Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Rajneethi Vigyan

Bhandari,shuk Sampathi · 2011/01

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हिन्दी पुस्तक एजेन्सी-माला सख्या-२८ राजनीति-विज्ञान अब लेखक- सुखसम्पतिराय भण्डारी हिन्दी पुस्तक एजेन्सी १२६ रिसन रोड,कलकत्ता प्रथम भार ] चन १९८० [ मूल्य १०)

हट
९२६,हरिस्सनरी
कलकत्ता
जगदीशनारायण तिवारी द्वारा
"वणिक प्रेस"
६० मिर्जापुर स्ट्रीट,
फलकत्तामे
मुदिन।

निवेदन प्रिय पाठकवृन्द । आज हिन्दी साहित्यमें राजनीति विषयक पुस्तकोंका जैसा अभाव है यह आपलोगोंसे छिपा नहीं है । उस अभावकी पूर्ति के लिये ही यह 'राजनीति-विज्ञान' नामकी पुस्तक आपके सामने रखता है। पाश्चात्य राजनीति-विद्या- विशारदोंके विचारों का स्थान स्थानपर उल्लेख किया गया है जिससे राजनीतिक गूढ रहस्योंको पाठक सहज ही समझ सकें। मैंने विशेष ध्यान इस ओर दिया है कि यह पुस्तक राजनी तिके विद्यार्थियोंके लाभको हो। जहातक में समझता ह इससे प्रत्येक विद्यार्थी विशेषकर राष्ट्रीय विद्यालयोंके विद्यार्थी अवश्य लाभ उठायेंगे। यह पाटन पुस्तकोंमें रगने योग्य है। मैं अपने इन प्रयलमें कहातक सफल हुआ है इसका निर्णय विद्यालयोंके शुभ चिन्तकों, विद्यार्थियों और प्रेमी पाठकों के ऊपर है। यदि प्रेमी पाठकोंने सदाको भाति इसे भी अपनाया तो दूसरे सस्क. रणको और भी अच्छे रूपमें पाठकोके सामने रसगा। विनीत- प्रकाशक - । भूमिका आजकल देशमे राजनैतिक भावनाओंकी अद्भुत जागृति हो रही है। देश स्वराज्य और उत्तरदायित्वपूर्ण शासनके लिए लालायित हो रहा है। पर स्वराज्यकी सफलताके लिए पौर्वात्य और पाश्चात्य राजनीतिज्ञानकी बड़ी ही भावश्यकता है। मुझे खेदके साथ कहना पडता है कि, हिन्दीमें राजनीतिके सिद्धान्तो- की विवेचना करनेवाले अन्य नाम मात्रके है । राजनीतिक साहि- त्यका अभाव साहित्यमे बहुत खटकता है। इसी प्रभावकी किंचित् अशमे पूत्ति करने के लिये मैंने यह प्रयत्न किया है। मे नहीं कह सकता कि, इसमे मै कहातक सफल हुआ हू, इसका निर्णय करनेका अधिकार पाठकोको ही है। मैं तो इतना ही निवेदन करना चाहता हूँ कि यह मेरे एक वर्षके सतत परिश्रमका फल है। इसके लिये मुझ पचासों अगरेजीके अन्य देखन पड़े है, और उन्हींका सार इसमें भरनेका प्रयत्न किया है । इस ग्रन्थके लिखनेमे मुझे प्रधान रूपसे निम्नलिखित ग्रन्थों- से सहायता मिली है जिसे मैं कृतज्ञता पूर्वक स्वीकार करता है। (I) Theory of the State by Bluntchli (2) Problems of Politicat Scie ice by Row 13) Political Philosophy by Willoughby (4) The Domain of Political Science by Munro Smith (5) Clements of political Science by Sidguick (6) Introduction to Political Science by Garner और भी अनेक सुप्रख्यात और प्रमाण भूत ग्रन्थोसे सहायता मिली है अतएव उन लेखकोंके भी हम अत्यन्त कृतज्ञ है । अजमेर भवदीय- २७ ३ २३ सुखसम्पति राय भण्डारी ।

१०५ १२० १२२ १५४ १८६ विपय ३८-व्यक्तिवाद ३६-व्यक्तिवादको उत्पत्ति और विकास ४०-व्यक्तिवादकी समालोचना ४१-साम्यवाद ४२--साम्यवादकी समालोचना ४३-अराजकवाद ४४--बोत्शेविक पन्य ४५-नागरिकता ४६-नागरिक और निर्वाचक ४७-नागरिकता और राष्ट्रीयता ४८-नागरिकताके अन्य भेद ४६--देशीयकरणके परिणाम ५०-नागरिकताका नाश ५१-प्रतिनिधि तत्त्व ५२-मताधिकारके सिद्धान्त ५३-साधारण मताधिकार ५४-त्रिपोंको मताधिकार ५५-लएडमें स्त्रियोंको मताधिकार ५६-अमेरिकामें स्त्रियोंको मताधिकार ५७-स्त्रियोंको मताधिकार क्यों दिया जाना चाहिये १६३ २०५ २०६ २१२ २१३ २१४ २१४

हिन्दी पुस्तक एजेन्सी-माला सपा-२६
मुखाकृति निदान
।
लेखक--प्रसिद्ध जलाचिकित्सक डाक्टर लुई कूने
अनुवादक, अध्यापक श्री रामदास गौड़ एम० ए०
शीघ्रही प्रकाशित होगी।
"
हिन्दी पुस्तक एजेंसी माला सख्या-३०
वीर केसरी शिवाजी
लेखक-श्रीनन्दकुमारदेव शर्मा
उप रही है।

राजनीति विज्ञान राजनीतिशास्त्र क्या है ? भिन्न भिन्न राजनीतिज्ञ राजनीतिशास्त्रको भित्र २ व्याख्या करते हैं पर सामान्यतया राजनीतिशाखसे उस शासकी कल्पना होती है जो राज्य (State) के शासन, गुण, कर्म, धर्म तथा उसके मित्र २ रूपोंका विवेचन करता है। यह दो प्रकारका है, यथा (१) सैद्धान्तिक राजनीतिशास्त्र (Theoriticil Pohtics) गीर दूसरा व्यावहारिक गजनीतिशास्त्र (Applied Politics)। सैद्धान्तिक राजनीतिशास्त्र केवल राज्य या राज्यशामनके मूठका, उसके तत्वोंशा, उसके सिद्धान्तोंका और उसके भादशों का विवेचन करता है। इसके विपरीत व्यावहारिक राजनीतिशास्त्र उन साधनों और उपायोंका विचार करता है जिनके भवरम्या- से राजनीतिशास्त्र तरय, आदर्श व्यवहारमें लाये जा सके। दूसरे शब्दोंमें यों कह लीजिये कि यह दूमरो तरफा राजनीति- शान शासनके व्यापहारिक रूप और कार्य पर प्रकाश डालता है। एक सुप्रख्यात पाश्चात्य विद्वानने सैद्धान्तिक और व्याय- हारिक राजनीतिशास्त्र के उद्देशोंको इस प्रकार प्रकट किया है- २ राजनीति विज्ञान सैद्धान्तिक राजनीति व्यावहारिक राजनीति राज्यके सिद्धान्तोंका अर्थात् (१) राज्यके व्यावहारिक और उनके मूल, गुण, धर्म और प्रत्यक्षरूप या शासनका विवेचन आदर्शों का विवेचन। (२) शासनके व्यावहारिक और (२) शासनसिद्धान्त अर्थात् प्रत्यक्षरूपका वर्णन जिसमें जदी शासन सम्बन्धी सस्थाओं, विभाग जुदो शासन-प्रणालियोंका वर्णन व्यवस्था,राज्यकर,कानून आदि और विश्लेषण होगा। सिद्धान्तोंका वर्णन (३) कानूनका व्यावहारिक (३) कानून बनानेका सिद्धान्त उपयोग। अर्थात् इसमें कानूनकी उत्पत्ति, उद्दश, विकास आदिका वर्णन रहता है। सुप्रख्यात जर्मन राजनीतिज्ञ ब्लशले ( Bluntschit) का कथन है कि "राजनीतिशास्त्र उस शास्त्रका नाम है, जिनमें गज्यफे तत्वोंका, उसकी मूल प्रकृतिका, उसके गुणधर्मका, उस- विविध रूपों और विकासका वर्णन रहता है। लन्शले की तरह एक दूसरा मैरियम (Garnes) नामक जर्मन राजनीतिज्ञ राज्यको व्याख्या इस प्रकार करता है-"राजनीतिशास्त्र राज्यको शकिको सस्था ( Institution of Power ) समझना है और यह राज्यको उत्पत्ति, उद्देश और आदर्शपर विचार करता है। पाल जैनेट ( Paul Janet ) नामक मान्सका राजनीतिशास्त्रका अन्य शास्त्रोंसे सम्बन्ध एक नामाकित लेखक राजनीतिशास्त्रको समाजशास्त्रका वह हिस्सा समझता है, जो राज्यके मूल और शासनके तत्त्वोपर विचार करता है। प्रोफेसर सीली महाशय राजनीतिशास्त्रकी व्याख्या करते हुए लिखते है-राजनीतिशास्न शासनके सिद्धान्तों और काव्यों का उसी प्रकार विवेचन करता है जिस प्रकार अर्थशास्त्र सपत्तिका, जीवशास्त्र जीवनका गौर योज- गणित अडोंका। इन समतों और व्याख्याओंका साराशयद है कि राजनीति- शास्त्र साधारणतया सय दृष्टियों और सव याजुओंसे राज्यका विचार करता है। राजनीतिशास्त्रमा आरम्म और अन्त राज्य हीसे होता है। वह जैसा कि हम ऊपर कह चुके है, राज्यकी उत्पत्ति, मूल प्रकृति, तस्थ और उसके विविध रूपों तथा विका- सपर विचार करता है। राजनीतिशास्त्रका अन्य शास्त्रोंसे सन्वन्ध जिस प्रकार अर्थशास्त्र, अपराधशास्त्र आदि ममाजशास्त्रके गङ्ग, घेसे ही राजनीतिशास्त्र भी समाजशास्त्रका एफ अङ्ग विशेष है। समाजशास्त्रकइन मिन्न भिन्न अङ्गोंमें परस्पर इतना सम्बन्ध है कि एक दूसरेस पिलकुल जुदा कर देना असंभव नही ता दुस्माध्य अवश्य ६। इनका पहा ही घनिष्ठ सम्पन्ध है। उदाहरण के लिये आप राज्यको ले लीजिये । जैसा हम पर पतला बुफे ई-राज्यपर विचार करना राजनीतिशास्त्रका काम ४ राजनीति विज्ञान है, पर राज्यहीसे सम्बन्ध रखनेवाले कितने ऐसे आर्थिक प्रश्न हैं, जिनपर विचार करना अर्थशास्त्रका काम है। इसी प्रकार राजनीतिशास्त्रका और भी अनेक शास्त्रोंसे सम्बन्ध है। सुप्रसिद्ध फेञ्च राजनीतिक लेखक पाल जैनेट ( Paul Janet) लिखता है-राजनीतिशास्त्रका अर्यशास्त्र (Political economy) ar Arglaranin (Science of nealth ) a afas सम्बन्ध है। इस प्रकार उसका कानून-इतिहास और दर्शन- शास्त्रसे भी सम्बन्ध है। जेलिनेक (Jellinek ) नामक विख्यात लेखक तो इससे बहुत आगे बढकर कहता है कि राजनीतिशास्त्रका सम्बन्ध न केवल अर्थशास्त्र, कानन विज्ञान और इतिहाससे है वरन, मनुष्यशास्त्र, मानसशास्त्र, नीतिशास्त्र और भूगोलसे भी है। इतना ही नहीं ये सब शास्त्र इसके सहयोगी है। यहा हम यह उचित समझते है 6ि इस बातका कुछ खुलासा कर दे कि मित २ शास्त्रोंके साथ इस शास्त्रका क्या सम्बन्ध है। समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र हम ऊपर कह चुके हैं कि राजनीतिशास्त्र समाजशास्त्रका मङ्ग- विशेष है । इन्हें एक दूसरेसे रिलकुल जुदा कर देना दुस्साध्य है। इन दोनोंके बीच सीमान्धनकी स्पष्ट लाइन खींचना दुष्कर है। राजनीतिशास्त्र समाजशास्त्रज्ञा बना है। हा, वैज्ञा- निक अन्वेषणके लिये इम इन्हें थोडी देरके लिये अलग २ कर

समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्र
है
सकते हैं,पर इनके बीच में सीमानधनको नैसर्गिक लाइन
खींचना
तो असभव भी कहा जाय तो विशेष अतिशयोक्ति न होगी।
समाजशास्त्र उस शास्त्रको कहते हैं जिसमें शास्त्रीय रीतिसे
समाजका इस दृष्टिसे विचार किया गया है कि वह व्यक्तियोंका
समुदाय है । दूसरे शब्दों में यों कह लीजिये कि लमाजशास्त्र उस
शास्त्रका नाम है जिसमें मनुष्योंफा उनके सामुदायिक रूपमें विचार
किया गया हो। इसके विपरीत राजनीतिशास्त्र समाजके केरल
एक रूपका-राजनीतिक रूपका विचार करता है। अर्थात् राज
नीतिशास्त्रका कार्यक्षेत्र समाजशास्त्र के कार्यक्षेनस सकुचित
। इतना होते हुए भी समाजशास्त्र और राजनीतिशास्त्रका
पिता पुन तुत्य सम्बन्ध है । जहा समाजशास्त्र समाजपर, मानव
समुदायपर सब दृष्टियोंसे विचार कर सकता है, वहा राजनीति
शाप्त समाजके केवल राजनीतिक पहलू (Political side) पर
विचार करता है।
इतिहास और राजनीतिशास्त्र
इतिहास और राजनीतिशासका भी घनिष्ठ सम्बन्ध है।
हा, यहा हम इतना अवश्य कहेंगे कि जहा समाजशास्त्र और
राजनीतिशास्त्रका पिता पुत्र तुल्य सम्बन्ध है, वहा इतिहास और
राजनीतिशास्त्रका भाई भाई सा सम्बन्ध है। सुप्रख्यात राज
नीतिके लेखक जेलिनेक ( Jellinek ) महाशयका कथन है,
किसी भी प्रकारकी सस्थाओंका मध्ययन, चाहे वे राजनीतिक हों,

६ राजनीति विज्ञान चाहे कानूनी या सामाजिक हों, विना इतिहासकी सहायताके नहीं हो सकता|राजनीतिशके लिये राजनीतिक सस्थामोंके केवल गुण धर्मकाही अध्ययन बस नहीं होता, उसे इस बातका भी अध्ययन करना पडता है कि इन संस्थाओंका विकास कैसे हुआ, उनमें समय समयपर किस किस प्रकारके परिवर्तन होते गये और उन परिवर्तनोंसे मनुष्य-समाजकी सभ्यतापर क्या क्या प्रभाव पडे । राजनीतिज्ञके लिये इन बातोंका जानना अत्यन्त मा- वश्यक है और ये वार्ते इतिहासले सम्बन्ध रखती हैं । गजनीति- शास्त्र और इतिहासके इस अत्यन्त धनिष्ठ सम्बन्धको देखकर राजनीतिके सुप्रसिद्ध आचार्य, सीली, महोदय कहते हैं, "दिना इतिहासके राजनीतिशास्त्र निकम्मा है और बिना राजनीतिशास्त्रके इतिहास निकम्मा है" यद्यपि इतिहास और राजनीतिशास्त्रका अत्यन्त घनिष्ठ सम्बन्ध है और इतिहास राजनीति-शास्त्रकी सामग्री तैयार करता है, पर हम सुप्रसिद्ध पाश्चात्य राजनीतिक लेखक फ्रीमेन महोदयके इस कथनसे सहमत नहीं कि “इतिहास भूतकालीन राजनीति है या भूतकालीन राजनीति ही इतिहास है। अगर भीमेन महोदयका अभिप्राय केवल राजनीतिक संस्थाओंके इति- हाससे होता, तो हम उनके साथ सहमत हो जाते पर उन्होंने केवल "इतिहास" लिखकर अपनी व्याख्याको कमजोर कर दिया है। नये २ आविष्कारोंके, भाषाओंके, रीतिरिवाजोंके, उद्योग धन्धोंके भी इतिहास है। पतलाइये, इनका राजनीतिशालसे अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र ७ ऐसा कौनसा आवश्यक सम्बन्ध है, इसी तरह सघ प्रकारकी राजनीतिका भी सम्बन्ध इतिहाससे नहीं है। विशुद्ध तात्यिक राजनीति ( Puro philosophical politics ) भी इतिहासमें से समा सकती है? इतिहासका कार्य ससारमें होनेवाली महत्त्वपूर्ण घटना- ओंका वर्णन करना और उनसे होनेवाले विविध प्रभावोंको प्रकट करना है। इसके अतिरिक्त इतिहासका यह भी काम है कि विविध संस्थाओं के विकास और पतनका परिचय करवाना और यह दिखलाना कि इनमें सृष्टि के नियम किस किस प्रफारसे कार्य कर रहे हैं, अर्थात् इतिहासका कार्यक्षेत्र राजनीतिक घट- नाओं के वर्णन या विश्लपणतक ही परिमित नहीं है। यह विशाल है और इतिहास तबसे चला आ रहा है जब मनुष्यमें राजनीतिक भावनाओं का उदय भी नहीं आ होगा। इसलिये इतिहास और राजनीतिशास्त्रका घनिष्ठ सम्बन्ध स्वीकार करते भी यह कहना ठीक नहीं कि "इतिहास भूतकालीन राजनीति है, और भूतकालीन राजनीति माधुनिक इतिहास है ( History is past politics or that politics is present history) i अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र हमने इस अध्यायके आरम्भमें अर्थशास्त्र और राजनीति. शास्त्र सम्बन्धपर कुछ प्रकाश डाला है, पर वह इतना थोडा है कि उससे शायद पाठकोंको सन्तोप न होगा। अतएव इसी राजनीति विज्ञान विषयपर और दो शब्द लिखने अनुचित न होंगे। इतिहासकी तरह अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्रका भी भाई भाई सा घनिष्ठ सम्बन्ध है विशेष कर इस युगमें तो यह सम्बन्ध इतना धनिष्ठ हो गया है कि शायद किमी ऐतिहासिक युगमें ऐसा सम्बन्ध नहीं रहा होगा। आजकल राज्यकी बहुतसी बातें आर्थिक नोतिपर निर्भर करती हैं। पूजोदारों और मजदुर्गेमें पपा सम्बन्ध है और क्या होना चाहिये ? देशको सम्पत्तिको किस प्रकार वृद्धि की जावे? कौन कौनसे मालपर कैसे केसे फर लगाये जाय? देशके लिये सरक्षण-नीति लाभकारक है कि अयाध्य वाणिज्य नीति १ चे मय प्रश्न ऐसे हैं, जिनका सम्बन्ध जहा अर्थशास्त्र है, वहा राजनीतिशास्त्रसे भी है, इसी प्रकार कई ऐसे विषय है, जिनका सम्बन्ध इन दोनों शास्त्रोंसे है। इकरार-सिद्धान्त राज्यकी उत्पत्तिके सम्बन्धमें जिस सिद्धान्तने गत दो सौ वर्षों से यूरोप और अमेरिकाके विद्वानोंका ध्यान खींच रखा है, वह इकरार सिद्धान्त ( The Compact theory) है। हमारे महाभारतमे भी इस सिद्धान्तका दिग्दर्शन है। श्रीयुक्त चिन्ता- मणराव वैद्य "हिन्दी महाभारत मीमासा" में लिखते हैं "राजसत्ताकी मूल उत्पत्ति कैसे हुई और उस सत्ताके साथ ही साथ न्यायानुसार राज्य करनेकी जवाबदेही राजालोगोंपर कैसे आ पडी? इन प्रश्नोंके सम्बन्धमें एक और सिद्धान्त महा- - इकरार सिद्धान्त ६ भारतमें पाया जाता है। इस सिद्धान्तमें यह कल्पना की गयी है कि राजा और प्रजाके बीच इकरार हुआ था। पाश्चात्य देशोंमे हास आदि राजकीय तत्त्ववेत्ताओंने यह सिद्धान्त प्रतिपादित किया है कि भारतमें राजा और प्रजाके बीच इफरार होता है। इम पातपर ध्यान रहे कि हजारों वर्ष पहले भारतीय आयों ने यही सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। शातिपर्वके ६७ अध्या- यमें यह वर्णन है कि पहले राजाके न रहनेसे वली निर्घलको जलको मछलियोंकी नाई खाने लगे, तब सब लोगोंने मिलकर नियम किया कि "जो कोई किसीसे कटु भापण करेगा, उसे मारेगा या किसीकी स्त्रा अथवा द्रव्यका हरण करेगा, उसे हम त्याग देंगे।" यह नियम सर लोगोंके लिये एक सा है, परन्तु जब इसका परिपालन नहीं हुआ तय सारी प्रजा ब्रह्माके पास गयी और कहने लगी कि हमारा प्रतिपालन करनेवाला कोई अधिपति हमें दो, तर ब्रह्माने मनुको आज्ञा दी। उस समय मनुने कहा- "मैं पापकर्मसे डरता । असन्मार्गले चल्नेवाले मनुष्योपर राज्य करना पाप है।" तब लोगोंने कहा-"राष्ट्र में जो पाप होगा, वह कर्ताको लगेगा। तू मत डर, तुझ हम पशुओका पचासवा हिस्सा और अनाजका दशमाश देंगे। शस्त्र अस्त्र और वाहन लेकर हमारे मुखिया लोग तेरे साथ रहेंगे। तु सुख और आनन्दसे राज्य कर, हम अपने धर्माचरणका चौथा हिस्सा भी तुझे देंगे।" इसको स्वीकार कर मनु राज्य करने लगे। मनमी और शत्रुको दण्ड देकर धर्मके समान उसने राज्य किया। इस कथामें राजनीति विज्ञान इकरार सम्बन्धी यह फल्पना की गयी है कि राजा धर्मके अनु- सार प्रजापर राज्य करे तथा पापियों को दण्ड दे और प्रजा उसे कर (लगान)द। मुख्यतः जमीनकी पैदावारका दशमाश और पशु तथा व्यापार आदिका पचासवा हिस्सा दे। यह मान लेने में कोई हर्ज नहीं कि प्राचीन कालमें भारतके राजा और प्रजा दोनों इस प्रतिज्ञाके अनुसार चलने थे और राजा लोग इससे अधिक कर नहीं लेते थे।" उपरोक अवतरणसे हिन्दूशास्त्रोंके अनुसार राजा और प्रजामें इकरारको क्या कल्पना है, इस बातका ज्ञान पाठकको हो गया होगा। अब हम पाश्चात्य लेखकोंकी दृष्टिसे भी इस विषयपर कुछ प्रकाश डालना चाहते हैं। महाभारतकी तरह कई पाश्चात्य विद्वानों और राजनीतिज्ञ महानुमायोने भी यही प्रतिपादित किया है कि प्रजा और राजाके इकरारहीसे राज्यसस्थाकी उत्पत्ति हुई। प्रजागे राजाओंको फर और अन्य प्रकारकी सहायता देना तथा राजाको हुकमत मानना स्वीकार किया, और इसके बदलेमें राजाने प्रजाकी रक्षा- का इकरार किया पाश्चात्य विद्वानोंका कथन है कि ससार- की अधिकाश राज्यकान्तिया इसी इकरार-सिद्धान्त के कारण जहा प्रजाने देखा कि राजा अपने इकरारके मुताबिक कर्तव्य नहीं कर रहा है, उस राजाके प्रति प्रजाके भाव दूषित * या अवसरण मेंने योयुत प० माधवराव सप्रेक हिन्दी अनुवाद, जानता पूर्वक लिया ।

इकरार-सिद्धान्त होने लगते है और एक समय आता है, जय येही भाप कान्तिका रूप धारण कर लेते हैं। माधुनिक पाश्चात्य लेखकों में जिन्होंने इकरार-सिद्धान्तके विषयपर कुछ लिखा है, साले पहला लेखक रिचार्ड हुकर (Richard Hooker) है। यह इङ्गलेएडका पादरी था। इसने सन १५६४ में "Ecclesiastical Policy" नामक ग्रंथ लिखा। उसमें इसने पोशैकि धार्मिक अधिकारोंकी रक्षा करते हुए इया. रार-सिद्धान्तका समर्थन किया है। इस समय इङ्गलेण्डके लोगों की मनोवृत्ति कुछ ऐसी होने लगी थी कि वे इस प्रकारका कोई लिद्धान्त बडो उत्सुकताले ग्रहण कर सकते थे, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया है कि राजाके अधिकार प्रनाको सम्मति पर निर्भर करते हैं, राज्यसस्थाकी उत्पत्ति प्रजाही द्वारा हुई। लोगोंने इस सिद्धान्तको उत्सुकतासे स्वीकार किया, इसके बाद और भी कितने दी र २ पाश्चात्य राजनीतिक लेखकाने इस विषयपर लेखनी उठायी। सुप्रसिद्ध पाश्चात्य लेखक माटियस (Grotrus) ने अपने विख्यात ग्रन्य “Law of War and Peace" में, मिल्टनने अपने “Tenure of Kings and Magistrate" में, फ्यूफे डार्फने अपने "Law of nature and of Nations" में, स्पाइन्शाने अपने "Tractatus Politics" में और इन सयले विशेष थामस हान्सने अपने "Lev tathan" में इस इफरार-सिद्धान्तकी यडे जोरसे पुष्टि की है। इसी समय सुप्रसिद्ध राजनीतिक लेखक लाक हुए जिन्होंने राजनीति विज्ञान "Two Trentises of Government" नामक अपने ग्रन्थमें इस सिद्धान्तको विवेचनात्मक पुष्टि की है। आपके एक सदी पाद सुप्रसिद्ध पाश्चात्य तत्वज्ञ रूसा हुए, जिन्होंने अपने “Le Contrat Social" प्रथमें विशेष तौरसे इसी सिद्धान्तका प्रतिपादन किया है। मापो इस प्रथके द्वारा इस सिद्धान्तको अत्यन्त लोकप्रिय कर दिया। अमेरिकामें भी वहाकी राज्यक्रान्तिके समय, यह सिद्धान्त लागो हदयोंपर जोरदार अधिकार जमाये हुए था । अमेरिकामें जिस समय राज्यकान्ति हुई, उस समय अधिकाश लोगोंका यही ख्याल था कि "इकरार ही अधिकारकी मूलभित्ति है । लोगोंकी सम्मतिहीसे राज्यसस्था अस्तित्व में आयी है। किसी सरकारको यह हक नहीं है कि यह उन लोगोंसे जबरदस्ती अपनी हुकूमत मनवावे जिसको स्थापनामें उनकी सम्मति नहीं है।" इस प्रकारके रयाल क्रान्तिके समय अमेरिकामें फैले हुए थे । अगर यह कहा जाय तो अतिशयोक्ति नहीं होगी कि उस समय ये बातें धार्मिक सिद्धान्तों की तरह मानी जा रही थीं। सोलहवीं और सत्रहवीं सदीमें इस सिद्धान्तका प्रभाव बहुत अधिक बढ़ा हुआ दीखता है। यहातक कि इग्लैण्डकी रानी मेरीको यह स्वीकार करना पड़ा था कि "राज्यशक्ति और कुछ नही, केवल लोग और राजाके बीचका इकरार है।" इसी बातफो, इसी सिद्धान्तको जार्ज बुचाननने अपनी पुस्तक "Rights of Kings among Scots" में घडी प्रचलतासे पुष्ट किया है । , इकरार सिद्धान्तकी समालोचना आगे चलकर मौरभी पितने ही महान लेवाहोंने इम सिद्धान्तका समर्थन करते हुए राज्य शक्तिको स्थिति इकरारके इसी सिद्धान्त- पर मानी है। इकरार-सिद्धान्तकी समालोचना जैसा कि हम ऊपर फह चुबै हैं सोली, सनहीं मदीमे करार-सिद्धान्त र लोकप्रिय हुआ। अठारहवीं सदीमें भी इसकी सूप बोलबाला हुई। इन तीनों सदियों में दिल्यात २ निद्वानोंने इसपर फरम उठायी। जनताकी तो पातही पया, पर पुद राजाओंतकपर इस सिद्धान्तका प्रभार पडा । पर उन्नीसवी सदीका प्रभावशाली राजनीतिक मत इसके अनुकूल नही रहा। क्यूडनिंग (Ludung), जेरमी वेन्याम, सर हेनरी मेन, थामस हील ग्रीन, पदमण्ड धर्क, मो० रुलराले, मर फ्रेडरिक पाक, प्रो० रिची ( Ritche) मादिने इस इकरार सिद्धान्तका खण्डन किया | उन्होंने इसकी निम्सारता टिल्लानेका प्रयत किया। येन्यामने तो लिखा है कि यह सिद्धान्त बिलकुल भित्तिहीन है। इसे कोई आधार नहीं अतएव इसपर व्यर्थ की सिरसपी करना सर हेनरी मेनने लिखा है-राज्यकी उत्पत्तिके सम्यन्धका यह इकरार-सिद्धान्त व्यर्थ और निम्मा है। इसी प्रकार अन्य महाशोंने भी इसकी कडी समालोचना की है इन समालोचकोंने इस सिद्धान्तके खिलाफ कुछ दलीलें देकर इसकी निस्सारता प्रकट करनेका प्रयन किया है। . ।

राजनीति विज्ञान
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इनमेंसे कितनोंहीका कथन है कि यह सिद्धान्त इतिहासके
अनुकुल नहीं। इतिहासमें एक भी ऐसा उदाहरण नहीं मिलता
जिसमें यह पात हो कि अमुक अमुक राजा और प्रजा अमुक
अमुक इकरार हुआ है, और इसी इकरारपर राज्यसस्थाकी
उत्पत्ति हुई है। सुप्रसिद्ध आग्लइतिहासक, ग्रीन, महोदयका
कथन है कि ऐतिहासिक दृष्टिसे देखा जाये तो यह सिद्धान्त केवल
कपोल कल्पना (Fiction) है । दूसरी बात यह कही जाती है कि
यह सिद्धान्त बुद्धिमें भी बरावर नहीं जमता क्योंकि जय मनुष्य
बिल्कुल निसर्ग अवस्थामें था, पचा उस समय उसके दिमागमें
इस प्रकारके इकरारकी कल्पना मा सकती थी। इस प्रकारके.
कुछ और भी कारणों को लेकर कितने ही पाश्चात्य लेखकोंने इस
इकरार-सिद्धान्त (Compact Theory) की कडी समालोचना
की है। प्रथके बढ जानेके भयसे हम इस विषयका जो कुछ
थोडासा दिग्दर्शन हुया है उसीसे सतोष मानकर इस विषयको
यही समाप्त करते हैं।
राज्य उत्पत्तिका पैतृक सिद्धान्त ।
प्राचीन समाज-सगठन-विज्ञानके अत्यन्त प्रसिद्ध विद्वान
जे०एफ० मेकलेनन महोदय ज्ञा कथन है-"राजकीय सस्थाकी
उत्पत्तिके विषयमें जो पैतृक सिद्धान्त है, उसका आशय यह है
कि कुटुम्बके विकासका परिणाम समाजमें परिणत हुआ है और
पहले पहल एक मनुष्य, एक स्त्री और कुछ वञ्चोंके संयोगसे
।

था। राज्य उत्पत्तिका पैतृक सिद्धान्त कुटुम्य-सस्थाका मारम्भ हुआ। पहले पदल एक ही कुटुम्ब होगा। निगह आदि सपन्धसे नये नये फुटुग्योंकी उत्पत्ति होने लगी। पढते घढते ये जातीय दलोंमें, जातीय दलोंसे समाज आदिमें परिणत होने लगे। यहा यह बात ध्यानमें रखना चाहिये कि इस प्रारम्भिक समाज व्यवस्थामें घरका जो बडा बूढा होता था, उसोझो ट्रकृमतमें सप फुहम्मके लोगोंको चलना पडता था। लोगोके रद जानेले जव कुटुम्प विभक्त होते थे तय भी जो मर- से बडा आदमी होता था, सयको उसके आजाधीन रहना पड़ता जन समाजका विकास होने लगा और समाजमें सुव्य- वस्थाको आवश्यकता होने लगी, तब उन्होंने इस कोम्बिक पद्धतिहीपर राज्यपद्धतिकी नींव डाली अर्थात् जिस प्रकार कुटुगमे घयोवृद्ध और विद्यावृद्ध मनुष्य कुटुम्बके सिरताज और रक्षक समझ जाते थे वैसे ही समर्थ, योग्य, प्रतापशाली और अनुभवी मनुष्यको घे अपना सरदार बना लेते थे और सर उली माज्ञाधीन चलते थे। इसी पद्धतिक विकासले राज- कीय सस्थाको उत्पत्ति हुई अर्थात् इस मिद्धान्तानुसार गज्यकी उत्पत्ति पैतृमसिद्धान्तपर निर्भर करती है। यहा यह धात ध्यान में रखना चाहिये कि जिम प्रकार मुटुम्ममें पुरोहीमेसे मुखिया होता वैसे ही कुछ अत्तरको लिये हुए राज्यकी मी परिपाटी चली। बस यही पैतृसिद्धान्तका साराश है। इस विषयपर जहा कुछ पाश्चात्य विद्वानोंका अनुकूल मत है वहा कितनोंका प्रतिकुल भी है। जो लोग इसके प्रतिकूल हैं, उनका -

राजनीति विज्ञान
कथन है कि इस सिद्धान्तकी स्थिति इतिहासपर नहीं है। उन
का कथन है कि प्राचीन कालमें केवल पुरुष-प्रधान कुटुम्य
ही
नथे, वरन् स्त्री-प्रधान कुटुम्म भी थे, अर्थात् ऐसे फुटुम्न
भी
थे या है जिनमें पुरुपके स्थानमें स्त्री कुटुम्रकी मुखिया रहती थी
और स्त्रियों के सम्बन्धले फुटुम्म पहचाना जाता था। इसलिये
केवल यह कहना कि पुरुष हो सदा फुटुम्सका मुखिया होता
आया है और इसी कौटुम्पिक पद्धतिके विकासपर राज्य उत्पत्ति'
हुई है, सर्वा शमें सत्य नहीं।
कुछ मी हो, पैतृकसिद्धान्तको अधिक पुष्टि मिल रही है
और ससारके इतिहासको अवलोकन करनेपर या समाजरचना-
पर विचार करनेपर पैतृकसिद्धान्तकी हो ओर अधिक ध्यान
आकर्षित होता है।
शक्तिसिद्धान्त ।
का लेखक राज्य-उत्पत्तिका कारण शक्ति समझते हैं।
उनका कथन है कि प्राचीन काल में कोई शक्तिशाली मनुष्य अपनी
भौतिक शक्तिके घलपर उन लोगोंपर अपना अधिकार जमा
लेता था, जो राजकीय रूपसे असुसगठित (Politically
unorganized ) होते थे, और उनपर अपनी हुकूमत चलाता
था। इस प्रकार वह अपना राज्य स्थापित कर लेता था।
इसी प्रकार बहुतसे राज्यों की उत्पत्ति हुई । सुप्रसिद्ध राजनैतिक
आचार्य राम महोदयने अपने "Original Contract" में लिखा

विकास-सिद्धान्त है, "राज्यकी उत्पत्ति उसी समय हुई होगी जय किसी मानव- दलके ताने शक्तिशाली और प्रभावशाली होकर अपने अनुया. यियोंपर अधिकार जमाकर उनपर अपनी हुकूमत लादी होगी।" इस सिद्धान्तके प्रतिपादक राज्य उत्पत्ति सम्बन्धी अन्य सय सिद्धान्तोंसे इस सिद्धानको अधिक सत्य और महत्वपूर्ण समझते हैं। वे कहते हैं कि “यह प्रत्यक्ष बात है कि बढे पढे साम्राज्य, जिनका प्रताप आज सारे ससारमें छा रहा है, शक्ति ही वारा अस्तित्यमें आये है और शकिपर ही उनका संगठन है। ब्लन्शलेका कथन है कि राज्यसगठनमें शक्ति अत्यन्त आवश्यक तत्व है और इस तस्त्रपर राज्यको मिति बहुत कुछ निर्मर करती है विकास-सिद्धान्त। कई तुमख्यात लेखकोंका मत है कि राज्य उत्पत्तिका तत्व विकास-सिद्धान्तपर निर्भर करता है। उनका कथन है कि "राज्य न तो ईश्वरको दस्तकारोका नमूना है, न वह उच्चतम भौतिकशक्तिका परिणाम है, न वह कृत्रिम यन्त्र है, और न वह केवल फुटुम्बका विकासमात्र है, पर वह एक नैसर्गिक और ऐतिहासिक, विकासका परिणाममात्रा है।" राजनीतिके एक अत्यन्त सुप्रख्यात आचार्यका कथन है-राज्य इतिहासफा फल (Product)है, इसका अर्थ यह है कि यह मनुष्य-समाजका क्रमिक (Gradual) और सतत होनेगला विकास है (It is the grad- । .

राजनीति विज्ञान . ual and Continuous development of human society) बर्गेस (Burgess) महोदयका कथन है कि जब मनुष्य निरी प्रम- तिकी अवस्थामें (in a state of nature) था, तर उसमें राज- कीय भावनाकी जागृति भी नहीं हुई थो, अतएव सामाजिक इकरारवादियोंका यह कथन भ्रमात्मक है कि राज्य-उत्पत्ति इकरार-सिद्धान्तपर एकाएक हो गयी। जिन लोगोंको यह बात भी मालूम नहीं थी कि राज्य किस चिडियाका नाम है, उनमें राज्यको कल्पना आने और उसका विकास होनेमें बहुत समय लगा होगा। पहले पहले यह कल्पना थोडेसे बुद्धिमान और समर्थ लोगोंके दिमागमें आयी होगी और फिर इसका प्रसार साधारण जनतामें हुआ होगा। विलकुल आरम्भमें "राज्य" केलव कल्पना- में रहा होगा और पीछे क्रमश उसका वाह्य अस्तित्व प्रकट हुआ होगा। पीछे सभ्यताके विकासके साथ साथ उसका सङ्ग- उन अधिक जटिल होता गया और उसे आधुनिक रूप प्राप्त हो गया। ईश्वर सत्तात्मक राज्य । ईश्वरसत्तात्मक राज्य (Theocracy)का रूप प्राय मनुष्य- जातिके वाल्यकालमें प्रचलित था। यहा यह कहनेको आवश्य- कता नहीं कि सयले प्रथम राज्यसत्ताका प्रारम्भ एशिया और अफ्रीकामें हुआ। उस समय वहा ईश्वरसत्तात्मक राज्यहीका उद्वहुमा। . ।

राज्य क्या है? मनुष्य-जातिके वाल्यकालमें ईश्वरीय सत्ता और प्रकृतिकी रहस्यमय शक्तियोंपर निर्भर रहनेकी अत्यधिक प्रवृत्ति थी। यहातक लोगोंका विश्वास था कि अमुक अमुक मनुष्यके द्वारा ईश्वर अपना सदेशा भेजता है। अमुक अमुक मनुष्य ईश्वरके दूत हैं । इसी प्रकार प्राचीन कालके लोग राज्यसत्ताको ईश्वरीय सत्ता मानते थे और राजाको ईश्वरका प्रतिनिधि समझते थे। हमारे हिन्दू शास्त्रोंमें भी राजाको विष्णुका अवतार कहा है। राज्य क्या है? हमने पिछले अध्यायमें दिखलाया है कि राज्यकी उत्पत्ति कैसे हुई। हमने दिखलाया है कि इस सम्बन्धमें हिन्दू आचार्यो- के तथा पाश्चात्य विद्वानोंके क्या मत है। दोनोंके विचार कहा- तक मिलते हैं और कहा जाकर दोनों में अन्तर दृष्टिगत होता है। इसके साथही साथ हमने यह भी दिखलाया है कि राजनीतिशास्त्र क्या है और उसका अन्य शास्त्रोंके साथ पया सम्बन्ध है। इस अध्यायमें हम यह दिखलाना चाहते हैं कि राज्य क्या है, राज्यके सम्बन्धमें भिन्न २ आचार्योंने किस प्रकार भिन्न भिन्न व्यारयाए की हैं। सुप्रसिद्ध जर्मन लेखक शुल्स ( Schulze) का कथन है कि राज्यकी व्याप्याएं इतनी अधिक हैं कि उनकी गणना करना कठिन है। प्रत्येक लेखक अपने अपने विचारानुसार राज्यकी व्याख्या करता है। राजनीतिके सुविख्यात अग्रेज आचार्य राजनीति विज्ञान - हालपड ( Holland ) महोदय राज्यकी व्याख्या इस प्रकार करते हैं- "राज्य मनुष्य-जातिका वह विशाल समुदाय है जो भूमि (Territory)के किसी विशिष्ट हिस्लेमें बसा हुमा रहता है और जिसमें या तो अधिकाश लोगोंकी राय काम करती है अथवा कुछ खास लोग बहुमतफेयरपर शासन करते हैं और उन लोगों पर अपनी इच्छा लादते हैं जो उनका विरोध करते हैं। हाल (Hall) महाशय राज्यकी व्याख्या हालण्ड महोदयसे कुछ भिन्न प्रकारले करते हैं। आप केवल राज्यके स्थानों में स्वतन्त्र राज्यके लक्षण कथित करते हैं। आपके मतानुसार स्वतन्त्र राज्यके लक्षण ये है कि "जिस समुदाय(Community) से वह सङ्गठित हुआ है, उसके कोई खास राजनीतिक ध्येय रहते हैं, उसके अधिकार- में निश्चित भूमि रहती है और वह किसी बाहरी शक्तिके याव स्वतन्त्र रहता है।" जर्मन लेखक सिडेल ( Seydel ) का कथन है-"राज्यका अस्तित्व उसो समयसे आरम्भ हो जाता है जब फई मनुष्य, जिन्होंने भूमिके किसी विशिष्ट हिस्सेपर अधिकार कर लिया है, किसी उच्च शक्ति ( Higher will ) के नीचे जमा हो जाते हैं। प्रोट्यूस ( Grotus ) महोदय राज्यकी व्याख्या इस प्रकार करते है-"राज्य स्वतन्त्र मनुष्योंका वह साङ्गोपांग समाज है, जो शुद्ध और सर्वसाधारण उपयोगिता (Common utility) का उपयोग करनेके लिये एकत्रित हैं।" वेटेल (Vattel) इससे कुछ आगे बढ़कर कहते है-"राज्य मनुष्योंके -- राज्य क्या है? nar ममाजका या नागरिक समाजका (Body politic) वह ममुख्य है, जो अपनी शकियोंके समिश्रण (Combination of forces) में सर्वसाधारणके हित और फल्याणकी अभिलापा करता है। राजनीतिक अत्यन्त प्रख्यात माचार्य लंशले महाशय (Bluntchlh) राज्यकी व्यारया अति सक्षेपमें यों करते है-"किसी भूमि-विशेषके राजनीतिक सुसङ्गठित लोगोंका दो नाम राज्य है। अमेरिकाके सयुक्तमान्तको सुप्रीम कोर्ट ने राज्यको व्याख्या करते हुए एक बार लिखा था-"राज्य स्वतन मनुष्योंका वह समुदाय है जो सर्वसामान्य ( Common) लाभके लिये सुसङ्गठित है तथा जो अपने ही पदार्थों पर अधिकार रखता हुमा दूसरोंके अधिकारोंको न्यायष्टिसे देखता है। अन्तर्राष्ट्रीय फागनके सुप्रख्यात पण्डित फिलिमोर (Phillimore) महाशयका कथन है कि "राज्य लोगोंका यह समुदाय है जो स्थायी रूपसे भूमिके किसी विशिष्ट हिस्सेपर बसा हुआ है और जो समान कानून तथा समान रीतिरिवाजोंसे बद्ध होकर सुचार रूपसे सुसङ्गठित है, और जो नियमबद्ध सरकार (Organized Government ) के माध्यम ( Medium) द्वारा उस भूमि विशेपमें घसनेवाले लोगोंपर तथा उस भूमि- विशेषके सब पदार्थों पर अधिकार रखता है तथा जिसे पृथ्वीके किसी देशसे युद्ध या सुलह करनेका तथा अन्य किसी प्रकारके अन्तर्राष्ट्रीय सम्बन्ध जोडनेका अधिकार है। इसके अतिरिक फई लेखकोंने अन्य सव घातोंको उपेक्षा कर आध्यात्मिक और ૨૨ राजनीति विज्ञान नैतिक दृष्टिले राज्यकी व्याख्या को है। एक फेञ्च पण्डितका कहना है कि राज्य और कुछ नही, केवल मनुष्य-जातिके आध्यात्मिक समुदायका दृश्य रूप है।" ससार-प्रख्यात जर्मन पण्डित हेगल ( Hegel) का कथन है, "राज्य लोगोंकी इच्छाका दृश्यरूपी बाहरी सघ है।" पलूफिनडार्क इससे आगे बढकर राज्यका एक ऐसा सघ मानते हैं, जो लोगोंकी सामुदायिक इच्छा ( Collective will) से सञ्चालित होता है। इटालियन पण्डित वानहानका कथन है कि राज्य उस देश और लोगोंका स्वामी है जो ससारकी किसी भी अन्य शक्तिके अधिकारसे स्वतन्त्र है।" एक सुप्रख्यात अग्रेज लेखक राज्यको परिभाषा यों करते हैं, "राज्य मनुष्योंका समाज है, जिसके अन्तर्गत स्वतन्त्र और समा. नाधिकार मनुष्योंकी बनी हुई सरकारका अस्तित्व रहता है।" अमेरिकाके भूतपूर्व प्रेसिडेण्ट डाफर विलसन राज्यकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं-"राज्य लोगोंका वह समुदाय है, जिनका मूल एक है और जिनकी एक सर्वसामान्य सरकार (Common Government) है । अमेरिकाके राजनीति-विज्ञानके एक लेखक मि० गार्नर राज्यके सम्बन्धमें अपने विचार यो प्रकट करते हैं- "राज्य शब्दसे राजनीतिक और चैधकानून (Constitutional Law) की भावनाको कल्पना माती है। राज्य बहु- सख्यक या अल्पसंख्यक उन लोगोंका समुदाय है, जो भूमिके किसी खास हिस्से पर बसे हुए हैं, जो बाहरी शासन (Control) राज्य धया है। २३ से मुक्त हैं और जिनके पास ऐसी सुसङ्गठित सरकार है जिसका हुपम अधिकाश लोग मानते हैं। इस प्रकार अन्य भी कई पाश्चात्य विद्वानोंने राज्यकी च्याख्याए की हैं। उन सयका विवेचन करनेसे एक घडा अन्ध भर जायगा। उपरोक्त व्यारयामोंसे पाठकोंको यह मालूम हो जायगा कि पाश्चात्य राजनीतिविशारदों के "राज्य के सम्बन्धमें क्या क्या विचार है। हमने साधारण रूपसे विवेचन किया है। महायुद्धके बाद इस सम्बन्धमें जो विचार क्रान्ति हुई है, उसपर हम किसी अगले अध्यायमें लिखेंगे। हमारे हिन्दू आचार्यों ने इस सम्बन्धमें क्या विचार किया है, इसपर भी हम तुलनात्मक दृष्टिसे आगे विचार करेंगे। अभी हमने राज्यके सम्बन्धमें केवळ प्रचलित और आधारभूत माने जानेवाले मतों. को ही प्रकट किया है। कितने ही लोग 'राज्य' ( State ) और सरकार (Government) को एक समझ लेते हैं। हमें माश्चर्य है, कुछ लेख- कोंने भी दोनोंको एक समझनेको भूल की है । दर असल- राज्य और सरकारमें चडा भेद है। हम तो यहातक कहनेके लिये तैयार हैं कि इन दोनोंका वास्तविक भेद समझ चिना राजनीति-विज्ञानके कई भूल और महत्वपूर्ण प्रश्न चिना हल हुए रह जाते हैं। इन दोनोंको एक मानना राजनीति-विज्ञानको दृष्टिसे एक गहरी भूल करना है, जैसा कि ऊपरकी व्याख्यामोंसे प्रकट है। राज्य एक राजनीति विज्ञान सत्ताधारी समुदाय (Sovereign Community) है, जो सर्व- सामान्य हितके लिये राजनीतिक दृष्टिसे सुसङ्गठित है और सरकार राज्यकी उस एजन्सी या सङ्गठनका नाम है जिसके द्वारा राज्य अपनी इच्छाको प्रदर्शित करता है तथा जिसके द्वारा अपनी इच्छाकी पूर्ति करवाता है। हा,सरकार (Government) राज्य (State) का एक आवश्यक लक्षण या अंग है पर इससे यह कहना कि सरकार ही राज्य है, बडी भूल करता है। जिस प्रकार किसी प्राणीके मस्तिष्कको खास प्राणी नही कह सकते, या किसी कारपोरेशन के बोर्ड आफ डायरेकृस' को खास कार. पोरेशन नहीं कह सकते, वैसे ही सरकारको राज्य नहीं कह सकते। राज्य सरकारले विशेष स्थायित्व है। सरकारमें परि- वर्तन होते रहते हैं, पर इसले राज्यका अस्तित्व नष्ट नहीं होता। रूसकी पुरानी सरकार-जारशाहीका अन्त हो चुका, यह नए भ्रष्ट हो गयी, उसकी सस्थाओं में बड़ा उथल पुथल हो गया, पर इससे रूसका राज्य नष्ट नहीं हुआ। वह बना हुआ है। हा, जिस मैशिनरीके द्वारा वह काम करता था वह नष्ट हो गयी और उसकी जगहपर दूसरी मशिनरी आ गयी। इङ्गलैण्ड की सरकारमें-उसके मन्त्रिमण्डलमें प्राय परिवर्तन होते रहते हैं पर इससे इङ्गलैएडके राज्य (State ) के अस्तित्वमें कोई धका नहीं पहुंचता। इस प्रकारके और भी कई उदाहरण दिये जा सकते हैं। मतलब यह है कि सरकार राज्यका एक भाव- श्यक अंग है। राज्य अपनी सत्ता (Sovereignty) और उच्च-" राज्य और राष्ट्र क्तिसे सरकारको मण्डित करता है। दूसरे शब्दोंमें यों कह कते है कि सरकार राज्यका अग ( Organ) है, जिसके द्वारा ज्यिकी सचा या इच्छा प्रकट होती है तथा जिसके द्वारा जैसा हम पहले कह चुके हैं उक्त इच्छाकी पूर्ति होती है। सरकार Government ) राज्यकी शक्तियोंका सञ्चालन करती है। (जनीतिके सुप्रसिद्ध लेखक प्रोफेसर सीली (Prof Seely) के ब्दों में राज्य व्यवस्था(Contravances)है, जिसके द्वारा राज्यको क्तिया प्रकट की जाती हैं। सरकार खुद सत्ताधारी नहीं, उसके सि खुद असीम अधिकार तथा शक्तियां नहीं हैं, उसके पास जो छ है वह राज्यसे उसके सङ्गठन द्वारा दिया हुआ है। अतएव राज्य और सरकार" इन शब्दोंका उपयोग करते समय इन नोंके यीचका अन्तर अवश्य ध्यागमें सरना चाहिये। नहीं तो सले राजनीति शास्त्रकी दृष्टिसे भूल होनेकी सम्भावना है। राज्य और राष्ट्र हम राज्य और सरकारका भेद पोछे दिखा चुके हैं। जिस कार कुछ लोग राज्य और सरकारको एक माननेकी भूल करते घसे ही वे राज्य और राष्ट्रको एक मानने में करते हैं। राज्य और राष्ट्र में सम्पन्ध होते हुए भी दोनों एक अर्थमें प्रयुक्त नहीं को सफते। राजनीतिक आचार्य इन दो शब्दोका एक अर्धमें योग नहीं करते। राष्ट्र राज्य नही है जहा राज्य कहते रावर हमारे मन में उस समाजका चित्र खींच जाता है, जो राज- तिक ढङ्गसे सुसगठित है, यहा राष्ट्रसे इसले कुछ भिन्न हो २६ राजनीति विज्ञान कल्पनाका आविर्भाव होना है। पाश्चात्य विद्वानोंके मतानुसार राष्ट्र अपने पूर्णरूप या अर्थ में मनुष्य-समाजका अंश है, जो अपनी भौगोलिक परिस्थिति या सोमाके कारण शेष ससारसे जुदा है, और जिसमें चलनेवालोंका जातीय मूल ( Racial Origin) एक होकर जिनकी भापा, जिनकी सभ्यता, जिनका साहित्य, जिनके रीतिरिवाज, जिनकी स्वभाव-प्रकृति एकसी है। राजनीतिके कई पाश्चात्य आचार्योंने राष्ट्रमें उपरोक लक्षणोंको आवश्यफ बतलाया है। पर कुछ पाश्चात्य राजनीतिविशारदोंने राष्ट्र, होनेके लिये इन सबकी सब बातोंकी आवश्यकता नहीं समझी है। कुछ लेखकोंने इनमेंकी कुछ बातें अलग कर दी हैं। उदाहरणके लिये राजनीतिशास्त्रके सुप्रसिद्ध आचार्य वर्गेस(Burgess)राष्ट्र की व्याख्या इस प्रकार करते हैं- राष्ट्र उस लोकसमुदायका नाम है जिसकी भाषा, जिसका साहित्य, जिसका इतिहास, और जिसके रीतिरिवाज एक है, जो पृथ्वीके उस हिस्से में बसा हुआ है जिसकी भौगोलिक परि- स्थिति समान है। वर्गस महोदय यह आवश्यक नहीं समझते कि एक राष्ट्रमें यसनेवाले सब लोगोंकी जातिमें भी समानता होनी चाहिये। आप भौगोलिक परिस्थितिको समानता और भाषाको समानताहीको अधिक महत्व देते हुए इन्हें राष्ट्र के आव श्यक लक्षण समझाते हैं। सुप्रसिद्ध फेश आईन-विशारद मोडि. यर फाडेरे राष्ट्रकी व्याख्या करते हुए लिखते हैं-"राष्ट्र एकही देशमें बसनेवाले उन लोगोंके समाजका सघ (Union) है, जो । ।

राज्य और राष्ट्र . एफ ही भाषा बोलते हैं , एफ ही कानूनके पाघन्द है तथा 1 जिनका जातीय मूल भी एक होकर जिनके रूप रगमें, जिनके स्मार्थ (Interest) और भावनाओं में समानता पायी जाती है। आगे चलकर ये महाशय फाहते है, "जातीय सादृश्य,भाषा, रीति- रिवाज और धर्मकी एकना आदि तय ही राष्ट्रको यनाते हैं।" । राजनीतिशास्त्र अत्यन्त प्रख्यात लेखक ब्लशले महोदय कहते है-"राष्ट्र भिन्न २ धन्धा करनेवाले तथा भिन्न २ सामाजिक स्थितिके ऐसे मनुष्योंका सघ है, जो समान भावना तथा समान जातिसे यद्ध है, और जो भापा, सभ्यता और रीतिरिवाजमें मी समान है।" महाशय काल्यो (Calvo)अपनी "अन्तर्राष्ट्रीय कानून" ५ नामक पुस्तकमें लिखते हैं कि, "राष्ट्रीय फरपनाका जन्म, जातीय । समानता, तथा भाषा-सम्बन्धो समानतासे घनिष्ठ सम्बन्ध है। जातीय समानतासे मनुष्योंका पारस्परिक सम्बन्ध प्रेमपूर्ण और अधिक दृढ होता है तथा मापाको समानतासे लोगोंको एक ऐसा सर्वसामान्य माध्यम (Medium) उपलब्ध हो जाता है, जिसके द्वारा एक राष्ट्रके सरके सब लोग परस्पर अपने विचारों को आसानीसे एक दूसरेपर प्रकट कर सकें।" मि० गार्नर नामक सुप्रसिद्ध अमेरिकन राजनीतिविशारदका कहना है कि मापाकी समानता आध्यात्मिक, यी द्धिक और सामाजिक व्यवहार (Intercourse)का एक ऐसा प्रयल शस्त्र है जो जनतामें जागृति उत्पन्न कर उनकी राजनीतिक भावनाओं के विकासका मार्ग खोल देता है। कानून-शास्त्र के सुप्रख्यात यूरोपियन विद्वान गमप्लाविस - है M

राजनीति विज्ञान
(Gumplorvicz) राष्ट्रकी परीक्षा फेवल सभ्यताकी समानता
(Community of civilization ) से करते हैं अर्थात् मापका
कहना है कि जहा लोगोंके मिसी विशिष्ट समुदायमै सभ्यता
समानता पायी गयी कि वह समुदाय राष्ट्रमें परिणत हो जाता है
इसके अतिरिक्त ये महाशय यह भी कहते हैं कि सभ्यताकी या
समानता उस विशिष्ट समुदायके जातीय मूलको प्रकट करने
साथ इतिहासको एकताको भी प्रकट करती है अथवा दूसर
शब्दों में यह कह लीजिये कि भाषा तथा सभ्यताकी समानत
भूतकालिक इतिहासको समानताका फल स्वरूप हुआ करत
है। आधुनिक कई राष्ट्रोंके जातीय मूल ( Ethnic origin'
विभिन्न तथा अस्पष्ट है, अतएव उपरोक आईनविशारदके मता
नुसार यह नहीं कहा जा सकता कि वे राष्ट्र के रूपमें नहीं पहचान
जाते। इस माईनविशारदके मतानुसार जातीय मूलकी समा
नता राष्ट्रकी अच्छी परीक्षा नहीं है। जर्मन, इटालियन, स्पेनिश
और फ्रेञ्च आदि कितने ही पाश्चात्य राष्ट्रोंमें घसनेवाले लोगों
वशोत्पत्ति एक सो नहीं है। इन राष्ट्रों में कितनी ही भिन्न
जातियों के लोग बसे हुए हैं। पर इन राष्ट्रोंमेले प्रत्येकने धीरे ।
अपनी सर्वसामान्य भाषा सगठित कर ली और इन्होंने सर्व
सामान्य सभ्यता (Common civilization ) का विकास
कर लिया और इससे ये देश राष्ट्र समझे जाने लगे।
एक समय यूरोपके कितने ही लेखोंने यह प्रतिपादित किया
था कि धर्मको समानता राष्ट्र के अस्तित्वका एक आवश्यक अग
.

राज्य और राष्ट्र १२६ लक्षण है, पर यूरोपमें ज्यों ज्यों धार्मिक स्वतन्त्रताका विकास ने लगा, त्यों त्यों इस कल्पनाको अधोगति होने लगी मोर गज तो वहां यह अवसर आया है कि राष्ट्रके संगठनमें धार्मिक रफतासी कुछ भी आवश्यकता नहीं लमझो जाती। यहा यह कल्पना हद सी होती जाती है फि भिन्न २ धर्मों को पालते हुए से मनुष्य राष्ट्र के एक मण्डेके नीचे राष्ट्रीय भावनाओंसे प्रेरित होकर पटे प्रेमसे इक हो सकते हैं। यूरोपमें धार्मिक भावना ननो प्रपल नहीं है, जितनी राष्ट्रीय भावना है। उपरोक्त विवेचासे पाठकोंको यह बात हो गया होगा कि राज्य और राष्ट्र एक नहीं हैं। एक राज्य जिस प्रकार कितने हो राष्ट्रोंको तथा जातियोंको अपने में समाविष्ट कर सकता है घेसे ही एक राष्ट्रमें कितने ही राज्योंफा समावेश हो जाता है। कभी राज्यका क्षेत्र इतना बढ़ा हुआ रहता है कि उसमें कितने ही राष्ट्रों का समावेश हो जाता है और कमी इसके विपरीत एक राष्ट्रका क्षेत्र इतना विशाल रहता है कि उसमें कितने ही राज्योंका समावेश हो जाता है। गाधुनिक ससारकी ओर दृष्टि डालोसे पाठकोंको उपरोक्त यातका पता चलेगा। अतएव इससे यह स्पष्ट है कि हर एक राज्य राष्ट्र नहीं है और न हर एक राष्ट्र ही राज्य है। दोनों में विभिनता है। गत शताब्दीसे इन दोनों में एकता प्रस्थापित करनेकी यूरोपके राजनीतिविशारदोंकी तथा मुसहियोंकी कुछ प्रवृति होने लगी है। कितने ही राजनीतिफे विशारदोंने अपने ये विचार प्रकट किये राजनीति विज्ञान है कि राज्यों के पुनः सङ्गठनमें जो सीमावन्धन किया जावे, घह राष्ट्रोंका विचार कर किया जावे। इसका मतलब यह है कि जो भूमि भौगोलिक परिस्थिति, सभ्यता, सस्कृति तथा भाषाको समानता मादि कारणोंसे जिस राष्ट्र के अन्तर्गत आती है, उस पर उसी राष्ट्रका राज्य होना चाहिये । पाश्चात्य राजनीतिविशा रदोंकी यह प्रवृत्ति राष्ट्रीयताके उस महान् तच्वपर निर्भर करती है, जो समान वश, समान भापा, समान सभ्यता, समान स्वा और समान राजनीतिक ध्येयोंके लोगोंको समान राजनीति सङ्गठनके अन्तर्गत लाकर उनकी इच्छाका प्रतिविम्ब सुसङ्गठि राज्य स्थापित करना चाहता है। पर साथ ही ये विद्वा राजनीतिज्ञ यह भी कहते हैं कि उपरोक्त तत्तका यह अर्थ नई है कि प्रत्येक राष्ट्रको चाहे वह क्षुद्रसे क्षुद्र फ्यों न हो पर उसे अपने आपको राज्यके रूपमें सङ्गठित करनेका पुश्तैनी अधिकार है। वे कहते हैं कि कितने ही ऐसे राष्ट्र हैं जिनमें न तो इतनी जनसख्या है और न इतनी योग्यता है कि वे अपने आपको राज्य के रूपमें सङ्गठित कर सकें। कई पाश्चात्य पण्डित बडे अमि मानके साथ इस घातको कहते हैं कि एशिया या अफ्रीका तथा दक्षिणपूर्व यूरोपकी कुछ जातियोंने अपनी इस प्रकारको राजनीतिक योग्यताका परिचय नहीं दिया, जिससे वे राज्यको सङ्गठित कर सकें तथा चला सके। इनकी ओर इशारा करते हुए ये लोग इस बातका प्रतिपादन करते हैं कि राजनीतिक दष्टि- से निर्बल और अयोग्य मनुष्यों को उन राष्ट्रोंकी रक्षा या देख

राज्य और राष्ट्र
रखमें अपने मापको समर्पण कर देना चाहिये जो राजनीतिक
दृष्टिसे प्रपल और योग्य हैं। कुछ लेखकोंने तो अपना पैर बहुत
आगे बढा दिया है और वे निस्सकोच यह बात कहने लगे हैं कि
ससारकी सभ्यताको रक्षाके लिये प्रल और योग्य राष्ट्रोंका
यह कर्तव्य है कि वे पिछडी हुई जातियोंपर अपना राज्य प्रबन्ध
लादें। मनुष्यताके विचारको ताकमें रखकर वे यह कहने में
भी नहीं हिचके है कि आवश्यकता मालूम होनेपर प्रवल राष्ट्रों-
का यह कर्तव्य है कि वे पिछडी हुई जातियोंसे भूमिको साफ
कर सभ्य मनुष्योंके लिये उसे निवासस्थान बना दें। हम
नही समझते कि महायुद्धने संसारको मानवी स्वाधीनता और
मानवी समानताका जो सन्देशा दिया है उसमें इन लोगों की
बातें कहांतक मान्य होंगी। यूरोपकी इस कुटिल और राक्षसी
नीतिके कारण आज संसारको जो महा भयानक दशा हो
रही है और मनुष्यजातिका विशाल समुदाय अपनी स्वाधीनताके
लिये दूसरोंकी खाधीनताको कुचलनेवाले और सभ्यताके
ठेकेदार गोरोंके खिलाफ जिस प्रकार उठ रहा है, उसे देखते
हुए कहना पड़ता है कि ससारमें इस महायुद्धके कारण.
आश्चर्यकारक राजनीतिक जागृति हो रही है और अगर
इन्हीं नाशकारी तत्पर रहकर यूरोपने वर्ताव किया तो
हम
दावेफे साथ कह सकते है कि उसका भविष्य अच्छा नहीं है।
उसको चाहिये कि इस प्रकारकी नाशकारी नीति और सिद्धा-
न्तोंको यदले, अस्तु ।
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राजनीति विज्ञान राष्ट्रीय एकता, राजनीतिक दृढता, तथा संसारकी स्थायी शातिके विचारले यह बात आवश्यक मालूम होती है कि जानक सभव हो, वहाँतकराज्योंके सङ्गठन तथा पुनः सङ्गठनमें राष्ट्रीयताके विशुद्ध तत्त्वका उचित सम्मान करना चाहिये। पिछला अनुभव हमें सिखलाता है और इस महायुद्धने तो हमें यह अच्छी तरह सिप्ला दिया है कि जय २ राष्ट्रीयताको उपेक्षा कर विजेता राष्ट्रोंने विजित देशोंको अपने आपमें याटा, तय २ इसके परि णाम अच्छे नहीं हुए। माज संसारमें जो घोर अशान्ति छायी हुई है, उसका कारण यही है कि युद्धकी विजयसे मदोन्मत्त होकर विजेता पाश्चात्य राष्ट्रोंने अन्य कई देशोंकी राष्ट्रीयताकी उपेक्षा कर दिन बुलाये उनके स्वामी या रक्षक बन बैठे। जवतक राष्ट्रीका सङ्गठन उनमें पसनेवाले लोगोंके "स्वनिर्णय" या राष्ट्री यताके अनुसार नही किया जायगा, जबतक उनपर डाकेजनीकी नीति चलती रहेगी, जबतक उन्हें कुचलनेके नीच प्रयत होते रहेंगे, जबतक उनकी राष्ट्रीय तथा उनके राजनीतिक भावोंका ख्यालकर उनके अनुकूल उन्हींकी शासनपद्धति स्थापित नहीं की जायगी, तबतक ससारमें स्थायी शान्तिका स्वप्न देखना व्यथ है। अतएव इस समय कितने ही उदारहृदय लेखक और मुसद्दी यह बात प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपसे स्वीकार करने लगे हैं कि ससारकी स्थायी शान्तिके लिये, संसारको भावी खून खरायीले बचानेके लिये यह आवश्यक है कि ससारके राज्योंका पुन संग- ठन, राष्ट्रीयता और नैसर्गिक भौगोलिक स्थिति आदि यातोंका ख्याल रखकर क्यिा जावे। . - राज्यसम्यन्यो सावयव सिद्धान्त राज्यसम्बन्धी सावयव-सिद्धान्त कई पाश्चात्य राजनीतिविशारदोका कथन है फि राज्यके प्रधान गुणोंमसे सावयच एकता (Organic unity) मी एक है। साययध एषता एक ऐसा शब्द है, जिसका ठोक २ अर्घ हमारे बहुतसे पाठक नहीं समझगे, मतपय यहा एम इसका खलासा कर देना आवश्यक समझते हैं। हमारा शरीर मिन्न मिन अवयवोंका एक सुसगठित संघ है। शरीरमें जितने अव- यम हैं, उन सरका एक दूसरेके साथ घनिष्ठ सम्रन्ध है । जहा पिसी अवयवको नोट लगी कि उसका असर शरीरके सब अव. योंपर होता है। पैरमें काटा लग जानेसे, हाथमें सुई चुम जानेमे हाथ और पैरको तो टुप होता ही है, पर इनके साथ २ शरीरके सच अवयवोंपर भी इसका प्रभाव पड़ता है। इसी प्रकार किसी अन्य अवयवमें चोट लगनेसे केवल उसीको दुख नहीं होता, पर शरीर के अन्य हिस्सोंको भी, उसके साथ २ न्यूनाधिक दुप होता है। देखा गया है कि कभी २ पैरमें जूतेके फोडेसे फेचल रहीको तकलीफ नहीं होती, पर इसका सारे शरीरपर असर होकर मनुष्यको यरतक चढ़ जाता है। इन सब बातोंसे यह प्रकट होता है कि शरीरके सय अवयवोंमें एकता है, इन सबका मापसमें, जैसा कि हम ऊपर कह चुके हैं, घनिष्ठ सम्बन्ध है। एक अवयव सुख दुखका प्रभाव दूसरे अवयवपर पढे बिना नहीं रह सकता। शरीरफे इन अवयवोंकी इस धनिष्ठ एकताहीका नाम सावयच एकता (Organic unity) है। ३ ३४ राजनीति विज्ञान + कितने ही समाजशास्त्रवेत्ताओं तथा राजनीतिके आचाय्याने शरीरको इन अवयवोंकी एकताका मिलान समाज या राज्यरूपी शरीरके अवयवों की एकतासे किया है, और उन्होंने इस सम्बन्धमें एक सिद्धान्त स्थिर किया है जिसे समाज या राज्यकी सावयव- एकता (Organic Theory of the Society or State) कहते है। उनका कथन है कि उन लोगोंका समुदाय जो परस्पर एकता के सूत्रमें बधे हुए नहीं हैं तथा जिनका आपसमें सम्बन्ध नहीं है, समाज या राज्य नहीं फहला सकता। इस प्रकारके विट बल समु- दायसे समाजका शरीर-संगठन नहीं होता। इनका कहना है कि जिस प्रकार वि-सठ और असम्बद्ध अवयवोंसे शरीरका सङ्गठन नहीं हो सकता, उसी प्रकार मनुष्यरूपी उन अवयवोंसे समाज या राज्यका सङ्गठन नहीं हो सकता जो किसी न किसी प्रकारकी एकताके सूत्रसे बद्ध नहीं हैं तथा जिनमें परस्पर कोई सम्बन्ध नहीं है। शरीरके सगठनके लिये जिस प्रकार उसके भिन्न २ अवयवों- की एकताकी आवश्यकता है, उसी प्रकार कितने ही लेखकोंक मतानुसार समाज या राज्यरूपी शरीरके सगठनके लिये उसके अवयवरूप सदस्योंकी एकताकी आवश्यकता है, पर इस विष. पमें कई भिन्न २ मत हैं। समाजशास्त्र या राजनीतिके कितने हो पण्डित इस सम्बन्धमें अद्वैतवाद ( Monistic Theory ) को सामने लाते हैं और कहते है कि सुरुगठिन समाज (Orgar nized Society ) एक ऐसा समुदाय है, कि जिसमें उन लोगोंका कोई स्वतन्त्र गस्तित्व ही नहीं है जिनसे यह समाज या गज्यसम्बन्धी सावधव-सिद्धान्त समुदाय बना है या सगठित हुआ है। वे कहते हैं कि जिस प्रकार- किसी पदार्थ के परिमाणुओका खतन्त्र अस्तित्व नहीं रहता, उनका मस्तित्व उस पदार्थ में लीन हो जाता है,ठीक यही दशा समाजके सदस्यों की होती है। उनका व्यक्तित्व,उनका स्वतन्त्र अस्तित्व विराट शरीर समाजमें लीन हो जाता है । इसके अतिरिक एक दूसरा सिद्धान्त है जिसका नाम वैयक्तिक स्वातन्त्र्य-सिद्धान्त 'Monadnistic Theory' है। यह सिद्धान्त उपगेक सिद्धान्तके विपरीत है। इसका मन्तव्य यह है कि समाज और कुछ नहीं, वह लोगोंका या लोगोंके समुदायका एक जुट (Aggregation) है जिसमें कोई पास्तविक एकता नहीं रहती। हर एक मनुष्य दूसरे मनुष्य या मनुष्योंसे प्राय स्वतारहता है। समाजका उसपर कुछ ऋण नहीं। किसी आकस्मिक समीपता ( Accidental Uxtaposition ) को छोडकर वह अपने आसपासवालोंसे अलग या स्वतत्र रहता है । इन दो सिद्धान्तों बीचका एक और सिद्धान्त है जिसे 'Dualistic conception' कहते हैं। इस सिद्धान्तका यह आशय है कि व्यक्तिका समाजके साथ सम्पूर्ण सम्बन्ध तो नहीं है पर कुछ सम्बन्ध तो अवश्य है अर्थात् व्यक्तिको कुछ अशोमें समाजके आश्रित रहना पड़ता है अर्थात् इल सिद्धान्तके मन्तव्यानुसार न तो व्यक्तिका अस्तित्व समाजमें विलीन ही है और न वह समाजसे या अपने आसपास के सामाजिक वातावरणसे बिलकुल जुदा या स्वतन्त्र ही है। अब हम सावयन सिद्धान्त (Organic Theory ) पर

राजनीति विज्ञान
वापस आते हैं। इस सिद्धान्तके आचार्यों ने मनुष्य शरारके साथ
समाज शरीरको तुलना करनेका प्रयल किया है। इन्होंने यह
दिखलानेका प्रयत्न किया है कि शरीरके रकविन्दुओं (Cells)
का शरीरके साथ जो सम्बन्ध है ठीक वही सम्बन्ध मनुष्योंका
समाजके साथ है।
लिनेक (Jellinek ) नामक एक विद्वानका कथन
है कि राज्यसे सम्बन्ध रखनेवाला यह सावयर-सिद्ध न्त बहुत
ही पुराना और लोकप्रिय है। सुप्रसिद्ध ग्रीकतत्त्वज्ञानी या
राजनीतिशास्त्रका प्राचीन आचार्य प्लेटोने अपने हो
रिपब्लिका' (De Republica ) नामक ग्रन्थ, रिपब्लिकको
तुलना एक विराट मनुष्यसे को है और बडे जोरसे यह प्रतिपा
दन किया है कि सर्वोपरि सुव्यवस्थित सस्तच शासन
(Common wealth) घही है, जिसकी बनावट तत्तात'
मनुष्य-शरीरको बनावटसे समानता रखती है। प्लेटोने
कहा है कि जिस प्रकार शरीरके सदस्यरूप किसी अवयवको
चोट लग जानेसे सारे शरीरको वेदना होती है और वह उस
दुषित अवयवके साथ सहानुभूति दिखलाता है, ठीक उसी
प्रकार समाज जिन व्यक्तियोंसे बना है, उनमेंसे किसीको बोट
पहुचनेसे सारे समाजको वका लगता है। अत्यन्त विख्यात श्रीक
पण्डित सिसरीने गज्य (State) और व्यक्तिकी तुलना
है। उन्होंने राज्यके प्रधानको उस आत्मासे तुलना की है जो
मानव-शरीरको सञ्चालित करती है। इसी प्रकार
अन्य कई

राज्यसम्बन्धी सावयव सिद्धान्त इस समय लोगों में देखकोंने भी इसी प्रकारको तुलना की है। अठारहनों सदीके हुतसे पाश्चात्य लेखकोंने तो इस तुलनाको बडा महत्व दिया है। हा, इसके पश्चात् फ्रान्सकी राज्यकान्तिसे इस सिद्धान्तका महत्व घटने लगा और इस विचारको विशेष अनुमोदन मिलने लगा कि राज्य और कुछ नहीं केवल एक कृत्रिम चीज है । इससे सावयव-सिद्धान्तको धक्का पहुचने लगा। पर उन्नीसवीं सदीके मध्यमें फान्सके तत्त्वज्ञानियों के इस विचारके खिलाफ प्रतिक्रिया शुरू हुई और इस विचारको विशेष प्रोत्साहन मिलने लगा कि राज्य एक शरीर (Organism ) है। इस सिद्धान्तका बहुन मोह बढने लगा। जर्मन राजनीतिविशारद ब्लशलेने अपने सुप्रसिद्ध ग्रन्थ ( Theory of the State) में मावयव सिद्धान्तको घडी योग्यतासे पुष्ट किया है । उसने दिखलाया है कि राज्य मानवी शरीर ( Human Organism) का मानों प्रतिविम्य है। इन दोनों में सादृश्य है। जिस प्रकार शरीरके सदस्य (Organs) कार्य और जीवन क्रियायें रहती हैं वैसे ही राज्यमें भी रहती है। उसने राज्यकी बनावट (Structure) और जीवनक्रिया (Life process) की मानवीय शरीरके साथ जो तुलना की है, वह अत्यन्त मनोरञ्जक है। उसने दिखलाया है कि राज्य केवल निजों व कृत्रिम मशीन नहीं है बल्कि यह एक सजीच, पौद्धिक तथा सेन्द्रिय पदार्थ (being) है। उसने इस बात को सिद्ध करते हुए लिखा है कि जिस प्रकार तैलचित्र (Oil painting ) तेलके बिन्दुओंके समुदायस कुछ राजनीति विज्ञान । अधिक है, जिस प्रकार मनुष्य रक्तविन्दु या अस्थियोंके संमि श्रणसे कुछ अधिक है वैसे ही राज्य राष्ट्री लोगोंके केवल समु- दायसे तथा बाहरी कायदे कानू नके सग्रहसे कुछ अधिक है। जिस प्रकार प्राणि-शरीर ( Animal organism ) उसके सजीव अवयवों तथा रक्तविन्दुओं (Cells) से बना है और जिस प्रकार ये अवयव एक दूसरेपर निर्भर करते हुए अपना जुदा २ कार्य करते हैं, ठीक यही हालत राज्यरूपी शरीरकी है। यह शरीर व्यक्तिरूप अवयवोंसे बना है और इनका भी ठीक वही हाल है, जो शरीरके अवयवोंका है। शरीरके अवयवोंकी तरह ये व्यक्ति भी, जो राज्य शरीरके अवयव है, अपना जुदा २ काम करते रहनेपर भी एक दूसरेपर या समाज- पर निर्भर करते हैं। इनका आपसमें सम्बन्ध है। क्या बनावट में, क्या क्रियामें और क्या अन्य बातों में मनुष्यशरीरसे समा. जशरीरको समता है। दोनोंहीका अस्तित्व कृत्रिम साधनोंक बजाय नैसर्गिक साधनोंसे शुरू होता है। सुप्रसिद्ध न तत्त्वज्ञानी रूसोने मानवीय शरीरके साथ राज्यको जो तुलना की है, वह यडी मनोरजक है। मनुष्यके सिरकी तुलना राज्यकी सर्वोपरि सत्तासे, मानवीय मस्तिष्ककी राज्यके कानून और रीति रिवाजोंसे, इच्छाओंकी जजों और मैजिस्ट्रटॉसे ध्यापार, खेती और उद्योगधन्धोंकी मुह और पेटसे तथा सार्वजनिक अर्थकोशकी रकके साथ की है । इग्लैण्डके ससारके प्रख्यात दार्शनिक विद्वान् महामति हर्षर्ट स्पेन्सरने अपने समाज- । - राज्यसम्बन्धी सावयव सिद्धान्त ३६ - शास्त्रके मूलतत्त्व ( Pinciples of Sociology ) में सुसंगठित समाज (Organized Society ) और प्राणि- शरीरकी बड़ी ही सुन्दर तुलना की है। उन्होंने यह दिखलाया है कि क्या प्राणि-शरीर और क्या समाज-शरीर दोनोंहीका आरम्म पहले पहल फली ( Germs )के रूपमें भारम्भ होता है इन दोनोंपर समानरूपसे निरन्तर वृद्धि फ्रिया होती है। इनके अगोंका असे २ विकास होता जाता है से उनका असादृश्य पढता जाता है और उनके डोलहौल (Structure ) में विशेष जटिलता आती जाती है । आप जानते हैं, सबसे क्षुद्र प्राणीको क्या स्थिति रहती है। वह जो कुछ है सो उसका पेट, श्वास, नलिका या पसली है। इनके अतिरिक्त उसके शरीर- की यनावट में कुछ नहीं रहता। इसी प्रकार समाज, उसकी अत्यन्त बाल्यावस्थामें क्या था? वह केवल बहादुरों, शिकारियों और भई औजार पनानेवालों का समुदाय ही था। पीछे जैसे जैसे समाजका विकास होता गया और उसकी जटिलता पढ़ती गयी वैसे वैसे उसमें श्रमविभाग होने लगा। हमारा हिन्दुओंका जातिभेद इसी श्रमविभागपर निर्भर करता है। मतलब यह है कि जिन तरयोंसे प्राणियोंके शरीरका विकास होता है उन्हीं तत्वोंके अनुसार समाजशरोरका भी विकास होता है। पर इन सय यातोंकी समानता दिखलाते हुए भी स्पेसर महोदयने प्राणि शरीर और समाज शरीरका एक तुलनात्मक भेद दिखलाया है। आपका कथन है कि प्राणि-शरीर और राज्य- বালানি বিছান रूपी शरीरमें एक मार्केका भेद है। प्राणि-शरीरकी बनावट आपके मतानुसार सुसगठित है अर्थात् उसके एक एक अङ्ग परस्परमें बडे गहरे सम्बन्धके साथ एक दूसरेके साथ सम्बद्ध है। इसके विपरीत समाजशरीर असम्मिश्रित है, अर्थात् उसके अग स्वतत्र होनेसे कम ज्यादा बिखरे हुए हैं। वे इस भेदको तारियभेद स्वीकार करते हैं। पर साथ ही साथ माप यह भी मानते हैं कि इस मेदके रहते हुए भी दोनों की तुलना की जा सकती है। क्योंकि आप महते हैं कि समाजशरीर असम्मिश्रित होनेपर भी साराका सारा पैतन्यमय है। स्पेन्सर महोदयने उपरोक्त भेदके अतिरिक्त प्राणि-शरीर और समाज शरीरमें एक और भेद दिखलाया है। आपका कथन उद्देशोंकी भिन्नता है। मनुष्य-शरीरमें उसके जुदे २ अवयवों का उद्देश अपना अपना काम करते हुए सारे शरीरकी सेवा करना रहता है अर्थात् उनका कोई स्वतन्त्र अस्तितत्व नहीं रहता । उनका सारा दारोमदार सारे शरीरके लाभपर निर्भर करता है। यह बात स्पेन्सर महोदपके मतानुसार समाज- शरीरके लिये लागू नहीं की जा सकती। आपके विचारानुसार समाजका अस्तित्व उनके सदस्योंके लाभके लिये है, सदस्यों या मनुष्योंका अस्तित्व समाजके लिये नहीं। समाज-शरीर और प्राणि शरीरके इसी भेदपर स्पेन्सर महोदयने अपने व्यक्ति- वाद विषयक राजनीति-विज्ञानको नींव बडो की है। स्पेन्सर महोदय व्यक्तित्ववाद ( Individualism ) के पूरे पूरे ।

राज्यसम्बन्धो सावयव-सिद्धान्त ४१ हिमायतो थे। कितनेही विद्वानोंका कहना है कि स्पेन्सर महोदयाला सावयव सिद्धान्त ( Organic Theory ) उनके उपरोक्त व्यक्त्यिवादके निद्धान्तके साथ मेलजोल नहीं पाता। इसी प्रकार ( अलर्ट शेपले ) नामक सुप्रस्त्यात आस्टि- यन विद्वान् एव कानून पण्डित (Jurist) ने प्राणि-शरीर और समाज शरीरको तुलना करने में बडा परिश्रम और अध्ययन किया है। आपने आस्ट्रियन भाषामें दी स्ट्रक्चर एन्ड लाइफ आफ दी सोशल वाडीThe structure and life of the Social Body नामक ग्रन्थ लिखा है। इस अन्धमें घडी ही विद्वत्ता और विस्तारके साथ अन्यलेखक महोदय ने प्राणि शरीर और समाज शरीरको शरीर-शास्त्र, जीव विज्ञान और मानस- शास्त्रको दृष्टिसे तुलना कर दोनों में आश्चर्यकारक मादृश्य दिख. लानेका प्रयास किया है। आपने दिखलाया है कि समाज एक शरीर है जिसका जीवनतत्व या अंग मनुष्य है। आपने इस ग्रन्धमें जिस अपूर्व विद्वत्ता और आश्चर्यकारक खोजका परिचय दिया है, वह आपके आराध ज्ञान, अपूर्व प्रतिभा और प्रशसनीय अन्वेषण शक्तिका पता देता है। आपहीके समान पाल लालिन फेड नामके रूमी समाज शास्त्रत्ताने हा दोनों में समानता दिखलाने में अपूर्व प्रतिभा शक्ति, गम्भीर गोषणाशक्ति और विद्वत्ताका परिचय दिया है। आपने एक अन्य लिखा है, जिसका नाम “ Thoughts Concerning the social science of the Future" है। इसके पास पडे २ भाग है।

राजनीति विज्ञान आपने सावयव सिद्धान्तका बडी ही योग्यतासे समर्थन किया है। आपने इस सिद्धान्तका जिस मार्मिकतासे खुलासा किया है, वह आश्चर्यजनक है। मापने समाज मनोविज्ञान (Social sy chology ) और समाज-शरीरका वडाही सुन्दर प्रकटो- करण कर प्राणि शरीरके साथ उसकी बडी ही अच्छी तुलना की है। कई बातों में यह स्पेन्सर और शेफ्ले (Schafle) से भी आगे बढ गया है। इसी तरह आगस्ट कोमट ( August Comte ), टार्ड ( Tarde) लिटारन्यू ( Letourneau), डि ग्रेट ( De Great ), फोले (Fowllee) और रनवर्स ( Rene Worms ) आदि फेञ्च तत्त्वज्ञानियोंने तथा कुछ दार्शनिकोंने भी सावयव-सिद्धान्तको पुष्ट और समर्थन करनेका प्रयत किया है। इनमेंसे फेञ्च तत्त्वज्ञानी और समाजशास्त्रवेत्ता वर्स तो इस सिद्धान्तका सबसे यधिक हिमायतो है। उसने कहा है कि समाज-शरीर और प्राणि शरीरमें आश्चर्यकारक- समानता पायी जाती है। सावयव-सिद्धान्तकी समालोचना जर्मन यह तो हुई उन महानुभावोंको यातें जो सावयव सिद्धान्त- के जनक, पुष्टिकर्ता या हिमायती हैं । अब उन लोगों की बाते भो सुन लीजिये, जो इसके विरोधी हैं। इन महानुभावोंका है कि प्राणि-शरीरके तत्वोंकी और सुसङ्गठित समाज-शरीर के तत्त्वरूप मानव प्राणियोंकी तुलना करना सर्वा शमें ठीक नहीं। कथन सावयव सिद्धान्तकी समालोचना ४३ हा, इन दोनों में कुछ समानता जबर है, पर वह इतनी नहीं है जिससे दोनों की पूरी २ तुलना की जा सके। प्राणि-शरीरमें जो रक्तविन्दु (Cells) हैं वे केवल पुदगल ( Matter ) के टुकड़े हैं, जिनका फि कोई स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं। इनमें कोई स्वतन्त्र इच्छाशक्ति नहीं है। ये फेवल सारे शरीरके जीवनकी सहायता या उत्तेजना करते है। अगर ये शरीरसे जुदा कर दिये जावें तो इनका कोई मूल्य नहीं। इसके विपरीत समाज- शरीरके मनुष्यरूप तत्वोंकी यह हालत नहीं है। इनमें स्वतन्त्र बुद्धि है, इनमें अपने निजकी इच्छाशक्ति है, इनमें दूरगटि है, इनमें आत्मसयमको शक्ति है, इनमें स्वतन्त्र जीवन और गति है, इनमें उस सारे शरीरले (जिसके कि ये अङ्ग हैं) स्वतन्त्र आधि- भौतिक जीवन है। हर एक व्यक्ति अपनी इच्छाके अनुसार अपना जीवन ढालनेको शक्ति रखता है। उसके कार्य समाज. के मध्यवती अवयवोंसे सञ्चालित नहीं होते। इसके विपरीत प्राणि शरीरके रक्तबिन्दुमैं इस प्रकारकी शक्तिया नहीं हैं। इनमें व्यक्तिके समान गुण, बुद्धि, प्रतिभा, स्वतन्त्र गति आदि नहीं हैं। इससे समाज शरीरके जीवन रूपतत्वों की प्राणि शरीरके तोके साथ वास्तविक तुलना नहीं हो सकती। जो फुछ तुलना हो सकती है, उसमें कृत्रिमताका भाव अधिक है। एक बात और है, वह यह है कि व्यक्ति समाजसे अलग होकर भी व्यक्ति ही रह सकता है पर यह बात प्राणि-शरीरके तत्त्वोंके लिये नहीं कही जा सकती। शरीरले अलग होनेपर इनका अस्तित्व शरीर-तत्त्व राजनीति विज्ञान रूपमें नहीं रहता। इसके अतिरिक वृद्धि, विकास, विनाश और मृत्युके जो नियम प्राणि-शरीरमें काम करते हैं वे राजनीतिकी दुनियामें नहीं करते। इस प्रकारकी कई वाते हैं, जिनसे प्राणि- शरीर और समाज शरीरकी तुलनाका कार्य असभव हो जाता है और सावयव सिद्धान्तको कमजोरो प्रकट होती है। कई आधु. निक राजनीतिज्ञोंका तथा समाज-शास्त्रवेत्ताओंका कथन है कि इन दोनों की कृत्रिम बाजुओं की तुलना कर जो फल निकालनेका प्रयत्न किया जाता है वह ठीक नहीं, क्या इससे यह सिद्ध करना है कि व्यक्तिका स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है और राज्य या समाजमें वह अपना स्वतन्त्र अस्तित्व भूल जावे और व्यक्ति वादका अन्त हो जावे। राज्यके आवश्यक तत्त्व । लोग। राज्यका भौतिक शरीर जिन तोसे सङ्गठित होता है, उनमें सबसे प्रथम और आवश्यक तत्र "लोग है। जो लोग राज्यमें बसते हैं,या जो लोग राज्यके सदस्य हैं, उनके दो विभाग हो सकते हैं (१) नागरिक और (२)प्रजाजन। नागरिक उन्हें कहते हैं, जिनकी राज्य शासनमें आवाज होती है अथवा जो मताधिकार रखते है । प्रजाजन उन्हें कहते हैं, जिनकी राज्यशासनमें कोई भावाज नहीं होती, जिन्हें मताधिकार नहीं रहते, जो फेवल हुकूमतके पाबन्द रहते हैं । यहा यह ध्यानमें 1 .rt राज्यके आवश्यक तन . रखना चाहिये कि हर एक नागरिक मजाजन होता है, पर यह मावश्यक नहीं कि हर पक प्रजाजन नागरिक हो। हर एक राज्यमें कई ऐसे निदेशी रहते हैं, जिन्हें उस राज्यमें नागरिक- ताके हक नहीं रहते। राज्य केवल उनको रक्षाके लिये जिम्मे- दार रहता है और इसके पदले में उन्हें उक्त राज्यकी हुकूमतका पावन्द रहना पड़ता है। हमें दुपके माध कहना पड़ता है कि भारतवासियोंको अपनी ही इस भूमिमें उसी दङ्गसे रहना पड़ता है, जिस ढङ्गसे पाश्चात्य देशके किसी राज्यमें विदेशी रहते हैं। शासन सुधार पास होनेके परले भारतवासियोंकी राज्यमामलों में काई सानाज नहीं थी। रिफार्म पेकृके पास हो जानेपर भारतवासियों को योड़ेसे टूटे फूटे अधिकार मिले है , पर उनसे यह नहीं कहा जा सकता कि भारतवासियोंको नागरिकताके आवश्यक अधिकार मिल गये। देशी राज्यों में तो इससे भी गयी पीती हालत है। वदा प्रजा सदियोंसे अत्याचार सहती २ और निरकुश शास- कोंकी हुकूमतको मानती मानती इतनी आत्मविस्मृत हो गयी है कि वह यह भी नहीं जानती कि नागरिकता किस चिडियाका नाम है । वह तो निरङ्कुश शासकका हुक्म, चाहे वह न्याययुक्त हो या अन्याययुक्त हो, मानना जानती है। यहाके शासन- में प्रजा च भी नहीं कर सकती। यह केवल निरकुश शासकोंकी भोग्य वस्तु समझी जाती है। कहनेका मतलब यह है कि अभी हमलोग प्रजाहीफे रूपमें हैं, नागरिकके रूपमें नहीं। अस्तु ।

४६ राजनीति विज्ञान प्रायः यह सवाल उठा करता है कि किसी समुदायको राज्यके रूपमें पहचाने जानेके लिये कमसे कम या ज्यादासे ज्यादा कितने लोगोंकी मावश्यकता होती है। ससारके इति. हासमें कभी ऐसी स्थिति नहीं आई जब सब राज्योंकी लोक- सख्या या भूमि समान हो गयी हो। प्रत्येक समय में भिन्न २ राज्योंमे लोकसख्या या भूमिविस्तारमें न्यूनाधिक रूपसे अवश्य ही अन्तर रहा है। किसी राज्यकी लोकसंख्या या भूमि- विस्तार ज्यादा है तो किसीका कम है। किसी राज्य में करोडों मनुष्योंकी बस्ती है तो किसीमें लाखों या हजारोंकी ही है। वहां भी ये राज्य कहलाते हैं। अतएव राजनीति-विज्ञानके आधु- निक लेखकोंने इस बातका कहीं भी निश्चय नहीं किया है कि इतनी २ लेकालख्या या भूमिविस्तार होनेहीपर राज्य कहा जा सकता है। हा राजनीति-शास्त्रके कुछ प्राचीन लेखकोंने मोटे तौरसे कुछ ऐसे तत्तत्र निश्चित किये हैं, जिनसे यह प्रतीत होता है कि राज्यके अस्तित्वके लिये इतनी रोकसख्या और भूमि- विस्तार आवश्यक है। प्राचीन कालके कुछ लेखकोंने तो इससे भी आगे पैर बढाये है और उन्होंने एक तरहसे यह भी निश्चित कर दिया है कि राज्यमें कमसे कम या ज्यादासे ज्यादा मामुक २ लोकसंख्या और भूमिविस्तार निश्चितरूपसे होने चाहिये । प्राचीन समयके राजनीतिशास्त्रके सुप्रसिद्ध आचार्य एरिस्टाटलने भी लिखा है कि किसी राज्यके सुसङ्गउनके लिये यह आवश्यक राज्य मावश्यक तत्त्व ४७ है कि उसमें लोकसपा और भूमिविस्तारको कुछ हद्द होनी चाहिये। उसने कहा है कि लोकसंख्या न तो बहुत ज्यादा होनी गहिये और न पहुत कम ही। वह इतनी होनी चाहिये, जैससे यह स्वत परिपूर्ण होकर अच्छी तरह शासित हो सके। सुप्रसिद्ध फेन्च तत्ववेत्ता ससो ( Rousseau) ने राज्यके अस्तित्वके लिये लोकसख्याकी कोई सीमा निर्धारित न कर यह कहा है कि राज्यके भूमिविस्तार और लोकसख्यामें अमुक २ अनुपात ( Proportion ) होना चाहिये । अर्थात् इसके कहनेके अनुसार भूमिविस्तारके मानले लोकसख्या होनी चाहिये। परिस्टाटलका कथन है कि राज्यकी माप ( Measurement ) दो बातोंसे की जा सकती है। एक उसके भूमिविस्तारसे और दूमरी उसको लोकमख्यासे । इन दो मापों ( Measurements ) के बीच जो सम्बन्ध है, उसीसे किसी राज्यकी वास्तविक इयत्ता ( Dimention ) जानी जा सकती है। भूमिविस्तार इतना होना चाहिये जिससे उसमें रहनेवाले लोगोंको खाने पीने और परवरिशके काफी साधन मिल सके, और किसी भूमिपर इतने ही लोग बसने चाहिये जिनके लिये वह गुतारके साधन पैदा कर सके । इससे आगे चलकर महामति एरिस्टाटलने इस बातपर बडो बहस की है कि राज्यकी लोकसख्या जितनी अधिक होगी उसमें वैयक्ति- क स्वाधीनता उतनी ही कम होगी। उसने उदाहरण देकर दिख- लाया है कि अगर किसी राज्यमें दस हजार नागरिक वसते हैं. ।

४८
राजनीति विज्ञान
०.००
तो प्रत्येक नागरिकका राज्यसत्तामें चा हिस्सा रहेगा
..
और उसी राज्यमें एक लाख नागरिकोसी बस्ती हुई तो वह
अधिकार दस हजारके स्थानमें एक लाख हिस्सोंमें बट जायगा
अर्थात् दसगुना म तर पड जायगा। इन सब बातोंको सोच
समझ कर एक राजनीतिज्ञने यह अनुमान निकाला है कि राज्य
में लोफसख्या इतनी होनी चाहिये, जिसमेंसे शासनका काम
करनेवाले तथा शासित किये जानेवाले और राज्य सङ्गठनमें
सहायता पहुचानेवाले यथेष्ट सख्यामें निकल सकें। राज्यकी
लोकसरयाके परिवर्तनसे उसके अस्तित्व (Corporate)
पर विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। लोकसख्याके बढ़ने के कारण या
तो नैसर्गिक रहते हैं या विदेशियोंका आगमन और घटनेके कारण
लोगोंका बड़ा तादादमें विदेश जाना या अन्य कारण रहते हैं।
पर ज्यतफ इस सख्यामें इतनी कमी नहीं होती, जिससे कि
राज्य शकटका चलना असम्भव न हो जाये, तबतक राज्यका
अस्तित्व बना रहता है।
भूमि या सीमा
भूमि-राज्यका एक आवश्यक अङ्ग है। सुप्रसिद्ध जर्मन
पण्डित ब्लशले ( महाशर) का
कथन है कि जिस
प्रकार राज्यका वैयक्तिक आधार ( Personal basis )
उसमें यसनेवाले लोगोंपर है वैसे ही उसका नैसर्गिक आधार
उस भूमिपर है, जिसमें वे लोग रहते हैं, जो उस राज्यके सदस्य
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भूमिपर किसका अधिकार है ? जस्टिस वेस्टाप तथा जस्टिम बेस्टने भूमिअधिकारके प्रश्नपर खूध घादानुवाद करके हिन्दू-धर्मशास्त्रके आधारपर यह सिद्ध करने. का सफल प्रयत किया था कि हिन्दू-धर्मशास्त्र के अनुसार पहले प्रजाका ही भूमिपर अधिकार था | प्रीवी कौन्सिलने भी अस्टिस महोदयोंकी इस पातका अनुमोदन किया था। मौंट स्टुअर्ट एलफिस्टनने भी अपने इतिहास में इस घातको मुक्त कण्ठसे स्वीकार किया है कि हिन्दुस्तानके धर्मशास्त्रानुसार भूमिपर प्रजाहीका अधिकार समझा जाता था। यह तो हुई धर्मशास्त्रको यात! अब यह देखिये कि मुस- लमानोंके धर्मशास्त्रमें इस विषयपर क्या विचार किया गया है। कुरानके व्याख्यामार "हिहाया"का मत है कि प्रजा ही जमीनका मालिक है। फर्नल हान्सरनेडी महाशयका कथन है कि प्राय सपती मुसलमान कानून-निशारदोंका भी यही मत था। सन् १६६८ में सम्राट औरङ्गजेबने एक घोषणापत्र निकालकर प्रजाका स्वामित्व स्वीकार किया था। सन् १७७५ में ईस्ट इण्डिया कंपनीने कलकत्तेको कोठोके पास ३८ गावोंकी तालुकेदारी खरी- दलेके लिये तत्कालीन यादशाहके पास एक प्रार्थनापत्र भेजा था। इसपर बादशाहने उत्तर दिया था कि लोगोंसे खरीद लो, मेरा भूमिपर वैयक्तिक अधिकार नहीं है। मध्ययुगमें यूरोपमें, भूमि- * Bombay High Court Reports Appendix Vol दुर्भाग्य है कि इस वक्त हिन्दुस्तानमें भूमिके मालिक राज्य या राजा ही समझे जाते हैं। XIL T -- +

राजनीति विज्ञान
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का मालिक राज्य या राजा समझा जाता था, पर आजकल
यूरोपमें, मध्ययुगकी तरह, भूमिका स्वामी राज्य या राजा नहीं
माना जाता। अब वहा भूमि उसकी निजी और वैयक्तिक
मिल्कियत नहीं समझी जाती।
इस वक्त पाश्चात्य ससारमें कोई राज्य या राजा मध्ययुगकी
तरह भूमिको घेवकर गिरवी नही रख सकते, मानों वह उनकी
निजकी जायदाद नहीं है । आधुनिक राज्य (Modern State )
अपनी अधिकार की भूमिका स्वामी प्रजाको समझते हैं अपनेको
नहीं।
अगर किसी राज्य के देशपर या देशके किमी अंशपर दूसरे
राज्यका अधिकार हो जावे तोभी आधुनिक सभ्य ससारके
नियमोंके अनुसार भूमिपर उन्हीं व्यक्तियोंका अधिकार
रहेगा, जिनका अधिकार पहले था।
राज्यसीमाका विस्तार
कितने ही लेखकोंका मत है कि राज्यकी सीमा जितनी ही
विस्तृत और विशाल होगी उसके पास आत्मरक्षाके साधन उतने
ही दढ और उसका प्रभाव उतना ही विशाल होगा।
विषयमें आधुनिक राजनीतिज्ञोंका वडा मतभेद है। वे कहते हैं
कि यद्यपि यह बात कुछ अशों में सच है पर सर्वा शमें नहीं। यदि
ऐसा होता तो जारफे समयका विशाल रूसी साम्राज्य ससारमें
सबसे अधिक यलवान और पराक्रमी होता, पर उसे जापान जैसे
.

४९ भूमिपर किसका अधिकार है ? पा प्रजागण है। जयतफ लोगोंका कोई समुदाय किसी निश्चित भूमिको नहीं प्राप्त करता, तबतक यह राज्यको सस्थापना नहीं कर सकता। जिन लोगोंकी पृथ्वीपर कोई निश्चित भूमि नहीं है समझना चाहिरे उनका कोई निश्चित गज्य भी नहीं है। समार में अभी ऐसी कई भरनत जातिया है, जिनका कोई निश्चित चासम्पल नहीं है, और जो हमेशा इधर उधर घूमा करनी हैं। राजनीतिक गठिसे इनका कोई महत्व नहीं। लोगोंका कोई भी समुदाय तयतक राज्य के रूप में नहीं पहचाना जा सकता जरतक कि वह किसी निश्चित भूमिपर अपना अधिकार न कर ले । राज्य. के अन्तर्गत कोई न काई निश्चित भूमि अवश्य होनी चाहिये। लोग और भूमिके बिना राज्यका अस्तित्व ही नहीं हो सकता। राज्य भूमिमें अथवा राज्यसीमामें केवल जमीनहीका पन्तर्भाव नहीं होता। उसमें सय नदिया, तालाब, नहरे आदि आ जाती है, जो उस राज्यकी सरहदमें होती हैं। अगर इस भूमिमे लगा हुआ कोई समुद्र हो तो उसका तीन मीलतकका क्षेत्रफल भी उसमें समाविष्ट हो जाता है। समुद्रके अधिकार- के लिये राष्ट्रीय परस्पर क्या समझौता है, तथा इस महायुद्धके पाद उममें किस प्रकार परिर्वतन हुए, इस विषयपर हम किसी अगले अध्यायमें स्वतन्त्ररूपसे लिखेंगे। भूमिपर किसका अधिकार है ? इमारे प्रचीन शास्त्रकारोंने स्पष्टरूपसे यह कहा है कि

राजनीति विज्ञान
राज्यका भूमिपर वैयक्तिक अधिकार नहीं। उसका उसपर
केवल साधारण अधिकार है। महाभारतके पढ़नेसे मालूम होता
है कि उस समय राज्यको यद्यपि जमीनका महसूल धान्यके
रूपमें दिया जाता था, पर जमीनपर गाववालोंका ही स्वामित्व
रहता था। गावांकी सीमायें निश्चित रहती थीं और उन गावों-
को सघ उपजाऊ भूमिपर उन्हीं गावोंके लोगोंका अधिकार
रहता था जमोनके अलग २ टुकड़े किये हुए थे और उनपर
अलग अलग लोगोंका अधिकार था।
उस समय लोग अपने
अपने स्वामित्वको भूमिका क्रय विक्रय स्वतन्त्रतासे कर सकते थे।
भूमिका उस वक्त भी मूल्य था। भूमिदान वडा पुण्यकारक
समझा जाता था। समझदार मनुष्यके लिये यह आवश्यक माना
जाता था कि वह भूमि खरीद कर दान करे । तस्मात्कोत्या नहीं
दद्यात्स्वल्पामपि विचक्षणा (अनुशासन पर्व २०६७ श्लोक २४।।
सुप्रसिद्ध इतिहासवेत्ता टाह महोदय ने अपने प्रख्यात ग्रन्थ
"राजस्थान" में मेवाडका वर्णन करते हुए एक स्थानपर लिखा
है कि वह किसान ही भूमिके मालिक समझे जाते थे धे
भगवान मनुके "स्थाणुच्छेदस्य केदारम्" (अथात् जमीनका
मालिक वही है, जो जंगल काटकर खेत तैयार करता है) के
आधारपर किसानको जमीनका मालिक मानते थे।
सारे राजपूताने में यह कहावत मशहूर है-भोगरा धनी राज हो,
भोमरा धनी मा छा ( अर्थात् राजा केवल करका अधिकारी हैं,
भूमिके मालिक हम है ) । सन् १८७५ में चंबई हाईकोर्ट चीफ
।
अब भी

राज्यसीमाका विस्तार उतनो विस्तृत होनी चाहिये जिससे राज्यके मध्यवती पेन्द्र में उस राज्यके अन्तर्गत दूर दूरके प्रदेशोंसे प्रतिनिधि तुभीतासे भाव श्यकतानुसार जमा हो सके। अगर राज्यका विस्तार इतना अधिक हुआ कि मध्यवर्ती केन्द्र में उस गज्यके दूर दूर प्रदर्शोके लोग जमा न हो सके तो इससे उस राज्य शासनमें सबके सब लोगोंके प्रतिनिधि न आ सकेंगे और जनताका एक हिस्सा शासनमें योग्य हिस्सा लेनेसे वचित रह जायगा। इसके विपरीत अलेकर्जेदर हैमिल्टन महोदयका कथन है कि भूमिका विशाल विस्तार लोगोंकी नेसर्गिक शक्तिको बढ़ाता है और अल्प विस्तार अन्य प्रयल गष्ट्रोंको उम राज्यपर हमा करने तथा उनकी स्वावीनता नष्ट करनेका मौका देना है। कथन है कि जितना कम भूमिविस्तार होगा उतना ही कर उस राज्यके लोगोंको शत्रुफे खिलाफ अधिक सुदृढ क्षेत्र बनानेका अवसर मिलेगा और जितना शिाल क्षेत्रफल होगा उतना ही उनको आत्मरक्षाके या शत्रुके विरोध करनेफे अधिक साधन मिलेंगे। सुप्रसिद्ध जर्मन लेखक ब्लशले (Bluntschli)ने इन सय विचारोंका परीक्षण कर लिया है कि राज्यकी शक्तिका अदाजा भूमिविस्तारसे नहीं लगाया जा सकता। फास और जर्मनीकी भूमिका क्षेत्रफल रुसले दस गुना कम है तोभी इन दोनों राष्ट्रोंकी शक्ति रूसकी अपेक्षा अधिक है । प्रेट ब्रिटनका यूरोपीय भूमि वि- स्तार जर्मनी गौर फाससे कम है पर उसके अधीनस्थ राज्योंको एक तरफ रखकर भी प्रभाव और शक्ति में ग्रेट ब्रिटन्की इन दोनोंके उनका राजनीति विज्ञान माथ मजेमें तुलना की जा सकती है। ग्रीककी सिटो स्टेट (City State) भूमिके विस्तारकी दृष्टिसे छोटी थी पर इतिहासमें ग्रीक राजधानी एयसका महत्व कम नहीं था। ब्लशले के मतानुसार उस राज्यको, जिसका विस्तार विशाल है. और भौगोलिक परस्थितिके कारण जिसके सबप्रदेश मिले हुए नहीं है, अपनी आत्मरक्षा करने में चडी कठिनाईका सामना करना पडता है । युद्धके समय अपने सब प्रदेशोंकी रक्षा करनेमें उसे पड़ी वडी दिकातोंका सामना करना पडता है। कुछ पाश्चात्य लेखकोंका मत है कि सिटी स्टेट या अल्प विस्तारका देश सरकारके या शासनके किसी विशिष्ट रूपके लिये विशेष सुभीताजनक होता है। इसके विपरीत उस विशिष्ट रूपकी सरकारको उस राज्यका इतजाम करना कठिन होता है जिसके प्रान्त, पर्वत, नदिया आदि भौगोलिक परिस्थितिक कारण एक दूसरेसे मिले हुए नहीं हैं तथा जिनके कुछ या मधिक प्रान्त राज्यके मध्यवर्ती केन्द्रसे बहुत जुदे और दूरपर इन विचारोंके लेखकोंके मतानुसार विशुद्ध प्रजातन्त्रको अल्प विस्तारवाले तथा जुड़े हुए प्रान्तोंवाले राज्यमें अधिक सफ. लता होती है । मि0 जैलिनेक नामक लेखक कहता है, 'रिपब्लि- मन सरकार अल्प विस्तारवाले राज्योंके लिये अधिक सुविधा- दायक होती है और विशाल विस्तारवाले राज्योंके लिये राज्य- तन्त्र (Monarchy) अधिक सुविधादायक होता है । हा, हालके कुछ विशाल भूमिवाले प्रजातन्त्र राज्योंने अपने प्रत्यक्ष उदाहरणk राज्यसीमाका विस्तार शुद्र क्षेत्रफलके राज्यसे हार खानी पडी। जर्मन सेनाओंने रूसी सेनाओंको बुरी तरह पछाडा। चीन साम्राज्यकी भूमि अत्यत विस्तृत होनेपर भी यह दुनियामें महा निर्यल राष्ट्र गिना जाता है। इन्हीं सब उदाहरणोंको सामने रखकर कितने ही राजनीतिज्ञ केवल भूमिके अधिक विस्तारको महत्व नहीं देते। हा, भूमि- विस्तारके साथ २ योग्य सगठन, जातीय एकता, भौगोलिक परिस्थितिकी श्रेष्ठता और अन्य कितने ही साधनों को राज्यकी महत्ताके लिये आवश्यक समझते हैं। अय यह देखना है कि राज्य के अस्तित्वके लिये कितने भूमि. विस्तारको आवश्यकता है । आधुनिक राजनीतिशोंके मतानुसार जिस प्रकार इस यातका नियम नहीं है कि अमुक राज्यमें इतनी इतनी लोकसख्या होनी ही चाहिये वैसे ही इस बातका भी नियम नहीं है कि अमुक अमुक राज्यमें अमुक अमुक विस्तारकी भूमि होनी चाहिये । क्या प्राचीन कालमें और क्या आधुनिक कालमें भिन्न मिस राज्यों में भिन्न भिन्न लोकस ख्या और भूमि-विस्तार रहते आये हैं। जहा बीस करोड मनुष्यस ख्या तथा सुविशाल भमिक्षेत्र रखनेवाला ऊस जिस प्रकार राज्य कहलाता है, वैसे ही थोडी सी लोकस ख्या और भूमि रखनेवाला जापान भी गज्य कहलाता है । अमुक अमुक परिमाणमें लोकसख्या या भूमि होने हीसे राज्य यनता है यह नियम नहीं है ।हामाजकल्के राजनीति इस यातकी तो आवश्यकता समझते हैं कि भूमिको भौगोलिक एकताकाण्यालकर राज्योंका संगठन होना चाहिय अर्थात् उनके राजनीति विज्ञान विचारानुसार जलवायु और नैसर्गिक परिस्थितिकी समानताका इस विषयमें जरूर ख्याल रक्पा जाना चाहिये। इसके साथ साथ राष्ट्रीयताकी ओर भी नजर रखनी चाहिये । इन तत्वोंको ध्यानमें रखकर जय राज्योंका नये ढगसे सगठन किया जायगा तभी ससारमें इन पाश्चात्य विद्वानोंके मतानुसार सायी शाति हो सकेगी। यद्यपि प्राचीन और आधुनिक कालके राजनीतिज्ञोंने इस यातके नियम नहीं बनाये हैं कि राज्यके अस्तित्वके लिये अमुक अमुक परिमाणकी लोकसख्या या अमुक अमुक विस्तारकी भूमि होनी चाहिये पर रूसो या कौटिल्य प्रभृति कितने ही राजनीतिके आचार्यों ने यह सिद्धात अवश्य स्थिर किया है कि राज्यको भूमि इतनी विस्तृत होनी चाहिये कि उसमें उस राज्यके लोग आसानीसे यम सके और उसमे अपने उदरनिर्वाह या आवश्यक आरामके साधन प्राप्त कर सकें। वह इतनी विस्तृत भी नहीं होनी चाहिये जिसपर शासन करना असम्भव हो और इतनी सकुचित भी नहीं कि वहाके निघासी अपनी रक्षा आप न कर सकें। रूसोने लिखा है कि बहुत दूरके प्रदेश में शासन करना कठिन हो जाता है। शासनके सुभीताके लिये और लोगोंके हितके लिये किसी राज्यमें जरूरतसे ज्यादा विस्तारको भूमि आवश्यक नहीं। कुछ पाश्चात्य लेखकोंने इस विषयपर विचार करते हुए राज्यतन्त्र और प्रजा- तन्न राज्योंपर विचार किया है। मेडिसन नामक एक सुप्रख्यात राजनीतिविशारदका कथन है कि प्रजातन्त्रकी नैसर्गिक सीमा राज्यका वी wwwmuvivinawww wwwmar-~ - भौगोलिक परिस्थितिफा देशके आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक जीवनपर कुछ न कुछ अवश्य प्रभाव पड़ता है। प्राचीन ग्रीसमें छोटे छोटे राज्योंका अस्तित्व था। ये राज्य पर्वतोंकी श्रेणियोंसे, समुद्रसे एक दूसरेसे अलग हो गये थे। इन्हें मिलानेका पाहुत प्रयत्न किया गया पर इसमें अमफलता हुई। इससे यह सिद्ध होता है कि भौगोलिक विभेद राष्ट्रीय 'एकता पाधा पहुंचाता है। राज्यका दंवो मूल राजा देवताका अश है, यह पल्पना समारमें अत्यन्त प्रचीन कालसे चली आ रही है। वेदोंमें, स्मृतियों में तथा पुराणों में कई जाह ऐसे उल्लेख साये हैं जिनमें धर्मात्मा, प्रजाप्रिय, जितेन्द्रिय और शक्तिशाली राजाको देवताका अश बतलाया है। महाराज मनुने लिखा है, जय प्राणीगण राजाके अभावमें डर के मारे इधर उधर च ओर बिखरने लगे तय ईश्वरले ससारको रक्षाके लिये गजाको उत्पन्न किया । मध्ययुगके एक सुप्रसिद्ध पाश्चात्य लेखस्ने लिखा है, "ईश्वरने भूमण्डलपर रहे हुए कुछ शक्तिशाली विभूतियोंपर प्रकाश डाला और प्रेरणा द्वारा संसारको उनका हुपम मानने में धर्म यतलाया।" सेएट जलने गेमन लोगोंको सम्बोधन कर आदेश क्यिा था, "हर एक आत्मा उच्च शक्ति- योंकी आधीनता स्वीकार करे, ईश्वरके सिवा कोई शक्ति नहीं है। अगर सृष्टिको किसी विभूतिमें शक्ति दिखलायी पडती है, तो ६० राजनीति विज्ञान राजा जय लोगोंको वह ईश्वरकी ही है। महाभारत में कहा है कि "राजाको साधारण मनुष्य समझकर कोई उसका अपमान न करे क्योंकि राजा इस भूमण्डलपर मनुष्यके रूपमें देवता है। शिक्षा करता है तय वह महेन्द्र रूपमें रहता है, जघ वह पापी लोगोंको दण्ड देता है तब वह यमरूपमें रहता है, जब वह पृथ्वीपर भ्रमणकर राष्ट्रका निरीक्षण करता है, तब वह सूर्य स्वरूप हो जाता है, अपफारी लोगोंका द्रव्य हरणकर जब वह दूसरोंको सम्पत्ति देता है तय वह कुयेरके रूपका हो जाता है। राजाको कभी दोष देनेके लिये तैयार नहीं होना चाहिये। मनु- प्यको राज्यद्रव्यका कभी अपहरण नहीं करना चाहिये । जो ऐसा करेगा उसकी इस लोक और परलोकमे निन्दा होगी। मतलब यह कि पाश्चात्य शास्त्रोंकी तरह हिन्दू शास्त्रों में भी कई जगह राजाको देवताका अंश माना है। हा, हिन्दू-शास्त्रोंमें उसी राजाको देवताका अश माना है जो सयमशोल, विद्वान, प्रजा- प्रिय और शक्तिशाली होकर विविध देवी गुणोंसे विभूषित हो । हिन्दू-शास्त्रोंमें ऐसे दिव्य गुणोंसे युक्त राजाको विष्णुका अव- तार तफ कहा है। प्राचीन कालके यूरोपकी तरह मध्यकालीन यूरोपमें भी यह भावना अधिक जोर पकडे हुए थी कि राजा देवताका अश है। मध्ययुगमें ईसाई धर्मके जो प्रन्थ लिखे गये हैं, उनमें कई जगह लिखा है कि राजा ईश्वर द्वारा नियुक्त प्रतिनिधि है । सन् १५३० में आगसघर्गफे एफ घोषणापत्रमें कहा गया था कि "स्वय ईश्वर- भूमि-विस्तारको राक्षप्ती आफाक्षा से इस धारणको वडा सन्देहास्पद कर दिया है। जान स्टुअर्ट मिलका क्थन है, "राज्यका विस्तार इतना नियमित होना चाहिये जिसपर कि अच्छी तरह शासन किया जा सके और एक मध्यवनी केन्द्र के द्वारा जिसका शामन देखा जा सके।" आगे चलकर मिल फिर कहते हैं, "ऐसे बहुतमे देश हैं जिनका विस्तार बहुत विशाल है और जिनके दरवों यातसे प्रान्त मध्य- वर्ती केन्द्रसे अच्छी तरह शाषित नहीं किये जाते हैं।" इन्हीं सब यातोको सामने रखवार सुप्रसिद्ध तत्ववेत्ता मिल महोदय राज्यकी सीमाकी अत्यधिक विशालताके बदले समुचित निय- मिनताको अधिक पसन्द करते हैं। भूमिविस्तारकी राक्षसी आकांक्षा इस तत्ताको ठीक समझते हुप भी कई आधुनिक यूरोपीय राष्ट्र अपनी चढता हुइ जनताके लिये उसके जीरनकी विशेष सुभीताओं और भारामके लिये, उनकी व्यापार वृद्धिके लिये, नये नये मुल्कोंपर अधिकारकर अपने राज्यको सुविशाल यनाना ठीक समझते हैं। एशिया अफोका आदि देशोंका अधिकाश भाग इसी तरह यरोपके राष्ट्राने याट लिया। यहाके मूलनिवा- सियों को कुचलकर ये उस भूमिरे स्वामी यन ठे। अपने राष्ट्रके फायदेके लिये, अपने राष्ट्र के लोगोंके आराम और सुमोनाके लिये अन्य राष्ट्रोंको कुचलकर उनपर अधिकार जमा ले और उस राष्ट्र के मूलनिवासियोंके नैसर्गिक स्वत्वों .

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राजनीति विज्ञान
का नाश कर देना, इस प्रकारको कुटिलता यूरोपको आधुनिक
राजनीतिमें घुसी हुई है। पर इस महायुद्धके वाद नसारमें
जो नयी लहर बह चली है उसने संसारभरको इनकी नीच
कुटिलताका सन्देशा पहुचाया है और आशा है भविष्यमें
इनकी इस कुटिलताका बुरी तरहसे अन्त होगा, अस्तु ।
भौगोलिक स्थिति और राष्ट्रीय जीवन
किसी राज्यकी भौगोलिक स्थितिका, उसकी सीमा रूप
और आकृतिका, उसके विस्तारका उपके राष्ट्रीय जीवन और
सयाजोपर वडा प्रभाव पड़ता है। प्लेटो, परिस्टाटल, मेके
हेली, वाडिन, फाम्प्ट ( Compte ), राम आदि प्राचीन कालके
कितने ही पाश्चात्य विद्वानोंने किसी राष्ट्र के चरित्र और राष्ट्रीय
जीवापर उसकी नेसर्गिक परिमितिका जो प्रभाव पड़ता है
उसको बहुत महत्व दिया है। सुप्रसिद्ध दार्शनिक यर्कलेने
यहातक कह डाला है कि फिली, राष्ट्र की भूमि, जलवायु
अन्नका उस राष्ट्र के औद्योगिक, बौद्धिक और राजनैतिक विकास
पर बडा आश्चर्यकारक प्रभाव पड़ता है। भाण्टेस्क नामक एक
तस्वयेत्ताने तो देशके जलवायुजनित प्रभावों और कानूनमें तथा
भूमिके उपजाऊपन और सरकारके रूपमें घडा भारी सम्बन्ध
रियर करनेका प्रयत्न किया है। पर इसका मत राजनीतिज्ञोंको
मान्य नहीं है। वे कहते है कि इसमें अतिशयोक्तिको विशेष
मात्रा।
और
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५
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राज्य स्वत अन्तिम ध्येय है या उसका साधन ? गया। अब पाश्चात्य संसारके लोग क्षणभरके लिये भी यह बात मानने के लिये तैयार नहीं है कि राजा देवताका अश या ईश्वर- का प्रतिनिधि है। राज्य स्वतः अन्तिम ध्येय है या - उसका साधन राज्यके उद्देश्य बडे ही पवित्र और दिव्य होने चाहिये, क्योंकि जनताका हिताहित बहुत कुछ राज्यपर निर्भर करता । है । "यथा राजा तथा प्रजा" की बहावत मशहूर ही है। हमारे । हिन्दू शास्त्रकारों ने तो राज्यके उद्देश्य घात ही व्यापक और । विस्तृत कर दिये हैं। उन्होंने स्पष्टतया कहा है कि राज्य पंचल प्रजाकी इहलौकिक उन्नतिही के लिये जिम्मेदार नहीं है, पर पार- लौफिक उन्नतिके लिये भी जिम्मेदार है। महाराजा अशोकने समय समयपर जो आज्ञाए प्रकट फी थी उनले हमारे कथनकी पुष्टि होती है। हिन्दू शास्त्रकारोंने राज्यके जो उद्देश्य और लक्ष्य बतलाये है, उनपर हम किसी स्वतन्त्र अध्यायमें विचार करेंगे। सम्प्रति हम पाश्चात्य दृष्टिहीसे इस विषयपर दो शब्द लिखना चाहते है। प्राचीन ग्रीक लोगोका राज्य-सम्बन्धी सिद्धान्त यहो सूचित करता है कि ग्राम लोग राज्यको मानी जीवनका सर्वोत्कृष्ट उद्देश्य समझते थे। घे राज्यको मन्तिम आदर्शपर पहुंचनेका - राजनीति विज्ञान " केवल साधन ही नही वरन् स्वत राज्यहीको अन्तिम आदर्श मानते थे (They regarded the State an end an itself)! व्यक्तियोंको घे राज्यके अशमात्र मानते थे। व्यक्तियोंके स्वतन्त्र मस्तित्वको विशेष महत्व नहीं देते थे। वे मानते थे कि जिस प्रकार शरीरके भिन्न भिन्न अवयोंका काम सारे शरीरको सेवा करना रहता है, वैसे ही व्यक्तियोंका काम उनके राज्यरूपी शरी रकी सेवा करना है, अर्थात् व्यक्तियोंको अपना भिन्न अस्तित्व राज्य के अस्तित्वमें विलीन कर देना चाहिये। प्राचीन ग्रीसमें व्यक्तिगत स्वाधीनता (Individual freedom) राष्ट्रीय स्वाधी नताका अशमात्र मानी जाती थी। वहा उस वक्त राष्ट्रीय हितके खिलाफ व्यक्तिगतहित या स्वाधीनताका कोई सवाल उठता, तो उसका समर्थन या तो होता ही न था, अगर कहीं कुछ हो गया तो बहुत ही कम । आधुनिक पाश्चात्य लेखक अधिकांशमें ग्रीक लोगोंके उक्त सिद्धान्तके खिलाफ हैं। हम यह नहीं कहते कि सबके सब ही खिलाफ हैं। हमारे कहनेका मतलब यह है कि अधिकांश पाश्चात्य लेखक अब इस सिद्धान्तके खिलाफ होते जा रहे हैं कि व्यक्तिगत हितकी यलि सम्पूर्ण रूपसे राष्ट्रीय हितके यज्ञमें कर दी जावे। आधुनिक लेखफ राज्यको आदर्शपर पहुचनेका केवल साधन मानते हैं, वे राज्यहीको आदर्श या अन्तिम लक्ष्य नहीं मानते । बहुतसे लेखक इसी वातका प्रतिपादन करते हैं कि मनुष्यफे हित या विकासके लिये राज्य एक साधन है। लाई - - ।

राज्यका देवी मूल ने सर्वसत्ता, कानून, सरकार और व्यवस्थाको उत्पन्न किया है।" मठारहवीं सदीतक यूगपमें यह भावना थी कि राज्य ईश्वरीय सस्या है और राजा देवा स्वत्वसे राज्य करते हैं। इस सिद्धात या भाधनाका जोर फ्रान्समें अधिक था। मान्समें तो राजा लोग इस यातका दावा करते थे कि हमें ईश्वरसे यह महान सत्ता प्राप्त हुई है। सन् १८१५ में रूस, मास्ट्रिया और प्रशियाफे सम्राटोंके बीच साधु मैत्रा हुई उसमें उन्होंने साफ तौरले प्रकट किया था कि हमें अपने राज्यके लोगोंपर शासन करने के लिये ईश्वरने प्रतिनिधि रूपमें भेजा है। इसी प्रकारकी भावनायें उस समय यूरोपके कई सम्राटोंको थीं । अधिकांश लोग भो ऐना हो समझते थे। इस पासवीं सदीमें भी इस कल्पनाका समूल नाश नहीं हुमा था। जर्मन सम्राट् फैसरने कई बार यह यात दावेके साथ कही थी कि हम ईश्वरीय सत्तासे शासन करते है। इसके बार और आष्ट्रिया सम्राटके भी ऐसे ही विचार थे। कई बडे २ राजनीतिक दार्शनिकोंने (Political Philosophers) ने भी यडे जोरके साथ राजाके देवी अधिकारका पुष्ट करनेका प्रयत्न किया है। सत्रहवीं सदीका सुप्रसिद्ध दार्शनिक 'बोसेट' ( Bossuet ) ने अपने 'Politics as derived from Scriptures' में लिखा है, "ईश्वरने राजाओंको अपने सचिोंकी हैसियतसे नियुक्त किया है। ईश्वर इनके द्वारा लागोंपर उसी प्रकार शासन करता है, जैसे पिता यश्चोंपर करते हैं।"

राजनीति विज्ञान इंग्लैण्डके राजा जेम्सने सिहासनासीन होने के पहले अपने The true Law of a Free Monarchy' में अपना मनस्वी सिद्धान्त प्रकट किया था कि “राजा ईश्वरीय अधिकारसे राज्य करते हैं। प्रजाको उनके खिलाफ वू करनेतकका अधिकार नहीं। इसने अपने इस धक्तव्यको ईसाई धर्मशास्त्रोंसे और प्रकृति के नियमोंसे सिद्ध करनेका प्रयत्न किया है। उसने बडे जोरसे यह लिखा है कि जिस प्रकार ईश्वर के खिलाफ उसके कार्यों के लिये खड़ा होना पाप और मूर्खता है, वैसे ही राजाके खिलाफ भी खडा होना पाप और मूर्खता है, क्योंकि राजा ईश्वरहीका प्रतिनिधि और प्रतिविम्ब है। यद्यपि पाटियस (Grotus ), हाल ( Hobbes ) और लाक (Locke)प्रभृति पाश्चात्य विद्वानोंने राजाके देवी अधिकार सिद्धान्तपर जोरका कुठाराघात किया था, पर इनके बाद भी यह कल्पना कुछ अशमें विद्यमान थी। उन्नीसवीं और बीसवीं सदीमे इस फल्पनापर जोरका कुठाराघात होता रहा ।। लोग समझने लगे कि यह सारा मायाजाल अपने स्वार्थकी सिद्धिके लिये रचा गया है । यह सर वनावटी बातें है। इस महायुद्धने तो यूरोपमें इस कल्पनाका मानों समूल नाश कर दिया। इसके जार जो अपने मापको सर्वसत्ताधारी और ईश्वरके खास प्रति- निधि समझते थे, राज्यच्चुत कर मार डाले गये । जर्मन सम्राट केसर हालैण्डमें अधिकारच्युत होकर पड़े हैं। आस्ट्रियाके समारका पता भी नहीं है। अब एकतन्त्रीय शासनको जमाना ।

राज्य स्वत अन्तिम ध्येय हेपा उसका साधन मेकालेने कहा है, "प्राचीन राजनीतिज्ञोंका प्रधान दोष यह है कि चे यह नहीं मानते कि राज्य मोर फानूनका मस्तित्व व्यक्तियों को सुख समृद्धिके विकासके लिये है। सुप्रसिद्ध जर्मन लेपक प्ल- शलेका कथन है, "आधुनिक राजनीतिज्ञ राज्यको एक ऐसी सस्था या यन्त्र मानते हैं, जो कि प्रत्येक व्यक्तिकी जान, माल और व्यक्तिगत स्वाधीनताको रक्षाका जिम्मा लेता है।" दूसरे शब्दों में यों कह लीजिये कि उनके मतानुसार राज्य पसा ऐसी कृत्रिम सृष्टि है जिसका दावा लोगोंकी अधिकाश लोगोंकी सुप-समृद्धिको वृद्धिके लिये यनाया गया है। येकन समयसे इस सिद्धान्तकी फई लेपकों द्वारा पुष्टि होती आ रही है। जो लोग राज्यको फेवल लोगोंका समुदाय समझते हैं वे इस सिद्धान्तको किसी न किसी तरह मानते ही हैं। मेरी रायमें माधुनिक और पुराने दोनों पिवारोंमें सन्यसा कुछ न कुछ अश है। पर इसके साथ ही साथ यह भी कहना पडेगा कि दोनोंने एकतरफा विचार करनेकी गलती को है, जहा एक द्दष्टिसे राज्य अन्तिम लक्ष्य माना जा वहा दूसरो दृष्टिसे वह मन्तिम लक्ष्यपर पहुचनेका साधनमात्र भी माना जा सकता है। इसका स्पष्टीकरण करनेके लिये हम यहा एक दो उदाहरण देते हैं। मान लीजिये एक चित्रकार है जिसको जीविका चित्र निकालनेस चलती है और एक दूसरा आदमी है जो इन चित्रोंको बेचकर मार्थिक लाम उठाता है। यहा यह कहने की आवश्यकता नहीं कि किसीन " सकता - राजनीति विज्ञान फिसी रूपमें दोनों ही उन चित्रोंसे आर्थिक लाभ उठाते हैं। पर पहला मनुष्य जो कि चित्रकार है, चित्रको किस निगाहसे देखत है ? वह तो यह देखता है कि चित्रमें मेरे आदर्शों के, मेरे मनो- गत विचारों के भाव ठीक ठीक उत्तरे हैं या नहीं। वह अपने लाभ- के विचारको इन ऊंची भावनामों में भुला देता है। उसके लिये चित्र खुद आदर्श हो जाता है, और दूसरा मनुष्य फेवल उसे धन- कमानेका साधनमात्र समझता है। मतलब यह कि जहा पहले मनुष्यके लिये अर्थात् चित्रकारके लिये स्वत चित्र ही भादर्श है, वहा दूसरे मनुष्यके लिये वह लाभप्राप्तिका केवल साधनमात्र है। अयदूसरा उदाहरण लीजिये। विवाह पतिपत्नीको व्यक्तिगत माव. श्यकताओंकी पूर्तिका साधन है, यह दोनों के लिये सुखी जीवन- फा मार्ग खोल देता है । यह तो हुई एक दृष्टिकी घात, अब दूसरी दृष्टिले विचार कीजिये । विवाह स्त्री-पुरुषका संयोग है । इसी सयोगपर कुटुम्बकी नींव पडती । कुटुम्य क्या है ? एक खानदानके लोगोंका सामुदायिक सध है जिसके लिये उसके सदस्यरूप प्रत्येक व्यक्तिको अपने बहुत कुछ वैयक्तिक स्वार्थ और हितकी बलि देनी पडती है। मतलब यह कि विवाह और कुटुम्बका जो उच्च ध्येय है, उसमें व्यक्ति अपने वैयक्तिक स्वार्थको लोन कर देनेके लिये तैयार हो जाता है। यही घात राज्यके लिये भी लागू हो सकती है। एक द्रष्टिसे वह उन लोगोंके लाभका एक साधन है जो उस राज्यके सदस्य है और दूसरी दष्टिसे राज्य स्त हो अन्तिम आदर्श है जिसकी ७ राज्यके आदर्श सेवा करनेके लिये व्यक्ति उसी प्रकारसे वाध्य है जैसे सारे शरीरकी सेवा करनेके लिये शरीरके अवयवरूप व्यक्ति वाध्य हैं। १ राज्यके आदर्श अयतक हमने राज्य स्वत मन्तिम लक्ष्य है, या वह लक्ष्यपर पहुचानेका साधनमात्र है, इस विषयपर विचार किया है। हमने प्राचीन और अर्वाचीन दोनों दृष्टियोंसे इस विषयपर प्रकाश डालनेको चेष्टा की है। अब हम यह दिखलाना चाहते है कि राज्यके ध्येय पया है या पया होने चाहिये। सुप्रसिद्ध जर्मन लेखक हाल्जेनडार्फ ( Holtzendorff ) अपने "Principlerder-Politik" प्रन्यमें राज्यके ध्येयोंको दो भागों में विभक्त करता है । वे ये हैं (१) राज्यके वास्तविक ध्येय ( Real ends और (२) राज्यके आदर्श ध्येय (Ideal ends)। उसके कथना. नुसार राज्यके वास्तविक ध्येय ये है कि राज्य अपनी राष्ट्रीय शक्तिको अढावे, वैयक्तिक स्वाधीनताको रक्षा करे, सामाजिक सुधार एव मानवी सभ्यताका विकास करे गर्थात् हालजेनडार्फ- के मतानुसार राष्ट्रीय शक्ति, वैयक्तिक स्वाधीनता और मनुष्य-जातिकी सभ्यताकी अभिवृद्धि ही राज्यका वास्तविक ध्येय है । वनमोहल (Von-Mohal) नामक एक सुपरयात जर्मन लेखकके मतानुसार राज्यका ध्येय यह है कि वह लोगोंकी उच्चतम शक्तियोंका विकास करे। घर्गेस नामक एक दूसरा राजनीतिका सुप्रसिद्ध लेपक राज्यके उद्देश या ध्येयोको तीन भागों में विभाजित करता है। (१ प्रारम्भिक ध्येय (२) माध्य.

६८ राजनीति विज्ञान मिक ध्येय (३) अन्तिम ध्येय । सबसे पहले उसने अन्तिम ध्येयपर विचार किया है। उसका कथन है कि मनुष्य जातिकी पूर्णता ( Perfection of humanity,), संसारकी सभ्यताका विकास और इस भूमण्डलपर धर्म ( Virtue ) और नीति (Morahty) के सामाज्यको स्थापना ही राज्यके अन्तिम ध्येय होने चाहिये । राष्ट्रीयताके तत्त्वकी पूर्णता और राष्ट्रीय प्रतिभा (National genius) तथा राष्ट्रीय जीवनका विकास राज्यका माध्यमिक ध्येय होना चाहिये । व्यवस्था और स्वाधीनताकी स्थापना उसका पहला ध्येय होना चाहिये । बर्गेस महोदय कहते है कि इनकी सिद्धिके लिये सबसे पहले ऐसी 'सरकार और स्वाधीनताका इस प्रकार सङ्गठन किया जाना चाहिये जो यथासभव व्यक्तिको सर्वोच स्वाधीनताके अनुकूल हो । दूसरी मात यह कि भित्र २ राष्ट्रोंकी प्रतिभाका विकास किया जावे और उसे पूर्णतापर पहुँचानेका प्रयत्न किया जावे । राजनीतिक प्रसिद्ध आचार्य लाक महोदयका कथन है, राज्यका उहेश या ध्येय मनुष्य-जातिकी भलाई करना है। प्रोफेसर रिचो (Ritchi) महोदय मनुष्यजातिके सर्वोत्कृष्ट जीवनके आविष्करणको राज्य का प्रधान उद्देश समझते हैं। एक आधुनिक फेञ्च विद्वानका कथन है, "सयसे पहले राज्यका यह कर्तव्य है कि वह बाहरी शत्रुओं से राष्ट्रीय स्वाधीनताकी रक्षा करे, भीतर मुख, शाति और सुव्यवस्था रख्ने । इसके पश्चात् राष्ट्रीय जीवन के विकास करनेका प्रयत्न करे अर्थात् राष्ट्रकी प्रगति. करे"। पले (Laboulaye) .

राज्यके आदर्श नामक एक दूसरे फेञ्च राजनीतिज्ञका मत है, "राज्यका कर्तव्य यह है कि वह प्रत्येक व्यक्ति के लिये उसके पूर्ण विकासका, मार्ग खोल दे, यह ऐसी व्यवस्था करे जिससे मनुष्यको शारीरिक बौद्धिक और नैतिक शक्तिका पूर्ण विकास हो, विकासके मार्गमें आनेवाली चाधामोंको घद हटा दे, गरीयसे गरीय और अशानीसे अज्ञानी मनुष्यके द्वारपर मान और शिक्षामा प्रकाशकर सर्वसा- भारणको उन्नतिके पथपर आगे बढाये।' अमेरिकाके विख्यात लेखक गार्नर महोदय इन सब बातोंका विश्लेपणकर यह सार निकालते हैं, "राज्यका वास्तविक,प्रारम्भिक और तत्कालिक ध्येय यह है कि यह शाति, व्यवस्था, हिफाजत और न्यायको व्यवस्था करे। इसमें कानूनका राज्य स्थापित करनेकी यात भी आ गयी है, जिससे घेयक्तिक स्वत्वोंकी रक्षा की जा सके, कोई मनुष्य, कोई समाज, या कोई सरकार दूसरेको वैयक्तिक स्वाधीनतामें बाधा न डाल सके। यदि राज्य इन उद्देशोंको,इन ध्येयोंको, पूर्ण करने में असफल होता है,तो समझना चाहिये कि उसका अस्तित्व न्याय- युक्त नहीं है। वह अन्य बातोंकी कुछ मशोंमें उपेक्षा कर सकता है पर इन अत्यन्त यावश्यक बातोंकी नहीं कर सकता। राज्यको वैयक्तिक तथा सामाजिक हित और आवश्यकतामोपर अवश्य नजर रखना चाहिये। उसे ऐसे कार्य करने चाहिये जो लोगोंके हितके लिये भावश्यक हों। इन सय प्रारम्भिक और मूल कर्तव्यों के सिन्हा राज्यका मन्तिम फतन्य,और सर्वोत्तम ध्येय मनुष्य-जातिकी सभ्यता मौर । J ७० राजनीति विज्ञान सस्कृतिका विकास करना है। प्रात.स्मरणीय श्री अरविंद घोषने अपने एफ व्याख्यानमें कहा था, "भारतीय स्वराज्यका आदर्श महान, पवित्र और दिव्य है । वह अपनी क्षुद्र आवश्यकताओं को पूर्तिके लिये, अपने होनतम स्वार्थों को सिद्धिके लिये अपना राज्य स्थापित करना नहीं चाहता। उसके सामने महान आदर्श है ।वर अपने साथ सारी मनुष्यजातिको उठाना चाहता है । वह सारी मनुष्यजातिके सामने अपना दिव्य आध्यात्मिक संदेशा रखना चाहता है। वह मनुष्य जातिमें रहे हुए उस अलौकिक तस्वका आविष्करणफर संसारमें अपूर्व सुख और दिव्यताका प्रका फैलाना चाहता है। भारतीय-स्वराज्यके सामने यही दिग्य उद्दे होने चाहिये।" कविवर रवीन्द्रनाथने भी इसी प्रकारके दिद विचार प्रकट किये हैं। २ विश्वव्यापी राज्य। जिन लोगोंने मानव-प्रकृतिका अन्वेपणापूर्वक पर्यवेक्षण किया है, ये जानते है कि, उसको स्वाभाविक प्रकृति एकता ओर रहती है, सृष्टिमें जो अनेक विभिन्नतायें तथा विविधतार्य दीखती हैं, उनमें वह एकताका दर्शन करने के लिये स्वभावहीसे प्रवृत्त होती है, ससार अनेक विविधताओंसे घिरी रहनेपर भी वह अपना आदर्श "एकता रखती है, संसारमें अनेक प्रकार मत मतान्तर हैं, पर सप अन्तमें एक ही लक्ष्यपर जाकर खित हो जाते हैं, विभिन्नतासे निकलकर एकवाकी ओर पहुचने के लिये सारा ससार प्रयत्न करता है, विज्ञान भी इसी बात की विश्वव्यापी राज्य ७१ खोज करता है कि प्रकृति के भिन्न भिन्न नियमों में एकताका एक सर्वसामान्य तत्त्व निफाला जावे, और इसमें उसे कुछ सफ- लता भी हुई है। जितने दार्शनिक,जितने विज्ञानी तथा जितने उच्च कवि हैं, सब ही “एकता" की ओर दौड़ते हैं। यह प्रवृत्ति आजसे नहीं, सृष्टिके आरम्भकालसे चली आ रही है । "सर्व खल्विदं ग्रहा"का तत्त्व इसी एकताका घोतक है, विज्ञान बडे परिश्रमके बाद अन्तमें एक तत्व इलेकद्रनकी ओर पहुवा है, ससारमें जितने धर्म है, सय एक सर्वसामान्य, सर्वव्यापी तत्त्वकी खोज कर रहे हैं । बात यह है कि मनुष्यको प्रकृतिको तयतफ असली शान्ति नहीं मिलती जबतक कि वह एकताके दर्शन नहीं करती। चडे २ दार्शनिकोंने लिपा है कि शान्ति एकता है। देखते हैं कि राजनीतिक ससारमें भी हजारों वर्षों से इस एकताके स्थापित करनेका प्रयक्ष किया जा रहा है। ससारके कई भूतकालीन महानुभावोंने इसे स्थापित करनेका प्रयत्न किया था, और मन भी फई महानुभाव ससारको स्थायी शान्तिके लिये मनुष्य-जातिकी भयङ्कर युद्धों और खनखराबीसे रक्षा करनेके लिये राजनीतिक एकताकी अत्यन्त आवश्यकता समझते हैं। ससारमें इस वक्त जिस अपूर्व मानसिक कान्तिकी तैयारी हो रही है बद इसी एकताके स्थापित करने हेतु हो रही है। इस बत ससारके पढे २ प्रतिभाशाली मस्तिष्क इसो संसार-व्यापी राजनीतिक एकताको चिरस्थायीरूपसे प्रस्थापित करनेके लिये प्रयक्ष कर रहे है। इस अध्यायमें जिस विषयकी चर्चा की राजनीति विज्ञान जायगी, वह इस गजनीतिक एकताका महासाधन होगा। वह विषय है सार्वभौमिक राज्य । सुप्रसिद्ध ग्रीक दार्शनिक परिस्टाटलका कथन है कि मनुष्य लभावहीसे राजनीतिक प्राणी ( Political animal ) है, वह किसी राष्ट्रीय विभिन्नता अथवा विशेषता के कारण राज्य नहीं चाहता। मनुष्यफी स्वामाविक प्रकृति दी ऐसी है कि बिना राज्यके उसका काम ही नहीं चल सकता। मनुष्य-समाजके लिये राज्यका अस्तित्व मावश्यक है। कई उदार राजनीतिके दार्शनि कोंका कथन है कि क्या सृष्टिके भिन्न २ राज्यों में एकताका सर्व- सामान्य सूत्र प्रधित नहीं किया जा सकता। मनुष्य-जाति उसके समष्टिरूपमें एकतामय है। यह किसी न किसी प्रकारकी सर्व- सामान्य भावनासे प्रेरित होती है। ऐसी दशामें क्या सारी मनुष्य जातिके लिये एफ सर्व-सामान्य राज्यका आदर्श असङ्गत इसमें शक नही कि इस वक संसारमें कई ऐसे राज्य हैं, जो राष्ट्रीय हैं, जो अपने राष्ट्र में एकता रखनेका यथाशक्ति प्रयत्न करते हैं, पर राजनीतिके उंदार दार्शनिकोंको इनसे सतोप नहीं होता। समझते हैं कि राज्य की सर्वोत्तम और सर्वोच्च कल्प नाकी सिद्धि इन राज्योंसे नहीं होती। उनके विचारानुसार एक सार्वभौमिक राज्य ऐसा होना चाहिये जो अपिल मनुष्य जातिका दृश्य शरीर हो । इन महानुभावोंके विचारानुसार सार्थ- 'भौमिक राज्यही मानवी प्रगनिका आदर्श है।। - ।

सार्वभौमिक राज्य ७३ - इतिहासको देखनेसे पता चलता है कि पूर्वकाल तथा मध्य- साल में भी सामामिक राज्य स्थापित करनेफे असफल प्रयदा हो चुके हैं। इनमें किसीको सफलता नहीं हुई। पर इससे यह न मान लेना चाहिये फि मागेभी सफलता न होगी। ससार विकास. मय है, मनुष्य-जातिके दिव्यगुणोंका ज्यों ज्यों विकास होता जायगा त्यों त्यों इस महान राजनीतिफ आदर्शको सफलता में विशेष सहायता मिलती जायगी। इसके लिये पदले जो प्रयत्न हुए, घे मप याहरी थे, इससे सफलता नहीं हुई। यारी कृत्रिम साधनोंसे इस महान प्रफ्ताफा स्थापित होना असम्भव है, इसके लिये मनुष्य-जातिके अन्त करणफी पताकी आवश्यकता है। जबतक मनुष्य जाति, "मय निज परोत्ति गणना लघु चेत- माम, उदार चरितानातु वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना गुढ न होगी, जयतक मनुष्य जाति यात्मैक्यका दिव्यअनुभव नहीं करने लगेगी, जपतफ यह आत्मष्टिमें एकताका अनुभव न पारने लगेगी तयाक इस राजनीतिक विश्वव्यापी एकताका-सार्व भौमिक राज्यपा-सफलताफे साथ स्थापित होना असमय है अगर कोई प्रयल राष्ट्र अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिये किसी सार्थ. भौमिक सत्ता या राष्ट्रसघकी स्थापनाकर ससारमें शान्ति- स्थापन करना चाहे तो यह त्रिकालमें सम्भव नहीं। ससारव्यापी शान्ति याहा साधनोंसे नहीं आन्तरिक साधनोंसे स्थापित हो सकती है। जडवादके पायेपर, बाहरी शक्तिके वलपर "सार्व- भौमिक राज्य" स्थापित किया जायगा, तो वह कमी चिरंजीवी राजनीति विज्ञान नहीं हो सकता। वह जन्महीसे रुग्ण होकर अत्यन्त अल्पायुमें ही मृत्युकी शय्यापर जा लेटेगा। इसलिये कविवर रवीन्द्रनाथ और प्रात स्मरणीय अरविंद घोपने संसारव्यापी एकताका, सार्वभौमिक सत्ताकी सफलताके लिये मनुष्य-जातिफे आत्म "क्यकी सबसे बडी सावश्यकता बतलायी है। अबतक इम विषयमें जो प्रयत्न हुए, उनकी असफलताका कारण यह था कि उनमें यात्मिक भाव नहीं था, उनकी नींव जड-शक्तिपर पड़ी हुई थी। अत्यन्त उन्ध, पवित्र और दिव्य आदर्शों को रखते हुए आत्मिकमावपर अगर कोई ऐसो सार्वभौमिक सत्ता, जिसमें सारी मनुष्य-जातिके प्रतिनिधि हों, जिसमें सारी मनुष्य-जातिकी कल्याणकामना हो, जिसमें मनुष्यजातिके लौकिक और मास्मिन विकासफे ध्येय समाविष्ट हों, स्थापित हो तो उससे संसारक वास्तविक कल्याण हो सकता है और यह सफलतापूर्वक चिर फालतक जीवित रह सकती है। ३ राज्यके भिन्न भिन्न रूप । सुप्रसिद्ध ग्रीक तत्वज्ञानी एरिस्टाटलने राज्यके रूपोंका विभकीकरण किया था। थोडेसे मतभेदके साथ आपका यह विभकीकरण आज भी कई राजनीतिक पण्डितोंको मान्य है। राजनीतिफ ससारमें यहुत प्रगति हो जानेके कारण, वक्त एरिस्टाटलके विभक्तीकरण (Division)से जैमा चाहिये चैसा काम नहीं चलता, पर फिर भी तत्वत यह भय भी मान्य F- राजतन्त्र शे रहा है। एरिस्टाटलने राज्यके प्रधानतया तीन रूप बतलाये हैं। (१) राजतन्त्र ( Monarchy ) (२) कुलीनतन्त्र KAristocracy) और (३) प्रजातन्त्र ( Democracy | आज मी प्रधानताले राज्यके ये तीन ही रूप माने जाते हैं। कितने ही विभाग जो आजकल किये जाते हैं, किसी न किसी तरह इन तीनों के अन्तर्गत आ जाते हैं। पहले हम इन तीनों पद्धति- पोंका अलग २ विचारकर फिर हम इनके अन्तर्गत आनेवाली अन्य राज्य पद्धतियोंका भी विचार करनेका प्रयत्न करेंगे। राजतन्त्र। राजतन्त्र (Monarchy) उस शासनप्रणालीका नाम है, जिसमें किसी एक उच्यतम सत्ताको प्रेरणासे राज्यका कारोयार चलता हो। इसे हम सीधे सादे शब्दों में यों कह सकते हैं कि जहा एक राजाका राज्य हो, जहा राजाफे हाथमें राज्यकी सव विधि द्वारा मर्यादित शक्तिया और अधिकार हों,वहाके शासनको राज तन्त्र कहते हैं। महामति एरिस्टाटलका कथन है-"वह राज्य राजतन्त्रीय कहलाता है, जहा एक आदमी सर्वसाधारणके हितके लिये राज्य करता है। अमेरिकाके सुप्रसिद्ध लेखक मि. गार्नरका कथन है जहा शासनकी ऊची सत्ता किसी एक व्यक्तिमें केन्द्रीभूत हुई हो, चाहे फिर उसके अधीनस्थ शासनका फुटकल काम करनेवाले क्तिने ही व्यकि क्यों न हों, वहाफे शासनको राजतन्त्र कहते हैं।" राजतन्त्रके प्रधानतासे दो भेद किये जा सकते हैं। सव.

राजनीति विज्ञान सत्ताधारी राजतन्त्र(Absolute monarchy)और धैध राजतन्त्र (Constitutional monarchy)। सर्वसत्ताधारी राजतन्त्र उमे कहते हैं जहा “राजा करे सो न्याव और पासा पडे सो दाव कहावत चरितार्य होती है, जहां राजाका हुक्म ईश्वरीय आशाके तुल्य समझा जाता है, जहाँ राजाके अधिकारमें किप्तीको वं करनेतकका अधिकार नहीं, जहां राजा ही सब कुछ है, प्रजाके 'मतका या माधोंका आदर करना यान करना, यह राजाके मर्जीकी यात है। बसका जार तथा भारतके अधिफाश देशी राजा इस श्रेणी में बाते हैं। हमारी रायमें सर्वसत्ताधारी राजतन्त्रके भी दो उपविभाग हो सकते है। यथा आदर्श सर्वसत्ताधारी और खेच्छाचारी'या अत्याचारी सर्वसत्ताधारी राजतन्त्र । आदर्श या प्रजाप्रेमी सर्वसत्ताधारी राजा उन्हें कहते हैं जिनके हाथमें यपि सर्वसत्ता, रहती है, पर वे अपनी सुशीसे प्रजामतका बडा आदर करते हैं, प्रजाको पुत्रवत् समझते हुए उसीके हितम अपना हित समझते हैं। प्रजाकी शारीरिक, मानसिक, आर्थिक, वौद्धिक और आध्यात्मिक उन्नतिको अपना प्रधान ध्येय मानते हैं। इस प्रकारके उच्चातिउच्च और दिव्य राजाओं में हम श्रीराम- चन्द्रका नाम सयसे पहले रखेंगे, जिन्होंने प्रजामतके आदर करनेका तथा प्रजाहितका सर्वोत्तम भादर्श दिखलाया। इस श्रेणी और भी कई आदर्श राजाओंके उल्लेख हमारे शास्त्रों में मिलते है। आधुनिक कालमें यद्यपि "राम" जैसे दिव्य राजा दिखायी नही देते हैं, पर फिर भी कुछ ऐसे राजा है जो प्रशामतका , राजतन्त्र मादर करते हैं और प्रजाका कल्याण करना अपना कर्त्तव्य सम- मते है। किसो अंशमें महाराजा बद्धीदा, मैसूर, द्रावनकोर, इन्दी, झालरापाटन आदिफे नपतियोंको इस श्रेणीमें ले सकते है। दूसरी श्रेषीमें अत्याचारो और खावारी सर्वसत्ताधारी राजा माते हैं। ये प्रजामतकी कुछ परवा नहीं करते। राज्यको अपनी पपीती मानते हैं। ये अपने आपको देवताका अश या विष्णुका अवतार समझते हैं। प्रजामतको अपहेलना फर चाहे सो कर डालते हैं। ये समझते हैं कि ईश्वरने हमें शासन करने होके लिये सजा है। मतलब यह कि ये पूरे तौरसे खेच्छा- चारी होते है। इसके मृत जारकी गणना ऐसे स्वेच्छाचारियों- में थी। भारतवर्षके अधिकाश राजा महागजा विशेष का राज- पूतानेके राजा इस श्रेणी में माने योग्य हैं। अथ वैध राजतन्त्र (Constitutional monarchy ) को लीजिये। चैध राजतन्त्र उसे कहते हैं जिसमें राजाकी शक्तिया देशकी किसी विधि (Constitution ) से या प्रजामतसे मर्या- दित हो। इङ्गलेएडके आधुनिक, राजा सम्राट पञ्चम जार्ज इस श्रेणी में आते हैं। यद्यपि वे राजराजेशार है, पर उनके अधिः । कार देशको विधि (Constitution) से मर्यादित हैं। ये पिल- । कुल स्वेच्छाचारी नहीं हैं। पार्लियामेण्टसे उनके अधिकार | नियमित हैं। घे भारतीय राजाओं की तरह मनमानी नहीं कर | सकते। यूरोपके मन्य कितने ही राजाओंकी शक्तियां या अधिकार । कुछ न्यूनाधिक रूपसे, इसी प्रकार देशको विधिसे नियमित है। - राजनीति विज्ञान यह तो हुए शासनकी दृष्टिसे राजतन्त्र ( Monarchy के भेद। अय दूसरी तरहफे भेदोंपर विचार कीजिये । राजा तरहके होते हैं, एक वे जो पुश्तैनी राजा होते हैं, दूसरे ये लोगोंके द्वारा चुने जाते हैं। दिन्दुस्तान के प्राचीन इतिहास देखनेसे पता चलता है कि प्राचीन हिन्दुस्तानमें कई जगह राज चुने जाते थे। वेदोंमें भी राजाके चुने जानेके उल्लेख मिलते हैं। बौद्ध ग्रन्यों में तो इस प्रकारके कई उल्लेख मिलते हैं। कहा जाता है कि प्राचीन कालमें रोममें भी राजा लोग चुने जाते थे। पोले- एडके इतिहासमें भी राजाओं के चुने जानेफे कई उल्लेख है। पवित्र रोमन साम्राज्यका प्रधान ( Head) भी चुना गया था। सन् १७७८ बर्लिनको सुलहके अनुसार बलगेरियाके राजाने भी चुनावके द्वारा राजगद्दो प्राप्त की थी। पर इस बक ससारके प्राय. सब राजा पुश्तेनी हैं, अर्थात् परम्परासे उनका परिवार राज्य करता था रहा है। अप साधारण रूपसे यह देखना है कि राजतन्त्रमें या गु और छोप है। प्रत्येक बातका विचार करते समय यह आवश्यक है कि उसकी दोनों बाजुये दिखलायी जावें । राजतन्त्रके गुण और दोपांकी समालोचना करना चाहते है या कहनेको तो आवश्यकता नही कि राजतन्त्र शासनप्रणाली संसारमें अत्यन्त प्राचीन है। ससारमें इसका कबसे प्रादुर्भाव हुआ, इसका ठीक ठीक प्रामाणिक इतिहास नहीं मिलता । जो कुछ मिलता है, वह विश्वसनीय नहीं । अठारहवी सदीके सुप्र - अतापर हम यह

राजतन्त्रके गुण
७६
सिद्ध दार्शनिक और इतिहासवेत्ता मि० ह्यूमने कहा था-
"यद्यपि आधुनिक कालमें सब प्रकारकी राज्य-प्रणालियों में सुधार
हुआ है, पर राजतन्त्र ( Monarchial Government ) ने
पूर्णता ( Perfection ) की ओर सबसे अधिक प्रगति की है
सभ्य राज्यतन्त्र रिपब्लिककी तरह कानून और निधिके राज्य
ने लगे हैं। उनमें व्यवस्था-पद्धति और स्थिरता दीखने
गी है। वहा धन माल सुरक्षित है। उद्योग धन्धोंको उत्तजन
मेल रहा है। हुनर और कलाकौशल तरको पा रहे हैं। राजा
लोग मजाके साथ वैसा बर्ताव करने लगे हैं, जैसे पिता पुत्रके
ज्ञाथ करता है।" इस प्रकार कुछ अन्य महानुभावोंने भी
राजतन्न शासनप्रणालोकी और उससे होनेवाले लाभोंकी प्रशसा
राजतन्त्रके गुण।
जो लोग राजतन्त्रके हिमायतो हैं, वे इस राजतन्त्रके पक्षको
कई तरहसे पुष्ट करते हैं। वे कहते हैं कि इसमें सारी शकि
एफ जगह केन्द्रीभूत रहती है इसलिये राज्य शासनमें मतभेद
हो जानेसे शक्तियोंके विपर जानेका जी डर रहता है, वह इसमें
नहीं रहता।
जबतक कैसरके हाथमें जर्मनका राज्यघून था,
तपतक वहा जिस एकता और पूर्णतासे राज्यशासन चलता था,
तथा राष्ट्रको शक्तियोंका जैसा बढिया सङ्गठन था, वैसा माज
नहीं है।
यद्यपि वहा माज प्रजातन्त्र है, पर वहाकी शक्तिया
बिखर गयी है। यहा पात बातमें मतभेद और विरोध हो रहा

राजनीति विज्ञान इसके सिवा सरक है। कोई कुछ कहता है तो कोई कुछ। समयमें जर्मनीकी सर्वाङ्गमुखी जो उन्नति हो रही थी वैसी आज नहीं हो रही है। इस प्रकारके उदाहरण देकर वे अच्छे राज तन्त्रको फुलीनतन्त्र और प्रजातन्त्रसे श्रेष्ठ सिद्ध करने की चेष्टा करते है। कहते हैं कि कभी कमी योग्य, प्रजाप्रेमी और शासन चतुर राजाके राज्य में प्रजा जैसी तरको कर जाती है, वैसी प्रजा कभी कभी प्रजातन्त्रमें भी नहीं कर पाती। दूसरी यास यह है कि जिन देशों में सभ्यताका यथेष्ट विकास नहीं हुआ है, जहाको प्रजा सुसस्कृत,योग्य तथा शासन । क्षम नहीं है, यहा कई राजनीतिविशारदोके मतानुसार जैसा सुयोग्य और परोपकारी राजतन्य सफल हो जाता है,सा प्रजातन्त्र नहीं होता। इसे दूसरे शब्दों में यों कह सकते हैं कि जहा लोगोंका यथेष्ट रूपसे राजनीतिक विकास नहीं हुआ जहाके लोग शासनकार्यमें हिस्सा लेनेफे लिये अयोग्य है, जहाके लोगों की राजनीतिक भावनायें बिलकुल अपूर्ण या सुपुप्ति अव स्थामें हैं, वहाको स्थिति के अनुकूल विशेष तौरसे राजतन्त्र ही हो सकता है। यहा यह तो अवश्य स्मरण रखना चाहिये कि गृह पात अच्छे और लोकप्रिय राजतन्त्र के लिये कही जा रही है। अत्याचारी और स्वेच्छाचारी राजतन्त्र तो सर्वत्र बुरा है, उसका अनुमोदन तो किसी स्थितिमें नहीं किया जा सकता । अमेरिका- के सुप्रसिद्ध विद्वान् मि. गार्नरका कहना है कि लोगों को जङ्गली: अवस्थासे निकालकर सभ्य भवस्थामें पहुचाने के !

राजतन्त्रके दोष लिये और उनमें नियमबद्धता ( Discipline ) का गुण लानेके लिये जितना फाम राजतन्त्र दे सकता है, उतना कोई दूसरा तन्त्र नहीं दे सकता। ग्लेण्डके विश्वविख्यात लेखक जान स्टुअर्ट मिलका कथन है-"जङ्गली आदमियों के साथ व्यवहार करने के लिये एकतन्त्रीय शासनप्रणाली ही सर्वथा उपयुक्त है। हा, उन जङ्गली मनुष्योंको सुधार फर सभ्य बनाना उसका उद्देश्य अवश्य होना चाहिये।" मागे चलकर फिर मिल महोदय कहते हैं-"जयतक मनुष्य-जाति इस अवस्थापर न पहुच जाये कि वह गहनतम मामलोंमें स्वतन्नताके साथ पादानुवादन कर सके, तत्रतरु उनपर स्वाधीनताका तत्व कुछ नियमित मर्यावामें लगाना चाहिये।" ई पाश्चात्य लेखकोंका कथन है- "मध्ययुग या प्राचीन युगके लिये राजतन्त्र शासनप्रणाली ही उपयुक्त थो। उसीका अस्तित्व उस वक मुनासिब (Justified) था। उस वक्तकी स्थितिमें अन्य शासनप्राणालीका सफल होना फटिन था। राजतन्म शासनप्रणालीहीने अन्य प्रकारकी शासन- प्रणालियों का मार्ग साफ किया।" राजतन्त्रके दोष। अयतफ हमने विशेष रूपसे राजतन्त्रके गुणोंपर ही विचार किया है। अय उसके दोपोंको भी देख लीजिये। हम ऊपर कहे हुए दोनों प्रकारके दापोंपर अलग अलग विचार करेंगे। पहले सर्पसत्ताधारी राजतन्त्र (Absolute Monarchy)को लीजिये। यह बात तो साफ है कि जिन लोगों के लिये राज्य किया -- ६

যনানি ঘিন্নান
जो
जाता है, उनका उसकी शासनप्रणाली में कोई हाथ नह
रहता। हाँ, राजा चाहे तो अपनी मर्जीसे थोडेसे इक प्रजाको
देता है, पर यह बात राजाकी मजीपर है। इस शासनप्रणाली
कुछ एक आदमी-राजा ठीक और योग्य समझता है, उसके
समझमें जो यातें ठीक ऊँचती है, वही करता है। मतलब यह
कि हजारों लाखों प्रजागणोंका शासन एक मनुप्यके हाथमे रहत
है। इसका परिणाम यह होता है कि कुछ कर्त्तव्यक्षम औ
आदर्श राजाओंको छोडकर अधिकांश राजा शासनमें जितना
अपना हित सोचते हैं उतना प्रजाका नहीं सोचते । प्रजाके हित
और स्वार्थका बलिदानकर चे अपना स्वार्थ और हित साध
है। गरीव प्रजाको कठिन कमाईके धनको किस प्रकार अपने
ऐश आराममें, अपनी नीच वासनाओं की पूर्ति वरवाद करते
हैं, इसके सैकडों उदाहरण आज हमारे सामने हैं। "Develop
ment of European Pohty' नामक ग्रन्थमें लिखा है--"स
राजतन्त्रकी प्रवृत्ति स्वेच्छाचारिता और उसकी बुराइयोंकी
ओर होती है। इसमें राजाके हित और स्वार्थको बहुत स्थान
मिलता है। लोगोंके स्वार्थो के बलिदानपर कई राजाओंकी नीव
वासनाओंकी पूर्ति होती है। इस प्रकारकी कई बुराइया
राज
तन्त्रमें हैं।"
अगर यह भी मान लिया जावे कि किसी राजतन्त्रीय शासन
में धर्मराज्य हो रहा है,
प्रजा सुखी है, राजकोष अच्छे कामोंमें
खर्च किया जाता है, शासन बड़ी क्षमता और योग्यतासे चराया
,

घंशपरम्परागत राज्य-पद्धतिफे गुणदोष
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जाता है, तोमी इन सब उच्च गुणोंक होते हुए भी आजकलो
जमाने में यह शासाप्रणाली श्रेष्ठतम नदी समको जा सकती
हा, ऐसे धर्मशील और न्यायो राजाफो भादर्श भीर धर्मायता
कह सकते है, पर इस यक एक तन्त्रीशासन, चाहे वह कितन
ही अच्छा क्यों न हो, आदर्श नहीं माना जा सकता। पयों
शासनमें योग देनेसे प्रजापपजिम्मेदारी परतो है और जिम्मेदारी
से मनुष्यको मात्माका विकास होता है, उसमें शासन क्षमत
माती है। यह पात अच्छेसे अच्छे राजतन्त्रमें भी उतनी सम्म
नहीं, जितनी प्रजातन्त्रमें है। सरकारका उद्देश फेवल प्रजा
सुन्नी और सतोषी करना ही नहीं है, उसकी शकियोंका विकार
और उनके फूलने फलनेफे अनुकूल अवसर भी उपस्थित करना है
माजफलके जमाने में सरकारका घहो रूप अच्छा समझा जात
है, जिसमें लोगोंका हिस्सा हो, और जिसके द्वारा शासनक्ष
योग्य नागरिकोंकी उत्पत्ति हो । सरकारका ऐसा ही रूप आज
फल यादर्श समझा जाता है। इसके अतिरिक्त राजतन्त्र शासन
प्रणाली में और भी अनेक दोष है, उन सबका विवेचन कर
यहा समय नहीं। अब हम यहा यशपरम्परागत राजतन्त्रप्रणा
लोकी थोडी सी समालोचना करते हैं।
वंशपरम्परागत राज्य-पद्धतिके गुणदोष ।
राजतन्त्रके पक्षमें जो कुछ कहा जाता है उसका निष्का
यही है कि पिताफे गुण फुछ न कुछ सशमें पुत्रमें उतर
है आधुनिक विज्ञानने भी किसी अंशतक इस घातको स्वीका
.

राजनीति विज्ञान किया है। पर इस नियममें जो अपवाद ( Exceptions) देखे जाते हैं, वे भी कम नहीं हैं। दुर्गुणी पिताके सद्गुणी पुत्र होने तथा सद्गुणी पिताके दुर्गुणी पुत्र होनेके सैकड़ों उदाहरण दिखलायो देते हैं। यह कोई निश्चित पात नहीं है कि गुणवान पिताफे गुणवान ही पुत्र उत्पन्न हों। इसी प्रकार किसी सद्गुणी और बुद्धिमान् राजाके सद्गुणी और घुद्धिमान ही पुत्र उत्पन्न होंगे, इसका कोई नियम नहीं है। सम्भव है कि उसके दुर्गुणी, लम्पट और गयोग्य पुत्र भी उत्पन्न हो जाय। अतएव योग्यता और अयोग्यता सद्गुण या दुर्गुणको विना परीक्षा किये ही केवल इसो यातपर कि वह राजाका लडका हे किसीको राजगद्दीपर बैठा देना और हजारों लाखों भादमियों के भाग्यको बागडोर उसके हाथ सौंप देना फहातक उचित है, इसका विचार प्रत्येक मनुष्य अपनी धुद्धिसे कर सकता इतिहासमे ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं कि कई बार इसी पुश्तैनी पद्धतिके कारण राजगहीपर ऐसे अनुभवहीन, अयोग्य और शासनअक्षम राजा बैठाये जाते हैं जो इन्द्रियोंके गुलाम बनकर दिनरात विपयासक रहते है और प्रजाफे कठिन एमाईके, अधिकाश रूपसे प्रजाहितमान लगाकर अपनी नीच शासनामोंकी प्तिमें लगाते हैं। फ्रान्समें पाव तौ वर्पतफ निरन्तर ऐसे राजा राज्यासीन किये गये, जिनको उम्न राज्याभिषेकके समय पचीस. यसे भी कम थी। सौ पर्पतक तो यहा ऐसे राजा गहीपर बैठने रहेजा उस समय इकोस वर्षकी आयुके मोन थे। हमारे भारत धनको ।

चंश परम्परागत राज्य पद्धतिके गुणदोप वर्षमे तो हमें ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं। यहां देशी राज्यों में सर्वन पुश्तैनी पद्धति मौजूद है । अठारह घर्षका लडका यहा गहीपर बैठा दिया जाता है। उसकी शिक्षा ऐसे घायुमण्डलमें होती है, जिससे यह सयमी और प्रजाहितपो बनने के बदले परले दर्जेका लम्पट और विलासप्रिय धनता है, प्रजाप्रेमी यन. नेके पदले गौराष्ट्रीफा दास बनता है। वह तो यह समझ बैठता है कि राज्य मेरी मौरूसी जायदाद है। इसका जैसा चाह वैसा उपयोग करनेफा मेरा अधिकार है। प्रजाको इसमें चूं करनेका कोई हक नहीं। यह मनमाने रूपसे धन उडाता है। प्रजापर चाहे जैसे मनमाने अत्याचार करता है। उसे अपनी जिम्मेदारीका तनिश स्याल नहीं रहता। हमारे हिन्दूशास्त्रोंमें राजाके जो दिव्य आदर्श यतलाये हैं, उनका उसे शान नहीं रहता। हमारे कहने का मतलब यह नहीं है कि आधुनिक काल के सर ही देशो राजा अयोग्य और वेलगामके घोडे हैं। उनमें कुछ अच्छे गौर प्रजाप्रेमी तथा न्यूनाधिक रूपसे अपनी जिम्मेदारीको समझाने- वाले हैं, पर इनकी संख्या अगुलीपर गिनने योग्य भी नहीं निक- लेगी। अधिकांश राजा उपरोक्त ही श्रेणीके हैं। इन सय यातोंसे यही तथ्य निकलता है कि वशपरम्परागत पद्धतिमें जहा थोडेसे गुण हैं, यहा अनेक दोय है। तिसपर भी जहा राजाकी शक्तिया अमर्यादित रहती है, किसी विधि ( Constitution ) या प्रजामतसे नियमित नहीं रहती, वहा तो राज्यकी यह पुश्तैनी पद्धति अत्यन्त हानिकारक है । यद्यपि ऐसी दशामें भी कुछ आदर्श रहे जो उस समप इकोस वर्षकी आयुके मीन थे। हमारे भारत ८४ P घसे भी कम थी। सौ घर्षतक तो यहा ऐसे राजा गद्दीपरांठने राजनीति विज्ञान किया है। पर इस नियममें जो अपवाद ( Exceptions : देखे जाते हैं, वे भी कम नहीं हैं। दुर्गुणी पिताफे सद्गुणी पुत्र होने तथा सद्गुणी पिताके दुगुणी पुत्र होनेके सैकडों उदाहरण दिखलायी देते हैं। यह कोई निश्चित यात नहीं है कि गुणात पिताके गुणवान ही पुत्र उत्पन्न हों। इसी प्रकार किसी सद्गुणी और बुद्धिमान् राजाके सद्गुणी और बुद्धिमान ही पुत्र उत्पन्न होंगे, इसका कोई नियम नहीं है। सम्भव कि उसके दुर्गुणी, लम्पट और गयोग्य पुत्र भी उत्पन्न हो जाय। अतएव योग्यता और अयोग्यता सद्गुण या दुर्गुणकी थिना परीक्षा किये ही केवल इसी यातपर कि वह राजाका लड़का है किसीको राजगद्दीपर पैठा देना और हजारों लाखों आदमियोंके भाग्यकी धागडोर उसके हाथ सौंप देना फहातक उचित है। इसका विचार प्रत्येक मनुष्य अपनी घुद्धिसे कर सकता है। इतिहासमें ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं कि कई बार इसी पुश्तैनी पद्धतिके कारण राजगद्दीपर ऐले अनुभवहीन, अयोग्य और शासन अक्षम राजा पैठाये जाते हैं जो इन्द्रियोंके गुलाम बनकर दिनरात विषयासक्त रहते है और प्रजाके कठिन यमाईक धनको अधिकाश रूपसे प्रजाहितमान लगाकर अपनी नीच वासनामोंकी वप्तिमें लगाते हैं। फ्रान्समें पाच सौ वर्पतक निरन्तर से राजा राज्यासीन किये गये, जिनकी उम्र राज्याभिषेकके समय पचीस- उधजनसत्तात्मक राज्य ८७ धनवान या राजवशके लोग अपने स्वार्थ और हितको सामने रखकर शासन करने लगे। इसीसे इसका महत्व घट गया और आधुनिक ससारमें राज्यको पद्धति सर्वोचर और आदर्श नहीं समझी जाती है। उच्च या अल्पजनसत्तात्मक राज्य के तत्वत जो मूल आदर्श हैं, उनपर भी प्रकाश डालना आवश्यक है। यह शासन-प्रणाली गुण को महत्व देती है, संप्याको नहीं अर्थात् थोडेसे गुणी मनुष्योंके शासनको यह जितना अभीष्ट समझती है, उतना जनताके महाविशाल समूहके शासनको नहीं समझती । यह मुडके शासन ( Mob-rule) को नापसन्द करती है। इसका सिद्धान्त है कि फुछ मनुष्य अन्य मनुष्योंकी अपेक्षा शासन करने में अधिक क्षम यह अनुभव और राजनीतिक प्रतिभाका अधिक आदर करती है। प्राचीन शासनप्रणालीको स्थिर रखना चाहती है। यह परम्परागत सत्ता में साकस्मिक क्रान्ति फरनेकी विरोधी रहती है। पुराने रीतिरिवाजों और इतिहासपर हडताल फेरना यह पसन्द नहीं करती। उन सस्यामोंको जो दीर्घ समयसे आदर- णीय गिनी जा रही है, एकाएक नाश करना नहीं चाहती। यह राजतन्त्र ( Monarchy ) और प्रजातन्त्र ( Democracy) के वीचकी प्रणाली है, जो दोनोंको सीमोल्लधन करनेसे रोकती है। यह दोनोंको उचित सयममें रखना चाहती है। माटेकके कथनानुसार यह एक नर्म राज्यपद्धति है, जो सद्गुणपर निर्भर करती है। इसमें पुश्तैनी जो शक्ति है, वह राजनीति विज्ञान 1 राजा निकल आते हैं, पर वे केवल अपवाद रूप रहते हैं। उनसे इस पद्धतिका किसी प्रकार समर्थन नही किया जा सकता। ४ उच्च जनसत्तात्मक राज्य जिस शासनप्रणाली में थोडेसे लोगोंके हाथ में या किसी विशिष्ट उम्च वर्गके हाथमें उच्च राज्यसत्ता रहती है, उसे अन्न जीमें एरिस्टोक्रेसी "Aristocracy" कहते हैं। हिन्दीमें इसे उच्च या अल्पजनसत्तात्मक राज्य कह सकते हैं। यह कई प्रकारका होता है। एक तो वह जिसमें राज्यसत्ता कुछ उच्च वशके लोगोंके हाथमें हो, दूसरे वह जिसमें कुछ धनवान लोगोंके हाथमें राज्यसत्ता हो, तीसरे वह जिसमें पण्डितों और विद्वानोंके हाथमे हो। मतलब यह कि इस अल्पजनसत्तात्मक शासन-प्रणाली में जनताके थोडेसे लोग हो राज्यसूत्र चलाते हैं। राजनीतिशास्त्रके कितने ही पण्डितोंका कहना है कि अगर इस शासनप्रणालीमें वे ही लोग राज्यचक्र चलावें, जो योग्यता और सद्गुणों में सर्वोत्तम श्रेणीके हों, तो इस शासन-प्रणालीका समर्थन बडो अच्छी तरह किया जा सकता है। प्राचीन ग्रीक लोगोकी यही भावना थी कि राज्यसूत्र उन्हीं लोगों के हाथमें रहे, जो नैतिक और बौद्धिक दृष्टिसे सर्वोपरिश्रेणीके हों। उन्होंने अल्पजनसत्तात्मक राज्यका दूसरा नाम "सर्वोत्तम मनुष्योंका शासन" रखा है । पहले पहल इस शासन-प्रणालीका बडा आदर था। पर पीछे जाफर इसका रूप विकृत हो गया। "सर्वोत्तम मनुप्योंका यह शासन" धनकुबेरोंके शासन में परिणत हो गया। ।

उध या अल्पजनसत्तात्मक राज्यपद्धतिके दोष
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रम्मत है कि किसी खास और विशिष्ट फुटुम्यपर राजनीतिक
ग्यताका सिका लगा देनेसे काम नहीं चलता। क्योंकि जैसा
म पहले काह चुके हैं बुद्धिमान् यापका लडका नालायक निकल
पाता है और नालायक यापका लडका घुद्धिमान निकल जाता
। इस प्रकारके अफारण भेद (Spontaneous variation)
हुत होते है। अतएव क्सिी राजनीतिधुरन्धर पिता था
ष्टुम्यकी भावी सताने भी उमी योग्यताकी होगी, इस
पातका कोई निश्चय नहीं कर सकता। इतना होनेपर भी कुछ
म्भीर और नामी लेखकोंने खुल्लमखुला नहीं परन्तु पुश्तैनी
सच्चपर अल्पजनसत्तात्मक राज्य के सङ्गठनको समर्थन करने
ग्यता किया है। सर हेनरी मेनका कथन है कि "पुश्तैनी
राज्यकार्य करनेवाले लोगोंमें राज्यकार्यके योग्य उतनेही
मनुष्य सम्भवत मिल सकते हैं, जितने सर्वसाधारणके चुनाव
( Popular election ) से मिल सकते हैं।
प्रोफेसर सिली महोदयका कथन है-"यह मनुष्य जो
राजनीतिज्ञा पुत्र है, कुछ न कुछ राज्यके मामलोंने परि-
चय रखता ही है, क्योंकि वह दिन रात राजनीतिक वायुमण्डलमें
रहता है।" इग्लैण्डके सुप्रख्यात् इतिहास लेखक लेफी महोदयने
राजपूताने में समद्दो एक कीम, इस कीमझे कुछ लोगों ने राजनीतिक
घोग्यताका परिचय भी दिया गा, रसमे छनको कोमडी मुत्सद्दी नामसे मगर
हो गया। यह कीमपपने पापको रामधुरन्धर मानती हैं। ऐसे भारतका पन्य प्रान्ती
पौर युरोपमै भी उदाहरण मिलते हैं।
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राजनीति विज्ञान प्रजातन्त्रमें नहीं है। यह अपने अधिकार और शक्तिका नादानीसे उपयोग नहीं करतो। यह बहुत संभल संभलकर आगे पैर रखती है। अगर इसमें प्रतिभाशाली और योग्य मनुष्यों का चुनाव होता रहे तो इसके खिलाफ कुछ भी नहीं कहा जा सकता। अगर लोकसमूहकी दष्टिसे विचार न कर केवल सरकारके गुणों की दूष्टिसे विचार किया जावे तो यह कहना पड़ेगा कि अशि क्षित गौर अज्ञानी लोकसमूहके शासनसे इसमें अधिक शक्ति और योग्यताफे तत्व हैं। जान स्टुअर्ट मिलका भी कथन है कि जो सरफारें अपनी तुली हुई मानसिक योग्यता और शक्ति (Vigor) के लिये सुप्रसिद्ध हुई हैं उनमें ज्यादातर अपजनसत्तात्मक सरकार ही है। हा यह यात अवश्य है कि इस प्रणाली में वे ही लोग होने चाहिये जिन्होंने सार्वजनिक कार्य और सार्वजनिक जीवनहीको अपने जीधनका लक्ष्य यना रणा हो । उच्च या अल्पजनसत्तात्मक राज्यपद्धतिके दोष इसमें कोई सन्देह नहीं कि दीखने में यह राज्यपद्धति वडीही अच्छी मालूम होती है । पर इसमें कुछ व्यावहारिक अडचनें ऐसी है कि जिनका इल होना वडा कठिन है। पहली बात यह है कि किस तत्वके आधारपर ऐसाचुनाच किया जावे जिसमें राज नोतिक इष्टिसे सर्वोत्तम मनुष्योंका ही चुनाव किया जा सके। दूसरी यात यह है कि इस वातका जिम्मा कैसे किया जावे कि ये लोग शासनमें अपने अधिकारों का अपने लाभ और स्वार्थकी पूर्ति के लिये उपयोग न कर सके । यह यात तो अय प्राय सर्व-

।
उच्च या अस्पजनसत्तात्मक राज्यपद्धतिके दोप
तान पैदा हो। क्या कई ऐसे उदाहरण नहीं मिलते कि यडे
री राजनीतिज्ञोंके ऐसे भी पुत्र हैं जिनमें मुत्महीपनका गुण
मूली आदमी घरावर भी नहीं है। इसके अलावा इसमें जो
(टिया हैं उन्हें हम अपर दिखला चुके हैं।
इसी प्रकार धन,जमीन,जायदाद या व्यक्तित्व भी राजनीतिक
ग्यताके खास चिह्न नहीं है। जो लोग इन यातीसे राजनीतिक
ग्यताको परीक्षा करते हैं वे गहरी भूल करते हैं। इन बातोंका
राजनीतिक योग्यतासे फोई आवश्यक सम्बन्ध नहीं। जेफरसन
मक सुप्रसिद्ध राजनीतिज्ञका कथन है कि वह अल्पजनस
वात्मक शासन (Aristocracy) जिसका पाया धन और जन्म
पर है केवल शरारतसे भरी हुई ही नहीं है पर साथही भयङ्कर
मी है । हां यह उच्चजनसत्तात्मक शासन-प्रणालीको, जो
सद्गुण
और योग्यतापर निर्भर करती है, सर्वोत्तम समझता है।
सुप्रसिद्ध तत्वज्ञानी रूसो निर्वाचित उच्चजनसत्तात्मक शासन
प्रणाली सर्वोत्तम है, जहा सबसे अधिक युद्धिमान मनुष्य अपने
सार्थके लिये नहीं वरन् जनताके हितके लिये शासन करते
हैं। इस प्रकारको शासन प्रणाली जिसमें जनता द्वारा चुने
हुए सबसे अधिक धुद्धिमान् और योग्य मनुष्य शासन
करते हैं, आधुनिक पाई लेखकोंके मतानुसार भी उत्तम
शासन प्रणाली है। पर जब जनता द्वारा चुने हुए सर्वोत्तम
मनुष्य शासन करें तो वहाँ प्रजासत्तात्मक राज्य हो
जाता है।
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६० राजनीति विज्ञान নিম্ন ar 3 चेन्जमिन फलीनके इस कथनका खण्डन किया है कि कानून पण्डितोंके कानन पण्डितही या शासफोंके शासकही पुत्र होते हैं। यह बात उतनी ही भहो है जितनी कि यह बात है कि महान भी महान गणितज्ञ होता है। यह बात निर्मूत, है कि प्रतिभाशाली पिताको प्रतिभा सर्वदा और सर्वत्र पुत्र में उतनी ही चाहिये। लेकी महोदय कहते है-यदि हम पाच सौ ऐसे कुटुम्बौंको लें जिनका पुश्तैनी धन्धा राज्यकार्य है, और जिनकी रवाभाविक भावनायें भी राजनीतिक है तो क्या हमें इन कुटुम्मोंमें अधिक राजनीतिज्ञ और शासनपूर्ण नहीं मिलेंगे । इसी सरमाके अन्य कुटुम्योंसे स्वभावतया ही उपरोक्त फुटुम्योंमें अधिक राजनीतिज्ञ मिलेंगे। सफल राजनीतिक जीवन के लिये तत्त्वज्ञान, और कविताकी तरह असाधारण वुद्धि और प्रतिभाकी उतनी आवश्यकता नहीं है। इसके लिये केवल निर्णयशक्ति, उद्योग, चतुराई और मनुष्य स्वभावके ज्ञानकी आवश्यकता है । ये गुण असाधारण घौद्विक शक्ति के बिना भी पूर्णतापर पहुच सकते हैं। यद्यपि लेफी महोदयके इस कथनमें सत्यका अश है पर साथ ही उनके इस कथनमें कई त्रुटिया भी हैं। यहा यह सवाल नहीं है कि कौन कौनसे फुटुम्योंमें शासन करने लायक अधिक मनुष्य मिल सकते हैं। सम्भव है कि जिन खानदानोंका परम्पराले हा धन्धा राज्यकार्य है उनमें अधिक राज्यकार्य धुरन्धर निकल जावे। पर सवाल इस बातका है कि क्या कोई ऐसा निश्चित नियम है कि राज्यकार्य्य धुरन्धरके घर राज्यकार्य धुरन्धरही ।

प्रजासत्तात्मक शासन आजकलका समय जनसत्तात्मक शासनका है। माजकल यही शासनप्रणाली सर्वश्रेष्ठ समझी जाती है। क्योंकि इस शासन- प्रणाली में सर्वसाधारण जनताको इच्छाए, भावनाएं और भाव श्यकताए जितनी अच्छी तरहसे व्यक्त हो सकती हैं तथा जितनी अच्छी तरहसे उनकी पूर्ति हो सकती है, उतनी अन्य किसी सिनप्रणालोमें नहीं हो सकती। जिन लोगोंके लिये शासन कया जाता है, उनकी इसमें पूरी आवाज रहती है। इसमें लोगोंक द्वारा चुने हुए प्रतिनिधि शासन करते हैं। अतएव ये अपने कार्यों के लिये उन लोगोंके सामने जिम्मेदार रहते हैं जिन्होंने उन्हें चुना है। या दूसरे शब्दों में यों कह लीजिये कि प्रजा- प्रतिनिधि अपने कार्यों के लिये प्रजाफे सामने जिम्मेदार रहते हैं। इसफा यह परिणाम होता है कि इन प्रतिनिधियों के लिये शासनमें अपने स्वार्थी या हितसरी पूर्ति करनेके यहुत ही कम अवसर रह जाते हैं। क्योंकि उन्हें प्रतिक्षण इस बातका ख्याल रहता है कि हमें अपने कार्यो के लिये प्रजाको जवाय देना है। सुप्रसिद्ध राजनीतिक दार्शनिक (Political philosopher) जान स्टुअर्ट मिटका कथन है--"सब लोग या लोगोंका अधिकाश भाग अपने चुने हुए प्रतिनिधियोंके द्वारा जिस राज्यमें शासन फरता है, उसे प्रजासत्चात्मक राज्य कहते हैं। मादर्शकी दष्टिसे राज्यका घही सर्वोत्तम रूप है जिसमें अन्तिम अधिकार जनता. के हाथमें रहता है, जिसमें हर एक मनुष्यको भाषाज उठानेका हक रहता है। फेघल उसी सरकारसे समाजको आवश्यकताए

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अमेरिकन लेखपाका कथन है कि मयकी सय जनता राज्यकार
राजनीति विज्ञान
प्रजासत्तात्मक शासन
लोकसत्तात्मक शासन राज्यके उस सङ्गठनको कहते हैं,
जिसमें जनता या जनताका अधिकांश हिस्सा प्रत्यक्ष या
अप्रत्यक्ष रूपसे राज्यशासनमें भाग लेता हो। आजकलका
प्रजासत्तात्मक राज्य इस तस्वपर निर्भर करता है कि हर एक
प्रामाणिक तथा अपना हिताहित समझनेवाले व्यक्तिको राज्य
सार्यमें प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपसे भाग लेनेका अधिकार है।
जेफरसन नामक विख्यात राजनीतिक लेखनका कथन है कि
आजकलके लोकसत्तात्मक राज्यों का सय दारोमदार मधि
फाश जनताकी योग्यता तथा मध्यम श्रेणोके मनुष्य या
मनुप्योंकी योग्यतापर है, क्योंकि ये ही लोग शासकोंको चुनने
हैं। कितने ही लेखकोंका कथन है कि किसी राज्यकी नींव
जनसत्तापर कितनी ही गहरी क्यों न पडी हो पर राज्यकार्य
करनेफा भार तो नियमित सख्याके लोगों ही पर डालना पड़ता
है अर्थात् व्यावहारिक दृष्टिसे वह प्रजासत्तात्मक होते हुए
सस्वत उच्चजन या अल्पजनसत्तात्मक ही रहता है। एक
भी
इसी प्रकार नहीं कर सकती जिस प्रकार एक गाडीमें बैठे हुए
सबके सब लोग घोडौंको नहीं हांक सकते, पर तोभी कोई घोड़े
को हाकेगा ही। इसी प्रकार शासनकार्य भी नियमित लोगोंतक
ही परिमित रहता है।
*पागल, शुष्ट, नागानिक पत्रे पादि कुछ लोगों का हिस्सा इसमें नहीं रहता है।

प्रजासत्तात्मक शासन आजकलका समय जनसत्तात्मक शासनका है। आजकल ही शासनप्रणाली सर्वश्रेष्ठ समझी जाती है। पयोंकि इस शासन- णाली में सर्वसाधारण जनताको इच्छाएं, मायनाए और आध- ययताप जितनी यच्छी तरहसे व्यक्त हो सकती है तथा जितनी मच्छी तरहसे उनकी पूर्ति हो सकती है, उतनी अन्य किसी गासनप्रणाली में नहीं हो सकती। जिन लोगोंके लिये शासन कया जाता है, उनको इसमें पूरी मायाज रहती है। इसमें लोगों द्वारा चुने एए प्रतिनिधि शासन करते हैं। अतएव घे अपने कार्यों के लिये उन लोगों के सामने जिम्मेदार रहते हैं जिन्होंने उन्हें चुना है। या दूसरे शब्दोंमें यों कह लीजिये कि प्रजा- प्रतिनिधि अपने कार्यों के लिये प्रजाके सामने जिम्मेदार रहते हैं। इसफा यह परिणाम होता है कि इन प्रतिनिधियों के लिये शासनमें अपने स्वार्थों या हितकी पूर्ति करनेके यहुत ही कम अवसर रह जाते हैं। क्योंकि उन्हें प्रतिक्षण इस बातका ख्याल रहता है कि हमें अपने कार्यों के लिये प्रजाको जवाब देना है। सुप्रसिद्ध राजनीतिक दार्शनिक (Political philosopher) जान स्टुअर्ट मिटका कथन है.-"सय लोग या लोगोंका अधिकाश भाग अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा जिस राज्यमें शासन फरता है, उसे प्रजासत्तात्मक राज्य कहते हैं । मादर्शको दष्टिसे राज्यका यही सर्वोत्तम रूप है जिसमें अन्तिम अधिकार जनता. के हाथ में रहता है, जिसमें हर एक मनुष्यको भाषाज उठानेका हक रहता है। पेघल उसी सरकारसे समाजको आवश्यकताए 'राजनीति विज्ञान . पूरी हो सकती है, जिसमें या तो सव लोग भाग लें या इतने लोग भाग लें जो समाजके सामान्य हितकी दृष्टिसे आवश्यक हैं।" यह तो हुई प्रजासत्ताकी साधारण व्याख्याएं', अय यह देखना है कि प्रजासत्तात्मकमें वे कौनसे विशेष गुण हैं, जिनकी बदौलत वह आज ससारमें प्राय सर्वमान्य हो रहा है । अमेरिका के सुप्रसिद्ध राजनीतिक मिगार्नरका कथन है-"प्रजासत्तात्मक राज्यमें सर्वोत्तम गुण और विशेषता यह है कि वह जनताको उठाता है, उनमें रही हुई शक्तियोंका आविष्करण और विकास करता है, राज्यकार्यों के लिये उसका उत्साह बढाता है और शासनमें उसे योग्य स्थान देकर उसकी स्वदेश भक्तिको दढ करता है। प्रजातन्त्र इस यातसे साफ इन्कार करता है कि कुछ मनुष्योंने तो शासन करनेके ही लिये जन्म लिया है और कुछ लोगोंने केवल उनकी आज्ञा पालनेहीके लिये जन्म धारण किया है। प्रजातन्त्र इस यातको नहीं मानता कि कुछ आदमी जन्महीसे घडे होते हैं। वह सवको राजनैतिक दृष्टिसे समान पायेपर रखना चाहता है। लेव्हेले ( Laveleye) महाशयका कथन है-"राजनीतिक गृष्टिसे कोई आदमी स्वतन्त्र नही है। जिस शासनमें, जिस सर फारमें जनताका हिस्सा नहीं रहता उसके लिये स्वार्थत्याग करने के लिये स्वभावतया ही वह तैयार नहीं होती। प्रजातन्त्रसे जनतामें रही हुई स्वदेशमक्ति विकसित होती है, क्योंकि इसमें हर एक नागरिक यह जानता है कि सरकार हमारी है और सरकाई फाम करनेवाले अधिकारी हमारे ही नौकर है । इसके अतिरित - प्रजासत्तात्मक शासन प्रजातन्त्रको स्थापना समानता और लोकमतकी नीवपर होने के कारण वे क्रान्तियोंके मयसे भी मुक्त रहते हैं ! डी टाविल (De roequeville ) महोदयका कथन है "आजतय ससारमें जितनी शान्तियो हुई है और जिन्होंने ससारकै रूपको बदल दिया है वे असमानताके नाश करनेहीमे लिये हुई है। यही महाशय अपने एक अन्य प्रत्यमें लिखते हैं कि प्रजातन्त्र नागरिकताफी शिक्षा देनेघाली शाला है । जान स्टुअर्ट मिल महोदयने भो प्रजातन्त्रकी प्रशसा करते हुए यह स्वीकार किया है कि प्रजातन्त्र जनताके चरित्र और यौद्धिक शक्तिको विकसित करने में बडी ही सहायता বন্ধু তারা স্পীৰ ৰিী বন যা ক্ষার্থী না দুর্নীৰ प्रकट होती है कि उसमें प्रजाकी मानसिक, नैतिक, आर्थिक और बौद्धिक शक्तियोंको पहातक उत्तेजना मिलती है। इन शक्तिपीर बढ़ाने में सरकारका जो रूप सबसे अधिक अनुकूल होता है, वह उसका सबसे अच्छा रूप है। प्रजासत्तात्मक शासनके दोष। अरतक हमने लोकसत्तात्मक राज्य या प्रजातन्त्रक गुणोंका ही विवेचन किया है, पर प्रत्येक पार्थ में जहा गुण होते हैं, वहा कुछ न कुछ दोप भो अरश्य ही होते हैं। निदोष तो केवलमात्र परमात्मा है। भूतकालके कुछ लेखकोंने प्रजातन्त्रकै दोपॉको दिखलानेकी घडी चेष्टा को है। ये लोग क्या कहते है, अब हम उसीका विरेचन करते हैं। इनका कथन है कि प्रजातन्त्र गुणपर निर्भर नहीं करता, वह

राजनीति विहान
संख्यापर निर्भर करता है अर्थात् यह गुणशाली मनुष्योंका
शासन नहीं है बल्कि जनसमुदायका शासन है। वह इस यातको
उपेक्षा करता है कि जिस प्रकार अन्य कार्यक्षेत्रों में विशेष
योग्यताझी आवश्यकता होती है वैसे ही राज्यकार्य में भी होता
है। वह इस झूठे सिद्धान्तपर काम करता है कि सय मनुष्योंमें
शासन करनेकी क्षमता घगयर है अर्थात् जितनी शासन करने
फी क्षमता एक मनुष्यमें है, उतनी ही दूसरेमें है । वह यह मान
फर चलता है कि सय ही मनुप्य राजनीति-धुरन्धर है। जस्टिम
जेम्स महोदयका कथन है कि
"सुशासनके लिये विशेष ज्ञान
की, विविध प्रकारको मानसिक शक्तिके विकासको और शान्त
और सयमयुक्त निर्णयशक्तिको आवश्यकता है। मझानता और
अयोग्यताको जितनी घरेलू काम काजमें टालनेकी जरूरत
उतनी ही राज्यशासनमें भी टालनेकी जरूरत है। अमानता,
अयोग्यता और सयमहीनताका जैसा पुरा परिणाम घरेलू
कार्यों में होता है, उससे कई गुना अधिक भयकर परिणाम
राज्यकार्यों में होता है। मिल और मास्क महोदयने भी
प्रजातन्त्रकी प्रशसा करते हुए इतना संकेत तो अवश्य किया है
कि प्रजातन्त्र वहीं व्यावहारिक रूपसे सफल हो सकता है, जहा
को सर्वसाधारण जनता बुद्धि, योग्यता और चरित्र में अवे दर्ज
की हो। वर्फ महोदय ने प्रजातन्त्रकी कडी समालोचना करते,
हुए लिखा है कि इस शासनप्रणाली में उत्तरदायित्वहीन लोगोंकि
हाथमें सत्ता चली जाती है। इससे बड़ा नुकसान होता है ।
है

प्रजासत्तात्मक शासनके दोप कुछ लेपकोंने इस शासनप्रणालीको घुराई दिखलाते हुए लिखा हे कि "प्रजातन्त्र कला कौशल, विज्ञान और संस्कृतिके लिये अनुकूल नहीं है। प्रजातन्त्रीय सरकार न तो प्रत्यक्ष रूपसे इन्हें उत्तेजना पहुचाती है और न ऐसी मिति उत्पन्न करती है, जिस- से अप्रत्यक्ष रूपसे इन्हें प्रोत्साहन मिले। सुपख्यात अप्रजो लेपक सर हेनरी मेन और प्रोफेसर डब्ल्यू० ५० एच० लेकीने प्रजातन्त्रको फही समालोचना की है। प्रजातन्त्रको इन सब मनुकूल और प्रतिकूल समालोचनाओं- को ध्य नपूर्वश पढनेले यह निष्कप निशलता है कि प्रजातन्त्र हो सर शासनप्रणालियों में उत्तम है, क्योंकि इसका पाया मानवीय स्वाधीनता और माननीय समानतापर लगा हुआ है। इससे मनुप्यको बुद्धि और कार्यकारी शक्तियों के विकासको माश्चर्य- कारक उत्तेजना मिलती है। उसकी स्वदेशभक्ति दृढ़ होती है। सारे समाज हित के लिये शासन होता है। पर साथ ही हम दूमरे मतको भी पसन्द करते हैं। हमारा विश्वास है कि प्रजा- तन्त्रको सफलताके लिये यह आवश्यक है कि सर्वसाधारण जनताका चरित्र ऊचा हो, उसमें सद्गुगों और सयमका विकास हो। जिस जनतामें योग्यता नहीं, चरित्रयल नहीं, सयम शक्ति नहीं यह प्रजातन्त्रके योग्य नहीं है । जिम्मेदार और सयम. हीन अयोग्य लोगोंके हाथमें शासन होनेसे ताभके बदले नुक सान होता है। हमारे काहनेका निष्कर्ष यह है कि अगर जनता *ब्लन्याले प्रभृति लेखकोंने इस बातका बएडन किया ६८ कि सिवा शान्तिरक्षा, सुव्यवस्था और लोगोंके जानमालकी राजनीति विज्ञान योग्य औरसयमी हो तो प्रजातन्त्र शासनकी ही सर्वश्रेष्ठ विजय दुन्दुभी बजेगी। इसका क्षेन दिनोंदिन अधिकाधिक व्यापक होता जा रहा है। भविष्य में इसका स्या रूप होगा, इसका उत्तर समयकी परिस्थितिपर ही छोडना अच्छा है। ५ व्यक्तिवाद। व्यक्तिवादी अराजकगादियों ( Anarchists) की तरह राज्यको अनावश्यक नहीं समझते। किसी न किसी रूपमें समाजकी वर्तमान दशामे, राज्यको आवश्यक समझते हैं। हां अराजकवादियोंकी तरह व्यक्तिवादियोंका भी यह मत है कि राज्य एक आवश्यक चुराई है। उनका कहना है कि राज्यका कार्यक्षेत्र जहातक सम्भव हो, इतना सकीर्ण कर देना चाहिये हिफाजतके उसके अधिकार में अन्य कोई काम ही न होना राहिये । व्यक्तिवाद याहरी रुकावटको अच्छा नहीं समझता और साथ ही उसका यह भी सिद्धान्त है कि जितना अधिक राज्यका कार्यक्षेत्र विस्तृत होता है, उतनी ही व्यक्तिगत स्वाधीनतामें बाधा पडतो है। व्यक्तिगदका सिद्धान्त है कि मनुष्यमें अहकार, अज्ञानता आदि दोप परम्परागत समावसे रहते हैं और इन्हीं दोषोंके वशीभूत होकर वह अपने निजी स्वार्थ के लिये दूसरे स्वत्वोंपर वार करता है। मनुष्य की इस कुप्रवृत्तिको उचित सोमासे बाहर न होने देने के लिये

व्यक्तिवाद
राज्यको मारश्यकता है। सुप्रसिद्ध फञ्च लेखक ज्यूल्स
साईमनने तो व्यक्तिवादकी सीमाको यात बढाकर यहातक
कह डाला है कि राज्यको ऐसा प्रयत्न करना चाहिये जिनसे
वह अपने आप येकाम हा जाये और वह अपनी मृत्युके लिये
आप तैयारी करे। विख्यात इतिहासकार फोमेन महोदयने भी
लिखा है, "राज्यको आदर्श पद्धति यह है जिसमें बिलकुल शासन
न करना पड़े। सरकारके अस्तित्वका कारण मनुष्यकी
अपूर्णता है।" व्यकिवादियोंका कथन है कि राज्यका अस्तित्व
फैरल इमलिये है कि ससारमें अपराधका अस्तित्व है।
इसलिये उसका कार्य केवल अपराधोंको रोककर शान्ति और
व्यवस्था रपना है। अन्य कार्मों में हाथ डालना उसका कर्तव्य
नहीं। जय राज्य रेल्वे, तार, थियेटर, पुस्तकालय, अजायबघर,
वाग यगोचे, स्कल कालेज आदि कई काम अपने सिरपर ले
लेना है तो समझना चाहिये कि वह केवल व्यक्तिती ही रक्षा
नहीं करता है (जिसके लिये कि उसका अस्तित्व है ) पर बद्द
उन कार्यों में भी अनुचित रूपसे हाथ डालता है जो कि
व्यकियोको करनेके हैं। आजकल शिक्षा, सफाई, टीका,
व्यापार और उद्योग धन्धे? जो अनेक काम राज्य अपने हाथों में
रखता है उने व्यक्तिवादी अच्छा नहीं समझते । साथ ही घे यह
| भी जोरसे प्रतिपादित करते हैं कि राज्यको व्यक्तियों के सामाजिक
। जीरनमें हस्तक्षेप करनेका कोई अधिकार नहीं है। व्यक्ति-
| वाधियोंका' तो साफ साफ कहना है कि ज्यादा शासनमत
-

- १०० राजनीति विज्ञान करो।" घे कहते हैं कि राज्यका कार्य केवल यही है कि वह शान्ति और व्यवस्था रखे, वादोंको पूरा करवारे, अपराधके लिये सजा दे और जब ये काम हो जाये तब समझ लेना चाहिये कि उसके काम हो चुके। इनके सिवा उसे और कोई काम करना नहीं है। व्यक्तिवाद की उत्पत्ति और विकास पाश्चात्य लेखोंके मतानुसार व्यक्तिवादका उत्पत्तिकाल अठारहवीं सदीका उत्तराई है। इस समय यूरोपमें सरकारका मासन चेहद बढा हुआ था। व्यक्तिखातयका नामोनिशान नहीं था। इसीसे प्रतिक्रिया शुरू हुई। उसी समय फिजियोकेटके अनुयायी अर्थशास्त्रविदोंने यह प्रकट किया था कि राज्यके उद्योगधन्धोंके लिये किसी प्रकारको शर्ते डालकर लोगों के आर्थिक व्यापार में किसी प्रकारका हस्तक्षेप नहीं करना चाहिये। उसका कार्य केवल उन प्रकृति के नियमों की रक्षा करना होना चाहिये, जिनके अन्तर्गत देशको पैदाइश बढे। फिजियोटके मतानुयायियोंने राज्यको उच्च सत्तापर भी आक्रमण किया था। उन्होंने उद्योग और व्यापार के लिये, पूर्ण स्वाधीनताके लिये आगज उठायी थी। सुप्रसिद्ध अर्थशास्त्रवेत्ता ण्डम स्मिथने भी अपने चिख्यात अन्य "Wealth of the Nations" में हम मतका वढे जोरले समर्थन करते हुए लिखा था कि राज्यको लोगों के आर्थिक मामलोंमें हाथ डालनेको आवश्यकता नहीं। इसके ।

ध्यक्तिवादको उत्पत्ति और विकास
१०१
.
बाद रिकार्डी, माल्थस नामक अग्रेज अन्धकारोंने, यास्टियेट, डे-
टॉषयूव्हेल (De. Tanqueville), इनायर, लिपानसे, नामक
कन्च लेखकोंने तथा कान्ट ( Kant ), फिच ( Fichte),
विलिहेम हमयोल्ट (Wilhelm Humboltdt) आदि जर्मन
दार्शनिकोंन भी इसी घातका समर्थन किया था। इन महाशयोंके
याद भी लेवोले ( Laboulaye), माईकेल, हर्ट स्पेन्सर, जान
स्टुअर्ट मिल, धुम्म स्मिथ, पई सघर्थ नामके कितने ही ख्यिात
महानुभाव इसका यहे जोरसे समर्थन करते हैं।
सबसे पहले सन् १७६२ में विलिहेम हमयोल्टने एक प्राध
लिखा था जिसमें उसने बडे जोरसे यह प्रतिपादन किया था कि
"सरकारको जहातक बन सके कम शासन करना चाहिये। वही
सरकार सबसे अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है।
सरकारका सयसे पहला कर्त्तव्य यही है कि अपने राज्यके
व्यक्तियोंके व्यक्तित्वका विकास करे।"
लिएड के महान दार्शनिक हर्षर्ट स्पेन्सर महोदयने व्यक्ति-
वादका थढे जोरसे समर्थन किया है। उसका कथा है कि राज्यका
अस्तित्व मनुष्यके परम्परागत अहमाव ( Egoism ) और
यदमिजाजी (Perversity ) का परिणाम है, अतएव राज्य
वास्तवमें राज्यरक्षक होनेसे भी कहीं अधिक भक्षक
है। आगे चलकर वह फिर कहते है, "चाहे यह पात सत्य
हो या न दो कि मनुष्य अधर्मो ढाचेमें दाला गया है, पर यह
बात बिलकुल सत्य है कि राज्यकी उत्पत्ति आक्रमणसे हुई
EM

૧૯૨ राजनीति विज्ञान .यह ख्याल करना गलत है। है। राज्यको स्थापना मनुष्यके दुष्प्रकृतिक कार्यों में उचित रोक रखनेके लिये और एफ मनुष्पको हमरे मनुष्य के अत्याचा रोते बचाने के लिये हुई है, अतएव जव समाज अपनी पूर्ण नैतिक अवस्थापर पहुंच जायगा तब उसे राज्यशासनकी कोई भाव श्यकता ही न रहेगी। स्पेन्सर महोदय कहते हैं, सरफार तत्वत दुराचारी ( Immoral) है। उसका अस्तित्व इसीलिये है न कि अपराधका अस्तित्व है? क्या अपराधके मिटते ही सरकारको न मिट जाना चाहिये? कि सरकारका अस्तित्व हमेशाके लिये घना रहना चाहिये ।" आगे चलकर स्पेन्सरने यह दिखलाया है कि व्यापार और वाणिज्यके लिये सरकारको कानून बनानेका कोई अधिकार नहीं। साथ ही कारन्टाइन, रजिस्ट्रेशन कानून, अनिवार्य शिक्षा आदि काम भी स्पेन्सरके मतानुसार सरकारके नहीं है । ये काम लोगोंको अपने आप करनेके हैं। स्पेन्सर मतानुसार केवल वहीं हस्तक्षेप करनेका अधिकार है, जहां किसीके स्वत्वों का अपहरण होता हो स्पेंसर महोदयको तरह अन्य कितने ही विद्वानोंने व्यक्तिवाद का समर्थन किया है। उनका कहना है कि राज्यको व्यक्तिको स्वतत्रतामें बाधा न देनी चाहिये । उसे इस प्रकार स्वतंत्र देना चाहिये कि वह अपने जीवन या अस्तित्व के उद्देशों को अप- प्रकार समझ सके ।जबतक किसी व्यक्तिको स्वाधीनतासे दूसरी बाधा न मावे तयतक राज्यको न्यायत. यह राज्यको व्यक्तिशादकी उत्पति चौर विकास দীকি মুন কি চাননার যাথা শুখি কম। ফাত,ডি, , ব্রান জুন দিন সমূরি সন কি fৰ বই রে বন্ধু মনিবাহন নিই কি কি ? ( অন একা একা খায় বিচার কান সিই যন্ত্র মা- হয় নি ভনী মাষীনমাম যখৰগৰ মুন গুন যারা লজ; হাজি নয় চীনাম লিনী বন্ধ হী জানা না হই ওষকী অমনি মীনাকী কিয়া रूम और उसको जिम्मेदारी निर्पर होगी तथा उसको शकियों. গ যান সুফি ম বা ৌ ।” প্লান মিন্ট মৗ কি মাষনৗ থানা (£aces of Gose- ৪, ৪ কিৗ মানষিক যভিী গৃষ্টি মানি ব্যথা ফীংমৰ মৰুথবী অনী নিয়াকি কনুষ থাই দাম যা ভৎসি । হাতী বিশ্বথা হল নবম মধায়ী {}\ss৫ঠtates) ফা বিষম ক্ষী , ভবা মা হী গীং গুম তার মা কা। ৪ মাধবী আমন তাজং বিষাদী কণ মনবম ফাযিল মহা । ।কিন ও মা দেবা crথ বা এ বাম বগফী ওয়াং হি ৫ ফী tী মলিক শাখা ২ ৫ কি ২। যায়, সে (cscicc নানান রীffiv रस्नोति विज्ञान है। यह यर यले मेल खाता है । यही एक सिद्धात जोहो या अदिश कलहमें योग्यताको जीत कर- मा रहेका का है कि स्वार्थ ( Self-interest ) को देश सारी तत्त्व है। हर एक मनुष्य जिनती ने सामोको समझता है उतनी अच्छी तरह कोई रहीं समझ सस्ती। व्यकिवाद डके की चोट कहता है कि मनुष्यको करने पैरोंपर खडा रहने देना चाहिये, और सारे वह खास ससे या गिर पड़े। उसे अपना भाग्य स्त सपशेम्पर देन्को आवश्यकता नहीं। किसी व्यतिको लिखा इसे यह परीक्षा हो जायगी कि वह इस जोशमा रहनेके योग्य है या नहीं। अगर यह जीवित रहने कोप होगा तो विजय पाकर अपना रास्ता आप लिकालगा, नही तो उसका अस्तित्व मिट जायगा। इस एकर संहासे घोर और समर्थ अपने साप क्योंकि हा समुदा - 1 - . APER को - पालवादझे - Sarth भास व्यक्तिवादको समालोचना सारी शक्तियों और योग्यताको इनकी तरक्षीमें लगा देता है। इनकी तरफोके नये नये मार्ग उसे सूभाते हैं। इससे पैदाइश भी ज्यादा होती है और व्यक्तिको शक्यिोंको आविष्करणका मार्ग मिलनेसे वे खूब फलती फूलती हैं। अन्तमें व्यक्तिवादी राज्यकी सर्वशताको ( Omnicience) खोकार नहीं करते। यह नहीं मानते कि व्यक्तियोंकी आवश्य- कताओंको जितनी अच्छी तरहसे खुद व्यक्ति समझ सकते हैं, उससे अधिक अच्छी तरह राज्य समझ सकता है। उनके मता- नुसार राज्यमें व्यकियोंसे अधिक आविष्कारक बुद्धि नही है, क्योंकि राज्य भी तो व्यक्तियोंहीसे बना है। व्यक्तिवादकी समालोचना । अभीतक हमने वही बात कही है जो व्यक्तिवादके हिमायती इसके समर्थनमें कहते हैं। अय उन लोगोंकी भी बातें सुन लीजिये, जो इसके विरोधी हैं। वे कई तत्वोंपर इसका विरोध करते हैं कि व्यक्तिवादियोंका यह कहना ठीक नहीं कि राज्य एक युराई है। मनुष्यजातिके अबतको अनुमवमें यह बात नहीं आयी है। इतिहास दिपला रहा है कि सभ्यताके विकासमें अच्छे राज्योने षडी सहायता पहुचायी है । अतएव राज्य, अगर यह अपनापास्तविक कर्तव्य पालता रहे तो निस्सदेह अच्छो यस्तु है। हा, कभी २ किसी राज्यको म्वार्थलोलुपताके कारण सर्व- साधारणकी उन्नतिमें बाधा पहुचती है, पर इससे राज्यसंस्थाको -- राजनीति विज्ञान - । । 1 पुरा कहकर उसका तिरस्कार करना ठीक वैसा ही है, जैसे' रेलवे सडकपर कभी कभी दुर्घटनाओंके हो जानेसे थइ कह देना कि इन्हें बनाना ही बुरा है । स्पेन्सरका यह कहना कि अपराध- का अस्तित्व होनेहीके कारण राज्यका अस्तत्व है और नैतिक इटिसे परिपूर्ण मानवसमुदायके लिये राज्यकी आवश्यकता नहीं, ठीक नहीं । राज्यके उद्देश केवल अपराधों की रोक ही नहीं है, उसके उद्देश इनसे कई दर्जे ऊ'चे हैं। जवतक मनुष्य समुदायमें रहता है, तबतक उसके सामुदा- यिक अभाव (Collective wants ) भीकिसी न किसी रूपमें रहते हैं। इनकी पूर्ति राज्यसङ्गठनके ही द्वारा हो सकती है। अतएव यह कहना कि कभी ऐसा समय आयगा कि राज्यको आवश्यकता हो नहीं रहेगी, ठीक नहीं। व्यक्तिवादके विरोको कहते हैं कि भाजकल जो चिह्न दिखलायो दे रहे है उनसे यह प्रकट होता है कि जेसे २ आधुनिक सभ्यताकी जटिलता (Comlerity) बढती जायगी, वैसे २ और भी अधिकाधिक राज्यकी मावश्यकता बढ़ती जायगी। उद्योग धन्धोंके बढ जाने से, शहरों- में अधिक धनी वस्ती हो जानेसे, सामुदायिक सम्पत्ति के घढ जानेसे तथा आर्थिक और सामाजिक स्थितिमें परिवर्तन होनेसे जो स्थिति उत्पन्न हो रही है वह व्यक्तिरादके अनुकूल नहीं । इससे इन वर्षों में इसके विरुद्ध एक प्रबल प्रतिक्रिया ( Reaction ) शुरू हो रही है। सुप्रसिद्ध दार्शनिक हक्सले महोदयका कथन है कि-"सभ्यताको स्थिति जितनी ही बी । व्यक्तिवादको समालोचना २०७ पहुची हुई होगी उतनी ही अधिक समाजके व्यक्तियों की एक दूसरेपर निर्भरता रहेगी। एक व्यक्ति के कार्यों का प्रनाथ किसी न किसी अश और रूपमें दूसरेपर पढे विना न रहेगा। ऐसी दशामें यह असम्भव हो जाता है कि कोई व्यक्ति किसीकी स्वतन्त्रतामें कम ज्यादा बाधा पहुचाये बिना कोई युरा काम नहीं कर सकता। ऐसी हालत में क्या यह बात नहीं कही जा सकती कि व्यक्तिवादियों का कहना अधिकाशमें ठीक नहीं और क्सिी न किसी अश या रूपमें राज्यकी आवश्यकता है।" ले नामक राजनीतिक विद्वानने भी ठीक ऐसे ही विचार प्रक्ट किये हैं। उसका कथन है "जैसे सभ्यताको प्रगति होती जाती है, वैसे २ व्यक्ति एक दूमरेपर या समष्टिरूपसे यों कहिये कि समाजपर अधिकाधिक निर्भर होते जाते हैं। अतएव सभ्यताको प्रगतिके रिमाणन राज्यका कार्यक्षेत भी यढते रहना चाहिये । स्पेन्सर का व्यक्तिवाद आधुनिक समाजको स्थितिमें उपयुक्त नहीं। व्यकिवादियों का यह कहना कि सर्वसाधारणकी भलाईके कामोंमें राज्यका हाथ अच्छा नहीं, इससे यक्तिक स्वतन्त्रता बाधा पहुंचती है, यहुत ही अल्पाशोंमे सत्य है । व्यक्तिवादके उमालोचकोंका मत है कि हर एक मनुष्यफे कार्यों पर पोग्य टोक ( Restrictions ) रखनेसे सय लोगोंके स्वन्त्र यढते और यापक होते हैं, जैसे वृक्षोंमें कलम बांधनेसे थोडेसे फलोंका कसान होता है पर अन्तमें अच्छे और यात फल उत्पन्न होते याने इससे आखिर लाभ हो होता है। इसका यहा पुलासा राजनीति विज्ञान r करना आवश्यक है कि प्रत्येक व्यक्ति कार्यमें उचित रोक रपनेसे सर्वसाधारणको स्वतन्त्रता घटनेके बदले बढती है। मान लीजिये कि सय व्यक्तियोंको पूर्ण स्वतंत्रता दे दी, पूरे तौरसे स्वच्छन्द कर दिये। इसका परिणाम यह होगा कि कितने ही दुष्ट व्यक्ति दूसरोंके स्वत्वोंपर-उनके जानमालपर हमला करेंगे। समाजमें बडी अव्यवस्था हो जायगी और समष्टि- रूपले सब व्यक्तियों की स्वतन्त्रतामें बेहद पाधा पहुचेगी। अत. पब व्यक्ति के कार्यमें बुद्धिमत्तापूर्वक क्तिी न किसी अर्मे ऐसी रोक अवश्य होनी चाहिये, जिससे वह दूसरेको स्वयोपर या जानमालपर अन्यायपूर्वक लामामण न कर सके। व्यक्तिवादियोंकी यह फल्पना भी निर्मल आधार रखती है कि राज्य स्वाधीनताका विरोधी है, राज्य और स्वाधीनता पर- म्पर विरोधसूचक शब्द हैं। राज्यका फाय्यक्षेत्र जैसे जैसे यदना जाता है, वैसे वैसे वैयक्तिक स्वतता कम होती जाती द, अर्थात् दूसरे शब्दों में यों कह लीजिये कि शासनकी अधि फताले वैयक्तिक स्वाधीनताकी कमी होती जाती है । वास्तविक बात तो यह है कि सुसङ्गठित और उदार राज्यके कार्यो व्यक्तियोंकी न चल नैतिक, शारीरिक और बौद्धिक योग्यता ही बढती है, पर साथ ही सपल और स्वार्थी मनुष्योंके द्वारा उनके मार्ग में रखी जानेवाली बाधाये हट जाने से उनकी स्वाधी. नताका मार्ग मी 'खुला होता है और ये उस हमेशाके झगडेस 'बचते है जो उन्हें राज्य न होने की हालतमें उन लोगोंसे करने व्यकिवादकी समालोचना १०६ हते है जो अपने स्वार्थ के लिये दूसरोंपर अकारण ही नाक्रमण करते हैं व्यकिवाद विरोधो व्यकिवादियों के इस कथनका खण्डन करते है कि सरकारी नियम और फानून व्यक्तिके चरित्रयल Character ) को निर्गल फरते है। इनफा (व्यक्तिमादके -बरोधियोका) फहना है कि यह यात ठीक नहीं। चरित्रयल ( Character ) फा विकास फेवल स्वाधीनताहोसे नहीं होता, उसके साय साध उचित संयमको भी आवश्यकता है। व्यक्ति चादके विरोधियों के मतानुसार यह यात मी ठीक नहीं कि सर- कारका कार्यक्षेत्र रहनेप्से घेयक्तिक स्वाधीनता कम होती है मौर मनुप्य निर्यल एव परावलयी बनता है । परिपूर्ण रीतिसे विकास पाया हुया मनुष्य यही है, जो सामाजिक है। समाजसे बिल्कुल अलग रहनेवाला या यों कहिये फि प्राकृतिक मनुष्य सभ्य नहीं कहलाता। आजकल यह बात प्रायः सर्वमान्य है कि व्यक्ति अपने चरित्र विकास के लिये समाजका बहुत कुछ ऋणी है। व्यक्तिवादमें यह एक भारी दोप है कि वह राज्यनियमों ( State regulations ) की घुराइयोंको बहुत पढाकर तथा उसके लाभोंको घटाकर बतलाता है, वह स्वाधीनताकी धास्त विक प्रति और सोमाको समझने में गलती करता है । समाजके साथ व्यक्तिका जो सम्बन्ध है, उसके जाननेमें यह भूल करता वह समाजले अधिक व्यक्तिको महत्व देता है । वह प्राय यह मानकर चलता है कि समाजसे मानों व्यक्तिका सम्बन्ध नहीं

राजनीति विज्ञान
+
.
है, और वह समाजसे जुदा किया जा सकता है। उनकी धानों-
से यह धारणा हुए बिना नहीं रहती कि व्यक्ति के हिताहित
समाजके हिताहितसे भिन्न है। हम भी मानते हैं कि व्यक्ति
केवल समाजका अंग (Iraction) नहीं है । वह समाजका जीवन
है। जिस प्रकार बिना व्यक्तियोंके, समाजका अस्तित्व नहीं,
वैसे ही गिना समाजके मनुष्य मनुष्य नहीं, पर वह एक जगलो
जानवर है।
व्यक्तिवादी सरकारके कई दोषोंको, उनके द्वारा की गयी
भनेक भूलोको दिखलाकर सरकारपर अविश्वास प्रकट करते
हैं। पर यह बात ठीक नहीं। यह समझना गलत है कि
अमुक अमुक सरकारने भूतकालमें अमुक २ भूलें कों या उसके
अधिकारियोंने शक्तिका दुरुपयोग किया, इसलिये सरकारका
अस्तित्व ही ठीक नहीं, भविष्यमें उनपर विश्वास करना
अनुचित है। यह बात कहना तो ठोक वैसे ही है, जैसे
यह कहना कि युनिसिपलिटीके द्वारा बनायो हुई गटरोंसे अगर
कभी मोनोजराको बोमारी फैल जावे तो यह कह देना कि गटर
बनानेको रोति हो खराय है। सरकारोंने भूतकालमें जो भूल
क्री हैं, या वर्तमानमें वे जो भूलें कर रही है, उन्हें व्यक्तिगादी
यहुत बढाकर दिखलाते हैं, वे उन सबोंको इकट्ठोकर उनकी
प्रदर्शनी करनेका प्रयत्न करते हैं। हफ्नले महोदयका कथन
है,-"राज्य काचके बने हुए महलमें रहता है। वह क्या
करता है सो हम सब देखते हैं। उसको सर असफलताये
.
-

। . व्यक्तिपादकी समालोचना - सम्पूर्ण या असम्पूर्ण रूपसे दृष्टिगोबर हो जाती हैं और वे बहुत बढाकर सामने लायी जाती हैं। इसके विपरीत खानगी लोगों- के काम ईट और चूनेको दीवारोंके अन्दर आध्रय पाते हैं । सर्व- साधारण शायद ही जान पाते है कि अमुक अमुक व्यक्ति क्या कर रहे हैं। हा, उनकी ये भूलें अलपत्ता प्रस्ट हो जाती हैं जो घडी गम्भीर होती है।" लाड पेमत्रोकका कहना है कि जिस प्रकार राज्यको भूलें इकट्ठी फर दिपलाई जाती है, से ही व्यकियोंको दिखलायो जावे तो वे अधिक होगी। व्यक्तिगदी कहते हैं कि प्रत्येक व्यक्ति जितनी अच्छी तरह अपना हिताहित समझ सकता है, उतनी अच्छी तरह राज्य नहीं समझ सकता। स्नत व्यक्तिदी अपने हितका सबसे अच्छा निर्णयकर्ता (Judge ) हो सकता है । अगर व्यक्ति खुद अपने आपपर छोड दिया जाये तो वह अपने हितको पूर्ति अच्छी तरह कर सकेगा। यह बात यद्यपि कुछ अशोंमें मत्य है पर सर्वा शमें सत्य नहीं। मिल, सिजविक जैसे व्यक्तिवादियों ने भी यह स्वीकार किया है कि वैज्ञानिक आविष्कारोंकी वृद्धिक कारण जैसे जैसे जीवन सरजाम अधिकाधिक जटिल और दुष्कर होते जाते हैं, वैसे वैसे धमविभागको दुटिसे भी आदमीको अपने जीवनोश के साधन जाननेके अवसर कम होते जाते हैं, वैसे वैसे प्राकृतिक विकास के मार्ग रुकते जाते हैं और शक्तियोंका हास होता जाता है। एक बेल्जियम लेखकका कथन है कि आर प्रत्येक व्यक्ति अपना हिताहित .

राजनीति विज्ञान PI स्वत्व और कर्तव्य भली प्रकार निर्णय कर सके और वही काम करे जो वस्तुन उसे करना चाहिये तो फिर राज्यके इस्तक्षेप- की आवश्यकता ही उठ जायगी और हम पूर्ण स्वाधीनताक राज्यमें रहने लगेंगे । यद्यपि यह बात कई अोंमें ठीक है, पर क्या यह सम्भव हो सकती है ? क्या अज्ञानी लोग उन भूलों और भयका प्रतिकार स्वत कर सकते हैं, जिनसे वे अज्ञान है। अज्ञानताके कारण कहिये या और अन्य किसी कारणसे कहिये, कितने ही लोग अपने हिताहितको अच्छी तरह नहीं समझते, अतएव राज्यको उनके हितों की रक्षा करनी पड़ती है। घच्चेको टीका न लगानेसे उसके जानको जोखिम है, इस वातको कितने ही मातापिता नही जानते या जानते हुए भी वे अपने यच्चेको टीका लगाना पसन्द नहीं करते। ऐसी दशामें उन बच्चों के हित के लिये या यों कहिये कि समाजके हित के लिये सरकारको अनिवार्य टीका लगानेका नियम धनाना पड़ता है। कितने ही मातापिता शिक्षाके महत्वको नहीं समझते, वे अपने बच्चोंको पढाना पसन्द नहीं करते तो क्या ऐसी दशामें यह कहा जा सकता है कि ये लोग अपने हितको अच्छी तरह समझत हैं ? क्या ऐसी दशामें राज्यका यह कर्तव्य नहीं है कि वह उनके उन दितोंको समझकर, जिन्हें वे अज्ञानता तथा अन्य किती कारणसे नहीं समझने हैं, अनिवार्य शिक्षाका नियम जारी कर दे? इसमें क्या बुराई है? इसमें कौनसी स्वाधीनताका नाश होता है ? शराब पीना बुरा है, इससे व्यक्तिको शारी-

1
व्यक्तियादकी समालोचना
रिक और मानसिक शकियोंका हास होता है, इसके भयङ्कर
परिणाम सारे राष्ट्रपर पडते हैं। पर तोभी कितने ही लोग
अज्ञानताफे फारण कहिये या आदतके गुलाम होने के कारण कहिये
नए शराय उडाते है। कितने दो अपना कमाया हुआ धन इसमें
वरवाद कर देते हैं। ऐसी दशामें व्यक्तियों और राष्ट्रफे हितके
लिये राज्य शराय रोकनेका कोई कानून पनावे तो इसमें क्या
बुराई है ? और इसमें यह व्यक्तिको स्वाधीनतामें कौनसी म.
न्याय पूर्ण याधा डालना है ? मतलय यह है कि ऐसी फितनी ही
बातें हैं जिनमें व्यक्ति अपना हिताहित या तो अज्ञानताके कारण
नहीं समझता है या समझता भी है तो अपने ऐहिक सुख
और पिपय लोलुपतामें उसे भुला देता है । ऐसी दशामें राज्य
उसके हिताहितके कायोंमें उचित निगाह रखें तो इसमें क्या
अनुचित है?
साम्यवाद।
मारपवाद उस सिद्धान्तका नाम है जो वर्तमान राजनीतिक
और औद्योगिक वस्तु स्थितिमें आवश्यक परिवर्तन द्वारा आर्थिक
समानताको दूर करना चाहता है । देखते हैं, कि इस संसारमें
एक ओर तो लक्षपति और करोडपति अनुपमेय विलासिताका
नोरन व्यतीत करते हैं, और दूसरी ओर पजारों गरीय धोर
रिश्ता और अन्धकारमें अपने दुखमय जीवनको बिता रहे
। एक ओर तो लोग रवरटायर गाड़ियों में और मोटरों में
ठे आनन्दसे सुबह और शाम हवा खाने जाते हैं और दूसरी

११४ राजनीति विज्ञान मोर करोडौं अमागे पेटज्वालासे जलते हुए जेठको कडी धूपमें मगे सिर और नंगे पैर डोलते फिरते हैं। एक ओर तो कुछ लोग तरह तरहके पकवान उडाते हैं और दूसरी ओर लाखों करोडों लोग भूषके मारे तडप तडपकर प्राण देनेमें बाध्य होते हैं। एक ओर तो कुछ लोग खसकी रट्टियोंके भीतर पडे पढे आराम से खर्राटे लेते हैं और दूसरी ओर बेचारे लाखों करोडों मनुष्यों को वैसाखको जलती हुई लूमें सेतों और खलियानोंमें काम करना पड़ता है। एक ओर तो कुछ धनिक अफसर, या राजा और महाराजा नाच मुजरों, विवाह शादियों, उत्सवों और दाव तोंमें पानोकी तरह रुपया नष्ट करते हैं दूसरी ओर लाखों क्रोडों मनुष्योंको अपनी या अपने बाल बच्चों को शिक्षा, अपनी शक्तियों के विकास और अपनी कार्यक्षमता बढाने के लिये भी साधन प्राप्त नहीं होते। अपनी गरीबी के कारण वे अपनी शारी- रिक, मानसिक और नैतिक उन्नति नहीं कर सकते। धनहीनता उनकी वृद्धिमें रुकावट डालती है। उनकी शकिया अविकसित रह जाती है और वे इस ससारसे अकालहीमें कूच कर जाते हैं। अकाल और महामारिया सदा उनके लिये मुंह वाये पही रहती हैं। उनकी मृत्युसख्या धनिकोंसे निगुनी होती है। उन्हें पापी पेटको ज्वाला शान्त करनेके लिये नाना प्रकारके अपराध और पाप करनेको, आत्माका हनन और दण्ड भोगनेको विवश होना पडता है। दिन रात कठोर परिश्रम करनेपर भी गरीबों 'को नारकीय यन्त्रणाएँ सहनी पडती हैं और अमीर बिना हाथ ।

साम्यवाद पेर हिलाये ही स्वर्गीय सुखों का मोग करते हैं। यह सय कि लिये? इसलिये नहीं कि मनुष्य नहों, उनके हाथ पांव य बुद्धि नहीं, पर केवल इसलिये कि एक धनी है और दूसर निर्धन । साम्यवादी ऐसी दुरवस्या उत्पन्न करनेवाली राजनीतिक मौर औद्योगिक परिस्थितियों, सामाजिक यन्धनों और अपचनाम सुधार करना चाहते हैं। प्रोफेसर एली महोदयका कथन है कि साम्यगदो वे हैं जो समाजका इस तरह संगठन करना चाहते है जिसमें वर्तमान आर्थिक असमानता दूर हो जाये और मनुष्य- समाजका सामुदायिक रूपले आर्थिक विकास हो। साराश यह है कि साम्यवादी वे हैं जो उस समाज-सङ्गठनको और राज्यप्रणालीको चाहते है जिसमें कि उद्योग धन्योंका स्वामित्व व्यक्ति या व्यक्तियों के हाथमें न रहकर सारी जनता या जनतासं बनी हुई सरकारके हाथमें रहे । जहा पकिवादो राज्य के कार्यक्षेत्रको केवल शान्तिरक्षातक हो परिमित रखना चाहते हैं, वहा साम्यवादी राज्य के कार्य क्षेत्रको हर यातमें विस्तृन करना चाहते हैं। उनका मत है कि राज्यका कार्य केवल शान्तिरक्षा या शासनप्रबन्ध करना हो नहीं दे पर लोगोंको आर्थिक, सामाजिक और बौद्धिक भावश्यक वाओंकी पूर्ति करना भी है। कितने हो साम्यवादियों के मतानु- सार राज्यका यह कर्तव्य है कि यह प्रजाक मनुष्यों को योग्य कार्य मिलनेको ग्यारटी दे, आवश्यकता पडनेपर उन्हें बिना व्या- जके रुपये दे, उनके लिये आरोग्यशालो घर बनाने, उनके लिये राजनीति विज्ञान वसाय करे तथा उनके माराम और सुभीतेके लिये हर प्रकार का प्रपन्ध करे। अमेरिकाके सयुक्तप्रदेश के कई साम्यवादियों ने अपने राष्ट्रीय प्लेटफार्मपर यह कहा था कि सब प्रकारके माल उत्पन्न करनेके यन्त्र, खाने, रेलवे, तार, टेलीफोन, गैसवर्स, नहरे आदि सबपर राष्ट्रीय सरकारका अधिकार रहे। ये सब सर्वसाधारणकी जायदाद समझी जावें। इनके नफे नुकसानमें सर्वसाधारण हिस्सेदार हों। किलो आविष्कारके लाभपर किसी व्यक्ति विशेषका अधिकार न रहकर सर्वसाधारणका रहे। राष्ट्रीय सरकार गरीब लडकों के लिये अन्न, वस्त्र और पुस्तकों का प्रबन्ध करे तथा शिक्षाका मुफ्त और अनिवार्य प्रचार करें। बेरोजगारियो और निठल्लोंके लिये योग्य मजदूरी या कामका प्रयन्ध करे। साम्यवादके पक्षमें जो दलीलें दी जाती हैं उनमें मुख्य ये हैं कि आजकलके आर्थिक संगठनमें मजदूरोंको-गरीबोंको-अपने परिश्रमका योग्य फल नहीं मिलता, इनके परिश्रमका अधिकाश भाग पूजीवाले हडप कर जाते हैं। इन चारोंको बहुत कम मिलता है। पूजीवाले दलाल या कारखानोंपर देखरेख करने वाले मनुष्योंशी जेवें तो खूब भर जाती हैं और दिन रात कडा परिश्रम करनेपर भी घेवारे ये दरिदाके दरिद्री ही यने रहने हैं। मतलय यह है शि साम्यवादियों के मतानुमार आजकलका आर्थिक सगठन धनवान या पूजीवालों के लिये ही लाभकारक है। इसमें अर्थ के बटवारेकी पटी असमानता है। इसमें ऊंचे करोडपति होता है। साम्यवाद ११७ उठनेके जितने अवसर धनवानोंको हैं, उनके शताश भी सम्पत्ति- के असली उत्पादक मजदूरों को नहीं है। इस आधुनिक आर्थिक सङ्गठनमें धनवानोंके पास मजदूरों को लूटनेके अनेक साधन है। जब लालों मजदूरोंके गलेपर हुरी चलती है तय एफ आदमी इन सय स्थितियोंको देखकर साम्यवादी कहते हैं कि संसारके सबसे अधिक मनुष्यों के सबसे अधिक हित और फल्याणके लिये(Greatest good of the greatest number)यह आवश्यक है कि राष्ट्रीय राज्य जमीन और पूजी- पर तथा पैदाइश ( Production ) के साधनोंपर अधिकार कर ले। इससे आज लाखों करोडों जनताका जो लाम मुट्ठी- मर जीवाले खा जाते हैं वह मारो जनताको मिलता रहेगा भौर समाजमें आज जो भयडर विषमता दिखाई देती है वह नहीं रहेगी। आजकल व्यक्तिवादके भावोंके कारण इतनी भयङ्कर प्रति- स्पर्धा चल रही है कि जो लोग औद्योगिक या साम्पत्तिक गष्टि से निल है उनकी कहीं दाद नहीं लगती। उनके लिये सफ- लताके बहुत कम साधन है। वे कितने ही योग्य होनेपर भी धनधानों के मुकाबले में खड़े नहीं हो सकते। इस स्थितिमें गरीय तो अधिक गरीब होते जाते हैं और धनवान अधिकाधिक धनवान होते जाते हैं। अर्थात् दूसरे शब्दों में यों कह लीजिये कि आधुनिक आर्थिक सङ्गठन भरेको अधिक भरता है और बालोको और भी खाली करता है। साम्यवादियोंका कहना

राजनीति विज्ञान
है कि इन्हीं सय खराबियोंसे साम्यवादकी उत्पत्ति हुई है और
न्याय तथा सत्यपर इसकी नींव पड़ी हुई है। उनका कथन
है कि भूमि, खनिजधातु आदिपर सयका एकसा अधिकार होना
चाहिये । ये सब ईश्वर-प्रदत्त है, जो सारी मनुष्य-जातिको दी
गयी है। जिस प्रकार वायु, सूर्यप्रकाश और जलपर सबका
एफसा अधिकार है वैसे ही इनपर भी होना चाहिये।
आधुनिक आर्थिक सङ्गठनमें जिस प्रकारको प्रतिस्पर्धा
चल रही है उसमें निर्यलोंका तो पूरी तरह घात होता है। इस
अनियमित प्रतिस्पर्धासे एक ओर वेतनकी कमी होती जाती है
और दूसरी ओर बेरोजगारियों की संख्या बढती जाती है। इस
स्थितिसे समाजको सामुदायिक रूपसे जो हानि होती है, वह
अवर्णनीय है। अगर यह स्थिति ज्यों की त्यों चलती रही तो।
संसारकी सभ्यताको नाशकारी धक्का पहुँचेगा। संसारको
इस आनेवाली भयकर स्थितिसे रक्षा करनेके लिये साम्यवादी
ससारमें रही हुई भयंकर आर्थिक विषमताको मिटाना ही एक
मात्र गमवाण उपाय समझते हैं। वे कहते हैं कि इसके लिये प्रति
स्पर्धाका अन्त कर उसके स्थानपर सहकारी तत्त्व(Cooperat
ive principle) को स्थान देना चाहिये। इस सहकारी तत्र
से लोगोंको अपनी उन्नति के लिये समान अवसर मिलेंगे। इससे
वैयक्तिक चरित्र और बलका अपूर्व विकास और सधी खाधी,
मताका आविष्करण होगा। आजकलको औद्योगिक प्रतिस्पर्धा
जडवाद ( Maternalism ) और अप्रमाणिकताको जन्म देती
.

साम्पधाद । इससे घेपक्तिक चरित्र ( Individual character ) सोइयत्ता (Standard ) गिरती है। मानवीय समाव निस. त हो निर्मल है, भटनाको भार यह सहजतया प्रवृत हो जाता मोर आधुनिक आर्थिक विषमता उसे और भी अधिक भ्रष्ट करती है । अतएव राज्यका मायक-पो फि वह मनुप्यकी इन यिकर बुराइयों से रक्षा करे और उसे योग्य मार्ग दिपलाये। माम्यवादका सिद्धान्त राज्यके सावयव मिद्धान्तले बहुत उ मेल वाताह। जिस प्रकार मावयव सिद्धान्त या प्रति. पादित करता है कि समाज एक शरीर (Organism) है, जिनमें प्रत्येक गरयघको सारे शरीरके लिये काम करना पडता है, वैसे ही साम्यवादके मतानुपार व्यक्तिको अपने धैयक्तिक लाभको उपेक्षाकर सारे समाजके लिये काम करना चाहिये, अर्थात् साम्यवाद सबसे अधिक मनुष्योंके मबसे अधिक हितको घोषणा करता है। साम्यवादी कहते हैं कि गज्यने कई क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धाका नाशकर उसके स्थान में सरकारी तस्वकी स्थापना कर दी है। सरकार पोस्टका इन्तजाम करती है, सिषके ढालती है और मी कई प्रकारके काम करती है। इसमें उसे सफलता भी हुइ है। इसी प्रकार सरकार सव औद्योगिक काम अपने हायमें लेकर संगठिन क्यों नहीं करती? क्यों नहीं वह ऐसा प्रयन्ध करती जिससे ससारकै उद्योग धन्धोंकी नींव न्याय और सत्यपर पड कर प्रत्येक मनुष्यको अपने परिश्रमका योग्य फल मिले । सामु.

१२०
राजनीति विज्ञान
दायिक स्वामित्व और व्यवस्था पूर्णरूपसे प्रजातन्त्रके सिद्धान्तों
पर निर्भर करती है। दूसरे शब्दों में यों कह लीजिये कि
इसफा पाया नैतिक और परोपकारी तच्चोंपर जमा हुआ है।
इससे समाजमें न्यायतका विकास होकर वैयक्तिक और
सामाजिक अभिवृद्धिको यडी सहायता मिलेगी।
साम्यवादकी समालोचना।
अपतक घेही बातें कही गयी है, जो साम्यवादके पक्षको
है । अय उन यातोंको मो सुन लीजिये जो इसके विरुद्ध कही
जाती है। जो लोग साम्यवाद विरोधी हैं उनका कहना है कि
साम्यवाद मानधी प्रतिके अनुकूल नहीं । वह अव्यवहार्य और
अधिकांशमें असम्भव है। अगर यह भी मान लिया जावे कि
भूमि, कारखाने, उद्योगधन्धे आदिके चैयक्तिक स्वामित्वकी जगह
समाज या राष्ट्रीय राज्यका स्वामित्व स्थापित किया जाना
सम्भव भी हो जाये तोभी इससे लाभके बदले हानि अधिक
है । इससे मानवीय परिश्रम, मानवीय बुद्धि और मानवीय
प्रनिभाषा विकास करनेवाले साधनोंका नाश हो जायगा।
मनुष्य किसी न किसी स्वार्थको लिये हुए कार्य करता है । जैसे
जैसे उसे अपने कार्य में अधिकाधिक सफलता होती जाती है से
वैसे वह अधिकाधिक उत्साहसे काम करता है। इससे उसकी
बुद्धि, प्रतिभा, कार्यकर और प्रवर्तक शक्तिको अपूर्व उशेजना
मिलती है। अगर मनुष्यको अपने किये हुए परिश्रमका,
अपनी
बुद्धि और प्रतिभाके उपयोगका फल न मिलेगा, तो वह पूर्ण

साम्यबादकी समालोचना परिश्रम पयों करने लगेगा? क्यों यह अपनी विधेकशकिफो नष्ट करेगा। मानयीय प्रतिमें यह यात नहीं है कि यह जपरदस्ती दमरों के लिये काम करना पसन्द फरे । इससे मनुष्य- की फार्यकारी शक्तिको धफा पहुचता है, उसकी प्रवर्तक शक्ति ( Incentive power ) का पास होता है। इसरी पात यह है कि ससारमें कमी पूर्ण समानता स्थापित भी हो सकती। यह पात प्रकृतिके नियमके पिलाफ है। दो वृक्षोंके फल समान रूपले श्रेष्ठ नहीं हो सकते। दो पशु या दो मनुष्य पुति, प्रतिभा या योग्यता में समान नहीं हो सकते। विपमता रहती दी है। उग्र साम्यवाद प्रकृतिके नियमके खिलाफ है। निरक्षर और विद्वान, भूत और बुद्धि मान, अल्पमति और प्रतिभावान, भालसी और परिश्रमी मनुष्य- को यरायरी से हो सकती है? अगर इस प्रकारकी यरावरी करनेका प्रयत्न किया जायगा तो बडा अन्याय होगा। इससे मनुष्यको उन शक्तियोंको धका पहुचेगा जो ससारकी सम्या ताका जीरन हैं। दूसरी बात यह है कि जस्तक मनुष्यकी महाति चोपो ही यगी रहेगी, जैसी कि वह इस वक्त है तबतक साम्यवादको पूर्ण सफलता होना कठिन है। इन्हीं सब यातोंका रूपालमर कुछ साम्यवादियोंने अन्य सिद्धान्तवादियोंके साथ समझौता कर ये बातें निश्चित की है १-प्रत्येक मनुष्यको सपनो आवश्यकतानुसार द्रव्य मिलना थोडी यात - चाहिये।

राजनीति विज्ञान
२-प्रत्येक मनुष्यको अपने परिश्रमके अनुसार द्रव्य मिलना
चाहिये।
३–प्रत्येक मनुष्यको अपनी योग्यताके अनुसार द्रव्य मिलना
चाहिये।
इन लोगोंका कहना है कि जप मनुष्यकी आवश्यकता, परि-
श्रम और योग्यता तीनों बातोंका स्यालकर द्रव्यला बटवारा होगा
तथ वे सब कठिनाइयां दूर हो जायगी जो अभी सामने लायो
जा रही हैं। पर इसपर भी यह दलील की जा रही है कि
मनुष्यकी आवश्यकता, परिश्रम और योग्यता किस पैमानेसे
मापी जायगी। इस प्रकारकी कितनी दलीलें की जाती हैं जो
साम्यवादके विरुद्ध कही जाती हैं। साम्यवादके कई भेद है।
उनमेले कुछपर हम अगले अध्यायमें विचार करेंगे।
अराजकवाद।
अराजकवाद शब्द ही अपने उद्देश्यको स्पष्ट कर देना है।
इसका सिद्धान्त है कि समाजपर किसी प्रकारका भीनरी या
याहरी नियन्त्रण न होना चाहिये। यह सिद्धान्त नवीन नहीं,
जबसे मनुष्यके, मनमन्दिरमें स्वाधीनता देवीका आह्वान होने
लगा है, जबसे मानवहृदय स्वाधीनताकी-झकारसे गूजने लगे
हैं, तमीसे इसका अस्तित्व प्रकट हुआ है और इसी कारण ससार•
का कोई भी देश इसकी कल्पनासे चचित नहीं। इस सिद्धा.
न्तके प्रसिद्ध प्रवर्तक प्रोढनका कथन है कि एक व्यक्तिका दूसरे
-

अराजकता व्यकिपर शासन करना घोर अन्याय है। आगे यही फिर कहता है कि "समाजकी धास्तविक उन्नति तभी हो सकती है जय मरा. सकता और सुव्यवस्था परस्पर एफनित हो जाय।" राजकीय दृष्टि से याह मराजकपाद अति प्राचीन है। परन्तु इसके आधुनिक स्वरूपमें राजकीय सिद्धान्तोंके साथ साथ कुछ साम्पत्तिक सिद्धान्तोंका भी समावेश हो गया है। इसके साम्प तिक सिद्धान्तोंके अनुसार समाजकी भावी व्यवस्थामें जमीन एव उद्योग धन्धोंके साधनों का स्वामित्व धयक्तिक न रहकर सामुदायिक रहना चाहिये। इसी कारण अराजकवादको माम्यवादका एक अङ्ग भी कह सकते हैं। प्राचीन साम्यनादियोंने अपने अन्धों में इसका विवेचन किया है माश्य, पर स्वतन्त्ररूपसे इस सिद्धान्तकी घोषणा एव प्रचार करनेवाला याकुनिन नामक एक रूमी नेता था। उसके मिद्धान्त माम्यवादी सिद्धान्तके पुरोगामी स्वरूप कहे जा सकते है। पाकुनिनके विचारों के अन्तर्गत आदिसाध्य और अन्तिम साध्यमें कोई अन्तर नहीं, अत इसके बहुतसे विचार अव्यव- हार्य समझकर छोड दिये गये हैं। मराजफरादपर कुछ कह ने पूर्व उसके सस्थापकके जीवन सम्बन्धी कुछ घटनाओंका उल्लेख करना आवश्यक है, क्योंकि उसके विचारोंके साथ उसके जीवनका विलक्षण साम्य है इसका सारा जीवन सामयिक शासनसे युद्ध करने में ही व्यतीत हुआ। बस जैसी एकतन्त्री और अनियन्त्रित भूमिपर सारी १२४ राजनीति विज्ञान कुछ खास खास आद- शासनसचाके विरोध करनेवाले किसी महापुरुषका जन्म होना कोई माश्चर्यजनक घटना नहीं। यह तो प्रकृतिका नियम हो है कि जहापर जितना ही भयानक रोग होगा, औषधि भी वहा उतनी ही चमत्कारिक होगी। याकुनिनफा जन्म १८१४में इसके एक उच्च कुलके अन्तर्गत हुआ था। शिक्षा समाप्त होनेपर उसने तोपखानेके एक अफ सरकी हैसियतसे सैनिक विभागमें प्रवेश किया था। उन दिनों यह पद याहुत श्रेष्ठ समझा जाता था और मियोंको छोडकर वाफीको मिलना असम्भव था। नियुक्त होते ही यह पोलेंड मेजा गया। उस समय पोलंडकी प्रजापर कसो सरकारफे राक्षसी अत्याचार होते देख उसके हृदयपर गहरी चोट पहुंची और उसने किसी भी तरह ऐसी अत्याचारी सर- कारसे सहयोग रखना उचित न समझकर तुरत अपने पसे इस्तीफा दे दिया। इसके पश्चात् कुछ समयतक वह भिन्न भिन्न विषयोंके अध्ययनमें सलग्न रहा । सन् १८४७ में वह पेरिस गया, जवापर फि प्रोढनसे उसकी मित्रता हो गयी और उसने उसीसे सामाजिक मराजफ पथके सिद्धान्तोंकी दीक्षा ली। सन् १८४८ में जर सारा यूरोप क्रान्तिको भारी लहरसे काप उठा था, वाकुनिनको अपने विचारों के अनुसार कार्य करनेका अच्छा अवसर मिला। वह तन, मनसे उस क्रान्तिमें सम्मिलित हो गया। सेक्सगीके ड्रेस्डेन नामक नगरमें जो उपद्रव हुआ था, उसमें उसका पूरा हाथ था। प्रारम्भमें उपद्रवकारियोंकी विजय

अराजकता
दुई और कुछ समयत घे उसपर स्वतन्त्र प्रजातन्त्र स्थापि
कर शासन करते रहे। पर कुछ ही समय पश्चात् प्रशियन स
कारको सेनाने उस नगरपर चढ़ाई की। यद्यपि वाकुनित
प्रोत्साहित करनेपर परवाइयोंने उस फौजका सामना किया
अन्तमें वे पराजित हुए । पाकुनिन शत्रुके हाथ गिरफ्तार :
और आठ चर्पतक कठिन कारावासमें फष्ट उठाता रहा। स
१८५० में प्रशियन सरकारने उसे फांसीकी सजा दी, लेकि
उसी समय मास्ट्रियाकी सरकारने उसे माग लिया और पा
महीने
पश्चात् वह आस्ट्रियाफे सुपुर्द कर दिया गया। आस्ट्रिय
“सरकारले भी पहले तो उसे फासीका हुपम दिया, पर बाद
उस माशाको पदलकर आजीवन कारावासका दण्ड दिया
आस्ट्रिया के कारावासमें उसे धोर यन्त्रणाए सहनी पडी। उस
दाय पर भारी जलीरोंसे जकड दिये गये थे। गलेमें भी ए
वजनदार जंजीर डाली गयी थी, जिससे वह कई बार खम्भों
बाधा गया। कुछ महीनोंके पश्चात् रुसी सरकारने उसे मा
लिया, जिससे यह शीघ्र ही रूस भेजा गया। वहा भी यह को
'खाली न रहा । यहातक कि बीमारीके मारे उसके सब दांत गि
पहे और पाचनशक्ति बिगड़ गयी। यद्यपि इन सब यन्त्रणाओं
उसका परीर कृश हो गया था, पर मन वैसा ही गभीर, अर
एपरिग्रही बना हुआ था । जेलबानेमें भी उसे हमेशा यह चिन्त
लगी रहती थी कि कहीं मेरे अन्त करणकी यह द्वेष
'लुप्त न हो जाय।
घह मग्नि जो उस शासनसत्ताको भस

१२६ राजनीति वज्ञान । करनेके लिये प्रज्वलित हुई है वुमन जाय । अत्यावारियोंके प्रति कहीं दया उत्पन्न न हो जाय।" पर उसकी यह चिन्ता निर्मूल थी, उसका यह निश्चय एफ क्षणमे लिये भी विचलिता न हुआ। जिस उद्देश्यको लेकर वह जेलमें प्रविष्ट हुआ था, उसीफे साथ वह वहांसे थाहर निकला। जिस समय वाफुनिन जेलखाने में था उसी समय जार निको- लसका स्वर्गवास हो गया और द्वितीय एलेक्जेंडर सिहासना रुढ हुआ । वह कुछ उदार स्वभावका था। उसने कई राजनी- तिक कैदियों को मुक्त कर दिया। यद्यपि उस रिहाईको सूचीमें बाकुनिनका नाम भी था पर जारने उसे अपने हाथसे काट डाला। जब पुत्रशोकसे विह्वल चाकुनिनकी माताने वाकुनिनको मुकिके लिये जारसे प्रार्थना की तब जारने उसके उत्तरमें यही कहा कि याफुनिनको छोडना खतरनाक है, सरकारसे द्वेष कर' नेके कारण वह जेल में ठूमा गया है, पर आश्चर्य है कि अभीतक उसके भावों में लेशमात्र भी परिवर्तन नहीं हुआ। सन् १८५७ में वह साइबेरिया भेज दिया गया। सौभाग्यसे वहाका गवर्नर उसका सम्बन्धी था जिसके कारण वह वहा बड़े आरामसे स्वतन्त्रतापूर्वक अपना समय व्यतीत करने लगा। चार वर्षतक वहा रहने के उपरान्त वह वहासे भाग गया और कई प्रकारके कष्ट सहन करता हुमा अमेरिका होकर १८६१ मे इग्लैण्ड पहचा। तदनन्तर उसने अपना सम्पूर्ण जीवन अपने मतका प्रचार करने में ही व्यतीत किया। पर फिर भी उसे अराजकता १२७ लको दया खानी पड़ी। सन् १८६७ में उसने "प्रजा सत्तात्मक साम्यवादी अन्तराष्ट्रीय समिति" (International alliance DiCocalist Democracy) स्थापित की। योधर्मे कुछ समय- तक यह इटली में मी रहा था। उसने पहापर मेजिनके विरुद्ध मजदूर लोगोंपो भन्तर्राष्ट्रीय पका उपदेश दिया था। यहा उसने एक समिति भी स्थापित की थी। सन् १८६६ में यह मावस के अन्तर्राष्ट्रीय सघमें सम्मिलित हो गया। रमके दूसरे वर्ष च-जर्मन-युद्ध में जय दूसरे नेपोलियनको रादशाहतका मत हो गया तय उसने लियान्समें पेरिसके कम्यून समान प्रजासत्तात्मक राज्यप्रणाली स्थापित करनेका प्रयन किया पर उसमें यह असफल हुमा। अन्तर्राष्ट्रीय सघमें भी उसके उग्र चिवारोंके कारण लोग उसके विरुद्ध थे। पन्तमें सन् १८७२ में यह मताधिश्मसे सके याहर फर दिया गया। यद्यपि पानेके असाप फप्टीफे कारण उसका स्वास्थ्य यात विगड गया था, पर तोमी उस महापुरुषने अपने सकल्यांका प्रचार करने में तनिक भी आलस्य न किया। मरते दमतक वह उसमें प्रयाशील रहा। इस प्रकार अपने जीवनको रोकसेवाको वेदीपर भर्पित कर यह महात्मा क्रान्तिकारियोंकी याध्यभूमि स्विट्जरलैण्डके यन नगरमें स्वर्गगामी हुभा। याकुनिनने "इश्वर और राष्ट्र (God and the State) नामक एक प्राय लिया है। उसकी प्रस्तावनामें उसके दो अभिन्न- हृदय मित्र "कैफिरो" और "लिसी" लिखते हैं.

१२८
राजनीति विज्ञान
"चाकुनिनके शत्रु और मित्र सभी लोग इस बातको भली
प्रकार जानते हैं कि अद्भुत विचारशक्ति, दृढ निश्चय और अपूर्व
कार्यात्साह आदि गुण इस महापुरुषमें कूट कूटकर भरे हुए
थे। सम्पत्ति, प्रतिष्ठा, कीर्ति आदि क्षुद्र लाभोंको, जिनको me
करने के लिये जनसमाज दिनरात व्यग्र रहना है, इसने हमेशा
घृणाकी दृष्टिसे देखा है। इसके ऊचे कुलमें जन्म लेनेपर म
उसने ऐश आराम, स्वार्थ आदि अवगुणोंसे अलग रहकर
समाजको निर्दीप फरनेका पीडा उठाया था।क्षणमरके लिये भी
उसने कभी अपने सुख और स्वार्ययी और दृष्टिपात नहीं किया।
अपने जीवनमें देशत्याग, कारागृहमास आदि अनेक कठि
नाइयोंका सामना करनेपर भी यह अपने उपदेशसे विचलित
न हुआ।
चाकुनिनका सारा जीवन अस्वस्थताहीमें व्यतीत हुआ, इसी
कारण उसे अपने मतका विस्तृतरूपसे विवेचन करनेको समय
ही न मिला । उसका यही एक प्रन्थ (ईश्वर और राष्ट्र,
और
वह भी अधूरा। चाकुनिनने भी एक बार यह
लिखा था कि, "मेरा जीवन ही
अधूरा
याकुनिनके विचार अत्यन्त पुरोगामी और क्रान्तिकारक
थे। हर एक प्रकारको वाह्यमत्ताका वह मट्टर विरोधी था । घर
ईश्वरसे लेकर डोटीने छोटी शक्तियों एवं समस्त आदर्श व्यय
स्थानोंको अस्वीकार करता था।
नियमोंका पालन करने हो पर मनुष्यकी स्वतन्त्रता रक्षित रह
) प्रका
शित हुआ,
वह कहता है फि सहिने
1

छाराजक्ता १२६ किती है। क्योंकि प्रतिके इन नियमों को यह स्वयं ही स्वीकार करता है। मानवीय या ईश्वरीय किसी भी कारणसे और दरी और पराई इच्छासे उन नियमोंको स्योकार करने के लिये दियाध्य नहीं। ये नियम तो अपनी इच्छाले ही बनाये गये हैं, निनके मतमे उपरोक्त नियमों के द्वारा समाजक व्यकिस्वा. यि सम्बन्धी प्रश्न सहज ही हल हो सफने हैं। प्रत्येक व्यक्तिको वृष्टिनिरीक्षण और शायाभ्यासके द्वारा प्रतिके नियमोंकी जान कारी प्राप्त करके संमारमें उसका प्रचार करना चाहिये। समाज- का प्रत्येक व्यकि जय इन निपमोंको जान लेगा तप वह उनका गला करेगा। मनुप्य सृष्टिका एक अग है, अत ये प्रकृतिक नियम उसके जीवन के नियम कहे जा सकते हैं जिनका पालन परना उन स्यमावशा एका धर्म है। इस प्रकार जय प्रकृतिके नियमों का पालन होने लगेगा, तब सब प्रकार के नियत्रण, कानून और राज्यसत्ता गादिको भावश्यफताए नष्ट हो जायगी। समात मिन भिन्न विभागों और उन विभागोंके पदाधि कारियोंका नाम मिटना जरूरी है। इस अधिकारोंसे समाजके एका समुदाययो लोगों को दूसरे समुदायपर अत्याचारपर अनु. चित ताम उठानेका अपनर मिल जाता है और इससे उनकी पुद्धि और मनोवृत्ति दुपित हो जाती है। वायुनिनका कथन है कि ससारसे सप धर्म उठा दिये जाय और मानवीय दृश्यों में पारलौकिक और ईश्वरीय न्यायके स्थाम- पर मानवन्यायकी स्थापना हो। मय प्रकारकी विवाहप्रथा तोड राजनीति विज्ञान . जिससे दी जाय। राजनीतिक और आर्थिक दृष्टिसे बननेवाली' सा जातिया और वर्ग तोड़ दिये जाय। प्रत्येक मनुष्यके चाहे वह स्त्री हो या पुरुष हक वरावर रपे जायं। उत्तराधिकारकी प्रथा नष्ट कर दी जाय। भूमि, श्रमके साधन, तथा सब प्रकारको पूजी- समाजके स्वामित्वमें रखी जाय, और स्वेच्छाप्रेरित मजदूरोंको उसका उपयोग करने दिया जाय। प्रत्येक श्रमजीवीको उसके परिश्रमका बदला मिलना आवश्यक है। भिन्न भिन्न राष्ट्रोम भमजीवियों के अन्तर्राष्ट्रीय सघ स्थापित किये जाय और उनमें पारस्परिक प्रेम बढ़ाकर उद्योग धंधोंकी आवश्यक व्यवस्था की जाय । इस प्रकार लोगोंके हृदयमें स्थित मिथ्या देशाभिमान और परराष्ट्रोंके प्रति द्वेषभाव दूर कर दिया जाय , सारे ससारके श्रमजीवी मिलकर एक होजायं। इन उद्देशोंकी पूर्ति के लिये याकुनिनने जिन उपायोंको योजना की है वे बहुत ही कातिकारक हैं । भविष्यमें उसके उद्दे- शोंकी सिद्धिमें जो राजनीतिक और सामाजिक सस्थाए बाधक हो सकती थीं उन सबको बह नष्ट कर देना चाहता था। उसका कथन है कि इस कार्यमें लगे हुए व्यक्तिको अपने वैयक्तिक हित, कोमल मनोभावना, धर्मविचार, राष्ट्राभिमान, या नीति-कल्पना- के कारण उससे कदापि परावृत्त न होना चाहिये । उसका उद्देश सदा यही होना चाहिये कि समस्त साध्य उपायोंसे प्रस्तुत समाजको बिलकुल नष्ट कर दिया जाय। उस कार्य में यदि दुष्टताका भी उपयोग करना पड़े तो करने में नहीं हिचकमा मराजकता चाहिये। इस विध्यसके पश्चात् जो व्यवस्था होगी, यह लोगोंके कायों और माधोंके अनुमार होगी। परन्तु उसका निर्णय आनेवाली पीढिया स्पर्य हो कर लेंगी। कसमें यातसे लोग याकुनिनके अनुयायी हो गये । यूरोपके दक्षिणी भागमें भी साम्यवाद-सम्बन्धो आन्दोलनपर इसके विचारों का प्रभाव पडा। १८७३ में स्पेनमें तत्कालीन समाज- पद्धतिफे विरुद्ध जो पलये हुए ये घे इसीके कारण हुए थे। उसकी मृत्युके पश्चात् उसके अनुयायो मासमें उसके उद्देशोंका प्रचार करने लगे। इसी समय शासकी पानोंके मजदूरोंने दगा किया, जिससे पुलिसने कई अराजकवादियोंको गिरफ्तार । इन कैदियों में विख्यात प्रिन्स फ्रोपानि भी था। मराजकादके सम्बन्धमें प्रिन्स कोपानिके ग्रन्थ माज तक प्रमाणभूत माने जाते हैं। उसके "अनार्फिस्ट फमुनिजम" भौर "फोल्ड, फैपटरीज एण्ड धकेशाप" नामक ग्रन्थ विशेष इन प्रन्योंमें उसके विचारोंका विस्तृत विवेचन किया प्रसिद्ध हैं किया गया है। मिस क्रोपाट्किनका जन्म रूसके एक बहुत उच्चकुलमें हुआ था। यहातक कि उसके मित्र कहा करते थे कि रूसके सिहा. सनपर जारको अपेक्षा उसके कुलका विशेष अधिकार है। उसका स्वभाव प्रेमपूर्ण और अन्त करण कोमल था। बाल्यकालमें गजदरवारमें रहनेमे यह राज्यपद्धतिसे बहुत परिचित हो गया था और इसी कारण तत्कालीन राज्यपद्धतिसे यह घणा

राजनीति विज्ञान
करतो था। भौतिक एव कपिशास्त्रसे वह भली प्रकार परिचित
थो। कारखानेकी मन्तर्व्यवस्था भी उससे छिपी हुई नहीं थी।
उसका पिता गुहोमोंका मालिक था, इसलिये वह वाल्या
वस्थासे ही ऐसे दृश्य देता करता था जो टाम काकाकी कुटिया
( Uncle Tom's Cabin ) में पढनेको मिलते है
दासोंके साथ जो निर्दयतापूर्ण व्यवहार किये जाते थे उन्हें देख
कर उसके हृदय में दयाका स्रोत उमड माता था। सोलह वर्पर्क
अवस्थासे उसे राजकीय परिसेवकों ( Pages ) की शिक्ष
मिलने लगी। घरके अन्दर रहकर उसने दीनों और अनार्थो
प्रति प्रेम करना सीखा था, अय राजदरवारमें रहकर उसने बह
आदमियोंके प्रति घृणा करना सीखा । उसने अपने मनमें निश्च
कर लिया कि रूसो दमनकारक सरकारसे सेना और शासन
विषयमें किसी तरहके सुधारकी आशा रखना बिलकुल व्य
है। उसके पश्चात् कुछ दिनोंतक वैज्ञानिक विषयका अध्ययन
फरके वह साम्यवादके आन्दोलनमें सम्मिलित हो गया।
हम ऊपर लिप्त आये हैं कि क्रोपानि अच्छा ग्रन्थकार भ
था और उसने कई अन्य भी लिखे है। क्रोपार्किनके अन्यो
जिन बातोंका विवेचन किया गया है वे दो भागोंमें विभक्त के
जा सकती हैं , (१)आर्थिक(२)राजकीय । आर्थिक मतमें दो प्रय
उपस्थित होते हैं। एक सम्पत्तिके उत्पादनका,
दूसरा
व्ययका। इनमें से पहले प्रश्नके सबन्ध प्रायः एक निश्चि
मर्यादातक अराजकवादी और साम्यवादी दोनोंमें मवैश्य है

अराजकता दोनोंका ही यह मत है कि आधुनिक श्रम और मूलधनके बीच रहा हुआ अन्तर नष्ट कर डालना चाहिये। कारखानों और जमीनपर समाजका अधिकार रपपाजाय । श्रमजीषियोंके औद्यो. गिक सघ ही इन कारखानोंको चलायें। मतल्य यह कि मूलधन- वालोंको सत्ता निर्मूल कर दी जाय। यहांतक अराजकवादी और साम्यवादी साथ २ चलते हैं परन्तु सामाजिक स्वामित्वकी यात छिडनेपर कारखानों में काम करने और तैयार हुए मालके वटवारे- के सम्बन्धमें दोनों में मतभेद हो जाता है। साम्यवादी कहते हैं कि वर्तमान में जो रोजाना मजदूरी दी जाती है, उसे यन्द करके, जो लोग काम करें या कमसे कम काम करने को तैयार हों उन्हें मालकी पैदावारमें हिस्सा दिया जाय, और जो काम न करना चाहे उन्हें या तो कामपर लगाया जाय या भूषों मरने दिया जाय । भागे चलकर इनमें दो मत हो जाते हैं। एक मत पाहता है कि हलके और ऊचे मनाडी और फुशल, सयको वरावर हिस्से दिये जाय। दूसरा मत कहता है कि मालका यटवारा कामकी योग्यता अनुसार होना चाहिये । परन्तु इससे इस सिद्धान्तमें बाधा नहीं आतो कि "बिना फर्म किये समाजमें किसीको कुछ भो न मिले। लेदिन अराजकवादी कहते हैं कि यलप्रयोग करके या क्षुधासे पीडित करके काम करनेके लिये मजबूर करना ठीक नहीं। रोजाना मजदूरीकी पद्धति बन्द करके किसीसे बलात् कार्य न कराया जाय। प्रत्येक व्यक्तिको अपने इच्छानुसार जितना समय मिले उतने ही समयतक कार्य करनेको पूर्ण स्वाधीनता रहे। 1 राजनीति विज्ञान समाजके प्रत्येक व्यक्तिको यथावश्यक जीवनोपयोगी समी सामग्रो बिना मूल्य दी जाय । विलाससामग्री इतने परिमाणमें उत्पन्न नहीं हो सकती जो सभीको पर्याप्त हो, तोभी ये पदार्थ मुफ्तमें ही दिये जायं । हा, वितरण करते समय इस यातका अवश्य ध्यान रखा जाय कि हरएक पदार्थ सबको समान भागमें पर्याप्त हो। ऐसा होनेसे वैयक्तिक सम्पत्ति न रहेगी, जिसका न रहना ही अच्छा है। अब यह प्रश्न उठ सकता है कि यदि कोई भी काम करने के लिये मजबूर न किया जायगा और विना परिश्रमके ही प्रत्येक जीवनोपयोगी सामग्री पा सकेगा तो फिर परिश्रम करने के अमटमें पडेगा ही कौन ? और जब कोई परिश्रम ही न करेगा तो फिर आवश्यक वस्तुए तैयार ही कैसे होंगी? दूसरा प्रश्न यह उपस्थित होगा कि सबको इच्छित परिमाणमें कोई भी वस्तु, चाहे वह आवश्यक ही क्यों न हो मिलती रहनेसे वह यर परिमाणमें कैसे उत्पन्न हो सकेगी। दूसर प्रश्नका उत्तर देते हुए झोपाकिन कहता है कि अन्न रस्त्र आदि आवश्यक पदार्थ किसी नियमित परिमाणसे अधिक कभी खर्च नहीं हो सकते। मनुष्यको उपभोगशक्तिने उसके उपभोगको मर्यादित कर दिया है। अतएव यदि ये मुफ्तमें भी मिलेंगे तोमी मनुष्य एक विशेष परिमाणसे अधिक संख्या कमी न लेगा । उदाहरणार्य माजकल नलोंके द्वारा यद्यपि लोगों को पानी मुफ्तमें मिलता है पर तीमी यह कहीं नहीं देखा जाता कि अराजकता लोग दिनरात उन्हें खुले रखते हैं। अपना कार्य होते ही नल यन्द कर दिये जाते हैं। यही सिद्धान्त अन्न और वस्त्रोंपर भी लग सकता है, पर तोभी इसमें कोई सन्देह नहीं कि मुफ्तमें सामग्री मिलनेपर कुछ अधिक व्यय अवश्य होगा। झोपाट्किन और अन्य अराजकवादियों का कथन है कि आज भी अनाज आदि आवश्यक पदार्थ जरूरतसे ज्यादा उत्पन्न होते हैं। फिर क्या कारण है कि इस समय भी लोगोंको ये सामान आवश्यक परिमाणमें प्राप्त नहीं होते। इसका मुख्य कारण यह है कि लोगोंके पास पदाधीको खरीदनेके लिये माव. श्यक द्रव्यको कमी है। द्रव्यकी कमीका यह अपवाद सामग्री मुफ्त में मिलनेपर मिट जायगा और आगे ज्ञानिक रीतिसे खेती करनेपर पैदावार भी बढ जायगी, जिससे रही सही कमी भी इर हो सकती है। मारथसने इस भविष्यवाणीको झूठा सिद्ध कर के दिखाया है। उसके विरोधमें फ्रोपानि अपने सिद्धान्तकी -पुष्टि करते हुए मासके उन वैज्ञानिकों की ओर उङ्गली उठाता है जो इस थातकी प्रतिक्षा करते हैं कि खरायसे खराय जमीन भी योहे परिश्रममें उपजाऊ बनायी जा सकती है और प्रत्येक खेतमें एक ही वर्ष पाच छ फसलें उत्पन्न की जा सकती हैं। जितनी जमीनमें आजकल पाव छ टन घास पैदा होता है उसी ५० से २०० टनतक घास पैदा की जा सकती है, एव एक वर्गमील भूमिमें इतना मनाज पैदा किया जा सकता है जो एक हजार मनुष्यों को पर्याप्त हो। ये बातें केवल जपानी जमा खर्व नहीं, ।

राजनीति विज्ञान बल्कि प्रयोग द्वारा प्रमाणित की हुई बातें हैं। इस समय इङ्ग लेएडमें चैम्पियन नामक एक सजन है जो एक एकड भूमिपर इतनी घास पैदा करते हैं जो तीन पशुओंको पर्याप्त हो । जब कि वहाके अन्य स्थानोंपर एक पशुके लिये दो तीन एकड भूमि दर- कार होती है। अतएव यह बात सिद्ध हो गयी कि वर्तमान और भविष्या घात समयता समाजके सब व्यक्तियोंको सय आवश्यक सामान देते रहनेपर भी भौतिक दृष्टिले पैदावार में कमी न होगी। अब पहले प्रश्नपर विचार करना है कि यदि सब लोगोंक आवश्यक सामग्री मुफ्तमें मिल जायगी तो काम करने के माझ कौन पढेगा। किसीको क्या जरूरत रहेगी कि वह व्यर्थ है परिश्रम करके अपने शरीरको कष्ट दे। झोपानि इसका उत्तर देते हुए कहता है कि मानव प्रकृति मिहनतसे घृणा नहीं करती। यथेष्ट काम करना उसे पसन्द है। आजकल लोग जो कार्य करना नहीं चाहते उसका कारण यह है कि उनके कार्यसे उन्हें सुख नहीं मिलता सुखको कुछ इने गिने श्रीमान् लोग लूटते हैं। इन्हें तो सिक मजदूरीफे गिने हुए पैसे मिलते हैं। परन्तु जब सबके हितका प्रश्न सम्मुख आता है, तरचे जी जानसे परिश्रम करते हैं। हा, यह सच है, कि सीमाये थाहर मनुष्य काम नहीं कर सकता वेद काम करनेसे मनुष्य जी चुराता है। इस बातको सर्भ जानते है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति चार घटे मच्छी तरहसे काम उस कार्य 1

यराजकता
परे, और सब एफमत पोकर उसफी उत्पादकतापर विशेष
ध्यान दें, तो श्रमका अपव्यय बिलकुल बन्द हो जायगा, एवं इस
चार घटेके परिशमसे समाजकेसर लोसमध्यम श्रेणीकी तरह
सुमपूर्वक अपना जीवन व्यतीत फर सोंगे।
जिस प्रकार यति परिश्रमसे मनुष्य धयराता है उसी प्रकार
निकम्मे दोफर पैटना भी यह पसन्द नहीं करता। यहातया कि
भाजपलके यो यो श्रीमान् भी कुछ न कुछ उद्योग करते रहते
है। समयको व्यतीत पारोके लिये एक न एक फार्य पारना
आरश्यक है। कुछ थोडेसे गालसी पिडोंको छोड, शन्य लोगों-
कुछ न कुछ कार्य किये बिना चैन नहीं पड़ता? इसका
अनुभव पेंशनर लोग भली प्रकार करते हैं। यह सच है कि
यधिक परिश्रमसाध्य और कटर कार्य करना कोई पसन्द नहीं
करता। इसके उत्तरमें कुछ शास्त्र याहते हैं कि यत्रोंका प्रचार
होनेसे लोगोंका धम पर कर दोनों पच जायगे और थोडे
श्रमसे माल भी अधिक तैयार होगा। परिश्रमकी मामा फम
धोनेपर सय लोग प्रसन्नतापूर्वक इसलिये कार्य करेंगे कि
निकम्मे पैठना उन्हें विरफुल पसद नहीं और ज्यों ज्यों यत्रोंका
प्रचार घढता जायगा त्यो त्यों ऐसे कार्य भी कम होते जायगे
जिन्हें करते करते लोग उकाता जाते हैं।
इसके अतिरिक्त सामाजिक प्रतिष्ठाके लोभसे भी लोग कार्य
करने में प्रवृत्त होंगे। जो व्यक्ति परोपकार-बुद्धिसे दूसरोंकी
अपेक्षा उत्तम काग करेगा, समाज उसे उतनी ही अधिक इजत

राजनीति विज्ञान - और सम्मान प्रदान करेगा। आन्तरिक भावना और प्रतिष्ठाके लोमले भी कई लोग साहसपूर्ण, चातुर्ययुक्त और अधिक परि श्रमके काम करने में प्रवृत्त होंगे। वर्तमानमें भी कई विद्वान केवल यशके मन्दिरमें पहुचनेके लिये सारा जीवन वैज्ञानिक खोजमें ही लगा देते हैं। वर्तमान कालमें भी जब कि लोगोंकी स्वार्थवृत्ति बढ़ रही है ऐसे महापुरुष पाये जाते हैं तो भविष्यत्में जय कि मनुष्य की वृत्ति स्वार्थकी ओरसे हटकर केवल परोपकार की ओर प्रवृत्त होगी ऐसे महात्मा इससे कई गुनी सल्यामें उत्पन्न होंगे। इस प्रकार उक्त दोनों प्रश्न सहज ही हल हो जाते हैं। पहला यह कि श्रम करने के लिये किलो प्रकारको सख्ती न की जायगी तोभी कुछ अपवादोंके सिधाय सभी लोग परिमित श्रम अवश्य करेंगे। दूसरा यह कि ज्ञानकी सहायता और यात्रिक उन्नतिसे उक्त परिश्रम द्वारा समाजके सब लोगोंको आवश्यक चस्तु यथेष्ट परिमाणमें मुफ्त मिल जाया करेगी। अतपय निश्चित हुआ कि- १---समाजमें किसीसे बलात्कार कार्य न कराया जाय और किये कार्यके बदले में किसीको वेतन, मजदूरी या अन्य किसी प्रकारका बदला न दिया जाय । २-समाजके प्रत्येक व्यक्तिको उदरनिर्वाहार्य आवश्यक वस्तु मुफ्त और काफी परिणाममें दी जाये । सुख भोगके वे पदार्थ जो काफी परिमाणमें उत्पन्न न हो, सबको घरावर बाट दिये जायें। । -

पराजकता
।
अय हम अराजकपथके दूसरे विभाग "राजकीय विभाग"
पर कुछ विस्तृत विवेचन करेंगे
मार्सने प्रतिपादित किया है कि आदर्श समाज व्यवस्था
होनेपर सरकारका आधुनिक स्वरूप नष्ट हो जायगा। उनके
जिम्मे फेवल भिन्न भिन्न औद्योगिक सघकी पारस्परिक व्यवस्था-
फा उपद्रवहीन कार्य रह जायगा। परन्तु उसने सरफारके
जिम्मे जिन जिन कार्यों को देनेका विचार स्थिर किया है उसको
देखते हुए यह नहीं कहा जा सकता है कि सरकारकी सत्ता
किसी प्रकार कम हो जायगी। उलटे उससे तो उसकी सत्ता
बढना ही सम्भव है। मार्सने 'कम्यूनिस्ट मेनिफेस्टो में लिखा
है कि भावागमनके सब साधनोंकी व्यवस्था सरकारके जिम्मे
रहे, और मध्यवर्ती धकके द्वारा यह फ्रेडिट (साख) पूर्तिको
व्यवस्था करे। इससे सरकारको जिम्मेदारी घटेगी या बढ़ेगी
इसे पाठक स्वय सोच सकते हैं।
प्रजासत्तात्मक पद्धत्तिके पृष्टपोषकोका कथन है कि एक तो
श्रमजीवियोंके प्रतिनिधि ही उसकी सत्ताका उपयोग करेंगे,
दूसरे उस समय वर्णभेद बिलकुल नष्ट हो जायगा।

द्वारा पहलेफी चयक्तिकराजपद्धति नष्ट हो चुकी। उसीके कारण
१४०
राजनीति विज्ञान
अनेकके उससे समाजको समान ही कष्ट होगा। अधिकारी
चाहे कैसा ही क्यों न हो अधिकारके शासनपर आसीन होते हो
उसकी द्रष्टि परिवर्तित हो जाती है,उसकी मनोवृत्ति बदल
जाती
है, और उन (अधिकारियों) का समाज ही अलग या जाता है।
वे अन्त करणसे इस बातका अनुभव करने लग जाते हैं कि
प्रजाको अपेक्षा उन्हें हिताहितका धान अधिक है एवं जो कुछ
भी वे कर रहे हैं वही समाजको हितकारक है। मतविरोधको
चे सहन नहीं कर सकने, और जो कोई उनका विरोध करते है
उनका प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूपसे अनिष्ट करनेपर उतारू हो जाते
हैं। निर्वाचकोंका प्रतिनिधियोंपर कुछ भी प्रभाव नहीं पड़ता।
इसका उदाहरण प्राय सभी प्रतिनिधि-सत्तात्मक राज्योंमें पाया
जाता है। अतएव यह अनुमान करना कि श्रीमानोंके हाथकी
सत्ता श्रमजीषियोंके हाथों में जानेपर समाजकी दशा सुधर
जायगी विलकुल व्यर्थ है। वर्तमानमें भी पार्लमेन्टके अन्दर श्रम
जीवियोंके प्रतिनिधि जाते हैं पर वे हमेशा अपने समाजको रुखको
देखफर कार्य नहीं करते हैं कितने मनमाना कार्य कर
हैं। इससे सिद्ध हुआ कि भविष्यत्में भादर्श स्थिति प्राप्त
होनेपर यदि थमजीवियोंके हाथों भी सत्ता रही तो उसका
परिणाम पुरा होगा।
कोपानि लिखता है कि "मापीय इतिहास में प्रातिनि-
धिक पद्धतिको जो कुछ करना था उसे वह कर चुकी। उसीके

अराजकता जनता भय सार्वजनिक प्रश्नोंकी मोर ध्यान देने लगी है, किन्तु इससे यह अनुमान कर लेना भारी भूल होगी कि यही पद्धति आदर्श समाजके अनुकूल होगी। समाजको आर्थिक स्थितिके अनुरूप ही उसकी राजकीय स्थिति होगी और समाजकी आधु निक मार्थिक अवस्थाका मूल वैयक्तिक सम्पत्तिके नष्ट हो जानेपर गाधुनिक राजकीय व्यवस्था परिवर्तन न होना असम्भव है। आधुनिक जीवनक्रमसे इस परिवर्तनको दशाका अनुभव हो सफा है। इस परिवर्तनसे सरकारको सता न यढ सकेगी। वर्तमानमें सरकार जिन जिन कार्यों के करनेमें हाथ डालती है भविष्यत्में वे ही कार्य पारस्परिक अनुमतिसे यने हुए मण्डल और सस्थाओं के द्वारा ही सम्पादित होंगे। अराजक लोग खुले मैदानमें इस यातको प्रतिपादित करते हैं कि समाजमें किसी प्रकारके याद्य शासन और सरकारकी ससा धरनेवाली दिली सस्थाकी आवश्यकता नहीं। इससे यह कल्पना न करना चाहिये कि सरकारके न होनेसे चारों ओर गोलमाल ग्व गडवह हो जायगी। अराजक भी समाजमें सुव्य- वस्थाका रहना अति आवश्यक समझते हैं, पर उनका फधन है कि यह सुव्यवस्था कोई किसीपर बलात्कार न करें। सब यह सोचकर कि उसमें समाजका हित है उस कार्यको अपने हृदयसे करें। ऐसी व्यवस्था करना असम्भव नहीं। श्रीमान् लोगोंकी वर्तमान सत्तामें भी इसी प्रकारको व्यवस्था रक्खी जाती है। इसकी पुष्टिके लिये वे लोग रेलवे का उदाहरण देते - राजनीति विज्ञान हुए कहते हैं कि सभी राष्ट्रोंकी रेलवे कम्पनिया पार सम्मतिसे टाइम-टेबिल निश्चित करती हैं। यद्यपि कोई इसे पालन करनेको मजबूर नहीं करता तोमी उस नि टाइम-टेबिलका पालन करनेमें वे तनिक भी त्रुटि नहीं क- मतलव यह कि पारस्परिक सम्मतिका उपाय बहुत ही उप है। इससे चैयक्तिक स्वार्थपरता नष्ट हो जायगी और सा सब कार्य सुव्यवस्थित रूपसे चला करेंगे। इन सिद्धान्तोंपर कई प्रकारके आक्षेप किये जाते हैं। लोग कहते हैं कि राज्यसत्ता नाम शेप हो जानेपर कोई कि को दबानेवाला न रह जायगा, जिससे महाभारत शान्तिपर्व वें अध्यायमें कहे अनुसार "किसीपर किसीका अधिक रहेगा।" खेच्छाचार और डकैती बढ़ जायगी। "जिसकी उसकी भैंस" वाली कहावत चरितार्थ हो जायगी। कृषि वाणिज्यका नाश हो जायगा। विवाहप्रथाका अस्तित्व जायगा, धर्म और यज्ञका नाम शेष हो जायगा और मारे हाहाकार मच जायगा। फ्रोपाकिन इस आक्षेपका उत्तर देते हुए कहता है कि विषयपर ज्यों ज्यों विचार किया जाता है त्यों त्यों यह विश् निश्चय होता जाता है कि आजकल समाजमें जितने दुष्कृत्य है उन सथोंका उत्तरदायित्वासमाजपर ही है। सजा देने फासीपर लटकानेसे इन दुष्कृत्योंकी कमी नहीं हो सकती। कल न्यायालयोंके अन्दर जितने मुकदमें आते हैं उनमें अधिका- *_ अराजकता । उत्पत्तिका कारण मनुष्य-समाजकी दुर्वृत्ति नहीं घरन् समाजको द्रव्योत्पादन या द्रव्यविभाजन करनेकी अव्यवस्था ही है। इसके अतिरिक मानवप्रतिकी दुर्वृत्तिके कारण भी जो अपराध होते हैं वे भी फासी और जेलपानेके डरले कदापि कम नहीं हो सकते प्रत्युत् इनसे उनकी संख्या और भी बढती है। हमारी गुप्तपुलिस, फैदखाने और फासीपर लटकानेकी व्यवस्थाने से समाजको उच्छृखल घना दिया है, और इन्होंके कारण इसमें नीच मनोवृत्तियों और दुष्ट आदतोंका प्रचार होता जा रहा है नीतिनियमकी माडमें समाजके अन्दर जोजो घटनाए होती है उन्हें देखकर कलेजा काप उठता है। किस रीतिसे इन उपायोंका पता गाया जा सकता है इसका विवेचन हम पहले कर चुके हैं ( Anarchist Communisme पृष्ठ ३१-३२) वैयक्तिक सम्पत्ति नष्ट हो जानेपर क्सिीको उदरनिर्वाह की चिन्ता न रहेगी। जिससे समाजका स्वरूप बदल जायगा, स्वार्थ- को जड कट जायगी, और दुष्ट विचार उत्पन्न करनेवाली परि. स्थिति ही नष्ट हो जायगी । इतनेपर भी यदि कोई भूला भटका किसी प्रकारका दुष्कृत्य कर भी डालेगा तो उसे किसी प्रकारको सजा न देकर सहानुभूतिके साथ समझा दिया जायगा। इस प्रकार धीरे धीरे अपराधों की संख्या घटती जायगी और कुछ समयमें ये बिलकुल निर्मूल हो जायगे । यही अराजकपथके राजकीय और आर्थिक भागोंका स्थूल स्वरूप है । एक दृष्टिसे देखा जाय तो इसका और सय धर्मा एवं राजनीति विज्ञान तत्त्वज्ञानोंका साध्य एक ही हातच्यज्ञान और धम भी यही उपदेश देते हैं कि मनुष्यको बाह्य नियन्त्रणको उपेक्षा न कर केवल कर्त्तव्यसे प्रेरित होकर निष्काम बुद्धिसे कार्य करना चाहिये । मनुष्य-समाजमें शान और यात्मसंयमका इतना प्रचार होना चाहिये फि कानून और सरकारकी उनको कोई परवा हो न रहे। उनक पारस्परिक व्यवहार नीति और प्रेमसे युक्त हों। यही सिद्धान्त (घाघवन्धनकी स्पेक्षा आन्तरिक प्रेरणाकी स्थापना) अराजक वादियोंका भी है। उनका कथन है कि प्रत्येक प्रकारका बाह्य नियत्रण मनुष्यको प्राकृतिक स्वाधीनतापर आक्रमण धरता है। अतएव उसको नष्ट करना अनिवार्य है आगे चलकर अराजकपंथवादी कहते हैं, सब आधुनिक सस्थाएं नष्ट कर दी जाय। तत्त्वज्ञान कहता है कि इनमेसे कुछ सस्थाएं स्वार्थनिरोध और इन्द्रियनिरोधके लिये आवश्यक है। उन्हीके द्वारा मनुष्य अपने साध्यपर पहुच सकता है। इस प्रकार अराजकपन्य और धर्ममें केवल साध्या अतर है, साधनका नहीं। हम पहले ही लिख चुके हैं कि यह पथरूसमें ही सबसे अधिक उस जमाने में सत्तके समान यूरोपमें कहीं भी एक तन्त्री राज्यव्यवस्था नहीं थी। शिना कारण कार्य कहीं नहीं होता। यही कारण है कि,रूसमें बहुत फैलनेपर भी इस सिद्धान्त की वायु यूरोपमें नहीं पहुंची। मानसशास्त्रका एफ सिद्धान्त है कि जहा लोगोंका वधन जितना ही दूढ होगा, उसका विरोध भी फैला है।

अराजकता उतना ही प्रयल होगा। जदांपर लोगोंको प्रगट में राजनीतिक पर्वा परनेकी इजाजत नहीं रहती, चहापर अश्याटमै अत्याचार और कात्ति मारा उसे साध्य करनेकी प्रवृत्ति उत्पन्न होती है। कसमें दो सस्साए पारा प्राचीन है, जिनका वहाके समाज- पर गहरा प्रभाव पहा है। पहली सस्या हजारको एकतन्त्र गासनको पद्धति सौर दूसरी देहातियोंकी "मीर" नामक समाज पद्धति । ताता, तुर्प, पोल, स्पीटन, लियूनियन आदि शत्रु समको घेरे हुए थे। मतपन उस समय देशकी रक्षाके लिये एक. तन्वी सरकारकी आवश्यकता थी। परन्तु एक धार स्थापित होते हो उस पद्धतिने यहा अपनी मजबूत जड जमा ली। जारको सत्ता मर्यादित रसने या उसपर किसी प्रकारका प्रतियन्ध डालनेवाली चहा कोई ममा नहीं। यूरोपके अन्य देशोंके समान वहापर धर्माधिकारियोंना प्रापल्य भी नहीं। यहा ईसाई धर्मका ग्रोक संचालिफ नामक विलकुल ही भिन्न मत प्रचलित है। मजहरके धर्माध्यक्षको कदर रोमनफेथालिक धर्माध्यक्षके समान स्वतन और राजाले श्रेष्ठ नहीं। प्रत्युत् चहाके धर्माधिकारीको राजाको माझा सनुक्कल चरना होता है । जारने यहाके सरदा- रोंको मोहतवीर्य कर डाला है, अतएव इग्लैण्डके समान चहा सरदारों का प्रायल्य भी नहीं । यूरोपके अन्य देशोंमें धनी, व्यापारी, फारपानेदार आदि रोगोंका मध्यम" नामक एक वर्ग है, पर समें ध्यापारिक एच औद्योगिक उन्नति न होनेसे उसका भी मस्तित्व नहीं। इन सय कारणों के एक ही स्थानपर एषत्रित M ।

राजनीति विज्ञान . । हो जानेसे जारकी सत्ता स्वेच्छाचारितासे पूर्ण और यहुत निर- कुश है। पीटर महानके लमान कुछ जारीने इस सत्ताका उपयोग कर देशका बहुत कुछ हित किया, पर खासकर इस सत्ताका उपयोग देशकी उन्नति के लिये न कर, अपने अधिकार और सुखको निर्विन रखनेके लिये ही किया जाता है। रूसकी दूसरी संस्थाका नाम है "मीर"। इसमें और भार- तवर्षकी ग्राम्यपचायतमें बहुत कुछ साम्य है। प्रत्येक ग्राम, एक एक मीर रहता है। ग्रामकी सब जमीन मीरके अधिकारों रहती है। मीरके और सब ग्रामवासियोंके हक बराबर रहते हैं भारतीय ग्राम्य पंचायतोंके समान ही मीर सय ग्रामकी व्यवस्था करता है। प्रत्येक गायका मोर और उसकी अन्तर्व्यवस्था स्वतत्र प्रकारसे चलती है और प्रत्येक आम अपनी भौतिक भार श्यकताए आप ही पूरी कर लेता है । जमीगका कर और सेना के लिये सैनिक देनेका कार्य भी इसीके जिम्मे रहता है। इससे जारको भी यडी सुविधा रहती थी। हजारों व्यक्तियोंसे भिन्न भिन्न सम्बन्ध रखनेकी अपेक्षा अकेले मीरसे सम्बन्ध रपना बडा सहज हे और इसी कारण कई राज्यकान्तिया होनेपर मी मीरफे जीवनमें कोई धका न पहुचा। जारको मीरको अन्त र्व्यवस्थामें हाथ डाल्नेका कोई मौका हो न आया। मीरके ही कारण कसी कृपकॉपर ससारके परिवर्तनका प्रभाव न पड़ा। लेकिन इस कारण उनके जीवन में एक प्रकारके शैथिल्यका प्राहु- वि हो गया। ससारकी सामयिक समीरका उनके शरीरमें ।

घराजकता सवार न होनेसे उनके विचारोंका विकास बिलकुल न होने पाया। ये यहायक नहीं जानते कि मुधार फिस चिडियाका नाम है। राज्यव्यवस्थासे उनका कोई प्रत्यक्ष सम्यन्ध न होनेसे उस ओर उन्होंने ध्यान न दिया । "कोउ नृप होउ में फा हानी" की नौसिके अनुसार डाकी स्थिति थी। इसीसे सारे यूरोपके मन्दर सफे रामान अज्ञानी, चैतन्यशून्य और पगु समाज दूसरे म्यानपर दूढे मी नहीं मिलेगा। इसका सय दोप यदि मीरके सिरपर मढ़ा जाय तो कोई मनुचित न होगा। जार युद्ध और ऐशोमारामके लिये प्रजाते जयईस्तो सैनिक और फर वसूल करता था।येसप अत्याचार रूसी कृपक्ष चुपचाप सहन कर लेते थे । इन अत्याचारोंके असह्य हो जानेपर कभी यलचे हो जाते थे पर ये सगठित न होने के कारण शीघ्र दया दिये जाते थे, और यठवाइयोंको कठोर दंड दिया जाता था। इन सय कारणोंले नायक अयाद नैराश्य-सागरमें गोता लगाकर हाथपर हाथ धरे मारत्रको ओर देखा करते थे। यह उनमें एक मादत सी हो गयी थी। ऐसी दशा होनेपर मी सका, यूरोपके अन्य देशोंसे थोदा यहुत सम्बन्ध हमेशा बना रहता था। अतएर यदि दरे छुपे यहाकी कोई फ्ल्पना रूसमें प्रविष्ट हो जाय तो कोई आश्चर्य नहीं । पारम्भमें रूस के उचकोटिके लोगों में यन्य देशोंके भाचार व्यवहार और स्वातम्य भावोंका प्रचार होने लगा। कुछ दिनोंके पश्चात् इस प्रकारके मतका होना एक तरहके फैशनमें परिग- -

१४८
राजनीति विज्ञान
णित होने लग गया । सन् १८५५में अलेक्जेंडर जारके सिंहास
नपर धैठा, उसके मत कुछ उदार थे अतएव वह राज्यव्यवस्था
सुधारकर लोगोंको कुछ अधिकार प्रदान करना चाहता था।
उस समयतक रूसी कृपक गुलाम समझ जाते थे, लेकिन
उसने उन्हें स्वतन्त्रता प्रदान कर दी। देशमें नवीन न्यायालय
स्थापित किये गये। लोगोंको स्थानीय स्वराज्य दिया गया एव
शिक्षाप्रचारको व्यवस्था की गयी।
इन सब सुधारोंसे लोगोंके मनमें कुछ कुछ आकाक्षाए
उत्पन्न होने लगी, जिससे वहाफे समाजमें कुछ कुछ जीवन
दिखायी पडने लगा। इसी समय रूसमें यूरोपके पुरोगामी और
क्रान्तिकारक विचारोंका समावेश हुआ । निराशा और अज्ञानके
अन्धकारमें पड़े हुए रूसी समाजको पकाएक प्रकाशकी किरण
दिखायी दी। अन्धेको लाठी मिलनेके समान इन लोगोंको इन
क्रान्तिकारक विचारोंसे आनन्द हुआ। उन्होंने इन विचारोंका
हृदयसे अभिनन्दन किया, और उस अभिनन्दनके साथ ही उन्हें
उस पराधीनताके बन्धनोंको तोडनेकी इच्छा हुई जिसमें वे
जकडे हुए थे। इसके इस क्रान्तिकारक मान्दोलनको “विवं
सक" ( Nihulist ) सज्ञा दी गयी। इस मतके अनुया
यियोंको किसी प्रकारको सत्ता पसन्द न थी। किसी भी
मत, सम्प्रदाय और सिद्धान्तको फेवल विश्वासपर पूजना
शानके खिलाफ था। समाजकी सब राजकीय और कौटुचिक
सस्थाए, धर्म और नीतिसे उनकी दृष्टिमें त्याज्य और दोषपूर्ण
।
उनकी
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रखता तो वहासे इस मतका अस्तित्व शीघ्र ही उठ जाता क्योकि से भारी धका पहुचा था। इससे पेयाती मौका देख रहेकि १४६ अराजकता यौं। ये उन सबको नए करके समाजकी एक नवीन ढङ्गसे रचना करना चाहते थे। क्रमश और धीरे धीरे सुधार करना वे अपनी शानके खिलाफ समझते थे। कला, कौशल, काव्य एव कोमल मनोविकारोंको वे तुच्छ दृष्टिसे देखते थे। भौतिक शास्त्र और बुद्धिका ही वे सबसे अधिक आदर देते थे। इन सब बातोंकी इनकी वाह्य नीतिमें गणना की जाय तो अनुचित न होगा। असलमें समाजकै दीन दुखी लोगोंका सुधार करना ही इनकी मान्तरिक नीति थी। लेकिन समाजकी एक भी सस्था और शासनपद्धतिसे उसका सुधार होते न देख वे पढे चिढ गये थे, और इसी सात्विक आवेशमें आकर वे सब प्रकारके विश्व- क कार्य करनेको उतारू हो गये। वे समाजके सय लोगोंको समान समझते थे, दूसरे अलेक्जेंडरके सिंहासनारूढ होने के समय इस मतके अनुयायियोंने आधुनिक व्यवस्थाको नष्ट करनेका यन आरम्भ किया। इस ओर ध्यान न देकर यदि जार अपने निजके उदार मतानुसार राजकीय और अन्य सुधारोका क्रम जारी तत्कालीन शोचनीय परिस्थितिके कारण ही इस मतका प्रवार दो पाया था। यदि वह परिस्थिति ही गष्ट कर दी जाती तो इस मतका कोई आधार न रह जाता। लेकिन जारफे ये सुधार देशके पुराने श्रीमानोंको पसन्द न थे । उनको साइम सुधारों. किसी प्रकार जारसे इन सुधारोंका होगा पद मारपापा जाप ।

राजनीति विज्ञान बस, ज्योंही निहिलिस्टोंका प्रचार हुआ, त्योंही जारके मन में उन्होंने यह यात जमा दी कि यह दल उन्हीं सुधारोंका नतीजा है। अस्थिर बुद्धिजारफा भी मन यह बात सुनकर मैला हो गया। दूरदशितासे रहित होने के कारण घह स्वय कुछ भी नहीं सोच सफा। इतनेमें ही सन् १८६६ में "क्रोफेजाप" नामक व्यक्तिने जारको मार डालनेकी कोशिश की, जिससे जारका मन और भी बिगड गया, और उसने शीघ्रही धरपकड प्रारम्भ कर दी। यूरोपमें अन्यत्र प्रचलित साम्यवादियोंके प्रयनसे रूसके नवयुवकों में जागृति होने लगी। दमननीतिसे उस उत्साहको नष्ट करना असंभव था। मासका अन्तर्राष्ट्रीय सघ श्रमजीवियों में जोर शोरले कार्य कर रहा था। जर्मनी में प्रजासत्तात्मक साम्य वादी पक्ष अपने मतका प्रचार कर रहा था। सन् १८७० में पेरिसमें भी कुछ समयके लिये फम्यूनने अपना प्रजासत्तात्मक साम्यवादी राज्य स्थापित किया था। इन सबका प्रभाव कसपर भी पड़ता था। रूसके सैफडों छात्र मास, जर्मनी, स्विट्जरलैंडमें शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। सन् १८७३में एक फरमान निकालकर जारने उन सबको बुला लिया। ये विद्यार्थी भी अपने साथ, अन्य स्थानोंके जागृतिकारफ भाव लेते आये थे। इनमें अधिकाश धाकुनिनके अराजक पथके ही भाव थोवेनिहिलिस्ट पथके मतोंको अपेक्षा अधिक सौम्य और विधायक थे। इन सय विद्यार्थियों का उहेश देशके सब लोगोंसे मिल जुलकर जागृति उत्पन्न फरनेका था। इसलिये वे सब लोग छोटेरखेडों में फैल गये और अराजकता वहाके लोगोंसे मिल जुल कर अपना कार्य करने लगे। ये छात्र भी छपकोंकी तरह मोटे कपडे पहनते और खेती करते थे, यहां तक कि बसे पवेचनात्योंके लडके भी जिन्हें खेती करनेका बिल- कुछ मम्वास न था साधारण मजदूरोंकी तरह पाठिन परिश्रम करते थे। ऐसा करके वे श्रमजीवियोंफो अपने दलमें मिलानेकी कोशिश करते थे। इस प्रकार सके नवयुवक अपूर्व उत्साह और अलौकिक स्वार्थत्यागसे जागृति फैलानेका प्रयत करने लगे, पर अनुभवहीन होने के कारण विशेष सावधानी और चतुरतासे कार्य परने घे असमर्थ हुए । सरकारको यह बात मालूम होते ही उसने उनको गिरफ्तार करनेका हुक्ष्म दिया, जिससे तीन ही वर्ष, (१८७३ ७६) दो हजार युवक कैद कर लिये गये । इस धरपकउसे बहुत परिवर्तन हो गया। जय रूसी युव- फोंको अपनी भूल मालूम हुई तो उन्होंने अपनी कार्यप्रणालीको पदल डाला। चे देहातोंमें जाकर रहने लगे, और धीरे धीरे लोगोंको उत्तेजना देकर जारके विरुद्ध भडकाने लगे। कुछ दिन पश्चात् फिर जब उन्हें यह मालूम होने लगा कि अशिक्षित कृष- कोको अपने अनुकूल करना बहुत कठिन है तो फिर उन्होंने मपनी कार्यपद्धतिको पदला, और जार या चारियों विरद्ध गुप्तरीहिसे सावधानीपूर्वक कार्य करना निश्चय किया। याकुनिनका यह उपदेश था कि समाज, यम दिन स्वातन्य होत चाहिये । परन्तु उसके अनुयायियोंने इस अमर्यादिन सातव्यको प्राप्त करने के लिये जिस गुप्त मण्डलको अन्य फर्म-

।
जिससे वेचार जारको खुद भी उनका शिकार बनना
राजनीति विज्ञान
स्थापना की उसमें आज्ञापालनके लिये बहुत कठोर नियम
बनाया गया।
एक मध्यवर्ती मण्डल स्थापित किया गया और यह नियम
बनाया गया कि सब मण्डल बिना किसी शिकायतके उसकी
आज्ञाओंका पालन करें। इस प्रकार कार्य प्रारम्भ किया गया।
इस मण्डलका उद्देश बडे २ अधिकारियों और जारका खून
करनेका था । दिन दहाडे पुलिसके एव प्रान्तोंके खास अधिकारी
किया और दो चार बार असफल
होने के पश्चात् १८८१ में जार भी मार डाला गया।
रूसके इस क्रान्तिकारक पन्थके पुरोगामी सिद्धान्त अत्यन्त
समाजघातक थे। इसलिये सरकारका उस ओर बिलकुल
ध्यान न देना असम्भव था। इस पन्थको नष्ट करनेका केवल
एक उपाय प्रजाको शासनके अधिकार देकर उसे कान्तिसे
विमुख करना था। पर जारने पेला न करके दमननीति प्रारगम
कर दी। जिसका फल यह हुआ कि लोगोंने प्रत्यक्षरूपसे
कार्य करना बन्द करके गुप्तरूपसे कार्य करना प्रारम्भ किया
और जनरलका खून
गया,
जिसमें
पडा। जारके खूनके पश्चात् जय नवीन जार सिहासनारुढ
हुआ तो क्रान्तिकारियोंने उसे एक
पत्र लिखा,
लिखा था कि यदि लोक-निर्वाचित प्रतिनिधिसभा स्थापित
फर उसे अधिकार दिये जाय तो सब पड्यन्न
अत्याचार बन्द कर दिये जायंगे। इससे स्पष्ट मालूम होता है
और
-

अराजकता कि यद्यपि क्रान्तिकारियोंने परिस्थितिसे लाचार हो नृशसता- पूर्ण कार्य किये थे, पर तोभी उनका उद्देश पविन था। खराव परिस्थितिके बदल जानेपर वे अपने मार्गको भी बदलने के उस लिये तैयार थे। पर सव व्यर्थ हुआ। तीसरे निकोलसने भी उसी प्रकार दमननीति प्रारभ कर दी और सन् १६०३में ही १२००० लोगोंपर राज्यविद्रोहका अभियोग चलाया गया। इधर रूस-जापान युद्धमें उसकी पराजय हुई, जिससे सारा देश तूफानसे प्रताडित समुद्र- की तरह क्षुब्ध हो उठा और अन्तमें लाचार होकर १६०५ में जारको डूमा नामक प्रतिनिधिसभा स्थापित करनी पड़ी। लेकिन फिर भी इस सभाको शासनके हक बिल्कुल नहीं दिये गये। केवल राज्यकार्यको आलोचना करने का हक उसे दिया गया। परन्तु उससे लोगोंका सतुष्ट होना असम्भव था। ससारव्यापी महासमरमें रूसकी सेना पडी अव्यवस्थित थी, जारको कायरता और उसकी पराजयने तो लोगोंका आरके प्रति जो कुछ भी प्रेम रह गया था, उसे भी नष्ट पर डाला। अन्तमें दूमाने २४ घन्टेके अन्दर जारको पदत्यागके लिये मजबूर किया। इसके पश्चात् ड्रमाने अपने निजका प्रधान मण्डल बनाया। परन्तु कुछ ही समयके पश्चात् शासनसत्ता दोनोंके - हायसे निकल गयी। श्रमजीवियोंके नेता 'लेनिम' और "ट्रोव्हस्की ने प्रधान मएडल और धमाको मर्द्धचन्द्र देकर सय सत्ता अपने हाथमें ले -- १५६ राजनीति विज्ञान . शत्रुसेना मैदानमें तलवार लिये युद्धके लिये उपस्थित थी, जिस समय अकालके मारे देशमें लूटमार मच रही थी, जिस समय कमजोर प्रजा बुरी तरह पिसी जा रही थी, जिस समय "जिस- की लाठी उसफी भैस" (The might is right) वाली कहा वत चरितार्थ हो रही थी और जिस समय सारी सेना हतबीय हो गयी थी, ऐसे सफटके समयमें बोल्शेविक नेताओंने इसका राज्य अपने हाथमें लिया और यूडेनिच, डेनकिन, रैगल आदि अन्तरस्थ शत्रुओंको पराजितकर मित्रराष्ट्र के समान बलवान शत्रुओंकी भी देशमें दाल न गलने दी। इसके पश्चात् उन्होंने जनतामें नवजीवनका सचार किया, उचित व्यवस्था निर्माण की, शान्तिकी स्थापना की, कारखानोंको चलाये और राज्य कारो वारको उचित रूप दिया। इसके अतिरिक्त अपने सिद्धान्तोंक कार्यरूपमें परिणत किया। वहाकी आधुनिक शान्ति और सुव्यवस्थाका लोहा मानते हुए शत्रु भी इस यातको स्वीकार करते हैं कि वहाकी राज्यव्ययस्था सुचारुरूपसे चल रही है इससे साफ मालूम होता है कि रूसी जनता बोल्शेविज्मको हृदयसे चाहती है, वह उसका सच्चे दिलसे अभिनन्दन करती है। इसका कारण यह है कि यह मत अपने अनुयायियों उत्साह और कर्तव्य परायणताभरनेका विलक्षण सामर्थ्य रखता है। ऐसी हालतमें कैसे कहा जा सकता है कि योल्शेविक लोग दुष्ट, दुराचारी एव त्याज्य होते हैं। किसी भी मतका अधिक • या उसमें अमृत प्रेरणाशक्ति तभी हो सकती है जबकि

कसोटोपर परखनेके लिये जो यह उत्तम अवसर प्राप्त हुआ है,
सरकारकी राज्यपद्धति और ससमें उनके द्वारा की गयी
बोल्शेविक पन्थ
उसमें प्रामाणिकता, चिरकालीन सत्यता, और परिस्थितिकी
'अनुरूपता काफी अशमें हो,और उस अशको जाननेके लिये उसके
अनुयायियों और प्रवर्तकोंकी दृष्टिसे उसपर विचार करना
चाहिये । फेवल द्वेषयुद्धिसे प्रेरित होकर छिद्रान्वेषणके द्वारा उसे
-जान लेना सम्भव नहीं। उसके लिये पक्षपातहीन एव सत्य
"जिज्ञासासे प्राप्त होनेवाली मनुकूल मनोवृत्तिको आवश्यकता है।
इसी उद्देशसे प्रेरित होकर पक्षपातहीन बुद्धिसे हम इस
पर विचार करेंगे। समाचारपत्रों के अतिशयोक्तिपूर्ण लेखों एवं
म्वार्या ध लेखकोंके द्वेषयुद्धिसे प्रेरित होकर लिखे गये ग्रन्थोपर
ध्यान न देकर हम प्रसिद्ध बोल्शेविक नेता लेनिन, और योदशे-
पिक सरकार द्वारा प्रकाशित लेखोंके आधारपर कुछ लिखनेका
प्रयत्न करेंगे। इस परिच्छेदमें केवल सैद्धान्तिक दृष्टिसे ही
विचार किया जायगा। साम्यवादी सरकार इन कुछ वर्षोंमे बहुत
समयतक स्थापित रही है। अतएव इस समय सारे संसारकी
दृष्टि इस वापर लगी हुई है कि इन तत्वोंको व्यवहारको
योत्शेविक सरकार उसका किस तरह उपयोग करती है।
यह भो साफ जाहिर है कि साम्यवादको भावी स्थिति इसी
अवसरके उपयोगपर अवलम्पित है। इस दूटिले बोल्शेविक
राजकीय, सामाजिक और आर्थिक क्राति संसारके इतिहासमें
महत्वपूर्ण स्थान रखती है।
अत्यन्त

राजनीति विज्ञान
L
।
गिक श्रमजीवियोंकी सख्या ही अधिक थी, न उनका सङ्गठन ही
दृढ था, और न कारखानोंकी स्थिति ही ऐसी थी, जिससे वहा
इन उपायोंका सहारा लिया जाय। इससे वहापर संघवादकी।
जड जमना कठिन था। इसके अतिरिक्त वहापर जारशाहीका
शासन इतना कठोर और दीर्घकालव्यापी था कि उसके विरुद्ध
कोई भी आन्दोलन शस्त्रकी सहायता और गुप्तरीतिसे किये बिना
सफल नहीं हो सकता था । 'क्रमश' 'वीरे धीरे इत्यादि शा"
वहाके शब्दकोपसे निकाल दिये गये थे।
उस समय तो वह
केवल "एक घाव और दो टुकडे" के सिद्धान्तका ही आधार य
गया था। न्यायसङ्गत उपायों द्वारा किसी भी इष्टसिद्धिक
प्राप्तिका प्रयत करना बिलकुल असभव हो गया था। ऐसे
परिस्थितिमें रूसके लोगों को मासके "वर्ग-फलह" और "सशरू
क्राति” सिद्धान्त ही पसन्द आये। बोल्शेविक लोगोंने इन्हीं
सिद्धान्तोंकी नीवपर अपने पन्थकी इमारत बडी की।
लेन्निने “दी स्टेट एन्ड रिवोल्यूशन"
- पृष्ठमे लिखा है कि "योल्शेविज्म" शब्द ससी भापाके
'Boishivstvo शब्दसे निकला है, जिसका अर्थ मताधिक्य होता
है। सन् १९०३ मे सेल्समें उसके साम्यवादियोंकी एक परि
पद् हुई, जिसमें अन्तर्व्यवस्था सम्बन्धी मतमेदोके कारण कई
पक्ष हो गये थे। उसमें लेनिनके पक्षपातियोंकी सख्या सबसे
अधिक थी। इसीसे इस पक्षको "वोल्शेविक" सज्ञा दी गयी,
नाम अभीतक प्रचलित है।
नामक ग्रन्थ ४
A

नीति विज्ञान
ही अधिक थी, न उनका सङ्गटन ही
की स्थिति ही ऐसी थी, जिससे वहां
जाय। इससे वहांपर संघवादकी
इसके अतिरिक्त वहांपर जारशाहीका
दीर्धकालव्यापी था कि उसके विरुद्ध
सहायता और गुप्तरीतिले किये बिना
क्रमशः धीरे धीरे इत्यादि शब्द
दिये गरे थे। उस समय तो वहां
टुआ के सिद्धान्तका हो आधार रह
उपायों द्वारा किसी भी इष्टसिद्धिकी
लकुल असंभव हो गया था। ऐसी
को मासके "वर्ग-कलह और "सशस्त्र
न्दि माये। बोल्शेविक लोगोंने इन्हीं
ने पन्धकी इमारत खड़ी की।
एन्ड रिवोल्यूशन" नामक ग्रन्थके ८४
क. "बोल्गोविन' शब्द रूसी भाषाके
निकला है, जिसका अर्थ मताधिक्य होता
लसमें असके सान्यवादियोंकी एक परि-
वस्था सम्बन्धी मतभेदोंके कारण कई
है

गिक श्रमजीवियोंकी सख्या ही अधिक थी, न उनका सङ्गठन ही दृढ था, और न कारखानोंकी स्थिति ही ऐसी थी, जिससे वहा इन उपायोंका सहारा लिया जाय। इससे वहांपर संघवादकी जड जमना कठिन था। इसके अतिरिक्त वहापर जारशाहीका शासन इतना कठोर और दीर्घकालव्यापी था कि उसके विरुद्ध कोई भी आन्दोलन शस्त्रकी सहायता और गुप्तरीतिले किये बिना सफल नहीं हो सकता था । 'क्रमश' 'धीरे धीरे' इत्यादि शब्द वहाके शब्दकोपसे निकाल दिये गये थे। उस समय तो वहा केवल "एक घाव और दो टुकडे" के सिद्धान्तका ही आधार रह गया था। न्यायसङ्गत उपायों द्वारा किसी भी इष्टसिद्धिकी प्राप्तिका प्रयत्न करना बिलकुल असभव हो गया था। ऐसी परिस्थितिमें ऊसके लोगोंको मासके "वर्ग-फलह" और "सशस्त्र काति" सिद्धान्त ही पसन्द आये। वोत्शेविक लोगोंने इन्हीं सिद्धान्तोंकी नीवपर अपने पन्थकी इमारत खडी की। लेनिनने “दी स्टेट एन्ड रिवोल्यूशन" नामक ग्रन्थके ८४ - पृष्ठमे लिखा है कि "योल्शेविज्म" शब्द रूसी भाषाके 'Bolshivstvo शब्दसे निकला है, जिसका अर्थ मताधिक्य होता है। सन् १९०३ मे सेल्समें उसके साम्यवादियोंकी एक परि- पद हुई, जिसमें अन्तर्व्यवस्था सम्बन्धी मतभेदोंके कारण कई पक्ष हो गये थे। उसमें लेनिनके पक्षपातियोंकी संख्या सबसे अधिक थी। इसीले इस पक्षको 'घोल्शेविक" सज्ञा दी गयी, और वही नाम अभीतक प्रचलित है। ।

पोल्शेविक पाथ १६१ योल्शेविशदको योलते ही मानलिफ पल्पना मन्तश्च- सुमोके सम्मुख लेगिनको तेजोमयो मूर्तिका निर्माण पर देती है। यदि कोई इसका कारण पूछे तो उसका यही उत्तर दिया जा मकता फिलेनिन बोल्शेविस्ममय और पोशेरिज्म लेनिन- मय है । लेनिन हो इस मतको मापोंकी ज्योति और हृदयका भाग है। यही इसफा पानाधता और विधाता है। उसीकी पर्तृत्वशक्ति और साहसके फारण इस मतका प्रचार हुमा, और उसीके नेतृत्व में यह अधिकारारुद भी हुआ। माज भी इस मतका सामर्थ्य और स्फूर्ति लेनिनपर ही निर्भर है। ट्राइस्की, जोनाफोफ मादि अन्य लोग भी इस मतके नेता है, पर वे केवल लेनिन सायफमात्र हैं। लेनिनफा असली नाम लादिमिर यूलेमाफ है । कसमें भार शाहीके विरुद्ध आन्दोलन उपस्थित करने के लिये, घाफे प्रजा- पसके लेखकोंको यपनी रक्षाफे लिये भिन्न २ पनाम रखने पस्ते थे। उसी अनुसार यूलेनाफने भी अपना उपनाम "निकोलाय लेनिन रपया है। वही गाम अय ससारमें प्रचलित हो गया है । लेनिनका जन्म सन् १८७० में हुआ। उसका पिता रूसी विद्या विभाग में एक अधिकारी था। उसने यचपनमें सेनिनको अन्तम शिक्षा दी थी। Brकालीन मन्य रूसी युवकोंके समान लेनिन भी युवावस्थाहीसे स्वतन्त्रतादेवीका उपासक बन गया। उसने उसी समयले स्वार्थत्यागके राज्यमें प्रवेश किया। जय चह फालेजमें पढ़ता था, उसी समय उसके ज्येष्ठ भ्राताको

राजनीति विज्ञान
फासीको सजा दी गयी थी। उसकी स्त्री भी एक बार दे
निर्वासित हो चुकी थी और वह स्वय भी कैद कर लिया।
था। पर उसके विरुद्ध प्रमाण न मिलनेसे वह छोड दिया गर
तोभी उसे युनिवर्सिटीमें पुनः स्थान नहीं मिला। 'se
पश्चात् भी कई बार उसे देशनिर्वासनका दण्ड मिला, a
कुछ समयतक वह साइबेरियामें भी कैद रक्खा गया, पर
माताका दुलारा लाल अपने उद्देशसे तनिक भी विचलित
हुमा । क्या स्वदेशमें और क्या विदेशमें हर समय वह अ
मतका प्रचार करने में प्रयतशील रहा।
लेनिन अपनेको मापर्सका अनुयायी मानता है। उस
कथन है कि मेरे मतमें कुछ भी नवीनता नहीं। मैं तो के
मार्सके बताये पधका पथिक हूं। बहुतसे अन्य साम्यवादी
मासके अनुयायी होनेका दावा रखते हैं, लेकिन या तो
मार्सके सिद्धातोंको समझ ही न सके हैं, या जानबूझक
खार्थवश हो,उसके सिद्धांतोंका मनमाना अर्थ लगाते हैं। अन्य
मासके अन्योंका निष्पक्षपात या सत्य जिज्ञासासे अध्यय
करनेवाले व्यक्तिका मत उसके मतोंसे कदापि मिन्न नहीं
सकता। कहा जाता है कि लेनिनका "समें धनियों
सत्ताका उत्कर्षः (The Development of capitalist
In Russia) नामक ग्रन्थ रूसमें बहुत प्रसिद्ध है। पर
या तो उसका फेवल सरकार और कान्ति" (The Stat
and the Resolution ) नामक अन्य ही प्राप्य है। उस

पोल्शेषिक पन्य
उसने मापस और ऐजिलके अवतरण देकर अपने मतके
कार्यक्रमका समर्थन किया है। "नामूलं लिख्यते किचित् फे
मतिमानुसार इस पुस्तकमे भी मासके माधारफे यिना किसीने
भी विरोध या प्रतिपादन नहीं किया है।
यह अन्य अपूर्ण है। सन् १९१७ के अगस्तमें अर्थात् योल्शे-
बिक कातिक तीन मास पूर्व इस पुस्तकको भूमिका लिखी
गयो है, जिसमें माफ्लके मतोंपर पडामा भ्रमजाल दूर किया
गया है। इसके आगेफे भाग; लेपफका विचार १६०५ की क्राति
और १९१७ की जारशाहोके उच्छेदपर मीमासा करनेका था,
लेकिन फाति प्रारम्भ हो जानेके कारण लेनिनपर उससे भी
अधिक महत्वका कार्य राज्यशासनको व्यवस्थाका मा पड़ा,
जिससे यह प्रत्य अपूर्ण हो रह गया। तारीख ३० नवम्बरको
लेनिनने उक्त पुस्तकमें यह अतिम वाम लिखा है-
*It is more pleasant and more useful to live
through the experience of revolution than to
write about it
इस प्रयको पढनेसे लेनिनके मतका वास्तविक स्वरूप
मालूम हो जाता है। अतएर हम उसका सारांश कुछ शब्दोंमें
नीचे लिख देते है-
"सरकार की उत्पत्ति क्यों हुई? इस विषयपर प्रकाश डालते
एलेनिन कहता है कि जब समाज में भिन्नर दो पक्ष हो जाते हैं
और उन दोनों के हितोंमें जब निरोध पैदा हो जाता है, तब उनके
.

१६६ राजनीति विज्ञान नहीं हो सकता। पूंजीपतियोंकी सत्ताका नाश करनेपर भी वैयक्तिक धनवानोंका विरोध शेष रह जायगा, जिसका विरोध सशलसेना द्वारा करनेमें भी वे न चूकेंगे। इस विरोधका पूर्ण रूपसे नाश करने के लिये समाजके अन्य तटस्थ लोगोंको-कृपक, डाकुर, इजिनियर आदि ऊचे दरजेके श्रमजीवियोंको-असली श्रमजीवियों में सम्मिलित करके नवीन समाजकी रचना करनी होगी। इसके लिये कुछ समयतक श्रमजीवी सरकारका स्थापित करना नितान्त आवश्यकीय है। मासने अपने "The State that is the Protectorate organised as the ruling"नामक ग्रन्थमें श्रमजीवी सरकारका उल्लेख किया है। उसका कथन है कि यह सरकार असल मज- दूरोंके संगठनसे बनायी जाय। लेनिनपर कितने लोग यह आक्षेप करते है कि उसकी राज्यपद्धतिमें केवल शहरोंके औद्योगिक श्रमजीवियोंको ही अधिक मत मिलनेकी व्यवस्था की गयी है। लोकशाहीका नायक कहलाने वाले, सार्वजनिकमतकी घोषणा करने वाले इस नेताने अपने हाथमें राज्यसूत्र आते ही धनवानों और कारखाने वालोंका मताधिकार छीन लिया। परन्तु उनका यह माक्षेप असगत है। लेनिन तो साफ कहता है कि 'सरकार' नामक संस्था एक दलका अधिकार दूसरे एलपर चलानेके लिये ही पैदा होती है। धनवानोंकी सत्ताको नष्ट करनेके लिये श्रमजीवी सरकार धनायी जाती है। इस सरकारको संगठित करनेके लिये अन्य लोगोंको अधिकार बोल्शेविक पन्थ १६७ देनेसे घडी हानि होगी। पूजीपतियोंकी सरकार और मजदूरोंकी सरकारमें यदी अन्तर है कि श्रमजीवी सरकारमें सब तरहके लोग सम्मिलित हो सकते हैं। यदि दूसरे लोगों को भी श्रम जीवियों के सिद्धान्तोंफी उत्तमता मालूम हो गयी, उनको नेस- निकतापर उनका ध्यान आकृष्ट होगया, एवं उनके द्वारा की गपी समाजस्थापना उन्हें सुपप्रद मालूम हुई तो घे मापही उस जागृन श्रमजीवीदलमें सम्मिलित हो जायेंगे। इस प्रकार जप सब लोग उनमें सम्मिलित हो जायेंगे तय सारा समाज ही श्रमजीवीमय हो जायगा और वर्गभेद पद होफर वर्गकलह मिट जायगा। फिर तो सरकार आपही नष्ट हो जायगी। उसी तरद नष्ट हो जायगी जिस प्रकार पानीका मावागमन यन्द हो जानेसे नदीका पानी सूख जाता है। 'The authority of the Government over persons will be replaced by the administration of the things and the direction of process of production 'आजकल समाजमें सरफारकी सत्ता व्यक्तिपर रहती है, पर भविष्यमें सरकार के जिम्मे सामा- जिक यातोंकी व्यवस्था और उत्पादनकार्यों के उपायोंकी देख- रेखका कार्य रहेगा। लेकिन इच्छित अपस्या प्राप्त होने तक मध्यको सक्रमणा- वस्थामें समाजके अन्दर अनियन्त्रित श्रमजीवी सरकारका होना आवश्यक है। इसका तात्पर्य यह कि खाभिमानी युद्धप्रस्तुत श्रमजीवियोंके सिवा दूसरों को सरकारके निर्वाचनका अधि the राजनीति विज्ञान य 1 और व्यवहार कार न रहे, और उस सस्कारको अपने विरुद्ध आचरण करने वालोंको शारीरिक दण्ड देनेका बेरोक अधिकार रहे। यह श्रमजीवी सरकार लुटेरे पूजीपतियों और कारखानेवालोंको भांति २ के बन्धनोंसे जकडेगी, एवं उनके वाक् स्वातन्यको बिलकुल मर्यादित कर देगी। मजदूरों की वर्तमान दासताको नष्ट करनेके लिये ऐसा करना अनिवार्य है। सम्भव है प्रजासत्तात्मकवादी इसे देखकर भौंहें टेढी करेंगे, पर उसके पहले उन्हें यह सोच लेना चाहिये कि आधुनिक प्रजातन्त्रवाद भी तो ऐसा ही है। उसमें भी तो मावश्यकता पडनेपर अल्प- मतवाले बहुमतवालोंको बातें' माननेके लिये मजबूर किये जाते हैं। इससे यह सिद्ध हुआ कि प्रजासत्तात्मक सरकार भी बहु- मतकी सत्ता अल्पमतपर जबरन लादनेवाली सरकार है। फिर श्रमजीवी सरकार और प्रजातन्त्रवादमें पमा जन्तर है इस प्रकार समाजमें श्रमजीवोसरकार स्थापित होजानेपर उसे समाजकी पुन रचनाका कार्य हाथमें लेना चाहिये । राज्य- व्यवस्थाके लिये लेनिनने पेरिसके कम्य नको ही आदर्श माना है। सन् १८७०-७१ में च-जर्मन-युद्धकै समय समाज सत्ता- चादी दलने क्रान्ति फरके इसे स्थापित किया था। यद्यपि इसका अस्तित्व बहुत कम समयता रहा पर तोमी समाजसत्तावादि. योंकी राजव्यवस्थाको प्रयोगप्टिसे यह बहुत महत्त्वकी है। मार्सने भी इसी दृष्टिसे उसकी मीमासा की है। फम्यूनके इस प्रयोगसे यह बात सिद्ध हो गयी शिधनवानोंकी राज्य-पद्धतिको घोल्शेधिक पन्ध १६ घनाये रमनेसे कार्य सिद्धि न होगी। घमजीवियोंके हायमें सत्ता आते ही उन्हें चाहिये शि पुराने राज्यशकटको छिन्न भिन्न फर डालें विध्यस पो जानेपर रचनाका कार्य प्रारम्भ करना चाहिये। फायूनने प्राचीन से तोडकर राष्ट्रीय सशस्त्र रय. मेवफोंकी योजना की। कम्यूनरहे सूत्र एक पोसिलके हाथमें दिये गरे। इस कोपिलमें पेरिसके भिन्न २ भागोंक निर्धानित किये हुए प्रतिनिधि सम्मिलित थे जो फि अपने मतदाताओं उत्तरदायी भी थे। सय संघको अपने अपने प्रतिनिधि कार्य पमन्द न दोनेपर उसके स्थानपर दूसरा प्रतिनिधि भेजनेका अधिकार था। मतलब यह कि कम्यूनने राज्यशफटका प्रत्येक घटक लोक- नियुक्त और समान घेतनभोगी बना दिया। उपरोक्त (पेरिसके समान) व्यवस्था वह (कम्यून) फास देश- के प्रत्येक ग्राम करना चाहती थी। वह प्रत्येक ग्राममें उसके पूर्णत स्नायत लोकनियुक्त कौंसिल स्थापित पिया चाहती थी। इसी कौंसिलको फम्यून नाम दिया गया था और इसी ग्राम्य कम्यूनले प्रतिनिधियोंका राष्ट्रीयमण्डल स्थापित करनेका विचार था। लेनिनका कथन है कि मार्सके मतानुसार समाजमा पूर्ण रूपान्तर एकदम नहीं हो सकता, उसके लिये कुछ समयकी आवश्यकता है। इस बीचके संक्रमणकालमें समाजकी व्यवस्था उसके अन्तिम स्वरूपसे बिलकुल भिन्न प्रकारफी रहेगी।

१७० राजनीति विज्ञान क्रान्तिके होते ही जमीन और फारखाने व्यक्तिगत अधिकारोंसे निकालकर राष्ट्रके अधिकारमें दे दिये जायंगे। उत्पादनके सय साधन राष्ट्रीय समझ जायगे। समाजके प्रत्येक व्यक्तिको वही कार्य करना होगा जो समाजको उपयुक्त हो। प्रत्येक व्यक्ति- को उसके कार्यके लिये प्रमाणपत्र दिया जायगा। उस प्रमाणपत्र. को बतलानेपर उसमें लिने हुए फार्यके परिमाणसे उसे सार्वज- निकभाएडारसे आवश्यक सामग्री दी जायगी। इस प्रकार प्रत्येक व्यक्तिको उसके कामके बदले में सार्वजनिक व्यवस्थाका अंश काटकर आवश्यक वस्तुप मिला फरेंगी। इस व्यवस्थाके अन्तर्गत "जो कार्य करेगा उसीको खानेको मिलेगा" इस तस्वका प्रतिपादन किया जायगा । जिस परिमाण. से श्रम करेगा उसी परिमाणसे बदला मिला करेगा। जिससे उत्पादनकार्यमें समता स्थापित हो जायगी और समाजके अन्दर जो धनियोंकी लूट जारी है वह धन्द हो जायगी। परन्तु यह वास्तविक समानता नहीं, न इससे समाजमें वास्तविक्ष न्याय हो स्थापित होने की आशा है। क्योंकि समाजमें सव मनुष्य एकसे नहीं हो सकते। कोई अशक होता है तो कोई सशक्त, कोई विवाहित होता है तो कोई अविवाहित, कोई निपूना होता है तो कोई पाच पुत्रोंका पिता, कोई सुस्त होता है तो कोई चालाक । इस प्रकार समाजमें स्थान २ पर विषमता पायी जाती है। इसलिये यदि समाजमें श्रमके मानसे ही भाव श्यक वस्तुएँ दी जायंगी तो एकको तो उन्हें इकट्ठीकर रखनेको योरोविकापन्य स्थान भी न मिलेगा एघ दुसरेको जीवननिर्वाहके लिये भी पर्याप्त सामग्री न मिलेगी, जिससे समताके स्थानमें विषमता उत्पन्न हो जायगी। पर सप विषमता एवं अन्याय एकदम ही दूर नहीं हो सकते। संक्रमणकाल में पूजीपतियोफी सत्ताके जो थोडे बहुत दोष रह जायगे उनमेसे यह श्रमानुसार घटवारका एक है। समाजकी इस सक्रमणावस्थामें सरकार अवश्य रहेगी। प्रारम्भमें धनिकोंफा घिरोध मिटाने के लिये इसको अत्यन्त आवश्यकता है। शनै शनै लोग बिना कहे ही कार्य करने लग जायगे। वे श्रमानुसार वटवारेके अभ्यस्त हो जायगे। अतएव इस बटवारेकी प्रथाको कार्यमें लानेके लिये भी सरकारको मावश्यकता रहेगी। जव लोग अपने इच्छानुसार कार्य करने लग जायगे, धनि- योका नाश हो जायगा, समाजमें केघल मजदूरदल रह जायगा, तव समाज अपनी संक्रमणावस्थाका अन्तकर आदर्शस्थितिको प्राप्त हो जायगा। मार्सने बडे ही अच्छे शब्दों में इस आदर्श स्थितिका वर्णन किया है। "समाजकी सोत्कृष्ट सामुदायिक (Communist) अवस्था श्रमविभाग तयों के द्वारा प्राप्त हुई दासताका अन्त हो जायगा। चौद्धिक और शारीरिक कार्यों का आधुनिक विरोध नएको जायगा। श्रम पेषल उदरपोपणकाही साधन न समझा जाफर मावश्यक भोग्यपदार्थका स्थान ग्रहण करेगा। मानव-

राजनीति विज्ञान
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जातिकी साङ्गोपाङ्ग क्षति हो जायगी। उत्पादक साधनोंकी
कमी न रहेगी। समाजकी शक्ति विकाराले सम्पत्तिका प्रवाह
नतत रूपसे प्रवाहित होता रहेगा । समाजको जब ऐसी स्थिति
प्राप्त हो जायगी नमी पूजीपतिसत्ताके कानूनक्षेत्रसे परे दृष्टिपात
पारणा सम्मव होगा। तभी समाजको ध्वजाके ऊपर स्वर्णा-
क्षरोसे लिखे हुए ये शब्द फडकने लगेंगे-
*From each according to his abihty to each
according to his needs" "प्रत्येकसे उसकी शक्तिके अनु-
सार प्रत्येकको उसकी आवश्यकतानुसार ।"
मतलब यह कि प्रत्येक व्यक्तिसे शक्तिके अनुसार कार्य
लिया जायगा और आवश्यकतानुसार मामान दिया जायगा।
इस अवस्थामें सरकारको कोई आवश्यकता न रह जायमी।
यह स्शष्ट है कि यदि प्रत्येक व्यक्ति सामाजिक हितके तत्वोंसे
परिचित होकर अपनी शक्ति के अनुसार कार्य करनेका अभ्यस्त हो
जायगा, तो फिर किसी प्रकारके वाह्य नियत्रण (सरकार) की
आवश्यकता न रहेगी और जब सरकारको कोई आवश्यकता ही
न रहेगी तो फिर यह आपही आय कुम्हलाफर निर्जीव हो जायगी।
आधुनिक पूजीपतियोंकी सत्ताके जमानेमें श्रम' तो
तराजूपर तौला जाता है, पर मजदूरी उसके अनुसार नहीं दी
जाती। जहातक हो सकता है धम देनेसी चेष्टा की जाती है।
लेकिन जय उत्पादक साधन घढ जाय गे,, माल अधिक पैदा
होने लगेगा और प्रत्येक व्यक्ति जीतोड परिश्रम करने लगेगा,

पोल्शेविक पाय १७३ तय श्रम तौलनेकी कोई आवश्यकता न रहेगी और न प्रत्येक व्यकिको उसफो आवश्यकतानुसार वस्तुए देनेमें ही किसी प्रकारकी आपत्ति शेप रह जायगी। मासने इस सर्वोत्कृष्ट अवस्थाको सामुायिक (Communistic) और इसके पूर्वकी सक्रमणावस्थाको सामाजिक (Socvalistic) शादी है, और इस थन्तिम सर्वोत्कृष्ट अवस्थाकी भोर लक्ष्य करके ही लेनितने अपने पक्षका नाम दिया है । यही लेनिनके मतका सार है । लेनिनके मुख्य सिद्धान्त उगलियोंपर गिननेके योग्य और बहुतही स्पष्ट है । सन् १९१६ के मार्च में मास्कोके अन्तर्गत कम्यूनिस्ट पक्षको अन्तर्राष्ट्रीय परिपद एई थी, जिसमें लेनिनने अपनी मतपत्रिका पेश की थी। उसमें भी इस सिद्धान्तका स्तत्र विवेचन किया था और उसपर किये भाक्षेपोंका योग्यतापूर्वक पण्सन किया था। लेनिनके सिद्धान्तोंपर भिन्न मिन्न लोगों की मिन २ गय है । कुछ इसे अच्छा पतलाते हैं कुछ बुरा। इसलिये हम पुनरुक्तिके दोपको स्वीकार करते हुए लेनिनफे सिद्धान्तोको उसको मतपत्रिकाके अधारपर सक्षिप्त रुपमें नीचे देते है- १-ससारमें वर्गकलह परस्पर यढता जायगा। पू जीपति- योकी सत्ता और पूजी बढती चलो जायगी, और समाजको सय पूजीको पूजीपति चूस लेंगे, जिससे श्रमजीवियोंकी स्थिति और भी दिन दिन बिगडती जायगी, एव पूजीपतियों भोर मजदूरोंका पारस्परिक कलह भयकरता धारण करेगा।

२१२ राजनीति-विज्ञान www स्त्रियोंको मताधिकार फांसकी क्रातिके समय जब यूरोपमें पुरुषोंके लिये आम मताधिकार की बात बडे जोर शोरसे चल रही थी तब वहाकी राष्ट्रीय सभा (National Assembly)के सामने एक दरख्वास्त पेश की गयी थी जिसमें स्त्रियोंको मताधिकार देने को प्रार्थना की गयी थी। मासके कई राजनीतिज्ञोंने इसका समर्थन किया था। उसमें कहा गया था कि मताधिकार प्रत्येक नागरिकका नैसर्गिक अधिकार है। इससे स्त्रियांको वचित रखना अन्याय है क्योंकि स्त्रियां भी नागरिक हैं। इसके बाद चेन्थम,थामस, हेयर, प्रोफेसर सिजविक, जान स्टुअर्ट मिल प्रभृति कितने ही ससार- विख्यात राजनीतिक लेखकोंने स्त्रियोंके मताधिकारके लिये आवाज उठायी थी। इन विद्वानोंने अपने अपने प्रथोंमें बडी योग्यतासे इस विषयकी पुष्टि की है उन्नीसवीं सदी मध्यकालमें स्त्रियोंको मताधिकार देनेका तन कुछ न कुछ व्यावहारिक रूप ग्रहण करने लगा। अमेरिकामें पहले पहल इसका श्रीगणेश हुआ। अमेरिकाके कई राज्योंने स्थानीय चुनावमें स्त्रियोंके मत लेने शुरू किये । तबसे इस तस्यका वहाँ यरावर विकास हो रहा है और आशा की जाती है कि निकट भविष्यमें वहां स्त्रिया पुरुषोंके समान विस्तृतरूपसे मता- प्राप्त कर लेंगी। +

Rajneethi Vigyan

Author
Bhandari,shuk Sampathi
Title
Rajneethi Vigyan
File name
Rajneethi Vigyan
Text
OCR done
Citation
1900
Published
2011/01
Publisher
Harison Road Calcutta
Language
Sanskrit
Pages
179
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546658
Barcode
4990010025111.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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