Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Hindi Komudhi
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हिन्दी कौमुदी।
हिन्दी भाषाका अपूर्व व्याकरण।
पंडित अंगिकाप्रसाद वालपेयी
प्रेकीशका
दि इंडियन नेशनल पलीशर्स लिमिटेड,
१५६ ची मछुआवाजार स्ट्रीट, कलकत्ता।
हित्यकामाल,
तृतीय संस्करण].
[ दाम 1
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विषयसूची।
विपय
पृष्ठ
भूमिका
?
२
व्याकरण
वर्णविचार
चणां के उच्चारण
उच्चारण करनेकी रीति
वर्ण लिखनेकी रीति
संयुक्त वर्ण
शब्दोंके सारणके नियम
सन्धि
जन्दविचार
१२
संज्ञा
२०
'लिङ्ग विचार
२२
२६
शब्दोंकी साधना
सर्वनाम
कारक
(ख)
विषय
पृष्ठ
विशेषण
क्रिया
क्रियाकी साधना
प्रेरणार्थक क्रिया
यौगिक क्रिया
नामधातु
कृदन्त
उपसगे
७५
૬૨
६३
६५
अव्यय
क्रियाविशेषण
सम्बन्धसूचक अव्यय
उभयान्वयी अव्यय
विस्मयादिबोधक अव्यय
तद्धित प्रत्यय
समास
१०५
चाक्यरचनाविचार
विभक्ति प्रत्ययोंके अर्थ
शब्दोंके अथ
क्रियापदोंके अर्थ
शब्दोंको पुनरुक्ति
११२
२२०
प्रथम संस्करणको भूमिका।
आज हिन्दीफे वैयाकरणों और शिक्षकोंके सामने पड़े
संकुचित चित्तसे यह व्याकरण रखा जाता है, क्योंकि इसमें
फई बातें ऐसी हैं जो उन्हें सर्वथा नयी प्रतीत होंगी और इस
समय यह जानना असम्भव है कि वे उन्हें कहांतक स्वीकृत
होंगी। परन्तु जो बातें इस पुस्तकमें उन्हें नयी जंचे और जिन्हें
स्वीकार करनेको उनका जी न चाहे, उनपर यदि ये पूर्व
संस्कारोंको त्याग कर विचार करेंगे, तो आशा है कि बहुतसा
मतभेद दूर हो जायगा।
"हिन्दी फीमुदी" लिखना प्रारम्भ फरनेके पहले हमने
भारतवासियों और विदेशियोंके लिखे कोई १५/२० व्याकरण
देखे. थे, जिनमें सर्वश्रेष्ठ व्याकरणों और उनके लेखकों.
की नामावली तथा उपनेका समय अन्यत्र दिया गया है।
इन व्याकरणोंमें पूर्णता और खोजकी दृष्टिसे पादरी केलागके
हिन्दी ग्रामरफा नम्बर पहला और पं० केशवराम भट्टके हिन्दी
व्याकरणका दूसरा है। पादरी फेलागके विदेशी होने तथा
उस समय व्याकरणकी यातोंके ज्ञानका यथेष्ट विकास न होनेके .
कारण उनके व्याकरणमें यहुतसो त्रुटियां और भूलें रह गयी
। परन्तु जिप्त समय यह लिखा गया था, उस समय तथा
उसके बाद चैसा भी व्याकरण किसीभारतवासियोंने नहीं बनाया यह हमारे लिये बड़ी ही लज्जा और खेदकी बात है। हमारी समझसे प्रत्येक व्याकरणलेखकको लिखना आरम्भ करनेके पहले केलागका हिन्दी ग्रामर-अवश्य पढ़ लेना चाहिये। हिन्दी व्याकरणके वर्ण, शब्द और वाक्यरचना इन तीन अड्डों का ही विचार हिन्दी कौमुदीमें किया गया है। ऐसा क्यों हुआ और छन्दःशास्त्रका विचार क्यों नहीं किया गया यह यथास्थान बतलाया गया है। हिन्दीमें विरामादि चिन्हों- का प्रयोग अब अच्छी तरह चल पड़ा है, इस लिये इनके प्रयोग- के नियम भी होने चाहिये। यद्यपि यह पाश्चात्य प्रथा है और संस्थात, प्राकृत वा हिन्दी व्याकरणसे इसका सम्बन्ध कहीं नहीं लगाया गया है, ( केवल पं० केशवराम भट्टके व्याकरणमें "चिन्ह विचार मिलता है ) इसलिये हिन्दी व्याकरणमें इसे स्थान नहीं मिल सकता, तथापि आजकल इस प्रकरणफी उपेक्षा भी नहीं की जा सकती। इससे हिन्दीके विद्यार्थियोंके सुभीतेके लिये परिशिष्टमें "चिन्ह प्रकरण" दिया गया है। आजतक जितने व्याकरण देखनेमें आये हैं और जो नये तैयार हो रहे हैं, 'सबमें सन्धिप्रकरण संस्कृत व्याकरणसे उठाकर रख दिया गया है। हिन्दी व्याकरणमें संस्कृतफा सन्धिप्रकरण ठीक नहीं जान पड़ता, परन्तु हिन्दीमें भी सन्धि है इसका विचार किसीने नहीं किया और एक आध वैयाकरणने तो यहांतक लिप दिया है कि हिन्दीमें सन्धि और समास नहीं हैं !" उन .
. हमारे मतसे हिन्दीमें सन्धि और समास दोनों है और हिन्दी कौमुदीके सन्धि प्रकरणमें हिन्दिकी हो सन्धि लिखी गयी पर आजकल हिन्दीमें तत्सम शब्दोंका प्रयोग दिनों दिन बढ़ता जाता है, दस लिये परिशिष्टमें संस्कृतकी सन्धि भी दे दी गयी है, क्योंकि हिन्दीके विद्यार्थियोंके लिये इसका जानना अत्यावश्यक है। इस व्याकरणमें नयापन इन विषयोंमें हैं :-(१) वर्णो के 'उच्चारण के नियम,(२) शब्दोंके उच्चारणके नियम, (३) हिन्दीकी सन्धि, (४) स्त्रीलिङ्गसे पुलिङ्ग बनाने के कुछ नियम, जो किसी भाषाके व्याकरणमें आततक नहीं देखे गये, (५) स्त्रीलिङ्ग और पुलिङ्ग शब्दोंकी पहचानके नियम, (६) शब्दोंकी साधना “विभकियों के अनुसार, (७) संस्तकी तरह क्रियामें चाच्योंका 'प्रयोग तथा कर्मप्रधान और भावप्रधान क्रियासम्यन्थी मतका त्याग, (८) क्रियापदोंके सम्बन्धमें शव्यशास्त्र सम्बन्धी शोध और भविष्यकालिक क्रियाकी कल्पनापर मत, (६)प्रेरणार्थक क्रियाके रूपों तथा अर्थों का स्पष्टीकरण, (१०) यौगिक ‘क्रियाओंका थेपिविभाग और विचार, (११) कृदन्त और 'तद्धित प्रत्ययोंका विस्तृत विवेचन, (१२) शब्दों और विभक्तिः 'प्रत्ययों तथा क्रियापदोंका अर्थनिर्णय और (१३) पदयोजना “सम्बन्धी विशेष नियम । हिन्दी कौमुदीके लिये यह दावा नहीं किया जा सकता
।
लिबनेकी प्रवृत्ति ही इसके प्रणयनका कारण है। इसमें पाहांधक
सफलता मुई है इसका विचार निरपेक्ष घेयाकरण और हिन्दी
शिक्षक ही कर सकते है। यह छोटे विद्यार्थियों के लिये निको
गयी है और लघु कौमुदी है, पर (Philology ) शब्दशासके
अनुसार बनने के कारण यड़े विद्यार्थी भी इससे लाम उठा
सकते हैं। यदि हिन्दीके अधिकारियोंने इसका आदर फिया तो
उच्च श्रेणीके विद्यार्थियोंके लिये सिद्धान्त कौमुदी लिपनका
विचार किया जायगा। जो सजन इसकी त्रुटियां या भूलें
चतानेकी कृपा करेंगे, उन्हें सादर धन्यवाद दिया जायगा और
यदि वे यथार्थ त्रुटियां या भूलें होंगी तो अगले संस्करणमें
उनका संशोधन कर दिया जायगा। जो महाशय समाचार.
पत्रों में इस विषयमें कुछ लिखें वे अपनी मालोचना चिन्हित
कर हमारे पास भेजेंगे, तो बड़ी कृपा होगी।
कलकत्ता:
अंबिकाप्रसाद वाजपेयी।
ज्येष्ठ दशहरा, सं० १६७६ ।
द्वितीय संस्करणको भूमिका ।
यह संस्करण बहुत पहले प्रकाशित होनेको था, पर नाना
कारोंसे नहीं हो सका। इससे शिक्षकों और विद्यार्थियोंको
जो मासुभीता हुआ उसके लिये हमें खेद है।
पहले संस्करणकी जैसी समालोचना होनी चाहिये थी, नहीं
हुई। इस लिये भूलोंका सुधार ठीक ठीक नहीं हुआ, क्योंकि
उनका ज्ञान ही नहीं हो सका। तथापि कई अंशोंमें इस संस्क.
रामें कुछ संशोधन और परिवर्तन कर दिये गये हैं।
पिछले संस्करणको भूमिकामें भ्रमवश यह लिप दिया गया
था कि स्त्रीलिङ्ग शब्दसे पुल्लिङ्ग शब्द बनाने के नियम किसीने
नहीं लिखे। वास्तवमें पं० केशवराम भट्टके व्याकरणमें उनकी
फुछ चर्चा हुई है।
इस संस्करणमें निम्नलिखित विषयोंमें महत्वका परिवर्तन
वा संशोधन अथवा परिवईन हुआ है :--वर्णमालाके वर्ण और
भेद, सन्धि, शब्दॉकी साधना, विशेषणके भेद, यौगिक किया
और समास। इनके सिवा जगह जगह फुट नोट दे दिये गये
है, जिनसे हिन्दोवालोंको ही नहीं, अन्य भाषाभापियोंको भी
सहायता मिलनेकी आशा है।
.
(1)
सुविज्ञ शिक्षकों और वैयाकरणोंसे विनीत निवेदन है कि
इसमें उन्हे जिस विषयकी अपेक्षा जान पड़े अथवा जिसमें कुछ
भूल दिखाई दे उसे या तो समाचारपत्रों या निजी पत्र द्वारा
सूचित करनेकी कृपा करें, जिससे अगले संस्करणमें उनका
-
सुधार हो सके।
अन्तमें पं० सभापति उपाध्याय व्याकरणाचार्य तथा 0
रामाशा पांडेय व्याकरणाचार्यको धन्यवाद है जिन्होंने उपयुक्त
सूचनाएं देकर इस संस्करणके संशोधित रूपको सर्वसाधारणके
समक्ष रखने में सहायता दी।
कलकत्ता:
चrealist
अंबिकाप्रसाद वाजपेयी।
तृतीय संस्करणकी भूमिका ।
परमेश्वरको कृपासे हिन्दी कौमुदीका यह तीसरा संस्करण
अध्यापकमण्डली और विद्यार्थियोंके सामने रखनेका सौभाग्य
प्राप्त हुआ है। यह पुस्तक इसी इच्छासे लिखी गयो
थी कि पढ़ने और पढ़ानेवालोंका इससे कुछ लाभ हो। इसके
लिये प्रारम्भसे ही हड़बड़ी करनी पड़ी और जिसमें किसी न
किसी स्कूलमें पढ़ायी जाने लगे, इस लिये पूर्वार्द्ध तो सं०
१६७६ के पीपमें निकल गया था और उत्तरार्द्ध कहीं ज्येष्टमें
निकला और इस प्रकार पुस्तक पूरी हुई।
आशा थी कि हिन्दीके वैयाकरण इसकी समालोचना
कर त्रुटियां बतलावेंगे, जिनका निवारण दूसरे संस्करणमें फर
दिया जायगा। पर जब कोई विचारणीय समालोचना देखनेमें ,
नहीं आयी, तब हमने आप ही संशोधन प्रारम्भ कर दिया और
प्रायः आधी दूरतक पहुंचे ही थे कि सरकारने अपना मेहमान
यना लिया। इस लिये दूसरा संस्करण प्रकाशित होने के पहले
देखा भी न जा सका और संशोधित संस्करणके बदले भूलभरा
संस्करण निकला।
परन्तु विहार संस्कृत परीक्षा बोर्डने इसे अपनाया, इस
लिये तीसरे संस्करणकी नीयत आयो। यह बात कोई दो
महीने पहले मालूम हुई कि हिन्दी कौमुदी मध्यमा परीक्षाका
कोर्स है। इस लिये जल्दी जल्दी यह तीसरा संस्करण एक
महीनेके भन्दर निकाला गया। दूसरे संस्करणपर एक आध
समालोचना निकली थी, पर संशोधनके समय वह नहीं मिली;
तोभी जो भूले ध्यानमें आयीं अपनी ओरसे सबका संशोधन
कर दिया गया है। फिर भी जो रह गयी हों उनकी
ओर यदि अध्यापक वा विद्यार्थी अथवा समालोचक ध्यान
आकर्षित करेंगे, तो उनकी कृपा धन्यवाद सहित स्वीकार
की जायगी और आवश्यक होनेपर अगले संस्करणमें संशोधन
कर दिया जायगा।
.
कलकत्ताः
पीप कृष्णा नवमी,
सं० १९८०वि०
अंबिकाप्रसाद बाजपेयी।
* ॐ श्रीगणेशाय नमः *
हिन्दी कौमुदी।
व्याकरण।
जिस शास्त्र के ज्ञानसे भाषाका शुद्धाशुद्धविवेक होता है,
उसे व्याकरण कहते है।
हिन्दी व्याकरणके तीन भाग है, वर्णविचार, शब्दविचार,
और वाक्यरचनाविवार !*
वर्णविचारमें अक्षरोंके नाम, भेद और उन्धारणका वर्णन है।
शवविचारमें शन्दोंके भेद, साधना और व्युत्पत्तिका
विवेचन है।
"
A
व्याकरणका प्रयोग जिस अर्थमें यहां किया गया है, यह संस्कृतसे ही
नहीं, अंगरेजीस मी भिन्न है। अंगरेजीमें छन्दायास्त्र प्रामरका अङ्ग है,
पर संस्कृतमें वह स्वतन्त्र शास्त्र. है। इसी प्रकार शिक्षा भी संस्कृतमें
स्वतन्त्र शास्त्र है, पर अंगरेजीमें ग्रामरका प्रथम भाग है। हिन्दी में छन्दः
शास्त्र अन्य तो अनेक है, परन्तु शिक्षाका कोई स्वतन्त्र ग्रन्थ नहीं है।
इसलिये हमने अन्य हिन्दी धैयाकरणोंके अनुकरणपर वर्णविचारका
व्याकरणका अङ्गमानकर इसमें स्थान दिया है।
हिन्दी कौमुदी। वाक्यरचनाविचारमें विभक्तियों, शब्दों और क्रियापदोंके अर्थ तथा शब्दोंसे वाक्य बनानेको रीतियां हैं। वर्णविचार। जिन वर्णों वा अक्षरोंमें हिन्दी भाषा लिसी जाती है, वे हिन्दी, देवनागरी या नागरी कहाते हैं। वर्णों की श्रेणीको वर्णमाला कहते हैं। हिन्दी वर्णमालामें अड़तालीस अक्षर हैं। इनके दो भेद हैं, स्वर और व्यञ्जन। ११ स्वर और ३७ व्यञ्जन हैं । न. जिन अक्षरोंका उच्चारण दूसरे अक्षरकी सहायता विना हो जाता है, वे स्वर कहाते हैं। स्वरोंके दो भेद है, सानुनासिक और निरनुनासिक। जो स्वर नकसुर बोले जाते हैं वे सानु नासिक और जिनके बोलने में नाककी सहायता नहीं ली जाती, वे निरनुनासिक कहाते हैं। स्वरोंकी सहायतासे जिनका उच्चारण होता है, उन्हें व्यञ्जन कहते हैं। निरनुनासिक स्वरपर ७ राजपुतानेमें ये शास्त्री और महाराष्ट्र तथा गुजरातमें थालयोध रहे जाते हैं। विहारमे कयी अक्षरोंको हिन्दी अनर कहते है। * सस्कृतमें दो स्वर और हैं, एक ऋ वर्णका दीर्घ रूप म दुसरा लु। पर हिन्दीसे इनका कोई सबन्ध न होनेके कारण इन्हे वर्णमालामें स्थान नहीं दिया गया । और वर्णविचार। अनुनासिक वा चन्द्रविन्दु लगा देनेसे वह सानुनासिक हो जाता है, जैसे अ, आदि। स्वर । अ आ इ ई उ ऊ ऋ ए ऐ ओ ओ व्यञ्जन । क ग ज 'भ who be ण घ न प फ ब भ म य व शप स ह • (अनुस्वार) :(विसर्ग) व्यञ्जन दो प्रकारके होते हैं। एक बे, जिनका उच्चारण हिन्दी पैयाकरणों में कुछने तो अ वर्णपर अनुम्बार और विसर्ग लगाकर अं अः अक्षर बना लिये हैं और इन्हें स्वर ठहराया है और कुछने व्यंजनांकि अन्सम लिखकर इन्हें व्यंजन मान लिया है। पर विचारनेपर ये न तो स्वर सिद्ध होते हैं और न व्यंजन ही और इमाम संस्कृतवालाने इन्हें प्रयोगवाह तिखा है। साथ ही स्वरोंकी महायता बिना इनका स्यारण नहीं हो सकता, इसलिये हमने इन्हें व्यंजनोंका हो एक भेद मान ‘लिया है। पहले संस्करण में प्रानुस्यार या चन्द्रविन्दु स्वतन्त्र वर्ण माना गया था, पर पूर्ण विचार करनेसे यह वर्ण नहीं मिल द्या; क्योंकि इसके बोलने में समय नहीं पड़ता। इसलिये हम इमं चिन्ह मात्र मानते हैं । स्वरोंका सानुनासिक उच्चारण लिखने में यह काम आता है। पर हिंदी में to za न , हिन्दी कौमुदी। पहले या पोछे स्वर रख देनेसे होता है, जैसे अफ, क। दूसरे, वे जिनके पहले स्वर रहे विना उच्चारण नहीं होता; जैसे 'अनुस्वार और : विसर्ग। पिछले प्रकारके व्यञ्जन दो ही हैं । दोनो प्रकारके स्वरोंके दो भेद और है, हस्व और दीर्ध । अ, इ, उ. और ना हस्थ और आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ और औ दीर्घ है। ए, ऐ, ओ और औ, दो दो अक्षरोंके मेलसे बने जान पड़ते हैं और इसलिये सन्ध्यक्षर भो कहाते हैं। इसीसे दीर्घ स्वर भी हैं। इनके ह्रस्व रूप नहीं होते, यद्यपि हिन्दी में विशेष. कर कविता ए और मोका हस्व उच्चारण भी होता है। ह्रस्व स्वरके उच्चारणमें जितना समय लगता है, दीर्घ स्वर- के उच्चारणमें उससे दूना लगता है। ह्रस्वको एकमात्रिक और दीर्घको हिमात्रिक भी कहते हैं। व्यञ्जनों का उच्चारण स्वरोंके विना नही हो सकता, इससे उनका उच्चारण करनेके लिये उनके अन्तमें "" लगा हुआ मान लिया जाता है। किसी अक्षरके साथ "कार" कहनेसे उसी अक्षरका बोध होता है ; जैसे ककारसे क, अकारसे अ आदि । ध्यान तीन भागों में विभक्त हैं, स्पर्श वर्ण, अन्तस्थ वर्ण और अप्न वर्ण। फसे मतक स्पर्श, यसे यतक अन्तस्थ और शसे हतक ऊम्म वर्ण कहाते हैं। स्पर्श वर्ण पांच पांच भक्षरोंकी पांच श्रेणियों में वो है और प्रत्येक श्रेणी वर्ग कहाती है। वर्गके आदि अक्षर से ही उसका 3 , वर्णविचार। नाम पड़ता है ; जैसे कसे कवर्ग, चसे चवर्ग, टसे ट्वर्ग, नसे तवर्ग ओर पसे पवर्ग कवर्ग कहनेसे क श्रेणीके पांचो व्यञ्जनाका बोध होता है। प्रत्येक वर्गका पहला और तीसरा वर्ण अल्पप्राण तथा दुसरा और चीथा महाप्रापा और पांचवां सानुनासिक अल्पप्राण कहाता है। जिन व्यसनोंमें हका भी उच्चारण रहता है, वे महाप्राण कहाते हैं, जैसे, पक+ह, घग+ आदि। इ और द अक्षरोंका स्थान संस्कृत व्यानों में नहीं है, इस- लिये ऊपर लिखे क्रममें इनका वर्णन नहीं हुआ। ड और ढके नीचे यिन्दी लगानेसेड़ और ढ़ अक्षर बनते हैं। पहला अल्पप्राण और दूसरा महाप्राण है। . . वा के उच्चारण । कपट या गलेके बिना तो किसी वर्णका उच्चारण सम्भव । नहीं है, पर कुछ वर्षों के उच्चारणके लिये कण्ठके सिवा कई और अवयवोंका प्रयोजन होता है। जिस अक्षरके उच्चारणमें जिस अवयवकी मुख्यता रहती है, उस वर्णका वही उच्चारण स्थान कांहाता है। उच्चारणस्थानके अनुसार वर्ण कंट्य, तालव्य, मूर्धन्य, दन्त्य और भोष्टय कहाते हैं। गलेसे कपठय, तालुसे तालव्य; मू‘से मूर्धन्य, दांतोंले दन्त्य और ओठोंसे मोष्टय वर्गोंका उच्चारण होता है।।
६ हिन्दी कौमुदी। नीचेके कोटकसे मालूम होगा कि किस वर्णका कौन उञ्चारण स्थान है :-- व्यञ्जन उच्चारणस्थान। स्पर्श वर्ण। स्वर सानु- अन्तस्थ ऊष्म अल्पभाण नासिक अल्पप्राण JOID कंठ अ आ के ग छ : ह थ तालु य a H ऋ ण HA ७. तद थध न ल ओष्ठ उऊ पब दन्तोष्ट व कंठतालु ए ऐ फंठो ओ नासिका उच्चारण करनेकी रीति । उचारणस्थान जानरमीकरणाम करना
वर्णविचार।
विद्यार्थियों के लिये कठिन होता है, इससे उनके उच्चारणके लिये
नियम इस प्रकार बनाये गये हैं।
हिन्दीमें का उच्चारण रिकी भांति ही किया जाता है।
इस लिये पुराने पद्यमयोंमें ऋके बदले रिका ही प्रयोग देखा
जाता है।
हिन्दी में ए, ऐ, मो और यो इन चार स्वरोंके दो दो उच्चा-
रण होते हैं। ए और ओका एक एकमात्रिक वा हस्व उच्चारण
होता है और दूसरा द्विमात्रिक वा दीर्घ । ह्रस्व उच्चारणमें अन्य
'हस्व स्वरोंको भांति दीर्घ उच्चारणसे आधा समय लगता है।
जैसे, एकाई (हस्व ), एक (दीर्घ), मोहल्ला (हस्व), मोहन
(दीर्घ)। ऐ और औका एक उच्चारण तो मर और अउ होता
जैसे, विलया, कौआ और दूसरा अय् और अब होता है;
जैसे, ऐसा, और । एकमात्रिक ए और ओके बदले इ और उ
लिखनेकी चाल भी हिन्दीमें है।
ङका उच्चारण कंठ और नासिकाकी सहायतासे होता है,
इसमें नासिकाका प्राधान्य इस लिये है कि दांतपर दांत रखकर
है।
,
७ बंगलाम ऐ और नौका उच्चारण थे और वो होता है। हिन्दीमें
यह अशुद्ध है। मराठी में अनुस्वारका सानुनासिक उच्चारण भी होता है,
पर बंगलामें नहीं होता, इस लिये नहींका उच्चारण बंगाली "नहीम्"
किया करते हैं। यगाली लोग श्रका उच्चारण प्रायः यो जैसा करते है,
इसलिये हिन्दी अकारके उच्चारणके लिये कहीं "या' और कहीं ""
लिखते हैं ; जैस, मेकरको मेकार और नहींको नहीं।
3
८ हिन्दी कौमुदी। भी इसका उच्चारण अनायास हो सकता है। अपने वर्गके अक्षरके साथ हिन्दीमें इसका उचारण होता है, स्वतन्त्र नहीं । तालमें सारी जीभ फैलाकर दयानेसे का और जीभकी नोकको उलटकर मूमि लगानेसे णका उच्चारण होता है। ड़का उच्चारण भी णको तरह ही होता है, पर भेद इतना ही है कि इसके उच्चारणमें नासिकासे सहायता नहीं ली जाती। अनु- स्वारका उच्चारण हिन्दीमें संस्कृतकी तरह ही होता है, पर अनुस्वारसे ही अनुनासिक वा चन्द्रविन्दुका काम भी लिया जाता है। हिन्दी अनुस्वार बहुत करके चन्द्रविन्दुके बदले ही लिखा जाता है और संस्कृत तथा बहुत कम हिन्दी शब्दोंको छोड़ सर्वत्र उसका सानुनासिक उच्चारण ही होता है, जैसे अंगूडी, चांदी, उगली, ऊंचना, नहीं, में, हैं। हिन्दीमें दीर्घ स्वर. पर अनुस्वार होनेसे संदा उसका सानुनासिक उच्चारण होता है। E, ञ, ण, , और ढ़, इन पांच अक्षरों में किसीसे कोई शद प्रारम्भ नहीं होता। पर पिछले तीन अक्षर शब्दके अन्त और पांचो मध्यमें आते हैं। हिन्दीमें य, च और पका उच्चारण ज, च और खकी तरह । भी किया जाता है और पुरानो कवितामें तो प्रायः इनका भेद ही नहीं माना गया है। वर्ण लिखनेकी रीति। व्यञ्जनोंका उच्चारण स्वरके आगे या पीछे रहे बिना नहीं
वर्णविचार।
होता, पर स्वरहीन व्यञ्जन लिखे जा सकते हैं। जिन व्यानों में
स्वर नहीं रहता, उनके नीचे एक तिरछी लकीर कर दी जाती
है। इसे हल चिन्ह कहते हैं।
जय स्वरों और व्यसनोंका मेल होता है. तब उनकी आकृति
बदल जाती है। स्वरोंके पूरे रूप व्यअनोंमें नहीं मिलते, पर प्रति-
निधिरूपले उनकी मात्राएं मिलती हैं। अकारके मिलनेसे
व्यञ्जनके.रूपमें कोई परिवर्तन नहीं होता, क्योंकि इसकी कोई
मात्रा नहीं है; केवल व्यञ्जनोंका हल चिन्ह उड़ा दिया जाता है।
अन्य स्वरोंके मेलसे व्यञ्जनोंके रूपमें कुछ कुछ अन्तर पड़ता है।
स्वरोंकी मात्रा
अ आ इ ई उ ऊ ऋ
ए ऐ ओ औ
A
७
अक्षरके ऊपर अनुस्वार और उसके पीछे विसर्ग लगता है।
रमें जब उघा ऊकी मात्रा लगती है, तब उसके ये रूप हो
जाते हैं, रू। इसी प्रकार द और हमें ऋकी मात्रा लगती
है, तब उनके ये रूप हो जाते हैं, ह, ह।
संयुक्त वर्ण ।
जब दो या अधिक ब्वानोंका संयोग होता है, तब चे संयुक्त
वर्ण कहाते हैं। संयुक्त घों के रूप तीन प्रकारके होते हैं।
कहीं तो अक्षरोंका स्वरूप ऐसा बदल जाता है कि उसमें मूल
.
हिन्दी कौमुदी।
अक्षरोंका कुछ भी पता नहीं चलता ; कहीं एक अक्षर दूसरेपर
लिखा जाता है और कहीं पहले अक्षरकी खड़ी सीधी रेपा
निकाल दी जाती है। पहले प्रकारके संयुक्त व्यञ्जन क्ष, त्र,
ये तीन ही है। क् और पके योगसे क्ष, त् और रफे योगसेन
तथा ज और के योगसे बना है। शहिन्दीमें ग्य उच्चारण
किया जाता है।
क, च, ट, ड और द जय द्वित्व लिपे जाते है अथवा
टवर्गमें णको छोड़ और अक्षरोंका जब उनसे योग होता है,
तब एक अक्षर दूसरेके ऊपर लिखा जाता है, जैसे शकर : लुभ्या
ह, अड्डा, गहा आदि।
ख, घ, च, ज, त, थ, प, च, भ, म, य, ल, व, श, प
और स अक्षरोंमें जब एक दूसरेसे मिलता है, तब पहले आनेवाले
अक्षर अपनी खड़ी सीधी रेखासे हाथ धो बैठते हैं। न और
ल द्वित्व होनेपर ऊपर नीचे या अगल बगल लिखे जाते हैं।
जैसे गन्ना गन्ना गल्ला गल्ला । टस कभी द्वित्व नहीं होते और
अपने वर्गके अक्षरके ऊपर लिखे जाते हैं। ण द्वित्व होनेपर
पण या ण लिखा जाता है त द्वित्व होनेपर त लिखा जाता
.
है, जैसे पत्तल।
.
जय र किसी अक्षरके पहले आता है, तब उसके ऊपर और
'जन पीछे आता है, तब नीचे लिखा जाता है ; जैसे, मर्क, बत्र।
जय कके साथ त यार जुड़ता है, तब दोनोके ये रूप होते हैं :
क्त, का। जव ज द्वित्व होता है, तव यातो ऊपर नीचे लिखा जाता
वर्णविचार।
..
में है या अगल यगल और पहले जकी लकीर गिर जाती है। जैसे,
में
लज्जा, रज्जू।
क, ट, ड, ढ के साथ जय य जुड़ता है, तब उनके रूप इस
प्रकार होते हैं:-क्य, ट्य, र, ड्य, व्य । जयण किसी अन्य
व्यञ्जनसे मिल जाता है, तय उसकी खड़ी रेखा गिर जाती है
कौर जब अपने घर्गफे व्यञ्जनोंसे मिलता है, तब भी रूप इसी
प्रकार यदल जाता है। पर उच्चारण के समान होता है;
जैसे, कपटक, उण्ड।
क गौर घफे योगों व कके नीचे लिखा जाता है, जसे फ।
जब पका संगोगट या ठसे होता है, तब यह इन अक्षरोंके
कपर लिया जाता है । जैसे ए, छ।
के साथ ण, न, म, य, र और बका योग होनेपर संयुक्त.
रूप इस प्रकार होते हैं, हा हा, , ह।
शब्दोंके उच्चारणके नियम ।
.
.
हिन्दीमें सभी शब्द स्वरान्त लिखे जाते हैं, पर कविताको
छोड़ सर्वत्र अकारान्त शब्दोंका उच्चारण व्यञ्जनान्त होता है
जैसे, भारत, राम। यहां त और म स्वरान्त हैं, पर इनका
उकारण इस प्रकार होता है, मानो त और ममें अकार है ही नहीं।
दो अकारान्त अक्षरों के शब्दोंका उचारपा करनेके समय
'दुसरा व्यञ्जनान्त बोला जाता है, जैसे, फल, घर ।
इसी प्रकार तीन अक्षरोंके शब्दों में तीसरा, चारमें दूसरा और
. हिन्दी कोमुदो। चौथा, पांचमें तीसरा और पांचयो, उमें तीसरा और छठा आठमें दूसरा, चौथा, छठा और आठवां व्यञ्जनान्त उच्चारित होता है ; जैसे, कलम, कमरख, गपड्चौथ, लश्टम्पश्टम्, गड़. वड़सड़व आदि। हिन्दीमें संयुक्त वर्गों के पूर्व वर्णका गुरु उच्चारण प्रायः नहीं होता। जैसे रामप्रसाद शब्दका उच्चारण संस्कृतफे ढङ्गपर रामप्रसाद न होकर रामप्रसाद होता है सन्धि ।* [शब्दोंका शीघ्रतापूर्वक उच्चारण करनेमें दो शब्दोंके चीचके अक्षरोंके संघर्षसे जो नया उच्चारण बनता है, उसे वैयाकरण सन्धि कहते हैं। प्रारम्भमें ठहर ठहरकर जव लोग वोलते थे, तव सन्धि नहीं होती थी। पर जब जल्दी बोलनेका प्रचार बढ़ा, तब किसी वैयाकरणने सन्धिकी कल्पना कर सन्धिके कुछ नियम बनाकर रख दिये और जब सन्धियुक्त ३ इस प्रकरणका नाम "सन्धि" हमारे एक च्यापरणतीर्थ मित्रको पसन्द नहीं है, पर प्रकरण ये यावश्यक समझते हैं। यहां हिन्दीकी सन्धि दो गयी है। .सस्कृतको सधि परिगिप्टमें मिलेगी। हिंदी सय 'शोंमें सस्कृतका अनुसरण नहीं करती, इमकिये दोनोको मधिके नियमोंकी तुलना करना भूल है।'
सन्धि। . उच्चारण बहुत अधिक होने लगा, तब व्याकरण ग्रन्थोंमें सन्धि प्रकरणको - स्थान मिल गया। सन्धि उच्चारणकी विशेषता ठहरायी गयी और संस्कृतवालोंने नित्य सन्धि चा सन्धिकी अनिवार्यताकी दुहाई देनी आरम्भ की।] [परन्तु हिन्दीमें नित्य सन्धि न होनेपर भी उच्चारणकी विशेषताने सन्धिका प्रश्न सामने ला खड़ा किया है। हिन्दीमें शब्दमें प्रत्यय जुड़नेपर ही सन्धि अधिक होती है, चाहे वह प्रत्यय तद्धित हो या कृदन्त, लिङ्गप्रत्यय अथवा क्रियाप्रत्यय । कुछ लोग हिन्दीमें सन्धि सुनकर बहुत असन्तुष्ट होते हैं, पर उपाय नहीं है, क्योंकि हिन्दी शब्दोंके व्यंजनान्त उच्चारणने सन्धिका मार्ग खोल दिया है। जय दो अक्षर मिलकर तीसरा रूप धारण करते हैं, तब उस मेलको सन्धि कहते हैं। संयुक्त अक्षर और सन्धिमें यह अन्तर है कि संयुक्त अक्षरमें मिले हुए अक्षर रहते हैं, केवल अगले अक्षर व्यंजनान्त हो जाते हैं, पर सन्धिमें दोनो अक्षर यदलकर तीसरा ही रूप धारण करते हैं। जब दो दो अक्षरोंके शब्दों में सन्धि होती है, तब पहले शब्दके प्रथम अक्षरका स्कर यदि दीर्घ होता है, तो हस्व हो जाता है। चार अक्षरोंका प्रथम शब्द होनेपर तीसरे अक्षरका स्वर ह्रस्व हो जाता है। . यदि उसका हस्व रूप नहीं होता तो उच्चारण अवश्य ही ह्रस्व या एकमात्रिक किया जाता है और
२४
हिन्दी कोमुदी।
कभी कभी उसके मेलका हख स्वर लिखा और उचारण किया
जाता है अर्थात् एके बदले इ और भोके चढले उ लिया जाता है।
उदाहरण :-यूढ़ा आपा-बुढापा, राजपूत+आना-राज.
पुताना, लोटा+इया लोटिया या लुटिया ।
अपवाद :-प्रथम शब्द का प्रथम अक्षर औकारान्त होनेसे
हस्न नही होता ; जैसे, चौवे+आइन-चीयाइन ।
जब दो स्वरोंके मेलसे तीसरा स्वर बनता है, तब उसे स्वर
सन्धि कहते हैं। पर जब स्वरान्त शन्द व्यंजनान्त होकर
प्रत्यय अथवा अन्य शब्दसे मिलता है, तव व्यंजन सन्धि होती
है। दीर्घको हस्ख पनानेवाला नियम दोनो सन्धियोंमें चलता है।
भ वा आके बाद आ रहनेसे दोनो मिलकर आ हो जाते
हैं ; जैसे, लड़+आई-लड़ाई, भूल+भावा-भुलावा, राजपूत+
आना=राजपुताना, बूढ़ा-आपा-बुढ़ापा ।
इसी प्रकार एक हो शब्दमें के बाद ई रहनेसे दोनो मिलकर
ई हो जाते हैं ; जैसे, दिई दी, किई =की, लिई ली, पिईपी
सिई-सी।
इसी प्रकार एक ही शब्दमें आके बाद ई रहनेसे प्रत्यय
जुडनेके पहले दोनो मिलकर ऐ तथा आके बाद ऊ रहनेसे दोनो
मिलकर ओ हो जाते हैं। यदि इकारादि प्रत्यय रहता है तो
इकारका लोप होकर प्रत्ययका अवशिष्ट भाग शब्दके अन्तमें
जुडता है, जैसे, भाई+इया भैया, गाई+इया गया, माई+इया-
मैया, नाऊ आ-नौसा।
-
सन्धि - अवा आके बाद ऐ रहनेसे दोनो मिलकर ऐ और भचा आके बाद औ रहनेसे दोनो मिलकर औ हो जाते हैं और पहला मा हस्व हो जाता है ; जैसे, परख+ऐ-परखैया, गोड़-ऐत= गोडैत वा गुड़त, डाका+ऐत=कैत, बाप+ोतोपोतो,चूना+ भीटी-चुनौटी। ईके बाद आ रहनेसे दोनो मिलकर या और ऊ के बाद ई 'रहनेसे दोनो मिलकर वी हो जाते हैं; जैसे, पी+आस-प्यास लखनऊ ई-लखनवी। जय दो अक्षरों में सन्धि होतो हैं, तब पहले अक्षरमै यदि दुहरा व्यक्षन हो, तो इकहरा रह जाता है और फिर सन्धि होती है। जय अ, भा, ई के बाद इ, ई, ऊ, ए, ओ होते हैं, तब अगले अ, आ, ई, स्वरोंका लोप हो जाता है और व्यक्षनोंसे वादके स्वरोंकी सन्धि होती है ; जैसे, माखन+इया-मखनिया, लत: इयललतियल, सोंटा+इया-सोंटिया, धोवी+इया-धोबिया, यंगालई वंगाली, गर्जऊ-गर्जू, डाका+डाक, कृत्ता इया=कुतिया, विलो+आव=विलाव, लूट+एरा-लुटेरा, बहन ओई-बहनोई । 'जब एके याद मा होता है, तव एका लोप हो जाता है और व्यञ्जनके साथ थाकी सन्धि होती है ; जैसे, पांडे आइन- . शिक्षकोंको चाहिये कि विद्यार्थियोंको ये नियम पट्टी या बोर्ड पर लिखकर इस प्रकार समझा :-माखन+इया-मसन् +इया-मसनिया कुत्ता+इया-कुत+इया-कुतिया, विल्ही याव-विल+प्राय:यिलाच । .
हिन्दी कौमुदी।
पंडाइन, चौवे+आइन-चीवाइन ।
जब किसो शब्दके अन्त में व हो और उसके बाद निश्चयार्थक
अव्यय "ही" आचे, तो कभी बके अका और कभी "ही"के हका ।
लोप हो जायगा और वही मिलकर “भी" वा बई मिलकर “वी"
हो जायंगे ; जैसे, भव+ही अव्+ही अभी, जय+ही जब+हो-
जमी, कय+ही-क+ही कभी, तव+ही तय+ही तभी।
विकल्पसे "ह" का लोप भी होता हैं ; जैसे, सयाही सभी
या सवी, दव+ही दवी ।
जय किसी शब्दके अन्तमें ह या हां हो और उसके बाद
"ही" शब्द आये, तो ह या हाका लोप हो जायगा और
शब्दका जो टुकड़ा बचेगा, होके साथ उसकी सन्धि होगी;
जैसे, मुह हो-मुही, कहां हो-फहीं, . यहां+ही यहीं, वहां+
ही+वहीं।
हम और तुम शब्दके बाद जब "हो" शब्द माता है, तो मके
अकार और होके हकारका लोप हो जाता है और फिर सन्धि
होती है ; जैसे, हम+ही हमी, तुम+ही तुमी।
साथ होकी सन्धि करने के समय कभी हीके हकालोप नहीं भी
करते ; जैसे, तुम+ही-तुम्ही।
बो समझते हैं कि यह नियम व्यापक नहीं है, वे यह भूल जाते हैं कि
अच्छे पढ़े लिखे लोग "दव ही" न बोलकर "दवी" बोलते हैं।
उनको वुद्धिको प्रशंसा क्या की जाय जो इनवतेंड कामानोंमें रहने के
कारण समझते हैं कि हम "भी" अव्ययको इसी नियमसे बना बता रहे हैं।
B
तुम शब्दके
सन्धि।
.
इस, उस, जिल, किस, तिल रूपोंके,वाद जय "ही" आता
है, तय होके हकारका लोप हो जाता है और ईके साथ पूर्व
# अक्षरकी सन्धि होती है ; जैसे, इस+ही इसी, उसही-उसी,
जिस+ही जिसी, किस+ही किसी, तिस-ही-तिसी।
"ही" शब्दके पहले अन्य अक्षर मानेसे भी प्रायः हका लोप
कर दिया जाता है ; जैसे, सुन+ही सुनी, मा+ही आई, पढ़ ही
* -पढ़ी, लिख ही लिपी।
इन, उन, जिन, फिन, तिन रूपोंके बाद जब "ही" शब्द माता
है, तव नके अकारका लोप कर दिया जाता है और न ही मिल
ही हो जाता है, जैसे इन+ही इन्ही, उनम ही उन्ही, जिन+ही
=जिन्ही, किनाही किन्ही, तिन+ही-तिन्ही।
धके बाद ह होनेसे का लोप हो जाता है और बचे हुए
अक्षरोंमें सन्धि होती है ; जैसे, दूध+हांडी दुधांडी।
कके बाद क रहे तो पहलेका लोप हो जाता है ; जैसे, नाक
+कटानकटा।
तके याद ६. रहे तो दोनों मिलकर ह हो जाते हैं, जैसे.
। पोतदार-पोद्दार।
.
.
है
१
'..
शब्दविचार ।
-
1
जो कुछ मुहले वोला या कानसे सुना जाता है, वह शब्द
कहाता है। शब्द दो प्रकारके हैं, सार्थक और निरर्थक।
जिनका अर्थ होता है, वे सार्थक और जिनका अर्थ नहीं होता,
वे निरर्थक कहाते हैं। व्याकरण सार्थक शब्दोंका ही नियामक
है, इसलिये यहां शब्द कहनेसे सार्थक शब्द ही समझना
चाहिये।
हिन्दीमें चार प्रकारके शन्द व्यवहारमें आते है, तत्सम,
तद्भव, देशी और विदेशी।
तत्सम वा संस्कृतसम शब्द बहुधा संस्कृतकी प्रथमा विभक्ति
के एकवचनके ही रूप होते है ; जैसे, राजा, माता। तद्भव
शब्द संस्कृत शब्दोंसे उत्पन्न होते हैं, जैसे, मेह, भगत । देशी
शब्द प्रदेश विशेषके शब्द होते हैं ; जैसे, डोंगी डाभ। विदेशी
शब्द अन्य भाषाओंके शब्द हैं ; जैसे, खरगोश, शेर, ट्रेन, गिरजा
कम्पनी आदि।
अर्थके अनुसार शब्द ५ प्रकारके होते हैं, संज्ञा, सर्वनाम
विशेषण, क्रिया और अव्यय ।
किसी वस्तु के नामको संज्ञा कहते है । जैसे, पहाड़, पोधी
सोहन, खरहा आदि।
किसी वस्तु के गुण, दोष, परिमाण, अवस्था और संख्य
.
---
शब्दविचार
वाचक शब्दको विशेषण फगते हैं : जैसे, काला घोड़ा, युरा
'आदमी, दुना भोजन, हंसता आदमी, वीस कपड़े।
संज्ञा शब्दोंके बदले जो शब्द प्रयुक्त होते हैं, वे सर्वनाम
कहाते हैं। जैसे. सब, मैं तू, यह आदि ।
किसी कामका करना चा होना मिया कहाता है ; जैसे,
। हंसना, खेलना, पढ़ना आदि।
जिस शब्दमें वचनभेदसे चा प्रत्यय जुड़नेपर भी किसी
। प्रकारका धिकार नहीं होता. वह अव्यय कहाता है । जैसे, ऊपर,
नीचे, जव, कय, पास, दूर आदि। अव्यय बहुधा पुल्लिंग ही
होते है, पर कुछ अव्यय स्त्रीलिंग भी हैं।
जिनके योगले शब्दोंकी अवस्था और अर्थ में अन्तर
पड़कर सिद्धपद बनता है, वे उपसर्ग और प्रत्यय कहाते हैं।
शब्दके आगे जुड़नेवाले उपसर्ग और पीछे जुड़नेवाले प्रत्यय
.
हैं
.
प्रत्यय चार प्रकारको होते है, विभक्ति प्रत्यय, तद्धित प्रत्यय,
क्रियाप्रत्यय और कृत् प्रत्यय ।
विभक्ति प्रत्यय बहुत ही कम है और कारक बताते हैं,
इसलिये ये कारकान्त चिन्ह भी कहाते हैं।'
मंडाविशेषण और सर्वनाम शब्दोंके पीछे लगनेवाले प्रत्यय
तद्धिन वा नामप्रत्यय कहाते हैं।
धातुमें जिन प्रत्ययोंके लगानेसे क्रियापद धनते हैं, वे किया
प्रत्यय कहाते हैं।
.
२०
-
हिन्दी कौमुदी।
धातुओंमें जिन प्रत्ययोंके लगानेसे संज्ञा या विशेषण बनते
हैं, वे कृत् प्रत्यय हैं।
संज्ञा और क्रियाके मूलका नाम धातु है।
संज्ञा ।
व्युत्पत्तिके अनुसार संज्ञा तीन प्रकारकी होती है, मंदि,
यौगिक और योगमढ़ि।
रूढ़ि संज्ञा वह है जिसके टुकड़ोंका अलग अलग कोई अर्थ
न हो सके अथवा जिसका परम्परागत एक निश्चित अर्थ माना
जाता हो, चाहे उसके और भी कई अर्थ क्यों न होते हों;
घोड़ा, गौ। घोड़ा शब्दके दो टुकड़े हए घो और
जिनका
अलग अलग कोई अर्थ नहीं है, इसलिये घोड़ा रुढ़ि है। गौका,
प्रचलित अर्थ गाय है और हजारों वर्षों से इसका यही अर्घ
चलो आता है। परन्तु गौका अर्थ इन्द्रिय और पृथ्विी भी होता
है और चलनेवाला जीव मात्र गो कहा जा सकता है।
जो संज्ञा दो संज्ञाओंके योग वा प्रत्यय लगनेसे बनती है,
उसका नाम यौगिक है ; जैसे, विद्यालय, पानवाला आदि।
यहां पहला शब्द "विद्या" और "मालय" इन दो शब्दोंसे बना है
और दूसरे में “पान" शब्दगें “चाला" प्रत्यय लगा है।
जो यौगिक संशा अपने मिले हुए शब्दोंसे निकलनेवाले अर्थ
न बताकर कोई तीसरा ही अर्थ बताती हो, वह योगरूढ़ि कहाती
है; जैसे, मोहनभोग, अंगरखा आदि ।
ड़ा,
मोहनभोगका अर्थ
संशा। २१ मोदनका भोग है, पर यह अर्थ न होकर उस शब्दका अर्थ हलया होता है। इसी प्रकार अङ्ग वा शरीरकी रक्षा करनेवाला मात्र अंगरना, पर उसका अर्थ होता है, वस्र विशेष ! अर्थानुसार संशाके और भी चार भेद किये जाते है, नाम- पाचक, जातिवाचक, गुणवाचक और भाववाचक। किसी व्यक्ति, स्थान, देश, नदी, पर्वत प्रभृतिके नामको नामवासक संशा कहते हैं ; जैसे, मोहन, कानपुर, भारतवर्ष, गङ्गा, हिमालय। जिस संघासे किसी जातिका पोध होता है, वह जाति. चाचा संशा कहाती है ; जैसे, मनुष्य, घोड़ा, पुस्तक आदि। यहां मनुष्यसे मनुष्य मात्र ही समझा जाता है, घोड़ा वा पुस्तक नहीं। इसी प्रकार घोड़ा या पुस्तक कहनेसे घोड़ा या पुस्तकके सिवा हायी या लाठो कोई नहीं समझ सकता। गुणवाचक संजा उसे कहते हैं, जिसका प्रयोग किसी प्रकारका विशेष गुण बतानेके लिये किया जाय ; जैसे, मिठाई, पटाई.निमकी, स्याही आदि। यहां मिठाई कहनेसे इलयाईकी दूकानपर मिलनेवाली मिठाई, जैसे लड्डू, पेड़े, जलेबी आदिका अर्थ होता है। इसी प्रकार घटाई कहने से अचार या निम्बूचटनी निमकीसे विशेष प्रकारका पकान और स्याहीसे काले रंगका लिनेका मसाला समझा जाता है। विशेषणमें प्रत्यय लगाकर गुणयानक संज्ञा बनायी जाती है। जिस संजामें किसी वस्तुके गुण वा दोष वा नियाका भाव हिन्दी कोमुदी। पाया जाय, वह भाववाचक संज्ञा कहाती है; जैसे लड़कपन, मिठास, हंसी आदि। पहले शब्दमें लड़केका, दूसरेमें मोठेका और तीसरेमें हंसनेका भाव है। जातिवाचक संज्ञा, विशेषण और धातुमें प्रत्यय लगनेसे भाववाचक संज्ञा बनती है लिंगविचार। संज्ञाके दो लिङ्ग होते हैं, एक पुलिङ्ग और दूसरा स्त्रीलिङ्ग। पुल्लिङ्गसे पुरुषका और स्त्रीलिइसे 'स्त्रीका बोध होता है। अप्राणियाचक शन्दोके स्त्रीलिइसे हीनता वा छुटाईका भाव निकलता है। हिन्दीमे सय पुरुषवाची शब्द पुलिंङ्ग और स्त्रीवाची शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं ; जैसे, मर्द, औरत, पुरुप, स्त्री, भाई, वहन आदि शब्दोंमें पुरुषवाचक मर्दै, पुरुप और भाई पुल्लिङ्ग तथा स्त्रीवाचक औरत, स्त्री और वहन स्त्रीलिङ्ग हैं। हिन्दीके आकारान्त शब्द पुल्लिङ्ग और ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग, होते हैं, यदि वे अपने लिङ्गोंको ठीक ठीक बतानेवाले हों; जैसे, लड़का, लड़की, घोड़ा, घोड़ी। नीचे लिखे ईकारान्त शब्द पुरुषवाची होनेके कारण पुलिङ्ग है:-साई, साखी, माली, धोबी, तेली, तम्बोली, नाई, दर्जी, बढ़ई, पटवारी, पड़ोसी, मोदी, भाई, नाती, पनती, बहनोई ननदोई, सोती, छत्री, पत्री, हरी, कारी, पापी। नीचे लिपे आकारान्त शन्द स्त्रीवाची होनेसे स्त्रीलिम हैं:-माता, मा, दारा। - ..
-- लिङ्गविचार। संस्कृतसे आये हुए पुंलिङ्ग वा तद्भव शब्द हिन्दीमें साधार• णतः पुंलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग या तद्नव शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं । जैसे, सेना, हत्या, दया, क्षमा, इच्छा, यात्रा, माला, पाठशाला, गोशाला, स्त्रीलिङ्ग और पक्षी, पंछी, जी और पानी पुलिङ्ग है। अपवाद-आत्मा, महिमा, अग्नि (आग), घायु, विन्दु, (बूद, विन्दी,) तान, शपथ (सोह, सौगन्ध),आम (आंब), पाहु (यांह), दाद, धातु (धात), अंजली, देव, धूप, जय, मृत्यु (मीच , घास (घासम्गन्ध),औषधि, सन्तान, प्रारब्ध,समाज, ऋतु, राशि और विधि संस्कृतमें पुंलिङ्ग होनेपर भी हिन्दीमें स्त्रीलिङ्ग हैं। * पुर और तारा खीलिङ्ग होनेपर भी पुलिङ्ग है। संस्थतसे भाये हुए नपुंसक लिङ्ग या तद्भव शब्द हिन्दीमें पहुधा पुंलिङ्ग होते हैं ; जैसे, फल, मधु, स्वादु (स्वाद), धारि, घृत (घी), दधि (दही)। अपवाद-आंख, वस्तु, पुस्तक, सामर्थ्य स्त्रीलिङ्ग है। अप्राणिवाचक शब्द भी याकारान्त होनेसे पुंल्लिङ्ग और ईकारान्त होनेसे स्त्रीलिङ्ग हैं। अपवाद-लघुतासूचक इया प्रत्ययान्त खड़िया, लुटिया, युनप्रदेशके पश्चिमी जिलोंमें उई के संसर्गसे गोगाला, पाटशाता और चर्चा शब्द लिङ्ग बोले जाते है, पर लिखनेमें विशेष सावधानी कारण स्वीलिम लिखे जाते हैं।
२४ हिन्दी कौमुदी। अँगिया, डिविया, चिड़िया, पुड़िया, हंडिया आदि स्त्रीलिङ्ग है। जी, पानी, घी, मोती और दही पुंलिङ्ग हैं। टेकारान्त, तकारान्त और सकारान्त शन्द स्त्रीलिङ्ग होने हैं ; जैसे, वनावट, थकावट, गत, पत, छत, लात, वात, मिठास, प्यासा अपवाद-टाट, ठाट, मत, निकास आदि पुल्लिंग हैं। ता, ताई, गी, ई, आई, नी, आनी, आइन प्रत्ययान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं; जैसे, मूर्खता, सुन्दरताई, जिन्दगी, खुशी, ढिठाई, परिडतानो और पण्डिताइन । त्व, य, पन, पना, आपा, आव, प्रत्ययान्त शब्द पुंल्लिङ्ग होते है ; जैसे, मनुष्यत्व, राज्य, लड़कपन, गुडपना, बुढ़ापा, बढ़ाव । अरवीके आकारान्त और तकारान्त शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं; जैसे, जमा, अदालत, मुसीवत। नीचे लिखे शब्द पुंल्लिङ्ग होते हैं (१) पुरुपोंके नाम। (२) बड़ी भारी और बेढङ्गी चीजोंफे नाम । (३) चादी और पीतल छोड़कर सब धातुमओ और नगोंके नाम ; जैसे, सोना, लोहा, मानिक, नीलम आदि। (४) - महीनों और वारोंके नाम जैसे, चैत, वैशाख सोमवार, मङ्गलवार। (५) ग्रहोंके नाम ; जैसे, चन्द्रमा, बुध, राहु आदि । (६) पहाड़ोंफे नाम ; जैसे, हिमालय, विन्ध्य । , 1 3 . .. -
२५
.
स
लिङ्गविचार।
(७) नदोंके नाम; जैसे, सिन्धु, ब्रह्मपुत्र,' दामोदर,
सोनभद्र आदि ।'
" (८) मैल, कीचड़, कफ, मलगम, चाल, सिर, , माथा, मुह,
नेत्र, नयन, हाथ, पैर, कान, शरीर, पेट, फन्धा, यज्ञोपवीत,
जनेऊ, हृदय, हिया, मन, अहङ्कार, फोप, लोभ, मोह और प्रेम ।
• (6) इ, ई, ऋ, ए, ऐको छोड़ सब अक्षरोंके नाम।
(१०) गेह, चावल, चना, मटर, धान, उर्द, तिल, गुड़,
.
गन्ना।
--
N
नीचे लिखे शब्द स्त्रीलिङ्ग होते हैं :-
(१) स्त्रियों के नाम।
(२) कोमल, छोटी और हल्की चीजोंके नाम।
(२) चांदो और पीतल।
(४) तिथियोंके नाम ; जैसे, पड़या, दूज, तीज आदि।
(५) नदियोंके नाम ; जैसे, गङ्गा, यमुना, सरस्वती आदि ।
(६) लार. कीच, आंख, नाक, चुटिया, विनी, भौंह, मूछ,
दाढ़ी, कोख, छाती, नाभी, इच्छा, बुद्धि और ममता! :,
(७) कई विदेशी शब्दोंके नाम; जैसे, रेल, लालटेन, लैम्प,
कांग्रेस, कानफरेन्स, लिस्ट, डिकशनरी आदि।
(८) शतभिष, श्रवण, पुनर्वसु, पुष्य, हस्त, मूल, पूर्वापाढ़
और उत्तरापादको छोड़ सब नक्षनोंके नाम।::
(e) इ,ई, ऋ, ए, ऐ स्वरों के नाम ।
(१०) अरहर, मूग, तिली, चीनी, शधर ।
tl.
-- २८ हिन्दी कौमुदी। ठाकुर+आइन-ठकुराइन । पंडित+आइन पंडिताइन । चौवर्ग माइन-चौधराइन । गुरु आइन-गुरवाइन । पांडेआइन-पंडाइन। चौवे+आइन-चौयाइन । ठाकुर. पण्डित, चौधरी, गुरु आदि शब्दोंमें आनी प्रत्यय लगाकर भी स्त्रीलिङ्ग रूप बनाते हैं ; जैसे :- ठाकुर+आनी-ठकुरानी। पण्डित+आनी-पण्डितानी। चौधरी+आनी चौधरानी। गुरु-आनी-गुरवानी। फारसीके मेहतर शब्दमें भी आनी प्रत्यय लगाकर मेहतरानी बनाते हैं। इसी प्रकार जेठ और देवरसे जेठानी और देवरानी स्त्रीलिङ्ग शब्द बनते हैं। अप्राणिवाचक आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंमें इया प्रत्यय लगा कर स्त्रीलिङ्ग बनाते हैं जैसे:- लोटा+इया लोटिया। सोंटा+डया-सोंटिया। पुरुष प्रत्यय। स्त्रीलिङ्ग शब्दोंमें ओई, आव और ओटा प्रत्यय लगानेसे पुल्लिङ्ग शब्द बनते हैं ; जैसे:- चहन+ओई-बहनोई, ननद+ोई ननदोई, बिल्ली आव विलाय, सिल+ मोटा-सिलौटा। ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोंको पुलिङ्ग बनानेमें ईको आ प्रत्ययसे बदल देते हैं। जैसे :- दुअन्नी, दुअन्ना, अधन्नी अधन्ना, गाड़ी गाड़ा,रस्सी रस्सा, र एक दो सज्जनोंने दुग्रन्ना शब्दपर यह यापत्ति की है कि यह अप्रचलित है। पर ऐसी ही गति । . है । L- .
शब्दोंकी साधना।
पोथी पोथा, हांड़ी हांडा, झोली झोला, मकड़ी मकड़ा, लकड़ी
लकड़ा आदि।
.
-
कई ईकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके पुलिगकर ईको आ प्रत्ययमें
बदल देनेसे बनते हैं, जैसे. रोटी, रोट। कहीं कहीं अन्तिम
अक्षरके पहलेका व्यक्षन भी द्वित्व कर दिया जाता है; जैसे,
लकड़ो, लकड़, टिकड़ी, टिकड़, गठड़ो, गढड।
शब्दोंकी साधना।
संज्ञामें दो वचन भी होते हैं, एकवचन और बहुवचन ।
एकवचनसे एक वस्तु और बहुववनसे अनेक वस्तुए जानी
जाती है। लड़का एकवचन है, क्योंकि इससे एक ही लड़का
समझा जाता है. पर लड़के कहनेसे दोसे अधिक लड़कोंका
बोध होता है।
हिन्दीके संज्ञा शब्दोंमें छ विभक्तियां होती है.पहली, दुसरी,
तीसरी, चौथी. पांचवीं और सम्बोधन, पर.विभक्तियोंके चिन्ह
चार ही है। इन चिन्होंके जुड़नेके पहले शब्दमें विकार होकर
जो रूप बनता है, वह सामान्य रूप कहाता है। पहली और
है। यहां ये गन्द केवल यह दिखानेको लिखे गये हैं कि ईको पास
बदल देनेसे पुंलिंग शब्द बनता है। चांदीको दुअन्नी छोटी होनेसे
दुअन्नो कहाती थी। अब निकलकी बहुत बड़ी दुअन्नी है, इससे उसे
दुअन्ना कहना अनुचित नहीं। इसी प्रकार तांक अधन्नेके बदलें यदि
इकन्नीसे छोटा निकलका सिक्का चले तो वह अधन्नी ही कहायगा।
an
.
३० हिन्दी कौमुदी। सम्बोधन विभक्तिका कोई चिन्ह नहीं है। आकारान्त पुलिङ्ग शब्दोंको छोड़ किसी शब्दकी पहली विभक्तिके रूपों तथा अन्य विभक्तियोंके एकवचनके रूपमें किसी प्रकारका विकार नहीं होता। आकारान्त शब्दोंकी पहली विभक्तिके वहुवचन और सम्बोधनके दोनो वचनोंके रूपोंमें विकार होता है। एकवचन बहुवचन पहली विभक्ति (कुछ नहीं) (कुछ नहीं) सामान्य रूप (.) ओं सम्वोधन () यो स्त्रीलिङ्ग शब्दोंके बहुवचनमें आं अथवा एं विकार होता है। आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंमें विकार । एकवचन बहुवचन पहली विभक्ति (कुछ नहीं) सामान्य रूप ओं सम्बोधन ओ अन्य अक्षरान्त पुल्लिङ्ग विभत्तियोके रूप ।' एकवचन बहुवचन पहली "दूसरी को मोको तीसरी - शब्दोंकी साधना। . . एकवचन बहुवचन चौथी से ऑसे 'पांचवीं में ओमें सम्बोधन ओ पुलिङ्ग शब्दोंके रूप। अकारान्त "बाप" शाद। एकवचन वहुवचन १ ली याप याप यापको पापोंको. यापने पापोंने ४ थी वापसे यापोंसे ५ वीं यापमें पापोंमें सं० पापो आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंके रूप वाप शब्दके समान ही होते हैं। आकारान्त "लड़का" शब्द । एकवचन बहुवचन १ ली लड़का लड़के . २ री: लड़केको लड़कोंको ३ री, लड़केने लड़कोंने ४ थी लड़केसे लड़कोंसे -वीं लड़केमें: सं०...लड़के लड़को याप . -- - - . ...लड़कोंमें.
Com राजा - ४ थी " : हिन्दी कौमुदी। प्रायः सब-अकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंकी साधना लड़का शब्द की भांति ही होती है। आकारान्त तत्सम "राजा" शब्द । एकवचन वहुवचन १ ली राजा, राजाको राजाओंको राजाने राजाओने राजासे राजाओंसे राजामें राजाओंमें सं राजा राजाओ पिता, भ्राता, जामाता जैसे संस्कृतसम आकारान्त शब्द तथा चाचा, मामा, काका.वावा, फूफा और नाना:शब्द राजा शब्दकी भांति साधे जाते हैं । दादा शब्द दोनो प्रकारसे साधा जाता हैं । इकारान्त “कवि" शब्द। एकवचन वहुवचन कवि कवि कविको कवियोंको कचिने कवियोंने - 42.6 J . . - - कोई कोर्ट राजा शब्दको लड़का शब्दकी भांति साधते हैं, पर यह साधना हिन्दीकी प्रकृतिके विन्द है। अरबी फारसीके प्राकारान्तं शब्दोंमें "मामला, मुल्ला, मुकद्दमा" सरीसे जो शब्द सर्वथा हिन्दीके हो गये हैं, उन्हें लोड वाली शब्दोंकी साधना। ४थी ५ वाँ चहुवचन। कवियोंसे कवियोंमें करियो . सं० एकवचन। कविले कवि कवि इकारान्त "भाई" शन्द * एकंचन । भाईको भाईने भाईसे भाईमें बहुवचन। भाई भाइयोंको भाइयोंने भाइयोंसे भाइयोंमें: মানুষী उकारान्त "रिपु" शब्द। एकवचन। रिपु रिपुको . घहुवचन। रिपु रिपुओंको 9 ईकारान्त शब्दोंके यहुवचनमें दूसरीसे पांचवीं विभक्ति तक "प्रोंको" आदिमें "नों" के बदले "यों" हो जाता है। सम्योधनके बहुवचनमें 'यो' होता है। इकारान्त शब्दोंकी उन्ही विभत्तियों के बहुवचनमें भी "योंको" याने" प्रादिके पहलेको "ई" "इ", कर दी जाती है और अकारान्त शब्दोंका ऊ भी उ हो जाता है। 3 हिन्दी कीमुदी। ३री ४ थी एकवचन। रिपुने रिपुसे रिपुमैं रिपु यहुवचन। रिपुमोने रिपुओंसे रिपुओंमें रिपुमो ५वीं सं० ऊकारान्त “भालू" शब्द । एकवचन। घटुवचन। १ली १री भालू भालुओंको ४थी ५वीं भालुओने भालुओंसे भालुओंमें भालुओ सं० भालू को भालूने भालूसे भालमें भालू एकारान्त "पांडे" शब्द। एकवचन। - पांडे पांडेको पांडेने पांडेसे पांडेमें पांडे १ ली बहुवचन । पांडे पांडोंको पांडोंने पांडोंसे पांड़ोंमें पांडो । ५वीं सं० शब्दोंकी साधना। ३७ बहुवचन। रीतियोंमें रीतियो बहुवचन। भुजालियां भुजालियोंको भुजालियोंने भुजालियोंसे भुजालियों एकवचन । रीतिमें रीति इकारान्त "भुजली" शब्द । 'एकवचन। सी भुजाली भुजालीको भुजालीने श्री भुजालोसे वीं भुजालीमें भुजाली उकारान्त "वस्तु" शब्द। : एकवचन । वस्तु री यस्तुको वस्तुने थी वस्तुसे चस्तुमें सं० ऊकारान्त "यह" शब्द । भुजालियो . बहुवचना वस्तुएं वस्तुओंको वस्तुओंने वस्तुओंसे वस्तुओंमें घस्तुओ घीं - बहुवचन एकवचन। १ ली
-
हिन्दी कौमुदो।
५ वीं
एकवचन।
वहुवचन
यहको
बहुओंको
यहुने
बहुओंने
४थी बहसे
बहुओंसे
बहमें
चहुओंमें
सं०
बहू
बहुओ
एकारान्त स्त्रीलिङ्ग शब्द हिन्दीमें नहीं है। रेलवे
विदेशी शब्दोंकी साधनामें दुसरीसे सम्बोधन विभक्ति
शब्दमें हिन्दी विभक्तियोंके चिन्ह मात्र लगा दिये जाते हैं,
मूल शब्दमें विकार नहीं होता।
ओकारान्त "सरसों" शब्द ।
सरसों शब्द एकवचनान्त है और इसमें एकवचनकी
विभक्तियां लगती है।
-
.
.. सर्वनाम। सर्वनाम शब्दों में पांच ही विमतियां होती हैं। इनमें सम्बो. धन नहीं होता और न लिंगभेद ही रहता है। "सव" शब्दके रूप। उभयवचन। सव १ली सवको सपने ঘৰ ५वीं सबमें सव शन्दके रूप दोनो वचनोंमें एकसे होते हैं। कुछ लोग सबोंको सयोंने आदि रूप भी बनाते है। सर्वनाम कई प्रकारके हैं; जैसे, पुरुषवाचक, सम्बन्ध सूचक, प्रश्नवाचक, मनिश्चयवाचक, आदरसुचक, और निजत्य- सूचका प्रथम पुरुष “चह" शब्द। एकवचन बहुवचन . . १ली . उहें. उनको २.रा.. उसे, उसको उसने हिन्दी कौमुदी। एकवचन। ४थी उससे उसमें बहुवचन। उनसे उनमें ५ वीं "यह" शब्द। १ली ये इन्होंने * ४थी इनसे इनमें यह इसे, इसको इसने इससे इसमे मध्यम पुरष "तू" शन्द । तृ तुझे, तुझको तूने तुझसे तुझमें . - २री ३री ४थी तुम तुम्हें, तुमको तुमने तुमसे तुममे . र नियमानुसार तो इसने" का बहुवचन "इनने" और ' उसने" , "उनने होना चाहिये । कानपुरसे पश्चिम फर्श सावाद और व्रजतक "इनने" "उनने" लोग बोलते ही हैं,पर लिखते प्राय नहीं है। स्व. ५० चन्द्रधर शमा गुलेरी तथा और दो चार लेसा "इनने" "उनने" लिखते थे। स्वर्गवासो प० दुर्गाप्रसाद मिश्र "इनाने" लिखा करते थे। इन्होंने" "उन्होने के अनुकरणपर कुछ लोग विशेषकर गुजराती और महाराष्ट्र इन्होंको, उन्होको इन्दोमे, टन्होंसे, इन्होंमें और उन्होम भी लिखते बोलते है।
४१ सर्वनाम ... . :उत्तम पुरुष "मैं" शब्द । है एकवचन बहुवचन ।। -- १ ली २री मुझे, मुझको हमें हमको हमने हमसे हममें .५ वीं ४थी मुझसे मुझमें सम्बन्धसूचक “जो" शब्द। एकवचन । १ली जो २री जिसे, जिसको जिसने ४ थी जिससे ५ वीं जिसमें पहुंवचन। जो जिन्हें, जिनको जिन्होंने जिनसे जिनमें सम्बन्ध सूचक "सो" शन्द । - १ एकवचन । बहुवचन। सो, तिसे, तिसको तिसने तिससे तिसमें तिन्हें, तिनको तिन्होंने तिनसे 1 . . थी वों t तिनमें .
इसके ५वीं । ४२ हिन्दी कौमुदी। आजकल “सो" शब्दका प्रयोग प्रायः नहीं होता। बदले “वह" शब्दके रूपोंका व्यवहार होता है। प्रश्नसूचक "कौन" शब्द । एकवचन बहुवचन १ ली कौन कौन २री किसे,किसको किन्हें,किनको किसने किन्होंने ४थी किससे किनसे किसमें किनमें आदरसूचक "आप" शब्द । उभयवचन। आप २री थापको ३री आपने आपसे आपमें दोनो वचनोंमें "आप" शब्दफे रूप एकसे ही होते हैं | जहां कहीं आपका बहुवचन "आप लोग बनाते हैं, वहां लोग शन्दमें विभकियां लगती हैं। "लोग" * शब्द पुलिङ्ग बहुवचन होता है और आकारा "लड़के लोग" "स्त्री लोग" लिखना ठीक नहीं है क्योंकि शरद पीछे लोग जोड़ देनेत ही बहुवचन नहीं बन जाता । लोग शब्द पुछिन -- उसकाटीलिटर -- विशेषण। संघाकी भांति विशेषणमैं भी लिङ्गभेद होता है,परन्तु हिन्दी आकारान्त शन्दोंमें ही, अन्य शब्दोंमें नहीं। जैसे, छोटा लड़का, छोटी लड़की, काला घोड़ा, काली घोड़ी, लाल गाय, लाल चैल । परन्तु विशेषण तत्सम होनेसे वह ज्योंका त्यों रहता है; जैसे, सुन्दर पुरुष, सुन्दर स्त्री। - संज्ञा शब्दोंकी भांति विशेषणकी साधना सब विभक्तियोंमें नहीं होती और संज्ञा मागे सामान्य रूपका एक वचन ही रख दिया जाता है, जिस संशाका यह विशेषण है वह चाहे बहु- वचनान्त ही क्यों न हो; जैसे, काले घोड़ोंने लात मारी, काले दृदृ से गिरा, उस वैलको न छेड़ो, काले घोड़ोंकी यद- माशी, सीधे लड़कोंकी शिकायत । विशेषणके भेद |* विशेषणके पांच भेद हैं:-गुणवाचक, संख्यावाचक, सादृश्यवाचक, परिमाणवाचक और सर्वनामवावक । गुण- वाचफ विशेषण वस्तुका गुणदोष बताता है ; जैसे, अच्छा या कर्ड संस्कृताभिमानी हिन्दी लेखक संस्कृत विशेषणों में भी लिङ्ग- - भेद करते हैं, परन्तु प्राचीन ग्रन्थों में वहीं लिङ्गभेद किया है जहां अत्यावश्यक - है; जैसे पुत्रवती स्त्री, श्रीमती पण्डितानी श्रादि । .. - 1
४८
हिन्दी कौमुदी।
बुरा आदमी, लाल या काला टट्ट । संज्ञावाचक विशेषण शन्दकी
संख्या बताते हैं ; जैसे, पाच आदमी। सादृश्यवाचक विशेषण
दुसरे शब्दोंकी सदृशता बताते हैं ; जैसे, ऐसा आदमी। परि
माणवाचक विशेषणसे परिमाण जाना जाता है; जैसे, इतना
बडा मकान।
सख्यावाचक विशेषण शब्दोंमें अथवा यह, वह, जो, सो,
कोई, के, कई, जैसे, विशेषणोंमें भी लिङ्गभेद नहीं है। परन्तु
सादृश्यवाचक ऐसा, वैसा, जैसा, तैसा, कैसा और परिमाण
वाचक इतना, उतना जितना, तितना, कितना विशेषण पुल्लिङ्ग
एकवचन हैं। ऐसे, वैसे, जैसे, तैसे, कैसे तथा इतने, उतने,
जितने, तितने, कितने बहुवचन और सामान्य रूप हैं। इसी
प्रकार ऐसी, वैसी, जैसी, तैसी, कैसी तथा इतनी, उतनी,
जितनी, तितनी, कितनी स्त्रीलिङ्ग है।
"कोई" शब्दका बहुवचन-"कोई कोई" और सामान्य रूप
"किसी” होता है। कोई कोई का सामान्य रूप किन्ही है।
-
ܝܺܪ .... क्रिया । किसी कामका होना या करना क्रिया कहाता है। धातुमें "ना" प्रत्यय लगनेसे क्रिया वनती है और अन्य प्रत्यय लगनेसे क्रियाके जो विविध रूप बनते हैं, वे क्रियापद कहाते हैं। क्रिया दो प्रकारको होती है, अकर्मक और सकर्मक सकर्मक क्रियाका कोई कर्म होता है, पर अकर्मक क्रियाका कर्म नहीं होता। खाना सकर्मक क्रिया है, क्योंकि कोई चीज खायी जाती है और जाना सकर्मक क्रिया है, क्योंकि कुछ जाया नहीं जाता। परन्तु प्रयोगके अनुसार कभी एक ही क्रिया सकर्मक और कभी अकर्मक हो जाती है ; जैसे, वह सिर खुजलाता है और उसका सिर खुजलाता है। यहां पहले वाययकी खुज- लाना क्रिया सकर्मक और दूसरेकी अकर्मक है। क्रियाकी अवस्थाएं, काल, पुरुष, वचन, लिंग और वाच्य होते हैं। क्रियामोंकी दो अवस्थाएं होती हैं, सांधारण और विशेष साधारण अवस्था में सीधी तरह बात कह दी जाती और .. . *हिन्दीमें शुद्ध क्रियापद, जिन्हें संस्कृतमें तिइन्त कहते हैं, नहींफे रायर हैं। इस लिये कृत्प्रत्ययों तथा दो क्रियाओंके योगसे अन्य क्रियापद नाये जाते हैं। दोनो प्रकारके क्रियापदोंकी पहचान यह है कि पहलेमें सङ्गभेद नहीं होता और दूसरे में होता है। ४
५०
हिन्दी कीमुदी।
उससे कोई विशेष अर्थ नही निकलता ; जैसे, यह रोटी बाता
है। पर जिस क्रियासे विशेष अर्थ निकलता है, वह उसकी
विशेष अवस्था होती है।
जब किसीको आता, शाप. उपदेश, आशीर्वाद या गाली दी
जाय अथवा किसी कार्यकी पूर्णता, अपूर्णता या सम्भावना नादि
बतायी जाय. व विशेष अवस्थाकी क्रियाना प्रयोग किया
जाता है। जैसे, तू वह काम कर, लड़के ऊधम न मचावे
तुम्हारा परिवार सुखी रहे, वह कदाचित् फल आये, राम गटी
सा रहा था, मै लिप्यता था,
इत्यादि।
काल समयको कहते हैं। मुख्य काल तीन हैं, वर्तमान,
भूत और भविष्य ।
वर्तमान काल वह है जो बीत रहा है ; जसे, वह खाता है,
मै जाता है।
जो काल बीत चुका, उसे मृत कहते हैं जैसे, वह गया मैंने
काम किया।
जो काल मावेगा वह भविष्य है ; जैसे, मैं खाऊंगा, यह
..
घर जायगा।
अवस्थानुसार वर्तमान कालके चार भेद हैं, अपूर्ण वर्त
मान, पूर्ण वर्तमान सन्दिग्ध वर्तमान औरतात्कालिक वर्तमान
अपूर्ण वर्तमान साधारण वा सामान्य रूपसे वर्तमान
कालका वर्णन करता है और बताता है कि कार्य पूर्ण नहीं हुमा
है ; जैसे, वह आता है, मैं जाता है।
।
लिया।
.
५१
पूर्ण वर्तमान सामान्य भून और वर्तमानके क्रियापदोंके योग
से बनता है और बताता है कि भूत कालमें कार्य थारम्भ होकर
वर्तमानमें पूरा हो चुका है ; जैसे, मैं माया हूं।
सन्धिग्द वर्तमान बताता है कि इस समय काम होनेकी
सम्भावना है ; जैसे, मोहन जाता होगा।
नात्कालिक वर्तमानसे जान पड़ता है कि कार्य हो ही रहा
है, बन्द नहीं हैं; जैसे, सोहन जा रहा है।
भूतकालके माठ भेद होते है, मामान्य भूत, अपूर्ण भूत.
सन्दिग्ध भूत, पूर्ण भूत, हेतुहेतुमद् भूत. तात्कालिक भून,
सम्भाव्य अपूर्ण भूत और सम्भाव्य पूर्ण भूत
सामान्य भूनकालो वर्णनमें कोई विशपता नहीं होती;
जैसे, राम गया, कृष्णने रोटी खायो।
अपूर्ण भून काल वह है जिसमें कार्य समान नहीं होता
जैसे, मोहन पोथी पढ़ता था।
पूर्ण भूत बताता है कि कार्यका आरम्भ और समाप्ति भून
कालमें ही हो चुकी थी ; जैसे, सोहनने पोथी पढ़ी थी।
... सन्दिग्ध भूत यह है जिसमें कार्यके होनेका निश्चय नहीं
होता, सन्देह बना रहता है; जैसे, मैं गया हूंगा।
हेतुहेतुमद्भूतमें कोई अन्य कार्यका आधार रहता है ; जैसे,
मै जाता अर्थात् में गया नहीं, पर जिस घातपर जाना अवलम्बित
था, यह हो.जाती तो मैं जाता।
--
an
।
हिन्दी कौमुदी।
तात्कालिक भूतकाल वह है, जिसमें काम जारी रहता है
जैसे, श्रीकृष्ण द्वारका जा रहे थे।
सम्भाव्य अपूर्ण भूतसे सम्भावनाके साथ हो भूतकालके
कार्यको अपूर्णता जानी जाती है । जैसे, जाता होता।
सम्भाव्य पूर्ण भूतमें कार्यकी पूर्णताकी सम्भावना रहती है।
जैसे, गया होता।
भविष्य कालके दो भेद है, सामान्य भविष्य और सम्भाव्य
भयिष्य।
सामान्य भविष्यमें होनेवालो घटनाका वर्णन रहता है।
जैसे, मोहन आवेगा।
सम्भाध्य भविष्यमें भावी कार्य होनेकी सम्भावमा रहती है।
इसमें विधिके रूपोंका प्रयोग किया जाता है ; जैसे, वह लिखे,
तू करे।
विधि और आज्ञाको छोड़ हिन्दीके सव क्रियापदोंमें लिङ्ग
भेद होता है।
क्रियामें भी प्रथम, मध्यम और उत्तम ये तीन पुरुष, एक
वचन और बहुवचन दो वचन तथा पुलिङ्ग और स्त्रीलिङ्ग दो लिङ्ग
होते हैं। आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोंकी तरह इन क्रियापदोंके लिङ्ग
यवन भो ईकारान्त, ईकारान्त तथा एकारान्त होते हैं ।
: क्रियाके चार वाच्य या प्रयोग हैं।
कत्तृवाच्य,
भाववाच्य और कर्मकर्तृवाच्य।
कत्तृवाच्यमें कर्नामें पहली विभक्ति और कर्ममें कमी
"
कर्मवाच्य
क्रिया। --- . -- . पहली और कभी दूसरी विभक्ति होती है तथा क्रियाफे लिङ्ग वचन कत्र्ता के अनुसार होते हैं। अर्थात् यदि फत्ता पुंलिंग होता है तो क्रिया पुल्लिङ्ग होती है और यदि स्त्रीलिङ्ग होता है, तो क्रिया भी स्त्रीलिङ्ग होती है। इसी प्रकार यदि का एक- वचन होता है तो क्रिया एकयचन और बहुवचन होता है तो क्रिया बहुवचन होती है ; जैसे, मैं खाता हूं, तीन लड़के खेलते हैं, सब लड़कियां कपड़े सोती हैं, एक लड़की रोती है। '. फर्मवाच्यमें कर्नामें तीसरी विभक्ति और कर्ममें पहली विभक्ति होती है और क्रियाक लिङ्गवचन कर्मके अनुसार ही होते हैं : जैसे लड़केने पेड़ा खाया, लड़कोंने पेड़ा खाया, लड़कीने पेड़ा खाया, लड़कियोंने पड़ा खाया। इन वाक्योंमें कर्ताके लिङ्गवचन तो यदले, पर क्रिया कर्मानुसार ही रही। 'अगले पाक्योंमें कर्म स्त्रीलिङ्ग है, इसलिये क्रिया भी स्त्रीलिङ्ग है : जैसे, देवदत्तने रोटी खायी, राम और कृष्णने रोटी खायी, स्त्रियोंने रोटी खायी, हमने रोटियां खायीं । भाववाच्यमें * कर्नामें तीसरी और कर्ममें दूसरी विभत्ति होती है और क्रिया सदा पुल्लिङ्ग एकवचन रहती है; जैसे, यापने लड़कोंको मारा. स्त्रीने गायको दूहा । . * कर्मवान्य और भाववाच्यफे दो रूप और होते हैं, पर वे यौगिक प्रियायोंसे बनते हैं, इसलिये उनका वर्णन यौगिक क्रिया शीर्षकमें मिलेगा।
.. हिन्दी कौमुदी। कर्मकत्तृवाच्यमें कर्म ही कर्ता हो जाता है और उसमें पहली विभक्ति होती है। कर्म करनेवाला या नहीं बताया जाता और दिमाया जाता है कि काम आपसे भाप होता है; जैसे, भोजन बनता है अर्थात् आप ही आप बनता है ; फल पकता है; मेह बरसता है ; कपडे भीगते हैं। कर्मवाच्य और भाववाच्य केवल सकर्मक क्रियाके भूत कालिक रूपोमें ही होते है । कत्तृ वाच्य और कर्मकर्तृवाच्य सय कालोमें होते हैं। सकर्मक क्रियाके वर्तमान और भविष्य कालों में भी कत्त वाच्य ही होता है। क्रियाकी साधना। विधि (प्रत्यय) पुरुष। एकवचन। - . उत्तम बहुवचन। ए, चे, यं ओ . "मध्यम - प्रथम ए आज्ञा (प्रत्यय) मध्यम ना, ओ, इयो ए,चे, यं , आशामें मध्यम पुरुष एकवचनमें धातु और क्रिया दोनोके रूप ज्योंके त्यों रहते हैं। आदरसूचक आज्ञा वा विधिके लिये धानुमैं "इये" और सो, पी. ले, दे, और कर धातुओमें “इये" के ,
क्रिया।
पदले "जिये" लगाते हैं, जैसे, सीजिये, पीजिये, लीजिये,
दीजिये, कीजिये।
जय कभी मध्यम पुरुषको विशेष मान देनेकी इच्छा नहीं
होती और "तुम" सर्वनामका प्रयोग भी उसके लिये नहीं किया
जाता, तब आदरसूचक "आप" सनामके साथ भी मध्यम
'पुरुषके यदुवचनकी क्रिया प्रयुक्त होती है ; जैसे आप कहा, आप
हमारी बात माना। मध्यम पुरुषके एकवचन के साथ जो क्रिया
आती है, वह साधारणतः धातुके रूपमें ही रहती है। पर
निवेधार्थक "न" के .योगमें दोनो वचनोंमें क्रियाके रूपका
व्यवहार होता है। "न" के यदले "मत" का प्रयोग जहां
होता है, वहां एकवचनमें तो क्रियाका रूप और बहुवचनमें कभी
क्रियाका रूप और कभी "भो" या "इयो" प्रत्ययान्त क्रियापद
आता है।
चार धातुओंकी सहायतासे ही सब कालोंके क्रियापद,
यनते हैं और इसलिये सभी क्रियापद यौगिक हैं। ये चार
धातु हैं-इ, था, गा और हो। धातुके वर्तमान काल और
था तथा गा धातुओंके भूतकालके रूप ही इस समय पाये जाते
है। हो धातुकी सहायता भी अनेक क्रियापदोंके लिये आव:
जा धातुके रूपोंके बिना अंगरेजी ढंगके कर्मवाच्य
और भाववाच्य नहीं बनते।
"ह" धातुके रूप (वर्तमान काल). ,
पुरुष
बहुवचन
उत्तम
'हम हैं
।
श्यक है।
एकवचन।
हिन्दा कौमुदी। पुष्प एकवचन । बहुवचना मध्यम तुम हो वह है . प्रथम "ह" धातुके स्प विधिक समान है, इसलिये लिड्मेद नही है। भूतकालिक "या" धातुके रूप । पुलिङ्ग ।। एकवचन। में पुरुष उत्तम वहुवचन। हम थे था मध्यम तू था प्रथम वह था स्त्रीलिङ्ग। . उत्तम मै थी हम थीं मध्यम तुम थीं प्रथम वह थी वेथी हिन्दीमे "ह" धातुको छोड सभी धातुओंसे चर्ने किया. पदोंके आज्ञा और विधिके रूपों में ही लिइभेद नहीं होता। शेष रूप धातुमे "ता" और "आ" प्रत्ययोंके लगनेसे तथा भविष्य कालके रूप विधिमैं "गा" लगनेसे बनते है, इसलिये इनमें लिडभेद रोता है। ব্বিার ওর বুক ঘাট বিম্বিয়া है, इसलिये पुलिन होनेसे ३. लिङ्ग ईकारान्त होते हे अर्थात् बटुवचन वनानेमें धातुमे "ते" वचन एकारान्त और स्त्री क्रिया। और "ए" तथा 'स्त्रीलिंगमें "ती" और "ई" प्रत्यय लगाने पड़ते है। "ती" और "ई" के बहुवचनमें तो "ती" और "ई" रूप धनते हैं, पर "गी" बहुवचनमें भी “गी” ही रहती है। इसका कारण यह है कि विधिके १७ बहुवचनमें "गी, जुड़ती है, इसलिये “गी" का बहुवचन करनेकी आवश्यकता नहीं होती। इसी प्रकार जब ती वा ईकारान्त क्रियापदोंके , पाद "ह" या . A । जिन्हें श्राजकल विधि कहते हैं, किसी समयमें ये ही क्रियापद वर्तमान कालफे वर्णनमें प्रयुक्त होते थे। इसके प्रमाण स्वरूप प्रन्धी पीसे, कुत्ते खांय"जैसे वाक्य अबतक पाये जाते हैं । परन्तु जब इन क्रियापदांस वत्तमान कालका योध न होने लगा, तब वर्तमानको बतानेके लिये इन रूपोंके साथ "ह" धातुसे बने क्रियापद लगाये जाने लगे। इसी प्रकार थपूर्ण भूत काल बतलानेके लिये विधिक साध "या"धातुके रूप और भविष्य बतानेके लिये "गा धातुके रूप लगने लगे। संस्कृतकी असू धातुमे हिन्दीकी "" धातु, स्था धातुमे "या" और गम् धातुसे "गा" धातु निकली हैं। "" धातुके धर्तमानके 'या' और "गा" धातुर्योक भूतके रुप ही मिलते हैं। संस्कृतकी स्था और गम् धातुओंमें "क" प्रत्यय लगनसे भृतकालिक स्थितः और गतः रूप बनते हैं और इन्हीसे प्राकृत नियमांस "था' और "गा" बने हैं। इस प्रकार वर्तमानमें "जाय है" "वाय है" अपूर्ण भूतमें "जाय धा""सायथा" और भविष्य जायगा","खायगा" रूपांका व्यवहार चल पड़ा। कालान्तरमें वर्तमान और अपूर्ण भूतकालोके इन प्रयोगासे, अर्धमें बड़ी गड़बड़ मचने लगी और "जाय" विधिके बदलें संस्कृषक गन् प्रत्ययान्त रूपोंसे यने कियापद प्रचलित हो गये । सामान्य भूतके श्री प्रन्ययान्त स्पॉस बने क्रियापद पहलेसे हो व्यवहार किये जाते थे और याज भी किया जा . . हिन्दी कौमुदी। "या" धातुओंसे बने क्रियापद रहते हैं, तब पूॉक्त "ती' वा "ई" में अनुस्वार नहीं लगाते और "ह" वा "या" धातुओंसे बने बहुवचन रूप ही संयुक्त क्रियापदोको बहुवचन बनानेमें समर्थ समझे जाते हैं। "था" धातुकी तरह "गा" धातुके भी भूतकालिक रूप ही बनते हैं। पर विशेषता यह है कि “गा" धातुके रूप दोनो तरहके होने हैं और एकका प्रयोग भूतकालमे तथा दुसरेका विधिक साथ होनेसे भविष्य कालमें होता है। पहले रूप धातुमें या लगानेले और दूसरे आ लगानेसे बनते हैं जैसे. गा+या-गया। पुल्लिङ्ग। स्त्रीलिङ्ग। पुरुष एकवचन वहुवचन एकवचन बहुवचन उत्तम मैं गयी मध्यम तू गया वह गया वे गये "हो" धातुके रूप। विधि और आशा। पुरप एकवचन। वहुवचन। मैं होऊ हम होवें, होय, हो मध्यम तू होवे, होय, हो तुम होओ, हो वह होवे, होय, हो वे हो, होयं, हों मैं गया हम गये तुम गये हम गयीं तुम गयीं प्रथम तू गयी वह गयी वे गयी उत्तम प्रथम उत्तम 1 . मध्यम तुम होओगे, होगे . प्रथम भविष्यकाल। हो+गा होगा। शिक्षा एकवचन । बहुवचन । मैं होऊंगा, हंगा हम होवेंगे, होयंगे, होंगे तू, होयेगा, होयगा, होगा यह होवेगा, होयगा, होगा ये होगे, होयं गे, हंगे स्त्रीलिका एकवचन। बहुवचन। मैं होऊंगी, हंगी हम होगी, होयंगी, होगी तू होयेगी, होयगी, होगी तुम होगोगी, होगी वह होयेगी, होयगी, होगी ये होगी, होयंगी, होंगी "ता" प्रत्ययान्त हो+ता होता । हेतुहेतुमद्भूत। पुलि। मैं होता पुत्प उत्तम प्रथम हम होते मध्यम टू होता तुम होते प्रयम' यह होता वे होते स्त्रीलिङ्ग। उत्तम मैं होता .- हम होती तुम होती मध्यम तू होती वह होती - वे होती प्रथम ६० हिन्दी कीमुदी। "मा" प्रत्ययान्त मामान्य भृत। हो+माहोमा हुना। पुलिस। पुरुष । एकवचन। घवनना उत्तम में सुधा तामा वह हुआ स्त्रीलिङ्का उत्तम. में हुई हम हुई मध्यम तुम दुई . यह हुई ह, था और गा धातुओंके साथ ही अन्य धातुओंफे विधि हेतुहेतुमद्भूत और सामान्य भूनके पोंके योगसे ही हिन्दीके समस्त क्रियापद बनते हैं। वर्तमान काला सामान्य वर्तमान पुलिना होता है। एकवचन। बहुवचन। १ उत्तम में होता है मध्यम हम होते है तुम होते हो प्रथम तू होता है वह होता है स्त्रीलिङ्ग । होती है। उत्तम मैं होती है हम होती है किया। पुरुष। एकवचन। तू होती है मध्यम बहुवचन । तुम होती हो वे होतो है . प्रथम यह होती है उत्तम मध्यम हम हो रहे हैं तुम हो रहे हो चे हो रहे हैं प्रथम -- तात्कालिक वर्तमान। पुल्लिंग। हो रहा है। मे हो रहा हूँ तू हो रहा है यह हो रहा है स्त्रीलिंग। हो रही है। मैं हो रही हूँ तू हो रही है वह हो रही है .. पूर्ण वर्तमान । हुआ है। में हुआ हूं हम हो रही हैं तुम हो रही हो मध्यम प्रथम वे हो रही हैं उत्तम हम हुए हैं तुम हुए हो मध्यम तू हुआ है वह हुआ है प्रथम ये हुए हैं, स्त्रीलिंग... हुई है। उत्तम में हुई हूं - हम हुए हैं. तुम हुई हो --- मध्यम: । प्रथम वह हुई है।
हिन्दी कोमुदो। पुख्या मध्यम यहुवचन। तुम हो रहे थे वे हो रहे थे प्रथम एकवचन । तू हो रहा था वह हो रहा था स्त्रीलिंग। हो रही थी। में हो रही थी तू हो रही थी वह हो रही थी 'उत्तम हम हो रही थी मध्यम तुम हो रही थी प्रथम चे हो रही थी. पूर्ण भूत। पुल्लिंग। हुआ था। . उत्तम हुआ था हम हुए थे तुम हुए थे प्रथम वे हुए थे: हम हुई थी तुम हुई थीं मध्यम तू हुआ था, यह हुआ था स्त्रीलिंग। हुई थी। उत्तम मैं हुई थी मध्यम तू हुई थो: 5 ... प्रथम: वह हुई थी सन्दिग्ध भूत।।. पुल्लिंग। हुआ होगा। उत्तम मैं हुआ,हूंगा: मध्यम प्रथम वह हुआ होगा वे हुई थीं. तू हुआ होगा हम हुए होंगे तुम दुर होगे घेहुए होने क्रिया। स्त्रीलिंग। हुई होगी। एकपंचन। मैं हुई हूंगी उत्तम .. . प्रथम पुरुष . यहवचन। हम हुई होंगी मध्यम तू हुई होगी तुम हुई होगी प्रथमः वह हुई होगी वे हुई होंगी सम्भाव्य अपूर्ण भूत | * पुल्लिंग। आता होता। * उत्तम मैं आता होता हम आते होते मध्यम तू आता होता तुम आते होते वह आता होता घे आते होते स्त्रीलिंग। आती होती। में आती होती हम आती होती मध्यम तू आतो होती तुम थाती होती यह आती होती वे आती होती सम्भाव्य पूर्ण भूत। पुल्लिंग। आया होता उत्तम मैं आया होता '' हम आये होते तू आया होता तुम आये होते वह आया होता चे आये होते 23 "होता होता" और "होती होती" प्रयोग व्यवहारमें नहीं पाते इसीसे "हो" धातुके बदले "आ" धानुके रूप साधकर दिसाये गये हैं। उत्तम प्रथम । এর . ...
हिन्दी कौमुदी। स्त्रीलिंग। आयी होती। हम आधी होती तुम आयी होती प्रथम पुरुष एकवचन। बहुवचन। उत्तम मैं आयी होती मध्यम तू आयो होती वह आयी होती वे आयी होती इसी प्रकार अन्य अकर्मक क्रियाओं के रूप साधे जाते हैं। वकना, बोलना, भूलना, मिलना और लाना क्रियाओंके रूपोंके लिये भी यही निथम है। सकर्मक क्रियाओंके "आ" प्रत्ययान्त रूपोंमें अन्तर पड़ता है, क्योंकि कम वाच्य होनेके कारण उनमें कर्मानुसार क्रिया होती है। सकर्मक "खा" धातु । सामान्य भूत । सा+आ-खा-खाया। पुरुप एकवचन । बहुवचन। उत्तम भात खाया भात खाया या या हमने मध्यम तूने तुमने प्रथम उसने रोटी खायी उन्होंने यहां कर्म के अनुसार क्रिया हुई है, कर्ता खानेवालेके अनुः सार नहीं। यदि स्त्री बोले वा उसके विषयमें कोई और बोले, और कर्म का लिंग न बदले, तो इन रूपोंमें अन्तर न पड़ेगा। रोटी खायी क्रिया। . . पूर्ण वर्तमान। P'पुरुष। एकवचन। बहुवचन। उत्तम मैंने । भात खाया है हमने । भात खाया है मध्यम तूने तुमने उसने ) रोटी खायी है उन्होंने ) रोटो.खायो है या या कप्रियम पूर्ण भूत। उजम मैंने भात खाया था हमने । भात खाया था या प्रथम या मध्यम तूने तुमने उसने ) रोटी खायी थी उन्होंने ) रोट खायो थों सम्भाव्य पूर्ण भूत। उत्तम भात खाया होता हमने ) भात खाया होता मध्यम तूने तुमने या प्रथम. उसने रोटी खायी होती उन्होंने ) रोटी खायी होती सन्दिग्ध भूत। भात खाया होगा हमने | भात खाया होगा तूने तुमने । उसने रोटी खायी होगी उन्होंने ) रोटी खायो होगी “आ”, “जा", "ar", "ला", "दे", "ले" आदि एक अक्षरबाली धातुओं में जय “आ” प्रत्यय लगता है, तब "आ" उत्तम मध्यम या या प्रथम + . ।
.
,
हिन्दी कौमुदी।
"या" हो जाता है; जैसे, आया,जाया, खाया, लाया,दिया, लिया
आदि । “जा" और "कर" धातुओंके सूतकालके रूपोमें कुछ,
निशेषता होती है । “जा" धातुके भूनकालका रूप नियमानुसार
तो "जाया" और "कर" धातुका “करा बनता है, पर हिन्दीमें
"गया" और "किया" रूप भी बनते हैं और इन्हीका बहुत
प्रचलन है। “करा" शिष्ट प्रयोग नहीं समझा जाता, यद्यपि
बोलचालमें आता और “जाया" यौगिक क्रियाओंके "वह ले
जाया जाता है और मुझसे जाया जाता है जैसे कर्मवाच्य और
भाववाच्यमें ही काम आता है। दो प्रकारके रूपोंका कारण यह
है कि जाया, गया आदि संस्कनकेत प्रत्ययान्त गतः और फनः ।
कृदन्त रूपासे बने हैं।
आकारान्त धातु गेंका छोड़ एक अक्षरवालो धातुओंमें अब
"आ" अथवा "या" प्रत्यय जुड़ता है, तब धातुका दोर्घ स्वर
"हम्ब" हा जाता है। एकारान्त धातु "इकारान्त" हो जाती है।
जैसे, ले और दे धातुओंसे लिया, दिया।
दिया, लिया, सिया, पिया और फिया क्रियापदोंके
स्रोलिङ्गमें दी, लो, सी, पी और को रूप होने हैं। *
जिस क्रियासे कार्यका समाप्ति नहीं होती और जिसे अन्य
क्रियाका अक्षा रहती है, वह असमापिका वा
-ये रूप नियमले विरुद्ध जान पड़ते हैं, परन्तु विचारपूर्वक देखनेसे
नियमानुसार हो ठहरते हैं। दिया, लिया भादिक स्त्रीलिङ्ग रूप दियो,'
लियी, सियो, पियो और कियी होते हैं। किमो समय अनेक पुस्तको आशा
.
H
पूर्वकालिक
"
प्ररणार्थक क्रिया।
६६.
क्रिया होती है। यह यातो धातुके रूपमें ही रहती है.
उसमें "कर", "के" वा "करके" जुड़नेसे बननी है ; जसे, जा,
जाकर, जाके, जाकरके।
.
प्ररणार्थक क्रिया।
'जो क्रिया किसी कार्यके लिये दुसरेको प्रेरित करती है, वह
प्रेरणार्थक क्रिया कहाती है; जैसे, करवाना, बुलवाना,
खिंचवाना।
अकर्मक, कर्म कर्तक और सकर्मक तीनो प्रकारकी क्रिया.
ओंसे प्रेरणार्थक क्रिया बनती है
अकर्मक और कर्मकर्तेफ क्रियाओंसे दो प्रकारकी प्रेरणार्थक
क्रिया बनती है। एक वह जिससे जिस मनुष्यको प्रेरणा की
जाती है, वो भाम करता है। दूसरी यह जिससे प्रेरणा की
जाती है, वह दूसरेसे काम कराता है;
अकर्मक
क्रियासे पहली प्रेरणार्थक क्रिया चढ़ाना और दूसरी प्रेरणार्थका ..
चढ़वाना । इसी प्रकार पिघलना कर्मकर्तृक क्रियासे पहली
प्रेरणार्थक क्रिया पिघलाना और दूसरी प्रेरणार्थक क्रिया
निकले सारमधानिधि और उचितवनका पत्रों में ये हो रूप लिखे जाते थे.
और पं० केशवराम भट्टकृत व्याकरणमें पाये भी जाते हैं। परन्तु पीछे इन
पोंको "यी" के बदले "ई" लिखी जाने लगी और ये रुप दिई, बिई, सि
पई और कि हो गये । अब भी अनेक मनुष्य दिई, लिई नादि लिखते
खे जाते हैं। कालान्तरमें सन्धिके नियमानुसार इन रूपांकी " अगले
अतरम मिल गयो और दी, लोयादि रूप बन गये।
जैसे चढ़ना
..
७० हिन्दी कौमुदी। पिघलयाना बनती है। पहली सकर्मक और दूसरी करण भावयुक्त सकर्मक प्रेरणार्थक क्रिया है।" इन क्रियाओंकी धातुमें "आ" लगानेसे पहली प्रेरणार्थक और "या" लगानेसे दूसरी प्रेरणार्थक क्रिया बनती है जैसे, अकर्मक क्रिया। प्रेरणार्थक करणभावयुक्त प्रेरणार्थक बैठना चैठाना वैठवाना उठना उठाना उठवाना चलना चलाना चलवाना हंसना हँसाना हंसवाना तरना तराना तैरवामा कर्मकर्तक किया। मकना चमकाना चमकवाना पिघलना विघलाना पिघलवाना मटकना भटकाना भटकवाना फाई गमवक क्रियाओंसे सकर्मक प्रेरणार्थक क्रिया धातुमें "आ" न लगाकर उसके प्रथम अक्षरफे भकारको दीर्घ कर देनेसे यनती है और मूल क्रियाके अन्तमें "at" और “चा' जाइनमे करणभावयुक्त प्रेरणार्थक किया बनती है ; जसे, लादना लदाना বৰা याधना बंधाना काटना फटाना मग्ना मारना मराना वा दरमभाययुक्त प्ररणार्थक निया हिन्दीयो विगैपता है, जो म . . . लदवाना वा 'चंधवाना करवाना मरमाना । मागमान नहीं दिपनी। , प्रेरणाधंक क्रिया। फड़ाना वा फड़नाना निकलना লিঙ্কাবনা निकलाना वा निकलवाना दवना या दवाना दरवाना यहां दयना क्रियाको छोड़ सय क्रियाओंकी करणभावयुक्त प्रेरणार्थक नियाके दो रूप दिखाये गये है। पहला रूप सकर्मक দুর্থ স্থী , এ, ঐ জামাক গাথা . . कहीं कहीं कर्म कर्त क क्रियाकी सकर्मक प्रेरणार्थक क्रिया ' यनाने के समय धातुके अन्तमें "आ" और "ओ" दोनो लगा सकते है: जसे, भीगना भिगाना या भिगोना মিয়ানা डूबना डुबाना चा डुयोना डुववाना कई भकर्मक और कर्म कर्तृक धातुओंके आदि अक्षर इकार वा उकारयुक्त हों, तो उनकी सकर्मक क्रियाकै आदि अक्षर + एकार वा मोकारयुक्त होते हैं । जैसे, खिंचना खेचना, खींचना खिंचाना खिंचवाना दिखना देखना दिखाना, दिखलाना दिसवाना गिरना गिराना বিমান। पिलना पेलना पिलाना पिलवाना मिलता * मेलना मिलाना मिलवाना { नपड़ना निड़ना निवाड़ना नियड़ाना निबड़वाना ७ गैरना और मैलना राजपुतानेकी बोलियोंमें श्रोते हैं । - , वा तुड़वाना - ७२ हिन्दी कौमुदी। खुलना खोलना खुलवाना घुलना घोलना घुलवाना जिन कर्मकर्तृक धातुओंके आदि अक्षर अकारान्त और अन्तिम टकारान्त होते हैं, उनकी सकर्मक क्रियामें ऊकार ओकार हो जाता है और टकार दोनो प्रेरणार्थक क्रिया भोंमें ड़ हो जाता है ; जैसे, फूटना फोड़ना फुड़ाना वा फुड़वाना टूटना तोड़ना तुड़ाना छूटना छोड़ना छुड़ाना वा छुड़वाना एक अक्षरवाली अकर्मक वा सकर्मक धातुओंसे प्रेरणार्थक निया बनाते समय प्रथम प्रेरणार्थको "ला" और द्वितीय प्रेरणार्थकमें "लवा" लगाते हैं, जसे, सिलाना , पीना पिलाना सोना सुलाना । रोना रुलाना कई धातुओंकी प्रेरणार्थक कियाओंके दो रूप होनेपर भी उनके अर्थों में अन्तर नहीं पड़ता ; जैसे, सीना सिलाना देना दिलाना वा छापना छराना खाना खिलवाना पिलवाना सुलवाना रुलवाना . वा सिलवाना दिलवाना छपवाना ।
। परखना धक क्रिश करना परखाना परस्त्रवाना चा . कराना करवाना इसी प्रकार कई एकाक्षरी सकर्मक धातुओंकी एक ही प्रकारकी प्रेरणार्थक क्रिया बनती है और "ला" के बदले "या" लगाया जाता है ; जैसे, गाना ना लियाना अनेक सकर्मक और अकर्मक धातुओंकी प्रेरणार्थक क्रिया धारण नियमसे ही बनती है ; जैसे, पकड़ाना पकड़वाना समझधाना गवाना समझाना ना जगाना Ir जगवाना লিনানা जितवाना . घुमाना घुमवाना सुधाना सुधवाना सुनाना सुनवाना बुलाना युलयाना सकर्मक धातुओंकी प्रथम प्रेरणार्थक क्रिया "या" और - द्वितीय प्रेरणार्थक क्रिया "चा" लगानेसे घनती
।
७४
हिन्दी कोमुदी।
देखना दिवाना वा दिखलाना दिखवाना
कहना
कहाना वा' कहलाना
कहवाना
सीखना सिखाना वा सिखलाना सिखवाना
कुछ धातुओंको प्रेरणार्थक क्रिया यीचमा अक्षर बदलनेसे
वनती है ; जैसे.
रहना
रखना
रखाना,
रखवाना
विकता वेचना
विकाना, विकवाना,
4
L
यौगिक क्रिया ।
दो या अनेक क्रियाओंके योगसे जो क्रिया बनती हैं,
'यौगिक क्रिया कहाती है। हिन्दीके आशा और विधि रूपों
छोड़कर सभी क्रियापद यौगिक क्रियाओंसे बनते हैं. पर
योगिक क्रियापद नहीं कहाते। इसका कारण यह है कि
जिन क्रियाओंके योगसे हिन्दीके क्रियापद बनते हैं, उनके बिना
काल वचन आदिका वर्णन असम्भव हो जाता है। जिन्हें हम
यौगिक क्रिया कह रहे हैं, वे आना, जाना, रहना, रखना,
उठना, धैठना, देना, लेना, डालना, पड़ना, सकना. चुकना,
लगना, करना, चाहना आ द क्रियाओंके योगसे बनती है
जो क्रियाए इनके पहले रहती हैं, उन्हीसे अर्थ निकलता है।
इनके साथ युक्त होने के कारण उनके अर्थमें कुछ विशेषता आ
जाती है.। अर्थ और रूपके अनुसार यौगिक क्रियाओंके अनेक
भेद होते हैं। यौगिक क्रियाओंका एक भाग कृदन्त और
दूसरा क्रिया रहता है।
पहली श्रेणी।
जिस यौगिक क्रियाका पहला भाग असमापिका वा पूर्व
कालिक क्रिया होता है, उसकी साधनामें दूसरे भागके ही रूप
इते हैं ; पदले भागकी क्रियाके अर्थमें दृढ़ताभर आ जाती
.
चुकना आदि। इनसे देने, लिखने और पोनेके कायकी
७६
हिन्दी कौमुदी।
है और जिसके रूपोंकी साधना होती है, उसका कुछ अध
नहीं होता; जैसे, वन आना। यहां अभिप्राय तो बननेसे
है और माना क्रियाका कोई अर्थ नहीं है, पर धन अर्धात्
बनकर आना क्रियाका वशेष अर्थ है महत्व वा सफलता प्राप्त
होना। इसी प्रकार मारना क्रियाका अर्थ केवल प्रहार करना
है, पर “मार डालना" क्रिया जान ले लेनेके अर्थमें प्रयुक्त होती
है। इसी भाति "तोड़ डालना," "खा डालना," "काट डालना"
आदिके अर्थ खण्ड खण्ड करना, हड़प या पचा जाना और
सावित न रखना है।
इसे ढ़ताद्योतक यौगिक क्रिया
कहते हैं । गिर पड़ना, बन पड़ना, जान पड़ना, फेक देना,
गिरा
देना, दिला देना, बता देना, सुना देना, दे बैठना, गे उठना,
चढ़ बैठना. पी लेना, जान लेना, बैठ रहना, दे रखना. टूट जाना
इसी श्रेणीकी यौगिक कियाएं हैं।
शक्ति वा सामर्थ्य जताने के लिये असमापिका क्रियाके रूपके
पीछे “सकना" क्रिया लगाकर खा सकना, मार सकना,'
जा सकना, भाग सकना, पढ़ सकना,
'लिख जैसी
यौगिक क्रियाए' बनायो जाती है। यह सामर्थ्यद्योतक यौगिक
क्रिया है
इसो प्रकार कार्यकी पूर्णता वा समाप्ति बताने के लिये भी
असमापिको क्रियाके ही पाछे “चुकना" क्रिया लगाकर यौगिक
क्रिया बनायी जाती है; जैसे, दे चुकना, लिख चुकना,
.
सकना
पी
योगिक क्रिया।
समाप्ति जान पड़ती है। इसका नाम पूर्णताद्योतक यौगिक
क्रिया है।
दूसरी श्रेणो।
दुसरी श्रेणीकी यौगिक क्रियाका पहला भाग तो भूत
कालके पुलिङ्ग एकवचनका रूप धारण करता है और दूसरा
सामान्य क्रियाके रूपमें रहता है तथा इसो पिछले भागकी
साधना होती है। पहला भाग रुदन्त अव्यय होता है। इस
श्रेणीको यौगिक क्रियाका दूसरा भाग सदा "करना" या
"चाहना" होता है। "करना" क्रियाकै योगसे बननेवाली यौगिक
क्रिया स्वभाव या व्याप्ति बताती है. इसलिये यह स्वभावद्योतक
यौगिक किया है। खाया करना, पढ़ा काना, लिया
करना,
सोया करना आदिसे खाने, पढ़ने, लिखने और सोनेका
स्वमाय जाना जाता है।
इसी प्रकार "चाहना" शियाके योगमै इच्छाका अर्थ पाया
जाता है, इसलिये यह इच्छाधोनक यौगिक क्रिया है। खाया
चाहना, पढ़ा चाहना आदि इस श्रेणीको नियाकं उदाहरण है।
कभी कभी संशाके इस रूपके बदले चाहना मियाके
योगमें खाना, पढ़ना, देना शब्दोंका भी संशा रूपमें व्यवहार
होता है, जैसे खाना चाहना, पढ़ना चाहना, देना चाहना आदि।
इस यौगिक क्रियासे इच्छाके सिवा कार्य शीघ्र होनेका भाव
भी निकलता है जैसे, पानी बरसा चाहता है, बादल गरजा
चाहता है, साफ आया चाहती है।
.
.
-
an
विचार न करके पहले भागका क्रियापद पुल्लिग बहुवचनके
हिन्दी कौमुदी।
तीसरी श्रेणी।
तीसरो श्रेणीकी यौगिक क्रिया लगना, देना, कहना, पाना,
क्रियाओंके योगसे बनती है और इसका पहला भाग क्रिया
रूपमें ही रहता है, केवल "ना" प्रत्यय "ने" कर दिया जाता है।
यह कृदन्त अव्यय कहाता है ; जैसे, वह खाने लगा, मैंने रामको
जाने दिया, मोहनको मास्टरने जाने कहा, सोहन वहां घुसने
नहीं पाया। लगना क्रियाके योगसे बननेवाली आरम्भद्योतक,
देना क्रियाके योगसे बननेवाली आज्ञाद्योतक और पाना क्रियाके
योगसे वननेवाली अवकाशद्योतक यौगिक क्रिया है।
चौथी श्रेणो।
चौथी श्रेणीको यौगिक क्रियाके दोनो भागोमें लिंगवचना
नुसार अन्तर पड़ता है और दूसरे भागमें जाना, आना या
रहना क्रियाके रूप होते है। जैसे, मैं सोता रहा, लड़की रोती
आती है, लड़के हंसते आते हैं।
जिस प्रकार ऊपर हेतुहेतुमद्भूतका रूप पहले मागमें
रहता है, उसी प्रकार मूतके रूपका प्रयोग भी होता है।
जैसे, लड़के भागे जाते है, लौंडी पड़ी रहती है, मैं चला
माता है।
कभी कभी "माना" "जाना" क्रियाओंके साथ लिङ्गवचनका
,
रूपमें रखा जाता है, पर यहां वह क्रियापद कृदन्त अव्यय
यौगिक किया।
होता है ; जैसे, वह हंसते हंसते आता है, नियां नाचते गाते
यार्थी
,
.
पांत्री श्रेणी।
कमी कभी इस श्रेणीकी क्रियाका पदला भाग भूतकालिक
मियाके पुलिङ्ग बहुवचन रूपोंमें रहता है और दूसरे मागमें
देना, आना, माना और छोड़ना क्रियाओंके रूप रहते है। इस
तरहकी क्रियाओंके दो विभाग होते हैं। एक तो वह जिसका
दूसरा भाग "देना" क्रियासे बनता है और दूसरा यह जिसका
पहला भाग ओढ़ना, पहनना और लगना क्रियाओंके लिङ्गभूत.
कालिफ बहुवचनके रूपमें होता है और दूसरा भाग माना,
जाना और छोड़ना क्रियाओं के रूपोंमें रहता है।
"देना" क्रियाके योगसे बननेवाली यौगिक क्रिया केवल
वर्तमान कालमें प्रयुक्त होती है ; जैसे, में बताये देता हूं, लड़के
पाठ सुनाये देते हैं, लड़कियां सब यातें कहे देती हैं।
; प्रकारकी यौगिक क्रिया के पहले भागको क्रिश सदा सकर्मक
होती है, परन्तु वह वास्तवमें क्रिया नहीं, कृदन्न अव्यय है।
यो, पहने, लादे, लगाये जैसे रूपोंके योगसे जो यौगिक
क्रिया बनती है, उसके दूसरे ही भागकी साधना होती है,
परन्तु दोनोके वीच लिङ्गवचनानुसार हुआ, हुए और हुई पद
लुप्त रहते है जैसे, वह ओढ़नी ओढ़े (हुई )आती है, मैं कोट
पहने (हुआ) जाता हूं, लड़के धोती पहने हुए) आते हैं।
।
८० , हिन्दी कौमुदी। इस यौगिक क्रियाकी साधना तीनो कालोंमें होती है। ओडे, भागे, लाये, लगाये आदि कृदन्त है। छठी श्रेणी। यौगिक क्रियाकी छठी श्रेणीमे एक ही अर्थमें दो क्रियाएं भाती है। वाक्यकी क्रियासे सम्बन्ध न होनेपर यातो ये अस मापिका क्रियाएं होती हैं या "विना" अव्ययके योगमें भूत- कालिक क्रियाके ववचन के रूपमें ; जसे, छोड छाडकर, मार- पीट कर, लूट मारकर वह चल दिया, विना कहे सुने यह चला गया। सातवीं श्रेणो। इस श्रेणीको यौगिक क्रियाका पहला भाग विशेष्य या विशेषण होता है और दूसरेमें करना, देना, होना, खाना, आना देखना जैसी क्रियाओंके रूप रहते हैं , जैसे, अंगीकार करना, उपदेश देना। विशेषण भूनकालके एकवचनके रूपमें भी रहता है , जैसे समाप्त करना, प्राप्त होना आदि । भूतकालिक विशेषण यदि हिन्दीका हो तो उसमें लिग वचनानुसार परिवर्तन भी होता है। जैसे, वह गाड़ी खडी हुई, उसने घोडा खड़ा किया, लडके पड़े हुए । आठवी श्रेणी। आठवी श्रेणीको यौगिक क्रियाका दूसरा भाग “जाना मियाके रूपोंसे बनता है और पहले भागी अर्थात मुख्य क्रिया सदा भूतकालिक होती है। , इस यौगिक क्रियाके दोनो
यौगिक किया।
Fri भागोंमें लिंगवचनानुसार परिवर्चन होता है। "जाना किया
योगस जो किया यनती है, वह कर्मचाच्य वा भाववाच्य
होती है, परन्तु इसके कमि सदा चौथी विभक्ति या करण
कारक होता है। इसके सिधा यह यौगिक क्रिया शक्ति वा
सामर्थ्य भी यतातो है ; जैसे, मुझसे या तुझसे या उससे या
तो हमसे या तुमसे या उनसे दूध पिया जाता है या पिया गया
in या पिया जायगा।
फर्म पुलिग बहुवचन होनेसे क्रिया भी पुल्लिंग बहुवचन
होगी : जैसे मुझसे या तुझसे या उससे या हमसे अथवा तुमसे
या उनसे पढ़े खाये जाते हैं या खाये गये या खाये जायंगे।
कर्म नीलिङ्ग एकवचन होनेसे किया स्त्रीलिङ्ग एकवचन
होती है । जैसे, मुझसे या तुझसे या उससे या हमसे अथवा
तुमसे या उनसे रोटी खायी जाती है या खायी गयी या शायरी
६
ar
जायगी।
कर्म स्त्रीलिङ्ग बहुवचन होनेसे किया स्त्रीलिङ्ग होती है
जैसे, मुझसे या तुझसे या उससे या हमसे अथवा तुमसे या
उनसे रोटियां खायी जाती है या पायी गयीं या सायी
जायंगी।
।
जाना क्रियाके योगसे बननेवाला भाववाच्य अकर्मक क्रिया में
ही होता है। इसमें, जैसा ऊपर बताता गया है, कर्नामें चौया
विभक्ति होती है और क्रिश सदा पुल्लिङ्ग एकचयन रहती है।
इसमें मुख्य क्रियाका भाव ही प्रधान है जैसे मुझसे या तुमसे
है
हिन्दी कौमुदी। या उससे अथवा हमसे या तुमसे या उनसे सोया जाता है, या सोया गया या सोया जायगा। नवी श्रेणी। नवों श्रेणीकी यौगिक क्रियाका पहला भाग तो कृदन्तक रूपमें रहता है और दूसरे में ह, था, हो और पड़ धातुओंसे कने रूप रहते हैं। इस यौगिक क्रियासे बने चाक्यके कर्नामें दूसरी विभक्ति होती है और यदि यौगिक क्रियाका पहला भाग सकर्मक होता है तथा कर्म व्यक्त रहता है, तो कर्मके लिङ्गरचनानुमार यौगिक क्रियाके रूप होते हैं, इसलिये यह कर्मवाच्य है ; जैसे, मुझे गेटी सानी होगी, मुझे कुछ काम करना है,रामको बड़े कष्ट उठाने पड़े, कृष्णको बड़े काम करने थे। परन्तु जब यौगिक क्रियाका पहला भाग अकर्मक होता है या सकर्मक होनेपर भी कर्म अव्यक्त रहता है, तब क्रिया सदा पुल्लिंग एकवचन होती है, इस लिये यह भाववाच्य होता है ; जैसे, मुझे जाना है, उसे खाना था, लड़कीको रोना पड़ा या रोना होगा। इसी प्रकार दिपाई, सुनाई, छुलाई और पकडाई शब्दोंके साथ “देना” क्रियाके योगसे जो क्रिया बनती है, वह भी कर्म वाच्य ही होती है। दिखाई आदि शब्दोंमें कोई विकार नहीं होता और देना क्रिया अकर्मक क्रियाके समान प्रयुक्त होती है। यहां दिखाई देना, सुनाई देना, छुलाई देना और पकड़ाई देना क्रियाओमें इन्द्रियगोचरत्व मात्र पाया जाता है; और दिखाई, सुनाई आदि अव्यय हैं, देने .
। ---- - यौगिक क्रिया। लेनेसे उनका कोई सम्बन्ध नहीं है। इस प्रकारके कर्मवाच्यका कत्तां बहुधा. अव्यक्त रहना है और यदि • व्यक्त भी होता है, तो उसमें दूसरी विभक्ति होती है और कर्मफे लिङ्गवचनानुसार ही क्रिया होती है; जैसे, सरस्वती बहुत दिनों बाद दिखाई दी, रामका बोल सुनाई दिया, वह किसीको छुलाई नहीं देता, उससे चोर पकड़ाई न देगा। ये प्रयोग दृष्टिगोचर होना, कर्णगोचर होना, स्पर्शगत और हस्त- गत होना अर्थ देते हैं। "चाहिये" शब्दके योगमें इसी प्रकारके कर्मवाच्य और भाव- वाच्य बनते हैं। "चाहिये" तो अव्यय होनेके कारण सदा विकार रहित रहता है, पर यदि वह सकर्मक क्रिया के साथ आता है, तो कर्मके लिङ्गवचनानुसार क्रिया बदलती है: और इसके कर्नामें दूसरी विभक्ति होती है। यह कर्मवाच्य होता है। जैसे, मुझे रोटी खानी चाहिये, उसे दस काम करने चाहिये, स्त्रीको भोजन बनाना चाहिये। यदि क्रिया अकर्मक हो या सकर्मक होनेपर भी उसका कर्ता अव्यक्त हो तो क्रिया सदा पुल्लिङ्ग एकवचन रहेगी। इसलिये यह क्रिया भाववाच्य होगी; जैसे, आपको जाना चाहिये, राम- को भय खाना चाहिये, मोहनको अव सोना चाहिये।
.
नाम धातु
संज्ञासे जो धातुए बनती हैं. वे नाम धातु कहाता है ।
अनेक संज्ञा शब्दों में क्रियाका चिन्ह "ना" जोड़ देनेसे नाम
क्रिया बन जाती है और संशाके रूप हो नाम धातुका काम देते
हैं । जैसे, रंग, बधार, फटकार, दुतकार आदि। ये संज्ञा शब्द
हैं और धातुका भी कामं देते हैं। इनमें “ना” जोड़ देनेसे रंगना,
यधारना, फटकारना, दुतकाग्ना कियाप बन जाती हैं।
कुछ शब्दों "आ" प्रत्यय लगानेसे नाम धातु बनती है।
खटखद, फरफट, छटपट, तड़फड़, तिलमिल, लाज, पात,
जैसे शब्दोंले खटखटा, फटफटा, छटपटा, तड़फड़ा, तिलमिला,
लजा, यता धातुएं और खटपटाना, फटफटाना, छटपठाना,
तड़फडाना, तिलमिलाना, लजाना, बताना कियाए बनती हैं।
कहीं कहीं "आ"के बदले “ला" प्रत्यय लगाकर धातु
बनाते हैं ; जैसे, भूसे झुठला और बातसे बतला धातुएं और।
कुठलाना तथा बतलाना कियाए बनी हैं।
कई संज्ञा शब्दोंमें "इया" प्रत्यय लगाकर धातु धनाते हैं;
जैसे पानीसे पनिया, जूतासे जुतिया. लातसे लतिया, चुकटीसे
चुटकिया आदि धातुए और पनियाना, जुतियाना, लतियाना.
चुटकिवाना कियाए बनी हैं।
,
-
,
कृदन्त ।
:--
।
--
कर, के और करके
धातुमें "कर", "के" और "करके" जोड़नेसे असमापिका
या पूर्वकालिक क्रिया बनती है। इससे जान पड़ता है कि
पहलेका कार्य तो हो चुका, पर उसके बादका समाप्त नहीं हुआ
और इसलिये यह असमापिका या पूर्वकालिक क्रिया कहाती है ।
जैसे, पा+कर खाकर, जा+कर जाकर, सुन+कर-सुनकर,
फर+के-करके, जान+के-जानके,सुन करके-सुगकरके । 'करके'
'प्रत्ययका प्रयोग बहुत कम किया जाता है। विना प्रत्ययकी धातु
भी असमापिका क्रियाका काम देती है।
धातुमें "य" और "प्रत्यय जुड़नेसे भी असमापिका क्रिया
धनती है, पर पुरानी हिन्दीकी, वर्तमान हिन्दीकी नहीं :
इतनी कथा सुनाय श्रीशुकदेवजी वाले,यह काह वह आगे चला।
जैसे,
t
धातुमें "ता" प्रत्यय लगानेसे जो रूप धनता है, वह तिहग
'काम करता है, हेतुहेतुमद्भूनकालिक किया, वर्तमान कालिक
किया और विशेषणका । यह आकारान्त पुलिस एकवचन होता
है जैसे, यह आता, मैं नहीं जानता, लड़की रोती है, लड़के
आकारान्त पुलिङ्ग शब्दोंके नियमानुसार इसके
लिंगवचन बदलने हैं।
खेलते हैं
हिन्दी कौमुदी।
जब "ता प्रत्यय "ते" कर दिया जाता है और लिंगवचनके
कारण इसमें अन्तर नहीं पडता, तब "ते" प्रत्यययुक्त कदल
अव्यय होता है।
"आ।"
धातुमे "आ" प्रत्यय लगानेसे जो रूप बनता है, वह दुहरा
काम करता है, भूतकालिक किया और विशेषणका । सकर्मक
धातुमे "आ" प्रत्यय लगनेसे तो कर्मके लिंगवचनानुसार यह
रूप रहता हैं और अकमकके कर्त्ताके अनुसार . जैसे, मैंने पोयो
पढी, वह भागा चला गया। यह पुलिङ्ग एकवचन होता है और
आकारान्त पुलिङ्ग शटोंकी भाति इसके लिड्डुवचन बदलते हैं।
जव "आ"ए"कर दिया जाता है और लिङ्गवचनके कारण
इसमें परिवर्तन नहीं होता, तब "ते" प्रत्ययवाला कृदन्त अव्यय
कहाता है, जैसे, हंसते हंसते नाचते गाते।
"ना।"
धातुमें 'ना" प्रत्यय जोडनेसे जो रूप बनता है वह तिहरा
काम करता है--आवश्यकता वा कर्त्तव्य, भावी कार्य और
आज्ञा बनाता है जैसे, मुझे जाना है, उसे रोटी खाना है, तुम्हें
सोना है। यह पुलिस एकवचन होता है और आकारान्त
पुल्लिङ्ग एकवचन शब्दोंकी भांति इसके बहुवचन और स्त्रीलिङ्ग
रूप बनते हैं
कून प्रत्ययोंने तीन प्रकारसे मंजा शब्द बनते हैं (१)
क्रियामे प्रत्यय लगानेसे, (२) धातुमे प्रत्यय जोडनेसे और (३)
८७
आकारान्त
-
कृदन्त।
धातुके रूपका ही संज्ञाकी तरह व्यवहार करनेसे
प्रत्यय लगनेसे शब्द पुल्लिङ्ग और ईकारान्त प्रत्यय जुड़नेसे
स्त्रीलिङ्ग तथा अकारान्त प्रत्यय जुड़नेसे कभी पुलिङ्ग और
कभी स्त्रीलिङ्ग बनता है।
"ना" जय "ने" कर दिया जाता है और लिंगवचनके कारण
इसका रूप नहीं बदलता, तब यह कृदन्त अव्यय होता है ; जैसे,
कहने लगा, जाने दिया।
कर्तृवाचक।
वाला, हारा, हार, सार और वाहा ।
बाला, हाग, हार, सार और चाहा सम्बन्धसूचक प्रत्यय
कियाओंमें लगते हैं, जिनमें आजकल "वाला" ही प्रचलित है
और "हारा" और "हार" अप्रचलित हैं। "याला" और "हारा"
जुड़नेके पहले किया एकारान्त कर दी जाती हैं और "हार"तथा
"सार" जुड़नेके पहले अन्तिम आकारका लोप कर दिया जाता
है ; जैसे, बोलना+वाला बोलनेवाला, करना+हारा-करनेहारा,
होना+हार-होनहार, सिर्जना हार-सिर्जनहार, मिलना+सार=
मिलनसार, चर+वाहा=चरवाहा । इन प्रत्ययोंके जुड़नेसे फर्तृ-
वाचक संज्ञा बनती है।
इया एरा, ऐया और वैवा।
धातुमें सम्बन्धसूचक इया, एरा, ऐया थोर वैया प्रत्यय
जुड़नेसे भी कत्तृवाचक संशा बनती है : जैसे, जड़+इया=
.
-
हिन्दी कौमुदी।
जड़िया, लूट परा-लुटेरा, परख ऐया-परमैया, गा+वैया=
गवैया
आ. ना, ना,टा।
आ, ना, ना, टा कर्तवाचक प्रत्यय हैं और धातुमें जुड़कर
व्यापार या स्वभाव बताते हैं; जैसे, भुज+आ-भूजा (भूजने-
बाला), रोना रोना ( रोनेवाला अर्थात् जिसका स्वभाव
रोना है ), खा+ना-खन्ना (खानेवाले), चट+टा-चट्टा
चट्टा (चाटनेवाला)।
आक, आलू, कड़, आड़ी, ओड़ और का।
आक, आल, कड़, आड़ी और ओड़ भी कर्तृवाचक
पुल्लिङ्ग प्रत्यय हैं, पर साथ ही कर्ताका स्वभाव भी बताते हैं
और धातुमें ही जुड़ते हैं ; जैसे, तैर+आव-तैराक, झगड़ा
माल-गड़ालू. भूल+कड़-भुलक्कड़,खेल+आड़ी-खिलाड़ी, हंस+
ओड़-हंसोड, उचक+का-उचकका-उचका।
आका, आऊ और ऊ।
धातुमें "आका"आ"और "अ" प्रत्यय लगाकर भी कत्त
बाचक संज्ञा बनाते हैं ; जैसे, लड़+आका-लड़ाका, उड+आका
-उड़ाका, टिक+आऊ-टिकाऊ । पर प्रेरणार्थक कर्ज वाचक
संज्ञा बनानेमें "" प्रत्यय ही लगता है ; जैसे, लड़ा+लड़ाक
जुझा+ऊ-जुझाऊ, उड़ा+ऊ-उड़ाऊ. खा+ऊ-वाऊ । इसी प्रकार
लेऊ, देऊ, बेचू आदि कर्तवाचक संज्ञाए बनी है। साधारण
{ फतवाचक संज्ञा मी "" प्रत्यय जुड़ से बनती है, जैसे मार
।
-
भ
कर्मकारक और करणवाचक !
नी और भोटो
धातुमें "नो" प्रत्यय जुड़नेसे कर्मपाचक और करणवाचक
संमार यगती है, जैसे, सुनी-सुचनी, ओढ़+नी-मोदनी।
इनका अर्थ है सुघने और ओड़नेकी वस्तु। धौंकानी-
धौंकनी, फतर नोकतरनी, फूक नीफ कनी, कस+औटी
कसौटी शब्दों के आये हैं ये चीजें जिनसे धोकने, कारने,
'फूकने और कसनेका काम लिया जाता है।
ई, न और आनी।
चातुमें ई, न और आनी प्रत्यय लगाफर भी करणवाचक
संशा बनायी जाती है ; जैसे, रेनई-रती, चेलंन-बेलन,
चलान चलान, मथ आनी-मानी।
भाववाचका
..
आई, आव आवा, ई. न, हट, वट और आस आदि ।
धातुमे "आई", "माव", "आवा", "ई", "न", "R", "ती"
"घर", "हट", "मास" और "आप" प्रत्यय लगनेसे मायवावक
संजा बनती है। जैसे, चड़+आई-चढ़ाई (बालू जमीन), लड़+
माई लड़ाई, बन+भाव धनाव, भूल+भाया- भुलावा, हंस
ई हंसी, चल+न-चलन, रह+ नरहन, लपस्त-वपत,
पढ़नीयढ़ती, घबरा हट-धवरार, सजास्पट-सजावट,
--
हिन्दी कौमुदी।
थका+वट-थकावट, पी+आस-प्यास, मिल+आप-मिलाप | रो
धातुमें "आस" और "आई"के बदले "लास" और "लाई"
प्रत्यय लगाते हैं ; जैसे, रोझ्लास रुलास, रो+लाई-रुलाई ।
आई" प्रत्यय दाम अर्थमें भी आता है ; जैसे, रंग+आई
रंगाई. उतार+आई-उतराई, छाप+आई-छपाई।
जब "आई" प्रत्यय "देख" "सुन" "पकड़" जैसी धातुओंमें
लगता है, तब वह कभी संज्ञा और कभी अध्यय होता है। दाम
अर्थ होनेसे वह संज्ञा और इन्द्रियगोचरत्व होनेसे अव्यय होता
है ; जैसे, शीशा दिखाई, वात सुनाई आदिमें शीशा दिखाने और
चात सुनानेका अर्थ है, पर दिखाई देना, सुनाई देना आदिमें
इन्द्रियगोवरत्व है।
लूट, मार, पीट, दौड़, धूप, देख, भाल, पुकार, गुहार,
बोल, चाल जैसी धातुए अपने इसी रूपमें ही भाववाचक
संज्ञाकी भांति व्यवहार की जाती हैं।
-
आन।
"आन" भाववाचक पुल्लिङ्ग प्रत्यय है, पर कभी कभी कर
अर्थ भी देता है ; जैसे, उठ+आन=उठान, लग+आन लगान।
भूकर
अर्थमें यह कर्मवाचक है।
.
--
उपसर्ग। . शब्दोंके पहले उपसर्ग जुड़नेसे उनका अर्थ बदल जाता है। हिन्दीमें अधिकतर संस्कृतके ही उपसर्ग प्रयुक्त होते हैं. पर कुछ हिन्दीके और दो एक फारसीके भी काममें लाये जाते हैं। अ और यन निषेधार्थक उपसर्ग है ; जैसे, अमोल-अमोल, भक्तोल अनोल, समाजानः अजान. अप-अपढ़, अन+पड़ अनपढ़, अन+रीति-अनरीति, अन+मिल अनमिल, अन+होनी अनहोनी। अप उपसर्ग जिस शब्दमें लगता है, उसका यर्थ उलट जाता है ; जैसे, अप+मान-अपमान अप+सगुन-अपसगुन. अप+ कीर्ति अपफोर्ति, अपयश-अपयश (अपजस )। नि और निर उपसर्ग शब्दक अर्थको उलट देते हैं और इन उपसर्गों के योगसे बननेवाले केवल विशेषण होते हैं : जैसे नि+डनिडर, नि+मय-निर्भय, निर+अपराध-निरपराध निर दोप-निदोय। सु और उसका हिन्दी रूप स अच्छाई तथा कु. थोर उसका हिन्दी रूप क बुराई बताता है ; जैसे, सुपुत्र सुपुत्र, स+पूत- सपूत, कुपुत्र-कुपुत्र, कापूत-कपूत. कुणा-कुटङ्गा, कुस्टेंब ३ प्रति प्रत्येकता और विपरीतिता बताता है ; जैसे, प्रतिदिन
-
हिन्दी कौमुदी।
प्रतिदिन, प्रति+यादी प्रतिवादी, प्रति+वर्षप्रतिवर्ष, प्रति+शद
-प्रतिशब्द।
वे और ला तथा विला फारसी उपमर्ग विना अर्थमें आते हैं,
जैसे, चे+शक बेशक, ये+कार-येकार,ये+शुमार-शुमार,ला+
चारलाचार, ला+परवाह लापरवाह,
विलाशिक-विलाशक।
बि हिन्दी उपसर्ग यिना अर्थ में आता है ; जैसे, वि+चारा-
विचारा वि संस्कृतका उपसर्ग विरुद्ध वा भिश अर्थमें आता
है ; जैसे वि+पक्षी विपक्षी, वि+धर्मी विधीं।
अव्यय।
अन्यय * शब्दों में संज्ञा शब्दोंकी तरह लिङ्ग और वचनका
यवड़ा नहीं है। प्रायः सभी अव्यय पुल्लिङ्ग एकवचन समझे
जाते हैं, पर कुछका प्रयोग स्त्रीलिङ्गकी तरह भी होता है।
पुलिङ्ग अव्ययका स्त्रीलिङ्ग वा स्त्रीलिङ्ग अव्ययका पुलिङ्ग नहीं
होता। स्त्रीलिङ्ग अव्यय बहुत ही कम है।
अव्ययके पांच भेद है, (१) क्रियाविशेषण, (२) सम्बन्ध
सूचक (३) उभयान्वयी (४) विस्मयादिबोधक (५) और
अधिकरण बोधक।
सस्कृतमें तो अव्ययमें लिंगवचन नहीं होता और न उसमें किसी
प्रकारका विकार ही होता है। पर हिन्दी सर्वथा सस्कृतका अनुकरण नहीं
करती और इसलिये इसके कुछ अव्यय सोलिग भी होते हैं।
.
क्रियाविशेषण ।
क्रियाके विशेषण रूपसे जो अव्यय आते हैं, वे क्रियाविशेषण
कहाते हैं जैसे, धीरे, सवेरे, अचानक आदि ।
कमी कमो सर्वनाम और विशेषण भी क्रियाविशेषण होते
है ; जैसे, काम कैसा करता है, अच्छा गाता है।
समयवाचक क्रिया विशेषण-आज, कल परसों, नरसों
अतरसों, नरसों, तड़के, सवेरे, सुबह, शाम, प्रातःकाल संवत,
मिती, तारीख, सर्वदा, तत्क्षण, तत्काल, हमेशा ।
प्रकारवाचक-अचानक, अचानचक, सहसा, जानो, मानो,
जल्द, जल्दी, अकस्मात्, झट, झटपट, टीक, ठीकठाक, थोड़े,
निपट, धीरे, शीघ्र, पैदल, सत्र, सचमुच, सत्य, अति, अत्यन्त,
विल्कुल, मूठ मूठमूठ, एकाएक, निरन्तर, येवल, लगातार,
परस्पर, यथा, तथा, वृया, सहज. निरर्थक, अधिक,व्यर्थ, अयांत,
यानी, इति, इत्यादि, सेंत, सेंतमेत, अथ, बहुत, निश्चय,
निस्सन्देह, बेशक, के. सर्वथा, स्वयं, खुद, आप, कदाचित
शायद, कदापि, अलबत्ता, यों, ज्या, त्या. क्यों।
.
.
अव्यय।
निषेधार्थकन, नहीं, मत ।
स्वीकृतियोधक हां, सही ।
हिन्दी कोमुदी।
.
.
निश्चयार्थक-ही।
आवश्यकतार्धक-चाहिये।
कव, जब, तव, भय, कहां, जहां, तहां, यहां,क्रियाविशेषणोंके
वाद निश्चयार्थक, "ही" आनेसे दोनोके मिलनेपर कभी, जमी,
तभी, अभी, की, जहीं, तहीं, यहीं, रूप बनते हैं।
हां और नहींके साथ "जी" का भी प्रयोग होता है ; जैसे,
जी हा, जी नहीं।
कभी कमी दो क्रियाविशेषण एक साथ अथवा क्रिया.
विशेषण साथ संयोजक अव्यय भी आते है ; जैसे, धीरे धीरे,
जोरजार, जल्दी जल्दी, नहीं तो, क्यों नहीं, और कहीं।
शब्दोंके साथ 'पूर्वक" और "कर" या "करके" जोड़नेस
किया विशपण बनते हैं; जैसे, कृपापूर्वक, विशेषकर, बहुत
करके। क्रियाविशेषणोके सिग संज्ञा शब्दोंके साथ "से" जुडने
पर भी क्रियाविशेषण होता है । जैसे, जोरसे बोलो, आलससे
काम न करो। संस्कृत शब्दोंकी तृतीयाके एकवचन के रूप और
विशेष तथा साधारण जैसे शब्दोंके पीछे तः जोडनेसे विशेषतः
साधारणतः क्रियाविशेषण बनते हैं।
दो पहर, सन्ध्या, सांझ, शाम क्रियाविशेषणोंके साथ कभी
कभी "से" और "को' विभक्ति भी रहती है ; जैसे, दो पहरको
लाना, सल्यासे बैठे हैं, शामको आना।
तीन तीन शब्दोंके भी क्रियाविशेषण होते हैं ; जैसे,
कभी, कही न कहीं, हो न हो;
an
B
जैसे, कभी
..
सम्बन्धसूचक अव्यय ।
जो अव्यय किसी शब्दसे सम्बन्ध रखते हैं, वे सम्बन्ध
सूचक अन्तय कहते हैं। इनके पहले वे शब्द आते हैं जिनसे
इनका सम्बन्ध होता है।
सम्बन्धसूचक अप्रय यथार्थमें संज्ञा शब्दोंके सामान्य रूप
है और इनकी विभक्ति चुप्त रहती है। इसी लिये सम्बन्ध
सूचक "का" और "रा" प्रत्यय "के" और "३" में बदल जाते
हैं; जैसे, घरके सामने, मेरे लिये।
सम्बन्धसूचक अव्यय ये हैं:
'आगे पीछे ( पश्चात), ऊपर, नीचे, तले, मारे, सामने,
'पास, करोच, नजदीक, समीप, निकट, अन्दर, भीतर, बाहर,
साथ, संग, समान, वरावर, विरुद्ध, विपरीत, सई, ताई, लिये,
वास्ते, निमित्त, हेतु, कारण, सयर बजह, वाइस, बीच, पार,
परे, विता, आसपास, द्वारा, अनन्तर, अनुसार, उपरान्त, वाद,
विषय, वगैर, सिवा (सिवाय), अलाबा, अतिरिक्त, बदले, पलटे.
योग्य, लायक।
इन अन्ययोंके पहले "के" और "३" प्रत्यययुक्त पद जाते हैं
और इनके बाद में विभक्ति लुप्त रहती है। मागे, पीछे,
ऊपर और नीचे अव्ययोंके पहले से" विर्भाकयुक्त पद भी आते
हिन्दी कौमुदो।
हैं ; जैसे, मुझसे आगे, रामसे पीछे, कृष्णसे ऊपर, मोहनसे,
.
नीचे।
1
.
ओर, नाई. तरफ, तरह, मार्फत, खातिर और ' बावत
अव्ययोंके पहले "के" वा "३" प्रत्यययुक्त पदोंके बदले "की"
"री" प्रत्यययुक्त पद आते है ; जैसे, मेरी ओर, रामकी नाई,
उसकी तरफ, राजाकी तरह, वायूकी मार्फत, सोहनकी वावत,
तुम्हारी स्वातिर।
पर्यन्त, तक, पर, पै, सहित और समेतके पहले "के" प्रत्यय
लुप्त रहता है, पर सशा वा सर्वनाम सामान्य रूपमें रहते हैं।
जैसे, ग्रामपर्पन्त, मुझतक, आलेपर, नाव, प्रेमसहित, वरा-
तियोंसमेत ।
,
-
।
. , . उभयान्वयी अव्यय । जिस अव्ययका सम्बन्ध दो शब्दों वा वाक्योंके अन्वयसे होता है, वह उभयान्वयी अव्यय,कहाता है। उभयान्वयी अव्यय छ प्रकारके होते हैं, संयोजक, वियोजक, कारणवाचक, संकेतार्थक, पक्षान्तरबोधक और कर्मप्रदर्शकं । जो अव्यय दो शब्दों वा वाक्योंको जोड़ते हैं, वे संयोजक कहाते हैं जैसे, और, भी, फिर, पुनः। जो अव्यय दो शब्दों वा वाक्योंको अलग करते हैं, वे वियोजक कहाते हैं ; जैसे, अथवा, किंचा, वा, या, या तो, नहीं तो, कि, चाहे, वरना। एक पक्षकी बात समाप्त करनेके याद दूसरे पक्षकी कहने के पहले जो अव्यय आता है, वह पक्षान्तरवोधक कहाता है ; जैसे, पर (पै), परन्तु, किन्तु, वरं, (वरण), लेकिन, मगर, परिक। कारण दिखानेके पहले जो अव्यय आता है, वह कारण- वाचक कहाता है ; जैसे, क्योंकि, कारण । जो अव्यय पूर्वकी क्रियाका कर्म दिखानेके लिये माता है, वह कर्ममदर्शक कहाता है ; जैसे, कि। जो अव्यय जोड़े के साथ आते हैं, ये संकेतार्थ कहाते हैं; जैसे, जो-तो, यद्यपि-तथापि, जोमी-सोभी, मग-ताहम फिर भी, यदि, अगर । निमित्तार्थक निमित्त यताते हैं जैसे, मतः अतएव । . - अव्यय .
.
विस्मयादिबोधक अव्यय ।
विस्मय, हर्ष, शोक, लज्जा, ग्लानि आदि भाव प्रकट करने
वाले अव्यय विस्मयादिबोधक कहाते हैं।
सम्बोधन करनेके लिये हे, हो, अहो, ओ, रे, री, अरे, अरी,
अजी, अये आते हैं। जैसे, हे राजा, हो भाई, ओ साधुमो,
रे बदमाश री लुची, अजी हजरत, अये पाजी।
हर्ष प्रकट करने के लिये वा प्रशंसामें धन्य धन्य, जय जय,
वाहवाह, शावाश, अव्यय आते है।
शोक प्रकट करने लिये हा, हाय हाय, हाय देया, अह, ओफर
शोक, अफसोस अव्ययोंका प्रयोग होता है।
निरादर वा तुच्छता दिखाने के लिये छिः छिः,यूथू, धिक्कार,
धत, हुश, फिश अव्ययोंका व्यवहार होता है।
अभिवादनमें प्रणाम, नमस्कार, सलाम, बन्दगी,
श्रीकृष्ण, रामराम, जयगोपाल, जुहार और आशीर्वादमें आशी.
र्वाद वा आशीस, असोस, चिरञ्जीव अव्यय रूपसे आते हैं।
प्रार्थना करनेमें दुहाई अव्यय भाता है।
जय
.
ताडत प्रत्यय। . जो प्रत्यय संज्ञा. विशेषण या सर्वनाममें जुड़ते है, वे तद्धित प्रत्यय कहाते है। तद्धित प्रत्ययोंके योगसे कर्तृवाचक, गुण- वाचक, भाववाचक तथा स्थानवाचक संज्ञा, विशेषण और क्रिया विशेषण बनते हैं। कर्तृवाचक। "बाल" प्रत्यय स्थान वा मनुष्यके नाममें जुड़नेसे निवासी या पंडा वा सन्तान अर्थका द्योतक होता है, जैसे, (पंडा अर्थमें) प्रयाग+वाल-प्रयागवाल, गया+वाल=गयावाल, (निवासी अर्थमें) पाली+वाल पालीवाल, (सन्तान अर्थमें ) अग्रयाल= अग्रवाल। "वाला", "हार", "हार" प्रत्यय निवासी, व्यापारी वा वाहक अर्ध बताते हैं : जैसे, ( निवासी अर्थमें ) मन+बाला- झूझनूवाला, नीमचम्बाला-नीमचवाला (व्यापारी अर्थमें ) टोपो चाला-टोपीवाला, लकड़ी+हारा लकड़िहारा, पानी+ हारा पनिहारा, मनि+हार-मनिहार । “वान" प्रत्यय हांकने वा चलानेवाला अर्थमें आता है जैसे, गाड़ी+वान गाडोबान, फील+यान-फोलबान (महावत)। । “री" और "भारी" व्यसनी और व्यापारी अर्थमें आते हैं; जैसे, जुआरी जुआरी, पूजा+रो-पुजारी, भीष भारी- भिखारी।
4 १०० हिन्दी कौमुदी। . "इया" प्रत्यय व्यापारी तथा कर्ता अर्थ जनानेके लिये जोड़ा जाता है ; जैसे, मासन+इयान्मखनिया, नोन+इया-नोनिया, आढ़त+इया+अढ़तिया) "ई" प्रत्यय सम्बन्धी, व्यापारी, . अनुयायी, निवासी तथा भावका द्योतक हैं; जैसे, बङ्गाल+ई-बगाली, तेल+ई-तेली, वैदक+ई वैदकी, रामनन्द+ई-रामनन्दी हठाई हठी। "इत” “ऐत" व्यापाग्द्योतक प्रत्यय हैं ; जैसे, डाका+ऐत= डकैत, लाठो+ऐत=7ठत, गोड़ ऐत-गोडैत वा गुड़त। "जा" पुत्र अथयोतक प्रत्यय है; जैसे, बहन जा=यहेनजा भैनजा-भाञ्जा। भाई शब्दमें “जा" प्रत्यय लगनेके समय "ई" "ती" हा जाती है ; जैसे, भाई+जा-भातीजा-भतीजा। 'चो" सम्बन्धवाचक फारसी प्रत्यय है, पर वही व्यसन, कहीं व्यापार और कही उत्तरदायित्व भी बताता है ; जैसे, अफीम+चा=अफीमची, मशाल+ची-मशालची, खजाना+ची- सजानची। हिन्दी शब्दोंके योगमें वह सम्बन्ध ही बताता है, पर स्थानका भी पना देता है ; जसे, घड़ों+ची धड़ोंची (घडोकी जगह ) दुम+ची-दुमचो (दुमका वन्धन) “ोटी" प्रत्यय पात्र अर्थमें आता है ; जैसे, चुनौटी। "आल" "उआ" "अ" और "आऊ" प्रत्यय भी "वाला" अर्थमें आते हैं; जैसे, घडी+आल-घड़ियाल. माछ+उआ- मछुगा, घर+आऊन्धराऊ, गर्ज+ऊ-गर्जु । चूना+ौटी , . " .. तद्धित प्रत्यय । "दार" फारसी प्रत्यय सम्बन्धद्योतक है और इसके, योगसे संज्ञा और विशेषण बनते हैं : जैसे, किराया+दार किरायेदार, जमीन+दार-जमीनदार, जोरदार-जोरदार, हवा+दार- हवादार। "पड़ी" व्यसनी और "ड़ो" प्रत्यय छुटाई बतानेके लिये जोड़ा जाता है ; जैसे, भांग+एड़ी-भंगेड़ी, गांजा+पड़ीगंजेदी, पल डी-पलङ्गड़ी। विशेषण । "का", "रा", "र", "न", "आया" सम्वन्धद्योतक प्रत्यय हैं और शब्दका सामान्य रूप होनेपर लगाये जाते है ; जैसे, लड़का+का-लड़केका, मामा+रा-ममेरा, आप+ना-अपना, पर- माया-पराया। “रा" और "आर" व्यवसायी अर्धके भी द्योतक हैं जैसे, कांसा+1=फांसेरा, सोना+भार=सुनार, चाम+आर- चमार। "सा"समान और परिमाण अर्थमें आता है ; जैसे, लड़का सा=लड़केसा, बहुत सा=बहुतसा । संज्ञा शब्दोंमें “ईला" प्रत्यय जुड़नेसे विशेषण बनता है। 'जसे : रडईला-रडीला. गांठ लागठीला, भड़फ ईला- 'भड़कीला। "तना" प्रत्यय संख्या और परिमाण अर्थमें आता है; जैसे, कितना-कितना, जितना जितना। "ऐ" संरण्यावाचक प्रत्यय है; जैसे, क-कै, जाऐ-ज।
हिन्दी कौमुदी।
"ना" और "गुना" गुणा अर्थमें आते हैं जैसे. दोन्ना-दना,
दोगुना दुगना, तीन गुना तिगुना ।
"हरा" तह अर्थमें आता है ; जैसे, दो+हरा दुहरा, तीन+
हरा-तिहरा।
"सरा", "था", "8" और "या"क्रमवाचक प्रत्यय है; जैसे,
दो+सरा दूसरा, तीन+सरा तीसरा. चौ+धा-चौथा, छ+ठा
-छठा, पांच चां-पांचवां।
गुणवाचक और भाववाचक
"याई","आया", "आस", "ौती", "ताई", "पन", "पना"
भावयाचक प्रत्यय हैं और संक्षा वा विशेषणमें जुड़नेसे भाववावा
संजा बनाने में जैसे दुश-गाई-गुरई, लड़-मा+आई-लड़काई,
बूढ़ा+भापा-पुढ़ापा, रांड+आपा-रडापा,मीठा+आस-मिठास
वाप्न+औती वपीती, सुन्दर ताई-सुन्दरताई, लड़का+पने-
"लड़कपन, लुचा+पना-लचपना ।
"औना" भी गुणवाचकं प्रत्यय है; जैसे, खेल+मीना
पिलाना, दीठ+औना-दिठौना।
"आई" गुणवानक प्रत्यय भी है ; जैसे, मोठा+आई-मिठाई
संस्कृत के "ता" और "त्व" भाववाचक प्रत्यय भी हिन्दी
भाते है ; जैसे, कायर+ता-कायरना, ननुष्यत्व-मनुष्यप्व ।
"गी" फारमी प्रत्यय भावाचक है ; जैसे, मर्दाना+गी:
'मर्दानगी, जिन्दा+गी-जिन्दगी।
---
१
,
तद्धित प्रत्यय।
..
"चा"फारसी प्रत्यय लघुता अर्थमें आता है ; जैसे, सन्दुक
चा-सन्दूकचा, चागचा-बागचा-बगीचा।
"नी" सम्यन्धद्योतक भाववाचक प्रत्यय है; जैसे, चांदनी
चांदनी।
"इख" गुणवाचक प्रत्यय विशेषणमें लगता है ; जैसे,
काला+ख कालिख।
"आँस" भाववाचक प्रत्यय विशेषणमें लगता है; जैसे,
काला+औंस कलौंस।
"आ" "वा" और "इया" प्यार, होनता वा लघुता तथा
-"आ" और "इया” भाव दिखाने के लिये भी जोड़े जाते है
जैसे, (प्यारमें) यावू+आ यवुभा,
वया+चायश्चवा%3
चचवा, भाई+इपा-भइया भयां, (लघुता वा तुच्छता अर्थमें )
नाऊ+आ-नीमा, नरायनं मा नरायना, चमारस्वानमरवा,
धोबी+इया-धोबिया।
(भाय अर्थ में)भूख+आ-भूखा, प्यास+आ-प्यासा, सच्च+आ
=सया, मैल+आ मैला, गोल+आ गोला, दुखो+इया-दुखिया।
"इया" प्रत्यय लघुतापूर्ण स्त्रीलिङ्गका भी द्योतक है ; जैसे
सोंटा+इया सोंटिया, खाट+इया खटिया।
फारसी शब्दोंमें लगनेसे "माना" प्रत्यय धन, अवधि अथवा
भाव बताता है ; जैसे, जुर्म+आना=जुर्माना, नजर+आना=
नजराना, साल+आना-सालाना, दोस्त+भाना=दोस्ताना ।
कहीं वस्त्र विशेषका भी अर्थ निकलता है। जैसे, दस्त+आना-
दस्ताना ( हार्थका मोजा)।
:
.
१०४
हिन्दी कौमुदी।
"ड़ा" भाव, प्यार वा लघुना दिखानेको संज्ञा ओर विशेषण
शब्दोमें जोडा जाता है ; जैसे, मुख+ड़ा-मुखड़ा, दुख+डा-
दुखड़ा, जोगी+ड़ा-जोगिड़ा-जोगड़ा।
"वाड़" सादृश्यसूचक गुणवाचक प्रत्यय है : जैसे. खेल+
वाट-खिलवाड़।
"क" और "त"भाववाचक तथा गुणवाचक प्रत्यय है : जैसे,
ठंढा-क-ठडक, ची+क-चौक संग+त-संगत, रंग+त रंगत,
दिक+त-दिकन।
स्थानवाचक।
"आना", "आल", साल","हाल","हर" और "का' प्रत्यय
स्थानवोधक है ; जैसे, ठोक+आना=ठिकाना, मुह आना='
मुहाना, सिर+आना=सिराना, ससुर+आल-ससुराल, नाना+
साल-ननसाल, दादी+हाल-ददिहाल (दादीका मैका), पी+हर
=पीहर, माय: कामायका-मैका।
क्रियाविशेषण।
"हां" और "आ" प्रत्ययोंके लगनेसे स्थानवाचक क्रिया-
विशेषण बनते हैं . जैसे, कहां-कहां, ज+हां जहां, यह+ओं
वह आं-वहां।
"ओ" प्रत्यय प्रकारार्थ में प्रयुक्त होता है ; जैसे, जि+ओं-
। ज्यों, कि+ओं-क्यों।
"व" समयवाचक प्रत्यय है ; जैसे, ज+वजय, क+4=कय ।
.
.
1
-
-यहां,
. । -- . . . समास। दो या अधिक शब्द मिलकर जब एक हो जाते हैं, तय समस्तं शब्द कहाते हैं। इस मेलका नाम समास .समास छ प्रकारका है ; द्वन्द्व, तत्पुरुष, कर्मधारय, वहुं. बीहि, द्विगु और मव्ययीभाव । जय दो वा अधिक शब्द मिला दिये जाते हैं तथा उनमें विशेष्य विशेषणका सन्यन्ध नहीं होता, तब द्वन्द्व समास होता है, जैसे, मातापिता, वापबेटा, राईनोन, दालरोटी, सेठसाहकार। साधारणतः अन्तिम शब्दफे लिङ्गानुसार ही समस्त शब्दका लिङ्ग होता है। परन्तु जिस लिङ्गके शब्दको प्रधानता होती है, उसीके अनुसार कभी कभी समस्त शब्दका लिङ्ग भी माना जाता है। : पितामाता, नरनारी, राजारानी जैसे शब्दों में प्रत्येक समस्त शब्दका अन्तिम अंश स्त्रीलिङ्ग है, पर पितामाता, नर- 'नारी और राजारानी स्त्रीलिङ्ग नहीं माने जाते। इसी प्रकार दो चा अधिक जातियों के शब्दोंके समस्त शब्दका लिङ्ग भी .यदि उसमें सव स्त्रीलिङ्ग शब्द न हुए, तो पुलिङ्ग हो होता है। 'सय अवस्थाओं में समस्त शब्द बहुवचन होता है ; जैसे, कुत्ते विल्ली पाये डालते हैं। दिल्लीचूहे उपद्रव मचा रहे हैं । जब समस्त शब्दके पहले भागमें दूसरी, चौथी और पांचवीं .. --
हिन्दा सामुदा।
विभक्तियां तथा सम्बन्ध जतानेवाले प्रत्यय रहते हैं ओर पिछले
भागको प्रधानता होनी है, तब तत्पुरुष समास होता है।
अर्थानुसार पांच प्रकारका तत्पुरुष समास है
पहला, जिसमें पूर्व भागमें दूसरी विभक्ति हो और अन्तिम
भागमें कदन्त संज्ञा हो; जैसे, अंखफोड़ा अर्थात् आंखको
फोडनेवाला, चिडीमार अर्थात् चिडियाको मारनेवाला, तिल.
चट्टा या तेलको चाटनेवाला ।
दूसरा, जिसमे पूर्व भागमें निमित्त अर्थमें दूसरी विभक्ति हो
और अन्तिम भागमें कृदन्त संज्ञा ; जैसे शरणको आया शरणा.
गत, ठकुरसुहाती, हथकड़ी।
तीसरा, जिसमें पहले भागमें चौथी विभक्ति और दूसरेमें
कृदन्त संज्ञा हो; जैसे, देसनिकाला, दईमारा, मुंहमांगा,
मनमाना, गुडभरा, मनमाना, आंखदेखा।
चौथा जिसमें पहले भागमें सम्बन्ध जतानेवाले का, की,
के ना, नी, ने, रा, री, रे प्रत्यय हों और दूसरेमें संशा : जैसे,
धर्मावतार, लखपती, हवाचक्री, घुडसाल, बनमामुम, अमचूर ।
पांचवां, जिसमें पहले भागमें पांचवी विभक्ति हो और
दूसरेमें संज्ञा चा कृदन्त हो ; जैसे, आनन्दमगन,
कैलासवासी।
पनडुव्या, धुडचढ़ो, चटमार।
[पं० कामताप्रसाद गुप्त शत हिन्दी व्याकरणमें "दीनानाथ"
शब्द "व्याकरणको दृष्टिसे विचारणीय" यताया गया है, क्योंकि
यह “दीननाथ होना चहिये"!
.
-
,
"
परन्तु दीननाथ और
समास
.
दीनानाथके अर्थ में जो अन्तर है. उसपर गुरुजोने ध्यान नहीं
दिया । "दीन" पुलिङ्ग और “दीनास्रोलिङ्ग है। दीना शन्द
द्रौपदी अर्थमें प्रयुक्त हुआ है।
कर्मधारय समासमें विशेष्य विशेषणका योग होता है
अथवा उपमा उपमेय मिलते हैं ; जैसे, (विशेष्य विशेषण )
नील गाय, काली मिर्च, भलामानस, कालापानी(उपमाउपमेय)
लालपोला, भलावुरा, मोटाताजा, बड़ाछोटा।
द्विगु समासमें पहले भागमें संख्या होती है और दूसरा
'विशेष्य होता है । जैसे, चौकोन, पंचदेव, तिकोना, दमकन्धर,
दशानना
यहुव्रीहि समासमें समस्त शब्दोंके अन्तर्गत शब्दोंका अर्थ न
'. होकर निराला हो अर्थ होता है : जैसे, चौमुग्ध, चारमुग्ध हैं
जिनके अर्थात् ब्रह्मा। इसी प्रकार दिगम्बर, दिशाएं हैं वस्त्र
जिनके (महादेय); पीताम्बर, पीला है वस्न जिनका { विष्णु);
लालपगड़ी, लाल है पगड़ी जिसकी (पुलिसका कान्सटेबल ।
कनफटा, बारहसिंगा, बहुरूपिया।
हिन्दीके याब्रोहि समासमें समस्त पदका अर्थ मिले हुए
अक्षरोंसे भिन्न होना आवश्यक नहीं होता : जैसे, नकटा,
पिकवनी, चम्पकवरनो, चन्द्रमुषी।
अव्ययीभाव समासमें पहला पद अव्यय होता है और इनोफे
साथ परवची शब्दका समास होता है; जैसे, प्रतिदिन, हर.
घड़ी, (घडीघड़ी), अतिकाल, निर्भय, सदावत। यह समास
ar
-
.
-
११०
हिन्दी कौमुदी।
पुत्र लवने" "मरा सांप" "परीक्षितने" "पांचो पांडवोंने "डाक"
"नगरवासी क्या स्त्री क्या पुरुष” “चोर" उद्देश्य और "इतिहास
प्रसिद्ध है", "लवपुर वा लाहोर बसाया था", "पिके गले में
डाल गया है", "कुछ न कहा", "द्रौपदीको पत्नी माना" "नाई
को मरा जान नौ दो ग्यारह हुए", "परस्पर कहने लगे" और
"धोरे धीरे घरमें घुसे" विधेय हैं।
कभी कभी वाक्यके उद्देश्य और विधेय अनुक्त भी रहते हैं ,
जैसे, भाग यहांसे, धर्मावतार, जीता रहूंगा तो कमा खाऊंगा,
दोनो वीरोंने प्रणाम किया, एकने वन्धु मान दूसरेने गुरु जान ।
इन चाक्योंमें "नू" और "मैं" उद्देश्य तथा
'प्रणाम किया"
विधेय अनुक्त है।
विशेषण उद्देश्य और विधय दानो रूपोंमें प्रयुक्त होता है।
जब वह कर्त्ताके पहले आता है, तब उद्देश्य और उसके बाद वा
क्रियापदके पहले आता है, तब विधेय होता है : जैसे, मधुरी
वानी वोलो, मोठे फल खाया कर, पानी ठंडा है, आदमी
सीधा है। पहले और दूसरे धाक्यके विशेषण उद्देश्य और
तीसरे और चौथेके विधेय हैं।
जव विशेष्य वा सर्वनाम कर्त्ताका अभाव होता है और
विशेपण ही विशेष्य कर्ताकी भाति प्रयुक्त होता है, तब वह विशे
पण ही उद्देश्य होता है और जब विशेगण किया विशेषणकी
भाति प्रयुक्त होकर विधेयके पहले आता है तो उसका अङ्ग होता
है; जैसे: गुणी सर्वत्र आदर पाते हैं,वह अच्छा व्याख्यान देता है।
.
वाक्यरचनाविचार। योग्यता, आकांक्षा और आसत्तियुक्त वाक्य ही ठीक ठीक अर्थ प्रकट कर सकता है। पदोंके परस्पर उचित सम्बन्धको योग्यता, उनके अन्वयमें वक्ताकी इच्छाको आकांक्षा और उनकी समीपताको आसत्ति कहते हैं। "हाथी चिग्घाडता है" वाक्यमें हाथी और उसके चिग्घाड़ने में उचित सम्बन्ध है । यदि हाथी कहकर चुप रह जायं, तो उसे क्रियाकी आकांक्षा वा इच्छा बनी रहती है। हाथी क्या करता है यह प्रश्न होता है और जबतक नहीं कहा जाता कि "चिग्घाड़ता है तबतक वाक्यका अर्थ नहीं होता, ख्योंकि अकेले "हाथी" कहनेसे कोई अर्थ नहीं निकलता। "हार्थी" के बाद ही “चिग्घाड़ता है" कहा जाय, तो वाक्यका अर्थ होगा। पर यदि "हार्थी" कहकर माध घंटे बाद "चिग्घाड़ता है" कहा तो वाक्य न बनेगा और अर्थ न होगा। वाक्यार्थके वोधके लिये विभक्तिप्रत्ययों और कई अन्य शब्दों तथा प्रयोगोंके अर्थशानका भी प्रयोजन है। जाय,
विभक्तिप्रत्ययों के अर्थ ।
.
पहली विभक्ति।
कर्नामे पहली विभक्ति होती है, पर पहली विभक्तिवाले
कर्ताकी क्रिया लिङ्गवचन और पुरुपमें उसके अनुकूल होती है;
जैसे, वह आता है, मैं पाता हूं, लड़कियां खेलती हैं, तुम
.
.
आओगे।
(२) जो संज्ञा क्रिया और कर्मसे रहित होती है और विशेष
अथ नहीं देती, वह पहली विभक्तिमें रहती है ; जैसे, पोथी,
काशी, गङ्गा, लड़का।
(3) कर्मवाच्यके कर्ममें पहली विभक्ति होती है;
जैसे
मोहनने दूध पिया, रामने रोटियां खायी, मैंने लड़के पढ़ाये।
(४) कर्तृवाक्यके पशुपक्षिवाचक पा अप्राणिवाचक कर्ममें
अपनी देह सम्हालो, मेरा कहा मानो ।
(५) द्विकर्मक वाक्यके दूसरे कर्म अथवा सम्प्रदान कारक
वाले वाक्यके कर्ममे पहली विभक्ति होती हैं। जैसे, मैंने उसे
आदमो समझा था, पर वह गधा निकला, फकीरको पैसे दो।
दूसरी विभक्ति।
(१) कर्म ओर सम्प्रदान कारकोंमें दूसरी विभक्ति होती है ;
उसे रामने रावणको मारा, राजाने ब्राह्मणको दान दिया।
.
"
चिमक्तिप्रत्ययोंके अर्थ , (२) मनुष्यवाचक कर्ममें दूसरी विभक्ति होती है, पर कमी कमी जोर देने के लिये और प्रकारके काम भी दूसरी विभक्ति होनी है ; जैसे, मास्टर लड़कोंको नहीं मारता, उस टोपीको ले आओ। (७) जिसे धिकार दिया जाय या जिसके प्रति कुछ कहा जाय, उसके लिये दूसरी विमतिका प्रयोग होता है जैसे, योमानोंको धिधार, भरतने कैकेयीको अप्रिय वचन कहे। (१) समय या मियाके साथ सम्बन्ध बताने के लिये दूसरी विभक्ति होती है। जैसे. दिनको सोना मना है। (५) उन व्यकियोंके वाचक शब्दोंमें दूसरी विभक्ति होती है, जिनकी रुचि किसी वस्तु के लिये होती है या जिनकी प्रसन्नताके लिये कोई काम किया जाता है ; जैसे, ब्राह्मणोंको मिठाई रुचती है, लड़कोंको तमाशा दिखा दो। (६) जिस किसीको किसी प्रयोजनसे कोई वस्तु दी जाती .है, पर दे नहीं डाली जाती, उसके लिये भी दूसरी विभक्तिका प्रयोग किया जाता है ; जैसे, धोधोको कपड़े दिये है, सुनारको - सोनादे दो। . . (७). "चाहिये" युक्त वाक्य तथा आवश्यकता वा कर्तव्य घतानेवाले वाक्यके कमि दूसरी विभक्ति होती है ; जैसे, तुम्हें घर जाना चाहिये, रोटी खानी है। नमस्कार, प्रण माशीर्वाद, बन्दगी, सलाम, आदान जैसे शब्दोंफे योगमें दूसरी विभक्ति होती है.; जैसे, बराबर- . -
1
हिन्दी कौमुदी।
वालेको नमस्कार, बडोंका प्रणाम, छोटोंको आशीर्वाद, मुशीजी
को बन्दगी, मास्टर साहवको सलाम, मौलवी साहयको
आदाव।
(e) द्विकर्मक वाक्यके मनुष्यवाचक कर्ममें दूसरी विभक्ति ।
होती है ; जैसे. पूतना कृष्णको दूध पिलाने लगी।
(१० कहना क्रियाके योगमें विकल्पसे दूसरी और चौथी
विभक्ति होती है ; जैसे. वसुदेवको समाचार कहे और वसुदेवसे।
समाचार कहे। दूसरी विभक्तिसे कुछ कुछ आज्ञाका भाव भी
झलकता है ; जैसे, नौकरसे कह दो।
(११) दाम बताने या पूछनेके समय विकल्पसे दाममें ।
दूसरी या पांचवों विभक्ति होती है ; जैसे, यह पोथी कितनेको
लाये या कितनेमें लाये। दूसरी विभक्ति निश्चित मूल्य बताती
है और पांचवीं सीमा प्रकट होती है।
(१२) जव धातुज नाम निमित्ताथ वालगना क्रियाके योगमें
आता है, तब उसमें दूसरी विभक्ति होती है। यह कर्मवाचक
संशाके सामान्य रूपमें रहता है और दूसरी विभक्तिका चिन्ह
लुप्त रहता है ; जैसे, श्रीशुकदेवजी कथा सुनाने लगे, लड़के
पढ़ने जाते हैं। सुनाने और पढ़ने क्रियावाचक अव्यय है।
(१३) क्रियाविशेषणके योगमें भी दूसरी विभक्ति होती है
और उसका चिन्ह लुप्त रहता है ; जैसे, कहां जाओगे, किधर
-
-
.
"
जाते हो।
(१४) ओर वा प्रति अर्थ बताने के समय भी दूसरी विभक्ति
.
.
विभक्ति प्रत्ययोंके अर्थ।
होती है, पर यह सामान्य रूपमें रहती है ; जैसे, घर लाता है,
चह पटने जायगा।
(१५) निमित्त वा लिये अर्थमें दूसरी विभक्ति होती है।
जैसे, मुझे आम ला दो।
. . (१६) "घाला" अर्थमें भी दूसरी विभक्ति होती है और इससे
कार्य शीघ्र होनेका भाव निकलता है ; जैसे, मैं स्कूल जानेको
"या, यह आज आनेको है।
तीसरी विभक्ति।
कर्मवाच्य वा भाववाच्यके कर्नामें तीसरी विभक्ति होती
है , जैसे, सब लड़कोंने रोटी खायी, लड़कियोंने आम खाये, रामने
'रावणको मारा
चौथी विभकि।
कारण और अपादान कारकोंमें चौथी विभक्ति होती
है ; जसे वाणसे मारा, आंखसे देखा, पेड़से गिरा, धग्नीसे
निकला।
(२) क्रियाविशेषणोंके योग चोथी विभक्ति भी होती है,
पर कहीं कहीं विभक्ति चिन्ह अनुक्त भी रहता है ; जैसे, किधरसे ,
आये. कहांसे टपक पड़े, मागेले लिया, पीछेसे देखा, अपरसे
'उतरे, नीबसे आये, घरसे दूर।
(३) क्या, हीन, कम, न्यून, प्रयोजन, शून्य, रहित, भिन्न
आदिके योगमें या साथ, हेतु और कारण अर्थमें और स्थान वा
समयकी अतानेमें चौथा विभक्तिका प्रयोग किया जाना
-
..
..
हिन्दी कौमुदी।
है; जैसे, झगड़ेसे क्या, नेत्रसे हीन, मुझसे कम, कामसे
प्रयोजन, मनुष्यत्वसे शून्य, विद्यासे रहित, वानरसे भिन्न,
रामसे बातचीत, भयसे कांपना, पटनेसे सौ कोस, आजसे
तीसरे वर्ष।
(४) दो मनुष्यों वा वस्तुओंकी तुलना करते समय जिससे
कोई वस्तु उत्कृष्ट वा निकृष्ट बतायी जाती है, उसमें चौथी
विभक्ति होती है : जैसे, धनसे विद्या बढ़कर है, भिखारी
तिनसे भी हल्का होता है।
(५) जिस चिन्हसे व्यक्ति वा वस्तु पहचानी जाती है,
उसमें चौथी विभक्ति होती है : जैसे, भस्मसे शैव समा, जटा.
ओले साधू माना, सिपाहियोंसे राजमहल जाना ।
(६) जिन अङ्गोंमें कोई दोष होता है, उनमें चौथी विभक्ति
होती है : जसे, आंखोंसे अन्धा, कानोंसे बहरा, पैरसे लाचार ।
कभी कभी चौथो विभक्तिके बदले विकल्पसे तद्धित प्रत्यय
"का" और इसके रूपोंका व्यवहार किया जाता है, जैसे, आंखके
अन्धं नाम ननसुख, कानके बहरे।
पांचवीं विभक्ति।
(३) अधिकरण कारकमें पांचवीं विभक्ति होतो है. जैसे,
तिलोंमें तेल होता है, फ्लमें सुगन्ध होती है।
(२) कारण, अवस्था वा द्वारा बताने में भी पांचवीं विभक्ति
होतो है : जैसे. तनिकसे अपराधमें ऐसा दण्ड अनुचित है,
।
.
.
विभक्तिप्रत्ययोंके अथ।
शिवजी ध्यानमें मग्न रहा, प्रभुने एक ही वाणमें उसका भय
वन्धन काट दिया।
(३) तीन वा अधिक मनुष्यों वा वस्तुओंमें किसी एकफी
श्रेष्ठता या हीनता बतानी होती है, तो जिनसे वह षठ वा होन
"तायी जाती है, उनके चाचक शब्दमें पांचवीं विभक्ति होती है।
जैसे, पुरुषों में रामचन्द्र उत्तम थे, नीच सबमें निन्दनीय ही
.
होता है। ::;.
,
(४) लुप्त अवस्थामें विशेषकर सम्बन्धसूचक अव्ययके बाद ,
पांवीं विभक्ति यहुत होती है ; जैसे, इस समय तुम चले
जाओ, आंखों देखा खुसरु कहे, चार माने सेर चावल, मेरे
सामने चुप रहो।
(५) मध्य, अन्तर्गत, अवधि और अन्तर अर्थों में भी पांचवीं
विभक्ति होती है । जैसे, हंसोंमें कोआ, समुद्रमें अथाह जल,
कितने वर्षों में राम लौटे, विष्णु और शिवमें भेद नहीं।
(६) मोल बतानेमें भी पांचवीं विभक्ति होती है जैसे कितने
में तुमने गाय लो।
.
सम्बोधन।
।
सम्बोधन विभक्तिका प्रयोग किसीको घुलाने; धिधारने घा
हर्ष या शोकसे उसका नाम लेनेमें किया जाता है। सम्योधनके
पहले विस्मयादिबोधक अव्यय रखना न रखना धक्का वा लेपक
की इच्छाके अधीन है ; जैसे, लड़के ! इधर था, हा राम!
१२८ हिन्दी कौमुदी। . सम्बन्धवाचक प्रत्यय । "का" और "रा" प्रत्यय हिन्दीमें संरपाली पष्ठी विभक्ति वा सम्बन्ध कारकका काम करते हैं और विभक्तिकी तरह इनका प्रयोग होता है। (देखो पृष्ट ४५ वां) आकारान्त पुल्लिङ्ग शब्दोके नियमानुसार इनके बहुवचन और सामान्य रूप "के" और "३" और स्त्रीलिङ्ग "की" और "री" होते हैं। ये विशे- पणका काम करनेके सिवा (१) सम्बन्ध, (२) स्थान, (३) निर्माणमें लगी वस्तु, (४) शुद्धता, (५) कारण, (६) अवस्था, (७) प्रकार,(८) निकास,() योग्यता, (१०) दाम, (११) समय, (१२) सम्पूर्णता और (१३)निश्चय दा दृढ़ता बताते हैं : जेसे. राजाका घोड़ा, ब्रजकी नारियां, कंचनके थाल,दुधका दृध पानीका पानी, राहका थका मांदा, जव कृष्ण आठ वर्षके हुए, अचरजकी यात, आगका धुआं, पीनेका पानी, एक लाखका हीरा, दस दिनकी वात, सभाकी सभा बोल उठी, सच का सचा । इन प्रत्ययोंले युक्त पदोके बाद यदि सविभक्तिक पद आने हैं तो विशेषणके नियमानुसार "का" और "1" "के" और "रे हो जाते हैं । सम्बन्धवाचक पुलिङ्ग अव्ययोंके पहले भी आर "२" रहते हैं, क्योंकि इन अव्ययोंकी विभक्ति लुप्त समझी जाती है ; जैसे, मेरे घोड़ेकी लगाम, रामके घरके पीछे । " "के" और रे" प्रत्युययुक्त पदों का एक विशेष प्रयोग भी है। इसमें आवश्यक नहीं कि इनके बाद पुलिङ बहुवचन या अव्यय या संविभक्तिक पद हो । ' ऐसे प्रयोगसे "अस्तित्व समझा . .
विभक्तिप्रत्ययोंके अर्थ ३ जाता है जैसे, मेरे वहन नहीं है, पशुपक्षीकोटपतंगोंके भी जीव है, उसके एक लड़का है। यहां "मेरे वहन नहीं है" वाक्यके पंदले "मेरी यहन नहीं है"नहीं कह सकते,क्योंकि दोनोके अर्थ में अन्तर है। पहले वाक्यका अर्थ है कि बोलनेवालेके माता पिताके कन्या नहीं जन्मी या इस समय जीवित नहीं है, पर दुसरे वाक्यका अर्थ है कि यहन दूसरेकी है, वक्ताकी नहीं।
शब्दों के अर्थ। आप। मध्यम पुरुषके प्रति आदर दिखानेको "आप" सर्वनाम प्रयुक्त होता है, पर इसकी क्रिया बहुधा प्रथम पुरुष बहुवचनमें रहती है; जैसे, आप जानते हैं कि मैं मिठाई नहीं खाता। कभी कभी "आप" सर्वनामकी क्रिया मध्यम पुरुषकं बहु. वचनमें भी होती है ; जैसे, आप सूर्य कुलके भूपण हो। "आप" शब्द जिसके लिये प्रयुक्त होता है, उसे आशा वा उपदेश देनेके समय इसके साथ "इयो" "इये". और "इयेगा" प्रत्यययुक्त क्रियापदोंका व्यवहार किया जाता है ; जैसे, आप मेरा सन्देसा कहियो, कहिये वा कहियेगा। अन्यत्र "आप" शब्दके साथ विधिके साथ प्रथम पुरुपके बहु- बचनको क्रिया प्राती है ; जैसे, आप समझे कि यह पागल है । "आप" स्वयं वा विना सहायक अधमें भी आता है : जैसे, मैं आप चला जाऊंगा, वह आप काम कर लेगा। कहीं अपना सम्बन्ध जताने और कहीं अपना वा दूसरेका प्रत्यक्ष सम्बन्ध परोक्ष रूपसे घतानेके भी इसका प्रयोग होता है। जैसे किसी मनुष्यसे किसी लड़केके वारेमें पूछा जाय कि यह किसका लड़का है और वह उसोका हो तो वह मनुष्य यह कहनेके बदले कि "मेरा है" कहता है "आपका है" .तीन वा अधिक मनुष्योंकी उप- स्थितिमें उन्हीमें किसी एकके बारेमें कहा जाय तो आप अन्य .
.
,
शब्दोंके अथ।
१२१
- पुगपके लिये भी आता है, जैसे "आपके बारेमें" यहां परोक्ष
मपसे प्रत्यक्षकी चर्चा हुई है। ऐसा प्रयोग हिन्दी उर्दू को
छोड़कर किसी भाषामें नहीं है।
"आप ही आप" बिना किसीकी सहायताके वा स्वेच्छासे
और मन ही मन वा स्वगत अधों में भी आता है ; जैसे, आप ही
आप यह बोल उठा, तू आप हो आप कह रहा है या किसीके
सिखानेस, राजा आपही आप सोच रहा था कि कैसे शत्रु को
परास्त करू।
"आपसे" और "पापसे आप" भी "आप ही आप" अर्थमें
आते हैं ; जैसे, यह आपसे यहां पहुंच गया, आपसे आप उसके
मनमें यह विचार उत्पन्न हुआ।
थपना।
स्वयं अर्थद्योतक "आप" सर्वनाममें सम्बन्धसूचक "ना
मत्यय लगकर बना हुआ “अपना" शब्द "निजका" अर्थमें आता
है और तीनो पुरुषों के लिये प्रयुक्त होता है; जैसे, सब अपनी
यड़ाई चाहते हैं, तुम अपना काम करो, मैं अपने घर जाता है।
"अपना" शब्द विशेषणवत् भी प्रयुक्त होता है और जय
विशेष्य होता है, तब आकारान्त पुलिङ्ग शब्दों की भांति इसकी
साधना होती है ; जैसे, अपने मतलयकी यात समी सुन लेते हैं,
अपनोंसे विरोध करनेवाला नष्ट होता है ।
". "अपना" शब्द हमारा अर्थमें भी आता है ; जैसे, भारत
अपना देश है, इङ्गलेण्ड पराया देश ।
..
१२२
'हिन्दी कौमुदी।
“अपना” कभी कभी लुप्त भी रहना है ; जैसे, वापसे वेटेने
विनती की, बड़ोंने लड़कोंको बहुत समझाया, वह घर जायगा।
यदुतसे लोग विशेषकर राजपुताने.महाराष्ट्र और गुजरातके
रहनेवाले “अपना" और उसके स्त्रीलिङ्ग "अपनी" शब्दके बदले
सम्बन्धसूचक तद्धित प्रत्ययान्त मेरा, हमारा, तेरा,तेरा, तुम्हारा,
उसका, उनका और आपका शब्दों वा इनके और रूपोका प्रयोग
करते हैं ; जैसे, मै मेरा काम करूगा, हम हमारी यात कहते
है, तू तेरा काम कर वा तुम तुम्हारा काम करो, वह उसका
काम करेगा, आप आपका काम करो। इन वाक्योंमें मेरा,
हमारी तुम्हारा, उसका और आपका शब्दोंके बदले अपना,
अपनी, अपना, अपना और अपना लिखना शुद्ध है।
"अपना अपना" शब्दोंका अर्थ है “प्रत्येक मनुष्यका निजका"
या 'प्रत्येकका प्रत्येकका"; जैसे, अपने अपने भाग्यकी बात है,
अपना अपना दुःख सुख भोगना पड़ता है, अपना अपना काम
करो। महाराष्ट्र और गुजराती इस प्रयोगमें बड़ी भूल
करते
हैं और “अपना अपना काम करो" वाक्यके बदले “आप आपका
काम करो" वोलते हैं।
"अपने" और "अपने राम" का प्रयोग प्रथम पुरुपके बहु-
वचनके लिये बोलचालमें होता है ; जैसे, अपने तो यह काम
करेंगे, अपने राम ऐसे मामलों में हाथ नहीं डालते ।
..
गोई और कुछ,
"कोई" और "कुछ" दोनोअनिश्चयवाचक सर्वनाम हैं। को
मनुष्यके लिये और कुछ वस्तुके लिये आता है ; जैसे, कोई
.. शब्दोंके अर्थ । कहता है अर्थात् कोई मनुष्य कहता है और कुछ है अर्थात् कोई. वस्तु है। एक अज्ञात मनुष्य या प्राय: अर्थात् लगभग अर्थमें भी "कोई" आता है जैसे, कोई पुकारता था अर्थात् पुकारनेवाला मनुष्य तो यां, पर अज्ञात था, उसको बतानेवाला नहीं जानता। कोई रामदास है अर्थात् रामदास उसका नाम है, पर बतानेवाला उसे नहीं जानता। कोई सौ वर्षकी बात है अर्थात् लगभग सौ वर्ष इसवातको बीते हुए होंगे। "कोई कोई" यहुवचन है : जैसे, कोई कोई कहते हैं। "कुछ" कोई शब्दफे यहुवचन रूपसे जब आता है तब मनुष्य बताता है : जैसे कुछ माते थे, फुछ जाते थे। “कुछ एक" फोई शब्दका बहुवचन होता है ; जैसे कुछ एक हां हां मिलाते थे और वाकी विरोध करते थे। कौन और क्या। “कौन" और "क्या" प्रश्नवाचक सर्वनाम है, जिनमें “कौन" तो मनुष्य के लिये और "क्या" वस्तु के लिये आता है ; जैसे,कौन - आया है ? क्या है अर्थात् क्या यात या मामला है ? "कौन कौन" वा "कौन लोग" बहुववनमें माता है ; जैसे, कौन कौन वा कौन लोग जाना चाहते हैं ? कौनके साथ सादृश्यवाचक "सा" प्रत्ययलगकर "कोनसा". कौन एक अर्थमें आता है और इस समय यह विशेषण होता है जैसे, कौनसा पाप किया जो आपको जगाया, कौनते धर्मा. त्माके आप पुत्र हैं। . - --
.
.१२४
हिन्दी कौमुदी।
"कौन" यों भी प्रश्नवाचक सर्वनामका काम करता है;
जैसे, तुम कौन हो ? मैं तुम्हारी रक्षा करनेवाला कौन हूं?
"क्या आश्चर्य प्रकट करने के लिये भी आता है और उस
समय इसके पहले "ही" रहता है ; जैसे, क्या ही सुन्दर पुरुष
हैं ! क्या ही गधा है! घरमें घुसा तो देखता क्या है कि
"क्या-क्या" उभयान्वयी अव्ययको भांति भी आते हैं
जैसे, क्या स्त्री या पुरुष समी टकटकी लगाये देख रहे थे।
जो और सो।
"जो" और "सो" सम्बन्धवाचक सर्वनाम है और दोनोका
जोड़ा है ; जैसे, जो कहते हो सो करते नहीं।*
कभी कभी "जो" वाला वाक्य समाप्त कर विना "सो" के
ही दूसरा वाख्य प्रारम्भ कर दिया जाता है ; जैसे, जो ईश्वरा
राधना करते हैं, सुखी रहते हैं।
3B
,
केलागने लिखा है कि वातचीतमें "जो" प्रायः बोला जाता है तो
इसका उदाहरण दिया है "परमेश्वर जो है सो सर्वशनिमान है।" 'परन्
वहां "जो है सो' घातके बीच में निरर्थक पाया है। यह "तक्यिा क्लाम
है और जहां बात भूल जाती है, वहां कोई "जो है सो", कोई "क्या ना
है", कोई "तुम्हारा क्या नाम है", और कोई "माने बोलता है। बिहार
"एधी” और बनारस मिर्जापुरमें "ण्या" वा "योधुग्रा” बोलते हैं
लोगों को ऐसे निरर्थक वास्य और शब्द बोलनेका अभ्यास हो जानेके कार
इनके प्रयोगके बिमा वे बात नहीं कर सकते।
नहीं लिसी जाती।
पर लेखादिमें ऐसी वा
.
शब्दोंके अर्थ।
१२५
"सो" के बदले बहुधा “यह" घोला और लिखा जाता है:
जैसे, जो दूसरेके दुखमें दुखी और सुखमें सुखी होते हैं, वे
ययार्थ
सनुष्य है।
कभी कभी "जो" भी अनुक्त रहता है, पर “जो" और "सो"
दोनों एक साथ अनुक नहीं रहते ; जैसे, तुम्हें भावे, सो करो।
"जो" उभयान्वयी अव्ययकी भांति “यदि" वा "अगर"
वर्थमें भी आता है ; जैसे, जो मैं जानता तो....
"सो" उभयान्ययी अव्ययकी भांति “अत:" "अतएव" या
"इस लिये" अर्थ में भी आता है ; जैसे, सो हे महाराज यह
आपके दर्शनोंका अभिलापी है।
“जो" के साथ ही "कोई" जब आता है, तव दोनोका अर्थ
होता है "चाहे जो"; जैसे, शंकरसे जो कोई वर मांगता है,
, वह पाता है।
यह और वह ।
“यह" पोर "वह" तथा इनके बहुवचन "ये" और "वे"
सर्वनामोंमें "वह" और "वे" पहले कहे हुए और "यह" और
नामोंका निर्देश करते हैं ; जैसे, भांग और
अफीम दोनो युरे नशे हैं उससे शरीर सुस्त हो जाता और इससे
कजियत होती है और इससे पेट ऐंटने लगता है और दस्त.
चन्द्र हो जाता है।
असमापिका क्रियाके पहले जब "यह" आता है तब "इति"
अर्थ देता है ; जसे, यह सुनकर में चला, यह कहकर वह लम्बा
- "ये" पोछे कहे
-
..
१
.
૨૨૬
हिन्दी कौमुदा।
ऐसा, चैमा, सा और तैसा ।
"ऐसा" इस प्रकार "वैसा” उस प्रकार,
"जैसा" जिस
प्रकार ओर “तैसा" तिस प्रकार अर्थ में आता है ; जैसे, ऐसा
गया जैसा महफिलसे जूता, ऐसे गये जैसे गधेके सिरसे सींग,
जैसेको तैसा मिले।
"ऐसा" "वैसा" और "जैसा" समानता बतानेमें भी आते
है; जैसे, किलेके ऐसा दिपाई देने लगा, मेरे जैसा सीधा
आदमी न मिलेगा. वैसे मनुष्य संसारमें कम होते हैं।
पुरा. नीच और निर्लज्ज अर्थों में “ऐसा तसा" प्रयुक्त होता
है ; जैसे, कोई ऐसा तैसा नहीं जाने पाता, ऐसा तसा हो जो
अब फिर वही काम करे।
"ऐसा वैसा” साधारण वा नगण्य और मृत्यु अर्थों में
आता है; जैसे, मैं क्या ऐसा वैसा हूं जो डरू', तुम्हारे घरके
सब पसे वैसे हो जायं।
"ऐसे ऐसे” इत्यादि अर्थ में आता है ; जैसे, एसे ऐसोंकी
वात न कहो।
"ऐसी तैसो" प्रयोग अपमान और नरक वा गढ़ा अर्थमें
आता है ; जैसे, तेरे दिलको ऐसी तैसी, अपने काम न आवे तो
ऐसी तैसीमें जाय।
"ऐसे", "वैसे", "जैसे" और "तैसे" उपमा वा उदाहरण
देनेमें क्रियाविशेषण रूपसे भी आते हैं ; जैसे, तुम ऐसे क्यों
कहते हो, वैसे वे हमारे गुरू हैं, ज से कहोगे वैसे ही करूंगा।
.
-
शब्दोंके अर्थ।
१२७
"कैसा" अवस्था लाननेके लिये प्रश्नमें आता है। जैसे, वह
कैसा है?
"कैसा कोई" चाहे जैसा मनुष्य अर्थमें थाता है ; जैसे,
कैसा कोई बुद्धिमान क्यों न हो।
"कैसे" किस प्रकारसे वा किस कारणले अर्थ में आता है
जैसे, तुम उसे कैसे जानते हो?
इतना, जितना आदि।
"इतना", "उतना", "जितना", "तितना" और "कितना"
परिमाणवाचक सर्वनाम है । "इतना" निकटवत्तों और “उतना"
दुरवत्तों परिमाणका योधक है। "जितना" और "तितना" "जो"
और “सो" की तरह जोड़ेके शब्द है और “कितना" प्रश्नवाचक है।
"कितना" 'दाम और गहराई पूछने के लिये ही माता है
जैसे, तुमने कितनेको वा कितनेमें यह मोटर परीदी ? बड़े बड़े
वहे जाय, गधा कहे कितना पानी।
"इस बीचमें", "दाम" और "यथेष्ठता" अर्यों में पांचवीं
विभक्तिमें "इतना" और "जितना" आता है ; जैसे,इतनेमें पुलिस
आ गयी, इतने में हम न येचेंगे, इतनेमें काम बन जायगा।
"उतना" और "जितना" शब्दोंकी पांचवीं विभकिके एक
वचनक रूप भी कालान्तर और दाम अर्थों में आते हैं : जैसे,
जितनेमें मैं आऊ आऊं उतनेमें यह एक कोस निकल गया,
जितनेमें तुमने घोड़ा पाया है उतनेमें तो ठगाये नहीं हो।
| "कितने एक" कई अर्थमें माता है ; जैसे, कितने एक दिन
..
तब
१२८
हिन्दी कौमुदी।
"कितना ही" चाहे जितना अर्थमें आता है। जैसे, कितना
ही यत्न करो, होगा वही।
"इतना उतना" थोड़े बहुत वा नगण्य अर्थमें भी आता है;
जसे, मैं इतने उतनेकी चिन्ता नहीं करता।
एक।
"एक" संरयावाचक विशेपण अनेकका विपरीत अर्थ देता
है और "कोई" अर्थमें भी प्रयुक्त होता है ; जैसे, एक आदमी
आया, एक दिनकी बात है, एक समय वह भी था।
क्रमसे एक एककर जय कई बातें बतायी जाती हैं,
क्रमके आरम्मका एक प्रथम अर्थमे आता है और "एक तो"
प्रथमतः अर्थ देता है ; जैसे, एक करेला दूसरे नीम चढ़ा. एक
तो रुलासी थी ही दूसरे आ गया भैया।
"एक" समान वा एक ही अर्थ में भी आता है, जैसे,
राम लक्ष्मण एक बापके वेटे थे।
"एक आध" कोई न कोई और बहुत कम अर्थों में आता
है; जसे, एक आध आदमो खड़ा ही रहता है, वहां एक आध
भलामानस हो तो हो।
बीसो, बीसों आदि,
तीन चार आदि संख्यावाचक शन्दोंमें "ओ" प्रत्यय जोड़ने
Ka तीन चार प्रादिके ही नहीं, पहले एक और दोके साथ भी "हु"
श्रव्यय लिखा जाता था और 'भो" अर्थ देता था, पर कालान्तरमें हकारका
लोप होनेसे "" रह गया और एकड, दोउ, तीनउ,
२
.
।
..
-
.
शब्दोंके अर्थ
१२६
से "तीनो","चारो" आदि बनते हैं और इनके अर्थ होते है
"सारे तीन" "सारे बार" आदि: जैसे, तीनो योल उठे, चार
हंस पड़े। इन वाक्योंका अर्थ है कि वहां तीन आदमी थे
और सब एक साथ बोल उठे तथा चार आदमीथे और सय पक
साथ हंस पड़े।
"दो" एक अक्षरका शब्द है, इसलिये इसमें "ओ" प्रत्ययके ,
बदले "नो" प्रत्यय लगता है और "दोओ।" न होकर "दोनो"
शब्द बनता है । जैसे, दोनो भाई मेलसे रहते हैं।
दसो, घीसो, 'पवासो, सौऔ, हजारो और लाखो आदि
तथा दसों, यीसों, पचासों, सैकड़ों. हजारों और लाग्ने भादिमें
अर्थ का बड़ा भारी अन्तर है ; जैसे, पचासो आदमी आये
वाक्यका अर्थ है कि पचास आदमी थे और सब मा गये। पर
गये और फिर सन्धिफे नियमानुसार ऐको, तीनो, चारो ग्रादि बने तथा
तीनौके अनुकरणपर दोउ, "दोनो" रूपमें परिणत किया गया। थोड़े दिनों
बाद मौकारके बदले योकार लिखा जाने लगा और दोनो, तीनो, पारो
आदि प्रचलित हो गये ।' एको योल चालमें कहीं कहीं पाता है, पर
शिष्ट प्रयोग नहीं समझा जाता। एको सदा निषेधार्थक अव्ययके साथ
थाता है । जैसे, वहां एको भादमी नहीं है अर्थात एक भी नहीं है। पर
दोनो, तीनो, चारो प्रादि इस नियमसे बंधे नहीं हैं, क्योंकि प्रों में
अन्तर है। केलागने प्रचलित धर्ण विन्यासके अनुसार “पीसी याये"
वाक्यका अर्थ, किया है, The twenty came पर यह ठीक नहीं है। या
"वोसो पाये" वाक्यका अर्थ है। पोसों भाये पाक्यमा भर्य है
Scores came or Twenties cime.
हिन्दी कौमुदी। यदि कहा जाय कि “पचासों आदमी आये" तो अर्थ होगा कि, कई पचास आदमी वहां थे और वे आये। इसी प्रकार “सौमओ याये" और "सैकड़ों आये" वाक्योंमें भी अन्तर है। चीसो, बीसों ओर हजारो, हजारों में भी ऐसा ही अर्थभेद है। अवा "अब" समयवाचक क्रियाविशेषण है. पर जब उसमें सम्बन्धसूचक “का” प्रत्यय जुड़ता है, तब "इस" और "इस वारका" अर्थ होते हैं ; जैसे, अबके साल न जाओ, अवकी वात मान लो। जहां। "जहां" स्थानवाचक क्रियाविशेषण है और जब इसके पीछे "तक" अव्यय जुड़ता है और आगे "हो सके" क्रियापद रहता है, तब वाक्यका अर्थ यथासम्भव, यथाशक्ति वा यथासाध्य होता है ; जैसे, जहांतक तुमसे हो सके यह काम कर डालो। . - कहां। . “कहां" भी स्थानवाचक क्रियाविशेषण हैं और इसका अर्थ होता है, किस स्थानमें; जैसे, कहां जायं? कभी कभी इसका अर्थ 'नहीं" भी होता है , जैसे, यह मकान कहां ऊंचा है? कहांके पीछे "तक" जुड़नेसे अर्थ होता है कितनी देरतक ; जैसे, मैं कहांतक उनकी प्रशंसा करू? तुलना करनेके समय वाक्यमें दो बार "कहां" आनेपर अर्थ होता है बड़ा अन्तर और भाव निकलता है कि दोनोकी " ।
शब्दोंके अर्थ।
तुलना नहीं हो सकती । जैसे, कहां शिवजीका पिनाक धनुष
और कहां ये कोमल बालक?
जहां तहां।
जहां तहां" सर्वत्र और कहीं कहीं अर्थों में आता है : जैसे
'जहांतहां लोग घूम रहे थे जहां तहां हमें भटकना मी पड़ा।
कहीं।
"कहां" क्रियाविशेषणके पोछे निश्चयार्थक क्रियाविशेषण
"ही" रहनेले "कहीं" रूप बनता है ( देवो पृष्ठ ६४) और इसके
"अर्थ होते है यहुन अधिक और कदाचित् ; जैसे, यह मामला
'बाही बड़ा है, हमारी बातें कहीं कोई सुन न ले।
जियर तिधर।
"जिधर तिघर" जहां तहां अर्थ में आता है; जैसे, जिधर
'तिधर सब लोग भागने लगे।
पर।
"पर" सम्बन्धसुचक अव्यय विभक्तिकी तरह शन्दका सामान्य
रूप होनेपर उसमें जुड़ता है और ऊपर, अनुसार, प्राधान्य,
अन्तर, अनन्तर, संलग्न, दाम और वार्तालापका प्रसंग इतने अर्थ
बताता है; जैसे, घोड़ेपर चढ़ो, धर्मपर चलो, दुष्टोंपर ईश्वरका ही
यश चलता है, यहांसे सौ कोसपर, चार दिनपर वह माया, द्वार
पर खड़े रहो, कितनेपर बैल घेचोगे, इसपर वह क्रोध कर घोला ।
"पर" उभयान्वयी अव्यय “परन्तु" अर्थमें भी आता है;
जैसे, मैंने बहुत कहा, पर उसने ध्यान ही नहीं दिया ।
१३२
हिन्दी कौमुदी।
लिये।
"
लिये, निमित्त, हेतु, कारण, बजह, सवय, जैसे सम्बन्ध.
सुवक अव्ययोके पहले "इस" आनेसे "इस लिये" और "किस"
आनेसे "किस लिये" पद बनते हैं। "इस लिये" अतः. बा
अतएव अर्थमें आता है और "किस लिये" क्यों अर्थ देता है;
जैसे, इस लिये उसने मेरी बात मान ली. में किस लिये वहां
जाऊं?
"किस लिये" और "किसके लिये" पदोंके अर्थों में अन्तर
है। "किसके लिये" पदका अर्थ होता किस मनुष्यके लिये;
जैसे. मैं किस लिये धन इवाहा कर' अर्थात् क्यों धन इकट्ठा
करू', मैं किसके लिये धन इकट्ठा करू अर्यात् मेरे कोई नहीं है
जिसके लिये धन संग्रह करू।
,
कि।
"कि" क्रियाविशेषण और उभयान्वयी अव्यय दोनो रूपोंसे
आता है। क्रियाविशेषण होनेपर त्योही, तभी वा तुरन्त अर्थ देता
हैं. जैसे, मै घरसे निकला ही था कि वह मिल गया।
जब "कि" उभयान्वयी अव्यय होता है,
ताकि वा जिससे अर्थो मे आनेके सिवा कर्मप्रदर्शक भी होता
है; जैसे, नुम जाते हो कि मै जाऊ, में
वहांकी दशा देखू', उसने कहा कि मैं अभी न चलूगा ।
तव या और
इस लिये जाता है कि
तो।
उभयान्वयी अव्यय "तो" "जो" अव्ययके. जोड़की तरह
शब्दोंके अर्थ
.
--
, आता है ; जैसे, जो मुझे चाहते होते तो ऐसा न करते। यदि
पहले वाक्यमें "जब" रहता है और दूसग वाक्य "तो" अव्ययसे
मारम्भ होता है, नव यह "तो" तब अर्थमें आना है । जैसे,,
जब महाराज आयें तो तुम उनके पैरोंपर गिर पड़ना ।
"तो वाक्यमें ज़ोर देने धा श्रोतामा ज्यान आकर्षित करने
का निश्चय यतानेके लिये आता है ; जैसे, एक तो वह मममता
दी नहीं, हमागी बात तो सुन लो, हम तो परमात्मासे प्रार्थना
करते ही रहेंगे।
३
और।
• "और" उभयान्वयी अव्यय है और दो शब्दों वा. वाक्योंको
‘जोड़ने के लिये उनके बीचमें लिखा जाता है । जैसे, राम और
संग आये। रामचन्द्र यनको चले गये और भरत नन्दिप्राममें
बाकर तप करने लगे।
"और" अन्य, अधिक या अतिरिक्त और भिन्न अयों में भी
• आता है और विशेषण चा विशेष्य होता है। जैसे मुझे और न
तुझे ठौर, कोढ़में खाज और मुश्किल. आजकल कुछ रुख ही
और है।
"और तो और" और "और तो क्या" औरॉकी चर्चा छोड़
'कर मोर औरकी कौन कहे अर्थों में माता है; जैसे, और तो और
वह अपने सगे वापको हो कुछ नहीं समझता।
"और भी" इसके अतिरिक्त अर्थमें आता है ; जैसे, और भी,
वह किसीकी बात सुनता ही नहीं।
३४
हिन्दी कौमुदी।
ओर।
-
.
"ओर" सम्बन्धसूचक अव्यय पक्षों तरफ, किनारा और
न्त अर्थों में आता है . जैसे. इस लडाईमें वह मेरी ओर है,
गे ओरसे भी प्यार कर देना समुद्रका न ओर है न छोर,
सते ठाकुर खांसते चोर इन दोनोका आया ओर ।
न, नहीं और मत।
"न", "नहीं" और "मत" तीनो निषेधार्थक अभ्यय है, पर
मत" मध्यम पुरुपके सिवा किसीके लिये नहीं प्रयुक्त होता।
नसे, वहां मत जा, ऐसा मत करो, वहां मत जाइये ।
'न" साधारण निषेधार्थक अव्यय है . पर "नहीं" द्वद्धता
योतक निषेधार्थक है ; जैसे, मैं न जाऊंगा, ये नहीं जाऊंगा।
"" अव्यय न तो और तथा और न अर्थों में भी आता हैं।
जैसे, मैं न जाना
न जाना चाहता है, मैं न गया न
गाऊंगा।
जय निषेधर्म कोई विशेषता नहीं होती तव हेतुहेतुमदुभृत,
सामान्य भूत, सम्भाव्य भूत, सन्दिग्ध वर्तमान, सन्दिग्ध भूत और
भविष्यकालोंमें "न' विधिमे और अन्य कालो, "नहीं" आता
३; जैसे, वह न जाता, मैं न गया, मैं न जाता होता, वह न
गया होता, तू न जाता होगा, वह न गया होगा, मैं न जाऊंगा।
सामान्य वर्तमानमें जर निषेधार्थक "नहीं" आता है, तो
उसका रूप हेतुहेतुमद्भुतका हो जाता है अर्थात् "ह" घातुके
है' और "हे" रूप लुप्त रहते है , जैसे, वह नहीं आता ( है )।
-
क्रियापदों के अर्थ ।
विधि।
विधि, निषेध, सम्भावना, अभिप्राय, इच्छा तथा चिन्ता
प्रकट करने, आशीर्वाद, उपदेश, शाप तथा गाली देने, प्रश्न करने
और भूत, भविष्य और वर्तमान काल बताने के लिये विधिका
प्रयोग किया जाता है ; जैसे, सब लोग तड़के उठे, 'सूर्योदयके
बाद कोई न सोए, चुप रहे तो काम बन जाय, समझा दो तो
. उसकी शका दूर हो जाय, परमेश्वर कुशल करे, मैं यह काम
कैसे करू ? जीते रहो, सदा सच बोलो, उसका सत्यानास हो
जाय, वह कैसे जाय ? आश्चर्य है कि चोर इतना पीटा जाप
पर कुछ न बताये, जब तुम्हारे लड़का हो तो उसे ले माना.
अन्धो पीसे कुत्तं वायं।
बाशा
.
-
.
आज्ञा देने और आशा मांगनेमें आशाके रूपोंका उपयहार
किया जाता है ; जैसे, तुम जाओ, वह जाय, मैं जाऊं।
निषेधार्थक आशा देने में मध्यम पुरुषके साथ "" और
"मन" अशयोंका प्रयोग होता है : पर प्रथम और उत्तम पुरुषों
के साथ केवल "न" आता है । जैसे, तू वहां न जा, नुम मत
जामो, चहन जाया में न जाऊं।
हिन्दी कौमुदी।
.
-
भविष्यकाल
किसी घटनाके निश्चय वा उसकी सत्यताकी सम्भावना
होनेपर भविष्यकालिक क्रियापद प्रयुक्त होते है ; जैसे, मैं
कल आऊंगा, जो ऋपि दक्षिणा न पावेंगे तो शाप देंगे, तुम्हारे
स्त्री पुत्रादि तुम्हारे वशमें रहेंगे।
किनी घटनाके विषय में निश्चय न होनेपर भी भविष्य
कालके क्रियापदोंका प्रयोग होता है ; जैसे, किसीके प्रश्न करने
पर कि क्या यह मन्दिर अति प्राचीन है, उत्तर देनेवालेको
उसका निश्चय न होनेपर वह कहता है “होगा।
हेतुबेतुमद्भूत ।
अपूर्ण भूत. सामान्य वर्तगन और हेतुहेतुमद्भूतके सिया
इच्छा. सामर्थ्य वा शक्ति बतानेके लिये भी हेतुहेतुमद्भूतका
प्रयोग होता है ; जैसे, जब कभी अवसर पाते तर खरी मुंहपर
सुना देते, मुझसे यह काम नहीं होता, जो ईश्वर न सहाय होता
नो कोई जीता न वचना, यदि आज मेरे भाई होते, यदि तुम
सम्हल जाते तो डाकृ न लूट
सामान्य वर्त्तमान।
भविष्य, भूत तथा सामान्य वर्तमान कालोंका काम करने के
सिवा
स्वभाव, चिर सत्य घटना बताने, आश्चर्य प्रकट करने
नथा उपमा देनेमें भी सामान्य वर्तमानका प्रयोग किया जाता
है ; जैसे, मैं घर जाता हूं अर्थात् शीघ्र ही जाऊंगा. तू यह बात
कसे कहता है अर्थात् तूने कैसे कही, मैं खाता हूं, वह जहा
क्रियापदोंके अर्थ आता है ऊधम ही मचाता है, जो दान पुण्य करता है यह ईश्वरका प्रियपात्र होता है. उसने घरमें प्रवेश किया तो देखता क्या है कि महफिल लगी हुई है, हिमवान विह्वल हो ऐसे गिरे - जैसे अन्धड़में पेड़ गिरता है। सामान्य भूत। :: : सामान्य भूतका प्रयोग सामान्य वर्तमान और सामान्य भूत दोनो के लिये होता है ; जैसे, नरतनु धारण कर जिसमें परोपकार न किया उसने वृथा जन्म लिया, कृष्णजन्मकी बात किसी ने नहीं जानी। पूर्ण वर्तमान। पूर्ण वर्तमानका प्रयोग सामान्य भूत, सामान्य वर्तमान और 'पूर्ण भूतके लिये भी होता है । जैसे, हम तुम्हारे द्वारपर आये हैं, नारदने कहा कि निश्चिन्त क्यों बैठे हो, दैत्योमें राजा बलि बड़ा दानी हो गया है।
में
शब्दों की पुनरुक्ति।
एक ही शब्द साथ साथ जब लिखा या बोला जाता है,
तब उसका विशेष अर्थ होता है। क्रिया और अव्ययकी पुनरुक्ति
तो साधारणतः “यारम्यार" और "धीरे धीरे" अर्थ देती
है, पर संज्ञा और विशेषण शन्दोंको ऐसी द्विरुति वा पुन.
रुक्तिका अर्थ प्रत्येक वा भिन्न भिन्न भी होता है, जैसे द्रौपदी रो
रो कहने लगी, होते होते वह पहुंच गया, जब जब धर्मकी
ग्लानि होती है तच तय भगवान अवतार लेते हैं, घर घरमें
आनन्द उछाह होने लगा, बड़े बड़े योद्धा सज सज मैदानमें
आये, देश देशके राजा आने लगे, नये नये वृक्ष ला लाकर
लगाये गये
जव संशा शब्दोंके वीचमें "ही" अव्यय आता है या पहला
शब्द पहलीको छोड़ अन्य विभकियोंमें रहता है, तव अर्थमें कुछ
अधिक अन्तर पड़ता है। "ही" का अर्थ जहां "केवल" होता है,
वहां तो शब्दका अर्थ "और कुछ नहीं वेचल" होता है और
जहां "रभ्यन्तर" होता है, वहां 'बाहर नहीं भीतर" अर्थ होता
है; जैसे. सीता ही सीता पुकारने लगे, मन ही मन सोचने
सम्बन्यवाचक प्रत्यय पहले शब्दके अन्तमें जय रहता
है, तव कमी "लगातार" और कभी "अत्यन्त अर्थ होता है।
जैसे, दलफे दल लोग आने लगे, बदमाशोंका बदमाश ।
ar
१
लगे।
-
.
शब्दोंकी पुनरुक्ति।
कमी कमी पहला शब्द सामान्य रूप बहुवचनमें रहता है
और विभक्तिका चिन्ह लुप्त रहता है। ऐसी अवस्थामें "लगातार"
अर्थ होता है । जैसे, हाथों हाथ माल पार कर दिया, यातों बात
मामला बढ़ गया।
अत्यन्त और समस्त अर्थों में भी एक ही विशेषण दो बार
माता है ; जैसे, मीठे मीठे फल खिलाऊंगा, सेत सेत सय
एकसे कनिक कपूर कपास ।
उत्कृष्टता वा. निकृष्टता बतानेके लिये विशेषण- दो बार
आता है, पर जिससे उत्कृष्ट वा निकृष्ट बताते हैं, उसमें चौथी
विभक्ति होती है ; जैसे, बड़े बड़े बदमाश मैंने ठीक किये हैं,
अच्छे से अच्छे कपड़े पहन लो।
संख्यावाचक विशेषण जर दुहराया जाता है, तब उसका
अर्थ प्रत्येक होता है; जैसे, एक एक मुहर और एक एक
मेंस सपके पास है,सबके दस दस बेटे हुए, दो दो जाने लगे,
एक एक बोलने लगा।
संख्यावाचक शब्दके बाद जब रुपये पैसे, मन, सेर. घंटा,
। मिनिट मादि शब्द रहते हैं, तब संख्यावाचक शब्द ही दुहराया
जाता है, ये नहीं दुहराये जाते; जैसे, पांच पांच रुपये, छ छ
पैले, दस दस मन, पांच पांच सेर, तीन तीन घटे, दो दो
मिनिटा. जय रायेके साथ थाने या मनके साथ सेर इत्यादि
रहते हैं,तब माने और सेरही दुहराये जाते है रुपये और मन नहीं;
जैसे, पांच रुपये दो दो आने मिले, छ मन तीन तीन सेर विक।
,
-
-
.
-
कर्ता. क्रिया
और कर्म।
कर्तृवाच्यमें अकर्मक वा सकर्मक क्रिया लिङ्गवचनमें
सदा
कर्ताके अनुकूल रहती है ; जैसे, वह आता था, मैं खाता
ह, राम जायगा, कृष्ण आया है, विहारी पड़ेगा।
कर्मफर्तृवाच्यमें क्रिश सदा कर्ता बने हुए कर्मके अनुकूल
रहती है ; जैसे, गाड़ी चलती है, बादल गरजा, मेह बरसेगा।
कर्मवाच्यमें क्रिया कर्मके अनुकूल रहती है और सकर्मक
क्रिया पूर्ण वर्तमान, सामान्य भूत, सामान्य पूर्ण भूत, पूर्ण
मृत और सन्दिग्ध भून कालोंकी, ही क्रियामें कर्मवाच्य होता
है ; जैसे, मैंने रोटी खायी है, मैंने रोटी खायी, मैंने रोटी खायी
होती, मैंने रोटी खायी थी, मैंने रोटी खायी होगी।
खेलना और बोलना सकर्मक क्रियाएं होनेपर भी कर्तघाच्य
होती हैं ; जैसे, मैं क्रिकेट खेला, वह झूठ योला।
खेलना और योलना क्रियाओंसे बने कर्म और कभी कभी
अन्य कर्म भी जब वाक्यमें आते हैं तो ये क्रियाएं कर्मवाच्य
भी होती हैं ; जैसे, मैंने बहे खेल खेले हैं, उसने चौपड खेली,
उसने कई बोलियां चोली।
जिन यौगिक क्रियाओंके सभी भाग सकर्मक क्रियासे बनने
हैं, उन्हीमें कर्मवाच्य होता है ; जैसे, मैंने हलवा वा डाला है
या था वा होगा वा होता।
.
-
+ " कर्ता, क्रिया और फर्म। १४१ जिन यौगिक कियाओंके सभी भाग अकर्मक क्रियाओंसे बनते है अथवा जिनका एक भाग भी अकर्मक क्रियासे बना हुआ होता है, उनमें फर्मवाच्य नहीं होता; जैसे, मैं उसे दे आया, वह ना गया है, राम पुस्तक लाया था। लाना किया ले धातु ओर आना क्रियाके योगसे बनी है। पहले इसका रूप ल्याना था. पर याद लाना हो गया। इस लिये लाना क्रियाका कर्मवाच्य नहीं होता। समझना क्रियाका कर्मवाच्य होता है और नहीं भी होता; जैसे, मैंने उसे आदमी समझा, मैं उसे आदमी समझा । भाववाच्यमें क्रिया सदा पुलिङ्ग एकवचनमें रहती है और कर्ता वा , कर्मका अनुसरण नहीं करती ; जैसे, मैंने रोटियोंको खाया, रामने ताड़काको मारा । कर्मवाच्य और भाववाच्य दो प्रकारके क्रियाके, दुसरे यौगिक क्रियाके। साधारण क्रियाके कर्मवान्य और भावाच्यका कर्ता तीसरी विभक्तिमें और यौगिक क्रियाके कर्मवाक्य और भाववाच्यका कर्त्ता चौथी विभक्तिमें होता है; मने जसे, (साधारण क्रियाके कर्मवाच्य और भाववाच्य हे . खाये और मैंने पेड़ोंको खाया : ( यौगिक क्रियाके कर्म- चाच्य और भाववाक्य) मुझसे पेढे खाये गये, मुझसे चला एक साधारण . नहीं गया। : जब एकवचनमें दो या अधिक कर्ता होते हैं और उनके बीचमें संयोजक अव्यय "और" नहीं रहता, तो सब
२४२
हिन्दी कौमुदी
r
फर्ताओंके स्त्रीलिङ्ग होनेपर क्रिया बहुवचन स्त्रीलिङ्ग होती है,
और पुलिङ्ग होनेपर बहुवचन पुल्लिङ्गः । परन्तु यदि भिन्न भिन्न
लिङ्गोंके कर्ता हों तो द्वन्द्व समासके नियमानुसार क्रिया होती
है; जैसे, रानी दासी मपी समी वहां थीं, रामलक्ष्मण भरत
शत्रुघ्न दशरथके पुत्र थे, राजारानी आये।
यदि कर्ता भिन्न भिन्न वचनोंके हों और उनके बीच में
"और" अव्यय न हो तो मध्यम और उत्तम पुरुषके कर्ता होने-
पर क्रिया उत्तम पुरुष तथा प्रथम पुरुष कर्ता होनेपर प्रथम पुरुप
बहुवचनमें होगी ; जैसे, हम तुम चलेंगे, तुम वह वहां जाओगे।
गदि भिन्न भिन्न लिङ्गों और वचनोंके कर्ता हों और उन
सबके अथवा अन्तिम कर्ताके पहले "और" रहे, तो क्रिया
अन्तिम कर्ताके अनुकूल होगी ; जैसे, तीन मर्द और एक औरत
आयी।
जब किसी सकर्मक भूतकालिक क्रियाका अर्थ कोई वाक्य
होता है तो किया कमवाच्य न होकर भाववाच्य होती है,
अर्थात् सदा पुलिङ्ग एकवचनमें रहती है ; जैसे, मैंने उससे
कहा कि घर जाकर सो रहो, उसने कहा कि दासी रोटी खा
रही है।
(
2 उर्दूवाले विशेषकर दिल्लीकी पोरके उर्दू के पढित उत्तम मध्यम और
प्रथम पुरपके कर्ता हों तो निया पुल्लिङ्ग बहुवचन कहते हैं ; जैसे, मैं तु और
वह चलेंगे, मै तुम चलेंगे।
,
।
कर्ता, क्रिया और कर्म।
जब किसीका यावर किया जाता है, तब उसके लिये
बहुवचनको मिया प्रयुक्त होती है : जैसे, जय राम बनको जाने
लगे तय,अयोध्यामें उदासी छा गयी, आप जानते हैं कि विद्या
बड़े परिश्रमसे आती है।
परमेश्वरको सम्बोधम करनेके समय अथवा किसीका
अनादर करनेमें मध्यम पुरुष एकवचन और उसीकी क्रियाका
प्रयोग किया जाता है ; जैसे, हे नाथ, तू घट घटकी जानता है,
तेरी महिमा अपरम्पार है, तू चालक है।
परमेश्वरके सम्बन्धमें कुछ कहा जाता है, तब उसके लिये
एकवचनकी क्रियाका ही प्रयोग होता है; जैसे, परमेश्वर जानता
है हम झूठ नहीं बोलते।
जब किसी वाक्यमें स्त्रीपुरुषके विषयमें समष्टि रूपसे कुछ
कहा जाता है, अथवा जब स्त्री अपने पति वा परिवारकी ओरसे
कुछ कहती है तो वह भी अपने लिये पुलिङ्ग बहुवचनकी
क्रियाका प्रयोग करती है ; जैसे, ब्राहणीने कहा कि न जाने
हम इन राक्षसों के अत्याचारसे कब छुटकारा पायेंगे।
यदि वाक्यमें दो कर्चा भिन्न लिङ्गों और वचनोंके हों, तो
क्रियाका कर्ता वही माना जायगा जो मुख्य होगा और क्रिया-
के लिङ्गवचन उसोके अनुसार होंगे; जैसे, इसका कारण
युवराज और युवराज्ञीकी हत्या न था।
यदि समय परिमाण तथा धनका विशेषण कोई संख्या हो
.
१४४
हिन्दी कौमुदी।
और वह एकसे अधिक हो तो समय, परिमाण तथा धनवाचक
शब्द पहलीको छोड़ और सब विभक्तियों तथा सम्बन्धवाचक
प्रत्यय लगनेके पहले पकवचनके सामान्य रूपमें होते हैं। जैसे,
दो घण्टेमें आओ, चार चार रुपयको धोती लाये, पांव सेरका
गेई विका।
|
1
ANPUR
"
।
विशेष्य, विशेषण और सर्वनाम।
जिस शन्दके गुण, दोष, संख्या वा अवस्था विशेषणसे जानी
जाती है, उसे विशेष्य कहते हैं ; जैसे, सुन्दर पुरुष, नटखट
लड़का, चार मादमी, वीमार लड़की।
विशेष्यके अनुसार ही विशेषणके लिंगवचन होते हैं;
सैसे, काला घोड़ा, लंगड़ा लड़का, अन्धी लौंड़ी।
हिन्दीमें आकारान्त विशेषण शब्दोंमें लिंगभेद प्रत्यक्ष रहता।
है और उनके रूप लिङ्गवचनानुसार बदला करते हैं, पर जिनके
रूप नहीं बदलते वे भी विशेष्यके लिंगवचनके अनुकूल मान
लिये जाते हैं, जैसे, मोटा लड़का, छोटी किताय, लाल स्यादी
साल, फूल।
यदि.फई विशेष्योंके लिये एक हो विशेपण हो तो विशेषण
अपने पीछे भानेवाले पहले विशेप्यके लिंगवचनके अनुकूल
रहता है; जैसे, कई छोटे बड़े लड़के और लड़कियां, मच्छ
बोड़ियां मौर रष्ट्रा
यदि विशेषण विशेप्यकी भांति माता है, तो संज्ञा शब्दोंकी
मांति सब विमकियों तथा सम्बन्धवाचक प्रत्ययोंमें उसके रूप
साधे जाते हैं, जैसे, दुर्वल को न सताइये, निर्धनोंको धन दो,
अखियोंकी सहायता करो।
-
G हिन्दी कौमुदी। जिस संज्ञा शब्दके पहले सर्वनाम आता है, उसीके लिंग- वचनानुसार इसके लिंगवचन भी होते हैं, जैसे, भारतमें स्त्रियोंको गृहकार्य सौंपा जाता है, वे बाहर नहीं जाती। विशेषणका प्रयोग दो प्रकारसे किया जाता है एक गुण- द्योतक, दुसरा विधेयद्योतक। गुणद्योतक विशेपण विशेष्यके पहले आता है और विधेयद्योतक विशेषण कर्मके गुण दोप बताता है। यदि कर्म पहली विभक्तिमें होता है, तो विशेषण कर्मके लिंगवचनानुसार होता है और यदि कर्म दूसरी विभक्तिमें होता है तो भाववाच्यकी क्रियाके समान विशेषण सदा पुल्लिङ्ग एकवचनमें होता है ; जैसे, सीधा आदमी आया है, मैंने किताब पूरी कर दी, उसने लड़कीको टेढ़ा किया। विशेषण क्रियाविशेषणको भांति भी प्रयुक्त होता है और उस अवस्थामें उसके लिङ्गवचनमें परिवर्तन नहीं होता ; जैसे, वह अच्छा गाता है, उसका चित्त बड़ा कठोर है। परन्तु जव क्रियाविशेषण क्रियाकी ही विशेषता नहीं दिखाता, बल्कि संज्ञाका भी सम्बन्ध बताता है, तब संज्ञाके लिङ्गवचनानुसार इसके लिङ्गवचन भी बदलते हैं ; जैसे, मुझे खाना अच्छा लगता है, उसको रोटी कड़वी लगती है। -
वाक्यरचना।
वाश्यरचनाका साधारण नियम यह है कि पहले कर्ता
और पीछे क्रिया रहे और अन्य कारकोंकी आवश्यकता हो तो
कत्ता और क्रियाके चीच में रखे जाय; जैसे, मोहन आता है,
सोहन रोटी खाता है।
वाक्यमें यदि कर्ता आदि सभी कारक हों तो कर्त्ता पहले
'आता है और कर्म अन्तमें और इसके बाद क्रिया रहती है।
जैसे, रामने वाणसे रावणको मारा, मालिकने मुनीमसे मिख.
मंगोंको एक एक पैसा दिलाया।
कर्ताके विशेषण कर्ताके पहले और क्रियाविशेषण किया
और कर्मके पहले रहते हैं ; जैसे, सुशील लड़के अपने माता
'पिताकी आज्ञा मानते हैं, वह यहांसे शान काशी आयगा ।
प्रश्श करनेके समय वाक्यके प्रारम्भमें "क्या" बोला जाता
'है । जैसे, क्या परमेश्वर हम दुखियोंकी सुध लेगा?
वाक्यमें "क्या" नहीं रहता तय बोलनेके ढङ्ग और पत्ताक
मुखकी आकृतिसे जाना जाता है कि यह प्रश्न कर रहा है ; जैसे
'मैं जाऊ? उसने सब मिठाई खा डाली?
भाव प्रकट करने के समय विस्मयादिबोधक अव्यय कियाके
साथ पहले आता है और शेप वाक्य पीछे ; जैसे, धन्य है नेरे
मातापिताको जिन्होंने तुझे जन्म दिया, धन्य है हम सब जिन्हनि
.
.
--
.
१४८
हिन्दी कौमुदी।
आपके दर्शन पाये, धिकार है तेरे शरीरको जो अपने सुपसे
सुपी होता है।
चाफ्यमें जोर लानेके लिये शब्द और पद अपने स्थानसे
हटाकर दूसरे स्थानपर भी रखे जा सकते हैं ; जैसे, समर्थ वे ही
है जो दूसरों की सहायता करते हैं, मनुष्य उन्हें कहिये जो
दूसरेके दुखसे दुखी और सुपसे सुपी होते हैं, हैं तो हम निर्धन
पर हमारा मन धनवान है।
-
and
परिशिष्ट । (अ) संस्कृतकी संधि । या स्वर सन्धि,। य या आके वाद म या आ रहे, तो दोनो मिलकर आ, इ 1. ईके. वाद इ या ई रहे, तो दोनो मिलकर ई, उ या ऊके बाद उ या ऊ रहे, तो दोनो मिलकर क, ऋके बाद ऋ रहे, वो दोनो मिलकर ऋ हो जाते हैं; जैसे, ज्ञान+अभाव जानाभाव, धर्म आज्ञा-धर्माशा,सीता+आधय-सीताश्रय, हरिइच्छा हरीच्छा, गौरी+ईश्वर गौरीश्वर, लघु ऊर्मि-लघूमि, यधू+उत्सव- वधूत्सव, पितृ ऋण-पितृ ण । अ या आके बाद यदि इ या ई रहे, तो दोनो मिलकर ए, उ या ऊ रहे तो दोनो मिलकर ओ और ऋ रहे, तो दोनो मिलकर अर् हो जाते हैं ; जैसे, नर+इन्द्र-नरेन्द्र, गण+ईश- गणेश, महा+इन्द्र-महेन्द्र, रमाईश-रमेश, राम+उदार रामो. दार, जल ऊर्मि-जलोमि, महा+उपदेश महोपदेश, महा+ऊर्मि महोर्मि, वसन्त ऋतु वसन्ततु, महा-पि महर्षि । • यदि म या आके बाद या. ऐ हो, तो दोनो मिलकर ये और यदि ओ या औ हो, तो दोनो मिलकर भी हो जाते हैं। .. .
१५०
हिन्दी कौमुदो।
वैसे, एका-एक-एकैक, जल+ओका जलीका, परम+ऐश्चर्य
परमैश्वर्य, महा+औदार्य महौदार्य।
यदि इ या ईके बाद इ या ईको छोड़ दूसरा स्वर हो, तो
इ पा ईके बदले य हो जायगा। इसी प्रकार यदि उ या ऊके
बाद उ या ऊको छोड़कर कोई दूसरा स्वर हो, तो उ या उसके
बदले व हो जायगा और यदि ऋके बाद ऋको छोड़ कोई
दूसरा स्वर हो, तो ऋके स्थानमें र हो जायगा ; जैसे, यदि अपि
यद्यपि, नि+ऊन-न्यून, प्रति+एक प्रत्येक, अति+ओज-अत्योज,
सु+आगत-स्वागत, अनु+एपण+अन्वेपण, पितृ अनुमति
पित्रनुमति।
ए, ऐ, ओ और औके बाद जब कोई स्वर रहता है, तब
क्रमसे , ऐ, ओ और औके स्थानमें अय, आय, अव्, आव् हो
जाते हैं ; जैसे, ने+अन-नयन, न+क-नायक, पो+अन-पवन,
पी+अक-पाचक।
व्यंजन सन्धि ।
'१।। जय क्, च इ, वा पके बाद कोई स्वर अथवा किसी
वर्गका तीसरा वा चौथा वर्ग अथवा य. र, ल, व, ह रहे तो के
स्थानमें ग, च्के ज, टके ड् और प् के स्थानमें,व् हो जाता है; जैसे
वाम् आडम्बरः वागाडम्बरः. वाक् ईशः वागीशः, दिनाज:-
दिग्गजः, प्राक्तन: प्राग्घनः, धिक् याचना-धिग्याचमा, वाक्न
रोधः वामोधः, धिक्+लोभिनम्-धिग्लोभिनम्, सम्यक् वदति-
.
व्यजन सन्धि।
सम्यग्वदति, दिक् हस्ती-दिग्हस्ती, अच्+अन्तःअजन्तः,
परिबाट उवाच-परिघाडुवाच ।
२। जब किसी शब्दके अन्तमें त् हो और उसके बाद कोई
स्वर अथवा ग, घ, द, ध, च, भ, य, र, या व हो, तो तके बदले
द हो जाता है ; जैसे, जगत् अन्तः जगदन्तः, जगत्म्गति
. जगद्गति, वृहत् घटः वृहद्घटः, उतन्दण्ड:-उहएडः, भवत्+
-दर्शनं भवदर्शन, महत्+धनुः महनुः, उत्स्योगः-उद्योगः,
महत्वन-महदनं ।
३। जब अनुस्वारके याद किसी वर्गका कोई अक्षर होता
है तो वह उसी वर्गके पञ्चम वर्णमें बदल जाता है ; जैसे,
शं+करः शङ्करः किंचित किश्चित,पं+दितः पण्डितः ।
४। जब किसी वर्गके किसी अक्षरफे याद किसी वर्गका
- पञ्चम वर्ण हो, तो पहला अक्षर अपने पक्षम वर्णमें बदल जाता
है ; जैसे, चाक्+मय वाङ्मय, अ+मात्र अमात्र, जगत्+
नाधाजगनाथः।
५। जब किसी ह्रस्व स्थरके याद छ होता है, तब उस छके
पहले च् बढ़ जाता है:
जैसे, परि छदा-परिच्छदा, पद छेदार
.
पदच्छेदः।
६। जय त या दके बाद चवर्ग वा स्वर्गका पहला वा
दूसरा अक्षर होता है तो त् या दुके स्थानमें च वाटू हो जाता
है; जैसे, महत्+छत्र महच्छवं, पतत् चन्द्रमण्डलं-पतचन्द्रमंडलं,
+छाया-पतच्छाया, उत्स्टलति-उट्टलति, तत्+टोका-
१५२
हिन्दी कौमुदी।
.
-
.
"
,
"
तट्टीका, सत्+ठकारः सहकारः, एतत् ठक्कुरः एतहक्कुरः।
७। यदि त् अथवा के बाद ज, झ. वा ड, ढ हो तो त,
वाद् को ज्, वा डू हो जाता है ; जैसे, भवत्+जीवन-मव.
जीवनं, विपद् जालं-विपन्जाल'. महत्-मममनं महम्मनं,
तद् झनकारातघनत्कारः,उत्+डीन: उट्टीन ,नद्+दिण्डिमः=
तडिण्डिमः, उत्=ढोकते उड्ढीकते, एतद्+डका एतडढका।
८। यदि त् वा के बाद श, हो तो त् वा इ, चमें और
श में बदल जायगा; जैसे, श्रीमत्+शङ्कराचार्य श्रीमच्छ.
ङ्कराचार्यः, तद् शरीरम्-तच्छरीरम् ।
६il यदि त्, के याद् द् वा ह हो तो त्का द् और दको
ध हो जाता है, परन्तु ह नहीं बदलता ; जैसे, उत्+हत=उद्धत,
तद्+हित तद्धित।
१०। यदि न्के बाद ज या झ हो तो नको असे घदल देते
है ; जैसे, महान्+जयः-महाअय', उद्यन्झङ्कारः उद्यमकार ।
११ । यदि न के बाद श हो तो न्को और शको छ हो
जाता है ; जैसे, धावन+शश: धावडशः ।
१२। यदि न के बाद ड या ढ हो तो नको ण् हो जाता
है; जैसे, महान् डामर: महाण्डामरः, गजन्+ढौकसे=
राजण्डौकसे
१३। यदि त् द् या न्के बाद ल तोत् द् चा नको ल
हो जाता है और न के पहलेवाले अक्षरपर चन्द्रविन्दु लगता है
व्यसन सन्धि। 'जाता है। १५३ 'जसे, वृहत् ललाटं वृहल्ललाटं, एतद् लीलोद्यानं पतल्लीलोद्यान, महान् लाभः महांल्लामः। १४। न्के बाद यदि च. छ. ठ, ठ, तया थ हो तो नको 'अनुस्वार च, छको श्च श्छ, ट, 8 कोट, मीर त, थको स्त और स हो जाता है ; जैसे, नृत्यन+चकोर नृत्यश्चकोरः धावन्छाग: धावश्छागः, चलन+टिट्टिमिः-चष्टिमिःमहान् +टर:-महाप्टकर, हसन्तरति-हसंस्तरति, गच्छन् थुत्- कार-गच्छंस्थुत्कारम् । १५। यदि नके बाद स स या ह हो तो नको अनुस्वार हो जैसे, दन+शनम् दशनम्, मोमान्+सते-मीमांसते, वृन्+दितम्-तृन्दितम् । १६। यदि न के बाद कोई स्पर्श वर्ण हो तो न उसी वर्गके पञ्चम वर्णमें बदल जाता है। जैसे, आशन्+कते-आशङ्कते, मालिन्+गति-आलिङ्गति, वन+चयति वञ्चयति. उतफन्+ठते- उत्कण्ठते, कन्-पते-कम्पते। १७। यदि म के बाद कोई स्पर्श वर्ण हो तो म् उसी धर्गके या तो पञ्चम वर्णमें या अनुस्वारमें बदल जाता है ; जैसे; किम् करोषिकिंकरोपि, चा किडरोपि, क्षिप्रम् चलति- क्षिप्रचलति वा क्षिपञ्चलति, नदीम् तरंति-नदीतरति चानदीन्त- रति, गुरुम्म्नमति-गुरु नमति या गुरुतमति। २८ । म् के बाद यदि अन्तस्य या उप्म.वर्ण हो तो मू को 'अनुस्वार हो जाता है; जैसे, सत्वरम् याति-सत्वरंयाति, :- .
.
१६०
हिन्दी कौमुदी।
फुलस्टाप या विन्दी वा शून्य वहां लगाया जाता है जहां
किसी शक्के बदले केवल एक अक्षर लिखा जाता है ; जैसे, पं.
(पण्डित) या० (पायू), ला० (लाला). वी० ए०, एम० ए० ।
हिन्दीमें वाक्यकी समाप्तिपर फुलस्टाप वा' विन्दीके बदले
पढ़ी सीधी रेखा लगाते हैं ; जैसे, दया धर्मका मूल है।
हिन्दीमें कोलनका प्रयोग बहुत कम लोग करते है और
जब करते हैं, तव कोलनके साथ डैश लगाकर कुछ बातें बताने
या गिनानेमें ; जैसे, नीचे लिखी बातें ध्यानमें रखो:-(१)
सदा सच बोलो, (२) किसीको दुख न दो. (३) पापसे
दंगे।
.
शब्द वा पदका अंश जब दो टुकड़ोंमें बट आता है, तब
योगोकी एकता घतानेको उनके वोचमें हाइफेन लगाया जाता
है. जैसे, राज-कर्मचारी, मृत्यु-दण्ड ।
वाक्यके योचमें जब कोई ऐसा वाक्य आ जाता है,
जो
स्वतंत्र वाक्य बन सकता है अथवा ऐसा वाक्यांश आता है
जिसके छूट जानेसे कुछ वनता बिगड़ता नहीं, तो उसके आगे
पीछे बैश लगाते हैं ; जैसे, “और परमेश्वरने कहा"-क्या ?--
"प्रकाश हो जाय । रामचन्द्र-येही दशरथके युवराज थे-
१४ वर्ष यनमें पिता माये थे।
बोलनेमें ठिठकना बतानेके लिये भी देशोंका प्रयोग किया
ताता हैजैसे, मुझे खेद है कि मैं, मापका-ऋण-नहीं
-
--
.
चुका सका।
- चिन्ह प्रकरण १६१ प्रअका हि उस वाक्यके अन्तमें लगाया जाता है जिसमें किसीसे कुछ प्रश्न किया जाता है ; जैसे, तुम्हारा घर कहां है ? आश्चर्य, हर्ष, विपाद आदि प्रकट करनेवाले शब्द या वाक्यके अन्तमें आश्चर्यका चिन्ह लगाया जाता है ; जैसे, भाग्य! तेरी भी क्या प्रशंसा करू! हे मित्रो ! घर जामो! दूसरेकी उक्ति उद्ध त करनेमें इनवर्टेड कामा डवल.(...") लगाये जाते हैं और जब उस उक्तिके भीतर तीसरेकी उक्ति आ जाती है, तब इनके लिये इनवर्टेड कामा सिङ्गल लगाये, जाते हैं। मनुष्य, वस्तु वा शब्दको महत्व देनेके लिये भी इनका प्रयोग किया जाता है ; जैसे, रामचन्द्रने सीतासे कहा "प्रिये, यनमें बड़े फष्ट है।" "रामाश्वमेधर्म" शत्रुघ्नसे लब- कुशको कड़ाईका वर्णन करते हुए केशवदासजीने कहा है “लय शत्रुघ्न लड़ने आये, तब कुशने कहा 'कौन शत्रु तै हत्यो जो नाम .. राघुहा लियो।" किसी वाक्यांश वा शब्दको यदि अलग रखकर भी वाक्यके मीचमें डालना चाहे तो उसे व्रकेट या पैरेन्येसिसमें यन्द करते है, जैसे, यह सत्य जान लो (मनुष्पके लिये इतना ही जानना ज्येष्ठ है) कि इस लोकमें धर्म ही सुखदाता है। -
-
मुद्रक-अंबिकाप्रसाद वाजपेयी,
"इण्डियन नेशनल प्रेस"
१५६ बी०, मछुआ बाजार स्ट्रीट,
कलकत्ता।
.
-
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