A. U. A

Bhasvati

2006\5

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॥ श्रीहरिः॥ श्रीमाञ्छतानन्द विरचिता भास्वती KARAN 4DAankhd. श्रीमज्ज्यौतिषीन्द्रमुकुटमणि श्री छत्रधरमूरिसूनुना मिरजा. पुरमण्डलान्तर्गताहीग्रामस्थशङ्करपाठशालायाः प्रधा- नाध्यापकेन सनातनधर्मोपदेशकेन गणक श्रीमातृप्रसाद (दैवज्ञभूपण) पाण्डेयेन कृता छात्रबोधिनीनाम संस्कृत- सोदाहरण भाषा टीका- सहिता तेनैव संशोधिताच Published and Solth by H. D. Gupta & Sons, PROPRIETORS, THE CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE, BENARES CITY. Printed by Grrri Shankar Lal Manager, at the Chandrapubiu Press cerul lry Joi Krishno Destirupiterut the vidgn Vins Pounds, HENARES - fro 4 SHANKaamw- (All Rights Reserverl) 119:7 Registered According to Act XXV. of 1867. (All Rights Reserved) ॥ श्रीहरिः॥ श्रीमाञ्छतानन्द विरचिता भास्वती श्रीमज्ज्यौतिषीन्द्रमुकुटमणि श्री ६ छत्रधरमृरिसूनुना मिरजा- पुरमण्डलान्तर्गताहीग्रामस्थशङ्करपाठशालायाः प्रधा- नाध्यापकेन सनातनधर्मोपदेशकेन गणक श्रीमातृप्रसाद (दैवज्ञभूषण) पाण्डेरे कृता छात्रबोधिनीनाम संस्कृत- सोदाहरण भाषा टीका- सहिता तेनैव संशोधिताच Published and Sold by H. D. Gupta & Sons, PROPRIETORS, THE CHOWKHAMBA SANSKRIT SERIES OFFICE, BENARES CITY. Printed by Genry, Shrinkar Lal Manager, at the Chandraprabha Press and by Jai Krishna Das Gupta, out. the Vidya l'ilas Press, BENARES, - (All Rights Reserthi) ) 1917.

सूची
-
है)
"
छपी
वास्तुमारणी पं० मातृप्रमादकृत
13)
अहिबलचक्र
भा.टी.)
मग्यपारीणमर्वस्त्र
विनाछपी (यन्त्रालयस्थ)
तिथि चिन्तामणि(करणपं० मातृप्रमादकृत सोदाहरण भा.टी.
चन्द्रार्की (करण)
तिथि मारणी (करण)
कामयेनु (करण)
करणमञ्जरी (करण)
मकरन्दविवर्ण (करण)
नूतनोदाहरण
ग्रहाचन्तामणि खण्डित (करण) सोदाह० भा.टी.
लोमम मंहिता (जातक)
भा.टी.
प्रात्याहिककृत्यकौमुदी (नित्यकर्म)
मिमांशुकण्ठाभरण (धर्मशास्त्र)
सान्वय भा. टी.
मुहर्नमत्रीर (मुहूर्त)
विवाह पञ्चरत्न (कर्मकाण्ड) पं० छत्रधरकृत भा० टी० सहित
सब प्रकार की संस्कृत तथा भाषा पुस्तकों के मिलने का पता-
हरिदास गुप्तः
चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफीस,
बनारस सिटी।

समर्पण। - श्रीदतातचरण, आपकी ही आज्ञा को शिरोधार्य करके मैने इस भास्वती की संस्कृत तथा सोदाहरण भाषा टीका बनाई है, अन्य विद्वान् लोग तो इसकी यथोचित समालोचना करेहींगे परन्तु इसे अविकल सुनने में आपको विशेष आनन्द होगा। जौ बालक कर तोतरि बाता, सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता। अत एव आपके ही श्रीचरणों में अर्पण करते हुए मुझे विशेष आनन्द होता है। इति शम् । भवदीय वात्सल्य भाजन- सम्वत् १९६८ वैक्रम अक्षैतृतीया } मातृप्रसाद पाण्डेय सूची - 1%D) ) छपी वास्तुमारणी पं० मातृप्रमादकृन अहिवलचक्र भा.टी.) मरयूपारीणमर्वस्व विनाछपी (यन्त्रालयस्थ) तिथि चिन्तामणि(करण). मातप्रमादकृत सोदाहरण भा.टी. चन्द्राकी (करण) तिथि मारणी (करण) कामधेनु (करण) करणमञ्जरी (करण) मकरन्दविवर्ण (करण) नूतनोदाहरण ग्रहचिन्तामणि खण्डिन(करण) सोदाह० भा.टी. लोमस संहिता (जातक) भा.टी. प्रात्याहिककृन्यकौमुदी (नित्यकर्म) मिमांशुकण्ठाभरण (धर्मशास्त्र) सान्वय भा. टी. मुहूर्तमजीर (मुहूर्न) विवाह पञ्चरत्न (कर्मकाण्ड) पं० छत्रधरकृत भा० टी० सहित . RANA सब प्रकार की संस्कृत तथा भाषा पुस्तकों के मिलने का पता- हरिदास गुप्तः चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफीस, बनारस सिटी।

समर्पण। D श्रीदतातचरण, आपकी ही आज्ञा को शिरोधार्य करके मैने इस भास्वती की संस्कृत तथा सोदाहरण भाषा टीका वनाई है, अन्य विद्वान् लोग तो इसकी यथोचित समालोचना करेहींगे परन्तु इमे अविकल सुनने से आपको विशेष आनन्द होगा। जौ बालक कर तोतरि बाता, सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता। अत एव आपके ही श्रीचरणों में अर्पण करते हुए मुझे विशेष आनन्द होता है। इति शम् । भवदीय वात्सल्य भाजन- RAND सम्वत् १९६८ वैक्रम अक्षैतृतीया मातृप्रसाद पाण्डेय भूमिका। सत्स्वानुमोदकमदन्नपि भक्तहस्ताद- दूर्वादलं कृषति जेमनहेतवे यः । तं ज्ञप्ति वैभववशाद्विवुधादि पूज्यं वन्दे महागणपतिं निजवुद्धिवृद्ध्यै ॥१॥ प्रियपाठकगण, अपनी भाषा की उन्नतिही सब प्रकारके उन्नतियों का मूल है । अत एव देशोन्नति साधन के लिये, साक्षर लोगों का यह कर्तव्य है कि पहले अपने यहां के प्राचीन ज्ञान विज्ञानों से भाषा के भण्डार को पुष्ट करें तत्पश्चात् नवीन विज्ञानों के समावेश- से समलंकृत करें। साधारण कृषक से लेकर बड़े २ नरपति तक सभी इस वात को जानते हैं कि कार्य के सफलता में काल (समय) एक असा- धारणकारण है । समय पर किया हुआ कार्य थोड़े से प्रयत्न में ही ऐसी सफलता प्राप्त करता है, कि वैसी सफलता असमय में कोटि यत्न करने पर भी असंभव है समय के प्रतिकूल होने से किसी की कुछ नहीं चलती और समय के अनुकूल होने से सिद्धि करतलगतसी रहती है। प्राचीन काल में समय पर कार्य करने का इतना ध्यान दिया गया, कि इसका एक पृथक् विज्ञान (Science ) ही व. नगया । समय विज्ञान ज्योतिष मुहूर्त विज्ञानादि उसी के नाम हैं । इस विज्ञानकी भी दो शाखाए हुई (१) गणित और (२) फलित, फलित में इस विषय का वर्णन है कि किस मुहूर्त में कौनसा कार्य करना चाहिये और गणीत में समय का निर्धारण किया जाता है।

(२) समय निर्धारण एक गहन विषय है और इस के लिये सूर्य सिद्धान्त ब्रह्मसिद्धान्त आदि बहुत से बड़े २ सिद्धान्त ग्रन्थ वन चुके हैं परमकारुणीक पंडितों ने अल्पबोध लोगों के लिये करणकुतूहल-ग्रहलाघव-मकरन्दादि अनेक ग्रन्थ बनाकर उस विज्ञान को और भी सुलभकर दिया, और इन्ही ग्रंथों के आ. धार पर सब पञ्चाङ्ग बनते हैं जिस्से कि सर्व साधारण को लौकिक वैदिक कार्य करने का समय निश्चित करने में अत्यन्त सुभीता होगयाहै । धर्मानुरागी आर्य सन्तानको कार्य करने के लिये सिवाय पञ्चाङ्ग के अन्य गति नही है । यह "भास्वती" ग्रन्थभी पञ्चाङ्ग बनाने में करणकुतूहल-ग्रह- लाघव-मकरन्दादि के श्रेणी का है परन्तु विशेषता इसमे इतनी है कि यह सूर्य सिद्धान्त* का अनुसरण करती है इसी से इस्का नाम (भास्वती) रक्खा गया है। इस ग्रन्थको बने हुए ८१२ वर्ष हुए और वराहमिहिर+के उपदेशानुसार वेधकरके ग्रहों की ठीक स्थिति जानकर इस्की रचना की गई है इसी से लोकोक्तिभी प्रसिद्ध है कि 'ग्रहणे भास्वती धन्या' ग्रहण का समय निकालने में भास्वती धन्या है। और ज्यो. तिषशास्त्र के प्रत्यक्ष होने में सूर्यग्रहण और चन्द्रग्रहणही प्रधान साक्षी है । यथा-प्रत्यक्षं ज्योतिष शास्त्र चन्द्राऊ यत्र साक्षिणौ । इस ग्रन्थ की तीन छपी हुई प्रतियां मुझे बडे यत्न क- रने पर मिली, एकतो 'अखवार प्रेस' की सम्वत् १९२३ की छपी हुई प्रति. दुसरी 'विनायक प्रेस' की सम्वत् १९४२ की छपी हुई प्रति, और तीसरी 'भारतजीवन प्रेस' की स. म्वत् १९४९ की छपी हुई प्रति, और मेरे वृद्ध प्रपितामह श्री ६ पं० शङ्कर पाण्डेयजीके पिता श्री ६ पं० सदाशिव पाण्डेय जी की एक हस्तलिखित प्रति सम्वत् १८३२ की स्वयम् मेरे पास वर्तमानथी सुहृद्वर पं० श्रीराधाकान्त * श्रीसूर्य सिद्धान्त समं समासात् । भा० +अथ प्रवक्ष्ये मिहिरोपदेशात् । भा०

(३)
पाण्डेय जी नम्बावगंज काशी से मुझे सम्बत् १९२३ की लि.
खी उनके पूर्वज अखिलज्योतिषशास्त्र पारावारीण प० श्रीकाशी
प्रसाद पाण्डेय जी की लिखी हुई प्राप्त हुई और पं० श्रीशारदा
प्रसाद तिवारी भदैनी बनारस से उन क पूर्वज पं० आत्माराम
त्रिपाठी की लिखी हुई संवत् १८३५ की एक खण्डित प्रति प्राप्त
हुई अत एव उक्त महानुभावों को अनेकानेक धन्यवाद देताहूँ।
इसी प्रकार मैने इन छवों प्रतियों को मिलाया और जहाँ
पर इन में भेद पड़ा वहाँ पर जिस ग्रन्थ का पाठ मुझे प्रा.
चीन तथा शुद्धजान पड़ा उसी का ग्रहण किया और उस पर
अपनी भाषा की उन्नति तथा छात्रों के उपकारार्थ उदा.
हरणों के सहित 'छात्रबोधिनी' नामकी संस्कृत तथा हिन्दी
टीका बनाई और निजनिर्मित 'करणमञ्जरी' नामक ग्रन्थ से
सारणी भी देदिया और वर्षादिक का विश्वा कल्यादिक का
गतवर्ष संख्या तथा दिन गण संख्या और अधिमास जानने का
प्रकार भी रख दिया है।
अब यदि इस पुस्तक से छात्रों का कुछ भी उपकार होगा
तो मैं अपने को कृतकार्य समझूगा।
इति शम्।
सम्वत् १९६८ वैक्रम
कार्तिक शुक्ला
भवदीय कृपापात्र
मातृप्रसाद पाण्डेय
शङ्कर पाठशाला
मौ. आही, पो. कछवा
जि. मिर्जापुर
एकादशी

भास्वतीस्थविषयसूची ७ or ९ ... २ २ ... ... तिथ्यादि ध्रुवाधिकार पृष्ट पं श्लो. मङ्गलाचरण और शास्त्राब्द बनाने का प्रकार १ गतकलिजाननेकी और अन्यरीति से शास्त्राब्द बनाने की विधि... संवत् जानने का और शाका जानने का प्रकार ३ ३ संवत्केपालक शुद्धिध्रुवा और सूर्यके मध्यम ध्रुवा की विधि मध्यम चन्द्र ध्रुवा की रीति केन्द्र ध्रुवा की विधि चन्द्रमा में केन्द्र संस्कार की विधि ८ राहुवनाने की रीति सूर्य चन्द्रमा और चन्द्र केन्द्र का वीज जानने की विधि १० देशान्तर वनानेका प्रकार ग्रहवाधिकार सौरवर्षाधिप वनाने की विधि ३ सौर सावन मासाधिप बनाने की विधि संवत् जाननेकी रीति मङ्गल के २१ १३ बुध २३ १० गुरु ૨ २ शुक्र २६ २४ ६ शनि २८ १५ मङ्गल आदि पञ्च तारा के वीजजानने का प्रकार 09 Vdo or ... ... ar ९ २ ... ३ ध्रुवा की विधि " ... ... ... ... ... " (२) पृष्ट पं. श्लो. ... १ ... of Am ४७ ૨ ८ ... वर्यादि के विश्वा का शान... कितना आढक जल कहां वरूँगा इसके जानने का प्र० ३६ १० आय व्यय जानने की रीति पञ्चाइस्पष्टाधिकार दिनगण वनाने की विधि ३ सूर्य के स्पष्ट करने की विधि २ ३ सूर्य के खण्डांक की विधि ... ४ सूर्य की गति स्पष्ट करने की रीति ४९ ६ तत्कालिक मध्यमचन्द्र-चन्द्रकेन्द्र और स्पष्टचन्द्रमा की विधि चन्द्रखण्डांक की विधि ५२ १५ १० चन्द्रमा की गति स्पष्ट करने की रीति तिथि स्पष्ट करने की विधि नक्षत्र बनाने की विधि २ १३ योगवनाने की विधि करण बनाने की रीति ५९ २१ १५ स्थिरकरण जानने की रीति ६० २४ १६ संक्षेप में पञ्चाङ्गबनाने की रीति संक्रान्ति स्पष्ट करने की विधि ६६ संक्रान्ति के तिथि जानने की गति ६७ संक्रान्ति को संक्षेप में स्पष्टकरने का प्रकार . अधिमाल जानने की विधि ६७ ग्रहस्पष्टाधिकार मध्यम मङ्गल बनाने की विधि ७४ बुध का शीघ्र बताने की विधि ७५ १२ मध्यम गुरु की विधि ૨ शुक्र का शीघ्र वनाने की विधि ७८ १२ मध्यम शनि वनानेका प्रकार ... ... ... ... ... ... w w r १ ३ ... ... २ " ३ (३) पृष्ट पं. श्लो. ... २ ... ... .. की रीति ... ... ... वुधशुक्र का मध्यम और मङ्गलवृहस्पतिशीन का शीघ्र वनाने की विधि ८१ १२ मङ्गल आदि पञ्चनारा के स्पष्ट की विधि शीघ्रखण्डांक जानने की रीति राहु और केतु स्पष्ट करनेका प्रकार... ९७ १७ १० नक्षत्र गत को राशिगत, राशिगत को नक्षत्रगत करने की विधि सूर्यादिकोंकी मध्यमगति १०० १९ १२ मङ्गल आदि पञ्चतारा की शीघ्रगति का ज्ञान १०१ १२ १३ पञ्चतारा की गति का गुणक और पश्चतारा की मन्द- स्पष्टगति करने का प्रकार ... १०२ ९ १४ पञ्चतारा की स्पष्टगति करने का प्रकार १०४ भौम आदि पञ्चतरा के वक्रीमार्गी का दिन जानने ११३ २२ भौमादि पञ्चतारा के वकीमार्गी का केन्द्रांश ... ११५ १५ भौमादि पञ्चतारा का उदय अस्त के अंश ११७ २० १९ अगस्त्य का उदय अस्त २० चन्द्रशृङ्गानति ज्ञान १२० त्रिप्रश्नाधिकार आयनांशा वनाने का प्रकार १२१ ३ चरवनाने की विधि ૧૨૨ ૨ २ दिनरात्रि का मान और नत बनाने का प्रकार १२५ १५ ३ प्रभा जानने की रीति १२६ १९ शंकु और घटी जानने की विधि छाया जानने की विधि १२८ १९ लंका के अवधिका दक्षिणाक्ष जानने की विधि १२९ १७ लग्नस्पष्ट करने का प्रकार १३० १४ चरखंडा वनानेकी रीति १३३ १० १० लङ्का का मान जाननेका और स्वदेशमान वतानकी विधि " *2 ३ ... ... १ ... ... ... on or m so v w a va ८ ... ... ... ...

(४) १ ... २ का प्रकार .. ... ૨ ... चन्द्रग्रहणाधिकार पृष्ट पं. श्लो. द्विगुणितसूर्य में पर्वकालका संस्कार तत्कालिक राहु और शर स्पष्ट करनेकी विधि ३ चन्द्रमान और राहुमान और ग्रास जाननेका प्रकार १३७ २० स्थित्यर्द्ध स्पर्शकाल मध्यकाल और मोक्षकाल वनाने १३८ २२ ३ शरकी कृति बनानेका प्रकार नत और वलन बनानेकी विधि सूर्यग्रहणाधिकार लंवन वनाने की विधि १४३ नति वनानकी विधि २ सूर्य में लंबन संस्कार करने की तथा सूर्यमान वनानेका प्रकार स्थित्यर्द्ध जानने की रीति १४७ २० परिलेखाधिकार शर आदिक का अङ्गुलादि मान वनानेका प्रकार १५० ३ घलन देनेकी विधि... १५२ चन्द्रमा और सूर्य के मानां गुलके स्पष्ट करने का प्रकार १५४ ११ प्रन्थ के वनाने का समय ३ o4 ... १ ... २ ... ... ३ ...

* शोधन पत्र पृष्ट पंक्ति । ५२ " ७ ३ ७ ९ ११ । , " " अशुद्ध शुद्ध स्थाप्यः स्थाप्या २४ ९ शानन्द शाखाब्द २८ शुद्धे चन्द्राष्ट शुद्धेश्चन्द्राष्ट ५ २१८ नखाश नखांश केन्द्रात् केन्द्राद् २३ १८ खगो काशी का काशी की १० १८ गणिता गणितात् १२ १४ १२ शास्त्राब्द शस्त्रादि १५ ५३८ १९७८ १९७७ १८ २० १३ २००२ ५३ २० २६ २० २५ १९ १ २० ५. २०४९ २० ७३ २० ९८ २१ २१ १ २१ ४६ ३८ २१ ६९ ८ २१ ९४ ४४ २० १२ २१ २० में को बनाई दी २६३४ ३०८ २४ ८ १० * येह अशुद्धियां 'संवत्सर अब्दादि निर्माणाय शकांक' में हुइ ह, १९७७ के जगह १९७८ छप गया और आगे भी २४ चालन देकर एक अंक की अशुद्धियां बराबर होती गई, इसी प्रकार २२-२४ के पृष्ट में भी भौम और वुध के शङ्कांक में हुई हैं। " " में ई " पृष्ट पति " 558 कले ५९ १८ होता अशुद्ध पृष्ट पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ४६ २४ २६ १६ २४ २३ १८ १९ १३ ३७ १७-१८ १८-१९ २१ १०२७ २६ ७१७-१८ १८-१९ ६९ १७ अभिष्ट अभीष्ट ४२ १० १७-१८ १८१९ मध्यमास मध्यममास४२ १६ ४४ रिप्पध्र रिवभ्र ४४ ४ १७ ९ कले: ४५ ८ बु. गु. शी. बु. शु. म. ८४ १५ तो ४ मं.गु.श.म. म.गु.श शी.८४ १५ रशा रसा २ फलवच्छीव- फलवच्छीघ्र- नक्षत्र योग फलं८६ १८ भुक्त मोग्य होतो ८८ १८ छायाछु- शङ्कुघटी- ६० ८ घटीविधयः विधी १२७ २० १५ १६ ६१ ३ त्रिशद्धिः त्रिंशद्भिः १३३ १५ १६ याम्य ११ ११ १४६ १४ १६ पर्वणि १५० १२ २०शरस्तता शरस्ततो १५२ १९ नोट ८ वे पृष्ट में ८ वीं पक्ति के नीचे यह श्लोक चाहिय- "त्रिवदशेनयदास्तिकिश्चित्तदा खखागैरदमेवभक्तम् । लब्ध तु दत्वा रदमेव केन्द्र शुद्ध्यष्टभागाव्दनखांश युक्तम्" ॥१॥ १३४ व पृष्ट मे ११ वें श्लोक के नीचे यह चाहिये कि- इतिश्रीमच्छनानन्द बिरचितायां भास्वत्या सूर्यग्रहणाधिकार : षष्ठः ॥६॥ १४५ वे नथा १४९ वें पृष्ट में सूर्यग्रहणाधिकार के जगह चन्द्र- प्रहणाधिकार छप गया है। इसक संस्कृत टीका में विशेष अशुद्धी होंगी व द्वितीया वृत्ति में ठीक की जायेगा। I or w w w 2 १५ ६ योग्य " , १६ पवणि

.
-
॥ श्रीगणेशाय नमः॥
भाखती
।
संस्कृत भाषा टीकोदाहरण सम्वलिता।
गौरीविलासिनः पादौ ध्यायं ध्यायं पुनःपुनः ।
भास्वत्याः क्रियते टीका मयेयं छात्रबोधिनी ॥१॥
मङ्गलं ग्रन्थसमयश्च-
नत्वा मुरारेश्चरणारविन्द
श्रीमाञ्छतानन्द इति प्रसिद्धः ।
तां भास्वतीं शिष्य हितार्थमाह
शाके विहीने शशिपक्षकैः ॥१॥
सं०टी०-ग्रन्थादौग्रन्थमध्येग्रन्थान्ते ग्रन्थ निर्विघ्न
समाप्त्यर्थ तथा शिष्येभ्य आनुषङ्गिक मङ्गलार्थश्च मङ्गला-
चरणमाचरणीयमिति शिष्टाचारः, श्रीमाञ्छतानन्द संज्ञा
कनेति प्रसिद्धः य आचार्यवयः सः मुरारेश्चरणारविन्दं श्री
कृष्णस्यपादपद्म नत्वा शिष्यहितार्थं तां भास्वतीमाह कदा
शशिपक्षखैकैविहीनेशाके अंत इष्टशकमध्ये शशिपक्षः
खैकैबिहीने, ऊनितेसति ग्रन्थोत्पत्तेरब्दाभवन्ति ॥ १ ॥

३ भास्वत्याम् भा० टी० श्रीमान् शतानन्द इस नाम से प्रसिद्ध जो आचार्य वह श्रीकृष्णजी के चरण कमलों को नमस्कार कर शिष्यों के हित के लिये भास्वती नाम का ग्रन्थ बनाते हैं। वर्तमान शाका में १०२१ घटाने से इस ग्रन्थ के उत्पत्ति का वर्ष होता है । ( इसी का नाम शास्त्राब्द भी है )॥१॥ उदाहरण- वर्तमान शाका १८३३ में १०२१ घटाया तो शास्त्राव्द ८१२ हुआ ॥१॥ गतकलिः प्रकारान्तरेण शास्त्राब्द विधिश्व- शाको नवाद्रीन्दुकृशानु युक्तः कलेर्भवत्यब्द गणस्तु वृत्तः। वियन्नभोलोचनवेद हीनः शास्त्राब्दपिण्डः कथितः स एव ॥२॥ सं० टी०-इष्टशकमध्ये नवाद्रीन्दुकृशानुयुक्ते सति कलेगताव्दा गतवर्षा भवन्ति तेषु कलिगत वर्षेषु विय- नभोलोचनवेद होने सति स एवाब्दपिण्डोभवति तमेव शास्त्राब्द पिण्डं कथयन्ति दैवज्ञाः॥२॥ भा०टी०-वर्तमान शाका में ३१७९ युक्त करने से गत कलि होता है । गतकाल में ४२०० को घटाने से शास्त्राब्द पिण्ड कहाता है ॥२॥ उदाहरण - वर्तमान शाका १८३३ में ३१७९ युक्त किया तो गतकलि ५०१२ हुआ और गतकलि ५०१२ में ४२०० घटाया तो शास्त्राब्द ८१२ हुआ ॥२॥ ।

३ : तिथ्यादिध्रुवाधिकारः। संवत् शाक विधिः- कृतयुगाम्बर वनिभिरुज्झितो गतकलिः किल विक्रमवत्सरः। शरहुताशनचन्द्र वियोजिते भवति शाक इह क्षितिमण्डले ॥३॥ सं०टी०-गतकलिमध्ये कृतयुगाम्बग्वह्निभिरुन्झिते सति श्रीमविक्रमादित्यसम्वत्सरो भवति तस्मिन् वत्सर मध्ये शरहुताशनचन्द्र वियोजिते विगते सति इह क्षि- तिमण्डले भूमण्डले शालिवाहनीयः शाको भवतीति नियमः ॥ ३ ॥ भा० टी०-गतकलि में ३०४४ घटाने से विक्रमसंवत्सर होता है। और विक्रम संवत्सर में १३५ घटाने से इस भूमण्डल में शाका होता है ॥३॥ उदाहरण-गतक ल ५०१२ में ३०४४ घटाया तो विक्रम संवत् १९६८ हुआ । इस सम्वत् १९६८ में १३५ घटाया तो शालि- वाहन का शाका* १८३३ हुआ । * वर्तमान शाकामें ७८ युत करने से ईसवी सन् , ५१५ हीन करने से फसली सन् , ५०४ हीन करने से हिजरी सन् (१०० वर्ष कुमरी में तीन वर्ष बढता है तहां पर अन्तर का ध्यान रक्खै ) होता है। जैसे शाके १८३३ में ७८ युत किया तो ईसवी सन् १९११ हुआ। शशाका १८३३ में ५१५ ही न किया तो फमली और बंगला सन् १३१८ हुआ। शाका १८३३ मे ५०४ हीन किया तो हिजरी सन् १३२९हुआ।

भास्वस्याम् सम्वत्सरपालक-शुद्धि मूर्यध्रुव विधय: अथ प्रवक्ष्ये मिहिरोपदेशा- च्छ्रीसूर्यसिद्धान्तसमं समासात् । शास्त्राव्दपिण्ड स्वरशून्यदिग्धन- स्तानाग्नियुक्तोष्टशतैर्विभक्तः॥४॥ लब्धन्नगैः शेषितमङ्गयुक्तः सूर्यादिसम्वत्सरपालकः स्यात् । शेषहरे प्रोह्यपृथग् गजाशा लब्ध रवेरौदयिको ध्रुवः स्यात् ॥५॥ सं०टी०-अथानन्तरं मिहिरोपदेशात् सूर्यशिक्षातः समासात संक्षेपात्, श्रीसूर्यसिद्धान्तसमं तुल्यं यथास्यात् तथा वक्ष्ये पूर्वोक्त शास्त्राब्द पिण्डः खरशून्यदिभिर्गुणित- स्तानामिभिर्युक्तस्तदृष्टशतैविभक्तो लब्धं ग्राह्यम्।पूर्वानितं यल्लब्धं तत्राङ्गयुक्तं सप्तभिः शेषितं सूर्यादिसंवत्सर पालक स्यात् यदष्टशतविभक्तेऽवशिष्टं शेषं तहरप्राह्य शोध्य शेषंशुद्धि संज्ञा स्यात् सा शुद्धिबिधास्थाप्यागजाशाभि- भक्तैकत्र लब्धः सूर्यस्योदयकालिको ध्रुवः स्यात् ॥४॥५॥ भा० टी०- अब मैं मिहिराचार्य के उपदेश से संक्षेपतः श्री सूर्यसिद्धान्त के समान ( सूर्य आदिक के स्पष्ट करने की विधि ) कहता हूं। शास्त्रन्द पिंड को १००७ से गुणा कर तिथ्यादिध्रुवाधिकारः। ५ ६ उसमें ३४९ युक्त करके उसमें ८०० भाग दे फिर लब्ध में ६ युक्त करके ७ का भाग देने से जो शेष वचै वह मूर्यादि सम्वत्सर का पालक होता है । और पूर्व शेष को भाजक में घटाने से शुद्धि होती है । उसको दो जगह धरे एक जगह १०८ का भाग देने से जो लब्ध फल मिले वह मध्यम सूर्य का ध्रुवा होता है ॥४॥५॥ उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को १००७ से गुणा किया तो ८१७६८४ हुए इस में ३४९ युत किया तो ८१८०३३ हुएइसमें ८०० का भाग देने से लब्ध १०२२ शेष ४३३ मिले लब्ध १०२२ में ६ युक्त किया तो १०२८ हुए इसमें ७ का भाग दिया तो शेष ६ वचे इस से सूर्य से छठवाँ शुक्र सम्वत्सर का पालक हुआ। हर ८०० में पूर्व शेष ४३३ को घटाया तो शुद्धि घटाया तो शुद्धि ३६७ हुई शुद्धि ३६७ १०८ का भाग दिया तो लब्ध ३ मिले शेष ४३ को ६० से गुणा किया तो २५४० हुए इसमें हर १०८ का भाग दिया तो लब्ध २३ मिले शेष ९६ को ६० से गुणा किया तो ५७६० हुए इसमें १०८ का भाग दिया तो लब्ध ५३ मिले इस प्रकार चैत्र शुक्ल पूर्णिमा के प्रातः काल सूर्य का अंशादि ध्रुवा ३।२३।५३ हुआ ॥४॥९॥ चन्द्र ध्रुव विधिः- सहस्त्रनिघ्नः खविधूनितोऽधः खसिद्धि भागोन भचक्रशेषः। खपञ्च संयुक्तदशनशुद्धे चन्द्रा- ष्टभागाभ्यधिकःशशाङ्कः ॥६॥ सं० टी०-अब्दपिण्डः शास्त्राब्दः सहस्रगुणितः ६ भास्वत्याम् खविधूनितोऽधः स्थानद्वये प्रस्थाप्यः तले खसिद्धिभागा- तफलेनोनस्तदेव भचक्र २७०० शेषः तदेवशुद्धे खप- चयुक्तो दशमः चन्द्राष्टभागेन यल्लब्धं तचक्रशेष- मध्ये युते सति चन्द्र धुवः स्यात् ॥६॥ भा० टी०-शास्त्राब्द को १००० मे गुणा कर उसमें १० घटाय दो स्थान में स्थापित कर एक स्थान में २४० का भाग देने से जो लब्ध मिले उसको दूसरे स्थान पर रक्खे हुए अंक में घटावे फिर उसको भचक्र २७०० से शषित करे । शुद्धि ५० युत कर के १० से गुणि उसमें ८१ का भाग देने से जो लब्ध मिले वह भचक्र के भाग से जो शेष वचा है उसमें युक्त करने से मध्यम चन्द्रमा का ध्रुका स्पष्ट होता है ॥ ६ ॥ उदाहरण - शास्त्र व्द ८१२ को १००० से गुणा तो ८ १२००० हुए इसमें १० घट या तो ८११९९० हुए इसको दो स्थान में स्थापित किया एक स्थान ८११९९० में २४० का भाग दिया तो अंशादि लब्ध ३३८३।१७।३० मिले इसको दूसरे स्थान ८११९९० में घटाया तो ८०८६०६।४ २।३० हुए । इसको भचक्र २७०० से शेषित किया तो शेष १३०६। ४२।३० बचे । शुद्धि ध्रुवा ३६७ में ५० युक्त किया तो ४१७ हुए इसको १० से गुणा किया तो ४१७० हुए इसमें ८१ का भाग देने से लब्ध अंशादि ५११२८१६३ मिले. इसमें भचक्र से शेपित अंक १३०६।१२।३०। को युक्त किया तो मध्यम चन्द्रमा का ध्रुवा १३५८।१११२३ हुआ ॥६॥ केन्द्र ध्रुव विधिः- रुद्राहतोवेदयुतस्त्रिवेद- - तिथ्यादिध्रुवाधिकारः । शेषश्चतुःषष्टिगुणो रदाढ्यः। पृथक् वसायुमुक्षेत्र शुद्धयष्टभागाब्दनखाशयुक्तः॥७॥ सं.टी.-अब्दपिण्डः रुद्राहत एकादशगुणितोवेदचतु. भिर्युतस्त्रिवेदैः शेषितस्तदेवचतुःषष्टिगुणितोरदाढ्यः द्वा- त्रिंशद्युतः तत्पृथक् स्थान द्वयेस्थाप्यः तले खखागाप्तफ. लेनोपरिपुनः पुनः शुद्यष्टभागेनचाब्दनखांशेन युत. इन्दुकेन्द्रोभवति ॥ ७ ॥ भा० टी०-शास्त्राब्द को ११ से गुणि के ४ युत करै फिर उसमें ४३ का भाग देने से जो शेष बचे उसको ६४ से गुणि के उसमें ३२ युक्त करके दो स्थान में स्थापित करै एक स्थान में ७०० का भाग देने से जो लब्ध मिले उसे दुसरे में युत करै फिर शुद्धि में ८ का और शास्त्राब्द में २० का भाग देने से जो लब्ध मिले उसको भी उसमें युक्त करने से चन्द्रमा का केन्द्रध्रुवा स्पष्ट होता है ॥ ७ ॥ उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को ११ से गुणा किया तो ८९३२ हुए इसमें ४ युक्त किये तो ८८३६ हुए इसमें ४३ का भाग दिया तो शष ३५ बचे इसको ६४ से गुणा किया तो २२४० हुए इसमें ३२ युत किया तो २२७२ हुए इसको दो जगह स्थापित किया एक जगह २२७२ में 900 का भाग दिया तो अंशादि लब्ध ३।१४४४ मिले इसको दूसरे जगह २२७२ में युक्त किया तो अंशादि २२७५।१४।४४ हुए शुद्धि ३६७ में ८ का भाग दिया तो अंशादि लब्ध ४५॥५२:३०

८
भास्वत्यानं
-
मिले और शास्त्राब्द ८१२ में २० का भाग दिया तो लब्ध अंशादि
४०३६।० मिले सबको एकत्र जोड़ दिया तो मध्यम चन्द्र केन्द्र का
ध्रुवा २३६११४३१४ हुआ ।। ७ ।।
चन्द्र ध्रुवे केन्द्रसंस्कारविधिः-
केन्द्रे भवघ्नादिषु नेत्रचन्द्र-
लब्धोनितो मध्य विधुः ध्रुवःस्यात् ॥८॥
सं० टी०-चन्द्र केन्द्रात् भवनादिषुनेत्रचन्द्रर्यल्लब्धं
तेनोनितो मध्य विधुः स्पष्ट मध्य चन्द्र ध्रुवः स्यात् ॥८॥
भा० टी०-चन्द्रमा के केन्द्र ध्रुवाको ११ से गुणिकर १२५का
भाग देय जो लब्ध मिलै वह चन्द्रमा के ध्रुवा में घटाने से
चन्द्रमा का स्पष्ट ध्रुवा होता है ॥ ८॥
उदाहरण-चन्द्रमाके केन्द्रध्रुवा २३६१॥ ४३ । १४ । को ११
से गुणातौ २६९७८॥ ५५॥३४ हुए इसमें १२५ काभाग दिया तो
लब्ध २०७। ४९।६३। मिले इसको चन्द्रमा के ध्रुवा १३५८ ।
१।२३ में घटाया तो मध्यम चन्द्रमा का ध्रुवा १९५०।२९।३०हुआ॥६॥
राहु ध्रुव विधिः-
पातः शरघ्नो नगनेत्रयुक्त-
स्त्रिनन्दशेषो गगनाङ्ग निघ्नः ।
द्विरिन्दु रामाप्तखरामहीनः
सांशोब्द बृन्दात्पुनरङ्गचन्द्रैः ॥ ६ ॥

तिथ्यादिध्रुवाधिकारः। सं० टी०-अब्दपिण्ड शरम्नः पञ्चगुणितः नगनत्रैः सप्तविंशतिभिर्युतस्त्रिनन्दैः शेषितः गगनाङ्गेन निन्नः द्वि- स्थः तलइन्दुरामाप्तैश्चन्द्ररामैर्भक्तः यल्लब्धं तत्खरामसंयुक्तं तेनोपरि हीनं पुनरब्दपिण्डादङ्गचन्द्रभक्ते यल्लब्धतेन युतः पातध्रुवः स्यात् । त्रिनन्दशेषयदाशून्यं स्यात्तदाचतुःपञ्चश- तानि संयोज्य ततोगगनाङ्गाननेति क्रियाकार्या किन्त्वत्र- चतुःपञ्चाशत् योजिते सति पातध्रुवो भवतीतिनियमः॥९॥ "न प्राप्यते यत्र त्रिनन्द शेष- स्तदाखखाब्धीषुयुतं प्रकुर्यात् । तदा बुधैः षष्टिगुणं विधेयम् पूर्वोक्तवत्पात खगोध्रुवः स्यात्" ॥१॥ भा० टी०-शास्त्राब्द को ५ से गुणि उसमें २७ युक्त कर के ९३ का भाग देवं शेषको ६० से गुणि दो जगह रक्खै एक जगह ३१ के भाग से जो लब्ध मिले वह दूसरे जगह घटावै फिर उसमें ३० घटाय शास्त्राब्द में १६ का भाग देने से जो लब्ध मिलै वह उसमें युक्त करने से राहु का ध्रुवा स्पष्ट होता है ॥९॥ उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को ५ से गुणातो ४०६० हुए इस में २७ युक्त किया तो ४०८७ हुए इसमें ९३ का भाग दिये तो शेष ८८ बचे इसको ६० से गुणातो ५२८० हुए फिर इसको दो स्थानमें स्थापित किया एक स्थान ५२८० में ३१ का भाग देने से लब्ध अंशादि १७०।१९।२१ मिले इसको दूसरे स्थान में रक्खे हुए भास्वत्याम् ५२८० में घटाया तो ५१०९।४ ०।३९। हुए इसमें ३० घटाया तो १०७९।४० ३९ हुए शास्त्राब्द ८१२ में १६ का भाग देनेसे लब्ध अंशादि ५०1४५१० मिले इसको ५०७९।४०।३९ में युत किया तो राहुका ध्रुवा ५१३०॥२५॥३९ हुआ ॥९॥ सूर्य चन्द्रयोः चन्द्रकेन्द्रस्य वीज विधिः पलप्रभा पण्णिहता दशाप्ता पुनश्च भुक्त्या गुणितः क्रमेण । शतोद्धृतं तहणकं रवेः स्याद् धनं च चन्द्रे खलु केन्द्रके च ॥१॥ सं० टी०--पलप्रभाषड्भिर्गुणितादशभिर्भक्ता पुन: स्वस्वभुक्त्या क्रमेण गुणिता शताप्ता यल्लब्धं तत्सूर्य्यस्य ऋणाभिधानं चन्द्रचन्द्र केन्द्रयोः धनाभिधानं देशान्तरं- भवति ॥ १० ॥ भाण्टी-पलभाको ६ से गुणिके १० काभागदेवै ल- ब्ध को अपनी २ भुक्तिसे गुणा करके १०० का भाग देने से लब्ध सूर्य का ऋण और चन्द्र-चन्द्र केन्द्र का धन संज्ञक अंशादि वीज होता है ॥ १० ॥ उदाहरण - काका पलभा १।४५ को ६ से गुणातो ३४३० हुए इसमें १० का भागदिया तो लब्ध ३।२७ मिले इसको सूर्यके भुक्ति ७ से गुणा किया तो २४।९ हुए इसमें १०० का भाग दिया तो लब्ध सूर्यका वीज अंशादि ऋण ०।१४।२९ हुआ। पूर्वके लब्ध ३।२७ को चन्द्रमा के झुक्ति ६० से गुणा किया तो ३१०१३० हुए तिथ्यादिध्रुवाधिकारः। इसमें १०० का भाग देनेसे चन्द्रमाका वीज अंशादि धन ३।६।१८ हुआ। पूर्वके लब्ध ३।२७ को चन्द्रकेन्द्र के भुक्ति १०० से गुणा किया तो ३४५/० हुए इसमें १०० का भाग दिया तो चन्द्रकेन्द्र का वीज अशादि धन ३।२७० हुआ ॥ १० ॥ "मेषादिगे सायनभाग सूर्ये दिनाईभा या पलभा भवेत्सा । त्रिष्टा हतास्युर्दशभिर्भुजङ्गै- दिग्भिश्चरार्दानि गुणो धृतान्त्या ॥ १ ॥ कलासप्त ७ रवे क्तिः खनन्दाश्च ९० विधोः स्मृताः । शतं १०० कलानि केन्द्रस्य राहोश्चैव जिना २४ गतिः" ॥ २ ॥ देशान्तर विधिः- रेखा स्वदेशान्तर योजनघ्नी गतिग्रहस्याभ्रगौभक्ता। लब्धा हि लिप्ता खचरे विधेयाः प्राच्यामृणं पश्चिमतोधनन्ताः॥११॥ सं० टी०-रेखाजनितखदेशान्तरयोजनं ग्रहमुन्या- गुणितोऽभ्रगबिभक्ता लब्धं रखायाः पूर्वपश्चिमक्रमेण- ऋणधनसंज्ञकं देशान्तरं भवति ॥ ११ ॥ "पुरीरक्षसां देवकन्याथ काञ्ची ११ भास्वत्याम् सितः पर्वतः पर्यली वत्सगुल्मौ । पुरी चोज्जयिन्याह्वयं गर्गराट कुरुक्षेत्रमेरू भुवो मध्य रेखा ॥१॥ यल्लङ्कोजयिनीपुरीपरि कुरुक्षेत्रादि देशान् पृशत् । सूत्रं मेरु गतं बुधर्निगदिता सा मध्य रेखा भुवः" ॥२॥ भा० टी०---रेखा के योजनको भुक्ति से गुणा कर ८० का भाग देने से जो लब्ध मिलै वह कलादि रेखा के पूर्व पश्चिम क्रमसे ऋण धन संज्ञावाला देशान्तर होता है ॥११॥ उदाहरण-कुरुक्षेत्र से ६४ योजन काशी है इस को सूर्य की मुक्ति 9 से गुणा तो ४४८ हुए इसमें ८० का भाग दिया तो सूर्य का देशान्तर कलादि ५।३६ हुआ। एवं चन्द्रमा का ७२।० चन्द्र- केन्द्रका ८०० रेखा से काशी पूर्व है अतः देशान्तर ऋण संज्ञक हुआ ॥ ११ ॥ देशान्तरं दृग्गणिता प्रसाध्य इतीह कल्पान्त समोध्रुवःस्यात्॥१२॥ इति श्रीमच्छतानन्द विरचिताथां भास्वत्यां तिथ्यादि ध्रुवाधिकारः प्रथमः ॥१॥ संटी-रेखायां स्वदेश संस्कारोनास्तितस्मात्प्राक् पश्चाद् भागे देशान्तरो नास्तीति सा रेखाकस्मिन् कस्मिन् देश इत्याकांक्षयां श्रीसूर्यसिद्धान्त उक्तं राक्ष- सालयदिवोकशैलयोर्मध्यसूत्रगारोहितकपर्वतीच सन्नि- तिथ्यादिध्रुवाधिकारः । हितंशर इत्यादिशेषाज्ञातव्या रेखेति देशान्तरंदृग्गणितमि- त्यत्रदृग्गणितग्रहणं तस्मादेशान्तरं साध्यम् तेन संस्कृता स्वदेशेदृग्गोचराः सन्तीत्युक्तम् तद्यथा यदा ग्रहणेखग्रा- सो भवति तदा देशान्तरसंस्कारं विना ग्रहणगणितं कृत्वा तद्देशान्तरं रेखाजनितं ज्ञेयम् तत्रोन्मीलनकालः साध्यः खदेशेच यन्त्रादिनोन्मीलनकालः साध्यःतयोरन्तरं रेखा- खदेशान्तर घटिका ज्ञातव्या ताभिर्घटिकाभिरनुपातेन दे- शान्तरयोजनानि साध्यानि तानि रेखास्वदेशान्तरयोजना- नि सन्तिरेखोन्मीलनकालात्स्वदेशोन्मीलनकालं यदाधिक खदेशरेखातः प्राग् ज्ञेयम् यद्यन्यं तदापश्चाद्ज्ञेयम् (दे- शान्तरं तु प्राग् ऋणं पश्चाइनमितिबोद्धव्यम्) अथा- नुपातप्रकारं वदेशजनित अक्षांशेनोनानवति ९० लम्बां. शास्युःतेषां ज्यालंवच्या अतोनुपातः त्रिज्ययाभूपरिधि लभ्यते तदा लंबज्यायाः, किमितियल्लब्धतत्वदेशज- निताभूपरिधिलभ्यते पुनरनुपातः यदिषष्टि घटिकाभिः खदेशपरिधि प्राप्यते तदा रेखावदेशोन्मीलनकालयो- रन्तरघटिकाभिः किं फलं यल्लब्धंतरेखास्वदेशान्तरयो- जनानि तैर्योजनैर्ग्रहाणांदेशान्तर संस्कारःकार्य्यः तत्पूर्व स्वदेशजभूपरिधियोजनैर्ग्रहगतिकला लभ्यते तदादेशा- न्तर योजनैः किं फलं लब्धं ग्रहाणांदेशान्तरकलास्तैः संस्कृताः खेटा देशान्तर संस्कृता भवन्त्येव यथोन्मील- :

१४ भास्वत्याम् न कालात्कृतं तथोन्मीलन कालादपि कृतं तथैव भवतीति विशेषतः सूर्यग्रहण एव देशान्तर संस्कारकृते सति भास्वत्याः कल्पान्त पर्यन्तं समध्रुवः स्यात् ॥१२॥ "रसद्मदेशान्तर योजनेभ्यो लब्धं फलं पक्षरसैः कलाद्यम् । रेखा परप्राक् वमृणं प्रकुर्य्या- दध्रुवोऽस्मिन्करणेशतांशे ॥ १ ॥ देशान्तरं खाङ्क निघ्नं विभजेदभ्र भूधरैः । चन्द्रेकवत्फलं पाते योजनेभ्यः खखेन्दुभिः।।२।। उज्जयिनी रोहित ककुव्हयें मुनि- हिमनिवासमेरूणां देशांतरं न कार्यम् । तद्रेखा मध्यसंस्थानदेशेषु तद्देशांतर योजनात्मकं दृग्गणितात्प्रसाध्यम्" ॥ ३ ॥ भा० टी०-दृग् गणितसे देशान्तर क्रिया करने पर कल्पान्त के समान ध्रुवा होता है और देशान्तर संस्कार विना स्वदेश में ग्रहणगोचर होने में असंभव रहता है अतएव देशा- न्तर संस्कार अवश्य करना चाहिये खग्रास में देशान्तर सं. स्कार के विना भी ग्रहण दृष्टिगोचर होता है ॥ १२ ॥ इति श्री ज्योतिषीन्द्र मुकुटमणि श्री छत्रधर सरि सूनुना गणक -मातृ प्रसादेन विरचितायां भास्वत्याः छात्र बोधिनी नाम टीकायां तिथ्यादि ध्रुवाधिकारः प्रथमः ॥१॥ १

प्रहध्रुवाधिकारः।
अथ ग्रहध्रुवाधिकारः।
वर्षाधिप विधिः-
शास्त्राब्द सौराब्द गणात्कले
वर्षाधिपाः सप्त हृतावशेषाः।
शुक्रेन्दुवाचस्पति सूर्यसौम्याः
शनिश्चरारौ क्रमशो भवन्ति ॥ १॥
सं० टी०-शास्त्रंभास्वती तस्यादिःशास्त्रादिरिति शा-
स्त्रादि सौराब्दगणाद् अब्दपिण्डाद् अथवागत कलिवर्षात्
सप्तावशेषे सतिगत वर्षाधिपतिःशुक्रेन्दुवाचस्पतीति क्र-
मेण वर्षाधिपतिर्भवति यथा-शून्यशेषेशुक्र एकेनचन्द्रः
द्वाभ्यागुरुर्विभिः सूर्यः चतुर्भिर्बुधः पञ्चभिः शनिः षड्भिः
भौमः क्रमेण ज्ञेयम् । प्रकारान्तरेण शास्त्राब्दपिण्डमेकविं-
शतिभिरूनितं कृत्वाष्टषड्भिहरेत् यल्लब्धन्तेनैकोनेनयु:
तोवर्षाधिपतिः। वाव्दपिण्डमनुनितमष्टषभिर्भजेल्लब्धा-
न्वितोवर्षाधिपतिब्रह्मसिद्धान्ततुल्यःसावनवर्षाधिपशुक्रे-
न्दुवाचस्पतीति क्रमेण भवतीति सूर्यसिद्धान्ते प्रदर्शिताः
गोलक्रमेण शनीवारोकॉशनेन्दुजेन्दव इति ॥
अत्र करणारम्भेशुक्रो वर्षाधिपतिरभृत्तस्माच्छुक्रादिगणना
कृताशुक्रात्तृतीयः चन्द्र, चन्द्रात्तृतीयो गुरूरित्यादि ॥१॥

१६ भास्वत्याम् भा०टी०-शास्त्राब्द या गतकलि में ७ का भाग देने से क्रमशः शुक्र-चन्द्र-गुरु-मूर्य बुध-शनि मङ्गल सौर वर्षाधिपति होते हैं (शून्यशेष में शुक्र एक शेष में चन्द्र इत्यादि ) ॥१॥ उदाहरण-शास्त्राव्द ८१२ में ७ का भाग दिया तो शेष शून्य बचा । और गतकलि ५०१२ में ७ का भाग दिया तो भी शेष शून्य बचा यह दोनों प्रकार से गतवर्षाधिपति शुक्र और वर्तमान वर्षाधिपति चन्द्रमा हुआ ॥१॥ मासाधिपविधिः- अब्दोऽर्क निनोरविमासयुक्तः सप्तावशेषे रविमासनाथाः। ज्ञ शुक्रसू-रसुरेज्यसौरि चन्द्रा युगात्सावन मासतोन्ये ॥२॥ सं० टी०---अब्दपिण्डोऽर्कनिनो द्वादशभिर्गुणितः, गतरविमासयुक्तः सप्तावशेषे सति बुध-शुक्र-सू-- घेकान्तरेण रविमास नाथाः सौरमासाधिपा भवन्ति- तद्यथा शून्यावशिष्टेबुध एकेनशुक्रो द्वाभ्यारविस्त्रि- भिभौमश्चतुर्भिर्गुरुः पञ्चभिःशनिः षड्भिश्चन्द्रइत्येका- न्तरक्रमेण रविमासनाथाभवन्ति, अन्येयुगात्सावन- मासनाथा भवन्तीति कथयन्ति । अत्रापि करणा- रम्भे मासाधिपोबुधोऽभूत्तस्माद्बुधादितोगणनेति ॥२॥ भा०टी० शास्त्राब्द को १२ से गुणा करके गत सौरमास युक्त करि उस में ७ का भाग देने से शेष क्रमशः बुध-शुक्र- में में ग्रहध्रुवाधिकारः। सूर्य-मङ्गल-बृहस्पति-शनि-चन्द्र-गतसौर मासाधिपति होते हैं। और किमी के मत से गतकाल को भी १२ से गुणा कर सावन मास युक्त कर हर का भाग देने से वर्तमान मासाधिप बुध-शुक्र- आदिक होते हैं ॥२॥ उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को १२ से गुणा किया तो ९७४४ हुए इस में गत सौरमास शून्ययुत किया तो ९७४४ हुए इस ७ का भाग दिया तो शून्य शेष बचा इस से गत सौरमासाधिप बुध वर्तमान मासाधिप शुक्र हुआ । गतकलि ५०१२ को १२ से गुणा तो ६०१४४ हुए इस में वर्तमान मास वैशाख का संख्या एक जोड़ा तो ६०१४५ हुए इस का भाग दिया तो शेष एक बचा इस सें वर्तमान मासाधिप शुक्र हुआ||२|| संवत् विधिः- अब्दः पृथक् खेशगुणः शराग- रामाङ्कलब्धेन्द्रियचन्द्रयुक्तः। तत्वष्टि शेषादिषुभिर्युगानि लब्धानि शेषेऽङ्गिरसः समाः स्युः॥३॥ सं०टी०-अब्दपिण्डः पृथक् स्थानद्वये स्थाप्यस्त- ले खेशगुणस्तत्रवक्षमाणश्लोकोक्त पञ्चचन्द्रेषुलोचनाः क्षेपका देयास्ततः शरागरामाङ्कलब्धं वर्षादिवर्षेपञ्च- दशभिः १५ सहितमुपरियुक्तं तत् षष्टिशेषिते सति गत सव्वत्सरं वर्षाद्यं भवति ॥ 3 १८ भाखत्याम् "अब्दे खेशगुणोदेयाः पञ्चचन्द्रेषुलोचनाः । भास्वतीकरणे नित्यं वत्सरं मिहिरोदितम्" ॥१॥ भा०टी०-शास्त्राब्द को दो स्थान में स्थापित करके एक स्थान में ११० से गुणि उस में क्षेपक २५१५ युक्त करि के ९३ ७५ का भाग देवै लब्ध वर्ष होता है, शेष को १२ से गुणि हर ९३७५ का भाग देने से लब्ध मास होता है, शेष को ३० से गुणि उक्त हर का भाग देने से लब्ध दिन होता है, शेष को ६० से गुणि उक्त हर का भाग लेने से घटी पलादि होते हैं। वर्ष में १५ युक्त कर दूसरे जगह रक्खे हुए शास्त्राब्द में युक्त करके ६० का भाग देने से जो शेष वचै वह गुरुमान से मुक्त वर्षादि स्पष्ट होता है ॥३॥ उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को दो स्थान में स्थापित किया एक स्थान के अङ्क ८१२ को ११० से गुणा तो ८८३२० हुए इस में क्षपक २५१५ युत किया तो ९१८३५ हुए फिर इस में ९३७५ का भाग दिया तो वर्षादि लब्ध ९।९।१६।२७/११॥ मिले, वर्ष ९ में १५ युत किया तो २४।९।१६।२७।११। हुए, इस को दूसरे जगह रक्खे हुए शास्त्रा- ब्द ८१२ में युत किया तो ८३६।९।१६।२७।५१॥ हुए वर्ष ८३६ में ६० का भाग देने से शेष वर्षादि ५६।९।१६।२७।११। हुए ॥ ३ ॥ अब्दादि निर्माणाय शकाङ्काः। १८३३११८५७१८८१,१९०५/१९२९/१९५३,१९७८२००२ शक ९ ५८ २२ ४६ वर्ष ९ ३ १० मास १६ २७ २० १ ६ दिन २७ १२ २० ५ घटी ३८ १२ पल ग्रहध्रुवाधिकारः। २०२६२०५०२०७४००९८/२१२२२१४६२१७०२१९४ शक ३५ २३ ४८ वर्ष ३ ६ ९ १ मास २९ २ १४ दिन २८ १४ २२ ७ घटी २६ ३३ ४८ पल was 6600 शेषाङ्काः। १ २ ३ ५ शष वर्ष १ २ . मास ८१२ १६२१ २५ २९/३ दिन घटी १३२६४०/५३ ७२०३४४७ २६/५३/१९ ४६/१२/३८ ५ ३१ पल ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ । ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ शेष वर्ष or M or १ १ २ २ ८१२१५/२०२४ २९ ३ १४/२७४१५४ ८२१३५ ५८.२४/५०१६ ४३/१०३६ २ दिन घटी १७/१८/१९/२०/२१ २२/२३/२४ १७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ शेष वर्ष २ २ २ २ ३ ३ ३ ११ १६ २०२४/२८२ ११ मास दिन घटी ४८ १ २२ २९ ५५ २२४८/१४ ४१ ७३३ पल भाखत्याम् भा० टी०-इष्टशाका में पुस्तकीय शक तब तक घटावै जब तक कि आगे का पुस्तकीय शक न आवै । यदि इष्ट शक पुस्त- कीय शक के बाद का होय तो उस इष्ट शक के पूर्व जो पुस्तकीय शक होय उस को इष्ट शक में घटावै । यदि इष्ट शक और पुस्तकीय समान (वरावर ) होय तो पुस्तकीय शक ही से कार्य हो जाता है, या उस इष्ट शक के समानता करने वाले पुस्तकीय शक के पूर्व जो पुस्तकी शक होय उसको इष्ठ शक में घटा के बनावै । इष्ट शक में पुस्तकीय शक घटाने से जो शेष मिले उसके तुल्य शेष कोष्ठ का और पुस्तकीय शक के कोष्ठ का अंक एक जगह जोड़ने से संवत्सर वर्षादिक होता है । * पंच तारा में भी उक्त क्रिया करने से अंशादि ध्रुवा होता है ।। उदाहरण-इष्ट शाका १८४० को पुस्तकीय शाका १८३३ में हीन किया तो शेष ७ बचे, इस शेष के नीचे का वर्षादि ७/१२९॥३४। ५ है और पुस्तकीय शाका के नीचे का वर्षादि ५६।९।१६।२७।५१ है, इन दोनों को जोड़े तो इष्ट शका में संवत्सर वर्षादिक ६३।९। ४६।१५६ हुए, वर्ष ६३ हैं इससे इसको ६० से शेषित किया तो संवत्सर वर्षादिक ३।९।४६।१५६ हुए ॥ जब तक इष्ट शाका १८५७ न आवै तब तक इष्ट शाका में पुस्तकीय शाका १८३३ ही घटावै, * शुद्धि प्रत्येक वर्ष २०७ घटती है। सूर्य के ध्रुवा मे ११५५ हीन करने से, चन्द्रध्रुवा में ९१०।३० और चन्द्र केन्द्रध्रुवा में ६७९ । ११ युत करने से अग्रिम वर्ष का ध्रुवा होता है । जिस वर्ष शुद्धि चक्र से संवन्ध करती है उस वर्ष उक्त ग्रहों का ध्रुवा, न्यूनाधिक होता है । और राहु कलादि ३।१०।४५ सदा न्यून होता है, जिसके स्थान पर इस ग्रन्थ में प्रति वर्ष का २९०।२४ कलादि लिखा है (और यह प्रति वर्ष एतना घटता है ) इसी कारणों से उक्त ग्रहों की सारणी नहीं बनाई गई है।

ग्रहधुवाधिकारः। इष्ट शाका १८५७ के बाद होने पर इष्ट शाका में १८५७ पुस्तकीय शाका घटावै जब तक पुस्तकीय शक १८८१ न आवै इसके वाद भी इसी प्रकार क्रिया करै और इष्ट शाका १८५७ है और पुस्तकीय शाका भी १८५७ ही है तो इसमें इस के पाहिले के पुस्तकीय शाका १८३३ को हीन किया तो शेष २४ बचे पुस्तकीय शाका १८३३ के नीचे का अंक ५६।९।१६।२७१५१ है और शप २४ के नीचे का अंक २४।३।११।२२।३३ है, इन दोनों का जोग किया तो सवत्मर वर्षादिक २१०।२७५०।२४ हुए, और इष्ट शाका १८५७ में पुस्तकीय शाका १८५७ को घटाया तो शेष ० बचा पुस्तकीय शाका १८५७ के नीचे का अंक २११०।२७१६०।२४ है, और शून्य के अभाव से अंक का भी अभाव है, इससे संवत्सर वर्षादिक २११०।२७।१०।२४ हुए ॥ भौमवैवविधिः- शास्त्राब्दपिण्डो वसुवहिषट्नः सशीतरश्मीज्वलनो महीजः । शताहतद्वादशराशिचक्रः शेषोऽब्धिवाणैश्च युतोऽव्दवृन्दात्॥४॥ सं. टी-शास्त्राब्दपिण्डो वसुवह्निषट्नः गुणितः सः शीतरश्मीज्वलनेन सहित एकत्रिंशद् युक्तश्च पुनरब्द- पिण्डादब्धिवाणैः प्राप्त फलेन युतश्शताहतद्वादशराशि चक्रैः द्वादशशतेन शेषितः महीजः, भौमोभवति ॥४॥ भा० टी०-शास्त्राब्द को ६३८ से गुणि उसमें ३१ युत करै फिर शास्त्राब्द में ५४ का भाग देने से जो लब्ध मिले २२ भास्वत्याम् उसको भी उसमें युक्त करके १२०० का भाग देवै शेष मङ्गल का ध्रुवास्पष्ट होता है ॥ ४ ॥ उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को ६३८ से गुणा किया तो ५१८०५६ हुए इसमें ३१ युत किया तो ५१८०८७ हुए और शा- स्त्राब्द ८१२ में ५४ का माग दिया तो लब्ध अंशादि १५।२।१३ मिले इसको पूर्व अङ्क ५१८०८७ में युत किया तो ५१८१०२।२। १३ हुए इसको १२०० से शेषित किया तो शेष मंगल का ध्रुवा अंशादि ८०२।२।१३ स्पष्ट हुआ ॥ ४ ॥ शकाङ्काः। १८३३,१८५७१८८१ १९०५१९२९ १९५३/१९७८२००२ शक ९०२ ६१४ ३२६. ३९ ९५१ ६६४ ३७६ ८९ অহা २ २८ ४८ १५ ४२ ८ १३ ५३ ३३ १३ ३३ १३ ५३ विकला २०२६२०५०२०७४२०९८२१२२२१४६२१७०२१९४ १९४, शक १००१७१४, ४२६ १३८/१०५१७६३ ४७६ १८८ अंश ३५ २२८ ५५ २२ १५, ४२ कला ३३ १३ १३ विकला शेषाङ्काः। २ ३ ६ ८ शेष ६३८ ७६ ७१४/१५२/७२०२२८/८६६३०४ अंश २ ३ ६ कला १३ २००६/३३/४०४६/५३ विकला १

ग्रहध्रुवाधिकारः ।
२३
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ शेष
-
९४२३८०१०१८४.६१०९४५३२११७०६०८ अंश
१० ११ १२ १३ १४ १५ १६ १७ कला
६ १३ २० २६ । ३३ : ४० १४६ विकला
॥
१७ १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ शष
४६६८४१२२७६०१९८८३६ २७४९१२ अंश
१८२० २१ २२ २३ २४ २५ २६ कला
६ १३ २०२६:३३।४० विकला
बुधोच्चध्रुव विधि:-
ज्ञोचं खखाश्विघ्नमथो दशनं
तिथीन्दुलब्धाङ्गरसाश्वि हीनम् ।
सं. टी.-अब्दपिण्डं खखाश्विगुणितं द्विस्थं तले
दशभिगुणितं तस्मात् तिथीन्दुभिर्भक्तं लब्धमुपरि हीनं
पुनः, अङ्गासाश्वि हीनं ( शताहत द्वादशराशिचकैः
शेषितं) अंशाचं बुधशीघ्रम् भवति ॥
भा० टी०-शास्त्राब्द को २०० से गुणा करके दो स्थान
में स्थापित करै, एक स्थान के अङ्क को से
गुणा कर
११५ का भाग देने से जो लब्ध मिलै वह दूसरे स्थान में
घटाकर फिर उसमें २६६ घटावै (बाद १२०० का भाग देने
से ) जो शेष बचै वह बुध का शीघ्र ध्रुवा होता है ।।
उदाहरण-शास्त्राव्द ८१२ को २०० से गुणा किया तो १६
१४०० हुए इसको दो जगह रक्खे एक जगह १० से गुणा तो

२४ भास्वत्याम् १६२४००० हुए इसमें ११५ का भाग दिया तो लब्ध अंशादि १४१ २१.४ ४।२० मिले इसको दूसरे जगह रक्खे हुए १६२४०० में हीन किया तो १४८२७८।१५/४० हुए फिर इस में २६६ हीन किया तो १४८०१२।१५।४० हुए इस में १२०० का भाग दिया तो शेष अंशादि बुध का उच्च ध्रुवा ४१२।१५।४० हुआ | शकाङ्काः। १८३३१८५७१८८११९०५१९२९१९५३/१९७८२००२ शक ४१२,११९४७७७,३६० १०४२७२५/३०८/१०९० अंश ३० ८ ४५ २३ ३८ कला ४४ १६ ४८ २४ विकला २०२६२०५०२०७४२०९८२१२२२१४६२१७०२१९४ ६७३ २५५/१०३८,६२१ २०३/९८६/५६९१५१ अंश ४६ २३ १ कला ५६ २८ ३२ विकला ० 3 १ ७ शेषाङ्काः। २ ३४ ५ ६ ८ হ १८२ ३६५ ५४७/७३०९१३ १०९५ ७८ २६० ३ ३९ १५५२ कला ६ ३७ ११ | विकला ११ । १२ १५ १६ शेष ४४३६०६८०८९९१ ११७३/१५६३३९ ५२१ अश ५ ४१ ३१ ४३ १४ । ४५ १७/ ४८ ૨૨ विकला १९ २१ २२ २३ २४ शष ७०४ ८८६ १०६९ ५२ २३४ ४१७/६००७८२ अंश २१ ५८ ११ ३७ कला ५३ । २४ ५६ २७ ३२ / विकला १ १

प्रहध्रुवाधिकारः।
३५
गुरुध्रुवविधिः-
शताहतोऽधः खनवाप्तनेत्र-
सूर्य्याड्यजीवोऽब्दनखांशयुक्तः ॥५॥
सं० टी०-अब्दपिण्डः शताहतः शतगुणितः,
अधः स्थानद्वयेस्थाप्यः तले खनवाप्तः, लब्धेन सहितः
नेत्रसूर्यास्तैरुपरियोज्यः पुनरब्दपिण्डानखांशयुक्तः गुरु-
ध्रुवको भवति (हादशशतेन शेषितोऽत्रापि ज्ञातव्यः)॥५॥
भा० टी०-शास्त्राब्द को १०० से गुणि दो स्थान में
स्थापित करै, एक स्थान में ९० का भाग देने से जो अंशादि
फल मिलै वह दूसरे स्थान में युक्त करके उसमें १२२ और युत करे,
फिर शास्त्राब्द में २० का भाग देने से जो लब्ध मिलै वह भी उसी
में युक्त करने पर (उसमें १२०० का भाग देने से जो शेष बचे
वही) मध्यम वृहस्पति का अंशादि ध्रुवा होता है ॥५॥
N
उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को १०० से गुणा तो ८१२०० हुए
इसको दो जगह रक्खे एक जगह ९० का भाग दिया तो लब्ध
अंशादि ९०२ । १३ । २० मिले, इसको दूसरे जगह घरे हुए ८१
२०० में युत किया तो ८२१०२।१३।२० हुए, इसमें १२२ युक्त
किया तो ८२२२४।१३।२० हुए, फिर शास्त्राब्द ८१२ में २०
का भाग दिया तो लब्ध अंशादि ४०।३६०० मिले, इसको ८२२२
४।१३।२० में युत किया तो (२२६४।४९।२० हुए, इसमें १२००
का भाग दिया तो शेष मध्यम वृहस्पति का अंशादि ध्रुवा ६६४४९
२० हुआ ॥५॥

भास्वत्थाम् शकाङ्काः। १८३३ १८५७१८८१ १९०५१९२९१९५३१९७७२००१) शक ६६४।६९२/७२०७४८७७६ ८०४८३२ ८५९ अंश ९ ५३ कला २० विकला AM २०२५२०४९२०७३२०९७२१२१२१४५२१६९/२१९३/ शक ८८७९१५ ९४३.९७१ ९९९, ९२७१०५४१०८२ अंश २१ १३ ५७ कला २० २० विकला amwom शेषाङ्काः। १ ३ ८ शेष २ ६ १०१ २०२३०३ ४०४/५०५/६०६७०८/८.९ अंश १९ २९ ३८ ४८ ७ १७ विकला . Ov १२ १३ १४ १५ १६ शेष ९१०१०१११११२ १३ ११५ २१६ ३१७ ४१८ अंश कला विकला ३० ४ १७ १८ १९ २० २१ २४/ शेष ५१९ ६२०/७२२/८२३९२४१०२५११२६ २७ अंश ४४ ३ १३२३, ३२ ४२ ५२ कला विकला memal शुक्रोच्चक्षुवविधिः- खेषुस्वरनोऽङ्कशराग्नियुक्तः सितोच्चमाढ्यं कुनृपैः शतन्नात् ।

१७ प्रहध्रुवाधिकारः। सं० टी०-अब्दपिण्डः खेषुस्वरन्नः कार्योऽङ्कशरा- ग्निभिर्युक्तः, पुनरब्दपिण्डाच्छतन्नात्-कुनृपैर्भक्तेयल्लब्धं तत् पूर्वाङ्के युक्तं (द्वादशशतेन शेषितं) शुक्रोचं भवति ॥ भा० टी०-शास्त्राब्द को ७५० से गुणा कर के उस में ३५९ युक्त करै, फिर शास्त्राब्द को १०० से गुणा करके १६१ का भाग देने से जो फल मिलै उसको पूर्व अङ्क में युक्त करने पर ( उसमें हर का भाग देने से शेष ) शुक्र के उच्च का ध्रुवा होता है। उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को ७५० से गुणा तो ६०९००० हुए इस में ३१९ युक्त किया तो ६०६३५९ हुए, फिर शास्त्राब्द ८१२ को १०० से गुणा किया तो ८१२०० हुए इस में १६१ का भाग देने से लब्ध अंशादि ५० ४।२०५२ मिले, इसको १०९३५९ में युक्तकिया तो ६०८८६३।२०१५२ हुए, इस में १२०० का भाग दिया तो शेष शुक्र का उच्चध्रुवा अंशादि २६३।२०।१२ हुआ। शकाङ्काः। १८३७/१८५७१८८११९०५/१९२९/१९५३, १९७७२००१ शक ९९७७ २००१ २६३/२७८/२९३/३०८/३२२ ३३७/३५२३६७। अंश २० ९ ४७ ४१ ४२ ૨૨ ४७ विकला २०२५/२०४९/२०७३२०९७२१२१२१४५२१६९२१९३ शक ३८२ ३९७४१२४२७ ४४२/४५७४७२/४८६ अंश ३० २५ १३ २ ५९ कला २७ । ५२ विकला २ २८ भावत्याम् शेषाङ्काः। ६ ७ ८ २ হা अंश कला ७५०३०१ १०५६ ६०२ १५३ ९०३ ४५४ २९ ६ ४३ ४८ २० ३६ ક૨ ८ विकला शेष १२ १६ -- 0 ७५५, ३०६ १०५६६०७, १५८,९०८/४५९/ ९ উহা ४१ १९ ५६ कला २४!४० ५६ १२ २८ १७ विकला १७ ! १८ १९ २० २१ २२ २३ २४ शेष ७६०३१११०६१६१२१६३ ९१३ ४६४ १४ । अंश ३३ ४८ २५ कला ३३, ४९ ३७ । ५३ २५ विक ला २१ मध्यमशनिवैवविधिः- खवेदनिघ्नोऽब्धिनवेषु युक्तः। शनिदेशघ्नात् सहितश्च शनैः ॥६॥ सं०टी०-अब्दपिण्डः खवेदनिन्नः कार्योऽब्धि- नवेषुयुक्तः पुनरब्दपिण्डाद् दशन्नाद् दशभिगुणिताच्छ- ऊश्चतुर्दशभिर्भजेत् यल्लब्धमंशादिः तेनाधिकः कर्तव्यः, (अत्रापिद्वादशशतशेषितः) मध्यमशनिध्रुवो भवतीति॥६॥ भा० टी०-शास्त्राब्द को ४० से गुणिके उसमें ५९४ युक्त- करै, फिर शास्त्राब्द को १० से गुणा कर के १४ का भाग देने से २९ ग्रहध्रुवाधिकारः । जो अंशादि फल मिले वह पूर्व के अङ्क में युक्त करने पर (हरका भाग देने से शेष) मध्यम शनि का ध्रुवा अंशादि होता है ॥६॥ उदाहरण-शास्त्राव्द ८१२ को ४० से गुणा किया तो ३२४८० हुए इस में ५९४ युतकियातो ३३०७४ हुए, फिर शास्त्राब्द ८१२ को १० से गुणा तो ८१२० हुए इस में १४ का भाग दिया तो लब्ध अंशादि ५८००० मिले, इस को ३३०७४ में युक्त किया तो ३३६५४०० हुए, इस में १२०० का भाग देने से शेष मध्यम शनि का ध्रुवा मंशादि ५४०० हुआ ॥ ६ ॥ शकाङ्काः। १८३३.१८५७ १८८१ १९.०५. १९२९ १९५३१९७७२००१. शक ५४ १०३१८०८:५८५ ३६२ १३९ १११६८९३; अंश १७ ३४ ४२ ५८ विकला २०२५/२०४९२०७३२०९७/२१२१२१४५२१६९२१९३ शाका ६७१४४८ २२५ २ ९७९७५६/५३३,३११ अंश ३४ ४२ कला १४ २२ ५६ ३० विकला ६ शेषाङ्काः। १ २ ३ ६ 0) ८ शेष ८१ १२२/१६२/२०३२४४२८५३२५ अंश ४२ २५८५१/३४|१७ ४२ कला ४३ ३४/२६१७ ९ ५१ विकला ३० भास्वत्याम् ९ १० ११ १२ १३ १४ १५ १६ शेष ३६६४०७/४४७४८८५२९ ५७०६१०६५१ अंश ४२ २५ कला ४३.३४ २६ १७ ५१ ४३ विकला १७ १८ १९ २० २१ २२ २३/२४ शेष o ६९२७३२७७३८१४८५५८९५९३६९७७ अंश ४३ २५ ८ कला ३४२६ १७९ ५१ ४३३४ विकला शास्त्राब्दागतस्पष्टमध्यमग्रहा। सू. चं. चं.करा. मं. बु शी. वृ. शुशीश न. ३ ११५०२३६१५१३०/९०२ ४१२६६४ २६३ ५४ अं. २३ । २१ ४३ २५ २ १५ ५३ ३० २० वि भौमादि ग्रहणां वीजविधिः- शास्त्राब्दपिण्डाद् गुणितात्कुजादे- स्सूर्य्याम्बराक्षीषुकुखेषुवेदैः। लब्धं क्रमेणाष्टशतैः फलं य- चन्द्राष्ट तत्त्वाधिशशाङ्कशिष्टम्॥७॥ इति श्रीमच्छतानन्दविरचितायां भाखत्यां ग्रहवा- धिकारो द्वितीयः॥ २॥ सं० टी०-शास्त्राब्दपिण्डात् पञ्चधास्थाप्यात् क्रमेण सूर्याम्बराक्षीषुकुखेषुवेदैर्गुणिताद् अष्टशतैर्यत् ३१ प्रहध्रुवाधिकारः। यत्कलंतत्तत् क्रमेण चन्द्राष्टतत्वाब्धिशशाङ्काशष्टम् शेषितं कुजादेर्वीजं भवति ॥ ७ ॥ भा० टी०-शास्त्राब्द को १२।२०१५।५।४ से गुणि ८०० का भाग देने से जो लब्ध प्राप्त होवै उसको ११८।२५।४।१ से शेषित करने से क्रमशः मङ्गल आदि का कलादि वीज होता है ॥७॥ उदाहरण-शास्त्राव्द ८१२ को १२ से गुणा तो ६७४४ हुए इस में ८०० का भाग दिया तो लब्ध १२|११ मिले ॥ शास्त्राव्द ८१२ को २० से गुणा तो १६२४० हुए इस में ८८० का भाग दिया तो लब्ध २०१८ मिले ॥ शास्त्राब्द ८१२ को १९ से गुणा तो १२१८० हुए इस में ८०० का भाग दिया तो लब्ध १५।१३ मिले ॥ शास्त्राब्द ८१२ को गुणा बो ४०६०० हुए इस में ८०० का भाग दिया तो लब्ध ५०१४५ मिले ॥ शास्त्राब्द ८१२ को ४ से गणा तो ३२४८ हुए इसमें ८०० का भाग दिया तो लब्ध ४।३ मिले ॥ मङ्गल के लब्ध १२।११ को १ से शेषित किया तो भौम का कलादि वीज १९ हुआ ॥ बुध के लब्ध २०१८ को ८ से शेषितकिया तो बुध का कलादि वीज ४.१८ हुआ ॥ वृहस्पति के लब्ध १५।१३ को २५ से शेषित किया तो वृहस्पति का कलादि वीज ११।१३ हुआ ॥ शुक्र के लब्ध ५०९४५ को ४ से शेषित किया तो शुक्र का कलादि वीज २१४५ हुआ। शनि के लब्ध ४।३ को १ से शेषित किया तो शनि का कलादि वीज ३ हुमा ।। ७ ॥ ५० से ३२ भावत्याम् भौमादीनां वीजनिर्माणाय शकाङ्काः । श्रीः १८३३/१८५७ १८८११९०५/१८२९१९५३१९७७२००१ शक . ० . o भौ. १ ४२ कलादि 0mm 130 . ४८ . ४८ ४ ७ Sar mov 0 0 oWS ४२ १८ 0 0 0 ३० कलादि बु. . १६ १७ MG १८ ૨૨ ३० FM १३ ३० ४० ३० वृ. कलादि ३० ३० ३० ૨ ३ २ १ ३ १५ १ १५ कलादि ० O MY MY ५४ कलादि . ३६ ४८ . १२ । २४ ४८ श्रीः२०२५२०४९/२०७३/२०९७२१२१२१४५२१६९२१९३) शक भौ. ३० १३ ३४ कलादि ३ ३६ २५ ४६ ४८ WS १२ ४८ १२ १ ४२ २ ર m|on. ३ ३० Soc १८ ५४ ६ बु. १८ कलादि ० कलादि २१ । २१ २१ ५८ ३० गु. ३० ook or mro o moc ३० . २ ૨ १ १ ३ on 9 ३ १५ १५ ४५ १५ कलादि ४५ . . . ० ५१ कलादि ८ C १५ २२ ४८ अंध्रुवाधिकार शेषाङ्काः। श्रीः १ ४ ६ ८ शेष M . 0 मं. १ ६ कलादि २ ३६ २४ . बु. ३ 0000 १२ कलादि ३० ३० ३० १ २ ६ वृ. कलादि 9 ५ ३७ ५२ ३० ० ११ १५ १८.२२ ३. कलादि IANS . RU .00 6. . १ १ २ २४ कलादि २ ६ १८३६ श्री: १० ११ १२ १३ १५ १६ शेष . मं. १२ ३६ १३ १४ कलादि २४ . बु. ३ १६ २१ २२ २४ कलादि ३ ० ३. 0 १२ १२ वृ. १६ • ๆ कलादि ३७ ४५ . १ ३७ ४५ ५६ कलादि ४५ २ ४२ Sc./MF ० . . ३ WW. ३ ३ कलादि ०४० १८८ भावयाम् । २० २१ ३ २५ शेष o मं. १७ १९ २१ कलादि ३६ श २८ NAI ३६ कलादि वृ. २१ २२ २३ । २४ १५ : २२ ४५ कलादि OCHNIW Go WW 06 ५२ ३० ० १ १ ૨૨ १ ३० कलादि १ १८ -- १५ P5/ou ६ ६ कलादि १२ वर्षाद्यानयनम् । *"शाकस्त्रिगुण्यो नगभाजितश्च शेष हिनिघ्नं शरसंयुतं च । वर्षा च धान्यं तृण शीततेजो वायुश्च वृद्धिः क्षयविग्रहौ च १॥ * उदाहरण-शाका १८३३ को ३ से गुणा किया तो ५४९हुए इसमें ७ का भाग देने से लब्ध ७८५ मिले, शेष ४ बचे इस शेष ४ कोश से गुणा किया तो ( हुए इसमें ५ युत करने से वर्षा का विश्वा १३ हुए, लब्ध ७८६ को ३ से गुणा किया तो २३५५ हुए इसमें ७ का भाग देने से लब्ध ३३६ मिले, शेष ३ बचे इस शेष ३ को २ से गुणा तो ६ हुए इसमें ५ मिलाया तो धान्य का विश्वा ११ हुए इसी प्रकार से तृण आदिक को भी निकालै ॥

अहध्रुषाधिकारः *शाकं च वेदगुणितं सप्तभिर्भागमाहरेत् । शेष द्विघ्नं त्रिभिर्युक्तं भुक्तविश्वाख्य सङ्ख्यया ॥ २ ॥ झुधा तृषा च निद्रा च आलस्योद्यममेव च । शान्तिः क्रोधस्तथा दम्भो लोभमैथुनयोः क्रमात् ॥३॥ ततश्च रसनिष्पत्तिः फलनिष्पतिरेव च । उत्साहः सर्व लोकानां फलान्येतानि चिन्तयेत् ॥ ४॥ शाकं च वसुभिनिम्नं नवभिर्भागमाहरेत् । शेषं द्विघ्नं रूपयुक्तं प्राप्तविश्वाख्य संज्ञकम् ॥ ५ ॥ उग्रत्व पाप पुण्यानि व्याधिश्च व्याधिनाशनम् । आचारश्वाप्यनाचारो मृत्युर्जन्म यथा क्रमम् ॥ ६॥ देशोपद्रवस्वास्थ्यञ्च चौरभिश्चौरनाशनम् । वह्निभिर्वह्निशान्तिश्च ज्ञातव्यानि यथा क्रमम् ॥ ७ ॥ * उदाहरण-शाका १८३३ को ४ से गुणा तो ७३३२ हुए इसमें ७ का भाग देने से लब्ध २०४७ मिले, शेष ३ बचे इस शेष ३ कोरसे गुणा किया तो ६ हुए इसमें ३ युक्त किया तो क्षुधा का विश्वा * हुए लब्ध से पूर्व प्रक्रिया के अनुसार तृपा आदिक को बनावै ॥ + उदाहरण-शाका १८३३ को ८ से गुणा तो १४६६४ हुए इसमें ९ का भाग दिया तो लब्ध १६२९ मिले, शेष ३ बचे इस शेष ३ को २ से गुणा किया तो ६ हुए इसमें १ युक्त किया तो उग्र का विश्वा ७ हुए, लब्ध से पापादिक का विश्वा भी उक्त प्रकार से बनावें ॥ से भास्वत्याम् AMRO *सप्तनशाकनवभिर्भाजितं शेषकं तथा। लोचननं युतं रामैजीवियाच्च यथा क्रमम् ॥ ८ ॥ शलभाश्च शुका अग्रे मुषका स्वर्णताम्रकौ । खचक्रं. परचक्रं च वृष्टिवृष्टिविनाशनम् ॥ ९ ॥ शिकः पञ्चभिः सप्तभिर्गोभिरीशै- श्चतुर्धाहतः सप्तभक्तावशिष्टः । द्विनिघ्नं त्रिभिर्युक्तमुद्भिज्जरा अ- ण्डजास्वेदजानां हि विंशोपकाः स्युः ॥१०॥ जलाढक विधिः- "युग्माजगोमीनगते शशाङ्के यदा रवौ कर्कटकं प्रयाति। *उदाहरण-शाका १८३३ को ७ से गुणा किया तो १२८३१ हुए, इस में ९ का भाग देने से लब्ध १४२५ मिले. शेष ६ बचे, इस शेष ६ को २ से गुणा किया तो १२ हुए, इस में ३ को युत. किया तो शलम का विश्वा १९ हुए, लब्ध से शुकादि का भी विश्वा बनावें। उदाहरण-शाका. १८३३ को क्रमशः ५, ७, ९, ११ से गुणा तो ९९६५, १२८३१, १६४९७, २०१६३ हुए, सब में ७ का भाग देने से शेष २, ९, ५, ३ बचे इन्हों के २ से गुणा तो ४, ०, १०, ६ हुए इन सभो में ३ मिलाने से उभिज् का जरायुज का ३ अंडज का १३ खेदज का, ९ विश्वा हुए। + उदाहरण-शाका १८३३ में कर्क की संक्रान्ति कुम्भ राशि के चन्द्रमा में हुई, इससे जल का आढक सङ्ख्या ९६ है, इसको तीन जगह धरि के क्रमशः १०,६,४ से गुणा किया तो ९६०,५७६,३८४ हुए इनमें २० का भाग देने से लब्ध ४८, २८१४८,१९१२ मिले । समुद्र में ४८ पर्वत पर २८१४८ पृथ्वी पर १९।१२ आढक जल जानें ।।

ध्रुवाधिकारः . ३ शताढमम्भो हरिकार्मुकेऽर्ध- मुक्तं हि कन्यामृगयोरशीति ॥ १ ॥ तुलालिकुम्भेन्दुगते तमीशे कर्के रखौ षण्णवतिस्तदानीम् । त्रिधाहतं दिग्रसवेदसङ्खयै- जलाढकं विंशति भागलब्धम् ॥ २ ॥ भवेत्समुद्रादिषु वृष्टिकं त- जलाढसङ्ख्या कथितो मुनीन्द्रैः। अ ईमई च क्रमेण तेषाम् स्थात्पर्वते शेषमिलातले च ॥ ३ ॥ जलाढक बोधकचक्रम् । . ककडकडधा जलाढक लिखितरा- सङ्ख्या शाविन्दौ समुद्र पर्वते भूमो मे.वृ.मि.मी. २० सिं.ध. ५० २५ १० कन्या.म. २४ १६ क.तु.कृ.कुं. २८ ४८ भास्वत्याम "गशीश बर्षेशयुतं त्रिगुण्यं शरेण युक्तं तिथि शेषलाभम् । लाभं त्रिगुण्यं च शरेण युक्तं तिथ्यावशेष व्यगमाननन्ति।।१।। विगोयनुसारेण रव्यादीनां क्रमाद् ध्रुवाः । रसदिक् शैलमेघोऽष्टिनखस्त्वेकोनविंशतिः ॥ २ ॥ रसानि वाणेन्दुमिनानि चाष्टो घनानि वैचाङ्कधरामितानि । भूपक्षसंज्ञानि खरूपकानि त्वष्टोत्तरीणां रवितो ध्रुवानि" ॥३॥ विंशोत्तरीमनेनार्कादीनां नृपेषु-आयव्ययवोधकचक्रम् । मे. वृमि. के. सिं. राशयः ८ १ १ १४ आ. २ सूर्यनृपे ११ आ. चन्द्रनृपे १४ Mosara आ. भौमनृपे १४८ २ २ ११ २ १४ २ ११ ११ १४ ८ १४ / ८ ११ २ ११ आ. व्य, बुधनृपे २ आ. व्य. गुरुनृपे २८ ८ ११ ११ आ. व्य. ५ आ. ८ ११ शुक्रनृप २ ८ २ शनिनृप * उदाहरण-शाका १८३३ में राजा शुक्र है, विंशोत्तरी के मत से शुक्र का ध्रुवा २० है, और मेष राशि का स्वामी मङ्गल है उक्त रीति से मङ्गल का ध्रुवा ७ है, इन दोनों के ध्रुवा को एक जगह जोड़ देने से २७ हुए इसको ३ से गुणा किया तो ८१ हुए फिर इसमें ५ युक्त किया तो ८६ हुए इप्तमें १५ का भाग देने से लब्ध ५ मिल शेष ११ वचे शेष तुल्य ११ लाभ हुए, लब्ध ५ को ३ से गुणा किया तो १५ हुए इसमें ५ और युक्त किया ता २० हुए इसमें १५ का भाग देने से शेष ५ व्यय हुए। ३ प्रहध्रुवाधिकार, तु. वृ. मी राशयः ८ १३ १. आ. सूर्यनृप ११ / ८ २ आ. चन्द्रनृपे , २ ८ आ. भौमनृरे २ . बुधनृपे ११ m गुमनृप ११ १४ । आ ८११११ ८ व्य ११ ११ आ. ८ ८ व्य. ८ २ आ. १४ । १ आ. ११ १४|११ व्य २१ / १४ शुक्रनृपे शनिनृप अष्टोत्तरीमतेनार्कादीनां नृपेषु-आयव्ययबोधकचक्रम् । मे, Im सि. क. राशयः 1 १ आ. य. सूर्य नृपे २ ocASWA ५। ८ : ११ आ. चन्द्रनृपे २ २ । ५ आ. भौम नृपे १४ व्य. V 55 २ १४ २ २ ११ ११ ८ ८ / २ । ११ बुधनृपे ८ आ. व्य. गुरुनृप १ १४ ८ १ शुक्रनृप १४ ८ शनिनृप ८ भावन्याम तु वृ. कुं मी. राशयः - " - सूर्यनृप १४/१४ व्य ८ २ आ. चन्द्रनृपे २ ११ । १४ । १४, ११ : आ भौमनृपे - । व्य. बुधनृपे १, ५ ८ आ. ५ | ५ | ११ | व्य. ३ १४ । आ ११. व्य. १४ . गुरुनृपे ११ शुक्रनृपे . आ. व्य. शनिनृपे २ इति श्रीज्यौतिपीन्द्रमुकुटमणि श्रीपछत्रधरसूरिसूनुना गणक मातृप्रसादेन विरचितायां भास्वत्याइछात्रबोधिनी नाम टीकायां प्रध्रुवाधिकारो द्वितीयः समाप्तः ।।२।।

पञ्चाङ्गम्पष्टाधिकारः। ४१ अथ पञ्चाङ्गस्याप्याधिकारः। दिलममानयनविधिः- त्रिंशद् गुणा मेष पासा दिनैस्समेला प्रश्नुवासरोनाः । युरन्दमेतशगभक्तशेषम् वारा भवन्त्वन्द मुखादि नाथात् ॥१॥ चन्द्राश्विालियुगभूतरताश्वतर्क षड् वाणभूतविषयाश्च यथा क्रमेण । मेषादिराशिपु खरामगुणेपु देया भास्वत्यहर्गण इनांशकसंयुतःस्यात् ॥२॥ सं०बी०-दिनगणःशून्यं तस्मात् तृतीय तिथिमार- भ्यपरमनंक्रान्तिपर्यन्तं मेषस्तदारभ्याग्रिमसंक्रान्ति पर्य- न्तं वृष इतिप्रकारेगाऽपि ज्ञातव्याः सौरनालाः, ते मेषमुखार्क मासाः मेषादि सौरमासाः त्रिंशद् गुमाः कार्या- स्तवक्षमाणमासस्य गतेनांशैर्गतदिनैः समेताः सहिताः कर्तव्यास्तेषु मेषाद्यर्कमासेषु चन्दाश्विवह्नियुगभूतरसाश्व- तर्कपड्वाणभृतविषयाश्च यथाक्रमेण योज्याः, तत्र मेष ? वृषे २ मिथुने ३ करूं ४ सिंहे ५ कन्यायां ६ तौलिके ७ वृश्चिके ६ धनुषि ६ सकरे ५ कुम्भे ५ मीने ५ चोजिते सति भास्वत्यहनजो भक्त । मेपादिशाशपु नेपादि & ६ । भास्वत्याम् । गत सावन मासेषु (यस्यां तिथौ मेषसंक्रान्तिर्भवति तदारभ्याग्रिममासस्य सैयतिथिर्यावदयं मेष इत्यनेन क्रमेण सावन मासा भवन्ति) खरामगुणेषु त्रिंशद् गुणेषु प्राप्त मासस्य गत तिथयः योज्याःतेषु ऋतुवास- रोनाः कार्या एवं कृते पूर्वानित दिनगण तुल्यो धुवृन्दो भवति तन्नगभक्तशेषम्-अब्द मुखादि नाथाद् वारा भवन्तीति (शून्यादि शेषे वर्षेशादयो ज्ञातव्याः) ॥१॥२॥ "अहर्गणेऽस्मिन्नगभक्तशेषे- समाधिपा वारसुसन्ति यातम् । अभिष्टवारार्थमहर्गणोऽयं- कुहीनयुक् स्यादिति सम्प्रदायः" ॥१॥ यब्धीन्द्रोनितशक ईशहत् फलं स्या- * उदाहरण-शाका १८३३ में १४४२ को घटायातो वर्ष समूह ३९९ हुआ, इसमें ११ का भाग दिया तो फल चक्र ३५ मिला, और शेष ६ चचे इसको १२ से गुणा किया तो ७२ हुए इसमें चैत्र से मास गत है इसको युत किया तो ७३ हुए (यह मध्यमासगण हुआ) इसको दो जगह रक्खे एक जगह इस में द्विगुणित चक्र ७० को जोड़ा तो १४३ हुए फिर इस में १० और युक्त किया तो १५३ हुए फिर इसमें ३३ का भाग दिया तो फल अघिमास ४ मिले, इसको दूसरी जगह धरे हुए ७३ में युक्त किया तो मास गण ७७ हुआ, इसको ३० से गुणा किया तो २३१० हुए इसमें गत तिथि १२ युत किया तो २३२२ हुए इस में चक्र का छठवां भाग ५ युक्त किया तो २३२७ (मध्यमगण हुआ ) इसको दो जगह धरा एक जगह इसमें .

.. - पश्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। चक्राख्यं रविहतशेषकं तु युक्तम् । चैत्रायैः पृथगमुतः सहग्नचक्राद् दिग्युक्तादमरफलाधिमासयुक्तम् ॥१॥ खत्रिनं गततिथियुङ्गिरग्रचक्रा- गांशाढ्यं पृथगमुतोऽब्धिषट्कलब्धैः । ऊनाहैवियुतमहर्गणो भवेट्टै वारः स्थाच्छरचक्रयुग्गणोऽब्जात् ॥२॥ * “ रामेन्दुभूवह्निकरक्षमाभि- यतो दिनौघोग्रहलाघवीयः। ६४ का माग दिया तो फल (क्षय दिन ) ३६ मिले इसको दूसरी जगह धरे हुए २३२७ में हीन किया तो दिन गण २२९१ हुआ इससे अभीष्ट वार नहीं आवता है अतः इसमें एक युक्त किया तो दिन गण २२९२ हुआ॥ चक्र ३५ को ५ से गुणा तो १७५ हुए इसको दिन गण २२ए में युक्त किया तो २४६७ हुए इसमें 9 का भाग दिया तो शेष ३ वचे (शून्य शेष में चन्द्र एक में भौम इत्यादि) इस से इष्ट गुरुवार आगया। * उदाहरण-ग्रहलाघव के दिन गण २२९२ में १२३११३ को युत किया तो १२५४०५ हुए, चक्र ३५ से ४०१६ को गुणा किया तो १४०५६० हुए इसको १२५४०६ में युत किया तो ब्रह्म तुल्य दिन गण २६५९६५ हुए, इसमें ७२०६३६००७४९२ को युत किया तो कल्प से दिन गण ७२०६३६२७३४१७ हुए, ब्रह्म तुल्य दिन गण २६५९६५ में ७१४४०३८६१३६६ को युत किया तो सृष्टि गम ७१४४० ४१२७३३० हुए, ब्रह्म तुल्य गण २६५९६५ में १५ ६४७३८ को युक्त किया दो कलि गण १८३०७०३ हुए ।

भावत्याम् चक्रमतर्कक्षितिखाधियुक्तः स्याद् ब्रह्मतुल्यो धुगणो विधिज्ञ ! ॥ १ ॥ नखखाङ्ग वद्धि- रिप्पभ्रयुग्माचलसंयुतश्चेत् । स्याद् ब्रह्मतुल्यो युगणन्तदानीम भवत्ययं कल्पदिनान्ववायः ॥ २ ॥ बाणाङ्गराभेन्दुरसाष्टवाहि- व्योमाब्धिबेदक्षितिशैलयुक्तः। चेद् ब्रह्मतुल्योदिवसव्रजं स्यात् तदा भवेत् सृष्टिदिनौष एषः ॥ ३ ॥ चेद् ब्रह्मतुल्योदिवसबजोऽहि- रामाद्विवेदाङ्ग शरेन्दुयुक्तः। भवेत्तदा भोगणकप्रवीण ! नूनं कलिप्राप्तिदिनौघ एषः ॥ ४ ॥ + नन्दाद्रिचन्द्राचलवेदरत्न- युग्मागखेटेन्दुयुताः शकाव्दाः । + उदाहरण-शाका १८३३ मे १९७२९४७१७९ को युत किया तो कल्प से गत वर्ष १९७२९४९०१२ हुआ, शाका १८३३ में १९६५८ ८३१७२' को युक्त किया तो दृष्टि से गत वर्ष १९५५८८५०१२ हुआ, श.का १८३३ में ३१७८ को युक्त किया तो गत कलि ५०१२ हुआ ॥

पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः।
यदाभवेयुगणिताधिराज !
सदा मिलेत् कल्पगताब्दसङ्ख्याः ॥ ५ ॥
अङ्काद्रिभूरामभूजङ्कसर्प-
वाणेषुनन्देन्दुयुताः शकाब्दाः।
सृष्ट्यब्दतां यान्ति विधिज्ञ ! मूर्व-
मालाललामार्चितपादपद्म ! ॥ ६ ॥
निधिशैलेन्दुरामैश्चेद् युताः स्युः शकवत्सराः।
तदा सम्पद्यते सङ्ख्यातीनां शरदा कलेः ॥ ७ ॥
भा. टी.-गत सावन मास को ३० से गुणा कर के गत
तिथि युक्त कर फिर उसमें ऋतु वासर घटाने से दिन गण होता
है । गत सौर मास (वीती हुई सूर्य की संक्रान्ति) ३० से गुणि
उसमें सूर्य के गत अंश को युत कर फिर उस में मेषादि संक्राति
का क्रम से ११२।३।४।५।६।७।६।६। ५.५१५
यह क्षेपक युत करने से दिनगण होता है । दिन गण में ७ का
भाग देने से शेष अब्दनाथ से गणना करने पर वार होता
है॥१॥२॥
उदाहरण-श्री सम्बत् १९६८ शाका १८३३ वैशाख शुक्ल १३
वार वृहस्पति के सूर्योदय पर स्पष्ठी है। गत सावन मास को ३० से
गुणा तो हुआ इसमें गत दिन २७ युक्त किया तो २७ हुए इसमें ऋतु
वासर घटाया तो अहगण २७ हुआ । गत सूर्य की राशि० को३८से गुणा
तो ० हुआ इसमें गत अंश २६ युत किया तो २६ हुए फिर क्षेपक
१ युक्त करने पर दिन गण २७ हुआ। इसमें ७ का भाग देने से
शेष ६ बचे अतः वर्षेश शुक्र से गनने पर छठवाँ वृहस्पति वार आया
( अभिष्ट वार के लिये एक न्यूनाधिक करै ) ॥१॥२॥

भास्वत्याम्॥ S मूर्य स्पष्ट विधिः- सूर्ये स्वरध्नास्तिथयः प्रदेयाः पृथक् शताप्ताः क्रमशश्चखण्डाः। शेषाच्चभुक्तोनितभोग्यनिधनाच्छताप्त युक्तोऽप्यधिकः स्फुटः स्यात् ॥३॥ सं० टी.-स्वरमाः सप्तगुणिताः तिथयः सूर्यध्रुवके प्रदेया योजनीया (ततो वीजदेशान्तराभ्यां संस्कारितः) एवं कृतेसति मध्यम सूर्यो भवति, मध्यमसूर्यः पृथक् स्थानद्वये संस्थाप्येकत्र शताप्ताः शतभागेन क्रमशः खण्डा लभ्यते तदनेभोग्यः शेषाच्चभुक्तोनित भोग्यनि- नाच्छताप्त युक्तः-अर्थाद्भुक्तभोग्य योरन्तरेण शतभाग- शेष गुणितं शतेन विभाजितं प्राप्तफलं भुक्तखण्डके सं- योज्य मध्यमार्के योजयेद् योजिते सति-अधिकः स्फुटः स्यात् स्पष्ट सूर्यो भवतीति ॥ ३ ॥ भा० टी०-दिन गण को ७ से गुणा करके उसमें सूर्य के ध्रुवा को युक्त करै फिरि देशान्तर और बीज से संस्कार करके दो स्थान में स्थापित करै एक स्थान में १०० का भाग देने से जो फल मिलै उतचे संख्या वाले कोष्ट के अङ्क को और उसके अग्रिम कोष्ठ के अंक को अन्तर करै फिर शेष को अन्तर से गुणिके १०० का भाग देने से जो फल मिलै उस को गत युक्त करके फिर उसको दूसरे जगह धरे हुए अंक में युक्त करने से स्पष्ट सूर्य होता है ।। ३ ।। खण्डा में R- पश्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। सूर्यखण्डाङ्काः- सूर्यस्य पञ्चाङ्करवीन्द्रभूपाः घनानवेन्दुः कुयमा जिनाश्च । सप्ताश्विनश्चन्द्रगुणा रसानी द्यब्धी मरुत् सप्तशराः शराङ्गाः॥४॥ पञ्चायो वेदगजाः कृताङ्का- स्त्रिखेन्दवो भानुभुवः कुसूर्य्याः। अष्टाश्विचन्द्राः शररामचन्द्रा- श्चन्द्राब्धिचन्द्राः शरवविणश्च ॥५॥ सं० टी०-सूर्यस्य दिनेशस्य पञ्चाङ्क रवीन्द्रभूपाः घनानवेन्दुः कुयमा जिनाः सप्ताश्विनः चन्द्रगुणा रसाग्नी व्यब्धी मरुत् सप्तशराः शराङ्गाः च पञ्चाद्र- यो वेदगजाः कृताङ्कास्त्रिखेन्दवो भानुभुवः कुसूर्य्या अष्टाश्विचन्द्राः शररामचन्द्राश्चन्द्राब्धिचन्द्राश्शरवज्रि- णश्चेति खण्डाङ्का भवन्ति ॥ ४ ॥ ५ ॥ भा० टी०-सूर्य का ५।९।१२।१४।१०।१७।१९।२१।२४। २७।३१॥३६।३।४९।५७६५ । ७५/८४९४।१०३।११२।१२१ । १२८।१३५।१४१।१४५ खण्डाङ्क है, एक लब्ध में ५ दो में ९ इत्यादि क्रमसे जाने ॥ ४ ॥ ५ ॥ उदाहरण-दिनगण २७ को ७ से गुणा तो १८८ हुए इसको मध्यम सूर्य के प्रवा ३।२३।५३ में युत किया तो तत्कालिक तो ३६८ । १५। १२ हुए इस में १०० का भाग दिया तो लब्ध ३।१०।५७ मिले, इस को गत खण्डा ५ में युक्त किया तो ८१४01 भास्वत्याम् । मध्यम सूर्य १९२२२३५३हुभा इसमें बीज ऋण १४।२८ को घटायां तो १९२।९।२४ हुआ इसमें देशान्तर ऋण ०।५।३६ को घटाया तो बीज देशान्तर संस्कारित मध्यम सूर्य १९२३।४८ हुआ इसको दो जगह स्थापित कर एक जगह में १०० का भाग दिया ता फल १ मिले अतः पहिला गत खण्डा ५ और दूसरा भोग्यखण्डा ९ इन दोनों का अन्तर धन ४ हुए इस से शेष ९२ । ३ । ४८ को गुणा हुए इसको दूसरी जगह स्थापित किये हुए १९२।३।४८ में युत किया तो स्फुटसूर्य २२० । ४४ । ४५ । हुआ ॥३॥४॥५॥ सूर्यखण्डा-अन्तर-मुक्तिबोधकचक्रम् । ५७ १ २ ३ संख्या ९ १२ १४ ७ १८ २१ खण्डा ४ PAW ૨ २ ३ ३ Do १६ १२ ४८ ३६२४ ८ । ४ २४१२ २४ १२ भुक्ति २४ १० १२ १३ १७ संख्या २४ ४९५७६५ ७५ खण्डा ३ ६ ८ १० अन्तर १२ | १६ २८ | ३३ ३३ २४ ३६ ३६ ४३ | ३७ मुक्ति ४८ पश्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। २० २४ : ३५ । २६ संख्या -- ८४ ९४ १०३ ११२ १२१ १२८ १३५ १४१, १४५ वण्डा , , १० ९ ९ । कलादि ००० ३७ ३७ २२ acOG मुक्तिः मूर्य गतिस्पष्ट विधिः- भुक्तिं च धृत्वा गुणयेत्स्वभुक्त भोग्येन हृत्वाम्बरशून्यचन्द्रैः। लव्धं फलं मध्यगतौ प्रदद्या- दहः परं स्यात्परकर्म कार्यम् ॥६॥ सं० टी०-मुक्ती धृत्वा मुक्त भोग्य खण्डान्तरेण गुणयेदम्बरशून्यचन्द्रहला लब्धं फलं मध्य गतौ प्रदद्यात् परकर्मकार्यमहः परं स्यात् । (स्पष्टार्कगतिरष्टभि- गुणिते सति ग्रहलाघव तुल्या गतिभवति) ॥ ६ ॥ "भोग्यारवेः सप्तगुणाच्छताप्ता सप्तान्विता स्यात् स्फुटसूर्यभुक्तिः ” । भा० टी० -सूर्य की मुक्ति को खण्डान्तर से गुणि १०० का भाग देने से जो लब्ध मिलै वह मध्यम भुक्ति में युत करने से स्पष्ट गति होती है ॥६॥ उदाहरण-सूर्य की मुक्ति ७ को खण्डान्तर ४ से गुणा तो भास्वत्याम्। २८ हुए इस में १० का भाग दिया तो फल ० । १६ मिले इसको मध्यम गति ।७० में युक्त किया तो स्पष्टगति ७ । १६ हुई ॥६॥ "तात्कालिक मध्यमचन्द्र-चन्द्रकेन्द्र-स्पष्ट चन्द्रविधयः खनन्द निघ्नास्तिथयः शशाङ्के केन्द्रे शतघ्नास्तिथयः प्रदेयाः। केन्द्रे क्रमात्खट् शरसप्तदस्त्रैः शोध्यो विधुश्चागशराब्धिदस्त्रैः ॥७॥ इन्दुर्घवृन्दात्सहितः खसूर्ये- श्चराईभागोन युतः समाऱ्यात् । चराई भागा विषुवादिमासैः खचन्द्र नेत्रदयचन्द्रखांशाः ॥८॥ पुनर्घवृन्दाद्गगनेषु लब्धम् शीतांशुकेन्द्रे तु युतं प्रकुर्यात् । तत्प्रत्यहं स्युः शतशश्चखण्डा भोग्योद्भवांशैश्च धनं स्फुटः स्यात् ॥६॥ सं० टी०-खनन्दनिघ्नाः तिथयः शशाङ्के ध्रुवके प्रदेयाः शतनास्तिथयः केन्द्रध्रुवके प्रदेयास्ततः क्रमात् केन्द्रे षट्शरसप्तदस्त्रैः षट्पञ्चाशताधिकसप्तविंशतिशतैः शोध्यो विधुश्चागशराब्धिदस्त्रैः सप्तपञ्चाशताधिकचतु- विशतिशतैः शोध्यः पुनर्घवृन्दाद् दिनगणात खसूर्यै- पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः । र्यल्लब्धं तेनान्वित इन्दुश्चन्द्रः कर्त्तव्यश्चगर्दृति समाद्धाद् अब्दाद् मेषतुलादितश्व-उन:-युतः कार्यः, मेघादि षण मासेषु-ऊनः तुलादिषट् मासेषु युतः कर्त्तव्यः (विषुव मेषतौलिकम् ) विषुवादि मासेषु खचन्द्रनेत्रदयचन्द्र- खांशाश्चराई भागा भवन्ति चराई भागसंस्कारिते सति (वीजदेशान्तराभ्यां संस्कारितः) पुनः दिनगमाद् गगने- षुभिर्यल्लब्धं तच्छीतांशुकेन्द्रे योज्यं तत्प्रत्यहं स्युः (ततो वीजदेशान्तराभ्यां संस्कारितः) केन्द्रो भवति । तस्मा- च्छतशः भागेन खण्डाः सन्ति । भोग्योद्भवांशैर्धनं स्फुटः स्याच केन्द्रे शतशःभागेन चन्द्रखण्डाकेषु भुक्तः खण्डः प्राप्यते तदने भोग्यः शतभागादवशिष्टं भुक्तभोग्यख- ण्डान्तरेण गुणितं शताप्तं भुक्तखण्डके युक्तं कृत्वा चन्द्रे योजयेद् योजिते सति, औदायिकमध्यमेन्दुः स्फुटः स्यात् ॥ ७ ॥ ८॥९॥ भा० टी०-दिन गण को ९० से गुणा करके मध्यमचन्द्र ध्रुवा में युक्त करै, फिर दिन गण में १२० का भाग देने से जो अंशादि फल मिलै उसे भी उसी में युक्त करै, मेषादि छः राशि- यों का ०।१।२।२।१।० यह ऋणचराई है और एही तुलादि छः राशियों का धन चरार्द्ध है । चरार्द्ध को युक्त वा हीन करके २४५७ से शेषित करने से शेष मध्यम चन्द्र होता है, फिर उसको वीज और देशान्तर से संस्कार करने पर वीज देशा- न्तर संस्कारित मध्यम चन्द्रमा होता है । दिन गण को १००

भास्वत्याम् ।
से गुणि चन्द्र केन्द्र ध्रुवा में युत करके फिर दिन गण में ५०
का भाग देने से जो फल मिले उस को भी उसी में युक्त करै
फिर उसको २७५६ से शेषित करने से शेष तत् कालिक चन्द्र केन्द्र
होता है फिर उस को बीज और देशान्तर से संस्कार करने पर
वीज देशान्तर संस्कारित चन्द्र केन्द्र होता है। केन्द्र में १००
का भाग देने से जो लब्ध मिले वही संख्या वाला भुक्त
खंडा और उस के आगे का अङ्क भोग्य खण्डा होता है,
भुक्त भोग्य खण्डा का अन्तर करके शेष को अन्तर से गुणा
कर फिर उसमें १०० का भाग देने से जो लब्ध मिलै उसे
भुक्त खण्डा में युक्त करै वाद २४५७ का भाग देने से जो
शेष है उसमें उस को युत करने से स्पष्ट चन्द्र होता है । (सुग-
मता के लिये संस्कृत टीका से भाषा टीका में भेद किया
गया है ) ॥७॥८॥९॥
चन्द्रखण्डाङ्का:-
इन्दोः खरूपाग्निरसाः खचन्द्रा
नृपा जिनाः पञ्चगुणा रसाब्धयः ।
षष्ठिः शरागाः कुनवाष्टकाष्ठाः
षड्भानवो राममनुर्नवाहाः ॥१०॥
पञ्चाम्बुदा खाङ्कभुवो हिखाश्वि
विश्वाश्चि जात्यश्वि खरामदत्राः।
पञ्चाग्निहग् गोऽग्नियमाः कुसिद्धा
नेत्राब्धिहग् वह्निजिनास्त्रिसिद्धाः॥११॥

पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः । सं० टी०-इन्दोश्चन्द्रस्य खरूपाग्निरसाः खचन्द्रा नृपा जिनाः पञ्चगुणा रशाब्धयः षष्ठिः शरागाः कुनवाष्ट- काष्ठा षड्भानवो राममनुर्नवाहाः पञ्चाम्बुदा खाङ्कभुवो द्विखाश्वि विश्वाश्चि जात्यश्वि खरामदस्राः पञ्चाग्निदृग्गो- ऽनियमाः कुसिद्धा नेत्राधिदृग् वह्निजिनास्त्रिसिद्धा- खण्डाङ्का भवन्ति ॥ १० ॥ ११ ॥ भा० टी०-चन्द्रमाका ०।१।३।६।१०।१६ । २४ । ३५ । ४३ । ६० । ७५ । ९१ । १०८ । १२६ । १४३ । १५९ । १७५ । १९० । २०२ । २१३ । २२२ । २३० | २३५ । २३९ । २४१ । २४२ । २४३ । ०४३ खण्डांक है ॥ १० ॥ ११ ॥ उदाहरण-दिनगण २७ को ९० से गुणा किया तो २४३० हुए इसको चन्द्रमा के ध्रुवा १९५० । २१ । ३० में युत किया तो ३५ ८० | २९ । ३० हुए, फिर दिन गण २७ में १२० का भाग दिया तो अंशादिक । १३ । ३० मिले, इसको ३५८० । २१ । ३० में मिलाया तो ३९८० । ३५ । ० हुए इस में चरार्द्ध० को हीन किया तो ३९८० । ३५ । ० बचे इस में २४५७ का माग दिया तो शेष ११२३ । ३५ । ० । रहे, इस में चन्द्रमा का अंशादि वीज ३ । ६ । १८ को युक्त किया तो १९२६ । ४ १।१८ हुए इसमें अंशादि देशान्तर ऋण । १ । १२ । ० घटाया तो वीज देशान्तर संस्कारित मध्यम चन्द्रमा ११२५ । २९ । १८ हुआ ॥ दिन गण २७ को १०० से गुणा किया तो २७०० हुए इस को चन्द्र केन्द्र ध्रुवा २३६१ । ४३ । १४ में युत किया तो ५०६१ । ४३ । १४ हुए फिर दिनगण २७ में ५० का भाग दिया तो फल अंशादि ० । ३२ । २४ मिले इसको ५०६१ । ४३ । १४ में युत किया तो ५०६२ । १५ । ३८ हुए इसमें २७१६ का १ भास्वत्याम् । भाग देने से शेष २३०६ । १५ । ३८ रहे इसमें चन्द्र केन्द्र का वीज धन ३।२७।० को युक्त किया तो २३०९।४२/३ ८ हुए. इसमें चन्द्र केन्द्र का देशान्तर ऋण अंशादि १।२०१० को घटाया तो वीज देशान्तर संस्कारित चन्द्रमा का मध्यम केन्द्र २३०८।२२।३८ हुआ । चन्द्रमा के केन्द्र २३०८।२२।३८ में १०० का भाग दिया तो फलगत खण्डा २३ मिला इमसे तेइसवाँ गतखण्डा २३५ है, इसके वाद चौविसवाँ भोग्य खण्डा २३९ है, इन दोनों का अन्तर धन ४ हुआ इस से शेष ।२२।३८ को गुणा किया तो ३३।३०।३२ हुए इसमें हर १०० का भाग दिया तो फल ०२०।६ मिले, इस को भुक्त- खण्डा २३५ में मिलाया तो २३९।२०१६ हुए इस को मध्यम चन्द्रमा ११२६।२॥१८ में युक्त किया तो स्फुट चन्द्रमा १३६ ०।४९।२४ हुआ ॥ ७॥ ८॥ ९॥ १० ॥ ११ ॥ चन्द्र खण्डा-अन्तर-मुक्ति बोधक चक्रम् । 0 १ ३ है संख्या १ ३ ४६ खण्डा २ ox ८ ३ ११ ११ १४ अन्तर ९२. ९३ २४९६, ९८१०१ १०१ १०४ कलादि गतिः ९३ १४९ ४ . ० 0 0 १२ १३ १४ १५ १७ १८ १९ संख्या ६० ७५९१ १०८,१२६ १४३ १५९१७५ १९०२०२खण्डा १७ १६ १६ १५ १२ । ११ अन्तर १ १०५ १.६ १०७ १०८१०७/१०६ १०६ १०५/१०२/१० गतिः कलादि . ४८ .

पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। २२ २८ मख्या - २१३ २२२२३०. २३५ २३९,२४१ २४२ २४३ २४३ खण्डा २ १ अन्तर २५ ९२ ९१ ९१ कलादि गतिः 0 ० . ० चन्द्रगति विधिः- भुक्तिनवत्यान्वितभोग्यामिन्दोः । सं० टी०-इन्दोश्वन्द्रस्य खण्डान्तरं नवत्यान्वितं युक्तं भुक्तिर्भवति ॥ भा० टी० -चन्द्रमा के बण्डा के अन्तर में ९० को युक्त करने से चन्द्रमा की गति होती है। उदाहरण-चन्द्रमा के खण्डा का अन्तर ४ है, इस में ९० को युक्त किया तो चन्द्रमा की गति ९४० हुई ॥ तिथि विधिः- अर्कोनचन्द्रातिथयः खनन्दैः । शेषोन खाङ्काङ्गगनाङ्गनिधनाद् भुक्त्यन्तराप्ता घटिका भवन्ति ॥१२॥ सं० टी०-अर्कोनचन्द्रात खनन्दैलब्धशुक्लपति- पदादयोगत तिथयो भवन्ति, यदा चन्द्राद्रविनशुधति तदा भगणं दत्वा शोधयेत्, शोधने यत्र शून्यं भवेच्छषं भास्वत्याम् । न भवति तत्र शुक्लप्रतिपत्तिथिर्भवति, शेषोन खाङ्काद् गगनाङ्ग निघ्नात् षष्ठिगुणिताद् भुत्यन्तराप्ता घटिका भवन्ति ॥ १२ ॥ भा० ठी० -- स्पष्ट चन्द्रमा में स्पष्ट मूर्य को घटाकर (सूर्य से यदि चन्द्रमा न्यून होय तो चन्द्रमा में २७०० को युत करके घटावे ) उसमें ९० का भाग देने से फल गत तिथि मिलती है, शेष को ६० से गुणि के उसमें चन्द्रमा और सूर्य की भुक्ति के अन्तर ( अर्थात् चन्द्रमा की मुक्ति में सूर्य की भुक्ति घटाने से जो शेष बचे) का भाग देन से वर्तमान तिाथे की भुक्त घडी आदि मिलती है, शेष को हर ९० में घटा कर उसको ६० से गुणाकर के उसमें भुक्ति के अन्तर का भाग देने से व. तमान तिथि की भोग्य घटी आदि होती है ॥ १२ ॥ उदाहरण-स्पष्ट चन्द्रमा १३६० । ४९ । २४ में स्पष्ट सूर्य २००। ४४ । ४५ को घटाया तो शेष ११६० । ४ । ३८ बचे इसमें ९० को भाग दिया तो लब्धगत तिथि १२वीं मिली, माग शेष ८०१४।३९ को ६० से गुणा कर के सनाती किया तो भाज्य २८८२७९ हुआ चन्द्रमा कि गति ९४ । • में सूर्य की गति ७।१६ को घटाया ता ८६ । ४४ बचे इसको सजाती किया तो भाजक ५२० ४ हुआ इसका भाज्य २८८२७९ में भाग दिया तो फल वर्तमान तिथि का मुक्त घडी ५६ पल २४ मिले। पूर्व भाग शेष ८०। ४ । ३९ को हर ९० हीन किया तो । ५५ । २१ बचे इसको सजाती किया तो ३५७२१ हुए इसमें माजक ५२०४ का भाग दिया तो फल वर्तमान तिथि की भोग्य घटी ६ पल ५२ मिले वर्तमान तिथि का गत भोग्य का योग ६२ | १६ हुआ ॥ १२ ॥ में पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। नक्षत्रविधिः- शताप्तमृतं शतशोधितांशात षष्ट्याहता भुक्ति हृतास्तुनाड्यः । राशिः शशाङ्काच्छरजाति लब्धम् नक्षत्रवत् तद् घटिका भवन्ति॥१३॥ सं०टी०-शशाङ्काच्छताप्तं नक्षत्रं भवति, शतशो- धितांशात् षष्ट्याहता भुक्ति हृता नाड्या भवन्ति, तु शरजाति लब्धं राशिर्भवति, तच्छेषात् नक्षत्रवद् घटिका अंशादयो भवन्ति, एवं सूर्यस्पष्टविधावपि-"राशिस्स्फु- टाकांच्छरजातिलब्धं खवह्नि निन्नादवशेषितोंऽशः॥१३॥ मा० टी०-स्फुट चन्द्रमा ( भचक्र २७०० से अधिक होय तो भचक्र से शोधि के) में १०० का भाग देने से लब्ध गत नक्षत्र होता है । शेष को ६० से गुणा कर सबर्णित करके चंद्र- गति का भाग देने से वर्तमान नक्षत्र की गत घड़ी आदि मिलनी है, और पूर्व शेष को १०० में घटा कर उस को ६० से गुणा करके सवर्णित कर, वाद उसमें चन्द्रमा की गति का भाग देने से वर्तमान नक्षत्र की भोग्य घड़ी आदि होती है। स्फुट चन्द्रमा में २२५ का भाग देने से लब्धराशि होती है, अंशादि नक्षत्र की घड़ी के प्रकार से स्पष्ट करै ।। १३ ।। उदाहरण-स्फुट चन्द्र १३६० । ४९ । २४ में १०० का भाग दिया तो फल गत नक्षत्र १३ वाँ हस्त मिला, शेष ६०। ४९ । २४ को ६० से गुणा करके सजाती किया तो भाज्य २१८९६४ हुआ,

५८
भास्वत्याम् ।
और चन्द्र गति ९४ को ६० से गुणा तो भाजक ५६४०हुआ, इस का
भाज्य में भाग दिया तो वर्तमान नक्षत्र की भुक्त घड़ी आदि ३८१४९
मिली, पूर्व भाग शेष ६०।४९ २४ को १०० में हीन किया तो शेष
३४११०३६ बचे इमको ६० से गुणा कर के सजाती किया तो माज्य
१४१०३६ हुआ इस में भाजक ५६४० का भाग दिया तो लब्ध वर्तमान
नक्षत्र का मोग्य घड़ी २६ पल मिले, गत ऐप्यका योग ६३।४९ हुआ।
स्पष्ट चन्द्र १३६० । ४९।२४ में २२५ का भाग दिया तो फल
गतराशि कन्या ६ मिली, शेष १० । ४९ । २४ को ३० से गुणा कर
सजाती किया तो ३४९ । २४ हुए इस में २२५ का भाग दिया तो
फलगत अंशादि १ । ३३ । १९ मिले, इम में गतराशि ६ को युत
किया तो स्पष्ट चन्द्रमा ६।१।३३।११ हुआ । स्पष्टसूर्य २०० । ४ ४ । ४९
में २२५ का भाग दिया तो फल गतराशि मिली, शेष २००१४४।४५
को पूर्वोक्त क्रिया करने से अंशादि फल २६ ९१।५६ मिले इसमें गत
राशि • युत किया तो स्पष्ट सूर्य ०।२६।५१।६६ हुआ ।। १३ ॥
योग विधिः-
एवं रवीन्दोर्युतितश्च योगाः
सूर्येन्दु भुक्तथैकहृतस्तु नाड्यः ॥१४॥
सं० टी०-एवममुना प्रकारेण रवीन्दोस्सूर्यचन्द्र-
योयुतितः, योगा भवन्ति च सुर्येन्दुभुक्तयैकहृतो नाड्यो
भवन्ति । एवं रवीन्दोयुतितश्चयोगाः सप्तान्विताश्चन्द्र-
गतिस्तुहार इत्यपिपाठः ॥ १४ ॥
"तिथिनक्षत्रयोगानां वृद्धिःपञ्चरसहि कम् ।
क्रमेणैव तु हृयन्ते रसवेदगजैः क्रमात्" ॥१॥

पञ्चाङ्गम्पष्ट धिकार:
०
भा० टी० -इसीप्रकार मृयचन्द्र के योग में १०० का
भागदने से फल गत योग होता है, शेषको ६० से गुणाकर
सजाती करके सूर्य चन्द्रमा की मुक्ति के योग का भाग देने से
लब्ध वनमान योग की मुक्तघड़ी होती है, पूर्व शेष को हर १००
में हीन कर उसको सजानी करके मुक्ति के योग का भागदेने
से वर्तमान नक्षत्र की भोग्य घड़ी होनी है ।। १४ ॥
उदाहरण-स्फुटसूर्य २००४ ४।४५ है, इसमें स्फुट चन्द्र १३६०
४९९३४ को युत किया तो १९६१३३४।९ हुए इस में १०० का भाग
दिया तो लब्ध गतयोग १५ वां बज्र हुआ, शेष ६१३४.९ को ६०
से गुणा कर के सजाती किया तो भाज्य २२१६४९ हुआ, सूर्य की
गति ७ । १६ है, चन्द्रमा की गति ९४ । ० है, इन दोनों को एक
जगह युक्त किया तो १०१ । १६ हुए इस को ६० से गुणा
करके
सजाती किया तो भानक ६०७६ हुआ, इस को भाज्य २२१६१९ में
माग दिया तो वर्तमान सिद्धि योग की भुक्त घड़ी आदि ३६।२९
मिली, और पूर्व शेष ६१ । ३४ । ९ को हर १०० में हीन किया
तो शेष ३८ । २५ । ५१ बचे, इस को ६० से गुणा करके सजाती
किया तो भाज्य १३८३५१ हुआ, इस में भाजक ६०७६ का भाग
दिया तो वर्तमान योग की भुक्त घटी आदि २२ । ४६ मिली, भुक्त
ऐप्य नाड़ी का योग किया तो ५६ । १५ हुआ ॥ १४ ।।
करणविधिः-
अर्कोनचन्द्राच्छरवेदहीनात्
ततोऽपिशेषाचशराब्धिलब्धम् ।
सप्तावशेषं करणं ववाद्यम
तन्नाडिकाद्यास्तिथिवद् भवन्ति ॥१५॥

भास्वत्याम् । ६ सं० टी०-अर्कोन चन्द्राच्छरवेदहीनात् ततोऽपि शेषाच्च शराब्धिलब्धं सप्तावशेषं बवाधं करणं भवति तन्नाडिकाद्या तिथिवद् भवन्ति ॥ १४ ॥ भा० टी०-स्पष्ट चन्द्रमा में स्पष्ट मूर्यको हीन करके फिर उसमें ४५ को घटाकर उसमें ४५ का भाग देनेसे जो लब्ध मिले उसमें ७ का भाग देनेमे शेष बवादिगत करण होता है, पूर्वभाग शेष को हरमें घटाकर वर्तमान करण की भुक्त भोग्य घड़ी तिथि की घड़ी की रीति से साधै ॥ १४ ॥ उदाहरण-स्फुट चन्द्र १३६० । ४९।२४ में स्फुटसूर्य २०० । ४४ । ४५ को घटाया तो ११६ ० १ ४ । ३९ बचे ० } ४ | ३९ बचे इस में ४५ और घटाया तो १११५ । ४ । ३९ वचे इसमें ४५ का भाग दिया तो फल २४ मिले इसमें ७ का भाग दिया तो शेष गतकरण ३ रा कौलव मिला, पूर्वशेष ३५।४।३९ को ६० से गुणा करके सजाती किया तो भाज्य १२६२७९ हुआ, चन्द्र गति ९४ । • में सूर्य गति ७ । २६ को हीन किया तो ८६ । ४४ हुए इप्स को ६० से गुणा करके सजाती किया तो भाजक ५२०४ हुआ, इसका भाज्य १२६२७९ में भाग दिया तो वर्तमान तैतिल करण की मुक्त घड़ी आदि२४।१६ मिलीं । फिर पूर्वशेष ३५।४।३९ को हर ४५ में हीन किया तो शेष ९।१५।२९ बचे इस को सजाती करने से माज्य ३५७२१ हुआ इस में भाजक ५२०४ का भाग देने से फल वर्तमान तैतिल करण की भोग्य घड़ी आदि ६ । ५२ मिली, वर्तमान करण का गत ऐष्य योग ३१।८ हुआ ॥ १४ ॥ स्थिर करणा:- परे दले कृष्ण चतुर्दशी या Home

६१
पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः।
तिथ्य भोगः शकुनिश्चतुप्पात् ।
नागश्च किन्तुन्नमिति क्रमेण
चत्वारिविद्यात करणानि नित्यम्॥१५॥
सं० टी०-कृष्णचतुर्दशी या परे दले तिथ्यई भोगः
शकुनी चतुष्पान्नागश्च किन्तुघ्नं चति क्रमेण चत्वारि
करणानि नित्यं विद्यात् ॥ १५ ॥
भा० टी०- कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के पर दल से तिथि
का आधा भोगने वाला शकुनी चतुष्पाद्-नाग-किंतुघ्न नामके
करण नित्य होते हैं, अर्थात् चतुर्दशी के उत्तरार्द्ध में शकुनी-
अमावस के पूर्वार्द्ध में चतुष्पाद्-उत्तरार्द्ध में नाग-और प्रतिपदा
के पूचाई में किंतुघ्न होते हैं ।। १५ ॥
अल्पश्रमेण पञ्चाङ्ग विधिः-
दिने दिने ऽहर्गण रूपयुक्तः
सप्तव सूर्ये च खनन्दमिन्दौ ।
खखेन्दवः केन्द्रगणे प्रयोज्या:
प्रागवत्स्फुटी कृत्यतिथिःप्रसाध्या॥१६॥
सं० टी०-दिने दिने कोर्थः प्रतिदिनेहर्गणरूप
युक्तः-सूर्येसप्तैव-इन्दौ चन्द्रे खनन्द-केन्द्रगणे केन्द्र-
समूहे खखेन्दवः प्रयोज्याः प्राग्वत् पूर्ववत् स्फुटीकृत्य
तिथिः प्रसाध्या ॥ १६ ॥

६२ २ भास्वत्याम् । भा० टी०-प्रतिदिन दिनगण में १ सूर्य में ७ चन्द्रमा में ९० केन्द्र में १०० को युतकर पूर्ववत् स्पष्ट करके तिथि आदि को साथै, इस श्लोक से और पूर्व के श्लोक से चन्द्र और चन्द्रकेन्द्र में अन्तर पड़ता है। चन्द्रमा में ९० । ।३०। और चन्द्रकेन्द्र में १००।१ । १२ को प्रतिदिन युत करने से ठीक होता है ॥ १६॥ सूर्यदिनगणसारणीयम् । एकाधङ्कानि ( एकाई )। ८ २ दिनगण १ ३ ५ ६ ७ १४ । २१ २८ ४९ ५६ ६३ अंश ० ० . विकला दशायङ्कानि ( दहाई )। ४० ९० दिनगण १४० २१० २८० ३५०/४२०४९०५६०/६३० अंश ० कला ० . विकला शताधकाने (सैकड़ा)। दिनगण १४०० अंश कला ० विकला पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। चन्द्रदिनगणसारणीयम् । एकाद्यङ्कानि ( एकाई) २ ac ९ दिनमा १८० २७० '३६० ४५० ५४० ६३०२० ' ८१० अंश २ २ ३ ४४ १ or ३. ३० ० विकला दशाद्यङ्कानि ( दहाई)। २ 30 ६० ७.८० ९० दिन गण ९०० १८०० . अंश ९०० १८०० २० १५ ३० ३५ कला . . विकला शतायङ्कानि ( सैकड़ा)। दिनगण १८०१ २ अंश ३० कला 0 विकला चन्द्र केन्द्र दिन गण सारणीयम् । एकाद्यङ्कानि ( एकाई) ३ ९ दिनगण १०.२००३०० ४०० ५००/६००/७०० ८००/९०० अंश २ ३ ६ कला १२ २४ १२ ४८ विकला ८ RAS भास्वत्याम् । दशायङ्कानि ( दहाई )। 0. ५० दिनगण १०००१२००० ३०० १३००२३०१. ६०१ १६०/२६०१ ९०१ अंश • १२ १२ ४८ कला . विकला . शतायङ्कानि ( सैकड़ा)। -- दिन गण १९०२ अंश . विकला भा० टी०-दिन दिन का दिन गणके अनुकूल मध्यम ग्रह जानने के लिये यह दिन गणसारणी तीन विभाग में बनाई गई है, पहिला विभाग जो ऊपर है उसमें एकादि (एकाईका) याने एकसे नवतक का अंक लिखा है, दूसरा विभाग जो पहिले विभाग के नीचे है उसमें दशादि ( दहाई का) अंक १०-२०-३० इस प्रकार से ९० तक लिखा है, तीसरा विभाग जो दूसरे विभाग के नीचे है उसमें शतादि ( सैकड़ा का) अंक एक सौ से तीन सौ तक लिखा है। जिस दिन का ग्रहस्पष्ट करना होय उस दिन का पहिले दिन गण बनावै, फिर जिस ग्रह को स्पष्ट करना होय उस ग्रह की दिन गण सारणी के अनकूल अर्थात् दिन गण में जो जो अक एकादिक का होय उस उस अंक के नीचे पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। जो जो अंशादि फल मिले उसको पृथक् पृथक् लिखना जाय पीछे सब अंक को एक जगह जोड़ देने से जो अंशादिक मिले उसको शास्त्राब्द से ल्याये हुए उस ग्रह के ध्रुवा में युक्त करने से उस दिन के मूर्योदय का मध्यम ग्रह होता है ।। उदाहरण- श्रीसम्बत् १९६८ शाका १८३३ वैशाखकृष्ण १० गुरुवार के दिन पूर्वोक्त रीति से दिनगण बनाया तो दिनगण : हुआ, सूर्य को स्पष्ट करना है और दिनगण में सिर्फ एकाई के अंकों में से है, इसमें सूर्य की दिनगण सारणी के एकाई में से • के नीचे देखा तो अंशादि ६३ । 0 1 0 मिले, इसको शास्त्राब्द से ल्याये हुये सूर्य के ध्रुवा ३ । २३ । ५३ में युक्त किया तो उस दिन का मध्यम सूर्य अंशादि ६६ । २३ । ५३ हुआ ॥ श्रीसंवत् १९६८ शाका १८३३ वैशाख शुक्ल १५ शनिवार के दिन दिनगण २९ है, सूर्य को स्पष्ट करना है, दिनगण में एकाई ९ है.दहाई दो इसमे सूर्य को दिन गण सारणी में एकाइ में से नव के नीच देखा तो अंशादि ६३ । । ० मिले, दहाई में दो है इस से वीस के नीचे दहाई के कोष्ठ में देखा तो अंशादि १४० । ० । ० मिले, इन दोनों को जोड़ दिया तो अंशादि २०३।०० हुआ, इसको सूर्य के ध्रुवा ३।२३।९३ में युत किया तो मध्यम सूर्य अंशादि २०६ । २३ । ५३ हुआ ॥ श्रीसंवत् १९६८ शाका १८३३ भाद्रपदकृष्ण ५ मङ्गलवार के दिनगण १२३ है, सूर्य स्पष्ट करना है दिनगण में एकाई में से तीन दहाई में से दो सैकड़ा में से एक है, पहिले इकाई में से तीन के नीचे देखा तो अंशादि २१ । ०। मिले, दहाई में दो है इससे बीस के नीचे देखा तो अंशादि १४० । । ० मिले, सैकड़े में एक है इस से सौ के नीचे देखा तो अंशादि अंशादि ७०० । ० मिले, इस तीनों अंशादिक अंक का एक नत्थी किया तो अंशादि ८६११०१० एक

मास्वत्याम् ।
--
हुआ, इसमें सूर्य के ध्रुवा ३ । २३ । ५३ को युत किया तो अंशादि
मध्यम सूर्य ८६४ । २३ । ५३ हुआ । इसी प्रकार से सब ग्रहों
को बनाकर वीज देशान्तर का संस्कार करने से वीज देशान्तर संस्का
रित मध्यम ग्रह होते हैं।
मङ्क्रान्तिविधिः
शत तत्वं शताई च
पादोनं क्रमशस्त्रिधा।
हिहीनं चाब्दगुणितम्
रवेस्सङ्क्रमणं भवेत् ॥ १७॥
पुनर्दिनिघ्नाब्दनगेषुचन्द्र-
लब्धं च घव्यादिषु युक्तमेतत् ।
रेखान्तरेणाघ्रियुतोन पूर्वे
परोऽथ मेषे खकृतिश्च देवे ॥१८॥
इति श्रीमच्छतानन्दविरचितायां भास्वत्यां पञ्चाङ्गस्पष्टा-
धिकारस्तृतीयस्समाप्तः ॥ ३ ॥
सं.टी.-शततत्वं शताई पादोनं क्रमशस्त्रिधाब्दगु-
णितं शताप्तं जातं वाराचं सप्ताधिकं सप्ततष्टं द्विहीनं घट्याचं
भवन्ति, पुनििननाब्द नगेषुचन्द्रैलब्धमेतत्पूर्व घट्या-
दिषु युतमथ ख कृतिदेवे च युक्तं रेखापरेणाघ्रियुतोन पूर्वे
परे-अर्थात् कुरुक्षेत्रात् पूर्वे देशान्तरेण युक्तं परे हीनं पुनः
व व क्षेपकाङ्कन युक्तं मेषादि सङ्क्रान्तिर्भवति॥१७॥१८॥

पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। ॥ ®" अब्दो भवनः पृथगर्कहीनः खागैकलब्धेन युतः खरामैः । लब्धाधिमासस्य तु योऽस्ति शेष- स्सैकोऽर्कसङ्क्रान्ति तिथिस्तु चैत्रे" । "वारे रूपं तिथौ रुद्र नाड्यां पञ्चदशैव हि । एकत्रिंशत् पले देया जायते सूर्यसङ्कमः" ॥ १ ॥ "अष्टाधिमासाः स्युर्नित्यं प्रोच्यन्ते फाल्गुनादयः । सौम्य पोषौ क्षयं नित्यं भवेतामिति निश्चितम् ॥१॥ क्षयो वाप्यधिमासो वा स्यादृर्ज इति निश्चितम् । न क्षयो नाधिमासः स्यान्माघो वै परिकीर्तितः ॥२॥ * उदाहरण- शास्त्राब्द ८१२ को ११ से गुणा किया तो ८९३२ हुए इसको दो जगह रक्खे एक जगह १२ घटाया तो ८९२० हुए इसमें १७० का भाग लिया तो लब्ध ५२ मिले, इसको दूसरी जगह ८९३२ में युक्त किया तो ८९८४ हुए इसमें ३० का भाग दिया तो लब्ध अधिमास २९९ मिले, शेष १४ बचे इसमें १ युत किया तो १५ हुए, चैत्र शुक्ल पूर्णिमा गुरुवार के घटी २८ पल २५ पर मेष की संक्रान्ति हुई। + श्रीसंवत् १९६८ शाका १८३३ में मेष संक्रान्ति वार ५तिथि १५ घटी २८ पल २५ पर हुई है, इस में वार्षिक क्षेपक श११।१५।३१ को युक्त किया तो शाका १८३४ में मेष की संक्रान्ति वार ६ तिथि २६ घटी ४३ पळ ५६ पर हुई इसी प्रकार से वृष आदि सब संक्रान्तियों को स्पष्ट करे।।

६८ भास्वत्याम् । पश्चमासास्तु वैशाखादधिमासा व्यवस्थिताः । भवन्ति चाष्टभिर्वष वैवाङ्क निशाकरः१३ ॥ ३ ॥ तथैव फाल्गुनश्चैत्रआश्विनः कार्तिकोऽधिका । एतेक्विन्द्रैः१४१ शरा३६५र्वा कदाचिद् गोकु१९वत्सरे॥४॥ मार्गपौषौ क्षयौ स्यातां कदाचित् कार्तिको भवेत् । अधिमामस्तदा भाद्रपदो ज्ञेयश्व फाल्गुनः ॥ ५ ॥ क्षयात् प्रागधिमासः स्यान्नित्यं भाद्रपदत्रये । आश्विनोजौ सदा स्यातामादौ भाद्रपदः सकृत् ॥६॥ द्वात्रिंशद्भिर्गतैर्मासैर्दिनैः षोडशभिस्तथा । घटिकाणां चतुष्केण पतत्यधिकमासकः ॥७॥ व्योमाग्निनागै रहितःशकेन्द्रा नवेन्दुभिर्भाजितशेषकाङ्कः। त्रिरुद्रखाष्टाष्टि शराश्च विश्वे हि चैत्रमारभ्य सदाधिमासः॥८॥ +वाणाग्नेिशकोनितशाक मध्ये सूर्याहतावेदयुतामुनीन्द्रैः। नवेन्दुभक्ता यदि यत्र शेषश्चत्रादि मासेषु तदाधिमासः॥९॥ *उदाहरण-शाका १८३४ में ८३० को घटाया तो शेष १०० ४ बचे इस में १९ का भाग दिया तो शेष १६ बचे अतः आषाढ अघिमास होना चाहिये । + उदाहरण-शाका १८३४ में १४३५ होन किया तो शेष ३९९ वचे इसको १२ से गुणा किया तो ४७८८ हुए इसमें ४ को युत किया तो ४७९२ हुए इसमें १९ का भाग दिया तो शेष ४ बचे अतः चैत्र से चौथा आषाढ अधिमास हुआ । T पञ्चाङ्गस्पष्टाधिकारः। ६९ चन्द्रार्कयोस्तुर्विवैक्यं प्रतिपद् दर्श सन्धिषु । अमान्तादुभयत्रापि रसनाड्योऽर्कमण्डलात्॥१०॥ तन्मण्डलाच्छशी गच्छेत्ततः सूर्यस्य संक्रमः । मासोऽसौ मलिनःप्रोप्तो न तद्धिनोऽधिकः स्मृतः॥११॥ असङ्क्रान्तिमासोऽधिमासः स्फुटं स्याद् द्विसङ्क्रान्तिमासः क्षयाख्यः कदाचित् । क्षयः कार्तिकादित्रये नान्यतः स्याद् तदा वर्षमध्येऽधिमास द्वयं च" ॥१२॥ भा०टी०-शास्त्राब्द को १२५।१०।७५ से गुणा करके उसमें १०० का भाग देने से क्रमशः वारादिक होते हैं (वार ७ से अधिक होय तो ७ से शेषित करै। फिर वार में २ घटा देवै, पुनः शास्त्राब्दको २ से गुणा करके उसमें १५७ का भागदेवै जो फलमिलै उसको पूर्व के ल्याए हुए घट्यादि में युत करे, फिर वारादिमें ०।२१।३३ को युत करके उसमें पूर्व पश्चिम के क्रमसे देशान्तर को धन ऋण करै, फिर उसमें जिस २ संक्रान्ति ( नक्षत्र ) का क्षेपक युक्त करै वह वह संक्रान्ति ( नक्षत्र ) स्पष्ट होती है ॥ १७ ॥ १८ ॥ उदाहरण-शास्त्राब्द ८१२ को १२१/९०७५ से गुणा किया तो १०२१९३।३५/०हुए इसमें १०० कामाग दिया तो फल वारादि १०२११५६।९ मिले वार १०२१ में ७ का भाग देने से शेष १ वचे इसमें २ घटाया तो वारादि ४१५६।९ हुए, शास्त्राब्द ८१२ को २ से गुणा किया तो १६२४ हुए इसमें १५७ का भाग दिया तो फल घटी आदि १०।२१ मिले इसको पूर्व के ल्याए हुए वारादि के ७० भास्वत्याम् । घटी आदिमें युक्त कियातो वारादि ५।६।३० हुए इसमें ०२११३३ को युत किया तो वारादि ५।२८।३ हुए इसमें स्वदेशका देशान्तर पल ४७ को युत किया तो सङ्क्यान्त का ध्रुवा १।२८।५० हुआ इसमें मेष राशि का क्षेपक ०101 ० को युक्त किया तो मेष संक्रान्ति वारादि ५।२८।५० हुई। ध्रुवा १।२८।५० में वृष राशिका क्षेपक २।५७।१ को युक्त किया तो वृष राशि की संक्रान्ति वारादि १।२६।११हुई, इस प्रकार से ध्रुवा में वारहो राशि अट्ठाईसो नक्षत्र का क्षेपक युक्त करके स्पष्ट करै॥१७॥१५॥ शकाङ्काः । १८३३१८५३१८७३१८९३,९१३ ९३३१९५३१९७३ शक ८३३ १८५ ६ ३ १ ૨ ५९ ९ ४० घटी NA २३ पल १९९३२०१३२०३३ २०५३२०७३२०९३२११३/२३३ शक ३ २ ६ ३ D वार Nos १ ३२ ४२ ३ घटी ४३ ३ २३ ३ २३ | ४३ पल २१५३२१७३२१९३२२१३२२३३ २२५३२२७३/२२९३ शक / २ ६ ३ . २ ६ ३ वार १३ ३४ ४४ २५ घटी २३ ३ २३ ४३ ३ २३ पश्चाङ्गरपष्टाधिकारः। ७१ शपांकाः । १ २ ३ ६ १० शेष १ २ ३ १ ५ वार ३१ ४६ २ ३३ ४ । १९ ३५ घंटी ३१ २ ३३ ३५ ६ ३९ १० पल १३ १४ १६ १७ १९ २० शष ६ २ १ ३ ६ १ २ भ ६ ३७ घटी १४ पल सङ्क्रान्ति क्षेपकाङ्काः। म. वृ. वृ.मि. क. बि. क. संक्रान्ति २ ६ ६ २ वार ३. घटी १ तु. वृ. कुं. मी. मङ्क्रान्ति ६ १ वार २ ३ ३ घटी पल ७२ भास्वत्याम् । नक्षत्र क्षेपकाङ्काः। अ. कृ. रो. मृ. आ पुः पु. म. नक्ष ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ ६ वार २४ २४ २५ ३२ ३२ ३० घटी . ३५ ३६ ३८ पल पू. उ. ह . चि स्वा. वि. अ. ज्ये. मू. नक्ष. ६ ६ ३ ३ २ १ वार १९ ५ १२ १७ घटी ४१ ४६ ४७ ४८ ११ पू. उ. अ. श्र. ध. श. पू . उ. ३ २ २ १ ५१ ४२ घटी ३५ भाषावार्तिक-सारणी से संक्रान्ति और नक्षत्र स्पष्ट करने की यह विधि है कि शकांक और शेषाङ्क को युक्त करके उस अपने देश के देशान्तर को धन ऋण करने से वर्ष भर की संक्रान्ति या नक्षत्र साधने का ध्रुवा होता है, फिर जिस २ राशि का क्षेपक उस में युक्त किया जायगा उस २ राशि की संक्रान्ति होगी या जिस २ नक्षत्र का क्षेपक युक्त किया जायगा वह २ नक्षत्र होगा (संक्रान्ति नक्षत्र का क्षेपक मकरन्दसारणी से लिखा गया है,

पश्चाङ्गस्पष्टाधिकारः।
७३
उदाहरण-शाका १८३६ में पुस्तकीयशक १८३३ को हीन
किया तो शेष २ बचे शकके नीचे वारादि ५।२८।३ शेषांक के नीचे
वारादि २१३१३२ है, इन दोनों को एक जगह जोड़ने से इस वर्ष की
संक्रान्ति नक्षत्र साधने का चारादि ध्रुवा ०५९।६ हुआ, इस में काशी का
देशान्तर पल ४७ को युक्त किया. तो १९९९२ हुए इस में सिंह
राशि का क्षेपक ६।३०१४ युक्त किया तो सिंह संक्रान्ति वारादि
०।२९।१६ स्पष्ट हुई, इस ध्रुवा ०६९।५२ में हस्त नक्षत्र के क्षेपक
१/४३१४३ को युक्त किया तो हस्त नक्षत्र वारादि ६।४३।३९ स्पष्ट
हुआ ( बहुत से लोग काशी का देशान्तर १२९ मानते हैं)।
इति श्रीज्यौतिषीन्द्रमुकुटमणि श्रीदछत्रधरमूरि सूनुना गणक
मातृप्रसादेन विरचितायां भास्वत्यां छात्रबोधिनी नाम
टीकायां पञ्चाङ्गस्पष्टाविकारस्वतीयस्समाप्तः ॥३॥

माखत्याम्। अथ ग्रहस्पष्टाधिकारः। मध्यमभौम विधिः- भौमः स्वरनायुगणात् कृताप्तम् पुनर्घवन्दात् त्रिशताप्त हीनम् । संन्टी.-स्वरनात् सप्तगुणाद् धुगणाद् दिनगणात कृताप्तं चतुर्भिर्भाजितं, पुनघुवृन्दादहर्गणात् त्रिशताप्त हीनम् (शास्त्रशरदागत ध्रुवके युत) मध्यम भौमो भवति॥ भा० टी०-दिनगण को ७ से गुणा करके उस में ४ का भागदेने से जो फलमिलै उसफल में, दिनगण में ३०० के भाग- देने से जो फल मिलै उसको घटावै फिर उसको मङ्गलके ध्रुवा में युक्त करने से उस दिन सूर्योदय काल में मध्यम भौम होता है। उदाहरण-दिनगण २७ को ७ से गुणा तो १८९ हुए इसमें १ का भाग दिया तो फल ४७ । १५ । ० मिले फिर दिन गण २७ में ३०० का भाग दिया तो लब्ध ० | ५ | २४ मिले इस को १७ । १५ । ० में घटाया तो ४७ । ९ । ३६ हुए फिर इस को मङ्गरु के ध्रुवा ९०२ । २ । १३ में युक्त किया तो उस दिन सूर्यो- दय में मध्यम भौम ९४९ । ११ । ४९ हुआ ॥ भौम दिनगण सारणीयम् । एकाधनानि ( एकाई)। १ २ ३ ६ ९ दिनगण १ ३ ६ २८ १३ १३ १५ अंश ५८ ४३ कला १२ विकला ४८ ३ ४८ प्रहस्पष्टाधिकार: दशाघकानि ( दहाई)। दिन १० २० ३० ४० ५० ६० । ३४ ५२ ६८ ८७ १०४१२२, १३९ १५७ अं. ५२ २० १२ -- 0 दि. शताघकानि ( सैकड़ा)। १०० २०० दिनगण ५२४ अश विकला बुधशीघ्र विधिः- अष्टाष्टशेषः खखरामनिघ्नः पक्षानिभिस्सोम सुतस्यशीघ्रम् ॥१॥ सं. टी.-अहर्गणोऽष्टाष्टशेषः ततः खखराम- निनः शत त्रयेण गुणितः पक्षाक्षिभिविंशतिभिर्भजेत् (शास्त्राब्दागत शीघे युक्तेसति) सोमसुतस्य बुध- स्य शीघ्रं भवति ॥१॥ भा० टी०-अहर्गण में ८८ का भागदेने से जो शेष बचे उसको ३०० से गुणि २२ का भागदेने से जो लब्ध मिले भास्खयाम् । रसको शास्त्राब्द से आयेहुए शीघ्रमें युक्त करने से उस दिन सूर्योदय के समय बुधका शीघ्र होता है ॥ १ ॥ उदाहरण-दिनगण २७ में ८८ का भाग देने से शेष २७ बचे, इसको ३०० से गुणातो ८१०० हुए फिर इसमें २२ का भाग देने से लब्ध ३६८।१०।५५ मिले, इसको शास्त्राब्द से ल्याये हुए शीव ४१२।१५।४० में युक्त किया तो बुधका शीघू ७८० । २६ । ३५ हुआ ॥१॥ बुधदिनगण सारणीयम् । एकाद्यङ्कानि ( एकाई )। १ ૨ ३ ४ ६ । ९ दिनगण १३ २७ ४० ५४६८८१ ९५ १०९, १२२ अंश ३८ १६ ४९।२७ ४३ कला ११२ ช ง રૂર २७ ३८ विकला दशाद्यङ्कानि ( दहाई )। १० २० ९० दिनगण - १३६/२७२/४०९/५४५/६८१८१८/९५४/१०९० २७ अंश ५ २७ ४९ १०३२ ५४ १६ ५०/३९ ३०१९ १०५९ ५० ३९ ३० विकला शताधङ्कानि ( सैकड़ा)। ३०० दिन गण. अंश ३८ ५५ ४० विकला ग्रहस्पष्टांधिकारः। मध्यमगुरुविधिः- गुरुर्गुणघ्नायुगणादशाप्तो वेदाब्धिभिलब्ध विवर्जितश्च । सं.टी.-गुणाम्नायुगणात् त्रिभिर्गुणिताद् दिनगणाद् दशाप्तो दशभिभक्तश्च पुनर्दिनगणाद् वेदाब्धिभिलब्ध- विवर्जितः (शास्त्रब्दागतध्रुवके युक्तः) गुरुर्भवति ॥ भा० टी०-दिनगण को ३ से गुणि दश का भाग देने से जो लब्ध मिले उसको एक जगह धरि देवे, फिर दिन गण में ४४ का भाग देनेसे जो लब्ध मिलै उसको पहिले के लब्ध में घटा कर बृहस्पति के ध्रुवा में युक्त करने से मध्यमगुरु होता है। उदाहरण-दिनगण २७ को ३ से गुणा तो ८१ हुए इसमें १० का भाग दिया तो लब्ध ८।६। • मिले, फिर दिन गण २७ में ४१ का भाग दिया तो लब्ध । ३६ । ४९ मिले, इसको पूर्व के लब्ध ८ । ६ । 0 में घटाया तो ७ । २९ । ११ । बचे इसको वृहस्पति के ध्रुवा ६६४ । ४६ । २० में युक्त किया तो मध्यम गुरु ६७२ । १८ । ३१ । हुआ ।। गुरु दिनगण सारणीयम् । एकाधङ्कानि ( एकाई)। १ २ ३ ५ ८ ९ दिनगण. ० OLA १ १ or २ २ अंश २३ कला ३८ १६ ३२ ११ ४९ विला

भाखत्याम्।
दशायङ्कानि ( दहाई )।
१०
३०
४०
९. दिनगण
२
२४ अंश
५
८
१६ | १९ २२
कला
४६ ३२
५१ ३८२४
४९ ११
१६ विकला
२१४३
शताद्यङ्कानि (सैकड़ा)।
दिनगण.
२७
अंश
कला
विकला
३८
१६
शुक्र शीघ्रविधिः-
वेदा हतोऽधोगुण भागयुक्तः
सितस्य शीघ्रं सहितः खशक्रः॥२॥
सं० टी०-वेदाहतश्चतुभिर्गुऽणीतो दिनगणोऽधः
स्थानद्वये स्थाप्यः-एकत्र गुणाप्तः त्रिभिर्भजेल्लब्धमंशादि-
रन्यत्र द्वितीय स्थाने युक्तः, पुनर्दिनगणात् खशः
प्राप्त फलेन सहितो युक्तः (शास्त्राब्दागत ध्रुवके युक्ते
सति) सितस्य शुक्रस्य शीघ्रं भवति ॥ २॥

अहस्पष्टाधिकारः । भा० टी० -दिनगण को ४ से गुणाकर दो जगह रक्दै, एक जगह ३ का भाग देने से जो लब्ध मिलै उसको दूसरे जगह जोड़े, फिर दिन गण में १४० का भाग देने से जो फल मिडै, उसको पूर्व अङ्क में युक्त करि शुक्र के ध्रुवा में युक्त करने से शुक्र का शीघ्र होता है ॥२॥ उदाहरण-दिनगण २७ को ४ से गुणा तो १०८ हुए इस को दो जगह धरि के एक जगह ३ का भाग दिया तो लब्ध ३६ ।। 1 • मिले, इस को दूसरी जगह युत किया तो १४४ । । ० हुए, फिर दिन गण २७ में १४० का भाग दिया तो फल ० । ११ । ३४ मिले इसको १४४ । ० । में युत किया तो १४४ । ११ । ३१ हुए, इसको शुक्र के शीघध्रुवा २६३ । २०। ५२ में युत किया तो शुक्र का मध्यम शीघ्र स्पष्ट ४०७ । ३२ । २६ हुआ ॥२॥ शुक्र दिन गणसारणीयम् । एकाद्यकानि ( एकाई) - दिन २ ३ ६ ९ गग १० १६ २१ २६ २० १ २ ४२ ४८श २३४३ ३ कला २६ ५१ विक० १७ ४३ ९ ३४ दशाघकानि ( दहाई)। दिन २० RAD ५० ७० ५३ १०६ १६० २१३,२६७ ३२०३७३ ४२७४८० अंश १२ १४ १६ ३३ विक० ८ ४२ ५ ९ भास्वत्याम्। शताधङ्कानि ( सैकड़ा)। दिनगण १०० १०६८ अंश ३ ८ कला विकला - मध्यमशनिविधिः- शनिर्युरन्दान्नव भाग लब्धम् ध्रुवान्वितं रव्युदयस्य मध्याः। सं० टी०-धुवृन्दाद् दिन समूहान्नव भाग लब्धं सुवान्वितं शनिर्भवति, रब्युदयस्य सूर्योदयस्य मध्या भौभादिग्रहा भवन्त्येवम् ॥ भा० टी०-दिन गण में ९ का भाग देने से जो लब्ध मिले उसको शनि के ध्रुवा में युक्त करने से सूर्योदय का मध्यमशनि होता है । इस प्रकार से सूर्योदय के समय मङ्गल आदि ग्रह का मध्यम स्पष्ट होता है ।। उदाहरण-दिनगण २७ में ९ का भाग देने से लब्ध ३० 1. मिले इसको शनि के ध्रुवा ५४०० में युत करने से मध्यम शनि ५७ ० । • हुआ । शनि दिनगण सारणीयम् । एकाद्यवानि ( एकाई)। दिनगण WERames ३ ७ sam . १ अंश ६ ४०२० २० ० विकला प्रहस्पष्टाधिकारः। ८१ दशाधनानि (दहाई)। दिन गण १ २ ३ " ६ ८ १० अंश २० २६ । ३३ । ४० ० कला ४० २० ० २० ० • विका शनायङ्कानि (सैकड़ा) २०० ३०० दिनगण २२ अंश १३ २० कला विकला बुबशुक्रयोर्मध्यम-भौम गुरु शनीनां शीघ्रविधिः- दिग्नाद् घनोनात् खनगांश हीनात त्रिभि गुज्ञार्कि कुजेज्यशीघ्रम् ॥३॥ सं. टी.-दिगन्नाद् दशगुणाद् दिनगणाद् घनो- नात् सप्तदशभिरूनात् ततः स्थनद्वये धृत्वा, एकत्र खनगांशेन विभाजितफलमन्यत्र हीनात् त्रिभिर्विभाजितं भृगुज्ञमध्यमौ-अर्किकुजेज्य शीघ्रं बुधशुक्रयोर्मध्यमौ भवतः, भौमगुरुशनीनां शीघ्रं भवति ॥ ३ ॥ भा० टी०-दिनमण को १० से गुणा कर उसमें १७ घटाकर दो स्थान में स्थापित करके एक स्थान में ७० का भाग ११ ८२ भाखत्याम् । देने से जो फल मिलै उसको दूसरे स्थान में घटाकर फिर उस में ३ का भाग देने से जो फल मिलै वह बुध-शुक्र का मध्यम और मङ्गल-वृहस्पति-शनिश्चर का शीघ्र होता है ॥३॥ उदाहरण-दिनगण २७ को १० से गुणा तो २७० हुए इसमें १७ घटाया तो २५३ हुए इसको दो स्थान में स्थापित किया, एक स्थान २९३ में ७० का भाग देने से लब्ध ३।३६।९१ मिले इसको दूसरे स्थान २५३ में घटाया तो २४९।२३।९ हुए इसमें ३ का मागदिया तो बुध-शुक्र का मध्यम, मङ्गल-वृहस्पति-शनिका शीघ्र ८३१७।४३ हुआ ॥३॥ ( यहाँ एतना विशेषता है कि एकाद्यंक सारणी का अंक केवल नवही दिन गण तक रहैगा, दशाद्यंक तथा शतायंक सारणी के साथ दिन गण के एकादि अंक के लिये एक होय वहाँ ३।१७।९ युक्त करें और दो के जगह ३।१७।९ का दूना ६।३४।१८ युक्त करै इसी प्रकार से तीन के जगह २०१७।९ का तिगुना चार के जगह चौगुना इसी प्रकार से आगे भी जानै )॥ बुधशुक्र मध्यम भौम गुरु शनि शीघ्र दिनगण सारणीयम् । एकाद्यानि ( एकाई)। १ २ ३ | ६ ७ ८ ९ दिनगण अंश कला १७ २५ ३३ ४२ ५० ५९ विकला ग्रहस्पष्टाधिकारः। ८३ दशायनानि (दहाई)। १० २० ३० ४०५० ६० दिनगण ८१ १०९ १३६ १६२.१९० २१८ २४५ अंश १६ ३२ ४८ ५२ १० २६ 928 १७ | ३३ ५० ४०। ५७ १४ ३१ विकला शताद्यङ्कानि ( सैकड़ा)। १०० २००,३०० दिनगण २७२५४५, ८१८ अंश २५ ३६ २४ विकला भौमादीनां देशान्तरम् । मं. बु. वृ. ! शु. श. ग्रह ० om - विकला । अंश २ ३८ ક ३८ ६ ऋऋऋ भौमादीनां वीजाः। वृ. ग्रह ० সহ २ ११. १८ ३ विकला व. ध घ. धन ८४ भास्वत्याम्। भौमादीनां बीजदेशान्तरयोरन्तरम् । मं. बु वृ.शु श. ग्रह অব १ कला ३ विकला 4. ध. ध. ऋ ध.ऋ. भाषाबार्तिक--बुध शुक्र के शीघ्र में और मङ्गल वृहस्पति- शनिके मध्यम में वीज देशान्तर को युक्त अथवा हीन ( अन्तर धन होयतो युक्त, ऋण होयतो हीन ) करने से वीज देशान्तर से संस्कारित ग्रह होते हैं। उदाहरण-मध्यम भौम ९४९।११।४९ में बीज देशान्तर के अंतर ऋण ११ । १३ को घटाया तो संस्कारित भौम ९४९।११ ३६ हुआ। ( ऐसे ही बुध आदिक का भी संस्कार करै) वीज देशान्तर संस्कारित मध्यम शीघ्र भौमादिग्रहाः । म. बु.शी. वृ. शु.शी. श. बु.शु.शी-म.गु.श म. प्रह ८३ अंश ९४९,७८०६७२.४०७ ५६ २८ ३३३२ ५९ कला ३३ विकला पञ्चतारा स्पष्टविधि:- अष्टेषु षट् नन्द चतुश्शताव्याः पृथग् ग्रहाः षड्भ गतैष्य केन्द्राः। - ग्रहस्पष्टाधिकारः। : षड्भादिकाः चक्रगणाद् विशोध्याः शतेन लब्धाः स्फुटमत्र खण्डाः ॥४॥ रुद्रा नवेन्दु द्वियमा नवेन्दु- रुद्राश्च भोग्योद्भव युक्त हीनाः । षड्भोन केन्द्रे खचरे ऋणं स्यात् षड्भाधिके चेत् धनमत्र कार्य्यम्॥५॥ घनाग नाग त्रय सूर्य निघ्नाद् दशोघृतं हीन धनं च मध्ये। पृथक् स्वशीघ्रोनित केन्द्र खड्भात् त्रिघ्नात्स्वशीघ्रोनयुतःस्फुटःस्यात्॥६॥ सं० टी०--वीज देशान्तर संस्कारित भौमादि. ग्रहाः पृथक् स्थान द्वये स्थाप्या एकत्र, अष्टेषु षट् नन्द चतुश्शताढ्याः कर्तव्याः । भौमोऽष्टशताधिकः, वुधः पञ्चशताधिकः, गुरुः षट्शताधिकः, शुक्रो नवशताधि- कः, शनिः चतुश्शताधिकः कार्यः, ते षड्भ गतैष्य केन्द्रा भवन्ति, चेत् षड्भाधिकाः चक्रगणाद् विशोध्याः, (द्वादशशताधिके द्वादशशतैः प्रयात्य शेषं गतगम्य केन्द्रो भवति ) अत्र शतेन लब्धाः क्रमशः रुद्रा न- वेन्दु द्वियमानवेन्दु रुद्राश्चेति खण्डा स्फुटम् लभ्यत भास्वत्याम्। , इत्यर्थः, लब्धाङ्क तुल्यगत खण्डको धार्यः तदग्रिम भोग्य खण्डकः स्थाप्यः भोग्योद्भव युक्तहीना मुक्त भोग्य मध्ये यो यस्मिन् पतति सः तस्मिन् पातनीयः छातभागशेष खण्डान्तरेण संगुण्य शतेन भजेद् यल्लब्धं तद् यदि गतखण्डाभोग्य खण्डकोऽधिकः तदा भुक्त खण्डके योज्यं, यदा भुक्तखण्डाद् भोग्य खण्डको न्यूनः तदा मुक्त खण्डके न्यून कर्तव्यं, यदान्तिम खण्डको लभ्यते तदान्तिम खण्डैवान्तरो भवति, यदा शतभागात खण्डा न प्राप्यते तदा प्रथमखण्डैवान्तरो भवति । शतभाग शेषमन्तरेण संगुण्य शतेन भजेल्लब्धमशादिकं मन्दफलं भवति । तत्कलं घनागनागत्रय सूर्यनिघ्नाद् गुणीताद् दशोद्धृतं दशभिर्विभाजितं फलं षड्भोन केन्द्रे सति मध्ये मध्यमग्रहे ऋणं स्यात् , यत्र षड् भाधिके चेद् धनं कार्यम् , कृते सति मन्दस्फुटा ग्रहा भवन्ति । मन्दस्फुटा ग्रहाः पृथक् स्थान द्वये स्थाप्या एकत्र स्वशीघेणोनाः ( यदा न पतति तदा द्वादशशतं संयोज्य पातयेत् ) शेषं शीघ्र केन्द्रो भवति । अत्रापि मन्दफलवच्छ्रीघ्रफलं ज्ञेयम् , यत्र शतभागेन पञ्चमख- ण्डको लभ्यते तत्र लब्धं पृथक् संस्थाप्य शेषं त्रिभिः सं. गुण्य शतेन हरेद् यल्लब्धं तत्पृथक् स्थापित संयोज्य योजिते सति यावत्सङ्ख्यको भवति तावत्सङ्ख्यको भुक्त , ग्रहस्पष्टाधिकारः। खण्डके प्राप्यते, त्रिगुणिताच्छेपाच्छतभागेन न किञ्चित प्राप्यते तदा पञ्चमखण्डएव-मन्द स्पष्टग्रहाः शीघ्र फलेन संस्कृताः स्पष्टग्रहा भवन्ति । “भादिः कृतने" तिवक्षमाण पद्येन-अनुमानं भवतीत्यत्रशतभागेन राश्यादिकाः स्पष्टाग्रहाभवन्ति ॥ ४ ॥ ५॥ ६ ॥ "यदान्त्य खण्डं पतितं तदाशु स एव भोग्य क्रियते फलोनः । न प्राप्यते यत्र तदा क्रमं च तत्पूर्व खण्डोद्भवमभ्र युक्तम् ॥ १॥ ग्रहः स्वशीघ्रोनितके यदा स्या- हणे धने वा शर राशि सङ्ख्यः। राशि विनाङ्का त्रिगुणी प्रकुर्यात् तदा ततः शीघ्रफलं प्रसाध्यम्” ॥ २॥ भा० टी०--मङ्गल--बुध--वृहस्पति--शुक्र--शनि का क्रम से ८०० ।५००। ६०० । ९०० । ४०० मन्दोच्च है। संस्कारित मध्यम ग्रहको दो जगह धरके एक जगह मन्दोच्च युक्त करने से मन्द केन्द्र होता है, मन्द केन्द्र ६०० से अधिक हो तो १२०० में घटाने से जो शेष बचे वह मन्द केन्द्र होता है, और यदि १२०० से अधिक होय तो उसको १२०० से शेषि करने से शेष मन्द केन्द्र होता है, मन्द केन्द्र छः राशि से न्यून होय तो ऋण संज्ञक, छः राशि से अधिक होय तो धन संज्ञक कहाजाता है, (शीघ्र केन्द्र मे भी ऐसे ही जान ) मन्द केन्द्र में १०० का भाग देने से ८८८ भास्वत्याम्। . क्रमशः १९ । १९ । २२ । १९ । ११ खण्डाङ्क होता है ( अर्थात् एक लब्ध में ११ दो लब्ध में १९ नीन लब्ध में २२ चार लव्ध में १९ पांच लब्ध में ११) भुक्त खण्डा के आगे का अंक भोग्य खण्डा कहाता है, भुक्त भोग्य खण्डा के अन्तर (मुक्त खण्डा से भोग्य खण्डा अधिक होय तो धन, न्यून होय तो ऋण संज्ञक अंतर होता है उस ) से शेष को गुणा कर १०० का भाग देने से जो फल मिलै उसको खण्डान्तर धन होय तो भुक्त खण्डा में युक्त करने से खण्डान्तर ऋण होय तो हीन करने से मन्द फल होता है। भौमादिकों के मन्द फल का क्रमशः १७।७।८।३।१२ यह गुणक है । मन्दफल को गुणक से गुणकर १० के भाग से मिले फल को मन्द केन्द्र छः राशि से न्यून होय तो दूसरे जगह रखे हुए मध्यमग्रह में घगने से और मन्द केन्द्र छः राशि से अधिक होय तो दूसरे जगह रक्खे हुए मध्यमग्रह में युक्त करने से मन्दस्पष्ट होता है। मन्दस्पष्ट ग्रह दो जगह रक्खकर एक जगह शीघ्रोच्च घटाने से शीघ्र केन्द्र होता है (न घटै तो मन्द केन्द्र में १२०० युक्त करिके घटावै) वह शीघ्र केन्द्र छः राशि से न्यून होय तो उसी में, छः राशि से अधिक होता उसको १२०० में घटाकर उस में १०० का भाग देने से जो लब्ध मिलै उस लब्ध के तुल्य भुक्त खण्डा उसके आगे का भोग्य खण्डा होता है दोनों के अन्तर से शेष को गुणि १०० का भाग देने से जो फल मिलै उस को मुक्त खण्डा में अन्तर ऋण होय तो घटाने से और यदि अन्तर धन होय तो युक्त कर देने से शीघ्र फल होता है । यदि १०० के भाग से ५ वाँ खण्डा मिले तो शेष को तीन से गुणि १०० के भाग से मिळे फल को ५ में युक्त करने से ग्रहस्पष्टाधिकार. ! मुक्त खण्डा होता है ( आग पूर्ववन् कर्म करने मे शीघ्र फल होता है.) शीत्र फल को केन्द्र छः राशि में न्यून होय नो दूसरे स्थान में घरे हुए मन्द स्पष्टग्रह में बटाने में यदि छः राशि से अधिक होय तो युक्त करने से संस्कृत स्पष्टग्रह होता है ( "भादिः कृतघ्नः" इस श्लोक से अनुमान होता है कि संस्कृत स्पष्ट ग्रह में १०० का भाग देने से राज्यादि सष्ट ग्रह झता है) ॥ ४॥६॥६॥ औमादीनां मन्दोदचक्रम् म.बु. वृ. ८०० ५००६.०९०.४०० मन्दोच्च ५०० ६०० भौमादीनां मन्दकेन्द्र खण्डाङ्काः । ६ १ ३ घ. न । घ.ऋ. भौमादीनां गुणकाङ्काः। वृ. . . ८ १२ । गुणक १२ भाखत्याम् । शीघ्रखण्डाङ्का:- भौमस्य खाब्धी नगसप्त खेशा देवेन्दु जातीन्गगो नगार्थाः । बुधस्य भाग्नीषु कुसप्त षट्रवराः ततत्रिपञ्चाङ्गगुणा नवेन्दवः ॥७॥ गुरोपाः खानि गजस्त्रयं च घडवलयो रामयमा नृपाङ्काः। भृगोढिवेदाः कुगजाः खसूर्याः व्योमाह नागेन्द्र भभूत्रिशैलाः ॥८॥ एनेर्दिशोऽब्दा कुयमा नवेन्दू द्विभूमयो मङ्गलमब्धयश्च । वीजैस्सुगोप्यैरिहखेचरास्ते सिद्धान तुल्यं खलु संस्कृतं स्यात् ॥६॥ सं.टी.-भौगस्य खाब्धी नगसप्त खेशा देवेन्दु जाती- न्द्वगगो नगार्थाः खण्डाङ्काः, बुधस्य भाभीषु कुसप्त षट् स्वराः ततत्रिपञ्चाङ्गाणा नवेन्दवः खण्डाकाः, गुरोर्जी- वस्य नृपा खाग्नि गजस्त्रयं च षड्बह्नयोरामयमा नृपाङ्काः खण्डाकाः, सुगोश्शुक्रस्य द्विवेदाः कुगजाः खसूर्य्याः व्योमाह नागेन्द्र भभूखिशैलाः खण्डाङ्काः, शनेश्शनिश्च.

प्रहस्पष्टाधिकारः। रस्य दिशोऽब्दा कुयमा नवेन्दु द्विभूमयो मङ्गलमब्धयश्च खण्डाङ्का भवन्ति, इह खेचरा ग्रहाः सुगोप्येव-जैः सं- स्कृतं सिद्धान्त तुल्यं स्यात् ॥ ७ ॥ ८ ॥ ९ ॥ भा. टी.- मंगल का ४०७७।११०।१३३।१२२१२.७१७७ बुध का २७१५३।७११७६१५३६३६।१९ वृहस्पति का १६।। ३८१३६।२३।१६।९ शुक्र का ४२०८११२०।१५०११४८।१२।७३ शनिश्वर का १०।१७।२१।१९।१२।८।४ खण्डाङ्क है। यह याने करणशास्त्र में गुप्त बीज से संस्कारितग्रह सिद्धान्त के तुल्य होते हैं ॥ ७॥ ८ ॥ ९ ॥ भौमशीन खण्डाकान्तरचक्रम् । १ २ ६ 0 ७७ ११० १३३ १२२, ९७ ११ बुधशीघ्रखण्डावान्तरचक्रम् । १ ૨ ३ ४ ६ संख्या 0 २७ ५३, ०१ ३६ १९ खण्डा १ ७६ ५३ २३ ७ १७ । १९ अन्तर ध ध. घ. ध. ऋ. ऋ. ऋ. ऋ..

भास्वत्याम गुरुशीघ्रखण्डाङ्कान्तरचक्रम् । २ ३ ६ संख्या ७ १६ ३० ३८ ३६ २३ १६ खण्डा ६, १४ ८ २ अन्तर ध. ऋऋ ऋघ. शुक्रशीघ्रखण्डान्तरचक्रम् । २ २ ३ ६ मंख्या १२० १५० १४८ १२७ ७३ खण्डा ४२ / ८१ १२० १५ ३० २ अन्तर घ. घ. ध. ध. . ऋ ऋ ऋ ऋ. ध ऋ शनिशीघ्रखण्डान्तरचक्रम् । १ २ ३ ६ संख्या १० २१ । १९ કર खण्ता १० २ ४ ऋ.ऋ. ऋऋऋ ध.ऋ. उदाहरण-मध्यम भौम ९४९।१०।३६ को दो स्थान में स्थापित किया, एक स्थान में मंगलका मन्दोच्च ८०० युत किया तो १७४९। १०.३६ हुए, इसमें १२०० का भाग दिया तो शेष मंगल का मन्दकेन्द्र ग्रहस्पष्टाधिकारः। . ५४।१०।३६ हुआ, इसमें १०० का भाग दिया तो फलगत खण्डा ५ वां मिला पाचवां गत खडा १ है, मान्य झण्डा के अभाव में एही अन्तर हुआ, भाग प ४९११३६ को अन्तर ११ से गुणा तो ५४ ० ०६:३६ हुए इसमें १०० का भाग देने से फल ९।२४। २४ मिले इसको पुजवण्डा ११ में घटाने मे मन्दफल ५।३१।२६ हुआ, इसको १७ से गुणा तो ९५।२१२२१ हुए इसमें १० का भाग देने से लब्य १३० १४ मिले इसको, केन्द्र छः राशि से न्यून है इससे दूसरे जगह रवन्ने हुए मध्यम भौम ९४९।१०।३६ में घटाया तो मन्द म्पष्ट भौम १३९१४१२२ हुआ। नन्दम्पष्ट भीम को दो जगह धरि एक जगह इस ९३९:४०१२२ में भौम के शव ८३१७:४३ को घटाया तो भौमका शीघ्र केन्द्र ८५६॥३२॥३९ हुआ, इमको १२०० मे घटाया तो ३४३। २७१२१ हुए इसमे १०० का भाग दिया तो फल ३ मिला तीसरा भुक्त खंडा ११० भाग्य खडा १३३ इन दोनों का अन्तर धन २३ हुआ इससे शेष ४३१२७१२१ को गुणा किया तो ९९९।२९।३ हुए इसमें १०० का भाग दिया तो फल ९:५९:४१ मिले इसको भुक्त खंडा ११० युत किया तो शीघ्र फल ११९ । ५९। ४१ हुआ, शीत्र केन्द्र छः राशि से अधिक है इससे दूसर जगहवरे हुए मन्दस्पष्ट ९३९:४०।२२ में शीघ्रफल ११९।५९ ४१ को युन किया तो सष्ट भीम १०५९१४०१३ हुआ। इनमें १०० का भाग देने से भौम की स्पष्ट राशि आदि १० १८६२ हुई ॥ मध्यम बुध (३७४३ को दोस्थान में स्थापित करके एक स्थान में बुध के मन्दोच्च ६०० को युत कियातो बुध का मन्द केन्द्र ५८३।७४३ हुआ, इसमें १०० का भाग देने से लब्ध से लब्ध ५ मिले तो पांचवां भुक्त खंडा ११ है भोग्य खंडा के अभाव से एही अन्तर हुआ इससे शेष ८३ । ७ । ४३ को गुणा तो ९१४ ॥२४ । ५३ हुए इसमें १०० का भाग देने से फल ९।८। ३९ । मिले इस को मुक्त खंडा ११ में घटाया तो मन्द फल १ १ ५१ । २१ हुआ, इस को ७ से गुणा म ९४ भास्वत्याम् । युत किया तो में तो १२ । ५९ । २७ हुए इस में १० का माग ले ने से लब्ध १। १७ । ५६ मिले इस लब्ध को, केन्द्र छः राशि से न्यून है अतः दूसरे स्थान में स्थापित मध्यम बुध ८३७६४३ में घटाया तो मन्द स्पष्ट बुध ८१॥ ४९। ४७ हुआ । मन्द स्पष्ट को दो जगह धरि एक जगह इस ८११४९४७ में बुध के शीघ्र ७८०२११५ को घटाना चाहिये सो नहीं घटता इस से मन्द स्पष्ट में १२०० को १२८१।४९/४७ हुए इस में शीघ्र घटाया तो बुध का शीघ्र केन्द्र ९०१ । २२ । ३२ हुआ इस में १०० का भाग देने से लब्ध. ५ मिले शेष १ । २१ । ३२ को ३ से गुणा तो ४ । ४ । ३६ हुए इस में १०० का माग दिया तो फल • मिला इसके पूर्व फल ६ युत करने से ५ ही रहे पाचवां भुक्त खण्डा ५३ भाग्य म्वण्ड। ३६ है इन दोनों का अन्तर ऋण १७ हुआ, इससे शेष ४।४।३६ को गुणा कियातो ६९ । १८ । १२ हुए इस में १०० का भाग देने से फल ०.४१।३५ मिले इसको मुक्त खण्डा ५३ में घटायातो शीघू फल ५२ । १८ । २५ हुआ, केन्द्र छः राशि से न्यून जगह धरे हुए मन्द स्पष्ट ८११४९४७ में शीघ्र फल ५२ ॥१८॥ २५ को घटाया तो स्पष्ट बुध २९ ॥३१॥२२ हुआ, इसमें १०० वा भाग देने बुध की स्पष्टराशि आदि ।।। ४९ हुई । मध्यम गुरु ६७२१३३.३० को दो जगह धरि के एक जगह गुरुके मन्दोच्च ६०० को युत करने से १२७२।३३।३० हुए इसको १२०० से शेषित किया तो वृहस्पति का मन्द केन्द्र ७२।३३।३० हुआ, इसमें १०० का भाग दिया तो लब्ध • मिला इससे मुक्त खण्डा का अभाव है भोग्य खंडार है एही अन्तर भी है, इससे शेष ७२।३३।३० को गुणा कियातो ७८1८।३० हुए इस में १०० का भाग देने से लब्ध ७५८५३ मिले भुक्त खंडा के अभाव से एही मन्द फल हुआ है इस से दूसरे से प्रहस्पष्टाधिकारः। । हुए इस में इसको ८ से गुणा तो ६३।११।४ हुए इस में १० का भाग देने से लव्ध ६ । २३ । ६ मिले इस को, केन्द्र छः राशि से न्यून होने से दूसरे जगह धरे हुए मध्यम गुरु ६७२ । ३३ । ३० में घटाया तो मन्द स्पष्ट वृहस्पनि ६६६।१०।२४ हुआ, मन्द स्पष्ट को दे जगहधर- के एक जगह इस में बृहस्पति के शीबू ८३।७१४३ को घाया तो वृहस्पति का शीघ्र केन्द्र ५८३:२।४१ हुआ, इस में १०० का माग दिआ तो लब्ध ५ मिले शेष ८३ । २ । ४१ को ३ से गुणा तो २४८८३ १०० का माग दिया तो लब्ध २ मिले इस को पूर्व के लब्ध ५ में युत किया तो ७ हुए सातवां भुक्त खण्डा ९ है भाग्य खण्डा के अभाव से एही अन्तर ऋण हुआ, इससे शेष ४९ । ८।३ को गुणा तो ४ १२ । १२ । २७ हुए इस में १०० का भाग देने से फल ४ ।२५।१९ मिले इसको भुक्त खण्डा ९ में घटाया तो शीवू फल ४ । ३४ । ४१ हुथा, शीबू केन्द्र के छः राशि से न्यून होने से दूसरे जगह घरे हुए मन्द स्पष्ट ६६६ । १० । २४ में शीवू फल ४ । ३३ । ४१ को घटाया तो स्पष्ट गुरु ६६१ । १५ । ४३ हुआ, इसमें १० का भाग देने से वृहस्पति की स्पष्टराशि आदि ६ । १८ । ३९ । २५ हुई ॥ मध्यम शुक्र ८३.७:४३ को दो जगह घर के एक जगह इस में शुक्र के मन्दोच्च ९३० कोयुत किया तो शुक्र का मन्द केन्द्र ८३।७।४३ हुआ, इसको १२०० में घटाया तो २१६ । ५२ । २१६ । ५२ । १७ बचे इस में १०० का भाग दिया तो २ मिले दूसरा मुक्त खण्डा १९ भोग्य खंडा २२ इनदोनों के अन्तर धन ३ से शेष १६ । ५२ । १७ को गुणा किया तो ६० । ३६ । ६१ हुए इस में १०० का भाग देने से लब्ध • । ३० । २२ मिले इस को मुक्त खण्डा १९ में युक्त किया तो मन्द फल १९।३०।२२ हुआ, इसको ३ से गुणातो ५८ ॥ ३१६ . हुए फिर इसमें १० का भाग दियातो लब्ध ५। ५१ । ७ मिले इसको, केन्द्र छः शाशे से अधिक है इससे दूसरे जगह धरे हुए मध्यम शुक्र ८३ । ७ । ४३ में युत कियातो मन्द स्पष्ट शुक्र ८८ | ५८ । ५० हुआ, मन्द स्पष्ट को दो जगह धरि के एक जगह इसमें शुक्र के शीबू ४०७३२॥३३ को घटाने के लिये १२०० मिला- यातो १२८८।५८।५० हुए इसमें शीघू घटाने से शेष शुक्र का शीवू केन्द्र ८८१ । २६ । १७ हुआ, इसको १२०० में घटाया तो ३१८॥ ३३ । ४३ बचे अब इसमें १०० का भाग दियातो लब्ध ३ मिले तीसरा भुक्त खंडा १२० है, और भोग्य खण्डा १५० है, इन दोनों का अन्तर धन ३० हुआ, इससे शेष १८ । ३३ । ४३ को गुणातो ५५६ । ५१ । ३० हुए इसमें १०० का भाग दिया तो लब्ध ५।३४। ७ मिले इसको भुक्त खंडा १२० में मिलाया तो शीबू फल १२५ । ३४ । ७ हुआ, शीबू केन्द्र छः राशि से अधिक है अतः दूसरे जगह धरे हुए मन्द स्पष्ट ८८ । ५८ । ६० में शीघ्रफल १२॥ ३४१७ को युत किया तो स्पष्ट शुक्र २१४।३२।९७ हुआ, इसमें १०० का माग देने से शुक्र की स्पप्टराशि आदि ।४।३१:४६ हुई । मध्यम शनि ५६।६९।९७ को दो जगह घर के एक जगह इसमें शनि का मन्दोच्च ४०० को मिलाया तो शनि का मन्द केन्द्र ४५६। ५९।५७ हुआ, इसमें १०० का भाग दियातो फल ४ मिले चौथा मुक्त खंडा १९ है ओर भोग्य ११ है इन दोनों का अन्तर ऋण ८ हुआ, इससे शेष ५६ ! ५९ । ५७ को गुणा तो ४५५ । ५९।३६ हुए इसमें १०० का भाग देने से लब्ध ४ । ३३ । ३६ मिले इस को खंडा १९ में घटाने से मन्द फल १४।२६ । २४ हुआ, इसको १२ से गुणाता १७३।१६।४८ हुए इसमें १० का भाग देने से लब्ध १७।१९ ४१ मिले इस लब्धको, मन्द केन्द्र छः राशि से न्यून है अतः मुक्त खंडा अहस्पष्टाधिकारः। - दूसरे जगह में धरे हुए मध्यम शनि ५६:४४ ५७ में वाया तो मन्द स्पष्ट शनि ३.४१।१६ हुआ, इस मन्द न्पष्ट शनि को दो जगह धरि एक जगह इरर में शनि के शीबू ८३७१७६ को घटाने लगे सो नहीं घटता इससे मन्द स्पष्ट में १२०० को चुत किया तो १२३९.४०.१६ हुए, इसमें शीघ्र (३।७।४३ को घटाया तो शनि का शापूजेन्द्र ११२६.३२'३३ हुआ, इसको १२०० में घटाया तो ४३ । २७ । २७ । हुर इनमें का भाग दियातो लव्ध मिला अतः भुक्त खंड के अभाव से भोग्य खण्डा १० ही अन्तर धन हुआ, इससे शेष ४३ । २१ । २७ को गुणातो ४३४३४।३० हुए इस में १०० का भाग दिया तो फल ४॥२०॥४५ मिले भुक्त खंडाक अभावले ४२१४५ ही शीव ल हुआ, केन्द्र छः राशि से अधिक है अतःदूसरी जगह धरे हुए मन्द स्पष्ट शनि ३९ । ४० । १६ में शीघूफल ४ । २० । ४५ को युत किया तो स्पष्ट शनि ४४ । १ । १ हुआ इस में १०० का भाग देने से शनिश्चर की स्पष्ट राशि आदि । १३ । १२ । ३७ । ॥४॥५॥६॥।॥9॥८॥९॥ राहु केतु स्पष्ट विधिः- अहगणं वेदहतं दशाप्तम् ध्रुवाईयुक्तं भवतीह पातः। खखागनेत्रान्तरितो मुखं स्या- चक्राईयुक्तं स्फुट राहु पुच्छः ॥ १० ॥ स० टी०-अहगणं दिनगणं वेद हतं चतुर्भिर्गुणितं दशाप्तं दशभिर्विभाजितं ध्रुवाई युक्तं ध्रुवार्डेन सहितं खखागनेत्रान्तरितो मुखमिह पातोराहुर्भवति, चकाई- । hch १३ ९८ भास्वत्याम् । युक्तं राहुपुच्छः केतुः स्यात्, शराकृतिभिर्भक्तो राश्यादि- को राहुः केतुश्च भवति ॥ १० ॥ "धुवृन्दमष्टाहतमत्रदिग्भिलब्धंध्रुवं युग्दलितंभचक्रात्। संशोधिते राहुरयं प्रतीपानक्षत्रगो पातगतश्च तद्वत्" ॥१॥ भा०टी०- देनगण को ४ से गुणि के उसमें १० का भाग देने से जो लय मिलै उसको पूर्व के ल्याये हुए ध्रुवा में युक्त करके उसको २७०० में घटाने से राहु होता है, उसमें २२५ का भाग देने से गहु की राशि आदिक होती हैं । राहु में चक्रार्द्ध १३९० को युक्त करने से केतु होता है । उसमें २२५ का भाग देने से केतु की राशि आदि होती हैं ॥१०॥ उदाहरण-दिनगण २७ को ४ से गुणा तो १०८ हुए इसमें १० का भाग देने से लब्ध १० । ४८ । ० मिले इसको राहु के ध्रुवा ५१३०।२५:३९ के आधे २५६५।१२।४९ में युन वि.या तो २५७६/०४९ हुए इसको २७०० में रटाया तो राहु १२३।५९।११ हुआ, इसमें २२५ का भाग देने ल राहु की राशि आदि ०।१६।३९।४७ हुई, राहु १२३॥ ५९।११ में च गर्द्ध १९५० को युक्त किया तो केतु १४७३।६९।११ हुआ, इसमें भो २२५ का भाग देने से केतु की स्पष्ट राशि आदि ६।१६।३९।४७ हुई ॥ १०॥ राहु नगण सारणीयम् । एकाधङ्कानि ( एकाई) ८ ६ ९ दिनगण १ २ २ १ २ २ अंश ३ १२ ३६ कला १२ ३६ २४ ४८ विकला प्रहस्पष्टाधिकारः । दशायङ्कानि (दहाई)। २० दिन ६० १२ १६ ३६ अंश ० ० विक शताद्यङ्कानि (सैकड़ा)। दिनगण জন্য ७ . चकला ग्रहाणांनक्षत्रगताद्राशिगतकरणराशिगतान्नक्षत्रगतकरण विधिः भादिः कृतघ्नोऽङ्कहतो ग्रहस्त्र राश्यादिरकैर्गुणितः कृताप्सः । भादिर्भवेद् भादिषु राशिहारः शराकृती राशिमुखे शतञ्च ॥११॥ सं० टी-भादिनक्षत्रादिः कृतन्नोऽङ्कहतो नव- भिर्विभाजितो राश्यादिको भवेत् , एवं राश्यादिको ग्र- होईनवभिर्गुणितः कृताप्तश्चतुर्भिविभाजितो भादि- नक्षत्रादि गतग्रडो भवेत् तु भादिषु नक्षत्रादिषु शरा- कृती राशिहारः, राशिमुखे शतञ्च-अर्थात् नक्षत्रादिषु ..

भाखयाम्। शरनेत्रकरैविभाजिते राश्यादिको भवति, राश्यादिषु शतेन विभाजिते राश्यादिको भवतीति ॥ ११ ॥ भा०टी०-नक्षत्र गत ग्रह की स्पष्ठी को ४ से गुणि के उममें नव का भाग देने से फल राशिगत ग्रह होता है, और राशि गत ग्रह को १ से गुणिके उसमें ४ का भाग देने से फल नक्षत्र गत ग्रह होता है। नक्षत्र गत ग्रह में २२५ का भाग देने से और राशि गत ग्रह में १०० का भाग देने से ग्रहों की स्पष्ट राशि आदिक होती हैं ( पूर्व की स्पष्टी से कुछ न्यूनाधिक अवश्यमेव होता है)॥ ११ ॥ उदाहरण-स्फुट सूर्य २००१४४।४५ को ४ से गुणा किया तो ८०२१५९० हुए इस में ९ का भाग देने से ८९.१३।१३।२० हुए फिर इसमें १०० का भाग देने से लब्ध स्पष्ट सूर्य की राशि आदि०।६ | १९।५६ । ० को से गुणा किया तो ९९३७ । ० । २७ हुए इस में ४ का भाग देने से लब्ध २३८४ । १५ । ७ मिले इस में फिर १२५ का भाग दिया तो रब्ध स्पष्ट भौम की राशि आदि १० ।१७।५६ । ० हुई, ऐसे ही बुध आदि को भी स्पष्ट करै ॥ ११ ॥ मध्यम गतिः रवेः स्वरा खं नवतिः खमिन्दोः केन्द्रे शतं भूस्तमसः खसिद्धौ । पादोनध्याम घनौ खमेघौ त्र्याब्दौखसप्तावनिजादिकानाम् ॥१२॥ सं०टी०-रवेः सूर्यस्य स्वराखं, इन्दोश्चन्द्रस्य नवतिः खं, केन्द्रे शतं भूः, तमसः राहोः खसिद्धौ, भौम १०५९।४०३ tam ग्रहसष्टाधिकारः। १०१ अवनिजादिकानां भौमौदीनां पादोनहग्, रामधनौ, खमेघौ घ्याव्दौ खसप्तौ मध्यमा भुक्तिरस्ति ॥१२॥ भाल्टी०-सूर्य की ७ } • चन्द्रमा की ९० । • केन्द्र की १०० । १ राहु की ०।२४ मंगळ की १ । ४५ बुध की ३ । १७ गुरु की ० । १७ शुक्र की ३ । १७ शचि की ०१७ मध्यम गती है ॥ १२॥ पध्यम भुक्ति चक्रम् । सू. चं. चं.के. रा. मं. वु. वृ. शु. ३ ३ ० १ OM १७ १७ शीघ्र गतिः त्रयोघना विश्वइभानलौ च त्रयोघनाः पञ्च नखा गुणाव्दाः। कुजादि शीघ्रस्य च भुक्तयः स्यु- रुक्ताः स्मृतीशैर्गणित प्रवीणः ॥१३॥ सं० टी०-स्मृतीशगणित प्रवीणैः कुजादि मङ्गला- दि शीघ्रस्य भुक्तयश्च त्रयोधना, विश्वइभानलौ, त्रयो- धना, पञ्चनखा, गुणाब्दाः स्युरित्युक्ताः कथिताः॥१३॥ शनैश्चराचार्य महासुतानां शैन्ध्रागतिः स्यात्रिघनाकलायाः विश्वाष्टिरामाशशिजस्य शैन्ध्री शुक्रस्य शैन्ध्री शरपूर्णदस्रा"१॥ भा०टी०-धर्म शास्त्र के ज्ञाता गणित में कुशल ऐसे भास्वलाम्। विद्वान् लोग मङ्गल की ३ । १७ बुध की १३ । ३८ वृहस्पति की ३ । १७ शुक्र की ५। २० शनिश्चर की ३ । १७ शीघ्र गति कहा है ।। १३ ॥ शीघ्र गति चक्रम् । म. बु वृ शु ३ १३ ३ ३ २० मन्द गति विधिः- घनागनागविरविघ्न भुक्ति- भॊग्याहताया खशताप्तलब्धम् । ऊने तु खण्डा सहितान्यथोना मन्द स्फुटाभुक्तिरियं कुजादेः॥१४॥ सं० टी०-भौमादि मुक्तिः घनागनागत्रिरविन्न भोग्यहताया खशताप्तलब्धं तु खण्डा ऊने ऋणे सहिता, अन्यथा ऊना इयं कुजादेमन्द मुनिः स्फुटा ॥ १४ ॥ भा० टी०-भौमादि ग्रहों के मध्यम गति को क्रमशः १७१७।८।३।१२ से गुणा करके फिर मन्द खण्डा के अन्तर से गुणा कर उसमें १००० के भाग से जो लब्ध मिलै उसको खण्डा का अन्तर ऋण होय तो मध्यम गति में युत करने से और खंडा का अन्तर धन होय तो मध्यम गति में हीन करने से मन्द स्पष्ट गति होती है ॥ १४ ॥ उदाहरण- मङ्गल का मध्यमा भुक्ति १ । ४५ को १७ से गुणा तो २९ । ४५ हुई, ऐसे ही बुध आदि की गति गुणक से गुण प्रहस्पष्टाधिकारः। ने पर बुध की २२ । ५९ वृहम्पति की २ ३ १६ शुक्र की । ५१ शनैश्वर की १।२४ हुई । मंगल की मध्यमा भुक्ति गुणक से गुण पर २९ । ४९ हुई है, इसको मन्द खण्डान्तर ऋण ११ से गुणा तो ३२७ । १५ हुए इसमें १००० का भाग देने से लब्ध . मिले इसको खण्डान्तर ऋण है इससे मध्यम गति १। ४५ में युत किया तो मंगल की मन्द गति ।। ४ । ३८ इई। ऐसे ही बुध की ३। ३२ । १० बृहस्पति की ० । १५ । ३० शुक्र की १ ।१९।१४ शनिश्चर की ० । ७ । ४० मन्द स्पष्ठ गति हुई है ॥ १४ ॥ भौमादीनां मन्दस्पष्टगतिः । ३ ८ मन्दख- ण्डान्तर or १ १ १ भौम RAN १८ 0CW ors SNOW0 ३ ३ ३ । १२ २८ ३ बुध ३ १२ १२ 0 ० १६ १८ ३० गुरु २४ २८ ४८ १६ ३६ as woman १२ ३ JAM ३ (A) १० OMM ४३ Morm or २३ ३० ३ ५६ ૨૨ ४८ ४८ 60MM ६ watcmo शनि ४८ १२

भास्वत्याम्।
स्पष्ट गति विधिः-
मन्द स्फुटा शीघ्र गतौ विशोध्या
प्राग्वत् कृताभोग्यगुणाच्छताप्ता।
वह्वल्प भोग्य स्वमृणं यथा स्याद्
वक्रागतिस्याद् विपरीतशुद्धा॥१५॥
सं० टी०-शीघ्र गतौ मन्द स्फुटा विशोध्या
शीघ्र केन्द्र गतिर्भवति शीघ्र केन्द्र गतौ प्राग्वत्
पूर्ववद् भोग्य गुणाच्छताप्ता वह्वल्प भोग्यं स्वमृणं
स्यात् शीघ्र केन्द्र खण्डान्तरं धनं चेत्तदा प्राप्त फलं
मन्द गतौ धनं, ऋणं चेणं कर्तव्यम् । यदा वक्र
गतिः स्यात् तदाविपरीत शोध्या वक्रीग्रहपर घटीसम्भवं
ऋणं कार्य पूर्व घटी सम्भवं धनं कार्य गतिः
स्यात् (स्पष्टभुक्तिरंशादिकाष्टादशभिर्गुणिता कलादि-
का भवति, नक्षत्रानयनाथ राश्यादिकमष्टादशभिस्स-
गुण्याष्टशतैरेल्लब्धमश्विन्यादि नक्षत्राणि भवन्ति शेषं
शतद्वयेन हरेल्लब्धनक्षत्र गत पादाः शेषं गतगम्य
प्रकृत्य त्रिंशांशकराशेः कलादिकया स्फुटभुक्तथा भजे-
लब्धानि गतगम्य दिनसमूहान्यवशिष्टं षष्टयास-
गुण्य
तथैवाप्ता घटिकादिका भवन्ति) ॥ १५ ॥

प्रहस्पष्टाधिकारः। "इष्टनाडीपरापूर्वा भुक्तिना षष्ठिभाजिता । लब्धांशादि धनोनं स्युग्रहास्तत्कालिकाः स्फुटाः" ॥१॥ भा० टी०-स्पष्ट मन्द गति को शीघ्र गति में घटाने से शीघ्रकेन्द्र गति होती है, इस शीघ्रकेन्द्र गति को खण्डा के अन्तर से गुणि के १०० का भाग देने से जो फल मिलै उमको अंतर धन होय तो मन्द भुक्ति में युक्त करने से ऋण होय तो हीन करने से स्पष्टगति होती है। वक्री ग्रह होय तो फल में ही मन्द गति को घटाने से स्पष्ट गति होती है (शीघ्र केन्द्र में ५, ६, ७, यह खण्डा मिलने पर वक्री पर ध्यान रखें और जहां शीघ्र . केन्द्र के पंचमादि राशि होइ वहां केन्द्रगति को ३ से गुणा करके तब उमे शीघ्र खंडान्तर से गुणा करके भाजक का भाग देव ) ॥ १५॥ उदाहरण- मंगल की शीघ्रगति ३ । १७ में मन्दस्पष्ट गति २। ४ । ३८ को घटाया तो मङ्गल की शीघ्र केन्द्रगति १२१२।२२ हुई, इसको खंडा के अन्तर ऋण २३ से गुणा किया तो २७१४४।२६ हुए इसमें १०० का माग देने से शघिफल ०।१६।३९ मिले, इसको खंडा के अन्तर धन होने से मन्दगति २।४।२८ में मिलाया तो मङ्गल की स्पष्टगति २ । २१ । १७ हुई । बुध की शीघ्रकेन्द्र गति १० । ५ । ५० गुरु की ३ । १।३० शुक्रकी २। ४ । ४६ शनि की ३ । । २० शीघ्रकेन्द्र गति हुई । बुध का शीघ्रफल ॐ श्रीसंवत् १९६८ शाका १८३३ वैशाख सुदि १३ वार वृह- स्पति के सूर्योदय से इष्ट ५ । ११ पर स्पष्ट करना है, इष्ट ५ । ११ को सूर्य की गति ५८ । १४ से गुणा करके उसमें ६० का भाग देने से फल ।५।१ । १९ मिले, इसको स्पष्ट सूर्य ॥२६॥५१॥ ५६।० में युत कियातो तत्कालिक सूर्य ० ।२६ ॥ ५६ । ५। १९ हुआ ॥

भास्वत्याम १।४२ ॥ ५९ गुरु का । १६ । २० शुक्र का 1 ३७ 1 २६ शनि का ० । १८ । १६ शीघ्रफल हुआ । बुध की स्पष्टगति १। ३६ । ४८ गुरु की ० । ३३ । ३० । शुक्र की ५१५२।४० शनि की • । । २६ । ३६ हुई ॥१५॥ भौमादीनां शीघ्रकेन्द्रगतिः । ११ध.८ध.३ ध. ३ऋ. ८ऋ १९ऋ. मन्दण्डान्तर १ १ or १ १७ १ १२ भौम ૨૬ ३८ १८४२ ६ ३२ २५ ०% or y ० ४६ AN ५५ १३ १२ १२ ३ १ ३ ૨ २ ५९ ५८ २ ५८ ३ १ २९ ३६ वृहस्पति ३१ । ४३ २४ ४८ ४८ २ २ २ १ ५६ যুগ্ধ ३० ३ ३६ ३ १० २९ २२/ ३७ १९ ५६ १२ १२ ३ ३ ३ १० ३ शनि ५२ ३३ ३६ १२ १२ 1 ग्रहस्पष्टाधिकारः। भौमस्पष्टगतिः । मंद खं ४०३.३७ध.३३ध २३ध.११.२५ऋ ४०.५७. शीखडांतर डांतर २ २ २ ६ १ १२ २ ४५ ३८ १ om ११ गति o ormNMo Nowww ३२ ४८ २४ 9W 0 . २ १३ १० A wo w 0 ou pour mon chung mr morm 1900 ५५ १२ ११ mammemoir - ८ ४७ ३२ ३८ 0 mmo - 0) ३६ गति १२ २४ . २ २ २ २ २ १२ १ २८ २६ १६ ६ ३९ ३ ३९ ५८ २० ९ गति ३२ ३० १२ ५ २२ . . २ २५ २ २२ ૨ १० १७ १ ५० EN ० 0 Otoww ४६ ४९ २८ ४३ गति ४८ २ ३४ ४८ ३ २ २४ २ २८ ૨ १ M WWW US OWWWCS 0 २ ૨૨ ४३ ३७ urno ०.5m o om 930000 गति ४८ १९ ४८ १२ ० romNMov30 • १ २ १ २१ ५६ ३३ ३ ७ ४७ ५३ ४९ २७ ३ ४४ २९ १३ १२ ३६ गति ४८ - १.८ भास्वत्यम्। बुधस्पष्टगतिः । ३ . मंदख शीघ्रखण्डा- २७ध.२६ध.१८ध. ५१.२३.१७.१७.१९ऋ. डांतर ३ २ २ ४७ २२ २२ १४ ६ २९ २२ ४१ ७ गति પર १ २६ १२ ५२ २ २ १२ २४ ४८ ४ ३ २ २ CH6 Moto ३० ३२ ३२ ३६ १७ ५९ ४५ ४ mms १७ गति १४ ३६ ७ २ MMSS १४ २४ . ७ १२ १२ २ २ २४ ३ २ ३७ ३ ३८ २३ ५७ २४ २४ गति ५७१ १९ २३ १५ २१ ३३ ३६ २४ ३ १२ ५१ ५९ १५ ४८ २५ ३२ ३८ १२ ६ १ ६ १ १२ १२ १ ५३ ५३ २४ २ ३० २८ २९ ३ ४१ ३२ गति २४ २ ४६ ४६ ५८ ५८ ॥WW ३३ ३६ ३३ ३६ ३६ १ 0000jococsac १ ३ १७ ५८ ४९ ३४ २७ २६ १९ ૨ ३१ ३७ ४९ गति ३ २१ ६ २ ४५ ५२ ३६ ४८ ऋ. ४५ ३६ ३६ ग्रहस्पष्टाधिकारः। मदखं २७ध. २६ध.१८ध. ५ध. ३ऋ. १७ऋ. १७३.१३. शी.खं.अन्त डांतर ६ १ २ १५ २१ १२ ३६ १३ ४५ १३ २७ ९ ६ ६ गति १३ ५३ ५८ १८ १८ ऋ. ३१ ४३ 5 300 mmm m mum - गुरुस्पष्टगतिः । डांतर १६ध.१४ध ८ध. २ऋ. १:ऋऋऋ ९ऋ मदख शीघ्रखण्ड- . १३ ३० १ ३३ २९ ११ ३२ २२ ३६ २४ ३६ गति घ. ९ २८ ३८ २४ ४८ ४८ १२ aro 6 ३० १२ ११ १५ ५१ २२ ६ ५९ १९ । २० गति १९ ४८ .oro १२ o ३६ . १२ २१ २१ 6c २६ ३७ ३७ २ गति १४ २६ 1mm or 30/055. ४८ UNorws So०० १२ • My Tww.MPRur 0 ३ ८ ३१ ४६ ३१ ३३ ३ १० ४८५६ ૨૨. गति ४५ ३३ ७ ६ २४ १२ ४८ भास्वत्याम् । मदखं १६ध.१४ध. ८ध. २. १३ऋ. ७ऋ. ७ऋ ७ऋ. ७ऋ९ऋ. शीखं.अन्त- डांतर ० ० • ४३ ८ १४ ३० २९ ३० १३ ३२ २४ ३ २७ २१ C. गति ovo O.. २६ WOMWW ६ ऋ. ४३ १२ ३९ १९ १२ ० . . १७ 0059 ४७ ३२ १४ ४६ ४२ २३ गति ३३ ३१ ३४ २४ १२ १२ २४ ४८ शुक्रस्पष्टगति । मदखं, ४२ध. ३९३.३९ध ३०ध. २ऋ२१ऋ५४ऋ७३ऋशी.वं.अन्त डांतर ४ ३ ३ १ १ १९ ३३ ११ ५४ ५४ ६ ३२ ३३ गति २५ २९ घ. २ २४ ४८ ४८ १२ १२ ३ १ ૨ २७ ८ ३५ ४८ ३८ २६ ४१ २५ १२ ४८८ गति ४४ १७ २६ २१ २५ २. २ ७ १२ २४ ३ ३ १ ३ ३ ५२ १२ ६ ३ ५२ ३९ ३७ १ ३२ १८ गति २ ३२ ૨ ३१ ३१ २४ १२ १२ ३४ ३६ १० १२ २४ ४२ Osms * * * * ๐ ६ १ १ ५६ SN GOCM १ ० MORM- ग्रहस्पष्टाधिकारः। मिदा ४२ध. ३९२.३९३.३०. २.२१३.४३.७३% शी वं.अन्त डातर ३ २ ६ २ ६ ३ २० ४२ ९ ५० गति १ ३० २७ ३३ ५६ २८८ २८ ९ २४ ३६ ४८ m Jr m 5 Gok ... * 3300 321My १२ १२ । २२ ५२ १५ गति ३८ . १६। १६ ३६ ३६ ३६ ४ ३ २ १२ २२ १० १४ ४६ ३६ २ २३ । २१ गति ११ ३१ २६ ३० ऋ.१६ १५ ३६ ३६ १२। ४८ ४८ १२ शनिस्पष्टगतिः। मदखं निदण्ड:- १०ध. ७ध. ४ध. २. ऋ ४. ४४ डांतर 4SMorarmoc ६ ० ० २५ २ १६ ६ २६ २६ २३ ५२ गति c CWCC00 my o wo aw २४ १२ ४८ १९ १३ २३ १६ ७३ ३३ ३३ : गति ३० ५२ ३४ | १४ ३० ४२ ३८ १२ ३८ २४ ३६ २४ आखत्यम्। मदख siat १०ध. ७ध ४ध. २ऋ ऋ ४ऋ. ४.४ऋशी खं.अन्त - . . ० २५ गति ४६ ३ ५६ ३ ३० ५९ २ २ २ २४ घ. ४८८ ३८ २४ २४ . १४ ३ 99 १५ २० ३३ १६ ५ २ ३ गति ३३ ४४ ३९ ४१ ૨ ५९ ८ ८ ९ ३६ ३६ ะ 3 3+ 4 ८ ९ ऋ.४८ ३८ ४५.४३ १२ gษ : * ๐ ๕ २० १५ ३ १५ १५ २ ४६ ४६ ૨ WC . गति &w NO.CMS १७ २९ ४१ २५ ३५ २१ ૨ ३६ १२ २४ ३३ ऋ. २१ । ४५ ३६ ३६ ३६ २६ १४ गति ११ ५३ ५५ १६ १६ १६ १३ २० ३८ २४ ऋ. ३६ १२ ४८ १२ १२ १२ भा. वा.-जिस ग्रहका जो मन्द खंडान्तर होय उसके समान मन्द स्पष्टगति के चक्र में देखने से मन्द स्पष्टगति मिलैगी, और शीघ्रकेन्द्र गति के चक्र में देखने से शीघ्रकेन्द्र गति मिलेगी। मन्द खंडान्तर और शीघ्र खंडान्तर इन दोनों का जहां समानता पावै वहां स्पष्टगति के चक्र में देखने से स्पष्ट प्रहस्पष्टाधिकारः। ११३ गति मिलेगी (अन्नर धन है, या ऋण इसका भी स्मरण रकैख) स्पष्टमति को १८ से गुणने से कलादि स्पष्ट गति होती है। उदाहरण-मंगल का मन्द खंडान्तर ऋण ११ है, इसके समान मन्दम्पष्ट भुक्ति चक्र में देखने से मन्दम्पष्ट गति २।४।३८1० मिली, और इस अन्तर के समान शीघ्रकेन्द्र गति के चक्र में देखने में शीघ्र केन्द्र गति ।१२।२१।९४ हुई, मन्द खंडांतर १९ है, और शीघ्र खंडां- तर धन २३ है, इन दोनों के समान कोष्ठ में देखने से स्पष्टगति २२१११६।४४।१३।१२ मिली, इसको १८ से गुणा करने पर कलादिम्पष्ट गति ४२।२३।१।१५।५७ ३६ हुई । सूर्यादिस्पष्टग्रह चक्रम् । चं. म. बु. । वृ. शु. ও যাহা १३ १६ १६ अंश ३९ ३९ कला ४७ : विकला प्रतिविक ३ ३ कलादि गति के. ग्रह -- २ ० १ २६ 't w or mor o १८ ००० ६ १८ ३९ २५ ३१ ४६ ५६ ० ० R ७.२ ४२ ६९ - २ ३ १ भौमादीनां चक्रादपरचक्रांर्द्धमाससंख्या च वक्रमार्ग दिनादि ज्ञानविधयः- विश्वाश्विगन्धर्वदशाङ्गमासै- श्चक्राईचक्र क्षितिजादिह्यम् । षड्वह्नयो द्वादश तर्कवाण वेदाश्विनः सप्तरसाःक्रमेण ॥१६॥ १५ ११४ भास्वत्याम्। स्वशीघ्रकेन्द्रस्य च मण्डला त् पूर्वापरावक्रगताश्च राशेः। षष्ट्यष्टि भूपाङ्क गुणाःकुदस्रा चक्रादितःप्रापरतोऽस्तगःस्यात्।।१७॥ एवं ज्ञभृग्वो वसुपञ्चषड्भात् प्रागूनखेटः परतोधिकोऽर्कात्॥१८॥ सं०टी०-क्षितिजादिषु विश्वाश्विगन्धर्व दशाङ्गमा- सैश्चकाई चक्रमूह्यम्, चक्र द्वादशशतानि तदर्ध चक्राई भौमस्य शीघ्रकेन्द्रो यदा पूर्णचक्रं भवति तस्मात् त्रयो- दसे मासे चक्राई ज्ञातव्यम्-एवं बुधस्य २ गुरोः ७ भृगोः १. शनेः ६ मासे चक्राई भवति, स्वशीघ्रके- न्द्रस्यच मण्डलार्धात्पूर्वापरा षड्वन्हयो द्वादशतर्क वाण- वेदाश्विनः सप्तरसाःक्रमेण वक्रगवासरा भवन्ति भौमस्य यस्मिन् दिनेषट्शतं शीघ्रकेन्द्रं भवति तदिवसात् प्राग् षट्त्रिंशदिनभौमो वक्र गतिर्भवति, चक्रात परतः षट्त्रिं- शदिनौगंगा भवति, एतेन भौमस्य वक्रदिनानि ७२ बुधस्य २४ गुरोः ११२ शुक्रस्य ४८ शनेः १३४॥ चक्रादितः प्राग् परतः षष्ट्यष्टिभूपाङ्क गुणाकुदना- स्तगः स्यात, यस्मिन् दिवसे चक्रं द्वादशशतपरिमितं भवति तस्मात् चक्रात्प्रागषष्टिदिनैभौंमोऽस्तः चक्रात् ६ ग्रहस्पष्टाधिकारः। ११३ परतःषष्टि दिनैरुदयः-एवं गतगम्यदिनानि सर्वेषां ज्ञेयः मङ्गलस्य १२० बुधस्य ३२ जीवस्य ३२ शुक्रस्य ७८ मन्दस्य ४२ अत्र चक्रेण भौमेज्यशनीनां पश्चादस्तः प्रागुदयः, चक्रेण बुध शुक्रयोः प्रागस्तः पश्चादुदयः, एवं षड्भाद् चक्रा_द् ज्ञभृग्वोर्वसुपंचदिनानि प्रागस्तः पश्चा. दुदयः,यस्मिन् दिने षट्शत पारमितं चक्रं भवति तदिनात् प्राग्वसुदिनैव॒धस्यास्तगः-आगामि वसुदिनैरुदयः शुक्र- स्य षट्शत परिमित चक्रात् प्राग् पञ्चदिनरस्तः परतः पञ्चदिनैरुदयः, अत्र वुधशुकयोश्चक्रार्द्धन पश्चादस्तं प्रागुदयः, प्रागूनखेटः-अर्कादून ग्रहः प्रागस्तं याति, अ- कोदधिकः परतः पश्चादस्तं याति गणितागतग्रहो यदि वेराश्यादिभिरुनो भवति तदा तस्य प्रागस्तं योऽधिको- भवति तस्यपश्चादस्तं याति, अस्तं ग्रहाणामदृश्यत्वं दृश्य- त्वमुदयः॥ १६ ॥ १७॥ १८ ॥ "भौमो गच्छति वक्रातां शुचिशगङ्गे वै स्वशीघ्रोनिते तद्दच्चन्द्र सुतस्त्रयोदश मुनौ जीवोऽरिषट् पर्वते । शुक्रः खेषुरसे खरांशुतनयो वह्नीन्दु नागे पुनः कौटिल्यं परि हृत्य पुस्कलगतिर्मागीभवेच्छोधिते" ॥१॥ मा०टी०-चक्र १२०० को और चक्राई ६०० को कहते हैं, मङ्गलका अपने चक्र से १३ वें मास में बुधका २ रे वृहस्पतिका ७ वें शुक्रका १० वें शनिका ६ ३ मास में चक्रार्द्ध होता है, च.

भास्वत्याम्। क्राईके पूर्व भौमादिक क्रमशः ३६ ॥१२॥५६॥ २४ । ६७ दिन वक्री होते हैं और एतनाही एतनाही दिन तक चक्र के बाद वक्री रह कर फिर मार्गी होते हैं, अर्थात् मगल ७२ दिन, बुध २४ दिन, वृहस्पति ११२ दिन, शुक्र ४८ दिन, शनि १३४ दिन, तक वक्री रहते हैं, मंगल आदि अपने २ पूर्ण चक्र के पहिले क्रमशः ६०।१६ । १६ । ३९ । २१ दिन अस्त होते हैं, और एतनाही एतनाहि दिन चक्र के वाद अस्त रहिके उदय होते हैं, अर्थात् मंगल १२० दिन, बुध ३२ दिन, बृहस्पति ३२ दिन, शुक्र ७८ दिन, शनि ४२ दिन, अस्त रहते हैं। मङ्गल-वृहस्पति- शनिश्चर पश्चिम दिशा में अस्त होके पूर्व दिशा में उदय होते हैं, और बुध शुक्र पूर्वदिशा में अस्त होके पश्चिम दिशा में उदय होते हैं । चकाई के पहिले वुध ८ शुक्र ५ दिन पश्चिम दिशा में अस्त और एतनाही एतनाही दिन चक्र के वाद अस्त रहिके पूर्व दिशा में उदय होते हैं, अर्थात् बुध १६ दिन, शुक्र १० दिन, अस्त रहते हैं, ग्रहों का नियम किए हुए अंश आय जावै वह यदि सूर्य की राशि अंशादि से न्यून होय तो सूर्य के राश्यादि के पहले अस्त होय, और सूर्य से ग्रहकी राशि आदि अधिक होय तो सूर्य की राश्यादिक के बाद ग्रह अस्त होते हैं ।।१६ ।। १७ ।। १८ ।। भौमादि ग्रहाणां चक्र चक्रार्द्ध वक्र मार्गवोधक चक्रम् । मं, बु. वृ.शु १४ १२ ६ चक्रामाम २ १० 0 २ ३ २२ २४ वक्री ४ १४ दि. १ o 8/02.0 . १ ११ १ १८ १ ६ १२ ० ३ मार्गी १६ ग्रहस्पटाधिकारः। भौमादीनांवक्रमााशवोधक चक्रम् । मं.दु. वृ. शु. ६५५७१३ ७६६ ६५० ८१३ वक्रांश ५४५ ४८७४३४ ५५०३८७ मागीश भीमादीनामस्तोदय वोधक चक्रम् । . वृ. । शु. ग्रह . व. 0. १ मा. पश्चिमारत १२ दि. १ १ . १ पूर्वोदय २८ १६ १८ दि. १ मा. दि पूर्वास्त १८ ४ मा. पश्चिमोदय दि. 0 ६ . ग्रहाणामस्तोदयांग ज्ञानविधिः- भौमोऽस्तं दहनग्रहे खजलदे- सौम्योऽरिवेदागुरुः व्योमाष्टै गुजो यमो रिपुरसैः केन्द्रे स्वशीघ्रोनिते। लब्धास्तं शंशिजस्त्रि पन्नगरसै:- काष्ठारिपौ भार्गवः ११८ भास्वत्याम्। तस्मिन् चक्र विशोधिते समुदयं- यान्ति ध्रुवं खेचराः ॥१६॥ सं ०टी०-दहनग्रहे भौमोऽस्तं खजलदे सौम्योबुधः, अरिवंदा गुरुः, व्योमाष्टै गुजःशुक्रः, रिपुरसैर्यमः शनिः, त्रिपन्नग रसैः शशिजो बुधः, काष्ठारिपौभार्गवः शुक्रो ल- ब्धःप्रामोऽस्तं यान्ति, एतस्मिन्नेव वशीघे चक्र १२०० शोधिते खेचरा ग्रहाध्रुवं समुदयं यान्ति, भौमः ९३ बुधः १७० : गुरुः ४६ शुक्रः ८० शनिः ६६ केन्द्रांशगतेऽस्तं मङ्गलः; ११०७ बुधः १०३० गुरुः ११५४ शुक्रः ११२०) शनि ११३४ केन्द्रांशगते-उदयः भौमेज्यशनीनां पश्चाद स्तः प्रागुदयः ज्ञशुक्रयोः प्रागस्तः पश्चादुदयः बुधः ६८३ शुक्रः ६१० केन्द्रांशे पश्वादस्तः, बुधः ५१७ शुक्रः ५९० केन्द्रांशे प्रागुदयः ॥१९॥ मा० टी०-मंगल ९३ बुध १७० वृहस्पति ४६ शुक्र ८० शनि ६६ केन्द्रांश होने पर अस्त होते है । मंगल-वृहस्पति- शनि पश्चिम दिशा में अस्त होते हैं, और बुध-शुक्र पूर्वदिशा में अस्त होते हैं, इसको चक्र में शोधने से मिले अंशों पर मंगल- वृहस्पति-शनि पूर्वदिशा में उदय होते हैं, और बुध-शुक्र पश्चिम दिशा में उदय होते हैं अर्थात् मङ्गल ११०७ बुध १०३० वृहस्पति ११५४ शुक्र ११२० शनि ११३४ अंश पर उक्त दिशा में उदय होते हैं, और बुध ६८३ शुक्र ६१० अंश परः पश्चिम में अस्त होते हैं, इसको चक्र से शोधे अंश पर अर्थात् बुध ५१७ शुक्र ५९० अंश पर पूर्व में उदय होते हैं।॥१९॥ .

११९ ग्रहस्पष्टाधिकारः। भौमादीनामस्तोदयांशज्ञानचक्रम् । म. बु । वृ. ९३६८३, ४६ ६१० ६६ पश्चिमास्तां श ११०७ ५१७ ११५४ ५९० ११३४ पूर्वोदयांश • पूर्वास्तांश १०३० ० • पश्चिमोदयांश अगम्त्योदयविधिः- पलप्रभा द्वित्रिहता खखाङ्क युता स्फुटार्केण समो यदि स्यात् । याम्ये तदास्यादुदयो निशान्ते मुनेरगस्त्यस्य सुरारि हन्तुः॥२०॥ इति श्रीमच्छतानन्द विरचितायां भास्वत्यां ग्रहस्पष्टाधिकारश्चतुर्यः।। सं० टी०-पलप्रभा द्वित्रिहता द्वात्रिंशद्गुणिता खखाङ्कयुता (पुनरष्टगुणिताषष्टि विभाजिता) याम्य स्फुटार्केण समो यदि स्यात् तदा निशान्त तत्समान राश्यादिके सुरारिहन्तुरगस्त्यस्य मुनेरुदयः स्यात् ॥२०॥ "पलभाष्टवधोन संयुता गजशैलावसुखेचरा लवा । *उदाहरण-श्रीकाशीजी की पलभा ५।१५ को ८ से तो ४६.० हुए इस को दो जगह धर के एक जगह के अंक को ७८ में हीन किया तो अगस्त्य के अस्त का अंशा ३२ मिले, दूसरे जगह ९८ को युत किया तो उदय के अंश १४४ हुए, ३२ अंश में ३० का भाग देने से राशि १ अंशर पर अगस्त्यजी का अस्त और १४४ में ३० का भाग देने से राशि ४ अंश २४ पर अगस्त्यजी का उदय स्पष्ट हुआ॥ गुणा भास्वत्याम् । HINDI इह तावति भास्करे क्रमाद् घटजोऽस्तंयुदयं च गच्छते"॥१॥ "चन्द्रशङ्गोन्नतिज्ञानम्- मीने मेषे गतश्चन्द्रः सततं दक्षिणोन्नतः । अन्योत्तर शृङ्गं स्यात् समं च वृषकुम्भयोः॥१॥ भा० टी०-पलभाको ३२ से गुणि उस में ९०० को मिलावे फिर उसको ८ से गुणि ६० का भाग देने से अंशादि फल मिलते है, उसमें ३० का भाग देने से जो राशि आदि मिलै उसके समान सूर्यकी राशि आदि होनेपर दक्षिण में देवता के शत्रुयोंके नाश करने वाले अगस्त्य मुनिजी उदय होते हैं । ( आठ से गुणि कर साठ का भाग लेना एह सूर्य की स्पष्ठी से अनुवर्तन किया जाता है) ॥२०॥ उदाहरण-श्री काशीजी की पलमा ६ । ४६ को ३३ से गुणा किया तो १८४ । ० हुए इसमें ८०० को मिलाया तो १०८४।० हुए फिर इसको ८ से गुणा तो ८६७२ । • हुए इसमें ६० का भाग दिया तो फल अंशादि १४४ । ३२ मिले, अंशा १४४ में ३० का माग दिया तो ४ । २४ । ३२ हुए, सिंहराशि के २४ अंश ३२ कला पर श्री१०(अगस्त्य जी का उदय स्पष्ट हुआ ॥ २० ॥ इति श्रीज्यौतिषीन्द्रमुकुट मणि श्रीछत्रधर सूरिसूनुना गणक- मातृप्रसाद विरचितायां भावत्याः छात्रवोधिनीनाम टीकायां ग्रहस्पष्टाधिकारश्चतुर्थः ॥४॥ .

त्रिभाधिकार । त्रिप्रश्नाधिकारः। अयनांश विधिः- राकेन्द्र कालात्खशराब्धिहीनात् षष्ट्याप्तशेषे ह्ययनाशकाःस्यु । अहर्गणं तैयुतमेव कुर्याद् भवेद् घुटन्दं द्युनिशोः प्रमाणे॥१॥ सं० टी-खशराब्धि हीनात्साई चतुश्शतै रहि ताच्छकेन्द्र कालाच्छकेन्द्र समयात् षष्टयाप्तशेषे.अयनां- शकाः स्युः, तैरयनांशकैरहर्गणं दिनगणं युतं मिलित- मेव कुर्य्याद् युनिशोः प्रमाणे धुवृदं दिन रात्रि मान ज्ञानार्थ सायनाख्य दिन गणं भवेत् ॥ १ ॥ भा० टी-शालिवाहन के बीते हुए शाका में ४५० को घटाकर ६० का भाग देनेसे अयनांशा होता है। अहगण को अयनांशा में युक्त करने से दिन रात्रि का प्रमाण जानने के लिये सायन दिन गण होता है ।।१।। उदाहरण--शाका १८३३ में १५० को घटाया तो १३८३ हुए, इसमें ६० का भाग देने से अयनांशा २३ । ३ हुआ। इसको दिन गण २७ में युत किया तो मारन दिन हुआ।१।।

१२२ भाखत्याम्। चरविधिः-- धुवृन्दतोऽगाष्टकुभिर्गजाम्बुदैः स्वल्पंगतैष्योत्तर दक्षिणे तु। ततः खरामं क्रमशश्च दद्यात् साई सषष्टं च दलं चराईम॥२॥ सं० टी०--धुवृन्दतः सायन दिन गणाद्-अगाष्ट- कुभिर्गतगम्यं कृत्वा स्वल्पं ग्राह्यं सौम्यगोल संवन्धि चर दलं सौम्यं भवति, यद्यगाष्टि कुभ्योऽधिको दिन गणो भवति,तदागाष्ट कुभिर्दीनं विधाय-अधशिष्टं गजा- ब्दैगम्यं कृत्वा स्वल्पं ग्राह्यं तत्संवन्धि चर दलं भवति, ततः खरामाप्तः क्रमशः त्रिंशत् साई पञ्चचत्वारिंशत् सषष्टं पञ्चत्रिंशच्च दलं पञ्चदशं लब्धफलं ग्राह्यम्, भाग शेष भोग्य खण्डकेन गुणितं पूर्ववत् खरामाप्तं, भुक्तखण्डकेषु युक्तं याम्योत्तर सम्बन्धि चर दलम जातम् ॥२॥ भा० टी०-सायन दिन गणको १८७ में. हीन करने से सौम्य शेष होता है, यदि न घटै तो दिन गण में १८७ हीन करके उसको १७८ में घटाने से याम्य शेष होता है, सौम्य शेष में सौम्य शेष और सायन दिन गण में से जो न्यून होय त्रिप्रश्नाधिकारः। १२३ , उसमें, और याम्य शेष में दोनों शेष में से जो न्यून होय उस में ३० का भाग देने मे क्रम से भुक्त खंड ४५॥३५॥१५ होता शेष को भोग्य खण्डा से गुणा करके उसमें ३० का भाग देने से जो. लब्ध मिले उस के भुक्त खण्डा में हीन करने से .. चर होता है ॥२॥ उदाहरण -सायन दिनगण ५०१३ को १८७ में घटाया तो सौम्य शेष १३६१५७ बचे सौम्य शेष से सायन दिनगण अल्प है इससे सायन दिन गण ५०१३ में ३० का भाग दिया तो फल १ मिला पहिला गत खंडा ४५ हुआ, शेष २०१३ बचे इस को भाग्य खडा ३५ गुणा तो ७०११४५ हुए इसमें ३० का भाग देने से फल २३१२३३० मिले, इसको भुक्त खण्डा ४५ में मिलाया तो सौम्यचर ६८/२३३० हुआ, कल्पित सायन दिन गण २२५३ है, यह १८७ में नहीं घटता इससे दिन गण १८७ को घटाया तो याम्य शेष ३८।३ बचे, इसको १७८ में घटाया तो शेष १३९।५७ बचे, दोनों शेषों में पूर्व शेष ३८/३ अल्प है, इसमें ३० का भाग दिया तो फल १ मिला पहिला गत खंडा ४५ हुआ शेष ८।३ को भोग्य खंडा ३५ से गुणा तो २८१४५ हुए इसमें ३० का माग देने से लब्ध ९।२३।३ • मिले इसको भुक्त खंदा ४५ में युक्त करने से याम्यचर ५४।२३।३० हुआ ॥२॥ से में Normance १२४ भास्वत्याम् । चरसारणीयम् । चा.ध. ६ ७ ८ ९ शेष १ १ १ १ १२ १३ ० RW शेष चा,ध ११ १२ १३,१४,१५ १६ १७ १८ १९ २७ १६ १८१९२१२० २४ १ २८ ३० ३. २७ २८ २९ হ चा.घ २१ २२२३४२५ २६ ३१ ३३/३४३६३७ ३९ ४२ ४३ १ ३० W ३७ ३८ चा.ध ३१ ३२३३३४३५ ३६ ३९ शेप ४६ ४७४८४९५० ५२ १ १० 332 ५५ ३० F2 ० ४८ ४९ शेष चा.ध ४१ ४२ ४३/४४४५/४६ ६८ १ ५० ०/१०/२०३० ४० १० २० चा.ध ५१ ५२५३/५४५५ ५६ शष १ ८० ७७ ६९७०/७१,७३,७४/७५ ३० ५० ६७ ६८/६९ ७० शेप ८०८१/८१/८२/८२, ८३ ८४ WA ORAN ० . चा.ध ७१७२७३७४७५७६ शेष ७७ ७९ ८० ९० ८५८६८६८७८७८८ चर ० ३० ८ ० ३० चा.घ ९१८२/८३/८४/८५-८६ ८७ ८८८९ शेष ९५ ९० ९१९१९२/९२ ९३ ९३ ०३०३० ३० चर ३ . .

त्रिप्रभाधिकारः। , भापावानिक-सौम्य शेप और मायन दिन गण में जो न्यून होय उमके, नथा याम्य में दोनों शेषों में जो अल्प होय उसके तुल्य चर सारणी में देखने से जो चर स्पष्ट मिल उसे एक स्थान में लिखें, फिर शेपके दूसरे अङ्क को पहला चर जिस कोष्ट का होय उस के चालन से गुणा करने से जो होय उम को एक स्थान हटाकर पूर्व चर में युक्त करने से सष्ट चर होता है। उदाहरण-दूसरे श्लोक के उदाहरण से सौम्य शेप १३६.९७ है, और सायन दिनगण ५०३ है, इन दोनों में सायन दिनगण अल्प है अतः इसके तुल्य चम्भारणी में ( यहां सायन दिन गण का शेष संज्ञा कार्य साधन के लिये है ) देखने से याने सायन दिन गण के प्रथम अंक ५० के सामने देखने से ६८।२० मिले, ओर चालन धन २१० है इससे शेष के दूसरे अंक ३ को गुणा तो ३।३० हुए इसको एक स्थान हटाकर चर ६८४२० में युक्त करने से स्पष्टचर ६८।२३।३० हुआ।। दिन रात्रिमान ननविधयः- पलप्रभाग्नं शरषड्यमाप्तम् । पञ्चेन्दुतस्तत् स्वमृणं स्वगोलात् । अहर्दलं व्यस्तमितोनिशार्दम् तयोगतैष्यान्तरितं नतं च ॥३॥ सं० टी०-पलप्रभानं चर शरषड्यमाप्तं फलं तत् पञ्चेन्दुतः स्वमृणं प्रकुर्यात् पञ्चदशमध्ये सौम्य याम्य- गोलखाइ धनमृणं कृतेसति, अहर्दलं दिनाई भवति तद्विगुणितं दिनमानं भवति दिनाई त्रिंशन्मध्ये व्यस्तं

१२६
भास्वत्याम्।
से
गुणा तो
निशाई भवति तद्विगुणीतं रात्रिमानं भवति ततस्त-
योर्गतैष्यान्तरितं पूर्व परनतं च भवति ॥ ३ ॥
भा० टी०-चर को पलभा से गुणाकर उस में २६५ का
भाग देने से जो फल मिले वह मूर्य सौम्य गोल में होय तो
१५ में युक्त और यदि मूर्य याम्यगोल में होय तो १५ में -
हीन कर ने से दिनार्द्ध होता है, दिनार्द को दूना करने से
दिनमान होता है, दिनार्द को ३० में घटाने से राज्य होता
है, और राज्य को दूना करने से रात्रिमान होता है, और दिनाई
राव्यर्द्ध का अन्तर नत हाता है, वह दिनाद्ध अधिक होय
तो सौम्यनत, राव्यर्द्ध अधिक होय तो याम्यनत होता है ॥३॥
उदाहरण-चर ६८।२३ को पलमा ११४५
३९३।१२ हुए इस में २६५ का भाग दिया तो फल ११२९ मिले सूर्य
सौम्य गोल में हैं इस से इसको १५ में युत किया तो दिनाई १६।२९
हुआ इसको दो से गुणा किया तो दिन मान ३२५८ हुआ दिनार्द्ध
१६।२९ को ३० में घटाया तो राव्यर्द्धमान १३।३१ हुआ, इसको
दूना किया तो रात्रिमान २७।२ हुआ, दिनार्द्ध राव्यर्द्ध का अन्तर
करने से सौम्यनत २।५८ हुआ ॥ ३ ॥
प्रभाविधिः-
षड्नं चराई दशभाग हीनम्
योम्ये तु रामांशयुतं दशाप्तम् ।
तदक्षि हीनाक्ष वियुक्त युक्तम्
भानोरुदग दक्षिणतःप्रभा स्यात्॥४॥

त्रिप्रश्नाधिकारः। सं० टी०-सौम्यं चराई षड्नं पड्गुणीतं स्वदश- भागहीनं दशमांशै रहितं दशाप्तं तदक्षिमध्ये ६०/२रहीने कृते भानोः सूर्यस्योदक मध्यप्रभा भवेत् नु षद्गुणितं चराई स्वरामांशयुतं दशाप्तं तदक्षिमध्ये ५८।२२ युते कृते सूर्यस्य दक्षिणतः प्रभा भवेत् ॥ ४ ॥ भा० टी०-चर को ६ से गुणि के दो जगह धरै एक जगह १० का भाग देनसे जो लब्ध मिले उसको दूसरी जगह घटावे फिर उस में दश का भाग ईन से जो लब्ध मिले उसको ६०२२ में घटाने से सौम्य गोल के मूर्य में प्रभा होती है और याम्य गोल में चर को ६ से गुणा करके अपने तृती- यांश से युत करै फिर उस में १० का भाग देने से जो लब्ध मिले उसको ५८०२२ ५८०२२ में युत करने से प्रभा होती है ॥ ४ ॥ उदाहरण-चर ६८.२३ को ६ से गुणा तो ४१०१८ हुए इसको दो जगह रक्खे एक जगह इसमें मौम्य गोल में सूर्य है इससे १० का भाग दिया तो लब्ध ४११२ मिले इसको दूसरी जगह ४२०।१८ में घटाया तो ३६९।१६ बत्र इसमें १० का भाग देने से लब्ध ३६.५५ मिले इसको ६०२२ में हीन किया तो सौम्यप्रभा २३१२७ हुई ।।४॥ छाया शङ्कु घटी विधयः छायादशना शतसंयुता च मध्य प्रभोना भवतीह शङ्क

१२८
भास्वत्याम्।
शताहताहर्दलतस्तदाप्त-
महर्गतैष्यो घटिकादिकालः ॥५॥
सं० टी०-दशनादश गुणिता छाया शतसंयुता
च पुनः मध्यप्रभोनेह शङ्कु भवति । अहर्दलं दिनाई
शताहतं यज्जातं तत्तदाप्तं शङ्कुना विभाजितं मह-
गतैष्योघटिकादिकालो भवति ॥ ५ ॥
भा० टी०-इष्ट छाया के १० से गुणि के उसमें१००को
युतकर के फिर उसमें मध्य प्रभा घटाने से शङ्ख होता है। दिना
र्द्ध को १०० से गुण के उसमें सवर्णित शङ्कु का भाग देने से
फल गत भोग्य ( मध्याह्न के पूर्व गत मध्याह्न के वाद भोग्य )
घटी होती है ॥५॥
उदाहरण --कल्पित इष्ट छाया १० है, इसको १० से गुणा
किया तो १०० हुए इसमें १०० मिलाया तो २०० हुए, इसमें प्रभा
२३॥ २७ को घटाया तो शङ्कु १७६।३३ हुआ। दिनार्द्ध १६।२९
को १०० से गुणा तो १६४८१२० हुए इसको ६० से गुणि के सवर्णित
किया तो ६८९०० हुए, इसमें सजाती शङ्कु १०५९३ का भाग
दिया तो घटी आदि बा२० हुई ॥ ५ ॥
-
छाया विधिः
खखेन्दु निनायुदला गतैष्य-
नाड्याप्त मध्य प्रभयासमेतम् ।
शतोनितं तदशभिर्विभक्तम्
लब्धांगुलाद्याभवतीप्सिताभा॥६॥

त्रिप्राधिकारः। १२९ सं० टी०-खखन्दु निन्नाच्छतगुणितायुदलाद्- दिनार्धाद् गतेप्यनाड्याप्तफलं मध्यप्रभयासमेतं शतानितं शतहीन यत् तदशभिविभक्तं लब्धाङ्गुलाद्या -इप्सि- ताभा भवति ॥ ६॥ भा० टी०-दिनाद्ध को १०० से गुणि के इसमें भुक्त या भोग्य घटी जो होय उसका भाग देने से जो फल मिलै उसमें मध्य प्रभा को युक्त कर के उस में १०० को घटान से जो शेष बचे उसमें दश का भाग देने से (इप्सिन्) अभीष्ट छाया होती है ।।६।। उदाहरण-दिनार्द्ध १६।२९ को १०० से गुणा तो १६४८ । २० हुए, इसको सजाती किया तो ९८९०० हुए इसमें घटी ९।२० के सजाती पल ५६० का भाग दिया तो लब्ध १७६।३३ मिले (लब्ध ३६ मिलता है परन्तु घटी ९।२० से कुछ अधिक होने से ३३ ही ठीक है) इसमें मध्य प्रभा २३।२७ युत किया तो २००० हुए, इसमें १०० को घटाया तो १००० हुए, इसमें १० का भाग देने से लब्ध इष्ट छाया १०० अंगुलादि हुइ॥६॥ लङ्कावधिदक्षिणाक्षविधिः- लग्नं तु सूर्योदयतः प्रसाध्य स्वभोदयस्सौर दिनानुपातात् । चन्द्राश्विनिघ्नापलभार्दिता च लङ्कावधेस्स्यादिह दक्षिणोक्षः ॥७॥ सं० टी०-वभोदयैः स्वदेशमानैः सौरदिनानुपा- तात् सूर्योदयतः लग्नं प्रसाध्य चन्द्राश्विनिना, एकवि- भास्वत्याम् । शतिगुणिता पलभा, अर्दिता लङ्कावधेरिह दक्षिणाक्षः स्यात् ॥ ७॥ भा० टी०-सायन सूर्य के स्वदेशमान से अनुपात से लग्न को स्पष्टकरै । ( अनुपात से लग्न बनावै इससे यह विदित हुआ कि इसके आगे का ४ श्लोक क्षेपक है) पलभा को २१. से गुणा करके उसको आधा करने से यहाँ लङ्का के अवधि से दक्षिणाक्ष होता है ॥ ७ ॥ उदाहरण-श्री काशीजी की पलमा १।४५ को २१ से गुणा किया तो १२०१४९ हुए, इसको आधा किया तो लंका के अवधिका दक्षिणाक्षध्रुवा ६०।२२।३० हुआ ( थोड़े दिन से कोई कोई विद्वान् काशी की पलमा ५/४० मानते हैं तिसपक्ष में दक्षिणाक्ष १८३० हुआ) ॥ ७ ॥ लनस्पष्टविधिः- तत्कालिकोऽर्कोऽयन भागयुक्तः तद्भोग्य भागैरुदयोहतः स्वः । खाग्न्युधृतस्तद्रविभोग्यकालम् विशोधयेदिष्टघटीपलेभ्यः ॥ ८ ॥ तदग्रतो राश्युदयाश्च शेष- मशुद्धहृत् खाग्निगुणं लवाद्यम्। अशुद्धपूर्भवनैरजाये- युक्तं तनुस्यादयनांशहीनम् ॥ ६ ॥ famous त्रिप्रश्नाधिकारः। सं० टी-अयन भागयुक्तः तत् कालिकोऽर्कः तद् भोग्य भागैस्त्र-उदयोहतः गुणितः तत् खाग्न्युधृतो रविभोग्य कालः स्यात्, भोग्य कालमिष्टघटी पलेभ्यो विशोधयेत् तदग्रतो राश्युदयाश्च विशोधयेत् शेषं खाग्नि- गुणितमशुद्धहृतं लवाद्यमशुद्ध पूवैरजाद्यैर्भवनैर्युक्तं ततो- ऽयनांशहीनं तनुः स्यात् ॥ ८ ॥ ९ ॥ भोग्यतोऽल्पेष्टकालात् खरामाहतात् । खोदयाप्तांशयुग् भास्करःस्वात्तनुः” ॥ मा. टी.-जिस समय का लग्न साधन करना हो उस समय का सूर्य स्पष्ठ करके उस में अयनांश युत करने से सायन मूर्य होता है, फिर उस सायन सूर्य की राशि को दूर करके अंशादि को ३० में घटाने से भोग्य अंश आदि होते हैं, फिर जो सूर्य * उदाहरण - शाका १८३३ वैशाखशुक्ल १३ वृहस्पति के दिन सूर्य के उदय से शून्यघटी ४८ पल पर इष्टलग्नसाधन करना है। चालित सूर्य ।२६।५०।४२ है, इस में अयनांश २३।३ जोड़ा तो सा- पन सूर्य १।१९।५३।४२ हुभा, इम पर से कही हुई रीति के अनुसार अर्थात् सायन सूर्य के भुक्त अंशआदि को ३० में घटाया तो मोग्यांश १०६।१८ हुआ, इसको वृष के उदय २५३ उदय २५३ से गुणा करके ३० के भाग से भोग्यकाल ८५।१३। ८ मिला, इससे पलात्मक इष्ठ काल १४८ न्यून है इसलिये इसको ३० से गुणा किया तो १४४० हुआ इस में सायन सूर्य के वृष राशि के उदय २५३ का माग दिया तो अंशआदि फल ५।४१।३० मिले इसको सूर्य ।२६ ॥५०४२ युत किया तो स्पष्ट लग्न १२२३२१२ हुआ ।। में १३२ भास्वत्याम् । की राशि दूर कर दी थी उस राशि के अपने देश के उदय से उन भुक्त भोग्य अंश आदि को गुणाकर के उस में ३० का भाग देने से मुक्त भोग्यकाल होता है, फिर इष्ट काल के घड़ी को पलकर के उसमें ( भुक्त ) भोग्यकाल को घटा घटाने स जो शेष बचै उस में सायन सूर्य के राशि के बाद की जेतनी राशि घटे उनको घटा देवे फिर ऐसे घटाने से जो अंक शेष रहे उसको ३० से गुण के उस में अशुद्धोदय अर्थात् घटी हुई राशियों के आगे की जो राशि हो उस के मान से भाग देवै उससे जो अंश आदि फल मिले उस में, जिस राशि के मान तक का उदय इष्ट पल में घटा होय उस राशि का मेष से जितनी संख्या होय वह संख्या को राशि के स्थान में युक्त करे फिर उसमें अयनांशा घटाने से स्पष्ट लग्न होता है । ( जो मुक्त लग्न बनावै तो जिस राशि के मान से गुणा करै उस उदय से पिछले उदय को घटावे और बाद पूर्ववत् क्रिया करके अंशआदि फल लेके फल में अशुद्ध लग्न राशि के अस्थान पर युक्त कर उस राशि के संख्या में से एक अंक की संख्या घटा कर अंश आदि को घटावै फिर शेष में अयनांशा को घटाने से स्पष्ट लग्न होता है) ॥ ८ ॥९॥ उदाहरण-सं० १९६८ शाका १८३३ वैशाख शुक्ल १३ वृह- स्पति के सूर्योदय से इष्ट घड़ी ५ पल १९ है, इस समय पर लग्न साधना है, सूर्य ०।२६.५४।५७ इस में अयनांशा २३।३ को युत किया तो सायन सूर्य १।१९ ५७।१७ हुआ, इसके राशिवृष को अलग रक्ख दिया भुक्त अंशआदिकों को३० में घटाया तो भोग्यांश आदि १०।२।३ हुआ, इसको वृष के उदय २५३ से गुणा किया तो २५३८।३८१३९ हुए इसमें ३० का भाग दिया तो भोग्य काल ८४।३७।१७ हुआ, इष्ट - त्रिप्रश्नाधिकारः। घटी ५ पल ११ को ६० से गुणि के सजाती किया तो ३११ हुए इस में भोग्यकाल ८४१३७ १७ को घटाया नो २२६।२२४३ शेप वचे इसमें इसके आगे की राशि मिथुन का उदय ३०१ नहीं घटता इस मे उक्त शेष २२६१२२१४३ को ३० से गुणा तो ६७११।२१।३० हुए इस में अशुद्ध लग्न मिथुन के उदय ३२४ का भाग दिया तो लब्ध २२२०२४ मिले इसमें शुद्ध लग्न वृप की संख्या मेघ से दो हुई इसको युत किया तो २०२२ २०२४ हुए इस में अयनांश २३६३ को घटाया तो स्पष्ट लग्न १२९।१७.२४ हुआ ॥ ८ ॥९॥ चरखण्डविधिः- द्विगुणा विपुवच्छाया विभजेत् क्रमशस्त्रिधा। सूर्याहः षड्गुणैर्लब्धम् चर खण्डापला भवेत् । १०॥ सं० टी०-विघुवच्छाया पलभा द्विगुणिता त्रिधा स्थाप्या सूर्याहः षड्गुणैादशपञ्चदशघट् त्रिशभिः क्रमशः विभजेत् चर खण्डापला भवेत् ॥ १० ॥ भा० टी०-पलभा को २ से गुणा करके तीन जगह धरै तीनों जगह में क्रम से १२।१५:३६का भाग देने से फल चर खण्डा होता है ।। १०॥ उदाहरण-काशी की पलमा ६।४५ को २ से गुणा तो ११:३० हुए इसको सजाती किया तो ६९० हुए इसको तीन जगह रक्खा पहले जगह १२ का भाग दिया तो फल ५७ मिला, दूसरे जगह १५ का माग Bar आखत्याम् । दिया तो ४६ मिला, तीसरे जगह ३६ का भाग दिया तो फल १९ मिला, एवं काशी का चर खण्डा ५७४६।१९। हुआ ॥१०॥ लङ्कामानंतन्मानात्स्वदेशमानविधिः- वश्वत नन्दनन्दाक्षि त्रिरदं च क्रमोत् क्रमात् । चरखण्डोनितं युक्तं विनाड्यो नाडिकादयः ॥११॥ सं. टी-वस्वक्षनन्दनन्दाक्षित्रिरदं चरखण्डाभिः क्रमोत् क्रमादुनितं युक्तं च मेषा दीनांविनाड्यो नाडि का दयो भवन्ति ॥ ११ ॥ भा० टी०-लंका में मेष का ०७८ वृष का २९९ मिथुन का ३२३ पलमान है इसका विपरीत करने से कर्कका ३२३ सिंह का २९९ कन्या का२७८ मान हुए, इन छ:वो को उत्क्रम याने उलटा करने से तुलादि छः राशि का मान होता है। मेष आदि तीन राशि के मान में चर खण्डा हीन करने से मेष आदि तीन राशि का स्वदेश मान होता है और युत करने से कर्क आदि तीन राशि का स्वदेश मान होता है उसके उलटा करने से मीन राशि तक की स्वदेश मान होता है ॥११॥ उदाहरण-लंका में मेषादि तीन राशि का मान २७८१२९९ ३२३ है, इसमें काशी का चरखण्डा हीन किया तो मेषादि तीन राशि का स्वदेशमान २२०२५३।३०४ हुए और खंडा युत किया तो कर्कादि तीन राशि का मान २४२ २४५।३५५ हुए, इसको व्युत क्रम करने से तुलादि का मान ३३३३३४५६३४२।३०४।२५३५२२१ हुए ॥ ११ ॥ से तुला त्रिप्रनाधिकारः। लङ्कोदयराश्युदयः काश्यांगयुदयः मेष २७८ मीन मेष २२१ : मीन वृष २९९ वृप मिथु. ३२३ मकर मिथु. कर्क ३२३ धनुः कर्क सिंह २९९ . वृश्चि. सिंह ३४५ वृश्चिक कन्या कन्या ३३५ तुला इति श्रीज्यौतिषीन्द्रमुकुटमणि श्रीवछत्रधरमूरि मूनुना गणक मात् प्रसादेन विरचितायां भास्वत्याः छात्रबोधिनी नाम टीकायां त्रिप्रश्नाधिकारः पञ्चमः ॥ ५ ॥ .

भास्वत्याम् । अथ चन्द्रग्रहणाधिकारः । द्विगुणितरवापर्वकालसंस्कार तत्कालिकराहु स्पष्टशरविधय:- हिनो रविः पर्वकृताप्तयुतो दिगभिस्तमोऽष्टनदिनं ध्रुवाड्यम् । तमो युतार्कात् खखभाप्तसौम्यम् याम्यं शरोऽल्पः स्वदशांशहीनः॥१॥ सं० टी०-हिन्नो रविः द्विगुणितसूर्यः पर्वकृताप्त- युतः तत्कालिकोऽर्को भवति। दिनं दिनगणमष्टप्नं दिग्भि- विभाजितं तमध्रुवक आढ्यं युक्तं च तमोराहुःस्यात, अ- कौद्युतस्तम खखभाप्तं सप्तविंशतिशतैविभाजितं फलं सौम्ययाम्यशरः (एकेन त्रिभिर्याम्यः, द्वाभ्यांशुन्येन सौ- म्यः) खखभैर्भक्ते सप्तविंशतिशतेन गत गम्यं कृत्वा यद- ल्पं भवेत्तद्ग्राह्यं स्वदशांशेनहीनः स्पष्टशरो भवति ॥१॥ भा० टी०-स्पष्ट सूर्य के दूना कर उसमें पर्वान्त नाड़ी का चतुर्थांश युत करने से पर्वकाल संस्कारित द्विगुणित सूर्य होता है। दिन गणको ८ से गुणि के उसमें १० का भाग देने से जो लब्ध मिले बहराहु के ध्रुवा में युत करने से राहु होता है। पर्वकाल से संस्कारित द्विगुणित सूर्य में राहु के युक्त कर के २७०० का भाग देने से फळ (१२३ मिलैतो) याम्य (१२।४ मिलतो) सौम्यशर होता है (जिस दिशा का शर होता है . उसी दिशा का ग्रास होता है) शेष को २७०० में हीन करने चन्द्रग्रहणाधिकारः। . युत किया से जो शेष वचै वह और पूर्व शेष इन दोनों में जो न्यून होय उसको अपने दशांश से हीन करने से स्पष्टशर होना है ॥१॥ उदाहरण-श्रीसंवन् १९६९ शाका १८३४ चैत्रशुक्ल पूर्णिमा के दिन चन्द्र ग्रहण का साधन करते हैं। सूर्य २६१३१३०२५ को दूना किया तो । ५२२७।०१६० हुआ, पर्वकाल ५३ घटी २३ पल में चार का भाग दिया तो लव्ध १३।२०।४५ मिले, इसको द्विगुणित मूर्य ५२२७०।१० में युत किया तो पर्व- काल संम्कारित द्विगणित मूर्य ५२४०१२१:३६ हुआ । दिनगण ३५३ को ८ से गुणा तो २८२४ हुए इस में १० का माग देने से फल २८२२४।० मिले इसके गहु के ध्रुवा ५१३०।२५।२९ में तो तत्कालिक राहु ५४१२।४९३९ हुआ । पर्व काल संस्कारित द्विगु. णीत सूर्य ५२४०।२१।३५ है इस में राहु ५४१२॥४९॥३९ को युत किया तो राहु युत पर्व काल संस्कारित सूर्य १०६५३।११।१४ हुआ, इसमें २७०० का भाग दिया तो फल ३ मिले इससे योग्य शर हुआ शेष २५५३।११।१४ बचे इसको २७०० में हीन किया तो शेष १४६।४८१४६ बचे इन दोनो शेषों में दूसरा शेष १४६ ४८।४६ न्यून है अतः इसमें इसके दशमांश १४।४।५२ को घटाया तो स्पष्टयाम्य शर १३२२७४५१ हुआ ॥१॥ चन्द्र राहु मान ग्रास विधयः- मानं हिमांशोर्गतिरग्निहीना द्विग्नं चतुर्भिश्चतमः प्रमाणम् । तद्योगतोऽर्द्धशरवर्जितं च ग्रासःसुधांशोः स्फुटपर्वसन्धौ ॥२॥ - भाव याम्। सं० टी०-हिमांशोश्चन्द्रस्यामिहीना वह्निरहिताग. तिर्हिमांशोः मानं भवति, इदं दशनं दिग्भिर्गुणित चतुभिर्विभाजितं तम प्रमाणं राहुमानं भवति तद्योगतो. ऽई मानयोर्योगाई शरवर्जितं च सुधांशोः चन्द्रस्य स्फु- टपर्वसन्धौ ग्रासःस्फुटः स्पष्टः स्यात् ॥ २॥ छादयत्यर्कमिन्दुर्विधं भूभिभा- छादकछाद्यमानैक्यखण्डं कुरु । तच्छरोनं भवेच्छन्नमतद्यदा- ग्राह्य हीनावशिष्टं तु खच्छन्नकम्" ॥१॥ भा० टी०-चन्द्रमा की गति में ३ घटाने से चन्द्रमान होता है । चन्द्रमान को १० से गुणि के उसमें ४ का भाग देने से जो फल मिले वह तमोमान होता है । चन्द्र-राहु मान के योग के आधे में शर घटाने से ग्राश होता है । (न घटे तो ग्रहण नहीं लगेगा यह जानै) ॥२॥ उदाहरण-चन्द्रमा की गति १२ में ३ को घटाया तो चन्द्र- मान ९९ हुआ। चन्द्रमान ९९ को १० से गुणो तो ९९० हुए इसमें ४ का भाग देने से फल तमोमान २४७ । ३० हुआ । चन्द्रमा के मान का और राहु के मान का योग किया तो ३४६ । ३० हुए इस का आधा किया तो योगार्द्ध १७३१ १५ हुआ इस में शर १३२ । ७ । ५४ को घटाया तो ग्रास ४१ । ७ । ६ हुआ ॥ २ ॥ स्थित्य स्पर्श-मध्य मोक्षकालविधयः- स्थित्यर्द्धमङ्गाहतमिन्दुखण्डम खपञ्चयुक्खण्डफलं विमर्दम् । AN

चन्द्रग्रहणाधिकारः।
हीनं धनं पर्वणि शीतरश्मेः
स्पर्शोऽयमुक्तिश्च तदिष्टकालः ॥३॥
सं० टी०–इन्दुखण्डमेकत्राइतं षड्गुणितं,
अन्यत्र खपञ्च युक् खण्डविखण्डितं पञ्चाशद् युक्तेन
ग्रासेन विभाजितं स्थित्यर्द्ध भवति तदिनमान हीन पूर्णिमा
घटिकामु हीनं धनं स्पर्श मोक्ष कालौ भवतः, पर्व घटि-
कासु हीने कृते सति स्पर्शकालः पर्वघटिकासु युते
सति मोक्ष कालो भवति पर्व घटिकैव मध्यकाल इति ॥३॥
भा० टी०-पास के दो जगह घर के एक जगह के अंक
को ६ से गुणि सजाती कर लेवे फिर दूसरे जगह घरे हुए
अंक में ५० को युत करि मजाती करके इसका सजाती षद्
गुणित ग्रास में भाग देने से फल स्थित्यद होती है । पर्वकाळ
में स्थित्यर्द्ध को घटाने से स्पर्शकाल होता है, और युक्त करने
से मोक्षकाल होता है, और पन्ति के समान मध्यकाळ
होता है ॥ ३ ॥
उदाहरण-ग्राम ४१।७।६ है, इसको दो जगह रक्खे एक जगह के
अंक को ६ से गुणा तो २४६।४।३६ हुए, इसका एक राशि किया तो
८८८१५६ हुए, दूसरे जगह ग्रास ४१७१६ रक्खा है इसमें ५० को
किया तो ६१७६ हुए, इसको सजाती किया तो ३२२०२६ हुए इसका
८८८१५६ में भाग दिया तो फल स्थित्यर्द्ध ४३ हुई । पर्व काल
५३ । २३ में स्थित्यद्ध २।४२ को हीन किया तो स्पर्शकाल ५० ४१
हुआ, पर्व काल में स्थित्यर्द्ध को युत किया तो मोक्ष काल ५६३ हुआ
पर्व काल के तुल्य ५३।२३ मध्य काल हुआ ॥ ३॥

१४०
भास्वत्याम
-
शरकृतिविधि-
खखेन्दुवेदाधिक भास्करस्य
प्रागवद्भचग्राप्तदिशः शरश्च ।
तत् खाष्ट भागस्य कृतिः सुधांशो-
यथा दिशं व्यस्तमितः खरांशोः॥४॥
सं० टी०-खखेन्दु वेदाधिकभास्करस्य पर्वकाल-
संस्कारितहिन्न सूर्यस्य प्रागवत् पूर्ववत् भचक्राप्तदिशः
शरश्वतत् खाष्टभागस्य सुधांशोश्चन्द्रस्य यथा दिशं कृतिः,
इतः खरांशोःसूर्यस्य व्यस्तं, चन्द्रग्रहणे याम्यशरे याम्या
सौम्यशरे सौम्याकृतिः, सूर्यग्रहणे याम्यशरे सौम्या सौम्य-
शरे याम्याकृतिरिति ॥ ४ ॥
भा० टी०-पर्वकाल से संस्कारित द्विगुणित सूर्य में ४१००
को युत करके उसमें २७०० का भाग देके पूर्ववत् याम्य सौम्य
दिशा का शर स्पष्ट करै (अर्थात् २७०० का भाग देने से लब्ध
२३ मिले तो याम्य शर, और २।४ मिले तो सौम्य शर होता है।
फिर शेष को २७०० में गत गम्य करने से जो शेष बचे वह
और पूर्व शेष इनमें से जो न्यून होय उसके अपने दशमांश
से हीन करने से स्पष्टशर होता है ) स्पष्टशर में ८० का भाग
देने से जो फल मिलै उसका कृति (वर्ग) वनावै । चन्द्रग्रहण
में जिस दिशा का शर रहता है उसी दिशा की कृति होती है,
और सूर्यग्रहण में याम्यशर में सौम्य कृति और सौम्यशर में
याम्यकृति होती है ॥४॥

चन्द्रग्रहणाधिकारः। में AUTARIAN- उदारहण-पर्वकाल से संम्कारित द्विगुणित सूर्य ९२४० २१:३९ है, इसमें ४१०० को युत किया तो ३४२१२१।३६ हुए इस २७०० का भाग दिया तो फल ३ मिले इसमे याम्यशर हुआ शष १२४०।२१।३५ को २७०० में हीन किया तो शेष १४५९।३८ १२५ बचे इन दोनों शपों में पहला शेष न्यून है अतः उसमें उसके दशमांश १२४२१९ को हीन किया तो स्पष्ट याम्यशर १११६।१९२६ हुआ । इसमें ८० का माग दन से फल १३५७।१४ मिले इपकी कृनि याम्य १९४३७ हुइ ।। ४ ।। नत बलनविधी- मध्यं दिनात् प्राक् परतश्चसौम्यम् याम्यं नतं स्यादथ तत् कृतिश्च । कृत्यस्तु तुल्यान्यदिशोः क्रमेण योगान्तरं वा वलनं रवीन्दोः ॥५॥ इति श्रीमच्छतानन्द विरचितायां भास्वत्यां चन्द्रग्रहणाधिकारःपष्टः। सं०टी०-सूर्यग्रहण दिनाई मध्यदिनं चन्द्रग्रहणे दिनमानयुतं निशाई पर्वकालः मध्यदिनात् मध्यरात्रेः प्राग्सौम्यं परतः याम्यं नतम् पर्वकालदिनार्धयो रात्र्य- धयोर्वान्तर कृते यदवशिष्टं तन्नतं स्यात् । पर्वकालम- ध्यदिन मध्यरात्रि तुल्यतायाम् नताभावः । अथ तत् कृतिश्च नतकृतिः पूर्वकृति तुल्यान्यदिशो क्रमेण यो- गान्तरं कार्यम्- रवीन्दोःसूर्यसोमयोः याम्यसौम्य वलनं स्यात् ॥ ५॥ ..

१४२
भास्वत्याम्।
मा० टी०- मध्य दिन या मध्य रात्रि के पूर्व का पर्वकाल
होतो सौम्य, पर का होय तो याम्य अर्थात् दिनार्द्ध, या
मध्यरात्रि में पर्वकाल घटै तो सौम्यनत होता है और यदि
पर्वकाल में दिनार्द्ध या मध्यरात्रि घटै तो याम्यनत होता है।
नतका कृति बनावै यदि यह कृति और पूर्वकृति एकदिशा की
होय तो योग करने से अन्य दिशा की होय तो गत गम्य
करने से सूर्यचन्द्र का वलन होता है ॥ ५॥
उदाहरण-दिनमान ३२।४८ रात्रिमान २९।१२ अर्द्धरात्रि १४३६
है; दितमान ३०/४८ में रात्रिमान का आधा १४/३६ युत किया तो
मध्यरात्रि १३२४ हुई, पर्वकाल ५३।२३ इसके बाद का है इससे पर्व.
काल में मध्यरात्रे मान को घटाया तो याम्यनत ७५० हुआ इमकी
याम्यकृति ६३।४४ हुई, पहले की भी याम्यकृति १९४ । ३७ दोनो
एक दिशा के होने से योग किया तो याम्यवलन २५८ । २१
के
हुआ ॥५॥
इति श्रीज्यौतिषीन्द्रमुकुट मणि श्रीवछत्रधर सूरिसूनुना गणक-
मातृप्रसाद विरचितायां भास्वत्याः छात्रबोधिनीनाम
टीकायां चन्द्रग्रहणाधिकारःषष्ठः ॥ ६॥

सूर्यप्रणाधिकारः। अथ सूर्यग्रहणाधिकारः। लम्बनविधिः । नताद् दशना जिनयुक् नताप्तम् तल्लम्बनं तेन युतं नतं च । तत्खाङ्क निम्नोन युतस्य भानोः प्राचीप्रतीच्योश्च शरःप्रसाध्यः॥३॥ सं० टी०-पूर्वानीत प्रकारे गानीतं ननं स्थान- इये स्थाप्यमेकत्रदशनान्नतात, अन्यत्रजिनयुक् नताप्त चतुर्विशति युतेन नतेन प्राप्तलव्धं लम्बनं, एवं पुनः पुनः कृलेसति स्थिरलंवनं भवति, तत् स्थिरलंवनं तेननतं युत खाङ्कनं पर्वान्तसंस्कृत हिन्न स्वौ सौम्यनतत्वात् खाङ्कनिनेन नतेन हीनं याम्यननत्व'द् युक्तं भचक्रा- तादिक्रियाभिः प्राचीप्रतीच्योः शरः प्रनाध्यः चति ॥१॥ "तत् खाङ्क निननुऋणेऽविकऽकोद शतनाकृतयश्चदेवा । तत्खाङ्कहीनादथ चाहीनाच्छोध्यःशगे दृग्गुणिनं यदल्यः१ भा० टी०-नतको दो जगह घर के एक जगह के नन को १० से गुणै उसमें दूसरे जगह रक्खे हुए नत में २४ युक्त कर के भाग देवै तो प्रथम लम्बन होता है, अब प्रथम सम्पन में नत को युतकरके दो जगह धर कर एक जगह १० से गुणा करके उसमें दूसरे जगह २४ को युत करके भाग देने से फल भास्वत्याम्। द्वितीय लम्बन होगा ऐसे ही दूसरे वल न में न त को युत करके उक्त क्रिया करने से तृतीय चलन होगा, फिर जब तक स्थिर लंघन न आवै तब तक से इसी प्रकार से स्थिर लम्बन बनाने का प्रयत्न करता रहै (जिसके आगे उक्त क्रिया करने से न्यूनाधिक न होय उसको स्थिर लम्बन कहते हैं) स्थिर लम्वन में नत युक्त करके उसको ९० से गुणा करै गुण- नफल को सौम्य नत होय तो पर्व काल से संस्कारि द्विघ्नरवि में हीन करे (न घटै तो ५४०० युन करके घटावै ) याम्य नत होय तो युक्त करै, फिर पूर्व चन्द्रग्रहण धिकार के प्रथम श्लोक के अनुसार शरस्पष्ट करै, बह शर उक्त अधिकार के कहे हुए दिशा का होता है यहां पर प्राचीप्रतीची का जो नाम लिया है उसका सम्बन्ध विशेष करके परिलेखाधिकार के दूसरे श्लोक से है अर्थात् वहां पर इसको स्पष्ट रीति से दर्शाया जायगा ॥१॥ उदाहरण-श्री संवत् १९६८ शाका १८३३ कार्तिक वदि ३० रवि. वार के ४ घटी १६ पल पर सूर्य ग्रहण साधते हैं । दिनगण १९९ पर्वान्त ४।१६ सूर्य १३-४ १५२।४ सूर्य की गति १२९ अंतर ७ चन्द्र १३७८१४४|४६ चन्द्रमा की गति ९५० अन्तर ५ दिनार्द्ध १४।८ है। दिनार्द्ध १४।८ में पर्वान्त ४।१६ को घटाया तो सौम्यनत ५२ हुआ, इसको दो जगह रक्खे एक जगह के अंक को १० गुणा किया तो ८/४० हुए इसके एक राशि की या तो भाज्य ५९२० हुआ, दूमरी जगह के अंक में २४ को युत किया तो ३३६५२ हुए इसको सजाती किया तो भाजक २०३२ हुआ, इस मानक का माज्य ५९२० में भाग देने से प्रथम लम्वन २५४ हुआ, इस को नत में यक्त करके पूर्ववत् क्रिया करने से द्वितीय ३।२८ तृतीय ३३४ चतुर्थ ३।३५ पञ्चम लम्वन ३।३५ हुए, पञ्चम लम्बन चतुर्थ लम्वन के समान है, अतः चतुर्थ से चन्द्रग्रहणाधिकारः। १४५ AD सम्बन स्थिर लम्बन हुआ, स्थिर लंबन में नत १९२ को युत क्रिया तो १३:२७ हुए फिर इस को ८० से गुणा तो १२१०१३० हुए, सूर्य १३८४१५२१ को दूना किया तो द्विगुणित मूर्य २०६९।४४/८ हुआ, पर्व ४:१६ में ४ का भाग देने से फल ६४ निछे इनको द्विगुगित सूर्य २०६८:४४८ में मिलाया तो पर्वकारू संस्कारित द्विगुणित सूर्य २७७०।४।८ हुआ इसमें पूर्वनत होने से ६० से मुगे हुए स्थिर लंबन १२१०३० को घटाया तो १५६०१२८१८ बचे इसमें २५०० का भाग दिया तो फल० सौम्यशर हुआ, शेष १५६०.१८१८ को हर २७०० में घटाया तो शेष ११३९॥ ४११३२ बचे इन दोनों शेषों में दूसरा शेष न्यून है अत; इसमें इसके दशमांश ११३५८:११ को घटाया तो सौम्यसर १०२५४३।४१ हुआ ।। १॥ नतिलम्बनस्य रचौसंस्कारमूर्यमानविधिः- पृथक् शतांशाधिकरुद्रभक्त- स्तदक्षयोगान्तरितो नति: स्यात् । तल्लम्बनं दिग्गुणितं गुणाप्तम् हीनं धनं प्रापरयो: खरांशोः॥२॥ ततस्तमः संप्रयुताच्छरश्च शरावनत्यान्तरयुक् स्कुटः स्यात् । मानं रखेर्नोग्ययुताङ्गनन्दा तद्राहकोऽवस्थित एवचन्द्रः ॥३॥ सं० टी०-सशरः पृथक् स्थानद्वये स्थाप्य एकत्र शनांशाधिकद्रभक्तोऽन्यत्र फलं तदक्षयोगान्तरितः, यदा १९ भास्वत्याम् । याम्य फलं तदा योगः यदा सौम्य फलं तदान्तरितो नतिः स्यात्, पूर्वानितस्थिरलम्वनं दिग्गुणितं गुणातं प्राक् पर. योःसौम्ययाम्ययोः खरांशोः हीनं धनं सौम्बनते हीनं याम्यनते धनं कार्यम् । ततस्तमः संप्रयुतात् पर्वकाल- संस्कारितहिन्नभास्कराच्छरः साध्यः ( स च शून्येन द्वाभ्यां च सौम्यः, ए केनत्रिभिर्याम्यः) शरावनत्यान्तरयुक् शरावनत्योरेकदिशो योगः भिन्नदिशोरन्तरकृते स्फुटः स्यात् । भौग्ययुतानन्दारवेर्मानं तद्राहकोधः स्थित- एवचन्द्रः॥ २ ॥ ३ ॥ भा० टी-शर को दो जगह धरके एक जगह के अंक में १०० का भाग देने से जो फल मिले उसमें ११ युक्त करके उसका दूसरे जगह धरे हुए अंक में भाग देने से जो फल मिले उसको "तदक्ष” में हीन युत करने से नति होती है। स्थिर लंबन को ११ से गुणिके उसमें ३ का भाग देने से जो फल मिलै उसको सौम्यनत होय तो पर्वकाल संस्कारित द्विघ्न रवि में हीन याम्य- नत होय तो युक्त करै, फिर उसमें उस दिन के राहु के स्पष्ट करके युत करने से सूर्ययुत राहु होता है। सूर्ययुत राहु से स्पष्ट शर पूर्व को कही हुई रीति से बनावै । सूर्य के खण्डा- न्तर को ९६ में युक्त करने से सूर्य का मान होता है, आगे कहे हुए प्रकार से चन्द्रमान आदि बनाकर ग्रास स्पष्ट करै ( मान गेग के आधे में शर न घटै तो जानै ब्रहण न लगैगा) ॥२॥३॥ उदाहरण-~-शर १०२५॥४३॥४१॥को दो जगह रक्खे एक

सूर्यग्रहणाधिकारः।
तदक्ष
जगह इसमें १०० का भाग दिया तो फल १०/१५ मिले इसमें ११ को
मिलाया तो २१॥१५ हुए इनका दूसरे जगह रक्वे हुए १०२५।४३१४१
में भाग दिया तो सौम्यफल ४८१६ मिले इसको
६०।२२ में हीन किया ता सौम्य नति १२६ हुई, स्थिर लंवन ३।३५
को १० से गुणा किया तो ३५।५० हुए इसमें ३ का भाग दिया तो
फल १९।५७ मिले, इसको सौम्यनत होने से पर्वकाल संस्कारित द्विन्न
सूर्य २७७१४८८ में घटाया तो २०५८।५११८ हुए, इसमें स्पष्ट राहु
५२८३।१४।३९ को युत किया तो सूर्य युत राहु ८०४२१५॥४७ हुआ।
इसमें २७०० का भाग देने से फल सौभ्यशर रहुआ, शेष २६४२२५१४७
को हर २७०० में घटाया तो शेष ५७१५४ १३ वचे पूर्व शेष से यह
शेष अल्प है इससे इसको अपने दशांश ५।४७ से हीन किया तो
सौम्यशर ५२।७।१२ हुआ । नति के और शर के एक दिशा का होने
से दोनों का योग किया तो स्पष्टशर ६४।१३।१२ हुआ । सूर्य के
खण्डान्तर 9 को ८६ में मिलाया तो सूर्य मान १०३ हुआ, और
चन्द्रभुक्ति ९५ में ३ हीन किया तो चन्द्रमान र हुआ। इन दोनों
मानों का योग किया तो मानयोग १९५ हुआ, इसको आधा किया
तो मान योगार्द्ध ९७।३० हुआ, इसमें स्पष्टशर ६४११३:१२ को घटाया
तो ग्रास ३३।१६।४८ हुआ ॥ २ ॥ ३ ॥
स्थितिविधिः-
ग्रासाच्चतु त् सवितुः खराम
ग्रासैक्यलब्धंस्थितिमदनार्द्धम् ।
इतीहसूर्य ग्रहणे विशेषः
शेषस्तु चन्द्रग्रहवद् विचिन्त्यः॥४॥
इति श्रीमच्छतानन्द विरचितायां भास्वत्यां
सूर्यग्रहणाधिकारः सप्तमः ॥ ७ ॥

मास्वत्वाम १५० ४ से गुणा •-सवितुःसूर्यस्य चतुर्माद् ग्रासात् खराम- स्थितिमर्दनाईम् (पूर्वानीतग्रासः स्थानह- त्रचतुर्भिर्गुणितोऽन्यत्र त्रिंश युक्तेन विभा- मानं ई तत् स्थानद्वय स्थाप्यमेकत्र दशनमन्यत्र युक्तेन भक्तं पूर्वानीतस्थिवर्डे युक्तं जातं स्पष्ट- चन्द्र ) सूर्यग्रहणे इतीह विशेषः शेषस्तु चन्द्रग्र- , चिन्त्यः॥४॥ स -ग्रास को दो स्थान में स्थापित करके एक स्थान्त करै द्वितीय स्थान के अंक में ३० को भाजक वार से गुणे हुए गुणन फल में भाग देने से लब्ध चन्द्राव मेर्द्ध होती है, (इसको दो स्थान में धर के एक लानि क को १० से गुणै दूसरे स्थान के अंक में २४ को "ग्राह्य 5 १० से गुणे हुए स्थित्यर्द्ध के गुणनफल में भाग फल मिलै उसको पूर्व के स्थित्यर्द्ध में युक्त करने हीनंध । प्रत्यर्द्ध होती है) यहाँ सूर्यग्रहाधिकार में एही एतना । है शेष चन्द्र ग्रहण के समान जानै ॥४॥ हरण-ग्रास ३३।१६।४८ को दो जगह रक्खे एक जगह ४ से गुणा तो १३३.७।१२हुए, दूसरे स्थान में रक्खे हुये अंक में ३० को युक्त किया तो ६३ । १६:४८ हुए इसका चार ८, ए ग्रास १३३/७१२ में भाग दिया तो फल स्थित्यर्द्ध २६ हुई, को दो जगह धर के एक जगह के स्थितिमदनार्द्ध श६ को १० से हर ( या तो २१६० हुए, दूसरे जगह धरे हुए स्थितिमर्दनार्द्ध श६ में युत किया तो २६ ।६ हुए इसका दश से गुणी हुई स्थितिमर्दनार्द्ध " शि नि राहु चन्द्रग्रहणाधिकारः। में भाग दिया तो लब्ध ०४८ मिले इसको स्थितिमर्दनाद्ध २.६ में युत किया तो स्पष्ट स्थित्यर्द्ध २१५४ हुई । इस स्थित्यर्द्ध २५४ को पर्व काल ४१६ में हीन किया तो स्पर्श काल १ २२ हुआ, स्थित्यर्द्ध २५४ को पर्व काल ४१६ में युक्त किया तो मोक्षकाल १० हुआ, पर्व काल के समान मध्य काल ४१६ हुआ । पूर्वानीत पर्वकाल सम्कारित हिन्न सूर्य २७१७१४८1८ है, इसमें ४१०० को युत किया तो ६८७०1४८८ हुए इस में २७०० का माग दिया तो फल सौम्य शर का सूचक २ मिले, शेप १४७०४८ ८ को २७०० में हीन किया तो शेष १२२९:११।५२ बचे, पूर्व शेष से यह दूसरा शेष न्यून है इससे इस में इसके दशमांश १२२।५।११ को हीन किया तो सौन्य शर ११०६।१६।४१ हुआ, इसमें ८० का भाग दिया तो लब्ध १३।४६ मिले इसका याम्य कृति १९०/५४ हुई, और सौम्यनत १५२ इसकी सौम्य कृति ९७२१ हुई, दोनों कृति भिन्न भिन्न दिशा की हैं इससे अन्तर किया तो याम्य बलन ९३३३ हुआ ॥ इति श्रीज्यौनिधीन्द्र मुकुटमणि श्रीदछत्रधर मूरि मृनुना गणक मातृप्रसादन विरचिनायां भास्वत्यां छात्रवाधिनी नाम टीकायां मूर्यग्रहणाधिकारः सप्तमः ॥ ७ ॥ Cinade भास्वत्याम् । अथ परिलेखाधिकारः। शरादेरङ्गुलादि मानविधिः- मानं शरादेस्वनतस्य पञ्च- भागोनदिक् शेषताङ्गुलाद्याः । चन्द्रार्कमानागुलसंगुणा सा खखागभक्ता वलनामुलानि ॥ १॥ सं० टी०-खनतस्य पञ्चभागोन दिवशेषो हरः भाजकः स्यात, शरादेः शेषहृताङ्गुलाधाः मानं स्यात्, चन्द्रार्कमानाङ्गुल संगुणा सा खखागभक्ता चलनाङ्गु- लानि भवेयुः ॥१॥ "ग्राह्योनखण्डारससंगुणाच्चखपश्चयुक्खण्डफलंविमर्दम् । हीनधनपवणिचन्द्रभानोनिमीलकोन्मिलनकोभवेताम्"। " स्फुट तिथ्यावसाने तु मध्यग्रहणमादिशेत् । स्थित्यर्द्धनाडिकाहीने ग्रासं मोक्षं तु संयुते ॥ १ ॥ निमीलनोन्मीलनाचे भवतां सफल ग्रहे । तहदेव च मदी. नाडिकाहनिशं युतमिति” ॥२॥ भा० टी०-नत के पश्चमांश को १० में हीन करने से हर (भनक) होता है, इसका चन्द्र ग्रहण में शर-चन्द्रमान- राहुमान और ग्रास में भाग देने से, और सूर्य ग्रहण में शर-मूर्यमान चन्द्रमान-और ग्रास में भाग देने से शरादिकों .

परिलेखाधिकार: का अगुलादिक मान होता है । मूर्य ग्रहण में वलन का मृय के मानांगुल से और चन्द्र ग्रहण में चन्द्रमा के मानांगुल मे गोमृत्रिका की रीनि से गुणि के उसमें ७७० का भाग देने से अंगुलादि वलन होता है ॥ १ ॥ उदाहरण-चन्द्र ग्रहण -चन्द्र ग्रहण में नत १९२ है, इसमें ६ का भाग दिया तो लब्ध ११३६ मिले इमको १० में हीन किया तो हर <।२४ हुआ । शर १३२।७ है, इसको सन नी किया नो ७९२७ हुए इसमें मनाती हर ९०४ का भाग दिया तो चन्द्रमान का अंगुल आदि १९१४३ मान हुआ ! चन्द्रमान ९९६० है, इसको सजाती किया तो १९४० हुए इसमें सजाती हर ५०४ का भाग दिया तो चन्द्रमान का अंगुल आदि १११४७ मान हुआ। राहुमान २४७.३० है, इसको सजाती किया तो १४८९० हुए इसमें सजाती हर ५०४ का माग दिया तो राहुमान का अंगुलआदि २९।२८ मान हुआ । पास ४२७ है, इसको सजाती किया तो २४६७ हुए इसमें सजाती हर ६० ४ का माग दिया तो ग्रास का अंगुलआदि ४/६३ मान हुआ, वलन २५८०२१ को चन्द्रमा के मान अंगुरु ११४७ से गृणा किया तो ३४४१४७ हुए, इस में ७०० का भाग दिया तो फल अंगुलादि बलन ४ २१ हुआ। सूर्य ग्रहण में नत ९।६२ है, इसका पंचमांश ११५८ होता है इसको १० में हीन किया तो हर ८।२ । हुआ । शर ६४।१३ है, इसको सजाती किया तो ३८५३ हुए इस में सजानी हर ४८२ का भाग दिया तो शर का अंगुल आदि ७१५९ मान हुआ सूर्यमान १०३।० है, इसको सनाती किया ६१८० हुए इसमें सनाती हर ४८२ का भाग दिया तो सूर्य का अंगुल आदि १२:४९ मान हुआ । चन्द्रमान ९२।० है, इसको सजाती किया तो ६५२० हुए सावत्याम इममें सजाती हर ४८२ का भाग दिया तो चन्द्रमान अंगुल आदि ११।२७ हुआ । ग्रास ३३६१७ है, इसको सजानी किया तो १९९१ हुए इस में सजाती हर ४८२ का भाग दिया तो ग्रास का अगुलादि १।८ मान हुआ। बलन ९३।३३ है, इसको सूर्य के पान अगुल १२।४९ से गुणा तो ११९९।२० हुए इसमें ७०० का भाग दिया तो बलन का अंगुल आदि १४३ मान हुआ ॥१॥ बलनदानविधिः- चन्द्रार्कयोर्दिकसममण्डलस्य सव्यापसव्ये वलनायसूत्रे । मध्यादुदग्दक्षिणतः शरान्तात् तमोईसूत्रेण रबीन्दुखण्डः ॥२॥ सं० टी०-रबीन्दुखण्डः मध्यादुद्ग्दक्षिणतः च- न्द्रायोदिक्सममण्डलस्याग्रसुत्रे सव्यापसव्येन वलनं देयं, शिलातले भूमौ वा मण्डलं कृत्वा केन्द्रमध्ये दक्षि- णोत्तररेखां कुर्यात् तत्रेन्दुमण्डले पूर्वभागस्सौम्यः पश्चि- मभागो याम्यः, अर्कमण्डले रेखापश्चिमभागस्सौम्यः रेखा पूर्वभागो याम्यः, यदिचन्द्रस्य सौम्यशरस्तदोत्तरे वलन- दानं यदि याम्यशरस्तदादक्षिणे वलनदानं, यदि सूर्यस्य सौम्य शरस्ततादिक्तममण्डलादुत्तरभागे वलनदानं यदि याम्यशरस्तदादिक्सममण्डलाद्दक्षिणेभागेवलनदान देयं ततश्चन्द्रस्य सूर्यस्य वा मण्डलमध्याद् वलनमार्गेण शराङ्गु- परिलेखाधिकारः लानिदघात, यत्र शरान्तात्तमोई शरस्यान्तस्तत्रराहोर्म- ध्यान्तः (राहुशब्देन छादक ग्रहणं ज्ञेयम्)राहोर्मध्ये मानां- गुलाई धृत्वा सूत्रंभ्रामयेत् तेन सूत्रेण चन्द्रस्य यावत्य- कुलान्याच्छाद्यन्ते तावन्ति ग्रासामुलानि वाच्याऽनीति, यंत्र सूर्यग्रहे शरस्यान्तस्तत्र चन्द्रस्य मध्यान्तः तस्मिन् चन्द्रमध्ये मानाङ्गलाई धृत्वा सुत्रं भ्रामयेत् तेना- कस्य यावत्यगुलानि छाद्यन्ते तावन्ति ग्रासाङ्गु- लानि वाच्यानीति, ततो वलनदानं-यदि याम्यवलनं सौम्यशरस्तदा पश्चिमाभिमुखे वलनं देयं, यत्र सौम्य- वलनं याम्य शरस्तत्र पूर्वाभिमुखे वलनं देयं, सूर्यग्रहणे विपरीतं ज्ञातव्यमिति ॥ २ ॥ "शरवलनयोः स्यातामेक राशौ यदा शशी । वलनं हि तदा पूर्व भिन्ने जातौ तु पश्चिमे" ॥१॥ भा० टी०-चन्द्रमा या मूर्य के मानक्य खण्डको मण्डल करके केन्द्र के मध्य में उत्तर दक्षिण रेखा करे, चन्द्रमण्डल में पूर्व भाग सौम्य पश्चिम भाग याम्य, और मूर्य मण्डल में पश्चिम भाग सौम्य पूर्व भाग याम्य संज्ञक होता है । चन्द्र का या सूर्य का सौम्यशर होय तो उत्तर बलनदान यौम्य शर होय तो दक्षिण वलनदान करे, जहां पर शरका अंत होता है वहां राहु (छादक) का मध्यान्त होता है, राहु के मध्य मानाङ्गु- लार्द्ध घर के सूत्र को भ्रमावे उस से चन्द्रमा का जनने अंगुल ढंके उतने ग्रासके अंगुल कहै, मूर्य ग्रहण में जहां शरका में

१५४
भास्वत्याम् ।
अंत होता है वा चन्द्रमा का मध्यान्त होता है तिस चन्द्रमा के
मध्य में मानाङ्गुलार्द्ध धर के सूत्र को भ्रमावे उससे सूर्य के
जतने अंगुल ढंके उतने ग्रास के अंगुल कहै, चन्द्र ग्रहण में यदि
बलन दक्षिण का और शर उत्तर का होय तो पश्चिम वलन को
देवे, यदि वलन उत्तर का और शर दक्षिण का होय तो पूर्वमें
वलन को देवे सूर्य ग्रहण में इससे विपरीत अर्थात् यदि वन
दक्षिण का और शर उत्तर का होय तो पूर्व में वलन को देवे
यदि वलन उत्तर का शर दक्षिण का होय तो पश्चिम में बलन
को देवे ॥२॥
चन्द्रसूर्ययोर्मानाङ्गुलस्पष्ट करणविधिः-
स्थित्यईनिम्नै रसवेदभक्तै-
मीनाङ्गुलैः प्राक्परतस्तदयात् ।
स्पर्शोथ मुक्तिश्च तदिष्ट काला-
दिन्दुग्रहेऽर्क ग्रहणे प्रतीपात् ॥३॥
सं टी० चन्द्रमानाङ्गुलानि सूर्यमानाङ् गुलानि
च स्थित्यहनिम्नै रसवेदभक्तैर्लब्धानि स्पर्श मोक्षाङ्गुला-
नि स्युः, अथ स्पर्शोऽमुक्तिश्च तदग्रात् प्राग्परतः
दातव्यानीति, वलनाग्रात् स्पर्शे पूर्वभागे दातव्यानि
मोक्षामुलानि परतःपश्चिमभागे दातव्यानीति तदि.
ष्टकालादिन्दु ग्रहे तत्पूर्वोक्त स्पर्शकालो वा मोक्ष.
कालो ज्ञानतव्यः, अर्कग्रहणे प्रतीपात् पश्चिमभागे स्प-
शकालः पूर्वभागे मोक्ष काल इति ॥३॥

परिलेखाधिकारः। "ग्रासं नसतं कृत्वा विवमानेन भजितम् । लब्धं विंशोपका ज्ञेया ग्रहणे सूर्यचन्द्रयोः" ॥१॥ धूम्रः कृष्णः पिङ्गलोऽल्पार्धसर्व ग्रस्तश्चन्द्रोऽस्तु कृष्णः सदैव”। +"स्थान त्रये स्थाप्य कलेगताब्दा- को २० से * उदाहरण-चन्द्रमा का ग्रास ४१ । ७।३८ को २० मे गुणा किया तो ८२२ । ३३ । ४० हुए इस में विम्ब ९९ का माग दिया तो लब्ध ८ विंशोपका हुआ। सूर्यका ग्रास ३३ । १६ । १८ गुणा तो ६६५३६ हुए इपमें विम्ब १०३ का भाग दिया तो लब्ध ६ विंशोपका हुआ। +उदाहरण-चन्द्रग्रहण-संवत् १९६९ का है, यहां कलिका गता- ब्द संख्या ५०१३ है इसको तीन जगह में स्थापित किया। तीसरे जगह में ३१ को भाग दिया ता लब्ध १६१ मिले इसको दुमरे स्थान के अंक ५०१३ में घटाया तो ४८९२ हुए इसमें १८ का भाग दिया तो लब्ध २६० मिले इस को प्रथम स्थान में स्थापित किये हुये अंक ५०१३ में युत किया तो ५२८२ हुए इस कोर से गुणा तो १०९६४ हुए इसमें ६ को युत किया तो १०५७० हुए इस में ७ का भाग देने से शेष बचे इस से सातवां पर्वाधिप यम हुआ । सूर्य ग्रहण-संवत् १९६८ का है यहाँ कलिगताब्द संख्या ६०१२ है, इसको तीन जगह रक्खे तीसरे जगह के अंक ५०१२ में भाग दिया तो लब्ध १६१ मिले इसको दूसरे जगह में रक्खे हुए ५०१२ में हीन किया तो ४८५१ हुए इप्त में १८ का भाग दिया तो लब्ध२६० मिले इस को पहले जगह में रक्खे हुए ५०१२ में युत- भाखयाम् । से नन्त्यं भजेच्चन्द्रगुणैः फलोनः । द्विस्थस्तदृष्टेन्दु लवे तयुक्त- स्त्रिस्थः द्विनिनोऽङ्गयुतोऽद्रिभक्तः ॥१॥ शेषे भवन्तीन्दु रविग्रहेऽस्मिन् पर्वाधिनाथाः शदृशाः फलैश्च । ब्रह्मन्दु शकोत्तरदिप- पाशि कृपीटयोन्यन्तकृतः क्रमेण" ॥२॥ भा० टी०-चन्द्रग्रहण में चन्द्रमा के मानांगुल को स्थित्यर्द्ध गुणा करके उस में ६ का भाग देने से और सूर्य ग्रहण में सूर्य के मानाङ्गुल को अपने स्थित्यर्द्ध से गुणा कर के उस में ४ का भाग देने से लब्ध स्पर्श-मोक्ष के अङ्गुलादि होते हैं, वह बलन के आगे से स्पर्श काल के अंगुल को पूर्वभागदेवे मोक्ष- काल के अंगुल को पश्चिम भाग में देवे, सूर्य ग्रहण में पश्चिम भाग में स्पर्श काल पूर्व भाग में मोक्ष काल देवे ॥३॥ उदाहरण-चन्द्रमानाङ्गुल ११ । ४७ को स्थित्यर्द्ध २ । ४२ से गुणा किया तो ३१ । ४९ हुए इसमें ६ का भाग देने से लब्ध अङ्गु- लादि ५ । १८ मिले, सूर्यमानाङ्गुल १२ । ४९ को स्थित्यर्द्ध २९४ से गुणा किया तो ३७ । १० हुए इस में ४ का भाग देने से लब्ध अंगुलादि ए । १७ मिले ॥३॥ - किया तो ५२८१ हुए इस को २ से गुणा किया तो १०५६२ हुए इस में ६ को युत किया तो १०५६८ हुए इस में ७ का भाग देने से शेष ५ चे इस से पाँचवाँ पर्वाधिपति वरुण हुआ ।।

परिलेखाधिकारः।
चन्द्रग्रहणम् ।
पू
सूर्यग्रहणम् ।
पू.
.
द.
वा.
ग्रन्थनिर्माणकालज्ञानम्-
खखाश्विवेदोपगते युगाब्दे
दिव्योक्तितः श्रीपुरुषोत्तमस्य ।

१५८ 520 । आस्वत्याम् । श्रीमाञ्छतानन्द इतीदमाह सरस्वतीशङ्करयोस्तनूजः॥४॥ इति श्रीमाञ्छतानन्द विरचितायां भास्वत्याः परिलखाधि कारोऽष्टमः ॥८॥ सं० टी०-सरस्वती शङ्करयोस्तनुजः श्रीमाञ्छता- नन्द इति खखाश्विवेदोपगते युगाब्दे श्रीपुरुषोत्तमस्थ सूर्यस्य दिव्योक्तित इदमाह ॥४॥ मा० टी०. सरस्वती शंकर के पुत्र जो श्रीमान् शतानन्द वह श्री सूर्य भगवान् की दिव्य उक्ति से ४२०० युगान्द (शाका १०२१) में इस भास्वती पुस्तक को बनाया ॥४॥ इति श्रीज्यौतिषीन्द्रमुकुट मणि श्रीदछत्रधर सूरिसूनुना गणक- मातृप्रमाद विरचितायां भास्वत्याः छात्रबोधिनीनाम टीकायां परिलेखाधिकारोऽष्टमः ॥ ८ ॥ श्री १०८ सांकृत्य कुले मनीषि मुकुटो विश्वेश्वरोऽभूत्ततः श्री १०८ कालीचरणोऽङ्ग दर्शन बुधो सद्धर्म वेत्ता ततः। श्री ६ मच्छत्रधराद् धरैक गणकान्मात् प्रसादोऽस्तियस्- व्यग्नीभेन्दु लसच्छ के ब्यरचयत् टीकां शिवप्रीतये ॥ १॥ पञ्चाङ्ग रचना क्लेश निश्शेषकरणोन्मुखी । कृता मातृपसादेन भाखत्यां छात्रबोधिनी ॥ २ ॥ समाप्तयं भास्वती।

The University Library.
Allababad.
20559
Accession No.
Section No.
--

Bhasvati

Title
Bhasvati
File name
Bhasvati
Text
OCR done
Published
2006\5
Publisher
Chowkhamba Sanskrit Series Office
Language
Sanskrit
Pages
176
Library
A. U. A
Classification
Literature
DLI number
448291
Barcode
5990010124649.00
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IIIT, Allahabad
Digital publisher
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VuTx4FLJr9b
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