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Dviragaman Eshtshodhan Dattakmuhoort Vyavastha

Pandit Ramyatna Ojha · 2009/09

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भूमिका। echo द्विरागमन तथा बधूपवेश को लेकर कभी कभी इस देश के पण्डिनों में बहुत विवाद उपस्थित हो जाता है तथा बहुत से आधुनिक पण्डिन शास्त्र रीति तथा देशरीति को न जान कर मनमाना कार्य भी कर बैठते हैं एवं बहुत से अल्पज्ञ अपनी प्रतिष्ठा बढाने के लिये प्रायः शुद्ध इष्टकाल को भी अशद्ध बना देते हैं तथा लग्न को भी अशुद्ध कर देते हैं उसी प्रकार दत्तक मुहूर्त क्या बस्तु है इम बिचार के लिए बिचारीलय का आश्रय लेना बहुधा इस देश में देखा जाता है। इन बातों को विचारकर जिस में इस देश के वासी मिथ्या भ्रम में न पड़ें और शास्त्र के सिद्धान्तों को जानें इसके लिए मैंने इन व्यवस्थावों को हिन्दी में बनाकर देश भाइयों की सेवा में निवेदन किया है। यदि कोई अपनी प्रथा का पालन करता हो तो उसके लिए मुझे आग्रह नहीं है। देश प्रेमी शास्त्रीय वस्तुको जानकर सन्मार्ग मे प्रवृत्त हों तथा उससे लाभ उठावें यही मेरा ईश्वर से प्रार्थना है। निवेदक- रामयत्न ओझा।

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-...
अथ द्विरागमन व्यवस्था
বগী
जब मैंने पाठशाला की पढ़ाई छोड़ी और श्री गुरु भगवान्
की दमासे कई कारणों वस कर्मक्षेत्र में आया- उस समय
नित्यही कई व्यवस्था गुरू मगवान के दरबार में बन जाती थी
यह देखकर मेरे मन में भी उत्साह हुवा कि द्विरा गमन की
एक व्यवस्था अच्छी पनाऊं । यह सोचकर इस कार्य में
उस समय केवल मुहर्त चिन्तामणि में बधू प्रवेश और द्विरा
गमन नामक प्रकरणों को देखकर और इधर उधर की बातों को
सुनकर मेरे मन भी यह दृढ निश्चय हो गया था कि जो मेरे
देश की रीति पुरानी चली आती है वह विलकुल अशुद्ध और
अशास्त्रीय है तथा नवीन प्रणाली जिसको थोड़े दिनों से लोग
व्यवहार कर रहे है वही ठीक है।
पुरानी रीति मेरे देश की यह है कि विवाह के बाद एक
वर्ष के भितर तक द्विरागमन यानी गौने में शुकूकी शुद्धि
नहीं देखी जाती-और एक वर्ष के वाद अथात् तीसरे या पाचवे
वर्ष में शुकूकी शुद्धि देखी जाती है । तथा मार्ग फाल्गुन और
पैशाख इन्ही महीनों में विरागमन विवाह के वाद होता है।
तथा द्वितीय आगमन जब कभी होता है उसको दोंगांचा यङ्ग
यात्रा कहते है-उसमें सदैव राहु की ही शुद्धि देखते है अर्थात्
विवाह के साथ बधू आ अथवा विवाह समयान्ततर जब
कभी आवै पुनः उसके द्वितीय आगमन
की शुद्धिही
प्रधान है । सारांश यह कि एक वर्ष के भीतर वधू प्रवेश होने
में शुक्र शुद्धि का लोप हो जाता है।
में

1 द्विरागमन व्यवस्था। दूसरी रीति नई यह है कि विवाहानन्तर जयंकभी स्त्री श्रावै तो बधू प्रवेश दोबारा जय श्रावै तब दिरागसन और तीसरे, मरत जब आवै उसको धङ्गयात्रा कहते है दूसरे में शुक्र और तीसरे में राहु की शुद्धि देखी जाती है-इ सदूसरी रीति के चला ने वालों में प्रधान दो आदमी थे एक तो छपरे में 'त्रिविक्रम तिवारी ज्योतिषी और दूसरे जिला पलिया-सिकन्दरपुरमें रामगुलाम ज्योतिषी । इनमें पहले त्रिविक्रम तिवारी अपने जमाने के बहुत अच्छे विद्वान थे दोष यही था कि जही थे जो घात मुहसे निकला जाय वह कैसी भी अनुचित हो परन्तु उसी को पुष्ट करना ! और दूसरे वैसे विद्वान नहीं परन्तु "दुमायते" में अवश्य थे। जब मैं इस कार्य में पड़ा तो पहले पुस्तकों का देखना बहुत उचित था निर्णयसिन्धु-निर्णयामृत-मुहर्तचिन्तामाणि- महूतमार्तण्ड-मुहूर्ततत्व राजमानण्ड इत्यादि पुस्तकों में इसका प्रमाण खोजा। प्रमाण खोजने में जो पातें मुझे मिली वह विद्वानो के सामने उपस्थित करता हूं वे उसकी फैसला- अपनेही करलेवेगें। पुरानी पुस्तकों में कहीं भी दो प्रकरण द्विरागमन तथा वधू प्रवेश नामके नहीं है एकही प्रकरण चाहे कोई नाम हो दीखपडता है- किसी किसी नवीन अथॉमें दो प्रकरण हैं। अषमै प्रकरण भेदसे लिखे हुये वचनों को लिखताहूं । मुहूर्तमार्तण्डमे एकहीं प्रकरण है। वग्नादष्टिदिनान्ततः सममुनर्विके धुष त्वयुग्धस्ने मास्यपि हायने शरमितादर्षात्परं स्वेच्छया । धैफामार्गासनेजगुः श्रुति युगोदाइनचित्राश्विनज्यिश्चानवमन्दिरतिशि वधूसं वेशमङ्गेस्थिरे विवाह के बाद सोलह दिन के भीतर २-४-६-८-१०-१२-१४-१६इन . ३ , द्विरागमन व्यवस्था। सम दिनों में और विषम में ५-७९दिनों में, इसके बाद महीने के भीतर विषम दिन में, अनन्तर एक वर्ष के भीतर विषम मास में, एक वर्ष के बाद विषम यानी तीसरे और पांचवें वर्ष में वधूप्रवेश करना । बाद जिस वर्ष में इच्छा हो करना। वधूप्रवेशमें वैशाख फाल्गुन और मार्गशीर्ष शुक्लपक्ष, श्रवण, धनिष्ठा रोहिणी मृगशिर, मघा उत्तरा फाल्गुनी हस्त स्वाती अनुराधा मूल उत्तराषाढ़ उत्तरा भाद्रपद रेवती चित्रा आश्विनी और पूष्य, ये १६ नक्षत्र पुराना गृह, रातका समय और स्थिर लग्न प्रशस्त है। इसके देखने से यह बात स्पष्ट है कि पहले वर्ष की गिनती विषम वर्ष में नहीं है क्योंकि पहले. वर्षमे मास का विचार है वर्ष का नहीं। निर्णय सिन्धु में दो प्रकरण है। वधूप्रवेशः । जयतुङ्गे। मार्गशीर्षे तथा माघे माधवे ज्येष्ठ संज्ञके । सुप्रशस्ते भवेदेश्म प्रवेशो नवयोषिताम् १ नारदः । आरभ्योदाहदिवसाषष्ठे वाप्य ष्टमे दिने । वधूप्रवेशः सम्पत्यै दशमेथ समेदिने २ संग्रह-विवाह मारभ्य वधूप्रवेशो युग्मे दिने षोडशवत्सरान्तः उर्व ततोन्देऽयुजि पञ्चमा-तमतः परस्तान्नियमो न चास्ति । नारदः।समे वर्षे समे मसि यदि नारी गृहं व्रजेत् आयुष्यं हरते भर्तुः सानारी मरणं व्रजेत् । प्रयोग रत्नतु । वधूप्रवेशः प्रथमे तृतीये शुभप्रदः पञ्चमकेथ- वान्हि द्वितीयकै बाथ चतुर्थ के वा षष्ठे वियोगामयदुः खदः स्यात् इत्युक्तं । तत्र मूलं चिन्त्यम् । वृद्धाशिष्ठोपि । षष्ठाष्टमे वा दशमे दिने वा विवाहमारभ्य वधूप्रवेशः । पञ्चाङ्ग संशुद्ध- दिनं विनापि विवाहबोचरगेपि कार्यः ।लल्लः । स्वभवनपुर प्रवेरो देशानां विप्लवे तथो राहे । नववधा गृहगमने प्रति .

- 0 द्विरागमन व्यवस्था । शुक्रविचारणा नास्ति । माण्डव्यः । नित्ययाने गृहे जीणे प्राशने परिधानके । वधूप्रवेशे माङ्गल्ये नमौढ्यं गुरुशुक्रयोः ज्योतिः प्रकाशे । वामे शुके नवोढायाः सुखं हानिश्च दक्षिणे। धनं घान्यं च पृष्ठस्थे सर्वनाशः पुरः स्थिते । नवोढायास्तु वैधव्यं यदुक्तं सम्मुखे भृगौ। तदेव विवुधैयं केवलन्तु द्विरा- गमे। पूर्वतोऽभ्युदितशुक्र प्रयायादक्षिणापरे। पश्चादभ्युदिते चैव जायात्पूर्वोत्तरे दिशौ । व्यवहारतले पौष्णत्काभाच्चश्रवणा च्चयुग्मे इस्तत्रये मूलमद्योत्तरासु । पुष्येच मैंन्त्रे च वधू प्रवेशो रिक्ततरे व्यर्क कुजे त्र शस्तः । व्यतीपाते च सका- न्तौ ग्रहणे वैधृताबपि । श्राद्धविना शुभं नैव प्राप्त झालोपि मानवः। तथा अमासंक्रान्ति विष्ट्यादौ प्राप्त झालेपि नाचरेत् । अथ दिरागमनम् । मार्ग फाल्गुन वैशाख शुक्लपने शुभे दिने । गुदीत्याविशुद्धो स्यानित्यं पत्नीदिरागमः । बादरायणः । नीहारांशु दनोत्तरादितिगुरुब्रह्मानुराधाश्विनीशके भास्करवायुविष्णुवरुणत्वाष्ट्रे प्रशस्ते तिथौ । कुम्भाजीलगते खो शुभकरे प्राप्तोदये भार्गवे जीवज्ञास्फुजितां दिने नव वधूवेश्मप्रवेशःशुभः। पहले मुहूर्तमार्तण्डे के श्लोक में जो बात लिखी है वही कुछ न्यूनाधिक भावसे दोनों प्रकरण में मिल कर हैं। पहले ही प्रकरण. में शुक्रशुद्धि लिख दी है. परन्तु यह भी लिखा है कि द्विरागमन में शुक्नशुद्धि देखना । माघ और ज्येष्ठ महीना भी वधू प्रवेश में लिखा है तथा द्विरागमन के प्रकरण के श्लोक में नववधूवेश्मप्रवेशः नवीन बघू का गृह प्रवेश लिखा है । ये बातें विचारने योग्य है । और पंचाङ्ग शुद्ध न होने पर वधु प्रवेश करने को लिखा है अर्थात वधू प्रवेश नक्षत्र होने से प्रवेश काल तो देखा ही जायगा यात्रा के मुहूर्त का लोप है . ।

द्विरागमन व्यवस्था।
मुहूर्तचिन्तामणिः वधूप्रवेशः।
समाद्रि पञ्चादिकदिने विवाहाबधू प्रवेशोष्टिदिनान्त
राले । शुभः परस्तादिषमादमासदिनेक्षवर्षात्परतो यथेष्टम् ।
ध्रुवक्षिप्रमृदुश्रोत्रवसुमूलमघानिले । बधूप्रवेशः सन्नेष्टोरिक्ता
सर्के बुधेपरैः २ ज्येष्ठेपतिज्येष्ठमथाधिके पतिहन्त्यादिमे भर्तृ
गृहवधूः शुचौ । श्वश्वं सहस्ये श्वशुरंक्षये तनुं तातं मधौ तात
गृहे विवाहतः ३
इसकी टीका में विशेष वही श्लोक लिखे है जो
निणयसिन्धु के है।
द्विरागमः। चरदथोजहायने घटालिमेषगरवौ वीज्यशुद्धि
योगतःशुभग्रहस्य वासरे नृयुग्ममीनकन्यका तुलाषेविलग्नके
द्विरागमलघुचवे चरेस्रपे मृदूनि-१ दैत्यज्यो ह्यभिमुखदक्षिणे
यादस्याद्गच्छयुनहि शिशुगर्भिणीनवादाः । वालश्चेद्धज
ति विपद्यते नवोदाचेबन्ध्याभवतिच गर्भिणी लगी ।।
नगरप्रवेशे विषयायुपद्रवे करपीडनेविबुधतीर्थयात्रयोः नृपपी
डनेववधूप्रवेशने प्रतिभार्गवो भवति दोषकृन्नहि-३ पित्र्ये
गृहे चेकुचपुष्पसंभवस्तदानदोपः प्रतिशुक्रसंभवः भृग्वाङ्गिरो
बत्सवशिष्टकश्यपात्रियां भरद्वाज ने कुले तथा ४-इति ।
यदि विचार कर देखी जाय तो वही बातें इन प्रकरणों
में भी हैं।
इस प्रकरणकटीका में पीयूपधारा कारने जो लिखा है उस
का अभिनाय क्या है यह नहीं निकलता-उन्होंने लिखा है-
अथ दिरागमनप्रकरण व्याख्यायते तत्र पूर्व नववधूप्रवेशे
जाते तदनन्तरं परावृत्यापि पितृगृहप्राप्ताया अपि बना
यथेष्टवाणिस्थितायाः पुनर्भर्तृगृहप्रवेशो दिरागमनशब्द

- इसका । उसका द्विरागमन व्यवस्था । वान्यः अयमाचारः प्राच्योदीच्यं पाश्चात्यानामेवेति । अधुना वसरप्राप्तस्वात्तन्मुहूर्त पञ्चचामरछन्दसाऽऽह অর্থ यह है जो स्त्री अपने पति के गृह में गई नय वधू प्रवेश हो चुका- और वह लौटकर पिता के गृह में आई तथा जितने दिन तक हो अपने पिता के गृह में रही पुनः पति गह में प्रवेश को द्विरागमन कहते हैं । यह पूर्व-उत्तर और पश्चिम के देश वासियो की चालहै । तो उसके लिये मुहूर्त होनाही चाहिये इस कारण द्विरागमन मुहत लिखा है । इस लेख से स्पष्ट जान पड़ता है कि इस पक्ति को गोविन्द ने बड़े संकोच सेलिखा है क्योंकि जब द्विरागमन नाम रखा गया,और प्रकरण भी लिखागया तो अर्थ समझाना भी आवश्यक है और वह अर्थ जो, आचार नाम से लिखा है वह शास्त्रीति से निकलता नहीं है। दूसरे यदि यह श्राचार ठीक होता तो उसका प्रमाण भी शास्त्रकारो ने लिखा ही हातो। गोविन्द भटने अपने देश की रीति क्या है सो भी नहीं लिखी दूसरे मुहूर्त देखा जाय यात्रा का और नाम हो बधूप्रवेशका यह भी विचित्र वात है। इसके टीके मे लिखा है। ऋक्षोच्चये । तिष्यादित्यसमीरणादितिवसुत्रीण्युत्तराण्य- श्विनीरोहिण्यः शुभदाश्च वर्षमसम मेषालिकुभरेविः कन्या मन्मथमीनभे नववधूयाने वृषे तौलिके. देवाचार्यसितेन्दुसौ म्यदिवसे शुद्धगुरौभास्करे । राजमार्तण्डे । नीहारांशुधनोत्तरादि तिगुरुब्रह्मानुराधाश्विनीमूलाहरूझरवारुणानिलहरिवाष्ट्रे पुशस्ते तिथौ । कुंभाजालिगतेखौशुभरे प्राप्तोदयेभार्गरे सूर्ये कीठघटाजगे शुभदिनेपक्षेच कृष्णोत्तरे दिवादिप्रतिलोम गौ वुधासती ललाटगंदिक्पतिंचानीतागुणशालिनी नववधू द्विरागमन व्यवस्था। नित्योत्सवैमन्दिरम् । चैत्रेपौषे हरिस्वप्ने गुरोरस्ते मलिम्लुचे। नवोढागमननैव कृतेपञ्चत्वमाप्नुयात् । जो प्रमाण गोविन्द ने लिखा हैं उन दोनों में नववधू पद दिया है और याने (यात्रा) दिया है प्रवेश नहीं लिखा है।इस कारण यह श्लोक द्विरागमन तथा प्रवेश मुहूत के हों यह किसी प्रकार नहीं निकलता। इस से यह सिद्ध है कि किसी जाति विशेष के भ्रमात्मक (चाल) रीति को देखकर मुहूर्त चिन्तामणि टीका कारने यह प्रकरण विना समझे लिख दिया । और शास्त्र का खोज नहीं किया। ग्रन्धकार रामाचार्य ने बहुत ठीक लिग्ग है उनका अभिप्राय आगे चलकर स्पष्ट हो जायगा। जो श्लोक राज मार्तण्ड का लिखा है वह खण्डित. है । ठीक श्लोक आगे लिखा जायगा। निर्णयामृतजो इस मध्य देश का धर्म शास्त्र पञ्च गौड़ो का ग्रन्थ हैं उसमें द्विरागमन नामका एक ही प्रकरण है । जो राज मार्तण्ड में वचन लिखे हैं और जिनकों गोविन्द ने लिखा है वहीं निर्णयामृत में प्रमाण हैं । जैसे- भर्तुः शोभनगोचरे हिमकरें (दिनकरे) नास्तेगते भार्गवे सूर्ये कीटघटाजगे शुभदिने पनेतुकृष्णेतरे । हित्वादिक्ष तिलोमगोवुधसितो. लालाटगं दिक्पतिं चानीतागुणशा लिनी नववधूनित्योत्सवैनन्दते । तथाच । नीहारांशुधनोत्तरा दितिगुरुत्वाष्ट्रानुराधाश्विनीशार्भास्करवायुविष्णुवं रुण वायै श्रशस्ते तिथी। कुम्भाजालिगतेरवी शुभकरे प्राप्तोदये भागवे जीवज्ञस्फुजितां दिने नववधू सम प्रवेशः शुभाः । इसी प्रकार के वचन सर्वत्र मिलते हैं जिनमें सर्वत्र नववधू इसी शब्द का प्रयोग है और यान यानी यात्रा इसका प्रयोग है प्रवेश कहीं नहीं लिखा है इसलिये ये द्वितीय श्रागमन के प्रवेश को कहते हों यह कथमपि नहीं हो सकता। बहुतों का कहना है कि . द्विरागमन व्यवस्था। द्विरागमन द्वितीय पार के आने का नाम है प्रथमागमन को द्विरागमन कैसे कहा जाय । परन्तु पुरानी प्रथा के अनुसार प्रथमा गमन काही नाम विरागमन है। इस संदेह के निवृत्ति के लिये शास्त्रों में दो श्लोक लिखे हैं जिसको सव कोई जानते हैं परन्तु उसपर ध्यान नहीं देते। प्रथम गुरुशुद्धिः स्यातशुक्रशुद्धिर्दिरागमे । त्रिगमेराहशुद्धि श्चचन्द्रशुद्धिश्चतुर्गमे। इसमें पहले पदको किसी जगह ऐसा भी लिखा है कि "वि- वाहे गुरुशुद्धि स्स्यात्" इस श्लोक में जो शुक्रशुद्धिविरागमे लिखा है इसीको देखकर प्रथमे गुरुशुद्धिः स्यात इसपदके यथार्थ अर्थ न लगने से आजकल के नये पण्डित्ताने पुरानी प्रथाका लोप करना शुरु कर दिया इसके लिये वचन पियूप धारा । वात्स्यः । स्त्रीविवाहः कुलेनिगमः कथ्यते पुंविवाहः प्रवेशो वशिष्ठादिभिः । निगमानादितो न प्रवेशो हितस्तत्रसं वत्सरांतोऽवधिः कीर्तितः अन्यच। पुत्रोदाहःप्रवेशाख्यःमुतोदा हस्तु निर्गमः। इसका अर्थ यह है कि स्त्री का विवाह-यात्रा कहलाता है और पुत्र के विवाह को प्रवेश कहते हैं यात्रा से पहले प्रवेश करना शुभ नहीं है । और प्रवेश की अवधि एक वर्ष तक है। इसी के अनुसार विवाहानन्तर एक वर्ष तक यात्रा नहीं देखी जाती केवल वधूप्रवेश काही मुहुर्त देखा जाता है। अत: द्वितीय यात्रा का मुहूर्त नीसरे पाचवे वर्ष में द्विरागमन के नाम से प्रसिद्ध है। और पुत्रों द्वाहानन्तर कन्यो द्वाह भी निपिद्ध लिखा है। इस लिखे सब पचनों की व्यवस्था- विवाह में जब कन्यादान कर्ता संकल्प कर देता है तो उससमय के बाद उसं कन्या परसे उसका अधिकार चला जाता है और वह कन्या पिताके नगीच से उठकर वरके नजदका - द्विरा गमन व्यवस्था.) चली जाती है इसीको प्रथम यात्रा कहते हैं-इस समय अर्थात् विवाह में गुरु शुद्धिही कन्या के लिये प्रधान है इसा कारण प्रथम गुरु शुद्धिः,, अथवा "विवाहे गुरु शुद्धिः" लिखा है .परन्तु जव तक कन्या वरको पति रूपसे मान न लेवे तव तक वर का विवाह नहीं समझा जाता-वरका विवाह सप्तपदी हो जाने पर समझा जाता है इसी कारण पूर्व सप्तपदीविधेधिगते दोषेवरेवामृते देयान्यत्र विवा- हितापिच वलाद्या विद्धयोनिनचेत्” इत्यादि लिखा हुआ है सप्तपदी में कन्या वरको पतिरूप से स्वीकार करती है तमी वरका विवाह समझा जाता है उसको कन्या का प्रवेश कहते है । इसी कारण प्रत्यक्ष जो प्रथम यात्रा है उसको द्विरागमन तथा प्रत्यक्ष द्वितीय यात्रा को धग यात्रा कहना अत्यन्त प्राचीन शास्त्र शुद्ध प्रथा लोक प्रसिद्ध है। आज कल मुहूर्त चिन्तामाणिमें वधू प्रवेश और द्विरागमन नामक दो प्रकरण लिखा हुवा देखा जाता है यहीं लोगों को भ्रममें डाल देताहै परन्तु यह लेख अयुद्धहै । मुहूर्त चिन्तामाण मे एकही वधु प्रवेश प्रकरण दोनो मिल कर था दो प्रकरण नही था इस बात को नरायणाचार्य ने पियूषधारा के " उदेति यस्यां दिशि " इस यात्रा प्रकरण के श्लोक की टीका में स्पष्ट लिख दिया है । इसके देखने से यह स्पष्ट जान पड़ता है कि फिसी शास्त्रज्ञान शून्य पुरुष ने पीछे से दो प्रकरण लिखकर कर दिया है। अब प्रत्यक्ष वधू का गृह प्रवेश तीन प्रकार का होता है नूतन वधू प्रवेश.१ वधू प्रवेश २ विलंवित. वधू प्रवेश ३ नूतन वधू प्रवेश वह है जो सोलह दिन के भीतर होता है वधू प्रवेश वह है जो एक वर्ष के भीतर होता है विलंचित वधू प्रवेश वह है जो एक वर्ष के बाद होता है। परन्तु वधू प्रवेश स्त्री १० हिरा गमन व्यवस्था। के पति गृह में प्रवेश करने के मुहूर्त का नाम है । वधू प्रवेश विना यात्रा के नहीं हो संक्ता इस कारण गित गृह से जाने का भी मुहूर्त होना आवश्यक है इप्ती पितृगृह से जाने का जो समय विचार है उसी को द्विरागमन मुहूर्त कहते है जिसका सन्देह सब किसी को रहता है। विवाह में अर्थात् १६ दिन के भीतर यात्रा नहीं देखी जाती केवच वधूमवेश के ही मुंहत का विचार होता है इसी लिये इसको नूनन वधूप्रवेश कहते है यही १ मुहूर्त चिन्ता मणि का पहला प्रकारण है इसमें यात्रा, समय की शुद्धि, महीना,. किसी का नियम नहीं यह वैवाहिक हर महीनों में होता है। ११ दिन के बाद जो वधूप्रवेश उसको पधूपवेश ही कहते हैं वह विवाह के बाद विषम महीने में मार्गशीर्ष फाल्गुन और वैशाख में होता है. इसमें पिता के गृह से चलने का मुहूर्त जिसको दिरा गमन कहते हैं नहीं देखाजाता और पतिगृह में प्रवेश का मुहूर्त जिसे वधप्रवेश कहते हैं वहीं देखा जाता है-शुक्र का विचार नहीं होता। इसके बाद विखंवित वधुमेवेश जो एक वर्ष के बाद तीसरे पांचवे इत्यादि वर्षों में होता है उसको विरागमन कहते है उसमें पूर्वोक्त सब बातों के साथ साथ शुक्र की भी शुद्धि पृष्ठ वा मरूप देखी जाती है इतनी व्यवस्था मैंने इस कारण लिखी है कि कोई पण्डित सन्देह करने वालों को यथार्थ इस बात को समझाते नहीं हैं शुद्ध रीति को छोड़कर लोक श्रम में पड़कर अन्यथा आचरण कर क्लेश उगते हैं । पुरानी रीति अभी बहुतों के मनसे जागृत हेक्योंकि देशमें अभी बहुत प्राचीन पण्डित वर्तमान है जिन्होंने पुरानी रीति को नहीं छोड़ी है अब यदि नई रीति के अनुसार किसी ने भन्यथा की और कहीं उसको मंगल नहीं हुआ तो

११
द्विरा गमन व्यवस्था
वह शास्त्र और पण्डिन दोनों को बदनाम करता है। ऐसे घटना
तो ईश्वर की इच्छा से होती है।
दीपावली-और कार्तिक पूर्णिमा के नगीव भी वधूप्रवेश
इत्यादि शुभ कार्य होते हैं इनकी इननी प्रशंसा है कि दीपावली
के समय कोई भी दोष वाधक नहीं है।
दीपोत्सववले नैव कन्या भर्तृगृहव्रजेत् । निर्णयामृते
विवाहोपयोगिनिर्णये । नशुक्रदोषो न सुरेज्यदोषस्तायक्वं
चन्द्रवलं चयोज्यम् नवानबोढागमनप्रयाणे दीपोत्सवे का-
तिकपौर्णमास्याम्-
उसकी बड़ी साफ २ व्यवस्था काश्यप संहिता में लिखी है
जिसकी खोज में मैं हूँ भगवान की दया होगी तो पुस्तक मिल
जाने पर मैं पण्डितों को भेंट करूंगा-यदि इस व्यवस्था से लोगो
को लाभ होगा तो मुझे बड़ी खुशी होगी!
श्री रामयत्न ओझा।
श्रा० शु०१ गुरौ-सं० १९७९
इण्ट शोधन व्यवस्था ।
ज्योतिष में प्रधान तीन अंग है पहला सिद्धान्त दूसरा होरा
तीसरा संहिता-नन तीनों के सम्पूर्ण मर्मज्ञ आज से.१५००
वर्ष पहले वाराह मिहिर हुवे थे उसके बाद आज तक किसी का
प्रमाण नहीं मिलता। यह बात सर्ववादि सिद्ध है कि पिना सिद्धां
के फलित और संहिता का पूर्ण विद्वान कोई हो नहीं सक्ता
कितना भी, वह बड़ा पण्डित कहलावे परन्तु राशि का नाम
उस्का (.. ) वही रहेगा।
यहुत अल्पज्ञ आज कल कह बैठते हैं कि भारतवर्ष की
ग्रहगणना प्राचीन समय में तो ठीक थी परन्तु आज कल वह
.

F६ निरामयस्या अशुद्ध हो गई है। इसी प्रकार ज्योतिषीजी ने कुण्डली देख कर दो चार बार उलट पुलट किया और क, दिया कि इष्ट काल अशुद्ध है इसकी शुद्धि के लिये छ महीना नमय चाहिये । वस सुनते ही यजमान के होश उड़ जाते हैं कहां तो वह अपना फल पूछने गया और कहां उसकी कुण्डली ही अशुद्ध हो गई- उसको ज्योतिषीज़ी से पूछने का हौसला ही नहीं पडता कि पूछे। उसको पूछना चाहिये कि महाराज छ महीना इष्ट काल शुद्ध करने के लिये हैं तो फल विचार करने के लिये वरसों का समय चाहिये । और आपने पाच मिनट भी खर्च नहीं किया और कुण्डली अशुद्ध कर दिया इसका कारण क्या है । परन्तु अपने गर्ज के मारे वह चुप ला जाता है। अब इसका कारण सुनिये । 'कभी तो इष्ट काल अंशुद्ध अवश्य रहता है । पर इसका पहचान षटुत दिनों पर होता है तुरंत नहीं; इष्ट काल कम होना चाहिये या अधिक, सन्देह स्थल में, इसका विचार वडा कठिन है । इसके लिये कई वर्ष की जरूरत है । आज कल के फलितज्ञ जो इस बात को कहते हैं उसका कारण दो है एक तो कुण्डली दिखलाने ' वाले ऐसी बात पूछते हैं जो परसा विचारने पर मी न निकले और ज्योतिषीजी के सामने एक टका पैसा भी रखते नहीं बनता। विना कुछ लिये कहने में दोष भी लगता है शास्त्र भी निन्दा ही करता है ऐसी अवस्था में हष्टकाल अशुद कह , कर . टाल देना बहुत ही जरूरी है। । : । परन्तु कुछ अल्पज्ञ ज्योतिषी इस बात को छोड़कर अन्यथा कहते है वे बात ये हैं लग्न सम और नवांश भी सम हो तो झट कह देते हैं कि "ओजेतदंशे पुरुषस्य जन्म अर्थात् विषम लग्ने नवांश में पुरुष का जन्म है सम लग्न नवांश में नहीं इस लिये लग्न अशुद्ध हैं "बाहरे बुद्धि की अजीर्णता' उनको वराह मिहिर का यह श्लोक नहीं याद आता कि- .:::..:

द्विरा गर्भन व्यवस्था स्तेनो भोक्ता पण्डिताब्यो नरेन्द्र क्लीवः शुरोविष्टिक- दासवात्तः पापोर्हिसोभाश्च वर्गोत्तमांशे ज्येषामीशा राशि वादशांशैः . इसका अर्थ यह है । मेष के नवांश में चोर वृष के नवांश में खाने वाला मिथुन क नवांश में पण्डित-क के नवांश में आट्य, सिंह के नवांश में राजा कन्या के नवांश में क्तीव तुचा के नवांश में वीर, वृश्चिक के नवांश में आज्ञाकारक, धनुके नवांश में दाल, मकर के नवांश में पापी, कुम्भ के नवांश में हिंसक; और मीनके नवांश में निर्भय हाता है, तथा इन राशियों के वर्गोत्तम में जन्म हो अ- धात लग्न तथा नवांश राशि एक हो तो. इनका स्वामी होता है-इससे यह हुआ कि वृष लग्न में वृष के नवांश में जन्म हो तो भोजन कराने वाला हो कर्क लग्न में कांशमे जन्म हो तो महा धर्ना हो. इत्यादि । यहां यह विचार करने की बात है कि जय सम राशि नवांश में पुरुष का जन्म ही नहीं होता तो प्रा- चार्य ने पुरुष का फल कैसे लिखा।इस बात को देख कर भी जो ऐसी अवस्था में कुण्डली को शुद्ध बना देते हैं उनको..क्या कहा जाय-अब इष्ट काल के शुद्धि के राति का विचार देखिये किसी का मत है, कि प्राण पदः से.इष्ट काल शुद्ध करना । उसकी रीति- घटी चतुर्गुणा कार्या तिथ्याप्तश्चपलैयुता शेिष पलाचं दिगुणं स्पष्टभास्करसंयतम् । सूर्येचरादिराशिस्थे शन्यना गाब्धिसंयुतम् । स्पष्टं प्राण पदं ज्ञेयमोजभावेङ्ग शुद्धता-.; दूसरे लिखते है कि- माणत्रिकोणो प्रवदन्ति जन्म तदेव मान्यन्वितयारीको .

विरागमन व्यवस्था । णे।मान्धंशकाकोणगतं विलग्नं तदंशकात्तन्मदकोणभेवा- इन श्लोकों से यह बात निकलती है लान का और प्राणपद का अंश तुल्य हो तथा माणपद लग्न से विषमस्थान में हो तो लग्न को शुद्ध जानना- अब जरा पारासर होरा की पुस्तक लेकर अप्रकाशक ग्रहों का फल देखिये प्राणपद के पार हो भाव में रहने का फल लिखा है जब सम भाव में प्राण पद होही नहीं सक्ता तब सम भाव का फल क्यों लिखा गया "क्योंकि सति कुड्य चित्रम्" कुछ ग्रन्थकारो ने गुलिक से इष्ट काल तथा लग्न की शुद्धि लिखी है तथा चन्द्रमा से भी इष्ट काल की शुद्धि लिखी है-उस में लिखा है कि लग्ने वले मांदिवशादिलग्नं चन्द्रे वले. चन्द्रवशा- दिलग्नम् । अर्थात् लग्न बलवान हों तो गुलिक के वश तथा चन्द्रमा बलवान हो तो चन्द्रमा के वश लग्न शुद्ध करना- अव विचार करने की बात है कि लग्न का यदि निश्चय ही होता तो शुद्धि किसकी देखी जाती ? जब लग्न ही नहीं तो बल किसका देखा जाय-इन परस्पर के विरुद्ध बातों के देखने से इसमें कुछ कहने का साहस नहीं होता-- अब उसके दोष का विचार कीजिये गुलिक बनाने की विधि दिनकी दूसरी आर रात की दूसरी है गुलिक, उन लोगों के मत में दिन भर एक ही लग्न में रहता है और रात भर एकहीं किसी दूसरे लग्न में रहता है. दिन में छ नग्न और रात में छ लग्न होते तो तीन लग्नों ही से विषम स्थान में पडेगां तीन से नहीं कल्पना किया जाय कि मेष से कन्या तक छ लग्न व्यतीत हुये और गुलिक कर्क में है तो बृष कन्या और कर्क से विषम स्थान में और मेष मिथुन और सिंह से सम स्थान में हुवा, इन लग्नों का मान कभी कमी २ । घंटे से भी अधिक हो जाता है तो २ - .

. - .. शिरा गमन व्यवस्था। १५ घंटे तक किसी मनुष्य का जन्म पृथ्वी पर न हों यहनात मनमें नहीं बैठती। चन्द्रराश्यधिपायत्र ततमि कोणमथापि वा तत्सप्तम त्रिकोणे वा भवेल्लग्नस्य निर्णयः। एक प्रकार इष्ट शोधन का यह भी है। यह प्रसिद्ध है कि चन्द्रमा एक राशि में सवा दो दिन रहता है तब तक चन्द्रराशी श भी एक ही ग्रह हुषा वह जिस राशि में होगा उसके विषम स्थान में छ ही लग्न पडेंगे बाकी क नहीं पड़ेंगे इससे यहबात हुई कि छ ही लग्न में सवादो दिन तक संसार में लड़का पैदा होगी पलमों में नहीं । परन्तु यहांत असंभवसी जाम पडती है क्योंकि एक एक लग्न सवादो घंटे का भी होता है कुछ लोग गर्भेष्ठयोधन करते हैं अर्थात जन्म समयं जाम कर गर्भ का दिन निकालते हैं और उस पर से गर्भ का समय निकालते हैं । जिस समय गर्भकालिक चन्द्र स्फुट जन्म लेग्न स्फुट के तुल्य हो और गर्भ का लग्नस्फुर जन्म चन्द्र स्फुट के तुल्य हो जाप उसी इष्ट काल को शुद्ध कहते हैं। परन्तु एक तो जय तक जन्मष्ठेकाल नहीं पताया जाय तब तक काम ही नहीं चल सक्ता उसमें याद गलती हुई तो सभी पात गरवरी जायगी-और यदि ठीक जन्म समय का ज्ञान होतो शुद्ध करना मी विडयना ही समझा जायगा इस कारण यह प्रकार अशुद्ध है। दूसरे गर्म दिम निकालने की मिन्न भिन्न रीति है उनसे कई प्रकार का गर्भ दिन निकलता है यह भी सोचने की यात है। तीसरे २४० दिन से कम नहीं निकलेगा यदि किसी को ७ मासे पर ही लड़का हुआ तो उसका गर्म दिन नहीं निकलं सत्ता इसी प्रकार यदि दश महीने से अधिक समय पर लड़का हुआं तो वह भी नहीं निकल सक्ता इससे भी यह रीति बिस्कुल मशुद है दूसरे गर्भ चन्द्र जन्म लग्न के तुल्य हो तथा गर्भ लग्न जन्म चन्द्र के तुल्य हो इसके लिये कोई आर्ष प्रमाण नहीं । वाराह मिहिर ने गर्म समय को जान कर जो जन्म काल मान १६ दशगवन व्यवस्था. लिखा है उस से भी: यह बात नहीं मिलती। इससे यह बात बहुतही स्पष्ट है कि इन प्रकारों के बनाने वाले बिल्कुल शास्त्र शुन्य और पूतथे और सच्ची रोति छोड़ कर अपनी मुर्खता को छिपाने के लिये नया प्रवन्ध बना दिया। इन प्रकारो से शुद्ध इष्ट काल भी अशुद्ध हो जाता है। पास्तष-इष्ट काल की शुद्धि कुण्ड ली या जन्म पत्र बनाना या बनवाना यह साधारण बात नहीं। यह काम पहले बड़े बड़े राजावों के यहाँ होता. था वीलों अच्छे अच्छे ज्योती दरबार में पड़े रहते थे और जागीर पाते थे उसके उपर से. राजावों मे. घराघर मदद मिलती थी उन को खाने पहिरने कुटुम्व.पालन. और, विवाहादिव्यय की चिन्ता धी ही नहीं केवल शास्त्र का विचार करना और फल का मिलाना.यही उनका कर्तव्य था-जबसे इस भारत वर्ष में दरिद्रा देवी ने. डेरा जमाया और लक्ष्मी ने पश्चिम की यात्रा की, यदि उनकी दया भी हुई तो अपने किसी वाह नहीं पर तवसे शास्त्र का रहस्य भी पुराने पण्डितों के साथ, चला गया और नाम के पण्डित तथा. शासच गये तब से शारत्र विचार प्राय: लुप्त हो गया । इष्ट काल शुद्धि के लिये आचार्यों ने मुक्त कण्ठ से पहले कहा है कि " पन्त्रैः स्पष्टतरोत्र जन्मसमयो वैद्य यानी. यन्त्रो के द्वारा जन्म काल का ज्ञान करना. यही उत्तम प्रकार है। आज कल . पुरानी शैली के यन्त्र तों.. नष्ट हो गये भारत के सर्वस्व अंग्रेजों की दया से घड़ी मिलती है । प्रायः शि- क्षितो में इसी के द्वारा इष्ट काल का ज्ञान किया जाता है इस लिये इसका भी वर्णन कर देना चाहिये "घडी क्या चीज है यद्यपि हिन्दूस्तान में प्रायः सभी मनुष्य घडी का बर्ताव करते हैं परन्तु उसका ज्ञान रखने वाले बहुत ही कम सज्जन मिझेंगे, खैर,.. घडी एक नियत मान से बनती हैं जिसको मध्यम मान कहते हैं। इस भारत वर्ष में कौन कह सब देशों में दिनका व्यवहार सूर्य उदय से पुनः सूर्योदय तक समय का होता है परन्तु शास्त्रीय व्यवहार करमें के लिये किसी ने उदय से उदय तक किसी ने मध्यान्ह ।

- इष्ट शोधन व्यवस्था। से मध्यान्ह तक २ किसी ने सूर्यास्त से सूर्यास्त तक ३ किसी ने मध्यरात्रिसे मध्य रात्रि तक किसी ने इष्ट समय से इष्ट समय तक माना है। इसको सावन दिन कहते हैं-- उदाहरण के लिये यदि मध्यान्ह से दिन कल्पना किया जाय तो, आकाशीय कान्ति वृत्त के जिस बिन्दु के साथ सूर्य किसी दिन याम्योत्तर--वृत्त में आया उसके बाद दूसरे दिन जब वह बिन्दु पुनः याम्योत्तर रेखा में श्राता है उस समय तक के समय को नाचत्र एक दिन कहने हैं उस समय सूर्य याम्योचर रेखा से कुछ पूर्व रहता है, जब सूर्य याम्योत्तर वृत्त में आता है तब एक सावन दिन व्यावहारिक होता है यह पूर्ष कथित नाचत्र दिन से करीब ४ मिनट बड़ा होता है- अर्थात् यदि नाचत्र मान से इस सावन दिन को मापन करें तो कहेगें कि चौबीस घंटा ४ चार मिनट का सावन दिन होता है और सावन मान से नाक्षत्र दिन को मापन किया जाय तो कहा जायगा कि एक नाक्षत्र दिन २३ घंटा ५६ मिनट का होता है। यह सावन दिन रविगति के न्यूनाधिक होने सेतथा उदय- मान के न्यूनाधिक होने से छोटा बड़ा होता है इस कारण पण्डितों ने अनुपात द्वारा “ रविगतितुल्यासुयुतनाक्षत्र दिन के वरावर" एक मध्यम सावन दिन कल्पना किया-इसी के अनुसार शुद्ध घडी चलती है भारत वर्ष में रेल घडी-या तार घडी --जिसको आज कल स्टेंडर्ड टाइम कहते हैं इसी के अनु. सार की घडी की चाल से होता है । यहां यह भी यादरखना चाहिये कि भारत वर्ष में प्रत्येक तार घर में दिन में चार बजे तार द्वारा घडिया मिलाई जाती है परन्तु तार धरे के अफसर अपने आलस्य से घड़ियों को नहीं मिलाते और कितना काम विगाड देते है । आज कल के हिन्दुस्तान में लोगो की यही चाल हो गई है कि जो काम उन ३

.१८
इष्ट शोधन व्यवस्था।
को सौपा जाता हैं सिवा उसके बिगाडने के दूसरी बात नहीं
जानते. बनाने वाले सैकड़ों में कोई मिलता है । जब कभी
आवश्यक होतो सावधानी के साथ तार घर से या रेल घर से
शुद्ध चाल की जो घडी हो उसको मिला लेना चाहिये-उस में
अपने देश का और स्टेडर्ड-समय का जो अन्तर (फर्क) हो
उसको पूर्व या पश्चिम समझ कर जोड देना वा घटा देना
चाहिये तो वह समय अपने देश का समय होजायगा उसमें
मध्यम स्पष्टका अन्तर जिसको काल सभी करण ( Equation )
कहते हैं उसका संस्कार करने से अपने देश में सूर्य
घडी के अनुसार का समय होगा उस परसे अपने देश सम्बन्धि
दिनाधं वा दिनमान अथवा सूर्योदय घंटा जान कर इष्ट काल
बनाना चाहिये यही इष्ट. काल शुद्ध बनाने की रीति है। परन्तु
इन बातों को इस देश के ज्योतिषी बहुत कम जानते हैं क्यो
कि ज्योतिष के सिद्धान्तों को वे नहीं जानते -यदि सिद्धान्त
जाना तो अंग्रेजी नहीं जानते अंग्रेजी भी जानते होतो अच्छे
गुरुकी सेवा नहीं करते इससे वास्तविक वस्तु का ज्ञान
नहीं होता।
लड़का होने पर पण्डितजी को बुलाया गया और अपने
घरकी घड़ीका समय बाबू साहबने उनको बतलाया पण्डितजी
ने पञ्चाङ्ग का सूर्योदय घंटा निकाल इष्टकाल बना कर फल
जो मनमें आया कह दिया और दक्षिणा कर घर चल
दिया। इस प्रकार शुद्ध इष्टकाल नहीं जानाजासक्ता ऊपर लिखी
रीति से किसी णित विज्ञ ज्योतिषी से इष्ट काल और
लग्न बनवा लेना चाहिये-इसके बाद फल जिससे पूछा जाय
वह अपने विश्वास पर है परन्तु इष्ट काल शुद्ध जानना यह
सयको उचित है-हमने रेल घड़ीसे इष्ट काल बनाने की रीति
अपने संवत् १९६७ के तथा संवत् १९७० के पञ्चाङ्ग में
लिख दिया है।

इष्ट शोधन व्यवस्था। -- अब जिस को आपने इष्ट काल में सन्देह हो उसके शुद्ध करनेकी रीति यह है कि पहले रंग रूप चिन्ह इत्यादि स्युन फल देख कर समझना चाहिये कि जो लग्न कुण्डली में लिखा है उससे वह मिलता है कि नहीं यदि मिलना हो तो कुछ पान ही नहीं-नही मिलताहो तो आगे पीछे के लग्नों से विचार कर किसी लग्न को पहले निश्चित करना चाहिये इसके अनन्तर दशा इत्यादि के द्वारा सूक्ष्म दैनिक मासिक वा वार्षिक फो का विचार करके उस को देखना चाहिये कि वे फल उस समय मिलते हैं कि नहीं, और मिलते नहीं तो कितना दिन घट पढ़ कर होते हैं। जितना दिन घट बढ़ कर होो हो दशा के द्वारा अनुपात से तत्सम्बन्धि समय लाकर पूराने इष्ट काल में उस का संस्कार कर के ठीक इष्ठ काल बनाना चाहिये सन्देह स्थल के लिये यही शुद्ध रीति है परन्तु यह शास्त्र प्रेमी राजा महाराजों का किया हो सक्ता है गरोगों का नहीं हो सक्ता- यही कारण है कि ज्योतिषियों की निन्दा प्रति दिन वढती जाती है और लोग अपनी भूल की ओर जराभी ध्यान नहीं देते। यह संक्षेप मे इष्ट शोधन व्यवस्था लिखी है इस से यदि इस देश के लोग लाभ उठावें में तो मैं अपने को कृत कृत्य समझूगा सच्ची बात को लोग जाने और धूतों के फेर से बचै यही मेरा अभिप्राय है । (१) प्राण पदसे इष्ट शोधन का प्रकार । संवत् १९७९ माघ कृष्ण त्रयोदशी सोमवार को सूर्योदय से २१ घडी २५ पलपर किसी का जन्म हुवा । इस समय इष्ट शुद्ध करने के लिये स्थूल सूर्य हार लग्न २५ प्राण पद १०।२२ यहां प्राण पद लग्न से नवमस्थान में है परन्तु लग्न और प्राण पद का अंश तुल्य नहीं है इससे अंश तुल्य करने के लिये दोनों का अंशात्मक अन्तर १७ इसका आधा ९ पल इष्टकाल में घटा दिया (क्योंकि प्राण पदं का अंश लग्न के अंश से अधिक है जब - इष्ट शोधन व्यवस्था। : कम होगा तब बग्न के बराबर हो सकेगा) और उस को इष्ट काल करपना करके लग्न प्राणपदः और सूर्य साधन किया । इष्ट २॥ १६॥ सूर्य ९॥ १॥ २७॥ ३२ लग्नम २।३। ४९। ३८ प्राण पद १०॥ ३॥ २७॥ ३२॥ पुनः लग्नं प्राणपद का अन्तर २२॥ ६ इसका आधा ११।३ विपल इष्ट काल में जोडा ५१.१६।११। ३ इसको इष्ट काल कल्पना किया यहां इस इप्ट काल पर पहलेही के सूर्य के तुल्य स्पष्ट सूर्य मानलिया तो इष्ट २१।१६।११।३ मूर्य ९।१।२७। ३२ लग्न २। ३।५०१४३ प्राणपदं १०३।१६।३८ हुवा फिर लग्न और प्राणपद का अन्तर किया । ११५ हुवा इसका आधा 01 01 ३२॥ ३० इस को इष्ट कालमे जोड़कर इष्ट काल माना २१।१६॥ २१॥ ३५॥३० इस पर लग्न २।३१५० ७.प्राण पद १० १५०। ४३। फिर अन्तर 1010 ४इसका आधा इष्ट कालमे संस्कार किया २१॥ १६॥ ११॥ ३९५ ३०। यह इष्ट काल शुद्ध हुआ क्यों कि स्पष्ट सूर्य ९१ ११२॥ ३२ स्पष्ट लग्न २।३। ५० १७ पाणपद ११॥ ३॥ ५०। ४७ इस इष्ट काल पर देखा जाता है किं लग्न और प्राण पदका अंशादि तुल्य है और प्राणपद लग्न से त्रिकोण में भी पड़ता है इससे यही २१॥ १६॥ ११॥ ३७ ३० इष्ट काल शुद्ध हुवा--इस समय की कुण्डली ४ ५ श६श. ७ ११चं बु१० स - यहां लग्न चन्द्रराशीश से त्रिकोण में नही है इस कारण चन्द्रराश्यधिपोयत्र तत्रिकोणमथापिवा । तत्सतमत्रिकोणेवा भवेल्लनस्य निर्णयः॥ इस प्रकार से अशुद्ध है । चन्द्रमा कर्क के नवाश में है इससे :

. नवांश के त्रिकोण में भी लग्न के मानहोने से इष्ट शोधन यवस्था । NA त्रिर्दशकांत्तन्म दकोण मेवाण इससे भी लग्न अशुद्ध हैं। इस दिन का दिनमान २६॥ १७ इस पर शुद्ध गुलिकेष्ट १९। ५। ९।१७ गुलिक लग्न । २१ यहां गुलिक लग्न और गुलिकांश दोनो से त्रिकोण में लंग्न के न होने से लग्न अशुद्ध है । गर्भेष्ट शोधन करने के लिये सूर्य ९१ १॥ २७॥ ३२ लग्न २॥ ३। ५०। ४७ चन्द्रमा ७/ १०। ४७। १० इन पर से गर्भ दिन जानने की रीनि। जन्मोत्थ व्यङ्गेन्दुलवा घटा १४ सा तयां १६ शयुक्ता श्ववरैः प्रयुक्ताः २४६ स्याज्जन्मगीन्तरवासरौघस्त्वनेन हीनो जनिसंभवोगणः। इसके अनुसार गर्भाहण २६०। ११ निकला तिथि २६४ निकली इस परसे स १९७९ वैशाख शुक्ल ३ रविवार को गर्भ दिन निकला परन्तु यह अहर्गण मध्यम मान से निकलता है और शोधन क्रिया स्पष्ट मान से होती है स्पष्टमान से जो गर्भेष्ट का नियम लिखा है उसका रविवार को संभव नहीं इससे चतुर्थी सोमवार को गर्भ दिन कल्पना किया। गर्भेष्ट शोधन का निधन यह है कि जन्म कालिक लग्न गर्भ का चन्द्र और जन्म कालिक चन्द्रमा गर्म का लग्नं होता है । इस कारण जब लग्न मिथुन है तो मिथुन का चन्द्रमा होना चाहिये तथा जन्म चन्द्र धनराशि में है इसलिये लग्न गर्म का धनु होना चाहिये । इस विचार से जन्मचन्द्रको गर्भ लग्न का लग्नं मानकर प्रातः कालीनहीं मूर्य पर से. गर्भेष्ट निकाला गया सूर्य । १७/ ११॥ ४ ३ लग्न ८।१०। ४७१० अर्कभोग्यस्तनोर्मुक्त कालान्वितो । युक्तमध्योदयोभीष्टकालो भवेत् ॥ इस रीति से इष्ट काल ४२॥ ३२॥ ३८॥ ४ हम पर स्पष्ट २२ इष्ट शोधन व्यवस्था। सूर्य ०। १७ ५।३ चन्द्र स्पष्ट २।१२।४५/ ५४ इसको जन्म लग्न कल्पना कर सूर्य १।१ २७। ३२ से इष्ट काल निकाला तो जन्मेष्ट २२॥ ५३॥ २०॥ ३५॥ २० हुवा। इस पर सूर्य २॥ १।२९। ११ चन्द्रमा ८॥ ११॥ ९॥ १२। इस चन्द्रमा को गर्भ लग्न कल्पना कर गर्भष्ट निकाला ४२॥ ३०॥ ४३। ४६। १८ इस पर सूर्य ०।१७।५२।१ चन्द्रमा २॥ १२॥ ४५। १७ इस को जन्म लग्न कल्पना कर सूर्य ९॥ १॥ २९॥ ११ पर से जन्मेष्ट निकाला । २२। ५२। ५६॥ ५०।२० इसपर सूर्य ९।१।२६।११। चन्द्रमा ७॥ ११॥ ९॥ ७ इस परसे गोष्ट सूर्य । १७॥ ५२। १ से निकाला तो भोग्य काल १६४। ५२।६।३४ भुक्त काल ३७। ५१। २। ५६। योग ३। २२। ४ ३। १२। ३० मध्योदय ३६॥ ८ इष्ट काल ४२। ३०। ४३॥ १२॥ ३० इस पर सूर्य ०।१७। ५२ १ चन्द्रमा २॥ १२॥ ४ ॥१७ लग्न ८॥ ११॥ ९॥ ७ इस पर से जन्मेष्टं काल के लिये सूर्य ९॥ १॥ २९॥ ११ लग्न २॥ १२॥ १५॥ १७। इष्ट इष्टकाल २२। ५२। ५६। ५०। २० चन्द्रमा दा११॥ ९॥ ७ इससे शुद्धष्ट २२॥५२॥ ५६॥ २०॥ २० हुवा । यह इष्ट काल और पूर्व इष्ट काल दोनों बराबर न होने से दोनों प्रकार अशुद्ध है। कई प्रकारों से जो भिन्न भिन्न जन्म दिन निकलते हैं इस कारण भी भिन्न भिन्न इष्ट काल निकलेगा इससे इष्ट शोधन के सब प्रकार अशुद्ध है। इष्टशोधन के प्रकार प्राणत्रिकोणे प्रवदन्ति जन्म तदेव मान्यन्वितराशिकोणे शशांक संयुक्तभकोण राशै तदंशकात्तन्मदकोण भेगा ॥१॥ लग्ने वले मान्दिवशादिल्लनं चन्द्रले चन्द्रवशाद्विलनम् मान्छशकाकोणगतं विलमं तथैव तत्सप्तमतश्च वेद्यम् ॥ २ ॥ चन्द्रराश्यधिपो यत्र तान्त्रिकोणमथापिवा तत्सप्तमात्रिकोणेवा भवेल्लमस्य निर्णयः ॥ ३ ॥ गर्भ लम समं जन्म चन्द्रमानं प्रकीर्तितम्

इण्ट शोधन व्यवस्था।
२३
गर्भ चन्द्रसमं जन्मलममानं तैथवहि ॥ ४ ॥ इति इष्ट
शोधन व्यवस्था।
अथ दत्तक मुहूर्त व्यवस्था।
तन्न अपुत्रस्य गतिर्नास्ति इति सर्वत्र प्रसिद्धत्वात् पुत्र
रहितःमृतपुत्रोवा "अपुत्रो मृत पुत्रोवा इत्यादि" शौनकोक्तेन
पुत्र प्रतिग्रहं कुर्यात् अपुत्रेणैव कर्तव्य पुत्र प्रतिनिधिः सदा
पिण्डोदकक्रियाहेतोः यस्माचस्मात्प्रयत्नतः। इत्युक्तेः । यद्यपि
शास्त्रे त्रयोदशविधाः पुत्रा उक्ताः तथापि कलौ "दतौरसे
तरेपान्तु पुत्रत्वेन परिग्रहः" इति शौनकोक्तेन दत्तकौरसभिन्ना
नां पुत्रले न निषेधात् श्रीरसाभावे दत्तको गृहीतव्यइति प्रा-
चीनानां सिद्धान्तः सोपि समानगोत्रश्चन्मुख्यः समान गोत्र
जाभावे पालये दन्य गोत्रजम् ' इत्युक्तेः । तत्र परगोत्रोवा
पिभागिनेयो दौहित्रो वा बिजानां न दत्तको भवितुमर्हति
शूद्राणान्तु भवति " दौहित्रो भागिनयोवा शुद्राणां विहितः
सुतः” इति स्मरणात् ! पिण्डोदकक्रिया हेतोरित्युक्तेः वर्तमाने
औरसपुत्रे तस्य पातित्यादि संभावनायां पिण्डदानावधि
काररहित्येन पुरुषः पुत्रप्रति निधिकुर्यात इति शास्त्र सिद्धा.
तः तथा क्रांतस्त्री
स्त्रीभवितुमर्हति तत्पुत्रो वा नपिण्ड
दानाधिकारीति । यथा
कर क्रीतातु या नारी नसापल्यभिधीयते ।
न सा देवे न सा पित्र्ये दाप्तीन्तां कवयो विदुः ॥९॥
अनिन्दितः स्त्री विवाहैः अनिन्द्या भवति प्रजा ।।
निन्दितनिन्दिता नृणां तस्मानियां विवर्जयेत् ॥२॥

२४
इष्ट शोधन व्यवस्था।
इत्यनेन वर्तमानेऽपि क्रीतोत्पन्नपुत्रे दत्तको गृहीतव्य इति ।
दत्तकलक्षणे मनुः
माता पिता वा दद्यातां यमद्भिः पुत्रमापदि ।
सदृशं प्रीति संयुक्तं सज्ञेयोदत्रिमः सुतः ।
इस तेन माता पिता उभौवा संकल्प पूर्व यं दद्याता
स एवदत्तको भवितुमर्हति । पत्युरभावे तदाज्ञया विधवा
तत्सल्यपि दातुं प्रतिगृहीतुवा शक्नोति यथा “नत्वेवैकं पुत्रं
दद्यात् प्रति गृह्णीयादाः न स्त्री पुत्र दद्यात् प्रतिगृह्णीयादा
अन्यत्रानुज्ञानं भर्तुः" इति वशिष्ठवचनात् । एवं सिद्धे शास्त्र
तोदत्तकग्रहणाधिकारे तन्मुहूर्त विचार आवश्यकः सर्वत्र का--
येषु जातोषुच लग्नवलेनैव शुभाशुभ फलाक्तेः । तत्र दत्तक
विधानवाक्यानि कालिकापुराणे दत्तकमीमःसायाञ्च ।
दत्ताद्या अपि तनया निजगोत्रेण संस्कृताः ।
श्रआयान्तिं पुत्रतां सम्यक् अन्यवीजसमुद्भवाः ।।
पितुगोत्रेणायः पुत्रः संस्कृतः पृथिवीपते ।
पाचूडान्तं न पुत्रः सः पुत्रतां याति चान्यतः॥
चूडाचा यदि संस्काराः निजगोत्रेण वै कृताः।
दत्ताधास्तनयास्तस्युरन्यथा दास उच्यते ।
उर्ध्वन्तु पञ्चमावर्षान्नदत्तायाः सुता नृप ।
गृहीता पञ्चवर्षीयं पुत्रेष्टिं प्रथमं चरेत् ।।
सर्वास्तु कुर्यात्संस्कारान् जातकर्मादिकान्नरः ।।
इत्यादि वचनेन यद्यपि स्वगोत्रेण चूणाकरणादि सं-
स्कार संस्कृतोपि . दत्तकोभवितुर्महति तथापि जातकर्मादि

दत्तक ग्रहण मुहूर्त व्यवस्था।
संस्कृतस्य- विशेषयोग्यतादर्शनात सद्योत्पन्नस्यामि दत्तक
खेन प्रतिग्रहात् न मुहूर्त विचार मावश्यकः । परन्तु यथा
विलम्वित जातकर्मणि तन्मुहुर्तविचारस्यशास्त्रेषूपलब्धेः
विलम्धिनवधूप्रवशे तृतीयवर्षादौ द्विरागमाख्ययात्रामुहूर्तस्य
गनर्विचारात् तुल्यन्यायेनात्रापि सद्योत्पन्नस्याला कारणान्त
• रण वा मुहूर्त विचार आवश्यकः सद्योत्पन्नग्रहणोपि शा-
रेलमवलस्यैव सर्वत्र प्राधान्यात्"लम लक्षगुणान्वित" मित्या
दौ लग्नवलविचार श्रावश्यकः । अन्यत्रतु मुहूर्तपूर्व
को लग्नविचारः । तत्र जातकर्ममुहूर्तविचारवत् नमासादि
विचारः " किन्तु सत्समयसल्लग्नविचार एव समुपयुक्तः ।
व्यतीपातेच संक्रान्तौ ग्रहणो वैधतावपि
श्राद्धं विना शुभव प्राप्तकालोपिनाचरेत्
अमा संक्रान्ति विष्ट्यादौ प्राप्तकालेपि नाचरेत्
इति पीयूषधारास्थवचनादिमानि-आवश्यकत्वेपि शुभ
कर्मनिषेधकवस्तूनि । आदिशब्दात् कुलिकादयोपि
मुहूर्त दोपा सर्वदा चिन्त्याः । दत्तकग्रहणमुहूतस्तु “पुत्रष्टिं
प्रथमं चरेत्" तथा "जातकर्मादिकान्नर" इत्यादि विचारात
मातकर्म मुहूर्त एव पुत्रष्टियागम्य विधानात् जातकर्म मुहूर्त
एव दत्तकग्रहणमुहूों भावतुमर्ह त नान्यत् तद्यथा
तज्जातकर्मादिशिशोधेिय
पर्वाख्यरिक्तोनतिथौ शुभेहि
एकादशे दादराकेपि घस्त्रे

२५
a
दत्तक.ग्रहण मुहूर्त व्यवस्था।
मृदुभुवक्षिपचरोडषु स्यात्
अत्रतच्छन्दार्थः
जातस्य पुत्रस्य दुष्टसमय लाभत्वेन पितुः
विदेशादिस्थितिवशेन विलान्विते जातकणि वा
जन्मसमयादन्यत्र दत्तकमहणन एतन्मुहूर्त-औरसस्य दत्त
कस्य वा विलम्वितं जातकर्म पुत्रेष्टिरूपं कुर्यात् इति मुख्या
पक्षः वस्तुतस्तु प्रतिगृहीतृगोत्रण चूडा करणादिसंस्कार
संस्कृतस्यैव दत्तकपुत्रत्वेन परिग्रहात् दत्त ग्रहणस्य
जन्मानन्तरं चूडाकरणात् प्रागेव विशेष विधानात् शुभयाग
विष्टियैव लमस्यावश्यकता । सत्यवकाशे तिथेदिननक्षत्र
योग करण मासपक्षवयनगुरु शुक्रवाल्यवृद्धास्तमकरसिंहस्थ
गुरु ग्रहणादयोपि दोषा स्थाज्याः । आवश्यकत्वेतु सर्वत्र
हम शुद्धिमात्रम् ।
आवश्यकत्वन्तु चूडाकर्मःण वहूनामेस्त्रसमावेशः
उपनयने कालातिक्रमत्वम् । पठनयोग्यत्वम् । शुद्ध
काल लाभश्च । विवाहे कन्याया ऋतुकाल प्राप्तिः योग्यवर
लाभः । (वस्योग्यताच विद्यावयोधन कुलशीलघटित मेला,
पकादि विशेषता ) पित्रोमरणसन्देहः द्विरागमनकन्याया:
वयो धकत्वम् । दत्तक ग्रहणे दातुः प्रतिगृहीतुर्वा मरणभयम
योग्यबालकलामः कालान्तरप्रतीक्षायां दातुरस्त्रीकृतिप्रप
इच योग्यताधिकारमातिश्चेत्यादि । देशोपद्रवादिकमपि
अग्नावश्यक विषयः तथ" व्यावहारिक संस्कारभास्करदेव

२७
दत्तक ग्रहण मुहूर्त व्यवस्था।
घरअनादिषु प्रसिद्धोदत्तक ग्रहणमुहूर्तः शिष्टेराहतत्वाद
समुपयुक्तः सयथा
इम्तादिपञ्चभिषग्वमपुष्पभेषु
सूर्यक्षमाजगुरूभागववासरेषु
रिक्ताविवर्जिततिथिप्पलिकुंभलने
लिहे वो भवति दत्तपरिग्रहोयम्
स्थिर लम पञ्चेष्टखटोनि म इत्युक्तेः पञ्चष्टरेवेटला
व त्यादिवत् द्विस्वभावलमपि दत्तको गृहीतव्यः । एवं सर्वेषु
मासपु विष्णुसुप्तो दक्षिणायने गुर्वास्तादिदोप समयेऽपि
" ( गर्भाद्यन्नाशनान्डेपु न गुरू सितयो वाल्यवायचमोट्यं
जयाकालस्यगेधाद्धरि गुस्मयनं याम्यमूनाधिमासौ एत
चौलादिपुज्मेत् ।
इनि मुहूर्त मार्तण्ड ५चने न गृहीतो दत्तको भवितुम
इति । सर्वत्र लग्नशुद्धोतु यथा घटित विचारे अष्टविधमे
लप गुणानयने “अदीन्दर्घ गुणै क्यं शुभमिति वदता
चार्येण सत्यपि गुणहीने कश्चित्कृटे न तद्दोपशंकामभिधायि
तथा त्रापि पञ्चाधिकेष्ट खेट लाभे नाष्टमस्थानादेविशेष
शुद्धिगवश्यकीति चिन्त्यते एवं निषिद्धस्थानस्थितायपि
स्वामियोगात् तत्प्रावल्यात् न स्वस्तानिनोरवस्थानं दुष्टम्
"वर्गोत्तमस्वपरगेषु शुभंयदुक्तं तत्पुष्टमध्यलघुताऽशुभ
सुक्तमण" तथा
उच्च त्रिकोण स्वसुहृच्छतुनीचगृहागैः
शुभं सम्पूर्ण पदोन दलपादलपफानलम
..

२८
दत्तक ग्रहण मुहर्त व्यवस्था।
योभावः स्वामि सौम्याम्यां युक्तो दृष्टोयमेधते
पादृष्टयुतैनाशं मिर्मिश्रफलं वदेत्
इत्यादिवचनात् अत्र लग्नतः केन्द्रत्रिकोण लाभेषु शुभ
प्रहाः त्रिपडाये षु च पायाः अष्टमं शुद्धम् गृहीतुरष्टमादिरहितं
भाग्य योगधनवतादियोगसंवलितं पञ्चमशुद्धयादि युतं
लमम् । इ विलगशुद्धौ द्रष्टव्यमिति । अत्रहि द्विरागमने
टशोधनदत्तग्रहणमुहर्तव्यवव्यासु या काचित् त्रुटिः
साविबुधैः कृपायो पूरणीया इति श्रीरामयत्नशर्मणः प्रार्थना ।

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एक सूचीपत्र ग ७७ OSYCHOOoyo50sYOSYCHYOGYuoyoyoyosycodi CELCOc गुटका भा० टी०११) ( ၅ + ၄ ဒီ ၀၉ ၉၅၉ తం తన తోడు దాక అందం అంత 444 tsetestette egocenost do zoeterosteste totodiodootpote com शीघ्रबोध भा० टी. क) हितोपदेश मूल चमत्कार चिन्तामणि Enहितोपदेश भा० टी० ॥) चालबोध सारावली 10) भर्तृहरि शतक भा० टी० ॥) धातु रूपावली लघुसंग्रह मूल सांची क) योगवाशिष्ठ, हनुमानज्यौतिष चासहित 1) श्रीमद्भगवत्गीता भा. टी. बड़ा २) सामुद्रिक सटीक B) वृहज्ज्योतिष भा० टी० ,, मूल रेशमी जिल्द छोटी) मुहर्त्तचिन्तामणि भा० टी० केवल भाषा में १) सजिल्द २) महाभारत सवलसिंहकृत जि.४॥) , मूल 14)| एकादशी माहात्म्य भा. टी. १॥) लघुसंग्रह भाषा टीका III) दुर्गा सप्तशती सजिल्द ११) सारस्वत 1| स्तोत्र रत्नाकर १॥) संस्कृत प्रवेशनी an | वेदान्तसार 1) बूटीप्रचार वैद्यक अमरकोष 1) अमृतसागर කලබල කල ඔබව මෙම ၉။ နီဓ ဗ န်း ခ န်း ခ ဇ ဇ ဇ ဇ နီ နီ M Pos " Cooye शब्द रूपावलो २) OQOJO Balseboyzocials costwood celoeloesegala sera पुस्तक मिलने का पता- मैनेजर-भार्गव पुस्तकालय, गायघाट, बनारस सिटी। DCON6YOR

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Dviragaman Eshtshodhan Dattakmuhoort Vyavastha

Author
Pandit Ramyatna Ojha
Title
Dviragaman Eshtshodhan Dattakmuhoort Vyavastha
File name
Dviragaman Eshtshodhan Dattakmuhoort Vyavastha
Text
OCR done
Citation
1111
Published
2009/09
Publisher
Bhargvbhushan Press Trilochan Kashi
Language
Sanskrit
Pages
34
Library
Sanmati Library Jaipur
Classification
Sanskrit Sahity
DLI number
345425
Barcode
99999990233767.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
WG4szQoqhUb
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