजन कहना तो बड़ा विस्तारहै परसीधी सीधी रोहसे समुभलो कि उन साधारण संकेतों से सीखनेवालेको उस ढंगमार्गमें जमाना ऐसाहै कि जैसे नवीन बछड़ेको जब सवारीमें जोड़ना चाहेंगे तब सबसे पहले उसे काठके घसीटामें जोड़कर सड़कमें निकालेंगे फिरपीछे रेतके मार्गमेंभी जव उसमें अभ्यास होजायगा तब खड़खड़ामें जोड़कर दुश पांचरोज फेरेंगे जब उसमें पकाहोजायगा तब इक्का या बग्घी आदिमें लगावेंगे तो कमरसे अभ्यास होजानेसे ठीकर काम देसकैगा जोएक सूत पहले बग्घीमें जोडदेते तो चौंककर बग्घीकोभी तोड़देता और घोड़ाकी श्रादति भी बिगड़ जाती-ऐसेही साधारण कवायदके संकेतोंको सुनतेही तत्काल उसने उस आकृतिको वनाकर दिखला दिया तो यह निश्चय होगया कि अब आगेको जोकुछ विशेप वार्ता सिखलगावेंगे तो उसयाज्ञाको भी मानेगा और उस श्राकृतिको वनास- केगा और जो इसमें सीधा न होसका तौ जानागया किाागेको बड़े संकेतोंमें क्या करसकैगा-ऐसेही ये धर्म शास्त्रकी साधारण कवाद के संकेतहें जो क्रमरसे इन माटी और रक्षादिकों की गुरुता लघुतामें श्रद्धा पूर्वक यथा योग्य दृष्टिजमिजायगी तो आगेको माता पिता गुरु तथा राजा आदि गुरुओंके बड़प्पन और पदवीको उन से भी लक्षगुणी कोटिगुणी समुझेगा और जो उनमें श्रद्धानहीं बांधैगा तो यह जानी कि पहला प्रारम्भ विगड़ा हुआ सर्वत्र शिष्टाचारको चंचलकर देवेगा-इस्तेधर्मशा- स्त्रका लिखाहुश्रा एक अक्षरभी च्था नहीं केवल समुझनेवालेकी समुझका अन्तरहै (भेद४) कुछ यही नियम नहीं है कि जो पांच वस्तइस १३२के श्लोकमें कही हैं उन्हीं को दाहिने देकर निकले किंतु जोर वस्तु उत्तम गिनीजाती हों उन सबकाही सत्कार करै क्योंकि यह पांचका कहदेना एक निदर्शनमात्रहै बल्किमनुजीनेयाठवस्तु कहीहें- यथा (मृदंगांदेवतांविघृतमधुचतुःपथमाप्रदक्षिणानिफुर्वीतप्रज्ञातांश्चचनस्पतीन्) अर्थात्-मृत्तिका गजर देवता विप्र घृत५ मधु-सहत आदि उत्तम मिठाई६ चो- २३ मिताक्षरा स०.याचाराध्याय । राहा७ प्रसिद्धवनस्पती८ इन सवोंको दाहिनेदेकर निकलै-सो,यह आठका कहनाभी निदर्शन मात्र, किंतु ऐसीर औरभी जो कोई बस्तु उत्तमहों वे सभी इनमें गिनती हैं और इसके सिवाय कुछ यही नियम नहीं है कि इनकोचाहै तिसदशाभी दाहिने दियेविना अधर्मी कहला सत्ताह किंत सिद्धांत केवल इतनाहे कि इस मर्यादमें अ. भ्यास और तत्परता बनीराखै अश्रद्धानहींकरे,जब किसी ऐसी सावधानीकी दशामें कहीं जाताहो कि इनको दाहिने करने में अवकाश मिलसक्ताहो तब अवश्य भाषसे लोकरीतिको पूरीकरनी चाहिये-या-जब किसी ऐसी दशामें कही जाताहो कि इनको दाहिने करनेका अवकाश नहीं मिलसक्ता और किसी अपेक्षित कार्यमें विलम्ब या उत्पात होनेकी शंकाहै तो उस अवस्थामें दाहिने और पामेका कुछ विवेक नहीं-किंतु निःसंदेह वामे देकर चलाजावै और मनकी भावना मात्रस हाथजोड़कर ऐसाध्यान करता चलाजावे कि जानी हम इनको दाहिनेदिये जाते हैं तो दोप नहीं- परन्तु शि- टाचार में उपेक्षा या निरादर आरोपित करना यह अधर्मका हेतु १३२॥ नतुमेहेन्नदीछायावर्मगोठाम्बुभस्मसु । नप्रत्यग्न्यर्कगोसोमसंध्यांनुस्खाद्विजन्मनः १३३ ॥ ऐ०-नदी छाया मार्ग गोशाला जल, भस्म इन्होंमें मूतै.नहीं और हगैनही-अग्नि सूर्य गऊ चन्द्रमा संध्या जल स्त्री द्विजाती,इनके सन्मुख अर्थात् इनको देखताहुन्या हगै मूतै नहीं १३३॥ अधि० -शंखजीने कुछ और वस्तुभीगिनाई हैं-यथा- गोवर-जुता और वायाहुआ खेत-चिता या किसी वस्तुकी ढेरी-श्मशान-खलिहान स्थान-जलका किनारा इनमेंभी नहींहगै मूतै-यह सिद्धांत नहींहै कि इन कहीहुई चीजोंके सिवाय और किसी वस्तुमें हगने,या मूतनेका निषेध नहीं है-अर्थात् इसकहेहुये निदर्शन मात्रसे वे सभीवरच और सभी स्थान इनमें गिनती हैं कि जो शास्त्रसेवालोक दृष्टिसे विरुद्ध पाये जातेहाँ या जिसमें मलकरने से किसीको प्रत्यक्ष या अज्ञात मावसे भी कोई तरहकी हानिध. थवा पीड़ा पहुँच सकती हो-और यद्यपि विस्तारके भयसे इन सबका हेतु लिखनेकी उपेक्षाहै परंतु एक २ निषेधमें अनेक २ हेतुभी ऐसे प्रत्यक्ष हैं जिनसे अपनेको दोप और परायेको पीडाकी संभावना है (जैसे)नदीमें जलका विगड़जाना उस्से रोगोंकी उ- त्पत्तिहोनी-छायामें जो कोई प्रानकर-विश्राम लेवेंगे उनको शहोना-मानमें सबको ग्लानिहोनी इत्यादि सबके हेतु प्रत्यक्ष हैं और अपने को उसदोपके सिवाय तत्काल या कुछ विलंबसे भी दंड मिलनेकी शंकाहै-और जो दंडसे वचजावे तो ऐसे गूढ़पापों से कुछादि और श्वासादि असाध्य राजरोगों के होजानेकी भीतिहै किन्तु पाप अपना बदला लिये बिना पीछा नहीं छोड़ता १३३॥ नेक्षेतार्कननग्नांबीनचसंसृष्टमैथुनाम् । नचमपरीपंवानानीराहतारका: १३ ॥ - - ----- " मिताक्षरा साचाराध्याय - ऐ०-सूर्यको-नग्नास्त्रीको-संसृष्ट मैथुनास्त्रीको भीनहीं निहारै-मत्र और पुरीपको भी नहीं देखे-आप अशुचि हुआ राहु और ताराओंको भी नहीं निहारै १३४॥ · · , अधि०-सर्यको न देखे यह प्रसंगत है क्योंकि सूर्यके दर्शन पुनीत हे परंतु इसका प्रयोजन मनजी के वाक्यसे सिदहोसकता है-यथा-(नेक्षेतोद्यतमादित्यंनास्तंयातं कदाचन नोपसृष्टंनवारिस्थंनमध्यंनभसोगतम्) अर्थात्-उदयहोतेहुये आदित्यको नदेखै किन्तु जब. पूराविंय उदयहोचुकै तबेदर्शनकरै-अस्तहोतेहुये कोभी कभी नहींदेखै किन्तु जबतक पूराविववनारहै तबतक देखनेका दोपनहीं-राहुसे ग्रसेहुये सूर्यको नदेखे-जल में सूर्यकेप्रतिबिम्बको नदेखै-मध्याहून कालमें श्राकाशके मध्य पहुँचेहुये सूर्यको नदेखै-यद्यपि सन्ध्यावन्दनकी उपासनासमय अवश्यभावसे ऐसे श्रोदय या अस्ति बिम्बका देखनाहोता है पर उसका निषेधनहीं है क्योंकि वह विधिकाप्रसंग है-यहवात जुदी है इसमें साधरणभावसे, दृष्टिजमा-करदेखने का निषेधहै इस्से प्रथम तौ सूर्यदेवका अपकार है दूसरे नेत्रोंकी दृष्टि मारीजातीहै- नग्नास्त्रीका निषेध मैथुनकालकेसिवाय निजभार्याका भी निश्चितहै-संसृष्ट मैथुना स्त्रीका यहअर्थहै कि किसीसे मैथुनमेंतत्परहुईकोनदेखै दूसराअर्थ यहभीहै कि मैथु, नसेनिपटेंपीछे तत्काल अनग्नाकोभी नहीं निहारै क्योंकि इस्से उसको अधिकलज्जा प्राप्तहोतीहै और इससे वह शापभीदेतीहै और (च) शब्दकेअभिप्रायसे वे बातेंभी- लेनीचाहिये कि जो इसमें नहीकहीं पर मनुजीनेकहीहे-यथा-(नाईनीयाद्भार्ययासाई नैनामीक्षेत्चाश्नतीम्।वर्तीजुंभमाणांचनचासीनांयथासुखम्।नांजयंतीस्वकेनेत्रेनचा भ्यक्तामनारताम् । नपश्येत्प्रसवंतीचश्रेयस्कामोद्विजोत्तमः) अर्थात्-जोकोई द्विजाती मात्रमें उत्तमगिनाजाताहो और वह सर्वथा अपनेकल्याणोंकी कामनारखताहो वह इतनीबातें नहींकरै-किन्तु-भार्याकेसाथ भोजननहीं-भोजनकरतीहुई भार्याको नदेखै- छींकतीहुईको नदेखे-जंभाईलेतीहुईको भी नहीं-स्वतंत्र अपनीइच्छाके अनुसार बैठी हुईकोभी नहीं-अपने नेत्रों में अंजन करतीहुईको भीनहीं-उवटनाकरीहुई या करवाती हुईकोभी नहीं-बस्त्रोंविना नहातीधोतीको भी नहीं-गर्भकाप्रसवकरतीहुईकोभी नहीं- यद्यपि इन कहीहुई सारी वातोंके हेतु अनेकहैं और सबके भिन्न २ भी हैं परन्तु सा- धारण भावसे यह हेतुहै कि यहांपर जिनवातों का निषेध किया है तिनके करनेवाले पुरुषकातेजो बल बुद्धि पराक्रम यश पुण्य सुकीर्ति श्रायु प्रताप ये सब शीघ्र नष्ट होजाते हैं १३४॥ 'मयमेवजइत्यवंसमंत्रमुदीरयेत् । वर्पत्यपाहतोगच्छेत्स्वपत्प्रत्यशिरानच १३५ ।। मक्ष०-यह मेरावज इसप्रकार जोमंत्रहै ताहि साराउच्चारणकरै वर्पतेमें उघाड़ा जावै- पश्चिमको शिरकियेहुये सोवै भी नहीं १३५॥

६२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। । अभि० वर्षाहोतेसमय कहींजोनापड़े तो वेखटके नंगाचलाजाय किंच-अयमेवचः पाप्मानमपहंतु-यह जो वेदकामंत्रहै इसे संपूर्ण उच्चारण करलेवे तो कुछचिन्तानहीं उत्पन्नहोगी और पछाँहको सिरहानाकरके सोवैभी नहीं १३५॥ अधि०-मंत्र जोवस्तुहै सो उसीकीरक्षाकरसक्ताहै जिसने मंत्रौको किसीप्रकारसे सिद्धकरपायाहो सो ऐसेमनुप्य थोड़ेहोतेहैं और यहप्रकरण यद्यपि स्नातकपुरुपके नामसे कहरहे हैं सो स्नातक अवश्य विद्यावान्होताहै-परन्तु स्नातक यह एक निद- र्शनमात्रकहाहै अर्थात् यह सिद्धांतनहीहै कि इसप्रकरणकी कहीहई मर्यादें स्नातक के सिवाय और कोईनहींमानै किन्तु द्विजातीमात्रके सबकेलिये कहीहैं-इसीहेतु से ऊपर जो वनमंत्रका उच्चारणकरनाकहाहै तिसका यह सिद्धांतहै कि बहुतेरे मनुष्य ऐसे कायरहोतेहैं कि वे वीकेसमय निकलनेसे भयमानतेहैं कि जानै ऊपरसे विजली गिरे या कोई और उत्पातहोजावे सो ऐसेमनुष्योंको हिम्मतिबंधानेकेलिये यह उपाय लिखाहै कि जिस्से उनकेकल्याणरूपीकामोंकी हानि नहींहोनेपावै क्योंकि हिम्मतहार जानेसे मनुष्यकाउत्साह माराजाताहै और उत्साहकेविना फिरकोईकामनहीं चलस- क्ता-अन्यथा जो देवकरताहे सोईहोताहै विनाउसकीइच्छा उत्पातनहीं होसक्ता और वचभीनहींसक्ताहै पर नेत्रोंकेआगे सीकोटकरनेसे पहाड़कादखिना बंदहोजाता है (भद २) मन्वादि अन्यशास्त्रोके अभिप्रायसे वर्षासमय दौड़केभी नहींचलै नग्नहो कर नहींसोवै किसीशून्यस्थानमें एकल्ला नहीसोवै १३५॥ टीवनासृक्शकन्मूत्ररतांस्यप्तुननिक्षिपेत् । पादौप्रतापपन्नाग्नौनचैनमभिलंघयेत् १३६ ॥ ऐ०-टीवन, थूक, खखार, आदि-अमृकरक्त-शकृत विष्ठा-मूत्रनेतसवीर्य-इनकोज- लोमें नहींफेके-अग्निमें पैरोंको तपावैनहीं-इस अग्निको उलॉपभी नहीं १३६॥"" अधि०-इसमें शंखजीने कुछ और वस्तुभी निषेधकरीहैं-यथा-तुपकेशपुरीपभस्मा स्थिउलेप्मनखलोमान्यप्सुन निक्षिपेत् पादेनपाणिनावाजलंनाभिहन्यात्-अर्थात्-तु पभूसी आदि, केशवाल, पुरीप विष्ठा, भस्म राखकूड़ा, अस्थिहाड़, इलेप्म खखार, मखमुह, लोमरोमा इनको जलोंमें नफेके क्योंकि प्रथमतो जल देवरूपहै दूसरेलोक दृष्टिसे जलोंका बिगड़जाना उस्सेपीने या नहानेवालों को रोगोंकी उत्पत्ति होना यह अधर्महे तीसरे जोकोई ऐसाकरते देखेगा वहबुरा कहेगा और मारपीटभी होजावेगी और पैरसे या हाथसे जलकोपीटनहीं इसे अपनी या पोरोंकी आँखोंमें जलका पड़ जाना और हाथपेरोंकी नसोंमें कफ वातका विकृत होजाना यहबड़ी शंकाहै-अग्निके मध्ये मनुजीने बहुत कुछ कहाहे-यथा-(नाग्निमुखेनोपधमेन्नग्नानेक्षेतचस्त्रियम् । नामे ध्यंप्रक्षिपदग्नी नचपादो प्रतापयेत् अधस्तान्नोपध्यान्चनचैनम भिलंघयेत् नचैनंपा दतः कुर्यानप्रापाव धिमा चरेत्)अर्थात् अग्निको मुंहसे नहीं फूकै क्योंकि चिटकारी - .

मिताक्षरा स० आचाराध्याय । आँखमें पड़ेंगी या नेत्रोंकी ज्योति मंद होजायगी-नंगीस्त्रीको नदेखे-अग्निमें अशुद्ध वस्तुनहींछोडै क्योंकि प्रथमतौ वह देवतारूपहै दूसरे उस्सेचिड़ाइँध छूटैगी तवकिसी को पीड़ापहुँचेगी यह भलावुरा कहेगा-पैरोंको भी नहींतपावे क्योंकि नेत्रोंकी ज्योति मारीजायगी और त्रिदोपं कुपित होनेकी शंका है-नीचे अग्निको कपड़ोंसे ढाँककर न बैठे क्योंकि इसभाँतिसे तापतेहुये बहुधा मनुष्य कपड़ों सहित जलजातेहैं और आ- गुभी लगजातीहै-इसको कूदकर उल्लंघे नहीं क्योंकि जो ऐसाअभ्यास पड़जायगा तौ एकदिन पूरा धोखा खायगा-इसको पैरकेनीचे भीनहींदवावे.क्योंकि प्रत्यक्ष पीड़ा काहेतुहे तीव्रता उसकी आँखोतक पहुँचतीहै औरखाल जलजावेगी तो लँगड़ेहुये फिरोगे तवसारेकाम बन्दहोजायँगे-इसकोप्राणोंकीअवधिताई न याचरणकरै अर्थात् जोलोग पंचाग्नि आदि प्रकारोंसे अग्निसेवनकरनेवालेहैं वेभी ऐसाअतिशय सेवन नहींकरें जिस्से प्राणजातेरहैं क्योंकि जो प्राणोंकीरक्षावनीराखोगे तो अनेक धर्मकर्म और तपस्याओंका संचय करसकोगे और प्राणोंकी हानिकरदेना यह तपस्यानहीहै किंतु श्रात्महत्यामें गिनतीहै १३६॥ जलंपिवेन्नांजलिनानशयानंप्रबोधयेत् ।नाःक्रीडेनधर्मघ्नैयाधितैर्वानसंविशेत् १३७॥ अक्ष-अंजलीसे जलनहींपीवै-और सोवतेहुयेको जगावैनहीं-अक्षांसे क्रीडानहींकरै- धर्मनोंसेभीनहीं-व्याधितोकेभी साथबैठेनहीं १३७॥ अभि०-जलको दोनोंहाथ वाँधकेनपीवै इसकहनेसे पीनेमांत्रकी कोईवस्तुहो उसको हाथसेनहीं क्योंकि यह एकप्रकारका गमारू लक्षणहोताहै इस्लेकपड़े छींटछाँटजातेहें और पीतेहुये जो श्वासलेलेवे तो आँतोंमें पानीघुसजानेकी शंकावनीरहती है और प्रमाणसे अधिकभी पीजाताहे इससे उदरशूलभी होजानेकी शंकारहती है इसलिये किसीपासेही पीवे-और सोवतेहुयेको अपनेसे अवस्था या विद्याआदि गुणोंसे श्रेष्ठ को तो अवश्यही नहीं जगावै परवहबात जुदीहै कि जो तत्काल कोई उपद्रव पानि . खड़ाहो क्योंकि(आपत्कालेमर्यादानास्ति) अक्ष कहिये पाशे जो द्यूतक्रीड़ामें प्रसिद्ध होते, तिनसे कभीसाधारण भावसेभी नहींखेले क्योंकि उसमेंसाधारणसभी तत्काल सच्चाखेल खड़ाहोजाताहै पीछे जो कुछ दशाहोतीहैं सो सब युधिष्ठिर और राजानल के इतिहासोंसे प्रसिद्हें-धर्मन्नोंसे न खेलै अर्थात्जो धर्मघ्नपरुप होतेहैं तिनके साथ न खेलै और न बैठे और एकप्रकारके धर्मनखेलभीहोते हैं जिनमें किसी जीवकी हिंसाहोतीहो जैसे कुत्तासे खरगोश आदिका तोड़वाना ऐसे अनेक खेल होतेहे तिन खेलोंसे आपनहींखलै और नेत्रोंसे देखेभीनहीं-और व्याधितपुरुप जो किसीप्रकारके ज्वर या विस्फोटक या कुष्ठादिरोगोंसे संयुक्तहो उसकेसाथभी न खेलै और न बैठे क्योंकि संसर्गसे वहीरोग दूसरेकोभी होजाताहै १३७ ॥ २४ निकसै १३८॥ मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । विरुदंवर्जयेत्कर्मप्रेतधमनदातरम् । केशभस्मतुपांगारकपालेपुचसंस्थितिम् १३८॥ प्रक्षा-विरुद्धकर्मको वर्जितराखे-प्रेतधूमको-नदी तरणेको भी बाल राख-भूसी- 'अँगार-कपाल-इनमें स्थिति वर्जित करे १३८॥ ... अभि०-विरुद्धकर्मभी दो प्रकारके होतेहैं एक तो आहार विहारादि-दूसरे कुल ग्राम जनपद देशकाल श्रादिसे विरुद्ध तिनसयोंको वचावैःप्रेत धूमकहिये चिताका धुआंभीवचावे-नदीका तैरना भुजाओंके वलसे पारउतरनाभी न करें-जहांवाल पड़ेहों तहां ऊलजलूलीसे नहीं बैठजाचे वालों के उपलक्षणसे नखदांत आदि जो शरीर से गिरेहुये द्वादश १२ मलप्रसिद्धहैं वे सभी समुझलेने-राख और भूसीपरभी नहीं बैठ जावे इसके उपलक्षणसे सभीकूड़ामात्र समुझलेना-अंगारकहनेका यह अभिप्राय है कि जहांअग्निकाफेलाबाहो तहां जोवैठाचाहे तौपहिलेप्टथ्वीपर दृष्टिकरदेखलेवै किंतु धोखाखाकर कहींअँगारी चिनगारीके ऊपरनहीवेठजावे या खड़ाहोजावे-कपालकहने का यह अभिप्राय है कि हांड श्रादि किसी मलीन वस्तुपर न बैठजावै या वहां होकर अधि०-दोप्रकारके विरुदकर्म जो कहेगयेतिनमें पहलेथाहार विहारसेविरुद्धको का (दृष्टांत) जैसे आहारभोजनकी वस्तु जो कोईसी जिसको सात्म्य नहींअर्थात् मु- वाफिक नहींहै वहउसीको खावै तौ विरुदहे या जिसरोगवालेको जो वस्तुसात्म्यनहीं है वहउसीको खावै तौ विरुदहै या जो वस्तुसात्म्यभीहो उसकोअपनी खुराकसे - धिकखाजावे तो भी विरुद्ध या जिसबस्तुकैसाथ मिलाकर जिसवस्तुकाखाना उचित नहींहै वह उसीमेंमिलाकरखावे तो विरुदह जैसेदूध और मछली या घी भोर सहत या नमक और मीठा या खटाई और दूध अथवा जिसवस्तुके ऊपर जो वस्तुखानी उचित नहींहै उसीके ऊपर खाय तो यह भी विरुद्धहै जैसे दूधकेऊपर दहीकारखाना या अफीमके ऊपर तेलकापक्कान्न और गुड़ श्रादिकाखाना इत्यादि असंख्य लक्षण जो वैयशास्त्रसे और निजपरीक्षासेभीजानेजातेहैं सो तो याहारविरुदहें योरविहार , विरुद्धका (दृष्टांत) जेसे हलनाचलना फिरना आदि शरीरकी चेष्टाओंको विहारकहते हैं सो जब कोई ऐसा विहार करे जिस्सेकिसीप्रकारका रोग या पीडाया भय पैदाहोने की शंकाही तब उसको विरुद्ध विहारकहते हैं जैसे भरीदुपहरी में दमखींचकर एक सन्नाटामै दशपांच कोशकाधावा करिके तत्काल किसीजलाशयमें स्नानकरलेना यह विरुद्धहै या उलटी कलावाजीखाना या उलटाहोकर पेड़ लटकना यह विरुदविहार हे या किसीऐसे बोझका खींचना और उठाना जो अपनी शरीर सत्तासे अधिकहो सो यह विरुद्ध विहार है अथवा दोचारपहर लगातार ऐसे ऊंचे और तीवस्वरसे गाना या रोना या पदनामादिकाकरना कि जिस्सेसारे शरीरकापराक्रमनिकालदेनापड़े मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। तो यह विरुद्ध विहार है या किसी ऐसेमार्गमें चलनाजहां चलनेकानिषेधहैया किसी ऐसे स्थानमें जाघुसना जहां जानेका निषेधहै तो भी यहविरुद्ध बिहारकर्महै इत्यादि और भी असंख्य लक्षणअपनी बुद्धिसे जानो १-दूसरे प्रकारकेविरुद्ध कर्मोंके (दृष्टांत) प्रथमतौकुलसे विरुद्ध किंतु जिसकुल में जो बातनिंदित गिनीजातीहो तिसकाकरना उसकुलके आचारसे विरुद्धकहलाताहै (जैसे) कान्यकुञ्ज या गुर्जर या दाक्षिणात्यकु- लोंमे बाजारसे पक्वान्नले करखाना-तथा-गौड या अगरवाल आदिकलों में ग्रामिपादि का सेवनकरना इत्यादि असंख्य लक्षण और भीजानो और इसकुलके निदर्शनमात्र से कुलान्तर्वर्तीभिन्न २ वंशोंको भी जानो-ऐसेही जिसग्राम की बस्ती में जो कामनि- दित गिना जाताहो चाहे केवलस्वार्थ या सर्वोपकारी दृष्टिसे भी कियाजावे वह उस स्तीसे विरुद्ध है तहां केवलस्वार्थ का दृष्टांत जैसे मृगयार्थी कोई पुरुष उसवस्ती में जाकर वहांकी बागात या वसायतके पशुपक्षी आदिका आखेटकरै-सर्वोपकारी का दृष्टांत जैसे वर्षाकालमें सूखापड़नेसे जलदृष्टिकी अपेक्षामें ग्रामकीसीमा पै मदिरा आदिसेधारादेना या भैंसायादि पशुओंका बलिदान करना-ऐसेही जनपदएक छोटे मोटे धरणीपालके वशवर्ती जिलाको और कसवाको भी कहते हैं जिस जनपदमें किसीकामका निपेधहो तिसकाकरना उससे विरुद्धहै जैसे किसी जनपदमें यहानि चलीयाती है कि उससीमाके भीतर या उसगढ़के आगेकोई छत्रीनहीं लगावै यानि- शानीसहित हाथीपर चढ़के नहींनिकलै या बंदूक नहींदागे या मुर्दाको लेकर कोला- हल करतानहीं जावै किंतु चुपचाप चलाजावै इनकामों में से कोईकामकरे तो वहबि- रुद्धहै-अथवा जिसजनपदम चोर बटमा की भीतिसे कोई मालदार या व्यापारी रातबिरात चलनेका अधिकारी नहीं है और इसीहेतुसे वहांकी यहपरिपाटी है किवह धरणीपाल किसीएक नियतसमयपर सारे देशोंके आयेहुये बटोहियोंको अपनी सि- पाहकी रक्षापूर्वक सीमासेवाहर निकालदेता है इसदशापर भी कोई पांथ अपनीऊल जलूलीसे कुसमयपर चलनिकसै तौभी यहकाम उस जनपदसे बिरुद्धह इत्यादि नानाभांतिसे जानो-ऐसेहीदेश शब्द यद्यपि साधारणभावसे स्थानमात्र का बोधकहै परन्तु विशेपलक्षण में हीपांतर अथवा दिशाभेदसे कहनेमें आताहै जैसे पूर्वदेश पश्चिमदेश इत्यादि जिसदेशमें शीत और उप्यादि हेतुओंसे या वहांके प्राचारोंके अनुसारजोकाम अथवा जोआहार विहारकरना निषेधहो तिसकाकरना उसद्वीप या देशसेविरुद्धहै और जवयहीदेश शब्दसाधारण भावसे स्थानमात्रका बोधक समुभा जाय तब हीपांतर आदिके सिवाय सारेदेशोंकी व्यवस्था इसीसे देसक्तैहैं जैसे श्रीजग- नाथपुरी में जाकरजुदा चूल्हापूके इसत्राग्रहसे कि में किसीका छुभानही खाताहूं तो उसदेशसे बिरुद्धहै या जिसदेशकी यह परिपाटीहे कि कूपके किनारेसे जबएककै मिताक्षरा साचाराध्याय। जलपात्र उठलेतेहैं तवदूसरा अपनेधरता है इसदशापर जो कोई पहले के उठलेने विना अपने मृत्पात्रोंको निजदेशीअथवाजांती चालिकेअनुसार धरदेवतो उसदेशसें विरुद्धहै या जिसदेश में इसबातका विवेकनहीं है और कूपोपरसबका एकसाथ जम- घटहोताहै इस व्यवस्थापर कोई ऐसाविवेकी यह कहनेलगे कि तुमसब हटजाओ मुझेभरलेनेदो तौयहभी उसदेशसे विरुद्धहे इत्यादि असंख्यभेद और भी अपनी वन्दिसे नानाभांतिकेजानो-देशसंबन्धी अाहार विहारकी अपेक्षासे देशोंके तीनलक्षण बैद्यशास्त्रके मतसे गिनेजातेहें यथा जांगल १ अनूप २ साधारण३-जांगल अर्थात् जंगलकादेशसोईयह कहाहे कि(अल्पोदकतृणोयस्तुप्रवातःप्रचुरातपः।सज्ञेयोजांगलो देशोबहुधान्यादिसंयुतः) अर्थात् जोदेश थोड़ेजल वाला थोड़तपवाला अत्यंत वाय वाला घनी घामवाला बहुतायतसे अन्नादिकोंसे संयुक्तहो सो जांगलजानो इसमें वात पित्तरोगोंकी प्रधानताहै १ अनुपदेशका लक्षणजलकी बहुतायत सेहै यथावत म्युर्वहुक्षश्चनानाशस्यफरनान्विताअनुपदेशोज्ञातव्योवातश्लेप्ममयार्तिमान् ) अ- त्यनेजलवाला घनेरक्षावाला नानाभांतिकी खेती और फलादिकोंसे संपन्न और कफवातरोगोंकी पीड़ावाला यह अनूपदेशजानो २ साधारणदेश उसेकहते हैं जिसमें थोड़े२ दोनोंलक्षण मिलतेही पूर्वोक्त किसीवस्तुकी वहुतायतभीनहीं और विशेप ही- नताभीनहो और वात पित्त कफ यहतीनोभी बरावरहों किंतु इनमेंसे किसीकी पीड़ा की अधिकतानहींहो ३-इन तीनोंभाँतिके देशोंमें जोर आहार या विहार वेद्यशास्त्रके संमतसे सेवनकरने उचितहोतेहों तिनसेविपरीत सेवन करना यहभी उनदेशोंसेविरुद्ध है ऐसेहीकालसे विरुद्धकहनेका यहभावहे कि जिसकालमें जो कामकरना निषेध है उसकोकरे तो कालसेविरुद्धहै (दृष्टांत) जैसे वर्तमानमें सतीहोनेका निषेध है जोकोई ऐसाकरे या देखतेहुये करनेदेवै तो इसकालसे विरुद्धहे-ऐसेर विरुद्धकामोंको सर्वथा अपनी शक्ति के अनुसार बचावै यहयाज्ञवल्क्यजीका सिद्धांतह इससेयाज्ञवल्क्यजीने यद्यपि संसार या परलोककी कोईवातकहनेसे न छोड़ी परसतीकेहोने या नहोनेकाभी कुछ चर्चा नहीं किया क्योंकि यद्यपि प्राचीनशास्त्रों में पहनेयुगोंकी अपेक्षासे सतीहोने की याज्ञाथी क्योंकि उनयुगोंमें सत्यधर्मकी विशेषताथी परपीछे २ कलियुगकेयान में अनेकऋपियों ने इसका अपवादकिया और स्मृतियों में अनेकभाँतिसे निपेधलिखा तबसे यह परिपाटीजातीरही तिसपीछे याज्ञवल्क्यजीने अपनेसमयमें इसपरिपाटीको न देखकर और कालसे विरुद्ध निश्चितकरके इसमाकुछभी चर्चा नहीं किया इसीसे श्रय कदाचित् जोकोई ऐसाभूलकर करताहै याकरनेदेताहे वह पूरादंडपाताहे इसीसे वहसतीभी स्वर्गभागिनी नहींहोतीहे क्योंकि प्रथम तो समयसे विपरीत कामकरना एकयहीबड़ापापहै दूसरे जिसकेहेतुसे अनेकांधवोंने पीछेदंडपाया और कारागारादि ।

मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । ६७ नरकोंकोभोगा वह अनेकोंको दुःखदेनेवाली एक क्योंकर स्वर्गफल पावेगी-सोई याज्ञ- वल्क्यजीसे पहले ऋपियोंनेकहाहैकि(पुरुषाणामिवस्त्रीणामप्यात्महन स्मृतम्।मृता- नुगमनंनास्ति ब्राह्मण्या ब्रह्मशासनात्॥जीवन्ती तद्धितंकुर्यान्मरणादात्मघातिनी या स्त्रीब्राह्मणजातीया मृतंपति मनव्रजेत् ॥ सास्वर्गमात्मघातेन नात्मानंनपतिनयेत ) अर्थात् आत्महत्या करनेकाअपराध जैसा पुरुपोंको होताहे तैसाही स्त्रियोंकोभी-ब्रह्मा- जीकी आज्ञाके अनुसार ब्राह्मणीको मरेहुये पतिकेपीछे मरजानानहीं है-इसलिये जीव- ती बनीरहकर उसमरेहुयेका हितकरतीरहै क्योंकि मरजानेसे अात्मघातिनी होती है- जोकोई ब्राह्मणजातिकी स्त्रीमरेहुये पतिकेपीछे मरजातीहै-सो वह आत्मघातके पापसे नतो अपनेापेको और न उसपतिकोभी स्वर्गलेजातीहे-अवकहो कि जब इनअप- राधोंकेसिवाय अपने बांधवोंकोभी दण्डादि नरकभुगवाये तव आपकेसे स्वर्गजासक्ती है-ब्राह्मणीके कहनेसे चारोंवर्णकीअपेक्षाहै क्योंकि जो काममुख्य एकब्राह्मणके लिये करना या न करनालिखाजाताहै वहतीनों अथवाचारोंवोंपरसंभवित होजाताहैदृष्टां- त जैसे १२८ केश्लोकसे जो मर्यादेकहते चले आते हैं वह यद्यपि (स्नातक) पुरुपके निमित्तसे कहरहेहैं परंतु इनमें थोड़ी बातें ऐसी हैं जो केवलस्नातकसेही अपेक्षा रखती हंऔर सारी बातें सबगृहस्थीमात्रके लियेसंसूचितहें किन्तु स्नातक एकनिदर्शनमात्र है-एक सतीके दृष्टांत मात्रसे और भी सहस्रों कामअपनी बुद्धिसे विचारलो जो काल से विरुद्ध हुआ करते हैं-आहार विहार की अपेक्षासे कालके भी तीनभेद शीत १ उपम २ वर्षा ३ काल प्रसिद्धहैं इनमें भी वैद्यशास्त्रके संमतसे जोजोयाहार याविहार करना अनुचितहों तिनका करना यहभीकाल विरुद्धहै १३८॥ नाचक्षीतधयंतींगांनाहारेणाविशत्कचित् । नराज्ञःप्रतिगृह्णीयालुब्धस्योच्छास्त्रवर्तिनः १३९ ॥ ऐ०-धयंती गऊ अर्थात् बच्चेको दूध पियाती हुई या प्यारसे चाटतीहुई अथवा परस्पर दोतीन आदि गोंयें प्यारसे किलोल क्रीड़ा करतीहुई सूंघतीहुई परस्पर थनों को चाटतीहुई यह सव धयंती कहलाती हैं और वहभी धयंती कहलाती हैं जो गाय और बैल परस्पर मैथुनके उद्योगमें तत्परहों इनको किसी दूसरेको दिखलावे नहीं- र्थात् अपनी दृष्टिपरजाय तो दृष्टिको निवर्तन करले और किसी योरको भी नहीं दि- खावे इसहेतुसे कि जानै कोई चंचल मनुष्य उन्हें देखकर छेडैया हटादेवै-और कहीं भी अहारसे प्रवेश नहीं करे किन्तु चाहै किसीका घरहो या बांगहो हाताहो ग्रामही जो मार्गउसके प्रवेशके निमित्तसे नियत किया गयाहो उसीसे प्रवेश करै-कृपएलोभी और शास्त्रसे विरुद्ध वर्तावा करनेवाले राजाका प्रतिग्रह नहीलेवे १३९ ॥ अधिo-धयंती गौओंका नदेखना यद्यपि पूज्यता पक्षसे सब संभचित और यथो- चितहै पर जो कोई उनमें पशुबुद्धि रखताहो उसके लियेभीयहवात फलदायकहै सि- मिताभरा साचाराध्याय। द्धांत इसका यहहै कि,जब पशुओंमें भी यह वुद्दि आरोपित,करी:जायगी कि उनके आनंदमें उपद्रव नहीं करना तो मनुप्यके लिये तो आपसे आप यह दया भाव प्रकट होजायगा कि किसीके श्रानंदमें विघ्नकरना अनुचितह और जव साधारण आनंदमें विघ्नकरना अनुचित ठहरा तव धागेको हिंसा आदि कोईसा कठिनदुःख भी किसीको क्योंदेसकेंगे इस्से यह मर्याद भी मनुष्योंकी रक्षा विषयके प्रबंध पर आरूढहै-और द्वारबिना प्रवेश करना यह प्रत्यक्ष अकल्याणहे कि जवऐसा करेंगा तब अवश्यकहीं न कहीं प्रतिष्ठा भंगकरवावेगा और प्रतिग्रहके लेने या न लेने में जो दोपादोपहे सो नीचेके श्लोकमें प्रत्यक्षहै १३६॥ प्रतिग्रहेनिचक्रिष्यनिवेदयानराधिपाः। दुष्टादशगुणंपूर्वात्पूर्वादेतेयथाक्रमम् १४०॥ ऐ०-प्रतिग्रहों के लेनेमें सामान्य दशापर भी सूनी आदि पाँचौ पहले २ सेपिछ- ला २ यथा क्रमसे दशगुणा दुष्टहोताहे इस्से इन पांचोंका प्रतिग्रह नहींलेवै-पांचों के नाम-सूनी अर्थात् जिसके घरमें सूना कहिये जीवहिंसा का स्थान या पेशाहो किन्तु कसाई इतिलोके प्रसिदिः १ चक्रीतली २ ध्वजी मदिरावेचनेवाला ३ वेश्या ४ राजा जिसके अवगुणऊपर १३६ केश्लोकमें कहचुके, अर्थात् सबहीनहीं ५-१४०॥ अध्यायानामुपाकर्मश्रावण्यांश्रवणेनया । हस्तेनौपधिभाववापंचम्यांश्रावणस्यतु १४१॥ अवअध्ययनधर्मकहते हैं। ऐ०-अध्यायोंका उपाकर्म अर्थात् अध्याय जो वेदहें तिनकाउपाकर्म कहिये उपक्रम किंतु विधिसहित प्रारम्भकरना सो यहकर्म ओपधियोंके उत्पन्नहोनेपर श्रावणमासकी पौर्णमासीकोकरै अथवा उसीपौर्णमासीके समीप जिसदिन श्रवणनक्षत्रहो तिसदिन करे अथवा श्रावणशुलापंचमी जो हस्तनक्षत्रसे संयुक्तहो तो उसदिनकर और अप- नी गृह्योक्तविधि अर्थात् गृह्यसूत्रादि शास्त्रनियमों अनुसारकरे १४१॥ अधि. और जो श्रावणमासमें ओपधियांनहींउत्पन्नहोवें तौभाद्रपदमहीनाके श्रवण नक्षत्रमेंकरे तिसकेपीछे साढ़ेचारमहीना पर्यंत वेदोकोपढ़े-सोई मनुजीका यहकथन है कि (श्रावण्यांप्रोष्ठपद्यावाप्युपाकृत्ययथाविधि । युक्तछंदास्पधीयीतमासान्वितोऽई पंचमान्) १४१॥ पोपमातस्यरोहिण्यामष्टकायामयापिवा । जलांतछंदतांकुादुरसगैविधिववहिः ११२ ॥ मक्ष-पोपमासको रोहिणीमेंअथवा अष्टकामेजलकेनिकट वाहर विधिके अनुसार छंदोंका उत्सर्गकरै १४२॥ पनि-पोपमासमें रोहिणीनक्षत्रके दिवस या उसीमहीनामें (अष्टका नामपर्व जो कृष्णाअष्टमीतिथि प्रसिद्धहे तिसदिन बाहर जलाशयनदी आदिके निकट जाकरवेदों का उत्सर्गकर्म जो उसविषयके ग्रन्थों लिखाहोतिसके अनुसार विधिपूर्वककरे१४२॥

मिताक्षरा साचाराध्याय। अधिः-अष्टका यद्यपि पौराणमतसे भी सप्तमी १ अष्टमी २ नवमी ३ ये तीन दिन प्रत्येकमहीनाके दोनोंपक्षमेंकहेहैं और इनतीनोदिवसमें शास्त्रकापढ़ना औरबत- बन्धकाहोनाभी निषेधकियाहै। और पितरोंकेउद्देशमें श्राद्धभेदसे पौष१ माघ २फाल्गु- नं ३ इनतीनोंमहीनाकी केवल कृष्णाअष्टमीही अष्टका कहलातीहें इनतीनोंमें भिन्नर श्राद्धोंकेप्रकारभी प्रसिद्धहें-यथा(पूपाप्टका पोपमासे १ मांसाष्टका माघमासे २'शाका- एंका फाल्गुनमासे ३) इनतीनोंमें इन्हीं तीनवस्तुसे पितरोंकी तृप्तिकरीजाती है-दो प्रकारकी अष्टकादशापर श्रीमत्परमहंस परिव्राजक विज्ञानेश्वर भट्टारकनेभी इसका निर्णय स्पष्टभावसे नहीं किया और इनत्राचारोंकी न्यूनतासेभी हेतु निश्चित नहीं होता परजिनस्थानों में इनाचारोंकी प्रत्ति संप्रतिहोगी वे इसवातके मेदूहोंगे क्योंकि शास्त्रकाप्रमाण लोकव्यवहारसे और लोकव्यवहारकी प्रमाणताशास्त्रकेवाक्यों से परस्परदोनोंका सम्बन्ध निर्वचनीयहै-इस्सेप्रत्यक्षविदितहोताहै कि श्रीमत्परमहंस परिव्राजक विज्ञानेश्वर भट्टारककेभी समय और स्थानमें इनाचारोंकी न्यूनताहोगी और मनुसंहिताकेकथनसे अष्टका या रोहिणीकाभी कुछनियमनहीं निश्चितरहा किंतु केवल पोपमासहीकहाहै और उसकेसाथमें माघमहीनाभी अधिक लेलियाहै पर उस माघभी कुछअष्टका या रोहिणी अथवा कृष्णपक्षकाभी कुछनियम नहींपायाजाता- तथाच(पोपेतछंदसांकुर्याद्वहिरुत्सर्जनबुधःमाघशुक्लस्यवाप्राप्तेपूर्वाल्हेप्रथमेहनि) अर्था- तज्ञानीपुरुप पोपमासमेंवाहर जाकरछंदोंका उत्सर्गकर्मकरै या माघमहीनाकाशुलपक्ष प्राप्तहोनेपर पहलेदिवस दोपहरसे पूर्वकालमेंकरै यहमाघशुक्ला प्रतिपदा उसअवस्था में संभवितहै कि जोश्रावणीका उपाकर्म भाद्रपदमें कियाहो ॥ देखोजिसश्लोकमूलकी यह अधिकोक्तिहै उस्से और इसमनुसंहिताके प्रमाण भूतश्लोक अनंतरोक्तसे पृथ्वी और आकाशका अंतरहै क्योंकि पूसके सिवाय और कोई अंग इसका और उसका एकतानहीं पासक्ता फिर दोनोंकी समता किसबाजारसे खरीदीजाय इसीहेतुसे शास्त्रों की कठिनाई लोकमें प्रसिद्धहै और इसीहेतुसे यहवातमी प्रसिद्धहै कि ऐसे असंभव स्थलोंमें जोकोई ग्रंथिभेदनकर वहशास्त्रज्ञ विज्ञकहलावे परन्तु यहग्रंथि यद्यपियति- शयं तुच्छहै तथापि खुलसकना इसका परम दुस्तरहे कदाचित् कोईदुस्तर नहींसमु- भै तौ जिसकी इच्छामावे प्रमाण पूर्वक सुलझावे कुछ निपेधनहीहै-इसके सिवाय जिज्ञासुको यह उचित होताहै कि जहांतक बनियावे संशय और संदेहांकी निवृत्ति पर दृष्टिजमीरक्खै दृष्टिके सन्मुख सींकखड़ी करनेसे पहाड़भी श्रोट होजाताहै उसी सींकको दूर करदेनेसे तद्रुप पहाड़ दिखाई देने लगता है इसीलिये पहलेभी सातवें इलोककी अधिकोक्तिमें यथावत् निर्णय दृष्टांतों सहित होचुकाहे कि जिस एककामकी कईरीत ग्रंथांतरोंसे या देशांतरोंसे प्रतीत होतीहो तिनमें अपने प्रात्मा कहिये मन १०० मिताक्षरा साचाराध्याय। बुद्धि चित्त अहंकाररूप चतुष्टय तिसमें जोवात समावे या अच्छी प्रतीतहोवे सोकरे या अपने व्यात्माको इतनी सामर्थ्य न हो तो अच्छे लोगोंका याचार जो प्रमाणीक सज्जन वर्तावा जहां जैसा करतेहों उसीको श्रापभी अंगीकारकरे-क्योंकि ग्रंथों में जो एकही कामके कईभेदहोजातेहैं तिनकाभी मुख्ययहीहेतुहे कि जोश्ऋषि या आचार्य अपने र समयमें निज २ स्थानोंकी अपेक्षा या अन्यस्थानोकी अपेक्षा जैसा जहाँका शुद्दआचार देखते हैं तैसाशास्त्रों में लिखकर प्रमाण करदेतेहैं इससे उनसबकी एकता होनी दुस्तर होजातीहे-अष्टकानामकी पदोप्रकारकी लिखीगई उनमेंजोतीनमहीना 'के तीनअष्टका कहेगये वहतो श्राद्ध विषयमें श्रेष्ठहैं और दूसरे जो प्रत्येक महीनाके दोनोंपक्षमें होतेहैं वे पठनपाठनसे संबंध रखतहें क्योंकि उनमें शास्त्रका पढ़नानिषेध कियाहै इससे इस वेदोत्सर्गमें वेही मुख्यहें और अभिप्रायार्थमें जो कृष्णा अष्टमी कही हे.सो इसलिये कि कृष्णाअष्टमी सदाही पर्यों में प्रसिद्धहे इससे शुलपक्षको छो- डुकर मुख्यता उसपरली गई और यद्यपि पठन पाठन सम्बन्धी अष्टका प्रत्येक पक्ष में ७।८।। यह तीनदिनमें होते हैं परन्तु केवल पोपका महीना शास्त्रोक्त होनेसे अष्टमीभी पौपहीकी अंगीकार करनी हुई इस अष्टमीके ग्रहण करनेसे दोनोंप्रकारके अष्टकामें मुख्यता बनीरही-इसके सिवाय रोहिणी नक्षत्र इस्सेभी अधिक श्रेष्टहै क्यों- कि वह मुख्यवचन पूर्वोक्तहै और अष्टका उसका विकल्पार्थ भावसे गोणपक्षहै और मनुजीका प्रमाण जो इसके साथमें लिखागया वह इसके आगे मध्यमहै क्योंकि यात्र- वल्क्य जीकी स्मृति उस्से पीछेहुई है और जो वात पीछेहोती है वह पहलीकी अपे- क्षा श्रेष्ठ होती है क्योंकि पहले नियमोंके गण दोप छांटकर पिछली संसिद्धि होती है परन्तु पिछलेकी उत्तमता परभी पहलेकी गौरवता नहीं मिटसक्ती किंतु उसकी गोर- वता इसलिये अधिक बनी रहती है कि उसीकी प्रमाणतासे पिछलाभी प्रमाणमें भा- सक्ताहै जैसे पिता या पितामह प्रपितामह ग्रादि पुत्रादिकोंके आगे वल पराक्रमसे हीन यद्यपि होजाते अर्थात् पुत्रादिकोंके समान उनसे कोईकाम नही चलसत्ता पर पुत्रादिक उन्हींके नाम या कुलग्रामसे प्रमाण पाते हैं (भेदर)(यथाशास्त्रंतुकृत्वैवमुत्सर्ग छंदसांवहिः।विरमेत्पक्षिणीरात्रिंयवाप्येकमहर्निशम् ॥अतऊर्धेतुछंदांसिशुक्लेपनियतः पठेत् । वेदांगानिचसर्वाणिकृष्णपक्षेपसंपठेत अर्थात् यह मनुजीका कथनहै कि जैसा इसविषयका कर्मट शास्त्र होताहो उसके अनुसार ऊपर कहीहुई रीतिसे इसभांति वेदों का उत्सर्गकिये पीछे पक्षिणी रानि मात्र या एकदिन रात्रिमात्र पठन पाठनको थांम कर वाहर उसी तीर्थ में विश्राम करै जहां उत्सर्ग कियाहो इसके उपरान्त श्रावणमास ताई जितने शुक्लपक्ष आते जावें उन सबोंमें वेदोंको नियत होकर पढ़े और जितने कृष्णपक्ष आते जावं उन सवोंमें वेदके समस्त अंगोंको अच्छी रीतिसे पढ़े-यह मर्यादें मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । १०१ जो १४१ ओर १४२ इन दो श्लोकों में अधिकोक्ति सहित कहीगई सो केवल वेद केही पढ़ने के लिये कही हैं किंतु और किसी विद्या अथवा शास्त्रके लिये यह वन्धन नहीं है तहां श्रावणीके उपाकर्मसे लेकर ४॥साढ़ेचार महीने जो १४१में कहे हैं तिन में शुक्ल या कृष्णपक्षका कुछ भेद नहीं है और नं यह भेदहै कि वेदको जुदापढ़े और उसके अंगोंको भिन्न दिवसों में पढ़े किंतु साधारण भावसे साढ़ेचार महीने ताई वेदका पढ़ना कहाहै तिसपीछे इधरके शेप महीनाओंमें पक्ष भेद और पाठभेदभी कियाहे इसप्रकारसे परे १२ महीनोंका हिसाव समझा दिया-और पक्षिणीरात्रि उसे कहते हैं कि बीचमें एकरात्रि और पहला पिछला दोनों दिवस उसके साथमें गिनलिये जाय- तथोक्तम्(आगामिवर्तमानायुक्तायांनिशिपक्षिणी) और पहला दिवस वही कहलाता है जिसमें पर्वोक्त उत्सर्ग कर्मकियाहो ऐसेहीयऔर कामोंमेंभी जहांकहीं पक्षिणीरात्रिका चर्चा हो यहीलक्षण जानो यद्यपि वेदोंके अध्ययन करनेवाले वर्तमानमें भी बहुतेरे हैं पर इस रीतिसे पढ़नेवाले भाव कहीं मिलसक्तहों और यहभी है कि जो इसी रीति से संप्रति कोई वेदोंका संग्रह करना चाहे तो अचंभा नहीं कि इस बन्धनमें ढोलसे भी खालजाती रहै परन्तु इसमें कुछ संदेह नहीं कि इसवन्धनके नियमों सहित पढ़ने से उस वेदका यह प्रभाव होताथा कि जो २ मंत्र जिसविपयका प्रसिद्ध है अपने कार्य को तत्काल प्रकट करताथा जैसे तत्काल अग्नि या जलका आवाहनसे उत्पन्न हो जाना आदि १४२॥ अब वेदके अनध्याय कहते हैं। त्र्यहंप्रेतेप्वनध्यायःशिष्यालग्गुरुवंधुपु । उपाकर्मणिचारसगैस्वशाखाश्रोत्रियेतया १४३॥ ऐ०-ऊपरके श्लोकोंमें कहीहुई रीतिसे वेदका अध्ययन करते या करातेहुये पुरुषों का शिप्य ऋत्विक् गुरु बन्धु इनमेंसे कोई मृतक होजावै तो तीनदिनका अनध्याय करे- और पूर्वोक्त उपाकर्म जो १४१ श्लोक अनुसार किया हो तौभी तीनदिवसका अनध्याय करे या पूर्वोक्त उत्सर्गकर्म जो १४२ श्लोक अनुसार किया हो तोभी तीन दिनतक पढ़ना बंद राखै-तैसेही वेदकी जो शाखा आप पढ़ता हो वहीं शाखा कोई दूसराभी पढ़ता हो और वह मरजावे तौभी तीनदिन पढ़ना बंदराखे १४३॥ अधि० -इस ऐक्यार्थमें उत्सर्ग कर्म परभी तीन दिनका अनध्याय कहाहै और १४२ इलोककी अधिकोक्ति में उत्सर्ग कर्मपर जो मनजीके दोइलोक दूसरे भेदमें लिखे हैं उनमें उत्सर्गके पीछे जो पक्षिणीरात्रि या एकही दिनरात्रि मात्रका विश्राम वा अन- ध्याय कहाहै यद्यपि इसमें उससे अन्तरभी है क्योंकि यहां तीनदिवस निषेध किये हैं परन्तु इन दोनों रीतोंमें विकल्पहै अर्थात् चाहे इसरीतिसे तीनदिवस मानो चाहे उस रीतिके अनुसार जैसा अपने मन बुद्धिमें समावे सोकरी कुछ विरोध नहीं है किंतु अ. पना अपना सम्मतहे १४३॥

+-- 7 १०२ मिताक्षरा साचाराध्याय । सन्ध्यागजितनिर्यात कंपोल्कानिपातने । समाप्यवेदानिशमारण्यकमधीत्यच १४४ ॥ -, ऐ०-धुनिश अर्थात् एक दिनरात भरका अनध्याय इतनी बातोंमें होताहै एक तो सन्ध्यासमय मेघ गर्जनमें निर्घात अर्थात् आकाशमें वज्रपात श्रादि उत्पात का शब्द होने में भूकम्पके होने में३ उल्काताराके गिरनेमें ४वेदकी समाप्ति अर्थात मन्त्र और ब्राह्मण जो वेदमें प्रसिद्धहैं-तिनके पूरे होनेमें ५ श्रारण्यक अर्थात् काण्व शाखा और माध्यन्दिनीय शाखा संबन्धी ब्राह्मण विशेष जो वेदका अंगहै. तिसको पढ़करभी एकदिन रात्रिका अनध्यायद और श्रारण्यक (मध्याय) कोभी कहते हैं- ऊपर जो सन्ध्यामें गर्जना लिखा है वह संध्या प्रातःकाल और सायंकाल दोनों की संभवितह १४४॥ - पंचदश्यांचतुर्दश्यामष्टम्याराहुततके । ऋतुसंधिपुभुक्तापात्रादिकंप्रतिगृह्मच १४५॥ -- ऐ०-पंचदशी ५ अमावास्या और पूर्णिमाभी चतुर्दशी१४ अष्टमी राहु सूतक अर्थात् सूर्य और चन्द्रमाके ग्रहणका दिवस-और ऋतुकी संधि अर्थात् दो दो. मास में जो ऋतुकाल पलटताहै तिसकी संधिके दोदिन होते हैं किंतु एक तो व्यतीत ऋतु के मासांतकी अमावास्या ३०और पागंतुक ऋतुके प्रारम्भकी प्रतिपदा १ तिनमें अमावास्या ऊपरभी कहचुके हैं शेष एक प्रतिपदाका निपेध यहां पायागया और श्राद्धका निमंत्रण भोजन करके या श्राद्धके नामका कुछप्रतिग्रह लेकर इन सभी बातों में एक एक दिन रात्रिका अनध्याय करना उचितहै-एक एक दिनरात्रि यह पूर्वश्लोक मेंसे घुनिश शब्दका अनुकर्ष हुआहै १४५॥ १. मधि०- राहुसूतकमध्ये स्मृत्यंतरमें तीन दिवस निषेधह-तथाच (त्र्यहनकीर्तयेद्र मराज्ञोराहोश्वसूतके ) अर्थात् राजाके सूतक होने और राहुकेभी सूतकमें तीन दिन ताई ब्रह्म जो वेदहै ताको कीर्तन नहीं कर और ऊपर एकही दिन रातका निषेध लिखाहै तहां यह कारणहे कि एक दिवस साधारण राहु सूतकमें लिया और तीन दिवसका निषेध ग्रस्तास्त और ग्ररतोदय और सर्वग्रासमें लिया है और प्रतिपदा का अनध्याय केवल दोदो मास पीछेकी प्रतिपदामें शास्त्रके अनुसार पायागया और लोकमें बहुधा जो पाक्षिक प्रतिपदाका अनध्याय किया जाताहै इसका कोई निषेध चिह्न शास्त्रमें नहीं पायागया इस्से संभवितहै कि भेड़ा चालि पड़ गई होगी और श्राद्ध विषयके भोजन वा प्रतिग्रह मध्ये जो एक दिवसका निषेधहै सो एकोद्दिष्टश्राद्ध के सिवाय अन्य श्रादमें जानौ क्योंकि एकोद्दिष्टके लिये यह स्मृत्यंतर वाक्य है कि (प्रतिद्विजीविद्वानेकोद्दिष्टस्यकेतनम् त्र्यहनकीर्तयेद्ब्रह्मेति)अर्थात् विद्यावान् द्वि- जोत्तम एकोद्दिष्ट श्राद्धका केतन अर्थात् निमन्त्रण अथवा कुछ प्रतिग्रह लेकर तीन दिवस ब्रह्मका कीर्तन नहीं करे १४५ ॥

मिताक्षरा स. आचाराध्याय। १०३ पशुमंदूकनकुलवाहिमाजीरमपकैः । रुतेंतरेत्वहोरात्रंशरुपातेतपोच्छ्ये १६ ॥ ऐ०-पशु चतुष्पद-मंडूकमेढुक-नकुल नेवला-श्याकूकुर-अहि सर्प-मार्जार विलाव- मूषक-मसा-इन जीवों में से कोई जीव पढ़ने पढ़ाने वालोके बीच में निकलजाये तो एक दिन रात्रि ताई अनध्याय होवे-तैसेही शक्रपात और उच्छृय में भी एक दिन रात्रिका अनध्याय-यहां शक्रपातके शब्दसे शक्रध्वजनाम उत्सव जो अनारष्टिमें वीके हेतु से राजालोग इन्द्रध्वजा खड़ी करके किया करते हैं तिसके विसर्जनका दिवस और उच्छ्यसे उसके खड़ी करनेका दिवस संभवितहै १४६॥ भवि०-अनध्यायोंकेनिमित्त जो बहुधा यहाँपर कईश्लोकों में कहे हैं तिनमें जहाँर एक दिनरात्रिकानिपेधहै तहाँ जिससमयसे कोईनिमित्त उत्पन्नहुाहो उस समयसे लेकर दूसरेदिवस उसीसमयताई उसनिमित्तका दोपसम्भवितहै उस्से आगेनहीं-और गौतमजीने जो इसविषयमें तीनदिवस और कुछ विशेषता कहीहैकि (श्वानकलसर्पम- इकमार्जाराणांव्यहमुपवासोविप्रवासश्च)अर्थात् कूकर नेवला साँप मेढक विलाई इ- न्होंके बीच में प्राजानेसे तीनदिनताई अनध्याय और उपवासकहिये निराहार और विप्रवासकहिये वस्तीकेवाहर किसीतीर्थ देवस्थानमें निवासकरे सो यहविशेषता केव- ल उसकेलिये है कि जिसनेउसीदिन प्रथमारंभकियाहो उसमें निमित्तहोजावे १४६॥ .. अब आगे सैंतीस ३७ अनध्याय तात्कालिकहैं सो ४ चारश्लोकोंमें कहतेहैं। श्वकोटगर्दभोलकसामवाणाननिःश्वने । अमेध्यशयादात्यश्मशानपतितांतिके १४७॥ ऐ०-श्वा कूकुर-कोटा शृगाल-गर्दभ गदहा-उलूक घुघुया इनकाशब्द सुनाईदेने में और साम अर्थात् सामवेदकागान सुनिपड़नेमें-बाणशब्दसे यहाँ चाँसकातडतड़ा- हट होने में-पातकहिये किसी दुःखीजीवका चिल्लाहटसुनिपड़ने में उतनीदेरताई पढ़ना बंदकरै-और अमेध्य अर्थात् कोई अशुचिवस्तु या शव कहिये मृतक या शूद्र जो अतिनीचहो या इमशान चिताभूमि या पतित कहिये चांडाल इनके समीप होने में उतनीदेरताई अनध्यायकरैजबतक इनकी समीपतारहे १४७॥ अधि०-गीतमजीने कुछ और भी कहे हैं यथा (वेणुवीलामृदंगगंध्याशब्देवन ध्यायः) अर्थात् वेणुवांस-वीणानाम का बाजा-मृदंग-गंत्रीगाड़ी-पातपीडावान् इनके शब्दोंमें तावत्काल अनध्यायहो १४७॥ देशेऽशुचावात्मनिवविद्युत्स्तनितसंप्लये। भुत्याद्रपाणिरंभातेरर्द्धरातिमारुते १४८ ॥ एक-शुद्धस्थानमे-अपनेशरीरकी यशद्धताम-विद्यसंश्वमै अर्थात् वारम्बार विजलीके चमकने में-स्तनितसंप्लवमें अर्थात वारम्बार मेघाके गर्जनेम-तावत्कालिक अनध्यायकरे और भोजनकरके जबतक जूठे हाथ रहें तबतकन्योर जबतक जलके .

मिताक्षरा स० आचाराध्याय। भीतर रहै तबतक-और अर्द्धरात्रिके समय जो महानिशीथ काल होता है तिसमें- और अतिभयानक झंझावायुके चलने में भी १४८ ॥ पांशुप्रवपेंदिग्दाहेसंध्यानाहारभीतिपु । धावत पूतिगंधेचशिष्टेचगृहमागते १४९॥ ऐ०-उत्पातरूप अंधकारकी धूलिवके समय-और दिग्दाहजो ज्वलती हुईसी दिशायें देख पड़तीहें जितनीदेर ऐसा लक्षण रहे तबतक और दोनों संध्याओंके स- मय तक-और नीहारकहिये कुहुर जो वादलीउँटकर धुयाँसा छाय जाताहै जितनीदेर वह रहे तवतक-और भीति जो चोर उचक्का वा राजदूत श्रादिसेअचानक पानिपड़- तीहें जितनीदेर बहरहें तबतक अनध्यायकरे और शीघ्रतासे दौड़ते हुये भी उतनी देरतक अनध्यायराखै जबतक दौडे या अतिशीघ्रचलै-पतिगंधमें भी अर्थात् जबतक कोई अशुचि दुर्गधि कहीसे मद्यादिवस्तुओंकी वायुके संयोगसे आनेलगै तवतक भी-और शिष्ट अर्थात् श्रोत्रिय आदिकोईसत्पुरुप अपनेघरावे या जहाँ अध्ययन का स्थानहो तहाँ पाजावे तौ जितनीदेर उसकी आज्ञा या सत्कारका पालनकरना हो उतनीदेरतक अध्ययनको विलम्बितराखै १४६॥ रखरोष्ट्रयानहस्त्यश्वनावलेरिणरोहणे । सप्तत्रिंशदनभ्यायानेतांस्तात्कालिकान्विदुः १५० ॥ ऐ०-खरगर्दभ औरखच्चर, उष्ट्रऊँट, यानरथगाड़ी आदि, हाथी, घोड़ा, नौका,दक्ष, ऊरिणं अर्थात् ऊपर भूमि या मरु भूमि यहा शून्य स्थानकोभी कहतेहैं-इनमेंसे किसी पर आरोहण होते समय उतनीदेरतक अनध्यायकर इतने सैंतीस ३७ अनध्याय तात्कालिककहेजातेहैं इसीहेतुसे कि यह केवल उतनेही कालतक होतेहैं और इनके सिवाय और भी बहुतेरे मनुजीने सोतेहुये या पैर पसारेहुये इत्यादिलक्षण कहेहैं पर कुछ लिखनेकी आवश्यकतानहीं पाई जातीहै १५०॥ इसप्रकार अनध्यायोंको कहा अब फेर उन्ही स्नातकव्रतोंको कहते हैं जिनका चर्चा बड़ी दूरसे चला आताहै। देवविक्स्नातकाचार्यराज्ञांछायांपरस्त्रियाः । नाकामद्रक्तविएमूत्रष्टीवनादर्तनादिच १५९ ॥ ऐ०-देवता ऋत्विक् स्नातक आचार्य राजा परस्त्री इन्हीं की छायाको जानवझ कर दवावे नहीं और उलाँधैभी नहीं और रक्त बिष्ठा मूत्र टीवनकहिये खखारथूक आदि यहां आदिशब्द से वमन कुल्ला इत्यादि जोडलेना उद्वर्तन कहिये उबटनका मैल तिसको यादिलेकर और भी अनेक भांतिके मैल स्नान धोवन आदि जोलोक में प्रसिदहें इनकोभी पैरसे दावै या उलांघे नही १५१॥ अधि०-इस ऐक्यार्थके वीचमें जो जान बूझकर यह विशेषलिखा है सो मनुजीके कथन में से लिया है इसको इस सारेही श्लोक में रक्तादिकोंसे भी सम्बन्धित करलेना अर्थात् इस श्लोकमें निषेधकरीहुई छाया या रक्तादिकोंके उलांघने वा दवानेका M मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । दोप उस अवस्था में नहीहै कि जो धोखेमें विना जाने ऐसा होजाय १५१॥ विप्राहिक्षत्रियात्मानोनावज्ञेया कदाचन । आमृत्यो श्रियमाकांक्षेनकंचिन्ममणिस्टशेत् १५ ॥ , ऐ०-हि-अवश्य भावसे क्षत्रियात्मानोविप्राः अर्थात् जो ब्राह्मण क्षत्रियात्मा किंतु क्षत्रियोंके अधिकारी कामदार उनके प्रात्मा कहिये शरीरके समान प्रियहों यहा आ- स्माकहिये मन या बुद्धि तिसमें एकतावान्हों किन्तुमंत्रादि संमतिदेनेमें प्रमाणीक हों वे कभीभी अवजाकिन्तु अपमान करिवेयोग्य नहीं हैं अथवा दूसरायह अर्थहैकि वि- प्रबहुश्रुत और अहिसर्प और क्षत्रिय-राजाऔरक्षत्रियात्मा कहिये उनकमंत्रीआदि ये सब कदाचनभी अपमान करिवेयोग्य नहीं हैं-आमृत्योःअपनी मृत्युकाल पर्यंत श्रियं श्राकक्षित् लक्ष्मीसंचय करनेकी आकांक्षाकरे परन्तुकिसीको भी मर्ममें स्पर्श नहीकरै अर्थात् किसीका हृदयऐसा नहींदुग्यावे जिससे वहलौटकर अपनेही विनाश करनेके उपायमें उद्यत होजावे १५२॥ दूरादुच्छिष्टविण्मत्रपादांभांसिसमुत्सृजेत् । श्रुतिस्मृत्युदितंसम्यनित्यमाचारमाचरेत् १५३ ॥ ऐ०-दूरात् निवासस्थानसे दूर भोजनकी जूठ और विष्ठा और मूत्र और पैरधोव- नाजलइन्हें फेंकवादे-श्रुतिवेद-स्मृति धर्मशास्त्र इनदोनों में कहाहुया आचारसम्यक् रीतिसे नित्यंप्रति याचरणकरै १५३ ॥ अधि०-ऊपर कहेहुये उच्छिष्ट विष्ठादिकेवल चारमलोंके निदर्शनमात्रसे, और भी सारेही मलोंकादूर फेंकवादेना उचितहै क्योंकि मलोंकी समीपतासे विकृतहुई वायु जो सड़ाइँध श्रादि दुर्गंधिको कपाल प्रवेशकरदेती है उससे बैद्यविद्याके सिद्धांतस नानारोगों की उत्पत्ति होजाती और बुद्धिकीतीव्रता कुंठितहोजाती और बारम्बार उसपर दृष्टिपड़नेसे चाभीस्थूल होजातेहैं और देवादिसत्सृष्टिके आराधन सिद्धांत सेकोई देव या सज्जन उसस्थानमे श्रातानहीं या दैवयोगसे आजाता है तो उस मलीनताके ध्यानसे शीघ्र चलाजाता और फिर झांकनेकी इच्छानहीं करताहै इसी लिये यहमर्यादा स्थान शुद्धिपर आरूढ़ है-तथाचाहंकश्चिद्विपये ( सर्वकर्मपरित्य ज्यकेवलंघटिकाद्वयम् स्यकीयंपरकीयंवानिजस्थानंसुशुद्धयेत्-नित्यमेतत्प्रकुर्वीतशरीरे पधनेनवा शुद्धस्थानेबसंतीहदेवर्षिपितृमानवाः)अर्थात् गृहस्थीके आवश्यकसयकामों कोछोडकर केवल दो घटिकामात्रके समयतक चाहे अपनाहो या विरानाहो परजिस स्थानमें जिसका निज निवासहोवे उसस्थानको अच्छीभाँतिसे शुद्धकरवावै-इतनायह दो घटिकामात्रका प्रायास नित्यंप्रति चाहै शरीरसे या धनसेकरे परकरनेमें प्रकर्पता की आवश्यकतासे पालस्य वा उपेक्षा नहींराखे क्योंकि इससंसारमें जो स्थान शुद्ध और निर्मल देखपड़ता है उसमें देवता वा ऋपि वा पितर और सज्जन मनुष्यभी किसीहेतुसे यानिकर कुछदेरतक वास किंतु विश्रामलेतेहैं-ऊपर दोघटिका जो लिखी २० १०६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय, हैं सो निरन्तर नित्यं प्रति करने में कही हैं सो यह थोडेसे थोडाकाल निर्मलता में इसीलिये नियत किया है कि जो कदाचित् किसीहेतुसे कोईदिनका अंतरभी पड़जावै तो फिर जिसदिन उसकामका अवसरमिलै तिसदिन उनव्यतीत दिवसोंका लेखा जोड़कर उतना थायास कियाजाचे अर्थात् जो एकहीदिनकायंतर हुयाहो तो तीसरे दिनके अवकाश अवसरमें चारघड़ीका आयासकियाजावे ऐसेही जो दोदिनका अंतर हुआहो तो चोथेदिनमें छःघटिका पायास कियाजावे इसीप्रकारचाहे दैवयोगसे एक पखवाड़े या महीनेकाभी अंतर हुाहो तो उनसबका लेखा जोड़कर जितने प्रहर होतेहो उतने प्रहरों के श्रायासमें यहनियम नहीं है कि वहसव एकही दिनमें किया जावे किन्तु कर्ताकी इच्छा और अवकाशपर आरूढ़ है कि वह चाहे तितने दिनों पर फैलादेवैपर निरन्तर उसलेखे में न्यूनता नहीं होनेदे-शरीर से या धनसे जो लिखा है तहाँ जो निर्द्धनहो वह शरीरसे और धनवानहो उसकेदास या चैतनिक जो कुछकरें सो धनसेहै-आलस्य वा उपेक्षा जो लिखीहै सो पालस्थतौ शरीरसेकरने पालेकी अपेक्षामें कहाहै और उपेक्षा धनवान् के पक्षमकहीहै इसलियेकि बहुधाधन- पात्रभी ऐसेमलीन प्रकृति होतेहैं जिनके दासादिकोंकी बहुताइतपर भी स्थान शुद्धि नहीं होसक्ती सो यह एकस्वामीकी उपेक्षा प्रवल हेतुहै किन्तु जिसघरका स्वामी इस बातमें अपेक्षा पूर्वक ध्यानरखकर दासोंपर प्रेरणावनाये रखताहै उसघरमै मलीनता का निवास नहींहोसक्ता-अन्यथा ऐसेदास बड़ेउत्तम प्रारब्धी धनपात्रों वा अमीरों के समीप हुआकरते वा उनके प्रारब्धोंके अनुकूल स्वतःआमिलतेहें जो स्वामीको उ. दासीन प्रकृतिसे विपरीतभी शुभचिन्तकताकै अनुकूल यहास्वकीय स्वच्छस्वभावक हेतुसे मलीनता नहींदेख सक्ते १५३॥ गोब्राह्मणानलान्नानिनोछिटोनपदारष्टशेत् । ननिदाताडनेकुर्यारपुत्रशिष्यंचतायेत् १५४ ॥ ऐ-गऊ ब्राह्मण अग्नि अन्नजो संसिद्ध भोजनयाग्य कोई वस्तुहो इनको आप जूठेहो तो नहींछूचे या बिनाजूठेभी लातसे न वे-पुत्र और शिप्यकी शिक्षा हेतुसे ताड़नाकरे और इनकेयोग्य ताड़न करनेवालेको निन्दाभी न करे १५४ ॥ अधि०-ऊपर निषेधकियेहुओंको कदाचित् भलचकमें जूठे या लातसेछूलेवे तो मनुजीकाकहा प्रायठिचत्तकरना उचितहै तथाच (स्टप्दैतानशुचिनित्यमनिःप्राणानुप स्टशेत् । गात्राणिचैवसर्वाणिनाभिंपाणितलेनतु) अर्थात्-इतनोंको जूठे या लातसे छूकर आप नित्यअशुचिहोजाताहै इसलिये अपनेशरीरकी शुद्धिकरनेकेलिये शुद्ध जलोंसे प्राणोंको और सबगानोंकोभी स्पर्शकर और नाभिको हाथमें जलरक्खेहुये हथेलेसेकुलदेरतक स्पर्शराखे-ताड़नविपय यद्यपि यहबात सामान्यलिखीहे पर इसमें अधिकविवेककी आवश्यकताहै क्योंकि पुत्र और शिष्य ये अधिकताड़नासे भी बिगड़ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । १०७ जाते और अधिक लाडप्यारसेभी शिरपरचढजाते है इसलिये इनकीशिक्षा और सौशील्यकी परिसिद्धिकेहेतुसे ताड़न और प्यारभी यहदोनो एकतुल्यबराबर कॉटेकी तौलसे करनेउचितहे सो वहताडनभी जबतक केवलनेत्रोकीताडनासे कामदेसक्ताहो तवतक और कोईरीतिनही और वह प्यारभी अतिवाल्य अवस्थासे जोकुछ किया जाय केवल शिक्षा वा सौशील्यके आश्रयभूत होकरहो-योग्य ताड़नकरनेवाले की निन्दाकानिपेध जोकियाहै सो केवल उसीअवस्थामे कि जो ताड़ना उचितरीतिकीहो या पुत्र वा शिप्यादिक अपने पिता और गुरुओका सामनाभी करतेहो अन्यथा जहाँ जैसा सम्भवही १५४॥ कर्मणामनसावाचायनादर्मसमाचरेत् । भस्वायलोकबिंदिष्टधर्ममप्याचरन्नतु १५५ ॥ मक्ष-कर्मसे मनसे बचनसे यत्नसे धर्मकोसम्यक् आचरै-अस्वयंलोक विद्विष्ट धर्मकोभी नही आचरै १५५॥ अभि-कर्मकहिये शरीरद्वाराकरनेसे अपनीशक्तिकेअनुसार जोकुछ होसकै धर्म का आचारकरै-मनसेभी धर्मकाध्यानकहिये शोचविचार लगारक्खे-वचनसेभी उसकी प्रशंसा वा कर्तव्यता वा न्यूनाधिक्य वा शुभाशुभका कथन उच्चारणकरतारहै इन तीनोप्रकारोसे यत्नपूर्वक जहातकवनियावै धर्मका समाचारकरै-परन्तु अस्वयकहिये जिसधर्मके प्राचरणकरनेसे प्रत्यक्षभावमें स्वर्गकामिलना नहींप्रतीतहोताहो अथवा लोकबिहिष्टकहिये लोकनिदितहो किन्तु जिसधर्मका आचारकरनेसे लोकनिन्दाहो- नेकीशकाहो ऐसाधर्मभी यद्यपि शास्त्रविहितहो पर उसकााचार कदाचितूभी नहीं करे (दृष्टात) जैसा सतीकाहोना यद्यपिशास्त्रविहितहै और किसी कालातरमे उसकी प्रत्तिभी अधिकथी परन्तु प्रत्यक्षभावसे उसमे कोईलक्षण स्वर्गप्राप्तिकाभी नही पायाजाता क्योकि बहुधा ऋपीश्वरोने पीछे २ अनेकस्मृतियोमे निषेधभी किया है जो स्वर्ग प्राप्तिका हेतु होता तो ऐसे त्रिकालज्ञ दूरदर्शी उसका निषेध क्यो करते और यथार्थसे लोकमें भी वहबात निंदितहै जैसा १३८ के श्लोकम पीछे वर्णन हो चुकाहै ऐसेही और भी अनेकवाते अपनी बुद्धिसे समझी जायँ १५५ ॥ मातृपित्रतिथिभातृजामिसम्बन्धिमातुलै । वृद्धवालातुराचार्यवैद्यसश्रितवांधवै १५६ ॥ ऋत्विक्पुरोहितापत्यभार्यादाससनाभिभि । विवावर्जयित्वातुसर्वान्लोकान्जयेद्गृही १५७॥ भक्ष.-सहद्वयो माता, पिता, अतिथि, भ्राता, जामय ,सम्बन्धी,मामाश्रोसे-द्ध, वालक, आतुर-प्राचार्य वेद्य-सश्रित-वाधवोसे १५६ ऋत्विक्-पुरोहित-अपत्य-भार्या- सनाभियोसे-विवादको वर्जितकरिकेभी सवलोकोको गृहस्थी जीतै १५७॥ भाभ० सहदयो -यहाँ (माता) के नामसे चाची, ताई, फूभा, मामी, मावसी आदि " । १०८ मिताक्षरा स० पाचाराध्याय । "भी अपेक्षित हैं-(पिता) केनामसे चाचा, ताऊ, फूफी, मावसापादिभी सम्बन्धित हैं- (भतिथि)अभ्यागत बटोही जोकोईजातिकाहो जिस्सेअपनी चिन्हारभी नहींहै-(भ्राता) शब्दसे चचेरे ममेरेआदि जो कोईहों-(जामी) शब्दसे नवोढ़ा बह वेटीयादि जिनके पतिविद्यमानहें कोईहों-(सन्बन्धी)जिनसे विवाहसम्बन्ध हालमेंहुयेहों-(मामा)केनामसे सगे और चचेरेआदि सवअपेक्षितहें-(बूढा) जो अपनीइन्द्रियों और अंगोंसेशिथि- लहो चाहे अपनाया विरानाकोईहो-(बालक)जो पोडशवर्प अवस्थासे नीचाचाहै अपना या विरानाकोईहो-(भातुर) शब्दसेरोगी और कातर जिसकोडरपोका कहतेहैं- (भाचार्य) जो विद्या वा ज्ञानदेव या कोईसी जीविकात्ति करनीसिखलावे-(वैद्य) जो विद्वान् किसीविद्यामें निपुणहो या केवल चिकित्सामें तत्परहो-(संश्रित) जो अपने- श्रय भूतरहकर जीविका आदिसे निर्वाहकरताहो-(बांधव) शब्दसे पितापक्ष और माता पक्षोभी गोत्रीलोग चाहै कोईहों १५६ (ऋत्विक्) यज्ञादि कर्म करवानेवाला(पुरोहित) प्रसिद्धहै पर अपना या अपने नातेदारका भी हो (भपत्य) पुत्रादि संताने चाहै अ- पनी या अपने किसी गोत्री आदिकीभी हों (भायी) वामांगी (दास) कर्मकार सेवक । चाहै अपने या अपने संबंधीके भी हों (सनाभि ) कहिये सहोदर चाहै भाईहो या ब- हन-इन ऊोक्त सबोंसे विवादको छोड़कर गृहस्थी सवलोकोंको जीतलेताहै १५७॥ । अधिo-लोकशब्द प्रजापति आदि लोकोंका वाचक और संसारके मनुष्योंका भी वाचकहै किन्तु लोके भवालोकाः इसी लोक शब्दका अपभ्रंश होनेसे मनुष्योंको लो- गकहा करते है-संसारमें आकर जो कोई गृहस्थी प्रजापति आदि लोक पालोंके लोकों को जीता चाहै अर्थात् अप्रतिहताश होकर उन लोकोंकी रचना में ईश्वरकी ईश्वरता मध्ये सैर विहारकरना चाहै या इस्त्रीसंसारके सम्पूर्ण मनुष्योंको अपनेवशकरना चाहै तो इन कहेहुये मनुष्यों से वाणी कलह कदाचित् भी नहोनेदे और नहोनेदेने का यह सिद्धांतहे कि जब उनके कुछेक अनुचित वचनको भी सुनिकर आप मौनकर जावेगा तो आगेको उत्तर प्रत्युत्तर तक दशा नहीं पहुँचेगी और पीछे वेहीलोग आप अपने मनमें संकुचित होजावैगे वरन वेही संकुचित हुये वशीभूत वनेरहकर किसीभीर पर सहायता करनेकी अभिलाप अपने आपपैदा करेंगे इसहेतुसे सारालोक अपनाहितू सादिखाईदेवेगा १५६ १५७॥ पंचपिंडाननुदृत्यनस्नायात्परवारिपु । स्नायानदीदेवखातदप्रस्त्रवणेपुच १५८ ॥ अक्ष०-(पांचर्पिदों) को उद्दारनकरके पराये जलोमें स्नान नहीं करै-स्नान करैनदी में देवखातमें हदमें प्रस्रवणमें १५८ ॥ अभि०-परायेजल उन्हें कहते हैं कि जो जलाशय बनाकर किसी देवता के नाम से या सारे संसारके नामसे नहींछोड़े गयेहों अर्थात् किसीनेकोई जलाशय ठेठ अपने मिताक्षरा स० आचाराध्याय। १०९ घरके या अपने सारे गोत्री लोगोकी आरामके लिये अपने स्थानकेागे या अपनी बगीची फलवाड़ी आदि किसीजगहवनारक्खाहो जिनमे सबलोगोकोन्हानेका अधि- कार नहींहै उनमें जो कोई दैवयोगसे स्नानकरनाचाहै तो पहलेपांच पिडउद्दार कर- लेवे तव स्नानकरै-और (पिंड)शब्दका अर्थ एकग्रासमात्र अन्न जो मुखमें एकवार धराजाय और मुरगाके अंडामात्रकोभी ग्रासकहते है और उसीकेउपलक्षणसे मुट्ठी मात्र अन्न जो एक हाथ के वकोटे मे आजावै-और एक आदमी के पूरे आहार को भी पिड कहते है-और दोनों हाथमे जितनी गीली मही आजावै उतने गोले को भी एक पिड कहते हैं-यहांपर इन सभी प्रकार के पिडोसे अपेक्षा है अर्थात् अवसर के अनुसार जहा जैसे (पिद) का संभव हो उसी प्रकार के पांच पिंड उद्धार करै अर्थात् देदेवै (या) निकालै तब स्नानकरै सो यह प्रकार रोज रोज के स्नान मध्ये किसीकाल मे वडी सी आवश्यकता ऊपर कहाहै-(अन्यथा) जो नैत्तिक स्नानका प्रकार मुख्यभाव से होता है सो यही है कि नदी जो अवाध अर्थात किसीकी रोक टोक से रहित प्र- बाह वाली हो या (देवखात) कहिये देव निर्मित पुष्कर आदि तीर्थ या (हद) अर्थात् जलप्रवाह के तीव्र अभिघात से स्वयंभूत अतिनिम्न प्रदेश जो जल से परित हो जिसको लौकिक भाषामें झील और तालाव भी कहतेहै या (प्रस्त्रवण) जो पर्वतादि उच्चस्थान से बहता हुआ जल भरना प्रसिद्ध है इन्हो मे स्नानकिया करै तौ पाच पिडों के उद्दारकरने की आवश्यकता नहीं है और उनमे भी पिडो के उद्धार करनेकी आवश्यकता विशेषनहीं है जो जलाशय क्सिीठेठ अपने प्रात्मीय भ्रात मित्रादिक ने बनाया और स्वकीय भावसे स्नानादि करने की आज्ञादेरक्खी हो १५८॥ अधि०–कई प्रकार के पिंड कहने का यह हेतुहे कि स्नान करनेवाला मनुष्य जैसा हो तैसे प्रकार का पिड उद्धार करै सो (उद्धार) का अर्थ देना और निकालना इनदोनो पर आरूढ है अर्थात् जो स्नानवाला राजा वा अमीर हो तो पाच पिड श्राहारमात्र किंतु पांचखुराके उसजलाशयवाले वा उसकेसमीपियो वा चाहै जिस किसीको उचित समुझकर भिन्न २ वर्त्ता देवै (अथवा) स्नानकर्ता जो सामान्य होवै तो निज शक्तिके अनुसार कुक्कुटाड प्रमाणके पिडसे पांचपिड मात्र कुछ उत्तम या मध्यम वस्तु देवै या पाच मुट्ठी मात्र कुछ अन्न अथवा पांच मुख ग्रासमात्रही कुछ वस्तु देदेवै तव स्नान करे (जो) स्नान कर्ता इतना देनेकी भी शक्ति नही रखता हो वह उस जलाशय मे से पांच पिंड मट्टीकेही काढ़कर बाहररखदेवै जिस्से वह जलाशय मट्टी से भरने नहीं पावै जहा कोई ऐसा जलाशय होवे जिस्से मट्टी के पिडभी निकलनेकी सभक्ता नहीं हो (दृष्टांत) जैसे कूप या वावड़ी आदि हो तहा केवल उनके ऊपरकी कीचड़जो अन्य लोगो की धोवामांजी से जमरही हों उसकोही धोडाले या उस जलाशय पर मिताक्षरा साचाराध्याय। दुसरा कुण्ड जो गदीले पानी या कीचड़से भराहो उसकोही निर्मल करदेव या उस कुण्ड में मनों कीचड़ भरीहोवै तो केवल पांच पिंडमात्र किन्तु पांचलोंदे उसमें से निकालकरपीछे स्नान करै तब उस जलाशय के स्नान भारसे उद्धार होचे-क्या सु- न्दरसुगमरीति है कि जो पांच २ पिड दश आदमी निकालेंगे तो पचास लोंदा माटी उसमे से बिना मजूरी दिये निकलजावेगी और इधर स्नानवालाभी बिना दाम खर्चे अपने ऋण से उद्धार होगया-स्नानके उपलक्षण भावसे जहांकेवल हाथ पैरोंश्रादि शौचकाही कामहो तहां भी पहले या पीछेही दो लोटा जलकाढ़कर जलाशय का तट घोडाले तब उस जलकाव्यय करने के ऋणसे उद्धार होवै-क्योंकि (तटशुद्धि) आदि के विषयमें वे जलाशयभी परसंबंधी हैं कि जो ठेठकर अपनेनहीं किन्तु देवताके नाम से या सब लोगों के वर्तावा के नामसे किसी ने बनाकर छोड़दिये हों यहा छूटेहुयेप्रा- चीन चलेआतेहों कुछ यह नियम नहीं है कि उनके कर्ता का नाम प्रसिद्ध है या नहीं अर्थात् इसप्रकार के जलाशयों में जैसे जलपीनेका सवको अधिकार है तेसेही उन- की रक्षा और तटशुद्धि आदिमें भी सबके ऊपर ऋणभार है-पांच पिडों में जहां अन्न देना कहा वह केवल एक निदर्शन है किन्तु चाहै अन्न दे या उसके पलटे कोई और वस्तु यथायोग्य या दाम भी देदेवै तो वहीं बात है १५८ ॥ परशय्यासनोद्यानगृहयानानिवर्जयेत् । भदत्तान्पग्निहीनत्यनान्नमयादनापदि १५९॥ मक्ष-पराईसेज, आसन, उद्यान, गृह, यानये बिना दियेहुये वर्जित करै-अग्नि हीनका अन्न आपत्काल विना न खावै १५९॥ भभिः शय्या सेज अर्थात् पलंग आदि और भी जो कुछ वस्तु सोवने लेटनेकी पराईहो-नासन जो कोईसी बैठनेकी पराई वस्तुहो चाहे वस्त्रकाहो चाहै पीढ़ा मोढ़ा चौकी आदि कुछहो-उद्यान वगीची फुलवाड़ी आदि जो पराईहो-गृह स्थान घर बैठक आदि-यान रथ गाड़ी घोड़ा आदि जो कुछ सवारीकी वस्तुहो इन वस्तुओंको पराई जानकर बचावै किन्तु बिना बताये भोगे नहीं-और अग्निहीन मनुष्य अर्थात् शूद्र जाति या प्रतिलोम जातें जिनको अग्निहोत्रका अधिकार नहीं अथवा जिनको अं- धिकारहै वेमी जो अग्निकर्म करते नहीं इनका अन्न अच्छे भलेमें लोभ लालचसेन खावै पर जो आपत्काल हो तो लाचारी है १५९॥ अधि०-ऊपर कहीहुई विरानी कोई वस्तु बिना दियेहुये नहीं भोगै इसका यह सि- हान्त नहीं है कि वह वस्तु अपनेको निपट मिलजावै अर्थात् इसमें यह तात्पर्य है कि जिसकी,वह वस्तुहे वह अपनेको आज्ञा देवै कि इसपर लेटो या बैठौ या सवारी करौ या विहारकरो या निवास वा विश्राम करो तब जितनी देर या जितने प्रहर वा जितने दिवसों के लिये उसने आज्ञादीहो उतनेही प्रमाणताई वर्त्तावा करै तौ दिया 1 1 मिताक्षरा स०, प्राचाराध्याय । १११ हुआ भोग कहलावेगा और जव उसकी परिनियमित आज्ञासे अधिक दिनोंका व. तीवा करेगा तो वही वर्तावा अदत्त भोगमे गिनती है-इसके सिवाय विना आज्ञाका जो भोग है उसके लिये यहां तक निषेधहै कि जब किसी दूसरेके समीप या घरजावे तो उसकी खाट या मोढ़ा आदि पर उसकी समस्या वा संकेत विना न बैठजावे चाहे वह अपना सगा भाईभी हो किन्तु पराया या विराना शब्द यह अपने शरीरके सिवाय सगेभाई आदि पर भी आरूढहै फिर भाईके सिवाय औरोका क्या लेखा है-(उद्यान) यहां पर सम्बन्धका दृष्टांत जैसे किसी एक प्रतापी अमीरका अति रमणीक वह वि- स्तारवान् वाग जो विचित्रतामें जानौ नन्दनवन कल्पहो जिसका कोई एक विभाग जिसमे अलभ्य पुष्प वाटिका या फलवाटिका लगी है जिसकी रक्षा उस सम्पूर्ण धाग से भी अधिक निर्विकल्प रहाकरती है-उस अमीरका पुरोहितया पुरोहितका पुत्र आदि कोई प्रिय आत्मीय उसी परिरक्षित फुलवाड़ी में से उत्तम फूल जो केवल नेत्रविषय मात्रके लिये लगायेगयेहै नित्यंप्रति तोड तोड़ लावै और जब कोई सिपाही आदि रक्षक उसे निषेध करें तो यही उत्तर देवे कि यह रक्षा मेरे लिये नहीं है यद्यपि वे रक्षक लोग कुछदिन इस शोच विचारसे निषेधसे चुपके रहै और मालिकको सबोधन भी नहीं करें कि हां इनके लिये आज्ञा देरक्खी होगी पर जिस दिन वह संवोधन होगा या किसी हेतुसे भेद खुलेगा उसदिन मालिक यही कहेगा कि उसमे पुष्प तोड़ने को निर्विकल्प मेरे पुत्रको भी आज्ञा नहीं है फिर पुरोहितका पुत्र किस हेतुसे तोड़सप्ताहै और यथार्थ में यह बात है कि जो कोई इस बातका दावा रखकर विना आज्ञाकी कोई वस्तु भोगे या भोगना चाहे कि मै इस वस्तु के मालिकका खास या सगाहू तो यह दावा उसका अनुचितहै क्योंकि जो वह सगाहै तो वनाने के लिये सगा है पर बिगाड़ने के लिये कोई सगा नहीं होसक्ता-कदाचित् पुरोहित इस बातका दावा अपने मनसे आरोपित करें कि मैं उसकी रक्षाका हेतु प्रसिद्ध और पूज्यहूं मुझको ऐसी पातोकी आज्ञा मिलने या न मिलनेसे क्या अपेक्षा है सो यह मनकी भ्रांति उसकी स्थाहै क्योकि पूज्यता और बड़प्पनके अनुसार मालिकको यहां तक अधिकार है कि वह चाहै अदेय वस्तु और सर्वस्वभी उसे देदेव पर आज्ञा विना वह भोगने का अधिकारी इस हेतुसे नहीं है कि जब उसकी रक्षाका हेतु वह प्रसिद्धहै तो जैसे और वातोकी रक्षा पुरोहितको करनी उचित होती है तेसेही उस मालिककी निर्विकल्प अाज्ञाकी भी रक्षा करनी उचितहै अर्थात जिस बातमे वह निषेधकी निर्विकल्प याज्ञा देवे उसमे पुरोहितको चाहिये कि आप भी उस निषेधको मान और अन्य भी प्रति- ठित सेवक वा सम्बन्धी जनोको उसी रीतिपर चलावै तब उसकी रक्षाका हेतु श्राप निश्चित होसताहे-अन्यथा जब पुरोहितने उसकी निर्विकल्प आज्ञा वा निषेधमें वि- - ११२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। कल्प करदिया तो उसकी देखादेखी अन्यभी प्रतिष्ठित सेवक वा उस मालिकके ठेठ सम्बन्धी लोग भी ऐसा करने लगेंगे तभी वह पुरोहित रक्षाका हेतु नहीं बल्कि उस के विनाशका हेतु होगया जिसने उसके निर्विकल्प निषेधौ विकल्प डालकर आज्ञा की दृढ़तामें भंग किया इसी एक दृष्टांतके निदर्शन मात्रसे सारी वस्तुओंका सिद्धांत समझलेना चाहिये कि विना आज्ञाके कोई भी किसी वस्तुको नहीं भोग सक्ला है और यद्यपि इस १५९ के श्लोकमें केवल पांच वस्तु लिखीह पर उनके निदर्शनसे.और भी संसारकी सारी वस्तुओं का सिद्धांत यही है १५९ ॥ अब यहांसे आगे अन्नोंको कहते हैं पर इसका चर्चा थोड़ासा ऊपरके श्लोकमें भी आया है अग्नि हीन इति॥ कदर्यबद्धचोराणांसीवरंगावतारिणाम् । वैणाभिशस्तवार्दुष्यगणिकागणदक्षिणाम् १६० ।। ऐ०-(कदर्य) कहिये लुब्ध अतिलोभी-बद्ध बँधा निगड़ादि बंधनसे यहा बाग्वं- धन सेहीहो-चोर प्रसिद्ध है जो साधारण चोरीभी करता हो-छीव नपुंसक जो सर्वधा पुरुषार्थ हीनहो-रंगावतारी अर्थात् नट चारण मल्ल आदि-इनसवोंका-ौरवैण कहिये वंश फोड़ जो बांस को चीर फाड़कर उपजीवन के काम करै-अभिशस्त जो पतनीय कर्मों से अभियुक्त हो पतनीय कर्म जिनके करने से पतित कहावै ऐसे कर्म जिसमें बहुधा हो सो अभिशस्त-बाईप्य जो निपिद्धिसे उपजीवनकर जैसेकसाई यादि जीवघातियों को धनरद्दिपर किस्तें देनी या मुर्दे का धन सस्ताखरीदकर बेंचना या चोरीका धन किसी से सस्तालेकर लाभउठाना प्रादि-गणिका पण्यस्त्री वेश्या प्रसिद्ध है-गण दीक्षी जो बहुतेरे गएसमहों को दीक्षा करवावे अर्थात् शिष्यों के गुणदोष विचारे विना सहस्रो सव जाती के मनुष्यों को दीक्षा देकर कंठी बांधें औरउनके य- सत्कमीके भागी बनें यहा बहुतों को यजनकरावे वह भी गणदीक्षी है इनसवों का भी अन्न अच्छेभलेमें न खावै पर आपत्कालमें लाचारीहै यहअनुकर्ष इस्से पहलेश्लोक मेंसे लियागया १६०॥ अधि०-ऊोक्तसवों में से एक कदर्यका माहात्म्य समक्ष कहते हैं-यथा (यात्मानं धर्मकृत्यंचपुत्रदारांश्चपीडयेत् लोभाद्यःपितरौभत्यान्सकदर्यइतिस्मृतः) अर्थात् जो पुरुप अतिलोभकी तृष्णासे अपने अात्माको और धर्म कृत्यको और पुत्रदाराओंको भी और माता पिता को भी मृत्यवर्गों को भी पीड़ादेवै सो कदर्य कहलाताहै(दृष्टान्त) इसका प्रत्यक्ष संभूतहे कि औरों को कहांतक शोचें पर जो मनुष्य दशवीस हजारकी धन संपत्ति संचित होने और दश पांच मुद्रा नैत्तिक ग्रामदि होने और सहस्रों में प्रतिष्ठापद मिलनेपरभी ऐसा लोभी हो जो संध्यासमय छदाम का तैल नहीं वाले और आये गये को पान या तमाकू तो कठिनहै पर बैठने को चटाईभी न देवै अपने मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। ११३ आत्माके भोजन वस्त्रादिक और दवा दारू में भी सुन्न खींच.जावै-यह सब एक और पर एक दो मुद्राके व्ययहोने से सारे कुटुंबका आनन्द बल्किदोही एक आनेके उठाने से प्राण रक्षामात्र प्रत्यक्ष होसक्तीथी मित्रादिकों के उपदेश परभी ध्यान नहीं लावे केवल लोभ तृष्णामें उन्मत्त है और ठेठ उस २) या) के हेतुसे ऐसा प्राणांतिक दुःख पावै कि शायद एक जन्म तो थोड़ाहै पर सात जन्म भी न भूलै बल्कि उसके सर्वसम्बन्धी और मित्रादिक भी न भूलें उस दुर्दशाको देखकर क्योंकि उस,दुःखमें आयेहुये सम्बन्धी लोग रातोदिन दुःखसाथी होने परभी खानेको न पावें पुनि उसी हेतुसे सौ दोसौका आवश्यक व्यय तत्काल करनापडै और आगेको उसी हेतुसे नैतिक आमदिमें भी कमताई होजावै सो यह अपने आत्माको पीड़ा देनाहुया-और (धर्मरुत्य) को पीड़ा देना यथा उसी घरमें तरुणकन्या जो गौनेके होजाने पर भी आरात् किसी हेतुसे अपने घर आईहो वर्षों ताई इसी शोचसे चालेमें उपेक्षाकरे कि जो अभी इसको भेजेंगे तौ सवारी आदि खोंमें दशवीस मुद्रा तथा उठिजावेंगे इस्से घर आये हुये जामातृको केवल एक मुद्रा देकर दो तीनवार पैरों लौटार देना यह कुछ ओछी बात नहीं है और अगिले साल काका देवदत्त गयाजीको जानेवाले हैं उनके साथ भेज देखेंगे तो सवारी नहीं करनी होगी वे अपने साथ लेजाकर पहुंचाते चलेजावेंगे और भरोसाहै कि वे हमसे इसका भाड़ा नहीं मांगेंगे पर जो जाना उनका होसकै और जो यह नहीं तो तीसरे साल तक हमकोभी सकुटुम्ब गोकर्णनाथजी को लड़केका मूड़- न करवानेको अवश्य जाना होगा तब साथ लियेजावेंगे तब तक जो आधसेर आटा यह खावैगी सो काम धन्धाकी आराम रहीआवेगी-सो यह लोभसे धर्मकार्यको पीड़ा देनाहुआ क्योंकि ऐसे दुर्ज्ञानियोंको शास्त्रकी सम्पन्नता पर भी यह नहीं सूझपड़ता कि ऐसी कन्याका पिताके घरमें रहनाही निषेधहै फिर जिस धर्मकी रक्षा और अधर्म की निटत्तिके लिये पहले सौ दोसौ चारसो मुद्रा व्याह और गौनेमें भी खर्च करचुके अब केवल दश बीसके लोभ लालचसे वही अधर्म तीन वर्षांतक अपने शिरपर कैसे रक्खे रहेंगे-पुत्र दारात्रोंको पीड़ा देना यह कि प्रथम तो जैसा खाना पहिरना उस घरके अनुरूप उनके योग्यहो तेसा लोभसे न करना दूसरे प्राधिक्यता यह कि ऐसे कुत्सित काम छोटे २ उन्हीं पुत्र दारादिकों से करवाना जिनको देख सुनकर अपने विराने सव निदाकरे क्योंकि जिनमें पैसा दोपैसा की प्राप्ति और वह काम न उस घर के योग्य न उस प्रतिष्ठाके योग्य परंतु उनका यह सिद्धांतहै कि निदाहो तो हो पर य- ल्लब्धंतल्लब्धं किन्तु ये पुत्र दारादि जो खाते हैं उस्से आधा भी पैदा इनके हाथसे होतारहे तो घरकी ग्रामदि या धनमें दाग न लगनेपावे-(मातापिता) को पीड़ा देना लोभसे यह वात कि पुत्रकी योग्यता में उनको वृद्धावस्था पर वैठके आराम करना मिताक्षरा स० आचाराध्याय। योग्यथा परंतु उनकी परमशिथिलता पर भी उनसे अनुचित परिश्रम करवाना और ऐसी निंद्य नौकरी प्रादि करवाना जिसको देख सुनकर गैरोंके रोवां खड़ेहों और जो कदाचित् कोई रोज वे नौकरी दिसे रहितहों तो घरसे भी एक आना रोजके हि- साव नौकरीकी रीतिपर जुदा देदेना और चतुर्गुण मिहनत लेना बल्कि यहांतक वेठी नहीं देखसकना कि तुच्छ तगादेके निमित्तसे ग्रीप्मऋतुमें पचास कोसके अन्तर पर विना जूता भेजदेना और केवल चाराने खर्चको बँधादेना इस प्रकार दो महीने की ग्रीष्मऋतुमें चारवारका दौड़ाना भी एकही लक्ष्यपर सुगम है चाहै वहांसे कुछ लाभहो या नहो पर लौटियानेके साथही तत्काल निवर्तनकी आज्ञा करदेना यह कुछ हिंसामें गिनती नहीं है पर.उस एक आनासे अधिक जो कुछ उनसे पैदा करवाना किसी निंद्यकामसे वह उनसे लेलेना यह धर्म इन्साफमैं गिनती है-(भृत्यवर्ग) में नो- कर चाकर दासादिकोंका होना तो ऐसे घरमें एक जन्म क्या सात शाखमें भी अस- म्भवहै पर कुछ खुशामदी लोग जो अपने २ किसी झूठे स्वार्थकी आशा किये अपने कठिन कालको काटतेहुये पड़े रहते हैं वेही भृत्यवर्ग हैं जिनको सिर्फ इसीलिये कुछ झूठी 'दमदिलासा देदीजाती है कि इनके पड़े रहनेसे कुछ काम निकलेगा उनको यहाँ तक लोभसे पीड़ादेनी कि प्रथम तो कोई स्थल ऐसा नहीं दरवाजे आगे अधिक राखना जहां कोई दशदिन भी पारामसे काटिसकै पर भाग्योंके मारे हुये जो ऐसी दशापर भी भड़भूजाके भाड़में आनि घुसे कि निराश्रय से दुःखाश्रय भी,वेहतर है और उन्होंने अपने उदर पूर्णमात्रका कोईसा परिश्रम जहां तहां से लाकर प्रारम्भ किया कि बरस छ:महीने इस रीतिसे काटें फिर नजानें कुछ यहांके झूठे दमदिलासा में भी कोई फल उत्पन्न होजाये तथापि उन विचारों को यहां तक पीड़ा देना कि वह काम पूरा करना दुर्लभ करदेना बल्कि रोटी भी बनाकर खाना कठिन करदेना क्योंकि घरके घर धनीसे लेकर दो बरसका बालक पर्यंत एक एक घड़ीमें तीन तीन बार ऐसा तीव्र हुक्म करताहै कि उस मन्दभागीकी प्रतिष्ठा पर भी दृष्टि नहीं डालकर करने और न करनेके भी सबकाम करवाना चाहें उसने अपने घरभी कभी न भराहो पर कोस आधकोसके अन्तरसे पानीके घड़े और मट्टी आदि मॅगवाना बाजार की यह दशाहै कि एक छदामके सौदापर तीनवार चक्कर लगवानाजो श्राने दोआनेका सौदा होती मातिबरीके लिये दो तीन और भी साथजावें तब सौदा आवै पर दो तीन बार । घानगीका पाना और सौदेका फेरमारना यह तो साधारण परिनियमितहै इस प्रकार उनको संकटमे राखना पर होली और अन्नकूटमें भी यह न बूझना कि दोपैसे भर प्रसाद तुम भी लेलो क्योंकि यह अन्नकूट एक दूसरे प्रकारका होता है किन्तु अपने घरू घराके लड़के वालोंकाही और भाई बिरादरी या मित्रादिक इसमें इसलिये सामी मिताक्षरा साचाराध्याय । ११५ नहीं होसक्ते कि उनके घर चाहै सालमें देशवार वे बुलावें तो सारा घर मिलकर खाइ आना पर उनको किसी बहानेसे वुलाकर कभी अपने घर खवाना यह अशुभ होता है-और यह बात भी अच्छी है कि उन मन्दभागी भृत्यवर्गोंको किसी काम पर दौड़ा देना तत्काल बोलीके साथही और पीछे उनका कपड़ा लत्ता जो मकानके न होनेसे छहा पड़ारहताहै उसको कोई घरका छोटा बड़ा खोल खखोलकर पैसा टका हाथलंगा तो निकासलेना वे बिचारे जानते हैं कि देवदत्तने लिया पर यह कहना तो अनुचित है इसके सिवाय उनकी कोई साधारण वस्तु मांगेसे वातोंमें फुसलानेसे, घरका कोई लड़का लड़की झपट लेवे तो यह वात घरके धनीको भी देख सुनकर बहुत अच्छी लगे क्योंकि कदाँकी यह नीति तो प्रसिद्धही है कि यार तुम हमारे आवोगे तो क्या लायोगे और हम तुम्हारे आवेंगे तो क्या खिलायोगे-यह सारे लक्षण जिस मनुष्य में या जिस घरमें ही वही मुख्य कदर्य कहलाताहै किन्तु एक दो वातके होनेसे नहीं यद्यपि (कदौं) के लक्षण जो प्रत्यक्ष देखनेमें आये हैं उनको अशेप लिखना चाहें तो हमारा एक मासका परिश्रम और लागति उन (कदों) केही निमित्तमें लगजाये क्योंकि जिनके घरमें इस प्रतिष्ठा पर भी घरकी मालिकनीसे लगा बहू बेटी पर्यंत इकहरी चद्दर ओढ़कर दिनभरमें चारवेर तगादेको शूद्रादिकों के घर पहुँचती हैं इस हेतुसे कि वे मुफ्तके नौकर जो बारम्बार हैरान किये जाते हैं और दुःखी होकर झूठी सच्चीवात बनाकर उत्तर देते, तभी झुल्लाहटकी तेजीमें आप उठ दौड़ती हैं ऐसेही बाजारके सौदा मध्ये किसीका विश्वास न मानिकर आप खरीदती फिरती हैं इसहेतु से कि निरख हरवक्त हमको मालुम रहै जिसका सौदा घर बुलाकर खरीदती हैं उस विचारेको प्राण छुटाने मुश्किल होजाते हैं यह सब लोभका हेतु है बल्कि घर धनी याप इन पाचरणों में सन्मुख देखतेहुयेमी नहीं दखलदेता बल्कि बाजारके कामको वह आप नहीं जासता क्योकि प्रतिष्ठाका माहात्म्य कुछ तो चाहिये फिर इन इतिहासों को किसकी सामर्थ्य है कि जो अशेप लिखसक्ला हे-इसलिये हजार बातोंमें एक बात सो उसको भी ऐसा तत्त्वभूत स्वल्प करिके लिखाहे जेसे मनभरमें एक रत्ती क्योंकि इतनेसे भी समझने वाले बहुत समझ लेंगे-कदाचित् कोई ऐसा मनुप्य जिसने सं- सारको थोड़ा देखाहो वह इस बात पर अविश्वासता लाकर हास्यपूर्वक यह कहने लगे कि ऐसा होही नहीं सका किये सारे लक्षण एकत्र इकट्रेहां-तहां-उस जगत्कर्ता ने यदि अद्यावधि पर्यंत असत्यके वोलने और लिखने पर प्रकृति नहीं दौड़ने दी है यह बात सत्यहै तो हम भी प्रतिज्ञापूर्वक वचन देतेहैं कि मुजरिम् को मये माल बांध कर हाजिर करदेना स्वाधीनहै पर दूर पहुँचाना बड़ा कठिनहे यद्यपि वाँका विलंब और कोसोंका अन्तर हमसे परचुका है पर गेसे लुब्धांका निकट श्राकर्पण क्या मु- ११६ मिताक्षरा स० याचाराध्याय । श्किलहै-परंतु इन बातोंमें कुछ वाद विवादको अपेक्षा नहीं है सिद्धांत केवल इतनाहे कि जो कोई इस अपार संसारमें सुकीर्ति अपनी चाही तो वाल्य अवस्थासे इन बातों के जिज्ञासु होकर ऐसी त्ति धारणकरौ जिस्से तुमको इनकी गिनतीमें न आना पड़े अर्थात् तुम ऐसा कभी न करना और अपने संसर्गियोंका भी निषेध युक्ति साथ करते रहना इसलिये इसके लिखने की आवश्यकता थी क्योंकि गुण और दोप सुने और सुनाये बिना कोई नहीं जानिसकता और जब जानै नहीं तव संग्रह या त्याग किसका कर इस्से जो बात बाल अवस्थामें जानीजायगी वही सारे जन्मभर फलदायक होगी- अन्यथा यह (दृष्टांत) उस बात पर लिखा गयाथा कि जो कोई इस भांतिका कदर्य होवे उसका अन्न न खाना चाहिये क्योंकि प्रथम तो ऐसे लोभीका अन्न मिलसकनाही असम्भवहै पर जो कदाचित् दैवयोगसे पश्चिम सूर्य उदय होजावे तौ (लातक) पुरुष को उस अन्नसे बचना चाहिये क्योंकि उन विपरीत पाचरणोंसे जो कुछ अधर्म उस कदर्यको होताहै उसका अन्न खानेसे उसी अधर्मका भागी होना पड़ेगा दूसरे यह बात कि वह देतेहुये अपने हृदयमें अनेक दुःख मानिकर देवैगा तभी वह अन्न खानेवाले को न पचिकर सात धारहो निकलेगा और नानारोगोंके अंकुर पैदा करेगा-और कदा- चित् किसी हेतुसे निरन्तर ४० दिन ताई ऐसे कदर्यका अन्न जो खाना परै तौ निःसं- देह वेही लक्षण उसमें भी होजावें १६०॥ चिकित्सकातुरमुद्धपुंश्चलीमनविद्धिपाम् । क्रूरोग्रपतितवात्यदांभिकोच्छिष्टभोजिनाम् १६१ ।। ऐ०-(चिकित्सक) जो वैद्यकर्मसे जीविका करै-(मातुर) जो महा कुष्ठादि राजरोगों से ग्रसित हो-(कुद) जो सदैव कोपरूप बनारहताहो या थोड़े हेतुपरभी अमित कोपसा- गर में डूब जाया करता हो-(पुंश्चली) व्यभिचारिणी जो प्रत्यक्ष भावमें प्रसिदहो- (मत्त) जो विद्या आदिकी अधिकता से गर्वित हो-(विहिप) अर्थात् विहिट् जो अनेकों से शत्रुता रखता हो यद्वा ठेठकर अपना शत्रु-कूर) कुटिल अर्थात् अकड़पनवालाम- नुष्य जो किसी को अपनी कुटिलता के आगे गिनती में न लाता हो-(उग्र) अर्थात् जो वाणी के और शरीर के व्यापारों से सज्जनों को उद्वेग पहुँचानेवाला हो-पतित अर्थात् ब्रह्मघाती आदि-व्रात्य जिसकी चर्चा ३८ अर्तीस के श्लोक में आचुकी है दांभिक पाखंडी वा बलिया उच्छिष्ट भोजी जो और का भोजन शेष खानेवाला-इन सवोंकाभी अन्न अच्छे भलेमें न खावै पर आपत्काल में लाचारी है यह अनुकर्षभी १५९ श्लोक से लियागया १६१ ॥ अधि०--महारोगोंके लक्षण यथा (वातव्याध्यश्मरीकुष्ठमेहोदरभगंदराः। अर्शीसि ग्रहणीत्यष्टौ महारोगाःप्रकीर्तिताः)अर्थात् १ वात व्याधि जो केवल एक वातकेही कोपसे अस्सी ८० वात रोग उत्पन्न होतेहैं जिनमें अगि धनुर्वात पक्षाघात आदि मिताक्षरा स० आचाराध्याय । ११७ भी गिनती हैं-२ अश्मरी पथरी शर्करा मादि रोग प्रसिद्ध हैं-३ कुष्ठ जो अठारहप्र- कारके कोढ़ प्रसिद्ध है-४ मेहकहिये प्रमेह जो २० प्रकार के होतेहैं-५ उदरव्याधि- जो जलोदर काष्ठोदर आदि प्रसिद्ध हैं और मुख्य उनकी जाति आठ ८ प्रकारकी होती है-६ भगंदर रोग जो गुदा अथवा योनि द्वारा होता है-७ अर्शम बवासीर के रोग जो छःप्रकार के होते हैं-- ग्रहणी जो संग्रहणी नामका रोग प्रसिद्ध है ये आठ महारोग कहलाते हैं १६१॥ भवीरास्त्रीस्वर्णकारस्त्रीजितग्रामयाजिनाम् । शस्त्रविक्रयकारतंतुवायश्वरत्तिनाम् १६२ ॥ ऐ०-अपीरास्त्री अर्थात्स्वतंत्रा निरंकुशा-स्वर्णकारसुनार-स्त्रीजितःअर्थात् सर्वत्रस्त्री के वशवगैरहे-ग्रामयाजी अर्थात् सब जातों सहित सारेग्रामभरको छठी दुसूठनिश्रा- दिशांति विपयकरवाने वाला-इनसवोंका और-शस्त्रविक्रयी जोशस्त्रोकोवनावे या खरी- दकरचेंचै-कर्मार अर्थात् लुहार और बढ़ई आदिभी-तंतुवाय अर्थात् कोली जोकपड़ा बनताहै और दर्जी आदिभी-श्वरत्ती अर्थात् श्वरत्तिमान् किंतु जो कुत्तानोंके द्वारा जीविका करै चाहै कुत्ताओं को मारखावै चाहे कुत्ताओं से अन्यजीवों की आखेट करै- इनसवोंका भी अन्न अच्छे भलेमें न लेना चाहिये पर आपत्काल में लाचारी है यह अनुकर्प भी उसी १५९ श्लोकसे लियागया १६२॥ अधि०-सर्वत्रस्त्रीकेवशवर्ती रहने का दृष्टांत जैसे ठेठ अपने गुरु अथवा अन्यकि- सी पूज्यके लिये श्रावणी रक्षाबंधन की दक्षिणा एकमुद्रा लिखचुके एवं अन्य सेवकों के लियेभी कुछइनाम अपनेहाथसेलिखचुके और निजकारपर्दाजको आज्ञाभी देचुके यह समाचार सबको विदित होचुके पीछेजब घरवालीने सुना और घुड़की दिखलाई और अपने सामने कलमसे कटवादिया तवउसकी याज्ञासे सबकापरिमाण चौथाई २ करदिया जोकुछ पहले लिखचुके थे-उसीघरका दूसरा दृष्टांत कुछ दिन पीछे पौत्रका जन्महुया जिसकी अपेक्षा अनेकवांसे लगरहीथी कि कोई रीतिसे इसघरमें वंशटक्ष का अंकुर जमे वल्कि इसवातकेलिये कुछदिनोंसे जपभी होरहेथे कि अबकीवार कन्या नहीं होवे परमेश्वर ने वहीकिया इस प्रसन्नतासे एक सहस्रताई व्ययकरनेका उत्मा- ह किया और थाज्ञाहुई कि जिस ज्योतिषी ने पहलेसे जपकिया है वही इसकी राशि गणनाको भी आवै क्योंकि जो दशवीस रुपये दियेजावें सो उसीको मिलें तो अच्छी वातहै इसलिये जन्म कालसे तीन घंटा पहले अईरात्रिके पीछेसे ज्योतिपीजी बुलाये हुये अति फूलेफाले श्रानि पहुँचे और अपने शालोंको सँभालकर निद्राको रोकेहुये संवुद्ध हरिका स्मरण करनेलगे जैसे तैसे वह रात्रिकटी ब्राह्ममुहूर्तमें प्रसव हुश्रा परंतु जव घरवालीने यह खबरपाई तव अत्यन्त घर धनीको घुड़काघुड़की करी और त- त्काल उस ज्योतिपीको बुलवालिया कि जो विद्यामें तो निपुण थोडाथा पर सदेव बहू १० ११८ मिताक्षरा साचाराध्याय । जी बहूजी कहकर जनानी ड्योढ़ीकी खुशामदिमें होशियार अधिकथा उसने राशिग- णना करी और देने लेने की प्रसन्नता में बहूजी की प्रशंसाकर घरकी राहली और जापक ज्योतिषी ने यामिक सेवा कियेपीछे कुछ साधारण दक्षिणा पाकर मुखमलीन- ता अंगीकारकी-यद्यपि घरधनी जो उनदोनों की विद्या और प्रभाव या धर्तता को भलीभांति जानताथा इस व्यतिक्रम से अप्रसन्नभी हुआ परइसवात से लाचारथा कि स्त्री के वशवर्तित्व को छोड़ नहींसताथा इस्से सब अंगीकारकिया दूसरेदिनसे नौवतरखवायेपीछे सातसौ रुपयेके वस्त्राभूपण आदिकी तैयारीमें निरंतरतत्परहुये औरयावन्मात्रमान्य और पूज्य और प्रतिष्ठित अधिकारीवासाधारणसेवक और पंडित वा नापित भांड भँडेले आदि उनसे संसर्गरखते और शुभ चिंतक थे सबकेलियेजुदे २ यथायोग्य पांचौं कपड़े वा आभूपण या रोक रुपये जो कुछदेनाचाहा सो एकफर्द चिट्ठामें लिख २ कर तैयारकरवातेरहे और छठीकेदिन परम उत्सव और नाचरंग सहित बिरादरी की ज्योनारका सामान बड़ी धूमधामसे संसिद्धकिया और छठीसेएक दिन पहलेसंध्यासे आधीरात्रिताई घरवाली को वह चिट्ठा सुना २ कर समझातेरहे कि यह चीज उसकेलिये यह अमुकामुकों के निमित्त वनवाई है उससमय जो उस घरिणी की इच्छामें आयासोर उचित और अनुचित भी घटावढ़ाकर काटकपटकर- वाया और पीछे से यह शिक्षादई कि अभी यह सवचीज देने वा लुटानेका कुलकाम नहीं है कल छठीके रोज सिर्फ विरादरीकी महफिल और विरादरी या मान्योकेलिये जो कुछ बनवाया और मैंने लिखवायाहै सो दीजिये जिस्सेनामहो नौकरआदि अन्य गजरभत लोगों को देनेसे क्या नामहे इस्से यह चीजें अभीरक्खो आगेपीछे समुझ २ कर जिसको जैसा उचित जानोंगी तैसा दूंगी सिद्धांत इसका यह कि उस आ- लिम और फाजिल और इकबालमंद समावित घरधनी को स्त्रीके वशवर्तित्व से यह भी करना अंगीकारहया पौरपांचदिन से जो समस्त सेवक रातोदिन उसकामकी धूमधाम और बहुताइत से काठकी पुतलीसी नाचते फिरते थे बल्कि ठेठ छठीकेदिन शमियाने और चंदोवे आदिकी खींचाखांची और दोसी मनुप्यकी भोजन वस्तु तै- यार करने वा कराने में लगेरहने से उनसेवकों ने नहाने और जलपीनेकाभी अव- सर नहीं पाया पर इसउत्साहसे काम करनेसे हटे नहीं कि आजरात्रि को नानावस्तु का भोजन मिलेगा और पोशाके वा आभूपण जो हमारेलिये बने हैं या और कुछ इनाम यह सवसारे समाजके सन्मुख हमको मिलेगा इस अभिमानमें डूबेरहे और घरके अधिकारियों ने यह भी नहीं यूझा कि तुम दो घड़ी की छुट्टी लेकर एक पैसे का चर्वण करलो अर्थात् राविके दो तीनबजेतक सबको जिमाजठाकर और समाज की सेवा शुश्रूपा से निपटकर मुहँ देखते से रहगये वह पोशाके तो भला संदृकों में मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। ११९ बंद हैं पर उस भोजन वस्तुमें सेभी सिवाय विरादरी के किसी नौकर ने कुछ न पाया जिन विचारों ने वेशरमाई लादकर भोजन मांगा उनको वीचके अधिकारियों ने ट- कासा उत्तरदिया कि मालिकों से कहो-उन सेवकों में से शायद कोई ऐसा निर्लज्ज होगा कि जिसको दूसरेदिनभी वहरुकीहुई नीदलौटकर आई हो-उसघरधनीने फिर भी दो दिन पीछे वह चीज वस्तु खोली और यह कहा कि लोगोंको देदेनी चाहिये पर उस चातुर्यलहरी घरिणी ने घुड़कीदी कि अब क्या देकर होगा अगर उसदिन सबके सामनेदियाजाता तो कोई जानताभी अब इस फज़ली की क्या जरूरत है-वह वंशांकुर जिसके हेतु से एक सहस्रका व्यय कियागया उसकी पीठमें उसी छठीकी रात्रिम इधरती महफिल होतीरही उधर उसके पीडारूपी कोई चिह्न उत्पन्नहुआ वह निरंतर वृद्धिको पहुंचेगया यहांतक पीड़ा उसके होनेलगी कि अंदर घरमें आहि २ ऐसी करताथा कि वाहरवालोंको यह मालूम होताथा कि यह कोई बूढ़ा मनुष्यवाह भरता है यद्यपिकईदिनतक रातोदिनअनेक सयाने और खिलाड़ियों ने भाड़ फेंक दौड़ धूप उतारे पुतारे बहुतेरेकिये दश २ कोस के बावाजीवग्धी भेजकर धुलायेगये सवने अपनी विद्या दौड़ाई पर किसीसे भी कुछ न हुआ वह जन्म से तेरहवेंदिवस अपनी राहलेगया-घरधनीनेपीछेभी यह चाहा कि यह वस्तु जिसके नामसेवनी है देदीजावे पर स्त्रीके बशवर्तित्व को न छोड़सके और स्त्रीने बड़ी चतुराई से यह कहा कि मेरी हजार वर्षकी नीउँउठकर जातीरही तुमको अवतकभी इनाम का अनुमान चलाजाता है इस्से क्रमक्रम से वह वस्तु कुछवेचीगई कुछ घरमें खर्चकरलीगई इस बात में अभी वहुतकुछ शेप है सो यह बात केवल एक वारका नमूना है किंतु उन घरों में निरंतरयहरीिति है १६२॥ नृशंसराजरजककृतघ्नवधजीविनाम् । चैलधावसुराजीवसहोपपतिवेश्मनाम् १६३ ॥ पिशुनानृतिनोश्चैवतथाचाक्रिकवंदिनाम् । एपामन्नंनभोक्तव्यंसोमविक्रयिणस्तथा १६४ ॥ ऐ० सहयोः-नृशंसराज अर्थात् निर्दय राजा निर्दयी इतिलोकेपि अथवा दोनोपद भिन्न २ करनेसे नृशंस लक्षण वाला कोईहो और राज शब्दसे राजा जिसके अवगुण १३९ श्लोकके अन्त्यपदमें कहचुके हैं अर्थात् लुब्ध और उच्छास्त्रवती भूपति किंतु सभी राजामात्र नहीं-रजक रॅगरेज जो नील कुसुभ अादिसे वस्त्रोंको रंजना करताहै- कृतघ्र कृतघी जो कियेहुये उपकारको न मानकर मेटिदेव-वधजीवी जो प्राणियोंका बध करिके जीवन करें-चेल धाव धोयी-सुराजीव जो मद्यादि वस्तु विक्रयसे जीवे-स- होपपतिवेश्म अर्थात् उपपति जो जार है तिस करके सहित एकही घरमै बसे इन सबोंका अन्न और १६३ पिशुन जो पराये दोपोंको चुगुलीचाई की रीतिसे कहे-थ- नृती जो प्रयोजनके मामिले परभी वारम्बार प्रत्यक्ष भावसे ऐसा अँठ बकाकर जैसे - १२० मिताक्षरा स० आचाराध्याय। कोई सबके सन्मुख गुड़का डला लियेहुये खारहाहे और कहताहै कि मेरे हाथमें गुड कहाँहै अर्थात् वह झूठ उसके मुखमेंसे निकलतेके साथही प्रतीत होजावै कि यह झूठ कहताहे पर उसको इस वातकी लज्जा कभीभीनावै जिसकी यह प्रकृति निर्विकल्प हो वह अनृती कहलाताहै-इन दोनोंका भी अन्न और तथा चाक्रिक अर्थात् तेली और गाडीमान् भी-बंदिनःस्तावकाः अर्थात् बंदी उन्हें कहते हैं जो स्तवोंका पेशा करते हैं जैसे भाटभँडेले आदि इन्होंका अन्ननहीं खानाचाहिये तैसेही सोम विक्रयीकाभीनहीं- परजोआपत्कालहो तो लाचारीहै यहअनुकर्प उसी १५९के श्लोकसेलियागया१६४॥ मधि०-सोमविक्रयी सोमलता वा सोमालताका बैंचनेवाला यहासोम नाम अमृत काहे अर्थात् अमृतके तुल्य स्वादु और गुणवाली जो वस्तुहें तिनका विक्रय कर्ता- और १५९श्लोकके अन्त्यपदसे यहां ताई जो निरन्तर अन्नका निषेधकिया सोप्रा- मान या सिद्धान्नका निषेध कहाहै किन्तु पक्वान्न आदिके निषेधका अवसर यहां पर नहीं है क्योंकि जिन जातोसे पक्वान्न आदि ग्रहण करनेकी प्राप्तिही प्रत्यक्षमै नहीं या जिसका निषेध अपने उचितस्थल पर प्रत्यक्षहे फिर उसकी चर्चाका क्या अवकाश है सोई नीचेके श्लोकसे स्पष्ट हुआ जाता है १६४ ॥ शूद्रपुदासगोपालकुलमित्रार्द्धसीरिणः । भोज्यान्नानापितश्चैवयश्चास्मा निवेदयेत् १६५ ॥ इतिस्नातकत्रतप्रकरणम् ॥ पक्ष-शूद्रोंमें दास गोपाल कुल मित्र अईसीरी नापित भी ये इतने भोज्यान हैं पर जो आत्मा को निवेदन करे १६५॥ मभि०-ऊपर जो शूद्र आदि अनेकों का अन्नखाना निषेधकरचुके हैं उसमें कुछ विशेप कहते हैं कि शूद्र जातों में एक ती दासकहिये धीवर अथवा पंद्रह १५ प्रका- र के दास जो नारद जीने अपनी संहिता में स्पष्ट लक्षणों सहित गिनाये हैं-दूसरेगो- पालजो गौओंका पालनकरें किंतु अहीर आदि-तीसरे कुलमित्र जो कोईसा उत्तम शूद्रअपने कुलमें दादा परदादा आदि से संतान पूर्वकमेल मिलापमै मित्रता की रीति से रहता चलाआया हो-चौथे अर्द्धसीरी अर्थात् अपनी सीर कहिये खेती में आधा साझा जिस किसी उत्तम शूद्रकाचलााताहो इतने शूद्रभोज्यानहोते हैं किंतु इनका आमान्न सिदानादि जोकुछ वे प्रीति पूर्वकदेने लगै सोलेलेना चाहिये और नाई भी भोज्यान्नहै परन्तु उसअवस्थामै कि जोयलोग अपने प्रात्माका निवेदनकर अर्थात् सदेवही सत्यभावसे यहकहें कि हम अापहीके हैं १६५॥ अधि०-हम आपहीके हैं इसकहनेका यह सिद्धांतहे कि जो इसप्रकारसे एकतावा- नहोकर समीप रहेगा वह अपने सत्संगके प्रभावसे कुछ उज्ज्वलता क्रियाकर्म आदि भी करने लगेगा और यथार्थ में ग्राह्य या अग्राह्यके विपपमें क्रियाकर्मही प्रधानहे- मिताक्षरा.स० पाचाराध्याय । १२१ नापित यहां पर वहय़ाह्यहै कि जो केवलदीवा बत्तीयादि गृहव्यापारोंका सेवकहोकि तुक्षीरकर्म और मृतकादि यजमानी धधोंसे रहितहो-पंद्रह १५.दास जो नारदजीने कहे तिनकी परिगणना और लक्षणयथा-(गृहजातस्तथाक्रीतोलब्धोदायादुपागतः। अन्नाकालभृतस्तद्वदाहितःस्वामिनाचयः ॥ मोक्षितोमहतश्चााद्युद्देप्राप्तःपणेजितः। तवाहमित्यपगतःप्रवज्यावसितःकृतः ॥ भक्तदासश्चविज्ञेयस्तथैवबडवाकृतः । विके ताचात्मनःशास्त्रेदासाःपंचदशस्मृताः) अर्थात्-एक तो (गृहजातदास) उसको कहते हैं जो अपने घरहीमें दासीसे उत्पन्न भयाहो १ (क्रीतदास) जो मोलको खरीदाहो२ (लब्ध- दास) जो स्वतः देवइच्छासे पागयाहो३ (दायादुपागत) दास जो क्रमागतहो जेसे अपने दादाके दासका पुत्र अपने वापका दास हुआथा पुनि उसका पुत्र अपना दास हुआ पुनि उसका पुत्र अपने पुत्रका दास होवेगा ? (अन्नाकालभृतदास) उसे कहते हैं जिसको दुर्भिक्षमें पालाहो ५ (स्वामिनााहितः) अर्थात् आहितदास उसे कहते हैं जिस दास के स्वामीने किसी आवश्यकतासे गहने रक्खाहो या धरोहरकी रीतिसे सौंपा हो.६ (ऋणमोक्षितः) अर्थात् मोक्षितदास जिसने अपने ऊपरका महत् ऋण उदार कराकर छुड़ानेवालेका दास्य अंगीकार कियाहो ७ (युद्धप्राप्तः) अर्थात् ध्वजाहतदास जिसके स्वामीको युद्दमें पराजय करके अन्य धनके साथ दासभी लेलियाहो - (पणेजितः) जो किसीसे उसका दास द्यूत आदि कोंकी वाजीमें जीताहो ९(तवादमित्युपगतः) अर्थात् उपगतदास वह कि जो किसीका दास नहींथा पर आपही भानकर दासरूप होकर यह कहताहुआ रहनेलगा कि अब में तुम्हाराहीहूँ मेरा और कोई रक्षक नहीं सो यह दास शरणागतके रूपमें है १० (प्रव्रज्याऽवसितः) संन्यासभ्रष्टः अर्थात् संन्यास धर्मसे भ्रष्टहोकर किसीके दासत्वमें रहनेलगा सो प्रवज्याऽवसितह ११ (रुतः) अर्थात कृतदास जो नौकरी ठहराकर दास रक्खाजाताहै और वह भी कि जो किसी पेशेका काम सिखलाने के लिये दासरूपसे कुछदिनों को रक्खाजाय १२ (भक्तदास) जो सु- काल के होनेपरभी अपनी श्रद्धा भक्तिसे सत्सेवा समुझकरदास्य अंगीकारकरे जिसे उदरपरण से अधिकवांछानहीं १३ पदबास्त) अर्थात् बड़वाकृतदास जो बड़वाकेनि- मित्त से दासहोवे या कियाजावे किंतुबड़वा जो दासी है किसी अमीर की उसदासी के लोभसे जो कोई दासबने इस्से कि वह अमीर भी यह चाहता है कि इसदासीका घरवसादे परउसी को यहदासी दीजाये जो पापभी दास होकर यहीं रहे १४ मात्मविझतादास) जिसने अपने पुत्रदारादिकों के किसी परमकल्याण के लिये धनचाह कर अपने प्रात्माको दासत्वरूप से बचांदयाहो १५-शासन यह पंद्रहप्रकारके दास कहेहे-यद्यपि वर्तमान काल परिपाटी में मल्यकीत संबंधी कई दासों का होना और करना भी निषेध वा अनुचित है तथापि जिस भूतकालकी यह व्यवस्था है उसमें - १२२ मिताभरा स० श्राचाराध्याय । इसी की प्रधानता थी शेपको दोनों कालमें समता है पर लिखना इनका इस हेतुसे उचित है कि सार्वकालिकमर्यादों के जिज्ञासुओं को संसारी तत्त्व की विवेचनामध्ये पूर्वापरका अंतरसमुझाजाना हितकारी हुआ करता है १६५ ॥ इति स्नातकवतप्रकरणम् ॥ यह (स्नातक) पुरुपका प्रकरण १२८ के श्लोकसे प्रारम्भहुआ था और यहां ताई पूराहोचुका स्नातक पुरुष के लक्षण पीछे १३० की अधिकोक्ति में कहचुके हैं और यद्यपि स्नातक पुरुषके लक्षणभी विशेपतर विद्याव्रत स्नात ब्राह्मणपर आरूटहें परंतु यह निर्विकल्प नियम नहीं है कि केवल स्नातकही इनवातोंको मानें और कोई नहीं मान अर्थात् यहसारी मर्यादें उसीस्नातक के निदर्शनसे त्रैवर्णिक जाति मात्रकेलिये संसूचितहे-हां-उनमें कहीं २ विरली बातें ऐसीभीहैं कि जिनसे केवल स्नातकही ) को अपेक्षा होसक्ती हे-धीर इस्से नीचे जो अब द्विजातियों के नाम से धों को कहते हैं उनमेंभी यहनिर्विकल्पता नहींहै कि केवल द्विजातीही उनवातोंको मानें और स्नातक नहीं माने पर द्विजातियों के नामसे कहने का यह सिद्धांत है कि स्नातकको उन बातों से कोई भांति अपेक्षा नहीं होसही है अर्थात् उसकेलिये स्वतः उनवातों का निषेधही हो रहा है फिर उसमें विधि या निषेध के कहने की क्या आवश्यकताहै प- रन्तु साधारण द्विजातियों को उनवातों से कुछ संबंधभीहै इस्से उनकेलिये विधि या निषेध कहने की आवश्यकता है (दृष्टांत) जैसे स्नातकको मांसभक्षण से कुछ भी सं- सर्ग नहीं और साधारण द्विजाती बहुधा मांसभी खातेहें इसलिये उनको मांसके भ- क्षण में विधि या निषेध कहने की आवश्यकता हुई ऐसेही और भी सारीवातों को जानलो- अथसाधारणद्विजातिधर्मकथनम् ।। यहांपर साधारण यह विशेषण देने का यह भाव है कि द्विजाती शब्द से ब्राह्मण क्षत्रिय वेश्यतीनोंका बोधहोताहे परन्तु साधारण कहनेसे वे इस गिनतीमें नहीं आये कि जो स्नातक पदवी को पहुंचे हों क्योंकि उनका प्रकरण ऊपर हो चुका है इसका वस्था से वे ब्राह्मण भी साधारण द्विजाति में गिनतीहुये कि जो विद्याव्रतस्नात ना हो और मांसादि भक्षण में तत्पर हो इसीलिये उनके धर्मों को अवनीचे भिन्न हते हैं १६५॥ भनर्चितंवृपामांसंकेशकीटसमन्वितम् । शुक्तंपर्युषितोच्छिष्टंइवस्टष्टपतितेक्षितम् १६६॥ उदस्यास्टटसंयुष्टंपर्यायान्नंचवर्जयेत् । गोधातशकुनोच्छिष्टंपदास्टटंचकामतः १६५ ॥ अद्वितीयपाठे(पर्याचान्तंचवजयेत्) तथातृतीयपाठे (पाङचान्तंचवर्जयेत्) ऐ०सहयो-मांस यहऊपरके श्लोकसे अन्न यह नीचेके श्लोकसे लेना क्योंकि इ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । १२३ दो श्लोकोंमें इन्हीं दोनों वस्तुका मुख्यविधि निषेधं कहाहै कि-अनर्चित अर्थात् अर्चा कहिये सत्कार तिस्से रहित जो मांस अथवा अन्नहो तिसको वर्जितकरै किन्तु जो कोई सत्कारपूर्वक देने योग्यहै उसको असत्कारसे यह दोनों वस्तु दीजावें तो न लेवे यहा किसी हेतुसे लेलेनापरै तौ न खावै किसी और को देदेवे-ऐसेही दृथा मांस अ- थवा तथा अन्नको भी वर्जितकरै-पेसेही केश कहिये वाल या रोमा और कीट कहिये कृमि जीव जंतु जिस मांसमें या जिस अन्नमें पड़जावें उसेभी छोड़देवै-ऐसेही शुक्ल मांस या शुक्लान्नकोभी छोड़देवै शुक्त उसको कहते हैं कि कोई अन्नादि वस्तु कच्ची या पकाईहुईको जलके या सीरा श्रादिके योगसे या राई नमक आदि किसी द्रव्यांतर योगसे धप या गरमी देकर कछ दिनों तक स्थापन करनेसे खटाइँधको पहुँचाई जाय जैसे कांजी या कांजीके बड़े आदि अनेक भांतिके शुक्ल होते हैं शुक्त मदिराके प्रकार में भी बनताहै शुक्त मांसका भी होताहे शुक्तोंकी अनेक जाते लोकमें प्रसिद्ध हैं उनको नहीं खावे-ऐसेही पर्युपित कहिये वासी तिवासी मांस अथवा अन्नको न खावे-ऐसेही उच्छिष्ट जो खातेहुये आगेसे वचजावै चाहे मांसहो अथवा अन्न उसकोभी उस काल के सिवाय फिर न खावै-ऐसेही श्वस्टष्ट कहिये कुत्तेकासँघा या कुणाहुया मांस यहा अन्न भी न खावै-ऐसेही पतितेक्षित कहिये चांडालादि या ब्रह्मघाती आदिका देखा हुआ मांस और अन्न भी न खावे १६६॥ऐसेही उदक्या स्पष्ट अर्थात् उदक्या जो रजस्वला पुनि उसके उपलक्षणसे चांडालीभी पुनि उसके उपलक्षणसे चांडालभी पुनि उसके उपलक्षणसे अमेध्य कुनखी कुष्ठी अादिभी जो शंखजीने कहे हैं इनका छुआहुधा मांस और अन्नभी न खावै-ऐसेही संघुष्ट कहिये जो मांस या अन्न किसी ने घुड़ककर कुरबुराकर कुछ बकतेहुये दियाहो उसको भी वचावे-ऐसेही पर्याय मांस और पर्याय अन्नभी न खावे-पर्यायवस्तु उसको कहते हैं कि जो कोई वस्तु किसी अन्यके नाम संकल्प कीगईहो उसे कोई और किसी औरको देदेवे या वही जानि वझकर आप लेलेवै जो किसी द्वितीयके नामसे रक्खीथी और उसकोभी पर्याय वस्तु कहते हैं जो अन्यकी वस्तु अन्य दान करदेवै-ऐसेही गोघ्रात कहिये गऊ उपभ आदि से सूंघाहुअा या चाटाहुआ जो मांस अथवा अन्न होवे उसको भी न खावे-ऐसेही शकुनोच्छिष्ट अर्थात् शकुन कहिये काकादि पक्षीमात्रका जुठाराहुआ मांसया अन्न भी न खावै-ऐसेही कामतःपदास्प्टष्टं अर्थात् जिस मांस अथवा अन्नको जानि बूझ कर बुद्धि पूर्व लातसे दियाहो उसको भी न खावै किन्तु अज्ञातभावमें छूगया हो उसका दोप नहीं है १६७॥ अधि०-यहां पर दोप दूपित मांस या अन्नोंका निषेध जो वारम्बार किया है सो मांस तो श्राम अर्थात् पाकरहितभी पूर्वोक्त दोपोंसे दूपित होजाताहे पर अन्न केवल .

१२४ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। वही जो परिपक्वहुये पीछे अदनीय होजावै सो दूपित होसक्ता है-वृथा मांस और स्था अन्न जो कहाहे सो स्था मांस तो उसको कहते हैं कि जो.गुल्ला गुलेल या ईट पत्थर आदिसे माराहो या किसी जीवने तोड़ाहो या आपही किसी रोगसे मरगयाहो पनि वहभी ट्था कहलाताहै कि जो देवादिपूजा या यज्ञादि हेतुसे न व्यापादन हुआहो जिसकी निर्दोष मर्यादा आगे १७८ के श्लोकमें श्रावैगी किन्तु केवल जिवा स्वाद के हेतुसे होवे सो स्थाहै-और अन्नभी वह रथाहै जो अभक्ष्यहो या भक्ष्यभी जो प्र- त्युकारा शक्तिसे हीनहो किन्तु जिसका बदला देनेकी शक्ति वा श्रद्धा अपनेको नहो- पर्याय अन्नका खाना जो निषेध कियाथा तिसका प्रायश्चित्तोपदेश-यथा (ब्राह्मणान्नं ददच्छूद्रःशूद्रानंब्राह्मणोदत्। उभावेतावभोज्यानौमुक्ताचांद्रायणंचरेत्) अर्थात् ब्रा- ह्मणका अन्न शूद्र दानकर या शूद्रका अन्न ब्राह्मण दानकरै यह दोनों अन्न अभोज्य हैं जो कोई भोजन करिलेवै चान्द्रायण नामका प्रायश्चित्तकरै तब शुन्दात्माहो-और इसी पर्यायान्न,शब्दके प्रतिस्थान जहां द्वितीय पाठसे (पर्याचांत) शब्द होवै तहां यह अर्थहै कि जिस अन्नको भोजन करते हुये भोक्ता पुरुष कुल्ला करलेवै तिस पीछे उसी शेप अन्नकी संज्ञा (पर्याचांत) होजाती है तिसको छोड़देवै फिर चाहै पूर्ण तृप्ति होने पाईहो या नहीं-सोई अन्यत्र भी स्पष्टभावसे यह कहाहे कि(गंडूपग्रहणादूर्ध्वमाचमना प्राङ्नभोक्तव्यम्)अर्थात-भोजनके अन्त्य आचमनसे पहले किन्तु भोजनके बीचही में कुल्ला लेलेनेके उपरांत शेष अन्नको न खाना चाहिये पुनि उसी पर्यायान्न शब्दके प्रतिस्थान तृतीय पाठसे (पार्थाचांत) शब्द होवे तहां यह भावहै कि किसी पार्श्वस्थ के आचमन करलेने पर पश्चात् उसी शेप भोजनकी संज्ञा (पावचिन्त) होजाती है यथा एक निर्मेंद पंक्तिमै थनेकलोग बैठेहुये भोजन करतेही वे परस्पर एक दूसरे का पार्श्वस्थ कहलातेहैं उनमेंसे कोई एक असुशील जव चमन या गंडूप करडाले तब ओरोंको भी भोजन छोड़देना उचितहे चाहे तृप्ति होनेपाई हो या नहीं-निर्भेद पंक्ति कहनेका यह प्राशयहै कि जिनके लिये जलकाष्ठ भस्म आदि रेखासे पंक्तिमें श्रासन भेद कियागयाहो उनको वह गंडूप वाधक नहीं है किन्तु निरंतर एक पंक्तिवालोंसे अपेक्षाहे-और गंडूप संज्ञा उसीको कहसक्ते हैं कि जब आचमन का जल मुखमें से उद्गीर्ण कियाजावे किंतु धूटिजानेको नहीं आचमन संज्ञायद्यपि जलप्राशीभी हो- तीहै पर इसविषय में केवल प्रोष्टादि प्रक्षालनकोही आचमन मानाहे और जलोद्- गीर्णके तद्रूपलक्षा से वहगंडप निषेधरूप नहीं है जो जलपान समयखासा ग्रंथिसे स्वतःउद्गीर्ण होजाताहे पर जो किसी पार्श्वस्थकेअन्नादिपर इसधांसके उद्गीर्णका छोटा पहुँचजावे तोजहांताई पहुँचाहो उतन और वहापभी तावत्कालपर्यंत भोजनको विश्राम देकरमौन बैठारहेंजवतफयहरोपपंक्तिभोजन फरिलेवै १६६।१६७॥

मिताक्षरा.स० श्राचाराध्याय । १२५ पर्युपित अर्थात् वासी तिवासी आदि चिरकालस्थ अन्नमै विशेषता कहते हैं। अन्नपर्युपितंभोज्यस्नेहाक्तंचिरसंस्थितं । अस्नेहामपिगोधमयवगोरसविक्रियाः १६८॥ ऐ०-अन्न अर्थात् अदनीय वस्तु जो परिसिद्दहुई भोजन योग्यहो ऐसा अन्नयदि स्नेहानहो अर्थात् घृतादि स्नेहोंसे संयुक्तहो जिसे पकवान कहतेहैं वहचिरकाल सं- स्थितभी पर्युपितहोवै तथापि भोजनकरने योग्यवना रहताहे-इसके सिवाय अस्नेहा अपिकिंतु बिना चिकनाई के भी अन्नजोगोधूम यव गोरसके विकारसे वनतेहैं वे भी पर्युपित कहिये धरेहुये भोजनकरिवे योग्यवनेरहते हैं-पर जो विकारांतरको न पहुंचे हॉ-गोधूम बिकारके अन्नजैसे गेहूंकाचूर्ण जो कड़ाहीमें भूनिलिया जाताहै या भूनेहुये गेहूंपीसलिये जाते. या गुड़ धानी आदि-और यबके विकारसे सत्त या धानाआदि धानाबहुरी को कहते हैं गोरस विकारके अन्न दधि तक्र किलाट अर्थात् मावा खोवा और किलाटी अर्थात् खड़ी और पायस अर्थात् खीर इत्यादि औरभीजानो १६८॥ अधि०-यह पर्युपित अन्न की विशेष विधि यहांपर इसलिये कहीगई कि इस्से प- हले १६६ श्लोकमें पर्युपितका निपेध सामान्य वचनसे करचुकेथे पर उसकी अति- व्याप्ति नहीथी-और गोधूम यव गोरस के विकार स्नेहरहितभी जो अंगीकार किये हैं तिसमें केवलता नहीं है अर्थात् गोधम यव गोरस इनके निदर्शन मानसे और अन्न भी उसी रीतिसे समुझलेने परन्तु उस अवस्था ताई कि जबतक उनपदार्थोमें किसी भाँति की विकृति नहीं होजावै और विकृति के न होनेपरभी जो पदार्थ भुक्तशेप हो- जावे वहभी त्यागयोग्यहै सो यह त्याग केवल इन्हीमें नहीं किन्तु पूर्वोक्त पक्वान्नमेंभी संभवित है क्योंकि इस्से पहले १६६ के श्लोकमें उच्छिष्टका निषेध जो सामान्य व- चन से कियाथा उसका कोई विशेषवाक्य इसमें नहीं पायागया जिस्से भुक्तशेप पक- पान खाना उचित जानाजाय १६८ ॥ संचिन्यनिर्दशारत्सागोपयःपरिवर्जयेत् । मौष्ट्रमैकशफंस्त्रैणमारण्यकमधाविकम् १६९ ॥ अक्ष०-संधिनीगोःपयः अनिर्दशागोःपयः अवत्सागोःपयः( मथ) प्रोष्ट्रंपयः ऐकश- फंपयः स्त्रैणंपयः आरण्यकंपयः प्राविकंपयः परिवर्जयेत् यह प्रत्येकमें जोडलेना १६९ ॥ अभि०-जिसगऊपर उपभछोड़ाजावै गर्भके हेतुसे वह संधिनी कहातीहै उसकादुग्ध छोड़देवै पनि उसकोभी संधिनी कहते हैं जो एकबेला छोड़ दूसरेसमय दुहीजावै और जो अपनावच्चा छोड़ किसी औरके बच्चेसे लगाईजावै उसका दूधभी छोड़देवै-जिस व्याईहुई गऊको परे दशदिन नही बीतेही वह (अनिर्दशा) कहाती है अर्थात् दशदिन भीतर दूध नहीं खावै (अवत्सा) वह कि जिसकावच्चा मरजावै और भूसी श्रादि वाट से लगतीहो उसका दूध छोड़देवै (अथ) औष्ट्रकहिये ऊंटका दूध और मूत्र आदिभी सदैववर्जितराखै-ऐकशफ अर्थात् एक खुरवाले जो घोड़ीखच्चरी खरीआदिपशु जिन १२६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। के खुर फटेनहीं होते उनका दूध न खावै अस्त्रैणकहियेस्त्रीका दूधनहींखावै-धारण्यक अर्थात् अरण्यमें रहनेवालेमग पशुओंका दूधनहींखावै-श्राविक अर्थात् अविसंज्ञा भेड़कीहोती है उस्से उत्पन्नहुआ दूध श्राविक सो न खावै १६९ ॥ अधि०-यद्यपि संधिनी दो प्रकार की अधिक पीछेसे लिखीगई परंतु विचारदृष्टि से भी उनके दुग्ध पानमें कुछ दोष नहीं देखपड़ता क्योंकि प्रथम तौ इसबात की साधना भी असंगत है दूसरे वह दोनों संधिनी भी (गौण) संज्ञक हैं अर्थात् संधिनी मुख्यभाव से वह एकही है जो पहले कहीगई और उसीका प्रमाणभी त्रिकांडी स्म- रणसे पायाजाता है-यथा(वंशांवंध्यांविजानीयाइपाक्रांतांचसंधिनीम्)परन्तुसंधिनीके निदर्शन मात्रसे स्यंदिनी और यमलप्रसूके भी दुग्धका निपेध संभवित है क्योंकि गौतम ऋपिने तीनों का निषेध एकसाथ एकपदमें किया है (स्यंदिनीयमप्रसूसंधिनी नांचेति)स्यंदिनी उसेकहतेहैं जिसकेस्तनोंसे दुग्धवंद या धारेटपकाकरें-यमप्रसू या यमलप्रसूं या यमलप्रसूता या यमलप्रसविनी उसेकहते हैं जो दोबच्चे एकसाथदेव-जो जोबातें गऊके विधि निषेधर्मऊपर लिखीगई सोई सबनिदर्शन वकरी और भैंसकाभी जानलो क्योंकि वसिष्ठमनि ने इन तीनों का चर्चा एकसाथ एकपदमें किया है-यथा (गोमहिप्यजानामनिर्दशानामिति)ऊँटऔर एक शफवालोंके दधका सदाही निषेधहै इसलिये उनका कोई विशेष भेद कहने की आवश्यकता नहीं है- स्त्रीदुग्धका निषेध करने से मानुपी मात्र कोई हो और इसीके उपलक्षण से दो थनोंवाला और भी जो कोई जीव होताहो उसकाभी निपैध है पर बकरी का नहीं क्योंकि बकरी भी दोथनों की होती है परन्तु उसका दूधगऊ के समान ऊपर अंगीकार हो चुका है-अंत्वन मृगौंका दूधजो निषेध किया तहां भैंसभीबन पशुओंमें गिनतीहै पर उसके दूधका निषेध नहीं है क्योंकि ऊपर उसको गऊ और बकरी के साथमें समान अंगीकार करें चुके हैं सोई इसका बाक्य भी स्पष्ट प्रमाण हो रहाहै-यथा-(भारण्यानांचसर्वेपांमृगा पांमहिपीविनेति) (माविक) जो भेड़ों का दूध निषेध किया है यद्यपि उसकी ग्राह्यता भी वहुधा लोकमै जहां तहां दिखाई देती है अर्थात् जो लोगवकरी का दूधग्रहण क- रते हैं वे भेड़ से भी बचाव नहीं करते किंतुभेड़ और वकरी को तुल्य समुझलेते सो यह मूर्खता उनकी वृथा है क्योंकि भाविक दूधका निपेध नित्य और निर्विकल्प है सोई गौतमऋपिने स्पष्ट कहा है-यथा(नित्यमाविकमपेयमोष्ट्रमेकशफंचेति)वल्किवि- रले अज्ञानी अजा को भी अति अशुद्ध और अशुभ कहदेते हैं सो यह उनकादोप नहीं किन्तु केवल अज्ञानताकाही दोप है क्योंकि यह शास्त्र तो केवल विधि औरनि- पेधकाही प्रत्यक्ष है तिसमें भी बकरी के दुग्ध की ग्राह्यता ठेठ इसी श्लोकमें लिखीहै इसके सिवायधन्य शास्त्र जो महानुभाव ऋपीश्वरों के निर्माण कियेहें जिनमें बड़े २ १२७ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । प्रकरण केवल छाग माहात्म्यकेही लिखे हैं और वह माहात्म्य कुछ मांसपक्षमें नहीं किन्तु केवल छागके पालने या पवित्रता मध्ये और उनके नानाभेदसे शुभाशुभ फल कर्तृत्व के विषय में आरूढ़हैं- इसके सिवाय वैद्य शास्त्र में जैसा छागीदुग्धका गुण प्रसिद्ध है तैसाऔर किसी का नहीं फिर इस दशापरभी छागीको अशुद्ध या अशुभ क्योंकर कहसक १६९॥ देवतार्थहविःशियुलोहितान्त्रश्चनांस्तथा। अनुपातमांसानिविड्जानिकवकानिच १७० ॥ ऐ०-देवताकेअर्थ कहियेनिमित्तसे जो कोई वस्तु बलिउपहार आदि कल्पितकरीहो किजो देवताको अर्पण नहीं करिपाईहोक्योंकि उसकार्यमें अभीविलम्ब शेपहे-हवि जो हवनकेनामसे बनाई हो पर अवतक हवन नहीं होचुका है-शिग्रुसहिंजना-लोहितान् अर्थात लोहित वर्णके वृक्षनिर्यास कहिये गोंदोंको तथा-त्रश्चनान अर्थात् ब्रश्चनकर्म जो हरेरक्षोंका छेदनकरना तिस्से उत्पन्नहुये गोंदोंको-यनुपाकृतमांसानि अर्थात्यज्ञ विधिसे नकल्पितकिये पशुओंकमांस-विड्जानि अर्थात् मनुप्यादिकोंके खायेहुयेफल बीजोंसे बिष्ठाद्वारा निकलकर उत्पन्नहुये शाकादिकों को यहाविष्ठाके स्थान में उत्पन्न इयोंकोभी-कवकानि अर्थात् छत्राक जो वर्षाऋतुमें होतेहैं-इनवस्तुओं को भी वर्जित करै वर्जितकरना यह पहलेश्लोकमेंसे लियागया है १७० ॥ अधि०-लोहित और ब्रश्चनशब्दकाअर्थ यद्यपि इसके श्लोकमूलसे अच्छास्पष्ट नहींहोता पर मनुजीका कहा प्रमाण इसमें प्रत्यक्ष है कि-(लोहितान् रक्षनिर्यासान् प्रश्चनप्रभवांस्तथेति)-लोहितनिर्यासों के निषेध से राल कर्पूर हिंगुअादि निर्यासों का निषेध नहींपायागया १७०॥ क्रव्यादपक्षिदात्यूहशुकप्रतुदटिद्विभान् । सारसैकशफान्हसान्सश्विग्रामवासिनः १७१ ॥ ऐ०-क्रव्यादतौ वेजीव जो अन्यजीवोंका कच्चा और मरामांसभी भक्षणकरतेहैं यथा श्वान शृगालआदि-और पक्षीभी उसीप्रकारके यथा काक टैंक गृधादि अनेकप्रसिद्ध हैं-और दात्यूह चातक जिसे पपैया वा पपीहा कहतेहैं-शुक तोता-और प्रतुदपक्षी वे कहलातेहैं जो किसी कीड़ेको या किसी रोटीअादिवस्तुकोभी जब खातेहैं तब अपनी चौचसे वारम्वार तोद कहिये पीड़ादेकर अर्थात् कूट पीटकर उछालतेहुये और अपनी ग्रीवाको भी पीड़ासीपातेहुये किन्तुग्रीवाको हिलाते झुलातेहुये खाते हैं और टिटिभ टटीहरी जो श्येनपक्षीका शब्दानु कारी प्रसिद्धहै-सारस यहलोकमें भी अतिविदितहै- एकशफा यह घोड़ा श्रादि एक सुमवाले प्रसिद्धहें-हंस जो अपने नामसे विख्यातहैं- औरभी ग्रामवासी पक्षी जोपारावत पंडुकी आदि अनेक वस्तीमें रहतेहैं वे सबके सब और वे पशुभी कि जो ग्रामचरप्रसिद्ध है-इनकहेहुये जीवोंका मांसभी न खावै किंतु वर्जितकरै यह १६९ श्लोकसे सम्बन्ध जोड़ा गया १७१॥

१२८ मिताक्षरा स. याचाराध्याय। अधिः-प्रतुद पक्षियोंका उदाहरण-यथा(हारीतोधवलःपांडुःचित्रपक्षोरहच्छुकः । पारावतःखंजरीटःपिकाद्याःप्रतुदाःस्मृताः १ प्रतुद्यभक्षयंत्येतेतुडेनप्रतुदास्ततः । पि काद्याइतित्रादिशब्देनश्येनादयोप्यन्येबहवः यथाश्येनःकंकाकाकःद्रोणकाकःउलूकाम- यूरः एवमन्येपिवहवोभवंति एपांकेचित्प्रसहापि प्रतुदलक्षणाद्ग्रहीताः कार्यापेक्षयान तुलक्षणमात्रपरिज्ञानार्थमित्याशयः) १७१ ।। कोपरिभवचक्राहवलाकावकविष्किरान् । स्थाशरसंयावपायसापूपशप्कुलीः १७२ ॥ ऐ० -कोयष्टि नामजल कुक्कुटपक्षी क्रौंच इति मिताक्षराकारः-प्लवनामजल कुकुट चक्राइनाम चक्रवाक-चलाकास्वनाम प्रसिद्ध है-वक बगुला-विप्किरा वे पक्षी कह- लाते हैं जो नखों या चोंचसे फैलाकर चुगते हैं जैसे मुर्गा और चकोर आदि अनेक इन का मांस नहीं खावै और तथा कृशर रथा संयाव थापायस यथाअपूप तथा शप्कुली इनको भी वर्जित करै यह योजना १६९ के श्लोक से हुई-कृशर खिचरीको कहते हैं वह खिचरी दाल चावर श्रादि से जैसी सनातन से होती आई और सबलोक में प्रसिद्ध है सो तो वृथा नहीं है पर जो विपरीत और असंगत या श्र. भक्ष्य वस्तुओं से बनाई जाय सो बथा है-संयाव गुझिया पिराकों को कहते हैं जैसी उनकी क्रिया प्रसिद्ध है सो ती स्था नहीं है पर जब असंगत या अभक्ष्य व- स्तुओं से बनाई जाय सो स्था है-ऐसेही पायस खीर जो असंगत या अभक्ष्य वस्तुओंसे बनाई जाय वहस्थाहे-ऐसेही अपूप कहिये पुआ वा कसार-और शप्कुली नामपूरी ये परिनियमित रीतोंसे असंगत या अभक्ष्य वस्तुसे बनाये जावें सो स्था, इनकोभी वर्जितकरै १७२॥ अवि०-विकिर पक्षियोंका उदाहरण-यथा-वर्तिकोलावचिकुरकपिजलकतित्तिराः। कुलिंग कुकुटाद्याश्च विप्किराःसमुदाहृताः १ कपिजलइतिप्राज्ञःकथितोगौरतित्तिरः। विकीर्यभक्षयंत्येतेयस्मात्तस्मादिविकिराः२ आदिशब्दादन्येपिबहुशःसंबोध्याः यद्य प्येपांकेचिल्लावादयोभक्ष्याअपिलोकप्रसिद्धाः तथापि शास्त्रवाक्यपरिसिद्धिनिमित्तमे- तल्लक्षणम् १७२॥ कलकिसकाकोलंकुररंरज्जुदालकम् । जालपादानखजरीटानज्ञाताश्चमृगहिजान १७३ ।। ऐ०-कलविक नाम कुलिंग चटक या ग्राम चटक अर्थात् गरगैया गौरया चिड़ा इतिच लोके प्रसिद्ध जो घरों में घुसिलारखता है-काकोल नाम द्रोणकाक अर्थात् कगार जो अशेपकाला और इसकाक से कुछ ऊँचा भी होताहे-कुररनाम उत्क्रोश पक्षी जो निरंतर रुदन सम शब्द करताहै जिसेलोक में भी कुररी कहतेहें-रज्जुदालक नाम रक्षकुटकपक्षी जिसे खुटक बढेया कहते हैं-जालपाद पक्षी उन्हें कहते है जिनके पंजाबोंके वीच २ खालकी जालीहोतीहै-खंजरीट नाम खंजन मेमला किरखिंदा इति ..

मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। १२९ लोके प्रसिद्ध जिसका कार्तिकमें श्रागमन और चैत्रमें प्रस्थान होता है-अज्ञात क- हिये विनाजानेहये जिन्हें कभी देखा और सुनाभी न हो ऐसे मृग अर्थात् वनकेजीव चतुष्पद और द्विजकहिये पक्षी-इन सबका मांस वर्जितराखे यह योजना १६९श्लोक से हुई १७३॥ अधि०-कलविंक यद्यपि १७१ श्लोक में भी ग्राम वासियों के निपेधमें आचुका क्योंकि इस कलविंक का दूसरानाम ग्राम चटक होताहै,और १७२ की अधिकोक्तिमें भी विप्किरगणना में कुलिंगनामसे आचुका परंतु यह संदेहका स्थल नहीं है क्योंकि इसी प्रकार और भी अनेक पक्षी जो अपने २ नामसे इन्हीं श्लोकों में निषेध हुये फिर वेही बहुधा प्रत्तुद और विप्किरमें भी पाये जाते हैं इसका यहहेतु है कि वे प्रत्तुद या विष्किर या ग्रामनिवासी केवल उनके निषेध में दर्शाये हैं कि जिनके नाम इन श्लोकों में प्रत्यक्ष नहीं आयेथे और निपेध उनका योग्य था इससे किसी किसी की पुनरुक्ति हो जानाभी कुछ दूपण नहीं बल्कि पुनरुक्ति से निपेध में विशेषता पाई जातीहै १७३ ॥ चापांश्चरक्तपादांश्चसौनंवल्लूरमेवच मत्स्यांश्चकामताजग्ध्वासोपवासघ्यहवसेत् १७४ ॥ ऐ-चापनाम किकीदिव पक्षीजिसे पुण्य दर्शन कहा करतेहैं अर्थात् नीलकंठ जिस की ग्रीवा नीलमणिके समान और चोंच स्वर्ण वर्ण होतीहै इसकी उपजाति में और भी कई पक्षी छोटे२ उसी समान होतेहैं(रक्तपादाःकादंवादयः) अर्थात् कलहंसादि अनेक पक्षी जिनके पंजालाल होतेहैं-सौन कहिये सूनाका स्थान किंतु कसाइयों का घातस्थान तिस्से उत्पन्न भया जो मांस तिस को भी सौन कहते हैं वहमांस चाहै भक्ष्यजीवों का भी हो-वल्लूर कहिये सूखामांस-मत्स्यभी जो नाना प्रकारके जलजीव प्रसिद्ध हैं-इनको वर्जितकर यह योजना १६६ श्लोक से हुई-इन सवों को कि जो १६९ श्लोकसे यहांताई गिनाये गये अर्थात् इनमें से एक वस्तुको भी कामना पूर्वक भक्षण करिलेवै तौ तीनदिनताई उपवासकहिये निराहार होकरबसै तब शरीर शुद्धि होवे या जो अकामभक्षणकिया होती एकहीदिनरात्रिके उपवासमें शुद्धिहोवै यह एक दिनरात्रि मनुजी के कथनसे प्रमाण है १७४॥ अधि०-जो कि शंखजीने इस विषयमें १२ दिवस इस प्रकार से कहे हैं कि-चक वलाका हंस प्लव चक्रवाक कारण्डव गृहचटक कपोत पारावत पांडुशुक सारिका सारस टिटिभ उलूक कंक रक्तपाद चाप भास वायस कोकिल शाङ्कलि कुक्कुट हारीत भक्षणे (हादश रात्र मनाहाराःपिवेद् गोमूत्रयावकमिति) सो यह शंखजीकावचन बहुतकाल पर्यंतजानि बूझिकर भक्षण करनेपर संभवित है १७४॥ पलांडंविबरादंचछत्राकंग्रामकुझुटम् । लशुनंजनचैवजग्ध्याचांद्रायणंचरेत् १७५ ।। .

- १३० मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। ऐ०-पलांडु पिआज-विरांह ग्रामसूकर-छत्राक सर्प छत्र जो छत्राकार वर्षाऋतु में होता है जिसका चर्चा १७० श्लोकमें कवक शब्द पर आयाथा-ग्रामकुक्कुट पा- लतमुर्गा-लशुनलहसुन इतिलोकेपि-गुंजन गाजर-इन चीजों को धोखेसेभक्षण करिक चांद्रायणकरे तव शरीर शुदिहोवै अन्यथाजानिकर खानेका प्रायश्चित्तनहींहै १७५॥ अधि० ग्रामकुक्कुट और छत्राक इन दोनों का निषेध पहले हो चुकाथा पर यहांपर पुनरुक्ति इसहेतु से हुई कि पिआज आदि अति निपिद वस्तुओं के समान इनका भी प्रायश्चित्त दर्शाना अंगीकार था-और इन्हीं को जानिवझि कर बहुत दिनोखाने से द्विजाती पतित होजाता है सोई मनुजीका वाक्य प्रमाण है कि(छत्राकं बिडराईच • लशुनं ग्राम कुकुटम्। पलांडुरंजनचैव मत्याजग्ध्यापतेहिजः)और जो विनाजानधोखे में खालेवे तिसके मध्ये भी मनुजी ने यह कहा है कि(अमत्यै तानिपटजन्ध्याकृच्छ्रेसां तपनंचरेत्)अर्थात्-बिनाजाने इन छ मेंसे कोई वस्तु खालेवै तो कृच्छ्र सांतपन नामका व्रत आचरे तव शरीर शुद्धि होवै-इस्से प्रत्यक्ष विदितहुआ कि इन वस्तुओंकोजानि करखानेपर प्रायश्चित्तसे भी शुद्धि नहीं होती क्योंकि केवल पतित होजानाहीलिखा उसका प्रायश्चित्त मनुजीने भी नहीं कहा १७५ ॥ अब नीचे भक्ष्य मांसोंको कहते हैं। भक्ष्या पंचनवाःसैधागोधाकच्छपराहकाः । शशश्चमत्स्येप्पपिहिसिंहतुंढकरोहिताः १७६ ॥ तथापाठीनराजीवसशकाचद्विजातिभिः । अतःशृणुध्वंमांसस्यविधिभक्षणवर्जने १७७ ।। ऐ० सहद्वयोः (सेधाश्वाविवाअर्थात्पंचनामें एक मृगविशेष-गोधा गोहीगोह इतिच कच्छप कछुवा-शल्लकसेह सेही-शश खरहा खरगोश-इतने पंचनखवाले भक्ष्य हैं अर्थात् वानर मार्जार आदि जो अनेक जीव पाँचनखोंवाले होतेहे तिनमें यह इतने मांसखाने योग्य है-और मत्स्यों में भी(सिंहतुंडक) अर्थात् सिंहमुख नाम मच्छी (रोहित) कहिये लोहित वर्ण जिसको रोह मच्छी कहते हैं १७६ तेसेही (पाठीन) जिसे पाठा या चंदानाम मछली कहते हैं-राजीव) जो पद्मवर्ण की मच्छी होतीहै (सशक)अर्थात् जिस मच्छी के ऊपर सीपके आकार चिह हों-सब जाति की मछली में से इतनी म- बुली भी द्विजातियों को भत्य है-इसके आगे तुम सब सुनो मांसभक्षणके निषेध में जो विधि है १७७॥ पषि०-पंचनखों के प्रमाणमें गोतमजीका वचन-यथा (पंचनखाःशशशल्लकवावि गोधाखड्गकच्छपाइति) इसीपर मनुजी का वचन-यथा (श्वाविधंशल्लकं गोधां खड्ग कूर्मशशास्तथा। भक्ष्यान् पंचनखेप्याहुरनुष्ट्रांश्चैकतोदतइति)और जो किवसिष्ठजीने खड्ग नाम मृगके मांस भक्षण मध्ये कुछ विवाद पूर्वक अभक्ष्यत्व भी कहाहै सो वह श्रादके सिवाय अन्य दशापर कहा है क्योंकि इसके फल विशेष पर भी वाक्य प्र.

- मिताक्षरा स० आचाराध्याय। १३१ माण है कि (खड्गमांसैर्भवेदत्तमक्षय्यंपितृकर्मणिइति) उक्तमत्स्यों के भी प्रमाणमम- नुजी का वाक्य है कि (पाठीनरोहितावाद्यौनियुक्तौहव्यकव्ययोः। राजीवाःसिहतुंडाश्च सशल्काश्चैवसर्वशइति) यह साधारण द्विजातियों के धर्म कहे अर्थात् इनमेंस्नातक 'ब्राह्मण गिनती में नहीं है और शूद्रभी इस गिनतीमें नहीं है क्योंकि शूद्र उसगिनती में आवेंगे जो नीचे अब चारों वर्ण के धर्म कहे जायँगे परन्तु इसमें यह विचार दृष्टि अधिकहै कि मांसादि भक्षणमें जो विधि शास्त्रोक्त भी प्रमाण पूर्वक लिखीहै उसकेगा- शय से कोई ऐसा द्विजाती नहीं भक्षणकरसता है कि जिसके कुल या देश या जाति में उसवातका प्रचार नहीं है क्योंकि वह विधिभी केवल उन्हींके लिये कही है कि जो द्विजाती पूर्वकाल से ग्रहण करते चले आये हों और उस प्रकृति को अब छोड़नहीं सक्ते हैं-अन्यथा जो शास्त्रमें द्विजाती यह सामान्य संज्ञा अविशेप लिखी है उसके लिये वह वाक्य भी बाधक है जो १५५ के श्लोकमें कहचुके हैं-कि (अस्वयं लोकवि हिष्टधर्मपाचरेन्नतु) १७६। १७७॥ अथ चातुर्वर्ण्य धर्मों को कहते हैं । प्राणात्ययेतथाश्रादेप्रोक्षितादेजकाम्यया । देवानपितॄन्समभ्यय॑खादन्मासनदोपभाक् १७८॥ प्रक्ष०-प्राणोंके अत्ययमें तथा श्राद्ध में प्रोक्षित मांस द्विजकामनासेसाधाहुनामांस देवताओंको पितरोंको सम्यक् अभ्यर्चना करिकेमांसखातेहुये दोपभागी नहीं १७॥ अभि-प्राणों का प्रत्यय कहिये नाशहुया जाताहो जैसे अन्नकी प्राप्ति नहीं है या कोई रोग ऐसा है कि वह मांस के खाने बिना प्राणलेजायगा तो निसंदेह प्राणों की रक्षाकेलिये उसका भक्षण नियमों के साथ करे-तैसेही श्राद्धमें निमंत्रितहुआ भी नियम से खावै-प्रोक्षित मांस अर्थात प्रोक्षण नामसे वेद विधिमें पशुका संस्कार जो कहा है उसके अनुसार जो पशु संस्कृत कियागया हो अर्थात् अग्नीपोमीय आदि यज्ञों में विधि सहित होमागया हो उसकाशेप मांस-द्विजकाम्यया अर्थात् ब्रह्मभोज के निमित्तसे और देव के निमित्तसे-और पितृकर्मके निमित्त से जो मांस साधन हुआ हो उसकेखाने से दोपभागी नहीं होसला १७८ ॥ अधिः-नियमसे भक्षणकरना यह कि जैसी उसकी विधियानिपेधऊपरसे कहतेचले पातेहैं उसके अनुसार-प्राणोंकी रक्षाकेलिये जो कहाहे सोप्राणोंकी रक्षा सब धोके ऊपर प्रधानहे-यथा(सर्वतएवात्मानंगोपयेदित्यात्मरक्षणविधानम्-तस्मादिहनपुरायुपः स्वःकामीप्रेयादितिमरणनिपेधस्तु) अर्थात्-प्रात्मा जो प्राण अथवा शरीरहै तिसको सवसेही अधिक समुझकर रक्षाकरे यह आत्मरक्षण विधानहे-तिस हेतुसे इह संसारमें स्वर्गकीकामनावालाआयुसे पहले न परलोकजावे यहनिरर्थमरणका निपेध भीहै-योर आदमै निमंत्रितहुया भीनियमोसे मांसभक्षणकर यह कहाहेतहां निमंत्रणचाहे ब्राह्म- १३२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। पत्यकाहो अथवा गोत्रित्वका क्योंकि यह स्थल चारौ वर्णके मध्ये कहरहेहैं और आड में न भक्षण करने का दोष भी मनुजीने कहा है कि (यथाविधिनियुक्तस्तुयोमांसंना त्तिमानवः।सप्नत्यपशुतांयातिसंभवानेकविंशतिम्)अर्थात्-जो मानव यथाविधिसेनि- युक्त हुआ भी मांस नहीं खावै है सो मरे पीछे इक्कीस जन्मताई पशु योनिमें जाताहै- परंतु इस दोप में भी यह बड़ा निर्वाह पायाजाता है कि जो यथा विधिसे नौतागया हो वह न खाये तो दोप भागी हो पर जो उस भेद को न जानेविना नौति दियागया हो और न खावै तो दोप भागी नहीं है इसलिये जिसको उसबातका त्याग है वह उस प्रकार के निमंत्रण कोही यथा विधिसे क्यों मानेगा-यथाविधिसे नियुक्तहोनायह कि जब श्रादसे पहले दिन सायंकालमें उसको शास्त्रोक्त विधिसे पादप्रक्षालन यादि प्रकारों से नौतादियागया और यह सुना दियागया कि तुम आज ब्रह्मचर्य आदिसं- यमसे रहना और भोजनमें अमुकामुक वस्तु भोजन करनी पड़ेंगी तब उसने अधिक दक्षिणा या वस्त्रादिक मिलना सुनिकर लोभ लालच से अंगीकार करलिया पर भो- जन समय विवेकी बना तौ निःसंदेह दोपभागी है ऐसेही जहां केवल गोत्रित्व भाव का निमंत्रण है या साधारण है तहां भी प्रथम उसवात का संवोधनहो-और प्रोक्षित मांस जो यज्ञोंमें संस्कार विधिसे संसाधनहुआ उसको यज्ञका यजमानही नहीं खावै तो यज्ञमें असिंधि कही है-अन्यथा मांस वहभी यज्ञार्थ हे जो केवल भृत्यभरणापेक्षा से संपादन हुआहो क्योंकि-भत्यभरणभी एक प्रकारका यज्ञ है-ऐसेही अतिथि आदि का सत्कार करना यह भी एक यज्ञ है इसमें से भी जो सत्कार से वचाहुआ मांस वह यज्ञार्थसंज्ञावान्है-और दोपभागी न होना इसका यहसिद्धांतहै कि दैवयोगसे स्वतः इन प्रकारों के आनि पड़ने में खाने से दोप भागी नहीं पर केवल मांस की अभिरुचि सेही इन यज्ञों का प्रारम्भ करिके मांस खाने से निःसंदेह दोपभागीहोगा इस्से जिन जीवों का मांसखाना भी १७६ और १७७ श्लोकमें उचित लिखचुके हैं उनका मांस भी इस १७८ में कहीहुई मर्यादों से रहित खानेवाला निःसंदेह दोपभागीहोगा सोई नीचे कहते हैं १७८॥ बसेरसनरकेयोरेटिनानिपशुरोमभिः । संमितानिदुराचारोयोहंत्यविधिनापसन् १७९ ॥ ऐ०-यह दुराचारी जो पशुओंको विधिविनामारेहै सो घोर नरक में उतनी संख्या के दिनों ताई बसता है जितने उस पशू के रोमा हो १७६ ॥ अब मांमके परित्याग का फल कहते हैं। सर्वान्कामानवाप्नोतिहयमेधफलतथा । गृहेपिनिवसन्वितोमुनिर्मासविवर्जनात् १८० ॥ ऐ०-सब कामनाओं को पूराकरि पाये है और अश्वमेधयज्ञका फलभी तथा गृह में निवास करताहुआ भी विप्र मांस के छोड़ने से मुनि होता है १८० ॥

१३३ . मिताक्षरा स० याचाराध्याय। मधि-विपके उपलक्षणसे चारोंवर्ण संभवित हैं और मुनि होताहै अर्थात् मुनि के तुल्यमाननीय बिना तपस्याके भी होता है-अश्वमेध फलके विषयमें मनुजी ने भी कहा है कि-(ववर्षेऽश्वमेधेनयोयजेतशतंसमाः।मांसानिचनखादेद्यस्तयोःपुण्यफलंस मम्)अर्थात् एक तो वह पुरुष जो हरसाल अश्वमेध यज्ञसे सौ वर्पताई प्रभुकायजन करै और एक वह जिस्से कुछ और तो न होसकै पर मांसों को न खावै इन दोनोंका पुण्यफल वरावर होता है १८०॥ इतिभक्ष्याऽभक्ष्यप्रकरणम् ॥ अथ दूव्यशुद्धिकथनम् ॥ सौवर्णराजताब्जानामूर्ध्वपात्रग्रहाश्मनाम् । शाकरज्जुमूलफलवासोविदलचर्मणाम् १८१॥ पात्राणांचमसानांचवारिणाशुद्धिरिप्यते । चरुसुक्खुवसस्नेहपात्राण्युप्णेनवारिणा १८२ ॥ ऐ० सहयो:-(सौवर्ण) कहिये सुवर्णपात्र-( राजत) रजतके पाव अर्थात् चांदीकेबने हुये-(भब्ज) अर्थात् मुक्ताफल शंखसीपी आदि चीजें-(ऊर्ध्वपात्र) अर्थात् यज्ञसंबंधी उ लूखल यादि इति मिताक्षराकारःयद्वा ऊर्ध्वपात्र सुवर्ण और रजत इन दो धातुओंसे ऊर्ध्व उपरांत जो अन्य धातु ताय आदि तिनके पात्र-(ग्रह) अर्थात् यज्ञ संबंधी सोम धारणपानादि यथा(सौत्रामण्यांसुराग्रहान्गृह्णाति इतिवाक्यप्रमाणात) (मश्म) जो पत्थरके सिलबहायादि अनेकप्रसिद्धहें इनसवोंकीशुद्धि और-(शाक)सागतरकारी या- वन्मात्र होतेहैं-रज्जु रस्सी डोरीआदि-मूल याक आदि यावन्मात्र नानामूल वस्तु होतीहों- फल)प्राय आदि यावन्मात्र खानेयोग्य होते हैं-(वासो वस्त्रमान-(विदल)वैणव आदि किंतु बांसादिसे जो वस्तुपिटारी विलहरा आदि बुनीजातीहैं-(चर्म चामवक- रीआदिका-इनसवोंकी शुद्धि १८१ और (पात्र) अर्थात् प्रोक्षणी पात्रादि-(चमस)अ. र्थात् होतचमसादि और काष्ठका बनाया हुश्रा यज्ञपात्रोंमसे एकपात्र विशेष और सोमपान पात्रकोभी चमसकहतेहें-इनसबोंकी शुद्धिकेवलजल से होतीहै परउस अव- स्थामें कि जो किसीवस्तकालेप इनमेंनहींहो अर्थात् केवल उच्छिष्टवस्तुके स्पर्शमात्र की भ्रांतिमें जलसे धोलेना उचितहे और जोउच्छिष्टादिका लेप होवे तौभस्ममृत्ति- का गोमयन्यादिसे शुद्धकिये पीछे जलसेधोवै-और चर)कहिये चरुस्थाली-(मुक)और (सुवा यह दोनों होमके उपकरण प्रसिदहें यह और अन्यभी जो चिकनाई लगे पात्र हो सो सबउप्ण जलसे प्रक्षालनकरै तवशुद्धहोवें १८२॥ मधिः-यद्यपि बकरीयादिके चर्मकी शुद्धिभी जलसे कही और लोकमें यहभीप्र- सिद्धहै कि चर्मकी शुदितैलादि स्नेहींसे होतीहे सोभी असंगत नहीं क्योंकि प्रत्यक्ष प्रमाणमें कुतर्क नहीं होसक्ती परन्तु इसमें यह प्राशय है कि जैसे चामकामढ़ाया संदृक वा पिटाला अथवा खड्गका पड़तला श्रादि कोई वस्तु जो अवझ्यवतीयामें १३४ मिताक्षरा स. प्राचाराध्याय। रहतीहै उसके ऊपर काक या विलाई श्रादि कोई वीटकरदेवै तौ प्रथम जलसेप्रक्षा- लेनकरै फिरसूखे पीछे तैलका स्पर्शकरै-तवशुद्ध होतीहै ऐसेही बुद्धिका विचारसर्वत्र मुख्यहै कुछ लिखेपरंभी केवलं प्रारूढ़ता नहीं होसक्ती क्योंकि अभी ऊपर ऐक्यार्थ में कहचुकेहैं कि विनालेपकी वस्तुकेवल जलसे शुद्धहोतीहै और उन्हींवस्तुओंमेंचा- मकोभी गिनती करचुकहें और यथार्थमें चामजलसे भीगजाने पर प्रत्यक्ष अशुद्धहो जाताहै परन्तु वह संघातवाक्यथा इसलिये उसमें, भिन्न २ वस्तुपर दृष्टिडालकर यथायोग्य व्यापार करना उचित है क्योंकि उच्छिष्टादिके स्पर्शमात्र की भ्रांतिमें के- वल जलसे प्रक्षालन कहा तो चर्मके साथमें स्पर्श भ्रांति यह असंगत है क्योंकिजय चर्म की वस्तुमें केवल स्पर्शमात्रकी भ्रांति है तब जल से धोना अनुचित है किंतु के- वल तैलके घर्पण मात्र से उसकी शुन्दि हो जायगी अन्यथा जलसे धोना उसी अ- वस्थामें उचित है कि जब पूर्वोक्त अनुसार विष्ठा प्रादिकालेप होजाय ऐसेही प्रत्येक वस्तुका भिन्न २ निर्णय करलेना उचित है-मनुजी का वाक्य-(निल्लेपंकांचनभांडमद्धि रेवेविशुद्ध्यति। अजमश्ममयंचैवराजतंचानुपस्कृतम्) अर्थात् कांचनकापात्र जिसमें किसी उच्छिष्ट का लेप नहीं होवै वह जलोंसेही शुद्ध होजाता है और अब्जकहिये शंख सीपी मुक्ताफल आदि चीजें तथा अश्ममय कहिये पत्थरकी पियाली आदि जो कुछ होता हो और राजत कहिये चांदी के पात्र आदि यह सब जल से शुद्ध होजाते है परंतु जो अनुपस्कृत हों अर्थात् जिनमें रेखा खुदी होवे फॅची आदिसे रगड़नेपर शुद्ध होवेंगे-और जिनमें किसी वस्तु का लेप लगा हो उच्छिष्ट आदि तिनके मध्ये मनुजी ने कहा है कि-(तैजसानांमणीनांचसर्वस्याश्ममयस्यच । भस्मनाद्भिर्मदाचैवशु द्विरुक्तामनीषिभिः)-अर्थात्-चांदी आदि सवधातुओं के और मणियोंके और सर्वजाति के पत्थर के भी जो पात्र आदिलेप सहित होवें उनकी शुद्धि भस्म और जलसे अ. थवा मृत्तिका और जलसे बुद्धिमानों ने कही है-अन्यथा जिन पात्रों में काक अथवा श्वान आदि मलीन जीव मुख डालें उनकी शुद्धि जो धातुके होवें तौ अग्निमें देनेसे अथवा जो पत्थर या सीपी श्रादिके होवें तो शाण अर्थात् खराद आदि से खुर्चाने पर शुद्धहोते हैं १८१ । १८२॥ स्पयाजिनधान्यानांमुसलालूखलानसा । प्रोक्षणंसंहतानांचाहनाधान्ययाससा १८३ ॥ ऐ०-(स्पय अर्थात् वनजो एक प्रकार का यज्ञांग होताहे-(प) सूपया छाजकेनाम से प्रसिद्धहे (भजिन)यद्यपि चर्म मात्रका नामहै पर चर्मको पहले१८१मेंभी कहचुके, इसलिये यहां पर वह मृगछाला आदि चर्म समुझने जो यज्ञादि कर्म या पूजनपाठ में काम आते हैं-(धान्य)नाजमात्र-इनसवों की शुद्धि और-(मुसल) मसल जो अन्नादि कृटने का होता है-(तलूखल)ोखली या गाली प्रसिद्ध है-(मनः)शकटं अर्थात् गाडी -- -- मिताक्षरा स० आचाराध्याय। १३५ आदि यानयंत्र (एतेषांप्रोक्षणंशुद्धिः)अर्थात् इनकी शुद्धिजलका छींटा देनेसेही हो- जाती है (तथैवसंहतानांबहूनाधान्यवाससांचशुद्धिःप्रोक्षणं) अर्थात् बहुत से अन्न और वस्त्रों का संघात कहिये ढेर लगाहो उनकी शुद्दि भी केवल जल के छींटा मात्र से होजाती है। अधिः-यहां पर धान्य या वस्त्रादि वस्तुओंका ढेर किंतु राशि जो कही सो अशु- चिके स्पर्श की अपेक्षा में कही है तिसका शास्त्रांतर वाक्यों से यह विवेक है कि उस राशिमें से एक ओर थोड़ी या बहुत वस्तु को कोई चांडाल आदि छूजावै या कुछ म- लीनता लगजाये तो उसमें से जितनी वस्तु अशुद्धहुई हो उतनी की शुदि तो उसी रीति से करी जायगी जैसे पूर्व से कहतेचले आतेहैं शेपकी शुद्धि केवल जलके छींटा देनेसे (दृष्टांत)जैसे एक गठरीभर कपड़े सुखानेको रक्खेगये उनमें काकनेविष्ठाकरदिया तौ जहार विष्ठाका स्पर्शहुआहो तहार तो पूर्वोक्तरीतोंसे धोनाचाहिये शेप और सब कपड़े जलके छींटा सेही शुद्धहो जायँगे-तथाचस्मृत्यंतरम् (वस्त्रधान्यादिराशीनामेकदे शस्यदूपणातातावन्मानंसमुद्धृत्यशेपंप्रोक्षणमर्हति) इसका अर्थ ऊपरके कथनसे प्रकट होचुका-अथवा जिसराशिम बहुतसाविभाग तो छुयागयाहो और थोड़ासा विनाछुया शेपहो-तहां समस्तराशिमात्रका धोडालना उचितहै क्योंकि थोडीसी जो नहीं छुईगई उसकाधोना तो उस बहुतकेस्पर्श दोपसे १८१-१८२ में कहचुके हैं और बहुतसी जो चांडालादिने छुई या किसी मलीनवस्तुसे लिपगई उसकाधोना प्रत्यक्षही संभवित है किंतु अशुचिलेपकी शुद्धि विना धोने के नहीं होती चाहें थोड़ी हो या बहुत-सोई मनुजी ने भी कहा है कि ( अद्भिस्तुप्रोक्षणंशोचंबहूनांधान्यवाससाम् । प्रक्षालनेनत्व ल्पानामद्भिःशौचंविधीयते) अर्थात् बहुतसेधान्यवस्त्रादिकोंकाशुद्धहोना जलोंके छींटा से और थोड़ोंका शुद्धहोना भ्रांतिौभी जलोंसे धोनेपर होताहे-इसी कहेहुये न्यायसे जिस राशिमें शुद्ध और अशुद्ध दोनों भाग बराबरहों उसको समस्त धोडालना उ- चितहै-जहां यह विवेक निश्चय नहीं होसक्लाहो कि इस राशिमें कितना भाग शुद्धहै कितना अशुद्ध परस्पर्श दोपकी भ्रांति प्रत्यक्ष तहांभी समस्तका धोडालना संभवित है-इसी न्यायसे जो वस्तु पंद्रहदिवस ताई बिना वर्तावा अज्ञातभावसे रक्खी रहीहो उसकोभी बर्तावेके समय जलका छींटा देकर शुद्ध करलेना उचितहे-इसीन्यायसे उन धान्य वस्त्रादिकोंकाभी जलके छीटासे शुद्ध करलेना उचितहे कि जिनको अनेक पुरुप ढोढोकर भारवाही से लातेहों चाहें उनमें स्पर्श अथवा अस्पर्शकाविवेकहो या नहो- (दृष्टान्त) यथा रेलाख्य धूम्राकर्षक यानसे उत्तीर्णहोनेपर अनेक भारवाहों से वस्रादि उठवाना पड़ता है एवं अन्यदशायामभी समझलेना १८३-यहां ताई मूलके तीन श्लोकोंमें यद्यपि कहीं २ अर्थकी पंक्तिमें काक विष्टा आदिके लेपका दृष्टांतभी दिया १३८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । केवलभीहों-तथाच(तालकामुपधानंचपुष्परतावरंतथाशोपयित्वातपेकिंचित्करैःसंमा जयेन्मुहुः। पश्चाञ्चवारिणाप्रोक्ष्यविनियुंजीतकर्मणि। तान्यप्यतिमलिष्ठानियथावत्परि शोधयेत)-अर्थात्-तूलिका कहिये तोसक वा गलीचा और उपधान कहिये तकिया तथा कुसुम कुंकुम आदि पुष्पोंके रँगेहुये रक्तांबर जो धोव नहीं सहसतहों यद्वार- क्लांवरके उपलक्षणसे पीतांवरभी जोहरिद्रा आदिसे कच्चे रंगवालेहों किंतु मंजिष्टमा दिपके रँगवालोंको छोड़कर इनकहे हुये वस्त्रोंको थोड़ेलेपकी भ्रांतिमें मध्यमधामसे सुखाकर उतने खूटको दोनों हाथसे बारम्बार मीजै मसले जिस्से वह अमेध्यलेषझ डुजावै तिसपीछे जलके छींटादेकर वर्तावामें लगावे-और जो चेही कपड़े अतिशय मलीनहोवें तो उनकोभी पूर्वोक्तरीतोंसे यथावत् प्रक्षालन करवावै-सोई शंखजीनभी एकपदमें यहकह दियाहे कि-रागद्रव्याणिप्रोक्षितानिशुचीनीति-अर्थात् रंगवालीची में छिड़कडालनेसे शुद्ध होजातीहैं १८५॥ सगौरसप्पैःक्षौमपुनःपाकान्महीमयम् । कारुहस्तइशुचिःपण्यभैध्ययोपिन्मुस्वंतथा १८६ ऐ०-पीली सरसोंके चूर्ण सहित जल गोमूत्रोंसे पूर्वोक्त (सौम)अर्थात् अतसीतंतुनि- मित वस्त्रकी शुद्दीहोतीह-और (महीमय)कहिये मट्टीके पात्र जो अन्नादि उच्छिष्टसेलि टेहों उनकी शुद्धि फिर अग्निमें पकानेसे होजातीहै-(कास) जाती लोगोंका हाथ सदा शुद्धहोताहे-एवं (पण्योवस्तु अर्थात् जो अन्नअथवा नोनमिठाई आदि विक्रयकरनेके निमित्तसे खोलकरदूकान आगे धरीजाती है जिसमें अनेकोंका हाथपाँच लगजाताहै वह भी सदाशुद्धहै-तथैव(भैक्ष्य ,कहिये भिक्षाका अन्न जो अनेक घरसे ब्रह्मचारी आ दिकोई आश्रमीलायाहो वहभी सदाशुद्धह-तथेव(योपित)कहिये भार्याका मुखभी भोग समय सदाशुद्ध है वरन स्मृत्यंतर मतसे रति कालमें स्वीका सर्वांग शुद्धहोताहै और स्त्रियां पादत्राण विनामलीन मार्गके अाक्रमणसे भी नहीं अशुद्ध होतीहैं १८६॥ पाधि गोरीसरसों के साथ में जल गोमूत्र यह दोनों १८५ के श्लोकमेंसे जोड़े गये क्योंकि उनका संबंध चला पाताहै (कारु जातीके यह लोग कहलातेहैं रँगरेज छीपी घोची सूपकार अर्थात् खटीक आदि जो बाज बनाताहो इत्यादि औरभी इनकाहाथ सदाशुद्ध केवल अपनेकारमें और कारकी अपेक्षासे सूतकादि दशाका सिद्धांतहै किंतु अन्यथा प्रत्यक्ष चांडालादि में गणनीयहे-सोई सूतक दशाकी अपेक्षासे स्मृत्यंतरवा क्यभी दृढ़ताकारहै कि(कारवःशिल्पिनोवैद्यादासीदासास्तथैवच । राजानोराजभृत्या श्चसद्यःशौचाःप्रकीर्तिताः)अर्थात्-(कारव)कहिये कारजाति के लोग जिनको अभाऊ परकहाथा-ौर(शिल्पी कहिये राज बढ़ईयादि कारीगरलोग-और वैद्य पेशाबाले-श्री रदासी दास-तथैव राजालोग और उनके भृत्यवर्ग सेवक आदि यहसबलोग अपने २ घर सूतक होनेपरभी (सद्य शौच) कहातेह अर्थात् इनकेलिये दशाहहादशाहादि मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। १३६ अवधिकाबंधन नहीं है क्योंकि इनके संबंधीकामोंकी हानिसे अनेक संसारी फलसा- धकतामें अप्रमेय हानिहोजावे इसलिये धर्मशास्त्र ऐसी आज्ञा नहीं देता जिस्सेपर- महानिहोजानेकी संभावनाहो क्योंकि धर्मशास्त्रकेवल कल्याणके श्राशयपर आरूढ़ होताहै १८६॥ अब आगे भूशुद्धिकहते हैं। भूशुद्धिर्माजनादाहारकालाद्गोक्रमणानथा । सेकादुल्लेरखनाल्लेपागृहमार्जनलेपनात् १८७ ॥ मक्ष०-भुशुद्धि-मार्जनसे १ दाहसे२ कालसे ३ गोक्रमणसे ४ तथासेकते ५ उल्ले- खनते ६ लेपते७ गृह मार्जनसे १ लेपसे २।१८७॥ मभि-बिगड़ी हुई धरती इनसात प्रकारोंसे शुद्धहोती है एक तो भारने वहारने से १ लकड़ी घासफूस उसपर फूंकदेनेसे २ (काल)से कहनेका यहअभिप्रायहै कि जि- तने दिनों या महीनाओतक सूनीपड़ीरहने या उसपर बहुत मनुष्योंकी चलाफिरीहो- नेसे उसधरतीका पहलादोप लेपादि अथवा जो कुछहो वहनाशहोसक्ताहो उतने कालमें आपही शुद्धहोजातीहै ३ ऐसेही जितने दिनोंतक गौओंके फिरने या बधीर- हनेसे दोपदूर होसकै वह गोक्रमण कहाताहै ४(सेकोछिड़कावको भी कहतेहैं कही तो दोपकी लघुता या गुरुताके अनुसार छिड़कावसेही शुद्धहोसक्ती है कहीं दोपकी अ- धिकता पर दूध गोमूत्र गोवरजल या गंगाजल इनसवका प्रसेक किया जावै या इन में से एकही दावस्तु जो हाथलगे या दोपके अनुसार छिड़की जावे तव शुद्धहो तिस को (सेक) कहतेहैं-अथवा दैवयोगसे उसपर वर्षाहोजाय सो यह सबसे उत्तम(सेक)है ५ (उल्लेखन) कर्म अर्थात् दोपके अनुसार उसधरतीको छीलडाले या खोदडालै६ (लेप) शब्दसे चनाकी गचकरनी मट्टीकालेस गोवरादिसे लीपनापोतनासवसंबंधितहें७ यहसात प्रकार जो धरती शोधनके कहेगये इनमेंसे जहां जैसी संभावना या योग्य- ताहो उसके अनुरूप सबके सब संस्कार कियेजावें अथवा जहां एकही दोप्रकारोंसे शुद्धि समझी जाय तहां एकही दोका करना उचित सोई नीचे अधिकोक्तिमें देखी और नित्यके वर्तावेका गृहस्थानझारने और लीपने पोतनेसेही शुद्धहोताहै क्योंकि यह इतना संस्कार नित्यकरना उचित है इस नित्यगृहसंस्कार कर्मको साधारण धर्म की शिक्षाओं मध्ये १५३ के श्लोकमें विस्तारसहित लिखचकेंहें सोदेखलो १८७ ॥ अधि०-भशुद्धिका प्रकार देवलऋपिनेभिन्न २ समझाकर कहाहै (तथाचं) (यत्रप्र सूयतेनारीघियतेदह्यतेपिवा । चांडालाध्युपितंयत्रयत्रविष्ठादिसंगतिः। एवंकश्मलभू यिष्टाभूरऽमेध्याप्रकीर्तिता । श्वशूकरखरोष्ट्रादिसंस्टष्टादृष्टतांत्रजेत् । अंगारतुपकेशा स्थिभस्माद्यैर्मलिनाभवेत् । पंचधावाचतुर्धावाभूरमेध्यापिशुद्धयति । दुष्टान्चितात्रिधा द्वेधाशुद्धयतेमलिनैकधा) अर्थात् जहां स्त्रीने प्रसव कियाहो १ जहां कोई मराहो २ १३६ मिताभरा स० श्राचाराध्याय । है पर शास्त्रवक्ताका अभिप्राय यहां तक निलेप शुद्धिमें है किन्तु जो वस्तु चांडाल आदिने ठूलीहोवे उसका शुद्धिविधान कहाहे सलेपशुद्धिके विषयमें अव आगे कहते है और अवतक जो कहींकहीं लेपका दृष्टान्त दियाथा वह केवल इसलियेहै कि थोड़ी बुदिवालोंकीभी समझमें सुगमतासे भाजावै ।। तक्षणंदारुशृंगारप्नांगोबालैःफलसंभुवा । मार्जनंयज्ञपात्राणांपाणिनायज्ञकर्मणि १८४॥ ऐ०-(दारु) कहिये काष्ठके पात्र-(श्रृंग) मेप महिपादि पशुओंके सींगोंसे बनेहुयेपात्र- (मस्थि) हाड अथवा दांत जो हाथी और बनवाराह यहा बारहसिंगा आदि जीवोंके वर्तावमें पातेहैं तथैव हाड़के उपलक्षणसे शंख वा सीपी आदिभी इन सबोंकी शुद्धि (तक्षण) कर्मसे होती है और (फल) अर्थात् बिल्वादि फलोंकी खोपड़ी यहा नारिअर का ठीकरा यहा तोमड़ीका तूंवा इनसे बनीहुई वस्तुओंकी शुद्दि गऊके बालोंकी कैंची से यथा संभव जल मृत्तिका सहित रगड़नेसे होती है-यज्ञकर्मके वीच जो यज्ञसम्बन्धी अनेक सामान्यपात्र होते हैं तिनकी शुद्धि केवल हाथसे कुशाओंकी कूँची अथवा दशा पवित्र थांभकर जलमात्रसे होती है किन्तु भस्म या मृत्तिकाका कुछ काम नहीं और (दशापवित्र) साफा वा अँगोछाको कहते हैं पर अंग पोछनेका नहीं किन्तु केवल नवीन वस्त्रका टुकड़ाहो-यज्ञोंका यहभी एक संस्कार भूतकर्मका अंगहै कि जिस रीतिसे कहा हो उसी रीतिसे करना किन्तु मनमौजी नहीं १८४॥ अधि०-(तक्षण) कर्म उसको कहते हैं कि जो कोई वस्तु घिसीजावै या छीलीजावै जिस्से कुछ पतनी होजाय सोई कहाहै कि काष्ठ सींग हाड़ दांतोंके पात्र जो जूठ था चिकनाई श्रादिसे लिपटेहों और भस्म जल मृत्तिकादिसे धोने परभी लेप दोष नहीं दूर होसक्ताहो तो उतने स्थलको ऐसा किसी कंकण यालोहे आदिसे घसिडाले जिस्से वह लेप या चिकनाई या दुर्गघि उसकी उड़जावे-परंतु जो जल मृत्तिकासेही रगड़ने से शुद्ध होसक्ताहो तो इस बातकी अपेक्षा नहीं है क्योंकि लेपवाली सामान्यभावसे सभीवस्तुका शोधना प्रथम जल मट्टीसे कहा है-यथा (यावन्नापैत्यमेध्याक्तोगंधोलेप श्चतत्कृतः । तावन्मृहारिवादेयंसर्वासुद्रव्यशुद्धिप) अर्थात्-सभी प्रकारकी द्रव्यशुद्धि के विपयमै जबताई अशुचि वस्तु का लगाया लेप या उसकी करीहुई दुर्गधि दूर नहीं होवे तबताई बारम्बार मृत्तिका और जलसे शोधन करता रहेगऊ के वालोंकी कूँची यह गक निदर्शनमानहै किन्तु घोड़े के वाल और मैंज आदि श्रीरभी उचित वस्तुओंकी फूंची संभवित है १८४॥ सोपैदकगोमत्र शुध्यत्याविककौशिक । सश्रीफलैरंशुपट्टसारिटेःकुतपंतथा १८५ ॥ ऐ०-सोपैः अर्थात् सहित ऊपर मृत्तिकाके उदक और गोमूत्रों से शुद्ध होता हे (माविक)जो ऊनी वस्त्र प्रसिद्ध है और (कौशिक) जो रेशमी आदि कहाता है वहभी- मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। १३७ (अंशुपट्ट) अर्थात् किसी देशके वक्ष विशेपते उत्पन्न हुये वल्कल सूत्रों से बुनाहा वस्त्र सो यह श्रीफल सहित शुद्ध होता है अर्थात् श्रीफल जो वेल तिसका प्रौटाया जल अथवा गूदाही यथा संभव और पूर्वोक्त गोमूत्र और ऊपर मृत्तिकाभी इनसवों से शोधाजाय तव शुद्ध होवे-तथा (कुतप) कहिये पहाड़ी बकरी के रोमा से चुनाया ऊनवस्त्र सो रीठासहित पूर्वोक्तचीजोंसे धोयाजाय तव शुद्धहोवै पूति अर्थात् ऊपर मृत्तिका और गोमूत्र इनमें रीठाका फेन भी मिलावे अथवा पहले पूर्वोक्तों से धोकर पीछे रीठाके फेन से शोधै यह भावहे-ऊपर मृत्तिकारेहको कहते हैं जिसको धोवीखर्च में लातेहैं-जहारेह गोमूत्र वेल जलकई वस्तु कहीहें तहां कुछ यही सिद्धांत नहीं है कि सब चीजें मिलालीजा अर्थात् किसीसे पहले किसीसे पीछे किंतु जैसी उसकीक्रिया उसकामके ज्ञाता को संविदित हो सो उचित है । पधिः-इस श्लोकमें कही हुई क्रिया उस अवस्थामें करनी योग्य है कि जवकोई चिकनाई आदिकी जूठ या अशुद्ध वस्तु का लेप दृढ़तर उन वस्त्रों में प्रवेश होगया हो अर्थात् जहां किंचित्मात्र लेशहुआ हो तहां छींटा आदि साधारण क्रियाओं से काम चलावे क्योंकि उसप्रकारके वस्त्रोंसे गाढ़ीधोव नहीं सहीजाती किंतु गादीधोव से फट जाते या झड़जाते हैं और शुद्धि का करना उस भांतिसे अपेक्षित है जिस्से वस्त्रादि द्रव्यों का विनाश नहीं होनेपावै-सोई इसका प्रमाण देवल ऋपिने प्रथम तो यह कहाहै कि-(ऊर्णाकौशेयकुतपपक्षौमदुकूलजाः। अल्पाशीचाभवत्येतेशोपण प्रोक्ष णादिभिः)-अर्थात् ऊनके रेशमके पहाड़ी ऊनके बक्षकी छालिके क्षोम कहिये अतसी तन्तुके दुकूल कहिये और भी वारीक बहुमूल्य वाले वस्त्र यह सब अल्पाशीच होते हैं अर्थात् ये स्पर्श दोपमात्रसे किंचित् अशुद्ध समझेजाते हैं इसलिये केवल धूपमें सु- खाने अथवा जलसे छिड़क देनेसेही शुद्ध होजाते और आदि शब्द से कभी वायुके संयोगसेही किन्तु पवन चलतीमें फैलानेसे विना धूपकेभी शुद्ध होजाते हैं कभी झा- ड़ने फटकारनेसेही शुद्ध होजातेहैं जहां जैसा सम्भवहो-यह कहकर फिर उन्हीं देवल ऋपिने यहकहाहै कि (तान्येवामेध्ययुक्तानिक्षालयेच्योधनःस्वकैः । धान्यकल्कैस्तुफ- लजैरसैःक्षारानुगेरपि)अर्थात-चेही पोल वस्त्र जो किसी अमेध्य वस्तुसे लिटपजावें तो उनको भी अपने २ शोधन प्रकारोंमे धोवै तयशुद्धिहो परन्तु धोबी आदिसे नहीं धुवावे किंतु अपने हाथ से बनायेहुये धान्य कल्फ अर्थात् वेशन या चूनपिट्टी आदि जहां जिसकी योग्यताहो तिनसे और नींबू अथया रीठायादि फलकेरसाने जो भार कहिये रेह अथवा चूना कलई श्रादिसे मिलेहो तिनसे अपने हाथसेही धोधे-यद्यपि ऊपी बलको सबके साथमें पहलेही कहचके पर ही देवल ऋपि अब ऐसे ऊन श्रादि वस्त्रोंको कहनेहें कि जिनमें कभी सूतकाभी संयोग हुयाकरता है अथवा चाहे १४० मिताक्षरा स० आचाराध्याय। जहां कोई फूंकागयाहो ३ जहां चांडाल श्रादि कोई वसाहो ४ जहां विष्ठा आदि कोई से महामलका संसर्ग रहाहो ५ इस भांति (कश्मल) कहिये मलोंसे यहा उक्त दोपोंसे दृपित हुई धरती (अमेध्या) कहलाती है १ इत्येकभेदः अर्थात् इन पांचौ दोपवाली एथ्वी एक अमेध्यानामसे विख्यात होती है और कुत्ता शूकरगर्दभ ऊंट श्रादि अशुचि जीवाँसे बिगाडीहुई (दुष्टा) कहलाती है २ इति द्वितीयोभेदः-अंगार-तुष कहिये भसी कूड़ा आदि-केशवाल-अस्थि हाड़-भस्मराख आदि और भी इन्होंसे बिगड़ीहुई धरती (मलिना) कहाती है किंतु केवल मैली गिनीजाती है कुछ बड़े दोपवाली नहीं ३ इति तृतीयोभेदः इन तीनों भेदमें जैसे यह तीसरा सबसे छोटा गिनागया ऐसेही पहला सबसे बड़ाथा और बीचका मध्यमदोपहै इनकीबड़ाई छुटाईके अनुसारशुद्धिसंस्का- रभी कियेजाते हैं सोई ऊपर (पंचधा)इत्यादि श्लोकसेदेवलऋपिने यहकहाहै कि-तीन भेदोंके प्रथम भेदमें जिसधरतीको कई भांतिसे अमेध्याकहचुके हैं वह(अमेध्या)धर- ती पंचधा अथवा चतुर्धा संस्कारोंसे शुद्धहोतीहै-और (दुष्टा)धरती जो विचलेभेदमें कहीथी वहत्रिधा अथवा द्वेधा संस्कारोंसे शुद्धहोतीहै-और (मलिना)जो तीसरे भेदमें गिनती है वह एकधा संस्कारसेही शुद्धहो जाती है । इसअर्थका स्पष्टभाव यह है कि याज्ञवल्क्य ऋपिने १८७ के इसी श्लोकमै जो सातप्रकारके भूसंस्कार कहें, उनमें से पंचधा वा चतुर्धा वा त्रेधा वा द्वेधा और एकधा देखलेने-अर्थात् जहां मनुष्य- केगयेहों या चांडालवसेहो इनदो लक्षणोंवाली(अमेध्या पंचधासंस्कारोंसे किंतुदहनी कालरंगीक्रमण३सेक४उल्लेखन५इनपांचोंके करनेसे शुद्धहोतीहै-ौरजहांमनुष्योंका प्रसूतहुयाहो या जहांपरमनुप्योंके प्राणछूटेहों या जहांअत्यन्त विष्ठाादिकी संग- तिहुईहो इनतीन लक्षणोंवाली (अमेघ्या) चतुर्धासंस्कारोंसे किंतु अभी जो पंचधाकहे थे इनमें से एकदहनकहिये दाहको छोड़कर शेषचारौ संस्कारकरै तब शुद्धहोवै अ- मेध्याके चतुर्धा पंचधाका स्पष्टकथनहो चुका अब (दुष्टा) के विधाहेधाको स्पष्टकहते है कि जहां कुत्ता या सूअर या गर्दभ बहुत दिनोंबसेहों ऐसी दुष्ा)तो त्रेधा संस्कारों से किंतु गोक्रमण १ सेक २ उल्लेखन ३ इनतीनोंके करनेसे शुदहोतीहै और जहां परउंट अथवा आदि शब्दसे मुर्गाआदि और कोई साधारणजीव कुछदिनों वसाहो तो ऐसी(दुष्टा)द्वेधा संस्कारांसे किंतु सेक १और उल्नेखन२ इनदोहीसे शुदहोजाती है॥आगे(मलिना)शेपरही वह एकधा संस्कारसेही किंतु उल्लेखनकर्मसे शुधहोजा- तीहै । इसप्रकार पांचसंस्कार याज्ञवल्क्यजीके कहेहुये यथास्थान कामभाये पर उ- न्होंने सातकहेथे तिनसे मार्जन कहिये (झारना)और लेप)यह दोशेपरहे सोसर्वत्रका- मयावेंगे किंतु उनकहे हुये संस्कारोंके भी साथमें पीछेसे यहदीनों अधिक लगेरहते है अर्थात् इनके विनाकहीं काम नहीं चलता १८७॥ १ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । १४१ अब सिद्धान्न शुद्धिकहते हैं। । । गोमातेऽन्नेतथाकेशमक्षिकाकीटदूपिते । सलिलंभस्ममृदापिप्रक्षेप्तव्यविशुद्धये १८८ ॥ ऐ०-गऊके सूंघेहुये कितु खासमारे हुये अन्नमें-तथा बाल मक्खी कीट पिपीलि- कामादि इनसे दूपितहुये अन्नमें उसकीशुद्धिके लिये यथासंभव अवसर या उसन- नकी अपेक्षा अनुसारजल या भस्म जो अतिशुद्धपूजन आदि कर्मकी शेपहो या मृ- त्तिका जो निर्विकारहो सो किचित् प्रक्षेपकरंनीचाहिये-यहां पर अन्न जो संसिद्धहुआ भोजन योग्यहो तिसका चर्चा है और अन्नशब्दसे कोई वस्तु जो खाने योग्यहो तिस काभावहे और वालोंके निदर्शनसे ऊनवस्त्रादिकेभी रोमसंभवितहैं और सलिला- दिका यथासंभव यह अपेक्षितहै कि जिसवस्तुमै जलके पड़नेसे वस्तु बिगड़े नहीं उसमें तो मुख्य जल काही प्रक्षेप उचितहै जैसे दुही अादिमें और जो वस्तु जलके पड़ने से बिगड़ सकतीहो जैसे चूराआदि इनमें भस्म या मृत्तिका उपकल्पहै १८८॥ अधि०-गौतम ऋपिने यहकहाहे कि (नित्यमभोज्यंकेशकीटावपन्नम् ) अर्थात् जि समें केशआदि या मक्खी मकरी यादि कोई कीट पड़गयाहो वह अन्न नित्यं प्रति अभोज्यहै किन्तु कभी नहीं खानाचाहिये-सो उनके इसकथनके दोसिद्धांत हैं किए- क तो जिसके साथ मिलकर केशकीटादिभी रँधगयेहों या पकगयेहों उसअन्नकाप- रित्यागहीं उचितहै किंतु उसकी शुद्धि नहीं होसकती-दूसरे यह कि पकेहुये संसिद्ध अन्नमें जब केशकीटादि कुछपड़जावे या जुठार जावे तब उसमेंसे उतना अन्नभो. ज्यहै जितनेके निकासडालनेसे दृष्टिकी भ्राति या ग्लानि दूरहोजावे अर्थात् उतनेको निकासडालने पीछे संस्कारकरै जो जल मृत्तिका भस्मसे कहा, १८८।। अब सोना चांदीके सिवाय अन्य धातुओं और घृतादि रसोंकी शुदि कहते हैं। पुसीसकताम्राणांक्षाराम्लोदकवारिभिः । भस्माद्रि कांस्यलोहानांशुद्धि प्लायोद्रवस्यतु १८९॥ ऐ०-(पु)कहिये रांग और जस्ता अर्थात् यसद-(सीसके,सीसा-तांबा और तांबे के उपलक्षण से पीतल भी इन सबोंकी शुद्धि क्षारोदक और अम्लोदक और केवल उदक से भी यथा संभव दोप विकारकी अपेक्षा अनुसार सबसे या एकहीदो उदकों से होतीहै-कांसा और लोहाइन्हों की शुद्धि भस्मोदक अर्थात् भस्म और उदकमिले हुये अथवा भिन्न २ से भी होती है औरद्रवस्य नाम द्रव द्रव्यस्य अर्थात् पिघलेहुये' बहते द्रव्य जो घृत सहत आदि अनेक प्रसिद्ध हैं उनकी शुद्धि (शव) कर्मसे होती है प्लावकहतेहैं बह चलनेको अर्थात् जिसपात्रमें रक्खेहुये घृतादि किसी द्रव्यको किसी प्रकार का अशुदि दोपलगैतो उसीपात्रमै वहाँवस्तु अधिकमँगाकर ऊपरतक भरता चला यावे यहांतक कि वह उमड़कर पात्र के मुखमें से बहनेलगे तब उसमें मिल - १४२ मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । कर वहभी शुद्धहोजायगा-अन्यथा जहां यह वात असभवहो तहां नीचे अधिकोक्ति में लिखाहुअा मनुजी का प्रकार करै १८९॥ अधिः--मनुजी का वाक्य-यथा(द्रवाणांचैवसापांशुदिउत्पयनस्मृतम्)अर्थात्-स- वही द्रवरूप वस्तुओं की शुद्धि (उत्पवन) कर्म कहा है-वस्त्रसे छानडालने को उत्पवन कहते हैं-इसके सिवाय जो वस्तु किसी प्रकार से दूपित नहीं है पर शूद्रजातिकेपान में रक्खीआईहै जैसे गांडेका रस सहत धी दूध आदि कोई द्रवरूप द्रव्य हो तो वह वौधायन ऋषि के वाक्य अनुसार अपने घरके शुद्धपात्रमें भरलेने से पवित्र होजा- ताहै-इसके सिवाय शंखजी के वाक्य अनुसार उनवस्तुओं की शुद्धि (पुन पचन) कर्म करने से होती है जो घृत के अनुरूप वस्तु हो और अधमजातिके हाथसे आई हो- घृत के अनुरूप कहने का यही सिद्धांत है कि जो वस्तु आगपर औटाने योग्य हो जैसा घी तेल दूध सहत रस आदि किंतु दही मट्ठा आदि नहीं क्योंकि ये अग्निपर नहीं धरेजासक्त-भेद २-इसी १८९ श्लोकके अनंतरोक्त ऐक्यार्थमें क्षारोदक अम्लो- दक से जो तामादिकों की शुद्धिकहीहै सो कुछ नित्य शुद्धिका विषय नहीं है और (यहभी) नियम नहींहै कि क्षारोदक अम्लोदकसे सिवाय और किसी वस्तुसे नशुद्धि करीजाय क्योंकि (नित्यशुद्धि)का विषय तौ १८१ के श्लोक में ऊर्ध्व पात्र शब्द से सर्व धातुओं का दर्शाय चुके हैं अर्थात् यहां पर क्षारोदक आदि से अति कालांतर शुद्धि कहीहै कि जिन पात्रोमें अतिकाल वितीत होनेसे काई आदि जटिजावै तिनकीशुद्धि क्षारोदक अम्लोदकसे करै-सोई मनुजीने भी यहकहा है कि(ताम्राय कांस्यरेत्यानांत्रप गःसीसकस्यच।शौचयथार्हकर्त्तव्यंक्षाराम्लोदकवारिभिः) अर्थात्-ताँवा लोहा कांसा पीतल इनकेपात्रों वारांगके पात्रोंवा सीसेके पात्रोंका शौचकर्म किंतु परिशोधन करना सोक्षारोदकसे अम्लोदकसे और केवलवारिनाम जलसे भी यथाहकर्तव्यहै अर्थात् जैसीयोग्यतादेखे तैसाही उसमलके अनुसार शोधनकरै-किंतु जोऔरही किसीवस्तुसे होसकताहो तो इनचीजोंकीभी कुछ आवश्यकता नहीं है-या-जबकभी विशेषदोपकी संभावनाहो तबकईचीजोंसे बारम्बारशोधनकरै-सोई यहवाक्यमी प्रमाणहै कि (गवा घ्रातानिकांस्यानिशूद्रोच्छिष्टानियानिच । शुद्धयन्तिदशभिःक्षारैःश्वकाकोपहतानिच) अर्थात्-गऊकेतूंघे चाटेया शूद्रकेजूठेकिये याकौवा कुत्ताआदिके बिगाडेहुयेप्सेकांस्य पात्र क्षारोंसे दशवारशोधेजाकरशुद्धहोतेहैं-किंतु यह भावनहीं है कि दशप्रकारके क्षार इकटेकरके शोधै-हां-जोकुछ दोचार अम्लोदकक्षारोदक आदि वस्तुमिलजा तिनसे दशवार शोधनकर यह भावार्थहै-और जोकि यहां पर केवल कांस्यकाचर्चा कियाहै सो भीयथार्थमें निदर्शनमार्गहे अर्थात् उसकासिद्धांत समीपर आरूढहै क्योंकिकाँसा तावे औरराँग इनदोनोंसेवनताहै फिर उसीतांवेमें जसदकायोग होनेसे पीतल वनतीहै इस मिताक्षरा स० आचाराध्याय १४३ हेतु काँसाकहनेसे सवागये क्योंकि इनके परस्पर संवन्ध मिलरहे हैं और जोकि यह वाक्यस्मृतियों में प्रसिदहेकि(भस्मनाशुद्धयतेकांस्यंताघमम्लनशुवति) अर्थात्-भ- स्मसे कांसाशुद्धहोताहे-और खटाईसे तांबा शुद्धहोताहै-इस वाक्यसे यद्यपि भिन्न २ विशेषता पाईगई परन्तु यह विशेषता कुछ इसलिये नहींहै कि इनकेसिवाय औरकिसी वस्तुसे न शोधैकिंतु यह परमदशा दर्शाई है कि जब कांसा या तांबा किसीऔरवस्तुसेन साफ होसक्ता हो उस अवस्थामें यह दोनों वस्तु भिन्न २ इनकी निर्मलतामें उस्ताद हैं और यह भी नियमनहीं है यह पंक्तिजो ऊपरलिखचुके हैं तिसका साधारण शुद्धि वाक्यसे यह श्राशय है कि(मलसंयोगजंतज्जयस्ययेनोपहन्यते। तस्यतच्छोधनप्रोक्तं सामान्यद्रव्यशुद्धिकृत) अर्थात्-जिस किसी वस्तुमें ऊपर से लगेहुये किसीमलसेजो कुछ दोप लांछनदाग उत्पन्नभया हो जैसे वस्त्रादिकों में तेल आदिका चिह्न जमजा- ताहै यहा उसी वस्तुमें से कुछ विकार उत्पन्नभया हो जैसे मोर्चा काई आदिपात्र या शस्त्रादिकोंमें जमती है इसभांतिके दोपजहां२ जिस२ वस्तुके लगाने या जिस किसी उपायके करनेसेदूरहो सकतेहों तहां उनवस्तुओंकाशोधन उन्हीं प्रकारोंसेकरै अर्थात् निर्विघुता से कार्य की सिद्धि करलेना यही मुख्य सिद्धांत है सो यह सभी प्रकारके द्रव्यों काशोधन प्रकार सामान्यभावसे कहा है-इसमर्यादकी अपेक्षाउस नियमकीभी दृढ़ता नहीं रही कि केवल क्षारोदक या अम्लोदक सेही धोवै तब शुदि हो-हां यह सिद्धांत है कि जब और किसीउपायसे शुद्ध नहीं होसक्ता हो तव क्षारोदक या अम्लोदक में आलिप्तकरके रख छोड़ें कुछ काल पीछे जलसे शुद्धकरलेवे तो शीघ्र मलछुटजायगा यह परमदशावतलाई है-इसीलिये बौधायन ऋपि का यह वाक्य * सर्वोपरि प्रमाण है कि (देशंकालंतथात्मानंद्रव्यंद्रव्यप्रयोजनम् । उपपत्तिमवस्थांच ज्ञात्वाशौचंप्रकल्पयेत्) अर्थात्-जब किसी वस्तुका परिशोधनकरने की आवश्यकता आनिपरे तहां प्रथमतौ-देश १ काल २ आत्मा ३व्य ४ व्यकाप्रयोजन ५ उपपत्ति कहियेसिद्धान्त ६ अवस्था कहिये दशा ७ इनसातोंको जानिकरकिंतु विधिपूर्वकइनका निर्णयकरके तवउसद्व्यका शौचकर्म आरम्भकरे-किंतु द्रव्यशुद्धिक विषयमें सर्वत्र या सर्वदा कुछलिखेहुये नियमपरभी यारूढ़तानहीं होसकती क्योंकि किसीदेशमें या किसीकालमै या किसी अवसरपर कोईवस्तु ऐसीहै कि वह मिलही नहीं सकती या मिलसकतीहै परउसदेश अथवा कालसे विरुदहै या उसद्रव्यकी अवस्थासे विरुद्धहै इत्यादि अनेकसंकेत ऐसेहैं जिनके अनुसार कोई आग्रहकरने लगे कि अमुक हेतुसे अमुकद्रव्यकी शुदिनही होसकती अवइसका त्याग करना उचितहे सो नहीं इससे योधायनजीने संदेहदरकियाहै कि जैसादेश अर्थात् जैसीजगहपर वहकामहे तैसाही विचारकरै १ या जैसाकाल अर्थात् ऋतु अथवा वर्तमान समयका अवसरसंयोग२ मिताक्षरा सः आचाराध्याय। यात्रामा कहिये:शरीर यहामनवुद्धिसो किसकी किजिसको उसव्यसेसंबंधहोतिस- के अनुरूपविचारकरैः३.या व्यजिसका शोधनकरना अपेक्षितहै उसकेअनुरूपक्रि- याकर.४,यादव्यका प्रयोजन कि इस द्रव्यसे यह प्रयोजन आगेकोपरैगा या वर्तमान हैउसकेअनुरूपकासकरै याउपपत्तिकिंतुसिद्धान्तइनसेभीलक्षणोंका साकुलसंभवित हो उसको भी शोचे ६ या अवस्था कहिये.दशा किंतु जैसीदशामें परिशोधनकी श्रा- वश्यकताहुईहो उसके अनुरूप शोधनकर(दृष्टांत)जैसे एकदशा तौ ऐसे अवकाशकी है कि चाहे दशदिनों तकशोधनकरतेरहो कुछहानि नहीं है और एकंदशा ऐसीहै कि तत्काल उसवस्तुसे आवश्यकताहै: फिर अवस्था शब्द वयसकामी वाचकहै अर्थात् जैसी उमिर उसवस्तुकीहो उसके अनुसार शोधनकर, (दृष्टांत)जैसे एक दुशालामें तै- लादिस्नेहकागहिरा दागपड़गया जो विशेष परिशोधनसे छूटसकताहै परन्तु वहदु- शाला ऐसाजीर्ण अवस्थाहै कि विशेष मर्दनसे झड़जायगा तो ऐसी अवस्थामें थो- ड्राही शोधनकरना:थोड़ादाग-शेपरहजायगा तो चिंतानहीं परजो कदाचित् वहदाग दीप शेप तैलसे पड़ाहो जिसमें अनेक पतंग भस्महुयेथे और वहदुशाला ठेठकरपू- जनके समय परिनियमित कामाताहै तो उसजीर्ण अवस्थामें भी अधिक शोधन करना उचितहै इत्यादि लक्षधाभेद अपनी बुद्धिसे विचारलेने तब उसकाम का आ- रंभकरना-इसप्रकरणमें जहां तहां कहीं क्षार और कहीं भस्मका.चर्चा बहुधा आयाहै यद्यपि क्षारभस्मकोभी कहतेहैं परन्तु यहां उसमें भेदहै किंतु भस्मसे तोराखसमझ- नी और क्षार शब्दसे उचित खारोंका भावार्थ है जैसे रेहखार चूनाखार सज्जीखार आदि जहां पर जिसवस्तुके लिये जिस२ खारकी योग्यता लोकमें प्रसिद्धहो सोसम- झलेना १८९॥ यहां ताई. १८१ से लेकर १८९ तक नौश्लोकोंसे जो शुद्धि विषय बर्णन किया सो सवसोना चांदी-रत्नतामादि धातु पत्थर काष्ठ वस्त्र शस्त्रादि अन्नादि वस्तुत्योंके परिशोधन मध्ये चांडालादिस्पर्श और मलके संयोग और स्नेह उच्छि- पादिके लेप और अमेध्यादिकी, उपघात:दशाओंपर आरूढथा अबभागे जो.१९० से प्रारंभकरते हैं वहशुद्धि-विपय मनुष्यके शरीरों पर प्रारूढहै किंतु शरीरोंसे अमे- ध्यका स्पर्श यहा लेपहोने पर शुद्धिका प्रकारकहतेहैं पर इसकोभी शरीरोंके उपलक्षण से.पूर्वक्तिवस्त्र शस्त्रादि पात्रादि द्रव्योंपर यथा संभव संबंधित करलेना यहसिद्धान्तहै। 5. अमेध्यातस्यमृत्तायै शुद्धिगधादिकर्षणात् । वाकशास्तमंचुनिर्णिक्तमज्ञातंचप्सदाशुचि १८०॥ मक्ष-अमेध्याक्तकी शुद्धि,मट्टी जलोंकरके गंधादि.अपकर्षणसे-वाक्शस्तभीशु- चिहोताहे-अंनिर्णितभी शुचिहोवे-और-अज्ञातसदाही शुचिहोताहे-१९०॥ -भभि अमेध्यात कहिये अमेध्यलिप्त शरीर या जिनका.चर्चापहले ९ श्लोकोंमें होचुका है उन्हीं से कोई द्रव्य अमेध्यमलसे: लिपजावे तिसकी शुदि मट्टी और । मिताक्षरा स० आचाराध्याय । १४५ से बारम्बार यहां तक मंजन करने से होती है कि जबतक उसमें से गंधादि अर्थात् दुर्गधि और दाग चिट्ट मिटजावें-वाक्शस्तसे भी शुद्धिहोती है अर्थात् यथोक्त रीतों से शौचकरने परभी मनकभ्रिांति नहीं जावै तब ब्राह्मणादि शस्तवाक्योंसे शुद्धिहो- तीहै यथा (एतत्शुद्दमस्तु)- इत्यादि ब्राह्मण वाक्यसहित जलका छींटालगनेसे यहा (अपवित्रःपवित्रोवा)-इत्यादि वेद मंत्रोंसहित जलका छींटालगनेसे मनकीभ्रांतिभीदू- रहोजातीहै तिसको (वाक्शस्त) कहते हैं-अन्यथा अंवनिर्णितं अर्थात् जिनदशाओं की शुद्धिशास्त्रोक्त नहीं पाई जावै तहाँभी जलसे धोडालना कहाहै या जहां परधोडा- लनाभी असंभवहो तहां केवल जलकेछींटाओंसे शुद्धिहोवैगी-और अज्ञातदोप स- दाही शुचिहोताहै अर्थात् जो कोईसी मलीनता देखने यहा सुननेमेंभी नहीं आईहो उसमें दोप नहीं है १९०॥ अधिः-प्राणियों के शरीरसे उत्पन्नहुये १२ मलप्रसिद्धहें वेही अमेध्य कहिये अ- पविवकहलातेहैं तथाच(वसाशुक्रमसृङ्मज्जामूत्रविटकर्णविड्नखाः । श्लेप्माश्रुपि कास्वेदोहादशैतेनणांमलाः) अर्थात्-वसाकहिये मेदा जो बसके नामसे प्रसिद्ध है। शुक्र वीर्यको कहतेहैं२ असृक् रक्त३ मज्जा जोहाड़की पोंगमेंसे मींगनिकलतीहै कुछ गीली कुछसूखी यह उसका स्वरूपहे ४ मूत्र ५ विट् विष्ठाद कर्णविट कानकामेल ७ नख ८ श्लेष्म कफ खखारादि ९ अश्रु आँशू १० दूपिकाकीचर गीड़नेत्रमल ११ स्वेद पसीना १२ यह बारहमल मनुप्योंके कहे परसभी जीवोंका उपलक्षणहै-इनके साथ मद्यभीअमेध्यमेंगिनतीहै सोईकहाहै कि(मानुपास्थिशवंविष्ठारेतोमूत्रातवंवसा। स्वेदोश्रुदपिकाश्लेप्ममद्यंचामध्यसुच्यते)अर्थात-मनुप्यकाहाड़-शवंमृतक-विष्ठा-रेतः शुक्र वीर्य-मूत्र-आर्तवं रजोदर्शनकारत-वसा-बस-स्वेदपसीना-अश्रु आँशू-दूपिका ने- त्रमलश्लेप्मबखार-मद्यंच मदिराभी यहइतने अमेध्यकहेजातेह-ऐसेमनु और देवल आदि सबनेकहाहे और मनुष्य यह एकनिदर्शनहै किंतु सभीजीवोंकेसमझने पर जव तक शरीरमै लगेरहें तबतक (भमध्य)नहीं किंतु शरीरसे छूटजाने पर अमेध्य होतेहैं जैसे अंगुलीमेंसे नखकाट डालागया तव अशुद्धहया-इनकहेहुये अमेध्यमलोंसे जो वस्तु या अपना शरीरहीलिप्तहो जावै तिसको (अमेध्याक्त)कहतेहैं-अमेध्यातकी शुद्धि जैसे याज्ञवल्क्यजीने मट्टी और जलसे कही तैसेही गौतमजीनेभी यहकहाहै कि(ले- पगंधापकपणेःशौचममेध्यलिप्तस्य)अर्थात् अमेध्यलिप्तकाशीचलेप और गंधकेअप- कर्पणकरनेके उपायोंसे करे तहां वे उपायभी मही और जलसेही संभवितहें (यथा-सर्व शुद्धिपचप्रथममृत्तायेरेवलेपगंधापकर्षणकार्य) अर्थात्-सभीविषयी शुद्धियोंमें पह- लेमही और जलोंसेही लेप और दुर्गधिकोदूरकरे जब इनमे न होसके तब और कि- सी उपायसे जल मट्टी सहित-परन्तुकेवल नखके स्पर्शसे स्नान या मृत्तिकासे मंजन मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । की आवश्यकता नहीं शेपमलोंके स्पर्शमें स्नान और लेपहोजानेपर मृत्तिकासे मंज- नकरै-सोई कहाहै कि-पुरुपस्यनाभेरूकरव्यतिरिक्तांगानामन्यामध्यस्पर्शस्नानम्- अर्थात्-हाथका मलकहिये नखतिसको छोड़कर अन्य अंगोंके अमेध्यमल पुरुपकेना- भिसे ऊपर किसी शरीर स्थलमें लगजायें तबस्नान करे-यह स्नानपूर्वोक्त मट्टी जल , से माँजेपीछे समुझना-और नखको छोड़करकहनेका यहभावहै कि नखके स्पर्शमें केव- लउतने अंगकेप्रक्षालनकरनेसेही शुद्धिहोजातीहै-औरनाभिसे ऊपरकहनेका यहचा- शयह कि नाभिसे नीचे किसी यंगस्थलमें जो स्पर्शहोवे तो केवल उतने अंगका प्र- क्षालनकरनेसेही शुद्धि होजातीहै इसी श्लोकाईका दूसरा अर्थ यहभीहै कि-पुरुपके नाभिसे ऊपरके सब अंग (करव्यतिरिक्त) अर्थात् हाथको छोड़कर ऊपरके और किसी अंगमें जव(अमेध्य) मलकालेप या स्पर्श होजावै तवस्नानकरै किंतु जो हाथहीमें मल कास्पर्श होजावै तो हाथके माँजने धोनेसेही शुद्धिहोजायगी-सोई इसअर्थकी दृढ़ता में यह वाक्यभी प्रमाणहै कि(ऊर्चनाभेःकरीमुक्तायदंगमुपहन्यते। तत्रस्नानमधस्तात्तु प्रक्षाल्याचम्यशुद्धयति)अर्थात-नाभिके ऊपरले अंगोंमें हाथोंको छोड़कर और कोई अंग जो दृपितहो जावै तब उसके धोने माँजने पीछे स्नानभीकरै और नाभिसे नि- चले अंगोंमें कहीं मलका (स्पर्श होजावै तव उतनेअंगकोधोकर और आचमना- दिकरके शुद्धहोजाताहे-आचमन आदि पवित्रीकरण क्रियाओंकी योजना सर्वत्र समुभलेनी जहां नहीं भी कहीहो-परन्तु इस अर्थसे और अर्थकी अनंतरोक्त दृढ़ता के प्रमाणसे भी वह पहला अर्थ असंगतहा जाताहै जिसमें नखोंका चर्चाऊपर आयाथा-तथापि वह असंगत नहीं किंतु दोनों अर्थ यथार्थ हैं क्योंकि वहांपर नसों के स्पर्शमें स्नानकी आवश्यकता नहीं पाई गईथी सो प्रथम तौ प्रत्यक्षभावमेंभी न- खऐसा महामलीन नहींहोता जिसकालेप शरीरमें होसके जिस्सेस्नानकी आवश्य- कतापाईजाय दूसरे यह प्रमाण है कि-देवल पिने स्नानकी अावश्यकताके साथ में नखोंकानामतकनहीं लिखा (तथाचदेवलः-मानुपास्थिवसाविष्ठामार्तवंमूत्ररेतसी।म- ज्जानंशोणितस्प्टष्टापरस्परस्नानमाचरेत्॥तान्येवस्वानिसंस्टश्यप्रक्षाल्याचम्यशुद्धध- ति) अर्थात् मनुष्यकाहाड़-घसा-विष्ठा-पातवरजोरक्त-मूत्र-वीर्य-मज्जा-शोपितरक्त- यह पराये शरीरसे उत्पन्नहुयेहांती इन्हें कर स्नानकरै-और येही जो अपने शरीरसे उत्पन्नहुयेहों तो इन्हेंछकरधोने और आचमनकरनेसेही शुद्धहोजाताहै किंतु स्नानकी आवश्यकता नहीं-अव ध्यानकरना चाहिये कि मल वस्तु औरभी कईशेपहें परयहां उन्हींका चर्चा कियाहै जिनसे स्नानोंकी आवश्यकता थी इसलिये नखोंकाभी चर्चा इनमें नहीं पाया सोई उसपहले अर्थका भावथा-यहांभी यद्यपि मनुप्यकेनामसे हा- आदि कहेहैं परन्तु वसाके उपलक्षणसे सभी जीवोंका भावार्थ समुझलेना क्योंकि मिताक्षरा स० पाचाराध्याय । वसामनुप्यके शरीरमें यद्यपिहोतीहै पर उसका स्पर्शके लिये मिलना या होना असं- गतहै-और यह बात जो अक्षरार्थ यहा अभिप्रायार्थमें कहीथी कि (अज्ञात का दोप नहीं है-पुनि-प्रायश्चित्त विषयमें यहभीकहा है कि (संवत्सरस्यैकमपिचरेत्कृच्छंद्विजो- त्तमः।अज्ञातभुक्तशुद्ध्यर्थज्ञातस्यतुविशेपतः) अर्थात्-द्विजातीमात्र में जो कोई अपने कोजातित्वसे यहा आचारसे उत्तम समुभाकरताहो या औरोंकेनिकट उत्तम समुझा जाताहो वह द्विजोत्तम होताहै ऐसे द्विजोत्तमको यह उचितहे कि वह अज्ञातभुक्तशु- दिके लिये संवत्सरमें एकवार तो अवश्यही कृच्छ्रचांद्रायणनामका व्रतकर डालाकरे और जानेहुये दोपका प्रायश्चित्त विशेष लक्षणसे किंतु जैसी उसकीविधि जहांकहीं लिखीहो तिसके अनुसारकरै-अज्ञातभुक्तशुद्धि यह कि विनाजाने किसीके हाथसेद- पित अन्नखायाहो तिसकी शुद्धिसंवत्सरके अंतमें एकवार चांद्रायण करनेसे होजाती है फिरचाहे कुछखायाहो या न खायाहो पर केवल अपने शरीरके तेजोवलबुद्धिा- दिकी उन्नतिके हेतुसे मनकी भ्रांति दूरकरदेवे-इसवाक्यसे उसमें यह विरोधदृष्टि श्रा- ताहै कि यहां तो अज्ञातकाभी प्रायश्चित्त कहा और वे कहतेहैं कि अज्ञातका दोप नहीं वह सदाही शुचिहोताहै-परन्तु यहविरोधदृष्टि स्थाहै अर्थात् विरोधकिंचित्भी नहीं है क्योंकि यह प्रायश्चित्तकेवल अज्ञातभुक्त विषय पर कहाहै किंतु इसमें खाने पीनेका चर्चा है और वहवात केवल अमेध्यलिप्तके ऊपर कहींहै किंतु उसमें शरीर शुद्धिका चर्चाहे तिसके लिये यह कहाहै कि विनाजाने कोई अमेध्य मल शरीरमें छूजावै या शरीरके उपलक्षणसे औरही किसी वस्त्र या पात्रादिक द्रव्यमें छूजावै तो सका दोप नहीं है १९ ॥ गोतृप्तिकत्तीयप्रतिस्थमहगितम् । तथामांसश्चचांडालक्रव्यादादिनिपातितम् १९१ ऐन्गोप्तिकृत्-अर्थात् एक गऊ जिसकेपीने से छकजावै इतनाजल जंगलकी पृथ्वी में पड़ाहुआ अर्थात् किसी निर्मल निम्न स्थानमें भराहुआ शुचि होताहै किंतु उसमेंसे आवश्यकदशा पर आचमन आदिकरलेना दोपनहींहै पर उसदशामें किवह जल प्रकृतिस्थहो अर्थात् ज्योंकात्यों बनरहाहो किंतु नतो उसका रूप बिगड़ा हो न रसमें अंतरहुआ हो न दुर्गंधिपानेलगीहो न उसमें कोई गुदाश्रादि प्रक्षालनकरताहो औरन उसकेनिकट चांडालोंका संसर्गहो-तैसेही श्वान चांडाल व्याद आदि इन्होंसे निपातित मांस भी शुचि होताहै अर्थात् मांसके अाहारी लोगों के लियेजो २ मांस खाने योग्य पहले कहचुके हैं उन्हीं में से कोई जीव ऐसाहो जिसको कुत्ताने मारगि- रायाजैसे विरले मांसभक्षीकुत्तासे श्राखेटकरवाते हैं सो वह उनके निकट शुद्धमें गि- नती है पर जो कुत्ताने उसमें से कुछखाया भी हो तो अशुद्ध है-एवं चांडालने मारा हो पर उसमें से खायानहीं तो शुद्ध में गिनती है एवंक्रव्याद कहिये मांसभक्षीपक्षी १४८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। तिसका माराहुया जैसे श्यन किंतु वाजका गिराया हुश्रा जो वाज ने खाया नहीं हो तो पवित्र में गिनती है ऐसेही आदि शब्द से और भी पुल्कस आदि जातोंके हाथ का माराहुअा समुझलेना १९१ ॥ अधि०-गोप्तिमात्रजल जोकहा सोयह परमन्यूनतर मानवतत्नायाहै किंतु इस्से अधिक जितनाहो उतना अधिक पवित्र है पर इस्से कमतीनहीं और यहमर्याद उस में नहीं जो नदी या कूपादिमेंसे भराहुआ आता है किंतु उसके लिये दिवल)जीने यह मर्याद कहीहै कि(उद्धताश्चापिशुद्धयंतिशुद्धैःपात्रैःसमुद्धृताः एकरात्रोपिताबापस्त्या ज्या शुद्धाअपिस्वयम्)अर्थात्-भरेहुये जलभी शुद्धहोतेहैं जो शुद्ध पात्रोंसे भरलिये जावे किंतु जवकहीं दूरसे भराहुश्रा जल मँगायागया और मार्गमें अधमादि जातों का स्पर्श होजानेकी संभावनाप्रवलहै तवउसजलको मॅजेधुये अन्यपात्रोंमें बदलकर भरलेवे तौवहभी शुद्धहोजाता है-और एकरातिका वसाहुया जलचाहै आपसेश्राप वह शुद्धभीहो पर दूसरे दिवस उसका त्याग करदेना उचितहे-और चांडालआदिके बनायेहुये जलाशयों मध्ये शातातपऋपिने यहकहाहे कि(अंत्यैरपिकृतेकृपेसेतीवाप्या- दिकेतथा। तत्रस्नात्याचपत्विाचप्रायश्चित्तंन विद्यते)अर्थात्-चांडालों करकेभी बनाये हुयेकूपमैयासेतुमैतथावावड़ी आदिमें भी स्नानकरके और पीकरभी प्रायश्चित्त नहीं पहुँचताहै अर्थात् प्रायश्चित्तकरने की आवश्यकता नहीं-परयह दोपकाअभावकेवल उनकेवनायेहुये पर कहा है किंतु जिसजलाशय परचांडालोंका संघातरहताहो चाहे वह उत्तमजातिका बनायाहो पर उसमें स्नान अथवा पानसे प्रायश्चित्तकी आवश्यकता प्रत्यक्षहै-मांसपक्षमें जो कुछकहा वह संदेहका स्थल नहीं है क्योंकि धर्मशास्त्र संसा- र और समयकी रीति अनुसार चलताहै यद्यपि मांसके प्रकरणमै अत्यंतमी नाभी लिखचुकेथे परन्तु मांसभक्षीलोग मुँहदेखतेसे रहजाते इसलिये यहां पर न कर उनकाभी मान रखदियागया यहांतक कि कुत्ता और कौवा और चांडाल श्रादिभी उनके सहायक उनकी पारामके लिये बतलादिये क्योंकि धर्मशास्त्रके हृदयमें यहद- याभाव और कोमलता प्रविष्ट है कि वह किसीका अपमान नहीं करसकता और न किसीको दुःख देसकता है किंतु उसकी प्रतिज्ञा यहीहै कि में संसारका दुःख दूरकरूं और जो कोई मेरा आदरकरै उसकानिरादर में कभी नहीं होने, १६१॥ रश्मिरम्नीरजरछापागौरश्वोवस्तुधानिलः । विघुपोमक्षिकास्पर्शवत्सःप्रस्रवनेशुचिः १९२॥ ऐ०-(रश्मिः)अर्थात्सर्यादिप्रकाशमानअन्यवस्तुओंकीभीकिरण-(अग्नि)जोचिता आदिकीनहो-(रज)धूलिजो उड़कर आयाकरताहे-(छाया)जो रक्षआदिकी शीतला- वश्यकहो-गऊ-घोड़ा-(वसुधा)धरती जोपड़ीहुई निर्लेप जंगलकी-(मनिल)वाय-(विषुपः) अर्थात् प्रोसकेयूँद जो अतिमलीनवस्तुपर नहीं-यहसब कहीहुईचीजें यद्यपिचांडाल * मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। १४९ 'आदिनेभी छुईही तौभीशुद्धहें किंतु उनकी छुईहुई फिर अपनेको छूनीपड़ें तोदोपनहीं- ऐसेही मक्खी यद्यपि मलीनबस्तुपरभी बैठातीहै परउसकेळूजाने या अपने ऊपर बैठ जानेका दोपनहीं-सेही बछरा(प्रश्नवन)कर्म किंतु दूधउतारनेमें पवित्र है अर्थात् वाख मेंभरेहये दूधके उतारनेमें बछराकीलार जोधमै मिलजातीहैतिसकादोपनहीं१६२॥ अधि०-(रज)धलिभी यद्यपि पवित्रकहीहैतथापिजोरधूलें निषेधकरी, तिनकाविवेक उचितहे-तथाच(श्वकाकोष्ट्रखरोलूकशकरग्राम्यपक्षिणामाग्रजाविरेणुसंस्पर्शादायल क्ष्मीश्चहीयते)अर्थात्-कुत्ताके देहमें की धूलि कौवाके परोंमें की-ऊंटकेदेहकी-गर्दभके शरीरकी-उलूक उल्लूनाम पक्षीके परों मेंकी-सुअरके शरीरकी-ग्राम्यपक्षी मुर्गा आदि तिनके देहकी-बकरी और भेड़के शरीरकी इतनी धूलोंके स्पर्शमात्रसे आयु और लक्ष्मीभी कमहोतीहै किंतु घटती जातीहै इसलिये उनका वचावकरना उचितहै पर "ऐसाबचाव नहीं करना जिस्से किसीसमय किसी कार्यमें हानि प्रकटहो १९२।। अजाश्चयोर्मुखमेध्यनगोर्ननरजामलाः । पंथानश्चविशुयंतिसोमसूर्यांशुमारुतैः १९३ ॥ ऐ०-अजावकरी-अश्वघोड़ा इन दोनोंका मुखपवित्र है-परन्तु नगो-किंतु गऊका मुखपवित्र नहीं है ननरजामला अर्थात् नरदेहसे उत्पन्नहुये मल पवित्र नहीं है और पंथाशुद्धहोते, सोमांशु १ सूर्यांशु.२ मारुत ३ इनतीनोंसे अर्थात् चांडाल आदिम्- लीनोंसे छुयेहुये किंतु चलेहुये मार्ग रास्ते यहरात्रिमें चन्द्रमाकी किरणों और वायुके स्पर्श मात्रसे आपही शुद्धहोजातेहें और दिनमें सूर्यकी किरणों तथा वायुके लगनेसे विशुद्धहोते रहतेहैं इसलिये उनका दोप नहीं अर्थात् उनपर कोईचलो १९३॥ । अधि०-मागीके शुद्धहोजानेका रूपक दृष्टांत सहित जैसे किसीवस्ती या बाजारके मार्गमें किसी मरेहुये पशु अथवा कुत्तासादिको चांडाल घसीटकरलेगये तो प्रत्यक्ष लोक-दृष्टिसे वह मार्ग अशुद्ध समझागया तहां जोतात्कालिक अवश्यचलने फिरने वाले साधारण बाजारू लोगहें उनकेलिये तोतत्काल उसकीशुदिकार्यकी आवश्यक- ता अनुसार संभवितहे क्योंकि सूर्यका प्रकाश और वायुका संचार तौसर्वत्रहोहीरहा है या जो रातिहै तो चन्द्रमाका प्रकाश अथवा वायु और चन्द्रमाके उपलक्षणसे उस के अभावमें तारागणभी अंगीकार, अथवा जो कोई (स्नातक ) वा (विवेकी) है उसके लिये इतने कालमें शुद्धिहोवेगी कि जब कोई और साधारण मनुष्य यहां गऊयादि पुनीत जीव पहले उसदूपित मार्ग परचला जावै तव उसके मनकभ्रिांति दूरहोवेगी अन्यथा जहां किसी नरसमूहको (टाकुर) का विमान किसी उत्सवसे याविवाहको उद्यत हुये (वर) का विमान लेजानेकी आवश्यकता है और सिवाय उसदूपित मार्गके कोई और मार्गभी ऐसा नहीं कि उसेछोड़ वहांको लेजावें और मनकीभ्रांति लोकदृष्टिसे दूरनहीं होतीहे तहां एक याम काल यहा चार घटिकाके अनुमान या दोही घटिका - मिताक्षरा स० आचाराध्याय। के परिमाण ताई सूर्यको किरणों और वायुके संघातसे वह दूपितमार्ग शुद्ध होजावे- गा-यहां पर विलंबकालकी अधिकता वा न्यूनताको वायुकी मंदता और प्रबलताके अनुसार यथाक्रमसे जानलेना क्योंकि उस्से वहदूपित धूल उड़जाती है जहां जिस कालमें वायु नहींहोवे और सूर्यमें किरणें भी बादलके प्रभावसे न होवें तहां उसदू- पित पंथा पर एक सहस्रादमियों के निकलनेसे परम शुद्धिहोजाती है इसमेंभीका- येकी गुरुता लघुताके अनुरूप थोडेभी मनुष्योंके निकलनेसे शुद्धिहोजाती है-लिस कालमें वर्षाभीहोरहीहो तहां कोईसाविवेक आवश्यक नहीं है क्योंकि वहदैवीगतिसे आपसे आप शुद्धिहोरही है १९३ ॥ .' मुखजाविषुपोमध्यास्तथाऽचमनविंदवः । श्मश्रुचास्यगतदंतसक्तत्यक्ताततःशुचिः १९४॥ ऐ मुखजा मुखसे उत्पन्नहुये विग्रुपकहिये लारकेबदमेध्यहें अर्थात् -अशुद्ध-नहीं पर उसी अवस्थातक जो मुखमें बनेरहें किंतु देहपर गिरनेसे अशुद्धहें तथा आचम- नबिंदु किंतुकुलाकरते हुये जो छोटे उड़कर पैरोंपर गिरतेहैं वे भी अशुद्ध नहीं तथा श्मश्रुकहिये डाढ़ी मछके बाल वेभी प्रास्यगत मेध्य अर्थात् मुखमें प्रवेशहुयेअशु- छ नहीं कहलाते-तथा दंतसक्तं जो दांतमें लगीहुई अन्नादि वस्तु वह जवतक दांत 'में लगीरहे तवतक मेध्यहै पर जव छुड़ाई जावै या आपही छूटपरेतब अमेध्यहोजा- तीहै अर्थात् छूटपरे पीछे उसका त्यागकरै तव आचमनकरिके शुद्धहोवै १९४॥ अधि०-मुखविप्रपों के मध्ये गौतमजीका वाक्यन्यथा-नमुखेविनुपउच्छिष्टंकुतिन चेदंगेनिपतति-अर्थात्-मुखमैविप्रप रहतेहुये अशुद्ध नहीं करतपर जो अंगपर गिरने नहीं पायें-दांतमें लगाहुआ अन्न जब तक दांत में लगारहे तबतक दांत के समान गिनाजाकर अशुद्ध नहीं समुझाजाता-इसके मध्ये गौतमजीने यह कहा है कि-दंत 'श्लिष्टंतुदंतवदन्यत्रजिहाभिमर्शनात्माच्युतेरित्येके-अर्थात्-दांत में लगीहुआ दांत 'के तुल्य हे पर जिहाभिमर्शनसे अलहद किंतु जब तक उसमें जीभकी नोक नहींल- 'गाई जाय और कोई यह कहते हैं कि गिरनेसे पहले किंतु जब तक दांत में से न छूटे तबतक दांतके समान गिना जायगा कुछ जीभलगनेपरभी नियमनहीं-परंतु समय २ 'के अनुसार यह दोनों मत ठीक है-शातातपटपिकावाक्य-(तांबलेचफलेचे वभुक्तस्ने हावशिष्टको दतलग्नस्यसंस्पर्शनोच्छिष्टोभवतिद्विजः)-अर्थात्तांबलके खाने में फलके खानेमें भोजनके स्नेहाबशिष्टमैं किंतु भोजन करनेसे घृत आदि चिकनाई जो मुख मंजनकरने परभी लगीरहजातीहेतिसकी दशामें द्विजाती जूठा नहीं होताहे १९४॥ स्नात्यापीत्वाक्षुतेसुभकारथ्योपसर्पणे । प्राचातःपुनराचामेद्वासोविपरिधायच १९५॥ ऐ०-स्नानाकये पीछे कुछ शर्यत यादि पानकिये पीछे कि आनेपीछे निद्वालिम पाछे कुछ भोजन किये पीछे मार्ग चलकर विश्राम लेने में वस्त्रों को उतारने और प- - मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । १५१ हिरने पीछे भी आचमनकिया हुआ फिर आचमन करे अर्थात् चाहे पहले से था- चमनकरिके शुइभीथा परइतनीवातोंकोकिये पीछेश्रावश्यक फिर आचमनकरै १९५॥ । अधि०-शास्त्रांतरम्-यथा(चर्वणेत्याचमेन्नित्यमुक्त्वातांबूलचर्वणम् । अोप्ठोविलोम कौस्टटावासोविपरिधायच)-अर्थात्-कोई वस्तुयद्वा तांबूलभीचवानेसेपहले और ता- बलको चबाकर थूकदेने पीछे सदाही आचमनकरै-दोनों पोठों को परस्पर उलटे सीधे अोठसे अोठलगाकर और वस्त्रों को उतारकर और पहिरके भी आचमन करै-वशिष्ठऋषि का वाक्य-यथा-सुप्त्वाभुक्त्वाक्षुत्वास्नात्वापीत्वारुदित्वाचाचांतःपुन राचामेत्-अर्थात-सोवने पीछे कुछखाने पीछे छीकाने पीछे स्नानपीछे कुछपानकिये पीछे रोनेपीछे आचमनकियाहुआभी फिर आचमनकरे-मनुजीका वाक्ययथा-(सुप्त्वा क्षुत्वाचभुक्त्वाचष्टीवित्वोक्त्वानृतंवचः।पीत्वापोध्येप्यमाणश्चाचामेत्प्रयतोपिसन्) अर्थात-सोयकर छीककर खायकर खखारिकर स्थावचनवोलकरजलोंको पीकर और पढ़नेको उद्यत हुआ मनुष्य सावधानीके होतेहुयेभी याचमनकरै-शातातप ऋपिका वाक्य-यथा-भोक्ष्यमाणस्तुप्रयतोद्विराचामेत्-अर्थात्-भोजन को उद्यतहुआ मनुष्य चाहै पहलेसेशुचिभी हो पर भोजनसे पहले दोबाराचमनकरलेवै-स्नान और जला दिकोंकेपानसे पहले एकवाराचमनकरै पढनेकेआरम्भसेपहले दोबाराचमन करै- यद्यपि आचमन शब्दका अर्थशास्त्रों में सर्वत्रजहां तहांयही कहाहै किहथेली पर जल रखकर आचमन किंतुजलकापीजाना-सोईमर्यादा परिपाटीमें भी१८।१९।२०१२१ इन चारों श्लोकों से याज्ञवल्क्यजी के आशय अनुसार लिखचु केहैं और वहीविधि ठीक है पर यथार्थ में जो भाव यहां पर १६५ श्लोक में कहा गया अथवा जहांकहीं आचमन का चर्चा पाया होतहांसर्वत्र गंडूप और मुख प्रक्षालनसे अपेक्षाहै (कुतर्क) भला ऋपियों के वाक्य पर खाक डालना यह कहां की विज्ञता है क्योंकि जब चारों वों को भिन्न २ श्राचमन की मर्यादें और उनके हृदय कंठ तालू आदि स्थान भी कहे और ब्राह्मतीर्थ आचमन को बतलाया और यहां पर भी अभीलिखचुके हो कि भोजनसेपहले दोवार संथासे पहले दोबारस्नान और पानसे पहले एकबार चम- न लेवै फिर इसवात में कुल्ला और मुख मंजनसे क्या अपेक्षा है-मुखभंजन चपेटि कासुनो-खाकनहीं कितु ऋपियों के वाक्य पर अज्ञानियों की कुबुद्धि रूप जाले का आवरण दूर करने को मयूर पक्षों का व्यजन परिवर्तन है क्योकि-(यदेवरोचतेयस्मिं स्तस्मिन्नेवप्रयुज्यते । लवर्णनचतांबूलेखदिरश्चनव्यंजने)-अर्थात्- जो वस्तु जिसमें रुचती है उसीमें प्रयुक्तकरी जाती है कोई कहे कि पानों में नोन लगायाजाय सो नहीं होसक्ता या यहकहे कि शाकादि व्यंजन वस्तुमें लवणके स्थानकत्थाडालाजाय तो क्या यह वाक्य भी प्रमाण होसक्ता है चाहे वह कहनेवाला ऋपियोकामी परम - १५२ मिताभरा साचाराध्याय । ऋषीश्वर हो कुछ उसके वाक्य का प्रभाव अंगीकार नहीं है किंतु लोक प्रचार का सौगम्य और शास्त्रोक्त वाक्यों की सात्म्यता पाई जावे तभी दृढ़ विश्वास और श्रा- स्तिकता भी प्रमाण में आती हे-परंतु यह अज्ञानियों की बुद्धि भ्रमता है कि अमुक ऋपीश्वर ने यह कहा-कोई ऋपिअसंभव नहीं कहसले कितु उस श्राशय का पूर्वा पर बालोचन करना जिज्ञासुके आधीन है-जो शास्त्रों में ऐसीही कठिनतानहीं होती तो क्या केवल अक्षरार्थ से प्रयोजन की सिद्धि नहीं होसक्ती थी-जिसपर यह कुतर्क आरोपित करते हो वह आचमन भी आचमन कहलाता है पर उसका अवसर पू.' जनादिक स्थानों पर आरूढ़ है दूसरा गंडूप और मुख प्रक्षालन को भी आचमन कहा करते हैं उसीसे यहां पर अपेक्षा है क्योंकि जो गंडूप को न मानोगे तो इसवात का उत्तर देना होगा कि इसी १९५ श्लोक में कहेहुये शर्वत प्रादिके पीनेवालेजब हथेलीपरधरेहुये तीन बूंद जलको कंठ या तालू तक पहुँचाकर चीखलेवेंगे तवक्या मूंछ या अोठों का चिपचिपाहट दूर होसक्ता है या सोनेवाले जिनकी आंखों और ओठों पर लिबलिवाहट उतर आया है वे तीन बूंद जल पीकरउलटा उसमल को हृदयमें प्रवेश करदेवेंगे तो इस्से क्या शरीर की मलीनता नही समझोगे ऐसेहीछौंक- ने वाले या कुछ खानेवाले या राहके चलनेवाले जिनके मुखप्रत्यक्ष अशुद्ध होजाते हैं वे उस तीन बूंद जल को चीखकर क्योंकर ग्लानि रहित होसते हैं या तांबलके चवानेवाले या भोठों को उलटे ओठ पर फिरानेवाले जिनके अोठलारसे सनजाते हैं या रोनेवाले जिनका सारामुख प्रांशूसे भीगजाता है या वहुतभांति अनृत कहिये वृथाबाद वकने से जब अोठों के जोड़ वा किनारोंपर दुर्गधि सहित लारजनजातीहै क्या तीनबूंद जल पीकर उसमलको भीतर प्रवेश करने से पवित्र होजावेंगे-कदा- चित् फिर भी यह कुतर्क करसक्ने हो कि जो वह वात नहींथी तो इसभांति से व्योरे वार क्यों लिखाहै कि भोजनसे पहले दोबार संथासे पहले दोबार स्नान वा पानसे पहले एक बार आचमन करे-तहां यह सिद्धांतहै कि प्रथम तो यावश्यकता जाने तो चरण भी धोवै नहीं तो कुल्ला और मुख प्रक्षालन विधिपूर्वक जलसे ऑखों पर्यंत कानों पर्यंत करिलेवे फिर उसरीतिसे एकया दोवारजलपीवे तब आचमन कहलाता है सोई श्लोकोंमें यह कहा है कि-याचांतःपुनराचामेत्-अर्थात्-याचमन कियाहुया भी फिर याचमनकरै-इसी प्रकार सर्वत्र हेतु गर्भित श्राशय हुआ करताहे जो पीश्वर लोग हेतु गर्भित नहीं कहते तो छोटे २ श्लोकों में इतनी बड़ी २ बातों को क्योंकर कहसले जिनका सिद्धांत दोर पत्रों में पूरा होता है-यद्यपि यह सिद्धांतथोड़े से कथन में भी लिखाजासताथा परंतु पाखंडियों की बहुताइत से लाचारीहै कि वे साधारण वात को भी पाखंड की निश्रेणी से श्राकाश पर चढ़ाते और निज बुद्धि की जड़ता मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । १५३ से निरक्षर लोगों को भ्रमजालमें फँसातेचलेआते हैं ऐसेही प्राचारका भ्रष्टाचार होकर नास्तिकताने बड़ाई पाई इस्से इतना विस्तार करना पड़ता है कि अब ऐसी उपकारी दशापरभी किसीको संदेह नहीं रहनेपावे-कोई यह उच्चारणकरै कि हम थोड़े कथनको समझते हैं-वह इसवातका ठेकाकरे कि मुझसेही सब होंगे १९५॥ रथ्याकर्दमतोयानिस्टष्टान्यत्यश्ववायसैः । मारुतेनैवशुद्धचंतिपक्केष्टकचितानिच १९६ ॥ ऐ०-रथ्यामार्ग बड़ी छोटी सवतरहकी तिनमें कर्दम कहिये कीचड़ और तोय क- हिये जल इत्यादि औरभी जो कुछ पड़ाहो यह सब चांडालों वा कुत्ताओं वा काकोंसे छुयेभीहों पर केवल वायुसेही शुद्ध होतेरहते हैं किन्तु और कोभी इनके छूजानेमें कुछ बड़ाभारी दोप नहीं ऐसेही पकीहुई ईटकेचिनेहुये स्थान आदिभी चाह चांडालोंसे छुयेहों पर वायुके लगने से शुद्ध होजाते हैं १९६ ।।, अधिक-यद्यपि सब द्रव्योंकी शुद्धि कहचुके तिनमें ईटभी प्राचुकीथी और गृहकी शुद्धिभी लीपापोतीसे कहचुके हैं पर यहां पर पकीहुई ईटके कहनसे यह भाव है कि १९३श्लोक उत्तराईमें यहकहाथा कि-प्रोक्षणसंहतानांच-अर्थात् संहतकहिये मिली हुई बहुतसी चीजोंकी शुद्धिप्रोक्षण किन्तु छिड़कदेना होती है सोयहाँपर वह छिड़- कना भी निषेध किया किन्तु कोई यह समझे कि बहुतसी ईंट और पत्थर आदि इकट्रे लगे हैं प्रासादमें इसप्रासादकोभी किसीके छूजानेपर छिड़कना चाहिये सो नहीं-और पक्कीईट कहनेसे दूसरा यहसिद्धांतभी है कि जो स्थान घास फूस लकड़ी पत्ता श्रादिसे बनायाहो उसको किसी अधमका स्पर्श होने पर छिड़कडालना उचित है १९६॥ इतिद्रव्यशुद्धिप्रकरणम् ॥ अब आगे दानधर्म कहनेके प्रयोजनसे उसके अंगभूत पात्रकी प्रशंसा लिखते हैं कि दानयोग्य ऐसा पात्र चाहिये। तपस्तप्त्वामृजद्ब्रह्माब्राह्मणान्वेदगुप्तये । तृप्त्यर्थपितृदेवानाधर्मसंरक्षणायच १९७ ॥ अक्ष०-वेद गुप्ति के लिये ब्रह्मा तप तपिकर ब्राह्मणोंको सृजताभया-देवता वा पि- तरोंकी तृप्तिके अर्थ और धर्मसंरक्षण के भी लिये १९७॥ मभिः-ब्रह्मा कहिये हिरण्यगर्भ तिसने कल्प रचनाकी श्रादिमें तपको तपिकर अर्थात् यह ध्यान धरिकर कि में किनको मुख्य बनाऊं जिनसे संसारकी मर्यादा बँधै ऐसा विचार किये पीछे प्रथम ब्राह्मणोंको बनाया इसलिये कि ये वेदोंकी रक्षा और प्रचार बना रखकर उनकी विधिद्वारा देवताओंकी यज्ञादि कर्मों से और पितरों की श्राद्धादि करिकै तृप्तिकरें और यथोचित अनुष्ठान तथा उपदेश द्वारा धर्मकी मर्याद बंधी राखें-बैदके निदर्शनमात्रसे सभीशास्त्र और विद्याओंका उपलक्षणहै किन्तु यह नहीं कि वेदकी रक्षाकरें और औरोंका निरादरकरें अर्थात् यावन्मात्र शुभ शाख या म १५४ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । शुभ विद्या है वह सभी वेदका रूपहें-वेद शब्द ज्ञानमात्रका वाचकहै जिस्से कुछ क- ल्याण विषय जाना जाय १९७॥ सर्वस्यप्रभवाविप्रा.श्रुताध्ययनशालिनः । तेभ्यं कियापराःभेष्टास्तेभ्योप्यध्यात्मविनमाः १६८ ॥ ऐ०-सर्वस्य अर्थात् सव क्षत्री आदि वर्णांके मध्ये ब्राह्मण प्रभयहें किन्तु श्रेष्ठ है जाति और कर्मसेभी फिर उन ब्राह्मणों भी जो श्रुताध्ययनशाली अर्थात् श्रुताध्ययन सम्पन्नहों वे अधिक श्रेष्ठहें किन्तु श्रुत कहिये ज्ञान और अध्ययन कहिये शास्त्रादि विद्याओंका पढ़ना तिन संयक्तहो वे साधारणोंसे उत्तम-फिर उनमें सेभी जो क्रिया परहों किन्तु शास्रोत कर्माका अनुष्ठानभी करतेहों वे अधिक श्रेष्ठ है-फिर उनसेभी अधिक वे उत्तम जो अध्यात्म वित्तमहों अर्थात् इसी शास्त्रमें जो मार्ग आगे कहा जायगा उसके द्वारा आत्मतल ज्ञान किन्तु अात्मा जो परब्रह्म हे तिसका तत्वज्ञान कहिये स्वरूप ज्ञान तिसमें यथार्थ निपुण और तत्परहों १९८ इसप्रकार जाति १ विद्या २ कर्मानुष्ठान ३ आत्मतत्त्व ज्ञान ४इनके द्वारा एकएक लक्षणसभी उत्तरोत्तर पात्रता कहकर अवउन्हींके समुच्चयसे परिपूर्ण पात्रता कहते हैं । नविद्ययावलयातपतावापिपात्रता । यत्रत्तमिमैचोमेतद्विपात्रंप्रकीर्तितम् १९९॥ ऐ०-केवल विद्यासे नही अर्थात् श्रुताध्ययन सम्पन्न होनेसेही पात्रता नहीं-तपसा वापिअर्थात् सूखेशमदमादिकी तपस्यासेभीपात्रतानही-अपि शब्दकी लक्षणासे केवल अनुष्ठानमात्र यहा केवल जातिमानसेभी पूर्ण पात्रता नही-किन्तु-जिस पुरुप में रत्त कहिये अनुष्ठान अर्थात् शास्त्रोक्त धर्मों का आचारभी हो और इमेचोभेकिंतु यह दोनों भी हों कौन एक तौ विद्या १ दूसरी तपस्या २ इन तीनों की एकता में पूर्ण पात्रता समुमी चाहिये परन्तु (च) शब्द के तात्पर्य से ब्राह्मण जाति भी अपे- क्षित है अर्थात् ब्राह्मण जातिके पुरुष में यह तीनों लक्षण हों तव पूर्ण पात्रता हो अन्यथा जहां यह तीनों असंभव हों फितु एकही दो लक्षण की प्राप्तिहो तहां उसके अनुरूप पात्रता समझी जायगी पर जातित्व लक्षण इस वार्ता में अवश्य भावसे अपेक्षित है १९९॥ अधिo-जहां एकही एक लक्षण की प्राप्तिहै तहांभी उत्तरोत्तर उत्तमता ज्ञातव्य है अर्थात् प्रथम तो केयरन एकलक्षणे जातिमात्रका फिर उस्से अधिक विद्या विशिष्टका फिर उससे अधिक आचार विशिष्ट का फिर उस्से अधिक तपो विशिष्ट का और इ- सीक्रमके अनुसार इनपात्रों में दान करने से फलमें भी उत्तरोत्तर विशेषताहे १९९॥ गोभूतिलहिरण्यादिपानेदातव्यमर्थितन । नापात्रेविटुपार्किचिदात्मन श्रेयइता २०० ॥ अक्ष०-गऊ धरती तिल हिरण्य आदि अर्चित किया हुआ पात्रमें देना उचित हे-अपना श्रेय इच्छा करनेवाले विदुप करके अपात्रमै किचिन् भी नहीं देना २००॥

मिताक्षरा स० आचाराध्याय। १५५ ,, अभि०-यह आदि शब्द सबमें लगता है अर्थात् गऊयादि कहनेसे हाथीघोडा आदि भी समुभने जो चतुष्पद दान योग्य प्रसिद्ध हैं-धरती आदि कहने से पृथ्वी ग्राम स्थान यह सभी समुझलेने और धरित्री में वीज ग्रहण वा जनन शक्ति के उ- पलक्षणसे कन्यादान आदिभी संबंधित हैं-तिल आदिके कहनेसे सर्व धान्यमानका निदर्शन है-हिरण्य आदि कहने से सर्व धातुमात्र वा रलादि द्रव्योंका निदर्शनहै-य- थार्थ में आदि शब्द कहने से सभी प्रकार के दान समझेगये तिनमें कोई दान क- रनाहो सो वह दानकी वस्तु अर्चित कहिये संकल्पित करीहुई विधिसहित उनपात्रों को देनी चाहिये जिनका चर्चा इस्से पहले श्लोक में आयाथा-न अपाने कितु क्षत्रि- यादि यहा पतितादि ब्राह्मण को भी नही देवै वह कि जो विदुप होवे किंतु पात्र वि. शेपके द्वाराफल विशेष को जानता हो और दान देकर अपनाश्रेयभी चाहताहो सो किंचित्यपि अर्थात् थोडाभी नहीं देवै २०० ॥ मधि०-थोड़ा भी नहीं देवे इस कथन का यह सिद्धांत नहीं है कि क्षत्रियादियहा पतितादि ब्राह्मणों को कुछ भी नही या किसी दशा में भी नही देवे-किंतु-यहांपर के- वल शास्त्रोक्तदान का चर्चा है कि जो वरतु किसी विशेषकल की कामना से संकल्प द्वारा देनी हो चाहे वह थोड़ी भी हो पर पात्रकोही देवै अपात्रको न देवै-अन्यथा अ- पना श्रेय भी चाहता हो यह कहने से प्रकट होताहै कि कोई आवश्यक दशापर अ. पात्र में भी देनेसे निःसंदेह कुछ फल होताहे-हां-पात्र में देनेसे उत्तमश्रेय की प्राप्ति थी अपात्रमें देनेसे तामसफल होगा यह सिद्धांत है-सोईभगवद्गीतामेंकृष्णद्वैपायन का यहवाक्यहे-कि(अदेशकालेयदानमपात्रेभ्यश्चदीयते।असत्कृतमवज्ञातंतत्तामसमु दाहृतम्) अर्थात्-जो दान-कुदेशमें-कुकालमें-कुपात्रोम-दीजिये है यहा सुपात्र को भी असत्कारसे अर्थात् विधि बिना दियाजाता है यहा अवज्ञातदान अर्थात् अपमान करके दियाजाताहै सो तामसदान कहाताहे-तामसदान कहनेसे यह सिद्धि पाईगई कि अपात्र को देना भी एक प्रकार का मंददान है किंतु उसकी मंदताके अनुसार फल भी मदहोगा-और यह बात जो कहीगई कि अपात्रको न देनाचाहिये तिसका यह सिद्धांत है कि उत्तम देश उत्तमकाल उत्तमद्रव्य की निकटतामें कदाचित् पूर्वोक्त पात्रदूरहोवे तौभी उसके निमित्तले संकल्प छोड़े और पीछे भेजदेवै या दान वस्तु स्थावर हो तौ पात्रको संबोधन पहले भेजकर पीछेदान उसके नामसेही करे-यद्वादेश काल और पात्रभी उपस्थितहै पर दान वस्तु जंगम या स्थावर हो कही दूरहै तौभी उसको संबोधन देकर दानछोडे-फिरभी अपात्र को न देना चाहिये इसका दूसरायह सिद्धांतहै कि जिसको पावजानकर संबोधन किया हो कि अमुकामुक देशकालपर. मुकामुक दान वस्तु यापके नामसे संकल्पितकरी जायगी इसप्रकार से सुपात्रको १५६ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । प्रतिश्रुत किया हो तिस पीछे उसमें कोईसा पातक आदि संयोग भी प्रत्यक्ष पाया जाय तो उस कहेहुये दान में से किंचित् भी न देवै यह शास्त्रोक्लदानों की प्रतिज्ञाहै- भेद-२ अन्यथा दान शब्द केवल देने के भावार्थ पर आरूढ़ है सो वह देना यथा संभव यथाकाल यथाकार्य के संबंधसे सर्वत्र और सवही मानुपजाति मात्रसे अपे- क्षित है उसमें भी पात्रता देखीजाती है किंतु प्रथम तो एक यथा संभव उसमें यहीहै कि किसी को दीनदयालुताकी रीतिसे कुछ देना यहा आतिथ्य सत्कार की रीतिसे कुछ देना तहां फिर जाति विद्या आचारतप इनका विवेक नहीं है किंतु कोई जाति हो और विद्या वा आचार आदि उसमेंहों या न हों-सोईदीनकी अपेक्षासे श्रीकृष्णजी ने भगवद्गीतामें यहकहा है कि-दरिद्रान्भरकौंतेयमाप्रयच्छेश्वरेधनम् । व्याधिनश्ची पधंपश्येन्निरुजस्यकिमापधम्)-अर्थात-हे कौतेय कंतीपुत्र अर्जुन दरिद्रान्भर किंतु दरिद्रसेपीड़ितोंकाभरणपोपणंकुरु-ईश्वरेधनमाप्रयच्छ-किंतु समर्थमें धनमत अर्पण करौ-क्योंकि-औपधंचव्याधिन पश्येत्-किंच औषधी भी रोगियों कीही करनी उचित है-निरुजस्यकिंौपधम्-निरोगी पुरुप को औषधी क्या करना-इस लक्षण से यद्यपि कोईसा पूर्वोक्त नियम शेप नही है तथापि यह सिद्धांत है कि देना तो सवही दीन- मात्र को चाहे कोई जाति हो परंतु उनमें भी जो कोई दीन जाति या विद्या या बा- चारया तपस्या से उत्तम हो तो उसे उसकी उत्तमता के अनुसार अपनी शक्तिके- नुरूप अधिक देना जो न्यून हो उसे न्यून-ऐसेही आतिथ्य सत्कार की रीति में भी जातियादि का नियमनहीहै (तपाच)(बालोवायदिवारहोयुवावागृहमागतः । तस्यपू. जाविधातव्यासर्वस्याभ्यागतोगुरुः) अर्थात् चाहै बालकहो या बूढ़ा हो या युवान् हो जो कोई अपने घरआवै वह अभ्यागत सवकागुरु किंतु सत्कार योग्यहोताहै इसलिये उसकी पूजाकहिये खान पान दान स्थानबासनादिसे सत्कारकरनाउचितहै-इसकी दृढ़ता मध्ये याज्ञवल्क्यजीने भी जो कुछकहा है सो ११० के श्लोकमें देखलो-भेद-३ इसके सिवाय प्रत्युपकार भीएक प्रकारका दान है उसमें भी जाति आदिका नियमनहीं होता अर्थात् जिसमनुप्यसे किसीप्रकारका अपना उपकार होताहो किन्तु कोईभौतिके छोटेमोटे कामसे भी सहारा मिलता होया केवल वचनसम्बंधीही सहायता मिलतीहो उसको कुछदेना अथवा किसीप्रकारसे उसका बदला पूराकरदेना यहप्रत्युपकार दानहै कदाचितुकोई अपनी कुबुद्धिसे यहकहे कि इसदानसे क्या कुछपुण्यहोगा यहती लोक व्यवहारहै उसे इसप्रकारसे ध्यान कर सोचना चाहिये कि सभी लोक व्यवहारहें और सभी लोक व्यवहारों में पुण्य होता है जो धर्म मर्यादके अनुसार कियेजायें और इस के समुझनेके लिये एक सीधा मार्गहै कि जिसकाम के न करनेसे पापहोगा उसके करनेसे अवश्य पुण्यहोगा भला जब किसीने अपने साथ कुछ भलाई करी और उस मिताक्षरा स० आचाराध्यायों १५७ का बदला अपनेसे न दियागया तब कृतघी.आपहुयेया नही किन्तु जब किसीकेकरे को मेट दिया तब निःसंदेह कृतघीहुये फिर कृतघी के लिये क्या २ प्रायश्चित्त लिखें हैं तो इस्से निश्चित हुआ कि कृतघी भी पापीहोताहै फिर जब किसी का प्रत्युपकार हमने करदिया तो कृतघ दोप जातारहा और दोपका मिटजाना यही पुण्यका स्वरूप है-हाँ-इतना अंतरहै कि वे शास्त्रोक्तदान संकल्पयादि विधियोंसे होते हैं यहदानदेदेने मात्रसेही होजातेहं परन्तु इसमें पुण्यकेस्वरूपका लक्षण बड़ेसे बड़ा एकयही है कि उनपूर्व उपकारियोंकी योग्यताके अनुरूप प्रत्युपकारकर अथवा जहांतक बनिावै अपने पूर्व उपक के साथकमसेकम दूना प्रत्युपकारकरै अथवा निजअशक्तिमेंभी ड्योदेसभी न्यनकदाचित्भी न होनेदे क्योंकि उसकेतुल्य उपकारकरनेमेंभी दोपलगा रहताहै और इसप्रत्युपकारके करनेमें बड़ेबड़े योग्यताओंके विचार आवश्यकहें और यद्यपि उनसवका लिखना तौ अव यहां पर अपेक्षित नहीं है तथापि एकछोटासा ह. टांत लिखदेतेहें कि तुल्य प्रत्युपकारमें इसभांतिसे दोपलगताहै जैसे एकमनुप्य इत- ना प्रतिष्ठितहै कि जो अपने जीविका संबंधी कामको करता तौदोघंटेमें॥) आठवा- नेपैदाकरलेता उसीने तुम्हारी किसी यावश्यकता परदोघंटेतक लकड़ीचीरी कि जिस के विना तुम्हाराबड़ा अकाजहुआ जाताथा किंतुचीरनेवाला उसबेरा नहींथा अवइस दशामें यद्यपि उसने मैत्रीभावसे या लोकरीतिसेभी तुम्हारा यह उपकारकिया और यद्यपि लक्कड़फाड़ मिलजाता तो उसे इतनेकामका एकही -) आनादेनापड़ता पर- न्तु अब उसका प्रत्युपकार न करनेसे तोतुम्हें कृतघ्न और केदर्यदोप लगताहै और तुल्य प्रत्युपकार किंतु एकाना देनेसे अधर्मज्ञता और कार्पण्य दोपलगताहे इस्से उचितहै कि उसकीयोग्यताके अनुसारकरना तथापि जो वहमनुष्य ऐसासाधारणहो कि प्रत्यक्ष परिश्रमका वेतन लेसक्ताहै तो दामोंपर उसकी योग्यता अनुमानकरनी उसभलाईके अनुसार कि इसने हमारेलिये वहकाम किया कि जिसको यहनहीं करता या अपनेलिये औरोंसे करवाताथा (अथवा) वह मनुष्य ऐसाहै कि प्रत्यक्ष परिश्रमका वेतन नहीं लेसक्ता बरनइस घातके चर्चासेभी चिड़परैगा तो तुमभी उसकेसाथ कोई ऐसा प्रत्युपकारकरौ जिस्से उसकी कोई बड़ीभीर पारहोजाय कुछ इसवातपर ध्यान मतरक्खो कि वहकाम एकानेकाथा (अथवा) वह मनुष्य ऐसामध्यमहै कि प्रत्यक्षले नहीं सक्ला परहृदयसे कामना रखता है तो केवल दशपांच रोजटालकर किसी और बहानेसे देदो परउसकी योग्यताका विचारबना रक्खो सो यहवातें उसकेलिये नहीं हैं कि जो प्रत्यक्ष वेतनको चुकाकर कामकरै किंतु उसकेलिये वहीरीति जो उसकामकेपे- शावालेसे अपेक्षितहो-बस इसीप्रकारसे सर्वत्र सवउपकारोंमें नानाभांतिकीयोग्यता- ओंका अनुमानकरके प्रत्युपकार करौ जिस्से पुण्यकी उन्नतिहो और पापनहीं लगने ४० १५८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। पावै यहां पर पापकाभी बड़ालक्षण यही है कि कोईअपनेमनमें प्रत्युपकारके न मिलने से दुःखमाने और आगेको उपकारमें हानिहो क्योंकि यहसारासंसारही उपकार और प्रत्युपकार रूपदोचकोंके सहारेसे चलता फिरताहै येही इसके पैरहैं-यहदोनों पहिये नहीं होते तो यह संसार शकट एक ठिकाने से हिलभी नहींसक्ता और कोई प्राणी मात्र किसी की बात भी न बूझता कि तुम दुखिया हो या सुखिया इसलिये उसप्रभु ने ऐसा जाल बंधनरचा है कि.परस्पर एक एक के आधीन है चाहे राजा हो चाहे प्रजा पर दूसरे की आधीनी सबकेलिये आवश्यक है इसीलिये उपकार और प्रत्युप- कार का परस्पर संबंध है (भेद ४) वह भी एक दान है जो किसी को वेतन ठहरा कर कामलिये पीछे दियाजाता है उसमें भी अपरिमित पुण्य होताहै जो धर्म मर्यादा के अनुसार दियाजावे अन्यथा जो कुरीति से तो वह भी पापका मूलहै छोटे२ अति स्वल्पकामों का चर्चा है कि जिनकेवेतन का नियम परिनियमित नहीं हो उनमेंपुण्य का यह लक्षण है कि जहां तक वनिश्रावे वैतनिकों को संतुष्टराखे संतुष्टिकाभी यही बड़ा लक्षण है कि जो उनसे प्रथम ठहरा हो उस्से कुछ अधिक अपनी ओरसे प्र. साद की रीति अनुसार देदेवै तौ संतुष्टहोजावेंगे इस देदेने में कुछ बड़ीसी हानिनहीं किंतु मनकी हारिजीति है कि जब एक दीनसे किसी कामके चारपैसे ठहरे और उस- ने उसकाम को अपेक्षा अनुसार साधनकरदिया तो एक छदाम अधिक देदेने में - सकी परमतुष्टि होजायगी और फिर आगे को वही वैतनिक तुम्हारेकामको दौड़कर अतिश्रद्धासे करैगा-मनकी हारिजीति का यह सिद्धांत है कि अपने मनको यह सम- झालेना कि अगर पहलेसेही सवाचार पैसेठहरे होते तौभी देने होते इस्से हम यही समझंगे इसकामके सवाचारठहरेथे-इस्से यह सिद्धांत भी है कि ठहराते समय जि- तना चाहै उतना खींचकर कमठहरालेवै पर देतीसमय ठहरे हुये से कुछ अधिकदेवै- और इसवार्ता में वैसे कदर्यों के आचरण पर ध्यान नहीं लावै कि अमुक मनुप्यने जो पैसे ३७॥ साढ़े सैंतीसटके बिकते हैं वेही अमुक वैतनिक को छत्तीस के भावमें लगाकरदिये इसमै धेलापैसा रगड़कर कमदेनेसेउसे कुछबड़प्पन मिलाहोगा लामो ऐसा हम भी किया करें यह बात अतिमंदों वा कदयों की प्रसिद्ध है (विरले) मंदयही कियाकरते हैं कि प्रत्येक मिहनतीकी मिहनत में काटकपटकरते और उसमें से कुछ पुण्य भी करते हैं वरन वे अपना सिद्धांत यही प्रकट करते हैं कि नीचसे काटकर ऊँच कोदे जिससेपुण्यहो सो यह उनका या तो पाखंडहै या अज्ञानपनकी छायाहै अर्थात उनको पुण्य कदाचित् नहीं होसक्ता सिवाय पापके क्योंकि पुण्य अपनी निर्मल कमा- ईसेही होता अथवा कमाई किसीभांति की हो पर प्रथम परिश्रम करनेवाले की तृप्ति रूप पुण्य करले तब उस प्रकार का किया हुआ पुण्य लगता है अन्यथा जो पुण्य रमेकी शेष व्यवस्था छगने नम्बर म मिताक्षरा स० आचाराध्यायां १५९ की शक्ति अपने को न हो तौ न करना उत्तमहै पर यह अन्याय नहीं कि परिश्रमक- रनेवाले रोतेजायें और बिना परिश्रम के लोगों को मुफ्त में देकर पुण्य हो यह स- +था धर्म से विरुद्ध है-सो इस प्रकारके लोग तो (मंद) कहलाते और वे लोग (कदर्य) होते हैं जो इस प्रकार से काटकपटं भी करते और पुण्यका नाम नहीं जा- नते परन्तु पापी दोनों होते हैं-तथापि उसदशामें पापी नहीं होसक्ने जो कोई मि- हनती अपने कर्तव्य कामको जान बूझकर या निर्गुणता से विगाड़े वरन उस दशा मैं निपट न देने से भी पुण्य है क्योंकि जो बिगाडू दंड पावेंगे तो आगेकोभी किसी और को दुःख न देखेंगे किंतु कामके बिगाड़ने पर भी वेतनका पाना यह पाप की दृद्धि है (भेद ५) वह भी दान है जो किसी काम का परिनियमित मूल्य प्रसिद्ध होता है जैसे नापित की मिहनत क्षौर कामके मध्ये किसी नगर में अधेला किसी में पैसा किसी में दो पैसे जहां जैसी रीति हो ऐसेही धोवी आदि औरों कोभी समझ लेना इसमें यह पुण्य और पाप है कि जिस नगर में जिसकाम का जो कुछ परिनि- यमित हो उसके ऊपर सब किसी को आरूढ़ बुद्धि होजाना अनुचित है क्योंकिवह नियम न्यूनतरसाधारण मनुष्यों के लिये इस हेतु से प्रसिद्ध किया जाताहै कि इस्से न्यून कोई कंगाल भी न देवै या इससे अधिक किसी कंगाल से न मांगाजाय जिस्से कहां सुनी का उपद्रव उठै परंतु यह सिद्धांत नहींहै कि इस्से अधिक कोई भी नदेवै और पूर्वोक्त नियमके आग्रह से अनीति करै (जैसे) विरले अन्यायी, कहीं स्थानांतर में जाकर सिपाही को आज्ञा देदेते हैं कि जाओ किसीनाई को बुलालाओ भला उ. नके महत्व से नाई भी उपस्थित हुआ दो घड़ी तक उस्से बोलने का भी अवकाश नहीं अपने काममें लगरहे हैं वह उनके प्रताप से कुछकहनहींसक्ता चुपका बैठा है और यह भी अनुमान है कि यह कोई प्रतापी मनुष्य है न जानैं प्रसन्न होकर अपने नामरूपी पुण्यके हेतु से क्या कुछ देडाले भला जव अवकाश हुआ तब हुक्महुआ फिौजार धोत्रो आप शौच को उठभागे अंत्य दशा उनका क्षौर कर्मभी औरोंकी अपेक्षा दूने तिगुने कालमें होसका जव छुट्टीपाई तव श्राप तौ स्नान ध्यान को चल दिये किसी नौकरने उसनगर के नियमानुसार पैसा या दो पैसा हाथरक्खे जब उसने कुछ कहा और सेठतक व्यवस्था पहुँची तव पूँचागया कि यहां क्या दस्तूर है किसी ने कहा दो पैसे तब घुड़की मिली बस और क्या चाहता है जो दस्तूर था सो मिल- गंया निकाल दो गुलकरता है-भला ऐसे अन्यायियों से झै कि वह दस्तूर तुम्हारे लिये है जो दो घंटेतक उसके प्राण और जीविका की हानि करी किंतु ऐसे स्थलपर जो काम उस्से दो आनेका लिया हो तो ढाई आनेके अनुमान देना चाहिये जिस्से पूण्य और प्रतिष्ठा दोंनों बनीरहें नहीं तो पाप और अपकीर्ति तौ सन्नद्ध खड़ाहोही मिताक्षरास आचाराध्याय । रही हैं-पर यह बात उनके लिये नहीं है कि जिनसे सदेव लेता पाता रहे किंतु वे अवसर पर इकट्टा समझा करते हैं अर्थात् वह तात्कालिक लोगों का चर्चा हे- और उन्हीं तात्कालिकों में जो प्रतापी नहीं किन्तु मध्यम ग्राजीवी हों और ना- पितादिकी प्रीति द्वारापुण्य और प्रतिष्ठाके अभिलापीहों तो केवल इतनी बात आवश्यकहै कि जहां अधेलेका नियमहो तहां एकपैसा जहां एकपेसेका नियमहो तहां दोपैसे जहां दोपैसेका नियमहो तहां चार अथवा तीन तो अवश्यहीदेवें चाहै इसके बदलेमें दो चारपैसे मासिक अपने अन्य खर्चामें संकोचकरलें पर इसप्रकारके दान द्वारा अपना पुण्य और प्रतिष्ठा संचयकरें तबपीछे शास्त्रोक्त दानोंपर दृष्टिडालें निःसंदेह इतना अधिक देनेसे वे नापितग्रादि उसपरिमाणसे कुछपरिश्रमभी अधि- कदेवेंगे जो परिनियमित वेतनसे देतेहैं जो वारम्बारसदा इसरीति से अधिक देनेमें कुबंधन समझै उसकोभी यहउचितहै कि कभी २ मध्यदशाओं में जब अपनी इच्छा मैं आजावै तब दोपैसे उठाकर प्रसादकी रीतिसे अधिकदेदेवे या उत्तीर्ण वस्त्रादिक जैसा लोकव्यवहारहोतो वहमनुष्यनिःसंदेहधर्मज्ञऔर पुण्यात्मानिश्चितहै अन्यथा जो इनमर्यादों कृपणताकरके उसप्रकारकेदानकियाचाहैतौ पुण्यात्मानहीं वरन पापा- स्माप्रत्यक्षहे जो किसीकेपरिश्रमको नहीपहिचान और दानोंकेफलढूंढताफिरै तो क्या ढूंढ़ेसेमिलसतेह भेद६)वहभी एक (दान) है जो सेवाधर्मसे मासिकादिरीतो अनु- सार दिया जाताहै परउसी अवस्थाताई दान है जो मर्यादिक और श्लाघ्यरीतोंसेही दियाजावे अन्यथा वहीपीडादानहोजाताहै-अर्थात् जिसप्रतिष्ठाका सेवकहो या जिस प्रतिष्ठा वाला काम उसके आधीनहो या जैसीकामकी अधिकताहो या जैसी श्रद्धासे वह कामका परिसाधन करताहो या जैसीउसके परिवारके निर्वाहमें योग्यतापाईजा- तीहो या जैसीअपने लाभ और ऐश्वर्यों परसंभावना समझी जातीहो इनसभी बातों को न्यूनाधिक भावाभावकी दृष्टिसे विचारकरके सबकी ऐक्य समताके अनुसार उस के सत्कारसे जोदेवे सोसवदान है फिरचाहै उसके परिनियमित मासिक मध्येहो या उस्से उपरांत किसी और ढंगसे प्रसादादि रीतोंसेही दियाजावै अथवा किसीअ- न्यसंबंध द्वारा दिलवाया जावे पर सिद्धांत इस्से इतनाहे कि उसकीसंतुष्टि और यो- ग्यता और परिश्रमका यथावत् इक्कीस बल्कि पच्चीस प्रतिकार और आवश्यक नि- हि इनमें किंतु नहीं लगने पावै तो सेवादानहे नहीं तोइनकी विपरीततामें पीडाप्रा- ण और अपमानमान है और वहीपापका स्थानहै (भेद७) वहभी (सेवादान) है जो मासिक रीतोंसे नियमित नहीं परसेवाके प्रतिकारमें पालन कियाजाय सो यहसेवा भक्तदासकी संभवितहे और भक्तदासवही है जो मासिकादिरीतोंसे परिश्रमका मुल्य तो नहीं ठहरावै और नमांगै पर निरंतरसंतोप रत्तिसे किसीकी सेवामें तत्पर मिताक्षरा स. याचाराध्याय। बनारहताहो ऐसेदासका माहात्म्य पूर्वोक्तसेभी अधिकहे पर जोइच्छाके अनुसारसेवा करंसक्ताहो इसका दानमान सत्कारऊोक्तसे विशेषकरना उचितहे क्योंकि वहमुखसे कुछकहता या मांगता नहीं यह पात्रता उसमें अधिकहै परन्तु जबइसकी पात्रताके अनुरूप नहींदियागया तभी केवलदुःखदानहे-क्योंकि दानशब्दका अर्थहीदेनेकोसि- वायरक्षण और पालनादिपर समाश्रितहे सोजवयथार्थ नहींहोसके तबकेवल दुःख दानउसकी सेवाद्वारा निश्चितहुआ-फिरवहीदान शब्दशुद्धिकेभी अर्थपर समाश्रितहे और शुद्धिशोधनमात्रसे अपेक्षितहे अर्थात् अपनेऊपरसे किसीके ऋणभारका शोधन करना या किसीके परिश्रमका प्रतिकार शोधनकरनाया पापसंचयकाशोधनकरना फिर वहीदानशब्द छेदन अर्थकाभी वाचकहै और इसमेंभी जो भावशोधनार्थसे पायेगये यह सबसंभवितहें इसकी कहावतभी लोकमें प्रसिद्ध है कि अमुक घातका पाप काटदो छुट्टीहो इत्यादिनानालक्षण रूपअर्थ एकदानशब्दके प्रसिद्हें(भेदः)यद्यपिदानशब्द की अर्थलक्षणा इतनीहें कियहांपर उनसवका लिखाजानाभी कठिनहै इसलियेयथा संभव अपनेरस्थलपर जहांतहां सवलिखेजायँगे तथापि केवलदानमात्रका साधारण स्वरूपएकलिखेदेतेहैं कि-(अर्थानामुदितेपात्रेश्रद्धयाप्रतिपादनम् ।दानमित्यभिनि द्दिष्टव्याख्यानंतस्यवक्ष्यते॥दाताप्रतिग्रहीताचथरादेयंचधर्मयुक्। देशकालोचदाना नामंगान्येतानिपतिदुः)अर्थात्-पात्रके उदितहोतसंतेश्रीकाश्रद्धासेपतिपादनकरना यहीदानकालक्षण अभिनिर्दिष्ट है किंतु अभि कहिये सर्वथा कहागया अर्थात् कोई तरहका दानहो परलक्षण सबका यही है उसदानका व्याख्यानभी अगलेश्लोक में कहतेहैं-और पात्रोंका उदितहोना यहकि ऊपरजोछःसात भेदोंसे पात्रोंकेलक्षण कह- चुकहें उन्हींमसे किसीप्रकारके पात्रको कुछ देनेका समय वर्तमान हो कि इससमय इसप्रकारके पात्रको अमुकवस्तु अमुकहेतुसे देनीउचितहे वसयहीउसका उदयहोना कहलाताहे अर्थात् वह अपने लेनेके उचितसमयपर उद्यतहोरहा है उसश्रवस्थामें अर्थकहिये पदार्थवस्तु जोजो उससमय के देनेयोग्य होतेहों उनका श्रद्धासे प्रतिपा- दनकरना किंतु उससमयपर यहश्रद्धाभी उत्पन्नहो कि अवश्य इसदशा में यहवस्तु इसको देदेनीउचितहे इसप्रकारकी अभिलापा से प्रतिपादन करे अर्थात् देदेवे सो यह सवतरहके दानोंका अभिलक्षणहे-इसकहनेका यहसिद्धांतहे कि जो इसीरीतिसे दियाजाय सो सबदानमें गिनतीहै चाहे किसीहेतुसे दियागयाहो-यन्यथा वही देना जोसमयटालकर पापहीदिया अथवा अश्रद्धासेदिया किंतु देतेहुयेदुःखमाना अधया लेनेवालेने मांगनेसे तगादाकरनेसे थुपाफजीहतीसे लिया इत्यादि कोईसीविपरीत- ता जहांउत्पन्न होगई तौफिर वहदाननहीं किंतुदाता प्रतिग्रहीनाश्रादि दोनोंकाप्रत्यक्ष अपमानहे इस्से उसदानका व्याख्यान अगलेश्लोकमें यहकहतेहकि-दाता १ प्रति- १६२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। ग्रहीता २ श्रद्धा ३ देयवस्तु ४ देश ५ काल ६ यह इतनेछःअंग सर्वप्रकारके दानोंमें कहेहैं परन्तु उसअवस्थामें कियह सबकेसव धर्मयुक्हों किन्तु किसी एकमेंभी कोई सी अधर्मता नहो-सो अधर्मताका स्वरूपयही है कि शास्त्रकी संमति और लोक व्यवहार से कोई विपरीत मर्याद इनमेंनहो-यथा-दाताकी अधर्मता जिसे नदेना चाहिये उसेदेना या कुकर्मके प्रतिकारमेंदेना या सुकर्मके प्रतिकारमें औचित्यसेन्यून देना या समयटालकरदेना या ग्रहीताकाजी दुखाकरदेना या अपमानसेदेना अश्रद्धा सेदेना इत्यादि १-प्रतिग्रहीताकी अधर्मता अनौचित्यसमांगना दाताका जी दुखाकर लेनेकी अपेक्षा करनी या किस कार्य निजसंबंधीकी अपूर्णता यहा समयकी प्राप्ति में अथवा किसीकार्यका विध्वंसकिये पछिभी प्रतिकारको अपेक्षाकरनी या धूर्तता से या किसीदूसरेके नामसेव्यर्थनिजभागता दृढ़करनी याखई निन्दकता करनीइत्यादिर- श्रन्दाकी अधर्मता भविष्यकालमें किसीकुकर्मकेहेतुसे श्रद्धाकाउत्पन्नहोना याविश्वास घातकीवांछासे श्रद्धाका उत्पन्नहोना इत्यादि ३-देयधनकी अधर्मता अर्थात् वहधन अपनानहीं किंतुपरसंबंधीहो यहा देकरकुलप्रतिकार लियेपीछे लौटारलेनेके अभिप्राय वालाहोया उतने का लालच दिखलाकर कुछ अधिक आकर्पण करनेके हेतुवालाहो इत्यादि ४-देशकी अधर्मताअर्थात्जोदेश जिसवस्तुके देने अथवालेने के लिये प्रति- नियतहे उस्से अन्य देशमें देनेकहे या मांगैया उस मुख्य देशकेनामसे लेजाकरकिसी अन्य देश अनुचित में उपस्थित करे इत्यादि ५-काल की अधर्मता जो काल जिस वस्तुके देनेअथवालेनका प्रति नियत अथवा मर्यादके अनुरूप पायाजाताहो उस्से न्यूनाधिक अवस्था में मांगना यहा देना इत्यादि ६॥ये सब लक्षण केवल सूत्रमान यहां पर दर्शाये गये किंतु इनके दृष्टांत बड़े लंबे चौड़े इसलिये लिखने से छोड़े गये सो सव यथा संभव यथा स्थान अपनी बुद्धिसे अनुमानकरौ २०० ॥ पात्र में देने की विधि और अपात्रमे देनेका निषेध दाता के प्रति कहचुके थव श्रागे प्रतिग्रहीता से कहते हैं। विद्यातपोभ्याहीनेननतुयाह्य प्रतियहः । गृहन्यदातारमधोनयत्यात्मानमेवच २०१ ।। ऐ०-विद्या और तप इन दोनों से हीन ऐसे पुरुष को प्रतिग्रह नहीं लेना उचित है क्योंकि ऐसा पुरुष प्रतिग्रह को लेताहुआ प्रदान करनेवाले को और अपने आ- त्माको भी नरक में पहुँचाता है २०१॥ मधिः-जहां शास्त्रोक्त अकाम्य दानका चर्चाहो तहां शास्त्रादि संबंधी विद्या और ईश्वर संबंधी तपस्याकी योजना है-जहां केवल प्रतिकार दान या सेवादानादिका चर्चा हो तहां विद्याके निदर्शन से अपनी २ जाति पेशा यद्वा शरीर संबंधी गुणोंका उपलक्षण हे और तपस्या के निदर्शन से निज २ गुण संबंधी उपकार परिश्रमसेवा मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। १६३ कार्य साधकता स्वामिभक्ति आदि समुझना और नरक को पहुँचाना उसमें तद्रूप और इसमेंभीहै परन्तु इसमें लोक दृष्टिसे प्रथमनिन्दा दुर्नामता अविश्वासताआदि ये अधिक हैं २०१॥ - अब यहांपर पात्रदानमध्ये कुछ विशेषता दाताके प्रति कहते हैं। दातव्यंप्रत्यहंपात्रेनिमिनेतुविशेषतः । याचितेनापिदातव्यं श्रद्धापूर्ततुशक्तितः २०२॥ अक्ष-पात्र में प्रतिदिन देना और निमित्तमें विशेपतासे याचितहुये करकेभीश्रद्धा पूत और शक्ति से दातव्य है २०२॥ भभि०-पात्रों में नित्यही जो कुछ बनि आवै सो अपनी शक्तिके अनुसार और निज कुटुंव के अविरोधसे देना-और निमित्त कहिये ग्रहण आदि पर्व या पुत्रजन्मबि वाह यज्ञया किसीअवसर संबंधी सत्कर्मोंके समाज उत्सवपरोपकार सार्वक कल्याणी प्रक्रिया आदि पापड़ने में विशेषता से अधिक और मांगने पर भी देना-परन्तु जो देना सो श्रद्धापूत करके अर्थात् अनिंदासे पवित्रकरके देना किंतु ऐसी श्रद्धा सहित देना जो किसी प्रकार से देने पर भी निंदा न हो और शक्ति से अधिक भी न देना जिस्से पीछे किसी तरहका दुःख उत्पन्न हो-और निज कुटंबके अविरोधका यह सि- द्धांत है कि जिस वस्तुके देदेने से अपने कुटुंब का कोई भृत्यबर्ग स्त्री पुत्रादि में सेयहा गुरुवर्ग में से बिरुद्धखड़ा करसक्ता हो तो ऐसी वस्तु नहीं देवै या जिस्से अपने कुटुंब के पालन में न्यूनता पड़नेकी संभावना हो उसको भीन देव-दूसरा ध्वन्यर्थइसके पहले चरण में मुख्यता से यही है कि पात्रे प्रत्यहंदातव्यं अर्थात् पात्र जो २०० की अधि- कोक्ति में छः सात भेदों से भिन्न २ दर्शायेगये उनको तौ नित्यही देना उचितहे कितु उनसे नित्यही देने का संबंध लगारहता है इससे उनकी पात्रता के अनुसार यथा सं- भव नित्य देना उचितहै और निमित्त विशेप तोदातव्यं अर्थात निमित्त जो अभी ऊ- पर कहचुके हैं उनमें निमित्त के अनुरूप पात्रों को विशेषतासे अधिक देना अपनी शक्ति आदिके विचार सहित-और मांगनेपर देनेका केवल यही अभिप्राय नहीं है कि कोई भिक्षुकता की रीति से निज स्वार्थ के हेतुसेही श्रापमांगै कितु कोई सज्जन किसी परोपकार सार्व कल्याणी प्रक्रिया की सिद्धिके निमित्त से मांगे कि तुम अमुक प्रयोजन में हमारे कहने से कुछ देदो तो ऐसी दशामें देनेसे अधिक पुण्य और प्र- तिष्ठा मिलती है २०२॥ माधि-युगव्यवस्था के अनुरूपभी दानों के भिन्नरूप पराशरजीने कहेहकि-(अ- भिगम्यकृतेदानंत्रेतास्वाहूयदीयते।द्वापरयाच्यमानंतुकलौदानञ्चसेवया)अर्थात्-कृत युगमें दाता आपजाकर देतेथे-त्रेतायुगमें ग्रहीताको बुलाकर देनेलगे-द्वापरमेमांगने पर तत्काल दियाजानेलगा-कलियुगमें सेवा कितु बड़ेपरिश्रम की मांगा तांगी से देना १६४, मिताक्षरा साचाराध्याय। दियाजाता है। इस का यह सिद्धांत नहीं है कि कलियुगमें इसी प्रकार से देना चा- हिये किंतु इस वाक्य में यह अभिप्राय हेतु गर्भित है कि अद्यापिजो कोईदाता जिसे किसी को किसीरीतिसे कुछदेना अंगीकारहै चाहे कोईभांतिका देनाहो वह ग्रहीताके घर श्राप जाकर देयावे अथवा किसीरीति से घरवैठे बिना मांगेही पहुँचादेवेतो यह कहाजायगाकि उसने सतयुगरूपी दानकियाअर्थात् सतयुगीरीतोंसे देनाउदारकिया- ऐसेही जो ग्रहीताको बिनामांगेहीबुलाकरदिया तो यह कहनाचाहिये कि उसनेत्रेतायुग की रीति अनुसार देनादिया-अथवा जो ग्रहीताने तगादाकिया और करनेसे तत्काल देना दियागया तो यह कहा जायगा कि उसने द्वापर की रीति अनुसार दान-किया- जब ग्रहीता उस्से बारम्बार जाने आने या कहने सुन्ने श्रादि के परिश्रमसे निकाल पावे तब यह जानौ कि वह दान कलियुगरूपी हुआ इस परिश्रमके हेतुसेही. इसको सेवा दान कहते हैं (मौर) एक वह भी सेवा दान है कि कलियुगमें जब कोई किसीको कुछ पुण्य दृष्टि से भी देना कहता है तब उस्से अनेक भांति के निज स्वार्थरूपीकाम धंधेयादि के प्रयोजन पहले सिद्धकरलेताहे तब देताहै बल्कि बहुधा तो यही कुरीति प्रवर्तित है कि उपकारीकोही दानदेतेहैं अर्थात् शास्त्रात अकाम्यदानभी उसीकोदेते हैं जिससे अपनाकुछ उपकार निकलतारहताहै इसीलिये श्रीकृष्णजीने गीतामें कहा है कि (दातव्यमितियद्दानंदीयतेऽनुपकारिणे।देशेकालेचपात्रेचतदानंसात्विकस्मृतम्) सोयहसात्विकदान अकाम्यदशापर कहाहे-अन्यथाजो राजसदानहैवहउपकारीकोही देनाउचितहे-तथाच श्रीकृष्णः(यत्तुप्रत्यपकारार्थफलमुद्दिश्यवापुनः दीयतेचपरिशिष्टंत दानंराजसंस्मृतम्)इसराजसदानके तीनभेद जो इसीश्लोकमें कहें तिनमें पहलाभेद जो प्रत्युपकारार्थ कहा सोवहीहै जिसकेलक्षण २००कीअधिकोतिव्यवस्था छःमात भेदोंसे कहचुकें, इसलिये यहांपर विशेप लिखनेकी अपेक्षा नहींरही-और ऊपरइसी अधिकोक्तिम चारोंयुगरूपीदान जो लिखचुके, तिनकैफलभी स्मृत्यन्तरमकहे हैं कि (गल्यायहीयतेदानंतदनन्तफलं स्मृतम्।सहस्रगुणमाययाचितेतुतदर्दकम्)-अर्थात् जोदान परवठेपहुँचायाजाताउसकाफल अनन्तहे-चौरजोवुलाकर दियाजाता उसका फल गकसहस्रगुण रहलाता-औरजोमांगेपर तत्काल दियाजावे तिसकाफल उससे भी श्राधाकिंतु पांचसोगुणरहजाताहे-इसकेपीछे जोकनियुगरूपीदान ऊपरकहचकेउसमें कुछभीफलशेप नहींरहता किंतुनिष्फल होजाताहे-सोई पराशरजीनेभी कहा कि सेवा दानंतुनिष्फलम्-अर्थात् सेवारूपी कलियुगदाननिष्फलहे-परन्तुयहांपर सेवादानका यहयर्थ नहीं है कि नौकरीन्यादि काम टहलके बदले दियाहुयानिष्फलहोताहै क्योंकि : उममेवाकेदानका माहात्म्य२००की अधिकोक्तिम देखो कैसाउत्तम कहाहे अर्थात् यहां मेवाकासिद्धान्तयहीहेरिमांगातांगी नादिकाशदेकरउद्दार करे सोसेवादानहे२०२॥

मिताक्षरा स० आचाराध्याय । • अवयहांपर सब दानोंकेमध्ये प्रथम गोदानकी विशेषता कहतेहैं ।। हैमशृंगीखुरैरौप्य सुशीलावस्त्रसंयुता।सकांस्पपात्रादातव्याक्षारिणीगौ.सदक्षिणा २०३॥ दातास्या स्वर्गमाप्नोतिवत्सरानोमसंमितान् । कपिलाचेनारयतिभूयश्चासप्तमकुलम् २०१॥ ऐसह--(हेमभंगी)हेमजोसुवर्णतासेमढ़ेहुयेसीगजिसके(खुरैरौप्यै. अर्थात् रूपाचाद केवनेहुये खुरोंसे संयुक्त सुशीला)कहियेसूधीस्वभावसे किन्तु भरकनीन और बस्त्रभ ओढ़ेहुये (सकांस्यपात्रा)अर्थात् काँसेकापात्र उसकेसाथमें दूधदुहने के लिये उसपत्रिकी परिमाण यहीहै कि जितनादूध वहदेतीहो उसके भरजानेयोग्य-औरक्षिीरिणी)अर्थात् घनादुग्ध देनेवालीहो और (सदाक्षिणा) अर्थात् दाताकीशक्ति अनुसारकुछ दक्षिणाभी उसकेसाथहो सोयहदक्षिणा गऊके आहारनिमित्तमें संसूचितहै इसलियेचाहैएकबर्ष मात्रके आहारयोग्य दक्षिणाहोचाहै एकमासकेया जितनेदिनीतक दूध देसकेंगी तव ताईके अनुमानपरहो परन्तु मुख्यसिद्धांत इसकायही है किजितनीवर्षीताई वहगऊ प्रतिग्रहतिाकेपास रहकरजीसके उतनेवों के प्रवन्धयोग्य दक्षिणाहो तब ऐसीगऊ दानकरनेकेयोग्यहै२०३॥इसगऊका दानकरनेवाला दाता स्वर्गकोपाताहै किंतुस्वर्ग में जाकर वहांके भोगोंको भोगताहै उतनी वर्षांताई कि जितनेरोमा उसगऊके शरीरमें होतेहें-और जो कदाचित् यहीगऊ कपिलाभी हो तो सातकुल पिछलेभी उसदाता सहित निःसंदेह तारदेतीहै २०४॥ भवि०-निःसंदेह तारदेती है यह निःसंदेहता भूयःशब्दके अर्थसे लीगईहै परन्तु निःसंदेहतारदेना सातकुलका उसीअवस्थामैसमझना चाहिये कि जोर लक्षणगऊके ऊपर ऐक्यार्थमें कहेगये वहसभी बातें यथावत्हों तो वहकपिला ऐसाफल करसती है किंतुकेवल कपिलाबर्णमात्रके होनेसे यहफल नहींकरसती है क्योंकि कपिलवर्ण नील पीतमिश्रित दोनोंआभाको कहतेहैं किजो ऐसेवर्णकी गऊहो वहकपिला है औरकोई आचार्य रोचनाछवि वर्णको कपिलवर्णकहतेहें प्रथमतों वर्णकाबिनिश्चयहोना दुर्लभ है दूसरे निश्चयहुयेपरभी कपिलाकामिलना दुर्लभहै तीसरेकपिलाचाहे एकयासहस्र भी मिलजायँ परउसवातकाहोना क्यासुगमहै कि उसगऊकेजीवन अवधिपर्यंतका प्र- वन्ध आहारमध्ये करदियाजाय-संप्रति बहुधा इसप्रकारसे गोदान करतेहैं किजवदेखा यहगऊबूढीहोगई दूधभी थोड़ादेतीहै इसकागर्भिपाहोनाभी अबअसंभवहे अवइस- काखर्चनहीं उठायाजाता लामो दान करदेवे तो पुण्यहोगा क्योंकि इसकोबैच तोकोई लेतानहीं दूसरे-दुर्नामनाभी होगी इससेयही अच्छा है कि एकहलकीसी घंटी और प्राधानेका अंगौछा और बाईपावअन्न आगेरखकर किसीब्राह्मणके पल्लेबाँधे तौ दोआनारोजकी दस्तकसेछूट-हाधिग् यहनहींसमझते कि जो ऐसीगऊ दानकरने से. सातकुलतरतेहोते तौनरकोकी छावनीउजाड होजाती-हां यहकहो कि ऐसीगऊदेने से . ४ मिताक्षरा साश्राचाराध्याय । बच्चाकेभीरोमतुल्य युगोंपर्यंत स्वर्गमवास करवाती है-युगयहांपर कृतयुग त्रेता आदि से अपेक्षाहे और यदिपूर्वकहीहुई विधिसे उभयतो मुखी दानकरीजावे तो इसकादाता • भी स्वर्गके ऐश्वर्यभोगताहै दोनोंके रोमतुल्य युगोपर्यंत-उभयतोमुखी अर्थात् जिसका दोनों ओरको मुखहो किन्तु एक ओर अपना और एकबोर बच्चेका सोईनीचेकेश्लोक में इसके लक्षण कहते हैं २०५॥ यावत्सस्यपादौदौमुखयोन्याचदृश्यते। तावद्गी पृथिवी यायावद्गभैनमुंचति २०६॥ ऐ०-जबताई बच्चाके दोनोंपैर और मुखभी योनिमें निकलताहुआ याउलझादेख पडताहै उतनेकालताई वहउभयतोमखीकहलातीहैक्योंकि दोनोंओरको मुखहोगसे- और तबताईगऊ पृथिवीरूपज्ञातव्यहै किजवतकगर्भको नहींछोड़तीहै-अर्थात् इसका दानकरनेसे एथ्वीदान करनेकाफल होताहै २०६॥ यथाकथंचिदत्वागांधर्नुवाऽधेनुमेवचा । भरोगामपरिक्लिष्टांदातास्वर्गमहीयते २०७ ॥ ऐ०-कथंचित् कहिये अतिप्रयत्नसे जैसे बनियावै तैसेही अर्थात हेमश्रृंग आदि विधिनहोसके तौनहींभीसही परपूर्वोक्तविधिसे धेनुकहिये दूधदेतीहुईगऊ यहा अधेनु कहिये विनादूधकीभीसही जो बध्यानहो परन्तु अरोगिणीहो अपरिमिष्टा कहिये अ- तिदुर्वलानहीं इसीउपलक्षणसे अतिटवाभीनहो तो ऐसीगऊको भी दानकरके दाता स्वर्गमें पूज्यहोताहै किन्तु वहांसत्कारसहित रहता है परन्तु ये सवउत्कर्षा उसीस- मयकेलिये कहीथी किन्तुअबकेलिये २०३ और २०४ कीव्यवस्था अनुसार गोदान करना शुभदायक है २०७॥ अब आगेगोदानके अनुकल्प लिखतेहैं। श्रांतसंवाहनरोगिपरिचयर्यासुरार्चनम् । पादशौचं हिजोछिटमार्जनगोप्रदानवत् २०८ ॥ ऐ०-यद्यपि श्रांत संवाहनका अक्षरार्थ तो केवल यही है कि थकेहुये को अपनी पीठपर या अपनी सवारी वा भाडेकी सवारीपर चढाकर अपेक्षितस्थानपर पहुंचा देवै परंतु अभिप्राय यहहै कि श्रांत जो कहींसे थकाहुआ आवे उसको आसन शस्या स्थान सेवा आदि आराम देना श्रांतसंवाहन कहलाता है इसमें वह बातें भी सब समझलेना जो अक्षरार्थसे दर्शाई गई यह श्रांतसंवाहनरूप पुण्यभी गोदानके स- मान होताहै-ऐसेही रोगीकी सेवा करनी गोदानके समान फल देतीहै-ऐसेही सुरा- चन कहिये देवताकी पूजाभी गोदानके समान फलदेतीहै-ऐसेही महात्माओंके चरण प्रक्षालन करना यहभी गोदानके समान है-ऐसेही हिजोकी उच्छिष्ट बुहारनी धोनी मांजनी यह सब गोदानके समान हैं २०८ ।। भवि०-देवताका पूजन किंतु हरि हर हिरण्यगर्भादिकोंका गंधमाल्यादिसे आराधन द्विजोंका पादशौच अपने समानोंका और अधिकोंकाभी-रोगीकी सेवा यथा सम्भव मिताक्षरा स० आचाराध्याय । १६६ औषधीआदिके देनेसे-यहसव अनुकल्प इसीलिये कहेहैं कि जिसे गोदान करनेकी शक्तिनहो अथवा शक्तिकहोनेपरभी देशकाल आदिकी विरुद्धता से गोदानकाहोना असंगतहो तहांये अनुकल्पही उसफलको देनेसक्तेहें २०६॥ भूदीपांश्चान्नवस्त्राभस्तिलसर्पिःप्रतिश्रयान् । नैवेशिकंस्वर्णधुर्यदत्वास्वर्गमहीयते २०९॥ ऐ०-भाटथ्वी जिस्से किसीप्रकारके लाभकाफल मिलस काहा तिसकादान-दीप दीपक जो नित्यंप्रति यहा अवसरपाय देवस्थानों वा सत्पुरुषों के स्थानमें पुण्यहेतुसे प्रदीप्त कियेजाय-अन्नजो असमर्थो वा दैवपर अनुद्योगियों को दियाजाय-एवं वस्त्रजो समय २ वा ऋतु के अनुरूपदियजायँ-अंभाजल जो प्रपा आदिसे यहा साधारण प्रकारसेभी आवश्यक दशाओंपर पानकरायाजाय-तिलजो अपनीऋतुमें दियाजाय. सर्पिः घृत जो सदैव साधारण अवस्थामेंभी दियाजाय(प्रतिश्रय) जो प्रवासियोंको आ- श्रयदियाजावे(नैवेशिक)जो गार्हस्थ्य धर्मकेलिये कन्यादान दियाजावै-स्वर्ण सुवर्ण जो आभूपणादि प्रकारोंसे समर्पितकियाजावे(धुर्य)जोयानादि भारखींचनेके निमित्त से उपभादि चतुप्पद दियेजावें-इनपदार्थोंको दानकरनेवाला दातास्वर्गमेंजाकर पूज्य होताहे २०६॥ भधिः-स्वर्गफलहोना यहवाक्य एकसाधारणभाव से मुख्यतात्पर्य पर आरूढ है इस्सेस्वर्गफल कहनेसे सभीफल समझेगये अर्थात् इसकथनसे उनफलोंका अभाव नहीं समझनाचाहिये जो कहीं शास्त्रांतरमें भिन्नव्यवस्थासे कहेहों-यथा(यत्किंचित्कु रुतेपापंज्ञानतोऽज्ञानतोऽपिवाअपिगोचर्ममात्रेणभूमिदानेनशुद्धयति-एवं-वारिदस्त प्तिमाप्नोतिसुखमक्षय्यमन्नदातिलदश्चप्रजामिष्टांदीपदश्चक्षुरुत्तमावासोदश्चन्द्रसा लोक्यमश्विसालोक्यमश्वदः)-इत्यादि-अर्थात् भूमिदानका यहभीफल कहाहै कि जो कुछपा कराजाता हे चाहै ज्ञानसे अथवा अज्ञातभावसे सोसव गोचर्ममात्र धरती दानकरनेसे शोधन होजाताहै-किंतु स्वर्गफल कहनेसे उसमें यहभी गिनतीमेश्रागया क्योंकि पापके शोधनहुये विनास्वर्गका मिलनाभी असंगत है-एवं-वारिदः जल दान करनेवाला सर्वतृप्तिरूप फलपाताहै सोभीठीकहै स्वर्गमेनिःसंदेह तृप्तिहुआकरतीहै- अन्नदानकरनेवाला अक्षयसुखपाताहे-तिलकादानी अपेक्षितप्रजापाताहै किन्तुजैसी प्रजापुत्रादि वहचाहे तैसीमिलती हे-दीपदानकरनेवाला नेत्रोंकी उत्तमदृष्टि पाता है- वस्त्रदान करनेवाला चंद्रलोकमें निवासपाता है-घोडादेनेवाला अश्विलोकमें निवास पाताहै-इत्यादिफल यहसब स्वर्गफलकहनेसेभी बनेरहे-और गोचर्ममात्रधरतीदान से जोपापोंका परिशोधनकहा सो केवल चर्साभर का अर्थ नहीं है किन्तु गोचर्म का परिमाण रहस्पतिजीनेकहा है कि-(सप्तहस्तेनदंडेनत्रिशइंडनिवर्तनम्। दशतान्येवगो चर्मदत्वास्वर्गमहीयते) अर्थात्-सातहाथलंवा वांस एक दंडकहलाता है इसदंडसे मिताभरा स० आचाराध्याय। संदेह नरकदेशोंकी वसापतमें संपन्नताहोगी क्योंकि दाता और प्रतियहाँतामा- दि अनेकोंको जाकर वहांवसनाहोगा-भलाजोगऊकेहाड़ या नाममात्र दानकरने से कुछपुण्यमें विशेषताहोती तोआचार्योको यहकहनेसे क्या आवश्यकताथी कि घनेदुग्ध चालीहो और जीवन अवधिके आहारयोग्य दक्षिणासेमीसंयक्तहो कांस्यपानभीसाथ हो ओढ़नेकावस्त्र उसकेसाथहो-इनवातासे सर्वथा निश्चितयहीहै कि पुण्यका स्वरूप फिसीसज्जनके सुख पारामका लक्षण है किंतु जिसमें कोई सज्जन बहुतसी आराम और सुखभोग आदिपावेगा उसमें बहुतसापुण्यहोगा इससे यहबातपाईगई कि ऐसी रीतिसे गऊदीजावे जो उसगऊके पालने या खचाने आदिकाझगड़ा प्रतिग्रहीता को न करनापड़े केवलअनायासका दुग्धपानकरनेको मिले जिससे उसके शरीरकेरोमा२ प्रसन्नहोकर आशीर्वादकरें तो इससे पहभी निश्चितहुआ कि प्रतिग्रहीताकेपास उस गऊकीसेवायोग्य कोईयधिक मनुष्य जो नहो तो एक सेवकभी साथ दियाजावे जैसे कन्याकेसाथमै टहलिनी दीजातीहै जिससे औरभी अधिक पुण्यकी रहिहोसर्वथापुण्य का स्वरूप दूसरेकी भारामनिश्चितहे-फिरजवकिसीनेवढी औरव्यर्थगऊहाड़ किसी कैपल्लेदांधकर उलटी दोभाना रोजकी दस्तक उसकशिर खड़ीकरी तहां प्रथमतो उसपर जो विपत्तिबढ़ी यही एकबड़ापापहे दूसरेजो वहग्रहीता कुछसमर्थ और विवे- कीहुया तो उसगऊका पालन अपने स्वार्थविना भी करेगा कदाचित् उसमें समर्थ और विवेकताभी नहुई तौनिःसंदेह यातौवेंचैगा या खडी २दुःखपावेगी उदरकोअपू. तिमें अथवा किसी संबंधी के ग्राममें करदेगा तो वहांभी आधुनिक समयमें निवाह पड़ादुर्लभहे ग्रामकी हांकीहुई गौओंकी जो दशाहोजातीहे सो आँखोंदेखनेमेंआई है परअकथनीय है अथवा उसने अपनी ओरसे किसीको पुण्यकर के देदी तो भी क्या निश्चितहे कि वहग्रहीता उसको कैसेरक्वेगा या किसकेहाथ बंगा-बड़ी से बड़ी यह यातहे कि उसरंचनेवालेने अपनी ओरसे किसीको हिदूया सत्पात्र समझकरची पर नहीं निश्चित कि उससे उसकाभार उठायाजाय या नहीं या वह कहांसेकहां पहुँचाये तो सर्वथा यहपापकी श्रृंखला उसपर्वदाताकेशिरारूदहे कि जिसने पहले दानकर- के अपनाभार उताराथा-इससे सर्वथाढविश्वासहे कि यदविकराल समय अबगोदा- न करनेका निर्विकल्प नहीं क्योंकि जिसकालमें यहाज्ञा उन्नतहईथी उसकालका प्रभावकुछ औरथा यथार्थ में गोदानसे यहीफलहोताया कि जो शास्त्रोत है-पयोंकि प्राचीन समयों में गऊऐसारन गिनाजाताधा जैसा संप्रति धरतीका बिसी समभाजा- ताहे इससे कि जैसा अबछोटेमोटे ग्रामका विर्मा कुटुम्बका पालन करमता है उसमे मी रकीस पहलेगोधनमे प्रतिपालहुयाकरताथा इमहेतुमे किवनजंगलाकीवहताय- तके सिवाय प्रत्येक ग्रामों में कुछधरती केवल गोयाक निमित्त कुटी रहती जिममें मिताक्षरा स० पाचाराध्याय । लाखांगोधनका प्रतिपाल बिनादामौकेहीहोताथा तयएकगउका मिलजाना एकर. फेसमानं समभाजाताथा वरनउसदशामदीगटकाभीलेनादेना इसलिये फन्नदायक समभाजाताथा कि अगर इससे दृधकासुख नहीं परएकदोयचादेदवनीताभीदीयों पीछे गोधन वा गोरसकी दिघरमै होजायगी जिसने दोवपाकी रखवाली करनीकटि- नसमुभी उसनेचाहे तिसग्रामके गोधनमें होड़दी प्रमनपीछे घरत्नाकरयांधी अवहनं मसे एकौवात नहीवनसती कहीं किसके गोधन में बाइमा घर २ मटियाले चल्हे एकसेहोगये यामांकी व्यवस्था शहरोंसे पचीसह इनकारणांसे गोदानकाकान ता पर धामको सिधारगया परन्तुकहींगोदानकादेश अवताहभी बनरहाहे किंजमीव्यवस्था अभी ऊपर लिखचुकेह तसीउनमें वर्तमानहें जिसकीइच्चाहो उनदेशीम घंटकर गो. दानकर तो यथोचितफल होसका है परन्तु वहदेश जहांहोंगे तहां तिसकेलिये होंगे हमको कोधियंदेश यहां नहींयासत हम यहां नहींजास-अन्यथा जिसको संदेश में गोदानकरनेकी श्रदाहो उसकलिये यहीबात बड़ीउत्तमह फिजैसी गाउदेनेकी सामन्य किजिसफिमीउत्तमपान प्रजिफर देदेव तो कोई मांतिसे दोपमागीनहींहोसमा-या-जोप्रत्यक्षगदानकरनेको इतनीयड़ी सामयं उम- महो कि बहसदेव उसकेदानाघासफा प्रबन्धकियेजायतो कुछचिंतानहीं-प्यधया-मदेय का प्रवन्ध नकरसफनेपरभी एकप्रकार, परन्तुजय वैसापात्र मिलमकथातगादानका ग्रहीतापात्र ऐसाहो कि प्रथमता ग्रामयादि कडधरतीमे संबन्धवानहोगेश्ययं यानही उदारहो विवेकीहो जिसके गोविनयकी निषेधप्रतिज्ञा निर्विकल्पही उदार यहांनाहोफि. चाहेंगऊ यहिलाहोजाय परमयकेतुल्य यांधकरग्वया जिसमें पहनक्षणही उसको गाह नमीगऊदेवतोभीदोपनहीं परजापेमाहोगा यह गोदान ने भी निषेधगणनाटांगा किंतुणेमासंयोग यनिपढ़ना बड़ादुर्लभ है एन्गे यहीमयमेश्रेष्टहै कि जो गोदान पग्नता अजा उत्पन्नहो तो समयको हायजीदकर गोदानका प्यानकरने घोर जी पायनि पाये मो उसका कल्पकरिफ देदेव-यनः-(अम्बन्यन्नायायिदिष्टंभममप्पानगगन) य. धात जोयात यथार्थमे शाग्यारह पीरधर्मम्पीट परजिमफेकग्ने अस्यम्पन्नक्षा प्रतीनही किन नरकनिशानी देखापरतीही यथया लीनन्दानही नौ उमरा भागाग्यग्ना उचित नहीं-मोहमध्ययन्याम लागानिंदागे गामपंक्षानही परमन्यन्य नक्षत्पाद जैमाऊपरसेवर्णनहोना पालामाया मो मगमभनी २०३।२०२॥ मच गयत्मापारन पहने हैं। romanimal दिनानु.५।। पदले पाविवि पहारने और १७० मिताक्षरा साचाराध्याय। तीस ३० बांस धरतीको एक (निवर्तन) कहतेहें ऐसे दश १० निवर्त्तन परिमाणे धरती गोचर्म मात्र कहलातीहै तिसके दान करने से पापों का क्षय होता और पीछे स्वर्गमें पूज्यतामिलतीहै-अतःपरम्(अधिकस्य अधिकंफलम्) यहशंकाकरनीबुद्धिकीभ्रमताहे कि २००की अधिकोक्ति व्यवस्थासे इस स्थलमें अंतर देखपडता है-किन्तु दोनोंका सिद्धांत एकहै और अंतरकिचिन्मात्र भी नहींहै पर जबतके बुद्धिमें समावै नहीं२०६॥ गृहधान्याभयोपानच्छत्रमाल्यानुलेपनम् । यानंवृक्षप्रियंशव्यांदत्वात्यंतसुखीभवेत् २१० ॥ , ऐ०-(गृह) स्थानघर जो वनाहुआ संसिद्धहो-(धान्य)नाज अन्नमात्रकोईसा-(भभय) अर्थात् भयभीत का भय दूरि करिके उसको निर्भय करदेना-(उपानव) जूता मोजा खड़ाऊ आदि पादत्राण मात्र (छत्र) छाता छत्री आदि कोईवस्तु जोवर्षा वा आतप से रक्षा करसली हो-(माल्य) शब्दसे चमेली आदि सुगंधिमान् पुष्प माला अतर फु- लेल आदि इनसबका उपलक्षण है-और (अनुलेपन) शब्दसे चंदन कुंकुम आदि अनेक वस्तु जिनका लेपकरने से शरीर और मनोवृत्ति को शीतलता वा प्रसन्नता प्राप्त होती हो-(यान) सवारीमात्र कोई भांतिकी हो-(वृक्ष) जिनसे किसी प्रकारकाफल या छाया आदि का लाभ सुख मिलसमाहो-(प्रिय) अर्थात् जिसवस्तु या जिसप्राणी के मिलने पर लालसा किसी को धर्मानुसार अतिशय अभिलापासहित रहतीही और वह वस्तु उसको अलभ्यहो उसका प्राप्तकरदेना सो यह प्रिय दान कहलाता है-(शच्या) शयन करने की कोई वस्तुमात्र हो पलँग ओदि चाहे वस्त्रों आदि सब उ- पकरणोंसे संपन्न हो चाहे अपनी अशक्ति अनुसारकेवल एक दो वस्तुशयनसंबंधी हों तो भी उसका नाम शय्यादान हे-इन कहेहुये पदार्थोंको देकर दाता अत्यंतसुखी होता हे २१०॥ अधिः-सिद्धांत निरंतर वही चलााताहे जो२००की अधिकोक्लिव्यवस्था में कथन होचुकाहे व्यर्थात् इन पदाधाकोचाहे तिसरीतिसेचाहे तिसको योग्य समझकर देदेने से दानकहलाताहै किन्तु केवल वहीदान नहींहै जो जलकुशके साथदियाजावै अर्थात् अपने संसर्गी और सेवक दासादिको भी पृथ्वी में शयन करते देख दयाभावसेखाट देदेना यह शय्यादान है फिर चाहे पीछे किसी अवधिपर उनसें निवर्तनभी दरलेनी परे तो भी उतनी अवधिका शय्यादानहोचुका जितनायाराम उनकोदियागया परंतु (उसादानी का शय्यादान दानकी पूर्णपदवी को नहींपहुँचसक्ला जिसके आधीन से- सर्गी या दासादिक कऋतमभी चिकृत धरतीपरलोटतेफिरें और वह धनी किसीका- लांतरसोदोसो मुद्राव्ययकरकेसांगोपांग शय्यादान जलकुशकेसाथकरनेवठे-सत्यंच (धिक्तस्यचोपदेष्टाधिग्दानंतञ्चदानिनमाधिगीहग्दानश्रदाञ्चयत्रापन्नाहिदुःखभा क्)अर्थात्-यापनकहिये मंप्राप्तजन आधीन संसर्गी-जहांप्रथम जिसके पापनजनr मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। १७१ ही दुखभागीवनेरहे उसकी ईदृशदान श्रद्दाकोभी धिक्कारहै कि वह शय्यादान आदि दानोपर-वहु ब्ययकरनेकी श्रद्धाकरै-और ऐसे कुश्रद्धावान्दानीकोभी धिक्कारहै और उस कुदानकोभी धिक्कारहै जो उचित पात्रों का भागहरिकैदानहुआ-उसदानी के उ- पदेष्टाको सबसे अधिक धिक्कारहै जो ऐसा कुत्सित उपदेशकरै-सबसे अधिक यहभाव मूलपाठमे नहीं परंतु उसकी अधिकताकेहीलिये प्रथम नम्वरपर उच्चारणहुआ कितु पहलापदसबसे उत्तमप्रसिद्ध है इसलिये पहलेपदपर उच्चारणहोनेसे दर्जेअव्वलकी धिक्कार उसकोमिली (भेद २) ऊपर अभिप्रायार्थ मे प्रियदान का चर्चााया और उसका स्वरूप भी वहांपर लिखागया पर उसके स्वरूपका केवल वही लक्षण नहीं है कि कोई ठेठकर अपने शरीरकेही प्रियपदार्थोंको चाहताहो किन्तु धर्म प्रियताभी उ- सका स्वरूप है दृष्टात जैसे प्रपा अर्थात् पिाऊका लगाना किसी असमर्थको प्रि- यहो या विद्यादानादि का प्रबंध करना प्रियहो या दीनोकी कन्यादान करवानायहा कोईसा उपकार करवाना प्रियहो जिसमें सर्व प्रियताके भी लक्षणपायेजातेहो जिसके करवाने में वह आप निफिचन है इत्यादि वहुधा लक्षण और भी जानो इसमे यहां तक विशेषता है कि अपना संचित पुण्यभी देदेवै जिस्से प्रियदानकी पदवीसमुझी- जातीहो-सोई स्मृत्यंतरकायह वाक्यहकि-(देवतानागुरूणांचमातापित्रोस्तथैवचापुण्यं देयंप्रयत्नेननापुण्यंचोदितंकचित्) अर्थात्-देवताओको और गुरुत्रोको तथा माता पिताकोभी अपना पूर्वोपार्जित पुण्य किसी आवश्यकता में उनका प्रियसाधनके हेतु से प्रयत्नकरके देदे-कितु ऐसे संकल्पादिक यत्नो से समर्पित करदेवै कि अपनाफ- लाधिकार उस्से दूरकरल-सो यहबात केवल मनकी आड़ है अर्थात् फलाधिकार दूरकरनेपरभी दूरहोना बड़ीदूरहै क्योकि यद्यपिउसपुण्यके दाताने फलका अधिकार अपना दूरइसहेतु से किया कि इसकाफल ग्रहीतापावै जिसके पासकुछ भी पुण्यसं- चय नहीं था परंतु प्रवइस तात्कालिक पुण्यका आनंत्यफलकैसेदूरहोगा जो उसने अपना बहुपरिश्रम या वहुकाल से कमायाहुपा पुण्यएकसाथदानकरिकै परोपकार में लगाया-अर्थात् तत्काल उसके फलकी वृद्धि अन्त गुणहोजाती है-परंतु-चौथे च- रणमे कहते है कि (धपुण्यउदितंचनक्कचित्देयं) अर्थात अपुण्य जो अपना पापहे सो कहनेपरभी कितु मागेसेभी न कहीं देना यहा (अपुण्यं चोदितंकचित्नदेयंइत्यन्य यः तत्रापिसएवार्थः) अर्थात् इस अन्वयसेभी वही अर्थहै कि प्रेरितहुयाभी पाप कभी न देवै-पापकेभी न देने अथवा देनेका वही हेतुहै कि जैसे पुण्य देदेनेसे बढताहै तैसेही पापभी अनन्तगुण बढताहै किन्तु जो वस्तु दानकरीजायगी वहीं वृद्धिको प- हुँचेगी जैसे धरती में बीज तो थोडा परताहै पर उस वीजकी वृद्धि पीछे बहुतसीहो. तीहै-सोई इसका प्रमाण शास्त्रमे यह कहा है कि (य पापमवलंज्ञात्वा प्रतिग्रहणाति - १७२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । दुर्मतिः ।गर्हिताचरणात्तस्य पापंतावत्समाश्रयेत् । समंद्विगुणसाहस्रमाऽऽनन्त्यंचप्रदा तपु) अर्थात् जो कोईदुर्बुद्धिजन पापको अवलकहिये थोड़ा यहा निर्वलजानिकैदूसरे से लेलेताहै तभीवहपाप उसकेइसगर्हिताचरणसे अर्थात् इसीपापिष्टकर्मके प्रभाव से उसकी कर्मरेखामें दोहजार गुणकसमान दृछिपाकर समाश्रित होजाता है चपुनः उसपापके प्रदानकरनेवालोंमें अनन्तगुणा होजाता इस्से पापकादेना और लेनाभी निसंदेह अशुभहोताहै-अनन्तगुणा या दोहजारगुणा उसपरिमाणसे कि जितनावह पाप पहलेथा २१०॥ सर्वधर्ममयंब्रह्मप्रदानेभ्योधिकंयतः तहदरसमवाप्नोतिब्रह्मलोकमविच्युतम् २१॥ भक्ष-जिस्से ब्रह्म सर्वधर्ममयहोता इसहेतुसे सर्वप्रदानोंसे अधिकहै उसका देने- वाला अविच्युत ब्रह्मलोक पावता है २११॥ मभि०-ब्रह्मकहिये वेद उसके निदर्शनसे सभी शुभशास्त्र वा शुभविद्याओंका उप 'लक्षणहै वहद जव सर्वधर्ममय प्रसिद्ध और प्रत्यक्षठहरा क्योंकि वेदवा शास्त्रोंसेही सारेधर्म जानेजातेहैं किन्तु उसकी प्राप्तिसे मनुष्यमें मनुष्यताके लक्षण सर्वथा प्रकट होजाते और सभीपदार्थ धर्म अर्थादि उसकोसुलभ होजाते हैं तो इसवेदका दान करना सबदानोंसे अधिक फलदायक निश्चितहुया इसहेतुसे वेदकादान ऐसाप्रबल है कि इसको दानकरनेवाला चाहै और कोईसादान नकरसक्लाहो परसभीदान धर्मी काफल उसकोमिलताहै कि उसफलके प्रभावसे अविच्यत ब्रह्मलोकका निवास वह पाना है-अविच्युत अर्थात् फिरवीचमेंच्युति जिसकी न होसकै-और वेदशास्त्रविद्या आदिका दानकरना कुछयहीनहीं कि पोथीको उठाकर जलकुशकेसाथ देदेवे अर्थात् विद्यार्थियोंको पढ़ाना या पोथीदेना या किसी से दिलवादेना या उनकेअन्न बस्त्रादि का प्रबन्ध करवादेना या उसप्रकारके प्रवन्धमै सबकैसाथ कुछयापभीदेना या विद्या दान शालाओंका निर्माणकराना किन्तु कोई भांतिसे विद्यासंबंधी कामोंकी सहायता करनी सो सव ब्रह्मदान है २११ ॥ अघिल-इसप्रत्यक्ष सर्वधर्ममय ब्रह्मरूप शास्त्रके ग्राहक आधुनिक जो अपने को यह समझते होंगे कि हम केवलयाहक हैं क्योंकि मूल्यभेजा और पत्रमँगवाया सो नहीं किन्तु वेभी ब्रह्मदानके फलभागी, इसहतुसे कि विचारदृष्टि में जब सो ग्राहकों के निमित्त से यहकाम प्रारोपितहुआ या आरंभइसका विच्युत नहीं होनेपाया तो सर्वथा बेही सोमनुष्य इसके मूलकारण समझेगये क्योंकि वेमल्यदेतेहैं उनकनिमित्त से इसकी संसिद्धि होतीहे तिसमेंसे दशासपचास ऐसे मनुप्यभी इसकी प्राप्तिकरते हैं कि उनसेमूल्य या तो किसीहेतुसे नहीलियाजाता यावे देनहींसक्ले या संपादक से मैत्रीभावरखतै या उसके मंबंधीह या सेवकहें या भिक्षुकहें या अभ्यागत महात्मा हैं - मिताक्षरा,स० आचाराध्याय । १७३ या सज्जन वा सहायकहें-याधूर्तहैं कि जोलेतेजाते और पीछे से धोखादेदेते या तस्कर हैं जो अांखवचाकर अधिकारीके पीछे लेभागते या कपर्टीहैं जो कार्यकी साधकतामें कुछकाटकपट करलेतेहैं अर्थात् नानाभांति,से.अनेक अभिलापी जो विनामूल्यदिये अपनी अभिलाप-पूरीकरपाते, या दशमनुष्य ऐसेंहें जो इसकार्यकी साधकतामेंसेवा धर्मसे अपनापरिवार पालनकरसक्तेहैं,यह सारापुण्य उन्हीकेहेतुसे होसक्ता है क्योंकि जो वेभी मल्य नहीं देते,या ग्राहकता नहीं करते तो किसके शिरपर यहबरात जोड़ी जाती-यथार्थसे वे सत्पात्रग्राहक इसब्रह्मदानके हेतु और फलभागीभी निश्चितहें-उ- नसेभी अधिक वे लोग सर्वशिरोमणि समझे चाहिये,जो ग्राहकों की द्विद्वारा या सहायताकी दृष्टिसे अपनाधन अधिक लगाने द्वारा इसकार्यकी सिदिमें तत्परहोरहे हैं-इनसबके पीछे सम्पादकभी निजशारीरक आयास वा उद्योग द्वारा भाव इसब्रह्म- द्वानमें कुछ पुण्यभागी होसक्लाहोगा क्योंकि जो उसने इतना उद्योग वाँधा तो वेभी सहायतापर उद्यतहुये किन्तु जो उद्योगमें आयास नहीं करता तौ,सहायताभी किस- की करीजाती २११॥ ; दानोंके करनेसे फल कहागया अब एकदशा ऐसीहै कि उसमें दानके न करने परभी दानका फल होताहै सो कहते हैं। प्रतिग्रहसमर्थोपिनादत्तेय प्रतिग्रहम् । येलोकादानशीलानांसतानाप्नोतिपुष्कलान् २१२ ।। ऐ०-जो मनुप्य प्रतिग्रह कहिये दानलेने में समर्थ अर्थात् दानलेनेकी योग्यता वाला पात्र भी है और जब कोई दान उसको मिलनेलगै उससमय वह न लेवे किन्तु नकार करदेवै तो जिस २ दानको मिलतेहुये उसने नहींलिया उसी उस दानके दाता- ओं को जो लोकफलभागितासे मिलते हैं उन सारेलोकोंको वहभी पाताहे-यथार्थ से यह बात सत्य है और इसी हेतुसे विरले देश या विरली जातिके ब्राह्मण आदि प्र. तिग्रह नही अंगीकार करते हैं २१२॥ मधि-ब्राह्मणादि कहनेसे इस यादि शब्दका यही सिद्धान्त है कि अन्यजा- तीय लोगभी क्षत्रिय आदि२०० की अधिकोक्ति व्यवस्था अनुसार उस प्रकारके प्र. तिग्रह जो उनको किसी प्रत्युपकार के हेतु से लेलेने योग्य हो जिनके लिये वे पात्र- भूत कहलासक्तेहें अपनी इच्छासे न लेवे किन्तु लेनेसे नकारकरदेव तो वेभी उसदान कैफलभागी होतेहैं जैसा ऊपर ऐक्यार्थमें लिखागया क्योंकि यथार्थसे जोवस्तुउनको लेलेनी योग्यहै तोउनकीहे कितु उसकेलेनेसे कोईभांतिकादोष उनको नहींलगसता था जब ऐसीवस्तुको उन्होंने मिलतेहुयेभी न लिया तो प्रत्यक्ष पुण्यहुया कि उनकी वहवस्तु जिसकिसीने भोगी तो वहींपुण्यहुया जो अपनेहाथमें बाजाने पाछे किसीको देदेनेमे पुण्यहोता-यहांपरप्रतिग्रह केवल उसदानकाहीनामनहींहै जो जलकुशकेसाथ १७४ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । कियाजाता किंतु किसीभांतिकादान२०७कीव्यवस्थाअनुरूप अपनेकोमिलताहोचाहे अपनाऋण किसीपराताहो चाहै किसीपरिश्रमका प्रतिकार कोईदेताहो या अपना धरतीआदिका हक किसीपरशेषहो सो सभी प्रतिग्रहरूपहै इसीलिये ऊपर मूलश्लो- कमें ब्राह्मण या क्षत्रियवादि कुछनामनहींखोला किन्तु केवल(प्रतिग्रहसमर्थोपि)यह लिखाहै सो इसीलिये हेतुगर्भितपद रक्खागया कि चाहैकोईहो और वह किसीहेतुसे कुछ प्रतिग्रहलेनेका अधिकारी किसीसे हुआहो और उसप्रतिग्रहको मिलतेहुये भी अपनीइच्छासे चाहैसवछोड़दे या उसमेंसे कुछभाग छोड़देवै तौ उसफलकाभागी हो जो उतनाधनअपनेहाथमें आजानेपीछे दानकरनेसे होनासंभाव्यथा-यतः(प्रतिग्रहणा तीतिप्रतिग्रहः) सिद्धांत से इसवा में इतनाभेद है कि जोवस्तु ठेठकर अपनेहकमें गिनतीथी जिसका लेलेना अपनेको योग्यथा उसके लेलेनेमें कछदोपनहीं बरनछोड़ देनेमें पुण्यप्रत्यक्षहै (परंतु) जो प्रतिग्रह ऐसाहो कियथार्थमें वस्तुकिसीभांतिसे अपनी नहींथी किन्तु जलकुशकेसाथ दानकरिकै कोईदेनेलगा तिसप्रतिग्रहके नकार करदेने में तो वही पुण्यहोगा जो उसकेदानीकोहोता क्योंकि उसको लेलेनेपरभी दानअपनी ओरसेकरदेते तौभी पुण्यहोता इसहेतुसे वहवस्तु अव अपनीमें गिनतीहोचुकी चाहे ली यान ली कुछइसका नियम नहींहै पर लेलेनमें यह दोषभागिता निःसंदेह अपने को लगैगी कि उसदाताके पापकाभागीहोनाहोगा इसीसिद्धांतसे उसप्रतिग्रहको हाथ में लेलेनेपीछे दानकरनेसे पुण्यनहींहोगा क्योंकि जितनापुण्यहोगा उस्से अधिक पूर्व दातृकापाप अपनेऊपर आरुदहुआ तो ऊँटमटीलाभी बरावर हुआ और प्रतिग्रह लेने का लांछन अपने को निःसंदेह लगा इससे पहलेसेही नकारकरदेना यह अपनी ओरसे निर्मलपुण्य ठहरा और उसदाताकोभी पाप नहींलगसक्ता जिसकादान इसने फेरदिया क्योंकि वह इसकेपलटे किसी औरको देवैगा-परन्तु इसआशय से पूर्वोक्त दाताओंको निःसंदेह उसग्रहीताके पापोंका भागीहोना होगा जिसका चर्चा यहां पर अभी पहले आयाथा कि वह अपनी योग्य वस्तुको भी मिलतेहुये सारी या कुछभाग उसमेंसे बोडदेवे तो दानका फलभागीहो-पुनिवेभी उसकेपापभागी नहींहोसक्तहें उस दशामें कि जितनाभाग उनपर किसी ग्रहीताने लेतेहुये छोड़दिया हो उतना किसी पुण्यकार्य में लगादेवै किन्तु अपने भोगोंमें न लावें २१२॥ अब उन प्रतिग्रहोंका चर्चा करते हैं जिनकालेना किसी दशाभी निपिद नहीं और न उनके लेलेनेसे कुछदोष वल्कि नलेनेसे दोप पैदाहोता है ।। कुशा शाकंपयोमरस्यागंधा.पुप्पंवपिक्षितिः । मसिंशय्यासनंधाना प्रत्यारस्ययनवारिच २१३॥ ऐ--(कुशा) प्रसिद्ध हैं-(शाक)तरकारी फल मूल कंद आदि कोईमी हो(पयः दूध जो केवल एकदिनके उठाचे योग्यहो-(मरस्या) प्रसिद्धाः परन्तु जिसको इनसे अपेक्षा हो- मिताक्षरा स० आचाराध्याय। 9g (गंधाः)सुगंधिवस्तु जोकुछदिवसोंके उठायोग्यहों-पुष्पं फूलमान पूजाआदिकेनिमित्त से-(दधि)दहीथोडासा प्रसादयोग्य यहा ब्रह्मभोज आदिके हेतुसे अधिकभी कदाचित (क्षितिः)अर्थात् मृत्तिकामात्र और कुछदिनोंके निवासयोग्य धरती और धरती सदा कोभी(माप्त परजिसको इस्से संबंधहो(शय्या)खाटआदि शयनकी वस्तुचाहै कुछ दिव- सोंको पारामयोग्य यहासदाकोभी-(भासन)विस्तर जो वैठने विछानेयोग्य सदाकोभी (धानाःबहुरीददरी होलेआदि हरितअन्नके बनायेहुये चाहेथोड़े या बहुतभी(धारि)जल यहचीजें जो कोई आपही विनामांगे लाकर उपस्थितकरै और प्रसादकी रीतिसे देने लगै किंतु संकल्पकीरीतिसेनहीं तो इनका लेलेनाउचितहै और फेरना या दुलखनकी रीतिसेकुछकहनाअनुचितहैअर्थात्प्रसन्नहोकरअनुग्रहकीदृष्टिसेलेलेनाचाहिये २१३॥ मधि-मनुजीके कथनसे इनकेसाथमैं औरभी कोई२ वस्तु पाईजातीहै-यथा-(गंधी दकंमूलफलमन्नमभ्युद्यतंचयत् ।सर्वतःप्रतिगृहणीयान्मध्वाज्याभयदक्षिणाम् )अर्थात्- गन्धसुगन्ध अपूर्वताकीरीतिसे-उदक जल किसीतीर्थका यद्वा मिष्टादिहेतुसे कूपकाभी या अलभ्यतामें किसीप्रकारकाभी-मूलफलजातिकी कोईवस्तु अलभ्य यहा सुलभ्य हो-अन्न जो आतिथ्यादिरीति या अपूर्व और नवीन जानिकर प्रसादकी रीतिसे कोई बिनामांगे देनेलगै-मधुसहत आदि जो सदाही अलभ्यमें गिनतीहै-भाज्य घृत गऊ आदि का जो सद्योत्थितादि हेतुसे प्रसादवत् समर्पणकरें किंतु बाजारसे खरीदकर दानादि कल्पनासे नहीं-अभयकर्म जो अपनीभयभीत दशामें कोई दयादृष्टिसे करने लगै-दक्षिणा जो महत्व वा पूज्यतासे सत्कारादिरीतोंद्वारादेव किंतु दानादि कल्पनासे नहीं- इसप्रकारसे उद्यतकरीहुई यहसारीचीजें प्रतिग्रहण करलेवै तौ प्रतिग्रहका दोप नहीं लगसक्ता किंतु यह संसारकी शिष्टाचारी मर्यादहै वरन इनके लेनेसे निपेधकर जानेमै उलटादोप लगताहै-क्योंकि जब कोईसज्जन बड़ेउत्साहसे कोई वस्तु तोफह या अपूर्व या प्रसादसमुझकर देनेभाया कि अमुकमहात्मा मेराउपहार वा उपायन अंगीकारकरें तो मुझकोभी कुछबड़प्पन शिष्टाचारी मध्येमिले और जब ऐसीदशामें उसने लेनेसे नकारकरके प्रसाद फेरमारा तो देनेवालेकामन कैसा कुम्हिलाकर छोटा सा होगया जानो एकप्रकारकी हत्यासीचढगईहो और अपनेमनमें उसने दुःखमान- कर यहभीकहा कियहमहात्मानहीं कोई अविवेकी है जोलौकिक शिष्टाचार नहींजानता सो यह इसके चित्तकी दुखमनी और हृदयगत कुवाक्य वा संकोचआदि उसकेपूर्व संचित पुण्यको हरिलेतेहैं जिसनेलेनेसे नकारकियाथा और संचितपुण्यका हरिजानाये हीपापकालक्षणहै-शास्त्रांतरेपि(शय्यांग्रहान्कुशान्गन्धानाऽऽपःपुप्पमणीन्दधिामत्स्या न्धानाःपयोमांसंशाकंचैवननिर्गुदेत्) अर्थात्- शय्या खाट जोसाधारणरीतिसे किन्तु शय्यादानकी कल्पनासेनहीं-गृहचाहेतिसरीतिसे-कुशा गंधवस्तु-यापःजल-पुष्पपूजr . १७६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। नादिनिमित्त और मालाआदि रीतोंसेभी-मणि जो दूरदेशी अलभ्य अपूर्व आदि ल- क्षणवाला सौगातके प्रकारसे देव-दधि दहीप्रसादचत्-मत्स्य जिसके योग्यहों- पयः दुग्ध-मांसजिसके योग्यहो-शाकतरकारीफल मूलादि इनको नहींत्यागे २१३॥ अवयागेइसी२१३श्लोकमैकहीहुईमर्यादामध्येकुछत्याज्यविशेपभी onrn. कहतेहें कि सबसे नहींलेलेना। अयाचिताहृतंग्राह्यमपिदुष्कृतकर्मणः भन्यत्रफुलटादपतितेभ्यस्तथाहिपः २१४॥ । ऐ०-अयाचित अर्थात् विनामांगे पाहतकहिये लायाहु किसीकरके कोईपदार्थ जिनकीचर्चा-ऊपर २१३ में आचुकीहे वह दुराचारीसेभी लेलेनाचाहिये पूर्वोक्तरीति के अनुसार परन्तु कुलटास्त्री.पंढकहिये नपुंसकादि पुरुपरपतित चांडालादिया जातिसेभ्रष्ट हुआचाहे स्त्रीहोयापुरुषा३तथा अपनाशत्र पुरुप स्त्री कोईहो४ इनचारों सेअन्यत्र अर्थात् इनकादिया पदार्थ उसरीतिसेभीनहीं लेनाचाहियेजोरीति २१३में कहीथी-नपुंसकमादिइसमादिशब्दसेगदयोनिपुरुपभीसंग्रहीतहे-तस्यलक्षणंचयथा- (स्वेगुदेऽब्रह्मचर्याद्यःस्त्रीपपुवत्प्रवर्त्ततासकुम्भीकइतिज्ञेयोगुदयोनिस्तुसस्मृतः२१४॥ । अभी इसवा में औरभी कुछ विशेषता नीचे कहते हैं। देवातिथ्यर्चनरुतेगुरुभृत्यार्थमेवच । सर्वतःप्रतिगृह्णीयादात्मवृत्यर्थमेवय २१५ ॥ ऐ०-ऊपर २१४ की कहीहुई मर्यादा अनुसार आईहुई वस्तुको फेरदेने से जिस गृहस्थीके नित्यकर्मधर्मामें हानि देखपड़तीहो उसको उनचारोंकाभी दियापदार्थ फेर देना अनुचितहै-अर्थात् देवता अतिथि इनकीपूजा सत्कार के लिये और माता पिता आदि गुरुओं तथा स्त्री पुत्रादि भृत्यवगी और निजात्माकी भी बत्तिकहिये आजी- वनकेलिये सभीतरहका जो कुछ मिलजावै सो प्रतिग्रहणकर लेवे किन्तु केवलपतित चांडाल, आदि अतिकुत्सितौका तो भी छोड़देव पर सिद्धांत इस्से यही है कि जो इतने कहेहुये मुख्यकारणों से कोईकारण प्रवलहो तो ऐसाकरना उचित है अन्यथा केवल अपने आत्माकेही निमित्तसे अनुचित है २१५॥ इतिदानधर्म प्रकरणम् ॥ अथ श्राद प्रकरणम् ॥ -अमावास्याप्टकावद्धिरूष्णपक्षोऽयनद्वयम् । द्रव्यंब्राह्मणसंपत्तिविपुवत्सूर्यसंक्रमः २१६ ॥ व्यतीपातोगजष्ठायाग्रहणंचन्द्रसूर्ययोः । आप्रतिरुचि चैवश्राद्धकाला प्रकीर्तिताः २१७ ॥ अक्ष सह-अमावास्या अष्टका द्धिकाल कृष्णपक्ष दोनों अयन द्रव्यकी प्राप्ति ब्राह्मण यथोक्त का मिलना विपुवती दोसंक्रति सूर्यकीसंक्रांत वारह-२१६ व्यतीपात योग गजछाया ग्रहणकाल चन्द्रसूर्य दोनोंका श्राद्धकेप्रति रुचिका उत्पन्नहोना यह सव श्राद्धकरनेके काल कहे हैं २१७ ।। - :- १७७ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । भभिः सह-इन दोश्लोकोंसे पार्वणश्राद्ध और वृद्धिश्राद इनके करनेकेकाल नि- श्चय करते हैं कि क्व २ इनको करना चाहिये पुनि इसी प्रसंगसे अन्यश्राद्धोंका भी चर्चा करेंगे-तहां अमावस किन्तु जिसदिन चन्द्रमा नहीं देखपड़ता तिसदिनमें भी यह श्राद्ध कियेजाते हैं परन्तु वह अमावास्या जब साठिघड़ीसे अधिक रदिपाकर दोनों दिनमें व्याप्तहो तब दो दिनमेंसे जिस किसीदिन अपराह्नव्यापिनी मिलसक्ती हो तिसदिन करै क्योंकि अपराह्न पितरोंका प्रसिद्धहै सो उस अपराहका यहलक्षणहै कि दिनमानके पांचभाग करिके चौथाभाग मुख्य समझना जैसे तीसघड़ीके दिनमान में दो २ घडीके १५ मुहूर्त्तहुये तिनमें तीन २ मुहूर्त्तके पांचभागहुये ऐसे तीनभागोंके उपरांत चौथाभाग जो तीन मुहूर्त यहा छःघटिकाकाठहरा तिसको अपराह्नकाल क- हते हैं इस अपराह्नकालके समयतक जिसदिन अमावसकी प्राप्तिहोसकै तिसमें श्राद्ध करै सो यह अमावस बारहोमासकी कही हैं जिस्से वनिश्रावै वारहमास निरन्तरकरौ अथवा एकदो अमावसमें अवसरके आधीन१ ॥ (मष्टका) चारप्रसिद्धहें हेमन्त और शिशिर इन दो ऋतुके चारमासमें कृष्णपक्षकी अष्टमीतिथि अष्टका कहलाती हैं तिनमें श्राखलायनऋपिके मतसे श्राद्धकरने का माहात्म्य अधिकहै २॥ (वृद्धिकाल) अर्थात् पुत्रजन्म आदिसमयमें जो श्राद्द कियाजाय वह वृद्धिश्राद्ध कहलाताहै आदि शब्दसे पुत्रका विवाह या द्विरागमन आदिभी अपेक्षितहै क्योंकि उनमेंभी एकमनुष्य की रद्धि घरमें होजाती है अन्यथा यज्ञोपवीत आदि जिनमें मनुष्यकी रद्धि नहींहोती पर उनमेंभी संस्कार विशिष्ट जातित्त्वकर्म धर्मोकी वृद्धि मंगलकीसद्धि पुण्यकी वृद्धि हुआ करतीहै इसलिये यह सवकालरद्धि श्राद्धकेप्रसिद्ध हैं ३॥(कृष्णपक्ष) भी पितरों का पक्षकहलाताहे इसलिये सदैव कृष्णपक्षोंमें चाहे तिसदिन पार्वणश्राद्ध करौ यद्वा उसपक्षमें अपने किसी पितर विशेपकी तिथिमें पार्वणकरौ चाहै समर्थहो तो रोज २ करौ पर संयोग और वानकके आधीन है ४॥ (अयनद्दयम्) अर्थात् उत्तरायण दक्षि- गायनकेसूर्य जिसदिनपलटतेहें वहदिन पार्वण यहा द्धिश्राद्धकेलिये परमपुनीतहे५॥ (द्रव्यम्) अर्थात् जो २ द्रव्य श्राद्धके लिये उत्तम कहलातेहैं उनमेंसे कोई द्रव्य जिस दिन मिलजावै वही दिन श्राद्धकरनेका मुख्यकाल होजाताहै फिर उसमें किसीपर्व या पनीतकालकी अपेक्षा शेप नही रहती (दृष्टांत) जैसे कृष्णसारनाम मृगमांसके पिंड देनेका अनन्तफल शास्त्रोंमें कहाहै और जिसको इसघातकी अपेक्षा किसी मर्यादा से दृढ़हो कि मेरे पितर मांस पिडासे अतिशय तृप्तहोंगे ऐसे पुरुषको जिस किसीदिन वह अलभ्यमांस मिलजावे उसीदिन श्राद्धकरनेका मुख्यकाल है ऐसे अन्यद्रव्योंके भी मिलजाने पर समझलेना ६॥ (ब्राह्मणसम्पत्ति) अर्थात् जिसप्रकारके ब्राह्मण श्राद्धमें अपेक्षितहोतेहैं जिनकाचर्चा श्रागे २१८ । २१९ । २२० । इनतीन श्लोकों मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । में आवेगा ऐसे अलभ्य ब्राह्मण जवकभी मिलजावें या यथोक्त विधिसे करानेवाला प्राचार्य जवकभी मिलजावे चाहै श्राद्धके कहेहुये काल उसदिन नहींभीहों परउस अवस्थामें वहीकाल मुख्यहोजाताहै ७ ।। विषुवत् । अर्थात् विपुवती नामकी दो सं- क्रांत प्रसिद्ध है उत्तरायण में मेप संक्रांति दक्षिणायन में तुलाकी संक्रांति इनमेंभी श्रादका माहात्म्य अधिक उत्तम है - ॥ सूर्यकी संक्रांतें जो प्रत्येकमास पीछेआया करती हैं वह भी श्राद्धका उत्तमकाल है-यद्यपि संक्रांति कहनेसे दोनों अयन और दोनों विषुवतीभी आगई परंतु साधारण संक्रांतोंकी अपेक्षा उनकाफल अधिक प्र- कट करनेकेलिये भिन्न कथन है २१६ (यतीपात ) जो २७ योगोंमें एक योग विशेष प्रसिद्धहै वहभी श्राद्धकालहै ९॥ गजच्छाया) यद्यपि कोई२ पुरुष हाथीको छायामही श्राद्द करने को गजच्छाया मानते हैं परंतु यहांपरकालके प्रसंग से वह्वात अप्रसंग है किंतु यह योग इसमें यथार्थ घटता है कि-(यदेन्दुःपिदैवत्येहंसश्चैवकरेस्थितः। याम्यातिथिर्भवेत्साहिगजच्छायाप्रकीर्तिता)-अर्थात-जब चंद्रमा पितृ देवत्य कहिये मघा नक्षत्रपरहो किंतुमघाजिसदिनहो और हंसजो सूर्यहेसोकरनाम हस्तनक्षत्र पर स्थित हो और ऐसी मघाके दिवस याम्यातिथि अर्थात् त्रयोदशीभीहो तो उसदिन गजच्छाया योगजानौ परंतु इसमें कृष्णपक्षकीभी अपेक्षा है क्योंकि पितरों का पक्ष वह विख्यात है और यही गजच्छाथा योग (सत्यचिन्तामणि) में भी कहा है तहां प्र- त्यक्ष भावसे कृष्णपक्ष कहदियाहै-तथाच-(कृष्णपक्षेत्रयोदश्यांमघास्विन्दुःकरेरविः। यदातागजच्छायाश्राद्देपुण्यैरवाप्यते)-अर्थात्- यह गजच्छाया योगश्राद्ध करने के लिये पूर्व पुण्यों के उदयसे मिलसलाहे किसी बड़भागी को-इसके सिवाय गजच्छा- या योग और भी अनेक प्रकारके शास्त्रों में जहां तहां कहे और वे भी श्रादसे सं- बंधरखते हैं उनकाचर्चा देखो नीचे अधिकोक्तिम १०॥ (ग्रहणं) अर्थात् चंद्रसूर्यदोनों का उपराग जो राहु करके होताहै वहभी आदकरने का पर्वरूप एककाल है ११ ॥ इनके सिवाय विनाकालके भी जवकभीश्राद्धकरनेकी श्रद्धाउत्पन्न होनेसेरुचि पाजावे तभीकरौ किंतु वहभी एक पर्वकालहे १२॥ यह सव श्राद्धकाल विशेषता करके कहे हैं इनसे यह सिद्धांत भी अपेक्षित है किजिसकिसी कर्त्ताको जिसदिन अपने किसी पितर विशेष का श्राद्ध करना आवश्यकथा वह किसी प्रतिबंधके हेतुसे न होसका तौ पीछे उक्तकालोंमेंसे जो कोई काल समीप आजावे उसमें करदेना उचित है २१७॥ अधिः-अष्टका यद्यपि इसके अभिप्रायार्थमें दोऋतुओंसे चार अष्टकाकहे हैं और पहले किसी स्थलपर शास्त्रांतरसे पोषादि तीन मासोंकी कृप्पाष्टमी द्वारा तीन अष्ट- का सिद्धहुयेथे परन्तु वे तीन तो पूपाप्टका १ मांसाप्टका २ शाकाटका ३ इनभेदोंकी विशेषविधि परकहेहूँ और यहां पर साधारण भावसे श्राहकापर्वकाल निश्चितकिया मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । १७९ है-इस्से दोनोंठीकहें विरुद्ध नहीं-अथ अन्यान्यपिगजच्छायालक्षणानितत्रैकंलक्षणं दर्शापराह्नकालएवगजच्छाया अर्थात् एकलक्षण तो अमावास्याके दिवस अपराह्न कालगजच्छाया कहलाताहे-तद्यथा(हिंगणाह्यात्मनश्छायादशेस्यादापराहिकी। गज च्छायेतिसाप्रोक्तापितॄणांतृप्तिकारिणी)अर्थात्-अमावसके दिवसठीक २ जिससमय अपने शरीरकी छाया यातपमें खड़ेहोनेसे दूनी अपने शरीरके परिमाणसे लंबीआ- जावे वहछाया आपरालिकी कहलातीहै पुनिवही गजच्छायाभी कही है और पितरों की तृप्तिकरनेवाली होतीहै। अथद्वितीयलक्षणं-यथा(अमावास्यांगतेसोमेछायाया प्राङ्मुखीभवेत् । गजच्छायातुसाप्रोक्तातत्रश्राद्धप्रकल्पयेत् अर्थात-अमावसमें सोम- वार आजानेपर जिससमय अपने शरीरकी छाया श्रातपमें खड़ेहोनेसे प्राङ्मुखीहो जावै किंतु पूर्वकी अोरको सीधी चलीजावै वहीगजच्छायाभी कहलातीहै उसीसमय श्राद्धकी कल्पनाकरै तो पितरोंकीतृप्तिहो॥अथवराहोक्ततृतीयलक्षणं-यथा सैहिकेयो यदाभानुग्रसतेपर्वसंधिपु।गजच्छायातुसाप्रोक्ताश्राद्धंतत्रप्रकल्पयेत्)अर्थात्-सैहिकेय नामराहुजय पर्वकी संधियों में सूर्यको ग्रसताहै वहसमयभी गजच्छाया कहलाताहै उससमय श्राद्धकी कल्पनाकर तौपितरोंकी अधिकतृप्तिहो-यद्यपि चंद्रसूर्यग्रहणे भो- जनस्य निषेधस्तथापिभोक्तःपोदातुरऽभ्युदय इतिमिताक्षराकारः किन्त्वस्मन्मतेभो जनस्यनिर्विकल्पनिषेधान्नतत्रभोजनावसरः भोक्नुरपिदोपापत्तिप्रसंगलक्षणयालोका तिगर्हितत्वाञ्चकथंदातुरभ्युदयः यत्रस्वाचारेपिपरस्यपूर्वपुण्यविनाशकत्वावयविदोपा पत्तिस्तत्रनकस्यापिद्वयोःश्रेयइतिनिर्विकल्पान्मैवं-किंतुग्रहणकालमें श्राइमात्र करना संसूचितहै और भोजन उसके पश्चात निर्दोपता प्रकटहाने पर संभवितहै क्योंकि मूलवाक्यों में भी कहीं भोजनकी आज्ञा नहीं पाई जातीहै-यद्यपि भोजनभी सिद्धांत श्राद्धरूप निश्चितहै उसअवस्थामें कि जवयथोक्तविधि अनुसार श्राद्ध कियाजाय परन्तु वहह्वात असंसाध्यहोनेसे वावेमें नहीपाती किंतु कुशाओंके पितर औरत्रा- माभी बनाकर श्रादकरनेका प्रचार अव निर्विकल्पहै इसहेतुसे ब्राह्मण भोजनका कर्म पिंडदान क्रियाओंसे भिन्नवत् समझा जाताहैया मतसमझाओ तथापि देशका- ल दोपादोप ग्राह्याग्राह्य प्रयोजनादिकी व्यवस्था अनुसारसर्वथा अनुचितहै किन्तु ऐसापुण्यभी स्थाहै जिस्से किसीके पुण्य और प्रतिष्ठामें हानिहो ध्यानधरौ कि जब अग्रोक्त २१८।२१९।२२० श्लोकोंके अनुसार तो श्राद्धमें ब्राह्मण चाहिये जिन्होंने कैसी २ विद्या वा तपस्या वा त्यागादिके साधनसे उतनी बड़ी योग्यतापाई फिर वेही जवग्रहणमें परान्नखाने लगेंगे तब क्या पतित नहोजायँगे जोकहो कि होजाओ हमें अपने कामसे कामहै तो निश्चितहुया कि एकवेरखवाकर फिर उनसे कुछकाम नहीं रक्खोगे किंतु अन्यदशाओम और ब्राह्मण ढूंढलियेजावेंगे और उनकोभहरि- १८० मिताक्षरा स० आचाराध्याय। योंमें मिलादिया जावेगा इस्से अगर मिताक्षराकार यहभी लिखदेते कि ग्रहपामें श्राद्धकरै तौ भरियोंको जिमावै क्योंकि उनकायहकामहै और जैसीदशाका'वहकाम है तेसेही वे भोक्तापात्रहें तौहमभी उनकेइसलेखको मनोज्ञकरसक्त----श्रादनामइस्से है कि श्रद्धारूपीप्रेमसे खानेपीनेकी कोईवस्तु या उसके स्थानकुछरोक द्रव्यकिसीप्रे. तके नामसे श्रद्धापूर्वक दियाजाय यह तो श्राद्धका स्वरूपहे सोयही-श्राद्धदोप्रकारका होताहै एक तौ (पार्वण)जो तीनपुरुपोंके नामसे किंतु बाप दादा परदादा या नाना पर- नाना सरनाना इनकेनिमित्तसे एकसाथ किसीपर्वमेकियाजावै इसलिये उसको पार्वण कहतेहैं दूसरा (एकोद्दिष्ट) उसे कहतेहैं जो एकही किसी प्रेतकेनामसे उसकी तिथिमें या तिथिकेबदले और किसी शास्त्रोक्षकालमें कियाजावै-फिर येहीदोनोंश्राद्ध तीनरप्रका- रके होतेहैं अर्थात् नित्यं १ नैमित्तिकं २ काम्यं ३ क्योंकि जो नियतनिमित्तकी उपा- धिसे बारम्बार उसीनियतसमयपर कियेगये तो (नित्य) कहलाये जैसेहर अमावसको या सदाकी अष्टकाओंमें या प्रतिसंक्रांति या प्रतिवर्प उसकी तिथिमें इत्यादि नाना लक्षण (नित्य) के जानौ-और जो अनियत निमित्तकीउपाधिसे वहसमय श्रापरनेपर हीकियेजायँतौ (नैमिनिक)जानौ जैसेपुवजन्मादि दैवयोगमें और जोफलकामनाकी उपाधिसेकरना कहाहो वहकियाजावै सो (काम्य) जानो जेसेस्वर्गफल आदिकीकाम- नासे कृत्तिकादि नक्षत्रों में करना कहाहै या कियाजावै अथवा घरकी प्रेतबाधाआदि शांतकरनेकी कामनासे या संतानादि होनेकी कामनासे इत्यादि-फिर येहीश्राद्धपाँ- चविधिके कहलातेहैं अर्थात् एक तौबहरहःश्राद१ पार्वणश्राद्ध र द्धिवाद३ एको- द्दिष्टवाद ४ सपिंडी करणश्राद्ध ५ तहां अहरहः श्राद्ध कहिये रोज २ दिन दिनप्र- तिमामूली जो कुछ पितरोंके निमित्तसे कियाजाय जैसा १०४ के श्लोकमें पहलेअदा से कहचुकेहैं कि-( अन्नंपितृमनुप्येभ्योदेयमप्यन्वहंजलम्) सोई मनुजीनेभी यहकहा है कि-(दद्यादहरहःश्रादमन्नाद्येनोदकेनका । पयोमलफलैपिपितृभ्यःप्रीतिमक्षयाम्) अर्थात-दिनदिन प्रति अन्नादि से वा जलसेही या दूध और मूलफल आदि चीजों सेही श्राद्धदेवै तौ पितरों की अक्षय प्रीतिपावै-शेपनाम सब श्रादोंके स्पष्टहें जिनका चर्चा पहले भी आचुका और इन पांचकी गणनामें फिराया है २१६ । २१७॥ अवयागे तीनश्लोकोंसे श्राद्धकी संपत्ति रूपभोक्ताजनोंका लक्षणकहते हैं कि ऐसें। ब्राह्मणादि भोक्ताहों सो यहसंपत्ति विशेषकर चारप्रकारके श्रादों में समझनी- र्थात् श्रादोंके पांचप्रकार जो ऊपर कहचुके, तिनमेंसे पहलाजो (अहरहः) श्रा- दकहलाताहै उसमें कुछइसघातकीअपेक्षानहहि और जो उममेंभीकिसीदिवस ऐसाबानकवनियावे तौअधिक अच्छीवातहकिंतु-अधिकस्यत्यधिकंफलम्॥ भग्या सर्वपुर्ववेपुनौत्रियोब्रह्मपियुवा । वेदार्थविज्येष्ठ सामानिमधुखिसुपर्णिकः २१८ ॥ - . मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। १८१ ऐ०-सर्वेषुवेदेषु (अग्याः) अर्थात् सभीवेदों में अग्रणी हों इसप्रकार से कि एकाग्र मनोरत्ति सहित निरंतर निर्भग पांठकरसक्तहों-दूसरे (श्रोत्रिय) अर्थात् श्रुताध्ययन संपन्न किन्तु अध्ययन तौ पढ़ना और पढ़े पीछे विद्वानों के वार्तालाप द्वारा अति- कालताई श्रवण करते करते पढ़ेहुये का सिद्धांत और उस्सेभी उपरांत अनेकशास्त्रों वा संसारसागर का तत्त्वसार निज हृदयमें हस्तामलकवत् समाश्रित करलेना यह दोनों बात जिनमेंहों वे श्रोत्रिय यद्वा श्रुताध्ययन संपन्न कहलाते हैं या ऐसे समुझ लेना कि श्रुत कहिये परमज्ञान और अध्ययन पढ़ना इनसे संयुक्त हों सो इन दोनों प्रकारोंसे तात्पर्य एकही है-तीसरे (ब्रह्मवित्) कहिये ब्रह्मके जाननेवाले सोउसब्रह्मका स्वरूप आगे इसी शास्त्र में यथावत् कहा जायगा-चौथों लक्षण (युवा) अवस्थाहै सो सभी लक्षणवाले के साथ चाहिये किन्तु पूर्वोक्त यहा अग्रोक्त सभीब्राह्मण युवाहों अर्थात् अति वालक या अतिबूढ़े शिथिलेन्द्रिय नहीं-पांचवें किन्तु चौथे (वेदार्थवित्) उन्हें कहते हैं जो वेद के अंगभूत मंत्र और ब्राह्मण प्रसिद्ध हैं तिनके अर्थ जानते या लगासक्ते हों-पांचवें (ज्येप्टसामा) उन्हें कहते हैं कि ज्येष्ठसामा नाम सामविशेष किन्तु सामवेदका एक अंगहै तिसके पढ़ने में जो २ ब्रत उसकी सांगता में गिनती हैं उनव्रतों के आचरण सहित उसको जो पढ़ता है वहभी ज्येष्ठसामा कहलाता है- ऐसेही छठे (निमधु) नाम ऋग्वेद का एक स्थल है उसके भी पढ़ने में जो २ व्रत नियम कहे हैं उनव्रतों की साधना सहित जो कोई उसको पढ़े यह त्रिमधु कहलाता है-ऐसेही सातवें (त्रिसुपर्णिक) वे हैं कि जिन्होंने त्रिसुपर्ण नामएक देश यजुर्वेद का उ- सके व्रताचरणों सहित पढ़ाहो-यह इतनेलक्षणवाले ब्राह्मण श्राद्धकीसंपदाम गिनती हैं यह योजना २२० के श्लोकमें से हुई २१८॥ स्वस्त्रीयऋत्विग्जामातृयाज्यश्वशुरमातुलाः। त्रिणाचिकेतदौहित्रशिप्यसंबंधिवांधवाः२१६॥ ऐ०-(स्वतीयः) भान्जा-(ऋत्विक्) जिसकेलक्षणा पहलेभी किसीरस्थलपर कईबार कहचकेहें-(जामातृ) जमाई-(याज्य )जो कोईअपना पूज्यहो-(श्वशुर) ससुरा-(मातुल) मा- मा-(त्रिणाचिकेत) उसे कहतेहैं जो त्रिणाचिकेत नाम एकस्थल यजुर्वेदका उसके व्रता- चरणों सहित अध्ययनकरै-(दौहित्र) धेवता-अपने शिष्य संबंधी वांधव येभीसवश्राद्ध की संपदाम गिनतीहैं २१९॥ कर्मनिष्ठास्तपोनिष्ठा पंचाग्निब्रह्मचारिणः । पितृमातृपराश्चैवब्राह्मणा श्राद्धसंपदः २२० ॥ ऐ०-(कर्मनिष्ठाः) अर्थात् शास्त्रोंमें कहेहुये कर्मधर्मों के अनुष्ठानमें तत्परहों-(तपो. निष्ठा.) तपमें शीलरखनेवालेहों-(पंचाग्निः) पांच प्रकारकी अग्निसेवन करनेवाले अ- थात् पट्प्रकारकी अग्निमेंसे एक गार्हपत्य अग्निको छोड़कर शेषपांचोंका सेवनकर सोपंचाग्नि यहा पंचाग्नि विद्याकोही पढ़ाहो-(ब्रह्मचारी) दोप्रकारकेहोते. एकतीउप- . १६२ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। कुर्वाणजोअवधि सहित ब्रह्मचर्य धारणाकरके विद्यासंग्रहकरे दूसरा नैष्ठिकब्रह्मचारी इनदोनोंके लक्षण मर्यादापरिपाटीके श्रादि खंडमें कहचुके हैं-(पितृमातृपराः) यर्थात जो माता पिताकी सेवाटहल श्राराम रक्षा पालन आदिमें व्यसन पूर्वक तत्परहों ये भी सब श्रादकी संपदाकही हैं और भी ब्राह्मण शब्द यहां पर फिर कहनेसे पूर्वोक्तों के अभावमै यहा उपस्थितिमें भी उनके उपरांत कोरे ब्राह्मणभी दर्शाये गये किंतु यह शब्द किसीका विशेषण नहीं है २२०॥ अव यहां पर जो वर्जितहे तिनके लक्षण ३ श्लोकोंसे कहतेहैं। रोगीहीनातिरिक्तांगःकाणापौन वस्तथा । अवकीर्णीकुंडगोलौकुनखीश्यावदंतकः २२१ ॥ ऐ०-(रोगी) जो प्रसिद्ध महारोगोंसे ग्रसितहो-(हानातिरिक्तांगः) कोई अंग जिसकेदेह में हीनहो यहा अधिकहो जेसे छःउंगली या गूमड़ा बतोड़ा श्रादि-(काणः)काना एकाक्ष (पौनर्भवः) अर्थात् पुन स्त्री जिसके लक्षण विवाहके प्रकरण ६७ के श्लोकसे कहचु- कहें तिसका पुत्र सो पौनर्भव-(मवकीर्णी) उसे कहतेहैं जिसने ब्रह्मचर्यकी धारणामें स्खलन किंतु वीर्यका विध्वंस किया-कुंड १ गोलक २ इन दोनोंके लक्षण परदारामें उत्पन्नहोना प्रसिद्धहै किंतु पतिके जीवतेहुये अन्य परुपतेहो सोतोकुंड और पर्तिकेम- रेपीछे गर्भमें यावे सो गोलक-(कुनखी)जिसके नखसंकुचित होकर बिगड़जावें-(श्यावद- तक)जिसके दांत जन्मके साथही कालेहों और वहभी कि जोपीड़ा विना मिस्सीयादि से रंगै यह इतने निदितहें यहयोजना २२३ में से हुई २२१ ॥ भृतकाध्यापकःवि कन्यादृप्यभिशस्तकः । मित्रधुपिशुनःसोमविक्रयीपरिविन्दकः २२२॥ ऐ०-(भृतकाध्यापक)जो वेतन लेकर पढ़ावे-(कोच)नपंसक-कन्यादपी)जोभले बुरे दो- पौसे किसी कन्याको कलंकलगावै-(अभिशस्त) उसेकहतेहैं जो ब्रह्महत्याग्रादिसेयुक्तहो (मित्रधुक्) जो मित्रद्रोहीहो-(पिशुन)जो परायेदोष प्रकटकरनेका स्वभावरखताहो-(सोम- विक्रयी) जोयज्ञमैसे सोमवेंचै यहाअमृत वेंचनेवाला अर्थात् जोअन्नादि अमृत वस्तु को ब्राह्मण वेंचै तौ अमृतविकयी या सोमविक्रयी कहलावै-(परिविन्दकः) परिवेत्ता जो जेठे भाईसे पहले विवाहकरलेवै या अग्नि'परिग्रह जेठेसे पहले बोटा करलेवै ये भी इतने निपिद्द हैं २२२॥ अधि०-परिवत्ता और परिवित्तिदार संग्रहके सिवाय अग्नि परिग्रहसेभी होते हैं सोई मनुजीने यहकहा है कि (दाराग्निहोत्रसंयोगं यःकरोत्यग्रजेस्थिते । परिवेत्तासवि ज्ञेयः परिवित्तिस्तुपूर्वजः)अर्थात् दारा या अग्निहोत्रका संयोग जो कोई छोटाहोकर जेठेसे पहले करताहै वहपरिवेत्ता जानना चाहिये और परिवित्ति दोपवाला वहजेठा. कि जिसने अपने होतेहुये ऐसाहोने दिया-ऐसेहीकन्याका दाता जिसने दानकरी वह (परिदायी) दोपवान् कहाताहै और याजक जिसने फेरेकरवाये वह (परियष्टा) दोपवान मिताक्षरा.स. श्राचाराध्याय। १८३ कहाताहै-और वह कन्याजिसकादानया परिग्रहहुआसो (परिवदेनी)दोपवतीकहलाती है ये सभी नरकभागी होते, (तथाच) (परिवित्तिःपरीवेत्ताययाचपरिविद्यते।सर्वतेनरक यांतिदातृयाजकपंचमाः)इस्सेइनकोआदमें भोजनकरवानेवालेकोभीअतिदोपहे२२२ । मातापितृगुरुत्यागीकुण्डाशीपलात्मजः । परपूर्वापतिःरतेनःकर्मदुष्टाश्चनिंदिता.२२३॥ ऐ-जो कोई किसी परम वलवान् कारण बिना माता पिता गुरुओंको त्याग देवे यह और (कुंदाशी) जो कुंड या गोलक इनका अन्नखावे और (कृपलात्मज)यर्थात् टप- लकहिये अधर्मी जो अपने जातीधर्मको न माने या जातीधर्मकी निंदा किसीरीतिसे भी करताहो किन्तु किसीरीतिसे धर्मको पीड़ादेताहो उसकी संतान सो.पलात्मज और (परपूर्वीपतिः) अर्थात् पिछला और पहला ऐसेदोपति जिसस्त्रीकेहों तिसकापति परपूर्वापति कहलाताहै किन्तु उन्हींदोमेंसे कोई एक और (स्तेनः) जोविनादिये किसी की कोईवस्तु किसीरीतिसे हरिलेताहो और (कर्मदुष्टाः) अर्थात् दुष्टकाँके करनेवाले जोशास्त्र विरुद्ध आचरणवान्हों और (च) शब्दके अभिप्रायसे कितव देवलका- दिभी मनुके कथनसे अपेक्षितहें येभी इतने श्राद्धविषयमें निन्दित, २२३॥ ..भधि०-(फिलय) छलियाको खलको द्यूत आदिखेलनेवालेकोभी कहते हैं और (देव- लक) जो जीविकादि निमित्तसे प्रतिमाओंका परिचार वा स्थापन वा पूजनादिकरें और औरोंकोभी प्रोत्साहितकर अर्थात् पुजारीजी इतिभापा प्रसिद्ध पेशेवाले-सोई मनुजीने यहकहा कि(चिकित्सकान्देवलकान्मांसविक्रयिणस्तथा। विपणेनचजीवंतो वाःस्युहव्यकव्ययोः)अर्थात्-चिकित्सकजोचिकित्सासे जीविकाकरें-देवलक मठोंके पति किन्तु पुजारी-मांसविकयी और जो दूकानदारीकी जीविकाकरतेहाँ ये सर्वप्र- कारके ब्राह्मण-हव्यकहियेदेवकर्म और कव्यकहिये पितृकर्म इनदोनों में वर्जितह-यौर मांसविकयी वह कहलाताहै कि जो ब्राह्मणहोकर कोई गेसी जीविकाकरे जिसमें मां- सवेंचनेका अभिप्राय किसी अाशयसेभी पाया जाताहो क्योंकि सनावसे प्रत्यक्षमां- सकाविकय कोई तुच्छ ब्राह्मणभी नहीं करताहे जिसकेलिये यहनिपेध लिखाजाता इस्से वहीहेतु मुख्यहै कि किसी लक्षणाकी ध्वनिसे मांस विक्रयका अर्थ जिसपर घट- ताहो वहमांस विक्रयीहे दृष्टांत जैसे कवतरोंको पालना और उनके अंडे था बच्चे ऐसे मनुप्योंके हाथवेचना जो मांसभक्षीहों तो यही मांसका विक्रयकरना उनपर निश्चित हुया इसी प्रकार और भी अनेक लक्षण जानी-देवलकोंका निषेध यहमनुजीका कि- याहुयाहे और वर्तमान समयके लोगवहुधा देवलको कोही अन्य ब्राह्मणों की अपेक्षा उत्तमसमुझकर श्राद्दमें ढूंढरकर बुलाते हैं इसीलिये याज्ञवल्यजीने इनका निषेध नहींलिखा कि जिसवातकी परिपाटी परगई उसकानिपेधभी क्योंकरना किंतु यह्वान उसीसमयमें निपिद समुभीजातीथी और यहभी है कि जय श्राधुनिक समयमै उस मिताक्षरा.स. आचाराध्याय। प्रकारके योग्य ब्राह्मण मिलते नहीं फिर देवलकों कोभी नहीं बुलावै तौ और कहांसे आसक्तेहैं इसलियेवेही अव ग्राह्यों में गिनती होगये-शास्त्रवताने २१८ से लेकर तीन श्लोकोंमें ग्राह्य ब्राह्मणोंका चर्चालिखा उसीसे प्रयोजन सिद्धहोचुकाथा फिर २२१ से लेकर तीनश्लोकोंमें निपिङ ब्राह्मणोंकाचर्चा जोकिया तिसकी कुछ आवश्यकता नहीं रहीथी परन्तु यह निषेध इसी अपेक्षासे लिखागयाहै कि जब पूर्वोक्त योग्य ब्राह्मणों का मिलनान होसकैतव अन्यसाधारण ब्राह्मणभीनिमंत्रितकियेजाय तिनमें ऐसाकोई न हो जिनका निषेध यहां पर होचुकाहै तीनश्लोकोंसे-(भेद२) इसव्यवस्थासे आधु- निक समयमें देवलकभी लाचारी अवस्थामै ग्राह्यहुये क्योंकि याज्ञवल्क्यजीने समय का.रूपक देखकर उनके लिये ग्राह्यताभी नही लिखी और त्याज्यताभी नहीं लिखी केवल बीचके साधारणोंमें रखदिये इस्से श्रेष्ठोंके अभावमै वेही न्योतदियेजातेहैं और मनुजीने जब इनकेलिये निषेध लिखाथा तब उससमयमें श्रेष्ठ ब्राह्मण बहुतसे मिल सक्तेथे और देवलक आदि पाखंडी लोगविरले होतेथे क्योंकि प्राचीनसमयमें माठा- पत्यकाकी जीविका निन्द्य और वेदशास्त्रसे बिरुद्धभी समुझकर कोई नहींकरताथा अद्यापि अवधिसम्बन्धी देशोंके ब्राह्मण माठापत्य नहींकरते परएतद्देशीय गौड़ादि विप्र उसके बिना अपने जन्मकी सुफलता नहीं समझते वरन,जिसकुलमें या जिस घरमें मठपरिचर्या नही होती उसको अन्यलोग और वह आपभी अपनेको मंदस- मुझता इसलिये जिसघरमें पहलेसे शून्यताभीहो उसमें कोई ऐसाउद्योगी पैदाहोजा- ताहै कि ज्यौ त्यों कर छोटामोटा मठमन्दिर अपने आजीवनका हेतुखड़ाकरलेता वही कुलदीपक गिनाजाताहै फिरचाहै वह साक्षरहो वा निरक्षर तथैव आचार सुकर्मों वा कुकर्मोंकाभी रखताहो कुछ इसपरदृष्टि नहीं करीजाती किंतु वह प्रतिष्ठितोंकी श्रेणी में आजाताहै-जिस्से कुछभी नहींबनियाता वह इतना तो अवश्यकरताहै कि अपनेरहने के मकानमेंसे एककोठेमें लीप पोत कुछ सिहासनादि उपकरण स्थापितकरके ठा- कुरद्वारानाम रखलेताहै अगर मकान नहीं भाडेकी दूकानहो तौभी ऐसाकरलेना यह उसकुलमें अहोभाग्यता समझी जातीहै-इसके सिवाय जिसके पौरोहित्यत्तिके दश बीसघरभीहों तो वह परमभाग्यवंतोंमें गिनाजाता और विर्सेवाला कहलाताहै जिस पौरोहित्यके लिये शास्त्रमें कहा कि (पौरोहित्यकर्मगीचलोके) अर्थात-(च)शब्दसे शास्त्रके सियायलोकभी पौरोहित्यकर्मनियह-तात्पर्य इसकाकेवल यहीहै कि यह मठ मंदिरादि दृत्ति तीर्थवासियों और योगी वैरागियोंका आचरणहोताहै ग्रहस्थीके लिये शास्त्रोक्त विधिसे देवाराधन और निर्मलत्ति उचितहै क्योंकि जोदेवलक लक्षण संबं- धिनी वृत्ति या आचरण उसका द्विजातीको उचितहोता तो श्राचाराध्यायमें कही तो उसका चर्चााता बल्कि एकबड़ालंबाचौड़ा प्रकरण उसका सबसे भिन्नहोनाचाहिये । यहां का धप पाठ अगले नम्बर में दवा मिताक्षरा साचाराध्याय। १८५ था जैसे अन्य प्राचारोंके प्रकरण भिन्नभिन्न क्रमसे कहतेचले आतेहैं और निषेधके लिये यही प्रमाण उसमें यथावत् संभवितहै जोउसकर्मके कर्ताओंकोभीश्राद्धविधिके भोक्तृत्वसे वर्जितकरदिया और उसकर्म संबंधी नामका विशेपणभी यथार्थसमुझकर दियागया-किन्तु-पूजायाअरिःपूजारिः तद्भापायामपभ्रंशेपुजारीयदरिवत्पूजनार्थमाग तान्द्रव्यानत्तीति (भेद३)इसीश्लोकमें सबसेपहलेमाता पितृगुरुत्यागीजोनिपिद्धलिखा था उसके साथमैं भार्या या पुत्रादिकोंका त्यागीभी संग्रहीतहै किन्तु वहभी गुरुत्यागी में गिनतीहै जो भार्या अथवा पुत्रादि भृत्यवर्गोंको बिना किसी प्रबलहेतुके त्यागिदे- वै-तथाचधर्म (टदौचमातापितरौसाध्वीभायासुतःशिशुःअप्यकार्यशतंकृत्वा भर्त्तव्या मनुरब्रवीत्)अर्थात्-बूढीअवस्थाकमाता पिता और भार्या साध्वी कहिये सुशीलाव्य- भिचारहीना और शिशु अवस्थाकापुव जो अपने आप अपना पालन करने में अ- समर्थहो यह इतनेसभी भरनेयोग्यहें चाहे शतधा अकरणीय कर्मोंसेभी धनलावै पर इनका पालन अवश्यकरै इनको त्यागै नहीं और जो त्यागदेवै वही अधर्मीहे उसको श्रा में जिमानेसे पितरोंकी तृप्तिमें न्यूनता होतीहै २२३॥ यहांतक श्राद्ध करने के काल और ब्राह्मणोंकी व्यवस्थाभी कहीगई अवनीचे पार्वणनाम श्राद्धकरनेका प्रकार बतलातेहैं। निमंत्रयेतपूर्वेद्युाह्मणानारमयानशुचिः। तेश्चापिसंयतैर्भाव्यमनोवाकायकर्मभिः २२४॥' ऐ०-श्राद्धकत्ती एकदिन पहले शुचिहोकर और आत्मवान अर्थात् शोक उन्माद आदिसे रहित हो और नियतेंद्रीहोकर पहलेदिवस जाकर पूर्वोक्त लक्षणवाले ब्राह्मणों को निमंत्रितकरै यह कहकर कि कल्हआप श्राद्धका उत्सव अवलोकनकरें इसप्रार्थना सहित कुछकाल वहां विलंबितभी होजावे किन्तु कहकर भागैनहीं-और उनब्राह्मणों कोभी निमंवित होनेपर मनवाणी कर्म आदिसे संयत होनाचाहिये २२४॥ अपराणेसमभ्यय॑स्वागतनागतांस्तुतान् । पवित्रपाणिराचांतानासनेपूपवेशयेत् २२५॥ ऐ०-अपराह्न अर्थात् मध्याहुकालमे उन्हीं निमंत्रित ब्राह्मणोको बुलाकर पावते हुये देखप्रथम समभ्यर्चन करिके अर्थात् स्वागत वचन रूपी पूजासे पूजिकर दृष्टांत यथा आइये विराजिये बड़ा अनुग्रहकिया अहोभाग्य हमारे यापने इसघरको पवित्र किया इत्यादि सत्कार और अभ्युत्थान देकर श्रादकर्ता पाणि कहिये हाथमें पवित्रा धारण कियेहुये उन्हें पादप्रक्षालन और आचमन कराकर श्राद्धस्थान में विरचेहुये आसनोंपर उपवेशकरावे २२५ ॥ अधि०-यद्यपि मूल श्लोक मे अपराह्न काल सामान्य भावसे कहा है और अप- राण शब्दके भी अर्थ अनेक होते हे परंतु यहांपर अपराह्न (कुतप) काल से अपेक्षा रखता है किन्तु कुतप कालके प्रारम्भसेही प्रासनपर वैठारनेका प्रारम्भ करके पांच १८६ मिताक्षरा स० आचाराध्यायां मुहूर्त अर्थात १० घटिकामें सारीक्रिया संपूर्णकरै तो सर्वथा श्रेयस्करहोता है-तथाच. (अहोमुह विख्यातादशपंचचसर्वदा । तत्राष्टमोमुहूत्तीयःसकालःकुतपःस्मृतः)-अ. र्थात् दिनभरके मुहूर्त विस्यांत हैं सर्वदा दश और पांच१५दो दो घड़ीके-तिनमै जो आठवां मुहूर्त किन्तु ठीक मध्याहसे एक घड़ी पहले और मध्याह से एकघड़ीपीछे ताई यह दोनों घटिका कुत्तप काल कहलाताहै-अपिच-(ऊर्ध्वमुहूर्तात्कृतपात्यन्महूर्त - चतुष्टयं । मुहूर्त्तपंचकंह्येतत्स्वधाभवनमिप्यते)-अर्थात्-कुतपनाम मुहूर्त से उपरांतके भी चार मुहूर्त उसमें जोड़कर यहमुहूर्तपंचक स्वधाभवन होताहै इसमें पितरोंके नि- मित्त से जो कुछ श्राद्ध आदि स्वधाकर्म कियाजाचे सो अपने यथोक्त फल को देताहे मुहूर्तका परिमाण निर्विकल्प दो घटिकाका परिनियमितहै परंतु दिनके १५मुहूर्त क- हने से केवल ३० घड़ी के दिनमानपर आतेहैं और यद्यपि दिनमान की न्यूनाधिक दशामें दो घटीसे कुछ न्यूनाधिक परिमाण एक मुहूर्त का दिनमान के अनुसार क- रिलेनेसेभी १५ मुहूर्त ठीक होसक्त हैं तथापि श्राद्धकर्मकी व्यवस्था में कुछ इसवात से अपेक्षा नहीं है अर्थात् केवल वही प्रमाण इसमें लेना संसूचित है कि ठीक २ म- ध्याह्नके बारह बजे से एकघटी पहले (कुत्तप) काल का प्रारम्भ होजाता है उसीसे लेकर दश घटिकाताई स्वधाकोका विशेष अधिकारहै फिर दिनमान चाहे तितना हो-श्राद्धकी सुफलता मध्ये जैसा एक यह अद्योक्त काल संबंधी कुतप होता तैसेही सात कुतप श्रीरभी होतेहे-यया-(मध्याहःखड्गपात्रंचतथानेपालकम्बलः।रौप्यंदर्भा स्तिलागावोदोहित्रश्चाष्टमःस्मृतः॥ पापंकुत्सितमित्याहुस्तस्यसंतापकारिणः। श्रष्टाचे तेयतस्तस्मात्कुतपाइतिविश्रुताः) अर्थात्-एक तो वहीं मध्याह्नकाल जिसका चर्चा ऊपर याचकाहे १ दूसरा खड्गपात्र कहिये गैंडेका अर्घार तीसरा नेपालदेशकाबहु मूल्यवाला कंचल जो पर्वतीवोली में खाचर्चा विख्यात है। चौथा रोप्य रुपया चांदीष्ट पांचवांदर्भकुशा ५ छठां कुतप तिल और तिलके फूल विशेप कर ६ सातवां कुतप गावः गावे ७ आठवां कुतप दोहिन कहिये दुहिता का पुत्र धेवता- यह बाठो इस हेतुसे कुतप कहलातेहैं कि (कु)शब्दका अर्थहे कुत्सित बुरा सो कोनहे अपनेपाप कुत्सित होते तिनको यह बाठो वस्तु (तप) शब्दके अर्थसे संताप करनेवाले हैं किन्तु पापों को पीड़ा देकर नाशकरदेतह इसलिये (कु) और (तप) मिलकर कुतपड- नकी संज्ञाहुई इस्से श्रादमें इनआठों को अवश्य भावसे संग्रहकरे-परंतु इन आठोंमें सातवां कुतप जो गोदानकहाहे सो२२३ ओर २२४ इनदो श्लोकोंकी उचित मर्यादा अनुसार तो होसकनायसंभव और दुर्लभहे इस्से उन्हींदोश्लोकोंकीनिपेध व्यवस्था से प्रत्यक्ष गज तीनदेना पर उनकी यनुकल्प व्यवस्थासे उसका अनुकल्प स्वर्णमयी कादानकर्तव्यहे सोभी गडकीसांग मूर्त्तिवनवाकर न करना किन्तु केवलस्वर्णपत्र यहा , मिताक्षरा स० आचाराध्याय। १८७ अधिकशक्तिहो तो स्वर्णमुद्रा अशर्फी आदि कल्पितकरलेना यहश्रेयस्कर समाचारहे क्योंकि यद्यपि कहीं किसी स्वार्थी शास्त्रमें प्रतिमा वनवाकर दान करना लिखाभीहो तथापि परमार्थी शास्त्र मर्यादापरिपाटी समाचार का यह सिद्धांत नहीहै कि यह ऐसे अनर्थ रूपी भ्रष्टाचार की आज्ञादेसकै जिस्से दाता और ग्रहीता आदि अनेकनरक वासी हों किन्तु ऐसी दशामें उपदेष्टाको सबसे आगे बढ़कर वहांकीभी राह दिखला- नेको अवश्यजाना होता है पर जिसको यह स्वीकार हो-अन्यथा ध्यानकरना योग्य है कि जो किसीकी प्रतिमाका पूजन करनेसे ठेठ उसको पहुँचसक्ताहोगा जिसके नाम की वह प्रतिमा किन्तु उपमूर्ति कल्पितहुई हो तो क्या उसमूर्ति का अपकार या च. रण प्रहार आदि नहीं पहुँचताहोगा भला मूर्त्तितौ साक्षात् उसकारूप समुझाजाता पर किसी के हाथसे पत्थर भी फूटजाने का प्रायश्चित्त कियाजाताहै क्या उसमूर्ति को तोड़ फोड़कर वेंचने या सांचे में गलवाने वाले अपराधी नहीं होते या केवल स्वार्थ की सांधकताही धर्म की निशानी है संप्रति कोई ब्राह्मण ऐसा नहीं जो मूर्तिको ले जाकर घरमें दोदिनभी सत्कारसे रखसक्ता हो किंतु सुनारका हथौड़ा उ- सकी पूजाहै-स्वार्थलिप्सूकहते हैं कि देवता भाव उसमें तभी तकथा कि जब दानसमय मंत्रसे आवाहन किया पीछे विसर्जन कालसे देवता भाव जातारहा अच्छा जवमंत्रों को यहशक्तिहे तो आवाहनसे क्या अशर्फी अथवा स्वर्णपत्रमें देवतात्व नहीं था- सक्का-हां-सांगमूर्तिमें देवतात्वके न होने परभी उसका खंडनकरना अपराधहे सो भी तत्काल देवताको उसी प्रकार पहुँचेगा जैसामूर्तिका पूजन उसको पहुँच सक्लाथा-भ- लादेवता तो दूर, किसीकी मूर्तिमें आवाहनसे नहीं आसक्ते पर प्रेमसे दिया अथवा किया था दूरसेभी अंगीकार करलेतेहैं किसीसे यहनहींकहते कि तुम हमारे नामकी र्तिकल्पितकरी यान करो केवलश्रद्धा और प्रेमके भूखेहोतेहैं (दृष्टांत मात्रसेमनुष्य परभी ध्यान करनाचाहिये कि तुम किसी प्रतिष्ठित या समर्थ राजाचादि या किसीत- पस्वी, मनुप्यके नामका एकपतलाबनाकर अपने द्वार भागेरखकर उसकी पूजा और वहुतसी स्तुति नित्यंप्रति किया करौ या पुतलाके बिनाभी नित्यप्रतिवही आचरण किया करौ अथवा नित्यंप्रति उठकर दो चार घड़ी उसको कूटा पीटा करौ या पुतला के विनाही उसका नामलेकर धरतीमें हाथपैर पीटाकरी और स्तुतिके बदले दुर्वाक्य मुखसे काढ़ाकरी-यह वृत्तांत उसको यौखोंसे देखने या कानोंसे सुने परहीदेखो पीछे क्या २ आनन्द उठतेहैं अर्थात् इस उत्तर दशाका करनेवाला अपराधी ठहरकर दं- डपावेगा श्रव कहो कि उसमनुप्यका आवाहन किसने मंत्रों सहित कियाथा जोउसने, बुरामाना और दंडदिया था दिलवाया इसनेतो बिना आवाहनके पुतला या धरती को उसके नामसेही कटापीटाथा फिर यह अपकार उसको क्योंकर पहुँचगया पुतना । १८८ मिताभरा स० आचाराध्याय। में भी महीथी-धरतीमें भी मही थी-ऐसेही उस सोने या चांदीकामर्तिमं यद्यपि केवल धातु है क्योंकि देवताका आवाहन जो कियाथा सो विसर्जनकरदिया बतलातेही पर नामती उसका वहीवनरहाहै जिसके नामसे तुमने वनवाई या दान में पाई फिर उसको जवहथोड़ा से तुड़वाई और सांचेमें गलवाई तो वह दंड क्या न देगा जिसके नामसे वनवाकर यह अपकार किया या करवाया इस्से यह निश्चय जानौ कि संसारमै सारे काम केवल नामसेही सिद्धहोते हैं नामकेही लिये किये जातेहैं नामके लियेनामीनर अपने धनप्राण देदेतहें नामसे मारेजाते हैं नामसे कुछकमाखाते हैं नामसे लज्जित होजाते हैं नामसे प्रशंसापाते हैं नामसे दुर्नाम होजाते हैं नामविना किसी चीज का पतानहीं लगसक्ला नामसे दुर्लभ बस्तु भी सुलभ होजातीहे जिनको मंत्रकहते हैं उनमें भी देवताओंके नाम या उनके बीजोंके नाम मात्रहोतेहैं नामके बंधनमें सारा संसार फँसाहुआ खड़ा है-सोई गोसाईतुलसीदासजीने कहा है कि-(देखियरूपनाम आधीना । रूपज्ञाननहिनामविहीना )२२५ ॥ युग्मान्दैवेयथाशक्तिपित्र्येऽयुग्मांस्तथैवच । परिस्तुतेशुचौदेशेदक्षिणाप्रवणेतथा २२६॥ अक्ष०-देवश्रादमें यथाशक्ति युग्म ब्राह्मणोंको तथैव पियवादमें अयुग्मोंकोशु- चिदेश तथापरिस्तृत और दक्षिणाप्रवण में बैठारे यहऊपरसे जुड़ा २२६ ॥ अभिः-शुचिर्देश कहिये गोमय आदिसे लिपेपुतेमें वहीदेश अर्थात् स्थानदक्षि- पाप्रवणभीहो किंतु दक्षिणोरको अवनत अँकाहुआहो फिर वही स्थल परिस्तृतक- 'हिये सब योरसे प्रच्छादित कियाहो तिसमें पूर्व श्लोकमें कहेहुये सूचित आसनोंपर पूर्वोक्त ब्राह्मणों को बैठावे तिनकी यहसंख्याहे किजोश्राद्धकर्म देवसंबंधी अर्थात् था-. भ्युदायिक दिश्राद्द कियाहो तो युग्मकहिये समसंख्या ब्राह्मणोंकी अपनी शक्ति- नुसारकरे जैसे पितापक्ष में विश्वेदेवाओंके दोदो और माता दादी परदादी इनके दो दो भिन्न २ एकएकके यहा शतिअनुसार तीनोंके नामसे दो ब्राह्मण ऐसेही पिता पि- तामह प्रपितामह इनतीनोंके दो दो भिन्न २ या तीनोंके नामसे दोही और जो इस्से 'अधिक शक्ति अपनेको हो तो चार २२२ आठ२ इत्यादि समसंख्या करिलेवे-(इसी प्रकार)-नाना पक्षमभी तीनों वर्ग भिन्नर समुझलेने समसंस्था द्वारा (भौरजो) पितृसं- बंधी अर्थात् पार्वण श्राद्ध किया हो तो अयुग्म कहिये विपम संख्या ब्राह्मणोंकी करे दृष्टांत जहां दो दो कहेथे तहां एक २ या तीनर या पांच २ इत्यादि दोनों पक्षमसमु- यहदोनों श्रादोंका सामान्यभेद कहा-यबकेवल पार्वणमध्ये देव योपित्र्यकर्मका विशेष प्रकार कहतेहैं। द्वौदेवप्रास्त्रया.पिज्येहदगेकैकमेवया । मातामदानामप्येवंतंत्रयावश्यदेविकम् १२७ ॥ भलेना २२६॥

मिताक्षरा स० आचाराध्याय । १८९ अक्ष०-हौदेवेप्राक्-त्रयःपित्र्येउदक्-वाएकैकंएव-एवंमातामहानामपि-वैश्व देवि- कंतंत्रवा २२७॥ अभि०-(दैवे) नामवैश्वदेवे अर्थात् देवसंबंधी स्थान जो विश्वेदेवाओंका तिसमें दो ब्राह्मण-प्राक् अर्थात् पूर्वमुख बैठारने चाहिये-और-पित्र्येनाम पित्रादिस्थाने अर्थात् पिता पितामह प्रपितामह इनतीनोंके स्थानपर त्रयोब्राह्मणा उदक् किंतुतीन ब्राह्मण • उत्तर मुखबैठारै सोई तीनोंकाएकएकहोगया (अथवा) यहभी न होसके तो इंसकावि- कल्पहै कि सर्वत्र एकैकं अर्थात् सभीजगहएकएकहो किन्तु विश्वेदेवाओंकेस्थानपर भी एक और पिता आदितीनोंके स्थानपरएकही यह निर्वाहकी रीतिहै-ऐसेही नाना आदिकाभी व्यौरासमुझलेना किन्तु जोकुछ ऊपर अर्द्धश्लोकके अभिप्रायार्थमें पिता पक्षकावर्णन किया सोईविधि नानापक्षमें भी जानौ-और-वैश्वदेविकंतंत्रवा अर्थात् वै- श्वदेवकर्म किन्तु विश्वेदेवाओंके ब्राह्मणसोविकल्पसे तंत्ररूपभीकरलेना अर्थात् जहां ऊोक्त विकल्पभी न होसक्लाहो तहां विश्वेदेवा पितापक्ष और नानापक्ष दोनों के एकत्रकरलेना यहभी एकनिर्वाहकी रीतिहै (तंत्रशब्दसमुदायकावाचकहै) २२७॥ भधि-जब किसीको दोही ब्राह्मण मिलसकें या दोसे अधिक करनेकी सामर्थ्य न हो तब वैश्वदेवके स्थानपर पत्तल कल्पित करके उन दोनों ब्राह्मणों को पिता और नाना दोनों पक्षोंके स्थान पर बैठारे-सोई वशिष्ठजीने कहा कि-(यद्यकंभोजयेच्छाद्धे दैवंतत्रकथंभवेत्।अन्नंपात्रेसमुद्धृत्यसर्वस्यप्रकृतस्यचादेवतायतनेकृत्वाततःश्राईप्रव तयेत् । प्रास्येदन्नंतदग्नौतुदद्याहाब्रह्मचारिणे )-अर्थात्-जो श्राद्दमें एकहीको जिवांचे तहां देवश्राद्ध किन्तु विश्वेदेवा सम्बन्धी कर्म कैसे होवै इसलिये उनसोंके नाम का अन्नपात्रोंमें निकालकर उनके और देवताके भी स्थानपर रखकरपीछे श्राद्धका प्रवर्तन करै फिर वह अन्न भी या तो अग्निमें जिमादेवे या किसी ब्रह्मचारीको देदेवै-यथार्थ से आभ्युदयिक और पार्वण श्राद्ध में कुछ विशेष अंतर नहींहै क्योंकि आभ्युदयिक उसी को कहते हैं जो वृद्धि श्राद्धके नाम से विख्यात है इसलिये कि वह अभ्युदयके समय पर कियाजाताहै और उसके करनेसे श्रागेको धनजन आदि अभीष्टकामोंकी . सृद्धि अभ्युदय पूर्वक होती है-परंतु उसमें भी श्राद्ध वही पार्वण किया जाता और उ- सकी विधिमं किंचित् अंतर होताहै-उस विधानांतरके सिवाय (मुरव्यपार्वण) विधिसे भी जो श्राद्ध किसी देवकल्प पर्वमें कियाजाय जैसे सूर्य संक्रांति आदि पहले कहचुके या किसीतीर्थपर्वमें या किसी देवताके नामसे मानकरपीछे कियाजाय या व्यतीपातमें या ग्रहणमें तो वही पार्वण देव संज्ञक होजाताहै या जो पितर संबंधी पर्वमें कियाजाय जैसे अमावास्या गजच्छाया पितृपक्ष अष्टका इत्यादि में यद्वा किसीके क्षयाहमैकि- याजावै तो वही पार्वण श्राद पिट सम्बन्धी गिनाजाता है सो कर्म उसदैव सम्बन्धी ४८ १९० मिताक्षरा साचाराध्याय। में भी पित्रोंके नामसे होता है परन्तु वह पितरों की तप्ति देवताकी प्रीतिके अर्थ या. रोपितकरीजाती है २२७॥ पाणिप्रक्षालनंदत्वाविष्टरार्यकुशानपि। मावाहयेदनुज्ञातोविश्वेदेवासइत्यूचा २२८ ॥' ऐ०-उनबैठेहुये ब्राह्मणों के हाथमें विश्वेदेवा के निमित्तसे जल हस्तप्रक्षालनके लिये देकर पुनि विस्तरकेलिये कुशाभी अर्थात् युग्म कहिये दो कुशा द्विगुणितकिये हुये उनके आसनकेदक्षिणओररक्खै फिर उन्हीं ब्राह्मणोंकी आज्ञापाकर विश्वेदेवाओं का आवाहनकरै उसऋचासे कि जिसकी आदिमें (विश्वेदेवासागत) इत्यादिपाठ आताहै-और आज्ञापाकर कहने का यह भावहै कि उनब्राह्मणोंसे आज्ञामांगे कि अंब गावाहन करें फिर वे आज्ञादे कि अच्छाकरौ तब आवाहन करै २२८ ॥ यवैरन्वयकार्यार्थभाजनेसपवित्रके । शन्नोदेव्यापयःक्षिप्त्वायवोतीतियवांस्तथा २२९ ।। यादिव्याइतिमंत्रणहस्तेप्वयं विनिक्षिपेत् । दत्वोदकंगंधमाल्यंधूपदानंसदीपकम् २३० ।। तथाच्छादनदानञ्चकरशौचार्थमंबुच । अपसव्यंततःकृत्वापितॄणामप्रदाक्षणम् २३१ ॥ • ऐ० त्रयाणांतह-इसपीछे विश्वेदेवाके निमित्त से ब्राह्मणकेसमीप दाहिनीअोर एथ्वी पर (यव) फैलाकर तिसपीछे चांदीआदि यथा लब्धपात्रसपवित्रमें किन्तु दोकुशाबोड़े हुये में ( शन्नोदेवीरभिष्टय) इत्यादिपाठवाली ऋचासे जलछोड़कर और (यवोसि धान्यराजोसि)इत्यादिपाठवाली ऋचासे (यव) छोड़कर गंधपुप्पभी छोडै तिसते अ- नंतर उसी अर्घ्यपात्रककुशा निकाल ब्राह्मण के हाथोंमें रखकर (यादिव्याआपःपय सा) इत्यादिमंत्रसे (विश्वेदेवांइदंवोऱ्या) यह कहकर अयॊदकछोड़े फिर हाथधोने के निमित्त से विनामंत्र के जलदेकर यथाक्रम से गंध पुप्प धूप दीप दानं कुर्यात् तथा आच्छादनवस्त्रदानभी करै और फिर भी हाथ धोनेकेनिमित्त से जलदेवे यह अढ़ाई श्लोकों से विश्वेदेवा का पूजनकहा-अब शेष आंधे श्लोकसे कहतेहैं कि ततः अपसव्यंकृत्वा अर्थात् ऊपर का कर्म तो सव्य में हुआथा तिसपीछे यज्ञोपवीत वा अँगोछासे अपसव्य होकर पितरों के अप्रदाक्षिण कहिये वाईओर-अवासनादि जो कुछ कहेंगे सो अगले श्लोकोंमें देखना २२९ । २३०।२३१॥ अधि० प्रयाणांसह-गंधादि वस्तु जिनका चर्चा ऊपर आयाथा तिनमें स्मृत्यंतर से विशेपताजातव्यहे-तथाचविष्णुः (चंदनकुंकुमकर्पूरागुरुपद्मकान्युपलेपनार्थम्) अर्था- त्-चंदन सुपेद कुंकुमकहिये केसर कपूर अगुरुपद्माख यह सव गंधकेस्थान उपलेप. नके योग्य है-ऐसेही पप्पों कोभी कहा है कि-(श्राद्देऽत्याज्याःप्रशस्ताःस्युमल्लिकाश्ये तथिका )-अर्थात्-श्रादमै जो अत्याज्य पुष्प किंतु जिनका नाम लेकर निषेधनहीं लिखा ये सभी प्रशस्त होतेहें और मल्लिका तथा श्वेत जूहीकाफूलभी और जोल जलमें होतेहैं वे सभी और चंपाभीश्रेष्ठह-तथावर्त्यपुष्पाणि-(उपगंधीन्यगंधीनित्य मिताक्षरा स०-पाचाराध्याय । वृक्षोद्भवानिच । पुष्पाणिवर्जनीयानिरक्तवर्णानियानिच )-अर्थात्-उग्रगंधवाले-निर्गंध भी चेत्यरक्ष से उत्पन्न हुये भी चैत्यरक्ष वें कहलाते हैं जो बड़े ऊँचे वृक्ष सीमा या देवस्थानों आदिपर होतेहैं येसारे पुष्पवर्जित हैं और रक्तवर्ण के होतेहों वे अन्यरक्षों के भी वर्जितहें और कांटेवालेटक्ष काभी वर्जितहे पर विरला पुष्प जो आपकँटीला न हो तो नहींभी वर्जित है-रक्त पुप्प वर्जित हैं परंतु कुंकम लालहोता है वह वर्जित नहीं और जलसे उत्पन्नहुये पुष्पजो लालहों तो वे भी वर्जित नहीं इत्यादि-धूप वि. पय में भी कुछ विशेषता विष्णुजीनेकहीहै कि-(प्राण्यंगसर्वधूपार्थेनदद्यात् )-अर्थात्- प्राणीके अंगसे उत्पन्न हुई सारी वस्तु धूपमें नहीं लगावै-किन्तु-(घृतमधुसंयुतंगुग्गु लुंश्रीखंडागुरुदेवदारुसरलादिदद्यात् )अर्थात-घृत सहत मिलाहुआ गूगुल सुपेद चंदन अगुरु देवदारु राल आदि यह सब देवेदीपके विषयमें कुछ विशेषता शंखजी ने कही है कि-(घृतेनदीपोदातव्यस्तिलतेलेनवापुनः । वसामेदानवंदीपंप्रयत्नेनवि- वर्जयेत्)-अर्थात्-दीपकघीसेदेना चाहिये अथवा घी नहीं तौ तिलके तैलसे भी परंतु बसा मेदा इत्यादि चीजोंसे बनायाहुआ दीपकनहीं वारै किंतु यत्न सहित इन्हेंबचावे- सेही आच्छादन वस्त्रको भी कहाहै कि शुभ्रकहिये उज्ज्वलहो।नवीन हो-फटा कटा नहीं हो-सदश अर्थात् दुशासहित किंतु किनारे वालाहो यहसव वैश्वदेवका अनुष्ठान काण्ड (क) उत्तरमुख बैठकर करै-और पित्र्यकांड जहांतक हो वह सब दक्षिणमुख बैठकरकरै-सोई टद्धशातातपने यह कहाहे कि-(उदङ्मुखस्तुदेवानांपितॄणांदक्षिणाम- खः। प्रदद्यात्पार्वणेसर्वदैवपूर्वविधानतः) अर्थात्-पार्वण श्रादमें सब जो कुछ करे सो देव पूर्व किंतु भाग पूर्व यथा विभाग सहित विधानसे देवताओंको उत्तरमुखहोकरदेवे और पितरोंकोदक्षिण मुखहोकर २२६ । २३०।२३१॥ द्विगुणांस्तुकुशान्दत्वा शंतस्त्वेत्यचापितॄन् । भावाह्यतदनुज्ञातोजपेदायतुनस्ततः ०३२ ॥ ऐ०-इसपित्र्य कांडका आधा श्लोक जो २३१ में पीछे गया तहां से ध्यानकरना चाहिये कि अपसव्य होकर पितृसंबंधी तीनों ब्राह्मणोंके आसनों पर वाईमोर विप- म३कुशा जो द्विगुणभुग्नकिये किंतु मिरोडीदियेहुये विष्टरके निमित्त उदक पूर्वकदेकर फिरभी उदकदेव तिसपीछे ब्राह्मणांसे आज्ञामांगे कि हमपित्रादि तीनोंका आवाहन करें फिर उनकी आज्ञामिले पछि (उशंतस्त्वानिधीमही) इत्यादि ऋचासे आवाहन करिके (आयंतुनःपितर) इत्यादि मंत्रसे बैठारै अपने बुलायेहुये पितरोंको २३२ ।। अधिः-उदकपूर्वक देकर फिरभी उदकदेवे यहभाव यद्यपि मूलश्लोकमें नहींह पर आश्वलायन ऋपिने यहकहा कि(अपःप्रदायद्विगुणभुग्नकुशान्दत्वायःप्रदाय)इत्या दि-अर्थात्-जलदेकर फिर द्विगभग्नकुशानोंको आसनकल्प देकर फिरभी जलदे- कर इसके आगे और विधिकही है-यादि और अंतमें भी जो उदकदान कहा सोयह १९२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। प्रकार पित्र्यकर्म और वैश्वदेवकर्म दोनोंमें समझलेना यथास्थलके अनुसार २३२॥ अपहताइतितिलानविकीर्यचसमंततः । यवार्थास्तुतिले कार्याःकुर्यादादिपूर्ववत् २३३ ।। दृत्वार्यसंस्त्रास्तेपापात्रेकरवाविधानतः पितृभ्यःस्थानमातिन्युजपात्रकरोत्यपः २३॥ ऐ०-सहहयोः-(यवार्थाः) अर्थात् यवोंसे करनेवाले कर्म जो २ पहले विश्वेदेवाओं के कांडमेंकहचुके हैं पृथ्वी पर फैलानाभादि सो सवकाम तिलोंसे इसमेंकरे और अ- ादिकर्म अर्थात् पात्रासादन से आच्छादन पर्यंत जो २ कुछपहले कियाथा उसी समान इसमेंभी करै परन्तु इसमें इतना कर्म और भी विशेपहै कि (अपहतासुरार- क्षांसि) इत्यादि ऋचासे तिलोंको ब्राह्मणोंके सबओर प्रदक्षिण मार्गसे रक्षाकल्पबत् विथोरिफैलाकर तिसपीछे चांदीआदि यथालव्ध तीनों पात्रोंमें तीन तीन कुशारख- कर उनमें (शन्नोदेवी) इत्यादि ऋचा पढ़कर जलछोड़े फिर (तिलोसिसोमदेवत्य) इत्यादि मंत्रसे तिलपुष्पगंध,ये सवछोड़कर (स्वधार्ष्या) यह उच्चारण करिके ब्राह्म- णोंके आगे अर्घ्यपान भिन्न २ स्थापितकरै पुनि (यादिव्या) इत्यादि मंत्रको उच्चारण किये पीछे अंतमें (पितरिदंतेय) १ (पितामहेदंतेर्य) २. (प्रपितामहेदंतेय) ३ यह जोड़२ कर तीनों ब्राह्मणोंके हाथोंमें अर्घ्य समर्पणकरै फिर उनकोदियेहुये अध्ययॊके (संस्रव) अर्थात् ब्राह्मणोंके हाथोंसे गिरेहुये जलोंको पितृपात्रमें लेकर एकलंबा कुशा का स्तंव सीधा दक्षिणको अग्रभाग करिके भूमिमैधरे तिसके ऊपर वहपात्र जलस- मेत (पितृभ्यःस्थानमसी) इत्यादि मंत्रसे (न्युज) कहिये औंधाकरिदेवै तिसके ऊपर अर्घ्य पात्रमेंसे पवित्रा निकालकर रखदेवै तिसते अनंतर गंध पुष्पधपदीप आच्छा- दन यह सब (पितरयतेगंधः)(पितरिदंतेपुप्पं) इत्यादि कल्पित मंत्रोंसे चढ़ावे-इस्से आगे और जोकुछ विधिविशेपहो सोसवश्राद्धकर्मकी पद्धतिसेसमझलो२३३२२३४॥ भधि-ऊपर ऐक्यार्थके वर्णनमें पिताआदि तीनोंके निमित्तसे तीन ब्राह्मणों के आगे भिन्न २ तीनों अर्ध्यपान कहेगये परन्तु जहां तीनों के निमित्तसे एकही ब्राह्मण कियाहो तहांभी अर्घ्यपात्र जुदे तीनकल्पित करिलेना और उसी एकत्राह्मणके द्वारा सारी क्रिया भिन्नवत् आचरणकरनी यहसिद्धांतहे २३३।२३४॥ पन्नौकरिष्यन्नादापष्ट उत्पन्नंघृतप्लुतं । कुरुप्वेत्यभ्यनुज्ञातोहुत्याग्नौपितृयज्ञवत् २३५॥ हुतशेपंप्रदद्यानुभाजनपुसमाहितः । यथालाभापपन्नेपुरौप्यपुचविशेषतः २३६ ॥ भक्ष सहदयोः-(भग्नौ) करनेकीइच्छाकरतेहुये घृतप्लुत अन्नकोलेकर पूंछताहे करौ यह आज्ञापायाहुआ अग्निमें पितृयज्ञवत् होमिकर-फिरहुतशेपको प्रदानकर समा- हितहुआ थथा लाभसेउपपन्नहुयेभाजनोंमविशेषतासेरोप्यपात्रोमेदेवै २३५।२३६॥ भाभ० सहदयोः-पहले कहेहुये कर्मके अनंतर अग्नौ कर्मका प्रारम्भ करने की इ- च्छाकरता हुआ श्राद्ध कर्ता घृतप्लुत कहिये घृताक अर्थात् घासे मिलाहुआ अन्न मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। १९३ पात्रस्थहाथमें लेकर ब्राह्मणोंसे पूँछे कि अग्नौकर्म करें फिर उनसे (कुरुप्व) इसप्रकार आज्ञापायाहुया प्राचीनावीती किंतु अपसव्य होकर (सोमायापिटमतेस्वधानमः। अग्नयेकव्यवाहनायस्वधानमः) इनमंत्रों से अग्निमें यथाभागपूर्वक पिंड पितृयज्ञके विधानसेहोमिकर२३५फिरहुतशेष कहिये होमसे बचाहुया अन्न थोड़ा२ उनपात्रों में समाहित कहिये सावधान होकर परोसे जो ब्राह्मणोंके आगे प्रथम तौ विशेषतासे चांदी के चाहिये अथवा जिसकिसी के हो किंतु ढाक श्रादिपत्तों केभी जैसे लाभहो- सकें और उपस्थित कियेगये हो परंतुमट्टी के पात्र इसमें वर्जित हैं २३६ ॥ दत्यानंष्टथिवीपात्रमितिपात्राभिमंत्रणम् । कृत्वेदंविष्णुरित्यन्नेद्विजांगुष्ठनिवेशयेत् २३७ ॥ सव्याहृतिकांगायत्रींमधुवाताइतिवचम् । जप्त्वायथासुखवाच्यं जीरस्तेपिवाग्यताः२३८॥ ऐ०सहयो-अन्न जो कुछ भोजनके निमित्त सिद्धकियाहो वह उक्त पात्रों में देकर (एथिवीतेपात्रं ) इत्यादि मंत्रसे पात्रों का अभिमंत्रण करिके (इदंविष्णुर्विचक्रमे) इत्यादिऋचा से अन्नपर ब्राह्मणों से हाथ का अँगूठा रखवावै तहां वैश्वदेव कर्म में यज्ञोपवीती अर्थात् सव्यहोकर (विप्णोहव्यंरक्ष) यह मंत्रकहे और पिठ्यकर्ममेंप्रा. चीनाबीती अर्थात् अपसव्यहोकर (विप्पोकव्यरक्ष) यह मंत्रकहै-तिसके अनंतर सव्यहोकर (विश्वेदेवेभ्यइदमन्नंपरिविष्टंपरिवेश्यमाणंचातृप्तेः) इसमंत्र करके यव और उदक से वह अन्न विश्वेदेवायों को निवेदन करिकै-तथा-अपसव्यहोकर पिता के निमित्त में (पित्रेअमुकगोत्राय अमुकशर्मणेइदमन्नंपरिष्टंपरिवेश्यमाणंचातृप्तेः) इसमंत्र करके तिल और उदक दानसे वह अन्न पिता को निवेदन करिकै (इसी) प्र. कार इसमंत्र की योजना में (पितामहाय) (प्रपितामहाय) यह संयुक्त करिकै उनदोनों कोभी उक्तविधिसे निवेदनकरै तिसके अनंतर आपोशान देकर पूर्वोक्त व्याहृतियोंस- हित गायत्रीको और (मधुवाताइतितचं) अर्थात् मधुवाताआदि ऋचाओंका तीया किंतु वे तीनों ऋचा और मधुमथुमधुयहभी तीनवारजपिकै (यथासुखजुपध्वं) अर्थात् इच्छा पूर्वक भोजनकरी यहउच्चारणकरै फिर वे ब्राह्मणभी मौनीभूत होकर भो- जनकरै २३७।२३८॥ अधि.--ऊपर (हव्य)(कव्य) यह मूलसे विशेप कथन जो ऐक्यार्थमें आया तिसका प्रमाण मनुजीका वाक्य-यथा-(विष्णोहव्यंचकव्यंचयाद्रक्षेतिवैक्रमात् )२३७ आपो शानादि शब्द जो मूलसे अधिकआये तिनका प्रमाण पारस्करादि वचनों से-यथा- (संकल्प्यपितृदेवेभ्यःसावित्रीमधुमज्जपः । श्राईनिवेद्यापोशानंजुषप्रैपोथभोजनम् ) तथा-(गायवींत्रिःसकृढापिजपेव्याहतिपूर्विकाम् । मधुवाताइतितृचमध्वित्येतत्त्रि तथा)२३८॥

१९४ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। अन्नमिष्टंदवियंवदद्यादक्रोधनोऽत्वरः । आतृप्तेस्तुपवित्राणिजप्त्वापूर्वजपंतथा२३६॥ अन्नमादायवृताःस्थशेपंचवानुमान्यच । तदन्नंविकिरडूमौदद्याच्चापःसहरसरूत्-२४० ॥ ऐ०सहद्दयोः अन्नं अर्थात् भक्ष्य भोज्य लेह्य ३ चोप्य ४ पेयात्मक ५ यह पांच प्रकारकी वस्तु और-इष्टं अर्थात् प्रियवस्तु जो ब्राह्मणको या प्रेतको या कर्त्ताको भी जो कुछरुचताहो सोभी-हविष्यं अर्थात् श्राद हविके योग्य जोकुलहोताहो सोभी दद्या- तुनाम परोसै किन्तु जिनचीजोंका निपेधहोवे हविष्यमै गिनती नहीं हैं परन्तु अक्रो- धनहोकर परोसै अर्थात् क्रोधकरनेका कोईसा हेतभी उत्पन्नहोजावै तौ भी क्रोधको वचाकर और अत्वर होकर परोसै अर्थात् घबराहटसे अव्यग्रहोकर शीघ्र२ नहींफेंके किन्तु सावधानी साथ जैसीरुचिसे वे भोजनकरें उसीकेअनुसार (प्रातृप्तेः)अर्थात् तृप्ति पर्यंत और (तु) शब्दके अभिप्रायसे वारम्बार वूझर करपरोसै-तथा उनकी उप्तिप- र्यंत (पवित्राणि) अर्थात् पुरुषसूक्त पावमानी आदि जपिकर जव उनको तृप्तहुये जाने तव पहला जपभी जपैजिसकाचर्चा २३८ के श्लोकमें आयाथा कि व्याहतियों सहित गायत्री और (मधुवाताइतितृचं) और मधुमधुमधु तीनबार यहभीजपै२३९तिसके नंतरवचाहुया सारा अन्नहाथमे लेकर या उसपर उद्देशकरिकै ब्राह्मणोंसेपूंछ कि आ- पतृप्तहुये खूबछके वहकहें कि (तृप्ताःस्म) हमतृप्तहोगये तवयह वृझै कि अभी अन्न औरभी शेपहे क्याकरें इसपर वे कहें कि (इष्टैःसहोपभुज्यतां) अर्थात् अपने प्रियपरि- वारश्रादि सहित भोजनकरना चाहिये यहाज्ञालेकर उसअन्नको पिताके स्थानीय ब्राह्मणके आगे उच्छिष्टके समीप दक्षिणायदर्भातरितभूमि पर तिलोदक छोड़कर (ये अग्निदग्धाश्च) इसऋचासे उसअन्नको छोड़कर फिरभी तिलोदक ऊपरसे छोड़ेतिस पीछे ब्राह्मणों के हाथमें गंडूपके निमित्तसे एकएकवार जलदेवे २४०॥ अधि०-यद्यपि परोसनेका प्रकार तो ऊपरके-ऐक्याथोंमें सवकहचुके और यहभी कहा कि (तु) शब्दके अभिप्रायसे वारम्बार परोसे परन्तु उसी (तु) शब्दके अभिप्रा- यसे वारम्बार परोसनेका यह सिद्धांतभीहै कि यहां तक वारम्वार परोसे जो थोड़ाव- हुत कुछ आगे उनके बचिभीरहे क्योंकि वह आगेकी जूठउनकी दासवर्गीका भागहो- ताहै-(दासवर्ग) अर्थात् वारी या भंगीआदि जो कोई उसकेलेने खानेके अधिकारीही. और पितरोंके अपने योग्यकाम धंधामें सौम्यतासे तत्परहों-सोई मनुजीनेकहाहै कि- (उच्छेपणभूमिगतमजिह्मस्याशठस्यचादासवर्गस्यतत्पित्र्येभागधेयंप्रचक्षते)अर्थात- पित्र्ययज्ञकेवीचमै उच्छेपणकहिये उच्छिष्टजो भूमिगतहो किंतु जूठलेकर पृथ्वीपरडा- लीजाय सो वह दासवर्गका भागधेय कहतेहैं परंतु वे दासभी कैसेहों कि (भजिह्म) - र्थात्-अकुटिल किंतु अपने योग्यकामों में कुटिलता नहीं करतेही-ऐसेही (मशठ) कहिये शठताभी न करतेही तो वह उनका भागहै अन्यथा जो कुटिल या शठहों तो वह उन १९५ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । का भाग नहीं किंतु और जो कोई उनके योग्यकामोंको सौम्यतासे साधनकरें वे उस जूठके भागीहों २३९।२४०॥ सर्वमन्नमुपादायसतिलंदक्षिणामुखः । उच्छिष्टसन्निधौपिटान्दद्यापिठ्यज्ञवत् २४१ ॥ अक्ष०-सव अन्नलेकर तिलसहित-दक्षिण मुखहोकर उच्छिएके समीप पितृयज्ञ • की विधिवत् पिंडोंकोदेवै () अर्थात् सावधानीसे २४१ ।। अभि०-पूर्वोक्तरीतिसे केवल एकएकवार जलगंडपको दियेपीछे-सर्व अन्नंसतिलं उपादाय अर्थात् सारे अन्न जो २ संपादन कियेहाँ उनको किंचित् अग्नीकरण से वचेहुये चरुसमेतलेकर उसमें तिल मिलाकर उसी पूर्वोक्त अग्नौकरणकी अग्निके सन्निधि दक्षिण मुखवैठाहुआ पितृयज्ञके (वत् ) कहिये कल्पनाअनुसार किन्तु जैसी उसकीबिधि श्रादपद्धतिमें कहीहो उसीरीतिसे पिंडोंका दानकरै-अथवा जिसनेअग्नी करण न कियाहो पुनि इसीहेतुसे उसका शेषचरुभी न हो तव अग्नि और चरुइनदो- नोंके अभाव कहिये न होनेमें (वह) अन्न जो ब्राह्मणों के निमित्तसे बनायाहो जिसमेंसे जिमाचुके उसीके सर्वशेपमेंसे किंचित् किंचित्लेकर उसमें तिल मिश्रितकरिकै श्राप दक्षिण मुखवैठकर ब्राह्मणोंकी उच्छिष्टके समीप पिंडदेवै क्योंकि अग्नि तौहै नहीं इस लिये-परन्तु (वै) शब्दके अभिप्रायसे सावधानी और (वत् शब्दकी अंत्ययोजनासे यथोक्त विधि जो (पिंडपितृयज्ञ) के विधानोंमें होतीहै सबकरनी चाहिये २४१॥ अधि०-ऊपरके अभिप्रायार्थमें मूलश्लोकसे अधिक वार्ता अर्थात् अग्निके समीप पिण्डदेना कहा और अग्नौकरणका शेपचरुभी अन्नके साथमेलेना कहा तिसका यह हेतुहै कि याज्ञवल्क्यजीने मूल मुख्यविस्तरको उलांघकर निर्वाहविधि कहदीहै इस लिये कि जोवात घंटाघोपयत् प्रसिद्धहै वह नकहनेसेभी नष्टनहींहोती और यथार्थसे जबउन्होंने(पितृयज्ञवत्)यहकहातौ सभीकुछ कहदिया क्योंकि पितृयज्ञकी कल्पविधि जोश्राद्धपद्धतिहै उसमें अग्नौकरणकाहोना मुख्यहै फिर जहां अग्नौकरणहोगा तहां (चरु)भी अवश्यभावसेहोगा सोईयाज्ञवल्क्यजी अग्नौकरणको यथाक्रमसे उचितस्थ- लपर २३५ के श्लोकमें प्रतीतकरचुके इसहेतुसे यद्यपि यहांपरभी कथनकी प्राप्ति थी परन्तु पिष्टपेपणदृष्टिसे प्रत्यक्षभावमें नकहा किंतु(पितृयज्ञवत् ) यहकहकर उसवात को गोल २ दर्शादिया-सो-यह इसप्रकारके हेतु गर्भितस्थल(अतिदेशधर्म)कहलातेहें कि जोबात धर्मसम्बन्धी किसीस्थलपर देखी अथवा सुनीहो वहीबात किसी अन्यस्थल पर उचित जानिकर योजना करीजाय-तद्यथा-(अन्यत्रैवप्रतीतायाःकृत्स्नायाधर्मसंत तेः। अन्यत्रकार्यतःप्राप्तिरतिदेशोऽभिधीयताप्रकृतात्कर्मणेयस्मात्तत्समानेपुकर्मसाधर्म प्रवेशोयनस्यात्सोऽतिदेशइतिस्मृतः)(भेद २)वर्तमानसमयमै अत्रत्यदेशीलोग तो निर्विकल्पही अग्नीकर्मको निरग्नि) किन्तु उपकल्पकीरीतिसे विनाअग्निकेही करलेते १९६ मिताक्षरा स. आचाराध्याय। हैं और वे उपकल्पभी सवशास्त्रोक्तह-परन्तु दाक्षिणात्यादि ब्राह्मण अद्यापि(साग्निक) अग्नौकर्म करतेहैं बल्कि ब्राह्मणोंका निमंत्रण और भोजनादिभी सर्वविधि जैसी कुछपूर्वश्लोकोंसे कहते चलेयातेहैं उसीप्रकार साक्षात्ब्राह्मणोंको वैठारकर अर्ध्यादि उनकहाथमें देतेहैं और अत्रत्यदेशी ब्राह्मणोंके स्थानपर कुशाओंके ब्राह्मण कल्पित करके साराकर्म निपटाय पीछे ब्राह्मणोंको भोजनसमय बैठारते हैं सो यथार्थ से जो ऐसा नहींकरें तो इसदेशमें श्राद्धकाहोनाभी दुर्लभहोजाय इस्से आचार्योंने सौगम्य निर्वाहके निमित्तसे प्रत्येक वार्ता के अनुकल्प नियतकरदिये हैं और पहलीबातें तो पहले समयके साथगई २४१॥ मातामहानामध्येचंदद्यादावमनंततः । स्वस्तिवाच्यंततःकुर्यादक्षग्योदकमेवच २४२ ।। दत्वातुदक्षिणांशक्रयास्वधाकारमुदाहरेत् । वाच्यतामित्यनुज्ञातःकतेभ्य स्वधोच्यता २४३ ॥ युरस्तुस्वधेत्युक्तभूमौसिंचेततोजलम् । विश्वेदेवाश्चप्रीयंतांचिप्रैश्चोकनिदंजपेत् २४४ ॥ ऐसहत्र (एवंमातामहानां) अपि अर्थात् जैसे पिता पितामह प्रपितामह इनतीनों कर्म वर्णनकिया ऐसेही नानाओंकाभी तीनपुरुषके उद्देशते विश्वेदेवा आवाहन अर्घ्यआदि पिण्डदान पर्यंत सव यथोक्तविधिसे कर्त्तव्यहै तिसपीछे किन्तु पिंडदानके अनन्तरब्राह्मणोंकोआचमनदेव-(ततःस्वस्तिवाच्यंकुर्यात् अर्थात् ब्राह्मणोंसस्वस्तिउच्चा- रणकरनेकोकहे पनिवेभी स्वस्तिवाचन उच्चारणकरें फिर ब्राह्मणोंकेहाथमें (अक्षय्योदक) अर्थात् कमंडलु आदि पानसे जलदेकर अक्षय्य उच्चारण करनेको कहे फिरि ब्राह्मण उच्चारणकरें कि(अक्षय्यमस्तु)२४रतिसपीछे अपनीशक्तिअनुसार सोनेचांदी आदि की दक्षिणा देकर यहकहे कि(स्वधाकार)उच्चारण करवावेंगे पुनि ब्राह्मणकहें कि(वाच्य ताम् ) अर्थात् करवाइये यह अनुज्ञापायाहुप्रा फिर कहे कि (प्ररुतेभ्यःस्वधोच्यताम् ) अर्थात् पिवादिकों केलिये और मातामहादिकोंके लियेभी स्वधाकार कहना चाहिये २४३ फिर (अस्तुस्वधा) यहशब्द ब्राह्मण उच्चारण करें यह किये पीछे लोटालेकर एथ्वी में जल की धारदेवै और यहकहे कि (विश्वदेवाःप्रीयंतां) फिर ब्राह्मणोंने भी कहा कि (विश्वेदेवाःप्रीयंतां)तिसपीछे (इदंजपेत्) अर्थात् यह जो अगलेश्लोक में अब कहेंगे सो जपै २४४॥ दातारोनोभिवतावेदा संततिरेवच । श्रद्धाचनोमाव्यगमवद्दुदेयंचनोस्त्यिति २४५॥ इत्युक्तोतयाप्रियावाच प्रणिपत्यविसर्जयेत् । वाजेवाजइतिप्रीतःपितृपूर्वविसर्जनम् २४६ ॥ यस्मिस्तेसंश्रवाःपूर्वमध्यपात्रेनिशिताः । पितृपात्रंतदुत्तानंहत्याविधानविसर्जयेत् २१७॥ ऐ०सहन -यह पढ़े कि (नोदातारःमभिवर्द्धता अर्थात् हमारेकुल में दातालोग बहुत से हो।-(वेदाश्चवर्द्धता)अर्थात् वेदभी रडिपावे किंतु हमारेकुलमें अध्ययन या अध्या- पन और उसके अर्थोके अनुमनन और कौके अनुष्ठान द्वारा वेदादि सर्वशास्त्रोंका मिताक्षरा स० आचाराध्याय । .१६७ सत्कार होवे-(संततिश्चवर्द्धता)अर्थात् पुत्रपौत्रादि परंपरासे वंशकीरद्धि बनीरहे-(नःश्र- दाचमाव्यगमत् अर्थात् हमारी या हमारेकुलकी श्रद्धाभी मतजावो-(नोपहुदेयंचास्तु)अ- र्थात् हमारेघर और कुलमेंभी देयवस्तुकहिये सोनाचांदीआदि बहुतसा अत्यन्तहोउ (एवच)अर्थात् औरभी जोकुछ पशु यान दास दासी आदि संसारयोग्य होताहो सो भीबढ़ौ(इति)अर्थात् यहजपै जिसकाचर्चा२४४के अन्तमें आयाथा२४५॥ इसप्रकार प्रार्थना मंत्रपढ़ाहुआ.प्रियवचनोंको कहकर और(प्रणिपत्य)अर्थात् प्रदक्षिणपूर्व नम- स्कार देकर बिसर्जनकरै-भलाकैसे विसर्जनकर सो कहतेहैं कि (बाजेबाजेवतबाजिनो न)इत्यादि ऋचासे(प्रीतः)कहिये प्रसन्नमन होताहुआ कर्ता (पितृपूर्वविसर्जयेत्) अर्थात् पहले पिताकेस्थानी ब्राह्मणरूप जो कुश कल्परक्खागयाथा उसकोउठावै फिर पिता- महका फिर प्रपितामहका फिर विश्वेदेवाओं का इसक्रमसे ऊोक्त ऋचाकोपढ़कर (उत्तिष्ठपितर) इत्यादि यथोक्त विधिसे विसर्जनकरै २४६ ॥ परन्तु इसमें इतनी वात औरभी शेपरहीहै कि जिस अर्घ्यपात्रमें वे(संभव)कहिये ब्राह्मणोंके हाथसे गिरेहुये अर्घ्यजल पहले स्थापित कियेगयेथे जिनकाचर्चा २३४ के श्लोकमें आयाथा वही पितृपात्र जो (न्युब्ज)कहिये औंधाकियागया था उसको उत्तानकहिये चितकरिके तब उनब्राह्मणोंके कुशकल्प विसर्जनकरै जिनकाचर्चा अभीऊपर(वाजेवाजे)इसऋचा के साथमें आयाथा अर्थात् इसऋचासे पहले और २४५ वाले प्रार्थनामंत्रसे पीछेवह पात्र चितकर लियाजावै तव बिसर्जन कर्महो तिसपीछे ब्राह्मण अपने स्थान को सिधारे २४७॥ भधि०-ऊपर २४६ के श्लोकमें प्रियवचनोंकाचर्चा आयाथा तिनकास्वरूप(धन्या वयंभवचरणयुगलरजःपवित्रीकृतमस्मन्मंदिरंशाकाद्यशनलेशमविगणय्यभवद्भिरनुर हीतावयमित्येवंरूपावाचः)अर्थात्-हमधन्यहुये जो आपके चरणोंकी रजने हमाराम- दिर पवित्रकिया और सागपात आदि कुभोजनके क्लेशको गिनतीमें न लाकर आप लोगोंकरके हम अनुग्रहीतहुये इत्यादि वाणीकोप्रियवचनकहतेहैं२४५।२४६।२४७॥ प्रदक्षिणमनुव्रज्यभुंजीतपितृसेवितम् । ब्रह्मचारीभवेत्तातुरजनींब्राह्मणैःसह २४८ ॥ ऐ०-फिर उनब्राह्मणोंके साथ (सीमांत) अर्थात् अपने ग्राम या मुहल्ला या स्थान आदिकी यथा संभवसीमा पर्यंत पीछे या उन्हें दाहनेदियेजावे-वे उच्चारणकरें कि जा- ओ बैठो भोजनकरौ इत्यादि आज्ञापायाहुआ उन्हें प्रदक्षिण देकरलोटे फिर (पितृसे- वित) कहिये श्राद्धसे वचाहुअा अन्न अपने प्रियपरिवार आदि सहित भोजनकरे और (तारजनींब्रह्मचारीभवेत्) अर्थात् उसरात्रिमें ब्रह्मचर्यसे रहे ब्राह्मणों सहित किंतु वे ब्राह्मणभी ब्रह्मचर्यसेरहें जिन्होंने श्राद्धका अन्नखायाहो और (तु)शब्दके अभि- प्रायसे पुनर्भोजनादि से बचैउसदिन २४८ ॥ ५० १९८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। · अधि०-आडकरनेवाले और भोजनकरनेवाले ब्राह्मणोंकोभी जो कुछ वर्जितहै सो यथा(दंतधावनतांबूलंस्निग्धस्नानमभोजनमारत्यौपधपरान्नानिश्रादकत्सप्तवर्जयेत्) अर्थात्-काष्ठसे दंतधावन १ तांबूलभक्षण २ तैलादि मर्दन सहितस्नान ३ अभोजन किंतुलंघन ४ रतिकहिये स्त्रीप्रसंग ५ औपधी भक्षण पराया अन्न७ श्राइकरनेवा- ला यह सातकाम बर्जितकरै ॥ अपिच(पुन जनमध्वानंभाराध्ययनमेथुनादानप्रति ग्रहहोमंश्राद्धभोक्ताष्टवर्जयेत्)अर्थात्-दुसराकरभोजन करना मार्गचलनार भारका उठाना ३ विशेषतर अध्ययन ४ मैथुन ५ दानकर्म ६ प्रतिग्रहकालेना ७ होमकर्म अपनेलिये या विरानेलिये ८ यह पाठबातें श्राद्धभोक्ताभी वर्जितकरै २४८ ॥ .. " यहांतकपार्वणाश्राद्धकीविधिवर्णनहोचुकी-अबागेरद्धिश्रादकाप्रकारकहतेहैं। एवंप्रदक्षिणावृत्कोवृद्धौनान्दीमुखानपितृन् । यजेतदधिकधुमित्रानपिंटान्यवैःकियाः २४६ ।। - अक्ष०-इसीप्रकार दृन्दिमें (प्रदक्षिणावृत्कयजमान) नांदीमुख पितरोंके प्रतिदधि और कध मिश्रित पिंडोंको यजनकरै यवोंसे क्रियायें साधै २४९॥ भभिक-एवंकहिये जैसे पार्वणश्राद्धकी विधिकही तैसेही किंतु त्रिपुरुषके उद्देशते पुत्रजन्म आदि रद्धिमें जोश्राद्धकरे तौभी उसीरीतिसे पितरोंका यजनकरै परन्तु इस में इतना विशेषहै कि वह यजमान प्रदक्षिणावत्क होकर यजनकरै अर्थात् प्रदक्षिण मार्गके प्रचारवाली अनुष्ठान पद्धतिसे श्राद्धकरै क्योंकि पार्वण विधिकी अपेक्षा उस में कुछ अंतरहै इसीसे उसकी संज्ञाभी (प्रदक्षिणाआरत्) हुई तहां पितरोंका वि- शेपण (नांदीमुखान्) कहनेसे औरभी यह विशेपताप्रकट हुई कि आवाहनादिप्रका- रोमें ऐसे उच्चारणकरै कि (नांदीमुखापितॄन्त्रावाहयिष्ये) (नांदीमुखानु पितामहा न्) इत्यादि प्रयोग उसपद्धतिमैमातेहैं औरभी यह विशेषताहै कि दही और कर्कधु नाम बनवेरोंकाचर्ण मिलाकर तिसके पिंडदेवै औरभी यहविशेषताहै कि (यवै.क्रियाः) अर्थात् जो २ कियायें तिलोंसे करनी कहीथीं वे भी सवयवोंसे साधै २२९ ।। अधिः-इसद्धि श्राद्धके ब्राह्मणोंकी संख्याभी पार्वण प्रारंभसाथ उसी २२६ के श्लोकमें पहलेचरणसे कहचुके, कि (युग्मान्दैवेयथाशक्ति) अर्थात् देवनाम आभ्य- दयिक जिसे दृद्धिश्राद्ध कहतेहैं तिसमें यथाशक्तिके अनुसार (युग्म) कहिये समस- ख्यावाले ब्राह्मण वैठारे वा निमंत्रितकर कितु इसके वैश्वदेवके सिवायपितरोंकेस्था- नमेंभी युग्मसंख्याकरै-इसमें प्रदक्षिणा उत्कत्वजो कहाथा उसके प्रमाणमध्ये अन्य स्मृतियोकाभी संमतपाया जाताहै (जैसा) आश्वलायन ऋपिने कहा कि(अथाभ्यु- दयिके युग्माब्राह्मणः अमूलादर्भाःप्राङ्मुखोयज्ञोपवीतीरयात्प्रदक्षिणमुपचारोयस्ति लार्थीगंधादिदा हिहि जुदीनासनेदद्यात्)अर्थात्-आभ्युदयिकनामरद्धिवारकै अधिकारमें(युग्मा )कहिये दो चार छः आदिसमसंख्यावाले ब्राह्मण-बिनाजड़के कुशा मिताक्षरा साचाराध्याय। १९९ पूर्वाभिमुखयजमानका वैठना-यज्ञोपवीती अर्थात् सव्यहोकर कर्मकाकरना किंतु पा- वणवत् अपसव्य नहीं प्रदक्षिणमार्गसे कर्मका उपचार अर्थात् श्रासनका देना या यवोंका फेंकनानादि दाहनीओरसे यवैस्तिलार्थो किंतु तिलोंकेप्रयोजन यवोंसेसाधै- गंधआदि चीजोंका चढ़ानादोदोबार-आसनकेलिये सधेकुशादेवै किंतु पार्वणके स- मान द्विगुणभुग्न नहीं-(भन्यच)-यवोंका फैलानाइसमंत्रसे कि (यवोसिसोमदेवत्योगोस वोदेवनिर्मितःप्रनवद्भिःप्रत्तःपुष्टयानांदीमुखापितॄन्इमाल्लोकान्प्रीणयाहिनःस्वाहा ) अर्घ्यदेनेके मंत्रयथा (विश्वेदेवाइदंगोन) Pr यथा लिंगभेदके अनुसार अर्घ्यदानके : ग्निमें होमकहाथा यहां ब्राह्मणके (हाथ) में ही होमहोताहै-वहां होमकेमंत्रांतमें स्वधानमः3- च्चारण कियागयाथा इसमें(अग्नयेकव्यवाहनायस्वाहा) (सोमायपितृमतेस्वाहा)उच्चा- रणहुआ-वहां तौ (मधुवाताऋतायते) इत्यादि तीनऋचाका उच्चारणहुआथा यहां इनके बदले (उपास्मैगायते) इत्यादि पंचमधुमती सुनावै (अक्षन्नमीमदत) छठी यह भी-औरभी ब्राह्मणोंको आचमन करवाये पीछे भोजनके स्थानोंको गोमयसेलीपकर पूर्वोरको अग्रभाग कियेहुये कुशाओं को विछाकर उनपर उसअन्नसे जो पितृवा- ह्मणोंको जिमानेसे बचाहो किंचित् घी मिलाकर एकएकके नामसे दोदो पिंडदेव इत्यादि बहुधा बातोंकाभेद उसपद्धतिमें होताहे-औरभी इसकेमूलश्लोक इसी २४९ में यद्यपि (पितनयजेत) यह वाक्यसामान्यतासे कहाहै किंतु इस्से कोईसाक्रम अथवा नियम नहीं पाया जाता परन्तु इसद्धि श्रादमें तीनिश्राद्धहोतेहैं सोई (शातातप)ऋ- पिने यथायोग उनकाक्रमभी कह दियाहै कि(मातृश्राइंतुपर्वस्यापितॄणांतदनंतरम् । ततोमातामहानांचद्धोश्रादत्रयस्मृतम्)अर्थात्-पहले मातुःश्राद्ध किंतु मातायादि का होवै तदनन्तर पिताआदि तीनोंका फिरसपत्नीक नानाआदि का इसप्रकारद्धि कालमें श्रादत्रय कहेहैं २४९॥ यह द्धिवादका वर्णन होचुका-अब आगे एकोद्दिष्ट नाम श्राद्धका प्रकारकहतेहैं। एकोद्दिष्टंदैवहीनमेकाध्यकपवित्रकम् । आवाहनाग्नौकरणरहितंापसव्यवत् २५० ॥ प्रक्ष-एकोद्दिष्टश्राद्धदेवहीन-एकअर्घ्य और एकपवित्रवाला-आवाहन और अ- ग्नौकरणसे रहित-अपसव्यवत् होताहै २५०॥ भभिक-एकोद्दिष्ट यह नामकर्म नामधेय इसहेतुसे कहलाया कि इसमेंएकहीपुरुप का उद्देश कियाजाताहै किंतु त्रिपूरुपनहीं क्योंकि त्रिपूरुपकर्म पार्वण और रद्धिश्राद्धों में होताहे-यद्यपि कर्म इसमेंभी पार्वणकीहीरीति अनुसारहोताहे परन्तु बहुधावातीमें कुछ २ अन्तर होताहै सो उसअन्तरको प्रकटकरते हैं कि एकोदिष्ट( दैवहीन) अर्थात् एकोद्दिष्टादमें देवकर्म कहिये विश्वेदेवाओंका आवाहन पूजन आदि सो न करना २०० मिताक्षरा सं० श्राचाराध्याय। चाहिये और एकही अर्घ्यपात्रभी करनाचाहिये तथा एकही दर्भपवित्रक उसमें छोड़े औरभी इसएकोद्दिष्टनामश्रा में आवाहनकाविधानभीनहींहोता और अग्नौकरणभी नहींहोता परन्तु(अपसव्यवत् अर्थात् यज्ञोपवीत और अँगौछासे प्राचीनावीती किन्तु अपसव्यहोकर कर्मकरे(हि) अर्थात् इसमेंसंदेह नहीं-अब ध्यानकरौ कि इसकथनसे अनन्तरोत रद्दिश्रादमें(सव्य होकर कर्मकरनेकी सूचनाहोगई अर्थात् २४९केश्लोक में जहां वृद्धिश्राद्धका प्रकारदर्शाया तहां उसके मलपाठमें(सव्य)या(भपसव्य) काचर्चा नहींआया और यद्यपि उसकी अधिकोक्लिमें आश्वलायनऋपिके वाक्यसे सिद्धिभी करदीगई तथापि कोई यहकहे कि वह द्वितीय ग्रंथकी वातहै किंतु याज्ञवल्क्यजी ने अपनेमुखसे कुछनहींकहा सो यहसंदेह व्यर्थहै क्योंकि उन्होंने पार्वणको अपसव्य से करना कहाथा बीचमें वृदिश्राडके स्थान(सव्य)या(अपसव्य)कुछभी नहींकहा फिरइस एकोद्दिष्टमैं आकार अपसव्यकहदिया इस्सेप्रत्यक्ष उनकाकहनाभी संसूचितहोगया कि मध्योक्त रद्धिश्राद्धको सव्यहोकर करना चाहिये २५०॥ उपतिष्ठतामक्षय्यस्थानेविप्रविसर्जने । अभिरम्यतामितिवदेलूपुस्तेऽभिरताःस्मह २५१ ॥ पक्ष-अक्षय्यस्थानमें उपतिष्ठतां यहकहे विप्रविसर्जनमें अभिरम्यतां यहकहे वे विप्र यहकहें कि अभिरताःस्म(ह)प्रसिद्द अर्थमें २५१॥ मभिः-इसमें औरभी विशेषता कहते हैं कि २४२ के चौथेचरणसे पार्वण श्राद्ध में (अक्षय्योदक)अर्थात् यहकहाधा कि ब्राह्मणोंके हाथमें जलदेवे और ब्राह्मण उसको लेकर(अक्षय्यमस्तु)यहवाक्य उच्चारणकरें-इसविधिके स्थानपर यहांयहउच्चारण किया जावै कि(उपतिष्ठता)औरभी ब्राह्मणोंके विसर्जनमध्ये जहां २४६ के श्लोकमें (वाजे वाजे) इत्यादि जपकियपीछे(उत्तिष्ठपितर)इत्यादि कहकर कुशकल्पका उठानाकहाथा इसकेबदले यहां कुशकल्पके उठातेसमय(अभिरम्यता)यह उच्चारणकरै फिरवेब्राह्मण अपने मुखसे यह उच्चारणकरें कि(अभिरताःस्म)-श्लोकान्तमें एक (ह) यहअक्षरजो अधिकह सो प्रसिद्धअर्थको देताहे अर्थात् यह विशेषता जो एकोद्दिष्टमध्येदोश्लोकों से वर्णनकरीगई सो सर्वत्र प्रसिद्धहै श्राद्धकी परतोंमें किंतु कुछ नवीनबात नहीं है- यह अर्थ(द)शब्दसे प्रकट होताहै २५१॥ भधिः-आगे २५३ के श्लोकमें सपिंडी करणकी विशेपता कहकर यहकहेंगे कि (शेपंपूर्ववढाचरेत् अर्थात् कहीहुई विशेषताके सिवाय जोकुछ विधिकहनी रहगईहो सो सवपूर्ववत् आचरणकरें किंतु जैसा पहलेपार्वणमें कहचुके, उसीकेअनुसारकरे सोयही अनुकर्प इसएकोदिष्ट में भी लगता है अर्थात् इसमें भी यहसमुझलना कि (शेपंपूर्ववदाचरेत् )इस एकोद्दिष्टनाम श्राद्धका प्रारंभ मध्याह्नकालमें कर्तव्य है-सोई (देवल)ऋपिने यह कहाहे कि (पूर्वाहदेविकंकर्मयपरातेतुपेटकम् । एकोद्दिष्टंतुमध्याने मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २०१ प्रातर्टद्धिनिमित्तकम्)अर्थात्-देवसंवन्धीकर्मतौदुपहरसेपहले और पितरों संबंधीकर्म दुपहरसे पीछे परन्तु एकोदिष्टश्राद्ध मध्याह किन्तु ठीकदुपहरकेवीचमें और रदिशा- इ प्रातःकाल करनाचाहिये-यह ठीकदुपहर या मध्याह्न जो कहा सो कुतपकालका उपलक्षण है जिसकीचर्चा २२५ में आचुकीहै देखलो-इसीएकोद्दिष्टकी औरभीविशे- पता कहते हैं कि २४८के श्लोकमें पार्वणविधिमध्ये यहकहाथा कि (भुंजीतपितृसेवि तम्)अर्थात् श्रादसे बचाहुआअन्न भोजनकरै सो यहीवाक्य सवश्राद्धोंपर संबंधित है-इसीहेतुसे यद्यपि एकोद्दिष्टनामश्राद्धका बचाहुआअन्न भोजनकरना उचितहै परं- तु उसअवस्थामें कि जब एकोद्दिष्ट बार्पिकहो-किंतु एकोद्दिष्ट नवसंज्ञक)हो तो उसका वचाअन्न भोजनकरना नही चाहिये-तथाच(नवश्राद्देपुयच्छिष्टंग्रहेपर्युपितंचयत् । दंप त्यो क्लशिष्टंचन जीतकदाचन) अर्थात्-नवश्राद्धोंमें जो बचाहो (या) जोअन्नगृहस्थी के घरमें बचाहुअा रक्खे २ पर्युपित होगयाहो(और वहभी किजो दंपत्यदोनोंके भोजन पीछे बचाहो ऐसे अन्नको कदाचित् नहीभोजनकरै-(दंपत्य)अर्थात् स्त्री पुरुष दोनोंजो घरके स्वामीहों वे जबतक नहीभोजनकरें तबतक चाहे कितनेही मनुष्य भोजन कर जावें वहरसोई शुद्धबनीरहतीहै परन्तु जबघरधनी दोनोंनेभोजनकरलिया तबरसोई उच्छिष्टमें गिनती होजातीहै ऐसाअन्न विवेकीके भोजनयोग्य नहीरहता-इसीलियेघर के धनीकायहधर्म गार्हस्थ्यप्रकरणमें कहचुके हैं कि वहसबको भोजनकरवाकर पीछे भोजनकरै-यद्यपि उसघरके बहूवेटाअादिकेलिये उनके भोजनकरलेनेसे रसोईउच्छिष्ट नहीं कहलासक्ती परन्तु बटोंका यहसनातनधर्म है और इसलिये है कि नजाने कोई अभ्यागत या संबंधी आदि विवेकी वीचमें भाजावे तो उसकेयोग्य वह रसोई नहीं रहेगी-नवश्राद्धोंका चर्चा ऊपरयायाहे तिनकेलक्षण कहतेहैं कि (प्रथमेट्विटतीयेहि पंचमेसप्तमेतथा । नवमैकादशेचैवतन्नवश्रादमुच्यते) अर्थात्-मनुप्यके मरनेमें पहले दिवस जो एकोद्दिष्ट कियाजाता अर्थात् घरसे लेचलनेके समयसे चिताकेअन्तताई जोपांच या छः पिंडदियेजातेहें तिसपीछे यातो दशग्यारह दिनलाई रोजरोज अथवा तीसरे पांचवें-सातवें-नववें-ग्यारहवें दिवसोंमंजोएकोद्दिष्टकियेजाते हैं उनकोनवश्राद्ध कहतेहैं क्योंकि वहमरनेके प्रारंभमे सबसे पहलेकियेगये इस्सेनवीनहें इसीसे नवश्राद्ध उनका नामहुश्रा तिनकायचा हुअा अन्नखानेका निषेधहे इस्सेपीछे जो वर्प वर्प प्रति एकोद्दिष्ट होताहै उसमेंनिपेध नही २५१ ॥ यहविधिएकोद्दिष्टकीकही सो यहएकोद्दिष्ट स्त्रियोंकाभी उनके क्षयाहके दिनमें जुदा केवल उनके नामसेही होताहे। अब आगे सपिंडी करण श्राद्ध कहतेहैं। गंधोदकतिलैर्युक्तंकुर्यात्पात्रचतुष्टयम् । प्रापिटपात्रेपुप्रतपात्रंसिंचयेत् २५२ ॥ पेसमानाइतिहाभ्यांशेपंपूर्ववदाचरेत् । एतत्सपिंढीकरणमेकोदिष्टंखियामपि २५३ ॥ R0613 २०२ मिताक्षरा साचाराध्याय । भक्षसंहद्वयोः-गंध उदक तिलोंकरके युक्त अार्थ पात्र चतुष्टयकरै-पितृपात्रोंमें प्रेतपात्रको प्रसिंचनकरै २५२ (यसमाना)। इन दोमंत्रों से-शेप पूर्ववत् आचरै-यह सपिण्डीकरण-एकोद्दिष्ट-स्त्रीकाभीहै २५३ ।। - मभिःसहदयोः-सपिंडी करण श्राद्दमें जो कुछ विशेषताहै सो कहते हैं कि (भार्थ) कहिये अर्ध्य विधिउद्दार करनेकेलिये चार पात्र ऐसेकल्पितकरे जोपूर्वोक्त विधिके अनु सार गंधउदक तिलोंसे संयुक्तहों सो इन चार पात्रोंके कथनसे याज्ञवल्क्यजीने यहां पितृपक्षके चार ब्राह्मण दर्शायेहैं क्योंकि पात्र ब्राह्मणोंकेही निमित्तहोतेहें और विश्वे. देवाके पक्षमें पार्वणके अनुसार दोहीवनेरहे क्योंकि नीचके श्लोकमें कहाहै कि जो कुछ न कहाहो सो पूर्ववत् आचरै पर यहां पर इतना विशेष औरभीहै कि प्रेतपात्रमें से उसप्रेतको अदिये पीछे बचेहुये जलको उनतीनौ पात्रोंमें थोड़ा २ भाग पूर्वक सींचदेवै सो इन मंत्रोंसे सींचे कि (ये समानाःसमनसः) इत्यादि-इसके सिवाय जो कुछ कहना शेपरहाहो सोसव विश्वेदेवा आवाहनादि विसर्जन पर्यंत पूर्ववत् क- हिये पार्वणके अनुसार विधि आचरणकरै परन्तु इतनी विशेषता औरभी है कि प्रेत पात्रके जलसे प्रेतस्थानी ब्राह्मणके हाथमें अध्यदेकर और बचेहुयेको उनतीनों पा- त्रोंमें सींचकर पीछे उसप्रेतका साराकर्म भिन्नएकोद्दिष्टवत् समाप्तिकरै (मौर) पित्र्य- पात्रों यहा पित्र्य ब्राह्मण तीनोंके स्थानशेपविधि पार्वणवत् आचरै-यह वर्णन किया हुआ सपिंडीकरण और इससे पहले कहाहुआ एकोद्दिष्ट ये दोनों श्राद्धस्त्रीके भी अर्थात् माताकेभी करने चाहिये सो इसकथनसे यहसिद्धांतभी पायागया कि पार्वण विधि, मातृश्राद्धजुदा नहीं करना चाहिये किन्तु पिताआदि तीनोंका सपत्नीक आ- वाहन करनेसे मातृश्राद्दभी उनकेसाथमहोगये (परन्तु द्विश्राद्धमें सपत्नीक पावा- हनसे नहीं होता किन्तु मातृश्राद्द पहले जुदाकरलिया जाता है जिसमें मातादादी परदादी इनतीनोंका आवाहनहोताहै तिसपीछे पितृश्रादकिया जाताहे जिसमें पिता आदि तीनोंका आवाहन भिन्नहुआ करताहै सोई नीचे अधिकोक्ति में सबसे पहलेदे- खो और यहभी यादरक्खो कि २२६ के अभिप्रायार्थ में नीचे जाकर यहवात जोलि खीहे कि इसीप्रकार नानापलमें भी तीनोंवर्ग भिन्नर समुझलेने-तिसका यहसिद्धांत नहीं है कि नानापक्षमभी तीसरामातृश्राद्ध भिन्नकरे किन्तु वहां परनानापामें दोही वर्गहोंगे एक विश्वेदेवाओंका दूसरा सपत्नीक नाना परनाना सरनानाका और पिता पक्षमें वहांभी तीनवर्ग जैसे भिन्नलिखे हैं उसी प्रकारहोंगे अर्थात् सवजोड़कर पांच वर्गहुये परन्तु वहां परतीनीवर्ग नानाकेभी इसलियेलिखेहैं कि ब्राह्मणोंकी संख्याका विभाग शीघ्रसमुझमें भाजावै २५२१२५३ ॥ भधि०सहदयोः (अन्यष्टकासुदीचगयायांचक्षयेहनि। मातुःश्रादप्यकुर्यादन्यत्रप मिताक्षरा स० आचाराध्यायः।। २०३ तिनासह) अर्थात्-माताकी सपिंडताहोचुके पीछेभी जो अन्वष्टका पर्वमें श्राद्धकरै या वृद्धिकालमें नांदीमुख श्राद्धकरै अथवा गयाजीमें करै या क्षयाहके दिन एकोद्दिष्टकरै तव तो माताका श्राद्धष्टथक् कहिये जुदाकर सो जुदाकरनेकीभी यहपरिपाटी है कि जो क्षयाहके दिनका एकोद्दिष्टहोवै तव तो केवलमाताकेही नामसे एकपिण्डदेव शेष और जो तीनिभेद इसमें कहेगये उनमें जुदा इसरीतिसे करै कि जैसे पिता पितामह प्रपितामह तीनोंका पार्वण एक साथहोताहै तैसेहीमातादादी परदादी तीनोंका एक साथ पार्वण विधिसे करै-(भन्यत्रपतिनासह) अर्थात् इनप्रकारोंके सिवाय और२ दशा- ओमें जो पार्वण श्राद्धकरै पतिके साथ सपत्नीक आवाहन करलेवै किंतु जुदाश्राद्ध नहीं करै-सपत्नीक श्राद्धके करनेमें कुछ औरभी निर्णयकरना शेपहै अर्थात् जिसस्त्री की पतिके साथ सपिंडता करीगईहो उसका तो पतिके साथ श्रावाहन करिकै सपत्नी- कश्राद्धकरै क्योंकि वह उसीकी अंशभागिनीहुई परन्तु जिसस्त्रीकी सपिंडता उसके पिताके साथकरी गईहो उसका श्राद्धभी पिताकेही साथकियाजावै किंतु उसका पुत्र जब अपने नानाका श्राद्धकर तभीअपने नानाके साथमैं अपनी माताकाभी एकसाथ आवाहनकरे क्योंकि उसकी सपिंडता उसके साथहुईथी इस्से वह उसीकी अंशभा- गिनीहोचुकी इसहेतुसे उसके श्राद्धका अधिकार सदैवकेलिये व्यपनेपिताके साथहो चुका किंतु पतिके साथका अधिकार नहींरहा-सोई शातातपऋपिने यहकहाहै कि-(ए कमूर्त्तित्वमायाति सपिंडीकरणेकृते। पत्नीपतिपितृणांचतस्मादंशेनभागिनी)-अर्थात्- सपिंडीकरण श्राद्धके करचकने पीछेपत्नी अपने पतिके साथ यहा अपने पितयोंकेसा थएक मूर्त्तित्वमें आजातीहै किन्तु जिसके साथसपिण्डताहुई तिसमें और उसमें कुछ अंतरनहीं रहता तिसहेतुसे उसीकी अंशभागिनीहुआ करती है-इसनिर्णयसे अब एक और वार्ता यह उत्पन्नभई कि जिस पुत्रने अपनी माताकी सपिण्डता अपने नानाके साथकरीहो उसको सदैव अपने नानाका श्राद्ध उसमुख्यतासे करना चाहिये कि जैसे पिताके श्राइमें पुत्रको नित्यअधिकारहे परन्तु इसमुख्यतामेंभी कुछपिताके श्राद्धका अधिकार नहीं नष्टहोताहे (भौर) जो उसने अपनी माताकी सपिण्डतापति के साथ या सासूके साथ अर्थात् अपने पिता या अपनी दादीके साथकरीहो तो फिर नानाके श्राईमें कुछसदेवकी मुख्यता नहीं आवश्यकहे-हां केवल इतनीवात कि जो अपनेसे बनियावे तो अपना अभ्युदय उस्से निःसंदेह होगा पर न पनिपरनेसे दोप भागी नहीं होसक्ता-यहवार्ता तीसर्वथा निश्चितहोगई पर इस्से एक नवीनसंदेह और भी उत्पन्नभया कि सपिण्डताभी कई प्रकारकी होतीहै और किस२ के साथ, होतीहै और न जाने वह किसर दशामें किसर के साथ करनी चाहिये या चाहे तिस के साथ जवचाहै तबअनायसनाय करदेवे-इसलिये अव शास्त्रांतरवाक्यमी प्रमाण मिताक्षरा स० आचाराध्याय । देकर लिखनेपरे जिनमें कई२ भांतिकी रीतें देखनेमें आतीह-तहां प्रथम तौ यही एक रीति पैठानसिऋपिने निर्विशेष कहीहै कि-(पितामह्यादिभिःसाईसपिंडीकरणस्मृतः। तथाभापिभार्यायाःस्वमात्रादिभिरेवच) अर्थात्-माताका सपिंडीकरण पुत्रकी दादी आदि तीनोंके साथ करना कहाहै तथैव जहां कर्मकर्ता पति होवै तहां वह भ अपनी भार्याका सपिंडीकरण अपनी माता आदि तीनोंके साथकरै यहबात दोनों भांतिसे एकही रही-अब इसवातके देखनेसे कर्त्तामभी यह संदेहउठा कि भगको किस दशा में कर्ता होना चाहिये और पुत्रको किस दशामें इसलिये कहते हैं कि-(अपुत्रायांम तायांतुपतिःकुर्यात्सपिंडताम् । श्वश्वादिभिःसहेवास्याःसपिण्डीकरणंभवेत्) अर्थात्- पुत्रकी विद्यमानतामें भर्तीके होतेहुयेभी पुत्रही कर्ताहोवै परंतु अपुत्राके मरनेमें भ- ही सपिण्डताकरै और इसका सपिंडीकरणभी सासू अादिके साथहोवै-जैसा ऊप- रले वाक्यमेंभी कहचुके हैं-अपुत्राके निदर्शनसे सपुत्राकभी मरनेमें भर्ती कर्ता होगा कि जब पुत्र उस स्थानपर उपस्थित नहीं है १-अव दूसरी रीतिसे पतिके साथ स- पिंडता कहते हैं जैसा (यमप्राचार्य) ने कहा है कि-(पत्याचेकेनकर्त्तव्यंसपिंडीकरणं स्त्रियाः । सामृतापिहितेनैक्यंगतामंत्राहुतिव्रतैः) अर्थात् पतिसे एकल्लेकेही साथ स्त्रीका सपिंडीकरण कर्त्तव्यहे क्योंकि वह मरीहुईभी मंत्राहुति नियमोसे उसकेही साथ ऐक्यभावको पहुँची २-अब तीसरी रीतिसे नानाके साथ किन्तु उसीके पिताके साथ सपिंडता कहते हैं जैसा (उशनाआचार्य)ने कहाहे कि-(पितुःपितामहेयहत्पूर्णेसंवत्स रेसुतैः । मातुर्मातामहेतहदेपाकार्यासपिडता)-अपिच-(पितापितामहेयोज्यःपूर्णेसंव त्सरेसुतैः । मातामातामहेतहदित्याहभगवानशिवः)-अर्थात्-उशनाने यह कहा कि- जैसे मरनेके दिनसे लेकर संवत्सरके पूर्णहोनेमें पुत्रों करके पिताकी सपिडता पिता- महके साथ किन्तु दादा आदि तीनोंके साथ करनी उचितहै उसीके समान माताकी यह सपिंडता मातामहके साथ किन्तु नाना आदि तीनोंके साथ करनी चाहिये-सोई भगवान् शिवजीनेभी कहा कि संवत्सरके पूर्ण होनेपर पुत्रोंकरके पिता तो पितामह के बीच में जोड़ना उचित है तैसेही माता मातामहके बीच ३-इत्यादि अनेक भांति की रीतोंके प्रमाणवाक्य मिलनेपरभी परस्पर एकसेएक विरुद्ध देखपड़तीहै कि किस रीतिको ठीकमानें या किस दशामें किस रीतिका वतीवाकर इस दृष्टिसे अब इनका विरोध शांत कियाजाताहै कि जिस पुरुपकी भार्या निपूतीमरै वहपति थापही कर्ता होकर निजभार्याकी सपिंडता अपनी माताकेही साथकरै १-और जहां देवगतिसे यह संयोग होजावे कि पति और पत्नी दोनोंका एकसाथ मरण होजाय तहां उसके पुत्र अपनी माताकी सपिडता उस पिताफेही साथकरें सो इस भेदमें पुत्रोंका कुछ नि- यम नहीं है कि किस प्रकारके विवाहसे उत्पन्न हुयेहों २-परंतु जहां पुत्र तौ (मासुर) मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। २०५ आदि निन्द्य विवाहों से उत्पन्न हों और वह निन्द्य विवाह करनेवाला पिता उनका चाहै विद्यमानहो चाहै पूर्वकाल में मरचुकाहो अर्थात् वह निन्द्य विवाहिता माता उनकी मरै तौ उन पुत्रो को उसमाताकी सपिण्डता अपने नानाकेही साथ करनी चाहिये और उस पुत्र को भीनानाके साथ सपिण्डता करनीचाहिये जो पुत्रिका सुत अर्थात् पुत्रकेस्थान गोदलियाहुआ वेटीका पुत्र धेवता प्रसिद्धहै ३-और जो (ब्राह्म) आदि शुभ विवाहोंसे उत्पन्नहुये पुत्रहों उनको तीनोंभांतिकी रीतोंमें (विकल्प) से स्वा- धीनताहै अर्थात् अपनीमाताकी सपिंडता चाहै अपने पिताके साथ या अपनेनाना केसाथ या अपनी दादीकेसाथकरें तौ कोईरीतिसेभी यद्यपि दोपनहींहै तथापि जैसा उनकेवंशमें नियतसमाचार चलाआताहो उसीके अनुसारकरैं अर्थात् यातौ उनके देशकी परिपाटीसे या ग्रामकी मर्यादासे या ठेठ अपने कुलकी परंपरासे यह नियम चलााताहो कि सासूकेसिवाय और किसीकेसाथ नहींहोती या नानाआदि जैसी जहांकी व्यवस्थाहो उसके अनुसारकरें-अथवा-जिसके वंशमें इसवार्तामध्ये कोईसा नियम परिनियमित नही या जिसको अपनेवंशका समाचार जो पहलेकभी था वह अब किसीहेतुसे मालूम नहींरहा तो ऐसे कर्मकर्ता को सर्वथा अपनी रुचिके ऊपर स्वाधीनताहै कि वह तीनोरीतिमेसे कोईएक मनोज्ञसमुझै जैसा सबसेपहले उपोद्- घात प्रकरणमें सातवें श्लोकमें यह कहाहै कि (स्वस्यचप्रियमात्मनः) इसकाअर्थ विस्तारभी उसीजगह लिखचुकेहैं देखलो (भेद२) अव माताके सपिडीआदि कमों में गोत्रके उच्चारणमध्ये निर्णय करतेहै कि-भर्तीकेगोत्र या पिताकेही गोत्रसे उच्चारण • करिकै पिण्डदानादि कर्मकरै क्योंकि दोनोंकाप्रमाण शास्त्रवाक्यों से पायाजाताहै- यथा(स्वगोत्राश्यतेनारीविवाहात्सप्तमेपदे। स्वामिगोत्रेणकर्त्तव्यातस्या.पिण्डोदक क्रिया) अर्थात-नारीकहिये स्त्रीमात्र विवाहके सातवेंपदसे उपरांत अपने पितागोत्र से च्युत होजावैहै इसहेतुसे उसके पतिके गोत्रसे करनी चाहिये उसकी पिण्डोदक दानक्रिया इत्यादि अनेकवाक्य तौ पतिगोत्रका प्रमाण करतेहै-और पितापक्षमेभी यहकहाहेकि(पितृगोत्रंसमुत्सृज्यनकुर्यादर्तृगोत्रतः।जन्मन्यवविपत्तीचनारीणापैतृकं कलम् ) अर्थात्-पितृगोत्र को छोड़कर भगोत्रसे न करै क्योंकि जन्मके मध्ये और विपत्ति कहिये मरणमेभी स्त्रियोंका पैतृककुल अंगीकार है किन्तु पिताकेही गोत्र से जन्म और मरणमे भी उनकी सारीक्रिया करवावै इत्यादि अनेकवाक्य पिताके भी गोत्रका प्रमाण देतेहैं तो इसमेंभी वहीसंदेह फिर उत्पन्नभया जैसा सपिडीके स्थल में हुआथा कि किसका प्रमाण मुख्यसमझाजाय इसलिये अब इनका भी विरोध शांत कियाजाताहै कि-आसुरादि निन्द्य विवाहों वाली स्त्री तथा पुत्रिका करणवाली स्त्री किन्तु जिसकापुत्र अपने नानाकी गोद वैठाहो इनस्त्रियोंकी क्रियातो पिटगोत्र २०६ मिताक्षरा साचाराध्याय । सेही करनी चाहिये और (बामा विवाहादि शुभ विवाहों वाली स्त्रीकी क्रियामध्ये (विकल्प) अंगीकार हे अर्थात् चाहै पितृगोत्र से करौं चाहै भर्तृगोत्र से परन्तु इस विकल्प में भी यहयात मुख्य है कि जिसके वंशमें जैसी परंपरा चली आतीहो उसको उसीके अनुसार चलना चाहिये सोई इसमें यहवाक्यभी प्रमाण है कि (ये नास्यपितरोयातायनयाताःपितामहाः।तेनयायात्सतांमार्गतेनगच्छन्नदुष्यति)अर्थात् जिसमार्गसे इंसमनुष्यके पितरकहिये पिता काका चाचा ताऊआदि गयेहों किन्तु जिंसरीतिमें चलतेरहेहों-या-जिसमार्गसे पितामह कहिये दादा परदादा सरदादावा- दि व वाकरिगयेहों उसीमार्गसे यहापभी जावै क्योंकि उसमार्ग में चलनेसे इस- को दोप नहीं लगताहे पर इसमें इतना लक्ष्य और भी विशेपहै कि (सतांमार्गया- यात्) अर्थात् वह उनके बड़ोंका चलायाहुप्रा मार्ग जो सत्पुरुषांके बावे या प्रमाण योग्यहोवै तो निःसंदेह उसपर चलें अन्यथा जो सत्पुरुषोंके वीवे या प्रमाण योग्य नहीं होवे जिसमें कोई प्रकारका (किंतु) लगसक्ताहो या कोई प्रकारके दुःखों वा निरा- दरोंकी संभावना देखपड़तीहो तो उसमार्गका प्रतिरोधकरिकै निजप्रभावसे प्रशंस्य वा सुखदायी मार्ग आरोपणकरें या इनवातोंके न होनेपरभी शसितमार्गमें कठिनता से चलसक्लाहो तो निःसंदेह उसकी कंटकिता वा नतोन्नतभावका परिशोधनकर जि- स्से सौगम्य और सरलताकी प्रत्तिसे कठिनताका प्रतिबंध जातारहै (अथव) (यत्र शास्त्र तोनव्यवस्थानाप्याचारतस्तत्राप्यात्मनस्तुप्टिरेवेतिवचनादात्मनस्तुष्टिरेवव्यव स्थापिका)अर्थात्-जहां शास्त्रसेभी कुछव्यवस्थानियत न होवे और न आचार कहिये वंशपरंपरासे तहांभी निजात्मा कहिये मन बुद्धि आदि इनकी प्रीतिके अनुसारकरै ' किन्तु दोरीतोंमेंसे जैसा अपने मन बुदिमें समावे तैसाकर सोयहआत्मतुष्टिही व्यव- स्थाहो जातीहै जैसापहले संस्कार प्रकरणमें १४ के श्लोकसे यहकहाथा कि (गर्भा एमेऽष्टमेवान्दे) अर्थात् जनेऊचाहै गर्भसे आठवें यहाजन्मसे आठवें सालकरै तौ भी दोप नहीं (भेद३) इसव्यवस्था (प्रेत) शब्दका चर्चा मूलमंभी २५२ के श्लोक में पाया तथा अथामभी बहुधा आचुका और अभीनीचेके वर्णनमें विशेषतर प्रेत का चर्चा आवेगा इसलिये प्रकाशकरना योग्यहै कि प्रेत शब्दके अर्थ तो यद्यपिकई प्रकारसे होतेहैं इसीहेतुसे प्रेतशब्दके ऊपर एकबडा लंवा चौड़ा शास्त्रार्थहै जिसमें नानाप्रकारके वाक्य अन्यशास्त्रोंके भी संग्रहीत और प्रमाणीभूतहें कि जिनके अर्था- शभी शास्त्रयुक्तिके अनुसार दोदोपक्षमै यथार्थ घटजातेहें (तदा) एक पक्षमें तो (रद प्रपितामहका)बोध होताहे किन्तु पूर्वकी चौथी पीढीपर सरदादा प्रेतनिश्चितहोजा- ताहै क्योंकि प्रथम तो उसके अक्षरोंसेही यह अर्थ प्रकटहोताहै कि (प्र-इतः)प्रेतः (किन्तुय (प्रकर्पण) इतः गतः)स प्रेतः(अर्थात् जो निपटतीनोंपीढ़ीको छोड़कर ऊपरको मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २०७ चलागया सो प्रेतकहलाया) इसप्रकार अर्थकी सिद्धिहुये पीछे औरभी अनेकवाक्य इसकी दृढ़तामें प्रमाणदेतेहै यहांतक कि (उदक) (पिंड) दान आदिमें जो २ उलटा पुलीहुई जातीहै उसकोभी सिद्धकरदेतेहैं पुनि वही सिद्धिमूलश्लोकपरभी यथार्थ घटजातीहै दृष्टांत जैसे २५२ के श्लोकमूलमे कहाहै कि (पितृपानेषुप्रेतपा–प्रसिंच येत् ) इसका भाव यह निश्चयहुया कि चार अर्घपात्र जो कल्पित कियेहैं तिनमें पि- ताकी मुख्यता अनुसार तीन तौ पितृपात्रहुये अर्थात् पिता दादा परदादा इनके सो इन्हीं तीनोंपितृपात्रोमें वहचौथे सरदादेका जोप्रेतपात्रहै तिसका जलसींचदेवै-इत्या- दिअनेक वाक्य इसीपक्षको दृढकरते चलेजातेहैं-सो उनसमस्त वाक्योंका लिखना तो यहांपर अतिविस्तारकी भीति और स्थातुपकंडनकी दृष्टि से अनुचितसमुझा-प- रंतु अव अपने मुख्य प्रयोजनपर दृष्टिकरनेकेलिये यहसमुझौ कि इसतीसरे भेदका सारालेख यहां ताई व्यर्थ है क्योंकि प्रथम तौ वेही वहुधा वाक्य जो उसपहले पक्ष की दृढताकरतेथे यथार्थसे इसपक्षमेंभी सबके सवघटते और साक्षीदेकर प्रमाणकर- तेहैं किन्तु उनमें दोदो अाँकी ध्वनिभरीहे दूसरेयहकारणहै कि सर्वत्र अक्षरोकेध्व- न्यर्थसे प्रयोजनमें अनर्थ नहीं कियाजासक्ता-भला जो अक्षरार्थकी सिदिसे वैद्यको गदहा कहनेलगै तौ क्योंकर उचितहोसलाहै क्योंकि यद्यपि (गदंरोगहंतीतिगदहा) अर्थात् गदनामहे रोगका तिसे जो कोई दूरकर वहगदहा ठीकरहै परन्तु यहवातलो- काचारमें प्रत्यक्ष विरुद्धहोनेसे अनर्थरूपहुई जातीहै किंतु जब अपने कल्याणकेहेतु से वैद्यको बुलानेगये और चली गदहाजी यों पुकारकर संवोधन किया तबतत्काल हंबरूप अनर्थहोने लगेगा क्योंकि यहबात उस्से सही न जायगी फिरकल्याण कहां- इस्से यह निश्चय जानौ कि (प्रेत) नाम उसीका होताहै जोसवसे पीछे हालमें मराहो सो यह प्रेत संज्ञा उसकी (रूढ़ि) भावसे होतीहै और केवल एकवर्ष पर्यंत मानीजा- तीहै जबतक सपिडता नही होवै-सोई मार्कडेयमुनि ने यह कहाहे कि(प्रेतलोकेतुवस तिर्नृणांवर्पप्रकीर्तिता। क्षुत्तप्णेप्रत्यहंतत्रभवेतांभृगुनंदन)अर्थात्-हे भृगुनंदनमनुष्यों कीवसति कहिये निवासमरजानपीछे एकवर्पताई प्रेतलोकमे विख्यात है जहां क्षुधा और तृप्णायह दोनों नित्यंप्रति बनीरहतीहैं-उसप्रेतलोकमें जवतक प्रेतरहताहै तव तकभूख और प्यास इनदोनोसे अत्यंतदुःखी होताहै और तबतक उसकी नामसंज्ञा भी पितर या पितृ शब्दके विशेपणसे नहीं बोलीजाती कितु सपिडी ताई जो२ श्रा- ह उसकेहोतेहैं उनमें (प्रेत) के उद्देशसेही पिडदानादि होताहै-परन्तु सपिडीके उप- रांतसे उसका (प्रेतत्वा दृरहोकर (पितृत्व) प्राप्तहोताहै-यह प्रेतत्व उसका कुछएकदिन में नहीं दूरहोजाता किन्तु ३६० दिनमें सोलहश्राद्धोके द्वाराक्रम २ से दूरहोतारहता है शेपरहा सहा बरसदिन एकोद्दिष्ट सहित सपिडी करणहोनेसे सर्वदूरहोजाता और २०८ मिताक्षरा साचाराध्याय। पितृभाव उसको मिलताहै इसलिये उनपोडश श्रादोंका करना आवश्यकहे-तथाच (यस्यैतानिनदत्तानिप्रेतश्राद्धानिपोडशाप्रेतत्वंचस्थिरंतत्यदत्तैःश्राद्दशतैरपि)अर्थात् जिसके यह सोलह प्रेत श्राद्ध नहीं दियेगये तिसका प्रेतत्वपीछे सैकरों श्राददेनेसेभी बनारहताहै । सोलहश्राद्धोंकी गणनायथा(बादशाहेत्रिपक्षेचपण्मासेमासिचान्दिके। श्राद्धानिपोडशैतानिसंस्मृतानिमनीषिभिः)यर्थात्-एक तौद्वादशाहका श्रादजोएका- दशाके भोरहोताहै दूसरा त्रिपक्षी श्राद्ध जिसे त्रिपखी कहतेहैं-तीसरा पड्मासिक जो छमाहीसे पहले साढ़े पांचमासपर होताहै-चौथा वार्पिक जो उनाब्दिक साढ़े ग्यारह मासपर होताहै चारयह और बारह प्रतिमासकेयह इतने पोड़शश्रादनामसे मनीपियों करके कहेहैं(भेद४)यहसपिंडीकरणभी जिसकाचर्चा ऊपरदूरसे चलाताहै सो जिस कोअपनेपिताकाकरनाहोतौउसीअवस्थामें करसकताहैकिजवदादा परदादा सरदादा तीनोंमरचुकेहों क्योंकि पितातौ प्रेतरूप निश्चितहेइसहेतुसे इसके अर्घ्यपानकाजल उन्हींतीनों पितरोंके पात्रोंमें सींचाजावेगातथैव इसकापिंडभी उनतीनोंके पिण्डोंमें मि- लायाजावेगा-इस्से यहभी निश्चितहुआ कि जिसका पिता प्रेत होजावै और दादा या परदादा दोमें कोई एकभीजीताबठाहो तो सपिण्डीकरणश्राद्धका अधिकारनहींहै-सोई यह वाक्यभी प्रमाण पायागया कि(व्युत्क्रमाचप्रमीतानांनैवकार्यासपिण्डता) अर्थात् व्युत्क्रमकहिये उलटापुलटीसे मरेहुयोंकी सपिण्डता नहींकरनी चाहिये और मनुजी ने जो यहकहाहै कि (पितायस्यतुरत्तस्याज्जीवेच्चापिपितामहः। पितुःसनामसंकीर्त्यकी तयेत्प्रपितामहम्) अर्थात्-जिसका पितामराहोवे और निश्चय जो पितामह कहिये दादा जीताहो वह कर्ता पहले पिताकाहीनाम उच्चारणकरिकै फिर प्रपितामह कहिये परदादे को उच्चारण करै-किंतु वीचमें पितामह जो जीताहै तिसके नामको छोड़देव- परन्तु इसबातमें यह सिद्धांत नहींहै कि पिता और परदादा इन दोहीका उद्देश करै या दोहीपिण्डदेव या परदादा यादि पूर्वकेतीन अंगीकारकरिके उनकेसाथ पिताका भी सापिंडयकरदेवै सो नहीं क्योंकि यहवात केवलनामोंके मंत्रप्रयोग जतलानेके नि- मित्तसे फहीहै-इसलिये अब सपिण्डीकेस्थान यहा उस्सेपीछेभी जबकभी पार्वण की आवश्यकताहो उसके नियमों को कहते हैं कि इसरीतिसे उद्दारकरै-तथाहि (घियमा णेतुपितरिपूर्वेपामेवनिर्वयेत् । पितायस्यतरत्तःस्याज्जीवञ्चापिपितामहः) अर्थात्-यह सिद्धांतहे कि-पिताकेजीतेहुये उस्सेपहले तीनोंकेनामसे पिण्डदेवे और जिसकापिता मराहोवै और पितामह जीताहोवै सोभी उसजीतेहुये पितामहसेपहले तीनोंके नाम पिण्डदेव अर्थात् इसदशामें पिताका भिन्नश्राद एकोद्दिष्टकीरीतिसे पहलेही करलिया जावेगा तिसपीछे उनतीनोंके पिंडएकसाथ दियेजावेगे क्योंकि सपिण्डता तो होहीनहीं सक्ती और श्राहकाकरना आवश्यकहै, सोई इसमें विष्णुजीका वाक्यभीप्रमाणहै कि- मिताक्षरास आचाराध्याय । ၃၁ (यस्यपिताप्रेत-स्यात्सपितृपिण्डनिधायपितामहात्पराभ्यांद्वाभ्यांदद्यात्)अंर्थात्-जिस कापितातौ प्रेतंहोजाये औरपितामह जीताहोवहक पहले पिताकेनामसे एकहीपिण्ड एकोद्दिष्टके विधानसे जुदासमर्पणकरिकै तिसपीछे(पितामहात्पराभ्यांद्वाभ्यां) अर्थात् अपने पिताके पितामहको और उस्से परे दो औरोंकोभी इसहिसाबसे अपनेपरदादा आदि पूर्वके तीनों पितरों को पिण्डदेवै पार्वणके प्रकारसे यह सर्वोपरि सिद्धान्त है परन्तु इससिद्धांतसे यहवात पाईजातीहै कि जिसकिसीकी सपिंडी इसनिर्णयके अनु- कुलकरनेसे छोड़ीगईहो उसकी फिर उसके मरनेपर होगी जिसके हेतुसे छोड़ीगईथी इस्सेयागे जिसकेकुलकामाचारजैसाहोताहोवह अपनारजानलोभिद५)अंबइनके नामोंके मंत्रप्रयोगभी जिसअवस्थामें जिसरीतिसे उच्चारणकरने उचितहों सो कह- ने चाहिये क्योंकि सीधेक्रमके मरणमें तो सर्वत्र (पितृभ्यःपितामहेभ्यःप्रपितामहेभ्यः) यहमंत्र प्रयोग बोलाजाताहै और सर्वत्रपद्धतियोंमेभी इसीक्रमसे लिखाहोताहै परंतु व्युत्क्रमके मरणवाला किसप्रकारसे उच्चारणकरै इसलिये यहनियम कहतेहैं कि जिस- का पिताजीताहो वह (पितुःपितृभ्यःपितामहेभ्यःप्रपितामहेभ्यः) इसयुक्तिसे उच्चार- पकरै-और जिसका दादा जीताहो वह (पितामहस्य पितृभ्यःपितामहेभ्यः प्रपिता- महेभ्यः) इसप्रकारसे कहै-ऐसही मातृश्राद्धोंमें माता दादी परदादी आदिके व्युत्क्रम मरण मध्ये यहनामोंका प्रयोग और इस्से पहले चौथे भेदमें वर्णनकरी सपिंडताका भी निर्णय अपनीवुद्धिसे अनुमानकरलेना॥(भेद६) उसचौथेभेदमें वर्णनकरी सपिं. डताके निर्णयमें इतनीवात औरभी विशेपहै कि गोब्राह्मणादिसे मृत्युपाये पिताकी भी सपिंडता नहीं होतीहै-सोई कात्यायन ऋपिका यहवाक्यभी प्रमाणहै कि(ब्राह्मणा दिहतेतातेपतितेसंगवर्जिते।व्युत्क्रमाञ्चमृतेदेयंयेभ्यएवददात्यसौ)अर्थात्-ब्राह्मणगऊ आदिसे पिताके मारेजाने या पतित कहिये वैधर्म्य किंतु जातिच्युतहो जाने या संग वर्जित कहिये संन्यासीहोजाने अथवा व्युत्क्रमकीमृत्युपाजाने परभी उनको पिंडदेने चाहिये कि जिनको यह प्रापदियाकरताथा-अर्थात् इसप्रकारकी मृत्युबालोंकी सापडता तौनहीं करनी परइनसे पहलेतीनों पितरोंकेनामसे पार्वण विधिकरदेनी चाहिये और भी यहविशेषताहै कि जो व्युत्क्रममृत्युके हेतुकरके सपिंडीकर्मसे वर्जितरहे हों तिनका यह सपिंडीकर्म उसदशामै फिर कियाजावेगा किजवकभी व्युत्क्रमसेजी तारहनेवाला मरै इसकाचर्चा ऊपरभी चौथे भेदके अन्तमें प्राचुकाहै परन्तु यहांपरौरजोगोब्राह्मणादि हतगिनायेगये उनकी पीछेभी न होगी किंतु उनकीगयाश्राद्धहोनासंभवितहे और संग वर्जित जो संन्यासी इनसाथमें गिनतीहुआ तिसकाचर्चा फिरभीत्रागे२५४की- धिकोक्तिके चौथेभेदमें आवेगावहां इसका विधिपूर्वक निर्णयदेखलेना-इस्से आगे जिस के कुल में जैसाजैसा शिष्टसमाचार चलााताहो वह अपनारजानलेना२५२।२५३॥

२१० मिताक्षरा साचाराध्यायो अब इंस्से आगेसालभरके मासिकश्रादसंयुक्तसोलह श्रादोंका निर्णय करतह ॥ भवोक्सपिंडीकरणयस्यसंवत्सराभवेत् । तस्याप्पनंसोदकुंभंदद्यात्संवत्सरंदिजे २५४ ॥ मक्ष-जिसका सपिंडीकरण संवत्सरसे पहले होवै तिसके अर्थभी संवत्सरताई अन्न और जल सहित कुंभ द्विजको देवे २५४॥ अभिल-सपिंडीकरण श्राद जिसप्रेतका वर्षभीतर करलियाहो तिसकेलियेभी नि- जशक्ति अनुसार अन्न और जलकाभरा घट यह रोजरोज यामास२प्रतिउसके नाम के उद्देशते सालभरतक ब्राह्मणको दिये जाये २५४ ॥ अधिः-इसऊपरके कथनसे दोबातें प्रकटहुई-एक तो यह कि सपिंडीकरणको अवधि जो याज्ञवल्क्यजीने अनन्तरोक्त मूलश्लोकोंमें नहीं कहीथी सो यहां परदर्शा- ईहै कि होना,तो सालपूरेमही उचितहे परकहीं किसीहेतुसे सालके भीतरभी करलेना उचितहे और दूसरी यहबात कि पूरेसालकी सपिंडी ताई प्रेतको अन्न और जलकुं- भदेना होता है कदाचित् कोई सालभीतर करलेनेसे श्राग्रहकरे कि सपिंडी तो होही- गई अब उसवातसे क्याकामहे जो अन्न और जलकुंभका झगड़ा शेपरक्खें सो नहीं किंतु सालभीतर करलेने परभी वहकाम सालपूरे ताई कियेजावे-चर्पभीतर सपिंडी होजानेके मध्ये (भाश्वलायन) ऋपिनेभी यहकहा है कि(अथसपिंडीकरणंसंवत्सरांतेहा दशाहेवा)अर्थात्-अब सपिंडीकरणका होना संवत्सरके अन्तमें अथवा द्वादशाहके दिनम-(कात्यायनजी) ने यह कहा कि(ततःसंवत्सरेपक्सपिंडीकरणंभवेत् । त्रिपक्षवा यैदावार्वाग्वृद्धिरापद्यतेतदा)अर्थात्-तिसपीछे संवत्सरपूराहोनेपर सपिंडी करणहोवै या जवसंवत्सरके भीतरहो तव या तोत्रिपक्षकहिये तीन पखवाड़े पूरेहोने पर या जव कभी रद्धिप्राप्तहोवै किंतु पिताके मरे पीछे सपिंडीका समयमानेसे पहलेही किसी के उसघरमें पुत्रजन्महोजाये तो फिर उसीसमय सपिण्डी करदेवे किन्तु वर्ष या त्रिप- क्षपूराहोनेकी आवश्यकता नहींहै-इनसभी प्राचार्योंके कथनसेद्वादशाह १ विपक्ष २ वृद्धिकाल३ संवत्सरका अन्त ४ यहचार पक्षसपिण्डीके निश्चितहुये तिनमैसे द्वाद- शाहमें तो पिताका सपिंडीकरण साग्निक द्विजको करनाचाहिये क्योंकि उसको नि- त्यप्रति पितृयज्ञकीभी आवश्यकता बनीरहतीहै और सपिंडी विना पिंड या पितृयज्ञ आदि कोकी सिद्धिनहीं होतीहे इस्सेवहशीघ्र निपटजावै-सोई यहवाक्यभी प्रमाण है कि (साग्निकस्तुयदाक प्रेतोवाप्यग्निमान्भवेत् । द्वादशाहेतदाकार्यसपिंडीकरणं पितुः) अर्थात्-जहां कर्मकाकर्त्तासाग्निकहोवे या प्रेतही अग्निवान् हो तव द्वादशा- हमेही पिताका सपिंडी करणकर देना चाहिये-और जो मनुष्य निरग्निकहो वहचाहै त्रिपक्षमें करे या वृद्धिकालमै करै यासंवत्सरके पूरेहोने में करै । (भेद२) यहवार्ता तो इसप्रकारसे निश्चय होगई (परन्तु) अव यह एकवड़ाभारी संदेहदेख पड़ताहै कि जव मिताक्षरा साचाराध्यायः। संवत्सरके भीतर कोई सपिंडी करनाचाहे तवं सोलहश्रादं कैसेहोंगे किंतु पोडशश्रा होंको पहलेदेकर पीछे सपिंडीकर या सपिंडी पहलेकरलेवै और पोडशश्राद्धोंको अप- नेर आगंतासमयों परपीछे करतारहै क्योंकि वे सोलहश्राद्ध तौ सालभर में पूरेहोतेहैं (और) इसवा में पूर्वापरके मध्ये दोनों भांतिके वाक्य पायेजातेहे-यथा-एकपक्षवाला तो यहवाक्यहै कि(श्राद्धानिपोडशादत्वानतुकुर्यात्सपिंडनम् । श्राद्धानिपोडशापाद्य विदधीतसपिण्डताम् ) अर्थात्-सोलह श्रादों के दिये विना सपिण्डन श्राद्दको नहीं करें किन्तु सोलह श्रादों को करलिये पीछेही सपिण्डी करे और दूसरा पक्ष यह क- हता है कि ( यस्यापिवत्सरादाक्सपिण्डीकरणंभवेत् । मासिकंचौदकुंभंचदेयंतस्या पिवत्सरम् ) अर्थात्-जिसकी किसीहेतुसे वर्प भीतर भी सपिण्डी होवे तिसकाभी मासिक श्राद्ध और जलकुंभादि जो कुछहोताहे सो वर्पताई दिये जावे-अब इनदो पक्षाकी विरोधतामें शांति वर्णन करतेहैं कि-जबसपिण्डी वर्पभीतर करनीपड़े तहां (उत्तमकल्प) तो यहीहै कि सपिण्डीकोही पहलेकर और सोलहश्रादोंको पीछे अपनेर सूचितकालोंमें करतारहै क्योंकि सूचितकालकी अप्राप्तिमें करनेका अधिकार नहीं होताहे और सपिण्डीका तौ वर्ष भीतरभी कालसंसूचितहे इस्से उसको करनेमें दोप नहीं (और) वहबात जो कहीथी कि सोलहश्राद्दों के किये बिना सपिण्डी नहीं करनी तिसका यहभावार्थहै कि उनश्राद्धोंकाकरनाअतिशय आवश्यकहै किन्तु करनेमेंउपेक्षा नहीं करनी चाहिये और आगापीछा तो यथाक्रमसे संभवितहोगा सोई होसक्ताहे- और दूसरे पक्षमें यहवाक्य जो प्रमाणहै कि सोलहश्राडौंको पहले एकसाथ इकट्रे करिके पीछे संवत्सरके भीतरभी सपिण्डीकरे सो यह (मापत्कल्प) गोणकहलाताहै - र्थात् जिसको कोई ऐसीही आपत्ति देख पड़तीहो कि जानें पीछे मुझ से इसबातका निर्वाहहोगा या नहीं तो गेसापुरुप एकसाथसोलह श्राद्धीकोउद्दारकरिके फिर सपिंडी करे-(परन्तु) इसदशामें थोरभी कुछ विशेषता चिंतनीयहै कि जबसपिंडीसे पहलेही (आपत्कल्प) की रीतिसे सोलह श्राद्ध एकसाथ निपटावे तब उनश्राद्धोंको केवल एको- द्दिष्टकेही विधानसेकरे अन्यथा नहीं और जो (उनमकल्प) की रीतिसे सपिंडीको पह- लेकरले ती उस्से उपरांतके वचेहुये पोडशश्राद्धों में कर्ताको साधारण भावसे भी अपनी शक्ति और श्रद्धाके अनुकूल स्वाधीनताहे तथा अपनेकुलाचार या देशाचार सेभी यहस्वाधीनताहे कि चाहे एकोद्दिष्ट विधिसेकरे चाहे पार्वण विधिकरे परन्तु इस (विकल्प) का सिद्धांत केवल इतनाहे किवर्पकेउपरांत हरसालके वार्पिक श्राद्दोंमें जिस- कोजेसा अधिकार अपने अपने कुलाचारके अनुसारहो वैसीही स्वाधीनतावर्प भी- तर सपिंडीके उपरांत सोलहश्राद्धोंके शेपमेंभी उचितहे कि चाहे पार्वणकरे चाहे एको. द्दिष्टकरै-सोई इसविशेषता मध्ये यहस्मृतिभी प्रमाणहै कि (सपिंडीकरणादाक्कुर्वन . मिताक्षरा स० आचाराध्याय। श्राद्धानिपोडशाएकोद्दिष्टविधानेनकुर्यात्सर्वाणितानितु॥सपिंडीकरणादूयदाकुर्यात दापुनःप्रत्यब्दयोयथाकुर्यात्तथाकुर्यात्सतान्यपि)अर्थात्-सपिंडीकरणसे अकिहिये इधरं किन्तु भीतर२ पोडश श्रादकरताहुआ एकोद्दिष्ट विधानसे उनसोको करे (त) शब्दके अभिप्रायसे निर्विकल्प यहवातसमझनी-और जवसपिंडीकरणसे उपरांतकर तब उनकोभी वहकर्ता उसभांतिकरे जो जिसभांति प्रत्यब्दकरे या करनेका अधिका- रीहो।(भेद३)यहपूर्वोक्त प्रेतश्राद्ध सहित सपिंडी करणभी अनेक भाइयोंकहोने और धनबांटकर जदे रहोजाने परभी एकहीको कर्तव्यहै किन्तु सबके सबजुदा श्रादभी उसप्रकारसे न करनेलगें जैसे देवकर्म या दानकर्म और तीज त्योहार अपने घर सबजुदा करते-तथाच(नवश्याइंसपिंडत्यंश्राद्धान्यपिचपोडशाएकेनेवतुकार्याणिसंवि भक्तधनेप्वप्रियर्थात्-नवश्राद जो हादशाहसे पहले२ किये जातेहैं और सपिडीश्रा- दऔर पाडशश्रादभी यहसब एकही करके कतै यह धनोंके बँटजानेमभी-परन्तु यह वात निर्विकल्प यावश्यकहै कि जोकोई एकभ्राता करें करनेका अधिकारीहो उसको थोडारधनसभी मिलकर कामकी अपेक्षा और अपनी शति या प्रभुता अनुसार जिस्से कर्मफलके भागीहों और विभागमें पायेहुये पैतृकधनकै रणभारसे उदारहो।। (भेद) यह प्रेतश्राद्ध सहित सपिंडी करण पुत्रादिको करके उन्मनुप्योंका अवश्य भाव नियमसे करनाचाहिये जो संन्यासी न होगयेहों किन्त जो संन्यासीहुयेही उनका नहीं-तथाचउशनाः (गकोद्दिष्टनकुर्वीतयतीनांचवसर्वदायहन्यकादशेप्राप्तपार्वणंतुवि धीयतेसिपिंडीकरणंतेपांनकर्त्तव्यसुतादिभिः।त्रिदंडग्रहणादेवप्रेतत्वनवजायते)मर्था- त्-यतियोंका सदेय प्रतिवर्ष एकोद्दिष्टभीनकर और पुत्रादिको करके साडी करणभी न करना चाहिये क्योंकि (निदंदग्रहण) करनेसेही उनकोप्रेतत्वनहीं होताहे परन्तु ग्या- रहवाँ दिवसप्राप्त होनेमें उनकाभी पार्वण कियाजाताहे-इसमें भी चित्तक स्थिरता या विचारकी लघुतासे संदेहहोसकाहे कि जयसपिंडीके होने विना पार्वणकनिषेधही करते चलेातेहाँ फिर संन्यासियोंका क्योंकर पार्वणहोगा जिनकी सपिण्डीका निषे- धभी इन्हीं श्लोकोंमें कहाहे-समुझो यहकेवल चित्तकीभ्रमताहे किन्तु जोसपिण्डीका निषेध उनको किया पर इन्हीं श्लोकोंमें यहभी तो कहा कि उनको त्रिदंडक लेनेसे प्रेतत्व नहीं लगता है फिर सपिण्डीकी या प्रेतश्रादकी क्या आवश्यकतारही क्योंकि सपिण्डी यहा प्रेतश्राद्धभी केवल इसनिमित्तसेहोताहै कि उनका प्रेतत्वछूटजा अपने पूर्व पितरों में मिलजावें भला यहभी सबठीक है परसंदेहकी प्रबलता' भी जाती नहीं क्योंकि प्रेतत्व तो लगता नहीं इसहेतुसे सपिण्डी और प्रेतश्राद्ध नहीं किया परन्तु सपिण्डी विना किसके साथ इसका उच्चारणकरै जो क्रमसे पिण्डदिये जावें सोकहो-समुझो इसीलिये २५३ की अधिकोक्ति व्यवस्थाके छठे मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । २१३ में कात्यायन ऋपिका वाक्यलिखचुकेंहें सो देखौ उसमें यहकहाहै कि (संगवर्जित)म- र्थात् जो संन्यासी होगयाहो उसके मरेपर पार्वण श्राद्ध उनके नामसेदेना चाहिये कि जिनतीनोंको यहसंन्यासी आपदेताथा किन्तु संन्यासीके वापदादे परदादे इनतीनों का पार्वणकरै क्योंकि पार्वणमें तीनही पिण्डहोतेहैं इसलिये तीनसे न्यन या अधिक पितरोंका उद्देश नहीं होता अगर तीसरा पिण्ड इसका होता तो चौथा परदादाका छूटजाता परन्तु इसका तौ सपिण्डी विनाहोता नहीं इसलिये उन्हीं तीनोंकी तृप्तिद्वा- रा इसकी परमतृप्तिहोवेगी अन्यथा वहसिद्धांतसे किसीके पिण्डोंका भूखानहीं किन्तु करनेवालेके वंशका साक्षात् अभ्युदयरूपहै जिसके हेतुसे पूर्वपितरोंका उत्सव भारी- पितहुआ-इसवार्ता में त्रिदंडकाचर्चा आयाथा सो संन्यासियोंका त्रिदंडनाम एकप्र- कारकादंड विशेष यद्यपि वस्तुरूपसे होता किन्तु चतुरंगुल गो वालोंकी त्रिवलीगूंथ कर कृत्रिम कियाजाताऔर उसकेधारणकरनेवालात्रिदंडीकहलातावरन उसकापंथभी उसके नामसे भिन्न विख्यातहोजाताहै (परन्तु)यहांपर ठेठकरउसकाच नहींहै क्योंकि प्रथम तौउसकृत्रिम दंडकेधारणकरनेसेही प्रेतत्वकाअभाव संभवितनहीं यहा संभवि- त होने परभी दूसरा यहदोप लगताहे कि उसकेवल त्रिदंडीकोही प्रेतत्व नहीं लगस- क्ता किन्तु अन्यसंन्यासियों को प्रेतत्व लगताहोगा क्योंकि इसभेदके लिखेहुये दो श्लोकोंमै त्रिदंडग्रहणका विशेषण आयाहै (इसलिये) यहां पर संन्यासीमात्रकाचर्चा है क्योंकि (त्रिदंड) संन्यासके आश्रममावकी संज्ञाहै इसहेतुसे कि उसपाश्रमके सा- मान्यलक्षण यहप्रसिद्धहै कि मन १ वाणी२ शरीर३ इनतीनोंको अपने आप दंडदेव सो (त्रिदंडी) अर्थात् यती और इनतीनोंको दंडदेना यहीहै कि असत्संकल्प १ और असहाक्यर और असद्व्यापार३ इनसेहोने नहीदेवै-सोई मनुजीने यहकहाहे कि (वाग्दंडोऽथमनोदंडःकायदंडस्तथैवचायस्यैतेनिहितायुद्धौत्रिदंडीतिसउच्यते)अर्थात् वाग्दंड १ मनोदंड२ कायदंड३ जिसकी बुदिमें यहतीनादंड उपस्थितहों वह (त्रिदंडी) कहाजाताहे-और उसीको प्रेतत्व नहीं लगताहे (मन्यथा) केवल गैरिक वस्त्रोंकोहीपीड़ा देनेसे प्रेतत्व दूरहोना तो दूरहै वरन वहकहावतभी सदावहोजाती है कि ढोलहूसेखा- लगई क्योंकि यहत्रिदंड कुछऐसा मद्दानहीं विकताहे जो हरकिसी संन्यासीके भणमें लुटताहो ॥ (भेद५) यहां ताई सारीक्रिया केवलपुत्रीद्वारा बतलाई इस्से कहते हैं कि पुत्रोंकी अनुपस्थितिमें सगोत्रीयादि जिसकिसीने आवश्यकतासे स्वर्यातकी दाह क्रियाकरीहो उसीको दशदिन ताईका साराकर्मकरना योग्यह-तथाच(असगोत्रःसगी बोवास्त्रीदद्याद्यदिवापुमान् । प्रथमेहनियोदयात्सदशाहंसमापयेत्)अर्थात्-असगोत्री चाहै अपनासगोत्रीही और स्त्री यहा पुरुपदाहदेवे परइनमें जो कोई पहले दिवस देवे सोई दशदिनभर सारा कर्म समापनकरे-तिसपीछे जोकुलहोताहो सो उसकेअनु- २१४ मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। पस्थित पुत्रादिक आकरकरै यहा किसीहेतुसे पीछेभी उसीको करनाहो तवसपिंडी ताई तो आवश्यकहै किन्तु सपिण्डीसे उपरांत जो वार्पिकपार्वणादि कियेजाते हैं उन में पुत्रोंका अधिकार तो निर्विकल्प नियमसेही निश्चितह परसगोत्री आदि जिसने दाह कियाहो उसकेलिये विकल्पहे अर्थात् वहअपनी इच्छा और श्रद्धाके अनुसार चाहै करौ या मतकरौ॥ (भेद६) इसीप्रकार पूर्वोक्तरीतोंके अनुसार यहसपिण्डी कर्म शूद्रोंकाभी वारहवें दिवसकरना योग्यहै पर मंत्रीविना-तथाच विष्णुस्मरणम्-एवंस- पिण्डीकरणंमंत्रवज्यशूद्राणांद्वादशेहि २५४॥ अवनीचेकेश्लोकमें एकोद्दिष्ट प्राइकरनेके कालवतलाते हैं। मृतेऽहनितुकर्तव्यप्रतिमासंतुवत्सरम् । प्रतिसंवत्सरञ्चैवमाद्यमेकादशेऽहनि २५५ ॥ मक्ष०-एकवत्सर-प्रतिमास मरे दिन में फिररकर्तव्यहै-और प्रतिसंवत्सरभी फिर फिरकर्तव्यहै-याद्यश्राद्द ग्यारहवें दिनमें २५५॥ भभि०-एकसाल भर ताई प्रतिमास उसके क्षयाह दिनमें एकोद्दिष्ट करना चा- हिये पुनिसपिण्डीहुयेपीछे हरसालभी एकोद्दिष्ट उसके मरेदिनमें करनाचाहिये-(माद्य) कहिये सबसे पहला श्राद्ध जिसको लोकमें एकादशाहभी कहते हैं सो ग्यारहवें दिनमें करै २५५॥ भधि०-यहां पर सावधानहोकर ध्यान धरना चाहिये कि योगीश्वर याज्ञवल्क्य जीको जो कुछ कहना था सो कहचके जैसा कि अभिप्रायार्थ में लिखागया है और मुख्य प्रयोजन भी यही अंत में भी सिद्धकिया जावेगा ( परंतु ) संसारकी प्रकृति अनुसार इसके निर्णय मध्ये जो अगाध सागर सम शास्त्रार्थ है जिसको इसी अ- धिकोक्ति के दूसरे भेदसे लिखनाप्रारम्भ करेंगे और चौथे भेदमें समाप्ति पावेगा- यद्यपि उसके लिखने की बडीसी आवश्यकता नहीं है क्योंकि (कार्य) कीसाधकता तो मुख्य सिद्धांत केही ध्रुवा से अपेक्षा रखती है-तथापि जिज्ञासु लोगों को यथावत् उसके पूर्वापर का बोध और उस्से न्यूनाधिक या विपरीत दृष्टिका सिद्धांत यहा सार्व देशिक आचार की परिपाटी समझलेनके हेतुसे लिखनाभी आवश्यक है इसलिये उक्तभेदोंमें जाकरदेखौ-परअभी इसमें एक व्यवस्था औरभी कहनी शेप है जिसका लिखना इसीजगह यावश्यकहे तिसके मध्ये यह अयोक्ल स्मृति कुछ विशेष कहतीहै कि-(अपरिज्ञातेमृतेऽहन्यमावास्यायांश्रवणदिवसेवा) अर्थात्-मरणका दिवस जिसका नहीं जानाजाय तब उसका श्राद अमावास्या करै या उसदिन करै जिसदिन उस के मरनेकी बात सुनीगईहो-सो-इन दोनों में यह सिद्धांत है कि जिसका दिन तौनि- श्चय नहीं पर मरण का महीनामान मालूम हो तिसकातौ उसीमासकी अमावसमें कर और जिसका मासभी निश्चित नहीं हो उसकेलिये अमावस नहीं किंतु जिस मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २१५ दिन मरनेकी वातसुनीगई तिसदिनकरै-इसके सिवाय जिस किसीका महीना या दिन भी नहीं मालूम और मरने की बातभी सुनियेमें न आईहो अर्थात् जबसे कभी वि- देशगया तबसे कोई भांति की खबर उसकी नहीं पाई और इसी हेतुसे शास्त्रोक्त - वधिवीति जानेपर उसका मरना निश्चय करिकै देहांत क्रिया तो करनीचाही पर कि- सदिन करै इस अपेक्षा में यह व्यवस्था है कि जिसदिन घरसे निकसा हो तिसदिन करै अथवा वह दिन भी याद नहीं है कि वह किसदिन घरसे गयाथा क्योंकि बारह वोकी बात हर कोई नहीं यादरखसक्ता है तब ऐसी दशामें उस महीना की अमा- वस के दिन करे कि जिस महीना में वह घरसेगयाथा सोई इसवार्ता में यह स्मृति भी प्रमाणहै कि-(प्रवासदिवसेदेयंतन्मासेन्दुक्षयेपिवा)अर्थात्-प्रवासकहिये परस्थान- के दिन श्राद्ध विधिदेयहै यहा उसी महीनाकी इन्दुक्षयनाम अमावसके रोज देवे यह तो मूलवाक्यहे और इसकी व्यवस्था ऊपर स्पष्ट होहीचुकी-परंतु यहांपरशास्त्रोक्त अ- वधिका चर्चा पायाथा उसका ज्ञानहोनाभी आवश्यकहेकि वह कितनी अवधिहोती है सो वह अवधियद्यपि कई भांति से होतीहै और जहां तहां अनेक शास्त्रोंमें उसका चर्चाआयाकरताहे और बिधि उसकी पुत्तलविधानद्वारा प्रसिद्धहै परंतु मुख्य अवधि उसकी वारहवर्पकी होतीहै और वही प्रमाण के योग्य है सोई महादेवजीने पार्वती से महा निर्वाणतंत्र में यह कहाहै कि-(नृणामुद्देशहीनानांपरिवारान्धनानपि।पालयेन्द्र क्षयेद्राजायावहादशवत्सरम् ॥ द्वादशाब्दगतेतेपांदर्भदेहानविदाहयेत् । त्रिरात्रांते तत्सुतायेःप्रेतत्वंपरिमोचयेत् ॥ ततस्तत्परिवारेभ्यःपुत्रादिक्रमतोधनम्। विभज्यनृ पतिर्दद्यादन्यथापातकीभवेत् ॥ यद्यागच्छेदनुद्दिष्टविभागांतपिकालिके। तस्यैवदाराः पुत्राश्चधनंतस्यैवनान्यथा)अर्थात्- जो कोई प्रवासी लोग गेसे कहीं विदेशमै रमि- जावें जो मनुप्योंके (उद्देश)कहिये ढूँढ़ने या पतालगानेसे हीनहीं किन्तु कोई उनको ढूँढ़ नसक्लाहो उनके परिवारोंको योरधनोंको बारह वपापर्यंत राजापाले तथा रक्षाकरे इसप्रकार वारहवां वर्पभी पूराहोजानेपर न आवे तो उनका मरजाना निश्चय करिके उनके (दर्भदेद) कहिये पुत्तलविधानसेदाहकरवावे योर उन्हींके पुत्रादिकोहारा तीनरात्रि पीछे उनका प्रेतत्वभी छुड़वावे तिसपीछे उनके परिवारों से पुत्रादि जोकोई धनके अधिकारीही या जोकोई धाके अधिकारी बनकर दावसतहों इत्यादि अधिकारियों को दायभागकी रीति से वांटकर राजा श्राप देवे इस्से विपरीत करनेमें वह राजाभी पातकीहोवे हे कालिके यदिकदाचित् धनका विभागहोजाने पीछेभी वह (मनुदिष्ट) क- हिये वेपतेवाला आजाये तो उसीकी स्त्रियहि उसीके पुत्रभी और वह बँटाहुआ धनभी फेर उसीका है किन्तु इसमें कुछ अन्यथा नहीं-यर्थात् जो स्त्रियां यह कहने लगे कि इसका तो दाह कर्मभीहोचुका अवहमारे कामकायह नहीं सो यह कहना उनका रथा २१६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । है ऐसेही पुत्र या जिस किसीने विभाग में धन पाया हो वह कहने लगे कि हमने तो बांट में पाया यह धन अवहमाराहीहोचुका सो सव ड्ठ है किन्तु ऐसी दशामेराजा फिर उसधनको लौटारकर धनीको दिलवावै और सारा घरबार उसीको स्त्रियोसहित सोंपदेवै और जो राजाके विनाही यह सारीवात शुभरीतिसेहोजावें तौ राजाकी मा- वश्यकता नहींहै। (भेद २) वह शास्त्रार्थ जिसकी चर्चा अधिकोक्ति के प्रारम्भ में हुई थी सो अब यहाँसे लेकर चौथे भेद पर्यन्त भिन्न २ देखौ मरण दिवस और दाह दिवस इनदोनों की अपेक्षामें (जातूफर्ण) के मतसे कुछ विशेष उक्ति है यथा (ऊ- चंत्रिपक्षाद्यच्छ्राद्धंसतेऽहन्येवतद्भवेत् । अधस्तुकारयेद्दाहादाहिताग्नेर्द्विजन्मनः)य- र्थात्-जो द्विजाती (माहिताग्नि) कहिये अग्निमान् हो उसका जो २ कर्म मासिकश्रार मादि त्रिपक्षके उपरांतहो सो तो मरने की तिथिमें होवै और तीन पक्षके भीतर जो कुछ प्रेतकर्म आदि होताहै सो दाहके दिनसे गिनतीकरे-इस्से यह सिद्धांत निकला कि जो द्विजाती अनाहिताग्नि किन्तु निरग्निकहो उसका त्रिपक्षसे उपरांत और भी- तरभी साराकर्म मरणकेही दिवसमें करै दाहसे कछ अपेक्षा नहीहै।(भेद३) इसके सिवाय(आद्यमेकादशेहनीत्याशौचोपलक्षणमितिकेचित्)अर्थात्-मूलश्लोकमेंयहवात जो कही है कि सबसे पहला श्राद्ध ग्यारहवें दिवसकर इसबात को कोई २ आचार्य अपने मतसे या.किसी और सिद्धांत से यह कहतेहैं कि यह ग्यारहवें दिन का श्राद शौच श्राद्धमें गिनती है क्योंकि ग्यारह दिन का श्राद्धभी नव श्रादों में गिनती आ- चुकाहै-तथाच-(प्रथमेहितृतीयेहिपंचमेसप्तमेनथा। नवमेकादशेचैवतन्नवश्रादमुच्य ते) किंतु ये नव श्रादभी मलिन पोडशीमें गिनती और पहले जिन सोलहश्राद्धोका चर्चा २५३ अधिकोक्तिके तीसरेभेदके अंतमें आयाथा वह उत्तम पोडशी कहलातीहै इस्से यह ग्यारहवें दिन का श्राद नि:संदेह शोच श्राद्दा उपलक्षण देखपड़ता है-दू- सरे यहवात जो शास्त्रोंमें प्रसिद्धहै कि (शुचिनाकर्मकर्त्तव्यः, अर्थात् शुद्धहुये मनुष्य करके कर्म कर्तव्यहे-किन्तु अशुद्धशरीरमे कर्मकोन करना चाहिये-इसलिये योगीश्वर याज्ञवल्क्यने यह कहाहोगा कि (आय) नाम शोचश्रान्ह ग्यारह दिनमेंकरे तिसपीछे बारहवें दिनमें उत्तम पोडशी संबंधी पहला श्रादहोगा-तथाच(ट्रादशाहेत्रिपक्षेचप- ण्मासेमासिचाब्दिकोश्रादानिपोटशेतानिसंस्मृतानिमनीपिभि.)दमसे वह ग्यारहवेंदि- नका श्राद्ध शोचश्रादका उपलक्षणदेख पड़ताहे-पुनि दमहेतमे भी निश्चित होता है कि (विष्णुऋपिने) भी ग्यारहवें दिनमें सामान्य रीनिमे चागेवोंकी तकशुदि और एकोद्दिष्ट करना कहाहे-परन्तु-इसवातको मिताक्षगकार अपने निमन विचारसे अयु क्लचतलातेहं किन्तु वे कहते हैं कि इसबातमै अयोल (पटीननि) ऋषिक वायसे कि. रोधाताहे-तथाच(एकादशेहियच्यादतत्सामान्यमुदाद्दनम् ।चतुणांमापवर्णानांसृत मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । २१७ कंचटथक्टथक्)अर्थात्-पैठीनसिने यहकहाहै कि ग्यारहवेदिनमें जो श्रादकियाजा- ता वह सामान्य भावसे चारों वर्णको उसीदिन कर्त्तव्यहै और सूतक चारों वर्गोंका जुदार होताहै-उसमें शूद्रको महीना ताई सूतकरहताहै ऐसेही अपनी जाति अनु- सार सूतकदूरहोताहै तभी उस जातिवालेका शौचश्राद्धभी होना उचितहै फिर ग्या- रहवें दिनके श्राद्धको कैसे शौच श्राद्धकहसक-अब इसमें जो यहवात कहना चाही कि फिर शौच कर्मके होने विना वह (माद्यं) श्राद्ध क्योंकर होसक्ताहै क्योंकि कर्मती शुचिहोकर करना कहा और शुचिका होना किसी २ को मासपर्यंतमें संभवितहै तो यह बिरोधकैसे शांतहो सो कहो-तहां-(शंखऋषि) का यहवाक्य प्रमाणमें अच्छीरीति से घटताहे कि(आद्यश्राद्धमशुद्धोपिकुर्यादेकादशेऽहनि। कर्तुस्तात्कालिकीशुदिरशुद्धः पुनरेवसः) अर्थात्-शंखजीने यहकहाहै कि-याद्यश्राद्धको अशुद्धमनुष्यभी ग्यारहवें दिनमें करै क्योंकि इस (माय) श्राद्धके करनेमें कर्ता पुरुपको तात्कालिक शुद्धिहो जा- तीहै किंतु जितनी देर उस (माय) श्राद्धको करताहै उतनीदेर तक शुद्धसमझाजाता है उस्से पीछे फिर ज्योंकात्यों अशुद्धहोजाता है उतनेदिनकेलिये कि जितनी अवधि उसके सूतकमध्ये उचितहो-अशुद्ध मनुप्यभी करे इसघातका यहाशयह कि जो कोई अपने वर्णजाति अनुसार उसदिन ताई शुद्ध होचुकाहो सो तो शुदहुये पीछे करै और जिसका सूतक अभी कुछ दिनको शेपरहाहो वह अशुदभीकरै अर्थात् यह प्राद्यश्राद्ध कोईभी ग्यारहवें दिनकरनेसे न छोड़े क्योंकि यहाद किसीभी पोडशी में गिनती नहीं है किंतु उत्तम मध्यम मलिन इनतीनों पोडशियोंसे भिन्न है-इसका (माद्यश्राद) जुदानाम है इसीको लौकिकमें एकादशाहभी कहते हैं यद्यपि एकादशाह के दिन और भी अनेक श्राद्ध मध्यम पोडशी आदि खीरिपाकसे होते हैं परन्तु यह सबसे भिन्न कियाजाता इसलिये योगीश्वरने ग्यारहवाँ दिवस इसका बतलाया है तथैव संवत्सर मात्रके प्रतिमास या रोजर और प्रति संवत्सरके जुदेकहेहें मूलश्लो- कमें कुछ असंभव नहीं है (परंतु) विष्णु आचार्यका वाक्य अभी विरुद्धदेख परताहे क्योंकि उन्होंने चारोंवर्णका अशौच दूरहोना और एकोद्दिष्टका करना कहाहै ग्यार- हवेदिनमें तहां यद्यपि सभीवाक्योंका प्रमाण यहां परलिखनेसे विस्तारहुआ जाताहे इसलियेयथाक्रमसे अपने २ स्थलपर लिखजावेंगे पर उसकाभी यह सिद्धांत है कि चारोंवोंका सूतक यद्यपि विशेपतासे अपनी २ अवधि अनुसारहोता है परन्तु सा- मान्यनिर्वाहकी मर्यादासे चारोंवर्णांकी दशाहिकशुद्धिभी होतीहै इसलिये विष्णुजी) के दोनोंकथन दशाहिक शुद्धिपर यथार्थभावसे घटतेहैं क्योंकि जब दशदिवसमें शुद्ध क्रियाकरीगई तो वहदिन शरीरकी शुद्धतामें गिनती नहींआसक्ता किन्तु उसदिनती शुद्धक्रियाके करनेमेरहे उसकेभोर ग्यारहवैदिनसे शरीरकी शुचिता समझीगई सोई २१८ मिताक्षरा साचाराध्याय । ग्यारहवेदिनमें एकोद्दिष्ट कियागया जो उन्होंने चारोंवणीको करनाकहाहै सो यथार्थ से वही(माद्याश्राद्धहै जिसको योगीश्वर)नेभी सामान्यभावसे चारोंवों को करनाकहा पुनिउसीकीदृढ़ता(पैठीनसि)केभीवाक्यसेऊपरहोचुकीहैउसीका(शंखजी)केवाक्यसेप्रमाण ऊपरहोचुकाहै अर्थात् याज्ञवल्क्यजीका सिद्धांत किसीकेभी वाक्यसेविरुधनहीहोसक्ता यह सर्वथा और सभीस्थलपर निश्चित है। (भेद४)यहांपर मल में योगीश्वरने प्रति संवत्सरके लियेभी एकोद्दिष्टका उपदेशकिया और२५०कै श्लोकमें एकोद्दिष्टकाविधा- न जो बतलायाथा उसमें देवकर्मका निषेधकहाहै सोई स्मृत्यन्तरसेभी प्रमाणपाताहै तद्यथा-(वर्षेवतकर्त्तव्यामातापित्रोस्तुसत्किया । अदैवंभोजयेच्छाइंपिंडमेकंचनिर्वपे त्)-अर्थात्-वर्षवर्पमें सदैव माता और पिताकीभी भिन्न २ (सक्रिया )कहियेश्राद्धसं- बंधी कियाकरनी योग्यहै तिसमें (अदैव) कहिये देवकर्मसेहीनश्राव भोजनकरवावे और पिंडभी एकहीदेवै-ऐसेही-(यमाचार्य)केभीवाक्यसे प्रमाण मिलता है-तद्यथा-(सपिंडी करणादू_प्रतिसंवत्सरंसुतः । मातापित्रोःष्टथक्कुर्यादेकोद्दिष्टमृतेहनि) अर्थात् सपिंडी के उपरांत पुत्र प्रतिसंवत्सर मातापिता दोनोंका एकोदिष्ट उनकेमरे दिनमें भिन्नकरे- (व्यासजी)के कथनसेभी एकोद्दिष्टकाकरना निश्चित होताहै किन्तु थे. वार्पिक तिथिमैं पार्वणकेकरनेसे उलटा दोपवतलातेहैं -तद्यथा-(एकोद्दिष्टंपरित्यज्यपार्वणंकुरुतेनरः। अकृतंतद्विजानीयादवेञ्चपितृघातकः )-अर्थात्-व्यासजी यहकहते हैं कि जो मनुष्य माता पिताके दिनमें एकोद्दिष्टको छोड़कर पार्वणकरैहै वह उसका किया आभी न क- रनेमें गिनतीसमझै और जो पेसाकर सो पितृघातकभी होवै-और (यमदग्नि) ऋपि साक्षात् पार्वण काही करना बतलातेहैं-तद्यथा-(पाद्यचसपिंउत्वतौरन्तोविधिवत्सु तः। कुर्वीतदर्श बच्छ्राईमातापित्रोःक्षयेहनि) अर्थात्-और सपुत्र माता पितानों का सपिंडत्व विधिवत् करचकनपीछे उनके क्षयाहके दिनमेंभी दर्शवच्छाद करे अर्थात् जैसे अमावसमें पार्वण कियाकरते हैं तैसेही प्रतिवर्ष उनके मरेदिनमै भी पार्वणकरै- (शातातप) ऋपिभी यहीबात कहतेहैं तद्यथा(सपिंडीकरणंकृत्वाकुर्यात्पार्वणवत्सदा। प्र तिसंवत्सरविवारच्छागलयोदितोविधिः)अर्थात्-ज्ञानीपुरुष सपिण्डीकरणकरिके फिर सदा प्रतिसंवत्सर पार्वण विधिसेही कियाकरे क्योंकि यह विधि उन.(छागलेय) मुनिकी कही हे जो यात्रेयगोत्रमें छगलकी संतान प्रसिद्धहे-इत्यादि बहुधा वाक्य दोनों पक्ष में प्रमाण मिलनेपर दाक्षिणात्यलोग यहव्यवस्था निश्चयकरतेहै कि औरस पुत्र तथा क्षेत्रजपुत्र यहदोनों तोमाता पिताके वाहमें पार्वणही करें (पौर) दत्तकमादि शेप दशपुत्रों करके एकोशिष्ट करना चाहिये लो यहवात दाक्षिणात्यलोग (जातूरुण) नाम एकनापि विशेपके नतसे कहतेहे-तथाच जातकर्ण (प्रत्यब्दपार्वणेनैवविधिनाक्षेत्रजी रसी।कुर्यातामितरेकुयुरेकोद्दिष्टंमुतादश)यात जातकर्ण मुनिने यहकहाहे कि औरत - मिताक्षरा स० पाचाराध्याय। और क्षेत्रजदोनों प्रतिवर्ष पार्वणकीहीविधिसेकरौ पर इतरदशपुत्र एकोद्दिष्टकरें-(परन्तु) मिताक्षराकार अपने निर्मल विचारसे इसव्यवस्थाको असत् वतलाते हैं किन्तु वे कहतेहैं कि इस जातूकर्णके वाक्यमें कुछ विशेषकर क्षयाहकाचर्चा नहीहै और (प्रत्य ब्द) यह शब्द जो इसवाक्यमें आयाहै तो प्रत्यब्द श्राद्ध क्षयाहसे भिन्न औरभी अ. नेक होतेहैं कुछ मेरेदिनकेही शिरटीका-नहीं है क्योंकि अक्षयतृतीया माघी वैशाखी श्रादि अनेक श्राद्ध प्रतिवर्ष करनेयोग्य शास्त्रोंमें कहे, तिनकेलिये पोरस औरक्षेत्र- जको करना कहाहोगा-इसहेतुसे क्षयाह संबंधी एकोद्दिष्ट और पार्वणकी यहव्यवस्था नहीं है और जो (पराशर) स्मृतिका यहवाक्यहै कि(पितुर्गतस्यदेवत्वमौरसस्यत्रिपौरूपं सर्वत्रानेकगोत्राणामेकस्यैवमृतेऽहनि)इस्सेभी यहव्यवस्थानही सच्चीहोसती है क्योंकि इसकाभी यहअर्थहै कि-देवत्वको पहुँचेहुये पिताका अर्थात् जिसकी सपिंडीहोचुकी हो तिसपिताका औरस पुत्रकरके (सर्वत्रत्रिपौरुप) कहिये पार्वण श्राद्ध कर्तव्यहे-यहां (सर्वत्र) कहनेसे यह विशेषता पाईगई कि क्षयाहमेंभी सपिण्डीके पीछे पार्वण करस- क्ताहै पर इसविशेषतासे कुछ एकोद्दिष्टका निषेध नहीं पायागया और (अनेक गोत्रा पां)अर्थात् अपने पितासे भिन्नगोत्रवाले मातुलादिकोंका (मृतेहनि) कहिये उनकेमरे दिनमें जो फरनाचाहे तो (एकस्यैवकुर्यात्) किन्तु उसएकहीके नामसे एकोद्दिष्ट मात्र करै-परन्तु (मृतेहनि) इसकथन से केवल मरे दिनमें भिन्नगोत्रियों के पार्वणका निषेध पायागया अन्यत्रइनकेभी पार्वणका निषेध नहीपायागया इसीसंवर्णित पराशरवाक्य में औरसको सपिण्डीपीछे क्षयाहमेंभी पार्वण करनेका अधिकार निश्चितहुआ जैसा अभी ऊपर लिखचुकेहें उसके साथमें यहभी लिखाहै कि इसविशेषतासे एकोदिष्ट का निषेध नहीं पायागया तिसकी दृढ़ताके लिये (पैठनिसि) ऋपिके वाक्य प्रमाणसे औरसको सपिण्डीके उपरांत प्रतिवर्ष अपने पिताके क्षयाहमें एकोद्दिष्टकाभी अधि- कारपाया जाताहै-तद्यथा(एकोद्दिष्टंहिकर्तव्यमौरसेनमृतेऽहनिासपिण्डीकरणादूर्ध्वमा तापित्रोनपार्वणम्)यर्थात-पैठीनसिने यहकहा कि औरसको माता पिताके मरेदिन में एकोद्दिष्टही कर्तव्यहै क्योंकि सपिण्डी करलेनेके उपरांत माता पिताके क्षयाहमें पार्वण नहीं होता किन्तु अमावसयादि अन्यपॉम पार्वणकरे-फिर इसीव्यवस्थाको उदीच्यलोग पहाड़ी आदि इसप्रकार निश्चयकरतेहैं कि(अमावास्यांक्षयोयस्यप्रेतप क्षेऽथवापनः।पार्वणंतत्रकर्त्तव्यनैकोद्दिष्टंकदाचन)यर्थात-अमावास्याके दिवसजिसके प्राणछूटेहों अथवा प्रेतपक्षमें छूटेही तिसके मरेदिनमें पार्वणकर्त्तव्य है कदाचनभी उसके मरेदिनमें एकोद्दिष्टनकरै-इसवाक्यसे सिद्धांत यह पायागया कि अमावास्या और प्रेतपक्षके सिवाय और किसी दिनमराहो उसके मरेदिनमें प्रतिवर्ष एकोद्दिष्टही करे किंतु उसदिन पार्वणका अधिकार नहीं और पार्वण अन्य पामें निःसंदेहकर- मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । वरनवे उदीच्य लोग बर्तावाभी इसीप्रकारकरते हैं (परन्तु) मिताक्षराकार यहकहतेहें कि वृद्धलोग जो अनेकशास्त्रोंके अधिकारीहें वे इसवचनका भावार्थ मात्र अंगीकार करतेहैं किंतु इसके सिद्धांतका आदर नहीं करते इसहेतुसे कि प्रथम तो इसवचन का उत्पत्तिमल किसीको निश्चित नहीं कि यहकौनसी स्मृति से लियागयादूसरे यह बात कि जोअनेकवाक्यप्रसिद्ध मुनीश्वरोंके कहेहुये मरेदिनमें पार्वण करनेकाप्रमाण देते हैं उनका प्रतिपक्षी इसका सिद्धांतहुआ जाता क्योंकि यहवाक्यकेवल अमा- बस और प्रेतपक्षके मरेदिनमें पार्वणकरनेको कहताहै सो तो प्रमाणके योग्यहे पर इसका सिद्धांत जो औरोंको निपेधवतलाताहे तिससे उनप्रसिद्ध मनीश्वरों के वाक्य झूठेहुये जाते हैं इसलिये इसवचनका केवल अक्षरार्थमात्रस्वीकार होसलाहे-क्योंकि क्षयाह के निर्णयमध्ये माता पिता पुत्र इनतीनोंकी लक्षणासहित पार्वण और एको- द्दिष्ट दोनोंका अधिकार सिद्धहोताह सोई दोनोंकीसिद्धि विपयिक अनेकवाक्यपहले भी इसी चौथेभेदके प्रारम्भमें लिखचुके हैं और यहांभी फिर लिखतेहैं-तथाच (स- पिण्डीकरणादू_प्रतिसंवत्सरंसुतैः । मातापित्रोःएथकार्यमेकोद्दिष्टमृतेऽहनि) इस्से तो एकोद्दिष्टका अधिकार निश्चित है और पार्वणका अधिकार इसअग्रोक्तसे नि- श्चितहै-यथा(पापाचसहपिण्डत्वमौरसोविधिवत्सुतः। कुर्वीतदर्शवच्छादमातापित्रोः क्षयेऽहनि)और कोई कोई जो (सुमंतु) के कथनानुसार यहकहते हैं कि माता पिताके क्षयाहमे(साग्निक) द्विजातीपार्वणकोर (निरग्निक) द्विजातीएकोद्दिष्टकरे-तद्यथासुमं तुः(वर्षेवसुतःकुर्यात्पार्वणंयोग्निमाद्विजः।पित्रोरनग्निमानधीरएकोद्दिष्टमृतेऽहनि) अर्थ इसका ऊपर होहीचुका-(परन्तु)मिताक्षराकारयहकहतेहैंकियह वाक्यभी उपेक्षा करने योग्यहे क्योंकि एक तो अच्छे सत्समाचारमें प्रतिपक्षी होताहे दूसरे यहस्मृति भी प्रमाणहै कि (वहग्नयस्तुयेविप्रायेचैकाग्नयएवच । तेषांसपिंडनादूर्ध्वमेकोद्दिष्टन पार्वणम्)अर्थात्-जो बहुत अग्नियोंवाले विप्रहें और जो एकअग्निवाले विप्रहें उनके भी सपिंडनके उपरांत एकोद्दिष्ट होताहै पार्वण नहीं (एवच)इसके अभिप्रायसे विनों के सिवायअन्य साधारण द्विजातीभी संग्रहीतहें किन्तु केवल विप्रही नहीं इसप्रकार के-फिर उस (सुमंतु) वचनकी विशेषता क्योंकर प्रमाण मानाजाय-इसलिये अवइस चौथेभेद मानके समस्त वाक्योंका पूर्वापर आलोचन किये पीछे विरोध शांतिपूर्वक निर्णयरूप (सिद्धांत) लिखतेहैं कि इसप्रकारसे वर्तावा करना चाहिये-तहां-अमावस के मरेदिनमें और प्रेतपक्ष जो करणागत प्रसिद्धहैं उसमें जो कोई मराहो तिसके मरे दिनमें पार्वण कर्तव्यहे-क्योंकि ऊपर उदीच्यलोगोंके प्रमाणदियेहुये बचनके सिद्धांत का निरादर करके उसका अक्षरार्थमात्र स्वीकारकरचुके हैं १ ॥और संन्यासियोंका भी उनके मरेदिममें पुत्रोंकरके पार्वण कर्तव्यहै एकोद्दिष्ट नहीं चाहे वे किसी पक्ष या मिताक्षरा स० पाचाराध्याय। २२१ किसी दिनमें मरेहों इसमें कुछभेद नहीं क्योंकि (प्रचेतस) स्मृतिका यहबचन इसमें प्रमाणहै कि(एकोद्दिष्टयतेनास्तित्रिदंडग्रहणादिहासपिण्डीकरणाभावात्पार्वणंतस्यस र्वदा)अर्थात्-(इह) संसारमें-(त्रिदंड) लेनेके हेतुसे (यती) का एकोद्दिष्ट नहीं होता किन्तु उसका सपिण्डी करणके अभावसे सर्वदा कहिये प्रतिवर्पभी पार्वणकर्तव्यहै-उसरीति से कि जैसा चर्चा २५३ की अधिकोक्तिके छठे भेदमें कात्यायन ऋपिके वाक्य अनु- सार आचुकाहै पुनि वहीचर्चा २५४की अधिकोक्तिके पांचवेंभेदमें पायाहै जहां चाही तहां देखलो २ इसके सिवाय और सर्वत्रसाधारणभावसे चाहै साग्निकहो चाहै निर- ग्निकहो किन्तु सभी द्विजातीमात्र को पिता माताके क्षयाह दिनमें प्रतिसंवत्सर के लियेभी (बिकल्प) अंगीकारहे अर्थात् चाहै पार्वण करौ चाहै एकोद्दिष्टकरौ दोप किसी मेंभी नहीं है और फलकी सिद्धिदोनोंमें संभवितहै-तथापि इसविकल्पमें अपनेरवंश के आचारपर दृष्टिकरनी उचितहै किन्तु जिसके वंशमै जैसाहोताहो सो समझलो३ ये तीन प्रकारके सिद्धांत इसमें अनिर्वचनीय निश्चितहुये-(शंका) क्योंजी अनिर्वच- नीय कैसेहुये इसीजगह ऊपर यहकहतेहौं कि दोष किसीमेंभी नहींहै और इसीचौथे भेदके प्रारंभस्थलमें (व्यासजी) का यहवाक्य जो लिखचुकेहो कि(एकोद्दिष्टंपरित्यज्य पार्वणंकुरुतेनरः।अकृतंतद्विजानीयाद्भवेच्चपितृघातकः)इसके साथमें यहभी लिखचुके हो कि व्यासजी पार्वणके करनेमें उलटादोप बतलातेहैं सो प्रत्यक्ष इसवाक्यसे पार्व- एकरनेमें (पितृघातकत्व) और (अमृत) शब्दसे फलाभाव दोदोपहैं फिर कैसे दोप नहीं और क्योंकर अनिर्वचनीय तीनों सिद्धांतहुये सो कहाँ (समाधान) सुनी व्यासजीके वाक्यसे जो भावार्थ तुमने समझा या पूर्वस्थलमें लिखागया तिसका श्राशयबड़ी दूरहै किन्तु व्यासजीने यहकहाहे किजो कोई एकोद्दिष्टको इसप्रकारसेपरित्यागकिये पीछे पार्वण करताहै कि आजहमारे पिताका वार्पिक क्षयाहका दिनायाहे जिसमें में पार्वण कियाकरताहूं पर अवकीबार पार्वण करनेकी या उसकी लागति लगानेकी मेरी सामर्थ्य नहीं यद्यपि एकोद्दिष्ट करसक्ताहूँक्योंकि उसमें थोड़ीलागति और थोड़ा कामहै परन्तु मैंने कभी एकोद्दिष्ट नहीं किया किन्तुमेरा नियमहे कि करों तो पार्वण . करों नहीं तौनकरों इस्से अबकीवार जानेदो अगलेसाल अच्छी लागतिसे पार्वण करोंगा-बसऐसे पुरुपने जबएकसाल इसमाग्रहसे एकोद्दिष्टका परित्याग किया और अगले सालबड़े धडिल्लेसेभी पार्वण किया तब उसका वहपार्वण न करनेकी गिनती में आया और पहले सालमें उसको निपट न करनेसे (पितृघातकत्व) दोप निःसंदेह लगा-इसीलिये योगीश्वरने समयकी सामर्थ्यका अनुमान करिके क्षयाहमें केवल एको- द्दिष्टका आदेश किया है जिससे किसीको (पितृघातक) न होनापरै किन्तु योगीश्वरने सभीवातोंमें सीधी निर्वाह विधिकहीहे सोई व्यासजीका आशय उसवाक्यसे पाया २२२ मिताक्षरास आचाराध्याय। गया कि उसप्रकारके पार्वणसे एकोद्दिष्ट काही करनाश्रेष्ठहे और जिस्से वनिश्रावै सो पार्वणकरौ यहअधिक अच्छीवातहै-अन्यथा कुछ व्यासजी अज्ञानी नहींथे जो एक अतिउत्तम कर्मके करनेको उलटादोप बतलाते जोअनेक ऋपियोंके द्वारा घंटा घोप- वत् प्रसिद्धहोचुकी या कुछपहले ऋषीश्वरोंसे व्यासजीका वैरभावनहींथा जो उनके सिद्धवाक्यों पर वचसा दे मारते-परन्तु ऋपीश्वरोंके स्वल्पोक्तिरूप और अनंतार्थहेतु- गर्भित वाक्योंका श्राशय समझिपाना वजहै किंतु देखनेमें बडेसीधे २ अन्वयवान् प्रतीत होतेहैं पर विचारनेमें भूलभुलैयाका अजायबघर होजातेहें इस्से शंकाकरने का अवसर नहीं है। (भेद५) दृष्टिकरौ उध्वोक्त चौथे भेदका साराशास्त्रार्थ जोवड़े२ चारएष्ठापर माया सोमलमें केवल (प्रतिसंवत्सरञ्चैव) इतने पदके ऊपर लिखागया ऐसेही इससे पहले तीसरेभेदका शारार्थ जो दोपौनेदो एठोपरयाया सोमलमें केवल (आद्यमेकादशेऽहनि)इसपदके ऊपरलिखाहे-पनि उस्से पहले दूसरे मेदका शास्त्रार्थ मूलमें (मृतेऽहनितुकर्तव्यं) इसपदके मध्यलिखाहै-पुनि उस्सेभी सबसे पहलेभेदमें अधिकोक्तिके प्रारंभसे लेकर दोडेढ़एटोंमें जोआया सोमलमें(मृतेहनितुकर्तव्यं)(प्र- तिमासंतुवत्सरं) इनदोनों पदोपर मरेहुयेका दिन और महीनाअादिके निर्णय मध्ये लिखागया-इसलिये उनपूर्व संवर्णित चारोंभेदका सिद्धांत यहांसे लेकरसातवें भेदतक स्पष्टकरतेहैं॥(भेद६) (सिद्धांत) पहलेभी इसवातका चर्चाहोचकाहै कि इतनाविस्तार करनेकी कुछ बड़ीसी आवश्यकता नहींथी क्योंकि योगीश्वरने जोमुख्य सिद्धांतका ध्रुवाथा सोमूलमें कहदिया और इसनिर्णयसेभी उसीकी सिद्धिकरीगई-हां-इतनीवात अधिक निकसी कि माता पिताके क्षयाहमें पार्वणकाभी अधिकारहै कितु केवल एको- द्दिष्टकाही नहीं पर योगीश्वरने एकही इसलिये बतलाया कि इसमें थोड़ा आयास और थोड़ा व्यय अपेक्षितहै(तथैव) समयकी शक्ति और श्रद्धाके अनुरूप योगीश्वरने सारीबातों में निर्वाह विधि आदेशकरी है कि जिसका भार उठाने में साधारणों को अरुचि नहींहोवे-तथापि-इस निर्णयरूप शास्त्रार्थका विस्तार लिखनेसे बड़े २ अद्भुत . लाभसमुझे गयेहैं कि एक तो शक्ति और श्रद्धा सर्वत्र सवजनोंकी एकसी नहीं होती किंतु न जाने कोई किसवातके करने या समझने मात्रकी अपेक्षारखताहो और म- यदिापरिपाटी के आलोकनकरने परभी उसको संदेहशेपरहजावे तौइतने बढ़ेग्रंथका बिचारनाभी वृथाहुपा-दूसरे यहबात कि वहुधाशुभ आचारके वर्गवा करनेवाले मनुप्य तो थोड़े मिलते पर वाद विवाद की कचरियां येचनेवाले संप्रतिभी बहुतेरे धूतखड़ेहोजाते उनका मुख भंजन करने को वाणगुल्ला बहुतेरे इसमें मौजूद हैं अर्थात् बहुधा अपक मनुष्यों की यह प्रकृतिहुया करतीहै किजब कोई सञ्जन किसी वार्ता के निर्णय मध्ये वह सिन्धांत उच्चारण करताहै कि जो उचित है और सिद्धरूप मिताक्षरा साचाराध्याय। २२३ निर्णय कियाहुआ उपस्थितहै ऐसे समयपर वे धूर्तलोग जो शास्त्रमें तो निपुणनहीं पर था कुतर्कवादमें अभ्यासरखतेहैं उन्होंने एक ऐसा संक्षिप्त ग्रंथोंका वाक्य उसमें पत्थरसा उछालकरमारा जिस्से प्रत्यक्षमें उसमुख्य सिद्धांतपर न्यूनताका लांछनसा प्रतीतहोनेलगा यथार्थ से वह लांछन उसमें लगने योग्य नहींहै क्योंकि उसपत्थरा- कार वाक्यमेंभीअर्थीश कुछ और हेऔर सिद्धांत कुछ और है परंतु अव तत्काल उस लांछन की शांतिकरनेको दशपांच अन्यशास्त्रोंके वाक्यभी उपस्थित होनेचाहिये फिर ऐसाहरकोई नहींहोता जो दशपांचग्रंथोंके अनेकवाक्योंको प्रत्येक छोटीमोटीवातपर उपस्थितकिये फिरताहोजिस्से तत्कालउसदुर्जनका मुख भंजनकियाजावै-हां-जिसको कोई परिहार उसकायादया उसनेतौ यथोचित प्रतिपादन किया और धूर्तकोपरास्त किया नहीं तो वृथाही तत्कालसच्चे को झंठाहोनापट्टा (भौर) यद्यपि बहुधा सज्जन प्राचीन ग्रथोंका संग्रह रखते हैं परंतु वहसंग्रह भी तत्काल काम नहीं पाता क्योंकि उनमें बड़े २ लिप्टस्थल संस्कृतमें जिनके एकएकमूल वाक्यपर दो चार पत्रोंकाटाका और ग्रंथांतर अनेक वाक्योंकी प्रमाण योजना जिसमें जितने वाक्य हैं उतनेही मत भिन्न २ प्रतीत होतेहैं यथार्थ से सिद्धांत सवका एक है पर ऐसेग्रंथ अतिकाल पीछे देखने में पढेहुये भी विस्मृतहोजाते हैं फिर विनापढ़ा केवल विचारसे उत्तर क्योंकर तत्काल देसताहै-इसहेतुसे निर्णय विस्तारका लिखानाही सर्वथा उचित समभागया जिसमें इसएकही ग्रंथके पढ़ने से अनेक ऋपीश्वरों का संमत वा अनेक शास्त्रोंका अभ्यन्तरबिरोध शांतिके सिद्धांत सहित जानाजाय और तत्काल सारीवातों के म- नोरथ पूरेही-तीसरे यह कैसा उत्तमलाभ है कि जो कोई सोत्साह विद्याके अनुरागी होकर अन्यस्मृतियोंको उल्था द्वारा प्रकाश करनाचा या प्रथमारभ से भापानुवाद की रीति सीखाचाहें उनकेलिये यह एक परम निदर्शन विद्यमान है कि दीपकसे दी- पक जोड़ें-चौथालाभ उनसेभी अपेक्षा रखता है कि जिनको इसके माचारसे तो कुछ सम्बन्ध नहीं पर शास्त्रोंके विचारमें निपुणता और बुद्धिकी सुगमता इच्छा करते ही उनको इसप्रकारके स्थल इसके पारसकी पथरी होजायँगे किन्तु यथार्थ रीतिसे जो. इसकोपढ़ि समुझिलेवेंगे उनको विनागुरुकेभी अन्यविपयोंके निर्णयमध्ये बुद्धिप्रवेश करना सुगम होजावेगा-इस्से निज प्रयोजनकी संपतिपरभी इन स्थलोंका छोड़ना उचित नहीं समझा-तिसपरभी कदाचित् कोई यह संदेह कुतर्क वा सुतर्कसेहीकरना चाहै किऐसीझगड़ालूवातोंसे क्या अपेक्षाथी जोपीश्वरलोग सीधी २ एकरात या एकहीमार्ग नहीं बोले किंतु अपनी २ोरको खींचाखांची होतीरही तिसका क्या हेतुहे तहां सद्भाव यह सिद्धांतहे किवेऋपीश्वरभीकुछ एकहीकालयाएकहीभूमिभागमें नहीं हुये अर्थात् अपनेरदेशविभागों में अवतरे पुनि उसीमंडल के विशेषधर्माचारोंको अपने २२४ - मिताक्षरा स० आचाराध्याय । ज्ञान और उसकालके अनुरूपं तथा उसमंडलके मनुष्योंकी प्रकृति और प्रसन्नता और कल्याण कुशलक्षेमके अनुसार उसीसमयके कालात्माजगदीशकी इच्छा, और प्रेरणासे परिकल्पनकिया इसप्रकारसे अनेक देशोंमें अनेकलक्षणके प्राचारहुये-तिस ...पीछे उनसवोंका संघात इसहेतुसे होताग़या कि संसारी मनुष्यभी जहां उत्पन्नहोते हैं 'सबके सब उसीमंडल में नहीं वनेरहते किंतु अंन्यदेशीने जाकर अन्यदेशी ऋपियोंसे विद्यापढ़ी उन्होंके याचारसीखे पुनि वहांसे आकरयातौ अपने या किसी दूसरेदेश के निवासीहये वहां अपने शास्त्रकै सीखेधर्मीका आचार प्रचारितकिया और प्राचार्य कहलायें तथा जो वहांकेभी कुछ ओचार जिनमें कुछ भिन्नरीतैथी अंगीकारकिये इस्से आगे.जो लोग इनके आश्रयभूतहुये या अन्यदेशी प्राचार्योंके अनुगतहुये उन्होंने परस्पर जहां तहांके निवासोंसे कुछ प्राचार अपने वहां सँचारे और वहाँके जो उत्तम समझे कुछर अंगीकारकिये इसीप्रकार कालांतरोंमें कमर से अनेकवाक्य वा अनेकरीते प्रतीत होनेलगीं और यथार्थमें सभीश्रेष्ठ और सभीजगदीशकी इच्छा के श्राश्रयभूत परंतु मनुष्योंके निवासभेद वा स्थानांतर और उन्हींकी प्रकृति और समझ और आत्मप्रियता परोपेक्षा यादि परस्पर विरोध दृष्टिसे बाद विवाद.को 'देखकर किसीमहात्मा परोपकारीने कोई ऐसाशास्त्रनिर्माणकिया जिसमें सबके आंचार और सबकारीते और सबके वाक्योंका प्रमाण देकर सबकी विरोध शांति और सब की एकता सबके निर्वाह अपनी इच्छा और निज२ देशाचारों के अनुसार संग्रकिये 'जिस्से कोईभी किसीसे( विरुद्ध ) नहींमानै किंतु अपने २ योग्य अपना विचार करिके समझले जब यह दंगचला और इसमें कुछ कल्याणदृष्टिआया तब उसीप्रकार के अनेक शाल उसकी देखादेखी निर्माण होनेलगे परंतु जोर हुये सो केवल संस्कृतमें जिनको पहले समयके लोग तो संस्कृत बहुधा पढ़तेथे और खूब समझतेथे पीछेर संस्कृत की न्यूनतामें उनका लोपसा होनेलगाइसलिये समयकै राजा आदि-प्रता- पियोंने भापाके प्रचारपर दृष्टिकरी जिस्से कल्याणमें हानि नहीं होनेपावै ॥ (भेद७) ऊपरकी व्यवस्था जो देशभेदोंसे बतलाई इसमें कोई यह कहे कि उनदेशों का क्या परिमाण या अवधिहे-सो कुछ परिनियमितनहीं क्योंकि देशोंके अनुसार जो व्यवहार या मर्यादें और बोली आदि बदलते हैं उनकी अत्यन्त भिन्नता तो द्वीपांतरसेही हो- तीहै और यह व्यवस्था केवल एक जंबूद्वीपके भीतरभी विशेषकर भरतखण्ड संबंधी आर्यावर्त से अपेक्षा रखती हे तिसमेंभी चातुर्यादिलोगोंपर मुख्यता है-तथापि- एकआर्यावर्तकेभी प्यनेकदेशविभाग और उनमें निजर मंडलके कुछभिन्न आचार और बोली आदि भूभ्यन्तर और जात्यन्तरसे प्रत्यक्ष यद्यपि जात्यन्तर तो सर्वथा अकथनीयहै परंतु भूम्यन्तरकी साधारणभावसे यहव्यवस्थाहै कि भूम्यन्तर एकपग .

.. मिताक्षरा साचाराध्याय। २२५ धरतीकोभी कहसक्तेहें अपनेअपेक्षित स्थानसेचाहे तिसोरको मापलो पर इस्से कुछ प्रयोजनकी सिदिनहीं यहकेवल वीजांकुरहै किंतु अपनेचाहे तिस अपेक्षित स्थानसे वारहपग परभी भूम्यंतर होताहै ऐसेही बारहदंडका भूम्यंतर फिर बारहक्षेत्रका भम्य- तर होताहै परन्तु वारहखेतके भूम्यंतर पर जो मनुष्य वसतेहोंगे उनमें और अपनेमें कुछ अंतरवोली आदिका निःसंदेहहोगा किन्तु वहयंतर ऐसा नहींहै कि जिसको हर कोई पहिचानसकै क्योंकि एकग्राम मात्रका साराचालचलन बोली वाणी एकसीहोती है तथापिजोग्राम बड़ा नगरहोगा तौ निःसंदेह उसके मुहल्लोंके अनुसार कुछयंतरहो जायगा ऐसेही वारह छोटेग्राम या वारह क्रोशके भूम्यंतरके जो निवासीहोंगे उनकी बोली आदिमें इतना अंतर होजायगा कि जिसको अनारी मनुप्यभी समझलेगांत- थापि वहअंतर ऐसा नहींहै कि जिस्से वहांके मनुप्योंमें कुछभिन्नता समझीजाय परंतु जंववारह योजनका अंतर होजायगा तब अनेक बातों में इतना बड़ाभेदहोजायगा कि उनमनुप्योंमें अपनेसे कुछ भिन्नता प्रतीत होजायगी इसके उपरान्त मनुप्यकी बारहकोसी मंजिलसें बारहदिनकी राहका भूम्यंतर जवहोजायेगा तव औरही कुछ बोली औरही खानपान चाल व्यवहार नादिसारी बातें ऐसीनिकलेंगी जो एकदूसरे की कठिनतासे पहिचानसर्केगा और एकदूसरेकी प्रवृत्तिको मनोज्ञनहीं जानकर शीघ्र अंगीकारभी न करेगा और एक दूसरेसे चौकन्ना होजायगा-परन्तु-मिलनेके समयसे पल घड़ी मुहूर्त प्रहरआदि वारहर काल व्यतीत होतेहोते क्रमरसे बारहदिनमें पर- स्पर जानपहिचानसी होनेलगेगी फिर वारहसप्ताह,१२ पखवाड़े आदि क्रमरसे बढ़- तीर वह पहिचान १२मासमेंपरस्परप्रीतिभावहोजायगाोरगक दूसरेकी प्रतिको थोड़ा बहुत अंगीकार करने लगताहे पुनिधारहवर्प परस्पर सहवास पूर्वकरहतेउन मैं केवल जाति आदिका अंतरशेप रहजाताहै वहुधा प्रति उनकीर एकसी होजा- तीहै ऐसेही बारहयुग उपरांत जो उनकी संतानें होजातीहं वे परस्पर ऐक्यभाव जा- नाकरतेहैं और जाति,यादिका अंतर जो शेपरह जाता कहा तिसमें एकबड़ी लंबी चौड़ी व्यवस्था जोनिपट लिखनेसे छोड़ीहे किंतु उसमेंभी बड़ेरभेदहें कि जो उनजा- तोंमें कुछ थोड़ाभेद देशमात्रकाही हुया अन्यथा वर्णमान दोनोंका एकहो तो फिर एकताभी यहांतकहोजातीहे कि परस्पर खानपान संबंधादिभी होजानलगते इत्या- दिनाना भेदहें कुछ गकहीनियम नहींह सो सब लिखनेसे छोड़ेगये-यस इसीप्रकारके वावेको मनप्याँका प्रकृति व्यवहार कहतेहैं और इन्हींकारणोंसे व्यवहारीमें नाना, लक्षणसे भिन्नरऔर मिलेभी प्रतीतहोनेलगते हैं इस्से कोई भांति संदेह करनेका स्थल नहींहै कि ऋषीश्वरोंने यह फ्याकिया क्योंकि इस (प्रतिव्यपदार) में कुछ पी. स्वरोंकोभी स्वाधीनता नहींहै किंतु यह प्रकृति व्यवहार यहा श्राचार यद्यपि मनुप्पों . .. २२८ मिताक्षरा साचाराध्याय। जो कोई उन्हींपूर्वोक्त चीजोंसे वर्षा त्रयोदशी कहिये वर्षाऋतु, भाद्रपद कृष्णात्रियों- दशीमें विशेषकर मघानक्षत्रसेभी संयुक्त उसीत्रयोदशीमें श्राद्ध करताहै,वह अधिक तर आनंत्यफल भोगताहै २६० ॥ भाद्र कृष्ण पितृपक्षका नामहै॥, - अधि०सहदयोः-(वाणित) उसेकहतेहें जोवहुत बड़ाबकरा श्वेतवर्णका खस्सीकिसी देश विशेषका होताहै उसका नाम (त्रिपिवन ) या (त्रिपिव)भी कहते हैं-तद्यथा(विपिवन् बिंद्रियक्षीणश्वतंटरमजापतिम्।वार्धाणसंततंप्राहर्याज्ञिकाःश्रादकमणि इतियाज्ञिक प्रसिद्दःत्रिपिवःपिवतःकौजिवाचयस्यजलस्पृशतिसत्रिभिःपिवतीतित्रिपिवः)अर्था- त् इसलिये उसको त्रिपिवकहतेहैं कि जलपीतेहये उसके दोनों कानभी जलमै छूजाते हैं अतिलंवे होनेसे और तीसरी जीभ जिस्से पीताहै-(च)शब्दकी लक्षणासे गंगाद्वा- रादिका प्रमाण-यथा(गंगाद्वारेप्रयागेचनैमिषेपुष्करेऽव॑देसिंनिहत्यांगयायांचाइमक्ष य्यतांब्रजेत्) २५७ के श्लोकसे लेकर यहां ताई जोमुन्यन्न,और मांसत्रादि सारीव- स्तुसाधारण भावसे कहीं, कुछ वर्णभेद इसमें नहींकहा तथापि पुलस्त्य मुनिकी कही हुई व्यवस्थासे कुछ विशेषतापाई जातीहे-सायथा(मन्यन्नंब्राह्मणस्योक्तमासंक्षत्रियवे- श्ययोः।मधुप्रदानशूद्रस्यसर्वेषांचाविरोधियत्)अर्थात्-पुलस्त्यजीने यहकहाथाकिनी: वार आदि मुन्यन्न.जोश्राद्ध योग्यवतलाया सोतो ब्राह्मण मात्रकेलिये प्रधानहै और यथोक्तफलकादेनेवालाहैजैसाकुछगयाअादिमें जहारका फलकहाहो औरमांसकाजो अधिक फलकहा सोक्षत्रीऔरवैश्य इनदोनोंको यथोक्त फलका देनेवालाहे-और सहत जोकहाहै सो विशेषकर शूद्रजातीको यथोक्तफलका देनेवालाहै इसके सिवाय(सर्वेपा चाविरोधियत्)अर्थात् जो वस्तु अविरोधीहो किंतु चाहे शास्त्र में कहीहो जैसे काल: शाक आदि चाहे विना कहीहुईभी जैसे वास्तुक आदि या कोई वस्तुहो परजिसकेकुल आचार आदिसे विरुद्धतानही रखतीहो वहवस्तु सबकेलिये उचितहे-परन्तु अवय- थार्थ दृष्टि से समयके अनुकूल यह पुलस्त्यजीका वाक्यभी कुवरविरुद्धहै जिससमय में उन्होंने यह व्यवस्था कहीथी तब तो किसी समयमें विरुद्धनहीथा.परअब निःसं- देह विरुहहै किंतु मांसादिके व्यवहारसे अब कोई भांति श्राद्ध नहीं होसक्ता क्योंकि यद्यपि और सबको छोड़कर केवल क्षत्रीमान पर अंगीकार करौ उनके जातीधर्मके हेतुसे तथापि श्रादभोक्ता तौ ब्राह्मणके सिवाय और कोईनहीं होसक्ता फिर वहक्षत्री क्योंकर करसक्ताहै-हां-उसदशामें करसलाहै कि जब श्रादभोक्ता ब्राह्मणभी पहले समयकेसे समर्थ ऋपिलोगहों सो यहवातभी असंगत है-कदाचित् कोईकहे कि अ- यापि कान्यकुब्जों या मैथिलीमें बहुत ऐसे विद्यमान, सोभी असंगतहै क्योंकि कान्य- कुब्ज या मैथिल मात्र निमंत्रणके भौजनसेही सबंध पक्वान्नसेभी नहींरखते फिरमांस को तोकञ्चीरोटीमें गिनतेहें दूसरे वैश्योंकाभीचर्चाइसमेंआयासो वैश्यजाति अधिक मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । २२९ तर इसवातकी उपेक्षा और निरादरहै इस्सेवर्ण या जातिमात्रके अनुसार यहव्यव- स्थाकोई रीतिसेभी सच्चीनहीं होसक्तीहै फिरव्यवस्थाके झूठीहोजानेसे पुलस्त्य और योगीश्वर याज्ञवल्क्य दोनों भंठेहुये जातेहैं क्याऐसे अज्ञानीथे जिनको यागापीछा कुछनहीं सूझपरा जो चाहै सोमुँह पाया सोईवकडारा-भला इनदोनोंकासमयप्राची- नथा इस्से इनको कुछनहीं कहसक्ते पर सबसे अधिक लांछन श्रीमद्विज्ञानेश्वरमिता- क्षराकार पर आरोपित होताहै जिन्होंने पुलस्त्यजीका वाक्यवर्ण जातिकी व्यवस्था परप्रमाण किया क्योंकि मिताक्षरा अभीहाल काल्हिपरसोंकी संग्रहकरी है क्याउन्होंने लोकाचारपर दृष्टिनहीं करीजोपुलस्त्यजीका विरुद्ध वाक्यमी प्रमाणमेलेलिया-परन्तु- अब अपने मुख्य प्रयोजनपर दृष्टि करनी चाहिये जिस्से यह विरोध भी शान्तहो और वे महानुभावऋपिभी सच्चे बनेरहे-यद्यपि मिताक्षराकारकी इतनी मूल निर्विकल्प है कि उन्होंने इसवातपर कुछ निर्णय नहीं किया तिसकाभी यह हेतु अनुमान से प्रतीत होता है कि भाव उन्होंने वंगालेमें बैठकर मिताक्षरा संग्रह करीहो-तथापि- यह व्यवस्था वर्ण और देश दोनोंके संयोग से सिद्ध होतीहै क्योंकि ऋपिलोग कदा- चित् भी असम्भव नहीं कहते-इसलिये मुन्यन्न और दूध पायस कालशाक श्रादिसे श्राद्ध जो फलदायक या परम तृप्तिकारक बतलाये सो तो उन जातों और देशोंके लिये बतलाये जिनमें मांसका त्याग और निरादरहै चाहै कोई वर्णहो इस्से कुछ त कणा नहीं है-दूसरे जो मांसके अधिकारवाले श्राद्ध फलदायक या परम तृप्तिकारक वर्णन किये सो उन्हीं जातों और उन्हीं देशोंके लिये बतलाये हैं जिनमें सर्वथा मांस का श्रादर और सत्कारहै जैसे वंगाला काश्मीर पहाड़ आदि देशों में जहां श्राद्ध के कर्ता और भोक्ता दोनों मांस खाते हैं चाहै कोई वर्णहो कुछ इस वातपर तर्कणा नहीं है-तीसरे जो सहतके अधिकारवाले श्राद्ध फलदायक या परमतृप्तिकारक बतलाये और पुलस्त्यजीने शूद्रोंके शिरथापे सो यहएक अोछी वातहै और शूद्र एक उपलक्षण मात्र इसलिये कहदियाहै कि पहाड़ोंमें बहुधा डोम आदि जातोंके शूद्र विख्यात होते हैं उनको इन देशोंके समान और कोई उत्तम पदार्थ नहीं हाथ आते हैं किन्तु वनमेंसे मनों सहतले यातेहैं और वहींके पहाड़ी ब्राह्मण उनके श्राद्धभोक्ता होते है जिनको दोरसेर सहत पीजाना एक सहजसी बातहै क्योंकि और कोई देशी मिठाई तो वहां होती नहीं और देशोंसे जाती है तो वंशलोचनके भाव बिकती है इस्से वे उसीको अमृत समझा करते हैं यद्यपि-सहतके गुण और स्वादुभी अमृतकेही तुल्य यथार्थ होतेहैं परन्तु इसलिये नहीं होते कि केवल वही पीकर पैटभरले। तथापिउन ब्राह्मणों को इसवातका अभ्यास होताहै दूसरे उन डोम श्रादि शूद्रोंके हाथका अन्न तो खाते नहीं फिर कोई रीतिसे उनका उद्दार करें या न करें इसलिये पुलस्त्यजीने शूद्रोंके उ- -- २२६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। की प्रकृतिमेसे उत्पन्नहोताहै परन्तु वह प्रकृतिभी विशेषकर मनुष्योंकेही वशकी नहीं अर्थात् उसप्रकृतिकी प्रेरणाकरनेवाला वहीएक जगदीशहै जिसकीमाया वा शक्ति प्रकृतिरूपहोकर सारेसंसारमै विस्तरितहोरहीहै वहीजगदीश नानाप्रकारकेदेशवनाता और वही उनदेशोंमें नानाजातिके मनुष्य पैदा करता और उनकी भिन्न प्रकृतीभी कल्पित करता और परिणामको पहुँचाता रहताहै इन्हींतरंगोंकी अगाधतासे संसार सागर इसका नामहै २५५॥ ' अब यहां से आगे केवल नित्य श्राइको छोड़कर अन्य सव श्राद्दोंका शेपव्यवहारवर्णन करते हैं। पिंदस्तुिगोऽजविप्रेभ्योदद्यादग्नीजलेपिवा । प्रक्षिपेत्सत्सुविप्रेषद्विजान्छिएनमार्जयेत् २५६ ।। ऐ०-पूर्वोक्तश्राद्धोंमें दियेहुये पिंडोंको (गऊ) यहा गऊके न होनेमें (मज) कहिये वक- रीहीकोदेदेवै अथवा कोई ब्राह्मण जोलेसकै या मांगनेलगै तिसको देदेवै या यहभी नहीं तो अग्निमें छोड़देवै पर अग्नि.ऐसीहो जिसमें भस्महोजाय अथवा गहिरेजल मेंछोड़देवै-और (सरसुविप्रेषु) अर्थात् होतेहये किंतु बैठेहुये ब्राह्मणोंके भोजनके स्थान पर द्विजोंकी उच्छिष्टनमार्जनकरै किन्तु पहारेनहीं २५६॥ अधि०-इसका सिद्धांत केवल यहीहै कि ब्राह्मण चलेजाचे या भोजनपंक्तिसे उठे पीछे किसी द्वितीय स्थानमें जावेतबज़ठ बुहारै किंतु उनके सन्मुख नहीं परन्तु यह सिद्धांत नहींहै कि उनके चलेजाने परभी जूठकोनिपट बुहारै नहीं २५६ ॥ : हविष्यान्नेनवैमासंपायसेनतुवत्सरम् । मात्स्यहारिणकौर,शाकुनच्डागपार्वतैः २५७ : एणरौरववाराहशाशैमीसैर्यधाक्रमम् । मासवृपाभितृप्यंतिदनारपितामहाः २५८ ॥ पक्ष सहदयोः-नि:संदेहहविप्यानसेमासमात्र-औरखीरिसेएकवत्सर-मात्स्य-हारि- एक-औरभ्र-शाकुन-छाग-पार्षत-इन्होंसे २५७॥ एण-रौरव-बाराह-शारा-दियेहुयेइन मांसोंसे मासद्धि पूर्वक यथाक्रमसे इससंसारमै पितामह अभितृप्त होते हैं २५८ ।। मभितहदयोः यहां पर भोज्य विशेष वस्तुसेफल विशेषवर्णन करतेहैं कि-निःसंदेह इससंसारमें (पितामह) कहिये वाप दादा परदादा यहतीनों हविप्यान्नसे श्रादके एक दिन करनेसेभी एकमास पर्यंत तप्तबने रहते हैं (पौर) पायस कहिये दूधकी खीरिसे आद भोजनकरवानेसे एकवर्षमात्र अभिकहिये भलीभांति तृप्तरहते हैं इसके सिवाय जिंनमांसोंकी चर्चा अबकरतेहेंतिनसे उत्तरोत्तर यथाक्रमसे एकएकमास अधिकतृप्ति होतीजातीहै अर्थात् जैसे हविप्यानके श्रादसे एकमास तृप्तिऊपर बतलाईथी परंतु जोपाठीनादि भक्ष्यमत्स्योंसे श्राद्ध भोजनकरवावे तौ(मारस्यप्राद)कहलाताहे उस्से दोमासतक अच्छी तृप्तिरहती है-जब तायम्गकहिये लालहरिणके मांसका श्रादकरे तवं (हारिणकाह) कहलाताहै उस्से तीनिमास तृप्तिरहती है-जब(उरभ्र) नाममेषकिंतु .

मिताक्षरास आचाराध्याय । २२७ मेढ़ाके मांसकाकरे तब (भौरभ्रश्राद्ध) कहलाताहै उस्से चार मासप्तिरहती है जब (शकुन) कहिये पक्षीमात्र जो भक्षोंमें गिनतीहों उनके मांसकाकरैतब (शाकुनश्राइ)कह- लाताहै उस्से पांचमास तृप्तिरहतीहै-जब (छाग) नाम वर्करमांसकाकर तव(छागश्राद्ध) कहलाताहै उस्से पड्मासिकतृप्तिरहती है-जब (टरत्) नाम चित्रमृग जिसे चीताकह- तेहें उसकाकरै तब पार्वतश्राद्द)कहलाताहै इस्से सात मास तृप्तिरहती है जव (एण) कहिये काले हिरनकाकरै तब (ऐणश्राद्ध)कहलाताहै उस्से आठमास तृप्तिरहती है-जब रुरुनाम बनमृग जिसको शंवर यहा भापामै शावरभी कहतेहें तिसकाकरै तव (रौरव- श्राद्ध) कहलाताहै उस्से नवमास तक तृप्तिरहती है-जब वराहनाम वनसूकरसेकरे तब (बाराहश्राद्ध) कहलाताहै उस्से दशमास तृप्तिरहती है-जब शशनामखरहा वा खरगो- शकारै तव (शाशश्राद) कहलाताहे उस्स ग्यारहमास तृप्तिरहतीहै २५७ ॥ २५८ ॥ भधि०-ऊपर हविष्यान्नका चर्चा पायाथा-हविष्यान्न तिलबीहि आदिको कहतेहैं सोई मनुजीने संबके नामभीस्पष्टकहदियेहे-यथा(तिलैबीहियापेरनिर्मूलफलेनया। दत्तेनमासंप्रीयंतेविधिवपितरोनृणाम्)अर्थात्-तिलोंसे-व्रीहिनामधानचावलोंसे-यवों से-मापनाम उड़दौसे-जलोंसे-यहा मूलसे फलसेही विधिवत् दियेहुये श्राद्धकरके मनु- प्योंके पितर एकमास तप्तरहतेहैं-यहसारी वस्तु हविष्यान्नमें गिनती सोई याज्ञव- ल्क्यजीने एक शब्दसे कहदियाथा-पायसके उपलक्षणसे दुग्धभी संबंधितहै सोई यह स्मृतिभी स्पष्ट भावसे कहतीहै कि (संवत्सरंतुगव्येनपयसापायसेनच)अर्थात्-गव्येन पयसा किंतु गऊके दूधसे तथा पायसेन कहिये खीरिसेभी संवत्सर मात्रकी तृप्तिहोती है-इस्से निश्चित हुआ खीरिसबसे उत्तमहै क्योंकि पूरे संवत्सरकी तृप्ति और किसी वस्तुसे नहीं बतलाई २५७।२५८ ॥ खद्गामिपमहाशकंमधुमुन्यन्नमेवच । लोहामिपमहाशाकमांसंवाणिसस्यच २५९ ॥ । यददातिगयास्थश्चसर्वमानत्यमश्नुते । तथावर्षात्रयोदश्यांमपासुचविशेषतः २६० ॥ • ऐसहद्दपा:-औरभी कुछविशेषता कहतेहैं कि (खड्गामिपं अर्थात् सड्गनाम गैंडा तिसका आमिप कहिये मांस (महाशल्क) एक प्रकारका उत्तमजातीमत्स्य विशेपहो- ताहे२ मधु सहत३ (मुन्यन्नं) मुनिलोगोंका अन्न नीवार आदि सभी प्रकारका जोबनमें होताहो (लोहामिष) अर्थात् लोहकहिये लालबकरा तिसकामांस५(महाशाक) अर्थात् कालशाकभी इसको कहतेहें श्रादशाकभी कहतेहैं वास्तवमें नाड़ीशाक प्रसिद्द है जो वर्षा ऋतुमें तालाबोंके किनारे होताहैद और (वार्धाणस) काभी मांस७।२५९ ॥ (यद पातिगयास्पश्च) अर्थात् इनमैसे किसी वस्तुकरके गयामें बैठाहुआ जो कोई श्राददे- ताहे यहा (च) शब्दकी लक्षणासे गंगाद्वारादि तीथों में बैठकरदेताहे वह मनुष्यप्रा- नंत्यफल भोगताहे अर्थात् जोर फलभोगनेको उसेमिलते, तिनकाअंत नहींहे तथा .

२३० मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। पलक्षणसे कहदियाहे-भला इसपर भी कोई यह (शंका) करे कि यह व्यवस्था तो सच्ची है पर पुलस्त्यजीने पूर्वोक्त वाक्यमें क्षत्री और वैश्य दोनोंको मांसका अधिकार श्राद्ध में बतलाया सो तो अबतकभी असंगत बनारहा सो यह शंका केवल वद्धिकी भ्रमता है किन्तु सावधानीसे ध्यान लगाकर सोचौ कि जब देश व्यवस्था कल्पित होचुकी इस बातमें फिर संदेहका क्या अवसर है देखौ सरस्वती सम्बन्धी पश्चिम देशों में सारस्वत ब्राह्मण और सारस्वत क्षत्री जिनको बहुधा खत्री कहते हैं और सारस्वत वैश्य जो बहुधा उन्हीं खत्रियोंके भेदमें कोई २ खत्री वहांके वेश्यों में गिनती होते हैं यह सभीलोग निर्विकल्प मांसाहारी होते हैं उन क्षत्री वैश्योंके लिये पुलस्त्यजीने कहा है कुछ सभी वैश्योंके लिये नहीं क्योंकि उन्होंने उसी वाक्यके चौथेचरणमें सवझगड़ा निपटादिया यह कहकर कि (सर्वेपांचाविरोधियत्) अर्थात् जो वस्तु जिसके निकट अविरुदहो किन्तु जिस्से जिसको ग्लानि'नहींहो वह सभीके लिये अपने २ कुलदेश जातिके अनुसार श्रेष्टहे फिर किसलिये (इका) करतेहो ॥ (भेद २) काश्मीरी लोगों वा सारस्वत वेश्य और सारस्वत क्षत्री और सारस्वत ब्राह्मणोंका चर्चा जो मांसके अधिकार मध्ये कहागया सो इसलिये कि काश्मीरियोंकी परिपाटी तो इस देशमै आ- बसनेपरभी बनिरही है कि बहुधा काश्मीरी लोग पिंडभी मांसकेही प्रत्यक्षभावसे देते हैं वरन वे अपने पितरोंकी वृप्तिही बिना मांसके अधिकार नहीं समझते क्योंकि उनके पितर जीवतेहुये भीमांस विना तृप्त नहीं होतेथे किन्तु एक दिनभी मांस विना भोजन नहीं करसक्तेथे फिर मरेहुये क्योंकर सूखे अन्नसे तृप्ति उनकी होसके सिद्धांतसे भी यह वात ठीकहै क्योंकि इस देशमेंभी यह परिपाटी अपने लोगोंकी प्रत्यक्ष है कि जो वस्तु प्रेतको जीवतेहुये बहुत प्रिय लगतीहो वह वस्तु अवश्यंभावसे उसके श्राद्धोंमें दीजाती है-इसीलिये काश्मीरी लोग जब कभी ऐसी दशामें श्राद्ध करते हैं कि जिस स्थानपर मांस नहीं मिलसक्ताहै या और कोई प्रवल हेतु प्रारूढ़ हुआ जिस्से मांस की असम्भवता हुई तब खोया मावा पेड़ा आदिमें किंचित् साँभरिनोन मिलाकर पिंड वनाते हैं कि मांसके अभावमें वहभी मांसका अनुकल्प होजाता है यहां तक उनको अपने पितरोंकी तृप्ति करनेमें श्रद्धा और विश्वासहे-दूसरे सारस्वतोंकी यह व्यवस्था है कि यद्यपि अपने सरस्वती तट सम्बन्धी देशों में तो सर्वथा मांसके अधिकारी होते यह वात निर्विकल्प निश्चितहे परन्तु जो २ सारस्वत अपना देश छोड़कर इन देशी में आबसे हैं उनमें अनेक भांति होगई हैं किन्तु बहुतेरे प्रत्यक्ष खाते हैं बहुतेरे छिपकर वहुतेरे इस देशको लज्जासे निपट त्यागी होगये हैं तथापि अपने देश या कुल मर्याद "पर इतनी थदा रखनेहें कि श्राडकर्मको विना मांसके संसर्ग नही होनेदेते वहतथोड़े ऐसे होंगे कि जो इस देशकी मर्यादा अनुसार श्राद्ध करतेही अन्यथा बहुधा तो यही मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २३.१ एथा चलीयातीहै कि जोलोग उनमें यहांकी देखादेखी त्यागी बनिरहेहैं वेभी गुप्त भावसे श्राद्दमें मांसमिश्रित पक्वान्नकी गोलियां धीमें पूरियोंकेसाथ पकवालेतेहैं वेही गोलियां पित्रोंको अर्पितकियपीछे पितृब्राह्मणोंको जिमादेतेहैं तब अपने पितरोंकी तृप्तिमें विश्वास लातेहैं इसीलिये वहुधा तो अपनेदेशी और सजातियोंकोहीन्योता देतेहैं परन्तु जबयह संयोग आवनताहै कि स्वदेशी और सजाती नही मिलसकतय औरोंकोहीन्योतदेतेहैं और वहगुप्तभेद प्रकटनहींकरते हैं क्योंकि प्रकटकरें तो अन्य जातीब्राह्मण उनगोलियोंका खानाअगीकार नहीं करें और जोलोगअन्यजाती ब्राह्मण इसवातकेभेदू होतेहैं वेसारस्वतोंका निमंत्रण श्राद्धविपयका अंगीकारनहींकरते-इसी प्रकार पहाड़ी और वंगाली आदि ब्राह्मण वा क्षत्री और वैश्योंकी भिन्न २ अनेक भांतिकीव्यवस्था हैं तिनकेलिये ऋपीश्वरोंने मांसका श्रादकरना फलदायक लिखा है किंतु सबकेलिये नहीं और उन्हीकेलिये जहां २ मांसकी चर्चा या प्रशंसा धर्मशा- स्त्रोंमें भक्ष्याभक्ष्य विवेकसे या और किसीरीतिसे आईहो सव संभवितह (दृष्टांत)जैसे इसीशास्त्र में १७६-१७७ इन दोश्लोकोंसे पंचनखादिजीवोंकामांस भक्ष्यवर्णनकर चकहें सोभी उक्तलोगोंका व्यवहार बतलायाथा फिर १७८ के श्लोकमें जो मांसखान कीविधि वर्णनकरीथी सोभी उकलोगोंका व्यवहारथा फिरः १७९ में जो चर्चाकिया था सोभी उक्तलोगोंका व्यवहारहै फिर द्रव्यशुद्धिके प्रकरणमें आकर १९१ के उत्त- राश्लोकमें जोकुछ कहा सोभी उक्तदेशोंका व्यवहारहै अन्यथा और सबसाधारण अत्रत्य संबंधीदेशों वा मनुप्योंकेलिये १८०के श्लोकमें प्रत्यक्षभावसे मांसकानिषेध कियाहै इसकेसिवाय जहांकहीं एकशब्दसेभी मांसका प्रसंग आयाहो सो सबइसी व्यवस्थाके अनुकूल है-इनदेशोंमें विशेपतर कायस्थजाती लोग मांसके व्यवहार में प्रसिद्ध हैं उनमेंभी सहस्रों ऐसेत्यागीहैं कि ब्राह्मणोंकोभी मातकरते हैं किन्तु बड़े २ विधेकी शास्त्रविद्याके अनुरागी सत्संगी और मांसखानेवालेके संसर्गसेभी बचते हैं और जो कि उनकेकुलमें मांसका व्यवहार अधिक प्रसिद्धहै सो केवल क्षात्रधर्म के हेतुसे विदितहै किन्तु क्षत्रीवर्णमें मांसकीप्रवृत्तिहै और येभी एकप्रकारके उपक्षत्री. वर्णमें गिनती, अर्थात् कायस्थनाम गोणक्षत्री कहलातेहै इस्से वहमांसकाव्यवहार उनमें विदितहै- इनकेसिवाय कान्यकुञ्ज ब्राह्मणभी इसदेशमै मांसके व्यवहारमध्ये विख्यातह तिनकी यहअद्भुत व्यवस्थाहै कि प्रथम तो समस्ती से चतांश मांस के अधिकारी हे शेषतीनभाग मांसकेत्यागी हैं-हां-इतनीबात अधिक है कि उनदोनों भांतिके परस्पर विवाहसंबंध होतेहैं इसवातमें कुछत्याग और संग्रहका विचार नहीं है परन्तु इसवातकी प्रतिज्ञा उनदोनोंभांतिमें निर्विकल्पहै कि विवाहादि मंगलकार्यों के समाज वरातत्रादि या श्राद्धकर्म या अन्यप्रतिष्ठा यज्ञादि कामोमें किमीके भी २३२ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । मांसका संचार नहींहोता किंतु केवल एक दुर्गोत्सव.यज्ञमें निःसंदेह उसका संचार उनलोगोंके घरहोताहै जो दुर्गाकेउपासक उसरीतिसे प्रसिद्धहें यहा कुछलोग ऐसेभी हैं कि वे कभी २ साधारणभी विनादुर्गोत्सबके अपनेघर संचारवान् होतेहैं परन्तु जब अपनेघरके सिवाय कभी निजगोनके दोचारघरकाभी भोजनएकत्र किसीहेतु से होगा उसमें उसकासंचार कदाचित् नहीं होनेदेंगे जैसे अन्यदेशी.या अन्यजाती लोगों में प्रत्यक्ष विवाहादि यज्ञों भी धूमधाम से उसवातका संचार कियाजाता है सो इसहेतुसे ऐसानहींकरते कि उनचारघरमें कोईघर निपटत्यागीहे या किसीघरमै एकदोमनुष्य त्यागीहोतेहैं तिनकी अप्रीतिहोजावे इसकेसिवायजोलोग इसकेत्यागी नहीं हैं तिनकीभी कुछ विरादरीमें प्रशंसानहीं किन्तु परस्परभी इसवातसे निन्दाभाव समझा करते हैं परन्तु अन्यदेशी और अन्यजाती लोगोंमें कि जिनके इसवातका अधिकारहे उनमकुछ परस्पर उपेक्षा वा निरादरनहीं वरनइसबात का बड़ा उत्साह और बड़प्पन समझाकरते हैं क्योंकि उनके कुलमें सभी एकसेहोतेहैं फिर निन्दा वा निरादर किसकाकौनकरै-और कान्यकुब्जोंमें जोकुछ थोडाबहुत इसकाप्रचारचलग- या सो इसहेतुसे कि उनमें पहले समय दुर्गाके उपासक बड़े २ शक्तिमान् तेजस्वी होतेरहे जिनकी अद्यापि बहुधा ऐसीवात प्रसिद्धहैं कि अमुकमहात्माकी धोती आ- काशमें सूखती थी किन्तु स्नान कियेपीछे निचोड़कर ऊपरको उछालदी वह उनके शक्तिप्रभावसे ऊँचीचलीगई और सूखकर हाथों में ओपड़ी अमुक महात्मा पूजन समय गंगाजीको गँगियानामसे पुकारकर आवाहन करते तभीतत्काल उनकेसन्मुख थोड़ासाकार्यमात्र जलप्रवाह आजाता जिसमें वलिवैश्वदेव किया और फिर उसी नामसे विसर्जनकिया इत्यादि अनेकोंकी प्रसिद्ध ऐतिह्यपूर्वक चलीआतीहै उनमें से किसी २ महात्माने भगवती को पशुबलिदानदेना अंगीकार किया उनसे उसवातकी परिपाटी चली परन्तु उन्होंने अपनी किसी चैतन्यशक्तिके अनुकूल अंगीकार किया था फिर पीछे २ समयके प्रभावसे वहशक्तिनरही परकेवल पशुदानकीलीकसी पीटने लगे-संपादक ठेठ निजकुलाचारकी व्यवस्था दृष्टांतमात्रसे कहताहै कि उसनेयद्यपि अपने प्रपितामहके दर्शन नहींपाये पर उनका यहयाचार निःसंदेह सुनतेचलेश्रा- तेहैं कि वे सिंहवाहिनीके परमउपासक अनन्यगतिसेहुये और बलिदान पडमासिक नवरात्रों में तथा अपने वंशमें किसीके पुत्रजन्म और पुत्र विवाहके होनेमेंभी केवल अपनीजिहाकी नोकलेकरचढ़ातेथेऔरतत्काल बहजिहाकाक्षतपूराहोजाताथा परंतु जब उन्होंने अपने देहांतसमय अपने पुत्रसे यहकहा कि यह कुलदेवकी पूजा अब तुमलो हम चलते तव अस्मपितामहने यहकहा कि मुझसे जीभ नहीं चढ़ाईजा- यगी उन्होंने प्रसन्नहोफर यह कहा कि अच्छा जो तुम्हारी इच्छा और समर्थहो सो मिताक्षरा साचाराध्याय। २३३ कहीं इन्होंने कहा कि मैं मेप पशुका बलिदान दिया करौंगा उन्होंने कहा एवमस्तु इस प्रकारसे पितामहने वीचमें अपनी जीवन अवधि ताई मेष बलिदान किया और उसका प्रसाद भी अंगीकार किया और कुलदेवकी प्रीति इसप्रकारसे भी अधिक पाई गई क्योंकि यह बात उन्हों ने समर्थकी आज्ञालेकर करीथी परन्तु उनके सर्वसम्पन्न तीनों पुत्रोंने निज विज्ञान शहोकर हिंसा विपयकी दृष्टिसे उसवातकी उपेक्षा करके अहिंस्य अनुकल्प नियतकिये और उस बातके त्यागीहुये पर इन अनुकल्पोंसे कुछ देवताकी अप्रीतिभी प्रकटहुई तथापि उस अप्रीतिको गिनतीमें न लाकर अनुकल्पों को ऐसा समझा कि हाथीके दांत निकसे सो निकसचुके-ऐसे २ असंख्य घरोंके नाना विध लक्षण देखनेसे सर्वथा निश्चित होताहै कि इनमें और मैथिलोंमेंभी यह संचार कुछ देश अथवा कुल रीतिसेभी सनातनका नहीं है किन्तु जो सनातनका होतो या देश वा कुलके प्राचारमें गिनती होता तो सारे देशमात्र या जातिमात्रके लोगोंकी एकसी परिपाटी होती और श्राद्धादि यद्वा प्रतिष्ठा रामादि यज्ञोंमें भी इसवातका कुछ संचार होता जैसा अन्य देशों वा जातोमें प्रत्यक्ष है परन्तु यह व्यवस्था उन कान्य- कुब्जों वा मैथिलोंकी नहीं है जो पहाड़ देशोंमें जावसे किन्तु केवल उनके निजदेश मात्रका चर्चा कियाहै क्योंकि पहाड़ देशोंमें दशौप्रकारके ब्राह्मण मिलकर सब एक रंग होरहें हैं इस्से वहांपर सवकी रीति भांति एक तुल्यहै वरन उनके सम्बन्धभी प- रस्पर ब्राह्मणत्वमात्रकी अपेक्षासे होते है फिर अन्य व्यवहारोमें भिन्नता क्योंकर कहीजाय २६०॥ । इति द्रव्यविशेष श्राइफलम् ॥ अब आगे तिथि विशेषमें श्राद्ध करनेका फल विशेप वर्णन करते हैं।सो यहां 7 से लेकर आगे २६६ श्लोक तक (काम्यविधि) का चर्चाहोगा । कन्यांकन्यावेदिनश्चपशून्वैसत्सुतानपि । द्यूतरूपिंचवाणिज्यदिशफैकशफंतया २६१ ॥' ब्रह्मवर्चास्वनःपुनान्स्वर्णरूप्येसकुप्यको जातिध्वसर्वफामानाप्नोतिबाद सपा २६२ ।। प्रतिपत्प्रभृतिप्वेकावर्जयित्वाचतुर्दशीम् । शस्त्रेणतुहतायैवैतेभ्यस्तत्रप्रदीयते २६३ ॥ । ऐ० त्रयाणांसह-एक चतुर्दशी को वर्जित करिकै अन्यसारी तिथी पड़वा श्रादि में क्रमसे सदा कहिये नियम सहित निरंतर श्राद्ध देनेवाला यहां पर कहेहुये सर्वकामों को प्राप्त होताहै अर्थात् जो कोई रूप लक्षणवती (कन्या) मिलनेकी कामना रखता हो वह सदेव प्रतिपदामे निरन्तर पार्वण कियाकरै तो नि:संदेह वैसी कन्या पावै किंतुं कुभार्या नहीं पावै १ (कन्यावेदिनश्च) अर्थात् जो कोई कन्या वेदी कहिये जमाई अच्छे रूप लक्षण सम्पन्न बुद्धिमंत अपनी कन्याओके निमित्तमें चाहताहो वह द्वितीयामें श्राद्ध कियाकरे तो कुत्सित जामात उसके नहींहों २ (पशून्) किन्तु जो कोई वकरी ।

२३४ मिताक्षरा स.प्राचाराध्याय। आदि पशुओंकी सम्पत्ति चाहै वह तृतीयामें श्राद्ध कियाकरै ३ (सत्सुतान्) किन्तु जो कोई सन्मार्गवी पुत्रोंकी कामना रखताहो वह चतुर्थीमें कियाकरै ४ (यूत) जो कोई द्यूतकर्मकी विजय चाहताहो वह पंचमीमें ५ (कपि) जो कोई खेती मात्रकी फल सिद्धि चाहे वह पष्ठी तिथिमैं ६ (वाणिज्य) जो वणिज व्यापारसे बहुलाभ चाहे वह सप्तमीमें ७(विशफं) अर्थात् दो खरोंवाले गाय भैंस आदि पशु चाहै वह अष्टमीमें ८ तथा (एकशर्फ) अर्थात् घोड़ा आदि एक सुमवाले पशुचाहे वह नवमी में ९ (ब्रह्मवर्चस्विनःपुत्रान)किन्तु वेदादिविद्याकाअध्ययन पुनि उसके आचारसे उत्पन्नहुआ तेज सोई ब्रह्मवर्चस तिस करके संयुक्त ऐसे ब्रह्मवर्चस्वी पुत्रोंकी कामनावाला दशमी तिथिमें १० (स्वर्ण) किंतु सोनेकी बहुताइत चाहै वह एकादशीमें ११(रूप्यं) किन्तु चांदीकी बहुताइत चाहै वह द्वादशीमें १२ (कुप्यं) किन्तु सीसा तांबा आदि धातोंसे जो लाभ चाहै वह त्रयोदशीमें १३ (जातिश्रेष्ट) किन्तु अपनी जाति विरादरीमें उ- कर्पा आदि श्रेष्ठता चाहै वह अमावसमें निरन्तर श्राद्ध कियाकरै ३० और चतुर्दशी जो छोड़ीगई सो इस हेतुसे कि जो कोई जिसके कुल में शस्त्रसे मारेगये हों तिनके लिये उस दिन श्राद्द कियाजाता है २६१४२६२।२६३ ॥ मन्त्रयाणांसह-यद्यपि इसमें तिथि कहने से पक्षकी विशेपता नहीं पाईगई परन्तु पितरोंके अधिकारमें कृष्णपक्ष परिनियमितहै इस्से कृष्णपक्षकी तिथें समझीजाती हैं तथापि केवल कृष्णपक्षका सिद्धांत नहीं निश्चित होता किंतु यह तिथों सम्बन्धी श्राद कुछ (नैतिक) या (नैमित्तिक)में गिनती नहीं अर्थात् यह प्रयोग (काम्य) विषय पर आरूढ़हे इस्से आगे नक्षत्रोंपर कहेंगे वहभी (काम्य) विषयपर आरूढहै इस हेतु से दोनों पक्ष पायेजाते हैं क्योंकि जो निपट कृष्णपक्षसे अपेक्षा पितरोंके अधिकार स्वीकार करीजावे तो अग्रोक्त सत्ताईस नक्षत्रोंमेंभी कृष्णपक्षकी अपेक्षा होनी चा- हिये सो असंगतहै किंतु सत्ताईस नक्षत्र दोनों पक्षमें आयेंगे इसलिये कर्ता पुरुपको अधिकारहै कि वह जिस किसी तिथिका नियस साधे उसको चाहे कृष्णपक्षसेही नि- रन्तर नियम अंगीकार करै चाहे केवल शुक्लपक्षसे अथवा दोनों पक्षसे निरन्तर नि- यम साधै तो अधिकश्रेयस्करहो-अर्थात् कृष्णपक्षमें पितरोंका अधिकार प्रसिद्ध होने से इस (काम्य) विधिमै शुक्लपक्षका निषेध नहीं पाया जाता कितु कृष्णपक्षका अधि: कार जो प्रसिद्धहै वह केवल (नैनिक) विधिसे अपेक्षारखता है उस्से सिवाय (नैमित्तिक) में भी कृप्पापक्षसे अपेक्षा नहीं है अर्थात पत्र जन्मादिक समयपर नैमित्तिक श्राद्ध अवश्य भावसे तत्काल कियाजाताहे फिर उसदिन चाहे कृप्रापक्षहो चाहे शुलहो इस पर कुछ तकणा नहीं होती ऐसेही इस (भाग्य) विधिमें भी केवल तिथि यहा नक्षत्र मानसे अपेक्षा अंगीकारहे कुछ कृष्ण यहा शुरूपक्षपर तर्कणा नहीं है। (भेदर) च- मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २३५ तुर्दशीभी केवल इसी हेतुसे वर्जित करी है कि यह विधि काम्य विषयसे अपेक्षा रखती है इसको शुभकार्यमें गिनते हैं और चतुर्दशी शस्त्रहतोंकी तिथिहै इस्से उसमें काम्य विधि वालान करै यद्यपि काम्य विधिवालेको निरंतर सव तिथोंसे अपेक्षा वारहमास में होती है और शस्त्रहतोंकी चतुर्दशी केवल पिटपक्षमें होती है तथापि नाम दूपित भाव अंगीकार किया है और शस्त्रहतका श्राद उस चतुर्दशी में भी पार्वणके स्थान ए. कोद्दिष्ट कियाजाताहे-तथाच (समत्वमागतस्यापिपितुःशस्त्रहतस्यवे । एकोद्दिष्टंसुतैः कार्यचतुर्दश्यांमहालये) अर्थात् (समत्वंभागस्य) कहिये सपिडीकरणको पहुँचेहुये शस्त्र हत.पिताका एकोद्दिष्ट पुत्रों करके महालयमें अर्थात् पितृपक्षमें कर्त्तव्यहै-यद्यपिएको द्दिष्टमें दैवकर्मका निषेधहै तथापि यह पार्वण स्थानी एकोद्दिष्ट जो शस्त्रंहतोंका चतु, ईशीमें करना कहा तिसमें देवकर्म भी होता है-तद्यथा-(विश्वेदेवांश्चतत्रापिपजयित्वा ततोऽमलान् । येवैशस्त्रहतास्तेपांश्राईकुर्यादतंद्रितः)-अर्थात्-उसमें निरालस्य हुया विश्वेदेवाओंको भी पहले पूजिकर तव शस्त्रहतोंका श्राद्धकरै-अन्यच्च-प्रयोगपारिजाते (तच्छृद्धंदैवहीनंचेत्पुत्रदारधनक्षयः। प्रेतपक्षेचतुर्दश्यामेकोद्दिष्टविधानतादेवयुक्तंतुत च्छ्राईपितृणामक्षयंभवेत्) अर्थात्-प्रेतपक्षकी चतुर्दशीमें जो श्राद शस्त्रहतोंका होना है सो एकोद्दिष्टके विधान में निषेध कियेहुये हेतुसे जो कोई देवहीन करै तौ पुत्र दार धन इनके क्षय करनेवाला वह श्राद्ध होताहै इसलिये वह श्राद्ध दैवकर्म संयुक्त किया जावै तो पितृयोंको अक्षय तृप्तिकरै और उस्से फलभी अक्षय हो जिसके कुल में दो मनुष्य शस्त्रहत हुयेहों वह दोनोंका भिन्न,२ एकोद्दिष्ट चतुर्दशी में करै-परन्तु जिसके कुलमें निरन्तर बाप दादा परदादा तीनों शस्त्रहत हुयेहों वह तीनोंका एक साथ पा- वण करै उस चतुर्दशी में-तथाच-सहत्पराशरः-(पित्रादयस्त्रयोयस्यशस्वैर्यातास्त्वनक मातासभूतेपार्वणंकुर्यादाब्दिकानिएथक्टथक्)-अर्थात् रहत्पराशर स्मृति हकहाहै कि जिसके पिताप्रादि तीनोपितर शस्त्रमृत्युसेगयेहों वहक पुरुप(भूत)नाम चतुर्दशी तिथिमें तीनोंका पार्वणकर (और) श्राब्दिक जो बसोंडी श्राद्ध प्रति संवत्सर एकोद्दिष्ट कियेजाते हैं सो जुदेश्उनकेक्षयाहकोदिनजिसरमहीनामे होतेहो तिनमेंकरै-इस्से यहभी निश्चितहुआ कि शस्त्रहतका वार्षिकबाद उसके क्षयाहकेही दिन होगा किन्तु वहांपर चतुर्दशीसे कुछ अपेक्षा नहीं है-इसके सिवाय जिसके कुलमें एक पुरुप शस्त्रहत हुया हो जिसके एकोद्दिष्टका चर्चा ऊपरसे चला आता है उसका भी चतुर्दशी में अवश्य करना है और दूसरा कोई ऐसाहै कि शस्त्रहतनही पर चतुर्दशी उसका क्षयाहका दिन है इस्से उसका भी उसी दिन होना चाहिये तब उन दोनोका भिन्न २ उसी चतुर्दशी में होगां ऊपर कहे ये प्रकारोंसे अर्थात् यह सिद्धान्त नहीं है कि शस्त्रहतके कारणसे क्षयाहवालेको चतुर्दशीमें नहो और केवल एक शस्त्रहतके निदर्शनसे, अन्यभी अप २३६: मितालरा स० आचाराध्याय । मृत्युवाले संग्रहीत हैं-यथा पृथ्वीचंद्रोदयेप्रेचेताः-(रक्षरोपणलोहाद्येविद्युजलविषा ग्निभिः । नखिदंष्ट्रिविपन्नायतेषांशस्ताचतुर्दशी)-अर्थात्-रक्षादिकोंके लगाने आदि समयोंपर किसी रक्षके गिरने आदि हेतुसे मराहो यो शस्त्र आदि किसी लोहेसे या विजली गिरने ग्रादि उत्पातोंसे या जलसे डूबाहो या विपसे मराहो या अग्निसे जलि गयाहो या नखवाले मृगोंसे मारागवाहो या दाढ़वालोंसे ऐसे२ सभीशस्त्रहत कहलाते हैं तिनके लिये चतर्दशी श्रेष्टहे-ध्यानकरना चाहिये कि इस दूसरे भेदका चर्चा केवल चतुर्दशी के प्रसंगसे करनापड़ा अन्यथा यह चर्चा (नैतिक) विधिमें गिनती है इस्से यहां पर इसके लिखने की अपेक्षा नहीं थी क्योंकि-याज्ञवल्क्यीय मूल श्लोक तीनों जिनमें सब तियोंका चर्चा है वह (काम्य)विधिका प्रसंगहै और पितृपक्षका विशेष व- र्णन इसमें नहीं किया क्योंकि वह प्रेतपक्षभी सामान्यभावसे (नैतिक) विधिमे गिनती है॥ (मेद३) और तिथि क्रमके मध्ये (कन्या) शब्दसे यद्यपिशुभ लक्षणा सुताका भी भाव निश्चितहे पर विशेष भाव कन्या शब्दसे शुभ लक्षणा भार्याकी अभिलापा पर भारूढहें तिसका यह सिद्धांतहै कि जिसकी भार्या मरजातीहोया वारम्बार दुःशीला कर्कशा आदि कुभार्या मिलतीहो या जिसको निपट न मिलती हो वह इस बातका नियम साधे कुछ सबके लिये नहीं-और पशु या सोना चांदी आदिधातोकी अपेक्षा से जो तिथे वतलाई तिनका यह सिद्धांतहै कि उन चीजोंकी वृद्धि चाहै अथवा जो कोई उन चीजोंमेंसे जिस किसी वस्तुका व्यापार करताहे उसके द्वारा अधिक लाभ चाहे जैसे सीसा तांबा रांगा आदिकी भरती करता है उसमें वारम्बार टोटा देखपड़ता है यह उसके पूर्वकाल या पूर्वजन्मके पापोंका उदय प्रत्यक्ष है तव ऐसी दशामें यह नियम कर्त्तव्यह किन्तु साधारण दशामें नहीं २६१।२६२।२६३॥ अब इस्से आगे इसी प्रकार नक्षत्र विशेषमेभी श्रादकरनेका फल विशेषकहतेहैं। ॥ स्वर्गह्मपत्यमोजश्चशौर्यक्षेत्रलतथा । पुत्रौप्ठयंससौनाग्यंसमृदिमुरम्यतांशुभम २६४ ॥ प्रवनचक्रताचैववाणिज्यप्रभृतीनपि । अरोगित्वंयशोवीतशोकतांपरमांगतिम् २६५ ॥ धनंवेदानभिपसिर्दिकुप्यगामप्यजाविकाम् ।प्रश्वानायुश्चविधिवद्याभादंसंप्रयच्छति २६६ ॥ रुतिकादिभरण्यंतसकामानाप्नुयादिमान् ! भास्तिक श्रद्दधानइचव्यपेतमदमत्सरः २६७ ।। , ऐ०-चतुणांसह-पहले-२६६ के उपरांतसे दृष्टिकरी-कृत्तिकाको आदिलेकर भरणी के अन्तताई २७ नक्षत्रों में जोकोई सम्यविधिसे आददेताहे सो वहपुरुष इनश्लो- को कहेहुये कामोंको पावैहेपरन्तुजो(भास्तिक) होकरफरे अर्थात् निजहदयसे उत्पन्न हुये विश्वासपूर्वक-और प्रधान भी हो किन्तु जोकुदकर सोअतिशय आदरसहित- और(प्यपेतममरमर भीहो किन्तु मदकहियेग और मत्सरकहिये ईर्ष्या इनसे व्यपेत कहिये रहित होकरकरें तो ययोक्त निन्न रनक्षत्रोमें करनेसे जैसा २ फलकहा है सो मिताक्षरा साचाराध्याय। २३७ तंदूप मिलै तिसका वर्णन २६४ के प्रारम्भ से,देखौ-(कृत्तिका) नक्षेत्रमें करनेसे (स्वर्ग) फल अर्थात् स्वर्गके समान इसी देहसे इंसी संसारमे निरतिशय सुखपावै १-(रोहिणी) नक्षत्रमें करनेसे (अपत्य) फल अर्थात् पुत्र पौत्र प्रपौत्र कन्या आदि सब तरहकी सं- तान रहिहो (मृगशिर) में करनेसे (मोजस) फल अर्थात् प्रात्मशक्तिकी अतिशयता किन्त निज शरीरमें अत्यन्त पराक्रमका होना ३-(भाद्री) में करनेसे (शौर्य) फल अर्थात् निर्भयत्व सब पोरसे ४(पुनर्वसु) में करनेसे (क्षेत्र) फल अर्थात् खेती आदिमें संपन्नता की वृद्धि ५-(पुष्य) में करनेसे (बल) का फल अर्थात् शरीर सम्बन्धी पराक्रम और अनुगामी मनुष्योंकी सहायता ६-(श्लेपा) में करनेसे (पुत्र) फल अर्थात् गुणवान् और आज्ञाकारीपुत्रहों ७-(मघा) में करनेसे (श्रेष्ठय) फल अर्थात् अपनी जातिमें बड़प्पनका मिलना--(पूर्वाफाल्गुनी) में करने से (सौभाग्य) फल अर्थात् सर्वत्र सर्वजनोमें अविरोध पूर्वक प्रियता और दर्शनीयताहो ९-(उत्तराफाल्गुनी) में करने से (समृद्धि) फल अर्थात् धन जन आदिकी संपन्नता उन्नति पूर्वकहो १० (हस्त) में करने से (मुख्यता).फल अ- र्थात् अग्रणी होना किन्तु प्रत्येक व्यवहारोमें मुखिया कहलाना ११-(चित्रा) में करने से (शुभ) फल अर्थात् सभी प्रकारके मंगलोंकी वृद्धि किन्तु कोई भांतिसे अमंगल नहीं १२६४-(स्वाति) में करने से (प्रवृत्तचक्रता) फल अर्थात् सर्वत्र अप्रतिहत आज्ञाका होना किन्तु जिसकी उचित आज्ञामें विघु प्रतिवन्ध नहीं होने पावै १३-(विशारया) में करनेसे (वाणिज्य) आदि फल अर्थात् वाणिज्य तौ सर्व वस्तुका क्रयविक्रय और आदि शब्दसे कृपी और कुसीद कहिये व्याज बढेका देनलेन और गोरक्षकर्म कहिये पशुओं को व्यापारकी रीतिसे पालना यह बातेंभी समझलेनी किन्त इन सारी बातोकी सिद्धि का होना १४-(अनुराधा) में करनेसे (मरोगित्व) फल अर्थात् शरीर और कुटुम्बमे नि- रोगताका होना १५-(ज्येष्ठा) में करनेसे (यश) फल अर्थात् संसारमें प्रख्यातिका होना १६-(मूल) नक्षत्रमें करनेसे (वीतशोकता) फल अर्थात् सर्व शोकोंका नाश किन्तु प्रिय वियोग आदि शोकोंका न होना १७(पूर्वापाढ़) में करनेसे (परमागति) फल अर्थात् ब्रह्म लोकोंकी प्राप्ति १८२६५-(उत्तरापाढ़) में करनेसे (धन) अर्थात् सुवर्णादि द्रव्योकी प्राप्ति १९-(श्रवण) मे करनेसे (वेद) फल अर्थात वेदादिधर्मशास्त्रादि सर्वशास्त्रोंकी सं- पन्नता होना २०-(धनिष्ठा) में करनेसे (भिपसिद्धि) फल अर्थात् जो वैद्यक शास्त्रकी विद्या सीखै या जो रसादिक औपध बनावे या सीखीहुईके द्वारा किसीपर हाथ डारे तो तत्काल उसके हाथसे पारामकी सिद्धिहो और यश मिलै २१-(शतभिपा) मे करने से(कुप्यं)फल अर्थात् सोना चांदीसे भिन्नतावादि सवधातोके व्यापार आदि फलकी सिद्धि २२-(पूर्वाभाद्रपद)में करनेसे गाव )फल किन्तु गा.गौवें और अपिशब्दकीलक्षणा से औरभी वैल भैंसआदि सबकामोकी सिद्धि २३-(उत्तराभाद्रपद) में करनेसे(मजा)फल , २३८ मिताक्षरा स० पाचाराध्याय। किन्तु वंकरी संवन्धी कामोंकीसिदि २४-(रेवती) में करनेसे (माविक)फल अर्थात् भेड़ों संबंधी कामोंकी सिदि२५-(अश्विनी)में करनेसे( अश्य )फल अर्थात् घोड़ासंबन्धी कामों कोसिद्धि २६-(भरणी, में करनेसे(आयुः)फल अर्थात् पूर्णायुभर जीवै २७-इसमें भी सि- द्धांत वही समझना जैसा तिथोंके फलकथनमें लिखाथा किंतु जिसवस्तुकी पीड़ा वा अपेक्षा जिसकोहो वहउसीवस्तुके संबंधी नक्षत्र में निरंतर पार्वणविधिसे श्राइकियाकरे तो निःसंदेह उसकीवहपीड़ा दूरहोवै और कामनापूरीहो २६६१२६७॥ 1 अधि०-(समुत्थितसंदेहानामत्रनिर्णयश्च)-यहांपर यहसंदेह निर्णय करतेहैं कि २५७ और २५८ इनके पिछले अद्धामें जो कहाथा कि हविष्यान्न आदि उक्तवस्तुओं के श्राददेनेसे इससंसारमें पितामहसंबंधी तीनोपितर मासमासकी रद्धिपूर्वक अभितृप्त होतेहैं सो यहकथन(अनुपपन्न)अर्थात ठीक नहीं है क्योंकि अपने २ शुभ अशुभ कोंके वशहोकर स्वर्ग अथवा नरकमें पहुँचेहुये मनुष्योंकी पुत्रादिकों करके दियेहुये अन्नपानादिसे तृप्तिहोनी असंभव है किन्तु नजानिये उन्होंने कहां२ उत्तमलोकों में जन्मपायेहों या किस योनिमें अपनेपापोंके फल भोगतहों फिर उनकीवृप्ति श्रवके दियेहुये अन्नपानादिसे क्योंकर होसक्ती है-भलायहभीमाना कि भावप्ति होतीहोगी क्योंकि अबका दियाहुया उनको उस पापिष्टयोनिमें पहुँचकर सहायता करताहोगा जिसमें उन्होंने जन्मपाया और छशितहोरहेहों किन्तु उसयोनिमेंभी अवकैदियेसे कुछ केशकीशांति होतीहोगी अथवा पुण्ययोनिमें जन्मपायाहोगा तो यद्यपि उसमें सुखी होंगे पर अवकैदियेकी सहायतासे कुछअधिकसुख मिलताहोगा(तथापि)शंकाहोती है कि जब आपही पराधीन और असमर्थहें कि पुत्रादिकोंके दियेहुयेकी सहायता और तृप्तिमें आकांक्षा वा लालसा रखतेहें फिर पुत्रादिकोंको क्योंकर स्वर्गादिफल देसक्ते हैं जो नानाप्रकारके फल वर्णनकरते चलातेही क्योंकि दूसरेको कुछदेना यह अ. पनी शक्तिविना कदाचित् नहीहोसक्ता( फिर)उन पराधीनोंमें सेसीकोनसी वहशक्तिहै जिस्से वे पुत्रादिकोंको संबसंसारी वा असंसारी सुखदेसक्तेहें-इसी शंकाकी शान्तिम नीचे दोश्लोक वर्णनकियेजातेहें सो देखो २६४१२६५।२६६।२६७॥ , वसुस्द्रादितिसुता पितर याददेवताः । ग्रीणयंतिमनुष्याणांपितॄन्त्राद्वेनंतापताः २६८ ॥ भायु प्रजांधनं विद्यास्वर्गमोक्षसुखानिच । प्रयच्छतितयाराज्यपीतानृणापितामहा. २६९॥ । भक्ष०सइयो- येसु १ रुद्र अदितिकपुत्र ३, यहतीनों पितर योर येही श्राद्धके देवताह श्रादद्वारा तर्पितहुये मनुप्याके पितृन्को प्रीणन करने २६८ातथा येही पितामह प्रीतहोतेहये मनुप्यों को-यायु-प्रजा-धन-विद्या-स्वर्ग-मोक्ष-सर्वसुख-राज्य- यहसबदेतेह २६९ ॥ यहांपर पहले श्लोकमें पितर) और दूसरे पित्तामद) यह दोनों शब्द देवताओंके वाचकह सो इसकाभाव अभिप्रायार्थमें समझलो. । ॥

. मिताक्षरा'साचाराध्याय। मभिसहयो:-इनदोनों से पहले चार श्लोकोंकी अधिकोक्तिवाली शंकामें समा- २३९ धान करतेहैं कि यद्यपि देवदत्त १ कृष्णदत्तः२ विष्णुदत्त ३इत्यादिपिता १ पितामह २ प्रपितामह ३ तीनोंके नामगोत्र उच्चारणकरिके श्राद्ध कियाजाता है तथापि श्राद्ध कर्मकीव्यवस्थामध्ये देवदत्तआदि तीनों चाप दादा परदादाही श्राद्धके(संप्रदानभूत) नहीं अर्थात् जिनकानामलेकर श्राद्धकियाजाताहे यथार्थमें केवलउनकोही नहीदिया जाता किन्तु कुछ वेही श्रादके भोक्ता या फलदाता नहीं हैं क्योंकि उनके नतो पहलेसे देहमानहैं न आत्मामात्र, केवलदेवदत्तत्रादि नाममात्र उच्चारणकियेजाते, सो इस नाममात्रके उच्चारणसे उनके एकभिन्न प्रकारके शरीरविशेपोंका उद्देशकियाजाता है (तथापि केवल देवदत्त आदि इन्हीनामोंसे उद्देश नहींकियाजाता किन्तु उनके साथ वसु १ रुद्र आदित्य ३ इनकाभी उच्चारण कियाजाता है(उदाहरण )जैसे अमुक गोत्र अस्मत्पिता देवदत्तशर्मा वसुस्वरूप.(एवं)अस्मपितामहः कृष्णदत्तशर्मा रुद्र स्वरूप (एवं)अस्मत्प्रपितामहो विष्णुदत्तशर्मा आदित्यस्वरूपः-अथवा-तीनोंका एक साथ उच्चारण करनाहुआ तो इसरीतिसे कि-पितृपितामहप्रपितामहाः वसुरुद्रादित्य स्वरूपाः सो यथार्थमें वसु रुद्रामादित्य येही तीनों पितामह शब्दवाच्यह किन्तु पि- तामह येहीकहलातेहैं और येहीतीनों श्राद्धके अधिष्ठातृ देवताहें इसलिये इनतीनों का और देवदत्त आदि तीनोंका एकसाथ आवाहन कियाजाताहै-इसीहेतुसे देवदत्त आदि तीनों बाप दादा परदादाभी तीनों अधिष्ठातूं देवताओंकरके सहित पित्रादि शब्दोसे विख्यातहें-इसीकारणसे पुत्रादिकों करके दियेहुये अन्नादि वस्तुसे प्रथम वसु'यादि तीनों देवता भोक्ताहोकर तृप्तहोते हैं फिर वे आप तृप्तहुये देवदत्त आदि मनुप्योंके पितृन्कोभी तृप्तकरतेहैं और वेहीदेवता अपने ज्ञान १ शक्ति अतिशय योग ३ इनतीनों उपकरणोंसे श्राद्ध कर्ता लोगोंकोभी कहेहुये फलोंसे संयुक्त करतेहैं- इसभांति पितरोंके श्राद्धसे मनुप्योंको फलमिलताहै किन्तु उनके अधिष्ठाता देवता संपूर्ण फलदेते हैं सो वह उन्हीकादेना कहलाता है इसलिये शंकाकरने का अवसर नहींहै २६८ । २६॥ - वि०सहद्दयोः यह उपशंकाभी निर्मलहै कि वेही पितरोंकोभी तृप्तकरते और वेही श्राद्धकर्ताको फलदेतेहैं क्या एकसे दौकामहोना संभवहै-इसमें(दृष्टात)दियाजाता है कि जैसे सगर्भास्त्रीको बहुभांति अन्नोंकी.लालसा पूरीकरने तथा शरीर पोपणके भी लिये पतिश्रादि करके अनदियेजातेहैं वह सगी उन्ही मन्नोंसे प्रथम प्रापभोजन करके तृप्तहोती है पुनि श्राप संतर्पितहुई|गर्भगत संतानकोभी संतर्पित करती किंतु गर्भगत वालक अपनी माताकेही थाहारसे पलताहै-पुनिावही सगी संतर्पित हुई संतानको तर्पित कियेपीछे पुत्रादिफल उत्पत्तिद्वारा अन्नदाता पतिआदिको भी फल २४० " - - मिताक्षरासाचाराध्याय। संयुक्त करतीहै फिर देवताओंको ऐसाकरना क्याअसंभवहै क्योंकि-बसुरुद्र आदित्य जो तीनोंकहे सो केवल गकरनही किन्तु वसुभी पाठन्हें सो,पितापक्षके अधिष्ठाता तथा ग्यारह रुद्रहें सो दादापक्षके अधिष्ठाताऔरवारहीरादित्यहें सो परदादा पक्षके अधिष्ठाता पुनि येहीनानापक्षमें तीनोंपुरुषके अधिष्ठाता इसीक्रमसेहोते हैं फिर इतनोंको मिलकर श्राद्धकर्ताको फलदेना क्याअसंभवहै इस्से कोई भांति शंका करने का अवकाश नहीहै २६८१२६६॥ इतिसर्वश्रादप्रकरणम् ॥ ज्ञातव्यहै कि २१६ और २१७श्लोकसे श्राद्धप्रकरण का प्रारम्भ हुआथा और २५३ के श्लोकतक इसप्रकरणका पूर्वाई पूराहोगयाथा वहांपर पूर्वाईकी समस्या लिखनी रहगई सो अवकीवार छपने में लिखीजायगी इनपुस्तकों में अपनी बुद्धिसे समझलेना और २५४ से उत्तराईका प्रारंभहोकर यहांतक पूराहुभा ॥ It अथ सर्वविघ्नादिशांति प्रकरणम् ॥ विनायकाकर्मविघ्नसियविनयोजितः । गणानामाधिपत्येचरुद्रेणब्रह्मणातथा २७० ।। अक्ष०-कमीकी विघ्नसिद्धिकेलिये ब्रह्माकरके तथारुद्रकरकेगणोंके श्राधिपत्यमें बिनायक बिनयोजित कियाहै २७० ।। अभि-(विनायक )कहिये विघ्नेश्वर किन्तु महागणपतिगणोंके(माधिपत्य में अर्थात् पुप्पदन्त आदि भयंकरगण समूहोंके सेनापतित्वमें नायकरूप(विनयोजित किया अ. र्थात् उस धंधेमें लगायाहे-किसने ब्रह्माने तथा रुद्रने और चकारके माशयसे विष्णु ने भी-सो किसलिये कि संसारी फल साधकरूप कोंमें (विघ्नसिद्धि)केलिये अर्थात् भयंकर गणोकेद्वारा यथोचित विघ्नपूर्वक उनकांकी फलसिद्धिका विघात करने के लिये-यहा-(गौणपक्ष)से यहअर्थभी होसक्ताहै कि कोंमें विघ्न और सिद्धिकेलिये किंतु विघ्न कियेपीछे अपनी मान्यता वा पूज्यताहोनेपर कर्मकी सिद्धिकेअर्थ परन्तु यह अर्थ श्रेष्ठनहींहै किंतु मुख्यर्थ वहीहे जो पहलेकहा २७० ॥ अधिः-इसकथनसे यह तात्पर्य है कि जो मनुष्य किसीप्रकारकी फल सापकताके लिये पूर्वोक्त उत्तम कर्मोंको बारम्बार करताहै और उसमें विघ्नोंकी उत्पत्ति बारम्बार होती यहा उनकोंसे यथोक्तफलकी प्राप्तिनहींदेखपरती तिसका यहीकारणहे कि वि- घ्नोंकेकारकहेतु असंख्यगण जगत्के अधिष्ठाता ब्रह्मा विष्णु रुद्रों करके नियुक्त किये हुये फिरते हैं-यद्यपि वेभी प्रारब्धों के अनुकूलही विघ्नकरते किन्तु उत्तम प्रारब्धी को नहीं डसते परकदाचित् यहभ्रांतिहो कि जगतके अधिष्ठातायोंका रक्षा और पालन आदि कामहै कि वनतेको बिगाड़ते फिरना यहक्याउनकी शोभाहै सोयहवातनहीं किंतु ये विघ्नकारक हेतुभी केवल जगत्की रक्षाकेही लिये नियुक्त किये हैं अर्थात् प्रजाको - 2- La मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। २४१ यह एक प्रकारका भय दिखलाना केवल सुमार्गताके निमित्त से ब्रह्मा रुद्रने निरूपित कियाहै क्योंकि भयके बिना प्रीतिभी नहीं होती और जब उसके बनायेहुये संसारी मनुष्य राजा आदि अपने आतंक या प्रजाकी सुमार्गताके लिये नाना भांतिकी भय कल्पना करते हैं कि जिस्से प्रबन्धमें दृढ़ता बनी रहे और प्रजा हमसे विमुख नहीं होनेपावैफिर सारे जगत्के अधिष्ठाताऐसानहींकरेंतोजगत् उनकेवशमैं कैसेरहै२७०॥ तेनोपसृष्टोयस्तस्यलक्षणानिनिवोधत । स्वप्नेऽवगाहतेऽत्यर्थजलंमुंडांश्चपश्यति २७१ ।। कापायवाससश्चैवक्रव्यांदाश्चाधिरोहतिः। अंत्यजैगर्दभैरुष्ट्रःसहैकत्रावतिष्ठते २७२ ॥ ब्रजन्नपितयारमानंमन्यतेऽनुगतंपरैः २७३ ॥ ऐ० साईद्वयोःसह-(हेमुनय-तस्यलक्षणानिनियोधत) इस प्रकार योगीश्वर याज्ञ- वल्क्य फेर उन मुनियोंको संबोधित करते हैं जिनसे सबसे पहले प्रश्न करनेपर हि- तीय श्लोकमें यह कहाथा कि-(यस्मिन्देशेमृगःकृपणःतस्मिन्धर्मान्निवोधत)हे मुनयः जो कोई पुरुप (तेन-उपसृष्टः) कहिये तिस पुर्वोक्त विनायकसे पकड़ाहुआ होवै तिसके लक्षणसमझो कि वह विनायकसे पकड़ाहुआ स्वप्नमें (अत्यर्थजलावगाह) करहै अर्थात् अत्यंतही अगाध जलमें गोतेसे खावे है और (मुंदान्पश्यति) किन्तु मुडेहुये शिरों के मनुप्योंको देखताहै २७१ (कापायवाससश्च) किन्तु गेरुआ और नीले खाकी आदि वस्त्रवालोंको भी देखताहै (एच) निश्चय जानी (क्रव्यादाश्चाधिरोहति) किन्तु क्रव्याद नाम मांस भक्षी व्याघ्र आदि या गृधू आदि पक्षीभी तिनपर श्राप पारोहण करता है या उनके साथ घिरा फिरताहे ऐसेही (मस्यज) चांडाल और गर्दभ और ऊँट इन करके सहित एकत्र बैठताहै या इनपर भी चढ़ता है २७२ तैसेही (व्रजन् ) अर्थात् जाताहुआ मार्गमें (मात्मानं) कहिये अपनेको (परैः) अर्थात् शत्रुओं यहा राजदूर्ती अथवा बटमारों आदि करके (अनुगत-मन्यते) किन्तु घेराहुआ मानै है अर्थात् जैसे यह लोग पीछेसे दोडेहुये पकड़ने या मारनेको मँके चलाते हैं तैसी अति खिन्न दशा स्वप्नमें भोगताहै ॥ यहां तक अढ़ाई श्लोकों से अतिभयानक स्वप्नरूप विध ज्ञापक हेतु कहे अर्थात् इन लक्षणों से जानाजाता है कि यह पुरुष विघविनायकसे गृहीत है २७३॥ अब नीचेके अढ़ाई श्लोकोंसे साक्षात् जाग्रत् अवस्थामें विध ज्ञापक हेतुओं के स्वरूप लक्षण कहते हैं । विमनाविफलारंभः सीदत्यनिमित्ततः २७३ ॥ तेनोपसृष्टोलभतेनराज्यराजनन्दनः । कुमारीचनभरिनपत्यगर्भमंगना २७४ ॥ प्राचार्यत्वंश्रोत्रियम्चनशिष्योऽध्ययनंतथा । वणिग्लाभनवाप्नोतिरूपिचापिकपीबलः २७५ ॥ ऐ०साईद्वयो.सह-(विमना) कहिये बिगड़ा हुआ मन किन्तु विकृत चित्त विक्षिप्तसा २४२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। मनुष्य होजाता है और (विफलारम्भः) किन्तु जो कुछ प्रारम्भ उद्योग श्रादि करता है सो विफल होजाता अर्थात् कियाहुया कर्म संसिद्ध नहीं होता जिस्से फल पावै औरभी (अनिमित्तत -संसीदति) अर्थात् बिना कारणकेही अकस्मात् खिन्नमन खिन्न शरीर होकर दीनसा होजाता और मुखकी कांति जाती रहती है २७३ उस विधाव- नायकसे पकड़ाहुआ राजनन्दनभी राज्य नहीं पाता अर्थात राजकुल में जन्म पाकर और श्रुत शौर्य धेर्य आदि गुण संयुक्त होकर भी राज्यका अधिकार नहीं पाला- (कुमारीच-नभर्तारं) अर्थात् कन्याभी रूप लक्षण अभिजन आदि सम्पन्न होने पर भी यथेप्सित वरदडे नहीं पाती-और (अंगना-अपत्य) अर्थात् स्त्री गर्भवती होकर भी संतान नहींपाती-और (गर्भ) मातुमती अर्थात् मासिक धर्म होनेपर भी गर्भनही पातीहे२७४ (भाचार्यत्वं श्रोत्रियश्च) अर्थात् श्रुत अध्ययन तदर्थ ज्ञान इनके होने परभी श्राचार्यत्व की पदवी वा अधिकार श्रोत्रिय नहीपाताहै-तथैव (शिप्य) भी विनय याचारादि यत होने परभी (मध्ययन) अर्थात् पढ़ना या तो प्राप्त नहीं करसक्ता यहा पढ़ाहुया याद वा स्पष्ट नहीं करसक्ता-(वणिग्ला नचाप्नोति) अर्थात् वाणिज्यवाला अपने व्यापारसे लाभनही करसला और (रूपिचापि-कपीवल.) अर्थात् कृपीबल कहिये कृपाण सो खेती से फल नहीपाता तब इनकहेहुये लक्षणों से जानाजाताहै कि यहमनुष्य विघ्नविना- यकसे गृहीतहै २७५॥ इसप्रकार विघ्नोंकेकारकहेतु और ज्ञापकहेतुभी कहे-अब आगे इनकी शांतिका विधान कहते हैं। लपनंतस्यकर्तव्यपुगयेतिविधिपूर्वकम् । गौरसर्पपकल्केनसाज्येनोत्सादितस्यच २७६ ॥ सर्वोपय सर्वगविलिप्तशिरसस्तथा। भद्रासनोपविष्टस्यस्वस्तिवाच्यादिजा शुभा. २७७ ।। ऐ० सहद्वयोः-पुण्यदिवममें उसकाविधिपूर्वक स्नपन)कर्त्तव्यहै अर्थात्पुण्यदिनकहिये पिनी राशियादिके अनुकूल चन्द्रनक्षत्रादिसे दिनदेखकर यथोक्त पद्धति आदिका विधिसे(स्नपन,कहिये अभिषेक कर उसका कि जो पुरुप विनायक से उपसृष्टहो-च- थवा-उपसृष्ट तो नहीहे पर किसी उत्तमकार्यके प्रारम्भसे पहले विनायक से उपसृष्ट नहोनेकी बांहासे अर्थात् निर्विघ्न परिसमाप्तिके हेतुसे विनायकसे न पकड़ाहुया भी अभिपेचन कर्मकरसो यहयभिषेक दिनमेंकरे किंतु रात्रिमनहीं सोइसविधिसे कर्तब्ध है कि पहले पीली सरसों छिलका उतारीहुईका कल्क अर्थात लुगुदी या नुगुदीघुदी हुई घृतसहित गाढ़े लेपके अनुमान बनाकर उस्से (उत्सादित)कहिये उद्वर्तित कितु उक. टना कियेहुयेका अभिषेककर जैसा २८०।२८१।२८२ इन तीनों मंत्रसे कहेंगे तिसकोविधि आगे कहतेहैं २७६.सर्वोपधी जिनके नामनीचे अधिकोक्ति में कहे है और सर्वगन्धभी जिनकेनाम अधिकोक्तिमें कहें सेव मिलाकर शिरमें लेपकियहुरी मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय ।। २४३ और भद्रासन पर बैठेहुयेके प्रति पहले शुभ ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचनहो-ब्राह्मणशु- भशब्दके विशेपपासे श्रुताध्ययन आचारादि संपन्नहीं और अग्रोक्त चार कलशाके उपलक्षणसे संख्यामेंभी ब्राह्मण चारहों पर गुरु यहा प्राचार्य इनसे पांचवांहो और (स्वस्तिवाच्याः)इसविशेषणसे(स्वस्तिभवंतोब्रुवेतु-इतिवाच्या.) अर्थात्उससमयब्राह्म- गोंसे कर्तीपुरुप कहे कि आप स्वस्तिवाचनबोलें तव अभिपेचनकेसाथही गृह्यशास्त्र के मार्ग से पुण्याहवाचन कियाजावै भद्रासनका स्वरूप अगले श्लोको से जाना जायगा २७७॥ भवि०सहयोः-(कष्टमांसीहरिद्रेहेमराशेलेयचन्दनम्।वचाकचोरकंमुस्तासर्वोपध्यः प्रकीर्तिताः) अर्थात्-कूट-जटामांसी-दोनोंहरिद्रा कितु हरिद्रा दारुहरिद्रार मुरामांसी शैलेय-अर्थात् वालछड़ा या छारछबीला जिसे कहते-चन्दनसुपेद-बच-कर्चर-मुस्ता दोनोंप्रकारके यहां मुस्ता नागरमोथा को कहते हैं-इनकानाम सर्वोपधी कहाहै परन्तु इनके सिवाय औरभी प्रियंगु नागकेसर आदिजो प्रसिद्ध हैं वेभी इनमे संयोज्यह- ऐसेही सर्वगंधोंमें भी चन्दन अगुरु कस्तुरी आदिवस्तु प्रसिद्धहैं सो सवलेनीचाहिये इनसबको मिलाकर लेपकरे उसकेशिरमै तब पीछे स्नानको वैठारे २७६ २७७ ।।. भश्वत्यानाद्गजस्थानावल्मीकात्संगमादात् । मृत्तिकारोचनांगंधानगुग्गुलुंचाप्सुनिक्षिपेत् २७८ ॥ यामाहताह्येकवर्णैश्चतुर्भि कलशैईदात् । चर्मण्यानडुहेरक्तस्थाप्यंभद्रासनततः २७९ ॥ ऐ०सहदयोः-अब स्नानकेजलकीविधिकहते हैं कि-घोड़ाके स्थानकी मृत्तिका-हाथीके स्थानकी-सर्पकी बांबीमेकी मृत्तिका-(संगमात्)अर्थात्-दोआदि नदियोंके मिलापस्था- नसे-(हूदात्।अर्थात् जिसतालावकाजल कभी सूखतानहींहो तिसकी-यह पांचप्रकारकी मँगाईहुई मृत्तिका और रोचनाकहिये गोरोचन और गन्धकहिये सुपेद चन्दन अच्छी सुगन्धिवाला और कुंकुम अगुरु आदि जो प्रसिद्द, तिनको और गग्गलकोभी यह सवचीजें कूटकर उन जलो मे छोड़े २७८ किनमें-कि-जौनसे जल इसी कार्यके नामसे मैंगायेहुये एकवर्णवाले चारकलशों करके अशोप्यहूदमेंसे उपस्थित कियेहों-अशोप्य (द) अर्थात् जिसतड़ागका जलकभी सूखतानहो अथवा ऐसातडागनहामिले तोनदी संगमसेभी मंगवाना उचितहै और चारोंकलश अर्थात् कुम्भ एकवर्णके इसलियेरहे कि चाहैपीतवर्णही चाहे रक्तवर्ण यहा श्वेतभी पर सभी एकरंगकेहों और कालेंवर्णके नहाँौरफूटेनहों चिद्रवाले न हो टेढ़ेमेवे कबरे नहीं स्वरूपमे अतिसुन्दरही तिनमें ऊोक्तमृत्तिका और गंधादि वस्तुछोड़कर फिर तिसके अनन्तरलाल अनडुहके चर्म पर भद्रासन स्थाप्य है अर्थात् प्राडू ठपभका लाल चमड़ा संपूर्ण अखंड जिसकी उत्तरको पूँछ और पूर्वको ग्रीवाकरके विछाया तिसपर भद्रासन अर्थात् भद्रकहिये अतिसुन्दर मनोरम आसन जोःश्रीपीसे निर्मित किया हुआ और श्वेतवस्त्र से २४४ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । प्रच्छादित कियाहो सो स्थापित करे तथापि भद्रासन संज्ञा इसकी यथार्थ उस दशाम होगी कि जब लिपेहुये शुद्धस्थानमें पंचरंगा आदि से रचेहुये स्थंडिलवेदी पर स्वस्तिवाचन पूर्वक उक्तचमसमेत स्थापितकरै और वेदीके चारों दिशामें पोंक्त जलके चारोंकलश आम्रादि पंच पल्लवोंसे शोभित किये हुये अनेक भांतिके पुष्प माला गन्धादिसे चर्चित कियेहुये अतिउत्तम नवीनवस्त्रोंसे विभूषित कियेहुये स्था- पितकरे इसभांति सारीरचना होचुकनेपर उसकीसंज्ञाभद्रासन होतीहै तिसभद्रासन पर वेदीके बीचमें उसमनुष्यको बैठारकर तब उससमय(स्वस्तिवाच्या:-द्विजाः)यह संबंध पूर्वोक्त २७७ के पिछले पदसे लियागया-अर्थात् इस विधिसे बैठारे हुयेका स्वस्तिवाचनहोवै जैसा अगले तीनश्लोकों में कहते हैं २७९ ॥ सहस्राक्षशतधारमृपिभिःपावनरुतम् । तेनत्वामनिपिंवामिपावमान्य.पुनन्तुते २८० ।। भगंतेवरुणाराजाभगंसूर्योदृहस्पतिः । भगमिंद्रश्चवायुश्चभगसप्तर्पयोददुः २८१ ॥ यत्तेफेशेपुदीर्भाग्यसीमंतेयामूईनि । ललाटेकर्णयोरक्ष्णोरापत्तनंतुसर्वदा २८२ ॥ ऐ०त्रयाणांसह-(सहस्राक्ष) यहजलका विशेषणहै अर्थात् अनेक शक्तिसम्पन्नजल- शतधारं अर्थात् बहु प्रवाहवाला (ऋषिभिः) अर्थात् मन्वादि ऋपियोंकरके यहा वेदों करके(पावनं रुत)अर्थात् पवित्र कियागया पूर्वकालमें अथवा इसीसमय घटोंमें रक्खा हुआ वेदमंत्रोंसे ब्राह्मणोंने पवित्रकिया यह दुसरा अर्थहै परन्तु पहलाअर्थ मुख्य (तेन)कहिये तिसीजल से(त्या) अर्थात् तुम्हें विनायकसे पकडेहुयेको उपसर्ग शांतिके लिये(भिपिचामि)अभिपेचन करूँहूं (पावमान्यः-पुनंतते) ये पावमान्यजल तुम्हें पवित्र करें-यह पहलामंत्रहुआ २८० अब दूसरा कहते हैं कि- (भग) अर्थात् कल्याण यहा ऐश्वर्य(ते) तुम्हें वरुण राजादेवै-(फर)भग नाम कल्याण तुम्हें सूर्य देव-फेर(भग) नाम ऐश्वर्य तुम्हे वहस्पति देव-फेर (भग) नाम सौख्य तुम्हें इन्द्रभीदेव-बायुभी देवै-और (भगोतुम्हसप्तऋपिभी देवें २८ अव तीसरामंत्र कहते हैं कि जो तुम्हारे वालोंमें या सीमंत में या मूडमें या ललाटमें या कानोंमें या अांखोम (दौर्भाग्य) कहिये अकल्याण वर्तमानहो तिसको ये पवित्रकियेहुये जल सर्वदा नाशकरें २८२॥ भधि० प्रयाणांसह-इनमंत्रोंसे पहलेजो स्वस्तिवाचन बतलायाथा तिसके कियेपीचे अभिषेक करनेका यह प्रकारहै कि सौभाग्यवती स्त्रियां जिनकेपति और पुत्र दोनों बिद्यमानहों पुनि वेस्त्रियांभी रूपवती गुणवती शीलवती पतिव्रता इन लक्षणोंवाली हो जो इस मंगलकार्यके बुलावेमें घरकी या वाहरकी उपस्थितहों दिव्य वस्त्राभरणों से सुबेपवालीहों ऐसी स्त्रियोंके हाथसे वे पूर्वोक्त घट संस्कार मंगल कियेहों उनमेंसे पूर्वदिशामें स्थापित कियाहुअा कुंभ गुरु अथवा प्राचार्य अपने हाथसे उठावे तव उठाते हुये वेही स्त्रियां गान वाद्य भादि मंगल उच्चारण करें इसप्रकार उसघटके जल - " . मिताक्षरा स०अाचाराध्याय। २४५ से स्नानं गुरु करवावै इन तीनमेंसे पहले मंत्रको पढ़तेहुये-पुनि इसी विधिसे दक्षिण दिशाका कलश लेकर दूसरे मंत्रसे अभिषेक करें-पुनि इसी विधिसे पश्चिमदिशाका कलश लेकर तीसरे मंत्रसे अंभिपेककरै-पुनि इसी विधिसे उत्तर दिशाका चौथा कुंभ लेकर इन तीनों मंत्रसे स्नान करावै २८०।२८१ १२८२॥ स्नातस्यसार्पपंतैलंवेणीद्वरेणतु । जुहुयान्मूर्द्धनिकुशान्सव्येनपरिगृह्यतु २८३ ॥ अक्ष०-स्नान किये हुयके मूडंपर कुशाओंको सव्य हाथसे थांभकर गूलरके सुवा करके सरसों पीलीके तेलको (जुहुयात्)-अर्थात् अग्रोक्त मंत्रोंको पढ़कर आचार्य अपने दाहने हाथसे तेल छोड़े क्योंकि बायें हाथसे कुशा थांभे है २८३॥ मितवचसमितश्चैवतधाशालकटकटौं। कूष्मांडोराजपुत्रश्चेत्यंतेस्वाहासमन्वितैः २८४ ।। नामभिर्वतिमंचनमस्कारसमन्वितैः । दद्याचतुप्पथेशूकुशानास्तीयेसर्वतः २८५ ॥ ऐ०सहयोः-मित१ सम्मितरशाल३कटंकटकूप्मांडपराजपुत्र यह छःनाम वि- नायकके कहे इनके अंकार आदि में और स्वाहा अन्तमें जोड़ेहुये इन्ही छः मंत्रोंसे उर्वोक्त सार्पपतैल होम-सोइसप्रकारसे जानौ-ॐमितायस्वाहा१ॐसंमितायस्वाहार ॐशालायस्वाहा३ ॐकटंकटायस्वाहाट अंकूष्मांडायस्वाहा५ अराजपुत्रायस्वाहा इस पीछे लौकिक अग्निमें स्थालीपाक विधिसे पकायेहुये (चरु) को अद्योक्त इन्हीं छः मंत्रोंसे उसी अग्निमें होमिकर (उसमेंसे) वचीहुई खीरिका बलिदान बलिके मंत्रों से अर्थात् चतुर्थ्यंत दशदिग्पाल नामोंके नमस्कार अन्तमें जोड़ेहुये बलिदान के मंत्रों से-इन्द्र अग्निर यम निऋति४ वरुण५ वायु ६ कुवेर ७ ईशान ८ ब्रह्मा ९ अनन्त १० इनको उसी कर्मशालाके भीतर दशौदिशामें यथाक्रमसे दद्यात् यह दो सो पचासीके उत्तराई प्रारम्भ तक सम्बन्ध रहा-पुनि इस्से आगे निचले श्लोकोंमें कहीहुई सामग्रीका उपहार लेकर (शू-सर्वतः कुशान-प्रास्तीर्य-चतुप्पये) (निध्यात्) इ- त्यधिकायोजना-अर्थात् सूपमें सब ओर कुशा विद्याकर उसमें नीचे कहीहुई सामग्री का उपहार रखकर चौराहे में रख देवे-किन्तु वहां जाकर उसके रखने का प्रकारभी नीचेके श्लोकोंसे प्रकट होगा (और) यह भी प्रकट होगा कि वह उपहार बस्तु पहले विनायक और अम्बिका उसकी जननीको भी अर्पण किये पीछे उसका शेप सूपमें रक्खाजावै सो अब कहते हैं २८४।२८५॥ हताहतास्तन्दुलांश्चपखलौदनमेवच । मत्त्या पक्कांस्तथैवामान्मांसमेतावदेवतु २८६ ।। ।मूलकंपूरिकापूपंतवाटेरक्यजः२८७॥ तान्सर्वान्समाहत्यभूमौरुरातत.शिरः ०८८॥ विनायकस्यजननीमुपतिप्टेनतोम्बिकाम् । दूर्वासर्पपपुप्पाणांदत्यायंपूर्णमञ्जिलम् २८९ ॥ ऐ०चतुर्णासह-यहां पर सबसे पहले २८८ और २८९ के श्लोक पर दृष्टि करो कि २४६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। इन्हीं.श्लोकोंमें पढ़ाई श्लोकसे सब सामग्रीका उपहार बिनायक और उसकी जननी अम्बिकाके आगे रखकर और भूमिमें शिर भुंकाकर दोनोंके समीप स्थित होवै इस कर्मको (उपस्थान) कहते हैं उपस्थानकी विधिका मंत्र भी २९० श्लोकमें कहेंगे परंतु उपस्थान पीछे करै किन्तु पहले उपहार देकर तिसके अनन्तर दूर्वा सरसों पीली और पुष्प सुगंधिमान् और चन्दन इनसे भरीहुई जल सहित अंजलीका अर्घ्य दोनोंको देकर तव पीछे उपस्थान करै पुनि उपहारसे वचीहुई सामग्रीको पूर्वोक्त विधिसे सूप में लेजाकर चौराहे में धरै यह सम्बन्ध २८५ से चलापाता है-अव ऊपरके अढ़ाई श्लोकोंकी सामग्री समझौ-(सत्तारुतांस्तंदुलान्) अर्थात् कछेक उसिजेहुये अधकच्चे चावर १ (पललौदन) अर्थात् पलल कहिये तिलकुटा तिसमें मिलाया हुआ प्रोदन कहिये भात २ (मरस्य) मछरी पकी कच्ची दोनों भांतिकी ३ (मांसमेतावदेवतु) अर्थात् मांसभी कच्चापका दोनों तरहका ४ (पुप्पंचित्र) अर्थात् पीले काले लाल सुपेद आदि सवतरहके फूल५ (सुगंधंच) चन्दनादिनानाभांतिकी सुगन्धवस्तु६ (सुरांचत्रिविधामपि) तीनों भांतिकी मदिरा किन्तु एक तो (गौदी) जो गुड़से बनती है दूसरी माध्वी जो सहत आदिसे बनती है तीसरी (पैप्टी) जो पिष्टादि वस्तुसे बनती है ७ (मूलक) मूली मूरी इतिच भापा विख्याता ८ (पूरिका) पूरी इति प्रसिद्धा ९ (अपूपः) अर्थात् गोधूम चूर्णका कसार और पुत्रा भी १० (उंडेरकस्त्रजः) अर्थात् चूनकी कच्ची और घृतपक्क गोलियोंकी प्रोहीहुई मालावत् सूधी लड़ी ११ (दध्यन्नं) अर्थात् दही मिलाहुआ उड़द का चूर्ण भूनाहुया यहा कच्चा भी १२ (पायस) दूधकी खीरि १३ (गुडपिष्ट) गुड़ मिला हुआ धान आदिका चूर्ण १४ (मोदक) लडुआ लड्डू कई प्रकारके १५ यह सारी वस्तु उपहार मध्ये कहींगई २८६।२८७।२८८।२८९॥ मधि चतुणीसह-यहकहीहुई सामग्रीकाउपहार भिन्नभिन्नविनायककेागे और उन कीजननीकेभी आगेरखकर और एथ्वीमंशिरझुकाकर भिन्न उपहारसंबंधी मंत्रउच्चा- रणकरै-यथा-(तत्पुरुपायविग्रहवक्रतुण्डायधीमहितन्नोदन्तीप्रचोदयात्)-यह गणपति केयागे-और-(समगायेविग्रहेकाममालिन्येधीमहितन्नोगौरीप्रचोदयात् )-यह जननी केउपहारमध्येमंत्र है-इन मंत्रों को शिरभुकाते समय उच्चारण करिके नमस्कार करे तिसपीछे पूर्वोक्तरीतिसे अंजली देव तिसपीछे अयोक्त २९० के मूलश्लोकी मंत्र से उपस्थान करै तिसपीछे उपहार शेपवस्तु सूपमें पूर्वोक्तविधिसे लेजाकर चौराहे में धरै तहांपर इनमंत्रीको शिरमुकातेहुये बोले-यथा-(वलिंगृह्णत्विमेदेवाग्रादित्याव सवस्तथा १ मरुतश्चाश्विनौरुद्राःसुपर्णःपन्नगाग्रहाः २असुरायातुधानाश्चपिशाचो रंगमातरः ३ शाकिन्योयक्षवेतालायोगिन्यःपूतनाःशिवाः४ ज़ुभकाःसिद्धगंधर्वामाया विद्याधरानराः ५ दिक्पालालोकपालाश्चर्यचविघुविनायकाः ६ जगतांशांतिकारो - + मिताक्षरा साचाराध्याय ब्रह्माद्याश्चमहर्षयः ७माविमाचमेपापंमासंतुपरिपंथिन।८ सौम्याभवंतुहप्ताश्चभू तप्रेताःसुखावहाः ९-अवनीचे उपस्थान का मंत्रदेखौ जिसकी चर्चा ऊपर कईवार आचुकी है २८६॥ २८७।२८८।२८६ ॥ रूपंदेदियशोदेहिभगंभवतिदोहिमे । पुत्रान्देहियनंदैहिसर्वकामांश्चदेहिमे २९० ॥ 11, - भक्ष-हेभवति अंविके मुझेरूपदेहि यशदेहि(भग) ऐश्वर्य और कल्याणदे अनेक पुत्रदे धनदेहि और मुझे सर्व अपेक्षित कामोंके फल देहि २६० ॥ • अभि०-यद्यपि मूलश्लोकी मंत्र और उसका अक्षरार्थ जो ऊपर लिखागया सो केवल एकपक्षमें कहा अर्थात् भगवती अविका के उपस्थान पर घटता है परन्तु अभिप्राय इसका दोनोंके उपस्थान पर निश्चितहै क्योंकि मुख्यभावसे गणपतिका यह विधानहै इसलिये गणपति के सन्मुख उपस्थानकी प्रार्थनामें इसप्रकारसे उच्चार- पा करना चाहिये-यथा-(रूपदेहियशोदेहिमगंभगवन्देहिमे । पुत्रान्देहिधनंदेहिसर्व कामांश्चदेहिमे २६० अर्थइसका जो अक्षरार्थमें ऊपर लिखागया वहीठीकहै पर इसमें संबोधन (हे भगवन् गणपते) इसप्रकारसे हुआ २९०॥ तत.शुक्लाम्बरधरःशुरुमाल्यानुलपनः । ब्राह्मणान्भोजयेद्दद्यादत्रयुग्मंगुरोरपि २६१ ॥ ऐ०-तिसपीछे वह अभिपेकवान् यजमान शुक्लाम्बर धारण कियेहुये और शुक्ल माल्य अनुलेपन आभूपण आदिसे संयुक्तहुप्रा ब्राह्मणोंको भोजनकरवावै और यथा शक्ति संभवके अनुसार विनायक के निमित्तकी दक्षिणा देवै और गुरुको यथाशक्ति दक्षिणाके सिवाय उत्तम दो वस्त्रभी देवै-यहांपर गुरुशब्दसे कुछमंत्र वा विद्यादाता वा कुलगुरु आदि गुरुओंसे अपेक्षानहींहै किंतु जो श्रुताध्ययन वृत्तवादिसे संपन्न हो और विनायक स्नपन विधिका जाननेवाला निश्चित करिकै इस कार्यमात्रमें गुरु हुआहो-और (मपि )शब्दकी लक्षणासे अपनेपूर्वोक्त गुरुयोंकोभी पज्यताकी रीतिसे जो बनियावे सो देवै और इसी (मपि शब्दकी लक्षणासे कर्मकर्तृत्वका परिश्रम उन ब्राह्मणोंको जुदादेवै उसमें कुछ गणपति का उद्देश अपेक्षित नहीं है २९१ ॥ प्राधि-इस अधिकोक्तिमें प्रकृत वर्णन मात्रका संक्षेप अनुक्रम कथन करते हैं इस- लिये कि कोईबात प्रकृत वर्णनमें व्यतिक्रम से भागेपीछेभी कहीगईहो तो अग्रोक्त अनुक्रमकेअनुसार यथोचित समुझलीजावै-(यथ प्रयोगक्रमः)-प्रथम चारोंब्राह्मणों सहित उक्तलक्षण वाला गुरुमंत्रों पूर्वक भद्रासन की रचनाकरे-फिर उसभद्रासन के समीप विनायक और अंविका उसकी जननीको कहेहुये दोनोंके मंत्रोंसे गंध पुप्पादि से पूजिकर-फिर चरुपकावै-फिर भद्रासन पर बैठेहुये यजमान प्रति पुण्याह वाचन करै-फिर चारोंकलशोंसे उक्त विधिपूर्वक अभिषेक करे-फिर सरसोंका तेल शिरपर होम-फिर चरुसे अग्निमें होमकरै-फिर अभिपेकशालामें दशदिक्पालोंको इसमेंकही २४८ मिताक्षरा साचाराध्याय हुई विधिसे वा पंचलोकपालोकोभी अन्यग्रंथोक्त विधिसे बलिदान करै-और यज- मानभी स्नानके अनन्तर शुक्लर्वस्त्र शुक्लमाल्यादि धारण कियेहुये गुरुके साथहोकर विनायक और अविका को उपहारदेकर भूमिमें शिरसे झुकै पुनि पुप्पोदकसे अर्घ्य देवै फिर दूर्वा सरसों और फूलोंसे अंजलिभरिकै चढ़ावै-फिर विनायक और अंविका के सन्मुख उपस्थानकरै-तिसपीछे उपहार शेपवस्तुओंको सपमें गुरुलेजाकर चौरा- हेमें रक्खै और शिरझुकाकर पृथ्वी में प्रणाम पूर्वक अर्पणकर पूर्वोक्त विधि से-फिर वहांसे गुरुके लोटियानपर ब्राह्मण भोजन-फिर पहले गुरुको दक्षिणा और दोवस्त्र फिर अन्यत्राह्मणों को दक्षिणादान-इस्सेआगे अपने कुलका याचार जोकुछ उचित हो किंतु अपने निजगरु कुलगुरु आदिका सत्कार वा मान्यता इसक्रम के अनुकूल एकप्रयोग पद्दति विद्वानोंको उचित है कि जो प्राचीन पद्धति नहीं हाथ आवै तो अपनी वद्धि और विद्यावलसे सम्पादन करलेंवे जिस्से औरोंका और उनका भी कल्याणहो परन्तु यह स्मृतरहे कि इसविधिमें कोई प्रकारका अनुकल्प श्रेयस्कर नहींहै कितु इसकी यथोक्त विधि तद्रूप फलसाधक निश्चित है जो किसीसे वनिपरै इसमें केवल एक दिनका प्रयोग है और जिस्से हरसाल होसकै तौ अधिक अहो- भाग्य है २९१॥ इति विनायक स्नपनविधिः॥ अथ ग्रहशांतिकरणापेक्षा कथनम् ॥ एवंविनायकंपूज्यग्रहां चैवविधानतः। कर्मणांफलमानोतिश्रियंचामोत्यनुनमाम् २९२ ॥ अक्ष०-इस विधान से विनायक को पुजि कर ग्रहोंकोभी पूजिकर कमांका फल पावताहे और अनुत्तमा लक्ष्मी कोभी पाताहे २९२ ।। अभि०-विनायक के कहेहुये विधानके उपसंहारसे संयोगांतर दिखलानेके लिये यह श्लोक कहाहे-अर्थात्-पूर्वकहेहुये विधानसे विनायकको सम्यक् पूजिकर प्रारंभि- तकमांकाफल निर्विघ्न पविताहै यह तो पूर्ववर्णन कियेहुयेका उपसंहारहे(अवहमी से संयोगांतर कहते हैं कि) केवल कर्मोंकाही फल नहीं किन्तु उत्तम लक्ष्मी भी पावता हे जो हरसाल इसी प्रकार एक दिन कियाकर-अर्थात् केवल कर्म विधोकी शांति चाहे उसको तो एकही दिवसके प्रयोगसे कर्म सिद्धि मिलती है परन्तु जो लक्ष्मी मिलने की कामना रक्खे वह प्रतिवर्ष नियमसे किया करै (इसी प्रकार)सूर्यादि ग्रह पीडा की शांति अथवा लक्ष्मी की कामना करने वालेके लिये ग्रहपूजादि कल्पका प्रारम्भ करतेहुये ग्रहपूजाकाभी उपक्षेप इसीश्लोकसेकरतेहैं किन्तु(यहांश्चैवविधानत.) सूर्य श्रादि ग्रहोकोभी अग्रोक्त विधिसे सम्यक् पूजिकर कमीकी निर्विघ्न सिदिपाता है तथैव प्रतिवर्ष एकवार नियमसे करनेवाला अनुत्तमा लक्ष्मीभी पावताहे २६२ ।।

- मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २४९ यहांपर वक्ष्यमाण नवग्रहशांति से पहले नित्य काम्य संयोगों को कहते हैं दोसौतिरानवे के श्लोक द्वारा ॥ अथ.महागणपत्यादिकल्पफल कथनम् ॥ आदित्यस्यसदापूजांतिलकस्वामिनस्तथा । महागणपतेश्चैवकुर्वसिद्धिमवाप्नुयात् २९३ ॥ • अक्षा-सदा आदित्य की पूजा वा तिलकभी तथा स्वामिकार्तिक और महागण- पतिकीभी करताहुआ सिद्धिको पावै २९३ ।। भभि.-सर्यरूपी आदित्य भगवान् की पूजा सदो कहिये प्रतिदिवस रक्त चन्दन कुंकुम कुसुमादि वस्तुसे तथैव(स्वामिनः स्वामिकार्तिक और महागणपतिकीभी पूजा यथा योग्यवस्तुओं से नित्यंप्रति करताहुना सिद्धि आत्मज्ञानादि और नित्यसंबंधी कामोंकीभी सिद्धिपावै है-यहा-पूजाकी असंभवता में आदित्य १ स्वामिकार्तिक २ महागणपति ३ इनतीनोंके (या) इनमेंसे किसी एक दोके (तिलक) अर्थात् सोना चांदी श्रादिसे बनाईहुई तदाकार तिलक मुद्रासे तिलक छापामात्र भी करताहुआ पूर्वोक्त अभिलपित सिद्धिपावै है-यह नित्यकाम्य संयोग है २९३ ॥ इतिमहागणपत्यादिकल्पः॥ अब यहांसे आगे २९२में दर्शाईहुई ग्रहपूजाका प्रकार वर्णन करतेहैं। अथनवग्रहशांति विधानफलकथन प्रकरणम् ॥ श्रीकामःशांतिकामोवाग्रहयज्ञंसमाचरेत् । वृष्ट्यायुःपुष्टिकामोवातथैवाभिचरन्नपि २९४ ॥ सूर्यःसोमोमहीपुत्र सोमपुत्रोवृहस्पतिः। शुक्रःशनैश्चरोराहु-केतुश्चेतिमहाःस्मृताः २९५ ॥ ताम्रकात्स्फटिकाद्रक्तचन्दनात्स्वर्णकादुमौ राजतादयस सीसात्कांस्यात्कार्याग्रहाःक्रमात्२९६॥ स्ववर्णैपिटलेरण्यागधैर्मढलकेपुवा । यथावर्णप्रयानिवासांसिकुसुमानिच २९७॥ गंधाश्चवलयश्चैवधूपोदेयश्चगुग्गुलुः । कर्तव्यामंत्रवंतश्चचरवःप्रतिदैवतम् २९८॥ ऐ० सर्वेषापंचानांसह-(श्रीकामः) लक्ष्मी प्रादि धन संपत्ति की कामनावाला-यहा- (शांतिकामः)अर्थात् ग्रहपीड़ा आदिकी शांति चाहेसोभी (महयज्ञ)कहिये नवग्रह शांति होमादि विधिसे सम्यक् श्राचरै-यद्वा (-(वृष्टि) वर्पा अनारष्टिसमय पर-(मायु)किंतु अप. मृत्यु को जीतिकर दीर्घ कालजीवन-(पुष्ठि) कहिये शरीर सौख्य निरोगता से-इन बातोंका चाहनेवाला भी ग्रहयज्ञकरै-तथैव-(मभिचरन्नपि)अर्थात् अदृष्टोपायपूर्वकनिज निष्कारण शत्रको पीडादान की वांछा करता हुआ भी ग्रहयज्ञ करे-२९४-इस ग्रह- यज्ञमें ये नवग्रह देवता प्रधान हैं-सूर्य-सोम-महीपुत्र-सोमपुत्र-हस्पति-शुक्र-शनै- श्चर-राहु-केतु-२६५-इनकहेहुये नवग्रहोंकी प्रतिमा यथाक्रमसे इनवस्तुभासे करें- अर्थात् सूर्यको तांबेसे-चन्द्रकी स्फटिकसे-भौमकी रकचन्दनसेवुधकीसुवर्णसे-रहस्पति कीभी सुवर्णसे-शुक्रकी चांदीसे-शनेश्चरकी लोहेसे-राहुकीसीसेकरके-केतुओंकीकांस्य २५: 'मिताक्षरा स० आचाराध्याय। करके-२९६-अथवा. यह नहोसके तो इसका अनुकल्प कहतेहैं कि पढेपर अपने २ वांसे जैसा जिसका वर्णहे उसीवर्णकी वस्तु रक्तचन्दन आदि गंधोंसे लिखलेवै-या पट्टेपरभी नहीं तो(मंदलकेचा अर्थात् पृथ्वीपर बनायेहुये मंडलों किंतु कोष्ठीमें तंदुल आदिसे तदाकार बनाकर उनमें अपने २ वर्णभर देवे यह तो स्थापन विधिकही- तथैव पूजाविधिौभी-बस्त्र और पुप्पभी(यथावणे)अर्थात् जैसा जिसकावर्णहो तिसको उसीप्रकारके देनेचाहिये-२९७ गन्धभी उसीप्रकारके वलिदानभी उप्तीप्रकारके और धूप सभीको गगुलकी देनी चाहिये-प्रतिदैवत कहिये भिन्न २ अपने २ मंत्रोंसे चरु भी अर्पण कर्तव्य हैं २९८॥ पथि०सर्वेषांसह -यद्यपि इस विधानमें नवग्रहों की प्रतिमा सामान्यभावसे कही है किन्तु कोई प्रकारका आकार विशेष नहीं कहा औरभी यद्यपि प्राकार विशेष के लक्षण कई प्रकारसे जहांतहां अन्य शास्त्रोंमें या ज्योतिपमें या हवनकी पद्धतिमें जोर पायेजाते, तिनमें परस्परकुछ अन्तर देखपरताहै तथापि(यादृशीभावनायत्रसिद्धिर्भ वतिताहशी)इत्यादि प्रमाणोंसे और विशेषकर इस विधानमें कामना विषय होनेसे भी-मत्स्य पुराणका कहाहुना प्रकार इसमेंसंभवहे-तद्यथा-(पद्मासनःपद्मकरःपद्मगर्भ समद्युतिः। सप्ताश्वरथसंस्थश्चद्विभुजःस्यात्सदारविः१)अर्थात्-सूर्यकी प्रतिमासदा- ही द्विभुजी करनी चाहिये और ऐसा ध्यान यहासंभवहो तो प्रतिमाभी ऐसी करनी चाहिये कि सातघोड़ोंके रथपर पद्माकार बनेहुये आसन किंतु सिंहासन पर बैठेहुये और पद्म जिनके हाथमें और पद्मकीसी याभावाली किरणों से संयुक्त और पद्मराग मणिके गर्भस्थ झलझलाहट चमचमाहटके समानहै द्युतिकांति शोभा जिनकी यहा पद्मगर्भ कहिये कमलके किजल्फवत् याभा जिनकी १-अथ चन्द्रस्य-(श्वेतःश्वेतांबर धरोदशाश्वःश्वेतभूषणः।गदापाणिढिवाहुश्चकर्तव्योवरदःशशी)अर्थात्-शशीनाम चद्रमा जव कदाचित् वरका देनेवाला कर्तव्य हो किंतु काम्यविधिमैं उसकी प्रतिमा करनी हो तव दोभुजी कर्तव्य है गदा जिसके हाथमें श्वेत जिसका वर्णहो श्वेतवस्त्र धारीहो दशघोड़ोंकेरथपर और श्वेतही आभूपण जिसका ऐसाध्यान या ऐसीप्रतिमा करे २-अथ भौमस्य-(रक्तमाल्यांवरधर शक्तिशलगदाधरः । चतुर्भुजोमेषगमोवरदः स्यादरासुतः ३)-अर्थात्-धरासुत मगल जब ऐसाहो तब बरका देनेवाला हो किंतु रकमाल्य रक्तअम्बर धारणकिये और इसीसंकेतसे रकवर्ण देहभी शक्ति बरछी शूल माला यह धारणकिये चारभुजावाला-मेपमेदापर चलनेवाला ३-अथ बुधस्य-(पीत माल्यांवरधरःकर्णिकारसमद्यतिः।खड्गचर्मगदापाणिःसिहंस्थोवरदोबुधः४)-अर्थात- पीतमाल्य पीताम्बरधारण किये और (कर्णिकार )के पप्पाकीसी कातिवालावर्ण जिस काखड्ग और ढालकोबांधेहुये गढा हाथमॉलियेहुये सिंहपरसवार ऐमेश्राकारवालावुध मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २५१ वरदायकहोताहै-बुधकीभुजाओंका चर्चा नहीं किया इस्सेटिभुजामूर्तिसमुझीजाती है (तथापि)अग्रोक्त श्लोकमें टहस्पति औरशुक्रकेसाथ इसकासादृश्यपदकरनेसे चतुर्भुज निश्चितहुआ-कर्णिकारनाम एकरक्ष जिसे छोटाधनबहेडा या कणिधारया कनियारी- किरियारीभी कहते हैं जिसकीफलीमेंसे अमिलतास प्रौपध निकलती है उसके पुप्प अतिपीतसुनहरे और बिना गूंथेहुयेभी दूरसेमालाकीसीलड़ीप्रतीत होती, इसीलिये संस्कृतमें कृतमालभी कहते हैं यद्यपि अमिलतास इस्से वंडा और फलीभी उसकी बड़ी होती है पर यहभी उसकी जातमें छोटा कहलाता है ४-थरहस्पतेः-शुक्रस्यच- द्वयोःसह ( देवदैत्यगुरूतद्वत्पीतश्वेतोचतुर्भुजो। दंडिनोवरदौकार्योसाक्षसूत्रकमंडलू ५६)अर्थात्-देवगुरु-गृहस्पति और दैत्यगुरु शुक यहदोनों चतुर्भुजकहिये चारभुजा वाले तहत कहिये बुधके समान पीतवर्ण पीतमाल्य पीताम्बरधारी वृहस्पति (पौर) श्वेतवर्ण श्वेतमाल्य श्वेतअम्बरधारी शुक और दंडधारी दोनों और (मक्षसूत्र) नाम जप मालाको लियेहुये दोनों और कमंडलको लियेहुये दोनों वरके देनेवाले कर्तव्य हैं-(तद्वत्) यह बुधका सादृश्य पद करने से इन दोनोंका भी सिंहवाहन और खड्ग चर्म गदा यह शस्त्रप्रतीत हुये ५।६-अथ शनैश्चरस्य-(इन्द्रनीलद्युतिःशूलीवरदोग धूवाहनः। वाणवाणाशनधरःकर्तव्योऽर्कसुत-सदा७)अर्थात्-अर्कसुतशनैश्चर सदा- ही इन्द्रनील नाममणिके समान कांतिवाला शूल धारण किये गृधूपर सवार हुआ बाण और वाणाशन कहिये धनुप बांधेहुये वरका देनेवाला कर्तव्यह-इसकी भुजाओं का चर्चा नहीं किया इस्से दोही समझलेनी७-अथराहोः-(करालवदनःखड्गचर्म शुलीवरप्रदः । नीलःसिंहासनस्थश्चराहुरनप्रशस्यते ८)-अर्थात्-(मत्रच) कहिये इस काम्य विधिमें भी राहु करालवदन नीलवर्ण और खड्ग ढाल शूल वांधेहुये सिंहासन किन्तु सिंहवाहन पर बैठा हुआ ऐसे श्राकारवाला वरप्रद श्रेष्ठ कहलाता है इसकी भी दो भुजा समझनी ८-अथकेतूनां-(धूम्बाहिवाहवःसर्वेगदिनोविकृताननाः । राधा सनगतानित्यकेतवःस्युर्वरप्रदाः ९)-अर्थात्-केतुके जितने श्राकार बनाये वह सभी गदाधारीही दो २ भुजा वालेहों विकृतानन किंतु भयानक मुखवालेहों गृधूकी सवारी पर बैठेहों नित्यं कहिये सदाही ऐसे आकारवाले केतु वरप्रद होवें केतुका बहुवचन केवल इस हेतुसे कहाहै कि यह नानारूप धारी होताहै इसलिये इसका ध्यान और अावाहन मात्र तो बहुतों के उद्देश और उच्चारणसे करलेना परंतु प्रतिमा केवल एक हो ९-श्रथ सर्वेपांप्रकृतनवग्रहाणांपरिमाणविशेपमाह-तद्यथा-(सर्वकिरीटिनःकार्या ग्रहालोकहितावहाः । स्यांगुलेनोच्छ्रिताःसर्वशतमष्टोत्तरंसदा)-अर्थात्-सभी नवग्रह लोक हिनके देनेवाले किरीटी किन्तु मुकुटवाले करनेचाहिये (और) कर्ता अपनेअं. गुलसे एकमो आठ अंगुल ऊंची मुत्ते सबकी करे तब लोक हितके देनेवालेहों-अथ २५२ मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। स्थापनदेशः (मध्येतुभास्करविद्यालोहितंदक्षिणेनतु। उत्तरेणगुरुविद्याद्रुधंपूर्वोत्तरेण तु॥पूर्वेणभार्गवविद्यात्सोमंदक्षिणपूर्वकोपश्चिमेनशनिविद्यादाहुँपश्चिमदक्षिणपश्चि मोत्तरतःकेतुंस्थाप्यावैशुकृतंडुलैः)-अर्थात्-सबकेमध्यमें सूर्यकोस्थापै-मंगलको दक्षि- एदिशाम-रहस्पतिकोउत्तरमें बुधको ईशानकोणमें-शुक्रको पूर्वोर-चन्द्रमाकोअग्नि कोशमें-शनिको पश्चिमोर-राहुको निऋतिकोणम-केतुको वायव्यकोण में यह सब सुपेद तंडुलोंसे स्थापनकरिकै पूर्वोक्त निजवर्णभर देवे उसअवस्थामें कि जो पूर्वोक्त विधिसे प्रतिमान होसके २९४ । २९५।२९६।२९७१२९८ ॥ अव नवग्रहोंके वेदोक्त मंत्रोंकी समस्या लिखते हैं। पारुष्णेनइमंदेवामग्निमादिव ककुत् । उदुध्यस्वेसिवनचोयथासंव्यंप्रकीर्तिताः २९९ ॥ तृहस्पत्तरत्तिमदपस्तथैवान्नात्परिश्रुतः शन्नोदेवी कयानश्चिकेतुंकण्वन्निमांस्तथा ३०० ।। । ऐसहयोः सूर्यादि नवग्रहोंके क्रमसे यथासंख्य यह नवमंत्र वेद ऋचाओंसे कहे- अर्थात्-(आकृष्णेनरजसावर्त्तमानों) इत्यादि पाठ वाली ऋचा सूर्यकी १ (इमंदेवा) इत्यादि पाठवाली ऋचा चन्द्रमाकीर (अग्निर्मूर्धादिवःककुत्पत्ति) इत्यादि पाठवाली मंगलकी ३ (उद्घध्यस्व) इत्यादि बुधकी ४ । २९५ (टहस्पतेःअति अदयों) इत्यादि रहस्पतिकी ५ (अन्नात्परिश्रुतो) इत्यादि शुक्रकी ६ (शन्नोदेवीः) इत्यादि शनैश्चर की ७ (कयानश्चित्रा) इत्यादि राहुकी (केतुंकृण्वन) इत्यादि केतुकी ९।३०० ॥ अब आगे नवसमिधैं बतलाते हैं। अर्कःपलाश खदिरअपामार्गोथपिप्पलः । मौदुम्बर शमीदूकुशाश्चसमिधःक्रमात् ३०१ ॥ एकैकस्यत्वष्टशतमष्टाविंशतिरयच । होतव्यामधुसर्पिभ्यांदध्नाक्षीरेणवायुताः ३०२॥ ऐसहयोः-(भर्क) कौआ१ (पलाश)ढाखा२ (यदिर)खैर३ (अपामार्ग) चिटचिटार्ट (पिप्पल) पीपर५ (मौदुम्चर) गूलरकी६ (शमी) छोकर७ (दूर्चा) दूवः (कुशा)९-यह नव दक्षोंकी हरी लकड़ी साफ अखंडित छिलका समेत हाथके प्रादेशमात्रसे नपी हुई कमसे सूर्यादि प्रोंके हेतुसे एक एक रक्षकी यथाक्रमसे करनी चाहिये ३०१ एक एक ग्रहके निमित्त उसकी यथोक्त समिध भिन्नर परी आठसौ संख्यामें होनी चाहिये आठ २ सौ न होसके तो अट्राईस २ करलेवै तिनको पूर्वोक्त मंत्रोंसे सहत और घृत लगाकर होमै अथवा सहत घी नहीं मिले तो दहीसेही यहा गाढ़े दुग्धमें लगाकर होमै पर इनमें भी शर्करा मिश्रित करलेवै ३०२॥ गुडौदनंपायतंचहविष्यंक्षीरपाष्टिकम् । दघ्योदनहविचूर्णमांतचित्रानमेवच ३०३ ॥ दद्याद्ग्रहक्रमादेवदिजेभ्योभोजनंद्विजः । शक्तितोवायथालाभंसत्कृत्यविधिपूर्वकम् ३०४ ॥ ऐ०सहयोः-नवग्रहोंकी प्रीतिकेलिये उनके निमित्तके भिन्न रनवब्राह्मणोंकी भोजन वस्तु वतलाते हैं कि मूर्यसम्बंधी ब्राह्मणको (गुदौदन) अर्थात् गुड़में रांधाहुआ मीठा मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २५३ भात चन्द्रमाको खीर२ौमको (हविष्य) कहिये सामाङगुनी आदि मुन्यन्न जिमावै३ बुधके ब्राह्मणको (क्षीरपाप्टिक) अर्थात् दूधमें सट्ठी चावलोंका भात मिलाकर ४ रह- स्पतिको (दध्योदन) दहीभात५ शुक्रको हविः अर्थात् घृत और भात इति मिताक्षरा- कारः६ शनैश्चरको (चूर्ण) अर्थात् तिल चूर्ण मिश्रभात इतिमिताक्षराकारः७ राहुके लिये मांस किन्तु मांस मिला भातपर जो भक्ष्य मांसोंमें गिनतीहों और जिस प्रकार का ब्राह्मण इस निमंत्रणको अंगीकार करै किन्तु राहकी प्रीतिसे विधिक्रम अंगीकार है (यद्वा) इसका अनुकल्पहो ८ केतुके निमित्तसे (चित्रान्न) अर्थात् अनेकवर्णका भात यहा सतनजा-यहबस्तु मुख्यविधिमें कहीगई परन्तु अपनी शक्ति और संभवता के अनुकूल यह नहीं तो और ही जो वस्तु होसक्ती या मिलसक्ती हो सोई विधिपूर्वक सत्कारसे उन ब्राह्मणोंको द्विजाती लोग देवें ३०३।३०४॥ अधि०-योगीश्वरने मुख्यविधिके पश्चात् यथालाभ या यथासंभवता जो आदेश करी सो इसहितुसे कि इन पदार्थों में मांसआदि विरलीवस्तु ऐसीहैं कि जिनको दाता और भोक्ताकेभी विवेकहै तो नहीं करनी चाहिये ३०३।३०४॥ अव दक्षिणा बतलाते हैं। धेनुशाखस्तथानद्वान्हेमवासोहयःक्रमात् । कृष्णागौरायसंछागएतावैदक्षिणाःक्रमात् ३०५॥ ऐ०-सूर्यादि नवग्रहोंके निमित्तसे भिन्न २ यह दक्षिणा क्रमसे उन ब्राह्मणों को देवै-धेनु दूधवाली १ शंखबजना २ अांडूटपभ ३ सुवर्ण कुछ भूषण वस्तु ४ वस्त्रपीत वर्णका ५ घोड़ासुपेद ६ कृष्णागऊ ७ लोहाशस्त्रादि ८ वकरा९।३०५॥ अब प्रकृत विधानमें कुछ विशेषता दुष्टग्रहकी अपेक्षासे कहते हैं। यश्चयस्ययदादुष्टःसतंयत्नेनपूजयेत् । ब्रह्मणैपांवरोदत्त पूजिताःपूजयिष्यथ ३०६ ॥ ऐ०-प्रकृत विधानमें यहबात कहीथी कि शांतिकी कामना से सभीग्रह एकसाथ पूजनीय हैं-परन्तु-यहां यह विशेषता कहते हैं कि जो कोईसाग्रह जिसकिसीको जव कदाचित् दुष्टहो अर्थात् जन्मराशिसे छठे आठवें आदि यथोक्त दुष्टस्थानों में स्थित हो वह पुरुप उसीग्रहको विशेषकर यत्नपूर्वकपजै क्योंकि ब्रह्माने इनग्रहोंको वरदिया है कि तुम मनुष्यों करके पूजेहुये उनमनुष्योंकोपूजो अर्थात् उनके इष्टकीप्राप्ति और अनिष्टका विनाशकरो-ययाती यद्यपि सामान्य सबकेलिये कहीगई तथापि अभि- पेकयुक राजाको विशेषकर इसबातका अधिकारहे सो नीचेकेश्लोकसे कहतेहैं३०६॥ यहाथीनानरेंद्राणामुच्छ्राया पतनानिच । भावाभावौचजगतस्तस्मात्पूज्यतमायहाः ३०७॥ ऐ०-नरेंद्राणां अर्थात् अभिषेकादि गुणयुक्त राजाअादि क्षत्रियोंको नवग्रह पूज्य- तम होतेहैं किंतु उनको विशेषकर ग्रहाँकीपूजा कर्त्तव्यहे पुनि जोबात राजाको कर्तव्य है तौ औरभी सब साधारणीको कर्तव्यह तिसकाहेतु कहते हैं कि जगत्का भावाभाव २५४ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। अर्थात् जंगम और स्थावरमात्रकीभी उत्पत्ति और प्रलय यह जगत्कर्ता ने ग्रहोंके आधीनरक्खेंहैं तथैव जीवोंकाउच्छाय कहिये उन्नति उँचाई डियादि और पतनानि कहिये हीनता क्षीणता निपात आदि यहभी सवग्रहोंके आधीनरक्खेगये-तिसहेतुसे जो कोई उच्छ्राय और पतनके अधिकारीही तिनकरके पूज्यहें-क्योंकि जो इनकीपूजा सत्कार होतारहा तो उत्पत्तिभी अन्नादि यहा किसीवस्तुकी अपने नियत समय पर होवैगी और प्रलय निरोधभी अपने उचितकालमें होगा अन्यथा उनकी पूजाविना यह सारीवातें विपरीत जानो-राजा जगतका ईश्वर होताहे उसको प्रजाकी उन्नति आदिसे अपेक्षा होतीहै इस्से जो राजा विशेषकर ग्रहोंको पूजेगा तो उसके पुण्य प्रभावसे सारीप्रजाके योगक्षेम आदिमें यथोचित कल्याण बनारहेगा-राजाके निदर्शन से कुटुंबी अपनेघरका राजाहै उसका कुटुम्ब उसकी प्रजाहे कुटुम्बी ग्रहोंको पूजेगा तो उसके सारे कुटुम्बके योगक्षेम आदिमें कल्याण रहेगा ३०७॥ अधि०-यह संदेह मतकरना कि जगत्की उत्पत्ति और प्रलय यहा उच्छ्राय और पतनादि यह सबकाम केवल एक जगत्का का कर्तृत्व है इसमें ग्रहोंके आधीन होना यह असंगत है क्योंकि जो ग्रहों का करना कहा सोई उस जगत्कर्ता का कर्तृत्व है जगत्का अपने हाथसे कोईकाम नहींकरता क्योंकि वह निर्लेप और निस्संग सर्वथा विदितहे किन्तु उसकी इच्छामात्रसे उसीकी मायाकरके नियुक्त कियेहुये नवग्रह सब कुछ करसते हैं (दृष्टान्त)जैसे संसारमें राजा अपने हाथसे कोईकाम नहीं करता उसके प्रधान करके नियुक्त कियेहुये कोतवाल थानेदार श्रादि सबकुछ करसक्तेहें शोर जोकुछ वे करतेहैं सो सब उसीएक राजाका करना कहलाताहै और यथार्थ मेंभी उसीकाकरना निश्चितहे क्योंकि उसके प्रतापके भयसे सब अपने २ कामोपर उद्यत बनेरहतेहें जब कदाचित् एकदिनकोभी राजाका प्रताप उठिजाताहे तबदेखो उस एकही दिनमें प्रजा में क्यारविध्वंस होनेलगतेहैंकि उन रक्षाकरनेवालोंकोभी तुच्छप्राणी विध्वंसकरदेते हैं इस्सेउनसवोंकाकरनाधरना केवलउसकेप्रतापकेाधीनहे-परन्तु-इतनाइसमविलक्ष- पहै कि उन अधिकारियों का सत्कार जो प्रजालोग करते रहते हैं तिनके तो सबकाम अपनेर उचित समय और उचितन्याय तक पहुँचते हैं और जो कोई उनका निरादर वा अपमान वा उपेक्षा रखते हैं तिनके सच्चे कामभी विपरीत होजाते और उचित समयपर इंसाफ़ तक पहुँचने नहींपाते क्योंकि जैसे वे जगत्कर्ता के नियुक्त किये ग्रह उलटा सूधा करदेनेको समर्धह तैसे यह राजाके नियुक्तकिये ग्रह उलटासुलटा करनेको समर्थहें इस्से इन राजग्रहोंकीभी पूजासत्कार प्रजाको नवग्रहोंके समान करनी उचित होतीहै किन्तु यहभी एक अपने योगक्षेमादिके हेतुसे धर्म मर्यादा में गिनती है (दग्ध बुद्धिका संदेह) भला ये बातें तो जुदीहें पर हमग्रहोंका विश्वास नहीं करसते क्योंकि मिताक्षरा.स० श्राचाराध्याय । २५५ यहनवग्रह एक पूँठीकल्पना देखपड़तीहै(आक्षेप)ठीकहै इस्सेअधिक और क्या मैंठ होगी कि जो सूर्यकाविम्ब मँठाकल्पितकरके नियतकिया जिसकेसायंकालछिपजातके साथही अन्धकार और प्रातःकाल उदयहोतेकेसाथही प्रकाशहोजाता ऐसेही चन्द्रमा आदिके विम्ब जो रात्रिमें अपने नियत समयपर उदितहोते और छिपजाते हैं और जिसने इनकोनिर्मितकियेहें उसकनिकट सवयथार्थमेंझूठेहैं किन्तु वह सबसेनिस्संगहै केवल इन्द्रजालमात्र उसनेरचाहै परन्तु जो ऐसाइन्द्रजाल नहींवनाता तो एकसूर्यके- ही नहोनेमें संसारका कोईकाम नहीं चलसक्ता किन्तु जलोंका शोपणमात्रभी न होने से यावन्मात्र संसारी आपदार्थ होतेहें सब सड़जाया करते अंधकार बनारहता वर्षा होनीदुर्लभहोजाती वीजोंमें अंकुरआदिकी उत्पत्तिकठिनहोजाती फिर इनवातोंकहोने विना जीवोंका पालनभी असंभवथा-ऐसेही चन्द्रमाके नहानेमें अमृतवर्पण अन्नपो- पणआदि रसोत्पत्ति श्रादिभी असंभवथी इत्यादि सभीग्रह अपनेरकामोंको प्रत्यक्ष करतेहैं और ज्योतिस्सिद्दांतवेत्ता लोग भूगोलखगोलविद्याके प्रभावसे उनकेसमयर के रूप लक्षण गुण कर्म आदिको प्रत्यक्ष देखसक्ते और देखतेहैं इस्से रचना करनेवा- लेने चाहे यहझंठा इंद्रजाल रचाहो पर अस्मदादि इस प्रत्यक्षविपयको क्योंकर झूठाकहें-यद्यपि अन्यग्रहोंकी अपेक्षा केवल राहुकेतु यहदोग्रह अदृश्यहें क्योंकि इन- का उदय प्रायः देखने में नहीं आता पर येभी कभी निजस्वापेक्षित समयपर अव- श्य उदय होतेहैं तब इनकोभी सवसंसार देखलेता है अभी केवल थोड़ेदिनोंकी वात है किंतु वैक्रम १९१० के और नौकेसंवत्में भी वरन ग्यारह पर्यंत दो अढ़ाई वर्पके अंतरमें कईबार और कईप्रकारके राहुकेतु (चरित्रा ताराके याकारसे उदय होतेरहे अतिकाल तक सायंकालके समयसेही सवलोग दर्शन करनेलगतेथे परन्तु अच्छ तरह यादहै कि उसकी शांति किसीनेभी नहींकरी और उसनेमी जैसा कुछ फल ज्योतिश्शास्त्रों में लिखाहै सो प्रत्यक्षकर दिखाया सोसवको याद है कि सारी पृथ्वीपर विध्वंस फैलगया-उस्से पहले १८५४ और ९६ केभी अंतरमें बहुधा इनके दर्शनहम नेभी किये जोदक्षिण दिशा और पश्चिमके कोणमें बड़ेलवे लट्ठाके आकार उदय । होताथा जिसमें बुहारीकी पूँछके समान कैंटीले जीरेसेप्रतीतहोते थे इसीहेतुसे बहु- धालोग उसको वुहारीभी कहतेथे कोई उसके लंवावको देखकर खेतकी पटेलनिकहने लगतेथे उसनेभी प्रत्यक्ष अपनाफल अनादृष्टि और अन्नाकाल जीवनाश और युद्ध आदि सवयथार्थ कर दिखायाथा-अन्यथाग्रहण और भूकंपादि औरभी अनेक ग्रहोत्पात जव२ कभी होतेहैं तव निस्संदेह अपना प्रभावकियेविना नहींरहते पर यह ठीकहै ये सारीवातें उसजगत्कर्ताके निकट निस्संदेह झूठा इंद्रजालहै तथापि अस्म- दादि जो एकलौकिक बाजीगरके या नटके इंद्रजालको समझतेहुयेभी देखकरसच्चा २५६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । प्रतीत करने लगते हैं सो जगकर्ता के इंद्रजालको कैसे ड्ठा कहसकें ३०७॥ इति सर्वविघ्नशांत्यादिग्रहशांतिप्रकरणम् ॥ यहांतक आचाराध्यायके प्रारंभसेलेकर योगीखरके कहेहुये ३०७ मूलश्लो- कोंके अवलंबसे अनेक धर्मशास्त्रों के प्रमाण और सिद्धांतद्वारा विस्तारसहित-जोर धर्म कर्म ग्राचारआदि विधि और निषेधरूप वर्णन किये सो सवसाधारण गृहस्थों के भाचार, अर्थात् उनमें राजा तथा प्रजाकोभी अधिकार एकसा बरावरहै-परन्तु- जोर धर्म अब आगे वर्णनकिये जावेंगे उनमें राज्याभिषेक यादिगुणसंयुक्त गृहस्थी का अधिकारहे अर्थात् केवल राजाकाही किंतु प्रजाका नहीं उनमें क्योंकि यहअग्रो- कमर्याद राजाके विशेष धर्महे किंतु अन्यसब साधारण गृहस्थियोंकी अपेक्षा इतने कामराजाको अधिक आचरणीयह सोअवनीचेसे कहतेह-तथापि इसकथनका यह सिद्धांत नहीं है कि राजाके आचरणकरिवेयोग्य कामोंको कोईसीखे नहीं किंतु सब कोहीसीखना उचितह बरन विशेषकर उनलोगोंको कि जो राजाओंके संगती वा निकटवर्ती होते या किसी प्रकारका संबंध राजाओं से रखतेहीं। अथ राजधर्मप्रकरणम्॥ महोरसादःस्थललक्षारुतज्ञोवृद्धसेवकः विनीतःसत्त्वसंपन्न कुलीन सत्यवाफ्शुचिः३०८॥ प्रदर्षिसूत्रःस्मृतिमानक्षुद्रोपरुषस्तथा । धार्मिकोऽव्यसनश्चैवप्राज्ञःशरोरहस्यवित् ३०९ ॥ स्वरंध्रगीतान्वीक्षिक्यांदनीत्यांतथैवच । विनीतस्त्वधवातायांत्रयांचवनराधिपः ३१०॥ मक्ष-त्रयाणांसह-महोत्साहः-स्थललक्षः-कृतज्ञः-रसेवकः-विनीतः-सत्त्वसंपन्नः- कुलीनः सत्यवाक्-शुचिः॥प्रदीर्घसूत्रः स्मृतिमान्-मक्षुद्रः-अपरुपः-धार्मिक अन्य- सनः-प्राज्ञः-शूरःनहस्यवित्॥ोर स्वरंध्रगोप्ताभीहो-(तथैव)-आन्वीक्षिकीम दंडनी- तिमें और वा में और त्रयीविद्या में विनीतहो ऐसा नराधिपहो ३०८।३०९।३१०॥ भनि-त्रयाणांसह-(नराधिप) राजा उसको कहिये कि जिसको राज्यगद्दीका अभि- पेक हुयाहो परन्तु वह अभिपेकभी उसकोहोना चाहिये जिसमें इतनेगणहों अर्थात प्रथम तो बड़े उत्साह वालाहो किंतु पुरुषार्थ साधन कमाके श्रारंभमै अध्यवसाय नामपरे निश्चयका होना सो उत्साह कहलाताहै जिसमें यह अधिकतरहो वही (मदान उत्साहयान् ) या बड़ा उत्साही कहलाता सो यहनराधिपमें अवश्यहोना चाहिये दुस- रागुण (म्पललस) उसको कहतेहैं जो अनेक शास्त्रांके देखने और मथन करनेमें अ. भ्यासराखे और प्रयोजनकेधवापर विशेषदृष्टिपातकररतीसरे(रतज्ञ) उसे कहते हैं जो पगये कियेहुये उपकार वा अपकारकोभी अधिक समुझे और भूले नहीं किंतु अव. सरके अनुकूल दोनोंका प्रतिकारभीकर३ चौथागुण (दसंघरु) अर्थात् तपज्ञानचा. तुग्यं विद्याआदि सर्वगुण सदोंकी सेवा करनेवाला और अपनी सेवामें रखनेवाला .

मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २५७ किंतु सवीभांति अच्छोंकी संगति वा अाराधन करताहो४ (विनीत) कहिये सौशील्य आदि विनयसे संयक्तहो अर्थात् किसी अपने संसर्गीसे विरुद्ध नही वांधे और स्ना- तक प्रकरणमें कहीहुई शिक्षावोंको वहुधा यादवनीराखै५ (सत्त्वसंपन्न) कहिये संपत्ति और विपत्तिमें भी एकसारहै किंतु न उसमें अतिहर्ष न इसमें अति विषादमानै ६ (कुलीन) कहिये कुलवान् अर्थात् पिताके कुलसे और माताकेभी कुलसे नाना मामा श्रादि वहुतसे जनसमूह वालाहो७ (सत्यवाक्) अर्थात् पूँठका अभ्यास नहीं डालै और मुखसे कहेहुये वचनपर आरूढ़ता धर्म के अनुकूल बनीराखै८ (शुचि) अर्थात् भीतरले मनसेभी शुद्धहो किंतु कपट आदिसे शून्यहो और वाहर इंद्रियोंसेभी शुद्ध रहै ९ (अदीर्घसूत्री) उसे कहते हैं जो ज़रूरी कर्तव्य कामोंके प्रारंभकरनेमें और नँधे हुये कामोंके पूरे करदेनेमें व्यर्थ विलम्ब को न करताहो सो यहगुण राजामें अवश्य होना चाहिये १० (स्मृतिमान् )अर्थात् जिसवात को एकबार अच्छीभांति समुझले फिर उसको नहींभूले ऐसी प्रकृति होनीचाहिये ११ (अक्षुद्र) अर्थात् क्षुद्रकहिये अस- द्गुण असद्विद्या असद्वार्ता असत्पुरुष बंध्या पुत्रादि इन सबकेसंग औरसंसर्गसेभी अलगहो और छछोरपन छोड़दे १२ (अपरुप)अर्थात् परुप वचन कहिये प्रत्यक्ष पर दोपोंका कथन करना तिससे अलग हो १३(धार्मिक)अर्थात् वर्ण और आश्रम केभी नियम धमों से समन्वित हो किंतु वर्ण तौ क्षत्रिय अथवा जो कुछहो और श्राश्रम गृहस्थ राजाकाभी होताहै सो इनदोनोंके यथोक्त आचारोंसे सम्पन्नहो१४(भव्यसन) अर्थात् कोईतरहका विशेष दुर्व्यसन जिसमें न हो व्यसन अठारह प्रसिद्ध हैं उनके नाम नीचे अधिकोक्किमें देखो १५ (प्राज्ञ)अर्थात् अतिगंभीर वार्ताके अर्थ प्रयोजन समुझलेनेमें समर्थहो १६(र)अर्थात् निर्भय जो किसीसे डरता न हो१७ (रहस्यवित्) अर्थात् गुप्त करनेयोग्य अर्थ प्रयोजनोंके छिपानेमें चतुरहो किंतु जिसका भेद उसके निकटवर्तीभी न पासकें १८(स्वरंधगोप्ता कहिये अपने छिद्रोंको ढाँकनेवाला किंतु अपने राज्यके प्रसिद्ध सात अंगों में शत्रुके प्रवेशहोनेयोग्य मार्गांकी शिथिलता रूप छिद्रोंका अवरोध करसकनेवाला हो १९ (तथैव) (भान्वीक्षिकी) में विनीतहो अर्थात् श्रान्वी- क्षिकी नाम यद्यपि तर्कविद्याका विख्यात है तिसमें चतुरहो पर विशेषतर आन्वीक्षि- की नाम आत्मविद्या मेंभी चतुरहो यहांपर आत्मविद्या कहनेसे यह सिद्धान्तहे कि जो विद्या पढ़े सने पीछे निजात्मद्वारा सुपरीक्षितभी करलीहो इसी परीक्षाको ग्रान्चीक्षा और उस विद्याको आन्वीक्षिकी कहतेहें इसभांति अनेक विद्याओंकी परीक्षा जिसने निज बुद्धिद्वारा करीहो यहभावहे २० तथैव (दण्डनीति)में विनीत हो किंतु दंडनीति नाम अर्थशास्त्रोंको कहतेहैं जिनसे अनागत अर्थीका साधन और समागत अथांकी रक्षा विधिदण्ड पूर्वक जानीजातीहै अर्थात् राजाको विशेषकर उशना और रहस्पति રેપુર मिताक्षरा स० आचाराध्याय। आदि आचार्यों के कहेहुये नीतिशास्त्र और कृष्णद्वैपायनकृत महाभारत संवन्धी राजधर्मके पढ़ने वा समुझने में विशेषता हो २१ तथैव वार्तामें विनीत हो अर्थात् कृषि वाणिज्य पशुपालन धनहदि आदि कामोंकी मूलविद्या वा कुशलता को वार्ता कहतेहैं तिसमेंभी राजाको निपुणता हो २२ तथैव (त्रयांविद्या) में विनीत हो अर्थात् ऋक् यजुःसाममयी तीनों विद्या प्रवीणहो किन्तु भिन्न उनके ज्ञाताओंसे प्रावीण्य संग्रह कियाहो २३ इत्यादि सर्वगुणसंयुक्त होनेपर अभिपेक पानेका अधिकारी राज- कुमार होताहै २०८।२०९।२१०॥ अधि त्रयाणांसह-यहांपर बीस इक्कीस बाईस तेईस इनचौरों अन्त्य संख्याओं में कहीहुई वार्तामध्ये मनुजीने अच्छीरीति कहीहै-सायथा (विद्येभ्यस्त्रयींविद्यांदण्डनी तिंचतद्विदः । आन्वीक्षिकींचात्मवियोवा रम्भांश्चलोकतः) अर्थात-राजाविद्य लोगोंसे जुदी २ एक २ विद्या जिसमें जोहो उस्से वही संग्रहकर और दण्डनीति उ. सके जाननेवालेसे संग्रहकरै आन्वीक्षिकी नाम आत्मविद्या प्रात्मविद्याके जाननेवा- लोंसे किंतु जिसरविद्याकीपरीक्षा जिसने अपनेयात्मद्वारा करलीहो उस्से वही संग्रह करै सो ये विद्यायें चतुर्दश विद्याओंसे अपेक्षितहें और(वातरंभांश्चलोकतः)अर्थात् कृपि वाणिज्य पशुपालन आदि नानां लक्षणवती वार्ता जो लोकमें प्रसिद्ध हैं उनको भी उनकेजानने वाले लोगोंसे सीखै समुझै-ऐसेही ऊपर पंद्रहवीं संख्यामें कहेहुये अठारहव्यसनोंके नाम जैसे (मनुजी) में कहे हैं तथाच (मृगांक्षादिवास्वप्न परिवादः स्त्रियोमदः । तौर्यत्रिकंस्थाघातःकामजोदशकोगणः-पेशुन्यसाहसंद्रोहईर्ष्याऽसूयार्थदू पणम्।वाग्दण्डजंचपारुप्यंक्रोधजोपिगणोप्टक)अर्थात-(मृगया) नाम आखेट या शि- कार १ (मक्षा. अर्थात् कईप्रकारके यूतकर्म जो पाँशेयादिसे खेलेजाते २(दिवास्वप्न) दिनका सोना ३ (परिवाद) स्थावाद थोथी कुतर्कणा आदि यापसके मनुष्यों से ४ (स्त्रीसेवा) अधिकतर या अनुचित मर्यादसे या दिवसमें स्त्रीप्रसंग ५ (मद)मदिरा या- दिका सेवन ६ (तौर्यत्रिक)नृत्य १ गीत २ वादिव ३ इन तीनोमें अधिक तत्पर होना (बधापात)किसी प्राणीमात्रको विनाकारणके वधकरना या करवाना ८ पाठहुये परंतु सातवेंके साथमैं तीनकहे इस्से उन दोनोंको जोडकर दशहुयेसो ये दशवगुणो का गणकहिये समूह कामसे अर्थात् मनकी अभिलापसे उत्पन्नहुये व्यसन कहलाते हैं ये दशव्यसन राजाको अत्यन्त पीड़ा तथा राज्य हानिके हेतु प्रसिद्ध है इसलिये इनमें तत्पर न हो-ऐसेही क्रोधसे उत्पन्नहुँया आठ अवगुणोंका अष्टगण कहलाताहे उनमें पैशुन्य पराई चगुली चाई यदि परोक्षनिन्दा ६ (साहस) विना विचार किये किसीपर प्रबलता आदि करवैठना २ (द्रोह)विना कारणका द्रोह वैर आदि खडाकर लेना ३ (ईया) ईपीजो परोत्कर्प आदिकै नमहने से या क्रोधसे 'या दुर्जनतासे छल मिताक्षरा स. याचाराध्याय। २५९ पूर्वक वर्धकारिणी हो.४ (मसूया) निन्दा-५ (मर्थदूपण) प्रत्येक शुद्धकामों में भी दोष लगाना ६ (वाक्पारुष्य) क्रोधसे गाली आदिका उच्चारण करना ७ (दण्डपारुष्य)-दंडे श्रादिसे निज अपने हाथसेही या विना अपराध के ताड़नकरना आदि ८ ये आ- ठौ व्यसन क्रोधसे उत्पन्न होतेहैं और राजाके प्राण तथा राज्यके विनाश करनेके हेतु प्रसिद्धहैं इसलिये राजाको प्रथम तौ क्रोध नहीं करना उचित और क्रोधके आजाने परभी इनका ध्यानरखकर इनका अवरोध करना उचितहोता-इन अठारहमेंभी सात व्यसन छांटकर अतिकष्टदायक बतलाते हैं-यथा (पानमक्षाःस्त्रियश्चैवमृगयाचयथा मम् । एतत्कटतमंविद्याच्चतुष्कंकामजेगणे-दण्डस्यपातनंचैववाकपारुप्यार्थदपणे। क्रोधजेपिगणेविद्यात्कप्टमेतत्रिकंसदा) अर्थात्-एकतौ(पान)मद्यादिवस्तुका १(अक्षाः) जूये का साधारणभावसेभी खेलना २ स्त्रियों का सेवन ३ मृगया शिकार अतिशय करके ४ ये चारों यथाक्रम से उत्तरोत्तर अधिकाधिकभाव से कटतम कामजगण में से छंटेहुये व्यसनजानै- और दण्डका पातन किन्तु निज अपने हाथसे जैसा ऊपर लिखागया १(वारपारुष्य) धिक्कार या गाली.आदि जैसा ऊपरकहार (मर्थदूपण)ऊपर कहेहुये के अनुसार ३ ये तीनों भी क्रोधजगणमें से छंटे हुये व्यसन सदाही कष्टतम जानो-ऐसेही उन्नीसवीं संख्यामें कहेहुये सप्तांग राज्यके सातोंअंग-यथा(स्वाम्यमा त्यसुहृत्कोपाराष्ट्रदुर्गवलानिच । परस्परोपकारित्वाद्राज्यंसप्तांगमुच्यते .) अर्थात्- एक तो (स्वामी) १ (ममात्य)जिसे प्रधान मंत्री या दीवानाम या देशदीवान कहतेहैं २ (सुहत)मित्र जो अन्यराजा उस राज्यके शुभचिंतकहों३ (कोप)धनागार,अन्नागार वस्त्रागार,शस्त्रागार आदिजो प्रसिद्धहोते हैं तिनके उपलक्षणसे उनकोपोंके अध्यक्ष भी समुझने ४ (राष्ट्र राज्य ५ (दुर्ग) किलागढ़ इसी उपलक्षण से गढ़का अध्यक्ष भी समुझना ६ (बलानि)फोजें७ये सातों परस्पर उपकारके हेतुसे राज्यके अंगकहलाते हैं अर्थात् इनमेंसे एकभी नहो तो राज्यनष्ट होसक्ला और परस्पर उपकार का यह भावहै कि फोजोंके नहोनेमें शेष छः अंगोंकी रक्षा नहोनेसे छहू नष्ट होजाय-ऐसेही कोपोंके नहोनेमें सेनासहित उन छःअंगोंकी पालनानहीहो तौभीमरे-ऐसेही मित्रों के नहोनेमें शत्रु प्रबल होजायें तब उस फ़ौज और खजाने आदि छः अंगोंसे कुछभी नही होसक्ता-ऐसेही उन पूर्वोक्त मित्रोंको इस मित्रसे भरोसा है इसी प्रकार परस्पर सातोंकी रक्षा और कल्याण उन्हीं सातोंसे होताहै-तव सप्तांगराज्य कहलातां और अभेद्य गिनाजाताहै-सिद्धांत इसका यह कि उन्नीसवी संख्यामें जो कहाथा कि राजा (स्वरंधूगोता) हो अर्थात् अपनेइन्ही सातअंगोंके रंधकहिये(छिद्रों)को ढांकतारहै जिस्से इनमें किसी एकमेंभी कोईशत्रु प्रवेश करनेका मार्गनहींपावे और(छिद्र)कहने से मार्ग यहएक उपलक्षणमात्रं है किंतु इसमें दोनों वातकी लक्षणा दर्शाई हैं अर्थात् एकतो . २६० मिताक्षरा स०आचाराध्याय। मार्गरूपी छिद्र यहभी कि कोई घुसजाने नहींपावे दुसरा मुख्य यहेभाव है कि इन कहहुये अंगोंके अध्यक्षोंसे कोईशत्रु मिलाप नहीं करने पावै क्योंकि शत्रु जब किसी अंगमें प्रवेश करताहै तो दोनों प्रकार से अर्थात् कभी तो अध्यक्षों की शिथिलता प्रमाद गफलत आदिके हेतुसे और कभी उनसे मिलाप करिकै प्रवेश करता है सो यह मिलाप आदि कारण उसी अवस्थामें होतेहैं कि जब राजा पूर्वोक्त अठारह महा- व्यसनोंमें आसक्तहोताहे किंतु अठारहमेंसे कोई एकव्यसनभी जवराजामें अधिकतर होगा. तभी इनसातों अंगमें से किसी न किसी अंगमें प्रवेशकरने का अवकाश शत्रु को अवश्य मिलजावैगा इसलिये अठारह व्यसनों से राजा हाथखींचे और अपने छिद्रोंका ढाँकना इसका नामहै कि अपने राज्यके सातअंगों यहा उनके अध्यक्षों को साम आदि नीतिसे अपने वशमें यथासंभव, यथाकाल, यथाशक्ति, यथाअवसर के अनुकूल काम और क्रोधोको रोकताहुआ बनारक्खै बसयही छिद्रोंका ढांकनाहै-यथा (सद्भावेनहरोन्मित्रंसद्भावेनचबांधवान् । स्त्रीभृत्यौदानमानाभ्यांदाक्षिण्येनेतरंजनम् ) अर्थात्-मित्रको सद्भाव कहिये निष्कपटतासे वशमरक्खे ऐसेही निज बांधवों को भी सद्भाव कहिये सत्कारसे वशमें रक्खैः स्त्रियों तथा समस्त भृत्यवों कोभी दान और मानसे वशमें रक्खै इनके सिवाय अन्य मनुष्योंको शिष्टाचार आदि चतुरतासे हरै- तद्यथा(लुब्धमधेनगृहपीयातस्तब्धमंजलिकर्मणा । मूखैछन्दानुसारेणयथातथ्येनपं डितम्)उपर कहेहुये सात अंगोंमें पहलाअंग जो(स्वामी)कहाथा यद्यपि(स्वामी) शब्द से केवल राजासे अपेक्षा है किन्तु जैसे छः अंग और हैं तैसेही सातवाँ अंग राजा प्रापहै जैसे अन्य छः अंगोंकी रक्षा तैसे अपनी रक्षाके छिद्रमागों का अवरोधकरै- परन्तु-इसीस्वामी शब्दके अभिप्राय से यहांपरयुवराज)सेभी अपेक्षा है किन्तु जैसे अन्य अध्यक्षों वा मित्रोंसे निज शत्रुओंका मिलाप होजाने के छिद्रोंको ढांकै तैसे युवराजसेभी किसी शत्रुका मिलाप होजानेवाले छिद्रोंको ढांकतारहै यह सिद्धांत है- पुनि इसी स्वामीशब्द के विशेषणसे प्रदेशाधिप भूपालभी अपेक्षित, किंतु जैसे अ- न्य छः अंगोंमें निज शत्रुके प्रवेश होनेवाले छिद्रोंका अवरोध कियाजाताहै तैसेही सातवांअंग जो प्रदेशाधिप भूपाल कहिये सूबालोग तिनसेभी किसीशत्रुके मिलाप होजानेवाले मार्गीको ढांके या उन्हींकी पराङमुखताका ध्यान रखकर तत्संबंधी छिद्रों को ढांके यह सिद्धांत है-इसीलिये उनकेभी लक्षण पहले देखलेने आवश्यक हैं-यथा (यःकुलाभिजनाचाररतिशुद्धःप्रतापवान् । धार्मिकोनीतिकुशलःसस्वामीयुज्यतेभुवि) अर्थात्-वह पुरुप किसी भमिभागमें स्वामी नियत कियाजाताहै जो अपनेकुलके और अभिजन कहिये संबंधियोंके भी आचारसे अति शुद्धहो किंतु अपनी कुलपरिपाटी पर थारूदहो और किसी अपने संबंधीसे विरुद्ध नहीं रखताहो और प्रतापवान - . मिताक्षरा.स. आचाराध्याय। २६१ कहिये प्रतापी रूंअबसे संयुक्त हो जिसके प्रतापसे वहसौंपाहुअा भूमिभाग स्वाधीन चनारहे किन्तु हाथसे.नजातारहे पुनि धार्मिकहो किंतु ऐसी अधर्मरति उसकी नहीं जिस्से उस भूमिभागकी प्रजाको विगाइदे और नीतिमें प्रवीणहो जिस्से वहांके प्र- बंधमें न्यूनता नहींञानेपावे वह स्वामी नियत कीजिये अन्यच्च-(क्षात्रधर्मरतोनित्यं स्थाहिंसांपरित्यजेत्।शुप्कवैरंमृपालापंपरनिन्दांचवर्जयेतोक्रोधंद्वेपंभयंशाढ्यपेशुन्य मसदाग्रहम् । कौटिल्यंदभमुद्देगंयत्नेनपरिवर्जयेत्)-अर्थात्-क्षात्र धर्म राज्य संबंधी आचरणमें,तत्परहुआ राजा नित्यंप्रति व्या हिंसाका परित्याग करै-सूखावैर किसी अपने नौकर चाकर या मित्रादिकोंसे नवांधे मपोलीप व्यर्थ वार्ताका कथन करना- पराईनिंदा सन्मुख या पीछेभी करनेकात्यागरक्खै-क्रोध-परीयारेप-भयभीत रहना या होजाना-शठता धारण करनी-पिशुना का स्वभावकरना-असहा का आग्रहकरना कुटिलता-दंभ-उद्वेग मनको व्याकुलकरलेना-इन सारीबांतों को राजा यत्नपूर्वक छोड़ देव जो अकंटक राज्य करना चाहे ३०८०३०९।३१०॥ यह तो राजा के (अंतरंग अर्थात् यात्मीयगुण कहे जो शरीरमें होने चाहिये। अव नीचे(बहिरंग) गुण कहतेहैं जो शरीरके बाहर होने चाहिये। समंत्रिणःप्रकुर्वीतप्राज्ञान्मौलानस्थिरानगुचीन् । तैःसाईचिंतयेद्राज्यविप्रेणार्थतत स्वयम्३११ ।। - ऐ०-(स) कहिये वही अभिपेकयुत राजा जिसकेगुण ऊपर कहेगये सो ऐसे मंत्रियों को अपने मंत्रित्वमें राखे जो(प्राज्ञ)हों अर्थात् हित अहित की बात समझने में चतुर हों पुनि(मौलान्) अर्थात् जो अपने वंशकी परंपरा में चले थातेहाँ वे मौल कहलातेहैं तिनको कर पुनि(स्थिरान्)अर्थात् जो अंतिहर्प के स्थान तो विशेष हर्पित होकर फूलें नहीं और यति विपाद के स्थान कुम्हिलाकर घबराचे नहीं वेस्थिर कहलाते हैं तिन को करै पुनि(शुचीन)अर्थात् धर्म अर्थ कामके भंयसे जिनको राजाने उपधाद्वारा शो- धिलियेही वे शुचि यहा उपधाशुचि कहलातेहें तिनकोकरे-तिनकेसाथ राज्यकाचिंत- मनकरे कितुसंधिविग्रह आदिराजद्धिके लक्षणवाले कामोंका विचारकरै तहां सभी मंत्रियोंको इकट्ठे करके एकसाथभी और आगे पीछे एक २ से जुदी २ भी संमतिलेवै पुनि (विप्रेणाध) अर्थात् उनके साथ संमतिकिये पीछे सकल शास्त्रार्थ के विचार में कुशल ऐसे ब्राह्मण वा पुरोहितसे संमति लेवे पुनि ततःस्वयं अर्थात् ब्राह्मणसे विचा- रांश किये पीछे केवल आप भी निज बुद्धि से विचार करे ३११ ॥ अधिक मंत्री जनों के लक्षण जोअन्य शास्त्रोंमें कहे तिनमें कोई श्वाती अधिक पाई जातीहै इसलिये उनका लिखनाभी यथोचितहे-तद्यथा(स्वदेशजंकुलाचार विशु हमुपधाशुचिमामंत्रज्ञमव्यसनिनंव्यभिचारविवर्जितमायधीतव्यवहारांगमोलंख्यात विपश्चितमायर्थस्योत्पादकसम्यदिध्यान्मंत्रिणंनृपः)अर्थात् राजा ऐसामंत्री नियत 1 રદર मिताक्षरा स० आचाराध्याय । करै जो अपने देशमें जन्माहो और निज कुलके आचारसेभी शुदहो और उपधासे भी शुचिहो किंतु उपधाद्वारा राजाने शोधन उसका कियाहो मंत्रज्ञभीहो किंतु मंत्र संमति सलाह में प्रवीणहो और अव्यसनीहो किंतु कोई तरहका व्यसन दुर्व्यसन जिसमें न हो व्यभिचारसेभी रहितहो यहां पर व्यभिचार उसकी प्रकृतिसे अपेक्षा रखताहै अर्थात् ऐसी व्यभिचारवती प्रकृति न हो कि अभी कुछ कहा और थोड़ीदेर में उसीवातसे पलटगया-और व्यवहारांग उसने पढ़ाहो जिस्से प्रजाकेन्यायमें गड़- वड़ झाला न करदे और मौलहो जिसके लक्षण ऐक्यार्थमें कहचुकहें और विख्यात हो और विपश्चितहो अर्थात् किसी वार्ताके समझनेमें बुद्धि जिसकी रुकती या उल- झतीन हो इनवातोंके होनेपरभी भलीभांति अर्थका उत्पादनकरसकने वालाहोतिस को मंत्रीकरै-अन्यच्च-युक्तिकल्पतरुनामक नीति शास्त्रे-यथा (शांतोधिनीत कुशलःस कुलीनःशुभान्वितःशास्त्रार्थतत्त्वगोमात्योभवेद्भमिभुजामिह)अर्थात्-शांतप्रकृतिवा- लाहो किन्तु क्रोधीस्वभाव जिसका न हो विनीतहो किन्तु सौशल्य चिद्यामें निपुणहो और कुशल अतिचतुरहो और सत्कुलीन कहिये श्रेष्ठ कुलमें जन्माहो और शुभा- न्वित कहिये शुभ आचरणवालाहो किन्तु कुमार्गी न हो पुनि शास्त्रार्थ तत्त्व कहिये व्यवहारांग आदि जानताहो ऐसा अमात्यनाम मंत्री इहसंसार यहाराज्य प्रबंध राजाओंका होवै-मनुजीके कथनसे मंत्रियोंकी संख्याभी सात यहा आठ निश्चितहो- तीहै-यथा-(मौलानशास्त्रविदःशूरान्लव्धलक्षान्कुलोद्भवान्।सचिवान्सप्तचाप्टोवाकु वीतसुपरीक्षितान् अर्थात्-सचिवनाम मंत्रीजन सात अथवाआठ एसकर जो भली भांति परीक्षा कियेहों किन्तु उपधाद्वारा राजा ने शोधिलियेहों और मौलहों जिनके लक्षण ऐक्यार्थ में कहेथे और शास्त्रोंके जानने वालेहों शरमाहों पुनि लब्धलक्षहों किन्तु जिनका चिहकोईसा विख्यातहो और कुलोचकहिये याती राजाकेही कुलमै हुयेही या किसी अन्य सत्कुलमें जन्मेहीं-यहां पर बहुधा उपधाकाचर्चा आया यद्य- पिइसमें कहींभी उसके लक्षण कहे नहीं परन्तु कालिका पुराणमें उपधाके लक्षणकहे हैं-यथा (धर्मार्थकाममोक्षश्चप्रत्येकंपरिशोधनः उपेत्यधीयतेयस्मादुपधापरिकीर्तिता।। अर्थकामोपंधाभ्यांतुभार्याःपुत्रांस्तुशोधयेत् । धर्मोपधाभिर्विप्रांस्तुसर्वाभिःसचिवानपु नः)अर्थात् राजाकोयहउचितहै किधर्म अर्थ काम मोक्ष इनचारोंसे प्रत्येक मनुष्यको यथायोग्य परिशोधनकरे-तहां इन चारों से यहा किसी एकहीसे परिशोधनों करके किन्तु परिशोधनके उपायोंसे (उपेत्य-धीयते) अर्थात् जिसलिये परिशोधनका उपाय उसके उप कहिये समीप पहुँचाकर धारण किया जाता और निज बुद्दिद्वारा उसका अभ्यंतर अपने मनमें धारण किया जाता इस्से उसकर्मको (उपया) कहते और उस पुरुषको (उपधाशुचि) कहते हैं जो उसमें पूराउतरे पर यथार्थ में यह भी एकप्रकारकी , मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २६३ गुप्तपरीक्षा होती है जिसको राजा धर्मकेभयसे अर्थकेभयसे कामकेभयसे मोक्षकेभय से इनके संबंधी मनुप्योंकी जुदीरनाना भांतिकी रीतोंसे करताहै दृष्टांत जैसेअर्थकी परीक्षामें गुप्तभाव उसके समीप कुछ धन रखवादेना या किसी निजमनुप्यके द्वारा चोरी आदिका कुछलालच दिखलाना इत्यादि नाना प्रकार-ऐसेही कामकी उपधा नाम परीक्षा मध्ये किसीस्त्रीसे छलवार्ता करवाना आदि नानाप्रकार-ऐसेही संबमें जानौ-तहां दूसरे श्लोकसे उपधाका भिन्न व्यवहार बतलातेहैं कि-(अर्थउपधा) और (कामउपधा) इनदोनोंसे भार्यायों और पत्रोंकाभी परिशोधन करलेवै-और (धर्मकीउ पधाओं) से विप्रोंका परिशोधनकर पुनि सचिव जो मंत्रीलोगहें तिनके आशयका परिशोधन सभीसे किन्तु चारोंप्रकारकी उपधाओं से परीक्षा करै (उपधीयते शुद्धि ज्ञानमत्र)३११॥ पुरोहितंप्रकुर्वीतदैवज्ञमुदितोदितम् । दंडनात्यांचकुशलमधर्वागिरसेतथा ३१२ ॥ ऐ०-वह राजा पुरोहितभी करै किंतु सभीप्रकारके दृष्टा दृष्टार्थरूप कर्नामें पुरतः कहिये आगे बढ़कर हितकरनेवालेको दान मान सत्कारोंसे अपनेमें युक्तकरै अर्थात् सदैवकेलिये अपना करिके मानै सो वह पुरोहितभी (दैवज्ञ) हो अर्थात होनेवालेग्रहो- त्पातोंको प्रथमसे जाननेवाला और उनकीशांति श्रादि प्रक्रियाका जानने वालाहो पुनि (उदितोदित) अर्थात् विद्या अभिजन अनुष्ठान आदि उदित कहिये शास्त्रोक्त तिनसे उदित कहिये समृद्ध संपन्न ऐसाहो और (दंदनीति) में कुशलहो किंतु अर्थ शास्त्रका वेत्ताहो तथा (अथर्वागिरस) में भी कुशलहो किंतु प्रतिष्ठाशांत्यादि कर्मोमें प्रवीण हो ३१२।। । श्रौतस्मानक्रियाहेतोवृणुयादेवचत्विजःयज्ञाश्चैवप्रकुर्वीतविधिवद्भरिदक्षिणान् ,३१३॥ . भोगांश्चदत्वाविप्रेभ्योवसूनिविविधानिच । अक्षयोयंनिधीराज्ञायद्विप्रेपूपंपादितम् ३१४ ॥ भस्कन्नमव्यथंचैवप्रायश्चित्तैरदूपितम् । अग्नेःसकाशादिप्राग्नौहुतंश्रेष्ठमिहोच्यते ३१५ ॥ ऐत्रयाणांसह-(प्रीत)कर्मअग्निहोत्रादि और(स्मान)कर्मउपासनाआदिक्रियाओंकी अनुष्ठान सिद्दिकेलिये ऋत्विजोंकोभी करै अर्थात् उनकों के जाननेवालोंको अपना ऋत्विक् बनावै-और-बहुतसी दक्षिणावाले राजसूयादि यज्ञोंकोभी विधिवत्करै३१३ पुनि उन्हींयज्ञोंकी क्रियासाधनाके दानद्वारा विौको नानाप्रकारकेभोगकहियेसोख्य वस्तु अनेक देकर और (वसूनि) कहिये धनभी सुवर्ण रूप्य आदि देवै क्योंकि यह ब्राह्मणों को अर्पण कियाहुआ धन 'राजाओंका अक्षयनिधि कहलाता किंतु इसका नाश नहींहोता ३१४ वरन हवनादि द्वारा अग्निमें होमेहुये यद्वा यज्ञादिकों में ल- गाएहुयेकी अपेक्षा(विनाग्नि)में होमाहुपाश्रेष्ठ इससंसारमें कहलाता-(विप्राग्नि) विप्र रूप अग्निमें होमाहुआ अर्थात् विप्रोंको दियाहुअा इसलिये श्रेष्ठहोताहै कि जिस्से २६४ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । यह विप्रोंका दियाईया(प्रस्कन्न)होताहै किन्तु फैलता.या खिंडता,नही और (भव्यय) होतो किन्तु उसयज्ञमें पशुहिंसा आदिभी होती, इसमें हिन्सानहीं और प्रायश्चित्तों सेभी प्रदूषित होता. किन्तु यज्ञादि संबंधी पशुहिन्सा के प्रायश्चित्तभी करने होते इसमें प्रायश्चित्तकी अपेक्षा नहीं ३१५॥ पलव्धीदेद्धमणलब्धंयत्नेनपालयेत् । पालितंवर्द्धयेन्नीत्यावृद्धपाने निक्षिपेत् ३१६ ॥ ऐ०-ऊपर कहाथा कि विनोंको धनादिक वस्तुदेव तिसकी परिपाटी कहते हैं कि इसरीतिसे देवे-किन्तु जो वस्तु हाथमें नहींाई,उसके लाभहोनेके लिये धर्मके अ-, नुकूल बांछा और उपायभी अनेक भांतिसे करै और यत्नसे हाथ भागहुये की रक्षा करे किंतु निज,आप उसकी अपेक्षा वनीरक्खे पुनि रक्षा कियेहुये कोभी नीति नाम युक्ति से बढ़ातारहै पुनि दृद्धिको पहुँचेहुये धनों को मात्रोंमें निक्षेप करै अर्थात् धर्म अर्थ कामरूप श्रेष्ठ पात्रोंको देतारहे पुनि दूसरा अर्थ यहभीहै कि बढ़ेहुये को निधि रूपं पात्रों में निक्षेपनाम संचयभी करतारहै पर मुख्यार्थ वहीहै ३१६ ॥ अव कदाचित् भूमियादि दानकियाहो उसकीरीति कहते हैं। दत्वाभूमिनियंधवाहत्त्वालेव्यतुमारयेत् । भागामिभद्रनृपतिपरिज्ञानावपार्थिवः ३१७॥ . ऐ०-यथोक्त विधिसे भूमि ग्राम क्षेत्र आदिदेकर अथवा(निबंध) नियतकरिकै(लेरख्य) पत्र अर्थात सनद उसकी करवावै-किसलिये कि-(मागामि) समय भविष्यकालमें जो होनेवाले(भद्रनृपति)युवराज थादि यहा जो कोई किसीहेतुसे किसी कालांतरमें वहां के राजा हो तिनके परिज्ञानके लिये लेख्यपन्न करवावे जिस्से उनको यह मालूम हो कि अमुक राजा ने अमुक मनुष्य को अमुकवस्तु अमुक समयपर दीथी सो यह (भूमिदान) या (निबंधों)का नियत करना और (लेरव्य) पोंका करवाना भी सब उसी (पार्थिव)के आधीन किंतु भूपतिके सिवाय किसी भोगपतिको अधिकार इसमें नहीं और निबंध वे कहलातहं जो राजा किसीको बसौड़ी या मासिक या नैतिक आदि अनेक रीतोंसे कुछ बन्धान नियत करताहै ३१७॥ लेख्यपत्र किसरीतिसे करवावे सो कहते हैं। पटेवाताम्रपतवावमुद्रोपरिचिद्वितम् । मभिलेख्यात्मनोवंश्यानात्मानंचमहीपतिः ३१८॥ : प्रतिग्रहपगमाणंदानछेदोपवर्णनम् स्विहस्तकालसंपन्नंशासनकारयत्स्थिर ३१९॥ ऐ०संहदयोः-(पट)अर्थात कपास श्रादि सूत्रके बुनेहुये और माड़ी चढ़ेहुये वस्त्र पर या कसीदा आदिकी रीतिमे जैसी जहांकी परिपाटी हो या जैसी राजाकीइच्छा हो उसके अनुसार अथवा(तात्रप)तांबेकेपत्रपर लिखवाकर खोदवावे इत्यादि कागद पर्यत पोरवस्तु भी द्वितीय (वा) शब्दके अभिप्रायसे समझनी तिसके ऊपर पहले राजानिज (मान्मनोवंश्यान्) अर्थात् अपने प्रपितामह पितामह पिता और (मात्मान) मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २६५ अपने नामको इन सवों के गुण वीर्य आदिकी विख्याति सहित (अभिलेरख्य) कहिये लिखकर वा लिखवाकर तथैव (च) शब्दकी लक्षणा से प्रतिग्रह लेनेवाले का भी नाम उसकी विख्याति सहित लिखै और (प्रतिग्रहपरिमाणम्) अर्थात् प्रतिग्रह जो वह दान वस्तु किन्तु जितना निबन्ध या जितनी धरतीहो तिसका परिमाणभी इसप्रकार से लिखवावै कि इतने मुद्रा मासिक या बौंडी तथैव (दानच्छेदोपवर्णनम्) अर्थात् जो पृथ्वी आदि का (दान ) हो तो उसका (छेद ) कहिये परिच्छेद किन्तु अन्य धरतीसे भिन्नता करदेनी लिखै (दृष्टान्त) जैसे अमुकनाम धरतीकाएकनिवर्तन अर्थात् कितअमुकनाम नदीके अमुकनाम घाट वा किनारेसे लेकर अमुकठिकाने पर्यंत-जिसका इतनेवीघे या विस्वे आदि परिमाणहे और इतना उसका भूमिलाभ होताहै-फिर इसपीछे उस धरतीका(उपवर्णन)भी इसप्रकार से लिखवावै कि उसके दक्षिण ओर अमुक क्षेत्र वा अमुकग्राम है पूर्वोर अमुक नदी वा झीलहै पश्चिम ओर खेड़ाहै पहाडहै उत्तरओर वन या राजमार्ग आदि जो कुछहो इत्यादि लिखे पीछे(स्वहस्तकालसम्पन्नम् अर्थात् स्वहस्त सम्पन्न तथा कालसम्पन्नकरिकै स्थिर शा- सन करै किन्तु दृढ़याज्ञाकर देव(दृष्टांत)यथा अपने हस्ताक्षरों से संयुक्त करना तो स्वहस्तसंपन्नता कहलाई सो इसप्रकारसे कि हमने अपने संमत पूर्वक निजहाथसे हस्ताक्षर किये और अमुक नामा मनुष्य अमुकनामाके पुत्रको जो इसपर लिखदिया सो प्रमाणहो-ऐसेही (कालसंपन्न) का यह भावहै कि पंचांगविधि सहित शाके और संवत्सर आदि दोप्रकारके कालपरिमाण उसमेंलिखे कि जोएकसे भूलपरनेकी संभा- वनाहो तो दूसरेसे निश्चय होजावै कि इतनीवर्षे इसपत्रके लिखे पीछे वीती हैं और उनपर्व श्रादिकालॉसेभीसंपन्नकरै कि उसदिन चंद्रग्रहणयासंक्रांतियादि जोकुछहो- औरदृढ़ आज्ञाकाकरदेना यह कि जो कुछहमनेलिखा सो धागेकोभी कोई(भद्रनृपति) नहींमेट किंतु इसलिखेहुयेका शिष्टमार्ग सवकोई पालनकिये जाये इसप्रकार सर्वथा उसपत्रको संपन्न किये पीछे (स्वमुद्रोपरिचिद्वितम)अर्थात् अपनी राजकार्यसंबंधी मुहरसे लिखावटकेऊपर भिन्नकिसी योग्यस्थलपर चिह्नितकहिये अंकितकरदेवै३१८॥३१९॥ अधि०-(पार्थिवःस्वयंकुर्यात्) इस कथनसे संधिविग्रह अादि करनेवाले किसी- न्यमंत्री श्रादिको इसवातमें अधिकार नहीं सोई यहस्मृतिभी प्रमाणहै कि(संधिविय हकारीतुभवेद्यस्तस्यलेखकास्वयंराज्ञासमादिष्टःसलिखेद्राजशासनम्)अर्थात्-संधि- विग्रह करनेवाला कोई मंत्री आदि जो उसका लेखकहो सो निज राजाकरके ठीक आज्ञा पायाहु राजशासन लिखे-किंतु राजाकी अधकच्ची श्राज्ञापरभी स्वातंत्र्य सेही न लिखवैठे ३१८।३१६॥

-- । मिताक्षरा समाचाराध्याय अवारोजाका निवास स्थान कहते हैं " , रम्यंपशव्यमाजीव्यंजांगलदेशमावसेतो तत्रदुर्गाणिकुर्वीतजनकोपात्मगुप्तये ३२० ऐ०-राजा-ऐसेदेशमें बसै जो (रम्य) कहिये रमणीय कितु अशोक चंपक आदिवन दक्षोंसे संपन्नहो और (पशव्य) कहिये पशुओंको हितकारीहो फितु चारा आदिकी बहुताइतसे पशुओंकी दृद्धिकरनेवालाहों और (आजीव्य) कहिये कंदमूल पुप्पफल अन्नादिनाना वस्तुवालाहो जिस्से सबका पालनहोसकै और (जांगल) हो प्रर्थात् यद्यपि जांगल देश, उसीको कहतेहैं जिसमें थोडा जल थोड़ेटक्ष थोड़ेपर्वतहों परन्तु यहां पर जांगल शब्द एक उपलक्षण मात्र केवल एकांत देशका वाचकहै अर्थात् राजाके निवासयोग्य येसाजांगल देशहो,जो वस्तीसे कुछदूर और अधिक जलवान् त्यधिक रक्षवान् अधिक पर्वतवानहो-तहां-निजमनप्योकी और कोपोंकी औरनिज आत्माकीभी रक्षाकेलिये एक अथवा अनेक दुर्गवनावै ३२० ॥ अधिः-दुर्ग उसस्थानको कहतेहैं जिसमें कोई शत्रुादिजानाचाहे तोप्रथम तो जाही नहींसकै अथवा बड़ेदुःखोसे गतिकरके पहुँचसके इसलिये दुर्गके न होनेमें राजाका निर्वाह नहीहोसक्ता-क्योंकि(अदुगोंविपय कस्यनारेःपरिभवास्पदम्।अदुर्गों ऽनाश्रयोराजापोतच्युतमनुप्यवत्) अर्थात्-विना दुर्गका राज किस राजाका,निजशत्रु के पहुँचायेहुये पराभवका ग्रास्पद नहीं होजाता इसलिये विनादुर्गके अनाश्रयभूत - राजा ऐसा गिनाजाता,जैसा जहाजसे गिराहुआ मनुष्य विनाश्रय होजाताहै-म- स्यपुराणके १९१ अध्यायमें दुर्गरचनाकी अपेक्षासे यह कहाहै कि(दुर्गचपरिखोपेत वप्राहालकसंयुतम्।शतप्नीयंत्रमुख्यैश्वशतशश्चसमास्तम्-गोपुरंसकपाटंचतत्ररया सुमनोहरम् । सपताकंगजारूढोयेनराजाविशेत्पुरम्)अर्थात्-दुर्गभीसब बोरसे खाई करके युक्त और वप्रनाम मट्टीके ऊंचे टीले दमदमे जो मोरचाओंके योग्यहों और अहालक नाम-अटारी अंटे और ऊंचेऊंचे बुरज इनसेभी संयुक्तहो और शतधाम- कारकी शतघ्नी नाम तोपों और यंत्रचरख आदि सवचीजोंसेभराहो-तिसदुर्गमे गो- पुर कहिये हारफाटिक सहित सुन्दरमनका हरनेवाला और इतना ऊंचाहो-जिसमें होकर हाथीपर सवारहया राजा निशानोंसहित दुर्गपुरमें प्रवेशकरें-दुर्गभी छःप्रका- रके होतेहैं सोई मनुजीते उनके यहलक्षण कहे कि(धन्वदुर्गमहीदुर्गमब्दुर्गवायमेव चीनदुर्गगिरिदुर्गचसमात्यावसेत्पुरम् ) अर्थात्-इनछ में से कोईसा एकदुर्ग,अपने वासपुरके प्रति सपोरसे घेरादेकर निवासकरै-तिनमें एकतो (धन्वर्ग) उसे कहतेहैं जो अपने निवासपुरके सवोर पाँचयोजन भूमिपर्यंत मरुदेश निर्जलहो वहांभी बडे दु खोसे पहुँचना होताहे जैसा बीकानेर आदि मारवाड देश मरुभूमि प्रसिद्धहें १.दूसरा (महादुर्ग) उसे कहतेहैं जोपत्थरईटसे बनायाहुआ हादशहाथ ऊँचाकोटसर्व -- -- " मिताक्षरास.'चाराध्याय २६७ ओरसे घेराहुया वहुँ विस्तारवाला युडके हेतुसे ऊपर सेनाके फिरने योग्य प्रति चौड़ाकोट जिसमें साधारण अनेक भांतिके गवाक्षझरोखेभी बनेहीं सुन्दर कपाटों सं- हित द्वारहो जैसे दिल्ली यांगरा आदिके किले रतीसरा (अब्दुर्ग) उसे कहते हैं जो सब ओर अगाधगहिरेजलसे घिराहो जैसे काश्मीर और ब्रह्माके देशआदि में किले प्रसिद्धहें३ चौथा (वादुिर्ग) उसे कहतेहैं जो सब पोर रक्षोंसे घिराहो जैसा रुहेलोके रामपुरमें वांसाका घेरा और कटियारी मुल्क अवधमें बवूरोंका पांचवां(नदुर्ग )उसे कहतेहैं जो चार प्रकारकी सेनासे चाहे तिसमैदानमें रेचना करिके बांधिनिया जा- ताह जैसे महाभारत और भोजप्रबंध आदि ग्रंथों में विशेषकर चक्रव्यूह शकटव्यूह पद्मव्यूह आदिनाना भांतिसे कहे और लोकमेंभी युद्धसमय बहुधारचेजाते हैं उस- को चाहे सदैव कोई उसीप्रकारसे बनाकर उसमें निर्भय वासकरतारहै तौ स्थावरदुर्ग बनानेकी जरूरत नहो क्योकि यहजंगमदुर्ग इसीसे कहलाताहै कि इसको चाहे तहां उठाकरलेजासक्तेोबरन ऐसे राजा सदेव इसीदुर्गसे निर्वाहकरते किजो किसी प्रबल के भयसे बनमें भागे फिरतेहैं।५ छठा (गिरिदुर्ग) उसको कहतेहैं जो सब योर पहाड़ोंसे घिराहो जैसे नैपाल और जयपुर अादिकेदुर्ग प्रसिद्धहै ६-यद्यपिदुर्ग सभीश्रेष्ठहे पर इनमें छठा गिरिदुर्ग सबसे उत्तम होताहे-यथा(एपहिबाहुगुण्येनगिरिदुर्गविशिप्यते) इनमें (धन्वदुर्ग) के रहनेवाले तो मरुमृगोके समान निर्भयगिने जाते, १ (महीदुर्ग) के रहनेवाले ऐसे निर्भय कहलातेहैं जैसे बिलमें रहनेवाले जीवोंको शत्रुनहीं पीड़ादेस- सा(जलदुर्ग)के रहनेवाले ऐसे निर्भय कहलातेहैं जैसे जलचरजीव जलमे निजशत्रु के वशमें नहीं आते३ (वृक्षदुर्ग)में रहनेवाले ऐसे निर्भय कहलातेहैं जैसे सक्षोंपर वसने वालेजीव किसीके वशमें नहीं आतेष्ट (सेनादुर्ग) के रहनेवाले इतना निर्भय कहलातेहैं जितना मनुप्य अपने मनुप्यत्वसे-किमीअन्य जीवके वशमैं नहीं पाता ५ (गिरिदुर्ग) केरहनेवाले इतना निर्भय कहलाते जैसे देवता स्वर्गमें बैठेहुये मनुप्यके वैशमें नहीं आसक्तेहैं इसीसे गिरिदुर्गसबसे उत्तम कहलाताद-तथाच (त्रीण्याद्यान्याश्रितास्त्वे पांमृगगर्ताश्रयापचराः । त्रीण्युत्तराणिक्रमश प्लवङ्गमनरामराः यथादुर्गाश्रयानेतान् नोपहिसंतिशबव तथारयोनहिसतिनृपंदुर्गसमाश्रितम्)यह बडाई दुर्गमें रहनेवालों की रक्षामध्ये लिखीगई अव.आगे दुर्गद्वारा कामोंकी सिद्धिवर्णन करतेहैं मनुजीके कथनसे-यथा(एकःशतंयोधयतिप्राकारस्थोधनुईरः। शतंदशसहस्राणितस्माहुगंवि- धीयते-तत्स्यादायुधसंपन्नंधनधान्येनवाहनेःब्राह्मणैःशिल्पिभित्रैर्यवसेनोदकेनच-न स्यमध्येसुपर्याप्तंकारयेद्ग्रहमात्मनः । गुप्तंसर्वर्तुकंशुभ्रंजलरक्षसमन्वितम्) अर्थात्- प्राकारमे बैठा हुश्रा धनुपधारी एकही वाहरले सो मनुप्योकेप्रति लढताहै एवं प्राकार में बैठेहुयोमतुप्योका सैकरा ऍक बाहेरले दशहज़ारोके साथ लड़सताहे तिसकारण मिताक्षरा स० पाचाराध्याय। से दुर्गबनातेहें-वह दुर्गशस्त्रों से संपन्नहोवै तथैव धन धान्य और चतुप्पदादि बाह- नों और ब्राह्मणोंसे और शिल्पिनाम कारीगरोंसे अनेक यंत्रोंसे और यवसनाम घा- सफूस भूसाआदिसे जलसेभी संपन्नहोना चाहिये-तिसके मध्यमें अपने रहने योग्य सुपर्याप्त कहिये बहुत ठीक रचनावाला विस्तारवान् घरवनयावे-पुनि-यह स्थानभी सब ओरसे (गुप्त) हो अर्थात् खाई अंतर कोट छारदीवारी आदिकी रक्षातथा सेना को तैनाथी आदिकी रक्षाओंसे सुरक्षित और अगम्यहो और (सर्वर्नुक) हो किन्तु वर्षा शीत आतप आदि सभी ऋतुकी श्रारामयोग्यहो और (शुध) कहिये अतिनि- मलहो जलों और वृक्षोंसेभी संयुक्तहो यह मनुजीने कहाथा-इसभांति निर्मित किये हुये दुगोंके(अध्यक्ष) कहिये अधिष्ठाता और उन्हीके उपलक्षणवान् रक्षकभी जैसेहोने चाहिये तिनके लक्षणकहतेहैं-यथा(अनाहाय॑श्चशूरश्चतथाप्राज्ञःकुलोद्गतः।दुर्गा- ध्यक्षःस्मृतोराज्ञस्तद्युक्तःसर्वकर्मसु)अर्थात्-राजाका दुर्गाध्यक्ष पेसा होनाकहाहै जो प्रथम तौ (मन्-माहाय्य) हो किन्तु जिसे कोई घेरकरपकड़ नसक्ताहो ऐसेपराक्रम और चालांकी वालाहो और युद्धकरनेमें विख्यात शूरमाभीहो तथैव (प्राज्ञ) कहिये अति- चतुरहो और कुलोद्गतहो किन्तु प्रथम तौ राजाकेही कुलकाहो अथवा किसी ऐसे उत्तम कुलकाहो जो अपने कुलमै सर्वोपरि अंकुशरूप नियमित कियागयाहो-जोर लक्षण इसमें कहे वेही इसके आधीनकी सेनामेभीहों अर्थात् ठेठदुर्गकी रक्षासंबंधी सेनाके सभी लोग इसभांतिके चुगमाहों ३२०॥ तत्रतत्रचनिष्णातानध्यक्षान्कुशलाञ्छुचीन् । प्रकुर्यादायकत्तिव्ययकर्मतुचोद्यतान् ३२७॥ ऐ०-(तत्रतत्र) जहांके तहां ठौरठौर अर्थात् धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष संबंधी कार्योंमें श्रेष्ठ (मध्यक्षों) को नियतकरै जो उन्हीं कामोंके करनेयोग्यहाँ १-सो कैसे अध्यक्षोंको नियतकरै (निष्णातान् ) अर्थात् जो उसीएक अपने व्यापारमें तत्परहों कितु बहुधं- धी न हों जिस्से उनका चित्तएकाग्रन होसकैरपुनि (कुशलान् ) अपनेसंबंधी कामोंकी प्रक्रियामेभी प्रवीणहों३-और (शुचीन् ) अर्थात् चार प्रकारकी उपधा जिनका चर्चा ३११ की अधिकोक्तिमें आयाथा तिनसे शुधेहुयेहों-पुनि (पायकर्मात-उयतान्) अ- र्थात् आय कहिये लाभसंबंधी कर्म जो सुवर्णादि उत्पत्तिके (भाकर) स्थानों पर श्रा- वश्यक होतेहैं तिनके (अंत) कहिये निकट जाकर निज २ कामकी अवेक्षामें उद्यतरहें किंतु उपस्थित वनेरहाकर ऐसा उनका स्वभावहो ५-पुनि (व्ययकर्मतु-उयतान्) अ- र्थात् सुवर्णादि अन्नादि शस्त्रादिके खर्च करने किंतु देनेवाले कामोंपर उपस्थित रहने वालेहोंद-ओर(च)शब्दके अभिप्रायसे(प्राज्ञत्वयादिगुणयोग्यतासेमीसंपन्नहों३२१॥ “भधिः-ऊध्वक्तिवातोंका निर्णय-उपर कहाथा कि धर्म,अर्थ,काम, मोक्ष संबंधीका- योंमें जो लोग उन्हींकामोंके योग्यहाँ तिनको नियतकरे सो कहते हैं-यथा (धर्मकृत्येषु - मिताक्षरा साचाराध्याय। २६९ धर्मज्ञानर्थकृत्येपुपंडितानास्त्रीपुक्लीवांन्नियुजीतनाचानिये'कर्मपु)अर्थात्-पंचयज्ञादि और दानादि धर्म संबंधी कार्योंके स्थान धर्मज्ञोंको अधिष्ठाताकर (मौर) अर्थकृत्य कहिये धनकी श्रामदि संबंधी कार्यों में पंडितोंको अर्थात् शास्त्र और लोकसेभी अ. तिचतुरोंको कि जो हानि लाभकी विवेचनामें समर्थहों (और) काम संबंधी कार्योंपर' अर्थात् स्त्रियोंकी रक्षा और पालन आदि स्थानों में क्लीवोंको किंतु जो नपुंसकहों तिन कोही अधिष्ठाता करै (मौर) निंद्य यद्वा मलीन कामोंके स्थान नीच जाताको अध्यक्ष बनावै-तिसपर चे पापभी उनकार्यों में कुशल कहिये प्रवीणहों यहकहाथा-तद्यथा-(यो यत्रकुशलःकार्येतंतत्रविनियोजयेत् । कर्मस्वदृष्टकर्मायःशास्त्रज्ञोपिविमुह्यति) अर्थात्- जोर मनुष्य जिसकार्यमें निपुण और प्रवीणहो उसीको उसकार्य में आरोपितकरै, क्योंकि-कौमें जो अष्टकर्मा होता वहशास्त्रज्ञभी विमोहित होजाता अर्थात् जिसने किसी कामका ढंगकेवल उसकामके विधिनिषेधरूप शास्त्रद्वारापढ़ा और समझाभी यद्यपिहो पर उसकामको करतेहुये कभीनदेखाहो तौवह ऐसाशास्त्रज्ञभी अदृष्टकर्मा होनेके हेतुसे उसकामके करने या करवानेमें विमोहितहोता अर्थात् घबराता और उसका जीउलझताहै (च) शब्दकेअभिप्रायसे प्राज्ञत्व आदिगुण योग्यता जोऊपर कहीथी-सायथा-(प्राज्ञत्वमुपधाशुद्धिरप्रमादोभियुक्तता। कार्येपुव्यसनाभावःस्वामिभ क्तिश्चयोग्यता) अर्थात् (प्राज्ञत्व) कहिये चतुरता-और उपधाशुद्धि जैसी ३११ की अधिकोक्तिमें कहचकेंहें तिसका होना-ौर (मप्रमाद) कहिये गफ़लत वा असावधा- नीका न होना-और (भभियुक्तता) कहिये जिसकाम पर लगायाजाय तिसमें तत्परव- नारहना-यौर (कार्येपु-व्यसनाभावः) किंतु निजसंबंधी कार्यों में व्यसनका अभावकहिये न होना सो इसबातके कई सिद्धांत, तिनमें एकतौ यह कि जिसकामको अपनेस्वा- मीके लिये करता या करवाताहो उसी कामका व्यसन अपनेलियेभी उत्पन्न करिके उसकामको जुदानिज अपनेलिये प्रारंभकरलेना किसीलाभकी दृष्टिसे दूसरा यहकि उसकामकेकरने या करवाने में व्यसन कहिये विपत्तिझगड़ा टेंश विघ्न उपद्रव आदि बारम्बार खड़े करदेने-तीसरा यह कि उसकार्यके सिवाय अन्य कामों में प्रात्मीयव्य- सन उत्पन्न करलेने-इत्यादि अनेक सिद्धांतरूप व्यसन जिसमें न हों किंतु चित्तकी एकाग्रतासे उसीकामकी साधनामें तत्परवनारहै-इनकहेहुये शुभगुणोंका होना उस मनुष्यकी योग्यता अर्थात् लियाकत कहलातीहे ३२१ ॥ नात.परतरोधर्मोनृपाणायद्रणार्जितम् । विप्रेभ्योदीयतेद्रव्यंग्रजाभ्यधाभयंसदा ३२२ ॥ यमाहयेपुवध्यतेभूम्यर्थमपराङ्मुखा । भकूटेरायुधैर्यातितेस्वर्गयोगिनोयया ३२३ ॥ ऐ०सहद्दयोः-पहले ३१४ श्लोकसे लेकर सामान्य धनों और भोगोंका दान फल कहाथा अब यहांपर विक्रमार्जित धनोंकादान फल विशेप कर कहतेहैं कि-राजायों ६८ २७० मिताक्षरा साचाराध्याय। को इस्से अधिक परतर धर्म और कोई नहीं जो विप्रोंको (रणार्जित) कहिये रणके द्वारा संग्रह किया धन और प्रजाओंको अभयदान संदेव दियाजाताहै ३२२ रणमें विपत्तिभी आपरतीहै फिर कहांसेधन और दान या धर्महोसक्ताहै किंतु न जाने पीछे क्याहो इसलिये कुछ न करनेमेही कल्याण है इस हेतुसे कहते हैं कि-ये भूपालभूमि आदिरत्नोंके अर्थ(माहवेपु)कहिये युद्दोंमें(वघ्यंते) मारेजातेहैं ते उसप्रकार सुखसे स्वर्ग को जातेहैं जैसे योगाभ्यासमें रतहोतेहुये योगीपुरुप चलेजातेहैं परन्तु वेही कि जो (अपराइमुखा) अर्थात् सन्मुख होकर मारेजातेहैं किंतु महँफेरकर भागतहुये जो पीछे शस्त्रखाते हैं वे नहीं और वेभी कि जो आप (अकूटशस्त्रों) से लड़तहें किन्तु ये विपद- ग्धआदि नानाकूट शस्त्रोंसे वधकरते ते नहीं ३२३॥ अव साधारण सभी युद्धकारियोंका धर्म कहतेहैं । पदानिक्रतुतुल्यानिभग्नेष्वविनिवर्तिनाम् । राजासुरूतमादनेहतानांविपलायिनाम् ३२४ ॥ ऐ०-भग्नेपु-अविनिवर्तिनाम्-पदानि-क्रतुतल्यानि-इतिपूर्वार्दसंबंधः-अर्थात् हा- थी घोड़ा रथ पदातीरूप अपने बलोंके भग्न होजाने किंतु सेना भंग होजानेमें जो कोई,धैर्यवान् होकर अविनिवर्तीहोते अर्थात् उलटेनहीं फिरते किन्तु शत्रुओंके स- न्मुख लड़ते चले जाते तिनके जातेहुये एकरपग अश्वमेधादि यज्ञोंके तुल्य फल देनेवाले होतेहैं-इस्से विपरीत करनेमें दोपहै सो पिछले श्रद्धासे कहतेहैं कि-विपला- यिनां-हताना-सुकृतं-राजा श्रादत्ते अर्थात् पराङ्मुखहोकर भागतेहुये मारेजानेवालों का पुण्यपहला संचित कियाहुयाभी राजालेलेता है ३२४॥ परन्तु अग्रोक्तोंको मारनेमें निषेधहे सो कहतेहैं। तवाहंवादिनीवनितिपरसंगतम् । नहन्याहिनिवृत्तंचयुद्धप्रेक्षणकादिकम् ३२५॥ ऐ०-किंतु इतनोंको कदाचित्भी न मारे एक तो (तवाहंवादिन) अर्थात् जो यहकह कर श्राधीन होनेलगै कि मैं तुम्हाराहूं १ (क्लीव) नपुंसक जोयुद्धके भयसे भिन्नछिपता फिरताहो२ (निहति) निःशस्त्र जिसके हाथमें शस्त्रनहों या हो और उसने फेंकदियेहों या युद्धकरतेहुये गिरगयेहों किंतु किसीतरहसे निहत्थाहो३(परसंगत) जो और किसी से लड़रहाहो ४ (विनिन) जो लडतेहुय भागपड़ाहो या लड़ाईसे हाथ खींचाहो.५ (युद्धभेक्षणक) जो युद्धका तमाशा देखरहाहोद (मादिकम् ) इसादिशब्दसे देखनेवाले को आदिलेकर औरभी अनेक संग्रहीतह तिनका चर्चानाचे अधिकोक्किमें ३२५ ॥ अधि०-ऊोक्त-आदि शब्दकासिद्धांत(गौतमजी) के वाक्यसे अपेक्षितहे-यथा-(न दोपोहिंसायामाहयेऽन्यवाश्वसारथ्यनायुधकृतांजलि।प्रकीर्णकेशपराङ्मुखोपविष्टस्थ लरक्षारूढ़दूतगोब्राह्मणवादिभ्यः) अर्थात्-(गौतम)ऋापिने यहकहाथा कि रणमेंहिंसा का दोष नहीं है परन्तु इनक सिवायाकतु घोडा सारथीरअनायुध-निहत्था३कृतां- .

मिताक्षरा स० पाचाराध्याय । २७१ जलि-हाथ जोड़ताहुआ ४ प्रकीर्णकेश-जो अपनी दाढ़ी हाथमें लेकर भागेकरै कि चाहै मारौ चाहै छोड़ी और वहभी प्रकीर्णकेशहे जिसकी आंखों आगे शिरके वाल या वालोंके उपलक्षणसे कुछवस्त्रादि प्रांडहो जिसके हेतुसे वह तत्काल अपने हताको देखनहीं सक्ला५ पराङ्मुख-जिसने लड़ाईसे मुँहफेरलिया६उपविष्ट-बैठाहुया ७ स्थलारूढ़-जो युद्धभूमिसे अलहदे किसी स्थलमें खंडाहो तिसको यहा वाहनसे उतराहुआ भी स्थलारूढ़ कहलाता उसको वाहन पर सवारहुआ नहीं मारै यहधर्म युद्धकीमर्यादहैरक्षारूढ़-जो टक्षपरचढ़ाहोदूत-जो चिट्ठी या ज़बानीखवरलायाहो १०गो-गऊ या पभ और उपभकेउपलक्षणसे अन्यभारवाहभी११ब्राह्मण-साधारण मात्रभी परन्तु जो सन्मुख युद्धनकरताहो १२ वादी-जो लड़ाईको थाँभकर तर्कवादमें तत्परहो १३-अर्थात् इनको मारनेसे रणमेंभी हिंसादोप लगताहै-इसवार्तामध्ये कुछ विशेषतासे(झारखाचार्य)ने भी वर्जित किये हैं-यथा-(नपानीयंपिवंतन जाननोपानहाँम चंतनावणिंनसवर्माणं नस्त्रियनकरेणुंनवाजिनंनसारार्थ नदूतंनब्राह्मणंनराजानमरा जाहन्यात्-अर्थात-एक तो पानीआदि कुछपीतेहुये को नमारे न जान-खातेहयेको भी नहीं२ नोपानहाँ{चंतं-जूताउतारतेहुये और इसी उपलक्षणसे पहिरतेहुयेकोभी नहीं३ नावणं-जिसने कवच उतारदियाहो तिसको नहीं? नसवाणं-कवचपहिर- तेहुयेको नही५ नस्त्रियं-स्त्रीको नहीं६ नकरेणु-हाथीको नही७ नवाजिन-घोडेको नहीं ८ नसारथि सारथीको नहीं९ नदूतं-दूतको नही १० नब्राह्मणं ११ (नराजानं अराजा .. हन्यात्) अर्थात् राजाको सन्मुख युद्धकरतेहुयेको भी राजाही अपने हाथसेमारै परंतु जो राजा नहीं किन्तु राजाका नौकर मात्र कोईहो सो प्रतिपक्षी राजाको मारे नहीं अर्थात् पकडलेना यह जुदीबातहै पर उसपर शस्त्र नहीं डाले क्योंकि राजा साक्षात् ईश्वरकारूप होताहै ३२५॥ अब दरवार आदि धंधोंका नियम कहतेहैं। कृतरक्ष समुत्थायपश्येदायव्ययोस्वयम् । व्यवहारांस्ततोदृष्ट्वास्नात्वा जीतकामतः ३२६ ॥ हिरण्यंव्याप्टतानीतंभांडागारेपुनिक्षिपेत् । पश्येच्चारांस्ततोदूतान्प्रेपयेन्मंत्रिसंगत. ३२७॥ ऐ०सहद्वयोः-(कृतरक्षा-समुत्थाय) रक्षा किया हुआ किंतु यथा संभव सिपाहियों की रक्षासे संपन्न ऐसा दिनप्रति प्रातःकाल उठिकर (मायव्ययो-स्वयं-पश्येत्) लाभ और खर्च दोनोंका लेखा जोखा आपदेखै (ततः) तिसपीछे (व्यवहारान् दृष्ट्वा) मुकद्दमातके इंसाफोंको देखभालकर मध्याह्नसमय यहा (कामतः) जिस किसीसमय अपनी इच्छा हो तव (स्नात्या-मुंजीत) स्नानकरिकै भोजनकरे ३२६ तिसपीछे (दिरण्य) कहिये सोना चांदी अादि जो कुछधन (व्याप्टतानीत) किन्तु (व्याप्टतैः मानीत) अर्थात् व्याटतोंकरके लायाहुआ उक्तधन याप देखकर (भादागारेप) भंडारोंमें (निक्षिपेत्) डालदेवै किन्तुरख 16 २७२ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । देवे या रखबादेवै जैसा उचितहो च्याप्टतोंका लायाहुअा अर्थात् व्याप्त उन्हें कहते हैंजो धनके उत्पत्ति स्थानोंपर अधिकारी नियत किये जाते हैं-यह कामकिये पीछे (चारान्-पश्येत्) चार नाम गूदचर किन्तु मुखविरखुफिया जो विश्वासकिये और कहीं भेजेहुये गूढसत्तांत लेकरआयेहों तिनकोदेखे अर्थात् उनकोदेखकर कहींटिकावै और पीछे किसी उचित समयपर उनकीवात बूझे सो इकल्ला आपनहीं किन्तु (मंत्रितंगतः पश्येत्) मंत्रीके साथ होकर देखेझै ततः तिसके अनन्तर मंत्रीके साथहुआ राजा (दूतान-प्रेपयेत्) दूतोंको भेजै अर्थात् अन्यत्रभी जरूरी कामोंको जहां भेजनाहो और पूर्वोक्त गूढचारोंकेभी कहेहुये रत्तान्त का सढ़-निश्चय करनेको दृतभेजे जो उचित समझै ३२७॥ - अधि०सहयोः-पूर्वश्लोकमें व्यवहारोंका देखनाकहाथा सोतो व्यवहाराध्यायआदि व्यवहारांगरूप शास्त्रोकेअनुसारदेखे-उक्तंच(व्यवहारान्नपःपश्येहिद्रिाह्मणेस्सहाध भशास्त्रानुसारेणक्रोधलोभविवर्जितः)-अर्थात्-राजाक्रोध और लोभीकोछोड़कर धर्म- शास्त्रके अनुसार व्यवहारोंको देखे पर इकल्लानहीं किन्तुविद्वान्ब्राह्मणों और मंत्रियों को साथलेकर देखे ३२६ (चार) और दूतोंका चर्चा कियाथा तिनमें चार का दूसरा नाम (प्रणिधि)कहतेहैं उसीको गूढ़चर भी कहते हैं इसहेतुसे कि वह छिपकर अन्य राज्योंका भेदभाव और अपने राज्यकाभी साराटत्तांत गूढरूपसेचल फिर लेत्राता हे-इसप्रणिधिमें इतनेगुणहोनेकहेहें नीतिवाक्यामृतमें-(अमोढयममान्द्यममृपाभाषि त्वमभ्यहकत्वंच)-अर्थात्-जिसमें मढ़तामन्दताअसत्यभापिता नहीं और(मभ्यूहकरन) कहिये प्रत्येक वार्ताको ऊहासेही पहँचानलेना यहप्रकृतिहो इसके विशेपलक्षणदेखी आगे३३१ की अधिकोक्तिमें-दूत उनको कहतेहैं जो किसीराजाके समीप प्रत्यक्षभाव से प्रकटभेजे जायें परन्तु यहतीन प्रकारके होते हैं तिनकेनाम-यथा-निसृष्टार्थ १ सं- दिष्टार्थ२ शासनहर३-तहां-(निसष्टार्थ) वे कहलातेह जो राजकार्योंको देशकालके श्री- चित्य अनुकूल प्रापही कथनकरने में समर्थहों किन्तु किसीकामकी श्राज्ञानाम मात्र सेही मिलनेपर तत्काल उसकामके करनेवालोंको अपनी बुद्धिसेही यथायोग्य सम- भादिया अथवा जहांकहीं आपही भेजेगये तो वहांजाकर सवउत्तर प्रत्युत्तर अपनी प्रज्ञासे आपही साधन करिआये वरन अन्त्य सिद्धांत इनका यहीहै कि विनाधाज्ञा भी देशकाल के अनुकूल योग्य कामोंका साधन स्वतःकरसके(संदिष्टार्थ)वे कहलाते हैं कि जितनीवात उनको आदेश पूर्वक सुनादीगई उतना संदेशा जाकर कहसुना देवें उसको कि जहांभेजेजायें २(शासनहर)वे कहातेहैं कि जिनको मुखसेतो सुनीहई भी कहलानेमें चतुरता नहीं परन्तु लिखेहुये आज्ञापनों को पहुँचास ३-इन दूतों के गुण और लक्षणभी पहले मनुजीके कहे दर्शातह-यथा-(दूतंचैवप्रकुर्वीतसर्वशास्त्र २७३ :- 'मिताक्षरा साचाराध्याय। विशारदम् । इंगिताकारचेष्टज्ञशुचिंदक्षंकुलोद्गतम्) अर्थात्-राजा ऐसे पुरुष को दूत नाम वकीलबनावैजो सर्वशास्त्रों, किंतु देखेबिनदेखेभी नीत्यादिअर्थशास्त्रोंकेसमभने में बुद्धि विशारद हो पुनि (इंगित-प्राकार-चेष्टज्ञं )इन तीनवातौकाज्ञाता तहां(इंगितज्ञ जो मनोगत अभिप्रायमात्र का सूचन करनेवाला बचन स्वरादिसे और (माकारज्ञ) जो मुख प्रसन्नता मुखमलीनता आदि देह धांकी समस्या से वातको पहँचाने और (चेष्टज्ञ) हाथ उँगुली नेत्र आदिके इशारे से तत्त्ववार्ता को सूचन करसकै और (शुचि) जो धन तथा स्त्रीव्यसनसे शुद्धहो(दक्ष)चतुर हो और कुलोद्गतभीहो किंतु यातौ राजा केही कुलकाहो यद्वा किसी प्रतिष्ठित.कुलका हो क्योंकि. (अनुरक्तःशुचिर्दक्षःस्मृति मान्देशकालवित् । वपुष्मान्वीतभीर्वाग्मीदूतोराज्ञःप्रशस्यते) अर्थात्-राजाका दूत ऐसा उत्तम होताहै जो(अनुरक्त हो किन्तु अपने स्वामीके सिवाय सभीमनुप्योंमें स्नेह करनेवाला हो जिस्से किसी राजाकेपास भेजाजाय तो वहां बातों २ टेप नहींकरलेवे और(शुचि)जों धन तथा स्त्री व्यसनसे शुद्ध होवै जिस्से कोई प्रतिपक्षी राजा उसको धन या स्त्री देकर लोभसे तोड़नहींलेवै और दक्ष)चतुरहोना इसलिये योग्यहै कि काम को और कामके समयको उलाँघे नहीं और(स्मृतिमान् होना इस्से उचितहे कि सीख पायेहुये संदेशेको यादरक्खै इत्यादि किसीवातको भूलैनहीं और(देशकाल)का जानने- वालाइसलिये कि देश और कालंको पहँचानकर कुछ अपनीवुद्धिसभी जैसा उचित समझै कइसकै इसीलिये प्रत्यक्ष देशों और कालौकी व्यवस्थाभी सीमा आदिवा श्राचार आदि सार्वदेशी व्यवहारों को यथावत् रीतिसे जानताहो किन्तु शास्त्र और लोकसेभी जिस्से देशकालके अनुकूल किसीवात्त में अनुत्तरन होजाय-और(वपुष्मान्) अर्थात् अच्छे डीलडौल स्थूलदेह सुरूपवान् वा निरोगीभीहो जिस्से उसका वचन शीघ्रहृदयमें स्वीकारहो और निरोगतासे किसीकामको अधकच्चाछोड़कर नहींभाग- और (वीतभीः)किंतु निर्भया स्वभावहो जिस्से किसी अप्रिय संदेशकेभी कहनेमें भय- भीत न होजाय और (वाग्मी)हो किन्तु उक्तिपूर्वक मधुरभापणसे बातचीत करता हो जिस्से सुननेवालेका मन उपरामको न पहुँचै ऐसे दूतसे राजाके सवकामसिद्धहोतेहैं- मत्स्यपुराणमेंभी इसके लक्षण कहेहे-यथा (यथोकवादीदूतःस्यादेशभापाविशारदः। सक्तःशसहोवाग्मीदेशकालविभागवित्॥विज्ञातदेशकालश्चदूतःस्यात्समहीक्षितः। (तेपामपि) वक्तानयस्ययःकालेसदूतोनृपतर्भवेत् )अर्थात्-दूत ऐसाहो जो यथोक्त वादी किन्तु जो बात राजाने कहकर भेजाहो उसीबात का चर्चा बादकर, किन्तु उस वातको छोड़कर कोई नईवात न खड़ी करलेताहो ऐसा स्वभावही उसका सदेवहो. अनेक देशभापानोंके बोलने और समझनेमें विशारदहो क्योंकि अनेक देशोंमेंजा- ना परैगा जहां की भिन्नर भापाहोती हैं (सक्त) हो किंतु कामोंमें लगारहताहो (क्लेशों) २७४ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। कोभी सहलेनेमें पक्काहो क्योंकि देशविदेश जानेमें क्लेश अवश्यहोतेहैं (वाग्मी) हो इसके लक्षण ऊपर कहचुके हैं (देशविभागवित्) भूगोल आदिके द्वारा देशोंकी सीमा आदि अनेक विभागोंका जाननेवाला (कालविभागवित) तीनों कालका विभाग किंतु भूत भविष्य वर्तमानमें पलघड़ी आदिसे लेकर युगों पर्यंतका गणित हिसाव और राजाओंके शकसंवत्सर और वितीत राजाओंके मितिग्रंथ अर्थात् तवारीखोंकाभी जानने वालाहो-इसके सिवाय (विज्ञातदेशकाल) हो अर्थात् समयरका वर्तावासर्वदेशों और कालोंकी रीतिभांति मर्यादें यहभी सब जानी सीखीहों सोमनुप्य राजाकादूत हो(तिनमेंभी)जो कोई उपस्थितसमयपर तत्काल नयनीतिका वक्ताहो सोठेठ नृपति का समीपवती दूतहोवै-जिसके द्वारा अन्य देशों के आये हुये विराने दूतों से वार्ता- लाप राजाकरै किंतु निजअपनेही मुखसे नहीं-चाणक्यमें भी इसके लक्षणकहेहें यथा (मेधावीवाक्पटुःप्राज्ञःपरचित्तोपलक्षकः । धीरोयथोक्तवादीचएपदूतोभिधीयते). र्थात् (मेधावी) बुद्धिमान्हो (वाक्पटु किन्तु जिसकी वाणीमें लावण्य और चतुरताहो (प्राज्ञ) पंडित विवेकीहो-और पराये चित्तकी भावना लखसक्ताहो (धीर) धैर्यवान्हो (यथोक्तबादी) भीहो इसकेलक्षण ऊपर कहचफेहें-यहदूत कियाजाताहै-दूतोंकी महिमा बारम्बार इसलिये कहनीपरी कि दूत राजद्वारों में बड़ी पदवीका मनुप्यहोता और संधितथा विग्रह यह दोनों बात इसकेहाथमें रहती हैं इसीलिये (मनुजीने) कहाहै कि (थमात्येदंडायत्तोदंडेवैनचिकीक्रिया । नपतौकोशराष्ट्रेचदूतसंधिविपर्ययोदतएव हिसंधत्तेभिनत्येवचसंहतान् । दूतस्तत्कुरुतकर्मभियंतेयेनवानेवासविद्यादस्यकृत्येषु निगूढेगितचेष्टितेः । आकारमिनितंचेष्टांभत्येपचचिकीर्पितम् ॥ तथाप्रयत्नमातिष्ठेद्य थात्मानंनपीडयेत्)३२णाअर्थात्-दंड जो वस्तुहे सोतो (अमात्य)नाम सेनापतिकेा- धीनहै किन्तु हाथी घोड़ा रथ पयादे यह चतुरंगिनीसेना और शस्त्र जो हैं सोईद्डरूप हैं सो उसके आधीनमें सौंपेहये रहते हैं इसलिये दंडसंबंधी कामोंमें उसकी योग्य- तादेखी चाहिये क्योंकि(दंडे-चैनयिकीक्रिया) अर्थात् यावन्मात्र विनयक्रिया किन्तु जोर नीति संबंधी प्रबंध हैं सो सवदंडके आधीन हैं दंडविनावशमें नहीं आसक्ते इस- लिये उसका होनाभी सूचितहे-और कोशधनकास्थान तथा राज्य देश ग्राम यहदोनों वस्तु राजाके आधीनहौती कितु औरके आधीन करदेना उचित नहीं इसलिये राजा आप इनका प्रबंधरक्खे-ऐसेही (दूते-संधिविपर्ययो) अर्थात् संधिनाम फूटेहुयोंका मि- लापकरादेना और विपर्ययनाम विग्रह फितु मिलेइयों में विरोध युद्धकरवादेना यह दोनोंवात इतके आधीन होतीहें वह जो चाहै सो गजाकीइच्छासे विपरीतभी करस- क्लाहै उसको थोड़ा नहीं समझना इसीलिये अवदूसरे श्लोकमें फिर सावधान करते और इतकी प्रशंसाभी करतेहै किंतु दोनोपनमें यहकथनहै कि ॥ दूतही फूटेहुयोंको मिताक्षरा.साचाराध्याय। २७५ मिलादेताहै दूतही मिलेहुयोंको फोड़देताहै दूतवह कर्मकरताहै परदेशमें जाकर कि जिसकर्मसे बड़ेरज्ञानमानभी आपसमें फूटजातेहें-अबतीसरे श्लोकसे दूतको शिक्षा करतेहैं कि वह दूत इसप्रतिपक्षी राजाके (कत्येपु) कर्तव्य कामोंकेमध्ये विद्यात् )भेद भावले किसप्रकारसे (निगूढ-इंगितचेष्टितैः)अर्थात् निगढ़नाम जो भितरियालोग रा- जाके समीप रहनेवाले परिजन आदि तिनकी समस्या और चेष्टानोंसे जाने क्या जानै वहांका (माकार) डौल (इंगित) मनोगत अभिप्राय(चेष्टा)कर्त्तव्यता जैसी देखपरै- और उसराजाका (चिकीर्पित) कहिये जो कुछ वहकरना चाहताहो सोउसके (भृत्येपुच) जानीयात् अर्थात् क्षोभकियेहुये अपमान पायेहुये लोभी श्रादि लघुसेवकोंके वार्ता कथनसेभी जानै अव चौथेश्लोकमें इसदूतकी अपेक्षासे-भेजनेवाले राजाको शिक्षा करतेहैं कि ॥ उसदूतके द्वारा साराहाल वहांका तत्त्वपूर्वक जानिके तैसा यत्नकरै जि- स्से अपनेको पीडा नहीं पहुँचै-किसीका भेजाहुया दूत जो अपने पासावे उसका वधकरना निषेधहै-येथा (नदंडाई प्रतिनिधिस्तथादूतोपिसुव्रतैः । नियोक्तृकृतदोपेण विधिरेपसनातनः) अर्थात्-यह सनातन विधिचली आतीहै कि सुव्रतों धर्मज्ञोंकरके प्रतिनिधि नाम मुखतार तथा दूतनाम वकील यहा संदेशहर ये दोनों भेजनेवालेके दोषते दंडयोग नहीं होते किन्तु जोआत्मीय कुछ अपराधकरवैठे तो जुदीवातहै-यतः (स्वापकर्पपरोत्कर्दूतोक्तर्मन्यतेतुकः। सदैवावध्यभावेनदूतःसर्वतुजल्पति)अर्थात्-दू- तकी उक्तियोंसे पराई उत्कर्षा और अपनी न्यूनता कौनमाने है किन्तु कोई नहीं मा- नता क्योंकि दूत अपने अवध्यभावसे निडर होकर सदैव सव कुछ कहनी न कहनी भी कहताहै-अन्यच्च (उद्यतेप्वपिशस्त्रेषुदतोक्दतिनान्यथा । नचहन्यात्तथाप्येनंराजा दूतमुखोयतः)अर्थात्-दूत अपने ऊपर शस्त्र उद्यत होनेपरभी अन्यथा नहीं कहता किन्तु जो आज्ञा लेन्यायाहै सो उसदशामभी कहेविना नहीं रहता तथापिइसको रैनहीं क्योंकि जिसहेतुसे राजा दूतमुखहोता किन्तु दूतही राजाका मुखप्रसिद्धहै फिर जब राजाका मुख तोड़दिया तो वात चीत उसके हृदयकी क्योंकर जानीजायगी-त- स्मात् (वरूप्यमंगेषुकपानिपातोमोंडयंतथालक्ष्मणसन्निवेशः। एतान्वधानहतिरूक्ष वादीशास्त्रेषदूतस्यवधोनदृष्टः)अर्थात्-किसीअंगमें विरूपता करनी-या कपानिपात चावुक आदिका मारना-या मुड़वादेना-याकिसीचिहसे दागदेना-इतने वोंके योग्य यद्यपि रूक्षवादीहोताहे तथापि शास्त्रोंमें दूतका वधकहीं नहीं देखागया रूक्षवाद पर भी इसलिये दूतको मारै नहीं ३२६।३२७॥ ततःस्वैरविहारीस्यान्मंत्रिभिर्वासमागतः । बलानादर्शनंकत्वासेनान्यासइचिंतयेत् ३२८॥ ऐ०-(तत:)दुपहर पीछे (स्वैरविहारीस्यात्) इच्छाके अनुकूल विहार करनेवाला हो किंतु चाहै अन्तःपुरमें श्राप एकाकी वार्ता विनोद करने जावै यहा वाह्यभूमि का - ४ । मिताक्षरा साचाराध्याय। (विहार) सैर करने जहां कहीं जानेकी इच्छा हो तहां विश्वास पात्र मन्त्रियों करके (समागत)किन्तु उनके मध्यमें हाधी आदि पर वैठाहुआ रक्षापूर्वक विहार करने जावे वहाँसे घूमघामकर फौजोंमेंजावै तहाँवालोंका दर्शन किन्तु सज्जीभूत अलंकृत चतु- रंगिनी सेनाओंकी गति परिपाटीआदि देखभालकर(सेनान्पासहर्वितयेत्)किन्तुसेनानी नाम सेनाका अधिपति उस्से आवश्यक वातोंका चिंतमन विचार करे अर्थात् सेना की रक्षा और शिक्षाआदिकी संमतिदेवै जैसा उचित हो ३२८॥ ( अधि०-मनुनेभी कहा है कि (विहृत्यचयथाकामंपुनःकार्याणिचिन्तयेत् ) अर्थात्- इच्छाके अनुकूल विहार कियेपीछे फिरभी कार्याका विचारकरे ३२८ ॥ . अव सायंकालसेपीछेका धन्धा कहते हैं। सन्ध्यामुपास्यशृणुयाचाराणांगूढभापितम् गीतनृत्यैश्च जीतपठेत्स्वाध्यायमेवच ३२९ ॥" .. ऐ०-वहां से लौटाहुया राजा संध्याकी उपासना करिके फिर (चाराणां-गूढभापित णुयात् अर्थात् पूर्वोक,चार गूढचर जो आयेहुये कहीं टिकाये थे तिनका (गूढभापित) किन्तु गुप्तवार्ता एकांत में सुनै फिर गीत नृत्य आदि संयुक्त यथारुचिके अनुकूल किंचित्काल विनोद कियेपीछे डोढ़ीमें,जाकर भोजन करै फिर(स्वाध्याय)को भी पढ़े अर्थात् अपना वह पाठ जिस्से रातोदिन धन्धा करने परते हों किन्तु व्यवहारांग शास्त्र आदि तिनको रात्रिमें भोजन कियेपीछे फुर्सतमें विचारै जिस्से भूलेंनहीं यहा स्वाध्याय अपने जाती नियम का पाठ ३२९ । । अधि०-चार लोगोंकी गुप्त वार्ता श्रवण करने का प्रकारभी कहा है-यथा (संध्यां चोपास्यशृणुयादतर्वेश्मनिशस्त्रभृत् । रहस्याख्यापिनांचैवप्रणिधीनांचचेष्टितम्) अ- र्थात्-संध्योपासन कियेपीछे(मंतवमनि) राजमहलोंके भीतर एकांतमेंजाकर(शस्त्रभृत) किन्तु नंगीखड्ग आदि हाथमें लियेहुये राजा उन लोगोंकी वार्तासुने जो(रहस्याख्या पी)हीं किन्तु एकांतमें संमति करनेवाले और (प्रणिधीनांचचेष्टितम) किन्तु प्रणिधिनाम चारलोगोंका चेष्टा कियाहुप्रा वृत्तांतहो सोभी इसीरूपसे सुने क्योंकि न जाने कोई कुछ विश्वासघात करनेका विचारकरियायाहो-भला जिसवातसे ऐसाखटका सम्भ- वितहै तो श्रवण करनाही अनुचितहै किन्तु न सुनना चाहिये इस अपेक्षा में कहते हैं कि सो नहीं किन्तु अवश्य सुनना चाहिये यथा (गावःपश्यतिगंधेनवेदैःपश्यंतिच द्विजाः। चारैःपश्यतिराजानश्चक्षुर्ष्यामितरेजनाः) अर्थात्-गायें किसी वस्तुको पह- चाना चाहतीहैं तो उसकी गन्ध सूघनेसे पहचानती हैं और ब्राह्मण वेदोंसे देखकर पहचानते हैं ऐसेही राजालोग चारों की बात सुनकर देशों का वृत्तांत घरबैठे देखा करतेहैं और अन्य सवसाधारण लोग नेत्रोंसेही देखसतेहैं-अर्थात्-चारलोग राजा के नेन कहलातेहैं इसीलिये (चारवत) रोजाका नामहै क्योंकि (चाराश्चर्भूपियस्य) मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २७७ यहीबात नीतिवाक्यामृतमेंभी कहीहै कि(स्वपरमंडलकार्याकार्यविलोकनैचाराश्चक्षुपि क्षितिपालानाम्) अर्थात्-अपने और परायेमंडलोंका काज अकाज भलाई बुराई जो कुछ कही होताहो तिसके देखने में क्षितिपालोके चक्षुचार लोगहोतेहैं-इसलिये चारों से अवश्यवातकरै-और पीछे जब भीतरली डौढ़ीमें भोजन करनेजावै तव किसी श्र- न्य प्रधानको सौंपजावै-तथाचोक्तं-(गत्वाकक्षांतरंत्वन्यत्समनुज्ञाप्यतंजनम् । प्रविशे दोजनार्थचस्त्रीभिरंतःपुरंसह) ३२९॥ संविशेनर्यघोपेणप्रतिबुध्येत्तथैवच । शास्त्राणिचिंतयेहुवासर्वकर्तव्यतास्तथा ३३०॥ ऐ०-भोजनकरचुकने और पूर्वोक्त स्वाध्याय पढ़े पीछे. (संविशेत्) शयनकरै सो किस समयकरै कि (तूर्यघोपेण) अर्थात् तुरही आदि वाद्योंसे शब्द होनेके साथ किंतु एकप्रहर या सवापहर रात्रिगये का गजर बजनेपर सुनतेके साथसोवै क्योंकि वहग- जर इसीलिये बजताहै कि सोरहनेकेलिये संबोधन होजाय कित अधिक जागने से भी रोगोंसे शरीर पीड़ित होजाताहै तव सभीकाम धंधे धन धर्मादिक बन्द होजाते हैं इसलिये अधिक जागभी नहीं (तथैव-भतिवुध्येच) अर्थात् उसीप्रकार तयघोषके साथ जागै किंतु चौघटिका रात्रिशेपका गजरसुनतेही उठखड़ाहो क्योंकि वह गजर इसी- लिये बजताहै कि सोनेवालोंको जागनेका संबोधनहोजाय और गजरयहा तूर्यघोष यहएक निदर्शन मात्रकहाहै किंतु जहां जैसी परिपाटीहो अर्थात् कहीं अनेक वाजन एकसाथ बजतेहैं कहीं शंखआदि कहीं केवल तुरुही कहीं केवलघंटा कहीं तोप कहीं धोंसानक्कारा नौवतयादि किसीरवोलीमें इसीको उर्दीभी कहते हैं (बुध्वा-शास्वाणिचिंत येत्) जागने पीछे शास्त्रोंका चितमनकर तथा (सर्वकर्तव्यताः) किंतु औरभी जोकुछकर. नाहो अगले दिनमें वहभी सबकरने योग्य कामधंधे उसीप्रकार फिर चिन्तमनकरै जैसे पहले दिनमें भिन्नर समझायेथे-दूसरा अभिप्राय इसका अगले श्लोकसे अ- नुकर्षपूर्वक यहभीहै कि रात्रिके पिछलेपहरे गुप्तभाव चुपकेउठिकर विश्वासपात्र शा- स्त्रज्ञोंके साथयहा एकल्लाही निज आपशास्त्रोका विचार किसी आवश्यक और सुगु- प्तवार्ताके निमित्तसे करै तैसेही अन्यभी कर्तव्यकामोंका विचार अगले दिनकेलिये उसीसमयकरलेवै सो इनदोनों बातका व्योरा आगे ३३१ श्लोकमें भिन्न रखुलजा- यगा कि पहलेअदामें गुप्तभाव चारोंका भेजनाकहेंगे और पिछले श्रद्धा में दूसरेदिन में प्रातःकालके वे धंधे कि जो पूर्वदिनके धंधोमें कहने शेपरहगयेथे सो स्पष्ट करेगे (परन्तु) पढ़नेवालेको दोनोंदिनके कहेहुये धंधेसव एकदिनका व्यवहार समझनाचा. हिये कितु किसीदिन दोकाम अधिक पानिपरतेहैं किसीदिन दोन्यनहोते परनित्यके मामूली काम सदैव एकसेहोते इसलिये दोदिनकी लपेटमें कहेहँ ३३०॥ अधिः 10-ऊपर कईश्लोकोंसे लेकर जो प्रतिदिनके आचारराजाको बतलाये गये २७८ मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय। सोनिरोगताकी दशामें समझने किन्तु विपरीततामें मुख्यमंत्री श्रादिको सौंपनामनु जीने कहा है-यथा (एतत्तंसमातिष्ठेदरोगःएथिवीपतिः अस्वस्थःसर्वमेवेतन्मंत्रिम ख्येनिवेशयेत्)अर्थात्-इसकहेहुये रत्तनाम श्राचारपरप्टथिवीपति(अरोग)स्वस्थहोकर स्थितहोवै और जो (अस्वस्थ) कहिये रोगीहोतो यहसारे काम मुख्यमंत्रीके आधीनकर किंतु किसी कामकी प्रवृत्ति नहींरोके अपनी बीमारीके हेतुसे ३३० ॥ प्रेपयेच्चततश्चारान्स्वेप्वन्येपुचसादरान् । ऋत्विपुरोहिताचाराशीभिरभिनंदितः ३३१ ॥ दृष्ट्वाज्योतिर्विदोवैद्यान्दद्योगांकांचनमहीम् । नैवेशिकानिचततःश्रोत्रियेभ्योगृहाणिच ३३२॥ ऐसहवयोः-पूर्वोक्त विधिसे रात्रिशेपमें शास्त्रोंका विचार या संमतकिये पीछेउसी जगह बैठाहुया विश्वासपान (चारों) को जहां भेजनाचाहे तहां सुगुप्तभावसे भेजे किन्तु (स्वेपु) अपने सामंत आदि अधिकारियोंपर यद्वा (अन्येषु) अन्यराजाओं पर उनका गुप्तभेद लेनेकेलिये दानमान सत्कारोंसे आदरसहित पूजित करिके भेजे पर इसवातको कोई और नहीं जाने किंतु इसीलिये रात्रिशेपमें शयनस्थान परवेठाहुना गुप्तभावसे विचारकरना पहले श्लोकमें कहाथा (ततः) तिसपीछे प्रातःकालका।सं- ध्योपासन अग्निहोत्र श्रादिकरिके-ऋत्विक्-पुरोहित-प्राचार्योंकरके आशीर्वादों से (पभिनंदित) हुया किंतु तेजोवल पायाहुया पश्चात् ३३१॥ज्योतिर्विदोंको वैद्योंको देखकर उनसे निजशरीर व्यवस्था कहसुन और उनका बतलायाहुया विधानकरने वालोको याज्ञादेकर तिसपीछे यथोक्त विधिसे चारासादिके प्रबंधपूर्वक विशेषदुग्ध- वतीगऊ और कांचन आदि और पृथ्वी और वनेहुये उत्तम घरभी और (नैवेशिका निच) अर्थात् विवाहके उपयोगी पदार्थ वस्त्रालंकारादि कन्यादानके योग्यइत्या- दि नाना सत्पदार्थ श्रोत्रियादिकोंको देवे ३३२॥ अधि०-भेजने योग्य (चार) लोगोंके लक्षण (युक्तिकल्पतरु) में अनेकधा कहे हैं यथा- (विवस्वानिवतेजोभिनभस्वानिववेगतःगनपोनिहन्याचारेणपरराष्ट्रविचक्षणः)स- यथा (तकगितजःस्मृतिमानस्वीयभावाप्रकाशकः । लेशायाससहोदक्षःसर्वभयच र्जितः।सुभक्तोराजसुतथाकार्याणांप्रतिपत्तिमान्। तथान्यानपियुंजीतसमर्थाञ्छुदचेत सः॥ कालज्ञानमंत्रकुशलान्सांवत्सरचिकित्सकाना अक्रुद्धांश्चतथालुब्धानुदृष्टार्थान् तत्वभापिणः ॥ पाखंडिनस्तापसादीन्परराष्ट्रनियोजयेत् (तेपामपिपरिज्ञान) (स्वदे शपरदेशज्ञानसुशीलान्सुविचक्षणान् । वार्ताहर्यान्वहूंश्चैवचाराणांविनियोजयेत्) यतः(नैकस्यवचनेराजाचारस्यप्रत्ययवहेत् । यो सम्बन्धमाज्ञायतद्युक्त कार्यमाचरेता तस्माद्राजाप्रयुंजीतचारानबहुमुखानबहूनानीरेतोवामनाकुजास्तद्विधायेचकारयः- भिक्षुझ्यश्चारणादास्योमालाकार्यकलाविदः। अंतःपुरगतांवातानिहरेयुरलक्षिताम्।। प्रकाशश्चाप्रकाशश्चचारस्तुद्विविधोमतः अप्रकाशोऽवमुद्दिष्टःप्रकाशोदूतसंज्ञकः) मिताक्षरा स० अाचाराध्याय। २७९ अर्थात्-विचक्षण राजा अपने शत्रुका राज (चार) द्वारा उस प्रकारसे मारे हरे कि जैसे (विवस्वान्) सूर्य अपने तेजोरूप किरणोंसे जहां जहां पाताहै सर्वत्र जलको शोपलेता है और (वेगतः-नभस्वान् इव) अर्थात् जैसे वायु अपने पवन वेगकोझकोरोंसे रक्ष वा छप्पर आदिको हर लेजाता है-तद्वत् राजा अपने चारों के बलसे कामकरै-वह (चार) भी ऐसा होना चाहिये (तर्क) और (इंगित) को जाननेवाला किन्तु बुद्धिसे ऊहा कर लेना किसीकी बात सुनकर अर्थात् अन्य सम्बन्धी वातसे निज प्रयोजनकी तर्कणा करलेना सो तौ तर्कज्ञ और इंगित किसीकी मनोगत वार्ताकी समस्या समझलेनी सो इंगितज्ञ ऐसे लक्षणवालाहो और (स्मृतिमान) हो किन्तु जो २ वात देखै सुनै सो तद्रूप याद रखसक्ता हो और (स्वीयभाव-मप्रकाशक) हो अर्थात् अपना भेद खोलने वाला स्वभाव उसका न हो जिस्से देखी सुनी वात या अपना सिद्धांत पेटमें रोक न सक्लाहो इतने गुण होनेपर भी (केश) और (भायास) परिश्रमका सहलेनेवालाहो क्यों- कि विदेशमें गये पीछे परिश्रम तौ नित्यही आवश्यकहै और बहुधा भांतिके क्लेशभी आपरतेहैं तिनके सहलेनेमें पक्काहो औरभी(दक्ष) अति चतुरहो और सर्वत्र (भयवर्जित) किन्तु भयके स्थानमें भी निडर होकर किसी बहानेसे जासला हो इसके सिवाय जो यह बात उसमें हो कि अपने किसी रंगढंग या किसी गुणके हेतुसे राजाओं मे (सुभक्त) हो किन्तु अनेक राजाओंसे आना जाना आदि मेलमिलाप ठेठ अपनी स्वाभाविक वृत्तिसे रखताहो (दृष्टांत) जैसे भाटलोग या बहुरूपिया लोग इत्यादि तो यह अधिक श्रेष्ठ गुणकारी वातहै औरभी (कार्याणां-प्रतिपत्तिमान) हो तो अधिक उत्तमहो किन्तु अपने किसी व्यापार आदि कामोंके धंधे सिद्ध करनेवालाहो जो उन कामोंके सहारे से सर्वत्र गति करसक्ताहो-अथवा कार्याणांप्रतिपत्तिमान् अर्थात् पूर्वोक्त सब गुणोंके होनेपर भी जो अपने स्वामीके कार्योंकी सिद्धि करसक्ताहो तो उसको (चार) करना चाहिये (तथा) विधान अन्यान् अपि अर्थात् उस प्रकारके गुणोंवाले अन्य (चारों) कोभी चाहै राजा आपकरै चाहे वह चारही अपने तुल्य गुणवाले अनेक (वार) अपने जानेहुये विश्वासपात्र अपनी ओरसे सहायकरूप नियत करके आप उनका अधिष्ठाता बने और उन सबसे अपनी बुद्धि और उपायके अनुकूल कामलेवै परन्तु वे सब यं- नुचारकभी ऐसेहो तिनको करै किन्तु (समीत्) जो भेदले पानेमे समर्थ हो तिनको करे और (शुद्धचेतस) शुद्ध निर्मल निष्कपट चित्तवालोको जो वीचही में घनी वातको बिगाड़ें तोड़ें नहीं और (कालज्ञान) जो कालके समयके पहचाननेवालेहो तिनको और (मंत्रकुशलान्) जो सलाह सम्मति करने में चतुरहो तिनको और (सावत्सर) जो संव- त्सर सम्बन्धी शास्त्रके जाननेवाले किन्तु वर्पफल बनाने या पंचांग पत्रके बनानेवाले ग्रो भूत भविष्य वर्तमान फल कहनेवाले.ज्योतिपीहों तिनको इसलिये कि उनकेपास २८० मिताक्षरा साचाराध्यायो विदेशमें भी सब लोग आतेजाते और अपने मनकी पीड़ा भेद भाव सब उनसे कह देतेहैं अथवा ऐसे नहीं तो वेभी (सांवत्सर) में गिनती हैं कि जैसे जयपुरिया ब्राह्मण कच्चेपक्के सभी पत्रा बांधकर नित्यंप्रति नियमसे घर घर श्राप जाकर फेरीदेते और स्त्रियों तकमें जाते पानेका अभ्यास रखकर भिक्षा रत्ति कियाकरते उनसे चाहे तिस घरका ब्योरा अखवार कीसी भांति मिलसक्ताहै तिनको करे और (चिकित्सकान) जो वैद्यक वृत्तिसे विदेशमैं बहुधा जाते श्रातहों तिनको अथवा(सांवत्सरचिकित्सकान्) इन दोनों पदोंको मिलाकर एक तीसरा अर्थ यहभी संग्रहीत है कि संवत्सर पर्यंत चिकित्सा करनेवालोंको अर्थात् जैसे प्रांखोंके बनानेवाले सथिया आदि अनेकवेद्य ऐसे होते हैं जो निरन्तर सालभर ताई दवा करनेमें तत्पर होते और प्रतिज्ञा अपनी पूरी कर दिखलाते हैं तिनको (चार) वनावै क्योंकि अच्छा भेद एक साल विना मिल सकना भी दुर्लभ होता-परन्तु (भदान्) अर्थात् यह लोगभी जो क्रोधी नहींहों तिन को करै क्योंकि क्रोधीसे कोई काम पूरा नहीं होता किन्तु वह बीचही में अपने कार्य सम्बन्धी मनुष्यसे तोड़फोड़कर बैठता है इसलिये क्रोधीको उन गुणोंके होने पर भी नहीं और (मलुब्धान्) जो लोभी नहींहों तिनको करै क्योंकि लोभी शीघ्र अपने स्वामी की शुभचिन्तकता छोड़कर थोड़े लोभसे पराये वशमें होजाताहै इसलिये अतिलोभी को उन गुणोंके होनेपरभी नहीं और(दृष्टार्थान् )जिन्होंने संसारके अर्थकहिये प्रयोजन काम धंधे नानाभांतिके ऊंचनीच भलेबुरे प्रतिकाल और अति अवस्था और अति बर्तावा द्वारा खूब देखेसुनेहों किन्तु संसारका मथन अच्छी भांतिसे किया हो तिनको करै इसलिये थोडीसी अवस्था चालेकोभी नहीं और (तत्त्वभाषिण) जो तत्त्वभापी हों किन्तु जितनीवात देखी या सुनीहो उतनी कहसुनानेकास्वभाव जिनकाहो तिनकोकरै अर्थात् जो ऐसे वतफरोश हों कि पैसाभर देखी सनी सेरभर अपनी ओरसे जोड़कर वकडारे तिनको नहीं क्योंकि इसवातसे परमहानि राजाकी होतीहै औरभी (पाखीडन- स्तापसादीन) अर्थात् जो लोग जीविकाके अर्थी पाखंडरूपसे बनेहुये तपसीआदिअनेक चेटकनाटकवाले देशोंमें विचरतेरहते हैं तिनकोभीउनके चेलीचॉटोसहित पर उसभेद को चेलेचाटे न जाने कियह हमारागुरुकिसराजाका साधकहै और कार्य अपने गुरुकी साधकतामें सबकरतेरहें इसभांतिसेउनको चारवनावै और परराज्यमलगावे (फिरदन चारोंकाभी गुप्तभेद लेनेकेलिये)कि यहलोग वहांजाकर क्याकरते हैं और यहांबाकर क्याकहते हैं इसलिये उनकी वार्ताहरनेवाले और भी अनेकोंको लगावै ऐसे कि जो अपने और परायेदेशों का भेदजानने वालेहों और सुशीलहों सुविचक्षणहों-क्योंकि- राजा एकही चारके कहने पर विश्वास न लावै इसलिये कि न जाने उसने कुछचल प्रपंचकी बनावट आनिकर कहीहो इसहेतुसे दोकीवात एक्सी मिलती जानकर जो मिताक्षरा स० आचाराध्याय । २८१ कुछ उचित हो सो काम करै-इसलिये राजा एकही दो चारों को नहीं भेजै किंतु ब- हुत से मुखवाले वहुत चारोंको भेजै-बहुतसे मुखवाले अर्थात् एकएक चारके साथ अनेक २ साधक उसके आधीन हों वेही उसके अनेक मुख हैं जिनके द्वारा वह ए. कत्र बैठाभी सब देखता सुनता और कहता रहे-इसलिये राजा ऐसे लोगों को उन (चारों) के आधीन साधकराखै जो (नीरेत) नपुंसक हों (वामन) बौनाहों (कुब्ज) लूले { लैंगडेहों और भी (तद्विधाः-कारवः) अर्थात् उसीप्रकार के नपुंसक बौना लूला आदि अंगभंग कारुजाती के लोग जिन्हें कारीगर कहते हैं किंतु राजबाढ़ई दर्जी सूपकार आदि अनेक जो प्रसिद्ध हैं तिनको उन पूर्वोक्त चारोंके साधक नियतकरै क्योकि ये लोग वहां जाकर अपने २ पेशे की नौकरीकरें और भेदूहोकर कार्यसाधैं और सदैव अपने अधिष्ठाता चारको संबोधित करतेरहें और वह अन्य दूतोंसे खबर पहुँचाता रहै अपने राजा पास-इसीलिये अनेक भिक्षुकीं वैरागिने आदि जोवाईवनिके घरों में भिक्षाके बहाने से जाकर और नाच गान दिखाकर बहुधारीति प्रीति करलेती हैं ति- नको और भी (चारण) जो एक प्रकारके कीर्ति गान करनेवाले नटप्रसिद्ध होते ति- नको करै क्योंकि वे राजा केभी सन्मुख जापहुँचते हैं और भी अनेक दास दासी जो वहां जाकर सेवा में नौकरी करैं या वहां के सेवकों से मिलाप अपनी रीति भांति से रखकर कामसाधैं और सदैव अपने अधिष्ठाता (चार) को संबोधित वहांके भेदों से करते रहें-और भी(मालाकारी) मालिने जो फूलमाला के हेतुसे अंतःपुरमें भी नित्य जासतीं या सेवामें रहसक्ती हैं और भी (कलाविदः) किंतु चौंसठि प्रकार की कलाओं मध्ये जो कोईसी एक दो चारकलाके जाननेवाले भानमतीदि पेशेवाले तिन्हेंउन पर्वोक्त (चारों) के साधक नियत करे इसलिये कि ये सब अपने २ कर्म या कौतुक हेतु से धुर अंतःपुरके भीतरकी अलख वार्ता को हरलावे-परन्तु इस भांतिका श्राचरण- भी राजाको सदेव निरर्थक में करना अनुचित है किन्तु इन बातोंका करना तो बड़ी- सी किसी यावश्यक दशामें समयके अनुकूल संभवहोताहै पर इनवातोंका याद र- खना इस हेतु से उचित है कि इन प्रकारों से कोई अपना भेद न लेजानेपावै जिस्से पीछे कुछ उपद्रव उठे इस्से इसभांति के आयेहुये विदेशी नौकर चाकर और सेवक दासी आदिकी चेष्टासे चौकसरहे यहसिद्धांतहै-(चार) दो प्रकारके होतेहैं एक प्रकाश- मान जो प्रत्यक्ष भेजेजाय-दूसरे-अप्रकाश जो गुप्तभेजेजायँ तिनमें अप्रकाश तो येही हैं जिनका चर्चा यहां पर कियागया और प्रकाशमानको दूतकहते हैं जिनका चर्चा ३२७ की अधिकोक्लिमें आयाथा ३३१ । ३३२॥ ब्राह्मणेपुक्षीस्निग्धेष्वजिह्मक्रोधनारिपु । स्याद्राजाभृत्यवर्गपुप्रजासुचयथापिता ३३३ ॥ ऐ०-पूर्वोक्तवातोंके सिवाय राजा अपनास्वभाव औरचेष्टा इसप्रकारकी राखै किंतु २८२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । ब्राह्मणों पर क्षमावान्हो निंदा आदिके करनेपरभी (स्निग्धेपुमजिह्मः) अर्थात् स्नेहकरने वाले मित्रादिकों पर सूधासरलभावहो-शत्रुओंपरमोधवान्-अन्यसाधारण भत्यवगा पर और प्रजाओंपरभी ऐसाहोकेरहे जैसा पुत्रोंपर पिता अर्थात् उनके हितकापाच- रण और अहितकी निवृत्तिमें तत्परवनारहै यह राजाओंका परमधर्महै ३३३ ।। अव प्रजा परिपालनका फल कहतेहैं। 'पुण्यात्पभागमादनेन्यायेनपरिपालयन् । सर्वदानाधिकंयस्माग्रजानांपरिपालनम् ३३४ ।। चाटतस्करदुर्वृतमहासाहसिकादिभिः। पडियमानाःप्रजारक्षेत्कायत्यैश्चविशेषतः ३३५॥ ऐ०सहद्वयोः-जिसहेतुसे कि धर्मशास्त्रोक्त न्यायसे प्रजाओं का परिपालन रक्षण आदि करताहया राजा उनके कियेहुये पुण्यमेंसे छठाभाग लेताहै किंतरक्षा करीहुई प्रजाके पुण्यम पष्ठांशका भागी धर्मके अनुसार होताहै इसीसे प्रजाओंका परिपालन कर्म राजाओंको पूर्वोक्त सबदानोंसे अधिकदान फलहोताहे इसलिये पुत्रोंकेही तुल्य पालनकरै-किसप्रकारसे सो कहतेहैं ३३४ (चाट) वे कहलातेहैं जो किसीतरहका वि- खासदे दिलाकर पराया धनहरलेते इन्हींको प्रतारकभी कहतेहैं-(तस्कर)जो छिपकर धनचुरावे-(दुश्च) वे कहलाते जोइन्द्रजाल आदि माया कितवलकरके किसीकाधन या.मनुप्य हरलेते-(साहसिक) वे कहलाते जो सहसा प्रवलता करिके छीनलेते तिनमें भी महासाहसी वे होते जो इसीवातका पेशाकरते वटमारमादि-यादि शब्दसे और भी अनेक धर्त सेवड़ेआदि (कुहक) विद्याके मायावीहोतेहैं-इनसे पीड़ित कियेहुये और पीडयमान प्रजालोगोंकी रक्षाकर-इनके सिवाय विशेषकर कायस्थौसभी प्रजाकी रक्षा करे (कायस्थागणकालेखकाश्च) अर्थात् सभीकायस्थोंसे अपेक्षा नहीं किंतु जोराज- द्वारों यहा वाह्यदेशोंके हिसाबी थोर लेखकहाँ तिनसेरक्षाकरे क्योंकि (तेपाराजवल्ल- भतयातिमायावित्वाञ्चदुर्निवारत्वात् अर्थात् वे राजाओंकेकार्य साधकता और उपक्ष- त्रियत्वसेभी वहुतप्यारे होते और मायावीभी उनमें यहुधाहोते इस्से उनके फंदेम. सीहुई प्रजाका बिगड़जाना संभवहे ३३५ ॥ भषि-(स्मृत्यंतरपि)चाटचारणचौरेभ्योवधबंधभयादिभिः।पीडयमानाःप्रजारभे तुकायस्थेभ्योविशेषतः-अर्थ इसकाभी वही है जो ऊपर कहागया-मोर कायस्थ यह एक निदर्शन मात्र शास्त्रवताने कहाहे किंतु कायस्थोंके उपलक्षणसे जो कोई उनका- मोपर नियनहो वहीकायस्थ समुझा चाहिये परन्तु विशेषकर कायस्थका नामलेकर कहनेसे सर्वथा यहभी निश्चितहुआ कि कायस्थ जातीका यहकामसृष्टिकी श्रादिसेही चलायाताहे क्योंकि जो यह प्रधानता इनको नहीं होती किंतु सभीलोग उनकामोंक अधिकारी होते तो शास्त्रवक्ता उनकामांकी अधिकार संज्ञासे श्रादेशकरते ३३५ ।। भरक्ष्यमाणावत्तियतिवित्तित्विषप्रजाः तस्मानुनृपतेरईयस्माद्गृणात्यसौकरान् ३३६ ॥

मिताक्षरा स० आचाराध्याय। ऐ०--रक्षाके न करने में दोष कहतेहैं कि अरक्ष्यमाण प्रजालोग जोकुछ पापकरतेहैं २८३ उसमें बाधा पाप राजाको इसहेतुसे लगता है कि जिस्से यहाजा उनसे अनेक राज करलेता और रक्षा उनकी नहीं करता ३३६॥ अधि०-(वरंविपाशनंराज्ञांवरमग्नौप्रवेशनम् । श्रनाथानांप्रपन्नानांकृपणानामरक्ष- णात्।अनाथकृपणंइंस्त्रियंवालंनिरागसम्।परिरक्षेचनेःप्राणेयाशक्तिवलेनच॥दे शंकालंचशक्तिचकार्यंचाकार्यमेवचीसम्यग्विचार्ययत्नेनकुर्यात्कार्याणिसर्वदा॥नकु- त्किस्यचिद्वाधांपरवाधांनिवारयेत्।चौरान्दुष्टांश्चशāश्चवाधयेच्चापिसर्वदा) अर्था- त्-राजाओंको विप भक्षणकरलेनाश्रेष्ठहे अग्निमें गिरपरना श्रेष्ठहै किन्तु अनाथोंकी प्राधीनोंकी कृपणोंकी दरिद्रोंकी रक्षा न करनाश्रेष्ठनहीं-इसलिये-अनाथकृपण वालक दृद्ध स्त्री निरपराधी कोईहो तिसको अपराधीसे वचावै और इन सबकी रक्षाकरे - पने धन प्राण वुद्धि शक्ति बल इनसे किंतु इनमेंजिसकिसीसे होसक्तीहो तिसकालोभ नहींकरै-(परन्तु सहसा नहींकरै यह कहतेहैं)किन्तु देश १ काल २ शक्ति अपनी यहा अपराधीकी ३ (कार्य)अर्थात् करनेकी योग्यता ४ (मकार्य) न करनेकी योग्यता ५ इन सवोंको यत्नपवक अच्छीभांति पहले विचारलेवै तब रक्षासम्बन्धी दण्ड आदिका- यॊकोकरै किन्तु (सर्वदा) सवदिनइसीरीतिसे आचरणकरै-और किसीकोभी वाधानहीं करे वरन जहांतक शकिहो पराई वाधाका निवारणकरे यहराजाकाधर्महै परन्तु चोरों को दुष्टोंको शत्रुओंको इनसवोंको वाधाभी सदैव यथाकाल यथाशक्ति यथादेश यथा- संभवके अनुकूल करतारहै तौ अधर्म नहीं किंतु यहभी एकधर्म है ३३६ ॥ अव निग्रह और अनुग्रह का न्याय कथन करतेहैं। येराष्ट्राधिकृतास्तेपांचारात्याविचेष्टितम् । साधन्समानयेद्राजाविपरीतांश्चयातयेत् ३३७ ॥ ऐ०-जेकोई राज्यके अधिकारी कियेहाँ तिनका विचेष्टित कहिये कियाहुश्रा आ- चरण अपने अधिकारोंकी साधनामें भलाई,बुराई सो पूर्वोक्त चारोंके द्वारा जानवू- झकर (साधन-संमानयेत् ) किंतु जो सत्याचरणवालेहों तिनका राजा मानबढ़ाये कि- सीरीतिसे दान मान सत्कारोंकरके उन्हें प्रतिष्ठितकरै और जोविपरीतहों कितु दुष्टट- त्तिवालेहां तिनकाभेद जानिकर घातकरै अर्थात् किसी प्रकारका दंड उनकी दुर्टत्ति के अनुसार देवै ३३७॥ अधि०-(चारों) के द्वारा उसदशामेंभी भेदलेना उचितहै कि जब कोई किसी अधि- कारीकी प्रत्यक्षमें निंदाकरताहो क्योंकिबहुतेरे किसी निजसंबंधी वैरभावसे स्थानिन्दा भी करनेलगते हैं इसलिये उनकेकहनेसेही दंडनदेवैतथाचोक्तं(नपरस्यापनादेनपरेपांद डमाचरेत् । आत्मनावगतंकृत्वावध्नीयात्पूजयेत्तुवा) अर्थात्-औरके अपवाद करने से हीऔरोंको दण्ड नपाचरे यहा वैरीके अपवाद करनेसे सारे रियोंको नहीं दे २८१ मिताक्षरा स. याचाराध्याय। किन्तु अपने मनवुदिसे विचार पूर्वक निश्चयकरिकै तब दंडदेवै या सत्कारकर-परंतु मनबुद्धिका विचारभी पीछेकरे किन्तु पहले चारोंसेही भेदभावलेवै यहसिद्धांतहे और दंडदेव या सत्कारकरे इसकथनका यह सिद्धांतहै कि जिसवातकी निन्दा उसकी हुई थी उसीकी दृढ़ता और सचेउटी चारोंसेभी मिलै तद्वत् अपनी आत्माका विचारभी उसीपर दृढ़ताकरे तव तो दंड जैसायोग्यहो सोदेवे (भन्यथा) जब उसनिन्दाका कोई भांति उसपर चिह्न नहीं पाया जाय और सर्वथा वह निष्कलंक निश्चितहोजाय तब उसका सत्कार कुछ इसहेतुसे करना योग्यहै कि उसपर झूठाकलंक जो आरोपित हुआ जिसके कारण उसकी व्यर्थ निंदा उडीफेली तिसका प्रतिकार उसके सत्कार द्वारा कियाजावे-इसलिये राजाको एकचारकेभी कथनपर विश्वास न करना चाहिये किंतु कईचारोंके कथनमें सात्म्यतापावै तबकुछकरे या उनकई के कथन असात्म्य. ताहोनेपर अपने मनबुद्धिके अनुकूल जो संभवितहो क्योंकि इसमें किंचित्भीव्यति- क्रमहोनेसे राजाकी परमहानि होतीहै-तथाचधर्मः-(अदंड्यान्दंडयनाजादंडयांश्चै- याप्यदंडयन् । अयशोमहदाप्नोतिपापंचैवतदच्युतम् ) अर्थात्-राजा अदंड्यपुरुषों को विनाविचारे दंडदेताहुआ और दंडनीयोंको प्रमादसे दंड न देताहुया महाययश तो पहले लोकमही पाताहे पनि उस्से पापभी ऐसाअच्युत होताहे कि जिसकीच्युति जन्मांतरमें भी नहीं होती इसलिये राजाको दोपादोपके विचारमें प्रमाद और शिथि- लता न चाहिये ३३७॥ अब घुस रिशवतकी चर्चा करतेहें। उत्कोचजीविनोद्रव्यहीनानरुत्वापिवासयेत् । सदानमानसत्कारान्श्रोत्रियान्वासयेत्सदा ३३८ । ऐ०-राजा उत्कोचजीवियों को द्रव्यहीन करिके विवासकरावै किंतु घूसखानेवालों से धनदंड लेकर उन्हें राज्यसे बाहरकरे और श्रोत्रियोंको दानमान सत्कारों सहित अपने राज्यमें सदेव जोपातेजायँ तिन्हें बसावे जिस्से उसके राज्यमें संपन्नता बनी रहे-(उरकोच) कहतेहैं घूसरिशवतको कि जो किसीकार्यवालेसे कुछधन लेकर कार्य में अयुक्तता करीजातीहे उसधनके खानेवालेको उत्कोचजीवी अर्थात् रिशवतखोर या घृसखाऊ कहते हैं ३३८॥ अब ठेठ राजाकी अपेक्षा अन्याय धनसे हानि कहतेहैं ।। भन्यायेननृपोराष्ट्रात्स्वकोशंयोभिवर्दयेत् । सोऽविराद्विगतश्रीकोनाशमेतिसांधयः ३३९॥ . प्रजापदिनसंतापारसमुहूतोहुताशनः । राज्ञःकुलश्रियंप्राणांवादग्ध्वाननिवर्तते ३४० ॥ ऐ०सदहयोः-जोकोई नृपति अपने राज्यमेंसेधन अन्यायसे संग्रहकरिके अपनाकोश 'बदाताहै वह शीघ्र थोड़े कालमें लक्ष्मीहीन होकर निजबांधवों सहित नाशको पहुँ- चताहे३३९ क्योंकि प्रजाकी पीड़ारूपी संतापसे समुत्थितहुश्राअग्नि-राजाकेकलको - 'मिताक्षरा स. आचाराध्याय। २८५ और लक्ष्मीको पीर प्राणोंकोभी बिनाजलाये नहीं जाता-इसलिये राजा जोधनलेवै सोन्यायसे विपरीत नहीं लेवै (तत्खादनेतुनारदः) (अन्यायेनापियशक्तंपित्रापूर्वतरै स्त्रिभिः। नतच्छक्यमपाकर्तुंक्रमात्रिपुरुपागतम्)३४०॥ अब आगे विजय फल कहतेहैं ।। यएवनृपतेधर्मःस्वराष्ट्रपरिपालने । तमेवकरस्नमाप्नोतिपरराष्ट्रवशनयन् ३४१ ॥ ऐ०-नृपतिका जोर धर्म या फल अपने राज्यके परिपालन करने में कहागयाउसी धर्मका साराफल अपने शत्रुका राज्य वशमें लेताहुअाभी पाहै ३४१॥ । वशमें आये हुयेकी परिपालन विधिकहतेहैं। यस्मिन्देशेयमाचारोव्यवहारःकुलस्थितिः । तथैवपरिपाल्योसौयदावशमुपागतः ३४२ ॥ ऐ०--जव कोईदेश अपने वशमें पायाहो तव अपने देशके प्राचारोंका प्रचार वा मिलाव उसमें नहीं करै किंतु जिसदेशमें जो आचार और जो कुछव्यवहार और कु- लोंकी परिपाटी जैसी चली आतीही तैसीही परिपालन कियेजावै जिसमें प्रजालोग सुखी रहकर आशीर्वादकरें किंतु विपरीततामें शापदेते हैं परन्तु जो कोईबात विरुद्ध वा दुःखदायकहो उसको प्रजाकी संमति और प्रसन्नतासे परिशोधन करना अनुचि- तनहीं-तथापि जो उचित और संभाव्यरीतोंसेही कियाजावे किंतु कोई वात हठ धर्मीसे नहीं ३४२॥ मंत्रमूलंयतोराज्यंतस्मान्मत्रंसुरक्षितम् । कुर्याद्यथास्यनविदुःकर्मणामाफलोदयात् ३४३ ॥ अक्ष०-यतःराज्यमंत्रमूलंतस्मान्मंत्रंसुरक्षितं तथाकुर्यात् यथास्यराज्ञःकर्मणांमत्रं आफलोदयानविदुरन्ये ३४३॥ अभि०-जिसहेतुसे ३११ में कहाथा कि उनमंत्रियों के साथ राज्यका विचार करै तो यथार्थसे राज्य मंत्रमल ठहरा किंतु राज्यके सारेकाम धंधोंकी मलकेवल मंत्रके आधीनहै तिसहेतुसे विचारेहुये मंत्रको उसप्रकारसे सुरक्षितकरै कितु जैसीभांतिसे इसराजाके संधिविग्रह आदि काँका मंत्रभेद तब ताई कोई और नजानै जबतक उसमंत्र यहा उनकर्मों के फल यथावत् उदय न हो लेवें ३४३ ॥ मधि-(मंत्रभेदेऽपियेदोपाभवंतिप्रथिवीपतेःनिशक्यास्तसमाधातुमंविभिस्सुभटे रपि) अर्थात्-प्टथिवी पतिके-मंत्रभेद होजानेमें जोर दोप उत्पन्न होते हैं वे दोष फिर मंत्रियों और सुभटों अतिवीरोंसेभी सम्यक् प्राधानकर सकने योग्यनहीं होते इस लिये राजा अपने राज्य संबंधी मंत्रोंकी रक्षाभली भांतिकरै-तथाचोक्तम्-(मंत्रंवीजव द्राजनरक्षणीययथातथा। मनागपिनभिद्यततद्भिनंनप्रराहति) अर्थात हे राजन् मंत्र जैसाही तैसाही वीजवत् रक्षाकरणीयहे किंतु उसमेंसे (मनाक् मपि) किंचित्भी न भेद होनेपावै क्योंकि वहमंत्रवीज किसीभांति भिन्नहुा जमता नहीं अर्थात् बोयाहुया - २८६ मिताक्षरा स० आचाराध्यायः। वीज धरतीमें से उभरकर भिन्नहोजाता वह जमता नहीं तैसेही मंत्रभी फूटाहुआ कार्यकी सिदिमें जमता नहीं-यदा किसानलोग जोवीज अगले सालकेलिये संचय करते उसमेंसे आवश्यकता परभी किंचित् नहीं निकालते क्योंकि उसमेंसे कुछभिन्न करलेनेमें फिर वहवीज अपनी ऋतुपर धरतीमें बोनेसे उपजता नहीं यहएक पानि होतीहै क्योंकि जबबोनेकेलिये निकालताहै तब उसमेंसे देवपितर आदिके नामसेमु. ट्ठीनिकालकर पीछेवोताहै इसलिये किसानउसवीजकी परमरक्षारखताहे-और यथार्थ उसवीजको रक्षा यहा आनि इसलिये होतीहै कि वीजमें बहुधा वारम्वार होथलगने या अधिक वायुलगने या धूपलगने या सीलपहुँचने आदिसे उसका उपजना और फलावट न्यूनहो जातीहै इसलियेवीजको वस्तु सबसे जुदी रखकर बारम्बार छेड़ते नहीं ऐसेही राजा अपने मंत्रको बारंबार उघाड़े नहीं तो फल दायकहो ३४३ ॥ • अब द्वादश राजमंडल यहा अपने सहित त्रयोदश राज मंडलका विचार कहते हैं इस वाती को अतिसूक्ष्मबुदिसे विचारना जिस्से-तद्रूप इसका स्वरूप हृदय गतहो जाय॥ अरिमिंत्रमुदासीनोऽनंतरस्तत्परःपरः । क्रमशोमण्डलंचिंत्यसामादिभिरुपक्रमैः ३४ ॥ अक्ष-अरि१ मित्रं उदासीनः३-अनंतरः तत्परः२ तस्मात्परः३-क्रमशः-अ. र्थात् यह तीनों यथाक्रमसे समझलेने-किंतु-ठेठ अपने राज्यसे (अनंतर) कहियेलगा हुआ भिडाहुअा दूसरा राज्य वह अपना अरि१ कहलाता-और (तत्पर) कहिये उस्से अगला तीसरा राज्य वह अपना मित्रर कहलाता-और (तस्मात्परः) उस्सेभी अंग- ला चौथा राज्य वहअपना उदासीन३ कहलाताहे-(यह तीनों अरि मित्रर उदासी- न३ यहां पर प्राकृत कहलातेहें प्राकृतका अभिप्राय,नीचे अभिप्रायाम समझले ना) इसभांति क्रमसे चारों दिशामें द्वादश राज्योंका मंडल और बीचमें तेरहवाँ थाप बैठाहुप्रासारेमंडलका चिंतमनविचारसामादिनीतिक उपक्रमोंसे करतारदे३४४॥ अभि-ऊपरके अक्षरार्थमें अरि १ मित्र २ उदासीन३ जो कहेगये सो यहतीनों प्राकृत कहलातेहें इसहेतुसे कि अरिनाम शत्रुभी तीनप्रकारके होतेहैं-तिनमें प्रथम इन्हीं तीनोंके लक्षण समभने चाहिये सो अरि और मित्रके लक्षण तो प्रसिदह पर तीसरा उदासीन वह कहलाताजोशत्रुताभीन करताहो और मित्रताभी न रखताहो किंतु जिसको बैरप्रीति दोनोंसे कुछ अपेक्षा नहीं वह उदासीन होता है-न्यब तीनोंके तीन प्रकार जो अभी ऊपर कहेथे तिनके लनण दांतह कि सहज कृत्रिम प्राकृत इनभेदोंसे तीन प्रकारके तीनों होतेहैं अर्थात् सहजशत्रु तो सापनको कहतेहैं और सापन भागी सामीको कहतेहे जसे अपना चचा या चचेरे भाई आदि जोबटवारी के भागीही इनको सहज इसलिये कहतेहैं कि ये साथही अपने घरसेही शत्रुल्पज- मिताक्षरा सः आचाराध्याय। २८७ न्मलेतेहैं फिर चाहे घरकेघरहीमें मौजूदहों अथवा कुछदूरीअन्तरसे वेभी कहींकेदेशा- धिपहों कुछइसपर नियमनहीहै परदायभाग उनका निश्चितहो यहसिद्धांतह १-दूसरे कृत्रिमशत्रु वे कहलातेहें कि जिनका कुछअपकार किसी हेतुसे कियागया और पीछे वे शत्रुभाव करनेलगे अथवा उन्हीने कुचअपकार अपनाकिया इसहेतुसे उनकैसाथ वैर करनापड़ाफिर चाहे अपनेसे दशराज्यका दूरी अन्तर उनसेहो कुछ इसका नियम नहीं है इनको इसलिये कृत्रिम कहते हैं कि ये बनावट के वनेहुये शत्रुहोते कुछ घरमें जन्म नहीं पाया-या-पाया हो तौभी जो अपकार हेतुसे शत्रुता बांधै तो वेभी कृत्रिम कहलाते हैं अर्थात् सहज शत्रु उसी दशामें कहलासक्ते है कि हिस्सा बांटके हेतुसे चैर बांधैर-तीसरा प्राकृतशत्रु वह कहलाताहै जो अपनेराज्यसे अनन्तर भिड़ाहुया दूसरा देशाधिप हो चाहे वह प्रत्यक्षमें शत्रुता नहीं भी करता हो परन्तु उसकी प्र- कृति में यह वैर भाव रक्खारहता है कि कोई भांति से अपने अनन्तरवाले को दवा- लेवें जैसे वह अपना प्राकृत शत्रु गिनाजाता है तैसेही आपभी उसका प्राकृत शत्रु कहलाता है क्योंकि जैसे अपनी सीमासे वह अनन्तरहै तैसेही उसकी सीमासेग्राप अनन्तर है इसलिये वह प्राकृत अरिभाव परस्पर दोनों में समझांजाता और इसी हिसाब से अपनी चारों दिशाके चारो राज्य प्राकृत अरिकहलाते हैं-इसी प्राकृत श्र- रिका चर्चाऊपर अक्षरार्थ में पायाथा किंतु वहां पर शेप दो शत्रुयोंसे कुछ अपेक्षा नहीं है३-अब तीनों भांति के मित्र बतलातेहैं कि-प्रथम तो सहज मित्र वे कहलाते हैं जो साथही किंतु निजघरसेही मित्ररूप जन्मपाकर सवतरहसे सहायकवनेजैसे अपने भानजे या फूत्रा के बेटे या मावसीकेवेटे मामाके बेटे इत्यादि और भी-दूसरे कृत्रिम मित्र वे कहलाते हैं कि जिन्होंने कुछ अपने साथ भलाई उपकार सहायता आदि किया हो या उनके साथ श्रापहीने किया हो या परस्पर दोनों का दोनोने किया हो ये इसीसे कृत्रिम कहलाते हैं कि कार्य व्यऔर कारण के अनुकूल मित्रवनजातेहैं चाहे अपने से दश राज्य का दूरी अन्तर उनसे हो कुछ इसवातका नियम नहीं है २-ती- सरे प्राकृतमित्र वह कहलाता है जो अपने राज्य से एकांतरित राज्य हो किंतु बीच में उस पूर्वोक्त प्राकृत अरिका राज्य अन्तरे देकर उस्से अगला राज्य प्राकृत मित्र कहलाता है इसीकी चर्चा अक्षरार्थ में आईथी किंतु वहांपर शेप दो मित्रों से कुछ सम्बन्ध नहीं है-इसको प्राकृत मित्र इसहेतु से कहते हैं कि चाहे वह अपना से कुछ मित्रता नहीं भी करता हो पर उसकी प्रकृति में यह बात समाई रहती है कि बीच- वाले पूर्वोक्त प्राकृत अरिको कि जो बरले परले दोनों का अरिकहलाचुका तिसको यद्यपि में कुछ नहीं दवासना पर इस्से परले तीसरे से कदाचित् मेरा मेल मिलाप होजाय तो दोनों मिलकर इसको वीचमें दवालें या वही गक ऐसा प्रवल हो जो इसे २८८ मिताक्षरा स. प्राचाराध्याय। दवासकै तो मैं उसको अपनामित्रसमझौं और वनै तौ सहायताभीकरूं-इन कारणों सेएकांतरितवाले परस्पर दोनों प्राकृतमित्रगिनेजातेहैं कुछमित्रता करनेपरही नियम. नहींहै-इसी हिसावसे चारों दिशामें जैसे चारिप्राकृत शत्रुवतलायेथे तेसेही उनसेपरे चार प्राकृत मित्रभी समझने चाहिये इसप्रकार आठ राज्यका मण्डल होचुका और बीचमें नवां श्राप हे ३-अब तीनों भांति के उदासीन बतलाते हैं तिनमें प्रथम तो सहज उदासीन वे कहलाते जिनमें सहज शत्रु और सहज मित्र इनदोनोंके पूर्वोक्त लक्षण कोई भी न पायेजायँ (दृष्टांत) यथा जन्म सम्बन्धसे चचा भाई भतीजोंमें अ- वश्य गिनती हो परन्तु किसी हेतुसे दायभाग के अधिकारी नहीं हैं जो झगड़ा टंटा करसके इसलियेवेही सहज उदासीन कहलानेलगे (और) किसी दशा में भी सहज उदासीन होसक्ते हैं कि जिनका दायभाग तो निःसंदेह निश्चित है परन्तु वे उसके पानेका दावाकभी आगे पीछे भी न करेंगे-इनके सिवाय वेभी सहज उदासीन हैं कि जन्म सम्बन्ध से सहज मित्रों में गिनतीहुयेथे अर्थात् पहले जैसा कहचुहैं कि भा- नजे या फूला और मावसी के बेटा आदि सहज मित्र कहलातेहें परन्तु वेही लोग उनमैसे जो २ कोई मित्र भाव सहायता आदि अपने साथ न करते और न मानते हों तौ सहज उदासीन कहलानेलगे फिर चाहै दूर या नगीच रहतेहों कुछ इसकानि- यम नहीं है यह तो सहज उदासीन कहेगये १-अब दूसरे कृत्रिम उदासीन वे कह- लाते हैं जिनमें पूर्वोक्त कृत्रिम शत्रु और कृत्रिम मित्र इनमें से एक केभी लक्षण नहीं पायेजायँ अर्थात् नतो अपकार करतेहों न उपकार करतेहों न कुछ वैर न कुछ प्रीति ऐसे सामान्य भावहों और जन्मसम्बन्धसे कुछयपेक्षा जिनमें नहीं और चाहे दूर यानगीचहीं कुछ इस वातकाभी नियम नहीं है २-और तीसरे प्राकृत उदासीन कहलाते जो अपने से चारों दिशामें चौथा २ राज्य अर्थात् पूर्वोक्त प्राकृत अरि और प्रांकृत मित्र इन दो २ राज्यों को बीच में देकर उनसे परेपरे प्राकृत उदासीन राज्य कहलाते हैं इन्हीं का चर्चा अक्षरार्थ में आयाथा किंतु शेप दो उदासीनों से वहांपर कुछसम्बन्धनहींहै-इस प्रकारसे वारहराज्यका मण्डल अर्थात् अपने से तीन आगे तीन पीछे तीन बामे तीन दाहने किंतु पूर्व पश्चिम उत्तर दक्षिण चारों ओर और वीचमें तेरहवां आप हे-यह राजमण्डल पद्माकार समझकर अवश्य भावसे साम आदि नीतिके उपक्रमों से विचारता रहे अर्थात् उन वारहो का विचेष्टित जो कुछहो तिसका विचार बलाबल के अनुकूल अपने कल्याण की अपेक्षासे रातोदिन चितवन करता रहे कि कौन हमसे संधि और कोन विग्रह किया चाहता है किंतु उ- नसे गाफिल असावधान मत होजावे ३४४॥

मिताक्षरासाचाराध्याय। ई श्रवयहांपरपहलेचक्रकाअवलोकनकरो फिरपीछे इसकीयधिकोक्तिकोविचारो. पूर्व हातरितराम्प४ रह अपना प्राशन उदासीन है और इसीको परिमित्रभीकहते सफांतरितराज्य३ यह अगमा प्राकृत मित्र IF अनंतरराज्यर यह अपप्रारुतरिकहाता है। उत्तर प्रतरितराज्य४ यह अपना प्राकृत उदासीन रसिया एकांतरितराज्य३ यह धपना प्राकृत मित्र पशिम मित्रका मित्र पश्चिमउदासीनकाउदासीननसरेसेहीसिउदाहरणकेचनुसार समझीयहीदक्षिण परिकामिप्रन्सियामित्रका उदासीन पौरपश्चिममरिकारि फाउदासीनहैयही उत्तर मित्रकारि उत्तरउदासीनका मित्रसेमेही सर्वत्र पही पूर्व भरिकाधरिशोरपूर्व मित्रका मित्र और पूर्वउदासीन यह उपनामारुत गरिफहलाता है चर्नतरराज्य २ सरकारों मेअपनी बुदिसेनानलो अपनाराज्य इसमध्यवर्ती रानाकोसंता मेरो विनिसीयू भी कहते है। उसअवस्थामे किजवकिसीप एनाकोविनयकरनेकाविचार करै। अनंतरराज्यर यह अपना प्राकृत रिकहाता यहीदक्षिणायालेउदासीनका मित्र हैयहीपूर्वकेशरिकानीर 'भोरपूर्वकेमिनका मित्रौरीकेउदासीन काउदासीनहैयहीदक्षिण पाते मित्रका बरि पश्चिमकेरिकाधारि-पशिमके मिश्का मित्र पश्चिमके. उरासीनका उदासीन और उचरकेअरिका भिवरत्यादिौरभीनानो । एकांतरित राज्य सहप्रपना ताकत मित्र छतरितराज्य यह अपनाप्राकृत उदासीन अनतरराज्य यह अपना मारुत अरिफहलाता है सकांतरितराज्य महअपनाप्रारुत मिन छांतरितराज्य ४ यह धपना प्रारुत गगसीन पश्चिम . २९० मिताक्षरा स० आचाराध्याय। अधिक -इस ३४४श्लोकमें अक्षरार्थ यहा अभिप्रायार्थसे विजिगीषू राजाके अरि १ मित्र २ उदासीन ३ यह तीन प्रकृती चारों दिशामें वतलाई और उन्हीं का तद्रूप ज्ञानहोजाने के हेतुसे त्रयोदश राजमण्डलका पद्माकार, चक्रभी निरूपण कियागया तथापि वह त्रयोदशराजमण्डलएक सामान्य रूपसे निदर्शनमात्र कहागया क्योंकि सर्वत्र और सदैव कुछ भमि अथवा राजमण्डलों का एकहीसा डौलनहींहोसक्ताभ- र्थात् जहां कहीं इसीप्रकारसे राजमंडलोंका डोलहो तहां तौ तद्रूप इसीचक्रके अनु- कूल समझाचाहिये और जहां कहीं अपनेसे चारों ओर बारह राज्य नहीं किंतुथोड़े बहुत जो कुछहों उनमेंभी प्रकार तो सर्वत्र यही समझलेना पर इसबातका आग्रह नहीं है कि चारों ओर अरि और चारों ओर मित्र या उदासीन क्योंकर समभेजायें अर्थात् दोहीतरफ समझलेने या तीनतरफ जहां जैसा राज्यकी सीमाका डौलहो तेसाही चक्रभी अंगीकारहोसलाहै-इसके सिवाय जहां पूरेबारहतेरह मंडलोंकीयथा- वत् प्राप्तिहो जैसी चक्र में लिखी हैतहांभीसदैव यहनियम नहींरहसता कि चारशत्रु चारमित्र चार उदासीन ठीक २ हों क्योंकि यद्यपि शास्त्रोक्त संज्ञामात्रसे वेही प्राकृत शत्रु कहलातेहैं कि जिनकी सीमा अपने राजसे भिड़ीहो परन्तु जवकदाचित् उनसे अगले राज्यवाले जो प्राकृत मित्र निश्चित होचुके, उनमेसेकोई एक या दो अपना कृत्रिम शत्रु होगया किंतु उनसे अपना अपकार हेतुक वैर बँधगया उससमय शत्रु अधिक होगये और मित्र थोड़े रहगये या उन्हीं मित्रोंमेंसे कोई अपने शत्रुका सेवन करनेलगा तो वहभी शत्रुगिनागया तोभी शत्रु अधिकहुये मित्र थोड़ेरहे-या प्राकृत शत्रुओंमें से कोई अपना उपकार करनेलगा तो वह मित्र कहलाया इसहेतुसे मित्र अधिक होगये शत्रु थोड़ेरहे अथवा इनबारहमेंसे तौनहीं परइनसे उपरांतके अधिक राज्यों से कोई राजा दूरस्थभी अपने प्राकृत शत्रुओंसे मिलाप रखनेलगा तो वह भी अपना अरि ठहरा तोभी शत्रु अधिक होगये और मित्र हीचार बनेरहे-सोई नीचे मनुवाक्यसे भी निश्चितहै-यथा (अनन्तरमरिंविद्यादरिसेविनमेवच। अरेरन- न्तरंमित्रमुदासीनंतयोःपरम्)-अर्थात्-अनन्तर कहिये भिडेहुये राज्यको विजिगीपू अपना अरि जाने और अरिसेवीकोभी अरिजाने किंतु अपने सीमाभिड़े राज्यवाले से जो कोई दूर या नगीचवाला मेल मिलाप अतिप्रीतिभावसे रखताहो या उसके श्राधीन होताहो तिसकोभी अपना अरिजाने और अरिसे अनन्तर कहिये परली और सीमा भिड़ेराज्यवालेको विजिगीषअपना मित्रजाने और उनदोनोंसे परे सीमा भिड़े राज्यको विजिगीपू अपना उदासीनजाने यह मनुजीने कहाथा(भेद २)मनुजी ने इस राजमण्डलको पद्माकार चक्रकीरीतिसे नहीं कहा-यद्यपि मनुजीके और योगी- श्वरके कथनमें कुछ अन्तर नहीं किंतु सिद्धांत दोनोंका एकह सोई अनन्तरोक मनुके २९१ मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। वाक्यसे योगीश्वरके मूलश्लोककी वाक्यमें एकता अभी ऊपर होचुकीहै तथापि उस पद्माकार मण्डलके स्थान मनुजीने कुछ और भांतिसे विलक्षणरूप मंडल दरशाया है 'अर्थात् मनुजीने कुछ चारोदिशाका नियम नहीं अंगीकार किया किन्तुं आगे पीछे दोही तरफके डोलसे राजमंडल कहदिया है-तिसकाभी यथार्थकारण वहीहै जो इस अधिकोक्रिके प्रारम्भमें लेकर अनन्तरोन मनुवाक्य से पहले २ लिखागया क्योकि सर्वत्र अपने से चारोंोर द्वादश राज यथोतक्रमसे नहींहोते अर्थात् कहींवैसा डौल भी होताहै और कहीं मनुजीके सिद्धांतसे केवल आगे पीछेकाही डोलहोताहै-दृष्टांत इसका ध्यानकरी कि जहां अपने राज्यसे दाहने और बायें दोनों तरफ़केवल पहाड यहा समुद्रहो किंतु दाहने वायें पार्श्वमें और कोई राज्य ऐसा नहींहै कि जिस्से कुछख- टका या प्रयोजन परे तहां केवल आगे और पीछेही निरंतर अनेक राजपंक्तिके श्रा- कार चलेजाते हैं इसलिये मनुजीने उसडौलसे राजमंडलका वर्णन कियाहै बल्किम- नुजीने अरि१ मित्र उदासीन३ इनके संज्ञाव्यपदेशभी अधिक बांधेहें-इसलियेयव हम अपने जिज्ञासू लोगोंका संदेह यहा चित्तकी भ्रांति दोनों ओरसे निटत्तहोने के • लिये मनुजीका वाधा डोलभी इसी अधिकोक्तिमें विन्यास करतेहैं सो देखो-यथा(म- ध्यमस्यप्रचारंचविजिगीपोश्चचेष्टितम् । उदासीनप्रचारंचशत्रोश्चैवप्रयत्नतः) अ- र्थात्-मनुजी कहतेहैं कि राजमंडलके विचारमें राजाको यहउचितहे कि एक तो (मध्यमराजाका)चितवनकरै कि वहमेरेलिये या मेरे शत्रुओंकेलिये या मेरे मित्रोंकेलिये क्या करना चाहताहै या किस उपायमें समुद्यतहै यह प्रचार उसका सोचे १ ऐसेही (विजिगीपोश्चचेष्टित) अर्थात् विजिगीपूजो कोई राजा किसी एकको या अनेकोको विजय करने पर समुद्यतहो तिसकाभी चेष्टित कहिये करना धरनामादि अपर्ने मनमें सोचे कि वह किसकेलिये क्याकरना चाहेहैर ऐसेही (उदासीन) काभी प्रचार कहिये करना धरनामादि देखमुनिके अपने घरमें बैठा सोचे कि उसका क्याडेगहै किनु बहकेवल उदासीनही बनारहेगा या यागेपीछे किसीका पक्षपातभी करेंगाई ऐसेही (शत्रोभेव) कितु अपने शत्रुकाभी करना धरना इच्छायादि प्रयत्नपूर्वक निजमंत्रियों सहित सोचें कि उसमेरे शत्रुका कोई औरभी सहायकहै या नहीं और उसका या उसके सहायकोंका कितनावल या कितना धन या कैसा उनका राज्यहे यह सबसोच विचार करतारहे-अब इन चारोंके लक्षण समझनेने चाहिये कि (मध्यमराजा) उसेकहतेहैं जो किसी विजिगीप और उसके शत्रुकीभी दोनोंकी सीमासे भिड़ाहुया तीसरा राजा इतना बड़ांसमर्थहो कि जब कदाचित् वे अरि और विजिगीपू दोनों परस्पर अपने वैर भावसे लड़भिड़ें तवदोनोंको दंडदेसक्लाहो या वे दोनों मिलापरक्खेतब दोनोपर कुछ अनुग्रहभी करमताहो वह (मध्यम) कहलाताहे इमीलिये विजिगीषको या मा- .

२९२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । धारणहर किसीको सबसे पहले मध्यमका अभिप्राय सोचना उचित कहाहै क्योंकि वहप्रबलहै न जाने पीछे किसकी ओरहो १ (मौरविजिगीपूराजा) वही कहलाता है कि जो अतिनाज्ञआदि गुणसंपन्न अतिउत्साहवाला अमात्यादिप्रकृती जिसकी उत्तम और अनुरक्तहों इतनी वातोंसे संयुक्तहुआ विजयकरनेपर उत्साह रखताहो इसलिये उसकाभी सोच विचार करना उचितहर और (उदासीनराजा) उसे कहते हैं जोपूर्योक्त अरि विजिगीषु मध्यम इनतीनोंको लड़तेभिड़ते देखतीनोंकोही दंडदेने में समर्थ या तीनोंको परस्परमेल मिलापरखने परकुछ अनुग्रहकरने में समर्थहो पर निष्कारण में किसीको सताने परदृष्टि उसकीनहीं वह (खदासीन) है इसलिये उसकेभी अभिप्रायका विचार करना उचितहै३ चौथे (शत्रुराजा) वे कहलातेहैं जिनकाचर्चा पहलेभी अभि- प्रायार्थमें होचुकाहै कि सहजशत्रु कृत्रिमशत्रु प्राकृतशत्रु यहतीन प्रकारके अरिहो- ते हैं ॥ इतना कहकर फिर मनुजी,कहते हैं कि (एताः प्रकृतयोमलमंडलस्यसमा- सतः। अष्टौचान्या समाख्याताद्वादशैवतुताःस्मृताः)-अर्थात्-इतनी जोचार प्रकृती ऊपर बतलाई सोराजमंडलकी मूलप्रकृती (समासतः) संक्षेपसे कही गई किंचनाठ प्रकृती राजमंडलकी शाखारूप और भी कहींहैं वेभी इन्हीं मलप्रकृतीनमें गिनती हैं। इसलिये चार और आठ मिलकर बारह प्रकृती राजमंडलम विख्यात है- आठप- कृती इसप्रकार से होती कि शत्रु तो ऊपरवाली चार प्रकृतियों में गिनती हो चुके अब उन्हीं पूर्वोक अपने शत्रुओंकी राजभमिसे आगेमागे यथाक्रमसे पहिला राजा अपना मित्र कहलाता है सोई पूर्वनिर्मित चक्रमें देखलो पुनि उससे अगिलाराजा अपना (अरि-मित्र) कहलाता अर्थात् अपने शत्रुका मित्र यहभी उसी चक्रमें देखलो २ पुनि उससे अगला राजा अपना (मित्र-मित्र) कहलाताहे अर्थात् अपने मित्र का मित्र सो यहभी उस चक्रमें यद्यपि तीनसे अधिक राजा पूर्व दिशा में लिखेनहीं क्यों- कि यह चक्र योगीसरके कहेहुये डौलपर बनाया है परंतु उसके अनुक्रमते अधिक राजा अपनी बुद्धिसे जोड़कर समझलो३पुनि उससे अगलाराजा अपना(परि-मित्र- मित्र) अर्थात् अपने अरिके मित्रका मित्र गिनाजाता है यहभी उसी चक्रमें अपनी बुद्धिसे जोड़कर पूर्वदिशा में समझलो ४ यह चार तो अपने और अपने शत्रुसेभी श्रागे हुये-ऐसेही अपने से पीछे पश्चिम औरभी यद्यपि इसी क्रमसे येही सब नाम संज्ञा होसक्तीथीं परन्तु मनुजीने थागे और पीदमें कडवैरभाव संबन्धी अधिकभेद समझकर संज्ञाभेद करदिया हे-योर यहभी कि भागे तो शत्रु भूमिसे थागे आगे गिनती करीथी और पीछे केवल अपनेसेही पाछपीछे किन्तु अपने एष्ठवर्ती शत्रुसे- ही नामसंज्ञा बदली हैं-यथा-अपनेसे पीछेवाला जो चक्रकेहिसाबसे शत्रु गिनाजाता उसीको (पाणिपाद) कहते हैं परन्तु पार्णियाह कोईछोटा मोटा नहींहोसता अर्थात्- मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । २९३ विजिगीषूका पृष्ठव भीहो और देशादिकोंका आक्रमणभी श्राचरताहो तो अपना पाणिग्राह कहलावै-यहां पर विजिगीपूका या अपना कहना दोनों एकीवातहै १ पनि उस्से पिछला जो चक्रके हिसाबसे मित्र कहलाता उसीको (माकंद) कहतेहैं परन्तु श्राकंदभी वही कहलासक्ता कि जो पाणिग्राहका नियामक बनसकै अर्थात् पाणि- ग्राह जो कुछ देशादिकोंका आक्रमण श्रादि पाचरताहो तिसके आचरणोंका नियं- ताहो किंतु चाहै करतेहुयेको रोकदेवै चाहै अपनी प्रेरणासेकरवावै या चाहे उसके आचरणों में नियमांध कि इसप्रकारसे करौ पर इस्से न्यनाधिक या हमारी इच्छासे विपरीत नहीं सोयह राजा उस विजिगीपूका अर्थात् अपनाही आनंद कहलाताहैर इस आक्रंदसेभी एष्ठवर्ती राजा (पाणिग्राहासार) कहलाता३ पुनि इस्सेभी एप्ठवर्ती राजा (प्राकंदासार) कहलाताहै४-आठ यह शाखा प्रकृती और चार पहली मूल प्रकृ- तींमिलाकर बारह राजमंडलोंका राजमंडल हुआ परन्तु पूर्वोक्त पद्माकार चक्रकी अपेक्षा इसमें कछ अन्तरहै क्योंकि यहांपर वामे दाहनेका चर्चा नहीं किन्तु केवल आगे पीछेका हिसावहै तिसका हेतु इसी अधिकोक्तिके प्रारंभमें लिखचुकेहें समझ- • लो अर्थात् किसी भूमिमें वहीडोल मुख्यहोसक्का और किसी भूमिभागमें यहडोल ठीक होसलाहै इसलिये दोनों महर्षियोंका सिद्धान्त एकहै कुछ सन्देह का अवसर नहीं-इस अद्योक्त राजमंडल में यद्यपि केवल आगे पीछेकाही चर्चा कियाहै तथापि इसमें इनाठसे पहले जो चार प्रकृती मूलरूप कहीथीं उनमें वामे दाहनेकीभी सं- भवता पाई जातीहै क्योंकि उनमें किसी ओरका निर्विकल्प नियमनहीहै-परन्तु यह भी यादरक्खो कि बारह राजोंका मंडल कहना यह शास्त्रवक्ताने नीतिज्ञोकेलिये एक निदर्शन मात्रलिखाहै किंतु यही मंडल कहीं दश या आठ नौ इत्यादि न्यूनसंख्यासे होसक्ताहै और कहीं अधिक संख्यामें चौदह पन्द्रह अठारहसेभी होसक्ता अर्थात् जहां जैसा भूमिभागोंका डोलहो या समयके अनुकल जैसे राजाही या जैसी उनमें परस्पर संमति या विरुद्धहो या जिसकालमें जेसा सार्वदेशी सम्राट्हो इनसारीबातों के आधीन जहां जैसीसंभवताहो उसीके अनुकूल राजमंडलभी नीतिज्ञोंको चिंतनीय हैं पर सर्वत्र या सर्वथा या सव कालोंमें निर्विकल्प नियम कोई साभी नहीं रहसता (भेद३) अब इस द्वादश राजमण्डलकी (द्रव्यप्रकृती) कहतेहैं अर्थात् प्रत्येक राज्यमें एक तौ (अमात्य) नाम देश दीवान और अनेकमंत्री १ (राष्ट्र) कहिये देश२ (दुर्ग) कि- ला३ (अर्थ) कोप४ (दंड) अर्थात् शस्त्रोंसहित चतुरंगिणी सेनाकाबल और सर्वसेना- पति५ यह पांचवस्तु सभी राज्यों में होतीहै येही पांचगव्य प्रकृती कहलातीहें इसहि- साबसे बारह राज्योंकी साठिप्रकृती द्रव्यरूपहुई और वे वारह राजाभी मलप्रकृति- रूपसे बारह प्रकृती समझेगये तिनमें साठिवेभी जोड़कर कुल्ल७२ प्रकृतीहुई-सोयह २९४ उपायसे मितालरा साचाराध्याय। मनुजीने कहाहे-यथा(अमात्यराष्ट्रदुर्गार्थदंडाख्याःपंचचापराः । प्रत्येकंकथिताह्येताः संक्षेपेणद्विसप्ततिः)अर्थ इसकाउपरहोचुका-इस बहत्तरि प्रकृतिरूप राजमंडलको श्र- पने हानिलाभ या शुभाशुभके हेतुसे सामादि उपायोंसे राजासदाही निजप्रधानों साथ एकांतमें विचार करतारहे-जैसा ३११ के उत्तराईमें कहाथा कि (तैःसाईचिंत येद्राज्यविप्रेणाथततःस्वयम् ) बहत्तरिप्रकृती कहनेका यहसिद्धांतहै कि अपनी और बिरानीभी ७२ प्रकृतियों का न्यूनाधिक भाव और अनुरक्तभाव या विरक्तभाव या अन्योन्योंका संहत वा मैत्रीभाव या अरिभाव त्रादि नानालक्षणसे विचार कि किस राजाकी प्रकृती मुझसे प्रबल या निर्बल या किससे किसको किसभांतिकी सहायता वा किसको किसकी उपेक्षा वा अनुराग आदि यह सरािबातें भूत भविष्यत् वर्तमान तीनों कालकी अपेक्षासंयोगसे विचारै-इसीलिये अवनीचे के श्लोकसे सामन्यादि उपायों को कहतेहैं ३४४॥ उपायाःसामदानंचभेदोदंदस्तथैवच । ऐ०-(उपायाः) यह चार उपाय के कामचलाना १ (दान) सुवर्णदिरत्नों वा भूमिभाग आदि देकर काम चलाना २ (भेद) अर्थात् शत्रुके सामंत आदि अधिकारियोंमें किसीयुक्तिसे फूटकरवाकर अपनाकाम निकालना३ (दंद) अपकार जो धनहरणसे आदिलेकर बधपर्यंत ४ यह चार उपाय शत्रुयादिको वशकरनेके प्रकार, सो यह चारौं (सम्यक्प्रयुक्ता सिद्धशेयुः) अर्थात् देश काल वस्तुयादिके अनुकूल सम्यक् विधिसे लगायेहुये सिद्धहोते अपना फलदेते हैं पर इनमें (दंड) जोहै सो (अगतिकागतिः) प्रसिद्धहै इसलिये जबतक उनतीन उपायोंसे काम चलसक्नाहो तबतक दंड नहीं लगावे किंतु दंडसंबंधी आचरणका वर्तावा ला- चारी अवस्थामें कियाजाताहे-तथापि-जहार दंडकी योग्यताहुआ करतीहै सो नीचे अधिकोक्लिमें कहतेहैं ३४५॥ गधिः-पहले त्रयोदश राजमंडलमें तीनप्रकारके शत्रुजो कहेथे वेही सवशनुचा- रश्मकारके होतेहें एक तो यातव्य१ उच्छेत्तव्यर पीडनीय३ कर्शनीय ४(यातव्य)उस परगमन करने योग्य सोऐसा कौनहोताहे अनन्तर भूपति जो अपना प्राकृत शत्रु गिनाजाताथा और वही किसीहतुसे कृत्रिम शत्रुभीहोजाय तब उसदशामें यातव्य है और तभी दंडकी अपेक्षाहोगी फिरचाहे वहीअनन्तर भूपनपने सहज शत्रुओंमें भी गिनतीहो या न हो तो इसबातपर कुछतर्कणा नहींहै १ (उच्छेत्तव्य) अर्थात् नाश करने योग्य कौनसा कि जोअपना कोई प्रकारका शत्रहोने परभी व्यसनीहो किंतुउक्त अठारह व्यसनामसे अनेक व्यसनोंसे संयुक्तहो और हीनबलमीहो और उसकी पू. वोक्त प्रकृतीभी उस्से विरकहीं किंतु उस्से नाराज या उसमें श्रद्दा नहीं करतीही या मिताक्षरा स० आचाराध्यायो २९५ विदुंर्गहो या मित्रहीनहों या दुर्वलहो तो इसमेंभी दंडकी अपेक्षाहोगी २ (पीडनीय) अर्थात् केवल पीडादेने योग्य कौनसा कि जो अपना निःसंदेह शत्रु होनेपरभी मंत्र बलसे हीनहो या मित्रवल से हीनहो ३ (कर्शनीय) अर्थात् कृश दुर्वल करदेने योग्य कौनसा कि अपना शत्रुहोनेपरभी प्रवल मित्रकेवलसे,संयुक्तहोनेसे बलवान्हो किंतु इसमें कुछदंडकी अपेक्षा तो नहीं परभेद उनमें फूटकरवानके उपायोंसे निर्बलकरदेना यह तात्पर्यहे यहा थोडाबहुत उसकेकोश और दंडयादिका अपकर्पण किसीयुक्तिसे करलेना तौभी निर्बलता संभवितहै-तद्यथा (निर्मूलनाशमुच्छेदंपीडनंवलनिग्रहम् । कर्शनंतपनःप्राहुःकोशदंडापकर्पणात् ) शत्र तो चार प्रकारके कहे पर मित्रभीदोप्रकार के होते हैं यथा एकतौ वंहणीय १ कर्शनीय २ (ईहणीय) अर्थात् पुष्टबलवान् करदेने योग्य कौनसा कि जो अपने पूर्वोक्ततीनिप्रकारके मित्रोंमें होनेपरभी यथार्थ मैत्रीभा. वरखताहो परन्तु कोश और वलसे हीनहो तो उसकोकोश और वलसे रहणकरदेना चाहिये क्योंकि उस्से कभी सहायता मिलेगी१ (कर्शनीय) अर्थात् अपने पूर्वोक्तमित्रों में होनेपरभी कोश और वलकी याधिक्यता उसमें विशेपहो तो किसीप्रकारसे कम करवादेनी चाहिये क्योंकि न जाने कोईसमय वही अपना शत्रहोजाय या अपनेशत्रु- ओंका सहायक होजायर साम दान दंड भेद यहचार उपाय जो शत्रु और मित्रोंकी अपेक्षासे कहेगये सो केवल इन्हींदोनोंके वशकरनेमें नहीं किंतु छोटेमोटे सभीकामों के प्रबंध राजा इनका (योगविचार) देशकाल वस्तुके अनुकूलकरै तथैव राजाके नि- दर्शनसे औरभी सारालोक अपने साधारण व्यवहारोंकी अपेक्षामें उनकामोंके अनु- कलयोग सोचे-(दृष्टांत) यथा (अधीप्यपुत्रकाधीबदास्यामितवमोदकान् । यद्वान्यस्मै प्रदास्यामिकर्णमुत्पाटयामिते) अर्थात् जैसे पुत्रकी शिक्षामध्ये (पढ़ौवेटापढ़ौ)इत्यादि प्रियभापण (साम) उपाय जब इसमें नहीं पढे तव (बेटातुम्हें लडूदेंगे) यह कहकर कुछलढयादि देनाभी जिसके लालचसे वहपढ़े सो यह (दान) उपाय जव इसमेंभी न पढ़े तब (यहलङ्कअवदूसरेकोदेंगे) यह कहकर उसके देखतेहुये उनको देदेना कि जो पढ़तेहों सो यह (भेद) उपाय कहलाया यद्यपि इसमें देना कहागया परन्तु यहउपाय औरोंको देनेसे दानमें गिनती नहींरहा किंतु इसमें दानरूपसे भेदकर दिखलायाहै क्योंकि भेदशब्दका अर्थ केवल फूटकरवानाही नहीं किंतु भेदके अनन्त लक्षण होते हैं जब इसप्रकारसे भी नहीं पढ़े तव (तरोकान उखेड्डालंगा)इत्यादि असंख्यलक्षण दंडके प्रसिद्धहें परन्तु इस दंडरूपी उपायमें राजाको बड़े२ विचार श्रावश्यक है - र्थात् दंडनीयोंके साथमें अदंड्योंको दंडदेना निषेधहै-तथाचमनुः(यथोडरतिनिर्दाता कक्षंधान्यंचरक्षति तथारक्षेन्नृपोराष्ट्रंहन्याचपरिपंथिनः)अर्थात्-जैसे खेतमें निर्दाता) कहिये कटेहुये अन्नोंकी लावनी आदि करनेवाला एक साथही पैदाहुये अन्न और २९६ मिताक्षरा स० आचाराध्याय । तृणादिक दोनोंमेंसे (कक्ष) नाम तृणोंको दूरकरता जाता और अन्नको रखलेताहै ते- सेही राजाभी राजकी रक्षाकरे और अपने परिपंथियोंको मारवहावै-अर्थात् दुष्टोंको दंडदेनेमें उनके सहजातभाई भतीजे आदिकुटुंब जोअदुष्टहों तिनको नहींमारै किंतु उनसुजनों सहित राजको बनारक्खै वरन उसराज्यको उन्हींके आधीनकरिके उनकी और उसराज्यकीभी रक्षा आपकरै परनिपट उसराज्यका नाम चिहनहींमेटे तब तौ उसकी शोभा और प्रशंसा और धर्म और बड़प्पन येवनेरहें अन्यथा इनसे विपरीत करनेमें यहसारी बातें विपरीत होंगी क्योंकि जो उनको राज्य सहितवनारखकर अ- पने आधीन रक्खेगा तब तो उनराजाओंका पूज्य और उनके मस्तकपर विराजमान उनसे बड़ा कहलावेगा और जब उनका नाम निशानभी मेटदिया तब क्या केवल हालीलोगोंसे बड़ाबनकर उसका बड़प्पन गिनती यासक्ताहै-इसके सिवायवड़प्पन मिलना तो एक योर पर उसअधर्मरूपदशामें राजाका नाशभी होजाताहै सोभी मनुजीने कहाहै-यथा (मोहाद्राजास्वराष्ट्रयःकर्पयत्यनवेक्षया । सोचिराश्यतेराज्या ज्जीविताच्चसांधवः) अर्थात-जो कोई राजा अपने पूर्व राज्यको या किसी राजको विजयकरिके अपना करिपावै तिसको भलेबुरेके अविवैकरूप अनवेक्षासेसवको एक- सी पीड़ादेताहे अर्थात् शास्त्रीय धनग्रहण और मारणादि कष्टोंसे एकसाँसभीको दुःखदेताहे वहशीघ्र थोड़े काल में जनपदवेराख्य प्रकृतिकोप अधर्मोकरके बाधवापु- वादिकों सहित राज्यसेभी भ्रष्टहोजाता और जीवनसेभी नष्टहोजाताहै-इसलियेदंड संबंधी उपायमें अत्यंत सावधानी उचित है ३४५॥ अब राजनीतिके पड्गुण कहतेहें। संधिचवियहचैवयानमासनसंश्रयो । द्वैधीभावंगुणानेतान्यथावत्परिकल्पयेत् ३४६ ॥ ऐ०-संधिविग्रहश्यान३ आसन४ संश्रय५ द्वैध-या-द्वैधीभाव६-(एतान्पगुणान्) इतनेछः गुणोंको (यथावत्) जैसे चाहिये तेसेही अन्य शास्त्रोक्त विधिके अनुकूल (परि- कल्पयेत्) वर्तावाकरै-अर्थात् जहां परजिस किसीगणसे कामचल सक्काहो तहांउसीको पाचरे या जहां दोतीन श्रादिकईकी आवश्यकताहो तहां कईको याचरे (अथवा)कि- सीसे संधि और किसीसे विग्रह इत्यादि कमसे जहां जैसा संभवहो सो तो नीचे अ- धिकोक्तिमै समझना ॥परइनके लक्षणपहले इसी समझो कि-(संधि) उसकर्मको क- हतेहैं जो परस्पर किसीप्रकारकी व्यवस्था निश्चयकरिके अहदनामा लिखलेते चाहे सदैवकेलिये चाहे किसी अवधिकोलिये चाहे किसी प्रतिज्ञाके अनुकूल या कुछदाना- दिव्यवस्थासे मिलाप करलेना सो इस संधिकेभी नीतिग्रंथों में सोलहलक्षण पर्यंत प्रसिद्धहें १-(पिमह) लड़ाई अपकार वैरयह प्रसिद्धहे २ (पान) यात्राको कहतेहैं कि जो किसीपर चढ़ाईकरी जातीह३ (भासन) बैठरहना अर्थात् कोई अपनेसे विरुद्धभी कर मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । २९७ ताहो पर अपना अवसर न देखकर उपेक्षापूर्वक चुपके होरहना ४ (संश्रय) उस कर्म को कहते हैं कि जो किसी वलवानका आश्रय सहारा लेलेते हैं कि वह अपनी रक्षा करसके ५ (द्वैधीभाव) उस कर्मको कहते हैं कि जो अपने सेना बलको दोठोर स्थापन करना किसी रक्षा सम्बन्धी स्वार्थ सिद्धिके हेतुसे होता है ६-ये छहूगुण प्रत्येक दो २ प्रकारके होते हैं-तथाचमनुः-(समानयानकर्माचविपरीतस्तथैवच । तदात्यायतिसंय- क्तःसंधियोहिलक्षणः)-अर्थात्-जहां तात्कालिक या उत्तरकालिकफल सिद्धिके लिये किसी अन्य राजाको साथ लेकर किसीपर चढ़ाई शादि कर्म किया जाता तहां तो (समानयानकर्मा) संधि कहलाताहे १ तैसेही जहां कहीं तात्कालिक या उत्तरकालिक फल सिद्धिके लिये इस प्रकार विपमरूपसे चढ़ाई आदि करीजाती है कि उस द्वितीय नृपतिसे कहाकि तुम वहां जावो हम यहां जावेंगे तहां (असमानयानकर्मा) संधि कह- लाता २ यह दो लक्षावाली संधि मनुजीने कही पुनि इन्हीं दोमैसे वह सोलह भेद भी उत्पन्न होजाते हैं कि जो विस्तार सहित नीति ग्रंथों में कहे अर्थात् युद्ध और जय पराजयके पश्चात् अथवा पहलेही दानादि काँसे जेसी संधि करीजाती है तेसाही उस कर्मभेद या प्रतिज्ञा भेदसे उसका नामभी प्रसिद्ध किया जाता है (दृष्टांत) यथा दारिकादान आदिसे करीहुई संधिको सन्तान संधिनाम-या द्रव्यादि भेंट देकर करी हो तो उपहार संधिनाम इत्यादि पोडश नाम संज्ञा होजाती हैं १ (अथद्विविधाविग्रहः- स्वयंकृतश्चकार्यार्थमकालेकालगववा। मित्रस्यचैवापकृतद्विविधोविग्रहःस्मृतः)-अ- र्थात्-एक तौ (स्वयंकृतविग्रह) वह कहाता जो ठेठ अपनेकार्यकी सिद्धि किन्तु शत्रुपरा- जय करनेको युद्ध किया जाता है-फिर चाहे वह युद्ध यथोक्त मार्गशिर आदि युद्ध मासोंमें चढ़ाई पूर्व कियाहो चाहे युद्दके वर्जित कालों में भी शत्रुको विपत्ति आदि व्यसन आपरनेसे अपना अवसर जानिके कियाहो इसका नियम नहीं दूसरा (मि- त्रस्यचैवापते) अर्थात् (मित्रापरुत-विग्रह) वह कहलाता कि जव अपने मित्रका अप- कार कोई करताहो या करनेवालाहो उस दशामें सहायता करने जानापरै-(परंतु) इस का एक लक्षण और भी होताहे उस दशामें कि जब अपने मित्रनेही किसी अपने शत्रुका अपकार किन्तु अपने शत्रुपर चढ़ाई आदि करीहो तौभी अपने मित्रकी स- हायता करने जानापरे तो वहभी (मित्रापरुत-विग्रह) कहलाताहै सो इस अर्थको सिन्दि ऊोक्त श्लोक पादमें पाठांतर करनेसे होतीहै यथा (मित्रेणचैवापकृते) इस प्रकार पाठ बदलकर पहला और यह दोनों अर्थ अंगीकार होते हैं दूसरे विग्रहके रूपमैर (भथद्विविधयानं-एकाकिनश्चात्ययिकेकार्यप्राप्तेयदृच्छया । संहतस्यचमित्रेपद्विविधं यानमुच्यते ) अर्थात् (पान) कहिये यात्रा दो विधि से कहाती है एक तो (यदृच्छया) अकस्मात् दैवयोगसे (मात्ययिककार्यप्राप्ते) किन्तु अवश्य कार्यके आपरने पर कि जिस्से २९८ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। अपनी कुछ हानि होतीहो अर्थात् किसी शत्रुने कुछ उपद्रव श्रादि किसी भूमिभाग में तत्काल खडा कियाहोतिसके हेतुसे या तो श्रापशक्तिमान्हो तो एकाकीही अपनी सेना साथ यात्राकरे सो यह एकप्रकार अथवा श्राप निर्वलहो तो मित्रकोभी उसकी सेना सहित लेकर यात्राकरे सो यह दूसरा प्रकार २ (अयादिविधमासनं-क्षीणम्यचै- वक्रमशोदेवात्पूर्वकृतेनवा । मित्रस्यचानुरोधेनहिविधंस्तमासनम् ) अर्थात् (मासन) उपेक्षाचपका हो रहना दो प्रकारका ऐसे होताहै कि एकतौ जो कोई अपने (दैवात) किन्तु पूर्वजन्मार्जित प्रारब्धरूपदेवसे अथवा (पूर्वकतेन) किन्तु इसी जन्मसे पूर्वकाल में संचित किये दुष्कर्मके प्रभावसे धन वाहन कोश आदि से क्षीण हीन होगया हो तिसका लाचारीस चुपका होजाना और दूसरा (मित्रस्यच अनुरोधेन) अर्थात् उसका कि जो मित्रके अनुरोध कहिये रोकनेसे चुपकाहो किन्तु शुभचिन्तकतासे भागापीछा सोचकर मित्र जिसको निषेध करै तिसका २ (अद्विविधद्वैध वलस्यस्वामिनश्चैव स्थितिःकार्यार्थसिद्धये । द्विविधंकीयंतेद्वेधपाड्गुण्यगुणवेदिभिः) अर्थात्-प्रथम तो (वैध) कहते हैं सेनाको द्विधाकर देना सो यहभी दो प्रकारका द्विधा करना उन लोगों ने कहा कि जो (पाद्गुण्यगुणवेदी) किन्तु संधि आदि छःप्रकारके नीतिगण जानने वालेहुचे-सो इसमें दोप्रकार क्या कि एक तो बलकी द्विधा स्थिति और दूसरे स्वामी कीभी द्विधा स्थिति अपने कार्यरूप अर्थ सिद्दिके लिये-अर्थात् एक तो जहां कहीं सेनापति सहित बलकी तैनाथी संयुक्ति हुईहो तहां किसी प्रयोजनके निमित्तसे द्विधा करना १ दूसरे किसी आवश्यक रक्षासम्बन्धी हेतुसे कभी (स्वामी) के उपलक्षणसे ठेठ राजधानी वा दुर्गसम्बन्धी सेनाका द्विधा करदेना २ यह मनुजीने कहा-परन्तु द्विधा करदेना यह एक निदर्शनमात्र कहाहै किन्तु इसी द्विधाके उपलक्षणसे स्वामीको या सेनापतिको अख्तियारहै कि वह जहां जैसी आवश्यकता देखे तैसाकरे किन्तु द्विधा नहीं त्रिधा चतुर्धा पंचधा करदेना भी द्वेधीभाव कहलावेगा यह सिद्धांतहे-इसके सि- चाय केवल द्विधा करदेनेकोही वैधीभाव नहीं कहते किन्तु द्वेधीभावके और भी अनेक अर्थ सिद्धांतरूप नीतिशालों में कहे हैं तिनमें एक तो यह सिद्धांतहे कि दो तरफ से दो शत्रुयोंका खटकाहो और निज शक्ति उन दोके तुल्य नहीं देखे तो उनमें एक से संधि करिके मित्र बनावे दूसरेसे विग्रह करे तो इस कर्मका भी नाम द्वेधीभाव गुण कहेंगे क्योंकि उसने द्विधा बर्तावा किया-एक सिद्धांत यहभी है कि बलवान् दोशत्रुओं से एकसाथ युद्ध विरुद्ध कुछ करनापरे तो पूर्वापर विचारिके वापीसे तो अपने आत्मा को उनके अर्पण करे कि हम तुम्हारे हैं क्षमाकरी इत्यादि पर हृदय करके धीभावसे वर्त सो उस प्रकार अललित भाव से कि जैसे कोआके नेत्र कोई नहीं लखपाता इ- त्यादि और भी नानाभेद इस वैधीभावकहोतेह(यया) बलिनोढिपतोमध्येवाचात्मानं - मिताक्षरा स० आचाराध्याय। २९९ समर्पयेत् । द्वैधीभावेनवर्तेतकाकाक्षिवदलक्षितः) (मथद्विविधरसंश्रयः-अर्थसंपादगार्थ चपीड्यमानस्यशत्रुभिः साधुपुव्यपदेशार्थद्विविधःसंश्रयःस्मृतः)अर्थात् (संश्रयः)किसी का आश्रय लेना सो यह भी दो प्रकारका होताहै एक तौ शत्रुओंकरकं पीड़ित किये का अपने (मर्थसंपादन) के अर्थ कहिये उन्हींशत्रओंकी दीहई पीड़ा निवृत्तिके लिये किसीकी शरणमें जाघुसना १ दूसरा संश्रय वह कि शत्रुकीपीड़ा वर्तमानमें नहींर होनेवालीपीड़ा की शंका से किसी का अवलंवमात्र लेना क्योंकि (साधुपुव्यपदेशार्थ) अर्थात् अच्छे भलों में कि जब तक पीड़ा का प्रारम्भ न होने पाया तबतक सर्वत्रसर्व जनों पर यह व्यपदेश व्याजमात्र किंतु चर्चा का बहानामात्र प्रकट होजानेके लिये कि वह नृपति अमुक अतिबलवान् राजाके आश्रय होगया जिस्से कोई पीडादेनेका विचारही फिर न करसकै ३४६॥ अब अगलेश्लोकमें यात्राके उद्देश पूर्व इनछहूगुणके भिन्न २ वर्तावामध्ये काल वर्णन करते हैं। यदासस्यगुणोपेतंपरराष्ट्रंतदाव्रजेत् । परश्चहीनमात्माचदृष्टवाहनपूरुपः ३४७॥ ऐ०-जो निजशत्रुपर चढ़ाईकरने की आवश्यकता हो तो जब उसका देश(सस्य) नाम धान्यादि सर्वबस्तु से संपन्न फलाफूल्ना और गुणोंसे भी उपेतहो किन्तु समान जल ईधन तृण घासफूस आदिसे संपत्रहो तब यात्राकरे सो यह ऐसा वानकबहुधा शरदकाल में होताहै इसीलिये मनुजीने मार्गशीर्षश्रादि मास युद्धयात्राको गुणकारी कहे और लोकमें भी विदित हैं क्योंकि उनमासोंमें युद्धकारियों को बहुधा आतप. आदिसे पीड़ा नहींहोती परन्तु केवल कालसेही कुछ सिद्धिनहीं किंतु(परश्वहीन)अ- र्थात् वह अपना शत्रुभी वलादिकोंसे होनहो और आप अपने वाहन और पुरुषोंसे भी हटहो किंतु अपने हाथी घोड़ा आदि और सेनाभी हृष्टपुष्टहो तवयात्राकरै३४७॥ अधि०-पूर्वोक्त पद्गुणोके वर्तावामध्ये जो २ कालउनके मनुजीने कहहें सो इस प्रसंगमें यथा क्रमसे दर्शाते हैं (तत्रादौ-यथासंधिः यदावगच्छेदायत्यामाधिक्यंध्रुवमा- त्मनः। तदात्वेचाल्पिकांपीड़ांतदासधिसमाश्रयेत् ) अर्थात्-जहां कहीं यद्धकरना परा हो और कदाचित् उसकी(मायत्यां)प्रायतीमें किंतु युद्धकेपीछे उत्तरकालमें(भात्मनःमा- धिक्य-ध्रुवं अवगच्छेत् )किंतु अपनी जयरूप अधिकता निश्चयजान(तदातत्कालही) थोड़ा भी अपना धनादिक जो हानि हुआहो सोलेना अंगीकार करिकै संधिके आश्रय होजाय किंत अरिसेमिलापकरलेवै-क्योंकि(तदात्वेवमल्पिकॉपीडा अर्थात् उसकालमेंता थोड़ाहीपीड़ा या हानिको पहुँचाहै और इसमें अपनी बात रहती है न जानिये अव- के युद्ध में क्याहो १ (मथविग्रहकालः-यदाप्रकृष्टामन्येतसर्वास्तुप्रकृती शम् । अत्यु- च्छ्रितंतथात्मानंतदाकुर्वीतविग्रहम् )अर्थात्-जब किसीसे अपना झगडा टंटालगाहो मिताक्षरा साचाराध्याय। उसदशामें निपट जव अपनी पूर्वोक्त द्न्य प्रकृती अमात्य आदि सभी को प्रकट) कहिये दान मानादि सत्कारोंसे संतुष्ट हुई अपनेमें श्रद्धावान् माने तथा निजआत्मा कोभी(मत्युच्छ्रित)कहिये अतिसमृद्द जान तौ विग्रहकरै अन्यथानही २ (मथयानकालः- यदामन्येतभावेनहष्टपुष्टंबलस्वकम् । परस्यविपरीतंचतदायायाद्रिपुंप्रति ) अर्थात्- जब तबसे अपने अमात्य और सेनारूप बल (हृष्ट) हर्पयुक्त और (पुष्ट) धनादि संपत्ति से बलवान जाने और शत्रुकावल विपरीतनाम दुर्बल समझे तब उसरिपुपर यान कहिये यात्रा करै अन्यथा नहीं ३ (अधमासनकालः-यातुस्यात्परिक्षीणोवाहनेनब- लेनच । तदाऽऽसत्तित्रयत्नेनशनके सांत्वयनरीन्)-अर्थात् जब कदाचित् आप हाथी घोड़े आदि वाहन और बल सेना और अमात्यादिक प्रकृतीभी इनसेपरिक्षीणदुर्वल हो तदा(प्रयलेनमासीत् अर्थात् उसदशामें बड़े यतनकेसाथ अपनी रक्षापूर्वक श्रासन मार चुपकाहो वैठा रहे तथापि( परीन् शनकैः सांत्वयन शत्रुओं को धीरे २ ठंढाकरता हुआ बैठारहे किंतु किसीको सामरूपी प्रियभाषण आदि उपायसेही ठंढाकर किमी को(उपदान)से किंतु धूस पञ्चड़ आदि उपहारोंसे और किसीको(प्रदान)से अर्थात् पूर्वो- क्वउपायोंसे भी न वनिआवे तो किसी भूमिभाग आदि रत्नके देडालनेसे ठंढाकरता हुआ येठारहे क्योंकि इसमें सवकल्याण हैं ४ (मयधीभावकालः-मन्येतारियदाराजा सर्वथावलवत्तरम् । तदाद्विधावलंकृत्वासाधयेत्कार्यमात्मनः) अर्थात् जवराजा अपने अरिको सवतरहसे बलवान्तर समझै किंतु पूर्वोक्त साम उपदान प्रदान इनसे भी वशमें नही आसकता हो तवलाचार निजसेना चलके द्विधा विभाग करके अपना कार्य साधनकरै अर्थात् कुछेक वलसे तो आप अपने दुर्गमें रक्षासहित बैठारहै किंतु युद्धभूमिमें न जावै अाप और कुछेकवलसे सेनापति द्वारा उनशत्रुओंसे युद्धको आ. चरै जो इसपर उद्यत हुयेहों यहा युद्धको संभवता वर्तमान तो नहीं परतीन शंका उसकी संभवहो तो सीमाकी रखवाली आदि आधेबलसे करताहुमा-और आधेबल से दुर्गमें बैठाहुआ आप मित्रादिकों का संग्रहरूप अपनाकार्य साधन करै ५ (अथसं- अयकाल -यदापरवलानांतगमनीयतमोभवेत्।तदातुसंश्रयेक्षिप्रंधार्मिकंवलिनंनुपम्) अर्थात्-जब कदाचित् पूर्वोक्त रीतिसे द्विधावल करनेपरभी निजरक्षा न होसक्ती हो किंतु अमात्यादि प्रकृतियों वा सेनापतियोंके उत्पन्न किये दोपकी बहुताइत से अपने आपेको शत्रुओंके वशम जाताहुथा समझे कि अब कोईभांतिसे रक्षा नही होसकी तव शीघ्र किसी अन्य राजाके पासजाकर उसकी शरणका आश्रय लेवै परन्तु ऐसे राजाका संश्रयकरे जो धार्मिक और निजशत्रुसे बलवान्भी हो क्योंकि उसमें इन बातोंविना वहांभी रक्षाहोनी कठिन है-इसलिये जो देवाधीन ऐसाही मिलजाय तो यह आचरण करना चाहिये सो कहते हैं ६ (यथा-निग्रहप्रकृतीनांचकुर्याद्योरिवलस्य मिताक्षरा स. प्राचाराध्याय । च । उपसेवेततंनित्यंसर्वयत्नैर्गुरुंयथा) अर्थात्-वह बलवान् और धार्मिक राजाजो इसके उन प्रकृतियों काभी निग्रहकरै किन्तु उन अमात्यादिक और सेनापतियों को दंडदेवै जिनके दोपकरके यह गमनीयतम हुआथा और इसके शत्रुवलकाभी निग्रह करै अथवा जिसके आश्रयभूत होनेसे यह अापही उनदोनोंका प्रतिकार करसकैतिस बलवान् राजा को यह नित्यप्रति उसप्रकार से उपसेवन करै जैसे गुरुको निष्कपट होकर सेवनकरतेहैं-भलाजव ऐसानहींमिलै और इसमेंभी निर्वाह न होसक्लाहो तब क्याकरै सो कहतेहैं कि-(यदितत्रापिसंपश्येद्दोपंसंश्रयकारितम् । सुयद्धमेवतत्रापिनि विशंकासमाचरेत् ) अर्थात्-संश्रयभी अगतिकागतिहोता है किन्तु जिसका आश्रय लेनेगये नजानिये वह कैसामिलै इसलिये जब वहांभी संश्रयसे उत्पन्नहुादोपकुछ विश्वास घात आदि भलीभांति देखे तब वहांभी निधड़क होकर फिर तीब्र युद्धको आचरै क्योंकि कहीं दुर्वलभी प्रबलको जीतलेता देखाहै अथवा यह नहीं तो मारे जाने में स्वर्गफल तो कहीं नहींगया-इसलियेदवेहुये समयपर केवल युद्धकही करनेमें भलाई होतीहै-तथाचनीतिः(यत्रायुद्धेध्रुवनाशोयुद्धजीवितसंशयः । तमेवकालंयुद्धस्य प्रवदंतिमनीषिणः) अर्थात्-जहांदबहुये समयपर युद्धके नकरनेमें तो निश्चय नाश होताहो और युद्धके करनेमें दोनों संशय किन्तु चाहै देव सीधाभी होजाय तव ऐसे कालको मनीपोलोग युद्दकाही समय बतलाते हैं ३४७ भला बहकामही ऐसा क्यों करना जिस्से ये झगड़े और विपत्तें आदि खड़ीहाँ किन्तु सारा संसार देवकेाधीन है उसीसे जीवोंके उदय और निपातभी होते, अर्थात् जोकुछ दैवमें वदा होगा सो सब आपसे आप चाहे उदय यहा निपात निस्संदेह सिद्धहोगा-और जो देवमें नहीं सोायास करनेपरभी नहींहोसक्ता इस्से उपायादिक अायास करनेही व्यर्थह-किंतु दैवपर होजाना उचितहै सोनहीं इसीलिये अवनीचे कहतेहैं । देवेपुरुषकारेचकर्मसिद्धिर्व्यवस्थिता । तत्रदेवमभिव्यक्तंपौरूपंपौर्वदेहिकम् ३४८॥ भक्षः कर्मकी सिद्धि दैवमें और पुरुपकारमंभी व्यवस्थापित हुईहै तहां देव प्रत्यक्ष पूर्वदेहिक पौरुपहै ३४८॥ अभि०-यहबात जोकोईकहे कि साधनभूत कर्मोंकी फलसिद्धि केवल देवकेयाधीन हे सोनहीं किंतु वहइष्टानिष्टफल सिद्धि देव और परुपा दोनों में संस्थापित करीगई उस जगदीश करके क्योंकि(पुरुपकार)पुरुपार्थके विना वह देवही नहींहोता फिरदेवमें फलसिद्धि क्योंकर होसती है इसीलिये पिछले अहासे यह सिद्धांत प्रकट करते हैं कि यद्यपि दोनोंमें फलसिद्धिधरीगई पर तथापि उनमें जिसकोदेव या प्रारब्धकहते हो सो वह दैवभी पूर्वदेहिक पौरुप रूप(अभिव्यक्त है अर्थात् पूर्वजन्मके देहसेभले बुरे जो २ कर्म पुरुषार्थरूप संचित कियेथे वेही इसजन्म के प्रारब्धरूप होकर प्रकटहुये । मिताक्षरा स० आचाराध्याय। इसीको देव कहा करतेहैं तो यथार्थसे पुरुपकारही उसदैवसेभी बड़ा ठहरा कि जिसके प्रभावसे इष्ट या अनिष्टरूप दैवकी उत्पत्तिहुई जिस्से सुख या दुःख पाया इसहेतुसे अवश्यभाव करके पुरुपकारमै यत्नादिक उपाय कर्त्तव्य है तिसपीछे देवपर अवलम्ब लेनाचाहिये किडसपुरुषकारमैंदेवकेअनुकूलजोकुछफल होनाहोगासोहोगा-इसलिये कि जो पूर्वदेहिक पुरुपार्थरूप दैववलवान होताहै तबतौ इसदेहसे थोड़ाभी उपाय करनेपर तत्काल वहीदेव महाफल सिद्धिरूप होकर उदय होजाताहे तथापि सिद्धांत में उस थोड़ेसे उपायकी आवश्यकता बनीरही किन्तु निपट न करने में उदयकीसंभ- वता नहीरही-अथवा-जहां दैव दुर्वल या पूर्वदेहिक दुप्कोंके प्रभावसे दुर्दैव हुआ तौभी इसदेहके सुकर्मरूप यत्नोंसे यद्यपि थोड़े पायास पर महाफलंका उदय नही होता परन्तु अति आयास और सुकर्मोंके प्रतापसे दुर्दैवत्वकी शांति होजाती है- अथवा-जहां यहभी नही किन्तु इस देहसे कियेहुये सुकर्म भी सर्वथा निष्फल देख परते तहां निस्संदेह वे सुकर्म संचित होकर अगले जन्मके प्रारब्धरूप देव होजाते हैं-यर्थात् सर्वथा यही निश्चितहे कि पुरुषार्थ सेंही दैववनताहै फिर उसी पुरुषार्थ के प्रभावसे उन्नति और उदयको पहुँचता है इसलिये सुकों के पुरुषार्थ मध्ये यन करनेकी उपेक्षा करनी अनुचित है ३४८॥ अब इसीमें कुछ औरभी मतान्तर दर्शाते हैं। केचिदेवात्स्वभावाद्वाकालापुस्पकारतः। संयोगेकेचिदिच्छंतिफलंकुशलबुद्धयः ३४९॥ . ऐ०-संसारमें कोई पुरुप तौ नीके नागा लक्षावाले फलको दैवसेही इच्छा करतेहैं कि जो कुचदेव करै सोईठीक है हमसे कुछ प्रयासमें उत्साह नहीं होता या कोईकरो तो कुछ होभीनहींसता और कोई पुरुपभलेबुरे फलोंको स्वभावसे अपेक्षा करते हैं कि आपसे आप जो कुछ होनहारहोता है सौ हो जाताहै अर्थात् वे दैवको भी नहीं गिनते और न पुरुषार्थ आदि किसी को इसमें कारण कहते-कोई पुरुष का लके आधीन बतलातेहेंकिकाल जो कुछ करताहे सो होताहै और किसीकेभी करने से कुछ नहीं होता-कोई केवल पुरुपकारसेही अर्थात् निज उपाय और पुरुपार्थके क- रने धरनेसे होजाय सोई ठीकहे यह अभिमान करते हैं और (केचित्कुशलवुद्धय ) किंतु कोई अतिप्रवीण बुद्धिवालेमनु आदिमहर्पिलोग (संयोगफलंइच्छंति) अर्थात् दैव आदि जो २ पहले अदामें कहेगये तिनसबो के संयोग से फल होताहै यह कहते हैं किन्तु केवल किसी एक हेतुसे कुछ नहीं-इसीका दृष्टांत नीचे कहते हैं ३४९ ॥ यथाहकनचकेणनरथस्यगतिर्भवेत् । एवंपुरुषकारेणविनादेवनसियति ३५० ॥ ऐ०-जैसे एक पहिया से रथकी गति नहीं होती ऐसेही पुरुप कारके विनादेव भी नहीं सिद्धहोता किन्तु जब दोनो ओर चक्रलगते हैं तब चलता है ३५०॥ -- मिताक्षरा स० आचाराध्याय । ३०३ हिरण्यभमिलाभेभ्योमित्रलब्धिर्वरायतः । अतोयतेततत्प्राप्त्यरक्षेरसत्यसमाहित. ३५१॥ ऐ०-पराये राज्यमें लाभके हेतु से पहुँचेहुये,को किसलाभपर अधिक दृष्टिकरनी चाहिये क्योंकि मुस्यलाभ तीनप्रकारके होतेहैं.एकतौ धन पृथ्वीर मित्र३ इसलिये कहते हैं कि-हिरण्य १ और भूमि २ इन दो लाभों की अपेक्षा मित्रलब्धि जिस हेतु से श्रेष्ठ कहलाती है इसीसे उस मित्रकी प्राप्तिमें यत्न करै पूर्वोक्त सामादिक उपायोंसे और समाहितहुआ सावधानी से अपने सत्यवचनकीभी रक्षाकरै कितु जो कुछ वचन प्रतिज्ञारूपदिया हो संधिके हेतुसे तिसको पीछे मेट नहीं क्योंकि मित्रलब्धिके विषय में सत्यता मूलमंत्र है अर्थात् अपनी सत्यसे विचलैगा तो मित्रभी फिर उसका शत्रु होजायगा और न जानै पीछे कितने शत्रुहोजायें इस अधर्मसे ३५१ ॥ भला मित्रऐसी क्या वस्तुहै जिसके लिये इतना बड़ा धागा पीछा वर्णन किया सो कहतेहैं नीचेकेश्लोकसेकि मित्रबिनाराज्यके सातअंगपूरेनही होसक्नेयहसिद्धांतहै। स्वाम्यमात्याजनोदुर्गकोशोदण्डस्तथैवच । मित्राण्येता प्रकृतयोराज्यंसप्तांगमुच्यते ३५२ ॥ ऐ०-एक तौ (स्वामी)१ अर्थात् राजा आप और (अमात्याः) २ अर्थात् मंत्री और पुरोहित आदि (जनः)३ अर्थात् चातुर्वर्णादिसारे प्रजालोग जो राज्यके निवासी हों (दुर्ग) किला गढ़ कोट श्रादि अपने राज्यभरेमें जितनेहों (कोश)५ खजाने सवतरह के (दण्ड) ६ अर्थात् हाथी घोडा पैदल आदि सेना सब तरहकी (मित्राणि)७ अर्थात् अनेक मित्र जितने होसके और मिलसके यह सात वस्तुराज्य की प्रकृती अर्थात् मूल कारण होती हैं इन्हीं से सप्तांग राज्य पूरा कहलाता है ३५२॥ तदवाप्पनृपादंदंदुर्वृत्तेपुनिपातयेत् ।धमाहिदंडरूपेणब्रह्मणानिर्मितःपुरा ३५३ ॥ ऐ०-उस ऐसे राज्यको पाकर नृपति दुर्घत्तोंमें दण्ड निपातकरै अर्थात् धूर्त,वंचक, शठ,परदार परद्रव्यापहारी परहिसक आदि दर्जनों को दण्डदेवे क्योंकि पहलेब्रह्माने (हि)जिसहेतुसे धर्म जोहै सोई दण्डरूप निर्मित कियाथा-किन्तु-अधर्मकी हानि और धर्म की प्रति विना दण्डके नही होसक्ती ३५३।। सनेतुंन्यायतोशक्योलुब्धनारुतबुद्धिना । सत्यसंधेनशुचिनासुसहायेनधीमता ३५४ ॥ ऐ०-वह दण्डभी (लुब्ध) कृपण प्रकृतिवाले से या (अरुतबुद्धि) चंचल बुद्धिवाले से न्याय पर्व नही लगसक्ता किञ्च जो (सत्यसंथ) हो अर्थात् सत्यभावसे धर्मानुकूलप्रजा की रक्षामें तत्परहो और (शुचि) भी हो अर्थात् काम क्रोध लोभ मोहादिसे निर्मलहो और (सुसहाय) कहिये पूर्वोक्त सहायक जिसके श्रेष्ठहों और(धीमान) हो कितु नय अ- नयके विचार में प्रवीणहो तवऐसे नृपतिसे वहदण्ड न्यायके अनुसारप्रयुक्तहोसलाहै यथाशास्त्रं प्रयुक्त सन्सदेवासुरमानवम् । जगदानंदयेत्सर्वमन्ययातप्रकोपयेत् ३५५ ॥ ऐ०-क्योंकि वह दण्ड यथायोग्य शास्त्र विधिके अनुसार लगाया हुआ देव असुर - ३०४ मिताक्षरा साचाराध्याय । मानव इन सबों करके सहित सारे जगत् को आनंद करता है अन्यथा शास्त्र से वि- परीत प्रयुक्त कियाहुआ उसी जगत् को प्रकोपित करदेता है-फिर सारे जगत् के प्र- कोपित होने में राजाका भी कल्याणकहाँ ३५५॥ केवल जगत् का प्रकोपही नहीं किंतु और भी सर्वथा हानि होती है। अधर्मदण्डनस्वर्गकार्तिलोकांश्चनाशयेत् । सम्यक्तुदण्डनंराज्ञ स्वर्गकीर्तिजयावहम् ३५६ ॥ ऐ०-क्योंकि अधर्मदण्ड नाम अन्यायरूप दण्डकरना यहराजाके (स्वर्ग)नामऐश्वर्य तथा स्वर्ग प्राप्तिकोभी और (कीति)नाम सुयश कोभी और (लोकान् अर्थात् मनुप्यों और देशों तथा परलोकोंकोभी विनाश करदेता है और जो सम्यक् न्याय की रीति से शास्त्रोक्त दण्ड लोभादिक वर्जित करिके कियाजाता वही धर्मका हेतु निश्चयहोने से स्वर्ग कीर्ति जय इनका देने और द्धिकरनेवाला होजाता है ३५६ ।। अपिधातासुतोऽर्योवाश्वशुरामातुलोपिवा । नाइंडयोनामराज्ञोस्तिधर्माद्विचलित स्वकात् ३५७ ।। ऐ० अपि)चाहें राजा का भ्राताहो या पुत्रहो अथवा (भय) पूज्य हो या ससुराहो मामा आदि कोई हो जो अपने श्रात्मा सम्बन्धी धर्म मर्यादा से विचलित हों तो ये भी सब दंडय हैं फिर इनसे इतरोंकी का कथा-क्योंकि- राजाकनिकट कोई ऐसानाम नहीं जिसकोकहें कि वह अदंडय है अर्थात् जो कोई अपनी उचित मर्यादा से पग- डिगावें वह कोई भी अदंडय नहीं पर जैसा वह दोपहो या जेसादोपी मनुप्यहो उसी की योग्यता अनुकूल दण्ड योग्यहे ३५७॥ भधि-स्मृत्यतरेतु(दंडयौमातापितरौ स्नातकपरिव्राजकपुरोहितवानप्रस्थाश्रु तशीलर्शीचाचारवंतस्तेहिधर्माधिकारिणः) अर्थात्-अन्यशास्त्रोंमें यह कहाहे किएक तौ मातापिता यह दोनों सदाही अदंड्यहोते और इनके सिवाय स्नातक आदिचार येभीजो ऊपर मलवाक्यमें गिनायेगये सो अदंड्यहोते उस दशाकि जो ज्ञानशीच आचारसे संपन्न हो क्योंकि ये इनबातोंसे संपन्नहुये धर्मके अधिकारीहोते,-इसकथन से और ऊोक्त योगीश्वर के मूल वाक्य से यद्यपि प्रत्यक्षभावमें विरुद्धदेख परताहै तथापि दोनों का परस्पर सिद्धांत एक है कुछ अन्तर नहीं क्योंकि योगीश्वरने पूज्यों को भी दंडय कहा उनके उपलक्षण से मातापिताभी गिनतीमें आगये परंतु योगी- श्वरने यह नहीं कहा कि पूज्यों कोभी वहीदंड देने जो अन्यसाधारणीको दियजातेहैं किन्तु पूज्यों के देनेयोग्य देडभी कुछ और प्रकारके होतेहैं दृष्टांत जेसे मातापिता से कुछ प्ययोग्यता हो तो उनके लियेपरम दंड यहीहैं कि उनसेमुख संभाषण श्रादिका त्याग करना ऐमेही अन्य पूज्योंसे साधारण अपराध मुख संभापण अादिकात्याग यहा अपराध की अधिकतामें आजीवनकी न्यूनता यहापरम अपराधमें निज उन्हीं का परित्याग यादि-इसीप्रकार व्यधिकोक्ति के प्रारंभम जिस वाक्यने मातापिता को मिताक्षरा साचाराध्याय । ३०५ अदंडय कहा उसनेभी यह नहीं कहा कि उनकी उपेक्षामात्रभी न करनी किंतुयथार्थ में अदंडय कहा सो इसलिये कहा कि जोर दंड औरोंको दियेजाते उनदंडोंके योग्य मातापिता नहीं हैं पर उनके कियेहुये किसी अधर्मके अनुकूल उपेक्षा श्रादिके योग्य तो भी हैं ऐसेही-उन चारों कोभी समुझलेना इसप्रकारसे दोनोंका सिद्धांत मिलकर मध्यम है-इसीलिये ३५३ श्लोकसे लेकर ३५६ पर्यंत कहचकेहैं कि दण्ड देनेमें श्न- त्यंत न्यायदृष्टिकी आवश्यकता है क्योंकि अज्ञानी राजा बिरली बातोंमें इसयाग्रह से अनर्थरूप दण्डकरता है कि जो शास्त्रमें लिखाथा सो किया परंतु यथार्थमें उस- लिखेका आशय सिद्धांत कहीं दूर होताहै इसलिये सबसे पहले दंडय और अदंडय काही निश्चय करना योग्य हे ३५७॥ योदंडधान्दंडयद्राजासम्यग्यध्यांश्चधातयेत्। इष्टस्यात्क्रतुभिस्तेनसमाप्तवरदक्षिणैः ३५८ ॥ ऐ०-जो राजा दंडनीयों को सम्यक् रीतिसे शास्त्र और विचार के अनुसार धि- ग्दंड आदिदंडों से दण्ड देवहे और बधयोग्यों को सम्यक् रीतिसे घातकरै है उस राजाने जानो बहुतसी दक्षिणा वाले यज्ञोंसे यजन किया ३५८।। । अधि०-दंडनीयों को दंड न देने और अदंडयों को दण्ड देने में प्रायश्चित्तभीव- सिष्ठजीने कहा है-यथा (दंडोत्सर्गेराजैकरात्रमुपवसेत्रिरात्रंपुरोहितः कृच्छ्रमदंडयद ण्डनेपुरोहितस्त्रिरात्रंराजा)अर्थात्-दंडनीयों से दण्ड त्यागकरने किंतु न देनेमें राजा एक रात्रि उपवासरूप प्रायश्चित्तकरै पुरोहित तीनरात्रिकरे और कदाचित् अदंडय कोही दण्ड दियाहोतो राजा तीन रात्रि उपवासरूप प्रायश्चित्त और पुरोहित कृच्छू सांतपनव्रतकरै तब शुद्धहो परंतु यह प्रकार केवल अज्ञातभावमें होजानेपर कहा है किंतु जान बूझकर ऐसा करने में प्रायश्चित्तसेभी शुद्धिनहीं होती है ३५८ ॥, अव-दंडय और अदंड्य की परिज्ञान विधिकहते हैं। इतिसंचिंत्यनृपति.क्रतुतुल्यफलंप्टयक् । व्यवहारान्स्वयंपश्येत्सम्यै परिवृतोऽन्वहम् ३५९ ॥ ऐ०-(इति) यही ऊपर कहाहुया यज्ञ फल जो दुष्टोंके दण्ड देनेमें होताहे तिसको और अदंडयों को दण्ड देनेमें जो सर्वस्व नाश होना कहा तिसकोभी राजा सम्यक् रीतिसे चितमन करिके कि मुझको केवलफलकी प्राप्तिहो पर दोप नहीं लगनेपावे इस्से दुष्ट और अदुष्टोकेपरिज्ञानंकेलिये राजा निज आप नित्यंप्रति (एयर२) भिन्नर वर्णादि कमसे सभ्य सभाजनौं करके(परिवृत संयुक्तहया उनकेसाथ व्यवहारोंको देखें भाले ये व्यवहार आगे व्यवहाराध्यायनाम द्वितीय खंड में सब कहेंगे और उसीके प्रारंभ में सभाजनोंकेभी लक्षण कहेंगे कि ऐसे २ होने चाहिये ३५९ ॥ कुलानिजाती.अंगीश्वगणान्जानपदानपि । स्वधर्माचलितानाजाविनीयस्थापयेत्पपि ३६० ॥ अक्ष०-स्वधर्म से चलित हुये कुलों को जाताको श्रेणियों को गणोंको जानपदों .

मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय । को (अपि) निःसंदेह राजा (विनीय) दण्डसे वश करिकै (पधिस्थापयेत्) उनके धर्म मार्ग में स्थापित करे ३६०॥ अभि-(कुलानि) अर्थात् ब्राह्मण आदि वर्षों के कल कहिये परिकर (दृष्टांत) जैसे एक ब्राह्मण में दशभेद या अनेकभेद ऐसेहीक्षत्रिय और वैश्यमभी तिनसोकोभिन्नर और (जातीः) अर्थात् मुर्दावसिक्त श्रादि छोटीमोटी औरभी अनेक जातीको भिन्नर और (श्रेणी:) अर्थात वे जातें कि जो अपने २ जाती नामसे किसी नियत पेशेकोक. रती चलीभाती हैं जैसे तमोली,भरभजा, नाई,वारी आदि अनेकोंको भिन्न २ और (गणान्) अर्थात् समह उन मनुष्यों के कि जो एकही किसी काम को अनेक जातोंके लोग करते हैं और उसी कामकेनामसे सबएकही गणमें गिनेजाते हैं (दृष्टांत)जैसे बजाज सराफ आदि अनेकों को यौर (जानपदान्)अर्थात् जनपदनाम राज भमिमें उत्पन्न हुये (कारुक) नाम कारीगरलोग जैसे लुहार,बाढ़ई,सूपकार आदि अनेकोंको-किजोर अपनी उचित मर्यादासे विचलें पगडिगावे तिनको राजा निश्चय दंडदेकर उनकी धर्म मर्यादामें स्थापित करे जो उचित से अनुचित नहीं करने पावै इस्से यहभी नि- श्चितहुआ कि बहुधा खिच्चर जातें और अज्ञातजातें जो निज कपोल कल्पनाद्वारा अपने को शर्म वर्मादि पद प्रसिद्धि देतेहैं तिनको देशकालका राजा अपने देशकाल में निषेध करनेको अधिकारीहै और यही सिद्धांत३४२ केभीश्लोकसेनितिहै३६०॥ मधि-स्वधर्म से विचलित हये दुर्वृत्तों को सर्वथादंड देनाकहा वह दंडभी दो प्रकार का होताहे-तथाचनारदः (शारीरस्त्वर्थदण्डश्चदण्डस्तुहिविधःस्मृतः। शारीर स्ताडनादिस्तुमरणांतःप्रकीर्तितः।काकिन्यादिस्त्वर्थदण्डःसर्वस्वांतस्तथैवच)अर्थात्- एकतौ शारीरदण्ड १ दूसरा अर्थ दण्डर यह दो प्रकार का दण्ड कहाहे तिसमें शा- दण्ड वह कहलाता जो ताड़न पीटन आदिलेकर मरणपर्यंत होताहै क्योंकि यह शरीरसेहीसम्बन्ध रखता है और अर्थ दंड धन दंडको कहते हैं वह एक कौड़ी से लेकर सर्वस्व हरलेने पर्यंत जो कुछहो क्योंकि वह केवल धनसेही अपेक्षा रखता है- इन दो प्रकारोंमसे फिर अपराधके अनुसार अनेकप्रकार होजाते हैं-यथा (शारीरो दशधाप्रोक्ताह्यर्थदंडस्त्वनेकधा)अर्थात्-शरीर दण्ड दश प्रकारका कहा है और धन दण्ड अनेकधा असंख्य लक्षणवाला होताहे देश काल वस्तु के अनुसार सो सब न- क्षण इन दोनोंके व्यवहारांग शास्त्र पढ़नेसे निश्चित होजाते हैं ३६० धनदंडको संज्ञा भेदसे कृपाल माप सुवर्ण पल इत्यादि शब्दोंसे बोलते हैं इसलिये किं धनवा- चक शब्दोंके पर्याय देश भेदसे जुदे २होतेहैं पर दंडके प्रयोजनमें एक रूपके श्रप- राधमें भेद मतहो इस्से उन शब्दाको नियतरूप से दर्शाते हैं कि निज २ देशी अपेक्षासे तुल्यता करके दंडका व्यवहार किया जाये।

मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । ३०७ जालसूर्यमरीचिस्थंत्रसरेणूरजःस्मृतम् । तेष्टौलिक्षातुतास्तिस्राराजसर्पपउच्यते ३६१ ॥ ऐ०-जोल झरोखेमें प्रवेश हुई सूर्य किरणोंमें उड़ती हुई रजके परम छोटे विभाग जो चमकते हैंवेही (प्रसरेणु) नामसे विख्यातहैं वेही त्रसरेणुाठ मिलकर एक(लिक्षा) कहलाती है वे तीन ३ लिक्षा मिलकर एक (राजसर्पप) कही जाती है-लिक्षा लीखोंका नामहै जो बालोंमें पसीनेसे छोटी २ अंडेसे उत्पन्न होजाती है और राजसर्पप यद्यपि गोरी या पीली सरसोंका नामहै पर इस बात में राजसर्पप राईको कहते हैं ३६१ ॥ गौरस्तुतेत्रय.पट्तेयवोमध्यस्तुतेत्रयः । कृष्णल-पंचतेमापस्तेसुवर्णस्तुपोडशपिलंसुवर्णावचत्वारः पंचवापिप्रकीर्तितम् ३६२ ॥ ऐ०-वे पूर्वोक्त राजसर्पप तीन मिलानेसे एक (गौरसर्पप) किन्तु गोरी सरसों होती है यह सरसो सवकी सिद्धार्थरूपहै क्योंकि इसीसे सव बांट आदि वनते हैं-छःसरसों का एक मध्यम (यव) कहाताहै मध्यम इस्से कहा कि वहुत मोटाभी नहो वहुत पतला भी नहो उस जौ पर छः सरसों चढ़ती हैं-तीन मध्यम यवोंका एक (कृष्णल) कहलाता है कृपणला गुंजा धुंघुची चौटली यह नाम इसके लोकमें प्रसिद्धहैं बहुधाइसीको रक्ति- • काभी कहते हैं-पांच कृप्पलोंका एक (माप) होताहै माप यद्यपि उड़दका नाम है पर . इस वार्ताम उस्से कुछ अपेक्षा नहीं किन्तु मासेकी तौलसे अपेक्षा है पर लौकिक में जो आठ रत्तीका मासा प्रसिद्धहै उस्से इसकी तुल्यता नहीं होसक्ती अर्थात् यह दंड सम्बन्धी व्यवहारका मासा जुदाहै-ऐसे सोलह मापोंका एक (सुवर्ण) कहलाताहै और यथार्थ में यह सब नाम तौलसे भी अपेक्षा रखते हैं जैसे ऊोक्त सोलह मासोंभर तोलीहुई वस्तु एक सुवर्ण भर कहलावै-चार सुवर्णका एक (पल) कहलाताहे अथवा नारदादिकों ने पांच सुवर्ण काभी एक (पल) कहा है ३६२॥ अधिः-यद्यपि योगीश्वरका कहाहुआ मुख्य सिद्धांत ऊपर सिद्ध होचुका और इन बातोंसे बहुधा काम अव नहींपरता तथापि इस वा में पहले लोगोंने अपने२ देश और काल और मतके अनुसार जो जो मान भेद संज्ञा रक्खीथी उनमें परस्पर एकसे दूसरी तुल्य नहीं होसक्ती तिसका अन्तरमात्र जान लेनेके लिये एक दो भेद उनके इस अधिकोक्ति में लिखते हैं-नारदादिकोंने पांच पलकाभी सुवर्ण होता बतलाया इस अपेक्षामें तीन ३ स्थूल अति मोटे यवोंसे कृष्णल एक माना इस कृष्णला को व्यवहारिक निष्कोंका सोलहवां अंश माना अर्थात् ऐसी १६कृष्णलौंका एक (निष्क) हुआ परन्तु ऐसी पांच कृष्णलका एक (माप) माना इन्हीं १६ माषीका एक सुवर्ण माना इस हिसाबसे व्यवहारिक पांच निप्कोंका एक सुवर्ण ठहरा इस हिसावसे चार सुवर्णांका एक पल माना तौ वीस २० निप्कोंका एक पल हुआ-जहां तीन सूक्ष्मयवों का (कृष्णल) एक मानाहै तहां उस पूर्वोक्त व्यवहारिक निष्कका चारहवांभाग कृष्णल - मिताक्षरा स० श्राचाराध्याय । कहलाता अर्थात् १२ कृष्णलका एक (निष्क) होता है इस पक्षमें सुवर्ण एक अढ़ाई निप्कोसे होता है और एक पल दश निष्कोंका होताहै-जहां मध्यम तीनि यवोंसे कृ- प्पल एक मानागया तहां उस व्यवहारिक निष्कका बीसवां अंश कृप्पल एक अ. र्थात् २० कृष्णलका एक निष्क होताहे और चार ४ निष्कोका एक सुवर्ण होता है इसी हिसाबसे १६ निप्कोंका एक पल होता है-इसीसे-पांच सुवर्णों का (पल) जिसने माना उसका २० निष्फोंका एक पल हुआ-ऐसेही कही निष्कका चालीसवां भाग कृष्णल अर्थात् कृष्णलका एक निष्फ और दोनिकोंका एकसुवर्ण गाठनिकोंका एक पल इत्यादि मत भेदसे या देश भेदसे संज्ञा भेदभी नाना भांतिसे पाये जाते हैं इनमेंसे जिसको जहां जिस मांतिकी अपेक्षा हो वह अपने देशके व्यवहारिक बांट मान या मुद्रायोंसे निज बुद्धिसे तुल्यता करलेवै ३६२ ।। यह तो सुवर्णको उन्मान कहा-अब रजतका उन्मान कहते हैं। देहष्णलेरुप्यमापोधरणंपोडौनते। शतमानंतुदशभिर्धरणै पलमेवतु ३६३ ।। ऐ०-उपर सोनेके मानमें योगीश्वरके कहहुये दो कृपणलोंका रूपे सम्बन्धी मान में एक माप होताहे वे रूप्यमाप १६ मिलकर एक (धरण) कहलाता है इसीको मनु जीने पुराण भी कहाहे ऐसे दश१० धरणोंका एक (शतमान) कहलाता है इसीको चाँदी सम्बन्धी (पल) भी कहा करते हैं ३६३ पहले कहेहुये चार ४ सुवर्णोभर एक (निष्क) चाँदी सम्बन्धी होताहै-यह नीचेके श्लोकसे लियागया ३६३ ॥ अब ताँवा सम्बन्धी उन्मान संज्ञा कहते हैं। निष्कंसुवर्णाश्चत्वारःकार्पिकस्तानिक पण- ३६४ ॥ ऐ०-इसके एक पादकाअर्थ ऊपरचाँदीमेंगया-दूसरे चरणमें ताँबा कहते हैं किएक (पल) का चतुर्थाश (कर्ष)कहलाता यह लोकमें प्रसिद्ध हे तिस कर्प के उन्मानसे तुला हुया ताम्र का विकार पैसा आदि जो कुछ होताहो इसलिये उसको (कार्पिक) भी क- हते हैं(ताम्रिक)भी कहतेहैं परन्तु उसका मुस्यनाम (पण)कहते हैं उसीको संज्ञा भेदसे (कार्यापण) भी कहते हैं ३६४॥ अधि०-इसताम संबंधी नामाको मनुजीने स्पष्ट भावसे एकसाथकहा-यथा (का पापणस्तुविज्ञेयस्तामिकःकार्पिकापणः) अर्थ इसका यही है जो बात ऊपर कहचुके- जहां पांच सुवर्णों का एक (पल) वांट मानागया उस पक्ष२०मापोंका एक (पण) ता. मिक होताह इस हिसाबसे गक (माप) पसका वीसांभाग होताहे-जहां चारसुवणीका एक पल मानागया उसपनमें १६ मापांका एक (पण) होताहे इसपक्षमें यद्यपि मुवर्ण कापापण पण इन शब्दों का समान अर्थ होताहे तथा सुवर्ण संज्ञा तो सुवर्णके दण्ड मैं होती और ताम्र विपयिक दण्डव्यवहार में पण अथवा कार्यापण कहते-इसमकार मिताक्षरा स० आचाराध्याय। सोना चाँदी तांबेके उन्मानकहेगये ऐसेही लोकव्यवहारांगभूत कांसे या पीतलआदि में समुझने चाहिये परन्तु यहां परकेवल दंडसंबंधी व्यवहारकेउपयोगी उन्मानकहे हैं अर्थात् वैद्यक परिभाषामैजुदे और लौकिकव्यवहारमें जुदेसंज्ञाभेद होतेहैं ३६४ ॥ . । अब दंडपरिमाणोंकी परिभाषा कहते हैं। साशीतिःपणसाहस्रोदंडउत्तमसाहसः। तदईमध्यम प्रोक्तस्तदर्दमधम स्मृतः ३६५॥ ऐ०-(साशीतिः) अस्सीसहित (पंणसाहस्रोदंडः) सहस्रपणका दण्ड अर्थात् १०८० पणका दंड(उत्तमसाहस) नामदंड कहलाता क्योंकि यह इतनादंड उसपर कियाजाता जो उच्चप्रकारसे साहस नामका अपराधकरै साहस अर्थात् किसीके साथ जोरावरी करना-उस्से आधा ५४० पणकादंड (मध्यमसाहस) दंडकहलाता क्योंकि जो मध्यम रीतिसे साहसरूप अपराधकरै उसके योग्य होताहै-इस्से आधा २७० पणकादंड (अधमसाहस) नामदंड कहलाता क्योंकि जो कोई अधमकहिये स्वल्परीतिसे साहस- रूपअपराध किसी परकरे तिसके योग्यहोताहै यह मन्वादिकोंने कहाथा ३६५ ॥ अधि०-मनुजीने परे एक हज़ार पणकहेथे किंतु अस्सी अधिक नहीं-यथा (पणा नांदेशतेसार्धेप्रथमःसाहसःस्मृतः। मध्यमःपंचविज्ञेयःसहस्रत्वेवचोत्तमः) अर्थात्-अ- ढाई सौ२५० पणोंका (प्रथमसाइस) नाम दण्ड किंतु सबसे छोटा और पांचसौ५०० पणोंका दण्ड (मध्यमसाहस) नाम २ और पूरेएक सहस्र १००० पोंका (उत्तमसाहस) नाम ३ विज्ञेय है-मनुजीने जव एक सहस्रपण कहेथे तव सतयुगके प्रभावसे मनुष्यों की थोड़े अपराधमें तत्परताथी किंतु उनसे अज्ञातभावसे अपराधहोताथा जानबूझ कर इच्छा पूर्वक नहीं करते थे और योगीश्वर के समयतक मनुष्यों की प्रकृति श्र- धिक अपराधों पर आरूढ़ होगई किंतु वहुधा जानि बूझकर अपेक्षा पूर्वकरनेलगे इस्से उन्होंने अस्सी और भी बढ़ादिये कि अधिक सुनिकर अपराधी भयमानें और अपराधों से हाथ खींचें-यह उत्तम मध्यम नीच जो तीनभेद धन दण्डके कहे तिनका यही नियम नहीं है कि उतनेका उतनाही सर्वत्रकरै किंतु तीन प्रकारकी परम अवधि कहीं है इसलिये कि जिस अपराध की लघुता गुरुता के समान एक कौड़ी से लेकर २७० पण पर्यंत जो कुछ दण्ड हो वह (अधम) या (नीचसाहस)'दण्ड कहलावें १ जव इस्सेभी अधिक अपराध हो और उसकी समताके अनुसार २७० से कुछ अधिक एक कौड़ी से लेकरदूने पर्यंत अर्थात्५४०पण ताई जो कुछदण्डहो वह(मध्यमसाहस) दण्डकहलावै २ जव इस्से भी कुछ अधिक अपराध निश्चितहो और उसकी समता के अनुसार ५४० के सिवाय एक कौड़ी से लेकर दूने पर्यंत अर्थात् १०८० पणतक जो कुछ दण्ड हो वह (उत्तमसाहस) दंड कहलावै यह सिद्धांत है यह डौल केवल (जर मान) का बताया ३६५॥

३०८ मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । कहलाता अर्थात् १२ कृपालका एक (निष्क) होता है इस पक्षमें सुवर्ष एक अढ़ाई निष्कोंसे होताहै और एक पल दश निष्कोंका होताहे-जहां मध्यम तीनि ययौसे कृ. प्पल एक मानागया तहां उस व्यवहारिक निष्कका बीसवां अंश कृष्णल एक अ. र्थात् २० कृष्णलका एक निष्क होताहे और चार निप्कीका एक सवर्ण होता है इसी हिसाबसे १६ निप्कोंका एक पल होता है-इसीसे-पांच सुवणों का (पल) जिसने . माना उसका २० निष्कोंका एक पल हुआ-ऐसेही कहीं निष्कका चालीसवां भाग कृष्णल अर्थात् ४० कृष्णलका एक निष्क और दोनिप्कीका एकसुवर्णपाठनिकोंका एक पल इत्यादि मत भेदसे या देश भेदसे संज्ञा भेदभी नाना भांतिसे पाये जाते हैं इनमेंसे जिसको जहां जिस भांतिकी अपेक्षा हो वह अपने देशके व्यवहारिक बांट मान या मुद्राओंसे निज बुद्धिसे तुल्यता करलेवै ३६२ ॥ यह तो सुवर्णका उन्मान कहा-अब रजतका उन्मान कहते हैं। देऊष्णलेरुप्पमापोपरणपोदरते । शतमानंतुदशभिर्धरणै पलमेवत्तु ३६३ ॥ ऐ०-ऊपर सोनेके मानमें योगीश्वरके कहेहये दो कृष्णलोंका रूपे सम्बन्धी मान में एक माप होताहे वे रूप्यमाप १६ मिलकर एक (परण) कहलाता है इसीको मनु जीने पुराण भी कहाहे ऐसे दश१० धरणोंका एक (शतमान) कहलाता है इसीको चाँदी सम्बन्धी (पल) भी कहा करते हैं ३६३ पहले कहेहुये चार ४ सुवर्णोभर एक (निष्क) चाँदी सम्बन्धी होताहै-यह नीचेके श्लोकसे लियागया ३६३ ।। अव तॉवा सम्बन्धी उन्मान संज्ञा कहते हैं। निष्कंसुवर्णाश्चत्वार कार्पिकस्ताम्रिक.पण. ३६४ ॥ ऐ०-इसके एक पादकाअर्थ ऊपरचाँदीमॅगया-दूसरे चरणमें ताँवा कहते हैं किएक '(पल) का चतुर्थीश (क)कहलाता यह लोकमें प्रसिद्ध है तिस कर्ष के उन्मानसे तुला हुआ ताम्र का विकार पेसा आदि जो कुछ होताहो इसलिये उसको (कार्पिक) भी क- हते हैं ताप्रिक)भी कहतेहैं परन्तु उसका मुख्यनाम (पण)कहते हैं उसीको संज्ञा भेदसे (कापिण) भी कहते हैं ३६४॥ अधि०-इसताम संबंधी नामीको मनुजीने स्पष्ट भावसे एकसाथकहा-यथा (का पपिणस्तुविज्ञेयस्तामिक कार्पिक.पणः ) अर्थ इसका वही है जो बात ऊपर कहचुके- जहां पांच सुवणों का एक (पल) बांट मानागया उस पक्षम२०मापोंका एक (पण) ता- मिक होताहै इस हिसावसे एक (माप) पणका बीसवांभाग होताहै-जहां चारसुवर्णांका एक पल मानागया उसपक्षम १६ मापोंका एक (पण) होताहै इसपलमें यद्यपि सुवर्ण कार्यापण पण इन शब्दों का समान अर्थ होताहै तथा सुवर्ण संज्ञा तौ सुवर्णके दण्ड महोती और तान विपथिक दण्डव्यवहार में पण अथवा कापण कहते-इसप्रकार -- 00 मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । ३०९ सोना चाँदी तबिके उन्मानकहेगये ऐसेही लोकव्यवहारांगभूत कांसे या पीतलआदि में समुझने चाहिये परन्तु यहां परकेवल दंडसंबंधी व्यवहारकेउपयोगी उन्मानकहे हैं अर्थात् वैद्यक परिभाषामैजुदे और लौकिकव्यवहारमें जुदेरसंज्ञाभेद होतेहैं ३६४ ॥ अब दंडपरिमाणोंकी परिभाषा कहते हैं। साशीतिःपणसाहस्रोदंडउत्तमसाहसः । तदईमध्यमःप्रोक्तस्तदईमधम.स्मृतः ३६५॥ ऐ०-(साशीतिः) अस्सीसहित (पणसाहस्रोदंडः) सहस्रपणका दण्ड अर्थात् १०८० पणका दंड(उत्तमसाहस) नामदंड कहलाता क्योंकि यह इतनादंड उसपर कियाजाता जो उच्चप्रकारसे साहस नामका अपराधकरै साहस अर्थात् किसीके साथ जोरावरी करना-उस्से आधा ५४० पणकादंड (मध्यमसाहस) दंडकहलाता क्योंकि जो मंध्यम रीतिसे साहसरूप अपराधकरै उसके योग्य होताहै-इस्से आधा २७० पणकादंड (अधमसाहस) नामदंड कहलाता क्योंकि जो कोई अधमकहिये स्वल्परीतिसे साहस- रूपअपराध किसी परकरै तिसके योग्यहोताहै यह मन्वादिकोंने कहाथा ३६५ ।। मधि-मनुजीने परे एक हजार पणकहेथे किंतु अस्सी अधिक नहीं-यथा (पणा नांदेशतेसार्धेप्रथमःसाहसःस्मृतः। मध्यमःपंचविज्ञेयःसहस्रत्वेवचोत्तमः) अर्थात्-अ- ढाई सौ२५० पोंका (प्रथमसाहस) नाम दण्ड किंतु सबसे छोटा और पांचसौ५ पणोंका दण्ड (मध्यमसाहस) नाम २ और पूरेएक सहस्र १००० पणोंका (उत्तमसाहस) नाम ३ विज्ञेय है-मनुजीने जब एक सहस्रपण कहेथे तव सतयुगके प्रभावसे मनुष्यों की थोड़े अपराधमें तत्परताथी किंतु उनसे अज्ञातभावसे अपराधहोताथा जानबूझ कर इच्छा पूर्वक नहीं करते थे और योगीश्वर के समयतक मनुष्यों की प्रकृति श्र- धिक अपराधों पर आरूढ़ होगई किंतु बहुधा जानि बूझकर अपेक्षा पूर्वकरनेलगे इस्से उन्होंने अस्सी और भी बढ़ा दिये कि अधिक सुनिकर अपराधी भयमानें और अपराधों से हाथ खींचें-यह उत्तम मध्यम नीच जो तीनभेद धन दण्डके कहे तिनका यही नियम नहीं है कि उतनेका उतनाही सर्वत्रकरै कितु तीन प्रकारकी परम अवधि कही हैं इसलिये कि जिस अपराध की लघुता गुरुता के समान एक कौड़ी से लेकर २७० पण पर्यंत जो कुछ दण्ड हो वह (अधम) या (नीचसाहस) दण्ड कहलावें १ जव इस्सेभी अधिक अपराध हो और उसकी समताके अनुसार २७० से कुछ अधिक एक कौड़ी से लेकरदने पर्यंत अर्थात्५४०पण ताई जो कुछदण्डहो वह(मध्यमसाइस) दण्डकहलावै २ जब इस्से भी कुछ अधिक अपराध निश्चितहो और उसकी समता के अनुसार ५४० के सिवाय एक कौड़ी से लेकर दूने पर्यंत अर्थात् १०८० पणतक जो कुछ दण्ड हो वह (उत्तमताहस) दंड कहलावै यह सिद्धांत है यह डौल केवल (जुर मान) का बताया ३६५॥

an ३१० मिताक्षरा स० अाचाराध्याय । अब दंड के मुख्यभेद कहते हैं। घिग्दंडस्त्वयवाग्दंडोधनदंडविधस्तथा । योज्यान्यस्ता समस्तावाह्यपरायवशादिमे३६६ ॥ ऐ०-पहला (धिग्दंड) धिक्कार श्रादि देकर छोड़देना दूसरा (वाग्दंड) वाणीमात्रसे दंडदेना अर्थात् आगेको दंडदेना कहकर छोड़ना तीसरा (धनदण्ड) अर्थात् एककोडी से आदि लेकर १०८० पण तक जुरमाना जो ऊपर के श्लोकमें कहचुके वहभी इ. सीके भीतर यागया और उसके उपरांत(सर्वस्वहरण)जिसे याचनभापामें (जतीजाय- दाद) कहते हैं तहांतक सब दशायें धन दंडही कहलाता है तथैव चौथा (वथदण्ड)- र्थात् शारीर दंड इसके भी अनेक प्रकार हैं सो (तथा) शब्दसे सब लियेगये किंतु यद्यपि वधशब्द प्रापघात पर्यंत का वाचक है पर यथा धन दंड कहने से जुरमाना श्रादि सब दशायें समझीगई तथा इसमें भी (रोध) घेरना चंदकरना या (बंधन) कैद करना या (ताडन) मारना पीटना या (देशनिकाला) आदि दशलक्षण सब एकही वध- दंड के भीतर २ समुझगये (इम) यह चारोदंड (मपराध-वशात्) अपराधके अनुकूल जैसा अपराधहो तैसेही (व्यस्ताः) एकर जुदे या दोतीन पा(समस्ताः) चारौदंडएकही पर अपराध की प्रबलता में जोड़ने चाहिये ३६६.॥ अधि०-यही चारभेद मनुने भी कहेथे यथा(धिग्दंडंप्रथमकुर्याद्वाग्दंडंतदनंतरम् । तृतीयंधनदंडंतुयधदंडमतःपरम् ) अर्थ इसकाभी वहींहै जो ऊपर कहाथा-परन्तु-य- थार्थ भावसे मुख्य दोही दंड होतेहैं किंतु एक धन दंड दूसरा बंधदंड यसइन्हीं दोके अंतर्गत अनेक भेद होजाते हैं जैसा २ ऊपरसे कथन चला आता वरन धिग्दंड बाग्दंड २ यह दोनों भी उन्हीं के उपभेदमें श्राजाते हैं क्योंकि धिग्दंड तो शरीरदंड में गिनती होकर बधदंडमें समुभागया सो यह मेसीदशामें कामयाताहै कि जब कोई तुच्छनर अपराधीहोऔरतुच्छहीउसका अपराधहोसोभी उसपरभलीभांति निश्चित नहीं होताहोतब धिग्दंडहोकर छूटजाताहै अथवा कोईसेवक वर्गौमसे अपराधीहुआ और उसकेअधिकार संबंधीकुछ थोड़ा अथवा पहलाही अपराधहमा तव घिग्दंडदे कर मुनाफरहा-इसके सिवाय जब दुसराकर फिर उसने वहीअपराध यद्वा उस्से भी कुछ यधिक कोई अन्य अपराध किया तव उसपर वाग्दंडकी आवश्यकता हुई और (वाग्दण्ड)का सिद्धांत भाव (मुचल्कह) होनेपर आरूढ होताहै अर्थात् उसपर दंडकिया तो नहीं गया पर वाणी से यह कहागया कि फिर आगे को ऐसा करेगा तव या तो इतनाधनदंड लियाजायगा अथवा इतने दिनोंका बन्धन किया जायगा इत्यादिल- क्षणों से जो कुछ मुखसे कहागया सोई उस्से लिखवालिया इसहेतु से यह बाग्दंड प्रथम तो विशेषकर धनदंडकीही गिनती में आजाताहै यहा उस मुचलिक शरीर- सम्बन्धी भी कुछ दंड होने को लिखागया तो दोनोंकी गिनतीमें भागया परन्तु य.

का मिताक्षरा स० प्राचाराध्याय। थार्थ में दंड दोही प्रकारके होतेहैं और सब उपभेद गिनेजाते हैं-यद्यपि (वाग्दण्ड को विरले गालिदान या शापादि आक्रोशन अर्थ कहतेहै परन्तु वह वात धर्मसे बिरुद्ध है क्योंकि गालिदान आदि यह अवगुण राजाके व्यसनों में गिनती होचुका है और लोकसेभी विरुद्धहै इसके सिवाय जब धिग्दंडपहले कहचुकेतौ वह धिक्कारही वाग्दंड कहलाचुकी फिर वाग्दंडका दूसराभेद्गानिदान आदिकैसे निर्णय होसक्ताहै ३६६ ॥ अब दंडकी व्यवस्था निर्णय करने के लिये उसके निमित्तों को जतलाते हैं। ज्ञात्वापराधंदेशचकालंबलमयापिवा । वय कर्मचवित्तंचदंददंदयपुपातयेत् ३६७॥ अक्ष-अपराध को देशको भी कालको और बलकोभी अवस्था को कर्म को वि- त्तको जानिकर दंड योग्यों में दंडडाले ३६७॥ अभि०-किसी अपराधी को दंडदेना निश्चितहोजानेपरभी प्रथम इतनी वातीका निर्णय करिलेबै तबदड उसकोकरै क्योंकि इसमें न्यूनाधिकरूप अधर्म दण्डहोजाने का वडाभयहोता है इसलिये प्रथम तौ (अपराध) का स्वरूपदेखे कि वह अपराधकि- सविषयका हुआहै-फिर (देश) को इसलिये देखै कि वही अपराध एकदेशम अधिक दंडके योग्यहोताहै पुनिवही अपराध किसीदेशमे वहांके प्राचारके अनुसार थोडे दंडयोग्य होताहै पनि वही अपराध किसीदेशके याचार अनुसार अपराधकी गिन- तीमेंभी नहीं थासक्ता फिरदंड होना क्योंकर उचितहो-ऐसेही देशके दृष्टांतवत् काल) काभी विचारकरै-फिर(बल)काभी बिचारकरै कि इस अपराधीको कितना दंडसहलेने का बल है या कितने दंडको यहगिनतीमेंभी कुदनही लासक्ता तबकुछ दंडहोनाचा- हिये यहाअपनेबलका बिचारकरै कि हमको कहातक दंडदेनेका अधिकारहे और किस दंडमें नहीं-इसके सिवाय अपराधीकी अवस्था औरजिसके साथ वह अपराधकिया गया उसकीभी अवस्थाका विचारकरै-दृष्टांत जैसे एक प्रति बूढा और कुरोगी जो थोडे दिनमें मरनेहारथा दैवयोगसे किसीलघु अवस्थाके बालकने ईटमारी वहमर- गया इसमें वहवालक जो अतिअचेतहै तौ निपटअदंड्यहै यहा समर्थहे तो थोडे दंडयोग्यहै परप्राणांतिक दंडउसको नहीं इत्यादि कर्मभेदसे अवस्थाभेदका मिला- नकरना अथवा-अवस्थाशब्दसे अपराधकी दशाकाभी विचारकरै कि किसदशाकी उपस्थिति से अपराधहुश्रा (दृष्टांत) जैसे कईसहस्र श्रादिमियों के मेले में हाधीके स- न्मुख आजानेसे वैल या घोड़ेने अकस्मात् गाड़ीको धर उड़ाया इसदशामें यद्यपि अनेक जीवोका नाशहुआहो परगाड़ीवानका अपराध थोड़ा है दूसरा (दृष्टांत) साव- काशके मार्ग में प्रमादसे गाड़ी दौड़ाई इसदशामें यद्यपि एकही जीवकानाश यहा अंगभंगहो परगाड़ीवानका अपराध अपरिमितहै इत्यादिनाना दशाओंकानि- यकरै-फिरउन्हीं सवदशाओंके साथमें कर्मका विचारहोना यह कि किसकर्म द्वारा ३१२ मिताक्षरा स० आचाराध्याय। वह ग्रंपराध हुआ कितु जो उसकर्मसे किसीकी प्रतिष्ठा अथवा धर्मकी हानि हुईहो तौ वालकभी दंडनीयह या उसकर्मका अपराधीयुवा औरसमर्थ ज्ञानवान्ह तौअति- शयदंडनीयहै-इसके सिवायवित्त अर्थात् अपराधीकी हैसियतभी देखनीचाहिये किंतु उसी अपराध में निर्धनपर एक पैसा और उसी अपराधमें सधन पर एक रुपयादंड उचितहोताहे-इसीहेतुसे ३६५श्लोकमेंकहेहुये तीनभांतिकेधन दंडजोपणों द्वाराकहेथे वे नियमसाथ उतनेही नहीं होसक्ते किंतु जहां जैसा उचितहो सो उनसे न्यूनाधिकभी , होताहै-तिसपरभी वह अपराधबुद्धिपूर्व जानिबूझकर हुआहो या दैव योगसे धोखेमे हुयाहो यह देखाचाहिये-तिसपरभी वह अपराधं पहलीवार कियाहै या कई वारपहले भी ऐसा करचुका है यह देखा चाहिये ३६७॥ अधि०-यद्यपि राज धर्मका संपूर्ण कलापराज़ाके अवलंबसे वर्णन कियागया क्योंकि राजा इसकामुख्य अधिकारी होताहै तथापि केवल राजाकेही शिरटीका नहींकिंतुचाहे कोई वर्णहों जो राजाके अधिकारसे किसी देश विभाग मंडल आदिके अधिकर्ता हों उनसभी का यह धर्महै-और राजकरकालेना प्रजारक्षाका हेतु है और दंड इन दोनों का साधक है अर्थात् दंडसेहीकरभी लियाजीता और दंडसेही रक्षाकरीजाती है-दंड नाम यद्यपि मुख्यकर सज़ाको कहते हैं पर दंड सेनाका भी नाम है राजकरलेने को भी दंडकहते. जुर्मानेकोभी दंडकहते हैं धर्मकोभी दंडकहतेहैं-यथा(दंडःशास्तिप्रजाः सर्वादडएवाभिरक्षति। दंडःसुप्तेपुजागर्त्तिदण्डधर्मविदुवुधाः)३६७ ॥ इतिश्रीशुक्लरम्पातिवंशीयमर्यादप्रियपढितदुर्गाप्रसादाभिधेयेनयोगीदवरयाज्ञवल्क्यमुनिप्रणीतधर्मशा- खमधिकत्यन्जुमिताक्षरार्थवादमवलंब्यसंपादितमादापरिपाटीतिनामधर्मशास्त्रसदा- चार.प्रथमोऽध्याय समाप्त: १॥

तथा तथा ॥ तथा ) तथा ३) तीसरे भागमें (८) कर्णपर्व(E)शल्यपर्व(१०)सौप्तिकपर्व (११)योपिक व विशोकपर्व (१२) स्त्रीपर्व(१३) शान्तिपर्व-राज्यधर्म,आपद्धर्म,मोक्षधर्म सफे ४५६ जुज़ २८ वर्क कीमत३) चौथे भागमें (१४)शांतिपर्व दानधर्म व अश्वमेध (१५)माश्रमवासिकपर्व (१६) मुसल पर्व (१७) महाप्रस्थानपर्व (१८) स्वर्गारोहण व हरिवशपर्व सफ़े ५२८ जुज़ ३३ कीमत ३) महाभारत के पर्व भलग २ भी मिलते है । १ भादिपर्व १ कीमत १७ २ सभापर्व २ कीमत 10 ३ वनपर्व ३ तथा १४ विराटपर्व १ तथा ७ ५ उद्योगपर्व ५ ॥ ६ भीष्मपर्व ६ तथा। ७ द्रोणपर्व ७ तथा ॥2) ८ कर्णपर्व ९ शल्यवगदा ९ सौप्तिक १० योपिकवविशोक ११ स्त्रीपर्च १० शातिपर्व १३ राजधर्म, आपद्धर्म, मोक्षधर्म, दानधर्म, सफे ५२८ ११मश्वमेध १४ माश्रमवासिक१५मुसलपर्च १६ मेहाप्रस्थान १७ स्वर्गारोहण१८ तथा। १२ हरिबंशपर्व १९ तथा महाभारत सवलसिह चौहान कृत॥ यह पुस्तक ऐसी उत्तम है कि सम्पूर्ण महाभारत की कथा दोहे चौपाई प्रादि छन्दोंमें है ऐसी सरलहै कि कमपढेहुये मनुष्यों को भी भली भांति समझमें आती है इसका आनन्द देखनेही से मालूमहोगा नीचे लिखेहुये पर्व छपेहुये तय्यार हैं यह पुस्तक बहुतही कम मिलती है घड़ी मुश्किलों से जो पर्व मिले हैं वह छापेगये। (१) आदिपर्व सफ़े७४ जुज४ वर्क५ कीमत) पैमाना११+७छपीहुई सन् १८८४ ई. (२) सभापर्व सफ़े ७८ जुज़ वर्क ७ कीमत " ऊपर लिखेहुये भलंकारों सहित पैमाना ११ ७ छपीहुई सन् १८८३ ई. (३) वनपर्व सफे ४२ जुज़ २ वर्क ५ कीमत । (४) विराटपर्व सफे ७६ जुज ४ वर्क ६ कीमत ।। (५) उद्योगपर्व सफ़े १४४ जुज ९ (६) भीष्मपर्व,द्रोणपर्व,कर्णपर्व,शल्यपर्व, व गदापर्व सफे १७६ जुज ११ कीमत |) (७) स्त्रीपर्व सफ़े (८) स्वर्गारोहण तथा सफे जज १ वर्क बाकी जव इसके पर्व मिलेंगे छापेजावेंगे जिनमहाशयों को मिलसक्ती हे रूपाकरके भेजदें तो छपजावें॥ ४ तथा तथा तथा तथा तथा तथा कीमत 10 तथा जुज १ वर्क कीमत - कीमत भगवद्गीतानवलभाप्यकाविज्ञापनपत्र ।। प्रकटहो कि यहपुस्तक श्रीमद्भगवद्गीता सकल निगम पुराण स्मृति सारख्यादि सारभूत परम रहत्वगीताशासाका सर्वविद्यानिधान सौशल्य विनयौदार्य सत्यसंगर शौच्यादि गुणसंपन्न नराव- तार महानुभाव भर्जुनको परममधिकारी जानके हृदयजनित मोहनाशार्प सवप्रकार अपारसंसार निस्तारक भगवद्भक्तिमार्ग दृष्टिगोचरकराया है वहीं उक्त भगवद्गीतावजूवत्वेदान्त व योगशास्त्रा- न्तर्गत जितको अच्छे २ शास्ववेत्तार अपनीनुदिसे पारनहींपासक्ते तवमंदबुद्धी लिनको कि केवल टेशनापाही पठनपाठन करने की सामर्थ्य है वह कर इसके अन्तराभिप्रायको जानसते-औरयह प्रत्यक्षही है कि जबतक किसी पुस्तक अथवा किसी वस्तुका अन्तरानिमाय अच्छेप्रकार बुद्धिमें न भासितहो तबतक प्रानन्द क्योंकरमिले इसप्रकार सम्पूर्ण भारतनिवासी भगवद्भक्तपादाब्जरसि- कजनों के विनानन्दार्थ व बुद्धिवोधार्य सन्तत धर्मधुरीण सकलकलाचातुरीण सर्चविद्याविला- सीभगवद्भक्तधनुरागी श्रीमन्मुन्शी नवलकिशोरजी सी, आई,ई ने बहुतसाधनव्ययकर फ़र्रुखाबाद नियासि स्वर्गवासि परिदतउमादनसि इसमनोरंजन वेदवेदान्तशास्त्रीपरिपुस्तकको श्रीशंकराचा- र्य निर्मितभाप्यानुसार संस्कृतसे सरलदेशभापा तिलकरचाय नवलभाप्यमारव्यसे प्रभातकालि. ककमलसरिस प्रफुल्लित करादिया कि जिलको भापामात्रके जाननेवालेपुरुपभी जानसक्ते हैं। जबछपनेका समपाया तो बहुतसे विद्वज्जन महात्मामोंर्की सम्मतिले यहविचारहुमा किइस अमूल्प व अपूर्व मन्धी भाप्पमें अधिकतरउनमता उससमयपरहोगी कि इसशंकराचार्य स्त भाप्य भाषाके साथ और इस ग्रन्थके टीकाकारों की टीका भी जितनीमिलें शामिलकीजावें जिसमें - उन टीकाकारोंके भभिप्राय का भी योधहोवे इसकारणले श्रीस्वानी शंकराचार्यजी की शंकरभाष्य कातिलक व श्री मानन्दगिरिस्त तिलक अरु श्रीधरस्वामिस्त तिलकभी मूल इलोकों सहितइस पुस्तकमें उपस्थित है। . इश्तिहार॥ माइमार्च सन् १८८६ ई० से मुमालिक मगरवी व शिमालीका बुडिपो इलाहाबाद क्यूरेटर युमरिपो से मतया मुंडीनयलकिशोर मुराम लखनऊमें भागया है इस वुदिपो में मगरवी व शिमाली पलकेशनल फित्तावोंके सिवाय गोरभी हरएक विद्याकी किताबमौजूदहें इन हरएक कितावॉकी खरीदारीकी कुलशर्तकीमत के सहित इस छापेरवाने की छपोहुई फेहरिस्तमें दर्ज हैं जो दरम्यारत करनेपर हरएक चाहनेगलोंको मिलाफ़ीमत मिलसतीदे जिनसाहयोंको इनकिताबोंकी खरीदारनादो वे इसेपरीदकरें और फेहरिस्त तलपकरें ।। दमैनेजर भवध भावकार निरखनऊमुहल्लाइज़रतगंज N

Mitakshara Satik Acharadhyaya Ka Mulsahit Bhasha Anuvad

Author
Pandit, Durgaprasad
Title
Mitakshara Satik Acharadhyaya Ka Mulsahit Bhasha Anuvad
File name
Mitakshara Satik Acharadhyaya Ka Mulsahit Bhasha Anuvad
Text
OCR done
Citation
1890
Published
2012/08
Publisher
Lakhnow.,munshi Navalkishore Chapa Khana
Language
Sanskrit
Pages
318
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312008
Barcode
99999990320839.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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Vmpr6BCUeNO
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