Central Archaeological Library, Asi

Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana

Ramdeva · 3/31/2010

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.-
GOVERNMENT OF INDIA
DEPARTMENT OF ARCHAEOLOGY
CENTRAL ARCHAEOLOGICAL
LIBRARY
Call No. Salvu
Jai-Ram
D.G.A.79.

ל
THE JAIMINYA OR TALAVAKARA
UPANISHAD BRAHMANA.
an
DEVANAGARI TEXT WITH INDEXES.
PREPARED FROM THE EDITION, IN ROMAN SCRIPT
01
SHRI HANNS OERTEL PH.D.
D.
& U.
BY
PANDIT RAMA DEVA, B. A.
WITH
AN INTRODUGTION ON THE HISTORY OF SAMAVEDA LITERATURE,
BY
BHAGAVAD DATTA.
FEBRUARY 192
FIRST EDITION,
r
Price
1,000 Copies.
6 Shillings,

ओ३म
दयानन्द महाविद्यालय संस्कृत-ग्रन्थमाला।
अनेक विद्वानों की सहायता से ।
भगवद्दत्त
संस्कृताध्यापक वा अध्यक्ष अनुसन्धान विभाग
दयानन्द महाविद्यालय, लाहौर द्वारा
सम्पादित ।
ग्रन्थाङ्क ३ ।
.
Marwa

है --- श्रीमद्दयानन्द महाविद्यालय संस्कृतग्रन्थमाला सं०३ 29333333333 ओ३म् ...." जैमिनीय उपनिषद्राह्मणम् PR श्रथवा ... तलवकार-उपनिषद्राह्मणाम् । पं० रामदेव बी० ए० द्वारा श्रीमान् हन्नस अर्टेल, पी० एच० डी. amitent H. Oeuf महाशयस्य रोमनलिपि-संस्करणात् देवनागयाम् लिपिकृतम् । Maheck HON भगवद्दत्त संस्कृताध्यापक दयानन्दकालेज, लाहौर, Saavu लिखितं /- SAY5 Jai/Ran भूमिका-सहितम् । Jai/ Ranu Jail Re आर्य सम्वत् १९६०८५३०२० । विक्रम सं० १९७७। सन् १६२१ ई०। दयानन्दा - 4 प्रथमावृत्ति.१००० प्रति -- मुल्य-२) REEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEEVRATREEEEEER पं.भैरवप्रसाद के प्रबन्धसे विद्याप्रकाश प्रेस चङ्गाड़महल्ला लाहौर में छपा। - ----

CENTRAL ARC1150 GIGA.
LIBRARY, NEW WEHti.
Ado. No.....$1 12
Date.........171-57
Call No.
Sa aru
Jai / ham
Wii Wiiwi***iiiiiitide Up
Printed by Bhairo Prasada,
MANAGER. VIDYA PRAKASHA PRESS_ LAHORE.
· AND PUBLISHED BY
THE RESEARCH DEPARTMENT. D. A. V. COLLEGE. LAHORE,
immmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmmm
The Publications of this series can also be had of -
1. MESSRS. LUZAC & Co.,
46 Great Russell Street,
Loulon W. (:
2. Lala Moti Lal Banarsi Dass, The Punjab
Sanskrit Book Depot, Said Mittha Bazar, Lahore,
3. Lala Mehr Chand Lachhman Dss, Sanskrit
Booksellers, Saïd Mittha Bazar, Lahore,
4. Pt. Wazir Chand, Vedic Book Depot, Mohan
Lal Road, Lahore.

भ
॥ भो३म् ॥
भूमिका ।
सामवेदीय वाङमय का इतिहास ।
परमात्मा से सावेद का प्रादुर्भाव ।
तस्माद्यज्ञात्सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे ।
छन्दांसि जज्ञिरे तस्माद्यजुस्तस्मादजायत ।
अ० १०६०॥यजुः ३७ ते मा० शशा
उस व्यापक सर्वपूज्य परवा से ऋग्वेद, सामवेद प्रादुर्भूत होते
। अथर्ववेद प्रसिद्ध होता है उससे,यजुर्वेद उस से प्रकट हुमा ।
(पूर्वपक्ष) ऋचः' ब्रादि पद बहुवचनान्त हैं, अतः इनका
अर्थ ऋग्वेद आदि कैसे हुभा १ इनका अर्थ तो यही है कि सुखाएं
साममन्त्र और छन्द उत्पन्न हुए।
(उत्तरपक्ष) यह सत्य है, कि 'ऋचः, सामानि, और
'छन्दांसि पद बहुवचनान्त हैं, पर साथ ही 'यजुः' पद एकवचन में
भी है। यदि तुम्हारी बाल मानी जाये तो 'यजुः' पद से तुम क्या
अभिप्राय लोगे?
(पूर्वपक्ष) 'यजुः' पद यहां जात्यर्थ में एफवचन होता
हुभा भी यजुर्मन्त्रों का बोधक है, यजुर्वेद का नहीं।
(उत्तरपक्ष) यह बात यहां न घटेगी क्योंकि छन्दोसि पद पर
पूर्ण विचार किसी और परिणाम पर ले जाता है। देखो ! 'छन्दॉसि'
पद यहां किन्हीं मन्त्र-विशेषों का बोधक नहीं है। दयान्द सरस्वती

( २ ) मे इसी पर विचार करते हुए लिखा है-'वेदानां गायत्र्यादिच्छन्दो ऽन्धितत्वात्पुमश्चन्दाँसीतिपदं चतुर्थस्याथर्ववेदस्योत्पत्ति शापयती- खवधेयम् । (ऋ० भाष्यभू वेदोत्पत्तिवि०) अर्थात् 'वेदों में सब मन्त्र गायच्यादि छन्दों से युक्त ही हैं, फिर (छन्दॉसि) इस पद के कहने से चौथा जो अथर्ववेद है उस की उत्पत्ति का प्रकाश होता है।' अन्यथा 'छन्दॉसि' का यहां कोई प्रयोजन नहीं । इस प्र में अन्य प्रमाण भी देखो। (१)"ऋचाम्. यजुषां..... सान्नाम्.. अथर्वणां... ....गायत्रं च्छन्दः। .त्रैष्टुभं छन्दः। जागतं च्छन्दः। ...सर्वाणि छन्दांसि।" गो० प्रा० शश२६॥ 7 वैदिक विचार में यह सुप्रसिद्ध है कि ऋग्वेद गायत्री इन्द सम्बन्धी है [यद्यपि यह अनुसन्धेय है कि ऋग्वेद में गायत्री(२०५०) की अपेक्षा त्रिष्टुए (४२५३) क्यों अधिक है ? ] यजुर्वेद त्रिष्टुप् छन्द सम्बन्धी और सामवेद जगती छन्द सम्बन्धी है। अब रहा अथर्ववेद, सो वह पूर्वोक्त गोपथब्राह्मण के प्रमाणानुसार सर्व-छन्द-सम्बन्धी ।उसका किसी एक छन्द से सम्बन्ध-विशेष नहीं। यही कारण है कि उपस्थित मन्त्र में 'छन्दांसि पद से अथर्ववेद का ग्रहण होता है। (२) प्रस्तुत मन्त्र-सम्बन्धी एक अन्य बात भी ध्यान देने योग्य है। अथर्ववेद में यह मन्त्र निम्नलिखित प्रकार से आया है- तस्माद्यज्ञात् सर्वहुत ऋचः सामानि जज्ञिरे । छन्दो ह जज्ञिरे तस्माद् यजुस्तस्मादजायत ।। अथर्व. १६६।१३॥ - ( ३ ) यहां छन्दांसि के स्थान में 'छन्दो ह' पाठ है। इस प्रकार पाठ में भेद कर देने से परमात्मा ने मन्त्रों द्वारा ही अन्य मन्त्रों का व्याख्यान कर दिया है । यह मन्त्र उन्नीसवें काण्ड का है, और यद्यपि पञ्चपटबिका की भूमिका में लिखे अनुसार हम अभी तक इस काण्ड के सहितान्तर्गत होने के विषय में कुछ नहीं कह सकते, फिर भी यह तो सब को स्वीकार करना पड़ेगा कि बहुवचनान्त 'छन्दॉसि' पद का अर्थ एकवचन 'छन्द' अर्थात् ( पूर्व प्रमाणों की दृष्टि से ) अथर्ववेद ही है। रहा क्रियापद 'जशिरें । सो वह व्यत्यय ही समझना चाहिये; यद्यपि ऐसे व्यत्ययों के उदाहरण सम्प्राप्त वैदिक ग्रन्यों में अत्यल्प मिले हैं। पूर्वोद्धृत अथर्ववेद के मन्त्रों से निश्चय होता है कि 'छन्दांसि' मादि पदों का अर्थ एक वचन में ही है। ऐसी अवस्था में यजुः भी यजुः मन्त्रों का जाति-वाचक न रहेगा। इस विषय में अन्य प्रमाण देखो- - (३) यस्मादृचो अपातक्षन यजुर्यस्मादपाक्षन् । सामानि यस्य लोमान्यथर्वाङ्गिरसो मुखं स्कम्भं तं ब्रूहि कतमःस्विदेवसः॥ अथर्व १०७।२०॥ इस प्रमाण में 'यजुः' पद एक वचन में है, और अथर्वाङ्गिरस स्पष्ट ही ब्रह्मवेद का घोतक है । अतएव 'ऋचः' और 'सामानि' पदों का प्रर्य भी ऋग्वेद और सामवेद ही होना चाहिये। विचारान्तर्गत "तस्माघशात्" सु. १०९ मन्त्र की वास्या में सखवत सामश्रमी प्रयीपरिचय तथा निरुतालोचन में दिखते हैं कि 'सामवेद छन्द और गान दो भागों वाला बन्द भाग का प्रण छन्दांसि पद से और गान भाग का ग्रहण सामानि पद से करना चाहिये।' इसका कुछ खण्डन तो हरिप्रसाद है । सो म . क . ( ४ ) जी ने वेदसर्वस्व के उपोद्धात पृ०१५ पर किया है । यद्यपि हम उनके विचार-क्रम से सहमत नहीं, तथापि उन के इस परिणाम के कि गान भाग तो मूलसंहिता का गेय-रूपान्तर ही है, अनुकूल सम्मति रखने हैं। इस गान भाग के लिये कहीं अन्यत्र मन्त्रों में 'सामानि' या 'साम पद प्रयुक्त हुआ होता तो सत्यव्रत जी का पक्ष कुछ ठहर सकता; पर ऐसा है नहीं, अतः उनका पक्ष निराधार होने से सम्मान योग्य नहीं। सत्यव्रत जी के पक्ष को एक बात कुछ आश्रय दे सकती है, द्यपि यह उन्हों ने स्वयं नहीं लिखी। अथर्ववेदीय पिप्पलाद शास्त्रा में 'सामानि यस्य खोमानि' के स्थान में 'छन्दांसि यस्य लोमानि' पाठ पाया है। ऐसी दशा में सत्यव्रत कह सकता था कि 'छन्दांसि पद 'सामानि का पर्यायवाची है, और सामवेद के छन्द भाग का द्योतक है। यह बात भी सत्य नहीं ठहरती क्योंकि 'सामानि' मादि पद जैसा आगे चल कर और भी विदित हो जायगा सामवेद पाचक हैं। वैसा कोई छन्द वेद है नहीं, और 'छन्द पद अथर्ववेद बाची सिद्ध हो चुका है, अतः पिप्पलाद का पाठ जब तक कि उस शाखा के अन्य लिखित ग्रन्थ न मिल (जो कि बहुत कम सम्भव है) अशुद्ध ही कहा जायगा। विदेशीय (पारसीक) भाषा में छन्द का अर्थ । भाषा-विज्ञानी जानते हैं कि छन्द शब्द ही पारसीक भाषा में ज़न्द बना है। यही जन्द पारसीकों का धर्मग्रन्थ है। इस में अथर्वन पुरोहिते का नाम भी कई वार आया है। हाग के मता- नुसार लो इस में आया हुआ एक मन्त्र भी अथर्ववेद का प्रथम मन्त्र है। इस प्रकार प्रतीत होता है कि ज़न्द का अथर्ववेद से सम्बन्ध- विशेष है, अतएव इन्द शब्द का अर्थ पूर्वोक्त मन्त्र में अथर्ववेद ही युचियुक्त है। ऐसी दशा में 'सामानि' आदि पद भी सामवेद मादि के वाचक हैं। 11

.
1
( ५ )
ब्राह्मणग्रन्थों में सामानि पद का अर्थ ।
(१) सामवेद आदित्यात् (ऐ० २३७)
(२) आदित्यात्सामानि (कौशी ६।१०)
(३) सूर्यात् सामवेदः (श० ११११८)
(४) सामान्यादित्यात् (डॉ० उ०४।१७।२)
(५) सामवेद श्रादित्यात (जै० उ० प्रा० ३०१७)
(६) सामवेदोऽभुष्मात् (षड्विं० ४।१)
(७) आदित्यातू सामवेदम् (गो. १६)
इन सात प्रमाणों में से दुसरे और चौथे प्रमाण में 'सामानि'
पद पाया है, अन्य पांच प्रमाणों में सामवेद । ये ब्राह्मणवाक्य
एक प्रकार से पूर्वोक्त वेद मन्त्रों की व्याख्या में ही कहे गये हैं । इन
में अधिकांश स्थलों में सामवेद का प्रयोग बता रहा है कि प्राचीन
ब्रह्मादि ऋषियों की दृष्टि में भी इन स्थलों में 'सामानि' पद से
सामवेद का ही अभिप्राय होता था। अतएव तस्माद्यशात्" मन्त्र का
इस लेख के प्रारम्भ में किया हुश्रा अर्थ ही सत्य है, और दूसरा नहीं।
इस मन्त्र का यही अर्थ ऋषि दयानन्द सरस्वती ने अपने अनेक
ग्रन्थों में किया है। हम ने तो उसी का उद्धरणमात्र दिया है।
इस कल्पारम्भ में सामवेद सब से प्रथम किस
को प्राप्त हुआ ?
पूर्व लेख से यह स्पष्ट होगया होगा कि सामवेदादि बेद उसी
यशस्कम्भ-परब्रह्म से.प्राप्त हुए । यहां यह विवाद नहीं उठाया
जायगा कि वेद-ज्ञान क्यों परमात्मा का है? इसे किसी अन्य
अषसर पर लंगा। यहां अब यही निर्णय करना है कि इस कल्पा-
सभ में सामवेद किसी एक व्यक्ति को परमात्मा से प्राप्त हुभाषा
अनेकों को।
.

। - -- ॥ -- अनेकों को प्राप्त हुना, ऐसा मानने वाले बहुत थोड़े हैं। उन के पक्ष में कोई प्रमाण भी नहीं है। जो यह मानते हैं कि सामवेद किसी एक व्यक्ति को परमात्मा से प्राप्त हुा, वे दो भागों में विभक्त हो जाते हैं। एक भाग वालों का मत है कि सामवेद अनि के अधिशता देव को प्राप्त हुना। उसी से मन्त्र-द्रष्टा ऋषियों को प्राप्त हुआ। दूसरे भाग वालों का मत है कि मनुष्य-देह-धारी अग्नि भूषि को प्राप्त हुमा जो इस कल्पारम्भ में अमैथुन सृष्टि का एक सभासद् था। इस पर विचार- . emand- (१) अग्नि प्रादि द्रव्यों का कोई चेतन जीष अधिष्ठाता है अर्थात् इनको स्व-शरीरवत् बनाये है, ऐसा घेद में कहीं नहीं माया। हां, अग्नि ईश्वरदेव का नाम तो सर्वत्र प्रसिद्ध है। इस का विशेष व्याख्यान भगवान् दयानन्द सरस्वती की ऋग्वेदादिभाष्य- भूमिका में मिल सकता है। इसी पक्ष के खण्डन में 'जड़ाग्नि से अग्वेद का प्रकाश हुमा' इस का खण्डन हो जाता है। कारण कि जड़ को ज्ञान होना असम्भव है। ग । (२) दूसरे मत में भी एक भारी आपत्ति भाती है। पूर्वोक्त प्रामणग्रन्थों के सात प्रमाणों में सूर्यात प्रादित्यात् = अमुप्मात पद माये हैं। इस पर- - (पूर्वपक्ष) यदि सूर्यादि मनुष्य देहधारियों के नाम होते तो उन के पर्याय प्रादित्य आदि और 'वायु' का पर्याय “योऽयं पवते' शत० ११।५।८।२म माते । ब्राह्मणग्रन्थो में "अमुमात्" प्रयोग स्पष्ट इसी सूर्य के खिये भाया है । और वायु यदि कोई मानव समाज का सदस्य पा तो क्या वह “योऽयं पवते" अर्थात् जो यह बहता है" ऐसा ही था ? क्या मनुष्य भी पवन समान बहते हैं।

। ना - . ( ७ ) (उत्तर पक्ष) प्राचीन संस्कृत वाङ्मय के न जानने का ही कारण है कि ऐसे पूर्वपत्र खड़े होते हैं। देखो महाभारत को (क) वहां कर्ण के समीप उस के पिता सूर्य का प्राना लिखा है। यह सूर्य कोई देवता न था, प्रत्युत मनुष्य देहधारी व्यक्ति ही था। उस के निम्नलिखित नाम महाभारत वनपर्व अध्याय ३०१ में माये हैं। अभिप्रायमथो ज्ञात्वा महेन्द्रस्य विभावसुः। कुपडलार्थे महाराज सूर्यः कर्णमुपागतः ॥६॥ स्वमान्ते निशि राजेन्द्र दर्शयामास रश्मिवान् । कृपया परयाऽऽविष्टः पुत्रस्नेहाच भारत ॥८॥ ब्राह्मणो वेदविद्भूत्वा सूर्यो योगद्धिरूपवान् ॥६॥ अहं तात सहस्रांशुः सौहृदात्त्वां निर्दशये ॥२२॥ इस का संक्षिप्त अभिप्राय यह है कि योगसिदि-समन्वित सूर्य महात्मा ब्राह्मण वेष में रात्रि के अन्तिम प्रहर में कर्ण के जागने पर उसके समीप आया। उस सूर्य के यहां कई नाम माये. हैं जो सूर्य शब्द के पर्याय हैं,यथाविभावसु-रश्मिवान सहस्रांशु। प्रब रामायण पर किञ्चित् ध्यान दो- (स) वाल्मीकिरामायण में वानर जाति का सुविख्यात वर्णन है। वहां भी मुनि वाल्मीकि वानर शब्द के अनेक पर्याय उस जाति के लिये प्रयोग में लाते हैं। ध्यान रहे कि मिथ्या कथा युक्त विवरण को छोड़ कर वानर जाति मानवेतर जाति सिद्ध नहीं हो सकती । और सत्य तो यह है कि (क) और (ख) स्थलों में सूर्य और वानर के क्रमशः पर्याय-प्रयोग को देख कर ही मध्यम कालीन. बोगों ने इन्हें देवता वा पशु मान लिया था। अन्त में ब्राह्मण प्रन्यों के पाक्य-प्रयोग पर भी ध्यान देना चाहिये- - । . (८) (ग) तैत्तिरीयब्राह्मण ३१शप में नचिकेता की कथा आई है। वहां उस का जिस ऋषि से प्रश्नोत्तर छुआ, उस का नाम मृत्यु ही कहा है। कठोपनिषद् में भी यही कथा बड़े विस्तार से प्राई है। वहां मूल ऐतिहासिक कथा के साथ २ कुछ अलङ्कनर भाग मिश्रित करके भोपनिषद-भाव अधिक खोला गया है । परसब से अधिक विचारणीय यह है कि यहां मृत्यु भृषि के कई दूसरे भी नाम दिये गये हैं। ये सब नाम मृत्यु शब्द के पाययवाची हैं यथा “यम १५ अन्तक २६”। (घ) वेद के ऋषियों के तो कई ऐसे नाम सर्वानुकमणी में माये हैं जैसे "अग्निः पावकः" ऋ. १०१४०॥ अग्निस्तपसः १० १०११४१॥ यहां विशेष्य विशेषण. भाव से ये समानार्थक शब्द प्रयुक्त हुए हैं। इन पूर्वोक्त प्रमाणों से यही निश्चित होता है कि बहुत प्राचीन काल में व्यक्ति-विशेषों के नामों के यदि कोई पर्याय हों तो वे भी उसी के नाम के लिये प्रयुक्त हो जाते थे । और जैसे महाभारत में 'सूर्य' को 'रश्मिवान्' आदि कहा है वैसे ही शतपथ . ब्राह्मण में 'वायु' को 'योऽयं पवते'..कह दिया गया है । अत्तएक ब्राहण प्रादि ग्रन्थों के पूर्वोत सात प्रमाणों में "श्रादित्य” मनुष्य देहधारी ऋषिदेव है, कोई जड़ वा जड़ सूर्य का अधिष्ठाता देव नहीं । इसी प्रादित्य-सूर्य-रवि के मन में इस कल्पारम्भ फे समय सब से पहले परमात्मा ने सामवेद का प्रकाश किया । इसी ने ब्रह्मा आदि को पढ़ाया और फिर यह वेद सर्वत्र फैलता गया। पशिब्राह्मण में जो "अमुष्मातू" प्रयोग पाया है उसका यही अभिप्राय है कि मनुष्य शरीर में शिर स्थान आदित्य वा सूर्य सम्बन्धी है। सूर्य ऋषि को समाधिस्थ दशा में शिर की नाड़ियों में मन के जाने से इस वेद का ज्ञान होता था, अतः यह प्रयोग प्रा गया है। . ।

- ( ६ ) . सामवेद की शाखाएं। आर्यावर्त में सृष्टि के प्रारम्भ से लेकर दीर्घ कालपर्यन्तलौकिक और वैदिक भाषा का बहुत प्रचार रहा । उस समय वेदादि शास्त्र आज कल की अपेक्षा अल्पपरिश्रम से ही समझे जाते थे । तब प्रव- चनकर्ता प्राचार्य वा ऋषि अपने शिष्यों के लाभार्थ कठिन वैदिक शब्दों के स्थान में अन्य सरल वदिक शब्द प्रयुक्त करके अथवा कुछ २ व्याख्या करके पढ़ाया करते थे ! उतने से ही शिष्य यथार्थ अभिप्राय समझ लेते थे । तब किन्हीं विस्तृत भाष्यों की श्रावश्यकता न थी । यही ऋषि-प्रवचन था जो पीछे शाखा आदि नाम से प्रसिद्ध हुआ । इसी प्रवचन के सम्बन्ध में भाष्यकार पतञ्जलि मुनि ने लिखा है- न हि च्छन्दांसि क्रियन्ते । निसानि छन्शसीति । यद्यप्यर्थो नियो या त्वसौ वर्णानुपूर्वी सानिया । तद्भेदाच्चैतद्भवति काठकं कालापकं मौदकं पैप्पलादकमिति । ".४।३ । १०१॥ अर्थात् वेद' तो क्या, साधारण ग्रन्थों के समान शाखाएं भी बनाई नहीं गई । इनका शब्दार्थ निस्य है । हां,अर्थ के नित्य होते हुए भी वर्णानुपूर्वी अंनित्य है । इसी के भेद से ऋषियों ने नित्य वेदार्थ खोला है । और इसी भेद से काठक आदि अनेक शाखाएं हुई हैं। (प्रश्न ) मूल सामवेद जिस की आगे शाखाएं बनीं अब कहां है ? उस में ऋग्वेदीय ऋचाएं. न होनी चाहियें। अब तो जितने ग्रन्य सामवेद के नाम से मिलते हैं उन सब में ऋग् भाग सम्मिलित है। ( उत्तर ) भूल सामवेद था तो अवश्य क्योंकि विना इस के साम-शाखाएं बनतीं कैसे, और प्रवचन किस का होता ? उसी मूल का वर्णन ऋग्वेदादि वेदों और ऐतरेय आदि ब्राह्मणों में प्रायाः .. । वह मूल भी प्रतीत होता है, प्रवचन के बल से पीछे ऋषि-विशेष नाम से प्रसिद्ध हो गया । ऋग्वेदीय ऋचाएं सामवेद में थीं ) गा -- । 1 m और न हैं । हम यह कह सकते हैं कि ऋग्वेद और सामवेद के अनेक मन्त्र सदृश हैं। उन्हीं मन्त्रों का पारिभाषिक नाम 'क्' भी है। कर्ता परमात्मा ने प्रयोजन-विशेष के लिए ये समान मन्त्र दो वेदों में रक्खे हैं । मिथ्या इतिहास-प्रचारक जो लेखक हमारे इस कथन को नहीं मानते उन्हें हम ऋग्वेद का एक मन्त्र बताते हैं- गायत्रेण प्रति मिमीते अर्कमर्केण साम त्रैष्टुभेन वाकम् । वाकेन वाक द्विपदा चतुष्पदातरेण मिमते सप्स वाणीः ।। ऋ०११६४।२॥ सुप्रसिद्धएकसौ चौसठवें सूत का यह कौबीसों मन्त्र है। उन यूपत्ती लेखकों के मतानुसार प्रथम मण्डलीय होने से अद्यपि यह मन्त्र अत्यन्त पुराना नहीं, तथापि बहुत नया भी नहीं है । इस सत्र में भी स्पष्ट ही साम में ऋचाओं का होना जताया गया है। अर्थ इस का अतीव सरल है । पूर्व लिखा जा चुका है कि ऋग्वेद गायत्री छन्दं प्रधान और यजुर्वेद त्रिष्टुप् छन्द्र प्रधान है। अर्क पद मन्त्र वा ऋचा का भी पर्यायवाची है । अतएव मन्त्रार्थ यह है- गायत्री छन्द से अर्क=ऋचा-मुग्वेद का ( जगदीश्वर ) प्रतिमान करता है । ऋचाओं से सामवेद का । त्रिष्टुप् छन्द से वाकयजुर्वेद का । यजुः मन्त्रों से थाक-अथर्ववेद का । जो ऐसी] सात छन्द युक्त वेद वाणी का मान करते हैं [वे कृतकृत्य होते हैं । इस से पूर्वपक्षियों को भी मानना पड़ेगा कि ऋचाएं वा ऋग्वेदीय मन्यों जैसे मन्त्र बहुत पुराने काल से सामवेद में चले आते हैं हम पूर्च बता चुके हैं कि प्रायेतिहासानुसार सामवेद प्रारम्भ से ही संहितारूप में चला आ रहा है, अतः इस दृष्टि से जो सत्य ही है श्रादि सृष्टि से सामंधेद में ऋचाएं चली आती हैं । जो व्यक्तिमऋभ्यायों को साम पाठ से पृथक् जानें, मानों, वडू वैदिक कामय के इतिहास से अश है। .

( ११ ) शाखा-विभाग। अब रहा शाखा-विभाग पर विचार । इस पर प्रकाश डालने वाला कोई अति प्राचीन प्रस्थ हमारे पास विद्यमान नहीं। एक चरण-व्यूह ग्रन्थ ही रह गया है। यह विक्रम से पांच, सौ वर्ष पूर्व का ही प्रतीत होता है । इस में पाठभेद का बाहुल्य है। नीचे उसी की साक्षी उपस्थिन की जाती है चरणव्यूह की साक्षी। शौनकीय परिशिष्ठ अथर्व-परिशिष्ट । सामवेदस्य किल सहसभेदा भवन्ति। तत्र सामवेदस्य शाखासहखसासीत् । एध्वनध्यायेष्वधीयानारते शतक्रतुवजे- अनध्यायेष्वधीयाना: सर्वे ते शक्रेण माभिहताः। विनिहतः प्रविलीनाः तत्र केचिदवा- शिष्टाः प्रचरन्ति । तद्यथा । शेषान्न्याख्यास्यामः । तत्र राणायनीया (१) राणायनीयाः (२) साधु- नां सप्तभेदा भवन्ति । (१) राणाय-सुग्नाः * (३) कालापाः (४) महा नीयाः (२) शाट्यमुग्राः*(३) का कालापाः (१) कौथुमाः (६) लाङ्ग- लोपा (४) महाकालोपा (५) लाङ्ग- लिकाश्चेति। लायनाः (६) शार्दूलाः (७) कौथु- माश्चेति । महिदास-प्रदक्षित प्रकाराम्सर । तत्र कौथुमानां षड्भैदा भवन्ति । कौथुमानां षड्भैदा भवन्ति । तथथा । (१) कौथुमाः। (२) प्रामुरायणाः (१) सारायणीयाः (२) कातराय- (३) वातायनाः (४) प्राचलिदैन- णीयाः (३) वैतधृताः(४) प्राचीनाः मृतः (१) प्राचीनयोग्याः (१) (५) तेजसाः (६) अनिष्टकाश्चेति । नैसमीयाः। -- * सात्यमुग्रा नाम अधिक युक्त है। महाभाष्य १।।४॥ १।१ । ४८॥ पर ऐसा ही पाठ है।

, - (.. १२) जहां सैङ्कड़ों साम-शाखानों के नाम विलुप्त हो गये हैं वहा विद्यमान नामों में भी पाठ भेद के कारण एक बड़ा अन्तर पड़ गया है। पूर्वोक्त शाखा-नामों के पढ़ने से यह बात सुस्पष्ट हो जाती है। चरणव्यूह के टीकाकार महिदास ने निज व्याख्या में कुछ अन्य नाम भी दिये हैं। उन्हीं का पाठभेद स्वामी हरिप्रसाद जी के वेदसर्वस्व के पृष्ठ १७२ पर मिलता है । पता नहीं उन्हों ने स्व-बुद्ध से पाठ संशोधन किया हैं अथवा किसी लिखित ग्रन्थ के आधार पर ये नाम दिये हैं । तथापि हम उनके पाठभेदों को कोष्ठों में रख कर महिदास के पाठ जो संवत् १६५६ के काशी-संस्करण में छपे हैं, नीचे देते हैं। (१) प्रासुरायणीया (२) वासुरायणीया (३) वार्तान्तरेया [वार्तान्तवेयाः] (४) प्राञ्जल [प्राञ्जलाः] (५) ऋग्वैविधाः [ऋग्वर्ण- भेदाः ] (६) प्राचीनयोग्याः [७ झानयोग्याः] (७) राणायनीयाश्चेति । तत्र राणायनीयानां नव भेदा भवन्ति । (१) राणायनीयाः (२)शाट्या- यनीयाः (३) शाट्यमुग्राः [सात्वला:] (४) खल्बलाः (५) महाखल्वलाः (६) लाङ्गलाः (७) कौथुमाः (८) गौतमाः (E) जैमिनीयाश्चेति । पतञ्जलि मुमि कहते हैं "सहस्रवमा सामवेदः” (महाभाष्य कीलहान सं० भाग १, पृ० ९) अर्थात् ‘सहन शाखा वाला साम वेद है।' उन्हीं सहन शाखाओं में से कुछेक का उल्लेख पूर्वोद्धृत चरणव्यूह के पाठों में है । चरणव्यूह के शाखा-नाश-इति- हास में तथ्य की किस अल्पमात्रा का होना सम्भव है। तदनु- सार वर्षा वा किसी विद्युत्-प्रकोप वाले दिन किसी सामशाखीय अध्यापक ने अपनी शाखा का पाठ किया होगा। वह इन्द्र-सूर्य के; वज्र-तड़ित की धारा से अपने प्राण नष्ट कर बैठा होगा। साथ ही १ । १-काशी-संस्करण में किसी भ्रष्ट-पाठ को देखकर कौथुमी, गौतमी छपा है।

( १३ ) टस के ग्रन्थ विनष्ट हो गये होंगे* । परन्तु यह सब दूर की कल्पना प्रतीत होती है । वस्तुतः कालक्रम से ही ये सब शाखाएं लुप्त होती गई होंगी। सम्प्राप्त तीन शाखाएं। सम्प्रति सामवेद की तीन शाखाएं ही प्रसिद्ध हैं । चरणव्यूह में भी इन्हीं का उल्लेख है । 'गुर्जरदेशे कौथुमी प्रसिद्धा । कार्णाटके जैमिनी प्रसिद्धा । महाराष्ट्रदेशे राणायनीया प्रसिद्धेति।" अर्थात् गुजरात में कौथमी, कार्णाटक में जैमिनी और महाराष्ट्र में राणाय- नीय शाखा प्रसिद्ध हैं। पूर्वोक्त तीन शाखाओं में से कौथुमी शाखा ही सम्प्रति मूल सामवेद माना जाता है । इस का एक कारण तो इस का समस्त भारत में अत्यन्त प्रसिद्ध होना है। अन्य प्रबल कारणों की प्रागे खोज होनी चाहिये। इस सामवेद के आठ ब्राह्मण हम तक पहुंचे हैं। (१) ताण्ड्य महा- ब्राह्मण अथवा पञ्चविंशम्राह्मण अथवा प्रौढ ब्राह्मण अथवा छान्दोग्य ब्राह्मण (बिबलियोथीका इण्डिका संस्करण संवत् १९२७-३०)। (२) षड्विंशब्राह्मण (जीवानन्द सं० १८८१ सन् तथा "विज्ञापनभाष्य- सहितम्,” एच० एफ० ईलसिंह सम्पादित, लीडन १६०८)। (३) सामविधानब्राह्मण (५० सी० बर्नेल सम्पादित १८७० सन्, लण्डन, तथा सत्यवत सामा० सम्पा० सं०.१९५१) । (४) भार्षेय ब्राह्मण (ए० सीबर्नेल सम्पा० १८७८ सन्, लण्डन,तथा सत्यव्रतला० सम्पा० . * अलबेरूनी लिखता है कि 'उस के काल से कुछ पूर्व ही कश्मीर के वसुक्र नामक ब्राह्मण ने वेदों को लिपिबद्ध करने की प्रथा चलाई थी। (अलबरूनी का भारत। भाग दूसरा। श्रीसंतरामकृत अनुवाद । सन् १८२.०१ पृ.०३-१-1, हमें इस बात पर विश्वास नहीं।

- - ( १४ ) सं० १६४८)। (२) देवताध्याय वा दैवत ब्राह्मण (ए० सी० बर्नेल सम्पा० सन् १८७३ तथा जीवानन्द सन् १८८१) । (६) उपनिषद् ब्राह्मण-(क) मन्त्रब्राह्मण (सत्यव्रतसा० सम्पा० सं० १९४७ तथा प्रथम प्रपाठकमात्र के० स्टोन्नर सम्पा० १९०१) (ख) छान्दोग्योप- निषद् (अनेक संस्करण निकल चुके हैं ) । (७) संहितोपनिषद् ए०सी० बर्नेल सन् १८७१) । (८) वंशब्राह्मण (ए. सी. बर्नेल सम्पा. १८७३ तथा सत्यव्रत सा० सं० १९४६)। कई विद्वानों का मत है कि वस्तुतः सामब्राह्मण एक ही है। वह सम्प्रति चार भागों में विभक्त हो गया है । (१) पश्चीस अध्या- यात्मक पञ्चविंशब्राह्मण (२) पञ्च अध्यायात्मक षड्विंशब्राह्मण (३) अष्ट अध्यायात्मक छान्दोग्योपनिषद् (४) दो अध्यात्मक गृह्य- कर्म-प्रधान मन्त्रब्राह्मण । सारा ब्राह्मण चालीस अध्याय युक्त था। अन्य पांच ब्राह्मण अनुब्राह्मणमात्र हैं । जब तक सामवेद सम्बन्धी अनेक ग्रन्थों के शुद्ध वैज्ञानिक संस्करण न छप जावें, तब तक इस विषय पर कुछ कहना हमारे लिये प्रयुक्त है । इस का विचार तभी होसकता है जब इन ब्राह्मण-ग्रन्थों का काल-निरूपण हो जावे। । .' - । 1 ताण्ड्यब्राह्मण की प्राचीनता । अष्टाध्यायी ४।२।१३८॥ पर एक वार्तिक है "चरण सम्बन्धेन निधास लक्षणोऽण् ।” इस पर लिखते हुए पतञ्जलिमुनि चरणसम्बन्धी नौ (E) ऋषियों को निवास-विचार से तीन भागों में बांटते हैं । त्रयः प्राच्याः, त्रय उदीच्याः। यो माध्यमाः।” काशिकाकार इसी वाक्य को ध्यान में रखकर अष्टा० ४ । ३। १०४ ॥ पर लिखता है-“वैशम्पायनान्तेवासिनो नव ।” आगे चलकर वह कुछ प्राचीन कारिकाएं उद्धृत करता है । उन में से एक का अर्ध भाग यह है परन्तु ताण्ड्यों ( १५ ) ऋचाभारुणिताएड्याश्च मध्यमीयास्त्रयोऽपरे ॥ अर्थात् ऋचाभ,मारुणि और ताण्ड्य तीनों वैशम्पायन-शिष्य माध्यम-मध्यम भूमि निवासी थे। इन तीनों के अपने २ चरण थे। इन में से तागड्यों की शाखा प्रारम्भ से कौथुमी ही चली आ रही है। इस का कुछ पता पाणिनीय गणपाठ से लगता है। वहां हा॥३७ पर यह तीन गण भी दिये हैं। "कठकालापाः। कठकौथुमाः।कौथुमलौकाक्षाः।" हम कह चुके हैं कि कठ और ताण्ड्य प्रादि सतीर्थ्य-एक गुरु के शिष्य थे। उन में से कठों की अपनी शाखा थी, का अपना चरण ही था । इस लिये गण में कठ और तायड्य दोनों की शाखाओं का परिचय देने के लिये “ कठकौथुमाः" कहा है । इस कथन में एक बात ध्यान देने योग्य है । सामविधान ब्राह्मण के अन्त में जो ऋषि-परम्परा दी है वहां ताण्ड्य का गुरु प्राजापत्यविधि से बादरायण कहा है । यथा- सोऽयं प्राजापत्यो विधिस्तमिमं प्रजापतिर्वृहस्पतये प्रोवाच । बृहस्पति रदाय । नारदो विष्वक्सेनाय । विष्वक्सेनो व्यासाय पाराशर्याय । व्यासः पाराशर्यों जैमिनये। जैमिनिः पौष्पिण्ड्याय। पौष्पिण्ड्यः पाराशायणाय । पाराशर्यायणो बादरायणाय । बादरायणस्ताण्डिशाय्यायनिभ्याम्। ताण्डिशाध्यायनिनौबहुभ्यः।। एक ताण्ड्य का वर्णन शतपथब्राह्मण १।२।२५ में आया है- “अथ ह स्माह ताण्ड्यः । अतः इतना निश्चित है कि चाहे ताण्ड्य कोई भी हो, है वह अतिप्राचीन । तब उस की संहिता क्यों कौथुम हुई और मूल सामवेद क्यों कौथुम कहलाया ? इस के विचार के लिए बड़े परिश्रम की आवश्यकता है। सूत्रों का विवरण निम्नलिखित प्रकार से है। (१) मथककल्पसूत्र ( १६ ) । -- अथवा प्रायकल्प ( डबल्यू० कालेण्ड सम्पा० सन् १९०८) । (२) तुद्रसूत्र आर्षेयकल्प का परिशिष्ट ही है ( उसी के उत्तर भाग में छपा है ) । (३) लाट्यायन श्रौतसूत्र ( बिब० इण्डि० सं० १९२८)। (४) गोभिलीय गृह्यसूत्र (नाएर सम्पा० १८८४ सन् तथा बिब. इण्डि०, वि० सं०, सन् १६०८) । (५) श्राद्धकल्प, परिशिष्ट, गोभिल अथवा वसिष्ठकृत (बिब० इगिड० द्वि० सं० सन् १९०६) । (६) कर्मप्रदीप अथवा छन्दोगगृहापरिशिष्ट (धर्मशास्त्रसंग्रह, सन् १८७६,जीवानन्द संस्करण के पूर्वार्ध पृ०६०३-६४४ तक,कात्यायन- स्मृति वा कात्यायनविरचित कर्मप्रदीप के नाम से छपा है । तथा प्रथम प्रपाठक श्रेडर सम्पा०,हले १८८र सन् तथा बिब० इण्डि में सन् १६०६और द्वि०प्रपाठक सृ० होलस्टाईन सम्पाहले सन् १८८०)। (७) गृह्यासंग्रह, गोभिलपुत्रकृत (लूमफील्ड द्वारा Z.D. M. G. Vel ३५ में सम्पा० तथा बिब० इण्डि० द्वि० सन् १९१० ) । (८) पञ्च- विधसूत्र ( सत्यव्रतसा सम्पा० तथा रि० जीमन सम्पादित १९१३ ब्रेसला)। शिक्षामन्यों में तीन शिक्षा प्रसिद्ध हैं। (१) नारदीय शिक्षा ( सत्यव्रतसा० सं०, दत्ताय सम्पा लाहौर सन् १९०६ तथा शिक्षासंग्रह काशी में, सन् १८९३) । (२) लोमशीय शिक्षा (शिक्षा संग्रह सं० ) (३) गौतमीयशिक्षा (शिक्षा संग्रह सं०)। प्रातिशाख्यों में निम्नलिखित ग्रन्थ हैं। (१) ऋतन्त्र (ए०सी० बर्नेल सम्पा. १८७६)/(२) सामतन्त्र (दयानन्द महाविद्यालय के लालचन्द पुस्तकालय में इस की एक प्रतिलिपि है जो मद्रास गवर्नमेण्ट के संग्रह के एक ग्रन्थ से कराई गई थी)। (३) पुष्पसूत्र वा फुल्लसूत्र (रि० जीमन सम्पादित)। ... कुल चौदह (१४) ग्रन्थों का हम ने ऊपर उल्लेख किया है। इन के अतिरिक्त अठतीस (३८) और ग्रन्थ हैं। उन सब के नामादि .

( १७ ) जैमिनीय संहिता (von Dr. W. Caland, Breslau, 1917 ) पृ० १३-१५ पर देखो। २. राणायनीय शाखा । इस शाखा की संहिता अभी तक नहीं छपी । इस के सूत्र प्राथ निम्नलिखित हैं। (१) द्राशायण श्रौतसूत्र (कुछ भाग रियूटर सम्पादित लगडन ९६०४ सन्न्)। (२) खादिरगृह्यसूत्र अथवा द्राशायण गृह्यसूत्र (मैसूर राज्य संस्कृत ग्रन्थमाला १६१३ सन् तथा आनन्दाश्रम पूना सन्१९१४)। (३) गौतमपितृमेधसूत्र (कालेण्ड सम्पा० लाईपज़िग १८८६ सन्।। (४) गौतमस्मृति ( स्मृतिसमुच्चय, पूना )। राणायनीय-शाखा, सम्बन्धी इतने ग्रन्थों का वर्णन करके डाकार कालेण्ड महाशय एक विचार उपस्थित करते हैं। वह इतना आवश्यक है कि हम उस का अनुवाद दिये विना नहीं रह सकते- परन्तु इन सब अन्थों का राणायनीय-शाखा सम्बन्धी होना अनिश्चित ही है । कर्मप्रदीप पर आशार्क का भाष्य है । उस में वह बताता है कि गोभिलसूत्र कौथमों का ही गृह्यसूत्र नहीं प्रत्युत राणाय- नीयों का भी है। हेमाद्रिभी अपने श्राद्धकल्प में तीन वार (पृ० १४२४, १४६०,१४६८) गोभिल को राणायनीय-सूत्रकृतू कहता है। यदि यह बात मान ली जावे तो खादिरगृह्यसूत्र राणायनीयों का सूत्र नहीं रह सकता । अस्तु, दक्षिण भारत में शारदूलों के एक खादिर गृह्यसूत्र की विद्यमानता कही जाती है । ( देखो Report on a search for Sanskrit mss. in the Bombay Presidency 1892-95, by .A. V. Kathavate Bombay, 1901, No. 79 ) । शारदूल भी सामवेद की एक शाखा है । अब यही खादिर गृह्यसूत्र शारदूल सामगों के खादिर सूत्र से कुछ पाठभेदों को छोड़ के प्रायः मिखता । ।

। ( १८ ) बताया जाता है । हेमाद्रि के काल में शार्दूल शाखा की ऐतिह्य शृङ्खला अटूट थी, यह भी श्राद्धकल्प से ज्ञात होता है। उस में (पृ० १०७८) पर, वह वेद के उन भागों का उल्लेख करता है जो ब्राह्मणों के भोजन-समय शार्दूल-शाखा वालों को गाने चाहिये। अतएव यह स्पष्ट है कि कम से कम खादिरगृह्यसूत्र में मूलतः शार्दूलों सम्बन्धी गृह्यकर्म थे । परन्तु एक और ऐतिय भी खादिर- सूत्र सम्बन्धी है। मैसूर में १८८१ सन् में कण्ठभूषण भाष्य सहित जो गृह्यरत्न छपा है उस में अनेक वार गौतमगृह्यसूत्र का उल्लेख है । उस में जितने भी वाक्य गौतम के नाम से दिये गये हैं, वे सब हमारे खादिरगृह्यसूत्र में मिलते हैं । इस के अतिरिक्त जैसा हम पूर्व कह चुके हैं, हमारे पास एक गौतम पितृमेधसूत्र है, एक गौतम धर्मसूत्र (स्टैनज़लर सम्पा० लण्डन १८७६ ) * और पक स्मृति भी है। ये सब गौतमों के ग्रन्थ भी हो सकते हैं कि जो सामवेद का गौण भाग है। हम ने विद्वान् पाठकों के विचारार्थ श्री कालेण्ड-प्रदर्शित के सब पक्ष उद्धृत कर दिये हैं । अपनी सम्मति किसी और समय पर प्रकाशित करेंगे। जैमिनीय शाखा। इस शाखा के निम्नलिखित ग्रन्थ अब तक प्रकाशित हो चुके हैं। (१) जैमिनीय संहिता (Dr. W. Caland's edition, Breslau, 1907.) । (२) जैमिनीय-ब्राह्मण (इस के अनेक खण्ड हन्नस अटेंल ने पाश्चात्य अनुसन्धान पत्रों में प्रकाशित किये हैं। अन्य उपयोगी खण्डों का अधिकांश भाग ग्रन्थरूप में छप गया है-Das Taiminiya Brahmana in Auswahal, Amsterdam, 1919) हस्तलिखित सामग्री के अपर्याप्त होने से यह बृहब्राह्मण अभी पूरा नहीं छप सका)। (३) जैमिनीय उपनिषद्ब्राह्मण (अर्थात् गायत्र्युपनिषद, * इसके दो भारतीय संस्करण निकल चुके हैं. (१) मैसूर (२) मद्रास । " - ( १६ ) पूर्वोक्त ब्राह्मण का उत्तर भाग है । हन्नस अर्टेल सम्पा० १८८४ सन्) (४) आर्षेय-ब्राह्मणं (ए० सी० बर्नेल सम्पा० मंगलोर १८७८) । (५) जैमिनीय श्रौतसूत्र अग्निष्टोम-प्रकरण (डी: गॅस्ट्रा सम्पा० लाईडन सन् १९०६)* । (६) जैमिनीय-गृह्यसूत्र (edited by Dr. W. Caland, Amsterdam, 1905.) जैमिनीय-ब्राह्मण । शौनकादिभ्यश्छन्दसि ।” ४।३।१०६ के गण में पाणिनि "तलवकार" शब्द पढ़ते हैं। इसी तलवकार भृषि के नाम पर तलधकार शाखा प्रसिद्ध थी। उसी का अब जमिनि-शाखा नाम हो गया है । इसका कारण अभी पूर्णतया ज्ञात नहीं। संहिता के समान ब्राह्मण को भी अब जैमिनीय ब्राह्मण कहते हैं। श्री शङ्कराचार्य केनोपनिषद भाष्य के प्रारम्भ में लिखते है- केषितम्" इत्याद्योपनिषत्परब्रह्मविषया वक्तव्येति. नवमस्या- ध्यायस्यारम्भः । प्रागेतस्मात्कर्माण्यशेषतः परिसमापितानि समस्त- कर्माश्रयभूतस्य च प्राणस्योपासनान्युक्तानि कर्माङ्गसामविषयाणि च। अनन्तरं च गायत्रसामविषयं दर्शनं वंशान्तमुक्तम् ।” (अर्थ) “केनेषितम्” से प्रारम्भ होने वाली, परब्रह्मविषय के कहने वाली उपनिषद् कहीं जानी चाहिये। यह नवम् अध्याय का प्रारम्भ है। इस से पूर्व (आठ) अध्यायों में यक्ष कर्म पूरे कहे गये हैं। प्राणीपासना भी कही गई है। तत्पश्चात् गायत्रसाम और वंश कहा गया है।" तलवकार ब्राह्मण का यह वर्णन शङ्कर ने किया जैमिनीयब्राह्मण जो सम्प्रति मिलता है उसका अध्यायक्रम * जैमिनीय श्रौतसूत्र समग्र सभाष्य बड़ोदा राजकीय ग्रन्थमाला में शीघ्र ही छपेगा + जैमिनीय गृह्यसूत्र का कालेण्ड सम्पादित भारतीय संस्करण ला. मोतीलाल बनारसीदास सदमिठा बाज़ार लाहौर द्वारा शीघ्र प्रकाशित किया जायगा ।

( २० ) शङ्कर-प्रदर्शित अध्यायक्रम से विभिन्न है । प्रथम तीन अध्याय है। पश्चात् उपनिषद् ब्राह्मण प्रारम्भ होता है । उस में चार अध्याय हैं । केन उपनिषद् चतुर्थाध्याय के अठारहवें खण्ड से प्रारम्भ होता है, और इक्कीसवें पर समाप्त हो जाता है । वंश इस से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। सात खयड इस से भागे और हैं। सो सारे मिल के ब्राह्मण के सात अध्याय होते हैं। यदि आर्षेय- ब्राह्मण भी मिला लिया जावे तो सारे पाठ अध्याय होते हैं। सम्भव है और ग्रन्थ मिलने पर इस बात का निर्णय हो जावे। उपनिषद् ब्राह्मण । उपनिषद् ब्राह्मण को हन्नस अर्टेल महाशय ने अमेरेकन ओरिएण्टल सोसायटी के जर्नल सं० १५ में रोमन-लिपि मे सम्पादित किया था। मेरे कहने पर पण्डित रामदेव जी ने उसी से इस का देवनागरी संस्करण तय्यार किया था वही अब यहां छापा गया है। हस्तलिखित सामग्री। जिस हस्तलिखित सामग्री से अर्टेल ने अपना संस्करण सय्यार किया था उस का उल्लेख उस ने अपनी भूमिका में इस प्रकार दिया है- A. बर्नेल के नोटानुसार जो लपेटने वाले काग़ज़ पर है, यह हस्तलेख “मलाबार हस्तलेख से नकल किया गया,” १८७८ सम् में । अन्त में वह लिखता है "मूल की तिथि, कुल्लम १०४०=१८६४ सन्। पलघट के हस्तलेख से।" B. तालपत्रों पर लिखे ग्रन्थ से, लगभग ३०० वर्षपूर्व लिखा गया, तिन्नवली से प्राप्त, परन्तु पहले अलेप्पी से लाया गया था।" इस के पाठभेद ही दिये गये हैं। C. बर्नेल के हाथ की रोमन लिपि में किया हुआ ग्रन्थ । यह १८ पर समाप्त हो जाता है। + .

. , - ( २१ ।) A. ग्रन्थ का पाठ और B. के पाठभेद अन्थाक्षरों में हरिवर्षीय कागज पर हैं । वे प्रो० जानअवेरे द्वारा रोमन में लिखे गये थे, और कापी प्रो० हिटने ने मूल से मिला ली थी । उन्हों ने C.के पाठभेद भी दे दिये थे। इसी कापी से यह संस्करण तय्यार किया गया है। मूल अय इण्डिया आफिस लण्डन के पुस्तकालय में है। हस्तलेखों में ऐसा शीर्षक है तलवकारब्राह्मणे उपनिषद्राह्मणम् । अनुवाक, खण्ड और कण्डिकादि के विभाग विषय में श्रीअटेल ने यह लिखा है । "वाक्यों (कण्डिकाओं) के अङ्क देने में हस्तलेख असावधान और असङ्गत हैं | A. अनुवाक और खण्डविभाग नहीं देता, परन्तु प्रत्येक अध्याय की कण्डिकाओं पर क्रमशः अङ्क देता है । मैंने अनुवाक और खण्ड विभागों में B. और C. की अथवा कण्डिकाओं के अङ्कों में तीनों हस्तलेखों की साधारण अशुद्धियों और विलोपों का लिखना उपयोगी नहीं समझा। अध्याय २१ से A. और B. अडगे का नया प्रकार (कण्डिकाओं की समाप्ति पर) प्रारम्भ करते हैं । तथापि तीन पहली कण्डिकाएं (२।१-३) छोड़ते हैं, और २।४ को २ लिखते हैं । पर इस के पश्चात् नियमपूर्वक अर्थात् २५-५ इत्यादि, लिखकर तृतीय अध्याय के अन्त तक जाते हैं, २४२=५७ । B. में अङ्क देने के एक और क्रम के भी अवशेष है । यहां तीसरे अध्याय की प्रथम तीन कण्डिकाओं पर और अङ्कों के साथ क्रमशः ५६,५७और५८ लिखा है। B. में ३।१८ पर ७०,३।२२ पर ७३, ३।३२ पर ७ के अङ्क अधिक हैं । इन अन्तिम तीन अनुवाकों की गणना स्पष्ट ही इस अध्याय के प्रथम तीन से विभिन्न है । साथ ही भूल की. कण्डिकाओं के क्रम से भी भिन्न है। 'तीनों हस्तलेख एकही सदोष मूल से पाए हैं। तीनों में सामान्य भ्रष्टपाठ हैं । विराम, अत्तर-विन्यास और सन्धि-सम्बन्धी ( २२ ) 1. . बातों में भी वे असावधानी से लिखे गए हैं। मैने इन बातों के ठीक करने में स्वतन्त्रता वर्ती है । सब स्थलों में, जो केवल अक्षर-विन्यास सम्बन्धी नहीं है, मैंने हस्तलेखों के पाठ-भेद पृष्ठ के नीचे दिये हैं। निर्देशों की सरलता के लिये मैंने प्रत्येक अध्याय में निरर्थक अनुवाक विभाग का ध्यान न करते हुए क्रमशः खण्डाडू देदिया है । हस्त लेखों में कण्डिकाओं पर कोई अङ्क नहीं तथापि मैंने यह दे दिया है। म - r . R । । - अमेरेकन संस्करण के अन्त में अर्टल महाशय ने चार सूचियां दी हैं। [१] आवश्यक शब्दों और मृषि नामों आदि की सूची । [२] निर्वचनों की सूची। [३] व्याकरण सम्बन्धी प्रयोजनीय स्थल । [४] उद्धरणों की सूची । हमने प्रथम सूची में से ऋषि नाम: पृथक् करके उनकी सूची देदी है। अन्य शब्दों को इस लिए नहीं दिया कि दयानन्द महाविद्यालय के अनुसन्धान विभाग की ओर से उपलब्ध ब्राह्मणों आदि की एक विस्तृत सूची तय्यार हो रही है। उसमें ये शब्द और अन्य शब्द भी आवेंगे, अतः उनको यहां छापना आवश्यक नहीं समझा । सूचियां (२) और (४) भी हमने देदी हैं। तीसरी को हम प्रा-वीय पण्डितों के लिए अनावश्यक समझते हैं। . . पं० रामदेव ने पाठभेदों को देने के लिये A.B.C. के हवाले नहीं दिये। सो आवश्यक होने पर भी यह रह गये हैं। पहले फामों में उन्हों ने Omitted के स्थान में "श्रीम" दिया था। मैंने आगे चल कर उस के स्थान में संस्कृत शब्द "नास्ति कर दिया है। यह संस्कृत शब्द होने से एतद्देशीय जनों के लिये अधिक उपयोगी है। अटेल ने प्रत्येक खर सन्धि पर 'कामे' का चिह्न दिया हुआ था । रामदेव जी ने उस के स्थान में 'चिह्न दे दिया था । संस्कृत में यह अनावश्यक है, अतः दूसरे फार्म से मैंने इसे भी हटा दिया है। . Hetaw " - ( २३ ) जैमिनीय उपनिषदब्राह्मण के सम्बन्ध में विशेष वक्तव्य । जैसा पूर्व लिखा जा चुका है, यह ब्राह्मण, बृहद् जैमिनीय ब्राह्मण का एक भागमात्र है । इस का मूल नाम "गायत्र उपनिषद् है । जै० उ० प्रा०४॥ ७ के अन्त में यही नाम आया है। यह नाम है भी सार्थक, क्योंकि इन सारे अध्यायों में गायत्र साम का ही वर्णन है । उसी से अमृत अर्थात् मोक्ष की प्राप्ति जताई गई है। जै० उ० ब्रा० ३।४० के प्रारम्भ में यही कहा गया है- तदेतदमृत गायत्रम् । एतेन वै प्रजापतिरमृतत्वमगच्छदेतेन देवा एतेनर्षयः॥२॥ अर्थात् वह यही अमृत गायत्र (साम) है। इसी से प्रजापति मुक्त हुआ, इसी से (अन्य ) विद्वान्, इसी से मन्त्रार्थ द्रष्टा (कृषि)। इस ब्राह्मण में दो स्थलों पर अर्थात् ३४०-४२॥ और ४।१६,१७॥ पर दो वंश परम्पराएं आई हैं । अन्तिम वंश परम्परा पहली से कुछ ही अन्य नाम रखती है। यह है भी छोटी। पहली का प्रारम्भ "ब्रह्म" से होता है । (१) ब्रह्म ने (२ प्रजापति के लिये। उसने (३) परमेष्ठी के लिये । उसने (४) देवसविता के लिये इत्यादि। शतपथब्राह्मण (माध्यन्दिन) में भी दशम काण्ड की समाप्ति पर और चौदहवें काण्ड के अन्त से कुछ पहले दो शृषि वंशा- पलियां आई हैं। पूर्वली में बताया गया है कि स्वयम्भु ब्रह्म ने प्रजा- पति को विद्या पढ़ाई, और उत्तरली में कहा है कि परमेष्ठी को। जै० उ० ब्रा० में एक रूप से इन दोनों का मेल है । अर्थात् ब्रह्म, प्रजापति, और परमेष्ठी यद्यपि समकालीन थे, तथापि गायत्र साम का रहस्य ब्रह्म ने स्वयं परमेष्ठी को नहीं बताया, प्रत्युत यह उस तक प्रजापति द्वारा प्राया। । .

. ॐ ( २४.) . . । 17 जैमिनीय ब्राह्मण कोई नया ब्राह्मण नहीं। शतपथ ब्रा० के द्वि० वंश में ब्रह्म से लेकर अपने आप (वयं) तक ६८ नाम हैं। जै० उ० ब्रा के प्रथम वंश में ब्रह्म से लेकर वैपश्चित दा० गुप्त लौहित्य तक ५० नाम हैं । प्रत्येक ब्राह्मण के सव वंशों को मिला कर और यदि कुछ नाम छूट गये हैं तो उनका स्थान छोड़ कर भी ब्रह्म से ऋषियों की एक जैसी संख्या होजायगी। इस से प्रतीत होता है कि आर्यावर्त्त के इतिहास में ब्राह्मणों के संकलन का समय प्रायः एक ही था। ब्रह्मा से जो अनेक विद्याय अनेको कुलों में चली आई थीं, वही इतिहासयुक्त करके प्रायः एक काल में एकत्र कर ली गई। जैमिनीय ब्राह्मण भी उसी समय संकलित हुआ। जब यह ग्रन्थ छप रहा था, तब श्रीमान् कालेण्ड महाशय ने मुझे पत्र लिखा कि वे अर्टल के कई पाठ शुद्ध कर देंगे। तब मैंने उन्हें मुद्रित७२ पृष्ठ भेज दिये थे। उन्होंने उनके हाशिये पर संशोधन कर दिया है। वह भूमिका के अन्त में छाप दिया गया है । अगले पृष्ठों का संशोधन फिर कभी छापा जायगा । इस परिश्रम के लिए जो उन्होंने स्वयं मेरा, ध्यान उधर खैच कर किया है, मैं उन का अत्यन्त अनुगृहीत हूं। इस ग्रन्थ के प्रूफ पं० विश्ववन्धु एम० ए० शास्त्री, तथा पं० हंसराज. पुस्तकाध्यक्ष लाल चन्द पुस्तकालय ने देखे हैं । इन दोनों म.शयों का भी मैं कृतज्ञ हूं। परमदयामय भगवान् अपनी कृपा से इन हृदय-पावक ग्रन्थों के प्रचार में मेरी सहायता करें। इत्योम्...... दयानन्द महाविद्यालय लालचन्द पुस्तकालय लाहौर भगवत्त माघ, संक्रान्ति सं० १९७७ १ ७ ५. दा ६. x - tv * * * ม ม ts श्री कालेण्ड-प्रदर्शित सटिप्पण पाठ संशोधन । पंक्ति प्रकाशित पाठ संशोधित पाठ ३, सिच्येतैषमे० १२ सिच्यादेवमे० ५, हैषाखला हैऽषा खला ५. उतैषाखला उतषा खला ०प्रति यस्य प्रत्यस्य हस्त ले०पाठ शुद्ध है। देखोपाठ भेद। लोप्टो लोष्टो ळयित्वा पनि ळयित्वापनि ववर्ज ववृजे* बहु बहो, ११, वैवेद वावेद० यदमृते यदनृचे देवा देवाः 'कस्मादु कस्माउ सप्ताहोरात्रा: सप्त होत्राः अभिपयुक्त अभिपर्यस्त [उच्चा] हस्मि] च. तद्य? यद्यद्वै ४६, प्रजापतिर्वा वेद अग्र प्रजापतिविदमन ४६, ૨૨ सुनोति सनोति ૨ सर्क सर्क ५३, गयतन .भयतना ३ पुनीध्वं न पूता व पुनीध्वमपूतावै ययाच पपाच or पपर्च * The mss. (Grantha) have ववृज or वव्रज which nearly is the same in Grantha. If the Sandhi is effaced we ought to return ववृजे । + इदमायतना is a. bahuvrthi compound: पाठभेद जो नीचे दिया है, वह ठीक है। + Must be corrupt. उचा ह च १ 1 शुद्धिपत्रम् । पं० अशुद्ध सिंहि० शुद्ध संहि० भू०४ ५ ४, ६, ८, ११ अग्नि सूर्य . १२ १३ ०सा ०सा- - यत्पर तद यत्परतद १ ३ शामूल प० १३ श्रेयस शामूलप० श्रेयस एवंवि० एवं वि० - १०६ १०७ वाङ বায वाङ् पानो १५ . ११३ युष्यासु रतो ०सपृणाति ३ १३१ १४२ युष्मासु रेतो स्पृणाति स्वर्गस्य च्छुक्ल स्वगस्य १४६

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Hmelalba belezhle
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ओ३म् जैमिनीय-उपनिषद्-ब्राह्मणम् ३ प्रजापतिर्वा इदं त्रयेण चेदेनाऽजयद् यदस्येऽदं जित तत् ॥ १।। स ऐक्षतेऽत्थं चेद्वा अन्ये देवा अनेन वेदेन यक्ष्यन्त इमां वाव ते जितिं जेष्यन्ति ये ऽयम्मम । हन्त त्रयस्य वेदस्य रस- माददा इति ॥ २॥ स भूरित्येवघेदस्य रसमादत्त । सेऽयम्पृ- थिव्यभवत् । तस्य यो रसः प्राणेदत् सोऽग्निरभवद्रसस्य रसः ॥ ३ ॥ भुन इत्येव यजुर्वेदस्य रसमादत्त । तदिदमन्तरिक्षम- भवत् । तस्य यो रसः प्राणेदत् स वायुरभवद्रसस्य रसः॥४॥ स्मरित्या सामवेदस्य रसमाद् त । सोऽसौ द्यौरभवत् । तस्य यो रसः माणेदव स आदित्योऽभवद्रसस्य रसः॥५॥अथै कस्यै- या ऽक्षरस्य रसं नाऽशकोदादातुम् ओमित्येतस्यैऽव ॥६॥ सेऽयं वागभवत् । ओमेव नाम ऽषा । तस्याउ प्राण एव रसः॥७॥ ६ तान्येतान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायनी। गायत्रं सामा ब्रह्म उ गायत्री। तद्ब्रह्माऽभिसंपद्यते। अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥८॥१,१ प्रथमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १.१वेदन । २ वाजयद ।३ पदेन । ४ हन्ता। ५'द' अधिकाला।

३ ( २ ) स यद् प्रोमिति सोऽग्निर्वागिति पृथिव्योमिति वायु- गित्यन्तरिक्षमोमित्यादित्यो वागिति द्यौरोमिति प्राणो वागित्येव वाक् ॥ ५ ॥ स य एवं विद्वानुद्गायत्योमित्येवाऽग्निमादाय पृथि- व्याम्प्रतिष्ठापयत्योमित्येव वायुमादायाऽन्तरिक्षे प्रतिष्ठापयत्यो- मित्येवाऽऽदित्यमादाय दिवि प्रतिष्ठापयत्योमित्येव प्राणमादाय वाचि प्रतिष्ठापयति ॥२॥ तद्देऽतच्छैलना गायत्रं गायन्त्यो- वा ३ च् ओवाश्च् ओवा३च् हुम्भा ओवा इति ॥ ३ ॥ तदु ह तत्पराङ् इवाऽनायुष्यम् इव। तद्वायोश्चाऽपांचानुवर्म गेयम् ॥४॥ यद्वै वायुः पराङ् एव पवेत क्षीयेत (स )। स पुरस्ताद्वाति स दक्षिणतस्स पश्चात्स उत्तरतस्स उपरिष्टात्स सर्वा दिशोऽनुस- वाति ॥५॥ तदेतदाहुरिदानी वा अयमितोऽवासीदथेऽत्थाद्वाती ऽति । स यद्रेष्माणं जनमानो निवेष्टमानो वाति क्षयादेव बिभ्यत् ॥६॥ यदु हवा आपः पराचीरेव प्रसृतास्स्यन्दरन् क्षीयस्ताः। यदकांसि कुर्वाणा निवेष्टमाना आवर्तान् सृजमाना यन्ति क्षयादेव विभ्यतीः । तदेतद्वायोश्चैऽवाऽपां चाऽनु वर्त्म गेयम् ॥७॥१,२।। प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। ६ 3 ૨ २, १ अन्तरीक्ष० । २ पापा । ३ वाची । ४ छेल०, छील् । ५ च । ६ परांद्, पुराद् । ७ रिष्ठात् । ८ सीत् । यजमानो, जमानो। १० वम् ११ दयद्, यद् १२ अङ्कासि ।

( ३ ) ३ ओवा ओवा ओवा हुम्भा ओवा इति करोत्येव । एताभ्यां सर्वमायुरेति ॥ १॥ स यथा वृक्षमाक्रमणराक्रममाण इयादे- वमेवैऽते द्वे-द्वे देवते संधायेऽमां लोकान् रोहनति ॥२॥ एक उ एव मृत्युरन्वेत्यशनयैऽव ॥ ३ ॥ अथ हिङ्करोति । चन्द्रमा वैहिङ्कारोऽन्नमु वै चन्द्रमाः । अन्नेनाऽशनयां नन्ति ॥४॥ तां-तामशनयामन्नेन हत्योऽमित्येतमेवाऽऽदित्यं समयातिमुच्यते। एतदेव दिवश्छिद्रम् ॥५॥ यथा खं वाऽनस स्स्याद्रथस्य वैज्वमे- तदिवश्छिद्रम् । तद्रश्मिभिस्संछन्नं दृश्यते ॥ ६॥ यद्गायत्रस्योऽऽ- व हिङ्कारात्तदमृतम् तदात्मानं दध्यादथो यजमानम् । अथ यदितरात् सामोऽऽध्वं तस्य प्रतिहारात् ॥७॥स यथाद्भिरा- पस्संसृज्येरन् यथा निनाऽग्निस्संसृज्येत यथा क्षीरे तीरमा- सिच्यादेवमेवै ऽतदत्तरमेताभिर्देवताभिस्संसृज्यते ॥८॥१,३॥ प्रथमेऽनुवांके तृतीयः खण्डः। तं वा एतं हिङ्कारं हिम्भा इति हिकुर्वन्ति । श्रीधैं भाः। असौ वा आदित्यो भा इति ॥३॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमन गर्ने १ ३.१ प्रोव २ ऐव् ३ अक्रम ४ इति ५ त्यां, त्य (नस ७ रसस्य पन्न त्वदू, तदू (?) १० रान् । ५. प्रोम् २ गंभ। .

. ( ४ ) بله इनि । यद् इति स्त्रीणाम प्रजननं निगच्छति तस्मान्तो ब्राह्मगा ऋषिकल्पो जायतेऽतिव्याधी राजन्यश्शूरः ॥२॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमनु दृषभ इति । यद् इति निगच्छति तस्मात्ततः पुण्यो बलीवर्दो दुहाना धेनुरुक्षा दशवाजी जायन्ते ॥ ३ ॥ एतं हवा एतं न्यङ्गमनु गर्दभ इति । यद् इति निगच्छंति तस्मात्स पापीया- छेयसीषु चराति तस्मादस्य पापीयसश्रेयो जायतेऽश्वतरो वा- ऽधतरी वा ॥ ४ ॥ एतं ह वा एतं न्यङ्गमनु कुभ्र इति । यद् इति निगच्छति तस्मात् सोनार्यस्सन्नपिराज्ञः पामोति ॥५॥ तं है- ऽतमेके हिङ्कारं हिम्भा ओवा इति बहिर्धेय हिङ्कुर्वन्ति । बहिर्धे ऽव वै श्रीः । श्री सानो हिङ्कार इति ॥ ६ ॥ स य. एनं तत्र श्रूयादहि(न्वा अयं श्रियमधित पापीयान् भविष्यति । स यदा वै म्रियतेऽथानौ प्रास्तो भवति । क्षिबत मरिष्यत्यग्नोवनम्मासिष्यन्ति"इति तथा हैऽव स्यात् ॥ ७ ॥ तस्माद् है त हिङ्कारं हि वो इत्यन्तरिवैज्वाऽऽत्मन- जयेत् । तथा ह न बहिर्वा श्रियं कुरुते सर्वमायुरेति॥८॥१,४ प्रथमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । ११ ४.३ स्त्रिण ४ जायत इतिव्य ५ यपतू इय ७ ऽति' अधिक ८ नाक्थ्यरस, नाथ्यस ६ अोम् । बहिर्धेव......तत्र नयादू : १० बहिर्द्धवे, प्रोम् । व ११ यत्तीति ।

( ५ ) ૨ ४ .. सा हैऽषा खला देवताऽपसेधन्तोऽतिष्ठति । इदं वै त्वमत्र पापमकर्णेऽहैऽऽष्यसि । यो वै पुण्यकृत् स्यात् स इहेऽयादिति ॥१॥ स ब्रूयादपश्यो वै त्वं तद्यदहं तदकरवं तद्वै मा त्वं नाऽका- रयिष्यस्त्वं वै तस्य कर्ताऽसीति ॥२॥ सा ह वेद सत्यम्माऽऽहे- ति । सत्यं हैऽषा देवता । सा ह तस्य नेऽऽशे यदेनमपसेधेत् सत्यमुपैऽवह्वयते ॥ ३ ॥ अथ होऽवाचैऽक्ष्वाको वा पाणो- ऽनुवक्ता या सात्यकीर्त उतैषा खला देवताऽपसेधुमेव ध्रियतेऽ- स्यै दिशः ॥४॥ [ तद् ] दिवोऽन्तः । तदिमे द्यावापृथिवी संश्लिष्यतः । यावती वै वेदिस्तावतीऽयम्पृथिवी । तधत्रैऽतच्चा- वालं खातं तत्सम्प्रति स दिव आकाशः॥५॥तद्धहिष्पक्माने स्तूयमाने मनसोऽद्गृहीयात् ॥ ६॥ स यथोऽच्छायम्प्रति यस्य प्रपद्यतेऽवमेवैतया देवतयेदममृतमभिपर्येति यत्राध्यमिदं तपती- ति ॥७॥ अथ होवाच-॥८, १, ४ ।। प्रथमेऽनुबाके पञ्चमः खण्डः । गोवलो वाणः क एतमादित्यमहति समयऽतुम् । दूराद्वा एष एतत् तपति न्यङ् । तेन वा एतम्पूर्वेण सामपथस्तदेव मनसा- ១ ។ । ६.१ ऽति' अधिक २ त्वद् ३ अर्क ४ स ५सत्यम्महे . मनम् ७क्षको ८ सत्यकीत ६ अ १० धृय ११ प्रत्यस्य १२ ऽततय ।

- १ ૨ ३ ( ) हृत्योऽपरिष्टा देतस्यैऽतस्मिन्नते निराविति". ॥ तदा होवाच शाळ्यायनिस्समयैऽवाऽतदेनं कस्तद्वेद । यधेता आपो वा अभितो यद्वायुं वा एष उपह्वयते रश्मीन्वा एष तदेतस्मै व्यूह- तीति ॥२॥ अथ होऽवाचोऽलुक्यो जानश्रुतेयो यत्र वा एष एतत् तपत्येतदेवामृतम् । एतच्चद्वै प्रामोति ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्तते ॥ ३॥ कस्तद्वेद यत्परेणाऽऽदित्यमन्तरिक्षामिदमना- लयनमवरेण ।। ४ ।। अथैऽतदेवाऽमृतम् । एतदेव मां यूयम्प्राप- यिष्यथ । एतदेवाहं नातिमन्य इति ॥५॥ तान्येतान्यष्टौ । ११ अष्टाक्षरा गायत्री । गायत्रं साम । ब्रह्म उ गायत्री । तदु ब्रह्मा- भिसम्पद्यते अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥५॥ १,६॥ प्रथमेऽनुवाके षष्ठः खण्डः । ता एता अष्टौ देवताः । एतावदिदं सर्वम् । [......] करोति ॥१॥ स नैषु लोकेषु पाप्मने भ्रातृव्यायावकाशं कुर्यात् । मनसैनं निर्भजेत् ॥ २॥ तदेतदृचाऽभ्यनूच्यते । "चत्वारि वाक् परिमिता पदानि तानि विदुर्ब्राह्मणा ये मनीषिणः। ३ ६.१वाऽयं २ तथ्, त ३ स्यै ४ अथो ५ोम वाचा (!) उलुक्यो, उनुष्यो ७ मत् ८परोय अन्विवय १० त, प्रापिए ११ यत ।

( ७ ) १ • ६ गुहा त्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्ति" इति ॥३॥ तद् यानि तानि गुहात्रीणि निहिता नेऽङ्गयन्ती (इती)ऽम एव ते लोकाः॥४॥ तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्तीति । चतुर्भाग ह वै तुरीयं वाचः । सर्वयास्य वाचा सर्वैरेभिलॊकैस्सर्वेमास्य कृतम्भ- वति य एवं वेद ॥५॥ स यथाश्मानमाखणमृत्वा लोष्ठो विध्वं- सत एवमेव स विध्वंसते य एवं विद्वाँसमुपवदति ॥६॥ प्रथमेऽनुवाके सप्तमः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ प्रजापतिर्वा इदं त्रयेण वेदेनाऽजयद्यदस्येदं जितं तत् ॥१॥ स ऐक्षतेत्थं चेद्वा अन्ये देवा अनेन वेदेन यक्ष्यन्त इमां वाव ते जितिं जेष्यन्ति येऽयम्मम ॥१॥ हन्तेऽमं त्रयं वेदम्पीळयानीति ॥३॥ स इमं त्रयं वेदमपीळयत् । तस्य पीळयन्नेकमेवाक्षरं ना- शक्नोत् पीलयितुमोमिति यदेतत् ॥ ४॥ एष उ ह वाव सरसः। सरसा ह वा एवंविदस्त्रयीविद्या भवति ॥५॥ स इमं रसम्पी- २ . ७.१ तानि २ नो, अोम ३ गयन्ति ४ तानि ५ अोम कृत्वा ७ लोप्टो ८ ओम् एवम् विध्वंसते स एषो...उपवदन्ति । १. ने २-दा, द३,--को. द्रवं ।

-- । ९ १० . १२ १७ (८) लयित्वा पनिधायोऽsोऽद्रवत् ॥६॥तं द्रवन्तं चत्वारोदेवाना- मन्वपश्यन्निन्द्रश्चन्द्रो रुद्रस्समुद्रः। तस्मादेते श्रेष्ठा देवानाम् एते ह्ये- नमन्वपश्यन् ॥७॥सयोऽयं रस आसीत्तदेव तपोऽभवत् ॥८॥ त इमं रसं देवा अन्वैक्षन्त । तेऽभ्यपष्यन्त स तपो वा अभूदिति , ॥६॥ इममु वै त्रयं वेदम्मरीमृशित्वा तस्मिन्नेतदेवाक्षरमपीळित- मविन्दन्नोमिति यदेतत् ॥ १० ॥ एष उ ह वाव सरसः । तेनै- नम्पायुवन् । यथा मधुना लाजान् प्रयुयादेवम् ॥११॥ तेऽभ्य- तप्यन्त । तेषां तप्यमानानामाप्यायत वेदः । तेऽनेन चतपसाऽपीनेन च वेदेन तामु एव जितिमजयन् याम्प्रजापतिरजयत् । त एते सर्व एव प्रजापतिमात्रा अया३म् अयम् इति ॥१२॥ तस्मात्तप्यमा- मस्य भूयसी कीर्तिर्भवति भूयो यशः । स य एतदेवं वेदैवमेधा- ऽपीनेन वेदेन यजते।यदो याजयत्येवमेवाऽपानेन वेदेन याजयति ॥ १३ ॥ तस्य हैतस्य नैव काचनाऽतिरस्ति य एवं वेद । स य एवैनमुपवदति सातिमृच्छति ॥१४॥ द्वितीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । ५. खेते ६. प्रोम् ७ सेनं ८ अन्, ऐच ६ तेभ्यप १०--श्यस्त-११ पीळितं. ता १२ वा १३. प्राय १४ ययाद् :१५. तेन, ते पन, तेनैन १६. यत् १७ यन् १८ अ३याम १८ प्रोम् यजते यदो-देन २० एव अपि २१ असि २२ उपदति उक्दति २३ अच्छति, पर- १ २१ ૨૨ ( ६ ) 10 ४ ७ तदाहुदोवा ओवा इति गीयते कात्रभवति क सामेति ॥१॥ोम इति वै साम वागित्यक् । ओमिति मनो वागिति वाक् । प्रोमिति प्राणो वागित्येव वाक् । भोमितीन्द्रो वागिति सर्वे देवाः । तदे- तदिन्द्रमेव सर्वे देवा अनुयन्ति ॥२॥ ओमित्येतदेवाक्षरम् । एतेन पै संसवे परस्येन्द्र जीत । एतेन ह वै तद्धको दालभ्य आजके- शिनामिन्द्र ववर्ज । प्रोमित्येतेनैवाऽऽनिनाय ॥३॥ तान्येतान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री गायत्रं साग । ब्रह्म उ गायत्री। तदु ब्रह्माभिसम्प- द्यते । अष्टाशफाः पशवस्तेनो पशव्यम् ॥४॥तस्यैतानि नामानीन्द्रः कर्माक्षितिरमृतं व्योमान्तो वाचः । बहुर्भूयस्सर्वं सर्वस्मा- दुत्तरं ज्योतिः। ऋतं सत्यं विज्ञानं विवाचनमप्रतिवाच्यम् । पूर्व सर्व सर्वा वाक् । सर्वमिदमपि धेनुः पिन्वते परागर्वाक ॥५॥१६॥ ९ १ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । सा पृथक्सलिलं कामदुधाक्षिति माणसहितं चक्षुश्श्रोत्र वाक्प्रभूतम्मनसा व्याप्तं हृदयान ब्राह्मणभक्त मन्त्रशुभं वर्षपवित्र . ३ १. पवा । २. अोवात (%ोषा ३?) ३. ऋग। ४. प्रवृञ्ज-५-शीन्-शीन-६. यवज । ७. वनिनाय ।८-३; 'तीति ।-हिर १०.विजिज्ञा-११-प्रः । १ सा । २-तुश्रोत्र-३-दयोय्-1४. भक्त्रम, भ्रत्रम, भृत्रमः।

- ( १० ) गोभग पृथिव्युपरं तपस्तनु वरुणपरियतनमिन्द्रश्रेष्ठं सहस्राक्षर- मयुतधारममृतं दुहाना सर्वान् इमाँलोकानभिविक्षरतीऽति ॥२॥ तदेला सत्य भक्षरं यदोम् इति । तस्मिन्नापः प्रतिष्ठिता अप्नु पृथिवी पृथिव्याधिमे लोकाः ॥२॥ यथा सुच्या पलाशानि सन्तृण्णानि स्युरेवमेतेनाक्षरेणेमे लोकारसंतृरणाः . । १० . ૧ ૨. तदिदमिमान् अतिविध्य दशधा क्षरात शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा ( नियुतधा) ऽर्बुदधा न्यर्बुदधा निखर्वधा पद्ममक्षिति- व्योमान्तः॥४॥ यथौषो विष्यन्दमानः परः-परोवरीयान् भव- त्येवमेवैतदक्षरम्पर:-परोवरीयो भवति ॥॥ ते हैते लोका ऊधी एव श्रिताः । इम एवं त्रयोदशमासाः ॥६॥ स य एवं विद्वानुद्रायति स एवमेवैताँलोकानतिवहति । ओमित्येतेनाक्षरेणा- . । मुमादित्यम्मुख अाधत्ते । एष ह वा एतदक्षरम् ॥७॥ तस्य सर्वमाप्तम्भवति सर्व जितं न हाऽस्य कश्चन कामोऽनाप्तो भवति य एवं वेद ॥८॥ तद्ध पृथुर्वैन्यो दिव्यान् व्रात्यान् पप्रच्छ । ५. पर्यतू- ६-७ अोमिति | ८-प्सुः । ६ आम्, 'इदं' और दशधा के मध्य स्थान रिक्त है । १० निर्बु-११ निखर्वाच, निखर्वदाच । १२-नान् । १३ भोम् । परः परो।१४ ते । १५ तसि।१६ कण्व |१७ वै ।

१८ 3 तेभ्यो हिङ्कारम्पायच्छत् । तस्मात्पशवो हिङ्करिक्रतो विजिज्ञास- ( ११ ) स्थूणां दिवस्तम्भनी सूर्य माहुरन्तरिक्षे सूर्यः पृथिवीप्रतिष्ठः । अप्सु भूमीश्शिश्यिरे भूरिभाराः किं स्विन्महीरधितिष्ठन्त्याप इति ॥ ६॥ ते ह प्रत्यूचुस् स्थूणामेव दिवस्तम्भनी सूर्य माहुरन्तरिक्ष सूर्यः पृथिवीप्रतिष्ठः । अप्सु भूमीशिश्यिरे भूरि- भारास्सत्यम्महीरधितिष्ठन्त्याप इति ॥ १० ॥ ओमित्येतदेवाक्षरं सत्यम् । तदेतदापोऽधितिष्ठन्ति॥११॥१॥१०॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः । प्रजापतिः प्रजा असृजत । ता एनं सृष्टा अन्नकाशिनीरभित- स्समन्तम्पर्यविशन् ॥१॥ ता अब्रवीत्. किंकामास्स्थेति । अन्नाद्य- कामा इत्यब्रुवन्।।२।।सोऽब्रवीदेकं वै वेदमन्नाद्यममुक्षि सामैव । तद्वः प्रयच्छानीति । तन्नः प्रयच्छेत्यब्रुवन् ॥३॥ सोऽब्रवीदिमान्दै पशून् भूयिष्ठमुपजीवामः । एभ्यः प्रथमम्प्रदास्यामीति ॥४॥ २०. ३ १८-मिश् । १६ शिशिरे। २० अथित् । २. वा । २. षाम-३ पृय-४ -कृतो।

( १२ ) माना इव चरन्ति ॥॥ प्रस्तावम्मनुष्येभ्यः । तस्मादु ते रतुक्त इवेदम्मे भविष्यत्यदो मे भविष्यतीति ॥६॥ आदि वयोभ्यः। तस्मात् तान्याददानान्युपापपातमिव चरन्ति ॥७॥ उद्गीथं देवेभ्यो ऽमृतम् । तस्मात्तेऽमृताः॥८॥ प्रतिहारमारण्येभ्यः पशुभ्यः । ६ ७ तस्मात्ते प्रतिहृतास्तन्तस्यमाना इव चरन्ति ॥६॥ १॥१५॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । '१ २ ३ उपद्रवं गन्धर्वाप्सरोभ्यः । तस्मात्त उपद्रवं गृह्णन्त इव चरन्ति ॥१॥ निधनम्पितृभ्यः । तस्मादु ते निधनसंस्थाः ॥२॥ तद्यदेभ्यस्तत् साम प्रायच्छदेतमेवैभ्यस्तदादित्यम्पायच्छत् ॥३॥ स यदनुदितस्सहिङ्कारोऽोदितः प्रस्तावासंगवमादिर्माध्यन्दिन उद्गीथोऽपराहणः प्रतिहारो यदुपास्तमयं लोहितायति स उपद्रवो ऽस्तमित एव निधनम् ॥४॥ स एष सबै.कैस्समः । तद्यदेष सर्वैलॊकैस्समस्तस्मादेष एव साम । स ह वै सामवित् स साम वेद य एवं वेद ॥६॥ ते ऽब्रुवन् दूरे वा इदमस्मत् । तत्रेदः कुरु ५. स्तुवतेव । ६. प्रतिहतास । ७. तात (?) स् (!) यमाना; तातास्यमाना। १-आपसरेभ्यः।२ अर्थोदित्-आदित्यः। ४ द्विवार'स सामवेद' देता है।

यत्रोपजीवामेति ॥६॥ तहतूनभ्यत्यनयत् । स वसन्तमेव हिङ्कार- मकरोग्रीष्यम्मस्वावं वर्षामुद्गीथं शरदम्पतिहारं हेमन्त निधनम् । मासार्धमासावेव सप्तामावकरोत् ॥७॥ तेऽब्रुवन्नेदीयो न्वावैतर्हि । तत्रैव कुरु यत्रोपजीवामेति ॥८॥ तत् पर्जन्यमभ्यत्यनयत् । स पुरोवातमेव हिङ्कारमकरोत् ॥६॥ १ ॥ १२॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । जीमूतान प्रस्ताचे स्तनयित्नुमुद्गीथं विद्युतम्प्रतिहारं दृष्टि निधनम् । यदृष्टात्मजाश्चौषधयश्च जायन्ते ते सप्तम्यावकरोत् ॥१॥ तेऽब्रुवन्नेदीयोन्वावर्ताह । तत्रय कुरु यत्रोपजीवामेति ॥२॥ तद्यज्ञमभ्यत्यनयत् । स यतॄष्येव हिङ्कारमकरोडचः प्रस्तावं सामान्युद्गीथं स्तोमम्प्रतिहारं छन्दो निधनम् । स्वाहाकारवषट्- कारावेव सप्तमावकरोत् ॥३॥ तेऽब्रुवन् नेदीयो न्वावैतर्हि । तत्रैव कुरु यत्रोपजीवामेति ॥४॥ तत्पुरुषमभ्यत्यनयत् । स मन एव हिङ्कारमकरोद्वाचम्प्रस्तावम्प्राणमुद्गीथं चतुःप्रतिहार श्रोत्रंनिधनम् रेवश्चैव प्रजां च सप्तमावकरोत् ॥।॥ तेऽब्रुवन्नत्र वा एनत्तद- ५-म इति । ६ कर-1 ७ प्रस्तावः । वर्षा उद्गीथः, शरत्प्रतिहारः, प्रोम् शरदम्धतिहारम् । १. प्रस्तात्रैवम् ।र-तिर् । ३सपतम्-क्ष्म इति । ५ अभ्यत्यत्यन- ( १४ ) कर्यत्रोपजीविष्याम इति ॥६॥ स विद्यादहमेव सामास्मि मय्येता . देवता इति ॥७॥ १ ॥ १३॥ १ तृतीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । न ह दूरे देवतस्स्यात् । यावद्ध वा आत्मना देवानुपास्ते तावदस्मै देवा भवन्ति ॥१॥ अथ य एतदेवं वेदाऽहमेव सामाऽस्मि मय्येतास्सर्वा देवता इत्येवं हाऽस्मिन्नेतास्सर्वा देवता भवन्ति ॥२॥ तदेतदेवश्रुत्साम । सर्वा ह वै देवताश्शृण्वन्त्येवं- विदम्पुण्याय साधये । ता एनम्पुण्यमेव साधु कारयन्ति ॥३॥ स ह स्माऽऽह सुचित्तश्शैलनो वो यज्ञकामो मामेव स वृणीताम् । तत एवैऽनं यज्ञ उपनस्यति । एवंविदं झुगायन्तं सर्वा देवता अनुसंतृप्यन्ति । ता अस्मै तृप्तास्तथा करिष्यन्ति यथैऽनं यज्ञ उपनस्यतीति ॥४॥ १।१४॥ तृतीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः । । देवा वै खर्ग लोकमैप्सन् । तं न शयाना नाऽऽसीना न तिष्ठन्तो न धावन्तो नैव केनचन कर्मणाऽऽप्नुवन् ॥ १॥ ते देवाः प्रजापतिमुपाधावन स्वर्ग नै लोक मैप्सिष्म । तं न शयाना १ देवत। २ श्रोम् । ३ एस्म । ४ देवभेत् । देवश्रुत् । एवश्रूत् । ५ नं। १-शीना।२-त्यो।३ उपाय-1 ४ ६ ७ ( १५ ) नाऽऽसीना न तिष्ठन्तो न धावन्तो नैव केनचन कर्मणाऽऽपाम । तथा नोऽनुशाधि यथा स्वर्ग लोकमाप्नुयामेऽति ॥२॥ तानब्रवीत साम्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्प्रयातेऽति । ते साम्नाऽनृचेन स्वर्ग लोकम्पायन् ॥ ३ ॥ प्र वा इमे साम्नाऽगुरिति । तस्मात्प्रसाम तस्मादु प्रसाम्यन्नमत्ति ॥४॥ देवा बै स्वर्ग लोकमायन् । त एता- न्य॒क्पदानि शरीराणि धून्वन्त प्रायन् । तेस्वर्गलोकमजयन्॥५॥ तान्या दिवः प्रकीर्णान्यशेरन् । अथेऽमानि प्रजापतिर्ऋक्पदानि शरीराणि सञ्चित्याऽभ्यचत् । यदभ्यर्चत्ता एव!ऽभवन् ॥६॥ १।१५॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सैऽवर्गभवदियमेव श्रीः । अतो देवा अभवन् ॥२॥ अथैऽषामिमामसुरारिश्रयमविन्दन्न । तदेवाऽऽसुरमभवत् ॥२॥ ते देवा अब्रुवन् या वै नश्श्रीरभूदविदन्त तामसुरः । कथं न्वेषा- भिमांश्रियम्पुनरेव ज्येमेऽति ।।३।। तेऽब्रुवन्नृच्येव साम गायामेति । ३ ४ ४ प्रयामे । ५प्रयाते, प्रधामे, प्रयामे । लोकंमप्रायत् । ७ इसके बाद कुछगड़ बड़ है।५ के पूर्व यह सब में लिखा है 'तएतान्य॒क्पदानि शरीराणि धून्वन्त प्रायन् (ययन् )। ते खर्गलोकमजयन् (-अत्)। अथेऽमानि प्रजापतिर् ...ता एव!ऽभवन् । ८ यत् । ६ प्रोम् । ते स्वर्ग अजयन् , यहां अधिक है। १० प्रोम् । यद्.. । ११ भोम्ता एष। १ पासू-१२ तदू । ३ एवा । ४ विन्दन्त । ५.अव ।

। H H . .. R Y । " 1. । ( १६ ) ते पुनः प्रत्याद्रुत्याचे सामाऽगायन् । तेनाऽस्माल्लोकाद- सुराननुदन्त ॥४॥ तद्वै माध्यन्दिने च सबने तृतीयसपने च न!ऽपराधोऽस्ति । स यत्ते ऋचि गायति तेनाऽस्माल्लोकाद द्विषन्तम्भ्रातृव्य नुदेते । अथ यदमृते देवतासु प्रातस्सवनं गायति तेन स्वर्ग लोकमेति ॥शा प्रजापति सान्नेऽमांजितिमजयद्याऽस्ये ऽयं जितिस्ताम् । स स्वर्ग लोकमारोहत् ॥६॥ ते देवाः प्रजापति- मुपेत्याऽब्रुवन स्मभ्यमपीऽदं साम प्रयच्छति । तथेति । तदेभ्य- स्साम प्रायच्छत् ॥७॥ तदेनानिदै साम स्वर्ग लोकं नाकामयत वोढुम् ।।८॥ ते देवाः प्रजापति भुपेत्याऽब्रुवन् यद्वै नस्साम प्रादा इदं वै नस्तत्स्वर्ग लोकं न कामयते वोढुमिति ।।६।। तद्वै पाप्मना समजतेति । कोऽस्य पाप्मेति । ऋमिति । तदृचा समसृजन ॥१०॥ तदिदम्प्रजापतेर्गहयमाणमतिष्ठदिदं वै मा तत्पाप्यना सम- सातुरिति । सोऽब्रवीधस्त्वैतेन व्यावर्तयाङ्येच स पाप्मनावर्ताता शति ॥११॥ स य एतचा प्रातस्सवने व्यावर्तयति व्येवं स पाप्मना वर्तते ॥१२॥ १।१६।। 'चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । -द्रुच्यत्य । ७ त्रीत्-1-पराथो । -चि। १०-वृते । ११ तम् । १२ अर्-१३ न कामायते, न कामयते । १४ कामाय्-, सामय्, । १५सस्त्र । १६ एव। - . . Hiry -- -- ( १७ ) तदाहुर्यदोवा ओवा इति. गीयते. कात्रभवति क सामेति ॥ २१॥ प्रस्तुवन्नेवाष्टाभिरक्षरैः प्रस्तौति । अष्टाक्षरा गायत्रीं । अक्षरमतरं त्र्यक्षरम् । तच्चतुर्विशतिस्सम्पद्यन्ते। चतुर्विशसक्षरा गायत्री ॥२॥ तामेताम्प्रस्तावेनचमाष्चा या श्रीर्याऽपचितिर्यस्वर्गोलोको यद्यशो यदनाधं तान्यागायमान आस्ते ॥३॥ ११.१७॥ चतुर्थेऽनुवाके तृतीयः खण्डः ।। १ . -- २ h प्रजापतिर्देवानसृजत । तान् मृत्युः पाप्मान्वसृज्यत, ॥२॥ ते देवा प्रजापतिमुपेयाब्रुवन् कस्मादु नोऽसृष्ठा मृत्युंचेन्नः पाप्मा- नमन्ववस्रक्ष्यन्नासिथेति ॥२॥ तानब्रवीच्छन्दसि सम्भरत । तानि यथायतनम्पविशत ततो मृत्युना पाप्मना, न्यावस्यथेति ॥२॥ वसवो गायत्री समभरन् । ता. वे पाविशन् । तान् साऽच्छादया un रुद्रास्त्रिष्टुभं समभरन् । ता ले. प्राविशन् । तानसाच्छाद- - ७ यत् ॥५॥ आदित्सा जगतीं समझरन् । ता ते प्राविशन्तान -- साऽच्छादयत् ॥६॥ विश्वेदेवा अनुष्टुभं समभरन्। तांते.पाविशन् । तान् साऽच्छादयत् ॥७॥ तान् अस्यामृच्यस्वरायाम्मृत्युनिरजा- १. प्रस्तावेप्रस्तवेन । २-। १. ता, ताः। २ कस्मा । ३-टा । ४-सुचन्न् । ५-शर ६-वक्स्य, वत्स्य्- ७च्छादू, याम् । + न . . 14 ( १८ ) . -- नाद्यथा मणौ मणिमूत्रम्परिपश्येदेवम् ॥८॥ ते स्वरम्प्राविशन् । तान् स्वरे सतो न निरजानात् । स्वरस्य तु घोषणाऽन्वैत् ॥६॥ ९ १० 1 त प्रोमिसेतदेवाक्षरं समारोहन् । एतदेवाक्षरं त्रयीविद्या । यददो ऽमृतं तपति तत्प्रपद्य ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्तन्त ॥१०॥ एवमेवैवं विद्वान् ओमिसेतदेवाक्षरं समारुह्म यददोऽमृतं तपति तत्पपद्य ततो मृत्युना पाप्मना व्यावर्ततेऽथो यस्यैवं विद्वानुद्गा- १२. 1 यति ॥१२॥ १॥१८॥ चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः॥ -- अथैतदेकविंशं साम ॥२॥ तस्य त्रय्येव विद्या हिङ्कारः। अग्निर्वायुरसावादिस एष प्रस्तावः । इम एव लोका आदिः । तेषु हीदं लोकेषु सर्वमाहितम् । श्रद्धा यज्ञो दक्षिणा एषउद्गीथः। दिशोऽवान्तरदिश आकाश एष प्रतिहारः । आपः प्रजा ओषधय एष उपद्रवः । चन्द्रमा नक्षत्राणि पितर एतनिधनम् ॥२॥ तदेतदेकविंशं साम । स य एवमेतदेकविंश साम वेदैतेन हास्य ८-यैद् । नास्ति । १० ओ । ११-पेद् । १२ पदो, प्रो । १. । २ वावायुर् । ३ येषु । ४-शा।

( १६ ) सर्वेणोद्गीतम्भवस्खेतस्मादेव सर्वस्मादाटश्च्यते य एवं विद्वांसमुप- वदति ॥३॥११॥ पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः । www १ ३ ४ १ ६ ७ ९ इदमेवेदमग्रेऽन्तरिक्षमासीत् । तद्वेवाप्येतर्हि ॥१॥ तदेतदन्तरिक्ष य एवाऽयम्पवत एतदेवान्तरिक्षम्। एष ह वा अन्तरिक्षनाम् ॥२॥ एष उ एवैष क्तितः तथा काष्ठेन पलाशे विष्कब्धे स्यातामक्षेण वा चक्रावेवमेतेनेमौ लोकौ विष्कब्धौ ॥३॥ तस्मिन्निदं सर्वमन्तः । तद्यदस्मिन्निदं सर्वमन्तस्तस्मादन्तर्यक्षम् । अन्तर्यक्ष ह वै नामैतत् । तदन्तरिक्षमिति परोक्षमाचक्षते ॥४॥तद्यथा मूताःप्रबद्धाः प्रलम्बे- रन्ने हैतस्मिन्सर्वे लोकाः प्रबद्धाः प्रलम्बन्ते ॥१॥ तस्यैतस्य साम्नस्तिस्त्र आगास्त्रीण्यागीतानि पड्विभूतयश्चतस्रः प्रतिष्ठा दश प्रगास्सप्त संस्था द्वौ स्तोभावेक रूपम् ॥६॥ तद्यास्तिस्स आगा इम एव ते लोकाः ॥७॥ अथ यानि (त्रीएय) आगीतान्यग्निर्वायुरसा ។ १२. ५-अस । ६ आवृच्योते । १-रीक्ष-१२ अधिक है 'एष ह वा अन्तरीक्षम् । ३ एवम् । ४ नास्ति । ५-क्षोना-1 ६ नवम् । ७ एतैन ।८ नास्ति । तद्' अन्तस् । ६ नास्ति । १०-बन्द-1 ११-नंम् । १२ अगमाः । १३ एक- रैपम्, एकरूपम् । १४ तो। - : ( २० ) पादिय. एतान्यागीतानि । न ह वै कांचनश्रियमपराधोति य एवं चेद ॥८॥२०॥ . 'षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । । . । २. अथ याप्पविभूतय ऋतवस्ते ॥२३॥ अथ याश्चतस्रः प्रतिष्ठा इमा एव ताश्चतस्रोदिशः ॥२॥ अथ ये दश प्रगा इम एव ते दश प्राणाः ॥३॥ अथ यारसप्त संस्था या एकैतास्सप्ताहोरात्राःप्राची- यषदकुर्वन्ति ता एव ताः ॥४॥ अथ यौ द्वौ स्तोभावहोरात्रे एव- ते ॥५॥ अथ यदेकंरूपं कर्मैव तत् । कर्मणा हीदं सर्व विक्रियते |', ६ ॥६॥ तस्यैतस्य सानोदेवा आजिमायन् । स प्रजापतिहरसा ' । ' . । ! ९ हिङ्कारमुदजयदग्निस्तेजसा प्रस्ताव रूपेण बृहस्पतिरुनीथं स्वधया पितरः प्रतिहारं वीर्यणेन्द्रोनिधनम् ॥७॥ अथेतरे देवा अन्तरिता इवासन् । त इन्द्रमब्रुवन् तव चै क्वे स्मोऽनुन एतस्मिन् सामना- भजेति॥॥तेभ्यस्वरम्पायच्छत् ।तम्प्रजापतिरब्रवीत्कथेस्थमकः। सर्व वा एभ्यस्साम पादाः। एतावद्वाव साम यावान स्वरः ऋग्वा एषर्ते स्वराद्भवतीति ।। सोऽब्रवीत पुनर्वाग्रहमेषामेतरसमादा- स्य इति । तानब्रवीऽदुप मा मायत । अभि मा स्वरतेति । तथेति :: नास्ति । सप्त..."एताम् । २-श्रा ! ३ वर्ष-1 ४ वा । ५ रैपिं । - सावध । -रमा सघर-1 १० एषो, एषोम । r 1. 14 ( २१ ) ११ ॥१०॥ तमुपागायन् । तसभ्यस्वरन् । तेषाम्पुनारसमादत्त ॥११॥ १॥२१॥ षष्ठेनुघाके द्वितीयः खण्डः । स यथा मधुधाने मधुनाळीभिर्मध्वासियादेवमेव तत्सामन् पुना रसमासिञ्चत् ॥२॥ तस्मादु ह नोऽपग़ायेत् । इन्द्र एष यदुद्गाता । स यथा सावमीषां रसमादत्त एवमेष तेषां रसमादत्ते २॥ कामं ह तु यजमान उपगायेद्यजमानस्य हि-तद्भवसथो ब्रह्म- चार्याचार्योक्तः ॥३॥ तदु वा पाहुस्मैव गायेत् । दिशो छुपागा- यन् दिशामेवं सलोकतां जयतीति ॥४॥ ते य एवेमे मुख्याः प्राणा एत एवादातास्श्चोऽपगातारश्च । इमे ह प्रय उद्गातार इम उ चत्वार उपगातारः ॥५।। तस्मादु चतुर एवोऽपगातॄन कुर्वीत। तस्मादुहोऽपगातून प्रसभिमशेद्दिशस्स्थश्रोत्रं मे माहिसिष्टेति ॥६॥ स यस्स रस पासीय एवायम्पवत एष एव स रसः॥७॥स यथा 'मध्वालोपमद्यादिति ह स्माह सुचित्तश्शैलन एवमेतस्य रसस्यात्मान- म्पूरयेत।सएवोद्गातात्मानंच यजमानंचामृतत्वं गमयतीति।।८२२ षष्ठेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः । ११-ता। १-धुवने । २ “स' अधिक पढ़ो। ३-यत् । -शम् । ५ पर्व । । ७ऽगा--तृन् 1.5-तृन् ।

( २२ ) . . अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाप्येतहि ॥१॥ . . -- १ २ . ३ ४ स यम्स आकाशो वागेव सा । तस्मादाकाशाद्वाग्वदति ॥२॥ तामेतां वाचम्प्रजापतिरभ्यपीळयत् । तस्या अभिपीळितायै रसः पागोदत्त एवेमे लोका अभवन ॥३॥ स इमाँ लोकानभ्यपीळयत् । तेषामभिपीळितानां रसः प्राणेदत् । ता एवैता देवता अभवन्नाग्नि- वायुरसावादिस इति ॥४॥ स एता देवता अभ्यपीळयत् । तासामभिपीळितानां रसः प्राणेदत् । सा त्रयीविद्याभवत् ॥५॥ स त्रयी विद्यामभ्यपीळयत्। तस्या अभिपीळितायै रसः प्राणेदत् । ता एवैता व्याहृतयो ऽभवन भूर्भुवस्स्वरिति ॥६॥ स एता व्या- हृतीरभ्यपीळयंत् । तासामभिपीळितानां रसः प्राणेदत् । तदेतद- ". क्षरमभवदोमिति. यदेतद् ॥७॥ स एतदक्षरमभ्यपीळयत् । तस्या- ऽभिपीमितस्य रसः प्राणेदत् ॥८॥ ॥२३॥ -- [" सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। १ तदतरदेव । यदतरदेव तस्मादक्षरम् ॥१॥ यद्वेवाक्षरं ना- क्षीयत तस्मादक्षयम् । अक्षयं ह वै नामैतत् । तदक्षरमिति १. एता वा । २. "रसम् । ३. 'स त्रयीम्। 'रसम् (!) प्राणेदत्' अधिक है । ४. नास्ति । ५-या | नास्ति । स त्रयीम् प्राणदत् । ७-आ। १-वा।

한 ३ ९ ( २३ ) परोक्षमाचक्षते ॥२॥ तद्वैतदेक प्रोमिति गायन्ति । तत्तथा न गायेत । ईश्वरो हैनदेतेन रसेनान्तर्धातोः । अथो द्वे इवैवम्भवत ओमिति । ओ इत्यु हैके गायन्ति । तदु ह तन्न गीतम् । नैव तथा गायेत् । ओं इसेव गायेत् । तदेनदेतेन रसेन सन्दधाति ।।३।। तदेतं रसं तर्पयति । रसस्तृतोऽक्षरं तर्पयति । अक्षरं तृप्तं व्याहृती स्तर्पयति । व्याहृतयस्तृप्तावेदाँस्तर्पयन्ति । वेदास्तृप्या देवतास्तर्प- यन्ति । देवतास्तृप्तालोकाँस्तर्पयन्ति। लोकास्तृप्ता अक्षरं तर्पयन्ति। अक्षरं तृप्तं वाचं तपर्यति । वाक् तृप्ताकाशं तर्पयति । आकाशस्तृप्तः प्रजास्तर्पयति । तृप्यति प्रजया पशुभिर्य एतदेवं वेदाथों यस्यैवं विद्वानुगायति ॥४॥ १॥२४॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः । १२ १ अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् स उ एवाप्येतर्हि ॥शा स यस्स आकाश आदिस एव स । एतस्मिन् (हा ) दिते सर्व- मिदमाकाशते ॥२॥ तस्य मर्यातयोर्वे तीराणि समुद्र एव । -- २ या-३-थे।४ बै, है । ५-नास्ति । ईनि+७. ने एव । मो. अक्षरं' 'वाचं तर्पयति यह पाठ नहीं। १०-यन्ति। ११ वार्कसू । १२ गाय त । १ दक् (!)।२ सुदिते । ३ वैर्व। ४ तरणी ।

( २४ ) . ९ १.०.. ११ १२ तयत्समुद्रेण परिगृहीतं तन्मृत्योराप्तमथ यत्पर तदमृतम् ॥३॥ स यो ह स समुद्रो य एवायम्पवत एष एव स समुद्रः। एतं हि. संद्रवन्तं सर्वाणि भूतान्यनुसंद्रवन्ति ॥४॥ तस्य द्यावापृथिवी एव रोधसी । अथ यथा नद्यां कंसानि का पहींणानि स्युस्सरॉसि वै- व मस्यायम्पार्थवस्समुद्रः॥५॥ स एष पार एव समुद्रस्योदेति । स उद्यन्नेव वायोः पृष्ठः आक्रमते । सोऽमृतादेवोदति । अमृतमनु- संचरति । अमृते प्रतिष्ठितः॥६॥ तस्यैतत् त्रिदूपम्मृोरनाप्त शुक्लं कृष्णम्पुरुषः ॥७॥ तद्यच्छुलं तद्वाचोरूपमृचोऽग्नेर्पयोः । सा या सा वायद सा । अथ योऽनिर्मत्युस्सः ॥८॥ अथ यत्कृष्णं तदपां रूपमन्नस्य मनसोयजुषः । तद्यास्ता प्रापोऽनं तत् । अथ यन्मनो. १७ . यजुष्टव ॥३॥ अथ यः पुरुषस्स माणस्तत्साम तद्ब्रह्म तदमृतम् । १ २ स यामागस्तत्साम । अथ यहह्म तदमृतम् ॥१०॥ ॥२५॥ अष्टमेऽनुवाके प्रथमः खगड़ा। अथाध्यात्मम् । इदमेव चतुनिच्छुक्तं कृष्णम्पुरुषः ॥२॥ तद्यच्छुक तहाचो रूपमृचोऽग्नेर्मयोः । सा या सा वागृक् सा । ५-यह-I(-२-७ अनुद्-८-या। -याम् । १० कसा. नि। ११ प्रहीणहीनि । १२ अधिक है 'सस्'. स । १३ प्रतितिष्ठतः। १४ वाक्म्, वाम्ग । १५ ऋत् । १६ अन्नमस्य । १७ नास्ति, तद्या:-पः पुरुषस। १.गुतू । २ अधिक 'सा'। 4 - ( २५ .) अथ योऽग्निर्मत्युस्सः॥२॥ अथ यत्कृष्णं तदपां रूपमन्नस्य मनसो यजुषः । तथास्ता प्रापोऽभं तत् । अथ यन्मनो यजुष्टत् ॥३॥ अथ यः पुरुषस्स प्राणस्तत्साम तब्रह्म तदमृतम् । स यः प्राण- स्तत्साम । अथ यद्ब्रह्म तदमृतम् ॥४॥ सैऽषोऽत्क्रान्तिब्रह्मणः । अथातः पराक्रान्तिः ॥५॥ सा या साऽऽक्रान्तिर्विद्युदेव सा । स यदेव विद्युतो विद्योतमानायै श्येतं रूपम्भवति तद्वाचो रूपमृचो- ऽग्नेयोः ॥६॥ यदेव विद्युतस्संद्रवन्यै नीलं रूपम्भवति तदपां रूपमन्नस्य मनसो यजुषः ॥७॥ य एवैष विद्युति पुरुषस्स प्राण- स्तत्साम तद्ब्रह्म तदमृतम् । स यः प्राणस्तत्साम । अथ यद्ब्रह्म तदमृतम् ॥८॥ ॥२६॥ अष्टमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स हैषोऽमृतेन परिदृढो मृत्युमध्यास्तेऽन्नं कृत्वा ॥११॥ अथै- ऽष एव पुरुषो योऽयं चतुषि । य आदिये सोऽतिपुरुषः । यो विद्युति स परमपुरुषः॥२॥ एते ह वाव त्रयः पुरुषाः। आ हास्यैते जायन्ते ॥३॥ स योऽयं चक्षुष्येषोऽनुरूपो. नाम । अन्वङ् होष ३-पो । सू (!) । ४-तू । ५ नास्ति । ६ श्चैतं । ७---थे। -मा।.. १-सी। २-यो। ३-बो,षा,-ब । ४-वज । ५ ह।

सर्वाणि रूपाणि । तमनुरूप इत्युपासीत । अन्वचि हैनं सर्वारिण रूपाणि भवन्ति ॥॥ य आदिसे स प्रतिरूपः । प्रसङ् श्रेष सर्वाणि रूपाणि । तम्प्रतिरूप इत्युपासीत । प्रसञ्चि हैनं सर्वाणि रूपाणि भवन्ति ।।॥ यो विद्युति स सर्वरूपः। सर्वाणि होतस्मिन रूपाणि । तं सर्वरूप इत्युपासीत । सर्वाणि हाऽस्मिन् रूपाणि भवन्ति ॥६॥ एते हवाच त्रयः पुरुषाः। आ हाऽस्यैते जायन्ते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुगायति ॥७॥ १२७|| अष्टमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अष्टमोऽनुवाकरसमाप्तः । अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाप्येतहि ॥२।। स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्र एष एव स य एष एव तपति । स एष सप्तरश्मिदृषभस्तुविष्मान्॥२॥ तस्य वायो रश्मिः प्राङ् प्रतिष्ठितः । सा या सा वागग्निस्सः। स दशधा भवति शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा नियुतधाऽर्बुदधा न्यर्बुदधा निखर्वधा पद्ममक्षितिव्योमान्तः ॥ ३॥ स एष एतस्य रहिमा- ३ ६-बञ्ची,वशी, वं। ७ होना । ८ प्रत्यं । “ अधिक है रूपाणि;' नास्ति-तं ... रूपाणि । १ नास्ति । २ अर्-३ निखर्वाचं । ४-ति । ५-त, स्सोम- -- ( ६७ ) ग्भूत्वा सर्वास्वास्नु प्रजासु प्रयवास्थितः । स यः कश्च वदसेतस्यैव ७ . रश्मिना वदति ॥४॥ अथ मनोमयो दक्षिणा प्रतिष्ठितः । तद्य- तन्मनश्चन्द्रमास्सः । स दशधा भवति॥॥ स एष एतस्य रश्मिर्मनो भूत्वा सर्वास्त्रासु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्चमनुत एतस्यैव रश्मिना मनुते ॥६॥ अथ चतुर्मयः प्रसङ् प्रतिष्ठितः। तद्यत्तश्चक्षु- रादिसस्सः । स दशधा भवति ॥७॥ स एष एतस्य रश्मिचतु- भूत्वा सर्वावासु प्रजासु प्रसवस्थितः।स यः कश्च पश्यसेतस्यैव रश्मिना पश्यति ॥८॥अथ श्रोत्रमय उदप्रतिष्ठितः। तद्यत्तच्छ्रोत्रं दिशस्ताः । स दशया भवति ।। स एष एतस्य रश्मिश्श्रोत्र- म्भूत्वा सर्वास्वामु प्रजासु प्रयवस्थितः । स यः कश्च शृणोसेतस्यैव . रश्मिना तृणोति ॥१०॥ १२८|| १ नवमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । अथ प्राणमय ऊर्ध्वः प्रतिष्ठितः । स यस्स प्राणो वायुस्सः । स दशधाभवति ॥१॥ स एष एतस्य रश्मिः प्राणोभूत्वा सर्वास्वामु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्च प्राणिस्तस्यैव रश्मिना प्राणिति ૨ ६ पश्यति । ७ पश्यति । नास्ति । ६ दक्षणा । १० मन्वश् । ११ चतुम-1 १२-य । १३ वस्थितः। १४ त, नास्ति। १५प्रत्यवस्थितः॥ 1-स्थ्-२ नास्ति ।

( २८ ) ३ ६ ९ ॥२॥ अथाऽसुमयस्तिर्यङ् प्रतिष्ठितः । स ह स ईशानो नाम । स 'दशधा भवति ॥३।। स एष एतस्य रश्मिरमुर्भूत्वा सर्वासामु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्चाऽसुमानेतस्यैऽव रश्मिनाऽसुमान् ॥४॥ अथाऽनमयोऽर्चाङ् प्रतिष्ठितः । तद्यत्तदनमापस्ताः । स दशधा भवति शतधा सहस्रधाऽयुतधा प्रयुतधा नियुतधाऽर्बुदधान्यर्बुदधा निखर्वधा पद्ममक्षितिोमान्तः ॥॥स एष एतस्य रश्मिरन्नम्भूत्वा सर्वास्तासु प्रजासु प्रसवस्थितः । स यः कश्चाश्नासेतस्यैव रश्मिना- नाति॥६॥स एप सप्तरश्मिर्टपभस्तुविष्मान्।तदेतदृचाऽभ्यनूच्यते यस्सप्तरश्मिवृषभस्तुविष्मानवासृजत्सर्तवे सप्तसिन्धून् । योरोहिणमस्फुरद्वज्रबाहु-मारोहन्तसजनास इंद्र इति ॥७॥ यस्मातरविमरिति । सप्त होत आदिसस्य रश्मयः । वृषभ इति । एष ह्येवाऽऽसाम्प्रजानामृषभः। तुविष्मानिति । महीयेऽवा स्यैषा ॥८॥ अवासृजत् सर्तवे सप्तसिन्धूनिति । सप्तयेतेसिन्धवः । ११ १४ ३ स्थान खाली है 'स 'ई' । ४-वन्ति । ५ ' यत्' के पश्चात् 'तत्युदं नाम' पाठ है, तदन्नम् 'स' नहीं है । ६ अँदन्नम्। ७ तेदा, स्त । ८ निखर्वाचम्, निखर्वधाच । ६ व.म- १० सामाख ११ नास्ति तदेतदुः "वृषभस्तुविष्मान् । १२ रोह- १३-हु । १५-त । १५ महयै ।

। ( २६ ) १६ १ ३ तैरिदं सर्व सितम् । तद्यदेतैरिदं सर्व सितं तस्मात्सिन्धयः || यो रोहिणमस्फुरद्वनचाहुरिति । एष (दि) रौहिणमस्फुरदनबाहूः ॥१०॥धामारोहन्तं स जनास इन्द्र इति। एप.हीन्द्रः॥११॥१॥२६॥ नवमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। तद्यथा गिरिम्पन्थानस्समुदियुरिति हस्माऽऽह शाव्यायनि- रेवमेत आदित्यस्य रश्मय एतमादिवं सर्वतोऽपियन्ति । स हैवं विद्वानोमिसाददान एतरेतस्य रश्मिभिरेतमादिसंसर्वतोऽप्यति॥२॥ तदेतत् सर्वतो द्वारमनिषेधं साम । अन्यतोद्वारं हैऽनदेक एवा- ऽभ्रङ्गमुपासते । अतोऽन्यथाविद्युः ॥२॥ अथ य एतदेवं वेद स एवैतत् सर्वतो द्वारमनिषेधं सामवेद ॥३॥ सा एषा विद्युत् । (यद) एतन्मण्डलं समन्तम्परिपतति तत्साम । अथ यत्परमतिभाति स पुण्यकृयायै रसः । तमभ्यतिमुच्यते ॥४॥ तदेतदभ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते । स यथेन्द्रो. न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुगायति ॥५॥ १॥३०॥ नवमेऽनुपाके तृतीयः खण्डः। नवमोऽनुवाकस्समाप्तः । ११ :०:- . १६ स्थान खाली है-ह-वाला, हत्तं । १ एवम् । २ तिप्रतिवियन्ति।३ अनुष्-१४ नास्ति । ५ नत, त । (नास्ति । एताव, एता । ८ गम्। पतो। १० विदुः। ११-तृवि ॥

مه ( ३० ) अयमेवेदमग्र आकाश आसीत् । स उ एवाऽप्येतर्हि । स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्रस्सामैवतत्॥१॥ तस्यै- तस्य साम्न इयमेव प्राचीदिग्धिकार इयम्प्रस्ताव इयमादिरियमुद्री- थोऽसौ प्रतिहारोऽन्तरिक्षमुपद्रव इयमेवनिधनम् ॥२॥ तदेतत्सप्त- विधं साम । स य एवमेतत्सप्तविधं साम वेद यत्किञ्च प्राच्यांदिशि या देवता ये मनुष्या ये पशवो यदन्नाचं तत्सर्वं हिङ्कारेणामोति ॥३॥ अथ यद्दक्षिणायां दिशि तत्सर्व प्रस्तावेनाप्नोति॥४॥अथ यत्पतीच्यां दिशि तत्सर्वमादिनामोति ॥॥ अथ यदुदीच्यांदिशि तत्सर्वमुद्गीथेनानोति ॥६॥ अथयदमुष्यां दिशितत्सर्वम्पतिहारेणा- मोति ॥७॥ अथ यदन्तरिक्ष तसर्वमुपद्रवेणामोति ॥८॥ अथ यदस्यां दिशि या देवता ये मनुध्या ये पशवो यदनाद्यं तत्सर्व निधनेनाप्नोति ॥३॥ सर्व हैवाऽस्याऽऽतम्भवति सर्व जितं न हा- ऽस्य कश्चन कामोऽनातो भवति य एवं वेद ॥१०॥ स यद्धकिञ्च किञ्चैवं विद्वानेषु लोकेषु कुरुते स्वस्य हैव तत्स्वतः कुरुते । तदे- तहचाऽभ्यनूच्यते ॥११॥ १॥३१॥ दशमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। १ दीर् । २-ईत् । ३ एत् । ४ 'मनुष्या' अधिक है। ५-वा । ६ यहां चौथा श्लोक (मन्त्र) अधिक है और साथ ही प्रतिहारेण 'प्रस्तान के स्थान में । ७ 'अव्यात अधिक है। दक्षिणायांदिशि।

( ३१ ) । ३ यद् द्याव इन्द्र ते शतं शतम्भूमीस्तस्युः। नत्या वत्रिन्त्सहस्रं सूर्या अनु न जातमष्ट रोदसी इति ॥१॥ यद् धाव इन्द्र ते शतं शतम्शूमीरुतस्युरिति । यच्छतं द्यावरस्युश्शत- म्भूम्यस्ताभ्य एप एवाकाशो ज्यायान् ॥२॥नत्वा वज्रिन्त्सहस्रं सूर्या अन्विति । न लेतं सहस्रं चन सूर्या अनु ॥३॥ न जातमष्ट रोदसी इति । न ह्येतं जातं रोदन्ति । इमे ह वाव रोदसीताभ्या- मेष एवाकाशो ज्यायान् । एतस्मिन् हवते अन्तः॥४॥स यस्स आकाश इन्द्र एव सः । स यस्स इन्द्र एपएक स य एषतपति ।।५।। स एषोऽभ्राण्यतिमुच्यमान. एति । तद्यथैषोऽभ्राशयतिमुच्यमान एरोवमेव स सर्वस्मात्पाप्मनोऽतिमुच्यमान एति य एवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥६॥ १॥३२॥ दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । दशमोऽनुवाकस्समाप्तः । ७ ६ त्रित्साम चतुष्पात् । ब्रह्म तृतीयमिन्द्रस्तृतीयम्प्रजापति- स्तृतीयमन्त्रमेव चतुर्थः पादः ॥२॥ तद्यदै ब्रह्मस प्राणोऽथ य इन्द्र- १ नास्ति । २-यां। ३ नास्ति । ४-यन् । ५ नास्ति, स-स। स्थान खाली '' तक। ७-मानम्, यमानक ॥ त्रित्- २ ३ . (१२) स्सा वागथ यः प्रजापतिस्तन्मनोऽनमेवं चतुर्थः पादः ॥२॥ मन एव हिङ्कारो वाक्प्रस्तावः प्राण उद्गीथोऽन्नमेव चतुर्थः पादः ॥३॥ करोयेव वाचा नयति प्राणेन गमयति मनसा। तदेतनिरुद्धं यन्मनः। तेन यत्र कामयते तदात्मानं च यजमानं च दधाति ॥४॥ अथाधि- दैवतम् । चन्द्रमा एव हिङ्कारोऽग्निः प्रस्ताव प्रादिस उद्गीथ आप एव चतुर्थः पादः । तद्धि प्रसक्षमन्नम् ॥५॥ ता वा एता देवता अमावास्यां रात्रि संयन्ति । चन्द्रमा अमावास्यां रात्रिमादित्यम्प्र- विशस्यादित्योऽग्निम् ॥ ६ ॥ तद्यसंयन्ति तस्मात्साय । स ह वै सामवित्स साम वेद य एवं वेद ॥७॥ तासांवा एतासां देवतानामे- कैकैच देवता साम भवति ॥८॥ एष एवादित्यस्त्रिवञ्चतुष्पादश्मयो मण्डलम्पुरुषः । रश्मय एव हिङ्कारः । तस्मात्ते प्रथमत एवोद्यत- स्तायन्ते । मण्डलम्प्रस्तावः पुरुष उद्गीथो या एता प्रापोऽन्तस्स एव चतुर्थः पादः ॥६॥ एवमेव चन्द्रमसो रश्मयो मण्डलम्पुरुषः । रश्मय एव हिङ्कारो मण्डलम्प्रस्तावः पुरुष उद्गीथो या एता आपोऽन्त स्सएव चतुर्थः पादः॥१०॥ चत्वार्यन्यानि चत्वार्यन्यानि । तान्यष्टौ। अष्टाक्षरी गायत्री गायत्रं साम ब्रह्म उ गायत्री । तदु ब्रह्माभि- सम्पद्यते। अष्टाशफाः पशवस्तनोपशव्यम् ॥१२॥ २॥३३॥ एकादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। । - २-देवत्-१३-अम्।४-मा। ५सय्-11-७ नास्तिाउदा:-त्री, ॥

- २ २ अथाऽध्यात्मम्।इदमेव चतुस्त्रिञ्चतुष्पाच्छुक्लं कृष्सम्पुरुषः। शुक्लमेव हिङ्कारः कृष्णाम्भस्तावः पुरुष. उदीयो या इमा प्रापोऽन्तस्स. एव चतुर्थः पादः॥१॥इदमादिखस्यायनमिदं चन्द्रमसः। चत्वारीमानि चत्वारीमानि । तान्यष्टौ । अष्टाक्षरा गायत्री। गायत्रं साम ब्रह्म उगा- यत्री । तदु ब्रह्माभिसम्पद्यते । अष्टाशफापशवस्तनो पशव्यम्।।२।। स यो ऽयम्पवते स एष एव प्रजापतिः। तदेव साम। तस्यायं देवो योऽयं चतुषि पुरुषः। स एष पाहुतिमतिमसोत्क्रान्तः॥३॥ अथ यावेतौ चन्द्रमाश्चादियश्च यावेतावप्मु दृश्येते एतावेतयोर्देवौ ॥४॥ यद्ध वा इदमाहुर्देवानां देवा इसेते ह ते। त एत माहुतिमतिमसो. स्क्रान्ताः ॥५॥ तद्ध पृथुर्वैन्यो दिव्यान्वायाम्पमच्छ येभिर्वात इषितः प्रवाति ये ददन्ते पञ्च दिशस्समीचीः। य बाहुतीत्यमन्यन्त देवा अपां नेतारः कतमे ता- सनिति॥६॥ते हू प्रत्यूचु रिमामेषाम्पृथिवीं वस्तएको- ऽन्तरिक्षम्पर्येको बभूव। दिवमेको ददते यो विधर्ता विश्वा श्राशाः प्रतिरक्षन्त्यन्य इति ॥७॥ इमामेषाम्पृथिवीं १-पा- २ नास्ति । ३-यते।४ एता उ । ५ तान् । पभिर् । ७ वशम, दश । दन। इत्यम्-१०पराङ् । ११-८-१२-धत्ता। ११ .१३..

( ३४ ) ११ १४ वस्त एक इसग्निर्हसः॥८॥अन्तरिक्षम्पर्येकोषभूवेति वायुई सः॥॥ दिवमेको ददते यो विधर्तेऽसादियो ह सः ॥१०॥ विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्सन्य इति । एता ह वै देवता विश्वा आशाः प्रतिरक्षन्ति चन्द्रमा नक्षत्राणीति । ता एतास्सामैव सखो व्यूढोऽन्नाधाय ॥११॥ १॥ ३४॥ एकादशेश्नुवाके द्वितीयः खण्डः । एकादशोऽनुवाकस्समाप्तः । १ • . अर्थतत्साम । तदाहुस्संवत्सर एवसामेति ॥१॥ तस्य वसन्त एंव हिङ्कारः। तस्मात्पशवो वसन्ता हिङ्करिक्रतस्समुदायन्ति ॥२॥ ग्रीष्मः प्रस्तावः । अनिरुक्तो वै प्रस्तावोऽनिरुक्त ऋतूनां ग्रीष्मः ॥३॥ वर्षा उद्गीथः । उदिव वै वर्षगायति ॥४॥ शरत् प्रतिहारः। शरादि हः खलु वै भूयिष्ठाओषध्यः पच्यन्ते ॥॥हेमन्तो निधनम् । निधनकृता इव वै हेमन्मजा भवन्ति ॥६॥ तावतावन्तौ संपत्तः । एतदन्वनन्तस्संवत्सरः । तस्यैतावन्तौ यद्धेमन्तश्चवसन्तश्च । एतदनु ग्रामस्थान्तौ समेतः । एतदनु निष्कस्यान्तौ समेतः। एतदन्वहि - गान्पाहसंशये ॥७॥ तद्यथा हवै निष्कसमन्तं ग्रीवा भिंपर्यंत I 3. १४ विधर्ते, विधत्ते । १५ अन्न-, 'न्न-'-याया। २-करिकुंतम्, करिकृतस् । २ नास्ति । ३-तत् । ४ सवत्- श्री-६-यत्तः। .

(. ३५ ) एवमनन्तं साम । स य एवमेतदनन्तं सामं वेदानन्ततामेव जयति ॥॥ १॥३५॥ द्वादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । अथैतत्पर्जन्ये साम । तस्य पुरोवात एव हिङ्कारः। अथ य- दभ्राणि सम्प्लावयति स प्रस्तावः अथ यत् स्तनयति स उद्गीथः। अथ यद्विद्योतते स प्रतिहारः। अथ यद्वर्षति तन्निधनम् ॥२॥ तदेतत्पर्जन्ये साम । स य एवमेतत्पर्जन्ये साम वेद वर्षको हास्मै पर्जन्यो भवति ॥२॥ अथैतत् पुरुषे. साम । तस्यायमेव हितारो- ऽयम्प्रस्तावोऽयमुद्गीथोऽयम्प्रतिहार इदं निधनम् ॥शातदेतत्पुरुषे सामः । स य एवमेतत्पुरुषे साम वेदोऽऽव॑ एव प्रजया पशुभिरा- रोहनेति ॥४॥ य उ एनत्प्रसग्वेद ये प्रसञ्चो लोकास्ताञ्जयति । तस्यायमेव हिङ्कारोऽयम्भस्तावोऽयमुद्गीथोऽयम्प्रतिहार इदं निधनम् । ये प्रसञ्चो लोकास्ताअयति ॥५॥ य ज एनत्तिर्यग्वेदः ये तिर्यञ्चो लोकास्ताञयति । तस्य लोमैव हिङ्कारस्त्वक्प्रस्तावो मांसमुद्गीथोऽस्थि प्रतिहारो मज्जानिधनम्॥६॥ तस्य त्रीण्याविर्गायतिप्रस्तावम्प्रतिहारं ३ ६ ७ऽनन्तामू.. पक्-१२-यो। ३ प्रजा ।। ४ नं.।... नास्ति । ( एन, एनं । ७-युच्-, 'म' अधिक है। खाक्-१९ हिंकारं ।।

( ३६ ) निधनम् । तस्मात्पुरुषस्य त्रीण्यस्थीन्याविर्दन्ताश्च दयाश्चनखाः। ये तिर्यचो लोकास्ताअयाति ॥७॥ य उ एनत्संयग्वेद ये सम्यञ्चो लोकास्ताअयति । तस्य मन एव हिङ्कारोवाक्प्रस्तारः प्राण उद्गीथ • श्वतुः प्रतिहार श्रोत्रं निधनम् । ये सम्यञ्चो लोकास्ताभति॥८॥ अथतद्देवतासु साम । तस्य वायुरेव हिङ्कारोऽमिः प्रस्ताव आदिस उद्गीयश्चन्द्रमा प्रतिहारो दिश एव निधनम्॥६॥ तदेतद्देवतासु साम । स य एतमेतद्देवतासुसाम वेद देवतानामेव सलोकतां जयति ॥१०॥ १ -- ११ १२ ३ ६ -- १॥३६॥ द्वादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तस्यैतास्तिस्रागा भाग्नेय्येकैन्द्रका वैश्वदेव्येका ॥१॥साया पन्द्रा साऽऽग्नेयी । तया प्रातस्सवनस्योद्नेयम् । प्राग्नेयं वैमातस्स- बनमानेयोऽयं लोकः। स्वयाऽऽगया प्रातस्सवनस्योऽगायत्यूनोंतीम लोकम सो अथ या घोषिण्युपब्दिमती सैऽऽन्द्री । तया माध्य- न्दिनस्य सवनस्योद्नेयम् । ऐन्द्रं वै माध्यन्दिनं सवन मैन्द्रोऽसौ लोकः । स्वयाऽऽगया माध्यन्दिनस्य सवनस्योगायत्पृश्नोत्यमुंलोकम् ॥३॥ अथ यां वीडयन्निव प्रथयन्निव गायति सा वैश्वदेवी । तया १ ऐक् २ऽन्द । ३ नास्ति, सा' 'ऽद् । ४. मैंनधी। १नास्ति अथ' 'लोकम् ।६-अब्दी के लिये स्थान खाली हैं। -दिन । -तिमं । या, 'घोषिण्यु', भी लिखा है।

... ( ३७ ) तृतीयसवनस्योद्नेयम् । वैश्वदेवं पै तृतीयसवनं वैश्वदेवोऽयमन्तरा- लोकः । स्वयाऽऽगया तृतीयसवनस्योद्गायत्युनोतीममन्तरालोकम् ॥४॥ अथो उच्चा खल्वाहु रेकयैवाऽऽगयोद्यं यदेवास्यमध्यं वाच इति । तद्यया वैवाचा व्यायच्छमान उद्गायति तदेवास्यमध्यं वाचः। तया वा एतथा वाचा सर्वा वाच उपगच्छति। अव्यासिक्तामेकस्था श्रियमनोति य एवं वेद ॥५॥ अथ या क्रौञ्चा सा बाईस्प्रया । स यो ब्रह्मवर्चसकामस्स्यात्स तयोद्गायेत् । तद्ब्रह्म वै बृहस्पतिः । तद्वै ब्रह्मवर्चसमृनोति तथाह ब्रह्मवर्चसीभवति ॥६॥अथ ह चैकिता- नेय एकस्यैव साम्न आगां गायति गायत्रस्यैव । तदनवानं गेयम् । तत् साम्न एवा प्रतिहारादनवानं गेयम् । तत्माणो वै गायत्रम् । तदै प्राणमधोति । तथा ह सर्वमायुरोति ॥७॥ १॥३७॥ द्वादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अथ ह ब्रह्मदत्तं चैकितानेयमुद्गायन्तं कुरव उपोदुरुज्जहिहि साम दालभ्येऽति ॥१॥ स होऽपोद्यमानो नितरां जगौ । तै होचुः किमुपोधमानो नितरामगासीरिति ॥२॥ स होवाचेदं वै लोमेऽसे- - १०-यन्ति । १९ ताया। १२ स, नास्ति । १३ “वै गायत्रम् नीचे से ले के अधिक लिखा है । १४ 'सानस' अधिक है। • १ तश् । २ उजिहि । ३ सोमे । PHYAM 1 ( ३८ ) ४ . is १॥ लदैवतत्मत्युपश्टएमः । तस्मादुये नएतदुपावादिषुर्लोमशानीऽव तेषां श्मशानानि भवितारः । अथ वयसुदेव गातारस्स्म इति ॥३॥अथ ह राजा जैवलिगलुनसमााकायणं शामूल पर्णाभ्यामुत्थितम्पम- च्छ!ऽऽगाता शालावयाई साम्ना इति ॥४॥ नैव राजन्नृचेति होवाच न सानेऽति । तद्यूयं तर्हि सर्व एव पणाय्या भविष्यथ य एवं विद्वाँसोऽगायतेति॥शाप्रथयद्धाऽवक्ष्यदृचाच साम्नाचाऽऽगामे- ति धीतेन वैतद्यातबाम्नाऽमलाकाण्डेनाऽगातेऽति हैनॉस्तदवक्ष्यत् । तद्ध तदुवाच स्वरेण चैव हिङ्कारेण चाऽऽगामेति ॥६॥ १॥३८॥ द्वादशेऽनुषाके चतुर्थः खण्डः। अंथ हंसवाधिवाकश्चैत्ररपिस्सययज्ञम्पौलुषितमुवाच प्राचीन- योगेति मम चदै त्वं साम विद्वान् सान्नाऽऽविज्यं करिष्यसि नैव तहि पुनर्दीक्षामभिध्यातासीति । मुहुर्दीक्षी ह्यास ॥१॥ स होवाच यो वै साम्नशिश्रयं विद्वान्साम्नाऽऽत्विज्यं करोति श्रीमानेव भवति । मनो वाव साम्नश्रीरिति ॥२॥यो वै साम्नः प्रतिष्ठा विद्वान्साना- विन्य करोति प्रसेव तिष्ठति । वाग्वाव साम्नः प्रतिष्ठेति ॥३॥ . . १ , ५-उपाश-५-पुल् । ६-लार । ७ गळूनसम, गुळिनसम् । पारपणाा । १.च भागमे । १ मच् । २-दी।३मा।

( . ३६ ) यो चै साम्नस्सुवर्णं विद्वान् साम्नाऽऽविज्यं करोयध्यस्य रहे. मुवों गम्यते । प्राणो वाव साम्नस्सुवर्णमिति ॥४॥ यो वै.साम्नो ऽपचितिं विद्वान्साम्नाऽऽविज्यं करोसपचितिमानेषः भवति । चतु-.. वि साम्नोऽपचितिरिति ॥५॥ यो वै साम्नश्श्रुतिं विद्वान्साम्ना : ऽविज्यं करोति श्रुतिमानेव भवति । श्रोत्रं वाव साम्नश्रुतिरिति ॥६॥ १॥३६॥ - द्वादशेऽनुवाके पश्चमः खण्डः । द्वादशोऽनुवाकस्समासः। चत्वारिवाक्परिमिता पदानि तानि विदुाह्मणा ये मनीषिणः । गुहा त्रीणि निहिता नेयन्ति तुरीयं वाचो मनुष्या वदन्तीति ॥१॥... वागेव सामः । वाचा हि साम गायति । वागेकोऽवलम्बाला खुक्थं शंसति । वागेव यजुः । वाचा हि यजुस्नुतते । बन्धन किचार्वाधीनम्ब्रह्मणस्तद्वागेव सर्वम्।प्रथयदन्यत्रब्रह्मोपदिश्यते। हि तेनाऽऽविज्यं करोति । परोक्षणैक तु कृतम्भवति ॥३॥ नै -हो। १-हानि । २-हितानी । ३,नास्ति । ४-क-५वाचं । ने। ७ नास्ति।

(४० ) । ९ तस्याएतस्यै वाचो मनः पादश्चतुः पादश्श्रोत्रम्पादोवागेव चतुर्थः पादः ॥४॥ तद्वै मनसा ध्यायति तद्वाचा वदति। यच्चतुषा पश्यति तद्वाचा वदति । यच्छ्रोत्रेण शृणोति तद्वाचा वदति ॥५॥ तयदे- तत्सर्व वाचमेवाऽभिसमयति तस्मादागेव साम । स ह वै सामवित्स साम वेद य एवं वेद ॥६॥ तस्या एतस्यै वाचः प्राणा एवाऽसुः । एषु हीदं सर्वमसूतीत ॥७॥ ॥४०॥ प्रयोदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। तेन हैतेनाऽसुना देवा जीवन्ति पितरो जीवन्ति मनुष्या जी- वन्ति पशवोजीवन्ति गन्धर्वाप्सरसो जीवन्ति सर्वमिदं जीवति ॥१॥ तदाहुर्यदमुनेदं सर्वं जीवति कस्साम्नोऽसुरिति ।प्रागण इति ब्रूयात् । प्राणो ह वा साम्नोऽमुः ॥२॥ स एष प्राणो वाचि प्रतिष्ठितो वागु माणे प्रतिष्ठिता। तावतावेवमन्योऽन्यस्मिन्प्रतिष्ठितौ । प्रतितिष्ठति य एवं वेद ॥३॥ तदेतदृचाऽभ्यनूच्यते- १. . . . . ८'चतुर्थः' अधिक है । स्वादू । १० श्रुणोति । ११ऽहिसमन १२-- । १३ “असूते' परे 'एषु हीदं सर्वे सूतेऽति' सब में लिखा है (नास्ति' ति)। १-तीति । २ यदा । ३ येने । ४ इदं 'प्रधिक अधिक है। ५-ये। मम्पसन ७प्रतिष्ठितः।

( ४१ । अदितिरिदितिरन्तरिक्षमदितिमाता स पिता स पुत्रः । विश्वे देवा अदितिः पञ्चजना अदिति- जीतमदितिर्जनित्वम् ॥ इति ॥४॥ अदितिौरदितिरन्तरिक्षमिति । एषा वै धौरेषाऽन्तरिक्षम् ॥५॥ अदितिर्माता स पिता स पुत्र इति । एषा वै मातैषा पितेषा पुत्रः ॥६॥ विश्वेदेवा अदितिः पञ्चजना इति । येदेवा असुरेभ्यः पूर्वे पञ्चजना अासन् य एवासावादिसे पुरुषो यश्चन्द्रमसि यो:: विद्युति योऽप्सु योऽयमक्षमन्तरेष एव ते । तदेषैव ॥७॥ अदिति तिमदितिर्जनित्वमिति। एषा ोच जातमेषा जनित्वम् ॥८॥१॥४२॥ त्रयोदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। प्रयोदशोऽनुवाकस्समाप्तः। १४ - memom. आरुणिई वासिष्टं चैकिवानेयम्ब्रह्मचर्यमुपेयाय ।तं होवाचा- जानासि सौम्य गौतम यदिदं वयं चैकितानेयास्सामैवोपास्महे । कां त्वं देवतामुपास्स इति । सामैव भगवन्त इति होवाच ॥१॥ तं ह पप्रच्छ यदग्नौ तद्वेस्थाश् इति । ज्योतिर्वाएतत्तस्य सानोयद्वयं ५ ६ 1 ... ८-रीक्सू-18 नास्ति, अदितिर्माता' 'अदितिरन्तरिक्षम् । १० च । ११-यो । १२-चैर् । १३-षम् । १४ इतिर्, इति ॥ १ (वाचा) आज । २।३-माह-इति । ४-सनहीं।५-वत: ता ( ४२ ) है 1 सामोऽपास्मह इति ॥२॥ यत्पृथिव्यां तद्वेस्था३ इति । प्रतिष्ठा वा एषा तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥३॥ यदप्सु तद्वेस्था इति । शान्तिर्वा एषा तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥४॥ यदन्तरिक्षे तद्वेस्था३ इति । प्रात्मा वा एष तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥५॥ यद्वायौ तद्वेस्था३ इति । श्रीर्वाएषा तस्य साम्रो यद्वयं सामोऽपास्मह इति ॥६।। यदितु तद्वेस्था३ इति । ख्याप्तिर्वा एषा तस्य सानो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥७॥ यदिवि सद्वेस्था३ इति । विभूतिर्वा एषा तस्य साम्नो यद् वयं सामोपा- स्मह इति ॥॥१॥४२॥ ૧ ૨ . १ १ 1 चतुर्दशेऽनुषाके प्रथमः खण्डः। यदादिसे तदेस्या३ इति । तेजो वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥१॥ यचन्द्रमसि तद्वेस्था३ इति । भा वा एषा तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्महः इति ॥२॥ यत्रतत्रेषु तद्वेस्था३ इति । प्रज्ञा वा एषा तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥क्षा यदने तद्वेस्था३ इति। रेतो वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयंसामोपास्मह १ rer 'इति। ७ हाशिया पर लिखा है। ८ एतस्य । ६ नास्ति यद् १० नास्ति सानो........। १९-हा । १२ नास्ति प १ नास्ति । २ प्रजा । ३ नास्ति, 'एतत्' में 'सत्' । स्मह॥ M . ( ४३ ) १ १ १०. ११ इति ॥४॥ यत्पशुषु तद्वेस्था३ इति । यशो वा एतत्तस्य साम्मो यद्वयं सामोपास्मह' इति ॥शा यदृचि तद्वेस्था३ इति । स्तोमो वा एष तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥६॥ यद्यजुर्षितद्वेस्था३ इति । कर्म वा एतत्तस्य साम्नो यद्वयं सामोपास्मह इति ॥७॥ अथ किं उपास्स इति । अक्षरमिति । कतमत्तदक्षरमिति । यत्तरनाक्षीयते- ति । कतमत्तत् क्षरमाऽक्षीयतेति । इन्द्र इति ॥८॥कतमस्स इन्द्र इति । योऽक्षत्रमत इति । कतमस्स योऽक्षत्रमत इति । इयं देवतेति होऽवाच ॥सा योऽयं चक्षुषि पुरुष एष इन्द्र एष प्रजापतिः। (स) समः पृथिव्या सम आकाशन समोदिवा समस्सर्वेण भूतेन । एष परो दिवो दीप्यते । एष एवेदं सर्वमित्युपासितव्यः ॥१०॥ सय एवंदेवं वेद ज्योतिष्मान प्रतिष्ठावाञ्छान्तिमानात्मवाञ्छीमान् व्याप्तिमान् विभूतिमांस्तेजस्वी भावान् प्रज्ञावानेतस्त्री यशस्वी स्तोमवान् कर्मवानक्षरवानिन्द्रियवान् सामन्वीभवति ॥१॥ तद्वे- तहचाऽभ्यनूच्यते ॥१२॥ १।४३।। चतुर्दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ४ नास्ति । ५ वो। ६ स्ते-। ७....."स्स' के लिये स्थान छोड़ा है। न्। भक्षर । १०-१ । ११ इन्द्रमत् । १२ सो । १३ नास्ति । । १५ दिन्य- १.-सीतन्यं । १७-धी । १८स्तोमान् । । १७ १८ १९ . namannama +prean - . A.IN . (४४. ) १ । ३ M . रूपं-रूपम्प्रति रूपोबभूव तदस्य रूपम्प्रतिचक्षणाय। इन्द्रोमायाभिःपुरुरूप ईयते युक्ताह्यस्य हरयश्शतादश। इति ॥२॥रूप-रूपम्प्रतिरूपो बभूवति । रूपं-रूपं ह्येषप्रतिरूपोबभूव ॥२॥ तदस्य रूपम्प्रतिचक्षणायेति । प्रतिचक्षणाय हाऽस्यैतद्रूपम ॥३॥ इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयत इति । मायाभिषे एतत्पुरु रूप ईयते ॥४॥ युक्ता ह्यस्य हरयश्शता दशेति । सहस्रं हैत-आदि- संस्य रश्मयः । तेऽस्य युक्तास्तैरिदं सर्वः हरति । तद्यदेतैरिदं सर्व हरति तस्माद्धरयः ॥५॥ रूपं रूपम्मघवा बोभवीति मायाः कृण्वानः परितन्वं स्वाम् । त्रिर्यदिवः परि मुहूर्तमागात् स्वैमन्त्रैरन्तुपा ऋतावेति ॥६॥ रूप-रूपम्मघवा बोभवीतीति । रूप-रूप होष मघवा बोभवीति ॥७॥ मायाः कण्वानः परि तन्वं स्वामिति । मायाभिषेष एतत्स्वां त, गोपायति ।।८॥ चिर्यदिवः परिमुहूर्तमागादिति । त्रिह वा एष एतस्य मुहूर्तस्येमाम्पृथिवीं समन्त: पर्येतीमा: प्रजास्संचक्षाण: ॥॥स्वैर्मन्त्रैरनृतुपाऋतावति। अन्तुपा ह्येष एतदृतावा॥१०॥२॥४४ चतुर्दशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । १ पुरुर इप, पुरुरूपं । रम्यते।३-णा ।४-पम्।५-पम्। ६ रमीयते। ७ नास्ति, हरयश्तेऽस्य । ८ 'म' अधिक है। मुईन १० नास्ति, इति । ११पुनः लिखा है 'रूपरूपं. ... वीत्तीति (!) । १२ कक्षा। १३-भि । ६४ श। १५ नास्ति । १८ प्रति। १७ नृत्-| १८ अता॥ १२ १३.१४ १५ ( ४५ ) तद्ध पृथुर्वैन्यो दिव्यान्त्रासान्पप्रच्छ- इन्द्रमुक्थमृचमुद्गीथमाहुब्रह्म साम प्राणं व्यानम् । मनोवाचतुरपानमाहुश्श्रोत्रंश्रोत्रिया बहुधावदन्ती- । ति ॥१॥ ते प्रत्यूचुः- ३ ऋषय एते मन्त्रकृतः पुराजा: पुनराजायन्ते वेदानां गुप्त्यैकम् । ते वै विदांसो वैन्य तद्वदन्ति समानम्पुरुषम्बहुधा निविष्टम् , इति ॥२॥ इमां ह वा तद्देवतां त्रय्यां विद्यायामिमां समानामभ्येक प्राप- यन्ति नै । यो ह वावैतदेवं वेद स एवैतां देवतां सम्प्रति वेद ॥३॥ स एष इन्द्र उद्गीथः । स यदैष इन्द्र उद्गीथ आगच्छति है। नैवोद्गातुश्चोपगातॄणां च विज्ञायते । इत एवोऽऽव॑स्वरुदेति । स उपरि मूों लेलायति ॥४॥ स विद्यादगमदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशेक्ष्यत इति । तस्मिन् ह न कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशिष्यते ॥५॥ तदेतदभ्रातृव्यं साम । न ह वा इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते।सयथेन्द्रोन कंचनभ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते य एतदेवं वेदाथो यस्यैवं विद्वानुद्गायति॥६॥२४॥ चतुर्दशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । चतुर्दशोऽनुवाकस्समाप्त १-पदम् । २ नो । ३ त्रा, तृ~।४ ईमां ।५-नी । म्य् । ७ हवै। ८य चै-तृन्-११०'ति' अधिककरो। ११ ा। १२ स्वर १३परिष- (४६ ) प्रजापतिर्वा वेद अग्र आसीत्। सोऽकामयत बहुस्स्याम्पजोयेय मूमान गच्छेयमिति ॥१॥ स षोडशधाऽऽत्मानं व्यकुरुत भद्रं च समाप्तिश्चाऽऽभूतिश्च सम्भूतिश्च भूतं च सर्वं च रूपं चाऽपरिमितं च श्रीश्च यशश्च नाम चाऽग्रं च सजाताश्च पयश्च महीया च रसश्च १ ૨ Y ॥२॥ तद्यद्भद्रं हृदयमस्य तत् । ततस्संवत्सरमसृजत । तदस्य संवत्सरोऽनूपतिष्ठते ॥३॥ समाप्तिः कर्मास्य तत् । कर्मणा हि समामोति । तत ऋतूनस्सृजत । तदस्यतवोऽनूपतिष्ठन्ते ॥४॥पा- भूतिरत्रमस्य तत् । (तच् ) चतुर्धा भवति । ततो मासानर्धमा- सानहोरात्राण्युषसोऽस्जत। तदस्य मासा अर्धमासा अहोरात्राण्यु- पसोऽनूपतिष्ठन्ते ॥५॥ सम्भूती रेतोऽस्य तद्। रेतसो हि सम्भव- "ति ||४६॥ 'पञ्चदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । ततश्चन्द्रमसमसृजत । तदस्य चन्द्रमा अनूपतिष्ठते । तस्मात्स रेतसः प्रतिरूपः ॥२॥ भूतम्माणोऽस्य सः। ततो वायुमसृजत । सदस्य वायुरनूपतिष्ठते॥२॥ सर्वमपानोऽस्यसः। ततः पशूनसृजत । तदस्य पशवोऽनूपतिष्ठन्ते ॥३॥ रूपं न्यानोऽस्य सः। ततः प्रजा , - १।२-याँ-1-मन्ते । 'त' अधिक है । ५ तद् । नास्ति।चर्धा, अर्धा-ति, ता, त। १।२-परायो।

( ४७ ) असृजत। तदस्य प्रजा अनूपतिष्ठन्ते । तस्मादामु प्रमासु रूपाण्य- धिगम्यन्ते ॥४॥ अपरिमितम्मनोऽस्य तत् । ततो दिशोऽमृजत । तदस्य दिशोऽनूपतिष्ठन्ते । तस्मात्ता अपरिमिताः।अपरिमितमिव हि मनः ॥॥ श्रीर्वागस्य सा । ततस्समुद्रमसृजत । तदस्य समुद्रो- ऽनूपतिष्ठते ॥६॥ यशस्तपोऽस्य तत् । ततोऽमिमसजत । तदस्या- ऽग्निरनूपतिष्ठते । तस्मात्स मथितादिव सन्तप्तादिव जायते..॥७॥ C नाम चतुरस्य तत् ॥८॥ १॥४७॥ १ पञ्चदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तत प्रादिसमस्जत । तदस्यादियोऽनूपतिष्ठते. ॥२॥ अग्रत म्मूर्धास्य सः । ततो दिवमसृजत । तदस्य औरनूपतिष्ठते ॥२॥ सजाता अङ्गान्यस्य तानि । अङ्गैहि सह जायते । ततो-वनस्पती- नसृजत । तदस्य वनस्पतयोऽनूपतिष्ठन्ते ॥३॥ पयो लोमान्यस्य ... तानि।तत प्रोषधीरसृजत। तदस्यौषधयोऽनूपत्रिष्टन्ते ॥४॥महीया माँसान्यस्य तानि । माँसर्हि सह महीयते । ततो. वयाँस्यमजत । तदस्य वयाँस्यनूपतिष्ठन्ते । तस्मात्तानि अपतिष्णनि प्रपतिष्णूनी- ४-यते । ५ नास्ति, ततो तस्मात् । नाति तस्या। ८मथितामिर, मथितिताद ॥ १ अंगान्य, भंगहान्य, अङ्गए । सा । ३गै। नास्ति, पयो "अनूपतिवन्ते । । मभिया, मछिया ।।

( ४८ ) + । ११ . । . व महामांसानि ॥॥ रसो मज्जाऽस्य सः। तत: पृथिवीमसृजत । तदस्य पृथिव्यनूपतिष्ठते ॥६॥ स हैवं षोड़शधाऽत्मानं विकस सासमैत् । तद्यत्सार्धं समैतत् तत्साम्नस्सामत्वम् ॥७॥स एवैष हिरण्मयः पुरुष उदतिष्ठत्प्रजानां जनिता ॥६॥ ॥४८॥ पञ्चदशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । देवामुरा अस्पर्धन्त । ते देवाःप्रजापतिमुपाधावाअयामाऽमु- रानिति ॥१॥ सोऽब्रवीन्न वै मां यूयं विस्थ नाऽमुराः। यदै मां यूयं विद्यात ततो कै-यूयमेव स्यात पराऽसुराभवेयुरिति ॥२॥ तदै ब्रूहीऽसबुवन । सोऽब्रवीत्पुरुष: प्रजापतिस्सामेति मोऽपाद्धवम् । ततो वै. यूयमेव भविष्यथ पराऽसुरा भविष्यन्तीति ।।३॥ तम्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपासत । ततो वै देवा अभवन पराऽमुराः । स यो. हैवं विद्वान्पुरुषः प्रजापतिस्सामेऽत्युपास्ते भवसात्मनां पराऽस्य द्विषन् भ्रातृव्यो भवति ॥४॥ १।४।। पञ्चदशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । पञ्चदशोऽनुवाकस्समाप्तः । :- । . ।' ७ महीम- ८ मज्ज्या । -न्ते । १० समैत; तत्पश्चात्, 'तत्साधं समैतत् (!) पुनः है । ११ जयिता ॥ मा १षस्य । २-त।३-हिं॥

(४६ ) -- -- --- 'देवा वै विजिग्याना अब्रुवन्द्वितीयं करवामहै। माऽद्वितीया भूमेति । तेऽब्रुवन सामैव द्वितीयं करवामहै। सामैव नो द्वितीय- मस्त्विति ॥१॥ त इमे द्यावापृथिवी अब्रुवन् समेत साम प्रजनयत- मिति ॥२।। सोऽसावस्या अबीभत्सत । सोऽब्रवीदहु वा एतस्या किं चकिं च कुर्वन्सधिष्ठीवन्यधिचरन्यध्यासते। पुनीतन्वेनामपूता वा इति ॥३॥ ते गाथामअन्वया पुनामति । किं ततस्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते गाथयाऽपुनन् । तस्मादुत गाथया शतं मुनोति ॥४॥ ते कुम्ब्यामब्रुवन् त्वया पुनामेति । किं तत- स्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते कुम्न्यया: ऽपुनन् । तस्मादुत कुम्ब्यया शतं सुनोति ॥५॥ते नारासीमछु- चन् त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति । शतसनिस्स्या इति । तथेति । ते नारासँस्याऽपुनन् । तस्मादुत नारासँस्या शतं सुनोति ॥६॥ ते रैभीमब्रुवन् त्वया पुनामेति । किं ततस्स्यादिति ।शतस- निस्स्या इति । तथेति । ते रैभ्या पुनन् । तस्मादुत रैभ्या शतं । . '' १५ १. विजिज्ञाना । २वा । ३सा । ४ प्रबीहत- हिंद: -नि,-नी । -स्य।८५ पुनः । लिखा है। तेन । १० शतनी । . ११-मिम । १२ ॥

'. ( ५० ) मुनोति ॥७॥ सेयम्पूता । अथाऽमुमब्रवीद्धहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीष्वेति ॥८॥ ॥५०॥ षोडशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १३ ३ ६.. स ऐलबेनाऽपुनीत । पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यनॅषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद ॥१॥ ते समेस साम प्रांजनयताम् । तद्यत्समेस साम प्राजनयतां तत्सा- नस्सामत्वम् ॥२॥ तदिदं साम सृष्टमद उत्क्रम्य लेलायदतिष्ठत् । तस्य सर्वे देवा ममत्विन आसन्मम ममेति ॥३॥ तेऽब्रुवन्धीद- म्भजामहा इति । तस्य विभागे न समपादयन् । तान्प्रजापतिर- ब्रवीदपेत । मम वा एतत् । अहमेव वो विभक्ष्यामीति ॥४॥ सोऽनिमब्रवीत्त्वं वै मे ज्येष्ठ पुत्राणामसि । त्वम्प्रथमों वृणीष्वेति ॥शा सोऽब्रवीन्मन्द्र सानो वणेऽन्नाद्यमिति । स य एतद्गायाद- बाद एवं सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्त- मुर्पवंदादितिः ।।६।। अथेन्द्रमब्रवीत्त्वमनुवृणीष्वेति ॥णा सोऽब्र- . ९ १ -१२ १३ तम्। १-सव-।, ऐलवनां । २-वाम् । ३ ग्रॅज्-। ४-अत् । ५ मे । घोऽस' के लिये स्थान वाली है, वीदां । ७. भविष्य-1 श्रियम् । गायत्राच् । १० श्रीमान् । ११ अथ । १२ सोमम् ।

A 13067 ( ५१ ) -- । वीदुग्रं सानो वृणे श्रियमिति । स य एतद्गायाच्छीमानेव सोऽस- न्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति ।। अथ सोममब्रवीत्वमनुणीश्चेति ।। सोऽब्रवीद्वल्गु साम्नो वृणे प्रियमिति । स य एतद्गायात्मिय एव स कीर्तेः प्रियश्चत्तुषः प्रिय- स्सर्वेषामसन् मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुप- वदादिति ॥१०॥ अथ बृहस्पतिमब्रवीत्त्वमनुवृणीष्वेति ॥११॥ सोऽब्रवीत्क्रौञ्चं सानो वृणे ब्रह्मवर्चसमिति । स य एतद्गायाब्रह्म- वर्चस्येव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुप- वंदादिति ॥१२॥ १॥५॥ षोडशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । अथ विश्वान देवानववीयूयमनुवृणीध्वमिति॥शातेऽत्रुवन्वैध- देवं सानो वृणीमहे प्रजननमिति।सय एतद्गायात्मजावानेव सोऽस- दस्मानु देवानामृच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति ॥२॥ अथ पशूनब्रवीचूयमनुणीध्वमिति ॥३॥ तेऽब्रुवन्वायुर्वा अस्माक- मीशे।सएवनो वरिष्यत इति। ते वायुश्च पशवश्चाब्रुवन्निरुक्तं साम्नो १३ वल्गु। १४ प्रियम् । १५ नास्ति, स य... 'सोऽब्रवीद में। १६ गायत्रच् । १७.नास्ति। १८ नु। १ 'म' अधिक है । २ नीचे से 'च स वायु' अधिक लेता है। ३ वरिष्ठ । ४ अनिरी-1 १ ૨ - ३ . . --- 8172 . . ६ En । ९ ( ५२ ) वृणीमहे पशव्यमिति । स य एतदायात्पशुमानेव सोऽसदस्मानु च स वायु च देवानामच्छाद्य एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिवि॥४॥ श्रय प्रजापतिरब्रवीदहमनुवारिष्य इति ॥५॥ सोऽब्रवीदनिरुक्तं सानो वृणे खर्यमिति । स य एतद्दायात्स्वर्गलोक एव सोऽसन्मामु स. देवानामच्छाय एवं विद्वाँसमेतद्गायन्तमुपवदादिति ।।६।। अथ वरुणमब्रवीत्त्वमनुटणीवेति ॥७॥ सोऽब्रवीद्यद्वो न कश्चना- ऽवृत तदहम्परिहरिष्य इति। किमिति। अंपध्वान्त सानोरणेऽपश- म्यमिति । स य एतद्गायादपशुरेव सोऽसन्मामु स देवानामृच्छाध एतद्द्वायादिति ॥८॥ तानि वा एतान्यष्टौ गीतागीतानि सान्नः। इमान्यु ह वै सप्तगीतानि । अथेयमेव वारुण्योगाऽमीवा ॥५॥स यांह को चैवं विद्वानेतासां सप्तानामागानां गायति गीतमेवास्य भवत्येतानु कामाबाध्नाति य एतासु कामाः। अथेमामेव वारुणी- 1 १४ मागां न गायेत् ॥१०॥ १॥५२॥ षोडशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । षोडशोऽनुवाकस्समाप्तः । Sin ५-युश् । र 'इति' तक शेष नहीं लिखा । ति । ८ वर्गम् । समुत् । १०-दृष्य्-क-, यत । ११ अपद्धमातम, अपध्मातम् । १२ परी-१३ द्धादू । १४-थ, स्थ। १५-२ । १८कामा। १५ मीरध- निधोति ।

(५३) द्वयं घावेदमग्र आसीत्सच्चैवासच ॥॥ तयोर्यत् सत् तत्साम तन्मनस्स प्राणः। अथ यदसत्सर्क सा वाक् सोऽपानः ॥२॥ २ तयन्मनश्चप्राणश्च तत्समानम् । अथयावाक्चापानश्चतत्समानम् । इदमायतनम्मनश्च प्राणश्चेदमायतनं वाक् चापानश्च । तस्मात्पुमा- दक्षिणतो योषामुपशेते ॥३॥ सेयमृगस्मिन् सामन् मिथुनमै- छत । तामपृच्छत् का त्वमसीति । साहमस्मीत्यब्रवीत् । अथवा अहममोऽस्मीति ॥४॥ तद्यत्सा चाऽमश्चतत् सामाऽभवत् तत्साम्नस्सामत्वम् ॥५॥ तौ चै सम्भवावेति । नेत्यब्रवीत्खेसा वै मम त्वमस्यन्यत्र मिथुन मिच्छस्वोति॥६॥साऽब्रवीन वैतं विन्दा- मि येन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति। साकै पुनीष्वत्यप्रवीत् । अपूता वा असीति ॥७॥ साऽपुनीत यदिदं विप्रा वदन्ति तेन । साऽब्रवीत्क्वेदम्भविष्यतीति प्रत्यूहेत्यब्रवीत्। धीर्वा एषामजानां जीवनं वा एतद्गविष्यतीति । तथेति । तत्प्रत्यौहत। तस्मादेषाधीरेख प्रजानां जीवनमेव ॥६॥ पुनीष्वेत्यब्रवीत् । साऽपुनीत गाथया साऽपुनीत कुम्ब्यया साऽपुनीत नारासँस्या साऽपुनीत पुराणेति- १ - । १ म्यक-अस्म्यद्ध भवितेऽति, (अस्त्य) भवितेति । २-ना। उपवशेते । ४-म । ५ सम्भवेत् । यम । ६ वा अधिक है । ७ प्रा, स्मिा । ५ त्वेत्यन् । १०-म्भ-, 'वा' अधिक بند " '. H १ :: ૨ हासेम साऽपुनीत यदिदमादाय नाऽऽगायन्ति तेन ॥१॥ साऽब्र- वीत्केदम्भविष्यतीति । प्रत्यूहेत्यब्रवीत् । धीर्वा एषा । प्रजानां जीवनं वा एतद्गविष्यतीति । तथेति । तत्पत्यौहत् । तस्मादेषा धीवप्रजानां जीवनम्वेव॥१०॥पुनीष्वैवेत्यब्रवीत्॥११॥१॥५३॥ सप्तदशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । सा मधुनाऽपुनीत । तस्मादुत ब्रह्मचारी मधु नाऽश्नीयाद्वेदस्य पलाव इति । कामं ह त्वाचार्यदत्तमश्नीयात् ॥१॥ अथ सामा- ब्रवीद्रहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीष्वेति । स भरण्डकेष्णेनाऽपुनीत । पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यषि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद॥२॥ ताभ्यां सदों मिथुनाय पर्यश्रयन् । तस्मादुपवसथीयां रात्रि सदसि न प्रयीत । अत्र ह्येताहक्सामे उपवसथीयां रात्रि सदसि सम्भवतः । स यथा श्रेय स उपद्रष्टैवं हि शश्वदीश्वरोऽतुलब्धः पराभवितोः ॥३॥ अथो आहुरुगातुर्मुखे सम्भवतः । उद्गातुरेव मुखं नेहे- ७ ११ इमम् । १२ मादायना, प्रादायना । १. सारे पद का पुनर्लेख है। २ स 'कामम्' के स्थान में। मा सर्वत्र है । ३ हरुण्डकेष्णेना, भरण्ड, भरुण्डकोचणेना.।४-चन् । ५-धीयाम, शीयाम् ।-ई । ७ यीत, येत । ८-- ६ नंदू । १० नुनुलष, अनुनुलुव-1 Min nevis ...

५५. ) तेति ॥४॥ तदु वा पाहुः काममेवोद्गातुर्मुखमीक्षेत । उपवसथीयामे- वैतां रात्रिं सदसि न शयीत । अत्र ह्येवैताक्सामे उपवस्थीयां १२ १४ रात्रि सदसि सम्भवत इति ॥१॥ तां सम्भविष्यन्नाहाऽमोऽहम- स्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहम् । सा मामनुव्रता भूत्वा प्रजाः प्रज- नयावहै । एहि सम्भवावहा इति ॥६॥ तां सम्भवन्नत्यरिच्यत सोऽब्रवीन वै त्वानुभवामि । विराड् भूत्वा प्रजनयावेति । तथेति ॥७॥ तौ विराड्भूत्वा प्राजनयताम् । हिङ्कारश्चाऽऽहावश्च प्रस्तावश्च प्रथमा चोद्गीथश्च मध्यमा च प्रतिहारश्चोत्तमा च निधनं च वषट्कारश्चैवं विराट् भूत्वा प्राजनयताम् । ते अमुमजनयतां योऽप्तौ तपति । ते व्यद्रवताम् ॥८॥ ॥५४॥ सप्तदशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। मदध्यभूश्न्मदध्यभूदिति । तस्मादाहुर्मधुपुत्र इति ॥२॥ तस्मादुतस्त्रियों मधु नाऽश्नन्ति पुत्राणामिदं व्रतं चराम इति वदन्तीः ॥२॥ तदयं तृचोऽनूदंश्रयत । इयमेव गायत्र्यन्तरिक्षं त्रिष्टुबसौ जगती । तस्यैतत्तृचः ॥३॥ स उपरिष्टात्सामाऽभ्याहितं तपति । २० ly १ ११ न । १२-थी-1 १३ 'रण' अधिक है। १४--| १५ संभवत । १६ प्रात्यरिच्यते । १७ हँ। १५ च । एवम् । १६ ज्- २० व्यदृप्ताम, भ्यहवताम, व्यहपताम् (१)॥ . १-या । २ इदम् । ३-ईत्- ( ५६ ) म . सोऽध्रुव इवासीदलेलायदिव । स नोोऽतपत् ॥४॥ स देवा- नब्रवीदुन्मा गायतेति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिह रहेतेति ॥५॥ तथेति । तमुदगायन् । तमेतदत्राऽहन् । तेभ्यरिश्रयम्पायच्छत् । सैषा देवानांश्रीः॥६॥तत एतद्ध्वस्तपति। स नार्वाङन्तपत् ॥७॥ स ऋषीनब्रवीदनु मा गायतति । किं ततस्स्यादिति । श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिहदहतोतापातयति। समन्वगायन् । तमेतदत्रादहन। तेभ्यश्श्रियम्मायच्छत् । सैषाऋषीणां श्रीः ॥ तत एतदर्वाङ् तपति । स न तिर्यङ् अतपत् ॥१०॥ स गन्धर्वाप्सरसोऽब्रवीदामा गायतति । किं ततस्स्यादिति श्रियं वः प्रयच्छेयम् । मामिहहहतोते ॥११॥ तथेति। तमागायन। तमेतदत्राऽहहन् । तेभ्यरिश्रयम्पायच्छत् । सैषा गन्धर्वाप्सरसा श्रीः ॥१२॥ तत एतत् तिर्यङ्तपति ॥१३।। तानि वा एतानि श्रीणि सान्न उद्गीतमनुगीतमागीतम् । तद्यथेदं वयमागायोद्गायाम एतदुद्गीतम् । अथ यद्यथागीतं तदनुगीतम् । अथ यत्किंचेति सा- म्नस्तदागीतम् । एतानि ह्येव त्रीणि साम्नः॥१४॥ ११५॥ सप्तदशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । सप्तदशोऽनुवाकस्समाप्तः । - १३ -::: ४ -- ५ दुहेते।६ उदगात्। ७-हत्। ८ तप्-तिय्यदू। १० । ११. तियद । १२ भागयो, मागेयो-१३-थम् ॥

( ५७ ) १ आपो वा इदमग्रे महत्सलिलमासीत् । स ऊर्मिरूमिमस्कन्दत् । ततो हिरण्मयौ कुक्ष्या समभवतां ते एवसामे ॥१॥ सेयमृगिदं २ सामाऽभ्यप्लवत । तामपृच्छत् का त्वमसीति । साहमस्मीयब्रवीत् । ६ ९ अथ वा अहममोऽस्मीति । तद्यत्सा चाऽमश्च तत्साम्नस्सामत्वम् ॥२॥ तौ वै सम्भवावेति । नेसब्रवीत्स्वसा वै मम त्वमसि । अन्यत्र मिथुनमिच्छति ॥३॥ सा पराप्लदत मिथुनमिच्छमाना । सा समास्सहस्रं सप्ततीः पर्यप्लवत ॥४॥ तदेष श्लोक:- स्त्री स्मवाऽने संचरतीच्छन्ती सलिले पतिम् । समास्सहस्रं सप्तती स्ततोऽजायत पश्यत, इति ॥५॥ असौ वा आदियः पश्यतः । एष एवं तदजायत । एतेनं हि पश्यति ॥६॥ साऽवित्त्वान्यप्लवत । साऽब्रवीन्न वैतं विन्दामि येन सम्भवेयम् । त्वयैव सम्भवानीति ॥७॥सा वै द्वितीयामिच्छ- खसबवीन वै मैकोऽधस्यसीति । सा द्वितीयां वित्त्वा न्यप्लवत ॥८॥ (तृतीयाम् ) इच्छस्वैवेसनवीनी वाव मा द्वे उद्यस्यथ इति । सा तृतीयां वित्त्वा न्यप्लवत । सोऽब्रवीदत्र वैमोऽद्यस्यथति १० ૧ ૨ 9 १५ - १३ १७ १-द । २ कुश्यौ । ३ येप। ४ सा-1५ ह्यल-1 ६ पपरा- ७ सम्ती।८-ति । पश्यः । १० तम् । ११ पित्वा । १२. नास्ति 'न्यप्लवंत । १३-यम् । १४ वै । १५ वा । १६ स्थानः छोड़ा हुआ है, ध्वे । १७ अब्-१८-स्यसी । स" ( ५८ ) २१ २ ३ ६ ॥६॥ स यदेकया ग्रे समवदत तस्मादेकर्चे साम । अथ यहे अपा- सेपत्तस्माद्वयोर्न कुन्ति । अथ यत् तिसभिस्समपादयत् तस्मादु तृचेसाम।।१०॥ ता अब्रवीत्पुनीचं न पूतावै स्थेति॥११॥ १॥५६॥ अष्टादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः सा गायत्री गाथयाऽपुनीत नाराशंस्यात्रिष्टुबैभ्या जगती । भीमम्बत मलमपावधिषतति । तस्मादीमलाधियो वा एताः। धियो वा इमा मलमपावधिषतति । तस्मादु भीमलाः । तस्मादु गायतां नाश्नीयात् । मलेन ह्येते जीवन्ति ॥१॥ अथर्क सामाऽब्रवीद्धहु वै किं च किं च पुमाँश्चरति । त्वमनुपुनीष्वेति । स ऊर्ध्वगणेना- ऽपुनीत ॥२॥ पूतानि ह वा अस्य सामानि पूता ऋचः पूतानि यर्षि पूतमनूक्तम्पूतं सर्वम्भवति य एवं वेद ॥३॥ ताभ्यां दिशो मिथुनाय पर्यौहन् । तां सम्भविष्यन्नह्वयताऽमोऽहमस्मि सा त्वं सा त्वमस्यमोऽहमिति ॥४॥ तामेतदुभयतो वाचाऽसरिच्यत हिङ्कारेण पुरस्तातस्तोभेन मध्यतो निधनेनोपरिष्टात् । अतितिम्रो. ब्राह्मणायनीस्सदृशी रिच्यते य एवं वेद ।।।। तयोर्यस्सम्भवतो- - C ९ १६-पद-1 २० तिस्र-२१ सम्प-॥ १-स्योत् । २ ब । ३-थे। ४-ता । ५ ऽग्नी-18 के । ७-तानी। -ता। नूक्-१०-प्यन्यू । १६ अवचयत, अह्वयन्त । १२ सामं ११-च । १४ त्यरूच्यते।

ke ) । रूवश्शूषोऽद्रवत् (प्राणास्) ते । ते प्राणा एवो; अद्रवन ॥६॥ सोऽसावादियस्स एष एव उदग्निरेव गी चन्द्रमा एव थम् । सामान्येव उदृच एव गी यजूंष्येव थमिसधिदेवतम् ॥७॥ प्रथा- ऽध्यात्मम् । प्राण एव उद्वागेव गी मन एव थम् । स एषोऽधिदेवतं चाऽध्यात्म चोद्गीथः ॥८॥ स य एवमेतदधिदेवतं चाऽध्यात्म चोद्गीथं वेदैतेन हास्य सर्वेणोद्गीतम्भवत्येतस्माद् एव सर्वस्मादा- १९ २० ३ वृश्च्यते य एवं विद्वाँसमुपवदति ॥६॥ २५७।। अष्टादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तद्यदिदमाहुः क उदगासीरिति क एतमादिसमगासीरिति ह वा एतत्पृच्छन्ति ॥१॥ एतं ह वा एतं त्रय्या विद्यया गायन्ति । यथा वीणागाथिनो गापयेयुरेवम् ॥२॥स एष हृदः कामानाम्पूर्णो यन्मनः । तस्यैषा कुल्या यद्वाक् ॥३॥ तद्यथा वा अपो हृदात्कु- ल्ययोऽपरामुपनयन्येवमेवैतन्मनसोऽधि वाचोद्गाता यजमानम् यस्य कामान प्रयच्छति ॥४ास य उद्गातारं दक्षिणाभिराराधयति ४ ३० १२ १५ चु-। १६ द्र-। १७ ऽद्धा- १८ गीथ्-। १६-गीथ्- २० भवत्येति, भवन्ति ॥ १-सी।२ प्रच्छन्य । ३ नृय्यां । ४-गायिनो,गायय्-१५ हृदू- ६ कूल्-७ यत् । ८ वात् । -त्र । १० अदो । ११-यन्य,-यन्ते, यन्त्य् । १२-ना । १३ दक्षिणोभि । १४ राध्-।

10 । r ( ६० ) म 1 १५ " १९ २.० 1 " ૨૨ ।। ' - तं सा कुल्योऽपधावति । य उ एनं नाऽऽराधयति स उ तामपि- हन्ति ॥॥ अथ वा अतः प्रत्तिश्चैव प्रतिग्रहश्च । तद्भूमामिति प्रदीयते । तद्वाचा यजमानाय प्रदेयम्मनसाऽऽत्मने । तथा ह सर्व न प्रयच्छति ॥६॥ तद्यदिदं सम्भवतो रेतोऽसिच्यत तदशयत् । यथा हिरण्यमविकृतं लेलायदेवम् ॥७॥ तस्य सर्वे देवा ममात्विन आसन्मम ममेति । तेऽब्रुवन्वीदं करवामहा इति । तेऽब्रुवञ्छ्रेयो वा इदमस्मत् । प्रात्मभिरेवैनद्विकरवामहा. इति ॥८॥ तदात्मभिरेव व्यकुर्वत । तेषां वायुरेव हिङ्कार आसाऽग्निः प्रस्ताव इन्द्र प्रादि- स्सोमबृहस्पती उद्गीथोऽश्विनौ प्रतिहारो विश्वे देवा उपद्रवः प्रजापतिरेव निधनम् ॥ एता वै सर्वा देवता एता हिरण्यम् । अस्य सर्वाभिर्देवताभिस्स्तुतम्भवति य एवं वेद । एताभ्य उ एवस सर्वाभ्योदेवताभ्याश्च्यतेय एवं विद्वाँसमुपवदति॥१०॥१॥५८॥ अष्टादशेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । अथ ह ब्रह्मदत्तश्चैकितानेयः कुरुंजगामाऽभिप्रतारिणं काक्ष- सेनिम् । स हाऽस्मै मधुपर्क ययाच ॥१॥ अथ हास्य वैप्रपद्य पुरो- ૨૨ २.४ an १५ अधः । १६ प्रतिश् । १७ घु-१८ श्रात्-। १६ सिध्य्-1 २० दश- २१ अपि-प्रपितृतं । २२ या.।२३ सोमावृ-दा२४ हिरण्य॥ १ कू-, भारैन् । २ एक में यहां हि समाप्ति है।३-य।

( ६१ ) ६ हितोऽन्ते निषसाद शौनकः । तं हाऽनामन्त्र्य मधुपर्कम्पपौ ॥२॥ तं होवाच किं विद्वानो दाल्भ्याऽनामन्व्य मधुपर्कम्पिबसीति । सामवैर्यम्प्रपोति होवाच ॥३॥ तं ह तत्रैव पप्रच्छ यद्वा यौ तद्वेस्था३इति । हिङ्कारो वा अस्य स इति ॥४॥ यदग्नौ तद्वेस्था३- इति । प्रस्तावो वा अस्य स इति ॥५॥ यदिन्द्रे तद्वेस्थाइति । आदिर्वा अस्य स इति ॥६॥ यत्सोमबृहस्पयोस्तद्वेस्थाश्इति। उद्- गीथो वा अस्य स इति ॥७॥ यदश्विनोस्तद्वेस्था३ इति । प्रतिहारो वा अस्य स इति ॥८॥ यद्विश्वेषु देवेषु तद्वेस्थाइति । उपद्रवो वा अस्य स इति ॥६॥ यत्प्रजापतौ तद्वेस्थाइति । निधनं वा अस्य तदिति होवाच । आर्षेयं वा अस्य तद्वन्धुता वा अस्य सेति ॥१०॥ स होवाच नमस्तेऽस्तु भगवो विद्वानपा मधुपर्कमिति ॥११॥ अथ हेबरः पप्रच्छ कि देवयं सामवैर्यम्प्रपद्यति । यद्देवसा- मु स्तुवत इति होवाच तद्देवसमिति ॥१२॥ तदेतत् साध्वेव प्रत्युक्तम् । व्याप्तिर्य अस्यैषति होवाच ब्रूह्येवेति । मेदं ते नमो- ऽकर्मेति होवाच । मैव नोऽतिपाक्षीरिति॥१३॥ स होवाचाऽप्रक्ष्यं १०। । ११ १२ ४-मन्त्रः । ५ सामवैर्या, 'र' रहित । ६. तत । ७ सोमाष्- ८ 'द- का पुनर्लेख । ९ नास्ति । १० अव्य । ११-वत्या । १२ सामवैय्या । १३-उत्तम् ।

१४ . १ ३ ( ६२ ) चाव, त्वा देवतामपक्ष्यं वाव त्वा देवतायै देवताः । वाग्देवसं साम वाचो मनो देवता मनसा पशवः पशूनामोपचय प्रोषधीनामापः । तदेतदभ्यो जातं सामाऽप्मु प्रतिष्ठितमिति ॥१४॥ १।५।। अष्टादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । देवामुरा अस्पर्धन्त । ते देवा मनसोदगायन् । तदेषाममुरा अभिद्रुस पाप्मना समसृजन् । तस्माद्बहु किं च किं च मनसा ध्यायति । पुण्यं चैनेन ध्यायति पापं च ॥१॥ ते वाचोदगायन। तां तथैवाऽकुर्वन् । तस्मादहु किं च किं च वाचा वदति । सत्यं चैनया वदसनृतं च ॥२॥ ते चतुषोदगायन् । तत्तथैवाऽकुर्वन तस्मादहु किं च किं च चतुषा पश्यति । दर्शनीयं चनेन पश्यत्य दर्शनीयं च ॥३॥ ते श्रोत्रेणोदगायन्।तत्तथैवाऽकुर्वन् । तस्माद्बहु किं च किं च श्रोत्रेण शृणोति । श्रवणीयं चैनेन शृणोत्यश्रवणीय च॥४॥ तेऽपानेनोदगायन् । तं तथैवाऽकुर्वन् । तस्माद्दु किं च किं चाऽपानेन जिघ्रति । सुरभि चैनेन जिवति दुर्गन्धि च ॥५॥ ते माणेनोदगायन् । अथासुरा आद्रवस्तथा करिष्याम. इति मन्यमानाः ॥६।। स यथाऽश्मानमृत्वा लोष्टो विवसेतैवमेवाऽसुरा १४ भ्यो। १ ऽगाय-1 २-द्रय अथवा-द्रत्य । ३-सज्- ४३।५कूर- रस्य । ७।८ नास्ति । -गात् । . । .

.. ११ ૧૨ व्यध्वसन्त । स एषोऽश्माऽखणं यत्प्राणः ॥७॥ स यथाऽश्मान- माखणमृत्वा लोष्टो विध्वंसत एवमेव सा विध्वंसते य एवं विद्वा- समुपवदति ॥८॥१६॥ अष्टादशेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । अष्टादशोऽनुवाकस्समातः । [ इति प्रथमोऽध्यायः।] -- १० सते, षन्ता । ११-णों। १२ प्राणम् । त । . - --- - [अथ द्वितीयोऽध्यायः। देवानां वै पडद्गातार आसन् वाक् च मनश्च चतुश्च श्रोत्रं चाऽपानश्च प्राणश्च ॥१॥ तेऽध्रियन्त तेनोद्गात्रा दीक्षामहै येनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्गलोकमियामेति ॥२॥ तेऽब्रुवन् वाचोद्गात्रा दीक्षामहा इति । ते वाचोद्गात्राऽदीक्षन्त । स यदेव वाचा वदति तदात्मन आगायदथ य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः॥३॥ ताम्पाप्माऽवसृज्यत । स यदेव वाचा पापं वदति स एव स पाप्मा ॥४॥ तेऽब्रुवन् न वै नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत्। मनसोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥॥ ते मनसोद्गात्राऽदीक्षन्त । स २ ३ . यदेव मनसा ध्यायति तदात्मन अागायदथ य इतरे कामास्तान्देवे- भ्यः ॥६॥ तत्पाप्माऽन्वमृज्यत । स यदेव मनसा पापं ध्यायति ३ ७ स एव स पाप्मा ॥७॥ तेऽब्रुवन् नो न्याव नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । चक्षुषोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥५॥तेचक्षुषो- द्गात्राऽदीक्षन्त । स यदेव चतुषा पश्यति तदात्मन आगायदय य इतरे कामास्तान्देवेभ्यः ॥६॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव चक्षुषा पापम्पश्यति ( स एव स पाप्मा)॥१०॥ तेऽब्रुवमोन्वाव १-म।२'य' अधिक है।३-त्यु।४ावीन् । ५न्व।६प्रवत्य-1-मान- ( ५ ) 'नोऽयम्मृत्यु न पाप्मानमसवादीत् । श्रोत्रेणोद्गात्र दीक्षामहा इति '११११॥ ते श्रीगोदानाऽदीक्षन्त । रा यव श्रोत्रेण भृणाति सदात्मन आगायदथ य इतर कामारतान्देवेभ्यः॥१२॥ तत्पाप्मा- ऽवया । स य श्रोत्रम् पाये गोति स एव स पाप्मा ॥१३॥ सेऽब्रुवन्नो बाब नोऽयम् मृत्यु न पाप्मानमसवांक्षीत् । श्रयानेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१४॥ तेपानेनोद्गात्रोऽदीदन्त । स यदेवामानेनाऽपानिति तदात्मन आगायदथ ये इतरे कामा- स्तान्देवेभ्यः ॥१५॥ तम्पाप्मा.न्यज्यत । स यदेवोऽपानन पाप 1 . . गन्धमपानिति स एव स पाप्मा ॥१६॥ तेऽब्रुवन् नो न्यानोऽय- मृत्यु न पाप्मानमसपाक्षीत् । प्राणेनोगात्रा दीक्षामहा इति।।१७|| ते प्राणेनोद्गात्राऽवीचन्त । स यदेव प्राणेन. मा.गति. ददाउन प्रागायथ यहारेकामास्त,न्देभ्यः। सत्याप्माना बदलत। न ह्येतेन प्राणेन पापं वदति न पापं ध्यायति न पापम्पश्यति न पापं गोति न पापं गन्यम्पानिति ॥१६॥तेनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं सगै लोकमायन् । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं वर्ग लोकमति य एवं वेद ॥२०॥ २॥२॥ प्रथमेगाके प्रथमः खगः । ८अपरिति । ।

(६६) सा या सा वागासीत्सोऽनिरभवत् ॥२॥ अथ यत्तन्मन आपीत् स चन्द्रमा अभवत् ॥२॥ अथ यत्तञ्चतुरासीत् स आदियोऽभवत् ॥३॥ अथ यत्तच्छोमासीत्ता इमा दिशोऽभवन् । साइएव विश्वेदेवाः॥॥अथ यस्सोऽपान आसीत्सबृहस्पतिरभवत् । पदस्यै वाचो बृहसै पतिस्तस्माबृहस्पतिः ॥५॥ अथ यस्स प्राण आसीत्स प्रजापतिरभवत् । स एष पुत्री प्रजावानुनीयो याप्राणः। तस्य स्वर एव प्रजाः । प्रजावान्भवति य एवं वेद ॥६॥ तं हैतमके असक्षमेव गायन्ति प्राणामाणा३माणाहुम्भा ओवा इति॥७॥ तदु होवाच शाख्यायनिस्तत एतमर्हति प्रसनं गातुम् । यद्वाव वाचा करोति तदेतदेवाऽस्य कृतम्भवतीति ।। अथ वा अत १ २ -- अक्सानोरेव प्रजातिः । स यद्धिङ्करोखभ्येव तेन क्रन्दति । अथ . यत्प्रस्ताव तेन लवते । अथ यदादिमादत्ते रेत एव तेन सिञ्चति। प्रय यदुद्गायति रेत एव तेन सिक्तं सम्भावयति । अथ यत्पति- हरति रेत एव तेन सम्भूतम्भवर्धयति । अथ यदुपद्रवात रेत एव तेन प्रदं विकरोति ।अथ यनिधनमुपैतिरेत एव तेन विकृतम्पज- १ यत् । २ अतम्, प्रथ। ३ कुर्वति । ४ ५ । ५-भैर, नास्ति यति। भय यत्प्रतिहरति । ।

। नयति । सैषसानोः प्रजातिः ॥॥ स य एवमेतामुक्सानीः प्रजाति वेद प्र हैनमृक्सामनी जनयतः ॥१०॥ २२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकस्समाहः ॥ १ । ३. ६ -- एष एवेदमग्र आसीद्य एष तपति । स एष सर्वेषाम्भूतानों तेजो हर इन्द्रियं वीर्यमादायो, उदक्रामत् ॥२॥ सोऽकामयते- कमेवाऽक्षरं स्वादु मृदु देवानां वनामति ॥२॥ स तपोऽतप्यतं । स तप तप्वेकवाऽक्षरमभवत् ॥३॥ तं देवाश्चर्षयश्वोपसमैप्सन् । अथैषोऽसुरान्भूतहनोऽसृजतैतस्य पाप्मनोऽनन्वागमाय ॥४॥ ते वाचोपसमैप्सन् । ते वाचं समारोहन् । तेषां वाचम्पर्यादत्त । तस्मात्पर्याद ता वाक् । ससं च निया वदसनृतं च ॥॥॥ तम्म- नसोपसमेप्सन् । ते मनस्समारोहन् । तेषाम्मनः पर्यादत्त । तस्मात्पर्यादत्तम्मन[:]स् । पुण्यं च ोनेन ध्यायति पापं च ॥६॥ तं चतुयोपसमप्लन् । ते चतुस्समारोहन् । तेषां चतुः पादत्त । तस्मात्पर्यात्तं चतुः। दर्शनीयं च ह्यनेन पश्यत्यदर्शनीयं च ॥७॥ ६ सानो, सानो। १स ।र-षा । ३मदु । ४ नास्ति । प्रति। ऐवा। ७ ' उदेवानाम' पूर्व से पुनः है। ८ पर्य।

(६८) ... ९ । तं श्रीरेणोपसमप्तन् । ते श्रोत्रं समारोहन । तेषां श्रोतम्पर्यादत्त । तस्मात्पर्यात्तं श्रोत्रम् । श्रवणीयं चनेन शृणोस श्रवणीयं च ॥५॥ समयानेनोपसमैप्सन् । तेऽपान समारोहन् । तेषामपानम्पर्यादत्त। तस्मात्पर्यात्तोऽशनः । सुरभि च ह्यनेन निवाति दुर्गन्धि च ॥ सम्हाणने पसनेप्स.न् । तथाणेनोपसमाप्नुवन् ॥१०॥ अथाऽसुरा भूतहन आद्रवन्म हयिष्यामः इति गन्यमानाः ॥११॥ स यथा- ऽश्मान्मृत्वा लोप्टो विध्वंसतैवमेवाऽमुरा व्यध्वसन्त । स एषोऽरमा- खरणो यत्माणः ॥१२॥ स यथाऽरमानगारुणरत्या लोष्टो विध्वंसत एवमेव.स.विध्वंसते य एवं विद्वांसमुपवदति।।१३।।।३।। ई तीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। स एष वशी दीप्तान उदीयो यत्माणः। एप हीदं सर्व वशेकुरुते ॥ ॥ वशी भवति वशे स्वान्कुरुते य एवं वेद । अस्य ह्यसावग्रे दीप्यते ३ अमुज्य वासः ॥२॥ तं हैतमुद्गीथं शाध्यायनिराचष्टे वशी दीवान इति । दीप्ताया ह वा अस्य कीर्तिभवति य एवं वेद ॥३॥ याभूतिरिति कारीरादयः प्राणं या अनुप्रजाः पशव आभवन्ति । स य एवमेतमाभूतिरित्कुपास्त ऐवप्राणेन प्रजयापशुभिर्भवति॥ पोत्त, पय्याप्त। १ एषौ तह. सर्व वशेकुरुते पैसा पाठ देते हैं। २-शो। ३ ऽमुष-1४अतः। १ ३ marwroornamentary ६ १२ सन्मतिरिति सात्ययज्ञयः । पाणं वा अनुवजाः पशवरसम्भवन्ति। स य एवमेतं सन्मतिरित्युपारते समे [व] प्राणेन प्रजया पशुभि- भाति प्रभूरिति शेतप्राणं वा अनुमजः पशमः प्रभवन्ति । स य एवमेत भूतिरित्युपास्ते जैव प्राणेन प्रजया पशुभिर्भपते ॥६॥ भूतिरिति भाल्लविनः। प्राणं वा अनुप्रजाः परो भान्ति । स य एसमेत पूतिरित्युपास्ते भात्येव प्राणेनं मनमा पशुभिः ॥ अरोधोऽनपरुव इति पार्णशैलनः । एप पन्यमपरणद्धि नैतमन्यः । एप ह वाऽस्य द्विषन्तम्भ्रातृव्यम- परुणाद्व य एवं वेद ॥८॥ द्विर्त.येऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । एकचार इत्यारुणेः। एको रवैष वीरो यत्माणः । आ हा ऽस्यैको वारोवीयवाआयते य एवं वेद॥१॥एकपुत्र इति चैकितानेयः। एको हवैष पुत्री यवाणः ॥२॥ स उ एव द्विपुत्र इति । द्वौ हि प्राणापानौ ॥३॥ स उ एंव त्रिपुत्र इति । त्रयो हि प्राणोऽपानो ध्यानः ॥४॥ स उ एव चतुष्पुत्र इति । चत्वारो हि प्राणोऽपानो ५-भूर् । ६ शलि-७ 'पजया' अधिक है। भूर ।९ अरोद्धा। १०-णद्वि । ११ से। १५-त । १३-चन- १-रु । र त्य। ३-णय, एफ. के स्थान में सर्वत्र 'एका'।४-२ । ५हिए- १ २. ३ ( ७० ) ७ ९ १० ११ व्यानस्समानः॥॥ स उ एव पञ्चपुत्र इति । पञ्च हिमाणोऽपानी व्यानस्समानोऽत्रानः ॥६॥ स उ एव पट्पुत्र इति । षड्हि प्राणो. ऽपानो व्यानस्समानोऽवान उदानः ॥७॥ स उ एव सप्तपुत्र इति सप्त हीमे शीर्षण्याः प्राणाः ॥८॥ स उ एव नवपुत्र इति सप्त हि शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाचौ ॥॥ स उ एव दशपुत्र इति । सप्त- शीर्षण्या:.प्राणा द्वाववाचौ नाभ्यां दशमः ॥५०॥ स उ एव बहुपुत्र इति । एतस्य हीयं सर्वाःप्रजाः॥११॥ एतं ह स्म वैतदुद्गीथ विद्वांसः पूर्वेब्राह्मणाः कामागायिन आहुः कति ते पुत्रानागास्याम इति ॥१२॥२१॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। स याद ब्रूयादेकम्न मागायेति प्राण उद्गीथ हात विद्वानेकम्मनसा ध्यायेत् । एको हि प्राणः । एकोहाऽस्याऽऽजायते ॥१॥ स यदि ब्रूयाहौ म पागायेति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान्द्रौ मनसा ध्यायेत् । द्वौ हि प्राणापानौ द्वौ हेवाऽस्याऽऽजाये।।२।ास यदि ब्रूयात्रीन्म प्रा- गायेति पाणउद्गीथ इत्येव विद्वांस्त्रीन्मनसाध्यायेत् । त्रयो हि प्राणो १ ६-ना। ७.अभि । ८-मां । ६ पसुपुत्र । १० यम, दयम् । ११-नीन॥ १.ऐक- २ अयो। ३'व्यानः' अधिक है। 'सहैवाइस्याजा- यन्ते अधिक है। ५मन ।

7 ऽपानोव्यानः त्रयो हैवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥शास यदि याचतुरोम भागायेति प्राणा उद्गीथ इत्येव विद्वाँश्चतुरोमनसा ध्यायेत्। चत्वारो हिमाणोऽपानो व्यानस्समानः। चत्वारो हैवास्याऽऽजायन्ते ॥४॥ स यदिब्रूयात्पञ्च म पागायेति प्राणउद्गीथइत्येव विद्वानपञ्चमनसा ध्यायेत् । पञ्चहिमाणोऽपानो व्यानस्समानोऽवानः। पञ्च हैवाऽस्या जायन्ते॥॥ स यदि ब्रूयात् षण्म आगायेतिवाणउद्गीथ इत्येव विद्वान् पण्मनसा ध्यायेत् । षाड्ढे प्राणोऽपानोव्यानस्समानोऽधान उदानः । षड्वाऽस्याऽऽजायन्ते ॥६॥ स यदि ब्रूयात्सप्तमागा- येति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान् सप्तमनसा ध्यायेत् । सप्त हीमे शीर्षण्याः प्राणाः । सप्त हैवाऽस्याऽऽजायने॥७॥ स यदि बयानव मागायति पाणउद्गीथ इत्येव विद्वान्नव मनसा ध्यायेत् । सप्त शीर्षण्याः प्राणा दाववाञ्चौ । नव हैवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥८॥स यदिब्रूयाद्दश मागायति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान्दश मनसा ध्यायेत् । सप्त शीर्षण्याः प्राणा द्वाववाचौनाभ्यां दशमः दश हैवा स्याऽजायन्ते ॥६॥स यदिब्रूयात्सहसम्म पागायति प्राणउद्गीथ इत्येव विद्वान् सहस्रन्मनसा ध्यायेत् ।सहस्रं हैत आदित्यरश्मयः। तेऽस्य पुत्रः । सहस्रहवाऽस्याऽऽजायन्ते ॥१०॥ एवं हवैतमुद्गीथ मास्ति । यदि म्यानम् । ७भिाददा। १०त । ९ । ७२ ) १२ स्वर आटणार कक्षीवाँस्त्रसदस्युरिति पूर्व महाराजाश्श्रोत्रियास्तह- सत्रमुगनिषेदुः । ते ह सर्व एल सहस्रपुत्रा भानुः॥१॥राय एवे। वेद सहस्रं हैवाऽस्य पुत्रा भवन्ति ॥१५॥ २॥६॥ द्वितीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। द्वितीयोडवाकरलमातः । ३ ६ शर्यातो वै मानवः प्राच्यां स्थल्यामयजत । तस्निन ह ना- न्युद्गीथेऽपिचमापरे ॥१॥ तं देवा बृहस्पतिनोद्गात्रा दीक्षामहा, इति पुरस्तादागच्छन्नयं त उद्गायत्विति । बम्बेनाऽऽद्विषेण पितरो दक्षिणा त उद्गायत्वित्युशनला काव्येनाऽनुतः पश्चादयं त उगा पबिपाहारिलेव मया उतरतो- अंत उहायबितत ॥२॥ सहेजको होना पृछाने कियतो वा एक ईशे कियत एकः क्रियत एक इति ।।३।। स होवाच बृहस्पतिं यन्मेत्वमुद्गायेः किं ततस्स्यादिति ॥ ॥ स होवाच देवे- धेव श्रीस्स्याइवेष्वीशा स्वर्गमुत्वालोकं गमयेयामिति ॥२॥ अथ होवाच असमाजद्विपस्सन्मत्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥६॥ स. १२ जश् । १३ यद् । १ शया- २ स्थालगाम्। ३ अपत । ४ ऽधिसम् । ५ऐशिरे । ६ बिम्ब- ७ दक्षणतो। ८ कांस्पेना। -१० श्चातः । ११ अ-नांबरोन', अहियेना। १२ कियं । १३-तिः।१४ा पम्'अधिक हैं । १५ नास्ति, स होवाच 'ततरस्यादित।..

( ७३ ) १६ १७ होवाच पितृष्वेव श्रीस्स्यापितृष्वीशा स्वर्गमु त्वां लोकं गमयेयमिति ॥७॥ अथ होवाचोशनसं काव्यं यन्मे त्वमुद्गायः किं ततस्स्यादिति ॥८॥स होवाचाऽमुरेष्वेव श्रीस्स्यादमुरेष्वीशा स्वर्गमु त्वां लोकं गमयेयमिति ॥ अथ होवाचाऽयास्यमाङ्गिरसं यन्मे त्वमुद्गायेः किं ततस्स्यादिति ॥१०॥ स होवाच देवानेव देवलोके दध्याम्मनुष्या- न्मनुष्यलोके पितॄन पितृलोके नुदेयाऽस्माल्लोकादम्रान स्वर्गमु त्वां लोक गमयेयामिति ॥११॥२७॥ २० ૨૧ ૨ ૨. तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । ५ + स होवाच त्वं मे भगव उद्गाय य एतस्य सर्वस्य यशो[ऽसीति ॥२॥ तस्य हाऽयास्य एवोजगौ । तस्मादुद्वाता मृत उत्तरतो निवेशनं लिप्सेत । एतद्ध नाऽऽरुद्ध निवेशनं यदुत्तरतः ॥२॥ उत्तरत भागतो यास्य आङ्गिरसशर्यातस्य मानवस्योजगौ । स माणेन देवान्देवलोके ऽदधादपानेन मनुष्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन पितृलोके हिङ्कारेण वजेणाऽस्माल्लोकादमुराननुदत ॥३॥ तान् होवाच दूरं गच्छतेति । स दरो ह नाम लोकः। त ह जग्मुः। त एतेऽसुरा असम्भाव्यम्पराभूताः ॥४॥ छन्दोभिरेव याचा १९ य । १७ जे । १८-शाः । १६न्य । २०-यात । २१-ॉन् । २२ 'उ' अधिक है । २३ है। १-शस । २-तृन् । ३असं यम्- ३ ( ७४ ) ६ -9 २ शर्यातम्मानवं स्वर्ग लोकं गमयांचकार ॥॥ ते होचुरसुरा एतत वेदाम यो नोऽयामस्थमधत्तेति । ततपागच्छन् । तमेसाऽपश्यन् ।।६।। तेऽब्रुवनयं वा आस्य इति । यदब्रुवन्नयं वा पास्य इति तस्मादय- मास्यः । अयमास्यो ह वै नामैषः । तमयास्य इति परोक्षमाच- क्षते ॥७॥ स प्राणो वा प्रयास्यः। प्राणो ह वा एनान स नुनुदे ॥८॥ स य एवं विद्वानुद्गायति प्राणेनैव देवान्देवलोके दधायपानेन मनुष्यान्मनुष्यलोके व्यानेन पितॄन् पितृलोके हिङ्कारेणेव वज्रेणाऽस्माल्लोकाविषन्तम्भ्रातृव्यं नुदते ॥६॥२८॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तं ह यादरं गच्छोते । सयमेव लोकमसुरा अगच्छंस्तं हैव गच्छति ॥१॥छन्दोभिरेव वाचा यजमानं स्वर्ग लोकं गमयति ॥२॥ ता एता व्याहृतयः। प्रेसति वाग[इति] भूर्भुवस्तारित्य[उदिति]॥३॥ तद्यत्मेति तत्माणस्तदयं लोकस्तदिम लोकमस्मॅिलोक आभजति॥४॥ एसपानस्तदसौ लोकस्तदमुं लोकममुष्मिलोक आभजति ॥५॥ वागितिं तद्ब्रह्म तदिदमन्तरिक्षम् ॥६॥ भूर्भुवस्वरिति सा त्रयी- विद्या ॥७॥ उदिति सोऽसावादियः । तद्यदुदित्युदिव श्लेष- ४ शय्या-1 ५ त । ६-छस् । ७-असो।८ पान्-.६ पहिंक्- १० षान् ॥ २ १-या।२ स्या-1३सत् । Rani ( ७५ ) ६. ७ यति ॥८॥ तघदेकमेवाऽभिसम्पद्यते तस्मादेकवीरः । एको ह तु सन्वीरो वीर्यवान् भवति । आहाऽस्यैको वीरो वीर्यवान जायते य एवं वेद ॥६॥ तदु होवाच शाव्यायनिर्बहुपुत्र एष उद्गीथ इसे- वोपासितव्यम् । बहवो ह्येत आदिस रश्मयस्तेऽस्य पुत्राः । तस्मा- बहुपुत्र एष उद्गीथ इसेवोपासितव्यमिति ॥२०॥रासा तृतीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकस्समाप्तः। " देवासुरास्समयतन्तेसाहुः । न ह वै तद्देवासुरास्सम्येतिरे। प्रजापतिश्च ह वै तन्मृत्युश्च सम्येताते ॥१॥ तस्य ह प्रजापतेर्देवाः प्रियाः पुत्रा अन्त आमुः। तेऽधियन्त तेनोगात्रा दीक्षामहै येना- ऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमियामेति ॥२॥ तेऽब्रुवन्वा- चोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥३॥ ते वाचोद्गात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं वागागायद्यदिदं वाचा वदति यदिदं वाचा भुनते ॥४॥ ताम्पाप्मान्वसृज्यत। स यदेव वाचा पापं वदतिस एक्सपाप्मा॥॥ तेब्रुवन् न वै नोऽयम्मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । मनसोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥६॥ ते मनसोद्गात्रा दीक्षन्त । तेभ्य इदम्मन -- ४श्येष्-५-ए।६-यावान् । ७-ए (इत्य)।८आदित्यं स्यात ॥ १-थाय । २ 'नोदात्रा दीक्षामहा इति' अधिक है पर 'ते' और भ्य' के बीच लाल रङ्ग से काटा गया है । ३ प्रवत्यy ( ७६ ) पागायचदिदम्मनसा ध्यायति यदिदम्मनसा भुञ्जते ॥७॥ तत्पा- -- 12. Aamir winnervey aahe ke : 3marwadi प्माऽन्वसृज्यत । स यदेव मनसा पापं ध्यायति स एव स पाप्मा ॥८॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । बत्तुषोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥६॥ ते चतुषोगात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं चतुरामायद्यदिदं चतुषा पश्यति यदिदं चतुषा भुनते ॥१०॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत। स यदेव चतुषा पापम्पश्यति स एव स पाप्मा ॥११॥ तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयम्मृत्युं न पाप्मा- नमसवाक्षीत् । श्रोत्रेणोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१२॥ ते श्रोत्रेणो- द्रात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं श्रोत्रमागायद्यदिदं श्रोत्रेण शृणोति यदिदं श्रोत्रेण मुअते ॥१३॥ तत्पाप्माऽन्वसृज्यत । स यदेव श्रोत्रेण पापं शृणोति स एव स पाप्मा ॥१४॥ तेऽब्रुवनोन्वाव नोऽयं मृत्यु न पाप्मानमसवाक्षीत् । प्राणेनोद्गात्रा दीक्षामहा इति ॥१॥ ते प्राणेनोद्गात्राऽदीक्षन्त । तेभ्य इदं प्राण आगाय- यदिदं प्राणन पाणिति यदिदं प्राणेन भुञ्जते ॥१६॥ तम्पाप्मा- इन्वरज्यत । स यदेव प्राणेन[पापं प्राणिति स एव स पाप्मा॥१७॥तेऽब्रुवन्नोन्वाव नोऽयं मृत्युं न पाप्मानमसवाक्षीत्। अनेन मुख्येन प्राणेनोगात्रा दीक्षामहा इति ॥१८॥ तेऽनेन ४-त्यु । ५ 'स' अधिक है। ने।

( ७७ ) मुख्येन प्राणेनोगात्राऽदीक्षन्त ॥१६॥ सोऽब्रवीन्मृत्युरेष एषां स १ उद्गाता येन मृत्युमसेष्यन्तीति ॥२०॥ न होतेन प्राणेन पार्ष वदति न पापं ध्यायति न पापम्पश्यति न पापं शृणोति न पापं गन्धमपानिति ॥२१॥ तेनाऽपहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमायन् । अपहस हैव मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति. य एवं वेद ॥२२॥२॥१०॥ चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। स यथा हत्वा प्रमृद्याऽतीयादेवमेवैतम्मृत्युमत्यायन् ॥१॥ स वाचम्पयमामत्यवहत् । ताम्परेण मृत्यु न्यदधात् । सोऽग्निर- भवत् ॥२॥ अथ मनोऽत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधात् । स चन्द्रमाअभवत् ॥३॥अथ चक्षुरत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधाद। स प्रादित्योऽभवत् ॥४॥ अथ श्रोत्रमत्यवहत् । तत्परेण मृत्यु न्यदधात् । ता इमा दिशोऽभवन् । ता उ एव विश्वे देवाः ॥ अथ प्राणमत्यवहत । तम्परेण मृत्यु न्यदधात् । स वायुर- भवत ॥६॥ अथाऽऽत्मने केवलमेवाऽन्नाद्यमागायत् ॥७॥ स एष ૨ ३ २ २ ७-यम्।८गमयन् । १ स अधिक है, 'प्रत्यायन्' के स्थान में-यत । २-यु। ३-न् ! ४दया।

( ७८ ) ६ ९ ११ १२ - एवाऽयास्यः। आस्ये धीयते । तस्मदयास्यः । यदेवा [ऽयम्] आस्य रमते तस्माद्वेवाज्यास्यः ॥८॥ स एष एवाऽऽङ्गिरसः। अतो हीमान्यङ्गानि रसं लभन्ते । तस्मादाङ्गिरसः । यद्वेवेषा- मङ्गानां रसस्तस्मा द्वेवाऽऽङ्गिरसः ॥२॥ तं देवा अब्रुवन् केवलं चा आत्मनेऽनाघमागासी । अनु न एतास्मिन्ननाद्य प्राभन । एतदस्याऽनामयत्वमस्तीति ॥१०॥ तं वै प्रविशतेति । स वा आकाशान् कुरुष्वति । स इमान् प्राणानाकाशानकुरुत ॥११॥ तं वागेव भूत्वाऽग्निः प्राविशन्मनो भूत्वा चन्द्रमाश्चतुर्भूत्वा ऽऽदित्यश्श्रोत्रम्भूत्वा दिशः प्राणों भूत्वा वायुः ॥१२॥ एषा वै दैवी परिषदैवी सभा दैवी संसत् ॥१३॥ गच्छति ह. वा एतां दैवीम्परिषदं दैवीं सभां दैवीं संसदं य एवं वेद ॥१४॥२॥११॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । यत्रो ह वैक चैता देवता निस्पृशन्ति न हैव तत्र कश्चन पाप्मान्यङ्गः परिशिष्यते ॥२१॥ स विद्यान्नेह कश्चन पाप्मान्यङ्गः परिशेक्ष्यते सर्वमेवैता देवताः पाप्मानं निधक्ष्यन्तीति । तथा हैव । १७ १७ . १ ૨ ५ पासे । ६ध्यति । ७ एगें। ८ स्य। -ज्यास्यः। १० अङ- ११ अः । १२ आमयत्वम् । १३ असी । १४ आकाशात् । १५ प्रशासनम् । १६ कूरुत । १७ - नास्ति । १८वी-॥ १चे। रचते । ३ एवम् । ४ एता ।

--- ( ७६ ) भवति ॥२॥ य उ ह वा एवंविदमृच्छति यथैता देवता ऋत्वा नीयादेवं न्येति । एतामु यैवेनं देवतामु प्रपन्नमेतासु वसन्तमुप- वदति ॥३॥ तस्य हैतस्य नैव काचनाऽतिरस्ति य एवं वेद । य एवैनमुपवदति स आतिमाछति ॥४॥सय एनमृच्छादेव तादेवता उपसस ब्रूयादयम्माऽऽरत् स इमामाति न्येविति। तां हैवाति, न्येति ॥५॥ यावदावासा उ हाऽस्येमे माणा अस्मिलोक एतावदान १३ वासा उ हाऽस्यता देवता अमुष्मिलोके भवन्ति ।।६।। तस्मादु १४ १५ हैवं विद्वानवाऽगृहतायै बिभीयानाऽलोकतायै । एता मे देवता अस्मिँलोके गृहान् करिष्यन्ति । एता अमुष्मिलोके भवन्ति । तस्मादु लोकम्पदास्यन्तीति ॥७॥ तस्मादु हैवं विद्वान्नैवाऽगृहतायै बिभीयानाऽलोकतायै । एता मे देवता अस्मिँलोके गृहेभ्यो गृहान करिष्यन्ति स्वेभ्य आयतनेभ्य इति हैव विद्याद् [एता] -- देवता अमुष्मॅिलोके लोकम्प्रदास्यन्तीति ॥८॥ तस्मादु हैवं ५-विद् वा विद।६ दुच्छति। ७ नेति । ८-तीर् । ६ आकृति । १० एम् । ११.रात् । १२ अत्ति ।१३-दावशा।१४ ग्रह-१५ अस्मिल ! १६ प्रवदा-1१७'श्रायतनेभ्य' अधिक है । १८ एव ता ।।

( ८० ) विद्वानैवाऽगृहतायै विभीयानाऽलोकतायै एता म एतदुभयं संनस्यन्तीति हैव विद्यात् । तथा हैव भवति ॥६॥२॥१२॥ चतुर्थेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः । -- १ - . ३ ६ देवा वै ब्रह्मणो वत्सेन वाचमदुहुन् । अगिर्ह वै ब्रह्मणो वत्सः॥१॥सा या सावारब्रह्मैव तत् । अथ योऽग्निर्मत्युस्सः ॥२॥ तामेतां वाचं यथा धेनुं वत्सेनोपसृज्य प्रत्तां दुहीतैवमेव देवा वाचं सर्वान्कामानदुहन् ॥३॥ दुहे ह वै वाचं सर्वान्कामान्य एवं वेद । स हैषोऽनानृतो वाचं देवीमुदिन्धे वद वद वदेति ॥४॥ तद्यदिह पुरुषस्य पापं कृतम्भवति तदाविष्करोति । यदिनदपि रहसीव कुर्वन्मन्यतेऽथ हैनदाविरेव करोति । तस्माद्वाव पापं न कुर्यात् ॥५॥२॥१३॥ पञ्चमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । एष उ ह वाव देवानां नेदिष्ठमुपर्यो यदग्निः ॥१॥ तं साधूपचरेत् । य एनमस्मिलोके साधूपचरति तमेपोऽमुष्पॅिलोके १ १ पस्तेन, पत्सेन । २ वक्ष-1३-र । ४ जहे । ५ उदिग्धे । ६ प्रमिह । ७-त। ८ अथ्- ६ 'एष उ ह वा दूसरे अनुवाक का यहां अधिक है। १चरति ।

( १ ) साधूपचरति । अथ य एनमस्मिलोके नाऽऽद्रियते तमेषो मुष्मि- लोके नाऽद्रियते । तस्माद्वा अग्निं साधूपचरेत् ॥२॥ तं नैव हस्ताभ्यां स्पृशेन पादाभ्यां न दण्डेन ॥३॥ हस्ताभ्यां स्पृशति यदस्याऽन्तिकमवनेनिक्ते । श्रथ यदभिप्रसारयति तत्पादा-- भ्याम् ॥शा स एनमास्पृष्ट ईश्वरो दुर्धायां धातोः। तस्माद्वा अनि साधूपचरति । सुपायां हैवैनं दधाति ।।।२।१४॥ पञ्चमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । एष उ ह वाव देवानाम्महाशनतमो यदानः ॥२॥ तत्र व्रत्यमददानोऽश्नीयात् । यो वै महाशने ननत्यश्नातीश्वारो हैनम- भिषक्तोः। पूतिमिव हाऽश्नीयात् ॥२॥ अथोडमोक्तेऽशने ब्रूयात समिन्त्स्वाऽग्निमिति । स यथा प्रोक्तेऽशने श्रेयाँसम्परिवेष्टव ब्रूयात्ताहक् तत् ।।३।। एतदु ह वाव साम यद्वाक् । यो वै चतु- स्साम श्रोत्रं सामेत्युपास्ते न ह तेन करोति ॥४॥ अथ में आदित्यस्साम चन्द्रमास्सामेत्युपास्ते न हैव तेन करोति ॥शा ६ G ९ ।' m अथ यो वाक् सामेत्युपास्ते स एवाऽनुष्टया साम वेदं । वाचा हि २ ताडेनम्, तपनम् । १ प्र -२ ददासीनो । ३ अभिष( भत्ताः ४-र । ५ विमिव । ६ मी-- ७ सम् । ८ मा । यद् .

(२) सान्नाऽऽविज्य क्रियते ॥६॥ स यो वाचस्स्वरो जायते सोड निर्वाग्वेव वाक् । तत्रैकधा साम भवति ॥७॥ स य एवमेतदे- कथा साम भवढेदैवं हैतदेकधा साम भवतीत्येकधेव श्रेष्ठस्वा- नाम्भवति ॥८॥ तस्मादु हैवंविदमेव साम्नाऽऽत्विज्यं कारयेत । स ह वाव साम वेद य एवं वेद ॥२॥१५॥ पञ्चमेनुवाके तृतीयः खण्डः पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ -- । । ...

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[तृतीयोऽध्यायः
१
एका ह वाव कृत्स्ना देवताऽर्धदेवता एवाऽन्याः। अयमेव
योऽयम्पवते ॥२॥ एष एव सर्वेषां देवानां ग्रहाः ॥२॥ स हैषो-
ऽस्त नाम । अस्तमिति हेह पश्चाद्रहानाचक्षते ॥३॥स यदादियो-
ऽस्तमगादिति ग्रहानगादिति हैतत् । तेन सोऽसर्वः । स एतमेवा-
ऽप्यति ॥४॥ अस्तं चन्द्रमा एति । तेन सोऽसर्वः। स एतमेवाऽप्ये-
ति ॥शा अस्तं नक्षत्राणि यन्ति । तेन तान्यसर्वाणि ।
तान्येतमेवाऽपियन्ति ॥६॥ अन्वग्निर्गच्छति । तेनं सोऽसर्वः। स
एतमेवाऽप्येति ॥७॥ एसहः । एति रात्रिः । तेन ते. असर्वे । ते
एतमेवाऽपीतः ॥८॥ मुह्यन्ति दिशो न वै ता रात्रिम्पज्ञायन्ते ।
तेन ता असर्वाः । ता एतमेवाऽपियन्ति ॥६॥ वर्षति च पर्जन्य
उच्च गृह्णांति । तेन सोऽसर्वः । स एतमेवाऽप्यति ॥१०॥तीयन्त
आप एवमोषधय एवं वनस्पतयः । तेन तान्यसर्वाणि ।
तान्यतमेवाऽपियन्ति ॥११॥ तदेतत्सर्वं वायुमेवाऽप्येति तस्माद्वा-
२
।
.
--
१चा ।२।३-
ताश्तांस सामवेद'अधिक है।
.

. . '. -- ( ४ ) युरेव साम ॥२२॥ स ह वै सामवित्स [कृत्लं] साम वेद य एवं बेद ॥१३॥ अथाऽध्यात्मम् । न वै स्वपन बाचा वदति। सेयमेव 'प्राणमप्यति ॥१४॥ न मनसा ध्यायति । तदिदमेव प्राणामप्ये- ति ॥१॥ न चतुषा पश्यति । तदिदमेव प्राणभप्यति ॥१६॥ न श्रोत्रेण शृणोति । तदिदमेव प्राणमप्यति ॥१७॥ तयदेतत्सर्व- माणमेवाऽभिसमेति तस्मात्माण एव साम ॥१८॥ स ह वै सामवित्स कृत्स्नं साम वेद य एवं वेद ॥१६॥ तद्यदिदमाहुर्न बताऽध वातीति[स] हैतत्पुरुषेऽन्तर्निरमते स पूर्णस्स्वेदमान भास्ते ॥२०॥ तद्ध शौनकं च कापेयमभिप्रतारिणं च[काक्षसेनिम्] ब्राह्मणः परिवेविष्यमाणा उपाववाज ॥२१॥२२॥ प्रथमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। तौ ह बिभिः । ते इ नाऽऽददाते को वा कोवेति मन्यमानौ ॥२॥ तो होपजगौ। महात्मनश्चतुरो देव एक: कस्स जगार भुवनस्य गोपाः । तं कांपेय'न विजानन्त्यकेऽभिप्रतारिन् बहुधा निविष्टम् ।। RamtemperimuppITI मम यति। -मिते । १०-ण। ११-काश् १२ विष्या-1 १३-प्राजा। तिम्-1 १ द्रात ३ ३ सो । ४ कालपेय । ५ निविन्दम् ।

१२ त्वया १६ १७ १८ १९ २०२१ २ ૨૪ २५ PROACHAAREE (८५) इति ॥२॥ स होवाचाऽभिपतारीम वाव प्रपद्य प्रतिब्रूहीति । वा अयम्प्रत्युच्य इति ॥३॥ तं ह प्रत्युवाच- आत्मा देवानामुत मानां हिरण्यदन्तो रपसो न सूनुः । महान्तमस्य महिमानमाहुरनद्यांनो यददन्तमत्ति ॥ इति ॥४॥ महात्मनश्चतुरो [देव] एक इति । वाग्वा अमिः। 'स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तद्वाचम्प्राणो गिरति ॥शा मनश्चन्द्रमास्स महात्मा देवः। स यत्र स्वपिति तन्मनः प्राणो गिरति ॥६॥ चक्षुरादित्यस्स महात्मा देवः । स यत्र स्वपिति तचतुः प्राणो गिरति ॥७॥ श्रोत्रं दिशस्ता महात्मानो देवाः । स यत्र स्वपिति तच्छ्रोत्रं प्राणों गिरति ॥८॥ तद्यन्महात्मनश्चतुरो देव एक इत्येतद्ध तत् ।। कस्स जगारेति । मजापतिः कास इतज्जगार ॥१०॥भुवनस्य गोपा इति । स उवाव भुवनस्य गोपा: १२शातं कायन विजानन्त्येक इति। न ह्येतमेके विजानन्ति॥१२॥ अभिप्रतारिन् बहुधा निविष्टमिति । बहुधा होवैष निविष्टो यत्साण: ॥१३॥ आत्मा देवानामुत मानामिति । आत्मा ह्येष देवाना- ई-म(म)म, मा। ७ वय्या, यय्या । ८ अया। ६ वाय। १०-युधे । ११ ऽति । १२-याच । १३ मत्य्-1 १४ परसो । १५ नु । १६. मभि- १७ यदि । १८ दतम, दैतम् । १६ अति ।२० पाश्, वा । २१ या। २२ स्वतिपिति । २३-न, इस के पश्चात् प्रा । २४-अर् । २५ महात्मा अधिक है । २६ क । २७ सो । २८ जगरना २-एध ।३०-यो। ૨૬ ૨૭ ૨ - - . .

( ८९ ) - . । ५ मुख मानाम् ॥१४॥ हिरण्यदन्तो रपसो न मनुरिति । न शेष सूनुः । सूनुरूपो ह्येष सन्न मनुः ॥१॥ महान्तमस्य महिमानमा- हुरिति । महान्तं ह्येतस्य महिमानमाहुः ॥१६॥ . अनधमानो यददन्तमत्तीति । अनयमानो ह्येषोऽदन्तमत्ति ॥१७॥२॥ प्रथमेऽनुवाके द्वितीयः स्वगडः ॥ तस्यैष श्रीरात्मा समुदूढो यदसावादिसः । तस्माद्गायत्रस्य स्तोत्रे णाऽवान्याछिया अवछिया इति ॥१॥ स एष एवोक्यम् । यत्पुरस्तादवानिति तदेतदुक्थस्य शिरो यद्दक्षिणतस्स दक्षिणः पक्षो यदुत्तरतस्स उत्तरः पक्षो यत्पश्चात् तत् पुच्छम् ॥२॥ अयमेव माण उक्थस्याऽऽत्मा । स य एवमेतमुक्थस्याऽऽत्मानमात्मन्प्रतिष्ठित वेद स हाऽमुष्मि लोके साङ्गस्सतनुस्[ सर्वस्]सम्भवति ॥३॥ शश्वद्ध वा अमुष्मिलोके यदिदम्पुरुषस्याऽऽण्डौ शिश्नं कौँ नासिके यत्किं चाऽनस्थिकं न सम्भवति ॥४॥ अथ य एवमेतमुक्थस्या- ऽऽत्मानमात्मन्मतिष्ठितं वेद स हैवाऽमुष्गिलोके साङ्गस्सतनुस्सर्व- स्सम्भवति।।।। तदेतद्वैश्वामित्रमुक्थम् । तदन्नं वैविश्वम्पाणो मित्रम् -से । ३२ नस् । ३३ म् । ३४ आहुर् ! और 'इति महान्त होलस्य महिमा अधिक है ।३५ अन्तम् । ३६ सूनूरला २समा- रवचन वा इति ४-राः । ५.सद्ध सिद्र।

(६७) ..... १४ 11 बद्ध विश्वामित्रश्श्रमेण तपसा वतचर्येणेन्द्रस्य प्रियं धामो- पनगाम ||७|| तस्मा उ हैतलोवाच यदिदम्मनुष्यानामवम् ॥ बद्ध स उपनिषसाद ज्योतिरेतदुक्थमिसि || ज्योतिरिति अक्षरे प्राण इति द्वे अनामिति द्वे। तदतेदन एवप्रविष्ठिवम् ॥१॥ अथ हैन जमदमिरुपनिषसादाऽऽयुरेतदुक्यामिति ॥११॥ प्रायुरिति दे अक्षरे प्राण इति द्वे अन्नमिति द्वे । तदेतदन्न एव प्रतिष्ठितं ॥१२॥ प्रय हैन बसिष्ठ उपनिषसाद गौरेतदुक्थमिति । तदेतदभमेव । अचं हि गौः ॥१३॥ तदाहुर्यदस्य प्राणस्य पुरुषश्शरीरमथ केना- ऽन्ये पाणाश्शरीरवन्तो. भवन्तीति ॥१४॥ स ब्रूयाधद्वाचा बदति सदाचश्शरीरं यन्मनसा ध्यायति तन्मनसशरीरं यञ्चतुषा पश्यति सयपशरीरं यच्छोत्रेण शृणोति तच्छ्रोत्रस्य शरीरम् । एवमु हाऽन्ये पाणावशरीरवन्तो भवन्तीति ॥१५॥३॥३॥ प्रथमेनपाके सूतीयः खण्डः । तदेतदुक्थं, समविधम् । शस्यते स्तोत्रियोऽनुरूपो पाय्या प्रगाथरसूक्तं निवित्परिधानीया ॥१॥ इयमेव स्तोत्रियो १६ ॥ । १० - ११ तदू । १२ उत्थ-। १३ (-साद ) गौर, आयुगौर । १५-५। १५ उद । १९ ऽन्येन । १गि अधिक है। नीयम् । ३ नास्ति ।

( 5 ) . ७ ७ मिरनुरूपो वायुर्धाय्याऽन्तरिक्षम्मगायो द्यौस्सूक्तमादित्यो निवित्। तस्माद्बह्वचा उदिते निविदमधीयन्ते । आदित्यो हि निवित् । दिशः परिधानीयेत्यधिदेवतम् ॥२॥ अथाध्यात्मम् । प्रात्मैव स्तोत्रियः प्रजाऽनुरूपः प्राणो धाय्या मनः भगाथरिशरस्सूर पतुर्निविच्छोत्रम्परिघानीया ॥३॥ तदैतदेके त्रिष्टुभा परिदधत्य- नुष्टमैक । त्रिष्टुभात्वव परिदध्यात् ॥४॥ तद्धैतदेक एता व्याहृती- रभिव्याहृत्य शंसन्ति महान्मह्या समधत्त देवो देव्या समधत्त ब्रह्म ब्राह्मण्या समवत्त । तयत्समधत्त समघत्तेति ॥॥ तस्मा- दिदानीम्पुरुषस्य शरीराणि प्रतिसंहितानि । पुरुषो होतदुक्थम् ॥६॥ महान्मह्या समधत्तेति । अग्नि महानियमेव मही ॥७॥ देवो देव्या समधत्तेति । वायुर्वं देवोऽन्तरिक्षं देवी ॥८॥ ब्रह्मा ब्राह्मण्या समधत्तेति । आदित्यो वै ब्रह्म द्यौब्राह्मणी ॥६॥ तासां वा एतासां देवतानां द्वयोयोर्देवतयोर्नव-नवाक्षराणि सम्पद्यन्ते। एतदिमे लोकास्त्रिणंवा भवन्ति ॥१०॥ तद्ब्रह्म वै त्रित् । तहमाऽभिव्याहृत्य शंसन्ति । एष उ एव स्तोमस्सोऽनुचरः॥११॥ ૧ ૨ १४ मा. ४ द्धास्या, द्धार्या । ५ प्राग-1 ६ धार्या । ७-धानी-1 तदुक्थम् अधिक है (हाशिये में) ? । ९-य। १०-मया । ११ इदानि। १.पा-मौ।१५-यो । १५-ौ । १९-कौं । १७ पा । १८ सा।

. १ ३ ६ ( ६ ) यदिममाहुरेकस्तोम इत्ययमेव योऽयम्पवते । एषोऽधिदेवतम् । माणोऽध्यात्मम् । तस्य शरीरमनुचरः ॥१२॥ तद्यथा ह वै मणौ मणिसूत्रं सम्पोतं स्याद्-॥१३॥३॥४॥ प्रथमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । एवं हैतस्मिन्सर्वमिदं सम्प्रोत गन्धर्वाप्सरसः पशवो मनुष्याः॥१॥तद्ध मुअस्सामश्रवसः प्रययौ । तस्मै ह श्वाजनि- श्या प्रेयाय ॥२॥ तस्य हान्तरिक्षात्पतित्वा नवनीतपिण्ड उरास निपपात । तं हाऽऽदायाऽनुदधौ॥३॥ ततो हैव स्तोमं ददर्शाऽन्तरिक्ष विततम्बहुशोभमानम् । तस्यो ह युक्तिं ददर्श ॥४॥ बहिष्पवमान- मासय टोत्र वियि प्राण्य इति कुर्यात् टीत्र गृहित्र अपान्य इति वाचा । दिदृक्षेतैवातिभ्यं शुश्रूषेतैव कर्णाभ्याम् । स्वयामिदम्म- नोयुक्तम् ॥५॥ तद्यत्र वा इषुरत्ययो भवति न वै स ततो हिनस्ति तदु वा एतं नोपाप्नुयात् । प इत्येवाऽपान्यात् । तद्यथा बिम्बेन मृगमानयेदेवमेवैनमेतया देवतयाऽऽनयति । स युक्तः करोति । एष एवापि युक्तः ॥६॥३२॥ प्रथमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ 1 2 . . . - . १६-रन्तम्॥ १ एवम् (पवा) के पहले पश्चम कं० का द्वि० वाक्य।२ मौज-३ साहश-४ तमस्मै । ५ प्रोयाय । तेतो ७-७।८-६ । टील, पहला असरळ भी हो।१०गृहिव।११अस्ति। हनस्ति ।१२यद् । १३यो।१४-ति॥

( ९० ) ३ . * ५ ६ ९ १०. । 3 ૨ वा योऽसौं साम्नः प्रतिवेदन हास्मै दीयते ॥१॥ ददा इति ह वा अयमानर्दीप्यते तथेति वायुः पवते हन्तेति चन्द्रमा ओमित्या- दित्यः ॥२॥ एषा ह वै सान्नः प्रत्तिः । एतां ह वै साम्नः पत्ति सुदक्षिणः मिर्विदां चकार ॥३॥ तां हैतां होतुर्वाऽऽज्ये गायेन्मै- त्रावरुणस्य वा तां ददा३ तथा३ हन्ता३ हिम्भा ओवा इति। म ह वा अस्मै दीयते ॥४॥ [सो] ऽप्यन्यान् बहुनुपर्युपरि य एवमेतां साम्नः प्रत्ति वेद ॥५॥ य उ ह वा अबन्धुन्धुमत्साम वेद यत्र हाऽप्येनं न विदुर्यत्र रोषन्ति यत्र परीवचक्षते तद्धाऽपि श्रेष्ठयमाधिपत्यमन्नाद्यम्पुरोधाम्पर्येति ॥६॥ अग्निह प्रबन्धुन्धुमल्साम । कस्माद्वा होनं दार्योः कस्याद्वा पर्याश्त्य मन्थन्ति स श्रेष्ठचायाऽऽधिपत्यायाऽनायाय पुरोधार्य जायते ॥७॥ स यत्र ह वा अप्येवंविद न विदुयंत्र रोषन्ति यत्र परीव- चक्षते तद्धाऽपि श्रेष्ठयमाधिपत्यमन्नाद्यम्पुरोधाम्पर्योति॥८॥३६॥ द्वितीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । स्वयमु तत्र यत्रैनं विदुः॥१॥सुदक्षिणो हवै मिः प्राचीनशा- लिर्जावालौ ते ह सब्रह्मचारिण आसुः॥२॥ते हैमे बहु जप्यस्य १ प्रतिं । २ तदान, ददान् । ३ प्रक्तिः, प्रवृत्तिः । ५. तौं । ६ 'हन्ताई' अधिक है । ७ नास्ति । ८ अप्य् । -हून्य । १०-उप । ११-धु । १२-धा । १३ श्रेष्ठ- १४-आये। १५ परि ॥ ६-शालिर् । २ है।

( १ ) ४ १० कर ૬ ૨. चाऽन्यस्य चाऽनूचिर प्राचीनशालिश्च जावालौ च ॥३॥ अथ है. स्म सुदक्षिणः तैमियदेव यज्ञस्याजो यत्सुविदितं तद्ध स्मैव पृच्छति ॥४॥ त उ ह वा अपोदिता व्याक्रोशमानाश्चरुनशंदो दुरनूचान इति ह स्म मुदक्षिणं क्षैमिमाक्रोशन्ति प्राचीनशालिश्च जाबालौ च ॥५॥ स ह स्माऽऽह मुदक्षिणः क्षैमियत्र भूयिष्ठाः कुरुपञ्चालास्मागता भवितारस्तन एष संवादो नाऽनुपदृष्टे शूद्रा इव संवदिष्यामह इति॥६॥ता उ ह वै जाबालौ दिदीक्षात शुक्रश्च गोश्रुश्च । तयोर्ह प्राचीनशालित उद्गाता ॥७॥ स तद्ध मुदक्षिणो ऽनुबुबुधे जाबालौ हाऽदीक्षिषातामिति । स ह संग्रहीतारमुवाचा- जनयस्वारे जाबालौ हाऽदीक्षिषातां तद्गमिष्याव इति॥३॥७॥ द्वितीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । तस्य ह ज्ञातिका अश्रुमुखा इवाऽऽसुरन्यतरां वा अयमुपागादिति ॥१॥ अथ ह स्म वै यः पुराब्रह्मवायं वदत्यन्य- तरामुपागादिति ह स्मेनम्मन्यन्ते । अथो ह स्मैनम्मृत्मिवैवोपासते ॥२॥ तं ह संग्रहीतोवाचाऽथ यद्भगवस्ते ताभ्यां न कुशलं ...२ है। ३ कच-४-शालाश् ।५-ण । ६ प्य्--श्रा। ७ चोरुश् । -प्रा। कोश् । १० ली पतिष्य । १२ वदी ११ । १४ प्र-। १५ संसं-। १९ दिदीच-१७ यास्वा । । ।

( २ ) कथेत्यमात्थेति ॥३॥ ओमिति होवाच गन्तव्यम्म आचार्यस्मय- मानमन्यतेति ॥४॥ स ह रथमास्थाय प्रधावयांचकार । तंह स्म ६ ७ 'C -- ११ प्रतीक्षन्ते ॥५॥ कं जानीतेति । मुदक्षिण इति । न वै नूनं स इदमभ्यवेयादिति । स एवेति ॥६॥ स ह सोपानादेवाऽन्तर्वेधव- स्थायोवाचाऽङ्गन्वित्थं गृहपता३ इति । स ह नाऽनूदतिष्ठा- सत् । स होवाचाऽनूत्थाता म एपि । कृष्णाजिनोऽसीति] । तदिमे कुरुपश्चाला अविदुरनूत्थातैव त इति होचुः ॥७॥ तं ह कनीयान्धातोवाचाऽनुत्तिष्ठ । भगव उद्गातारमिति । तं हा ऽत्तस्थौ ॥८॥ स होवाच त्रि. गृहपते पुरुषो जायते । पितुरेवाऽग्रेधि जायतेऽथ मातुरथ यज्ञात् ॥६॥ त्रिव नियत इति। स यद्ध वा एनमेतत्पिता योन्या रेतो भूतं सिञ्चति-॥१०॥ द्वितीयेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । -तत्मथमम्म्रियते ॥२॥ अन्धमिव वै तमो योनिः।लोहि- तस्तोको वा वै स तदाभवत्यपां वा स्तोकः । किं हि स तदा- भवति ॥२॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या १२ १३ १४ ...' १ ३ am २ - ३. पाचर्-1. ४ सूय-1-५-स्- -ऊया- ७ म । ८ 'इति अधिक है । । प्रातो। १० वा । ११ अनुतिष्ठ । १२ मिव । १३ अ, ऊ । १४ नास्ति । १५त्रियत। १अन्य्-। २ वो।३।।

( ३ ) ६ चैनं तम्मृत्युमतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥३॥ अथ य एनमेतद्दीक्षयन्ति तद्वितीयम्म्रियते । वपन्ति केशश्मश्रूणि । निकृन्तन्ति नखान् । प्रत्यअन्त्यङ्गानि । प्रत्यचत्यङ्गुलीः । अपवतोऽपवेष्टित आस्ते । न जुहोति । न यजते । न योषितं चरति । अमानुषीं वाचं वदति । मृतस्य वावैष तदा रूपम्भवति ॥४॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चैनं तम्मृत्युमतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥॥ अथ व एनमेतदस्माल्लोकात्मेतंचित्यामादधति तद् तृतीयम्म्रियते॥६॥ स यस्तां देवतां वेद यां च स ततोऽनुसम्भवति या चैनं तम्मृत्यु- मतिवहति स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥७॥ एतावदैवोक्त्वा रथमास्थाय प्रधावयांचकार ॥८॥ तं ह जाबालम्प्रत्येतं कनीयान् भ्रातोवाच काम्भवाञ्छूद्रको वाचमवादीति । हस्तिना गाधमैषी- रित ॥॥ हैवैनं तच्छशंस यः कथमवोचद्गव इति । यस्त्रयाणा- म्मृत्यूनां साम्नाऽतिवाहं वेद स उद्गाता मृत्युमतिवहतीति ॥१०॥ द्वितीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । १२ १४ १५ ६६ ४ चे । ५ दि-६-अजत्य् । ७ यज्-भव- यौष-१:स। ११ का अधिक है। १२ यन्तम । १३-तीति । १४ वा । १५वहतीति अंधिक है। १-वच् ॥

है ६ ७ । ९ तं घाव भगवस्ते पितोद्गातारममन्यतेति होवाच । तदु प्राचीनशाला विदुर्य एषामयं वृत उद्गाताऽऽस । तस्मिन् ह ना- ऽनुविदुः ॥१॥ ते होचुरनुधावत काण्ड्वियमिति । तं हाऽनु- सखः । ते ह कारड्वियमुद्गातारं चक्रिरे ब्रह्माणम्प्राचीन- शालिम् ॥२॥ हाऽभ्यवेक्ष्योवाचैवमेष ब्राह्मणो मोघाय कादाय नाऽग्लायत् । स नाऽणु साम्नोऽन्विच्छतीति । अति हैवनं सच्चक्रे ॥३॥ स यद्ध वा एनमेतत्पिता योन्यां रेतो भूतं सिञ्च- त्यादित्यो हैन. तद्योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति । स हाऽस्य तत्र मृत्योरीशे ॥४॥ अथो यदेवैनमेतत्पिता योन्या रेतो भूतं सिञ्चति तद्धः वाव स ततोऽनुसम्भवति प्राणं च । यदा ह्येष रेतस्सिक्तं प्राण आविशत्यय तत्सम्भवति ॥॥ अथो यदेवैनमेतदीक्षयन्त्य- गि वैनं तद्योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति । स हैवाऽस्य तत्र मृत्योरीशे ॥६॥ अथो यामेवैतां वैसर्जनीयामाहुतिमध्वर्युर्जुहोति सामेव स ततोऽनुसम्भवति छन्दांसि चैव ॥७॥ अथ य एनमे- ११ । ' -- May १-ए । २ विषुर् । ३ सः । ४ कान्त्यावयम् । ५-स्रः । ब्राह्मणम् । ७-पेक्ष्या । न्वीच-1 ६ रणम् । १० नास्ति ११ रत्- १२-भो । १३ “अथोवाच अधिक हैं । १४ अथो य एनमेतही- बयन्त्य "तत्रमृत्योरीशे' अधिक हैं । १५ अथो यदेनिमें- सद्दीचयन्ति' अधिक है । १९ भासि ।

( ५ ) १७ तदस्माल्लोकात्प्रेतं चित्यामादधति चन्द्रमा हैवैनं तद्योन्यां रेतो भूतं सिञ्चति । स उ हैवाऽस्य तत्र मृत्योरीशे ॥८॥अथो यदेवैन- मेतदस्माल्लोकात प्रेतं चित्यामादधत्यथो या एवैता अवोक्षणी- या आपस्ता एव स ततोऽनुसम्भवति प्राणम्वेव । प्राणो ह्यापः ॥३॥ ते ह वा एवंविदुद्गाता यजमानमोमित्येतेनाक्षरेणाऽदित्यम्मृत्यु- मतिवहति वागित्यग्नि हुमिति वायुम्भा इति चन्द्रमसम् ॥१०॥ तान् वा. एतान्मृत्यून् सानोद्गाताऽऽत्मानं च यजमानं चाऽति- वहत्योमित्येतेनाक्षरेण प्राणेनाऽमुनाऽऽदित्येन ॥११॥ तस्यैष श्लोकः- २० उतैषां ज्येष्ठ उत वा किनष्ठ उतैषाम्पुत्र उत वा पितेषाम् ।. एको ह देवो मनसि प्रविष्टः पूर्वो ह जज्ञे स उ गर्भेऽन्तः- २१ इति ॥१२॥ तद्यदेशोऽभ्युक्त इममेव पुरुषं योऽयमानो ऽन्तरोमित्येतेनैवाक्षरेण प्राणेनैवाऽमुनैवाऽऽदित्येन[...]॥१३॥३३१० द्वितीयेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ kapan त्रिह वै पुरुषो म्रियते त्रिर्जायते ॥१॥ स हैतदेव प्रथमम्म्रियते यद्रेतस्सिक्तं सम्भूतम्भवति । स प्राणमेवाऽभिसम्भवति। आशाम- ३ १७-श्रान् । १८-वन्तीति । १६ ता । २० जेष्ठ । २१ लघु-। २२ प्रयन् ॥ १हे । रस हैतदेव प्रथमस्म्रियते निर्जायते अधिक है।३सम् ।

६ क मिजायते ॥२॥ अथतद्वितीयम्म्रियते यदीक्षते । स छन्दांस्येवा- ऽभिसम्भवति । दक्षिणामभिजायते ॥३॥ अथैतत् तृतीयम्म्रियते यन्म्रियते । स श्रद्धामेवाऽभिसम्भवति । लोकमभिजायते ॥४॥ तदेतत् ध्याद्वायत्रं गायति । तस्य प्रथमयाऽऽतेममेव लोक जयति यदु चास्मॅिलोके। तदेतेन चैनम्प्राणेन समर्धयति यमभिसम्भवसतां चाऽस्मा आशाम् प्रयच्छति यामभिजायते॥शाअथ द्वितीययाते- दमेवाऽन्तरिक्षं जयति यदु चान्तरिते । तदेतैश्चैनं छन्दोभिस्स- पर्षयति यान्यभिसम्भवति । एतां चास्मै दक्षिणाम्प्रयच्छति याम- मिजायते ॥६॥ अथ तृतीययाऽऽस्ताऽमुमेव लोकम् जयति यदु चाऽमुष्मिलोके । तदेतया चैनं श्रद्धया समर्धयति ययैवैनमेतच्छद्ध- यामातभ्यादधति समयमितो भविष्यतीति । एतं चास्मै लो- कम्पयच्छाते यमभिजायते ॥७॥३॥१२॥ तृतीयेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । एतदै तिमाभिराद्भिरिमाँश्च लोकाअयसतैश्चनम्भूतैस्समधय- ति यान्यभिसम्भवति ॥१॥ अथ वा अतो हिडारस्यैव। तं हे खर्गे लोके सन्तम्मृत्युरन्वेसशनया ॥२॥ श्रीर्वा एषा प्रजापतिस्सानो ४ अोव । ५-म । त्रिय-। ७-अन्ति । ८ इम्-(1)। मृथ्- १० 'न्यभिसम्भवति' अधिक है लाल रंग से कटा हुआ । ११ च । १२ ऽभाव। १३-पा। १ पोक्-१२-मृध्- ३ मास्ति ।४ सितम् । ५.अनेति । श्री। १२ . i " १ २ -- .

( १७ ) यद्धिङ्कारः ! तमिदुद्गाता श्रिया प्रजापतिना हिङ्कारेण मृत्युमपसेध- ते ॥३॥ हुम्मेसिाह माऽत्र नु गा यत्रैतद्यजमान इति हैतत् ॥४॥ स यथा श्रेयसा सिद्धः पापीयान् प्रतिविजत एवं हैचाऽस्मान्मृत्युः पाप्मा प्रतिविजते ॥।॥ यन्मत्याह चन्द्रमा वैः मा मासः । एष ह वै मा मासः। तस्मान्मेसाह । भा इति हैतत्परोक्षणेव । यस्मादेव मेसाह यद्वेव मेसाहैतानि त्रीणि । तस्मान्मेति ब्रूयात् ॥६॥३॥१२॥ तृतीयेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। हुम्भा इति ब्रह्मवर्चसकामस्य। भातीव हि ब्रह्मवर्चसम् ॥२॥ हुम्बो इति पशुकामस्य । बो इति ह पशवो वाश्यन्ते ॥२॥ हुम् बगिति श्रीकामस्य । बगिति ह श्रियम्पणायन्ति ॥३॥ हुम् भा अोवा इसेतदेवोपगीतम् ॥४॥ महदिवाऽभिपरिवर्तयन् गाये- दिति ह स्माऽऽह नाको महाग्रामो महानिवेशो भवतीति । स यथा स्थाणुमर्पयित्वेतरेण वेतरेण वा परियायात् ताक्तत् ॥॥ तदु होवाच शाट्यायनिः कस्मै कामाय स्थाणुमर्पयेत् । अथोपगीतमे- वैतत् । नैवैतदाद्रियेतैति ॥६॥ [इति] नु हिङ्काराणाम् । अथ वा ७ एद् । इतिअधिक है। -विच- १० ए एवम् । ११ भाग । १२ ऐव॥ १ वो।२ धिक्-,-सु । ३-वा, प्रयित्वा । ४-रेए । ५पा- ६ तेंदू । ७ भाद्-८हिङ्कार- ३ -- ( ८) अतो निधनमेव । भोवा इति द्वे अक्षरे । अन्तो वै सानो निधन- मन्नस्स्वर्मो. लोकानामन्तो अधस्य विष्टपम् ॥७॥ समेतदाता यणमानमोमिखेतेनावरेणान्ते स्वर्ग लोके दधाति ।।८। य हवा अपक्षो वृक्षाग्रं गच्छवव वै स ततः पद्यते । अथ यदै पती वाले यदसिधारायां यत्तुरचारायामास्ते न वै स वतोऽवपद्यते । पक्षाभ्यां हि संयत प्रास्ते ॥६॥ तमेतदुद्वाता यजमा- नमोमिसेतेनाक्षरेण वरपर्त कृत्वाऽन्ते. खरें लोके दधाति । स यथा प्रक्ष्यविभ्यंदासीतैवमेव खर्गे लोकेऽविभ्यदास्तेऽयाऽऽचरति ॥१०॥ तेक्वा एते अक्षरे देवलोकश्चैव मनुष्यलोकश्च । प्रादि- सच हवा एते अक्षरे चन्द्रमाश्च ॥११॥ प्रादिस एव देवलोक- चन्द्रमा मनुष्यलोकः । भोमियादियो वागिति. चन्द्रमाः ॥२२॥ तमेतदुहाता यजमानमोमिसेतनावरेणाऽऽदिसं देवलोकं गम्य- १:० " , तिरशाशा तृतीयेऽनुवाके दुतीयः खग्रहः । संहागतम्पृच्छति कस्त्वमसीति । स यो ह नाना वा मो- बेल का प्रते तं हाह यस्तेऽयम्मथ्यात्माऽभूदेष ते स इति ॥२॥ १ हिंसयत।१ ११-६॥

३ (# ) तस्मिन् हाऽऽत्मन् प्रतिपद । वमृतवस्सम्पदार्यपद्गृहीतमपकर्षन्ति । वस्य हाहोरात्रे लोकमाप्नुतः ॥२॥ तस्मा उ डैवेन अब्रुचीत को- ऽहमस्मि सुवस्त्वम् । स त्वां स्वयं स्वरगामिति ॥२॥ को ह वै प्रजापविरथ हैवंविदेव मुवर्गः। स हि मुवर्गच्छति ॥॥ तं श ऽऽह यस्त्वमसि सोऽहमस्मि योऽहमस्मि स त्वमस्येहीति ॥५॥ स एतमेव सुकृतरसम्प्रविशति । यदु ह वा अस्मिल्लोके मनुष्या यजन्वे यत्साधु कुर्वन्ति वदेषाभूपत्राधमुत्सीदति । बदमुं चन्द्रमसम्मनुष्यलोकम्पविशति ॥६॥ तस्येदम्मानुषनिकाशन- मण्डमुदरेऽन्वस्सम्भवति । तस्योर्ध्वमनाद्यमुत्सीदति स्तनावभि । स यदाजायतेऽथाऽस्मै माता स्तनमन्नाद्यम्प्रयच्छवि राजा प्रजातो हवै तावत्पुरुषो यावन्न यजते स यज्ञेनैव जायते । स यथाऽण्ड प्रथमनिभिएणमेवमेव ॥६॥ तदा त ह वा एवंविदुद्गाता यज- मानमोमित्येतेनाऽक्षरेणाऽऽदित्यं देवलोकं गमयति । वागि- त्यस्मा उत्तरेणाऽक्षरेण चन्द्रमसमन्नाद्यमक्षितिम्पयच्छति ॥६॥ अथ यस्यैतदविद्वानुगायति न हैवैनं देवलोकं गमयति नो २ त । ३ तैन । ४-अ-, चीत् । ५-गम् । ६ सुस्वर-, -म् । ७जायन्ते।इस-16-2|१-प-निक-इसके पश्चात इदम्। ११ भदेरे। १२ - १३-नाच । १४ जायते।१५-स । १६-यक्षिति। १७ ना। ।

( १०० ) १९ एनमन्नाद्येन समर्धयति ।।२.०॥ स यथाऽण्ड विदिग्धं शयीता- ऽन्नाधमलभमानमेवमेव विदिग्धश्शेतेऽन्नाधमलभमानः ॥१२॥ तस्मादु हैवंविदमेवोद्गापयेत । एवंविदिहैवोद्गातरिति हूतः प्रतिशृणुयात् ॥१२॥१४॥ तृतीयेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । तृतीयोऽनुवाकरसमाप्तः । ૨૬ V मा म । वागिति केन्द्रो विश्वामित्रायोक्थमुवाच । तदेतद्विश्वामित्रा उपासते वाचमेव ॥११॥ मर्नुई वसिष्ठाय ब्रह्मत्वमुवाच । तस्मादा- हुर्वासिष्ठमेव ब्रह्मोते ॥२॥ तदु वा आहुरेवंविदेव ब्रह्मा । क उ एवंविदं वासिष्टमहतीति ॥३॥ प्रजापतिः प्राजिजनिषत । स सपोऽतप्यत । स ऐक्षत हन्त नु प्रतिष्ठां जनय ततो याः प्रजास्त्रत्ये ता एतदेव प्रतिष्ठास्यन्ति नाऽप्रतिष्ठाश्चरन्तीः प्रदघिष्यन्त इति ॥४॥ स इमं लोकमजनयदन्तरिक्षलोकममुं लोकमिति । तानिमास्त्री- ल्लोकाअनयित्वाऽभ्यश्राम्यत् ॥॥ तान् समतपत् । तेभ्यरं.तो- भ्यस्त्रीणि शुक्राण्युदायन्नाग्निः पृथिव्या वायुरन्तरिक्षादादियो दिवः ॥६॥ स एतानि शुक्राणि पुनरभ्येवाऽतपत् । तेभ्यस्संतप्तेभ्य १८-मृध-1१६-मा। २०-माः।२१-श्रुणु-॥ १ है। २ उत्थ- ३ जाये, जनये । ४-५ ताम्। ७ समभवन् । ८स्स।। ६ । -- ( १०१ ) स्त्रीरयेव शुक्राण्युदायन्नृग्वेद एवाऽगेयजुर्वेदो वायोस्सामवेद पादियात् ॥७॥ स एतानि शुक्राणि पुनरभ्येाऽतपत् । सेभ्य- स्संतप्तेभ्यस्त्रीण्येव शुक्राण्युदायन्भूरिखेवग्वेदा व इति यजुर्वेदा- स्वरिति सामवेदात्तदेव ॥८॥ तद्ध वै त्रय्यै विद्यायै शुक्रम् । एतावदिदं सर्वम् । स यो वै त्रयीं विद्यां विदुषो लोकस्सोऽस्य लोको भवति य एवं वेद ॥६॥३।१।। चतुर्थेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । अयं वाव यज्ञो योऽयम्पवते । तस्य वाक् च मनश्च वर्तन्यौ। वाचा च होष एतन्मनसा च वर्तते ॥१॥ तस्य होताऽध्वर्युरुगाते- सन्यतरां वाचा वर्तनि संस्कुर्वन्ति । तस्मात्ते. वाचा कुर्वन्ति । ब्रह्मैव मनसाऽन्यतराम् । तस्मात्स तूष्णीमास्ते ॥२॥ स यद्ध सो- ऽपि स्तूयमाने वा शस्यमाने वा वावद्यमान आसीताऽन्यतरामेवा- ऽस्यापि तहि स वाचा वर्तनि संस्कुर्यात् ॥३॥ स यथा पुरुष एकपाद्यन् भ्रषन्नेति रथो वैकचक्रो वर्तमान एवमेव तहि यज्ञो १ ३ भ्रषन्नेति ॥४॥ एतद्ध तद्विद्वान् ब्राह्मण उवाच ब्रह्माणम्मातरनु- /-100 १०-म॥ । १-मान् । २५-३-मां।४त।

( १०२ ) ९ . बाक उपाकृते वा वद्यमानमासीमम वा इमे तहि यज्ञस्याऽन्तर- गुरिति । अर्धे हि ते तहिं यज्ञस्याऽन्तरीयुः ॥२॥ तस्माद्ब्रह्मा भातरनुवाक उपाकृते वाचंयम आसीताऽऽपरिधानीयाया प्रा वषद कारादितरेषां स्तुतशखाणामेवाऽसस्थायै पवमानानाम् ॥६॥ स यथा पुरुष उमथा पाचन भ्रषन न्योत रथो चोभयानको- वर्तमान एवमेतहि यज्ञो धेष न भ्येति ॥७॥१६॥ चतुर्थेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । स यदि पा शक्ती भ्रषभियाइमणे प्रब्रूतेसाहुः। अथ यदि यजुटो ब्रमले पब्रूतेखाहुः । अथ यदि सामतो ब्रह्मणे प्रतेसाहुः । अथ यचनुपस्मृतात् कुत इदमजनीति ब्रह्मणे प्रबूते सेवा ॥२॥ स अमा पाइ उदेस स्वदेणाऽऽसीध पाज्य जुहुयाभूर्भुवस्वरिखे- तामियाहृतिभिः २॥ एता वैव्याहृतयस्सर्वप्रायश्चित्तयः तद्यथा सकोन सुवर्ण संदध्यात् सुवर्णेन रजतं रजतेन त्रपु अपुणा सोहावल लोहायसेन काणावस काणायसेन दारु दारु च चर्म ४ AUN ॥ ५-यो।' पास द्विवार पढ़ा गया है। 5-1-पु- रन्तयुः । १०-म । ११-पादू १२ यदू । १३ १६-२-षो ।रपा ४ प्रन्दू, प्रा ।५ विदधत - - ( १.३) चे श्लेष्मणैवमेवैवं विद्वाँस्तत्सर्व भिषज्यति शावदाहुर्यदोषीन्मे ग्रहान्मेऽग्रहीदियध्वर्य दक्षिणानयन्सचसोन्मे वषङ प्रकर्म इति होत्र उदगासीन्म इत्युदानेऽय किं चक्रुषे ब्रह्मो दूष्णीमासीलाय. समावतीरेवेतरैत्विरिभदक्षिणा नयन्तीति । स यावर्ष- भाग्य कै स यज्ञस्या ह्येष यज्ञस्य वाहतीति । पहिस्म के पुरा ब्राह्मणे दक्षिणा नयन्तीति । अर्धा इतरेभ्य ऋत्विरभ्यः || तस्यैव श्लोको- मयीदम्मन्ये भुवनादि सर्वमा, मयि लोकर मयि दिशशतक। मयोदमान्ये निमिषषदेजति, मायाप. अोषधया सर्वा, इति ॥६॥ १८ मयीदम्मन्ये भुवनादि सर्वमिसेविदं हवाचेदं सर्वम्भुवनमन्या- यचम् ॥७॥ मयि लोका मयि दिशश्चतख इवेवंविदिड वाच लोका पर्वविदि दिशश्चतनः ॥८॥ मयीदम्मन्ये निमिषयदेजति मय्याप मोषधयश्च सर्वा इसेवविदि हवावेदं सर्वम्भुवनम्मतिषितम् ॥६॥ तस्मादु हैवविदमेव ब्रह्माणं कुर्वीत । स ह वाव अक्षा य एवं वेद ॥१०॥३॥१७॥ चतुर्थेऽनुषाके तृतीय +Par-201... har 7 पश्येम (संदण्यात)ण कोष्ठ बाल रंग में कटा हुमार-षष् । १० प्रकृण । ११ मय् । २० 'एवं नास्ति । २१ माशांसीन् । १२-रेर् । १३-माइ।१४ मास्ति।१५ थे । १९५।१७मतिही । १८-१५ २ ( १०४ ) प्रय वा अतस्तोमभागानामेवाऽनुमन्त्राः ॥१॥ तद्वैतदेके स्तोमभागरेवाऽनुमन्प्रयन्ते । तत्तथा न कुर्यात् ॥२॥देवेन सवित्रा मसूतः प्रस्तोतर्देवेभ्यो वाचमिष्येत्यु हैकेऽनुमन्त्रयन्ते सविता बैं देवानाम्पसविता सवित्रा प्रसूता इदमनु मन्त्रयामह इति वदन्तः। नदु तथा न कुर्यात् ॥३॥ भूर्भुवस्वग्त्युि हैकेऽनुमन्त्रयन्त एषा वै त्रयीविद्या त्रय्यै वेदं विद्ययाऽनुमन्त्रयामह इति वदन्तः । तदु तथा नो एवं कुर्यात् ॥ ४॥ प्रोमिसेवानुमन्त्रयेत ॥॥ अथैष वसिष्ठस्यैकस्तोमभागानुमन्त्रः । तेन हैतेन वसिष्ठः प्रजातिकामो- अनुमन्त्रयां चक्रे देवेन सवित्रा प्रसूतः प्रस्तोतर्देवेभ्यो वाचमिष्य भूर्भुवस्वरोमिति । ततो वै स बहुः पजया पशुभिः पाजायत ॥६॥ स एव तेन वसिष्ठस्यैकस्तोम भागानुमन्त्रेणाऽनुमन्त्रयेत बहुरेव प्रजया पशुभिः प्रजायते । इयं त्वेवस्थितिरोमिसेवाऽनुमन्त्रयेत. १.२. ॥७॥१८॥ चतुर्थेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । १ स्तोमा-२नु । ३ कुर्वाद् । ४।५ ने 'ए' खाल में कटर, ए । । ७ त्रैय्ये । ८ऽव । -याया । १०-हु । ११-जाया । १२ प्राज्-। १३ तस्तोम-1 १४-येते । १५ इय । १६ पञ्चमः। १७-स्ता॥

(१०५ ) १ अयैष वाचा वज्रमुद्गृह्णाति। यदाह सोमः पवत इति कोपावर्त- ध्यामिति वा वाचैव तद्वाचो वजं विगृह्यते वाचस्सत्येनातिमुच्यते । तस्मादोमित्येवाऽनुमन्त्रयेत ॥२॥ देवा वा अनया अय्या [विधया] सरसयो;स्स्वर्ग लोकमुदक्रामन् । ते मनुष्या- णामन्वागमादिभ्यंतस्त्रयं वेदमपीलयन् ॥२॥ तस्य पीलयन्त एकमेवाक्षरं नाऽशक्नुवन्पीलायितुमोमिति यदेतत् ॥३॥ एष उ दवाव सरसः । सरसा ह वा एवंविदस्त्रयी विद्या भवति ॥४॥ स यां ह वै त्रग्या विधया सरसया जिति जयति यामद्धिमनोति जयति तां जितिमनोति तामृद्धि य एवं वेद ॥शा एतद्ध वा प्रतरं त्रय्यै विद्यायै प्रतिष्ठा । भोमिति वै होता प्रतिष्ठित भोमित्य- ध्वयुरोमित्युद्गाता ॥६॥ एतद्ध वा अक्षरं वेदानां त्रिविष्टपम् । एतस्मिन्वा अक्षर ऋत्विजो यजमानमाधाय स्वर्ग लोके समुहन्ति तस्मादोमित्येवानुमन्त्रयेत् ॥१३॥१६॥ चतुर्थेऽनुषाके पञ्चमः खण्डः । चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः। । १ गुहासि देवोऽस्युपवा स्युप तं वायख योऽस्मान्दृष्टि यं च वयं द्विष्यमादिनासिबलासि बृहत्यसि रोहिंग्यस्यपासि।२॥ १य । २-३ विम्-१४ प्रैय्-५ प्रतिष्ठे ।-ए । १ देवास्मि । २ प्य । ३वयस्विामहिका।

( १०१ ) T द ७ सम्भूर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । प्राभूतिरस्याभूयासम् । मूतिरसि भूयासम ॥२॥ यास्ते मजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्योमि । उपते ता दिशामि ॥४॥ नाम मे शरीरम्मे प्रतिष्ठा मे । तन्मे स्वयि तन्मे मोऽपहया इतीमाम्पृथिवीमवोचत् ॥५॥ तमियमागतम्पृथिवी प्रतिनन्दत्ययं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥६॥ यद्वार मे त्वयीत्याह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥७॥ किं नु ते मयीति । नाम मे शरीरम्मे प्रतिष्ठा मे । तन्मे त्वयि तन्मे पुनर्देहीति । सदस्मा इयम्पृथिवी पुनर्ददाति ॥८॥ तामाह ५ मा वहेति । किमभीति । अग्निमिति तमग्रिमभिप्रवहति ॥ सोऽग्निमाहा- भिनिदस्यभिजय्यासम् । लोकाजिदसि लोकं जय्यासम् । प्रचिरस्यन्नमद्यासम् । अनादो भवति यस्त्वैवं वेद ॥१०॥ सम्भूर्देवोऽसि समहम्भूयासम् । आभूतिरस्याभूयासम। भूतिरसि. भूयासम् ॥११॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्येमि । उप तेता दिशामि ॥१२॥ तपों मे तेजो मेऽमम्मे वाङमे । तन्मे स्वयि । तन्मे मोऽपहथा इत्यग्निमवोचत् ॥१॥ तं तथैवाऽऽगत- १० ११ ५माभूरिति । ६ स । ७ मधी । ८ म । -इन्ति । 'अभिजिदस्य' दो बार पाया है । ११ ज-1 १२-थाम् । १३ तस्मा। १४ भस्मात् ॥ -- ( १०७ ) मायः मतिनन्दत्ययं ते भगवो लोकस्सह नावयं लोक इति ॥१४॥ ૬ ૨ P यद्वाव मे त्वयीत्याहु ताव मे पुनर्देहीति ॥१शा किं नु वे मयीति । तपो मे तेजो मेऽन्नम्मे वाङ् मे । तन्मे त्वाये । बन्ने पुनर्देहीति । तद] अस्मा अग्निपुनर्ददाति ॥१६॥ समाह म मा बहेति ॥१७॥३॥२०॥ पञ्चमऽनुवाके प्रथमः खण्डः । किमभीति । वायुमिति । तं वायुमभिप्रवहति ॥१॥ सवायु- माह यत्पुरस्ताद्वासीन्द्रो राजा भुतो वासि।यदक्षिणतोवासीशानो भूतो वासि । यत्पश्चाद्वासि वरुणो राजा भूतो वासि । यदुत्तरतो वासि सोमो राजा भूतो पासि। यदुपरिष्टादववासि प्रजापतिर्भूतो- ऽक्वासि ॥२॥वासोऽस्येकवासोऽनवसृष्टो देवानाम्बिलमप्यया ॥३॥ सव प्रजास्तवौषधयस्तवाऽपो विचलितमनुविचलन्ति ॥४॥ सम्भू- देवोऽसि समहम्भूयासम् । प्राभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥शा यास्ते मजा उपदिष्टानाऽहं तव ताः पर्येमि । उप ते ता दिशामि ॥६॥माणापाणौ मे श्रुतम्मे । तन्मे त्वयि । सन्मे मोऽपया इति वायुमवोचत् ॥७॥ तं तथैवागतं वायुः प्रतिनन्दसर्य ते मगको लोकस.इ. नावयं लोक इति ॥ायद्वाब में स्वयी. १७५-२५-३-बो।(प)पधिः। सदा प्राणानौ ७षयी १ भी ( १०८ ) साह तद्वाब मे पुनर्देहीति ॥६॥ किं नु ते मयीति । माणापानौ मे श्रुतम्मे । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै वायुः पुन- ददाति ॥१०॥ तमाह प्रमा वहेति । किमभीति । अन्तरिक्षलोक- मिति । तमन्तरिक्षलोकमभिप्रवहति ॥१२॥ तं तथैवागतमन्तरिक्ष लोक प्रति नन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥१२॥ यद्वाव मे त्वयीसाह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥१३॥ किं नु ते मयीति । अयम्म आकाशः स मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति। तमस्मा आकाशमन्तरिक्ष लोकः पुर्नर्ददाति ॥१४॥ तमाह प्रमा चहेति ॥१शा॥२१॥ पञ्चमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः। किमभीति । दिश इति । ते दिशोऽभिप्रवहति ॥२॥ तं तयै- वामनं दिशा प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्मास्विसाह नद्वाव मे पुनर्दत्तेति ॥शा कि नु तेऽस्माखिति । श्रोत्रमिति । तदस्मै श्रोत्रं दिशः पुनर्ददति ॥४॥ ता अाह प्र मा वहतेति । किमभीति । अहोरात्रयोलोंकामिति । तमहोरात्रयोर्लोकमभिमवहन्ति ॥॥ तं तथैवागतमहोरात्रे पति- नन्दतोऽयं ते भगवो लोकास इनोऽयं लोक झवि मा महान १-२।२-ति । १ - ( १०६ ) से युवयोरिसाहतद्वाव मे पुनर्दत्तमिति ॥७॥किं नु त प्रावयोरिति । अक्षितिरिति । तामस्मा अक्षितिमहोरात्रे पुनर्दत्तः ॥८॥ वे पाह प्रमा वहतमिति ॥॥२२॥ पञ्चमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। किमभीति । अर्धमासानिति । तमर्धमासानभिप्रवहतः ॥३॥ तं तथैवागतमर्धमासाः प्रतिनन्दन्सयं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्माखिसाह तद्वाव मे पुनर्दत्ते- ति ॥३॥ किं नु तेऽस्माखिति । इमानि तुद्राणि पाणि । तानि मे युष्मान । तानि मे प्रति संधत्तेति । तान्यस्याधमासाः पुनः पति संदधति ॥४॥ तानाह प्र मा वहतेति । किमभीति । मासा- निति । तम्मासानभिमवहन्ति ॥॥ तं तवैवागतम्मासाः २ । - - --- ३ । प्रतिनन्दन्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति.॥६॥ यदाव मे युष्माखिसाह तद्वाब मे पुनर्दचति ॥७) किं नु तेऽस्मा- खिति । इमानि स्थूलानि पर्वाणि । तानि मे युष्मास । तानि मे प्रति संपत्तेति । तान्यस्य मासाः पुनः प्रति संदधति ॥८॥ तालाहमा बहवेति ॥२॥३॥२॥ पचमेज्नुचाके चतुर्थः समः। . Pommaari १ नास्ति । २-इति । ३-धाति, बाल रंग से शोधा मा है।

( ११० ) किमभीति । ऋतूनिति । तमृतूनभिप्रवहन्ति ॥१॥ ते तषाऽऽगतमृतवः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं सोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्मास्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दचेति ॥३॥ किं नु तेऽस्मास्विति । इमानि ज्यायांसि पर्वाणि । तानि मे युष्यामु तानि मे प्रतिसंधत्तेति । तान्यस्यतवः पुनः प्रतिसंदधति ॥४॥ तानाह प्रमा बहतेति । किमभीति । संवत्सरमिति । से संवत्सरमभिप्रवहन्ति ॥।॥ तं तथैवाऽऽगतं संवत्सरः प्रतिनन्द- त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नाक्यं लोक इति ।।६।। यद्वाव मे त्वयीत्याह तद्वाव मे पुनर्देहीति ॥७॥ किं नु ते मयीति । अयम्म मात्मा । स मे त्वाय तन्मे पुनर्देहीति । तमस्मा प्रात्मानं संवत्सरः पुनर्ददाति ॥८॥ तमाह ममा वहेति ॥२४॥ पञ्चमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । किमभीति । दिव्यान् गन्धर्वानिति तं दिव्यान गन्धर्वानभि- प्रवहति ॥१॥ तं तथैवाऽऽगतं दिव्या गन्धर्वाः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे युष्मा- स्वित्याह तद्वाव में पुनर्दत्तेति ॥३॥ किं नु तेऽस्मास्विति । १।२ स्वधी। वहते।

( १९१ ) -- -- -- ३ । ..... - गन्धो मे मोदो मे प्रमोदो में । तन्मे युष्मासु । तन्मे पुनर्दति तदस्मै दिव्या गन्धर्वाः पुनर्ददति ॥४॥ तानाह म मा वहतेति । किमभीति । अप्सरस इति । तमपसरसोभिप्रवहन्ति ॥५॥ है सथैवाऽऽगतमप्सरसः प्रतिनन्दन्त्ययं ते भगवो लोकः। सहनोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाव मे युष्मास्वित्याह तद्वाव मे पुनर्दचेति ॥७॥ किं नु तेऽस्मास्विति । हसो मे क्रीळा मे मिथुनम्मे । तन्मे युष्यासु । तन्मे पुनर्दत्तति । तदस्मा अप्सरसः पुनर्ददति ।।६।। वा माह प्रमा वहतेति ॥॥२॥ पञ्चमेऽनुवाके षष्ठः खण्ड । किमभीति । दिवमिति । ते दिवमभिप्रवहन्ति ॥१॥ सथैवागत द्यौः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । स ह नावयं लोक इति ॥२॥ यद्वाव मे त्वयीसाह तद्वाब मे पुनर्देहीति ॥२॥ किं नु ते मयीति । तृप्तिरिति । सकृत्तसेव होपा । बामस्मै कृति यौः पुनर्ददाति ॥४॥ तमाइ म मा बहेति । किमभीति । देवानिति। तं. देवानभिमवहति ॥५॥ तं तथैवाऽऽगतं देवाः प्रतिनन्दन्ययं ते भगवो लोकः । स ह नोऽयं लोक इति ॥६॥ यद्वाष मे युष्माति- - २गन्धवों । ३ युयद्॥ IMA १ १ ( ११२ ) साह तद्वाव मे पुनर्दत्तेति ॥७॥ किं नु तेऽस्मास्विति । अमृतमिति। तदस्मा अमृतं देवाः पुनर्ददति ।।८॥तानाह प्रमावहतेति साश२।। पञ्चमेऽनुवाके सप्तमः खण्डः। किमभीति । आदिसमिति । तमादिसमभिप्रवहन्ति शास आदिसमाह विभूः पुरस्तात्सम्पत् पश्चात् । सम्यङ् त्वमसि । समीचो मनुष्यानरोषी रुषतस्त ऋषिः पाप्मानं इन्ति । अपहत- पाप्मा भवति यस्त्वैवं वेद ॥२॥ सम्भूर्दैवोऽसि समहम्भूयासम् । प्राभूतिरस्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥३॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पयमि । उप ते ता दिशामि॥४॥ोजो मे बलम्मे चतुर्मे । तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपया इसादिसमवोचद।। सं. तथैवाऽऽगतमादिसः प्रतिनन्दसयं ते भगवो लोकः । सह नावयं लोक इति ॥६॥ यद्बाव मे त्वयीबाह तद्वाव मे पुनर्देही- ति ॥७॥ किं नु ते मयीति । ओजो में बलम्मे चतुर्मे । सन् त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मा आदियः पुनर्ददति ॥८॥ तमाह पमा वहेति । किमभीति । चन्द्रमसमिति। ते चन्द्रमसमाधि- २-दाति ॥ १-वत् । २ सम्यद । ३ अरोतिषि 'ति' बाल से कटा हुआ है, । ४ त्व् । ५एवम् । -भूतिर् । ७ भृतिर् 1८ गता | मास्ति । १० त्वीयी, स्वी यीति । ११ चन्- ११ (१९३.) प्रवहति ।। स चन्द्रमसमाह ससस्य पन्था त्वा जहाति। अमृतस्य पन्था न त्या जहाति ॥१०॥ नवो नवो भवसि जाय मानो भरो नाम ब्राह्मण उपास्से। तस्मात्ते ससा उभये देवमनुष्या अन्नाद्यम्भरन्ति । अन्नादो भवति यस्त्वैवं वेद ॥११॥ सम्भूर्देवों- ऽसि समहम्भूयासम् । आभूति स्याभूयासम् । भूतिरसि भूयासम् ॥१२॥ यास्ते प्रजा उपदिष्टा नाहं तव ताः पर्येमि । उप ते ता दिशामि ।। १.३|| मनो मे रेतो में प्रजा मे पुनस्सम्भू- तिम तन्मे त्वयि तन्मे मोऽपहृथा इति चन्द्रमसमवोचत् ॥१४॥ तं तथैवाऽऽगतं चन्द्रमाः प्रतिनन्दमयं ते भंगवो लोकः । सह नावयं लोक इति॥१शायद्वाव में त्वयीसाह तद्वाय मे पुनर्देहीति॥१६॥ किं नु वे मयीति । मनो मे रतो मे प्रजा मे पुनस्सम्भूति । तन्मे त्वयि । तन्मे पुनर्देहीति । तदस्मै चन्द्रमाः पुनर्ददति ॥१७॥ तमाह प्र मा वहेति ॥१८॥२७॥ पञ्चमेऽनुवाके ऽष्टमः खण्डः। किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति। तमादिसमभिप्रवहति ॥२॥ स प्रादिसमाह प्र.मा बहेति । किमभीति । ब्रह्मणो लोकमिति । ११ चन्- १२ वा । १३-मास । १४ नास्ति, अमृतस्य पराधा देवोऽसि समहम् । १५-ति । १९ में, म । १७ किं नु ॥ १ प्रथमो । २ ग्राह- . .

(:११४ ) ६ सं: चन्द्रमसमभिमवहति । स एवमेते देवते अनुसंचरति ॥२॥ एषोऽन्तोऽतः परः प्रवाहो नास्ति । यानु काँश्चाऽतः प्राचो लोका- नभ्यवादिष्म ते सर्व प्राप्ता भवन्ति ते जितास्तेष्वस्य सर्वेषु काम- चारो भवति य एवं वेद ॥३॥ स यदि कामयेत पुनरिहाऽऽजाये- येति यस्मिन् कुलेऽभिध्यायेद्यदि ब्राह्मणकुले यदि राजकुले तस्मिन्नाजायते । स एतमेव लोकम्पुनः प्रजाननभ्यारोहन्नेति ॥४॥ तदु होवाच शाट्यायनिर्बहुव्याहितो वा अयम्बहुशो लोकः। एतस्य कामाय नु ब्रुवते [वा] श्राम्यन्ति वा क एतत्प्रास्य पुनरिहेया- दत्रैव स्यादिति ॥५॥२८॥ पञ्चमेऽनुवाके नवमः खण्डः । पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः । १ ३ उच्चैःश्रवा ह कौपयेयः कौरव्यो राजाऽऽस । तस्य ह केशी दाभ्यः पाञ्चालो राजा स्वसीय आस । तौ हाऽन्योन्यस्य मिया- बासतुः ॥५॥ स होञ्चैश्रवाः कोपर्ययोऽस्माल्लोका मेयाय । तस्मिन् ह प्रेते केशी दाभ्योऽरण्ये मृगयां चचाराऽमेिगं विनिनी- ३-अन्ति, । ४ 'एषोत्यमभिप्रवहति । - मावहेऽति । किमभीऽति। ब्रह्मणो लोकमिति.........देवते अनु संचरति अधिक है । ५ऽस्मि । -दिष्ठ । ७ तेषु । 'वा' अधिक है। धूवते। १० 'चा' अधिक है। १-ऐश्-२कौव-३केश्शी, केश्य। ४ स्वस्नी- ५'गा' लाख रङ्ग में कहा था अधिक है।

( ११५ ) १० ११ १२ पमाणः ॥२॥ स ह तथैव पल्ययमानो मृगान् प्रसरगन्तरेण- वोचैश्यसं कौपयेयमधिजगाम ॥३॥ तं होवाच हप्यामि स्वी३- जानामीति । न हप्यसीति होवाच जानासि । स एवास्मि यम्मा मन्यस इाते ॥४॥ अथ यद्गव आहुरिति होवाच य आविर्भव- त्यन्येऽस्य लोकमुपयन्तीत्यथ कथमशको म आविर्भवितुमिति॥५॥ मोमिति होवाच यदा वै तस्य लोकस्य गोप्तारमविदेऽतस्त प्रावि- रभूवमप्रियं चास्य विनेष्याम्यनु चैनं शासिष्यामीति ॥६॥ तथा भगव इति होवाच । तं वै नुत्वा परिष्वजा इति । ते ४ स्म परिष्वजमानो यथा धूमं वापीयाद्वायुं वाकाशं वायचि वापोवैवं ह स्मैनं व्येति । न ह स्मैनम्परिष्वगायोपलभते ॥७॥३२॥ षष्ठेऽनुषाके प्रथमः खण्डः । स होवाच यद्वै ते पुरा रूपमासीत्तत्ते रूपम् । न तु त्वा परि- ध्वगायोपत्रभ हाते ॥ ॥ ओमिति होवाच ब्राह्मणो वै मे साम विद्वान् सान्नोद्गायत् । स मेऽशरीरेण साम्ना शरीराण्यधूनोत् । तद्यस्य वै किल साम विद्वान सान्नोद्गायति देवतानामेव सलोकतां गमयतीति ॥२॥ पतङ्गः प्राजापत्य इति होवाच प्रजापतेः मियः प्रस्सर-1 ७ ऽन्येश्व-इश्-१८ य । अत । १० वा। । १२ ॥ १व । २ ने । ३-गोगों । इक खभते । ५-गरणय । ११ हे।

C पुत्र प्रास । स तस्मा एतत् सामाब्रवीत् । तेन स ऋषीणामुद- गायत् । त एत ऋषयो धूतशरीरा इति ॥३॥ एतेनो एव साम्नति होवाच प्रजापतिर्देवानामुदगायत् । त एत उपरि देवा धूतशरीरा इति । ४॥ तस्मिन् हैनमनुशशास । तं हानुशिष्यो- वाच यस्स्मैवैतत् साम विद्यात स स्यैव त उद्गायत्विति ॥५॥ स हानुशिष्ट प्राजग्रास । स.ह स्म कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणानुपY- च्छमानश्चरति ॥६॥३॥३०॥ षष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । व्यूढच्छन्दसा चै द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मि । स यो वस्तत्साम वेद यदहं वेद स एव म उद्गास्यति । मीमांसध्वमिति ॥२॥ तस्मै ह मीमांसमानानामेकश्चन [1] सम्पत्यभिदधाति ॥२॥ स ह तथैव पल्ययमानश्श्मशाने वा वने वाऽऽकृतीशया- नमुपाधावयांचकार । तं ह चायमानः प्रजहौ ॥३॥ तं हो- वाच कोऽसीति । ब्राह्मणोऽस्मि मातृदो भाल्ल इति ॥४॥ स किं वेत्योति । सामेति ॥५॥ ओमिति होवाच । व्यूढच्छन्दसा बै द्वादशाहेन यक्ष्यमाणोऽस्मि । स यदि तत्साम वेस्य यदहं वेद त्व- या। ७ । ८1-ष्ठा । १०-पाजे- १-बम-१२ यदि । ३त्वम्।४ वेत्थ ।५श्मभूनाम् । वायसाधनि । सव,उपाध्यायान, जायान । १०-चम्। ११ यदहं वस्य' भधिक है। ६ *१० ( ११५ वै . १.२२ मेव म उद्गास्यसि । मीमांसस्वति ॥६॥ तस्यै ह मीमांसमानस्त- देव सम्प्रत्यभिदधौ ॥७॥ तं होवाचाऽयम्भ उद्गास्यतीति ।।८।। तस्मै ह कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणा असूयन्त आहुरेषु ह वा अयं कुल्येषु सत्सद्गास्यति । कस्मा अयमलामिति ॥ ॥ अलम् मह्यमिति हस्माऽह । सैवाऽलम्मस्याऽलम् मतायद्गतस्य हाऽल- मेवोज्जगौ । तस्मादालम्यैलाजोरातेत्याख्यापयन्ति॥१०॥३॥३१॥ षष्टेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । तद्ध सात्यकीर्ता आहुयाँ वयं देवतामुपास्महा एकमेव षयं तस्यै देवतायै रूपं गव्यादिशाम एक वाहन एक हस्तिन्येकम्पुरुष एक सर्वेषु भूतेषु । तस्या एवेदं देवतायै सर्व रूपमिति ॥१॥ तदेतदेकमेव रूपम्प्राण एव । यावद्धयेव प्राणेन प्राणिति तावद्रूपम्भवति नटू- पम्भवति ॥२॥ तदथ यदा प्राण उत्क्रामति दावेव भूतोऽनर्य परिशिष्यते.न किंचन, रूपम् ॥३॥ तस्यान्तरात्मा तपः । तस्मा- तप्यमानस्योष्णतरः प्राणो भवति ॥४॥ तपसोऽन्तरात्मानि: ३ । ।' ६ स निरुक्तः । तत्मात्स दहति ॥५॥ अथाधिदेवतम् । इयमेवैषा- १२-ति से ठीक किया हुआ! १३.'त अधिक है। १४. नास्ति इति । १५-पाच १६पासू-१७ कुलेषु ।.१८शास-1.१६ अर्णम।२७.न्य इसकेमागे 'म" लाल रंग में कटा हुआ है । २१'म'अधिक है। २२ एवौं । १ अदू । २ एयो। ३-ए । ४-थः । ५ दति । -दैव---- - ( ११८) ८ . '. देवता योऽयम्पवते । तस्मितस्मिन्नापोऽन्तः । तदनम् । सो- ऽरूक्ष उपासितव्यः । यदस्मिन्नापोऽन्तस्तेनाऽरूक्षः ॥६॥ तस्या- न्तरात्मा तपस् । तस्मादेष आतपत्युष्णतरः पवते ॥७॥ तपसो- ऽन्तरात्मा विद्युत्। स निरुक्तः। तस्मात्सोऽपि दहति ॥८॥ तानि वा एतानि चत्वारि साम पाणो वाङ्मनस्स्वरः । स एष माणो बाचा करोति मनो नेत्रः। तस्य स्वर एवं प्रजाः । प्रजावान् भवति य एवं वेद ॥॥॥३२॥ षष्ठेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः। स यो वायुः प्राण एव सः । योऽनिर्वागेव सा । यश्चन्द्रमा मन एव तद् । य आदित्यस्स्वर एव सः । तस्मादतमादित्यमाहु- स्स्वर एतीति ।।२॥ स यो ह वा अमूर्देवता उपास्ते या अमूरधि- देवतं दूरूपा वा एता दुरनुसम्पाप्या इव । कस्तद्वेद्यता अनु वा सम्प्राप्नुयान्न वा ॥२॥ अथ य एना अध्यात्ममुपास्ते स ऽन्तिदेवो भवति । निर्जीयन्तीव वा इत एता। [२] अस्य वा एताशरीरस्य सह प्राणेन निर्जीयन्ति । क उ एव तद्वेद यद्येता अनु वा सम्पाप्नुयान वा ॥३॥ अथ य एना उभयीरेकधा मक 'तानि वासितव्यो (!) बदस्मिन्नापोऽन्तम्-तस्मात्सोऽपि इति दोबारा पाया है। १मा । २ प । ३-मापा । ४ चा। ५२ उमेधीर। १ 3.

2 (१६) तीर्वेद स एवानुष्ठथा साम वेद स पात्मानं वेद स ब्रह्मवेद ॥४॥ तदाहुः प्रादेशमात्राद्वा इत एता एकम्भवन्ति । अतो ह्ययम्माण- स्स्वयं उपर्युपरि वर्तन इति ॥५॥ अथ हैक आहुश्चतुरंगुलाद्वा इत एता एकम्भवन्तीति । अतो ह्येवायम्पाणस्वयं उपर्युपरि वर्तत इति ॥६॥ स एष ब्राह्मण आवर्तः । स य एवमतम्ब्रह्मण पावत वेदाऽभ्येनम्प्रजाः पशव आवर्तन्ते सर्वमायुरेति ॥७॥ स यो हैवं विद्वानमाणेन प्राण्याऽपानेनाऽपान्य मनसैता उभयोर्दे- पता आत्मन्येत्य मुख आधत्ते तस्य सर्वमाप्तम्भवति सर्व जितम्। न हास्य कश्चन कामोऽनाप्लो भवति य एवं वेद ॥८॥३३॥ षष्ठेश्नुवाके पञ्चमः खण्डः । तदेतन्मिथुनं यद्वाक्च प्राणश्च । मिथुनमुक्सामे । भाचतुरं वाव मिथुनम्पजननम् ॥१॥ तद्यवाद प्राह सोमः पवत इति ।। . : वोपावर्तध्वमिति वा तत्सहैव वाचा मनसा प्राणेन स्वरेण हि कुर्वन्ति । तद् हिङ्कारेण मिथुनं क्रियते ।।२।। सहैव वाचा मनसा माणेन खरेण निधनमुपयन्ति । तनिषनेन मिथुनं क्रियते ॥शा तत्सतविधं सान्नः । सप्तकृत्व उद्गाताऽऽत्मानं च यजमानं च शरीरात्मजनयति ॥४॥ यादृशस्यो ह वै रेतो भवति तादृशं ७-अखिय्य । -रि()|१०-लइदू । ११ नमन पापा-कारा३-भा। ३ ५ ( १२० ) सम्भवति यदि वै पुरुषस्य पुरुष एव यदि गोरौरेव यद्यश्वस्याश्च एव यदि मृगस्य मृगएव । यस्यैव रेतो भवति तदेव सम्भवति ॥५॥ तद्यथा ह वै सुवर्णं हिरण्यमग्नी प्रास्यमानं कल्याणतरं कल्याण- तरम्भवति एवमेव कल्याणतरेण कल्याणतरेणात्मना सम्भवति य एवं वेद ॥६॥ तदेतदृचाभ्यनूच्यते ॥७॥३॥३४॥ षष्ठेऽनुवाके षष्ठः खण्डः । पतङ्गमक्तमसुरस्य मायया हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चितः । समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षते मरीची- नाम्पदमिच्छन्ति वेधस इति ॥३॥ पतङ्गमक्तमिति । प्राणो चै पतङ्गः। पतन्निव होष्वङ्गेष्वति रथंमुदीक्षते । पतङ्ग इत्याचक्षते ॥२॥ असुरस्य माययेति । मनो वा असुरम् । तद्धन्यमुषु रमते । वस्यैष माययाक्तः ॥३॥ हृदा पश्यन्ति मनसा विपश्चित इति । हृदैव ह्येते पश्यन्ति यन्मनसा विपश्चितः ॥४॥समुद्रे अन्तः कवयो विचक्षत इति । पुरुषो वै समुद्र एवंविद उ कवयः । त इमाम्पु- रुषेऽन्तर्वाचं विचक्षते ॥॥ मरीचीनाम्पदमिच्छन्ति वेधस इति । मरीच्य इव वा एता देवता यदाग्निर्वायुरादिसश्चन्द्रमाः ॥६॥ न इ ७ ... manand BAR Humang. ४. ऋच्या। ५-स्था-॥ प्रत्तम् । २-ताः।३-ए। ताइएवं ७स।

( १२१ ) चा एतासां देवतानाम्पदमस्ति । पदेनो ह वै पुनर्मत्युरन्वेति ॥७॥ तदेतदनन्वितं साम पुनर्मत्युना । अति पुनर्मुत्युं तरति य एवं वेद ॥८॥३३॥ षष्ठेनूवाके सप्तमः खण्डः । ... ४ पतङ्गो वाचम्मनसा बिभर्ति तांगन्धर्वोऽवदर्भ अन्तः। तां द्योतमानां स्वर्यम्मनीषामृतस्य पदे कवयो निपान्ति इति ॥२॥ पतङ्गो वाचम्मनसा विभीति । प्राणो वै पतङ्गः । स इमां वाचम्मनसा बिभर्ति ॥२॥ तां गन्धर्वोऽवदद्गर्भ अन्तरिति । प्राणौ चै गन्धर्वः पुरुष उगर्भः। स इमाम्पुरुषेऽन्तर्वाचं वदति।। तां द्योतमानां स्वर्यम्मनीषामिति। खर्या ह्येषा मनीषा यद्वान्।।।। ऋतस्य पदे कवयो निपान्तीति । मनो वा ऋतमेवंविद उ कवयः। प्रोमिसेतदेवाक्षरमृतम् । तेन. यदृचम्मीमाँसन्ते यद्यजुर्यत्साम. तदेनां निपान्ति ॥५॥३॥३६॥ षष्ठेऽनुवाकेऽष्टमः खण्डमा . ८। १-यो । २-मा । ३ वदति। ४ प्रस्तू- ५-६ यत्साम' के प्रागे 'ब्रोमित्ये-लम्' है।

( १२२ ) अपश्यं गोपामनिपद्यमानमा च परा च पथिभिश्चरन्तरम् । १ स सधीचीस्स विषूचीर्वसान आ वरीवर्ति भुक्नेध्वन्तर् इति ॥१॥ अपश्यं गोपामनिपद्यमानमिति । प्राणो वै गोपाः । स हीदं सर्वम- निपद्यमानो गोपायति ॥२॥ आ च परा च पथिभिश्वरन्तमिति । तये च ह वा इमे प्राणा अमी च रश्मय एतैर्ह वा एष एतदा च परा च पथिभिश्चराति ॥३॥ स सधीचीस्स विषूचीर्वसान इति । संधीचीश्च ोष एतद्विषूचीश्च प्रजा वस्ते ॥४॥ आ वरीवति भुवने- श्वन्तरिति । एष ह्येवैषु भुवनेश्वन्तरावरीवति ॥५॥ स एष इन्द्र छद्रीयः । स यदैष इन्द्र उद्गीथ पागच्छति नैवोद्गातुश्चोपगातॄणां च विज्ञायते। इत एवोर्ध्वरस्वरुदेति । स उपरि मूर्चा लेलावति ॥६॥ स विद्यादानमंदिन्द्रो नेह कश्चन पाप्मा न्यङ्गः परिशेक्ष्यत इति । तस्मिन् ह न कश्चनः पाप्मा न्यङ्गः परिशिष्यते ॥७॥ तदेतद- भ्रातृव्यं सायन, ह वा. इन्द्रः कंचन भ्रातृव्यम्पश्यते ।स ३ यथेन्द्रो न कंचन भ्रातृव्यम्पश्यत एवमेव [न] कंचन भ्रातृव्य- म्पश्यते य एतदेवं वेदायो यस्यैवं विद्वानुद्रायति ॥८॥३७॥ षष्ठेऽनुवाके नवमः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ १-रीच्-इस पाद के प्रारम्भ में प्रति ऐसा अधिक है। २ सस्ते। ३-तृण-४-ध्व । ५ भागाद् । ६ पारिखे- ७ अस 1 5 5-॥

२ ४ (१२३ ) प्रजापतिम्ब्रह्माऽसृजत । तमपश्यममुखमसृजत ॥१॥ तमप्र- पंश्यममुखं शयानम्ब्रह्माऽऽविशत् । पुरुध्य तत्। पाणौ वै ब्रह्म । प्राणो वावैन तदाविशत् ॥२॥ स उदतिष्ठत् प्रजानां जनयिता । तं रक्षांस्यन्वसचन्त ॥३॥ तमेतदेव साम गायनत्रायत। यद्गायक- आयत तद्गायत्रस्य गायत्रत्वम् ॥४॥ त्रायत एनं सर्वस्मात्पाप्मनी मुच्यते य एवं वेद ॥॥ तमुपाऽस्मै गायता नर इत्यूचाउँऽश्रेव- णीयेनोपागायन् ॥६॥ यदुपाऽस्मै गायता नर इति तेन गायत्रम- भवत् । तस्मादेषेव प्रतिपत्कार्या ॥७॥ पवमानायेन्दावा अभि देवमिया हुम्-भाक्षाता इति षोडशाक्षराण्यभ्यगायन्त। घोडशकलं ब्रह्म। कलाश एवैनं तद्ब्रह्माऽऽविशत् ॥८॥ तदेतचतुर्विंशयक्षरं गायत्रम् । अष्टाक्षरः प्रस्तावः । षोडशाक्षरं गीतं तच्चतुर्विंशतिस्स- म्पद्यन्ते । चतुर्विंशयर्धमासस्संवत्सरः । संवत्सरस्साम साता चश्शरीरेण मृत्युरन्यैतत् । तद्यच्छरीरवत्तन्मृसोराप्तम् । अथ यद- वै ११ १४ शरीरं तदमृतम् । तस्याऽशरीरेण साना शरीराण्यधूनोद ॥१०॥ . ३॥३८॥ सप्तमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १.मुख्-1२ अप्रव-1३-षं । ४-आस्य् । ५ अनुसच्- ६ गा- यद । श्रवसीय पाय-1 10 लाम् । १९ प्रास्तू-1 १२ तम्। १३-यत । १४-सास ॥

( १२४ ) ओवाश्चोवा३चोवाश्च हुम्भा प्रोवा इति षोडाक्षरा- एयभ्यगायत । षोडशकलो वै पुरुषः । कलाश एवास्य तच्छरी- राण्यधूनोत् ॥१॥ स एषोऽपहतपाप्मा धूतशरीरः । तदेविक्रया- वृतियुदासंगायसो इत्युदास । आ इति आद्यात् । वागिति तद्ब्रह्म । तदिदन्तरिक्षं सोऽयं वायुः पवते । हुमिति चन्द्रमाः। भा इसादियः ॥२॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतर्भातीसाच- क्षते ॥३॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य ऋतोरभ्रमियाचक्षते ॥४॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य अतोः कुभ्रमियाचक्षते ॥५॥ एतस्य हवा इदमक्षरस्य ऋतोश्शुभ्रमियाचक्षते ॥६॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य क्रतोदृषभ इसाचक्षते ॥७॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य क्रतोदर्भ इत्याचक्षते ॥८॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य क्रतोर्यों भातीयाचक्षते ॥६॥ एतस्य ह वा इदमक्षरस्य क्रतोस्सम्भवती- साचतते ॥१०॥ तद्यत्किं च भा३ इति च भा३ इनि च तदेत- मिथुनं गायत्रम् । म मिथुनेन जायते य एवं वेद ॥११॥ २३॥ 2 सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । १-या।२ कृत-३ सर्वत्र ऐसा पाठ । ४-ख । ५ वृवृष्- हदभ, सम्भवती। ७ य मती । ॥

। 1 २ ( १२५ ) तदेतदमृतं गायत्रम् । एतेन वै प्रजापतिरमृतत्वमगच्छदेतेन देवा एतेनर्षयः ॥१॥ तदेतद्ब्रह्म प्रजापतयेऽब्रवीत् प्रजापतिः परमेष्ठिने प्राजापसाय परमेष्ठी प्राजापसो देवाय सवित्रे देवस्सविता- ऽप्रयेऽनिरिन्द्रायेन्द्रः काश्यपाय काश्यप ऋश्यशृङ्गाय काश्यपाय श्यशृङ्गःकाश्यपो देवतरसेश्यावसायनाय काश्यपाय देवतराश्श्या- वसायनः काश्यपश्श्रुषाय वाहृयाय काश्यपाय श्रुषो वाह्यः का- श्यप इन्द्रोताय देवापाय शौनकायेन्द्रोतो दैवापश्शौनको दृतय ऐन्द्रोतये शौनकाय तिरेन्द्रोतिश्शौनकः पुलुषाय प्राचीनयोग्याय पुलुषः प्राचीनयोग्यस्ससयज्ञाय पौलुषये प्राचीनयौग्याय सस- यज्ञः पौलुषिः प्राचीनयोग्यस्सोमशुष्माय साययज्ञाय प्राचीन- योग्याय सोमशुष्मस्सासयज्ञिः प्राचीनयोग्यो हृत्स्वाशयायाल- केयाय माहाषाय राज्ञे हृत्स्वाशय पालकेयो माहाटषो राजा जनश्रुताय काण्ड्वियाय जनश्रुतः काण्ड्वियस्सायकाय जानश्रुते- याय काण्ड्वियाय सायको जानश्रुतेयः : काण्ड्वियो नगरिणे जानश्रुतेयाय काण्ड्वियाय नगरी जानश्रुतेयः काण्ड्वियश्शाय १ काश्पयो' अधिक है। २श्यावसाय । ३ भूषो, शुषो । ४, वाख्ने । ५ इन्द्रातू- ६-पिश् । ७ लोक-सूर सात्यायवः प्राचीनयंग्यो हत्स्वा' अधिक है । ६ जानु-, जानव- १०शिंग-1 :

Paralia meani...- ( १२६ ) ११ . ३ शाध्यायनय प्रात्रेयाय शङ्गश्शाध्यायनिरात्रेयो रामाय कातुजाते- याय वैयाघ्रपद्याय रामः कातुजातेयो धैयाघ्रपद्यः-॥२॥३॥४०॥ सप्तमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । -शङ्काय बाभ्रव्याय शङ्खो बाभ्रव्यो दक्षाय कासायनय आत्रेयाय दक्षः कासायनिरात्रेयः कँसाय वारकये कँसो पारकि: पोष्टपादाय वारक्याय प्रोष्ठपादो वारक्यः कँसाय वारक्याय कसो वारक्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यः कुबेराय वारक्याय कुबेरो वारक्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुतो वारक्यस्मुदत्ताय पाराशर्याय मुदत्तः परिशर्योऽषाढायोचराय पाराशायाऽषाढ उत्तरः पारा- शर्यो विपश्चित शकुनिमित्राय पाराशर्याय विपश्चिच्छकुनिमित्रः पाराशर्यो जयन्ताय पाराशर्याय जयन्तः पाराशर्य:-॥२॥३॥४२॥ सप्तमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । श्यामजयन्ताय लौहिसाय श्यामजयन्तो लौहियः पल्लि- गुताय लौहिसाय पल्लिगुप्तो लौहिसस्ससश्रवसे लौहियाय सय- ४ Powere in Eyearatear Parwahie sath nirementerved ween women updao maravadwapsailway Reasons. TRam Yadav Fir a १ १६-नाय। १-नार्य, कात्याजय-२ वर्-1३५-४सुदत्ता, सुंदत्तताय। ५ अर्ष (1), प्रीष्- १ लोह- %3D ३ ( १२७ ) श्रवा लौहिसः कृष्णधृतये सासकये मृष्णधृतिस्सासकिश्श्याम- मुजयन्ताय लौहिसाय श्यामसुजयन्तो लौहिसः कृष्णदत्ताय लौहिसाय कृष्णदत्तो लौहिसो मित्रभूतये लौहिसाय मित्रभूति लौहिसश्श्यामजयन्ताय लौहिसाय श्यामजयन्तो लौहित्यस्त्रि- वेदाय कृष्णराताय लोहियाय त्रिवेदः कृष्णरातो लौहित्यो यशखिने जयन्ताय लौहित्याय यशस्वीजयन्तो लौहित्यो जयकाय लौहत्याय जयको लौहित्यः कृष्णराताय लौहित्याय कृष्णरातो लौहित्यो दक्षजयन्ताय लौहित्याय दक्षजयन्तो लौहित्यो विपश्चिते दृढजयन्ताय लौहित्याय विपश्चिदृढजयन्तो लौहित्यो वैपश्चिताय दाढजयन्तये दृढजयन्ताय लौहित्याय वैपश्चितो दाई- जयन्तिदृढजयन्तो लौहित्यो वैपश्चिताय दार्टजयन्तये गुप्ताय लौहित्याय ॥१॥ तदेतदमृतं गायत्रमथ यान्यन्यानि गीतानि काम्यान्येव तानि काम्यान्येव तानि ॥२॥३॥४२॥ सप्तमेऽनुवाके पञ्चमः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः॥ २-ति । ३ श्यामजयन्तो लौहित्याय' अधिक है। वैविप्- (१२८ ) [चतुर्थोऽध्यायः] १ २ १ श्वेताश्वो दर्शतो हरिनीलोऽसि हरितस्पृशस्समानबुद्धो मा हिंसीः । न मां त्वं वेत्थ प्रद्रव ॥१॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरुपमकोविदमाममयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा॥२॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरुषमको विदमयस्मयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥३॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि वपन्तम्पु- रुषमकोविदं लोहमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥४॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि स्वपन्तम्पुरुषमकोविदं रजतमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥५॥ यदभ्यवचरणोऽभ्यवैषि वपन्तम्पुरु- षमकोविदं सुवर्णमयेन वर्मणा वरुणोऽन्तर्दधातु मा ॥६ १ आयुर्माता मतिः पिता नमस्त आविशोषण | ग्रहों नामाऽसि विश्वायुस्तस्मै ते विश्वाहा नमो ६ नमस्ताम्राय नमो वरुणाय नमो जिघांसते ॥७॥ यक्ष्म राजन्मा मी हिंसीः । राजन् यक्ष्म मा हिंसी । तयोस्संविदानयोस्सर्वमायुर- मान्यहम् ॥वाशा प्रथमोऽनुवाकस्समाप्तः । १-णा । २ इति मन्ममयेन ।३ प्रयाण्य । ४ संक्षेप है। ५मासनई-चाहाय । ७ रुपाय |८॥

( १२६ ) २ ३ पुरुषो वै यमः ॥१॥ तस्य यानि चतुर्विशतिर्वर्षाणि सत्यात- स्सवनम् । चतुर्विशत्यतरा गायत्री । गायत्रम्मातस्सवनम् ॥२॥ सदसूनाम् । प्राणा वै वसवः । माणा हीदं सर्व वस्वाददते ॥३॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदुपद्रवेत्स ब्रूयात्माणां वसव इदम्मे प्रातस्सवनं माध्यन्दिनेन सवनेनानुसंतनुतेति । अगदो हैव भवति ॥४॥ अथ यानि चतुश्चत्वारिंशतं वर्षाणि तन्माध्यन्दिन सबमाम् । चतुश्चत्वारिंशदक्षरा त्रिष्टुप् । त्रैष्टुभ माध्यन्दिनं सवनम् ॥५॥ तदुद्राणाम् । प्राणा बै रुद्राः । प्राणा हीदं सर्व रोदयन्ति ॥६॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदुपद्रवेद स ब्रूयात्माणा रुद्रा इदम्मे माध्यन्दिनं सवनं तृतीयसवनेनानुसंत- नुतेति । अगदो हैव भवति ॥७॥ अथ यान्यष्टाचत्वारिंशतं वर्षाणि तत् तृतीयसवनम् । अष्टाचत्वारिंशदक्षरा जगती । जागतं तृतीयसवनम् ॥५॥ तदादिसानाम् । पाणा वा आदित्या। भाणा हीदं सर्वमाददते ॥६॥ स यद्येनमेतस्मिन् काल उपतपदु- पद्भवेत्स ब्रूयात्माणा आदित्या इदम्मे तृतीयसवनमायुषानु- संतनुतेति । अगदो हैव भवति ॥१०॥ एतद्ध तद्विद्वान ब्राह्मण - १-ति । २-ण । ३ अधिक है। ४ वाणि।

(१३० ) उवाच महिदास ऐतरेय उपतपति किमिदमुपतपसि योऽहमनेनो- पतपता न प्रेष्यामीति । स ह षोडशशतं वर्षाणि जिजीव । प्रह षोडशशतं वर्षाणि जीवति नैनम्माणस्साम्यायुषो जहाति य एवं वेद ॥१॥४॥२॥ ܩ १ ४ .. द्वितीयोऽनुवाकस्समाप्तः। व्यायुष कश्यपस्य जमदमेस्त्र्यायुषम्। नारायमृतम्य पुष्पाणि त्रीण्यायूंषि मेऽकृणोः ॥१॥ स नो मयोभूः पितवाविशस्व शान्तिको यस्तनुवे स्योनः ॥२॥ येऽमयः पुरीष्याः प्रिविष्टाः पृथिवीमनु । तेषां त्वमस्युत्तमः प्र णो जीवातवे सुव ॥३४॥३॥ तृतीयोऽनुषाकस्समाप्तः। अरण्यस्य वत्सोऽसि विश्वनामा विश्वाभिरक्षणोऽपाम्पक्यो- सि वरुणस्य दूतोऽन्तर्धिनाम ॥१॥ यथा त्वममतोमर्येभ्योऽन्तहितो- ऽस्येवं त्वमस्मानघायुभ्योऽन्तर्धेहि।अन्तधिरसि स्तेनेभ्यः॥२॥४॥४॥ चतुर्थोऽनुवाकस्समाप्तः । ५ सम्य ।। १.त्रियाय्-। २त्रीण् । ३ आयुक्षि । ४-तो । ५ चतोका । य।७-15 प्रा। १ विश्वोनू-। २-क्षमा ।३ दूर्धनाम । ४ त।५मसेभ्यो। १ 1 ३ ૨ ३ ( १३१ ) व्युषि सविता भवस्युदेष्यन् विष्णुरुद्यन्पुरुष उदितोबृहस्पति- रभिप्रयन्मघवेन्द्रो वैकुण्ठो माध्यन्दिने भगोऽपराह उग्रो देवो लो- हितायनस्तमिते यमो भवसि ॥२॥ प्रश्नसु सोमो राजा निशाया- म्पितृराजस्वमे मनुष्यान्प्रविशसि पयसा पशून् ॥२॥ विरात्रे भवो भवस्यपररात्रेऽङ्गिरा अग्निहोत्रवेलायाम्भृगुः ॥३॥ तस्य तदे- तदेव मण्डलमूधः । तस्यैतौ स्तनौ यद्वाक् च प्राणश्च । ताभ्या- म्मेधुक्ष्वाऽध्यायम्ब्रह्मचर्यम्प्रजाम्पशून् स्वर्ग लोकं सजातवन- स्याम् ॥४॥ एता आशिष प्राशासे । भूर्भुवस्वः। उदिते शुक्रमा- दिश । तदात्मन्दधे ॥४॥ पञ्चमोऽनुवाकस्समाप्तः। भगेरथो हैक्ष्वाको राजा कामप्रेण यज्ञेन यक्ष्यमाण प्रास॥२॥ तदु ह कुरुपञ्चालानाम्ब्राह्मणा ऊचुर्भगेरथो ह वा अयमैक्ष्वाको राजा कामप्रेण यज्ञेन यक्ष्यमाणः । एतेने कांवदिष्याम इति ॥२॥ तं हाऽभ्येयुः । तेभ्यो हाऽभ्यागतेभ्योऽपचितीश्चकार ॥३॥ अथ हैषां स भाग प्रावबाजोप्त्वा केशश्मश्रूणि नखानिकृत्याऽऽज्ये- ६ ३ १-प्रो।पराहेण । ३-ज। ४ त । ५-य । ६ प्रासिष । ७ प्रादिष ॥ १-पाञ्च- २ यक्षम- ३ एततेन । ४ ‘भा' अधिक है। 1.उपत्वा ..

( १३२ ) नाऽभ्यज्य दण्डोपानहम्बिभ्रत् ॥४॥ तान् होवाच ब्राह्मणा भगवन्तः कतमो वस्तद्वेद यथाऽश्रावितप्रत्याश्राविते देवान् गच्छत इति ॥।॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यद्विदुषस्मृद्गाता मुहोता खध्वर्युस्सुमानुषविदाजायत इति ॥६॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यचानि सर्वाणि संस्तुतान्यभि- सम्पद्यन्त इति ॥७॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यथा गायच्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥८॥ अथ होवाच कतमो वस्तद्वेद यथा दक्षिणाः प्रतिगृहीता न हिंसन्तीति ॥६॥४॥ षष्ठेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । एतान् हैनान् पञ्च प्रश्नान् पप्रच्छ ॥१॥ तेषां ह कुरुपञ्चा- लानाम्बको दालभ्योऽनूचान आस ॥२॥ स होवाच यथाऽश्रा- चितप्रसाश्राविते देवान् गच्छत इति प्राच्यां वै राजन् दिश्या- श्रावितप्रसाश्राविते देवान् गच्छतः । तस्मात्मातिष्ठन्नाश्रावयति प्राङ् विष्टन्पत्याश्रावयतीति ॥३॥ अथ होवाच यद्विदुषस्सदाता महोता स्वध्वर्युस्सुमानुषविदाजायत इति यो वै मनुष्यस्य सम्भूति वेदेति होवाच तस्य सद्गाता सुहोता स्वध्वर्युस्मुमानुपकि- . ३ . ज्या॥ १-पाच्-२ अस्म-। ३ सम-१६ पॅच- ।

( १३३ ) दांजायत इति प्राणा उ ह वाव राजन् मनुष्यस्य सम्भूतिरेवेति ॥४॥ अथ होवाच यच्छन्दांसि प्रयुज्यन्ते यत्तानि सर्वाणि संस्तुतान्यभिसम्पद्यन्त इति गायत्रीमु ह. वाव राजन् सर्वाणि छन्दांसि संस्तुतान्यभिसम्पद्यन्त इति ॥॥ अथ होवाच ययों गायच्या उत्तम अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति वषट्कारेणो हं वाव राजन गायत्र्या उत्तमे अक्षरे पुनर्यज्ञमपिगच्छत इति ॥६॥ अथ होवाच यथा दक्षिणाः प्रतिगृहीता नहिंसन्तीति-11७४|| षष्ठेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । -यो वै मायन्यै मुखं वेदेति होवाच तं दक्षिणा प्रतिगृहीता न हिंसन्तीति ॥१॥ अग्निह वाव राजन् गायत्रीमुखम् । तस्माघदनावभ्यादधाति भूयाने स तेन भवति वर्धते । एव- मेवैवं विद्वान्ब्राह्मणः प्रतिगृह्णन्भूयानेव भवति वर्धत उ एवेति ॥२॥ स होवाचाऽनूचानो वै किलाऽयम्ब्राह्मण आस । लामहमनेन यज्ञेनैमीति ॥शा तस्य वै ते तथोदास्यामीति होवाच य- कराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमेष्यसीति ॥क्षा तस्मा एतेन गाय- त्रेणोद्गीथेनोजगौ । स हैकराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमियाय १ २. ४ सम्भूतिधुर, सम्भूतिद्धर । ५ है। १ प्रश्न-र-यन् । ३गायन सों।

न्तेन हैतेनैकराडेव भूत्वा स्वर्ग लोकमेति [य एवं वेद] ॥॥ ओं वा इति द्वे अक्षरे । ओं वा इति चतुर्थे । ओं वा इति षष्ठे । हुम्भा ओं वागित्यष्टमे ॥६॥ तेन हैतेन प्रतीदर्शोऽस्य भयदस्या- समात्यस्योज्जगौ ॥७॥ तं होवाच किं त आगास्यामीति । स होवाच हरीमे देवाचा वागायेति । तथेति । तौ हास्मा भाजगौ। तौ हैनमाजग्मतुः ॥८॥ स वा एष उद्गीथः कामानां सम्पदों वाश्चों वाश्चों वा३च् हुम भा प्रों वागिति। साङ्गो हैव स ननुर- सतस्सम्भवति य एतदेवं वेदायो यस्यैवं विद्वानुद्गायति ॥॥॥ ६ षष्ठेश्नुवाके तृतीयः खण्डः । षष्ठोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ पुरुषो वै यज्ञः पुरुषो होगीयः । अथैत एव मृत्यवो यद- निर्वायुरादित्यश्चन्द्रमाः ॥१॥ ते ह पुरुषं जायमानमेव मृत्युपाझर- भिदधति । तस्य वाचमेवाग्निरभिदधाति प्राणं वायुश्चतुरादित्यश्- श्रोत्रं चन्द्रमाः ॥२॥ तदाहुस्स वा उद्गाता यो यजमानस्य माणे- भ्योऽपि मृत्युपाशानुन्मुञ्चतीति ॥३॥ तद्यस्यैवं विद्वान् प्रस्तौति य एवास्य वाचि मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥४॥अथ यस्यैवं ४ तोन ।५-शे। संघद् ॥ १प्रवाश्यजा-३ उमुन्- ।

( १३५ ) विद्वानुदायति य एवास्य प्राणे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥शा अथ यस्यैवं विद्वान् प्रतिहरति य एवास्य चतुषि मृत्युपाशस्त- चास्योन्मुञ्चति ॥६॥ अथ यस्यैवं विद्वानिधनमुपैति य एवास्क श्रोत्रे मृत्युपाशस्तमेवास्योन्मुञ्चति ॥७॥ एवं वा एवंविदुद्वाता यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुञ्चति ॥८॥ तदाहुस्सा वा उद्गाता यो यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुच्यान साङ्गं सत्तनुं सर्वमृत्योस्स्पृणातीति ॥४॥ सप्तमेऽनुषाके प्रथमः खण्डः । तथस्यैवं विद्वान हिङ्करोति य एवास्य लोमसु मृत्युपाशस्त- स्मादेवैनं स्पृणाति ॥१॥अथ यस्यैवं विद्वान प्रस्तौति य एवास्य त्वचि मृत्युपाशस्तस्मादेवनं स्पृणाति ॥२॥अथ यस्यैवं विद्वाना- दिमादचे य एवास्प माँसेषु मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥३॥ प्रय यस्यैवं विद्वानुद्गायति य एवास्य स्नावसु मृत्युपाशस्तस्मा- देवैनं स्मृणाति ॥४॥ अथ यस्यैवं विद्वान्मतिहरति य एवास्यानेषु एसपाशस्तस्मादेवनं स्पृणाति ॥॥अथ यस्यैवं विद्वानुपद्रवति य एवास्यास्थिषु मृत्युपाशस्तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥६॥ अथ यस्यैवं ४-द्वा । ५ उदायति । ६माणे । ७ नास्ति । प्रतिहरति । १क्ष्-या। १ २ .

( १३६ ) विद्वान् निधनमुपैति य एवास्य मज्जमु मृत्युपाशस्स तस्मादेवैनं स्पृणाति ॥७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य प्राणेभ्येऽधि- मृत्युपाशानुन्मुच्याथैनं साक्षं सतनुं सर्वमृत्योस्सपृणाति ॥८॥तदा- हुस्स वा उदाता यो यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मुच्याथैनं साङ्गं सतनुं सर्वमृसोस्स्मृत्वा स्वर्गे लोके सप्तधा दधातीति । स वा एष इन्द्र वैध उद्यन् भवति सवितोदितो मित्रस्संगवकाल इन्द्रो वैकुण्ठो मध्यन्दिने समावर्तमानश्शर्व उग्रो देवो लोहितायन् प्रजापतिरेव संवेशेऽस्तमितः ॥१०॥ तद्यस्यैवं विद्वान् हिङ्करोति य एवास्योद्यतस्स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥११॥ अथ यस्यैवं ब्रिदान प्रस्तौति य एवास्योदिते स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं. दधाति ॥१२॥ अथ यस्यैवं विद्वानादिमादचे य एवास्य संगवकाले स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१३॥ अथ यस्यैवं विद्वानुद्गायति य एवास्य मध्यन्दिने स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१४॥अथ त्यस्यैवं विद्वान् प्रतिहरति य एवास्यापराह्ने स्वर्गो लोकस्तस्मिने- वैनं दधाति ॥१५॥ अथ यस्यैवं विद्वानुपद्रवात. य एवास्यास्वं- बनस्स्वर्गों लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१६॥ अथ यस्यैवं विद्वात्रि- ३ F ३ सम्भवक्-१४-ए-मोजनायां गमा। -अमाध- ७स।ऐवा। .

( १३७ ) धनमुपैति य एवास्यास्तमिते स्वर्गो लोकस्तस्मिन्नेवैनं दधाति ॥१७॥ एवं वा एवंविदुद्गाता यजमानस्य प्राणेभ्योऽधिमृत्युपाशानुन्मु- च्याथैनं साङ्गं सतनुं सर्वमृत्योस्स्मृत्वा स्वर्गे लोके सप्तधा दधाति ॥१८॥४॥१०॥ सप्तमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । सप्तमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ -- षड् ढ वै देवतास्स्वयम्भुवोऽमिर्षापुरसापादित्यः प्राणोऽनं वाक् ॥१॥ तात्रैष्ठ्ये व्यवदन्ताऽहं श्रेष्ठाऽस्म्पई श्रेष्ठाऽस्म्य्? [स्मि] मां श्रियमुपाध्वमिति ॥२॥ सा अन्योन्यस्यै श्रेष्ठवायै नाऽतिष्ठन्त । ता अब्रुवन्न वा अन्योन्यस्यै श्रेष्ठत्तायै तिष्ठामह एता सम्मभ्रवामहै यथा श्रेष्ठास्सम इति ॥२॥ ता अग्निमब्रुवन्कयं त्वं श्रेष्ठोऽसीति॥४॥ सोऽब्रवीदहं देवानाम्मुखमसम्पहमन्यासाम्प्रजानाम् । मयाऽहुतयो हूयन्ते । अहं देवानाममं विकरोम्यहम्मनुष्याणाम् ॥५॥ स यन्न स्याममुखा एव देवास्स्युरमुखा अन्याः प्रजाः। नाऽऽहुतयो हूयेरन् । न देवानामन्नं विक्रियेत न मनुष्याणाम् ||६॥ तत इदं सर्वम्परा- १५ ૨ १३ सप्त॥ १. षड्ढ । २ ड । ३-प्रा.। ४-ठे । ५ ववद् श्रेष्- ७मान्या-1 है । पत । १० त्वा । ११-कार-1 १२। १३ हूयन्ते (1) लिख कर हुयरन (1) किया गया। १४-ए। . बि ( १३८ ) १६ भवेत्ततो न किंचन परिशिष्येतेति ॥७॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत् त्वं न स्या इति ॥८॥ अथ वायुमब्रुव- न्कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ॥६॥ सोऽब्रवीदहं देवानाम्प्राणोऽस्म्यह- मन्यासाम्पजानाम् । यस्मादहमुत्क्रामामि ततस्स अप्लवते ॥१०॥ स यदहं न स्यां तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येते- ति ॥१।। एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्वं न स्या इति ॥१॥४॥१२॥ अष्टमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः। अथादित्यमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ।।१॥ सोऽब्रवीद- हमेवोद्यन्नहर्भवाम्यहमस्तंयन्रात्रिः । मया चक्षुषा कर्माणि क्रियन्ते। स यदहं न स्यां नैवाहस्स्यान रात्रिःन कर्माणि क्रियेरन् ॥२॥ तत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येतेति ॥३॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥४॥ अथ पाणमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठोऽसीति ॥॥॥ सोऽब्रवीत्मागो भूत्वाऽग्निर्दीप्यते । प्राणो भूत्वा वायुराकाशमनुभवति । प्राणो भूत्वाऽदिस उदेति । माणादन्नम्प्राणाद्वाक् ॥६॥ स यदहं न स्यां तत १ ३ ४ न १५-प्ये । १६ य । १७ अहहम् । १८ऽव ह ॥ १ इंन । २ ५। ३ उक् । ४ अंक- ५ तत् (I) ।

( १३८ ) ३ इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्येतति ॥७॥ एवमेवेति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥८॥ अथान- मब्रुवन् कथमु व श्रेष्ठमसीति ॥२॥ तदब्रवीन्मयि प्रतिष्ठायानिर्दी- प्यते । मयि प्रतिष्ठाय वायुराकाशमनुविभवति । मयि प्रतिष्ठाया- दिस उदेति । मदेव प्राणो मद्राक् ॥१०॥ स यदहं न स्यां सत इदं सर्वम्पराभवेत्ततो न किंचन परिशिष्यतेति ॥११॥ एवमेवेति होचुनॆवेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥१२॥ अथ वाचमब्रुवन् कथमु त्वं श्रेष्ठासीति॥१३॥ साब्रवीन्मयैवेदं विज्ञायते मयाऽदः। स यदहं न स्यां नैवेदं विज्ञायेत नाऽदः ॥१४॥ तत इदं सर्वम्पराभवेन् नैवेह किंचन परिशिष्यतेति ॥१॥ एवमेवे- ति होचु वेह किंचन परिशिष्येत यत्त्वं न स्या इति ॥१६॥४॥१२॥ अष्टमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ता अब्रुवन्नेता वै किल सर्वा देवताः । एकैकामेवानुस्मः । स यन्नु नस्सर्वासां देवतानामेकाचन न स्यात्तत इदं सर्वम्परा- भवेत्ततो न किंचन परिशिष्येत । हन्त साधं समेस यच्छष्टं १ ६ संक्षेप करते हैं । 'स (! न के स्थान में )स्था इति' यहां तक छोड़ दिया है । ७इ-त्य (1) संक्षिप्त दिया है । ८-शिष्य। तुर् ॥ १-२साम्-1 ।। .

( १४० ) ३ ४ तदसामेति ॥१॥ ता एतस्मिन् प्राण ओकारे वाच्यकारे समायन् । तद्यत्समायन् तत्साम्नस्सामत्वम् ॥२॥ ता अब्रुवन् यानि नों मर्यान्यनपहतपाप्मान्यक्षराणि तान्युझ्यामृतेष्वपहतपाप्मसु शुद्धे- ष्वक्षरेषु गायत्रं गायामाऽग्नौ वायावादिखे प्राणेज्ने वाचि । तेनापहस मृत्युमपहस पाप्मानं स्वर्ग लोकमियामेति॥३॥ एसग्नेर- मृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । ग्निरियस्य मर्त्यमनपहतपाप्मा- ऽक्षरम् ॥४॥ वेति वायोस्मृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । युरित्यस्य मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥५॥ एत्यादित्यस्याऽमृतमपहत्पाप्म शुद्धमक्षरम् । त्येत्यस्य मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥६॥ प्रेति प्राणस्यामृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । त्यस्य मर्त्यमनपहत पाप्माक्षरम् ॥७॥एत्यनस्यामृतमपहतपाप्म शुद्धमक्षरम् । नमित्यस्य मर्त्यमनपहनपाप्माक्षरम् ॥८॥ वेति वाचोऽमृतमपहतपाप्म शुद्ध- मक्षरम् । गित्पस्यै मर्त्यमनपहतपाप्माक्षरम् ॥६॥ ता एतानि मान्यनफ्हतपाप्पान्यक्षराण्युदृत्याऽमृतेष्वपहतपाप्पम शुदेष्व- क्षरेषु गायत्रमागायनग्नौ वायावादित्ये पाणेऽन्ने वाचि । तेनाप- १२. ३-णे । ४ वाच्च् । ५-त्यँ । ६ मम्-(!)। ७ येन । ८-त । -न । १० त्य इत्य् । ११ वेदिवाचो मृत' अधिक है पर लाल रज से काटा गया है । १२ ण इत्य् । १३-मासु॥ ।"

१० ( १४१ ) हत्य मृत्युमपहत्य पाप्मानं स्वर्ग लोकमायन् ॥१०॥ अपहत्य मृत्यु मपहत्य पाप्मानं स्वर्ग लोकमेति य एवं वेद ॥११॥४॥१३॥ अष्टमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः । ता ब्रह्माऽब्रुवन्त्वपि प्रतिष्ठायैतमुघच्छामेति । ता ब्रह्माऽब्रवी- दास्येन प्राणेन युष्मानास्येन माखन मामुपामवाथेति ॥१॥ ता एतेन प्राणेनौकारेण वाच्यकारमभिनिमेष्यन्त्यो हिङ्कारागका- रमोकारेण वाचमनुखरन्त्य उभाभ्याम्माणाभ्यां गायत्रमगायमो- वाश्चीवाश्चोवाश्च् हुम् मा वो वा इति ॥२॥ स यथोभया- पदी प्रतितिष्ठत्येवमेव स्वर्गे लोके प्रत्यतिष्ठन् । प्रति स्वर्गे लोके तिष्ठति य एवं वेद ॥३॥ य उ ह वा एवं विदस्माल्लोकात्मति स प्राण एव भूत्वा वायुमप्येति वायोरध्यभ्राण्यभ्रेभ्योऽधि दृष्टि वृष्ट्यैवेमं लोकमनुविभवति ॥४॥ ऋषयो ह सत्रमासां चक्रिरे । ते पुनः पुनर्बडीभिडीभिः प्रतिपाद्भस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं नानुचन बुबुधिरे ॥॥ श्रमेण तपसा प्रतचर्येणेन्द्रमवरुरु- घिरे ॥६॥ त होस्स्वर्ग कै लोकमैप्सिष्म । ते पुनः पुनर्बहीभि- बहीभिः प्रतिपद्भिस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारं नानुचनाऽभुत्स्महि । १मास्यनेन ।२-प्रा,-ऑन् । ३-अत् । ४ - ५-- ऐप्सिष्टु । ७ बहीभिर' अधिक है। ८ऽभूत-१० मेषन्त। ४ ( १४२ ) ३ तथा नोऽनुशाधि यथा स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनातास्स्वस्ति संवत्सरस्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमियामेति ॥७॥ तान् होवाच को वस्स्थविरतम इति ॥८॥४॥१४॥ भ्रष्टमेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । अहमिसगस्त्यः ॥१२॥ स वा एहीति होवाच तस्मै वै तेऽहं तद्वक्ष्यामि यद्विद्वाँसस्स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुमज्ञायाऽनास्स्विस्ति संवत्सरस्योदृचं गत्वा स्वर्ग लोकमेष्यथेति ॥२॥ तस्मा एतं गायत्रस्योद्गीथमुपनिषदममृतमुवाचाऽग्नौ वायावादित्ये प्राणेऽन्ने वाचि ॥३॥ ततो वै ते स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनांर्ता- स्स्वस्ति संवत्सरस्योदृचं गत्वा स्वर्ग लोकमायन् ॥४॥ एवमेवैवं विद्वान् स्वर्गस्य लोकस्य द्वारमनुप्रज्ञायाऽनार्तस्स्वस्ति संवत्सर- स्योहचं गत्वा स्वर्ग लोकमति ॥शा४१५॥ ४ . भ्रष्टमेऽनुवाके पश्चमः खण्डः । अष्टमोऽनुवाकस्समाप्तः ॥ । १ एवं वा एतं गायत्रस्योद्गीथमुपनिषदममृतमिन्द्रोऽगस्त्यायो- वाचाऽगस्त्य इषाय श्यावाश्वय इषश्श्यावाश्विौषूक्तये गौपूक्ति- ६ 'अहमित्य' (1) अधिक है। १ नास्ति । २-क्षामि । ३ 'द्वारमवैवं' अधिक है। वाय ॥ १-गीत-१२-श्रावो। ।

( १४३ ) १ ज्वालायनाय ज्वालायनश्शाध्यायनये शाळ्यायनी रामाय कातु- जातेयायवैयाघ्रपद्याय रामः कातुजातेयोवैयाघ्रपथः ॥२॥१६॥ नवमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । -शङ्खाय बाभ्रव्याय शङ्खो बाभ्रव्यो दक्षाय कात्यायनय आत्रेयाय दक्षः कात्यायनिरात्रेयः कँसाय वारक्याय कँसो वार- क्यस्सुयज्ञाय शाण्डिल्याय मुयज्ञश्शाण्डिल्योऽग्निदत्ताय शाण्डि- ल्यायाऽग्निदत्तश्शाण्डिल्यस्सुयज्ञाय शाण्डिल्याय सुयज्ञश्शाण्डि- ल्यो जयन्ताय वारक्याय जयन्तो वारक्यो जनश्रुताय वारक्याय जनश्रुतो वारक्यस्मुदत्ताय पाराशर्याय ॥१॥ सैषा शाट्यायनी गायत्रस्योपनिषदेवमुपासितव्या ॥२॥४॥१७॥ नवमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । नवमोऽनुवाकस्समाप्तः ।। ३ - केनेषितम्पतति प्रेषितम्मनः केन प्राणः प्रथमः प्रति युक्तः। केनेषितां वाचमिमा वदन्ति चतुश्श्रोत्रं क उ देवो युनक्ति ॥१॥ श्रोत्रस्य श्रोत्रम्मनसो मनो यद् वाचो हवाच स उ प्राणस्य प्राणः। चतुषश्चत्तुरतिमुच्य धीराः प्रेसाऽस्माल्लोकादमृता भवन्ति ॥२॥ ३ ब्वा-४-पाये। ५.वाय्या-॥ १-प्राय । २५-३-श्रो, और 'जनश्रुताय धारक्याय जनश्रुते (!) वारक्यसू' अधिक है। -भो। । ब *- .

४ ( १४४ ) न तत्र चतुर्गच्छति न वाग्गच्छति नो मनः । न विद्म न विजानीमो यथैतदनुशिष्यात् ॥३॥ अन्यदेव तद् विदितादयो प्रविदितादधि । इति शुश्रुम पूर्वेषां ये नस्तव्यायचक्षिरे ॥४॥ यद वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५॥ यन्मनसा न मनुते येनाऽऽहुर्मनो मतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि मेदं यदिदमुपासते ॥६॥ यचतुषा न पश्यति येन धषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विदि नेदं यदिदमुपासते ॥७॥ यच्छ्रोत्रेण न शृणोति येन श्रोत्रमिदं श्रुतम् । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं पदिदमुपासते ॥८॥ यत् प्राणेन न प्राणिति येन प्राणः प्रणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥६॥४॥१८॥ दशमेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । यदि मन्यसे सुवेदेति दहमेवाऽपि ननं त्वं वेथ ब्रह्मणो रूपं यदस्य त्वं यदस्य देवेषु । अथ नु मीमांस्यमेव ते मन्येऽविदितम् ॥ १॥ १ विदु । २-५ । ३ ऽवै अधिक है । ४-शिंष्-। ५-शू- ६ मन्यो । ७ मतेम् । ८ नश् । उत्तानुक्त है। १०-णीति ॥ ' , ( १४५ ) नाऽहम्मन्ये सुवेदेति नो न वेदेति वेद च । यो नस्तद् वेद तद्वेद नो न वेदेति वेद च ॥२॥ यस्याऽमतं तस्य मतम्मतं यस्य न वेद सः। अविज्ञातं विजानतां विज्ञातमविजानताम् ॥३॥ प्रतिबोधविदितम्मतममृतत्वं हि विन्दते । आत्मना विन्दते वीर्य विद्यया विन्दतेऽमृतम् ॥४॥ इह चेदवेदीदथ ससमस्ति । न चेदिहाऽवेदीन्महतीविनष्टिः। भूतेषु-भूतेषु विविध्यधीराः प्रेयाऽस्माल्लोकादमृता भवन्ति।।शा४।१६ दशमेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । ब्रह्म ह देवेभ्यो विजिग्ये । तस्य ह ब्रह्मणो विजये देवा अमहीयन्त । त ऐक्षन्ताऽस्माकमेवाऽयं विजयः। अस्माकमेवाऽयं महिमेति ॥२॥ तद्वैषां विजज्ञौ । तेभ्यो ह प्रादुर्बभूव । तन्न व्यजानन्त किमिदं यक्षमिति ॥२॥ तेऽग्निमब्रुवनातवेद एतद् विजानीहि किमेतद् १ २ यक्षमिति । तथेति ॥३॥ तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदतु कोऽसीति । ३ अग्निर्वा अहमस्मीसब्रवीजातवेदा वा अहमस्मीति ॥४॥ तस्मिँ- . १ अम्-१२-वितू-॥ १-प्रत । २-म् । ३ ऽहम् ।

३ ( १४६ ) स्त्वयि किं वीर्यमिति । अपीदं सर्वं दहेयम् यदिदम्पृथिव्यामिति ॥शा तस्मै तृणं निदधावेतद्दहेति। तदुपप्रेयाय सर्वजवेन।तन्न शशाक दग्धुम्। स तत एव निववृते नैनदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति ॥६॥ अथ वायुमब्रुवन् वायवेतद विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति॥७॥ तदभ्यद्रवत् । तमभ्यवदत् कोऽसीति । वायुर्वा अहमस्मीसब्रवी- न्मातरिश्वा वा अहमस्मीति ॥८॥ तस्मिँस्त्वयि कि वीर्यमिति । अपीदं सर्वमाददीय यदिदम्पृथिव्यामिति ॥६॥ तस्मै तृणं निदधावेतदादत्स्वेति । तदुपप्रेयाय सर्वजवेन । तन्न शशाका- दातुम् ।सतत एव निववृते नैनदशकं विज्ञातुं यदेतद्यक्षमिति॥१०॥ अथेन्द्रमब्रुवन् मघवन्नेतद् विजानीहि किमेतद् यक्षमिति । तथेति। तदभ्यद्रवत् । तस्मात् तिरोऽदधे ॥११॥ स तस्मिन्नेवाऽऽकाशे स्त्रियमाजगाम बहु शोधमानामुमा हैमवतीम् । तां होवाच किमेतद् यक्षमिति ॥१२॥४॥२०॥ दशमेऽनुवाके तृतीयः खण्डः। ब्रह्मेति होवाच ब्रह्मणो वा एतद् विजये महीयध्व इति । ततो हैव विदांचकार ब्रह्मेति ॥१॥ तस्माद्वा एते देवा अतितरामि- ६ ४-म । ५ निघत । ६ म (!)।

( १४७) १ ६ बान्यान् देवान यदग्नि युरिन्द्रः । ते ह्येनन्नेदिष्टम्पस्पृशुस्स नित प्रथमो विदांचकार ब्रह्मोति ॥२॥ तस्माद् वा इन्द्रोऽतितरामिवा- अन्यान् देवान् । स होननेदिष्ठम्पस्पर्श स होनत् प्रथमो विदांचकार ब्रह्मोति ॥३॥ तस्यैष आदेशो यदेतद् विद्युतो व्यातदा३ इति । न्यामिषदा३ । इसधिदेवतम् ॥४॥ अथाऽध्यात्मम् । यदेनद् गच्छतीव च मनोऽनेन चैनदुपस्मरसभीक्ष्णं संकल्पः ॥५॥ तद्ध तद्वनं नाम । तद्वनमित्युपासितव्यम् । स य एतदेवं वेदाभिहैनं सर्वाणि भूतानि संवाञ्छन्ति ॥६॥ उपनिषदम्भी बहीति । उक्ता त उपनिषत् । ब्राह्मीं वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥७॥ तस्यै तपो दमः कर्मेति प्रतिष्ठा वेदास्सर्वाङ्गाणि ससमायतनम् ॥८॥ यो वा एतामेवं वेदाऽपहस पाप्मानमनन्ते स्वर्ग लोकेऽज्येये ९ प्रतितिष्ठति ॥८॥४॥२१॥ दशमेऽनुवाके चतुर्थःखगडः । दशमोऽनुवाफस्समाप्तः॥ .. १ नेदिष्मा,नेदिषुम् । २ते । ३ अन् । ४ विद्यु। ५ इती। मीए । --- ७ सुक् ।८ सम्वक्षन्ति । ६ श्रो। १०-ए ॥ - (१४८ ) प्राशा वा इदमग्र आसीद्भविष्यदेव । बदभवत् । ता आपो- ऽभवन् ॥२॥ तास्तपोऽतप्यन्त । तास्तपस्तेपाना हुस्सिसेव प्राची: प्राश्वसन् । स वाव प्राणोऽभवत् ॥२॥ ताः प्राण्याऽपानन् । स इ वा अपानोऽभवत् ॥३॥ ता अपान्य व्यानम् । स वाव व्यानो- ऽभवत् ॥४॥ता व्यान्य समानन् । स वाव समानोऽभवत् ॥५॥ ६ ९ तास्समान्योदानन् । स वा उदानोऽभवत् ॥६॥ तदिदमेकमेव सधमाधमासीदविविक्तम् ॥७॥ स नामरूपमकुरुत । तेनैनद्वय- विनक । वि ह पाप्मनो विच्यते य एवं वेद ॥८॥ तदसौ वा आदिवः प्राणोऽग्निरपान आपो व्यानो दिशस्समानश्चन्द्रमा उदानः ॥६॥ तद्वा एतदेकमभवलाण एव । स य एवमेतदेकम्भ- बढेदै हैतदेकधा भवतीखेकषैव श्रेष्ठस्वानाम्भवति ॥१०॥ तदग्निर्वै प्राणो वागिति पृथिवी वायुर्वै प्राणो वागित्यन्तरिक्षमा- दित्यो वै प्राणो वागिति द्यौर्दिशो वै पालो वागिति श्रोत्रं चन्द्रमा वै प्राणो वागिति मनः पुमान्दै प्राणो वागिति स्त्री॥११॥ तस्येदं सृष्टं शिथिलम्भुवनमासीदपर्याप्तम् ॥१२॥ स मनोरूपमकुरुत । । १'आशा वा' का पुनः पाठ है । २ येद् । ३ अपान । ४५-५-मादम् । -रैपम् । ७-विनोत् । ८-इम् । ६ उपा-१० खे-॥

। ( १४६ ) तेन तत्पर्यामोत् । दृढं ह वा अस्येदं सृष्टमशिथिलम्भुवनम्पर्या- सम्भवति य एवं वेद ॥१३॥४॥२२॥ . एकादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १ ३ ६ सैषा चतुर्धा विहिता श्रीरुद्गीथस्सामाक्य ज्येष्ठब्राह्मणम् ॥१॥ प्राणो वावोद्वाग्गी स उद्गीथः ॥२॥ प्राणो वावामो वाक् सा तत्साम ॥३॥ प्राणो वाव को वाक् तदय॑म् ॥४॥ प्राणो वाव ज्येष्ठो वाग्ब्राह्मणं वाग्ब्राह्मणं तज्ज्येष्ठब्राह्मणम् ॥५॥ उपनिषदम्भो ब्रूहीति । उक्ता त उपनिषद्यस्य ते धातव उक्ताः। त्रिधातु विषु वाव त उपनिषदमब्रूमेति ॥६॥ एतच्कुक्लं कृष्णं तानं सामवर्ण इति ह स्माह यदैव शुक्लकृष्णे ताम्रो वर्णोऽभ्यवैति स वै ते दृङ्ते दशम मानुषमिति त्रिधातु । स ऐक्षत क न म उत्तानाय शयानायेमा देवता बलि हरेयुरिति ॥७॥४॥२३॥ एकादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः ॥ स पुरुषमेव प्रपदनायाऽणीत ॥१॥ तम्पुरस्तात्पयञ्चम्मा- -- ९ - ११ १ साश् । २ विहीता । ३ अगीः, गीः । ४।५-अः। -पद् । ७-दा।८।त । १० दश्श्श् के पूर्व एक. अक्षर पढ़ा नहीं जाता, कदाचित् कटा है । ११ उक्तानाय ॥

( १५० ) ૨ विशत् । तस्मा उरुरभवत् । तदुरस उरस्त्वम् ॥२॥ तस्मा अत्रसद एता देवता बलिं हरन्ति ॥३॥. वाचमनुहरन्तीमग्निरस्मै बलिं हरति ॥४॥ मनोऽनुहरच्चन्द्रमा अस्मै बलिं हरति ॥५॥ चतुरनु- हरदादियोऽस्म बलिं हरति ॥६॥ श्रोत्रमनुहरादिशोऽस्मै बलि हरन्ति ॥७॥ प्राणमनुहरन्तं वायुरस्मै बलिं हरति ॥८॥ तस्यैते निष्खाताः पन्था बलिवाहना इमे प्राणाः । एवं हैतं निष्खाताः पन्था बलिवाहनास्सर्वतोऽपियन्ति प्राणा य एवं वेद ॥६॥ सा हैषा ब्रह्मासन्दीमारूढा । आ हास्मै ब्रह्मासन्दी हरन्यधि ह ब्रह्मासन्दी रोहति य एवं वेद ॥१०॥ तदेतद् ब्रह्मयशश् श्रिया परिदृढम् । ब्रह्म हतु सन् यशसा श्रिया परिढो भवति य एवं वेद ॥११॥ तस्यैष प्रादेशो योऽयं दक्षिणेऽक्षनन्तः । तस्य यच्छुक्लं तदृचां रूपं यकृष्णं सत्साम्नां यदेव ताम्रामिव बभ्रुरिव तयजुषाम् ॥१२॥ य एवायं चक्षुषि पुरुष एष इन्द्र एष प्रजा- पतिस्समः पृथिव्या सम आकाशेन समो दिवा समस्सर्वेण भूतेन । एष परो दिवो दीप्यते । एष एवेदं सर्वमित्युपासि- तव्यम् ॥१३॥४॥२४॥ एकादशेऽनुवाके इतीयः खण्डः । १अदिश्रा।३बलिंबाह । ४ऽपय्।५हर ति।६-श/७मा।-ऊर॥

( १५१ ) सच्चाऽसच्चाऽसच्च सच्च वाक् च मनश्च [ मनश्च] वाक् च १ चतुश्च श्रोत्रं च श्रोत्रं च चतुश्च श्रद्धा च तपश्च तपश्च श्रद्धा च तानि षोडश॥१॥ षोडशकलम्ब्रह्म । स य एवमेतत् षोडशकलम्ब्रह्म वेद तमेवैतत् षोडशकलम्ब्रह्माऽप्येति ॥२॥ वेदो ब्रह्म तस्य सयमायतनं शमः प्रतिष्ठा दमश्च ॥३॥ तद्यथा श्वः प्रैष्यन् पापात्कर्मणो जुगुप्सेतैवमेवाऽहरहः पापात्कर्मणो. जुगुप्सेताss कालात् ॥४॥ अथैषां दशपदी विराट् ॥॥ दश. पुरुष स्वर्ग- नरकाणि । तान्येनं वगै गतानि स्वर्ग गमयन्ति नरकं गतानि नरकं गमयन्ति ॥६।४।२।। एकादशेऽनुवाके चतुर्थः खण्डः । मनो नरको वाङ् नरक: माणो नरकश्च चतुर्नरकरश्रोत्रं नरकस्त्वङ्नरको हस्तौ नरको गुदं नरकशिश्नं नरकः पादौ नरक ॥१॥मनसा परीक्ष्याणि वेदेति वेद ॥२॥ वाचा रसान्वेदेतिवेद ॥३॥ प्राणेन गन्धान्वेदेति वेद ॥४॥ चतुषा रूपाणि वेदेति वेद ॥॥ श्रोत्रेण शब्दान्वेदेति वेद ॥६॥ त्वचा संस्पर्शान्वें- देति वेद ॥७॥ हस्ताभ्यां कर्माणि वेदेति वेद ॥८॥ उदरेणा- . १--अश्॥ १-क्षा ॥

( १५२ ) ऽशनयां वेदेति वेद ॥६॥ शिश्नेन रामान्वेदेति वेद ॥१०॥ पादाभ्यामध्वनो वेदेति वेद ॥११॥ प्लक्षस्य प्रास्रवणस्य पादेशमात्रादुदक् तत्पृथिव्यै मध्यम् । अथ यत्रैते सप्तर्षयस्तद्दिवो मध्यम् ॥१२॥ अथ यत्रत ऊषास्तत्पृथिव्यै हृदयम् । अथ यदे- तत्कृष्णं चन्द्रमास तदिवो हृदयम् ॥१३॥ स य एवमेते द्यावा- पृथिव्योमध्ये च हृदये च वेद नाऽकामोऽस्माल्लोकात्मेति ॥१४॥ नमोऽतिसामायैऽतुरेताय धृतराष्ट्राय पार्थश्रवसाय ये च प्राणं रक्षन्ति ते मा रक्षन्तु । स्वस्ति । कर्मेति गाहपसराम इसाह- वनीयोदम इसन्वाहार्यपचनः ॥१।४।२६॥ एकादशेऽनुवाके पश्चमः खण्डः । एकादशोऽनुवाकस्लमाप्तः ॥ कस्सविता । का सावित्री । अग्निरेव सविता । पृथिवी सावित्री ॥५॥ स यत्राऽग्निस्तत्पृथिवी यत्र वा पृथिवी तदग्निः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥२॥ कस्सविता । का सावित्री । वरुण एव सविता । आपस्सावित्री ॥३॥ स यत्र वरुणस्तदापो । . १ यत्र वाऽऽपस्तदुरुणः । ते द्वेयोनी । [ तदेकम्मिथुनम् ] ॥४॥ --- ५ एतुर् । २-वद् । ३-कोमो । ४-सामय-सामाय । ६ पार्जुश्-से ठीक किया हुआ है । ७-मम् ।।

२ ( १५३ ) कस्सविता । का सावित्री । वायुरेव सविता । आकाशस्सावित्री ॥।॥ स यत्र बायुस्तदाकाशो यत्र बाऽऽकाशस्तद्वायुः । दे पोनी । तदेकम्मिथुनम् ॥६। कस्सविता। का सावित्री यज्ञ एव सविता । कन्दांसि सावित्री ॥७॥ स यत्र यज्ञस्तच्छन्दांसि यन्त्र या छन्दांसि तद्यज्ञः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥८॥ कस्सविवा। का सावित्री स्तनयित्नुरेव सविता । विद्युत् सावित्री ॥८॥ स यत्र स्तनयित्नुस्तद्विद्युद्यत्र वा विद्युत् तत्स्तनयित्नुः। ते दे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१०॥ कस्सविता । का सावित्री । आदिस एव सविता गैस्सावित्री॥११॥ स यत्राऽदियस्तयौर्यत्र या चौस्तदादियः। ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१२॥ कस्सविता का सावित्री। चन्द्र एव सविता । नक्षत्राणि सावित्री ॥१३॥ स यत्र चन्द्रस्त वक्षत्राण यत्र वा नक्षत्राणि सयन्द्रः । दे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१४॥ कस्सविता । का सावित्री। मन एष सविता । वाक् सावित्री ॥१५॥ स य मनस्तद्वाम्यत्र [वा] वाक् तन्मनः । ते द्वे योनी । तदेकम्मिथुनम् ॥१६॥ कस्स- बिता का सावित्री । पुरुष. एक सविता । स्त्री, सावित्री। स पत्र पुरुषस्तव स्त्री यत्र वा स्त्री तत्पुरुषः। ते वे योनी। वंदेकस्मि- धुनम् ॥१७॥४॥२७॥ द्वादशेऽनुवाके प्रथमः खण्डः । १५-२संक्षेप किया गया है। ३-उन् । ४-ई: (!) । भा -- १ ( १५४ ) तस्या एष प्रथमः पादो भूस्तत्सवितुर्वरेण्यमिति । अग्नि वरेण्यम् । आपो वै वरेण्यम् । चन्द्रमा वै वरेण्यम् ॥१॥ तस्या एष द्वितीयः पादो भर्गमयो भुवो भर्गो देवस्य धीमहीति । अनि भर्गः।आदियो वै भर्गः । चन्द्रमा वै भर्गः॥२॥ तस्या एष तृतीयः पादस्स्वर्धियो यो नः प्रचोदयादिति । यज्ञो वै प्रचोदयनि । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयतः॥३॥ भूर्भुवस्तत्सवितुर्वरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहीति । अग्निर्वे भर्गः । आदियो वै भर्गः । चन्द्रमा वै भर्गः ॥४॥ स्वधियो यो नः प्रचोदयादिति । यज्ञा वै प्रचोदयति । स्त्री पुरुषश्च मजनयतः ॥५॥ भूर्भुवस्स्वस्तत् सवितुर्वरेण्यम्भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयादित।यो वा एतां सावित्री- मेवं वेदाप पुनर्मृत्युं तरति सावित्र्या एव सलोकतां जयति साविच्या एव सलोकतां जयति ॥६॥२६॥ द्वादशेऽनुवाके द्वितीयः खण्डः । द्वादशोऽनुवाकस्समाप्तः। इत्युपनिषद्बाहाणं समाप्तम् ॥ १-सं। २ 'यज्ञो वै प्रचोदयति । स्त्री च वै पुरुषश्च प्रजनयतः' प्राधिक करो॥

१-ऋषि-नामों की सूची। वं. से वंश का अभिप्राय है। अगस्त्य, ४१५२॥१६॥२॥०। अतिसाम पतुरेत, ४।२६।१५॥ अनुवक्ता सात्यकीर्त, श अभयद प्रासमात्य, ४८७॥ अमिप्रतारी, ३११२१॥२।२,३,१३॥ अभिप्रतारी काक्षप्सेनि १५॥१॥३१॥२१॥ प्रयास्य, २८७,८॥११॥८॥ प्रयास्य पाङ्गिरस, २७२,६॥८॥ अषाढ उत्तर पाराशयं १४११॥ वं. श्राङ्गिरल, २।२।६॥ देखो प्रयास्य । श्राजकेश्धी, १॥३॥ प्राज द्विश, देखो बम्ब श्रा०। पाटणार, देखो पार आ। प्रात्नेय, देखो दक्ष कात्यायनि प्रा०, शङ्ग शाट्यायनि प्रा। प्रारुणि, ११४२२१॥ प्रारुणेय, शश॥ प्रार्वाकायण, देखो गळूनस प्रा । भालुकेय, देखो हृत्स्वाशय प्रा०। पासमात्य, देखो अभयद प्रा० । इन्द्रोत देवाप शौनक, ३।४।१॥ ५०। इष श्यावाश्वि, ४११६१॥ वं उपेश्श्रवस कौपयेय, २२९/१,२,३॥ ܫ , ( २ ) उत्तर, देखो प्राषाढ उ० पाराशर्य। बमा हेमवती, ४॥२॥१२॥ अनुक्य (१) जानश्रुतेय, श६॥३॥ उशमः काव्य,२७१२,६॥ ऋष्यशृङ्गकाश्यप, ३१४०॥धं। रतुरेत (?), देखो अतिसाम ए.। ऐशवाक, देखो भगेरथ ऐ.। ऐचवाक वार्ण, शशा ऐतरेय, देखो महिवास। ऐन्द्रोति, देखो इति ऐ० शौनक कंस वारकी, ३१४|१॥ ध। कंस वारक्य, ३१४११॥ वं।४।११॥५॥ कक्षीवन्त, २॥५॥११॥ कश्यप, ४॥३२॥ काबलेनि, देखो अभिप्रतारी का 1 कागड्विय, ३११०।२॥ देखो जनश्रुत का। नगरी जामश्रुतेय का। सायफ जानश्रुतेय का०॥ कात्यायनि, देखो दक्ष का० प्रात्रेय । कापेय, ३२,१२॥ देखो शौनक का । कापीरादि, राक्षा॥ काव्य, देखो उशनः का। काश्यप, ३१४०१२॥ ५० देखो मृण्यशृङ्ग का देवतरः श्यावसायन का० । श्रुष चाहेय का। कुबेर वारक्य, ३।४।१॥२०। कुरु, (एकथ०) १५६।१(बहुव०)१॥३८॥ देखो कौरव । कुरुपश्चालाः, जापा७॥३०॥६॥४२॥७॥२॥ कादत्त लौहित्य, ३१४२११॥ २०॥ देखो निवेद का खौहिस्य। .

. . -- । कृष्णधृति सात्यकि, ३।४२।१॥ वं०। कृष्णारात लौहित्य, ३।४।१॥ ३० । देखो शिवद छ सौहित्यः । केशी व., ३२८६,२॥ कौपयेय, देखो उचश्भवः । कातुजातेय, देखो राम का वैयाघ्रपथ । क्षमि, देखो सुदक्षिा १० गाखूनस पाकिायण, ११३८॥४॥ गन्धर्वाप्सरसः, १४११॥४५॥१०,११॥३५॥१॥ गुप्त, देखो वपश्चित दादजयन्ति गुरु खोहित्य । गोबल वार्ष्ण, ११६॥ गोश्रु (जाबाल), ३७७॥ गौतम (मारुणि) ११४२॥१॥ गौषुक्ति, ४१६॥ २०॥ चकितानेय, ११३७७॥राश२॥ (बहुव०) १४॥१॥ देखो ब्रह्मदत्त चै० । वासिष्ठ च। चैनारथि, देखो सत्याधिवाक च०। जनश्रुत कापड्विय, ३।४०।२॥ वं० । अनश्रुत वारक्य, ३१४११॥ १७१॥०। जमदग्नि, ३॥३१॥४॥३१॥ अयक लौहित्य, ३२४२।१॥ ०। नयन्त, देखो यशस्वी ज. लौहित्य। जयन्त पाराशर्य, ३४११॥ ०। जयन्त वारक्य, उ॥ ०। (इस नाम के दो व्यक्ति) धा९७१ ast जानश्रुत, देखो नगरी जा० काण्ड्विय । नामश्नुतेय, देखो उलुक्य जा० । सायक जा काराब्दिय जायाल, ३६॥ (द्विव०) ३७१२,३,५,७,८॥ देखो गोश्च शुक्र । , . , H 1 ( ४ ) जेबलि, ११३८१४॥ ज्यालायम, ४१६११॥६०। सदस्यु, शश१॥ त्रिवेद कृष्णरात लौहित्य, ३।४।१०। दक्ष कात्यायनि प्रालेय. २४१।१ ।। दक्षजयन्त लौहित्य, ३।४।३।। दाढजयन्ति, देखो वैपश्चित दा० गुप्त लौहित्य, वैपश्चित दा. ढजपन्त लौहित्य। दार्य, देखो केशी दा०। दालभ्य (ब्रह्मदच चैकितानेय), २३८१॥५६॥३॥ पाल्भ्य, देखो बन दा। जयन्त, देखो विपश्चित दा० लोहित्य, बैपमित दार्दजयम्न र लौहित्य। इति ऐन्द्रोति शौनक, श४२॥ ०। देवतरसू श्यावसायन काश्यप, ३२४०।२॥ थे। देबाप, देखो इन्द्रोत दै० शौनक । धृतराष्ट्र, ४२६१५॥ नगरी जानश्रुतेय कापविय, ३॥४०॥६॥ नाक, ३११३३५॥ पता प्राजापत्य, ३।३०॥३॥ परमेष्ठी प्राजापत्य, ३४०॥ पलिगुन लौहित्य, ३१४२१॥ वं० पाराशर्य, देखो अषाढ उत्तर पा० । जयन्त पावैपश्चित शकुनि- मित्र पा० सुदत्त पा। पाथुश्रवस , ४।२६॥१५॥ पा शेखन, छाया - . . ( ५ ) पुलुष प्राचीनयोग्य, ३४२॥ पृथु वैन्य, ११ १०१६॥३४ाश१॥ पौलुषि, देखो सत्ययश पौ० प्राचीनयोग्य । पौलुषित, देखो सत्ययक्ष पौ० । प्रतीदर्श, ४८७॥ प्राचीनयोग्य, १३६११॥ देखो पुलुष प्रा०। सत्ययक्ष पौलुषि प्रा०। सोमशुष्म सात्ययशि प्रा० । प्राचीनशाख (बहुव०), ३।१०।१६ प्राचीनशालि, ३७४२,३,५,७॥१०॥१॥ प्राजापत्य, देखो परमेष्ठी प्रा। प्रातूद भान, ३३शक्षा प्रास्रवण, देखो प्लक्ष प्रा०। प्रोष्ठपाद बारक्य, ३१४११॥ ६० । पक्ष प्रास्रवण, ४२६१२॥ बक दाल्भ्य, शा॥४७॥२॥ बम्ब आजद्विष, २७२,६॥ बाम्रव्य, देखो शङ्ख बा। ब्रह्मदत्त चैकितानेय, ११३८।१॥५६॥१॥ भगेरथ पेक्ष्याक, ४।६।१,२॥ भाल, देखो प्रातृद भा। भालबिन (बड्डुव०), २।४।७।। मनु, ३११५॥२॥ महिदास ऐतरेय, ४२२१२॥ मातरिश्वन, ४॥२०॥ मानव, देखो शांत मा। मित्रभूति लौहित्य, ३।४।१॥ ।। .. ।' " मुख सामश्रवस, ३१॥२॥ यशस्वी जयन्त लौहित्य, ३२४२।१॥ वं०। राम कातुजातेय वैयाघ्रपद्य, ३।४।२॥ यं ।।१६।२॥ वंग रोहिण, श२६७,१०॥ मौहित्य, देखो कृष्णव त जो०, कृष्णरात लौ०, जयक बो०, त्रिवेद कृष्णरात लौ०, दक्ष जयन्त लौर, पल्लिगुप्त जौ, मित्रभूति औ०, यशस्वी जयन्त लौर, विपश्चित दृढजयन्त खो०, पश्चित दाढजयन्ति गुप्त मौ०, वैपश्चित. दादजयन्ति हढजयन्त लौ०, श्यामजयन्त लौ०, श्यामसुजयन्त बौर, सत्यश्रवसू लो। वसिष्ठ, २०१३॥१॥२॥१८६,जा तुख वासिष्ठ । धारकि, देखो कंस वा०। बारक्य, देखो कंस वा०, कुबेर घा०, जनश्रुत घा०, जयन्त था, प्रोष्ठपाद वा०। चाणं, देखो ऐदवाक वा०, गोबन का। पासिष्ठ चैकितानेय, १४२॥१॥ चालेय, देखो श्रुष घा० काश्यप । विपश्चित सढजयन्त लौहित्य, ३।४।१॥ वं। विपश्चित् शकुनिमित्र पाराशर्य, ३२४१।१॥ ० । विश्वामित्र, ३।३॥७॥१५॥१॥ (बहुव०) ३॥१५॥१॥ तुल० वैश्वामित्र । धैकुण्ठ (इन्द्र), ४२१॥१०॥१०॥ बैन्य, १।४।२॥ देखो पृथु बै० । वपश्चित दाढजयन्ति गुप्त लौहित्य, ३॥४२॥१॥२० । पश्चित दाढजयन्ति दृढजन्त लौहित्य, ३४२॥१॥६०। बैमृध (इन्द्र), ४।१०।१०॥ बयानपथ, देखो राम मातुजातेव वैः।

( ६ ) . . शकुनिमित्र, देखो विपश्चित् श० पाशर्य। शङ्ख बाभ्रव्य, ३३४११॥ ५।४।१७३॥। शङ्ग शाट्यायनि आत्रेय, ३१४०११॥ शर्व, ४११०१०॥ शर्यात मानव, १७१।।३,५।। शाट्यायनि, शा२॥३०॥१॥२॥२८॥७॥३॥१०॥३॥१३॥६॥२८ाशा ४।१६।१॥६० । १७११॥ व०। देखो शङ्गशा प्राय। शाण्डिल्य, देखो सुयश शा० । शालावत्य, ११३८॥४॥ शुक्र (जाबाल), ३७७॥ शैलन (बहुव०),१२॥३॥२॥४६॥ देखो पार्ण श सुचित्त ३०। शौनक, ११५६२॥ देखो इन्द्रोत द्वैवाप शौ०, हत्ति पन्द्रोति शौ। शौनक कापेय, ३१॥२१॥ श्यामजयन्त लौहित्य (इस नाम के दो व्यक्ति), ३.४२११॥ श्यामसुजयन्त लौहित्य, ३१४२॥१॥५०। श्यावसायन, देखी देवतरसू श्या० काश्यप । श्यावाश्वि, देखो इश इया० [.. ध्रुष याह्नेय काश्यप, ३४०६॥4 वाजनि (एक वैश्य), ३।५।२॥ सत्ययक्ष पौलुषित, १॥३१॥ सत्ययज्ञ पौलुषिः प्राचीनयोग्य, ३१४०१॥ ५० ॥ सत्यश्रवस् लौहित्य, २४२१॥०॥ सत्याधिवाक चवरथि, २३॥१॥ सात्यकि, देखो कृष्णधृति सा०। सात्यकीर्त (बहुव०), ३।३।१॥ देखो अनुवक्ता सा० । सात्ययशि (बहुव०), शाशा देखो सोमशुष्म सा०प्राचीन योग्य ।

( ८ ) सामश्रवस, देखो मुञ्ज सा । सायक जानश्रुतेय कापड्विय, ३.४०॥२॥ वं० । सुचित्त शैलन, १११४॥४॥ सुदक्षिण, ३७.८।८। (देखो सुदक्षिण मि ) सुदक्षिण तैमि, ३६॥३॥७॥१,४,५,६॥ (देखो सुदक्षिण)। सुदत्त पाराशर्य, ३१४११६॥ ०४।१११॥व०। सुयज्ञ शाण्डिल्य, ४।१७१॥ सोमवृहस्पति (द्विव०), श५८॥ सोमशुष्म सात्ययशि प्राचीनयोग्य, ३१४०१२॥ वं० । हृत्स्वाशय भालकेय, ३।४।२॥ वं० हैमवती, देखो उमा है। २-निर्वचनादि सूची अक्षर, २२४३१॥४३॥२४॥२॥ देवश्रुत् , १११४॥३॥ ४३॥८॥ पतङ्ग, ३।३।२॥ अन्तरिक्ष, २०४॥ पश्यत,११५६६॥ अयास्य, शा७॥१८॥ प्रतिहार, ११११॥ अर्य, ४॥२३॥४॥ प्रसाम, प्रसामि, ११५॥ . असु, १४०॥७॥ असुर, ३१३५॥३॥ आङ्गिरस, २॥११॥९॥ आदि, २११७॥१२॥ मादित्य, रा प्रावत, ३२३३॥७॥ उरस, ४॥२४॥२॥ अच् , १२१॥६॥ गायत्र, ३।३८॥ बृहस्पति, शरा॥ भीमल, ११५७॥ मधुपुत्र, १३५॥१॥ महीया, १४८॥ रुद्र, ४ाशा रोदसी, १३२॥४॥ वसुः रा३॥ वैश्वामित्र, ३/३६॥ J

( ६ )
शतसनि, १।१०॥४॥
सजात, ॥४८॥३॥
समुद्र, ११२५॥४॥
सामन्, ११३३७॥ ४०॥४८/७॥५२॥४॥१३॥२॥ १॥१२॥५॥१॥५३॥५॥
પહારાજારાણા
सिन्धु, १२२२॥
सुवर्ग, ३२४॥
हरि, २४४॥॥
३-(क) चादिसूची।
अदितिौरदितिः, १२४१४॥ ऋ०१८॥१०॥
अपश्यं गोपामनिपद्यमानाम, ३॥३७॥१॥ ०२१६४॥३१॥
प्रात्मा देवानामुत मानाम, ३।२।४॥ तु छां० उ० ४॥३॥७॥
श्रायुर्माता मतिः पिता, ४।११७॥
इन्द्रमुक्थमृचम्, १।४।१॥
इमामेषाम्पृथिवीम, १॥३४॥७॥ अथ०१०॥८॥३६॥
उतैषां ज्येष्ठः, ३।१०।१२॥ अथ० १०२८॥
उपाऽस्मै गायत, ३२३८६,८॥ ऋ० १११११॥
भूषय एते मन्त्रकृतः,१।४।२।।
चत्वारि वाक् परिमिता, ११७३॥४०॥१॥ ऋ० ११६४४५॥
तत्सवितुर्वरेण्यम्, ४।२८।१॥ ऋ० ३।१२।१०॥
ध्यायुषं कश्यपस्य, ४॥३॥१॥ तुल०, ००२८७॥
नवो नवो भवसि, ३।२७.११॥ तुल०, ऋ० १०१८४।१६॥
पतङ्गमक्कम, ३३५॥१॥ ०१०।१७७।१॥
पतङ्गो वाचम्मनसा, ३६३६॥२॥ ऋ० १०॥१७७॥२॥
मयीदं मन्ये भुवनादि, ३।१७।६॥
महात्मनश्चतुरो देवः, ३।२।२॥ तुलछां० उ०४॥३६॥

स . En . .. । (१०) यद्याचा इन्द्र से शतम्, ११३२।१।। ऋ८।०५॥ यस्सप्तरश्मिवृषभः, १२७॥ ऋ० २।१२।१२।। येऽग्नयः पुरीष्याः, ४/३३३॥ या १८६७॥ येभिर्वात इषितः, १३४॥ अथ० १०८॥३५॥ रूप-रूपम्प्रतिरूपः, १४४१॥ ० ६।४७॥१८॥. रूप-रूपम्मघवा, २४४६॥ ऋ० ३५३८॥ स नो मयोभूः, ४॥३२॥ स यदा वै म्रियते, शाखा स्त्री स्मैवाऽने, १॥५६॥५॥ स्थूणां दिवस्तम्भनीम्, श१०८॥ (ख अभिजिदस्यभिजय्यासम्, ३।२०।१०॥ प्रमोऽहमस्मि, (दीर्घपाठ), ११५४६॥ (संक्षिप्त), ५७।४।। भरण्यस्य वत्सोऽसि,४॥ उपावर्तध्वम्, ३॥१६॥१॥३४॥२॥ गुहासि देवोऽसि, ३॥२०॥१॥ दिशस्था श्रोत्रम्, २२॥ देवेन संवित्रा, ३१८३,६॥ पुरुषः प्रजापतिः, १२४६३,४॥ प्राणा३ प्राणा३ प्राणा३, २०१७ महान्मह्या समधत, ३४॥५॥ व्यत्पुरस्ताद्वासीन्द्रः, ३२२१११॥ विभूः पुरस्तात्सम्पत, ३३२७॥१॥ म्युषि सविता भवसि, ४॥॥१॥ श्वेताश्वो दर्शतो, अशा सत्यस्य पन्था, ३२२७११०॥ लोमः पवते, २११॥३४॥२॥ farpan

1
"
1

D.G.A. 80.
CENTRAL ARCHAEOLOGICAL LIBRARY
NEW DELHI
Borrowers record
87
| No.- Sa2Vu/Jai/Ram
Rama Deva R
DE 2.4.4
mark
Why
ਹਰੇ

Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana

Author
Ramdeva
Title
Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana
File name
Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana
Text
OCR done
Citation
1921
Published
3/31/2010
Publisher
Dayanand Collage
Language
Sanskrit
Pages
199
Library
Central Archaeological Library, Asi
Classification
Brahmanism
DLI number
424526
Barcode
99999990074181.00
Scanning centre
IGNCA, Delhi
VMLT id
WJIMjuYyQXK
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Jaiminiya Or Talavakara Upanishad Brahmana