Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Jeevan Ka Divya Paksh
Front matter
प्रकाशक
चौखम्बाविद्या भवन,
चौक, पनारस-१
The Chonkbambs Vidya Bhayan
Chork, Banaras.
{ INDIA
PRESENTED BY
llunity of Lancation
FOREWORD (human life, with its infinite complexities and contradictions, presents a veritable ridale which seems to baffle all solution. If it is sorrow and misery looked at from one side, it is the basis of blissful perfection and eternal progression viewed from another. The polari. ties of life are facts of experience and cannot be explained away by reasoning. Come attempt to bring them round to a higher Synthesis where gorrow and joy lose their own earthly values and appear to assume a Divine mobning. Others however recognise the reality of both and emphasise the brighter side of life seeking to draw out the best that it contains. They do not look upon gorrow as a necessary evil but as a chastening principle intended for discipline and purification.) The following pages represent such attempt. The author, in elegant and easily intelligible Sanskrit veraeg with & Luminous rendering into Hindi prose, tries to analyse life as it is found and places his yiews in three parts before the readers for their appreciation, PARIT I åeals with the aim of lire ana tha basis on which life with this ain deserves to be founded. This basis is held to be Brahmacharya or Restraint, on which every scheme ot education, to be worth tbe name, must be based, PART II dwell, on the noble and ethical qualities which form the backbone of a progreslive life aspiring after spiritual perfection, Those qualities include among others integrity } an [ 2 ] of character, truthfulness, purity of heart, fortitude, mental pouge, vigilance and selfintrospection, These constitute the Path which leads to the Goal. It is a diffcult path, but it has to be trodden by one in quest of Perfection and Bliss. PART III describes the highest stage of life, where passions have been conquered and tranquility achieved. This stage_marks the fulf11nent of life, being the realidation of ita unity with the Highest Being Whose infinite love, compassion and power are respongi. ble for the upkeep of creation. The first emergence of life out of primitive matter, its passage through different grades of matter and its transcendence into Pure Spirit in the end, with the possibility of infinite Sprogression in future, have been beautifully described. The three stages of the learned author remind one of the well-known three stages of the Mystic Way, viz. Furgation, Illumination and Unitive Life. the work 25 throughout inspired by Lofty Vedic Idealism and is a beautıful handbook which ought to be in the hands of every earnest youth, at least of every Sanskrit student. Being free from soctarian ideologion and abstruso expressions of a technical nature it 18 calculated to be intelligible to all readers and helpful to those' in pursuit of Truth, Good and Beauty Varanasi Gopinath Kaviraj 11-9-2856 ( Mahamahopadhyaya, M. A., D. Litt.)
महामहोपाध्याय डाक्टर गोपीनाथ कविराज M.A,D.Litt. द्वारा लिखित प्राकथन का अनुवाद - 7 प्राक्कथन अनेकानेक प्रकार के चैपम्यों और विरोधों से समन्वित मानव-जीयन वस्तुत' एक ऐसी समस्या है जिसका समाधान अत्यन्त कठिन है। यदि एक दृष्टि से वह केवल शोक-रूप और दुख-रूप है, तो दूसरी दृष्टि से वह आनन्दमय पूर्णता और अनन्त समुत्कर्प का आधार भी है। जीवन के स्वरूप की ये परस्पर विरुद्ध दिशाएँ आनुभविक तथ्य हैं और किसी तार्किक व्याख्या द्वारा उनका अपलाप नहीं किया जा सकता। कुछ लोग उनको एकत्र कर ऐसे उत्कृष्टतर समन्वय की स्थिति में लाने का प्रयत्न करते है जिसमे शोक और हर्प अपने लोक-प्रसिद्ध मूल्यों को छोड़ कर एक दिव्य अभिप्राय को ग्रहण करते हुए प्रतीत होने लगते है। दूसरे लोग शोक और हर्प दोनों की वास्तविकता को स्वीकार करते हुए भी, जीवन में जो कुछ अच्छाई है उसी को लेने की दृष्टि से, जीवन के प्रकाशमय पक्ष पर ही बल देते हैं। वे शोक और दुःख को एक अपरिहार्य चुराई के रूप मे न देखकर विनयन और आत्मशुद्धि को लानेवाले एक पवित्रता- धायक तत्त्व के रूप मे ही देखते हैं। प्रकृत प्रन्थ में इसी प्रकार का प्रयत्न किया गया है। अपने अभिप्राय को स्पष्ट करनेवाले विशद हिन्दी गद्यानुवाद से युक्त ललित तथा सरल- सुबोध संस्कृत पद्यों द्वारा अन्धको ने जीवन के धास्तविक स्वरूप का विवेथन करते हुए अपने विचारों को तीन भागों में बड़े रोचक ढंग से पाठकों के सामने रखने का प्रयत्न किया है। प्रथम भाग में जीवन के प्रधान लक्ष्य और उसकी ओर प्रवृत्त जीवन के लिए आवश्यक मौलिक आधार का वर्णन किया गया है। ब्रह्मचर्य या संयम ही यह आधार है । वास्तविक शिक्षा की कोई भी योजना उसी पर खदी की जा सकती है। द्वितीय भाग में उन उदात्त और नैतिक गुणों की चर्चा है जिनको आध्यात्मिक पूर्णता के लिए सचेष्ट प्रगतिशील जीवन का मेरुदण्ड कहा जा सकता है। उनमे अन्य गुणों के साथ-साथ, चरित्र की पवित्रता, सत्य- , [२] भारना, हृदय की स्वच्छता, धैर्य, चित्त की शान्ति, सतत जागरूपता तथा अन्त समीक्षण-ये सम्मिलित हूँ। ये ही गुण जीवन के प्रधान लक्ष्य की ओर ले जाने वाले मार्ग को अनाते हैं। वह मार्ग दुर्गम है "दुर्ग पथ स्तत् करयो वदन्ति", पर आध्यात्मिक पूर्ण विकास और वास्तविक आनन्द की सोज मे प्रवृत्त मनुष्य को उसी मार्ग से यात्रा करनी पड़ती है। हतीय भाग में जीवन की उस उत्कृतम अवस्था का वर्णन है जब कि मनोविकारों को आमान्त कर मनुष्य स्थिर शान्ति को प्राप्त कर लेता है। इसी अवस्था में मनुष्य जीवन की वास्तविक चरितार्थता और शवछत्यता का अनुमन करता है । जिसके अनन्त प्रेम, कारुण्य और शक्ति से समस्त विश्व का सचालन हो रहा है उस परमतत्त्व के साथ अपनी एकात्मता के अनुभव में ही जीवन की यास्तविक चरितार्थता निहित है। इसी भाग में घोर तम-स्वरूपिणी जडात्मक प्रकृति से चैतन्य का प्रारम्भिक विकास, प्रकृति की विभिन्न अवस्थाओं में से उसकी प्रगति, और अन्त में उत्तरोत्तर अनन्त उत्कर्ष की सभावना से युक्त विशुद्ध चैतन्य के रूप की प्राप्ति का सुन्दर डग से वर्णन किया गया है। (दे० पृष्ट ६५-६६) विद्वान् अथकार द्वारा प्रतिपादित उक्त तीनों अरस्थाओं से रहस्य यादीय जीवन म की विशुद्धाकरण, प्रकाश और अमेत भाषना इन तीन सुप्रसिद्ध अवस्थाओं का स्मरण हो आता है। स्पष्टत - दोनों म साम्य है। आदि से अन्त तक उदाच घेदिक श्रादों और भावनाओं से भाषित यह सुन्दर हस्त पुस्तक प्रत्येक कर्तग्य-परायण मय-युधक के, कम से कम सस्कृत पढने वाले प्रत्येक छात्र ,हाथों में होनी चाहिए। सकीर्ण साम्प्रदायिक विचारधारा और दुर्योध पारिभाषिक शम्दावली से नितरा रहित होने के कारण पुरसक सय पाठका के लिए सुयोध होने के साथ साथ 'सत्य शिष सुन्दरम् के थारश का अनुसरण करने वालों के लिए सहायक और उपयोगी सिद्ध होगा। वाराणसी, } गोपीनाथ कविराज विशेष सम्मतियाँ डाक्टर बाबूराम सक्सेना, एम० ए० डी० लिट. अध्यक्ष, सस्कृत-प्राकृतभापा-विभाग, प्रयाग विश्वविद्यालय। डा. मगलदेव शास्त्री का नया ग्रन्थ 'अमृतमन्थन' देखकर चित्त बहुत प्रसन्न हुआ। भारत के दर्शन-पडित अधिमाश में निराशावादी हैं, यद्यपि दर्शन का मूलतत्त्व आशा और श्रद्धा है । शास्त्रीजी ने अपने पूर्व प्रशशित रश्मिमाला-नामक अन्ध में अपनी थाशावादी दृष्टि स्पष्ट की थी और उत्साही, कियाशील होने की प्रेरणा दी थी। प्रस्तुत ग्रन्थ में जीवन का वही दिव्यपक्ष और भी स्पष्ट हो गया है। भारतीय सस्कृति का दिव्य स्वरूप को छिपा हुआ था अव वह निखर कर प्रकाश में आया है। इस दिच्य रूप का दर्शन करने में अन्यार को स्वय प्रेरणा वर्तमान युग के भारत के दिव्य रन तीन महापुरुषों से मिली है । लेखक का परिश्रम ठाघनीय है और हमें विश्वास है कि भारतीय समाज इस ग्रन्थरत्न का समुचित धादर करेगा और इससे लाभ उठावेगा। प्रकाशक ने भी बाह्य रूप को सर्वथा दिव्य बनाने में कोई बात उटा नहीं रक्सी। उनका परिश्रम भी अभिनन्दनीय है। मोफेसर धर्मेन्द्रनाथ शास्त्री, एम० ए० अध्यक्ष, सस्कृत-विभाग, मेरठ कालेज, तथा संयोजक, सस्कृत बोर्ड, आगरा विश्वविद्यालय। मैं यह कहे बिना नहीं रह सकता कि 'अमृतमत्थन' के पाठ से मुझे स्वय स्फूति और प्रेरणा प्राप्त हुई है। आधुनिक युग के उन गिने चुने सस्कृत लेखकों में जिन्होंने नचीन भावों की अभिव्यअना के लिये सरकत की व्यजन क्षमता का विकास क्यिा है, डाक्टर मङ्गलदेव शास्त्री का बहुत ही आदरणीय स्थान है । उन्होंने प्रवन्धप्रकाश ये दोनों भागों द्वारा एक ऐसे उत्कृष्ट सस्कृत गद्य का नमूना प्रस्तुत किया है जिसमें प्राचीन लेख-पद्धति को अपनाते हुमे नवीन भावों का प्रकाश है । प्रस्तुत अन्य 'अमृतमन्धन' में पद्यों द्वारा जीवन-यात्रा के लिये उदात्त भावनाओं का पाथेय प्रस्तुत किया गया है। श्रआधुनिक युग में स्फूत्ति देने वाले अमृत के घूट पीते हुये अमरवाणी सस्कृत का अभ्यास करने के लिये सरस्वती के एर वरद पुत्र ने हमारे लिये एक नवीन सामग्री प्रस्तुत कर दी है।
ग्रन्थ-समर्पण
वन्दनीय गुरुजनों
चरणों में
प्रस्तावना
ग्रन्थ-रचना का उद्देश्य
तत्त्वदर्शी मनीषियों की दृष्टि में मनुष्य-जीवन सदा से एक गम्भीर समस्या का
विषय रहा है । वैदिक वाङ्मय के सुप्रसिद्ध अन्य शतपथ ब्राह्मण { AIR ) में
एक प्रसङ्ग में ठीक ही कहा है
को हि मनुष्यस्य वेद ?
अर्थात्, मानव की, मानव-जीवन की, समस्या का समाधान बड़ा कठिन है ।
ऐतरेय आरण्यक ( २।३।३ ) में इसी तथ्य को अधिक स्पष्ट शब्दों में इस
प्रकार कहा है।
.
स एप पुरुषः समुद्रः।
अर्थात्, मनुष्य को एक प्रकार से 'समुद' ही समझना चाहिए। संसार को भी
कई दृष्टियों से 'समुद्र' कहा जाता रहा है। एक प्रकार से जीवन और संसार दोनों
समानार्थक हैं। क्रमश व्यटिगत और समष्टिगत दृष्टिभेद से दोनों एक ही वात
को भोर संकेत करते हैं-
दोनों में अनन्त गाम्भीर्य है।
दोनों में विप और अमृत का स्थान है।
साथ ही, यह हमारे हाथ में है कि उनमें से हम विप का उपभोग करें, या
अमृत रस का पान करें।
जीवन के सम्बन्ध में दो परस्पर-विरद्ध दृष्टियों का वर्णन हम अन्यन्न' विस्तार
से कर चुके हैं।
एक दृष्टि के अनुसार संसार और जीवन दुःखमय है। अतएव सधा हेय है।
जीवन धन्ध या कारागार के समान है। इसीलिए जीवन और ससार मिथ्या और
असार हैं। उनसे छुटकारा (या मोक्ष ) पाना ही हमारा परम ध्येय होना चाहिए।
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१. देखिए रश्मिमाला' पृ०९-२१ तथा भूमिका पृ० १६, 'भारतीयसंस्कृति
का विकास प्रयमखण्ड, वैदिक धारा, पृ० १०-११, ७७-८५ ।
जीवन में अवसाद अनुरसाह और निराशा को लाने वाले प्रायः ऐसे ही विचारों से हमारा प्राचीन पुराणों आदि का साहित्य भरा पड़ा है। उदाहरणार्य, देखिए-- मृत्युलोके महादुःसं कथयामि ततः शृणु । - संसार स्वममात्रश्च चलाः प्राणा धन तथा। मुख तत्र न पश्यामि दुःसं तन दिने दिने ।। इन्द्रजालमयं ना संसार अभ्रमध्ये च पश्यन्ति चञ्चलां विद्युतां गतिम् । क्षणं दृष्ट्वा च नश्यन्ति तथा संसारिणो जनाः॥ जले च बुबुदो यद्वत्तद्वत्संसारिणो जनाः ।... अर्यात, मृत्युलोक में महादुःख है। संसार एक स्वप्नमान है। प्राण, अनादि अस्थायी है। उसमें मुख नाममात्र को नहीं है। दुस प्रतिदिन रहता है। संसार इन्द्रजालमय या भोसे को चीज है। बादलों में पाल विद्युत् अथवा पानी में धुलपुले के समान ही मनुष्यों का जीवन है । इत्यादि । दूसरी दृष्टि के अनुसार, जीवन प्रेम और करुणा के धाम भगवान का परमोत्कृष्ट नसाद है। यह हमारे उत्तरोतर विकास का, उष्ट प्रगति का, एकमात्र साधन है। उसका परम लक्ष्य प्रानन्द निधेयस या अमृतत्व है। इसी दूसरी दृष्टि को हम जीवन का दिव्यपक्ष कह सकते हैं। वेदादि शास्त्रों में 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (बृहदारण्यकोपनिषद् १।३।३८) (अर्थात्, भगवन् ! हमें अन्धकार से प्रकाश की ओर ले चलिए), 'जीवा ज्योतिरशीमहि' (ग्वेद ७।३२१२६ ) (अर्थात् , हम जीवन में विशुद्ध प्रकाश को प्राप्त करें), उद्वयं तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम् । देयं देवना सूर्यमगन्म ज्योतिरुत्तमम् ।। (यजु० २०११) (अर्थान, अज्ञान में प्रकाश की और यदते हुए हम अपने को उत्तरोत्तर समुलत करें ) इत्यादि वरन जीवन के इसी दिव्यपक्ष की व्याख्या करते हैं। जीवन के इसी दिम्य पक्ष के संदेश को दूसरों तक पहुँचाने के लिए, सबको भगवान् के सर्वोत्कृष्ट प्रसाद रूप जीवन के मन्यन से समुनत अमृत फा दिय-रस- पान कराने के लिए, इस प्रन्य की प्रवृत्ति हुई है। दूसरे शब्दों में, जीवन में उदात्त भावनाओं के दिव्य संदेश की नवीन स्फूर्ति, नवीन जागरण, नवाभ्युत्थान का लाना ही इस रचना का मुख्य उद्देश्य है। [ ४ ] विपय-निर्देश मनुष्य जीवन के उत्तरोत्तर विकास की अवस्थानों की दृष्टि से पुस्तक लक्ष्या- नुसन्धान, जीवन-पाथेय तथा प्रज्ञाप्रसाद नामक तीन मुख्य भागों (-प्रसव अथवा प्रवाह) में विमफ की गयी है। प्रथम भाग ( = लक्ष्यानुसंधान ) में मनुष्य जीवन के लक्ष्य पर विचार किया गया है। जीवन की महत्त्वपूर्ण यात्रा पर चलने से प्रथम जीवन लक्ष्य का अनुसंधान और उसकी प्राप्तिके ब्रह्मचर्य जैसे मुख्य साधनों का प्रतिपादन ही इस माग का भयान विषय है। 'ब्रह्मचर्य-संदेश' इस भाग को मुख्य रचना है ; और वह घटना-मूलक है । उसके पच मूलतः ईस्वी सन् १९०९ में लिखे गये थे ! उपनयन और वेदारम्भ संस्कार के अनन्तर पवित्र गुरुकुलीय वातावरण में रहते हुए क्रमशः जीवन में उत्तर- दायित्व की युद्धि के विकसित होने पर, देश की दुर्दशा से चिन्तित अवस्था में एक महापुरुष के चित्र के संदर्शन से जो दिव्य संदेश मिला था, उसीके अाधार पर उत्त पद्यों की रचना हुई थी। इसीलिए उक्त रचना को "चित्र-दर्शन' भी कहा जा सकता है। प्रथम भाग को अन्य रचनाओं में ब्रह्मचर्य के आदर्श से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने चाले 'नत का जीवन', 'ब्रह्मचारी के लिए शिक्षा का आदर्श' जैसे अत्यन्त धावश्यक प्रश्नों पर भी प्रकाश डाला गया है। दूसरे शब्दों में, भारतीय राष्ट्र की शिक्षा विषयक आधुनिक दुरवस्या के मौलिक परिष्कार की महती समस्या का बहुत कुछ समाधान ही प्रथम भाग का विषय है। द्वितीय भाग ( जीवन-पाथेय) का सम्बन्ध विशेषतः उन विशिष्ट प्राभ्या- त्मिक गुणों और संपत्ति के वर्णन से है जिनको अनिवार्यरूप से आवश्यकता उत्तरोत्तर आध्यात्मिक विकास और उत्कृष्ट प्रगति के महान् आदर्श को अपने सामने रखकर जीवन-यात्रा करने वालों को हुआ करती है। ऐसी जीवन-यात्रा के लिए ही शास्त्रों में 'पुर की तीक्ष्म धारा के समान दुर्गम पथ' कहा गया है। जैसे- उत्तिष्ठत जागृत प्राप्य वरान्निबोधत धारा निशिता दुरत्यया। पथस्तत्कयो ( कठोपनिषद् ११३।१४) अर्थात्, उठो, जागो और महान पुरुषों से जीवन-यात्रा के लक्ष्य और कर्तव्यों को समझो। मनीषो लोग इसकी क्षुर की कठिन तोदय धारा के समान दुर्गम मार्ग जीवन में अवसाद अनुरसाद और निराशा को लाने वाले प्रायः ऐसे ही विच से हमारा प्राचीन पुराणों आदि का साहित्य भरा पड़ा है । उदाहरणार्य, देखिए- मृत्युलोके महादुम्स कथयामि ततः शृणु । ............ संसारः स्वममात्रश्च चला: प्राणा घनं तथा । सुसं तत्र न पश्यामि दुःसं तत्र दिने दिने । इन्द्रजालमयं दृष्ट्वा संसार अभ्रमध्ये च पश्यन्ति चञ्चलां विद्यतां गतिम् । क्षणं दृष्ट्वा च नश्यन्ति तथा संसारिणो जनाः।। जले च बुवुदो यद्वत्तद्वत्संसारिणो जनाः ।.. अर्थात, मृत्युलोक में महादुख है। संसार एक स्वप्नमात्र है। प्राण, धनादि अस्थायी है। उसमें सुख नाममात्र नहीं है। दुख प्रतिदिन रहता है। संसार इन्द्रजालमय या धोखे की चीज है । वादलों में चघल विद्युत् अथवा पानी में बुलबुले के समान ही मनुष्यों का जीवन है । इत्यादि। दूसरी हटि के अनुसार, जीवन प्रेम और करुणा के घाम भगवान् का परमोत्कृष्ट प्रमाद है। वह हमारे उत्तरोत्तर विकास का, उत्कृष्ट प्रगति का एकमात्र साधन है । उसका परम लक्ष्य प्राननत्व, नियस या अमृतत्व है। इसी दूसरी दृष्टि को हम जीयन का दिव्यपक्ष रह रहते हैं। वेदादि शास्त्रों में 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (बृहदारण्यकोपनिषद् ११३।२८) (अर्यात, भगवन् ! हमें अन्धकार से प्रकाश को भार ले चलिए), 'जीवा ज्योतिरशीमहि (ऋग्वेद ७॥३२॥२६) (अर्थात्, हम जीवन में विशुद्ध प्रकाश को प्राप्त करें), उद्वर्य तमसस्परि स्वः पश्यन्त उत्तरम् । देवं देवना सूर्यमगन्म क्योतिरुत्तमम् ।। ( यजु० २०११) (नर्यात, अहान से प्रकाश की ओर बढ़ते हुए हम अपने को उत्तरोत्तर समुजत करें) इत्यादि पचन जीवन के इसी दिव्यपक्ष की व्याख्या करते हैं। जीवन के इसी दिव्य-पक्ष के सदेश को दूसरों तक पहुँचाने के लिए, सबसे भगदान के सर्वोत्कृष्ट प्रमाद रूप जीवन के मन्थन से अमुग्न अमृत का दिव्यरस. पान कराने के लिए, इस प्रन्य की प्रति हुई है। दूसरे शब्दों में, जीवन में उदात्त भावनाओं के दिव्य संदेश की नवीन स्मृति, नवीन जागरण, नराभ्युत्थान का लाना ही इस रचना का मुख्य उद्देश्य है।
विषय-निर्देश मनुष्य जीवन के उत्तरोत्तर विकास को अवस्थाओं की दृष्टि से पुस्तक लक्ष्या- नुसन्धान, जीवन-पाथेय तथा प्रज्ञाप्रसाद नामक तीन मुख्य भागों (प्रसव अपवा प्रवाह) में विभक्त की गयी है। प्रथम भाग (-लक्ष्यानुसंधान) में मनुष्य जीवन के लक्ष्य पर विचार किया गया है। जीवन की महत्त्वपूर्ण यात्रा पर चलने से प्रथम जीवन लक्ष्य का अनुसंधान और उसकी प्राप्तिके ब्रह्मचर्य जैसे मुख्य साधनों का प्रतिपादन हो इस भाग का प्रधान विषय है। 'ब्रह्मचर्य-संदेश' इस भाग को मुख्य रचना है; और वह घटना-भूलक है। उसके पथ मूलतः ईस्वी सन् १९०९ में लिखे गये थे। उपनयन और वेदारम- संस्कार के अनन्तर पवित्र गुरुकुलीय वातावरण में रहते हुए मशः जीवन में उत्तर- दायित्व की बुद्धि के विकसित होने पर, देश की दुर्दशा से चिन्तित अवस्था में एक महापुरुष के चित्र के संदर्शन से जो दिव्य-संदेश मिला था, उसीके श्राधार पर उक्त पद्यों की रचना हुई थी। इसीलिए उक्त रचना को “विन दर्शन' भी कहा जा सकता है। प्रथम भाग की अन्य रचनाओं में ब्रह्मचर्य के आदर्श से घनिष्ठ सम्बन्ध रखने वाले व्रत का जीवन', 'ब्रह्मचारी के लिए शिक्षा का आदर्श' जैसे अत्यन्त आवश्यक परनी पर भी प्रकाश डाला गया है। दूसरे शब्दों में, भारतीय राष्ट्र की शिक्षा-विषयक प्राधुनिक दुरवस्या के मालिक परिष्कार की महती समस्या का बहुत कुछ समाधान ही प्रथम भाग का विषय है। द्वितीय भाग (-जीवन-पाथेय) का सम्बन्ध विशेषतः उन विशिष्ट प्राध्या- स्मिक गुणों और संपत्ति के वर्णन से है जिनकी अनिवार्यरूम से आवश्यकता उत्तरोत्तर आध्यात्मिक विकास और उत्कृष्ट प्रगति के महान् भादर्श को अपने सामने रखकर जीवन-यात्रा करने वालों को हुआ करती है। ऐसी जीवन-यात्रा के लिए ही शास्त्रों में 'पुर को तीन धारा के समान दुर्गम पथ' कहा गया है। जैसे- उत्तिष्ठत जागृत प्राप्य वरान्निबोधत क्षुरस्य निशिता दुरत्यया दुर्ग पथस्तत्कवयो बदन्ति। ( कठोपनिषद् ११३१४) अर्थात, उठो, जागो और महान पुरुषों से जीवन यात्रा के लक्ष्य और कर्तव्यों को समझो। मनोवो लोग इसको धर को कठिन तीश धारा के समान दुर्गम मार्ग धारा r इस दुर्गम पथ पर सास यात्रा के लिए उपास चरित्र, प्रशान्त मन, मान-संशुद्धि प्रमोद सपा पैर्य आदि की परम पावश्यकता होती है। तमी लो शुति ने नाविरतो दुश्चरितानाशान्वो नासमाहितः । नाशान्तमानसो वापि प्रज्ञानेननमाप्नुयात् ।। (कटोपनिषद ।।२४) थर्यान, दुधरित्र, असयत, अस्थिर-पुद्धि और मशान्त मन घाला व्यक्ति सत्य को नही पा सकता। ऐसे ही विचारों के आधार पर इस जीवन-पाथेय-नामक द्वितीय भाग में अध्यात्मिक नीयन-विकास के लिए परमोपयोगी पारश-चिन्तन, चारिश्य-संपत्ति भाव-शुद्धि, सत्याचरण, इन्दिय-संयम, धैर्य, सत्सर-माहात्म्य जैसे विषयों का प्रतिपादन किया गया है। तृतीय भाग (प्रज्ञा-प्रसाद) में श्राध्यामिक विरास की उस उत्कृष्टतर अवस्था का वर्णन है जब कि पलोन्मुख जीवन यात्रा का यात्री, विषयासक्ति और धुदवासनाओं से ऊपर उठ कर, अपने चरम लक्ष्य के प्रकाश में, समस्त विश्व का संचालन करने वाली, उसमें प्रोत-प्रोत (तु. “स ओतः प्रोतच विभूः प्रजामु", यजुक ३२) और उससे बाहर भी अवस्थित, मौलिक महान् सत्ता के साथ अपने व्यक्तित्व के घनिष्ठ सम्बन्ध को देखता हुथा, अपने जीवन को वास्तविक चरितार्थता और कृतकृत्यता का अनुभव करता है। उस उत्कृष्ट अवस्था का मूल्यांकन किसी भी भौतिक संपत्ति आदि से नहीं किया जा सकता । वह तो स्वयं ही अपना मूल्य है । यही 'प्रज्ञा-प्रसाद' को अवस्था है। इमी को वास्तव में 'सौम्या मनःस्थितिः। कह सकते हैं। उक्त अवस्या का ही विशद वर्णन इस भाग में मूलतत्वानुभूति, आत्म-तत्व. विवेचन, ब्रह्म-भावन, तत्त्वसाक्षात्कार इन अवान्तर-खण्डों में अनेक रचनाओं द्वारा किया गया है। उक्त तीनों भागों के अधिदेवता वर्तमान भारत के नवजागरण में, ज्ञान कर्म और उपासना के भेद से काण्डत्रयात्मक मानव-जीवन को प्रकाश और प्रेरणा के देने में निर्विवाद रूप से प्रमुख स्थान स्वामी दयानन्द सरस्वती, महात्मा गांधी और परमहंस रामकृष्ण इन तीन महापुरुषों का है। उनके अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र के अनुसार अन्य के सौनों भागों को हम प्रमशः, अधिदेवता के रूप में, एक महापुरुषों की सेवा में विनीत भाव से समर्पित करते हैं। । ६ ।
. प्रक्रिया और शली पुस्तक को रचना शैली के विषय में हमें विशेष कहने की आवश्यकता नहीं है। हमारा सदा से यह सिद्धान्त रहा है कि किसी भी रचना के लिए उसमें प्रसाद गुण का होना अत्यावश्यक है । वही मिष्टाम सर्वात्तम समझा जाता है जिसके माधुर्य का रसास्वादन मुख में रखते ही होने लगता है। इसी तरह उसी रचना का विशेष महत्व होता है जिसको सुनने के साथ ही अर्थावबोध होता जाता है और विचार की प्रगति में किश्चिन्मान भी बाधा नहीं आती। भगवद्वोता, मनुस्मृति, वाल्मीकि रामायण जैसे प्रामाणिक प्रन्थों की लोकप्रियता और महत्ता का मुख्य रहस्य उनकी सरल, सुवोध और हृदयाकर्षक शैली में निहित है। दूसरे, हमारा विश्वास है कि सस्कृतभाषा के प्रति जनता में अनुराग और आकर्षण उत्पन्न करने के लिए आधुनिक सस्कृत में उक्त प्रसाद-ग-बहुल स्वामाविक शैली को ही अधिकाधिक अपनाना चाहिए । उपर्युक्त कारणों से ही प्रकृत अन्य की रचना शैली प्रारम्भ से अन्त तक स्वाभाविक प्रसाद गुण से विशिष्ट है। पड़नेवाला अधिकारी व्यक्ति उसको पढ़ते-पढते तन्मय हुए बिना नहीं रह सकता। पाठक-न्द इसी प्रकार ग्रन्थ की रचनाओं का रसास्वादन कर सके, यही प्रकार का प्रथम ध्येय है। अमृतमन्थन की रचनाओं की दूसरी विशेषता उनकी अपारिभाषिकता है। यथासमन इसी लक्ष्य को सामने रखा गया है कि विभिन विषयों का प्रतिपादन ऐसे शब्दों में और ऐसे ढग से किया जाय जिससे उनके अन्तहृदय को, वास्तविक श्रभिप्राय को, किसी भी संप्रदाय, धर्म, सस्कृति या देश से सम्बन्ध रखनेवाला मनुष्य सरलता से हृदयगम कर सके। अभ की भूख की तरह विचारों की भूख भी मनुष्य मात्र में स्वभावत पायी जाती है। यह सर्वथा साध्य है कि उत्तम भोज्य पदार्थों के समान उत्कृष्ट विचारों को भी ऐसे रूप में रखा जावे कि वे सबको प्रिय ही। इसीलिए ऐसे विषयों के प्रतिपादन में जिनका सम्बन्ध मानव मात्र की समस्याओं से है अपारिमाषिकता का होना अत्यावश्यक है । विश्वविख्यात उपनिषदों की हृदय माहिणी प्रतिपादनशैली प्राय इसी प्रकार की है। हमें पूर्ण प्राशा है कि किसी भी संप्रदाय, संस्कृति अथवा धर्म से सम्बन्ध रखने वाला व्यक्ति 'अमृत मन्यन' के भावों का रसास्वादन कर सकेगा। साथ ही हम यह भी समझते है कि सस्कृतमापा का विशेष ज्ञान न रखने वाले लोग भी 'अमृत-मन्पन' को सरलता से समझ सकेंगे और उसके द्वारा अपने सस्कृत ज्ञान को बढ़ा सकेंगे।
पुस्तक की पृष्ठभूमि भौवन और जीवन माता के सम्बन्ध में प्रकार के अपने कुछ ऐसे विचार है जिनकी पृष्ठभूमि को समझे पिना प्रत अन्य को विशेषता को ददयंगम करना कटिंग है। पास्तव में प्रन्थ को जो कुछ विशेषता है उसका बहुत बड़ा कारण उक -भूमि में ही निहित है। उन विचारों का दिग्दर्शन हम निन्नरूप में कर सकते हैं (1) जीवन में प्राशावाद: दुसरे शब्दों में, निराशायाः समं पापं मानवस्य न विद्यते। मानरस्योमतिः सर्या साफल्यं जीयनस्य च । पारिताध्य तथा सृष्टेराशारादे प्रतिष्ठितम् ।। आशा सर्वोत्तम ज्योतिर्निराशा परमं तमः । (रश्मिमाला 11-३) अर्यात, मनुष्य के लिए निराशा के समान दूसरा पाप नहीं है। मनुष्य को सारी सति, जीवन की सफलता और सुष्टि को चरितार्यता प्राशावाद में ही प्रतिष्ठित है। आशा सर्वोत्कृष्ट प्रशश है । निराशा घोर अन्धकार है। (२) प्रेम और करणा के धाम भगवान की पृष्टि में दूध की प्राति निष्प्रयोजन नहीं हो सकती। उसको हमें अपने उत्तरोत्तर उत्कर्ष की प्राप्ति के लिए सौदी हो सममना चाहिए । इसीलिए उत्तरोत्तरमुत्कृष्टप्रगतायुत्सुकन्तु यः । दुःसानां स्वागतं युवंस्तत्वज्ञो नावसीदति ।। (रश्मिमाला ९९) अर्यात तत्यानी मनुष्य जो अपने जीवन में उत्तरोत्तर उत्कृष्ट उमति के लिए उत्सुक रहता है दुःखों का स्वागत करता हुमा उनले दिपार को नहीं प्राप्त होता । (३) उत्तरोत्तर समुत्कर्ष को प्राति ही हमारे जीरन का लक्ष्य है। क्योंकि, उत्तरोत्तरमुत्कर्पि जीवन शाश्वतं हि नः । (रश्मिमाला ) हमारा जीवन उत्तरोत्तर समुन्नति शील और वास्तव में सदा रहने वाला है। (४) मूल तत्व के विषय में, परम मत्य के अन्वेषण में, अमाप्रदायिक भावना । षयोकि, भापासीमामतिप्रम्य ज्ञानगम्यं कथंचन ! स्वयभु, यस्तुतो नाम्ना रहितं तद्धि वर्तते ।। (रश्मिमाला ६०२)
अर्थात्, मूलतत्त्व भाषा की सीमा को अतिक्रमण करके रहता है, अर्थात्
भाषा द्वारा उसके स्वरूप का वर्णन कठिन है। वह स्वयम्भू है, स्वयं सिद्ध है
वास्तच में उसका कोई अपना नाम नहीं है।
प्रस्तुत प्रन्थ की विचारधारा को, उसकी विशेषता को, यथावत् हृदयंगम करने
के लिए उक्त पृष्ठभूमि को समझ लेना आवश्यक है।
इसीलिए प्रत्य के परिशिष्ट-भाग में इस विषय को और अधिक स्पष्ट करने का
हमने यम किया है।
उपसंहार
पूर्व प्रकाशित अपनी पुस्तक रश्मिमाला (अथवा 'जीवनसंदेश गीताञ्जलि') की
रचनाओं के समान अमृतमन्यन की रचनायें भी समय समय पर श्रात्म-संतोष के
लिए, हो लिखी जाती रही हैं। प्रात. सायं के भ्रमण में, रेल आदि की थाना में, और
कमी-कमी साधारण से अवसर पर ही, उत्पन्न समस्याओं या विचार-तरनों से हो
इनके लिसने में प्रेरणा प्राप्त होती रही है। इनको क्या प्रकाशित किया जा रहा है।
इसका उत्तर हम ऊपर दे चुके हैं
'रश्मिमाला के समान ही यह अमृतमन्थन' भी श्रद्धय राजर्षि श्री पुरुषोत्तम-
दास टंडनजी की प्रेरणा और प्रस्ताव के कारण भारतीय संस्कृति-सम्मेलन के
तत्वावधान में प्रकाशित किया जा रहा है। निस्सन्देह पुस्तक के लिए यह विशेष
गौरव की बात है।
घड़ी प्रसन्नता का विषय है कि पुस्तक का प्रकाशन वाराणसी की सुप्रतिष्ठित
विद्याभयन संस्कृत ग्रन्थमालामें हो रहा है। इसके लिए हम प्रन्यमास के उत्साही
और विद्या प्रेमी अध्यक्ष श्रीजयकृपादास गुप्तजी के विशेष कृतज्ञ हैं। कहने को आवश्यकता
नहीं है कि उन्होंने पुस्तक को शुद्ध और मुन्दर मुदित कराने में यथाराम प्रयल
किया।
अन्त में हमारी यही हार्दिक कामना है कि
भद्रा भयतु नो याणी तेभ्यो ये वामधीयते ।
भद्रा उत प्रस्तयो जागृयाम पुरोहिताः ॥१॥
मह पाणी पदने वालों के लिए कल्याणकारिणी हो। इस अन्य में हुई विमिन
विषयों को प्रशस्तियों (वर्णन ) मगम और कल्याण करने वाली हो । राष्ट्र.
निर्माण में मार्गदर्शन करने वाले हम लोग अपने कर्तव्य पारन में सदा सावधान
भौर तरसर रहे!
भद्राः सन्तु प्रशस्तयो मदा यायो योविदः।
जागृयाम पुरोहिताः॥२॥
प्रन्पकार को प्रशस्तियाँ मुन्दर मौर मुखर सिस। शब्दावली मी सब के दिव-धन में समर्ष दी। जनता का मार्ग-प्रदर्शन पाने वाले हम अन्यधर लोग अपने कर्तव्य-पालन में पारद। तमसस्परि पश्यन्तो नित्यं सांयमुत्तरम् । अमुकीमहि पज्योतिरुत्तमं यदनामयम् ॥३॥ तर प्रकाश को आदर्शरूप में देखते हुए हम रोग, थानान्धकार की वर्तमान अवस्था से ममरा उपर उठा, उस उत्तम प्रमश को प्राप्त हो ओ सब प्रसार के अन्धकार से, अज्ञान से, और अपूर्णता से रहित है। वैदिक स्वाध्याय मन्दिर, ज्योतिरानम, वाराणसी छावनी ज्येष्ठ कृष्ण ५, २०१३ (२९॥॥१९५६) मङ्गलदेव शास्त्री विषय-सूची [१] [३] [१५] प्रत्यसमर्पण प्रस्तावना शुद्धाशुद्धसूची मातृ भूमि का अभिनन्दन ( संस्कृत में वैदिक पद्धति से ) ऊपर के अभिनन्दन का हिन्दी में अनुवाद भारत्या सुप्रभातम् देववाणी का नव जागरण १ २ ५ सन्तो मधुमता ७ अमृत-मन्थनम् महलाचरणम् प्रथम प्रवाह लक्ष्यानुसन्धान १ ब्रह्मचर्य संदेशः ( ब्रह्मचर्य का संदेश) २ मतमात्मविशुद्धये - प्रत से प्रात्म-शुद्धि) ३ श्रात्मवत्तागुणोपेता ( ब्रह्मचारी की शिक्षा का स्वरूप) २८ ४ ब्रह्मचर्य तदिष्यताम ( = ब्रह्मचर्य की महिमा) ब्रह्मचारिणः परेशस्तोत्रम् (ब्रह्मचारी की ईश्वर प्रार्थना) । ५ द्वितीय प्रवाह जीवन-पाथेय ( = आदर्श-चिन्तन) ६ भादर्श चिन्तनम् १७ चारित्र्य-संपत्तिः चारिश्य-संपत्ति चारिश्यमारमन स्वास्थ्यम् चारित्यं मरपक्षस्य सुगन्धि पुपं शुमम् ( = चारिभ्य और भारमा का स्वास्थ्य)३९ ( = चारिश्म-चर्चा) ८ । ११ ।
( ४२ ११ ४४ ४७ - ५० विमुखा हुन्त मानवाः! चारिध्य की उपेक्षा) १. गृहरूपं मनोऽस्माकम् ( = भाव-संशुद्धि) सद्विचाराः प्ररोहन्ति (सद्विचारों का विकास) शुमसंकल्पवारिणा १२ कृपया परयाविष्टो ( = मद मोह से प्रस्त मनुष्य) दर्श दर्श भवाम्यहम् १३ जीवनेऽस्मिन्महाँक्षामः अन्तरात्मा का विरोध) स्वान्तस्तोपो निगद्यते १४ सस्य जयति मध (= सत्य की जय) सत्यस्य हि प्रतिष्ठायां सत्य और चारित्र्य) चारिन्य स्थितिमश्नुते যামু शारीरिक स्वास्थ्य इन्द्रियसंयमञ्च तथा इन्द्रियसंयम १६ स्वस्योऽहनात्र संशयः स्वास्थ्य का मन्न) न शरीरकृते भयम् - हम शरीर के लिए नहीं है ) १८ अतिधाममहो मोहादायुमर्माणि । -स्वास्थ्य के नियम) कुन्तति १९ शारीरं स्वास्थ्यमानित्य स्वास्थ्य-रक्षा के लिए यल) सर्वमन्याप्रवर्तते २० ययाच्चागिने गच्छन् (: इन्द्रिय संयम) इन्द्रियागौ प्रमोन (इन्द्रियों में प्रसफि) दोषमृच्छत्यसंशयम् २२ विचरेदिमितेन्द्रियः (= जीवन-यात्रा) कर्ममार्ग पर्म का मार्ग २३ चतुरसेटमसिद्धि- ( कानपुरस्सर कर्म च महत्व) मायण कल्पनालोके ( = पर्तमान की उपेक्षा) विचरन्तोद मानवा. २५ मालम्बनं धम् ( = धैर्य का पालम्पन) २६ धौरा धपुरन्धरा (दुसागम से स्याण) लोकनीतिः व्यावहारिक नीति विया समुनिपथं निरादौरोति ( विशा-चंदना) सः मुटो शर्मशतानि सूते (सरसा-माहात्म्ब) ~ २१ %3 ६१ ७१ सजना पापनिवदबुद्धि २. निरादरस्यास्पदमस्ति यारमा ३१ सालेषु धन्धो ननु कुलराणाम् ३२ नीतिमुक्तावलि (= असज्जनों का स्वभाव) याचना से अपमान) ( = सामर्थ्य की महिमा) (= नीति के मोती) ૭૨ तृतीय प्रवाह ८२ ८३ प्रज्ञा-प्रसाद ३३ अनन्तमनवच्छिन्नं (= मूल तत्व की अनुभूति ) यत्तत्त्वं तदुपास्महे ३४ परमतत्त्वमहं नतोऽस्मि (=परम तत्व को नमस्कार) तषः शिवं वितनुता (शिवस्वरूप परम धाम ) परमं हि धाम ३६ नूनं मरूं हितधिया समुपाश्रयन्ते (= पूर्ण पुराण-पुरुष) ३७ स्रोतः सुखस्य सलिलेन परिमृतं तत् (-मनुष्य का महान मोह) आत्मतत्त्वविवेचनम् आत्मतत्व का विवेचन ८७ D (: सर्वदानन्दरूपं तदात्मतत्त्वं (-अपना स्वरूप) मनीषिणाम् ३९ ज्योतिषामपि तज्ज्योतिरात्मतत्वं (-प्रकाशस्वरूप आत्मतत्व) मनीपिणाम् चञ्चले तु जगत्यस्मिन्नेक = श्रात्म-तत्त्व की स्थिरता) श्रात्मैव निधल' ४१ शिलासंघालसंकाशाः (= महात्माओं का स्वभाव) सुस्थिरा दृढनियया. ४२ मदर्थ खलु रश्यानि - हरस हमारे लिए हैं) न तदर्थ समास्तिता ४३ सत् त्वं तत्ते महद्धनम् = श्रात्मस्वरूप में संस्थिति) सोऽहं न संशयः (= मैं कौन हूँ.) १ ( ( ૨૨ ब्रह्म-भावनम् = ब्रह्म का चिन्तन ४५ शेते सुप्त इचोरग. ४६ भूमा व सुखमाम्नातं सुखमरपे न विद्यते (= ब्रह्म-सायुज्य प्राप्ति का क्रम) (= विशाल चिन्तन का महत्त्व ) [ १३ 1 - प्रसन्नता का मूल-स्रोत) (-अभिमान का आवरण) मस्वा घीरोच शोचति ४८ यात्मानममिमानोऽयं नूनमात्य तिष्यति ४९ विहमोऽनन्त माकाशे ५० काठपुतलिका व ५७ दिम्यजीवनमार्गस्यो मवेयमिति भावये = अनन्त की यात्रा) (= विश्व का सूत्रधार) (= दिश्य शैशवी अवस्पा) १०१ तत्त्यसाक्षात्कारः परम-तत्व का साक्षात्कार ( ११४ ११५ ५२ यस्मात्परतरं नास्ति = समस्त शक्तियों का मूल सोत) तदहं नित्यमाश्रये ५३ तदहं नित्यमानये (= मूल तख में आस्था) ५४ कृष्ोत्याकर्षकं तत्त्वम् (= कृष्ण-तत्व मोर्मासा) ২ লামুলি -आनन्द की अनुभूति) ५६ अनन्ते प्रगर्माग (= प्रगति का अनन्त मार्ग) ६५७ सदानन्दो बसाम्यहम अानन्द निर भगवान्) अयि विश्व-भावन। = भगवान् की महिमा) विश्वमृद्। परिशिष्ट-भाग परिशिष्ट - (क) आशा सर्वोत्तम ज्योतिः = श्राशा सर्वोत्कृष्ट प्रकाश है) १२३ (ख) जीवनस्य रहस्यम् (=जीवन का रहस्य) १२४ (ग)संयतस्व जोवनाय -जीवन के लिए चरावर यक करो) १२६ (घ) दुख-मीमांसा (3 -दुःख के स्वरूप पर विचार ) १२७ (1) जीवने नायसाहश्यम् (= जीवन नाय) १३४ (च) उत्तरोत्तरमुन्नतिः (:: उत्तरोत्तर उन्नति परिशिष्ट २- तत्त्वमीमांसा (= मूल तत्व का विचार) १३६ परिशिष्ट ३ ओंकार माहात्म्यम् = चौकार की महिमा) ( ( JAGDIO- [१४]
शुद्धाशुद्ध-सूची
पृष्ठ
अशुद्ध
10
द्वितीय
तृतीय
८४
२
तनो
१२
लोक की संख्या ।। ११॥ चाहिए
मातृभूमेरभिनन्दनम् सा नो माता भारती भूविभासताम् येय देवी मधुना तर्पयन्ती तिम्रो भूमीरधुना द्योगपस्थान । सामान् दुग्धे प्रिकर्पत्यलक्ष्मी मेधा श्रेष्ठ सा समारमामु दध्यात ॥ १ ॥ मर्ये वेदा उपनिषदश्च सर्चा धर्मग्रन्थाश्चापरे निधयो यस्याः । मृत्योर्मानमृतं ये दिशान्ति चे सा नो माता भारती भूर्षिभासताम् ॥ २ ॥ यां प्रच्युतामनु यज्ञाः प्रायान्ते उत्तिष्ठन्ते ते भूय उत्तिष्ठमानाम् । यस्या व्रते प्रसचे धर्म एजते सा नो माता भारती भूविभासताम् ॥ ३ ॥ यां रक्षन्त्यनिशं प्रतिबुध्यमाना देवा ऋपयो मुनयो हप्रमादम् । राजर्पयोऽपि ह्यनघाः साधुवर्याः सा नो माता भारती भूर्विभासताम ॥ ४ ॥ महान्तोऽस्यां महिमानो निविष्टा देवा गातुं यां क्षमन्ते न सद्यः । सा नो बन्या भ्राजसा भ्राजमाना माता भूमिः प्रणुदतां सपनान् ॥ ५ ॥ अभिनन्दनमिदं पुण्य दिव्यभावैः समर्हितम् । मातृभूमे पठन्नित्यमात्मकल्याणमरनुते ॥ ६ ॥ । PORAGISO-
भारतीय संस्कृति की दृष्टि से
मातृभूमि का अभिनन्दन
विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि भारत देदीप्यमान हो!
१. धुलोक से मानो अवतीर्ण,
तीनों लोकों को दिव्य माधुर्य से आपूर्ण करनेवाली,
अभिलषित कामनाओं को देनेवाली
तया दुःख दारिद्रय (अलक्ष्मी ) को हटानेवाली,
देवीस्वरूपिणी भारत-माता
सविचारों की साधना में हमारी सहायक हो ।
२. मनुष्यों को मृत्यु से हटाकर
अमृतत्व की प्राप्ति का उपदेश देनेवाले
समस्त वेद, उपनिषद् तथा अन्य (बौद्ध, जैन भादि ) धर्म अन्य
जिस के निधि स्वरूप हैं,
वह विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि भारत देदीप्यमान हो!
३. जिसका अपकर्ष संसार में
धर्माचरण के अपकर्ष का कारण होता है,
जिसके उत्कर्ष में धर्माचाए का उत्कर्ष निहित है,
जिससे धर्म को प्रेरणा प्राप्त होती है,
वह विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि भारत देदीप्यमान हो!
[ २ ]
४. देवगण, ऋषि, मुनि, राजन
और पवित्रारमा सन्त-महात्मागण
सावधानता तया तत्परता से
जिसके कल्याणमय स्वरूप की निरन्तर रक्षा करते आये है,
वह विश्वप्रसिद्ध हमारी मातृभूमि मारत देदीप्यमान हो।
५. जिसकी महिमा महान है,
देवगण भी जिसके स्वरूप का गान नहीं कर पाते,
समुज्ज्वल तेज से देदीप्यमान
वह सर्द-लोक-चन्दनीय हमारी मातृभूमि
विरोधी शत्रुओं को शमन (निराकरण ) करनेवाली हो!
माहात्म्य
६. मातृभूमि भारत के दिव्य मावों से युक्त इस पवित्र अभिनन्दन का नित्य
पाठ करने वाला मनुष्य यात्मकरयाज को प्राप्त होगा।
भारत्याः खलु सुप्रभातमभितः संवर्धतां भारतम् ! भारत्या भुवनेऽपिले पृथु यशस्वन्नद् युधानां मन:- स्वाशावल्लरिकामुमानि विकचीकुर्वत्तमो धारयत् । नूत्नज्ञानरः प्रकाशकिरणविस्तीर्यमाणं पुरो हृद्यं तत्खलु सुप्रभातमभित: संवर्धतां भारतम् ।। ( काव्यपद्धतिः) सुप्रभात विजयतां धियो यत्सुष्टिवर्धनम् । पथः सत्यस्य सातये ।। (मन्नपद्धतिः) देवाश्च वा असुराश्चोभये प्राजापत्या: पस्पपिरे। ते दण्डैधनुभिर्न व्यजयन्त । ते हाविजयमानाः प्रजापति पितरमुपतस्थुरस्माकमये भविष्य- त्यस्माकमयं भविष्यतीति । प्रजापति ज्योतिदेवेभ्यः प्रददा एतद्वो विजित्यै भविप्यति, तमोऽमुरेभ्य: प्रदा एतद्वो विजित्यै भविष्यतीति । तस्मादेवा ज्योतिपा विजयन्ते, असुरास्तमसा । तस्मादायोतिर्जुपो ये देवाः, असुरा- स्तमोजुषः । अथ प्रभात एव प्रथमं देवा ज्योतिरपश्यन् । प्रभात एवोप- बुधोऽनिस्तायते । अनिमुसा वे देवाः । तस्मात्प्रभातमेव ज्योतिषां ज्योतिः । सुप्रभातमु ह सस्य भवति, तमसः पार याति य एवं विद्वान् ज्योतिर्जुपो देवान्वेद । ज्योति सत्यम् । ज्योतिरमृतम् ।। (ब्राह्मणपद्धतिः) [४] देववाणी का नवजागरण भारत में सर्वत्र भारती ( देववाणी) का सुप्रभात होये ! समस्त ससार में भारती के विपुल यश को फैलाता हुआ, विद्वानों के हृदयों में पाशा बल्ली के कुसुमों को विकसित करता हुश्रा, अज्ञानान्धकार को हटाता हुअा. नवीन ज्ञान के सूर्य के प्रकाश की किरणों के साथ सामने फैलता हुआ, मुन्दर सुप्रभात (= नवजागरण ) भारत में सर्वन वृद्धि को प्राप्त हो! सच्चे मार्ग की प्राप्ति के लिए, युद्धि को पुष्टि-प्रदान करने वाले, सुप्रभात (नवजागरण) की जय हो ! प्रजापति से उत्पन्न देवता और असुर दोनों परस्पर में स्पर्धा करने लगे। दण्डों और धनुषों की सहायता से उनमें से किसी की विजय नहीं हुई। तब यह सोचते हुए कि प्रजापति हमारा पक्ष लेगा, दोनों पक्ष प्रजापति के पास पहुंचे। प्रजापति ने 'इससे तुम्हारी विजय होग।' यह कहते हुए ज्योति अर्थात् प्रकाश देवताओं को दिया और अन्धकार असुरों को दिया। इमी से प्रकाश में देवताओं का और अन्धकार में असुरों का उत्कर्ष होता है। इसीलिए कहते है कि देवता प्रकाश से और असुर अन्धकार से प्रेम करते हैं। तब देवताओं ने प्रकाश को प्रयमत प्रभात के समय ही देखा। उप काल में जागनेवाली श्रमि का विस्तार प्रभात में ही होता है। अग्नि ही देवताओं का मुख है। इसलिए प्रभात ही ज्योतियों की ज्योति है। जो विद्वान् यह जानता है कि देवत्ता प्रकाश से ही प्रेम करते हैं, उसी का सुप्रभात (= नवाभ्युत्थान ) होता है, वही अज्ञानान्धवार को पार कर जाता है । प्रमाश ही सत्य है । प्रकाश ही अमृत है।
सन्तो मधुव्रताः सान्द्र पोत्या शाखरेसामृतम् । लोकोत्तरं तथाक्षय्य मानन्दमुपभुते ॥१॥ सत्पुरुषों का स्वभाव मधु-पान रसिक श्रमर के समान होता है। चे शास्त्रों के रस रूपी अमृत को तन्मयता के साय पीकर अक्षम्य लोकोत्तर भानन्द का उपभोग करते हैं। dada [७]
meanta
महर्षि स्वामी दयानन्द सरस्वता
अमृतस्य निए
समजीवयत् ।
मन्ये मो भारत भूयो महषि त नतोऽस्म्यहम् ॥
प्रथमः परित्रका
लक्ष्यानुसन्धानम्
इह चेदवेदीदथ सत्यमस्ति । न चेदिहावेदीन महती बिनष्टिः ।
(केनोपनिषद् २५)
मा प्रगाम पथो पयम् ।
(माग० १०५७१)
मथम प्रवाह
लक्ष्यानुसन्धान
इसी जन्म में यदि जीवन के लक्ष्य को जान लिया, तो ठीक है । यदि नहीं जाना,
तो घड़ी हानि है।
(केन उपनिषद् २।५)
हम जीवन में पथ-भ्रष्ट न हो।
(ग्० १०५१)
(१) ब्रह्मचर्य-संदेशः ब्रह्मचर्य का संदेश - कदाचिदेकान्तगतो विचार- परम्परान्दोलितमानसोऽहम् । हीनां दशा भारतमानभूमे- विचिन्त्य चिन्ताकुलतामगच्छम् ।। १ ।। कमी एकान्त में बैठे हुए, जब कि विचारों के प्रवाह से मित्त आन्दोलित हो रहा था, मातृ-भूमि भारत को हीन दशा को सोचते-सोचते में चिन्ता से व्याकुल हो गया। शोकामिना दग्धमिवातिदीनं मनस्तदा मे गतधैर्यमासीत् । धूमेन योर्नु समुत्थितेन व्याप्तं शिरश्चेतनतामहासीत् २ उप समम शोक-रूपी पति से मानो जले हुए मेरे अतिदीन मन ने धैर्य को खो दिया। उस रहि से मानो उठे हुए धुंए से मेरा मस्तिष्क व्याप्त हो गया और उसकी चेतनता जाती रही। बालादिविस्फोटनतो नु जातं भयावह वेपथुमन्यभूवम् । विदीर्गमस्माद् घृदयं मदीयं ममस्तथासीत्तमसीन लोक: ।। ३ ।। उस समय ज्वालामुखी पर्वत के विस्पोट से उत्पम से कम्पन धे मैने अनुभव किया। इससे मेरा इदय विदा हो गया और ऐसा प्रतीत हुआ कि सारा संगर मन्धघर में हर गया है। [ १३ ] आवर्तमाये पवितव नीका शोकाधिमन हृदयं ममासीत् । राहुर्यथा पीडयतीन्दुविम्वं प्रस्तो मेहेर्दुष्टतरैस्तथासम् ॥ ४ ॥ स समय मैंवर के बीच में पड़ी हुई नौका के समान मेरा हृदय शोक-सागर में इंच रहा था। जैसे राहु चन्द्रमा के विम्ब को पीडित करता है, उसी प्रकार दुष्ट ग्रहों से मैं मस्त हो रहा था। आसीदवस्था मम या तदानीं वाणी न वक्तुं खलु तां समर्था । आपादचूडं सुतरां निमम- स्तदाभयं दुःसपयोधिमध्ये ॥ ५ ॥ उस समय मेरी जो अवस्था हो रही थी पाणी उसको नहीं कह सकती। उस समय में पैर से लेकर सिर तक दुस-सागर में वित्त मा हुमाया। समासीनत्य मम मनसि चिन्तापरयशे शुषा दग्धे, लीने नयनयुगले घोरतमसि । तदा चित्रे कस्मिंश्चिदपि मम दृष्टिहि सहसा गता, येनैवाई झटिति गमशोफः समभयम् ॥ ६॥ इस दशा में बैठे हुए, जय किचिन्ता से प्याकुल मेरा मन शोक से जल रहा था और भयन-युगल पोर अन्धकार में पड़े थे, रहवा मेरी टि एक चित्र पर जा पड़ी। उससे मेरा सारा शोक तत्काल जाता रहा । तस्मिश्च पिने मृदुरम्यगात्रं कोपीनमात्र चसनं घसानम् । वेदेषु शातिशयं दधानं धर्मग्य पोतस्य प कर्णधार ॥ ७ ॥ विस्मृत्य सर्व स्यपायभायं दीनेपुदीनेषु दयास्यभायम् । पद्मासनेन स्थितमासनेऽई समापिनिष्ठं यमिनां परिष्ठम् ॥ ८ ॥ [ १४ ॥
सव्ये च वेदैरथ दक्षिणा कुण्डया यतीनामतिशोभमानम् । आस्यप्रभातोऽमृतमानरन्त तपोधनं ज्ञानवतां गरिम् ॥ ६॥ अभ्यन्तरे प्रज्वलतीर यस्य निरन्तरं धर्ममयः कृशानुः । सं श्रीदयानन्दमुनि महर्षि- मपश्यमानन्दपयोधिममम् ॥ १०॥ उस चित्र में मृदु और मुन्दर शरीर वाले, कौपीन-मान पन को पहने हुए, वेदों में अत्यन्त श्रद्धा को रखने वाले. धर्म के पोत के कर्णधार अपने और पराये के भेद-भाव को भूल कर दरिद्र और दीन-दुखियों पर दया-स्वभाव वाले, श्रासन पर पद्मासन से पैठे हुए, समाधिनिष्ठ, यमियों में श्रेष्ठ, चाममाग में वेद की पुस्तकों से और दक्षिण भाग में सन्यासियों के कमण्डलु से अत्यन्त शोभायमान, मुख की प्रमा से अमृत को घरसाते हुए, तपोधन, ज्ञानियों में गरिष्ठ, जिनके अन्दर निरन्तर मानो धर्म की ज्वाला प्रज्वलित हो रही है, मानन्द-सागर में मम उन महर्षि श्री स्वामी दयानन्द मुनि को मैंने देखा ॥ यदीयमालोकनमध्यधानि निहन्ति पुसा चिरसञ्चितानि । दृष्ट्या मुनि तं कमनीयकान्ति- मयं विचारो हृदि प्रादुरासीत् ।। ११ ॥ जिनके दर्शन -मात्र से मनुष्यों के चिर-सचित पाप नष्ट हो जाते हैं उन चमनीय-कान्ति मुनि को देख कर मेरे मन में यह विचार उत्पल हुश्रा-- ये पुन्दपुवयः समस्तभुवनैः कर्णावंसीकताः यः सर्पन शलाकयेव लिपिदिग्मिचयश्चित्रिताः । हिदि फल्पितरपि घयं हग रोमाधिता- स्तेषां धर्मनिधिर्षयं नु महतामेको गुणनां निधिः ॥ १२ ॥ जिन इन्दापपात महान गुणों को सुनने के लिए समस्त लोक लालायित रहते हैं, शलाका से मानो लिले हुए जिनगुणसे दिगूरूपी भित्तियों चित्रित हो रही है, जिनके विषय में रहने के लिए दृश्य में संकल्प मात्र से हम सघ हर्प से रोमाधित हो जाते हैं, ये धर्मनिधि महात्मा उन महान् गुणों के एकमान निधि हैं। समालोक्यवाह प्रचुरशमदं शान्तिनिलयं महस्तधिनं निसिलमरतापापहरणम् । समाश्वासं लन्ध्या समाहितचित्तः कथमपि पुरस्तात्तस्यैवं निजहृदयगाथामकथयम् ।। १३ ।। मधुर शान्ति को देने वाले, स्वयं शान्ति के स्थान, और संसार के समस्त तापों को हरने पाले महर्षि के उप चित्र को देखते ही सान्त्वना को पाकर किसी प्रकार चित्त को सावधान करके उसके सामने मैंने अपने हृदय की गाथा को इस प्रकार कहा- लब्धप्रसारं परितो जगत्या- मज्ञानजं पापमपास्य घोरम् । ज्ञानोपदेशेन जनेषु धर्म संस्थापयंस्त्वं जयसीह लोके ।। १४ ॥ संसार में चारों ओर फैले हुए अज्ञान से उत्या घोर पाए को हटाकर ज्ञानोपदेश द्वारा मनुष्यों में धर्म की स्थापना करने वाले आप की लोक में जय हो । सत्योपदेशैननु गर्जयित्वा प्रावृष्य धर्मामृतमा समन्तात् । पापानिकीलावलिदग्धचित्तान सञ्जीवयंस्त्वं जयसीह लोके ।। १५ ।। सत्य के उपदेशों से मानो गरज कर सब और धर्म रूपी अमृत की वर्षा द्वारा पाप-रूपी अमि की ज्वालाओं से एग्य-चित्त लोगों को जीवन-प्रदान करने वाले आप की लोक में जय हो । 1 "वहेद्रयोज्वालकीलावचिहति शिखा स्त्रियाम्' (अमरकोष १११६.)। [ १६ ।
1 सत्यप्रियोऽसत्यनिवारणोत्क: समस्तलोकस्य हिते सनिष्ठः । शास्त्रार्थगोष्ठीषु धुरन्धरस्त्वं विद्वदरेण्यो जयसीह लोके ।। १६ ।। सत्य को प्यार करने वाले, असत्य के निवारण में उत्सुक, सब लोगों के हित के संपादन में श्रास्था रखने वाले, शास्त्रार्थ सभाओं में धुरंधर और विद्वानों में श्रेष्ठ श्राप की लोक में जय हो । गोब्राह्मणानामतिदुर्दशा ताम् अनाथदीनानथ हीनसत्त्वान् । दृष्ट्वातिमात्रेण दयाचित्तो यथार्थनामा जयसीह लोके ॥ १७ ॥ गै और नाह्मणों को अत्यन्त दुर्दशा को तथा अनाथ दीन और दुर्वलों को देख कर दया से अत्यन्त आई चित्त तथा यथार्थ नाम घाले आपको लोक में जय हो। भवन्तं संस्तुत्य प्रगतविधिनाई गुरुवर ! समासाद्योच्छासं तब बदनचन्द्रादविरलम् । विनीतो यथान्यद् विवदिपुरिदानी, करुणया ग्रहीतव्यं, सन्तः परहितपरा: सन्ति सततम् ॥ १८ ।। गुरुवर ! नसता पुर सर आप की स्तुति कर के श्राप के मुखचन्द्र से मैंने पर्याप्त सान्त्वना प्राप्त की है। मैं विनीत भाव से और जो कुछ निवेदन करना चाहता हूँ उस को कृपया मुनिए, सत्पुरुष सदा दूसरों का हित करने में तत्पर रहते हैं। सर्थव्यवस्थास्वतिरेकभानात् स्वार्थप्रवृत्तलियोन्मुताम् । स्वच्छन्दमार्गेषु विजम्भितेषु सर्वत्र हा-हा-कृत्तमाविरासीत् ॥ १६ ॥ स्वार्थ की प्रवृत्ति के अत्यन्त घट जाने से सारी व्यवस्थाओं के मष्टप्राय हो जाने पर और स्वच्छन्द मागों के प्रबल हो जाने पर देश में सर्वत्र हाहाकार मच गया। मोहान्यकारे प्रसते समन्ताद् अस्तंगते शाश्वतधर्मभानी।
. -- मतान्यस्यानि समस्तदेशे तारा रजन्यामिव प्रादुरासन् ॥ २० ॥ शादत या सनातन धर्मरूपी सूर्य के मस्त हो जाने पर सब ओर बहान अन्यकार फैल गया। ऐसी दशा में रात्रि में ताराओं के समान समस्त देश में असंख्य मत मतान्तर चल पड़े। देशे सतो दुर्यलवां प्रयाते विनष्टसत्त्वे हतगौरव च । प्रजासु न्याय्येतरमार्गमासु वैदेशिफैः शासनमत्र लब्धम् ॥ २१ ॥ उफ कारण से देश के दुर्वल, निस्सत्त्व और गौरवविहीन हो जाने पर क्या जनता के नैतिकता से विपरीत मार्ग में चलने पर विदेशियों ने देश में अपना शासन स्थापित कर लिया। चिराय तच्छासनतो विशीर्णो परम्परा भारतसंस्कृतेः सा । विलुपधैर्या अथ भारतीयाः परेश्वरं प्रार्थयितुं प्रवृत्ताः॥ २२ ।। चिरकाल तक रहने वाले विदेशी शासन से भारतीय संस्कृति की विश्व प्रसिद्ध प्राचीन परम्परा नष्ट-भ्रष्ट हो गयी। तब भारतवर्ष-वासी अधीर होकर परमेश्वर से प्रार्थना करने लगे- त्रायस्व लोकेश ! दयासमुद्र ! दिने दिने वर्षद एव पापम् । सर्वस्वहीना हतभागधेया विचारमूढा वयमद्य सर्वे ॥ २३ ॥ हे लोकों के स्वामिन , दया के समुद्र भगवन ! हमारी रक्षा कीजिए । दिनों दिन पाप पढ़ रहा है। सब कुछ खोकर आज हम सब श्रमागे किंकर्तव्य-विमूढ हो रहे है। विस्मृत्य कर्तव्यपथं स्वकीयां परम्परां तां जगतोऽभिवन्द्याम् । असत्यमार्गेपु रताः समन्ताद् दूयामहेऽनर्थपरम्पराभिः ॥ २४ ॥ [ २८ कर्तव्य-पय को और जगन्दनीय अपनी उस प्रसिद्ध परम्परा को भूलकर हम उलटे मागों पर चलने से अनेकानेक आपत्तियों द्वारा सब ओर से सताये जा रहे हैं। आसीत्पुरा यद् बहुमानपानं विद्यागुरुत्वेन च यत्प्रसिद्धम् । तद्धारतं हीनदशां प्रपन्न- मनादरस्यास्पदमद्य जातम् ॥ २५ ॥ जो भारत प्राचीन काल में अत्यन्त संमानित था, जो विद्या-गुरु के रूप में प्रसिद्ध था, वह आज हीन दशा को पाकर अनादर का पान बन गया है। धनेन धान्येन सुपुष्कलेन स्वास्थ्येन वृत्तेन च सूपपन्नम् । आसीत्तदेवाच ततो विडीनं दृष्ट्वा प्रभो ! त्वां शरणं व्रजामः ॥ २६ ॥ जो भारत देश प्राचीन काल में पुष्कल धन और धान्य, तथा स्वास्थ्य और चारित्र्य से संपत था, उसी को आज उन सब से विहीन देखकर हे प्रभो ! हम श्राप की ही शरण में थाते हैं। रामः क रावणकुलस्य स धूमकेतुर् थावचतुर्दश समाः पितुराज्ञया य: । सत्यवतो गहनकाननमध्यवर्ती रक्षांसि मृत्युपथमाशुतरामनपीत् ॥ २७ ॥ जिन्हों ने पिता की माला से चौदह वर्ष तक गहन फानन में निवास किया और अतीव शीघ्रता से राक्षसों का संहार कर डाला, रावण के फूल को नाश करने वाले चे सत्य-प्रती राम कहा है। फाजातरायुरिह यः कुरुयशदीप: फालं निनाय विपिने स्वपणेन पद्धः । आजन्म येन वितथा नहि धागभाग स्यानि गतोऽसिलभुनि गुणरुदाः ॥२८|| जिन्होंने अपने बरन से मर हो कर जंगल में समय ये म्यतीत किया, जन्म-पर्यन्त मिप्या-मारग नहीं स्थिा, और मरने नदार गुणों से समास पृप्वी पर राधेमा यिा, औरण-राको प्रधशित करने वाले भातरा पुषितिरों है। [१६] भीष्मोऽपि कुन भुबने बलिनां बलिष्ठः संप्रीणनाय पितुरात्मपलि विधाय । मत्या तृणाय निखिलामपि राज्यलक्ष्मी- माजीवनं स्म चरति तिनां व्रतं यः ॥ २६ ॥ जिन्हों ने पिता की प्रसन्नता के लिए श्ररने को बलि देकर, और समस्त राज्य लक्ष्मी को तृण समान मान कर जीवन पर्यन्त प्राचर्य-अत का पालन किया था, पालियों में बलिष्ठ वे भीष्मपितामह आज संसार में कहाँ है ? स्नेहानुरागपरमोऽप्रजपादपद्म- द्वन्द्वे, विहाय विविधानि सुखान्यरण्यम् । यावः समुज्ज्वलयशा ननु लक्ष्मणो यः कास्तेऽधुना स पुनरिन्द्रजितो बिजेता ॥ ३० ॥ जिन्होंने अपने ज्येष्ठ भ्राता के पाद-पनों में स्नेह और अनुराग के कारण नाना प्रकार के सुखों को छोड़ कर पनवास स्वीकार किया था, वे समुज्वल यशवाले और इन्द्रजित् (मेघनाद) पर विजय पानेवाले लक्ष्मण आज कहाँ हैं ! प्राप्तं च राज्यमसिलं तृणवद्विहाय चीरं जटाश्च परिधाय पुराहियः । भ्रातुर्वनं गतवतः प्रदिपालनेन काल निनाय भरतः क गतोऽधुना सः ॥ ३१ ॥ हाय में थाये हुए समस्त राज्य को तृण के समान छोड़ कर तथा चीर और जटाओं को धारण कर जिन्हों ने चन-चास में गये हुए अपने भाई को प्रतीक्षा में नगर से बाहर रहकर समय को व्यतीत किया था वे भरत श्रय की है। हा क्रूर ! काल ! भवता किमिदं व्यधाथि हीनां दशां यत इमां गत एप देशः । एवं स्थितेऽपि दयसे न समीक्षमाण: को वेद का नु गविरस्य भविष्यतीति ॥ ३२॥ हे कर काल ! सुम ने यह क्या कर गला जिस से यह देश इस दोन दशा को पहुँच गया! ऐसी स्थिति में सब कुछ देखते हुए भी यदि तुम दया नहीं करते, तो कौन जानता है कि इस देश को क्या दशा होगी! [२०] तस्मात्त्वमेव भगवनिममाननाद श्रुत्वा विधेहि करुणामयि दीनबन्धो !! लोकत्रयस्य परिपालयितारमीशं त्यामेव भो अशरजैकशरण्यमाहुः ।। ३३ ।। ऐसो दशा में हे दीनवन्धी ! भगवन् ! इस भार्तनाद को सुनकर आप ही कृपा करें। आप तीनों लोकों की रक्षा करनेवाले ईश्वर है; पाप हो 'अशरणों के एकमात्र श्राश्रय' कहे जाते हैं। त्वं वायसे हि बलिन, न तदा महत्त्वं दीनान् समुद्धरसि, तर्हि तु ते महत्त्नम् । धारापरस्य किमु वर्षणमन्धिमध्ये. तश्चन्मरी भवति तस्य महत्त्वमाहुः ॥ ३४ ॥ भाप यदि बलवान् की रक्षा करते हैं तो इसमें आप का कोई महत्त्व नहीं; यदि आप दोनों का उद्धार करते है, तभी आप का महत्व है। समुद्र में मेघ के घरसने से क्या लाम! मरुस्थली में परसने पर ही उस का महत्त्व माना जाता हैं। इत्यं प्रजाभिर्यहु प्रार्थितः सन् लोकैकनाथोऽपि दयां चकार । संप्रेपितो यदु यमिनां वरिष्ठः स्वामी दयानन्दसरस्वती त्वम् ।। ३५ ।। इस प्रकार जनता के बहुत प्रार्थना करने पर लोकों के एकमात्र स्वामी भगवान् ने दया की और यमियों (मुनियों) में श्रेष्ठ आप स्वामी दयानन्द सरस्वती को भारत में जन्म दिया। दयापरस्त्वं जगदुर्दिधी: शास्त्राणि वेदांश्च समध्यगीष्टाः । सत्यप्रकाशन वतः समन्तात् प्रजागरोऽरश्यत नर एर ।। ३६ ॥ दयालुस्वभाव क्ले मारने नगर के उसार की रछा से शानों और वेदों में पा। सपनन्तर सत्र के प्रारा से एक नवीन जागरन सब और दिखाई देने मा। [२१] चिराय मोहोऽपगतः प्रजानां जातोऽपि भूय: स्वपरावबोधः । विदेशिनामाममणरय रोप- चिन्ता पदं लब्धपती समन्तात् ॥ ३७ ॥ जनता में चिरकाल से फैला हुआ अज्ञान दूर हो गया। फिर से अपने और पराये का ज्ञान उत्पम हुआ। विदेशियों के नाममण को रोकने की चिन्ता देश में सर्वत्र फैलने लगी। गीर्वाणवाण्याः पठनप्रवृत्तिर भूयोऽभितो भारतमा विरासीत् । स्वसंस्कृतेश्चोधरणस्य वार्ता पुनः श्रुतेर्गोचरतामयासीत् ॥ ३८ ॥ भारतवर्ष में चारों ओर देववाणी (संस्कृत भाषा) के पढ़ने की प्रवृत्ति फिर से दृष्टिगोचर होने लगी। अपनी संस्कृति के उद्धार को चात्ता पुनः सुनाई देने लगी। तथापि चैदेशिकराज्यशक्ति- स्तथा तदाचारविचाररीतिः । विजृम्भमाणा परितोत्र देशेऽ- स्मदीययनान् विफलीकरोति ॥ ३१ ॥ इस पर भी हमारे भारतवर्ष में सब ओर से बदती हुई विदेशियों के राज्य की शफि तथा उनके शचार-विचार की रीति हमारे प्रयों को विफल कर रही है। क्यं तदस्मिन् विपये विमूढा उत्साहचारित्र्यविवेकहीनाः । आत्मन्यनिश्वासहता निराशा- पानागिन: शाधि विधेयमन्त्र ॥ ४० ॥ सो इस विषय में हम किंकर्तम्य विमट हो कर रस्साह, चारित्र्य और विवेक खो चुके हैं। आत्मविश्वास के न होने से निराशा ने हम को घेर रखा है। हम को बतलाइए, यहाँ हम क्या करें! समाकरयता मे विनतिपरिपाटी करुणया स्मितं कुर्वन्मन्येऽमृतमिव समाश्यासबटुलम् । । २२ ] । अगादीत्तच्चित्रं मितममितसारं ननु पचो ह्यधोनिर्दिष्टं यत्पुनरपि समाधि नु समधात् ।। ४१ ।। मेरी उफ विनति को सुन कर मुझे ऐसा लगा कि, करुणा-पुरस्सर अमृत के समान सान्त्वना देनेवाले स्मित को करते हुए उस चित्र ने संक्षिप्त, पर सारगर्मित, निम्न-निर्दिष्ट वचन को कहा और फिर समाधि को धारण कर लिया। "ब्रह्मचर्य महान् यज्ञो ब्रह्मचर्य महत्तपः । ब्रह्मचर्येण सर्वोऽर्थः सिद्धो भवति भूतले ॥ ४२ ॥ मनीषितानामर्थानां सिद्धथै तगतये तथा । भारते ब्रह्मचर्यस्य युनः स्थापनमिप्यताम्" ॥ ४३ ॥ "ब्रह्मचर्य एक महान् यज्ञ है । ब्रह्मचर्य महान् तप है । प्रत्येक लक्ष्य की प्राप्ति संसार में ब्रह्मचर्य से हो सकती है। इसलिए अभीष्ट अर्थों की सिद्धि और उनके उत्कर्ष के लिए भारतवर्ष में फिर से ब्रह्मचर्य की स्थापना करनी चाहिए।" तदेतदतिसद्धितं चित्रेण ननु घोपितम् । प्रकृतापेक्षिणी तस्य काचिद् व्याख्या विधीयते ।। ४४ ॥ अति संतेप में मानो चित्र ने यही घोषित किया । प्रकृत विषय को टि से उसकी थोड़ी सी व्याख्या यहाँ की जाती है । सर्वेपामपि भूतानां यत्तत्कारणमव्ययम् । कूटरथं शाश्वतं दिव्यं, वेदो बा, ज्ञानमेय यन् ॥ ४५ ॥ तदेतदुमयं ब्रह्म ब्रह्मशब्देन कथ्यते । तदुद्दिश्य व्रतं यस्य ब्रह्मचारी स उच्यते ॥४६॥ सृष्टि के समस्त पदार्थों का जो अक्षय्य, कूटस्थ, शाश्वत, दिम्य मूलकारण है उसको, तथा ज्ञानरूप वेद को भी, ब्रह्म शब्द से कहते हैं। उस नाम की प्राप्ति के उद्देश्य से जो मत प्रहण करता है उसी को ब्रह्मचारी कहते हैं। समष्टिरूपं यद् ब्रह्म तद्रूपं ज्ञानमेव यत् । ताभ्यां सायुज्यसंपत्यै ब्रह्मचारी सदेप्सति ॥ ४७ ॥ समस्त पदार्थों की समधि-रूप जो ब्रह्म है, तया समष्य्यात्मक ( अथवा व्यापक ) जो ज्ञान है, उन दोनों के साथ सायुज्य अथवा तादात्म्य की प्राप्ति के लिए मनचारी सदा उस्सुक रहता है। [ २३ ] एतस्यां भूमिफायां तु तिष्ठतो ब्रह्मचारिणः । उत्तरोत्तरमुत्कृष्टं जीवन लक्ष्यमुच्यते ॥ ४ ॥ "भद्रादमि श्रेयः प्रेहि", "भद्र भद्रं न आभर इत्येवं बहुशो मन्त्रैरेप एवार्थ उच्यते ॥ ४ ॥ उफ मानसिक परिस्थिति में वर्तमान ब्रह्मचारी के लिए उत्तरोत्तर उत्कृष्ट जीवन हो लक्ष्य होता है। "तुम भद्र से भद्रतर जीवन को प्राप्त करों", "भगवन् ! हमारे लिए बराबर कल्याण को ही लाइये" इस प्रकार अनेकानेक वेद मन्त्र इसी बात को कहते हैं। तदर्थ स्वीयशक्तीनां रिकास: सचयस्तथा । श्रमेण तपसा वृत्ति: संयमेन पुरस्कृता ॥ ५० ॥ चारित्र्यस्य विनिर्माण विद्याया अर्जनं तथा । प्रथमं तस्य कर्तव्यं जायते प्रथमाश्रमे ॥ ५१ ।। उफ लक्ष्य की सिद्धि के लिए प्रथम श्राश्रम ( ब्रह्मचर्याश्रम) में उसका (=प्रदाचारी का) मुख्य कर्तव्य होता है : अपनी शचियों का विकास और संचय, मन चाणी और शरीर के संयम के साय श्रम और तप का पाचरण, चरित्र का निर्माण और विद्या का उपार्जन तपसा पारमामोति तपसा हन्ति किल्विपम् । तपसा वर्तमानः स उन्नतेमूनि तिष्ठति ॥ ५२ ॥ तप द्वारा वह (मद्मचारी) अपने अभीष्ट को प्राय करता है और पाप या अपूर्णता को दूर कर अपने चरित्र को उज्ज्वल और पवित्र धनाता । सप का श्राचरण करता हुया वह उन्नति के शिखर पर श्रासीन होता है। तपसा निर्मलो भूत्वा परिपारेण शुद्धधी । द्वितीयमाश्रमं गत्वा सर्वस्येष्टे न संशयः ॥ ५३ ।। तप से चरित्र को दुर्वलतायों को दूर कर और मनोविकारा द्वारा तत्वावगाहिनी विशुद्ध युद्धि को प्राप्त कर पह द्वितीय गृहस्थ श्राधम में प्रष्ट होने पर समस्त पणीस्थितियों को अपने अन्बल्ल धनाने में समर्थ होता है। "ब्रह्मचारीमा भ्राजद्विमति तस्मिन्देवा अधि रिश्ते समोवा! "ब्रह्मचारी समिधा मेसलया धमेण लोकांस्तपसा पिपत्ति ॥ ५४॥ १. ऐतरेयमाझण २. सामवेद पू. सथा। ३ अपर्व. HARI ४. अपर्व ११॥ [२४] "ब्रह्मचर्येण तपसा राजा राष्ट्र वि रक्षति । आचार्यों ब्रह्मचर्येण ब्रह्मचारिणमिच्छते"" ५५ ॥ "ब्रह्मचर्येण तपसा देवा मृत्युमपानत | इन्द्रोह ब्रह्मचर्येश देवेभ्य: स्वराभरत्" ।। ५६ ॥ इत्यादिवेदमन्त्रैश्च वैदिकोदात्तमापया । ब्रह्मचर्यस्य माहात्म्यं रहस्यं चोपवर्ण्यते ॥ ५७ ॥ "ब्रह्मचर्य-प्रत को धारण करने वाला ही प्रकाशमान ब्रह्म (= समष्टिरूप ब्रह्म श्रयचा ज्ञान) को धारण करता है और उसमें समस्त देवता श्रोत-प्रोत होते हैं (अर्थात् , यह समस्त देवी शक्तियों से प्रकाश और प्रेरणा को प्राप्त कर सकता है)" "समिधा और मेखला द्वारा अपने व्रतों को पालन करता हुश्रा ब्रह्मचारी श्रम और तप के प्रभाव से लोकों को आरित करता है (अर्पात् , समस्त राष्ट्र के उत्थान में सहायक होता है।" "ब्रह्मचर्य के तप से ही राजा अपने राष्ट्र की रक्षा में समर्थ होता है। ब्रह्मचर्य द्वारा ही प्राचार्य ब्रह्मचारियों को अपने शिक्षण और निरीक्षण में लेने की योग्यता और क्षमता को संपादन करता है।' "ब्रह्मचर्य के तप से ही देवताओं ने मृत्यु को दूर भगा दिया है । ब्रह्मचर्य द्वारा हो इन्द्र ने देवताओं को दिव्य प्रकाश लाकर दिया है (अर्थात् , संयत जीवन से रहने वाला मनुष्य ब्रह्मचर्य द्वारा ही अपनी इन्द्रियों को पुष्ट और कल्याणोन्मुख बनाने में समर्थ होता है) इत्यादि चैदिक मन्न अपनी उदात्त भाषा में नह्मचर्य को महिमा और रहस्य का वर्णन करते हैं। प्रासादस्य विनिर्माणे मूलभित्तिरपेक्ष्यते । तथैव जीवनस्यादी ब्रह्मचर्यमपेक्ष्यते ॥ १८ ॥ जैसे किसी महल के बनाने में नौंव की अपेक्षा होती है, उसी प्रकार जीवन के प्रारम्भ में ब्रह्मचर्य की अपेक्षा होती है। ब्रह्मचर्यत्रतं चीण यस्तैरेव तपस्विभिः । उत्तरोत्तरमुत्कर्षों जीवने लभ्यते ध्रुवम् ।। ५६ ॥ तप के रूप में ब्रह्मचर्य के व्रत को पूर्ण करने वाले मनुष्य ही निस्सन्देह जीवन में उत्तरोत्तर उत्कर्ष को प्राप्त करते हैं। १. श्रपर्व. ११।५।१७ । २. अथर्व० ११३५।१९। [ २५ ] ४ इत्येवमाश्चर्यमयं मह- चिनस्य भुत्या तु पचो गभीरम् । अपास्तशः सुतरां प्रसन्न- स्तत्वार्यसिद्धथै उनमग्रहीपम् ।। ६० ॥ इस प्रकार मानो महर्षि के चित्र के गम्भीर वचनों को सुनकर मेरी शंकाएँ दूर हो गयी, और मैं ने अत्यन्त प्रसनता के साथ उस लक्ष्य की सिद्धि के लिए व्रत ले लिया। बतमात्मविशुद्धये व्रत से आत्मशुद्धि सपर को रचना में ब्रह्मचर्य-प्रत के वर्णन के अन्त में मन प्रहण को यात भी कही गयी है। इसीलिए नताचरण के महत्व को दिखाने वाली निम्नस्य रचना को यहाँ देना उचित प्रतीत होता है। जीवन के उत्थान और विकास के लिए प्रात्म-विधास और पाहिमक शक्ति की भावश्यकता है। यात्मिक शक्ति और आत्म-विश्वास अनुशासन, प्रताचरण और नियम पालन से ही प्राप्त हो सकते है। जीवन में मतों के ग्रहण और पालन का यही रहस्य है। इसी सिद्धान्त का विशदी-करण किसी मती के मुख से नीचे के पचों में कराया गया है:- उत्तरोत्तरमुत्कर्ष जीपने लघुमुत्मुकः । प्रतिजाने चरिष्यामि प्रतमात्मविशुद्धये ॥ १ ॥ अपने जीवन में उत्तरोत्तर उत्कर्ष प्राप्त करने के लिए उन्मुक है। यात्मवि- शुद्धि या पवित्राचरण से ही यह हो सकता है। उस नात्म-विशुद्धि के लिए प्रताचरण की मैं प्रतिक्षा करता हूँ। [ २६ ] बनानां पातनेनैव सद् गूढमात्मदर्शनम् । जायते यमिनां नूनमात्मविश्वासकारणम् ॥ २ ॥ व्रतों के पालन से ही संयमी मनुष्यों को अपने उस गूढ स्वरूप का दर्शन होता है जो कि आत्म-विश्वास का कारण होता है। अभिप्राय यह है कि व्रतों के याचरण से ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप और शक्ति को पहचानता है, और इसी प्रकार उसमें श्रात्म-विश्वास की भावना का उदय होता है। ऋपिभिर्मुनिभिश्चैव लोकानां मार्गदर्शकः । सेवितो विततः पन्था एप नैवान संशयः ॥ ३ ॥ संसार को सन्मार्ग दिखाने वाले ऋषियों और मुनियों ने वास्तव में इसी प्रशस्त मार्ग का सेवन किया था। अभिप्राय यह है कि प्रताचरण द्वारा मनुष्य सपि और मुनि की पदवी को भी प्राप्त कर सकता है। विश्वस्य विविध कार्य कुर्वन्तोऽत्र निरन्तरम् । ब्रतानां पालनेनैव देवा अमृतभोजिनः ॥ ४ ॥ विश्व के विभिन्न कार्यों को निरन्तर नियमपूर्वक करने वाले अग्नि, वायु, सूर्य आदि देवताओं को प्रतों के पालने के कारण ही अमृत-भोजी ( अमृत अथवा अमृतत्व का सेवन करने वाले ) कहा गया है। दूसरे शब्दों में, अग्नि, वायु, सूर्य प्रादि देवता विश्व के संचालनार्थ अपने अपने महान् प्रत अथवा कर्तव्य का अविचल- भाव से पालन करते है। इसी आधार पर उनको 'अमृत-भोजी' कहा गया है। अभिप्राय यह है कि प्रताचरण द्वारा ही मनुष्य को अपने अमृतत्व या शाश्वत जीवन का बोध हो सकता है। व्रतेन प्राप्यते दीक्षा दक्षिणा दीक्षयाप्यते । तथा च प्राप्यते श्रद्धा श्रद्धया सत्यमाप्यते ॥ ५ ॥ प्रताचरण से ही मनुष्य को दीक्षा अथवा उजत जीवन की योग्यता प्रात होती है। दीक्षा से दक्षिणा अथवा प्रयल की सरलता प्राप्त होती है। दक्षिणा से अपने जीवन के लक्ष्य अथवा श्रादों में श्रद्धा, और श्रद्धा से सत्य अथवा वास्तविक लक्ष्य की प्राप्ति होती है। अभिप्राय यह है कि प्रतों के पालने से ही मनुष्य अपने जीवन के परम लक्ष्य तक पहुँच सकता है। - Asuso- [२७] (३) आत्मवत्तागुणोपेता सा शिक्षा ब्रह्मचारिणः ब्रह्मचारी की शिक्षा का स्वरूप शिक्षा का प्रश्न बदा गहन है। वर्तमान मारत की यह एक महती समस्या है । नीचे के पद्यों से इस समस्या के संबन्ध में कुछ प्रकाश अवश्य मिलेगा, ऐसी हमें धाशा है। चारित्येण समं शिक्षा श्रमेण तपसा तथा । अनुशासनसंजुधा सा लक्ष्यं ब्रह्मचारिणः ॥१॥ चारित्र्य, श्रम और तप के साथ तथा अनुशासन से युक्त शिक्षा ही ब्रह्मचर्य- आश्रम में रहने वाले का लक्ष्य होती है। सर्वेषामपि भूतानां मूर्धन्यं पदमास्थितम् । साधनं सर्वसिद्धीनां यरान्मानुष्यक मतम् ॥ २ ॥ प्रासुरी चिमुत्सृज्य दैवं भारमुपाश्रितम् । यया संपद्यते शिक्षा सा लक्ष्य ब्रह्मचारिणः ॥ ३॥ समस्त प्राणियों में सर्वोत्कृष्ट पद में स्थित और सब सिद्धियों की एकमात्र साधन मनुष्यता आसुरीतियों को छोड़ कर जिरा शिक्षा द्वारा देवी प्रत्तियों को पारण करती है वही ब्रह्मचर्य -यात्रम में रहने वाले का लक्ष्य होती है। शिक्षा या केवल स्वार्थ-बुद्धिं पुष्गाति सर्वथा । विपयेष्पिन्द्रियारामप्रवृत्तिर्वर्धते यया ॥ ४ ॥ तां समूलं समुत्सार्य लोककल्याणराम्यया । भात्मवत्तागुणोपेता सा शिक्षा प्रह्मचारिणः ॥ ५ ॥ [ २८ जो शिक्षा सब तरह से फेपल स्वाय-युधि को पुष्ट करती है और जिससे विषयों में इन्द्रियों की श्रासति पदती है. लोक कल्याण की कामना द्वारा उसका समूल उन्मूलन कर के आत्मसंयम की भावना से युफ शिक्षा ही प्राचारी का लक्ष्य होती है। उत्तरोत्तरमुत्कों जीवनस्य यया भवेत् । सदाचारसमृद्धेश सौरमं सुमनोहरम् ।। ६ ।। सर्यलोकसमाफर्पि देशव्यापि यया भवेत् । आशाप्रकाशसंयुक्ता सा शिक्षा ब्रह्मचारिणः ।। ७ ॥ जिस से जीवन का उत्तरोतर उत्कर्ष हो और जिससे सारे जगत् पो श्राकृष्ट करने वाला सदाचार की समृद्धि का मुमनोहर सौरभ देशभर में फैल जाए, जीवन में श्राशावाद के प्रकाश को देनेवाली ऐसी शिक्षा हो ब्रह्मचारी का लक्ष्य होती है। " (४) ब्रह्मचर्य तदिष्यताम् ब्रह्मचर्य की महिमा उह्यमानस्य विवशं भावानां तीनधारया । आत्मविश्वासमापने ब्रह्मचर्य तदिध्यताम् ॥ १ ॥ भावों की तीव्र धारा में वेबस हो कर बहते हुए मनुष्य में जो आत्म विश्वास को उत्पन्न करता है उस ब्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए । शारीरें मानस वापि स्वास्थ्यमाध्यात्मिक तथा । अभीष्टं चेत्तदा सर्वैब्रह्मचर्य तदिष्यताम् ॥ २॥ यदि शारीरिक मानसिक तथा आध्यात्मिक स्वास्थ्य की इच्छा है तो सबको प्रह्मचर्य का पालन करना चाहिए। [ २ ] ब्रह्मचारिणः परेशस्तोत्रम् ब्रह्मचारी की ईश्वर से प्रार्थना शम्भो ! परेश ! मम वाचमिम जुपस्व संयोज्य पाणियुगलं विनयानतस्य । पापं विधूय शुभमार्गरतो भवेयं चारियरक्षणपरो तमाचरेयम् ॥ १॥ हे शम्भो । हे परेश! दोनों हाथ जोड़कर मैं विनय-पूर्वक नमस्कार करता हूँ। मेरी इस वाणी पर कृपा-पूर्वक ध्यान दीजिए। मैं चाहता हूँ कि पाप को दूर करके मैं सदा शुभ मार्ग में रत रहूँ, और चारित्र्य की रक्षा करते हुए अपने व्रत का पालन करता रहूँ! शारीरमानसविकारकरालयाधा- विश्वसनाय परनितिसाधनाय । लोकदयेऽमिलपितार्थविवर्धनाय प्रार्थीभवामि भगवन् ! तिनां व्रताय ॥ २ ॥ है भगवन् । शारीरिक और मानसिक विकारों को भयंकर बाधाओं को विध्वंस करनेवाले, परम संतोष के साधनीभूत, और लोक तथा परलोक में अभीष्ट अर्थों की वृद्धि करने वाले ब्रह्मचर्य-प्रत के लिए मैं नाप से प्रार्थना करता हूँ। चेदापदां नु निवहः पतितोऽमितः स्यात् चेत्कष्टनावमभितोऽभिगतं वतं स्यात् । प्राणप्रयाणभयमप्युदितं भवेचे याचे तथापि मम चित्तमनाकुलं स्यात् ॥ ३ ॥ [३१] अनन्त श्रापत्तियों के समूह के उपस्थित होने पर भी चारों ओर घरावर कों से घिरे होने पर भी, ग्राणों के चले जाने के भय के प्रा जाने पर भी, में प्रार्थना करता हूँ कि मेरा चित व्याकुल न हो। प्रायोचयोपचितपर्वतमस्तके या नानातरङ्गकुलसंवुलसागरे पा । व्याचादिहिंसनियहाकुलकानने पा- ऽन्यत्रापि देव ! सततं भवतः स्मरेयम् ॥ ४ ॥ पर्वत श्रेणियों से युक्त महान् पर्वतों के शिखर पर, अथवा असंख्य तरजों से व्याकुल समुद्र में, अथवा व्याघ्रादि हिंसक पशुओं के समूह से भयर फानन में, तथा अन्यत्र भी है देव ! मैं सदा श्रापका स्मरण रखें। तिष्ठन् प्रजच भगवन्नथवा शयानो रात्री दिनेऽप्युपसि सायमथान्यदा था । पातालपतिकुहरे दिवि वा पृथिव्यां सर्वत्र ते स्थितिमहं कलयानि भूमन् ! ॥ ५ ॥ है भगवन् ! हे भूमन् ! ( भूमन् = अमन , परमात्मन्) ठहरे हुए, चलते हुए, अथवा शयनार्य लेटे हुए, रात में, दिन में, उष काल में, सायंकाल अयवा किसी दूसरे समय, पाताल की गुफा में, धुलोक अथवा पृथ्वी में- सर्वन में श्राप की स्थिति का अनुभव करूँ। द्वन्द्वानि यानि जगवीह शरीरिजातं खिन्नं पर विदधते जगदीश ! नित्यम् । सोढुं क्षमो भवति तानि जनो यतोऽयं सामध्यमेतदसुलं मयि संनिधेहि ।। ६ ।। हे जगदीश्वर। जो काम-क्रोधादि द्वन्द्व इस संसार में प्राणिवर्गको सदा थत्यन्त सिर करते रहते हैं, उनको जिससे मैं दवा सर्व उस अतुल सामर्थ्य को मुझ में सम्मिहित कीजिए। [ ३२ ] अगानि यानि मुनिभिः प्रतिपादिवानि कारुण्यवारिधिभिरात्महितोचितानि । योगस्य, तैरनुदिनं मनसो विशुद्धया मज्ञापसादमधिगन्तुमहं लपामि ॥ ७ ॥ करुणा के सागर मुनियों ने प्रात्म-हित-संपादन में उचित योग के जिन प्रमों का प्रतिपादन किया है, उनसे मन को विशुद्धि द्वारा प्रज्ञा-प्रसाद की प्राप्ति के लिए मैं उत्सुक हूँ। 'प्रज्ञा प्रसाद' का वस्तुतः क्या अभिप्राय है, इसका समाधान नीचे के पद्य में दिया गया है: योऽयं परेश ! मम चेतसि संप्ररूढो दुर्वासनापचयपाफयशामलीघः । तन्नाशनाय करुणां कुरु शंकर ! त्वं तयस्वरूपमनघं मम येन भाति ॥ ८ ॥ हे परेश। यह जो मेरे चित्त में दुर्वासनाओं के परिपाक से मल का ढेर एकत्रित हो गया है, उसके नाश के लिए हे शंकर ! आप कृपा करें, जिससे परमतत्त्व के निष्पाप (= विशुद्ध) स्वरूप को मैं देख सकूँ। पापानिवारय, विधेहि शमे मति मे, सत्ये रता समधिको मयि धेहि मेधाम् । विश्वासमात्मनि जगद्वितसाधनोरका नि:स्वार्थबुद्धिमथ मे भगवन् ! प्रयच्छ ।।६।। , १, देखिए-"यमनियमासनप्राणायामप्रत्याहारधारणाभ्यानसमाषयोऽधायज्ञानि" ( योगसूत्र रा२१)। अर्थात् , यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि,-योग के ये पाठ अंग माने जाते हैं। २. तु. "निर्विचारवशारोऽध्यात्मप्रसादः । प्रातम्भरा तन प्रा।" ( योगसूत्र । ४७, ४८) । तया (निर्विचारवेशारये सति) समाहितचित्तस्य या प्रा जायते तस्या ऋतम्भरेति संज्ञा भवति । श्रन्वर्या च सा, सत्यमेव बिमति, न तत्र विपर्यास- गन्धोऽप्यस्ति ।" ( योगसूत्र १।४८ पर व्यासमाय)। [ ३३ ] है भगवन् । पाप से हटाकर मेरी मति को शान्ति प्रदान कोजिए: सत्य में रत तीक्षा मेधा को मुग्म में स्थापित कीजिए। मात्म-विश्वास के साथ-साय जगत् के हित- साधन में उरमुक निःस्वार्थ-युद्धि को भी मुझे दीजिए। हे लोकेश ! दृशं सदा सफरगां मय्यर्पयारामदा हेलोन्मूलितपाप ! देहि भंवतो भक्तिं सदा शर्मदाम् । नाहं गुणिनां गणे तय गुणान् गायेयमत्यादराद् ये नाहंकृत्तचेतसां श्रुतिपर्थ यान्तीय शान्ता दरात् ॥ १०॥ ॥ इत्पमृतमन्यने लक्ष्यानुसन्धान नाम भयमः परिस्रवः ॥ हे लोकेश ! मुझ पर सदा करुणामय तथा शानन्दप्रद दृष्टि डालिए; सरलता से पाप को नष्ट करने वाले । सदा कल्याण-कारिणी अपनी भक्ति को दीजिए। जिससे में अत्यादर के साथ गुणियों के मध्य में आपके इन गुणों का गान कर सकें, जो मानो डर से शान्त हुए अहंकारी लोगों के प्राण में नहीं आते हैं।
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1-
विरमामा की
एखादिसारता पपिरदारयादमौषमत् ।
पारिमाप बर मारत,
हिरो मामलामो सवारपापड
सपनदान परिसराम्
1
द्वितीयः परिस्रवः
जीवन-पाथेयम्
अने! नय सुपथा राये ।
(यजु० ४०1१६)
स्वस्ति पन्थामनुचरेम सूर्याचन्द्रमसाविय ।
(ऋग्० ५॥५११५)
परि मामे ! दुश्चरिताद् बाधस्वा
मा सुचरिते भज 1
(यजु० ४।२८)
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द्वितीय प्रवाह
जीवन-पाथेय
प्रकाशस्वरूप देव ! अभीष्ट अर्थ की प्राप्ति के लिए हमें क्ल्याणमार्ग से ले चलिए ।
(यजु० ४०।१६)
सूर्य और चन्द्रमा के समान हम अपने जीवन मार्ग पर सकुशल चलने रहें !
(ऋग्०५।११।१५)
अमिस्वरूप देव । मुझे दुष्परित से पचाकर सुचरित में स्थापित कीजिए।
( यजु० ४।२८)
आदचिन्तनम आदर्श-चिन्तन सफल जीवन यात्रा के लिए आदर्श-चिन्तन, सदसद्विवेचन में समर्थ बुद्धि, स्वकर्तव्य परिज्ञान, श्रात्म-विश्वास, श्राशावाद और साथ ही विश्व को नियन्त्रण में रखने वाली आय महाशक्ति के सानिध्य की भावना की महती आवश्यकता है। इसी सिद्धान्त का विशदीकरण नीचे के पचों में किया गया है। सौभाग्यमेतदतुलं मम येन लब्धं मानुष्यकं प्रभुप्रसादललामभूतम् । याचे तमीशमधुना सदसद्विचारो- शुक्तां धियं सफलताधिगमाय तस्य ॥ १ ॥ मेरा यह अद्वितीय सौभाग्य है जिससे मुझे भगवान के उत्कृष्ट प्रसाद के रूप में मनुष्यता प्राप्त हुई है। मैं अब उसकी सफलता के लिए ईश्वर से सदसद् के विचार (विवेक ) में तत्पर धुद्धि को प्रार्थना करता हूँ। याचे मुटुहुरई तमर्ज परेशं सत्ये दृढामथ विवेफरतां सुबुद्धिम् । माने यातिषिमे निजडीनस्प कर्तव्यपालनपर: मुशली अजेयम् ॥ २॥ उरा भनादि परमेश्वर से में यार-पार गरय में और दिव -- की सायना करता है, जिसकी सहायता मे में कर्तव्यों का पटना औवन के प्रत्यन्त कठिन मार्ग पर साल यात्रा कर सा: [ ३७ ] जम्माप्य लोफ इह घुद्धिमता जनेन मार्गः स एय सुतरामयलम्बनीयः । फर्तव्यपालनपुरःसरमेव येन कल्याणमेप लभतेऽन परत्र चापि ॥ ३॥ इस रोक में जन्म पाकर बुद्धिमान् मनुष्य को दृढ़ता से उसी मार्ग का अवलम्बन करना चाहिए जिससे उसे अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए इस लोक और परलोक दोनों में पल्याण की प्राप्ति हो। रेरे मनो ! यिसूज दैन्यमिदं दुरन्त नैराश्यमाहुरिद सथिमाशहेतुम् । आशावता धृतिमतां मत एप लोको निवासमात्मनि च ये नियतं भजन्ते ॥ ४ ॥ श्रयि मन! इस दुखदायिनी दीनता को छोड़ दे। निराशावाद की भावना सर्च विनाश का कारण होती है। यह लोक उन्हीं के लिए है जो आशावादी तया धृति वाले हैं और जिनको निधय रूप से अपने में विश्वास है। रक्षां चकार जननीजठरे स्थितस्य स्तन्यं य एन तद्नु स्तनयोः समर्ज। संवर्य मां बहुविधैरिसरः प्रकारैः देवेन तेन न हि सप्रति विस्मृतोऽहम ॥ ५ ॥ माता के गर्भ में रहते हुए जिन्होंने मेरी रक्षा की यो, तत्पश्चात् माता के स्तनों में जिन्होंने दुग्ध उत्पन कर दिया था, अन्य अनेक प्रकारों से भी मेरा सवर्धन करके, उन विश्वम्भर भगवान् ने अय मुझे भुला नहीं दिया है। [३८] चारिय-संपत्तिः चारित्र्य-संपत्ति (७) चारित्र्यमात्मनः स्वास्थ्यम् चारित्र्य और आत्मा का स्वास्थ्य जीवन में चारित्र्य ही मनुष्य का सर्वस्व है । प्रत्येक मनुष्य की मुख्य को उसका चरित्र होता है । उसी के स्वरूप का कई घटियों से प्रतिपादन नीचे के पचों में किया गया है। सुरम्यं कुसुमं दृष्ट्या यथा सर्व: प्रसीदति । प्रसन्मानपरान् दृष्ट्या तथा त्वं सुसमामुयाः ॥ १ ॥ मुन्दर फूल को देखकर जैसे सब कोई प्रसन्न होते हैं, ऐसे ही दूसरों को प्रसव देषकर तुमको प्रसवता होनी चाहिए । प्रसन्नानपरान् दृष्ट्वा यस्यान्तन प्रसीदति अप्रसन्नांस्तया दृष्ट्वा यस्यान्तन विपोदति ॥ २॥ नूनं तस्यात्मनोऽस्वास्थ्य कारणं तत्र विद्यते । अस्वस्थस्थ जनस्येद द्राक्षापि शिरसायते ॥ ३ ॥ दूसरों को प्रात देशकर जिराका मन प्रसन्न नहीं होता और अप्रसन देसफर जिसके मन में पीसा नहीं होती, निषय ही उनको प्रारमा धे अस्पस्थता इस पर है। प्रत्याप मनुष्य को पास मी स्वाद में पुरी मगती है। सतः सदात्मनः स्वाध्यते यत्नपरो भय । सदर्यमात्मनो हीनमापनाया जिनम् ॥ ४ ॥ [ ३६ ] तथा चैवाभिमानस्य दुरन्तस्यापसारणम् । कर्तव्यं प्रथमं तावन्मन्यते तत्त्वदर्शिभिः ॥ ५ ॥ इसलिए श्रात्मा की स्वस्थता के लिए सदा प्रयाशील रहो। इसके लिए तस्वदर्शियों के मतानुसार पहला कर्तव्य यह है कि मनुष्य अपनी हीनभावना छोड़ दे और परिणाम में दुःख दायो अभिमान को भी भगादे। अमिमानेन मृदस्वमात्मनो हीनभावना। आत्मनः स्वास्थ्यनाशस्य द्वयमेयात्र कारणम् ॥ ६ ॥ मात्मा की स्वस्यता का नाश दोही कारणों से होता है । वे हैं--(१) अभिमान से होने वाला मोह, और (२) अपने को होन या तुच्छ समझना । देहस्वास्थ्यकृते लोकाः सप्रयत्ना निरन्तरम् । तमूलमात्मनः स्वाध्यमिति ते नैव जानते ॥ ७॥ संसार में मनुष्य शारीरिक स्वास्थ्य के लिए यराबर प्रयत्नशील रहते हैं। पर इस बात को नहीं जानते कि शारीरिक स्वास्थ्य का मूल कारण भारमा की स्वस्थता हो होती है। विफारा मानसाः सर्वेऽस्थ आत्मन्यसशयम् । प्राप्नुवन्ति पदं, तामादात्मस्वास्थ्यपगे भवेत् ।। ८ ।। यह निधय है कि मामा के अस्वस्थ होने पर ही मन समस्त इर्विकार उत्पन हुआ करते हैं। इसलिए मनुष्य को सबसे पहले पारमा की लापता के लिए ही प्रयन-शील दोना चाहिए। पारिध्यमात्मनः स्वास्थ्य, जीरनस्य कृतार्यता। वय विद्यरो, सम्मानदथं यनमाचरेत् ॥ ६ ॥ पारमा को स्वस्थता किमको बहने हैराणा उत्तर दी है कि मनुष्य के उदान चरित्र को ही कात्मा की स्वस्पदा मममना पाहिए । मनुष्य जीवन दी गाना उसी में रहती है। इसलिए मनुष्य को नरिट की उपासना के लिए प्रयास करना चाहिए। १. "पराभवम्य सन्मुग पदविमान" (नस्याम ) १. "नामानमधमन्यद" (मनुमति ११)"माचपा यमानम्" (मनुस्मृति lar), [१] (८) चारित्र्यं नरवृक्षस्य सुगन्धि कुसुमं शुभम् चारित्र्य-चर्चा चारित्र्य के ही महत्त्व को दिखलाने का नीचे के पद्यों में यन किया गया है:- चारित्र्यं परमो धर्मश्चारित्र्यं परमं तपः । चारित्र्यस्य प्रभावेण तमस्तरति दुरतरम् ।। १ ।। चारित्र्य परमधर्म है। चारित्र्य परमतप है। चारित्र्य के प्रभाव से ही मनुष्य मोह और जहता (= अकर्मण्यता) के दुस्तर अन्धकार को पार कर सकता है । चारित्र्यं नरवृक्षस्य सुगन्धि कुसुमं शुभम् । आकर्षण तथैवान लोकानां रञ्जनं महत् ॥ २ ॥ चारित्र्य मनुष्य-रूपी वृक्ष का सुन्दर सुगन्धित पुष्प है। अर्यात , जैसे किसी फूलने वाले पौधे का उत्कृष्ट सौन्दर्यमय सारांश पुष्प रूप में विकसित होता है, इसी तरह मनुष्य-जीवन का उत्कृष्ट सुन्दर रूप था परम ध्येय उदात्त चरिन ही है। सुन्दर सुगन्धित पुष्प के समान ही उदात्त चरित्र सब को अपनी ओर आकृष्ट करता है और सव को प्रसनता प्रदान करता है। यथा हि लौकिकाः स्वीय धनं रक्षन्त्यतन्द्रिताः। चारित्र्यस्य तथा रक्षा विधेयोत्कर्पमिच्छवा ॥ ३ ॥ इस लिए, जैसे सांसारिक लोग बड़ी सावधानता से अपने धन की रक्षा करते हैं, इसी तरह जो अपना उत्कर्ष चाहता है उसे चारिश्य की रक्षा करनी चाहिए । [ ४१ ] विमुखा (3) हन्त मानवाः! चारित्र्य की उपेक्षा जीवन में चारित्र्य का अत्यन्त महत्व होने पर भी मनुष्य उसकी उपेक्षा करते हैं। वास्तव में यह प्रात्मघात के समान है। इसी बात को नीचे के पर्यो में दिखलाया गया है: :-- शरीरमिदमस्थायि जानन्तोऽपि जना ध्रुवम् । तत्स्वास्थ्यस्य कृते यनान् विविधानाचरन्ति वै ॥ १ ॥ अन्तःशरीरं यत्वेतजन्मजन्मान्तरेष्यपि । स्थास्तु तत्स्वास्थ्यसम्बन्धे विमुखा हन्द ! मानवाः ॥ २ ॥ मनुष्य यह जानते हैं कि यह शरीर सदा रहने वाला नहीं है। तो भी, शारीरिक स्वास्थ्य के लिए वे तरह-तरह के यन किया करते हैं। पर यह खेद की बात है कि यद्यपि मनुष्य का चारिभ्यरूपी अन्त शरीर जन्म-जन्मान्तर में स्थायी रहने वाला है तो भी उसके स्वास्थ्य की मनुष्य परवा नहीं करते। उत्पद्यन्ते शरीरेऽस्मिन्धिकारा ये निरन्तरम् । प्रायेणोपशमं यान्ति किधित्कालादनन्तरम् ॥ ३ ॥ परमन्तःशरीरेऽस्मिन् चारित्र्याख्येऽतिरोहितम् । विकारा: सकृदुत्पन्नाः प्रायस्तिष्ठन्ति सर्वदा ॥४॥ इस शरीर में जो रोगादि विकार घरावर होते रहते हैं, वे कुछ काल के भनन्तर प्रायेण शान्त हो जाते हैं। पर यह कौन नहीं जानता कि इस चारित्र्य रूपी आभ्यन्तर शरीर में जो विकार एक वार उत्पन हो जाते हैं वे प्रायः सदा रहते हैं; अर्यात् । उनको हटाना बड़ा कठिन होता है। इसलिए मनुष्य को चरित्र शुद्धता का पूरा पुरा ध्यान रखना चाहिए । [ ४२ ।
(१०) गृहरूपं मनोऽस्माकम् भाव-संशुद्धि भाव संशुद्धि चारित्र्य का मुख्य अंग है। भाव-सशुद्धि की क्यों आवश्यकता है । इसी का उत्तर नीचे के पद्यों में दिया गया है:- गृहरूप मनोऽस्माकं स्वच्छं शान्तं भवेद्यथा । तत्परेण मनुष्येण प्रयत्नः क्रियतां तथा ॥ १ ॥ हमारा मन एक प्रकार से हमारा घर है । वह हमारा गृह रूपी मन जैसे भी स्वच्छ और शान्त रह सके, उसके लिए हमें तत्सर होकर प्रयत्न करना चाहिए । सोपद्रवं तथास्वच्छं दुर्गन्धेन समाचितम् । अभद्रदर्शनं देश्माध्युपितः कः सुखं ब्रजेत् ॥ २ ॥ भावसशुद्धिमेतस्मात्सीमनस्यं तथैव च । सद्विचारसमृद्धिं च समीहन्ते मनीषिणः ॥३॥ उपद्रव या कोलाहल से युक, अस्वच्छ, दुर्गन्ध से भरे हुए और देखने में अभद्र न्या भद्दे घर में रह कर कौन सुखी हो सक्ता है ? इसीसे मनीषी लोग भाव सशुद्धि, सौमनस्य और सद्विचारों को समृद्धि को चाहते हैं। अभिप्राय यह है कि स्वास्थ्य और प्रसन्नता के लिए जैसे शान्त, स्वच्छ और सुन्दर घर की आवश्यकता होती है, उसी तरह आध्यात्मिक शान्ति और प्रसनता के लिए भाव संशुद्धि आदि मानसिक गुणों की आवश्यकता है । स एप परमः सार्थो दोपसरपशवजितः । परार्थजीवनस्यापि पात्रता तत्र जायते ।। ४ ॥ भाव-सशुद्धि प्रादि उपर्युक्त मानसिक गुणों की प्राप्ति ऐसा सस्कृष्ट 'स्वार्थ' है जिस के साथ दोष का सस्पर्श भी नहीं है । इस 'स्वार्थ'-सिद्धि के हो जाने पर ही [ ४३ ] मनुष्य में परार्य-जीवन की पात्रता माती है । अर्याद, उक्त उदात गुणों से युफ मनुष्य में ही वास्तव में दूसरों के हित के लिए कार्य करने की योग्यता होती है। वस्तुतस्तत्पदं पुण्यं यजमार्थपरार्थयो। एकत्वं जायतेऽद्वैतं तदेवाविचक्षणाः ॥ ५ ॥ वास्तव में मनुष्य के चरित्र की यही स्थिति पविन और उत्कृष्ट होती है जिसमें स्वार्य और परार्य की एकता या अभिन्नता हो जाती है। विद्वान् लोग उसी अवस्था को 'पद्धत' की स्थिति कहते हैं। :- (११) सद्धिचाराः परोहन्ति शुभसंकल्पवारिणा सद्विचारों का विकास सद्विचारों को चारिभ्य का शरीर कहना चाहिए । उनका विकास से हो सकता है इसी बात को नीचे के पत्रों में समझाने का यक्ष किया गया है: क्षेत्र विना प्रयत्नेन पन्यत्रणसमुद्भवः । भूयो भूयः कृपेः पो महानाय जायते ॥ १॥ सब कोई जानते हैं कि प्रत्येक खेत में जंगली घाम-पात विना प्रयत्न के ही बारवार उगती रहती हैं और इससे खेती की बड़ी हानि होती है। कृपकस्य प्रयत्नेन सावधानस्य नित्यशः । चारणं क्रियते तेषां कृपे रक्षा च जायते ॥ २ ॥ सावधान किसान वरावर प्रयत्न पूर्वक उस जगली घास पात को निकालता रहता और इसी प्रकार की रक्षा की जाती ४४ . .. एवं चित्ते स्वभावेन नानादुर्चासनोदयः । जायमानो मनुष्यस्य लेशसन्ततिकारणम् ॥ ३ ॥ इसी प्रकार मनुष्य के चित्त में स्वभाव से ही अनेकानेक दुर्वासनाएँ पैदा होती रहती हैं और उनके कारण उसको बराबर क्लेशों का अनुभव करना पड़ता है। केबलं वत्र यत्नेन भूयोभूयः कृतेन थे। निरोधः शक्यते कर्तुं तासामुन्मूलन तथा ।। ।" इस स्थिति में केवल बार-बार किये गये यत्न से ही उनका निरोध और उन्मूलन किया जा सकता है। धीरैरुत्साहसम्पन्नः श्रद्धाविश्वासधारिभिः । कर्तुं तत्पार्थते, नैव संशयाविएमानसः ।। ५ ।। यह कार्य ( दुर्वासनाओं का निरोध और उन्मूलन ) श्रद्धा और विश्वास को धारण करनेवाले उत्साही धीर-वीरों द्वारा ही किया जा सकता है। जिनके मन में संशय बैठा हुआ है वे इस कार्य को नहीं कर सकते । वासना याः शुभोदो विचारा ये च साधकः। कुशलं तत्र रोहन्ति स्वच्छे चित्ते न संशयः॥६॥ शुभ परिणाम को उत्पन्न करनेवाली वासनाएँ और अच्छे विचार स्वच्छ वित्त में हो अच्छी तरह पनपते हैं, इसमें कोई संशय नहीं हो सकता । तस्य देवस्य सवितुः प्रसवानां य ईशिता । प्रकाशप्रेरणां लब्ध्वा वस्तुतो जीवनप्रदाम् ॥ ७ ॥ नष्टा ये दुष्टसंस्कारास्तेषां खाद्येन नित्यशः । सद्विचारा: प्ररोहन्ति शुभसंकल्पवारिणा ॥ ८ ॥ समस्त उत्पत्तियों के स्वामी उन सवितृ देव से वस्तुत' जीवन को देनेवाली प्रकाश को प्रेरणा को पाकर, जो दुष्ट सस्कार बराबर नष्ट होत जाते है उनके खाद्य = खाद) से, और शुभ संकल्पों के जल से मनुष्य के चित्त में सद्विचार उगते और बढ़ते हैं। 1. तु. "अविद्यास्मितारागद्वेषाभिनिवेशा पथ क्लेशा । ते प्रतिप्रसवहेया सूक्ष्मा। ध्यानहेयास्तवृत्तयः । ( योगसूत्र २॥३, १०, ११) [४५ ] अभिप्राय यह है कि अच्छी रौती के लिए जैसे सूर्य-प्रमाश, खाद और पानी की श्रावस्यकता होती है, ऐसे ही मनुष्य के विस में सद्विचारों की उत्पति और पुष्टि के लिए भगवान् की प्रेरणा ( या कृपा), दुष्ट संस्कारों का नाश और शुभ-संकल्प (प्रमश सूर्य-प्रकाश, खाद और पानी के स्थानीय }, इनकी आवश्यकता होती है। एच्छेद्या याश्च संरक्ष्या वासनास्तन संस्थिताः । तासां विवेफः प्रथमं बुद्धिमद्भिरपेक्ष्यते ॥ ६ ॥ इस कार्य में सबसे पहले वित्त में रहनेवाली उच्देदनीय -जिन का उन्मूलन करना है ) और संरक्षणीय ( -जिन की रक्षा करना अपेक्षित है) वासनाओं में पर स्पर विवेक करने की आवश्यक्ता पुद्धिमानों को होती है । चित्तभूमी प्रयत्नेन पोपितैवं निरन्तरम् । सद्विचारकपिः कृष्टिः संस्कृतिर्वा मता बुधैः ॥ १० ॥ इस प्रकार चित्तरूपी भूमि में घरावर प्रयत्न-पूर्वक पापित की गयी सद्विचारों की कृषि को विद्वान लोग 'कृष्टि' अश्या 'सस्कृति' समझते हैं। अभिप्राय यह है कि मनुष्यों के सद्विचारों की समष्टि को ही संस्कृति' अथवा 'कृष्टि' इन शन्दों द्वारा कहा जाता है। अक्षय्यममृतं पुण्यं दिव्यानन्देन संयुतम् । तत्फलं तेन धनिनस्ते धन्यास्ते मनीषिणः ॥ ११ ॥ उपर्युक सदिचारों को कृषि का पल अक्षय, अमृत, पवित्र और दिव्य आनन से युक्त होता है। उस पल से जो धनी है वे धन्य है, वे मनीची हैं। अभिप्राय यह है कि लोक प्रसिद्ध कृषि से मनुष्यों को साधारण अन्नादि का लार होता है, परन्तु उपर्युक सद्विचारों की छपि से जो फल प्राप्त होता है वह अक्षर आदि गुणों से युफ होने के कारण अनादि से कहीं बढ-चढ़ कर होता है। [१६] :- (१२) कृपया परयाविष्टो दशैं दर्श भवाम्यहम् मद-मोह से ग्रस्त मनुष्य मद और मोह चारित्र्य के चाधक हैं। अत एव मद-मोह से प्रस्त मनुष्यों की दयनीय दशा को नीचे के पद्यों में दिखलाया है :- आवासस्थानभूता ये प्रायेण मदमोहयोः । तृणाय मन्यमाना या अन्याननतिवैभवान् ॥ १ ॥ तत्तजौकिककार्येषु लिप्तांस्तान जिप्तचेतसः । उधावचपदस्थान्या नानोपायर्धनार्थिनः ॥ २ ॥ अवशानक्सन्नांश्च विवेकविधुरानरान् । कृपया परयाविष्टो दर्श दर्श भवाम्यहम् ।। ३ ।। प्रायेण मद और मोह से युक्त होकर जो बभव हीन दूसरे लोगों को वृणतुल्यं सममाते हैं, उन लौकिक कार्यों में इचे हुए, व्यप्रचित्त, अच्छे-बुरे उपायों से धन-संग्रह में संलम, कामनाओं से परवश, अत एव सिल, विवेक हीन, ऊँचे-नीचे पदों पर भासीन लोगों को देख-देख कर मुझे बड़ी कृपा पाती हैं । रोगेण महताक्रान्तः पीडया या प्रपीडितः । नष्टसंशोऽथवास्यस्थो यथा, तद्वद्धि ते मताः ॥ ४ ॥ बड़े रोग से भामान्त, अथवा पीडा से पीडित, अथवा नष्टचेतन, अपवा अस्वस्थ मनुष्य के समान ही वे मुझे प्रतीत होते है।
जीवनेऽस्मिन् महाँल्लाभः स्वान्तस्तोषो निगद्यते अन्तरात्मा का अविरोध चारिश्य के लिए मनुष्य के भाचरण और अन्तरात्मा में परस्पर विरोध की आवश्यकता है। हमारे प्राचीन शालों में इसी को 'श्रात्मनस्तुष्टि' या आत्मतुहि' रहा है। इसी का वर्णन नीचे के पद्यों में किया गया है। जीवनेऽस्मिन् महाँल्लाभ: स्वान्तस्तोपो निगद्यते । स्वस्यान्तरात्मना सार्धमविरोघे तदिप्यते ॥१॥ इस जीवन में सब से बड़ा लाम अपनी अन्तरात्मा का संतोष ही है। श्रन्तरामा के साय मनुष्य के अविरोध से ही यह प्राप्त होता है। यतस्तत्परमं सत्यं भास्यरं च निरञ्जनम् । अन्तः सर्वस्य सत्त्वस्य सातिरूपेण विष्ठति ॥२॥ क्योंकि वह प्रकाशमान विशुद्ध परम सत्य प्रत्येक प्राणी के अभ्यन्तर में साक्षिरूप से विराजमान है। सालोक्यमथ सारूप्यं सायुज्यमथका पुनः । अन्तस्तत्वेन तेनैव कल्याणेप्सुमिरिष्यताम् ॥ ३ ॥ जो अपना कल्याण चाहते हैं उनको उसी आभ्यन्तर परम तत्व के साथ सलोकता, सरूपता अथवा एकीभान प्राप्त करने का यन करना चाहिए। तत्त्वस्यानुमपस्तस्य मानवस्यैव जायते। ततः सर्वेषु भूतेषु श्रेष्ठं मानुष्यक मतम् ॥ ४ ॥ अपने अन्दर रहनेवाले उस परम तत्व की अनुभूति केवल मनुष्य को ही होती है। इसी लिए मनुष्यता का पद सब प्राणियों में श्रेष्ठ माना गया है। -000- १.तु. "श्रात्मनस्तुटिरेव च" (मनुस्मृति २६)। २.. "एकोऽहमस्मीत्यारमानं यत्त्वं कल्याण मन्यसे । नित्यं स्थितस्ते होष पुम्पपापेक्षिता मुनिः ॥" (मनुस्मृति ८९१)। तथा "मावमस्थाः स्वमात्मानं नृण साक्षिणमुत्तमम् ।" ( मनुस्मृति ८)। १.तु. "या विश्वस्य भूतस्याहमस्मि यशस्तमः" (पर्व ६।५८३)।
सत्यं जयति सर्वत्र सत्य की जय सत्य ही चारित्र्य का आत्मा है । सत्य के बिना चारित्र्य रह ही नहीं सकता। उसी सत्य के स्वरूप का वर्णन निम्नस्थ पद्यों में किया गया है:- सत्यं जयति सर्वत्र नेवासत्यं कदाचन । तस्मात्सत्यपरो भूत्वा निर्द्वन्द्वो विचरेन्नरः ॥ १ ॥ सत्य की सर्वत्र जय होती है, असत्य की कभी नहीं। इसलिए मनुष्य को सत्य-परायण होकर निर्द्वन्द्व ( = निर्भय अथवा निर्विरोध) भावना से जीवन-यात्रा करनी चाहिए। सत्ये स्वरूपसंरक्षानपलापौ हि तिष्ठतः । तत्र स्यात्मविरोधोत्थदौमनस्यं न जायते ॥ २ ॥ सत्य में अपने वास्तविक स्वरूप को रक्षा और अनपलाप । = न छिपाना), दोनों रहते हैं । सत्य के रहने पर अपनी अन्तरात्मा के विरोध से उत्पन्न होनेवाली खिन्नता भी नहीं होती। अतस्तत्रात्मसंतोपो मनःस्वास्थ्यमकृत्रिमम् सयरप्यनुभूयेते निर्भयावस्थितिस्तथा ॥ ३ ॥ इसीलिए सत्य की स्थिति में प्रारमसंतोष, मन को स्वाभाविक स्वस्थता और निर्भयता को अवस्था को सब अनुभव करते हैं। सत्याधारण तिष्ठन्ति मनःस्वास्थ्योद्भबा गुणाः । मनःप्रसादः सौम्यत्वमा शान्तिरेव च ॥४॥ मन को स्वस्यता से उत्सन्न होनेवाले गुण, जैसे मनप्रसाद, सौम्यता, आर्जव भौर शान्ति, ये सत्य के आधार पर ही ठहरते हैं। यया प्रकाशो लोकानां हितमातनुते सदा । सत्यशीलास्तथा सन्तः परसन्तापहारिणः ॥ ५ ॥ असे प्रकार से सदा लौकी का हित होता है। इसी तरह सत्य-शील सापुरुर दूसरी के सन्तापों को हरनेवाले क्षेते हैं । [] :- (१५) सत्यस्य हि प्रतिष्ठायां चारित्र्य स्थितिमश्नुते सत्य और चारित्र्य चारित्र्य की दृष्टि से ही सत्य का वर्णन नीचे के पदों में भी किया गया है: स्वरूपे संस्थिति: सत्यमसत्ये तद्विरुद्धता । मृत्युरूपं ततोऽसत्यं सत्येऽमृतनिधिः स्थितः ॥ १ ॥ अपने स्वरूप में रहना ही सत्य है। असत्य में यह बात नहीं होती। इसी लिए असत्य मृत्यु के समान है और साय में अमृत की निधि रहती है।' सत्येन हि सहायेन ततो देवा निरन्तरम् । वज्ञा अमृता विश्वभारं बिभ्रत्यतन्द्रिता: ॥ २॥ इस लिए सत्य की सहायता से ही अग्नि, वायु, सूर्य श्रादि देवतागण शता (प्रकृति के अटल नियमों के अनुवर्ती) और अमृत ( अमरणशील) कहे जाते हैं और अतन्द्रित होकर ( - तत्परता से निरन्तर विश्व के भार को वहन करते हैं। सत्यरक्षाकृते तस्मात् सन्तः प्राणपणैरपि । तत्परा नियतं लोके दरयन्ते देवसन्निभाः ॥ ३ ॥ इसीलिए संसार में देवताओं के साथ समानता रसने वाले सत्पुरुष भी ग्रामपण से सत्य की रक्षा में सदा तत्पर दिखायी देते हैं। सत्यस्य हि प्रतिष्ठायां चारित्र्य स्थितिमश्नुते । सर्व धर्माः क्षयं यान्ति यदि सत्यं न विद्यते ॥ ४ ॥ सत्य के रहने पर ही चारित्र्य की स्थिति हो सकती है। सत्य के न रहनेपर राप धर्म नष्ट हो जाते है। सत्याश्रयेण लोकरय व्यरहार: मसिम्यति । सत्ये सत्येव विश्वासो व्यवहारस्तदुद्भवः ॥ ५॥ सत्य के सहारे पर ही लोक का व्यवहार चलता है। क्योंकि लोग-व्यपहार के लिए परस्पर विश्वास की आवश्यकता होती है और विश्वास सत्य के रहने पर ही हो सकता है। १. इसीलिए "असतो मा सदमय" और "मृत्योर्मामृतं गमय" (मृहदारण्यकोप- निषद् ॥२८) ये दोनों श्रुतियों वास्तव में समानार्थक है। २. तु. "देवा"अमृता रतला." (ग. १६५४)। [५० ] यथाऽभावस्य भावेन विरोधः शावतो मतः । प्रकाशसंनिधाने हि तमः सद्यो निलीयते ॥ ६ ॥ यथा मनःप्रसादेन शोकोगी विनश्यतः । तथासत्यस्य सत्येन सहभावो न सिद्धयति ॥ ७ ॥ जैसे अभाव का भाव के साथ शाश्वत विरोध है, जैसे प्रकाश के होते ही अन्धकार तत्काल हट जाता है, जैसे मन प्रसाद से शोक और उद्वैग नष्ट हो जाते हैं, ऐसे हो सत्य और असत्य एक साय नहीं रह सकते हैं। 43278 FANAYADAS0- . शरीर-स्वास्थ्यम् इन्द्रिय-संयमश्च शारीरिक स्वास्थ्य तथा इन्द्रिय-संयम तनूपा अमेऽसि तन्वं मे पाहि । पायुदी अमेऽरयायुर्मे देहि । • 'यन्मे तन्वा ऊनं तन्म आ पृण ।। (यजु. ३०१७) थमिदेव ! तुम शरीर की रक्षा करने वाले हो, मेरे शरीर को पुष्ट कीजिए। तम आयु को देने वाले हो, मुझे पूर्ण भायु दीजिए । मेरे शारीरिक स्वास्थ्य में जो भी कमी हो इसे पूरा कर दीजिए। वाङ्म आसनसोः प्राणध्यक्षुरक्ष्णोः श्रोनं कर्णयोः । अपलिताः केशा अशोणा दन्ता बहु बाहोलम् । ऊोरोजो जहयोर्जयः पादयोः प्रतिष्ठा ।। (अथर्व० १९१६०11-२) मेरे समस्त अंग पूर्ण स्वस्थता से अपना अपना कार्य करें, यही मैं चाहता हूँ। मेरी वाणी, प्राण, अख और कान अपना-अपना काम कर सकें। मेरे बाल काले [१]
रहे। दाँतों में कोई रोग न हो। पाहुना में बहुत पल हो। मेरी ऊरओं में श्रोज
जाधों में वेग और पैरों में दता हो ।
अश्मा भवतु नस्तनूः ।
(यजु० २९४१)
हमारी प्रार्थना है कि हमारे शरीर परपर के समान सुदृढ हो ।
भद्रं जीवन्तो जरणामशीमहि ।
(ऋ० ११३७६)
हम कल्याण मार्ग पर चलते हुए दावस्या को प्राप्त हों।
अहं सर्वमायुर्जीव्यासम् ।
(अथर्व० १९१७०१
मैं अपने जीवन में पूर्ण आयु को प्राप्त कर।
तचक्षुर्देवहितं पुरस्ताच्छुकमुञ्चरत्
पश्येम शरदः शतम् । जीवेम शरदः शतम् ।
शृणुयाम शरदः शतम् । प्रमगाम शरदः शतम् ।
अदीना: स्याम शरदः शतम् । भूयश्च शरदः शतात् ।।
वह देखो। इन्द्रियों के स्वास्थ्य के निर्वाहक, सबके चक्षुःस्थानीय प्रकाशमय
सूर्य भगवान् सामने उदित हो रहे हैं । उनसे स्वास्थ्य को प्राप्त करते हुए, हम सौ वर्ष
तक देखें, सौ वर्ष तक नीचे, सौ वर्ष तक मुन सके, सौ वर्ष तक बोल सके, सौ वर्ष
तक किसी के साधित न हों और सौ वर्ष के अनन्तर भी।
ऊपर दिये हुए वचनों से स्पष्ट है कि हमारे वैदिक यामय में शारीरिक स्वास्थ्य
और दीर्घायुष्य के प्रति कितनी गम्भीर पाया है। वास्तव में लौकिक या पारमार्थिक
किसी भी ष्टि से जीवन में शारीरिक स्वास्थ्य का अनिवार्य महत्व है। जीवन की
सफलता, चारित्र्य की दृढता, उदास भादशी को भावना, इन सबका शारीरिक
स्वास्थ्य मूलाधार है । शारीरिक स्वास्थ्य का घनिष्ठ संबन्ध इन्द्रिय संयम से है। नीचे
की संख्या १६ से २२ तक की रचनाओं का संवन्ध इन्हीं दोनों विषयों से है:-
[ ५२ ]
स्वस्थोऽहं नात्र संशयः स्वास्थ्य का मन्त्र मनुष्य के जीवन में शुभ संकल्पों और भावनाओं का बड़ा भारी स्थान है। हमारी शक्ति का स्रोत उन्हीं में निहित रहता है। निम्नस्थ दोनों पद्यों को इसी श्राशय से हम मन्त्र कह सकते हैं। दोनों की रचना अन्तःप्रेरणा से ऐसे समय हुई यो जब हम स्वयं एक भयानक रोग से श्राकान्त थे और डाक्टरों को चिकित्सा से भी कोई लाभ नहीं हो रहा था। हमारा विश्वास है कि उस समय हमारे पूर्णतया स्वास्थ्य लाभ में निम्नस्य विचारों ने श्रापर्यजनक सहायता की पी:- (ओम् ) स्वस्थोऽहं सर्वधा स्वस्थः स्वस्थो मेवात्र संशयः । स्थस्थः सदा भविष्यामि सत्यमेतद् व्रतं मम ॥ १ ॥ (ओम् ) सूर्येण वायुना चैव देवरन्यैश्च सर्वदा । रक्षितः सखिभावेन स्वस्थोऽहं नान संशयः ॥२॥ मैं स्वस्थ हूँ, सर्वथा स्वस्य हूँ। मेरे स्वस्थ होने में संशय के लिए कोई स्थान नहीं है। सदा स्वस्थ रहुँगा' यह मेरा सचा व्रत है। सूर्य, वायु तथा अन्य देवतागण भी सदा ससा रूप में मेरी रक्षा करते है। इसलिए मैं स्वस्थ है। इसमें कोई संशय नहीं है। "श्रप्स्पातरमृतमाम मेपजम्" (ऋग्: १।२३।११, मर्यात् , अलों में ममृत का पारा है, पे मौषध-स्वस है। 'सविता "अपामीषां पायते' (ग. १॥३॥९), अपात, सूर्य बीमारी को भगाता है। इस्यादि वेदमन्नों से स्पष्ट है कि सुर्य पारियो शकियों में स्वारस्य का प्रसार देने के लिए पदेष सनद रहती हैं। [५] '. न शरीरकृते वयम् हम शरीर के लिए नहीं हैं स्वास्थ्य के मौलिक सिद्धान्तों का प्रतिपादन नीचे के पचों में किया गया है। ब्रह्मचर्य महान् धर्मो ब्रह्मचर्य परं तपः । ब्रह्मचर्यप्रसादेन तमस्वरति दुस्तरम् ॥ १ ॥ शरीरमिदमस्मभ्यं न शरीरकृते ययम् । तदेतत्तत्त्वतो ज्ञात्वा नरः फल्याणमश्रुते ॥ २॥ ब्रह्मचर्य महान् धर्म है । ब्रह्मचर्य परम तप है। ब्रह्मचर्य के प्रसाद से मनुष्य दुस्तर मोहान्धकार को तर जाता है। यह शरीर हमारे लिए है, हम शरीर के लिए नहीं है.- इसको ठक ठीक समझ लेने से मनुष्य कल्याण को पाता है । - (१८) अतिक्रामन्नहो मोहादायुर्मर्माणि कृन्तति स्वास्थ्य के नियम यात्रायां जीवनस्यास्य शरीरं रथमुच्यते । इन्द्रियाणि हयानाहू रथस्यास्य मनीपिगः ॥१॥ स्वस्थेनातः शरीरेण संयतैरिन्द्रियैर्वजन् । लक्ष्यं यजीवनस्यात्र सुसं प्राप्नोति मानयः ॥ २॥ इस जीवन को यात्रा में मनीषी लोग शरीर को रथ और इन्द्रियों को घोडे कहते है। इसलिए स्वस्थ शरीर तथा संयत इन्द्रियों से जीवन-यात्रा करता हुमा मनुष्य सुख-पूर्वक अपने जीवन के लक्ष्य को पा सकता है। [ ५४ ] तत्राहारविहारेषु तथा स्वमाययोधयोः । च्यापारेषु तथाम्येपु युक्तबुद्धिरपेक्ष्यते ।। ३ ॥ उस के लिए श्राहार-विहार में, सोने-जागने में तथा अन्य कामों में भी युक्त युद्धि की अपेक्षा होती है। याथातथ्येन संपन्नं सर्व कार्य प्रशस्यते । पर्यायां जीवनेऽप्यस्माद् याथातथ्यमपेक्ष्यते ॥ ४ ॥ गीतायामेप एवार्थो युक्तशब्देन कथ्यते । युक्ततेवोच्यते योगो योगः कर्मसु कौशलम् ॥ ५ ॥ याथातथ्य या औचित्य से जो कार्य किया जाता है वह प्रशंसनीय होता है। इसलिए जीवन-चर्या में भी यायातथ्य की अपेक्षा है। भगवद्गीता में इसी भाव को 'युफ' शब्द से कहा गया है। युक्तता अथवा औचित्य को हो योग कहा जाता है। क्योंकि, काम करने में कुशलता का ही नाम 'योग' है । जाननप्यतिमूढोऽयं स्वास्थ्यस्य नियमानिमान् । अतिक्रामन्नहो मोहादायुमर्माणि कृन्तति ।। ६ ॥ स्वास्थ्य के इन नियमों को जानता हुआ भी अतिमूढ मनुष्य इनका उमञ्चन करता है और इस प्रकार यह प्राचर्य की बात है कि स्वयं अपनी श्रायु के मर्मस्थलों को काटता है। १. तु. "युषाहारविहारस्य युरूचेष्टस्य कर्मसु । युक्तस्वभावपोषस्य योगो भवति हुसदा ॥" (भगवद्गीता )। २.तु. "योगः कर्मसु कौशलम्" ( भगवद्गीता २।५.)। [ ५५ ] - (१९) शारीरं स्वास्थ्यमाश्रित्य सर्वमन्यत्प्रवर्तते स्वास्थ्य-रक्षा के लिए यन शारीरं स्वास्थ्यमानित्य सर्वमन्यत्मयतते ततः स्यारथ्यस्य यनेन परिरक्षा विधीयताम् ।। १ ।। चारित्र्यं ब्रह्मचर्य घ संयमः श्रम एव च । साधनं प्रथमं तस्य पौष्टिकाहार एव च ।। २ ।। जीवन में सब कुछ स्वास्थ्य पर निर्भर है। इसलिए पन से स्वास्थ्य की रक्षा करनी चाहिए। स्वास्थ्य रक्षा के मुख्य साधन हैं:-चारिश्य, ब्रह्मचर्य, संयत जीवन, श्रम और पौष्टिक भोजन । 20- (२०) यथोच्चैर्गगने गच्छन् इन्द्रिय-संयम यथोर्गगने गच्छन् पक्षी दृश्यैरनेकशः । अनाकृष्टः प्रयात्येव स्वाभीष्टं स्थानममतः ॥ १॥ तथैव जीवने दृश्य कैरादर्शमात्मनः । अविस्मरन् निरातको विचरेद्विजिनेन्द्रियः ।। २॥ जैसे गगन में ऊँचाई पर उदता हुभा पक्षी, विभिन प्रकार के रश्यों से आकृष्ट न होकर, अपने अभीष्ट स्थान की ओर आगे बढ़ता ही जाता है। इसी प्रकार मनुष्य को, विभिन्न दृश्यों के कारण अपने आदर्श को न भुलाते हुए और इन्द्रियों को वश में रखते हुए, निस्सन्दिग्ध भाव से जीवन-याना करनी चाहिए इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोषमृच्छत्यसंशयम् इन्द्रियों में प्रसक्ति नूनं दृश्यस्य कस्यापि केनचित्परमार्थतः । कर्तुं न शक्यते सद्यः स्वरूपस्यानधारणम् ।। १ ।। किसी भी दृश्य के वास्तविक स्वरूप का अवधारण कोई भी तत्काल नहीं कर सकता। हर्म्यमेकं गत, साय रात्री वा तन सस्थितः । चस्तुतस्तन्न जानीते दिया थावन पश्यति || २ || किसी बड़े मकान में सायकाल के समय पहुँच कर या रात्रि में यहाँ ठहर कर भी कोई उसके वास्तविक स्वरूप को तब तक नहीं समझ पाता है जब तक कि उसको दिन में नहीं देख लेता। साते मनुजे सयो ववभूपारिभूपिते । मनोज्ञे मधुरालापे विश्वासं तनुतेऽन क. १ ॥ ३ ॥ अच्छे वस्त्रों और आभूषणों से विभूषित, सुन्दर और मधुर-भाषी मनुष्य से 1. मिलते ही तत्काल उसका विश्वास कौन कर लेता है । अर्थात् कोई नहीं । इन्द्रियाणां ततः साक्ष्य सत्य नेकान्ततो मतम् । परीक्षायास्ततः त्रैष्ठ्य गीयते तत्ववेदिभि. ॥ ४ ॥ इसीलिए इन्द्रियों का साक्ष्य एकान्तत सत्य नहीं माना जाता है। इसीलिए तत्त्ववेत्ता लोग परीक्षा की श्रेष्ठता का मान करते हैं। एवाभियुक्ताना मतमेतन्मनीपिणाम् । इन्द्रियाणां प्रसङ्गेन दोपमृच्छत्यसशयम् ॥ ५ ॥ इसीलिए विचारशील मनोपियों का यह मत है कि इन्द्रियों में प्रसक्ति से मनुष्य निस्सन्देह दोष को प्राप्त होता है । 'द्विपन्ति देवाः मत्यक्ष परोक्षपिपतां गताः। सिद्धान्त. श्रुतियाक्येषु श्रूयते यत्र तत्र वै ॥ ६ ॥ "देवता प्रत्यक्ष से द्वेष करते हैं और परोक्ष ही उनको प्रिय होता है' यह मिदान्त अनेकन श्रुतिवाश्मों में सुनाई देता है । १ तु "परोक्षप्रिया श्व हि देवा भवन्ति, प्रत्यक्षद्विय ।" (गोपयवाह्मण १111) [५. ] अत वत आपाततो रूपं दृष्ट्या कस्यापि वस्तुनः । नावशलद्वशं गच्छेद् यारत्तनायधारयेत् ॥ ७ ॥ इसलिए मनुष्य को चाहिए कि वह किसी भी वस्तु के रूप को श्रापाततः देखकर तय तक उसमें आसक्त या धनुरफन हो जाए जबतक उसके सर को ठीक-ठीक न सममले। (२२) विचरोद्विजितेन्द्रियः जीवन-यात्रा सुदीर्घस्याप्चनः पार गन्तुकामोऽय जीवने । स्वलल्यैकमना नित्यं विचरेविजितेन्द्रियः ।।१॥ स्पर्धायाः शत्रुताया था रागस्यायथ कुत्रचित् । प्रसङ्गोऽवसरोऽप्येवमुपयोगो विद्यते ॥ २॥ निरुद्देश्यं निरादर्श फर्तव्येन वियर्जितम् । जीवनं यस्य, कामं स व्यर्थ तदतियारयेत् ॥ ३ ॥ जो मनुष्य इस जीवन के सुदीर्घ मार्ग को सफलतया पार करना चाहता है, उसे इन्द्रियों को वश में रखते हुए सदा एकमात्र अपने लक्ष्य में मन लगाकर भोवन-यात्रा में असर होना चाहिए । इस जीवन यात्रा में किसी विषय के संबन्ध में स्पर्धा अथवा राग अथवा देष का न तो प्रसर ही है, न अवसर(सकार); और कोई उपयोग भी नहीं है। अभिप्राय यह है कि इस जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करना इतना कठिन है कि वास्तव में मनुष्य को किसी के साय स्पर्धा अयचा राम देष करने का न तो अवकाश हो मिल सकता है, न उनका कोई प्रसन्न उपल्पित होना चाहिए, और न उनसे उसको कोई लाभ ही होता है। हाँ, जिसका जीवन उद्देश्य हीन, श्रादर्श झोन और पतन्यता की भावना से रहित है, वह भले ही उसको ध्यप की बातों में न करे ! App+- [५] कर्ममार्गः कर्म का मार्ग केरल शुष्क हान या निरीह शुभ संकल्पों से ही मनुष्य अपने जीवन को सफल नहीं बना सक्ता। उनकी वास्तविक्ता की परीक्षा कर्म की कसौटी पर ही हो सकती है । साथ ही यह भी आवश्यक है कि किसी भी संक्ट या आपत्ति से न घबढ़ाकर अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए मनुष्य बराबर धैर्य और उत्साह से कार्य करता रहे। इसी सिद्धान्त का प्रतिपादन नीचे की रचनाओं (संख्या २३-२६) में किया गया है :- (२३) चतुरस्रष्टसंसिद्धिः ज्ञान-पुरस्सर कर्म का महत्त्व कर्मणा रहितं ज्ञानं पङ्गुना सदृशं भवेत् । न तेन प्राप्यते किंचित् न च किंचित्प्रसाध्यते ॥ १ ॥ फर्म से रहित ज्ञान एक पख के समान होता है। उससे न तो कोई वस्तु प्रास की जा सकती है, न कोई कार्य सिद्ध किया जा सकता है । एवं ज्ञानेन हीनं यत् कर्मान्धेन समं स्मृतम् । मार्गो वा मार्गलयं या नैर तस्य प्रदीयते ॥२॥ इसी तरह ज्ञान से रहित फर्म को एक अन्धे के सदृश समझना चाहिए । उसको मार्ग अथवा मार्ग का लक्ष्य कुछ मी प्रतीत नहीं होता। फर्मणा मनसा याचा फर्तव्यं फर्म कुर्वतः । तस्मादेवेष्टसंसिद्धिश्चतुरमा प्रजायते ॥ ३ ॥ इसीलिए ठीक ठीक इर की प्राप्ति उसी मनुष्य को होती है जो मन वाणी और कर्म से अपने पर्तव्य कर्म फो करता है। अर्थात् , ज्ञान पुरस्सर कर्म से हो ट की गिदि होती है। ar 1.1. "ते य एवमेतहिये तरकम कुते, मृत्वा पुन समयन्ति । ते संभवन्त एषागृतत्वमभिगभवन्ति भय य एषत विदु तस्कर्म न कुर्वते. मृत्वा पुन संभवन्ति । त एतस्येवा पुन पुनन्ति " (रातपपमा 1.111..) [५] (२४) प्रायेण कल्पनालोके विचरन्तीह मानवाः वर्तमान की उपेक्षा चातुतो वर्तमान यज् जगत्तत्परिहाय हा 11 प्रायेण कापनालोके विचरन्तीह मानवाः ॥ १ ॥ यह खेद का विषय है कि मनुष्य वस्तुत दर्तमान या उपस्थित कर्तव्य के जगन् को छोड़कर भायण कल्पना के लोक में ही घूमा करते हैं। उपस्थितं परित्यज्यानुसरन्तोऽनुपस्थितम् । मन्दमता हि वर्तन्ते धुधस्तान्नाभिनन्दयेत ॥ २ ॥ मन्दबुद्धि लोग हो उपस्थित को छोचकर अनुपस्थित के पीछे दौसा करते हैं। सममदार मनुष्य को चाहिए कि उन लोगों को बढावा न दें । वर्तमान समालम्भय चर्तते यदनागतम् । उपेक्षा वर्तमानस्य तस्मानोपयुज्यते ॥ ३ ॥ भविष्य का भाधार वर्तमान ही होता है । इस लिए दर्तमान की उपेक्षा करना किसी प्रकार भी युरू नहीं है। .. , (२५) धैर्यमालम्बनं श्रेष्ठम् धैर्य का आलम्बन आशाकुलितः कष्टं बिना प्रायेग कारणम् सहते, तस्थले तस्माद् विद्वान् धैर्य समाश्रयेत् ॥ १ ॥ धैर्यमालम्बन श्रेष्ठम् , धैर्यमालम्बनं परम् । धैर्येण हि सहायेन तमस्तरति दुस्तरम् ॥ २ ॥ आशा पार से व्याकुल होने वाले लोग प्राय बिना कारण के ही कष्ट को सा करते हैं। इसलिए आशक्षा के अवसर पर विद्वान् को धैर्य से काम लेना चाहिए। धर्य सबसे श्रेष्ठ पालम्बन है। धर्य परम आलम्बन है। धैर्य की सहायता मनुष्य घोर अन्धकार को पार करता है। [ ६.] से (२६) धीरा धैर्यधुरन्धराः दुःखागम से कल्याण पङ्कादुत्पद्यते पद्म- महो राश्याः प्रजायते। मीप्मादनन्तरं वी विद्युन्मेधात्मजायते ॥ १ ॥ शुक्लपक्षसमारम्भः कृष्णपक्षादनन्तरम् । कण्टकाचितवृक्षेभ्यो मनोज्ञकुसुमोद्गमः ॥ २ ॥ दास्यात्स्वतन्त्रतावाप्तिः स्वास्थ्य रोगादनन्तरम् । दारिद्रथं संपदो भूमिरतपसः सिद्धिरेव च ॥ ३ ॥ फ-पापर्भात्समुत्पत्तिासादीनां महात्मनाम् । शूद्रेभ्योऽपि सतां जन्म ज्ञानमज्ञानिनां तथा ॥ ४ ॥ वृत्तेऽस्मिन् दृश्यमाने तु सृष्टावस्यां समन्ततः । कस्यांचिद् दुःस्थिती नैव नैराश्यमुपयुज्यते ॥ ५ ॥ लोकेशस्य जगद्भर्तुर विश्वकल्याणकारिणी । प्रवृत्ति(मतां शश्च द्धाविश्वासदायिनी ॥ ६ ॥ सर्यापि दुःस्थितिस्तस्मात् मुस्थितेरेव कारणम् । एवं दुःखागमो नूनं कल्याणायैव जायते ॥७॥ सिद्धान्तमिममाधित्य धौरा धैर्यधुरंधराः । निराता: समुन्नत्य प्रयतन्ते निरन्तरम् ॥ ८॥ पन उत्पन होता है, रात्रि से दिन का जन्म होता है, प्रीम के पवाद वर्ष माती, विपुर मेप से जन्म सेती है। [ ६१ ]
२, शुक्रपक्ष का प्रारम्म कृष्णपक्ष के अनन्तर होता है,
काँटों से व्याप्त पौधों से सुन्दर पुष्पों का उद्गम होता है।
३ दास्य से स्वतन्त्रता को प्राप्ति होती है,
रोग के पचात् स्वास्थ्य लाभ होता है,
जहाँ दारिद्रय है वहीं सम्पत्ति भाती है,
कटमय तप से हो सिद्धि प्राप्त होती है।
४. कन्या के गर्म से व्यासादि महात्माओं का जन्म होता है,
शुद्धों से भी सन्तों का जन्म होता है,
अज्ञानियों को ज्ञान की प्राप्ति होती है।
५ इस सृष्टि में जब सब ओर यह वात दिखाई दे रही है,
तब किसी भी दुरवस्था में निराश होना उपयुक्त नहीं है ।
६ जगत् का पोपण करने वाले लोगों के स्वामी भगवान की
विध का कल्याण करने वाली प्रति
बुद्धिमानों में सदा श्रद्धा और विश्वास को उत्पन्न करती है।
७ इसलिए 'सारी दुरवस्था अच्छी स्थिति का पूर्वरूप हुआ करती है,
एव दुख का आगमन भी स्याण के लिए ही हुआ करता है।'
८ इसी सिद्धान्त का पाश्रय लेकर
धर्य-धुरन्धर धीर लोग निर्भयता के साथ
सदा उन्नति के लिए प्रयत्नशील रहते हैं।
[ ६२ ]
लोकनीतिः व्यावहारिक नीति जीवन में आदर्शवाद के साथ-साथ लौकिक वस्तु स्थिति और व्यावहारिक जगत् के परिचय की भी आवश्यकता होती है। इसी दृष्टि से निम्नस्थ रचनाओं ( सख्या २७.३२ ) में संक्षिप्तरूप से श्रावश्यक लोक-नीति का वर्णन किया गया है:- (२७) विद्या समुन्नतिपथं विशदीकरोति विद्या-चंदना विद्या समुन्नतिपयं विशदीकरोति बुद्धिं विचारविषये प्रखरीकरोति । कर्तव्यपालनपरां धियमादधाति विद्या सखा परमबन्धुरथेह लोके ॥ १ ॥ विद्या उन्नति के मार्ग को स्पष्टतया दिखाती है। विद्या विचारणीय विषयों में वृद्धि को तीक्ष्ण करती है। विद्या बुद्धि को कर्तव्य-पालन में तत्पर बनाती है। विद्या इस लोक में सखा और परम-बन्धु के समान है। रूपं प्रसिद्ध न बुधास्तदाहु- विद्या मता वस्तुत एव रूपम् । अपेक्षया रूपवतां हि विज्ञा मानं लभन्तेऽतितरां जगत्याम् ॥ २ ॥ मंसार में जिस को रूप कहा जाता है विद्वान् लोग उस को रूप नहीं मानते । धे तो विद्या को ही वास्तविक रूप समझते हैं। क्योंकि, रूपवानों की अपेक्षा संसार में विद्वान् लोग ही अधिक मान सरकार को पाते हैं। [६३ ] धनं धनं नैव मतं युधानां विद्यैव वित्तं मतमस्ति तेपाम । चौरो न यां चोरयितुं समर्थो भूयोऽपहर्तुं न च यो समर्थः ॥ ३ ॥ विद्वान् लोग धन को धन नहीं समझते। उनके मत में तो विद्या ही वास्तव में धन है। क्योंकि विद्या को न तो चौर चुरा सकता है, न राजा ही उस को छौन सकता है। विद्या सकाशादपि प्राकृतस्या- देया सदा स्याद्यदि सा चरिष्ठा! स्थानेऽप्यपूते पवितं सुवर्ण के नाम लोकेऽन परित्यजन्ति ॥ ४ ॥ उत्तम विद्या को साधारण व्यक्ति से भी ले लेना चाहिए। अपवित्र स्थल में भी सुवर्ण को संसार में कोई नहीं छोड़ता। अयाप्य विद्या विनयेन शून्या अहंयत्रो दुर्जनतां ब्रजन्ति । दुग्धस्य पानेन भुजङ्गमानां विषस्य वृद्धि ग्नप्रसिद्धा ॥५॥ विनय-भाव से शल्य अभिमानी लोग विद्या को पाकर पुर्जनता को धारण का लेते हैं। सपार में यह बात प्रसिद्ध है कि दूध के पीने से सपा के विष को इदि होती है। ईदियो जामति यावदन्द- रात्मस्वरूपावगमो न यायत् । याबरो नापि विवेकशाली भेदः क भूसे विदुषीह तायत् ।। ६ ॥ जबतक मनुष्य के अन्दर या लोभ मोह आदिका प्रायस्य है, जयतः उस मात्म-स्वस च मान नहीं है, जबतक मनुष्य विवेक सारी नहीं है, तबतक विद्वान करे कमाने वाले व्यक्ति में और मूर्स में कोई भेद नहीं है। [६४ ] अभ्यासशीला: सुतरां जना ये भवन्ति ते मन्दधियोऽपि विज्ञा' । कनेह रज्मा हि गमागमाभ्यां शिलापि घृष्टा भुवने न दृष्टा १ ॥ ७ ॥ विशेषतया अभ्यास शील लोग, मन्द शुद्धि होने पर भी, विद्वान् हो जाते हैं। कए की मन में लगी हुई शिला भी रस्सी के जाने-आने से घिसनाती है, यह किस ने नहीं देखा है ? -O-AGNOS- (२८) सङ्गः सतां शर्मशतानि सूते : सत्सङ्ग-माहात्म्य सङ्गः सतां शर्मशतानि सूते सङ्गोऽसतां तद्विपरीतवृत्तिः । यस्तेजसा यस्तमसां स्वभागो भेदस्तयोः सर्वजगत्प्रसिद्धः ॥ १ ॥ सत्पुरुषों का सत्र अनेक कल्याणों को जन्म देता है। असज्जनों का सा उस से उलटा ही होता है। तेज के स्वभाव और श्राघवार के स्वभाव में जो अन्तर है उसे सव कोई जानते हैं। सत्सङ्गमे तिष्ठति यन्महत्वं तज्ञायते दुर्जनसगमेन । सुख हि दुःखानुभन भाति दीपप्रकाशोऽपि धनान्धकारे ।। २ ।। सत्सा का जो महत्व है वह दुर्जन के सा से ही जाना जाता है । मुख का स्वरूप दुख के अनुभव से हो स्पष्ट होता है, एव घोर अन्धकार में ही दीप प्रकारा का महत्त्व स्पष्ट होता है। [ ६५ ] - नीचोऽपि सङ्गेन सतां जनानां महत्तमासादयति प्रकामम् । समुद्रशुफी गतमम्बुदाना प्राप्नोति मुक्ताफलतां जलं तत् ॥ ३ ॥ सम्मनों के सर से नीच मनुष्य भी विशेष महत्व को प्राप्त कर लेता है। यह प्रसिद्ध है कि समुद्र की शुक्ति में पड़ा हुआ बादलों का जल मोतियों के रूप में परिवर्तित हो जाता है। समुज्ज्वलं मेम हि सज्जनानां दिन दिने पोपमुपैति नूनम् । स्थिरस्वभावं सुतरामुदारं हासोन्मुसत्वं भजते न जातु ॥ ४ ॥ सजनों का समुज्ज्वल अर्थात विशुद्ध प्रेम दिन-प्रतिदिन पुष्ट होता जाता है। स्थिर-स्वमाव और स्वार्थ की भावना से रहित होने के कारण यह कभी हासोन्मुख महीं होता। आपग्निममा अपि साधुषों हरन्ति दुखानि सदा परेपाम् । आच्छादितोऽहपतिरासमन्ता- दभ्रेस्तमो धारयतीह नूनम् ।। ५ ॥ विशेषतया साधुस्वभाव वाले सम्बन स्वयं आपत्तियां पड़े हुए भी सदा दमरी के दुःखों को दूर करते हैं। सब ओर से बादलों से हवा हुमा भी सूर्य अन्धकार को अवश्य दूर कर देता है। न दुर्जनानामपत्यमन्तः सतां पदाचित्पदमादधाति । पादाइतोऽप्येष सहर्निशालश छायाश्रितानामपन्ति तापम् ॥ ६ ॥ दुर्जनों का अपचर सत्पुरुषों के हृदय में कमी स्थान नहीं पाता। यह सामने का विशाल वृक्ष, पैरों से ताडित होने पर भी, अपनी दाया में अधितों के साप दूर कर देता है। [ ६६ ] कदर्थितोऽपीह खलेन साधुर् हितं परेषां नियतं करोति । मुहर्मुहुश्चन्दनमङ्ग ! पृष्टं मनोरम सौरभमातनोति ॥ ७ ॥ - दुष्ट मनुष्य द्वारा पीडित होने पर भी साधु मनुष्य सदा दूसरों की भलाई करता है। देखिए, बारवार घिसने पर चन्दन मनोज्ञ सुगन्ध को फैलाता है। द्राक्षेव केचिद्वहिरन्तरा चा- न्ये नारिकेलेन समं मनोज्ञाः । सौवीरंतुल्या बहिरेव केचि- देवं मनुष्यास्त्रिविधा हि लोके || ८ ॥ संसार में मनुष्य तीन प्रकार के होते हैं। कोई तो द्राक्षा (= दाख) के समान बाहर और भीतर से मनोरम होते हैं; कोई नारियल के समान केवल भीतर से मनोरम होते हैं; और कोई पके-मीठे बड़े बेर के समान केवल बाहर से अच्छे होते हैं । प्राप्ते प्रसने मनुजस्वरूपं विज्ञायते, नेतरथा कथंचित् । विद्रायणेनैव यथा जगत्या- माभूपणानां क्रियते परीक्षा ॥ ६ ॥ अवघर के उपस्थित होने पर ही मनुष्य का स्वरूप जाना जाता है; अन्यथा कभी नहीं। जैसे संसार में भाग में पिघलाने से ही आभूषणों की परीक्षा की जाती है। इक्षोः प्रवृत्तेनुगामिनस्ते सन्तो महान्सो विचरन्ति लोके । प्रपीडितोऽपीपुरमन्दमोदं रसप्रदानेन सदा तनोति ॥ १० ॥ संसार में महान् सत्पुरुष भ के स्वभाव का अनुसरण करने वाले होते है। व पेरे जाने पर मो रस देकर सदा विशेष मानन्द का प्रसार करता है। १.तु. "सौवीर पदरं पाय" (भमरकोषे ।।३७)। तया "पच्यमान सुमधुर सौवीरं यदरं महत्" (भावप्रकरो)। [ ६७ ] पदं वरेण्यं समुशान्ति सन्तोऽ- सन्तः पुनस्तद्विपरीतभाराः । गृधः श्मशाने रमते स्वभावाद् हंसः पुनर्मानसमेय भुझे ।। ११ ॥ । सरपुरुष घरणीय उत्तम पद की चाहा करते हैं। असजनों का स्वभाव उनसे विपरीत हुआ करता है । गृध्र स्वभाव से श्मशान में प्रसन्न होता है, पर हंस प्रसनता के लिए मानस-सरोवर का ही सेवन करता है। चाम्भिः सतां सुनृतशीतलाभिः क्षुब्ध मनः शान्तिमुपैति नूनम् । उत्सितमद्भिः पतनोन्मुखं तद् वही पय: स्वस्थितिमेति सद्यः ।। १२ ।। सत्सुरुषों के प्रिय-सत्य और शीतल वचनों से क्षुब्ध मन को निचय ही शान्ति प्राप्त होती है। वह में गिरने के लिए तैयार दुग्ध, पानी के हिदकने पर, तत्काल अपनी पूर्व स्थिति में श्रा जाता है। क्षोभं प्रयाता अपि नैव सन्तो दुष्टामशिष्टां गिरमुद्गृणन्ति । दुष्टाः प्रसन्ना अपि शीलयुक्त वातुं न जातु प्रभवन्ति वाचम् ॥ १३ ॥ सजन क्षुब्ध होने पर भी अशिष्ट और दुष्ट वाणी का व्यवहार नहीं करते। दुष्ट लोग प्रसलता में भी शीलयुक वाणी को कमी नहीं बोल सकते । [ ६८ ] (२९) असज्जनः पापनिबद्धबुद्धिः असजनों का स्वभाव असज्जनः पापनिवद्धबुद्धि- स्तस्मै न कोपावसरः प्रदेयः । क्षेपेण पविदितं शिलाया वस्त्राणि नूनं मलिनीभनन्ति ॥ १ ॥ श्रसज्जन की बुद्धि पाप में लगी रहती है । उसको कोप का अवसर न देना चाहिए । यह सब जानते हैं कि कीचड में पत्थर के फैक्ने से कपडे मैले हो जाते हैं। बहूपकारैरुपसेवितोऽपि कृतज्ञता नैव सलो विभत्ति । सुपर्णकुम्भेन पयोनिपेकान् माधुर्यमाप्नोति न निम्बवृक्षः ।। २ ।। भनेक उपकारों से उपकृत होने पर भी दुष्ट मनुष्य कृतज्ञ नहीं होता। सुवर्ण के घडे से पानी सीचने से नीम के वृक्ष में मिठास नहीं पाता है । श्रुत्यैव वागीरुपदेशयुक्ता दुष्टा बुधानां सहसा त्यजन्ति ! मालाकृता सग्रथितं सुपुष्प- मुगन्ति माल्यं कपयो मनोज्ञम् ।। ३ ।। दुष्ट लोग विद्वानों के उपदेश भरे वचनों को सुनते ही तत्काल छोड़ देते हैं। माली द्वारा अच्छे फूलों से बनायी हुई सुन्दर माला को बन्दर मसल डालते हैं। बुधाः सलानां मृदुम वाचा यचः कदाचिन्नहि विश्वसन्ति । माधुर्ययुक्ता अपि ता मयूरः केका वदन्नत्ति भुजङ्गजातम् ॥ ४ ॥ [ ६६ ] विद्वान् लोग मृदु-मधुर-भाषी दुष्टों के वचन में कभी विश्वास नहीं करते। अत्यन्त मीठी बोली को पोलता हुथा भी मोर सो को सा जाता है । दुप्राशयानामसतां प्रसङ्गः फलं प्रसूते नितरामवद्यम् ! भुजगमानां पतितं मुसान्तः स्वातेर्जलं याति विपत्वमेव ॥ ५ ॥ दुष्ट अभिप्राय वाले असजनों का सङ्ग अत्यन्त निकृष्ट फल को पैदा करता है सपों के मुख के अन्दर गिरा हुआ स्वाति नक्षत्र का जल विष बन जाता है । दुष्टप्रसङ्गेन सतामपीह मानस्य हानिर्भवतीति दृष्टम् । यकस्य लोहस्य निपेवणेन घनस्य घातं सहते कृशानुः ॥ ६ ॥ दुष्ट के सबसे सज्जनों के भी मान की हानि देखो जाती है। टेटे लोहे के सेवन से अग्नि को हयोडे को चोट सहनी पड़ती है। मलीमसा मत्सरिण: सहन्ते नैवापरपां सलु माग्यवृद्धिम् । संघीय चन्द्रस्य रुचि रजन्यां न जातु मोद भजते हि चौरः ॥ ७ ॥ ईर्ष्यालु स्वभाव के दुष्ट लोग दूसरों को भाग्य-वृद्धि को नहीं सह सकते । रानि में चन्द्रमा के प्रकाश को देख कर चोर को भी प्रसन्नता नहीं होती। सङ्ग समासाद्य सतां जनानां न दुर्जनो विस्मरति स्वभावम् । वृक्षे निवासी पलु चन्दनस्य पिपं न सर्पस्त्यजतीह जातु ॥ ८ ॥ सज्जनों के संग को पाकर दुर्जन अपने स्वभाव को नहीं भूलता है। चन्दन के वृक्ष पर रहने वाला सर्प विष को कभी नहीं छोडता [७] (३०) निरादरस्यास्पदमस्ति याच्या याचना से अपमान निरादरस्यास्पदमस्ति याच्या स्थान हि मानो लभते न तत्र। विश्वाधिपो वामनरूपधारी जातो बलेर याचनतत्परः सन् ॥ १ ॥ याचना में निरादर रहता है। उसमें सम्मान के लिए कोई स्थान नहीं होता। विश्व के स्वामी भगवान को भी घलि से याचना करते समय वामनरूप को धारण करना पड़ा था। श्रेष्ठः कदाचित्कृपणं कदर्य न याचते फष्टशताकुलोऽपि । किं घातको जातु पिपासयापि घट जलं प्रार्थयते विपएण: ? ॥ २ ॥ श्रेष्ठ मनुष्य संकों कों से व्याकुल होने पर भी कभी कृपण नीच व्यक्ति से याचना नहीं करता। प्यास से व्याकुल होने पर भी क्या कभी चातक घड़े से जल की प्रार्थना करता है? [१] (३१) सालेषु वन्धो ननु कुञ्जराणाम् सामर्थ्य की महिमा सामर्थ्यभाजो बह्वः सहाया न निर्यलाना भरतीह कश्चित् । चाहिं प्रदीप्तं पननः करोति दीपं पुनः प्रापयति क्षयं सः॥ १ ॥ सामर्थ्य यालों के अनेक सहायक होते है, निर्यलों का कोई भी नहीं । वायु अमि को प्रदीप्त करता परन्तु दीपक पो घुमा देता है। सामर्थ्यभाजां ननु वैरिणोऽपि भवन्ति नम्रा हितकातिणश्च । वयस्यपर्या अपि दुर्बलाना- मुपेक्षया दूरत एव यान्ति ॥ २ ॥ सामर्थ्य पालों के वरी भी नम्र और हितैषी हो जाते हैं। अच्छे मित्र भी दुर्वलों की उपेक्षा करके पूर से ही चले जाते है। घोढुं समर्था महतां महान्तो भारं गुरु नेव तु हीनसत्त्नाः । सालेषु धन्धो ननु मुञ्जराणा- मैरएडवृक्षेषु न जातु दृष्टः ॥ ३ ॥ घदों के भारी बोझे को बडे ही वहन करने में समर्थ होते हैं; दुर्वल नहीं। साल के पक्षों में हाथियों का योपना देखा जाता है। वी के वृक्षों में कभी नहीं। क्षुद्रैः समेत्यापि हि सत्त्वभाजों प्रभूयते नापतिं विधातुम् । कुशंकदाचिन्नहि जम्बुकानां हन्तु यथा केसरिणं समर्थम् ॥ ४॥ शुद्र लोग इक्ट्ठे होकर भी सस्यशाली लोगों का अपकार करने में समये नहीं होते जैसे गीदनों का समूह भी सिंह के मारने में कभी समर्थ नहीं होता है। [ ७२ ।
नीतिमुक्तावलिः नीति के मोती उत्कर्षमासादयितुं समर्था गुणेन युक्ता न तु तद्विहीनाः । गुणेन युक्तेन घटेन नूनं कूपान्मनुष्या जलमाप्नुवन्ति ॥ १ ॥ गुणवान् ही उत्कर्प के पाने में समर्थ होते हैं। निर्गुण नहीं। 'गुण' (अर्यात् रस्सी) युफ पड़े से ही मनुष्य कुएँ से जल को प्राप्त करते हैं। विना श्रमं जातु जनो न कश्चित् श्रियं समासादयितुं समर्थः । अतिप्रयासेन सुरासुरैहि लब्धानि रत्नानि समुद्रमध्यात् ॥ २ ॥ विना श्रम के कोई मनुष्य कमी भी लक्ष्मी को नहीं पा सकता। देवताओं और अमुरा ने बड़े परिश्रम से ही समुद्र के मध्य के रानी को पाया था। सुसं परं कि? निजतन्त्रतेव दुःसं परं किं ? परतन्त्रतत्र । यनेपु फीस: सुसिनो भ्रमन्ति दीनाः पुनः फाइनपारेषु ।। ३ ।। पड़ा मुस यया है। स्वतन्त्रता हो। पड़ा इस क्या है परसन्नता हो। जंगलों में तोते प्रसनता से जाते फिरते है। पर स्वर्ण के भी पिंजड़ों में दोन दुसी रहते हैं। धनं धनं नैव मतं पुपानां सन्तोप एयास्ति धनं वरीयः । [३] सन्तोपहीना अपि वित्तवन्तः सुसेन निद्रां बत ! नो लभन्ते ॥ ४ ॥ विद्वान् लोग धन को धन नहीं मानते, उनके लिए सन्तोष हो श्रेष्ठ धन है। सन्तोष से होन धनवान् भी घुस को नींद नहीं सोते हैं। स्वल्पोऽपि दोप: समुपेक्षितश्चे- दनर्थसन्तानमसौ प्रसूते। यहः कणोऽरण्यपरम्परास्ता भस्मत्वमापादयितुं समर्थः ॥ ५ ॥ उपेक्षित किया हुया योड़ा-सा भी दोष अनर्थ परम्परा को पैदा कर देता है । बद्धि का दश बड़ी-बड़ी अरण्य परम्पराओं को भस्म करने में समर्थ होता है। प्राप्तिर्यदीया सुखमातनोति तस्यैव दुःखाय भबेद्वियोगः । सूर्योदयेन प्रविकासि पद्म तस्माद्वियुक्तं लभते प्रमीलाम ॥ ६ ॥ जिसकी प्राप्ति सुख देती है, उसी का दियोग दुःख देने वाला हो जाता है। सूर्य के उदय से खिलने वाला कमल उससे वियुफ होकर संकुचित हो जाता है । न भुज्यते नापि वितीर्यते चेद् अन्ते तदन्येऽपहरन्ति नूनम् । एवं च वित्तं कृपणस्य लोक तथा समानं मधु मतिकाणाम् ॥ ७ ॥ यदि उपभोग नहीं दिया जाता और दान भी नहीं दिया जाता, तो अन्त में निधय ही दूसरे लोग उसका अपहरण कर लेते हैं। इस प्रकार संसार में कृपण का घन और मधु-मक्षिकाओं का मधु दोनी समान हैं। कार्य प्रयतत फलं समीक्ष्य व्यथा न जायेत ययानुतापात् । ४] तुल्यं तिलैः कः सिकताः प्रपीड्य.. तैलं समासादयितुं समर्थः १॥ ८ ॥ परिणाम का विचार करने ही कार्य में प्रवृत्त होना चाहिए, जिससे पचात्ताप की व्यथा न होने पाए । तिली की तरह बालू को कोहू में पेल कर कौन तेल को पा सकता है? कार्यस्वरूपावगमस्य काल: कार्यप्रवृत्तः प्रथम प्रदिष्टः । जाते विवाहे कुलशीलपृच्छी जामातृपक्षात्कुरुते नु कश्चित् ? ॥ ६ ॥ जो काम करना है उस के स्वरूप को समझने के लिए उसके प्रारम्भ करने से पहले का ही समय ठीक कहा गया है । विवाह हो जाने पर क्या कोई जामाता के पक्ष से उस के कुल और शील के विषय में पूछ ताछ करता है । फालानुकूल्येन विधीयमानं कार्य हि साफल्यमुपैति नूनम् । उन्नेपुचीजेष्वयथर्ववश्य धनश्रमौ निष्फलता प्रयात: ॥ १० ॥ काल की अनुकूलता को देख कर जो कार्य किया जाता है वह अवश्य सफलता को पाता है। प्रतिकूल ऋतु में बीजों के वोने से धन और श्रम दोनों अवश्य व्यर्थ जाते हैं। अनागतार्थ असमीक्ष्यकारी संसिद्धिमासादयितु समर्थः । वह्निप्रदीप्त भवने तु कूर्म खनन् हि मूर्थी लभते न किञ्चित् ॥ ११ ॥ अनागत (श्रानेवाले) विषय का सम्यक् विचार कर के जो कार्य करता है वही सफलता को पा सकता है। घर में आग के लग जाने पर कुएँ को खोदने पाले मूर्स जन को कोई फल नहीं मिलता। [७] उपायगुप्तस्य नरस्य फश्चित शान शकोऽरहतं विधातुम् । उपानही येन धृते न वक्ष्य तापाय शक्ताः सिकता: प्रवताः ॥ १२ ॥ ।। इत्यमृतमन्थने जीवनपाथेयं नाम द्वितीयः परिस्रवः ॥ जो यथासमय उपाय से अपनी रक्षा कर लेता है, कोई भी शत्रु उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। जिसने जूते पहिन रखे हैं गरम बालू उसके पैरों को नहीं जला सकता।
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परमहस श्रीरामकृष्ण देव
अध्यात्मनातो मानुज्ञानतिमिराब्तान
लोकानुढोषय योऽसौ दैशिकेन्द्रो नमामि तम् ॥
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तृतीयः परिस्रवः प्रज्ञा-प्रसादः ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्वस् ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः । (मुण्डकोपनिषद् २०१७) स तस्मिन्नेराकारी नियमाजगाम पहुशोभमानामुमा हेमवतीं तार्थ होगा किमेतद् यशामिति । सा प्रीति होवाच' 'ततो हैव विदाञ्चकार ग्रोति । (केनोपनिपद् २५-२६) द्वितीय प्रवाह प्रज्ञा-प्रसाद में समर्थ होता है। साधक ज्ञान द्वारा प्रज्ञा प्रसाद को पाकर ही विशुद्ध परमतत्त्व के साक्षात्कार (मुण्डकोपनिपद ३।११८) इन्द्र (= जीवारमा)ने यक्ष (= यजनीय देव ) के स्वरूप को जानना चाहा । सब ओर से निराश होकर वह अत्यन्त शोभामयी उमा ( = विशुद्ध प्रज्ञा) के पास पहुँचा । उसके द्वारा ही इन्द्र ने ब्रह्मरूप में उस 'यक्ष के स्वरूप को जाना। (केनोपनिषद् २५-२६) ocexe- [७७ ] प्रज्ञा-प्रसादः प्रज्ञा-प्रसाद जीवन क्या है ? क्यों है ! उसका परमलक्ष्य क्या है ? इस महान् प्रश्न का उत्तर यही हो सकता है कि- उत्तरोत्तरमुत्कृष्टप्रगत्तिर्जीवन मतम् ।' अर्थात् , उत्तरोत्तर उत्कृष्ट प्रगति, उत्तरोत्तर समुत्थान ही जीवन है, यही जीवन का वास्तविक लक्ष्य है। इस उत्तरोत्तर प्रगति में जीवन को क्रमशः तामस, राजस और सात्त्विक अवस्थाओं में से होकर जाना पड़ता है। वास्तविक आदर्श का अपरिज्ञान, मोह, प्रमाद और भालस्य का ही नाम तामस अवस्था है । लक्ष्य की अस्थिरता, अनिश्चय, अशान्ति, अवसाद और मिथ्या अभिमान का ही नाम राजस अवस्या है । परम- लक्ष्य को स्पष्ट प्रतीति, निश्चय, तत्परता, अध्यवसाय, शान्ति और प्रसन्नता को ही सात्विक अवस्था कहते हैं। इन अवस्थाओं के प्रमिक विकाम का विशेष प्रतिपादन नीचे संख्या ४५ की रचना में किया गया है। उक्त सात्त्विक अवस्था के परम उत्कर्ष को हो 'प्रज्ञा-प्रसाद' समझना चाहिए। 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' (बृहदारण्यकोपनिषद् ॥३।२८), "जीवा ज्योति- रशीमहि" ( भाम् ॥३२॥२६ ) इत्यादि वैदिक प्रार्थनाओं का वास्तव में अभिप्राय उक्त 'प्रमा-प्रसाद' से ही है। 'प्रज्ञा प्रसाद' के स्वरूप और स्थिति का विभिन्न दृष्टियों से सुन्दर वर्णन शाम्रो में यत्र-तत्र मिलता है । उदाहरणार्य, निम्नस्य प्रमाणों को देखिए :- ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसच्चस् ततस्तु तं पश्यते निष्कलं ध्यायमानः । (मुण्डकोपनिषद् ३।११८) अर्थात्, सधिक ज्ञान द्वारा प्रज्ञा-प्रसाद को पाकर ही विशुद्ध परमतत्व के साक्षात्कार में समर्थ होता है। १. तु. "मवायुः प्रतरं नवीय" (ऋग्० १०१५९१)। "कृषी न ऊर्धाम् चरथाय जीवसे' (ऋग् ११३६।१४)। भद्रादमि श्रेय प्रेहि" (ऐतरेय ब्राह्मण १।१३)। [ ] "समाहितचित्तस्य या मझा जायते तस्या ऋतम्भरेति संज्ञा भवति । अन्वर्था च सा, सत्यमेव विभर्ति । न तत्र विपर्यास- गन्धोऽप्यस्ति ।" ( योगसून 11४८ पर प्यास-माप्य) अर्थात्, विशुर सात्त्विक अवस्था में जिसका वित्त समाहित (=समाधान या समाधि को प्रार) हो चुका है उसी प्रहा को ही मातम्भरा कहा जाता है। क्योंकि यह सत्य को ही धारण करती है और उगनें विपर्यास या मोह का गन्य भी नहीं रहता। प्रसन्नचेतसो द्याशु बुद्धिः पर्यवतिष्ठते । (भगवद्गीता २१६५) विशुद्ध और प्रसन चित्तवाले मनुष्य को ही बुद्धि प्रतिष्ठित होती है। प्रज्ञा-प्रसाद की स्थिति' का ही वर्णन हमारी 'रश्ममाला' पुस्तक में निम्नस्य शन्दों में किया गया है। - सौम्या मनःस्थितिः अभिमानेन दम्भेन दर्पण परिवर्जिता । शान्ता न मायया स्पृष्टा संयमेन पुरस्कृता ॥ १ ॥ श्रद्धया च वियेफेन सत्यमार्गानुसारिणी। लोककल्याण द्धयैव ज्ञानोपार्जनकारिणी ॥ २ ॥ हितवुद्धया समस्तानां प्राणिनां या समन्विता । उत्तरोत्तरमुत्कृष्टचारित्र्यपरिपोपिणी ॥ नैराश्येन विनिर्मुक्ता यासौ सौम्या मनःस्थितिः । सन्तुष्टा च प्रसन्ना च सोऽयं मे निधिरव्ययः ।। (रश्मिमाला ५८) १. इसी स्थिति से सम्बन्ध रखने वाली अन्य पद्यात्मक रचनाओं के लिए 'रश्मिमाला' की अन्तिम तीन रश्मियों को देखिए । [ २ ]
सौम्प मनःस्थिति
अभिमान से, दम्भ से और दर्द से रहित,
शान्त, छल-कपट से अस्पृष्ट और संयम से युक्त,
धद्धा और विवेक के साथ सत्यमार्ग का अनुसरण करने वाली.
संसार के कल्याण की बुद्धि से ही ज्ञान का उपार्जन करने वाली,
समस्त प्राणियों के हित को धुद्धि से समन्वित,
उत्तरोत्तर उत्कृष्ट चारिय को पुष्ट करने वाली,
नैराश्य से रहित, सन्तुष्ट और प्रसन्न
जो सौम्य मन स्थिति है-
वही मेरी अक्षय निधि है।
उक्त प्रज्ञा प्रसाद की पृष्ठभूमि के अाधार पर ही 'अमृत मन्मन' के इस तृतीय
'परिव' या प्रवाह की रचना हुई है।
नैराश्य, प्रादहीनता, लक्ष्यहीनता, रित्तत्ता, लघुता, अवसाद, अशान्ति और
वैषम्य से परिपूर्ण मानव-जीवन में उससे श्राशा, विश्वास, प्रकाश, पूर्णता, औदार्य,
मना-प्रसाद और स्थिर शान्ति की भावनाओं को पुष्टि और नवीन प्रेरणा प्राप्त होगी,
ऐसी हमें आशा है:-
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(३३) अनन्तमनवच्छिन्नं यत्तत्त्वं तदुपास्महे मूल-तत्त्व की अनुभूति इस समस्त विपक्ष के मूल में अवस्थित परम तत्व की अनुभूति का कुछ दिग्दर्शन नीचे के पद्यों में मङ्गलाचरण के रूप में किया गया है- निर्मलं शाश्वतं शाम्तमवाङ्मनसगोचरम् । विद्यते यन्महत्तेजस्तन्मे नित्यं प्रकाशताम् ॥ १ ॥ जो निर्मल, शावत, शान्त, मन और वाणी का अगोचर, महान तेज स्वयम्भू रूप से विद्यमान है, यह मेरे लिए सदा प्रकाशित रहे। व्यापि सर्वत्र लोकेपु निपु फालेषु, सर्वथा । अन्तर्यामि च यत्तत्त्वं तन्मे नित्यं प्रसीदतात् ।। २ ।। मूल तत्व तीनों लोकों और तीनों कालों में व्याप्त है, जो सारे विश्व का अन्तर्यामी रूप से नियमन कर रहा है, वह सदा मुझ से प्रसन रहे । निधानं यद्धि शक्तीनां सर्वासामन्ततो मतम् । आत्मरूपेण सर्वे भाति यत्तदुपास्महे ॥ ३ ॥ नन्ततोगत्वा जो समस्त शकियों का एकमात्र निधान है और जो मारमरूप से सबको प्रतीत हो रहा है, उसी मूलतत्त्व को हम उपासना करते हैं । चराचरमभिव्याप्य तदतीत्य घ संस्थितम् । अनन्तमनवच्छिन्नं यत्तत्यं तदुपास्महे ॥ ४ ॥ चराचर जगत् को व्याप्त कर के और उस को भी अतिकान्त कर के जो स्थित है उसी अनन्त अनवनिधन परम तत्व की इम उपासना करते है। ८२ ] (३४) परमतत्त्वमहं नतोऽस्मि परम-तच को नमस्कार व्याप्य स्थितं त्रिभुवनं परितोऽप्रमेयं पुण्यं परं परमनिर्वृतिधाम सत्यम् । पापापहं त्रिविधतापहरं वरेण्यं शान्तं शिवं परमतत्वमहं नतोऽस्मि ॥ १ ॥ तीनों लोकों में पूर्णतः व्यात, अप्रमेय, अत्यन्त पवित्र, परम आनन्द के स्थान, सत्य स्वरूप, पापों को दूर करनेवाले, वरणीय, शान्त, शिवस्वरूप परम तत्व को मैं नमस्कार करता हूँ। यस्यास्ति वाम्मनसयोमहिमा न गम्यो लोकानतीत्य निखिलानपि संस्थितं यत् । भूत्वा यतो विलयमेति च यत्र विश्वं तच्छाश्वतं किमपि तत्त्वमहं नतोऽस्मि ॥ २॥ जिसकी महिमा का पार दाणी और मन नहीं पा सकते, जो समस्त लोकों को भी अतिकान्त कर के स्थित है, जिस से उत्पन होकर विश्व उसमें हो विलीन होता है, उस अनिर्वचनीय शाश्वत-तत्त्व को मैं नमस्कार करता हूँ। यच्छाश्वतं परमतत्त्वमतीन्द्रियं सल- लोकनयरय परिचालनमातनोति । आनन्दधाम सततं जगतां प्रतिष्ठा भन्या नतोऽस्मि करुणावरुणालयं तत् ।। ३ ॥ जो शाश्त परम तत्त्व अतीन्द्रिय होता हुमा तीनों लोकों का परिचालन कर रहा है। सतत भानन्द के स्थान और लोकों के प्राचार उस करुणा सागर को मैं भक्तिपूर्वक नमस्कार करता हूँ। fri (३५) तन्नो शिवं वितनुतां परमं हि धाम शिवस्वरूप परम धाम सृष्ट्या जगन्ति निसिलानि पितामहो यो विन्णुस्तथैव भुवनानि च पालयित्वा । मृत्युञ्जयस्तदुपसंतिकारणत्याद् योऽसौ स नोऽवतु सदा निगुण समन्तात् ॥ १ ॥ समस्त लोकों की छुटि के करने से जो प्रहा है, लोकों का पालन करने से जो विशु है. उनका सहार करने से जो शिव है, वह विगुण भगवान् सदा सर्वत हमारी रक्षा को ! विश्वं यदस्ति सचराचरमेन विष्ट कालनयेऽपि परिणामदशानभिज्ञम् । भास्यन्ति येन निसिलानि जगन्त्यमूनि तन्न शिवं बितनुतां परम हि धाम || २ ॥ जो समस्त चराचर जगत् में व्याप्त हो रहा है, जो तीनों कालों में सदा एक ही रूप में रहता है, जिससे ये सारे जगत् प्रकाशमान हैं, वह परम घाम हमारे लिए कल्याग का विस्तार करे । भानु शशी समुदितो नियमेन, चान्ये लोका यदीयमनुशासनमाचरन्ति । ब्रह्माण्डमाण्डरचनाकुशलैकदेव पायास नोऽनवरत दुरितादद्यात् ।। ३ ।। जिनके अनुशासन में सूर्य और चदमा नियम से उदित होते है और अन्य लोक मी जिनके अनुशासन का अनुसरण करते हैं, प्रामाण्ड रूपी भाण्ड (= पात्र) को रचना में एकमात्र शल वे सर्वलोकरा सर्वान्तर्यामी परमेवर कुत्सित पाप से सदा हमारी रक्षा करें। [४] सृष्ट्वा जगन्निखिलमेव निवासगेई यो निर्ममेऽम्बरमदः पटलेन तुल्यम् । तत्रापि सूर्यमथ चन्द्रमसं च दीप्त्य शश्वच्छिवं चित्तनुतां स जगनियासः ॥ ४॥ जिन्होंने समस्त जगत् को एक निवास-गृह के रूप में निर्माण करके पाटन के सहश उस उच्च गनन को बनाया और उसमें प्रकाश के लिए सूर्य और चन्द्रमा का निर्माण किया ये जगधिवास परमात्मा हमारे लिए सदा कल्याण का विस्तार करें। तत्वं यदेतदतिशुद्धमचिन्त्यरूपं शान्तं शिवं सकलविश्वविकास केन्द्रम् । यनेति नेति श्रुतिसारवचोभिरेष व्याख्याते किमपि, वत्समुपाययेऽहम् ।। ५ ।। जो अत्यन्त शुद्ध, अचियरूप, शान्त, शिवस्वरूप और सकल विश्व के विकास का केन्द्र है, जिसकी चेद के विशिष्ट वचन 'नतिनेति' ( 3 यह भी नहीं) कहकर म्याहया करते हैं, उस अनिर्वचनीय परम तत्व या में श्रीप्रय लेता हूँ। Coor (३६) नूनं मरुं हितधिया समुपाश्रयन्ते पूर्ण पुराण-पुरुष सेयस्य मो: सततमातिहरं समन्तात् पूर्ण पुरागपुरुष परिपूर्णताय । सर्यस्य कारणमसएटमनन्तरूप. मानन्दधाम फरुगाधरुगालयं तम् ॥ १॥ अयि मनुष्य। परिता के लिए सू सदा को मामूल हरने वाले टरा पूर्ण पुराण पुरा मेवन कर, जो गम का कारण, असगर, अनन्तस, भानन्द पाम और करना मुर। -- भो मानपा ! भजत तत्परम पवित्र सर्वस्य कारणमधीपविनाशहेतुम् । ज्ञात्वा यदेव मुनयो विततं समन्ताद् -थानन्दधाम सततं मुदमाप्नुवन्ति ॥ २ ॥ अयि मनुष्यो । तुम उस परमपवित्र, सब के कारण और पापों के समूह को नाश करने वाले परमेश्वर का सेवन करो, जो सर्वत्र व्यापक और मानन्दमय है और केवल जिसको जानकर मुनिजन सरा आनन्द का अनुभव करते हैं। कारुण्यवारिधिममुं जगतामधीशं त्यक्त्वापरं कमपि देवमुपासते थे। नूनं हिते ननदीपरिपूर्ण देश हित्वा मरूं हितधिया समुपानयन्ते ॥ ३ ॥ करुणा के सागर और लोकों के स्वामी उस ईबर को छोड़कर जो किसी अन्य देवता की उपासना करते हैं ये मानों नदों और नदियों से परिपूर्ण देश को छोड़कर हित-गुद्धि से मरुस्थल का सेवन करते हैं। आनन्दहेतुमजरं जगवां प्रविष्ठां देवाधिदेवमयि मूढ ! विहाय फरमात् ? अन्यं प्रयासि शरणं, किमु याचमानो दारिद्रयापतितं लभते स्वमर्थम् १ ॥ ४ ॥ अयि मूद | आनन्द के देव, अजर, लोगों के प्रय, देवाधिदेव परमेश्वर को घोष कर, अन्य की शरण में क्यों जाता है ! दखिता के गर्द में पड़े हुए म्यकि से याचना करने यामा क्या कभी अपने अमोष्ट मर्यको पा सकता है। [RJ (३७) : सुखस्य सलिलेन परिप्लुतं तत् मनुष्य का महान मोह प्राप्तुं सुखं हि मनुजा जगति भ्रमन्तः केशान् पहननुभवन्ति न घाप्नुवन्ति । स्रोतः सुखस्य सलिलेन परिप्लुतं यत् स्वान्तस्तले प्रबहतीति न जानते है ॥ १ ॥ पर मुच पाने के लिए मनुष्य संसार में घूमते हुए अनेक केशों को सहते हैं, सुस छ नहीं पाते। वे यह नहीं जानते कि मुख-रूपी जल से लबालब भरा हुमा खोत स्वर्य उनके अन्दर यह रहा है। मूढ ! त्वया मम मनः ! किमिदं व्यधायि हा हन्त ! यत्परमनिर्वृतिधाम सत्यम् । त्यत्कासि भोः ! पतितमिन्द्रियतृप्तिदेती पर्यन्वतापिविषये, शलभो यथामी ।। २ ।। असि मूब । मेरे मन । हातूने यह क्या किया कित्, परमशान्ति के घाम अस्य को बोरकर, केवल इन्द्रियों की हिफरने वाले और अन्त में दुखदायी विषयों में, अमि में पतंग माई, गिर पाए [५] आत्मतत्त्वविवेचनम् आत्मतत्त्व का विवेचन हमारे वास्तविक उत्थान का मूल धात्म परीक्षण में निहित है। इसीलिए, हमारा अपना वास्तविक स्वरूप क्या है। इसी प्रश्न का उत्तर नीचे की ३८ से ४४ तक की रचनाओं में दिया गया है - (३८) सर्वदानन्दरूपं तदात्मतत्त्वं विवेकिनाम् अपना स्वरूप आत्म-तत्व के स्वरूप के विषय में विवेकी और अविवेकी मनुष्यों की घटियों का वर्णन नीचे के पचों में किया गया है। शर्घाम स्वयंज्योतिः फूटस्थं सर्वसाशि च । सर्वदानन्दरूपं तद् आत्मतत्त्वं विवेकिनाम् ।। १ ।। जो विवेकी है उनके लिए वह श्रात्म-तत्त्व शफि का घाम, स्वयं प्रकाशमान, सर्वदा एकरूप में रहने वाला, सब का साक्षी और सदा श्रानन्द-स्वरूप है। संमूढं सर्वदा ममं समुद्वेगविषादयोः । अस्थिरं स्थितिवात्याभिस्तत्त्वं तदपिवेफिनाम् ॥ २ ॥ पर जो अविवेकी हैं उनके लिए यही आत्म-तत्त्व मोह में पता हुश्रा, सदा उद्वेग और विषाद में इवा हुआ और परिवर्तनशील परिस्थितियों की प्राधियों से अस्थिर अथवा चल रहता है। [] (३९) ज्योतिषामपि तज्ज्योतिरात्मतत्त्वं मनीषिणाम् प्रकाशस्वरूप आत्मतत्व आत्मनो यस्य कामाय सर्वे कामा अवस्थिता.। यस्यार्थे तत्तदर्थानामर्थना सप्रवर्तते ॥ १ ॥ 1 चोरैः परिश्रमैः कृत्वा नानायनान् दिवानिशम् । यच्चाप्यतेऽपि तद् यस्य भोक्तत्वे पर्यस्यति ॥ २ ॥ मात्मनस्तस्य निस्मृत्य स्वरूपं गौरवं तथा। कोडीकृत्यात्मनो हीनभावनां विचरन्ति ये ॥ ३ ॥ तध्यातथ्यविवे केन हीना: कृपणबुद्धयः । अन्धे तमसि ममास्ते श्रुतावात्मनो मताः ॥ ४ ॥ ज्योतिषामपि यज्ज्योतिरात्मतचं मनीषिणाम् । तदेवाज्ञानमूढे हाँ ! प्रत्यक्षं सन्न दृश्यते ! ॥५॥ चैतन्यं यद्धि ते रूप भास्वतोऽपि प्रभाश्वरम् । विद्यते तत्र मोहस्य स्थितेरेव न संभवः ॥ ६ ॥ मोहचैतन्ययोनित्यं भेद स्वाभाविको मतः । तेजस्तिमिरयोभोवाभावयोरथवा यथा ॥ ७ ॥ । जिस श्रात्मा की कामना के लिए सारी कामनाएँ हुया करती है, जिस अारमा के लिए विभिन्न पदार्यों को माँग हुआ करती है, [ ८८ ]
२. दिन-रात पोर परिश्रमों के साथ
अनेक प्रकार के यनों को करके
प्राप्त हुई प्रत्येक वस्तु का सार्यश्य
निस आत्मा के भोकृत्व में रहता है,
३. सस वात्मा के स्वरूप
और गौरव को भुलाकर
तपा अपनी हीन भावना को
हृदय से पकड़कर जो विचरते हैं,
४. सत्यासत्य के विवेक से हीन,
अनुदार बुद्धि रखने वाले.
तया घोर अन्धकार में निमम,
उन लोगों को श्रुति में आत्मघाती कहा गया है।
५. जो आत्मतत्व मनीषियों के लिए
ज्योतियों का भी ज्योति है,
खेद है। यही अज्ञान से मूह व्यक्तियों को
प्रत्यक्ष होता हुआ भी नहीं दिखायी देता!
६. तेरा यह चैतन्य रूप
सूर्य से भी अधिक प्रकाश वाला है।
उसके विषय में मोह को
स्पिति हो ही नहीं सकती।
५. मोह और चैतन्य में परस्पर जो भेद है
वह सदा स्वाभाविक माना गया है।
यह भेद ऐसा ही है जैसा
प्रकाश और अञ्चकार में अथवा भाव और अभाव में।
[ ..]
(४०) चञ्चले तु जगत्यस्मिन्नेक आत्मैव निश्चलः आत्मतच्च की स्थिरता चञ्चले तु जगत्यस्मिन्नेक आत्मैव निथला । तत्र चञ्चलभावानां कृते ते विनमः कुतः॥१॥ जीवनेऽस्मिन्नवस्थानां भेदः स्वाभाविकस्तथा । बाहुल्येनानिवार्योऽपि दृश्यते, नात्र संशयः ॥ २॥ कृते तासामवस्थानां हर्पः शोकोऽथ खिन्नता। अभिमानोऽथवा गर्यो युज्यते नैव नैव च ।। ३ ।। १. इस अस्थिर स्वभाव वाले जगत् में केवल एक आत्मा हो निथल है। ऐसी अवस्था में अस्थिर पदार्थों के सम्बन्ध में तुझे विनम क्यों है ? २. इस जीवन में अवस्याओं में परिवर्तन का होना स्वाभाविक है और प्रायेण वह अनिवार्य भी होता है, इसमें कोई सन्देह नहीं है । ३. इसलिए उन अवस्यानी के सम्बन्ध में हर्ष, शोक, खेद, अभिमान अपवा गर्ष का करना किसी भी प्रकार युक नहीं। CASIRoo- (४१) शिलासंघातसंकाशाः सुस्थिरा हृढनिश्चयाः, महात्माओं का स्वभाव प्रारम-तत्त्व समझने पाले महात्मा अपने निययों पर पत्परों की चटानों के समान रहते हैइसी सिद्धान्त का प्रतिपादन नीचे के पयों में किया गया है:--- जीयनेऽस्मिन्नवस्थानामागमोऽपाय एव च । स्थमावत: समायाति सर्वस्यापीति निश्चयः ॥१॥ तत्वमेकं परं वन फूटस्यत्वेन पर्तते । नदेव शरणं गत्वा शान्तिमृच्छति मानयः ॥ २ ॥ इस बीपन में निषय ही समरिधी सायं पुनसादिवस्यामाका भाना. बाना स्वभाव ही होता रहता है। पर उन अवस्यानों में भी एक मामल [११] अविचल रूप में (कूटस्पभाव में) यरावर वर्तमान रहता है। उसी की शरण में जाकर, उसी के साप अपने तादात्म्य को समझकर, मनुष्य शान्ति को पाता है। हर्पणं वा विपादेन स्वरूपाद्विच्युतो नरः । पात्यावेगेन संक्षुब्धवृक्षावलिसमो मतः ॥ ३ ॥ शिलासंघातसंकाशाः मुस्थिरा दृढनिश्श्याः । सत्त्वयन्तो महात्मानः शोभन्ते क्षोमवर्जिताः ॥ ४ ॥ हर्ष अयवा विषाद के कारण जो मनुष्य अपने स्वरूप से विच्युत हो जाता है वह आँधी के वेग से अत्यन्त चाल वृक्षावली के समान है। परन्तु सत्त्वशील महात्मा लोग पत्थरों की चट्टानों के समान सुस्थिर, हद- निश्चय और सदा क्षोम से रहित होते हैं। 4- (४२) मदर्थं ननु दृश्यानि न तदर्थ ममास्तिता -- , दृश्य हमारे लिए हैं (श्य और दया के बीच में प्रष्टा का ही प्राधान्य होता है, इसी सिद्धान्त को नीचे के पद्यों में सममाया गया है:- । गतागतत्वाद् दृश्यानामस्थिरागां स्वभावतः । एकोऽहं निश्चलो द्रष्टा बर्वे, नयात्र संशयः ॥ १॥ अतो मदर्थ दृश्यानि न तदर्थ ममास्तिता। ततस्तत्कारणास्तोम: सर्वथा न ममोचितः ।। २ ।। १.श्य आने-जाने वाले होने से स्वभाव से ही अस्थिर होते हैं। मैं अकेला उनको देखने वाला निघल रहता है। इसमें सन्देह नहीं है। २. अतः दृश्य मेरे लिए है; मेरा अस्तित्व दृश्यों के लिए नहीं है। इसीलिए हरयों के कारण मुझे क्षोभ हो, यह किसी प्रकार उचित नहीं है । [ २ ] तत् त्वं तत्ते महद्धनम् आत्म-स्वरूप में संस्थिति अहंकारेण निर्मुक्तं तवं यच्छुद्धमव्ययम्। तव त्वं भ्रावन जानीप तत् त्वं तत्ते महद्धनम् ।। १॥ यस्याभीप्साजिहासाभ्यां व्यासमेवजगत्त्रयम् । सार्थक्यं लभते नूनं यस्यैवेक्षणमानतः ॥ २ ॥ महत्त्वममहत्त्वं था सर्पस्यापीह वस्तुनः । यस्यापेक्षामुपेक्षा वा समाश्रित्यैव तिष्ठति ॥ ३ ॥ संस्मृतिस्तस्य तत्वस्य नियतं हनपायिनी । स्वरूपे संस्थितिः सत्यमात्मसंमानना मता ॥४॥ १. अहंकार से निर्मुक्त जो शुद्ध व तत्त्व है, भाई तुम उसको नहीं जान रहे हो। भास्तव में तुम वही हो, वही तुम्हारा बड़ा धन है । २. जिसकी अपनी अमीमा (= प्राप्त करने की इच्छा) और जिहासा(-छोड़ने की इच्छा) से व्यास इस निलोको की सार्थकता उसके ईक्षुण-मात्र से सम्परा होती है, ३. प्रत्येक पदार्य की महत्ता अथवा लघुता का रहस्य जिसकी अपेक्षा अथवा उपेक्षा में ही निहित है, ४, उसी तस्व की निष्क्षय से अविचल संस्मृति को 'स्वरूपापस्थिति' कहना चाहिए। पास्तव में 'प्रारम-संमान की भापना' यही है । [३] (४४) सोऽहं न संशयः मैं कौन हूँ? सारवत्त्वमसारत्यं मूल्यवत्वमथान्यथा । पस्तूनां निर्णयापेक्षि यस्य सोऽहं न संशयः ॥ १ ॥ आहरन्ति बलिं यस्मै दृश्यानीमानि नित्यशः । विश्वभुग विश्वसाक्षी च सोऽहं नैवात्र संशयः ॥ २॥ मांसमजादिभिः पूर्णो देहोऽयं पूतिपूरितः। मनोज्ञो रुचिरश्चापि येन, सोऽहं न संशयः ॥ ३ ॥ १. कोई भी पदार्थ सारवान है अथवा सारहीन, मूल्यवान् है अथवा मूल्यहीन इस दात में जिसके निर्णय की अपेक्षा की जाती है, निस्सन्देह में वही हूँ। २. ये सारे दृश्य पदार्थ पूजारूप में जिसके लिए अपने अनुभवों की बलि देते हैं यह विश्व का भोक्ता और साक्षी मैं ही है, इसमें सन्देह नहीं है। ३. मौस मन्ना आदि से पूर्ण और दुर्गन्ध से पूरित यह शरीर जिसके कारण सुन्दर और आकर्षक प्रतीत होता है, निस्सन्देह मैं यही हूँ। SONG- [ ६४ ] ब्रह्मभावनम् ब्रह्म का चिन्तन ऊपर प्रारम-तत्त्व का विचार किया गया है। उस विचार का पर्यवसान विध- प्रपत्र के समधि रूप धन के चिन्तन में ही होता है। व्यष्टियों का जीवन समष्टि में ही रहता है, उसी तरह जैसे मछलियों पानी में ही जीवित रहती है। नीचे की रचनाओं ( ४५-५१) का इसी विचार से संबन्ध है-- (४५) शेते सुप्त इवोरगः ब्रह्म-सायुज्य-प्रासि का क्रम आत्मनो ब्रह्मसायुज्य- क्रमव्याख्या विधीयते । प्रथमं जडात्मक सर्व तमोऽवस्थानमेव तत् ॥ १ ॥ प्रकरया पलशालिन्या तमोभूयिष्ठया तदा । थाच्छादितो य एवाशि:ोते मुप्त इचोरगः ॥ २ ॥ सधूमो रागयोगेण रजोऽवस्थानमेव तत् । स एव निर्मल: शान्तः सत्त्वभूयिष्ठ उच्यते ॥ ३ ॥ तम्ययोपरमोऽनन्ते शान्ते प्राण्यसंशयम् । निर्याणमय सायुज्यमगृतत्वं च गीयते ॥ १ ॥ एवं तमोरजासत्त्वा- वस्थाः क्रान्त्या तदमृतम् । चैतन्यमश्नुतेऽद्धतं ब्रह्मणा मण्येन ॥ ५ ॥ १.3. मेरिलक्षामिरर सर्व तस्योपभ्याख्यानम्। "इति समोर पर पेममायमात्मा RR ममात्रधनुर्षोऽवार्यः प्रपोपशमः शिमोडत लमोहर मामे संपिशापारमनारमानं य एवं वेद ।" (मानवयोपनिषत् ।) [१५] “१. व्यरि-रूप आत्मा विष के समटि-रूप प्रा के साथ किम कम से सायुज्य अपवा अद्वैत को प्राप्त करता है या कर सकता है, इसी की व्याख्या यहाँ की जा रही है। जीव के रमिक विकास में जो सब से नीचे की या प्राथमिक अवस्था होती है यह जहावस्था से अभिष होती है; उसे घोर तामसिक स्थिति हो समझना चाहिए। २. उस अवस्था में अत्यधिक तमास्वरूपिणी तथा चलशालिनी प्रकृति से आच्छा. दित चैतन्य इस अमि, सोये हुए सर्प के समान, मानो सुप्तावस्था में रहती है । ३. यही चैतन्यरूप अनि जय राग (-आसक्तिरूप रक्ता) के योग से मानो सधूम अवस्था को प्राप्त हो जाती है उसी को रजो गुण की स्थिति समझना चाहिए। यमिप्राय यह है कि घोर तामसिक अवस्था से ऊपर उठले हुए जीव में जो रागात्मक प्रवृत्ति का विकास होता है उसको राजस स्थिति हो समझना चाहिए। रास से दकी हुई कण्डे को श्राग चायु के लगने से सुलगने और धुओं देने लगती है। वही स्थिति उक्त द्वितीय अवस्था में श्रात्मा को होती है। वही चैतन्यरूप अनि जब निर्मल और शान्त होकर प्रकाशित हो उठती है तब उसमें सात्विक अवस्था का अत्यधिक विकास हुभा समझना चाहिए । अभिप्राय यह है कि जैसे अमि अपने प्रकाश की उत्कृष्ट अवस्था में शुभ्र, निर्मल और शान्त दिखलायी देती है, ऐसे ही उत्कृष्ट सात्विकता के विकसित होने पर यात्मा निर्मल और शान्त भवस्था को प्राप्त हो जाता है। ४. उसी व्यष्ट्यात्मक चैतन्य को जब अनन्त तथा शान्त ब्रह्म में उपरति हो जाती है उसी अवस्था का शाबों में निर्वाण' अथवा 'सायुज्य' अथवा 'अमृतत्व' इन शब्दों से वर्णन किया गया है। अभिप्राय यह है कि अमि जैसे अपनी अन्तिम स्थिति में समष्यात्मक अनि में लीन हो जाती है, श्रारमा की "निर्वाण' अवस्था को भी वैसा ही समझना चाहिए। ५. इस प्रकार व्यष्टि रूप यात्मा प्रमशः तामस, राजस और सात्विक अवस्थामा को पार करता हुआ अन्त में विश्व के समष्टि प प्रा के साथ अमृत रूप अतावस्या को प्राप्त कर लेता है । शानों में उसी प्रक्ष का वर्णन प्रणय या ओंकार रूप से भी किया गया है। [१६] भूमा वै सुखमानातं सुखमल्पे न विद्यते विशाल-चिन्तन का महत्व :- यो वै भूमा तत्सुसम् । नाल्पे सुखमस्ति । भूमैव सुसम् । भृमा त्य विजिज्ञासितव्यः । (छान्दोग्य उपनिषद् ७४२३१) अर्यात , जो विशाल है, महान है, वही सुख-रूप है । अल्प में, लघु में, सुख नहीं रहता। निस्सन्देह महान ही सुख है। इसलिए महान को हो विशेष रूप से जानना चाहिए। लघु स्वार्थो का सतत चिन्तन ही मनुष्य की अशान्ति का मूल कारण है और विशाल-चिन्तन में ही उसकी सचो शान्ति का रहस्य निहित है, इसी तथ्य का प्रतिपादन नीचे के पदों में किया गया है। शरीरारमा लघुस्तस्य नैथ कार्या विचारणा। चिन्तन हि लघोर्यस्मालधुतापादकं मतम् ॥ १ ॥ भूमा वै मुखमा मातं सुखमरूपे न विद्यते । अनन्तिरता तस्मान्मवा भूमपरात्मनोः ॥ २ ॥ प्राविज्ञायते अझ पानातमसकच्छुती । सरमाद् प्राविचारेऽन्धी निममः शान्तिमामुहि ॥ ३ ॥ सत्त्वमानन्दरूपं तदादिमं नात्र संशयः । तथापि महदाधयं दृश्यन्ते सिनो जनाः ॥५॥ एकमेवाद्वितीयं तन्मूलं सर्वस्य पस्तुनः । सद्विकासा: समे भाषा नियतं मत्स्यरूपिणः ॥ ५ ॥ इत्येयं सततं ज्यापन्मुनिर्मापरायः । लघुताराकान्भावान् भित्या भूमानमरनुते ॥ ६ ॥ [५] 1. शरीरधारी सत्ता व्यकि का ब्यतिख लघु है। केवल उसी के स्वार्य के विचार में मनुष्य को नहीं लगा रहना चाहिए। क्योंकि लघु का चिन्तन लघुता को लाने वाला होता है। २. विशालता में अपना महत्ता में हो सुख रहता है, ऐसा (उपरि-निर्दिष्ट ) पुति में कहा गया है। अल्प में, लघु में, मुख नहीं रहता। इसीलिए 'भूमन' (= महन् ) और 'परमारमन्' दोनों शद यास्तव में समानार्थक है, ऐसा शास्त्रीय सिद्धान्त है। ३. मन ओ भूमा है उसको जानने वाला ब्रह्म हो जाता है, ऐसा थुति में पार-बार पहा गया है । इसलिए ब्रह्म-विचार-रूपी सागर में निमम होकर तुम शान्ति को प्राप्त करो। अभिप्राय यह है कि मनुष्य का चिन्तन जितना ही विशाल होगा अयया लघु स्यार्थों में ऊपर रहेगा उतना ही अधिक सच्चे मुम्प और शान्ति का अनुभर उमको होगा।
(४७) मत्वा धीरो न शोचति प्रसन्नता का मूल-स्रोत यथा कस्यापि वृक्षस्य फले तर्विनो गुगाः आविर्भावाय करपन्ते साकल्येन विशेपतः ।। १ ॥ तथैव ब्रह्मणो धान्नि ब्रह्माण्डे सन्ति ये गुणाः । आविर्भवन्ति ते सर्व पिण्डे तत्कार्यरूपिणि ।।२॥. अत एव शरीरेऽस्मिन् चैतन्यं यद्धि दृश्यते । नूनं तद् ब्रह्मणो रूपं मूलतो नात्र संशयः ।। ३ ।। आत्मनो प्रनगरमाद्वैतं तस्माच्युतिर्जगी । तदेतत्तयतो नूनं मला धीरो न शोचति ॥ ४ ॥ १. जैसे किसी वृक्ष में जितने भी गुण होते हैं वे सब के सब पूर्ण-रूप से उसके पल में विशेषतः प्रकट हो जाते हैं। २. वैसे ही ब्रह्म के धाम स्वरूप ब्रह्माण्ड में जो भी गुण विद्यमान हैं चे सय ब्रह्माण्ड के कार्यरूप इस शरीर-पिण्ड में विशेषतः आविर्भाव को प्राप्त हो जाते हैं। अभिप्राय यह है कि जैसे श्राम्रादि वृक्षों के विशिष्ट माधुर्य यादि गुण उनके कार्य रूप फलों में ही देखने में आते हैं, ऐसे ही प्रमाण्ड में प्रह्म के प्रोत-प्रोत होने पर भी उसके चैतन्यादि गुणों को साक्षात् प्रतीति ब्रह्माण्ड क्ष के फलस्थानीय शरीर में ही होती है । ३. इसलिए यह मानना पड़ता है कि इस शरीर में जो चैतन्य दिसायी देता है वह मूल में प्रमका होता है। इसमें संदेह नहीं हो सकता। ४. इसीलिए श्रुतियों भारमा और मन के प्रदेस का गान करती है। लपर्युक्त सभ्य को नायिका इन्मेि जान कर सारी विदार, सी.पोर ओ नहीं प्राप्त होते। [ (४८) आत्मानमभिमानोऽयं नूनमावृत्य तिष्ठति अभिमान का आवरण आनन्दं विभुमरत्मानं प्रम प्रारमनीषिणः । सर्वत्रगमतोऽस्माभिः सान्निध्यं तस्य विद्यते ॥ १ ॥ सानिध्यं कथमति जिज्ञासा न प्रयोजिका । सत्यस्मिन् नित्यसान्निध्ये फुतोऽस्माकं विपएणता ? ॥ २ ॥ प्रश्न एप महांस्तावन् ममोद्वेगाय जायते । वस्येतस्य समाधान किश्चिदन प्रपन्च्यते ॥ ३ ॥ अभिमानो दुरन्तोऽयं तम आवरकं यथा । व्याघातकारणं तन सान्निध्ये न: प्रतीयते ॥४॥ आवृत्य परितः पृथ्वी वर्तते वायुमण्डलम् । आत्मानमभिमानोऽयं तथैवात्य तिष्ठति ।। ५॥ अभिमानेन मूढोऽयं सनिघावपि संस्थितम् । आनन्दधाम सर्वत्र व्याप्तं तत्त्वं न पश्यति ॥ ६॥ ततो ज्ञानासिना धैर्यधर्म संगृह्य पुद्धिमान् । बित्वाहंकारमानन्दी ब्रह्मणा संगतो भवेत् ।। ७ ।। १. तत्वदशियों का कहना है कि प्रल स्वभावतः आनन्द-स्वरूप, ध फैला हुमा, सय का प्रारमा और सर्व-व्यापक है । ऐसी दशा में हमारे साथ उस का सामिप्य है, यह स्वतः सिद्ध है। २. पर यहाँ 'यह सानिध्य क्यों कर है' इस जिज्ञासा से हमारा कोई प्रयोजन नहीं है। आनन्दस्वरूप मान के साथ नित्य रहने वाले इस साक्षिण्य के होने पर हमारी यह विषण्णता क्यों है ! उसका क्या कारण है ! ३. यही महान् प्रस हमारे सामने है। इसी से हम उदित हो रहे हैं। इसी के समाधान की कुछ चर्चा हम यहाँ करना चाहते हैं। ४. हमें तो ऐसा प्रतीत होता है कि जैसे अन्धधर भय पदार्थों को ढक लेता है, इसी प्रकार हमारा यद दुखदायी अभिमान ही मन के साप हमारे सामिप्य में व्यापात का कारण हो रहा है। 1१०० ५. जैसे पृथ्वी को चारों ओर से वायु-मण्डल प्राकृत किये हुए है, इसी प्रकार यह अभिमान हमारी आत्मा को आरत किये हुए रहता है । ६. अभिमान से मदावस्था को प्राप्त मनुष्य अपनी सनिधि में भी रहनेवाले आनन्द के धाम तथा सर्वत्र व्याप्त प्रहा-रूप परम-तत्त्व का अनुभव नहीं कर पाता। ७. इस लिए धुद्धिमान् मनुष्य को चाहिए कि वह धैर्यरूपी ढाल को लेकर ज्ञान रूपी खड्ग से अहंकार-शनु का संहार कर के ब्रह्म के सा। का अनुभव करे। (४६) विहगोऽनन्त आकाशे अनन्त की यात्रा विहगोऽनन्त आकाशे विचरन्नपि यदा कदा । वृक्षामं पर्वतानं वा यथैवाश्रित्य तिष्ठति ॥ १ ॥ तथैव पथिकोऽनन्ते विचरन् ब्रह्मणोऽध्धनि । तांस्तानाश्रयते देवान तत्तदादर्शरूपिणः ॥ २ ॥ उच्चादुयप्रदेशांस्तान् लब्ध्या सोऽध्यात्मवर्मनि । असतो निर्ममो गच्छन् ब्रमसायुज्यमभुते ॥ ३ ॥ १. जैसे अनन्त नाकाश में जव तय विचरता हुभा एक पक्षी पक्षों की चोटियों पर या पर्वत के शिखर पर प्राधय पाकर बैठ जाता है। २. इसी प्रकार प्रक्ष प्राप्ति की अनन्त यात्रा का पथिक भी विचरता हुआ तत्तद उदात्त श्रादर्शों के रूप में तत्सद् देवताओं का आश्रय लेता हुमा भागे-भागे पढ़ता जाता है। ३. इस प्रकार यह अध्यात्म मार्ग में ठच से उच्च स्थितियों (भूमियों) को पार असत और निर्मममाव से ऊपर उठता हुआ अन्त में प्रा-सायुज्म को पा लेता है। १.तु. "संस्कृतस्तारतम्यं य आदर्शा दर्शयन्ति नः । स एष देवतामा हस्रन्ने भावमूलचः।" (अन्पकार की पुस्तक 'रश्मिमाला' ३८४). [१०१] (५०) काष्ठयुत्तलिका इव - विश्व का सूत्रधार यदन्तः शाश्वतं तत्त्वं तेजोरूपमकल्मषम् । तन्मनास्तत्परो भूत्वा पिचरेन्ना गतस्पहः ॥ १ ॥ कार्यकारणसूत्रेण जगदेतत् परात्मना। चाल्यतेऽचलभावेन काठपुतलिका इव ॥ २॥ कार्यकारणसूत्रेण सूत्रधारेण केनचित् ! चाल्यमाने जगत्यस्मिन् मैव विचिदहेतुक्म् ॥ ३ ॥ १ तेजोरूप अकस्मय (= मल या पाप से रहित) जो शायत सर्वान्तर्यामी मूल तत्व है, मनुष्य को उसका चिन्तन करते हुए और उसमें विश्वास रखते हुए तृष्णा या लिपसा से रहित होकर विचरना चाहिए । २. तथ्य तो यह है कि सर्वान्तर्यामी परमात्मा हो इस जगत् को कठपुतली के समान अचल भाव से कार्य कारण के सूत्र (और)द्वारा चला रहे हैं। ३. जब कि कोई सूनधार कार्य-कारण के सूत्र द्वारा इस जगत् को चला रहा है तब यह निक्षित जानो कि इस जगत् में कोई भी बात निहतुक नहीं हो सकती। -CASID3-0+ [१०२] (५१) दिव्यजीवनमार्गस्थो भवेयमिति भावये दिव्य शैशवी अवस्था अध्यात्म मार्ग के पथिक के लिए, दूसरे शब्दों में, अपने जीवन में विश्व के समष्टि- रूप प्रा के साग सादारम्य का अनुभव चाहने वाले के लिए एक सुन्दर प्रादर्श के रूप में दिव्य शैशवी श्ररस्या का हृदयस्पर्शी चिमण नीचे के पदों में किया गया है:- अवस्थां शैशवी दिव्या- मामनन्ति मनोपिणः। गुणानां कीर्तनं तस्याः क्रिपते शान्ति-वर्धनम् ॥ १॥ चिन्ता यापरिमेयान्ता लोकान् संव्याप्य तिष्ठति । तस्या नानापि सद्भारस्तरयां किञ्चिन्न दृश्यते ॥ २ ॥ सन्दिहानमनोवृत्तिः संशयावसरातथा । अंशेनापि न विद्यते यत: शान्तिमयी हि सा ॥ ३ ॥ किचिनोकोत्तरं ज्योतिदोपसंस्पर्शयर्जितम्। शान्तेः प्रसारकं मन्ये शिशुभावेन तिष्ठति ॥४॥ 1. मनोवो लोग रोशची अवस्थाको दिम्य अवस्या बतलाते है । शान्ति को पढ़ाने पाला उग्री के गुणों का कीर्तन यहाँ हम करेंगे। २. कमी रामात न होने पाही जो चिन्ता सम लोगों को ध्यास किये हुए है उराडो नाममान की मीराता उस अास्था में नहीं पायी जाती। ३. सब कामों में सन्देह करने वाली मनोति सा संशया अवघर सेना विधि- न्मात्र भी उसमें नहीं पाये जाते. क्योंकि पदमावस्या केवल शान्तिममी होती है। ४. ऐसा प्रतीत होता है कि दोनों के पेपर से रहित और शान्ति प्रसार करने मानोई मोघेतर ज्योति शिशुमाव में स्थित हो रही है। 2 १.. "मियानं योनि सपोप्तमोऽहम् । (रपुरामापये १३) [ १०३] 'प्राणरक्षाकृते लोकाश्चिन्तासन्तानफर्पिताः । दृश्यन्ते भयविभ्रान्ता धावन्त इव सर्वत: ॥ ५ ॥ तेषु तेषु प्रयत्नेषु साधक बाधकं प्रति । रागद्वेषौ प्रजायेते सर्वस्यापि न संशयः ॥ ६ ॥ परेशस्य जगद्भर्तुर्मायया मातृरूपया । रक्षितानां शिशूनां सा चिन्ता नैवोपपद्यते ॥ ७ ॥ रागद्वेषभयः शून्या निश्चिन्ता: प्रेममूर्तयः । सर्वेषां शिशयस्तस्मान्मोदमादधते सदा ॥ ८ ॥ निर्माया निरहङ्काराः स्पर्षयास्पृष्टमानसाः। प्रसन्नचेतसो नूनं शिशवो वशिभिः समाः ॥ ६ ॥ ५. सांसारिक लोग अपने प्राणों की रक्षा के लिए नानाप्रकार की चिन्ताओं से सन्तप्त तथा एक न एक भय से विधान्त मानो सब तरफ दौड़ते हुए दिखायी पड़ते हैं। ६. प्रत्येक मनुष्य में अपने विभिन्न प्रयनों में साधक और बाधक वस्तुओं याव्यकियों के प्रति ममशः राग और द्वेष के भाव उत्पाहुना करते हैं। ७. परन्तु जगदीश्वर भगवान की मात-रूपिणी माया से सुरक्षित शिशुओं में वह दुख-दायिनी चिन्ता नहीं पायी जाती। ८. राग, द्वेष और भय के भावों से शुन्य, चिन्ता से रहित प्रेम के मूर्ति स्वरूप शिशु सब के लिए प्रसनता को देनेवाले होते हैं। .. छल-कपट और अहवार से रहित, जिनके मन में सर्या ने स्पर्श भी नहीं किया है, अत एव सदा प्रसम-चित्त शिशुओं को संयतेन्द्रिय महात्माओं के समान सममाना चाहिए। नानाधिव्याधिविन्नानां सन्तपिस्तप्तचेतसाम् । दुर्भावनापरीतानां मर्त्यलोकाधिवासिनाम् ॥१०॥ [१०४ ) शान्तिप्रसादमाधुर्य- दिन्यसंदेशवादिनः। देवदूतान शिशून्मन्ये देवलोकादुपागतान् ॥११॥ 10. नाना प्रकार की प्राधियों और व्याधियों से खिन, सन्तापों से सन्तप्त और अनेकानेक दुर्भावनाओं से प्रस्त मर्त्यलोकाधिशासी लोगों के लिए ११, शान्ति, प्रसाद और माधुर्य के दिव्य सन्देशों को देने वाले शिशुओं को देवलोक से आये हुए देवदूत मानना चाहिए । अवस्थां शैशवीं तस्माद आहुरादर्शमुत्तमम् । मनीपिणो मनुष्याणां कृते लोकहितैपिणः ॥ १२ ॥ बालभावेन तिष्ठासेद् विद्वान् शान्तिपरायणः । श्रुति रेतजगी तस्माल्लोककल्याणकाम्यया ॥ १३ ॥ ब्रह्मसूत्रपदै श्चैव हेतुमद्भिर्विनिश्चितम् । श्रावणक्षोमनेरर्थे शैशवाश्रयण हितम् ॥ १४ ॥ एतस्मात्कारणादेव शिशुभावेन कल्पिता । लोकस्तस्य जग हुंचा मूर्तिरुपास्यते ।। १५ । १२. इसीलिए लोकहितैषी मनीषियों ने मनुष्यों के लिए शैशवी अवस्था को उत्तम श्रादर्श कहा है। १३. इसीलिए-शान्तिपरायण विद्वान् को यालमाव से रहने की इच्छा करनी चाहिए- ऐसा लोक कल्याण की कामना से श्रुति (वेद) ने गान किया है। १४. वेदान्तसूत्रों ने भी इंतु और उपपत्ति के साथ ऐसा सिद्धान्त निक्षित किया है कि माध्यात्मिक जगत में उपर उठने की इच्छा रखने वाले मुनि के लिए शिव-भाव को धारण करना घेयस्कर है। १. "सस्माद् माझण्णः पाण्डित्यं निर्विध धास्येन तिष्ठासेत् ।' (बृहदारण्यकोपनिषद् ३३) २. सु. "धनाविष्फुर्वमन्वयात" (वेदान्तसूत्र ३१४५.) [१०४) १७. उपर्युक कारण से ही सांसारिक लोग जगदीश्वर भगवान की शिशु-भाव से कल्पित सुन्दर मूत्ति की उपासना करते हैं। तमेव शैशवादर्श- मनुगच्छनिरन्तरम् । मसन्नो दोपनिर्मुक्त- स्तिष्ठेयमिति भावये ॥ १६ ॥ १६. उसी शैशवी अवस्था के आदर्श वा निरन्तर अनुसरण करते हुए दोषों से रहित होकर मैं असमता से रहे, यही मेरी कामना है। -AND- तत्त्व-साक्षात्कारः परम-तत्त्व का साक्षात्कार मूल तत्त्व के चिन्तन और विश्वास को अपने जीवन का आधार और चरम लक्ष्य समझने वाले तत्वदशी विवेचक की रहिसे परम तत्व के स्वरूप के वर्णन के साथ साथ उसके चिन्तन से जनित अपनी अनुभूति का दिग्दर्शन भी नीचे की (५२ से १८ तक की) रचनाओं में किया गया :- यस्मात्परतरं नास्ति तदहं नित्यमाश्रये समस्त शक्तियों का मूल-स्रोत आश्रयः सर्वशक्तीनां द्वन्द्वातीतं निरञ्जनम् । यत्तत्कारणमभ्यर्स शाश्वत पदमध्ययम् ॥ १॥ समष्ठिभूतं सर्वासां ध्यष्टीनामन्ततो मतम् । यस नास्ति तदहं नित्यमाप्रये [१०६ ।
जो मूल तत्व समस्त शक्तियों का आश्रय, द्वन्द्वों से परे, अर्थात् सर्वदा एक रस, रिशुद्ध और सृष्टि का अव्यक कारण है; जो ध्रुव अविनाशी पद है। अन्ततोगत्वा समस्त व्यटियों का जो समष्टि रूप है। और जिससे परे कुछ नहीं है, मैं सदा उसी का नाश्रय लेता हूं। तदहं नित्यमाश्रये मूल-तव में आस्था प्रेमकारुण्ययोर्धाम तत्त्वं विश्वनियन्त यत् । जीवनस्य पर मुलं तदहं नित्यमाश्रये ॥१॥ चिस्मृतेनापि बहुधा मया मोहवशेन हा ! विस्मय न क्षणं येन तदहं नित्यमाश्रये ॥ २ ॥ प्राणानामपि में प्राणः परमं यत्परायणम् । वरेण्य शरणं पुण्यं तदहं नित्यमाश्रये ॥ ३ ॥ 1. जो मूलतत्त्व प्रेम और कारुण्य का स्थान है, जो समस्त विश्व को नियन्त्रण में रखता है, जो जीवन का परममूल है। मैं सदा उसी का आश्रय लेता हूँ। । १०७ ] २.हा ! मैं मोहवश प्रायः उसे भूले रहता हूँ! पर जो क्षण भर के लिए भी मुझे नहीं भुलाता, मैं सदा उसी का आश्रय लेता हूँ। ३. जो मेरे प्राणों का भी प्राण है, जो जीवन का परम उत्कृष्ट श्रादर्श है, जो वरणीय पविन शरण स्थान है, मैं सदा उसी का श्राश्रय लेता हूँ। ध्यायने योगिभिनित्यं ज्ञानिभिश्चिन्त्यते तथा । भक्ता गानरता यस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥ ४ ॥ सन्तोऽपि यस्य सत्ताया विश्वासेन निरन्तरम् । जीवन्मुक्का यसन्तीह तदहं नित्यमाश्रये ॥ ५ ॥ ४. योगी सदा जिसका ध्यान करते हैं, ज्ञानी जिसका चिन्तन करते हैं, भक्त-जन जिसके गान में रत रहते हैं, मैं सदा उसी का थाप्रय लेता हूँ। ५, सन्त-महात्मा जिसकी सत्ता के विश्वास से, संसार में निरन्तर जीवन्मुलों का जीवन व्यतीत करते है, मैं सदा उसी का साधय लेता है। गीयते कीर्तिसंगीत मुगन्धिसुमनोहरैः । निशिन्दं कुमुमैर्यस्प तदई नित्यमाश्रये ॥६॥ सौन्दर्य विश्वविस्तीर्ण कवयः क्रान्तशिनः। पश्यन्पलौकिक यस्य तदा निन्यमाश्रये ॥ ७॥ [१८] शुद्धोदात्तविचारेपु परार्थे जीवने तथा। मन्ये मे दर्शनं यस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥ ८॥ व्यष्टेरस्या मदीयाया: सर्वस्वं निलयस्तथा । समष्टिरूपं थत्तत्वं तदहं नित्यमानये ॥ ६ ॥ अपूर्णतासु सर्वासु तथाकाक्षास्वसंशयम् । संकेतो यस्य पूर्णस्य तदहं नित्यमाश्रये ॥१०॥ यन्नूनं परमं सत्यं नैव किचिदहियतः । सन्निधायथ दूरे यत् तदह नित्यमाश्रये ॥ ६. सुगन्धित सुमनोहर पुष्प जिसकी कीति के संगीत का निशब्द-भार से गान करते हैं, में सदा उसी का श्राश्रय लेता हूँ। ७. जिसके समस्त विश्व में फैले हुए अलौकिक सौन्दर्य को फ्रान्त दर्शी फदिगण देखते हैं, में सदा उसी का श्राश्रय लेता हूँ। ८. पवित्र उदात्त विचारों में तथा परार्थ जीवन में मुझे जिसकी माँ की मिलती है, मैं सदा उसी का श्राश्रय लेता है। २.जो विश्व का समष्टि रूप तत्व मेरी इस व्यष्टि (= व्यक्ति का सर्वस्व और एकमान निकेतन है, मैं सदा उसी का आश्रय लेता हूँ। १. समस्त अपूर्णतामों में सपा समस्त आकाक्षाओं में [ १८ 1 जिस पूर्ण तत्त्व का निम्ति संकेत मिलता है, मैं सदा वसी का श्राश्रय लेता हूँ। ११. निश्चय ही जो परम सत्य है. जिधसे बाहर छ मी नहीं है, जो पास भी है और दूर भी है, मैं सदा उसी का श्राधय लेता हूँ। OGR30- (५४) कृष्णेत्याकर्षकं तत्त्वम् कृष्ण-तत्व-मीमांसा ऊपर परम तत्त्व के साक्षात्कार का उल्लेख किया गया है। प्रश्न यह है कि वह साक्षात्कार कैसे हो सकता है और उसका स्वरूप क्या है। ऐसी परम्परागत धारणा है कि इन्द्रियों की जहाँ तक गति है उससे ऊपर उठकर, इन्द्रियों का सर्वया निरोध करके, योग शास्त्रोक्त धारणा ध्यान और समाधि के द्वारा ही भगवान का, परमतत्त्व का, साक्षात्कार किया जा सकता है। यदि ऐसा ही है तब देखना यह है कि वह साक्षात्कार किस रूप में होता है। उक दृष्टि में इन्द्रियों के सर्वया निरोध के कारण यह स्पष्ट है कि वह साक्षात्कार ऐन्द्रियक प्रकार का नहीं हो मकता । अपूर्ण भाषा के सहारे उसे किसी प्रकार बुद्धिगम्य या उससे भी ऊपर उठकर स्वरूपादस्थिति के रूप में ही कहा जा सकता है। एक प्रकार से यह ठोक है। पर अन्न उठता है कि जब इन्द्रियों उस साक्षात्कार में वाधक ही है, तब क्या.आध्यात्मिक दृष्टि से सृष्टि की योजना में इन्द्रियाँ व्यर्थ ही है। क्या वे पापक होने के स्थान में अध्यात्म दर्शन में सहायक नदी हो सकती। एक दिन प्रात नत्यिक भ्रमण के लिए जाते हुए यही समस्या विकट रूप में मन में उठी । निधय किया कि इसका समाधान नाज ही होना चाहिए । नगर के बाहर की प्राकृतिक सौन्दयांवली में विचरते हुए अनुभव किया- प्रकृतेमातृभूतायाः क्रोटे क्रीडन्न नारतम् । लालितः पालिनश्चापि सदानन्दो साम्यहम् ॥ १ ॥ [ ११० ] स्नेहा नित्यसंस्थायि तस्या माधुर्यमद्भुतम् । दृष्ट्वा पीत्वेव पीयूपं सदानन्दो यसाम्यहम् ।। २ ।। ( रश्मिमाल! ३६) श्रांत-- प्रकृति-माता की गोद में सदा क्रीडा करता हुया. तथा लानित और पालित, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ! उसके स्नेह से आई,नित्य रहने वाले, अद्भुत माधुर्य को देखकर, मानों अमृत को पीकर, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ। अथना लोकोत्तरेण दिव्पेन माधुर्यंश समन्विता । येयं प्रसादनी शक्ति के सर्वत्र संस्थिता ।। सूर्य चन्द्रे जले चायावुत्फडकुसुमारलौ। सेयमाविर्भवेत् शश्वत् तिष्ठतान्मम मानसे ।। (रश्मिमाला ३४:१-३ ) খান लोकोत्तर दिन्य माधुर्य से समन्वित, जो प्रसादनी शान्ति सटि में सर्वत्र- सूर्य में, चन्द्रमा में, अल में, वायु में, प्रफुल्त कसुमावलि में- संस्थित है, यह पाविर्भूत होकर सर्वदा मेरे मन में वास करे। इसी मानसिक पृष्ठभूमि में भगवद्गीता के निम्न वचन मरण हो आये- रसोऽहमप्सु कौन्तेय! प्रभास्मि शशिमूर्ययोः। पुण्यो गन्धः पृथिव्यां च तेजयास्मि विभावसी ।। (गोता ७15-) ( १११ र्यात , जलों में रस, चन्द्र-सर्य में प्रमा, पृथिवी में पवित्र मुगन्ध और अमि में प्रकाश-ये सब भगवान के ही रूप है। उस समय यही प्रतीत होने लगा कि विश्व का यावत् सौन्दर्य भगवान् का ही सौन्दर्य है ! जैसे मांस-ममा अादि से पूर्ण और दुर्गन्ध से पूरित इस शरीर में जो मनोज्ञता और आकर्षण है उसके मूल में चेदन थारमा की सत्ता है। इसी प्रकार इस विश्व में तत्तत् पदायों द्वारा जो दिव्य शान्ति, जीवन प्रेरणा, अनन्तानन्त ऐवर्य और सौन्दर्य की प्रतीति इन्द्रियों द्वारा हो रही है, उस के मूल में मूलतत्त्व-स्वरूप भूत-भावन भगवान् को सत्ता है। उक्त रष्टि से भगवान के स्वरूप के साक्षारघर में, अनुभव में, परतः इन्द्रियों साधक ही है, बाधक नहीं। उक्त भ्रमण में त विचार उसी समय जिन पयों में प्रथित कर लिये गये थे उन्हीं को संशित व्याख्या के साथ हम नीचे देते हैं--- आनन्दं शाश्वतं तेजो लोकादुद्विग्नचेतसः। रुद्धाताः प्रयतन्ते यत् स्वान्ते द्रष्टुं मनीषिणः ॥ १ ॥ तदेतदिन्द्रियः :साक्षात् परितः परमेष्टिनम् । दृष्ट्वा भवाः प्रसीदन्तः कीर्तयन्ति दिवानिशम् ॥ २॥ कृष्णेत्याकर्षकं तत्त्वम् इन्द्रियाणामतो मतम् । गोप्यस्तवृत्तयस्तस्माद् भक्तानां परिभापया ॥३॥ मनीषी लोग संसार से उद्विमा चित्त हो कर जिस आनन्द स्वरूप शाश्वत तेज को इन्द्रियों का निरोप करके, अपने मानम या मल करमा में देखने का प्रयत्न करते हैं, १. गवाम् इन्द्रियाणा पालन पुष्टिवा सत्तिभिरेय कियते । पुष्पेषु भ्रमर्य इव विषयेषु पाता इन्द्रियात्तयत्तसं गृहीत्वा तेनैवेन्द्रियाणां तृप्ति पुष्टि च कुन्ति । अन्यथा तेषां वैयपित्तः क्षीणत्वसंभावनोत्पद्यते । अतो वृत्तय एव गोप्यः । [ ११२ ] सर्वत्र परमेष्ठी (परमे = ऊँची स्थिति में स्थित, अर्थात , आपाततः उद्भूत अनुभवों की अपेक्षा उत्कृष्टतर अनुभव से गम्य) उसी मूल तत्व को भक-जन साक्षात् इन्द्रियों द्वारा देखकर (= अनुभव करके) दिनरात उस का कीर्तन करते हैं। इसलिए इन्द्रियों के लिए आकर्षक होने से वह मूल तत्त्व, भक्तजनों की परिभाषा में, 'कृष्ण' इस नाम से कहा जाता है और इन्द्रियों की वृत्तियों को 'गोपो' (गो- इन्द्रियों को पालने या पुष्ट करने वाली) कहा जाता है। अभिप्राय यह है कि उपर्युक्त दृष्टि से इस अनन्तानन्त परम-विशाल विश्व के द्वारा जिसका सुन्दर रूप हमें सदैव इन्द्रिय-गोचर हो रहा है और जो स्वभावतः इन्द्रियों के लिए 'आकर्षक है उसी परम तत्त्व को 'कृष्ण' इस नाम से कहा जाता है। अपनी वृत्तियों द्वारा ही इन्द्रियों को बाह्य रश्यों का बोध होता है। दूसरे शब्दों में, इन्द्रियों के इन्द्रियत्व को सार्थक करने वालों या उनको पुष्ट करने वाली ( = उनके भोग्य अनुभवों को देनेवाली)इन्द्रिय वृत्तियाँ ही हैं। इन्द्रियों का नाम 'गो' है। इसलिए उनकी वृत्तियों को 'गोपी' कहा जाता है। इन वृत्तियों ( = गोपियों) का स्वाभाविक 'आकर्षण' (= प्रत्ति) बाह्य जगत् की और है।' जैसे मधु मक्खियाँ नाना प्रकार के पुष्पों से मधु को, या सूर्य-रश्मियाँ नाना प्रकार के जल स्थानों से विशुद्ध जलको खींच लेती हैं, ऐसे ही आध्यात्मिक उत्कर्ष की अवस्था में इन्द्रियों में बाह्य जगत् के द्वारा ही परम तत्व-स्वरूप भगवान् के साक्षात्कार की योग्यता आ जाती है। इन्द्रियों द्वारा परम तत्व के साक्षात्कार का यही अर्थ है। बाह्य जगत् में भगवान् की स्थिति आपातत नहीं दिखायी देती; आध्यात्मिक उत्कर्ष की अवस्था में ही उसका भान होता है । इसीलिए परम तत्त्व को 'परमेष्ठी' कहा गया है। सह आध्यात्मिक दृष्टि जिन की हो जाती है सच्चा 'भक्त' उन को ही कहना चाहिए। वास्तव में 'कृष्ण' और 'गोपी' ये शब्द भी उन्हीं की परिभाषा के हैं। ऐसे ही भक्तों की प्राध्यात्मिक भावना का वर्णन इस अन्य को अन्तिम रचना ( संख्या ५८) में किया गया है । AIDEO १. तु. "पराधि खानि व्यत् स्वयम्भू." (कठोपनिषद् २।११)।तथा "प्रकृति यान्ति भूतानि निप्रदः किं करिष्यति ।" (भगवद्गीता २३३)। २. तु. "बश्यमपि यत्तत्त्वं लौकिकानामगोचरम् । तदैव परितः स्पष्ट वियुपानी प्रतीयते ॥"(रश्मिमाला ६२ )। [११३] (५५) आनन्दानुभूतिः आनन्द की अनुभूति नित्यं तस्य जगतः प्रतिवेशे वसन्नपि । दारिद्ररेणाभिभूतोऽहमिति मिध्यामतिर्मम ।। १ ॥ सदा उस विश्वंभर भगवान् के पड़ोस में रहते हुए भी मेरा में दारिद्रय से अभिभूत हूँ' ऐसा सोचना मेरी मिथ्यामति ही है। पेयस्यामृतफपत्य जीवनस्यान्तिके सतः । पासाकुलितस्येव महामूर्सस्य सा यतिः ॥ २ ॥ मेरी यह स्थिति पीने के योग्य और अमृत के समान जल के पास में होते हुए भी प्याससे व्याकुल महामूर्स के समान ही है । (५६) अनन्ते प्रगतमार्ग प्रगति का अनन्त मार्ग अनन्ते प्रगतमांगे गच्छन्सोल्लासमानसः । नानाविधानि दृश्यानि पश्यन्नानन्दनिर्भरः ॥ १॥ अनासक्तः कचित् , स्यीयं यात्रोद्देश्यं च संस्मरन् । सर्वदा सर्वथा स्वस्थ: सदानन्दो वसाम्यहम् ॥ २ ॥ प्रगति के अनन्त मार्ग पर मन में उलास के साथ चलते हुए, नाना प्रकार के दृश्यों को शानन्दातिशय से देखते हुए। कही भी श्रासकन हो कर अपनी यात्रा के उद्देश्य को स्मरण में रखते हुए, सर्वदा सब प्रकार से शान्त विस, मैं सदा भानन्द से रहता हूँ! १. "पयः कीलालममृतं जीवनं भुवनं धनम्" इत्यमरः । । ११४ ] (५७) सदानन्दो वसाम्यहम् आनन्द-निर्झर भगवान् विश्वात्मा भगवान् नूनम् , साक्षादानन्दनिझरः। तस्यान्तः संस्थितः स्वस्थः सदानन्दो बसाम्यम् ॥१॥ योऽसी सरजगदुरक्षामार वहति सर्वदा। तस्मिन्यस्याखिलाश्चिन्ताः सदानन्दो साम्यहम् ॥ २॥ योऽसी सर्वजगत्साक्षी भगवन् पुरुषोत्तमः । तदानयेण निश्चिन्त: सदानन्दो बसाम्यहम् ॥ ३ ॥ चिन्तासन्तानसंतापैः सिन्नानां परमौषधम् । आत्मविश्वासमाश्रित्य सदानन्दो वसाम्यहम् ॥४॥ 1.विवारमा भगवान् निधय ही साक्षात् यानन्द के निमरई। सन के अन्दर स्थित, शान्तरित, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ! १. मानन्दानुभूति को तोय लालसा से पैदिक साहित्य प्रोत-प्रोत है। उदाहरणार्य नीचे के प्रमाणों को देखिए- स्वाभिविष्पम् । (पजु.११११) पत्र प्योतिरबल यस्मिन् लोके स्वहितम् । तस्मिन् मा घेहि परमानामवे लोके अक्षिते । ( 111) कोन या ज्योतिम्मन्तस्तन मामगृतं कृषि..."( 1110) मत्रानन्दाय मोदाद मुरमुर भयो । कामस्य यत्राप्ता कामास्तर माममृत कृय । (111) ८११५ ।
२. षो सदा संपूर्ण जगत् पी रक्षा के भार को उठाये हुए हैं, उन्हीं पर सारी चिन्ताओं को छोड़ कर सदा आनन्द से रहता है। ३. ये जो सारे जगत् के साक्षी भगवान पुरषोत्तम है, उन्ही के आधय से निपिन्त हो कर, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ। ४ चिन्ता की परम्परा के संताप से खिन्नों के लिए परम यौषधरूप आत्म विश्वास के श्राश्रय को पाकर, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ । (५८) अयि विश्व-भावन ! विश्वभृद । भगवान् की महिमा अयि ! विश्वभावन विश्वभृत् करुणानिधान नमोऽस्तु ते महिमा महान् मम मानसे महनीय देव ! विभाति ते ॥१॥ गिरिमूर्ति निर्जनकानने रमणीयतकनिकेत्तने । सडिता गगैरतिशोभने परिभाति ते महिमा धने ॥ २ ॥ ६ ११६ ] तपनातपेन विभासिते गगनालणे विधु-भा-सिते । उडुपन्ददीतिविचित्रिते शव रोचिरेष विरोचते ।।३।। 1. अयि विश्व-भावन । विश्वम्भर । करणा-निधान ! आपको मेरा नमस्कार है। हे पूजनीय देव । आपकी बड़ी महिमा मेरे मन में भासित हो रही है । २. पर्वत के शिखर पर, अथवा रमणीयता के एकमात्र निकेतन निर्जन कानन में, अथवा घराबर दमकती हुई दामिनी से शोभित बादल में श्रापकी महिमा भासित हो रही है। ३. सूर्य के प्रकाश से प्रकाशित, अथवा चन्द्रमा को चाँदनी से शोभायमान, अथवा तारा समूह की दीप्ति से विचित्रित गगन के अंगण में आपकी ही छवि चमकती है। द्विजन्दशब्दनिकूजिते कुसुमावलीपरिशोभिते । मलयानिलेन सुगन्धिते मृगसंचयेन निपेविते ।। ४ ।। शुभशीतनिझरवारिणा सरसीवटे परिपूरिते। मुनियोगिन्दसमचिते महिमा विभो ! तव भासते ॥५॥ , ४. पक्षि-समूहों के शब्दों से शब्दायमान, पुष्पों की पंकियों से शोभायमान, मलयानिल से सुगन्धित, भूगों के समूहों से निषेवित, । ११७ ॥
२. जो सदा संपूर्ण जगत् की रक्षा के भार यो घटाये हुए हैं, उन्हीं पर सारी चिन्ताओं को छोड़ कर मैं सदा प्रानन्द से रहता हूँ! ३. ये जो सारे जगत् के साक्षी भगवान् पुरुषोत्तम हैं, उन्ही के आश्रय से निधिन्त हो कर, मैं सदा भानन्द से रहता हूँ। ४. चिन्ता की परम्परा के संताप से सिनों के लिए परम औषधस्प भारम-विश्वास के आश्रय को पाकर, मैं सदा आनन्द से रहता हूँ। --03- (५८) अयि विश्व-भावन ! विश्वभृद् भगवान् की महिमा अयि ! विश्वभावन विश्वभृत् करुणानिधान नमोऽस्तु ते महिमा महान् मम मानसे महनीय देव ! विभाति ते ॥ १ ॥ गिरिमूर्ति निर्जनकानने रमणीयते कनिकेतने । तडिता गगैरतिशोभने परिभाति ते महिमा घने ।। २ । [ ११६ ] ५. मरनों के स्वच्छ शीतल जलों से परिमित मीलों के सटपर, जहाँ मुनियों और योगियों के दर्शन होते है, हे प्रभो। आपको महिमा दृष्टिगोचर होती है। विजितान्तरारिचमुचया: शुभशान्तवृत्तिसदाशयाः । विहिताधिदेवसमाश्रया: प्रणिधानजातविनिश्चयाः ॥ ६ ॥ परदु सतापकदर्थना मयितु समाहितभावना । तब तन्मन सु विरोचना द्युतिरस्ति येऽन तपोधनाः ॥७॥ ६. जिन्होंने भाभ्यन्तर शत्रुओं को सेनाओं को बीत लिया है, पिनो चित्त-पतियों पवित्र और शान्त हैं और जो सदाशय है, बिन्दे एकमात्र भगवान का सहारा है, जिन्होंने चित्त की एधमता से तात्विक मान को पा लिया है, ७. दूसरों के दुख के सापों की पीगमों को दूर करने के लिए जिहोंने अपनी भावनामा चे पवित्र बनाया है, उन तपोधनों के हदयों में भापकी शोभायमान पुति विराजमान है। मुनिभिर्भयानि पिन्यते प्रविभिभयान परिधीयते । निगमस्तया जगदीश ! ते युपपन्नत्यरसीयते ॥ ८॥ निवनीडसप्रितपतिभि- पसीह सायमु रापिभि.। रामगठन वर योगिभिः झियते समाविबुद्धिभिः ॥ १ ॥ [ १९८] ८. मुनिजन आपकी चिन्तना करते हैं; प्रती लोग आपका परिचय प्राप्त करते हैं। हे जगदीश । वैद भी निषय ही आपके गुणों का वर्णन करते हैं। १. अपने घोसलों में बैठकर प्रातः और साय शब्द करने वाले पक्षियों द्वारा तया समाहित बुद्धिवाले योगियों द्वारा अापके गुणों का कीर्तन किया जाता है । सगुणो भवानिह कर्म- रपि निर्गुणः कथितः कठः। तव चित्रमत्र चरित्रमा- त्यरतैरवक्ष्यमसंशयः ॥ १०॥ विपिनेऽथवा गिरिगडरे परितो दरेऽपि मनोहरे। समुपहरे त्वयि सुन्दरे मुनयो हरे ! निरताः परे॥११ ।। १०. श्राप कर्मकाग्दियों द्वारा सगुण और उपनिषदों द्वारा निर्गुण कहे गये हैं। भापके विचित्र चरित्र को संशय से रहित प्रारम-रत लोग ही देख सकते हैं। १.हे भगवन् ! चारों ओर भय के होने पर भी मनोहर विपिन में, अथवा पर्षत को गुफा में, अपवा एकान्तस्थान में मुनिजन सौन्दर्य से युक तथा परमधाम-स्वरूप मापके प्पान में ही निरत रहते हैं। [ ११६ ]
यदर्ज ध्रुवं परितस्ततं
निगमागमैरपि संस्तुतम् ।
तव तत्स्वरूपमह भने
शिव ! शान्तिधाम निरन्तरम् ।। १२ ।।
।। इस्यमृतमन्यने मज्ञाप्रसादो नाम तृतीयः परिस्रवः ।।
१२ हे शिव । हे शातिधाम | भगवन् ।
में आपके उस स्वरूप को निरन्तर भजता हूँ,
जो अजन्मा, कूटस्थ, सर्वन व्यापक
और निगम तथा प्रागम द्वारा सस्तुत है ।
[ १२० ॥
परिशिष्ट-भाग जीवन और जीवन के अनुभवों के सम्बन्ध में 'अमृत-मन्थन' की रचनाओं में प्रन्यकर्ता को एक विशेष दृष्धि रही है। उसी दृष्टि के स्पष्टीकरणार्थ अपनी पुस्तक 'रश्मि-माला' (अथवा 'जीवनसंदेश-गोतालि') से कुछ उपयोगी उद्धरण रिशिष्ट रूप में आगे दिये जाते हैं।
परिशिष्ट १ (क) आशा सर्वोत्तमं ज्योतिः आशा सर्वोत्कृष्ट प्रकाश है "अस्माकं सन्त्वाशिपः । सत्या नः सन्त्याशिपः ॥" [यजु० २।१०] अर्थात, हम आशावादी बनें। हमारी प्राशाएँ सफल हो। भारतीय विचार धारा में इधर चिरकाल से 'संसार असार है', 'जीवन क्षणभंगुर और मिप्या है। इस प्रकार को निराशावाद की भावनाओं का सामाग्य रहा है। हमारी जाति के जीवन को शक्तिहीन, उत्साहहीन और श्रादर्शोन बनाने में निराशावाद का बहुत बड़ा हाप रहा है, यह कौन नहीं जानता ! पर भारतीय संस्कृति की सूधारमा में श्राशावाद सदा से श्रोत-प्रोत रहा है। उसी श्राशावाद के स्वरूप और महिमा का वर्णन नीचे किया जाता है:- निराशायाः समं पापं मानवस्य न विद्यते । तां समूलं समुत्सार्य ह्याशावादपरो भय ॥ १ ॥ मनुष्य के लिए निराशा के समान दूसरा पाप नहीं है। इसलिए उन्हें उस पाप- रूपिणी निराशा को समूल हटाकर पाशावादी बनना चाहिए । मानवस्योन्नति: सर्वा साफल्यं जीवनस्य च । पारिताध्य तथा सष्टेराशावादे प्रतिष्ठितम् ॥ २॥ मनुष्य की सारी उमति, जीवन की सफलता और सटि को चरितार्थता भाशावाद में ही प्रतिष्ठित है। माशा सर्वोत्तम ज्योतिनिराशा परमं वमः । वस्माद् गमय तज्ज्योतिस्तमसो मामिवि श्रुतिः ॥ ३ ॥ ... तमसो मा ज्योतिर्गमय' (पहरारम्पनिषत् ||२८)। । १२३ ] थाशा सरेकर प्रगर है। निरावा और अन्यत्रर है। इसलिए "भगवन् । मुझको अम्मार से प्रकाश की ओर ले चलिए" ऐसा श्रुति का वचन है। आस्विक्यमात्मविश्वास: फारुण्यं सत्यनिष्ठता । उत्तरोत्तरमुरको नूनमाशावतामिह ॥ ४ ॥ प्रास्तिकता (= जीवन में श्रादर्श भावना), प्रारमविश्वास, कापण्य, सत्यपरायणता और उत्तरोत्तर समुन्नति-संसार में इनका सदाच माशावादियों में ही हो सकता है । निराशावादिनो मन्दा निष्ठुराः संशयालयः । अन्धे तमसि ममास्ते श्रुतापात्महनो मताः ॥ ५ ॥ निराशावादी लोग स्वभाव से हो मन्द ( उदात्त भावनाओं से विहीन), निर (असंवेदनशील) और संशयालु होते हैं । वैद' में ऐसे ही लोगों को उदात्त आदर्शों को प्रेरणा से विहीन समानान्धकार में निमम, तया आत्मविस्मृति कर आत्महत्या करने बाम कहा गया है। ( रश्मिमाला (ख) जीवनस्य रहस्यम् जीवन का रहस्य "लोका यत्र ज्योतिष्मन्त- स्तब माममृतं कृधि ।" [ग०६।११३२६ ] अर्थात्, भगवन् 1 मुझे ज्योतिर्मय लोकों में अमृत पद (= शाश्वत जीवन) प्राप्त कराइये। १. तु. "असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसाताः । तास्ते प्रेत्यापि सन्ति ये के चारमहनी जनाः ॥" (यजु. ४०६३) अर्यात, यात्मस्व या बारम चेतना की विस्मृति- आत्महत्या (अर्थात्, जीवन में आदर्शभावना का अभाव ) न केवल म्याफियों के लिए, किन्तु जातियों और राष्ट्रों के लिए भी, किसी भी प्रकार की प्रेरणा से विहीन अज्ञानान्धकार में गिराकर सर्वनाश का हेतु होती है। ४] 'जीवन निःसार और मिथ्या है', 'जीवन बन्धन या कारागार के समान है और उससे छुटकारा (मोक्ष) पाना हो हमारा परम कर्तव्य है' ऐसी मिप्या भावनाओं ने, हमारे जातीय जीवन को चिरकाल से नष्ट-भ्रष्ट कर रखा है। इनके कारण ही, जेल के कैदी के समान, हम स्वभावतः, न केवल अपने ही, किन्तु जाति, राष्ट्र या मानव के भी विकास और समुत्थान से प्रायः उदासीन रहे हैं। परन्तु नीचे जीवन के विषय में एक नयी दृष्टि का प्रतिपादन किया गया है। उसके अनुसार जीवन मिथ्या होने के स्थान में परमात्मा का एक महान् प्रसाद है। इस अनन्तानन्त ब्रह्माण्ड में अनन्त विकास और समुन्नति का साधन जीवन ही है। वास्तव में तो हमारा जीवन शाश्वत है। हमारा यह जीवन उसी शामत अनन्त जीवन की प्राप्ति का एक अनिवार्य और अमूल्य साधन है। इसो लिए उसमें आस्था की अनिवार्य रूप से अावश्यकता है:- जीवन परमोत्कृष्टः प्रसादो जगतीपतेः । तस्य तत्त्वं रहस्य च ये विदुस्ते मनीषिणः ॥ १॥ जीवन जगदीचर का सर्वोत्कृष्ट प्रसाद है । मनीषो लोग ही उसके वास्तविक स्वरूप और रहस्य को समझते हैं। जीवनस्य भयं मृत्योर्मरणान्तं च जीवितम् । आ जन्मनः क्रमेणायुहासो मृत्युपथानुगः ॥ २ ॥ इत्येवं नैकधानर्थमूलं मिथ्यामतिर्नृणाम् । जीवनास्थाविहीनांस्तान् विदधाति भयादितान् ॥ ३ ॥ 'जीवन को मृत्यु का भय है', 'मृत्यु पर्यन्त ही जीवन है, तथा 'जन्म से ही आयु घटने लगती है और बरावर मृत्यु के पास पहुँचती जाती है। इस प्रकार के अनेकानेक अनों के मूल परम्परागत मिथ्या विचार मनुष्यों को जीवन में आस्था से रहित और भय से व्याकुल बनाते हैं। निराशावादिनो भन्दा मोहावर्तेऽत्र दुस्तरे । निममा अवसीदन्ति पके गानो यथावशाः ॥ ५॥ १. तु. "मरणं प्रकृतिः शरीरिणा विकृति वनमुच्यते बुधैः" (रघुवंश ८८७) तथा "संसारः स्वप्नमात्रय चलाः प्राणा धनं तथा । सुखं वत्र न पश्यामि दुःखं वन दिने दिने । अर्थात, मनुष्य के लिए मृत्यु स्वाभाविक और जीवन अस्वाभाविक है। एवं संसार स्वप्नमात्र है, प्राण और धन चलायमान है। संसार में मुख के स्थान में बराबर दुख ही दुःख दीख पड़ता है। [ १२५ ] कामपनी से विहोन निराशावादी लोग मोह के दुस्तर भवर में पड़े हुए दलहम यस गौमों के समान दुख को पाते है। सेषामेवानुकम्पार्थमभिधत्तेऽसकृच्छुतिः । "कुर्वन्नेवेह फर्माणि", "जीवा ज्योतिरशीमहि ॥ ५ ॥ उनके प्रति अनुकम्पा के भाव से दो चेद में “मनुष्य को सौ वर्ष तक कर्म करते हुप हो जाने की इच्छा करनी चाहिए", "हम बराबर प्रकाशमय भाशामय जीवन को प्राप्त करें" इस प्रकार बार-बार कहा गया है। फर्मर जीवन तस्माद्, विकासस्वस्य भास्वरः । उत्तरोत्तरलोकेषु कर्तव्यत्वेन मन्यताम् ॥ ६ ॥ इसलिए कर्म का ही नाम जीवन है। उत्तरोतर लोकों या अवस्मानों में उसके प्रकाशमान विकास को ही हमें अपना प्येय समझना चाहिए । उत्तरोत्तरमुकर्षि जीवनं शाश्वत हि नः । अस्पृष्टं तमसा चापि मोहरूपेण सर्वथा ॥ ७ ॥ वास्तव में हमारा जीवन उत्तरोत्तर समुपतिशील और शाश्त (= सदा रहने पाला) है। उसका स्वरूप अज्ञान रूपी अन्धकार से सर्वथा अस्पृष्ट है। (रश्मिमाला २) -- (ग) संयतस्व जीवनाय जीवन के लिये वरावर यन करो "उदायुपा स्वायुपोदस्थाम् ॥" [यजु० ॥२८ ] अर्थात्, हम दीर्घ और शुभ जीवन के लिए सदा उद्योगशील रहें । १. "नवेह कर्माणि जिजीविषेच्छत समा"(मनु. ४०२), २. तु. “बोवा ज्योतिरशीमहि" ( ऋग् ३२।२६)। [ १२६ ] प्राप्य मानवीयजन्म पुण्यकर्मसंचयेन । दीनदुःखिरक्षणेन संयत्तस्य जीवनाय ॥ १ ॥ मनुष्य जन्म को पाकर पवित्र कर्मों का संचय और दीन-दुखियों की रक्षा सेवा करते हुए जीने का यन करो! सत्पथानुवर्तनेन भव्यभावभावनेन । लोकसंप्रसारणेन संयतस्व जीरनाय ॥ २ ॥ सदाचार के मार्ग पर चलते हुए, सुन्दर-समुन्नत विचारों को रखते हुए और लोक-कल्याण का प्रसार करते हुए जीने का यन करो! दैन्यभावभञ्जनेन धैर्यधर्मधारणेन । वीरतासमाश्रयेण संयतस्य जीवनाय ।। ३ ।। दीनता के भाव का भजन करते हुए, धैर्य रूपी धर्म को धारण करते हुए. बीरता- पूर्वक जीने का यन करो। जीवनं विदं मुषेति पामरा जमा वदन्ति । नैव तत्तथा, ततोऽत्र सयतस्त्र जीवनाय ॥ ४ ॥ यह जीवन मिथ्या है, ऐसा मूर्ख-पामर लोग कहते हैं। पर जीवन मिथ्या नहीं है। इसलिए इस संसार में जीने का यन करो। (रश्मिमाला) Rao- दुःख-मीमांसा दुःख के स्वरूप पर विचार हमारे देश को विचारधारा में इधर चिरकाल से दुख-विषयक विचारों और तन्मूलक विभीषिका ने एक ऐसा वातावरण बना रखा है बो वैयक्तिक तया जातीय दोनों दृष्टियों से हमारे लिए प्रायेण घातक सिद्ध हुआ है। संसार दुसमय है, अतएव प्रसार और देय है', 'जीवन दुःख रूप है, अतएव बंध (= कारागार ) है, उपसे किसी प्रकार छुटकारा ( मोक्ष) पाना ही हमारे जीवन का परम ध्येय है।' १. तु• "अथ निविधदुःखात्यन्तनितिरत्यन्तपुरुषार्थ" (सांख्यसूत्र १)। [ १२७ ] 'दुख सबको ही प्रतिकूल और बाधा के रूप में प्रतीत होता है' विवेकी मनुम्म रे सब कुछ दुःखरूप में ही देखना चाहिए-इस प्रकार के विषाक अनार्य विचारों ने जहाँ एक ओर हमारे जीवन को नीरस, मन्द, उत्साह दीन, नैराश्यपूर्ण और घमण्य बनाने में समा भाग लिया है, यहाँ दूसरी और हमारे करोड़ों भाइयों में जीवन संघर्ष से मुंह छिपाकर, प्रायः अपरिपक दशा में ही, संन्यास की मिप्या प्रकृति को परापर प्रोत्साहित किया है। दुःख के विषय में उपर्युक विचारों में यदि कोई आगे पढ़े हैं तो उन्होंने येवल इतना हो कहा है कि कर्मयोगी चे सुख-दुए को समान समझकर ही जीवन के युद्ध में प्रात्त होना चाहिए।' परन्तु प्रस्तुत प्रकरण में दु:ख के स्वरूप के विषय में हम एक नितरा नवीन पार्शनिक रटिकोम उपस्थित कर रहे हैं। बमारे परिक्षान में रिचार भारतीय वाम्यय में कहीं देखने में नहीं भाये है। इयों से उहिम मानव को उनसे एक नया दो प्रकाश मिलेगा, ऐसी हमारी धारणा है। नीचे पचों में कुछ के विपर में युकि मोर उपपति के पापो मिति हमने उपस्थित किये है ये संप में मुख्यतः इस प्रथा है- (1) दुन्द की प्रति आकस्मिक या शुरू नहीं होती। (२)मा योजना में दुख की प्राति निष्प्रयोजन नहीं होती। (३) दुख से लगनेवाले भय के मूल में हमारा मान हो कारण होता है। महान पुरुप तो दुख और क्यों का स्वागत करते है। (४) दुखों को मालिक मारय भूमिप यमका पाहिए। (५)स्वच्छ से सात दुपहर के का में परिवरिया का पता। रुप से दी समस्त परियामास दोसी। (६) मनुष्य की समुति में दुरापाल शादियों के समान है। या पानी कमाठानी। नाम परोप्रा सधये देते हैं- 4 उद्वेगजनकं दुःख सर्वेषामेव प्राणिनाम् । सेथमापाततो बुद्धिस् तत्त्वदृष्टया विविच्यते ।। १ ।। इस संसार में दुख से सब कोई घबड़ाते हैं। दुख को उद्वेग जनक समझते हैं। दुःख के विषय में यह जो आपाततः विचार है उसका यहाँ हम तात्त्विक दृष्टि से विवेचन करेंगे। न चैयाकरिमक दु.ख न चाप्यत्यप्रयोजनम् । न चैवावश्यक, दुःख दु खमित्येव मन्यताम् ॥ २ ॥ दुख के विषय में विचार करने पर, न तो हम उसको आकस्मिक अथवा अहेतुक कह सकते हैं, न निषयोजन । दु ख को दुख के रूप में ही अनुभव किया जाय, यह भी आवश्यक नहीं है। दुख आकस्मिक नहीं हो सकता, इसका समर्थन नीचे करते हैं- कार्यकारणसूत्रेण सूत्रधारेण केनचित् । चाल्यमाने जगत्यस्मिन् कथं दुखमहेतुकम् ? ॥ ३ ॥ इस जगत् या विश्व के सूत्रधार या नियामक परमात्मा कार्य और कारण के सून अर्थात् नियम द्वारा सारे जगत् का संचालन कर रहे हैं। ऐसी स्थिति में किसी के ऊपर आनेवाला दु ख अहेतुक है, अर्थात् उसका कोई हेतु नहीं है, ऐसा कैसे हो सकता है? दु ख निष्प्रयोजन भी नहीं हो सकता, इसका समर्थन नीचे करते हैं--- गर्भावस्था समारभ्य या यावस्थानुभूयते । प्राणिना, वद्धितायैव स्पष्टं तस्याः प्रयोजनम् ॥ ४ ॥ जब से प्राणी गर्भावस्था में आता है, उसे बराबर नई नई दशाओं का अनुभव करना पड़ता है। शास्त्रों में उनका प्रायः भयानक दु खमय अवस्थाओं के रूप में वर्णन मिलता है। उन पशानी को हम दुखमय माने या न मानें, इतना तो स्पष्ट है कि उनका प्रभाव प्राणी के लिए हितकर ही होता है। अभिप्राय यह है कि गर्भावस्था के समान प्रत्येक दुखावस्था मनुष्य के हित के लिए ही होती है। गर्भावस्था के अनुभव के पश्चात् ही राम, कृष्ण, बुद्ध और गाधी जैसे अवतारी पुरुष बनते हैं। एवं स्थावरलोकेऽपि वृक्षादीनां समुद्भवे । नानाथस्थास्तु बोजस्य जायन्ते सप्रयोजनाः ॥ ५ ॥ [ १२६ ] J इसी प्रकार त्यावर जगत में भी वृक्ष प्रादि की उत्पत्ति में बोने के पश्चात् वीज को जो सड़ने-गलने भादि की अनेक अवस्थाएँ होती हैं वे सब सप्रयोजन होती हैं। वीज बोए जाने के पीछे पहले गलता है, फिर सड़ता है। तब कहीं यह अंदर के रूप में उगता है और अंत में माम, अनार, अंगूर जैसे उपयोगी और मुंदर वृक्षों के रूप में आता है। इस प्रकार आपाततः दुख को अवस्थामी को भी जानना चाहिए। दुम्सावस्था से हमारा अंत में हित ही होगा, यही समझना चाहिए। तत्रैवं सति लोकेऽस्मिन् दुःसावस्थेति या मता। सप्रयोजनता तस्या नूनं नैवात्र संशयः ॥ ६ ॥ इसलिए संसार में जिसको दुःख की अवस्था माना जाता है उसका ईश्वर को ष्टि में कोई न कोई प्रयोजन भवस्य होता है, यही मानना चाहिए। सहेतुकत्वामित्येवं सप्रयोजनतां तथा । दुःखस्यावेक्ष्य तत्त्वज्ञो न ततो विजुगुप्सते ॥ ७ ॥ इस प्रकार दुख की सहेतुकता और सप्रयोजनता को समझकर, अर्थात् यह मन में बैठाकर वि ईश्वर को अष्टि में को कोई दुख पाता है उसका कोई कारण और प्रयोजन भी अवश्य होता है, तत्वज्ञानी मनुष्य दूसों से कभी नहीं घबराता। अन्धकारणवः कश्चिद् यथाकस्माद् भयातुर । भवेत्तथैव दुःखेभ्यो मन्दानां जायते भयम् !! = || जैसे अंधेरे में खड़ा हुआ मनुष्य यास्तविक स्थिति को नहीं समझता और न जाने वहाँ से क्या भापति का जाय' यह सोचकर भय से व्याकुल हो जाता है, उसी प्रकार शहानो का दुय के बारम और प्रयोजनको समाते रखरते रहते हैं। उत्तरोत्तरमुत्कृष्टप्रगतावुत्सुफस्तु यः । दुःखनां स्वागत कुस् तो नारसीदति ॥ ६ ॥ पर तत्यमानी मनु जोपने जीवन में उत्तरोत्तर उत्कृष्ट उमति के लिए उस्मुक रहता है, दुखों का स्वागत करता हुआ उनसे विषाद को नहीं प्राप्त शेता। यथा बारस्य कस्यापि तापसस्य धनार्थिनः । फष्टानां महतामङ्गीकारो दृष्टः फलाधिनः ॥ १० ॥ जैसे अपने अपने अमीर लक्ष्य (कम से विद्या, आध्यामिक सिद्धि और पनि) को प्राप्ति के लिए प्रयम करनेवाला एक विद्यार्थी, तपस्वी या पनापी प्रथमता से बरेच काय को सहता है, उसी प्रघर तत्वज्ञानी मनुष्य अपने जीवन के सदय को मोर पड़दा हुमा दुखों और करों को सहर्ष स्वीकार करता है। । १३० ] विधातुः सर्वलोकस्याभिप्रायोऽप्येप दृश्यते । यत्कार्यसिद्धितः पूर्व कष्टस्वीकरणं मतम् ।। ११ ।। समस्त संसार की सृष्टि करनेवाले प्रजापति का अभिप्राय भी यही दीखता है कि किसी भी कार्य की सिद्धि से पहले कष्ट या दुख को उठाना ही चाहिए। दूसरे शब्दों में, भगवान् की रची हुई इस सृष्टि में सब के लिए यह स्वाभाविक है कि अपनी अभीट सिद्धि के लिए कष्ट या दुख को उटाया जाय । अत एव सिसक्षः सन् लोकानेतान् प्रजापतिः । 'तपोऽतप्यत', नेकन श्रूयते ब्राह्मणादिषु' ।। १२ ।। इसीलिये शतपय ब्राह्मण आदि ग्रंथों में जहाँ कहीं 'प्रजापति ने इन लौकी की सृष्टि करने की इच्छा की', इस बात का प्रसंग आया है वहाँ 'प्रजापति ने तप किया' ऐसा कहा गया है। अभिप्राय यह है कि औरों की तो बात ही क्या, प्रजापति या ब्रह्मा को भी सुष्टि को रचना से पहले तप करना पड़ता है। स्वेच्छा से स्वीकार किए गए दुख या कष्ट को ही तप कहते हैं, यह नीचे कहा , गया है- शिवस्य नीलकण्ठस्य घिपपानं यदुच्यो । व्याख्यानमस्य तेनापि सिद्धान्तस्य विधीयते ।। १३ ॥ पुराणों में भगवान् नीलकंठ शिव को विषपान की कथा प्रसिद्ध है। वास्तव में उस कया से उफ सिद्धांत को हो व्याख्या की गई है। संसार में कौन स्वेच्छया विषपान करने को तैयार होगा। फिर भी लोक कल्याण को इच्छा से शिव जी ने प्रसनवापूर्वक भयकर विष का पान किया। इसलिए अभीष्ट अर्य की सिद्धि के लिए मसमतापूर्वक कष्ट को स्वीकार करना चाहिए। रामस्य तस्य भीष्मस्य युद्धस्यापि महात्मनः ! काइस्टस्य जिनस्यापि गान्धिनश्च महात्मनः ॥ १४ ॥ जीवनेषु तथान्येपां लोकोत्तरयशस्विनाम् । स्वेच्छयव सुख त्यक्त्वा फटस्वीकरणं मतम् ॥ १५॥ उक्त कारण से ही भगवान राम, सुप्रसिद्ध भीष्म पितामह, महात्मा युद्ध, महात्मा काइस्ट, भगवान महावीर, महात्मा गांधी तथा अन्य लोकोत्तर यशवाले महापुरुषों के १.तु "सोऽयं पुरुषः प्रजापतिरकामयः । भूयान् त्यो प्रजायेयेति । सोऽधाम्पत् । स तपोऽतप्यत ।"""" (शवर्षपदाह्मण ६८)। [ १३१ ।
जीवन में देखा जाता है कि उन्होंने महान आदर्शों के पालन के लिए स्वेच्छा से सुखों को छोड़कर कष्टों को स्वीकार किया ) आपेत्तिकी मता तस्माद् भावना सुखदुःखयोः । नैकान्तिकं तयो रूपमित्येवमवधायताम् ॥ १६ ॥ इसलिए सुख और दुःख की भावना को श्रापेक्षिक ही मानना चाहिए। उनमें से किसी का अपना कोई निधित या ऐतिक रूप नहीं है। दुःखं वै दुःसरूपेग तावदेव प्रतीयते । यावत्परिग्रहस्तस्यानिच्छयैव विधीयते ।। १७ ।। दुःख दुःखरूप से अभी तक प्रतीत होता है जब तक कि उसका प्रहण अनिच्छा से हो पिया जाता है। दुःखं चेत्स्वेच्छया प्राज्ञः प्रसन्नेनान्तरात्मना । आदन्ते, तत्तपोरूपमाधत्ते, नात्र संशयः ॥ १८ ॥ यदि बुद्धिमान मनुष्य पाए हुए दुस को स्वेच्छा पूर्वक प्रसन्न मन से स्वीकार कर लेता है तो वही दुस्स उसके लिए निस्सन्देह तप का धारण कर लेता है। भाशय यह है कि मनुष्य को चाहिए कि यह सहमा माए हुए दुःख को अपनी उमति को प्राप्ति में सहायक तप मानकर प्रसनता से सहे। इस प्रकार वह दुःख उसके लिए कल्याण का ही साधक हो सकता है। नूनं तपांसि कृयाणि शास्त्रोक्तानि विधानतः । आचरन्त्यात्मनः शुद्ध श्रद्धया ये मनीषिणः । १६ ।। यह कौन नहीं जानता कि शास्त्रों में अनेकानेक रितिकृच्छ् यत श्रादि तमा म विधान किया गया है। जो धुद्धिपान है वे मारम शुद्धि के लिए उन तपों का श्रद्धा से विधि-पूर्वक पालन करते हैं। तपसा पारमानोति उपसा इन्नि किल्विपम् । लोकेऽत्र तपसा धीर उन्नतेजि विति ॥ २० ॥ तप की महिमा महान है । पद्वारा हो मनुष्य मरने अभीट परको प्रास करता है और पाप या पर्णता ग्रेपूर कर अपने चरित्र को उम्मबल और पवित्र पनाता है। घोर पुरुष संसार में तप द्वारा ही उनति के शिखर पर विराजमान होता है। उतोऽनिवार्यदास यन प्रातं भवति जीरने । वप इत्येव तद्विद्याद्य इच्छेच्छेच आत्मनः ॥ २१ ॥ [ १३२ ] इसलिए जो अपना कल्याण चाहता है उसे चाहिए कि जीवन में जो कोई अनिवार्य दुःख प्राप्त हो उसे वह अपनी अभीष्ट सिद्धि का साधक तप हो समझे और माने । हिरण्यस्य यथा शुद्धिरमितापेन जायते । तथैव दुःखतप्तानां जायते कल्मपक्षयः ।। २२ ॥ जैसे अमि में तपाने से सुवर्ण की शुद्धि हो जाती है, उसी प्रकार दु:ख रूपी तफ से तपे हुओं के कल्मप या पाप का नाश हो जाता है । रम्यं प्रासादमारोहन्नत्युच्चशिखरस्थितम् । कष्टानि सहते धीरः प्रसन्नो लक्ष्यसिद्धये ॥ २३ ॥ क्सिी पर्वत के प्रति ऊँचे शिखर पर बने हुए रमणीय प्रासाद तक पहुँचने के निर्मित ऊपर चदनेवाला धीर मनुष्य अपने लक्ष्य को सिद्धि के लिए प्रसन्नता पूर्वक कष्टों को सहता है। उत्तरोत्तरभुत्कृष्टप्रमतावुत्सकरतु यः । एवं वेदोकमार्गेण दुःखावुद्विजते न सः ॥ २४ ॥ इसी प्रकार 'तुम उत्तरोत्तर समुषति को प्राप्त करो इस वैदिक उपदेश के अनुसार जो मनुष्य अपनी उत्तरोत्तर उत्कृष्ट समुपति के लिए उत्सुक है वह दुःख से कभी नहीं घबराता। देवाधिदेवतत्त्वेन करणाप्लुतचेतसा । नूनं सृष्टं जगत्कृत्स्नं भूतानामुहिधीर्पयाँ ।। २५ ।। इसमें संदेह नहीं कि उस परमतत्त्व परमात्मा ने, जो देवताओं का भी अधिष्ठातृ- देवता है, करुणा-वश होकर प्राणियों के उद्धार की इच्छा से ही समस्त जगत की सुष्टि की है। तत्रैवं सति लोकेऽस्मिन् दुःखावस्थेति योच्यते । नूनं सास्मद्धितायैव नोद्वेगाय मनीपिणः ।। २६ ॥ १. तु. "प्रात्मानं नियमस्तैस्तैः कर्पयित्वा प्रयत्नतः । प्राप्यते निपुणधर्मो न सुखालभते सुखम् ॥" (वाल्मीकिरामायण १९३१) २. तु. “भद्रादमि धेयः प्रेहि" (ऐतरेयब्राह्मण १।१३) (अर्थात, तुम भद्र से भरतर जीवन को प्राप्त करो)। ३. नु० "भद्रा इन्द्रस्य रातयः" माम०१० ५।२।१४) (अर्थात, भगवान् के प्रधान कल्याणमय है)। [ १३३ ] सृष्टि के विषय में उपर्युक वस्तुस्थिति के होने से, लोक में जिसको दुम्यावस्था कहा जाता है वह निषय हो हमारे कल्याण के लिए ही होती है, ऐसा मानना चाहिए। समझदार लोग उससे उद्विम नहीं होते। कदाचिदेवदेवात्र कारणं येन, विस्मयः ! कुत्रापि चेदमन्त्रेषु दुःसशब्दो न दृश्यते ॥ २७ ॥ दुःख के विषय में शोध जर कहा गया है हरिद उसी कारण से, सह पाथर्य को पात है कि, वैदिक सहितामा के मंत्रों में कहीं भी 'दुख' शब्द नहीं पाया जाता। (रश्मिमाला) --- (3) जीवने नाट्यसादृश्यम् जोवन-नाव्य "साही घेता फेरलो निर्गुण" (रेवाश्यतरोपनिषत् ६।११)। अर्थात, यह परमारमा TREE GIRI, नय, निन्द्र और पवन-समम् इन तीनों गुणों से रहित है। धनन्यरेन यानि नाइसवीनि समुमुकमः । पायन्ति लौकिफास्त पाया जीयन प्रधि ॥१॥ सांसारिक सोग पनपस करो गुनासा नाय कादियों (तमा) देखोरे। वन विषय में भीम ऐसा ही पर्वात मो! भिम किन मानो एनारमR पटनामा मेसिन हो दुए को मनुने अनुमा और मार्ग पर मागे पते राना चाहिए। (माका. . --- [ ६४ (च) उत्तरोत्तरमुन्नीतः उत्तरोत्तर उन्नति "प्र तार्यायुः प्रतरं नवीयः। (ऋग० १०॥५६१)। अर्थात, भगवन् ! हमें उत्तरोत्तर समुन्नति-शील नवीनतर जीवन में अप्रसर कीजिए। जन्मजन्मान्तरस्यैतद् विज्ञा आहुः प्रयोजनम् । अनुभूतिविशेषैर्यदुत्तरोत्तरमुन्नतिः ॥१॥ विज्ञो का कहना है कि विभिन्न अनुभवी द्वारा उत्तरोत्तर उन्नति अथवा विकास हो जन्म जन्मान्तर का प्रयोजन है। तस्माद् यानुभवस्याप्तिानवस्येह जायते । दुःखरूपापि सानून मन्तव्या सप्रयोजना॥२॥ इसलिए मनुष्य को इस जीवन में दु ख रूप में भी जो अनुभव प्राप्त होता है उसको सप्नयोजन ही समझना चाहिए । अभिप्राय यह है कि मनुष्य को अपने जीवन को दुखात्मक घटनाओं से न पबढ़ाकर उनको, उनसे प्राप्त शिक्षा या अनुभव द्वारा, अपने उत्तरोत्तर विकास का साधन ही बनाना चाहिए। क्योंकि--- यथाय॑ते धनं लोके दुःखै. कष्टैश्च भूरिशः । सथा तैरज्यंते ज्ञानं जनैरनुभवात्मकम् ||३|| जैसे ससार में अनेक प्रकार के दुखों और कों से धन का संचय किया जाता है, वैसे ही अनुभवात्मक मान भी अनेक दुखों और कष्टों से सचित किया जाता है । (रश्मिमाला ५१) Opape- [ १३४ ॥
परिशिष्ट २ तत्त्व-मीमांसा मूलतच्च का विचार "एक सद्विमा बहुधा वदन्ति" (ऋग० १४१६४१४६) अर्यात् , एक ही मूलतत्व को विद्वान् अनेक नामों से कहते है। प्रायः प्रत्येक धर्म और संप्रदाय के लोग इस स्य जगत् के मूल में रहने वाले एक परम तत्व को स्वीकार करते हैं। उसके लिए वे अपनी-अपनी परम्परा या दार्शनिक रष्टि के अनुसार मिन-मिन नाम भी देते हैं। इस नाम भेद के हो घर वै प्रायः यह सोच नहीं सकते कि नाम भेद और दृष्टि-भेद से वह मूलतत्व वास्तव में असंपृक्त है, और इसीलिए उनसे स्वीकृत मूल तत्व, नाम भेद और दृष्टि-भेद के होने पर भी, वास्वष में एक ही है। मूल तत्त्व स्वयं-खिद है । उनको किसी ने बनाया नही है। उसके सम्बन्ध में नाम भेद और टि-भेद का यही अर्य हो सकता है कि हम सब उसके स्वयको समभाना चाहते है। ऐसी दशा में नाम मे और रवि-भेद को लेकर झगड़ने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । पर धो और संप्रदायों के इतिहास इस मगड़े से भरे पड़े हैं। इसीलिए मूलतत्व मीमांधा की विशेष थावस्यकता है। इसी मीमांसा को लेकर नीचे के पथ लिखे गये है- यतो भूतानि जायन्ते यत्र तेषां लयो मपः । यदाश्रयेण तिन्ति उत्वं तन्नित्यमव्ययम् ॥१॥ समस्त सत्सदार्थ विध मूलतब से उत्सव होते हैं. बिसरे उनकाय होता है और जिसके माधय से वे वर्तमान रहते हैं, वह स्वयं नित्य और अध्यय अर्थात सप रहित है। भापासीमामतिकम्प नानगम्य फयंचन । स्वयम्भु, वस्तुतो नान्ना रहिवं तद्धि पर्वते ॥ २ ॥ [ १३६ वह मूलतत्त्व भाषा की सीमा को अतिक्रमण करके रहता है, अर्थात् भाषा द्वारा उसके स्वरूप का वर्णन कठिन है । किसी प्रकार केवल ज्ञान की गति उस तक हो सकती है। वह स्वयंभू है, अर्थात् उसको किसी दूसरे ने उत्पन्न नहीं किया है। वास्तव में उसका कोई अपना नाम नहीं है। तनामविपये मन्दास्वतऋतिषशान्मुधा। विवदन्ते, तदाश्चर्यमुपहासकरं महत॥३॥ उसी मूलतत्त्व के नाम के विषय में मन्द बुद्धि लोग, विभिन्न शाब्दिक रूदियों के कारण, व्यर्थ में विवाद करते हैं। यह बड़े प्राचर्य और उपहास की बात है । नियतो चिपयो चाचोऽनियतो मनसस्ततः । हसीयसी हि चागुक्ता मनसोऽपेक्षया श्रुतौ ॥ ४ ॥ वाणी का विषय परिमित है और मन का अपरिमित । इसीलिए श्रुति ( वेद ) में मन की अपेक्षा वाणी को छोटा कहा गया है । अभिप्राय यह है कि हमारे मन के भावों को वाणी प्रायः पूर्णतया प्रकट नहीं कर पाती। इससे स्पष्ट है कि वाणी के क्षेत्र की अपेक्षा मन का क्षेत्र कहीं अधिक विस्तृत है। तत्त्वं स्वभावतः सिद्ध गुणामनिकेतनम् । गुणमेकं समाश्रित्य पुनर्नीम प्रवर्तते ॥ ५ ॥ वह मूलतत्त्व स्वभाव से ही अनेकानेक गुणों का स्थान है। परन्तु (अन्वर्य) नाम किसी एक गुण को लेकर ही प्रवृत्त होता है। अभिप्राय यह है कि जितने भी अन्वर्य नाम होते हैं वे सब किसी न किसी एक ही गुण को लेकर रखे जाते है। मूलतत्त्व में तो अनेकानेक गुण रहते हैं। इसलिए कोई अन्वर्थ नाम मूलतत्त्व का ठीक-ठीक वर्णन नहीं कर सकता। इसी बात को नीचे स्पष्ट किया गया है। न विद्यते ततो नाम त्रिषु लोकेयु तादृशम् । सत्त्वोपवर्णने शक्तं साफल्येन भवेतु यत् ॥ ६ ॥ अन्यर्थवाचक सर्व नाम तत्त्वस्थ विद्यते । नैन रूळ, स्वस्तेन विशेषगुण उच्यते ।। ४ ।। १. तु- मनसो हसीयसी। अपरिमिततरमिव हि मनः । परिमिततरेव हि वाक् ।" (शतपथ ब्राह्मण iitats ) अर्थात्, मन को अपेक्षा वाणी छोटी है; क्योंकि मन का वेन्न अपरिमिततर जैसा है और वाणी का परिमिततर जैसा [ १३७ ] परिशिष्ट २ तत्त्व-मीमांसा मूलतच का विचार "एक सद्विप्रा बहुधा यदन्ति" ( ऋ० १११६४१४६) अर्थात् , एक ही मूलतत्व को विद्वान् अनेक नामों से कहते हैं। प्राय प्रत्येक धर्म और संप्रदाय के लोग इस दृश्य जगत् के मूल में रहने चाले एक परम तत्त्व को स्वीकार करते हैं। उसके लिए वे अपनी-अपनी परम्परा या दार्शनिक दृष्टि के अनुसार मिन-भिन्न नाम भी दते है। इस नाम भेद के ही कारण धे प्रायः यह सोच नहीं सकते कि नाम-भेद और दृष्टि भेद से वह मूलतत्व वास्तव में असंपृक है, और इसीलिए उनसे स्वीकृत मूल तत्त्व, नाम भेद और दृष्टि-भेद के होने पर भी, वास्तव में एक ही है। मूल तत्व स्वर्य-सिद्ध है । उनको किसी ने बनाया नहीं है। उसके सम्बन्ध में नाम भेद और हष्टि-भेद का यही श्रर्य हो सकता है कि हम सर उसके स्वरूप को समभना चाहते हैं। ऐसी दशा में नाम-भेद और रवि-भेद को लेकर मगढ़ने का कोई अर्थ ही नहीं रह जाता । पर धर्मों और संप्रदायों के इतिहास इस मगड़े से भरे पड़े हैं। इसीलिए मूलतत्व-मीमांसा की विशेष आवश्यकता है। इसी मीमांसा को लेकर नीचे के पच लिखे गये है- यतो भूतानि जायन्ते यत्र तेपो लयो मतः । यदाश्रयेण तिष्ठन्ति तत्त्व तनित्यमव्ययम् ॥१॥ समस्त सत्पदार्थ जिम मूलतत्त्व से उत्पन्न होते है, जिसमें उनका लय होता है और जिसके आश्रय से वे वर्तमान रहते हैं, वह स्वयं नित्य और अव्यय अर्थात क्षय रहित है। भापासीमामतिक्रम्य ज्ञानगम्यं कथंचन । स्वयम्भु, पस्तुतो नान्ना रहित तद्धि पर्वते ।। २ ।। [ १३६ ] एवं सत्यपि दृष्टीनां विभेदे दर्शनादिपु । तत्वं स्वरूपतः स्थायि कूटस्थं चैव वत्तते ।। १३ ।। इसी प्रकार विभिन्न दर्शनों श्रादि में मूल-तत्व के विषय में विभिक्ष दृष्टियों के पाये जाने पर भी, वह स्वरूप में स्थायी और कूटस्प हो रहता है। अभिप्राय यही है कि मूलतत्त्व के विषय में अनेक दृश्यों भले ही हो, वह अपने रूप में सदा अविचल और अस्थायी भाव से ही रहता है। उन दृथियों का उसके अपने रूप पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता। एकस्यैव प्रमेयस्य परिभाषान्तरं यथा कियते शाखभेदेन तथा तत्त्वेऽपिड श्यताम् ॥ १४ ॥ सत्यं ब्रह्म परं धाम कर्म 'धम्म' प्रजापतिः । शक्तिर्माता शिवो विष्णू राम ओंकार एव च ॥ १५ ॥ प्रेमेत्यादि पदं भूलतत्त्ववाचि न संशयः । तदेव तत्त्वं गीतायामशब्देन कथ्यते ॥ १६ ॥ एक दो पदार्थ के लिए विभिल शादों में विमिण पारिभाषिक शन्द नियत कर लिये जाते हैं । मूलतत्व के विषय में भी ऐसा ही समझना चाहिए। सस्य, घन, परमधाम, कर्म, धम्म (धर्म), प्रजापति, शक्षि, माता, शिव, विष्णु, राम, श्रीम्, प्रेम इत्यादि सारे शब्द मूलतत्व के हो पाचक है। इसमें कोई संशय नहीं है। उसो मुलतत्व के लिए भगवद्गीता में 'अहम्' शब्द का प्रयोग किया गया है। (रश्मिमाला ६.) । १३६ ] । इसलिए तीनों लोकों में कोई ऐसा नाम नहीं है जो पूर्णतया मूलतत्व के स्वरूप के वर्णन में समर्थ हो। क्योंकि उस मूलतत्व के जो भी नाम संसार में प्रसिद्ध हैं ये सब अन्धर्य-वाचक ही है। प्रर्यात किसी अर्थ को लेकर ही वे प्रवृत्त हुए हैं। इसीलिए उन नामों से मूलतत्व के किसी न किसी विशेष गुण का ही अभिप्राय होता है। उनमें से कोई भी पूर्णरूप से मूलतत्व के सर गुणी को नहीं बता सकता। उसका कोई एक (= जिसमें अर्य की अपेक्षा न हो) नाम को है ही नहीं। रुचिभेदादियो भेदास्था संप्रदायतः। तत्वस्य विपये दृष्टे दः समुपजायते ॥३॥ दर्शनानि विभिन्नानि संप्रदायास्वतोऽपरे । समुत्पन्नानि लोकेऽस्मिन् दृश्यन्ते यत्र तत्र वै ॥ ६ ॥ मूलतत्व के विषय में जो अनेक रष्टिया पायी जाती है, उनका कारण रुचि भेद, बुदिभेद, अथवा संप्रदाय भेद हो है। संसार में जहाँ-तहाँ पाये जाने वाले विभिन दर्शनों और संप्रदायों की उत्पत्ति इन्ही कारणों से हुई है। परिधानीयवत्राणां भोज्यानां चैव निश्चितम् । प्रकारेषु महान भेदो देशभेदेन दृश्यते ॥१०॥ सत्तत्कारणसत्त्वेऽपि तत्र भेदे, न मौलिकः । अभिप्रायो मनुष्याणां भेदमापद्यते कचित् ॥ ११॥ विभिल देशों के पहनने के पन्नों और भोज्य पदार्थों के प्रकारों में महान भेद पाया जाता है। उक भेदा में विनिय देशों के जल वायु श्रादि का भेद ही कारण होता है । al भी, पहनने के घरों और भोज्य पदार्थों के संबंध में मनुष्यों के मौलिक अभिप्राय में कोई भेद नहीं होता। अर्थात, संसार में सर्वत्र वस्त्र शीत भादि से बचाव के लिए हो पहने जाते है और भोजन शरीर पुष्टि के लिए ही च्यिा जाता है। रुचकादिप्रकारेण भिन्नाकारानुपेयुपः । सुवर्णस्य सुवर्णत्वं हीयते न कदाचन ॥ १२॥ मुदर्भ के गले आदि के प्राभूषा में खोना मिन मिल माघरों को पार कर देता है। तो भी, उनमें सुवर्णका सुवर्णत्व ज्यों का त्यों रहता है, उसमें कोई अन्दर नहीं पड़ता। [ १३८ ] परिशिष्ट ३ आध्यात्मिक साधना या प्रगति में कारोपासवा का बड़ा महत्व है। इसी लिए साधकों के हित को दृष्टि से निम्नस्थ उद्धरण यहाँ दिया जा रहा है:- ओंकार-माहात्म्यम् ओंकार की महिमा देवादि-शामों में कार के अहत माहात्म्य का वर्णन किया गया है। उस माहात्म्य को अतिशयोकि न समझना चाहिये । उसका आधार, निधय ही, ऋषि-मुनियों का अपना अनुभव था। उस माहात्म्य हो पढ़कर यही मानना पड़ेगा कि एक सचे श्रद्धालु के लिए ओंकार ऐसा चिन्तामणि है जिसके द्वारा मनुष्य सब कुछ प्राप्त कर सकता है-"एवद् प्येवाक्षरं हात्वा यो यदिच्छति तस्य तत्" (कठोपनियन्द्र ११२६१६)अर्यात, ओकार को जानकर कोई भी जिस पदार्थ को चाहता है उसको पा सस्ता है। छान्दोग्य-उपनिषद, माइक्य-उपनिषद्, कठ-उपनिषद्, श्वेताश्वतर उपनिषद भगवद्रोता, मनुस्मृति भादि में अनेकानेक स्थलों में ओंकार का वर्णन है। उससे स्पष्ट है कि प्राचरं मह्म-प्राप्ति का एक अद्वितीय साधन है। पातजल-योगसूत्रों में कहा है कि परमेश्वर का मुख्य वायक शन्द ओंकार ही है और ओंकार के जप और अर्य के चिन्तन से अध्यात्म मार्ग पर चलने वाला सरसता से एकाप्रसा तथा अन्तर्-मुखता को प्राप्त कर सकता है और उसके मार्ग में आने वाले सब प्रकार के विन्न स्वयं नष्ट हो जाते है इसी ओकार का एक आकर्षक, साथ ही वास्तविक वर्णन, माहारम्य के कम में, हम नीचे देते हैं। निश्चय हो, निझामु लोगों को यह अत्यन्त प्रिय लगेगा। साथ ही हम भारा करते है कि पाठक इसको, सविता के रूप में नहीं, किन्तु आध्यात्मिक भावना के रूप में ही पढ़ेंगे और प्रत्येक विचारधारा को अपने मन में सजीव देखने चयन करेंगे। 1. १४० ।
(ओंकार का दोला या झूले के संगीत के रूप में वर्णन ) प्रेमकारुण्ययोर्घाम तत्त्वं विश्वनियामकम् । यत्, तेन निर्मितामेतां तेनैवान्दोलितां तथा ॥१॥ श्वासप्रश्वासयोर्दोलामारूदो मोदनिर्भरम् । गायाम्योंकारसंगीतं मधुरं मधुराक्षरम् ।। २ ॥ श्रोत, प्रेम और कारण्य के स्थान तथा सारे विश्व के नियन्ता भगवान ने यास और प्रश्वास की दो बोरियों वाली एक दोस (मूला) मेरे लिये बनायी है और स्वयं ही उस दोला को आन्दोलित कर रहे हैं ! उन्हीं के द्वारा मैं उस दोला में मैठा हुआ आनन्द विभोर होकर मीठे स्वर में मधुराक्षर ओंकार रूपी संगीत को गा रहा हूँ। ठीक उसी तरह, जैसे कोई चालक अपने पिता द्वारा मूले में बिठाया और मुलाया जाकर भानन्द में मग्न होकर गीत गाता है। (२) ( माता को बुलाने के लिए बच्चे के आह्वान के रूप में वर्णन) यासी सर्वजगन्माता सर्व देवनमस्कृता । ऋपिभिर्मुनिभिर्माता सर्वशास्त्रोपवर्णिता ॥ ३ ॥ नानासंतापसंत्रस्तस् तस्या आह्वानमुत्तमम् । ओंकारमाश्रये नित्यं भक्तिप्रवणमानसः ॥ ४ ॥ अर्थात् , समस्त देवताओं से नमस्कृत, ऋषियों और मुनियों से गायी गयी, तथा सय शास्त्रों से वर्णन की हुई जो सारे जगत् की माता है, ओंकार इसके आदान का, अपनी और आकृष्ट करने का, उत्कृष्ट साधन है। अनेकानेक सन्तापों से त्रस्त होकर मैं भक्ति प्रवण होता हुआ सर्वदा उसी ओकार का आश्रय लेता हूँ। अभिप्राय यह है कि हरे हुए बच्चे की तरह मैं भी नाना संतापों से डरा हुआ ओंकार द्वारा ही विश्व को माता को बुलाना चाहता हूँ। उनके धुलाने के लिए यही सर्वोत्तम भावान है। (३) ( भगवरपद की प्राप्ति के लिए सोपान के रूप में वर्णन) योगिनामपि दुर्गम्यं भवानामपि दुर्लभम् । ज्ञानिनामपि दुश्चिन्त्य जगतः प्रभवाध्ययम् ॥ ५ ॥ [ १४१ : १५ फूटस्यं शाश्वतं दिव्यं विष्णोर्यत परमं पदम् । ओमित्युगीथिनः प्राहुस्तस्य सोपानमद्भुतम् ।। ६ ।। अर्यात् , ओम् का गान करने वाले प्राचार्यों का कहना है कि ओंकार हो उस कूटस्य शाश्वत और दिव्य भगवसद की प्राप्ति के लिए एक बहुत सोदी है, जो योगियों के लिए भी दुर्गम्य है, भलों के लिए भी दुर्लभ है, शानियों के लिए भी दुधिन्त्य है और जहाँ से जगत् को लत्ति होती है और जिसमें प्रलय होता है। (४) (आत्मरक्षार्य कवच के रूप में वर्णन ) आन्तरागामरातीनां विजयनतधारिणाम् । भवबन्धविनाशार्थ मुनीनां धर्मचारिणाम् ॥ ७ ॥ आवारं परमं प्राहुराश्रयं तद्विदो धुधाः । तमेनं सुरदं मन्ये "ब्रह्म धर्म समान्तरम्" ।। ।। अर्यात, काम, क्रोध, मद, मत्सर यादि श्राभ्यन्तर शत्रुओं को विजय करने का प्रत लेने वाले, और भव-धन्ध अर्थात् सांसारिक जीवन की त्रुटियाँ और अपूर्णताओं को निति के लिए धर्माचरण में रत मुनियों का ओंकार ही एकमात्र उत्कृष्ट सहारा होता है, ओंकार के तस्च को जानने वालों का ऐसा मत है। उसी ओंकार को मैं ब्रह्म-रूप में अपना सुरद आध्यात्मिक कवच सममता हूँ। भमान्तरम्" यह अपर्ववेद ( ११९) का मन्त्र है। उसी की ओंकार-परक व्याख्या यहाँ की गयी है । अभिप्राय यह है कि ईश्वर-भक के लिए ओंकार ही एक मुहट कवच का काम करता है। (५-१) ( सुगन्धित पुप्प, परम ज्योतिः, अमृत, परमौषध तया ब्रह्मास्त्र के रूप में वर्णन) ज्ञानविज्ञानवृतस्य सुगन्धि कुसुमं शुभम् । ज्योतिपामपि यग्ज्योतिरमृवं भोज्यमात्मनः ॥ ६ ॥ नानासन्तापवतानां यचाप्योषधमुत्तमम् । पापी, भरमसात फतु प्रमाखं ब्रह्मवादिनाम् ।। १० ॥ श्रर्याद, ओंकार मान विज्ञान कपी पक्ष का सुन्दर सुगन्धित पुष्प है। अर्थात, ब्रह्म धर्म | १४२ ] जैसे किसी फूलने वाले पौदे का उत्कृष्ट सौन्दर्यमय - सारांश पुष्प-रूप में विकसित होता है, इसी तरह समस्त धान और विज्ञान का अन्तिम निचोड़ या परम ध्येय या पर्यवसान ओंकार है। ओंकार समस्त प्रकाशमय पदार्थों का भी प्रकाश है। ओंकार ही वास्तव में आत्मा का अमृतमय भोज्य है। अभिप्राय यह है कि मनुष्यमात्र में अपने को पूर्ण की ओर ले जाने की जो भूख है उसकी सदा के लिए, तृप्ति भीम से ही हो सकती है। नानाविध सन्तापों से संतप्त प्राणियों के लिए ओंकार हो सर्वोत्तम अचूक श्रौषध है। मनुष्य के अन्दर जो पापों की राशि घर किये हुए है उसको श्रामूल भस्मसात् करने के लिए ओंकार को ही प्रशानी लोग अत्यन्त शतिशाली ब्रह्मान समझते है। (१०) (सर्व-देवारमक, सर्वत्र व्यापक मूल तत्व के रूप में वर्णन ) सर्वदेवात्मकं शान्वं सत्यमेफरसायनम् । अथवा पहुनोन कोऽर्थ, एवं विचिन्त्यताम् ।। ११ ।। निलोक्यामपि यत्किश्चित् तदादाय समन्ततः। तिष्ठन्तं प्रणवं ध्यायन् प्रमभूयाय कल्पते ।। १२ ॥ अर्यात, समस्त देव जिसके अंग हैं ऐसा, सदा एक स्वरूप में रहने वाला (अथवा मद्वितीम रसायन-भूत), शान्त शव ओंकार ही है। अथवा अधिक कहने से क्या लाम है। यही समझना चाहिए कि तीनों लोकों में जोछ भी विद्यमान है रस सबको अपने में लेकर जो स्थित है, उसो भौचर च प्पान हरता हुमा मनुष्य प्रभाष को प्राप्त कर सकता है। (उपर्युक्त ओंकार-माहात्म्य के माहात्म्य का वर्णन) एसदोंकारमाहात्म्य प्रातः सायघानेन मनसा शान्त एकान्तसंस्थितः ॥ १३ ॥ गुरुपदिष्टमार्गन प्रपनन् मागोऽानि । प्रगयस्य जपेनार्यभाषनेन च नित्यशः ॥ १४॥ उत्तरोत्सरमुरथष्ट स्थान प्राप्य, परं पदम् । अस्यममृतं दिघ्यं लन्म्या विष्टत्यनामयम् ॥ १५ ॥ प्रातः पठसरः। [ १४३ ]
अर्थात, उपर्युफ ओंकार-माहात्म्य का एकान्त में घेठकर प्रत्येक दिन प्रातः काल
शान्तचित्त चौर सावधान होकर जो मनुष्य पाठ करता है यह गुरु द्वारा बतलाये हुए
मार्ग से प्रहाप्राप्ति को और चलता हुश्रा नित्य अविचार के साथ शाकार के जप से
क्रमशः आध्यात्मिक उक्षति करता हुआ निधय हो अन्त में अक्षय, अमृत, अनामय
{ सर पीड़ाओं से रहित ) आनन्दमय परमपद को प्राप्त कर लेता है।
(उपसंहार)
स एष सरलो मार्ग: सर्वकपटकपर्जित
अत एव सदा सङ्गिः सम्प्रदायः समर्हितः ।। १६ ॥
अर्थात्, ओंकार उपासना का परि-निर्दिष्ट मार्ग सीधा-सादा है। इसमें किसी
प्रकार के फाटकों या विनयाधाओं या जटिलताओं का डर नहीं है। इसी लिए समस्त
सत् सम्प्रदाय इस मार्ग का श्रादर करते हैं ।
कहने को भावश्यकता नहीं है कि वैक्षिक मार्ग की तरह जैन बौर थादि सम्प्रदाय
भी प्रकार के माहात्म्य को मानते हैं।
(रशिममाला.)
..
[ १४३ ]
डाक्टर मङ्गलदेव शास्त्री द्वारा प्रणीत अथवा
संपादित ग्रन्धों का परिचय
(संस्कृत भाषा में)
मूल्य
(१) ऋग्वेदप्रातिशाख्यम्, उवटाचार्यकृतभाष्येण सहितम् । ८)
(२)प्रवन्धनकाश: । (संस्कृतनिवन्यात्मकः) प्रथमो भागः । नवर्म
संस्करणम्
(३)प्रवन्धप्रकाश द्वितीयो भागः, ऐतरेयब्राह्मणपर्यालोचनेन सहितः। ३)
(४)न्यायसिद्धान्तमाला। (द्वी भाग)।
१॥-)
(५) उपनिदानसूत्रम् ( सामवेदीयम्)।
(६) उपेन्द्रविज्ञानसूत्रम् ( वेदान्तः )।
(७) श्राश्वलायननौतसूत्रम् (सिद्धान्तिभाष्यसहितम् ) (द्वौ भागौ )
(2) थार्यविधासुधाकरः।
(8)भारतीयसंविधानस्य (उत्तरार्धस्य) संस्कृतानुपादः।
(१०) ऐतरेयारण्यफ-पर्यास्लोचनम्
२)
(इङ्गलिश भाषा में)
(११) भग्वेदप्रातिशाख्यम् English Translation, Critical
Notes, Appendices, oto. २०)
(१२)ग्वेदमातिशास्यम् (Critical Introduction, Text in
Sanskrit Stanzas, Appendices, etc.). In the Press.
1. गवर्नमेंट संस्कृत कालेज, यनारस, के प्रिंसिपल के पद से प्रकृत लेखक द्वारा
शंपारित 'सरस्वती भवन प्रन्पमाला' की पुस्तकों का उल्लेख इस सूची में नहीं है।
L१५ ।
(हिन्दी भाषा में)
(१३) भाषापिमान (अथवा तुलनात्मक भाषाशास), परम संस्करण
(१४) भारतीय धार्यधर्म को प्रगतिशीलता (भारतीय संहति के
विकास का विवेचनारमक अभ्या)
(१५) मिना ( प्रेम और प्रतिमा का संप)(मिना मान मदम' नामक
जर्मन नाटक का अनुवाद)।
(१६) पेदों का पास्तपिक स्परूप पपवा -पेड़ों के महान् भादर्श
(१७) रश्मिमाला (थपा जीपमसंदेश-गीताञ्जलि') मूल संघका
पप हिन्दी अनुवाद । उतरप्रदेश र पुराre i)
(१८) मारणीयमंगति का विकास किया। ७)
(प्रशासनार्य परतुन प्रन्ध)
(१)तपयमानणपोलोपनम्
(२)ीतपालोशाम
(२)संम्पयोगपारिभाषिपोषः
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चाखम्या विद्या भवन