Adarsh Library, Jaipur

Mahabali Endra

Gkumar Sushi · 2011/03

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हाबला
इन्द
किमोर-उपन्यास-माला पम-५५

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लेरक्क-सुशीलकुमार
चित्रकार-हरिपालत्यागी
महाबली
इन्द्र

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पाज से हजारों वर्ष पहले —तब न माज की तरह सम्पना पी, न देश था, न सीमाएं। मनुष्य मलग-अलग दल बनाकर पहा-यहां विचरता रहता। हर दल एक पूरा परिवार पा। मव यम बरसे मोर जो कुछ जुटता, सभी घरावर वटि लेते । देव जाति के ऐसे ही एक दल का नेठा या महावली इन्द्र-संसार के इतिहास का सम्मवत: पहला ब्यक्ति, जिसने शासन की नई प्यास्या स्थापित की । पुराणों में उसके सम्बन्ध में अनेक चमस्कारमरो कथाएं हैं, पर वैदिक साहित्य में यह एक महाबली पोद्धा के रूप में सामने पाता है । उसने मनंक बनवान शत्रुपो का कप करते तया भनेरु व्यक्तियों से मित्रता करके देव जाति के लिए परती और वैभव जुटाया था । इस उपन्यास में प्रामाणिक लम्पों के मापार पर देवासुर-गंग्राम की रोचक कया प्रस्तुत करने को पेप्टा की गई है। -

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पाज से हजारो वर्ष पहले-~तम न भाम को तरह गम्मता भी, ग देश था, में सीमाएं। मनुष्प मतग-अलग दन बनाकर पहा पहा विपरता रहता। हर दल एक पूरा परिवार पा। सब धग करते गौरको कुरा जुटता, सभी परावर परि सेते । देव जाति मे ऐसे ही एक दाना नेता पा महावलो इन्द्र-संसार के इतिहास का सम्ममा पहला मति, जिसने शासन की गई परस्पा स्थापित की । पुराणों में उसके सायना में पनेरु पमसारभरी कपाए है, पर वंरिक साहित्य में वह एक गहापसी योजा के रूप मे सागो पाता है। उसने पोक पसवान पापों का मम करके सपा पनेरु पश्तियो से मिनता करते देव जाति लिए भरती पौर बैभव जुटाया था । इरा उपमारा में प्रामाणिक तमों के मापार पर देशगुर-संग्राम को रोक कया प्रस्तुत करने की पेया की गई है।

किशोर-उपन्यास-माला (सचित्र, सरस तथा स-उद्देश्य ) हम इस लोकप्रिय उपन्यास माला के अन्तर्गत एक-दो या चार-छ: नहीं, पचास से भी ज्यादा रचनाएं प्रकाशित कर चुके हैं, और करते जा रहे हैं । ऐतिहासिक नायक-नायिकाएं, 'अरख की रातों के राजा- रानी, राष्ट्र और विभिन्न धर्मो के नायक, शिकार की रोमांचकारी गाथाएं, प्रख्यात साहित्यकारों का जीवन और शेक्सपियर के नाटकों की कथाएं--कोई भी विपय ऐसा नहीं, जिसकी जानकारी इन रोचक उपन्यासों के माध्यम से न दी गई हो । राष्ट्र के होनहार नागरिकों का निर्माण- यही है हमारा उद्देश्य । हमारे यहां से प्रकाशित रोचक उपन्यास श्री कृष्ण वीर रस से परिपूर्ण भीष्म कर्ण अर्जुन तात्या टोपे जय भवानी वाजीराव पेशवा वीरांगना चेन्नम्मा सम्राट शिलादित्य खूव लड़ी मर्दानी चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य चित्तौड़गढ़ की रानी गढ़मंडल की रानी महावली छत्रसाल गुरु गोविन्द सिंह वीर कुंवर सिंह प्राचार्य चाणक्य हल्दी घाटी दुर्गादास महाबली इन्द्र उदयन चन्द्रगुप्त मौर्य वीर कुणाल अन्य महापुराणों पर यावाग्नि महाकवि कालिदाम पापि का पाप गुरु नानक देव शान्ति-दूत नेहरू गुदडी का माल : मालवहादुर मदुरा को मोनाक्षी देवता हार गए मबाट मोक गुरु अमरदास गुरु मंगद देव गौतम बुद्ध दापू रवि बाबू संगपियर नाटकोपर ग्राधाग्नि तूफान में कयेय जूलियस सीजर हैमलेट गजा लियर भूल पर भूल गेमियो जूलियट वेनिस का सौदागर राई से पहार शिकार एव जान-विज्ञान पर प्राधाग्नि कपा मोर लल्ली बाप का शिकार परव के मसरारे हाथी का शिकार मगरमच्छ का शिकार ढेल का शिकर दैत्याकार पक्षी पा शिकार पूपू मालीवाया घालीस चोर उमेश प्रकाशन 11मार नाही.

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-
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१
०००
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दिन
ढल गया था । सूर्यास्त को प्राभा नदी के वक्ष पर धीरे-
धीरे हिल रही थी। रेत के कणों से टकराकर सूरज की
लाल चमकीली किरणें इधर-उधर विखर जाती थी। उत्तर
की ओर थोड़ी ही दूर पर एक छोटा-सा गांव दिखाई पड़ रहा
था। इस समय यहां से केवल लाली में नहाए छप्पर ही देखे
जा सकते थे । उन पर धुएं की एक तह बिना किसी प्राधार
के लटकी जान पड़ती थी, जिसका रंग कही गाढा लाल था,
कहीं नीला।
नदी के एकदम किनारे एक बड़ा-सा पेड़ था, जिसकी
कुछ डालें पानी पर दूर तक फैली हुई थी। टहनियां हवा में
झूल-झूलकर पानी को छू लेती थीं।
चारों ओर शान्ति छाई थी-
हां, एकाध बार घोंसले में लौटते सहचर को देखक
गत में किसी पक्षी का कलरव गूंज उठता, फिर
4

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अचानक मन्नाटे को चीरकर कही मे तीखी शंख-ध्वनि
गूंज उठी । एक बार, दो बार, फिर कई बार । साथ ही घोडे
की टा उभरी और योड़ी ही देर में पेड़ों के झुरमुट के बीच
की पगडंडी से घोड़े को नंगी पीठ पर सवार एक युवक निकल
पाया।
सतर्क दृष्टि से इधर-उधर देखता वह पेड के नीचे
आ खड़ा हुआ। उसके लम्बे और मुनहरे बाल हवा में
लहरा रहे थे । ऊचा माथा, बड़ी-यडी मुन्दर पीली आंखें,
पुतलियों का रंग हरा था, पर उनसे जैसे तेज की धारा झरी
पड़ती थी। लम्बी और ऊंची नाक, सुन्दर कटावदार होठ ।
अभी उसकी वय अठारह-उन्नीस से अधिक नहीं लगती
थी। दाढ़ी-मूछों की जगह कुछ मुनहरे रंग के बिसरे-बिखरे-से
वाल थे, जिनसे उसके सुकुमार चेहरे पर गम्भीरता की छाप
उभर आई थी।
नीचे उतरकर उसने घोड़े की पीठ थपथपाई, फिर कुछ
ग्रागे वढकर बार-बार पूरव को ओर फैले घने जंगली प्रदेश
की ओर देखने लगा । लेकिन कही कुछ भी नहीं दिखाई पड़ा।
उसने फिर शंख होठों से लगाया और उसकी रुवा-रुककर

१२ महावली इन्द्र होने वाली तीखी ध्वनि फिर से वातावरण में गूंज उठी। बड़ी देर तक वह उत्तर सुनने के लिए कान लगाए खड़ा रहा, पर व्यर्थ । चिन्ता से सिर झटककर उसने दोनों हाथों को अगल-बगल तानकर जमुहाई ली। उसके ऊंचे कन्धे और भी चीड़े लगने लगे, साथ ही बांहों की पुष्ट मछलियां उभर आई । वक्ष पर पड़ी बाघ की खाल भी जैसे कुछ और तन - उठी। शंख रेत पर रखकर वह पानी में उतर पड़ा। हाथ-मुंह धोकर वह अंजुलियां भर-भर पानी पीने लगा। ठीक उसी समय जान पड़ा कि किसी की पदचाप सुनाई पड़ रही है। उसने कान लगाकर सुनने की चेष्टा की, फिर जल्दी-जल्दी पानी से बाहर निकलकर घोड़े के पास आ खड़ा हुआ । रेत पर पड़ा शंख वैसे ही पड़ा रहा । उसने पेड़ के सहारे रखा हुआ लम्बा और मजबूत धनुप उठा लिया। पठारी क्षेत्र में अपने हाथों से उसने एक हरिण मारा था। धनुप उसी की लम्बी और चिकनी सींगों से बना था। डोर की जगह प्रांत लगी थी। धनुप उठाकर उसने धरती पर टिकाया और पूरी शक्ति लगाकर प्रत्यंचा चढ़ा दी। उसके गोरे चेहरे पर लाली छा गई। पाहट के साथ-साथ कुछ लोगों के बोलने की भी आवाज सुनाई पड़ने लगी। एक हाथ में धनुष और दूसरे में वाण लेकर वह ध्यान से सुनने लगा-नहीं, शत्रु नहीं, मित्र हैं। उत्सुक होकर वह कई पग आगे बढ़ गया। थोड़ी ही देर बाद घने भाड़ों को प्रोट से उसी की तरह गोरे और लम्वे- चौड़े पाठ-दस युवक बाहर निकल पाए । उनके साथ-साथ उनकी अपेक्षा कुछ मटमैले उजले रंग का एक प्रौढ़ व्यक्ति था, जिसे वे लोग कभी धक्का दे देते थे और कभी ठोकर मारकर

महावनी इन्द्र
आगे बढ़ाते थे। वह गिरता-पड़ता, चुपचाप बड़ा प्रा
रहा था।
वाण कंधे से लटकते तूणीर में डालकर इन्द्र ध्यान से
उस व्यक्ति की ओर देखने लगा और धीरे में बड़बड़ाया,
'अमुर!' उसकी भौहों पर वल पड़ गए, अांखें चमक उठीं।
पास पहुंचकर एक युवक ने असुर की पीठ में पत्थर के
बरखे की नोक चुभा दी।
पीड़ा से वह चीख पड़ा । मभी ठहाका लगाकर हम पड़े।
एक ने आगे बढ़कर अमुर की गर्दन पर घूसा मारा ; वह
नीचे गिरकर विलविला उठा।
"इन्द्र, तेरी जय हो ! हम अग्नि, मरुत्, अश्विनीकुमार,
मनु आदि देवगण तुझे प्रणाम करते हैं । तू बलगाली है।"
इन्द्र ने दायां हाथ उठाकर उन्हें अभयदान दिया। साथ
ही प्रश्नभरी दृष्टि से अमुर की ओर देखने लगा।
अग्नि ने आगे बढ़कर कहा, "यह असुरों का सेवक दिमि
है । वहां, उस ओर नदी पार करके हम देवों की सीमा में घुस
ग्राया था। चोर है, दस्यु !"
इन्द्र की प्रांखें जैसे भक से जल उठी, वोला, "तू ?"
अमुर ने जोर से सिर और हाथ हिलाकर 'ना-ना' किया,
"मैं चोर नहीं हूं। मैंने कुछ नही चुराया है।"
अश्विनीकुमारों में से एक ने बढ़कर कहा, "नही चुराया
तूने ? सेल ऋपि का अन्न कहां गया ?" उसने मुड़कर इन्द्र
से कहा, "पिता देव मार्तण्ड ने खेल ऋपि को यज्ञ में बंटा अन्न
दिया था। उसे कुटिया में रखकर ऋपि सोम घोंटने लगा।
लौटने पर देखा, तो अन्न का एक दाना भी नही था । हम
उधर पहुंच गए थे, सुनते ही योजने लगे। उस समय
तट पर यही मिला । असुर है-चोर और कौन हो

१४ महावली इन्द्र "अन्न इसने क्या कर डाला ?” इन्द्र ने पूछा। अग्नि ने तुरन्त कहा, "हमें देखकर नदी में फेंक दिया होगा।" इन्द्र को जैसे वहाना मिल गया, बोला, "हां, ऐसा ही होगा। इसे ले चलो, सुरनायक द्यौस दण्ड देगा।" वहां खड़े सभी युवकों के चेहरे उदास हो गए । अग्नि बोला, "तेरा पिता क्या दण्ड देगा? तू अाज्ञा दे, दण्ड हम देंगे।" इन्द्र का चेहरा मलिन हो गया। संभलकर वोला, "नहीं, पिता देव द्यौस राजा है । दण्ड वही देगा। वहीं दे सकता है।" " सब चुप ही रहे । थोड़ी देर बाद इन्द्र ने ही फिर पूछा, "और?" सारे युवक सकुचा गए । सहमे हुए स्वर में अश्विनी- कुमार दस्र ने बताया, "इस दस्यु को पकड़कर हमने तो सोचा था, इन्द्र बहुत प्रसन्न होगा... "और प्रसन्न होकर इन्द्र असुर का मांस खा लेगा।" इन्द्र क्रोध से बोला । उसकी गरदन की नसें तन गई। युवकों ने भय से अांखें झुका लीं। "अश्विनीकुमार नासत्य, मैंने तुझसे क्या कहा था ? नासत्य ने डरते-डरते धीरे से कहा, "कृष्ण मृग लाने के लिए।" "कहां है ?" नासत्य सिर झुकाए खड़ा रहा। इन्द्र ने क्रोध से अपनी ही जांघ पर चूंसा मारते हुए कहा, "नहीं लाया ?" फिर दायीं भुजा अाकाश में तानकर बोला, "मैं इन्द्र, दोनों अश्विनी- कुमारों को वंचित करता हूं। अाज से इन्हें यज्ञ में देवों का -

महावली इन्द्र
भाग नहीं मिलेगा।"
दोनों अश्विनीकुमार हाथ वांधकर उसके पैरों पर गिर
पड़े, लेकिन इन्द्र ने उपेक्षा कर दी और मुड़कर वोला,
"अग्नि ! उधर, वृक्ष के पास मेरा मारा हुअा कृष्ण मृग पड़ा
है, उठवा ला।"
वह लपककर एक ही छलांग में घोड़े की नगी पीठ पर
बैठ गया और पलक झपकते प्रांवों में प्रोझल हो गया।
अश्विनीकुमारों ने भय से प्रांमें फाड़कर अपने साथियों को
ओर देखा, पर उनमें से कोई कुछ भी नहीं बोता। उनसे
अांखें मिलाए बिना सिर झुकाकर सब इन्द्र के बताए हुए वृक्ष
की ओर बढ़ चले।
"अग्नि, हमें नहीं ले चलोगे ?" नासत्य ने गिडगिडाकर
पूछा।
अग्नि ने ठमककर धीरे से कहा :न्द्र जाने । ' और वह
भी मुड़कर साथियों के पीछे-पीछे चला गया ।
दोनों अश्विनीकुमार अपमान मे काल पड़ गए थे। वह
चुपचाप गडे, उन्हें जाते देखते रहे।

२ 000 सांझ को इन्द्र के गांव में बड़ी हलचल मच गई। रोज ही इस वेला पूरा उत्सव-सा होता था। यज्ञशाला में गांव का हर व्यक्ति आ जुटता । दिनभर में जो भी कमाई होती थी, सब उसे लाकर यज्ञशाला में रख देते थे। फिर हवनकुण्ड में अग्नि देवता का आवाहन किया जाता। चारों ओर प्रजा वैठती और वीच में गणपति बैठता था। उसके निकट ही पुरोहित बैठता, जिसे ब्राह्मणस्पति भी कहते थे। आज से कई हजार वर्ष पहले आर्य जाति की ही सबसे प्राचीन शाखाओं में से एक शाखा 'देव' अथवा 'असुर' कही जाती थी। इस गोत्र की माता थी अदिति । वहुत पहले गण- गोत्रों का नाम माता के नाम पर ही होता था। गण की सवसे योग्य और श्रेष्ठ स्त्री ही माता चुनी जाती थी; और गण का हर व्यक्ति उसका पुत्र माना जाता था। फिर यह परम्परा बन जाती थी कि जो भी स्त्री माता चुनी जाती, उसका महाबली इन्द्र पर नाम वही हो जाता, जो पहली माता का पा। मदिति के नाम पर देवों के समूचे गण का नाम मादित्य था। उनमें सूर्य अथवा मित्र, वरुण आदि बारह मादित्व प्रसिद्ध हुए हैं। आदित्यों की संख्या बहुत बढ़ गई थी। कुछ लोग अब भी दूर पश्चिम-उत्तर में अपनी मातृभूमि में ही रहते थे, वहां पाहार, जल तथा अन्य सुविधाओं का प्रभाव हो जाने पर वाकी लोगों को दूसरे निवास स्थान की खोज में निकलना पड़ा। वर्षों तक राह में अनेक जातियों और गणो से लड़कर आदित्यों को अपने लिए जगह बनानी पड़ी। कभी माता दिति के पुत्र दैत्यों तथा माता दनु के पुत्र दानवों से युद्ध होता, पौर कभी विनता के पुत्र वैनतेपो अथवा गरुड़ो या माता कद्र के कारवेयों अथवा नागों से। कही वे जीर पर रोकेको को जला दिया, या उन लोपोर इन कार कर लिया और सर कर या फिर से प्रभार हो : प्रागे बढ़ते गए। इस बीच धरती नमक के ... समूहों का प्रापस में भी कई सरकार देनी नए गणों में बंट जाते। दो प्रमुग प्रादित्यगणों-कित और प.-मो में बट्टा मोह था। दोनों ने अपना नाम निर: न्याया। किन्तु, यह स्नेह भी बहुत दिन तक गरमः । पहले उनमें भी मनमुटाय हो गया था। कोटे-मोरे दान है। द की प्रजाम मे वादा जल से भो में मन- बनके माता देना - - M wws . म.ई. दी यलिट का अनुहीन्हे ने करने r , के उन्न र जाति का काम ग्रामकलशाली और वित्राकान लोगों की कमी नयी ने जो गम का हर व्यक्ति कुछ न कुछ कमाता ही या बालक, वृद्ध और रोगी या पंगु व्यक्तियों को छोड़कर बनी को कान करना पड़ता। वीरे-धीरे उन लोगों को 'ज्ञान' का नाभाल हना। लोग वृद्धों का आदर तो करते ही थे, वुद्धिमानों का भी आदर होने लगा। जो लोग सोच-समझकर संकट के समय गणनायक को परामर्श देते थे या तरह-तरह दुख-वाघा से बचने का उपाय सुझाते थे, उन्हें भी शारीरिक मेहनत करने से छुट- कारा दे दिया गया था। बहुत पहले अंगिरा ऋषि को ऐसी ही छूट मिली थी। इसी अंगिरा ने सबसे पहले अग्नि को खोज निकाला था। दो काठों या पत्थरों को आपस में रगड़- कर आग पैदा करने की विद्या उसी ने खोजी थी। देवों और असुरों के परस्पर झगड़े के बाद बुद्धि के आधार पर अपनी जीविका चलाने वाले भी वंट गए थे। अंगिरा के शिष्य आचार्य शुक्र असुरों के पुरोहित बन गए थे और अंगिरा के पुत्र प्राचाय वृहस्पति देवों के । इन लोगों का एक विशेष

महाबली इन्द्र
१६
.-..
काम हो गया था-यज्ञ कराना ।
समूचे गण को ही सामूहिक रूप से ब्रह्म कहते थे।
ब्रह्म के सामने गण के हर व्यक्ति की कमाई रसकर पुरो.
हित देवताओं की उपासना कराता था । उद्गाता स्तुति गाते
थे । यज्ञकुण्ड में अग्नि को हवि दी जाती थी। गण की गारी
कमाई में से थोड़ा-थोड़ा भाग निकालकर पुरोहित देवताओं
के नाम पर अलग रख देता। उनके देवतागों के नाम थे जपा,
सूर्य, अग्नि, सोम, प्राकाग, पृथ्वी प्रादि । उन दिनों अपना
जीवन चलाने में जिस चीज का भी महाग मिलता, ये सी
की पूजा करने लगते थे। कभी-कभी ऐगी-ऐसी शातियो यो
भी पूजा होने लगती थी, जिसमें वे डरते थे गाजिये ।
में कुछ समझ नहीं पाते थे।
इन्द्र के गण का नायक इन्द्र का 0
था। उसे गन् अथवा राजा भी कहते।
गतिमानी व्यक्ति ही राजा चुना जा1 ५.) . . .)
मलाह में वह गण के ऊपर शासन । २ .
गन की रक्षा करता था। वह 2 )
निग नहीं था।
पनगाला में देवो की Nो को
की तरह प्रसन्नता नहीं थी।
जोर से बातें कर रहे थे !
ठहाके नहीं सुनाई १३३
भी तना-तना-सा था । उस मा mistry
पुरोहित वृहस्पति प्रांस मुद्दे पता )
"गणपति की जय हो।" नगी
सब को आंखे उस और
ममय की सब से सुन्दर मोरगीना

२२ महाबली इन्द्र । क्या ? . क्रोध से विफर उठी, 'तू राजा है। तेरे होते क्या मुझे ही बताना पड़ेगा कि दोनों अश्विनीकुमार कहां हैं !" गणपति चिन्ता में पड़ गया। अश्विनी कभी इस तरह नहीं बोलती थी। हुआ कुछ समझ में नहीं आता। राजा ने वृहस्पति से पूछा, "आंगिरस, तू जानता है, दोनों अश्विनीकुमार कहां हैं ?" वृहस्पति ने अांखें खोल दी और एक बार पूरे मण्डप पर दृष्टि डालकर जैसे किसी को खोजता रहा, फिर गम्भीर म्वर में वोला, "इन्द्र के पास होंगे।" उसका कठोर स्वर सुनकर गणपति और भी उलझन पड़ गया, बोला, “इन्द्र कहां है ?" "यज्ञशाला के द्वार पर होगा।" "वहां क्यों है ? अब तक अपना भाग लेने यज्ञमण्डप में क्यों नहीं आया?" पल भर चुप रहकर वृहस्पति अपनी चमकीली आंखों से अश्विनी की ओर देखता रहा, फिर भारी स्वर में बोला, "आज इन्द्र ने क्रोध में आकर दत्र और नासत्य को यज्ञ में भाग लेने से वंचित कर दिया है। उन्हें यज्ञमण्डप में आने से रोकने के लिए ही वह बाहर खड़ा होगा।" गणपति का चेहरा क्रोध से तमतमा उठा। फिर भी अपने को संभालकर बोला, "तू जानता है, इन्द्र ने अश्विनीपुत्रों को इतना भयंकर दण्ड क्यों दिया?" "अग्नि जानता है।" बृहस्पति ने मण्डप में पूर्व और दक्षिण के कोने में सतर्क खड़े अग्नि की ओर संकेत किया। राजा ने उस पर दृष्टि डाली। अग्नि सिर झुकाकर धीरे-धीरे पास आ खड़ा हुआ। पर राजा ने उससे कुछ नहीं पूछा । एकाएक कोपकर

महाबली इन्द्र
बोला, "पर ऐसा हुग्रा क्यों ?"
बृहस्पति ने कहा, "इन्द्र प्रजा है, अश्विनीकुमार भी प्रजा
हैं । प्रजा प्रजा को दण्ड नहीं दे सकती।"
'राजा न्याय करे !" अश्विनी वहीं खड़े-खड़े चिल्लाकर
बोली, "ब्रह्म प्राज्ञा दे, राजा न्याय करे।"
"हां, राजा न्याय करे।"
राजा चिन्तित होकर बृहस्पति की ओर देखने लगा। उसे
कोई रास्ता नहीं सूझ रहा था।
पर बृहस्पति ने भी प्रजा के स्वर में स्वर मिलाकर कहा,
"तुझे न्याय करना ही होगा, राजा ! प्रजा पर अत्याचार होगा
तो तू असुर कहा जाएगा।"
राजा ने सिर झुका लिया। कुछ देर सोचता रहा, फिर
बोला, "अच्छा, मैं न्याय करूंगा, पर पहले इन्द्र से पूछ लूं ।
यज का समय निकला जा रहा है । प्रागिरस, तू देवताओं की
वलि देकर पहले भाग वांट दे।"
अश्विनी चिल्लाई, "और मेरे बेटे क्या खाए गे? उनका
भाग कौन देगा?"
राजा के माथे पर सिकुड़नें आई । उसे लगा कि इन्द्र के
कारण सभी उसका अपमान कर रहे हैं। बृहस्पति भी जैसे
होंठों में ही हंस रहा है । वह धीरे से बोला, "तेरे बेटे भूसों
नहीं मरेंगे। आंगिरस..."
बृहस्पति यज्ञ कराने लगा। यज्ञमण्डप में देवों के मृदु-
गम्भीर स्वर गूज उठे, उद्गाता मन्त्र गा रहे थे :
"प्रजारक्षक और लोकप्रिय अग्नि को हम पुकारते हैं । हे
अग्नि, प्रानो, हमारे यज्ञ में बैठो..."
"हे देवदूत, हमारे लिए तुम देवों को यहां ले प्रायो, और
हमारा हव्य देवों तक ले जायो...'
"

२४
महाबली चन्द्र
" अगि, तुग पी देकार नुलाए गए हो, तुग प्रकाशमान
हो, हगारी रक्षा गरो, हमें पन दो, असुरों को जला दो..."
राजा ने गुण में हनि डाली । पता नहीं गयों नाज भाग
भगकार जली नहीं, जो नहीं उठी -पुना ही धुनां छा
गगा । हरपति गाहा, "देगा परान्न नहीं है।'
प्याकुल होकार राजा बोला, “पयों ? हमरी गया अपराध
हुशा?
-
"अपराष? गण भूप रो पुगी है । प्रजा पर अत्याचार हो
रहा है। हमें पर रहा है। राजा, इसी कारण सारा गण
श्रापरान है, देवता भी।"
राजा भगगीत-सा उठ खड़ा हुमा । जल्दी से बोला,
"मेरा भाग दे, शांगिरस !'
गृहरपति ने गशगठप में एक पोर रसे प्रान्न, पाल, गा,
पुरा इत्यादि की भोर रांगेत कर दिया। राजा ने अमरज रो
पूछा, "इतना!"
"हो । इरागें अश्विनीगुगारों का भी भाग है। प्रजा के
परी भाग गा पिनारी भी राजा ही होगा।"
बिना एक शब्द भी बोले, राजा सिर शुगाए हुए गशशाला
रोनाहर निकल गया।
बहरपति ने शाज्ञा दी, "अग्नि, ये तीनों भाग राणा के
यहां शेण दे।"

0
20
७००
त्यर के बड़े-से कटोरे में ऊपर तक भरा सोमलता का
रस इन्द्र एक ही बार में पी गया और क्रोध से अांखें चढा
कर बोला, "वृहस्पति कह रहा था न? मैं जानता हूं।
अाज कई महीने से वह मुझ पर रुष्ट है । देखूगा ।"
उसकी हुंकार सुनकर पास बैठे युवक डर गए । अग्नि मे
कहा, "इन्द्र, तेरा पिता द्यौस भी तुझ पर रुष्ट है ।
"क्यों ?"
"तेरे कारण उसका अपमान हुअा है। वह राजा है, तू
प्रजा है। अश्विनीकुमार भी प्रजा हैं । बृहस्पति कहता है,
प्रजा प्रजा को दण्ड नही दे सकती।"
इन्द्र खड़ा होकर वाहें तानता हुमा वोला, "मैं दण्ड दे
सकता हूं। मैं न्याय कर सकता हूं । न्याय शक्तिशाली करता
है। मेरी भुजानों में शक्ति है।" उसने दोनों बांहें मोड़ी।
मछलियां छटककर पत्थर की तरह कड़ी हो गः

E
उठाकर वह फिर से रस पीने लगा।
युवकों ने एक साथ प्रशंसाभरे स्वर में कहा, "तू बलवान
है, इन्द्र!"
इन्द्र इधर से उधर टहलने लगा। उसके चौड़े, ऊचे कन्धे
सांड के डील की भांति बलिष्ठ दिखाई पड़ते थे।
अग्नि फिर धीरे से बोला, "पर राजा तुझसे पूछेगा।"
"क्यों पूछेगा ?"

"राजा का अपमान हुआ है । वह अपमान नहीं मह
सकता।"
एकाएक मुड़कर इन्द्र अग्नि के सामने आ खडा हुआ ।
उसकी पीताभा मिली लाल अांखें उत्तेजना के कारण और
भी बड़ी-बडी हो गई थी। वोला, "मैंने दम्भी अश्विनीकुमारों
को जान-बूझकर उनको कायरता और पालस्य के कारण
दण्ड दिया है । इस बात से तो तेरे राजा का अपमान होता
है, और उस तरफ प्रजा पर रोज असुरों का अत्याचार होता
रहता है । कभी वे हमारी गायें छीन ले जाते हैं और कभी
नदी पार करके अन्न चुरा ले जाते हैं । उस दिन वे नदी/

महाबली इन्द्र
"
-
पर नहाती हुई देवबाला इला और उसके पुत्र गय को
ड़कर नाव पर लिए जा रहे थे, तब किसने उनकी रक्षा
थी ? मैंने और तूने । तब तेरा राजा कहां था ?"
अग्नि धीरे से बोला, "इन्द्र, वह तो हमारा कर्तव्य था।
जा हमें इसीलिए यज का भाग देता है।'
पर इन्द्र ने जैसे उसकी बात सुनी ही नहीं। वह उसी धुन
कहता गया, "इन सवसे तेरे राजा का अपमान नहीं होता?
प्रसुर वरुण के उपासकों के सैनिक जव भी चाहते हैं,
नदी के पानी पर रोक लगा देते हैं । और इस ओर हमारे
लिए मरुस्थल हो जाता है । देवों के बालक एका-एक बूंद पानी
के लिए तड़पते हैं । मैंने कितनी बार कहा कि अमुरों से लड़-
कर जल पर अधिकार कर लिया जाए। पर राजा कुछ सुनता
ही नहीं। जब देखो, कायरों की तरह न लड़ने का उपदेश
देता है।"
अग्नि बोला, "पर राजा किसी कारण से ही तो ऐसा करता
होगा । असुर बड़े प्रतापी हैं । अश्विनीकुमार दस्र कहता था
कि युद्ध में भी अगर बड़े मायावी हैं। जल पर भी उन्हीं का
अधिकार है। उनसे युद्ध में पार पाना कठिन है। उनके पास
बड़े-बड़े पुर हैं, पत्थरों की इतनी मोटी-मोटी दीवारें ! तांबे
के भी कितने ही नए-नए अस्त्र-शस्त्र हैं । भण्डार के भण्डार
भरे पड़े हैं। और तुम्हारे पास क्या है ?"
अग्नि ने पास बैठे युवकों की ओर अंगुली उठाकर कहा,
"अंगुलियों पर गिनने लायक बाण और पत्थरों की गदाएं।
चार-छ: के पास ही तांबे के एक-दो शस्त्र होंगे। अगर मरिच
पणि ने असुरों के यहां से चुराया हुअा तांवा हमारे हाथ न
वेचा होता, तो हम लोग अभी तक काठ और पत्थर के फाल'
से ही धरती जोतते होते।"

२६
महाबली इन्द्र
गायद अग्नि की बात से इन्द्र कुछ प्रभावित हुआ । थोड़ी
देर सोचकर उसने कहा, "दोनों अश्विनीकुमारों को मेरे पास
आने के लिए कह दे । उनके बिना हम असुरों से कितनी ही
बातों में पिछड़े रह जाएंगे।"
अग्नि बोला, " हां, योपधि में उनसे बढकर कौन है ?
पलक झपकते रोग को वश में कर लेते है। फिर नौका चलाने
में असुरों से भी बढकर..." कुछ रुककर अग्नि ने समझाया,
"राजा को सब कुछ बताकर एक वार देख ले..."
इन्द्र फिर से उत्तेजित हो गया, "क्या करेगा राजा वह
कभी असुरों से युद्ध नहीं करेगा । हमें कभी न जल मिलेगा,
न भरपेट भोजन । नहीं, इस तरह नहीं चल सकता। इन
निर्मम, क्रूर असुरों को तू नही जानता क्या !"
अग्नि चुप ही रहा । असुरों के अत्याचार देखकर वह भी
बहुत चिन्तित रहता था । उसी के सामने एक दिन असुरों ने
नन्हे-से मघ को पानी के लिए कितना तड़पाया था !
?
वालक मघ. को वे देवों की वस्ती से पकड़ ले गए थे।
अग्नि उसी को खोजता-खोजता चुपके से नदी पार करके
असुरों की सीमा में बडी दूर तक चला गया था। प्यास से
तड़पते मघ को पहले तो असुरों ने कटोरा भर पानी दे
दिया। पर जैसे ही उसने होंठ लगाया, एक असुर ने पत्थर
मारकर कटोरा फोड़ दिया। प्यास से तड़फड़ाता मघ
विलख-बिलखकर रोने लगा, पर असुरों ने वही खेल कई वार
किया। अखिर एक पत्थर मघ के माये में लगा वह तड़प
कर नीचे गिर पड़ा।
उत्तेजित होकर अग्नि ने कमर में खुसे दो पत्थर निकाले
और एक झोपड़ी के पास जा खड़ा हुआ। पहले नो

महावली इन्द्र
छप्पर में हलका-सा धुवां रिसता रहा, फिर थोड़ी ही देर बाद
हवा के झोंके के साथ लपटें उठने लगीं । साथ ही असुर स्त्रियां
तथा बच्चे भयभीत होकर चीख पड़े, "आग-आग।"
कुछ ही पल बाद बस्ती के बीच में एक और झोपड़े से
आग की लपटें उठने लगी और फिर पूर्वी छोर पर बना झोपड़ा
भी
एकाएक भक से जल उठा। गांव के बीच में बने पत्थर
के चबूतरे के पास आदिमाता तथा पशुदेवता की उपासना के
लिए जुटे हुए असुरों में भगदड़ मच गई। कई बूढ़े असुर धरती
पर पसरकर मिट्टी में माथा रगड़ने लगे तथा जोर से चिल्ला-
चिल्लाकर देवताओं की प्रार्थना करने लगे।
अग्नि उनकी घबराहट देखकर मन ही मन हंसा और
चक्कर काटकर चबूतरे के पास पत्थर के खम्भे से बंधे मघ
के पास जा पहुंचा । निकट ही तांबे के छोटे-से घड़े में असुरों
के उपासक ने पूजा के लिए पानी रख छोड़ा था । अग्नि ने उसे
उठाकर मघ के होंठों से लगा दिया।
एक साथ तीन-तीन झोपड़ों में आग लग जाने से असुर
बहुत घबड़ा गए । भगदड़ के कारण कोई किसी को
संभाल नहीं पा रहा था । लपटें भड़ककर और भी फैलने
लगीं। चबूतरे की ओर देखने का समय किसी के पास नहीं
था। जल्दी-जल्दी बन्धन काटकर अग्नि ने मघ को मुक्त
किया। पूछा, "मेरे साथ दौड़ सकता है ?"
"हां ।” मुक्त होकर प्राण बचाने का उत्साह मघ में कम
नहीं था। अग्नि के कुछ कहने के पहले ही वह नदी की ओर
भागा । अग्नि उसकी बांहें पकड़कर दौड़ने लगा । नदी के तट
पर पहुंचकर भी दोनों ने सांस नहीं ली। आसपास कोई
नौका नहीं दिखाई पड़ रही थी। थोड़ी ही दूर पर असुर
नाविकों के झोपड़े थे। कहीं उनको जरा भी आहट मिल गई
थे

महावली इन्द्र
तो लेने के देने पड़ जाएंगे। साहस करके अग्नि वालक के साथ
भरी नदी में उतर पड़ा।
अभी वे मंझधार में ही पहुंचे थे कि पोछे जोर से हल्ला
मचा । लगा कि कई व्यक्ति चिल्लाकर पानी में कूद पड़े
और छप-छप तैरते हुए उनका पीछा करने लगे। अग्नि ने
मुड़कर उस ओर देखा। उसकी सांस ऊपर की ऊपर, नीचे
की नीचे रह गई।
"अव ?" अग्नि ने हांफते हुए बालक से इस प्रकार
पूछा, जैसे वह मघ नही इन्द्र हो, जिसके बल का सहारा
पाकर अग्नि कुछ भी कर सकता है।
पर मध घबराकर रोने लगा। बोला, "नाव भी पा रही
है। हाय मां! वे अपने भयानक देवता के सामने मेरी वलि
और कोई चारा नहीं था। अग्नि ने उसे डांटकर कहा,
"चुप ।" और उसे अपनी बाई भुजा का सहारा देते हुए बोला,
"जितनी तेज हाथ-पांव मार सके, मार ।"
बरसात अभी-अभी बीती थी। नदी का पाट जैसे कोसों
तक फैला हुअा हो। समुद्र की तरह दूर तक जल ही जल
दिखाई पड़ता था। उस सकट में भी अग्नि मन ही मन हंस
पड़ा । नासत्य की बात याद आई, "अग्नि, तेरी समाधि कभी
जल में ही होगी !"
मघ को वांह पर संभाले अग्नि बाण की तरह तेजी से
पानी पर फिसल रहा था। असुरों के तैरने की छपछपाहट
तथा उनके नाव के चप्पुत्रों की आवाज बहुत निकट सुनाई
पड़ने लगी थी। अगर वे अनुमान लगाकर वाण चलाने लगे
तो? मध न होता तो अग्नि इन असुरों के घर-पानी में ही
उन्हें छका मारता। उनके जल के अधिपति देवाधिदेव वरुण

महावली इन्द्र
छप्पर में हलका-सा धुनां रिसता रहा, फिर थोड़ी ही देर बाद
हवा के झोंके के साथ लपटें उठने लगीं। साथ ही असुर स्त्रियां
तथा बच्चे भयभीत होकर चीख पड़े, "प्राग-आग।"
कुछ ही पल वाद बस्ती के बीच में एक और झोपड़े से
आग की लपटें उठने लगी और फिर पूर्वी छोर पर बना झोपड़ा
भी
एकाएक भक
से जल उठा। गांव के बीच में बने पत्थर
के चबूतरे के पास आदिमाता तथा पशुदेवता की उपासना के
लिए जुटे हुए असुरों में भगदड़ मच गई। कई बूढ़े असुर धरती
पर पसरकर मिट्टी में माथा रगड़ने लगे तथा जोर से चिल्ला-
चिल्लाकर देवताओं की प्रार्थना करने लगे।
अग्नि उनकी घबराहट देखकर मन ही मन हंसा और
चक्कर काटकर चबूतरे के पास पत्थर के खम्भे से बंधे मध
के पास जा पहुंचा । निकट ही तांबे के छोटे-से घड़े में असुरों
के उपासक ने पूजा के लिए पानी रख छोड़ा था । अग्नि ने उसे
उठाकर मघ के होंठों से लगा दिया।

४
०००
दो-तीन माह और बीत गए । यज्ञ होते रहे, पर न तो राजा
सका, न इन्द्र के विरुद्ध कुछ कहने का ही। उसने अश्विनी को
पता नहीं क्या समझा दिया था, वह भी चुप थी। हां, वृहस्पति
की चमकीली आखों के सामने राजा की अांखें झुकी रहती।
उसे लगता कि लगातार कोई उसका अपमान कर रहा है ।
इसी ग्लानि के कारण मन ही मन वह इन्द्र से और भी कुढ़ने
लगा था। इन्द्र की शक्ति उससे कही बढ़ी-चढ़ी है । वह राजा
है, फिर भी जो मन चाहे, नही कर सकता इन्द्र; मनमाना
कर सकता है।
उस दिन यज्ञशाला में बड़ी देर तक बातें चलती रही।
असुरों के आक्रमण बढ़ गए थे। राजा द्यौस जानता था कि
वरुण का प्रभाव असुरों पर ही नही और भी अनेक जातियों
पर फैला हुआ है । अासपास के कितने ही अनार्य राज्यों पर

महावली इन्द्र असुरों का दबदवा है । कई जातियां तो असुर वरुण की पूजा करने लगी थीं और कुछ अपने को असुर कहकर असुरों में ही मिलजुल गईं। इस कारण असुरों की शक्ति और भी बढ़ गई थी। राजा को हर बात पर लड़ते रहना पसन्द भी नहीं था। फिर पास में ही बसे असुरों के शक्तिशाली गण से युद्ध करने में तो उसे अपने गण का नाश ही दिखाई पड़ता। जीवित रहना है तो दूसरा उपाय करना होगा । एकाध वार तो उसने प्रजा से कहा भी था कि हमें पूर्व की ओर बढ़कर अपने लिए और भी भूमि तैयार करनी चाहिए । हमारी संख्या बढ़ती जा रही है । पणियों, तथा दूसरी अनार्य जातियों से सीखकर हम लोग अन्न उपजाना भी शुरू कर सकते हैं, पर इतनी ही धरती बहुत नहीं है, हमें और धरती चाहिए। दैत्यों और असुरों की तरह व्यापार भी अपनाना चाहिए । पर देवों के समूह में राजा के इस सुझाव का बड़ा विरोध हुआ था। बृहस्पति ने बताया था कि हम सुरगण श्रेष्ठ जाति के हैं। हमें अपनी भुजाओं के बल पर जीना चाहिए । व्यापार और खेती अनार्यों का धर्म है, हमारा नहीं। प्रजा इसे अपना नहीं सकती। राजा यह सुनकर चुप रह गया था, किन्तु वर्षों से सुरगण को अभाव में जीवन विताना पड़ रहा था। बस, किसी प्रकार काम चलता जा रहा था । कोई ठोस उपाय नहीं किया जा सका। गायों, घोड़ों तथा दूसरे पशुओं की संख्या कुछ बढ़ी जरूर थी, पर पेट भरने के लिए उतना ही काफी नहीं था। यज्ञ का भाग दिनोंदिन कम होता गया और अब स्थिति इतनी भयंकर हो गई थी कि विद्रोह के स्वर उठने लगे पहले यज्ञशाला के कोने में लगा हुआ अन्न का ढेर तथा दूध, । कुछ दिन -

महावली इन्द्र
मधु, तिल आदि ही काफी होते थे, लेकिन अब देवों की संख्या
इतनी बढ़ गई थी कि वह ढेर बहुत छोटा दिखाई पड़ने
लगा था।
कल सांझ को यज्ञभाग बांटा गया तो कई देव बिगड़
खड़े हुए थे । रानी ने कहा था, "एक मुट्ठी अन्न और मांस के
एक टुकडे से हमारा पेट नही भरता । इतना तो हमारे बालकों
के लिए भी काफी नहीं है। स्वर्ग का सुस भोगने वाली देव
जाति क्या अन्न के बिना भूखों मरेगी ?"
कल राजा ने सभी को अधिक से अधिक सामग्री जुटाने
की आज्ञा दी थी, पर आज कुछ अधिक नहीं जुटाया जा सका
था । राजा यज्ञशाला में बैठकर बृहस्पति तथा अन्य वृद्ध देवों
और ऋपियों के साथ विचार करने लगा। आखिर क्या किया
जाए ? पर उत्तर किसी के पास नही था। यज्ञशाला में बैठे
देवों और देवियों के चेहरे लगातार प्राधा पेट भोजन मिलने के
कारण मुरझा-से गए थे। बच्चों के कुम्हलाए हुए चेहरों की
ओर देखकर राजा को यज्ञ प्रारम्भ करने की ग्राना देने का
साहस नहीं हो रहा था। पता नहीं क्या हो! भाग बंटते
समय जब कल स्वयं रानी ही बोल पड़ी, तो अाज कोन चुप
रहेगा! राजा के चेहरे पर चिन्ता की परछाई साफ झलक
रही थी।
बृहस्पति ने कहा, "हमारे युवको में ही अनाचार बढ़ गया
है । अगर पूरा श्रम किया जाए, तो कुछ न कुछ और मिले
ही । अस्तु, राजन्, यज्ञ करने की प्राज्ञा दे।"
सुनकर राजा वौखला-सा गया। पूछ बैठा, "इन्द्र कहा
है ?"
बृहस्पति की तेजी से चमकती आंखों में पने व्यंग्य की
झलक मिली। राजा ने प्रांखें झुका ली। भयानक स्थि

महाबली इन्द्र एक-दूसरे के - बचने के लिए ही आज उसने एकाएक वर्षों बाद पहली बार इन्द्र का नाम लिया था। सभी जानते हैं कि राजा द्यौस और इन्द्र भीतर ही भीतर शत्रु हो गए हैं। पराक्रमी इन्द्र की शक्ति से शायद राजा मन ही मन डरता भी है, फिर उसे क्यों पूछ रहा है ? वृहस्पति ने कहा, "वह आज-कल केवल अनिष्ट की सूचना देने के लिए ही मुझसे मिला करता है। उस पर किसी का अंकुश नहीं।" ये शब्द राजा के लिए चुनौती थे। आज तक, सब कुछ होते हुए भी, किसी ने इस प्रकार खुले शब्दों में राजा का अप- मान नहीं किया था। क्रोध से लाल पड़कर वह गरज उठा, "तू क्या बोलता है, वृहस्पति ! यहां ब्रह्म है, गणपति है । ब्रह्म और गणपति के होते गण का एक भी व्यक्ति निरंकुश नहीं ।" बृहस्पति ने एक बार चारों ओर बैठी प्रजा पर निगाह डाली...हर आंख जैसे उसे अपना समर्थन करती-सी प्रतीत हुई। पूरे जोर से माथा ऊपर उठाकर बृहस्पति ने कहा, "है, इन्द्र निरंकुश है ! किसी से भी पूछ ले । इन्द्र जो चाहता है, वही करता है । राजा की अनुमति लिए विना वह युद्ध करता है और राजा की आज्ञा के बिना ही सन्धि भी करता है। कौन रोकता है उसे ?" राजा की भुजाएं फड़क उठीं। उसने कड़ककर कहा, "मैं । मैं राजा हूं। इन्द्र का पिता हूं। बुला इन्द्र को । उसके अनाचार के लिए मैं उसे दण्ड दूंगा... "मैं यहां हूं।" सहसा इन्द्र का हुंकार सुनाई पड़ा । यज्ञ- मण्डप के द्वार पर इन्द्र अकेला ही खड़ा था। लेकिन, उसके विशाल शरीर के कारण द्वार छोटा-सा लगता था। कोई दो . -

महाबली इन्द्र
-.-.-.-.-."
वर्ष वाद राजा ने इन्द्र पर सीधी दृष्टि डाली, कितना बदल
गया था ! उसकी आंखों में अब सुकुमार दृष्टि की जगह विद्रोह
की कौध थी और चेहरे पर कोमलता की जगह दर्प की
चमक । कन्धे वैल के डील की तरह ऊंचे उठे हुए थे, उन पर
इन्द्र के लम्बे सुनहरे केश लहरा रहे थे। छाती चट्टान की
तरह कठोर दिखाई पड़ रही थी । दाहिने हाय में विशाल गदा
थी और बाएं हाथ में भयंकर ध्वनि करने वाला शंख ।
राजा को लगा, जैसे असुरों ने पथ पर उसके रथ के आगे
एक बहुत बड़ी चट्टान खडी कर दी हो...अडिग, भारी-भरकम
चट्टान । भारी-भारी डग रखता हुअा इन्द्र वहां बैठी प्रजा के
वीच से होकर यज्ञकुण्ड के निकट पा सडा हुअा। पास ही
सोमरस से भरे, पत्थर तथा मिट्टी के कई घड़े रखे थे। वेदी
पर अपना एक चरण टिकाकर गदा के सहारे कुछ तिरछा
अड़ता हुआ इन्द्र वोला, "मैं यहां हूं !"
बृहस्पति ने ललकारकर कहा, "इन्द्र, वहां से हटकर
खड़ा हो । वेदी से चरण हटा ले । वह स्थान यज्ञपुरुप का है।
वहीं खड़ा होकर यज्ञपुरुष हमारा हव्य ग्रहण करता है, सोम
पीता है।"
इन्द्र अडिग खड़ा रहा। ठहाका मारकर बोला, "सपने
मत देख, ब्राह्मणस्पति । तेरा हव्य कोई यज्ञपुरुप स्वीकार नही
करता। जिस ग्राम की प्रजा भूखो मरती है, एक-एक बूद
पानी के लिए तडपती है और शत्रुओं के प्राक्रमण से भयभीत
है, वह यज्ञ क्या करेगी? और वहां के राजा की दी हुई हवि
कौन स्वीकार करेगा ?"
राजा ने तड़पकर उठते हुए कहा, "तू ढीठ है, तू अपने से
थोष्ठ पुरुषों का अपमान करता है । तू दण्ड का भागी है
इन्द्र का माया जसे और ऊंचा उठकर मण्डप में।
."

?
?
तोरण को छूने लगा। वाण जैसी नुकीली दृष्टि से राजा
को देखता हुआ वोला, "कौन है यह श्रेष्ठ पुरुष ? तू ?
या यह ब्राह्मणस्पति, जिसे यज्ञभाग के नाम पर मुट्ठी भर
अन्न देते लज्जा नहीं आती? यह वही देवलोक है, जहां के
ऐश्वर्य और सुन्दरता की कीति सारी पृथ्वी पर फैली है ! और
यही वे देव हैं, जिन्हें अमर कहा जाता है ! ये हड्डियां ही
अमर होने का यश पाएंगी ? देवों के भक्षक असुरों का मित्र
तू इनका रक्षक है !'

राजा बोला, "तू उद्दण्ड है। अनार्यों की भांति हमारे
गण का द्रोही है।"
"गण का द्रोही मैं नहीं, तू है, जो शत्रुओं के अत्याचार से
प्रजा की रक्षा नहीं करता! जो प्रजा को पेट भर खाने को
नहीं देता।"
न्द्र की ढिठाई से अपमानित राजा का चेहरा फक्
पड़ गया। वह दांत पीसकर बोला, "मैं जो साता हूं, प्रजा
को भी देता हूं। और कहां से दूं?"
"चाहे जहां से दे। अनार्यों से छीनकर दे। घर
जहां जो कुछ भी है, वह सब देवों को मिलना चाहि

४२ महाबली इन्द्र कर्तव्य है, उसे लाकर देना।" "तू नीच है। अनार्यों की भांति हमें नीच कर्म करने को कहता है । तू दस्यु है।" इन्द्र ने सीधे खड़े होते हुए कहा, "दस्यु भी अपने परिवार का पेट भरता है। तू मेरा पिता है, पर मुझे पेट भर खिला नहीं सकता । तू गण का राजा है, पर असुरों से गण की रक्षा तक नहीं कर सकता... "राजा की जय हो !" द्वार से घबराया हुआ दस भीतर आया। उसके शरीर पर खून के धब्बे थे। वाईं बांह पर घाव हो गया था। बोला, "अभी-अभी असुरों का एक समूह हम पर टूट पड़ा और उनका नेता अयोमुख अपने भाई लोम के साथ देवकन्या सन्धि और ताम्रा को पकड़ ले गया । युद्ध में तीन- चार देव युवक पाहत हो गए। रक्षा कर ! राजा अवाक् उसकी ओर ताकता रह गया । इन्द्र ने ललकारकर कहा, "चुपचाप ताकता क्यों है, राजा ? उठ, और प्रजा की रक्षा कर।" बृहस्पति की ओर देखते हुए राजा ने गम्भीर स्वर में कहा, "तू जानता है, पुरोहित, असुरों का वल हमसे कितना बढ़ा हुआ है ! फिर हम उन्हीं के दिए हुए पानी पर निर्भर हैं। हमारी- उनकी सन्धि है । मैं असुरराज के पास दूत भेजूंगा । वह ताम्रा और सन्धि को लौटा देगा । तू इन्द्र को समझा।" किन्तु बृहस्पति के कुछ बोलने के पहले ही इन्द्र ने गरज- कर कहा, “सावधान ! जिस दिन अग्नि असुरों के दुर्ग में फंस गया था, उसी दिन मैंने प्रतिज्ञा की थी कि यदि कोई मेरे सामने असुरों की प्रशंसा करेगा अथवा उनसे सन्धि करने की बात कहेगा, तो मैं उसका वध कर दूंगा। मैं नहीं चाहता कि मुझे अपने गणपति अथवा ब्राह्मणस्पति की हत्या करनी पड़े !" -

महाबली इन्द्र
सारे यामण्डप में सन्नाटा छा गया था। किसी की सांस
तक नही सुनाई पड़ती थी। राजा श्रोध में आकर उठ खड़ा
हुअा, बोला, “इन्द्र, मैं तेरे अनाचारों से ऊब उठा हूं। मैं तुझे
दण्ड देता हूं। तुझे यज्ञ में वलिभाग पाने से वंचित करता हूं।
जा, चला जा ! तुझे यज्ञशाला में आने का अधिकार नहीं है।
और सुन ले, असुर मेरे मित्र हैं, यदि तूने फिर कोई उद्दण्डता
की तो मैं तेरा वध करने की आज्ञा दूगा।"
इन्द्र बाई भुजा अाकाश में उठाकर बोला, "कौन करेगा
मेरा वध ? कौन मुझे यज्ञभाग से वंचित कर सकेगा ?"
"मैं ! मैं गण का राजा हूं, मैं तेरा वध करूंगा।"
इन्द्र उपेक्षा के साथ हस पड़ा, बोला, "तू
का राजा
राजा झपट कर कई पग आगे बढ़ पाया और चिल्लाकर
वोला, "इसे यज्ञशाला से बाहर निकाल दो। मेरी आंखों के
आगे से दूर कर दो, नही तो मैं इसका प्राण ले लूंगा।"
इन्द्र गरजकर बोला, "सावधान जो भी मेरे समक्ष प्राएगा,
मैं उसका वध करूंगा..."
उसने अपनी विशाल गदा उठाकर कंधे तक तानी और
एक ही आपात में सोमरस से भरा हुआ पत्थर का पात्र तोड
डाला, फिर बैल की तरह मुंह लगाकर जी भर सोमरस पीने
के बाद डकार भरता हुमा खडा हो गया। बोला, "किसे
पज्ञकुण्ड में आहुति बनना है, मानो ! ग्रा, प्रो द्यौस...प्रा,
मेरा पराक्रम देख !"
उसका प्रचण्ड रूप देखकर लोग थर-थर कांपने लगे।
बच्चों ने माताओं की देह से सटकर मुंह छिपा लिया।
राजा क्रोध से कांपता हुआ इन्द्र पर टूट पड़ा।
"तू अनार्य है । तूने सोम से भरा हुमा पात्र तोड़कर

महाबली इन्द्र , अपमान किया है।" इन्द्र ने कई आघात सहकर राजा को दूर ढकेल दिया। वोला, "जा, यो द्यौस, तू पिता है। राजा है। अपने हाथों से मैं तेरा वध नहीं करना चाहता। "पर मैं तेरा वध करना चाहता हूं।" द्यौस के मुंह से फेन टपक रहा था। "मुझे विवश मत कर, राजा! राजा ने झपटकर इन्द्र की दाढ़ पर चूंसा मार दिया। इन्द्र के मुंह से कई चूंट खुन वाहर निकल पाया । सोम पीने से इन्द्र की आंखें लाल हो गई थीं । खून के कारण चेहरा भयानक दिखाई पड़ने लगा। विराट शरीर फूलकर जैसे कई गुना बढ़ गया। उसने गदा संभाल ली। शरीर की एक-एक मांसपेशी तनकर कठोर दीखने लगी, जैसे सुनहरे पत्थर से गढ़ी गई हो। वह हुंकार भरकर बोला, "तो शस्त्र उठा।" राजा ने दोनों हाथों की अंगुलियों को एक-दूसरे से जकड़ कर गदा-सी बनाई और इन्द्र की दूसरी दाढ़ पर भी प्राधात करते हुए बोला, "तेरे लिए मैं विना शस्त्र के भी बहुत हूं।" इन्द्र ने भारी-भरकम गदा सहित अपनी दाईं भुजा आकाश में तानकर कहा, "तो ब्रह्म साक्षी है, मैं भी शस्त्र त्याग । । रहा हूं।" उसने घुमाकर गदा फेंक दी । वह जाकर पास ही पड़ शिलाखण्ड से टकराई। चट्टान चकनाचूर होकर धरती पर विखर गई। इधर राजा धनुष से छूटे वाण की तरह झपटकर इन्द्र से से लिपट गया, फिर पलक झपकते पता नहीं क्या हुआ, इन्द्र ने कव द्यौस को अपने सिर से भी ऊपर आकाश में उठा लिया और कव उसके पांव पकड़कर नचाने के वाद देवों की भीड़

महाबली इन्द्र
में धरती पर पटक दिया, इसे कोई देख पाया, कोई नहीं।
राजा की हड्डियां चूर-चूर हो गई थी और खून में सने
मांस के लोथड़े वियुरकर सारी यज्ञशाला में फैल गए थे।
पल भर स्तब्ध रहने के बाद जैसे भयंकर सपना देखकर सब
की नींद टूटी। जो जहां था, वहीं धरती पर माथा टेककर
स्तब्ध पड़ रहा । बृहस्पति ने उत्तेजना से कांपते स्वर में कहा,
"इन्द्र, तूने पिता की हत्या की है।"
यज्ञशाला के अपने कोण में खड़े-खड़े ही अग्नि ने स्तुति
की, "हे महावली इन्द्र, तेरे पराक्रम से धरती थर-थर काप
रही है । तूने अपनी प्रचण्ड शक्ति से प्रजा की रक्षा की है।
"हे इन्द्र, तूने अपने विशाल भुजदण्डों से अपने पिता को
आकाश में उठाकर, उसका पांव पकड़कर चक्कर कटाने के
बाद धरती पर पटककर उसका वध कर दिया है !
"हे शत्रुमर्दन इन्द्र, देवों की परम्परा में ऐसा कभी नहीं
हुआ । तूने पांव पकड़कर आकाश में नचाने के बाद धरती पर
पटककर अपने पिता द्यौस का वध क्यों किया?
"हे इन्द्र, तेरे प्रताप से अन्धकार दूर भागता है । असुरों
से जल पीड़ित है-हम जल से पीड़ित हैं । तू नदियों को उनके
मार्ग पर स्थिर कर।
"हे इन्द्र, तुझे सोमरस प्रिय है। उसी तरह हमें भी तू
अपना प्रिय बना ले । हमारी रक्षा कर । हम तुझे सोम देकर
तेजस्वी बनाएं, तू हमारे शत्रु असुरों का नाश कर...
इन्द्र ने प्राज्ञा दी, "वृहस्पति, तू यज्ञ करा, यजमान में
1
"
बनूंगा।"
बृहस्पति अडिग खड़ा रहा । बोला, "तूने पिता की हत्या
की है । तेरी आहुति यज्ञपुरुप स्वीकार नहीं करेगा।"
वेदी पर अपना दायां चरण रसता हुमा इन्द्र बोला,

४६
महावली इन्द्र
"कौन है यज्ञपुरुष ? मैं ही यज्ञपुरुष हूं। मैं स्वीकार करूगा ।।
आज से ब्राह्मण भी यजमान के साथ हवि दे । मैं यज्ञपुरुष
उसे स्वीकार करूंगा। बृहस्पति, तू यज्ञ करा और सबको
यज्ञभाग दे । तू ब्राह्मणस्पति है।"
बृहस्पति खिन्न होकर बोला, "नहीं इन्द्र. यह अनाचार
हैं । मैं तेरा यजन नहीं कराऊंगा । यज्ञभाग नहीं बांटूंगा।"
"तो तू भी जा। मैं आज से एक और मर्यादा स्थापित
करता हूं-ब्राह्मणस्पति ही नहीं, गणपति भी यज्ञ का भाग
वांट सकता है।"
"नहीं। मैं ऐसा यज्ञ नहीं कराऊंगा।"
"तो जा, वृहस्पति, मैं त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप त्रिशिरा
को पुरोहित बनाता हूं। विश्वरूप, तू यज्ञ करा।"
अपमानित होकर भी बृहस्पति के चेहरे का तेज कम नहीं
हुआ। वह धीरे-धीरे पश्चिम के द्वार से बाहर चला गया और
उसी समय पूर्व में प्रजा के बीच से उठकर त्रिशिरा दर्प के साथ
चलता हुआ पुरोहित के आसन पर आ बैठा । उसके मन्त्रो-
च्चारण के साथ-साथ यज्ञ प्रारम्भ हो गया। सारी यज्ञशाला
गूंज उठी-
गणानांत्वा गणपतिहवामहे...
प्रियानांत्वा प्रियपतिहवामहे...
निधीनांत्वा निधिपतिहवामहे...

५
०००
खते ही देखते देव गण की व्यवस्था बदल गई थी।
कितने ही परिवर्तन हो गए थे। इन्द्र को गण के बलगाली
युवकों का समर्थन तो प्राप्त ही था, भूख-प्यास से कष्ट सहते
प्रौढ़ योद्धानों, वृद्धों, स्त्रियों तया बालकों का भी समर्थन
मिला। वैसे भी गण को रक्षा तथा उसके पालन-पोपण का
भार इन्द्र ने अपने बलिष्ठ कन्धों पर उठा लिया।
इन्द्र राजा हो गया। उसके वल-विक्रम के गीत गाए जाने
लगे।
राजा बनते ही इन्द्र ने सबसे पहला काम किया, गों
के गढ़ों पर आक्रमण । उसने दैत्य पुलोमा के दुर्गपर अचानक
ही हमला बोल दिया। दिति के पुत्र दैत्यों तथा अदिति के
पुत्र प्रादित्यों को जन्म से ही शत्रुता चलती थी क्योकि दोनों
गों को माताएं आपस में शत्रु थीं। दैत्य भी अमी
तरह अपने गढ़ तया ग्रानो शक्ति के गर्व में डवे :

00000000 फिर देव गण में जो क्रान्ति हो गई थी, उससे भी उन्हें हर्ष ही हुआ। उन्होंने सुरों के राजा द्यौस के मरते ही सोचा कि देवों की शक्ति क्षीण हो गई। उन्हें दबाते कितनी देर लगेगी। और इन्द्र जैसा कम उम्र का युवक इस प्रकार सहसा उन्हीं के गढ़ पर आक्रमण कर देगा, इसकी तो किसी ने कल्पना भी न की थी। बलवान और साहसी देव योद्धाओं को लेकर एक दिन इन्द्र अपने हरि नामक घोड़ों को रथ में जोतकर रातोंरात पुलोमा दैत्य के पुर पर टूट पड़ा। दैत्य असावधान थे, फिर भी घमासान युद्ध हुआ। पुलोमा दैत्य की कन्या शची पौलोमी भी युद्ध में उतर पड़ी। उसकी सुन्दरता और वीरता की ख्याति इन्द्र बहुत पहले सुन चुका था। बचपन में वह घोड़े पर चढ़कर अपने पिता के साथ देवों के खेतों की ओर घूमते समय कई बार शची को देख भी चुका था। तभी से उस सुन्दर दैत्यकन्या के प्रति इन्द्र के मन

में एक मोह जग गया था।
आज सहसा वही शची वीरवेश में अपने रथ पर सवार
होकर ठीक उसके सामने युद्ध करने के लिए प्रा पहुंची तो
इन्द्र थोड़ी देर के लिए स्तब्ध रह गया। थोड़ी ही दूर पर
अश्विनीकुमार दस घायल पड़े एक देव योद्धा को अपने रथ
में डालकर उसकी चिकित्सा करने के लिए बाहर ले जाने की
चेष्टा कर रहा था। उसका जुड़वां भाई नासत्य रथी दर
तथा घायल की रक्षा के लिए युद्ध कर रहा था। सहसा उसकी
दृष्टि इन्द्र पर पड़ गई। यह और शची आमने-सामने रथ
खड़े करके स्तब्ध होकर एक-दूसरे को देख रहे थे। नासत्य ने
अपने सामने खड़े दैत्य पर गदा से प्राधात पर आघात करते
हुए चेतावनी दी, "इन्द्र, ताम्ना और सन्धि को बात भूल
मत जाना...
इन्द्र की नसों में खून की जगह जैसे आग की धार वह
पड़ी। वह चौंक उठा। उसने दूसरे ही क्षण हाथ में पकड़ा
"

के रथ
इन्द्र
श फेंका और पलक झपकते ही शची के सारथी को
कर धरती पर झटक दिया। शची के घोड़े भड़क उठे।
ई-अचकचाई-सी शची अभी संभल भी न पाई थी कि
ने झपटकर उसको पकड़ लिया। उसका धनुष छीनकर,
की डोर में शची को फंसाकर इन्द्र ने उसे विवश कर
या।
के एकदम
निकट तक खिंच आने पर सहसा
राची एक झटके से मुक्त हो गई। दूसरे ही क्षण उसने इन्द्र
की छाती पर गदा से प्रवल प्राघात किया। पल भर के लिए
इन्द्र विचलित हुअा, पर सामने ही शची को दूसरी बार गदा
तानते देखकर वह सतर्क हो गया। रथ पर से सहसा छलांग
लगाकर उसने शची को दोनों पंजों में जकड़कर ऊपर उठाया
और अपने रथ पर फेंक दिया। उसके शस्त्र छीनकर उसे रथ
में जकड़कर बांधते हुए इन्द्र सारथी से बोला, "मातलि, इसे
तू ले चल, मैं पुलोमा को देखता हूं। मनु अकेला ही उस ओर
जूझ रहा होगा..."
देवतानां और दैत्यों का युद्ध जमकर हो रहा था। अब
तक दैत्यों की स्त्री-सेना भी सावधान हो चुकी थी। युद्ध में वे
देवों या दैत्यों से किसी प्रकार कम नहीं थीं। शची को पकड़े
जाते देखकर वह और भी क्रुद्ध हो उठीं। इन्द्र हंसा। बोला
"इनसे लड़ने की बात तो मैंने सोची ही नहीं थी। वध म
करो, जितनी भी जीवित पकड़ी जा सकें, पकड़ने की चेष
करो। हम भी असुरों तथा नागों की तरह अव शत्रु वन्ति
को दास-दासी बनाकर देवलोक की शोभा बढ़ाएंगे..."
किन्तु दैत्य वालाबों का आक्रमण साधारण न था।
की दुर्दशा वह देख चुकी थीं। उसके बन्दी बनते ही
मन में पाग-सी भड़क उठी। शची जैसी प्रचण्ड शक्ति

..... महाबली इन्द्र युवती को इस प्रकार सहसा पकड़े जाते देखकर वे स्तम्भित रह गई थीं। उसे बचाने की वे कोई चेष्टा भी न कर पाई, इसलिए संभलते ही पूरी शक्ति के साथ इन्द्र पर टूट पड़ीं। इन्द्र को रास्ते से हटाकर वे शची को रथ पर लेकर जाते भातलि को रोकना चाहती थी। इस पोर थोड़े-से ही देव सैनिक थे। पराक्रमी इन्द्र दैत्य- वालानों की इस भयानक चपेट से अचकचा उठा । अपने प्रचण्ड धनुप-याण तथा भारी-भरकम गदा संभालकर वह भी अड़ गया । दैत्यवालानों को जीवित पकड़ने का स्वप्न पूरा होने की प्राशा नहीं रही। वह प्राणरक्षा के लिए प्रांख मूदकर ग्रुपक्षा का वध करने लगा। दल को रथ लेकर सुरक्षित निकल जाने का अवसर देने के लिए नासत्य अब तक उसी ओर दैत्यों से युद्ध कर रहा था। दस के निकलते ही वह भी बचकर दूसरी ओर हटने की चेष्टा करने लगा। सामने से वह एकदम घिर चुका था। बाई ओर से ही वचने का रास्ता था, क्योंकि उस ओर इन्द्र थोड़े से योद्धानों के साथ अव तक दैत्यवालाग्रो का रास्ता रोके हुए था। उस ओर पहुंचकर नासत्य ने अपना रय संभाला। तूणीर में वाण भरे और रास संभालकर इधर-उधर देखने लगा। सहसा उसकी दृष्टि पश्चिम की ओर पड़ी। पुलोमा योद्धा दैत्यों की एक बड़ी-सी टुकड़ी के साथ उल्का की भांति तेजी से इन्द्र की ओर झपटा चला आ रहा था। दूसरी ओर इन्द्र दैत्यवालाओं के कारण एक ही जगह उलझा रह गया था। कई देव युवक आगे बढ़कर इन्द्र को उनके अाक्रमण से बचाए रसना चाहते थे, पर उन्हें अवसर ही नहीं मिल पा रहा था। ऐसा लगता था, मानो अकेला इन्द्र ५२ महावली इन्द्र ही हर जगह युद्ध कर रहा हो । जहां देखो, वहीं इन्द्र दिखाई पड़ रहा था। पर पुलोमा के वहां पहुंचते ही भयंकर संकट खड़ा हो जाएगा। इन्द्र किस-किस तरफ लड़ेगा! इस समय इन्द्र का रथ भी नहीं था, न सारयी मातलि ही। वह घोड़े पर सवार था। उसके तूणीर के वाण चुक गए थे और वह भयंकर वेग से गदा घुमाता हुया युद्ध कर रहा था। पल भर में ही नासत्य ने निश्चय कर लिया। उसने सबसे हले शंख बजाकर इन्द्र को सावधान किया, फिर पश्चिम की गोर मनु के साथ शत्रुओं से लड़ते योद्धा देवों को सहायता के लए इधर पहुंचने का संकेत करके स्वयं उसी ओर बढ़ पाया। न्द्र के वाएं पक्ष पर पहुंचकर ठीक अवसर पर नासत्यं ने लोमा दैत्य की गदा का आघात अपनी गदा पर रोककर उसे पर्थ कर दिया। पुलोमा की आंखों से अंगारे बरस पड़े । वह घोड़े की रास ांतों में संभालकर दोनों हाथों से पूरी शक्ति के साथ गदा ला रहा था । अश्विनीकुमार नासत्य को देखते ही वह चिल्ला र बोला, "अच्छा हुअा, अश्विनीपुत्र, तुझे तो मैं कब से खोज हा था । तू ही अपने नीचकर्मा इन्द्र का रक्षक है न ! कायर, इतना अपमान सहकर भी उसी के साथ रहता है !" नासत्य ने गदाघात करते हुए कहा, "राजा राजा है। पना काम वह जाने, प्रजा अपना काम संभालेगी। त अपनी - रता देख..." नासत्य की गदा रोकी नहीं जा सकी। पुलोमा ने वचने चेष्टा की, पर नासत्य ने जैसे पहले ही से अनुमान लगा या था। उसने घूमकर प्राघात किया। पुलोमा का वायां धा जैसे चूर-चूर हो गया। पर वह हटा नहीं, उसने तड़प- : गदा मारी और नासत्य के रथ में जुता एक घोड़ा तुरन्त ही

महाबली इन्द्र
गिरकर मर गया। नासत्य रथ से कूद पड़ा। दूसरे ही क्षण
दत्य योद्धा उसे चारों ओर से घेरकर शस्त्र बरसाने लगे।
इस बीच पश्चिम में मनु के नेतृत्व में लड़ते देवों की स्थिति
सुधर गई थी। उनका एकभाग अवसर पाकर गढ़के भीतर घुस
गया था। वहां से स्त्रियां और बच्चों का हाहाकार सुनाई पड़ने
लगा था। कई जगह आग की लपटें भी उठने लगी थीं। कई
देव योद्धा नासत्य की ललकार सुनकर इस ओर पहुंच गए थे
दैत्य नारियों की सेना आधी कट चुकी थी और अब उनका
उत्साह भय में बदल चुका था। वे किसी तरह प्राण बचाने
लगीं।
अवसर पाते ही इन्द्र मुड़कर नासत्य के साथ पुलोमा के
सैनिकों से युद्ध करने लगा। केवल दाई भुजा से ही गदा
चलाता हुआ पुलोमा अव भी देवों के लिए भारी पड रहा था।
किन्तु अधिक देर नहीं लगी। इन्द्र दैत्यों की भीड़ को चीरता
हुआ उसके पास पहुंचा और एकाएक पुलोमा पर टूट पड़ा।
विना शस्त्र का प्रयोग किए उसने पुलोमा के पत्थर जैसे कठोर
शरीर को अपनी बलिप्ठ भुजाओं में जकड़कर पछाड़ दिया।
उसके गिरते ही दैत्यों की सेना में भगदड़ मच गई।
इन्द्र ने पुलोमा को उठाकर नासत्य के रथ पर डाल दिया।
साथ ही प्राज्ञा दी, "नासत्य, तू इसका उपचार कर।"
मन ही मन नासत्य हंस पड़ा। शची पौलोमी के प्रति इन्द्र
के मोह को वह प्रारम्भ से ही जानता है । उसने अाज भी लड़ने
को तत्पर खड़ी शची के सामने इन्द्र को चुपचाप खड़े देखा था।
शची बन्दी बनाई जा चुकी थी। इन्द्र उसे मातलि को सौंप
चुका है। अाज पहली बार इन्द्र ने युद्ध में एक साथ दो-दो
शत्रुओं को प्राणदान दिया था-पता नहीं वह क्या सोर
है।

५४
महावली इन्द्र
पुलोमा को संभालकर नासत्य धीरे-धीरे मार्ग बनाता
हुआ
देवों की सेना की ओर चल पड़ा।
दैत्यों की पराजय होने के कारण देव युवकों का उत्साह
बढ़ गया था। उनके ठहाकों से दैत्यों के गढ़ की पथरीली
दीवारें हिलती-सी लग रही थीं। चारों ओर से उठता शत्रु-
पक्ष का चीत्कार इन्द्र की जय-जयकार में खो गया। नासत्य
की तरह अनेक योद्धा इन्द्र की स्तुति कर रहे थे.
"हे इन्द्र, तेरे द्वारा रक्षित होकर हम प्रवल सेनावाले
शत्रुओं को परास्त करेंगे । प्रहार के लिए प्रस्तुत शत्रु पर
प्रहार करेंगे...इन्द्र, तू युद्धजयी है...
"हे इन्द्र, तू महान है, ऐसा करना कि शत्रु हमारे शरीर
पर आघात न कर सकें। तू हमारा वध न होने दे...
"युद्ध के समय जिस देवता के रथ के सामने शत्रु नहीं पाते,
उस महाबली इन्द्र का यश गाओ। तेजोमय सोम से उसका
अभिषेक करो..."
1
।

६ 000 उस दिन से देवलोक का प्राधा भार जैसे त्रिशिरा के सिर पर ही या पड़ा था । दैत्य पुलोमा पोर इन्द्र के बीच वार्ता में विशिरा ने सबसे बढ़-चढ़ कर भाग लिया। उसके प्रयक प्रयास के कारण पुलोमा के साथ इन्द्र को सन्धि हो गई। चाची को विशिरा ने कुछ ही देर बात करने के वाद चकित कर दिया। वह कल्पना भी नहीं कर सकती थी कि युद्ध में उतना भयंकर कर्म करने वाला देवताओं का योद्धा राजा इन्द्र मन से इतना कोमल भी है। उसने अांखें मुकाकर हां कर दी। गची और इन्द्र ने अग्नि को साक्षी बनाकर एक-दूसरे को ग्रहण किया । बलवान पुलोमा दैत्य मुन्दरी और वीर पुत्री को इन्द्राणी धनते देखकर सारा देवलोक प्रममता से खिल उठा। महीनों तक उत्सव चलता रहा । देवों में विजेता इन्द्र जैसा राजा पा जाने के कारण अपार उत्साह भर गया उन पर तरह-तरह के बन्धन ये। अब इन्द्र का:

५६ महावली इन्द्र अपने को स्वतन्त्र समझने लगे। चारों ओर से आय बढ़ने का अवसर मिल गया। अव यज्ञों में मन्त्रों का उच्चारण करते समय पार्यों का हर्ष से भरा गम्भीर स्वर नदी के उस पार असुरों की वस्ती तक सुनाई पड़ता था। यज्ञशाला में जहां एक दिन तिल, घी, दूध, जो आदि के छोटे-छोटे ढेर होते थे, अब वहां अन्न रखने को जगह भी नहीं रह गई थी। देवों ने यज्ञशाला को और भी बड़ी बनाने का निश्चय किया। पश्चिम की ओर एक नया छप्पर डाल दिया गया। ग्राम के पूर्व की और भी बढ़कर नए-नए क्षेत्रों पर अधि- कार जमाया जा रहा था। पहले असुरों के अत्याचार से देव- लोक आतंकित रहता था, पर कुछ दिनों के लगातार संघर्ष के वाद स्थिति बदल गई। देवलोक में शान्ति छा गई थी। इन्द्र अब गर्व से अपने लिए प्रस्तुत काठ के भव्य आसन पर बैठ- कर न्याय करता था। आसन पर सोना-चांदी तथा कितने ही चमकीले पत्थर जड़े हुए थे। दानवों का एक शिल्पी सुदूर पश्चिम में समुद्र के उस पार से आया था। उसने नील नदी के तट पर विशाल भवन देखे थे, और वहीं देखा था वहां के महान योद्धाओं का सिंहासन। वे योद्धा अपने को देवता सूर्य का पुत्र कहते थे। उनके सिंहासन को देखकर उसने भी एक दिन वैसा ही सिंहासन बनाने का निश्चय किया था। लौटकर उसने पूरा सिंहासन वना भी लिया था, और जिस दिन उसे लेकर वह दानवराज के पास जाने वाला था, ठीक उसी दिन सहसा देवों का आक्रमण हुआ। दिन भर भयानक युद्ध चलता रहा । सिंहासन के पास ही खून में लथपथ शिल्पी तड़प-तड़पकर मर गया। देव अपने साथ सिंहासन उठा लाए। उसे देखकर प्रजा की आंखें फैली की फैली रह गई। ऐसे प्रासन

महावली इन्द्र
१७
.....
की तो वह कल्पना भी न कर सकते थे। एक भी युवक ऐसा
न था, जिसकी प्रांखों में उस सिंहासन के प्रति लोभ न कौंधा
उस दिन यज्ञशाला में सिंहासन भी रखा गया ।
पन समाप्त होने के बाद इन्द्र की प्राज्ञा से विशिरा देवों
को भाग बांटने लगा। अन्त में सिंहासन बच गया।
कुछ देर तक मण्डप में सन्नाटा छाया रहा । एकाएक
विशिरा ने कहा, "यह सिहासन हमारे पराक्रमी इन्द्र को ही
शोभा देगा । अाज से यह इन्द्रासन हुअा। इन्द्र की इच्छा
विना जो भी इस प्रासन पर बैठे, उसे ब्रह्म नष्ट कर दे । उस
पर बैठा हुअा इन्द्र सबसे श्रेष्ठ होगा। उससे महान मोई
नहीं।"
विशिरा के निर्णय से देव युवकों में मुभी की लहर दौड़
गई। सच ही तो है, इन्द्रामन पर बैठने के लायक इन्द्र को
छोडकर और है ही कौन ?
इन्द्र मिमिरा पर प्रसन्न था। बृहस्पति तो फेवल कटोर
और कटु सत्य कहना जानता था। निशिरा मन को समझता
है। वह देव गण के हित के लिए सब कुछ स्वयं ही निर्धारित
कर सकता है। सचमुच उसकी बुद्धि तीन मिरों की बुद्धि के
समान है। इन्द्र को कहीं किसी प्रबन्ध में त्रुटि नहीं दिमाई
पड़ती।
धीरे-धीरे विगिरा के अधिकार बढते गए । उमने एक और
भी सुविधा दी। यज्ञ में हवि देते समय मन्त्रोच्चारण तया
स्तुति के बाद भी देवों को बड़ी देर तक अपना भाग लेने के
लिए बैठे रहना पड़ता या। उनके परिश्रम में ही तो गय कर
होता है । उन्हें विधाम और मनोरंजन नी तो करना
इसलिए निमिरा ने प्रबन्ध कर दिया कि देवों के भाग:

महा
द्वारा घर पर ही भेज दिए जाया करेंगे।
इन्द्र को त्रिशिरा पर पूरा विश्वास हो गया। भाग बांटने
का पूरा भार त्रिशिरा पर छोड़कर वह निश्चिन्त हो गया।
--

महावलो इन्द्र
विगिरा का पिता त्वष्टा देव उस समय सुरलोक का सबसे
योग्य शिल्पी था। वह कितनी ही कलानों में पारंगत था।
वह सुन्दर से सुन्दर भवन, काठ की मूर्तियां, अस्त्र-शस्त्र सव
कुछ बनाने में कुगल था । अपने पुत्र की प्रगति देखकर वह
प्रसन्नता से फूला नहीं समाया। वह इन्द्र की स्तुतियों की
रचना करता और उन्हें गा-गाकर इन्द्र तथा अन्य देव युवकों
का उत्साह बढाया करता था।
फिर तो देवलोक अपने पूर्वजों के समय से कहीं आगे बढ
गया । त्वष्टा देव की पत्नी अमुर जाति की थी। वह सब कुछ
होते हुए भी प्रसन्न नहीं रहती। उसकी तीखी पालोचनाओं से:
स्वप्टा कभी-कभी चिन्ता में पड़ जाता। कभी वह त्रिशिरा की
हंसी उड़ाती, कभी देवलोक की।
उस दिन त्वष्टा नाराज हो गया। वोला, "इस समय
पृथ्वी पर कौन ऐसा है, जिसके पास देवताओं के समान वल
हो । देवों के समान सुन्दर, स्वस्थ और पराक्रमी योद्धा हैं
किसी जाति में ?"
त्वष्टा की अमुर पत्नी ने हसकर कहा, "पराक्रम की क्या
कहते हो ! पासिर पणि और दूसरी जातियों के लोग भी तो
चुराकर या वलपूर्वक छीनकर पेट भर लेते हैं । तुम देवों में
भी तो यही चलता है न ? तुम लोगों के पास है ही क्या ? न
रहने का घर है, न सुख से जीने के साधन । पानी तक पर तो
बन्धन हैं। उसे भी किसी तरह चुराकर या लूटकर लाना
पड़ता है । अमुरों के यहां देखा है कभी? बड़े-बड़े कुण्ड होते
हैं, जिनमें वरुण की कृपा से वर्ष भर अमृत जैसा पानी भरा
रहता है !
त्वप्टा खीझकर बोला, "बस एक ही बात का इतना
मभिमान है असुरों पर । जरा सोचकर बोल तो, देवों को

महाबली इन्द्र
कर और किसी के पास इन्द्रासन है !"
"बस, जव देखो, उसी सिंहासन के अभिमान में डूबे रहते
वह भी तो दानवों की कला है, तुम्हारा उसमें क्या है ?
र कुछ भी है तुम्हारे पास ? देव लोग खा-पीकर खूब पेट
र लेंगे, फिर सोमलता घोंटकर उसका रस पी लेंगे और नशे
धुत्त होकर सो जाएंगे। फिर न घर की सुध, न किसी की
चन्ता !"
. "तू क्या जाने !" त्वष्टा मुसकराया, "तेरे असुर तो
पाणियों को अन्न देकर उसी से सुरा बनवाते हैं ! अन्न भी सड़:
कर बरवाद होता है और प्रजा का भाग अलग से मारा जाता
है। सड़े हुए अन्न का रस पीकर असुर योद्धा चारों ओर आतंक
फैलाते हैं। और हमारे सोमरस में बल बढ़ाने की शक्ति है।
उसके पीने से हम तेजस्वी हो जाते हैं । उस दिन देखा नहीं
था...निकम्मे राजा द्यौस को मारने के पहले हमारा इन्द्र
वैलों की तरह आधा कुण्ड सोमरस पीकर पर्वत की तरह
विशालकाय और सूर्य की तरह तेजस्वी दीखने लगा था...":
"सब देखा था।" त्वष्टा की पत्नी ने होंठ विचकाकर
कहा, “सोमरस का गुण दुर्गण भी तो बन सकता है। पीकर
सारे देव यहां-वहां वेहाल पड़ रहते हैं-कोई भी सुध में नहीं
रहता। असुर तुम लोगों के अत्याचारों से तंग आ चुके हैं।
किसी भी दिन उन्होंने...तुम्हारे पास तो ऐसे घर भी नहीं हैं
कि भागकर छिप सको। और असुरों को देखा है, उनके राजा
और पुरोहित पत्थर के दुर्गों में रहते हैं। चारों और बलवान
असुरों का पहरा रहता है। उनकी आंख बचाकर वायु में
भीतर नहीं जा सकती। और एक देवताओं का यह 'पुरोहि
है...देखो जरा!" उसने अपने बेटे त्रिशिरा की ओर संके
किया, "इसे देवताओं का सबसे ऊंचा.५८ प्राप्त है । इन्द्र
।

" महारती इन्द्र इने प्रणाम करता है. पर यह रहता किस प्रकार है, जैसे कोई साधारण-सा बढ़ई का बेटाहो...' त्वष्टा कोरकर उठ खड़ा हा। दोला, "चुप रह ! सावधान, यदि पात्र में देवों के पुरोहित या देवराज के विस्त अपमान के गब्द निकाले नो मैं तेरा वध कर दूंगा । तेरे अनुरों में सब कुछ विचित्र है। वहां हर एक की अलग नम्पत्ति है। कोई विशाल नवनों में रहता है और कोई झोपड़ी में। किसी के पान अपार धन और अन्न है. कुछ भूनों मरते हैं । असुरों में ही कोई राजा का प्रिय है और कोई दान बना दिया गया है। हम देवों में मब मुमान हैं !" त्वष्टा में रुककर गर्व के साथ विगिरा की ओर संकेत करते हुए कहा, "इस विश्वल्प से पूछ, सबको समान भाग, बांटता है । इन्द्र और किसी भी देव युवक में कोई अन्तर नहीं। हम किसी को छोटा नहीं समझते। यहां बन्दी बनाकर लाए गए शत्रु और दम्यु हो दास हैं, देव नहीं। दास हो सेवा करते हैं। हम ब्रह्म के उपासक हैं । यन के समय ब्रह्म जो आमा देता है, वही हमारा धर्म है। यहां किसी एक व्यक्ति का मासन नहीं चल सकता। वह कोई भी हो। राजा को ब्रह्म इसलिए चुनता है कि वह प्रजा की रक्षा, न्याय और पालन- पोपप करे, उने नोच-खसोटकर अपने पेट और अपनी विला. सिता के लिए ही सब कुछ न करे !" वह उठकर वाहर चला गया। विगिरा पास ही सिर झुकाए बैठा अपने मां-बाप की बात चुरचाप सुनता रहा । वह जानता था कि जब से इन्द्र ने उसे अपना पुरोहित बनाया है, तब से पिता त्वष्टा उसका अधिक प्रादर करने लगा है, साथ ही वह स्वयं भी देवलोक के हित के लिए और भी धम से काम करने लगा।

महावली इन्द्र तू मां उठकर उसके पास आ खड़ी हुई । वोली, "त्रिशिरा, देख रहा है न ? यह देवलोक ऐसा ही रह जाएगा। और तू भी इनका भिखारी पुरोहित बना रहेगा। कभी तूने मेरे यहां जाकर देखा होता तो समझता । असुर राजा अरिष्ट इस समय पृथ्वी पर सबसे महान और सबसे धनी राजा है । देवों का गण उसके सामने पल भर भी नहीं ठहर सकता। अगर असुर तेरे साथ हो जाएं तो तू क्या नहीं बन सकता ! पर मेरे सपने पूरे हों, तव न!" वह सिर झुकाकर चल पड़ी। निशिरा ने टोंककर कहा, "मां, मैं तेरा पुत्र हूं। और कौन बताएगा मुझे ? बोल, क्या करूं, जिससे तेरा स्वप्न भी पूरा हो, और मेरी शक्ति बढ़े ?" मां रुककर कई पलों तक उसे धूरती रही, फिर बोली, "तू शक्ति चाहता है ?" "क्यों नहीं चाहता, मां !" त्रिशिरा ने अटक-अटककर अपने मन की बात जताई, "मैं जानता हूं...असुरों के यहां पुरो- हित की कितनी पूजा होती है। वह चाहे तो एक संकेत पर कुछ भी कर सकता है। और यहां...यहां क्या है ? इन्द्र मुझे प्रणाम भले ही करता हो, पर है वही सब कुछ। उसके विरुद्ध एक शब्द का भी उच्चारण हो जाए, तो बस...मैं किसी का दास नहीं, शक्तिशाली बनकर जीना चाहता हूं।" असुरवाला कुछ देर सोचती रही, फिर बोली, "पर तेरा संस्कार भी तो देवों का ही है । देख जरा, मैंने सोचा था, इन्द्र से कुपित होकर यह आंगिरस बृहस्पति शायद विद्रोह करे, पर वह एक अोर चुपचाप बैठा मन्त्र रचा करता है । और अश्विनी के दोनों बेटों को ही देखो, अव तक इन्द्र ने अपने दण्ड से उन्हें छुटकारा नहीं दिया है । वे अब भी यज्ञ में भाग नहीं पाते, पर इन्द्र के लिए प्राण देने को तत्पर रहते हैं ! कहीं तू भी..." ? ,

.....
महाबली इन्द्र
६३
"नहीं मां, मैं कायर नहीं हूं ! मुझ पर विश्वास कर !",
मां ने सिर हिलाकर कहा, "मेरे विश्वास करने से कुछ
नही होगा । लाभ होगा, जब असुर राजा अरिप्ट विश्वास करे,
सेनापति नमुचि विश्वास करे...इसके लिए तुझे दुस्साहस करना
होगा । तू तैयार है ?"
"तैयार हूं, मां । जो कुछ भी तू कहेगी, करूंगा...अगर मैं
कर सका तो..."
"कर सकता है । तेरे पास शक्ति है, तू कर सकता है,
पर चाहे तब...यह तो तू जानता है न कि अपनी शक्ति बढ़ाना
या शत्रु की शक्ति को घटाना एक ही उपाय है। समझ
जाएगा...प्रतीक्षा कर, मैं तुझे बताऊंगी।"
मां जल्दी से चली गई। मिशिरा वड़ी देर तक सिर झुकाए
सोचता रहा । उसके मन में सपने तैर रहे थे-कोई ऐसा भी
दिन आएगा, जब वह भार्गव शुक्राचार्य की तरह असुरों को
अपने संकेतों पर नचा सकेगा! वह ससार में जो कुछ भी
चाहेगा, पा लेगा...
सहसा एक दास ने भीतर आकर प्रणाम किया । बोला,
"यज्ञशाला में जाने की घड़ी आ गई है, देव ! रथ तैयार है।"
"हां!" विशिरा चौककर बोला, "चल, मैं पाता हूं!
फिर झटके से उठा और दास के पीछे-पीछे बाहर निकलकर
रथ पर बैठ गया।
1

OOO अपनी असुर पत्नी से लड़कर त्वष्टा उस रोज वहां से हट तो आया था, पर उसे लगा कि बहुत-सी बातें ऐसी थीं, जिन्हें न मानने से अपनी ही हानि होगी। इधर इन्द्र को नेता बनाने के बाद देव जाति ने उन्नति अवश्य की थी, पर उसे लगातार युद्ध करना पड़ रहा था। शत्रुओं की संख्या बढ़ती ही जा रही थी। देवों ने दूर-दूर तक धावे मारकर दूसरी बस्तियों से धन- धान्य छीनना शुरू कर दिया था। पर वे किसी को बहुत हानि नहीं पहुंचा पाते थे । असुरों के बड़े-बड़े गढ़ां, दैत्यों और दानवों के पथरीले दुर्गों को इधर-उधर से तोड़ देना ही बहुत नहीं था। वे देखते ही देखते फिर से अपना सारा काम ठीक कर लेते । अभी तो उन लोगों को ठीक से संभल पाने का अवसर नहीं मिल रहा है, पर जिस दिन वे सावधान हो जाएंगे, उसी दिन से देवताओं पर आक्रमण होने लगेगा। उस संकट से उबरना महाबली इन्हें देवों के लिए कठिन होगा। छिपने के लिए एक छोटा-सा गढ़ भी तो नहीं है देवलोक में !" यह काम त्वष्टा को ही करना पड़ेगा। सारे ग्राम में घूम-घूमकर त्वष्टा रात-दिन मन ही मन युक्ति सोचने लगा। ग्राम के कई वृद्धों से मिलकर उसने अपना विचार बताया। अग्नि, नासत्य, दस, मनु आदि से मिला। फिर उन सब के साथ वह इन्द्र के पास गया। उसका प्रस्ताव सुनकर इन्द्र प्रसन्न हो गया। उसे उठा- कर छाती से लगाता हुआ बोला, “तू ही इसे कर सकता है, देव, तू विश्वकर्मा है ! तू देवलोक को यह वरदान दे । देवों के लिए तू एक नए विश्व का निर्माण करने जा रहा है । मैं तुझे अधिकार देता हूं, तू जितने भी दास चाहे, जिस देव की पाव- श्यकता समझे, उन्हें साथ लेकर तुरन्त यह शुभ काय प्रारम्भ कर दे..." फिर दित पर दिन बीतने लगे। नदी के तट से लेकर गांव को चारों ओर से घेरनेवाली गढ़ की एक लम्बी दीवार धीरे- धोरे उभरने लगी। देवों के बालक, स्त्रियां और पुरुप सभी उत्साह से इस निर्माण में जुट गए थे। ग्राम के बीचोंबीच सबसे पहले त्वष्टा ने इन्द्र के लिए काठ, मिट्टी और पत्थर का एक विशाल सुन्दर भवन खड़ा किया। बीच में जल का बड़ा-सा कुण्ड बनाया। पीछे की ओर एक सुन्दर उपवन भी लगाया । जिस दिन वहां का काम पूरा हुना, त्वष्टा ने इन्द्र को उम नए भवन में ग्राकर रहने का आवाहन किया। देवलोक का वच्चा-बच्चा उस भवन को देसकर चकित रह गया । कोई सपने में भी नहीं सोचता था कि देवलोक में कभी इतना सुन्दर भवन खड़ा हो जाएगा । उपवन में पहुंचकर

बोली,
महावली इन्द्र
तो शची पौलोमी मुग्ध हो गई, "यहां आते ही मन
कितना मानन्दित हो उठता है !
इन्द्र ने मुस्कराकर त्वष्टा का अभिनन्द किया। वोला,
"देव, तू सचमुच विश्वकर्मा है । इस उपवन का नाम होगा
नन्दन कानन और इस भवन का नाम है, वैजयन्त । यह असुरों
पर हमारी विजयों का प्रतीक होगा !
त्वष्टा को अव पूरी छूट मिल गई थी। वह जहां, जैसे भी
चाहता, काम करता था। देवों की नगरी अमरावती का
-
प
-
ago
निर्माण एकदम नए ढंग से होने लगा।
पर उन्हीं दिनों एक संकट खड़ा हो गया। देवों का प्रचण्ड
योद्धा मनु एक दिन यज्ञ से लौटते समय ग्राम के पश्चिमी छोर
की ओर पहुंच गया। वहां कुछ वृद्ध बैठे बातें कर रहे थे । मतु
उन्हें दूर से ही प्रणाम करते हुए आगे बढ़ जाना चाहता था।
पर वह अभी कुंज की ओट में ही था कि एक व्यक्ति की बात
सुनाई पड़ी, "हम पर तो फिर वही संकट टूट पड़ा। जल की
समस्या अब भी वही है !"

६७ -.-.-.-.- .... - महाबली इन्द्र "पर यह संकट इस बार की वर्षा के बाद तो दूर ही हो जाएगा..." पहला देव हंसा । वोला, "तू सपने देखता है, त्वष्टा ने ये जो थोड़े से कुण्ड वनाए है, उनमें कितना जल इकट्टा होगा। वर्षा के बल पर उन्हें भरकर तू समझता है कि हम मव का काम हमेशा चलता रहेगा। फिर वर्षा का भी क्या ठिकाना- हुई, न हुई । जल का देवता वरुण तो असुरों पर ही रीझा हुआ है, हमारा साथ कौन देता है !" "इन्द्र देगा!" दूसरे देव ने जरा तेजी से कहा, "तू इन्द्र के रहते इस तरह की पोछी बातें करता है । हमारा इन्द्र क्या नहीं कर सकता!" "क्या कर रहा है ! जब इसका पिता द्यौस राजा था, तब भी तो यही सव होता था। अब तो फिर से वही अन्न का संकट खड़ा हो गया है । कोई सुननेवाला नही । इधर चार- पांच मास से अन्न-भाग धीरे-धीरे कम होने लगा और अव सो प्राधा ही हो गया । त्वष्टा ने इन्द्र के लिए भवन बना दिया । वहां इन्द्रासन पर शची के साथ बैठकर गन्धवों और अप्स- रात्रों का नृत्य देसने से ही इन्द्र को छुट्टी नहीं मिलती। उमे तो कल्पना भी नहीं होती होगी कि देवलोक पर फिर मे अन्न का संकट या पड़ा है। किसकी प्रागा करें? प्राज का भाग दिसाऊं तुझे, कितना मिला है ? देवी रागा कूट-पीसकर भोजन बना रही है। उतने से तो बच्चों का भी पेट नहीं भरेगा!" कुछ देर चुप्पी छाई रही । लगा कि सभी उस देव की बातों से सहमत हैं । मनु यह सब मुनकर चकित रह गया Ira, इन्द्र तो दूर, स्वयं मनु को भी नहीं पता था कि प्रज इस प्रकार प्राधा पेट साकर जीवन विताना - । * ६८ महाबली इन्द्र लेकिन ऐसा होता क्यों है ? देवों की खेती से भी अब तो बहुत अन्न उपजता है !" i. "इराका दोष किसे दिया जाए, देव, किसके कारण फिर से यह स्थिति खड़ी हो गई?" नीचे चट्टान पर पसरा पड़ा एक मरत योद्धा पूछ बैठा। "सब कुछ मैं ही कहूं ?" देव वृद्ध नाराज हो गया । बोला, "जाकर पूछो त्वष्टा के पुत्र निशिरा से । वही तो भाग बांटता है। और अब तो उसने नियम भी ऐसा बनवा दिया है कि भाग बांटते समय यज्ञमण्डप में कोई नहीं रहता...उंह होगा। मैं ही क्यों मरूं ? सभी मरेंगे । जब भूख से पेट ऐंठेगा तो सभी चिल्लाएंगे। मैं अकेला ही क्यों इन्द्र का कोप सहूं... मनु बड़ी देर तक खड़ा सोचता ही रह गया । देवों में यह कराा रोग फैल रहा है ! गण की सबसे बड़ी शक्ति ब्रह्म है। उसी की प्राज्ञा से सब कुछ होता है। पर जब इस तरह संच तटस्थ हो जाएंगे, या एक-दूसरे पर ही अविश्वास करेंगे तो कैसे चलेगा? ब्रह्म अखण्ड है, फिर यह टूटन क्यों ? उधर से बातें बन्द हो गई थीं। देव लोग शायद मन में चिन्ता लेकर अपने-अपने घरों की ओर चले गए थे। मनु वहां से हटकर धीरे-धीरे नदी की ओर बढ़ चला। उसका मन यह संब सुनकर कड़वा हो गया था। देवलोक के शासन और रक्षा का भार संभालने वाले राब युवक जब मिलकर बैठते थे तो कितने उत्साह से बातें करते थे ! त्वष्टा के निर्माण के साथ- साथ वे लगातार देवों की उन्नति की बात सोचते, पर वास्तव में कुछ और ही हो रहा है। यह अशुभ है । इससे देवों का कल्याण नहीं होगा। पहाड़ी की ओर पहुंचकर वह एक चट्टान पर बैठ गया। खूब टटको चांदनी रात खिली हुई थी। मनु अपलक नदी की महाबली इन्द्र ओर ताक रहा था । एकाएक उसे लगा जैसे रेत पर कुछ पर- डाइयां चल रही हैं। उनके कन्धे तथा सिर पर वोन लदे थे। मनु समझ नहीं पाया कि यह सब क्या हो रहा है। अगर ये सब त्वष्टा के लिए कोई सामग्री लाते तो उसे ग्राम की ओर ले जाते, पर ये तो ग्राम से बाहर की ओर जा रहे हैं ! अपना संग संभालकर वह नीचे उतर पाया । पता नहीं कैसा सन्देह उसके भीतर सुलगने लगा। वहीं पगियों का दल चोरी करने के लिए तो इधर नहीं निकल पाया है ! रेत पर झुक झुककर चलता हुआ वह एकदम तट के पास पहुंच गया। ठीक से समझ-यूझकर ही कुछ करना चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह मंख बजाकर देवों को जुटा ले और रात में स्वयं देवों के ही वीच युद्ध हो जाए । अपनी ही हानि करा देने पर सवेरे सब उसकी हंसी उड़ाएंगे। ठीक सामने एक नौका लगी थी। उनी पर एक-एक करके सब वोझ लाद रहे थे। नाविकों में से किसी ने कुछ कहा । सुनकर मनु की नमें खड़ी हो गई । ये तो अमुर हैं, फिर ? वह कुछ और आगे बढ़ा। वोमा ढोकर लानेवाले तो देवी के ही दास हैं । उनके मस्तक पर बंधी पट्टी को मनु अंधेरे में भी पहचान रहा था। यह सब क्या हो रहा है? कही दासों ने हो मिलकर असुरों को... कुछ ही देर में नाव चल पड़ी और तेजी से मझधार को मोर तिर गई। तट पर खड़े दासों का मुड नाम की ओर लौट पड़ा। वे सब एकदम चुप थे, जैसे किसी ने उनके होंठों को चिपकाकर बन्द कर दिया हो । मनु समझ नहीं पाया कि क्या करे! पर इस रहस्य का पता तो लगाना ही होगा। कहीं किसी व्यापारी को नाब हुई तो? पर व्यापारी विता इन्द्र की प्राज्ञा लिए, इस प्रकार छिपकर क्यों जाएगा?

महाबली इन्द्र
फिर असुरों की नौका पर?
सहसा मनु ने देखा कि सबसे पीछे एक व्यक्ति धीरे-धीरे
लंगड़ाता हुआ चल रहा है। वह औरों से काफी पीछे रह
गया। इससे अच्छा अवसर नहीं मिलेगा!
मनु हाथ-पांव के बल रेत पर तेजी से रेंगता हुआ आगे
बढ़ा। दूसरी ओर से घूमकर वह थोड़ी ही दूर पर रास्ते में
जा बैठा और घुटनों के बल पड़े-पड़े प्रतीक्षा करने लगा। जैसे
ही दास निकट पहुंचा, मनु ने तेजी से छलांग लगा दी। क्षण
भर का भी अवसर दिए बिना उसने दास का मुंह वाएं हाथ से
दवोच लिया और उसे लेकर रेत पर गिर पड़ा। साथ ही
उछलकर उसके ऊपर सवार हो गया ।
उसे दवाए हुए मनु बड़ी देर तक नीचे पड़ा रहा । दास के
छटपटाने से रेत उड़ रही थी, मनु ने अांखें मूंद लीं। थोड़ी
देर में ही दास बेबस होकर शान्त हो गया ।
अांखें खोलते ही वह चौंक पड़ा, "कौन ?"
"अरे, तू है, मनु !" उसे चकित स्वर सुनाई पड़ा, "हम
दोनों अश्विनीकुमार हैं । तूने जो काम किया, वही करने के
लिए हम दोनों कव से घात लगाए रेत में पड़े थे।"
मनु खड़ा हो गया । बोला, "यह सब क्या है ? कैसा रहस्य
?"
"हम भी नहीं जानते । पर इस रहस्य को भेदना ही होगा।
हम कल से ही यह सब देख रहे हैं !"
"कल से ही?"
"हां, कल ही आर्या गाता ने बताया था कि वह रोज ही
ऐसा काण्ड देखती है, पर भयवश चुप पड़ी रहती है। इसे
प्रेत-लीला समझकर वह डरती थी और इसी कारण बीमार
भी पड़ गई है । हमने आज इसका भेद खोलने का निश्चय कर
है यह

महावली इन्द्र
लिया था। अब खुला ही समझ । एक प्रेत तो तूने पकड़ ही
लिया है...हट, हम उसे पाश में बांध लेते हैं !'
अश्विनीकुमारों ने दास को जकड़कर बांध लिया, फिर
उसे घसीटते हुए बोले, "मा, चल । पहले इसे अपने यहां ले
चलेंगे।"
मनु उनके पीछे-पीछे चल पड़ा।

इस रात देवलोक में अजीव-सा सन्नाटा छाया रहा। ऐसा
लगता था कि जीवन की गति कहीं एकाएक टूट गई है।
इधर कई दिनों से अन्न का अभाव होने के कारण देवलोक में
वैसे ही हलचल मची हुई थी। इन्द्र के आतंक के कारण यह
हलचल अभी तक झोपड़ियों के भीतर या निर्जन स्थानों तक
ही फुसफुसाहट बनकर रह गई थी, विद्रोह नहीं हो पाया था,
पर किसी भी दिन इस सुलगती हुई आग से लपटें
फूट सकती
थीं।
अश्विनीकुमारों के घर के बाहर दुनिया भर की जड़ी-
बूटियां लगी थीं । निकट ही केतकी का बड़ा-सा झाड़ था।
उसकी गंध से मन को इस समय शान्ति से अधिक बेचैनी ही
हुई। मनु ने स्वप्न में भी नहीं सोचा था कि देवों की अमरा-
वती असुरों के भयानक षड्यन्त्र के चंगुल में छटपटा रही
है। किसी भी क्षण विस्फोट होगा और त्वष्टा के हाथों से

महावलो इन्द्र ७३ - निर्मित इन्द्र के भव्य राजभवन बैजयन्त का एक-एक कण विपर कर रेत में मिल जाएगा। थककर मनु धरती पर यों ही पसर गया । वह वन्दी असुर दास से सब कुछ मुन चुका था, तभी से उसको ऐमा लग रहा था कि देव गण ने सब कुछ सो दिया है । कुछ भी बचा- कर रखने की शक्ति उसमें नहीं रह गई है। अपने कन्धे पर पड़े हुए विशाल धनुप को छूते ही मनु को पता नही कितना बल अपने खून में दौड़ता-सा लगता था। उस समय उसे किसी भी सहायक की अावश्यकता नहीं होती थी। भीषण से भीपण युद्ध में अपना रथ मंभाले हुए मनु पलक झपकते कितने ही अनुरों को परागायी कर मकता था। उस बार नमुचि के साथ लड़ते समय वह और खेल ऋपि की पत्नी विश्पला अकेले ही असुरों के व्यूह में फंस गए थे नमुचि पूरे वेग से विश्पला पर आक्रमण कर रहा था। सोचा होगा, एक साधारण-सी स्त्री को रास्ते से हटाते देर ही कितनी लगेगी, पर विश्पला ने नमुचि की गदा को एक ही वार में काटते हुए ललकारकर कहा था, "मनु, तू मेरी ओर से निश्चिन्त हो जा । बलशाली सेनापति नमुचि को मैं एक पग भी आगे नहीं बढ़ने दूंगी। तू जाकर देस, कहीं इन्द्र संकट में न हो।" मनु की भुजाएं वह दृश्य याद करके फड़क उठती हैं । उस दिन उसका रथ रणभूमि में इतनी तेजी से नाच रहा था कि लगता था, देवी उपा का रथ भी पीछे छूट जाएगा। तेजी से वाण चलाता हुअा अनुरों की सेना को चीरकर वह पश्चिमी द्वार की ओर इन्द्र की सहायता के लिए बढ़ गया था। पर इन्द्र तो वही भी दिखाई नहीं पड़ता था। मनु की छाती जोर से धड़क उठी। देव और असुर योद्धा भयानक महावली इन्द्र कर रहे थे, पर इन्द्र कहां गया ? देखा जाएगा । इन्द्र के व होने की वात देवों को नहीं मालूम होनी चाहिए, नहीं भगदड़ मच जाएगी। फिर असुरों से जान बचाकर देवलोक रहना भी असम्भव हो जाएगा। "महावली इन्द्र की जय हो !" पूरे जोर से चिल्लाकर मनु रथ आगे बढ़ा दिया। पता नहीं कितने असुर उसके पहियों को घरघराहट सुनकर हटते, इसके पहले ही रथ उन्हें कुचल रता और वायुमण्डल में चीख पर चीख थरथरा उठती। मनु के देखते ही जैसे देवों का उत्साह दूना हो गया था; युद्ध और भी भयानक हो उठा। रथ को चारों ओर नचाता हुआ मनु राजा इन्द्र को खोज रहा था, नीचे कुचले जाते असुरों के कारण उसका रथ उछल- उछल पड़ता, पर घोड़ों की रास संभाले हुए मनु अडिग खड़ा रहा । उसके चेहरे पर, प्रांखों में सारे शरीर पर तेज-सा छा गया था। आज यदि इन्द्र नहीं मिला तो मनु धरती से देवाधि- देव वरुण के असुरों का नाम-निशान तक मिटा देगा। सहसा कोई पीछे से चिल्ला पड़ा, "मनु ! रक्षा कर !" "अग्नि !" मनु चिल्लाया और दूसरे ही क्षण उसका रथ असुरों के बीच घटा में बिजली की तेजी से लपलपाकर बाई ओर घूम पड़ा। ठीक उसी समय बहुत तेज गड़गड़ाहट हुई और देखते ही देखते असुरों के गढ़ का एक भाग धरती पर विखर गया। मुड़कर मनु उस ओर देखता ही रह गया। अग्नि का रथ ठीक उसके रथ के पास पा लगा, उसके कंधे पर हाथ रख- अग्नि मुस्कराया, वोला, "अगर तेरा रथ वहां एक पल भी और रह जाता तो इसी गढ़ में तेरी समाधि बन जाती। इसी- लिए मैंने रक्षा के बहाने चिल्लाकर तुझे बुला लिया था !" बोलने का अवकाश नहीं था । एक वार धीरे से अग्नि क कर महाबली इन्द्र ७५ हाथ दवाकर मनु ने कृतज्ञता प्रकट की, साथ ही पूछ बंधा. "इन्द्र कहाँ है ?" एकदम पास ही सहमा इन्द्र का पंख वजा और सब ने एक साथ देखा, धूल के बादलों में किसी चट्टान की तरह अडिग खड़ा इन्द्र शंख बजा रहा था। मनु को प्रतीत हुअा कि पूर्वज ऋपियों ने कभी ठीक इसी प्रकार धुएं की नहरों में लिपटे यज्ञपुरुष का दर्शन किया होगा। "इन्द्र, विजेता इन्द्र महान है।" अग्नि और मनु एक साथ बोल पडे। रथ से उतरकर अग्नि ने अपने रथ पर रखा तांबे का पाय उठा लिया और मनु के साथ इन्द्र के पास जा खडा हुआ । बोला, "हे इन्द्र, तेरी गदा के प्राधान से असुरों के पुर दह जाते हैं... मनु ने साथ ही कहा, "तेरे शम को ध्वनि सुनते ही असुरो के कलेजे फट जाते हैं। तेरे प्रताप मे धरती असुरो को अपनी गोद में छिपा लेती है ! "तू पुरन्दर है। जिस प्रकार तू कई गतो तक केवल वायु पीकर बलगाली बना रहता है और असुरों का नाश करता है, उसी प्रकार, हे पराक्रमी इन्द्र, तू मेरे हाथ मे यह मोमग्स ग्रहण करके पी और हमारे दुखों को नष्ट कर।" तांचे का पात्र हाय में लेकर इन्द्र सोमरस पीने लगा। पूर्व की ओर हाहाकार बढ गया था। काठ के ढांचों में जड़ी हुई बालों पर तेजी से थाप पड़ने लगी। मारू बाजे की घरघराहट सहसा तेज पड़ गई। मनु चौंक पड़ा इन्द्र को प्रणाम करके रथ पर चढ़ता हुआ बोला, "विश्पला अकेली ही नमुचि से लड़ इन्द्र और अग्नि को वहीं छोड़कर वह रथ के घोड़ों को तेजी से दौड़ता हुआ फिर पूर्व की ओर बढ़ चला । रास दांतों ७६ महाबली इन्द्र । के बीच संभालकर उसने धनुष उतार लिया था। बाईं ओर से असुरों की एक टुकड़ी ने आक्रमण करके उसे रोकना चाहा था, पर सावधानी से रथ नचाकर मनु एकदम उनके दाईं ओर चला गया। असुरों ने उसे तिरछे वार करते देखकर तुरन्त व्यूह-रचना बदलने की चेष्टा की। पीछे से असुरों की चिल्ला- हट सुनकर मनु ने मुड़ते ही देखा कि विश्पला चारों ओर से घिरी हुई प्रचण्ड वेग से युद्ध कर रही है । मनु किसों प्रकार इस घेरे को तोड़कर उसके पास पहुंचना चाहता था। वह और भी तेजी से लड़ने लगा। पर असुरों की संख्या अपार थी। एक के गिरते ही, उसकी जगह दो पहुंच जाते । मनु उस समय अपने रथ को बवंडर की तरह वेग से नचाकर विश्पला के पास पहुंचना चाहता था। पश्चिम की ओर से इन्द्र की प्रचण्ड शंख-ध्वनि सुनाई पड़ी, -साथ ही अग्नि ने जयजयकार किया। मनु ने चिल्लाकर कहा, • "देवी विश्पला, मैं आ गया हूं। इन्द्र और अग्नि भी श्रा रहे हैं..." उसे लगा, जैसे विश्पला की थकती बांहों में फिर से शक्ति लहरा उठी । पर अव कुछ ही क्षण और हैं-यदि उसके पास पहुंचा न जा सका तो सब कुछ व्यर्थ हो जाएगा। उसके धनुष की टंकार के साथ-साथ वर्षा की तीखी बूंदों की तरह वाण बरसने लगे थे और साथ ही उसका तेजी से नाचता रथ शत्रुओं को कुचल रहा था। सहसा मनु ने दाएं हाथ में रास संभाली, फिर पता नहीं क्या हुआ, विजली-सी चमकी और दूसरे ही क्षण मनु असुरों का घेरा तोड़कर विश्पला के निकट पहुंच गया। इसके साथ ही एक भयानक चीख वातावरण में थरथरा उठी। उसकी झन- कार मनु की शिराओं में टकरा-टकराकर वजती रह गई। - ।

--- महावलो इन्द्र उसने मुड़कर देखा-विश्पला को जांघ कटकर घरती पर गिर पड़ी, साथ ही वह भी घोड़े की पीठ से नीचे प्रा गई। दूसरे ही क्षण असुर बढ़कर उसे रौंद डालेंगे...पर मनु के जीवित रहते नहीं! मनु ने घनुप-याण फेंककर गदा उठा ली और रास बाएं हाय में संभालकर बीच में पड़ी विश्पला की परिक्रमा-सी करने लगा । अमुरों का क्रोध बढ़ गया था। उन्हें जैसे विश्पला के शव को कुचलने की हठ हो गई थी और मनु को बचाने की। वह चारों ओर चक्कर काट-काटकर गदा से असुरों पर आघात करने लगा। उसका रथ पूर्व-पश्चिम उत्तर-दक्षिण हर दिशा में दिखाई पड़ रहा था। किसी को पल भर का भी अवकाश नहीं मिलता था कि बढ़कर विश्पला को छू भी सके।। जो मनु के रथ के पहियों से बच जाता, उसका सिर मनु की गदा से चूर-चूर हो जाता। फिर भी असुर पीछे नहीं हटे । उत्तर और दक्षिण से पहुंच- कर असुरों को दो टुकड़ियों ने इन्द्र और अग्नि को बीच में ही रोक लिया था। मनु अकेला कच तक विश्पला की रक्षा करता रहेगा? जव तक मनु की एक गिरा में भी प्राण रहेगा... सहसा नासत्य और दस्र को ललकार मुनकर मनु को चेत प्राया। वे पूर्व की ओर से मनु और विश्पला को घेरे हुए असुरों पर टूट पड़े। विवश होकर उनसे प्राण वचाने के लिए प्रमुरों को घेरा तोड़कर उस ओर मुड़ना ही पड़ा। वस, मनु को अवकाग मिल गया था। उसे केवल पश्चिम की मोर घेरकर खड़े असुरों को संभालना था। वह बिना देर लगाए उन पर रख दौड़ाने लगा। धनुप की प्रत्यंचा को कान तक चढ़ाकर छोड़े गए उमक वाण एक मैनिक की छाती चीर. पर दूसरे के गरीर में जा धंसते !

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-.-.-.-. -...-. । महाबली इन्द्र थोड़ी ही देर बाद चारों ओर देवों के दाखों की तेज ध्वनि गूंजने लगी थी। असुरों के चेहरों पर आतंक छा गया था। मारू बाजे की ढम-ढक ...ढम-ठक तथा शंखों का गर्जन चढ़ता ही गया; और सहसा शत्रुत्रों में भगदड़ मच गई। असुरों को जिधर से भी राह मिली, वे जान बचाकर भाग निकले । जो देवों के घेरे में फंस गए थे, उन्होंने शस्त्र फेंककर घुटने टेक दिए । देवों ने शस्त्र चलाना बन्द कर दिया। दासों का लाभ वे खूब समझने लगे थे। युद्ध में निःशस्त्र व्यक्ति को मारना कायरता का लक्षण माना जाने लगा था। इन्द्र की प्राज्ञा थी कि अमुर जातियों के शक्तिशाली सैनिकों को बन्दी करके गण में दास बना देना चाहिए। केवल उन्हीं व्यक्तियों का वध कर देना चाहिए जो राजा या नेता हों। उनके जीवित रहने पर विद्रोह हो सकता है। युद्ध बन्द होते ही मनु ने विश्पला को उठाकर रथ पर रख लिया। उसकी कटी जांघ देखकर सन्नाटा-सा छा गया। इन्द्र की प्रांखों में आंसू या गए। बोला, "मुझे नमुचि के जीवित बच जाने का उतना दुख नही, जितना देवी विश्पला की जंघा कट जाने का!" मनु ने दोनों हाथों में माथा दवाकर रथ के पहिए के सहारे निढाल पड़ते हुए कहा, "मेरी प्रांखों के सामने ही यह सय हो गया, पर मैं रक्षा नहीं कर सका । मुझे धिक्कार है !" विश्पला ने धीरे से प्रां खोल दी। चोली, “मनु, तेरे ही कारण मैं बची हूं। तू न होता, तो आज असुर मेरे शव को पिशाच जाति के वबंर योद्धाओं की तरह कच्चा ही चवा जाते ! पर मेरे प्राण बचाकर ही तूने..." मनु उसका पाराय समझ गया। उसने आवेश में इन्द्र के कन्धे पकड़कर कहा, "राजा...इन्द्र, अब क्या होगा ! जव सेल

.
महावली इन्द्र
दृषि सुनेंगे कि मनु वहीं था और देवी विश्पला की जंघा
सुरों ने काट दी, तब ? मैं क्या उत्तर दूंगा उन्हें !"
अग्नि ने समझाया, “मनु, तू अधीर मत हो। यहीं इन्द्र
भी था, मैं भी था, और नासत्य भी थे, पर कितने ही देवों
के प्राण नहीं बचा सके। वह देख, असुरों की तांबे जैसी देह.
के साथ-साथ कितने ही देवों के सोने जैसे शरीर भी निर्जीव
पड़े हैं...
"मनु, तूने मुझे भी क्यों नहीं मर जाने दिया..." विश्पला
कराह उठी।
मनु रो पड़ा।
दस्र और नासत्य विश्पला के घावों को ध्यान से देख रहे
थे। उन्होंने एकाएक मुड़कर रोते हुए मनु को देखा । दस्र
बोला, “मनु, तू भी सूर्यपुत्र है, हम भी हैं । सहोदर न सही,
फिर भी हम भाई हैं। तू चिन्ता मत कर, हम तुझे लज्जित
नहीं होने देंगे !'
अश्विनीकुमारों ने इधर कितने ही चमत्कार किए थे, मनु
को पाशा-सी बंधी। पर इस स्थिति में वे करेंगे ही क्या.?
नासत्य ने कहा, "अभी नहीं। करने के बाद ही
देखेगा! चल, तू हमारा छोटा भाई है। तेरे प्रताप से
हमारा मस्तक गर्व से ऊंचा हो गया है, राजा तुझे वरदेगा!
इन्द्र होंठों को दांतों से दवाकर रथ पर कुहनी टिकाप
खड़ा एकटक विश्पला की ओर देखता रहा ।
-
और उसके पश्चात एक मास भी नहीं वीता था कि सह
इन्द्र-सभा में पहुंचकर अश्विनीकुमारों ने एकाएक स्तुति ।
"इन्द्र तेरे तेज से दसों दिशाएं प्रकाशित हैं ! तेरे बल
धरती का कण-कण चेतन है। एक देवी तेरा दर्शन का

महाबली इन्द्र
"
-
चाहती है !
इन्द्र की अनुमति पाकर दस ने संकेत किया और दूसरे
ही क्षण एक नारी भीतर पाई। इन्द्र चकित होकर बोला,
"विश्पला!"
"देवी !" मनु आश्चर्य से चिल्ला पड़ा था । विश्पला के
दोनों पर ठीक थे। वह अपने पति खेल ऋपि का सहारा लिए
धीरे-धीरे अपने ही परों से चलती हुई भीतर आ रही थी।
मनु को अपनी आंखों पर विश्वास नही हुआ । वह
अपने
प्रासन से उठकर विश्पला के निकट जा खड़ा हुआ ।
सेल ऋपि ने उसकी प्रशंसा करते हुए कहा, "मनु, में तेरा
ऋणी हूं, तूने विश्पला की प्राण-रक्षा में जैसा पराक्रम दिसायां
है, उसका कोई उदाहरण नहीं मिलता। फिर में अश्विनी-
कुमारों का ऋणी हूं, जिन्होंने विश्पला को लोहे की जंघादी
है। फिर मैं राजा का ऋणी हूं, जो अपनी प्रजा को पुत्रों की
भांति चाहता है, जो हमारे सुख के लिए असुरों का नाश
करता है।"
इन्द्र ने भरे गले से कहा था, "अाज से अश्विनीकुमारों को
पहले की ही तरह सम्मान के साथ यज्ञभाग दिया जाएगा।
विशिरा से कहो, इनके भागभी दास पहुंचाया करेंगे..."
सहसा केतकी कुंज के पास सरसराहट-सी हुई। मनु नौंक
पड़ा। उसने देखा, वाहर से रेंगता हुआ एक सांप पाकर
केतकी के झुरमुट में समा गया है। सिन्न-सी हंसी हसकर
वह उठा और धीरे-धीरे बाहर निकल गया। उसे लग रहा
था, जैसे जांघे इतनी भारी हो गई है कि पर उठाना कठिन
हो गया है । जिन जांघों के बल से उसके घोड़े की हड्डियां
चटस उठती हैं, माज उनमें यल जैसे रह ही नहीं गया। जिन

महाबली इन्द्र
।
बांहों से वह प्रत्यंचा को कान तक खींचकर बाण छोड़ता है,
उसमें अब धनुष को झुकाकर उस पर डोर भी चढ़ा सकने भर
की शक्ति नहीं रह गई है।
धीरे-धीरे चलता हुना मनु नदी के तट पर पहुंचकर यों
ही खड़ा हो गया। पूर्व दिशा में उषा की लाली छिटकी हुई थी।
मन की अशान्ति से मनु को कहीं भी छुटकारा नहीं मिल रहा
था। हाथ जोड़कर खड़ा वह देवी उषा की स्तुति करने
लगा:
,
"हे कुमारी उषा, जिस प्रकार तू अपने रथ पर खड़ी होकर
सातों अश्वों को एक ही कर से संचालित करती है, जिस
प्रकार सूर्य की सहस-सहस किरणें तुझमें केन्द्रित हो जाती हैं,
उसी प्रकार हमारे मन को भी एकाग्र कर...
"हे उषा, तू अन्धकार की छाती चीरकर प्रकाश को राह
देती है। हमारे सामने छाए अन्धकार को भेदकर हमें मार्ग
दे..."

E ००० मन्त्रोच्चारण रुक गया। कुण्ड से भाग की ऊंची-ऊपी मग उठने लगी थी। देवगण फिर धीरे-धीरे इधर-उधर की चातें करने लगे थे। विशिरा से भाग बांटने का अनुरोध करके इन्द्र वही बेठे-बैठे देव सेनानायकों में बातें करने लगा। प्रायः ऐसा ही होता था। कितनी ही बार देव लोग यमगरप में ही तरह-तरह के मेल गेलने लगते और कभी-कभी तो दन्द्र वहीं बैठे-बैठे मोमरम भी पीता था। विशिरा मण्डप के साथ ही यने भण्डार के बाहर पहें पारान पर बैठकर भाग बांटने लगा । दास प्रभी तक भीतर नहीं पाए ये। एक देवपुत्र को धुलाफर प्रिगिरा ने पाना दी, "जाते समय तू दासों को इधर भेजता जा । में भाग बांट चुका हूं।" देवपुत्र वाहर की ओर दौड़ा, पर दन ने वीच ही में रोक- कर कहा, "जा,तू रघर जाकर सेल ।" "पुरोहित ने कहा है...'

महाबला - इन्द्र के पास "जो मैं कहता हूं, कर । दासों को बुलाने के लिए मैंने सरे को भेजा है।" देवपुत्र डरकर मण्डप के बाहर खेलते हुए देवपुत्रों में जा मला। "ला, मेरा भाग दे दे, ब्राह्मणस्पति, दास पता नहीं कव पाएंगे।" एक वृद्ध देव पुरोहित के निकट जा खड़ा हुआ। विशिरा ने जरा खीझकर कहा, "ऐसी जल्दी क्या है। जरा देर बैठ जा । भाग में बांट चुका हूं।" "जल्दी नहीं है ?" देव एकाएक कोपकर बोला, "कल से पेट में अन्न का एक दाना तक नहीं गया है !" "कल तुझे भाग नहीं मिला था, देव ?" वैठ- कर किसी गम्भीर विषय पर बातें करते-करते अचानक मुड़कर नासत्य ने कहा, "अन्न क्यों नहीं गया पेट में ?" देव सहमकर एक ओर खड़ा हो गया। इन्द्र की भौंहें तनं गई। एक ओर बैठे अग्नि और मनु की दृष्टि एक-दूसरे से मिली। दोनों ने ही सिर हिलाया। उन्होंने सावधानी से देखा, पहले की निश्चित योजना के अनुसार दस्र मण्डप के द्वार पर खड़ा था। उससे बचकर कोई भी उस ओर से निकलकर नहीं जा सकता। मनु का संकेत पाते ही अग्नि बोल पड़ा, "तुम लज्जा नहीं आती इस प्रकार बोलते ? महापराक्रमी इन्द्र हमारा पालनकर्ता है। उसके होते कौन बिना अन्न खाए से संकता है !" अव भी देव को कुछ बोलने का साहस नहीं. हुआ। व डरी हुई अांखों से चारों ओर इस प्रकार ताकने लगा जैसे कि सहायक की खोज में हो। अग्नि की ललकार सुनकर अचान चारों ओर सन्नाटा छा गया था। सब पथराए-से एकटक ६ राए हुए वृद्ध देव की ओर ताक रहें थे। किसी में भी सा P... महावलो इन्द्र न था कि एक बार अांख उठाकर कोध से तमतमाए हुए पनि या इन्द्र की ओर ताक लेता। बड़ी देर तक चुप्पी छाई रही। अन्त में इन्द्र का गम्भीर म्वर गूंज उठा, “देव, कल तू भूया रहा ? क्यों ?" "कहीं किसी चोर ने न लूट लिया हो।" किसी कोने से धीमी-सी आवाज आई। दल ने वही से कहा, "नही, पुर की रक्षा करने वाले योद्धानों में से किसी ने भी कल रात का कोई ऐसा काण्ड नहीं बताया।" "देव ! बताता क्यों नहीं ?" मनु अपनी जगह से उठकर देव के निकट आ सड़ा हुआ, बोला, "तू निर्भय हो। यता तुझे क्या कष्ट है ? कल तुझे अप्न क्यों नहीं मिला?" कन्धे पर मनु के बलिष्ठ हाथों का स्पगं पाकर जैसे देव का साहस पंधा । धीरे से वोला, “कल ही नहीं, आज चार- पांच मास से कितनी ही वार हमें भूमों सो जाना पड़ता है..." मनु ने एक बार चारों ओर दृष्टि दौड़ाकर पूछा, “क्यों, ऐसा क्यों होता है ? तुझे यज्ञभाग नहीं मिलता?" "भाग मिलता है, पर पूरा नहीं पड़ता। वह देयो, उतना- सा भाग मिलता है, उससे किमका-किसका पेट भगा?" सवकी यांखें निशिरा द्वारा लगाए गए भागों पर टिक गई। मनु ने एकाएक पूछा, "उतने से तेरा ही पेट नहीं भरता, मोर सबका क्यों भर जाता है ? हमारा भाग भी तो यही से मिलता है।" देवों में से एक प्रौढ़ सौर उठकर उनके पास पा सड़ा हुमा, चौला, "अाज प्राणों का मोह छोड़कर मैं भी कहूंगा। देवलोक की प्राधी प्रजा माथा पेट साफर सोती है। तुम्हें, वया अग्नि, नासत्य और दस, इन जैसे लोगों को भाग मधिर - महाबली इन्द्र मिलता है, और शेष प्रजा को कम । तुम अपने पशुओं को भी अन्न देते हो, हम अपने बच्चों का भी पेट नहीं भर पाते।" सहसा त्रिशिरा चिल्ला पड़ा, "हां, तुम पशुओं से भी गए- बीते हो। तुम्हारा जितना अधिकार है, उतना ही मिलेगा। मैं बन JUM

८७
"
महावली इन्द्र
तुम्हें शाप दूंगा...तू...'
"इन्द्र, रक्षा कर...राजा, तू महान है...
सहसा दोनों देव धरती पर पसरकर मस्तक रगड़ने लगे।
इन्द्र ने दाई भुजा उठाकर कहा, "सावधान पुरोहित...मैं इन्द्र,
तेरे शाप का वर्जन करता हूं।"
"राजा!" विशिरा चिढ़ गया। बोला, "तू मेरा अपमान
करता है।"
इन्द्र ने त्रिशिरा की वात अनसुनी कर दी। वह उठकर
आसन से नीचे उतरा और पास ग्राकर भागों का निरीक्षण
करने लगा। बोला, पुरोहित, कुछ भाग पांच-पांच गुना हैं
और कुछ बहुत ही छोटे । गण के हर व्यक्ति को समान भाग
देने को व्यवस्था है। तूने यह भेद क्यों किया?"
विशिरा ने इसे स्वर से कहा, "राजा, भाग में बांटता हूं।
मैं जानता हूं, जिनके बल से गण चलता है, उन्हें पूरा भाग

- . . -- लना ही चाहिए। शेष जितना होगा, उसी को बोरकर एगे। बन्द कोष से कांप जाबोला, "या कहता है ? इसका अर्थ तो यह है कि देवलोक में भाग भी धमाल है ! मैंने सोचा था कि अब किसी दिन देवों की जलकी सगरमा रमार दूं, तो अमरावती अमरावती हो जाएगी, पर अभी तक प्रला भूखों ही मर रही है ! मुझे भिनकार है। या कुल तना ही अन्न मिलता है ?" "जो कुछ है, मैं बांट देता हूँ।" निशिरा कुर संगोष के साथ कहा। "तो मुभमें और मेरे कायर पिता गोश में शरारही। मैं उससे भी बड़ा अपराधी हूं। यह तो सब चुप जानता था, मैं यह भी नहीं जानता कि मेरी प्रजा भूख से तड़पती । वैजयन्त भवन में इन्द्रारान पर बैठा शप्सराओं का नुत्य देखा हूं; नन्दन नानन में सुगन्धियों के समुह में तैरता हूँ; शोरगे प्रजा भूख से तड़प-तड़पकर रात काटती है। अगिग, गनु... सब क्या है ! अश्विनीतुगारो, तुग शी यह सब नहीं जान "हम जानते हैं, इन्द्र ! आ तुभो भी दिखाएं।" भण्डार के द्वार पर रखी शिला को अपनी बलिष्ठ शुजा ठेलकर एक ओर कर दिया, फिर बोला, सा, गह यह देख !" त्रिशिरा श्रासन पर रतब्ध बैठा रहा । इन्द्र ने " देखा, प्राधा भण्डार अन्न रो ठरााठरा भरा पड़ा था। :; उसके मुड़ते ही प्रिशिरा ने कहा, ''यह भण्डार खाली नहीं होने देता। किसी भी दिन संकट पाने पर इसी से पेट भरना पड़ सकता है !" IIT सका भार तो, राजा पर है !" अग्नि .

महाबसी इन्द्र
--
"इन्द्र के भण्डार मैं रसा अन्न प्रजा के लिए ही तो है !
फिर तू किस कारण प्रजा का पेट काटता है, ग्राह्मण ?"
मनु
गरज उठा।
"राजा के साथ-साथ पुरोहित का भी कर्तव्य है कि प्रजा
की रक्षा का उपाय करे..." निशिरा की जीम लड़खड़ाने
लगी।
इन्द्र ने बीच ही में कडककर कहा, "तो माज तक तू जी
अन बचाता रहा, कहां है यह सच ?"
मिशिरा ने पल भर सोचकर कहा, "रोज इतना ही नही
बचाता । बम प्राधा भण्डार सदा भरा रहता है..."
"तो यश के समय पूरा अप्न बंटता है, फिर भी प्रजा का
पेट नहीं भरता ?"
"जो मिलता है, मैं देवों को ही तो देता हूं..."
"प्रसत्य है !" मनु ने चिल्लाकर कहा, "इन्द्र, में बताता
हूं तुझे । इस मिशिरा की माता असुरवाला है। उमी के संकेत
पर हमारा पुरोहित रोज हमारा प्राधा भाग प्रमुरों को देना
"
"मनु !" प्रिगिरा क्रोध से कांपते हुए बोला, "तुझे मेग
शाप है...'
मनु ठहाका मारकर हस पडा बोला, "सावधान विभिग
पाप देने के पहले इसे देख ले!"
यह झपटकर बाहर निकल गया और तुरन्त ही कल गत
में पकड़े गए प्रमुर यन्नी को लाकर पिगिरा के सामने ही
इन्द्र के परों पर डाल दिया । बोला, "इम दास को पहलानता
है तू? इन्द्र, इस दाम मे पूछ कि देवों का पेट काटकर विगिरा
मारा भन्न कहां भेज देता है। देवों के श्रम का भाग
रात नौका पर मदकर प्रमुरों के ग्राम में चला जाता

महायली
"त्रिशिरा"न्द्र गागीर, गाठोर बर रो जैसे चट्टाने
भी उठीं।
त्रिशिरा ने चरणमाकर चारों ओर देगा। उराकी प्रांग
फटीगी पाटी रह गई। गना नहीं मान गारात्य, दग्न, अनि
और ग मार पर गये हो गए थे। नहीं, गोई गार्ग नहीं।
"तेरा नाग ग़म ही मेरे तीन शिर, निशिग! तेरे
तीन गुण, । एक रोग यज्ञ गी बलि ग्रहण करता; दुरारे
में गोग पीना और तीसरे गे हग देवों की गणित पीता है !
नील, मामेव नदी, पागुर है,.. सावधान !
इन्द्र ने साथ बढ़ाकर पग उठा लिया।
"इन्द्र !" निगिरानी पाटी हुई अावाज गाय की दीवारों
गे टगाग-कारागार शिर घुनने लगी, "तू क्षेत्रों का परामगी
राणा । तमामणगी हत्या गारेगा !"
"एक बार पीर राही!" इन्द्र ने दांत पीरामार उराकी पोर
भागते हुए गाहा, "fने एक दिन प्रजागे लिए अपने पिता
प्रयोग का वध किया था...माज तेरा वध गागा..."
"इन्द्र !" दन गो टेलगार राहा वटा पिल्लाता हमा
गीतर पाया, "तुको बाहत्या लगेगी। राजा..." उरायो हाथों
गैसोगररा रोगरा पर था।
एगा मोने में बैठा पराजयुत पुरोहित बहराशि गा होगर
जिल्ला पा, "इन्द्र, सावधान ! यह बस अपमान होगा...
गुरोहित की हत्या प्रगानार...आताण निगा देवों गा नाश
हो जाएगा...
"AE बालाण नहीं है...विशिरा मार्ग प्रामाणगे नहीं
है!" इन्द्रमा मग श्राफाश में गया और दूसरे ही पान
निशिरा मा शिर पाटगार धरती पर लुलगा गया। तब भी
उराना गुल से लथपण धड़ उठगार गाई पग इधर-उधर भागा,

-.-.-.. महाबली इन्द्र १ फिर अपने पिता त्वष्टा के घरों के पास गिर पड़ा। इन्द्र के ठहाके से जैसे प्राकाग कांपने लगा। उसने पुकार- कर कहा, "ला, त्वष्टा, सोमरग दे। मुझे प्याम लगी है !" वृहम्पति ने चिल्लाकर कहा, "नहीं, देवो, मावधान । इन्द्र नीचकर्मा है, अनाचारी है, मोम का अधिकारी नहीं !" यज्ञशाला में घोर सन्नाटा छाया रहा, किसी पोर से एक भी गन्द नही मुनाई पडा । इन्द्र और बृहस्पति एक-दूसरे के गामने विशाल चट्टानों की भांति अडिग रहे थे। उनके तेजपूर्ण नेत्र एक-दूसरे का मर्म भेद रहे थे। कोई भी नन होना नहीं दीया। रूसे, कठोर म्वर से इन्द्र ने घोषणा-मो की, "मैं गणपति "मैं ग्राह्मण हूँ।" वृहस्पति ने उसी स्वर में उत्तर दिया। "गणपति अपराधी को दण्ड देगा!" "ब्राह्मण की व्यवस्था से ब्रह्म जीवित है ! गणपति ब्राह्मण से श्रेष्ठ नहीं !" वृहस्पति ने यनशाला में बैठे देवों पर दृष्टि डाली । उगे लगा कि हर दृष्टि उसका समर्थन कर रही है, पर हीट इन्द्र के. प्रातंक से वन्द हैं । उसने जोर से कहा, "गणपति ब्रह्म गे पोट नहीं है । इन्द, तू अनाचारी है ! ममाज का निरम्कार करता है "मैं शक्तिशाली हूं! अक्ति ही श्रेष्ठ है !" "तू दम्भी है ! सोम का भाग पाने योग्य नहीं !" "गण मेरे प्रादेश से चलेगा!"इन्द्र गरज उठा। "तो ब्रह्म की परमरा ममाप्त हो जाएगी। मैं पितरों के नाम पर मर्यादा देता हूं...ब्रह्म न्याय करे ! इन्द्र माज मे.. "वृहस्पति...व्हर ! मुझे पूछ लेन दे। कही मुझे मर्यादा और माप का भी वजन न करना पड़े।"

से अव
-
महाबली इन्द्र
इन्द्र के विशाल पीले नेत्रों की लाली और बढ़ गई। उसने
अपने दाएं हाथ की ओर देखा, खड्ग
भी त्रिशिरा का
गरम खून टपक रहा था। उसने गरजकर कहा, "अग्नि...
मनु...नासत्य...क्या तुम भी सोमरस मुझे नहीं दोगे ?"
युवक देव सिर झुकाए खड़े रहे । बृहस्पति के साथ ही उस
ओर बैठे देवों ने उत्तेजना से कांपते हुए कहा, "नहीं, नहीं..
इन्द्र सोम का अधिकारी नहीं है !
इन्द्र एक बार आग्नेय दृष्टि से चारों ओर देखकर गरज
उठा, "तो मैं, द्यौस का पुत्र इन्द्र, सोमपान करता हूं...
जिसमें शक्ति हो, रोके..."
उसने बांया हाथ बढ़ाकर त्वष्टा के हाथ से घट छीन
लिया और गट-गट सोम पी गया। इस बीच उसकी दाईं भुजा
उठी रही और खड्ग से खून की बूंदें टपकती रहीं।
त्वष्टा पुत्र के शव से लिपटकर चीखने लगा।
सोम पीने के बाद खड्ग एक ओर फेंककर इन्द्र भारी
भारी डग रखता हुआ बाहर निकल गया।

१० - असुर खुलकर सत्ता पर उतर आए । अब तक रोज छोटे-मोटे झगड़े चलते रहते थे, कभी-कभी युद्ध भी हो जाता था, पर बहुत-सी बातों में वे मिलजुलकर रहते । व्यापार, और विशेप- कर समुद्र पार के देशों से व्यापार करने में प्रमुर पौर देव जाति का साथ रहता था। कितनी ही बार उन्हें पश्चिम में मिस देश के योद्धामों, और पणियों से लड़ना पड़ जाता। उनसे अपनी सम्पत्ति बचाने में वे एक-दूसरे का माय देते थे पर अब वह सब बन्द हो गया। देव और प्रमुर जातियां जहा भी थी, वही उनकी लड़ाई ठन गई। अपने पुत्र का वध होने के कारण स्वप्टा राजा इन्द्र में रुष्ट हो गया। पुत्र के गोक में वह पाल गत भर नदी की रेत में छटपटाता-लोटता रहा। यह बार-बार चिल्ला पड़ता. "त्रिशिरा, तू कायर है । तू बैठा देयता क्यों रहा ? - इस कृतघ्न इन्द्र का वध क्यों नहीं कर दिया !"

महाबली .
इन्द्र ने भी अपने भवन के निकट खड़े होकर उसका प्रलाप
था । पास ही खड़े अग्नि ने अपना धनुष संभाला, पर इन्द्र
वीरे से कहा, "नहीं अग्नि, उसे जाने दे । त्रिशिरा के शोक
वह पागल हो गया है।
फिर उसी रात त्वष्टा पता नहीं कहां चला गया था।
दूसरे दिन सवेरे ही देवों के अनेक योद्धा और सेनापति
M
राजा इन्द्र का दर्शन करने आए।
इन्द्र ने उनकी अोर उपेक्षा से देखकर कहा, "अब इन
क्या लेना है ? इन्द्र सोम से वंचित है न! जानो, और
चुन लो !"
कल की घटना से सभी डर गए थे। किसी में इन्द्र से
मिलाने का साहस नहीं रह गया था। शची भी उसके
रही थी। वे बड़ी देर तक इन्द्र की स्तुति कर
डर

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महावी इन्ट
इन्द्र के बिना देव गम नष्ट हो जाएगा....न्ट ही उनकी रक्षा
कर मरना है...
अन्त में इन्द्रमान गया। उसनेगची को मारकर इन्द्रा-
मन परवठा लिया । और देवों के लिए भी प्रागन मा गए ।
उन्हान
विस्मय
माय देखा,
इन्द्र का टर
दुना जान
पहना था।
पलकों दले
कालिमा छा
गई थी और
मंत्र प्रधानाटिंग में नाल । टन्द्ररी नीली प्रांगों
की लाली उनके ने उ मोर मुन्दग्ना की प्रतीक श्री. रग्राउ
कुछ यार हौलना।
"गा माद गन नरमाया नहीं।" दर ममाया।
मनु गिर हिलासरह गया। मं तिनी ही दार इन्द्र
को गन-गत नरनार गमों में खुद ऋग्न दन्दा है. कर
का दो कभी नही दृप्रा या! इन्ट का वहग कमी नना
चिन्निद प्रांर नंदगयाना नहीं दिनाई पड़ा।
इन्द्र ने पीनेन्दरछा. "दटा का कुछ पदावमा ?
दानन्द ने बनाया, "नहीं। गत कीदह नदी पार करे
धनुगें की प्रोगबना ना...पा ददने ददावा है कि...'
"क्या बनाता है ?"लक चंद्रकाली दिलानग
उन्नुरनानी दोगनी नहीं टिम्गाई पहनी थी!

महाबली इन्द्र . कुछ हिचककर नासत्य ने कहा, "वही, त्वष्टा प्रलाप कर हा था...त्रिशिरा...मैं प्रतिशोध लूंगा । तू अन्तरिक्ष में ठिठक- र देवाधिदेव वरुण असुर की आंखों से देख, मैं इन्द्र के वध के लए महायज्ञ करूंगा ! आज से उलटे मन्त्र पढ़गा.. इन्द्र सहसा उठ खड़ा हुअा । देवताओं की प्रांखें उसे देख- कर आश्चर्य से फैल-सी गई । इन्द्र झेप गया। फिर बैठते हुए बोला, "हमें सावधान रहना चाहिए! अग्नि ने दर्प से कहा, "उस बूढ़े त्वष्टा के कारण ऐसी कौन-सी विपत्ति आ जाएगी, राजा !" उसे आश्चर्य हुआ। कल यही इन्द्र तो था, जो सारे देवों की उपेक्षा करके सोम छीनकर पी गया था। फिर आज यह क्या हो गया है उसे ? "नहीं ।" इन्द्र ने सिर हिलाया, "त्वष्टा साधारण नहीं है । हमें सतर्क रहना चाहिए।" "इन्द्र का तेज ब्रह्महत्या के कारण क्षीण हो गया है !" इन्द्र-सभा में बैठे एक देव ने करुण स्वर में कहा, "तुम सब देवों को मिलकर इन्द्र की रक्षा करनी चाहिए... "हा...हा...हा..." इन्द्र जोर से हंसा, पर उसकी आवाज में आज वह वल नहीं था । बोला, "इन्द्र की रक्षा नहीं, देव गण की रक्षा की बात सोचो ! त्वष्टा का महायज्ञ हमारे नाश के लिए होगा। इस नगरी को त्वष्टा ने ही बनाया है। हम लोगों के पता नहीं कितने रहस्य वह जानता है । उसे यह भी मालूम है कि हम लोग नदी के किस भाग से अपने जलकुण्डों को भर हैं । यह सब बहुत भयंकर है। त्वष्टा हम पर किसी भी सम संकट ढा सकता है" देव सिर झुकाए बैठे रह गए । इन्द्र सच ही तो कहता उसकी चिन्ता अनुचित नहीं । "आज से हमारा पुरोहित कौन होगा ! भाग

महाबली इन्द्र
बांटेगा?" इन्द्र ने सहता पूछा, "विना पुरोहित के यज्ञ रुक
जाएगा । हमारा पतन होगा..."
सन्नाटा छाया रहा, सचमुच विना पुरोहित के मामन कैसे
चलेगा?
मनु ने कहा, "ऐसा एक ही व्यक्ति है, इन्द्र ! पांगिरम
वृहस्पति ! इस संकट में वही देवों की रक्षा कर मकता है !"
"वृहस्पति !" इन्द्र चौंक उठा, "पर वह तो..."
"और किसी पर भी विश्वास नहीं किया जा सकता।
जान, शक्ति, और बुद्धि सव में वह श्रेष्ठ है। असुरों के सबसे
बड़े पुरोहित उदाना शुफ से निबटना भी अकेले उमो का काम
है। और उससे बढ़कर देवां का विश्वासपात्र भी तो कोई
नहीं । तूने उसका पद छीनकर विशिरा को दे दिया था, फिर
भी वह मन्त्रों की रचना करता है और देवों के हित में ही लगा
रहता है..."
इन्द्र ने सिर हिलाकर स्वीकार किया। पर सन्देह भरे स्वर
में बोला, "किन्तु वह मानेगा?"
मनु ने कहा, "वह तुमसे रुष्ट है, देव जाति से नहीं।
अपनी बुद्धि और तेज के बल से वह जब चाहता, विशिरा से
अपना पद छीन सकता था। प्रजा उसके एक संकेत पर उसके
साय सड़ी हो जाती, पर वह धीर-गम्भीर है। उसमें स्वायं
नहीं, मोह भी नहीं है । वह देवों का हितपी है । यदि तू कहेगा
तो वह तुरन्त स्वीकार कर लेगा!"
इन्द्र संकोच के साथ बोला, "पर उसके पास जाकर कहते
पता नहीं कैसा लगता है..."
"देवों के हित के लिए तूने अपने पिता का वध तक किया
था, इन्द्र!" दस बोल पड़ा, "माज उसी के लिए ब्राह्मण के
सामने सिर मुकाते लजा रहा है ! तू जिस क्षण भी चाहे,

महावली इन्द्र बृहस्पति का अस्तित्व मिट्टी में मिल सकता है । तेरी इच्छा के कारण ही तेरा शत्रु होते हुए भी वह जीवित है । तू ही उसका रक्षक है । तू चाहता तो त्रिशिरा की तरह उसका भी वध कर सकता था, फिर उसे प्रणाम करने में तेरा गौरव ही तो है... इन्द्र ने खिन्न हंसी हंसकर कहा, "अच्छा, मैं तत्पर हूं। चल... - "नहीं इन्द्र, तुझे जाना नहीं पड़ेगा ! मैं स्वयं पा गया हूं।" द्वार से बृहस्पति ने प्रवेश करके कहा, "तेरे पराक्रम से देव सुखी हैं, तेरे कारण प्रजा का वैभव बढ़ रहा है । इससे बढ़कर कामना मुझे और क्या हो सकती है । तूने अपने को सुरनायक सिद्ध कर दिया है। अाज असुर तेरे विरुद्ध संगठित होकर खड़े हैं । मैं भी इसी कारण स्वयं चला आया हूं! मैं तुझे राजा मानकर तेरा अभिषेक करता हूं। मैं तेरा पुरोहित बनूंगा! "प्राचार्य !" इन्द्र दौड़कर उसके चरणों पर गिर पड़ा। "हां इन्द्र ! तेरे बिना देवों का नेता कौन होगा । त्वष्टा तेरे नाश के लिए यज्ञ कर रहा है । मैं तेरी रक्षा के लिए यज्ञ करूंगा!" सारी देव सभा ने हर्ष से चिल्लाकर बृहस्पति का अभि- वादन किया। इन्द्र ने अपने हाथों से बृहस्पति के लिए पुरोहित का आसन रखकर उसे बैठाते हुए कहा, "तब मुझे कोई चिन्ता नहीं । आज मैं असुरों से अधिक बलशाली हुमा..." कई मास बीत गए। एक दिन राजा तुन का पुत्र व्यापारी नाविक भुज्यु यात्रा से लीटकर अमरावती आया। उसने कुछ गम्भीर सूचनाएं दीं। "त्वष्टा पागल नहीं था । वह सचमुच प्रतिशोध के लिए भयानक जुट गया है। उसने रात-दिन एक करके असुर बल । प्रयास में महाबली इन्द्र वृसय के पुत्र असुर वृत्र को खोज निकाला । वृत्र की भुजानों में इतनी शक्ति है कि वह अपने से कई गुना भारी चट्टान उठा. कर पर्वत के ऊंचे-ऊंचे गिवरों पर दौड़ता हुया चढ जाता है । पल भर भी रुके बिना त्वष्टा उसे अथक परिश्रम करके युद्ध- विद्या में पारंगत कर रहा है । उसने पता नहीं कौन-मी ग्रोपाधि खोज निकाली है, जिसका प्रयोग करके वह वृत्र के शरीर को ऐसा बनाए दे रहा है कि उसकी देह पर किसी गम्त्र मे कोई घाव ही नहीं होता !" "असम्भव !" अग्नि ने हसकर नासत्य की ओर देगा। योला, "सुनते हो, नासत्य, ऐसा भी कही हो सकता है कि हाड़-मांस पर शस्त्रों से घाव ही न लगे !" नासत्य ने गम्भीर होकर कहा, "कुछ भी अमग्भय नहीं है अग्नि ! तुमने सुना नहीं है, नमुचि के शरीर पर भी तो किमी भी शस्त्र से घाव नहीं होता। उसे बस, ऐसे ही गम्भ से मारा जा सकता है जो न गीला हो, न सूसे पदार्थ का । ऐसा क्या हो सकता है भला ! इस कारण नमुचि अमर ही हो गया है न ! पिछले युद्ध में भी वह बच ही निकला।" "वृयामुर को देखा तूने ?" इन्द्र पूछ बैठा । "नहीं । पर उसके अपार वल का गयं हर असुर को है। कहते हैं, त्वष्टा ने वृत्र से इन्द्र की हत्या करने का वचन लेकर उसे असुरों की संगठित सेना का प्रधान सेनापति भी बनवा दिया है।" "उस किगोर को!" इन्द्र हंसा, "तब हो चुका भुज्यु ने सिर भुकाकर कहा, "उमकी उपेक्षा नहीं दी जा सकती, राजा! मैंने उसकी उसाडी हुई एक मिला देवी है । और नदी के तट पर ही उसने अपनी भुजायो में जरदार र पेड़ उगाड़ फेंका है, उसे भी देवता पा रहा हूँ महावली इन्द्र एकाएक जोर से हाहाकार सुनाई पड़ा। कितने ही नारी, वालक और पुरुष कण्ठों से 'रक्षा करो, रक्षा करो' का आत- नाद सुनाई देने लगा। इन्द्र के साथ ही सारे देव योद्धा खड़े हो गए। "असुरों का आक्रमण हो गया !" मनु चिल्लाया और. बाहर की ओर भाग चला। पीछे-पीछे योद्धा भी दौड़ते हुए निकल गए। इन्द्र अपनी भारी-भरकम गदा उठाकर बोला, "मैं देखता हूँ ! शची, सावधान ! उसके चलने से पृथ्वी जैसे धमक उठी। वाहर आते ही मातलि उसका रथ लिए मिला । इन्द्र के रथ पर चढ़ते ही घोड़े हवा की तरह दौड़ चले। हाहाकार बढ़ता ही जा रहा था... थोड़ी ही देर बाद भयंकर मारू वाजे वजने लगे। शंखो और शृगों की भीषण ध्वनि से वायुमण्डल थर्रा उठा। वालकों, वृद्धों और स्त्रियों की चीख-पुकार के साथ योद्धाओं की हुंकार और पशुओं की चिंघाड़ मिल जाने के कारण ऐसा लग रहा था मानो महाविनाश सिर पर मंडराने लगा हो। थोड़ी ही देर में सारा देवलोक धूल, आग की लपटों और खून की बौछारों में खो गया। कौन कहां है, क्या हो रहा है, कुछ पता नहीं चलता...

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१०२
महावली इन्द्र
झुण्ड सूंघ-सूंघकर खून चाट रहे थे।
देवलोक की स्थिति देखकर इन्द्र की प्रांखें भर पाई।
उसने गहरी सांस के साथ यों ही पुकारा, "मातलि !"
सारथी मातलि निढाल बैठा था । पुकार सुनकर उसने
धीरे से सिर उठाया, साथ ही पीड़ा से सिसिया उठा । अाज
वह एकाएक सतर्क होकर इन्द्र का अभिवादन नहीं कर सका।
"कोई नहीं दिखाई पड़ता ...शायद कोई नहीं बचा !"
इन्द्र का भारी स्वर लड़खड़ा-सा रहा था ।
एक शब्द भी विना बोले मातलि रथ हांकता रहा । रास
हिलाकर उसने घोड़ों को संकेत किया। उन्हीं की तरह जैसे
दोनों घोड़े भी थक-हारकर शिथिल पड़ गए थे। फिर भी वे
संकेत समझ गए । सामने ही दो-तीन देवों और स्त्रियों की
खून से लथपथ लागें पड़ी थीं। उधर से मुंह फेरकर घोड़े
Vira

महाहारती इन्द्र
उत्तर-पूर्व की दिशा में
चल पड़े। दूर से ही
त्वष्टा के बनाए हुए
काठ के सुन्दर राजा
भवन से उठती हुई
लपटों और धुएं का
चवण्डर-मा दिखाई
पड़ा।
इन्द्र की दोनों
पाली मुट्ठियां तीये
प्रावेद से कस उठी।
वह बुदबुदा उठा,
"विनाग मातलि,
महाविनाम, लगता है.
मेरी सची भी गई।"
"इन्द्राणी अमर
हो " मातलि का स्वर कापा और अचानक एक हिचकी के
साय टूटन्सा गया। पर इन्द्र नहीं रोएगा इन्द्र कभी गया
नहीं करता।
कितनी ही बार लागों को कुचलते हुए ग्य ले जाना पड़ता।
उनकने के कारण वे कई जगह गिरते-गिरते बचे । अन्तिम मोड़
पर पहुंचते-पहुंचते अंधेरे में एक परछाई मामने आ गडी हुई।
इन्द्र ने सतर्क होर धनुप-चाप उठाना चाहा, फिर अपनी गदा
पोजने लगा। उफ, गंग भी नहीं रहा ! कुछ भी तो नही है ।
माननि नै रच दूर ही रोक दिया । इन्द्र ने पूछा, "कोन
-
"मैं ,मग्नि।"

१०४
महाबली इन्द्र
"अग्नि !" इन्द्र चिल्ला पड़ा, "अग्नि, तू जीवित है ?"
बड़ी फीकी-सी हंसी सुनाई पड़ी। फटी-फटी-सी आवाज
से अग्नि ने उत्तर दिया, "जीवित हूं, पर मरे से अधिक नहीं।"
रथ से उतरकर इन्द्र उसके पास पहुंच गया। अग्नि का
सारा शरीर घावों से भरा था। देह पर न कवच था, न कुण्डल
थे, न कोई शस्त्र था। उसके कन्धे पर हाथ रखकर इन्द्र
फुसफुसाया, "और सव...सव...
पता नहीं अग्नि हंसा या सिसक उठा। बोला, "कुछ को
देखकर पा रहा हूं। दोनों अश्विनीकुमार देवियों की सहायता
से घायल योद्धानों को खोज-खोजकर उधर पूर्व की उस गुफा
में भेज रहे है...
"वहां कौन हैं ?"
"युद्ध प्रारम्भ होते ही बृहस्पति सतर्क हो गया । इन्द्राणी
के साथ वृद्धों-स्त्रियों और बालकों को जल्दी से जल्दी जुटाकर
वे
दूर गुफा की ओर चले गए थे..."
"शची जीवित है ?" इन्द्र उत्साह से चिल्ला पड़ा, पर
सहसा उसके चेहरा काला पड़ गया, बोला, "इन्द्राणी जीवित
है, फिर भी वह गुफा में जा छिपी?"
अग्नि ने आदर के साथ कहा, “इन्द्राणी पूजनीय है,
राजा, आचार्य बृहस्पति ने बड़ी चेष्टा की, पर वह जा नहीं
रही थी । अन्त में वृहस्पति ने उसे तेरी सौगन्ध दे दी। समझाया
कि युद्ध में प्राण देना ही सव कुछ नहीं है, आने वाले युग के
लिए प्राणों की रक्षा भी उतना ही महान कर्म है। अाज यदि
इन्द्र न रहे, तो भी वह चाहेगा कि उसकी जाति जीवित रहे।
आने वाला इन्द्र जीवित रहे, इसलिए इन्द्राणी, तू मेरे साथ
चल ।"
"इन्द्राणी अमर है।" मातलि ने फिर से कहा।

.-.-.- महापती इन्द्र इन्द्र सिर झुकाकर जैसे प्रणाम करते हुए बोला, "मापा बृहस्पति सचमुच ही पूजनीय है । पल अग्नि, हम भी मश्विनी- कुमारों की सहायता करें।" मारी रात प्रांतों में ही बीत गई। इन्द्र प्रयोते ही अपने यून से लथपथ कन्धों पर पनासों घायल देय पोसामों को लाद- कर गुफा तक ले गया। हर बार इन्द्राणी उराफे पारा भागर मुस्कराती। उसके कन्धे छूनी। उसकी आंखों में भरी मीठी. सी चमक देराफर इन्द्र को लगता-यह जरा भी थमा नहीं है। इन्द्राणी के छूते ही करते हुए पाय जैसे एनाएग मन्छे हो जाते थे। इन्द्र कहता, "तू इन्हें जीवन दे, शची।" मोर म्पयं पहाड़ी ढलान पर दौडता हुअा श्मशान बने देवलोक की बोर चल पड़ता। भोर होते-होते छुटकारा मिला । रोप केवल पाव रह गए थे। अश्विनीकुमारों ने देवलोक छोड़ने के पहले उन्हें जुटाकर काठ से ढक दिया और प्राग लगा दी। एक पेड़ के नीचे गट्टान पर गित पड़ा इन्द्र पक्ति ग्तव्य दृष्टि से सूने प्राकाम यी पोर देखता रहा । पश्चिम में उदनी लपटों के सामने पूर्व में उभरती हुई युमारी उपा गी पागा निस्तेज-सी पड़ गई थी। "महाविना !" "हंह, अभी और गेप है ?" इन्द्र ने बिना हिले-जुले पाहा. "गाची, तू यया सोचती होगी?" सामने सड़ी होकर मची हंग पडी, बोली, "अपने महा- पराममी इन्द्र के गिवा इन्द्राणी गंगार में न गुध देगती है. ग जानती है, न सोचती है।"

महावली इन्द्र
इन्द्र ग्लानिभरी हंसी हंस पड़ा, बोला, “पौलोमी, तेरी
ति मुझे व्यंग्य लग रही है । तू, जा, देवों को देख । उन्हें
ण दे, उनकी रक्षा कर।"
इन्द्राणी गई नहीं, चुप खड़ी रही।
"क्यों ? क्या हो गया तुझे ?
इन्द्राणी के होंठ कांप उठे । गीली आंखों से इन्द्र की ओर
देखती हुई बोली, “बच्चा-बच्चा पानी के लिए तड़प रहा है।"
इन्द्र ने कहा, "त्वष्टा के वनाए हुए जलकुण्डों में पानी
भरा होगा। मनु से कह दे, घोड़ों और बैलों पर चमड़ों के थैलों
में लाद-लादकर पानी मंगवा देगा। चाहे तो मेरा रथ भी ले
जाए।"
-
.
इन्द्राणी गई नहीं । दाएं अंगूठे से मिट्टी कुरेदती हुई नीचे
देखती खड़ी रही। इन्द्र उठ बैठा, वोला, "लगता है, अब किसी
में चलने-फिरने तक का साहस नहीं रहा । ला, चमड़े के दो
थैले उठा ला, अभी तो इन्द्र जीवित है।"
इन्द्राणी ने गीली आंखों से उसे देखते हुए कहा, “वृत्रासुर
भयानक है। पता नहीं कब, कितने दिन से वह आक्रमण की
तैयारी कर रहा था। फिर त्वष्टा ने उसे सारे भेद भी तो बता
दिए होंगे। उसने बांध बनाकर उन स्थानों पर नदी का जल
ही रोक दिया है, जहां से नाली लाकर त्वष्टा ने देवलोक में
जलकुण्ड भरने का प्रवन्ध किया था । अव तो देवलोक के कुण्ड
में पानी की जगह खून भरा है।"
सुनकर इन्द्र पथरा-सा गया । वह आंखें फाड़े शून्य की
देखता रहा, देखता रहा...
पर उसी रात मनु और दस्र ने पहाड़ी के बहुत ऊंचे स
पर एक छोटा-सा सरोवर ढूंढ़ निकाला । प्यास से तड़पते
को शान्ति मिली।

-- महावली इन्द्र १०७ किन्तु दूसरे ही दिन अस्निीकुमारों ने अनुमान लगाकर बताया कि सरोवर का जल अधिक से अधिक दो मास तक चलेगा। उसके बाद फिर कोई न कोई प्रबन्ध करना ही चाहिए। वर्षा तो अभी चार मास दूर है !" वृहस्पति ने कहा, "हमें और पूर्व की ओर बढ़कर अपने लिए कोई नया स्थान खोजना होगा।" शायद और दिन होता तो देवसभा में इस पर घंटो विचार- विमर्श किया जाता। पर आज इन्द्र ने सहमा गड़े होकर कहा. "हमें आज से ही इस प्रयास में लग जाना चाहिए। मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि देवों के लिए नदियों के मार्ग निश्चित कर दूंगा । यदि मैं जीवित रहा तो देवों को कभी पानी के लिए तड़पना नहीं होगा।" सदा की तरह इस बार भी अग्नि कोही नेता बनाया गया। यज्ञकुण्ड की रक्षा का भार उसी पर रहता था। उसके साथ- ठीक एक मास वाद तांबे और काठ के बने पात्र में पाग रसकर, अग्नि ममीदण्ड संभालकर देयों के लिए नए स्थान की खोज में समूह के प्रागे-मागे चल पड़ा। साथ कितने ही देव योद्धा थे। इस बीच अश्विनीकुमारों की चिकित्सा और इन्द्राणी की स्नेहभरी सेवा के कारण लगभग सभी पायल ठीक हो चुके थे । नारियों की रक्षा का भार देवि अश्विनी पर था। विपला स्त्री संनिकों का नेतृत्व करती थी। एक सप्ताह के भीतर ही गुफाएं लगभग गाली कर दी गई। इन्द्र राव के बाद में जाने वाला। उसके माथ लगभग पचाम देव युवक रके हुए थे। कुछ वृद्ध पियों और कुछ घायल निवल योदामों को ले जाना बाकी था।

महाब सांझ को, सूर्यास्त होते ही इन्द्र के साथ अन्तिम दल भी की दिशा में चल पड़ा। रात बीत गई । सूर्य निकल आया। दोपहर आई। फिर क और सांझ रात में खो गई। यात्रा चलती रही, चलती ही... पथ-प्रदर्शक साथ था । वह थोड़ी ही दूर पर आगे-आगे चल रहा था । एकाएक चीखकर वह रास्ते से कई पग पीछे हट आया। इन्द्र तेजी से दौड़कर उसके पास पहुंचा। सामने ही दो देवों के शव कुचले पड़े थे । पथ-प्रदर्शक चिल्ला पड़ा, "पहला पड़ाव यहीं ऋषि दधीचि के आश्रम में था। ये दोनों यहां रखे भोजन की रक्षा के लिए नियुक्त थे ! उस दिन दोपहर को इनसे बातें करके मैं गुफाओं की ओर आया था !" इसी बीच कई देव युवक आगे चले गए थे। चारों ओर मृत्यु का सन्नाटा छाया हुआ था। इन्द्र अांखें फाड़-फाड़कर शवों की ओर देखता रहा। बृहस्पति उसके पास ही आ खड़ा हुआ। वह धीरे से फुसफुसाया, "देवों ने चतुरता से काम लिया है । उन्होंने युद्ध नहीं किया, इस समय रक्षा ही सबसे महान कर्म था, इन्द्र !" पास ही खड़े एक मरुत योद्धा ने कहा, "युद्ध कहा, "युद्ध करते भी क्या! किसी के पास ढंग का एक शस्त्र भी तो नहीं था... इन्द्र चुपचाप आगे वढ़ चला। ऋषि दधीचि का आश्रम उजड़ गया था। चारों में उपवन के कटे हुए पेड़ और कुचले हुए पौधे इस प्रकार पड़े कि इन्द्र को महीने भर पहले का, लाशों से भरा हुआ देवलं याद आ गया। उसकी शिराएं तन गईं । वह धीरे-धीरे रखता आगे बढ़ रहा था।

महाबली इन्द्र ..-.-.-.-.-.- सहसा उसका पर राख के गरम ढेर में पड़ गया, वह उछल- कर दूसरी पोर हटा ही था कि उसकी दृष्टि सामने धरती पर झुके किसी व्यक्ति पर पड़ी। पास ही एक झोपड़ी अब तक जल रही थी। काठ का एक जलता हुअा डंडा खींच कर इन्द्र उधर दौड़ा। पास पहुंचकर कांपती लो के लाल प्रकाग में उसने देखा, एक धड़ ध्यान की मुद्रा में अब भी जैसे का तैसा बैठा है । देह पर का मांस लगभग चुक गया है । पता नहीं कर पशुओं ने उसे नोच-खा लिया था । कन्धों से लेकर कमर तक केवल कंकाल ही रह गया था। पास ही उसका सिर पड़ा था। दाढ़ी और सिर के सफेद दूधिया बाल खून के गाढे रंग में डूवे- से थे। पर झुका व्यक्ति सीधा हो गया। इन्द्र ने पहचान लिया ---मनु ! कांपते हुए लाल प्रकाश में उनको अांखें मिलों । इन्द्र बोला नही, प्रश्नभरी दृष्टि से देखता रह गया। मनु का कण्ठ स्वर सूसा हुया था। "पूर्व में देवों की यज्ञ-परम्परा को जीवित रखने वाले देवों के मित्र महपि...वृत्रासुर ने वध कर दिया ! हमें विवश होकर देवों को साथ लेकर आगे बढ़ जाना पड़ा!" इन्द्र ने सहसा दधीचि के कंकाल को छूकर कहा, "तेरी शपथ है प्रापि, इन्द्र को तेरी प्रान है, मैं वृत्रासुर का वध करूंगा!" "पर उसे काटने वाला कोई भी शस्त्र अब तक नहीं बना है, इन्द्र, सावधान !"प्राकागवाणो-सो सुनाई पड़ी। मनु, बृह- म्पति मौर ोप सभी व्यक्ति प्राश्चयं से इधर-उधर देसने लगे। इन्द्र एकाएक उछलकर पास ही के घने झुरमुट के पीछे पहुंचा और घसीटते हुए एक व्यक्ति को मामने लाकर डाल "महर्षि दधीचि..." दिया।

११० महावली इन्द्र वृहस्पति ने चौंककर कहा, "त्वष्टा ! तू ?" "हाँ ! मैं ही हूं, आंगिरस ! तू धन्य है ! तूने सब कुछ खोकर भी देवों के प्रति अपना मोह नहीं खोया! अपने गण के लिए..." बृहस्पति ने कहा, "पर तू तो प्रतिशोध की आग से जल रहा है..." "हां, जल रहा था, और आज पश्चाताप की आग से जल रहा हूं !" वह सिर पकड़कर बैठ गया, फिर बोला, "मैंने वृत्र को इसीलिए बनाया था, इसीलिए यज्ञ किया था कि इन्द्र का वध करने वाला उत्पन्न हो । पर वह शक्ति पाकर मद से चूर हो गया है । वह सारे विश्व पर अखण्ड शासन करना चाहता है । सुर ही नहीं, नाग, दैत्य, राक्षस-जो भी सामने पड़ जाए, वृत्र उसी का नाश कर डालता है..." .. त्वष्टा जोर से हांफने लगा। बोला, "उसके ताप से धरती जल रही है । मैं यह नहीं सह सकता। उन्मत्त होकर आज मेरे कहने पर भी नहीं माना । उसने महर्षि दधीचि की हत्या की है ! मैं उसका वध करने का यज्ञ करूंगा..." "तू फिर कोई षड्यन्त्र करना चाहता है, त्वष्टा ?" इन्द्र - गरज उठा। "नहीं । मैं तेरी प्रतिज्ञा पूरी कराना चाहता हूं! इन्द्र, मुझ पर सन्देह मत कर । मैं सन्देह करने का अवसर ही नहीं दूंगा। तू मेरी बात मान, एक बार फिर उठ और सृष्टि के विद्रोही प्रचण्ड शक्तिशाली वृत्र का वध करके विश्व को मुक्त कर! करेगा देव ?" इन्द्र ने गरज कर कहा, "मैं वृत्र का वध करूंगा ! मैं वृत्र का वध करूंगा !! वह अहि है, उसने अपनी कुण्डली में जल वांध रखा है । मैं उसका वध करके जल को मुक्त करूंगा!

" महावनी इन्द्र जल का मार्ग निश्चित करूंगा।" त्वष्टा ने प्रणाम करके कहा, "राजा, वृत्र का वध करने के लिए नया गस्त्र चाहिए । आज दो दिन से यहा पड़ा-पड़ा मैं यही उपाय करता रहा हूं। ठहर... माड़ के पीछे जाकर वह एक विचित्र-सा शस्त्र लाया। चौला, "देख, यह क्या है !" इन्द्र ने उसे लेकर देखा, और चकित रह गया, बोला, "यह क्या है ? इसमें से चमक क्यों उठ रही है ?" "यह महर्षि दधीचि की रीढ़ की हड्डी से बना है, इन्द्र ! नही, उर मत । मैंने इसमें तावा लगाकर इसे खूब दृढ़ और पना बना दिया है । यह वन है । वृत्र का वध करने वाला एक- मार शस्त्र ! तेरे अतिरिक्त इसे कोई संभाल नही सकता, इन्द्र ! इसे तू धारण कर । तू वज्रधर उन और अन्धकारस्पी वृष को इस तेजोमय वब से मार "विश्वकर्मा, तू धन्य है !" इन्द्र ने उसके कन्धे पर थपकी दी और लपककर व उसके हाथ से ले लिया। प्राग की लपटो के लाल प्रकाश में अनेक नोकों वाले वन को घारें लपलपा रही थी-लोहमय वन ! तेजोमय वज्र !! वसो हो पनी धारवाली चमक इन्द्र के विशाल नेत्रों में पागई। निकट ही सडे मनु तथा अन्य योद्धानो ने सिर झुकाकर स्तुति की: "महाबली इन्द्र, तूने जिस पराक्रम को प्रकट किया है, उसे मानते हुए भी हम किस प्रकार वर्णन करें "तू जो पराकम करने जा रहा है, हम उसकी गाथा यज्ञ में गामा रग...

.
जल
११२
महावला इन्द्र
धारें देखते ही असुर
आतंकित हो जाएंगे...
"जो वृत्र सारे जल को घेर कर दम्भ की निद्रा में सो रहा
है, उसे तू इस तेजोमय वज्र से पीड़ित कर। हमारे सुख के लिए
उसका विनाश कर।"
इन्द्र दाएं हाथ में वज्र उठाए ऋषि दधीचि के शव के
निकट गया । बोला, "देवों के मित्र, तू आकाश से देख ! मैं
वृत्र से प्रतिशोध लूंगा ! इस वज्र से उस असुर को फाड़कर
को
मुक्त
करूंगा!"
त्वष्टा मनु के पास या खड़ा हुआ । वोला, “मनु तू मुझे
बन्दी बना ले । मुझे वृत्र से भी पुत्र के समान ही स्नेह है
कहीं मोहावेश में मैं फिर कोई अपराध न कर डालूं !
बृहस्पति ने उसके शरीर पर हाथ फेरते हुए कहा, "
महान है, विश्वकर्मा ! वज्रधारी इन्द्र...महापराक्रमी शत्र
तुझ पर प्रसन्न हो !"
त्वष्टा दोनों हाथों में मुंह छिपाकर धरती पर बैठ गया
वातावरण में, जलती हुई लकड़ियों के चटकने, जन्तुओं
लड़ने-झगड़ने तथा छीना-झपटी की आवाज गूंजती रही ।
2000

१२
०००
1
देवों को अमरावती पुरी उजाड़ हो गई। नन्दन कानन के
सदाबहार फूलों के पेड़-पौधे कुम्हिला गए थे। हर जगह
राख के ढेर लगे थे । फूलों की मधुर गन्धभरी बयार की जगह
हवा के तोरो झोंके चल रहे थे, जिनमें सड़े हुए मांस की बू
समाई थी।
वृक्षासुर ने एक बार फिर पुरी पर धावा मारा था, पर
वहां देवों को गन्ध तक न मिली।
अपने धलगाली कन्धे पर विकराल गदा रखकर वृय असुरों
की सेना के साथ धरती की विजय करने निकल पड़ा था।
काही, किसी भी जाति के योद्धा उसके सामने नहीं टिक पाए।
त्वष्टा से प्रेरणा पाकर वृत्र ने कितनी ही जातियों की
युद्धाला सीसी थी । नागों को पछाड़कर वृत्र ने अपनी शक्ति
पौर भी बड़ा ली । देव तो उसे ही अहिं कहने लगे थे।
उन्हें लगता कि वृक्ष एक विशाल सर्प की भांति जल के भण्डार

महावली इन्द्र
के चारों ओर कुण्डली मारकर बैठा है। उसने देवताओं को
मिलने वाले जल को तो रोक ही दिया था, समुद्र पर भी उसके
प्रताप के कारण असुर नाविकों की धाक जम गई । उस समय
समुद्री मार्गों पर असुरों का ही अधिकार हो गया।
देवों का तो सब कुछ उजड़ ही गया था, राक्षस, दैत्य,
पिशाच तथा नाग जातियों को भी वृत्र से टकराने का साहस
नहीं होता था। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई थी । नाग
जाति का धीर-गम्भीर नेता विष्णु भी वृत्रासुर की अपार शक्ति
तथा उसके अत्याचारों के कारण चिन्ता में पड़ गया।
इन्द्र ने सबसे पहले अपनी गण की रक्षा के उपाय किए।
ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरी दुर्गम घाटी खोजकर उसने वहीं
पूरा देव परिवार वसा दिया। चारों ओर घना जंगल था।
यहां तक पहुंचना किसी के लिए भी बहुत कठिन था, फिर भी
इन्द्र ने बड़ी सावधानी से काम लिया। उसने घाटी के कोरों
पर चट्टानों के ढेर लगवा दिए तथा कुछ युवकों को रक्षा के
लिए नियुक्त कर दिया। स्त्रियां भी वहीं रखी गईं। यदि कही
सहसा शत्रु इस ओर घूम ही पड़े, तो किसी भी प्रकार उसका
यहां तक पहुंचना असम्भव हो जाए। उसकी सेना पर चट्टानों
की वर्षा करके उसे
कुचल
दिया जाए।
देवों के पास शस्त्र बहुत कम रह गए थे । जो थे भी, उन्हें
इन्द्र अपनी सेना के साथ ले जाना चाहता था। कितने ही देव
युवक, हड्डी, काठ तथा पत्थरों को घिस-बांधकर रात-दिन
नए तथा अमोघ शस्त्र वनाने में लग गए।
वृत्र के सामने पहुंचकर युद्ध करना ही होगा। और जिस
तरह भी सम्भव हो, वृत्र का वध होना ही चाहिए । देव जाति
इसी तरह भटकती रही तो एक दिन उसका नाश हो जाएगा।
और इन्द्र उनका तड़पना नहीं देख सकता। इससे अच्छा तो

महावली इन्ट यही होगा कि अनुरों के मामने ललकारकर मंग्राम करे । या तो वृष का यय हो जाए या देवों का ही अस्तित्व समाप्त हो । "वृत्र का ही वध होगा।" इन्द्र को भागों में तेज टपलने नगता, "मैं वृत को मारकर जल को मुक्त कम्गा।" उसके अपार धन का ही महारा रह गया था । सारी देव जाति इन्द्र का बन बढ़ाने का उपाय करने में लगी थी। इन्द्र ही यह कार्य सम्भव कर मकता है । एक मात्र इन्द्र ही जन को मुक्त करेगा, नदियों का मार्ग निश्चित करेगा। उन्हीं दिनों एक और पटना हुई। नाग जाति के नेना विष्णु ने इन्द्र के लिए एक कवन भेजा...नारायण कवच । माय ही सन्देश भी-अवसर पड़ने पर नाग योटा भी इन्द्र का साथ देंगे। नाग दूत ने कहा, "भगवान विष्णु ने मुरनायक इन्द्र को प्रणाम कहा है और निवेदन किया है कि महाबली गर मदा मुझे अपना छोटा भाई और दाई भुजा मममें।" प्रसन्न होकर इन्द्र बोला, "भगवान विष्णु को मेग मभि- नन्दन कहो । मैं सदा उन्हें उपेन्द्र ही समझगा।" देवलोक में उस रात विनित्र मा समारोह हुपा। विष्णु नागों का नेता होने के साथ ही और भी जातियों का हृदय जीत चुका था। गण्ड़ मोर नाग लोगों में भयंकर रायता थी, विष्णु के प्रयास में उन दोनों को मन्धि हो गई थी। विष्णु प्रपार गरिन तथा उदार मौर गात चित्त, दोनों का ही धनी था । उसे विना में अधिक मोह निर्माण में या 1 इसी कारण त्रु को भी मिन बना लेने की पेप्टा यह सबसे पहले करता पा। नागों पौर देवों के बीन पहली बार ऐमा सम्बन्ध हो रहा था। विष्णु की पति उस समय कौन नहीं जानना था ! स्वयं इन्द्र भी उममी पाक मानता था और नागों तथा के मंघर्ष बनाता रहता था । एक माय दो यनवान महान २४ कठिन था, चारों ओर कुण्डली मारकर बैठा है। उसने देवताओं को मलने वाले जल को तो रोक ही दिया था, समुद्र पर भी उसके प्रताप के कारण असुर नाविकों की धाक जम गई । उस समय समुद्री मार्गों पर असुरों का ही अधिकार हो गया। देवों का तो सब कुछ उजड़ ही गया था, राक्षस, दैत्य, पिशाच तथा नाग जातियों को भी वृत्र से टकराने का साहस नहीं होता था। चारों ओर त्राहि-त्राहि मच गई थी। नाग जाति का धीर-गम्भीर नेता विष्णु भी वृत्रासुर की अपार शक्ति तथा उसके अत्याचारों के कारण चिन्ता में पड़ गया। इन्द्र ने सबसे पहले अपनी गण की रक्षा के उपाय किए। ऊंची-ऊंची पहाड़ियों से घिरी दुर्गम घाटी खोजकर उसने वहीं पूरा देव परिवार बसा दिया। चारों ओर घना जंगल था। यहां तक पहुंचना किसी के लिए भी बहुत फिर भी इन्द्र ने बड़ी सावधानी से काम लिया। उसने घाटी के कोरों पर चट्टानों के ढेर लगवा दिए तथा कुछ युवकों को रक्षा के लिए नियुक्त कर दिया। स्त्रियां भी वहीं रखी गईं । यदि कही सहसा शत्रु इस ओर घूम ही पड़े, तो किसी भी प्रकार उसका यहां तक पहुंचना असम्भव हो जाए। उसकी सेना पर चट्टानो की वर्षा करके उसे कुचल दिया जाए। देवों के पास शस्त्र बहुत कम रह गए थे । जो थे भी, उन इन्द्र अपनी सेना के साथ ले जाना चाहता था। कितने ही दे युवक, हड्डी, काठ तथा पत्थरों को घिस-बांधकर रात-दि नए तथा अमोघ शस्त्र बनाने में लग गए। वृत्र के सामने पहुंचकर युद्ध करना ही होगा । और जि तरह भी सम्भव हो, वृत्र का वध होना ही चाहिए । देव ज इसी तरह भटकती रही तो एक दिन उसका नाश हो जाए और इन्द्र उनका तड़पना नहीं देख सकता । इससे अच्छ

-.4
लगता, "मैं
महाबली
यही होगा कि अमुरों के सामने ललकारकर मंग्राम करे । या तो
वृष का वध हो जाए या देवों का ही अस्तित्व समाप्त हो ।
"वृत्र का ही वध होगा।" इन्द्र की प्रांगों से तेज टपकने
वृष को मारकर जल को मुक्त करूंगा।"
उसके अपार वल का ही सहारा रह गया था। सारी देव
जाति इन्द्र का बल बढ़ाने का उपाय करने में लगी थी। इन्द्र
ही यह कार्य सम्भव कर सकता है । एक मात्र इन्द्र ही जल को
मुक्त करेगा, नदियों का मार्ग निश्चित करेगा।
उन्हीं दिनों एक और घटना हुई । नाग जाति के नेता
विष्णु ने इन्द्र के लिए एक कवच भेजा...नारायण कवच । साथ
ही सन्देश भी-अवसर पड़ने पर नाग योद्धा भी इन्द्र का साथ
देंगे। नाग दूत ने कहा, "भगवान विष्णु ने मुरनायक इन्द्र को
प्रणाम कहा है और निवेदन किया है कि महाबली पक्र मदा
मुझे अपना छोटा भाई और दाई भुजा समझे।"
प्रसन्न होकर इन्द्र वोला, "भगवान विष्णु को मेरा अभि-
नन्दन कहो । मैं सदा उन्हें उपेन्द्र ही समझंगा।"
देवलोक में उस रात विचित्र-सा समारोह हुमा । विष्णु
नागों का नेता होने के साथ ही और भी जातियों का हृदय
जीत चुका था । गरद और नाग लोगों में भयंकर शत्रुता थी,
विष्णु के प्रयास से उन दोनों की सन्धि हो गई थी। विष्णु
अपार शक्ति तथा उदार और मांत चित्त, दोनों का ही धनी
था । उसे विनाश में अधिक मोह निर्माण में या । इसी कारण
ग को भी मित्र बना लेने की चेष्टा वह सबसे पहले करता
या। नागों और देवों के बीच पहली बार ऐसा सम्बन्ध हो रहा
था । विष्णु की शक्ति उस समय कौन नहीं जानता था !
स्वयं इन्द्र भी उमकी पाक मानना था और नागो तथा देवों
के संघर्ष बनाता रहता था। एक माय दो बलवान गयुगों मे

ܩܘܘܕ
ܟܘܟܘ
ܩܩܩܘ
ܐ

महाबली इन्द्र
लड़ने का अर्थ था, देवों का नाश ।
पर उसने यह नहीं सोचा था कि शक्तिगाली विष्णु एक
दिन स्वयं इतनी नम्रता के साथ उमका मित्र बनना चाहेगा।
उसने अपने को इन्द्र का छोटा भाई यहकर इन्द्र का मन
जीत लिया था । एक नाग दूत के साथ कई देव-योद्धा इन्द्र का
मन्देश लेकर विष्णु के पास दौड़ा दिए गए थे । इन्द्र ने उपेन्द्र
को नए नन्दन कानन के सदावहार पुष्पों से गुंथी हुई वैजयन्ती
माला उपहार में भेजी थी। स्वयं गची ने वह माला अपने
हाथों से बनाई । इन्द्र ने विष्णु से सहायता भी मांगी थी।
देव योदा भी प्राज ही चल पड़ेंगे। उधर से जितने भी योद्धा
हो सकें, बढ़कर पुरानी उजाड़ अमरावती के पास देवों से मिल
जाएं । संग्राम करना होगा-कई ग्रामों के योद्धा वृम से लड़ेंगे।
नारायण कवच को काट पाना किसी साधारण स्त्र के
वा की बात नहीं थी । इन्द्र उसे धारण करके अद्भुत तेजन्दी
दोसने लगा । उसका प्रात्मविश्वास सौ गुना हो गया।
माज का उत्सव समाप्त होते ही इन्द्र देवों की सेना मेरा
वृत्र से युद्ध करने के लिए निकल पड़ेगा । एक पोर मयु का का
होने की प्रागा से देवों की प्रांखों में चमक थी और इस
भयंकर संकटों की कल्पना करके प्रांसू भर पाने में।
इन्द्र अपने विशालकाय गजराज पर चढ़ा हद
पा सड़ी हुई । उसने प्रणाम करके कहा, "द
प्रतीक्षा करती रहूंगी।"
इन्द्र का हृदय भर पाया, पर गर्व
बोला, "मौर में विजय करके लौटुंगा दोन
फिर से इन्द्रासन लाऊंगा।"
साथ ही गजराज उठ मट्टामाटर
बज उठे । देवों को नुजाएं फटकने की
.

११८
महाबली इन्द्र
एक ओर खड़ा त्वष्टा रीती अांखों से इन्द्र को जाते देख
रहा था। सहसा हाथ उठाकर वह चिल्ला पड़ा, "तेरी जय
हो, इन्द्र ! तेरी जय हो !"
पास ही खड़े वृहस्पति ने उसे अपनी बांहों में संभाल
लिया।
चारों ओर से उमड़ती-घुमड़ती घटा के समान उस दिन
अचानक ही देवों की विशाल सेना ने असुरों को घेर लिया-
ठीक उसी प्रकार, जैसे एक दिन सहसा ही वृत्र अमरावती पर
टूट पड़ा था।
रात-दिन की चिन्ता छोड़कर घोर संग्राम छिड़ गया। इस
बार असुरों और देवों की भयानक टकराहट से धरती कांप
उठी। कौन जीतेगा, कुछ पता नहीं।
अग्नि, मनु, अश्विनीकुमार दस्र-नासत्य, मरुत तथा कितने
ही देव अलग-अलग टुकड़ियां बनाकर असुरों पर टूट पड़े।
दूसरी ओर से विष्णु की आज्ञा से नाग सेनापति नहुष भी अपने
नाग योद्धाओं के साथ झपट पड़ा। असुरों की सेना को विना
किसी योजना के कई भागों में बंट जाना पड़ा था । हानि उन्हें
ही अधिक उठानी पड़ रही थी। संभलना कठिन हो गया।
देवों और नागों ने उन्हें एक क्षण का भी अवसर नहीं
दिया । असुर जैसे ही कहीं व्यूह बनाने लगते, उन पर कोई न
कोई टूट पड़ता।
वृत्र भी ठीक-ठीक संभल नहीं पा रहा था। आक्रमण पर
आक्रमण । उसे कल्पना तक न थी कि वह जिन देवों को जड़-
मूल से नष्ट समझ रहा था, वे धरती फाड़कर यहां प्रकट हो
जाएंगे और ऐसा भयानक युद्ध करेंगे । फिर भी वह धीरज के
साथ अड़ा रहा। उसने चरों को भेजकर असुरों की नई सेना

महाबली हन्न
...............
भी मंगवा ली थी. और माता दी थी कि वह बांध के उस ओर
प्रोट में गड़ी होकर पहले व्युह बना ले, फिर चारों पोर में
गामुमों को घेर ले।
प्रमुगे की नई मेना के प्राने की सूचना पाकर इन्द्र चिन्तित
हो गया। यदि शत्रु को जग भी ममय मिल गया तो उन्हे
कभी हराया नहीं जा सकेगा। उमने निश्चय किया बम, यही
क्षण है, प्राज और अभी।
अग्नि, मनु नया अश्विनीकुमारी को प्रावश्यक मन्देश
भेजकर वह अपनी मेना के माथ मकर मीधे बाध बी और
चढ चला । नुपचाप वे ऊपर चढ़ गए। फिर अनानक ही उनके
मग गरज उठे । देवो की कई टुकडिया अलग-अलग जगहो पर
जमकर लड़ रही थी, गयो की ध्वनि मुनने ही वे अचानक
घोड़ों को मोडकर भाग निकली। माय हो वे चिल्लाने लगी
"यन हमारा मित्र है...वृक्ष की जय हो।
प्रमुर योद्धा कुछ देर तक भौचक्के मे पड़ रहे । यह का
हो गया? फिर वे प्रसन्न होकर चिल्लाने लगे। देव अाज कि
पराजित होकर भाग रहे हैं। उन्हें मधि बनी ही
महायली प्रमुर के चरणो पर मुरपनि दन्द्र को मिर
.
पड़ा!
योड़ी देर तक केवल कोलाहल होना :-
गई । अगुरो को चंन मिला । वे विधाम की परी
ठीक उसी समय नदी के वाय समोर 733
उठे। मेसो की गरज से वान फटने यो । अमर 7
देवों ने घोवा दिया | यहा मंदान छोटकनाद
बना लिया। इस बार उधर नहीं चाय Pra
सेना को उन्होंने नारी पोर में घी पिया दही af
वृक्ष भी है ! और सन्धि' गदा व मजन क्यामम

१२० महावली इन्द्र सब कुछ खो गया। जल्दी-जल्दी तैयार होकर असुर उस ओर मुड़े। इधर से बांध पार करके उस ओर पहुंचते उन्हें देर नहीं लगेगी। वे दल बनाकर ऊपर चढ़ने लगे। अभी आधी ही चढ़ाई पार की थी कि ऊपर से बाणों की बौछार हुई। कितने ही असुर लुढ़क गए । नीचे पहुंचते-पहुंचते उनके शरीर मांस के लोथड़ों के रूप में बिखर गए। पीछे खड़े असुर नीचे से ही वाण चलाने लगे, पर ऊपर से देवों के बाणों तथा पथरीले शस्त्रों की हर वौछार सौ-सौ असुरों को ले लेती । पीछे से नाग योद्धा पराक्रमी नहुष उन्हें कुचलने लगा। उसके कारण फिर एक भी असुर बांध पर नहीं चढ़ने पाया। दूसरी ओर से वृत्र ने देखा कि वह सेना सहित घिर गया है । देवों की युद्धकला पर उसे अचरज हुआ । पर एक ही चारा था, युद्ध ! वह इस समय असुर स्त्रियों की सेना के पास खड़ा व्यूह बनवा रहा था । आक्रमण की सूचना पाते ही वह दूसरी ओर जाने को मुड़ा, पर ऊपर से इन्द्र का शंख गरज उठा। वृत्र चौंककर उधर देखने लगा। विश्वास नहीं हो रहा. था। पूरे बांध पर देव योद्धा लम्बे-लम्बे धनुषों पर वाण चढ़ाए उसने हुमककर अपनी प्रचण्ड गदा उठा ली। "इधर आ वृत्र, इस ओर ! मैं सुरनायक इन्द्र, तुझे युद्ध करने के लिए बुला रहा हूं! वृत्र ने ध्यान से उसे देखा, फिर ठहाका मारकर हंसा । बोला, "आज आया है ! अब तक कायर की तरह लुकता- छिपता रहा । तेरा वध करूंगा। पिता त्वष्टा ने इसीलिए मुझे बनाया है !" वह घूमकर कवच तथा ढाल की आड़ लेकर ऊपर चढ़ने लगा। देवों के बाण इस ओर भी तीखी बौछार की तरह पड़ने खड़े थे।

१२१ महाबली इन्द्र लगे, पर अकेला वृत्र विशाल शिलाखण्ड की तरह बिना रुके ऊपर चढा जा रहा था। असुर स्त्रियों की सेना का नेतृत्व वृत्र की माता दनायु कर रही थी। उसने ललकारकर आज्ञा दी, "वृत्र अकेला जा रहा है, चलो! देवों के बाणों से प्रात्मरक्षा करती हुई असुर स्त्रियों को सेना वृक्ष के पीछे-पीछे ऊपर चढ आई और वाध पर भयानक संग्राम छिड गया। वृत्र अपनी विशाल गदा संभालकर इन्द्र पर टूट पड़ा। इन्द्र अपनी गदा पर उसके प्राघात रोकने लगा। वृत्र का एक- एक मापात झेल पाना कठिन था। वह उन्मत्त होकर इतने वेग से वार कर रहा था कि इन्द्र को अपनी रक्षा में ही अपना सारा युद्ध-कौशल लगाना पड़ रहा था। प्राघात करने का उसे कोई अवसर ही नहीं मिला। देव योद्धा वृत्र पर वाणों की बौछार कर रहे थे, पर उसका शरीर तो जैसे सचमुच वय का बना हो। वह बिना चिन्ता किए इन्द्र को गदा पर गदा मारता जा रहा था। सहसा इन्द्र ने अवसर पाकर एक प्राघात उसकी ठुड्डी पर किया । पोड़ा से वृष चीसा, और उसने झपट कर इतने वेग से गदा मारी कि इन्द्र की गदा छूटकर नीचे जा पड़ी। युत व्हाका मारकर हंसा और गदा तानकर झपटते हुए चिल्लाया, "से इन्द्र ! तेरा वध हुग्रा!" पर दूसरे ही क्षण चमत्कार-सा हुमा । इन्द्र को कोई शस्त्र हाथ में लेने का अवसर नहीं मिला था। वह घूमकर गदा का वार बचा गया । वृष झटके के कारण लड़खड़ाकर घुटनों के बल धरती पर गिरा, तभी इन्द्र ने उसे पीछे से दबोच लिया, पर इस चपेट में इन्द्र की कटि में खोंसा हुआ वब सहसा छिटक .

१२२ महाबली द्रन्ड थे कर नीचे गिर पड़ा। इन्द्र स्वय भी यह घटना देख नहीं सका था । उसने वृत्र को जकड़कर सिर के उपर उठाया और चट्टान पर पटक दिया । पर वृत्र को जैसे कोई आघात लगता ही न था। वह छलांग लगाकर फिर से इन्द्र पर टूट पड़ा नीचे से असुरों की सेना को चीरकर नासत्य और मनु भी अब तक इस ओर पहुंच गए थे। उन्होंने वृत्र की गदा तनी देखी थी और इन्द्र को निहत्था देखा था। उनकी सांस ऊपर की ऊपर रह गई...पर इन्द्र मरा नहीं...वह वृत्र को दबोचकर उसे पटकने की चेष्टा कर रहा था। वृत्र की गदा भी छूट गई थी। दोनों एक-दूसरे से गुंथ गए । वे एक-दूसरे को पछाड़ते तो लगता कि पत्थर का विशाल वांध कांप रहा है । इस अोर असुरों का मर्दन करके खड़ा नहुष विस्मय के साथ इन्द्र और वृत्र का युद्ध देख रहा था । वृत्र के धूंसों का आघात भी गदा के आघात से कम नहीं या। इन्द्र का शरीर शिथिल पड़ गया । उसे लगा कि वृत्र के साथ इस युद्ध में वह फिर उठ नहीं पाएगा । पर वृत्र की शक्ति भी धीरे-धीरे टूट रही है। सहसा वृत्र ने इन्द्र को उठा लिया। देव योद्धाओं के प्राण सूग्व गए। उन्हें लगा कि दूसरे ही क्षण नीचे की चट्टानी धरती पर इन्द्र के मांस के लोथड़े विखर पड़ेंगे, पर इन्द्र ने तुरन्त ही उलटकर दोनों पांवों को वृत्र के गले में फंसा लिया। क्रोध से कांपकर वृत्र ने उसके सारे शरीर को मरोड़ डाला और अपनी दोनों भुजाओं में बांध लिया । वृत्र की भुजाओं में जकड़ा इन्द्र उलटा लटका हुआ था। उसके दोनों पाव वृत्र की गरदन पर कसे हुए थे, पर स्वयं उसका शरीर वृत्र की कठोर जकड़न में फंसकर रह गया था। भयानक ऐंठन के कारण उसका शरीर टूटने लगा। बस, कुछ ही क्षणों में उसकी हड्डियां कड़कड़ाकर

..-.-
........-
महाबली
१२३
चूर-चूर हो जाएंगी...महमा उसने देशा, सामने ही धरती परं
वय पड़ा है । पीड़ा मे तड़पकर इन्द्र ने हाथ बढ़ाया। उफ!
दूसरे ही क्षण यस उसके हाथों में था ! और एक ही प्रापात
में इन्द्र ने पत्र की फोग फाड़ दी।
वृष फिगी मरते हुए हायो की तरह चिपाड़ उठा, फिर
उसको भुजाएं ढीली पड़ गई। इन्द्र तुरन्त छूट निकला।
उसके पांव की ठोकर लगते ही वृत्र जह से उपडे हुए पेड़ की
तरह लुहककर यांप के नीचे समुद्र की तरह लहराते पानी में
पड़ा।
विजय के कारण इन्द्र का शरीर जैसे नई पक्ति से भर
उठा । उनकी मांगें दहकने लगी।
अचानक वह गिरते-गिरते वगा । वृत्र की माता दनायु ने
झपटकर उगकी बाई भुजा पर गदा मारी थी। पर इन्द्र के
प्रताप को प्रब कोन पण्डित कर सकता है ! एक ही पापात
में दनायु की हड्डियों को तोड़कर इन्द्र ने उसे भी ठीक यही फेर
दिया, जहां वन गिरा था।
पता नहीं कितनी देर तक इन्द्र की जयजयकार मे परती
कांपती रही...
"ययवाही इन्द्र महान है ! इन्द्र के योग्य स्तुति हम नही
जानते...
"यौम के पुत्र इन्द्र, गनुवय के समय कोई तेरा तेज नही
सह सकता । तू हमारी पुकार गुन...
"तू प्रसन्न होकर सोमरम पान र!
"हम तेरा अनुगमन करते हैं...
"तू हमारा कल्याण कर । तेजोमय यय से तूने प्रमुर वृष
को योस फार दो! मय जल को मुक्त कर...

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Mahabali Endra

Author
Gkumar Sushi
Title
Mahabali Endra
File name
Mahabali Endra
Text
OCR done
Published
2011/03
Publisher
Lahore,the Printing Press
Language
Sanskrit
Pages
126
Library
Adarsh Library, Jaipur
Classification
Poetry
DLI number
552105
Barcode
4990010032831.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library of India
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Copyright permitted
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