Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Prarambhik Manovigyan

S.m.mohasim · 2010/12

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प्रारम्भिक मनोविज्ञान
एस० एम० मोहसिन
अध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग
पटना विश्वविद्यालय
लोकभारती प्रकाशन
१५ ए, महात्मा गाधी मार्ग, इलाहाबाद १

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प्रारम्भिक मनोविज्ञान
एस० एम० मोहसिन
अध्यक्ष, मनोविज्ञान विभाग
पटना विश्वविद्यालय
लोकभारती प्रकाशन
१५-ए, महात्मा गाधी मार्ग, इलाहाबाद १

लोकभारती प्रकाशन
१५ए महात्मा गाधी माग
इलाहाबाद द्वारा प्रकाशित
कापीराइट
एस० एम० मोहसिन
मूल्य ५५०
प्रयम सस्वरण, १९६७
सुपरवाइन प्रिंटस,
1-सी बाईमा माग, साहावाद ३
द्वारा मुद्रित

इस पुस्तक के विषय में हिनी में प्रारम्भिक मनाविनान की पुस्तकों की कमी नहीं है । इनमें किताबों में मुख्य विषय वस्तु का अच्छा समावेश भी है। लेकिन ऐमी किता त कम है जिनके पन्ने पर ऐसा लगे कि लेखर ने प्रामासिक पुस्तकों में विचारपूवर पा है उनका मनन किया है और अपने अध्ययन और मनन के फलस्वरूप मनोवैगनिक विषया का जो मुसम्बद्ध मान उम हुप्राह उसे उसने अपनी पुस्तक में व्यक्त किया है । फेवल इसी एष कारण म निन्दी में ऐसी बहुत कम विवाह जो अमरोको मोर अग्रेज लेखका को कितावा की तुलना में बराबर मा मरे। पाई और परीक्षा का माध्यम प्रब मानापायें हो गई है और अब अमेरिकनों मोर अग्रेजा द्वारा लिम्दा प्रप्रेजी किताबा की उपयोगिता धीरे-धीरे घटती जा रही है । ऐसी पाशा का जाती थी कि पटाई और परीक्षण के माध्यम से ददलने से विद्यार्थी अपना पाटय पुस्ता विचार वस्नु का पहले से ज्यादा व्यापर और गहरा नान प्राप्त कर सकेंगे । लेकिन मेद को बात है कि ऐसा नहीं हो रहा है बचि विद्यायियों के नानानन का स्तर हर तरह से नीचे गिर रहा है। पान का मामा व विद्यार्थी जो कुछ पढताह उस न तो ठीक से समझता है और न उसे अपने पूर्व अजित वान के साथ समन्वित कर पाता ह । वह किसी तरह स इम्तहान वो पान कर लेता है लेकिन मानी जानकारी को किसी अन्य महत्वपूर्ण उद्देश्य को प्राप्ति में उपयोग नहीं कर पाता है। प्रारम्भिा मनोविज्ञान सामाय मनोविनान का परिचय कराने- वाना पुन्तर है। इसका मुख्य उद्देश्य ह कि इसका पान माधुनि

लोकभारती प्रकाशन
१५ ए महात्मा गाधी माग
इलाहावा १द्वारा प्रकाशित
पापीराइट
एम० एम० मोहसिन
मूय ५५०
प्रथम सस्वरण, १९६७
मुपरखाइन प्रिंटस,
-गो बाईमा बाग, इलाहाबाद ३
द्वारा मुद्रित

इस पुस्तक के विषय में हिनी में प्रारम्भिन मनोविगन को पुस्तका का कमी नहीं है । इनमें से कुछ मिनावों में मुख्य विषयवस्तु का मच्या ममावेश भा है। सक्नि ऍमा शिवाय बढ़त कम है जिनके पन्ने पर ऐमा लाकि सब ने प्रामाणिक पुस्तकों को विधारथा है उनका मनन विमा ह भोर अपने प्रध्यपन মীৰ দলৰ ৰ লৰণ দৰাৰপানি বিয়ে কা বা মুঘর পানি বন हमा । उन उसने अपनी पुस्ता में व्यक्त किया है। केवल इसो एर वापु म हिन्दी में ऐसी दल क्म पिता है जा ममरोरी और भग्रेस लेबरा को रिवाया की तुलना में बराबर मा सरें। पढाई और पताका माध्यम पद मातभाषायें हा गदह ौर पर अमेरिकनों पर प्रजा द्वारा लिनी प्रजो किवारों को उपयोगिता धोर-धीरे पती जा रही है। ऐसी पाशा जाता थी कि पगई और परीक्षण के माध्यम देवाने स विद्यार्यों अपनी पाट्य पृस्तरों के निचार वस्तु का पहले स ज्या या और गहग नान प्राप्त कर सकगे। लेकिन मेद की बात है कि ऐसा नहीं हा रहा है यदि विद्यापियों में जानाजन का नर हर वर से नीचे गिर शार का मामाच विद्यापी जो कुछ पता है उस न तोटारस समझता है और न से मपने पूर्व प्रति मान + साथ समन्वित कर पाता है। वह किसी तरह से इम्तहान तो पार कर लेता है सरिन मी जानकारी का किसी माय महत्वपूर्ण उद्देश्य की प्राप्ति में नहीं प्रारम्भिा मनोदिनान सामाय मनोदिन का परिचय करने वाती पुन्तर ह । इसका मुख नद्देश्य है कि इन ४ मनोविनान के मूलभूत तथ्या भौर प्रत्यया को इतनी अच्छी तरह समझ ल कि उसके बौद्धिक जीवन रूपी भवन में एक ऐसी नीव पड जाये जिस पर उच्चतर स्तर की पुस्तका का पदने स सतत विस्तृत होनेवाली जानकारी और सूझ-बूझ की इमारत खडी हो सकें । लेखक ने ऐसी लेखन-शली के प्रयोग का प्रयत्न किया है जिसमे बिना सोचे-समझे रटने की प्रवृत्ति को, तोता रटन को जिसमें स्कूल और कॉलेज को विद्यार्थिया की बौद्धिक शक्नियाँ सूस जाती ह और जिस कारण वे शक्तियां पनप नही पाती, प्रश्रय नहीं मिले । विसी भा नय प्रत्यय का उपयाग करने के पहले लगव न पाटर को इतनी सामग्री द दी ह जिसम यह उस नये प्रत्यय को समझ सके और स्वीकार कर सक । इस पुस्तक वो लिखने में लेखक वा एक उद्देश्य यह भी रहा है कि पुस्तक एसी हो जो मागे लिसी जानेवाली प्रारम्भिर मनोविनान की पुस्तका के लेखका के लिये एक 'मॉडल' या पाम पर सब । लेकिन लेखक इस प्रयल में कहाँ पर सपन हो सका है इमना निग्णय ता मनाविनान घिन मालोचर ही पर सकते है। भाषा की मरलता और अभिव्यक्ति की स्पष्टता के मतिरिक्त इस पुस्तष यो भय विशेषतायें ये है --मनुष्य के व्यवहार के प्राधुनिक मान नारेद्र सौपने का क्रिया, प्रेरणा और व्यक्तित्व सवधी पान ह । लकिन सेद की बात है कि अपने दश म वी० ० या यी० एस-सी० वा मौसत विद्यार्थी इनरे मबघ म बहुत अधिक नहीं जान पाना ह । सोरान' , रामप में उसे चूग पिल्निया, कुत्ता भोर बन्दरा ये व्यवहार ये सवध पी पापस्मिक या अनियमित निरीक्षण के प्राधार पर एकत्रित कुछ जानकारी ही उपतम्य हो पाती है । उसर अपने या अपन साथियों के जीवन मोर म्यवहार से इन 'महानिप्राय तय्या या कुछ सवय ह यह घर नही समझ पाता ह । 'प्रेरणा' को विवचना इससे मागे नहीं जा पाती कि लोगों को इन्धायें और माया होती है, जोगा के प्रेरणा में दन्द होता है इस ५ बात को मामतौर पर एक दो उदारहाण दवर घोह दिया जाता है-म, माप घर में रहकर पाना भी चाहते है और सिनेमा भी देखना चाहते हैं, लेकिन एक हो समय दोना काम नगें कर सकते हैं, वगरह-वगरह । 'व्यक्तिन्य उसके लिये एक रहस्य ही बना रहता है-उस निये अन्त- मुम्वता और 'वहिमुमता ऐम जादुई शद वन जाते हैं जिनम वह सामाजिक मवधा के तिलिम्म वा खालने की कोशिश करने लाता है । इस विशाव ऐमी कोशिश की गई ह कि सौखने की क्रिया का विवचन पाटका को अपने जीवन और प्रयत्नों सम्बर दोष और वे अपने अनुभवा और दुनिया की अपनी जानकारी और अपने रितादी जानकारी का समन्वय कर मरें। 'प्रेरणा और 'व्यक्ति व व अध्याय में लेबर ने सामाषिक व्यवहार तथा मनोविकृतियों मघा अपने गन का वा उपयाग किया है क्याति सामाजिक व्यवहार और मनाविकृतियों सवयी नान के बिना उन कारणों को समझा ही नहीं जा माता ह ना लोगों के व्यवहारा व पीछे काम करते रहते हैं। सामाय मनोविज्ञान की बहुत कम किताबें 'सायको' के मौनिक प्रत्ययों को अपने पाठमा के लिये बाधगम्य बना पाती है। कभी-कभी सास्य की गणना की विनियो के सबध में एक अध्याय द रिया जाता है निसका वाको दूसरे अध्याया सवाई सवध नहीं रहता ह, यहा तर मि वर शूय में लटका जान पडता है। इस विवाद में सास्यका व प्रथयों को वृद्धि + सदन में रखकर इस तरह से समझाने की काशिश की गई है। पान मनोविज्ञान में सस्याशाप क स्यान को समझ जायें। बुद्धि और समतायें व मध्याय में पाठकों का इतनी जानकारी दन की काशिश को गइह कि दे मागे चकर मनावनानिक टेस्टों को बनान की विधियो के उच्चतर और जटिलतर विवेचन का समझ पारें। सामा यप से शिक्षित पास के लिये भी इस पुस्तक में दर्द काम को चीजें हैं। अपने विषय की प्रारमिक पुस्ता होने के कारण लेखा कहीं - भी यह मानकर नहीं चला ह कि पाठव को मनावितान को पहले से कुछ भी जानकारी है । प्रत बिना किसी मनोव नानिक नान के भी इस पुस्तक का ममझा जा सकता है। परिचित परिस्थितिया और घटनाया का बार बार उपयोग दिया गया है और इस तरह पाठकों को दिलचस्पी वरावर वनी रहेगी, इसकी काफी सभावना ह । साथ ही, इम विधि स पाठको पो मनुप्या के यवहार को गति को निर्धारित करनेवालो धारामा, विपरीत धारामो, और छिपी हुई धारामा को समझने में सहूलियत होगी। में अपने सहकमिया के प्रनि कृतन हूँ जिन्हाने मुझे इस पुस्तक को निग्वने के लिये बराबर प्रो साहन दिया ह । म अपने भादरणीय सहकर्मी डा० कृषपकुमार जमुमार का विशप रूप से कृता हूँ जिनके सह्याग के बिना यह पुस्तक सभवत हिंदी में प्रशशित नहीं हो पाती । म रामचद्र प्रमाल को भी घयवाद करता हूँ जिन्हान प्रेस म जाने के पहले पुस्तक की पाइलिपि का एक नजर देखा। स. मु. मोहसिन मनोविनान विभाग पटना विश्वविद्यालय अनुक्रम . १२० मनाविनान वो विषय-वस्तु तथा परिभाषा Subject matter of Psychology and Definition स्नायु-मण्डल The Nervous System सवेदना Sensation ध्यान Autention प्रत्यक्षीकरण १०४ Perception सीखना Learning स्मरण तथा विस्मरण Remembenng and Forgetting कल्पना. १६५ Imagination चिन्तन १७२ Thinking भाव तथा सवेग १०५ Feeling and Emotion प्रेरणा १६८ Motivation व्यक्तित्व Personality बुद्धि तथा याम्यताएं २५६ Intelligence and Aptitude शब्दानुक्रमणिका ३०३ Glossory २२७८---

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१ मनोविज्ञान की विषय-वस्तु तथा परिभाषा Subject matter of Psychology and Definition मनोविनान मनुष्य के स्वभाव, उमदे नान और काय करने की निधिया का अध्ययन है। मनुष्य कई वस्तुग्रा के बीच रहता है। इनम कुछ वस्तुएं उसके लिए लाभप्रद ह और कुछ हानिकारण भो । अत उम यह जानना चाहिए कि कौन कौन सी वस्तुएँ उसके लिए लाभदायक है और कौन-यौन सी वस्तुएँ हानिकारक ह । इन वस्तुमा से लाभ उठाने के लिए उमे कुछ काय करना पड़ता है । इमा तरह हानिकारक वस्तुपा से बचने के लिए भी वह काय करता ह । मनुष्य में वस्तुओं को समझने की और उनके प्रति अपने नान दे अनुसार काय करन की क्षमता ह । मनुष्य कई यक्निया के बीच भी रहता ह । वचपन में इन्ही में से कुछ व्यक्ति उसे विभिन वस्तुओं का पान प्राप्त करने में सहायता देते ह । वे इन्हें इन वस्तुप्रा के प्रति काय करने की भी शिक्षा रते है । वातावरण की विभिन वस्तुमा के सदुपयोग के लिए मनुष्य अय व्यक्तियों के साथ काय करता है। इसी प्रकार वातावरण की विभिन हानिकारख वस्तुमा से वचने के लिए भी वह अय व्यक्तिया के साथ काय करता है । वह सभी व्यक्तिया को सहायक नहीं पाता ह । इनम से कुछ लोग उसे हानि भी पहुंचाते है । वह ऐसे लागा से बचता है । क्भा-रभी उसे कुछ ऐसे काय भी करन को आवश्यक्ता हाती ह जिसमे वह हानि पहुंचाने वाले व्यक्तिया से अपने को बचा सके । अत मनुष्य के लिए यह जानना आवश्यक हो जाता ह कि कसे लोग उसके सहायक होगे और क्मे लोग उसे हानि पहुँचाएंगे प्रारम्भिक मनोविज्ञान तथा अपने मान के अनुसार इन व्यक्तिया के प्रति यमे व्यवहार करना चाहिए यह भी उ7 सीखने को जरूरत होती है। मनुष्य के स्वभाव का समझने के लिए हम यह समझना चाहिए कि मनुष्य वस्तुओ और व्यक्तिया को किस तरह जानता ह। हम लागा को यह भी समझना चाहिए कि वह किम तरह इन वस्तुग्रा प प्रति काय करता ह, विम तरह मय व्यक्तियो के साथ रहता ह और उनके साथ किस तरह का व्यवहार करता ह । मनुष्य के जानने और काय करन के तरीके जम के समय और बडे हाने पर एक ही प्रकार के नहीं होते । जमे-जम उसकी आयु बढती ह उसका वस्तु तथा व्यक्ति सम्बधी नान एव उनके प्रति पाप तया व्यवहार करने के तरीक विशप रूप से परिवर्तित होत ह । उसके मान और व्यवहार में अधिकतर परिवतन सीखने के कारण होते ह । मनुष्य वस्तुमा तथा व्यक्तिया को समझने के नए तरीक सीखता उसा मान क्रमश पर भी जटिन बन जाता है। मनुष्य वाय एव व्यवहार में भी नए तरीको को सीखता ह । ये भी क्रमश जटिल होत जाते है। प्रत मनुष्य के स्वभाव को समझने पनिए हम लोगा का भव यह समभना ह वि उसर सीसने के कौन-कौन स तरीक ह, किस प्रकार उसक पान तथा व्यवहार या विवाम और परिवता होता है । मनुष्य के मान पे पई तरीके है । जो यस्तुणे तया जो व्यक्ति भी यहाँ पर हैं उनको जानकारी उने प्रयक्षीकरण द्वारा होती है । उम स्मरण द्वारा उन वस्तुमा भोर उस व्यक्तिया का भी पान होता है जो अभी यहाँ पर नहीं हैं। इनका उम परले षभी प्रत्यक्षीकरण हुश था। मनुष्य कल्पना द्वारा थैम वस्तुमा पोर व्यक्तिमा का भी पान प्राप्त कर सकता है जिनका उम कभी प्रत्यक्षीकरण नहीं हुमा ह । काई भी व्यक्ति रिमी ऐम दश यी वस्तुमा भोर पक्तिया की कल्पना कर सकता ह जिम उसने कभी भी नहीं मनुप्य वागुमा तथा व्यक्तियों के सम्बप में येवल जानता ही नही है । वह पुष वस्तुपा को प्राप्त परने तथा दुध घ्यक्तिया में ।

मनोविज्ञान की विषय-वस्तु तथा परिभाषा साय रहने को भी इन्धा रखता ह । जर उसकी इच्छाएं पूरी होती हैं तो वह मन्तुष्ट होता ह मोर जव उमको इच्छाएं पूरी नहीं होती हैं तब उमे प्ररमोम होता है । जब वह काई काय करता ह तो अपने कार्यों म भी वह कभी खुश होता ह और कभी नाखुश। कभी मनुष्य शान्ति के काय करता ह । क्भी उम क्राप या भय भी हाता है। मनुष्य दूसरे व्यक्तियो के साय क्वल रहता ही नहीं ह । वह कुछ लोगा का प्यार और कुछ का प्रादर भी करता है । वह बार-बार उनकी मदद करने के लिए अथवा उनको आता का पालन करने के लिए तत्पर रहता ह । कुछ व्यक्तिया वो वह नापमन्द करता है कुछ से वह घणा भी करता ह । इनकी न तो वह मदद ही करता ह और न इनमे उमकी सहानुभूति ही हाती ह । मनोविमान के अन्तगत हम लोग यह ममभने का काशिश करते हैं कि मनुष्य का वस्तुप्रा तया व्यक्तिया का प्रत्यक्षाकरण किस प्रकार हाता ह वह उन्हें क्मे स्मरण रखता ह और कम भूल जाता ह वह कम उन वस्तुप्रा और व्यक्तिया की कल्पना करता ह जिन्हें उमने पहले कभी नहीं जाना है, वह वन वस्तुमा और व्यक्तिया के नात गुणा के सम्बध में माचता है । हमलाग यह भी जानने का काशिश करते ह कि क्म मनुष्य को मुख होता है और क्म दुख को क्रोध और भय वा सवैग होता है कम उसमें किसी एक के लिए प्रेम और किमी दूसरे के लिए घणा का विकाम होता है । हमलोग यह भी मममने की कोशिश करते ह वि क्मे वह एक प्रकार का काय करना स्वीकार करता है और दूसरे प्रकार के कार्यों का बहिषार करता ह, किम प्रकार वह निणय करता है और कम वह वस्तुप्रा और व्यक्तियों के प्रति वाम्तर में कार्य करता है। किसी भी प्रौढ व्यक्ति के इन सभी वियाग्रा का समझने के लिए हम यह समझने की वारिश करते हैं कि इन क्रियायो का शिक्षण एव विकास कसे होता ह । मनुष्य क क्यों का सामूहिक नाम व्यवहार रखा गया है । मनुष्य के स्वभाव वा समभने पे लिए मनाविनान मानव व्यवहार का अध्ययन करता ह । यह अध्ययन नियमानुसार हाता है। यह तथ्या के सनह पर - १२ प्रारम्भिक मनोविज्ञान प्राधारित रहता ह । तथ्यो का संग्रह एक निर्धारित योजना तथा पद्धति द्वारा किया जाता ह । इन तथ्या से निप्वष तक वे नियमा के अनुसार निकाले जाते है। विश्वमनीय तथा मही विधि द्वारा तथ्या का नियमित अध्ययन यनानिक अध्ययन कहलाता है । मत मनाविनान को व्यवहार का विनान पहा जा सकता है। मनुष्य के स्वभाव को सममने के लिए हम लागा को नियमित रुपम उसक कार्यों पोर ‘यवहारा का दामना होता ह । एक व्यक्ति पे लिए दूमर यकिन ये व्यवहार का दखना सम्भव ह । किन्तु मनुष्य की सभी क्रियाएँ नही देखा जा मक्ती ह । कुछ क्रियाएं क्वल उसी व्यक्ति द्वारा देवी जा सवती हैं जिसकी वे क्रियाए ह और पिसी दूसरे व्यक्ति द्वारा नहीं। इसी प्रकार की क्रियाए प्रयक्षतान स्मरण कल्पना, विचार इच्छा, निणय, रुचि भाव सुख और दुर इर्पा, स्नह, भय आदि है। ये क्रियाएँ दौटना भारा, पाडना उठाना वारना लिखना, सलना मादि से भिन है। जिनो मे पाय ह उना प्रतिरिक्त दूसर व्यक्ति भी इनका निरीक्षण मात ह। इनके अतिरिक्त कुछ और भी क्रियाए ह जगे सांस की गति की गति रक्त की दौडान पारि मिना निरावण दूसरे व्यक्ति भी किमा या को महायना म घर गवन ह। कुछ मनोदनानिक वन व्यवहारा का वणन जिना निरीक्षण दूमर विन नहीं कर सकते हैं अनुभव शद द्वारा करते हैं। ये "व्यवहार' शद का प्रयोग उग प्रसार की रिमामा के लिए परते ह जो दूसरे व्यक्ति द्वारा भी दर जा राक्त ह। जिन क्रियामा को दूमर व्यक्ति नही दान सो उन्हें मानशिप प्रप्रिपाए कहा जाता है। जिन क्रियामा का दूसरे यस्ति दग गाते ह य शारीरिक क्रियाएँ कहलाती है। मनोविनान यम्नया तथा व्यगिता में सम्बन्धित मनुष्य के सभी रियामा का शारीरिक गय मानगिर )प नियमित अध्ययन है। मनारिता अन्तगत हम माय स्वभाव को समझने को पारिश परते हैं । इगने लिए हमें वेवल यह नही जानना हनि मनुष्य की कौन मनोविज्ञान की विषय वस्तु तथा परिभाषा कौन सी क्रियाएँ ह तथा उसके अनुभव और व्यवहार के कौन-कौन से तरीक है । हमलागा को यह भी जानना चाहिए कि कों मनुष्य कभी एक तरह का कभी दूसरे तरह का व्यवहार करते ह क्या वे एक तरह का या दूसरे तरह का अनुभव करते है ? मनाविनान एक विनान ह । एव विनान केवल अपने तय्या का वणन ही नहीं करता ह यह उनको व्याख्या भा करता ह । मनाविनान मनुष्य की क्रियाना, उसके अनुभव एव व्यवहार वा वणन एव व्याख्या करता ह । प्रत मनोविनान को परिभाषा हम व्यवहार का दिलान के म्प में द सकते हैं क्याकि हम मनुष्य के मानसिक प्रक्रियाग्रा को उसके व्यवहार को देखकर ही समझते हैं । मनोविनान की विधियां (Methods of Psychology) - मनोविनान के अन्नगत मनुष्य के व्यवहार का नियमित वणन और व्याच्या किया जाता है । किन्तु हम लोग किमो वस्तु या घटना का वर्णन तब तक नहीं कर सकते हैं जब तक हमने उसका निरीक्षण नहीं किया है । मनुष्य व्यवहार का वणन करने के लिए हम लोगों का मनुष्य के व्यवहार का निरीक्षण करता आवश्यक है। अत निरीक्षण को मनो बिनान की विधि कहा जाता है। मनुष्य को क्रियात्रा का निरीक्षण ही एकमात्र साधन ह जिसके द्वारा हम जान सकते ह कि मनुष्य को कौन कोन सी क्रियाएँ ह किस प्रकार उमका एक काय उसके दूसरे काय से सम्बपित ह । निरीक्षण ही एकमात्र साधन ह जिसके द्वारा हम यह पता लगा सकते हैं कि किस तरह की परिस्थिति में किस तरह की क्रिया होती ह। न मव बाता की जानकारी हमें मनुष्य के व्यवहार को व्याख्या करने में महापा होती है। अत मानव व्यवगर का वणन करने तथा उसकी व्यामा करने के लिए मनाविनान निरीक्षण विधि (Observationmethod) का उपयाग करता ह । एक मनावनानिक मनुष्य के सभी कार्यों का निरीक्षण नहीं कर मक्ता ह। वह केवल उन्ही व्यवहारा का निरातण कर सकता है जिनका प्रारम्भिक मनोविज्ञान निरीक्षण दूसरे व्यक्ति भी कर सकते है । उदाहरणाय, जव एव व्यक्ति क्सिी वस्तु या किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति व्यवहार करता ह तव माप देख सकते ह कि यह उस वस्तु या यक्ति की मोर बढ रहा है । चलन को निया में उसके हाथ और पैर आगे और पीछे की ओर बढते ह । जो व्यक्ति चल रहा ह वह भी यदि ध्यान द ता इन क्रियामा का दस सक्ना ह । किन्तु उसी समय और भी बहुत सी दूसरी क्रियाएं उस व्यक्ति में हो रही ह । इन्हें हमने पहल मानसिक प्रक्रियाएं बतलाया है। इन क्रियाओ या निरीक्षण फेवल यह व्यक्ति स्वय कर सस्ता ह । दूसरा कोई भी व्यक्ति उनमा निरीक्षण नहीं कर सकता । उदाहरणाय माप यह नहीं जान सकते हैं कि वह व्यक्ति क्या किसी वस्तु या किसी व्यक्ति की पोर बर रहा । क्या उस पारचय हो रहा है कि यह कौन सी वस्तु ह या पौन पादमी है ? या क्या वह उस वस्तु का प्राप्त परना चाहता है या उस व्यक्ति से मिलना पाहता ह ? माप यह नहीं जान सकते ह कि उम वस्तु या व्यक्ति के प्रति उसके मन में कौन सा भाव है और यह उनमे क्या करना चाहता है। इन सम्बध में केवल वही व्यक्ति सच्ची बातें बतना सकता ह और तब पाप उन्हें जान सक्त है। केवल वही इनरा निरीक्षण कर सकता है और इस तरह उन्हें जान सकता है। जय मनावनानिक दूसरे व्यक्ति के व्यवहार का निरीक्षण करते। यह निरीक्षण वस्तुनिष्ठ निरीक्षण (Objective observation) कहलाता है । जव एव व्यक्ति प्रोधित ह तर पाप ऐग ही दरा सकते हैं कि उमया घेहरा लाल ह उगफी प्रसि सुलो र उसके हाट पक रहे ह यह चिल्ला मा गरज रहा है। उससे शारीरिव रियामा का दरावर प्राइम निप्यप पर पाते हैं कि य-प्रोधित है । जय एव मामी चुपचाप बठा ह तब एसो पम ही थार्ने रहती ह जिनका पाप गिरीक्षण पर गरते हैं। पाप उसा सम्बध म बहुत ही कम वा जान स ग । वितु हो साता है कि वह व्यक्ति किसी परित मानसिब पाय में मगा हो, वह विगी कहानी का पताट सोच रहा हो नवी पोशिशपर ह तय मेवर मनोविज्ञान की विषय-वस्तु तया परिभाषा रहा हो, वह उनकी तुलना मपनी सोची हुई नई कहानी वो प्लाट रहा हो वह कहानी लिखने म हतात्मा का अनुभव कर रहा हो । जब आप उसमे पूछने ह कि वह क्या कर रहा था तब वह पापो ये सभी वातें बतला दता ह । जा वणन वह पापको दता ह व उसको मानसिक प्रक्रियामा के स्वनिरीक्षण पर भाधारित है। जो निरीक्षण व्यक्ति अपनी मानमिक प्रक्रियाग्रा का स्वय परता ह वह अन्तनिरीक्षण या स्वत निरी पण ( Introspection or Self-observation) कहलाता है। मत भनिरीक्षण वाह्य निरीक्षण से भिन ह । मनोवनानिक दूसरे व्यक्ति की मानसिक प्रक्रियाग्रा के सम्बध में तव जानता ह जब दूसरा व्यक्ति उनके मम्बध में उसे स्वय बताता है। वह व्यक्ति अपनी मानसिक प्रक्रि- याणा का वणन अपने पनिरीक्षण या स्वत निरीक्षण स कर पाताह । मनावनानिक वाह्य निरीक्षण विधि का उपयोग करता है। वह दूसरे व्यक्ति को अपने विचार भाव, इच्छाएं प्रादि उमे बतलाने के लिए प्रारसाहित करता है । ऐसा करने के लिए दूसरा व्यक्ति अन्तनिरीक्षण का उपयोग करता है। अन्तनिरीक्षण स्वत निरीक्षण ह विन्तु ममी स्वत निरीक्षण प्रत निरीक्षण नहीं ह । अन्तनिरीक्षण उस प्रकार का निरीक्षण है जिसमें व्यक्ति अपनी माननिक क्रियाप्रा का निरीक्षण करता है। एक व्यक्ति अपना ललाट छू सकता है और इने गम पा सकता है । वह अपनी नाडी का गति गिन सकता है और यह समझ सक्ता ह कि यह तेज चल रही है। वह अपनी सास को गति देष सक्ताह मोर विसी दौड के बाद उसे तेज चलते हुए पा सक्ता है । इन सभी दशाओ में वह स्वय निरीक्षण कर रहा ह । किन्तु यह निरीक्षण अन्तनिरीता नहीं है । यह वाद्य निरीक्षण है। वही व्यक्ति अपने सिर में भारीपन अनुभव कर मक्ता है । वह सोच मरता ह कि उम ज्वर ह । उमे चिन्ता हो सकती ह कि वह बीमार पडने जा रहा ह । जब वह अपने इन विचारा और भावनामो का निरीक्षण करता ह तब उमका निरीक्षण स्वतः निरीक्षण ह । यही स्वत निरीक्षण प्रारम्भिक मनोविज्ञान अनिरीक्षण है। अन्तनिरीक्षण अपनी मानसिक प्रक्रियाग्रा का स्वत निरीक्षण है। वाह्य निरीक्षण तथा अन्तनिरीक्षण मनाविनान की दो विधियां मानी जाती थी। यह सब ह कि मनोविनान म हम लोग मनुष्य को सभी --शारीरिक तथा मानसिक दोनो प्रकार की---क्रियामा अध्ययन करते है। इसलिए वाहा निरोतए तथा अन्तनिरीक्षण दोना का उपयोग मावश्यक ह । किन्तु मनोवैमानिक वेदर वाह्य निरीक्षण का उपयाग करता है। दूमर लोग उसे अपने अन्तनिरीक्षण का वाणुन दते ह मनौवैज्ञानिक थो भपनी भावनाओं प्रत्यतीकरण स्मृतियां विचार इच्छाएँ, निणय आदि वे राम्बध में अननिरीक्षण द्वारा जानवर वतनाल है। फिर भी मनोवनानिक को प्रतनिरीक्षण द्वारा जो वा मिलने । उनर उपयोग में सावधान रहना पड़ता है। अन्तनिरीक्षण पठिन है। एक ही व्यक्ति मानसित निया में यमा रहता ह और स्वय उरावा निरीक्षण भी परता है । यह विचार करता ह और विचार की क्रिया का निरीक्षण भी। मन्तनिरीक्षण स उराको मामिक क्रिया बीच म ही हा जा सकता है। एक व्यक्ति विमी समस्या को हल करन में लगा हा मक्ता ह। उस समय उसमें कई तरह की प्रतिमाएँ हा सातो है । उम समस्या के कारण उम उसी तरह को दूसरी समस्यामा वे बारे में विचार करना पर सकता है। वह या पर सवता ह विस तरह उसने 7 तरह वो दूसरो समस्यामा यो हल रिया था। जितन भी हल ये उपाय उमक निधार में पा माने है वह उन सर को तुलना पर सपना है। वह विमो सनोपजनन हल पर पाने को भाशा कर सकता है। यह य भी अनुभव पर मरना है कि समस्या का हल उमद वश मे परे है। इसम र चितित हो राना है। यदि उमी व्यक्ति को इन सभी रियामा का वगान परने वा महा जाप तो समस्या हल वा पाय ममाप्त हो ना गाना ह । समस्या हल बग्ने सो मोरिस मी प्रपेक्षा व रामम्या इम करो में रोने वाली मानगिर प्ररियामों पा निरीक्षण भारम्भ पर देता है।

- मनोविज्ञान की विषय-वस्तु तया परिभाषा यद्यपि मनोवमानिक अपने अध्ययन के लिए बहुत मी वातें अन्न- निरीक्षण द्वारा प्राप्त करता है फिर भी अधिकाश तध्या के लिये उसे मुख्य म्प में वाह्य निरीक्षण पर ही निमर करना पडता है । वच्चे पागल तथा पशु अन्तनिर्गचरा नहीं कर सकते । वे अपनी मानमिर क्रियानों का निर्गदाणु कर मनौवनानि का नहीं बतला माते है । मनोवैनानिक उनमें शारीरिक व्यवहार्ग का निरीक्षण करता ह । वर शारीग्यि व्यवहारों का अथ निकालता है । शारीरिक व्यवहार उसके माप हाने वाली मानसिक क्रियाया पर प्रकाश डालते हैं। एक चार मात्र के बच्चे को जिसने अक्षरा को मोखा ह, अक्षरा को दाहराने के लिए कहा जा मरता है। बच्चा कुछ का बगर क्सिी भिझा के दाहाता ह । कुछ को क कर दोहराता है। कुछ का दोगने में असमय रहता ह । हम इस निष्कप पर पढेचन हदि वच्चा कुछ अक्षरा का अच्छी तरह याद करता है कुछ के लिए उना स्मरण कमजार हे दुध का वह भूल गया ह । जब कोई अजनबी घर में प्रवेश करता है तब घर का कुत्ता भूक्ने लगता है । जब घर में रहन वारे लाग अन्तर पाते ह नब वह नहा भूक्ता ह । हम उसके भुक्ने क व्यवहार का समझने ह । कुत्ते को जाने गहिवाने लागा का स्मरण ह वर उन्हें पहिचान मम्ता ह । एक पागत व्यक्ति को जब म बात करते टबत ह वब हम उमर शद्ध असम्बधित तथा उमक वाक्या का अधूरे पाते ह। हम ममन्ते है कि उसके स्यान उनझे हुए ह उसके विचार असम्बचित ह। हमने पहले वननाया ह नि मनावनानिक केवल वस्तु निष्ट विधि का पयाग करता है । वह व्यक्तिया के व्यवहारों का निरीक्षण करता है। वह इन प्रयक्षीकरण विचार नाव इच्छानों आदि + वपन का भी निराखण करता है । इन म्यिाग्रा का वणन ये वाउचात द्वारा या निवर वर मरते है। इन दाना म्पितिया में मनोदनानि इनकी दाता का या लिम्पावट का निराक्षण करता ह । अतः मनावतानिर की विधि वाह्य निरीक्षण ह । वह अन्तनिरीक्षण नहीं करता। ऐसा कहना गलत नहीं प्रारम्भिक मनोविज्ञान १८ होगा वि अन्तनिरीक्षण मनोविज्ञान की विधि नहीं ह क्योरि मनोवानित इमका उपयाग नहीं करता है । अत एक विनान की तरह मनाविनान देवन वाह्य निरीक्षण विधि का उपयाग वरताह । अन्ननिरीक्षण या स्वत निरीक्षण केवल एक ऐसी विधि ह जिमस व्यक्ति, जिनका अध्ययन-मना दनानिक करत ह अपनी मानमिक प्रक्रियामा को जान सकता ह । विना अन्तनिरीक्षण के ये इन प्रक्रियामा क बारे में मनोवनानिय को नहीं बतना सकते प्रयोगविधि (Experimental Method) हमनागों ने देखा कि वास्तव में वस्तुनिष्ठ निरीक्षण ही मनोविमान यो विधि ह । मनोयनानिय व्यक्तियों के व्यवहार का निरीक्षण करता है। वह यथासम्भव उना मानसिक क्रियामा का भी निरीक्षण करता है। ऐमे वणन शानिव व्यवहार (Verbal behavar) कहे जाते ह क्योकि इनम शता का उपयोग वापर या लिखकर दिया जाता है। मन वनानिक व्यवहार का निरीक्षण स्वाभाविक परिस्थितिया में कर सकता है। निरीक्षण की इस विधि को स्वाभाविक स्थिति निरीक्षण (Naturalistic observation) कहा जाता है । उदाहरण के लिए कोई व्यक्ति दस मवता हरि जिन यच्चों को सफलता प्राप्त करन पर माता पिता द्वारा पुरस्कार दिए जाते ह य अधिक मन लगाकर पढ़ते है । वह इस निप्पप पर पहुँच साता हरि अध्ययन में मच्छे अब ये लिए पुरस्कार मिलने स उम वाय में व्यक्ति को रचि बढ़ती है। यह निरीक्षण जिम पाधार पर यह इम निपप पर पहुँचता है म्वाभाविक स्थिति निराक्षण पहलाता है । इसमें काई भी व्यक्ति प्यवहार या निरीक्षण रम समय करता है पर यह व्यवहार स्वाभाति पग हाता रहता है। पर हम लोग एक दूमरा उदाहरण पाद व्यक्ति एवं बच्च मे प्यार का निगक्षण उमरे जमत सकर यारह वप वी मायु नर करता है। वह बच्चे पप्रथम राद का तथा उसर प्रथम व बालन पी उम्र वानिमार रगता है। इसी तरह मनोविज्ञान की विषय वस्तु तया परिभाषा वह यह भी लिगता ह मिसि उम्र में बच्चा दूमग शब्द बोलता ह, किम उम्र में वह पहले पहल वाक्य का उपयाग करता ह, सि उग्न में विमी शत वा उपयाग धिमी विशेष भाव के लिए करता ह । वह इस प्रसार बच्चे में भाषा विकास का निरीक्षण करता है। यह निरीक्षण स्वाभाविक निरीक्षण है । इमो प्रकार वह कई वच्चा का निरीक्षण पर सकता ह मोर पोमत बच्चे के भाषा विकास पी घवस्थामा बो निधारित कर सकता है । वह अपन इम पान का उपयोग किमी विशेप बच्चे के भापा विकाम को मममन के लिए कर सकता ह । जर एक बच्चा अपनी उम्र पे भाषा विकास की अवस्था तव नहीं पहुंचता ह तब वह यह निणय करता ह कि इस बच्चे वा भाषा विकास मन्द ह । वह सममताह शायद यह लडा मौसत स कम बुद्धि वा है । इसके अतिरिवन दूसरे तरह का निरीक्षण भी होता है । यह प्रयागात्मक निरीक्षण या प्रयोग कहलाता है। इसम व्यक्ति के व्यवहार का निरीक्षण उसक स्वाभाविक अवस्था में नहीं किया जाता है । उम व्यक्ति पर प्रयोग द्वारा ही उसके व्यवहार का निरीक्षण दिया जाता है । प्रयोग में ऐसी परिस्थिति बनाई जाती है जिसमें निरीक्षण दिए जाने वाला व्यवहार उत्पन हो। उदाहरण के लिए एक मनोनानिक प्रयोग क आधार पर पुरस्कार के प्रभाव का निरीक्षण करना चाहता ह । मान लें वह बारह वप के बीम लडके और लडक्यिा को इट्टा करता ह । वह उनका नाम अलग अलग एक ही तरह के कागज के पुजों पर लिखता है । वह इन सभी पुजों का एक टिव्वे म रखता है और इन्हें अच्छी तरह भवभोर वर मिला देता ह । वह इनम म किसी दा पुर्जे को निकालता ह और परले पर १-लिखता ह और दूमर पर २-फिर वह दो पुर्जे का निकालता ह और पहले पर ३ और दूमरे पर४ लिखता है । इसी तरह वह सभी पुर्जे को निकाल लेता है और उन पर १ स ८० तक प्रव अक्ति कर देता है । इसके बाद वह उन्ह दो हिस्सा म बांटता ह । जिन पर फुट नम्बर ३६ होते ह उन्हें एक हिस्से म और जिन पर जोडे नम्बर २० प्रारम्भिक मनोविज्ञान ४० होते ह उन्हें दूसरे में। इस तरह उसने ४० लडो और लडक्यिा वे दल को वीस-बीस के दो छोटे दलों में वोट दिया है। यदि वह यह पाता है कि किमी दल में लडका से अधिक लडकियां ह तब वह उन्हें घरावर कर देता ह । मान लें एव दल में आठ लडक्यिा और दूसरे में बारह है । पर वह दूसरे दल स दो लडविया को पहले दल में तथा दो लया को पहले दल से दूसरे दल में हटा देता है। जिस व्यक्ति पर प्रपाग विपा जाना है उमे प्रपोज्य ( Subject) कहा जाता है । जो प्रयोग करता ह वा प्रयोग-वत्ता ( Exper: mentor ) पहलाता है। ऊपर ये उदाहरण में जिस विधि में पाधार पर प्रयोगक्त्ता ने प्रयोया का ता स्तों में विभाजित किया वह विधि अनायास विधि ( Random method ) कहलाती है । प्रयोया या इस तरह वा चनार अनायाम चुनाव कहलाता अनायास चुनाव हरक प्रयोज्य यो एक दल या दूमरे दल में रसे जाने की सम्भावना एक ममान है। जो उदाहरण हमने दिया है वह प्रया या य चुनाव का पर यहृत सरत विधि है। मनोवनानिव प्रयाग में और भी अधिर जटिल चुनाव विधिया का उपयोग पिया जा सस्ता ह । रिमी पाय पर पुरस्कार का प्रयागारमर अध्ययन के लिए प्रयागरा मान लें, २५ शदा की ए मूचि तयार करता है जिसम प्रत्यय शट पाट अक्षरों का है। यह प्रत्यक प्रयोज्य या यह यहता ही हैं यहुत ही सावधानी रा उन शो दयना ह क्यानि उस उहें पगठस्थ वगा हा एकदन सभी प्रयोया का यह एक एप पर प्रत्यर वाड हिमनाया प्रया का दो मेवउ लिए गिनाया जाता है । जब सभी वाड पिला लिए जात ह तर प्रत्यैर प्रयाय यो एप पुर्जे पर उन राय या लिमना होता है जो उहें यार रन । प्रयागार्ना इन पुजौ का बगित परता ह । पिर या उशता को एकनार कर पिलाता है । इगा सरह यह इस पाप मा गई यार दोहराना ह । प्रत्यर पर यह डा पूजों को जिंग पर प्रयो य श को याद पर लिगते हैं एकत्रित करता है। मान मनोविज्ञान की विषय-वस्तु तपा परिभाषा लें, दम वार के वाद वह प्रयोग बन्द कर देता है । वह देखता है कि एक या भधिक प्रयाग्य नै ५ वार व दाद सभी शगवासही-मही दाहरा लिया है, कुछ ने ऐमा ६ वार के बाद किया ह । एक या कुछ अधिक प्रयोग्य दस वार के अन्त में भी सभी शदा को सही-मही नही दाहरा सके है। यह प्रयोग टीक उसी तरह दूमर दल पर भी किया जाता है । किन्तु प्रयाग प्रारम्भ करने पहन प्रयागरता प्रयाज्य में यह कहता ह कि उसके पाम तीन पुरम्बार ह जा इस प्रयाग में प्रथम, द्वितीय एव नृतीय स्थान पाने वाले का दिए जायगे । यह उसन पहले दल के लोगा का नही बत- साया था । अत पहले दल ने किमी पुरस्कार के लिए काय नहीं किया। पहले दन का नियमित दल ( Control group ) कहा जाता है। दूसरा दल निम पुरस्कार के लिए काय करने का कहा गया ह वह प्रयोगा मक दल (Experimental group ) कहलाता है। यह ऐसा इसलिए कह लाता ह क्यानि प्रयोग पुरस्कार के प्रभाव का पता लगाने के लिए किया गया ह । दूसर दल पर ठीक पहले दल की तरह स प्रयाग पूरा करने के बाद प्रयागक्ता प्रयोग के परिणाम की जाच करता ह । वह यह पाता ह नि इस दन के सभी प्रया या ने पाठवें वार में सभी शब्दा को सही-मही दाहरा दिया ह । कुछ ने ता सभी शन्दा को चौथे वार में ही दाहरा निया । प्रयोगकर्ता इस निष्कप पर पहुँचता ह कि जब सीखने का काय अच्छे ढग से करने के लिए प्रयोज्या को पुरस्कार का प्रलोभन दिया गया तब उनका सीमना जल्द हुमा । अच्चे काय के लिए पुरस्कार उम काय का या किसी काय के साखने का प्रभावित करता है। प्रयोग का परिणाम अधिर विश्वसनीय हाता है। स्वभाविक स्थिति निरीक्षण या स्वाभाविक निरीक्षण में ऐमा नहीं होता ह। प्रयोग में प्रयोगवता अपने प्रयोज्या के व्यवहारा का निरीक्षण ऐसी परिस्थितियों में करता ह जिन्ह वह स्वय उत्पन करता है । वह सभी परिस्थितियों को जानता है और वह यह भी जानता है कि वहाँ पर कोई दूमरी स्थिति नही ह । ऐसा नियन्त्रण स्वाभाविक निरीक्षण २२ प्रारम्भिक मनोविज्ञान में सम्भव नहीं है । जब कोई घटना क्मिो स्वाभाविव परिस्थिति में होती ह तव हम यह नहीं जानते कि उस समय मय परिस्थितियां किस तरह की थीं। एक परिस्थिति के बार में हम अनजाने रह सक्ने हैं और उसी परिस्थिति के कारण वह घटना हो सकती है। अत स्वाभाविक निरीक्षण में हम लोगा से गलती होने की मम्भावना रहनी ह । ऐमी गलतिया से प्रयोग में बचा जा सकता है । इमरे अतिरिक्न किमी एक प्रयाग को कई वार दोहराया भी जा मक्ता ह और यह देखा जा सस्ता है कि सभी के परिणाम एक ममान मिलते ह या नहीं। मनोविनान में कुछ प्रयोगा में यात्रा की भी आवश्यकता होती है । इनमें से कुछ यत्र व्यवहार व उन सूक्ष्म परिवनना का बतलाते ह जिनका निरीक्षण प्रासानी स नही दिया जा सकता है। कुछ दूसरे ऐम सामार भी ह जिनका उपयोग प्रयाय को विमी प्रयाग के लिए करना पड़ता है। पुष यत्र मे भी बने हा प्रयाय के लिए वमो परिस्थिति उत्पन परले ह जिसमें उम पाय वरना होता है। किन्तु मनोविमा म कई महत्त्वपूर्ण प्रयोग एम भी किए गए ह जिनमें किमी कीमती पा ताजुष यत्र की पायरयाना नहीं होती ह । प्रयोग के लिए या विशेष महत्त्वपूर नही है । प्रयाग को विधि अधिर महत्त्वपूर्ण है । हम लोगा जिम उदा. हरण मा वणन रिया उममें किमी विशेष यत्र की भावश्यकता नहीं ह। फिर भी यति बोई गावधानी से वतनाए गा विधि का दान पर तो यह बहुमूय विप प्राप्त कर साता है। यह नहीं सममा चाहिरा दि प्रयोग में प्रयाग्य पवल एक बार परताह मोर प्रयोगकर्ता उमरे व्यवहार का निरीक्षण परता ह । मिमी प्रयोग में प्रयाय का काय करते समय हाने वाली मानसिन प्रक्रियामा पा निरीक्षण पर उग प्रयोगरा दोबनताना हा हा प्रयाय भन्तनिरीसा सवणन देता ह । पुरम्बार वे प्रभाव याने प्रयाग में जिरावा पणन पर दिया गया है, प्रयो य यो प्रपनी मानगिय प्रत्रिपामा मा वणा भी करना पाहिए। उपरणाय योई व्यक्ति वह मरता ह पि एवं विशप शर मनोविज्ञान की विषय वस्तु तथा परिभाषा २३ ने उसे एक घटत ही प्रिय वस्तु की याद दिलाई । वह उम शद को उम वस्तु म सम्बध के कारण याद रख मया । इमी तरह प्रयोगात्मक दल के प्रयोज्य उम कह सक्ने ह वि व मा पुरस्कार के बारे में जान रहे थे। वे यह भी कर सकते हैं कि मी कारण उहाने उस काय पर पूरा घ्यान दिया । यह मान प्रयागकता के इस निप्पप को कि पुरस्कार पा प्रनाभन क्मिी काय का प्रभावित करता ह और भी न्ट बना देता ह । स्वाभाविक निरीक्षण का कभी कभी निरीक्षण कहा जाता ह, जम प्रयागात्मक निरीक्षण का प्रयोग कहा जाता है । अत हम लोग मनोविनान म निरीक्षण और प्रयोग की विधिया की चर्चा करते ह । इसका यह तान्पय नहीं हरि प्रयोग में निराक्षण नहीं होता ह । प्रयाग भी निरीक्षण की एक विधि ह । प्रयोग में प्रयागक्ता द्वारा निधारित एक विशेष परिस्थिति में विमा व्यक्ति को वाय वरना पता ह । प्रयोगकर्ता उम 'यक्ति के व्यवहार का निरीक्षण करता है। और उसे रिखता है। वह कभी-कभी प्रयो य को अन्तनिरीक्षण कर अपनी मानसिक प्रक्रियामा के वारे म मा बतलान लगता है। किसी प्रयाग का एक अच्छा प्रयोग बनाने के लिए अय कई नियम और कई तरीके भी ह। ये प्रयोग विधि के एक अग बन जाते है। मनोविज्ञान के क्षेत्र (Fields of Psychology ) इन दिना मनाविनान में बहुत प्रगति हुई है । यह विभिन परिस्थि- निया में हानेवाले मानव व्यवहार के अनेका प्रकार तथा इनके भिन पलुना पर विचार करता है । अत मनाविनान कई शाखामा म बट गया ह । हमलोग अव मनाविज्ञान की कुछ मुख्य शाखामा का वखन करेंग । बाल मनोविज्ञान (Child Psychology) मनोविनान मानव स्वभाव का अध्ययन करता है । हमलोग मनुष्य क यवहार का दखवर मानव स्वभाव का समझ सक्ते ह । मनुष्य के प्रारम्मिा मनोविज्ञान पवहार जम मम स प्राय परिदनिन हात त ह । मानव पवार का समान लिए हमलोग मानव व्यवहार के इस परिवतन का समान का काशिश करत है । मनाविनान का एक विशष शाता ह तो यह मध्ययन परतीह वि वरन म नबर युवावस्या तया बद्वावस्था तर विस प्रकार मनुष्य का व्यवहार परिवर्तित होता है । मनावितान के इस क्षत्रा विवामम मनाविनान कहा जाता है । मनुष्य यसवहार म अधिर म त्वपूल परिवतन उम समय पर ह उब वह पचपन म वारस्या का पार वाला है। मत बालमनाविनान मुध्यत वच्चा व व्यवहार या वरणन सपा व्याच्या पता है। बालमनाविनगन हम बच्चा , शारारिक एवं मानमित मिाम सम्ब र म व माता हावन्न त्रिम प्रकार काय करन ६ नए तराज सातारा यह वणन तपा व्याख्या करता है। म बनताता है कि किस प्रकार बच्चा का व्यवहार र पसिया 7 भिन है। यह उन मभी नया पर मा प्रकाश टाला ह लो वचा क शारारिक एवं मानमिन रियामा का प्रोगवन्या ता प्रभावित बग्न है। असामाय मनोविज्ञान ( Abnormal Psychology ) जब हममानव स्वभाव का मध्ययन करत है तब हम यह पाशा करत हैं जिम कुछ एन मानव व्यवहार पाण्ग ना नाना प म पाए जात हम यह बन का प्राशा रमन रि मनुष्य एक तरह का परिस्थितिम अधिक या कम मात्रा म एक हा तरह का व्यवगरला है। रिनु 'म यह दपन ह कि कुछ नाग साधारणन न त म नर्ग पवार करत ह जम दूभर परत है। प्राय हम यर मारा करा हति विमा व्यक्ति का यह माम हाता ह कि उन सब न विद्याप का पराक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया ह ता वह बहुत ज्या बुग हाता है। चिन्नु हम ५ इ एमा व्यक्ति मा मिल माता ह जिस पर इस तरह का सदर का काइ मा प्रभाव नहीं होता है। दमा तरह हम यह भाशा करत है कि अब वाई व्यक्ति अपन एक्लोत पुत्र के निधन वा सदर मुना मनाविज्ञान की विषय-वस्तु तया परिभाषा २५ तो वह प्रयन्त ही शोशल हो जायगा । किन्तु काई व्यक्ति ऐसा भी हो मक्ता ह जो इस खबर से जरा भी न विचले । ऐसे लोगों से प्राय हमारी मुलाकात मानसिक रोग के अस्पताला में होती ह । इन्हें असामान्य व्यक्ति कहा जाता ह । इनका व्यवहार प्रमामाय व्यवहार कहलाता ह। इनरे व्यवहार उन व्यवहारा स भित ह जिन्हें हम साधारपत दूसरे व्यक्तिया में पाते है । किस प्राशा होगी कि एक गरीब आदमी फटे कपडे पहिने हुए अपने का गरगट की रानी बतला सकता ह ? किन्नु मानसिक रागा के अस्पताल में पाप किमी ऐम अमामाय व्यक्ति को भी दव सक्ते हैं जो अपने मिर का रंगीन पौठा म मजाकर गनी की तरह शान स टहलता ह । वह क्या कहता ही नहीं कि वह रानो ह वह विश्वास भी करता है वह एक रानो ह तथा सम्पनाउ के डाक्टर तया दूमरे कर्मचारी उसके दरबारी ह। म लाग असामाय मनाविनान या मनोवकारिको Psychopa thology ) के अन्तगत यह अध्ययन करने की कोशिश करते हैं कि अमामाय व्यक्ति सामान्य व्यक्तिया स भित व्यवहार क्या करते ह असामाय व्यवहार के कौन-कौन से प्रकार है। उनरे क्या कारण है किस प्रकार असामाय व्यवहार को सामाय व्यवहार में बदला जा सकता ह? किस प्रकार एक मसामाय व्यक्ति मामा य बनाया जा सकता ह ? समाज मनोविज्ञान (Socral Psychology) मानव व्यवहार का अध्यनन करते समय हम यह पाते हैं कि जब व्यक्ति प्रदेते रहता ह तो उसके भाव विचार त्या काय एक प्रकार के हाते हैं । किन्तु जद वह दूसरों के साथ रहता ह तब उसके भाव विचार गव कार्य टूमरे प्रकार के हाते । हमारी भेंट ऐस व्यक्ति से भी हो मकती ह जा सामाचार पत्रा में मानव जीवन के आदर्शों की व्याख्या करता ह पर जव जातीय या धामिर दगे होते हैं तो वही व्यक्ति दगा करने वाला का दूसरे घम या जाति के लोगों की औरतों और बच्चा पर गोली २ 7 7 २६ प्रारम्भिर मनोविज्ञान पलाने के लिए उभारता है। आपकी मुलाकात एक ऐम अनुभवी चिकित्मर रानी हो सकमोह जो सभी रोगा व शारीरिक वारणा तया उनकी चिकित्सा में विश्वास रखता है और जिसने चिक्मिा शास्त्र का उन्नत बाने के लिए कई महत्वपूर्ण भनुमधान भी पिया है । पर आप उसा अनुभवी चिदि मय को घुछ दिता म वोमार अपने एवलीत पुर व राग निवारण के लिए विसो मोमा के पास मना द्वारा रोग पिवारण के लिए जाते दसवर पाश्चय चक्ति रह जाते ह । समाज मनाविनान में हम लोग मनुष्य के एमे तथा इमी तरह के माय सामाजिक व्यवहारा का अध्ययन करते ह । जिस समाज म बच्चा बड़ा होता ह उस समाज का जा प्रभाव उसकी मादत, विचार धारणाएं रचि उद्देश्य एव ध्येय के विवास पर होता ह उनका अध्ययन भी हम समाज मनोविनान म परते है । समाज मनोविनान में हम यह भी अध्ययन करते ह कि किस तरह जनता क्सिी महत्वपूर्ण समस्या पर अपना मत निणय करती है ? अफवाह क्से फनती ह एक दल के लोग दूसरे दल के लोगा से क्या मोर क्स युद्ध करते ह जव कि वे जानते ह कि एस युद्ध दोनो के लिए हानिकारक है ? क्यो कुछ लोग नेता बनते हैं और कुछ लोग अनुयायो । समाज मनाविनान में इन प्रश्ना का तथा इसी तरह वे अय प्रश्ना का उत्तर हम पाते हैं। तुलनात्मक और पशु मनोविज्ञान ( Comparative and Animal Psychology ) मानव स्वभाव को समझने के लिए हम मनुष्य के यवहार का दूसरे प्राणिया के व्यवहारा रो तुलना करते हैं । हम जानते ह कि मनुष्य भी प्रय पशुओ की भांति एक पशु ह । उसके अन्दर भी उसी तरह को बहुत सो प्रेरणाएँ ह और वह भी उन्हीं से मिलते-जुलते बहुत से काय करता है । मनुष्य को भी भोजन, रहने की जगह और आराम को आवश्यक्ता है । वह भी खाता है खाकर पचाता ह और मल मूत्र त्याग करता है।

मनोदिनान की विषय-वस्तु तया परिभाषा ७ दूसरे पशु भी विशेप प म वे जा जावन २ स्तर पर मनुष्य क सनिस्ट है बहुत म नए कार मौनते हैं। उनमें भी प्रत्यदीवरण तया स्मरण को क्रियायों व सक्त मिलते ह । पर मनुष का व्यवहार किम हद तक पशुमा पन्यवहार स मितवा-बुनता ह रिस हद तन मानव व्यवहार परप्रा के व्यवहार म मिन ह म न प्रश्नों का उत्तर पशुओं के व्यवहारा के नियमित प्रत्ययन द्वारा ही द माने है। तुलनामा मनाविनान (Comparative Psychology ) में ऐन अध्ययन हुए हैं और उनका वर्णन किया गया है । पशुओं के सवगा मा व्यवहार, सामानिक व्यवहार, उनका बुद्धि एव तक की याग्यता तथा उनक सौन्दने का विधि आदि के कद अध्ययन किए गये हैं। मनुष्य के सीखने के सम्दप में बहुत सी वा पशुओं के सौखने पर प्रयोगा मा अध्ययन द्वारा जानी गई है । पशुओं पर प्रयाग करना अधिक मरत ह । आप उन्हें जिन स्थिति में चाहें रख सकते हैं । आप अपने प्रया की पावश्यकतानुसार उनके साथ कुछ भी कर सकते हैं । उदाहर- पाय आप उन्हें कितने भी समय के लिए भूसा रख सकते हैं और उनके व्यवहार पर मूत्र के प्रभाव का निरीक्षण कर सकते हैं। उनके शरीर में मूई द्वारा रसायन दर पाप भोपए सवैग उत्पन्न कर सकते है। कना आप उनकी मापडी हटा मक्ते हैं और यह देख सकते ह कि यदि मस्तिष्क दे विभिन्न रिम्ना को दिल्ली द्वारा उत्तेजित किया जाता है तो उनक शरीर में कौन-कौन सी प्रतिक्रियाएं होती हैं। शरीरक्रिया मनोविनान (Physiological Psychology) मनाविन्गन मानव व्यवहार का दिनान ह। मानद व्यवहार म शारारिख तथा मानसिक क्रियाएं दाना मनिहित है। शरीरिक प्रियाएँ शरीर व विमिन हिम्या में हाता है। शरीर के विमिन हिम्ने इन्द्रिय क्लाने है। नदिया की बनावट अन्न ही जटिल ह । इनके काय मी अयन्तु ही जटिव हैं। प्रत्येक टन्द्रिय के वार दूसर इन्द्रियों केगर तपा प्राणी २८ प्रारम्भिक मनोविज्ञान की समस्त क्रियामा स सम्बधित है। शरीर क्रिया विज्ञान इद्रिया को बनावट मोर दूमरे इद्रिया के साप हाने वाले कार्यों का तथा सम्पूर्ण प्राणी की क्रियामा वा अध्ययन करता है। मनुष्य के शारीरिक व्याहारो को समभन के लिए मानव शरीर क अगा की बनावट तया उनक कार्यों का जानना मावश्यक ह । शरीर निया मनोविज्ञान मनुष्य के शरारिव प्रियामा का अध्ययन रता है। जब हम दपते ह सुनत ह सघत ह या क्मिी वस्तु का चसने ह तो इनमें जो ज्ञानद्रियां शामिल ह उनसरी बनावट तथा कार्यों के बार में हमें शरीर क्रिया मनोविनान बतलाता है। यह मानव मस्तिप्प तथा उसव विभिन्न हिस्सा की बनावट तथा उनक कार्यों के सम्बध म बतलाता ह । जब हम शरोर तथा उसक विभिन्न हिस्सा का संचालित करते हैं जब हम किसी वस्तु या व्यक्ति २ प्रति व्यवहार करते ह तो उनम शामिल होन वाली इन्द्रिया की बनावट तया उनक कार्यों क सम्बप में हमें शरीर प्रिया मनोविज्ञान बतलाता है। यह उन इद्रिया को यनावट और कार्यों में सम्बध म भी बतलाता है जिनसे पाचन क्रिया सांस को गति रक्त- सचालन आदि होती है । इन सब बातो की जानकारी से हम मानव व्यवहार को अच्छी तरह समझ पात है। व्यवहारिक मनोविज्ञान (Applied Psychology) मानव स्वभाव का जो गान हम मनापिनान से प्राप्त होता ह उमका उपयोग मानव जीवन को तथा जिस वातावरण म वह रहता ह उसे अच्छा और प्रभावशाली बनान के लिए दिया गया है । मानव व्यवहार के जिन नियमा को मनाविनान न ढूढ़ा ह उनका उपयोग मनुष्य म अच्छे यवहार उत्पन्न करन के लिए दिया जाता है। मनाविनान की वह शाबा जो मानव व्यवहार के तध्या एव नियमा का उपयाग मानव व्यवहार में परि वतन लान के लिए करती ह उम यवहारिप मनोविनान कहा जाता है । म व्यवहारिक मनाविनान की तीन प्रमुख शाखामा की चर्चा करेंगे।

- मनोविज्ञान की विषय-वस्तु तया परिभाषा २६ चिकित्सा मनोविज्ञान (Clinical Psychology) कभी-कभी काई व्यक्ति यह नहीं जान पाता ह कि प्रमुर परिस्थिति में उनकमा काय करना चाहिए। वह अनिश्चित तथा परेशान हो जाता ह । दूसरा व्यक्ति रिमा विशेष परिस्थिति में काइ काय करता ह पर उस इन्वानुमार फल नहीं प्राप्त हाता है । यह व्यक्ति हतामाह एव चिन्तित हा जाता है । एक तीसरा व्यक्ति मयन्त ही विचित्र काय कर डालता ह । उसक काय से उसन सम्बधित दूसरे व्यक्तिया का टिनाई हा सकती है। इन सभी व्यक्तिया रे माय हम व्यवहार सम्बधी समस्याएं पाते हैं। ये सभी कटिनाइ में है । इनकी करिनाई दूर करने के लिए इन्हें सहायता को आवश्यकता है । चिकितना मनाविनान हमें यह बतलाता है कि किस प्रकार ग्नका व्यवहार सम्बयो समस्याएं दूर करने में इन्हें सहायता दी जा माताहा चिकिमा मनाविनान कई प्रकार के मनावनानिक जाचा का उपयोग करता है। इनकी महापठा स वह यह जानता ह कि वाई व्यक्ति कितना बुद्धिमान है उमक मोखने की योग्यता क्या ह उसकी मचि क्या है दूसरे व्यक्तिया के प्रति वह क्रिम प्रभार व्यवहार करता ह अपने मम्बध में ता दूसरा मम्बध में उसकी क्या भावनाएं हैं इत्यादि । चिकित्सा- मनादिनान किसी व्यक्ति के सम्दव में बहुत सी बातें उससे या उसके मम्बधियों से सादातार कर पता लगाता ह । वह उस व्यक्ति का एक वयक्ति इतिहास भा तयार करता है। इससे उसे किसी व्यक्ति की ममस्या के कारण का समझने में सहायता मिलती है । वह उस व्यक्ति वी दास्तविक कटिनाई का निणय कर पाता है । सम्भवत उम व्यक्ति को अपने या किसी प्रय व्यक्ति के प्रति किमी प्रकार का निराधार मन्ह हा रहा हो । वह किसी ऐम उद्देश्य की पूर्ति के लिए कोशिश कर रहा हो जो टमको योग्यता से परे है। रसरी पादत तक से अधिक मबंगों द्वारा प्रभावित होने की दन गर्द हो । ऐन व्यक्ति को सहायता के लिए चिकि सा ३० प्रारम्भिर मनोविज्ञान मनोदिन उन सभी नियमा का उपयोग करता है जिहें वह मानव व्यवहार का समझने तथा परिवर्तित करने के लिए जानता है । वह ऐमे व्यक्ति में सौ मन स्थिति उत्पन करता है जो उसकी भावनामों, मनोवृत्तिया तथा दृष्टिकोण में परिवतन ला दौर। शिक्षा मनोविशान (Educational Psychology) बच्चे ही मागे चलकर युवा बनते हैं । अपने विकाम क्रम में ये तरह तरह के माय तथा तरह-तरह की नई वाने एव नए विचार सीखते है । किन्तु ये सभी व स्वत नही सीखत । समाज ऐसी सत्याग्रा का निर्माण घरता ह जहा हा शिक्षण वा नियंत्रण एव दिशा निर्देशन किया जाता है । ये सस्थाएँ ऐसी परिस्थिति उत्पन्न करती ह जिसमे बच्चा र सीखने का पाप मुचारू रूप से पधिर मात्रा में हो सरे। सूल, कालिज विश्वविद्यालय भादि ऐसे शिक्षण वद्र है। जिस प्रणाली द्वारा इन सस्यामा में शिक्षा का माय हाता है उसे शिक्षा रहा जाता है। मच्छी तरह शिक्षा दन के लिए छात्रो के सम्दध में बहुन सा बाता धा जानना और समझना मावश्या है । शिक्षक के लिए विकास की विभिन्न अवस्थामा म छात्रा को योग्यता का नाम प्रावश्यक ह । उमे यह भी जानना चाहिए कि छात्रा की आवश्यकताएं क्या ह जिममे वह उनये शिक्षण या उनकी पावश्यक्तामा पर आधारित वर सा । ऐसी स्थिति म शिक्षण सरत हागा और अधिक समय तक कायम रहेगा तथा धारा के अधिक प्रयास करन की आवश्यकता भी नही होगी। अत शिता की कौन-मी विधि उपयुक्त होगी इसका निणय कर लेना मावश्यर है । इस सभी वाता को अच्छी तरह समझने के लिए हमें मानव स्वभाव नया व्यवहार के विकास के सम्बध म मनाविनान द्वारा प्राप्त निवर्पो वा नान आवश्यक हो जाता है। प्रत शिक्षा मनाविन, मनोदिनान का उपयाग शिक्षा की समस्याग्रा का समझने के लिए करता है ।

मनोविज्ञान की विषय-वस्तु तथा परिभाषा प्रौद्योगिक तया व्यवसाय मनोविज्ञान (ladustrial and Business Psychology) अनिकाश तागा का अपनी जीपिका र पिए काय करना हाता ह । उन्ट रिमी वड या छटे कारखान में मशन द्वारा उत्पादन का वाय करना परता है । उन्हें निी व्यवमायो के दफ्ना या दूकान में सामान वचने या उनो प्रचार का काय करना होता है। वे विमी दफ्तर में भी मदा का वार बर मत ह । रिमी कारखाने म क्मिी व्यवमाय म या विमी हफ्तर में या जहा भी वे काय करते ह उन्हें विभनि प्रकार का काय विभिन परिस्थितिया में वरना हाताह । कोई भी व्यक्ति मभी वाय कुशनना म नही कर सकता है । 'नमें अधिकतर दार ता ऐम हाते है जिन्हें वह कर ही न मरता है । यह क्वल कुछ ही कार्यों को कर मरता ह पर उन्हें भी समान कुशलता से नीं। प्रत किमी काय के लिए उपयुक्त व्यक्ति का पता लगाना आवश्यक ह । इमन अतिरिक्त उन परिस्थितिया का जा विमी व्यक्ति क लिए काय करन में सहायक अथवा वापर हा सकती है उन्हें भी जानना आवश्यक ह । इन सबके लिए यह जानना चाहिए कि क्मि तरह किमी काय के लिए अच्छे व्यक्ति का चुनाव किया जा सकता है । विम तरह उसके काय करने की परिस्थिति में परिवतन लाया जा सकता ह, किम तरद दुघटनामा स बचा जा सकता ह यादि । कुव घटनाए कभी प्राणघातक हाती है । कुछ दुपटगाए ऐमा भी होता हना व्यक्ति का मदा के लिए वकार बना दती हैं । इनसे उनादन के मामान को दबादी तया मशाना को क्षति भी हाती है। प्रौद्यागिक मनाविनान क्मिी काय के लिए उपयुक्त व्यक्ति के चुनाव की विधिया गे बनाता है । यह स्मिी व्यक्ति की काय-दतता को कायम रपने तया उम उनत दनाने का विधिया को भी बतलाता है । यद्यवावट कम करने तथा दुघटनामों से बचने की विधिया भी बतलाता ह। यह हमें यह भी बतलाता है कि किस प्रकार मानव स्वमान मम्दरी नरना उपयाग क्मिी वस्तु वे बेचने तथा प्रचार के लिए दिया जा मक्ता ह।

प्रारम्भिक मनोविज्ञान प्रौद्योगिय मनोविनान मजदूर तया मालिक के वीर अच्छे गम्बध बनाए रखने की विधिया पर भी प्रकाश डालता ह । मजदूर वड या छोटे दलो में वाय करत ह । इस तरह के कई दस एक ही समय काय करते रहते ह । कुछ व्यक्ति दूसरे व्यक्तिया को यह बतलाते हैं कि उन्हें क्या करना ह और पस करना ह ? कुछ व्यक्ति दूसरे व्यक्तिया के कार्यों की देखभाल करते है । जो लोग काय को देपभाल करते है वे प्रवधक कहलाते हैं। प्रवधक तथा कायर्तायो के एव उन विभिन्न दला के बीच अच्छ सम्बध का होना अत्यत ही आवश्यक ह । उनके बीच कभी-कभी मतभर तथा भगडे भी हो सकते ह । कायकर्ता हडताल कर सकते ह । प्रौद्यागिक मनाविनान इन सभी समस्याग्रा को सुलमाने का विधियां बतलाता ह । मजदूर तथा मालिक का सम्बघ, कायकर्ता तथा प्राधक का सम्बध, प्रवधक तथा उन सस्थामा का सम्बध जो कायक्तामा के हित को रक्षा करती ह आदि, उद्योग सम्बधी समस्याएँ कहलाती है ।

२ स्नायु-मण्डल (The Nervous System) मनुप्य वस्तुमा तया व्यक्तिचा वे दोच घिरा रहता ह । वह उनके पारार, म्दम्प तमा विमिन ग्गा का देवता है । वन वातावरण में उदान ग्राबाता को मुनता है। वह कुछ वस्तुमा को गप लेता है, कुछ का गार उनका स्वार अनुनय करता है । कुछ वस्नुमों को म्पश करना ह पार पाता है कि यह चिकना स्वा मुलायम या सस्त ह । वह ट और गम का भी अनुभव करता है । कभी-कभी किसी नुकीली चौन चुमने म उमर का भो अनुभव होता है । मनुष्य को ये मान उनकी मानेन्द्रियों द्वारा प्राप्त होते है । नानेन्द्रियों वस्तुओं और व्यक्तियों के प्रनाव का नहाए करती हैं। प्रत ये माह (Receptors) कहताती हैं । टन ग्राहों पर वस्तुमा और व्यक्तिया का प्रभाव पता है । य उन्हें उत्तेजित कर क्रियाशीन बनात है। वातावरण में भूय की रोशना पत्ती हुइ ह । यह राश्नी दिमी वस्तु पर पडतो ह । यह राश्नी किस वस्नु न परावृत (Reflected) होकर उम चम्तु को देखनेवाने व्यक्ति की प्रारखा पर पड़ती है। वह व्यक्ति उस वस्तु के म्प और रग को दबता है। यहा अनि मात्र हैं। रोशनी वस्तु से परावत होकर प्रबों को ग्राहत नापाका उत्तेजित कर उन्हें क्रियाशील बनाती है। अत रोशनी उत्तेजन । मनुष्य में कई प्रकार व पाहत है । नको विशेषताएं भी मिन ह । पातार और रग लिए प्रांम आवाज के लिए कान, स्वाद के लिए जीन गरदे लिए नाम, स्पश दर गम टड तथा दवाव के लिए त्वचा माह है । प्रपत्र ग्राह्य का उत्तेजित करने के लिए अला अलग प्रारम्भिा मनोविज्ञान मनुष्य बदल दसने सुनन स्वाद ने गघ तथा गम ठड, दवात्र, दद गादि का अनुभव हा नही पता ह वह वस्तुमा और व्यक्तिया के प्रति पाय भी करता है। इसके कुछ वार हाथ और पर द्वारा हाते है। पुछ रिया शगेर ये अदर को दिया ना करती है । मनुष्य भाग पार हवा से घिरा है। सांस तारा वह हा लता है। मांग लने की जिया शरीर के अादर ये हिम्ने मे होती ह जिम हम बाहर म नही दान हैं। सौ प्रकार जर सान को कोई चीज भु में पतो हवा चयो और निगला की जिया होती है। य नित्याएं तभी हो सकती है जर भय तर रहता है। मन्द सार अश्यिया को क्रियामा द्वारा तर रहता ह । चाने मोर निगनने कीनिया में पीभ प तया जब भादि अय इन्द्रियाँ भी वाय भरती है। जब भाजन पट म चना जाता है तब वहां प्राय प्रकार के पाय प्रारम्भ हो जाते है । इहे पाचन या क्रियाए वा जाता है । शगेर के दूसरे हिस्से जो पट वर ह इन कार्यों का करते हैं। इसी तरह शरीर अदर मय इन्द्रियां भी विभिन्न प्रकार के वाय परती है । शरीर के व प्रग जिनट मनुष्य काय करता हवे कर्मेन्द्रियाँ मयवा प्रभावक (Erectors) बहलात है। किसी प्रकार या बार देवर इन्ग करिया द्वारा ही होता ह । इन्ही वे द्वारा प्राणी वातावरण की वस्तुमा पोर “यक्तिया ये प्रति काय करता है । मनुष्य इन्ही के द्वारा वातावरण में वस्तुमा और व्यक्तिया पर प्रभाव डालता है। प्रत ये प्रभावक (Lffectors) कहलाते है। मनुष्य के वातावरण में रहने वाल वस्तु तथा -यक्ति उमपे गानेन्द्रिय के लिए उत्तेजक का वाय करत है । पानद्रिया द्वारा वस्नु नया “यक्ति के विभिन गुणा का बाप हाता है । वदिया द्वाग यह वस्तुमा और "यक्तिया के प्रति उत्ताना ग उत्पन्न ज्ञान के अतुमार काय करता है। ऐमा करने के लिए मानयि तथा कौद्रिय ग्राहक तथा प्रभाव के बीच सम्बध स्थापित हाना प्रावश्यक है। पक्नि पाई पाने की चीज देखना ह । वह उसे उठाकर मुह में डाल लता है, चदाता ह और निगल जाता ३५ साय मण्डल है। वर्ग व्यग्नि उमान पर परी पॉटी दवा है । उने उदार दह मिमा टेकुन रात्र में रख लेता । य? अपने मित्र री भावान सुनता है और निमार माराज अनी दरो पार करने गता है। परन्नुम अपना मार विमी निभाया प्रात पता है मानिट को किनी नी में ना गाहा टन गे वमों मननिय नया दिया प्रताप्राहा तया प्रमावर वदीच मम्बा भ्यापित कने वारा कई मा भी अदरक है । शगर का यह मा स्नायमाल ( Dehous System) लाता ह । गद्रियों वानु तथा व्यक्ति के प्रभाव पा ग्रहण वरतीह दे उत्तेग्नुि हाना ह और कानसाल दनना ह। इनका त्रियाएँ मानी भी तक मामित न रहती। ये गदिम सम्बचिन स्नायुमाल का क्रियाशील दनाती है। फि म्नायुमन वर्मेद्रिया का विमारीत बनाती है । अव न्नुष्य उन वस्नुमा और व्यक्न्यिा पनि पार करता हजाउन नमियों का नातक तह । म्नायुमण्डन ग्रास तया प्रभाव के दीच सम्बर म्यापित करता है। इसलिए इस नन्दना या माजर Conductor ) कहा गवाह । गद्रिया उनिट हाने FTTT ( Aerous crersy or Acural impnire ) Jf77 हेत है । म्नायुमगन म नया का एक जानेद्रिय म मरे निजी कर्मेन्दिय में या कदै कर्मेन्द्रिया में आता हा वारीत हा जाती ह और इस नगर उत्पन हाता हा प्रकार मनुष्य एक प्रकार की वस्नु या नेनन के प्रति एवं प्रभा का काम करता ह और दूमर प्रकार चे उलेना या वन्नु क प्रति दूसरे प्रकार का । स्नायु कोष-नभी प्राणा अमन वाया (Cells) म दने में गवन व प्रारम्भिक दवह। एव काप (Cell) सन् धगजव है। मानव जीवन का पारम्न क्वल एक पमही हाता ह जिस दीर कप (sper. matozoa) कहा जाता है । इमी एक कप म गम में अना काप वनडे है । अनेर क्या बनने स हो मानव शरीर का निमा हाता है । शरीर वा पर अग त्या इन माँ का प्रपर माा काम ही बना है। प्रत बाप

प्रारम्भिक मनोविज्ञान
शरीर में अस्थिकोप, चमोष अघिकोप नानद्रिय-योप आदि ह।
स्नायुमाल भी कोपा से ही बना ह । स्नायुमण्डल के दोष स्नायुकोप
(Neurons) पहलाते ह । स्नायुकोष में एक कोप और स्नायुनतु (Nerve
fiberes) रहते ह । इहें आप इस चित्र में दस सकते हैं।
'कर्मवाही स्नायु कोष
कर्मेन्द्रिय स्नायु
सयोजक स्नायु कोष
ज्ञानवाही स्नायु कोष
चित्र १
कुछ कोपा में दो प्रकार के स्नायु रहते ह ! पानेन्द्रिय स्नायु
( Dendrnder ) और कर्मेद्रिय स्नायु (Acon) 1 स्नायुप्रवाह नानवाही
स्नायु (Dendrndes) से कमवाही स्नायु (Aron ) में प्रवाहित होते ह ।
स्नायुकोप (Neurons) तीन प्रकार के होते ह कमवाही स्नायुकोप

३७ स्नायु-मपाल (Motor Neurons ), मानवाही स्नायुकोप ( Sensory Acurons ) 44147 FIICETTO ( Connector Neurons ) : स्नायुमण्डर के तीन भाग ह । (१) पेन्द्रिय स्नायुमण्डल (The Central Nervous System) (२) त्वचा स्नायुमण्डल ( The peripherai Merous System) (३) स्वत मचालित स्नायुमण्डल (Autonomic enous System ) वेद्रित स्नायुमडलवेनिय स्नायु मगटन सुपुम्ना (Spinal Cord) और मस्तिष्क म बना है। पीठ के बीच में रोट की हड्डी ह । यह पाठ के निचले भाग में गदन तक फती है । यदि पाप रस हड्डी का बाहर से धुएँ तो आप इसरे अन्दर एक दूसरे के कार सनाए हुए घाटे-घाटे गिर पाएंगे। रोट की हड्डी के भीतर स्नायु तन्तु (hernous Tissues) ह। रोड की तरह य भी पीठ के निचले माग स सोपटी के निचले भाग तर फ्ले है। यह एक माटो रम्नी (Cord) की तरह ह और इसीलिए इस (Spinal Cord) सादनल बांड कहा जाता है। मस्तिष्क की बनावट-मस्तिष्क सिर वी सोपडी भीतर है। मुपुम्ना की तरह मस्तिप भी मदतरल द्रव्यों का बना ह । इसमें भी अनेकों स्नायु तन्तु (Nervous Tissues ) ह । मस्तिष्क का बाहरी सतह बल्ल (Cortex) कहलाता ह पाप नीचे दिए गए चित्र में देखेंगे मि मस्तिष्क के तीन प्रमुख भाग हैं । मस्तिष्क का सबसे वहा हिम्सा वृहत मस्तिष्क (Cerebrum) कहलाता ह और इसका एक घाटा हिम्सा लघुमस्तिप्त (Cerebellum) कहलाता ह । लघुमस्तिष्क के नीचे तया सुपुम्ना से सम्बधित सेतु (Pons) और मुयुम्नाशीप (Medula oblongata) ह। मस्तिष्क की ऊपरी सतह या वृहत मस्तिप्कोय बल्ल (Cerebral Corner ) सेव की रूपरी सतह की तरह समतल नहीं ह । यह प्रवराट की तरह बह-सावह ह । कहीं पर कुछ उमरा हुमा ह और यहीं पर कुछ गहा है । गहग्रहयों को प ( Fissure) 1

३६
प्रारम्भिर मनोविज्ञान
कहा जाता है। ये क्प मस्तिष्क या सनर या छोटे-घाटे भागा में
विभाजित करते हैं । बल्य ( Corner) को एक नम्बी दरार दो भागों में
बांटती है । एक भाग दाहिनी पार है और दूमरा बाई पोर । प्रत्यक
भाग को गोताध ( Hermisphere ) पा जाता - । दानों गाला? पा
आगर एक समान है। कार के चित्र में यायां गानाध दिखलाया गया
अग्रवड
कर्मवाही भाग
पाश्चात्य सड
भाषा वृहत् मस्तिष्क
प्रव्य
पाई खड
मस्तिष्क
चित्र २
सुमुगाशी
है। प्रत्येर गोलाध वर्षों द्वाग चार मुन्य हिम्मा बँटा ह । प्रत्येक
हिस्मे को खण्ड ( Lobe) कहा जाता ह । बल्क (Cortex) का वह
भाग जो ललाट के मामने ह प्रग्नपण्ड ( Frontal lobr) कहलाता है।
प्रमखण्ड के कार दूसरा हिस्सा ह जिस मध्य सण्ड ( Panetal lobe )
कहा जाता ह । इसका तीसरा हिम्सा सिर के पीछ ह जिस पाश्चात्य
खए- (Occipital lobe कहा जाता है। इसमा चीया हिस्सा मिर के
बगल कनचपडी के पास ह जिस पारद सएद ( Temporal lobe ) पहा
जाता है।

स्नायु मण्डल त्वक स्नायु-मडल-नानेन्द्रियां तथा कर्मेन्द्रियां अथवा ग्राह्य तथा प्रभावा मुपुम्ना स सम्बंधित है। यह सम्बध स्नायुमा द्वारा स्थापित होता ह । स्नायु (Nerve ) म्नायु ततुपा (Mervefibers ) का समूह है । एक प्रकार के स्नायु सुपुम्ना को नादिया म सम्बधिन करत है। इन म्नायुमा को नानवाही स्नायु (Sensory nerves) कहा जाता है । ये अन गामी स्नायु (Afferent nerves) भी कहे जाते हैं। ये ग्राहका स उम्पन स्नायु प्रवाह का मुगुम्ना तक ले जाते है । दूसर प्रकार के स्नायु मुपुम्ना का मंद्रिया म मम्बर स्थापित करने ह । ये स्नायु क्रियावाही ज्ञानवाही सायु नित्र ३ क्रियावाही सायु ग्राहक प्रभावक स्नायु ( Motor nerves ) क्लाते हैं । ये वहिगामी स्नायु ( Efferent nerves) कहे जान ह । ये स्नायु प्रवाह का सुपुम्ना से प्रभावका तप ले जाते ह । चित्र न. ३ म यह दिसताया गया है कि किस प्रकार जानवाही म्नायु डाग स्नायु प्रवाह सार्नेन्द्रिय (ग्राहक) से मुषुम्ना तक जाना है और फिर वह विम प्रसार मुपुम्ना से कायवाही स्नायुमा द्वारा कर्मेन्द्रिय तक अथवा प्रभाव तक पहुँचता है। शरीर के विभिन्न भागा में इस प्रकार के प्रारम्भिक मनोविज्ञान कई मानवाही और वाययाही स्नायु ह । इही के द्वारा स्वर स्नायुमण्डल ( Peripheral nervous system ) पा निमाण हुमा है। इसे त्वर स्नायुमण्डल इमलिए कहा जाता है क्यापि यह द्रिय स्नायुमण्डल का सम्बध शरीर में स्थित प्राहमा एक प्रभाव में स्थापित करता है। अब केन्द्रिय स्नायुमण्डल के सम्बध में विशप जानने पहले प्रभावो वै सम्बध में कुछ बातें जान लेना अधिर श्रेयस्कर होगा। पार्द भी शारीरिक काय प्रभावों के निया द्वारा ही होता है । मत प्रभावर हो शरीर का कायशीन बनान वाले प्रधान प्रग ही प्रभावक (Erictors) दो प्रकार के होते हैं--(२) मासपशियो ( AMusces ) और (२) अस्थियाँ (Glands) 1 मास पेशियो--शरीर के प्रत्यर अग में मासपशियां ह । मासपशियाँ सिकुस्ता और फलती ह । मामपशियो के मिकुडने और फनने मे हड्डिया ड्रामा ( Tendom ) तथा जाडा (Joints) में निपा होनी ह । माय रतु या ड्राए ( Tendons ) मासपशिया तपा हडिया को सम्बन्धित करतो ह । जर एष मासपी मिवु ती ह तर वा उम मासपशी म सम्बन्धि जान तया हड्डी को ऊपर की मोर उठाती है । जब वही मासपी फाती है तब तनाव खत्म हो जाता ह और वह हड्डी या जोड अपनी वास्तविक स्थिति में या जाती है । मामपशिया के सिडन और फलाव से हलियां घूमती ह । इन धूमने म शरीर का विशप भग भी घूमता ह । जब मासपशियां लगातार सिकुर तो और फलती है तब लगानार गति उत्पन होनी है। आप अपनो ऊगला मोर मकन ह और फिर उसे सीधी भा कर संक्त है । उगली ये जोड और दृष्टा में दो तरह वो मासपेशियां ह । इन दाना का काय एक दूसर से विपरीत है। जब एक सिकुडता है. सो दूसरा पलता है । अगली के माडने म जब एक तरह की मासपेशियां सिडनी ह ता ऊँगली नीच की पार भुक जाती ह । अव दूसरे प्रकार की मासपशियां फनती ह तब ऊगली मुडतो ह । यदि ये मामपशियां भी सिड जाती तब ऊँगलो नहीं मुड सक्ती थी। दूसरे क्षण जब आप ऊँगली सीधी स्माय मात परते हैं तब वे मारपेशियो जिन्होंने मानी सिनुहन से गतो दोनोरे नवा दिया था वे फैल जातो ह पौर दमरो मासपेशिपा सिटती है, भव ऊँगली ऊपर उठनी है और यह सोपी हो जाती है। इस तरह की कई मामाशिमा शरीर प्रत्येक प्रा में है और इनके काय एक दूसरे में सा विपरोत होवे ह । जव एक मिहतो है तब दूसरी फलती है। इस सिकुदन और प्रसारण की शिया का 'पारम्परिवचनाप्रदान' ( Reciprocal Innervation) यहा जाता है । इसका तात्पप यह है कि जब एक तरह को मामपेशियां क्रियाशील होती है तो समगे मासपेशियां विश्राम बरती है। धारीटार मासपेशियाँ शिकनी मासपेशियाँ 'चित्र ४ मासपेशियों को बनावट मुस्थत दो प्रकार की है (१) पारोदार मामपेशिर्मा तथा (२) चिक्नों मासपेशियां (1 Striped muscles and 2 Smooth muscles) । धारीदार मांसपेशिया में पारोगार लकीरें है तथा चिवनी मासपशिया में धारी नहीं रहती है । शरीर के वे प्रग जिनमे हम बाहर की वस्तुपा या व्यक्तियों के प्रति काय करते है उनमें धारोदार मामपेशियां रहती है । अत , वांह, पैर, कमर, गदन में धारीदार मास पेशियां हैं। इन अगा को हरिया को काल (Skeleon) कहा जाता है।

प्रारम्भिर मनोविज्ञान प्रत झाको मासपेशियां 'क्याल पेशी' (Skeletal muscles) कहलाती है । शरीर के मान्तरिव भाग में जमे, हृदय, फेफडा, पेट, रक्त-सस्थान प्रादि में चिक्नी मासपेशियां है । ये प्रातरिक अग मन्तरावयव (Viscernt Organs) कहलात है । इनमें चिक्नी मासपेशिया के सिकुडन और प्रसारण से गति उत्पन्न होती है। अथियां अथियां भी एक प्रकार के प्रभावर हैं । थियो का काय एक प्रकार का रसायन पदाय छोडना ह जिस सार कहा जाता है । कुछ अथिया को तो हम अच्छी तरह जानते है जमे अश्रुनय ( Tear gland) जिसके साव से मांखा से प्रभु निकनते है । श्वेद-प्राय ( Swet gland ) जिसके स्राव से पसीना (श्वेद) निकलता ह । इनके अतिरिक्त शरीर पे अन्दर और भी कई अथिया है । इनमें से कुछ नथिया के साव एक विशेष नालिका द्वारा निकलता ह । इहें नालिकायुक्त अग्थियों ( Duct glands ) कहा जाता ह । इनमें स्राव के निकलने के लिए एक नालिका लगी रहती है । कुछ प्रयिया नालिकाविहीन (Ductless) ह । इनमें नालिकाएँ नही लगी रहती ह, अत ये नालिका विहीन-अथिया ( Ductless gands ) कहलाता है। नालिकायुक्त अन्थियां जैसे अश्रु अयि, श्वेद-प्रथि प्रादि वहिस्रावी-अथियां कहलाती ह । नालिकाविहीन थियो अत स्रावी अथियाँ कहलाती ह ! इनके स्राव सीधे रक्त में जाते हैं। समस्त शरीर में धमनियो द्वारा रक्त का सचालन होता रहता है । ये धमनियों शरीर के प्रत्येक अग में ह और इनमें प्रतिक्षण रक्त सचालन होता रहता ह। धमनियो द्वारा निरन्तर रक्त सचालन को रक्त प्रवाह (Blood stream) कहा जाता ह क्याकि नदी के प्रवाह को तरह रक्त प्रवाह भी प्रतिक्षण होता रहता है। अन्त स्रावी-प्रन्थिया के कई प्रमुख काय है । इनसे नाव शारीरिक विकाम, शरीर में विभिन धातु के उत्पादन एव विभिन शारीरिक प्रगा के कार्यों को प्रभावित करते ह । आगे के चित्र में कुछ प्रमुख अत सावी या गया है।

४३
स्नायु-मण्डल
सुषुम्ना- सुपुम्ना स्नायुतन्तुमा को एक शृखला है । इसका प्रसार
पीठ के निचले हिस्से से मस्तिष्क के निचले भाग तक ह । सुषुम्ना
विभिन्न भाग ऊपर स नीचे तक एक दूसरे से सम्बधित ह । ये मस्तिप्व से
भी सम्बधित ह । जब काई ग्राहक उत्तेजित होता ह ता स्नायुप्रवाह
पिनियन ग्रथि
पिट्युटरी ग्रथि
पाराथामरॉयड
भायरायड
थाईमस
एडिनल
स्त्री यौन ग्रथि
(अंडकोष उत्पादक थि।
OYO
पुरुष यौन ग्रथि
(बीजकोष उत्पादक ग्रथि
चित्र ५
भानवाही स्नायु द्वारा सुपुम्ना के किसी एक भाग में जाता है । ये स्नायु-
प्रवाह उपर मस्तिष्क को पार भी जा सकते है और ये नीचे क्मवाही
स्नायु द्वारा क्मिी कर्मेंद्रिय में भी पहुंच सक्ते हैं । (चित्र न० ३ )
वोई बच्चा एक खिलौना दग्वता ह । यह उसे पाने के लिए अपने
हाया का आगे की ओर बढाता ह । रोशनी बिलौने से टकराकर बच्चे की
प्रावों के ग्राहा पर पडनो ह । ग्राहके उत्तेजित होती ह, स्नायु प्रवाह

प्रारम्भिक मनोविज्ञान उत्पन्न होते हैं । ये स्नायु प्रवाह जिस स्नायु द्वारा चलते है उसे हम दृष्टि स्नायु पहते हैं। दष्टि स्नायु प्रांगों का सम्बध, सुपुम्ना सबसे ऊपर वाले भाग मे, जो मस्तिष्क ये सबसे निचले भाग तर जाते है, म्यापित परते है। इसी धार से स्नायु प्रवाह ऊपर जाने वाले स्नायु-ततुओं में जाते हैं और मत में यह प्रवाह बृहत मस्तिप्वीय-वध के पाश्चात्य-पराड (Occapetal lobe ) में पहुंचते हैं। पाश्चात्य-सण्ड में स्नायु-तन्तु उत्ते जित होते है जिसके फलस्वरूप बच्चा सिलीने यो देखता है, उसे उमवे प्राकार मौर रग या बोध होता है । स्नायु प्रवाह ऊपर वढन के साथ-ही- साथ सुपुम्ना से नीचे की भोर भी प्राता है। ऐसी स्थिति में स्नायु प्रवाह वायवाही स्नायुमा द्वारा हापा मोर वाहा तक पहुंचता है । हाय मोर बहि पिलौने पो भोर बढत है और उसे उठा लेने हैं। स्वत सचालित स्नायु सस्थान सुपुम्ना स्नायुओं द्वारा शरीर के उन भगा से भी सम्बधित ह जो जीवन के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है । हृदय, फेफ्डा, यकृत (Liver) याप ( Blood Vessels ) यात प्रादि पट के एसे ही विभिन्न भग ह । इन भगा का उपयोग मनुष्य वातावरण को वस्तुप्रो मोर व्यक्निया के प्रति पाय धरने के लिए नहीं करता है । ये शरीर का स्वस्थ बनाए रखत है। ये मनुष्य के विभिन्न अंगों का स्फूनि प्रदान करते ह जिससे वह वस्तुप्रो और व्यक्तियो के प्रति काय परता है । हृदय, पंपडा, पेट तथा शरीर के प्रय सभी प्रग जो जीवन और स्वास्थ्य के लिए प्रावश्यक है सभी एक दूमरे से सम्बधित हैं। व सुपुम्ना के विभिन्न स्तरा से भी सम्वधित है। स्नायुओं का वह समह जो इन्ह एक दूसरे से तथा सुषुम्ना से सम्बंधित करता ह उसे स्वत संचालित स्नायु मएन ( Autonomic nervous systerm ) कहा जाता है। स्वत सचालित स्नायु मण्डन स्नायु-मएल का तीसरा भाग ह । ये स्वत सचालित इसनिए पहलाते ह क्याकि जिन अगा को ये सम्बन्धित

स्नापु-माल
करते हैं उनपर मस्तिन का निमंत्रण नहीं रहना है, ये स्वतत्र रहते हैं।
साधारणव काई मा व्यक्ति अपनी इच्छा से अपने हाय की गति परिवर्तित
नी पर सस्ता ह, न वह धमनिया में रक्त की दौरान का बदामा घटा
सरता है और न वह अपने पर गे मान्तरित नियामा को प्रभावित कर
सरता है। दूसरी भार बाई भी व्यक्ति अपना इच्छानुसार अपनी बांहों को
ऑरखे
लार उत्पादक अथियाँ
0 हापिण्ड
स्वासनली
यकृत
अमाशय
आते
पूडिनुल
किडनो गुर्दा
मूत्राशय
गुदा
चित्र
कार उठा सकता है या नीचे गिरा सकता है अपने पैरा को जिस भार
चाहे धुमा सकता है। अपनी पनरों का मूंद सकता है, प्रानो पीठ का
सुरला माता है । ये मग मस्निया के नियन्त्ररा में रहते हैं। स्वत सवा-
रित स्नायुमण्डल जिन प्रगा को संचालित करता है वे सुपम्ना समो
सम्बन्धित है। (वित्र न०६) इन ममा की क्रिया से जा प्रवाह उत्पन

प्रारम्भिक मनोविज्ञान होते हैं वे सुषुम्ना द्वारा मस्तिष में पहुंच जाते हैं । इसी कारण हमें कभी कभी इसकी क्रियामा पी भी अनुभूति होती है । प्रत हमें भी हृदय की घड़कन, सांस को तीव्र गति एव पेट के द का अनुभव भी होता है । मस्तिष्क के कार्य पेन्द्रिय स्नायु मण्डल मनुष्य के शारीरिक तथा मानसिक नियामा में अत्यन्त हो महत्वपूर्ण पाय करते हैं। सभी प्रार को मानसिक कियामो के लिए मस्तिप्प विशेष रूप से महत्वपूर्ण है । वृहत मस्तिष्क के कुछ भागो के उत्तेजित होने पर ही हमें विभिन्न प्रकार को सवेदनाएं हो सकती है। ये भाग मानवाही क्षेत्र ( Sensory area ) कहलाते हैं । जव मोखो के ग्राहक्षा से स्नायु प्रवाह मस्तिष्क के पाश्चात्य वएट में पहुँचता ह तय हमें दृष्टि सवेदना होती है, हम रोशनी और रग देखते हैं। श्रवण सर्वदा तभी होती है जब काना के ग्राहकों में उत्पन्न म्नायु प्रवाह मस्तिष्क के पाश्व सण्ड में पहुंचता ह । इसी प्रकार स्पश, ठड, गर्मी, मोर दबाव को सवेदनाएं तभी होती है जब इनके विभिन्न प्राहको में उत्पन्न स्नायु प्रवाह मस्तिष्क के मध्यखएड के विशेष प्रगों म पहुँचते हैं। गध तथा स्वाद की सवेदनाएँ मस्तिष्क के किम भाग से होती है इसका भभी तक ठीक-टोक पता नहीं चला है। वृहत मस्तिष्कीय बल्क के पाय क्षेत्रा के उत्तेजित होने से पय प्रवार को मानसिक प्रक्रियाएँ भी होती है जैसे, प्रत्यक्षीकरण, स्मरण, कल्पना, चितन, इच्छा, चुनाव, निणय मादि । यन मस्तिष्कीय बल्क का यह क्षेत्र जिनसे ये काम सम्पन्न होते हैं वे सयोजक क्षेत्र ( Association area) बहलाने हैं। मनुष्य जिन क्रियानो को अपनी इच्छानुसार करता है उनमें मस्तिष्क की क्रियाएं होती ह । ऐसी क्रियाएं ऐच्छिव क्रियाएँ (Voluntary action ) र लाती है । ऐच्छिक क्रियाएं तभी होती है जब मस्तिष्क का अप्रखड क्रियाशील होता है । अत यह क्षेत्र पायवाही क्षेत्र कहलाता है ।

स्नापु-मण्डल नए काय मीसने में अधिकतर ऐच्छिा क्रियाएं होती है। मत सीम्बना बिना बह्न मस्तिष्कीय वल्ल की क्रियाना वे नहीं हो सकता ह । किसी सीखे हुए काय के सम्पन्न होने में, जिसे हम भादत मा कहते हैं वृहत मस्तिष्कीय बल्क का प्रमुख हाय रहता है। जब कोई व्यक्ति साइकिल चलाना अच्छी तरह सोख लेता है तो पहिल चलाने का काय स्वमाविक बन जाता है। वह ज्योंही साइक्लि पर चढ़ता है त्याही पडिल चलान लगता है। किन्तु मस्तिष्क के उम क्षेत्र को जिसस यह क्रिया होती है यदि घायल कर दिया जाय तो वह इस मादत को भूल भी जा सकता है। सहज क्रियायें मनुष्य के कुछ काय ऐसे भी होते हैं जिनमें मस्तिष्क की रियामा की भावश्यकता नहीं होती ह । ऐसी क्रियाएं सहज क्रियाएं (Reflex action) बनाती हैं । जब कोई व्यक्ति नस लेता है तो उसे छींक माती है । इसी तरह जब कोई माने को चीन मुंह में डाली जाती ह तव मुँह में तरी मा जानी ह । इसे लार टपक्ने की सहज क्रिया कहा जाता है। जीभ में भी ग्राहक है । मुंह के अन्दर खाने की चीज़ उन्हें उत्तेजित करती है। इन ग्राहकों के उत्तेजित होने स कठ की अधियां कायशील होती हैं। ये लार अथिया कहलाती है । इन ग्रयियों के स्राव को लार कहा जाता है । इन अथियों की क्रिया से लार उत्पन्न होता है जो मुंह को तर बना देता है । आपरा हाय क्सिी गम वतन पर पड़ जाता ह और यह स्वत विच जाठा है । ऐसी स्थिति में त्वचा पर ताप के प्राह उत्तेजित होते हैं । इनसे उत्पन्न स्नायु प्रवाह मानवाहा स्नायु द्वारा सुषुम्ना में जाता है । सुषुम्ना से ये प्रवाह कायवाही स्नायु द्वारा हाय के प्रभावर तक पहुँचते हैं जिसके परिणाम स्वरुप हाप हटाने का वाय हाता है। इस सह क्रिया को हटाने को सहज क्रिया (Withdrawal reflex) कहा जाता ह । (चित्र न०३ महन क्रिया में होने वाले कायक्रमा को स्पष्ट करता ह। इसे सहज-क्रिया धनु ( Reler arc) कहा जाता है ।

४८ प्रारम्भिक मनोविज्ञान जब स्नायु प्रवाह सुपम्ना में पहुंचते है सब ये मस्तिष्क में भी जा सक्ते है । जब यह प्रवाह वृहत मस्तिष्कीय बल्व में पहुँचता ह तव वस्तु- बोध होता ह । पापको घिर हुए वतन की गर्मी का बोध होता ह । श्राप गर्मी को सवेदना अनुभव परते है । जब हटाने को सहज किया ( Reflex action) द्वारा मापका हाथ धिर वतन से अलग हो जाता ह तव मापस हाथ की गति का बोध होता है। प्रभावर की क्रिया से भी पानवाही प्रवाह उत्पन्न होते ह । हम तीसरे अध्याय में बतलाएंगे कि प्रभावत, मासपेशिया, जोड तथा वॉर्ड में भी कुछ ग्राहव पाए जाते हैं । जब मांग पेशियां सिकुडती और फ्लती ह तब इनमें क्रिया उत्पन्न होती है। प्रभावका को क्रिया इनम स्थित ग्राहको को उत्तेजित करती है । इस प्रकार इनम मानवाही स्नायु प्रवाह उत्पन्न होते हैं । ये शानवाही प्रवाह ज्ञानवाही स्नायु द्वारा सुपुम्ना से होते हुए यहत मस्तिप्वीय बल्क के मानवाही क्षेत्र में पहुँचते ह । प्रत पापको प्रभावर यो क्रिया मर्थात् सहज निया का बोध होता है। विसी यक्ति को सभी सहज नियामा का बोध नहीं होता है । व बार पानवाही प्रवाह ग्राहक से मस्तिष्क तक नहीं जाते है । यह सुपुम्ना तक पहुंचकर प्रभाव में चले जाने ह । सहज क्रियाएँ तो होती ह पर उम व्यक्ति को इसका बोध नहीं होता ह । शरीर पे अदर भी बहुत सी सहज क्रियाएँ होती रहती ह । रक्त को धमनियो में भेजने के लिए हृदय की गति, साँस लेने और छोड़ने के लिए फेफडे को गति, धमनिया द्वारा रक्त सचार, प्रन्थियो की क्रियाएँ पाचनक्रिया माति सभी सहज क्रियाएं ह । साधारणत हमें इन सहज रियामा का बोध नही हाता है । हमने बतलाया ह कि मस्तिष्य सहज क्रिया के लिए आवश्या अग नहीं है । इस तथ्य का स्पष्टीकरण निम्नमाटि के पशुमा के उदाहरण द्वारा किया जा सकता है । एक जीवित बैंग के मस्तिष का हटा दिया ना सकता है, या एक जीवित पुत्ते पे वहत् मस्तिप्त को काटा जा सकता ह । जब विसी पशु का समस्त मस्तिष्क हटा दिया जाता है तब वह पशु ४६ स्नायु मण्डल 'मुषम्ना-पशु' (Spinal animal ) बहलाता है। जब कवत उमये वन मस्तिष्क को काट दिया जाता है तब वह 'वृहत मस्नियाविहीन पश' ( Decerebrate animal ) बलाता है। एक 'सुपुम्ना पशु' मा वृटत मस्तिष्कविहीन पशु म तभी निन्या उत्पन्न होती ह जव उमरे ग्राहर उजित किए जाते हैं। उदाहरणाय एक सुपुम्ना बैंग ( Spinal flog) भूग्वे मर रहा हो पर वह अपनो इन्धा स भाजन की खोज या तालाब में कूदने का वाय नही करेगा। किन्तु जब पाप उमके मुन में कुछ डाल देंगे तब उसमें चबाने और निगरने यो सहज निया होने लगेंगी। या, माप उस जब पानी में डाल दगें तव उसमें तरने को सहन क्रिया शुभ हा जायगी । इसी तरह वृहत मस्तिप्यविहीन' कुत्ता अपने मालिक को नहीं पहिचान सकता ह पार न कोई ऐच्छिक क्रिया ही कर सकता है । इसमें नित्याए तमा होंगी जब इसके ग्राहक उत्तेजित किए जायेंगे । इममें वेयन सह्न क्रियाएँ हो सकेंगी। अनेक सहज क्रियाएँ जाम के समय से ही पायी जाती है। इनमें से प्रये सहन क्रिया किसी विशेप उत्तेजक के द्वारा विशेष प्रतिक्रिया वेप में होती है । उनाहरणाथ मुंह में खाने की चीज द्वारा लार टपकने को विशेप क्रिया होती है । खाने की चीज़ जीम के ग्राहका को उत्तेजित करतो ह और तब नार टपरने की सहन क्रिया होती हा जीभ ये ग्राहका के उत्तेजित होने पर लार टपक्ने को विशेष सहज त्रिया पशुपा तथा छोटे बच्चा में हाती ह । प्रायु बढने पर अय ग्राहा को उत्तेजित करने वाले प्रय उत्तेजना द्वारा भा एक ही प्रतिक्रिया उत्पन हो मक्ती है। इस सम्बध में एक सी शगैर क्रिया वनानिक ( Russian Physiologist) पदनाँव ( Pavlov ) ने कुत्ता पर प्रयोग किया है। उसे ध्वनि उत्तेजक द्वारा कुत्ते में लार टपक्ने की महज क्रिया उत्पन करने में सफलता मिती । पहले पैवलॉव ने कुत्ते के मुँह में विस्कुट का चूण डाल दिया और घनी द्वारा ध्वनि दी । इसके बाद उसने घण्टी की ध्वनि दी और कुछ क्षण के बाद उसे बिस्कुट दिया । वह घण्टी का ध्वनि और कुते के मुंह में 1 भारम्भिक मनोविज्ञान बिस्कुट डालने के समय का प्रमश बढ़ाता गया। उसने देखा कि जब घण्टी बजती थी तब कुत्ते का मुंह लार स तर हो जाता था । कुत्ते के मुह म लार टपकने लगती थी। पहल ता ध्वनि उत्तेजन म लार टपकन का क्रिया नहीं होती थी किन्तु इस प्रयोग में भोजा के बदले ध्वनि से लार टपकने की क्रिया हान लगो । एक नए उत्तेजक पोर प्रतिक्रिया के बीच सम्बध स्थापित हो गया। दूसर शटा में एक नया पाह्य प्रभावक सम्बध ( Receptor effector Connection ) स्थापित हुमा । सहज क्रिया अब इस नए उत्तेजर द्वारा उत्पन्न हो सकती ह । कान के ग्राहका के उत्तेजित होने पर लार ग्रयिया की क्रिया पव हो सकती है। इस प्रकारको सहज किया को पैवनॉव ने सम्बध प्रतिक्रिया ( Conditioned Reflex) कहा है । जिस विधि से यह नया सम्बय स्थापित किया गया उसे सम्बधी करण ( Conditioning ) कहा गया है। पैवलाँव में प्रयोग में साने की वस्तु असम्बधित उत्तेजर (Unconditioned Stimulus) तथा लार टपाने की असम्बधित प्रतिक्रिया (Unconditioned Response ) थी। किन्तु जब सम्बध प्रतिक्रिया ( Conditioned Reflex ) हा गई तव घण्टो की ध्वनि लार टपकने की सम्बध प्रतिक्रिया के लिए सम्बद उत्तेजक बन गया। सम्बपीकरण की क्रिया नीचे दिखलाई गई ह प्रसम्बधित उत्तेजक प्रतिक्रिया (खाना) (लार टपकना) सम्बधित उत्तेजक । बचपन में जब पहले पहल मापके मुह में इमली का एक टुक्डा पडा था तर भापके मुंह में पानी मा गया था। इसके बाद आपने इमली कई बार खाई और साथ ही इसका नाम भी सुना। इमली 'शब्द' मौर सार टपक्म को सहज क्रिया के बीच सम्बधीकरण हो गया। अब जब प्राप इमनी शन्न सुनत ह या इस श को नही लिखा देखते है तब मापके मुंह म पाती पा जाता है। कई सम्बधित उत्तेजक जैसे-इमलो वा देखना, स्नायु मण्डल इमली शन्द की ध्वनि या लिखित इमली शब्द पहले में असम्बधित उत्तेजक इमली के स्वाद, या स्थान ले लेते हैं । अब न पेवल इमली में स्वाद से वरन् इमलो शब्द से हो मापदे मुह में पानो मा जाता ह । प्रद एक सम्बधित किया स्थापित हो गई ह । सम्बधित क्रियाएं अनच्छिर क्रियाएं (Involuntry actions) कह- लाती है। ऐसी क्रिया मनुष्य के इच्छानुसार नहीं होती है। सकल्प एव इच्छाएँ तभी होते ह जव मस्तिष्क कार्यशील होता है। एक सरल सहज क्रिया में मस्तिप्त का हाय नहीं रहता, मत यह काम प्रनच्छिक काय कहलाता है । ऐच्छिक क्रिया में स्नायु प्रवाह पहले मस्तिष्क में उत्पन्न हाते ह और तव ये सुपुम्ना में माते हैं। वहाँ से वायवाही स्नायु द्वारा यह हाथ वाह, पर, कमर, गदन, होठ अथवा जीभ में जाते हैं । साधारणत इन्ही अगों द्वारा ऐच्छिक क्रियाएं होती ह । इन्हें हम अपनी इच्छानुसार घुमा सक्ने है । किसी वस्तु को ऊपर उठाना, लिखना, टहलना, मिर धुमाना, बोलना प्रादि ऐच्छिक क्रियामा के कुछ उदाहरण है। अधिक अभ्यास के कारण पादत को क्रियाएँ भी मधिक्तर सहजक्रिया को तरह होतो ह । किसी वस्तु को दखने, छूने या भावाज से ही विभिन्न प्रकार की क्रियाएँ होने लगती ह । पादत को क्रिया में अपनी इन्छा या प्रेरणा को व्यक्ति को कोई भी जानकारी नहीं भी रह सकती है । यह बिना किसी सक्ल्प के भी हा सक्ती ह। जब बच्चा हाथ स खाना सीख लेता ह तब ज्योंही उसके सामने खाना माता है त्योही खाने की समस्त क्रियाएं खाना मिलाना, कार बनाकर मुंह तक ले जाना मुंह खोलना मादि होने लगती है। ये क्रियाएं ठीक उसी क्रम में तब तक होती रहती ह जब तक वह खाना समाप्त नहीं करता ह। एक लगी हुई पादत की क्रिया ठीक सहज क्रिया के समान स्वत होती है। जब एक पादत बन जाती है तब उसे छोडना कठिन हो जाता ह । व्यक्ति की इच्छा का इस पर कोई भी प्रभाव नहीं होता है । कभी-कभी आदत की क्रिया मनुष्य अपनी इच्छा के विरुद्ध भी करता है। एक रोगी को डाक्टर धूम्रपान छोड देने की प्रारम्भिा मनोविज्ञान जितनी प्रकार की मानेंद्रियां है उतनी ही प्रकार की सवदनाएं हाती है। हमनापा को भाखा म सम्बधित प्रारा तथा रग पो सपना होती है । हमलोगों को जाना से सम्बंधित श्रवण तया ध्वनि की सवेना होती ह । इसी प्रकार हमलोगो को स्वार, गप, स्पश, ट, ताप (गम तथा ठ३) स्नायविक तया गति मादि की सवेदनाएँ हाती है । इनमें से प्रत्येव रिसी विशेष प्रारक से सम्बपित है। हमलोग विभिन्न प्रकार को मवेदनामा को उन्हें उत्पन करनेगाने विभिन्न प्रकार के उत्तेजका की दष्टि से भी देख साते हैं। उदाहरणाय दृष्टि सवेदना प्राश किरणा से उत्पन्न होती ह । श्रवण सवपनाएं की लहरा द्वारा उत्पन प्ररम्पन से होती हैं । स्वाद तथा गध की सबानाएं रसायनिक पदार्यों द्वारा उपन्न होती है, ययात उन वस्तुमा द्वारा जो पिघलने या गलने योग्य रहती है। विभिन्न सवेदनामा का वणन करते समय हम लोग इहें उत्पन्न करन वाले विभिन्न प्रकार के उत्तेजना का यणन करेंगे। सवदनामों का अध्यया करने के लिए हमलोगा को उन उत्तेजका ये स्वरूप का अध्ययन करना होगा जो इन सवदनामो को उत्पन्न करते हैं। हमलोगों को उन पानेद्रियो मथवा ग्राहको का भी अध्ययन करना होगा जिनपे उत्तेजित होने से सवेनाएं होती है । सवदना की कुछ इन विशप तापा को सवेदना की विशेषताएं कहा गया है। सवेदना की विशेषताएं (The Attributes of Sensation) सवेदना की कुछ सामान्य विशेषताएं ह। ये अधिकतर सवेदनामा में पाई जाती है । गुण (Quality) सवेना को एक ऐसी ही रिशेपता है । किसी भी मवेदना का कोई न कोई गुण रहता है। उदाहरणाय, बन्न एक या दूसरे रग का हो सकता है । स्वाद सवाना का गुण पट्टा, तोता या क्हुप्रा हो सकता है । ऐमा ही अप सवदनानो के साथ भी होता सवेदना सवैना का दूमग गुण तीव्रता (Intensity) ह । हमनोग चमकाने नया फावे रग के अन्तर का बतलाते हैं। हमनाग तीव्र या धीमी ध्वनि मुनने है । मनागा का तीन या पाके गर को सर्वनाएं होती ह । मवेना की तीसरी विशेषता सत्ताकार (Duration) ह । काई प्रकाश एक क्षण के बाद लुप्त हो सकता ह या यह अधिक समय तर रह मक्ता है। कोई ध्वनि तुरन्न समाप्त हा सक्नो ह या यह लगातार होती रह माती है। सवदना को चौथो विशेषता विस्तार ( Extensity ) है । आवाश में किमी छाटे सितारे को जगमगाहट एक मोमिन क्षेत्र तक रहती है। किन्नु मूर्य का प्रकाश विनत क्षेत्र त प्रसारित होता है। यदि आपकी त्वचा का किसी बात को नोर मे स्पश किया जाता है ता प्रापको म्पश की मोमित मवेदना हानी ह । किन्तु यदि कोइ म्पये का सिक्का आपकी हथेली पर रखा जाता ह तो आपकी सदैदना विप्नत हाती है। उपर को चार विशेषनाग्रा में मे गुण तया तीव्रता की अधिक धान- बीन की गयी है । म उनके मम्बघ में बहुत सी बातें जानते है । अय दो का क्वन उल्लेख किया गया है। कुछ मनोवनानिब उन्हें संवन्ना की सरल विशेपता नहीं भी मानते है। हम लोग विभिन्न सवैन्नाया को विशेषतामा सम्बध में प्रत्येक प्रकार की सवेदना के वणन के अन्तगत जानेंगे। मनोवैनानिकों ने उत्तेजन की विशेषतामा मे सम्बचिन मवेदना की विशेषतामा सम्बध में मनौरजा वानों का पता लगाया है । एक अत्यन्त ही क्षीण उत्तेक द्वारा किसी प्रकार की सवेदना नहीं होती है। यह अनुभव योग्य नहीं रहता है । उदाहरणाय एक अत्यन्त हो सीण प्रकाश नग रिखलाई दता ह । कुछ एमे सितारे भी ह जिन्हें हम विना यन्त्रो के अपनी प्रांगा में नहीं दम सक्ने हैं। उन्हें एक शक्तिशाती टेलिस्वाप या रवीन द्वारा दवा जा सकता है । इसा प्रकार शान्त वातावरण में नदा की तरमा द्वाग सुनने याम्य ध्वनि नही उत्पन होती है। यहा उत्तेवर अत्यन्त प्रारम्भिक मनोविज्ञान ही सीप है। पिन्तु तूफान के ममय या जब नदी में बाढ़ माती ह तव नहरें नाद ध्वनि उत्पन्न करती है। उत्तेजक में सवेदना उत्पन्न करने योग्य तोत्रता रहती ह । मत तीव्रता वी एवं सीमा है जिसके नीचे कोई उत्तेजक सवेदना नही उत्पन कर सकता है। इसके मतिरिक्त एक एसी भी सीमा ह जहाँ सवेदना के गुण में परिवतन हो जाता है। माप दसेंगे कि एक विशेष सीमा से क्म प्रकाश की तीव्रता में आपको कोई भी रग नही दिखलाई देता है। माप वस्तुमो को देखते हैं पर उनके रगा को नहीं। जव प्रकाश की तीव्रता वा दी जाती ह तब माप रगों को भी देखने सगते है। उत्तेजक को निम्नतम सीमा जो सवेदना उत्पन्न कर सकती ह उसे अनुभव मात्र सोमा' ( Threshold ) कहा जाता ह । मापन क्सिी कमरे की चौखट को अवश्य देखा है। यह एक विशेष ऊंचाई को रहती ह जिससे बाहर से पानी अन्दर कमरे में नही पाने पाता है। चौखट पार करने के लिए पानी को इसकी सतह तक पाना होगा इमे उसकी ऊँचाई तक पहुँचना होगा। इसी प्रकार विसी उत्तेजर को सवेदना उत्पन्न करने के लिए एक विशेष सतह तक अनुभव मात्र सीमा ( Threshold ) तक पहुँचना होगा। प्रत यह अग्रेजी शब्द ( Stimulus threshold ) इसके लिए उपयुक्त समझा गया है । उत्तेजर या ( Sumulus ) के लिए जमन शद रीज ( Ress ) तथा ( Threshold ) के लिए लाईमन ( Limen ) है । अत ( Ress Limen ) का प्रय ह उत्तेजक का अनुभव मात्र सीमा (Stimulus threshold) । मनोविनान में R L का उपयोग उत्तेजक के अनुभव मात्र सीमा ( Threshold ) के लिए सक्षेप में किया गया है। विभिन्न सवेदनामो वे उत्तेजना अनुभव मात्र सीमा (RL ) का पता लगाया जा सकता है। पाप रग, ध्वनि स्वर, स्पश पीडा, गम तथा ठड आदि सवेदनापो के उत्तेजक का "अनुभव मात्र सीमा" (RL ) जान सकते है। हमने पहले बतलाया ह कि उत्तेजक का अनुभव मात्र सीमा (RL) सवेदना वह क्मिो उत्तेजर के वोध के लिए निम्नतम मूल्य ह । हम लाग किसी एक ही उत्तेजक को दो मूल्या वे 'निम्नतम अनुभव भेद' (Least noticeable difference) पर भी विचार कर सकते हैं। यदि आप एक समान दो बनना में चीनी भर दें एक म एक क्लिोनाम या १००० ग्राम तथा दूसर में एक किलोग्राम तथा १८ ग्राम । अब आप किसी ऐसे व्यक्ति को जा इनके वजन का नही जानता ह एक के बाद दूसरे वतन को उठाकर इनके वान का अनुमान करने का कहें तो अधिव सम्भावना इस वात की ह कि दोना के वजन को बराबर बतलाएगा। दूसरे शदा में यह कहा जा सकता ह कि दोना वतन वजन को एक ही सवेदना उत्पन करते ह । उत्तेजना का अनुपात एक नहीं है किन्तु उनसे जो सवेदनाएं उत्पन होती ह व एक ह । दाना उत्तेजका का अतर ध्यान देने योग्य नहीं रहता है। यदि आप दूसरे वतन में दा ग्राम चीनी और मिलाकर इसके सम्पूर्ण वजन को १०२० ग्राम वा दते ह और इसकी भी जानकारी उस व्यक्ति का नही होने दते जिम आप फिर एक के बाद दूसरे बता का उठाकर वजन का अनुमान करने को कहते है तो आप अब यह देस सकत ह कि वह दूसरे वतन को पहले वतन से अधिक वजन का वत माना है। आप उम दाना वतनो को बारबार उठाकर कई वार निणय करने कहते है और आप यह पाते है कि अधिकतर वह दूसरे बतन को अधिक भारी बतलाता है। प्रत आप यह दखते है कि दूसरे बनन वे वन म दो ग्राम बता देने स सवेदना म भी अन्तर उत्पन हो जाता है । इस प्रकार आप इम निष्वप पर पहुंचते ह कि प्रति १००० ग्राम म २० ग्राम वजन और जोडने मे ही वजन की सवदना म अन्नर उत्पन हो सकती है । इमस कम वजन में अतर होने से सवदना म अन्तर होने की कम सम्भावना ह । अत एव हजार ग्राम के वजन म अन्तर अनुभव करने के लिए २० ग्राम अनुभव भेट मात्र (Minimum noticeable difference) मममा जायगा। यह विभिन वजना का ४ प्रारम्भिक मनोविज्ञान सवेदना उत्पन्न करने के लिए 'मीमात भेद' बन जाता है। अन इमे सीमान्त भेद (Differential threshold Limen ) कहा जाता है । यह भेद के योष के लिए निम्नतम भेद समभा जा सरताह । DL Dff-rential Limen या गक्षिप्त विवरण ह। RL वो भाति सभी सवानाग्रा Differential Limen या DL ( सीमान्त भेद ) कामा पता लगाया जा सकता है। प्रत प्रकाश रग स्वाद गय, स्पश मादि सबदनामो के 'सीमान्त भेद' (DL) या पता लगाया गया है। मनोवतानिया ने सीमान्त भेद (DL) के सम्बप में एक मनोरजक तथ्य वा पता लगाया ह । किसी भी उत्तेजन के मीमान्त भेट (DL) का सम्बध उस उत्तेजक के साथ निश्चित अनुपात में रहता ह । हम लोगा ने देगा वि १००० ग्राम की वजन के लिए २० ग्राम सीमान्त भेद (DL) था। ५०० ग्राम वजा के लिए १० ग्राम सीमात भेद (DL) होगा तया १०० ग्राम के लिए २ ग्राम सोमान्त भेद ( DL ) होगा। आप इसे इस अनुपात में पाएंगे --- 3- -4-। प्रत किसी उठाने योग्य वजा का अनुभव भेद मात्र मीमान्त भेद उस वजन वा-वां भाग होगा। प्रत क्सिी वजन को जानवर हम उस वजन के 'सीमान्त भेद' वा पता लगा सकते ह । ऐमा इसलिए होता ह क्याकि इस सम्बध में एव सामाय नियम है-क्सिी सवेदना में मन्तर उत्पन परने के लिए उत्तेजक में वृद्धि एक निश्चित अनुपात में प्रथवा निश्चित प्रश में होना चाहिए। इस नियम का प्रमाण सभी प्रकार की सवेदनायो में पाया गया है तथा इसे अधिकतर सत्य पाया गया है। अनुभव मात्र सीमा तथा सीमान्त भेद ( R L and D L ) पता लगाने के लिए कई विधिया का उपयोग किया गया ह इन्हें मनोशारीरिक विधियां (Psycho-Physical methods) कहा गया है । ये ऐमा इसलिए कहताती हैं क्योंकि इनकी सहायता से हम उत्तेजक तथा सवेदना के सम्बध का निणय क्र सक्ते ह । उत्तेजक शारीरिक है। यह शारीरिक जगत सवेदना शक्ति हैं तया सर्वाना मनोवैनानिर है । इसकी उपत्ति व्यक्ति के मन्तग्न होती है। मनोशारीरिक विधियों (Psycho-Physical methods) के उपयार से यह विदित हुअा है कि विभिन नाद्रिया के लिए अनुमव मात्र सीमा (RL ) या सीमान्न भेद (DL ) एक ही नहा रहता है। एक व्यक्ति दटत ही दीए प्रकाश दर सकता ह जिसे दूसरा व्यक्ति नहीं दम माना है। इसी प्रकार कोई व्यक्ति एक बहुत ही धीमी अावाज मुन सक्ता ह निमे टूसरा व्यक्ति नहीं सुन पाता ह । अथवा, कोई व्यक्ति किनी गघ का अनुभव कर सकता है जबकि उस गध का अम्नि व अय व्यक्तियों के लिए नहीं रहता है । व्यक्निया में सवेदनामा को चमना मिन रहती है । उदाहरणाय स्वाद में मून्म अन्तर का पता एक व्यक्ति को लग जाता ह तया दूसरे को नहीं । रमी प्रकार किमी व्यक्ति को कान सगीत के लिए अत्यन्त पतली हो सकती है । वे सगीत में स्वरा के प्राशिक भेद को भी अच्छी तरह समझ लेते हैं । कुछ लोगों की आँ रगा र शेड पहिचानने में अधिर तन होता है वे किसी रग के विमिन शेडा को अच्छी तट पहिचान लेते हैं। सदनाना के कुछ तथ्या को समझ लेने के बाद अब हम विभिन्न प्रकार की सवेदनाओं का वणन प्रस्तुत करते हैं । दष्टि सवेदना (Visual Sensation) जिस वाह्य-जगत मे हम घिरे रहढे हैं उसके सम्बध में अधिकतर नान हमें आखों द्वारा प्राप्त होता है । अत दष्टि सदमे मूल्यवान सवेदना है । इमो से इसको क्षति सवस अधिक सततो ह । नेत्र रोगी की आँखा पर जब पट्टी दाय दी जाती ह तो वह प्रान पाम की सभी वस्तुमा के रहते हुए भी उनम बिलकुल दूर हो जाता है। दृष्टि के लिये उत्तजा मूर का प्रकाश दष्टि उत्तेजक ह । इमको अनुपस्थिति में किसी भी ६० प्रारम्भिक मनोविज्ञान पदाय द्वारा उत्पन्न प्रकाश ष्टि उत्तेजर या काय करता है जो मामवत्ती की रोशनी, बिजली की रोशनी मादि। प्रकाश किरण जर मपने उद्गम से वस्तु तक पहुँचती है तो व वक हो जाती है । प्रत्येक किरण तरणा का रूप ग्रहण कर लेती है। ये तरंगे विभिन्न लम्बाई को हो साती है। इन्हें प्रवाश तरगे वहा जाता है । चित्र ७ हम लोग ऊपर के चित्र म विभिन्न सम्बाई तथा विभिन्न ऊचाई की प्रकाश तर दखते ह । इनकी मॉप मॉप की अत्यन्त ही छोटी इकाइया द्वारा होती है जिन्हें मिली माईक्रोन्स (Milumicrones) कहा जाता है । एक माइक्रोन (Micron) एक मीटर का एक लासका हिस्मा या एक मिलोमीटर का एक हजारवां हिस्सा है। मापने विमी 'फुट-स्वेल' में मिलीमीटर अवश्य देखा होगा। यह एक इच के पच्चीसवें भाग स कुछ अधिक होता है। मिली माईक्रोन को म्यु (mu) द्वारा व्यक्त किया जाता है। जिन प्रकाश तरगा को मनुष्य की प्राचं देख मवती ह उनकी सीमा ७६० म्यु (mu) से लेकर ३६० म्यु (mu) तक है । रष्टि उत्तेजक अथवा प्रकाश-तरगे केवल लम्बाई म ही नहीं मिल होती है । इनकी तीयता में भी अन्तर रहता है । प्रकाश तरगा यी तीव्रता इन तरगो की ऊँचाई द्वारा व्यक्त होती है। प्रपारा किसी प्रबल या तीण मोत से पा सकता है। प्रकाश की तीव्रता में अन्तर के अतिरिक्त प्रकाश की जटिलता में भी अन्तर हो सकता है। प्रकाश तरग विशुद्ध अथवा विभिन्न ऊंचाई तथा लम्वाई को मिश्रित तरणें हो सकती ह । जब किसी वस्तु पर प्रकाश पडता है । तब वह परावत (ReDected) हो जाती ह । हम देखेंगे कि मूय के प्रकाश में विभिन्न लम्बाई को प्रकाश तरगें मिश्रित रहती ह । किन्तु जब प्रकाश किसी वस्तु पर पडता सवेदना ह तब सभी सम्बाद को प्रकाश तरगे नहीं परावत होती है। कुछ तरगें साब ली जाती है । ये नहीं परावत्त (Reflected) होती है । जो वस्तुएं एक रग को दिखाई दती है व एक ही लम्बाई की तरगों को परावन करती है तथा अन्य को सामती है। एमा विमिन प्रसार के वस्तुओं के मातिक पार्यों का मिनता के कारण होता है। प्रत वह वस्तु जो चार रग का दिमाई दता है वह उन तरगा का परावटन (Reflect) करता ह जा ७०० मितीकोन के लगमग होती है । यह अय प्रकाश तरगों वामय लेता है। वन्तु से परादत प्रकाश ( Reflected light ) प्रांया पर पडती ह । मामों को ग्राहः उत्तेजित होती है। हमें दष्टि-मवेदना होती है। हम पराश तया रग दखते है। प्राश तथा रग को सवेदना रिम प्रसार हाती ह यह जानने के पहले लागों को मनुष्य के प्राव को बनावट तया उमकी क्रियामा के सम्बध में जान लेना चाहिए। प्रांख को बनावट तया क्रियाएँ (Structure and Function of the Eye) भूटि के नीचे सोचले स्थान पर मां स्थित है। इस स्थान का प्रतिकूप (Socket) कहा जाता है । नेत्र गोलार (Eyeball) से सम्बंधित कई मांसपशियां ह । इनका सहायता स हम सा का इधर उधर घुमा सक्ने है । प्राय दे पागे का भाग पारदर्श हैं। इसे कनिका (Cornea) वग जाता है । वनिरा पीछे पुतनी (Pupil ) है । पुती उपठारा (Ins) की मांगाशियों में बनी एक गोल कैद ह । इस मांसपशियों की क्रियामा म तुली वटी या छोरी हानी ह । प्रांत में प्रकाश इन्हीं पुरिया द्वारा प्रवेश करता ह। जद धीमी रोशनी रहती ह तो पतारा द्वारा पुनिया दहा जाती है ग्मिने पास में अधिक प्रकाश पहुँच जाता ह। जब प्रकाश दिन की रोश्नी की तरह चमकीला होता है तो अपनारा (Ins)

ॐ
प्रारम्भिक मनोविज्ञान
पुतली को सिकोड देता है जिसमे प्रांप व अदर वम प्रसाश जाता है ।
उपतारा (Ins) के पीछे अाख का वीच (Lens) ह । यह एक दूसरा पारदर्शी
पदाथ ह। वीत (Lens) में सभी ओर स लगो मांसपेशियां इमे प्रपन स्यान
पर पायम रसती है। ये मांगपेशियां सोलीपरी मांसपेशियों ( Chity
muscles) यहलाती है । वोक्ष (Lens) भी चिपटा और कभी वक्र रूप
ग्रहण पर लेता है। ऐसा सोयरी मांसपेशिया को प्रियामा के कारण
होता है । जब कोई दूर को वस्तु देसी जाती ह तो सीलीमरी मांसपेशियां
इस तरह सिकुडती पोर फैलती ह पि वीच (Lens) का मावार चिपटा
और पतला हो जाता है । जब कोई वस्तु निकट रहता है तो ये मांसपेशियों
पुतली
कर्णिका
जलद्रव्य
उपतारा
लेन्स (वीक्ष)
-श्वेत पटल
-मध्य पटल
-अक्षिपट
कॉद दव्य
अप बिन्दु
पीत बिन्दु
चित्र
इम तरह सिकुडतो प्रौर पलती है कि वोच ( Lens) का आकार वक्र
तया मोटा हो जाता है । इस प्रकार सीलीयरी मांसपेशियाँ दूर तथा नजदीर
की दृष्टि के लिए आरा को ममियोजित करती है।

सवेदना कनिका (Cornea) तथा वीर (Lens) के बीच एक जेनी के समान पाथ रहता हूँ जिम जनद्रव्य (Aqucous humour) कहा जाता है । प्राग्य में ऐमा हो एस दूसरा द्रव्य भी रहता है जिस कांच द्रव्य (Vimeous humour) क् जाता है। यह पदाथ ग्रांप का गेंद क प्राकार का बनाए रखता है । प्रांख में तीन पतले प्रावरण प्रयवा पतनी परतें हैं। बाहर का आवरण श्वैत पटन (Sclerotic) बहलाता है। इसके बाद का दूसरा प्रावरण मध्याटल (Chorond) कहलाताह । तीसरा तथा अन्तिम प्रावरण अचिपट (Retina) कहलाता ह। त्रि में प्राव के विभिन भागो का दिपनाया गया है। प्रतिपट में दष्टि ग्राहक (Visual receptors) रहते है । ये दो प्रकार दी हाने हैदएडे तथा सूचिया ( Rods and Cones)। सूचियाँ चित्र दण्ड तथा सूचि अत्यन्त ही घाटे कोश के रूप में है। इनमें लम्बे स्नायु रहते ह । ये समस्त रेटिना पर छाये हुए है । दण्डों तथा मूचिया को स्नायुएँ एक स्थान पर एकत्रित होती है और एक पतल धागे के समान बन जाती है। स्नायुमा का यह माग रष्टि-स्नायु कहलाता है । जिस स्थान पर दष्टि-ग्नायु अतिपट से बाहर निकल जाती ह उने अब बिन्दु (Bund-Spor) कहा जाता है । मध विन्दु में वेवल स्नायु रहते हैं । इनमें प्रारम्भिक मनोविज्ञान श नहीं रहते । भय विन्दु के निस्ट प्रक्षिपट का एक छोटा सा भाग है जिसमें वेवल मूचियां पाई जाती है । इसमें दण्ड नही रहते । इसे पीत- विदुः (Yelow-Spot ) कहा जाता है। यह फोविया ( Fovea ) भी कहलाता है । जय प्राप क्मिी वस्तु को दवते हैं तो आपका सिर तथा प्रापको प्रोसें इस प्रकार मुड जाती है कि उस वस्तु को प्रतिमूर्ति प्रापरी अक्षिपट के इस भाग पर पडती ह । चित्र न०६ में दष्टि-स्नायु मध बिन्दु तथा पीत विन्दु दिसलाए गए ह । पक्षिपर के दूसरे भागों म दण्ड तथा मूचियाँ दोना पाई जाती ह । मध विन्दु तथा पीत विदु के प्रासपास अधिक मूचियाँ ह । इम भाग से हम ज्यो-ज्या प्रागे बरते ह दण्डो की सस्या बत्ती जाती ह । अक्षिपट के दूर के भाग मे येवल दण्ड ह और सूचियां प्राय नी के वरावर है। हम लोग प्रतिपट को केद्र मध्य तथा वाह्य भागा मे बांट सकते है । इसके वेद्र वाले भाग में दएन से अधिक सूचियाँ ह इसके मध्य भाग में दगड तथा मूचिया की सख्या लगभग वरावर ह । वाह्य भाग म अधिकतर दण्डै ह। जब आप किसी वस्तु को देखते है तो उसम परावत प्रकाश निका तया जलद्रव्य से होर यांख में प्रवेश करती है। यह अन्त म अतिपट म पहुँचकर प्रतिपट के ग्राहको को (दण्ड तथा मूचियो को) उत्तेजित करती है । जव किसी वस्तु का ख स इस प्रकार सम्पर होता है कि प्रकाश सीधे पीत विन्दु पर पडती ह तो वह वस्तु मास की सीधी दष्टि म कहलाती है। इस स्थिति में साँखें वस्तु पर पद्रित समभी जाती ह । व्यक्ति को वह वस्तु अत्यन्त ही स्पष्ट रूप से दिसलाई दता ह । इसे वेद्रित-दष्टि भी कहा गया है। यदि आप अपने सामने की टेबुल पर रखी हुई किसी वस्तु पर दष्टि दते है तो वह वस्तु पापको साफ तथा स्पष्ट दिसलाई दता है । टेवुल पर पडी भय वस्तुएं उतनी साफ नहीं दिखलाई देती। यदि प्राप अपना सिर घुमावर अपनी मांसा को इनमें से किसी प्रय वस्तु पर केन्ति परें तो यह वस्तु भी साफ तथा स्पष्ट दोखेगी, पहले वाली वस्तु अब अस्पष्ट दीखेगी । आप अपनी दृष्टि नीचे के चित्र 'क' पर केद्रित करें ६५ सदना मार विदुओं को गिनती पर सबने है। माप चित्र १० में' पर दष्टि- पान करते समय चित्र प भी दागे रिन्तु पाप दिलमों की गिनती नहीं कर पाएंग। चित्र १० क रह पाप को दष्टि 'द पर वेदित रहेगी तथा ' पर विवन्द्रित । ' को प्रतिमूर्ति (Image) मचिपट के मध्य में पोत विन्ट पर पडती है । '' सो प्रतिमूर्ति पक्षिपट वे वाह्य भाग में पड़ती है। माप व से 'म की पार मुहते ह तो 'म प्रापको दष्टि वेद में या जाता। जब किसी वस्तु की प्रतिमूनि परविन्नु पर पड़ती है तो वह वस्तु नहीं दिवलाइ दती हमार अपनी वाइ प्रांव बन्द कर में और दाई माप से चित्र ११ ६ वत का दै।। इस घृन में दाग्निा मोर जो मिद्वारे या चित्र बना ह वह भा पापका दौरा । अब पाप पुस्तक को सीधे अपने सामने रखें। पाप दाद माम बनर वत्त की मार देखते रहें । पाप मिवार के चित्र का ना दवेंगे। यदि पार पोरे-गोरे पुग्नक को अपने निस्ट लाएँ या दूर हाएं तो एक म्यान ऐना पाया जहाँ पर मिठारे का चित्र प्रापका दृष्टि से भोगत हो जाया | इस स्थान पर उम सितारे को प्रतिमूर्ति अरनिट पर पता है। चित्र ११ मूचिर्या तीन प्रकाश में क्रियाएं करती है। दण्डों को क्रियाएं मन्द प्रकारा में होता है । मूधिया रगा की दष्टि के लिए प्राहक हैं । हम प्रस्तुमा प्रारम्मिा मनोविज्ञान के ग्गो को तीन प्रकाश में हो देख पाते ह । मन्द प्रकाश में मूर्यास्त के बाद हम वस्नुभो को ता दस राक्ने ह पर उनके रगा को ही। हम उन्हें धूमर (Grey) रग के विभिन्न शैडो के रूप में दूमर से भिन्न समझने ह । यदि आप अपन कमरे की रोशनी धीमी कर दे ना पाप टेवुल पर पड वस्तुप्रो के रगा का नहीं देष मक्ते ह । किन्तु जर आप रोशनी तेज कर देते हैं तब आप रगों को देख सकते ह । धौमी रोशनी में सूचियां गाप नहीं करती है । वैवल दण्ड ही धीमी रोशनी में चाय करते हैं । ऐसी दशा में जो कुछ भी दिखलाई देता ह वह दगडावे उत्तेजित हाने व कारण दसा जाता है । म लोगा ने पहले देखा शिजर विमी वस्तु की प्रतिमा पोत बिन्दु (Fovea) पर पन्ती ह तव हम लोगा को उस वस्तु को दष्टि स्पष्ट होती है हम लोग केवल वस्तुओं के प्रावार को हो स्पष्ट रूप से नहीं देखते यरिय उन वस्तुपा के रगों का भी स्पष्ट दखते है । पौत विन्दु में वेवल मूचियों पाई जाती ह । हम लाग उन वस्तुओं के रग नहीं देखते जिनकी प्रतिमा प्रतिपट के उन भागा पर पड़ता है ओ पोत विन्दु से दूर है । इन भागों में अधिकतर दण्ड तया मूचियाँ पाए जाते हैं। बौन प्राइस (Von Kries) ने सवप्रथम यह बतलाया कि मचिपट में प्रकाश तथा मधकार, रग तपा रग विहीन दष्टि के लिए मलग अलग दा प्रकार के भिन्न ग्राहर है। इसे दष्टि का द्वैन सिद्धान्त (Duplicity Theory of Vision) कहा जाता है । इस सिद्धान्त की पुष्टि हो चुकी ह और यह सवमान्य है। यह सिद्धान्त बतलाता है कि रगा के प्टि-प्राहक रगविहीन दष्टि ग्राहको से भिन है । रण, चमकीलापन तथा परिपूराता (Hue Brightness and Saturation) हम लोग ष्टि उत्तेजक के स्वरूप तथा दष्टि ग्राहका के प्राकार तथा कार्यों को समझ चुदे ह । अब हम सोग दष्टि सवेदना को विशेषतामा को समझने की कोशिश करें। दष्टि सर्वदना की तीन विशेषताएं हैं-रग, सवेदना चमकोलाएन तया परिपूराता (Hue, Brightness and Saturation) | ये विशेषता दृष्टि नेय की विशेषतामा मे सम्वरित है। मनुष्य विभिन गा का देवठा ह । हम नाग तास, हा, नौला, पाता नया अप रगा का दमत है । दये गए रगों में यह भद प्रतिपट पर पहने थाने प्रकाश तरगों को लम्बाई में मद स मम्बधित ह । सबने अधिक सम्बी प्रकाश उरगें लान रग वी तथा सबस घाटी तरगें नौल-नाति (Violer) रग को सवेदना उत्सन वरती है। इसी प्रकार विनित प्रारा तरगों की नम्बाई द्वारा अन्य रगों का मवदनाए होती है। आपने इन्द्रधनुष (Rainbow) अवश्य देखा हागा। इसके पन्तगत वई रङ्ग रहत ह साल नारगा, पीला, हय, निनोन, नाला, नाल लाहित ( Red Orange Yellow Green Indigo Buc and Violer) 1 ये रग प्रकाश तरंगा का लम्बाइ के अनुसार एक क्रम में मुमज्जित रहते हैं। यह रन उपसग रन (Spectral Colour) कहे जाते हैं। जब सूय का रोशनी मारने के किनारे पर पटती ह वो हम लोग पसग रङ्ग दमने हैं सूर्य की किरणों में सभी प्रकार की लम्बाई को प्रकाश तरणें रहती ह । मत सूर्य की किरणे प्रोवों पर साधी पडती है तब काई भी रङ्ग नहीं दीखता ह । किन्तु जब मूय की राशनी किसी माइन के किनारे पर पड़ती ह तव वह विभिन प्रकाश तरङ्गा में विन्छिन हो जाती है और ये प्रकाश त्रियां प्रतिपट के विमिन भागा पर पतोह और हम लोग माइने क किनार वाले माग में विभिन रङ्गाका दम है । निम्नतिम्वित तालिका में विभिन्न रगा के प्रकाश तरगों की उम्दाइ'मिनीशोन में व्यक्त की गई ह ४३० मिनीकान नोललोहित (Violet) नौर या नाला (Blue) ४९२ af Tref (Greenish Blue) zutat (Bluish Green) हरि (Green) पौतारि (Greensh Ydiow) ४७३ ४५७ ५७८ प्रारम्भिा मनोविज्ञान " ५८२ मिलीकोन पोत या पीना (Yellow) नारगी (Orange) रक्तापीत (Yellowish Red) ६८० रक्त या नार (Red) चमबालापन दष्टि सवेदना को दूसरी विशेषता है । लम्प को रोशनी को अपेता मूय की राशनी में नरा में अत्रिय चमकीलापन दीसता ह। पिसा रग वा चमकीलापन प्रकाश की तीव्रता पर भिर करता है। तान प्रकाश में प्रत्येर रग अधिक चमकीना प्रतीता होता है किन्तु धीमी रोशनी में यही रग पोका दोषता है। अन प्रराश यी विभिन्न तीव्रता के अनुरूप हम लोग नष्ट सयदना में विभिन्न स्तर का चमकीलापन देखते हैं। एक बार हम उजना तथा दूसरी और राजा देखते हैं । इनरे बीच हम विभिन्न प्रकार के धूमर (Grey) रगा पो देखते हैं । अत हम उजला भूरा वाला को शुषका (क्य) पाने है। परिपूर्णता दप्टि मवेना को नासरी विशेषता ह। पाप गहा या हल्ला लाल रंग देखते ह । हल्ये लान रग भी अपना गहरा लाल रंग अरिक परिपणा समझा जाता है। इसी प्रकार गहरा हरा रग हानील (Btunsh green) से अधिक परिपूण “हता है । अत रग की विशुद्धता का ही दूसरा नाम रग की परिपणता (Saturation) हूँ । रक्तापान (Yellowsh Red) रक्त या नात {Red) मे कम विशुद्ध है । इसी प्रकार TAY BIH (Whitish Red) 277 279947 (Pink) * 127 at afeguar प्रकाश उत्तेजक की जटिलना के स्तर म सम्बपित है। तुय परिमाप का शुद्ध अमिश्रिन उत्तेजक परिपूण रग उत्पन्न करता है । दृष्टि सवेदना के तथ्य (नियम) (Facts about Visual Sensation) m fost (Colour Mixture) मृप प्रकाश म सभी लम्बाई पो तरग मिथित रहती है । हम लोग प्रकाश तरणो का समिश्रण कृत्रिम दग से मो उत्पन्न कर सक्न ह यह प्रारम्भिक मनोविज्ञान माएको कोई विशेष रग नहीं दिखलाई देगा। मापको रगविहीन मवदना होगी। इसी तरह घूमत हुए डिस्क द्वारा पीला और नौगाम का समिश्रण भी रगविहीन सवदना उत्पन्न करगा। रगा के ये जाइ परिपूरक रंग (Cornphmentry Colours) कहतात ह । तार तरा होनोल (Blush Green) परिपूस रग है । पीला मोर नाना भी परिपूरक है । एक विशेष मात्रा में इनक समिश्रण स प्रत्यक जाडे से रगविहीन सवेदना उत्पन होती है। कुछ रगा के समिक्षण मे रविहीन सवरना नही भी होती है। ये रग में एक नया शेड उत्पन्न करते हैं। जब आप लाल तथा पीले डिस्क को घुमाते है तो पाप नारगो (Orange) रग देयते है । एक विशप मात्रा म नौला तथा लाल क समिश्रण से नीललोहित (Violet) रग दिनलाई देता है। जिन रगा क समिधरण से रगविहीन सवना उत्पन्न होती है व अपरिपूरक रग कहलाते हैं। लाल, हरा तथा नीला का एक दूसरे के साथ विभिन्न मात्रामा में समिश्रण से मनक रण देखे जा सकत है। प्रत इन रगा का प्राथमिक रग कहा जाता है। ताल तमा हरा को उत्पन परल वाले तरगा के समिधा से पीसा उत्पन्न किया जा सकता है। मत' पीला का प्राथमिक रग (Pnmary Colour) नहीं समझा जाता है। wafafaragtat fatia (After image and Contrast) भाप एक घाटे रगोन धन्वे को लगभग प्राधे मिनट तक देखें । उसके वाद माप दिवाल की उलझी सतह को दखें । पापको दिवाल पर एक पाले रग का छोटा धब्बा दिखलाई देगा। यदि माप किसा दूमर रग पर दष्टि केदित करेंगे तब भी वही बात होगी। किसी रग पर कुछ क्षण के लिए दष्टि वेद्रित करने से उस रगवा रग रगविहान पृष्ठभूमि में उत्पन्न होता है। नीला से पीला तथा पोला मे नीला रगविहान पृष्ठभूमि में उत्पन्न होता है। लाल से हर्यानोर (Brush Green) तथा हरा स नोलाहण (वगनो) (Purple) दोरता है। इस प्रकार उत्पादित रग मतु सवेदना प्रतिविम्ब (After-image) कहलाता है । यह ऐसा इसलिए पहलाता है स्थाकि ग्ग को उत्तेजना को अनुपस्थिति में प्राप काई रग दगत है। पार यह भनुभूति ग उत्तेजक द्वारा प्रक्षिपट - उत्तेजित होने के बाद होता है । इस विराधी अनुमविविध (Negative after image) वहा जाता है । जा रग पारसते ह वह उत्तेजक रस का विराधी या परिपूर गह। पाप उजन तया कारे उत्तेजक का भी विरायो पनुप्रतिविम्ब दवत है। आप नाच दिए गए चित्र के पवाले विन्दु पर एक मात्र बन्द- कर और लगमा एक मिनट तक दष्टिपात करें। उसके बाद रिसी उजलो सतह पर दृष्टि दें। आप एक विरोधी अनुप्रतिविम्न दवेगे। चित्रका उजला भाग काला तथा कावा भाग उजता दोगा। चित्र १२ विरोषा अनुप्रतिविम्व (Negauve after image) तथा अनुरूप मनु- प्रतिविम्ब ( Positive after Image ) में अन्तर है। अनरूप प्रतिनित ७२ प्रारम्भिक मनोविज्ञान । कहा जाता है। क्सिी रग पर दष्टिपात करने से विरोधी रग उत्पन्न होता है । ऐसा उत्तेजक रग के हट जाने पर होता है। विरोध प्रभाव उत्तेजक की उपस्थिति म भी हो सकता है । ग्राप दो चतुभुजाकार रगो को जर्स एक लाल तया दूसरा हर्यानोल (Bluish Green) को अगल-बगल रखें। आप देखेंगे कि लाल पहले से अधिक नाल तथा हरा पहले से अधिक हरा दीखगा। किसी प्रकार के रग का धब्बा अपन इद गिद अपने परिपूरक रग को उत्पन करता है। यदि आप अपरिपूरव रगा को अगल-बगल रखें तब विरोध प्रभाव दूसर प्रकार का होगा । उदाहरणाथ पाप लाल तथा पीला को लें । यहाँ लाल रक्तानील ( Bluush Red) तथा पीला पीता हरि (Greenish Yellow) दीखगा। यदि आप इन्ही रगों को एक दूसर से दूर हटाकर रखेंगे तब यह केवल विशुद्ध लाल या विशुद्ध पोला दिग्वलाई दगा। विरोध प्रभाव उजले तथा काल म भी देखा जायगा । इसी कारण वाले रग का छाप अप किसी पप्ठभूमि स उजले पर अधिक स्पष्ट दीखता अनुकूलन (Adaptation) जव आप बद कमरे से सूय के तीन प्रकाश में प्राते ह तो सूय का प्रकाश आपको अधिक चमकीला प्रतीत होता है। आपकी आखे पाचौंध हो जाता ह । अव यह प्रकाश इतना उमकोला नही प्रतीत होता है । इसे प्रकाश अनुकूलन कहा जाता है। जब ग्राप क्सिो अधेरे कमरे म प्रवश करते ह तो सवप्रथम श्राप उस कमरे की क्सिी वस्तु को नहीं देख पात है । उस कमर म आपको अपना रास्ता भी नहीं दिखलाई द सकता है । विन्तु कुछ समय बाद आप उस कमरे को वस्तुमा को देखने लगत ह । प्रापको आँख अधिकार अनुकूलित हो जाती है । आपको एसा अनुभव ल्म प्रारम्भ हाने के बाद सिनेमा भवन में प्रवेश करने पर अवश्य हुमा गा। किन्तु जब आपकी आँखें अधकार अनुकूलित हो जाती ह फिर भी प अपने मासपास के वस्तुमा के रगो को नहीं देखते हैं। आपने पहले ७३ सवेदना पड़ा ह कि रग तमा देपे जाते हैं जब मूचियों उत्तेजित होती हैं । मन्द प्रकाश में मूचियां उत्तेजित नही हो सकता है। अधकार म दण्हे काय करते हैं । अधकार मनुकूलन से दण्ड अधिक मूक्ष्मप्राहो हो जाते हैं। UT #9197 (Colour Blindness) तीव प्रकाश म आप वस्तुपा के रगा का दख सकते है तथा इनके परस्सर भर का वतना मक्त है। किन्तु कुछ व्यक्ति तात्र प्रकाश म मा रगा का नहा देख पाते ह । ये रगाच कहताते हैं । इन्हें सभा वस्तुए उजला काता या धूसर (Grey) दाखता ह । एक ही मावार किन्तु विभिन रगा की कई वस्तुएं उहें विनकुल एक ममान प्रतीत हागा । रगाच व्यक्तिया के प्रतिपट मे मूचियो का अभाव रहता है। इनमें केवल दण्ड हो रहते ह या कभी-कभी मूचियां रागग्रस्त हाने के कारण क्रियाशील नही हाता है । रगाध व्यक्ति को अधिक प्रकाश म वस्तुमा को दबने में भी कठिनाइ हाता है। प्रत प्रकाश से बचने के लिए ऐसे व्यक्ति अपनी प्रति अपनी रवते है। ऐस व्यक्ति जिन्हें काई रग नहीं दिखाई दता वे पूर्ण रगाघ कहलाते है । कुछ ऐम व्यक्ति भी हाते हैं जो पाशिक रगाध रहते ह । इनम लाल और हरे रंग का अधापन रहता है। ये लोग लाल और हरा रग नही दम्ब सक्ते ह । वे उस पीला के साथ गडमड (Confuse) कर देते है। उनके रगा का ससार नाला और पोला तक सीमित रहता है । सडक के चौराहा पर आप परेतात्मक लाल और हरे रंग का राशनी देखते हैं। नाल राशनास ठहरने का सकेत मिलता ह और हरी राशनी से मागे बढने वा । इसा तरह क सक्त आप रेलवे स्टशना पर भी देवते ह । प्रत माटर तवा रेतगाडो के चातका को एव सकेत दनेवाले व्यक्तिया को लाल और हरे रग के अधापन का जांच मे उत्ताण हाना होता है। रग अधापन वा जांच आसानी से हो मस्ती है। एक घाटे ट्रे में निश आकार तथा विभिन रगा को माता रख लें। जिस व्यक्ति को प्रारम्भिक मनोविज्ञान जांच परनी ह उसे लाल, हरे, नाले तथा पील मातिया का अलग अलग वसा म रखने का भातश दें। यदि काई व्यक्ति लाल और हरा गाय है तो आप देखेंग कि वह लाल हरे और पोले मोतिया को एक साथ मिला माशिक रगाध की जांच एक थय रीति सभा की जाती ह । लाल, हरे और पीले रंग के चुदा म कुछ प्रक लिये रहते ह । जस लाल दुदा म ५लिस दिया जाय, इसके इन गिद अन्य रगा के बुनें हा । एक प्रोसत व्यक्ति इस यक का दस सकता है । वह भ्रक 4 बुदो को अन्य बुन्दा स मिन समझता है। किन्तु एक रंगाध व्यक्ति उस प्रक को नही दय सक्ता है । लाल बुन्दो को वह हरे या पोले बुदा के साथ गहमद कर देता है । इस प्रकार की विशेष जांचिकाएं बना ली गई है। इह रग मधापन का इशीहार जाँच (Ishihar Test) कहा जाता है। रगक्षत्र (Colour Zones) माप वसन्त ऋतु म किमी एम बगीचे म खडे हो जाय जहाँ रग-विरग के फूल खिने हो । किसी एक फूल का पाप नजदीक से देषत रहें । माप रेवल उसक रग को ही नही वरन् उसके विभिन्न प्रशो को भी स्पष्ट देखेंग । यदि आप फूलो क नाम से परिचित है तो आप केवल उसका नाम ही नहीं बतलाएँग । सम्भवत पाप उसकी पसुडियो को भी गिन ले सकत है । उस फूल को देखते समय उसके आस-पास के अय फूल तथा पौधे भी आपको रिखलाई देंगे वितु व उतना स्पष्ट नही दायेंगे । प्राप उस फूल के विलकुल समीप वाते फूला के रगा को देख मक्ते है किन्तु आप इनके प्राकार तथा स्वरूप को अच्छी तरह नहीं देख सक्त है । इन फूला की आग को वस्तुप्रो को भी प्राप देख सकते है वितु आप यह नहीं निश्चय कर सकेंगे कि वे क्या है ? इसम आगे आपको कुछ भी नहीं दिखाई पडगा । किसी एक पूल का मोधे दसते समय जिस नेर में मुछ वस्तुएँ आपको बिलकुल स्पष्ट, क्या कुछ अस्पष्ट दृष्टिगोचर होती है उसे भापका वेदना दृष्टिक्षेत्र कहा जाता है । दृष्टिक्षेत्र के अन्तगत एक छोटा क्षेत्र रहता ह जिन हरणा का दष्टिक्षेत्र या रगोत्र कहा जाता ह । रग दृष्टिक्षेत्र के मन्तगत वस्तुएं अपने रग के साथ दिखलाई दती है । इस क्षेत्र के बाहर से विना अपने रग दिखाई दती है। दप्टिक्षेत्र को तरह प्रदिपट में भी विभाजन है ।ये प्रतिपट क्षेत्र (Retinal Zone) कहलात है । प्रतिपट मे आप एक केद्र क्षेत्र पाते है। प्रकाश तरगें जो इस नाग पर पडती है वे अपने अनुरूप लार, हरे, पीले और नीले रगा में देखा जा सकता है। केन्द्रक्षेत्र के मागे मध्यक्षेत्र ह। लाल पीला नीला चित्र १३ इस क्षेत्र में प्रकाश-तरगे क्वा दो राा में हो, पाले और नीले में दवा जाता ह। मध्यक्षेत्र मागे वाहक्षेत्र है। इस क्षेत्र में सभी उत्तेजक रगहीन दासत हैं। ये कदा उजले काो तथा धूसर को सवेदना उत्पन प्रारम्भिक मनोविज्ञान करते हैं । प्रतिपट के रंग क्षेत्र ( Reunal Colour Zones) चित्र १३ में दिखलाए गए हैं। श्रवण सवेदना (Sensation of Hearing) दष्टि से हम वस्तुमा के साथ अभियाजन में सहायता मिलती है। इनके द्वारा हमें उनकी विशेषताया का ज्ञान प्राप्त होता ह । यह हम वतमान तथा भूतकाल के विचारा तथा अनुभूतिया स अवगत कराता ह । आधुनिक युग में हम उन्हें प्रचुर मात्रा म पढने योग्य सामग्रियो के मन्तगत पाते हैं । श्रवण हमें आसपास के व्यक्तियो के साथ अभियाजन में सहायक हाता है। मनुष्य एक सामाजिक प्राणी ह। प्रत उसका वणन बोलता पशु के रूप म किया गया है। सामाजिक परिस्थितिया में व्यक्तिया को परस्पर प्रतिक्रियाएँ होती है । इनम से अधिकतर प्रतिक्रियाएं बोलने तथा मुनने की होती ह । जनता को द्रवित कर देनेवाले विचार, लिखने तथा पढ़ने से अधिक प्रभावशाली ढग से वोलने और सुनने के द्वारा जनता तक पहुचते ह । एक बहिरा व्यक्ति अपने को समाज से अलग पाता है । वह भीड में भी अकेलापन अनुभव करता है । प्रत मनुष्य के लिए श्रवण दष्टि से कम महत्व नहीं रखता है। श्रवरण उत्तेजक (The Stimulus for Hearing) ध्वनि-नरगा म श्रवण उत्तेजक रहते हैं । ध्वनि-तरगें वायुक्णा के प्रकम्पन द्वारा उत्पन्न हाती ह । वायु सभी रिक्त स्थाना में ह । इसमें अत्यन्त ही सूक्ष्म कण रहले है । पाप कभी भी अपने कमरे की खिडकी के छेद से आती हुई मूय की रोशनी में इहें नाचती देखते है । प्रकम्पन पोछे और आगे की गति ह । जब आप किसा लाह को छड को पीटते ह तो माप इसमें इस तरह के पीछ और आगे को गति का अनुभव करते हैं । यह प्रयाम्पित होता ह। जब काई शद बोला जाता है तो वायुकणा म प्रकम्पन प्रारम्भ हो जाता है । यह प्रकम्पन निकटवर्ती कणा में चला जाता सवेरना है । इसमें पीछे मोर मागे को गति रहती ह इसलिए यह तरणा का तरह बन जाती है। मापन इसा प्रकार के तरगा का क्सिी पाखरे में पत्पर फैलने के बाद मवरय दता हागा । जल पीछे मोर भागे को मोर तब तक वदता रहता है जब तक लहर शान्त नहीं हा जाता। इसी स गति को तरगें उत्पन्न हाती ह । पडुलम का गति में भा भाप प्रकम्पित गति का उदारहण पाते । पडुलम में पाधे और मागे को गति हाती ह । प्रत्यक वार यह एक गति-चक्र तय करता है। यह मध्य स दाहिनी मोर तव बाद पार और तब फिर यह बीच के स्थान में पहुँचता ह । तरग का भाति यह पूरा चक्र इस प्रकार का हाता है, पडुलम को गति तीर या मन्द हो सकती है । इस मेद का एक निश्चित समय में होने वाले वि-चा की सख्यामा द्वारा व्यक्त किया जा सकता है। इस चका को तात्रता ( Frequency ) कहा जाता है। ध्वनि-तरगा के प्रति सकेन्ड तीव्रतान्चक्र में मा अन्तर पाया जाता ह। निम्न चित्र १४ में यह अन्तर स्पष्ट किया गया है। ग mi दिन १४ २ का तात्रता ४ चना द्वारा व्यक्त की गई ह। स' को तीवता उतने ही समय में चा द्वारा व्यक्त हुई है। माप ध्वनितरा तथा प्रकाश-तरग को तुलना कर सकते हैं । प्रकाश तसा का नाप तम्बाई का इसाइ द्वारा होती है । ध्वनि तरगा को माप प्रति सेकएह चक्र को तावता द्वारा हाती है । स्थान के नान के लिए दृष्टि इद्रिय तया समय क नान के लिए यवरा इन्दिप प्रयम या मौलिक सापन ह। विसो एक स्थान स सम्बधित वस्तुएं एक साय रहती हैं। दाएं, वाएँ,

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प्रारम्भिक मनोविज्ञान
ऊपर, नोचे, दूर तथा नज़दीक प्रादि स्थान के वग ( Categories) है।
समय से सम्बधित घटनाएं एक दूसरे के वाद होती है । अब और तव
पहले तथा पीछे, समय के वग है। श्रवण इद्रिय स्थान के गान क लिए
भी सहायक साधन ह । जव हम कोई आवाज़ सुनते हैं तब हम उसका
स्थानीकरण भी करते हैं। हम यह समझते हैं कि वह आवाज विम
दिशा से पा रही है । इससे हमे आवाज़ उत्पन्न करनेवाल वस्तु के
स्थान का नान प्राप्त होता है । हम यह समझते हैं कि यह प्रावाज दूर
या नजदीक, दाएँ या बाए, ऊपर या नीच से भा रही ह । स्थान के मान
का दूसरा मौलिक साधन स्पश-सवेदना ह।
तीव्रता के अतिरिक्त ध्वनितरग ऊँचाई म भी भिन्न होती ह । यह
भेद ध्वनि-उत्तेजक की तीव्रता पर निभर है। एक ही तीव्रता के ध्वनि
तरगा की ऊँचाई में अन्तर चित्र.१४ म दिसलाया गया
है । ' में ध्वनि-तरगें 'ग' से अधिक ऊंचे है।
चित्र १४ में हम लोग विशुद्ध घ्वनितरगो को
देखते हैं। ये साइन तरगें भी कहलाती है। इसमें सभी
तरगें एक समान है । इनको प्राकृति नही बदलती ह ।
'टयूनिंग फाक (Tuning Fors) के प्रकम्पन में 'साइन
तरगें' (Sign Waves ) उत्पन्न होती है । टयूनिंग
फाक ( Tuning Fort ) बगल के चित्र १५ मे
दिखलाया गया है।
जिन पावाजा को हम सुनते ह उनकी उत्पत्ति ऐसे
तरगो से होती है जो विशुद्ध या सरल नही रहते
है। ये जटिल रहते हैं और इनके आकार विभिन्न
चिन १५
होते ह । इनकी उत्पत्ति विभिन्न तीव्रता की तरगा के
समिश्रण स होती ह । एक जटिल ध्वनितरग के आकार म निम्नलिखित
प्रकार का क्रमिक परिवतन देखा जाता है।
क' के तरगो का विश्लेपण 'ख और ग मे व्यस्त दो प्रकार के

७९ बदना रगा म किया जा सकता है जिनकी तीव्रता भिन्न है। २५६ चक्र प्रसे ५१२ चक्र प्रसे १२ २५६ चन प्रसे व चित्र १६ ऊपर के चित्रा म व्यक्त किए गए मरल या जटिल तरगा का एक निश्चित प्राकार ह । जव इनम कोई परिवतन होता ह तव यह परिवतन मा एक निश्चित समय के साथ होता है। अत यह सामयिक-तरगें (Penodic Waves) कहलाती ह । अनिश्चित प्राकार को भी ध्वनितरग हो सकता है । ये असामयिक तरग (Aperiodic Waves) कहलाता है। इन्हें आप निम्न चित्र १७ म देखें। Haryanvi चित्र १७ हम लोगा ने दखा कि ध्वनितरगा म तीव्रता तथा ऊचाई रहती है। वे विशुद्ध या मिश्रण, सामयिक या असामयित हो सकती है। श्रवण-उत्तेजक के विभिन गुण अवरण-सवेदना की विभिन्न विशेषतामा से सम्बधित है। सामयिक-तरगा (Penodic Waves) से ध्वनि (Tone) को उत्पत्ति होती है। वाद्य यन्त्रा द्वारा उत्पन्न ध्वनितरंगें 'सामयिक-तर,' (Pernodie Waves) ह । जव हम कोई सगीत सुनते हैं तव हम ध्वनि (Tone) सुनते ह । असामयिक तरग टाइपराइटर' (Typewriter) को खटखटाहट या क्सिा पत्थरीली जमीन पर बलगाडी के पहिए को घडपडाहट की भांति शोरगुल उत्पन करती है। ध्वनितरगा की तीव्रता म अन्तर श्रवण सवेदना को काटि (Pitch) GO प्रारम्भिक मनोविज्ञान से सम्बधित है। भाप एक 'टनिंग फाक' (Tuning Fork) से ऐसी ध्वनि उत्पन्न कर सकते हं जा २५० चक्र प्रति सेकड की गति से प्रकम्पित हो रही ह । तथा दूसरे स एसो ध्वनि उत्पन कर सकते ह जो ३०० चक्र प्रति सेकड की गति से प्रकम्पित हो रही है । इन दोनों की ध्वनि मे जो भेद आप सुनते ह वह काटि का भद है। मनुष्य २० स २०,००० चक्र प्रति मकड तक की ध्वनि-तीव्रता सुन सकता है। कम तीव्र ध्वनि तरग 'निम्नकोटि' (Low Pitch) तथा अधिक तीव्र ध्वनि तरग 'उच्च काटि' (High Pitch) उत्पन करते ह। घनत्व ध्वनितरग की उस विशेपता स सम्बन्धित ह जिस हमने तरग की ऊँचाई कहा ह । ध्वनि तरग जितनी ऊँची होगी उतनी ही जोरदार आवाज होगी। किन्तु समान तीव्रता का कम ऊचा ध्वनि उत्तेजक अधिक ऊंचे ध्वनि उत्तेजक के समान प्रवल नही होगा । अत ध्वनितरग की तीव्रता में वृद्धि के साथ ध्वनि उत्तेजक के तीव्रता को अनुभव मात्र सीमा (R_L) कम होती है। मनुष्य वा कान ५१८ स २० ४८ चक्र प्रति सेक्ड तक की तीव्रता को अधिक ग्रहण कर सकता ह इस श्रेणी के अन्तगत अत्यत निम्न तीव्रता के ध्वनि तरग भी थवण-सवदना उत्पन्न पर सकते है। हमने पहले यह देखा कि टचूनिंग फार (Tuning Fork) विशुद्ध स्वर उत्पन करता ह । वाद्य-यत्र जटिल स्वर उत्पन करते हैं । इहे विभिन तीव्रता की ध्वनितरगो म वाँटा जा सकता ह । निम्नतम तीव्रता की ध्वनि प्रधान ध्वनि (Fundamental Tone) कहलाती है । अन्य ध्वनि गोण ध्वनि (Over Toners) कहलाते है । प्रथम गौण ध्वनि की तीव्रता प्रधान ध्वनि की तीव्रता से दुगुनी ह । द्वितीय गौण ध्वनि (Over Tone) की तीव्रता प्रधान ध्वनि से तिगुनी ह इत्यादि । विभिन वाद्ययत्रो के गौण ध्वनिया में अन्तर पाया जाता है। व एक ही तरह के गौण ध्वनियां नहीं करते। गौण ध्वनिया की तीव्रता भी विभित यत्रों म विभिन्न होती ह । कुछ यन्ना म कोई विशप गौण ध्वनि सवेदना पर प्रबल रहती ह तथा अन्य गोण ध्वनि घोण रहता ह। विमिन वाद्ययात्रा द्वारा उत्पन्न नवदना में अन्तर इन्ही भिनतामा के कारण होता है। इनके सम्पूर्ण प्रभाव का नाद (Tambre) कहा जाता पाप सगीत को सुनकर यह पता लगा सकते ह कि कौन-कौन से याद्ययन्त्र बनाए जा रहे हैं। यह नद पाप नाद (Timbre) के भेद के आधार पर समझते ह । रडिया सुनत समय माप यह सनभने ह कि वामुरा वायारिन या सितारवादन हा रहा है । इनम न प्रत्यक पर एकी धुन बजाया जा रहा हो फिर भी इनम अन्तर स्पष्ट रहता है। फान को वनावट तथा क्रियाएँ ( Structure and Function of the Ear) मानव कान तान भागा म बेटा ह । वाह्य कान (Outer Ear) मध्य कान (Middle Ear) तथा अन्त कान (Inner Ear)। वाह्यमान के लटकते हुए भाग का पिना (Pinna) कहा जाता ह यह कपाञ्जलि (Auditary meatus) का बाहरी भाग ह । पिना कोई विशेष काय नहा करता ह । ध्वनि तरगें क्णाञ्जलि द्वारा कान में प्रवश करती है । व रणदात (Ear Drum) या टाम्पनिक मेम्ब्रेन (Tympanic membrane) से टकराता ह । कणहाल वाहकान तथा मध्यकान के बीच में है । ध्वनि तरों क्णताल में प्रकम्पन उत्पन करती है। मध्यकान में तान हड्डियों को एक मृखना ह जिसे औतीकल्स (Osicles) कहा जाता ह । प्रथम हवा को मुदार (Hammer) दूसरी को निहाइ (Anvil) तया तासरी का रकाब (Surrup) कहा जाता है । इनका इस प्रकार नामा न भावार के अनुरूप किया गया ह । मुदगर क्षकाल क प्रान्तरिक माा उनटा ह । अत क्णटान में प्रकम्पन हाने स मुदगर म मा प्रकम्पन प्रारम्भ हो जाता ह। खाव अन्त षण के एक छेद म सटा ह जिस अण्डाकार खिडका (Oval Window) कहा जाता ह । कान के विभित भाा चित्र १८ में दिखलाए गए ह - ८२ प्रारम्भिक मनोविज्ञान अन्त कान, मध्यकान से अण्डाकार सिडका तथा गोल खिडकी (Round Window) द्वारा सम्बधित ह । दानो पतली झिल्ली से ढकी ह । अन्त कान म अद्ध चक्राकार नली (Serm Circular Canai) वेस्टीवुली (Vesubule) तथा काकलिया (Cochlca) ह । श्रवण के लिए प्रथम दो की कोई उपयोगता नही है । निहाई अर्धचक्राकरजली -भेम्टीबुली -काकलिया पिना- चित्र १८ कर्ण टोल रकाब काकलिया (Cochlea) म श्रवण-ग्राहक रहते हैं । इसका आकार पाधे की तरह चक्राकार ह । इसम लीन सामानातरनती ह । य झिन्लीदार परत द्वारा एक दूसरे से अलग रहती ह । प्रत्येक नली के अन्तगत एक तरल पदाथ रहता ह जिस अन्तलसिका (Endoly raph) कहा जाता है। एक झिल्ली को बेसीलर मेम्वेन (Bassiler Membrane) तथा दूसरे को वेस्टीवुलर मम्नेन {Vestbuler Membrane) कहा जाता है । वैमीलर मेम्ब्रेन (Bassiler Membrane) पर कोर्टी द्रिय (Organ of Cora) है। कोर्टी द्रिय मे केश-पशिया (Har cells) रहती ह जो श्रवण के वास्तविक पाहक ह। निहाई के प्रकम्पन से अण्डाकार खिडकी (Oval Window) म अन्दर पोर बाहर की गति हाती ह । काकनिया के अदर के तरल पदाथ म भी पाछे और प्रागे की गति होती ह । इन गतिया म बेसालर मेम्ब्रेन (Bassiler सवदना ३ Afembrane) में तथा कोटा इद्रिय में गति उत्पन्न होती है। प्रत इस प्रकार श्रवण ग्राहक उत्तेजित हो जात ह । स्नायु प्रवाह थवरण स्नायुमा द्वारा प्रवाहित हाती हैं। श्रवण-स्नायु कान का सम्पक शख खण्ड में स्थित नानवाही क्षेत्र से स्थापित करते हैं। ये स्नायु प्रवाह वृहत मस्तिष्कीय वल्क र द्रा को उत्तेजित करत हं तथा श्रवण-सवना होती है। स्वाद सवेदना (Taste Sensation) स्वार सवदना के लिए उत्तेजक बाई मा रसायनिक पदाथ ह । काइ भा ठास वस्तु विमा स्वाद मवदना का उत्पन्न नहीं करता है । इस प्रकार को वस्तु ने पापका स्पश या ताप का सवदना हो सकती है । स्वाद-ग्राहका (Taste Receptors) का स्वाद कलिका ( Taste Buds ) कहा जाता है । व जिह्वा तया गाल की रखापा एव एठ में स्थित ह । जव रसाय- निक पदाय लार द्वारा मुंह म घुलते ह तव स्वाद कलिकाएं उत्तजित होती है। स्वाद के चार प्रधान गुण हैं-माठा, खट्टा, तोता[वया नमकोन । स्वाद का प्रय विशपताएं अधिकतर प्रार-सवदना के समिश्रण के कारण होती है। मर्दी का दशा में हमें अनक खाद्य-पदायों के स्वाद की सवदना नही हाती ह । वास्तव म इन पार्थों में हम उनक स्वाद के कारण अन्तर नहीं पात विन्तु यह अन्तर प्राण-सवदना ( Smell Sensation ) द्वारा उनक गधम मद के कारण हाता है। यह समना जाता है कि मुख म चार प्रकार के प्रमुख स्वाद के अनुरूप चार प्रकार के स्वाद-ग्राहक है। इसी कारण जिह्वा के सभी भाग सभी प्रकार के स्वार-गुणा को एक समान ग्रहण नहीं करते । जिह्वा का अग्रिम भाग मोठापन, पप्ठभातोतापन तथा विनारा का भाग सट्टापन ग्रहण करते हैं । जिह्वा का समस्त नाग नमकीन स्वाद ग्रहण करता है। अय सवदनामा की भांति स्वाद-मददना नो अनुकूलन द्वारा लुप्त हो प्रारम्भिक मनोविज्ञान जाती है । जो वस्तु पहले बहुत तीतो मालूम होती ह उसका तोतापन उमे लगातार खाते या पीते रहने से कम प्रतीत होता है। इसी तरह कोई अत्यन्त ही अधिक नमकीन वस्तु कुछ समय के बाद खाने योग्य प्रतीत होने लगता ह । अनुकूलन (Adaptation ) का प्रभाव दूसरे प्रकार से भी दम्बा जा मक्ता ह । कुछ नमकीन खा लेने के वाद काई भी मोटा पेय अधिक प्रतीत होता है। गय या प्राण सवेदना (Smell Sensation) घ्राण-सवेदना के उत्तेजक वाप्प तथा गस है। ये हवा द्वारा नामिका छिद्र मे प्रवश कर नासिवा छिद्र में स्थित घ्राण ग्राहका (Smell Receptors) को उत्तेजित करते ह । प्राण के छ प्रमुख गुण हव्यन्जनी ( Spicy) पुष्प सुरभि (Flowery) पल सुरनि (Truty ) दग्ध-गध (Burnt), उदासवत ( Resinous ) तथा परिदूषित गध ( Foul )। अय सभी प्रकार के गध इन्ही के मिश्रण है। हम स्वाद की अपेक्षा अधिकतर प्रकार के गधा का अनुभव होता है । वास्तव में हम स्वाद के मूक्ष्म भेदा का ना गध के प्राधार पर ही होता है। हम पहले भी बतला चुके है कि यदि घ्राण में अवरोध हा जाय तो स्वाद के गुण केवल कुछ ही प्रकार तक सीमित रह जायगे। स्वाद-कनिका की भांति प्राणकद भी अनुकूलित हो जात है। कुछ समय के पश्चात किसी प्रकार के दुगध को तीत्रता कम प्रतीत होने लगती है। ऐसा ही अय प्रकार के गधो के साथ भी होता है। स्पर्श सवेदना (Touch Sensation) त्वचा के खिंचाव और तनाव स जो परिपतन होता है वहा स्पश का उत्तेजक ह। पश के ग्राहक त्वचा म स्थित है। त्वचा के केशवाने भागा में तथा वेशा के जड मे जिस केशकर कहा जाता ह ये ग्राहक पाए जाते है। जिन भागा म केश नहीं रहते ह वहाँ सवेदना ८५ मैसनर नामक मूक्ष्म प्रश ( Mesner Corpuscles) स्पश-ग्राहक का काय करते है। त्वचा के समस्त भाग में सश को मवेदना नही होता है । इसमें कुछ ऐम विन्दु (Spots) हैं जो शरार में समान रूप से नहीं विद्यमान हैं। स्पश-विन्दु (Touch Spots) शरीर के विभिन नागा में विभिन मात्रा म पाए जात ह । स्पश विन्दुमा की प्रति वग मोटर सख्या जिह्वा के अग्रिम नाग में तथा अंगुलिया के छार में सवस अधिक ह । स्पश विन्दुमा की सख्या सवस कम पीठ में है । इसा कारण एक ही समय त्वचा क दो स्थानो के उत्तेजित होने पर का निकटतम दूरी विभिन्न भागों में भिन भिन पाई जाता है। क्सिा भाग म सबस कम दूरी जहाँ पर दो विन्दुमा के स्पश को अनुभूति हो सकती ह उम उस भाा का दा विन्दुप्रा का अनुभव मात्र सामान्त (Two point Threshold) कहा जाता है । इस स्थान अनुभव मात्र सीमान्त (Spatial Threshold) भी कहा जाता ह । यह ऐसा इसलिए कहलाता ह क्याकि यह शरीर के विभिन्न भागा म दा विन्दुप्रा के बीच के स्थान के प्रत्यताकरण का एक माप प्रस्तुत करता ह । दो बिन्दु अनुभव मात्र मोमान्त (Two pornt Threshold) अनुभवमात्र सोमा (RL) है न कि मामान्त भेद (DL) का नान । यह त्वचा पर स्पश दिए गए दो विदुआ के निम्नतम दूरी को एक मॉप ह । यह किन्हीं दो मूल्या के भेद का माप नहीं है। पश क गुणों का वर्गीकरण गुदगुदी, सम्पक तथा दवाव में किया गया है । क्षाण उत्तेजक स गुदगुदा, मध्यम तीव्रता के उत्तेजक से सम्मक तथा अधिक तोत्र उत्तेजक स दवाब उत्पन होता है। एपश उत्तेजक के प्रति अनुकूलन भी शीघ्र हो जाता है। लगातार उत्तेजना से सवेदना लुप्त हा जाती ह । ज्व कोई व्यक्ति पहले-पहल चश्मा लगाता है तो उसे स्वचा के उन सभी नागा में स्पश को सवदना की अनु. भूति होती ह जिनका सम्पक चश्मे की फेम से रहता ह । क्रमश यह प्रारम्भिक मनोविनान अनुभूति लुप्त हो जाती ह । यदि अापका टापी पहिनने को आदत ह तो सिर क स्पश ग्राहका के अनुकूलन के कारण टोपा पहिन रहने पर नी आपको यह पता नहीं चलना ह कि आप टापो पहिने हुए है। पीडा सवेदना (Pain Sensation) पीडा को उत्पत्ति किसी प्रकार है ऐम उत्तेजक मे होता ह जिममे त्वचा के उमुक्त स्नायु को अन्तिम शिवाग्रा ( Free Nerve Endings) को प्राघात पहुँचता है। अधिक उत्तेजित किए जान पर किसी भी जानेन्द्रिय में पोडा हो सकती है। उगहरणाय अधिक जोर की आवाज म कान म पोडा होती है। प्रत पाडा के लिए कोई विशिष्ट उत्तेजक नहीं है। स्पश की भांति त्वचा के सभी भागा में पीडा नही होती है । फिर भी पीडा विन्दुमा की सरया स्पश विदुपा से अधिक ह । यह प्रविक्तर छोरा ( Extremities ), जोडा (Joints ) गदन तथा अन्य स्थाना म जहाँ दोघ स्नायु तथा रक्त नालिकाएँ ( Blood Vessals) त्वचा के सन्निक्ट रहती हैं । गाल के पदर का रेपामा म पाडा नही होती है। पोडा को विशेषताए सुजलाहट चुभन तथा दद है । सुजलाहट वीण उत्तेजक स तथा चुभन और दद की उत्पत्ति तोव उत्तेजका द्वारा होता है । समान तीव्रता के उत्तेना द्वारा उत्तेजित होने रहने स पी म भी अनु- कूलन हो जाता ह । अधिक समय तक लगातार पीडा की अनुभूति तभी होती ह जव पोडा के उत्तेजक नी तीव्रता वीच बीच म परिवर्तित होती रहती है । समान तीव्रता के उत्तेजक स पीडा को सवदना शीघ्र तुप्त हो जायगी। पीडा अनुकूलन का समय उत्तेजक क स्वरूप तथा शरीर के स्थान पर निभर करता है। ठढ तथा गम की संवेदनाएं (Temperature Sensation) ठन तया गम को सचेतनाएँ ताप-सवेदना भी कहलाती है। त्वचा का ताप साधारणत ३३० रहता है। जिन उत्तेजना का ताप ३२५ से सवेदना ६७ ३३ ५ ० तक रहता ह उनमे ताप की सवदना नहीं होती ह । यह शारारिक दष्टिकोख से शून्य ताप के बराबर ह । यह शारीरिक शूय शरीर के अगा के माय बदलता रहता ह । जिह्वा के नीचे का ताप ३७°रहता है। वान में लगभग ३६५° तया क्णपालि ( Ear Lobe) का ताप लगमा २६ रहता है । जब आप अपने कान को छूते है तो यह प्राय ठग रहता ह। यह ऐमा इसलिए प्रतीत होता है क्यानि आपका गुलिया को ताप ३३ ० ० है । अत यह स्पप्ट ह कि ताप-सवेदना की उत्पत्ति शारारिक ताप तथा उत्तेजक के ताप म अन्लर पर निभर करता है। त्वचा पर ३३ ५ ८ ताप का कोई उत्तेजक गम मालूम होगा किन्तु ३२ ५' में कम ताप का उत्तेजक ठडा मालूम होगा। अय त्वक्सकन नामा की भांति ठड तथा गम विन्दुएँ भी समस्त शरार में विद्यमान हं । जव विसी उत्तेजक का ताप ३३ ० °C से कम रहता ह तर ठड विन्दुएँ क्रियाशील हाती ह तथा जव क्सिी उत्तेजक का ताप ३३°c स अधिक रहता ह तब गम विन्दुएँ उत्तेजित होती है। किन्तु ठड विदुएँ ४३ c स अधिक नाप द्वारा मा उत्तेजित होती है । यद्यपि उत्तेजक अधिक तापमान का रहता ह फिर भी सवेदना ठड की होती ह । इस विरोधभामी ठड ( Paradoxical Cold ) कहा जाता ह । प्रत ४३°० तापमान म गम नही मानूम होता ह । इसम ठड तथा गम का समिश्रण रहता ह जिसका अनुभव ताप के रूप में होता ह । ठड विन्दुएँ टडक की तथा गम बिन्दुए गम को सवदनाएं उत्पन्न करती है । ४३ ० से अधिक तापमान द्वारा ठड तया गम बिन्दुआ के एक साथ उत्तेजित होने से ताप की मवेदना उत्पन होता है । विरावभासी ठड की भाति विराधभासी गम ( Paradoxical Hot ) भा हाता ह । यह २५ ८ मे ३१"c तापमान द्वारा गम विन्दुमा के उत्तेजित होने से उत्पन होता है। रक्त नालिसाएँ जो समस्त शरीर म पाई जाती है वे ताप ग्राहक का काय करती हैं। रस नालिकामा को चिक्नो मांसपशिया को स्नायु प्रारम्भिक मनोविज्ञान शिखा पाहक हैं । चिक्नो मांसपेशियो हड से सिकुडती है वथा गम से फैलती है। अधिक समय तक उत्तेजित हात रहने से ताप उत्तेजक के प्रति भी अनुकूलन हो जाता ह । ताप मनुकूलन का प्रदशन ताप को धीरे धीरे घटा कर या बढाकर किया जा सकता हा धोर-धोरे साप वढाने या घटाने से किसी प्रकार के परिवतन का अनुभव नहीं होगा । जव ताप एकाएक अधिक बढ़ा या घटा दिया जाता ह तब दद को सवेदना होता है। ताप मनुकूलन से एक मनोरजक भ्रम मा होता है । आप अपना एक हाथ गम पानी म तथा दूसरा ठडा पानी म कुछ समय तक रख रह । इसक बाद माप दोना हाया का त्वचा क साप के बराबर तापमान के जल म रखे । यह जल एर हाय म ठडा तथा दूसरे म गम मालूम हागा। अपर जिन विभिन्न सवेदनामा का वर्णन किया गया है (स्पश, पीडा तथा ताप) व त्वक मवेदनाए भी कहलाता है। कुछ अन्य सवदनामा का वखन पवनीचे दिया जाता है गति सवेदना (Kinesthetic Sensation) किसी प्रय वस्तु वो दसत ममय भी हम अपने शरीर को गति का चोध होता है। जब आप किसी पपरे कमरे म प्रवेश कर आगे बढ़त ह तब आप यह जानते है कि किस दिशा म कितनी तेजी स तथा दिन स्थानो सभापक पर पाया रह है। पाप यह सभी इसलिए जानत ह क्याकि प्रापको शरीर को गति से सवदनाएं भिन्न रही है। ये मवदनाए गति द्वारा उत्पल हो रही है ये मवेदनाए गति-सवेदनाएँ कहलाता है। गति-सवेदनामा के ग्राहक मासपेशिया, जाडा तथा मांस रज्जुमा (Tendons) में जा मांसपशिया तया हड्डियो का मिलाती ह स्थित है। ये ग्राहक 'प्रोप्रायासपरस'(Proprioceptors) क्लाते हैं। य मांसपशिया जोडा तथा मास रज्जुमा की गति से उत्तेजित होती है। जब हमारी मांसपेशियां, जोडें तथा मांस रज्जुए गतिशाल होती ह तब गति माहक उत्तेजित होते हैं। नानवाही प्रवाद उत्पन्न होकर याश्व यएड { Parretal Lobe ) सवदना ८३ के ज्ञानवाही क्षेत्र म पहुँचती है तथा हम लागा गति की मवेदना होती है। फिर प्रवाह क्रियावाही पर म हाकर मासाशियां जाहा तया मांस रज्जुमा में पहुचार उनम गति उत्पन्न करते ह । इन प्रसार गति यो एक चमार भूखला प्रारम्भ हो जाता ह । गति म क्रमबद्धता तथा प्रय गति प्रारम्भ हान का सक्त मा गति प्रवाहा के मस्तिप्प तक पहुंचन व फलस्वरूप होता है। प्रत्यक पर दो गति से उत्पन्न गति सवदना व द्वारा ही नाना पांव का ब्रमश माग बढ़न का सम्पदस्था बनी रहती ह । गति सवाना प्रत्यक क्रिया को रमबद्धता का मस्त प्रस्तुत करती है । एक कुशन टाइप करन वाता व्यक्ति प्राखा पर पट्टी लगाकर मा मच्छी तरह टाइप कर सकता है। वह एमा इस पारण करता ह क्यापि उसकी मगुती को प्रत्यक गति उम दूसरी गति प्रारम्भ करन का सक्त प्रदान करती है। प्रत्यक गति द्वारा उत्पन गति मवाना उसे गति का निशा स्थान तथा रफ्नार आदि प्रदान करती है। गति सवरनामा द्वारा वजन उठान का नान भी प्राप्त हाता है। वजन की मवाना शायन (Strain) तथा प्रयत्न की सवरनामा का समिथण ह । वजन उठान म वजन क दवाव से शरीर में उस अग की मांसपशिया म जो वजन उठाती ह अवरोध उत्पन हाता है । इससे वोझ (Strain) की उत्पत्ति हाता ह । बाम तथा प्रयन की सवानाए मांसपेशिया तया माम रजु प्राका क उत्तजित हान के कारण उत्पन होता है। गति मवाना क गुण वाझ पीडा दवाव तथा तनाव है। सतुलन (स्थिरता) सवेदना (Static Sensation) शरीर अपना मतुलन स्वत कायम रसता है । मिर क भाग पाछ, दाए बाए तथा चक्रवार घुमान में जो सवदना प्रत कान म उत्पन हाती है उसी कारण यह मतुनन कायम रहता है। हम लगान पहत दवा कि अन कान म तीन भाग ह-कारलिया वस्तीबुली तथा अद्ध चक्रकार नातिकाएँ (Cochlea Vestibuli and Semi-Circular Cenals) सुनन म पानिया प्रियाशीन होता है । वस्रीबुली तथा अद्ध चक्रवार ६ ।

प्रारम्भिक मनोविज्ञान नालिकाएं शारीरिक सतुलन कायम रखती है। पान के विभिन्न स्थाना में तीन भद्ध चक्रकार नालिकाएं हैं। प्रत्येक में एक प्रकार का वरल पदाप रहता है। कान के मन्तगत रेस्टीवुली पर केश के तरह यो बनावट है जो तरल पदाय मे डूवी रहती है । जव माप मपनी मुद्रा बदलते हैं सड हाते है चठते है या टहलत ह तब सिर वो गति होती है । इसस उन तरल पदार्थो म भी गति उत्पन्न होती है जो वेस्टीवुली के देशों को उत्ते- जित करता ह। देशो के उत्तेजित होने से पानवाही प्रवाह लघुमस्तिष्क तक पहुंच जाते ह । लघुमस्तिष्क म क्रियावाही प्रवाहें उत्पन होती हैं जो शरीर का सतुलन कायम रखती है । समुद्र यात्रा तथा वायु-यात्रा से उत्पन्न राग (Sea Sickness and Air Sickness) मकान के मतगत सतुलन प्राइका में अधिक उत्तेजना हाती ह जिसके परिणामस्वरूप चक्कर, वमन को इच्छा या मतली होती है। अतरावयव सवेदनाएं (Organic Sensation) हमलोगा ने पहल देखा कि चिक्नी मांसपेशियां शरीर के सभी भाव- स्यक प्रगो में है। ये मग मन्तरावयव मण्डल (Visceral System) पहलाते है । स्वस्थ तथा सुसमय अनुभूति से सम्बंधित सभी जटिल सवेद- नामा के ग्राहक इनमें पाए जाते हैं जिह 'इटरासेप्टस (Introceptars) कहा जाता है। ये अन्तयवयव सवदनाएं कहलाती है। भूख, प्यास,(मतली, मल-मूत्र तथा पेट की चैतडिया म तनाव भादि अन्तरावयव को जटिल सबदनाएं हैं।

४ ध्यान (Attention) क्सिा विशेष क्षण किसी व्यक्ति को वातावरण की उन वस्तुपो मोर व्यक्तिया का नान होता ह जो उसके इन गिट रहते हैं और उसके नाने. द्रिया को उत्तजित करते हैं। उसे मस्तिप्न में प्रानेवाली वस्तुमा को प्रतिमाया का, उसके अन्तगत हानवाल विचारा तया भावनामा का, उसके शरीर के अन्तगत होनेवाली प्रक्रियामा का तया उन कार्यों का भी जिसे वह कर रहा ह नान होता है। किन्तु इन मव का नान उस विलकुल स्पष्ट रुप से नहीं होता है। किसी एक क्षण उस इस वस्तु या उस वस्तु का, इस प्रतिमा या उस प्रतिमा का, इस विचार या उस विचार या भाव का स्पष्ट नान होता है। इसका स्पष्ट नान इसलिए हाता ह क्याकि वह इन पर ध्यान देता है । उस उस चप होनवाले दूमरो अनुभूतिया का स्पष्ट ज्ञान नहीं होता ह क्याकि वह उन्हें ध्यान नहीं दता है । ध्यान व्यक्ति को उम प्रान्तरिक स्थिति का नाम है जिससे उसे किसी वस्तु या काय का स्पष्ट मान होता है । यह किसी दूसरे व्यक्ति का काय हो सकता ह अथवा यह उसको स्वय मानसिक और शारीरिक क्रियाए भी हो सकती है। जिन उत्तेजना या प्रतिक्रियामा के प्रति ध्यान नही दिया जाता है उनम वह उत्तेजक जिस पर ध्यान दिया जाता है पयक हो जाता है । चित्र १८ को देखन पर एक क्षण प्रापको एक काले क्रॉस (Cross) का ज्ञान होता ह तथा दूसर पण उजल क्रॉम ( Cross ) का। पहल ७ चित्र का काला भाग आपक ध्यान को आकर्षित करता ह । उजल भाग स काला नाा पृथक हो जाता है । उजला भाग पृष्ठभूमि में चला जाता है । दूसर पण उजला भाग सप्ट हाता है और यह आपक ध्यान को प्रापित करता है । काला नाग पष्ठभूमि में चला जाता ह ।

प्रारम्भिक मनोविज्ञान एक क्षण माप उजले पृष्ठभूमि में उजले प्राकार को देखते है । आप जिस पर ध्यान देते ह वही एक प्राकार के रूप में दिखाई देता है। किसी माकार को कुछ विशषताएं होती है । ये इसे उसके पप्ठभूमि म पथक पर देती हैं । दखनेवार व्यक्ति को प्राकार पष्ठभूमि स लिस्ट मालूम हाता ह~यह माग रहता है और पृष्ठभूमि पोछे। प्राकार को रेखाएँ स्पष्ट रहती है, पृष्ठभूमि को ससक नहीं रहती ह । प्राकार की सभी चार्जे विस्तृत एव स्पष्ट रहती है पप्टभूमि को सभी चीजें प्रविस्तत एव अस्पष्ट रहती ह । ध्यान का वणन उस प्रतिक्रिया के रूप म किया जा सकता है जिससे सम्पूय उत्तेजक का एक भाग प्राकार को विशेषताओं का अपना चित्र सेता ह। ध्यान का वणन उस प्रक्रिया के रूप में भी किया जा सकता ह जो कुछ उत्तेजको को चेतना में केद्रित करता है । इसके फ्रस्वरूप वे उत्तेजक भिन्न एव सप्ट प्रतीत होने ह । जा उत्तजन येद्रिभूत नही हो पात हवे अभिन्न एवं अस्पष्ट रहते हैं। यह उसी तरह होता ह जसा टाच को रोशनी जलने पर होता है ! जो वस्तु राशनी की सीध म रहनी है वे केट में आ जाती है और कोई भी व्यक्ति उह बहुत ही पप्दप से देखता ह । जो वस्तुएँ राशनो को सोध स बाहर रती ह वै केद्र के बाहर रह जाती है। या य तो हम उन्हें नही दपते ह या हमें अस्पष्ट दाखती है। जा उत्तेजक ध्यान क केद्रम रहते ह उन पर हम यति ध्यान दत है, भत ३ भित और स्पष्ट दोषत है। जो उत्तेजन पेद्र कवार रहते है उनपर हम पाश्व ध्यान देते ह अन वे अभिल एवं यसपष्ट होते है । एक ऐमा स्थिति भी हो सकती ह जिस समय कोई उत्तेजक न तो हमार ध्यान केन्द्र म रहता ह मोर न पाश्व धान म। एस उत्तेजका का हमें ध्यान नहीं रहता है। एक क्लास में क्तिी धार का ध्यान केंद्र सडक पर के क्सिा सगीत को पार रह सकता ह । उसका पाश्य ध्यान निकटवर्ती कमर की शारगुल का पार ना रह सकता है। उसका ध्यान क्लास की पाइ को पार नहीं रह सकता है। क्लाम खत्म होने पर आप उसन विभिन्न घट- नाना के वार म पूछ सकते है । वह थापा सगीत का स्पष्ट वणन दगा। वह उस राग का दाहरा ना सकता है । वह पापका यह भी बतला सकता ह कि उसन वगल के कमर के शोरगुल का सुना किन्तु वह उसके स्वभाव के मम्बध में अधिक नही वतला सगा । वह क्लास में पढाए गए पार के सम्बध म ता कुछ भी नीं बतलाएगा। ध्यान का वखन उत्तजक क प्रति प्रारणा को अभियोजन का क्रिया के म्प में भी किया जा सकता है। जब काइ दूर के शोरगुल की मार ध्यान दता है तो उसक ग्रहण की श्रवण इन्द्रियां उस उत्तेजक को ग्रहण करन क लिए तत्पर हो जाती ह । जिम दिशा में शोरगुल हाता ह उत्त दिशा की ओर उसे अपना सिर घुमात माप दस सक्ते ह । एसा करन म उसक दोना कान उत्तेजक का अच्छी तरह ग्रहण करत ह । आपने एक घोल या किसी अय पशु का दूर के शारगुल का सुनकर कान खड़ा करते हुए अवश्य देवा हा । जव काई व्यक्ति क्मिा वस्तु का ध्यानपूर्वक देखता ह तो इसी प्रकार का अभियोजन उसको दृष्टि ग्राहका में देख जा सान है। प्रत ध्यान एक तयारी या तत्परता की स्थिति ह । जव कोई व्यक्ति ध्यान दता ह तो उसके नानन्द्रिय उत्तेजक को ग्रहण करन के लिए विशेष रूप स तत्पर हो जात है। ध्यान में ग्राहका क अभियोजन के अतिरिक्त प्रभावका में नौ मभि याजन होता है। शरीर की मासपेशिया ध्यान की वस्तु को मोर काय करन क लिए या उन कार्यो म भाग लेन के लिए जो ध्यान के केन्द्र में रहते ह विशपम्प से तत्पर रहती है । ध्यान की अवस्था में कोई भी व्यक्ति मासपशिया में तनाव दस सकता है। मापने (NCC) एन० सी० प्रारम्भिक मनोविज्ञान सो० का परेंड तो अवश्य ही देखा होगा। जब तक उस्ताद सावधान नहीं बोलता है तब तक सभी छात्र प्राराम से खड़े रहते ह पर ज्याहि उसक मुष से सावधान शब्द निकलता है उनकी मुद्राएं बदल जाती ह पोर उनकी मासपशियो कडी हो जाती है और तन जाती है। वही बात किसी दौड म भाग लो वाले व्यक्तियों के साथ होती है । ज्याहि तयार हाने की सूचना दी जाती ह दौड म भाग लने वाले लोग सावधान हो जात है। उनकी मुद्राएँ बदलती हैं। व आगे की ओर झुक जाते है । वे प्रारम्भ हानेवाले क्रिया को मोर विशेष रूप से ध्यान दते ह । वे उसके लिए तयार हो जाते ह । ध्यान मे मानसिक तत्परता या सनकता भी हाती है। जब आप किसी काय की पार ध्या त ह तो उस काय म सम्बधित मानसिक प्रियाएं विशेष रूप से सजग हो जाती है। इस मानसिक तत्परता को उनति पाप किसी व्यक्ति के काय करने को कुशलता म देखत ह । यदि एक छात्र क्लास में शिक्षक को सुनते समय किसी पुस्तक के पना का पढ़ते समय या हिमाव क प्रश्न का बनाते समय पूरा ध्यान नहीं देता ह तो उम पढाए गए पाठ का तान, या पुस्तक को बाता का सीखना या हिसाव के प्रश्न का सामाधान निम्नकोटि का होता ह । किन्तु जब वह ध्यानपूर्वक सुनता ह पढता ह या हिसाब बनाता है तो इनके परिणाम अत्यन्त ही उत्तम होत है । ये अन्तर इमलिए हागे क्याकि ध्यान मानसिक प्रक्रियाग्रा को विशप रूप से सजग बनाता है। ध्यान के निर्धारक मौर दखा हम लोगा ने ध्यान क स्वभाव को समझने की कोशिश कि ध्यान की प्रक्रिया का वणन कई तरह से किया जा सकता है । अव हम उन तत्वा को समभने को कोशिश करते हैं जो किमी व्यक्ति म ध्यान की अवस्था उत्पन करते है । ये तत्व ध्यान निर्धारक अथवा ध्यान प्रति वधक बहे जाते है । इनक द्वारा ध्यान का निर्धारण होता ह य निकारक वाह्य या वस्तुनिष्ठ हा सक्त हैं। य प्रान्तरिक या व्यक्तिात ना हो सकन है । वाह्य निवारक र अन्तगत उत्तेजक की कुछ एग विशपता रहती हैं जिनकी मार च्यान चला जाता है। उत्तेजन का तारता एक एमा हा विशेषता ह । कम तात्र उत्तेजक की अपचा अधिक तीव्र उत्तेजक का मार ध्यान के अधिक प्राप्ति हान का मम्भावना रहनी है। हम लागा का ध्यान जार की ध्वनि तीव्र प्रकाश या नीत गर भी मार पानानाम चला जाता ह । आहिस्ता आवाज धामी राशनो या हल्क गर ग पार हमारा ध्यान न ना जा सकता है। उत्तेजक वा पातार ध्यान का दूसरा वाह्य निधारप ह । एक छाटे वस्तु का अपना वातावरण का वह वस्नु को पार ध्यान के पापण का यधिक सम्भावना हानाहरणाय जब आप रात में यानाश का घार तसत है वा आपका ध्यान सबन पहले पहर चन्द्रमा का पार चला जाता है यद्यपि चितिज में पना तारे ना चमरते रहते है। अापन सम्मत एक हाया और एक गहा है। यदि आप गाहे में विशप दिवसा ना रखत हता हाथी को धार पापक ध्यान के मार्पित हान की अधिक सम्भावना है । उत्तेजक का सत्ताकाल मा ब्यान का प्रभावित करता ह । काइ राशना या आवाज जा क्वल कुछ हा चरा क लिए हाती है उन ध्यान से बच जान का अधिक सम्भावना ह। किन्नु काई राशना या आवाज जा कुछ समय क लिए स्थिर रहती ह ता वह अापक ध्यान का अपना भार प्राप्ति करता है। फिर भी बाई रोशना या पावाज जा समय-समय पर प्राता और जाती है उसका अपना वह राशना पर आवान जा लगातार हाता रहता ह उस मार ध्यान क आकर्षित होने की कम सम्भावना रहना है। यदि पिता स्थान पर वरावर हल्ला होना रहना ह ता वह आप ध्यान व वाहर चला जाता ह जिन्तु यदि हल्ला रुक-एक पर हाता ह ता जवना एसा होता ह तव यापका ध्यान उस पार चला जाता है। वस्तु को अपना गतिमान दन्तु की मार प्रापका ध्यान जल्द जाता है। यदि आप एक मगन में काम कर रह ह ता वहाँ पर पिना प्रारम्भिक मनोविज्ञान गतिविहीन सप की मार मापका ध्यान न भी जा सकता है। पर ज्याहि यह गतिमान हो जाताह आपका ध्यान जग जाता है। एक तरह के उत्तेजना को अपना परिवतित और रग विरग उत्तजन आसानी से ध्यान का प्रापित करते है । साधारणुन पाप अपन टयुल पर यो घडीको कि टिक को पार ध्यान नहीं दत ह पर ज्याहि यह आवाज चद हा जाती ह प्रापया ध्यान उम पार चना जाता है। इसी तरह एक रग के छपे विज्ञापन की अपेक्षा विभिन रगा ये अक्षरा क छपे सितापनी पार ध्यान के अधिक प्राकर्षित हान वी सम्भ बना । क्या रगाम भद को अपना विरोध का प्रभाव ध्यान पर अधिक होता है । उजन और लात या हरे पोर पोल रग के विनापन की अपक्षा कान और उजन या हरे पोर पाले रगा म छप विनापन की अोर ध्यान में अधिक प्रापित होन की सम्भावना है। यदि एक बहुत हो नम्बा और एक बहुत ही चौना व्यक्ति माय टहल रह ह तो पापका ध्यान उनकी ओर पहन जा सकता ह न कि उस व्यक्ति को पार जा एक दूसर में केवल थाडा हा लम्बा है। ध्यान के वाह्य निधारक सम्बधी बाता का उपयाग विज्ञापन निका न म किया गया है । जब विमी वस्तु को दिशापित किया जाता ह उस वस्तु के प्रारका का ध्यान उस वस्तु को पार खीचन तथा कायम रमन के उद्देश्य से किया जाता है। एक अच्छ विज्ञापन का इस याग्य हाना चाहिए । विनापन निकारत समय उत्तेजर की सभी विशपतारों थाकार सत्ताकार गतिशीलता परिवतन आदि दष्टि म रख जात है। एक अच्छा विनापन व मत्तरा म छपा होता है और समाचार-पत्रों तथा पत्रिकामा म मधिक स्थान म दिया जाता है। वड शहरा म विनापनक लिए विजली की रोशना का उपयोग होता है। किसी वस्तु का नाम मौर प्राकार पल-पन विजली को राशनी द्वारा दिखनाया जाता है । कुछ एस विनापना में गति का उपयाग भी होता ह । एक वस्तु दूसरे वस्तु के पीछ धूमत हुए दिखलाया जाता है । ये सभी उपाय इसलिए किए जाते ह कि ध्यान व्यक्तियो का ध्यान विनापित वस्तु की अोर ग्बीचे और कुछ समय तक कायम रह जिसस उहें उस वस्तु का पान हो सक । ६७ ध्यान के प्रान्तरिक या व्यक्तिगत निधारक व्यक्ति की अभिरुचियो, पर पाएं इच्छा आवश्यक्ताएँ तथा घ्यय ह । वस वस्तु या काय जिहे व्यक्ति पसन्द करता ह या जिनस व्यक्ति की आवश्यक्ताप्रा का पूर्ति होता ह उनको पार ध्यान के अधिक प्रापित हान की सम्भावना ह । का व्यक्ति एक प्रकार का का पमन्द कर सस्ता है या कोई किसी विश प्रकार क खेत में अभिरचि रस मक्ता ह । अय वस्तुमा की अपेक्षा उन पर या उस खत में इम्नमान किए जानेवाली वस्तु को पार उस व्यक्ति के ध्यान के अधिक प्रापित होने की सम्भावना है। इसी प्रकार खाने की वस्तु को पार तुरन्त भानन किए हुए व्यक्ति की अपेक्षा भूख व्यक्ति के ध्यान के अधिक प्रापित होने की सम्भावना रहती ह । यदि कोई व्यक्ति चिनिया क शिकार के लिए निकलता है ता वन में लगे फल की अपेक्षा उन पर वठ पड़ा का ओर उसके ध्यान के अधिक आवपित हाने का सम्भावना रहती ह । यदि काई व्यक्ति जूता मरोग्न के लिए जाता है तो कपड को दूकान का अपना जून की दुकान को भार उसका ध्यान अधिक माकर्षित होता है। ध्यान के सवय की कुछ बातें ध्यान को अच्छी तरह समझन लिए ध्यान क सम्बध में कुछ प्रय विशप वाता को नी जानना चाहिए । यनि पाप अपना ध्यान दूर के किसा धीमी आवाज (पटो को टिक टिक) या क्मिो धोमो राशना की ओर त ह तो यह प्रावाज या राशना कभी प्रकट होती ह मौर कभी लुप्त हो जाता है । एक क्षण यह प्रापक ध्यान में रहती है और दूसर उण यह ध्यान त हट जाती है । इस ध्यान विचलन (Fluctuation of Attenuon) कहा जाता है।

8 प्रारम्भिक मनोविज्ञान T चित्र २० ध्यान विचलन से मिलती-जुलती पर वास्तव में इसस भिन्न ध्यान के मम्बध म एक और भी दूसरी बात ह । इसे ध्यान का हटना ( Shift of Attention ) कहा जाता है। पहल मापन एक चिप दसा जिसका पाकार बदलता रहता था । यहाँ पर उसी तरह का एक दूसरा चित्र ह । यति माप इसकी श्रार कुछ समय के लिए देयत है तो आप अपने ध्यान का एक प्राकार म दूसरे प्राकार पर हटते हुए पाते हैं। पाप अपने ध्यान म क्सिो एक प्राकार को अधिक समय तक नहीं रख सक्त है। बच्चे का ध्यान बहुत ही चचल होता है । यह एक वस्तु से हटकर दूसरे वस्तु पर चला जाता है । यह विसी एक वस्तु या काय पर एक क्षण में अधिक नही केन्द्रित रहता ह । बच्चा किसी वस्तु पर ध्यान केंद्रित करने म मसमय रहता है । मोर व्यक्ति अपन ध्यान को एकाग्र कर सकते है । इसका यह अथ नही ह कि प्रौढ व्यक्तियों का ध्यान नहीं हटता है । प्रोढ़ व्यक्तिया का ध्यान नी एव वस्तु स सम्बधित दूसरे वस्तु की ओर चला जाता है । जव माप ताश के पत्तो का अपन हाथ में लेत ह और खल पर ध्यान केद्रित करते ह तो मापका ध्यान एक ताश से दूसर ताश पर जाता है । यह खेल से हटकर पास के चावल के मिल के हल्ल को पार नही जायगा। वास्तव म व खल में अधिक ध्यान दिया जाता है तब हल्ला बिलकुल नहीं भी सुना जा सकता है। बच्चा किसी वस्तु पर एक क्षण से अधिक समय तक ध्यान कायम रखने स असमय रहता है । जब ध्यान का हटना साधत वस्तुमा या कार्यों तक मीमित रहता ह तब इम कद्रित ( Absorbed or Concentrnted ) ध्यान कहा जाता है ! असम्बधित वस्तुए और काय ध्यान म नहीं रहते ह । व असम्वचित उत्तेजक ध्यान पापित करत ह तब इस विभाजित ( Distracted ) घ्यान कहा जाता है। बच्चा का ध्यान अधिक प्रामानो ध्यान ६६ से विभाजित होता है। वच्चा क ध्यान केंद्रित करने के लिए शिक्षा की आवश्यकता होती ह। उस ऐसा करने के लिए प्रारम्भ म विशेष प्रयत्न करना होता है । जब किसी वस्तु या वस्तुना पर ध्यान केद्रित करने क लिए प्रयत्न की आवश्यकता होता ह तर वह प्रयत्नात्मक या ऐच्छिक ध्यान ( Effornfulor Voluntary Atention) कहलाता है। छोट वच्चा के शिक्षक इस वात को जानत है कि बच्चे को ध्यान वेद्रित करने की शिक्षा दना कितना कठिन ह । वस्तु या काय म बच्चा का अभिरुचि उत्पन कर इस कठिनाई का दूर किया जा सकता ह । शिक्षा का खल विधि वच्चा को ध्यान पेन्द्रित करने की शिक्षा दता ह क्याकि वच्च खेल की चीजा म अभिरुचि रखते ह । रगीन मूंग या शीशे को गालिया का उपयोग वच्चा को प्रक सिखलाने या गिनती सिखतान म किया जाता है । धीरे धारे वच्चा विना प्रयत्न के रन कार्यों पर ध्यान दना सीख लेता है, उसमें ध्यान दने की आदत उत्पन होती ह । एक बार जब बच्चा ध्यान केद्रित करना सीख लेता ह तव उसका ध्यान शोन किसा अमबधित वस्तु कार, प्रत्यय या प्रतिमा को पार नहीं हटता है। विशेष प्रकार के वस्तुपा और कार्यों क प्रति ध्यान स्वत बिना प्रपल के अनच्छिक (Involuntary) हो जाता ह । यदि किसी धातु को अभि रुचि गणित बनाने में ह तो वह इस कार पर बिना किसी विशेप प्रयत्न के आसानी से ध्यान केंद्रित कर सकता ह । उसका ध्यान वातावरण के किमी दूसरे उत्तेजक या किसी असम्बधित प्रतिमा, प्रत्यय या विचार की ओर जल्द नही जायगा। व प्रामानी से उम समय के काय से उसके ध्यान का नहीं विभाजित करेंग । ऐच्छिक या प्रयत्नपूगा ध्यान प्रौढ व्यक्तियो म भी दसा जाता है । जिस समय आप अपनी पाठय-पुस्तक पढते रहते ह उम समय यदि दो व्यक्ति अापके निकट बातें करने लगते ह ता आपक ध्यान में वाधा होती ह ! आपको उनके बातचीत की ओर ध्यान नही दने के लिए विशेष रूप

Prarambhik Manovigyan

Author
S.m.mohasim
Title
Prarambhik Manovigyan
File name
Prarambhik Manovigyan
Text
OCR done
Citation
1967
Published
2010/12
Publisher
Allahabad,lock Bharati Prakashan
Language
Sanskrit
Pages
101
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Science
DLI number
515044
Barcode
4990010022703.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
WEn6STq5zQI
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