Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur

Shri Brahataklap Sutram

Hastimalo Muni · 2012/04/01

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Front matter

श्री बृहत्कल्प सूत्रम्
सटीकम्
सम्पादकः
प्राचार्य हस्तिमल्लो मुनिः

कम्पोज
छपाई
लागत ५०० प्रति
४८७।।) रुपये
७८)
५७) "
२६२॥"
२५) "
V
बाइडिंग
कागज
टाइटल
कुल ९१
मुद्रित
श्री दुर्गाप्रसाद
दुर्गा प्रेस धानमण्डी, अजमेर ।

प्रबन्धक के दो शब्द लक्ष्य रहित, अनियन्त्रित जीवन, जीवन नहीं, महद्भावों से भरा अनुशासित एवं संयत जीवन ही आदर्श-मानवीय जीवन है। जो, मनुष्य जीवन जैसे अनमोल, दुर्लभ जीवन को पाकर भी अपनी उद्दाम-लालसा, विषय-तृष्णा तथा क्रोधादि- कपाय भावों पर नियन्त्रण नहीं रखता, दुर्विचारों का उपशमन नहीं करता, भला वह भी क्या मानव कहाने का अधिकारी है ? उससे तो वे पशु पक्षी अच्छे, जो अज्ञानता की दशा में भी पापातिरेक से बचे रहते हैं। संसार में जितने भी महापुरुष हुए हैं, उनकी महत्ता उनके शुभाचरणों के द्वारा ही कुन्दन की तरह तपकर निखर पायी । शास्त्र, पुराणों में उनके अलौकिक पाच- रणों का महत्वपूर्ण दिग्दर्शन है, जो भावी पीढ़ी के पथ प्रदर्शन के लिये प्रकाश-स्तम्भ की तरह चिरकाल से चमकता बारहा है । "वृहत्कल्प' उन्हीं श्रादर्श पुरुषों के कर्तव्यों का परिचायक शास्त्र है, जिसमें दिखाया गया है कि उभयलोक कल्याण कामियों को कैसे चलना, ठहरना, खाना, पीना, आना, जाना, तथा लोक समुदाय के संग व्यवस्थित व्यवहार पूर्वक जीवन चापन करना चाहिए । अद्यपि वृहत्कल्प का प्रणयन साधु वर्ग के निमित्त हुआ है, फिर भी हम संसारी मानत्र इस में प्रतिपादित अनुशासनात्मक तरीके से अपनी श्रात्मा का अभ्युद्ध कर जीवन को सफल बना सकते हैं। पूज्य श्री ने इस सूत्र का अनुवाद् आज से बहुत पहले ही सम्पादित कर दिया था, किन्तु इसी बीच दूसरे सूत्रों के प्रकाशन होते रहने से इसके प्रकाशन का अवसर प्राप्त नहीं हुआ। इस वर्ष मेड़ता चातुर्मास में " सम्यक ज्ञान प्रचारक मण्डल " जोधपुर ) के कुछ उत्साही एवं प्रागमनेगी सन्ननों की राय इसको प्रकाशित कर देने की हुई । सुयोग से उस समय श्रीमान् “सरदारनाथजी मोदी एडभोकेट जोधपुर" (आ) प्रयास यहां उपस्थित थे। उन्होंने इसके प्रकाशन का द्रव्य भार अपने ऊपर उठा लिया। तदनुसार इसके प्रकाशन का कार्य मुझपर सौंपा गया, और बड़ी मिहनत के बाद अल्प समय में ही मैं इसको प्रकाशित करवा रहा हूँ । इसलिये इसमें त्रुटियों का रह जाना असंभव नहीं । हां, यह कहने में मुझे कुछ भी संकोच नहीं कि जितना भी कर सकता था करने में नहीं चूका, फिर भी पृष्ठ ४० के २१ वी पंक्ति में 'कप्पइ' की जगह 'नो कप्पइ' तथा पृष्ठ ४० " ऽऽवश्यायेपु में ये छूट गया है। ऐसे विन्दु, विसर्ग या मात्रा अथवा अक्षर जो भी दृष्टिदोप अथवा मुद्रण यन्त्र दोष से छूट गए हों पाठक उन्हें सुधारकर पढ़ें। प्रकाशन की सारी जिम्मेदारी मुझपर है, इसलिए इसकी समस्त त्रुटियों का जिम्मेदार मैं हूँ। आशा है विज्ञ पाठक मानवीय अन्तःकरण की दुर्बलताओं को ध्यान रखते हुए मुझे क्षमा करेंगे। अंत में मैं उन सब सजनों का आभारी हूँ जिनके सहयोग से इस काम को पूरा कर पाया हूँ। विनीत शशिकान्त झा, 'शास्त्री' व्याकरणाचार्य - प्रकाशन सहायक का संक्षिप्त परिचय :- मरुधरा में जोधपुर चिर अतीत से लेकर इस क्षण तक प्रापनी कतिपय विशेष. ताओं के कारण सुप्रसिद्ध रहा है। यहां के नागरिकों में एक बड़ी संख्या जैन धर्मा- चलम्बी ओसवालों की हैं जो शिक्षा एवं राजकारिणी के क्षेत्र में जोधपुर ही नहीं अपितु राजस्थान भर में काफी ख्यात रहे हैं । इसी प्रोसवाल वंश की गोदी शास्त्रा में इस सूत्र के प्रकाशन सहायक श्री सरदारनाथजी साहब का शुभ जन्म हुआ। आपके पिता श्री सुजाननाथजी मोदी हिन्दी, अंग्रेजी एवं उर्दू के अच्छे विद्वान थे । और र इसी आनुवंशिक संस्कार के फलस्वरूप सरदारनाथजी साहब १८ वर्ष की छोटी उम्र में ही वकालत की परीक्षा पास कर गए । सं० १८७५ में सुजाननाथजी साहव ने 'परबतसर में अपनी इह लीला समाप्त की, जब सरदारनाथजी की उम्र केवल २१ चर्ष की थी। आपके ऊपर एक बड़े परिवार का भार आ पड़ा और आपने उसे बड़ी दक्षता के साथ माथे चढ़ाया। कुछ दिन भी नहीं बीतने पाये कि मारवाड़ में प्लेग और मलेरिया का दौरा प्रारम्भ हुआ। जिसमें आपकी धर्मपत्नी तथा दो लड़के एवं अन्य कतिपय स्नेही स्वजन चल वसे । यद्यपि यह घटना बड़े बड़े संगदिलों को को भी घबरा सकती थी, किन्तु आपने इस आकस्मिक दारुण दु ख को बड़े धैर्य से सहन किया और अपनी दुनियादारी में कोई आंच नहीं लगते दी। एक साधारण. सुनीमी से लेकर जोधपुर राज्य के ख्यातिनामा वकील के रूप में आप अपना कार्य सम्पादन करते रहे हैं । दृद्ध अध्यवसाय तथा अटूट लगन से आपने अच्छी सम्पत्ति भी. उपार्जन करली है। भीवालिया में वैज्ञानिक यन्त्रों से आपकी देख रेख में चलने वाला कृषि कार्य जोधपुर के कृषि-क्षेत्र का एक जीता जागता उदाहरण है। श्राप जोधपुर के " रतन भावक भएडल" के उप-प्रधान मन्त्री हैं तथा समाजमें आपका आदरणीय स्थान है ।

(ई) आप एक परिश्रमी तथा दूरदर्शी व्यक्ति हैं। जैनधर्म में आपकी अटूट श्रास्था तथा विश्वास है । आप हर काम को पूर्ण मुस्तैदी तथा लगनसे करते हैं, यही कारण है कि आपने अपने जीवन में काफी प्रगति भी करती है। आपने द्रव्य दानसे इस सूत्र को प्रकाशित करने में मण्डल की मदद की है। अतः मण्डल की ओर से मैं मापको धन्यवाद देते हुए शासनदेव से प्रार्थना करता हूं कि वे आपकी इस उदार तथा धार्मिक भावना को सफल बनाए रहें। विनीत शशिकान्त झा' शास्त्री प्राकथन में एक जैन शास्त्रों को प्रमुख चार भागों में बांटा गया है अंग, उपांग, मूल और छेद । उनमें बृका का स्थान भी छेद सूत्र है। आगमों में विभिन्न जगह 'दसा कप्पबवहाराणं उद्देसण कालेणं' ऐसा निर्देश अाता है, जिसमें दशाश्रुत स्कंध के साथ बृहत्कल्प का भी कल के संकेत से उल्लेख किया गया है । ज्ञात होता है कि इसका पूर्व नाम कल्पसूत्र ही रखा गया हो, क्योंकि वृत्तिकार आचार्य मलयगिरि भी इसी नाम से परिचय देते हैं । स्थानांग और आवश्यक आदि में कल्प नाम का उल्लेख होते हुए और वृत्ति में भी कल्प नाम से परिचय होते हुए इसको बृहत्कल्प नाम से क्यों कहा जाता है, 'निगूढाशया हि प्राचार्याः ऐसा होने पर भी यथासाध्य कारण का पता लगाना चाहिये । संस्कृत में एक नियम है कि-'संभव व्यभिचारा- भ्यास्याद्विशेषणमर्थवत्' विशेषण का संभव हो या उसके बिना दोप आने की संभावना हो, तभी विशेषण की नाम के साथ सार्थकता होती है। इस दृष्टि से देखने पर ज्ञात होता है कि बृहत्कल्प और दशा तस्कंध का पयूषण-कल्प जिसको आज कल्पसूत्र के नाम से कहते हैं, दोनों को यदि एक ही नाम से कहा जाय तो ग्रंथ का सही परिचय प्राप्त नहीं होगा। अतः आवश्यकता हुई दोनों में विशेपण देने की । कल्प सूत्र के अन्तिम भाग समाचारी में भी कुछ कल्पाकल्प का भेद दिखाने को उल्लेख किया है और इसमें उसी का विस्तृत विचार है.-संभव है इसी दृष्टिकोण को लेकर मध्यकाल के प्राचार्यों ने इसका नाम बृहत्कल्प रखा हो। सामग्री के अभाव और समय की कमी से यहां अभी यह निर्णय नहीं कर सकते कि बृहत्कल्प नाम की प्रसिद्धि कय से हुई। प्राप्त सामग्री के अनुसार बृहत्कल्प सूत्र के को भुतकेवली भद्रबाहु माने गये हैं। थाचार्य मज पगिरि कहते हैं कि-ग्रंय का सूत्रम कार्पो ! को वा नियुक्ति को वा

ई
(ई)
श्राप एक परिश्रमी तथा दूरदर्शी व्यक्ति हैं। जैनधर्म में आपकी अटूट आस्था
तथा विश्वास है । प्राय हर काम को पूर्ण मुस्तैदी तथा लगनसे करते हैं, यही कारण है
कि आपने अपने जीवन में काफी प्रगति भी करली है। आपने द्रव्य दानसे इस सूत्र
को प्रकाशित करने में मण्डल की मदद की है। अतः मण्डल की ओर से मैं
मापको धन्यवाद देते हुए शासनदेव से प्रार्थना करता हूं कि वे आपकी इस उदार
तथा धार्मिक भावना को सफल बनाए रहें।
विनीत
शशिकान्त 'झा' शास्त्री

शास्त्र के अधिकारी- प्राचीन समय की एक मर्याता है कि अयोग्य को ज्ञान नहीं देना चाहिए यदि कोई आचार्य ज्ञान दान में योग्याऽयोग्य का विचार नहीं करे तो शास्त्र में उसे दोपभाजी माना है । अावश्यक सूत्र में इसको “ सुट छु दिन्नं " नामक ज्ञानका अतिचार कहा है . स्थानांग के तीसरे स्थान में कहा है कि अविनीत १ रसलोलुपी २ और कलह का उपशमन नहीं करने वाला सीव कपायवान ये ३ वाचना देने योग्य नहीं हैं। प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान तो पापी को धर्मी वनाता और दुर्जन को भी सजन करता है फिर इसके लिये ऐसा परहेज क्यों ? बात यह है कि ज्ञान दो प्रकार का है एक ग्रहण शिक्षा रूप दूसरा सेवन रूप । इनमें पदार्थ ज्ञान एवं उत्सर्गारवाद की शिक्षा वाला जो प्रथम ज्ञान है उसके लिये अधिकारी का विचार आवश्यक है। अाज भी अणु विज्ञान आदि के तत्व गुप्त रक्खे जाते हैं, कारण उनके दुरुपयोग की आशंका रहती है। इसलिये भाष्यकार कहते हैं कि-शाब के रहस्यों को जो साधारण में प्रगट करता और अपवाद पद का गल्त उपयोग करता है। वैसे ज्ञान- दर्शन-चारित्र की शिथिल प्रकृति वाले को ज्ञान देना दोप का हेतु है। ऐसे अपात्र में शाल ज्ञान देने वाला चतुर्गतिक संसार में परिभ्रमण करता है। इसलिये कल्पशाब का ज्ञान देने के लिये निन्न गुण देखने चाहिये कहा है-- अरहस्सधारए, पारएय, असढकरणे तुलासन समिते । कप्पाणु पालणा दीवणाय, आराहण छिन्न संसारी । ६४६० । अर्थात जो गम्भीर रहस्य को धारण करने वाला है, प्रारम्भ किये शुत को बीच में नहीं छोड़ता, छल और अहंकार से दूर तथा तुजा के समान राग ई प रहित समबुद्धि वाला है, जितेन्द्रिय है उसको देना चाहिये, जिससे भगवत्कथित कल्प की आराधना हो ! अथवा जो शास्त्र कधित विधि का पालन करे उसको देना चाहिये । ऐसा करने से मार्ग की दीपना होती है। शाखान्तर से तुलना- बृहत्वल्प की शानान्तर से दो प्रकार की तुलना हो सकती है, एक शब्द से और दूसरी अर्थ से ! यहां आर्थिक तुलना समयाभाव से नहीं कर थोड़ीसी शाब्दिक तुलना ही की जायगी । भगवती, व्यवहार और स्थानांग सूत्र में तुलना के स्थल मिलते हैं। जैसे-चतुर्थ स्थान के आदि में -तो अगुग्घाया प० त० हत्यकम्म -- . (र भाप्यम् ? इनि, उच्यते-इह पूर्वपु यद् नवमं प्रत्याख्यान नामक पूर्व तस्य यत् तृतीय- माचाराख्यं वस्तु तस्मिन् विंशतितमे प्राभृते मूल गुणे पूत्तरगुणेषु चापराधे दशविध- मालोचनादिकं प्रायश्चित्तमुपवर्णितम् । कालक्रमेण च दुषमानुभावतो धृति-बल वीर्य- बुद्ध्या-ऽऽयुः प्रभृतिषु परिहीयमानेपु पूर्वाणि दुरवगाहानि जातानि, ततो 'मा भूत- प्रायश्चित्त व्यवच्छेदः-इति साधूनामनुग्रहाय चतुर्दश सूर्यधरेण भगवता भद्रबाहुस्या- मिना कल्पसूत्र व्यवहार सूत्रं चाकारि, उभयोरपि च सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिः । इमे अपि च कलर--व्यवहार सूत्र सनियुक्ति के अल्पग्रंथतया महार्थत्वेन च दु पमानु भावतो होयमानमेधा-ऽऽयुरादि गुणानामिदानीन्तनजन्तूनामल शक्तीनां दुर्ग दुखधारे जाते, ततः सुखग्रहण-धारणाथ भाष्यकारो भाष्कृतवान , तच्च सूत्रस्पर्शिक- नियुक्त्यनुगतमिति सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिर्भाष्यं चैको ग्रंथो जातः । टी० रचना का उद्देश्य- टीकाकार प्राचार्य मलय गिरि ने कहा है कि पूर्व का यह प्रायश्चित भाग नष्ट नहीं होजाय इसलिये भद्रबाहु ने इसकी रचना की । किन्तु कुछ गहराई से सोचने पर मालूम होगा कि छेद सूत्र की रचना का उद्देश्य विभिन्न देशकाल में होने वाले साधु माध्विओं की परिस्थिति वश उलझी समस्या को सुलझाना और मोह, अज्ञान एवं प्रमाद् आदि से लगने वाले दोपों से संयम की रक्षा करना भी है। यह सर्वविदित बात है कि साधु भी शरीरधारी प्राणी है । काम, क्रोध लोभादि उसके साथ भी लगे हैं । यद्यपि वह इनको आश्रय नहीं देता और न उद्य को टिकाने का ही यत्न करता है. फिर भी छ8 से ११ चे गुणस्थान तक लाख प्रयत्न करने पर भी इनका समूल नाश नहीं होता । इन छ दों में वह अपने प्रयत्न के बल पर इनको मन्द, मन्दतर, मन्दतम बना लेता है, और इग्यारवें पहुँचकर तो उसको 'भस्माच्छन्न' आग की तरह हत शक्ति कर देता है। किन्तु अधिकता से प्रमत्तदशा के प्रथम स्थानपर रहने वाले साधु साध्वियों के लिये तो सदा कषाय का खतरा बना रहता है। उनके लिये निर्मोह और वीतरागता का आदर्श वांछनीय होकर भी प्राप्त नहीं है । उनका शरीर और संघ से प्रेम सम्बन्ध टूटा नहीं है। शरीर, संगी और संयम की रक्षा के लिये आहार, वस्त्र, पात्र, स्थान आदि साधनों की समय समय पर आवश्यकता होती है। अत: उत्सर्ग और अपवाद के कथन से मुनि धर्म की रक्षा और शुद्धि करना इसका प्रधान उदेश्य समझना चाहिये।

शास्त्र के अधिकारी- प्राचीन समय की एक महता है कि अयोग्य को ज्ञान नहीं देना चाहिए यदि कोई आचार्य ज्ञान दान में योग्याऽयोग्य का विचार नहीं करे तो शास्त्र में उसे दोपभागी माना है । आवश्यक सूत्र में इसको “ सुट दिन्न " नामक ज्ञानका अतिचार कहा है . स्थानांग के तीसरे स्थान में कहा है कि अविनीत १ रसलोलुपी २ और कलह का उपशमन नहीं करने वाला सीन कषायवान ये ३ वाचना देने योग्य नहीं हैं। प्रश्न हो सकता है कि ज्ञान तो पापी को धर्मी बनाता और दुर्जन को भी सजन करता है फिर इसके लिये ऐसा परहेज क्यों ? बात यह है कि ज्ञान दो प्रकार का है एक ग्रहण शिक्षा रूप दूसरा सेवन रूप। इनमें पदार्थ ज्ञान एवं उत्सर्गापवाद की शिक्षा वाला जो प्रथम ज्ञान है उसके लिये अधिकारी का विचार अावश्यक है। आज भी अणु विज्ञान आदि के तत्व गुप्त रखे जाते हैं, कारण उनके दुरुपयोग की आशंका रहती है। इसलिये भाष्यकार कहते हैं कि-शान के रहस्यों को जो साधारण में प्रगट करता और अपवाद पद का गल्त उपयोग करता है। वैसे ज्ञान- दर्शन-चारित्र की शिथिल प्रवृत्ति वाले को ज्ञान देना दोप का हेतु है। ऐसे अपात्र में शास्त्र ज्ञान देने वाला चतुर्गतिक संसार में परिभ्रमण करता है। इसलिये कल्पशास्त्र का ज्ञान देने के लिये निम्न गुण देखने चाहिये कहा है-- अरहस्सधारए, पारएय, असढकरणे तुलासन समिते । कप्पाणु पालणा दीवणाय, आराहण छिन्न संसारी । ६४६० । अर्थात जो गम्भीर रहस्य को धारण करने वाला है, प्रारम्भ किये अत्त को वीच में नहीं छोड़ता, छल और अहंकार से दूर तथा तुजा के समान राग हूँप रहित समबुद्धि वाला है, जितेन्द्रिय है उसको देना चाहिये, जिससे भगवत्कथित कल्प की आराधना हो । अथवा जो शास्त्र कधित विधि का पालन करे उसको देना चाहिये। ऐसा करने से मार्ग की दीपना होती है। शास्त्रान्तर से तुलना- बृहत्वल्प की शालान्तर से दो प्रकार की तुलना हो सकती है, एक शब्द से और दूसरी अर्थ से। यहां आर्थिक तुजना समयाभाव से नहीं कर थोड़ीसी शाब्दिक तुलना ही की जायगी । भगवती, व्यवहार और स्थानांग सूत्र में तुलना के स्थल मिलते हैं। जैसे-चतुर्थ स्थान के मादि में -तो असुग्घाह्या प० २० हत्यकम्म () करेमाण-से तो सुमण्गामा प० २०. प्रबुगहिए । पर्यन्त १३ सूत्रों का तृतीय उद्देश में पूर्ण साम्प है। स्थानांग की विशेषता यह है कि उसके पंचम स्थान के द्वितीय उद्देश में पांच प्रकार का अनुद्घातिक बताया है, जैसे कि--पंच अणुग्धाइया पं० तं० हत्थ कम्म करेमाणे १, मेहुणं पडिसेवमाणे २, राइभोयम्भुजमाणे ३, सागारिय पिंडं भुजमाणे ४, रायपिंडं भुंजमाणे ५। द्वितीय उद्देशके अंतिम दो सूत्रों का पंचम स्थान के तृतीय उद्देश के "कप्पड़ निग्गंयाणवा निग्गंथीण वा पंच वत्याइंधारित्तए .."सूत्र में पूर्ण साम्य है केवल यहां 'इमाइं पद नहीं है। चतुर्थ उद्देश के ३२ वे सूत्र के साथ पंचम स्थान द्वितीय उद्देश के आदि सूत्र में प्रायः साम्य है । वहां 'कोसिया' के स्थान पर 'एरावई' का प्रयोग है। अपवाद में स्थानांग की विशेषता है, वहां पांच कारण बताये हैं। जैसे कि- पंचहि ठाणेहिं कप्पति, तं भयंसि वा १ दुभिक्खंसिवा २, पवहेजचणकोई ३, उदयोघंसिवा एज्जमाणंसि महतावा ४ अणारिएसु ५। " छ8 उद्देश के अवचनादि चार सूत्र भी स्थानांग के छ8 स्थान में मिलते हैं । दुर्ग प्रकृत के 'निग्गंथे निर्गथिं दुग्गंसिवा चिसमंसिवा' आदि सूत्रों का स्था- नांग पंचम स्थान के द्वितीय उद्देश और छ8 स्थान में साम्प मिलता है। अर्थ की तुलना के लिये आचारांग आदि अन्य शास्त्र भी तुलना स्थान हो सकते हैं। वृहत्कल्प के टीका ग्रन्थ और संस्करण भद्रबाहु स्वामिकृत नियुक्ति के अतिरिक्त एक संघदासगणीकृत प्राकृत भाष्य है जो गाथा बद्ध है । आचार्य मलयगिरि ने कहा है कि-"सूत्रस्पर्शिकनियुक्तिर्भाष्यं चैको अन्थो जातः {" नियुक्ति और भाष्य का पृथक्करण करना कठिन हो गया है। क्षेम कीर्ति के उल्लेख से चूर्णि का होना भी पाया जाता है। फिर प्राचार्य मलयगिरि ने इस पर संस्कृत टीका की है, जो पूर्ण उपलब्ध नहीं होती, आचार्य क्षेमकीर्ति कहते हैं कि--तदपि कुतोऽपि हेतोरिदानी परिपूर्ण नावलोक्यत इति परिभाव्य मन्दसति मौलिनाऽपि मया गुरूपदेशं निश्रीकृत्य श्री मलयगिरि विरचित विवरणादूवं विवरीतुमारभ्यते ।" इससे ज्ञात होता है कि मलयगिरि कृत टीका का जो भाग उपलब्ध नहीं है, उसी की क्षेमकीर्ति ने पूर्ति की है। पूर्वाचार्यों ने कुछ टवार्थ भी किये हैं। उपरोक्त नियुक्ति, भाष्य और टीका सहित संपूर्ण ग्रन्थ "आत्मानन्द जैन सभा भावनगर" से ६ भागों में प्रकाशित हुआ है । मुद्रित भाष्य : के साथ लगे हुए लघु विशेषण से यह अनुमान सहन होता है कि वृद्भाष्य भी होना चाहिये। इसके अतिरिक्त डा. जीवराज छेलाभाई ने गुजराती अनुवाद सहित अहमदाबाद से भी १ संस्करण निकाला है। यात ब्रह्मचारी शास्त्र विशारद पूज्य श्री अमोलक ऋषिजी महाराज द्वारा इसका हिन्दी अनुवाद भी किया गया है जो हैदराबाद दक्षिण से प्रकाशित हुआ है। अागम मन्दिर पालीताणा और मुनि जिन विजयजी द्वारा मूल संस्करण भी निकाले गये हैं। हमारा संपादन कार्य:- पाठक सोचेंगे कि बृहत्कल्प सूत्र के २-३ संस्करण पहले निकल चुके हैं और एस० एस. जैन का भी आगम बत्तीसी में इसको निकालना चाहती है। फिर यह अलग प्रयत्न क्यों ? निन्तु बात ऐसी नहीं है, आजतक के छपे हुए से इसमें विशिष्टता है। हिन्दी और गुजराती के अतिरिक्त संस्कृत टीका के साथ शुद्ध संस्करण अभीतक कोई प्रकाशित नहीं हुआ है। भावनगरसे प्रकाशित बृहत्कल्प सूत्र- भाष्य विशालकाय ६ भागों में है, जिसले सभी जिज्ञासुओं के लिये वह सुलभ नहीं हो सकता। अत: आज से १० वर्ष पहले स्व० सौभागमाजी ढा अजमेर वालों के भंडार से प्राप्त इसकी हस्तलिखितप्रति जो संस्कृत टीका सहित थी जीर्ण शीण दशा में होने से उसका रक्षण भी कठिन था, दक्षिण चातुर्मास में प्रतिलिपि करवाई गई । संशोधन के लिये गवेषणा करने पर भी कोई अन्य प्रति नहीं मिजी, किन्तु प्रयत्न जारी रहा। जब मुनि श्री पुण्यविजयजी द्वारा संपादित बृहत्कल्प भाग्य से मिलान करना आरम्भ किया तब सहसा वृहद् वृत्ति के अङ्गरूप यह टीका भी उसमें प्राप्त होगई। अभिलाषा की पूर्ति के साधन पाकर वड़ी प्रसन्नता हुई । वाद उपयुक्त टिप्पण, शब्दकोश और अर्थ भी तय्यार किया गया। इसी बीच जिनागम प्रकाशन समित्ति व्याघर से कुछ आगमों के मूल संशोधन के लिये कहा गया। भागमःसंशोधन के उस परम पुनीत कार्य में ६ सूत्र लिये गये, जिनमें बृहत्कल्प का भी एक स्थान था । अतः आगम मंदिर पालीताणा और भाष्य की प्रति से इसका संशोधन किया गया। शब्दार्थ के लिये यह उचित प्रतीत हुआ कि संपूर्ण नहीं देकर कुछ सार भाग ही दिया जाय । इस प्रकार वर्षों के प्रधान और विभिन्न .

(ो) संस्करण एवं विद्वान् मुनियों के परामर्श को ध्यान में रख कर कार्य किया गया है। विशेष कर जैनाचार्य जैन धर्म दिवाकर पूज्य श्री श्रआत्मारामजी म० तथा कविवर उपाध्याय पं० श्री अमरचन्दजी म. के विचारों का अधिक सहयोग मिला है। एतदर्थ उन सब ग्रन्थकार और माननीय मुनिवरों का सादर स्मरण करना भी मेरा कर्तव्य हो जाता है। संशोधन आदि में सावधानता रखते हुए भी छद्मस्थता वश कुछ त्रुटियां रहना संभव है। जिसके लिये 'वायविक्खलियं न चा नतं उवहसे मुणी' इस आंगम वचन के अनुसार गीतार्थ मुनि-'क्षन्तु मर्हाः' त्रुटियों के लिये क्षमा कर भविष्य के लिये मार्ग दर्शन करेंगे। इत्यलम्... श्राचार्य हस्तिमल्लो मुनिः वृहत्कल्प परिचय पहिरंग में इसका मूल भद्रबाहुकृत होने से प्राकृत भाषा में है। जिसको ६ उद्देशकों में बांटा गया है। उनमें कुल ८१ अधिकार हैं। प्रथम उद्देश में ५१, दूसरे में २५, तीसरे में ३१, चतुर्थ में ३७, पंचम में ४२, और छ8 में २० कुल २०६ सूत्र हैं। साथ ही बृहट्टीका से सौभाग्यसागरसूरि द्वारा उद्धृत सुवोधा टीका भी है। विशिष्ट शब्द कोश और टिप्पण, पाठान्तर श्रादि से परिशिष्ट सजाये गये हैं। प्रथम उद्देशक में-२४ अधिकार हैं, पहले प्रलंबाधिकार है, जिसमें कहा गया है कि ताल एवं केला आदि प्रलंबफल साधु साध्वियों को कैसा लेना और कैला नहीं लेना। कच्चा हो तो साधु साध्वियों को बिना कटा लेना नहीं कल्पता-कटा हुआ ले सकते हैं । साधुओं के लिए पक्के ताल प्रलंब का निषेध नहीं किन्तु साध्वी उसे भी विधि पूर्वक कटे होने पर ले सकती है। अन्यथा नहीं। दूसरा मास कल्पाधिकार-इसमें कहा है कि वर्षाकाल के अतिरिक्त साधु (मास और साध्वी २ मास एक गांव में रह सकते हैं। यदि गांव बाहर भीतर आदि रूप से दो भागमें हो तो द्विगुण कालतकरह सकते हैं, किन्तु उस समय जहां रहते हों उसी हिस्से से भिक्षा लेनी चाहिए ।तीसरे अधिकार में साधु साध्विओं के एक गांव में एकत्र रहने का विचार है। जो गांव एक ही द्वार वाला हो, जहां उसीसे निकलना और प्रवेश करना हो वहां दोनों को एक साथ रहना निषिद्ध है । भिन्न मार्ग होने पर रह सकते हैं। चौथे उपाश्रय अधिकार में साध्वियों के लिये बाजार या गली के. मुंह पर ठहरना निषिद्ध कहा है। साधु वहां ठहर सकते हैं । साध्धियां खुले मकान में बिना प्रावरण किये नहीं ठहर सकती, साधु रह सकते हैं। पंचमः अधिकार में बताया है कि यदि मिट्टी का भांड लेना आवश्यक हो तो साध्वियां सकड़े मुंह के. अरहट की घडी जैसा भांड ले सकती हैं किन्तु साधु वैसा नहीं ले सकता । ६ठे अधि- कार में साधु साध्वियों को वन की चिलिमिक्षिका-मच्छरदानी रखने की अनुमति दी गई है । सप्तम अधिकार में कहा है कि पानी के किनारे साधु साध्धिओं को १० काम नहीं करना चाहिए, जैसे-खडे रहना, बैठना, सोना और खाना, पीना, स्वा. ध्याय प्रादि। आठवें अधिकार में चित्रवाले घर में साधु साध्वियों के लिये १ - (यः) ठहरना निषिद्ध कहा है। क्योंकि वहां ज्ञान ध्यान में विक्षेप हो सकता है, अतः साधु साध्वियों को चित्र रहित स्थान में ठहरना चाहिए । नवमें अधिकार में सायिओं के शील रक्षण की दृष्टि से कहा है कि उन्हें शरणादाता की देख रेख में ही रहना चाहिए । साधुओं के लिये ऐसा नियम नहीं है। दशमें अधिकार में कहा गया है कि साधु को सागारिक उपाश्रय में नहीं रहना चाहिये, किन्तु सागारिक रहित स्थान में रह सकते हैं। फिर स्पष्ट कर इसी बात को इग्यारवें अधिकार में कहा है-साधु स्त्री वाले उपाश्रय में नही रहे । पुरुप वाले घर में रह सकते हैं । ऐसे साध्विओं के लिये पुरुप सागारिक का निषेध और स्त्री वाले स्थान की अनुमति समझनी चाहिए । बारहवें अधिकार में कहा है कि जहां स्ली आदि का प्रतिबन्ध हो वहां साध्वियां रह सकती हैं, साधु नहीं । १३वा अधिकार-जहां घर में होकर आना जाना पडता हो उस जगह साधु नहीं रह सकते, साध्वियां स्थानाभाव से रह सकती हैं । १४ वें अधिकार में कहा है कि साधुओं को क्रोध नहीं रखना चाहिये : कभी कलह-बोलना हो जाय तो. अविलम्ब क्रोध का अन्त कर लेना चाहिये। कारण प्रशमभाव ही संयम का सार है। १५३. अधिकार में बिहार का विचार है, वर्पा- काल में बिहार का निपेव और शेप काल में अनुमति है। १६ वें अधिकार में साधु साधिओं के लिये दो विरोधी राज्यों में परस्पर शका, हो इस प्रकार जल्दी -गमना- गमन करने का निपेत्र है। १७ वां अधिकार अवग्रह. का है, इसमें कहा है कि मिक्षा के लिये घरमें गये हुए ग्रा.स्वाध्याय और बहिभूमि जाते समय कभी गृहस्थ या पानादि से निमन्त्रण करे तो साधु साध्वी का कर्तव्य है कि वे आचार्य एवं प्रवर्तनी की निश्राय से लायें और उनकी अनुमति पाकर ही ग्रहण करें ।: १८ में से २१ ३ तक चार अधिकार में रात्रि के निपिद्ध कार्यो का वर्णन किया गया है।। पहले में कहा गया है कि रात या विकाल में चारों आहार ग्रहण नहीं करे, केवल दिन को देखे हुए शय्या-संस्तारक रात में ले सकते हैं । ऐसे रात या विकाल में. साधु, साध्वी वस्त्र भी नहीं ले सकते, अपना चुराया गया वस्त्र यदि रात में लाया. गया हो तो बह ले सकते हैं। फिर-रात में एक गांव से दूसरे गांव विहार करना भी नहीं करता । २२ वें अधिकार में जीमणवार में जाने का निपेव है । २३ वें, अधिकार में कहा है कि साधु साध्धिों को शारीरिक.कारण या स्वाध्याय के लिए: रात्रि में उपाश्रय के बाहर जाना हो तो, अनुकूलतानुसार १-२ दो को साथ लेकर जाना चाहिए । २४ में अधिकार में विहारक्षेत्र. बताया गया है, पूर्व में अंग और - -- -- उत्तर (क) मगध, दक्षिण में कौशाम्बी, पश्चिम में स्थूणा और में कुणाला देशतरू प्रार्थ क्षेत्र कहा गया है। उद्देश २--दूमरे उद्देश में अधिकार है। प्रथम उपाश्रयाधिकार जिस में खास . तौर से १२ सूत्रों के द्वारा यह बताया गया है कि कैसे उपाश्रय में उत्तरता और कैले में नहीं। पहले कहा है कि जहाँ शालि आदि के बीज विखरे हो वहां नहीं ठहरना चाहिए, जहां सद्य के घड़े रखे हों और ठंडे या गर्म जल के घडे भरे रहते हों, यहां भी साधु साथी के लिये ठहरना निपिद्व है। जिस घर में रात भर आग. जलती हो या दीपक रात भर जलता रहे, वहां भी साधु साध्वियों को नहीं ठहरना, चाहिए। उपाश्रय की सीमा में घृत, गुड़ और मोदकादि खाद्यपदार्थ विखरे हों वहां भी नहीं ठहरना चाहिए । साध्वियों के लिये सार्वजनिक धर्मशाला-मुसाफिर खाना-में एवं खुला घर या वृक्ष के नीचे ठहरना निषिद्ध है। साधु ऐसे स्थान में ठहर सकते हैं। दूसरे अधिकार में शय्यातर विंड का विचार है। यदि किसी मकान के एक से अधिक स्वामी हों तो उनमें से.एक को शय्यादाता बनाकर शेप घर की भिक्षा ले सकते हैं। शयपातर का पिंड बाहर निकलने पर भी कर लिया जा सकता है, बताया गया है । ३-१-५ म अधिकार में, जो भोजन शय्यातर के यहां दूसरे का आया हो, या शय्यातर के यहां से भेजा गया हो, तथा उसके पूज्य-मान.. नीय-पुरुष के लिये बनाया गया हो, उसको किस प्रकार ग्रहण करना, कहा गया. है। छठे अधिकार में कहा है कि साधु पांच प्रकार के वस्त्र धारणकर- सकते हैं। जंगमज-ऊन, रेशम आदि र, अलसी २, सणसूत्र ३, कपास और वृक्ष की छाल के वल्कल ४-५ । सात में अधिकार में पांच प्रकार के रजोहरण बताये हैं-१ ऊनका २ ऊंट की जट का ३ सणका ४-५ कुटे हुए घास और मुञ्ज का । ३-तीसरे उद्देशक--में १६ अधिकार हैं। प्रथम अधिकार में कहा है कि जहां साधु रहते हों उस स्थान पर साध्वी को और साध्वी के यहां साधु को बिना कारण : जाना नहीं । दूसरे अधिकार में सकारण चमड़ा लेने का विचार है। तीसरे अधि- कार में कहा है कि साधु साध्वियों को अखण्ड, याने बहुमूल्य वस्त्र नहीं रखना, आवश्यकता से टुकड़ा रख सकते हैं । चतुर्थ अधिकार में कहा कि साधु कच्छा नहीं रक्खें, साध्वियां रख सकती हैं। पंचम अधिकार में भिक्षा के लिये गयी हुई साध्वी को वन की आवश्यकता हो तो लाने की विधि बताई गई है। पष्ठ अधिकार में. सर्व प्रथम दीक्षा लेने वाले साधु साध्वी के लिये उपकरण का विचार है। सप्तम .

(ख) अधिकार में कहा है कि शीतकालके प्रारंभ में अर्थात् चातुर्मासके अन्तमें वस्त्र ग्रहण कर सकते हैं। वर्षा के प्रारंभ (चातुर्मास) में नहीं। ८-९ और १० में कहा है कि वस्त्र ग्रहण, शय्या ग्रहण और वन्दन छोटे बड़े के क्रम से ही करना चाहिये । ११ वें १२ में अधिकार में गृहस्थ के घर पर साधु साध्वियों के लिये ठहरना और व्याख्यान का निषेध है, अपवाद भी बताया गया है । १३ थें अधिकार में पाट आदि पाडि- हारिक शय्या संथारा के देने की विधि कही गई है। १४ वें अधिकार में शय्या वापिस देते समय दूसरे साधु आ जाय तो अवग्रह की विधि बतलायी गई है। १५ चे अधिकार में कहा है कि गांव के बाहर सेना पड़ा हो तो भिक्षा के लिये वहां जाकर रात में नहीं रहना चाहिये । १६ वे अधिकारमें साधु साध्वियों के लिये गांव के चारों ओर ५-५ कोश का अवग्रह लेकर रहने का विधान है। ४-चतुर्थ उद्देश-में १६ अधिकार हैं। प्रथम द्वितीय और तृतीय अधिकार में क्रमशः तीन प्रकार के अनुद्घातिक, पारांचित और अनवस्थाप्य प्रायश्चित के कारण कहे गये हैं। चतुर्थ अधिकार में कहा है कि तीन प्रकार के मनुष्य दीक्षा, मुंडन, शिक्षा, उपस्थापन, संभोग और संवास के अयोग्य है। पंचम अधिकार में अविनीत आदि तीन प्रकार के पुरुपों को वाचना के अयोग्य और विनीत आदि को वाचना योग्य कहा है । पष्ठ अधिकार में दुष्ट, मूढ आदि तीन प्रकार के मनुष्य को दुर्योध्य और अदुष्ट आदि को सुखवोध्य कहा है। सप्तम अधिकार में कहा है कि कष्ट में ग्लानि पाते हुए साधु को साध्वी एवं साध्वी को साधु आवश्यकता समझकर सद्भाव से सकारण सहारा दे तो आज्ञा का उल्लंघन नहीं करता । अष्टम अधिकार में कहा है कि काल या क्षेत्र की-पहर तथा कोश रूप-मर्यादा का उल्लंघन कर श्राहार आदि का उपभोग करने से साधु साध्वी प्रायश्चित के अधिकारी होते हैं । नवमें अधिकार में आकस्मिक कोई अनेपणीय घस्तु पाजाय तो साधु को क्या करना चाहिये, यह बताया गया हैं। दशम अधिकार में कल्पस्थित और अकल्प- स्थित साधु के लिये औदेशिक अाहार की विधि कही गई है। एकादशवें अधिकार में साधुगणावच्छेदक और आचार्य आदि के गणान्तर करने की विधि वतलाई है। १२ वें अधिकार में कदाचित् किसी साधु का आकस्मिक निधन हो जाय और साधु परठना चाहे तो उसकी विधि बतलाई है। तेरहवें अधिकार में कहा है कि कदाचित् मोहोदय से साधु का किसी के साथ कलह हो जाय तो तत्काल उसका उपशमन करना चाहिये, बिना शान्त किये भिक्षा आदि के लिये जाना नहीं कल्पता ।

(ग) चौहदवें अधिकार में परिहार तप वाले के साथ कैसा व्यवहार किया जाय, यह बताया गया है । पन्दरहवें अधिकार में कहा है कि गंगा, यमुना जैसी पांच बड़ी नदियां एक मास २-३ बार उतरना नहीं कल्लता। कैसी दशा में उतर सकते यह भी दिखाया है। १६ चे अधिकार में बताया कि घास आदि का कच्चा घर यदि निर्जीव हो तो कितनी ऊंचाई होने पर वहां मास कल्प या वर्षाकाल रह सकते हैं। पंचमोद्देश-प्रथम अधिकार में कहा है कि-साधु साध्वी को यदि स्त्री पुरुष के रूप में कोई देव देवी ग्रहण करे और वे उनको अच्छा समझे तो प्रायश्चित के अधिकारी होते हैं। दूसरे अधिकार में बताया है कि कोई साधु कलह करके दूसरे गण में जावे तो वहां कोमल वचनों से शान्त कर उसे फिर मूल गण में भेज देना चाहिये आदि। तीसरे अधिकार में प्रातःकाल या सायंकाल भोजन करते समय यदि मालूम हो जाय कि सूर्य उदय नहीं हुआ अथवा अस्त हो गया है, तो क्या करना चाहिये, बताया है। चौथे अधिकारमें रात्रि या विकाल में कंठ के नीचे से गुचलका जाय तो उसकी विधि कही गई है। पंचम अधिकार में बीज या जन्तु उपर से पात्र में गिर जाय तो किस प्रकार करना चाहिये, बताया गया है। छट्ठ अधिकार में- भोजन में सचित्त जल की बंद गिर जाय तब उसके उपयोग की विधि कही गई है। सप्तम अधिकार में साध्वी के व्रत रक्षा का विचार है, उसके लिये निम्न बातों का निपेध है-५ एकाकिनी होकर भिक्षा, जंगल और ग्रामानुग्राम विहार करना । २ वर्ष रहित रहना, ३ अपात्र होना, ४कायोत्सर्ग में देह का भान भूलना, ५ गांव के बाहर खड़े अातापना लेना, ६ स्थानायत आसन से रहना, ७ एक रात्रि की पडिमा कायोत्सर्ग रूप करना, ८ निषद्या आसन करना, ६ उकडू पासन से बैठना, १० वीरासन से बैठना, ११ दंडासन करना, १२ लकडासन करना, १३ उलटे मुंह सोना, १४ सीधे सोना, १५ आम्रकुजासन करना, १६ एक पार्श्व से अभिग्रह कर लेटना, ये कार्य साध्वी को नहीं करने चाहिये। साधु की तरह साध्वी को आकुंचन पट्ट धारण करना, पीछे तकिये-सहारेदार- श्रासन पर बैठना, दोनों वाजू खुट्टीदार पट्ट पर बैठना, नालवाला तुम्बा रखना खुली दंडी का रजोहरण धारण करना, पुजनी में दण्डी रखना ये बातें भी साध्वियों के लिये निषिद्ध हैं। अष्टम अधिकार में मोक प्रतिमा का विचार है। नयम अधिकार में रात में रहे हुए आहार के सेवन का निषेध है। लेप भी रात में (घ) रक्खा हुआ गाढ कारण बिना निषिद्ध है। ऐसे वासी रक्खे हुए घृत आदि की मालिश भी निषिद्ध है । दश अधिकार में परिहार तप वाले के व्यवहार की विधि कही गई है। ११ चे अधिकार में कहा है कि निस्सार श्राहार पाकर साध्वी निर्वाह नहीं कर सके तो दूसरी वार भी भिक्षा को जाना कल्पता है । षष्ठ उद्देश--प्रथम अधिकार में छः श्रवचन कहे हैं-जैसे १ हंसी आदि से झूठ घोलना, २ अवहेलना करना, ३ खिसनाने वाले वचन ४ कठोर वचन ५ गृहस्थ जैसे अपशब्द, ६ शान्त कलह को उत्तेजित करने वाले वचन ये अवाच्य हैं । दूसरे अधिकार में-हिंसा, झूठ, चोरी, मैथुन, अपुरुषवचन और दास वचन रूप छः प्रायश्चित के स्थान कहे गये हैं। तीसरे अधिकार में चार सूत्रों से कहा गया है कि साधु साध्वी के पैर में कांटा, कील आदि लग जाय एवं अांख में रज कण या जन्तु गिर जाय और चे निकाल नहीं सके तो आवश्यकता से साधु का साध्वी तथा साधु निकाल सकते हैं। किन्तु यह विशेष प्रसंग का सूत्र है। चौथे और पांचवें अधिकार में कहा है कि १२ कारणों से साधु साध्वी का स्पर्श करते हुए आज्ञा का उल्लंघन नहीं करते। जैसे-दुर्गादि भूमि में साध्वी का पैर फिसलता हो, कीचड आदि में फिसलती हो, २ नौका पर चढती या उतरती हो, ३ भय आदि से विक्षिप्त चित्त हो, ४ कामादि से दीप्त चित्त हो, ५ भूतप्रेतादि बाधा से बेभान हो, ६ उन्मत्त हो, ७ उपसर्ग से व्या- कुल हो, ८ क्रोध या कलह से अनुपशान्त हो, ९ प्रायश्चित से भयभीत हो १०, भक्त प्रत्याख्यान वाली हो ११ अर्थजात से चिन्तित हो १२, तो साधु पकड सकते एवं सहारा दे सकते हैं। छ? अधिकार में ६ बातें संयम को निस्सार बनाने वाली कही गई हैं। अन्त में कल्प की ६ स्थितियां बताई गई हैं। छद्मस्थ साधक के कल्पमात्र का इसमें समावेश कर दिया गया है। साध्वी का .

वृहत्कल्पसूत्रस्यानुक्रमणिका १ २ " . : " सूत्र प्रथम उद्देशकः १-५ प्रलम्ब प्रकृतम् पृष्ठ १-२ निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयक.म्-अभिन्न-आमताल प्रलंव सूत्रम् भिन्न ३ भिन्न-अभिन्न पकताल प्रलम्बसूत्रम अभिन्न पक्वताल प्रलम्ब सूत्रम् भिन्न मासकल्पप्रकृतम् ३- ५ निर्ग्रन्थ विषयके मास कल्प सूत्रे निग्रन्थी विषयके १०-११ बगड़ा प्रकृतम् ५ १०-११ निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयके वगडा सूत्रे १२-१३ आपणगृहरथ्यामुखादि प्रकृतम् १२ निर्ग्रन्थी विषयकम् आपण गृहरच्या मुखादि सूत्रम् १३ निर्ग्रन्थ १४-१५ अपावृत्तद्वारोपाश्रय प्रकृतम् निर्ग्रन्थी विषयकं अपावृत द्वारो पाश्रय सूत्रम् निर्ग्रन्थ १६-१७ ६-७ १६ निर्मन्थी विषयकम् घटी मात्रक सूत्रम् निम्रन्थ १८ चिलिमिलिका प्रकृतम् निम्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं चिलिमिलिका सूत्र " . " घटीमात्रक प्रकृतम् " (च) G १६ २० " " " " " २४ ८-8 " " " दकतीर प्रकृतम् निम्रन्थ निम्रन्थो विषयकं दकतीर सूत्रम् २०-२१ चित्रकर्म प्रकृतम् निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं सचित्र कोपाश्रय सूत्रम् २१ अचित्र २२-२४ सागारिक निश्रा प्रकृतम् २२-२३ निर्ग्रन्थी विषयके सागारिक निश्रा सूत्रे निम्रन्थ विषयकं सागारिक निश्राऽनिश्रा सूत्रम् २५-२६ सागारिकोपाश्रय प्रकृतम् निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं सागारिकोपाश्रय सूत्रम् २६ निम्रन्थ-विषयकं स्त्री सागारिकोपाश्रय सूत्रम् पुरुप निर्ग्रन्थी २६ स्त्री सागारिकोपाश्रय सूत्रम् ३०-३१ प्रतिवद्ध शय्या प्रकृतम् ३० निरन्थ विषयकं प्रतिबद्ध शय्या सूत्रम् निम्रन्थी ३२-३३ गृहपति कुलमध्यवास प्रकृतम् ३२ निर्ग्रन्थ विषयकं गृहपति कुल मध्यवास सूत्रम् ३३ निर्ग्रन्थी व्यवशमन प्रकृतम् भिक्षु विषयकं व्यवशमन सूत्रम् ३५-३६ चार प्रकृतम् निर्ग्रन्थ निम्रन्थी विषयके चार सूत्रे ३७ वैराज्य विरुद्ध राज्य प्रकृतम् ३७ निर्ग्रन्थ निम्रन्थी विषयकं वैराज्य विरुद्ध राज्य सूत्रम् है " " है है 8-१० (छ) ११-१२ ३८-४१ अवग्रह प्रकृतम् ३८-३६ निम्रन्थ विषयके वस्त्राद्यवग्रह सूत्रे ४०-४१ निर्गन्थी " १३ १३ १३ ४५ १३ ३ ४२-४३ रात्रिभक्त प्रकृतम् ४२ ४३ निर्ग्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयके रात्रि भक्त सूत्रे ४४ रात्रिननादि ग्रहण प्रकृतम् निम्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयकं रात्रि वस्त्रादि ग्रहण सूत्रम् हरियाहडिया प्रकृतम् ४५ निम्रन्थ निम्रन्थी विषयकं हरियाडिया सूत्रम् अध्व प्रकृतम् निम्रन्थ निम्रन्थी विषयकम् अध्व सूत्रम् सङ्खडि प्रकृतम् निर्ग्रन्थ निम्रन्थी विषयकं सङ्खडि सूत्रम् ४८-४६ विचार भूमि विहार भूमि प्रकृतम् निम्रन्थ विषयकं विचार भूमि विहार भूमी सूत्रम् निन्थी ५०-५१ ५०-५१ निम्रन्थी विषकम् आर्य क्षेत्र सूत्रम् १४ १४ १८ " " आर्यक्षेत्र प्रकृतम् " १५ पृष्ठ १७-२१ द्वितीय उद्देशक: १-१२ उपाश्रय--अधिकारः निम्रन्थ निम्रन्थ्युपायोपघात विषयाणि बीज सूत्राणि विषयकं विकट सूत्रम् विपयकम् उदक सूत्रम् विपयकं ज्योतिः " " wr " सत्रम् (ज) ७ " प्रदीप सूत्रम् 2 " " २१-२२ ९-१० विषयाणि पिण्डादि सूत्राणि ११ निन्थी विषयम् आगमन गृहादि सूत्रम् १२ निधी १३-१६ सागारिक पारिहारिक-अधिकारः १३ सागारिक पारिहारिक सूत्रम् निग्रन्थ निम्रन्थी विषयम् अनिहत सागारिक पिण्ड सूत्रम् १५-१६ विषये निहत सूत्रे १७-१८ आहृतिका निह तिका-अधिकारः निग्रन्थ निग्रन्थी विषयकम आहूतिका सूत्रम् १८ निहतिका सूत्रम् " २२ " " " अंशिका प्रकृतम् २२ " २३-२४ १६ निग्रन्थ निग्रन्थी विपयकं अंशिका सूत्रन् २०-२३ पूज्य भक्त उपकरण अधिकारः २०-२३ निम्रन्थ निर्ग्रन्थी विषयाणि-पूज्यभक्तोपकरण सूत्राणि २४ निग्रन्थ निन्थी विपयकम् उपधि सूत्रम् २५ रजोहरण-अधिकारः निम्रन्थ निन्थी विषयकं रजोहरण सूत्रम् उपधि प्रकृतम् २४ २४ पृष्ठ २५ तृतीय उद्देशकः १-२ उपाश्रय प्रवेश प्रकृतम् १ निम्रन्थ विषयकं निग्रन्थयुपाश्रय प्रवेश सूत्रम् २ निर्ग्रन्थी विपयकं निर्ग्रन्थोपाश्रय " ३-६ चर्म-अधिकारः निर्मन्धी विषयकं सलोम चर्म सूत्रम् " " २५-२६ ३ (क) ४ : ५ " ६ २६ " २६-२७ " " २७ निर्ग्रन्थ निर्गन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं कृत्स्न चर्म सूत्रम अकृत्स्न" कृत्स्नऽकृत्स्नावस्त्र-अधिकारः निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं कृत्स्नाऽकृत्स्न वस्त्र सू० ८-8 भिन्ना-ऽभिन्न, वस्त्र अधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकम् अभिन्न वस्त्र सूत्रम् भिन्न १०-११ अवग्रहानन्तकाऽग्रह पट्टक-अधिकारः निम्रन्थ विषयकम् अवग्रहानन्तका-ऽवग्रह पट्टक सू० ११ निग्रन्थी १२ निश्रा-अधिकारः १२ निर्ग्रन्थी विषयकं निश्रा सू० १३-१४ त्रिचतुः कृत्स्न-अधिकारः १३ निर्ग्रन्थ विषयकं त्रिकृत्स्त सू निग्रन्थी विषयकं चतुः कृत्स्न सू० १५ समवसरण-अधिकारः १५ निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं समवसरण स० वस्त्रपरिभाजन-अधिकारः २६ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं वस्त्र परिभाजन सू० १७. शय्या संस्तारक परिभाजन-अधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं शय्या संस्तारक परिभाजन स० १८ कृतिकर्म-अधिकारः निम्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं कृतिकर्म सू० १६ अन्तर गृहस्थानादि-अधिकारः १४ निर्ग्रन्थ-निम्रन्थी विषयकम् अन्तर गृहस्थानादि सू०. २०-२१ अन्तर गृहाख्यानादि-अधिकारः २८ " २८-२९ २३ २६ 40.' २६.

३१ (5) २०-२१ निर्ग्रन्थ-निम्रन्थी विषयक अन्तर गृहाख्यानादि स० २२-२४ शय्या संस्तारक-अधिकारः २२-२४ निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयाणि शय्यासंस्तारक सू० २५-२६ अवग्रहाधिकारः २५-२६ निम्रन्थ विषयाणि अवग्रह सू० ३० सेनाधिकारः निर्ग्रन्थ-निर्ग्रन्थी विषयकं सेना सू० ३१ क्षेत्रावग्रह प्रमाण अधिकारः निर्ग्रन्थ-निम्रन्थी विषयकम् क्षेत्रावग्रह प्रमाण स० " ३२-३३ ३४ चतुर्थ उद्देशकः अनुद्घाति-अधिकारः पृष्ठ ३५ १ अनुद्धाति प्रकृतम् २ पाराश्चिक-अधिकारः ३५ ૨ पारान्त्रिक सू० ३ अनवस्थाप्य-अधिकारः ३ ३६ mK अनवस्थाप्य सू० ४-६ पविध सचित्त द्रव्य कल्प-अधिकारः सचित्त द्रव्यकल्प विषय कम् प्रजाजना सू० मुण्डापना सू० शिक्षापना सूत्रम् उपस्थापना सूत्रम् सम्भोजना सूत्रम् संवासना सूत्रं च ८ " ३६-३७ ३७ " ३७-३८ " " (ट) १०-११ वाचनाधिकारः १० वाचना विषयम अविनीतादि सूत्रम् ११ विषयं विनीतादि सूत्रम् १२-१३ संज्ञाप्य-अधिकारः १२ दु.संज्ञाप्य सूत्रम् सुसंज्ञाप्य ग्लान-अधिकारः १४ निम्रन्थी विषयकं ग्लान सूत्रम् १५ निर्यन्य १६-१७ काल क्षेत्रातिक्रान्त-अधिकारः १६ निम्रन्थ-निम्रन्थी विषयकं कालातिक्रान्त सूत्रम् क्षेत्रातिकान्त. १८ अनेषणीय-अधिकारः निर्ग्रन्थ विषयकम् अनेषणीय १३ कल्पस्थिता-ऽकल्पस्थिति-अधिकारः कल्पस्थिता-Sकल्पस्थित २०-२८ गणान्तरोपसम्पत्प्रकृतम् भिक्षु विषयकं गणान्तरोपसम्पत्सूत्रम् गणावच्छेदक विषय प्राचार्य उपाध्याय विषयं २३ भिक्षुविषयं सम्भोग प्रत्ययिक गणावच्छेदक विषयं संभोग प्रत्ययिक आचार्यउपाध्याय, भिक्षु विषयकम् अन्याचार्योपाध्यायोदेशन सूत्रम् गणावच्छेदक विपयम् आचार्य उपाध्याय २६ विष्वग्भवन-अधिकारः " ३८-३६ & " ३६-४३ २० ११ २२ २४ " (ट) २६ अधिकरण प्रकृतम् ४४ '४५ भिक्ष विषयकं विष्वग्भवन सूत्रम् ३० ३० भिक्षं विपयकम् अधिकरण सूत्रम् ३१ परिहारिक-अधिकारः ३१ भिक्ष विषयकं परिहारिक सूत्रम् ३२-३३ महानदी-अधिकारः ३२-३३ निर्गन्य-निम्रन्थी विषयकं महानदी सूत्रे ३४-३७ उपाश्रय विधि अधिकारः ३४-३५ निम्रन्थ-निग्रन्थी विषयकम् ऋतुबद्धोपाश्रयविधि सूत्र द्वयम् विपयकं वर्पावासोपाश्रयविधि सूत्रद्वयम् ४५-४६ ४६-४७ " " पृष्ठ पञ्चम उद्देशकः १-४ ब्रह्मापाय-अधिकारः निग्रन्थ ब्रह्मापाय विषयकं देव बी सूत्रम् देवी घी निथी १ २ " " ३ " देवी पुरुष " देव पुरुष अधिकरण प्रकृतम् " ५ ४६ ४६-५० ५ भिक्षु विषयकम् अधिकरण सूत्रम् ६-8 संस्तृत निविचिकित्स अधिकार भिक्षु विषयकं संस्तृत निर्विचिकित्स सूत्रम् विचिकित्स असंस्तृत निर्विचिकिस्थ सूत्रम् विचिकित्स ६ " " १० १ ५१ (3) उद्गार-अधिकारः निग्रन्थ-निम्रन्थी विषयकम उद्गार सूत्रम् आहार विधि-अधिकारः ११ नियन्य विषयकम आहारविधि सूत्रम् १२ पानक विधि प्रकृतम् निम्रन्थ विषयकं पानक विधि सूत्रम् १३-३६ ब्रह्मरक्षा अधिकारः १३ निन्थी विपयकम् इन्द्रिय सूत्रम् श्रोतः एकाकि अचेल ५१-५२ ५२-५५ " " " अपात्र " " " व्युत्सृष्टकाय" ८ " आतापना " " स्थानायत्" निषद्या सूत्रम् २४ " प्रतिमास्थायि सूत्रम् २३ उत्कटुंकासन सूत्रम् वीरासन २५ दण्डासन लगण्डशायि सूत्रम् २७ अवाड्मुख उत्तान २६ थाम्र कुन्ज एक पार्श्वशायि सूत्रं च निम्रन्थ निम्रन्थी विषयकम आकुञ्चन पट्ट सूत्रन सावयासन संविषाण पीठ फलक सूत्र० सवृन्तालाबु सू० सवृन्त पात्र केसरिका सू० दारुदण्डकस. ३१ " ३३ " " " ३५ " (ढ) ५ ५५-५६ ३७ मोक-अधिकारः निम्रन्थ निन्थी विषयकं मोक सू० ३८-४० परिवासित-अधिकारः निम्रन्थ-निग्रन्थी विपयकम् श्राहार सू० आलेपन सू० म्रक्षण सू० ४१ व्यवहार-अधिकारः ४१ परिहार कल्पस्थित भिक्षु विषयं व्यवहार सू० ४२ पुलाक भक्त-अधिकारः ४२ निर्ग्रन्थी विषयकं पुलाक भक्त सू० " " ५६-५७ । पष्ठ उद्देशकः वचन अधिकारः निग्रन्थ निम्रन्थी विपयकं वचन सू० प्रस्तार--अधिकारः १ २ ५८-५९ २ प्रस्तार सू० " ५९-६० ३ ४ MK ३-६ कण्टकाधु द्धरण--अधिकारः निम्रन्थ सम्बन्धि कण्टकाद्युद्धरण विषयकं पाद सू० प्राण-बीज-रज आद्युद्धरण विपयकम् अक्षिसूत्रम् निर्गन्थी काण्टकायुद्धरण विषयकं पाद सू० प्राण-बीजााद्धरण विपकयकम अक्षि सू० ७-8 दुर्ग-अधिकारः निग्रन्थी विपयं दुर्ग स० " ६०-६१ " " पङ्क सू० नौ स०. .

६१-६३ (ण) १०-१८ क्षिप्तचित्तादि-अधिकारः १० निर्ग्रन्थी विपयं क्षिप्तचित्ता स० दीप्तचित्ता सू० १२ यक्षाविष्टा सू० १३ उन्माद प्राप्ता सू० " उपसर्ग प्राप्ता सू० साधिकरणा सू० सप्रायश्चित्ता सू० १६ " " भक्त पान प्रत्याख्याता सू० अर्थजात सू. " १६ परिमन्थ-अधिकारः " ६३-६४ १६ २० परिमन्थ प्रकृतम् कल्पस्थिति अधिकारः कल्पस्थिति सूत्रम् ६४-६५ - - प्रथमं परिशिष्टम् द्वितीयं परिशिष्टस् तृतीयं परिशिष्टम् चतुर्थ परिशिष्टम् पञ्चमं परिशिष्टम् शब्दकोषः पाठभेदः प्रति परिचय विशेषनामानि टिप्पणम् - पृष्ठ ६९-१०२ " १०३-१०६ १०७-१०८ " १०६-१११ ॥ ११२-११४ - ॥ श्रीः॥ ॥ श्री बृहत्कल्प सूत्रं सटीकम् ॥ टीकाकारस्य मंगलविधानम्- येषां सदागमविकाशविधौ विधित्सा, जन्मादिभीतभविनामभयप्रदित्सा । जात्यादिमानमदमत्तजनेपुकुत्सा, तीर्थङ्करास्त इह नो भुवि शङ्कराःस्युः।।१।। सत्तां कल्प्याऽकल्प्येप्रकृतिजनिते वस्तु निवहे, निवृत्त्य संशीत प्रवचनविदा कल्पितमिदम् । सुसूत्रं कल्पाख्यं विवृतिसहितं सल्लिपिमयं, प्रकुर्वेऽसद्गर्वोलिपिकृतिकलायामचतुरः ॥२॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीणं वा आमेतालपलंबे अभिपणे य पडिग्गाहित्तए ॥ १॥ टीका-नोक-नोकल्पते निग्ग०-नियंन्थानां निग्रन्थीनां वा 'आमे' आमं ताल- प्रलम्चं अभिन्न प्रतिग्रहीतुमिति योजना । अथ पदार्थः-नोकल्पते-नो समर्थी २ प्रथमोद्देशकः भवति न युज्यते इत्यर्थः निन्थानां-साधूनां, निम्रन्थीनां-साध्वीनां किम् ?-आर्म- अपक्वं-तालो-वृक्ष विशेषः तत्रभवं ताल-तालफलं, प्रकपेण-जंबते इति प्रलंत्र, अभिन्नद्रव्यतोऽविदारितं, भावतोऽव्यपगतजीवं, किमित्याह-पडि०-प्रतिग्रहीतुम्- आदातुमितिपदार्थः । प्रतम्यं द्विधा-मूल प्रलयं ताल प्रलम्ब वा, मूल प्रलम्ब- डिड्डियादि, ताल प्रलम्ब-सल्लकी प्रभृतयः ॥ १॥ मूल-कप्पइ निगंथाण वा निग्गंथीण वा प्रामे ताल पलंबे भिन्ने पडिगाहित्तए ॥ २ ॥ टीका-( कल्पन्ते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां चा प्रामानि-अपक्कानि ताल अलम्बानि-फलानि भिन्नानि-खंडशः कृतानि प्रतिग्रहीतुम्) कप्प०-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरं 'भिन्न-भिन्न-भावतोव्यपगतजीवं, द्रव्यतो भिन्नमभिन्न का तृतीय चतुर्थ भंगवर्तीत्यर्थः ॥ २॥ मूल-कप्पड़ निग्गंथाणं पक्के ताज पलंबे भिन्ने वा अभिन्ने वा पडिगाहित्तए ॥ ३॥ नो कप्पड निरगंथीणं पक्के ताल पलये अभिन्ने पडिगाहित्तए ॥ ४ ॥ कप्पइ निग्गयीणं पक्के ताल पलंबे भिन्ने पडिगाहित्तए, सेवि य विहि- भिन्ने, नो चेर-णं अविहि-भिन्ने ॥ ५॥ टीका-एतानि त्रीणि सूत्राणि समकमेव व्याख्यायन्ते--"कप्प-कल्पते नि०- निर्मन्थानां पक्के--पक्वं ताल प्रलम्ब द्रव्यतोभिन्नमभिन्नं वा प्रतिग्रहीतुम् ॥ ३ ॥ नो क०-नोकल्पते निन्थीनां ५०-पक्वं ताल प्रलंबं अ०-अभिन्न १०--प्रतिग्रही- तुम् ॥ ४॥ क० कल्पते नि०--निग्रन्थीनां पक्कं-- पनचं ताल प्रतर्च भि०--- द्रव्यतोभिन्न प्रतिग्रहीतु सेवि--तदपि वि०--विधिभिन्न--विधिना' वक्ष्यमाए लक्षणेन भिन्न--विदारितं नो०-~नचअविधिभिन्न 'ण' वाक्यालझारे ।। ५ ॥ १-अविधिल विधिना च भिन्नस्य प्ररूपणा नियते पत्र यत्-चियादिकं विदार्य ऊफालिरूपाः पेश्य: कृर्त तद् जुक भिन्नम् यत तु पेश्यः कृत्वा पुनः दलक्षणदलक्षणतरादिभिः सण्डैरनेकशर्दिछत्त्वा तथा कृतं यथा भूयस्तदाकारं कर्तुं न पार्यते, तदेव विध विषमकुट्टभिन्न मुच्यते, विमा-पुनस्तथा कर्तुमशक्यः है:-इलक्षण खण्डभिन्नमिति न्युरपत्तेः । एतच्च विधिभिन्नम् । मन्त्र चाऽविधिभिन्ने ते में दोषा द्रष्टव्या येऽभिन्ने देवीस्टान्तेन वर्णिताः ॥१० | ५५ ॥

बृहत्कल्पसूत्रम् मूल--से गामंसि वा नगरंसि वा खेडंसि वा कबडंक्षि वा मसि का पट्टांसि वा आगरंसि वा दोणमुहंसि वा निगमंसि वा रायहाणिसि वा आसमंसि वा संनिसंसिका संबाहंसि वा घोसंसि वा अंसिसि वा पुडभेयणंसि वा सपरिखेसि अबाहिरियंसि कप्पट् निगंशाणं हेमंत गिम्भासु एगं मामं वत्थए ।। ६ ।। टीका--से--से शब्दो मागधदेश प्रसिद्धः अथ शब्दार्थः, गा०--ग्रामेवा न०- नकर वा खे०-खेटे वा कर्वदे वा म०--मडंबे वा ५.० -पत्तने वा ०--श्राकरे वा दो०--द्रोणमुखे वा निक- निगमे वा रा०--राजधान्यां वा आ- श्राश्रमे वा संनि:--संनिवेशे वा सं0- संवाधे वा घो०-घोपे वा अं0--अंशिकायां वा पु०- पुट भेदने वा गा०--यत्र गवादीनां कराः सन्ति (गम्यो गमनीयो वा, अष्टादशानां कराणामिति, ग्रसते वा बुद्धयादीन् गुणान् इति, ग्रामः) नास्ति-निविद्यतेऽत्राष्टादश- कराणामेकोऽपि करः इति नकरम् , खेदं-पुनधूलीप्राकारपरिक्षिप्तम् । कटं तु कुनगरमुच्यते, मडम्यं नाम यत्सर्वतः--सर्वासुदिक्षुछिन्नं-- अर्द्ध तृतीय गव्यूत्त मर्यादायामविद्यमान प्रामादिकमिति भावः, अन्ये तु व्याचक्षते-- पार्श्वतोऽर्द्ध तृतीय योजनान्तामादिकं न प्राप्यते तन्मडम्बम् । पत्तनं द्विधा जल पत्तनं स्थल पत्तनञ्च, यत्र जलपथेन नावादिवाहनारूढ़ भाण्डमुपैति तज्जल पत्तनं, यथा द्वीपम् । यत्र तु स्थल पथेन शकटादौ स्थापितं भाण्डमायाति तत्स्थलपत्तनं यथा आनन्दपुरम् । अय आकरादयः यत्र पाषाणधातु धमनादिना लोहमुत्पाद्यते स अय आकरः, आदि शब्दात् ताम्ररूप्यका (प्या) चाकर परिग्रहः । दो०--यभ्यतु जल पथेन स्थल पथेन च द्वाभ्यामपि प्रकारास्यां भाण्डमुपागच्छति तद् द्रोण मुखम् (द्वयोः पथोमुखमिति निरुक्त्या) उच्यते, तच्च भृगुकच्छ ताम्रलिमो वा। निगम नाम यत्र नैगमा:--वाणिजकविशेषास्तेषां वर्ग:--समूहो वसति, अतएव निगमे भवा नैगमा इति व्यपदिश्यते । यत्र नगरादी राजा परिवसति सा राजधानी । आश्रमो-यः प्रथमतस्तापसादिभिरावासितः, पश्चादपरोऽपिलोकस्तत्र गत्वा व. सति, नि--निवेशो नाम--यत्र सार्थ आवासितः, आदिग्रहणेन ग्रामो वा अन्यत्र प्रस्थितःसन् यनान्तरावासमधिवसति, यात्रायां वा गतो लोको यत्र तिष्ठति एप सर्वोऽपि निवेशः । ('संबा० गाथा') सं०--संबाधोनाम--यत्र कृषीवल लोकोऽन्यत्र कर्षणंकृत्वा चणिग्यो वा वाणिज्यं कृत्वा अन्यत्र पर्वतादिपु विषमेषु स्थानेषु प्रथमोद्देशकः 'संबोढुम्' इति कणादिकं समुह्य कोष्ठागारादौ च प्रक्षिप्य वसति (सः संबाधः ) । तथा घो०--घोषस्तु गोकुलमभिधीयते । अंक--अंशिका--यन्न ग्रामस्यार्द्धम, आदि शब्दात् त्रिभागो वा चतुर्भागो वा गत्वास्थितः सा ग्रामस्यांश एव अंशिका । (गा० - नाणा० ) पुड----नाना प्रकाराभ्यो दिग्भ्य भागताना भाण्डानां--कुङ्कुमादीनां पुटा यत्र-विक्रयार्थ भिद्यन्ते तत् पुटभेदनम्-उच्यते । (केपाञ्चित्मतेन 'संकरंसि वा इत्यधिक पदं पठितव्यम् । सहरोनाम किञ्चिद् ग्रामोऽपि खेटमपि आश्रमोऽपीत्यादि) सपरि०-सपरिक्षेपे--वृत्त्यादिप परिक्षेपयुक्ते, अबा० 'अबाहिरिके--बहिवा बाहिरिका [ अध्यात्मादिभ्य इकण , सिद्ध ६-३-७८ इति इकण प्रत्ययः ] प्राकार वहिर्वर्तिनी गृह पद्धतिरित्यर्थः, न विद्यते वाहिरिका यत्र तद् अवाहिरिकं तस्मिन् कल्पते निम्रन्थानां 'हेमन्त ग्रीष्मेपु--ऋतु बद्ध काल सम्बन्धियु अष्टसु मासेष्चित्यर्थः, एक मासं वस्तुं-अवस्थातुम्, वा शब्दाः सर्वेऽपि विकल्पार्थाः स्वगतानेक भेद सूचका वा द्रष्टव्याः इति सूत्र समासार्थः । मूल-सेगामंसि वा जाव रायहाणिसि वा सपरिक्खेसि सबाहिरि- यंसि कप्पइ निग्गंथाणं हेमंत--गिम्हासु दोमासे-वत्थए । अंतो एगं मासं, बाहिं एगं मासं । अंतोवसमाणाणं अंतोभिक्खायरिया, बाहिं वसमाणाणं चाहिंभिक्खायरिया ॥ ७ ॥ टोका-( अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां वा वृत्त्यादिरूप-परिक्षेपयुक्ते सपरि- क्षेपे ) सबाहिरिके-प्राकारवहिर्वति गृहपद्धतिरूपया वाहिरिकया सहिते कल्पते निम्रन्थानां हेमन्त-ग्रीष्मेपु द्वौ मासौ वस्तुम् । कथमित्याह अन्तः-प्राकाराभ्यन्तरे एकं मासं, बहिः-बाहिरिकायामपि-एक मासम् । अन्तर्वसतामन्तर्भिक्षाचर्या, बहि- सतां वहिर्भिक्षाचर्येति ॥ ७॥ मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा सपरिक्खेवंसि अबाहिरियसि कप्पइ निरगंथीणं हेमंत-गिम्हासु दोमासे वत्थए ॥८॥ टीका-अस्य व्याख्या प्राग्वत् । (अथ ग्रामे वा यावद् राजधान्यां वा सपरि- क्षेपे ) नवरम् (विशेषः ) अवाहिरिकेक्षेत्र कल्पते निम्रन्थीनां हेमन्त ग्रीष्मेपु द्वौ मा. सोचरतुमिति । ८।३। .

बृहत्कल्पसूत्रम् मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा सपरिक्खेवंसि सबाहिरियसि कप्पड़ निगंथीणं हेमंत-गिम्हासु चत्तारि मासे वत्थए,-ग्रंतो दो मासे, बाहिं दो मासे, अंतो वसमाणीणं अंतोभिक्खायरिया वाहिं वसमाणीणं बाहिं भिवखायरिया । । । ४ । टीका-अस्य व्याख्या प्रारंवत् । (अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां व सपरिक्षपे) न बरम् (विशेपः ) सबाहिरिके क्षेत्र -अन्तद्वौ मासौ वहिौमासौ-इत्येवं चतुरी मासान् निर्ग्रन्थीनां वस्तुं कल्पते इति (अन्तर्वसन्तीनामन्तर्भिक्षाचर्या, बहिर्वसन्ती नां बहिर्भिताचर्या)। ६।४। वृत्तरत्र प्रथम खण्डं पूर्तिमगात् । मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा एगवगड़ाए एग दुवाराए एग निक्खमणपवेसाए नो कप्पइ निग्गंथाण य निरगंथीण य एगत्तयो वत्थए । १० । टीका-से गामंसिक-से-अथ ग्रामे वा यावत् राजधान्यां वा यावत् करणात नगरे वा खेडे वा इत्यादि पद् परिग्रहः । एगवगड़ाके०-वगड़ो नाम परिक्षेपः पर्वत प्राकारादिः तेन एकेन परिक्षिप्तो ग्राम एकवगड़ इति उच्यते। एगदु०-एकद्वारे-एक निष्क्रमण प्रवेशके च क्षेत्रे न कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनाञ्च एकतो मिलिताना वस्तुम्-अवस्थातुम्-इति सूत्रार्थः ।। १० ।। मूल-से गामंसि वा जाव रायहाणिसि वा अभिणिवगड़ाए अभिणि दुवाराए वा अभिणिक्खमण पवेसाए कप्पड़ निग्गंथाण य निग्गंथीण य एगत्त उत्थए ॥ ११ ॥ टीका-से गामंसिवा-यावत् राजधान्या वा अभिनिवगड़ाके " निपातानाम- नेकार्थत्वात"-अभीत्यनेकानीति नियतावगड़ापरिक्षेपा यत्र तत् अभिनिवगडाकं तत्र, एवं अभिनिद्वारके-अभिनिष्क्रमण प्रवेशके च कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां- च वा एकतो वस्तुम्-इति सूत्रार्थः ॥ ११ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं आवणगिहंसि वा रत्थामुहंसि वा सिंघाडगंसि चा तियं(क)सि वा चउक्कंसि वा चच्चरंसि वा अंतरावणंसि वा वत्थए।१२।

६ प्रथमोदेशकः टीका-नो कप्पइ निग्गंथीणं आव० -नो कल्पते निम्रन्थीनां प्रापणगृहे वा, रथ्या मुखे वा, शृगाटके वा, त्रिके वा पन्थचतुके बा चत्वरे वा, अन्तरापणे वा नस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १२ ॥ मूल-कप्पड़ निम्नथाणं-प्रावणगिहंसि वा जाव अंतरावर्णसि वा वत्थए ।। १३ ॥ टीका--कप्पई निग्गंधाणं०--अस्य व्याख्या प्राग्वत् (कल्पते निम्रन्थानां आपण गृहे वा, रथमासुखे वा, शृंगाटके वा, त्रिके वा, चतुष्के वा, त्रिके वा, चतुष्के वा, चत्वरे--महा- पथे वा-अनेके पन्थानः सम्मिलन्ति तत्र, अन्तरापणे वा वस्तुमिति ।। १३ ।। मूल--नो कप्पइ निग्नंथीणं अवंगुय दुवारिए उबस्सए वत्थए, एगं पत्यारं अंतो किच्चा-एगं पत्थारं बाहिं किच्चा-योहाडिय चेलचिल- भिलियागंसि एवं णं कप्पइ वत्थए । १४ ।। टीका--नो कप्पइ--नो कल्पते निर्ग्रन्थीनां---ब्रतिनीनां अपावृतद्वारके-- उटिनद्वारे उपाश्रये वस्तु । सकपाटोपाश्रयालाभे तु तत्राऽपि वसन्तीभिः इत्थं विधिविधेया--एक प्रस्तारकं--कटं अन्त:--प्रतिश्रयाभ्यन्तरे कृत्वा एकं प्रस्तार-चदं बहिः कृत्वा ततोऽवघाटित चेजचिजभिजिकाके--अवघाटिना बद्धा चिलमिलिका पत्रस तथा ईदृश उपाश्रये एवमनन्तरोक्तेन विधिना (णं) इति वाक्यालंकारे कल्पते वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १४ ॥ मूल--कप्पइ निग्गंथाणं अवंगुय-दुवारिए उबस्सए वत्थए ।।१५।। टोका--कप्पइ--कल्पते निम्रन्थानां--अपावृत द्वारे उपाश्रये वस्तु मिति सूत्रार्थः ॥ १५ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथीणं अंतोलित्तयं घडिमत्तयं धारित्तए वा परि- हरित्तए वा ॥१६॥ टीका--कप्पइ--कल्पते निम्रन्थीनां--ब्रतिनीनां अन्तर्लिप्तंघविमानक-घटी संस्थानं मृण्मय भाजन विशेष धारयितुं वा परिहत्तुं वा । धारयितुं नाम स्वसत्तायां स्थापयितुम् परिहत्तुं--परिभोक्तुम एप सूत्रार्थः ॥ १६ ।। मूल-नो कप्पइ निग्गंथाशं अंतोलित्तयं घडिमत्तयं धारित्तए वा परि- हरित्तए वा ।। १७॥

हत्कल्पसूत्रम ? टीका-नोकप्पइ-अस्य व्याख्या पूर्ववत् (नो कल्पते निर्यन्यानां अन्तर्मित घटिमात्रकं धारयितुं वा परिहतु वा ) ॥ १७ ॥ मूल-कप्पड-निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा चेल चिलमिलियं धारित्तए वा परिहरित्तए वा ।। १८ ।। टीका--कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा चल चिलमिलिका धार चिनुचा परिहतु वा एप सूत्रार्थः, वस्त्र-रज्जु-कट-कल्क-एडभेदात् पञ्च विधां चितमिलिका वक्ष्यते तत्कथं सूत्रं चेलचिलमिलिकाया एव ग्रहणम् ? इत्याह-चेलन्तु वस्त्र ज्यादीनां मध्ये बहुतरोपयोगित्वात् प्रधानतरम् तस्यैव सूत्रे ग्रहणं कृतम् , नान्यासां रज्जुचिलमिलिकादीनाम् ।। मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा दगतीरंसिचिद्वित्त- ए वा निसीइत्तए वा तुयट्टित्तए का निदाइत्तए वा पयलाइत्तश्या असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा आहारं आहारित्तर वा उच्चारं वा पास- वणं वा खेलं वा सिंघाणं वा परिवितर वा, सज्झायं का करित्तर धम्म जागरियं वा जागरित्तर ( झाणं वा झाइत्तर ) काउस्सरगं वा ठाणं वा ठाइत्तए ॥ १६ ॥ टीका-"नोकप्प०-नोकल्पते निम्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा दक तीरे-उदकोप कण्ठे स्थातुं वा-उर्ध्वस्थितस्यासितुं वा, निपत्तु उपविष्टस्यधातुं, त्वग्वर्तयितुं वा दीर्घकायं प्रसारयितुं । निद्रापितं सुखातिबोधावस्थया निद्रयाशयितुं प्रचलायितुं वा स्थितस्य स्वप्तुं 'अशनं वा पानं वा खादिमं वा स्वादिसं या आहारयितं वा, उच्चारं वा प्रस्रवणं वा स्नेलं वा, सिंघानं वा परिष्ठापयितु वा स्वाध्यायं वा, वाचनादिकं कत्तुं धर्म जागरिकां वा धर्मध्यानलक्षणां जागरयितु-कर्तुम, धातूनाम- नेकार्थत्वात् अत्र पाठान्तरम् । झाणं वा झाइत्तए-धर्मध्यानमनुसत्तुं इति कायो- त्सर्ग वा चेष्टाभिभवभेदात् द्विविधकायोत्सर्ग लक्षणं स्थानं स्थातुं कत्तुं इत्येष सूत्रार्थः ।। १६ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सचित्त कम्मे उबस्सए पत्थए।॥ २० ॥ टीका--नो कप्प-नो कल्पते निम्रन्थानां निम्रन्थीनां था सचित्रकर्मणि-- चित्रकर्मणासंयुक्ते उपाश्रये वस्तुम् ॥२०॥ .

प्रथमोद्देशकः मूल-कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा अचित्त कम्मे उबस्सए पत्थए ।॥ २१ ॥ टीका कप्प०--कल्पते निर्ग्रन्थानां निम्रन्थीनी चा अचित्र कर्मणि उपाश्रये वस्तुमिति सूत्रार्थः ।। २१ ।। मूल--नो कप्पइ निग्गंथीणं सागारिय-अणिस्साए वत्थए ॥२२॥ टोकानो कप्प-नोकल्पते निर्ग्रन्थीनां सागारिकाऽनिश्रया शरघातरे- णाऽपरिगृहीतानां वस्तुमिति ।। २२ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथीणं सांगारिय णिस्साए पत्थए ॥ २३॥ टीका--कप्प०..-कल्पते निन्थीनां सागारिकनिणया- शय्यातरेणपरिगृही. तानां चन्तु एष-सूत्रार्थः ।। २३ ।। मूल--कप्पइ निग्गंथाणं सागारिय णिस्साए वा अणिम्साए वा चत्थए ॥२४॥ टीका--कप्पा--कल्पते निर्ग्रन्थानां सागारिक निश्या चा अनिश्रया वा घस्तु- मिति ॥ २४॥ मूल--नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा सागारिय उवस्सए वत्थए ।॥ २५ ॥ टीका--नोकप्पइ--नोकल्पते निग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा सागारिक द्रव्ये उपाश्रये--यत्र सागारिकस्य द्रव्यं चखालंकारादिकं तिष्ठति तत्र वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ २५ ।। मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अप्पसागारिए उवस्सए वत्थए ।। २६ ॥ टीका--कप्प०--इति सूत्र सुगमम्--इदंसूत्र वृत्तौ न दृश्यते (कल्पते निर्ग- न्थानां वा निग्रन्थीनां वा अल्पसागारिके उपाश्रये वस्तुम् ॥ २६ ।। मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं इत्थीसागारिए उवस्सए वत्थए ॥२७॥ टीका-नो कप्पइ-इत्यादि अस्यसूत्र चतुष्टयस्य व्याख्या--नो कल्पते-निर्ग- न्यानां स्त्री सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ।।.२७ ।।

ह बृहत्कल्पसूत्रम् मूल--कप्पइ निग्गंयाणं पुरिस सागारिए उवस्सए वत्थए ॥२८॥ टीका--कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थानां पुरुप सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ॥ २८ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं पुरिस सागारिए उवस्सए वत्थए ।।६।। टीका--नो कप्प -नोकल्पते निर्ग्रन्थीनां पुरुप सागारिके उपाश्रये वस्तुम् ।।२६॥ मूल-कप्पइ निग्गंथीणं इत्यि सागारिए उबस्सए वत्थए ॥३०॥ टीका--कप्पइ-कल्पते निर्ग्रन्थीनां स्त्री सागारिके उपाश्रये वस्तुमिति सूत्र चतुष्ट- याक्षरार्थः ॥ ३०॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं पडिबद्धाए सेज्जाए वत्थए ॥३१।। टीका--नो कप्पइ-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां प्रतिवद्धशय्यायां-द्रव्यतो भावतश्च प्रतिबद्धे उपाश्रये वस्तुमिति सूत्रार्थः ।। ३१ ।। मूल-कप्पड़ निग्गंथीणं पडिबद्धाए सेज्जाए वत्थए ।॥३२॥ टीका--कप्पइ-अस्य व्याख्या प्राग्वत् ( कल्पते निर्ग्रन्थीनां प्रतिबद्धायां शय्यायां वस्तुम् ) ॥ ३२ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं गाहावइ कुलस्स मझ मज्झे णं गंतु वत्थए ।॥३३॥ टीका--नो कप्पइ-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां गृहपति कुलस्य मध्ये मध्ये गत्वा यत्र निर्गम प्रवेशो क्रियते तत्र उपाश्रये वस्तुन । उपलक्षणमिदम्-तेन गृहस्थाः यत्र संयतो- पाश्रयस्य मध्ये मध्ये निर्गच्छन्ति प्रविशन्ति वा तत्राऽपि न कल्पते-वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ३३ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथीणं गाहावइ कुलस्स मज्झं मझेणं गंतु वत्थए।३४॥ टीका--कप्पइ-अस्य व्याख्या प्राग्वत् ( कल्पते निर्ग्रन्थीनां) गाथापति कुलस्य मध्ये मध्येनगत्वा वस्तुम् ।। ३४ ॥ मूल-भिक्खू य अहिगरणं कट्ट तं अहिगरणं अविनोसवित्ता अवि- ओसविय पाहुडे इच्छाए परो श्राढ़ाएज्जा, इच्छाए परो नो आढाएज्जा, इच्छाए परो अमुट्ठज्जा, इच्छाए परो नो अब्भुट्ठज्जा, इच्छाए परो चंदेज्जा, इच्छाए परो नो वंदेजा, इच्छाए परो संभुजेज्जा, इच्छाए परो न १० प्रथमोदेराक: संभुजेज्जा, इच्छाए परो संबसेज्जा, इच्छाए परो नो संबसेज्जा, इच्छाए परो उसमेजा इच्छाए परो नो उनसमेजा, जो उस मइ तस्स अस्थि पारा- हणा जो न उपसमइ तस्स नत्थि आराहणा, तरहा अप्पणा चे उपसमि- यव्वं । से किमाहु भंते! उवसम सारं खु सामन्नं ॥३॥ टीका--भिक्खूयः-भिनुः--सामान्य साधुः च शब्दस्यानुक्तसमुञ्चयार्थत्वात्- आचार्योपाध्यायावपि गृह येते, अधिक्रियतेनरकगतिगमनयोग्यताप्राप्यते-आत्माऽनेन इति अधिकरणम्,-कलहः प्राभृतमिति एकार्थाः, तत्कृत्वा तथाविध द्रव्य क्षेत्रादि साचिव्यात् पापवृहि तत् कषाय मोहनीयोदयात् द्वितीय साधुना सह विधाय तत्- स्वयं अन्योपदेशेन वा परिभाव्य तस्यैहिकामुष्मिकापायबहुलं वा तदधिकरणं- विविधैः-अनेकप्रकारैः स्वापराधप्रतिपत्तिपुरस्सरं मिथ्या-दुष्कृत प्रदानेन अब- शमय्य-उपशमं नीत्वा ततो विशेपेणावसायितं--अवसानानीतम् प्राभृतं--कलहो येन स व्यवसायित प्राभृतो उत्सृष्ट कलहो भवेत्, किमुक्तं भवति ? गुरु सकाशे स्व- दुश्चरितमालोच्य तत्प्रदत्तं प्रायश्चित्तञ्च यथावत् प्रतिपद्यते यः तत् अकरणायाभ्यु- त्तिष्ठेत्--आह येन तदधिकरणं उत्पन्नं स यदि उपशाम्यमानोऽपि नोपशामयति ततः कोविधिरित्याह-इच्छाए परो-इत्यादि सूत्र-इच्छथा यथा स्वरुच्या परं आद्रियते (प्रागिव संभापणादिकमादरं कुर्यात् वा नवा इतिभावः ) एवमिच्छयापरः तमभ्युत्तिष्ठेत , इच्छया परो वन्देत् वा इच्छया परो न वन्देत , इच्छया परः तेन साधुना सह सम्भुजीत-एक मण्डले भोजनादान ग्रहणं संभोगं वा कुर्यात , इच्छया परो न सम्भुञ्जीत, इच्छया परः तेन साधुना सह संवसेत् , सम्-एकीभूय एकत्र उपाश्रये वसेत् , इच्छयापरो न संवसेत् , इच्छया पर उपशाम्येत् इच्छया परः नोपशाम्येत् परं यः उपशाम्यति-कपायतापापगमेन निवृतीभवति तस्याऽस्ति सम्यक दर्शनादीना- माराधना, यस्तु नोपशाम्यति तस्य नास्ति तेपामाराधना तस्मात्-एवं विचिन्त्य यात्मना एव उपशमितव्यम्-उपशमः कर्त्तव्यः । शिष्यः प्राह से किमाहु भंते ? अथ किमत्र कारणमाहुः भदन्त ? परं कल्याण योगिनः तीर्थ करायः, सूरिराह-उव०- उपशम सारं श्रामण्यं तस्मात् विहीनस्य निष्फलतया विधानात्, उक्तञ्च दशवै- कालिक नियुक्तौ "सामन्नमनुचरन्तस्स, कसाया जस्स उकडा होइ, मन्नामि उच्च पुफ्फं व निफ्फलं तस्स-सामन्नं । इति सूत्रार्थः ।। ३५॥ , वृहत्कल्पसूत्रम् ११ मूल--नो कमा निग्गंधाण वा निग्गंधीण वा वासावासासु चरित्तए ।। ३६॥ टीका-नो कप्पइ-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्गन्थीनां वा चोपलक्षिता वर्पा वर्ष- वर्षा तासु चरितुम ॥ ३६॥ ['चर, गति भक्षणयोरिति धातोर्गत्यर्थोगृह्यतः ] त्रामानु- प्रामं पर्यदितुप्-इत्यर्थः । यद्वा भक्षणार्थोऽपि गृह्यते, तथाहिमक्षणं समुद्देशनं तच्च यथा ऋतुबद्धे साधूनां, तथा वासु कतु नो कल्पते । तदानी हि चतुर्थभक्तादि प्रत्याख्यान परायणर्भवितव्यम् । विकृतीनां चाऽभीदणग्रहणं न कर्तव्यमिति सूत्रार्थः ।। ३६ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा हेमंत गिम्हासु चरि- तए॥ ३७॥ टीका-कल्पते निर्गन्थानां वा निम्रन्थीनां वा हेमन्त ग्रीष्मयोरष्टासु ऋतुबद्धमासेपु. चरितुं-ग्रामानुग्रामं पर्यदितुम् इति सूत्रार्थः ।। ३७ ।। मूल--नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा बेरज्न विरुद्ध रज्जसि सज्जंगमणं सज्ज आगमणं सज्जंगमणागमणं करित्तए । जो खलु निग्गंथो वा निग्गंथी वा बेरज्ज विरुद्ध रज्जंसि सज्ज गमणं सज्ज आगमणं सज्ज गमणागमणं करेइ, करं (रि)तं वा साइज्जइ, से दुनो वि वीतिकममाणे भाव- ज्जइ, चाउम्मासियं परिहार हाणं अणुग्वायं ।। ३८ ॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा वैराज्यविरुद्ध राज्ये-यन्त्र राज्ये. पूर्वपुरुष परम्परागतं वैरं तद् वैराज्यमुच्यते । यत्र तु वणिजां शेषजनपद्स्य च निस्सञ्चारं कृतं गमनागमन निषेधो विहितः, ततः वैराज्यविरुद्ध उच्यते, तत्र सद्यस्ता कालंगमनम् , सद्य आगमनम् , सद्योगमनागमनं कर्तुम् , 'जो'-यः खलु निम्रन्थो वा निम्रन्थी बा बैराज्यविरुद्धराज्ये सद्योगमनं सद्य आगमनं, सद्योगमनागमनं करोति, कुर्वन्तं वा प्रास्वाद्यति--अनुमोद्यति, स 'द्विवापि' तीर्थकृतां राज्ञश्च सम्बन्धिती- माज्ञामतिक्रामन् श्रापद्यते प्राप्नोति चातुर्मासिकं परिहारस्थानमनुद्घातिक चतुर्गुरुकमित्यर्थः, इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। ३८ ।। मूल--निग्गंथं च णं गाहावइकुलं पिंडवाय पडियाए अणुभविट्ट केई वत्येण वा पडिगहेण वा कंबलेण वा पाय-गुंछोण वा उपनियंतेजा, - , १२ प्रथमोदेशकः १ कप्पड़ से सागारकडं गहाय आयरियपायमूले ठवित्ता दोच्चंपि उग्गहं अणुराणवित्ता परिहारं परिहरित्तए ।। ३६ ।। टीका-"निर्ग्रन्थं पूर्वोक्तशब्दार्थं च शब्दोऽर्थान्तरोपन्यासे, 'णं, इति वाक्या- लकारे, गृहस्य पतिः स्वामी गृहपतिः, तस्य कुलं-गृहं 'पिण्डपात प्रतिज्ञया' पिण्ड:- श्रोदनादि, तस्य पात:-पात्रे प्रवेशः, तत्प्रतिज्ञया-तत्प्रत्ययमनुप्रविष्टं कश्चिद् उपा- सकादिर्वस्त्रेण वा प्रतिग्रहेण वा कम्बलेन वा पात्रोछनेन वा उपनिमन्त्रयेत् । वस्त्र सौत्रिकमिहगृह्यते,प्रतिग्रहः-पात्रम् , कम्बलम्-बोर्णिकः कल्पः, पात्रशब्देन तु पात्रवन्ध पात्र केसरिका प्रभृतिकः पात्र निर्योगः, प्रोञ्छन शब्देन तु रजोहरणमुच्यते । अाहच चूर्णिकृत्-"पायग्गहणेणं पायभंडयं गहियं । पुछणं, रयहरति ।” ततश्च पात्रं च प्रोञ्छनं चेति पात्रप्रोग्छनमिति समाहार द्वन्द्वः । एतैः उप-सामीप्ये प्रागत्य निमन्त्रयेत् । उपनिमन्त्रितस्य च 'से, तस्य निर्ग्रन्थस्य 'साकार कृतं', आचार्यसत्क- मेतद्वन न मम, अतो यस्मै ते दास्यन्ति, अन्यस्मै वा मह्यचा, अात्मना वा परि- भोक्ष्यन्ते, तस्यैतद्भविष्यति, इत्येवं सविकल्पवचन-व्यवस्थापितं सद्गृहीत्वा तत चार्य पादमूले तद्वखं स्थापयित्वा यदि ते तस्यैव साधोः प्रयच्छन्ति, तदा द्वितीयमप्यवग्रहम् , एव.स्तावद् गृहस्थादवग्रहोऽनुज्ञापितो द्वितीयं पुनराचार्यपाद् मूलावग्रहमनुज्ञाप्य धारणा-परिमोगरूपं द्विविधमपि परिहारं तम्य वस्त्रस्य 'परिहतु, धातूनामनेकार्थत्वाद् आचरितु कल्पते, इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। ३९ ।। मूल-निग्गंथं च णं बहिया नियारभूमि वा विहारथूसिं दा निक्खंत समाणं केइ कत्थेण वा पडिग्गहेण वा कंबलेण वा पायपुंछणेण वा उव- निमंतेज्जा, कप्पड़ से सागारकडं गहाय आयरिय पायमूले ठवित्ता दोच्चंपि उग्गहमणुन्नवेत्ता परिहारं परिहरित्तर ॥ ४० ॥ टीका-"निग्गंथं च णं बहिया-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरं-'बहिः विचार- भूमौ-संज्ञासु, विहार भूमौ वा स्वाध्यायभूमिकायाम् ।। ४० ॥ मूल-"निग्गंथिं च णं गाहावइकुलं पिंडवाय पडियाए अणुप्पविद्ध केइ वत्थेण वा पडिग़ाहेण वा कंबलेण वा पायपुछणेण वा उवनिमंतेज्जा, कप्पड़ से सागारकडं गहाय पवत्तिणि-पायमूले ठवित्ता दोच्चपि उग्गह- मणुएणवित्ता परिहारं परिहरित्तए ॥ ४१ ॥ आचाय वृहत्तरूपमूत्रम् मूल-"निग्गंथिं च णं बहिया विचारभूमि वा विहारभूमि या निस्वात समाणिं केइ वत्थेण वा पडिग्गहेण वा कंवलेण वा पायछणेण वा उप- निमंतेजा, कप्पड़ से सागारकर्ड गहाय पत्तिणि पायमूल ठवेत्ता दोच्चं- पि उग्गहमणुएणवित्ता परिहारं परिहरित्तए ।। ४२ ।। टीका--सूत्र द्वयस्याऽपि व्याख्या प्राग्वत् ।। ४१-४२ ।। मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा रायो वा रियाले वा असणं चा पाणं वा खाइमं वा पडिगाहित्तए । ४३ ।। टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा रात्री वा विकाल वा 'अशनं वा, ओदनादि 'पानं वा, आयामादि, 'खादिमं वा' फलादि 'स्वादिम वा' शुण्ठ्यादि प्रतिग्रहीतुमिति सूत्राक्षरार्थः ॥ ४३ ॥ मूल-नऽन्नथ एगेणं पुवपडिलेहिएणं सेज्जासंथारएणं ।। ४४ ॥ टीका-योऽयमुपयुक्तः प्रतिषेधः स एकस्मात् पूर्व प्रत्युपेक्षितात-शय्या संस्तारका- दन्यत्र । इहाऽन्यत्र शन्दः परिवर्जनार्थः। यथा-अन्यत्र द्रोणभीष्माभ्यां सयोधाः पराङ्मुखाः । द्रोण भीष्मौवर्जयित्वा, इत्यर्थः । ततश्चैकं शय्यासंस्तारकं ( पूर्व प्रति लेखितं-दिवा दृष्ट) विहायाऽपरं किमपि रात्रौ ग्रहीतुं न कल्पते । इति सूत्र संक्षे. पार्थः ॥ ४॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण का निग्गंथीण वा रात्री वा बियाले वा वत्यं वा पडिग्गहं वा कंबलं वा पायपुछणं वा पडिगाहित्तए ॥ ४५ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा रात्री वा विकाले वा वस्त्र प्रतिग्रहं वा कम्बलं वा पादप्रोञ्छनं वा प्रतिग्रहीतुमिति सूत्राक्षर गमनिका ।। ४२ ॥ मूस-नऽन्नत्थ एगाए हरियाहडियाए । साविय परिभुत्ता वा धोया वा रत्ता वा घट्टा वा मट्ठा वा संपधूमिया वा ॥ ४६॥ टीका--न कल्पते रात्रौ वनादिकं ग्रहीतुं इत्युक्तम ! अन्यत्रैकस्या हताहतिकाया हरिताऽऽहतिकाया वा। तत्र पूर्वहृतं पश्चादाहृतम्-शानीतं वस्त्रं हृताहतम् , तदेव हृताहृतिका स्वार्थे क प्रत्ययः। अतिवर्तन्ते स्वार्थिक प्रत्ययाः प्रकृत -लिङ्ग वचनानि, इति १४ प्रथमोद्देशकः वचनात् अत्र रूदितः स्त्रीलिङ्ग निर्देशः । एवं हरितेषु-वनस्पतिम्बाहृतं हरिताहृतं वस्नम्, तदेव हरिताहतिका । सापिच हताहतिका 'परिभुक्ता' परिधानादौ व्यापा- रिता 'धौता' अप्कायेन प्रक्षालिता 'रक्ता' विचित्रवर्णकैरुपरञ्जिता घृष्टा घटकादिना घट्टिता, 'मृष्टा' सुकुमारीकृता 'सम्प्रधूमिता' धूपद्रव्येण समन्तत: प्रकर्षेण धूपिता। घा शब्दाः सर्वेऽपि विकल्यार्थाः । एवं विधापि सा स्वीकर्तव्या, न पुनरसाधु प्रायोग्या कृति कृत्वा परिहर्तव्येति सूत्रार्थः ॥ ४६॥ मूल-जो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंधीण या रात्री वा वियाले वा अद्धाण गमणं एत्तए ॥४७॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानांचा निर्ग्रन्थीनां वा रात्री वा विकाले वा अध्य- गमनम् एतु-गन्तुमितिसूत्रार्थः ॥ ४७ ॥ मूल-( नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं वा ) संखडि वा संखडि पडियाए एत्तए ॥४८॥ टीका--संखडिं वा, इति वा शब्दात् "न कल्पते" इत्यादि पदान्यनुवर्तनी- यानि । तद्यथा--न केवलमध्वानं रात्रौ वा विक्राले बा गन्तुं न कल्पते किन्तु संखडिमपि रात्रौ वा विकाले वा सङ्घडिप्रतिज्ञया 'एतु गन्तुन कल्पते । एप सा- संक्षेपार्थः । ( समू-इति सामरत्येन खण्ड्यन्ते-तोट्यन्ते जीवानां-वनस्पतिप्रभृतीना- मायूपि प्राचुर्येण यत्र प्रकरणविशेपे सा खलु सङ्घडिरित्युच्यते, तां सङ्खई 'तत्प्रतिज्ञया' सजडिमपि गन्तुन कल्पते ) ॥ ४८ ॥ मूल-नो करइ निग्गंथस्स एगाणियस रायो बा विधाले वा बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निक्खमित्तए चा पविसित्तए वा । कप्पड़ से अप्पविड्यस्स वा अप्पतझ्यस्स वा रायो वा त्रियाले वा बहिया वियार भूमि वा बिहार भूमि वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा ॥४६ ।। टीका-तो कल्पते निर्ग्रन्थस्य साधोरेकाकिनो रात्रौ वा विकाले वा बहिर्विचार- भूमि वा विहारभूमिं या उद्दिश्य प्रतिश्याद् निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुवा। कल्पते से- वृहत्कल्पसूत्रम तस्य निम्रन्यस्वात्मद्वितीयस्य वा धात्मतृतीयम्य वा रात्री वा विकाले वा बहिर्विचार भूमि वा विहार भूमि वा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टु वेत्ति सूत्र समासार्थः ॥ ४ ॥ मूल-नो कप्पड़ निग्गंथीर एगाणियाए राम्रो वा वियाले वा बहिया वियारभूमि वा बिहारभूमि वा निक्लमित्तर वा परिसित्तए वा । कप्पड़ से अप्प विड्याए वा अप्पतइवाए वा अप्प चउत्थीए वा राम्रो वा वियाले वा बहिया वियार भूमि वा विहार भूमि वा निस्खभित्तए वा पविसि- त्तए वा ॥ ५० ॥ टीका-अस्य सूत्रस्य व्याख्या प्रागवत , नवरं केवलं प्रमाणे निर्ग्रन्थेभ्यो निम्रन्थीनां नानात्वम् । निर्ग्रन्थानां द्वयोत्रयाणां वा निर्गन्तु कल्पते । निग्रन्थीनान्तु द्वयोस्ति- सूणां चतसृणां चा इत्ययं संख्याकृतो विशेषः । ये च स्तेनाऽऽरक्षिकाद्यो दोपाः पूर्व सूत्रे यतीनामेकाकिनिर्गमने प्रोक्ताः। त एवार्याणामपि सविशेपतरास्तगणा- धुपद्रवसहिता मन्तव्याः ॥ ५० ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पुरथिमेणं जाब अंग- मगहाप्रो एत्तए, दक्षिणेणं जाव कोसंबीओ एत्तए, पञ्चस्थिमेणं जाव थूणा विश्याओ एतए, उत्तरेणं जाव कुणाला विसयात्री एत्तर, एताव ताव कप्पइ । एताव ताव मारिए खेत्ते । णो से कप्पड़ एत्तोचाहिं । तेण परं जत्थ नाण दसण चरित्ताई उस्सप्पंतित्तिमि ।। ५१ ॥ कप्पे पढ़मो उद्देसो । टीका-कल्पते निम्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा पूर्वस्यां दिशि यावदङ्गमगधान् एतुं- विहर्तुम् । अङ्गो नाम चम्पा प्रतिबद्धो जनपदः । मगधो राजगृह प्रतिबद्धोजनपदः । दक्षिणस्यां दिशि यावत् कौशाम्बीमेतुम् । प्रतीच्या विशि स्थूणाविपश्यावदेतुम् । उत्तरम्यां दिशि कुणाला विषयं यावदेतुम् । { सूत्रे पूर्व दक्षिणादिपदेभ्यस्तृतीया निर्देशो लिङ्गव्यत्ययश्च प्राकृतत्वात् ] एतावत् तावत् क्षेत्रमवधीकृत्य विहर्तुं कल्पते । कुतः ? इत्याह-एतावत् तावत् यस्मादाय क्षेत्रम् । नो 'से, तस्य निर्ग्रन्थस्य निन्थ्या वा कल्पते 'अतः, एवंविधादार्यक्षेत्राद्वहिविहर्तुम् । ततः परं वहिर्देशेषु "अपि प्रथमोद्देशकः वचनात् अत्र रूदितः स्त्रीलिङ्ग निर्देशः । एवं हरितेषु-वनस्पतिध्वाहृतं हरिताहृतं चन्नम्, तदेव हरिताहतिका । सापिच हताहतिका 'परिभुक्ता' परिधानादौ व्यापा. रिता 'धौता' अप्कायेन प्रतालिता 'रक्ता' विचित्रवर्णकैरुपरञ्जिता घृष्टा घट्टकादिना घट्टिता, 'मृष्टा' सुकुमारीकृता 'सम्प्रधूमिता' धूपद्रव्येण समन्ततः प्रकर्षेण धूपिता । या शब्दाः सर्वेऽपि विकल्यार्थाः । एवं विधापि सा स्वीकर्तव्या, न पुनरसाधु प्रायोग्या कृति कृत्वा परिहर्तव्येति सूत्रार्थः ॥ ४६ ।। सूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा रात्री वा वियाले वा अद्धाण गमणं एत्तए ॥४७॥ टीका--नो कल्पते निग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा रात्रौ वा विकाले वा अध्य- गमनम् एतु-गन्तुमितिसूत्रार्थः ॥ ४७ ॥ मूल-( नो कप्पइ निग्गंथाणं वा निग्गंथीणं चा ) संखडि वा संखडि पडियाए एत्तए ॥ ४८ ॥ टीका--संखडिं वा, इति वा शब्दात् "न कल्पते" इत्यादि पदान्यनुवर्तनी- यानि । तद्यथा--न केवलमध्वानं रात्रौ वा विकाले वा गन्तु न कल्पते किन्तु संखडिमपि रात्रौ वा विकाले वा सङ्घडिप्रतिज्ञया 'एतु' गन्तुन कल्पते। एष सूत्र- संक्षेपार्थः । ( सन-इति सामरत्येन खण्ड्यन्ते-नोट्यन्ते जीवानां - वनस्पतिप्रवृत्तीना- मायूपि प्राचुर्येण यत्र प्रकरणविशेपे सा खलु सङ्घडिरित्युच्यते, तां सस 'तत्प्रतिज्ञया' सबडिमपि गन्तुन कल्पते) ॥ ४ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथम्स एगाणियस्स राम्रो बा त्रियाले वा बहिया वियारभूमि वा विहारभूमि वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा । कप्पड़ से अप्पविइयस्स या अप्पतइयस्स वा राम्रो वा वियाले वा बहिया वियार भूमि वा विहार भूमि वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा ॥४६॥ टीका-तो कल्पते निर्ग्रन्थस्य साधोरेकाकिनो रात्रौ वा विकाले वा बहिर्विचार- भूमि वा विहारभूमि वा उद्दिश्य प्रतिश्रयाद् निष्क्रमितु वा प्रवेष्टुवा। कल्पते से-

अथ द्वितीय उद्देशः प्रारभ्यते-
मूल-
-
"उबस्सयस्स अंतोषगडाए सालीणि वा वीहीणि वा मुग्गाणि
चा मासाणि वा तिलाणि वा कुलत्थाणि वा गोधूमाणि वा जबाणि वा
जवजवाणि वा उक्खित्ताणि वा विक्खित्ताणि वा विकिनाणि या विप्प-
किन्नाणि वा, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए॥१॥
टीका-उपाश्रयस्य या 'अन्तर्चगडा, चगडाया-अभ्यन्तरम्' तञ्च प्रतिश्रयमध्यं
वा स्यात् प्राङ्गणं वा । तत्र 'सालीणि वत्ति शालिवीजानि चा, 'वीहीणिव' त्ति
प्रीहिबीजानि वा, एवं मुद्ग-माष-तिल-कुलत्थ-गोधूम-[ यव ] यवयवैरपि तत्त-
दीजान्युच्यन्ते, यवयवाः-यव विशेपास्तबीजानि वा । एतानि वीजानि यत्रोपाश्रये
उरिक्षतानि वा विक्षिप्तानि वा, व्यतिकीर्णानि वा, विप्रकीर्णानि वा, तत्रं नो कल्पते
निर्ग्रन्थानां चा तिम्रन्थीनां वा यथालन्दमपि वस्तुम् । इह यथालन्दं त्रिधा जघन्यं
मध्यममुत्कृष्टं च । यावता कालेन उद्काोहस्तः शुष्यति तज्जघन्यम् । पञ्चरात्रिन्दि-
चान्युत्कृष्टम् । तयोरपान्तराले सर्वमपि मध्यमम् । अत्र जघन्य मध्यमयोः सूत्रा-
चतारः । अपि शब्दः सम्भावनायाम् । जघन्यमपि मध्यममपि वा थथालन्दं नो
कल्पते वस्तुम् , किम्पुनरुत्कृष्टम् ? इति भावः । अत्र चोरिक्षप्तादीनि पदानि भाष्य-
गाथयैव व्याख्यास्यन्त इति नात्र व्याख्यातानीति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १ ॥
मूल-अहपुण एवं जाणिज्जा-नो उक्खित्ताईनो विविखत्ताई नो
विइकिएणाई नो विप्पकिरणाई रासिकडाणि वा पुंजकडाणि वा भित्तिक-
डाणि वा कुलियाकडाणि वा लंछियाणि वा मुहियाणि वा पिहिताणि वा,
कप्पड निग्गंथाण चा निग्गंधीण वा हेमंत गिम्हासु वत्थए ॥ २ ॥

द्वितीयोद्देशकः " टीका-अथ पुनरेवं जानीयात्-'तानिशाल्यादीनिबीजानि तत्रोपाश्रये नो उत्क्षिप्तानि, नो विक्षिप्तानि, नो विकीर्णानि, नो विप्रकीर्णानि, किन्तु राशीकृतादि चा, पुञ्जरेकृतानि वा, भितिकृतानि वा, कुलिकाकृतानि वा, लाञ्छितानि वा, मुद्रितानि वा पिहितानि वा, तत एवं कल्पते निग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा, हेमन्त- ग्रीष्मेषु वस्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ २॥ मूल-अहपुण एवं जाणिज्जा-नो रासिकडाई नो पुजकडाई नो भित्तिकडाइनो कुलियकडाई कोहाउत्ताणि वा पल्लाउत्ताणि वा मंचा उ- ताणि वा माला उत्ताणि वा ओलित्ताणि वा लित्ताणि वा पिहियाणि बा लंछियाणि वा मुद्दियाणि वा कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा चासावासं वत्थए ॥३॥ टीका-अथ पुनरेवं जानीयात्-नो राशीकृतानि नो पुजीकृतानि नो भित्तिकृतानि नो कुलिकाकृतानि, कोष्ठागुप्तानि वा पल्यागुप्तानि वा, मञ्चा गुप्तानि वा, माला- गुप्तानि वा अवलिप्तानि वा लिप्तानि वा पिहितानि वा लाञ्छितानि वा मुद्रितानि धा। तत्र कोष्ठे-कुशूले आगुप्तानि-प्रक्षिप्यरक्षितानि कोष्ठाऽऽगुप्तानि । एवमुत्तर- त्रापि भावनीयम् । नवरं-'पल्यं -बंशकटकादिकृतो धान्याऽऽधारविशेषः, मञ्चः- स्थूणानामुपरिस्थापित वंशकादिमयो लोकप्रसिद्धः, मालकः-गृहस्योपरितनोभागः, 'अव लिप्तानि, नाम द्वारदेशे पिधानेन सह गोमयादिना कृतोपलेपानि, लिप्तानि- मृत्तिकया सर्वत: खरण्टितानि, पिहितानि स्थगितानि 'लाञ्छितानि-रेखाऽक्षरा- दिभिः कृतलाञ्छनानिमुद्रितानि, मृत्तिकादिमुद्रायुक्तानि । एवं विधेपु धान्येषु कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा वर्षावासं वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ३ ॥ मूल-"उबस्सयस्स अंतोवगडाए सुरावियडकुमे वा सोचीरय वियड- कुभे वा उपनिक्खित्ते सिया, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उवस्सयं पडिलेहमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पइ एगरायं वा. दुरायं वा वत्थए । जे तत्थ एगरायाओ वा दुरायाओ वा परंवसइ से संतरा छेए वा परिहारे वा ॥४॥ टीका-सुराविकटं-पिष्टनिष्पन्नम्, सौवीरक विकटतु-पिष्टवज्जैर्गुडादिद्रव्यनिष्पन्नम्। ततः सुरा विकटकुम्भो वा सौवीरक विकटकुम्भो वा यत्रोपाश्रयस्याऽन्तर्घगडायामु- बृहत्कल्पसूत्रम् १६ पनिक्षिप्तः स्यात्-तत्र नोकल्लते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथालन्दमपिकालं. वस्तुम् ‘हुरत्या य, त्ति देशीपदं बहिराभिधायकम् । च शब्दो वाक्यभेदद्योतकः,, ततोऽयमर्थः-अथ बहिरन्योपाश्रयं प्रत्युपेक्षमाणोऽपि नो. लभेत, ततएवं "से" तस्य साधोः कल्पते एकरात्रं घा द्विरानं वा तत्र वस्तुम् । यस्तत्रैकरात्राद्वा द्विराबाहा 'परम, अर्ध व वसति 'से' तस्य संयतस्य, स्वान्तरात ,, स्वकृतं यदन्तरं-त्रिरात्र- चतूगनादिकालावस्थानरूपं तस्मात् 'छेहो' चा पञ्चरात्रिन्दिवादिः, 'परिहारो, वा म.सलघुकादिस्तपोविशेषो भवतीति सूत्रार्थः ॥ ४ ॥ मूल---उवस्सयस्स अंतोवगडाए सीपोदग वियडभे वा उसिणो- दग वियडकुमे वा उवनिक्खित्ते सिया, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण, वा अहालंदमविवत्थए । हुरत्या य उवस्सयं पडिलेहमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पड् एगरायं वा दुरायं वा वत्थए । जे तत्थ एगरायाओ वा दुरायाो चा परं वसइ से संतरा छेए वा परिहारे वा ॥ ५ ॥ टोका-अस्य व्याख्या पूर्ववत्, नवरं-विकृतं-शीतोष्णादि शस्त्रेण विकार प्रापितं, प्राशुकीकृतमित्यर्थः । शीतोदकं च तद् विकृतं च शीतोदक विकृतं तस्य कुम्भः-घटः । एवमुष्णोदक विकृतकुम्भोऽपि ।। ५ ।। मूल-- उबस्सयस्स अंतोवगडाए सबराइए जोई झियाएजा, नो. कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गीण वा अहालंदमवि वत्थए । हुरत्था य उव- स्सयं पडिलेहमाणे नो लभेजा, एवं से कप्पड़ एगरायं वा दुरायं वा. वत्थए । जे तत्थ एगरायाओ वा दुरायाओ वा परं. वसइ से संतरा छेए वा. परिहारे वा ॥ ६॥ टीका-व्याख्या प्रागवत्, नवरं सार्वत्रिक 'ज्योतिः, अग्निर्यत्रोपाश्रये 'ध्यायेत्', धातूनामनेकार्थत्वात् प्रज्वलन् तत्र साधु साध्वीनां वस्तुं न कल्पतेः ॥ ६ ॥ मूल-~-उबस्सयस्स अंतोवगडाए सब्बराइए पईवे दिप्पेज्जा, नो. कप्पइ निग्गंथाण चा निग्गंधीण वा अहालंदमवि पत्थए । हुरत्था य. उबस्सयं पडिलेहमाणे नो लभेज्जा, एवं से कप्पइ एगरायं वा दुरायं वा पत्थए । जे तत्थ परं एगरायाश्रो वा दुरायाभो वा वसइ से. संतरा छेए वा परिहारे वां ॥७॥ ।

२० द्वितीयोद्देशकः टीका-व्याख्यानं ज्योति: सूत्रवत् ॥७॥ मूल-उवस्सयस्स अंतोषगडाए पिंपए वा लोयए वा खीरे वा दहि वा नवणीए वा सप्पि वा तेल्ले वा फाणियं वा पूर्व वा सक्कुली वा सिहरिणी वा उक्खित्ताणि वा विक्खित्ताणि वा विइकिन्नाणि वा विप्प- इन्नाणि वा, नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहालंदमवि वत्थए।।८|| टीका-उपाश्रयस्यान्तर्वगडायां पिण्डको वा, लोचकं वा, क्षीरं घा, दधि वा, नवनीतं या, सर्पि, तैलं वा, फाणितं वा, पूपं वा, शकुलिका वा, शिखरिणी वा, एतान्युत्क्षिप्तानि वा, विक्षिप्तानि वा, व्यतिकीर्णानि वा, विप्रकीर्णानि वा भवेयुः, नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा यथालन्दमपि वस्तुमिति सूत्रार्थः ॥ ८ ॥ मूल-अह पुण एवं जाणेज्जा-'नो उक्खित्ता नो विक्खित्ताईनो विकिरणाई नो विपकिराणाई रासिकडाणि वा पुजकडाणि वा भित्ति- कडाणि वा कुलिया कडाणि वा लंछियाणि वा मुहियाणि वा पिहियाणि वा कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा हेमंत गिम्हासु यथए ।।४।। टोका-अस्य व्याख्या प्रागवत्, नवरं यत्र पिण्डादीनि राशीकृतादिरूपाणि तत्र गीतार्थानां कल्पते ऋतुबद्धे वस्तुमिति सूत्रहृदयम् ॥ ६ ।। मूल-अह पुण एवं जाणिज्जा-'नो रासिकडाईजाव नो भित्तिकडाई कोहाउत्ताणि वा पल्लाउत्ताणि वा मंचाउत्ताणि वा मालाउत्ताणि वा ओलित्ताणि चा विलित्ताणि वा कुभिउत्ताणि वा करभिउत्ताणि वा लंछियाणि वा मुदियाणि वा पिहियाणि वा कप्पइ निम्गंथाण वा निग्गयींण चा वासावासं वत्थए ॥ १० ॥ टीका- अस्य व्याख्या प्रागवत् , नबरं-कुम्भी-मुखाऽऽकारा कोष्ठिका, करभी- घट संस्थान संस्थिता, तयोरागुप्तानि-प्रक्षिप्य रक्षितानि कुम्भ्या गुप्तानि, करस्या गुप्तानि वा ।। १०॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं अहे आगमणगिहसि वा वियडगिर्हसि वा सीमूलंसि वा रुक्खमूलसिवा अव्भावगासियंसि वा वत्थए ॥ ११ ॥ टीका-इह निर्ग्रन्थ निन्थीनां सामान्यत: सदोपा उपाश्रया उक्ताः । अथ केव- लानामेव निम्रन्थीनामभिधीयन्ते, इत्यनेन सम्बन्धेनायातस्यास्य व्याख्या-अध:

वृहत्कल्पसूत्रम् । शब्द इह अवशब्दार्थे। पथिकादीनामागमनेनोपेतं तदर्थ वा गृहमागमनगृहन् । विवृतम्- अनावृतं गृहं विवृतगृहम । वंसीमूलं नाम-गृहाद् बहिः स्थितमलन्दकादिकम् । वृक्ष- मूलं तु वृक्षस्य-सहकारादेमू लम्-अधोभागः । अभ्राकाशमाकाशमुच्यते । एतेपु प्रतिश्रयेषु-निम्रन्थीनां वस्तु न कल्पते, इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। ११ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाणं अहे आगमणगिहंसि वा वियडगिहंसि वा वंसीमूलंसि वा रुक्खमूलंसि वा अन्माषगासियंसि वा वत्थए । १२ ।। टीका-अस्य प्राग्वद् व्याख्या ॥ १२ ॥ मूल-एगे सागारिए पारिहारिए-दो तिनि चत्तारि पंच सागारिया पारिहारिया, एगं तत्थ कप्पागं ठवयित्ता अवसेसे निविसेज्जा ।। १३ ।। टीका-एकः सागारिकः-वसतिस्वामी परिहारं-परित्यागमहतीति व्युत्पत्त्या पारिहारिकः, भिक्षाग्रहणे परिहर्तव्य इत्यर्थः । यथा चैकः सागारिकः पारिहारिक: तथा द्वौ त्रयश्चत्वारः पञ्चसागारिकाः पारिहारिकाः, न तेपांबहूनामपि गृहेषु प्रवेष्टव्य- मितिभावः । अथ सूत्रेणैव सूत्रमपवदति-एगं तत्थ कप्पागं, इत्यादि । बहुजनसाधा. रणे देवकुलादौ स्थिताः 'तत्र, तेषु बहुषु सागारिकेषु मध्ये येन सागारिकतया स्थापि- तेन शेषगृहेषु प्रवेष्टु कल्पते, तमेकं कल्पकं स्थापयित्वा शेपेषु सागारिककुलेषु निर्वि. शेयुः-प्रविशेयुरिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १३ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंयाण वा निग्गंथीण वा सागारियपिंडं वहिया अनीहडं असंसद्ध वा संसह वा पडिग्गाहित्तर ।। १४ ।। टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा सागारिक पिण्डं बहिर्वाटकात् अनिह तम् , अनिष्क्रामितम् 'असंसृष्ट' वा अन्यदीय पिण्डैः सहाऽऽमीलितं, संसृष्ट वा अन्यदीयपिण्डैः समं मीलितं प्रतिग्रहीतुमिति सूत्राथः ॥ १४ ॥ मूल---"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सागरियपिंडं बहिया नीहडं असंसह पडिग्गाहित्तए । कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सागारियपिंडं बहिया नीहडं संसट्ठ पडिग्गाहित्तए ॥ १५ ॥ टीका-अस्य व्याख्या प्राग्वत् । नवरं सागारिक पिण्डो वाटकाद् बहिनिष्का- मितोऽपि 'असंसृष्टः' अन्यपिण्डैः समममीलितो न कल्पते संमृष्टस्तु कल्पते इति । मूल-"जो खलु निग्गंथो वा निग्गंथी वा सागारियपिंडं पहिया २२ द्वितीयोद्देशकः नीहडं असंसट्ट संसट्ट करेइ, करेंतं वा साइज्जइ, से दुहयो वीइक्कममाणे आवज्जइ चाउम्मासि परिहारहाणं अणुग्वाइयं ॥ १६ ॥ टीका-यः खलु निर्ग्रन्थो निर्ग्रन्थी चा सागारिक पिण्डं वहिनिर्गतमसंसृष्ट संसृष्ट करोति कुर्वन्तं वा स्वादयति-कारयति कुर्वन्तमनुमन्यते वेत्यर्थः, स 'द्विधा, लौकिक लोकोत्तरिकभेदाद् द्विप्रकारां मर्यादा व्यतिक्रामन् अापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्था- नमनुद्घातिकम्, चतुरो गुरुमासानित्यर्थः । एप सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १६ ॥ मूल-'सागारियस आइडिया सागारिएण पडिग्गहिया, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए । सागारियस्स आहडिया सागारिएण अप्पडिग्गहिया, तम्हा दावए एवं से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥१७॥ टीका-'आहृतिका, प्रहेणक सा सागारिकस्य गृहे कुतोऽपि गृहान्तरादागता, सा च सागारिकेण 'प्रतिगृहीता, स्वीकृता 'ततः तस्या मध्यात् दद्यात्, नो 'से, तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुम् । सागारिकस्याहृतिका सागारिकेण 'अप्रतिगृहीता, न स्वीकृता तस्या मध्यात् दद्यादेवं 'से, तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १७॥ मूल--"सागारियस्स नीहडिया परेण अपडिग्गहिता, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए । सागारियस्स नीहडिया परेण पडिग्गहिया, तम्हा दावए एवं से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥ १८ ॥ टीका-'व्याख्या प्राग्वत्, नवरं सागारिक द्रव्यं यदन्यत्रनीयते सा निहति- केत्युच्यते । सा यस्य समीपे प्रेषिता तेनाऽप्रतिगृहीता न कल्पते प्रतिगृहीता तु कल्पते ॥ १८ ॥ मूल-''सागारियस्स अंसियाओ अविभत्तायो अयोच्छिन्नाओ अव्योगडायो अनिज्मूढाओ, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए । सागारियस्स अंसियाओ विभत्ताओ वोछिन्नाओ वोगडाओ निजबूढाओ, तम्हा दावए एवं से कपइ पडिगाहितए ॥ १६ ॥ टीका-सागारिकस्य या अंशिका तस्या अन्येपामंशिकाभ्योऽविभक्ताया अव्य- वच्छिन्नाया अव्याकृताया अनिगूढाया मध्यात् कश्चिद्भक्तपानं यात्, नो से-तस्य साधोः कल्पते प्रतिग्रहीतुम् । सागारिकस्यांशिका विभक्ता व्यवच्छिन्ना व्याकृता .

बृहत्कल्पसूत्रम् ૨૨ निर्गुढा च यस्माद् राशेर्भवति तस्माद् दद्याद्, एवं 'से, तस्य कल्पते प्रतिग्रहीतु- मिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १६ ॥ मूल-"सागारियम्स पूयाभत्ते उद्देसिए चेइए पाहुडियाए, सागारि- यस्स उबगरणजाए निहिए निसडे पाडिहारिए, तं सागारियो देज्जा सागारियस्स परिजणो देज्जा, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए।॥२०॥ व्याख्या-सागारिकस्य ये पूज्याः-स्वामिकलाचार्यादयः, तदर्थ भक्तम्-अश- नादि पूज्यभक्तम्, तच्चोद्देशः-सङ्कल्पः तेन निवृत्तमौदेशिकम्, तानेव पूज्यानुद्दिश्य कृतमित्यर्थः । ततस्तेषामेव प्राभृतिकायां चेतितं ढौकनीकृतम् उपनीतमितिभावः । तथा सागारिकस्य उपकरणजातं वन कम्बलादिकं पूज्यानामर्थाय 'निष्ठितम्, निष्पादितम् । ततः 'निसृष्ट', पूज्येभ्यः प्रदत्तम् । 'तच्च, भक्तमुपकरणं वा तेभ्यः प्राति- हारिक दत्तम् , भुक्तावशेष सदिदं भूयोऽप्यस्माकं प्रत्यर्पणीयमिति भावः । तद् एवं प्रकारं संयतानां सागारिको वा दद्यात्, सागारिकस्य परिजनो वा दद्यात् किंकल्पते ? नवा ? इत्याह-'तस्मात् पूज्यभक्तात् पूज्योपकरणाद्वा प्रातिहारिकाद् दद्यात्, परं न कल्पते प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ।। २० ।। मूल-'सागारियस्स पूयाभत्ते उद्देसिए चेइए जाव पाडि हारिए, तं नो सागारियो देज्जा नो सागारियस्स परिजणो देजा, सागारियस्स पूया देज्जा, तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥ २१ ॥ व्याख्या-प्राग्वत् नवरम्-अत्र न सागारिको न वा सागारिकभ्य परिजनोद्यात् किन्तु सागारिकस्य 'पूज्यः, सम्बन्धि स्वाम्यादिद्यात्, तथापि न कल्पते, प्रातिहारिक- तया दत्तमिति कृत्वा सागारिक पिण्डत्वात् ।। २१ ॥ मूल---"सागारियस्स पूयाभचे उद्देसिए चेइए पाहुडियाए सागारि- यस्स उवगरणजाए निहिए निसट्टे अपाडिहारिए तं सागारिओ देइ सागारियस्स परिजणोदेइ तम्हा दावए नो से कप्पइ पडिग्गाहित्तए ॥२२॥ टीका-अयमप्रातिहारिकतया सागारिक पिण्डो न भवति, परं सागारिकस्तत्प- रिजनो वा दातीति कृत्वा प्रक्षेपकादि दोप सद्भावान्न कल्पते ॥ २२ ॥ मूल-"सागारियस्स पूयाभत्ते जाव अपाहिहारिए, तं नो सागारि- २४ द्वितीयोद्देशकः , श्रोदेइ, नो सागारियस्स परिजणो देइ सागारियस्स पूयादेइ, तम्हा दावए एवं से कप्पइ पडिगाहित्तए ।। २३ ॥ टीका-अत्र सागारिकेणादृष्टं तत्पूज्योऽप्रातिहारिकंदातीति कल्पते, परं द्वितीय- पदे, नोत्सर्गतः ।। २३ ॥ मूल-"कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाई पंच वत्थाई धारित्तए वा परिहरित्तए वा, तं जहा जंगिए भंगिए साणए पोत्तए तिरी- डपट्ट नामं पंचमे ॥ २४ ॥ टीका-कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा इमानि पञ्चवस्त्राणि धारयितुवा परिग्रहे धर्तुं परिहतुं वा परिभोक्तुम् । तद्यथा जगमाः-बसाः, तदवयव निष्पन्न जाङ्गमिकम्, सूत्रे प्राकृतत्वाद्-मकारलोपः, भङ्गा-अतसीतन्मय भाङ्गिकम्, सन- सूत्रमयं सानकम्, पोतकं, कासिकम्-तिरीट:-वृक्षविशेषस्तस्य यः पट्टो वल्क- लक्षणस्तन्निष्पन्नं तिरीट पट्टकं नाम पञ्चमम् । एप सूत्र संक्षेपार्थः ।। २४ ॥ मूल-"कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाई पंच रयहरणाई धारित्तए वा परिहरित्तए वा, तं जहा-उरिणए उट्टिए साणए वच्चा- चिप्पए मुंजचिप्पए नाम पंचमे ।। २५ ॥ त्तिवेमि विइनो उद्देसओ । टीका-कल्पते निम्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा इमानि पञ्चरजोहरणानि धारयितु वा परिहतुं वा । 'तद्यथा, इति उपप्रदर्शनार्थः । औणिकम् ऊरणिकानामूर्णाभिनि- वृत्तम् , 'औष्ट्रिकं, उष्ट्ररोमभिनिवृत्तम् , 'सानकं, सनवृक्ष वल्काद् ज्ञातम, वच्चक:- तृणविशेपस्तस्य चिप्पका-कुट्टितः-त्वग्रूपः तेन निष्पन्नं वच्चक चिप्पकम्, मुञ्जः- शरस्तम्बस्तस्य चिप्पकाद् जातं मुञ्जचिप्पकं नाम पश्चममिति सूत्रार्थः ।। २५ ॥

अथ तृतीय उद्देशः मूल---"नो कप्पइ निग्गंथाणं निम्गंथीणं उवस्सयंसि चिद्वित्तए वा निसीइत्तए चा तुयट्टित्तर वा निदाइत्तए वा पयलाइनए वा असणं वा ४ आहारं आहारित्तए, उच्चारं वा पासवणं वा खेलं वा सिंघाणं वा परिढवित्तए, सज्झायं वा करित्तए, झाणं वा झाइए, काउस्सग्गं वा ठाणं चा ठाइतए ।॥ १ ॥ टीका--"नो कल्पते निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थीनामुपानये स्थातु वा निपत्तुं वा त्वग्. घर्तयितुवा निद्रायितुवा प्रचलायितु वा अशनं वा पानं वा खादिमं वा स्वादिम वा चतुर्विधमप्याहारमाहर्तुम् , उच्चारं वा प्रस्रवणं वा खेलं वा सिंघाणं वा पंरिष्ठापयितुम् , स्वाध्यायं वा कर्तुम, ध्यानं वा ध्यातुम, कायोत्सर्ग वा स्थानं स्थातु- मिति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥ १॥ मूल-नो कप्पड़ निग्गंथीणं निग्गंथउबस्सयंसि चिद्वित्तए वा जाव काउस्सग्गं वा ठाणं ठाइत्तए ॥ २॥ टीका-~~यथा निर्ग्रन्थानां निर्ग्रन्थ्युपाश्रये गमनादिकं कर्तुं न कल्पते तथा तासा- मपि निन्थीनां यति निलये निम्रन्थोपाश्रये निष्कारणे गमनादिकं कर्तुं न कल्पते । [एतदर्थप्रतिपादनार्थमिदंसूत्रमारभ्यते ।। अत्र च यत् प्रायश्चित दोपजालादि- पूर्व सूत्रोक्तं 'यत्र' निष्कारणगमनादौ युज्यते तत्र तद् 'ज्ञ यं' स्वबुध्याऽभ्यूह्य ज्ञातव्यम् ॥२॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं सलोमाई चम्माई अहिद्वितए ॥ ३ ॥ 4 -

तृतीयोद्देशकः
टीका--नो कल्पते निम्रन्थीनां सलोमानि चर्माणि 'अधिष्ठातुं' निषनादिना
परिभोक्तुमिति सूत्रार्थः ।। ३ ॥
मूल-कप्पइ निग्गंथाणं सलोमाई चम्माई अहिद्वित्तए सेविय परिभुत्ते
नो चेव णं अपरिभुते, से विय पाडिहारिए नो चेव णं अप्पडिहारिए, से वि य
एगराइए नो चेव णं अणेगराइए ॥४॥
टीका- कल्पते निर्ग्रन्थानां सलोमानि चर्माणि 'अधिष्ठातुं' परिभोक्तुम् । तत्रापि
यचर्म परिभुक्त तदेव ग्राह्य नापरिभुक्तम् । तदपि च प्रातिहारिक नाप्रातिहारिकम्
तदपि चैकरात्रिकं नैवानेकरात्रिकमिति सूत्रार्थः ॥ ४ ॥
मूल-नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा कसिणाई चम्माई
धारित्तए वा परिहरिचए वा ॥ ५ ।।
टीका--नो कल्पते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा कृत्स्नानि वर्णप्रमाणादिभिः
प्रतिपूर्णानि चर्माणि धारयितुं वा परिहतुं वेति सूत्रार्थः ॥ ५॥
मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अकसिणाई चम्माई
धारितए वा परिहरित्तए वा ॥ ६॥
टीका--कल्पते निम्रन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा [अकृत्स्नानि ] चर्माणि धारयितुं
वा परिहर्तुं वा इति सूत्रार्थः ।। ६ ।।
मूल-नो कप्पइ निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा कसिणाई वत्थाई धारि-
त्तए वा परिहरित्तर वा । कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंधीण वा अकसिणाई
वत्थाईधारित्तए वा परिहरित्तए वा ।। ७ ।।.
टीका--"नो कप्पइ' त्ति आर्षत्वादेकवचनम् नो कल्पन्ते निर्ग्रन्थानां या
निर्ग्रन्थीनां वा कृत्स्नानि सकल कृत्स्नादि रूपाणि वस्त्राणि 'धारयितुवा' परिग्रहे
धतु 'परिहतुं वा' परिभोक्तम्, अकृत्नानि तु कल्पन्ते, इति सूत्रसंक्षेपार्थः ॥७॥
मूल-"नोकप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अभिन्नाई वत्थाई
धारिचए वा परिहरिचए वा.॥८॥
टीका--नोकल्पते निर्मन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा' अभिन्नानि, अच्छिम्मानि
घस्राणि धारयितुचा परिहतु वेति ॥८॥

बृहत्कल्पसूत्रम् २७. मूल-कप्पड निरगंथाण वा निग्गीण वा भिन्नाई वत्थाई धारित्तए वा परिहरित्तए वा ॥६॥ टीक--अस्य व्याख्या प्रागवत्. (कल्पते निर्ग्रन्थानांवा निम्रन्योनां वा भिन्नानि- छिन्नानि वस्त्राणि धतुं वा परिभोक्तं वा) ॥ ६ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथाणं उग्गहणंतर्ग वा उग्गहपट्टगं वा धारिचए चा परिहरित्तए वा ।।१०।। टीका-नोकल्यते म्रिन्यानाम् 'अवग्रहाऽनन्तकं. वा गुददेशपिधान-. वस्त्रम् ‘अवग्रहपट्टकं वा' तस्यैवाच्छाकपटुं धारयितु वा परिहतुं वा इति सूत्र- संक्षेपार्थः । १०॥ मूल-कप्रइ निग्गयीणं, उग्गहणंतगं वा उरगहपट्टगं वा धारिताए वा परिहरित्तर वा ॥ ११ ॥ दीका--अस्य ब्याख्या प्रानवत् ॥ ११ ॥ मूल-निरगंथीर अ गाहावकुलं पिंडवाय पडियाए अणुप्पविट्ठाए। चेलटठे समुपज्जेज्जा, नो से कप्पइ अपणो नीसाए चेलं पडिग्गाहित्तए, कम्पई से पात्तिणि नीसाए चेनं पडिग्गाहित्तए । नो य से तत्थ पवत्तिणी. सामाणा सिया जे तत्य सामाणे प्रायरिए वा उबझाए ना पवित्ती वा थेरे वा गणी वा गणहरे वा गणावच्छेइए वा जं चऽनं पुरो कट्ट विहरइ कप्पड़ से तन्नीसाए चेनं पडिग्गाहित्तए ॥ १२ ॥ an टीका--निर्ग्रन्ध्या गृहपतिकुलं पिण्डपात प्रतिज्ञया अनुप्रविष्टायांश्च लेनाऽर्थ:-. प्रयोजनं चेजार्थः स समुत्पद्यत, नो से, तस्याः कल्पते प्रात्मनो निभया चेलं. प्रति- ग्रहीतुम् , किन्तु कल्लते 'से' तस्याः प्रवर्तिनी निश्रया चेंलं प्रतिग्रहीतुम् । अथ तत्र न. प्रवर्तिनो 'सामाणा' सन्निहिता ततो यस्तत्राचार्यो वा उपाध्यायो वा प्रवर्ती वा. स्थविरो वा गणीवा गणधरो वा गणावच्छेदको वा सन्निहितो भवेत् । 'गणी' गणा-. धिपतिराचार्यः, 'गणधरः' संयतीपरिवर्तकः शेषाः सर्वेऽपि प्रतीताः । एतेषां निश्रया यं वा 'अन्य गीतार्थ साधुपुरतः कृत्वा विहरति तन्निश्या कल्पते 'से- तस्याश्चत प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रसंक्षेपार्थः !! १२ ॥

२९ तृतीयोदेशकः मूल-निग्गंथस्स तप्पढमयाए संपव्वयमाणस्स: कप्पइ रयहरण गोच्छग पडिग्गहमायाए तिहिं कसिणेहिं वत्थेहिं आयाए संपव्वइत्तए । से अ पुयोवठ्ठिए सिया एव से नो कप्पइ रयहरण पडिग्गह गोच्छय मायाए तिहिय कसिणेहिं वत्थेहिं आयाए संपव्यइत्तर । कप्पइ से अहा, परिग्गहियाई वत्याई गहाय आयाए संपव्वइत्ता ॥ १३ ॥ टोका--निम्रन्थस्य तत्प्रथमतया सम्-इति सम्यग् , प्रकर्पण पुनरनङ्गीकार लक्षणेन जतो-गृहवासान्निर्गच्छतः संप्रव्रजतः कल्पते रजोहरण गोच्छक-प्रतिग्रह- मादाय त्रिभिः कृत्स्नैर्बस्त्रैरात्मना सम्प्रव्रजितुम् । इह रजोहरण ग्रहणेन मध्यमोपधिः, गोच्छक ग्रहणेन जघन्योपधिः, प्रतिग्रहग्रहणेनोत्कृष्टोपधिः सर्वोगृहीतः, ततोऽयमर्थः- नघन्य मध्यमोत्कृष्टोपधि निष्पन्ना ये त्रयः कृस्ना:-प्रतिपूर्णा वस्त्र पात्र प्रत्यवतारा- स्तरात्मना सहितैः प्रव्रज्या ग्रहीतु कल्लते । 'से य' ति च शब्दोऽथ शब्दार्थः, प्रथाऽसौ प्रयाप्रतिपत्ता पूर्वम् उपस्थितः-दीक्षितः स्यात् ततो नो कल्पते 'से' तस्य पूर्वोपस्थितस्य रजोहरण गोच्छक प्रतिग्रहमादाय त्रिभिः कृत्स्नैर्वस्त्ररात्मना सम्प्रनजितुम् । किन्तु कल्पते 'से' तस्य 'यथापरिगृहीतानि क्रीतकृतादिदोपरहितानि घस्राणि गृहीत्वा अात्मना संप्रत्रजितुभिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १३ ॥ मूल- -निग्गंथीए णं तप्पढमयाए संपव्ययमाणीए कप्पड़ से रयहरण- गोच्छग-पडिग्गहमायाए चउहि कसिणेहिं वत्थेहिं आयाए संपव्वइत्तए । साय पुबोवटिया सिया एवं से नो कप्पड रयहरण गोच्छग पडिग्गह मा- याए चउहिं कसिणेहिं वत्येहि आयाए संपव्व इत्तए कप्पड़ से अहापरिग्गहि- एहिं वत्थेहिं आयाए संपव्वइत्तए ॥ १४ ॥.. टीका-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरं निम्रन्थ्याश्चतुर्भिः प्रत्यवतारैः सहितायाः . प्रनजितु कल्पते इति विशेपः ॥ १४ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा पढमसमोसरणुद्देसपत्ताई घेलाईपडिग्गाहित्तए । कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा दोच्च समो- सरणुद्देसपत्ताई चेलाई पडिग्गाहितए ॥ १५ ॥ टीका-"नो कप्पइत्ति आर्पत्वादेकवचनम्-नो कल्यन्ते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां घा प्रथमसमवसरणे-वर्षाकाजे उद्देश:-क्षेत्रकालविभागस्तं प्राप्तानि प्रथम समवसर- - वृहत्कल्पसूत्रम् २६ . णोद्देश प्राप्तानि 'चेलानि' वखाणि प्रतिग्रहीतुम् । किमुक्त भवति ?--इह साधयो यत्र वर्षावासं चिकीर्पवस्तत् क्षेत्रं यावद् नाद्यापि प्राप्नुवन्ति, प्राप्ता वा' परं नाद्या- प्यापाढ पूर्णिमा लगति, तावत्कल्पन्ते वस्त्राणिप्रतिग्रहीतुम् । अथ वर्पावास प्रायोग्यं क्षेत्रं प्राप्ताः, आषाढ पूर्णिमा च सञ्जाता तत इयन्दं क्षेत्र कालविभागं प्राप्ताणि वस्त्राणि न कल्पन्ते । द्वितीय समवसरणोद्देशप्राप्तानि तु कल्पन्ते । इति सूत्र- संक्षेपार्थः ॥ १५ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहाराइणियाए चेलाई पडिग्गाहित्तए ॥ १६ ॥ टीका--कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां चा यथारानिक यो यो रानिक:- भावरत्नैरधिकस्तदनतिक्रमेण चेलानि प्रतिग्रहीतुमिति सूत्रार्थः ।। १६ ॥ मूल-कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहाराइणियाए सेज्जासंथारए पडिग्गाहित्तए ॥ १७ ॥ टोका--कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथारत्नाधिकं शय्यासंस्तारकान् प्रतिग्रहीतुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ॥ १७ ॥ मूल-कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अहाराइणियाए किइकम्म करितए ॥ १८ ॥ टीका- कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा यथारानिक, यो यो रत्नाधिकस्त- दतिक्रमेण कृति कर्म कर्तुमिति सूत्र संक्षेपार्थः ।। १८ ।। : मूल-नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अंतरगिहंसि चिट्ठि- त्तए वा निसीइत्तए वा जाव काउस्सग्गं वा ठाणं ठाइत्तए । अह पुण एवं जाणिजा-वाहिए, जराजुएणे तवस्सी दुबले किलं ते मुच्छिज्ज वा पवडिज एवं से कप्पड़ अंतरगिहंसि चिट्टित्तए वा जाव ठाणं ठाइत्तए।॥ १६ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा 'अन्तरगृहे' गृहस्य गृहयो.. अन्तराले [ राजदन्तादित्वाद् आपत्वाद्वा अन्तर शब्दस्य पूर्वनिपातः ] स्थातु वा निषत्तुं बा यावत्करणात् त्वग्वर्तयितुवा, निद्राथितुवा, प्रचलायितु धा, अशन वा, पानं वा, खादिमं वा, स्वादिमं वा (आहारम् ) अाहर्तुम् । चारं वा प्रस्रवणं घा खेलं वा सियानं वा परिष्ठापयितुम् , स्वाध्याय वा कर्तुम् , ध्यानं वा ध्यातुम् , वा; , तृतीयोद्देशकः "काउस्सग्ग" त्ति कायोत्सर्गलक्षणं वा स्थानं 'स्थातु' कर्तुम् । सूत्रेणैवाऽपवादं दर्शयति-अथपुनरेवं जानीयात्-'वाहिए, इत्यादि व्याधितः-ग्लानः, जराजीर्ण:- स्थविरः, 'तपस्वी' क्षपकः दुर्वलः-ग्जानत्वादधुनैवोत्थितोऽसमर्थ शरीरः, एतेषां मध्यादन्यतमस्तपसा भिक्षाटनेन वा क्लान्तः-परिश्रान्तः सन् मूछेद्वा प्रपतेद्वा, एवं कारणमुद्दिश्य कल्पते अन्तरगृहे स्थातु वा यावत् कायोत्सर्ग वा कर्तुमिति सूत्रार्थः ॥ १६॥ मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अंतरगिहंसि जाव चउगाहं वा पंचगाहं वा आइक्खित्तए वा विभावित्तए वा किट्टित्तए वा पवेइत्तए वा, नऽन्नत्थ एगणाएण वा एगवागरणेण वा एगगाहाए वा एग सिलोएण वा, से वि य ठिच्चा नो चेव णं अडिच्चा ॥ २० ॥ टीका--नो कल्पते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा अन्तर गृहे यावत् चतुर्गाथं वा पञ्चगाथं वा आख्यातुवा विभावयितुवा कीर्तयितुवा प्रयेदयितुवा । एतदेवाप- वन्नाह-'नऽन्नत्थ' इत्यादि 'न कल्पते' इति योऽयं निषेधः स एकज्ञाताद्वा एक व्याकरणाद्वा एक गाथाया वा एक श्लोकाद्वा अन्यत्र मन्तव्यः । [ सूत्रे च पञ्चम्याः स्थाने तृतीया निर्देशः प्राकृतत्वात् ] तदपि च एक ज्ञातादि व्याख्यानं स्थित्वा कर्तव्यम् , नैव 'अस्थित्वा' भिक्षां पर्यटतोपविष्टेन वा इति सूत्रार्थः ।। २० ।। मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा अंतरगिहंसि इमाई पंच महब्बयाई सभावणाई श्राइक्खित्तए वा विभावित्तए वा किट्टित्तए वा पवेयत्तए वा, नऽन्नत्थ एगनाएण वा जाव सिलोएण वा, से वि य ठिचा नो चेवणं अठिच्चा ॥ २१ ।। दीका-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरम् ‘इमानि' स्वयमनुभूयमानानि पंच महा- प्रतानि सभावनानि-प्रतिव्रतं भावना पंचक युक्तानि आख्यावा, विभावयितुवा कीर्तयितुवा प्रयेदयितु वा न कल्पन्ते । आख्यानं नाम-साधूनां पंचमहाव्रतानि पंचविंशतिभावनायुक्तानि पटकायरक्षणसाराणि भवन्ति 'इति सामान्यकथनम् ।। विभावनंतु प्राणातिपाताद्विरमणं यावद् परिग्रहाद्विरमणमिति । भावनास्तु- "इरियासमिए सयाजए. इत्यादि गाथोक्तत्वरूपाः । षटकायास्तु-पृथिव्यादयः ! कीर्तनंनाम--"या प्रथमत्रतरूपा अहिंसा सा भगवती सदेवमनुजाऽसुरस्य लोकस्य धृहत्कल्पसूत्रम् ३२ पूज्या, द्वीपः, त्राणं शरणं गतिः, प्रतिष्ठेत्यादि, एवं सर्धेपामपि प्रश्नव्याकरणोक्तान, गुणान् कीर्तयति । प्रवेदनं तु-महानतानुपालनात् स्वर्गोऽपवर्गो वा प्राप्यते इति लाभकथनम् ) इति सूत्रार्थः ।। २१ ॥ मूल-"नो कप्पति निग्गंथाण वा निग्गंधीण वा पाडिहारियं सिज्जा- संथारयं आयाए अपडिहट्ट संपव्वइत्तए ॥ २२ ॥ टीका-नो कल्पते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा प्रतिहरणं-प्रतिहारः-प्रत्यर्पणं तमहतीति प्रातिहारिक, शय्याचसर्वाङ्गीणा, संस्तारकः-अर्द्धतृतीयहस्तमानः, शय्यासंस्तारकं तद् आदाय' गृहीत्वा कार्यसमाप्तौ 'अप्रतिहत्य' प्रत्यर्पणमकृत्वा सम्प्रव्रजितु-ग्रामान्तरं विहर्तुमिति सत्रार्थः ।। २२ ॥ -"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा सागारिय संतियं सेज्जासंथारयं आयाए अविकरणं कटु संपव्यइत्तए ।। २३ ।। टीका--नोकल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा सागारिकः-शय्यातरस्तस्य सत्कं शय्यासंस्तारकम आदाय-गृहीत्वा 'अविकरणं कृत्वा, अविकरणं नाम-यत् साधुना करणंकृतम्-तृणानां प्रस्तरणं कम्बिकानां वन्धनं फलकस्यस्थापनम् , तद् अनपनीय संप्रव्रजितु विह मिति सूत्रार्थः ।। २३ ॥ मूल-"इह खलु निग्गंथाण वा निग्गंथीण वो पाडि हारिए वा सागा- रियसंतिए वा सेज्जासंथारए विप्पणसिज्जा से य अणुगवेसियव्वे सिया, से अ अणुगवेस्समाणे लभेज्जा तस्सेव पडिदायव्ये सिया, से अ अणुगोस- माणे नो लभिज्जा एवं से कप्पड़ दोच्चंपि उग्गहं अणुन्नवित्ता परिहारं परिहरित्तए ॥ २४ ॥ टीका--इह अस्मिन् मौनीन्द्र प्रवचने स्थिताना 'खलु' वाक्यालङ्कारे, निम्रन्यानां वा निम्रन्थीनां वा प्रातिहारिको वा सागारिकसत्को या शय्यासंस्तारकः 'विप्रणश्येत्' विविधैः प्रकारे प्रकर्षेण रक्ष्यमाणोऽपि नश्येत्, सच 'अनुगषयितव्यः विप्रणाशान- न्तरम् पृष्ठत एव गवेषयितव्यः । स्याद्-भवेत् सचानुगवेष्यमाणो लभ्येत तस्यैव संस्तारक स्वामिनः प्रतिदातव्यः-प्रत्यर्पणीयः । स्यात् स चानुगवेष्यमाणो न लभ्येत तत एवं 'से' तस्य कल्पते 'द्वितीयमप्यवग्रहमनुज्ञाप्य' एकं तावत्प्रथमं यदा गृहीत. स्तदाऽनुज्ञापितः, ततो विप्रणतः सन् गवेष्यमाणोऽपि यदा न लब्धः, तदा संस्तारक ३२ तृतीयोदेशकः स्वामिनः कथिते सति यदसावन्यं संस्तारकं ददाति, यद्वा स एव संस्तारक स्वामिना मृग्यमाणोलब्धः, ततस्तद्विपयं द्वितीयमवग्रहमनुज्ञाप्य 'परिहारं' धारणा-परिभोग- लक्षणं परिहतु' धातूनामनेकार्थत्वात्कर्तु मितिसूत्रार्थः ।। २४ ।। मूल-"जदिवसं समणा निग्गंथा सिजासंथारयं विप्पजहंति, तद्दिवसं अबरे समणा निग्गंथा हव्यमागच्छिज्जा सच्चे उग्गहस्स पुवाणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ।। २५ ।। टीका--जदिवस, [ इतिप्राकृतत्वात्सप्तम्यर्थे द्वितीया ] ततो यस्मिन् दिवसे श्रमणा निर्ग्रन्थाः शय्या च वसतिः, संस्तारकश्च-तृणफलकात्मकः शय्यासंस्तारकम् । अत्र शय्याग्रहणेन ऋतुबद्धः कालः सूचितः, संस्तारकग्रहणेन तु वर्पाकालः, अथवा कारणजाते ऋतुबद्धेऽपि संस्तारको गृह्यते, इतिकृत्वा संस्तारक ग्रहणेन द्वावपि गृहीतो, ततो मासकल्पे वर्षावासे वा पूर्णे शय्यां संस्तारकं वा यस्मिन् दिवसे पूर्वस्थिताः साधवः 'विप्रजहति' परित्यजन्ति, तदिवस एवाऽपरे श्रमणा निर्ग्रन्था- स्तत्र क्षेत्रे 'हव्य' शीघ्रमागच्छेयुः, ततः सैवाऽवग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्ठिति । किमुक्त भवति ?-- “य एव ततः क्षेत्रान्निर्गतास्तेषामेवाऽवग्रहे तत् क्षेत्रम् , येतुं तदिवसमन्ये आगतास्ते क्षेत्रोपसम्पन्ना इति कृत्वा यत् तत्र सचित्तादिकं तत् पूर्व- स्थितानामाभाव्यम् । कियन्तं कालं यावद् ? इत्याह--"अहालंदमवि उग्गहे" इह यस्यां वेज्ञायां ते साधवो निर्गताः तावती वेलां यावद् द्वितीयेऽप्यह्नि तेपामेवाऽवग्रहो भवतीतिवक्ष्यते, ततः 'यथालन्दम् इहाऽष्टपौरुषीप्रमाणं मध्यमं गृह्यते, एतावन्तमपि कालं तदीय एवावग्रहे तत् क्षेत्रन , अतो यद्यागन्तुकास्तत्र सचित्ताऽदिग्रहणंकुर्वन्ति, तदा साधर्मिकस्तैन्यप्रत्ययं प्रायश्चित्तमापद्यन्ते । अत्र तु सचित्तेनाऽधिकार इति सूत्रार्थः ॥ २५॥ मूल-"अत्थि या इत्थ केइ उवस्सय परियावन्नए अचित्ते परिहरणा- रिहे सच्चेव उग्गहस्स पुव्याणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ॥२६॥ टीका-अम्ति च 'अत्र' अनन्तरसूत्र प्रस्तुते प्रतिश्रये किम् ? 'किञ्चिद्! आहारार्थजातादिकं गृहस्थसत्कम् उपाश्रये पर्यापन्न -विस्मृतं परित्यक्त वा उपाश्रय- पर्यापन्न 'अचित्तं प्राशुकम् 'परिहरणाह, साधूनां परिभोक्तं योग्यम्, तत्र सैवाव- ग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्ठति, तत्रोपाश्रये तिष्ठद्भिः पूर्वमेव 'अनुजानीत प्रायोग्यम्इत्येवं ; चदवग्रहोऽनुज्ञापितः सैवानुज्ञापना, पश्चादुपाश्रय पर्यापन्नग्रहणे व्यवतिष्ठते न ; ..

बृहत्कल्पसूत्रम् ३३ पुनरभिनवमनुज्ञापनं कर्तव्यमितिभावः । कियन्तं कालमित्याह--"यधालन्दमपि। मध्यमजन्दमात्रमपि कालं यावद्वग्रह इतिसूत्रार्थः ॥ २६ ॥ मूल-'सेवत्थुसु अव्यांवडेसु अब्बोगडेसु अपरपरिग्गहिएसु अमर परि- गहिएसु सच्चेव उग्गहस्स पुव्वाणुराणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उग्गहे ।२७। टोका- से, तस्थ निर्ग्रन्थस्य धास्तुपु' गृहेषु, कथम्भूतेषु ? 'अव्यापृतेषु शटित- पतिततया व्यापार विरहितेषु 'अव्याकृतेपुर दायादादिभिरविभक्तपु अथवाऽतीत काले केनाऽप्यनुज्ञातमितिनज्ञायते यत् तद् अव्याकृतं तेपु, तथा 'अपरपरिगृहीतेपुर परैः-अन्यैरनधिष्ठितेपु 'अमरपरिगृहीतेपु-देवैः स्वीकृतेषु, सैवावग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना निष्ठति यथालन्दमप्यवहे । किमुक्त भवति ?-यावन्तं कालं तानि वारतूनि तेपां पूर्वस्वामिनामवग्रहे वर्तन्ते तावन्तं कालं सैव पूर्वानुज्ञा तिष्ठति, न पुनभूयोऽप्यव. ग्रहोऽनुज्ञापनीय इति सूत्रार्थः ।। २७ ।। मूल- 'से पत्थु वावडेसु बोगडेसु पर परिग्गहिएसु भिक्खुमावस्त अट्ठाए दोच्चं पि उग्गहे अणुएणयव्ये सिया अहालंदमवि उग्गहे ॥२८॥ टीका--से, तस्य निर्ग्रन्थस्य वास्तुपु-गृहेषु व्याप्तेषु-व्यापारयुक्तेषु वहमान. केष्वित्यर्थः व्याकृतेपु-दायादादिभिर्विभक्तेषु 'परपरिगृहीतेपु' अन्यवंशीयरधिष्ठितेषु भिक्षुभावस्यार्थाय-भिक्षुभावो नाम ज्ञान-दर्शन-चारित्राणि तृतीय व्रतादिकंचा, तत्रैव भिक्षुशब्दस्य परमार्थत्वेन रूढत्वात् । सभिक्षुभावः परिपूर्णो भूयादित्येवमथं ये साधवः पश्चादागच्छन्ति, तैहितीयमपि बारमवग्रहोऽनुज्ञापयितव्यः स्याद् 'यथा- लन्दमपि जघन्यलन्द मात्रमपि कालमवग्रहे तत्राऽवस्थाने इति सूत्रार्थः ।। २८ ।। मूल-'से अणुकुड्डेसु वा अणुभित्ती वा अणुचरियासु वा अणुशरि- हासु वा अणुपंथेसु वा अणुनेरासु वा सच्चे। उग्गहस्स पुयाणुएणवणा चिट्ठइ अहालंदमवि उज्गहे ।। २६ ॥ टीका--से-तस्य निग्रंन्यस्य अनुकुड्य पुवा, कुड्यसमीपवर्तिपु वा प्रदेशेषु, एवम् - धानुभित्तिपु वा, अनुचरिकासु वा, अनुपरिखासु वा, अनुपथेषु वा अनुमर्याद्वासु वा । अनचरिका नगर प्राकारयोरपान्तराले हस्ताष्टक प्रमाणो मार्गः, परिखा-खातिका, मर्यादा-सीमा शेषं प्रतीतम् । एतेपु सैवावग्रहस्य पूर्वानुज्ञापना तिष्टति यथालन्द्- मपि कालमवग्रह इति सूत्रार्थः ।। २६ ।।

तृतीयोद्देशकः मूल-"से गामस्स वा जाव रायहाणीए वा वहिया सेएणं सनिचिट्ठ पेहाए कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा तद्दिवसं भिक्खायरियाए गंतु पडिएत्तए । नो से कप्पइ तं स्यणि तत्थेव उवाइणा वित्तए । जो खलु निग्गंथो वा निग्गंथी वा तं रयणि तत्थेव उपाइणाइ, उचातिणंतं वा साइ- ज्जति, से दुहतो वि अक्कममाणे आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्घाइयं ॥ ३०॥ टीका-से शब्दोऽथ शब्दाऽये । अथ ग्रामस्य वा यावद् राजधान्या वा, याव- रकरणात् नगरस्य वा खेटस्य वा इत्यादि परिग्रहः, एतेषामन्यतरस्य बहिः 'सेन्' राज्ञः स्कन्धावारं रोधकं कृत्वा सन्निविष्टं 'प्रेक्ष्य' दृष्ट्वा कल्पते निम्रन्थानां पा निर्ग्रन्थीनां वा तदिवसं भिक्षाचर्यायां गत्वा प्रत्यागन्तुम् । नो-नैव 'से' तस्य विवक्षि. तस्य भिक्षोः कल्पते तां रजनी तत्रैव सेनायाम् उपादातुम्-अतिक्रामयितुम् । यः खर निम्रन्यो वा निर्ग्रन्थी वा तां रजनी तत्रैवोपादाति, उपादतं का स्वादयति स द्विधाऽप्यतिकामन्-जिनसीमानं राज सीमानं च विलुम्पन् श्रापद्यते चातुर्मासिक परिहारस्थानमनुद्घातिकमिति सूत्रार्थः ॥ ३०॥ मूल-"से गामंसि वा जाव संन्निमसि वा कप्पइ निग्गंधाण वा निग्गं- थीण वा सव्वओ समंता सकोसं जोयणं उग्गहं ओगिरिहत्ताणं चिद्वित्तए ॥ ३१॥ तिबेमि तइत्रो उद्देसो । टीका-“अथ ग्रामे वा नगरे वा यावत् सन्निवेशे वा कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निम्र- न्थीनां वा 'सर्वतः' सर्वासुदिक्षु 'समन्तान-चतसृष्वपि विदिक्षु सक्रोशं योजनमवमह- मवगृह्य स्थातुमिति सूत्रार्थः ॥ ३१ ॥ इति तृतीय उद्देशकः समाप्तः अथ चतुर्थ उद्देशकः मूल-" तो अणुग्धाइया पन्नत्ता, तंजहा-'हत्थकम करमाणे, मेहुणं पडिसेवमाणे, राइभोयणं मुंजमाणे ॥ १ ॥ टीकर -त्रयः-त्रिसंख्याकाः अनुघातिकाः, उद्घातो नाम "अद्वेण छिन्नसेसंग (गा ) इत्यादिविधिना भागपातः सान्तरदानं वा उद्घातः, स विद्यते येपु. ते उद्घातिकाः, तद्विपरीता अनुद्घातिकाः प्रज्ञप्ताः-तीर्थकरादिभिः प्ररूपिताः । 'तद्यथा' इत्युपप्रदर्शनार्थः । हन्ति हसति वा मुखमावृत्यानेनेतिहस्तः-शरीरैकदेशो. निक्षेपाऽऽदानादि समर्थः तेन यत् कर्म क्रियते तत्-हस्तकर्म, (विषयाऽसेवनरूपं तत्कुर्वन् । तथा स्त्रीपुसयुग्मं मिथुनमुच्यते, तस्य भावः कर्म घर मैथुनम्, तत् प्रतिसेव:- मानः । तथा रात्रौ भोजनम्-अशनादिकं भुञ्जानः । एप सूत्रार्थः ॥ १॥ मूल " तो पारंचिया पन्नत्ता, तंजहा-दुडे पारंचिए, पमत्त्वे पारंचिए, अन्नमन्नं करेमाणे पारंचिए ॥२॥ टीका--(शोधिः शुद्धिद्विविधा-तपोऽहो, छेदाऽहांच, तपोऽहोशोधिः खलु पूर्वसूत्रे प्रोक्ता, अथेदानी छेदार्हाऽभिधीयते । सचच्छेदो द्विधा-देशतः सर्वतश्च, तत्र देशच्छेदः पञ्चरात्रिन्दिवादिकः षण्मासान्तः । सर्चच्छेदः 'मूलादिः मूला-ऽनव- स्थाप्य-पाराश्चिक भेदात् त्रिविधः । अत्रसर्वच्छेदः-पाराचिकलक्षणोऽधिक्रियते- "अथास्य सूत्रस्य व्याख्या- त्रयः पाराञ्चिकाः प्रज्ञाप्ताः । तद्यथा-दुष्टः पाराञ्चिकः, प्रमत्तः पाराञ्चिकः 'अन्योऽन्यः परस्परं मुखपायु प्रयोमतः प्रतिसेवनां कुर्वाण पाराश्चिक इति सूत्र समासार्थः ॥ २॥ - चतुर्थाद्देशकः . मूल---" ततो अणवठ्ठप्पा पएणत्ता, तंजहा-साहम्मियाणं तेरणं करेमाणे, अन्न धम्मियाणं तेरणं करेमाणे, हत्थादालं दलमाणे ।। ३ ।। टीका--त्रयः-'अनवस्थाप्याः-तत्क्षणादेव व्रतेषु अनवस्थापनीयाः प्रज्ञप्ताः । द्यथा-'साधर्मिकाः साधवस्तेषां सत्कस्योत्कृष्टोपधेः शिष्यादेर्वा स्तैन्यं चौर्यं कुर्वाण:। अन्यधार्मिकाः-शाक्यायो गृहरथा वा तेषांसत्कस्योपध्यादेः स्तैन्यं कुर्वन् । तथा हस्तेनाऽऽताडनं हस्तातालः, [ सूत्रे च तकारस्थ दकारश्रुतिरापत्वात् ] तं दलमाणे- दत्-यष्टिमुष्टि लकुटादिभिरात्मनः परस्य वा प्रहरन्निति भावः । अथवा-'हत्थालंब' इतिपाठः, हस्तालम्ब इब हस्तालम्ब:-अशिचादि प्रशमनार्थमभिचारुक मन्त्रादि प्रयोगः तं 'दलमाणे' कुर्वन् , यद्वा 'अत्यादाणं दलमाणे' इति पाठ', तत्र अर्थाऽऽ- दानम्-अर्थोपादानकारणमष्टाङ्गनिमित्तं दत्-प्रयुञानः एप सूत्रसंक्षेपार्थः ।। ३ ।। मूल-" तो नो कप्पंति पञ्चावित्तए, तंजहा-पंडए, वाइए,कीव॥४॥ टीका--त्रयो नो कल्पन्ते प्रव्राजयितुम् । तद्यथा-पण्डकः-नपुसकः । वातिको नाम यदा स्वनिमित्ततोऽन्यथा वा मेहनं कापायितं भवति, तदा न शक्नोतिवेदं धारयितु यावन्न प्रतिसेवा कृता (तथाविधः)क्जिीबः-असमर्थः सच दृष्टि क्लीवादि- लक्षणः । एप सूत्रार्थः ॥ ४॥ मूल-" एवं मुंडावित्तए, सिक्खा वित्तए; उवट्ठावित्तए, संभुजित्तए; संवासित्तए, ।। ५। ६ । ७।८।६॥ दीका--यथते पण्डकायस्थ्यः प्रव्राजथितुन कल्पन्ते एवंमेते-एव कथञ्चित्- छलितेन प्रभाजिता अपि सन्त: 'मुण्डापयितु' शिरोलोचेन. लुचितुन कल्पन्ते ।। एवं शिक्षापयितु प्रत्युपेक्षणादि सामाचारी ग्राहयितुम् । उपस्थापयितु-महाव्रतेपु व्यवस्थापयितुम् । सम्भोक्तुम , एक मण्डली समुद्देशादिना व्यवहारयितु। संवासनि- तुम्-आत्मसमीपे आसवितुमिति सूत्रार्थः ॥ ५। ६ । ७ ।।६।। मूल-" तो नो कप्पंति वाइलए, तंजहा--' अविणीए, विगई- पडियद्धे, अविश्रोसवियपाहुडे ।। १० ॥ मूल-"तो कप्पंति वाइत्तए, तंजहा-विणीए, नो विगईपडिबद्ध वित्रीसवियपाहुडे ॥ ११ ॥ दीका--अयो नो कल्पन्ने वाचयिन-सूत्र पाठयितुमर्थ वा श्रायथितुम् । तद्यथा बृहत्वल्पमत्रम् अविनीत -सूत्राऽर्थदातुर्वन्दनादि विनयरहितः । विकृतिप्रतिवद्धः-घृतादिरस विशप- गृढः-अनुपधानकारीति भावः । अव्यवशमितम्-अनुपशान्तं प्राभृतमिव प्राभृतं- नरकपाल कोशलिक तीव्रक्रोधलक्षणं यस्याऽसौ-अव्यवशमित प्राभृतः ॥ एत- द्विपरीतास्तु त्रयोऽपि कल्पन्ते वाचयितुम् । तद्यथाविनीतो नो विकृति प्रतिवद्धो व्यपशमितप्रामृतश्चेति सूत्रार्थः ॥ १० ॥ ११ ॥ भूस-'तो दुस्सन्नप्पा पन्नता, तं जहा-दुड्ढे, मूहे, बुग्गाहिए ॥१२॥ टीका--त्रयः दु खेन-कृच्छ्रेण संज्ञाप्यन्ते-प्रतिबोध्यन्ते, इति दुःसंज्ञाप्याः प्रज्ञप्ता। तद्यथा--'दुष्टः-तत्त्वं प्रज्ञापकं वा प्रतिद्व पवान् स च अप्रज्ञापनीयः द्वं पेणो- पदेशाऽप्रतिपत्तेः । एवं मूढो-गुणदोपाऽनभिज्ञः । व्युद्ग्राहितोनामकुपज्ञापक दृढीकृत विपरीतावबोधः । एष सूत्रार्थः ॥ १२ ॥ मूल-"तो सुसरणप्पा पनत्ता, तंजहा-'अदुव, अमूढे, अवुग्गा- हिए ॥१३॥ टीका--त्रयः सुसंज्ञाप्याः-सुख प्रज्ञापनीयाः प्रज्ञप्ताः । तद्यथा-अदुष्टोऽमूढोऽव्यु- ग्राहितश्चति ।। १३ ॥ मूल-"लिग्गथि च णं गिलायमाणिं पिता वा भाया वा पुचो वा पलिस्सएज्जा, तं च निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुणपडिसेवणपणा, आवजह चाउम्मासियं परिहारहाणं अगुग्याइयं ॥ १४ ॥ मूल-"निग्गंथं च णं गिलायमाणं माया वा, भगिणी वा, धृताया पलिस्सएज्जा, तं च निग्गंथे साइज्जेज्जा, मेहुण पडिसेवणपने पावज्जड़ चाउम्नासियं परिहारहाणं अणुग्याइयं ।। १५ ।। टीका--दिग्रन्थी-प्रागुक्त शब्दार्थाम् च शब्दो वाक्यान्तरोपन्यासे, 'गां' इति वाक्यालकारे 'गिलायमागि, इति ग्लायन्ती ( ग्लै -हर्ष क्षये,) शरीरक्षयेण हर्पक्षय मनुभवन्ती, पिता वा, भ्राता वा, पुत्रो वा निग्रन्थः सन् ‘परिघ्यजेत, प्रपतन्तीं धार- यंन् , निवेशयन् , उत्थापयन् वा शरीरे स्पृशेत् , 'तं च, पुरुषत्पशं सा निम्रन्थी मैथुन प्रतिसेवन प्राप्ता स्वादयेत-अनुमोदयेत् तत आपद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थान गनुद्घातिकम् । एवं निम्रन्थ सूत्रमपि व्याख्येयम्, नवरं माताबा, भगिनी वा, दुहिता - वतुर्थो देशकः चा परिष्वजेन् (तं च निर्ग्रन्थः अनुमोदयेत् ततः मैथुन प्रतिसेवना प्राप्तः-आपद्यते चातुर्मासिकं परिहार स्थानमनुद्धातिकम ) एप सूत्रार्थः ।। १४ ।। १५ ।। मूल-"नो कप्पड निरगंथाण वा निग्गंथीण वा असणं वा पाणं वा, खाइमं वा, साइमं वा, पढमाए पोरिसीए पडिग्गाहित्ता पच्छिमं पोरिसिं उबाइणाविराए । से य आहच्च उवाइणाविए सिया तं नो अपणा भुजिज्जा, नो अन्नेसिं अणुप्पएज्जा, एगते बहुफासुए थंडिले पडिलेहित्ता पमज्जित्ता परिडवेयव्ये सिया । तं अप्पणा भुजमाणे अन्नेसि वा दलमाणे पावज्जइ चाउम्नासियं परिहारट्ठाणं उग्घाइयं ।। १६ ।। मूल-'नो कप्पड़ निग्गंथाण वा २ असणं वा ४ परं अद्ध जोयण मेराए उबायणावितए । से य पाहच्च उवाइणाविए सिया, तं नो अप्पणा मुंजिज्जा नो अन्नेसिं अणुप्पएज्जा एगते बहुफासुए थंडिले पडिलेहित्ता पमज्जित्ता परिट्ठवियव्वे सिया। तं अप्पणा भुजमाणे अन्नेसिं वा दलमाणे श्रावज्जइ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं उग्वाइयं ।। १७ ॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निर्ग्रन्थीनां वा अशनं वा, पानं वा, खादिमं वा, स्वादिमं वा, प्रथमायां पौरुष्यां प्रतिगृह्य पश्चिमां पौरुपीम् ‘उवाइणावित्तए त्ति, उपानाययितु-सम्प्रापथितुमिति । तच्च "अाहच्च, कदाचित् उपानायितं स्यात् , ततः 'तद्, अशनादिकं नात्मना भुञ्जीत, नवा अन्येषां साधूनामनुप्रदद्यात् । किम्पुन- स्तर्हि विधेयम् ? इत्याह-एकान्ते बहुप्राशु के स्थण्डिले प्रत्युपेक्ष्य-चक्षुपा प्रमृज्य-रजो- हरणेन परिष्ठापयितव्यं स्यात् । तद् आत्मना भुञ्जानोऽन्येषां वा दान प्रापद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थानमुद्घातिकम् ।। एवं क्षेत्रातिक्रान्त सूत्रमपि वक्तव्यम्- नवरम्-अर्द्धयोजनलक्षणाया मर्यादाया अतिक्रामयितुमशनादिकं न कल्पते । स्यात् तदुपानायितं ( उपानाययितं ) भवेत् , ततो यः स्वयं तद् भुङ्क्तेऽन्येषां वा वाति तस्य चतुर्लघुकमिति सूत्रद्वयार्थः ।। १६॥ १७ ॥ मूल-"निग्गथेण य गाहावइकुलं पिंडबाय पडियाए अणुप्पविणं अन्नयरे अचिचे प्रणेसणिज्जे पाणभोयणे पडिग्गाहिए सिया, अत्थि या इत्थ केइ सेहतराए अणुवट्ठावियए, कप्पड़ से तस्स दाउ (वा)अणुप्पदा नत्थि या इत्थ केइ सेहतराए, अणुवट्ठावियए तं नो अप्पणा भुजेजा, वा, बृहत्कल्पसूत्रम् नो अन्नेसिं दावए, एगते बहुफासुए पएसे पडिलेहित्ता पमज्जित्ता परि- ट्ठवेयव्वे सिया ॥ १८ ॥ टीका-निर्ग्रन्थेन च गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञयाऽनुप्रविष्ट न 'अन्नतरे त्ति' उद्गमोत्पादनैषणादोपाणामन्यतरेण दोपेणदुष्टम् 'अ..पणीयम्' अशुद्धम् , 'अचित्तं निर्जीवं पानभोजनमनाभोगेन प्रतिगृहीतं स्यात्' तच्चोत्कृष्टं न यतः ततः परित्यक्त शक्यते, अस्ति चात्र कश्चित् 'शैक्षतरक, लघुतरः अनुपस्थापितकः, अनारोपित- महाव्रतः, कल्पते 'से' तस्य निर्ग्रन्थस्य तस्मै शैक्षाय दातुमनुप्रदातुवा । तत्र दातु- प्रथमतः, 'अनुप्रदातुम्-तेनाऽन्यस्मिन्न पणीये सति पश्चात् प्रदातुम् । अथ नास्त्यत्र कोऽपि शैक्षतरकोऽनुपस्थापितकस्ततस्तद् 'नैवात्मनाभुञ्जीत नवाऽन्येषां दद्यात्' किन्तु एकान्ते बहुप्रासुके प्रदेशे प्रत्युपेक्ष्य प्रमृज्य च परिष्ठापयितव्यं स्यात् । इति सूत्रार्थः ॥ १८ ॥ मूल- "जे कडे कप्पट्ठियाणं कप्पइ से अकप्पट्टियाणं, नो से कप्पड़ कप्पट्ठियाणं । जे कडे अकप्पट्ठियाणं णो से कप्पड़ कप्पट्ठियाणं, कप्पड़ से अकप्पट्ठियाणं । कप्पे ठिया कप्पडिया, अकप्पे ठिया अकप्पट्ठिया ॥१६॥ टीका-यद् अशनादिकं 'कृतं, विहितं कल्पस्थितानामर्थाय कल्पते तद् अकल्प. स्थितानाम् । नो तत् कल्पते कल्पस्थितानाम् । "इहाऽचेलक्यादौ दशविधे कल्पे ये स्थितास्ते कल्पस्थिता उच्यन्ते पञ्चयामधर्मप्रतिपन्ना इति भावः । ये पुनरेतस्मिन्न कल्पे सम्पूर्णे न स्थितारतेऽकल्पस्थिताः, चतुर्यामधर्मप्रतिपत्तार इत्यर्थः। ततः पञ्चया- मिकानुद्दिश्य कृतं चतुर्यामिकानां कल्पते, इत्युक्त भवति । तथा यद् 'अकल्पस्थितानां चतुर्यामिकानामर्थाय कृतं नोतत्कल्पते, कल्पस्थितानां पञ्चयामिकानां किन्तु कल्पते तद् 'अकल्पस्थितानां चतुर्यामिकानाम् । अत्रैव व्युत्पत्तिमाह-'कल्पे अचेलक्यादौ दशविधे स्थिताः कल्पस्थिताः । प्रकल्प अस्थितकल्परूपे स्थिता अकल्पस्थिताः। एष सूत्रार्थः ॥ १६॥ मूल-"भिक्खू य गणामो अवक्कम्म इच्छेज्जा अन्नं गणं उपसंपन्जि- ताणं विहरित्तए, नो से कप्पइ अणापुच्छित्ता आयरियं वा, उवज्झायं वा पवत्तिं वा, थेरं वा, गणिं वा, गणहरं वा, गणावच्छेइयं वा अन्नं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरिशए । कप्पइ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जावगणा-

चतुर्थोद्देशकः
वच्छेइयं वा अन्नं गणं उवसंपज्जिताणं विहरितए : ते य से वियरेज्जा
एवं से कप्पड अन्नं गणं उपसंपज्जिताणं विहरितए ते य से नो वितरेज्जा
एवं से नो कप्पइ अरणं गणं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए ॥ २० ॥
टीका-"भिक्षुः-सामान्य साधुश्चशब्दान्निग्रन्थी वा गणाद् 'अवक्रम्य-निर्गत्य
इच्छेद्-अभिलपेदन्यं गणमुपसम्पद्यविहर्तुम्। नो से-तस्य भिक्षोः कल्पतेऽनापृच्छयाऽऽ
चार्य
वा उपाध्यायं वा प्रवर्तक वा, स्थविरं वा गणिनं वा, गणधरं वा, गणावच्छेदकं
वा अन्यं गणमुपसम्पद्य विहर्तुम् । कल्पते से-तस्य भिक्षोराचार्य वा यावत्करणादु
पाध्यायं वा प्रवर्तिनं वा स्थविरं वा गणिनं वा गणधरं वा गणावच्छेदकं या-
ऽऽपृच्छयान्यं गणमुपसम्पद्य विहर्तुम । ते चाऽऽचार्यादय आपृष्टाः सन्तस्तस्यान्य-
गणगमनं वितरेयु:-अनुजानीयुः, तत एवं तस्य कल्पतेऽन्यं गणमुपसम्पद्यविहर्तुम् ।
ते च तस्य न वितरेयुस्ततो नो कल्पते तस्याऽन्यगणमुपसम्पद्य विहर्तुमिति सूत्रार्थः।२०
मूल-"गणावच्छेइए य गणाअो अबकम्म इच्छेज्जा अण्णं गणं उवसं-
पज्जिचाणं विहरित्तए, नो कप्पइ गणावच्छेइ यस्स गणावच्छेइयत्तं
णि क्खि विचा अण्णं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरितए, णो से कप्पड़ अणा-
पुच्छित्ता आयरियं वा जाव अन्न गणं उपसंपजित्ताणं विहरित्तए, कप्पड़
से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव विहरित्तए । तेय से वितरंति (यरेज्जा) एवं
से कप्पड़ जाव विहरित्तए तेय से नो वितरंति ( यरेज्जा) एवं से नो कप्पड़
जावविहरित्तए ॥ २१ ॥
मूल-"आयरिय उवज्झाए य गणाश्रो अवक्कम्म इच्छेज्जा अन्न गणं
उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए, कप्पइ अायरिय उवज्झायस्स आयरिय उव-
ज्झायचं णिक्खिवित्ता अएणं गणं उवसंपज्जित्ताणं विहरित्तए । णो से
कप्पड अणापुच्छिता आयरियं वा जाव अन्नं ग़णं उवसंपज्जित्ताणं विहरि-
त्तए । कप्पति से आपुच्छित्ता जाव विहरिशए । ते य से वितरंति, एवं से
कप्पति अन्नं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरिन्लए । ते य से णो वियरंति एवं
से णो कप्पति अन्नं गणं उपसंपज्जित्ताणं विहरित्तए ॥२२॥
टीका-अस्य सूत्र द्वयस्य प्रागवद् व्याख्या, न वरम् --गणावच्छेदकत्वमाचा-
र्योपाध्यायत्वं च निक्षिप्य गन्तव्यमितिविशेपः ।। २१. ॥ २२ ॥

चतुर्थोदेशकः विहरितए । ते य से वितरति एवं से कप्पति जाब विहरित्तए, ते य से णो वितरंति एवं से णो कप्पति जाव विहरित्तए । जत्युत्तरियं धम्मविणणं लभेजा एवं से कप्पड़ जाव विहरित्तए। जत्युत्तरियं धम्मविणयं नो लमे जा एवं से णो कप्पति जाब विहरित्तए ॥ २५ ।। टीका--अस्य सूत्रद्वयस्य व्याख्या पूर्ववत् ॥ २४ ॥ २५ ॥ मूल-"भिक्खू य इच्छिज्जा अन्नं आयरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए, नो से कप्पइ अणापुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्न श्रायरिय उवज्झायं उदिसावित्तए । कप्पइ से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्नं पायरियं उब मायं उद्दिसावित्तए । ते य से विय- रिज्जा, एवं से कप्पइ अन्नं पायरिय उवझायं उद्दिसावित्तए । ते य से नो वियरेज्जा एवं से नो कप्पइ अन्नं आयरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए । नो से कप्पइ तेसि कारणं अदीवित्ता अन्नंपायरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए, कप्पति से तेसिं कारणं दीवित्ता अन्नं पायरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए ॥ २६॥ टीका- व्याख्या प्रागवत् । नवरम्-अन्यम्-श्राचार्योपाध्यायमुद्देशयितुम् आचार्यश्च उपाध्यायश्च-इत्याचार्योपाध्यायम्-( समाहारद्वन्द्वः,) यद्वा ..प्राचार्य युक्त उपाध्याय आचार्योपाध्यायः (शाकपार्थिववत्-मध्यमपदलोपी समासः) प्राचार्योपाध्यायावित्यर्थः, तावन्यावुद्देशयितुमात्मनइच्छेत् । ततो नो कल्पते अनापृच्छयाऽऽचार्य वा यावद् गणावच्छेदकं वा इत्यादि प्रागतद् द्रष्टव्यम् । तथा न कल्पते तेषाम्-श्राचार्यादीनां कारणम् 'अदीपयित्वा, अनिवेद्य अन्यमाचार्योपा. ध्यायम् 'उद्देशयितुम् आत्मनो गुरुतया व्यवस्थापयितुम् 'कारणंदीपयित्वा तु कल्पते।' एप सूत्रार्थः ॥ २६ ॥ मूल-"गणावच्छेइए य इच्छिज्जा अन्नं पायरिय उवज्झायं उद्दिसा- वित्तए, नो से कप्पइ गणावच्छेइयत्तं अनिक्खिविता अन्नं अायरिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए, कप्पइ से गणावच्छेइयत्तं निक्खिवित्ता अनाय- रिय उवज्झायं उद्दिसावित्तए । नो से कप्पइ अणापुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्नं आयरिय-उवज्झायं उद्दिसावित्तए, कप्पइ से आपुच्छित्ता जाव उद्दिसावित्तए । नो से कप्पति तेसिं कारणं अदीवित्ता

वृहत्कल्पसूत्रम्
४३
अन्न आयरिय-उबझायं उद्दिसावित्तए, कप्पड़ से तेसि कारणं दीविता
अन्न जाव उद्दिसावित्तए ॥ २७ ॥
मूल-आयरिय उवज्झार इच्छिज्जा अन्न आयरिय उवज्झायं उद्दि-
सावित्तए, नो से कप्पइ अायरिय उवज्झायत्त अनिक्खिवित्ता अन्न पाय-
रिय उवज्झायं उदिसावित्तए, कप्पड़ से अायरिय उवज्झाय निक्विवित्ता
अन्नं पायरिय उत्रन्झायं उद्दिसावित्तए । णो से कप्पति अणापुच्छिता
श्यायरियं वा जाव गणावच्छेड्यं वा अन्न आयरिय उवज्झायं उद्दिसावि-
त्तए, कप्पति से आपुच्छित्ता आयरियं वा जाव गणावच्छेइयं वा अन्न
पायरिय-उवज्झाय उद्दिसावित्तए । ते य से वितरंति एवं से कप्पतिः
जाव उद्दिसावित्तए, ते य से णो वियरंति एवं से नो कप्पड़ जाव उद्दिसा-
विचए । णो से कप्पड़ तेसिं कारणं अदीवित्ता अन्न आयरिय-उज्झाय"
उद्दिसावित्तए, कप्पड़ से तेसि कारणं दीवित्ता जाव उद्दिसावित्लए ॥२८॥
टीका- अस्या सूत्रद्वयस्य व्याख्या प्राम्वत् ।। २७ । २८ ।।
मूल-भिक्खू य राम्रो वा वियाले वा आहञ्च, चीसु भिज्जा, तं च
सरीरगं केइ वेयावच्च करे भिक्खू इच्छिज्जा एगते बहुफासुए पएसे परि-
वित्तए, अत्थियाइत्थकेइ सागारियसंतिए उबगरणजाए अचित्ते. परिहरणा--
रिहे, कप्पइ से सागारिकर्ड गहाय तं सरीरगं एगते बहुफासुए पएसे परिह-
वित्ता तत्थेव उवनिक्खिवियव्य सिया ।। २8 ।।
टीका-भिक्षु: च शब्दादाचार्योपाध्यायौ वा रात्रौ वा विकाशे. वा 'श्राहच"
कदाचित्-विष्वग भवेत्-जीव शरीरयोः पृथग् भावमाप्नुयात्-म्रियत इत्यर्थः । तच्छ
शरीरकं कश्चिद् वैयावृत्यकरो भिक्षरिच्छेत् 'एकान्ते' विविकते 'बहुप्राशुके' कीटकादि-
सत्त्वरहिते प्रदेशे परिष्ठापयितुम् । अस्ति चात्र किञ्चित्सागारिक सत्कम् 'अचित्त
निर्जीवं 'परिहरणाह-परिभोगयोग्यमुपकरणजात-बहनकाष्ठमित्यर्थः। कल्पते 'से'
तस्य भिक्षोस्तत्काष्ठं सागारिक कृतं-सागारिकस्यैव सत्कमिदं नास्माकम् , इत्येवं
गृहीत्वा तत्-शरीरमेकान्ते बहुप्राशुके प्रदेशे परिष्ठापयितुम् । तच्च परिष्ठाप्य यत
गृहीतं तत् काष्ठं तत्रैवोपनिक्षेप्तव्यं स्यादिति पत्रार्थः ॥ २ ॥

४४ चतुर्थीद्देशकः मूल-भिक्खू य अहिकरणं कट्ठ तं अहिगरणं अविश्रोसवित्ता नो से कप्पइ गाहावइकुलं मचाए वा पाणाए वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा बहिया बियार भूमिं वा विहार भूमि वा णिक्खमित्तर वा पविसित्तए वा गामाणुगामं वा दूइज्जित्तए, गणातो वा गणं संकमित्तए, वासावासं वा वत्थए । जत्थेव अप्पणो अायरिय उज्झायं पासेज्जा बहुस्सुयं वभाग तस्रातिए आलोइज्जा पडिक्कमिज्जा निदिज्जा गरहिज्जा विउद्देजा विसोहेज्जा अकरण याए अभुठ्ठिज्जा आहारिहं तबोकम्प्नं पायच्छित्वं पडिमज्जेज्जा । से सुरण पट्टबिए प्राइग्रव्ये सिया, से य सुरण नो पविए नो आइतव्ये सिया, से य सुंएण पट्ठबिजमाणे नो आइयइ से निज्जूहियव्ये सिया || ३० ॥ टीका--भिक्षुः प्रागुक्तः च शब्दादुपाध्यायादिपरिग्रहः अधिकरणं-कलहं कृत्वा नो कल्पते तस्य तदद्धिकरणमव्यवशमय गृहपतिकुलं भक्ताय वा पानाय वा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुं वा 'बहिर्विचारभूमौ वा विहारभूमौ बा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुवा, ग्रामानुमामं वा द्रोतुं विहतुम् | गणाद्वा गणं संक्रमितुम् । वर्षावासं वा वस्तुम्। किन्तु यत्रैवात्मन आचार्योपाध्यायं पश्येत् , कथम्भूतम् ? बहुश्रुतं-छेदग्रन्थादिकुशलं, वह्वागमम्-अर्थतः प्रभूतागमम् । तत्र तस्थान्तिके 'पालोचयेत्' स्वापराधं वचसा प्रकटयेत् प्रतिक्रामेत्-मिथ्यादुष्कृतं तद्विपयें दद्यात्, 'निन्द्याद्' आत्मसाक्षिकंजुगुप्सेत, गर्हेत-गुरुसाक्षिकं निन्द्यात् । इह व निन्दनं गहणं वा तात्त्विकं तदा भवति यदा तत्करणतः प्रतिनिवर्तते तत श्राह-व्यावर्तेत, तस्मादपराधपदाद्-निवर्तेत । व्यावृत्तावपिकृतात्पापात् तदामुच्यते यदाऽऽत्मनोविशोधिर्भवति, ततआह-"आत्मानं विशोधयेत् , पापमलास्फेटनतो निर्मलीकुर्यात् । विशुद्धिः पुनरपुनः करणतायामुपपद्यते ततस्तामेवाऽऽह-"अकरणता-अकरणीयता तया अभ्युत्तिष्ठत् । पुनरकरणतया अभ्युत्थानेऽपि विशोधिः प्रायश्चित्तप्रतिपत्त्या भवति, तत आह्-'यथाऽहम्' यथा- योग्यं तपः कर्म प्रायश्चित्तं प्रतिपद्येत । तच्च' प्रायश्चित्तमाचार्येण 'श्रुतेन' श्रुतानु- सारेण यदि 'प्रस्थापितं' प्रदत्तं तहा 'आदातव्यं, ग्राह्य स्याद् भवेत्, अथ श्रुतेन न प्रस्थापितं तदा नादातव्यं स्यात् 'स' च आलोचको यदि श्रु तेन प्रस्थाप्यमानमपि तत् प्रायश्चित्तं 'ना ददाति-न प्रतिपद्यते ततः सः 'नि! हितव्यः, 'अन्यत्र शोधिंकुरुष्व' इति निपेधनीयः स्यादिति सूत्रार्थः ॥.३० ।।

४५ वृहत्कल्पसूत्रम् मूल-परिहार कप्पट्टियस्स णं भिक्खुस्स कप्पड़ पायरिय उज्झाएणं तदिवस एगगिहंसि पिंडवायं दवावित्तए, तेण परं णो से कप्पड असणं वा पाणं वा खाइमं वा साइमं वा दाउ वा अणुप्पदाचा । कप्पड़ से अन्न- सरं वेयावडियं करित्तए, तंजहा-उठावणं वा, निसियावणं वा, तुपट्टा- वणं वा, उच्चार पासवण-खेल-सिंघाण विगिचणं वा विसोहणं वा करि- चए। अह पुण एवं जाणिजा-छिन्नावाएसु पंथेसु आउरे झिझिए पिवासिए, विम्सी, दुबले, किलंते मुच्छिज्ज पर डिज्न वा एवं से कप्पइ असणं या ४ दाउं वा अणुप्पदावा ॥ ३१ ॥ टीका- परिहार कल्पस्थितस्य भिक्षोः कल्पते प्राचार्योपाध्यायेन 'तदिवसम्' इन्द्रमहाद्युत्सव दिने एकस्मिन् गृहे 'पिण्डपातं' विपुलमवगाहिमादि भक्तलाभ दापयितुम् । ततः परं 'से' तस्य नो कल्पते अशनं वा पानं वा खादिम वा स्वादिम वा दातुमनुप्रदातुवा। तत्र दातुमेकशः, अनुप्रदातु पुनः पुनः। किन्तु कल्पते 'से तस्य परिहारिकस्यान्यतरद् वैयावृत्त्यं कर्तुम् । तद्यथा--"उत्थापनं वा निपादन वा त्यापनं वा उच्चार प्रस्रवण खेल सिंड्यानादीनां च विवेचनं वा-परिष्ठापनं 'विशोधनं वा' उच्चारादिस्वरण्टितोपकरणादेः प्रक्षालनं कर्तुम् । अथ पुनरेवं जानीयात्-छिन्नापातेषु, व्यवच्छिन्न गमाऽऽगमेपु पथिपु श्रातुरः ग्लानः 'झिकिझतः' बुभुतातः पिपासितः तृपितो न शक्नोति विवक्षितं ग्रामंप्राप्तुम् , अथवा ग्रामादावपि तिष्ठतां सः तपस्वी पष्ठाऽष्टमादिपरिहारतपः कर्मकुर्वन् दुर्बलो भवेत् , ततो भिक्षाच- र्यया क्लान्तः सन् मूर्द्रद्वा प्रपतेद्वा 'एचं से-तस्य कल्पते अशनादिकं दातुमनु- प्रदातुधा एष सूत्रार्थः ।। ३१ ।। मूल-"नो कप्पड़ निगंथाण वा निग्गंथीण वा इमानो पंच महएण- पात्रो महानदीत्री उद्दिष्टायो गणियाओ वंजियाओ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरित्तए वा संतरित्तए वा । तं जहा-गंगा, जउणा, सरऊ, कोसिया, मही ।। ३२ ।। टीका-नो कल्पते, न युज्यन्ते, सूत्रे एक वचननिर्देशः प्राकृतत्वात् निग्रन्थानां वा वा निग्रन्थीनां वा इमाः-प्रत्यक्षासन्नाः पञ्च महार्णवा-बहूदकत्तया महार्णवकल्पा: महासमुद्रगामिन्यो वा महानद्यः-गुरुनिम्नगाः उहिष्टाः. सामान्येनाभिहिता -यथा - - चतुर्थीदेशक: महानद्य इति गणिता यथा पञ्चेति व्यञ्जिताः' व्यक्तीकृता यथा गङ्गत्यादि 'अन्तर' मध्ये मासस्य द्विकृत्वो वा विकृत्वो वा उत्तरीतं वा-बाहुजंघादिना सन्तरीतुं वा- नावादिना। तद्यथा गङ्गा, १ यमुना,२ सरयू , ३ कोशिकी,४ मही, ५ एष सूत्रार्थः॥३२॥ मूल-"अह पुणएवं जाणिजा-एरावइ कुणालाए जत्थ चकिया एगं पाय जले किच्चा एगं पायथले किच्चा एवएहं कप्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरिचए वा संतरितए वा जत्थ एवं नो चक्किया एवएहं नो कप्पइ अंतो मासस्स दुक्खुत्तो वा तिक्खुत्तो वा उत्तरितए वा संतरिचए वा ॥ ३३ ॥ टीका-अथ पुनरेवं जनीयात--ऐरावती नाम नदी कुणालाया नगर्याः समीपे जंवार्द्ध प्रमाणेनोवधेन वहति तस्यामन्यस्यां वा यत्रैवं "चकिया-शक्नुयादुत्तरीतुमिति शेषः । कथम् ? इत्याह-एक पादं जले कृत्वा, एकं पादं 'स्थले' आकाशे कृत्वा 'एवण्ह' इति वाक्यालङ्कारे,यत्रोत्तरीतुं शक्नुयात् नत्र कल्पतेऽन्तर्मासस्य द्वि-कृत्वो वा त्रिःकृत्वो वा उत्तरोतुं-लंघयितुं सन्तरीतुं वा भूयः प्रत्यागन्तुम् । यत्र पुनरेवमुत्तरीतुं न शक्नु- यात् तत्र नो कल्पतेऽन्तर्मासस्य द्विकृत्वो वा विकृत्वो वोत्तरीतुं पा सन्तरीतुवा । इति सूत्रार्थः ।। ३३ ।। . मूल-"से तणेसु वा तणपुजेसु वा पलालेसु वा पलालपुजेसु वा अप्पंडेसु अप्पपाणेसु अप्पबीएसु अप्पहरिएसु अप्पुस्सेसु अप्पुतिंग पणग दगमट्टिय मक्कडगसंताणएसु अहेसवण मायाए नो कप्पड़: निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उवस्सए हेमंत गिम्हासु वत्थए॥ ३४ ॥ मूल-"से तरणेसु वा जाव संताणएसु उप्पिसवणमायाए कप्पइ निम्ग- थाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उवस्सए हेमंत गिम्हासु वत्थए ॥३५॥ मूल-"से तणेसु वा जाव संताणएसु अहेरयणी मुक्कमउडेसु नो कप्पड़ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उबस्सए वासावासं पत्थए ।।३६।। मूल-"से तणेसु वा जाव संताणएसु उप्पिरयणीमुक्कमउडेसु कप्पइ निग्यथाण वा निग्गंथीण वा तहप्पगारे उपस्सए वासावासं वत्थए ॥३७॥ टीका--अथ तृणेषु वा तृणपुलेपु वा पलालेषु वा पलाल पुजेषु वा अल्लागडेषु, बृहत्कल्पसूत्रम् - १ अल्पप्राणेषु अल्पचीजेषु अल्पहरितेपु अल्पाऽवश्यापु-अल्पोत्तिन पनक दक मृत्तिका मर्कट सन्तानकेषु । इहाऽण्डकानि पिपीलिकाऽऽदीनाम् । प्राणाः-द्वीन्द्रियादयः, बीजम्-अनङ्कुरितम् , तदेवाऽङ्कुरितोद्भिन्नं हरितम् , अवश्यायः-स्नेहः-उत्तिङ्गः- कीटिकानगरम् , पनकः-पञ्चवर्णः साङ्कुरोऽनकुरो वा अनन्त वनस्पति विशेषः, एक- मृत्तिका-सचित्तो मिश्रो वा कदमः, मर्कटकः-कोलिकस्तस्य सन्तानकं जालकम् । अल्पशब्दश्चेह सर्वत्राऽभाव वचनः, ततोऽण्डरहितेपु प्राणरहितेपु इत्यादि मन्तव्यम , शहेसबणमायाए, इति-अधः श्रवणमात्रया-श्रवणयोरधस्तात्-यत्र छादन तृणादीनि भवन्ति तथा प्रकारे उपाश्रये नो कल्पते निम्रन्थानां वा निम्रन्थीनां वा हेमन्त प्रीष्मेषु वस्तुम् अष्टावृतुबद्धमासान् इत्यर्थः ॥ एवं प्रतिषेध सूत्रमभिधाय प्रपञ्चितज्ञविनेयाऽनुग्रहाऽथ विधिसूत्रमाह-अथ तृणेषु वा यावदल्प सन्तानकेषु उपरिश्रवण मात्रया युक्तेपु तथाविधोपाश्रये कल्पते हेमन्त प्रीष्मेषु वस्तुम् । एवमृतुबद्ध सूत्रद्वयं व्याख्यातम् । अथ वर्षा वास सत्रद्वयं व्याख्यायते-अथ तृणेषु वा तृणपुजेषु वा यादल्प० सन्तानकेषु "अधेरयणी मुक्क मउडेसु" इति अञ्जलिमुकुलितं बाहुद्वयमुच्छ्रितं मुकुट उच्यते सहस्तद्वय प्रमाणः । रनिभ्यां-हस्ताभ्यां मुक्ताभ्याम् उच्छिताभ्यां यो निामतो मुकुटः स रनिमुक्त मुकुटः, एतावत्प्रमाणमधस्तादुपरि च यत्राऽन्तरालं न प्राप्यते तेवघोर निमुक्त मुकुटेषु तृणादिपु न कल्पते वर्षावासे वस्तुम् ॥ अथ तृणेषु वा यादल्प० सन्तानकेषु उपरि रनि मुक्त मुकुटेषु यथोक्त प्रमाणेषु मुकुटोपरिचर्तिपु संस्तारके निविष्टस्य साधोरर्द्ध तृतीय हस्ताद्यपान्तरालयुक्तेषु-इत्यर्थः। ईदृश्यां वसती कल्पते वर्षावासे वस्तुमिति सूत्र चतुष्टयार्थः ॥ ३४ ॥ ३५ ।। ३६ ।। ३७ ।।. । इति कल्पसूत्रस्य सटीकस्य चतुर्थ उद्देशः समाप्तः ॥

अथ पंचम उद्देशकः भूल-"देवे य इत्थिरूवं विउव्वित्ता निग्गंथं पडिग्गाहिज्जा तं च निग्गथे साइज्जेज्जा, मेहुण पडिसेवणप्पत्त आवज्जइ चाउम्मासियं परि- हारहाणं अणुग्याइयं ॥ १ ॥ मूल-"देवी य इत्थीरूवं विउवित्ता निग्गंथं पडिगाहिज्जा, तं च निग्गथे. साइज्जेज्जा मेहुणपडिसेवणप्पत्ते पावज्जइ चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं अणुग्घाइयं ॥२॥ मूल-"देवी य पुरिसरूवं विउव्वित्ता निग्गंथि पडिग्गाहेज्जा, तं चं निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुणपडिसेवणप्पत्ता आवज्जइ चाउम्मासियं अणुग्याइयं ॥३॥ मूल-"देवे य पुरिसरूवं विउव्वित्ता निग्गंथीं पडिगाहिज्जा, तं च निग्गंथी साइज्जिज्जा, मेहुण पडिसेवणपत्ता भावज्जइ चाउम्मासियं श्रणुग्याइयं ॥ ४ ॥ टीका-देवश्च स्त्री रूपं विकुर्य निम्रन्थं प्रतिगृहणीयात् , तच्च निर्ग्रन्थो मैथुन प्रति सेवनप्राप्तो यदि स्वादयेत्-अनुमोदयेत् तत आपद्यते चातुर्मासिक परिहारस्थानम् अनुद्घातिकम् ॥ १। एवं द्वितीयसूत्रं-देवी नीरूपं विकुळ निम्रन्थं प्रतिगृह्णीयादित्याद्यपि मन्तव्यम् ।२ तृतीय सूत्रम्-देवी पुरुपस्यरूपं विकुळ निर्ग्रन्थी प्रतिगृहणीयात् , तच्च निर्मन्थी स्वादयेत् , मैथुन प्रतिसेवन प्राप्ता प्रापद्यते चातुर्मासिकमनुद्घातिकं स्थान ॥३॥ ।"

बृहत्कल्पसूत्रम् टीका--एवं देवः पुरुपरूपं विकुर्य निर्यन्धी प्रतिगृहणीयादित्याद्यपि चतुर्थसूत्र वक्तव्यम् । एष सूत्र चतुष्टयार्थः ।। ४ ।। मूल-"भिक्खू य अहिंगरणं कट्ठ तं अहिंगरणं अवियोसविता इच्छि- ज्जा अन्न गणं उपसंपन्जिनाणं विहरित्तए, कप्पड़ तुस्त पंचराइंदियं छेयं कट्ट, परिनियाविय परिनियाविय दोच्चं पितमेव गणं पडिनिजाएयच्चे सिया, जहा या तस्स गणस्स पत्तियं सिया ॥ ५॥ टीका--भिनुः-च शब्दादाचार्य उपाध्यायो चाऽधिकरणं कृत्वा तद्धिकरण- सत्यवशमयप इच्छेद् अन्य गणमुपसम्पद्य विहर्तुम् । ततः कल्पते 'तस्य अन्यगण- मुषसंकान्तस्य पञ्चरात्रिन्दिवं छेदं कर्तुम् । ततः परिनिर्वाप्य परिनिर्वाप्य- कोमल वचः सलिनसेकेन कपापान्ति सन्तप्त सर्वतः शीतलीकृत्य द्वितीयमपिवारं तमेवगणं स प्रतिनिर्यातयः, नेतव्यः स्यात् । यथा वा तस्य गणस्य प्रोतिकं स्यात् तथा कर्तव्यम् ।। एप सूत्रार्थः ।।५।। मूल-"मिस्खू य उग्गय वित्तीए अणथमिय संकप्पे संथडिए निधि- तिगिच्छे असणं वा ४ पडिग्गाहित्ता आहारं आहारेमाणे अहपच्छा जा- णिज्जा-अणुग्गए सरिए अथमिए वा, से जं च मुहे जं च पाणिसि जंच पडिग्गहे तं विगिंचमाणे वा विसोहेमाणे वा नो अइक्कमइ, तं अप्पणा भुजमाणे अएरणेसिं वा दलमाणे राइभोयण पडिसेवणप्पत्ते आगज्जड़ चाउम्मासियं परिहारहाणं अणुग्याइयं ।। ६॥ (१) मूल-"भिक्खू य उग्गय वित्तीए अणत्थगिय संकप्पे संथडिए विति- गिच्छासमावन्ने असणं वा ४ पडिग्गाहित्ता आहारं आहारमाणे जाव अन्नेसिं वा दलमाणे राइमोयण पडिसेयणप्पत्ते पावज्जइ चाउस्मासिचं परिहारहाणं अणुग्याइयं ॥ ७ ॥ (२) मूल-"भिक्खू य उग्गयवित्तीए अणथमियसंकप्पे असंथडिए निव्व्-ि तिगिच्छे असणं वा ४ पडिगाहित्ता आहारं आहारेमाणे जाव अन्नेसिं वा दलमाणे राइभोयण पडिसेगणप्पत्ते आवज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अपुग्पाइयं ।। ८ । (३) ३० पंचमोद्देशकः मूल-"भिक्खू य उग्गयवित्तीए अणथमियरकप्पे असंथडिए बि- इगिच्छासमावन्ने असणं वा ४ पडिगाहित्ता आहारमाहारेमाणे जाव अन्नेसिं गा दलमाणे राइभोयण पडिसेवणप्पत्ते बावज्जइ चाउम्मासियं परिहारद्वाणं अणुग्याइयं ।। ६ ॥ (४) टीका-भिक्षुः पूर्ववर्णितः, चशदादाचार्य उपाध्यायश्च परिगृह्यते, उद्गत आदि- त्ये वृत्तिः-जीवनोपायो यस्य स उद्गतवृत्तिका, पाठान्तरं वा-उग्गयमुत्तीए त्ति, मूर्तिः शरीरम् , उद्गते रचौ प्रतिश्रयावग्रहाद् बहिः प्रचारवती मूर्तिरस्य इति उद्गतमूर्तिकः-मध्यमपदलोपी समासः। अनातमिते सूर्ये सङ्कल्पो-भोजनाभिलापो यस्य सोऽनस्तमित सङ्कल्प: । संस्तृतो नाम-समर्थम्तदिवसं पर्याप्त भोजी वा । नि- वितिगिछे इति विचिकित्सा चित्तविप्लुतिः-सन्देह इत्येकोऽर्थः, सा निर्गता यस्मात् स निर्विचिकित्सः-उदितोऽनस्तमितो वा रविरित्येवं निश्चयवान् इत्यर्थः । एवंविध विशेषणयुक्तोऽशनं वा पानं वां खादिमं वा स्वादिमं वा प्रतिगृह्य आहारम् ‘ाहरन्' भुञ्जानोऽथ पश्चादेवं जानीयात्-अनुद्गतः सूर्योऽस्तमितो वा । एवं विज्ञाय 'से' तस्य यञ्च मुखे प्रतिक्षिप्तं यच्च पाणावुत्पाटितं यच्च प्रतिग्रहे स्थितं तद् विविञ्चन् वा (विविचन् वा) परिष्ठापयन् 'विशोधयन् वा निरवयवं कुर्वन् 'नो' नैव भगवतामाज्ञा- मतिकामति । तद् अशनादिकम् आत्मना भुञ्जानोऽन्येषां वा ददानो रात्रिभोजन- प्रतिसेवन प्राप्त आपद्यते चातुर्मासिकं परिहारस्थानमनुद्घातिकम् ॥ ६॥ १॥ एवमपरमपि सूत्र त्रयं मन्तव्यम् । नवरं द्वितीय सूत्रे-संस्तृतो-विचिकित्सा- समापन्नश्च यो भुक्ते । विचिकित्सा-समापन्नो नाम 'किमुदितोऽनुदितो वा रविः' ? अथवा-अस्तमितोऽनस्तमितो वा ?, इति सन्देदोलायमानमानसः। एवं भुञ्जा- नस्य अन्येपां वा वानस्य चतुर्गुरुकम् ॥ ७ ॥२॥ तृतीय सूत्रे 'असंथडिये' इति 'असंस्तृतः' अध्वप्रतिपन्नः क्षपको ग्लानो वा भएयते, स निर्वि चिकित्सः, नियमानुद्गतोऽस्तमितो वा रविः इत्येवं निस्सन्देहं जानानो ? (जानन् ) यदि भुक्ते तदपि चतुर्गुरुकम् । शेपं प्रथम सूत्रवत् ॥ ८ ॥ ३ ॥ चतुर्थ सूत्रे-असंस्तृतो विचिकित्सासमापन्नश्च यो भुक्ते स पापद्यते चातु- मासिकं परिहारस्थानमनुद्घातिकम् ।। एप सूत्र चतुष्टयार्थः ॥ ६ ॥ ४ ॥ मूल-"इह खलु निग्गंथस्स चा निग्गंथीए वा राओ वा वियाले वा हत्कल्पनूयमः सपाणे सभोयणे उग्गाले आगच्छेजा, तं विगिचमाणे वा विसोहेमाणे वा नो अऽक्कमइ । तं उम्मिलित्ता पचोगिलमाणे राइभोयण पडि.सेवाप्पत्त आरज्जइ चाउम्मासियं परिहारहाणं अगुवाइयं ॥ १० ॥ टीका--इह, अस्मिन् मौनीन्द्र प्रवचने, ग्रामादौ वा वर्टमानन्य स्खलु , वाक्या लङ्कारे निम्रन्थस्य वा निम्रन्ध्या वा रात्री वा धिकाले वा सहपानेन सपानः सह भोजनेन. सभोजन उद्गार आगच्छन् । किमुक्त भवति ? सिक्थ. विरहितमेकं. पानीय मुद्गारेण सहागच्नति, कूर सिक्थं वा केवलमागच्छति, कदाचिंदुभयं का। र.मुद्गारं विविञ्चन् चा सकृत्परित्यजन् 'विशोधयन् वा बहुशः. परित्यजन नो श्राज्ञामतिकामति' तमुद्गीर्य 'प्रत्यवगिजन्' भूयो यारवादयन, अापद्यते चातुर्मा- सिकं परिहारस्थानमनुद्घातिकमः। एप सूत्राऽर्थ. ॥ १० ॥ मूल-निग्गयस्स य गाहावकुलं पिंडवाय पडिराए. अणुरविहस्स अंतोपडिग्गहंसि पाणाणि वा वीयाणि वा रए. वा. परिवारजोना, तं च संचाएइ विगिचित्तए वा विसोहितए वा, तं. पुवामे लाड्या विसोहिया तो संजतामेव भुजेज वा पिएज्ज वा । तं. च नो. संचाएइ विगिचित्तर. वा विसोहित्तर वा तं नो अप्पणा भुजेज्जा नो अन्नेसि दावए एगने बहु- फासुए परसे पडिलेहित्ता पमन्जित्ता परिदृविगव्य सिया ॥ ११ ॥ टीका-निर्ग्रन्थस्य गृहपतिकुलं पिण्डतप्रतिज्ञया अनुप्रविष्टस्याऽन्तः प्रतिग्रहे. प्राणा वा बीजानि वा रजो वा परि-समन्तादापतेयुः । 'तच्च प्राणादिकं यदिशक्नोति विबेक्तं वा विशोधचितुवा ततः-'तत्-प्राणादिजातादिकं लात्वा-हस्तेना गृहीत्या विशोध्य २-सर्वथैवापनीय ततः संयत प्रयत्नपारः एव भुञ्जीतः वा पिवेद्वा। तच्च न शक्नोति विवेक्तुं चा विशोधयितुं वा तन्नात्मना भुञ्जीत, नवाऽन्येषां दद्यात , किन्तु एकान्ते वहुप्राशुके प्रदेशे प्रत्युपेक्ष्य प्रमृज्य परिष्टापवितव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ॥११॥ मूल-"निग्गंथस्स य गाहावइकुलं पिंडवाय पडियाए अणुप्पविट्ठस्स. अंतोपडिग्गहगंसि दए वा दगरएवा दगफुसिए वा परियावज्जेज्जा, से य. उसिरणे भोयणजाते भोत्तव्ये सिया, से य सीए भोयणजाते तं नो अप्पणा मुजेजा, नो अन्नेसिं दावए, एगते बहुफासुए पदेसे परिट्टवेयच्चे सिया।१२॥

पंचमोद्देशक: टीका -निर्ग्रन्थस्य गृहपतिकुलं पिण्डपात प्रतिज्ञयाप्रविष्टस्यान्तःप्रतिग्रहे भक्त- पानमध्ये 'दकं वा' प्रभूताप्कायरूपं दकरजो वा, उदकबिन्दुः 'दकस्पर्शितं वा, उदकशीकराः पर्यापतेयुः। तच्चोष्णं भोजनजातं ततो भोक्तव्यस्यात् । अथ शीतं तद् भोजनजातं ततस्तन्नात्मना भुञ्जीत, नान्येपांदयात, एकान्ते बहुप्राशुके प्रदेशे परिष्ठापयितव्यं स्यादिति सूत्रार्थः ॥ १२ ॥ मूल-निग्गंथीए रामो वा वियाले वा उच्चारं वा पासवणं वा बिगिच माणीए वा विसोहेमाणीए वा अन्नयरे पसुजाइए वा पक्खिजाइए वा अन्न परं इंदियजायं परामुसेज्जा, तंच निग्गंथी साइजेज्जा, हत्थकाम पडिसेवणप्पत्ता पावज्जइ मासियं अणुग्धाइयं ।। १३ ॥ मूल-निग्गयीश्री रामो वा वियाले वा उच्चारं वा पासवणं वा विगिंचमाणीए वा विसोहेमाणीए या अन्नयरे पसुजाइए वा पक्खिजाइ- ए वा अन्नयरंसि सोयंसि ओगाहिज्जा, तंच निग्गंथी साइज्जेज्जा, मेहुण- पडिसेवणप्पत्ता आवज्जइ चाउमासियं अणुग्याइयं ॥ १४ ॥ टीका-निर्ग्रन्थ्या रात्रौ वा विकाले वा उच्चारं वा प्रस्रवणं वा विविचिन्त्या वा विशोधयन्त्या वा अन्यतरः पशुजातीयो वा वानरादिकः पक्षिजातीयो वा, मयूरादि- कोऽन्यतरदिन्द्रिय जातं 'परामृशेत् ,स्पृशेत् , सा च निर्ग्रन्थी तं च स्पर्श स्वादयेत्- सुन्दरोऽत्य स्पर्श इत्यनुमत्येत, हस्तकर्म प्रतिसेवन प्राप्ता प्रापद्यते मासिकमनुद्- घातिकं स्थानम् । इह निर्ग्रन्थीनां परिहारतपो न भवतीति कृत्वा 'परिहारद्वाणं' इतिपदं न पठनीयम् ॥ एवं द्वितीयसूत्रमपि व्याख्येयम् । नवरम्-स्रोतसि-योन्यादौ वानरादिरवगाहेत । सा च मैथुन प्रतिसेवनप्राप्ता यदि स्वादयेत् ततश्चतुर्गुरुकमिति सूत्रार्थः ॥ १३॥ १४॥ मूल-नो कप्पइ निगंथीए एगाणियाए गाहावइकुलं पिंडवाय पडि- याए निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा, बहिया बियार भूमि वा विहारभूमि वा निक्खमित्तए वा पविसित्तए वा एवं गामाणुगामं वा दूइज्जित्तए वासा- चास वा पत्थए ।॥ १५ ॥ दीका-नो कल्पते निम्रन्ध्या एकाकिन्या गृहपतिकुलं पिण्डपात प्रतिज्ञया निक वृहत्कल्पमूत्रम् मितुवा प्रवेष्टु वा वहिर्विचारभूमौ वा विहारभूमौ वा निष्क्रमितुवा प्रवेष्टुवा प्रामानुपामं वा द्रोतु-विहर्तुम् वर्षावासं वा वस्तुमिति सूत्राऽर्थः ॥ १५ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए अचेलियाए हुँ (हो) तए ॥ १६ ॥ टीका-नो कल्पते निर्घन्ध्या अचेलिकाया वस्त्ररहिताया भवितुमिति एपसूत्राथं ॥१६॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए अपाइयाए हुतए ॥ १७ ॥ टीका-नो कला निर्गन्धया अपात्रायाः-पात्र रहिताया भवितुमिति सूत्रार्थः ।१७। मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए वोसहकाइयाए हुतए ।॥ १८ ॥ टीका-नो कल्यते निर्मथ्या व्युत्सृष्टकायिकायाः- परित्यक्तदेहाया भवितुमिति सूत्रार्थः ॥ १८ ॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंथीए बहिया गामस्स वा जाव सन्निवेसस्स वा उड्ढं बाहाम्रो पगिन्मिय पगिजिमय सुराभिमुहीए एगपाझ्याए ठिच्चा पायावणाए आयावित्तए । कप्पइ से उबस्सयस्स अंतोवगडाए संघाडिपडिवद्धाए पलं- विय वाहियाए समतल पाइयाए ठिच्चा पायावरणाए आयावित्तए ॥१६॥ टीका-नो कल्पते निर्ग्रन्थया बहिामस्य वा यावत्संनिवेशस्य वा ऊर्द्ध वम्- ऊर्द्ध वाऽभिमुखौ बाहू प्रगृह्य-प्रगृह्य प्रकर्षण गृहीत्वा-कृत्वेत्यर्थः । सूर्याभिमुख्या एक पादिकायाः, एकंपामुई वं कृत्वाऽऽकुच्य च अपरमेकं पादं भुविकृतवत्या एवंविधायाः स्थित्वाऽऽतापनयाऽऽतापयितुम् । किन्तु कल्पते से-तस्या उपाश्रयस्याऽन्तर्वगडायां (सवाटी प्रतिवद्धायाः) प्रलम्बित बाहायाः समतल पादिकायाः स्थित्या आताप- नया आतापयितुमिति सूत्रार्थः ।। १६ }} मूल-नो कप्पड़ निग्गंथीए ठाणाझ्याए हुतए ॥ २० ॥ मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीए पडिमट्ठाइयाए हुँतए ॥ २१ ॥ मूल-"एवं ने सजियाए ॥ २२ ॥ उक्कुडुगासणियाए ॥२३॥ चीरा- सणियाए ॥२४|| दंडासणियाए ॥२॥ लगंडसाइयाए ॥२६॥ प्रोमंथि- याए ॥२७॥ उत्ताणियाए।॥२८॥ अंबखुज्जियाए॥२६॥ एगपासियाए।३० दोका-नो कल्पते निर्ग्रन्थयाः स्थानायताया भवितुम् ॥ २०॥ एवं प्रतिमास्था. यिन्याः । नैपधिकायाः। उत्कंटिकासनिकायाः । वीरासनिकायाः। दमानिया -- पंचमोद्देशकः लगण्डशायिन्याः । अवाङ मुखायाः । उत्तानिकायाः । आम्रकुग्जिकायाः । एक- पार्श्वशायिन्याः ॥ इति सूत्राक्षरार्थः ॥२१-२२-२३-२४-२५-२६-२७-२८-२६-३०॥ मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीणं अाकुचणपट्टगंधारित्तर वा परिहरि- तए वा । कप्पइ निग्गंथाणं श्राकुचणपट्टगं घारित्तए वा परिहरित्तर वा।३२॥ टीका-“नो कल्पते निर्ग्रन्थीनाम् अाकुञ्चनपट्ट-पर्यस्तिकापट्ट धारयितु वा परि- हर्तुं वा । कल्पते निर्ग्रन्थानामाकुञ्चनपट्ट धारयितुवा परिहतुं वेति सूत्रार्थः ॥३१ । मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीणं सावस्सयंसि पासणंसि आसइत्तए वा तुयट्टित्तर वा । कप्पइ निग्गंथाणं सावस्सयंसि पासणंसि आसइत्तए वा तुयट्टित्तएवा ॥३२॥ टीका--सावश्रयं नाम-यस्य पृष्ठतोऽवष्टम्भो भवति, एवंविधे आसने निर्ग्रन्थीनां नोकल्पते आसितु वा त्वग्वर्तितुवा कल्पते निर्ग्रन्थानां सावश्रये आसने आसितुवा त्वग्वर्तितु वा निग्रन्थ्यस्तु तादृशे आसने यदि उपविशन्ति शेरते वा तदा त एवं गर्वाद्यो दोपाश्चतुरु च प्रायश्चित्तम् । द्वितीयपदेऽल्पसागारिके स्थविरा ग्लाना वा उपविशेयुः । निर्ग्रन्थानामपि न कल्पते । यदि उपविशन्ति तदाचतुर्लघु । सूत्रंतु कार- णिकम् । तदेव कारणमाह--"सावस्सए इत्यादि पश्चार्द्धम् । यो वृद्धाचार्यः सः 'पूर्वकृते' गृहस्थैः स्वार्थ सम्पादित सावश्रयेऽप्यासने उपविष्टः 'असागारिके एकान्ते वाचयेत् विनेयानां वाचनां दद्यात् ।। ३२ ॥ मूल-"नो कप्पइ निग्गंथीणं सविसाणंसि पीढ़सि वा फलगंसि वा आसइत्तए वा तुयट्टित्तए वा । कप्पइ निग्गंथाणं सविसाणंसि पीढंसि वा फलगंसि वा श्रासइत्तए वा तुयट्टित्तए वा ॥३३॥ टीका--सविपाणं नाम-यथा कपाटस्योभयतः शृङ्ग भवतः एवं यत्र भिसिकादौ पीठे फलके वा विषाणं शृङ्ग भवति तत्र निर्ग्रन्थीनामासितुवा शयितु वा न कल्पते । निम्रन्यानां तु कल्पते । निन्थ्यस्तु सविपाणे पीठे फलके वा यापविशन्ति शेरते वा तदा चर्तुगुरु प्राज्ञादयश्च दोपाः !! ३३ ॥ मूल-नो कप्पड़ निग्गंथीणं सवेंटयं लाउयं धारित्तए वा परिहरित्तए वा । कप्पड़ निग्गंथाणं सवेंटयं लाउयं धारित्तए वा परिहरित्तए वा ॥३४|| टीका-अस्य व्याख्या सुगमा । नवरम्-'सटियं नाल्युक्तमलावुकं तन्निर्ग्रन्थीनां न कल्पते । निर्ग्रन्थानान्तु कल्पते ॥ ३ ॥ । ।

यहत्तरपत्रम मूल-नो कापइ निग्गंथीणं सर्वटियं पायकसरियं धारिता वा परिहरि- तए वा । कप्पइ निग्गंयाणं सवेंटियं (टया ) पाद मरिगं (स्था) धारित्तए वा परिहरितए वा ॥ ३५ ॥ टोका-नो कल्पते निग्रन्थीनां सवृन्तिका पादकसरिका' धारगितु वा परिहर्नया । कल्पते निम्रन्थानां सन्तिका पादकसरिका धारयितु वा परिहर्नु वा ।। ३५ । मूल-नो कप्पइ निग्गंथीणं दारुदंडयं पायपुंकणं धारिनग वा परि- हरित्तए वा । कप्पड़ निग्गंथाणं दारुदंडयं जाव परिहरितए वा ।। ३६ । टीका--यत्र दारुमयस्य दण्डत्याप्रमागे शिका दशिका बध्यन्ते तद्दान्दा एडकं पादप्रोञ्छनमुच्यते । तद् निम्रन्थीनां न कलते । निग्रन्थानां तु कल्पते ।। ६६ ।। मूल-नो कप्पड निग्गंधाण वा निग्गंथीण वा अन्नमन्नस्ल मोयं आइ- यत्तए वा आइमित्तए वा नन्नत्थ गाढाऽगाहेसु रोगायंकेसु ।। ३७ ।। टीका-नो कल्पते निर्घन्धानां वा निग्रन्थीनां वा अन्योन्यस्य-परस्परस्य मोकगा- पातु वा श्राचमितुवा । किं सर्वथैव ? न, इत्याह-गाढाः-अहि-विप-विसृचिका- यः अगाढाश्च, ज्वरादयो रोगातकास्तेभ्योऽन्यत्र च कल्पते, तेषु तु कल्पते, इत्यर्थः । एप सूत्रार्थः ॥ ३७॥ मूल-नो कप्पइ निग्गंयाण वा निग्गीण वा पारियासियस्स पाहार- स्स जाव तयप्पमाण मित्तमवि भूइप्पमाण भित्तमवि विन्दुप्पमाण मित्तमवि आहारं आहरित्तए, नन्नत्थ आगासु रोगायकसु ।। ३८ ॥ टीका--नो कल्पते निर्ग्रन्थानां वा निग्रन्थीनां वा परिवासितस्य, रजन्यां स्था- पितस्याहारस्य मध्यात् त्वक् प्रमाणमात्रमपि भूति प्रमाणमात्रमपि बिन्दु प्रमाण मात्रगपि याबदाहारमाहर्तुम् । इह त्वक् प्रमाणमात्र नाम-तिलतुषत्रिभागमात्रम् सच्चाशनस्य घटते, भूति ( भस्म) प्रमाणमात्रं सक्तुकादीनां नेयम् । बिन्दु प्रमाण मात्रं पानकस्य । इमेवाऽपवदति-आगाढेभ्यो रोगाऽऽतङ्केभ्योऽन्यत्र न कल्पते । तेषु पुनः कल्पत इति सूत्रार्थः ॥ ३८ ॥ ?

पंचमोद्देशकः मूल-नो कप्पड निरगंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासिएणं आलेषण जाएणं (गायाई) आलिंपित्तए वा विलिपित्तए वा नन्नत्थ आगादेहि रोगा- घंकेहि ॥ ३8 ।। टीका--नो कल्पते निग्रन्यानां वा निर्ग्रन्थीनां वा परिवासितेनाऽऽलेपनजातेन 'आलेपयितु' वा ईपल्लेपयितुवा, विलेपयितुवा-विशेषेण लेपयितु वा नाऽन्य- प्राऽऽगाढेभ्यो रोगाऽऽतङ्कभ्य इति सूत्रार्थः ॥ ३६ ॥ मूल-नो कप्पड निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा पारियासिएणं तेल्लेण चा घएण वा नवणीएण वा वसाए वा गायं अभंगित्तए वा मक्खित्तए वा नन्नत्थ गाढागादेहि रोगायंकेहिं ।। ४० ॥ टीका~-नो कल्पते परिवासितेन तैलेन वा घृतेन चा नवनीतेन वा वसया वा गात्रम् 'अभ्यङ्गितुवा, बहुकेन तैलादिना, म्रक्षितुवा-स्वल्पेन तैलादिना, नान्यत्र गाढाऽगाढेभ्यो रोगातभ्यः तान मुक्त्वा न कल्पते । दोषाश्चात्र त एव सञ्चयादयो मन्तव्याः॥४०॥ , मूल-"परिहार कप्पट्ठिए भिक्खू चहिया थेराण वेयावडियाए गच्छे- ज्जा, से य ाहच्च अइक्कमेज्जा, तं च थेरा जाणेज्जा, अप्पणो आग- मेणं अन्नेसिं चा अंतिए सोमोचा तो पच्छा तस्स अहालहुस्सए नाम नवहारे पट्टवियन्ने सिया ।। ४१ ।। टीका-परिहार कल्पस्थितो भिक्षुः बहिः अन्यत्र नगरादौ स्थविराणान प्राचार्याणामादेशेन वैयावृत्य(त्या)थं गच्छेत् , किमुक्तं भवति ? अन्यस्मिन् गच्छे केपां- चिदाचार्याणां वादी-नास्तिकादिक उपस्थितः, तेपां च नास्ति वादलब्धिसम्पन्नः, ततस्ते येपामाचार्याणां स परिहारिकस्तेपामन्तिके संवाटकं प्रेषयन्ति, सच संघाटको व्रते-वादिनं कमपि मुत्कलयत । एवमुक्ते ते-आचार्याः परिहारिकं परचादि निग्रह- क्षमं मत्वा तत्र प्रेपयन्ति। ततस्तदादेशादसौ परिहार तपो वहमान एव तत्र गच्छेत् । इदंच महत्प्रवचनस्य-वैयावृत्यंयद् अग्लान्या परवादि निग्रहणम् । ततस्तदर्थं गतः स पारिहारिकः अाहच्च, कदाचित् अतिक्रामेत् , पाद्धावनादिकं प्रतिसेवेत, तच्च प्रतिसेवनं 'स्थविरा' गौलाचार्या पात्मनः. 'आगगेन' अवध्यातिशयज्ञानेन बृहत्कल्पसूत्रम अन्येषां वाऽन्ति के श्रुत्वा जानीयुः ? ततःपश्चात् तत्परिज्ञानाऽन्तरं 'तस्य' पारिहारि- कस्य 'यथालघुत्वको नाम, स्तोक प्रायश्चित्तरूपो व्यवहारः प्रस्थापयितव्यः स्यादिति सूत्रार्थः ॥ ४१॥ मूल-"निग्गंथीए य गाहावइकुलं पिंडवायपडियाए अणुप्पविठ्ठाए अन्नयरे पुलागभत्ते पडिग्गाहिए सिया, सा य संथरिज्जा, कप्पड़ से तदि- वसं तेणेव भत्तटठेणं पज्जोसवित्तए, नो से कप्पइ दोच्चंपि गाहावलं पिंडवाय पडियाए पविसित्तए, सा य नो संथरेज्जा, एवं से कप्पड़ दोच्चं पि गाहावइकुलं पिंडाय पडियाए पविसित्तए ॥ ४२ ॥ टीका--निर्यन्ध्या गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञयाऽनुप्रविष्टया 'अन्यतरद् धान्य गन्ध-रसपुलाकानां-वल्ल विकट दुग्धादिरूपाणामेकतरं पुलाकभक्त प्रतिगृहीतं स्यात् , साच तेनैव मुक्तेन 'संस्तरेत्' दुर्भिक्षाद्यभावात् -निर्वहेत् , ततः कल्पते तस्यास्तद्दिवसे 'सं०' तेनैव भक्तार्थेन 'पर्युषितुम' निर्वाहयितुम् । नो से-तस्याः कल्पते द्वितीयमपिवारं गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञया प्रवेष्टुम् । अथ सानसंस्तरेत्, ततः कल्पते तस्या द्वितीयमपि वारं गृहपतिकुलं पिण्डपातप्रतिज्ञया प्रवेष्ट मिति सूत्रार्थः ॥ ४२ ॥ "इति बृहत्कल्पसूत्रस्य पञ्चमोद्देशकः समाप्तः" अथ षष्ठ उद्देशकः मूल-"नो कप्पइ निग्गंथाण वा निग्गंथीण वा इमाइ छ अवयणाई घाए, तं जहा-अलिया.यणे १ हीलियवयणे २ खिसियवयणे ३ फरुस- बयणे ४ गारस्थियवयणे ५ 'विउसवियं वा पुणो उदीरित्तए ॥ १ ॥ टोका--पञ्चमोद्देशकस्यादिसूत्रं उक्तम्---"देवः स्त्रीरूपं कृत्वा साधु भोगै- निमन्त्रयेत्' सच तान् मुक्त वा गुरुसकाशमागत आलोचयेत्-दिव्योगैः 'छन्दितः' निमन्त्रितोऽहं परं मया ते भोगा नेप्सिताः 'इति एवं गौरवेग कश्चिदलीकं वदेत् । अत इदं षष्ठोद्देशकस्यादिसूत्रमारभ्यते । अनेन सम्बन्धेनायातस्यास्य व्याख्या- 'नोकप्प०' इति वचनव्यत्ययात्--नो कल्पन्ते निम्रन्थानां निर्ग्रन्थीनां चा इमानि प्रत्यक्षाऽऽसन्नानि षडिति-पटसंख्याकानि अवचनानि-नञः कुत्सार्थत्वात् अप्रशस्तानि वचनानि वदितु-भापितुम् । तद्यथा-अलीकवचनं १ हीलितवचनं २ खिसिनवच- नं ३ परुपवचनं ४ आगारिणो (आगारेस्थिताः)गृहिण:-तेषांवचनं ५ व्यवशमितं वा, उपशमितमधिकरणं पुनभूयोऽप्युदीरयितुन कल्पते इतिप्रक्रमः । अनेन व्यवशमितस्य पुनरुदीरणवचनं नाम षष्ठमवचनमुक्तम् इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। १ ।। मूल-"कप्पस्स छ पत्थारा पन्नत्ता, तं जहा–'पाणाइवायरस वायं वयमाणे १ मुसावायरस वायं चयमाणे २ अदिन्नादाणस्स चायं वयमाणे ३ अविरइय' वायं क्यमाणे ४ अपुरिस वायं वयमाणे ५ दासवायं चयमाणे ६ इच्चेते कप्पस्स छ पत्थारे पत्थरेत्ता सम्म अप्पडिपूरेमाणे तहाणपत्चे सिया ।। २॥ टीका--कप्पस्स-कल्पः-साधुसमाचारः, तस्य सम्बन्धिनः तद्विशुद्धिकारणत्वात् प्रस्ताराः-प्रायश्चित्तरचना विशेषाः पड्विधाः प्रज्ञप्ताः, तद्यथा-पाणाइ०-प्राणाति- १--विओतवियं मा० भा० । २--मविरक्या आ० भा०।

वृहत्कल्पसूत्रम् यन्, पातस्य बादं बातों वाचं वा वदति साधौ प्रायश्चित्तप्रस्तारो भवतीत्येकः ॥ १ ॥ सुमा०-एवं मृवावादस्य वादं वदति द्वितीयः ।। २ ।। अदि०-अदत्तादानस्य वाद घदति तृतीयः ॥ ३ ॥ अवि.-'अविरनियते यद्वा न विद्यते विरतिरस्याः सा अवि- रतिका स्त्री सेवारूपं तद्वादं वदति चतुर्थः ॥४॥ अपु०-अपुरुष:-नपुंसकः तद्वावं धति पञ्चमः ॥ ५॥ दास-दासबादं वदति पष्ठः ॥ ६॥ इच्चेते-इतीति उपदर्शने-एवं प्रकारान् एतान् पट कल्पस्थ पत्थ० प्रस्तारान् प्रायश्चित्तरचनाविशेषान् मासगुर्वा- दयः पारञ्चिकपर्यन्ताः (तान ) पत्थरे-प्रस्तीर्य । अभ्युपगमनम् ( अभ्युपगम्य } प्रात्मनि प्रस्तुतान् विधाय प्रस्तारथिता वा अभ्याख्यान दाता साधुः सम्यगप्रतिपूर- अभ्याख्येयार्थत्यासद्भूततया अभ्याख्यान समर्थनकर्तुमशक्नुवन् । तस्यैव प्रारणातिपातादिकर्तुरिच स्थान प्राप्तः तत् स्थानप्राप्तः स्यात् , प्राणातिपातादिकारीव इण्डनीयो भवेत् इति भावः । अथवा प्रस्तारान् प्रस्तीर्थ विरचय्य आचार्येण अभ्याख्यान दाता अप्रतिपूर्यन अपराऽपर प्रत्ययवचनैस्तमर्थ सत्यमकुर्वन् 'तहाण- तत्स्थान प्राप्तः कर्तव्य इति शेषः । यत्र प्रायश्चित्तपदे विवमानोऽवतिष्ठते-न पदान्तर- मारभ्यते तत्पदं प्रापणीय इतिभावः । एप सूत्रार्थः ॥२॥ मूल-"निग्गंथस्स य अहेपायंसि खाणू वा कंटए वा हीरे वा सकरे वा परियावज्जेज्जा, तं च निग्गंथे नो संचाएज्जा नीहरित्तर वा विसोहेशए था, तं च निगथी नीहरमाणी वा विसोहेमाणी वा णाइक्कमइ ।। ३ । मूल-"निग्गंथस्स य अच्छिसि पाणे वा बीए वा रए वा परियावज्जे- ज्जा, तं च निग्गंथो नो संचाएज्जा' नीहरिशए वा विसोहेलए वा, च निग्गंथी नीहरमाणी वा चिसोहेमाणी वा णाइक्कमइ ।। ४ ।। मूल-"निग्गंथीए य अहेपायंसि खाणू वा कंटए चा हीरे वा सक्करे वा परियावज्जेज्जा, तं च निग्गंथी नो संचाएज्जा नीहरिचए वा विसो- हित्तए बा, तं च निगये नीहरमाणे वा विसोहेमाणे वा णाइक्कमइ ।।५}}. मूल-"निग्गंथीए य अच्छिसिपाणे वा वीए बा रए वा परियावज्जे- जा तं च निगगंथी नो संचाएंइ नीहरित्तए वा विसोहितए वातं च निग्गंथे नीहरमाणे वा विसोहेमाणे वा णाइक्कमइ ।। ६ ।। १-गविरतिः अब यहान विद्यते विरतिरका सा मदिरनिका बी आल मा. २-संवा. लि. ३ हीर९ भा. भा. 1 । तं ६० पष्टोद्देशकः - अस्य सूत्र चतुष्टयस्य व्याख्या- टीका--निग्ग-~-निर्ग्रन्थस्य अधः पादे-पादतले स्थाणुर्वा कण्टको वा हीरो वा काचविशेषो पा शर्करा वा पर्यापतेत्-अनुप्रविशेत , 'तंच नि:-तच्च कण्टकादिक निम्रन्थो न शक्नु यातनीह' वा-निष्काशयितुं वा 'विसोः-विशोधयितुं वा-निश्शेष- सपने तुम्"तंच नि-तच्च निग्रन्थी निहरन्ती वा विशोधयन्ती वा नासिकामति प्राज्ञा- मिति गम्यते, इति प्रथम सूत्रम् ॥३॥ टीका--निर्ग-निर्ग्रन्थस्य 'अच्छि' अक्षिण-लोचने प्राणा वा मशकादयः सूक्ष्माः 'वीए'--. बीजानि वा सुक्ष्माणि श्यामाकादीनि 'रएवा' रजो वा-सचित्तमचित्तं वा पृथ्वीरजः, 'परि०-पर्यापतेत्-प्रविशेख, तच्च प्राणादिकं निग्रन्थो न शक्नुयात् नीहर्तुमित्यादिप्राग्वत् ॥ ४॥ टीका--( तृतीय चतुर्थ सूत्रे निम्रन्थी विषये एवमेव व्याख्यात्तव्ये ) इति सूत्र चतुष्टयार्थः ।। ५॥ ६॥ मूल-"निग्गंथे निग्गंथीं दुग्गंसि वा विसमंसि वा पव्ययंसि वा 'पक्ख- लमाणि वा पत्रडमाणिं घा गिण्हमाणे वा अवलंबमाणे वा णाइक्कमइ । टीका---अस्य सूत्रत्रयस्य व्याख्या--निम्रन्थो निर्मन्थीं दुर्गे वा विषमे वा पर्वते वा, विविधञ्च भवति दुर्ग तद्यथा--वृक्षदुर्ग श्वापददुर्ग, मनुष्यदुर्ग च । यवृक्षरतीवगहनतया दुर्गमम् यत्र वा पथि वृक्षः पतितस्तयक्षदुर्गम् । यत्रव्याघ्र: सिंहादीनांभयं तत्-श्वापदुर्गम् । यत्रम्लेच्छबोधिकादीनां मनुष्याणां भयं तदु- मनुष्यदुर्गम् । एतेषु विष्वपि दुर्गेपु यदि निष्कारणे निन्थी गृहाति अबलम्बते वा तदाचतुर्गुरु । त्रिविधञ्चभवति विषमम्-भूमिविषमम, श्वापद विपमम्, मनुष्यविषम- च । भूमिविषमं नाम गर्तापापाणाद्याकुलो भूभागः, श्वापदमनुष्यविषमे तु श्वापदमनुष्यदुर्गवज्ज्ञ ये । अत्र भूमिविपमेणाधिकारः, पव्व० पर्वतपदं तु प्रतीतत्वात् न व्याख्यातम् 'पक्खलमाणं'-प्रकर्षेण स्खलद् गत्यागच्छन्ती भूमौ असम्प्राप्तां वा पतन्ती पतितुकामामित्यर्थः । पव०--प्रकण भूमौ सर्वैरपिगात्रै पतन्ती, 'गिण्ह-बाह्वादावङ्ग गृहणन · वा, अवलम्बमानो वा बाहादौगृहीत्या बृहत्कल्पसूत्रम् - मूल- धारयन् अथवा गृहणन् सर्वाङ्गीणां धारयन् , अवलम्बमानो देशतः करेण गृहणन् - साहयन् इत्यर्थः-नातिकामति स्वाचारमाज्ञां वा इति प्रथम सत्रम् ॥ ५ ॥ "निग्गंथे निग्गंथी सेयंसि वा पंकगि वा पणगंसि वा उदयंसि वा ओकसमाणिं वा अोवुझमाणिं वा गिण्हमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥८॥ टीका--व्याख्या पूर्ववत्-'नवरम्-सेयं-सेको नाम पर पनके वा सजज्ञे यत्र निमज्ज्यते तत्र वा, पंक-पङ्कः कर्दमः, तत्र वा, पनको नाम आगन्तुकः प्रतन्द्रवरूपः कर्दम एन तन बा, उदकं-प्रतीतम् , तत्र वा, उकसमा०-अपकसन्ती वा पङ्कपनकयोः परिहसन्ती' ओबुझ अपोह्यमानांवा, सेकेन-उदकेन वा नीयमानां गृह्णन् वा अव- लम्बमानो वा नातिकामति ॥८॥ - -"निग्गंथे निग्गंथिं नावं आरोहमाणिं वा उरोहमाणिं वा गि- एहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥ ६ ॥ टीका--तृतीय त्रे निर्ग्रन्थीमेव नावम् आरोह-आरोहन्तीम (आरूढमानाम) उरो० अवरोहन्तीम्-नाव्युत्तरमाणाम् , गिण्ह ८-गृह्णन् वा अवलम्बमानो वा ना कामति, इति सूत्रार्थः ॥ ६ ॥ मूल-"खित्तचित्रं निग्गंथिं निग्गथे गिएहमाणे वा अवलंवमाणे वा नाइक्कमइ ॥१०॥ टीका--खित्तचित्तं ति-क्षिप्तं-नष्टं रागभयाऽपमानै श्चित्तं यस्याः सा लिप्तचित्ता, ताम् निर्ग्रन्थीं वा निम्रन्थोगृहणानो वा अवलम्बमानो वा नातिक्रामत्याज्ञामिति सूत्रार्थः ॥ १०॥ मूल-"दित्तचित्तं निग्गंथिं निग्गंथे गिएहमाणे चा अवलंवमाणे वा नाइक्कमइ ॥११॥ टीका-दित्त-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , 'नवरम्'-दीप्तचित्ता-लाभादिनदेन पर- पशीभूतहृदया ताम् ॥ ११॥ १-परिहलतन्ती मा० भा० । २-माममाणि का भोरुममाणि वा मां. भा. ।

षष्ठोद्देशकः मूल-"जक्खाइट्ट निग्गथि निग्गंथे गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा माइक्कमइ ॥ १२॥ टीका--जवा०-अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरम्-यक्षाविष्टाम्-यक्षो देवता- पूर्वसंस्तुतादिः । तेनाऽधिष्ठिताम , इति ॥ १२ ॥ मूल-उम्मायपतं निग्गंथि निगंथे गिरहमाणे वा अवलंबमाणे वा नाइकमइ ।। १३ ।। उपसगपत्रं निग्गंथि निग्गंथे गिगहमागणे वा अवलंब- भाणे वा नाइक्कमइ ।। १४ ।। टीका~-अस्थ सूत्रद्वयस्य व्याख्या प्राग्वत् । नवरम्-उन्माप्राप्ताम् ॥ १३ ।। अवसग-उपसर्गप्राप्ताम् ।। १४ ॥ मूल-''साहिगरणं निग्गंथि निग्गंथे गिएहमाणे वा. अवलंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥ १५ ॥ टीका-साहि०-अस्य व्याख्या प्राग्बत्, अत्र भाष्यम्-उप्पन्ने इति संयत्या गृहस्थे- नसममधिकरणे उत्पन्ने द्विविधमतिक्रमं दृष्ट्वा तस्याधिकरणस्य व्यवशमनं कर्तव्यम् किमुक्त भवति ? स गृहस्थोऽनुपशान्तः सन् तस्याः संयत्याः संयमभेदं जीवितभेदं वेति द्विविधमतिक्रमं कुर्यात् , तदुपशमवितव्यमधिकरणम् । कथमित्याह-यस्तस्याः संयत्याः प्रतिपक्षो गृहस्थः तस्य प्रथमतः कोमलवचनैरनुशासनं कर्तव्यम् । तथा- प्यत्तिष्ठति भीपणं-भापणं कर्त्तव्यम, तथाप्यभिभवतो निरु भणं यस्य या लब्धि- स्तेन तया निवारणं कर्तव्यम् ॥ १५ । मूल-"सपायच्छितं निग्गंथि निग्गंथे गिएहमाणे वा अवलंबमाणे वा गाइक्कमइ॥ १६ ।।। टीका--सपाय-अस्य व्याख्या प्राग्वत, नवरम्-सा सप्रायश्चित्ता तत्प्रथमतायां प्रथमतः प्रायश्चित्ते दीयमाने भयेन-कथमहमेतत्प्रायश्चित्तं वक्ष्यामि ? इत्येवं रूपेण विपण्णा भवेत् , यदि वा प्रायश्चित्तं वहन्ती तपसा क्लान्ता भवेत् , तत्रेयं यतना- पायच्छित्ते दिएणे, भीताए विसजणं किलंताए । अणुसट्टि वहतीए, भएण खित्ताइ तेइच्छं ।। प्रायश्चित्ते दत्ते यदि विभेति ततस्तस्या भीतायाः क्लान्तायाश्च विसर्जनं, प्रायश्चित्तंमुत्कलं क्रियत इत्यर्थः ॥ अथ वहन्ती क्लाम्पत्ति ततस्तस्या. वहन्त्या अनुशिष्ट्रिीयते यथा मा भैपीः बहुगतं स्तोकं निष्ठति, यदि वा वयं साहा.

गृहरकल्पमूत्रम ६३ व्यं करिष्याम इति । अथैवमनुशास्यमाणाऽपि भयेन शितचित्ता भवति ततस्तम्या: चैकित्य-चिकित्सायाः कर्म कर्तव्यम् ॥ १६॥ मूल-"भत्तपाण पडियाइक्वियं निर्गथि निग्गंथे गिरहमाणे या अव- लंबमाणे वा नाइक्कमइ ॥ १७ ॥ टीका--मन्नपाण-'अस्य व्याख्या प्राग्वत् , नवरम भक्त च पानं च भक्तपाने ते प्रत्याख्याते यया सा तथोक्ता । क्तान्तस्य परनिपातः सुखादिदर्शनात ।। १७ ।। मूल-'अट्ठजायं' निग्गथि निग्गंथे गिराहमाणे वा अवलंबमाणे वा गाइक्कम ॥ १८ ॥ टीका---'अहजा०'-अस्य व्याख्या प्राग्वत् । साम्प्रतम् अर्थजातशब्द व्युत्पत्ति- प्रतिपादनार्थमाह--श्रीणत्ति-अर्थेन-अथितया संजातं कार्य यया । यद्वा अर्थेन- द्रव्येण जातम् उत्पन्न कार्य यस्याः सा अर्थजाता गमकत्वादेवमपि समासः । उपल- क्षणमेतत् , तेनैवमपि व्युत्पत्तिः कर्त्तव्या-'अर्थः प्रयोजनं जातोऽस्या इति श्रर्थजाता । कथं पुनरस्या अवलंबनं क्रियते ? इत्याह तां पुनः प्रथमव्युत्पत्तिमूचितां संयम भावात् चाल्यमानाम् द्वितीय तृतीय व्युत्पत्तिपक्षे तु द्रव्याऽभावेन प्रयोजनाऽ. निष्पत्या वा सीदन्ती समवलंबेत-साहाय्यकरणेन सम्यग् धारयेत्, उपलक्षणत्वाद गृह मीयादपि ॥१८॥ मूल-"छ कप्पस्स पलिमंथू पएणत्ता तंज्जहा कुकुइए संजमस्स पलि- मंधू १ मोहरिए सञ्चवयणस्स पलिमंथू २ तितिणीए एसणा गोयरस्स पलिमथू३ चक्खूलोलुए इरियावहियाए पलिमंथूट इच्छालोभए मुत्तिमग्गस्स पलिमंथू ५ भिज्जा' नियाणकरणे मोक्खमग्गस्स पलिमंथू ६ सव्वत्थ भगवया अणि- याण्या पसत्था ॥ ११ ॥ टीका-छकप्परस०- पडिति पटसंख्या कप्प-कल्पस्य कल्पाध्ययनोक्त साधुसमा- चारस्य परिः-सर्वतो मश्नन्ति बिलोडयन्ति (इति) परिमन्यवः, उणादित्वात. ' प्रत्ययः। पाठान्तरेण परिमन्था वा व्याघातकाः इत्यर्थः । प्रज्ञप्तास्तीर्थकरादिभिः प्रणीताः, तद्यथा कुकु०-कुचणअवस्यन्दने इतिवचनात् कुत्सितम्-अप्रत्युपेक्षि- १ मजायम्मि मा० भाप ! २ भुजो मा भा० ।

६४ पष्टोद्देशकः तत्त्वादिना, कुचितम्-अवस्यन्दितं यस्य स कुकुचितः स एव प्रज्ञादिदर्शनात् स्वार्थिकाण प्रत्यये कौकुचितः, कुकुचा वा अवस्यन्दितं प्रयोजनमस्येति कौकुचिकः, ससंयमस्य पृथिव्यादिरक्षणरूपस्य परिमंथो व्याघातकारी ॥१॥ मोहरी-मुख-प्रभूत भापण ति. शायिवदनमस्यास्तीति, मुखरः स एव मौखरिको बहुभाषी । विनयादेराकृतिगणत्वा- दिकन् प्रत्ययः । यद्वा मुखेन अरिमावहतीति व्युत्पत्त्या निपातनान्मौखरिकाः, सत्यवचनस्य मृपावाद विरतेः परिमन्थुः । मौखये सति मृपावाद सम्भवात् ।। २ ।। चक्खु:-चक्षुपा लोलःचञ्चलो यद्वा चक्षुः लोलंयस्य स चक्षुलोलः सन् स्तूप देवकुलादीनि विलोकमानो व्रजति, ईर्यागमनम्-तस्याः पन्थाः ईर्यापथः तत्रभवा या समितिः सा ऐपिथिकी-ईर्यासमितिः, तस्याः परिमन्थुर्भवति ॥ ३ ॥ तितिणि-तिन्तिनीकः-- आहाराद्यभावे खेदात् , यत्किञ्चनाभिधायी, स एपणा-उद्गमादिदोषविमुक्त- भक्तपानादिगवेपणारूपा तत्प्रधानो यो गोचरः गौरिव मध्यस्थतया भिक्षार्थचरणं स एपणागोचरः, तस्य परिमन्थुः, सखेदो हि अनेषणीयमपि गृहणाति इतिभावः ॥४॥ इच्छालोभ-इच्छा अमिलापः सचासौ लोभश्च इच्छालोभः महालोमः इत्यर्थः, यथा निद्रा निद्रा महानिद्रा इति, सचइच्छालोभ:-अधिकोपकरणादि मेलन लक्षण: मुक्ति मार्गस्य-मुक्ति-नि:परिग्रहत्वम्, अलोभतेत्यर्थः, सैव निवृत्तिपुरस्य मार्ग इव मार्गः, तस्य परिमन्थुः ॥ ५॥ भिज्जत्ति 'मा लोभः तेन यत् निदान करणं देवेन्द्र चक्रवादिविभूति प्रार्थनम्, तन्मोक्षमार्गस्य सम्यग्दर्शनादिरूपस्यं परिमन्थुः । वार्तध्यान चतुर्थभेदरूपत्वात् । भिज्जाग्रहणेन यत् अलोभस्य भव निर्वेदमार्गानुसा. रितादि प्रार्थनं तन्न मोक्षमार्गस्य परिमन्थुरित्यावेदितं प्रतिपत्तव्यम् ॥ ६॥ ननुतीर्थ- करत्वादि प्रार्थनम्, न राज्यादिप्रार्थनवत्-दुष्टम् , अतस्तद्विपयं निदानं मोक्षस्य परि- मन्थुर्नभविष्यति ? नैवम्, यताह-"सव्वत्थ०-इत्यादि । सर्वत्र तीर्थ करत्व-चरमदे. हत्वादि विषयेऽपि" प्रास्ता राज्यादौ। अनिदानता-अप्रार्थनमेच भगवता-सममेश्वर्या दिमताश्रीमन्महावीरस्वामिना 'पसत्थेत्ति' प्रशंसिता-लाधिता, एप सूत्रार्थः ॥ १६ ॥ मूल-छविहाकप्पट्टिईपन्नता, तंजहा-सामाइयसंजयकप्पट्टिई १, छेत्रो- वट्ठावणिय संजयकप्पट्टिई २, निविसमाणकप्पट्टिई ३, णिविट्टकाइय कप्पट्टिई ४, जिणकप्पट्टिई ५, थेरकप्पट्टिई ६, तिमि ॥ २० ॥ सिरि कप्पे अट्ठोद्देसको समत्तो। - • .

बृहत्कल्पसूत्रम् टीका छव्धिहा कप्प०,-पड्विधा-पटप्रकारा कल्पे कल्पशास्त्रोक्त साधुसमाचा- रेस्थितिरवस्थानं कल्पस्थितिः, कल्पस्य वा स्थितिः-मर्यादा-कल्पस्थितिः प्रज्ञप्ता- तीर्थकरगणधरैः प्ररूपिता । तद्यथा-इति उपन्यासार्थः । सामा०-'सामायिक संयत कल्पस्थितिः समो-राग' द्वषरहितः, तस्य प्रायः-लाभो ज्ञानादीनां प्राप्तिरित्यर्थः, समाय एव सामायिक सर्वसावद्ययोगविरतिरूपं, तत्प्रधानाः ये संयता:-साधवः, तेषांकल्पस्थितिः सामायिक संयत कल्पस्थितिः । १। छेदो० तद्यथा- पूर्वपर्यायच्छेदेन उपस्थापनीयमारोपणीयं यत् तत्-छेदोपस्थापनीयम् , व्यक्तितो महाव्रतारोपणमित्यर्थः, तत्प्रधाना ये संयताः, तेषां कल्पस्थितिः, छेदोपस्थानीय संपतकल्पस्थितिः । २ । निन्वि-निर्विशमाना:-परिहार विशुद्धि कल्पं वहमानाः तेषां कल्पस्थितिः निर्वि- शमान कल्पस्थितिः ॥ ३॥ णिवि०-निर्विष्टकायिका नाम-यः परिहार विशुद्धिकं तपो व्यूढम्, निर्विष्ठः प्रासेवितो विवक्षित चारित्रलक्षण कायोयैस्ते निर्विष्टकायिका इति व्युत्पत्तः, तेषां कल्पस्थितिः, निर्विष्टकायिक कल्पस्थितिः ॥४॥ जिणक०-जिनाः-गच्छनिर्गता:- साधुविशेषाः, तेषां कल्पस्थिति:-जिनकल्पस्थितिः॥५॥ थेरक०-स्थविरा-श्राचा- र्यादयो गच्छ प्रतिवद्धान्तेषां कल्पस्थितिः स्थविरकल्पस्थितिः॥ ६॥ इति-अध्ययन परिसमाप्तौ । ब्रवीमीति-तीर्थकर गणधरोपदेशेन सकलमपि प्रस्तुत शास्त्रोक्त कल्पा- अकल्पविधि भएामि न पुनः स्वमनीषिकया इति सूत्र संक्षेपार्थः ।। २० ।। इति बृहत्कल्पसूत्रस्य षष्ठ उद्देशकः समाप्तः ।।

श्री बृहत्कल्पसूत्रस्य परिशिष्टानि

--: परिशिष्टानुक्रमणिका :-
१--प्रथमं परिशिष्टम्-
२---द्वितीयं परिशिष्टम्-
३---तृतीयं परिशिष्टस्-
४---चतुर्थ परिशिष्टम्-
५-- पंचमं परिशिष्टम्-
-शब्द कोपः
-पाठ भेदः
-प्रति परिचयः
विशेष शब्द सूची-
-टिप्पणम्
-

प्रथमं परिशिष्टम् श्रीमहत्वल्पसूत्रस्य-उद्देशकानुसारी अकारादिवर्ण क्रमेण शब्दार्थनिर्देशः उद्देश- सूत्र- १-३ ६ १ १ १ है शब्द- अमिराणे अंसि सि अंबाहिरियसि अंतो अंतो भिक्खायरिया अंतोवसमाणीणं अभिरिवगड़ाए अभिरिणदुधाराए अभिणिक्खमणपसाए है ११ १ ११ अर्थ- विधि से न काटे गए, ग्राम का आधा, चौथाई भाग जो ग्राम आदि से बाहर न हो भीतर भीतर गोचरी करना भीतर में बसती हुई अनेक प्रावरण वाले अनेक द्वारवाले निकतने व प्रवेशकरने के दरवाजावाले. दूकान के भीतर उपाश्रय के भीतर खुले द्वारवाले भीतर में लीपा हुश्रा भोजन चित्ररहित (गृह) शरयातरसे ग्रहण न किया गया गृहपति की थोड़ी वस्तु सहित कलह विना उपशमन किए १ १३ . १ १ १४-१५ १ १६ अंतरापणंसि अंतोकिचा अंवगुयदुवारिए अंतोलित्तयं असनं श्रचित्तकम्मे अणिस्साए अंप्पसागारिए अहिगरगां अधियोसवित्ता or १ २२-४ १ १ .३५ - १ ३५ शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- -- २ २५ अस्थि है ३५ श्रात्मा से (स्वयं) आदर के लिए खड़ा होवे ३८ ३ उल्लंघन करता हुया. ३८ गुरु प्रायश्चित्त २ १ ४६ or २ १-४ २ ११-१२ अप्पणा अठभुजा अहक्कममाणे अणुरघाई अणुप्पचिट्ठ अणुएणवित्ता श्रद्धाण गमणं अप्प विइयस्स अप्प तड्यस्स अंग अंतोवगड़ाए अहालंदमवि अभावगासियंसि अचसेसे अनीहरं असंसट्ठ अपडिग्गहिया अनिज्जूढ़ाओ अविभत्ताओ अव्वोच्छिन्नाओ अव्योगड़ाओ अंसिपात्रो अपाडिहारिए अहित्तिए अणेगराइए अपरिभुत्ते १३ प्रवेश किए हुर अनुज्ञा लेकर मार्ग में जाना आत्मा ही है दूसरा आत्मा ही है तीसरा चम्पा नगरी से सम्बन्धित देश दरवाजे के भीतर का भाग थोड़ाकाल भी मध्य की खुली जगहों में पाकी बचे गृहों में नहीं लेगए, नहीं निकाले गए न मिला हुआ नहीं ली हुयी वस्तु नहीं ढंकी हुई पृथक नहीं की हुई निश्चित न की हुई विशेष रीति से प्रकट न की गई अंशिका (हिस्से की चीज) अप्रातिहारिक बैठक में काम लेना कई रातें (रानियां) उपयोग में न लाए हुए २ २ १४-१५ १७-१८ १६ २ {8 २ १६ २ १६ २ २ २२-२३ ३-४ ३ .C शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- नगर गृह और नगर कोट के- मध्य का मार्ग ३ अणुचरियासु ३ २६ ३ २६ ३ अणुभित्तिसु अणुफरिहासु अणुपंथेसु अणुमेरासु अन्नमन्न ३ २६ જ अणवठ्ठप्पा ३ अन्नधम्मियाणं अविओसवियपाहुडे १० ४ १३ प्रविणिय अमूढ़े अदुठे ४ १३ परिखा-खाई के समीप मार्ग के समीप ग्रामनगर की सीमा के समीप परस्पर तत्काल व्रत में नहीं रखने योग्य पर धर्म वाले का तीव्रतर क्रोध जिसका शान्त नहीं है अविनीत जो मूढ़ न हो गुरुजनों के प्रति द्वष नहीं- करने वाला उलट मार्ग पर न ले जाया गया हो बड़ा प्रायश्चित दूसरों को देवे श्रात्मा से स्वयं आधा योजन की मर्यादा से निर्जीव महावतों में नहीं लाए गए नहीं लेने योग्य-सदोप आहार पोछे देने के लिए आचैलक आदि दश प्रकारके साधु १३ अबुग्गाहिए ४ স্মঘা १६ अणुप्पएन्जा १६ ४ ४ अप्पणा श्रद्धजोयणमेराए अचित्ते अगुवठ्ठाचियए अणेसरिणज्जे अणुप्पदाउ यकापट्ठियारणं ४. १८ प्रथमं परिशिष्टम् उद्देश- सूत्र- शब्द- २०, २२ ४ ४ २४-२८ ४ ३० ४ '३३ अवस्कम्म अण्णं ( अन्न) अनिक्खिवित्ता अदीवित्ता अकरण्याए अंतोमासस्स अप्पंडेसु अप्पवीएसु अप्पुस्सेसु अपहरिएसु अप्पपाणेसु अप्पुत्तिंगपणगदगमट्टिय ४ ४ ४ ३४ c. c ३५ अर्थ- बाहर निकलकर दूसरे बिना त्याग बिना समझाए नहीं करने के लिए मास के भीतर अल्प अंडा वाले अल्प वीज वाले अल्प प्रोस वाले (तुपारयुक) अल्प हरित वाले अल्प प्राणिवाले अल्प कीटक नगरी पांच वर्ण- का पनक आदि शमन करके या शान्त करके बाद ( तदनन्तर) सूर्य के उद्य न होने पर सूर्य के अस्त होने पर दूसरों को उल्लंघन करता है सूर्य के रहते भोजनकी इच्छा रखने वाले अथवा पर्याप्त श्राहार नहीं मिलने से पुनः भोजन की इच्छा वाले परिग्रह के भीतर चब रहित पात्रों से रहित सात्री अविओस वित्ता . ५ अह ६ ५ ६ ५ ६ अगुगए अत्थमिए अन्नेसिं अइक्कम अणत्यमियसंकप्पे ५ ७-८ ११ अंतोपडिग्गहंसि अचेलियाए । अपाड्याए .. शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- - शब्द- अंघस्युज्जियाए २९ H ३७ ५ अनमन्नस्स अभंगित्तए अंतिए अर्थ- आम्रकुब्जिका नाम के सासन से एक दूसरे का शरीर में मालिश करना समीप में प्रायश्चित्त विशेष (पाद धावन श्रादि कर्म से) उल्लंघन करे ५ ४१ अहालहुस्सए अइक्कमेजा ४१ ५ ४२ कोई एक ६ ६ १ २ ६ २ अभयरे अययणाई अलिय वयणे अविरइय अपुरिसवाय श्रदिन्नादाण अपडिपूरेमाणे अच्छिसि अहेपायसि अवलंबमाणे २ ६ २ न वोलने योग्य वचन मिथ्या वचन अविरति-स्त्रीसेवा के बाद नपुंसक के समान बोलना किसी के दिए बिना लेना सत्य न करता हुआ अांख में पैर के नीचे पकड़ता हुआ (आधार देता हुआ) किसी कार्य के वशीभूत किसी भी फल की चाह नहीं करना ६ ४ ६ ५ ६ ७-८-१ ६ अट्ठजायं अण्यिापता D (आ) १ १ ६ आमे आगरंसि आसमंसि कच्चे श्राकर अर्थात् खान में মাগল সুখানু খ্রীষ্ট मठ में १ ६ प्रधर्म परिशिष्टम् ७५ अर्थ- उद्देश- सूत्र- १३ श्रावणगिर्हसि दूकान के घर में धादर करे आढ़ाएज्जा १ पालन करना प्राप्त करता है १ ५१ २ गृह २ ३ ३ ३ श्राना धार्यक्षेत्र पथिकों के आने के में सन्देश (उपहार) कहने को लेकर आवें कदाचित्-लाकर पूछकर प्राचार्य को प्राचार्य और उपाध्याय को अपने अपराध को वचन से प्रकट करे यथा योग्य-अपराध के अनुकूल लेता है ४ ४ ३५ आराहणा ३८ आयज्जा आगमणं पारिए खेत श्रागमण गिर्हसि १७ श्राहडिया श्राइक्खित्तए प्रआयाए श्रागच्छिज्जा पाहच्च २३.२७ श्रापुच्छिता २३ आयरियं पायरिय उवज्झायं ३० आलोइज्जा पाहारिह भाइयई ३० श्राइतव्वे ३. आहार आहारमाणे १९ भायाषणाए १६ भायावित्तए ३१ धाकुंचण पट्टगं ફર घासइचए श्रासाभि ४ ४ ४ ४ 20 ग्रहण करने योग्य ४ भाउरे बीमार पड़ा चतुर्विध भोजन भोजन करते हुए ५ आतापना से प्रातापना लेने को धन विशेष बैठने को भासन पर 36 शब्दकोष: उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ५ ३७ ३७ ५ ३७ आइयत्तए. आइमित्तए आगाढ़ेसु आर्यकेसु आहारस्स आलेवण जाएणं श्रालिंपित्तए आगमेणं पारोहमाणिं पीने को श्राचमन को ज्वर आदि रोगों का आतक-भय चतुर्विध आहार के लेप के साधनों से श्रालेपन करने को अवधि आदि अतिशयज्ञान से बढ़ती हुई ५ ३९ ३९ ५ ६ (इ) १ इक्क इत्थी सागारिए १ २७ १ ३५ २ इच्छाए इमाई इह एक स्त्री गृहस्वामिनी घाले. अपनी इच्छा से ये-आगे कहे जाने वाले यहां-इसमें यहां चाहे-इच्छा कने ३ २४. इत्थ occ इच्छेजा इच्छिज्जा इमाओ इच्छा करे ४ हरावह इत्थीरूवं x ये नदी विशेष (इरावती.) स्त्री स्वरूप को. ऐसे, ये, इतने इन्द्रिय विशेष को जाने आन रूप समिति के इच्छा से लालची १३ डॉदयजार्य इरियावहियाए, ६ च्छिालोलए प्रधर्म परिशिष्टम (उ) अर्थ- उद्देश- सूत्र- शब्द- ११ १ सुधस्थए १ उवस्सए उच्चार उवसमियचं उवसमज्जा or ३५ १ घसने को उपाश्रय में मलोत्सर्ग उपशान्त करने योग्य उपशान्त हो उपशान्त होता है उपशम ही सार रूप है अपने उपयोग में लेने को लेने आदि की प्रार्थना करे उत्तर दिशा में बढ़ते हों, वृद्धिंगत हों १ or ३३ or or २ १ उबस्सम उवसमसारं उग्गह उपनिमंतज्जा उत्तरेणं उस्संपति उक्खित्ताणि उक्खित्ताई उवगरणजाए उट्टिए उशिणए उगहणतगं जगह पट्टगं उवमाए २२ २ २४ २ २४ ३ ३ छींटे गए, फेंके गए उपकरणजात-भण्डोपकरण आदि अंट के रोमसे बने हुए ऊनों से बने हुए गुह्य देशको ढकने वाला वस्त्र अवग्रहानन्तक को ढकने वाला उपाध्याय अवग्रहके-लिए हुए उपाश्रय आदि के निवास करके स्वीकार करता लिबास से स्वीकार करने योग्य निवास पूर्वक बिताते हुए. महाव्रतों में लाने योग्य. प्राप्त करके ३ ३ २५ जग्गहस्स ३ ३० . ३ ३ उघाइगाइ उवाइयावित्तए उपातिणतं ज्वट्टा वित्तए उवसंपन्नित्ता: ४ ४ १० शब्दकोपः -- or or ? १ उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ६४ अोगाहिज्जा स्पर्श करे अोमंथियाए नीचे मुख सोने वाली ६ ८ अोकम्माणि फिसलती हुई ६ ८ ओबुज्झमागि बहती हुई (क) कबडंसि कर्वट-खराब शहर ३५ कट्टु करने को १ ३५ किमाहु ऐसा क्यों कहा कंबलंण कम्बल के लिए ५१ कोसंबीओ कोशाम्बा नगरी से ५१ कुणाल विसयायो कुणाल देश से २ १ किन्नाणि विखरे हुए २ १ कुलत्याणि कुलथी धान्य विशेष ૨ २ कुलियाकडाणि पृथक् २ इकट्ठ किए २ १० कोट्ठा उत्ताणि कोठार में रक्खे.हुर कुंभी उत्ताणि कोठी में रक्खे हुए २ १० करभि उत्ताणि पात्र विशेष में रक्खे हुए २ कप्पागं एक को मुख्य बनाकर २ ५६ करें करते हुए को, ३ कसिणाई समस्त-अखण्ड ३ कप्प कल्पता है किइकम्म धन्दना-नमस्कार करित्तएं करने को १९ किलते थके-बीमार हुए 'किट्टित्तए कीर्तन- विशेष कथन करत कुछ किञ्चित् कायोत्सर्ग . २ ६ س س س س له به केह १ कारसम्म प्रथमं परिशिष्टम् अर्थ- ४ ४ उद्देश- सूत्र- शब्द- १ करेमाणे कीवे १९ कप्पद्विय कडे किञ्चा करता हुआ नपुंसक अचेलक्य आदि कल्पों में स्थित. किया हुआ ४ ६ २ कप्पस्स ६ कुकुइए करके कल्प साधु समाचार का कौकुचिक पृथ्वी काय की रक्षा नहीं करने वाला (ख) छोटे गांव में खेडंसि खेलं * १ १६ कफ को १ ६६ खाइम १ ३५ १ खु खेते खारे खिसिय. ૨ ६ १ w ३ खार चार आहारों में एक उपदर्शक अव्यय प्रदेश में : दृध खिसला कर कहा गया स्थाणु-ठूठ राग, भय, अपमान से विक्षिप्त (ग) गांव में गृहस्वामी गृहस्वामी के परिवारका जाने के लिए ६ खित्तचित्तं १ ५ १ १ १ ३३ ३३ ३७ गामंसि गाहावा गाहावइ कुलस्स गंतु गमणं गमणागमणं गहाय रामरणं एत्तय १ जाना ow ३६ जाता पाना लेकर मार्ग गमन प्राप्त करने को १ ४७ ८२ शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- २ १ २ ३ m १२ ३ १२ ३ १२ अर्थ- गोधूम-गेहूं छिपाकर रक्खे हुए गच्छ के अधिपति गणावच्छेदक गणी गणधर को गोच्छक-पूजनीजघन्यउपधि-उपकरण लेकर गाथाओं को शरीर की हानि से हर्ष क्षय को पाती हुई शारीरिक क्षय से हर्ष क्षय वाला w १२ ३ १३ ३ शब्द- गोहमाणि गुत्तानि गणधरे गणावच्छेइए गणी गणहरं गोच्छगमायाए गाह गिलायमाणिं गिलायमाणं गणातो गणावच्छेइयत्तं गरण ओ गणं নাবিলা गणियाओ गंगा गामागुंगाम गामस्स गाढ़ागाढ़ेसु १५ . २० गच्छ से २१ ४ ३० ३० ४ ३२ ५ ५ १६ गएरगावच्छेदक पद को गणसे गण को गुरुसाक्षी से आत्मगहीं करने वाला गिनी गई गंगानदी एक गांव से दूसरे गांव को गांव के गाढ़-सर्प विष हैजा आदि आगाढ़ ज्वर- आदि अनेक रोग शरीर के अवयव को जावें गृहस्थ के जैसे वचन को प्रहण करता हुआ (घ) पशुपालकों के स्थान में ४ ४१ गायं गच्छेज्जा गारत्थियवयणे गिण्हमाणे ६ १ ६ १ ६ 'घोसंसि प्रथम परिशिष्टम् अर्थ- उद्देश- सूत्र- शब्द- १६ घडिमत्तयं घड़ेके रूप में मिट्टी का पात्र घिसे गए-चिकन किए २ घट्टा ५ घएगा घृत से १ १ 8 चत्तारि चार १२ चउक्कंसि जहां चार मार्ग मिले हों १२ चचरंसि चत्वर-चौक १४ चेज चिलमिलियागंसि चर की चिलमिलिका १६ चिट्टित्तए ठहरने को ३६-३७ चरित्तए करने को or १ १ पुनः, और ३ २ २५ चेइए चिएफए चम्माई ३ ३-१५ १२ १२ ३ ३ १ ३ २० चेल? चहिं चउगाह चिदुइ चक्मिया चक्खूलोलए उपहार रूप में पहुँचाए गए कूटी हुई त्वचाओं से बना चमड़े-मृगचर्म आदि वन को चन के लिए चारों से चार गाथाएं ठहरता है कर सके श्रांख से चंचल (छ) छेद में जहां लोगों का गमनागमन नहीं है ऐस म छेद को न की संख्याएं ६ १ w छेए छिनावाएसु छेयं ५ ६ १ शब्दकोप: ६ ६ १ १ or or उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- छव्धिहा छः प्रकार के छेउवट्ठावरिणय कप्पट्टिइ-छेदोपस्थापनीय कल्पस्थिति (ज) ५१ जत्थ नहीं जाव उसकी अवधि लेकर २ १ जवानि जव-धान्यविशेष २ जय जवानि धान्यभेद २ जे जो २ ६ जोई ज्योति-दीपक २४ अंगिए जाङ्गमिक त्रस प्राणीके अवयदाँसे मनाहा १६ जाणिज्जा जाने ३ १६ লৰালুয়া बुढापे से थके ३ जदिवस जिस दिन में ३ ३१ जोयणं एक योजन यमुना રે રે জন जलमें ६ ज जिसको ६ जक्खाइट्ठ यक्षों से आविष्ट ६ २० जिण कापट्टिा जिनकल्पस्थिति ६ नागरित्तए जागते रहने को (झ) १ मा ध्यान १ माइत्तए चिन्तन करने को क्षुधा से पीडित हुआ (8) বন্যা रखकर ३ ठारा श्रासन पर ce dw অভয়া। १२ १६ प्रथमं परिशिष्टम् ८५ उद्देश- सूत्र-- शब्द- १६ ठाइत्तए ठिया ५ १६ ठिना ५ २० ठाणाइयाए अर्थ- बैठने को स्थिर रहने वाले ठहर कर श्रासन विशेष (त) ताल वृक्ष का फल जहां तीन मार्ग मिले हो इसलिए १ १ ताल पलंबे १ १३ तिकसि १ तम्हा तेणं परं ५१ उससे बाहर १ २ १ २ २४ २ १२ ताप तिलानि तिरीडपट्ट तन्नीसाए तप्पढ़मयाए तिहिं तवरसी. तदिवस ३ १३ तावत्काल, तावत् अवधि तिल तिरीट वृक्ष की त्वचा से बना पत्र उनके नेसराय में वही प्रथमवार हो तीनों तपस्या करने वाले उस दिन में ही यहां ३ ३ ३ २५ ३ तत्थ ३ तीन गिने हुए जैसे कि चोरी करता हुआ ३ २६ ३० तो तंजहा तेएणंकरमाणे तेसिं तथोकम्म तुयट्टापणं तिखुत्तो तिरिण तणेसु ३१ उन आचार्य उपाध्यायों को तप रूप क्रिया को त्वग्वपिन-सुलाना तीनधार ४ ३२ ४ तयों के ऊपर क ८६ शरदकोपः अर्थ- उद्देश- सूत्र- शब्द- तहप्पगारे ३२ तुयद्वित्तए ३८ तयप्पमाणमित्त तेल्लेण ५ उसके समान सोने को तिल तेल से तुष मात्र भी ४० ५ ४१ उसका, उसको ४१ तत्रोपच्छा तेरणेव ५ ४२ उसके पीछे उसे ही हिंसाकारी के समान बना हुआ २ तट्ठाणपत्ते ६ तं उसको (थ) १ थूणा विसयानो स्थूण देश से ३ १२ स्थविर-वृद्ध ४ थेरे थंडिले थले थेराण थेरकापट्ठि बाह्य प्रदेश स्थल में ४ ५ ४१ ६ गच्छ स्थित रत्नाधिक वृद्ध साधु के स्थविर कल्पस्थिति (द ) द्रोणमुख अर्थात् जल थल दो मार्ग घाला जलाशय के किनारे दक्षिण दिशा में ६ १ or दोणमुहंसि दगतीरसि दक्खिणेणं दसण, दुरायं दिपेन्जा १ श्रद्धा-सम्यक्तत्व २ दो रातें २ जलाए दही दो संख्या दोनों की २ 40 0 दो दुद्दो २ प्रथमं परिशिष्टम अर्थ- देखें देता है ४ दुष्ट पारश्चिक देते हुए उद्देश- भूत्र- शब्द-- २ देजा २ २३ देह २ दुट्ठ रंपिाचए ४ ३ दलमाणे ४ १२ दुड्ढे ४ १२ दुस्सन्नप्पा ४ २७ दीवित्ता दुइज्जित्तए ३१ द्वावित्तए ४ ३१ दुबले ४ ३१ दाउ ४ ३२ द्रुक्खुत्तो ५ देवे दोच्च १२ दए द्गरए १२ द्गफुसिए १२ दावए दारुदंडयं ६ २ दासवायं दुष्ट-तत्त्व वेत्ताओं पर भी द्वप रखने वाला दुःसंज्ञाप्य-दुःख से समझाने योग्य प्रकट कहकर जाने को दिलाने को दुबले देने को दोवार देव दूसरे वक्त भी उदक-जल जल के कण जल से छूए गए . देवे-दिलावे लकड़ी के डंडे नौकरों के समान कथन को (ध ) धारण करने को धर्म सम्बन्धी जागृति xxx १ १ धरित्तए धम्मजागरियं धोया धूता धम्मविणयं धुले हुए ग लड़की धर्म सम्बंन्धी शिक्षा शब्दकोयः (न) अर्थur उद्देश- सूत्र- शब्द- नगरंसि निगमंसि १९ निद्दाइत्तए नस्थि ६ बड़ा शहर व्यापारी निवास सोने को नहीं है दूसरी जगह नहीं प्रवेश करे, उपभोग में ले or ૨ २ निकलते हुए लेगया हुआ २ २ मकान मालिक का अन्यत्र गया द्रव्य २ २ ३ १ ३ ४४ नन्नत्थ ५३ निविसेज्जा निक्खंत १६ नीहडं १८ नीहडिया निट्टिए निस? निसीइतए 1 नीसाए २२-२७ निक्खिवित्ता निदिजा ३० निज्जूहियो निसिप्रावणं १० निग्गंथस्स १० निग्गंथीए निक्खमित्तए ૨૨ नेसब्जियाए नवणीएण ३ नीहरितए ३ नो नीहरमाणी निबितिगच्छे बनाया गया भेजा गया, दिया गया वैठने को ने.सराय में रखकर, उतारकर आत्म सातिक निन्दा करे अपने गच्छ से बाहर करने योग्य वैठाना साधु का साध्वी का ४ ४ ३ KK १५ बाहर निकलने को ५ ५ ६ निपद्या-आसन विशेष से मक्खन से निकालने को नहीं निकालती हुई सन्देह रहित ६ w ६ ६ प्रथमं परिशिष्टम् नौका पर ६ w १ ३ पुट भेयणसि १ १ १ उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ६ ६ नावं ६ निग्गंथिं साध्वी को १६ नियाणकरणे फलों की आशा करना २० निविसमाणकप्पहिइ निर्विशमानों की कल्पस्थिति (प) पक्के पके हुए ६ पट्टणंसि पत्तन-नगर का भेद ६ कुंकुम आदि के पट्टे खुलने का स्थान परिक्खेसि दीवाल आदि के घेराव में पत्थारं कट-चटाई पयलाइत्तए निद्रा लेने के लिए १ २६ पुरिस सागारिए पुरुप, गृह स्वामी युक्त ३१ पडिबद्धाए द्रव्य और भाव से बंधे हुए १ ३५ परो दूसरे १ पडिग्गहेण पात्रों से १ ३६ पायपंछणेण पात्र साफ करने के वस्त्र से ४१ पवित्तिणिपायमूले प्रवर्तिनी के चरण पर पुष पडि लेहिएण पहले प्रतिलेखन किए हुए ४६ परिभुत्ता परिभोग में लाई हुई ५० . पविसित्तए प्रवेश करने को पुरथिमेणं पच्चत्थिमेणं पश्चिम दिशा में २ पुंजकडाणि २ पिहियाणि ढके हुए २ ३ पल्लाउत्ताणि ऊंचे करके रक्खे हों २ ४ परं उससे आगे २ ६ पडिलेहमाणे १ or १ पूर्व दिशा में or २ देर किए हुए २ प्रतिलेखन करता हुआ शव्दकोषः ७ २४ १ लघुनीति उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- २ पईवे दीपक २ पूर्व मालपूत्रा २ पिंडए लड़डू के समान बनाए २ २१ पूया पूज्य २ परिजणो परिजन-कुटुम्बी २ पडिगाहित्तए लेने को २ पंचमे पांचवां २ पोत्तए रूई के बने हुए ३ परिटुवित्तए परठने को ३ पासवणं ३ पाडिहारिए पीछे देने को ३ १० परिहरित्तए त्यागने को ३ १२ पिंडवाय पडियाए आहार ग्रहण की इच्छा से ३ २ पवित्ती. प्रवत्तक १२ पुरो आगे १२ पवित्तिणिनीसाए प्रवर्तिनी के नेसराय से १४ पुचोवट्ठिया पहले उपस्थित होने वाली पढ़मसमोसरणुद्देसपत्ताई-पहले वर्षावासके देशकाल विभागसे मिलेहुए १६. पवडिज्ज गिरकर पवेइत्तए अच्छी तरह समझाने को पंच पांच संख्या में २१ पूयाभत्ते पूज्य के लिए किया गया श्राहार ३ २१ पाहुडियाए उन्हीं के लिए भेजे गए ३ २४ पडिदायव्वे पीछे देना चाहिए ३ परिहारं धारणा-परिभोगरूप ३ पुवाणुएणवणा प्रथम ली हुई आज्ञा परिहरणारिहे साधुओं के उपभोगने योग्य اس سم ل س س س له ३ ३ प्रथमं परिशिष्टम् ११ 씽씽 cc अर्थ- भूले हुए या छूट गए लौटकर आने को देखकर प्रतिसेवना करता हुया प्रमादी पारश्चिक नपुंसक दीक्षित करना धृत आदि विकृति में लोलुपी क्रोध कहे गए हैं यालिंगन करे बाप उद्देश- सूत्र शब्द- ३ परियावन्नर ३ पडिएत्तए ३ पेहाए पडिसेवमाणे ३ पमत्तेपारंचिर ४ पंडए पव्वावित्तए ११ पडिबद्ध ४ पाहुडे पन्नता ४ १४ पलिसएन्जा पिता ४ १४ पुत्तो १६ पडि तेहित्ता १६ पमज्जित्ता ४ पढ़माए पोरिसीए पच्छिम १६ पानं परिहारट्ठाणं १७-१८ परिदृषियने १८ पडिग्गाहिए २६ परिटुवित्ता ४ पट्ठविए पढविजमाणे ३० पासेन्जा ४ ३ पुत्र प्रतिलेखना करके प्रमार्जन करके पहली पोरसी में अन्तिम जल (अचित्त) परिहार स्थान ( प्रायश्चित्त विशेष) परठना चाहिए आहार पानी पाण भोयणे १८ लिए गए परठकर दिया गया हो दिया जाता हुआ भी देखे शब्दकोयः उद्देश- सूत्र- ३० ३० ३१ ४ ३१ ४ ३३ ३४ ४ ३४ ११ अर्थ- पायच्छित्तं प्रायश्चित को पडिंकमिज्जा पाप स्थान से पीछे लौटे पाणाए जल के लिए पिडवायं श्राहार को पिवासिए प्यासा परिहार कप्पट्टियस्स परिकल्प में स्थित साधु को पंथेसु भागों में पुण फिर पायं पैर को पलालेसु पुबालों में पराग पनक-पांच वर्णवाला बनस्पतिकाय जीछ पच्चोगिलमाणे पीछे गिलते हुए पएसे प्रदेश-क्षेत्र में पिवेज्ज यीवे-पान करे पसुजाइए पशुजातिवाला पक्खिजाइए पक्षीजातिवाला परामुसज्जा स्पर्श करे पगिझिय पगिझिय ऊपर करके ऊपर करक पलबिय वाहियाए हाथों को फैलाने वाली पडिमाझ्याए पडिमा श्रासन विशेष से वैठने वाती पीटंसि पी के ऊपर पाद केसरिका पादकेसरिका-श्रासन विशेष पारियासियरस वासी-पर्युपित पच्छा उसके बाद पुलागभत्तए पुलाकमक्त यज्ञोसविताए निर्वाह करे पडियाहिंना ५ १३ ५ १६ २१ ३५ ३८. . ग्रइया करे प्रथमं परिशिष्टम् ६ उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ६ २ पाणाइवाय प्राणातिपात-हिंसा ६ २ पत्थरा प्रायश्चित रचना विशेष ६ ३ पायंसि पैर में ६ ३ परियावज्जेजा प्राकर गिरे ६ ४ पुरिस स्वं पुरुप के रूप को ६ पंचराईदियं पांच दिन रात ६ ६ पाणे कोई प्राणी ६ पव्वयंसि पहाड़ पर ६ पक्खलमाणि फिसलती हुई ६ पवडमाणि पड़ती हुई ६ पणगंसि पारीक कीचड़ (जलयुक्त) ८ पंकसि गाढ़े कीचड़ में ६ १९ पलिम) व्याधात करने वाले छ दोष १९ पसत्था प्रशस्त-उत्तम है (फ) २ फागिए फेणी-फटे दूध के बने २६ फासुए भासुक-निर्जीव फलगंसि फलक (तख्ता) फरुसवयणं (ब) १. बाहिं बाहर ६ बाहिंभिक्खायरिया बाहर ही गोचरी करनी १ बाहिरियसि वाहर वाले उपाश्रय में बह्यिा बाहर १ बीहीणि ब्रीहि-शाल्यादि धान्य बदु फासुर सया निर r कठोर-वचन or शब्दकीयः 30 18 कटे हुए १ भगवन् ? or उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ३० बहुम्सुए बहुसूत्री या बहुश्रुत बभागमं अनेक आगमों के जानकार ११ धीयाणि बीज-धान्य आदि ५ बाहायाः फैलाए हाथ वाली ४१ बहिया बाहर के नगर में ६ धीए बीज ( भ ) २ भिन्ने १ भिक्खायरिया गोचरी करनी भंते ? ३५ भिक्खू साधु ૨ भित्तिकडाई भीत बनाए गए भंगिए अलसी से बने ३ है भिन्नाई फाड़े गए १-१६ भुंजमाणे भोजन करते हुए भाया भाई भगिणी बहिन भोजन करे ४ भत्ताए आहार के लिए भोयणजाए आहार की चीज १२ भोत्तव्वे श्राहार करना चाहिए ३८ भूयप्पमाणमित्तमवि चुटकी भर भी भूति-भस्म, ५ १२ भत्तहणं उसी पुलाग भक्त से ६ १७ भत्तपाणपडियाइक्खियं आहार पानी त्यागने वाली साध्वी को ६ १६ भुजो भुज्जो फिर फिर कर ( म ) १ दाई योजन के भीतर ग्राम रहित स्थान हुए वरून ४ भुंजिजा. मडासि .. प्रथम परिशिष्टम् उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थw on १ ६३ १ एक साल तक वीच वीच से चिकने किए गए मगध देश से मूग १ २ १ २ २ मासं मझममेरा मट्ठा मगहायो मुग्गाशिव मासाणि मुद्दियाणि मंचा उत्ताणि माला उत्तागि मुंज चिप्पए मुच्छिन्न मेहुणं मुंडावित्तए ३ २ ३ ४ रेखांकित-चिह्नांकित मंच पर रक्खे गए माले पर रक्खे हुए मुंज की चनी पूजनी मूच्छित होये स्त्री पुरुप का संयोग लोच करवाने को जड़ बुद्धि वाला माता नदी विशेष का नाम समुद्रसी बड़ी बड़ी नदियां ५ ४ १५ माया ४ मही महराणवायो महारादीओ मुक्कमउडेसे ३१ मुक्त मकुद ६ मुख में ५ मेहुणपडिसेवणापत्ता मैथुन सेवना को प्राप्त करती हुई मोयं लघुनीत मक्खित्तए बहु चिकना बनाने को मुसावायरस असत्य वचन मुत्तिमगस्स मुक्ति मार्ग के मोहरिए मौखरिक-बहुत बोलने वाला २ ६ १६ w शब्दकोपः -- १ अर्थ- राजा के निवास युक्त नगर गली के द्वार पर १ M राज्य में रात में उद्देश- सूत्र- शब्द- ६ रायहणिसि १ १२ रत्थामखंसि रज्जसि १ ४३ राओ ४६ रत्ता २ २ रासिकडाणि २ १२ रुक्खमूलंसि २ २४ रयहरणाई ३० रयणि ४ राई भोयणं ३७ रोगायंकेसु रंगी गई लाल की गई इकट्ठ किए गए वृक्ष के नीचे रजोहरण-पूजनी रात में १ रात में खाना हैजा आदि रोग, सर्प विष आदि आतंकोंमें रजकण २ ७ ( ल ) लोचक-दही का बना पदार्थ चिह्न विशेष से युक्त ६ २ १० लिपे गए लोयए लंछियाणि लित्ताणि लभेज्जा लाइया लगंडसाइयाए ३ ११ K : लाउयं लाभ करे-पावे हाथ से लाकर लगंड-आसन विशेष से सोने व अलावुक-तुबीपात्र (व) विधि पूर्वक कांटे गए अनेकार्थक-अथवा वसने को वसते हुए को १ २ विहिभिन्ने १ ३ वा ६ वत्थए वसमाणाणं १ ६ प्रथम परिशिष्टम् अर्थ- १ चन्दना करे १ उद्देश- सूत्र शब्द- ३५ चंदेजा ३६ चासाचासासु ३ चीतिकममाणे ३८ चेरज्ज विरुद्ध रज्जसि १ वत्थेरण चंसह घर्पावास याने चातुर्मास में राजा व तीर्थंकर की आज्ञा परस्पर विरोध वाला राज्य किसी कारण से लड़ने वाले राज्य में १ चरसे वसता है उपाश्रय के भीतरी भाग विखरे हों २ २ फैले हुए २ २ १०. घगडाए विक्खित्ताणि विइ किरणाशि चिप्पइन्त्राणि विलित्ताणि बंसीमूलसि वियडगिर्हसि विभत्तायो वोच्छिन्नाओ वोगडाओ. २ १२ घंशी-वृक्ष विशेष रीति से फैले विशेष रीति से लिपे हुए विशेष के नीचे खुले द्वार वाले घर में पृथक किए हुए बिना परिमाण किए २ १२ २ २ २ कहे गए २ पत्याई बच्चाचिप्पए २ ३ ३ ३ २५ ३ २८ विभावित्तए चिप्पणसिजा विष्पजहंति वत्थुसु चाईए विगई पडिवद्ध विपीए वस्त्र घच्चक की त्वचा से बना हुआ रजोहरण समझाने को खो जाय या गुम हो जाय स्वागते हैं वस्तुओं में वातिक-तुच्छ प्रकृति घृत आदि में लोलुपी विनीत याचना देने के लिए ४ ४ ४ घाइत्तए शब्दकोषः उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ४ चुगााहिए ४ ४ में ४ ४ ४ ४ ४ उत्तटा समझाया गया २३ विहरिए विहार करने को चियरेन्जा देखें २८ वितरति देते हैं २९ चियाले विकाल में-प्रतिकूल काल वीसुमिज्जा शरीर त्याग करे २४ वेयावच्चकरे साधु सेवा करने वाले विउ?ज्जा उस अपराध स्थान से पीछे हटे ३. विसोहेज्जा विशुद्ध करे यावडियं व्यावच-सेवा कार्य को ३१ विगचणं पृथक करना विसोहन विशुद्ध करना ३२ पंजियायो प्रकट की गई १ विउवित्ता विकुर्वणा करके ६ विगिंचिमाणे ६ वितिगिंछा चिचिकित्सा-सन्देह विगिचित्तए ११ विसोहिताए ११ विसोदिया १३ विसोहमाणीए १३ विगिंचमाणीए १५ चियार भूमि विहारभूमि-स्वाध्याय भूमि १५ विचारभूमि संज्ञा भूमि वोसह काइयाए कायोत्सर्ग-देहभान भुलाती हुई २४ चीरासरिणयाए वीरासन से बैठने वाली बिदुप्पमाणमित्तमवि धूद मात्र भी विलिंपित्तए विलेपन करने को ५ बाहर डालते ५ पृथक करने को शुद्ध करने को शुद्ध किए गए शुद्ध करती हुई वाहर डालती हुई ५ ५ प्रथमं परिशिष्टम् ६१ उद्देश- भूत्र- शब्द- अर्थ- ६ ६ घोलते हुए ६ १ ४ १ w वसाए चसा-चिकनी चीज ४१ ववहारे व्यवहार ४१ बेयावडियाए पावच के लिए वइत्तए बोलने को १ विउसवियं शान्त होने वाले को २ वयमाणे २ वायंवयमाणे मृपा, हिंमा आदि को बोलता हुभा विसमंसि विपय ( ऊंचनीच) ( स ) समाणीं होती हुई संनिचेससि यात्रा का ठहराव स्थान ६ संवाहंसि साधन रखने का स्थान सपरिक्खेवंसि परिक्षेप-आवरण से युक्त ६. सबाहिरियंसि बाहरी भूमि से युक्त सिंघाडगसि शृगाटक में १६ सिंघाणं नाक का मज १६ साइम स्वादिम १६ सज्झायं स्वाध्याय को सचित्त कम्मे सचित्र उपाश्रय में २३ सागारिय निस्साए गृह स्वामी के नेसराय में गृह स्वामी के द्रव्य सहित सेज्जाए उपाश्रय ३५ संवसेज्जा एक साथ रहे संमुज्जेज्जा एक साथ आहार करे सामएएं श्रामण्य-श्रमण धर्म 'साई सद्य:-तत्काल. १ १ १ १ १ १ १ १ सागारिय उवस्सए १ १ १ १ ३८ F शब्दकोषः उद्देश- मत्र- अर्थ- ४ ४ ४ 2 में ४ ४ ४ ३ ४ शब्द- १२ चुग्गाहिए उलटा समझाया गया २३ विहरिताए विहार करने को वियरेज्जा देवें वितरति देते हैं चियाजे चिकाल में-प्रतिकूल काल वीसुमिज्जा शरीर त्याग करे २६ वेयावच्चकरे साधु सेवा करने वाले ३० विउठूजा उस अपराध स्थान से पीछे हटे विसोहेज्जा विशुद्ध करे वेयावडियं व्यावच-सेवा कार्य को ३१ विगंचणं पृथक करना विसोहन विशुद्ध करना वंजियायो प्रकट की गई चिउव्यित्ता चिकुर्वणा करके विगिचिमाणे बाहर डालते हुए ६ वितिगिछा विचिकित्सा सन्देह चिगिचित्तए चिसोहिए विसोहिया शुद्ध किए गए १३ विसोहमाणीए १३ विगिंचमारणीए बाहर डालती हुई चियार भूमि विहारभूमि-स्वाध्याय भूमि १५ विचारभूमि संज्ञा भूमि वोसह काइयाए कायोत्सर्ग-देहभान भुलाती हुई २४ वीरासणियाए वीरासन से बैठने धाली विटुपमाणमित्तमवि बूद मान भी विलिपित्तए चिलेपन करने को ६ पृथक् करने को शुद्ध करने को ५ K R S शुद्ध करती हुई ५ ५ ३६ प्रथमं परिशिष्टम् F- उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थ- ६ ६ ६ घोलते हुए ६ २ ६ or १ w १ ४० चसाए चसा-चिकनी चीज चवहारे व्यवहार ४१ यावडियाए पावच के लिए चहत्तए बोलने को १ विउसवियं शान्त होने वाले को २ वयमाणे बायंचयमाणे मृपा, हिंमा आदि को बोलना हुआ विसमंसि विपय ( ऊंचनीच) ( स ) ४ समाणी होती हुई सनिवेसंसि यात्रा का ठहरात्र स्थान ६ संवाहंसि साधन रखने का स्थान सपरिक्खेवंसि परिक्षेप-आवरण से युक्त सबाहिरियंसि बाहरी भूमि से युक्त सिंघाडगंसि शृंगाटक में सिंघाणं नाक का मन साइमं स्वादिम १६ सज्झायं स्वाध्याय को सचित्त कम्मे सचित्र उपाश्रय में ૨૨ सागारिय निस्साए गृह स्वामी के नेसराय में सागारिय उवस्सए गृह स्वामी के द्रव्य सहित सेज्जाए उपाश्रय ३५ संबसेज्जा एक साथ रहे संमुज्जेज्जा एक साथ आहार करे सामएएं श्रागण्य-श्रमण धर्म सर सद्यः-तत्काल or or 8 १ १ १ १ or १ १ १ ३५ १ १ १०० शब्दकोपः उद्देश- सूत्र- शब्द- अर्थor वह भी १ 10 २ or २ २ २ २ २ २ है सागारकंड गृह स्वामी का किया हुआ ४०-४२ ससाणं होते हुए-निकलते हुए सावि संपधूमिया खुशबूदार बनाया गया संखडि पडियाए संखडी की इच्छा से सालीणि धान-चावल वाला संतरा अपने किए हुए दो तीन रात ठहरना रूप ४ सुरावियडकुमें सुरा से विकृत कलश ४ सोधीरय वियडकुभे विकृत जल के कुभ ५ सिओदग वियडकुभे शीत जल के कुभ सम्बराइए रात भर सपि घृत सबकुली माला ८ सिहरिणी श्रीखण्ड (खादा विशेफ) १५ संसट्ठ दूसरे भोजन से सम्मिलित सागारिय विडं गृह स्वामी का भोजन साइज्जह आस्वाद लेके सागारिए से तस्य-उसका सागए ३ सलोमाई म के साथ सविय सामाणा धमान हो संपन्यमाणसं सम्यक प्रव्रज्या लेता हुआ १३-२३ संपव्वइत्तए दीक्षा लेने को, विहार करने को समोसरणुद्देल पत्ताई प्रथम वर्षावास के क्षेत्रादि का उद्देश्य को पाने वाली २ २ २ ३ गृहस्वामी ने २ २ ग से बने हुए ३ ३ र वह मी ३ ३ ३ प्रथमं परिशिष्टम् १०१ al Aw0 अर्थ- भावनाओं के साथ साधु उपाश्रय संस्तारक होने पर ही सैन्य-सेना 'उतरा है हाट अथवा पेठ में चारों ओर से अच्छी तरह 'कोश कोशभर साधर्मिकों के "पढ़ाने के लिए एक मण्डल में भोजन कराने की 'साथ रखने के लिए सुख से समझाने योग्य उद्देश- सूत्र- शब्द- २१ सभावणाई ३ समा ३ सिज्जासंथारय ३ सच्चेव a ३० सेएणं ३ सन्निविट्ठ ३ संन्निवसंसि ३ सव्यो ३ ३१ समंता ३ सकोसं ३ साहम्मियाणं ५ सिक्खावितए ४ संभुजित्तए ५ संचासित्तए ४ सुसरणप्पा सेहतराए ४ २३ संभोगवडियाए सागारिय संतिए ४ २६ सरीरगं संकमित्तए सुएण सरऊ ४ संतरित्तए सूरिए ५ समावन्ने १० सभोयणे सोयसि ५ १६ सूरामि मुहीप ३१ छोटे साधु AN I एक साथ भोजनादि के निमित्त से गृहस्वामी की मुख्यता में शरीर को एक गण से दूसरे गण में संक्रमण करने को सूत्र से-शास्त्रानुसार सरयू नामकी नदी पार उतरने के लिए सूर्य के ६ घाने पर 'भोजन के साथ गुह्य अङ्ग में सूर्य के सामने में १८२ शब्दकीप: उद्देश- सूत्र- १६ ५ ३३ ५ ३४ ५ ४२ ५ ६ २ ६ اللي لعم ६ ६ शब्द- अर्थ- समतलपाइयाए समानता से दोनों पैर रखकर संघाडि पडिबद्धाए अपने गच्छ में बंधी हुई सावरसगंसि पीठ देने के पालम्बन के साथ सविसाणंसि सींग के समान अवयव युक्त सवेंटगं डेंट लगे (अलावू) सुच्चा सुनकर संथरिजा निर्वाह कर सके सिया कदाचित् ( यदि) सम्म सभ्यग-अच्छी तरह संचाएज्जा समर्थ होवे सक्करे छोटी कंकड़ी सेयंसि जलके साथ कीचड़ में साहिगरणं किसी गृहस्थ से विरोध करने वाली साध्वी सपायच्छित्तां प्रायश्चित्त पायी हुई साध्वी सामाझ्यसंजय कप्पट्टिइ-सामायिक संयत कल्पस्थिति ( ह ) हेमंत गिम्हासु हेमन्त ग्रीष्म में हरिया इडियाए हृताहृतिका को हुरत्था बाहर-दूसरे उपाश्रय के हत्यकम्म खराब चेष्टा हत्थादालं परताड़न या स्वयं मारन हवं साथ या शीघ्र हुँतए होने को हीलिय वयणे निन्दित पचन हीर फील-छोटी टकटी ६ ६ १६ ६ २० १ ४६ १ २ ४ १ ३ ४ ३ ५ १६ ६ १ ६ ३ !! प्रथम परिशिष्टं समाप्तम्।।

द्वितीयं परिशिष्टम् पाठभेदः " " य " " दुहओ- " उद्देश- सूत्र- आगम मन्दिर प्रति संशोधित प्रति १ ६ संनिवेसंसि (सं०) निवेससि (आ० टी०) १४ श्रोहाडियचिलिमिलिया, ओहाडिय चेस) चिलिमिलिया माहरेनए माहारित्तए सागारियं य सागारिए ३६ चारए (चरित्तए) ३८ करेत्तए करित्तए वि ४३ नन्नत्थ नऽन्नत्थ ४६ घट्ठा घट्टा विहारभूमि वा वियार-वियारभूमि वा विहारभूमि वा भूमि वा ५० थुणाविसयात्रो थूणाविसयाओ प्रोकिरण णि उक्खित्ताणि ३ विक्खिएणाणि विविखत्ताणि ४ ४ वसज्जा वसह पडिग्गहिता पडिग्गहिया देह देज्जा २ २६ कप्पई० ८पडिग्गाहेत्तए ३० बद्धाचिप्पए बच्चाचिप्पए मुज्ञचिप्पिएचि मुजचिप्पए " .. २ १ शब्दकोषः " " ३ उद्देश- सूत्र- आ० म० उदेसो श्रासइत्तएवा करेत्तए निग्गन्थाएं उवा आसइत्तए परिभूते अपरिभूत्ते ११ चेलाई नि०य संशोधित उसओ चिाटुत्तएवा x निगंथ उव० चिट्ठित्तएवा परिमुत्ते अपरिभुत्ते चेलं निग्गंथस्स सेज्जासंथारए " " १६ सेज्जासंथारयं " X " X आसइत्तए करेत्तए जजरिए अहिंगरणं " " x " अविकरणं " x २६ ३ विश्रइक्कममाणे तेएणं अन्नधम्मियाणं हत्यादा सुसरणप्पा एगते " " वीइक्कममाणे तेन्न परधम्मियाणं हत्थायालं सुरसन्नपा एमन्तमन्ते चउत्थं पएसे पएसे श्रणापुच्छित्ताणं यावबकरा हगंतमते ११ १२ " थंडिने अणापुच्छिता वेयावच्चकरे एगते द्वितीयं परिशिष्टम " २६ . " " " " " उद्देश- सूत्र- श्रा० म० संशोधित सागार कडं सागारिकर्ड भिक्खूनो से कपिई गामागुगामं गामाणुगाम वा गणाओ गणाश्रो चा ४ २५ आइय श्राइयह से उचज्झायाणं उवज्झाएणं तवस्सी x झिझिए झिझिए पिवासिए पिवासिए, तवस्सी २८ मट्टियमक्कड मट्टियमक्कडग अहेसेवण मायाए अहेसवण मायाए उपिसेवण मायाए उपिसवण मायाए राइंदियाई राइंदियं परिणिव्वविय परिणियाविय ६ निव्विइगिच्छासमा- निविइगिन्छे वरणेणं, ११ से पाणं वा वीए पाणाणि वा बीयाणि वा तो तं थातोइय लाइया थिसोहिय विसोहिया परिमोत्तब्वे भोत्तव्वे नोउसिणे x चाउम्मासियं परिहारट्ठाणं-मासियं भत्ताए वा पाणाय वा पिंडवाय पडियाए सूराभिमुहीए २२ नेसिज्जियाए नेसन्जियार चिट्टित्तएवा निसीइत्तएवा ४ " " " " " " " " " १२ " सूराभि मुहाए . .

१०६ पाठभेदः संशोधित उद्दे उ " ३ " " उद्देश- सूत्र- प्रा० म० ४८ याइत्तए वा ३६ आलिम्पित्तए या आगाढानागादेहि ४० गायाई मक्खेत्तए वा आगाढ़ा नागाडेहिं ५२ णं ६ उदीरेत्तए ३ खाणुए " " म " आइयत्तए वा आलिपित्तए चा गाढेहिं गायं मक्खित्तए वा गाढागाडेहिं x उदीरित्तए खाणू तं च गिण्हमाणे तिन्तिणीए मुत्तिमग्गस्स छविहो " or " " तं " " ७ " १६ ", गेण्हमाणे तिन्तिणिए मोक्खमग्गरस छव्विहा " m ॥ द्वितीयं परिशिष्टं समाप्तम् ।।

ततीयं परिशिष्टम् प्रतिपरिचयः १--श्री वर्द्धमान जैन आगममन्दिर, पालीताणा से प्रकाशित एवं तपो. गच्छीय श्री सागरानन्द सूरि द्वारा संशोधित प्रति । इसमें प्राचीन प्रतियों से पाठ संशोधित है, किन्तु अधिकांश जगह ० विंदु देकर पाठ संकोच किया गया है एवं कई जगह पाठ छुट भी गए हैं। कहीं पदों के क्रम में परिवर्तन हो गया है। बीच २ में पाठान्तर व अन्य प्रतियों में प्राप्त नहीं होने पर भी अपनी ओर से संशोधित पाठों को ( ) कोष्ठक में दिए हैं। सूत्राकों के साथ स्थान २ पर नियुक्ति व भाष्य गाथाओं के अङ्क भी दिए गए हैं। पत्र सं०८-६ है। प्रति लम्बेसाइज पत्रा- कार में मुद्रित है। --नियुक्ति लघुभाष्य वृत्युपेत बृहत्कल्पसूत्र--यह श्री आत्मानन्द जैन सभा, भावनगर से प्रकाशित एवं मुनि श्री चतुरविजयजी पुण्यविजयजी द्वारा संपादित है। प्रस्तुत सूत्र के सम्पादन में मुनि श्री ने विविध प्रतियों से-जिनमें ताड़पत्रीय प्रति भी सम्मिलित है-श्रम पूर्वक मूलपाठ एवं टीका का संशोधन किया है। सूत्र ६. भागों में पूर्ण हुआ है-जिनमें से ५ अभी उपलब्ध हैं। पाठ प्रायः शुद्ध है । संशोधन में इस प्रति को मुख्यता से प्रामाणिक माना गया है। ३--हस्तलिखित प्रति--यह प्रति स्वर्गीय ढढ्ढा सौभागमलजी के ज्ञानभंडार की सावचूरि ( सटीक ) प्रति है जो कि वर्तमान में पूज्य श्री हस्तिमल्लजी महाराजा साहेब की निश्राय में है। इसके पाठ आत्मानन्द सभा, भावनगर से मुद्रित सभाष्य- बृहत्कल्पसूत्र से अधिकांश मिलते हैं। प्रति त्रिपाठी होने से बीच में मून और ऊपर नीचे टीका की गई है । लिपि साधारणतया सुवाच्य है। संशोधन में इस. प्रति का संकेत 'ह' प्रति रक्खा है। पत्र सं० १८ है । प्रति पृष्ट में मूल और टीका को मिलाकर २३ से २५ पंक्तियों के लगभग अनुपात हैं। अधिकांश पाठ शुद्ध हैं। यह - १०८ प्रतिपरिचयः प्रति १८ वीं शताब्दी के एक मुनिराज की लिखी हुई है। इस प्रति के अंत में प्राय- श्चित का यंन और भाषा में प्रायश्चित के विधान चूर्णि पर से लिखे हुए है । मूल- पाठ के अंत में प्रशस्ति-लेख निम्न प्रकार है:- "संवत् १७५१ वर्षे वैशाख मासे शुक्ल पक्ष ६ दिने पीपाड़ ग्राममध्ये ऋप ५ जीघराजजी पूज्य तत् शिष्येण ऋप सुरत्राणेन लिपिफुट स्वात्मार्थम् पश्नार्थं । शुभं भवतु । कल्याणमस्तु । श्री० ७ श्री ।। ॥ तृतीयं परिशिष्ट समाप्तम् ।।

चतुर्थं परिशिष्टम् धृहत्कल्प सूत्र घृत्यन्तर्गतानि विशेष नामानि विशेषनाम कस्य निर्देश स्थलम् सू० उ० फलस्य १ १ १ १ फलस्य ताल पलंय डिड्डियादि सल्लकी फलस्य १-टीका १-टी. फलस्य १ १ गाम जनपदस्य ६ नगरस्य ६-टी० ६-टी० १.टी. .. प्रानन्दपुर भृगुकच्छ ताम्रलिप्ती श्रावणगिह चिलमिलिका द्रोण भीष्म अंग नगरस्य नगर्याः स्थानविशेषस्य पर विशेषस्य कलाचार्यस्य. ૧૨ १ १ ४४-टी० ४४-टी . देश विशेपत्य " मगह कोसंधी "" थूणा कुणाल साली थीही ५१ ५१ १ धान्य विशेपस्य २ १ १ ११० विशेष शब्द सूची विशेपनाम कस्य निर्देश स्थलम् गोधूम २ जव " २ " जवजव " .२ मुद्ग " २ " माष २ १ तिल २ " १ १ वस्त्र विशेपस्य २ २४ कुलत्थ लोयए जंगिए -भंगिए २ " २ '२४ . " " " २ सानए पोत्तए मुंजचिप्पए २ .२४ " २ २४ " पशु विशेषस्य २ २५ पायरिय साधोविशिष्टपदस्य ३ -१२ " ३ १२ سد سد س १२ १२ जवज्झाय पवित्ती थेरे गणी गणहरे गणावच्छेइए पारंचिय " " " १२ ३ " ११.२ ३ १२ प्रायश्चित्त भेदस्य -२ ३ " अगवट्ठप्प गंगा नद्याः ४ जउगा " ૨૨ सरऊ कोसिया ३२ ४ " ..

चतुर्थ परिशिष्टम् १११ निर्देश स्थलम् कस्य देशस्य विशेपनाम कुणाल मही एरावई नेपधिका नद्याः ३२ नया: ४ ३३ २२-टी आसनविशेषस्य ५ उत्कटिका ५ २४ ह ५ वीरासनिका दण्डासनिका আম্বালা तिल्ल " २९ ५ २६ तैलस्य खाद्यविशेपस्य ४० घन नवनीय " वसा ५ पाणाइवाय ६ अभ्यङ्गविशेपस्य हिंसायाः मृपावादस्य चौर्यग्रहणस्य २ ६ मुषावाय अदिन्नादान २ w २ । चतुर्थ परिशिष्टं समाप्तम् ।।

पंचमं परिशिष्टम टिप्पणम् १-वंशी मूलं- - यो गृहाद् चहिाराप्रवर्ति स्थंडिकारूप अलिंदकः, या वा 'अपसारिका' पटा- लिका, कुत्र ? इत्याह-गेहस्य पार्श्वे वा पुरतो वा पृष्टतो वा तद्येशीमूल नाम गृहम् । २-सागारिक पिएड: सागारिक इति शय्यातरः, उपाश्रय दाता इत्यर्थः । तस्य पिण्डः सागारिक- पिण्डः । शय्यातर पिंड प्रणे प्राचार्यविविधा दोपाः प्रदर्शिताः । तेषु प्रथमस्तीर्थ- कराणामाज्ञाखण्डनं द्वितीयः प्रत्यासन्नतया पुनः पुनर्भिक्षा ग्रहणे आहार शुद्ध्यभावः, तृतीयः लोलुपता वृद्धिः शय्यादायकेन मुनीनां सर्वा भिक्षादि व्यवस्था विधेया इति शंकया शय्या दुर्लभा भवेत् इति चतुर्थः । अतश्च मुनिभिः शय्यातर पिण्डो न प्रायः । वृत्तिकारेण पूर्वं तावत् कः सागारिकः कदा व शय्यातरो भवति, कतिविधः शय्यातर पिण्डः इति प्रपञ्चितस्तत्र प्रथमं कः सागारिकः इति प्रदर्शयति-- सेजायरो पभूवा, पभू संदिट्ठो व होइ कायव्यो । एग मणेगे व पभू, पभु संदिट्ठ वि एमेव ।। शय्यातरः प्रभुर्वा प्रभु सन्दिष्टो वा कर्तव्यो भवति । तत्र प्रभुः-उपाश्रय स्वामी । प्रभु सन्दिष्टस्तु तेनैव प्रभुणा यत् कृत प्रमाणतया निर्दिष्टः । यः प्रभुः स एको वा स्यादनेको घा, प्रभु सन्दिष्टोऽपि 'एवमेव एकोऽनेको वा भवति । कदा सागारिको भवति ? एतस्य बहुविधं प्रतिवाक्यमस्ति तद्यथा-कश्चिद्वदति- क्षेत्रे प्रत्युपेक्षिते सति यदा प्रतिश्रयोऽनुज्ञापितस्तदा सागारिको भवति । अन्यो व ते. यदा तस्य गृहस्थागणं प्रविष्टाः । अपरो भणति-यदा वसतिम् 'अतिगताः, प्रविष्टा । कश्चिदाह-यदा स्वाध्यायः कर्तुमारब्धः। एवं पञ्चदशमतानिदर्य प्राचार्यः श्रादि- पंचमं परिशिष्टम् ११३ शति-एते सर्वेऽज्यनादेशाः कुतः ? इत्याह-अनुज्ञापितावग्रहादिपु निक्षिप्तान्तेषु दिव- संत-एव व्याघात्तो भवेत , व्याघाताच्चान्यां वसतिमन्य वा क्षेत्रंगताः ततः कस्या. सौ शय्यातरो भवतु ? आवश्यकादिषु च चतुर्थयाम-पर्यन्तेपु वसति व्याघातेन बोधिकस्तेनादि भयेन वाऽन्यत्र संक्रामतां कस्य शय्यातरी भवितुमर्हति । श्रादेशः पुनरयं-"नियाघाते" व्याघाताभावे यद्यन्यां वसतिं न गताः तत्रैव रात्रावुपिता- स्ततो भजना कर्तव्यास वा शय्यातरो भवेत् इतरो वा अन्य उभयं वा । अन्यत्र स्थाने सुप्त्वा 'चरम' प्राभातिकमावश्यकमन्यत्र कुर्वन्ती तदा यस्यावग्रहे रात्री सुप्ता यवाहे च प्राभातिक प्रतिक्रमणं कृतं तौ द्वावपि शय्यातरौ भवतः । इदं प्रायः सार्थादियु सम्भवति, आदि शब्दात् चौरावस्कन्द भयादि परिग्रहः । इतरथा तु ग्रामादिषु वसतां 'भजना' विकल्पना । अथ कतिविधः शय्यातर पिण्डः ? तत्राऽह-द्विविधो वा चतुर्विधो वा पड् विधो चा अष्टविधो वा द्वादशविधो वा शय्यातरस्य पिण्डो भवति । तद्विपरीतः 'पुनः' 'अपिण्डः शययातर पिण्डो न भवति । द्विबिंधः-शय्यातरपिण्डः-आहार उपधिश्च । "बिदु"त्ति द्विगुणितौ द्वौ-चत्वारो भवन्तीति कृत्वा चतुर्विधः शय्यातर पिण्ड: पुन- स्थम्-अन्नं पान औधिकोपकरणं औपग्रहिकोपकरणंचेति । तथा अशनादयश्चत्वारः औधिकोपधिः औपग्रहिकोपधिश्चेति पड्विधः । अन्नं पानं वस्त्र पात्रं 'शूच्यादय.' शूची-पिपलक-तख रनिका-कर्ण शोधन रूपाश्चत्वार इत्यष्टविधः । तथाऽशना- दीनि वखादीनि सूच्यादीनि चेति त्रीणि चतुष्कानि द्वादश भवन्ति । तद्यथा-अशनं १ पानं २ खादिमं ३ स्वादिमं ४ व ५ पात्रं ६ कम्बलं ७ पादप्रोऊच्छ ८ सूची ९ पिपलको १० नखच्छेदनकं ११ कर्ण शोधनकं १२ चेति । तृण डगल-झार-मल्लक-शय्या-संस्तारक-पीठ-लेपाः, आदि शब्दात् कुट- मुखादिकं च एप शय्यातर पिण्डो न भवति । यदि च शय्यातरस्य पुत्रादिः शैक्षो वन-पात्र सहितः प्रबजितुमुपतिष्ठते तदा स सागारिक पिण्डो न भवति, अत: कल्पते सोपधिरप्यसौ प्रव्राजयितुम् । टी०. ३-कुलिका कृताणि-इत्यादिः- कुलिका-कुड्यमुच्यते, ततः कुलिकाकृतादि नाम कुड्यालीनानि कृत्वा स्थापि- तानि । मृपिंडादि निर्मितं कुञ्यम् ।

टिप्पणम् सौवीर विकट-द्राक्षा-खजूरादिभिव्यनिष्पाद्यते तद् मद्यं सौवीरविकटम् । सीअोद्ग वियड -विकृतं शीतोष्णादि शस्त्रेण विकारं प्रापितम्, प्राशुकीकृत- मित्यर्थः । तत्र प्रथमभंगे उष्णोदकमेवशीतीभूतं तन्दुलधावनादिकं वा । तृतीय भंगे उष्णोदकमुद्धृतत्रिदण्डम् । पाडिहारिय--भुक्तोहरितं भूयोऽस्माकं प्रत्यर्पणीयमिति यत् प्रतिज्ञातं तत्- आतिहारिकम् । अनुद्घातिकः- अनुद्घातिकः-न विद्यते उद्घातो लघुकरणलक्षणो यस्य तपौविशेषस्य तद्- नुद्घातं यथाश्रुतदानमित्यर्थः । तद् यस्य प्रतिसेवाविशेपतोऽस्ति सोऽनुद्घातिकः । तपोगुरुप्रायश्चित्ताहोऽनुद्घातिक उच्यते। अथवा-उद्घातो नाम भागपातः सान्तरहानं वा स विद्यते यस्मिन्-असावुद्- घातिकस्तद्विपरीतोऽनुद्घातिकः । तपोगुरुप्रायश्चित्ताऽहे । त्रयोऽनुद्घातिकाः प्रज्ञप्ताः । उद्घातो नाम भागपातः । सोऽस्त्येषु त उद्घा- तिकाः, तद्विपरीता अनुद्घातिकाः । तपोगुरुप्रायश्चित्तस्थानमपि-अनुद्घातिकमुच्यते, तन्मासिकं, चतुर्मासिकम् । पाएमासिकादिभेदाबहुविधम् । ५-पारञ्चिक:- पारश्चिक इति दशम प्रायश्चित्तस्थानम् । अस्यार्थः-पार-तीरं गच्छति येन प्रायश्चित्तेनाऽऽसेवितेन् तत् पारञ्चिकम् । पारं पुनः संसार समुद्रस्य तीरभूतम, अने. नासेवितेन साधुर्मो गच्छत्तीति भावः। यद्वा शोधेः पारं- पर्यन्तमञ्चति यत् तद् पाराञ्चिकम् , अपश्चिमं प्रायश्चित्तमित्यर्थः । ततो येन तपसा पारं प्रापितेन अच्यते श्री श्रमणसंघेन पूज्यते तत् पाराञ्चिकं पाराञ्चितं वाऽभिधीयते तद्योगाद् साधुरपि पाराञ्चिकः । पाराञ्चिकः समासेन द्विविधः, तद्यथा-आशातना पाराञ्चिकः प्रतिसेवि- पाराञ्चिकश्च। प्रतिसेवना पाराञ्चिकः सूत्रोक्तः त्रिप्रकारः। आशातनो पाराग्निको जघन्येन - पंचमं परिशिष्टम् ११५ परमासान् उत्कर्षतश्च द्वादश मासान् भवति । एतावन्तं कालं गच्छान्नियूढः बहिर्भूतस्तिष्ठति । प्रतिसेवना पाराश्चिको जघन्येन सम्वत्सरं उत्व.र्पतो द्वादश घर्पाणिनि'ढ आस्ते । सच कारणे यथोक्तकालादयंगपि गच्छं प्रविशतीति भावः अथ के पुन: पाराचिकमहन्तीति प्रदर्शयति आचार्यः संहननं वनऋपभनाराचम्, वीर्य-धृत्या धनकुड्य समानता, श्रागमः- जघन्येन नवम-पूर्वान्तर्गतमाचाराख्यं तृतीयं वस्तु उत्कर्षतो दशमपूर्वमसम्पूर्णम, र.च्च सूत्रतोऽथेतश्च यदि परिजितं भवति, एतैः संहननादिभिर्विधिना च तदुचित समाचारेण य: 'समग्रः' सम्पूर्णः । 'तपस्वी- नाम सिंह निक्रीडितादि तपःकर्मभाषितः । 'निग्रयुक्तः' इन्द्रिय-पायाणां निग्रह- समर्थः । 'प्रपचन सारेऽभिगतार्थ. परिणामित प्रवचन रहस्यार्थ इनि । किञ्च-याय गच्छान्नियूदस्य तिलतुषत्रिभागमात्रोऽपि 'नियू ढोऽहम्' इत्यशुभो भावो न विद्यते स नियूहणायाः 'अर्हः' योग्यः । शेषस्य एतद्गुण विकलस्य नियूदणा नाऽस्ति, न कर्तव्येत्यर्थः । एतैः-संहननादिभिर्गुणैः सम्पयुक्तः पाराञ्चिकाहं स्थानंप्राप्नोति । यः पुनरेतद्गुण विषमुक्त: 'ताशे' पाराम्बिकापत्ति प्राप्तेऽपि मूतमेव प्रायश्चित्तं भवति । ६-अनवस्थाप्यम्- अनवस्थाप्पम् --'यो हि-त्रासेवितातिचार विशेष. सन्-अनाचरित तपोविशेष: तद्दोपोपरतो महाव्रतेषु नावस्थाप्यते-नाधिक्रियते-असौ महाव्रतेषु स्थापनाऽयोग्यः । नवमं वा प्रायश्चित्तस्थानम्अनवस्थाप्यमभिधीयते । - ७-सम्भोग वृत्तिः समान-समाचाराणां साधूनां सहभोजनं संभोगः । सच उपध्यादि भेदाद् द्वादशधा, तथाचाह--"दुवालसविहे संभोगे पएणते, तं जहां-'उबहिसुस भत्तपारणे अंजली पम्गहेत्तिय । दायणे य विकाए य, अब्भुट्ठाणेति आवरे ॥ किइकम्मरस य. करणे, वेयावञ्चकररोह य । समोसरणं संनिसिज्जा य, कहाए य पर्धधणे ॥ १ ॥ समः ॥ २ .1 परस्पर वस्न पात्राद्युपधीनां भक्त पानयोश्च आदानप्रदान साम्भोगिकस्य साम्भोगिकेनैव भवति, श्रुतसम्बन्धेतु सम्भोगिकस्य, प्रत्यसाम्भोगिकस्य चोपसम्पन्नस्य , ११६ टिप्पणम् श्रुतस्य वाचना प्रच्छनादिकं विधिना कुर्वन्शुद्धएव । ४ अञ्जलिप्रग्रहः-वन्दनादिकम् । तथाहि 'साम्भोगिकानाम् अन्यसाम्भोगिकानां वा संविग्नानां चन्दनकं प्रणामः-. सोञ्जलिप्रग्रहः' अर्थात् नमः क्षमाश्रमणेभ्य इति भणनम् । आलोचना-सूत्रार्थ- निमित्त निषद्याकरणं च कुर्वन् शुद्धः। ५ दान-साम्भोगिकः--साम्भोगिकाय घम्सादिभिः शिष्यगणोपग्रहासमर्थे साम्भोगिके । अन्यसाम्भोगिकाय वा शिष्यगणं यच्छन , शुद्धः । ६ निकाचनं-शय्योपध्याहारैः शिष्यगणप्रदानेन स्वाध्यायेन च . साम्भोगिकः साम्भोगिक निमन्त्रयन् शुद्धः । ७ अभ्युत्थानम्-श्रासनत्यादिरूप सत्कार:-अयसपरं सम्भोगासंभोगस्थानम |कृतिकर्म-वन्दनकम् । ९ वैयावृत्यम् श्राहारोपधि दानादिना प्रश्रवणा पात्रकाद्यर्पणादिना अधिव.रणोपशमनेन साहा- य्यदानेन वा उपष्टम्भकरणम्--उपकार करणमित्यर्थः । १० समवसरणम्-व्याख्या- नादियु यन्त्र बहवः साधवो मिलन्ति तत्त् समवसरणम् । ५१ सन्निपद्या-एकस्मिन्नं . वाऽऽसने सहोपवेशनम् । १२ कथाप्रबन्धः वादादिकथानां धर्मकथाया था. सहैव करणम इत्ति संक्षेपार्थः, विन्तरार्थस्तु सम्प्रदायादवसेयम् । -- ८-स्थानायतिकाऽऽदिः- स्थानायतं नाम ऊर्द्ध वस्थान रूपमायतं स्थानम् , तद्यस्यामस्ति सा स्थाना- यत्तिका प्रतिमास्थायिन-प्रतिमया एक रात्रिक्यादिकया कायोत्सर्ग विशेषेणैव तिष्ठती . त्येवंशीलो यः स.प्रतिमास्थायी। निपद्या-निपटनं निपद्या उपवेशन प्रकार:-सच उत्कुटुक-गोदोहिक-समपादपुत पर्यङ्क-अद्धपर्य भेदैः पञ्चविधाः । वीरासनं नाम यथा सिंहासने उपविष्टो भून्यस्तपाद श्रास्ते तथा तस्यापनयने कृतेऽपि सिंहासन इव निविष्टो मुक्त जानुक इव निरालम्बनेऽपियद् आस्ते । दुष्कर- चैतत , अतएव वीरस्य साहसिकस्यासन वीरासनमुच्यते, तद् अस्या अस्ति-इति वीरासनिका।

पंचमं परिशिष्टम् २१७ - 8-पुलाकं- तिविहं होइ पुलागं, धरणे गंधे य रसपुलाए य । चउगुरुमाऽऽयरिआई, समणीणुद्धद्दरग्गहणे ।। त्रिविध पुलाकं भवति, तद्यथा-धान्यपुलाकं, गन्धपुलाकं रसपुलाकञ्च । अय त्रीण्यपि धान्यपुलाकादीनि व्याचष्टे-- निप्फावाईधरणा, गंधे वा दिगपलंडु लसुणाई । खीरं तु रस पुलाओ, चिचिणिदक्खारसाईय ।। निष्पावा वल्लास्तदादीनि धान्यानि पुलाकम् । तथा 'वाइगं' विकटं, पलाण्डुल- शुने च प्रतीते, तदादीनि यानि उत्कट गन्धानि तद्गन्ध पुलाकम् । यत् पुनः क्षीरम् , ये च चिश्चिणिकाया गोस्तनिकाया रसो वा आदिशब्दादपरमपि यद् मुक्तमति- सारयति-तत्सर्वमपि रसपुताकम् । अथ किमर्थमेतानि पुलाकान्युच्यन्ते ? इत्याह-- आहारिया असारा, करेंति वा संजमाउ णिस्सारं । निस्सारं च पवयणं, दर्छ तस्सेविणिं विति ॥ इह पुलाकमसारमुच्यते, तत आहारितानि वल्लादीनि यतोऽसाराणि सन्ति ततः पुलाकानि भण्यन्ते । संयमाद्वा संयममङ्गीकृत्य यतः क्षीरादीनि निस्सारां साध्वीं कुर्वन्ति, ततस्तान्यपि पुलाकानि, प्रवचनं वा निस्सारं, तेषां विकटादीनां सेवनशीला संयती दृष्ट्वा जना व वते ततस्तानि पुलाकान्युच्यन्ते । - कल्पस्थितिः- कल्प:-श्राचार मर्यादा, सच जिनकल्प, स्थविरकल्पस्थितकल्पाऽस्थितकल्प भेदाबहु प्रकारः । शास्त्रोक्त प्रलम्बादिरूपो वा, तस्य समासतः पट प्रकारा स्थिति:- मर्यादा भवति, अत उक्तं पड्विधा कल्पस्थितिः। सामायिक संयत कल्पस्थिति:-- भरतैरावत क्षेत्रे मध्यवर्तितीर्थकृतां विदेह जिनानाचशासने सामायिक- संयमो भवति, तस्य कास्थितिः-सामायिकसंवत कल्लस्थितिः, अत्र चाऽयं विशेष:- - ११८ दिगम सामायिकसंयमे हि चत्वारि नियतकल्पा: पडनियत कल्याश्च भवन्ति । तत्र शय्यातर- पिण्ड चतुर्याम-पुरुष ज्येष्ठ कृतिकर्मरूपो चतुर्धा नियतक.ल्लो वेदितव्यः । छेदोपस्था- पनोयं नाम यत्र संयमे पूर्व पर्यापस्य छेदेन व्रतेपूपाधापनम्-अारोपणं क्रियते तत्छेदोपस्थापनकम्, तद् द्विधा सातिचारं निरतिचारञ्च । तच्च निरतिचारं यद् इत्वर- सामायिकस्य शिष्यस्य-आरोप्यते । पार्श्वनाथ साधोर्वा पञ्चयामधर्मप्रतिपत्तौ । सानिचारम्-यन्मूजवायश्चितयतः--साधोभवति यथाचोक्तम्--परियायस्सछेओ, जत्थोवट्ठानणंबएसुचछेदे । छेदोषहावणमिह तमण इयारेतरं दुविहं ।। सेहम्स निरइयारं तित्थंतर संकमेव तं होज । मूल गुण घाइणो सा,-इयारमुभयं च ठियकप्पे । सातिचारछेदस्य प्रथम-जिनशासने संवत्सररूपोत्कृष्टा तपोभूमिः, मध्यम तीर्थ- करतीर्थेऽष्टमासिकी, श्रीवीरतीर्थे च पण्मासिकी ज्ञातव्या । छेदोपस्थापनीयस्य दशधा कल्पस्थितिः, तद्यथा-- आचेलक्कुद्देसिय-सिज्जायर-रायपिंड-कितिकम्मे । वत-जेट-एडिक्कमणे-मासं पज्जोसवण कप्पे ।। श्राचेलक्यम १ औद्देशिकं २ शय्यात पिण्डः ३ राजपिण्डः ४ कृतिकर्म ५ व्रतानि ६ ज्येष्ठः । पुरुष ज्येष्टो धर्मः ७ प्रतिक्रमणं ८ मासकल्प: ६ पर्युषणकल्पश्च । सर्वेप्येते कल्ला: प्रथम चरम जिनयोस्तीर्थे नियम तो भवन्ति । . निर्विशमानादिः- - प्रथम चरम तीर्थकृच्छासने यदा केचिन्मुनयः परिहार विशुद्धिकल्पं प्रविशन्ति तेषां कल्पस्थितिः-निर्विशमानकल्पस्थितिः, अत्रचायं विधिः-तीर्थकृतां पादमूले ये विद्वांसः प्रस्तुतं कल्पं प्रतिपन्नास्त एवाऽन्यास्तत्र कल्पे स्थापयन्ति । इमत्रहृदयम्- इयमेवाऽस्य कल्पस्य स्थितियत् तीर्थ कर समीपे वाऽमुंप्रतिपद्यन्ते, तीर्थंकर समीप- प्रतिपन्न साधु सकाशे वा, वा, नाऽन्येपाम् । जधन्यतः सातिरेकाष्टवर्पे ये प्रव्रज्यां गृहीत्वा विंशतिवरधीत-दृष्टिवादाः, परिणिष्ठित ज्ञान-दर्शन-चारित्राः, जघन्यतोऽपि नवपूर्वविदः धृत्यादिगुणयुक्ताम्से कल्पमहन्ति । त्रिपुगणेषु जघन्येन सप्तविंशति पुरुपा भवन्ति, प्रत्येकस्मिन् गणे नवभिः मुनिभिः पंचमं परिशिष्टम् ११६ चत्वारः परिहारमारभ्यते, तत्र च नवानां मध्यादेको कल्पस्थितः--गुरुस्थानापन्नः, परिहारिकाः, चत्वारश्चाऽनुपरिहारिकाः। परिहारिका यदि वर्परीवारभन्त तदा जघन्येनाऽष्टमंतपः, मध्यम दशमम्, उत्कर्पण द्वादशम् । शिशिरेचेत्तदा पष्ठाऽप्रम- दशमरूपेण क्रमशः जघन्यादिकमवसेयम् ग्रीमतौं-चतुर्थ-पष्ठाऽष्टमरूपाणि जघन्य. मध्यमोत्कृष्ट तपांसि ज्ञयानि । पारणकेचाऽऽचाम्लेन पारयन्ति । अनुपरिहारिकाः कल्पस्थितश्च प्रतिदिवस- माचाम्लं कुवन्ति । परिहारिकाः प्रथमतः परमासान् यावत्प्रस्तुतं तपोवहिन्त, ततोऽनु परिहारिकाः अपि परमासान् वहन्ति, इत्तरे तु तेषामनुपरिहारिकत्वं प्रतिपद्यन्ते । तैरपि व्यूढे सति कल्पस्थितः षण्मासान् वहति, तनः शेषाणामेकः कल्पस्थितो भवति । एकः पुनरनुपरिहारिकत्वं प्रतिपद्यते । एवमेतेऽष्टादश मासाभवन्ति । ते परिहारिकाः पभिर्मासैर्गतैस्तपसि व्यूढे सति 'निर्विष्टाः निर्विष्टकायिका भवन्ति ! एवं परिहार तपः समाराधयतां कल्पस्थितिः निर्विशमानकल्पस्थितिः, समापित परिहाराणां या कल्पस्थितिः सा निर्विष्टकायिक कल्पस्थितिः । जिनकल्पस्थितिः- धृति बल-वीर्य संहननादि संयुताः मुनयो जिनकल्पाय समर्था भवन्ति । जिनकल्प- स्थिति ग्रहणेन उपलक्षणत्वात्सर्वेषामपि गच्छ निर्गतानां स्थितिः परिगृह्यते । जिन- कल्पे नास्ति-अपवादपदम् । स्थविर कल्पस्थितिः- प्रलम्बादि षड्विध कल्पस्थिति पर्यन्ता, द्विपद् युक्ता उत्सर्गाऽपवाद् पद्वय युक्ता स्थचिरकल्पस्य स्थितिभवति । विस्तारस्तु-आचाराङ्गादिशानान्तराद्वसेयः ।

Shri Brahataklap Sutram

Author
Hastimalo Muni
Title
Shri Brahataklap Sutram
File name
Shri Brahataklap Sutram
Text
OCR done
Citation
1955
Published
2012/04/01
Publisher
Ajmer,durga Press Dhanmandi
Language
Sanskrit
Pages
147
Library
Acharya Shri Vinaychandra Gyan Bhandar, Jaipur
Classification
Literature
DLI number
407297
Barcode
99999990294625.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
W6AhpH9vLFy
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