Shri Jawahar Vidyapith Binasar, Bikaner
Ganga Shahar Ki Ganga
Front matter
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गंगाशहर की गंगा
तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी
सम्पादक
राजेन्द्र भंसाली
संकलन
राजेन्द्र कुमार सेठिया
प्रकाशक
रतनलाल इन्द्रचन्द सावनसुखा
गंगाशहर, बीकानेर
गंगाशहर की गंगा
तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी
प्रकाशन वर्ष
आश्विन शुक्ला 12
विक्रम संवत 2044
सन् 1987
,
मूल्य
सदुपयोग
प्राप्ति स्थान
विजय स्टोर
के.ई.एम रोड, बीकानेर
रत्न दीप
नई लाईन, गंगाशहर
मुद्रक
सांखला प्रिन्टर्स, बीकानेर
आवरण
पृथ्वी
Gangashahr Ki Ganga-Tapasvi Muni Shri Ganga Rami
Edited By Rajendra Bhansali
तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी
जीवन झॉकी
जन्म
स्थान
वि. सं. 1946
-रुणिया (बीकानेर)
पिता का नाम -श्री खुमानचन्दजी सावनसुखा
माता का नाम --श्रीमती मीरा देवी सावनसुखा
विवाह -वि स 1961, फाल्गुन शुक्ला सप्तमी
पत्नी का नाम -श्रीमती नानू देवी सावनसुखा
श्रावक पडिमा -वि स 2002 से 2007 तक
दीक्षा -वि स 2007, पोप शुक्ला सप्तमी (हिसार, हरियाणा)
-आचार्य श्री तुलसी
तपस्याए -एकान्तर तप लगातार 32 वर्ष तथा तप की 1 से 35 तक
की एक श्रेणी तथा दूसरी श्रेणी 1 से 21 तक
-वि. स. 2042 आश्विन शुक्ला 12, गगाशहर, बीकानेर
सर्वायु -97 वर्ष (तेरापथ धर्म-सघ के साधु समाज मे सर्वाधिक
दीर्घायु)
दीक्षा गुरु
अनशन
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प्रकाशकीय । मुनि श्री गगारामजी हमारे ससारपक्षीय दादाजी थे। आप 6 2 वर्ष की आयु मे अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री तुलसी के चरणो मे दीक्षा स्वीकार कर सयम मार्ग पर बढे । आपने श्रावकावस्था मे भी सादगीपूर्ण जीवन व्यतीत किया। आपको अपने माता-पिता का प्रेम, वात्सल्य नहीं मिल सका क्योकि उनका स्वर्गवास आपकी अल्प आयु मे ही हो गया था। इकलौता लडका होने के कारण पूरे परिवार का सचालन आपके कन्धो पर था । आप छोटी उम्र मे ही दूर प्रदेशो मे व्यापार के लिए गये । नैतिक एव सम्मानित जीवन जीया। गृहस्थ जीवन मे आत्म-जागरूकता के साथ आपने वि. स. 2007 मे श्रावको की ग्यारह प्रतिमा की साधना कर तेरापथ धर्म-संघ के प्रथम श्रावक बने । गृहस्थ के सभी सुखो की प्राप्ति के बाद वि स 2007 मे ही साधु जीवन स्वीकार कर साहस और त्याग के परिचायक बने । आपने तपस्या का क्रम जारी रखा और 35 वर्ष के साधु जीवन मे लगभग 32 वर्ष तक एकान्तर तप किये । दीक्षा के बाद आपका विचरण मेवाड की तरफ हुआ। आचार्य श्री तुलसी ने पूर्ण कृपा कर वि. स 2018 के भीनासर मर्यादा महोत्सव तथा गगाशहर धवल समारोह के पश्चात् आपको मुनि श्री चम्पालालजी 'मीठिया' के साथ वीकानेर चोखले मे ही रखा। मुनि श्री गगारामजी तपस्वी थे, स्वभाव बहुत ही शात एव सरल था। आपकी स्मरण शक्ति बहुत तेज थी। आपको पुस्तकीय ज्ञान का अभाव था लेकिन अन्तरज्योति बहुत ही जागृत थी । जब आपने दीक्षा ली उस समय यह नही सोचा गया होगा कि आप इतनी लम्बी आयु प्राप्त करेगे । लम्बी आयु प्राप्त करना आपकी तपस्या का ही परिणाम रहा । तपस्या प्रसग पर आचार्य प्रवर फरमाया करते कि मुनि श्री गगारामजी की इतनी लम्बी आयु तपस्या का परिणाम है। आपकी शिक्षा एव प्रेरणा से आपके बडे पुत्र पूनमचन्दजी (मुनि श्री पूर्णानन्दजी) 60 वर्ष की आयु मे दीक्षित हुए । आपके छोटे पुत्र मुनि श्री राजकरणजी आपसे पहले ही दीक्षित हो चुके थे । आपने हमारे पूरे परिवार ।
- को समर्पित एवं संस्कारित बनाने का प्रयास बराबर रखा । आचार्य-प्रवर की कृपा से हमें उनकी सेवा का पूरा अवसर मिला । जव हम सेवा करते तो मुनि श्री फरमाते परिवार मे प्रेम से रहना, धन को महत्त्व नहीं देना, धन आज है कल नहीं । भाई-भाई प्रेम से रहना, इससे समाज मे प्रतिष्ठा वढेगी, परिवार का वातावरण शान्त एव सौम्य रहेगा। आपकी हृदयस्पर्शी शिक्षाओं से संबल मिलता । आप फरमाते 'भाई मै तो थाने थारे ठीक वास्ते कहूं, यदि थाने दोरो लगायो हुवे तो बारम्बार खमत खामणा करू ।' यह आपकी ऋजुता थी । आप जैसे दादाजी को पाकर हम आनन्द की अनुभूति करते है। आपके प्रति हम कृतज्ञ है। हम परिवार वाले आचार्य श्री तुलसी के पूर्ण आभारी है जिन्होने मुनि श्री को 24 वर्षो तक बीकानेर क्षेत्र मे रखकर हमें सेवा का मौका दिया तथा अन्त समय में मुनि श्री राजकरणजी, मुनि श्री पूर्णानन्दजी को सेवा करने का अवसर प्रदान किया। श्रद्धेय आचार्य-प्रवर की ही असीम कृपा है कि मुनि श्री गंगारामजी के जीवन चरित्र को संकलित कर पुस्तक का रूप दिया गया है। इस पुस्तक के संकलन कार्य में श्री गणपतजी चोपड़ा एवं श्री राजेन्द्र कुमार सेठिया तथा सम्पादन मे श्री राजेन्द्र भसाली ने अपना अमूल्य समय दिया। उन्होने अपनी सूझ-बूझ से व्यवस्थित करके पुस्तक को प्रकाशित करने में सहयोग किया। हम उनके हृदय से आभारी है । साँखला प्रिन्टर्स ने अल्प समय मे ही प्रस्तुत पुस्तक को मुद्रित किया, हम कृतज्ञता प्रकट करते है । रतनलाल, इन्द्रचन्द, विजयकुमार धर्मचन्द, राजेन्द्र कुमार सावनसुखा ।
निवेदन अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री तुलसी के दर्शनार्थ मै मेवाड की धरा आमेट मे उपस्थित था। गगाशहर से रवाना होने से पूर्व चातुर्मासिक प्रवास कर रहे मुनि श्री राजकरणजी, मुनि श्री गगारामजी के दर्शन किये थे, मुनि श्री गगारामजी के स्वास्थ्य के सम्बन्ध मे जानकारी भी ली। हालाकि मुनि श्री का स्वास्थ्य कुछ समय से ठीक नही था लेकिन यह सोचा भी तो नही जा सकता था कि जब मै आमेट से वापिस आऊगा तब तक मुनि श्री गगारामजी इस सासारिक जीवन का त्याग कर चुके होगे । मैने आमेट मे गुरुदेव के दर्शन किये, मालूम पड़ा कि मुनि श्री गगारामजी जैन धर्म के सर्वोत्कर्ष तप 'सथारे' की अर्ज कर रहे है । मै सुनकर अवाक् रह गया। क्योकि 30 घटे पूर्व ही तो उनके दर्शन किये थे । खैर ! उनकी श्रद्धा अगाध थी और सथारा लिया भी। जव मै गगाशहर वापिस पहुचा तब मुनि श्री गगारामजी की अन्तिम रस्म अदा किये जाने की तैयारिया चल रही थी, मै प्रबल इच्छा होते हुए भी उनके दर्शन नही कर सका तथा आमेट से श्रद्धेय आचार्य-प्रवर का सथारे के लिए जो सन्देश लाया था वह भी समय से पूर्व मुनि श्री से अर्ज नहीं कर सका । क्योकि मुनि श्री गगारामजी तो इस दुनिया से कूच कर चुके थे। तेरापथ धर्म-सघ मे घोर तपस्वी साधु-साध्विया एव श्रावक-श्राविकाए हुई है इसी कडी मे मुनि श्री गगारामजी का जीवन भी साधु एव श्रावकावस्था दोनो मे ही तपस्यामय बन गया। भगवान महावीर ने श्रमणोपासको के लिए उत्कृष्ट विधि के रूप मे ग्यारह पडिमाए बताई है । मुनि श्री ने श्रावकावस्था मे इन ग्यारह पडिमाओ को स्वीकार कर पडिमाधारी बने । जैन धर्म के इतिहास मे भगवान महावीर के समय आनन्दादि श्रावको द्वारा इस तरह की साधना करने का उल्लेख मिलता है। इन शताब्दियो मे यह अवसर सम्भवत मुनि श्री गगारामजी को ही मिला। मुनि श्री ने अपने श्रावक जीवन मे अनेक त्याग एवं तप किये । अष्टमाचार्य श्रीमद् कालूगणी, अणुव्रत अनुशास्ता आचार्य श्री तुलसी की सेवा में आप महीनों व्यतीत करते । आपने व्यापार में कभी अनैतिकता को प्रश्रय नहीं दिया। सादा, संयमी एवं प्रामाणिक जीवन ने आपको पूरा सम्मान दिलाया। अणुव्रत अनुशास्ता ने 62 वर्ष की वृद्ध अवस्था में आपको दीक्षा दी, यह भी इतिहास बना । मुनि श्री ने संयम मार्ग अपनाने के बाद कठोर तपस्याएं की। जिसमे मास खमन से ऊपर की तपस्याएं शामिल हैं। मुनि श्री पिछले 32 वर्षों से लगातार एकासन तप कर रहे थे। आपने 35 वर्षों के साधु जीवन को पूर्णतः त्यागमय बना दिया था। और अन्ततः जैन धर्म के सर्वोत्कर्प तप संथारा स्वीकार कर मानव जीवन को अधिक सार्थक बना दिया। लेकिन सभी के दिलो-दिमाग पर उनके शतक न बनने की आकांक्षा रह ही गई, वे शतक से तीन मंजिल ही दूर रहे। गंगाशहर का यह गौरव ही है कि यहाँ शासन समर्पित, विशिष्ट प्रभावी एवं सेवा परायण, श्रावक-श्राविकाएं एव साधु-साध्वियां हुई है। मुनि श्री गंगारामजी भी इसी श्रेणी मे आते है । मुनि श्री प्रारम्भ से ही सघनिष्ठ एव समर्पित रहे है । उन्होने अपने परिवार को भी इसी शृखला मे जोड़ दिया। वर्तमान मे उनके परिवार से अनेक साधु-साध्वियां धर्म-संघ मे साधनारत है । उनके पुत्र मुनि श्री राजकरणजी, मुनि श्री पूर्णानन्दजी का धर्म-सघ मे विशिष्ट स्थान है। गगाशहर के तेरापंथ एव जैन समाज मे सावनसुखा परिवार भी विशेष सेवाएं दे रहा है । मुनि श्री गंगारामजी की सवल प्रेरणा से ही यह सम्भव हो सका है। मुनि श्री गंगारामजी के संसार पक्षीय पौत्र श्री रतनलालजी, श्री इन्द्रचन्दजी ने उनके जीवन चरित्र को संकलित कर पुस्तक का रूप देने का निश्चय किया, यह निस्सदेह प्रशसनीय कहा जा सकता है। हालाकि किसी महान् आत्मा के जीवन चरित्र को कुछ ही शब्दो मे नही वांधा जा सकता, फिर भी कोई व्यक्ति इससे प्रेरणा ग्रहण कर सके, तो यह प्रयास सार्थक होगा । मुझे विश्वास है, सुधि पाठक मुनि श्री गंगारामजी के जीवन चरित्र से अवश्य लाभान्वित होगे। राजेन्द्र भंसाली आशीर्वचन -- । मैंने अपने जीवन में बालक-बालिकाओ को ही नही वृद्धो को भी दीक्षित किया है। उनमें एक थे मुनि गगारामजी। 62 वर्ष की उम्र में मैने गंगारामजी को दीक्षित किया। वे गृहस्थ जीवन मे भी श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओ की साधना कर चुके थे। उनकी सयम-यात्रा के 35 वर्ष पूरे हो गये । सेवा हमारे संघ की एक अतुलनीय विशेषता है। इस वर्ष मुनि गंगारामजी की सेवा मे मुनि राजकरणजी, मुनि पूर्णानन्दजी आदि थे। संसारपक्ष में उनका सबध पिता-पुत्र का था। वे दोनो भी पितृ-ऋण से मुक्त हो गए है। अंत मे एक पद्य के साथ दिवगत आत्मा के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ- गगा गंगा मे किया, अनशन गगा स्नान । पितृ-ऋण से उऋण हुए, राज-पूर्ण पुण्यवान ।। - आचार्य तुलसी
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आशीर्वचन - मुनि श्री गगारामजी एक सौभाग्यशाली साधु थे। उन्होने 62 वर्ष की अवस्था मे दीक्षा ली , तपस्वी का जीवन शुरू किया, जीवन-भर तपस्या करते रहे। दो पुत्र दीक्षित वने-मुनि राजकरणजी व मुनि पूर्णानन्दजी। दोनो ही शासन की सेवा में सलग्न है । पूरा परिवार भी शासन के प्रति समर्पित है । मुनि गगारामजी ने दीर्घ आयु प्राप्त की। 97 वे वर्ष की अवस्था मे भी वे सचेत और जागरूक थे। अतिम समय तक उनकी जागरूकता बनी रही। समाधिपूर्वक अनशन को स्वीकार कर इस पौद्गलिक शरीर का परित्याग किया। एक सुखद योग था कि दोनो पुत्र मुनि उनकी सेवा मे विद्यमान थे। ऐसा समाधिपूर्ण जीवन जीया और समाधिपूर्ण मृत्यु का वरण किया, यह प्रसन्नता की बात है। युवाचार्य महाप्रज्ञ PARS आशीर्वचन A - Er man ini ak मुनि श्री गंगारामजी वय प्राप्त होकर मुनि बने । उस समय यह कल्पना भी नहीं थी कि वे इतने लम्बे समय तक संयम पर्याय का पालन कर पाएंगे। यह उनका सौभाग्य था कि वे लगभग पैतीस वर्ष तक परमाराध्य आचार्य- प्रवर के नेतृत्व मे सफल साधना कर सके। इस अवधि मे एक चातुर्मास में आचार्यवर की उपासना का सौभाग्य भी मिल गया। आखिरी समय मे उनके संसारपक्षीय दोनों पुत्र मुनि राजकरणजी और मुनि पूर्णानन्दजी उनके पास थे। यह पूज्य गुरुदेव की दूरगामी दृष्टि का उदाहरण है। मुनि श्री अपने जीवन मे तपस्या और जप का भी विशेष प्रयोग करते रहे। उनके जीवन प्रसंग पाठको के लिए प्रेरणास्त्रोत बने यह अपेक्षा है। - साध्वी प्रमुखा कनकप्रभा मेरे जीवन के 82 वर्षों के सस्मरण एवं अनुभव मुझे याद है। बचपन से ही साधु-साध्वियो की सेवा मेरी रुचि रही है । अनेक आगम, ग्रंथ तथा आख्यान सुनता और पढता रहा हूँ। चौथे आरे (काल) मे हुए अनेक उत्कृष्ट श्रावको तथा मुनियो की जीवन गाथाएं सुनी, पर इस पंचम आरे के इतिहास मे एक ही व्यक्ति ने श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओ की आदर्श साधना करके तपस्वी साधु-जीवन की यात्रा 97 वर्ष की आयु मे सथारे के साथ सफल की हो ऐसा उदाहरण नही मिलता । मुनि श्री गंगारामजी इसके अनुपम उदाहरण है। इनकी तपस्या का वर्णन सुनकर रोमाच हो जाता है। तपस्या एवं विनय प्रायः एक साथ नही चलते पर मुनिश्री गगारामजी इन दोनो गुणो के प्रतीक रहे है । लगता है इनके पुरुपार्थ मे सयम की प्रेरणा थी जो प्रत्यक्ष प्रकट हुई। इनके दो पुत्र, 3 भानजे और भानजो के पुत्र व पुत्रिया श्रमण जीवन व्यतीत कर रहे है, उन्हे सयमी जीवन अपनाने मे आपका अमूल्य सहयोग रहा है। - धन्य है तेरापंथ धर्म-सघ जिसमे ऐसे उत्कृष्ट मनीषी, तपस्वी श्रमण हुए है-जिन्होने अपने परिवार, समाज और धर्म-संघ को उज्ज्वल बनाया है। ऐसे महान् सन्त के चरणो मे अपनी भावभीनी श्रद्धाजलि अर्पित करने मे अपना सौभाग्य मानता हूँ। -मोहनलाल कठौतिया अध्यात्म साधना केन्द्र महरौली, दिल्ली आप अत्यन्त ही सौभाग्यशाली है जिन्हे परमाराध्य युग प्रधान आचार्य श्री तुलसी की असीम अनुकम्पा से मुनि श्री के गंगाशहर स्थिरवास मे उनकी सेवा करने का अपूर्व अवसर मिला । मुनि श्री ने अपने साधुत्व-काल में 35 चातुर्मास किये। मुनि श्री का श्रावक जीवन जैसा गौरवपूर्ण था वैसा ही साधु-जीवन भी अत्यन्त गरिमामय रहा । उन्होने अपनी श्रावक अवस्था में सामायिक, सेवा, पौपध, तप-जप आदि में अग्रगण्य स्थान बनाया वही श्रावकावस्था के अन्तिम चरण में श्रमणोपासक की ग्यारह प्रतिमाओं की उत्कृष्ट साधना भी की। उस उर्ध्व साधना को देखकर ही परमाराध्य आचार्य-प्रवर ने उनकी उच्च भावना की पूर्ति करते हुए 62 वर्ष की वृद्धावस्था मे जैन मुनि दीक्षा प्रदान की। मुनि श्री ने 97 वर्ष की वृद्धावस्था मे चौविहार अनशन मे 'पण्डित मरण' प्राप्त कर अपना आत्म-कल्याण किया। हम मंगल कामना करते है कि प्रस्तुत पुस्तक से पाठकवृन्द मुनि श्री के साधनामय जीवन से प्रेरणा प्राप्त कर सयम के अनुमरण से अपने जीवन का कल्याण करे। आप ऐसे दीर्घ तपस्वी मुनि का जीवन परिचय प्रकाशित करने जा रहे है । इसके लिए जैन विश्व भारती परिवार की ओर से हार्दिक शुभ- -सेमचन्द सेठिया अध्यक्ष, जैन विश्व भारती तपस्वी मुनि श्री गगारामजी ने निश्चय ही दृढ मनोबल का परिचय दिया है । जीवन भर तपस्या के माध्यम से उन्होने साधना की और अतिम समय स्वेच्छापूर्वक मृत्यु का वरण करने के लिए सथारा स्वीकार कर वीरता का परिचय दिया। मुनि श्री ने जहा अपने आत्म-कल्याण के लिए यह नश्वर शरीर त्यागने का दृढ सकल्प लेकर अमृत पद प्राप्त किया, वहा गगाशहर, सावन- सुखा परिवार एवं धर्म-सघ को भी गौरव प्रदान किया है। -धर्मचन्द चोपडा सयुक्त सयोजक, नियोजन मडल - । । मुनि श्री गगारामजी तपस्वी, यशस्वी संत थे। उनके श्रावक एवं संयमी दोनो जीवन गौरवशाली रहे । श्रावकावस्था मे उन्होने श्रावक की ग्यारह प्रतिमाएं पूर्ण कर तेरापथ ही नही समूचे जैन शासन की गरिमा बढाई । श्रद्धेय आचार्य श्री तुतसी ने 62 वर्ष की अवस्था मे दीक्षा देकर उनके जीवन को नया मोड दिया। वे लगातार तपस्यारत रहे । अन्त समय में सर्वोत्तम तप संथारा स्वीकार कर उन्होने दृढ़ मनोबल का परिचय दिया। मुनि श्री सरल स्वभावी थे, मुझे जब भी उनके दर्शन, सेवा का लाभ मिलता उनसे बहुत ही मृदुता एवं वात्सल्य का व्यवहार मिला। उनके संयमी पुत्र मुनि श्री राजकरणजी एव मुनि श्री पूर्णानन्दजी भी सघीय प्रभावना बढ़ा रहे है । धर्म शासन की सेवा में सावनसुसा परिवार को भी कम नही आका जा सकता। मुनि श्री की प्रेरणा ने इस परिवार को मस्कारी एवं समर्पित बना दिया। इस अवसर पर मुनि श्री गगारामजी के भावी आध्यात्मिक विकास की मंगलकामना। -कन्हैयालाल छाजेड़ अध्यक्ष, श्री जन श्वे ते. महासभा स्वर्गीय मुनि श्री गगारामजी तेरापथ इतिहास की उज्ज्वल कडी के रूप मे सदैव स्मरणीय बन गये है । गृहस्थ जीवन के 62 वर्ष पूरे कर आप दीक्षा की ओर अभिमुख हुये और तत्पश्चात पैतीस वर्ष की सयम साधना पूरी कर अपनी जन्मभूमि गगाशहर मे पूर्ण समाधि मरण को प्राप्त हुये। मुनि श्री गगारामजी को निकटता से देखने एव समझने का अवसर मुझे तब मिला जब मै 14 वर्ष का किशोर था। वि स 2014 का चातुर्मास मुनि श्री राजकरणजी (आपके ससारपक्षीय पुत्र) का मोमासर मे था । मै सोचता हू मेरे वाल जीवन मे धार्मिक एव सघीय सस्कारो की जो पुट मिली उसका श्रेय उस चातुर्मास को ही है और निमित्त बने-आदरास्पद मुनि श्री राजकरणजी, गगारामजी आदि । सच्चाई यह है कि बालवय मे दीक्षित होकर सयम साधना के साचे मे ढलने से कठिन है ससार के समग्र क्रिया- कलापो को सचालित कर उनको ठुकरा देना, भरे पूरे परिवार का मोह त्याग देना। सचमुच मुनि श्री गगारामजी ने ऐसा करके एक अनुकरणीय उदाहरण प्रस्तुत किया था। श्रावक प्रतिमा की उत्कृष्ट साधना कर आपने जहा अपने आपको तौला, सयम साधना मे आने वाली कठिनाईयो का पूर्वाभास किया, वहा यह साबित किया कि आज भी श्रावक प्रतिमा (पडिमा) का अनुष्ठान सम्पन्न किया जा सकता है जिसकी चर्चा ढाई हजार वर्ष पूर्व भगवान महावीर के समय के इतिहास में की गई है।
। स्वर्गीय मुनि श्री गंगारामजी सरलमना, घोर तपस्वी संत थे। जैसा कि हम सब जानते है, वे तेरापथ धर्म-संघ के साधु-समाज मे सर्वाधिक उम्र पाने वाले संत हो गये हैं । अपने सुदीर्घ जीवन मे आपका अधिकाश समय गंगाशहर एवं पाश्ववर्ती क्षेत्र उदासर मे वीता । श्रद्धेय आचार्य श्री ने अत्यन्त कृपाकर आपको अन्तिम समय मे गंगाशहर स्थिरवास प्रवास पर विराजने का मौका दिया जिससे आपके पारिवारिकजनों को निकट उपासना का अवसर मिला। आज मुनि श्री गगारामजी हमारे बीच नही हैं लेकिन उनका जीवन क्रम, उनका व्यावहारिक चिन्तन एव उनकी शिक्षाए हमारे बीच स्मृतियो के रूप में सुरक्षित है। मुनि श्री की पावन स्मृति मे उनके जीवन क्रम को प्रकाशित कर जन योग्य बनाने का जो प्रयत्न किया जा रहा है उसके लिए सावनसुखा परिवार के सदस्य साधुवाद के पात्र है । आशा है यह प्रकाशन जन-जन में वैराग्य के वीज अकुरित करेगा एवं आध्यात्मिक विकास का मार्ग प्रशस्त करेगा। ----पदमचन्द पटावरी 'पद्म' अध्यक्ष, अखिल भारतीय तेरापंथ युवक परिपद् तेरापंथ धर्म-संघ मे एक से एक बढकर महान् तपस्वी साधु-साध्विया तथा श्रावक-श्राविकाएं हुए है । यह इतिहास की ही बात नही, वल्कि वर्तमान में भी इसके अनेक उदाहरण मौजूद हैं । मुनि श्री गगारामजी का जीवन साधना, तपस्या और सयम की त्रिवेणी था। आपका गृहस्थ जीवन श्रावक का आदर्श उदाहरण था और बाद में साधु जीवन उत्कृष्ट त्याग-तपस्याओ से परिपूर्ण रहा । 97 वर्ष की कुल आयु में आधी से अधिक जिन्दगी गृहस्थ अवस्था मे व्यतीत की और वि. स. 2007 में आचार्य श्री तुलसी से अर्हत जैन दीक्षा स्वीकार कर साधु बने । लगभग 35 वर्षों का साधु जीवन सयम और तप की आराधना मे व्यतीत कर पडित मरण प्राप्त किया। मुनि श्री गगारामजी के दो पुत्र, तीन भाणेज एवं परिवार के अन्य लोगो ने दीक्षाएं ली, जो आज भी अपनी संयम साधना मे सलग्न है । ऐसे विरक्त त्यागी और सत पुरुष की सन्ताने भी सयमी हो तो कोई आश्चर्य नही । मुनि श्री गगारामजी अपनी साधना मे सलग्न रहने वाले तपस्वी संत थे। उनके सुपुत्र मुनि श्री राजकरणजी एव मुनि श्री पूर्णानन्दजी तेरापंथ धर्म-संघ के जाने माने सन्त है। वस्तुत यह कहा जा सकता है कि मुनि श्री गगारामजी का जीवन गगा की तरह पावन था। उनके जीवन से हम सबको प्रेरणा लेनी चाहिए। -चन्दनमल 'चाँद' महामत्री, भारत जैन महामण्डल
अनुक्रम
जीवन वृत्त
उत्कृष्ट उपासक व सत मुनि श्री गंगारामजी, पारिवारिक परिचय,
सहधर्मिणी श्रीमती नानूदेवी, पुत्री श्रीमती अन्नीदेवी, पुत्र
श्री पूनमचन्दजी, पुत्रवधू श्रीमती विजय श्री, द्वितीय पुत्र
श्री राजकरणजी।
व्यावसायिक क्षेत्र
19
धामिक क्षेत्र
24
धूम्रपान का त्याग, कडे त्याग, पुत्र को दीक्षा, पडिमाओ का स्वीकरण,
हांसी मे गुरुदर्शन और साधु प्रतिक्रमण की आज्ञा, 62 वर्ष की आयु मे
दीक्षित, विहार चर्या, स्थिरवास, सर्वोत्कर्प तप की ओर, महाप्रयाण,
सवसे अधिक आयु, शोभा यात्रा, श्रावकगण आमेट मे, विशिष्ट त्याग,
तपस्या के अभूतपूर्व आंकड़े, एक गीतिका, भावनाएं।
स्मृतियां एवं अनुभूतियां
काव्याञ्जलि
49
81
107
परिशिष्ट
श्रावक साधना
महामंत्र साधना
जप साधना
गीतिकाएं
उत्कृष्ट उपासक व संत मुनि श्री गंगारामजी परिवर्तिनि ससारे, मृत. कोवा न जायते, स जातो येन जातेन, जातः वश सम्मुतिम् । यह ससार अनादि और अनन्त है । इसमे अनन्त प्राणी प्रतिक्षण जन्म लेते है और अनन्त ही मृत्यु को प्राप्त होते है । किन्तु जन्म और मरण उन्ही का सार्थक माना गया है जिन्होने अपने जीवन मे अपना आत्म-कल्याण किया तथा दूसरो के कल्याण मे प्रेरक वने । ऐसे ही एक महापुरुप हो गये है मुनि श्री गगारामजी, जिन्होने परिवार से प्रतिष्ठा पाई, सामाजिक क्षेत्र मे समाज से सम्मान पाया, व्यापारिक क्षेत्र मे प्रामाणिकता से पैसा पाया और धार्मिक क्षेत्र मे आत्म-कल्याण के साथ आचार्यो महामहिम आचार्य श्री कालूगणी एव आचार्य श्री तुलसी की कृपा, मुनि वर्ग की मगल कामना एव श्रावक समाज की श्रद्धा पाई। काफी समय तक उच्चकोटि का श्रावकपन पाला और वृद्धावस्था मे साधुपन लेकर भी लम्बे समय तक सयम के साथ तप-जप से आत्म-शुद्धि के पथ पर बढते रहे । सत्ताणवे वर्ष मे अनशन-पूर्वक शरीर छोडकर स्वर्गवासी हुए । इस प्रकार आपका जीवन श्रावको व साधुओ के लिए शिक्षाप्रद रहा है ।
पारिवारिक-परिचय तत्कालीन बीकानेर राज्यान्तर्गत गुसांईसर में श्री दोलतरामजी सावणसुखा रहते थे, जिनका ससुराल रुणिया बड़ावास फलोदिया परिवार मे था । आपके तीन पुत्र-श्री कालूरामजी, श्री खुमाणचदजी, श्री भोमराजजी व एक पुत्री सुश्री नौला कुमारी थी। आपका देहान्त छोटी वय मे ही हो गया और आपकी धर्मपत्नी अपने परिवार को लेकर अपने पीहर रुणिया बड़ावास आ गई। आप बड़ी कुशल गृहिणी थी। उम्र भी काफी पाई और परिवार का पालन भी विशेष कुशलता से किया । आपके छोटे पुत्र श्री भोमराजजी गोद चले गये, जिनके दो पुत्रों को श्री रुघलालजी और जयचन्दलालजी का परिवार अब रतनगढ़ निवासी है । पुत्री नीला का विवाह उदासर के उमचंदजी बैद के साथ हुआ। उनका परिवार आज उदासर निवासी है । श्री कालूरामजी के दो पुत्र श्री भैरुदानजी व मेघराजजी व तीन पुत्रियां हुए, जिनमे भैरुदानजी विवाहित होकर छोटी वय में ही दिवंगत हो गये । श्रीमान् खुमाणचदजी का विवाह राणीसर निवासी श्री कानीरामजी बोथरा की पुत्री श्रीमती मीरा देवी के साथ हुआ, जिनके दो पुत्र श्री गंगारामजी और श्री सुगनचदजी तथा दो पुत्रियां छोगां तथा धापूहुए । कुछ समय पश्चात् आपके मामा श्री हीरालालजी एव मनसुखलालजी गंगाशहर आकर बस गये । कालूरामजी के पुत्र श्री भैरुदानजी का विवाह के कुछ समय पश्चात् तथा खुमाणचंदजी के छोटे पुत्र श्री सुगनचदजी का अविवाहित अवस्था मे ही देहात हो गया। अब दोनों भाइयो के दो ही पुत्र श्री गंगाराम जी और मेघराज जी रह गये । आपका भ्रातृत्व सम्बन्ध इतना प्रगाढ़ रहा कि आज तक भी लोगो को यही लग रहा है कि यह दोनों सगे भाई ही थे। श्री खुमाणचन्दजी की बड़ी पुत्री छोगा का विवाह मालासर के श्री छोगमलजी डागा के साथ हुआ, जिनके पुन श्री आईदानजी व दो पुनिया श्रीमती हीरादेवी व श्रीमती रामीदेवी नोपडा, टन तीनो का परिवार आज उदासर के श्रावक वर्ग की प्रथम श्रेणी मे है। श्री सुमाण चन्दजी की दूसरी पुत्री श्रीमती धापू देवी का विवाह गैरसर में श्री चुन्नीलालजी दाजेठ के साथ हुआ । कुछ समय पश्चात् गंगाशहर भाकर बम गये, जिनके एक पुत्री । MAH 1. पतं मान राजस्थान 2. जिसा बीकानेर 3. 19वर्षीटागने श्रीमती पानी देवी तथा पाच पुत्र हुए। पाच मे से तीन भाई दीक्षित होकर आज तेरापथ धर्म सघ की प्रभावना कर रहे है। मुनि श्री मगनमलजी व 1 वर्प पश्चात् मुनि श्री धर्मचन्दजी अविवाहित अवस्था मे ही दीक्षित हुए । मुनि श्री फतेहचन्दजी विवाहित होकर एक पुत्र होने के पश्चात् सपत्नीक दीक्षित हुए। आपकी सहधर्मिणी साध्वी श्री लिछमांजी है । सबसे बड़े पुत्र श्री शेरमलजी छाजेड श्रावक व्रत की आराधना कर रहे है । इनके एक पुत्र मुनि श्री मुनि व्रतजी तथा दो पुत्रिया साध्वी श्री चन्द्रावतीजी व शाता कुमारी जी श्रमण संघ मे साधनारत् है । दूसरे पुत्र श्री सूरजमलजी श्रावक व्रतो की आराधना कर रहे है । श्री कालूरामजी की तीन पुत्रियो मे से दो के परिवार नही है । तीसरी पुत्री श्रीमती धन्नीदेवी जिनका विवाह श्री प्रतापमलजी भसाली के साथ हुआ, जिनका बहुत बड़ा परिवार आज श्री डूगरगढ निवासी है । श्री गगारामजी व श्री मेघराजजी अपने पूर्वजो की विपनावस्था से आगे बढ़कर व्यापारी वर्ग मे पहुचे और बगाल जाकर व्यापार कार्य मे सलग्न हुए आपकी माताजी का देहान्त जब आप सात साल के थे तभी हो गया था। आपकी दादीजी ने बडी आयु पाई 84 वर्प । वि. स. 1962 मे उनका देहान्त हुमा । आपके पिताजी का देहान्त वि. स. 1965 पोप बदी 5 को हो गया। श्री गगारामजी का विवाह श्री डूगरगढ के श्री नथमलजी चोरडिया की सुपुत्री श्रीमती नानूदेवी के साथ वि स. 1961 फाल्गुन सुदी 7 को हुआ। जिनसे आपके रूणियां निवास स्थिति मे एक पुत्री श्रीमती अन्नीदेवी वि सं 1973 कार्तिक कृष्णा 4 व एक पुत्र श्री पूनमचन्दजी वि. स. 1976 आश्विन कृष्णा 14 को हुए । श्री मेघराजजी का विवाह श्री खूमचन्दजी बोथरा की सुपुत्री सोहनी देवी के साथ हुआ जिनसे रूणिया मे ही एक पुत्र श्री तोलारामजी हुए, तब मन हुआ कि अब हमे यह छोटा-सा गाव छोडकर गगाशहर बसना चाहिए । बीकानेर नरेश श्री गगासिंहजी इसे अपने नाम से बसा रहे है और इस शर्त के आधार पर कि चार दीवारी और मकान बनाओ तो प्रत्येक पुरुप को चाहे वह छोटा हो या बडा एक-एक पट्टा सवा-सवा रुपये मे दिया जायेगा। उस समय श्री गगारामजी व उनके पुत्र श्री पूनमचन्दजी 1. वि स 1999 मे 2. वि. स 2006 3. प्रतापमल गोविन्दराम, कलकत्ता फर्म के मालिक 4 मुनि श्री पूर्णानन्दजी - तपस्वी मुनि श्री गगाराम जी 3 तथा श्री मेघराज जी व उनके पुत्र श्री तोलारामजी चार पुरुप ही थे, चार पट्टे लिए और उक्त शर्त पूर्ण की। कुछ समय के पश्चात् रहने योग्य मकान भी बना लिया। गंगाशहर आने की सोच ही रहे थे कि इधर श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्म सघ के अष्टमाचार्य महामहिम पूज्य गुरुदेव कालगणी ने अपना पावस' गंगाशहर घोषित कर दिया। फिर तो दोनो भाईयो के पूरी चटपटी लगी। वे चातुर्मास से पूर्व ज्येष्ठ महीने मे ही रूणियां बडावास के खेतो-मकानों को छोड़कर अपना पूरा परिवार लेकर स्थाई रूप से गंगाशहर आकर बरा गये। गंगागहर आने के लगभग 9 महीने पश्चात् श्री गंगारामजी के एक पुत्र और हुआ जिनका नाम राजकरण रखा गया । मेघराजजी के एक पुत्री हुई जिसका नाम दिया गया तोली। प्रथम पत्नी के देहान्त हो जाने से श्री मेघराजजी का दूसरा विवाह छीले के राजमलजी वुच्चा की पुत्री श्रीमती मोहनी देवी के साथ हुआ, जिनसे दो पुत्र श्री देवचन्द और श्री शुभकरण तथा दो पुत्रियां श्रीमती लक्ष्मी देवी व कमला देवी हुए । इस प्रकार आपके भाई- बहिनो का परिवार आपके लिए तथा आप परिवार के लिए प्रतिदिन पूरे सहयोगी रहे । सब के साथ मधुर व्यवहार रहा। सहधर्मिणी श्रीमती नानूदेवी पुरुप की प्रगति की प्रेरणा-स्रोत पत्नी भी होती है । पत्नी घर आकर घर को स्वर्ग बना सकती है । श्री गगारामजी की पत्नी वह सचमुन ही सहर्मिणी थी और आपके हर कार्य मे पूर्ण सहयोगिणी थी। वि सं 1950 मे आपका जन्म किस्तूरिया गांव में हुआ । कालान्तर मे अपने पिताजी के साथ श्री डगरगढ मे बस गई और वि. मं 1961 मे विवाह कर सावणसुमा परिवार मे आ गई। आपके आने से सावनगुना परिवार में आर्थिक, धार्मिक सभी प्रकार से प्रगति हुई । आपका जीवन स्वावलम्बन, नयम और मादगीमय था । आलस एवं अहकार आपके निकट काभी आया ही नहीं । कई बार कम आय हुई तो भी आपने उधार नहीं लिया, थोडे में ही अपनी कुशलता से काम चला लिया। एक बार रूणिया निवाग स्थिति में 18 महीने में आपको गिफ 40 रुपये मिले, उससे ही व्यवस्थित काम चलाया, कुछ भी नामी महगुम नहीं होने दी। उन दिनो मोठ, बाजरा, ग्वार, घाम आदि गेत में मिल जाते तथा घी, दूध आदि के लिए मैसे-गाये पते ही थे। उन दिनो रपये की कीमत भी आज से बहुत अधिक थी। अपर मे हजारो रुपये मासिक भी आप द्वाग व्यय किये गये। इन सम स्थितियों में समता आपका गहज स्वभाव था। गृह- मंचालन मे घरो गदस्यो को उपालम्भ अवश्य दिया किन्तु पक्ष में प्रणमा 1. दि म. 1983 2. मुनि श्री गपगानी 4 गगानहामी गमा . श्रीमती नानूदेवी जिन्हे अमर सुहाग मिला ही की। कभी किसी की भी कटवी नही की। सगे-सम्बन्धियो के घरो से जो भी मिठाई के रूप मे आया, सामने वाले को कभी यह नही कहा कि कम है। अगर कम हुआ तो बच्चो मे बांट दिया और अधिक हुआ तो सबने मिलकर खा लिया। आपने 77 वर्ष की आयु पाई। 36 वर्ष से अबह्मचर्य, रात्रिभोजन, समस्त सचित और समस्त हरी सब्जी के त्याग थे। प्रतिवर्ष दो महीने एकान्तर उपवास करती तथा एक महीने नमक व एक महीने घी का त्याग रखती। जीवन भर के लिए सिर्फ 51 द्रव्य रखे हुए थे उनमे प्रतिदिन के लिए 13 से अधिक नही थे । प्रतिदिन 11 से 15 तक सामायिक करना और कम पानी से शरीर, वस्त्र और घर को साफ-सुथरा रखना आप जानती थी और अपने परिवार को भी यही शिक्षा देती थी। आपके लिए हुए त्यागो को आपने दृढता से निभाया और रुग्णावस्था मे भी हरी सब्जी, रात्रि मे दवा- पानी व इजेक्शन नहीं लिया। आपने अपने पति-पुत्र व दोहित्री को दीक्षा की आज्ञा देकर बहुत बडा लाभ कमाया । आपके छोटे पुत्र पहले ही दीक्षित हो चुके थे । आठ वर्ष बाद 1. मुनि श्री राजकरणजी 5 तपस्वी मुनि श्री गगारामजी जब आपके पति श्री गगारामजी दीक्षित होने लगे तो आपकी आंखे गीली हो गई। तब श्री गगारामजी ने कहा-क्यो उदास होती हो एक पुत्र तुम्हारे पास है और एक मेरे पास । हाँ, तुम्हे कुछ विचार हो तो जब तक मै साघु न बन जाऊं तब तक 5-10 हजार रुपये तुम्हारे नाम से जमा करा दूं । जब तक तुम जीवित रहोगी तब तक कोई दूसरा उन रुपयो का उपयोग नहीं कर सकेगा। श्रीमती नानूदेवी ने कहा-मुझे कुछ नही चाहिये। मेरा पुत्र व बहू पूरे विनीत है, अत समय तक मेरी पूरी सेवा करेगे । आखो में पानी आना तो सहज स्त्री स्वभाव है । आप प्रसन्नता से दीक्षा लीजिए, अपना कल्याण कीजिए । इस प्रकार आपने अपने पति को दीक्षा देकर सहज ही अमर सुहाग प्राप्त कर लिया। रूणियां गांव मे श्रीमती नानू देवी ने एक दिन कहा था-मुझे मेरी मां ने दर्शन दिये है और कुकुम, रोली, मोली, कसुम्बल ओढ़ना देते हुए कहा है- बेटी ! तुझे अमर सुहाग देती हूँ। वह बात भी सही सिद्ध हो गई। परिवार में आपकी पूरी प्रतिष्ठा थी, समाज मे पूरा सम्मान था। पडोसी लोग हर मंगल काम मे आपको प्रमुखता देते । कभी किसी के साथ तेज शब्दो मे बोलते हुए नही देखा-सुना गया। आपने तपस्या के क्षेत्र मे मास खमण तक की तपस्या की। आपकी तपस्या इस प्रकार है 7 - 1 3 5 231212328 6 2 2017 8 4 35 4 6 이와 10 13 15 16 17 18 14 2 7 - 12 1 -- - 4 2 2 1 27 28 29 30 31 - 19 1 20 1 -- 2 1 1 इसके अतिरिक्त आयर्याम्बल, नीवी, एकलठाना आदि भी अनेक किये थे। दस पचखान की तपस्या भी अनेको बार की। - 1. वि. स. 2007 पौष शुक्ला सप्तमी 2. इस बात पर भाईजी महागज मेवाभावी मुनि श्री पम्पालामी बिनोद में कई बार वहा गरते- 'मां पुन् री है मौर बार रात्रि में यो साते महाराज रावण को स्वामी यो मा वमा भारी तब आप शिष्ट को- 'मा माग पुन गे है, गयि रोगो मार है।' 6 गंगादा की गंगा आपके पीहर के परिवार में दो भाई व तीन बहिन थी। बड़े भाई श्री आईदान जी चोरडिया की पत्नी व तीन पुत्र श्री राजकरण, श्री हसराज, श्री शुभकरण तथा चार पुत्रिया और उनका परिवार। छोटे भाई की पत्नी है और परिवार नहीं है । आपकी एक बहिन श्रीमती सोनी देवी श्री डूगरगढ के ही श्री अर्जुनलालजी पुगलिया को ब्याही गई, जिनका बहुत बड़ा सम्पन्न परिवार है । धर्म-शासन की सेवा मे विशेष अग्रणी है । उनकी एक पुत्री धर्म- सघ मे दीक्षित है जिनका नाम है साध्वी श्री विनयश्री जी। सबसे छोटी बहिन स्वय तो नही रही, पर उनका परिवार है। अन्त मे आप कुछ दिनो की ही अस्वस्थता के बाद वि. स 2027 आश्विन शुक्ला 4 को अनशन-पूर्वक शरीर त्यागकर स्वर्ग सिधार गई। उस समय मुनि श्री गगारामजी भी गंगाशहर में ही थे और कुछ समय पहले ही दर्शन व धर्म प्रेरणा देकर आये थे। आपके स्वर्गवास के समाचार श्री डूगरगढ स्थित मुनि श्री राजकरण जी ने कहा- पावन जीवन सरल दिल पतली सभी कपाय । पाप-भीरु मृदु वृत्तिया, आई सबने दाय ।। सम्बल तप औ त्याग को, घणो ले गई साथ । दोनू जन्म सुधारिया, कमी नही तिल मात ।। समभावां स्यू देह तज, तज पूरो परिवार । आश्विन शुक्ला चौथ दिन, पहुची स्वर्ग मझार ।। घर के कांमा मे कुशल, कुशल धर्म रे काम । जीवन सफल कर्यो सही, माता नानू नाम ।। पुत्री श्रीमती अन्नीदेवी आपकी प्रथम सन्तान पुत्री थी अन्नी । गगाशहर आने के बाद आपने अपनी पुत्री का विवाह बिना पैसे लिए सुप्रसिद्ध भसाली परिवार मे उत्तमचंद जी के सुपुत्र श्री कोडामल जी के साथ किया। उस समय तक प्रायः कम या अधिक रूप मे पुत्री के पैसे लेने की प्रथा थी और बिना पैसे लिए विवाह करना धर्म विवाह कहलाता था। आपने अपनी पुत्री के विवाह मे पैसे नहीं लिये 1. श्रीमती नानूदेवी की भागजी 2. वि. स. 1974 मे गगारामजी ने अपनी पुत्री अन्नी की रुगनावस्था के समय यह सकल्प लिया था कि उसके विवाह के अवसर पर रुपये पैसे नहीं लूंगा, जबकि उस समय यह प्रथा चालू थी। - तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी 7 । इससे आपकी बहुत ख्याति हुई । मंमाली परिवार धन व जन दोनों से समृद्ध था । रगपुर1 मे बहुत बड़ा व्यापार था। आज भी सम्पन्न है। श्रीमती अन्नी देवी एक कुशल-गृहिणी व धर्म-परायण श्राविका है । सामायिक, सवर, व्याख्यान, श्रमण सेवा आदि में विशेष रुचि है । आपके एक पुत्र श्री शातिलाल व उसका परिवार है । चार पुत्रियो मे से दो नहीं रही किन्तु उनके परिवार है। एक पुत्री धर्म-सघ मे दीक्षित है-~- साध्वी श्री जिनरेखाजी, जो दीक्षित होने के साथ ही साध्वी श्री कमलश्रीजी के साथ साधनारत् है । एक पुत्री श्रीमती कानी देवी व उसका परिवार है जिसकी एक पुत्री सुश्री माधुरी जो अब साध्वी मधुरयशा है। श्रीमती अन्नी देवी की एक दोहित्री लगभग पांच वर्ष से पारमार्थिक शिक्षण-सस्था मे साधनारत् है- मुमुक्षु जतन कुमारी पारख । अन्नी देवी अपनी सतानो मे अच्छे संस्कार देकर धार्मिक बनाने का प्रयत्न कर रही है। पुत्र श्री पूनमचन्दजी आपके बडे पुत्र श्री पूनमचदजी विरल व्यक्तियो में से एक है । स्वभाव से शात, सरल, विनम्र तथा सतोपी है । समझदार, कर्मठ, प्रामाणिक, परि- श्रमी और सेवाभावी है । ऐसे पुत्र का मिलना बहुत बड़े भाग्यशालीता का प्रमाण है । वर्षों तक एक ही सस्थान प्रतापमल गोविन्दराम, कलकत्ता के यहां काम किया। सबका मन जीत लिया। 50 वर्ष के पश्चात् बगाल मे कमाई करने का त्याग था अत. फार्म के अधिकारियो के न चाहते हुए भी आपको विदाई देनी पडी। पहले भी प्रायः 6-7 महीने कलकत्ता में रहकर कार्य करते और अवशेष ममय आचार्य श्री तुलमी तथा माधु-सतियो की सेवा मे लगाते । 28 वर्ष की आयु से ही रात्रि मे चार आहार का त्याग था, चतुर्दगी को उपवास तथा पीपध करते, प्रतिदिन सामायिक करते । व्यापार कायं से गुक्त होने के बाद तो अधिकाश समय सेवा मे ही लगता। वर्ष में तीन-चार महीने आचार्य श्री की सेवा में बीतने लगे । आचार्य श्री जय दक्षिणाचल पधारे तब काफी समय आचार्य श्री की सेवा में लगाया । कम बोलना और अधिक कार्य करना आपका महज गुण है । श्रावकावस्था में आपने अपनी बड़ी मा श्रीमती जड़ावदेवी की अन्तिम समय में कमर जमी भयकर बीमारी में अपने बालान भाव से घाव आदि थोने का कार्य महीनो तक किया । आगिरी समय में मन- Pus- 1. दगान मामाद है। 8 गंगागहरवीगमा शन करवाया और आराधना आदि सुनाने का कार्य किया। अपने काकाजी श्री मेघराजजी को भी अन्तिम समय मे धार्मिक सहयोग प्रदान किया। वि. स 2035 का आचार्य श्री का पावस गगाशहर हुआ। एक दिन आचार्य श्री ने मुनि श्री राजकरणजी से अकेले में कहा कि- "तेरा भाई पूनमचन्द अच्छा श्रावक है पर मैं चाहता हू यह श्रावकत्व से बढकर साधुत्व की ओर आये । मैंने इसे साधुपन की प्रेरणा दी है, तू भी देना।" इतनी बडी कृपा थी आप पर आचार्य श्री की । आपके पुत्रो ने आज्ञा देने के लिए कुछ आनाकानी की तो आचार्य प्रवर घर पर पधारे, वहा विराजे और मधुरता से समझाया। मुनि श्री राजकरणजी ने कहा- ये तो घर मे एक ही भाई थे, मै तो पहले ही दीक्षित हो चुका था फिर भी अपने पिता श्री को सहर्प आजा दी। तुम तो पाच भाई हो, क्यो विचार कर रहे हो । तब सभी ने सहर्प आज्ञा दे दी । आपकी भावना पहिले भी थी और अब विशेप बलवती बनी । अपना भरा-पूरा परिवार त्याग कर इसी चातुर्मास मे दीक्षित हो गये। दीक्षा की स्वीकृति के समय श्री पूनमचन्द जी नईलेन ओसवाल पंचायती के सदस्य थे । अध्यक्ष श्री जसकरण जी बोथरा थे। उन्होने पचायती की ओर से अभिनन्दन समारोह आयोजित किया और आपको ससम्मान विदाई दी तथा आपके स्थान पर आपके बडे पुत्र श्री रतनलाल जो को पचायत का सदस्य निर्वाचित कर दिया। श्री पूनमचन्दजी ने दीक्षित होने के पहले दिन लगभग चार-पाच सौ जाति जनो को आमत्रित कर भोजनादि से सम्मानित किया । बहन -वेटियो आदि को जो कुछ देना था वह दिया। रात्रि को अपनी पत्नी, पुत्रो तथा पुत्र-वधुओ से सामूहिक तथा एक-एक से बात की, शिक्षाए दी और कहा कि किसी को कुछ कहना हो तो मुझे आज ही कह दो, कल से तुम्हारा-हमारा सम्बन्ध पारिवारिक न होकर, साधु - श्रावक का हो जायेगा। यो सुनकर सभी की आखे गीली अवश्य हुई कितु हार्दिक प्रसन्नता के साथ कहा कि आप निश्चित होकर दीक्षा लीजिये । हमे कुछ भी नही कहना है । आपकी शिक्षाओ के अनुसार हम चलते रहेगे। श्री पूनमचन्द जी की माताजी श्रीमती नानूदेवी प्राय कहा करती थी- पूनमचन्द अपने पिता की भाति धर्मात्मा होगा, गुरुदेव की और साधु-सतियो की सेवा करेगा और उसी आयु मे दीक्षा भी लेगा किंतु मेरी मृत्यु के पश्चात् । वह बात भी सत्य सिद्ध हो गई। 1. आश्विन शुक्ला 15 को तेरह भाई-बहिनो के साथ दीक्षित हुए । तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 9 आचार्य श्री ने अनेक बार साधु-साध्वियो तथा श्रावक-श्राविकायो के मध्य कहा- यह दीक्षा बड़ी दीपती दीक्षा हुई है। दीक्षित होने पर आनार्य श्री की आज्ञा से आपने अपना अधिक समय मुनि श्री गंगारामजी की सेवा में लगाया । अन्तिम तीन वर्ष कडी सेवा के थे। आपने दिन • रात पूर्णतया सजग होकर सेवा की। इस प्रकार अपने सभी माइतो की सराहनीय सेवा कर उऋण हुए। आपके श्रावक-जीवन के व्रत इस प्रकार ये:- - वि. सं. 1987 से जमीकन्द पूर्णतया, अष्टमी.चतुर्दशी को हरी सब्जी, रात्रि-भोजन तथा अब्रह्मचर्य का त्याग । सातो कुव्यसन के त्याग। (जगी- कन्द का जीवन मे कभी प्रयोग नहीं किया) वि.सं. 1996 परिग्रह व दिशाओ परिमाण व्रत लिया। - वि.सं. 1999 पाच तिथि को रानि-भोजन, हरी सब्जी, अनाचर्य का त्याग और गांव में चारित्र आत्मा विराजित हो तो दर्शन मिगे बिना भोजन पानी करने का त्याग । वि.सं. 2000 बारह-व्रतो का विधिवत म्बीकरण । वि.सं. 2005 मृतक के पीछे होने वाली सभी रुढ़ियो का त्याग, साधुओ के सम्मुरा कोई भी वस्तु को खाने का त्याग और वर्ष में 6 महीने अब्रह्मचर्य का त्याग । विनं. 2007 रात्रि में चारो आहार का त्याग, तपस्या के उपलक्ष में साने-पीने का आयोजन न करने का त्याग, भोजन को गमय किगी भी व्यक्ति पर और भोजन की वस्तुओं पर क्रोध करने का त्याग । जागागं श्री द्वारा प्रवर्तित अणुव्रतो का पूर्णतया स्त्रीकरण । वि.स. 2025 पूर्ण रूप से ब्रह्मचर्य का स्वोरण । आपकी धावकपन की तपस्या एम प्रकार: 2 3 + 5 1503 35 3 3 brandt 8 -/- - 150 146 पोपवः 8 6 taluri 야 836 10 irritam M m पुत्रवधू श्रीमती विजयश्री श्री गगारामजी को पुत्र वधू भी स्वभाव की विशेष श्रेष्ठ मिली । गगा- शहर के ही प्रसिद्ध श्रावक श्री मेवारामजी हीरावत की पुत्री, श्री पूनमचन्दजी को पति मान कर सावनसुखा परिवार मे आई। बडो का विनय, छोटो पर वात्सल्य आपका मनु- करणीय था। सम्यग् प्रकार से सास-श्वसुर आदि सभी की सेवा की, पुत्र-पुत्रियो का पालन-पोषण किया। पास-पड़ोस मे प्रतिष्ठा पाई। सबकी श्रद्धेय बनी। अपने श्वसुर के पडिमा स्वीकार करने पर आपने भी कच्चे पानी का तथा रात्रि भोजन का त्याग कर दिया। ग्यारह पडिमाओ को पूर्ण कराने मे विजय श्री का भी विशेष सहयोग रहा। श्रीमती विजय श्री सावनसुखा न मालूम क्यो इतनी महान महिला के चाय का व्यसन हो गया। उपवास तपस्याएं छूट गई, अस्वस्थ रहने लगी, भूख भी कम लगने लगी। आपकी सास कहती, पिछले जन्म मे किसी को भोजन की अन्तराय दी होगी, खाना खाते हुए थाली छीनी होगी, अत तुम्हे भोजन अच्छा नहीं लगता। आपकी सास चिन्तित रहती, वह कहती मेरी सास, दादी सास के जिम्मे बच्चो को छोडकर चली गई। कही ऐसा ही यह नही कर दे मेरे जिम्मे बच्चो को छोड़ पहले ही न चल बसे । किन्तु आपने अपनी सास को यह चिन्ता नही होने दी, उनको अन्तिम समय तक सम्यग् सेवा कर समाधि-मरण मे सहयोगिनी बनी। आपकी सास का स्वर्गवास वि सं 2027 आश्विन शुक्ला 4 को हो गया। वि. स. 2033 चातुर्मासिक चतुर्दशी के दिन आपके पारिवारिकजनो मे से अनेक ने उपवास का प्रत्याख्यान किया तब मुनि श्री राजकरणजी ने आप से भी उपवास के लिए कहा। आपने उत्तर दिया-महाराज मेरे से तो सवत्सरी के अलावा उपवास होता ही नही । चाय पीये बिना उठा ही नही जाता । मुनि श्री ने कहा-छोटे-छोटे बच्चे करते है और तुम कमजोरी दिखाती तपस्वी मुनि श्री गगाराम जी - हो । तव श्रीमती विजय श्री ने कहा-12 बजे तक त्याग करवाइये, फिर चार बजे, फिर उपवास के पश्चात् तो उस दिन से लेकर अन्तिम दिन तक निरन्तर एकान्तर तप चलता रहा । एकान्तर प्रारम्भ करने पर आपका स्वास्थ्य अच्छा हो गया। घर के कामों में भी संलग्न हो गई। चाय पीना तो नहीं छोड़ा किन्तु व्यसन छूट गया। आचार्य प्रवर तथा साधु-साध्वियों की उपासना भी अधिक करने लग गयी। वे नौ वर्षों से वर्षीतप कर रही थी। उपवास में ही वि. सं. 2041 पोप बदी 5 को रात्रि में उनका महाप्रयाण हुआ। मुनिश्री राकेश कुमारजी के सान्निध्य मे गंगाशहर के शान्तिनिकेतन में स्मृति सभा आयोजित की गई। उनके जीवन की विशेषताएं बताई गई । मुनि श्री राकेश कुमारजी व मुनि श्री पूर्णानन्दजी आदि साधुओं ने तथा समाज के प्रवुद्ध व्यक्तिो ने आपको भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की। बालोतरा में आचार्य श्री के सान्निध्य में भी स्मृति सभा का आयोजन किया गया जिसका उल्लेख विज्ञप्ति संख्या 726 दिनांक 13/1/85 में हुआ है वह इस प्रकार है मुनि श्री पूर्णानन्दजी की संसारपक्षीया धर्म-पत्नी गंगाशहर निवासिनी श्रीमती विजय देवी सावनसुखा का स्वर्गवास हो गया। उस उपलक्ष में उनका पूरा परिवार आचार्य प्रवर की उपासना मे पहुंचा । आचार्य प्रवर ने फरमाया- विजया देवी एक तपस्विनी महिला थी। आठ वर्षीतप वह पूरा कर चुकी थी। नौंवा वर्षीतप उनके चालू था। पूरे परिवार को उसने धार्मिक प्रेरणा और धार्मिक संस्कार दिये, उसका पूरा परिवार धर्म संघ के लिए समर्पित है। पारिवारिक जनो ने विजया देवी के पीछे किसी रूढ़ि को प्रोत्साहन नहीं दिया यह वास्तव मे ही अनुकरणीय बात है । दिवंगत आत्मा के प्रति शुभकामना। गगाशहर तथा बालोतरा की उनको स्मृति सभाओं में श्रीमान् गुलाबचन्दजी चोपड़ा के पुत्र श्री गणपतलाल चौपड़ा द्वारा गाई गई गीतिकाएं विशेष आकर्षक रहो। मुनि श्री राजकरणजी ने कहा-मैं उनको बचपन से जानता हूँ। उनके जीवन ने मुझे बहुत प्रभावित किया है। आपने ये दोहे भी श्रीमती विजयादेवी सावनसुना के प्रति कहे :- हीरावत पर जनमिया पाया शुभ संस्कार भाग भलो पाने मिल्यो- सायनसुबा परिवार पूनम पति पाथे गिम्यो निम जीवन ने प्रष्ट तिम पूनम पण अनुभव्यो घर में सुख उत्कृष्ट सासू सुर्मरारी बारी सेवा मत्तंन्य ज्ञान 12 गंगाशहर की गंगा १ परिवार पाल्यो प्रेम स्यूं हुआ घणा गुणवान थारी क्षीण कपाय ही देता सबने मान सावनसुखा परिवार री खूब बढ़ाई शान थारे घर आया पछे सात साल अनुमान मै पण थारे घर रह्यो थे रख्यो सम्मान निजपति पूनमचन्द ने दे दीक्षा आदेश गुस्वर री कृपा लही पायो सुयश विशेष पाच पुत्र-दो पुत्रिया और बडो परिवार छोड सिधाया स्वर्ग मे कियो आत्म उद्धार सुसरा पति देवर सहित गण मे सतिया सन्त न्यातीला थारे घणा साध रह्या शिव पथ आत्म विजय पथ पर बढो विजया देवी तृर्ण सतराज री शुभभावना सौख्य ल्हो सम्पूर्ण द्वितीय पुत्र श्री राजकरणजी श्री राजकरणजी का जन्म गगाशहर मे वि सं. 1983 मे हुआ। आपकी बाल्यकाल से ही धर्म के प्रति रूचि थी। आपने बाल्यकाल मे ही पच्चीस बोल, नवतत्वद्वार आदि कठस्थ कर लिये थे । धर्म के प्रति रूचि ज्यादा होने से साधु-सन्तो का पूर्ण सहयोग मिला । आपकी सयम अगीकार करने की भावना प्रवल होती गई आपने अपनी भावना परिवार वालो के सामने रखी परिवार वाले दीक्षा देने को तैयार नहीं हुए आपको बहुत समझाया गया कि "साधुपणो सोरो नही है" परन्तु आप अपनी भावना मे विचलित नही हुए तो परिवार वालो ने आपकी सगाई कर दी तथा आपको व्यापार के लिए वाहर भेज दिया गया परन्तु आपका मन व्यापार मे नही लगा आप वापिस देश आ गये साधु-सन्तो की सेवा मे ज्यादा समय व्यतीत करने की प्रबल भावना को देखकर परिवार जनो को दीक्षा देने का निर्णय लेना पडा। आपकी सगाई छोडनी पडी । परिवार वालो ने आचार्य श्री से दीक्षा देने की अर्ज की । आचार्य श्री ने पूर्ण कृपा करके दीक्षा देने की स्वीकृति प्रदान की। - आपकी दीक्षा वि स 1999 कार्तिक कृष्णा अष्टमी को चूरू मे आचार्य श्री तुलसी के कर कमलो मे हुई । आचार्य श्री की पूर्ण कृपा से आपको विद्वान मुनियो के साथ रहने का अवसर प्राप्त हुआ। मुनि श्री कानमल जी, मुनि श्री डूगरमल जी, मुनि श्री हीरालाल जी का सान्निध्य प्राप्त हुआ। तीनो - तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 13
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मुनि श्री राजकरणजी
साधु अच्छे विद्वान तथा शास्त्रो के मर्मज्ञ थे। आपने इनके पास रहकर
शास्त्रों का गहन अध्ययन किया तथा आपने हिन्दी, गुजराती, प्राकृत,
संस्कृत, राजस्थानी गापाओ का ज्ञान प्राप्त किया। आपने शास्त्रों का ठोस
अध्ययन किया।
अग्रगण्य पद पर
वि.स. 2009 मे आप मुनि श्री हीरालालजी के साथ थे। मुनि श्री
हीरालालजी का चातुर्मास सुजानगढ फरमाया हुआ था परन्तु चातुर्मास से
पहले ही मुनि श्री हीरालालजी का देवलोक हो गया। आचार्य श्री ने पूर्ण कृपा
करके मुनि श्री को अग्रणी पद पर धोपित किया । सुजानगढ़ तेरापथ समाज
का अच्छा क्षेत्र रहा है वहां के श्रावको ने आचार्य श्री के दर्शन किये। मुनि
श्री हीरालालजी के देवलोक होने के समाचार अवगत कराये। श्रावको ने कहा
कि गुरुदेव सुजानगढ़ क्षेत्र बडा है तथा मुनि श्री राजकरणजी वालक मुनि है
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गगागहर की गंगा
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। - - इस क्षेत्र को पूर्णरूप से कैसे संभाल पायेगे ? गुरुदेव ने फरमाया- आपचिता मत करो। अच्छी तरह संभाल लेगा। चातुर्मास मे अच्छा धर्म उपकार हुआ श्रावक आपके द्वारा किये कार्यो से तथा व्याख्यान से बहुत प्रभावित हुए। आप अग्रणी बनने के बाद मे मेवाड, पजाब, दिल्ली, गुजरात, बगाल, असम, भूटान, नेपाल, विहार आदि प्रान्तो की लम्बी-लम्बी यात्रा करके सम्यक ज्ञान, सम्यक दर्शन, सम्यक चरित्र के अमर उपदेश की अलख जगाते धर्म का उद्घोष कर रहे है । जिससे भौतिकता से प्रताडित जनमानस मे शाति एव आनन्द की वर्षा होना स्वाभाविक है आपके चिन्तन एव मार्ग-दर्शन से तेरापथ व जैन शासन की प्रभावना के साथ मानवता की सेवा हो रही है। देश के पूर्वांचल मे सुदूर घने पहाडी इलाको की जैन मुनियो मे पहली बार आपने पदयात्रा कर जन्मना जैनियो को संस्कारित करने में महत्वपूर्ण योगदान किया। ऐसा समझा जाता है कि इन क्षेत्रो मे काफी वर्षों से जैन मुनियो का विचरण नही हुआ। लेकिन मुनि श्री राजकरणजी अदम्य साहस कर इस क्षेत्र मे पधारे। वे अपने साधु जीवन मे 50000 किलोमीटर की पदयात्रा मे उपदेश देकर सघ प्रभावना कर रहे है। अवधान विद्या का प्रभाव अवधान विद्या एक विलक्षण विद्या है तेरापथ धर्मसघ मे अनेक साघु-साध्विया अवधान विद्या का प्रयोग अच्छे ढग से करते है। मुनि श्री राजकरणजी का मस्तिष्क गणित मे बहुत ही तीव्रगामी है। इसलिए अवधान विद्या उनके लिए बहुत ही आसान हो गई। भारत ज्योति आचार्य श्री तुलसी की व सेवाभावी भाईजी महाराज की सतत प्रेरणा पाकर मुनि श्रीराजकरणजी ने पाच सौ अवधान करने का निश्चय किया। मुनि श्री उस समय मेवाड की सश्यश्यामला भूमि पर विचरण कर रहे थे । वि स 2015 मे आप धानीण ग्राम मे पधारे । यहा पर भाई-बहनो का उत्साह देखते हुए बैसाख शुक्ला पूर्णिमा को लगातार एक स्थान पर नौ घन्टे आपने अवधान विद्या की परम्परा मे अर्धसहस्त्रावधानी बनकर एक नया कीर्तिमान स्थापित किया। आपने स्मृति चमत्कार का अद्भूत उदाहरण प्रस्तुत किया है। गणित के विषय मे आपने नये-नये फार्मूले खोज निकाले है। आपने जन साधारण से लेकर विद्यार्थियो मे, राजनीतिज्ञो मे व बुद्धिजीवियो के बीच अवधान विद्या का प्रभावशाली ढग से प्रयोग करते हुए सभी को आश्चर्यचकित कर दिया। मुनि श्री ने उदार मनोवृति का परिचय देते हुए, धर्म संघ के अनेक साधुओ को अवधान विद्या का प्रशिक्षण भी दिया। तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 15
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मुनि राजकरणजी अवधान मुद्रा मे
सपित जीवन के धनी
मुनि श्री राजकरण जी का जीवन बचपन से ही समर्पित जीवन रहा
है । आपने सदैव ही गुरुष्टि को सर्वोपरि मानकर चलने का प्रयत्न किया
है । युग प्रधान आचार्य श्री तुलसी का जिस कार्य के लिए आपको सकेत
मिलता उसी कार्य मे आप लग जाते । एक दिन गुरुदेव ने प्रसगवश फरमाया
कि दलित व पिछड़े वर्गो मे जैन धर्म के संस्कारो का प्रचार-प्रसार करना है।
आपने उन कार्य को बडे उत्साह के साथ प्रारम्भ किया । बीकानेर का चोखला
आपका कार्य क्षेत्र रहा है। बीकानेर के आस-पास के छोटे-छोटे गामों मे
जाकर दलित वर्गो मे धर्म के सुसस्कार भरने का सफल प्रयत्न किया है।
उन लोगो के बीच मे रहकर अपनी सुख-सुविधाओ को गौण कर वर्षों
तक कार्य किया तथा लोगो को दुर्व्यसनो व कुरीतियो से छुटकारा दिलाया।
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गंगाशहर की गंगा
। मुनि श्री की सात्विक प्रेरणा से कई हरिजन भाई भी कार्यकर्ता के रूप मे उभर कर सामने आये। आचार्य श्री का मर्यादा महोत्सव डूंगरगढ मे था उस समय सारे थली प्रान्त के मिलकर आये हजारो लोगो की भारी भीड हो गई। आचार्य श्री ने एक बार चुटकी लेते हुए फरमाया कि ये सभी श्रावक मुनि राजकरण के है। वि स. 2035 का चातुर्मास गुरुदेव का गगाशहर मे था। उस समय मुनि श्री राजकरण जी के ज्येष्ठ बंधू पूनमचन्दजी की भी दीक्षा की भावना हो गई । लगभग 60 वर्ष की आयु मे जैन अर्हत दीक्षा ग्रहण की और पूनमचन्दजी से मुनि पूर्णानन्दजी बन गये। आचार्य श्री ने मुनि श्री पूर्णानन्दजी को पिताश्री की सेवा मे तथा मुनि श्री राजकरणजी को वगाल, बिहार, असम, त्रिपुरा, नेपाल, भूटान आदि की यात्रा मे भेज दिया। मुनि श्री राज- करणजी ने छ वर्षों की लम्बी यात्रा सम्पन्न कर जसोल मर्यादा महोत्सव पर आचार्य श्री के दर्शन किए। मर्यादा महोत्सव का कार्यक्रम सम्पन्न होने के पश्चात् आपका चातुर्मास आचार्य श्री ने महती कृपाकर गगाशहर फरमा दिया। वहां से विहार कर आप गगाशहर पधार गये । अपनी जन्म-भूमि मे पिता-पुत्र व भाई-भाई का मिलन देखकर गगाशहर की जनता हर्ष विभोर हो गई। सयोग की बात थी कि मुनि श्री गगागम जी इसी चातुर्मास मे 97 वर्ष की आयु मे स्वर्गवासी हो गये। दोनो ही भाईयो ने अपने पिताश्री की बहुत अच्छे ढग से सेवा की व पितृ ऋण से मुक्त हो गये। मुनि श्री गंगारामजी भी इस दृष्टि से पूरे पुण्यवान थे। विराट व्यक्तित्व के धनी आचार्य श्री की सूझ-बूझ कहे या दूरदर्शिता कि मुनि श्री राजकरण जी छ वर्षों की सुदूर यात्रा करके पिताश्री की सेवा में उपस्थित हो गये। यह आचार्य श्री की महती कृपा का ही फल है। तीसरी, चौथी एव पांचवी पीढी श्री गंगारामजी ने अपने जीवन में तीसरी पीढी के सदस्यो मे पांच पौत्र- श्री रतनलाल, श्री इन्द्रचन्द, श्री विजयचन्द, श्री धर्मचन्द, श्री राजेन्द्र कुमार चार पौत्र-वधू श्रीमती पुष्पादेवी, श्रीमती सुन्दरदेवी, श्रीमती सरलादेवी [प्रथम] श्रीमती सरलादेवी [द्वितीय] दो पौत्रियां श्रीमती सूरजदेवी राका, श्रीमती गुलावदेवी महनोत तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 17 चौथी पीढ़ी के सदस्यों में प्रपौत्र ग्यारह खेतू, कमल, विमल, पारस, सुमति, ऋषभ, रणजीत, जितेन्द्र, मुकेश, राकेश और विकास प्रपौत्री पांच भावना, सज्जन, प्रेम, राजमती और शिल्पा पौत्री के पुत्र 2 हडमान, महावीर पौत्री के पुत्रियां 6 कंचन, शशि, चन्दा, सीमा, रेखा और जयश्री अपनी पुत्री की संतानों में एक दोहित्र श्री शांतिलाल भसाली व दोहि- त्रियां तथा उनका परिवार । पाचवी पीढी मे पौत्र के दोहित्र तथा दोहिनी के पौत्र और पौत्रियां देख लिये। वैसे आपने अपनी सात पीढ़ियां देखी। 1. अपनी दादीजी 2. पिताजी एवं मां 3. स्वय 4. पुत्र-पुत्री 5. पौत्र-पौत्री, दोहित्र-दोहित्री 6. प्रपौत्र- प्रपौत्री तथा दोहित्र-दोहित्री 7. पौत्र के दोहित्र एवं दोहित्री के पौत्र-पौत्री इस प्रकार मुनि श्री गंगारामजी को ससार पक्ष मे विशाल एवं विनीत परिवार मिला । ऐसा परिवार किसी विरल भाग्यशाली को ही मिल सकता है। 1. बहुत बड़ी परिवार मापरो घर में सामारिक लेसे, बेटो-पोता दिक परिकर ने ससम्मान जनता देखें, सगला एक भावना भावे पहुचो अविचल धामजी । मुनि राजकरण - 18 गंगाशहर की गंगा
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आचार्य श्री तुलसी
श्री पूनमचन्दजी की दीक्षा से पूर्व उनके घर प्रेरणा देते हुए।
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श्री पूनमचन्दजी की दीक्षा के समय शोभायात्रा का एक दृश्य ।
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मुनि श्री राजकरणजी 6 वर्षो तक पूर्वाचल का विचरण कर 2041 के जमोल मर्यादा महोत.
पर आचार्य श्री तुलमी के श्री चरणो मे उपस्थित हुए। पूज्य गुरुदेव ने उन्हें पिताश्री की सेव
का आदेश फरमाया । मुनि श्री राजकरणजी के गंगाशहर प्रवेश पर लिया गया चित्र ।
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आत्मीयता के क्षण, मुनि श्री गगाराम जी पूर्वाचल के वृतान्त मालूम कर रहे है ।
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सावनसुखा परिवार का यह चित्र वि स. 2035 मे श्री पूनमचन्दजी के दीक्षा लेने से पूर्व का है,
श्री पूनमचन्दजी मध्य मे दिखाई दे रहे है
व्यावसायिक क्षेत्र श्री गंगारामजी के पूर्वज कृपक थे। किसानो की भाति मोटा खाना, मोटा पहनना, खेती व पशुपालन उनका कार्य था। प्रारम्भ मे आपने भी थोड़ा बहुत खेती के कार्य मे हाथ वटाया था। किन्तु शीघ्र ही व्यापारार्थ आप बगाला जाने लगे। व्यापारिक क्षेत्र मे भी श्री गगारामजी जी भाग्यशाली थे हालाकि आपने लाखो-करोडो तो नही कमाये । आपका आर्थिक ढाँचा सहस्त्रो मे ही रहा किन्तु उस युग मे दस हजार भी दस लाख के समान थे । सही बात यह है आप संतोषी थे। सतुभवति दरिद्रो यस्यतृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टेकोर्थवान् को दरिद्रः आपने अपनी कमाई से गगाशहर में रहने योग्य भवन का निर्माण करवाया। सौ तौला स्वर्ण, काफी मात्रा मे रजत आदि का क्रय किया और वस्त्र-पान आदि का भी समय-समय पर क्रय करते रहे। खान-पान के क्षेत्र मे हमेशा उदारता से व्यय करते रहे । गाये रखते, गायो की सेवा भी करते और शुद्ध घी, दूध दही भी अच्छी मात्रा मे काम लेते । एक बार व्याख्यान मे सतो ने संतोप विपय पर व्याख्यान देते हुए कहा-क्या करोडपति-लखपति हीरे-पन्ने, सोना-चादी खाते है ? खाते तो वे भी दाल-रोटी ही है । हा, वे घी, दूध कुछ अधिक खा लेते होगे । तब आप बीच में ही बोल पडे-नही, महाराज दूध तो हम ही अधिक खाते है, करोडपति व्यक्ति तो लूखे-फुल्के व मूंग की दाल खाते है उनके भाग्य मे घी-दूध कहा आपकी सहधर्मिणी जब आप वगाल मे होते तो काफी मात्रा मे घृत सग्रह करके रखती आप घर आते तव पर्याप्त मात्रा मे आपको खिलाती। ! घी, ? 1. वर्तमान मे वाग्ला देश 2. गया देश बगाल कमावण (पण) साथ धर्म ने राख्यो, सित्ताणूं बरसा री वय मे ओ उत्तम फल चाख्यो। मुनि राजकरण - । गृह-व्यवस्था मे वह इतनी कुशल थी कि न तो कभी ऋण लिया और न ही कभी कोई वस्तु की कमी रहने दी। सर्वप्रथम आप वि. सं. 1958 में साढ़े पांच रुपये लेकर बादिया-खाली गये। वि.सं. 1960 मे वापिस रुणिया आये तो लोगों ने आपको कमाऊ पूत की संज्ञा दे दी। क्योकि और सबको प्रथम चार में केवल भोजन मिलता, दूसरी बार में 21 रुपये वार्पिक जबकि आपको प्रथम बार में ही 31 रुपये वार्षिक मिलने लगे । आपकी दादीजी तो यह जानकर इतनी प्रसन्न हुई कि उनके पैर धरती पर भी नहीं टिकते और आपके पिताजी खुमानचन्दजी को आपके विवाह की सलाह भी दे दी। वि. सं. 1961 में आपका विवाह कर दिया। वि स. 1962 में पुनः वंगाल में दरियापुर गये वहा मंगलचन्दजी बाबेल के यहा नौकरी की। वार्षिक 61 रुपये मिलते रहे फिर बढ़ते-बढते 300 रुपये तक पहुंच गये, फिर दरियापुर छोड गायबांधा जाने लगे। वहा मगनमल जेठमल फूलफगर, लाडनू के यहा मुख्य मुनीम के रूप में कुछ समय कार्य किया और वि. सं 1981 मे श्रीमान् चुन्नीलालजी छाजेड के साथ गायवांधा मे अपनी दुकान की, जिसमें वस्त्र, धान, चावल, सोना-चांदी, सिक्को तक का व्यापार करते । वर्षो तक साथ रहने के पश्चात् दुकान चुन्नीलालजी को सौपकर गायबाधा मे ही वि. सं. 1993 मे अपना पाट का धन्धा प्रारम्भ किया जो वि स 1996 तक चलता रहा। व्यापार के क्षेत्र मे आपके प्रगति का कारण था-प्रामाणिकता व परिश्रम । तुच्छ प्रलोभनों मे आकर आपने कभी अनैतिकता की ओर कदम नही उठाया। इसकी छाप किसानो मे तथा छोटे व्यापारियो मे, जिनसे आप जूट खरीदते थे और कलकत्ता व गायबांधा में एक डिपट कम्पनी जहां आप पाट वेचते थे, सब में थी। डिपट कम्पनी के एक यूरोपियन मैनेजर को इतना विश्वास था कि आपको सहस्त्रो रुपये अग्निम दे दिया करते थे। अनेको वार अपने शस्त्रधारी सरक्षक को भी सुरक्षा के लिए भेज देते थे। कई बार वह स्वय आ खडा होता और कहता गंगाराम बाबू पाट वेचेगा, आप कहते चोखा पंसा मिलेगा तो क्यों नहीं बेचेगा। व्यापारिक कार्य में आप चतुर्भुजजी बोथरा' को मार्ग दर्शक के रूप में मानते थे। उन पर पूरा विश्वास था - । 1, व्यापारिक कामा में रानी नैतिकता रीटेग, गलत बात मोटा मिनया रो थे नहीं मानी एक। ---गुनि राजकरण 2. पारवे वाले 20 गंगाशहर की गंगा आपका । पूरे सम्मान की दृष्टि से देखते थे । बोथरा होने के कारण मामाजी कहकर सम्बोधित किया करते थे। व्यापारिक क्षेत्र मे प्रामाणिकता की अनेक घटनाए है जिसमे से यहा पर दो घटनाओ का उल्लेख किया जा रहा है गायबांधा मे आप मुख्य रूप से पाट का व्यापार करते थे। वि. स 1996 मे व्यापार अच्छा चला । आपने जो परिग्रह की मर्यादा की थी उस सीमा तक आर्थिक लाभ हो गया। आपके एक भागीदार भी थे । जव आयकर देने की चर्चा चली तो आपके भागीदार का मन लोभ मे आ गया और वोला गगारामजी आय पूरी दिखायेगे तो कर बहुत लगेगा और सभी व्यापारी कम दिखा रहे है हम भी कम बतायेगे। यह सुनकर आपने कहा-नही, जिस राज्य मे हमने काम किया, जिस राज्य ने हमारी सुरक्षा व्यवस्था की उसको पूरा कर देना चाहिए । मै इस विषय मे कभी असत्य नही बोल सकता । भागीदार ने कहा-आप अपना भाग देकर गगाशहर चले जाइये, अधिकारी जाने और मै जानूं । सत्य बोलूगा तो मै, असत्य बोलूगा तो मै । दूसरे पाट व्यावसायियो को भी चिन्ता थी। ये इतना बतायेगे तो हमारे पर भी अधिक आय की सम्भावना अधिकारीगण बतायेगे। उन लोगो ने भी काफी दबाव दिया किन्तु आपने स्पष्ट कहा-मैं तो पहले पूरा-पूरा इन्कमटैक्स दूगा और शेप बचेगा उसमे से आया हिस्सा लूगा और वैसा ही किया। समय पर निडरता एक बार आपको व्यापारिक कार्य के लिए गायबाधा से कलकत्ता जाना था। श्री पाचीलालजी को पता चला तो उन्होने कहा-गगारामजी मेरे पास मासिक टिकट है जिसकी अवधि तीन दिन ही रह गई है मुझे तो जाना है नही, आप इसे पाच रुपये मे ले जाइये । मुझे भी लाभ और आपको भी लाभ । आपने कहा-नही जी, क्यो पैसे के लिए वेइमानी करे ? जब उन्होने कहा- इसमे क्या बुराई है, सभी करते है। आपके मुह से निकल गया दो रुपये मे दो तो ले जाऊ। उन्होने दे दिया और लेकर रेल मे बैठ गये । जहा कही चैकिंग हुई आपने पास दिखा दी और अपना नाम पाचीलाल बता दिया। 1. जिला रगपुर वर्तमान मे बाग्ला देश मे है। 2. गया रेल मे कलकत्ते जद टिकट अन्य री ली ही, मोको भाया उरया नही थे साच बात कह दीन्ही । मुनि राजकरण तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 21 कलकत्ता प्लेटफॉर्म पर भी अधिकारी ने पूछा और आपने पांचीलाल नाम बता दिया। उसने हस्ताक्षर के लिए कहा और आपने उसी भूतनागरी लिपि मे हस्ताक्षर कर दिये । ज्यो ही अधिकारी कुछ आगे बढा कि एक साथी ने आवाज दी, गगारामजी आ रहे हो या देरी है। इतना सुनते ही वह रेल अधिकारी । लौटकर आया और पूछने लगा, बाबू सच-सच बताइये, आपका नाम गगाराम है या पांचीलाल । धर्म से बताइये, उसी क्षण आपको धर्म याद आया, सोचा थोड़े जीवन के लिए झूठ बोलू उचित नही । क्या होगा, कोई फांसी तो होगी नही जुर्माना होगा या जेल, देखा जायेगा। आप साफ कहा-जी, मेरा नाम तो गगाराम है मै तो यह पास दो रुपये में लेकर आया हूँ, आपकी इच्छा हो सो कीजिये । आपकी स्पष्ट सत्यवादिता है अधिकारी इतना प्रसन्न हुआ कि पास तो ले ली और आपको गेट से बाहर तक पहुंचा आया और कुछ नहीं किया। ऐसे एक नही अनेक उदाहरण आपके जीवन से संबंधित है जिससे प्रत्येक व्यक्ति प्रेरणा ले सकता है। आप अपने बड़े पुत्र श्री पूनमचन्दजी को व्यापार कार्य के लिए गाय- बांधा ले गये थे किन्तु श्री पूनमचन्दजी के कार्य के लिए वह स्थान आपको जचा नही क्योकि वहां बोलने का काम अधिक रहता था। किसानो के साथ पूरी सिरपच्ची करनी पड़ती और श्री पूनमचन्दजी की प्रकृति कम बोलने की थी। दूसरे मे, कलकत्ते के प्रतापमल गोविन्दराम के यहां आराम का काम था। फार्म के मुख्य कार्यकर्ता मापके भाणेज ही थे अतः श्री पूनमचन्दजी को भी वहा छोड दिया गया जो 33 वर्ष तक वही रहे । अपने दूसरे पुत्र श्री राजकरणजी को भी वि. स. 1996 मे गायवाधा ले गये क्योकि वि. स. 1995 मे ही श्री राजकरणजी ने दीक्षा लेने की भावना प्रकट की। अतः परीक्षा के लिए विद्यालय छुडा कर ले गये । उस वर्ष आपके खूब कमाई हुई। वि स. 1995 मे जो घाटा था वह पूरा हो गया गौर अतिरिक्त बीस हजार रुपये की कमाई हुई। काम नागौर के श्री माणिकचन्दजी पीचा की साझेदारी मे था। आपके हिस्से में दस हजार आये, जो परिग्रह की सीमा थी वह पूर्ण हुई। दस हजार नगदी, 100 तोला सोना, कुछ चांदी, एक मकान मादि । उसके पश्चात् आपने व्यापार छोड़ दिया और पूर्णतः धर्म-ध्यान मे लग गये । बंगाल में रहते हुए भी आप प्रतिदिन सामायिक 1. मापने वि. म. 1989 में दम मात्र से अधिक नकद साये रखने का त्याग तथा व्यापार का त्याग रिया था। 22 गगामहर की गंगा -
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करते, पर्व तिथि को उपवास, पौषध भी करते, स्वधर्मी बधुओ को भी इसके
लिए प्रेरित करते । स्थानीय लोगो को अहिंसा का महत्व बताते, मासाहार
त्यागने की प्रेरणा देते । स्थानीय लोग माने न माने किन्तु आपकी बात
ध्यान से सुनते।
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1. बगालियो को
तपस्वी मुनि श्री गगारामजी
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धार्मिक क्षेत्र आपके पूर्वज ओसवाल होने के कारण परम्परागत जैन थे, इसी क्रम मे आप जन अवश्य कहलाते थे किन्तु णमोकार-मन्त्र व जैन तीर्थकरो के नाम के अतिरिक्त ज्ञान कुछ नहीं था। वि. सं. 1967 मे सर्वप्रथम मुनि श्री फोजमलजी के दर्शन रुणियां मे हुए और उनके पास सम्यक्त्व दीक्षा स्वीकार की। देव-तीर्थकर महावीर, गुरु-श्री कालूगणी, धर्म-जन तेरापंथी। दिल व दिमाग मे जचा लिया और वचन से बोलने भी लगे। उनके पास ही सप्त कुव्यसन का त्याग किया। पांच तिथि को हरियाली का व रात्रि-भोजन का त्याग किया। 31 हरियाली के अतिरिक्त और जमीकन्द का जीवन भर के लिए त्याग किया। अच्छी वस्तु मिलने पर स्वीकार करने की तत्परता प्रारंभ से ही थी। अतः धर्म-क्षेत्र मे सत-दर्शन होते ही आगे बढने लगे। फिर सामा- यिक, पौषध, जप-तप आदि करने लगे। समय-समय पर पूज्य गुरुदेव महामहिम आचार्य श्री कालूगणी के दर्शन भी करने लगे। धूम्रपान का त्याग प्रारम्भ में धूम्रपायी लोगो के सम्पर्क के कारण यह व्यसन भी आप में था। वि. सं. 1977 गुरु दर्शनार्थ रेल द्वारा हिसार जा रहे थे। वहा आपके मन मे आया और सकल्प किया जब तक गुरुदेव के दर्शन नही होगे तब तक धूम्रपान नही करूगा, फिर रेल मे ही पता चला कि गुरुदेव हिसार से विहार कर डाबड़ी पधार गये, वहां रेल थी नहीं । आपने सोचा न मालूम कव दर्शन होगे और मै कय धूम्रपान करूगा और तब तक कौन यह अड़बजाट रसे। लगता है धूम्रपान से मुक्त होने का एक सुअवसर सहज ही मापको प्राप्त हो गया। चिलम, तम्बाकू, टिकिया और तम्बाकू वस्त्र रेल से ही जंगल मे फेक - 1. गाव रुणिये जन्म भूमि लो, समकित फोज मुनिवर स्यू। ज्यू-ज्यू समा पठो लागी, इकतारी मिक्षु शामन स्यू । गणपतलाल चोपडा 2. प्रथम वार गुरु दर्शन वि. स. 1971 मे श्रीडूंगरगढ़ में आचार्य श्री नागपो मे - किये। 3.सापी दिये फिर दर्शन की व्यवस्था भी वैठ गई, गुरुदर्शन भी हो गये और गुरुदेव के पास हमेशा के लिये संकल्पबद्ध भी हो गये। धीरे-धीरे ज्ञान, दर्शन, चारित्र के क्षेत्र मे आगे बढते रहे, पूर्णतया गति प्राप्त हुई गंगाशहर आने के पश्चात । आते ही पूज्य गुरुदेव का पावस मिल गया और अपना काफी समय दर्शन, सेवा, व्याख्यान श्रवण, जप-तप व अध्ययन मे लगाया। उसके बाद तो ऐसी लगन लगी कि प्रतिवर्ष पूरा परिवार लेकर महीनो तक गुरु सेवा मे रहते 11 गुरुदेव तथा अपने गाव मे प्रवासित मुनि-सतियो की मार्गवर्ती गावो मे पैदल सेवा करते। कभी यह चिन्ता नहीं की कि बच्चो की पढाई मे हर्जा होगा या घर की रखवाली कौन करेगा । कीमती स्वर्णाभूपण कुछ तो शरीर पर रहता तथा कुछ एक पेटी मे वन्द कर अपने भाई मेघराजजी के घर तिजोरी मे रख देते और वापस आने पर अपने घर ले आते। दिन मे घर की रखवाली के लिए पड़ोसियो से कह देते। रात्रि मे किसी एक व्यक्ति को वेतन देकर रात्रि-शयन हित कह देते । प्राय पांच-छः महीने व्यापारार्थ बगाल मे तथा अवशेष समय गुरु उपासनार्थ लगते और अतिरिक्त समय मे तत्व-ज्ञान सीखते । तत्व-ज्ञान सिखाने मे श्री हरखचन्दजी नाहटा व देवचन्दजी लूणावत का पूरा सहयोग रहता। सभी सम-वयस्क होने से अच्छी पटरी बैठती थी। तप गृहस्थावास मे बहुत अधिक तो नही किया किन्तु पचरगी, सतरगी मे हमेशा अग्रणी रहे। वि स. 1984 मे सर्वप्रथम अठाई न कर नौ की तपस्या की । ग्यारह तक की लड़ी की, तेरह का थोकडा वि. स. 1987 मे किया और अधिक तपस्या साधुपन स्वीकार करने के बाद की। कड़े त्याग वि स. 1992 चातुर्मास मे पूज्य आचार्य श्री कालूगणी के दर्शनार्थ उदयपुर पहुचे। वहां गुरुदेव से निवेदन किया कि आजीवन ब्रह्मचर्य स्वीकार कराइये । गुरुदेव ने कहा-धर्म पत्नी कहा है । वह भी खडी हुई और गुरुदेव ने नियम करवा दिया। फिर बोले 70 वर्ष के पश्चात बाजरी व पानी के अतिरिक्त त्याग करवाइये । गुरुदेव ने कहा-यह त्याग वडा कड़ा है, सोच समझकर करना चाहिये। फिर बोले-हस्तरेखा विशेषज्ञ ने कहा है कि- 1. श्रावकपन मे गुरु सेवा रो राख्यो पूरो कोडजी, ले पूरो परिवार जावता महीना तक घर छोडगो, रास्ते री पैदल सेवा में जाता ग्रामो-ग्रामजी । मुनि राजकरण --- तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 25 तुम्हारी आयु 70 वर्ष से ऊपर है ही नही अतः आप करवा ही दीजिये। गुरुदेव ने फिर कहा-उनका क्या भरोसा, अपनी आत्मा को तोले बिना कोई काम नहीं करना चाहिये। फिर बैठ गये और तीसरी बार खड़े होकर बोले- मैने अपने आप को तौल लिया है, आप त्याग करवा ही दीजिये। गुरुदेव ने उत्कृष्ट भावना देखकर त्याग करवा दिये। यह तो आचार्य श्री तुलसी की कृपा ही थी कि 62 वर्ष की वय में भी उनको साधुपन दे दिया वरनाश्रावक रहते तो 70 वर्ष के बाद चार-छः महीने से अधिक निकलना मुश्किल था । आचार्य श्री कालूगणी की कितनी दूरदर्शिता थी कि हस्तरेखा व ज्योतिष के जानकारों का भरोसा नहीं किया। क्रमशः वैराग्य बढ़ाते हुए हरी सब्जी, सचित, रात्रि-चौविहार आदि के भी आपने त्याग कर दिये। फिर वस्त्रो की मर्यादा करते समय 21 रुपये से अधिक के वस्त्र एक वर्ष में क्रय करने का त्याग किया। जब कीमत वढने लगी सब लोगों ने कहा-अब कैसे काम चलेगा? तो आपने कहा-नियम नियम ही रहेगा, 21 से 31 होने से रहे, 11 हो सकते है । आज से एक वर्ष में 11 रुपये से अधिक के वस्त्र अपने लिए खरीदने का त्याग है। इससे आपको काफी कठिनाई हुई। घटिया व पुराने वस्त्रों से काम चलाया, पर नियम पर सुदृढ़ रहे। पुत्र को दीक्षा आपने अपने छोटे पुत्र श्री राजकरण को दीक्षा का आदेश देकर महान लाभ कमाया। हालांकि एक बार यह सोचकर कि इसको बंगाल ले गये तव व्यापार अच्छा चला, कमाई अधिक हुई, यह भाग्यशाली लड़का है इसको दीक्षा नही दूंगा किंचित आनाकानी भी की थी। दीक्षा की स्वीकृति लेने जव श्री राजकरणजी चूरू गये तव आप साथ भी नही गये। जब श्री राजकरणजी ने आचार्य प्रवर से निवेदन किया कि दीक्षा की रवीकृति दीजिये तव आचार्यप्रवर ने कहा-तेरे पिताजी तो आये नही, स्वीकृति कैसे हो । उस समय समाज के प्रमुख व्यक्ति सेठ श्री ईश्वरचन्दजी ने आचार्य प्रवर से निवेदन किया कि उसके पिताजी को समझाने की जिम्मेवारी में लेता हूं। तव मंत्री मुनि श्री मगनलालजी ने कहा-सेठ ईश्वरचन्दजी की जिम्मेवारी मै लेता हूं । आचार्य-प्रवर ने कहा-'आपकी जिम्मेवारी मै तेता हूं।' तब श्री राजकरणजी ने कहा-क्रमान्तर से मेरे पिताजी की जिम्मेवारी भी 1. वि. सं.1996 में 26 गंगामाहर की गंगा आपने ले ली, अव आज्ञा मिल जानी चाहिये । आचार्यप्रवर ने स्वीकृति दे दी और श्री गगारामजी बिना ननुनच दीक्षा देने के लिए तैयार हो गये। उस समय कई सतो ने, श्रावको ने कहा---गगारामजी साथ-साथ तुम भी दीक्षा क्यो नही ले लेते । तुम कड़े आदमी हो। आपने कहा-और सब कुछ सहन कर सकता हूं किन्तु मूंछो का लुचन नही करा सकता, अस्तु उस समय आपकी दीक्षा नही हुई। पडिमाओं का स्वीकरण तीर्थकर महावीर ने श्रमणोपासको के लिए उत्कृष्ट विधि के रूप मे ग्यारह पडिमाएं बताई है। उस समय के आनन्दादि श्रावको ने पडिमाएं स्वीकार की थी। उसके पश्चात पूर्ण रूप से ग्यारह पडिमाओ को अगीकार करने वाले आपके सिवाय कोई ध्यान में नही आया। 2500 वर्षों मे यह अवसर आपको ही मिला। वि स. 2002 मे कई श्रावको ने एक साथ पडिमाए स्वीकार की। कई तो जहा चौथी पडिमा मे बेले, उपवास, पौषध का प्रसग देखकर 6 प्रतिपूर्ण, पौपध करने का प्रसग आया आगे नही बढ सके और कईयों के आठवी पडिमा मे पूर्णतया हिंसा परित्याग का प्रसग आया तो उसकी गति मे अवरोध आ गया । आचार्य श्री ने फरमाया-गंगारामजी तुम बड़े श्रावक हो, तुम्हारे पीछे सभी पारिवारिक-जन पूर्णतया सेवा करने वाले है, तुम्हे इन पडिमाओ को पूर्ण करना है और आप उसी समय सकल्पबद्ध हो गये । ग्यारवी पडिमा 'समणभूये' की चर्चा एक अपेक्षा से तो साधुपन से भी कठिन है-ग्यारह महीनो तक कोई शारीरिक सेवा नहीं करा सकता । साधु की साधु तो कर सकता है किन्तु यहा कोई नही कर सकता । एक बार आंख मे कुछ गिर गया आप वही आख मूद कर खडे हो गये । वह पानी के साथ बहकर निकल गया । एक बार तीव्र ज्वर आया, आपने समता से सहा कुछ ठीक होने पर पड़ोसी घरो से गोचरी कर पथ्य ले आये । एक बार दसवी 1. ग्यारह पडिमाए अलग परिशिष्ट मे देखें। 2. बोल थोकडा, तत्वज्ञान और पडिमा ग्यारह पूर्ण हुई, गुरु सेवा, गुरु शिक्षा या वैराग्य भावना जाग उठी। गणपत लाल चोपडा 3. श्री लिखमीचन्दजी सावनसुखा, श्री केशरीचन्द जी बोथरा, श्री छोगमलजी सेठिया आदि। 4 दो बेले 14-15 व दो उपवास आठ । तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 27 पडिमा में पद-यात्रा कर गंगाशहर से राजलदेसर आये, व्याख्यान में दर्शन किये तब आचार्य-प्रवर ने आपकी पडिमाओं का उल्लेख कर सराहना की। - - आपने कहा- हांसी में गुरुदर्शन और साधु-प्रतिक्रमण की आज्ञा वि.सं. 2007 मे पडिमा सम्पन्न हुई। पूरे साढ़े पांच वर्ष लगे । भक्षव- गण में एक नया कार्य हुवा, चतुर्विध संघ मे इससे आपका पूरा परिचय हो गया । उस वर्ष आचार्य-प्रवर का चातुर्मास हासी था, वहा आप परिवार के साथ दर्शनार्थ गये । गुरुदेव ने बड़े कृपापूर्ण शब्द फरमाये । वहां एक दिन समाज-भूपण श्री छोगमलजी चौपड़ा ने पूछ लिया- गंगारामजी पडिमा तो पूरी कर ली अब क्या विचार है ? आपने कहा- विचार क्या, और तो कोई काम करने से रहा, कर रहा हूँ श्रावक व्रतो की आराधना । तब समाज-भूषणजी ने कहा- गुरुदेव आगे बढ़ने की कृपा कराये तो? सहसा आपके मुंह से निकल गया फिर चाहिये ही क्या । आचार्यप्रवर से बातचीत हुई। चक्षु-परीक्षण के लिये आचार्य-प्रवर ने आपके हाथ अपने पास का एक पत्र दिया और फरमाया- पढो तो। कहा- मै तो सिर्फ भूतनागरी पढा हूँ। देवनागरी पढ़ना जानता ही नही । तव मुनि श्री चीथमलजी से आचार्य श्री ने कहा- देखो इनके कीडी की कल्प है या नहीं। मुनि श्री चौयमलजी ने परीक्षण करके कहा- गुरुदेव ठीक है। फिर आप सपरिवार उदयपुर में अपने पुत्र मुनि श्री राज- करणजी के दर्शनार्थ गये और ये सब बात हुई तब मुनि श्री राजकरणजी ने कहा-आचार्य-प्रवर कृपा कराये तो विलम्ब करना ही नहीं है। वहा से फिर गंगाशहर आये। वहा फिर समाज-भूपण श्री छोगमलजी चौपडा का पत्र मिला जिसमें आचार्य प्रवर के दर्शनों की प्रेरणा थी। श्री चौपडा जी ने इस काम मे पूरा उत्साह दिखाया। श्री गंगारामजी फिर हांसी पहुचे । 1. वि. सं. 2005 के मर्यादा महोत्सव के प्रसग पर । 2. पावकपन री उच्च माधना पटिमा ग्यारह पूर्ण करी, वृद्धावस्था मे ली दीक्षा गुरु तुलगी स्यूं भाव घरी, तप-जप मे तरलीन रहा थे प्रतिफल प्राट्यामजी। मुनि राजकारण 3. मगंव परीक्षारा पूज्य प्रवर जद दियो हाय में पानी, देवनागरी हं नहीं जाप, कह दियो रख्यो नहीं छानो। मुनि राजकरण 4. गडे-प यदि कोली दिवाई दे तो उममो नजर टीक मानी जाती है । 5. मुनि श्री गंगारामजी कई बार फरमाने कि श्री योगमलजी मा र म भूल नी 28 गंगापारी गंगा आचार्य श्री से दीक्षा के लिये निवेदन किया और साधु - प्रतिक्रमण सीखने का आदेश तो अभी दिराये, प्रार्थना की। आचार्य श्री ने फरमाया- उदय- पुर भाटो मे क्यो गये, वेटे से क्या पूछना था ? इतने दिनो मे प्रतिक्रमण काफी सीख लेते और अब भी सीखो। सुनकर आपके प्रसन्नता का कोई पार नही रहा और साधु-प्रतिक्रमण सीखना प्रारम्भ कर दिया । ६२ वर्ष की आयु में दीक्षित साधु-प्रतिक्रमण सीखने मे आपको कुछ कठिनाइया आई। देवनागरी आप जानते नही और भूतनागरी तो बस भूतनागरी ही है। लिखो- बाबा जी अजमेर गये और पढो-वाबाजी आज मर गये । आपके बडे पुत्र श्री पूनमचन्दजी ने इसमे पूरा सहयोग दिया। वे देवनागरी और भूतनागरी दोनो लिपिया जानते है । दोनो मे ही उन्होने साधु-प्रतिक्रमण की दो प्रतिया लिखी। दोनों एक साथ बैठ कर सीखते-सीखाते । देवनागरी श्री पूनमचन्दजी पढकर सुनाते तथा भूतनागरी आप देखकर दुहराते । श्री पूनमचन्दजी ने अपने सभी काम छोडकर आपको साधु-प्रतिक्रमण सिखाया । इधर आचार्यप्रवर की वेजोड कृपा। बार-बार याद करना-पूछना क्या प्रतिक्रमण याद हो गया? समाज-भूषण श्री छोगमलजी चौपड़ा, तत्कालीन महासभा के मन्त्री श्री जेठमलजी भसाली के पत्र बराबर आने लगे। आप प्रतिक्रमण याद कर आचार्यप्रवर के निकट पहुचे और निवेदन किया। आचार्य श्री ने प्रसन्न होकर कहा- तुम्हारा पुत्र मुनि तो अभी यहा आया नही, उससे पूछ लेते सेवा करेगा या नही। आपने कहा- सेवा आप करवा- येगे, वेटा क्या कर सकेगा। आप उन्हे पूर्व और मुझे पश्चिम भेज सकते है, सैकडो कोस दूर रख सकते है । जो सत पास रहेगे वे सेवा करेगे। मुनि श्री फतेहचन्द जी वहा थे। उन्होने भी आपकी दीक्षार्थ आचार्य श्री से निवेदन किया । आचार्य श्री ने फरमाया-दिन थोडे ही रह गये है । आपने कहा- आज्ञा फरमाइये, आज्ञा प्राप्त होने पर गगाशहर श्रावक-जीवन मे जाना नही है, वस्त्र-पात्र, परिवारजन ले आयेगे। आचार्य श्री ने पोष शुक्ला 4 को दीक्षा की स्वीकृति दे दी और पोष शुक्ला सप्तमी दीक्षा-तिथि भी निश्चित कर दी। हिसार मे भी दीक्षार्थियो के जुलूस मे शामिल नहीं हुवे, दीक्षा का कोई उत्सव भी नही मनाया गया । आप घर आये नही । घर की जिम्मेवारी 1. आपके भाणेज मुनि तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 29 - तो पहले ही अपने पुत्र व पुत्रवधू को सौप रखी थी। औपचारिक रूप में अपनी धर्म-पत्नी, पुत्र, पुत्रवधू व पौत्र आदि पारिवारिक - जनों को शिक्षाऐ हिसार मे ही दे दी। बहिन-बेटी आदि को कुछ देना था वह भी हिसार मे ही दे दिया और निर्धारित तिथि को संयम-स्वीकार कर श्रावक से संत बन गये । आप जिस समय दीक्षित हो रहे थे, नये वस्त्र नहीं पहन सके क्योंकि एक रुपये दो आने में नया चोलपटा मिलता नहीं था और अधिक कीमती कपड़ा पहनने का त्याग था। साधु होने के पश्चात् ही नये वस्त्र धारण किये । भैक्षव-गण में एक नया कार्य हुआ। 62 वर्ष की आयु में आज तक कोई भी दीक्षित नहीं हुवा है। दीक्षा के कुछ दिनो पश्चात् आपके पुत्र मुनि श्री राजकरणजी ने आचार्य श्री के दर्शन किये तब आचार्य श्री ने फरमाया--तेरे पिता को दीक्षा दे दी है, सुनकर मुनि श्री ने कृतज्ञता ज्ञापित की। दूसरे दिन आचार्य श्री ने फिर पूछा- "बाप ने संभाल्यो क नी" मुनि श्री ने कहा- मैं क्या संभालू आपने जब पूर्णतया संभाल लिया । वि.सं. 1992 में पूज्य गुरुदेव आचार्य श्री कालूगणी के पास अविरत आश्रव कम करने के लिये वाजरी पानी के अतिरिक्त जो त्याग किये उसकी अव अपेक्षा नहीं रही क्योकि साधु-मर्यादा के अनुसार जो भी आये उसे प्रयोग में लेना शुभयोग है । अविरत आश्रव नही वह तो पूर्णतया छूट गया। किंतु साधुपन लेने के बाद आपने मैथी के मोदक व गेहूँ के आटे के हतवे के सिवाय सभी मिठाइयो का त्याग कर दिया। थोड़े दिनों के बाद एकान्तर तप प्रारम्भ कर दिया जो विशेष कारण के विना आजीवन चलता रहा। बीत- वीच मे बेले, तेले भी चलते रहे, समय-समय पर नकेले ही पूरी पचरगी करते । ऊपर में आपने 35 तक का लड़ी-बद्ध किया। 21 त 7 की दूगरी लड़ी की। आप तपस्या मे भी विहार करते रहते, अनुकूल क्षेत्र को देखकर पारणा करते और वहा कुछ दिन रुकना होता। विहार-चर्या "विहार चरिया इमीणं पमध्या" की उक्ति के अनुमार आप स्थविरह- वस्था मे दीक्षित होकर भी प्राय. विहार करते रहे। हिमार में दीक्षित होवार 1. करके फीडी मटर परीक्षा, तुलनी गुस्वर दोन्हीं दीक्षा, पारी पूर्ण हुई म्न श्या, अक्षरसागन नन्दनवा री मौजा गादि मामा । सरनार चौपदा 30 गंगारकी गंगा भिवानी मर्यादा-महोत्सव तक आचार्य-प्रवर के साथ विहार किया फिर आचार्य श्री ने मुनि श्री हीरालालजी (आमेट) के साथ थली मे भेज दिया। कारणवश मुनि श्री हीरालालजी का सरदारशहर मे मत्री मुनि के साथ ही रहना हुआ और मुनि श्री गंगारामजी को पहला पावस वि सं. 2008 का मत्री मुनि के सान्निध्य मे हुआ । उस वर्ष मर्यादा-महोत्सव आचार्य-प्रवर ने सरदारशहर करवाया । मुनि श्री गगारामजी तो मुनि श्री हीरालालजी के साथ थे ही। मुनि श्री राजकरणजी को भी आचार्य-प्रवर ने व्याख्यान आदि की जिम्मेवारी सौप कर मुनि श्री हीरालालजी के साथ सौप दिया। आषाढ महीने में एक साथ इन सबको आचार्य श्री की सेवा का अवसर राजलदेसर मे मिल गया । मुनि श्री हीरालालजी का चातुर्मास सुजानगढ घोषित हुआ । और आप राजलदेसर से विहार कर रतनादेसर पहुचे तथा वही सुरवासी हो गये। मुनि श्री हीरालालजी सप्तमाचार्य श्री डालगणी के युग मे दीक्षित योगी सत थे। प्रतिदिन चार - पाच घंटे तक ध्यान, मौन, प्राणायाम किया करते । शरीर के मजबूत थे। एक बार कई सत एकत्रित हो गये । आहार के पश्चात् झोली लूहने - धोने के लिये मनुहार होने लगी तब आपने अपनी मुठी मे झोली लूहने ले लिये और कहा-- जिनकी अधिक भावना हो वे ले जाओ वरना मुझे धोने दो। पाच - सात संतो के दस - बारह हाथ प्रयास कर थक गये पर आपकी मुट्ठी नही खुला सके । मुनि श्री गगाराम जी को आपने साधुचर्या आदि सिखाने में सहयोग देकर बडा उपकार किया । मुनि श्री हीरालालजी के स्वर्गवास के अनन्तर आचार्य श्री ने आपके पुत्र मुनि श्री राजकरणजी को अग्रणी नियुक्त किया और वि सं. 2009 का चातुर्मास आपका सुजानगढ हुआ । वि स 2010, 2011, 2012 के चातुर्मास आपके मुनि श्री सागरमलजी के साथ उदासर हुए जहा पर एका- न्तर व कभी-कभी बेले - वेले तप भी करते रहे। लम्बी तपस्या की भावना हुई । एक वार पखवाडे का तप किया भी किंतु मुनि श्री सागरमलजी की आज्ञा न मिलने पर आगे तपस्या नही कर सके। वि स 2013 का आपका चातुर्मास पुत्र मुनि श्री राजकरणजी के साथ गगाशहर हुआ । वहा पहली बार आपने मासखमण तप किया, तदनन्तर लम्बी तपस्याओ का क्रम चलता ही रहा । लम्बी तपस्या के पारणे के पश्चात् भी एकान्तर तप चलता रहता। तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 31 वि. सं. 2014 का मोमासर, 2015 का चारभुजा, 2016 का आमेट, 2017 का लूणकरणसर आपने अपने पुत्र मुनि के साथ ही चातुर्मास किये । आपकी तीन भावना रहती कि आचार्य श्री के साथ चातुर्मास कर तप करूं। आचार्य श्री के सान्निध्य में विशेष आन्दानुभूति होती है। वि.सं. 2018 में आचार्य श्री ने आपकी भावना पूर्ण की और अपने साथ वीदासर रस कर तप करवाया। उसके बाद आप आचार्य श्री के साथ गंगाशहर आ गये और फिर इसी चोखले में विचरणा हुआ। वि. सं 2019 व 2020 के चातुर्मास मुनि श्री चम्पालालजी के साथ गंगाशहर व बीकानेर हुवे। 2021 का चातुर्मास आचार्य श्री ने बीकानेर करवाया और भाई जी महाराज मुनि श्री चम्पालालजी का गंगाशहर । आप भाई जी महाराज के साथ रहे। 2022 मे फिर गगाशहर मुनि श्री चम्पालालजी' के साथ, 2023 में अपने पुत्र मुनि श्री राजकरणजी के साथ उदासर, 2024 मे फिर गगाशहर । इस वर्ष आपके पुत्र मुनि श्री राजकरणजी भी मुनि श्री चम्पालालजी की सेवा मे रहे। 2025 मे पुत्र मुनि के साथ बीकानेर चातुर्मास किया, 2026 व 2027 मे गंगाशहर तथा वि सं 2028 व 2029 मे उदासर भी मुनि श्री चम्पालालजी के साथ रहे । मुनि श्री चम्पालालजी (राजनगर) भी अपने ढंग के निराले संत रहे है। आप इतने मिष्ठभापी थे कि जनता ने आपका नाम भी मीठिया दे दिया और आचार्य श्री ने इसे स्वीकार कर लिया। स्थिरवास वि. सं. 2030, 2031 मे पुत्र मुनि ने गगाशहर व बीकानेर मे पावस किये। मिगसर कृष्ण पंचमी को गगाणहर आये और स्थिरवासी हो गये। मेवा में प्रायः मुनि श्री राजकरणजी ही रहे । वि न. 2032 व 2034 के चातुर्माग मुनि श्री राजकरणजी के देशनोक हुए । उम समय मुनि श्री दूलीचन्दजी 'दिनकर' तथा मुनि श्री गणेशमलनी के साथ आप रहे । जो भी सत आपकी सेवा में रहे, सबके माथ सम्बन्ध विशेष मधुर रहा । मवकी मेवा से आप गंतुष्ट रहे और आप की गवा करने वाले गत मुनि श्री पानमलजी के माथ तो तना नादात्म्य जुटा कि आपको तो मुनि श्री पानमलजी की सराहना करते ही रहते तथा मुनि श्री पानमनी भी आपको याद करते और आपके शतायु होने की मगल-सामना कारने रहने । I. रामनगर 32 - - वि सं 2033 मे आपके पुत्र मुनि श्री राजकरणजी तो आपकी सेवा मे थे ही, साथ मे मुनि श्री राकेशकुमारजी का सिंघाडा भी गगाशहर मे रहा। लगभग नौ महीने तक दोनो सिंघाडो के सातो सतो का व्यवहार बहुत मधुर रहा । मुनि श्री राकेशकुमारजी मे इतनी कुशलता है कि प्रत्येक व्यक्ति का दिल आसानी से अपनी ओर आकृष्ट कर लेते है । वि स 2035 मे आचार्यप्रवर ने गगाशहर के श्रावक वर्ग एव स्थिर- वासी मुनियो की निरन्तर चार वर्षों की प्रार्थना पर गगाशहर पावस किया। इस पावस मे आपको गुरु उपासना का विशेष अवसर मिला। उपवास वाले दिन तो आप दिन भर गुरु चरणो मे ही बैठे रहते । गुरु की अमृत-दृष्टि का पान करते रहते, अमृत-वचन सुनते रहते । जब कभी आचार्य-प्रवर आपको लक्ष्य करके कुछ फरमाते तो आपके हर्प का कोई पार नही रहता। इस वर्ष आपके बडे पुत्र श्री पूनमचन्दजी' की दीक्षा भी हो गई । आचार्य प्रवर ने फरमाया- इतने दिन मुनि राजकरण तुम्हारे निकट या आसपास रहा, अब तुम्हारे बडे लडके की भी दीक्षा हो गई। अब मुनि राजकरण को दूर प्रदेशो मे भेजने का भाव है। आचार्य श्री यहाँ से विहार कर मर्यादा महोत्सव के पावन-प्रसग पर राजलदेसर पधारे। युवाचार्य श्री की नियुक्ति की । बडा महत्वपूर्ण कार्य हुआ। मर्यादा महोत्सव के पश्चात् मुनि श्री राजकरणजी को पूर्वाचल की ओर विहार करवा दिया और मुनि श्री पूर्णानन्दजी आपकी सेवा मे रहे। आचार्यप्रवर ने आपको गगाशहर से भीनासर भेज दिया। वहा प्रथम वर्ष मुनि श्री हनुमानमलजी का सिंघाडा सेवा मे रहा साथ मे मुनि श्री शुभकरणजी थे। दोनो सतो ने क्षेत्र सभालने के साथ आपकी सेवा की। मुनि श्री शुभकरणजी ने तो आपको विशेष ही समाधि उपजाई । वि स 2036 का चातुर्मास भीनासर हुआ। वि म 2037 का पावस भी भीनासर रहा । सेवा मे मुनि श्री रवीन्द्र कुमारजी आये। उम वर्ष सेवा करने वाले दो ही सत थे। आप तथा मुनि श्री पूर्णानन्द जी। अत कार्याधिक्य रहा, फिर भी आपने भली भाति सब स्थाविर सतो की सेवा की। क्षेत्र की सभाल की । वि स 2038 का चातुर्मास भीनासर ही रहा। सेवा मे मुनि श्री ताराचन्दजी का सिंघाडा रहा। मुनि श्री पूर्णानन्दजी को मुनि श्री रवीन्द्र कुमारजी के साथ मेवाड़ 1 मुनि श्री पूर्णानन्दजी 2. सरदारशहर तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 33 - भेज दिया। इस वर्प मर्यादा-महोत्सव गंगाशहर होने के कारण मुनि श्री गगा- रामजी को पुनः गगाशहर आने का आदेश आचार्य-प्रवर ने दिया और अंतिम क्षण तक गगाशहर शांति-निकेतन मे ही रहे । मुनि श्री रवीन्द्र कुमारजी के साथ मुनि श्री पूर्णानन्दजी ने गंगाशहर में आचार्य-प्रवर के दर्शन किये । तव पिता मुनि से मिलन अवश्य हो गया किंतु आचार्य श्री ने यहां साथ रखा नही । वापिस रवीन्द्र मुनि के साथ ही मेवाड भेज दिया। गंगाशहर की सेवा व्यवस्था मुनि श्री मगनमलजी को सौपी गई । मुनि श्री मगनमलजी, धर्मचन्दजी, फतहचन्द जी, तीनो सहोदर आपके भाणजे उग्र विहारी होने के कारण दूर-दूर तक विहार अधिक करते रहे । अपने मामाजी महाराज के साथ सिर्फ वि स. 2023 मे कुछ महीने रहे थे और अवसर नही मिला था। इस वर्ष पूरा एक वर्ष मिल गया, जिमसे सवको ही बड़ी प्रसन्नता रही। वि. सं. 2040 मे पुनः मुनि श्री रवीन्द्रकुमारजी का सिंघाडा सेवा मे रहा, उनके साथ मुनि श्री पूर्णानन्दजी तो आये ही साथ ही साथ आपके भाणजे पुत्र मुनि श्री मुनिव्रत जी अपने दादाजी महाराज की सेवा में आ गये। तीनो ही संतो ने बहुत अच्छी सेवा की। चित्त मे पूर्ण समाधि रही। वि. सं 2041 मे मुनि श्री राकेश कुमारजी का सिंघाडा सेवा मे आया और मुनि श्री पूर्णानन्दजी को भी अपने पिताजी के पास रख दिया। मुनि श्री राकेश कुमारजी विद्वान्, प्रचारक, मधुर गायक, वक्ता, मिलनसार आदि अनेकानेक गुणोपपेत है । आपने स्थविर रातो को तो ममाधि उपजाई ही साथ ही क्षेत्र की भी समुचित सार-सभात की । युवकों ने भी विशेष धर्म- जागरणा पैदा की। प्रतिदिन व्याख्यान की उपस्थिति और अठाईया आदि तप का इस वर्ष कीर्तिमान बना। उम वर्ष शीतकाल मे आपकी गंमार- पक्षीय पुत्रवधू श्रीमती विजयी नौ वर्ष तक निरन्तर एकान्तर तप करते हुए ममाधिकरण को प्राप्त हुई । इसमें भी मुनि श्री राकेश कुमारजी का अच्छा सहयोग रहा। रामेश गुनि 1. तीन माग पो प्रमोट, पीयुष पौर पर ने भी, गुर गा मा जन्म मि में, माजी धीमेवा की, मिला नेह उनको हम अपनार है। मुनि र पद पर 2 कि. .2039 3. मुनि भी पान-दनी को ममागीय पिन्नी। मापदरीमा बिना संथारे ही कही न चले जाये । पर मुनि श्री राजकरणजी ने कहा- आज-आज तो अवश्य देखेगे। दूसरे दिन प्रात बेला पचखाया गया और मध्याह्न मे पुन: सथारे की माग की। मुनि श्री पूर्णानदजी तथा श्री रतनलालजी का भी विशेष आग्रह रहा। साध्वी श्री केशरजी, चादकवरजी आ गई। कई श्रावक-श्राविकाए भी पहुच गये। मुनि श्री गुणचन्दजी, मुनि श्री पूनमचन्दजी, मुनि श्री राजकुमारजी भी वही थे। इसी बीच डॉ. भण्डारी भी आ गये, उन्होने कहा-अब एक दो दिन से अधिक निकलने की सभावना नहीं है। मुनि श्री गगारामजी करबद्ध पूर्वोत्तर दिशि मे मुहकर बैठ गये। मुनि श्री राजकरणजी ने आपकी तीव्र भावना देखकर चतुर्विध सघ की सलाह मानकर दो नमोत्थुण गुण और आचार्य श्री का नाम लेकर आजीवन अनशन करवा दिया। मुनि श्री गगारामजी ने उच्च स्वर मे बोलकर कहा-त्याग है। वह समय 12-33 बजे का था । महाप्रयाण गगाशहर चोखले के सहस्त्रो लोग दर्शनार्थ आने लगे। श्री डूगरगढ से आपके ससार-पक्षीय ससुरालपक्ष के तथा बहिन परिवार के लोग भी पहुच गये । श्री डूगरगढ से आपके ससार-पक्षीय साढ़ श्री अर्जुनलालजी पुगलिया भी पहुंच गये और नाड़ी देकर कहा कि पांच सात दिन निकालेगे। भीनासर के श्री तोलाराम जी काकरिया, बीकानेर के श्री मूलचन्दजी बोथरा आदि अनेक लोगो के भी विचार थे। दिन भर दर्शनार्थी लोगो का ताता-सा लगा रहा। सबसे हाथ ऊंचा कर धीमे-स्वर मे बोलकर आप खमत-खामणा करते रहे । साध्विया आई, तव दोनो हाथ जोड़कर खमत-खामणा किये । 1. विक्रम दो हजार बयालिस आश्विन शुक्ला ग्यारस ने, पूर्वोतर मुख करने वैठ्या थे जोडया कर दोन्यु करने, चार तीर्थ मे कर सथारो मेट्यो अन्तर धाम जी मुनि राजकरण 2. दोनो दीक्षित सुत सेवा मे, अन्त समय मे थे हाजिर, सौभागी वे थे पूरे, है मिला योग अनशन का फिर, हम भी गौरवान्वित आज अपार है, जीवन सफल किया अनशन कर, करने आत्मोद्धार है। मुनि फतहचन्द 'पकज' - तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 37 है, इससे यह कठिनाई है । यह बिना यन्त्र के हम या कोई बडा डॉ. भी नही बता सकता। मुनि श्री राजकरणजी ने कहा-अब कोई यन्त्र या बड़े डॉक्टर की आवश्यकता नहीं है । चलता है तब तक चलने दो, छूटता है उस दिन छूटना ही है। डॉ. मरोटी ने जव आचार्य-प्रवर के दर्शन किये तब भी यही बात कही। आचार्य श्री ने पूछा-मुनि राजकरण ने क्या कहा है। डॉ. मरोटी ने कहा-उन्होने मना की है। आचार्य श्री ने कहा-बस वह ही ठीक है। आश्विन शुक्ला अष्टमी दिनांक 22-10-85 सोमवार को एकान्तर के के क्रम मे उपवास था। नवमी को प्रातः पय लिया। द्वितीय प्रहर मे प्रतिदिन के अनुपात मे आधे से भी कम पय लिया और यह आपका अन्तिम पयपान था । मध्याह्न मे पीपलपाक व शर्कराखण्ड आपको दिया तो आपने हाथ मै लेकर वापिस लौटा दिया और कहा-मुझे अब नही लेना है । वरा त्याग कराओ। जाव-जीव के त्याग कराओ। मुनि श्री पूर्णानन्दजी ने मुनि श्री राजकरणजी से कहा- मुनि श्री राजकरणजी ने जाकर पूछा, क्या कह रहे है । अभी तो शाम का पय लेना है। आपने कहा- मुझे अव नही तेना है, त्याग करवा दीजिये। कुछ भाई वहा बैठे थे। साध्वी श्री केशरजी भी पता लगते ही पहुंच गई। मुनि श्री राजकरणजी ने कहा-ऐसे संथारा नहीं कराया जा सकता और सबकी सहमति मे उस दिन का चौविहार करवा दिया। दूसरे दिन सहज ही एकान्तर का उपवास था । अत. उस दिन का भी तिविहार त्याग करवा दिये । चोखले मे सर्वत्र हवा पंत गई । कइयो ने कहा संथारा माग रहे है तो कडयो ने कह दिया थारा कर लिया है । हजागे भाई- बहिन दर्शनार्थ आने लगे। रात्रि व्यारयान तथा प्रातः प्रवचन मे मुनि श्री ने स्पष्टीकरण किया कि सथारा मांग रहे हैं किन्तु अभी करवाया नहीं। आपके बडे पोत्र श्री रतनलालजी व्यापार कार्य के लिए एक दिन पूर्व बम्बई गये थे। ये जय कभी भी बम्बईयाकलकत्ता जाते तो अपने भागोगे कह जाते नि दादाजी महाराज के जरा भी तकलीफ हो तो मुसो तमान मुचित कर देना । श्रीन्दिनन्यजी आदि भाष्यों ने तथा श्री नारायणनन्दजी नोपडा ने नाम बम्बई गवाद दूरभाष द्वारा पहुंगाए और वे उसी समय तन दाग दिली और दिल्ली में देगी द्वारा प्रातः होते-होते गगाहर पर गये और पर्गन के योग बनधारा माग है तो आपको नी रसाने । पर दो दिन बार पा जाहिर को होगी नो । । मगादाता संख्या में लोग आये । सरदारशहर, छापर आदि कई क्षेत्रो के लोग अपने कार्यवश यहा आये हुवे थे, वे भी इस कार्यक्रम में सम्मिलित हो गये । रात्रि मे 30-35 युवक शाति-निकेतन मे रहे । सभी एक दूसरे से मनु- हार कर रहे थे कि आप सो जाइये हम बैठे है, किंतु दो-चार ही थोडी देर के लिए सोये है तो अलग बात है । वरना सभी जाग रहे थे और मुनि श्री के तप- त्याग की भाग्यशालीता की चर्चा कर रहे थे। उनके पार्थिव शरीर को ले जाने के लिए दो महीने पहले से ही विमान तैयार हो रहा था। काष्ठ का कार्य पूर्ण हो गया था और अवशेष कार्य रात- दिन लगाकर शीघ्रता से करवा लिया गया था। विमान की बनावट इतनी आकर्पक थी कि अच्छे-अच्छे लोग दस-दस, वीस-बीस मिनट तक अनिमिप आखो से देखते रहते । उस विमान में आपके निर्जीव देह को टिकाया गया और लोग इसे घण्टो तक देखते रहे। ठीक सवा नौ बजे विमान को गगनभेदी जयनाद के साथ उठाकर शाति- निकेतन से गगाशहर के विभिन्न मार्गो से घुमाते हुए मोक्षभूमि (श्मशान भूमि) ले गये। वहा तक भी हजारो भाई-बहिन, बालक-बालिकाए उपस्थित थे । पीपल, चन्दन, घृत, नारियल आदि मे आपके पार्थिव देह को रख कर अग्नि के भेट कर दिया गया। दिनाक 27-10-85 को समस्त चोखले के श्रावको ने मुनि श्री राज- करण जी के सान्निध्य मे आपको भावभीनी श्रद्धाजलि समर्पित की । बोलने वाले सत तथा श्रावक सभी गद्गद् हो रहे थे । कुछ खो गया हो ऐसी रिक्तता अनुभव कर रहे थे। दर्शनार्थ आने वाले श्रावक-श्राविकाएं उस कमरे की ओर झाकते जहा आप रहा करते । और पीडा-सी महसूस कर आगे बढ जाते । अबोध बच्चे पूछ लेते, इधर वाले महाराजजी किधर गये । श्रावकगण आमेट में दिनाक 27-10-85 को ही सायं बीकानेर व गगाशहर के कुछ श्रावक आचार्य-प्रवर के दर्शनार्थ आमेट रवाना हुए और प्रातः आमेट पहुच कर सारे समाचार अवगत कराये । आचार्य-प्रवर ने फरमाया-आकाशवाणी द्वारा प्रसारित समाधि-मृत्यु के सवाद सक्षिप्त मे मिल गये किन्तु व्योरेवार समा- चार जानने के लिये हम तुम्हारी इतजार कर ही रहे थे । पूरे समाचार तुम्हारे आने से प्राप्त हुए। । तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 39 रात्रि मे ठिकाने में काफी श्रावक थे, कई सो गये, कई बैठ रहे । संतों ने भी रात्रि-जागरण किया और आपको धर्म-ध्यान सुनाते रहे। मुनि श्री पूनमचन्दजी ने रात्रि जागरण मे विशेष समय लगाया। दूसरे दिन बीकानेर, भीनासर से भी साध्विया पहुंची। आप बोल तो नही सके, किन्तु हाथ ऊंचा कर खमत-खामणा किये । धीरे-धीरे बोलना बंद हुआ और हाथ-पांव का हिलना भी कम हुआ। दोपहर 1-17 बजे आपको चौविहार सथारा करवाया और दोपहर मे ही 1-58 बजे गंगाशहर चातुर्मास स्थित पाचों साधुओ व पांचों साध्वियो और अनेको श्रावक-श्राविकाओ की उपस्थिति मे आपकी श्वास की गति तीव्र हुई। मुनि श्री पूर्णानन्दजी णमोकार, मंगल-पाठ, शरण आदि सुना रहे थे। उसी समय शरीर से आत्म-प्रदेशो का खीचाव प्रारम्भ हुआ, आंखे खुली और आप महाप्रयाण कर गये। मुनि श्री राजकरणजी ने कहा---'गये', साध्वी श्री केशरजी ने भी कहा-'हां गये', दूसरी साध्वियो ने पूछा-क्या पता? मुनि श्री राजकरणजी ने रुई लेकर नाक के सामने रखी किन्तु उड़ी नही। ? सबसे अधिक आयु हस्तरेखा विशेषज्ञ के कथनानुसार आपकी आयु सत्तर से आगे थी ही नहीं। उसे तो सत्ताणवे तक खीच ले गये किन्तु अनशन के पश्चात् अनेक लोगो की धारणा होते हुए भी सत्ताण घण्टा भी नही चते। पच्नीम घण्टे तथा पच्चीस मिनट के सथारे मे ही स्वर्ग-सिधार गये । हरतरेगा विशेषज्ञ तथा नाड़ी विशेपन दोनो की भविष्यवाणियां सही नहीं हुई। तेरापथ धर्म संघ मे साधु-साध्वियों में आपने सबने लम्बी आयु प्राप्त कर इतिहास बनाया। लेकिन आप शतक से वंचित रह गये । आपके पार्थिव देह पर संतो ने नये वस्त्र धारण करवाए नया श्रावको को सम्बोधित कर उनके सामने शरीर का विमर्जन कर दिया अर्थात् आपका निष्प्राण तन धावको को सौप दिया। शोभा यात्रा अनशन व महाप्रयाण के मवाद दैनिकपत्रो तथा आकाशवाणी धाग प्रमारिल हो गये । ज्यो-यो लोगों को पता चला, साके पार यो, भारो देगो में आने लगे। गंगागर, भीनागर, बीकानेर, नाल, यामा, श्रीनगर- गा, मीथान, कानागर, मनोर, रामीमा, नोवा दिदायों में महावीनी । 38 - प्रसंग पर ही अमर-पद1 पा लिया। इसलिए भी आपको विशेष - विशेष बधाई। विशिष्ट त्याग आप अपने जीवन में क्रमश व्रत बढाते रहे अव्रत घटाते रहे, उसका क्रम इस प्रकार है - वि सं 1964 से जमीकन्द पूर्णत व पाच तिथि को हरी सब्जी तथा रात्रि भोजन का त्याग तथा 31 से अधिक हरी सब्जी खाने का सदा के लिए त्याग। वि स 1966 मे जुआ खेलने का त्याग (एक बार जीवन मे खेले थे। दो सौ अस्सी रुपये हार गये । सकल्प किया यदि ये रुपये वापस जीत जाऊ तो हमेशा के लिए नही खेलूगा, वे जीत लिये, फिर नही खेले)। वि. स 1967 मुनि श्री फौजमलजी के सान्निध्य मे सम्यक्त्व दीक्षा स्वीकार की एव सप्त-कुब्यसन के त्याग किये । दिग् मर्यादा मे पूर्व दिशा मे हजार कोस तथा शेष तीनो मे पाच सौ-पाच सौ कोस से आगे जाने का त्याग। वि स 1971 मे प्रथम बार गुरु दर्शन, आचार्य श्री कालूगणी के श्री डूगरगढ़ मे किये। वि स. 1973 मे सामायिक का क्रम प्रारम्भ । वि स 1974 मे पुत्री के पैसे लेने का त्याग (उस समय यह प्रथा प्राय चालू थी किन्तु आपकी बडी पुत्री सुश्री अन्नी कुमारी रुग्ण हो गई, तब आपने यह नियम कर लिया और पुत्री ठीक हो गई। उन दिनो पुत्री के पैसे लिए बिना विवाह को लोग धर्म-विवाह कहते थे। ) वि. स. 1977 मे धुम्रपान का त्याग । वि. स 1981 मे नवकारसी प्रारम्भ, जीवन भर के लिए। वि. स. 1984 प्रथम बार नव दिन का तप । मुनि श्री पृथ्वीराजजी ने अठाई का उपदेश दिया तब आपने कहा-जीमन करना पड़ेगा इसलिये अभी नही करूगा । मुनि श्री ने कहा-अच्छा आठ नही, नौ कर लो। तव आपने नौ कर लिये। वि स. 1984 मे 21 रुपये से अधिक वस्त्र एक वर्ष मे अपने लिए क्रय करने का त्याग, सवा दो रु. से अधिक का धोती जोडे का क्रय करने का त्याग । - 1. देवो का एक नाम अमर भी है। तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 41 प्रातः प्रवचन के समय जैन विद्या परिपद् का कार्यक्रम चल रहा था, उसी में से आचार्य-प्रवर ने मुनि श्री गगारामजी की स्मृति-सभा समायो- जित करने का समय दिया । गगाशहर के श्री भंवरलालजी चौपड़ा ने आपके जीवन से सम्बन्धित क्षेप मे कुछ बाते बताई । आचार्य-प्रवर ने फरमाया- "मैने अपने जीवन मे बालक-बालिकाओ को ही नही वृद्धो को भी दीक्षित किया है । उनमे एक थे मुनि गगारामजी। आज उनके पण्डित मरण का संवाद लेकर गगाशहर तथा बीकानेर के श्रावक पहुच गए है। यह वास्तव मे ही सघ-निष्ठा की बात है। 62 वर्ष की उम्र मे मैने गगारामजी को दीक्षित किया । वे गृहस्थ-जीवन मे भी श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओ की साधना कर चुके थे । आज उनकी सयम-यात्रा के 35 वर्ष पूरे हो गये है। सेवा हमारे सघ की एक अतुलनीय विशेषता है । इस वर्ष मुनि गंगारामजी की सेवा में मुनि राजकरण, मुनि पूर्णानन्द आदि थे । मंसार-पक्ष मे उनका सम्बन्ध पिता-पुत्र का था । आज वे दोनो भी पितृ-ऋण से मुक्त हो गए है। अत मे एक पद्य के माथ दिवंगत आत्मा के उज्जवल भविष्य की कामना करता हू "गगा गंगा में किया, अनशन गगा रनान । पितृ-ऋण से उऋण हुए, राज-पूर्ण पुण्यवान ।।" इससे पहले जब आचार्य-प्रवर को "मुनि श्री गंगारामजी संभारा मांग रहे है" यह संवाद मिला तो फरमाया-भावना तीव्र हो तो मुनि राजकारण तथा मुनि पूर्णानन्द मोह न करे, अवश्य ही उन्हे सथारा कराये। मुनि गगा- रामजी मंथारे में परिणाम ऊचा रगे। हालाकि यह संदेश गगाशहर बाद में मिला किंतु जिस समय आनार्य-प्रवर यह सदेश दे रहे थे ठीक उनी समय मुनि श्री राजकरणजी आपको अनशन करवा रहे थे । इस प्रकार विनारोका सप्रेपण वाली बात भी नहीं हो जाती है। जब आचार्य-प्रवर को यह मं वाद मिला कि मुनि श्री गंगारामजी ने चारा कर लिया है, तब व्यारयान में फरमाया मुनि श्री गगारामजी ने मथारा कर लिया है । वे बरे कडक पनि है, उन्होंने बहस तपम्याग की है। अब जत समय में अनशन पर बहुत अन्छा काम किया है। अमृत-पुरुष आनार्य श्री तुलसी के पनागय पट्ट-महोत्गय के उप में मनाय गर्न वागे अमृत-गहोमर के उपना में अनेर माधु-गानिमोनमा धावर-श्राविकाओ ने जान मोजपनाया। कईया प्रसार पसार आरकट किये। विन्तु अमृत महोगय के स्वगर पर आमरण अनशन पर प्रानो अगं देने वाले अभी त मापीर।बापने अगल में मरा - श्रावकपन मे जो खान-पान, वस्त्र आदि का त्याग अविरत कम करने के लिये किया गया था, वह अब आवश्यक नहीं रहा । साधुपन मे जो त्याग, प्रतिज्ञाएँ की जाती है वह विशेष निर्जरार्थ है अत कुछ सकल्प अपने साधुपन स्वीकार करने पर किये। वि स 2008 को मथी के मोदक व आटे के हलवे के अतिरिक्त मिठाई का त्याग । वि. स 2009 मे आजीवन निरन्तर एकान्तर तप, कारण विशेष के सिवाय । वि स 2042 आश्विन शुक्ला नवमी 11 बजे अतिम पय पान तथा शर्कराखण्ड व पीपलपाक का ग्रहण । मध्याह्न 2 बजे अनशन की भावना के साथ त्याग । दशमी को उपवास, एकादशी को बेला और मध्याह्न मे 12-33 बजे आजीवन अनशन स्वीकरण । द्वादशी को 1-17 बजे चौविहार अनशन स्वीकरण तथा दोपहर मे ही 1-58 बजे महाप्रयाण । पौने तीन बजे निष्प्राण देह का सतो द्वारा विसर्जन और श्रावको द्वारा ग्रहण । त्रयोदशी को 9-15 बजे मोक्षभूमि (श्मसान भूमि) की ओर पार्थिव देह का प्रस्थान और 12-30 बजे अग्नि स्नान श्रावकों के द्वारा किया गया। आश्विन शुक्ला चतुर्दशी को स्मृति सभा का आयोजन गगाशहर मे मुनि श्री राजकरणजी के सान्निध्य मे तथा पूणिमा को आमेट मे आचार्य- प्रवर के सान्निध्य मे किया गया। मुनि श्री गगारामजी की तपस्या के सम्पूर्ण आँकड़े कितने दिनो का व्रत कितनी बार एक दिन का व्रत 3531 दो दिन 591 तीन दिन 133 चार दिन 21 पाच दिन छः दिन सात दिन आठ दिन 4 नौ दिन दस दिन 21 2 15 3 2 तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी 43 1 वि सं 1985 मे शरीर पर तेल साबुन लगाने का त्याग । वि सं. 1989 मे दस सहस्त्र से अधिक नकद रुपये रखने का त्याग तथा व्यापार का त्याग। वि.सं. 1990 से बाजार मे बनी मिठाई का त्याग । रात्रि में चारो आहार का त्याग। वि. सं. 1991 मे 1998 के बाद व्यापारार्थ बंगाल जाने का त्याग । वि. सं 1991 से तीन हरी सब्जी (आम, मतीरा, परवल) के अतिरिक्त त्याग । वि. स. 1992 श्रावण शुक्ला 15 को ब्रह्मचर्य का स्वीकरण और 70 वर्ष के पश्चात बाजरे पानी के अतिरिक्त त्याग । वि सं 1994 चारो पाप स्कन्द के त्याग (हरी सब्जी, सचित्त, रात्रि चतुर्विध आहार, अब्रह्मचर्य)। वि. सं. 2000 में आचार्य श्री तुलसी का चातुर्मास गंगाशहर था। वहां पर देव, अरिहन्त, गुरु, निर्ग्रन्थ के अतिरिक्त किसी भी देव-देवी आदि को वन्दन पूजन का त्याग । घर की मरम्मत के लिए 50 रुपये से अधिक व्यय करने का त्याग । 65 वर्ष की आयु के पश्चात 6 द्रव्यों से (दूध, घी, गेहू का फुलका, बाजरे की रोटी, मूग की दाल, पानी) अधिक खाने का त्याग । फिर एक साल में एक-एक कम करते-करते अत में बाजरी पानी के सिवाय अन्य द्रव्य खाने का त्याग। वि. स 2001 प्रतिक्रमण कण्ठस्थ किया और 30 द्रव्य निर्धारित कर उसके अतिरिक्त अन्य सभी द्रव्यो को खाने का त्याग । वि स. 2001 मे ही पखे से हवा लेने का त्याग । एक दिन में 10 द्रव्य से अधिक खाने का त्याग । 48 मिनट दिन रहे उसके पश्चात तीन आहार का त्याग । अग्नि तथा वनस्पति के आरम्भ का त्याग । हल्दी के अतिरिक्त सूखी जमीकन्द के भी त्याग । एक दिन में तीन विगय के उपरान्त त्याग। वि स. 2002 चैत्र शुक्ला 3 से श्रावक की ग्यारह पडिमाओं का स्वीकरण । पांव मे मौजा व जूता पहनने का त्याग। वि.सं 2007 पोप शुक्ला 7 को महाव्रत दीक्षा स्वीकरण । महाव्रत दीक्षा अंगीकार करने पर अविरत पूर्णतया समाप्त हो जाता है । अत. 42 गंगाणहर की गगा भावनाएं सावनसुखा परिवार द्वारा मुनि श्री गगारामजी के स्वर्गवास पर आयोजित स्मृति सभा मे सम्मुचारित गीतिका :- देवारी विरादरी मे हुआ शामिल, उगो अठे सू था रोजे दिल याद आपरी आई आ जीबडली ललचाई गुण गावणन्है आभा आया आया आयुष्य ले पूरो करमां रो कर चूरो, साधपणे मे अनसन सनूरो, थारी छवि बणाई गम खुशिया सागे छाई, कुम्हलाया व हरसाया, आया आया ।1। विजय आथारी घाटी ही पार उतारी, जोड़ी है आत्मा सू इकताये । खरी करी कमाई सारा मे घणी सुहायी जै जै कार मनाया आया आया 121 सद्गुण थारा दीज्यो, नमस्कार लीज्यो, विनती म्हारी ध्यान धरीज्यो। गुणारी करा वडाई आत्मा री सही पढाई, होसी म्हारे सुखदाया आया आया ।31 . 000 तेरापथ धर्म सघ मे श्रावको एव साधुओ मे तपस्वी मुनि श्री गगारामजी का स्थान विशिष्ट श्रेणी मे रहा है । वे मेरे समारपक्षीय बाबाजी थे । मुनि श्री गगारामजी से श्रावकावस्था व साधु अवस्था दोनो मे ही हमे अत्यन्त वात्सल्य, मृदुता मिली। मुनि श्री के इस व्यवहार से ही हम पारिवारिकजनो को सस्कार परित जीवन मिला है। मुनि श्री का जीवन प्रारम्भ से ही सघ व संघपति के प्रति समर्पित रहा है । आचार्यों की सेवा मे उन्होने अत्यधिक समय व्यतीत किया। वि स 1983 मे बाबाजी गगारामजी व पिताजी मेघराजजी रूणिया बडा बास से गगाशहर आने की सोच ही रहे थे कि अप्टमाचार्य पूज्य श्री कालूगणी ने उस वर्ष का पावस गगाशहर घोपित कर दिया । गगाशहर मे यह पावस तेरापथ धर्म सघ के आचार्यो का प्रथम पावस था। फिर तो हम लोगो ने गगाशहर आने का निश्चय कर ही डाला । आगमन का सम्पूर्ण प्रयास बाबाजी की प्रेरणा से ही सम्भव हो सका। चातुर्मास मे हमने पूरा समय सेवा मे ही बिताया । चातुर्मास समाप्ति पर हम लोग गगाशहर ही बस गये। तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 45 ग्यारह दिन 4 2-2 बार 1-1बार बारह दिन से अठारह दिन तक 2-2 बार उन्नीस दिन बीस व इक्कीस दिन बाईस से चौबीस और छब्बीस से तीस तक बतीस दिन 2 तेतीस, चौतीस, पैतीस दिन 1-1वार इस प्रकार आपने सम्पूर्ण जीवन मे 6277 दिन तपस्याए की, जिनके 17 वर्ष पांच महीने और सात दिन बनते है जो काफी विस्मयकारी है। एक गीतिका वि. सं. 2029 मे मुनि श्री चम्पालालजी के सान्निध्य मे मुनि श्री जंवरीमलजी की विदाई समारोह पर मुनि श्री गगारामजी के लिए मुनि श्री जवरीमलजी द्वारा समुच्चारित गीतिका :--- गंगारामजी! मुनि की महिमा मै कुछ तो गास्यू गगारामजी ! तुलसी की गुण गगा मे न्हास्यू रे ! सुखे-सुखे सम्पन्न हुई श्रावक री ग्यारह पडिमा रे। गूज उठी घर-घर मे गगा की गुण गरिमा रे ।।1।। घर मे रहता यदि मैं सत्तर वर्षा रो हो ज्याऊ रे । रोटी पाणी छोड़ और कुछ भी नही खाऊ रे ।।2।। तुलसी प्रभु रे करुणा से ओ आज ले रह्यो लहरा रे। करे एकान्तर, शासन मे पग रोप्या गहरा रे ।।3।। तपस्या री पैतीस दिवस तक, लड़ी हुई है पूरी रे। फिर एक बीस तक दूजी हुई सनूरी है।।4।। उगणीसे बाणवे वर्ष मे च्यारू खध उठाया रे । स्नान चोणमे तज्यो, और भी नियम बढाया रे ।।511 पैसठ वर्षा बाद द्रव्य छह राख्या सारा गिण कर रे। और तपस्या हुई वहुत, जीवन मे फुटकर रे ।।6।। नौ का एक सात का तेरह, कीनी एक अठाई रे । चोला और पचोला बीस किया सुखदाई रे ।।7।। वेला किया पाच सौ, तेला एक सौ बीस सुखकारी रे । बास हजारा लगभग है यह संख्या सारी रे ।।811 महामंत्र नवकार जाप में धुन अब पक्की लागी रे । आकति में धन्ने ज्यू लागे ओ बड़ भागी रे ||911 गगाशहर की गंगा सेवा मे था । हम भी सौभाग्यशाली है कि आप जैसे पडदादोजी महाराज मिले तथा हमे ससुराल भी मैक्षव गण मे मिला। आपकी प्रपोत्रिया, भावना, सज्जन, प्रेम A00 - पूज्य पडदादोजी महाराज की सघ व सधपति के प्रति गहरी श्रद्धा थी। हम सब बच्चे जब दर्शन करते तो यही फरमाते कि टावरो ऐसा धर्म सघ कही नही मिलेगा। हम बच्चो मे वे धर्म के प्रति भावना पैदा करते, उनकी शिक्षाए आज भी याद आती है। आपके प्रपोत्र, खेतुलाल, कमल, विमल, पारस, सुमित, ऋषभ, रणजीत, जिनेद, मुकेश, राकेश, विकास -- - - 000 पूज्य नानाजी महाराज ने कभी भी ममत्व नही रखा । मेरे पिताजी श्री कोडामलजी का जब स्वर्गवास हुआ तब मै छोटी अवस्था मे ही था । उस समय मुझे व मेरी माताजी को आपने यही शिक्षा दी कि होनहार को कोई टाल नहीं सकता, अब धर्म का सहारा रखो तथा खोट कर्म को तोड़ो, ठीक रहेगा। आपका दोहित्र शातिलाल भसाली सब -- r न म रह तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी 11 47 मुनि श्री गंगारामजी सामाजिक रूढियों को पसन्द नहीं करते थे। एक बार 1989 मे मेरी माताजी ने अठाई की तपस्या पर गंगारामजी की प्रेरणा से ही लेन-देन की परम्परा नहीं रखने का निश्चय कर लिया जो सभी परिवारजनों को स्वीकार्य था। मृत्यु आदि अवसरों पर होने वाली रूढियों का भी उन्होने बहिष्कार किया। हम वहुत ही सौभाग्यशाली है कि मुनि श्री गगारामजी का बहुत वर्षो तक गगाशहर क्षेत्र में ही विराजना हुआ। इसी कारण आज सावणसुखा परिवार धर्म संघ की सेवा में पूर्णतया समर्पित है । मुनि श्री गगारामजी आज हमारे बीच नही रहे लेकिन उनकी शिक्षाए हमारे बीच सुरक्षित है । ----तोलाराम सावनसुखा nan पूज्य दादाजी महाराज मुनि श्री गगारामजी के दर्शन करते तो यह महसूस होता कि तपस्या के प्रभाव से इस अवस्था मे भी आपके चेहरे व आखो में शेर जैसी चमक है। उनकी हमेशा यही शिक्षा रहती कि मिलजुल कर रहना बडी चीज है तथा धर्म के प्रति गहरी श्रद्धा रहनी चाहिये । उनकी शिक्षाएं बहुत अमूल्य थी आपकी पौत्रवधुए, पुष्पा, सुन्दर, सरला, सरला OOD पूज्य दादाजी महाराज ने अपनी शिक्षाओं मे हमेशा गुरु व धर्म के प्रति अगाध श्रद्धा रखने एव जीवन मे जप-तप को बढाने पर बल दिया। वे कहते इसी में मनुष्य जीवन का सार है। उन्होने हमेशा भाई-भाभियो से मधुर सम्बन्ध रखने की प्रेरणा दी। आपकी पोत्रिया, सूरज, गुलाब 000 पूज्य पडदादोजी महाराज बहुत ही भाग्यशाली थे जिन्हे भिक्षु शासन एवं युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी जैसे गुरु मिले तथा 62 वर्ष की अवस्था मे दीक्षा का अवसर मिला। आचार्य-प्रवर की ही दृष्टि पाकर अन्त समय में दोनो मुनि पुत्रों का महयोग मिला तथा ससारपक्षीय भरा-पूरा परिवार निकट । 46 गगाशहर की गंगा
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मुनि श्री गगारामजी
मानव जीवन के चरमोत्कर्ष की ओर अग्रसर
} M vdos Manasa- मुनि श्री पूर्णानन्दजी पिताश्री को सम्बल प्रदान करते हुए । Preone ormonary HAN ४ मुनि श्री गगारामजी के दोनो सुत मुनि अन्तिम सेवा-सुश्रुषा कर पितृऋण से मुक्त हुए।
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मुनि श्री गगारामजी ने नश्वरदेह त्याग दिया।
उनका पार्थिव शरीर परिवारजनो व श्रावकों को सुपुर्द ।
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मोक्ष यात्रा से पूर्व वैकुण्ठ के पास मुनि श्री राजकरणजी, मुनि श्री पूर्णानन्दजी।
श्री रतनलालजी सावनसुखा जयघोष लगाते हुए।
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मुनि श्री का पार्थिव शरीर मोक्षयात्रा के लिए इस वैकुण्ठ से ले जाया गया।
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मोक्ष यात्रा शान्ति निकेतन से प्रारम्भ हुई। यात्रा का विहंगम दृश्य ।
चन्दन की चिता मे आपका दाह संस्कार किया गया। मुनि श्री का पार्थिव शरीर अग्नि पित करते हुए उनके ससारपक्षीय पौत्र श्री रतनलालजी एव श्री राजेन्द्रजी सावनसुखा
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। इन्द्रचन्दजी सावनसुखा मोक्ष घाट पर अन्तिम सस्कार के समय रस्म अदायगी करते हैं
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साली मुनिश्रीगंगाताजी स्वामी का जीवन परिचय
जन्मवि.सं.१८४६ विवाह वि स २८६१
दीक्षा वि स २००६
संपरा विस.२०४२ धिारणER:४२
तज्योतीपुगप्रधानमनलसांके शासन में
शतक सयमसागाएतरवासेएकात्तर
सपतयालाबीनपल्यावरत हए मतसमय
अपोदेतोपुत्रो मुनिश्रीराजकरणजीस्वामी
मोगांनन्दजीके सानिध्य मेमनशनकरके
दतमरणप्रातकियाआसोजसुदीरता.25-10-85
समगतिमेपोत्रोनेनाया विसावतर०४३
तीसोजसुदीर ता14-10-16
मलालइन्द्रबदविजयचन्दधर्मचन्द
राजेन्द्रकुमारसामसुखा मंगाशहर
म्मारक मे म्मृति अभिलेग
शूरवीर व्यक्तित्व मुनि मगनमल 'प्रमोद मै ससार मे कर्म बन्धन के कामो मे शूरवीरता दिखाने वाले अनगिनत पुरुष मिल सकते है पर कर्म काटने मे शूरवीरता दिखाने वाले विरले व्यक्ति ही निकलते है। उन विरले व्यक्तियो मे निकट सम्बन्ध होने के कारण कह सकता हूं कि मुनि श्री गगारामजी भी एक थे । गृहस्थाश्रम मे रहते हुए भी अनेक प्रकार के तप त्याग के द्वारा अपनी आत्मा को विमल बनाने का प्रयास किया, यहा तक कि श्रावक की ग्यारह पडिमाओ की साधना भी सम्पन्न की। 'ज्ञान क्रियाभ्या मोक्ष' का सिद्धात जीवन मे चरितार्थ किया। क्षयोपशम भाव के कारण थोकडो का एव सैद्धान्तिक तत्वो की काफी जानकारी प्राप्त की, वहा वीर्य अन्तराय के क्षयोपशम के कारण त्याग भावना मे काफी सफलता प्राप्त की । जीवन की तीसरी अवस्था मे अर्थात् 62 वर्ष की आयु मे पत्नी और पूरे परिवार का मोह त्याग कर युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी के कर कमलो से वि. स 2007 मे दीक्षित हुए। उसके बाद कुछ चातुर्मास मुनि श्री राजकरणजी के साथ मेवाड आदि स्थानो मे किये । पर अधिकतर चातुर्मास गगाशहर के आसपास के क्षेत्रो मे ही सम्पन्न हुए। अभी करीब 4 वो से तो गगाशहर मे ही स्थिरवासी थे । इस अवधि मे वि स 2039 मे आचार्य श्री तुलसी के आदेशानुसार गगाशहर सेवाकेन्द्र मे हम तीनो सहोदरो का प्रवास भी ग्यारह महीनों के लिए हुआ। उनकी भी हार्दिक इच्छा थी कि एक साल तीनो सहोदर मेरी सेवा मे रह जाये तो मेरे मन मे न रहे, उनकी यह भावना भी गुरुदेव की कृपा से पूर्ण हुई । अभी मुनि पूर्णानदजी करीब 3 साल से उनकी सेवा मे थे । पर इस बार सयोगवश मुनि श्री राजकरणजी भी अपने जीवन की प्रथम सुदूर क्षेत्रो की 6 वर्षीय लम्बी यात्रा सम्पन्न कर उनकी सेवा मे पहुच गये और उनको श्रेय प्राप्त होना था । अत. दोनो पुत्रो । 1 मुनि मगन, धर्म, फतह
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11 दिल की दो बातें मुनि पूनमचन्द - - . जन्म मे । (रात मे लगभग चार बजे मै सुख की नीद सो रहा था। अमृत वेला की शीतल लहरे खा रहा था कि आवाज आई ‘मत्थएण बदामि' मैने देखा एक वृद्ध मुनि की मूर्ति सामने खड़ी है, ऊँचा-सा चोल पट्टा, मैली सी पछेवडी, मुख पर मुहपत्ति और करबद्ध चेहरे पर दिव्य तपो तेज चमक रहा है।) पूनम : (चमककर) कौन ? तपसी मुनि गगारामजी | तपसी (नतमस्तक) हाँ आप के शरीर रतन के सुख साता है ? पूनम · गुरुदेव की कृपा दृष्टि से । परन्तु अभी अचानक कैसे आ गये ? तपसी : आप के दर्शनो की वडी अभिलापा थी, आपका उपकार मै जन्म- भूल नही सकता। वह छापर का आपके हाथ का तपस्या का घारणा याद आ रहा है । आचार्य श्री के दर्शनो के लिए मेवाड जाते हुए पीपाड के मार्ग मे जो आपने सेवा की वह स्मृति पटल पर अकित है और भी समय-समय पर मुझे आपकी शिक्षा तथा सात्वना का सम्बल मिलता रहा है। पर आप सथारे पर दर्शन देने नही पधारे? पूनम मै कसे आता, पाच-पच्चीस कोस पर होता तो आये बिना भी नही रहता, लेकिन मै बम्बई रहा, फिर भी मेरे सद्विचार आते रहे है । बतलाओ, स्वर्ग का क्या हाल है ? वहा का मुख-वैभव कैसा है? तपसी वाह ! वाह !! आप भी क्या मजे की बात कहते है ? जो मैने मर के पाया वह जिन्दे-जी को अनुभव कैसे कराया जा सकता है । उन 1. काल्पनिक की सेवा और पारिवारिक जनों की उपस्थिति मे अनशन व्रत स्वीकार कर समाधि के साथ अपने नश्वर शरीर का परित्याग कर स्वर्गवासी बने, यह अत्यन्त प्रसन्नता की बात है । जीना-मरणा महत्वपूर्ण नही, पर समाधि के साथ जीवन की यात्रा सम्पन्न करना महत्व की बात है। मुनिश्री गंगारामजी संसार पक्ष की दृष्टि से सगे मामाजी लगते है, इस दृष्टि से विशेष तौर पर उनके भावी जीवन के प्रति हम तीनो सहोदर मुनि हृदय से शुभ कामना करते है । वे जहां भी हों उनकी आत्मा को अमित शांति प्राप्त हो और कर्मों से मुक्त होकर शाश्वत सुखो को प्राप्त करे, यही मुनि श्री गगारामजी (संसारपक्षीय मामाजी) के प्रति हम सहोदर मुनियो की मंगल भावना है। एक प्रेरणा साध्वी पन्ना (दीर्घ तपस्विनी) गंगाशहर की धरती पर जब से तेरापथ का बीजारोपण हुआ है, उसे अभिसिंचित करने के लिए वह निरन्तर साधको को समर्पित करती रही है। इसी क्रम मे मुनि श्री गगारामजी का विशिष्ट स्थान है । गृह व्यवस्था से ही उनका साधना की ओर विशेष झुकाव हआ था। आगमकारो ने श्रावको में लिए एक विशेष साधनाक्रम दिया है । श्रावक-प्रतिमाओ का । उन्होने उसी साव्य को पाने के लिए स्वय को समर्पित किया। निष्ठापूर्वक ग्यारह श्रावक, पडिमाओं की परिपालना के बाद से वृद्धावस्था मे मुनि बने । त्याग तपस्या के के साथ चरित्र की निर्मत आराधना करते हुए उन्होने अपने लक्ष्य को प्राप्त किया। उनका यह भावना नाम जहा आत्मविकास का हेतु है, वहां पारि- वारिक जनो के लिए एक प्रेरणा। 1. tícity 50 गंगाशहर की - तपसी · वह नाटक मेरा भूल रूप देख रहा है। मैं तो उत्तर वैक्रिय रूप बना- कर यहा आया हूं। पूनम उत्तर वक्रिय रूप क्या लाख योजन का बनाया था। तपसी · यह पता नहीं, लेकिन रूप बहुत लम्बा-चौडा और ऊचा था। पूनम . बीच मे कितने देवलोक आये । ज्योतिश्चक्र तो आया ही होगा। तपसी : यह भी पता नहीं, मै तो पवनगति से चल कर आया हूं। पूनम : सिद्धान्त मे देवता की चार गति बतलाई जैसे- (1) चण्डागति-दो लाख तिय्यासी हजार पाच सो अस्सी योजन छह कला प्रमाण अर्थात् एक पादान्तराल (पावडे) मे इतना क्षेत्र उल्लघन करता है। (2) चपलागति-चार लाख बहत्तर हजार छ. सौ तैतीस योजन एक पादान्तराल मे क्षेत्र उल्लघन हो। (3) यातना गति-छह लाख इकसठ हजार छह सौ छयासी योजन चोपन कला एक पादान्तराल मे क्षेत्र उल्लंघन होता है। (4) वेगावती गति-आठ लाख, पचास हजार सात सौ चालीस योजन अट्ठारह कला एक पादान्तराल मे क्षेत्र उल्लघन होता है। इन चालो से चलने वाला देवता भी छह मास तक चले फिर भी मनुष्य लोक मे नही पहुच सकता है तो तुम कौनसी गति से आये हो। तपसी स्वामीजी ! यह पता नही, मैं तो आंख मूदकर और मुट्ठी मे थूक- कर दौडा आया हूं, लेकिन मनुष्य लोक मे आने से शरीर को सकुचाता-सकुचाता यहा तक यह रूप धार कर हाजिर हुआ है। पूनम जिसे गुरुदेव की दया दृष्टि से अनन्त ससारी से परीत ससारी बने । असयमी से संयमी बने, लाखो लोको के पूज्य बने, सलेखना सथारा भी आया। मनोकामना पूर्ण करने के लिए पाडाल मे सुरतरु फल लाया, उन आचार्य श्री तुलसी के दर्शन किये कि नहीं। तपसी . नहीं किए, अब जरूर करने का भाव है, उनकी करुणा से ही जीवन मन्दिर पर कलश चढा है। स्वामी भीखणजी के शासन जैसा शासन कहा पड़ा है मेरा भाग्य बड़ा जो स्वामीजी का शुद्धाचार और विमल विचार मिला है, अब आज्ञा हो? पूनम : तपसी सीमन्धर स्वामी के पास कुछ सवालो का जवाब लेना है। तपसी वे फिर क्या ? . -- 1. कल्पसूत्र की लक्ष्मीवल्ला भी टीका हिन्दी अनुवाद वाचना दूसरी । तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी 53 सुखो को जाहिर करने वाली यहाँ कोई वस्तु भी नही, जो उपमा दी जाए। पूनम : यह तो बताओ तपसी! तुम्हारी सभी मनोकामना तो पूर्ण हो गई? तपसी : हाँ! हाँ !! महाराज, मेरे जीवन में कमियां तो बहुत थी। लेकिन युग प्रधान आचार्य श्री तुलसी की मेहरबानी से-लोहे से सोना वन गया-शुद्ध समकित मिली, श्रावक व्रत मिले और श्रावक की ग्यारह प्रतिमा करने का शासन मे पहला मौका मिला। इकसठ साल की उम्र में मुझे संयम रत्न दिलाया, जन्मभूमि में रहने का वसर प्रदान किया, तपस्या का सहयोग दिया, सेवा मे एक-एक से बढकर सेवा भावी सत रखकर हाथों मे थुकाया। एक जीभ से गुरुदेव के गुणो का और उपकार का क्या वर्णन करू ! अन्त समय मे दोनों पुत्र सेवा मे रखाये, पोते-प्रपोते आदि परिवार वालो के सामने संलेखना संथारा भी आ गया, मेरी मनोकामना पूर्ण हो गई। पूनम : आने में दो-दो वर्ष का विलम्ब कैसे ? क्या नए प्रेम मे उलझ गये थे। तपसी · स्वामीजी! यह तो निमेण मात्र का भी काल नही, जहा उपवात शय्या मे जन्मा, उठकर बैठा हुआ देवताओ ने प्रश्न पूछे-कि किच्चा कि दच्चा आदि प्रश्नो का उत्तर भी पूरा नहीं दे पाया और अकस्मात आसन हिला कि मै यहा चला आया। पूनम : जहां पैदा हुए वहा देवियां मिली होगी। तपसी : वहां देवियों का नामो-निशा तक भी नहीं है । वहा तो देव ही देव मेवा में हाजिर राडे है। पूनग : तपसी ! वहां का आयुप्य कितना है ? नपमी : पता नहीं मै तो जन्मा ही ह, मरते किसी को देगा नहीं। पूनम : कौन से देवलोक मे गये हो? तपगी . 'यह अमुक देवतोक है' ऐगा बान तगा देगा नहीं तो क्या बतलाऊं? पूनम : अन्धा ! यह तो बताओ? एमा वाम कितने दिनों में गेते हो ? तपनी : यहां दिन-राज लामवाल ही नहीं है । यहा तो मूर्य में भी अगरय गुणा ने रत्नो मा हमेमा विराजमान है। अरे भोजानो। देवनी दिव्य नाटक देगा नहीं? ! ? 52 गगामदारकी मंगा विचित्रता का महान नमूना 0 साध्वी कमलश्री मुनि श्री गगारामजी ने जब से तेरापथ श्रमण-सघ मे अपना पदार्पण किया तभी से सभी के स्वरो में एक ही गूज थी कि धन्य है, उन्हे जो अपने जीवन की अतिम घडियो को तपस्या की आग मे तपाकर कुन्दन बना रहे है। उस समय उनकी उम्र लगभग 62 वर्ष की थी। श्रमण-दीक्षा से पूर्व श्रावक की 11 प्रतिमाओ की साधना उनकी तप आराधना का बहुमूल्य काल था। उनके जीवन मे विचित्रता का यह महान नमूना था। वहीं विचित्रता आगे जाकर उन्हे वैदेह अवस्था मे परिणत कर देती है और आज से 35 वर्ष पहले तीनो आश्रमो की अवस्थाओ को पारकर सन्यासाश्रम मे प्रविष्ट हो गए । आप धन-वैभव, पुत्र और पौत्र, विशाल स्थान और समाज मे अजित विपुल प्रतिष्ठा के होते हुए भी आत्म साधना का निर्णय लेकर निकले। इस धरती के सस्कारो का परिणाम है कि उनसे पहले उनके छोटे-पुत्र मुनि श्री राजकरणजी ने साधुव्रत स्वीकार किया और आपके वाद माठ वर्ष की उम्र मे अपने पिता की परम्परा मे कड़ी जोडते हुए दूसरे पुत्र मुनि श्री पूर्णानन्दजी ने भी अनुसरण किया शालीभद्र की सी ऋद्धि का त्याग कर भगवान महावीर के शासन की शोभा को बढाया। आचार्यप्रवर ने अपने पिता श्री की सेवा मे रखवाने की कृपा की। उनके प्रथम दीक्षित किन्तु छोटे पुत्र मुनि श्री राजकरणजी अभी-अभी बगाल, विहार, आसाम, सिक्किम, मेघालय, त्रिपुरा, नागालैण्ड, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश, नेपाल, भूटान आदि की यात्रा सम्पन्न कर आए थे कि आगम दृष्टा आचार्य-प्रवर ने निकट भविष्य को देखा और दोनो ही पुत्रो को उनकी सेवा के लिए गगाशहर मे नियुक्त कर दिया। सौभाग्य से जन्मने वाले, सौभाग्य से पलने वाले तथा सौभाग्य से ही इस शासन नन्दन-वन की मौज उड़ाने वाले मुनि श्री गगारामजी को गुरुदेव की शुभ दृष्टि से दोनो पुत्रो की सेवा मे गगाशहर की पुण्य धरा पर समाधि मरण प्राप्त हुआ। - पूनम : मै कौन से देवलोक में हूं, मेरी दिव्यायु कितनी है और मोक्ष जाने मे कितने भव बाकी है ? तपसी . आपने बहुत ही सुन्दर सुझाव दिये है, मै अभी महाविदेह क्षेत्र मे जाता हू (हाथ जोड कर) मत्थयण वदामि ! (दिव्य शक्ति लोप हो गई ) । इधर मेरी आख भी खुल गई। . मत्यु को महोत्सव बनाया साध्वी राजीमती जैन धर्म मे साधु का जीना और मरना दोनो महत्वपूर्ण माना है । जब तक सासे चलती है, साधु बडी जागरूकता के साथ सयम पालता है। जब मृत्यु की पदचाप सुनाई देती है तो उसे भी अभय बनकर समत्व से स्वीकार करता है । सलेखना संथारा कर भेद विज्ञान का अनुभव करता है । मुनि श्री गगारामजी स्वामी ऐसे ही तप पूत आत्मा थे जिन्होंने कलात्मक ढग से जीना भी सीखा और मरना भी। प्रौढावस्था मे गृहस्थ जीवन का व्यामोह तोड़कर साधु जीवन स्वीकार किया। अहिंसा, सयम और तप की साधना मे उतर गए। उन्होने उम्र के साथ कभी समझौता नही किया। उनका आचापक्ष बहुत मजबूत था। सघीय मर्यादाओ के प्रति बड़े राजग थे । तपस्या का क्रम निरन्तर चलता रहता । अपनी दृढ सकल्प शक्ति से मृत्यु को भी महोत्सव बना दिया। ऐसी पवित्र मात्मा को मेरा शत-शत नमन। धुन गुरु भक्ति की साध्वी भाग्यवती वयोवृद्ध, सघनिष्ठ मुनि श्री गंगारामजी स्वामी को ग बार निकटता में देखने का मौका मिला। उनकी गुरु-मस्ति, चरित्ररमण और तपस्या की धुन का भी घोडाबरत अनुसरण हम भी करेंगे तो अवश्य भिक्ष शामन ..-+mr meanir निष्पाप जीवन जीया मुनि पूर्णानन्द मेरे ससार-पक्षीय पिताजी मुनि श्री गगारामजी का समाधि-पूर्वक पडितमरण हुआ, प्रसन्नता है । आपने हमे जन्म दिया, पाल-पोप कर बडा किया। अच्छे संस्कार दिये। महान् उपकार किया। माता-पिता के उपकार से उऋण होना बहुत कठिन है। मुझे कुछ ऐसा अवसर मिला इसलिए मै अपने आप मे आनन्दानुभूति कर रहा हू परमाराध्य गुरुदेव आचार्य श्री तुलसी ने मुझे महाव्रत दीक्षा देकर आपकी सेवा मे रखाने की जो कृपा कराई, उसके लिए मै आचार्य श्री का अत्यन्त आभारी हूं। मुनि श्री गगारामजी ने निष्पाप जीवन जीया। श्रावकपन तथा साधुपन मे कड़ी करणी की। अत मे आमरण अनशन कर महाप्रयाण कर गये। अब आपकी आत्मा निरन्तर प्रगति पथ पर बढती रहे और शीघ्रतया सिद्ध पद प्राप्त करे। इसी मगल-भावना के साथ- अटूट श्रद्धा साध्वी कंचन रेखा जब-जव वयोवृद्ध, शात-स्वभावी बावे को देखती तब, मन मे आता कि इतनी वृद्ध अवस्था मे गुरुदेव के प्रति उनकी श्रद्धा कितनी अडोल है । हसमुख चेहरा, हाथ की माला अप्रमादी जीवन जीने की प्रेरणा देती थी। अधिक क्या कहूं-यह शासन नदनवन है, एक-एक से बढकर ज्ञानी, ध्यानी, तपस्वी साधु- साध्विया हुवे है उनमे आपका नाम जुड़ गया है। इसी आशा और विश्वास के साथ उनकी आत्मा के प्रति सत्कामना ।
यों जीवन को धन्य बनाने वाले मुनि श्री गंगारामजी संसार-पक्षीय परिवार के घेरे से निकलकर भी उनके परिवार का बहुत बडा घेरा इस संघ में उनके सामने रहा। दो पुत्र, एक दोहिनी, 3 भानजे मुनि श्री मगनमलजी आदि भाई, एक भाणजे की बहू', भाणेज पुत्र मुनि श्री मुनिव्रतजी, दो पोत्रिया साध्वी श्री चन्दा कुमारी, साध्वी श्री शान्ताकुमारी। साली की पुत्री साध्वी विनय श्री जी, एक पड़-दोहित्री साध्वी मधुर यशा। दिवगत आत्मा के प्रति कोटि-कोटि नमनपूर्वक श्रद्धाजलि । 0 जीवन समाधिमय बना मुमुक्ष शान्ता वह व्यक्ति स्वय अपने आप में एक प्रेरणा है जो सोचने और करने के बीच दूरी नही रहने देता। मुनि गंगारामजी स्वामी ऐसी ही एक प्रेरणा थे जो संकल्प की पूर्ति मे कमी किसी के साथ समझौता नहीं करते। मैं बचपन से उनके दर्शन करती आई हूँ। हर वार ही शिक्षा देते-'लिए गए संकल्पो को कभी मत तोड़ना'। उन्होने जीवन को बड़ी नजदीकी से जीया था, शायद यही कारण होगा कि उन्होने प्रौढ़ता तक आते आते सांसारिक रिश्तो को अलविदा कह दिया । वर्षों का अनुभव उनके साथ था। शिशु-सी निश्छलता, युवा-सी समक्ष और वृद्ध-सी दूरदर्शिता उनके हर व्यवहार मे झांकती थी। वे अहिंसा, संयम ओर तप को माधना में चट्टान से कठोर थे तो व्यवहार के क्षेत्र मे मोम से कोमल भी । उनका सम्पूर्ण जीवन समाधिमय बना रहा। बड़ी शूरवीरता के साथ उन्होंने मौत को महोत्सव का रूप दिया । उस दिव्यात्मा को शत-प्रात प्रणमन। PyaNP 1. गादीनिंगयात्री 2. मित्री पडिमाधारी महाव्रती मुनि ताराचन्द - 'ज से य त समायरे-जो श्रेयकारी है उसका आचरण करना चाहिए। इस आर्षवाणी के आलोक मे व्यक्ति को चिंतन-मनन पूर्वक अपने जीवन को एक नया मोड देना चाहिए। यदि जीवन मे नया कुछ करना है तो आवश्यक है कि व्यक्ति अपनी चिर पालित मोहमूर्छा को तोडने के लिए नया उपक्रम प्रारम्भ करे। वह उपक्रम है--धर्म । अहिसा, सयम और तप, यही धर्म का सही लक्षण है । उसका आचरण ही व्यक्ति को प्रकाश, शाति और अमरतत्व प्रदान करने वाला होता है। भगवान महावीर वाणी मे दो प्रकार के धर्म की व्याख्या भी उपलब्ध है-अणुव्रत धर्म और महाव्रत धर्म । अणुव्रत सद्गृहरथ बनने का और महाव्रत आत्मा से परमात्मा की ओर बढने का सद्प्रयत्न है। एक कठिन और दूसरा कठिनतम साधना-पथ है। जिसका जितना मनोबल, शरीरबल होता है उसी के अनुसार मार्ग का चुनाव किया जाता है । आज भी अनेक व्यक्ति आचार्य के नेतृत्व मे अपने जीवन को उजागर करने, दोनो मे से एक मार्ग पर चलने के लिए प्रस्तुत होते है। तेरापथ परम्परा मे अनेक-अनेक व्यक्तियो ने महाव्रत धर्म स्वीकार किया है। उनमे लघु, तरुण तथा प्रौढ अवस्था मे दीक्षा लेने वालो की संख्या अधिक है किन्तु कुछ वृद्ध अवस्था प्राप्त श्रावक भी महाव्रती बने है। उनमे एक वृद्ध मुनि गगारामजी का उल्लेख करना चाहता है। जिन्होने वासठ वर्ष की अवस्था तक श्रावक के व्रतो तथा प्रतिमाओ की महत्वपूर्ण भूमिकाओ को पार किया तत्पश्चात् महाव्रती दीक्षा लेकर एक अनूठा कार्य किया। इस अवस्था मे कठोरतम पथ पर कदम रखना अपने आप मे विस्मयकारी है। इससे भी अधिक उल्लेखनीय उनका तपस्वी जीवन है। पैतीस वर्ष की इस दीक्षा पर्याय मे उन्होने जिस सुदीर्घ तपस्या का जीवन जीया वह उनके जीवन का महत्वपूर्ण पहलू है।
तपस्वी जीवन मुनि बुद्धमल 'निकाय प्रमुख' - । त्याग और तपस्या का मार्ग तलवार की धार पर चलने जैसा कठिन है । अत्यन्त साहसी और सकल्पी व्यक्ति जब भव विरक्त होता है तभी उस पर चलने का अधिकारी होता है, अन्यजनो के लिए तो वह मार्ग दुर्गम ही नहीं अगम होता है । मुनि गंगारामजी उन साहसी और सकल्पी व्यक्तियो मे थे, जिन्होने उस मार्ग का अवगाहन के लिए अपनी क्षमताओ का विकास किया और आगे बढ़े। गंगारामजी गृहस्थ जीवन से ही धार्मिक-वृति के व्यक्ति थे, त्याग और तपस्या की भावना को माने वे अपने पूर्व सस्कारो मे सजोकर लाये थे। वे ही सस्कार काल परिणति के साथ विकसित होकर उन्हे आगे से आगे बढाते रहे, सम्यक्त्वी और बारहव्रती बनने के पश्चात् वे प्रतिमाधर श्रावक वने, श्रावक की ग्यारहों प्रतिमाओ की साधना करने वाले अपने समय के वे प्रथम श्रावक थे। वृद्धावस्था के द्वार पर पहुंचते ही 62 वर्ष की अवस्था मे तो उन्होने स्वय को धर्म के लिए पूर्णत समर्पित कर दिया था। आचार्य श्री तुलसी के पास श्रमण धर्म की दीक्षा ग्रहण कर वे तपस्या मे लग गये। उनका पूरा साधु जीवन एक तपस्वी जीवन की कहानी है। सत्तानवे वर्ष की पूर्णायु तक वे एकान्तर तप करते रहे। बीच-बीच मे अन्य बड़ी तपस्याएं भी चलती रही। अत मे अनशनपूर्वक उन्होने देह त्याग किया। तेरापथ की गौरव वृद्धि मे ऐसी हुतात्माओ का त्याग और तपोवल निरन्तर लगता रहा है।
कीर्तिमानों की सीढ़िया : ऊर्वारोही व्यक्तित्व मुनि धर्मचन्द 'पीयूष जीवन प्रसून मे परिमल भरते है-तप-संयम, शम-दम और ब्रह्मचर्य । भैक्षव गण एक सदावहार नन्दनवन है, जिसका बीजारोपण कर अपने खून- पसीने से सीचा आचार्य भिक्षु ने । मर्यादा और अनुशासन का खाद-पानी देकर नव-नव प्रयोगो से प्राणवान बनाया उत्तरवर्ती गणपालकों ने। नवमाधिशास्ता अमृत-पुरुष आचार्य श्री तुलसी व प्रज्ञा पुरुष युवाचार्य श्री महाप्रज्ञजी सह सृष्टि की अमीवृष्टि से महकता-गमकता यह उपवन विश्व की नजरो मे समा गया है । बहुरंगी गुलाबी फूलो वाले इस उपवन के कुछ फूल किशोरावस्था व तरुणावस्था से ससार को सौरभ देने लगते है, तो कुछ ढलती वय से । ऐसा ही एक महकता-गमकता फूल है तेरापथ धर्म-संघ के साधु समाज मे सर्वाधिक दीर्घायु प्राप्त मुनि श्री गंगारामजी। मा मीरा और पिता श्री खुमाणचन्दजी सावनसुखा के इस लाडले लाल का जन्म बीकानेर जिला के रुणिया नामक गाँव मे हुआ। बालक को माता की ममता भरा साया कम मिला, दादीजी की छत्र-छाव मे वह पला-पुसा व बडा हुआ। तत्कालीन प्रथानुसार अल्पायु मे ही श्रीडूगरगढ के श्री नथमलजी चौरडिया की सुपुत्री नानु देवी के साथ विवाह सम्पन्न हो गया। वि स. 1983 मे तेरापथ धर्म-सघ के अष्टमाचार्य श्री कालूगणी का गगाशहर पावस- प्रवास सुनकर, रुणियां गांव से सपरिवार गंगाशहर मे आकर बस गये और आर्थिक सामाजिक व धार्मिक दृष्टि से प्रवर्धमान बने। श्रीगगारामजी का संत-समागम, थोकडो का ज्ञान व अनुभव जैसे-जैसे परिपक्व होता गया, वैसे-वैसे, सामायिक संवर, पौषद्य, तप-जप तथा श्रावकपन मे निखार आता गया। तीर्थंकर महावीर के युग मे आनन्दादि, , स्थविर वय में-दीक्षा लेना, लम्वा तप करना, शताब्दी के करीब पहुंच जाना और अनशन द्वारा समाधि मृत्यु प्राप्त करना यह सब तेरापंथ इतिहास मे एक घटना हो गई। कई वर्षों से वे संघीय सेवाए ले रहे थे। उस शृखला मे पूज्य श्री गुरुदेव ने एक सेवा का सुअवसर मुझे भी प्रदन किया । वृद्ध, रुग्ण, बाल...मुनि आदि की सेवा करना हमारा आत्म धर्म है और सुखद संघीय जीवन का अनुपम सूत्र है। वृद्ध मुनि श्री गगारामजी भाग्यशाली थे कि युगल पुत्र मुनि श्री राजकरणजी तथा मुनि पूर्णानन्दजी के हाथो मे समाधि मरण प्राप्त कर जीवन को धन्य बनाया । गंगाशहर के गौरवशाली संत भंवरलाल बोथरा मुनि श्री गंगारामजी बड़े सरल स्वभावी, सबसे बड़े प्रेम से मिलने वाले, सरल भाषी उपदेशक थे । आप गगाशहर के गौरवशाली सन्त थे, तो गगाशहर श्रावक आपको लेकर गौरवान्वित थे। आपके रहते गगाशहर के शान्ति- निकेतन के 24 घण्टे चहल-पहल रही । आपके सेवी-सन्तो मे नया आनन्द, उत्साह और लगन बराबर बनी रही। मै स्वामी पूर्णानदजी की मुक्तकंठ से प्रशंसा करता हूं जिन्होने सत खेतसीजी और तपस्वी सत गंगारामजी स्वामी की दिल खोलकर अग्लान भाव से सेवा कर एक आदर्श उपस्थित किया है। अब गंगारामजी स्वामी के न रहने से गगाशहर शाति-निकेतन सूना- सूना सा लगेगा। मैं कोटि-कोटि वन्दन करता हुआ दिवंगत आत्मा की शाति और मुक्ति की कामना करता हूं। 60 मंगाशहर की गंगा Aw K -- तो यह वना कि उनके दोनो सुपुत्र मुनि उनकी सेवा मे रहे । प्रथम पुत्र मुनि श्री पूर्णानन्दजी गत 7 वर्ष पूर्व दीक्षित होकर अधिकाश समय सेवा मे रहे। द्वितीय पुत्र मुनि श्री राजकरणजी, जो अभी छ: वर्षों से पूर्वाचल की सफल जन कल्याणी यात्रा पर थे, गुरु कृपा से वे भी सेवा मे पहुच गये । बन्धुद्वय धर्म सहयोग देकर परम चित्त समाधि प्रदान कर पितृ-ऋण से मुक्त हुए । विज्ञप्ति सख्या 768 मे दिवगत मुनि श्री के बारे मे परमाराध्य आचार्य प्रवर ने जो फरमाया उसमे भी एक वाक्य है 'आज वे पितृ-ऋण से मुक्त हो गये है। वि. स. 2042 आश्विन शुक्ला 11 वृहस्पतिवार को 12 33 पर तिविहार अनशन, आश्विन शुक्ला वारस शुक्रवार को 1.17 बजे चौविहार अनशन कर, 1 58 पर चढ़ती भाव-श्रेणी मे उन्होने पंडित मरण का वरण किया । श्रावक पडिमा, वृद्धावस्था मे चारित्र ग्रहण, 35 वर्ष चारित्र पर्याय का पालन एव तेरापथ धर्म-सघ के साधु-समाज मे सर्वाधिक दीर्घायु प्राप्त तपस्वी जीवन जैसे अनेक कीर्तिमान स्थापित कर जन्म को धन्य बनाया। हृदय वोल उठता है। कोई हस के मरा, कोई रो के मरा। जिंदगी पाई मगर, जो कुछ हो के मरा ॥ . उच्च मनोबल के धनी पूनमचन्द सेठिया तपस्वी मुनि श्री गगारामजी की महानता जबरदस्त थी । तपस्वी मुनि बडे उच्च मनोवल के धनी थे। धर्म-शासन की बहुत गरिमा बढाई । शासन पर कलश चढा दिया, बहुत से कीर्तिमान स्थापित किए । उनका जीवन एक खुली पुस्तक के समान था। सथारे का और सतो की सेवा का बहुत अच्छा मौका मिला। बडे भाग्यशाली थे। आप उत्तरोतर अपने सिद्ध-बुद्ध लक्ष्य की और बढते रहे, यही मगल कामना करता हूँ । शासन साक्षात् कल्पतरू चिन्तामणि नन्दनवन है । एक से एक तपस्वी शासन मे हुए है । 1 दोनो दीक्षित सुत सेवा मे, अत समय मे थे हाजिर, सौभागी वे थे पूरे, है मिला योग अनशन का फिर, हम भी गौरवान्वित आज अपार है । मुनि फतेहवन्द पकज 2 सरदारशहर तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 63 - ख्यातनाम, श्रमणोपासकों ने श्रमणोपासक की ग्यारह प्रतिमाए1 पूर्ण की थी, किन्तु विगत 2500 वर्षों के इतिहास मे संभवतः यह प्रथम उदाहरण है कि श्री गंगारामजी ने श्रावकत्व की वह उत्कृष्ट तप साधना कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। उससे प्रसन्न होकर आचार्य-प्रवर श्री तुलसीगणी ने वि सं. 2007 पोष सुदी सप्तमी के दिन 62 वर्ष की वृद्धावस्था मे जैन अर्हत दीक्षा प्रदान की । लगता है कि आचार्य देव की प्रजागरित प्रज्ञा मे भविष्य झलक रहा था कि ये लम्बे समय तक चारित्र पर्याय पालन करते हुए तपस्वी जीवन से शासन सुषमा बढायेगे। 1 साधुत्व चमकता है-तप-जप, स्वाध्याय और ध्यान द्वारा । मुनि श्री गंगारामजी ने तप-जप मे अपने जीवन को झोक दिया। सहस्त्रों उपवास, सकडो बेले-तेले और एक से पैतीस तक की एक श्रेणी तथा दूसरी एक से इक्कीस तक की श्रेणी पूर्ण की। विगत वत्तीस वर्षों से एकान्तर तप किया। लगता है-तप ने ही उनको सताणवे वर्ष की स्वस्थ दीर्घायु प्रदान की। विज्ञप्ति संख्या 692 मे परम श्रद्धेय युवाचार्य श्री महाप्रज्ञजी का उपवास विषयक वक्तव्य इस तथ्य को उजागर कर देता है । उसका एक अंश इस प्रकार है-'हम खाते है इसलिए नही जीते है, किन्तु नही खाते है इसलिए जीते है । हमने देखा है, अधिक खाने वाले जल्दी मर गये, मर जाते है और जिन्होने कम खाया, रोज नही खाया, वे दीर्घायु बन गए । दीर्घायु बनने का एक कारण है कम खाना, प्रतिदिन न खाना, एकान्तर उपवास करना । जिन- जिन लोगों ने एकान्तर उपवास किए, उन्होने दस-बीस वर्ष की आयु बढा ली।' तीन वर्ष पूर्व हमे हमारे ससार पक्षीय मामाजी की सेवा करने का अवसर गुरुदेव की कृपा भरी आज्ञा से मिला। हमने देखा 94 वर्ष की लम्बी उम्र में भी उनके आंख-कान आदि सारी इन्द्रियाँ सक्षम थी, आवाज बुलद थी, स्मरण शक्ति प्रखर थी। वे वडे सौभाग्यशाली निकले कि इतनी वृद्धावस्था मे साधुत्व स्वीकारने के बावजूद गुरुदेव की उन पर असीम कृपा दृष्टि रही। विगत 28 वर्षो से बीकानेर चोखले मे विहार और अनेक वर्षों से गगाशहर स्थिरवास मे शासन नायक की ओर से काफी सम्मान मिला। पूरे चोखले के लोग उनके तपोमय जीवन के प्रति श्रद्धावनत थे। सबसे महत्वपूर्ण सुयोग 1. श्रावक को उत्कृष्ट साधना 2. मुनि श्री मगनमलजी 'प्रमोद', मुनि श्री धर्मचन्दजी 'पीयूप', मुनि श्री फतेहचन्दजी 'पकज' 3. मुनि श्री गगारामजी 62 गगागहर की गंगा मानसिक विशुद्धि का प्रशस्त एवं सुन्दरतम प्रसाधन है। मुनि श्री ने दीक्षा काल से अन्त तक एकान्तर तप तो किया ही साथ-साथ बीच मे कई बार तप के लम्वे थोकड़े भी करते रहे। कह सकता हू उनका सारा जीवन तप की लम्बी कहानी वन गमामागचा उन्होने अपने सारे परिवार मे धर्म के अच्छे संस्कार जो भरे हैं उसका उदाहरण सबके सामने है। उनके सुपुत्र मुनि राजकरणजी तथा मुनि पूर्णानन्दजी ने भी दीक्षा व्रत स्वीकार किया। अन्य पारिवारिक जनो मे भी जो अध्यात्म का अकुर प्रस्फुटित है यह सब मुनि प्रवर का हान है। 97 वर्ष की प्रलम्ब अवस्था मे महाव्रती दोनो ही सतो (पुत्रो) के FE हाथों में समापूर्वीचीधहारभिशन कर गंगाशहर मा गर्व स 2042 HIP औंसीज सुंदी का स्वर्गवासाचन गये। सरि समाज का प्रशस्तत्तम चिन्ताया कि मुनिश्राम सिौ वर्ष तक सयमी जीवन जकर मैक्षव सघाम एक मिनियामावरिणाम महासामाड किन्तु कुटिलकाल कारकुटिलता के TFधार्गे हर इन्सीन निस्तेजवन जाता | FREET कि TRIPTE जिग fer for fre 1 by PETTE-ETH FEETE FT में fir pos SO TIFFTF FPIFE 1 1517FFE 1F TFT TITS BEFTE FIF 14 Bits TUFEPIA É FETE FPE APIE I T F gati 1rſs IS A PTTE FI I & IPISE 1f57T FF FFIS IT F16 FEW JIPPREEF-les यदि शतक बन गया होता 1517-78175 511€ JETSITTI JFIFTH TUETT 11SFF FF 1P78 F IPES šs 3F P5 555JFT PIE £ ÏPF 555 I TEE IFFjTplfplate म> IF कामहस्या से अपने को मुनित मे लगा देत एका साहसरा निर्णय PTF है, इसअिहमधा मातोशदी-असम चाहता है।HTFT मुनिम्मी सगा कामजी PTIODरामा विविसी को छोड़कर सपना का चुनौती भुरा मार्ग स्वीकार PHiकिन माज्यतुहा महाकल्पना नही सी-शिकिउनकी साधु पर्याया इतनी कि हो जायेगी अपने हद सहनन के कारण होते इतकालकी आयु FFत की विशाहाने यामथ सामघसे एक कीर्तिमान बन गया। कोतरे साध्वी ite समनश्यामातुशी छरेजी तथा साक्षी बदनामी ने सदीर्घ आयु मात की यो, पर सत सम्हास से इससे अधिक आयु किसी से पानही की दीक्षा लेने के बाद भी तपस्या का क्रम चलता रहा। उनकी लम्बी आयु का शायद यहा रहस्य धात्री घायाम्मुनि श्री गजकरणन्तिी पहले से ही दीक्षित थे पर # मुनि मामी की ताउन्होंने ही अपनी और आकृष्ट किया न्याय एस श्रद्धालु कौरपरिकासमी कम होमिलते है मिविचार करता हूं विदि मुनि श्री गगारामजी शतक पूरा कर जन्ति तर वितिनीम्सुखद बात होती fPTEFE I TET हरि मुनि सुखलाल त तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 65 अध्यात्म के धनी मुनि कन्हैयालाल तेरापथ धर्म-संघ एक तेजस्वी गौरवशाली संघ है। ज्ञानाराधना, दर्शानाराधना, चरित्राराधना एवं तपाराधना के चार अडिग खम्भों पर तेरापंथ समाज की विशाल-अट्टालिका हिमालय की भाँति सुशोभित हो रही है। इस संघ की गौरव गरिमा को वृद्धिगत करने में अनेक साधु-साध्वियों ने तप की बलिवेदी पर अपने जीवन को न्यौछावर किया है। शासन की प्रभावना में उनका जो महत्वपूर्ण योगदान रहा है, वह युग-युग तक इतिहास मे स्वर्ण अक्षरों मे अकित रहेगा। उनमे से कुछ साधु-साध्वियो ने भयकर से भयकर तप कर जैन समाज के समक्ष एक अनुपम उज्ज्वल आदर्श स्थापित कर दिया जो ढाई हजार वर्षों में भी सभव न हुआ हो। भद्रोत्तर, महाभद्रोत्तर, लघु सिंह निक्रीडित, रत्नावली, बारहमासी आदि भयंकर तपस्या का लेखा-जोखा पढने से ऐसा प्रतीत होता है कि कलिकाल मे भी सतयुग का अद्वितीय साकार दृश्य उन्होने प्रस्तुत किया। मुनि श्री कोदरजी, मुनि श्री शिवचन्दजी, मुनि श्री गुलहजारीजी आदि अनेक तपस्वी सन्तो ने शासनवट-वृक्ष को पल्लवित एवं विकसित करने में जो कुर्वानी की, वह सदा सदा के लिए अविस्मरणीय रहेगी। उन्ही तपस्वी सतो की शृखला मे मुनि श्री गगारामजी का नाम जिह्वान पर आए बिना नही रह सकता, जिन्होने बासठ वर्ष की अवस्था तक श्रावक के व्रतो तथा प्रतिमाओ की महत्वपूर्ण भूमिका निभाने मे सफलता अर्जित की। इतनी वृद्ध अवस्था होने के पश्चात् आचार्य श्री तुलसी के कर-कमलो द्वारा हिसार (हरियाणा) में उन्होने सयम पथ स्वीकार कर जनता के समक्ष एक अनूठा उदाहरण प्रस्तुत किया। यह उनके जीवन की विशेष उपलब्धि मानी जाती है। इस अवस्था मे ऐसे कठोर तप नियमो का पालन करना राधावेध साधना है । काटो के मार्ग-पर चलना सरल हो सकता है किन्तु मुनि साधना के पथ पर अग्नसर होना दुरूह से भी दुरूहतर कार्य माना गया है । तप-जप मे लीन रहना - तपस्वीजी महाराज के संसार-पक्षीय दो पुत्र रत्न अवधानकार मुनि श्री राजकरणजी, सेवाभावी मुनि श्री पूर्णानन्दजी काफी वर्षों से अपने पूज्य पिता श्री की सेवा में संलग्न थे। मुनि श्री पूर्णानन्दजी ने अग्लान भाव से पितृ-सेवा का जो उदाहरण प्रस्तुत किया है, तेरापथ धर्म-सघ की धरोहर बन गई है। मुनि श्री पूर्णानन्दजी ने धर्मशासन का गौरव बढाया है। मेरा बीकानेर चोखले मे तीन वर्षों तक लगातार रहना हुआ। मै गगाशहर शेप काल मे काफी महीनो तक वृद्ध सतो की सेवा में भी रहा। गंगाशहर सेवा केन्द्र मे मुनि श्री गुणचंदलालजी, मुनि श्री खेतसीजी, मुनि श्री पूनमचन्दजी, मुनि श्री लालचन्दजी और तपस्वी मुनि श्री गगारामजी विद्यमान थे। सेवा- केन्द्र के सतो की सेवा मे, सस्कृत आदि अनेक भाषाओ के विद्वान, मिलनसार मुनि श्री राकेशकुमारजी, शूक्ष्म लिपिकार मुनि श्री हर्षलालजी, सेवाभावी मुनि श्री पूर्णानदजी, मुनि अभिनदनजी और मुझे भी सेवा का सुन्दर अवसर मिला । तपस्वीजी का और मेरा ससार-पक्षीय मकान बहुत निकट है, पडौसी होने के नाते भी मुझे बहुत-बहुत खुशी है । तपस्वी मुनि श्री गगारामजी का अनशन व समाधिपूर्वक स्वर्गवास हो गया, वे अपने जीवन पर कलश चढा गये और साथ-साथ तेरापथ शासन का गौरव सतगुणित कर गए । इस बात की मुझे बहुत-बहुत प्रसन्नता है । । - । सोने मे सुगन्ध - -- मुनि श्री राजकरणजी सम्वत् 2035 राजलदेसर मर्यादोत्सव के पश्चात् कलकत्ता, वगाल, आसाम, विहार, नेपाल आदि प्रातो की पदयात्रा पर पधार गए। लगभग 6 वर्षों तक विविध प्रातो की यात्रा सम्पन्न करके शीघ्र गति से चलकर जसोल मर्यादा महोत्सव पर पूज्य गुरुदेव के दर्शन किये । युग प्रधान आचार्य श्री ने महती कृपा करके मुनि श्री राजकरणजी के विषय मे महत्वपूर्ण शब्द फरमाये। अत' यात्रा की महत्ता स्वयं सिद्ध हो गयी। प्रकाशपुज, दूर- द्रष्टा आचार्य श्री ने पूर्ण कृपा कर सेवा केन्द्र गगाशहर मे आपकी नियुक्ति करके सोने मे सुगन्ध वाली कहावत चरितार्थ की है। मेरा मानना है, जीवन के अन्तिम समय तक दोनो पुत्रो का सयोग मिलना गुरुदेव की महती कृपा का ही फल है। - एक ही परिवार की अनेक दीक्षायें तपस्वी मुनि श्री गगारामजी के ससारपक्षीय दो सुपुत्र रत्न मुनि श्री राजकरणजी, सेवा-भावी मुनि श्री पूर्णानदजी बडी उम्र मे दीक्षित होकर भी - 67 तपस्वी मुनि श्री गगारामजी गृहस्थ जीवन भी धर्ममय मुनि मूलचन्द 'मराल' तेरापंथ धर्म संघ गौरवशाली एवं प्रगतिशील धर्म-संघ है । इस धर्मस मे आचार्य भिक्षु से लेकर अनेक महान् आचार्य हो गये है । वर्तमान मे परम पावन, ज्योति पुरुष, युग प्रधान आचार्य श्री तुलसीगणी व अनुत्तर ध्यान योगी, प्रज्ञा पुरुष अन्तर प्रज्ञा के उद्घाटक युवाचार्य श्री महाप्रज्ञ नये-नये आयामो को जोडकर धर्म संघ का विकास कर रहे है । गौरवशाली धर्म सं मे अनेक तपस्वी साधु-साध्वियां हुए है । इसी कडी में मुनि श्री गंगाराम का नाम गौरव के साथ लिया जा सकता है। आपने लगभग 62 वर्षों में प्रौढ़ आयु मे दीक्षा स्वीकार की । आपने अपने जीवन में मासखमण आ वड़ी-बडी तपस्याएं अनेक बार की है। शासन की गरिमा को बढाया है । इ वो मे आपका वृद्ध अवस्था के कारण भीनासर, गगाशहर आदि आस-पा के क्षेत्रो मे काफी विराजना हुआ। बहुत वर्षो से आप एकान्तर तप कर र थे, बीच मे कभी-कभी जब मन होता तो बड़ी तपस्या भी कर लेते थे । इ प्रकार मुनि श्री गगारामजी का जीवन त्याग तपस्या प्रधान रहा है । आ आयु की दृष्टि से लगभग 97 वर्ष तक पहुच गये, इतनी लम्बी आयु तेरापः धर्म सघ के संतो मे कीर्तिमान है। तपस्वीजी का गृहस्थ जीवन भी धर्ममा था । आपने अपने जीवन मे श्रावक की ग्यारह प्रतिमाओ की आराधना के है । तपस्या के क्षेत्र मे आप शुरू से ही आगे रहे है । तपस्वीजी का गृहत्य: मुनि जीवन दोनो ही मुखमय, शातिमय, वैराग्यमय, आनन्दमय और धर्मनिष्ठ जीवन रहा है । इस दृष्टि से आप पूरे पुण्यवान आपकी ससारपक्षीय धर्मपत्नी भी धर्मपरायण महिला थी। तपस्या के क्षेत्र मे उनका भी महत्वपूर्ण स्थान रहा है। उन्होने भी अपने जीवन में मासखमण और बड़ी तपस्याए खूब की थी । वह त्याग और बैराग्य की प्रति मूर्ति पी। उनका भी समाधिपूर्वक स्वर्गवास हो गया। क . थे।
FIFFT TIEPIFIM FIT FFIFFITP5113 1 5 3.7 FIFFE FIF 1 Free को SFETI PISTS Fb F FRIS WISIT F DETETTE F SHOS BFP FP FI ÁT ÁLFSE 15 FPE 15 TFFIT VF FFF FEffe FFIE TITLE तिOFTE EIFFTEIFFT 7795115 FFFFFFT-PFPUFFET 19 FF THE अमिट सितारेाबनगोगा साध्वी विनय श्री 'प्रथम' श्रीडूंगरगढ़ EFFEE hi त्रिप-त्याग की जहा बहती है निर्मल धारा । IF विहीर है पावन तेरापथ संघ हमारा॥ भिगवान महावीर की श्रेियस उर्वरशिासनघरा जी रामवषाविजी की वीर भूमि है । अत्मरिपुदमन को दमतान्द्रय मिमि हातपातज का अनलशिला से लपाय कल्मपाधूतने कीप्तिपी भूिमिाहीं। ऐसी प्रकृष्ट पुण्य की प्रतीक-पचासुन्धारा जो गौरवान्वित है कि प्रभावशाली आँचायाँ VIP fie साधनारत् आत्मार्थी ज्ञातीमध्यानी, तमस्वी; द्योतकरीि साधु-साध्वयो कलिया पाकर मर्यादा पुरुषोत्तम आचार्य भिक्षु की कल्याणी वाणी जो आगम का समाधान लेकर चली थी, उसी भिक्षु गण वसुन्धरा पर अनेक रत्न प्रकट हुए हैं । उन रत्नो की अभिधा मे एक अनमोल रत्न जो अपनी प्रभा से इतिहास का एक स्वर्णिम पृष्ठ बना है, मुनि गगारामजी नाम से ही उल्लिखित है। सम्वत् 2007 मे आचार्य श्री तुलसी के द्वारा अर्हत् दीक्षा स्वीकार की एव त्वरितं गंगा को गति, तप एव जप के विविध आयामी सागर मे निमज्जित हो गई। मुनिश्ची जव गृहस्थ धरातल पर श्रावक धर्म आराधना मे अग्रसर थे तब से ही अन्तर मानस मे हर क्षण यह भावना प्रस्फुटित रहती थी 'शिवपूद्ध फलुद्ध स्यात! कल्पवृक्ष" इस भावना का ही प्रतिफल है कि ला ग्यारह मा प्रतिमाओ की तीव्रतम साधना सम्पन्न कर तपस्या के इतिहास अपना एकeft नया कीतिमान स्थापित किया है। ऐसी उग्र प्रतिमाओकी साधना कमाए कि तेरापथ धर्म-संघ मे सबसे प्रथम अपनी शूरवीरता का बढ़ सकल्प परिचय पेशाजी किया । मुनि गगारामजी वास्तव में ही तीन पुण्याई के प्रतीक थे। एक व्यक्ति भी अपने परिवार से यदि दीक्षित होता है तो अपने कुल को कितना गौरव एव कुलोजागर का द्योतक बन जाता है लेकिन आपका परिवार विशेप गरिमा एव महिमा से अपने आप मे परिमडित है एव सौभाग्य का सूचक है कि वर्तमान मे 11 रत्न इस सघ मे साधना की तेजस्विता से चमक रहे हैं एवं . or मा किमान में मौजवान जगी तन में स्पति है तमस्वीकृति के संसार पक्षीय एक पुत्री अन्नी बाई की सुपुती जिरेखाली ने दीक्षा महाग की भाषक संसार-पक्षीयीभानजे गावधानी मुति भी मानमूलही प्रमोद सहस्वाक्याती मुलिली विदजी FE सीमापाची मानिशी-फतहुचंदजी मुक्कानिनों ही भार्शसुदारु दक्षिण आदि मानो की यात्रा कर भिक्ष शासन का गौरव बढ़ा पहे हैं मुनि भी फतहबदजी Pe Harकी संसारपक्षीय धर्मपत्नी साध्वीश्री लिछम्माजी ने दीक्षा लेकर TFT सायकति का अनूष्टा परिचय दिया? गुरू से लागल क्लिाक तक एक ही में कर तिर्विता-सामना कूरकरही हैवातपस्वी जय महाराज के एकमानजे -शेरमूलजी लानेश पुन मुनि सुनितजीक और लहतियार सतीध्वी श्री माजावती जी व मालीश्री शंति कुमारीजी शासत की अच्छी प्रभावती कर किशारही है,पारही पुचितारतमें इतनी दीक्षायेऽअपने आप मे।महत्वपूर्ण मदिना है। Tस धर्स-साना और संपत्तिले लिड गौरव की बात है। THEPH ऽमुग्लिी नीमूनिन्द्रजीनिासंसाराक्षिीय ज्येष्ठ पुत्ररितनलाल आदि सभी TH Trभाई शासनीभक्ती श्रद्धीनिष्ठ, संतसितियो की सेवा औरधिमदलाली की कार्य TBF बहुताअच्छा करते हैंातपस्वीमुनिश्रिीगंगीरामजी के लघुभ्राता मघर्शजजी FIF सविनसुखा, उनका परिवाररामे भिीधर्मध्याम की भावना बहुत अच्छी हैं। भिक्षु शासन के रंग मे रगे हुए है । धार्मिक व संस्कार परिवार को देखकर सात्विक गौरव की अनुभूति होती है। FFE मा FIFFP Á 575151FF FASFTIG ČEOS FETS FTSFE15 1ĪS FIF FIBP GP IF155P PS Thir 3717 TIP5 315F.FTFIE ,5311F, IFIFFIT 11 5775 FUE $5 F FSPIF JFIF FF Thir FF11 F15 ÍDE T F सन्त FIER TEE 1 37 Fts F F$IT PEP IP 613515f 1515A FTTT YTFF iPEPEE SE #FFIFTH TRY जान प्रकाश जैन Eजैन धर्म के तेहराहाथ धर्मसंघ म अवता अत्तुशास्ता साचार्य श्री तुलसी करके मोबन्दा शिष्य स्वामुनिः गंगारामजी स्वामी अन्नतिमा प्रतिमा के तपस्वी, के हसास्वी मासे माशहर मे एक समृद्ध परिवार से जल्मा लेकर उत्कृष्ट IT AT जीवन के साथ अपने सत्यास- स्वीकार कर अपने जीवन को धन्य बनाया। स्व. मुनि गंगारामजी ने अपनी 97 वर्ष की जीवन यात्रा मे, तप, त्याग और साधना की जो छाप छोड़ी है वो इतिहास के पृष्ठो मे अमिट रहेगी। परिसरामा औरधिर्म-रावको मापने गौरवा बढाया है। fire FAT मयागमूर्ति यशस्वी सन्त स्व. मुनि नशामजी को शत शत श्रद्धाजलि । सामितीयोदिनम्बरटजी प्रबन्ध-ममिति/काने ... RETTE IMITET- गंगामहराकी गंगा F) 68 .
4- -- तप-ज्योति की एक मशाल साध्वी प्रानन्द श्री । 'अपने ध्येय की पूर्ति के लिए यदि सकट सहने पडे तो मुस्कराकर सहते जाओ, विपत्तियाँ आये तो उनका स्वागत करते जाओ। मृत्यु आये तो निर्भय हो उसका आलिंगन करते जाओ । सकट समाप्त हो जायेगे, विपत्ति सपत्ति वन जायेगी और मृत्यु अमरता का वरदान दे जायेगी।' मुनि श्री गगारामजी का जीवन उपरोक्त वाक्यो को पूर्णतः चरितार्थ करने वाला था। वे धुन के धनी थे । गृहस्थाश्रम मे रहकर अपने पूरे परिवार को सुसस्कारी बनाने का अथक श्रम किया । अपने पुत्र मुनि श्री राजकरणजी को छोटी वय मे दीक्षित कर आदर्श पिता का उदाहरण प्रस्तुत किया। परिवार के अनेक सदस्यो की दीक्षा उनके सस्कारो का प्रतिविम्ब है । उन्होने वृद्ध-अवस्था मे आचार्य प्रवर के श्री चरणो मे दीक्षित वन जीवन को धन्य व कृत-पुण्य बनाया । उनका जीवन सहज था। गुरु के प्रति समर्पण उनके जीवन- विकास का स्वणिम सूत्र था। प्रकृति से हम देखते है कि नये पत्र, पुष्प एव फल प्राप्त करने के लिये वृक्ष को पतझड मे पहले अपना सर्वस्व लुटाना पडता है। ठीक उसी प्रकार जीवन मे नया उल्लास एव आनन्द प्राप्त करने के लिए मानव को पहले समर्पण करना पडता है । जल की एक बूद सागर मे समर्पित होकर असीम बन जाती है, छोटा-सा रजकण पृथ्वी मे समर्पित होकर विराट बन जाता है । वैसे ही वृद्ध अवस्था मे दीक्षित मुनि गुरु चरणो मे समर्पित होकर अपने जीवन को लक्ष्य की ओर बढाते रहे । जप-तप के वे सगम थे। तपस्याचर्या उनकी बेजोड थी। श्रावकावस्था मे भी उनकी तपस्याए उल्लेखनीय रही थी। दीक्षा के साथ ही वे तपस्या के क्षेत्र मे और आगे बढते गये । करीव वत्तीस वर्षों से एकान्तर तप उनके जीवन का प्रत्यक्ष कीर्ति- मान है। गगाशहर की पावन धरा मे समाधि-मरण प्राप्त कर उन्होने जीवन- मशाल को प्रज्ज्वलित किया। किसी ने सच ही कहा है कुल का नाम उजागर कर रहे है । आत्मसाधनारत् मुनि गंगारामजी संसार से विरक्त एव सन्यास से अनुरक्त बने तब से ही आप नीरजवत निलिप्त जीवन चमन को साधना के सुमन से महकाते रहे एव वि. सवत् 2042 मे आश्विन शुक्ला 12, शुक्रवार को अनशन की अलख जगाकर जीवन को आलोकित किया, समाधिमरण का वरण किया एव तेरापथ धर्म-सघ मे चमकते अमिट सितारे बन गए। महान् संत प्रतापसिंह वैद मुनि श्री गगारामजी महान् सन्त थे। मै तो सोचता था कि मेरी मूक अर्ज को मानकर वे तीन वर्प और विराजते तथा हम 100 वर्ष का उनका उत्सव मनाते, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। मुनि श्री राजकरणजी, मुनि श्री पूर्णानन्दजी को उनकी सेवा का बहुत ही सुन्दर मौका मिला, वे सौभाग्य- शाली थे। उनकी आत्मा की उत्तरोतर प्रगति की कामना करता हूँ। । सुन्दर संगम साध्वी यशोधरा मुनि श्री गगारामजी का जीवन चमक और महक दोनो का मुन्दर संगम था। जहां तप का तेज उत्तरोतर निसार पा रहा था वहा शील की सौरभ से उनके जीवन का कण-कण सुरभित था। ऐसे सफल साधक सघ की शोभा होते है । वे अपने पीछे मोहक महक छोड़ जाते है जिससे न केवल परिवार ही अपितु समूचा सघ गौरवान्वित होता है। 1. मिलीगुड़ी 70 गंगागहर की गगा मानस पटल पर कित्ता डॉ. जैन मिल REFER श्रद्वय मुनि श्री गंगारामजी अपन जायनाक आतमम विराजेंग मेरों कार्य क्षेत्र भी गगीशहर, 'भानासर रहा है। उन दर्शन, विकास एवं स्वास्थ्य परीक्षण काचेसवर अवसर मिलता रही ना का जिक आयुष्यारन्होने फ्राप्तकीमाहविष की अवस्था में दीक्षित होकरी तक सर्यमेकांपालमाकियो पालम्बसमय तक तपस्या करते रहे। वृद्धावस्था fire मे भी आँख कीन आदिईन्द्रय सामान्य रूप से कार्य करता रही यह आश्चय र एवं हपीका विषय थी मजिचं कभी उनके दर्शन करता कई बार उनकी मर शिक दादाजी स्वर्गीया माणकचन्द जामर्सटी की यादमती थामी हष्टि में भाग वे एक कर्मठ विकाथे जिस समय मुझ युवक रित्न का सम्मान मिला उन्हान कि बहुत हो वात्सल्यपूर्णशिव्द फरमर्मीय मन्उनको भौतिक अकिति आज भी पत्रक मि की भांतिम मास पटल पर 'किताह माईस अवसर पर मैं इस महान TTES आत्मा के आध्यात्मिक विकास की मगल कामना करता PIPE PRE fis Thu JEER LIFTE FETE (15777 SFPE LE FIFTTT: FIE 57 मेरी भावनाएं व्यक्त करने का अवसर प्रदान किया, इसके लिये मेको प्रकाशक TFB16175 TOFFER FL PE SIE EJUF FF13 FIF FIT IFís Efs fæ jsbef F FFÊFIFFIP FA Ég FF F (fessfirgrip) 1 FIFhीरकि की fSIEF FIT F FF HEAF firs 3755 175T5 Trap F FFE 91651P PIISP GITE APITE TIER THE I TP15F LSE FP FPÉS APIFÁ 195 IPISE TEIE TIF FETTE FP ET STE किFिTII FESE F FEITFTTTTERIES .TEEPhi बाइ 'आभारी ह מיזום | 36Ffs PID , FEFTIFF FF 5511 ,1677 1. युवक रत्न मरणोपरान्त जीने की है, यदि चाह तुझे तो सुन बतलाता हूं काम सलीमी तिक राही उड-का लिख ऐसी चीज कि दुनिया डोल ਠੇ या कर कुछ ऐसा काम fre FiF#f631] बोल उठे जमाना m Hिमाउhि E FEE 37777 की शो को pिs FPS' sirat fE FTES OF IfT EITFT TERE TO SHदीर्घायुसंता Fipt fps), JESIE Í FJ1FF 5Fis i feite find her TETE ProLFU 5 F1555 JE 15777€ FF Gfis True FF मुनि श्री गंगारामजी तपस्वी, धर्मशसिननिष्ठ, सरल हृदये, गुणग्राही, वैरागी, धर्मशासनमा सीधिक दीधाधु सत याचिका Tip मुनि श्री के परिवार के साथ हमार वारवार का विनश्चम सम्पन्जा अष्टमींचायगाम कालमटिमकरणसरण यीमामा आपके पैतृक गांव हणिया पधारे, उस समय हुआ। इसके वेदि गंगामहरमिक रहते सम्बन्ध व्यक्तिगतोच धम सिंहयोगी कि रूपमतियावरीवर F 375 17 FEITE FE 57515 TuSF ITS OF JER VIFITS FÁ TESIFIE-FT रहा आपका स्थायी सदिगाव पूर्ण ARENA हा इसम- आपकी ससार पक्षा धर्मपत्नीजी को भी पूजीसहयोग रहा।वसर पर अपने 'पूर गृहस्थध्यरिवार का वर्षभर की खच मावन में ही निवाहक कर लियी FIT FIE FIFIES FP FIRE IFF REFINE TER THE Ft औषको धामिकाका टीला को कठस्थ परभण कात्यन्त चिना रहती थी जिसे आप मीडिया लिपि म लिखकर कठस्य किया करती यामा हिन्दी को पढाई उस समय गावों में नहीं होती थीं TESTT Eि FIREF ENFIEIS DISF EITE FETT. FEIE FM571 तेरापंथ धर्म-सघ में आपके परिवार के साधु-साध्वियां शासन, की गोल नगार RETRIEगा गरिमा वृद्धि में सहायक हो रहे है। आपके परिवार के स्थानीय ते. सभा से मधुर सम्बन्ध कायम है.ri FEPF THE IF THE Afri आपकी आत्मा चिर शान्ति की ओर अगसर होती रहे और आपके परिवार के साथ मेरा धर्म सम्बन्ध बढ़ता रहे ऐसी.मंगल कामना के साथ। MIT T-77171 177 FFIP 1,7 TITIR 1. अध्यक्ष, थी न . ते. सभागमाहर TTAffai Pinargin 72 गगाशहर की गमा सहजता एवं सरलता के प्रतिबिम्ब डॉ. मदनमोहन भण्डारी स्व. महाराज गंगारामजी से मै अच्छी तरह परिचित ही नही बल्कि उनसे मेरा गहरा सम्पर्क भी बना रहा उनके पास आने-जाने के मुझे अनेको अवसर मिले । मैने यह पाया व अनुभव किया कि उनके साधु जीवन मे सह- जता व सरलता ओत-प्रोत है। यही विशेषता थी जो मुझे उनसे मिलने के लिए बार-बार प्रेरणा देती रही। जवसे मैने उनको देखा तव से उनको चलने में कठिनाई थी। शायद कमर के झुके रहने के कारण हो या वृद्ध अवस्था के कारण हो । इसके बाव- जूद वार-वार मना करने पर औपधि लेने किसी के साथ या खुद को कभी- कभी नीबू की शिकंजी आदि लेने दोपहर की चिलचिलाती धूप मे पधारते देखा। बातचीत में भी कई बार फरमाते थे कि हम तो साधु है आप लोग औपधि के लिए इतना दवाव क्यो दे रहे है। वो हमेशा मारवाडी मे मधुर भाषा बोलते थे, ऐसा मालूम पडता था कि उनकी वाणी से अमृत बरस रहा है। उन्होने मुझे कई बार कहा कि आगे के लिए कुछ करो- माला फेरो, दर्शन करो, रात्रि भोजन जो मै अभी भी करता हू- छोडने के लिए भी प्रेरणा देते रहते थे। वे आध्यात्मिक जीवन बिताने के लिए मेरी तरह अन्य सवको भी ऐसी प्रेरणा देते थे । साधु जीवन का एक अनिवार्य कर्तव्य है- दूसरो को ऊपर उठाना, अच्छे काम व चरित्र बनाने, सयम रखने के लिए सतत प्रेरणा देना । इसके लिए वे बराबर प्रेरणा देते रहे ।
सहज सरलता जसकरण सुखानी ? 97 वर्षीय वयोवृद्ध सन्त स्व. गंगारामजी स्वामी की संयम साधना, उनका ओज और तेज चेहरे पर बोलता था। मुझे अनेको बार उनके दर्शन करने का अवसर मिला। उनमे सहज सरलता व आध्यात्मिक वत्सलता थी। चूकि उनके ससार पक्षीय पुत्र व मुनि राजकरणजी स्वामी युगप्रधान आचार्य श्री तुलसी द्वारा प्रवर्तित अणुव्रत आदोलन तथा सस्कार निर्माण को गति- शील करने मे सदैव अग्रणी रहे है। अतः गगाशहर, शाति निकेतन मे जब कभी भी हम अणुव्रत और संस्कार निर्माण के कार्यकर्ताओ के साथ मुनि राजकरणजी के सान्निध्य मे पहुंचते और वयोवृद्ध तपस्वी सन्त मुनि गगाराम जी के दर्शन करते, वे तपाक से कहते कोई आयोजन रखा है क्या? हम जब भी कहते मुनि राजकरणजी काफी मेहनत कर रहे है वे सीधा इसे अपने आराध्य आचार्य श्री तुलसी का आशीर्वाद मानते थे। उनके रग-रग मे आचार्य श्री तुलसी के प्रति समर्पण व श्रद्धा थी। स्व मुनि गगारामजी ने अपनी लम्बी जीवन यात्रा मे अपना स्वर्णिम इतिहास बनाया है जिसे कभी धूमिल नहीं किया जा सकता । विद्वान शताव- धानी मुनि राजकरणजी के बाद इनके दूसरे पुत्र पूनमचन्दजी सावनसुखा (मुनि पूर्णानन्दजी) ने भरे पूरे समृद्ध परिवार,वैभव व ऐश्वर्य को छोड दीक्षा अंगीकार की,यह सव इन मुनि गगारामजी के व्यक्तित्व का ही प्रतिविम्ब है। इसी प्रकार आपके ससार पक्षीय परिवार के अनेक व्यक्तियो ने दीक्षा लेकर अपने जीवन का सुयश वढाया है तथा तेरापंथ धर्मसघ पर कलश चढ़ाया है । ऐमे तपस्वी, यशस्वी, गौरवशाली म्व. रान्त मुनि गगारामजी को शत शत - 1. मन्ती, भारत जैन महामण्डल, माया चोरानेर S याद उस व्यक्तित्व की डॉ.जुगल किशोरभिाटिया . ज्ञान का प्रकाश रहो ही। सबके हित में अपना हित मानने वाल: .ESPEE पर -IT कि प्रि विखे जो न सिपने चिकित्सीय जीवन म मुझे इश्वर कृपास अनेक जैन साधु- के सिाध्वियो की सेवा की अिवसर प्राप्त हुमोइिन्हीं साधुओं में से एक व्यक्तित्व प्रगाछ श्रद्धेय जैन साधु स्वर्गीय श्री गंगारमिजी उनका प्रतीवर्ष की दीर्घ आयु Sil' अतिमंदसौच से मिरी सम्पर्फ' उनसे रहा जब कभी वे रोगग्रस्त हो जाते तो अन्य किसी भी पद्धति से इलाज करने की अपेक्षा होम्योपैथिक विचिकित्सा पद्धति को ही चुनने रहे। सौभाग्य से अथवा उनकी अगाध कृपा -ग्री से इनके द्वारा सोपालस्त्तता की स्थिति से चिकित्सा का अवसर अक्सर FFIमुझोही प्रास्ताझेता रहा। इसी कारण मेरा उनसे निजता का सम्बन्ध स्था- ÉFEPTEM FF-PE-PE Fpfp,JET , FBIFIE PIE É IBF5E IFIR | निकटती के कारण कई बार मुझ पर ज्ञान पुप बरसादत । इसी IM से उनके भीतर का दीप्तिमान व्यक्तित्व मुझ पर उजागर हुआ और उनका दिग्ज्ञान जैसे उनकी आंखों में चमकाउठती थीउनकी दी शिक्षा आज कमी. मेरे असकरपाको प्रेरित करती रहती है कि यह किमल चचल है 15 इसे सदा मिभागकरने का प्रयास करना चाहिए, तभी मनुष्याशाति की F हिओरनिवृत्त हो सकता है, दूसरीत्यहा कि सबके हित मे अपना हित मानने वाला PF उपयक्तिक चूससे की ज्याचा हरकिर सक्य को प्रसन्नइख सकता है। APTE TES FFfw FPISiभीम एंसालमा आज भी मुझे ऐसा लगता है कि उस महात्मा की दिवंगत आत्मी जैसे मेजा हो F. त ऐसी कविभूति आकाशंगामा होकर भी लाके हिताय कार्यों को जैसे निर्वाध सम्पादित fiकर रही हो पातको नमन करता हDE Erry: for 115 1858 Frisire EPPE APIE I MiBJFeIT FETEII FE FIF EिPITS BETE ISS TOR नि FT FEE SEIFETE-IT IF T D से हर मनुष्य कोrep TEFEF FIFSTEFATION जन-जन के पूंजतीया II ट्र रक्षा लूणकर छाजेशFREE वगतका गृहस्थ धर्म व्यतीतकरके 62चे तप से माधुाणीवत स्वी- कार कर लगातार होकपोतककस्तितपस्यस्मक जीवन जीने वाले मुक्ति FिE श्री गगमरामजी तेरापंथ धर्म संघ से एकमाता ऐसे साचारहे है जिनके समीपमा पुत्रो ने भी साधु जीवन स्वीकार किया जो मुनि श्री राजक्त-स्णाजी एव-मुEि TEE श्री पूर्णानन्दजी के नाम से जाने जाते है । जाति, धर्म गण कर्मनिरपेक्ष भाव ही 35 वर्ष के साधु जीवन में अधिकाश समय तपस्यामय जीवन जिया बच्चने 555 से बूढो तक सभी के साथ सरल भाव से व्यवहार के कारण जन-जन के पूजा नीय बन गए। IFS ETT ThiTFF) for typis 61 51115 fiue figli fisit मुनिश्री के सादगीमय, अहिंसामय एक तपस्वीमय जीवन को नमन । करता हुआ उन्हें श्रद्धांजलि व्यक्त करता हूँ for FIFF TFTE Pो f Fris Togg Ft Tilmie firFT ) IFS IFCP PGIF TÝ, 16 Bridgit 1E वृद्धावस्था मे भी आश्चर्यचकित कर रही थी वह थी- आपकी तीन स्मरण शक्ति । आपकी स्मरण शक्ति इतनी तीन थी कि आप जिस किसी भी व्यक्ति से बातचीत करते तो उसे दशाब्दियो पूर्व उसके साथ हुई बात का भी जिक्र कर देते थे। आप जिस किसी से भी बात करते उससे पूरा जीवन-वृतांत पूछ लेते। मै दोपहर मे प्रायः हमेशा आपके दर्शन करता तो दो-तीन दिनों के वाद आपने मेरी जो पहचान बनाई वह थी कि- ज्यो ही मै वदना करके चरण-स्पर्श करता त्यो ही आप बोल उठते-'पन्द्रहवी पढे जिको है काई ।' मुझे स्वयं को वडा ताज्जुब होता- आपकी तीव्र आत्मिक चेतना को देख कर । यद्यपि आपकी नेत्र-ज्योति बहुत कमजोर हो गयी थी परन्तु फिर भी आप तीव्र आत्मिक चेतना के द्वारा व्यक्ति को सरलता से पहचान लेते थे। आप मुझे हमेशा आगे बढकर आशीर्वाद प्रदान करते और नैतिकता की प्रेरणा देते। मै आपकी प्रेरणा को हमेशा जीवन मे क्रियान्वित करने का प्रयास करता रहूगा। आप कितने सौभाग्यशाली थे इस बात का अनुमान इससे आसानी से लगाया जा सकता है कि अंतिम समय मे आपके पुत्र मुनि श्री राजकरणजी छ वर्षों की पूर्वाचल की यात्रा परिसम्पन्न कर आचार्य-प्रवर के शुभाशीर्वाद से आपकी सेवा मे पहुच गये। साथ ही गुरुदेव की असीम अनुकम्पा से मुनि श्री पूर्णानन्दजी को भी सेवा मे ही रहने का सुअवसर मिला। आपने दोनो मुनि पुत्रो के हाथो मे आश्विन शुक्ला द्वादशी शुक्रवार को मध्याह्न 1-58 बजे चौविहार अनशन मे पडित मरण प्राप्त कर जीवन को धन्य बनाया। मुनि श्री पूर्णानन्दजी ने जिस तन-मन से आपकी सेवा की, यह सपूर्ण जगत् के लिये अविस्मरणीय रहेगी। जहां गृहस्थी जीवन मे भी पिता की सेवा करना पुत्र के लिये दुसाध्य होता है वहा आपने गुरु -कृपा से मुनि जीवन मे भी पिता की अनुपम सेवा कर राष्ट्र के सामने एक उच्च आदर्श प्रस्तुत किया है । उन्हे शत-शत साधुवाद । अत मे, मै दिवगत आत्मा के उत्तरोतर आध्यात्मिक विकास की मगल कामना करता है और यह आशा करता हूं कि आपके जीवन-प्रसगो से समाज और राष्ट्र प्रेरणा ले तथा उन्हे अपने जीवन मे क्रियान्वित करे। इसी शुभेच्छा के साथ- - 79 तपस्वी मुनि श्री गगारामजी दीर्घ तपस्वी . राजेन्द्र कुमार सेठिया विरले मनुष्यों का जन्म भी सामान्य मनुष्य की तरह किसी एक परि- वार में ही होता है। और सीमित रेखाओ के बीच वे पलते हैं, पर सभी के साथ सहानुभूति, पर व स्व का बोध, द्वैत मे अद्वैत का भाव, आत्मोपम्य भावना की प्रवल प्रेरणा, परोपकार-परायण की प्रवृत्ति, औदार्य-कारुण्य आदि गुणों का विकास उन्हे उच्चता के सिहासन पर आरूढ कर देता है। गंगा जैसे पवित्र, निर्मल और शांत दीर्घ तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी का जन्म वि स 1946 मे बीकानेर जिले के रुणियां गांव के सावनसुखा परि- वार मे हुआ । वचपन से ही आपकी धर्म के प्रति अच्छी अभिरुचि थी। श्रावक अवस्था मे आप सामायिक, सवर, पौपध, तप-जप-व्रत और व्याख्यान सुनने मे हमेशा अग्रणी रहे। इसी प्रकार व्यापारिक कार्यो मे भी आपने पूर्ण प्रामा- णिकता का पालन करके समाज के सामने एक उच्च आदर्श रखा। ऐसा आपका जीवन-वृतांत पढने से मालूम होता है । श्रावकावस्था मे ही आपने श्रावक की उत्कृष्ट साधना-श्रमणोपासक की ग्यारह प्रतिमाएं पूर्ण की। आपकी थावकत्व की सर्वोच्च साधना को देग कर अणुव्रत अनुशारता आचार्य श्री तुलसी ने वि.ग. 2007 पीप बदी 7 को आपको जैन अर्हत दीक्षा प्रदान की। दीक्षा के पश्चात् आपने तम-जप मे विशेष ध्यान लगाया। कठोर मे बाठोर तपस्याये करके आपने अपने जीवन कुन्दन-मा प्रगर और तेजस्वी बनाया। आपने सेकदो उपवास, बेने-तते और पतीन की एक श्रेणी तथा : कशीग की दूसरी श्रेणी पूर्ण की तमा नगा- नार बत्तीग वर्षों तक एकान्तर तप किया। मेरे विनार गे आपकी दीर्घायुमा नायर यती गजग। गुरदेव ती नीम पा में आप पिछले कई वर्षों में नागार में बिरवामी थे। आप हममुर आलोक नेहरा, सायनी माया-मनातीगाने की प्रेरणा देने थे। मुरे आगपी को गान * काव्याञ्जलि TOFAF ffu fpi-fis af fis has got TiflFİFFIK JE É IPSIEIFF Fp115 Fe EFFET P116 7 TS FIF F5E 5F7E T7SFIT TOPIK I FFTT- Et fic tā 515 FE PIE ÁFE sp itselles ha f1 ÉJF F F FIF F GP 5156-F5fte 158 11s FF 51F TF is fpal FF7 PIES is R$ 59 fF51 715-15 15 155 Fies APIFS IT FE :GTR TË JEPTS À LA FIF 17.56 Å TE TEE free 56 ZIFF FIF5P ff for FPIE 576 's F FAFT ST 16557-655 FÍS PIE 15 1155 158.5 TUPS-TOFF PS F 155€ Fine ffs fæpe -JA1F FFEIG TEF TE PEF tre The FF7 yarp fis PiSTI TE FTPF 5155 Fift-FÁ TÆPPIE PIEB 1 5:5 Ito pali FIFP F 15F5F TF 55175 1819 $ Fhé F751178 Fíh PIES fis 15:5516 578 FSE FIER SIFTSIE FF56 FAITE TEEB FET PIE 17 65.5 55511pkt Á FEITO FE POF ITO SÊ FET PIE À 166 EGR 11155 1657 FIER # FIFIE FASE FIFFE # FIF FI B fit prixfE5 6522 FT THE FUTFELG TES FIE FT FPIFS FA PHTS 7755175 Ft 15775 IF IPINE SÍFIYFTE FER-ÍIFIE 57 EPIFIT Trig för 55Fipp TF THE I Folg f 1p7FFE PRE TT Fsar la PIF 1815 FIP É IFFE TE PIJE TE Fly TFUE ÉPITS {1F5F} FT-BRIS 1F FFT MJ F IFK TE TIF fasifite the FE 82-1 F1P3F LF JIFAT TILSIS IFFTE FELIS FITTE IS TFF 1 PTFE BSF F ForfFE 57 FIR TOFF FETP É FEITE T រន្ធគយ yoges Tif TgiL TAPIE T FF-F5 FF? 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पूर्ण समाधि
मुनि राजकरण
थारो जीवन बणग्यो शुद्ध, श्रद्धा स्यू सगला नमन करे ।
थारा गुण गावे लोक् प्रवुद्ध, कोई भक्ति स्यू श्रवण करें।
पाल्यो श्रावक पणो सातरो, तप जप पूरो करता।
आचार्यो री, संत
संत सत्यारी सेवा मे मचरता 111
व्यापारिक कामा मे राखी नैतिकता
री टेक।
गलत बात मोटा मिनखा री थे नही मानी एक ।।2।।
गया देश वगाल कमावण (पण) साथ धर्म ने राख्यो।
सित्ताणू वर्षी री वय मे ओ उत्तम फल चाख्यो।।3।।
गया रेल मे कलकत्ते जद टिकट अन्य री ली ही।
।
मोको आया डऱ्या नही थे साच
कह दीन्ही 11411
आख परीक्षण पूज्य प्रवर जद दियो हाथ मे पानो।
देवनागरी हूँ नही जाणूं, कह दियो राख्यो नही छानो ।।5।।
और सादगी थारी म्हे देखी
वेजोड ।
महगाई आई
कपडा दिया कीमती छोड ।।6।।
पायो पडित मरण पूर्णत पाई पूर्ण समाधि ।
सुखे-सुखे अब शिवपुर पहुँचो हरो कर्म री व्याधि 17।।
वात
सयम
जद
लय-मदिर मे कोई ढ ढती फिर
तपस्वी मुनि श्री गगारामजी
81
،
n n
ދު
संयम का अनुदान
मुनि गणेशमल
संघ-शरण गुरु का शरण, है ना वा साकार ।
साधक इसको प्राप्त कर, पाता है भव-पार ।।1।।
श्री तुलसी गुरुदेव की, है यह कृपा महान् ।
वृद्धावस्था मे दिया, सयम का अनुदान ।।2।।
तप-गगा मे स्नान कर, मुनिवर गगाराम ।
सयम की कर साधना, चले गये सुर-धाम ।।3।।
अंत समय अनशन सुखद, वर्षमान परिणाम ।
है सुगन्ध यह स्वर्ण मे, योग मिला अभिराम ।।4।।
अवधानी मुनि राज औ, नि स्पृह पूर्णानन्द ।
इनकी सेवा से मिली, चित्त-समाधि अमन्द ।।5।।
कर्म-निर्जरा के लिये, सेवा करते सत।
भैक्षव शासन की अत है महिमा अत्यन्त ।।6।।
गण आश्रित मुनि कर रहे, निज-पर का कल्याण ।
मुक्त-कठ से कर रहा, मुनि गणेश गुण-गान ।।7।।
.
पस्वी मुनि श्री गगारामजी
83
निर्मल जीवन
मुनि राजकरण
धन्य-धन्य मुनिवरजी थे तो कीन्हो उत्तम कामजी
अंत समय मे अनशन धार्यो रख ऊंचा परिणाम जी।
नाम गाँव है गंगा थारो गंगा सम जीवन निर्मल
श्रावकपन री मुनिपन री थे करी साधनापूर्ण सफल ।
भाग्यशालीता देख आप री विस्मित लोक तमाम जी ||1||
श्रावकपन मे गुरु सेवा रो राख्यो पूरो कोड जी
ले पूरो परिवार जांवता महीनां तक घर छोड जी
रास्ते री पैदल सेवा मे जाता ग्रामो-ग्राम जी ।।2।।
श्रावकपन री उच्च साधना पडिमा ग्यारह पूर्ण करी
वृद्धावस्था में ली दीक्षा गुरु तुलसी स्यूं भाव धरी।
तप जप मै तल्लीन रह्या थे प्रतिफल आढू याम जी ।।3।।
वहुत बड़ो परिवार आपरो घर मे सांसारिक लेसे।
बेटा पोता दिक परिकर ने ससम्मान जनता देखे।
सगला एक भावना भावे पहुंचो अविचल घामजी ।।4।।
गंगाशहर क्षेत्र है चोखो श्रद्धा भगतीवान जी
इण नगरी रा संत सत्या श्रावक भी हुआ महान् जी।
यी श्रेणी में आज लिखिज्यो धारो भी तो नाम जी।।51
विक्रम दो हजार बयालिन आश्विन शुक्ला ग्यारस ने
पूर्वोत्तर मुग करने बैठ्या थे जोठया दोन्यू करने
चार तीर्थ में कर मंथारो मेट्यो अन्तरघामजी 11611
मन-वानरेग रोटी
80
गंगाशहर की गमा
स्वर्ग संचार
मुनि सुमेर 'लांडनूं'
तपसी गंगारामजी, अनशन का शुभयोग ।
दोनू पुत्रो का मिल्या, सुन्दरतम सयोग ।।
वासी
गगाशहर रा, मुनिवर गगाराम ।
पिता पूर्ण मुनि राज रा, परम स्थविर अभिराम ।।
ढलती वय मे संयमी, वण्या छोड गार्हस्थ्य ।
उग्र तपस्वी थे वण्या, सुदृढ थांरो स्वास्थ्य ।।
श्रावक श्रेणी मे सदा, रह्या अग्रणी स्थान ।
पडिमा एकादश करी, बह्या सदा अम्लान ।।
चढता परिणामाँ लियो, सयम गगाराम ।
पाल्यो चढ़ता भावस्यू थे सयम गुणधाम ।।
हुआ शतायु निकट थे, पायो पुनि संथार ।
दोनु बेटा पास मे, कियो स्वर्ग सचार ।।
-
तपस्वी मुनि श्री गगारामजी
85
कर्म मुक्त मुनि फतहचन्द 'पंकज' रूप धन्य-धन्य मामाजी लाखो वार है! देते हम लाखो वार है। जीवन सफल किया अनशन कर, करने आत्मोद्धार है॥ श्रावकपन मे श्रावक की, ग्यारह पडिमा भी तुमने की। छोड़ पत्नी वृद्धावस्था मे, बन वैरागी दीक्षा ली। दुःख भवजल से पाने पार है। जीवन" थे तुम कम्भे श्रूरा, देखा है निज आंखो से हमने । कर्म काटने में वैसे ही, अन्तिम वय में श्रूर बनें । की उज्ज्वल आत्मा तप-जप स्वीकार है। जीवन"||2 मासखमण तप किये अनेकों, अपनी आत्मा को धोने । एकान्तर वर्षों तक करते, रहे विमलतन तुम होने । हुए अनशन आखिरकार है। जीवन"॥3॥ तीन साल पहले प्रमोद, पीयूष और पंकज ने भी। गुरु आज्ञा पा जन्म भूमि मे, मामेजी की सेवा की मिला स्नेह उनको हमको अनपार है। जीवन""11411 दोनो दीक्षित सुत सेवा मे, अत समय में थे हाजिर । सौभागी वे थे पूरे, है मिला योग अनशन का फिर । हम भी गौरवान्वित अपार हैं। जीवन11511 सिद्ध बुद्ध परमात्म बनो तुम कर्म मुक्त अब होकर के। दुखदाता कर्मों को हण, अपनी आत्मा को धोकर के। धर्म, पंकज के हृदयोद्गार हैं। जीवन1611 धन्य कर आज मगन, सब-महीनोमनीचे 1. धन्यवाद देते हम ला दार। 2. ग्यार मोने सेवा की 3. मार रहूंगा पर हमदरबार । गंगाशहर की +
आउखो प्राच्छो पायो
मुनि मोहन 'पामेट'
-
पुत्र
पनोता जैहना, राजा पूर्णानन्द ।
तात गंग-गण-गग मे, न्हायानित सानन्द ।।
न्हायानित सानन्द, जवानी प्रतिमाघारी ।
पकड बुढापे संयम तप तलवार दुधारी॥
कोड खपाई कर्म री, काट्या भव रा फन्द ।
पुत्र पनोता जेहना, राजा पूर्णानन्द ।।
लड़ी करी पैतीस लग, अन्त एकान्तर ठाय ।
पाछल खेती बायने, मोती लिया निपजाय ।।
मोती लिया निपजाय, आउखो आच्छो पायो ।
साल सिताणु कर, सथारो कलश चढायो ।।
आराधक पद पा लिख्या, जिण शासण छविछद ।
पुत्र
पनोता जेहना, राजा पूर्णानन्द ।।
तपस्वी मुनि श्री गगारामजी
87
गंगाशहर के गौरव मुनि मधुकर - तप रम्य। गौरव गंगाशहर के, मुनिवर गगाराम । त्याग तपस्या पर चले, जीवनभर अविराम ||1।। बचपन से ही प्रवल था, संयम पर अनुराग । श्रावकपन मे ही किये, विधिवत रह के त्याग ।।2।। तात्विक चर्चा मे उन्हे, आता भारी स्वाद । धीरे-धीरे कर लिये, विविध थोकडे याद ।। 311 श्रावक प्रतिमा ग्रहण कर, दिखलाया आदर्श । तप श्रेणी पैतीस तक, मन मे भारी हर्ष ।।4।। सवत्सर बत्तीस से, एकान्तर कठिन तपोबल प्राप्त कर, बन गये सहज प्रणम्य ॥5॥ तुलसी गुरुवर ने किया, बहुत बड़ा उपकार। रखी वृद्ध की भावना, निज कर्तव्य से निहार ।।6।। वृद्धावस्था मे कठिन, दीक्षाव्रत स्वीकार । अंत समय अनशन ग्रहण, कर पहुचे भवपार ॥7॥ पारिवारिको में बहुत, है धार्मिक संस्कार । ग्यारह जन दीक्षित बने, करते संघ प्रसार 1811 राज पूर्ण सुत पास में, अन्त समय सहयोग । सहयोग कर उऋण बने, अद्भुत मिला सुयोग ।।9।। गंगा मुनि निज कार्य में, सफल बने शुभ बात । 'मधुकर' हम भी बढ़ चले, चिन्तन हो दिन-रात ॥10॥ 86 गंगाशहर की गगा
अमर बग्या
गणपत लाल चौपड़ा
आपा गंग मुनि गुण गावां,
आपा तपसो गरिमा गावा,
वारे आदर्शा ने ध्यावा,
सयम सुरसरिता ने सिंहवृत्ति स्यूं पार करग्या ।
भैक्षवगण मे तपसी गगमुनि नाम करग्या ।।ध्र.11
गाव रुणिये जन्म भूमि ली, समकित फोज मुनिवर स्यू ।
ज्यू ज्यू समझ पड़ी लागी, इकतारी भिक्षुशासन स्यू ।
लाभ लियो थे कालूगणी री, शिक्षा सेवा दर्शन स्यूं ।
वस्त्र संयम, व्यापार सयम और खाद्य सयम श्रध्यो मन स्यूं।
राखी सदा सादगी मुनिवर,
चाहे देश हुवो दिशावर,
रखता त्याग रो ध्यान बरावर,
देखो ! बालपणे बोयोड़ा बीज, कैसा पांघरग्या ।।
.
पढ्या लिख्या थे भूतनागरी, पण जागृत अनुभव शक्ति ।
नेक-नीति, प्रामाणिकता री सर्वालय ही साख बढी।
बोल थोकड़ा, तत्वज्ञान और पडिमा ग्यारह पूर्ण हुई।
गुरु सेवा, गुरु शिक्षा पा, वैराग्य भावना जाग उठी।
करके कीडी कल्प परीक्षा,
तुलसी गुरुवर दीन्ही दीक्षा,
थारी पूर्ण हुई मन इच्छा,
भक्षव शासन नन्दनवन री मौजा मौहि रमग्या ।।
तपस्वी मुनि श्री गगारामजी
89
सुगन्ध समाधि है मुनि राकेश कुमार साठ त्यागी बडभागी प्रबल, मुनिवर गंगाराम अमर बना इतिहास मे, जिनका पावन नाम ।।1।। श्रावक की पडिमा सभी, की सम्पन्न महान् जैन धर्म इतिहास मे, पाया ऊचा स्थान 1121 और दो वर्ष 'मे, मुनि जीवन की राह सहे परिसह शांति से, नही उम्र परवाह ।।3।। किये वर्प बत्तीस तक, एकान्तर उपवास तप मे तन्मय हो गये, जगा आत्मविश्वास ॥4।। तप का चलता ही रहा, जीवन मे अभियान लडी पूर्ण चमत्कार महान् ॥5॥ वय सर्वाधिक प्राप्त कर, बना दिया इतिहास वर्ष सिताणू मे हुआ, अनशन मे सुरवास ॥6।। राज पूर्व दीक्षित हुए, पश्चात पूर्णानन्द पुत्र के योग से, मिली समाधि सुगन्ध ।।7।। सावनसुखा परिवार का, गौरव बढ़ा अपार जैसा रत्न जो, जन्मा जिसके द्वार ॥8।। आये पुनः, गगाणे मुनिराज कार्य पिता का सिद्ध कर, वने धन्य है आज 1911 पैतीस तक, उभय गगा यात्रा कर 88 गगाशहर की गंगा ar है समता से संहार मुनि चारित्र रुचि 'राजनगर' तप सयम मुनिवर गगारामजी, लेकर तरवार । कर्म शत्रुओ का किया, समता से सहार ।।1।। श्रावक प्रतिमा पूर्ण कर, तजकर धन परिवार । वृद्धावस्था मे किया, अगीकार ।।2।। गंगाणे मे है किया, सुखप्रद स्थिरतावास । विविध तपस्या से किया, अपना आत्म-विकास ॥3॥ दीर्घ आयु मे है किया, अनशन मन उत्साह । महिमा फैली मुलक मे, जैसे मे, जैसे नदी प्रवाह 14॥ यात्रा कर छह वर्ष से, आये है मुनिराज । अंत समय अद्भुत मिला, अवसर वे अन्दाज ।।5।। पिता पुत्र का यह मिलन, हुआ हर्प अतिरेक । देखा मुनि चारित्र ने, गण मे हम सब एक ।।6।। श्री तुलसी गुरुदेव की, है यह कृपा अपार । गति अलक्ष्य गुरुदेव की, क्या जाने ससार 1711 सेवा कर निज जनक की, पाये तुम आनन्द । साधुवाद शत-शत तुम्हे, मुनि श्री पूर्णानन्द ।।8।। . स्वी मुनि श्री गगारामजी 91 -- --
पैतीस वर्ष लग साधु जीवन, तपस्यामय श्रीकार है।
स्थिरवास प्रवास में राखी गुरुवर महर अपार है।
अंत समय दो पुत्रां रो, साझ मिल्यो सुखकार है।
थारे कारण शोभा पाई, सावणसुखा परिवार है ।
मुनिवर अमृत महोत्सव वर्षे,
गंगाणे
मे हरषै हरणे,
आश्विन शुक्ला द्वादश दिवसे,
'गणपत' अनशन तप कर गंग मुनि अमर वण्या ।।
भैक्षव गण मे तपसी गंगमुनि नाम करग्या ।।
.
.
लय-सिरियारी रो सत
90
गंगाशहर की गंगा
निज प्रात्म उद्धार
साध्वी केशर
तपसीजी रा गुण म्है गाँवाजी तप तपियो
थे आ करो तप री गगा म्है न्हावा
हद हिम्मत कर आदर्यो अण सण दुष्कर कार ।
चढता परिणाम कियो निज आत्म उद्धार ।
भैक्षव शासन है मिल्यो, तुलसी सा गणिराज ।
भवसागर मे डुव्या मिलिया तारण जहाज ।
गुरु कृपास्यू है मिल्यो सयम रत्न उद्धार ।
तप सयम री साधना स्यू लियो जीवन निखार ।
पैतीस वर्प लग पालियो मुनिवर सयम भार ।
त्यागी ममता देह री मन मे समता धार ।
आत्म भिन्न शरीर भिन्न ओह है मत्र महान् ।
नश्वर काया है सही ओ जीवन विज्ञान ।
च्यार तीर्थ सामने करयो कठिन तप काम ।
मगल भावना म्हॉरी पाओ अविचल धाम ।
दोहे
गगाणे मे मुनि गगारामजी, हद हिम्मत है धारी ।
चौविहार अणसण करके निज आत्म उद्धारी ।।
सित्याणु वर्षा री उम्र मे कीन्हो काम कमाल ।
मुनि राजकरणजी आज कर दिया निहाल ।।
गुरु कृपा स्यू योग मिल्यो थे बडा सौभागी।
पितृ-ऋण स्यू मुक्त वण्या पुरणानन्दजी भागी।।
लय
सपना
000
वी मुनि श्री गंगारामजी
93
शत-शत साधुवाद
मुनि कमल कुमार
हरियाणा वर प्रान्त में, सुन्दर शहर हिसार ।
श्री तुलसी कर कमल से, सयम व्रत स्वीकार ।
वृद्ध अवस्था में बने, मुनि गगा अणगार
घूमे थली मेवाड़ मे, करने धर्म प्रचार ।
वर्षों तक तप त्याग से, करके अन्तर स्नान
वय सन्ताणूं मे किया सुखे स्वर्ग प्रस्थान ।
अंत समय अनशन किया, मन पर लगा लगाम
अमर बना इतिहास मे, मुनि गंगा का नाम ।
सेवारत मुनि राज, पूर्ण युगल पुत्र प्रख्यात
जिनकी सारे संघ मे, सचमुच सुन्दर ख्यात ।
पडिमा कर दीक्षित हुए, बना दिया इतिहास
जिनके पावन दर्शन कर, जन मन अति सौल्लास ।
-
सिंहवृति संयम सहज, सिंहवृति से पार
शत-शत साधुवाद दे, नत हो 'कमलकुमार'।
92
गंगाशहर की गंगा
गंगाशहर में गंगाधार बही साध्वी जिनरेखा गगाराम तपस्वी मुनिवर री गावा बलिहारी बारबार सयम पथ सफल कर्यो । दोनू पुत्रा री सेवा ने सफल करी अनशन कर थे निकाल्यो है सार ।। 1 ।। पुण्यवान वडा सौभागी हा गुरु री करुणा ही अपरपार ।। 2 ।। गगाशहर मे गगाधार बही हो सहज सरल व्यवहार ।। 3॥ बेटा पोता परपोता थारी सेवा मे सहसा अनशन आश्चर्य अपार ।। 4 ।। काई देवा बधाई नानाजी मुनि ने थे तो कर दियो खेवो पार।।5।। श्रावकपण प्रतिमाधारी नर भव रो निकाल्यो भारी सार ।। 6 ।। तपस्या जीवन रो आदर्श रही अतिम श्वास एकान्तर स्वीकार ।। 7 ।। सौ वर्षा रे निकट पुण्यवानी रो आर न पार।।8।। स्वणिम कलश चढायो गण पर आखिर धार्यो सथारा है जय-जयकार ।। 9 ।। मे ग्यारह रही आयु लय-मैं तो बावल रे पस्वी मुनि श्री गगारामजी 95
फुलवारी सुरंगी जीवन री
साध्वी कानकंवर
मुनिवर गंगा करी सुरंगी जीवन री फुलवारी
कर अनशन ओ मनहारी ।।
श्रावकपण मे भी सामायिक सँवर पौषध करता
तप-जप स्यूं जीवन घट ने थे रह्या निरन्तर भरता
श्रमणोपासक री मंगलमय पडिमा ने स्वीकारी ||1||
गुरु चरणो मे हुआ समर्पित, अपनी ढलती वय मे
चचल मन ने करयो नियत्रित, तप सयम की लय में
सहज सरलता समता रस स्यू भरली अपणी झारी ।।2।।
दोनूं सुत सम्मुख सेवा मे, मुनिवर हा बड़भागी
अन्तिम वय मे अनशन री आ, प्रबल प्रेरणा जागी
चढता निर्मल भावां स्यू, काटी कारां कर्मा री ।।3।।
प्रभु री महर नजर स्यू गगाशहर सु अवसर पायो,
चौक-चौक मे गली-गली मे, रग अनोखो छायो
गौरवशाली गण उपवन पा आपां से आभारी ।।4।।
लय-सयम मय जीवन हो
94
गंगाशहर की गंगा
शासन ने चमकायो साध्वी भाग्यवती 'श्रीडूंगरगढ़ सत्ताणू व री गगाराम मुनिवर भारी जीवन बाग खिलायो। जीवन बाग खिलायो थे शासन ने चमकायो हो। थे तो ਕਵੀਂ आयु ही पाई। वडा-बडा ही काम कर्या थे आ ही है अधिकाई । रह्या श्रावक थे व्रतधारीजी, फिर श्रावक प्रतिमाधारीजी। बासठ वर्षा मे सयम धन तुलसी चरणा पायो हो। 1। पैतीस इक्कीस मजिला तप रा महल बणाया ठाडा । ऊपर अनशन कलश चढायो रमग्या तप मे गाढा। ही पूरी ही पुण्याई जी थारे कमी रही नही काई ही। दोनू पुत्र मुनि हाथा मे वेडो पार लगायो हो । 2 । गगाणे रा वासी थे तो गगाणे स्थिरवासी। गगाणे मे तपी तपस्या, गगाणे सुरवासी। रहता सयम मे रगराताजी, रही सदा चरण मे साताजी। गगाराम नाम गगाजल जीवन शुद्ध बणायो हो। 31 भिक्ष शासन जयवतो ओ सौभागी कोई ईं गणवन रा फूल सुगन्धी बण सुरभि फैलावे । थे हा सचमुच सौभागीजी रह्या सयम पथ अनुरागीजी। गावे 'भाग्य' तपस्वी गौरव कण-कण ओ हरसायो हो। दोहा सुदृढ मनोबल का धनी मुनिवर गगाराम । पूर्ण सजगता मे ग्रह्यो, सथारो निष्काम । 11 राज पूर्ण मुनि पुत्र द्वय, दियो सहज सहयोग गुरु करुणा स्यू ही मिल्यो, ओ समुचित सुयोग ।21 गुरुदेव जाण्या अहो थारे मन रा भाव । थे गुरुवर रा जाणिया, चमत्कारी प्रभाव ।। 1 लय-मारु जी थारे देश मे आ रेलगाडी 2. गुरु तुलसी पद अनुरागी पावे। -
क्षणिकाएं
साध्वी विनयश्री 'प्रथम'
यथानाम तथा गुण
गंगाधाम
गगानाम
उत्तर में
अकित राम
निर्मलता
पवित्रता
अपराजेय व्यक्तित्व
मुनिवर गंगाराम
खोला शान्तिधाम
पहचानी क्षणभगुर धाम
तपा तप प्रकाम
देकर एक छिदाम
पायो पर्याप्त दाम
की मुरक्षा आठोयाम
रखा जागरूक अपना राम
तुमने गगाराम।
खोलो शान्तिधाम ।
स्वच्छता
प्राप्त कर
कल्मप हर
जीवन स्तर
उन्नत कर
गए शीघ्रतर
सिन्धुतर।
96
गंगाशहर की गंगा
तीन मुक्तक
मुनि गंगारामजी के प्रति
मुनि चोथमल 'छापर'
हम तुम्हे नही तुम्हारे तप को याद करते है।
बडी उम्र मे सयम प्रतिरूप को याद करते है ।।
सावनसुखा परिवार पर स्वर्ण कलश चढाने वाले।
'गगारामजी' तुम्हारे जप को याद करते है ।।
यह अनशन और तुम्हारी समता के क्या कहने ।
सयम, तप व सत्य के प्रति ममता के क्या कहने ।।
रूणिया जन्म, हिसार दीक्षा, गगाणे मे स्वर्गवास ।
सरलता, सहजता और क्षमता के क्या कहने ।।
पितृ-ऋण से मुक्त बने मुनि राजकरण भी धन्य है।
पूर्णानन्द भी उऋण बने बदौलत कृत पुण्य है ।।
आपकी खिदमत का एक अवसर मिला था हमे भी।
लिहाजा भिक्षु शासन कर्म निर्जरा वास्ते अनन्य है ।।
तपस्वी मुनि गगारामजी
99
कुण्डलियां
मुनि विजय कुमार
तेरापंथ का तेज अनूठा दिन-दिन बढता जाये
तपस्वी महावृद्ध अनशन कर स्वर्णिम कलश चढाए
स्वर्णिम कलश चढाए बाबा गंगा गंगा नहाएं
पुण्यवान, दोनो पुत्रो के हाथो स्वर्ग सिधाए
विजयमुनि कहे गंगाशहर मे तीर्थ गंगा भाए
सतानवे वर्षों का तपस्वी नव रिकार्ड गण पाए ।
भाग्योदय
साध्वी झमकू
तप संयम की साधना, श्रावक जीवन मांय ।
पडिमा ग्यारह पूर्ण की, रखू दृढ़ता अधिकाय ।।।
वृद्धावस्था मे कर्यो, संयम पथ स्वीकार ।
भाग्योदय स्यू है मिला, तुलसी तारणहार ।21
संयम में ही सजगता, करता तप-जप, ध्यान ।
गगाणे गंगा किया, तप गंगा मे स्नान 131
सुत दोनूं है संयमी, राज पूर्ण सुखकार ।
अन्त समय अनशन करा, कर दी नैया पार 141
हुवे पिता स्यूं उऋण यू, आगम वच अनुसार ।
ठाण तीजे मे कहयो, सुण पढ तेओ चार 151
98
गगाशहर की गगा
.
यश की बिगुल बजाई
मुनि हर्षलाल
-
धन्य गंगाराम अणगार, अन्तिम आराध्यो सथार
नैय्या पार लगाई जी, यश की बिगुल बजाई जी।
पडिमाधारी श्रावक बणकर गृहस्थ पणो दीपायो
बासठ वय मे दीक्षा लेकर मेरु पहाड उठायो
गुरुवर तुलसी करुणाधार, सयम साज दियो हर बार । नैय्या ...।।1।।
मुनि श्री राजकरणजी थारा द्वितीय पुत्र सुखकारी
थास्यूं ही पहला ली दीक्षा आगम ज्ञाता भारी
आया कोस सात सौ चाल, अन्तिम मौको मिल्यो विशाल । नय्या...।।2।।
पूर्णानन्द मुनीश्वर की आ दीक्षा हुई शुभकर
सात वर्ष मे पाच वर्ष की सेवा धर्म समझकर
थारे पुण्यवानी रो योग, गुरुवर बहुत दियो सहयोग । नैय्या. ।।3।।
सत्ताणू वर्षा री सारी उमर आपने पाई
पैतीस साल सयम पाल्यो गगाणे ज्योति जलाई
दोनो पुत्र मुनि गुण हीर, सेवा करता रह्या सधीर । नय्या...।।4।।
भिक्षु शासन है जयवन्तो तुलसी आज रुखाल
सदा फूलता फलता रहवै जो आज्ञा मे चालै
'हर्ष मुनि' तपसी रो ध्यान, ध्याया कर्मा रो अवसान । नैय्या...।।5।।
लय-नीले घोडे रो असवार
तपस्वी मनि गगारामजी
101
'छप्पय'
मुनि नवरतनमल
सुनाम ||
वासी गंगाशहर के गंगाराम सुनाम ।
गण-गंगा में स्नान कर पाये परमाराम ।
पाये परमाराम
नाम सार्थक कर पाये।
संयम-तप मकरन्द स्वाद अनुपम चख पाये।
अनशन करके अन्त मे चले गये सुरधाम ।
वासी गगाशहर के गगाराम
पडिमाधारी अणुव्रती, श्रावक श्रद्धाशील ।
दीक्षित होकर हो गये, गण मे प्रथम दलील ।।2।।
वय मे बासठ साल की, बने संयमी सूर ।
दीर्घकाल कर साधना, लिया लाभ भरपूर ।।3।।
दोनो नन्दन पास में, राज व पूर्णानन्द ।
योग प्राकृतिक मिल गया, जैसे स्वर्ग सुगन्ध ।।4।।
नवति-सात वर्षायु का, उदाहरण उत्कृष्ट ।
श्रमण संघ मे रख दिया, नया लिख दिया पृष्ठ ।।5।।
100
गंगाशहर की गगा
rame
ram
कर गया खेवो पार
मुनि राजकुमार
श्रावकपन मे तप कर्यो, फिर ली पडिमाधार ।
वय वासठ पाई जणा, दीक्षा की स्वीकार ।।
बत्तीस वर्षा तक कियो, एकान्तर तप आप ।
माला अनुपूर्वी लिया, खूब कर्यो है जाप ।।।
सौ वर्षा मे तीन कम, आयु पाई आप ।
दोनू सुत हा पास मे, जबर जमाई छाप ।।
ग्यारह आश्विन शुक्ल मे, कर अनशन तिविहार ।
वारह पर तैतीस मिनट, कर गया जय-जयकार ।
चवविहार दिन दूसरे, बारस सुकरवार ।
एक अट्ठावन मिनट पर, कर गया खेवो पार ।
अभिनन्दन शत वार
मुनि अभिनन्दन
मुनिवर गगारामजी, स्वय बने है धन्य ।
उनके कारण बन गया, गगाणा भी पुण्य ।।1।।
वर्षों तक करते रहे, एकान्तर उपवास ।
दूर-दूर फैली वहुत, जिनकी सुगुण सुवास ।।2।।
मुनि अभिनन्दन कर रहा, अभिनन्दन शत वार ।
अनशन व्रत मे कर गये, अपना वेडा पार ।।3।।
तपस्वी मुनि श्री गगारामजी
103
अरासरा भारी . n महिला मण्डल, गंगाशहर मुनिवर तपसी भारी थे हद हिम्मत धारी। चढते भावास्यू थे लियो अणसण भारी। सत्याणु वर्षां री उम्र मे मुनिवर काम कमाल कियो। सयम री कर विमल साधना जीवन ने चमकायो। जीती अतिम बाजी जावा म्हे बलिहारी। गुरुदेव री पूर्ण कृपा स्यूं थाने अभिनव जोग मिल्यो। मुनि राजकरणजी पुरणानन्दजी दोनो रो सहयोग मिल्यो । थे कितना बडभागी हो मिल्यो मौको भारी । थां जिसा तपसी सन्ता स्यूं शासण है सौभागी हो। मन पर काबू कर थे आखिर काया री ममता त्यागी हो । समाधि आखिर लियो थे स्वीकारी। गंगाणे रा बाया-भायां तपसी रा गुण गावा हो । थारे संथारे री मुनिवर खुशिया आज मनावा । तपसी रा गुण गायां जीवन नैया तारी हो। लास्ट पैतीस वर्ष संयम पाल्यो जीवन मे तप धार्यो थे । मुनि पूरणानन्दजी सेवा साजी अपनो तन-मन मार्यो हो । मरण - . लय-नखरालो देवरियो 102 गगाशहर की गगा - भद्र प्रकृति, पग-पग पापा स्यूं उरणो। रह्यो लक्ष्य एक-भव-सागर पार उतरणो' ॥ पूर्ण समर्पित, कह्यो एक गुरु-शरणो। अनशन-पूर्वक, गगाणे पडित मरणो ।। है लाख-लाख लखदाद, सफल जीवन लाखीणौ 11511 वयोवृद्ध स्थिरवासी गुणचन मुनिवर । को रह्यो साझ सेवा मे अति ही सुखकर ।। सभी शक्ति सारू सेवा पूनम मुनिवर । मुनि राजकुमार रह्यो सेवा मे हाजर ।। सहयोग सत्या रे साथ दियो सति केशर। अवसर सुन्दर सेव रो भाव स्यू मीणो 11611 सेवा मे पुत्र-रत्न मुनि राजकरणजी। मुनि पूर्णानन्द ज्येष्ठ सुत रहे समन जी।। कर सेवा खूब चुकायो पितृ-ऋण जी। आदर्श नमूनो व्यावच रो इण गणजी ।। कर गुण तपसी रा फूले सीनो ॥7॥ गा-गा जबर।। कर सौरठा मुनिवर गगाराम वय सित्याणू वर्ष मे। जन्म-धाम अभिराम, आदरियो अनशन हद हिम्मत रो काम शेष समय समभाव स्यूं । उजवाल्यो नाम, सजम जीवन सफल कर। पडिमाधारी श्राद्ध बणा वय वय बासठ वर्ष मे ।। तुलसी चरण आराध, साते सयम-पथ लह्यो। राज पूरणानन्द सुत विहुमुनि है सेवा मे ।। लहि आनन्द अमद उऋण पितृ-ऋण स्यू वर्ण । धन तपसी तप-तेज आत्म-शक्ति अद्भुत खिली। शिव-सुख वरवा हेज, तपसी रे रूं-रू रम्यौ ।। सयम-जीवन सार उज्ज्वल भावां स्यू ग्रही। सुखे उतारो पार भार लियो जो सहर्प यह ।। m लय....लावणी 1. निदेशक, समण सस्कृति सकाय, जैन विश्व भारती तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 105 - पूर्ण समर्पित मूलचन्द घोषल गगा ज्यू निर्मल, राम-राम पथ चीनो। मुनि गगाराम नाम निज सार्थक कीनो।आंकड़ी। पडिमा ग्यारह चढता परिणामां पूरण । कर भयो मुदित मन, पुलकित तन रो कण-कण ।। हुई वृद्धि वैराग्य भाव मे क्षण-क्षण । तैयार हुये फिर वे साधुपन लेवण ।। जाण्यो 'पाणो दुर्लभ नगीनों ।।1।। यद्यपि उमर थी बासठ बरसा री। फिर भी वैराग्य वृत्ति अति तीव्र तिहारी ।। देकर दीक्षा गुरु जीवन नैया त्यारी । बण गये श्रमण श्रावक वे पडिमाधारी ।। साते पोह सुदी सात्यू हिसार रसभीनो। नव कीर्तिमान स्थापित गण मे कर दीनो 11211 नर-जन्म पैतीस वर्ष लग सयम-जीवन पाल्यो। तप-जप-स्वाध्याय ध्यान स्यू खूब उजाल्यो ।। कर अनशन अत मे जवर जग व्रत झाल्यो। सुद वारस आश्विन दिन सुरपुर कियो ठाल्यो। धन पंडित मरण औ सयम जीवन जीणो ||3|| वेले मे कियो सधारो सुविचारी। इक दिन तिविहारी, इक दिन ही चौबिहारी ।। वय सित्यागूं वर्ष में इचरजकारी। ओ काम कियो बाबो तप-ममताधारी। सयम जीवन पर म्वर्ण-कलश मगीनी 1411 101 गगाहर की गमा परिशिष्ट
श्रद्धा 'सुमन'
मुनि श्रेयांसकुमार, 'गंगाशहर'
1.
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2.
3.
संयम धन स्वीकार कर, किया अनूठा काम ।
गंगा सम निर्मल बने, मुनिवर गगाराम ॥
सावनसुखा परिवार का, शासन मे सहयोग ।
चवदह दीक्षाएं हुई, मणि काचन सयोग ।।
तात्विक चर्चा के रसिक, कई थोकडे याद ।
श्रावकपन से ही लिया, सिखलाने का स्वाद ।।
तपस्या में तल्लीन बन, तन का खीचा सार ।
अनशन पूर्ण समाधि युक्त, कर पाये भव पार ।।
पुत्र युगल सहयोग से, पाया पूर्णानन्द ।
मुनि श्रेयास विकास हो, टूटे भव के बन्ध ।।
4.
5.
D
106
गमागहर की गगा
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श्रावक-साधना
श्रावक की ग्यारह प्रतिमा
1. दर्शन-प्रतिमा।
समय-एक मास। विधि-सर्व-धर्म रुचि होना, सम्यकत्व विशुद्धि
रखना, सम्यकत्व के दोषो को वर्जना।
2. व्रत-प्रतिमा।
समय-दो मास, विधि-पाच अणुव्रत और तीन गुणव्रत धारण करना
तथा पौपध उपवास करना।
3. सामायिक-प्रतिमा।
समय-~-तीन मास । विधि-सामायिक और देशावकाशिक व्रत धारण
करना।
-
4 पौषध-प्रतिमा।
समय-चार मास, विधि-अष्टमी, चतुर्दशी, अमावस्या और पूर्णमासी
को प्रतिपूर्ण पौषध व्रत का पालन करना ।
5. कायोत्सर्ग-प्रतिमा।
समय-पाच मास । विधि-रात्रि को कायोत्सर्ग करना। पाचवी
प्रतिमा वाला (1) स्नान नही करता। (2) रात्रि-भोजन नही
करता। (3) धोती को लाँग नही देता । (4) दिन मे ब्रह्मचारी
रहता है । (5) रात्रि मे मैथुन का परिमाण करता है।
6 ब्रह्मचर्य-प्रतिमा।
समय-छह मास । विधि-सर्वथा शील पालना।
7. सचित-प्रतिमा।
समय-सात मास । विधि-सचित आहार का परित्याग करना ।
8. आरम्भ-प्रतिमा।
समय-आठ मास । विधि-स्वय आरम्भ-समारम्भ न करना।
ಫಸಿ:
9. शयन- शयन-बिछौनों की सीमा करना। 10. विलेपन - केसर, चन्दन, तेल आदि लेप करने वाले पदार्थो की सीमा करना। 11. अब्रह्मचर्य-मैथुन सेवन की सीमा करना। 12. दिशा -छहो दिशाओ मे यातायात व अन्य जो भी प्रवृत्तिया की जाती है, उनकी सीमा करना। 13. स्नान - स्नान व जल की मात्रा की सीमा करना। 14 भक्त-अशन, पान, खादिम, स्वादिम की सीमा करना। - श्रावक के दस लक्षण 1 जीवादि नौ तत्वो का ज्ञाता। 2 सकट के समय देवतादि की सहायता की कामना न करना। 3 धर्मादि कार्यो मे दृढ रहना । देवो के चलाने पर भी चलित न होना। 4. निर्गन्ध प्रवचन मे शकादि न करना। 5 शास्त्रो के अर्थ को कुशलता से ग्रहण करना। 6. निर्ग्रन्थ प्रवचन को ही ससार मे सार समझना । 7 घर का द्वार वन्द न करना। 8. विश्वास पात्र होना। 9 बारह व्रतो का धारक होना । 10 साधुओ को निर्दोप आहार-पानी देना (बहराना) श्रावक की दैनिक जीवन चर्या के सकल्प 1. मै मन की शाति के लिए प्रतिदिन प्रात आसन, मन्त्र जप और ध्यान का अभ्यास करूगा। 2 मै प्रतिदिन पन्द्रह मिनट सत्साहित्य का स्वाध्याय करूंगा। 3. मै आत्म तेज बढाने के लिए प्रतिदिन एक घण्टा मौन करूगा। 4 मै सप्ताह मे कम से कम एक बार सामूहिक प्रार्थना, सामायिक साधना तथा गोष्ठी मे भाग लूगा । 5 मै प्रतिदिन सोते समय शुभ सकल्पो को दोहराऊगा। 6 गृहस्थ जीवन मे पूरी प्रामाणिकता निभायी जा सकती है, इस पर मै नित्य नये प्रयोग करूगा। 7 मेरे कारण कही परिवार मे अशान्ति तो नहीं बढ़ रही है प्रतिदिन चितन करूगा। तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 109 9. प्रेष्य-प्रतिमा। समय-नव मास । विधि-नौकर-चाकर आदि से आरम्भ-समारंभ न कराना । 10. उद्धिष्ट-वर्जक-प्रतिमा । समय-दस मास । विधि उद्धिष्ट भोजन का परित्याग करना । दशवी प्रतिमा वाला बालो का क्षुर से मुण्डन करता है अथवा शिखा धारण करता है । घर सवधी प्रश्न करने पर 'मै जानता हूं या नहीं' इन दो वाक्यों से ज्यादा नही बोलता। 11. श्रमणभूत-प्रतिमा । समय-~-ग्यारह मास । विधि-ग्यारहवी प्रतिमा वाला बालो का क्षुर से मुण्डन करता है अथवा लोच करता है और साधु का आचार, का आचार, भण्डोप- करण एव देश धारण करता है । केवल ज्ञातिवर्ग से उसका प्रेम-बधन नही टूटता, इसलिए वह भिक्षा के लिए केवल ज्ञातिजनो में ही जाता है । अगली प्रतिमा मे पहली प्रतिमा का त्याग यथावत चालू रहता है । चौदह नियम श्रावक अपने जीवन मे सब प्रकार की पापकारी प्रवृत्तियो का त्याग नही कर सकता । फिर भी उनकी सीमा का निर्धारण कर सकता है । सपाप प्रवृति की सीमा का निर्धारण भी आध्यात्मिक विकास का एक द्वार है। श्रावक के दैनदिन व्यवहारिक प्रवृत्तियो के सीमाकरण का एक क्रम प्राचीन- काल से चला आ रहा है, जिसमे प्रमुख रूप से चौदह बिन्दुओ का स्पर्ण है । ये चौदह बिन्दु चौदह नियम की संज्ञा से अभिहित है -- . - 1. सचित अन्न, पानी, फल आदि सचित वस्तुओ की मीमा करना । 2. द्रव्य खाने-पीने सवधी वस्तुओ की सीमा करना। 3. विगय दूध, दही, घी, तेल, गुड, मिठाई-इन छह विगय के परिभोग की सीमा करना। 4. पन्नी जूते, मोजे, खडाऊ, चप्पल आदि की मीमा करना। 5. ताम्बूल -पान, सुपारी, इलायची, चूर्ण आदि मुग्ववास के द्रव्यों की सीमा करना। पहनने के वस्त्रो की मीमा करना। 7 कुसुम- फूल, इत्र व अन्य मुगंधित वस्तुओं की सीमा करना। 8. वाहन-मोटर, रेल, मूटर, सिंगा आदि वाहनों की मीमा पारना। 6 वस्त्र 108 गगाटाकीगा 20. परहितकारी-जो औरो को न्याय मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता हो। 21 लब्ध-लक्ष्य--जिसे अपने लक्ष्य का विवेक तथा स्थिरता प्राप्त हो गई हो। नोट जो उपयुक्त सभी गुणो को अपने मे अनुभव करते है वे उत्कृष्ट कोटि के साधक है, जो इनमे से आधे गुणो का अनुभव करते है वे मध्यम कोटि के साधक है और जो आधे से न्यून गुणो का अनुभव करते है वे साधारण कोटि के साधक है। श्रावक के तीन मनोरथ 1. श्रावक यह भावना भाये कि वह शुभ दिन कब आएगा जब मै अल्प या अधिक परिग्रह का त्याग करूगा। 2. श्रावक यह चिंतन करे कि वह शुभ समय कब प्राप्त होगा जब मै गृहस्थावास को छोडकर सयम ग्रहण करूंगा। 3. श्रावक यह विचार करें कि वह मगल बेला कब आएगी जब मै अन्तिम समय की संलेखना व अनशन कर मरण की इच्छा न करता हुआ समाधिमरण को प्राप्त करूंगा। श्रावक के चार विश्राम जैसे भार वाहकमनुष्य के चार विश्राम होते है- 1 भार को एक कधे से दूसरे कधे पर लेना। 2. शौच्चादि करते समय भार को नीचे उतारना। 3 रास्ते में रात पड़ने पर देवालय मे विश्राम करना। 4. जहा पहुचना है वहां भार से बिल्कुल मुक्त होना। उसी प्रकार सासारिक भार से दबे हुए श्रावक के भी चार विश्राम माने गये है। 1 अणुव्रत । बारहव्रत, विविध त्याग-प्रत्याख्यान । 2 सामायिक साधना। 3 पौषध साधना। 4. सलेखना पूर्वक अनशन । दस निमितो से उच्च गति का बन्ध 1 सन्तो के दर्शन न होने पर पश्चाताप करने से। 2. प्रवचन न सुन सकने पर पश्चाताप करने से। 3 ज्ञान देते समय अशुद्ध होने पर पश्चाताप करने से। 4. शक्ति होते हुए न पढने पर पश्चाताप करने से। 5. साधामिक की सभाल न करने पर पश्चाताप करने से। तपस्वी मुनि श्री गगारामजी - श्रावक कैसा हो ? 1. अक्षुद्र-जिसका जीवन व्यवहार अक्षुद्र अर्थात् गभीर हो । 2. रूपवान--जो शरीर व इन्द्रियों से सक्षम तथा मजबूत अस्थिसस्थान वाला हो। 3 प्रकृतिसोम-जिसके स्वभाव में शाति और सहिष्णुता का भाव हो । 4. लोकप्रिय-- जिसने अपने व्यवहारो से समाज मे लोकप्रियता प्राप्त की हो। 5. अक्रूर-जो क्रूरता प्रभावित दामन और शोपण जैसी प्रवृतियों को प्रश्रय नहीं देता हो। 6 भीरू-पापात्मक कार्यों को करते सकोच का जिसे अनुभव हो। 7 अशठ-जिसके जीवन व्यवहार में छल, प्रपंच, माया, धूर्तता जैसी आत्म-घातक वृत्तियां न हो। 8. सुदक्ष-जो सभी आवश्यक कार्य दक्षतापूर्वक (कुशलतापूर्वक) करता हो तथा जिसकी कार्य-विधि सभी के लिए अनुकरणीय हो । 9. लज्जालु-अकरणीय कार्यो से दूर रहकर सदाचार का आचरण करता हो। 10. दयालु-धर्म का मूल दया है, यह सोचकर जो दया, करुणा, प्रेम आदि के भाव रखता हो। 11. मध्यस्थ-राग और द्वेष वश किसी का पक्ष नही लेकर जो न्याय का आदान-प्रदान करता हो। 12 गुणानुरागी-गुणवान व्यक्तियो का बहुमान, निगुण व्यक्तियो की उपेक्षा तथा सग्रह मे तत्पर रहता हो। 13. सत्कथ-विवेक ही धर्म है, यह सोचकर सदा सत्य भाषण करता हो। 14. सुपक्षयुक्त-जो अपनी धर्म-यात्रा मे परिवार को अनुकूल बनाये रसने में समर्थ हो । 15 सुदीर्घदर्शी-जो सुदूर भावी परिणामो को मोचकर चलता हो । 16 विशेषज्ञ~जो हेय, ज्ञेय तथा उपादेय पदार्थों की विशेष जानकारी रसता हो। 17 वृद्धानुयायो-वृद्धो के अनुभवो का जो अनुगमन करता हो। 18. विनीत-मोक्ष-प्राप्ति का मूल विनय है यह नोचकर मव के प्रति जो विनम्र व्यवहार करता हो । 19. कृतज-जो अपने धर्माचार्य को परम उपकारी मानता हो। 110 गमागहरी गगा 5. शासन के किसी साधु-साध्वी मे दोष जान पडे तो स्वयं उसे या आचार्य को जताऊंगा। प्रचारित नहीं करूंगा। 6. मै अपने खान-पान की शुद्धि बनाए रखूगा। 7. में प्रतिदिन एक सामायिक या कम-से-कम वीस मिनट धर्मोपासना करूगा। तपस्या का फल । राग और द्वेष के कारण प्रति समय जीव के अशुभ तथा असाता कारक कर्मो का बध होता रहता है। जब वे कर्म भोग में आते है तब वे अपना भयकर दु.खद प्रभाव दिखाते है । उन कर्मो से छुटकारा पाने का एक साधन तपस्या है । तपस्या का प्रारम्भ नवकारसी से होता है। नीचे तपस्या और उसका फल दिया जा रहा है। किस तपस्या से कितने वर्षों के अशुभ कर्मों का क्षय (नाश) होता है। 1 नवकारसी सौ वर्ष के अशुभ कर्म क्षय 2. पोरसी एक हजार वर्ष कर्म क्षय 3. डेढ पोरसी दस हजार वर्ष कर्म क्षय 4. दोपहर (आधा दिन) एक लाख वर्ष कर्म क्षय 5. एकासन दस लाख वर्प कर्म क्षय 6. नीवी (विगय त्याग) एक करोड वर्ष कर्म क्षय 7. एकल ठाणा (एक घटे के अन्दर मौन से खाना) दस करोड वर्ष कर्म क्षय 8 आयविल सौ करोड़ वर्ष कर्म क्षय 9 उपवास एक हजार करोड वर्ष कर्म क्षय 10. एक प्रतिपूर्ण पौषध का क्या फल ? 2777 करोड 77 लाख 77 हजार 777 पल्य तथा एक पल्य के नोवे भाग का सातवा भाग जितना देवता का आयुष्य बधता है । 11 एक पहर की सामायिक करने का क्या फल है ? 32 दोष रहित सामायिक करे तो 347 करोड 22 लाख 22 हजार 222 पल्य तथा एक पल्य के नौ भाग मे से एक भाग जितना देवायुष्य बधता है। 12 48 मिनट की शुद्ध सामायिक का क्या फल है ? 92 करोड 59 लाख 25 हजार 925 पल्य तथा 2 पल्य का 4 भाग जितना देवायुष्य बंधता है। तपस्वी मुनि श्री गंगारामजी 113 6. अनुकूल योग होने पर भी सुपात्र दान न देने पर पश्चाताप करने से । 7. पूर्व और पश्चिम रात्रि में साधु और श्रावक धर्म की चितवला न करने पर पश्चाताप करने से । 8. सामायिक तथा प्रतिक्रमण शुद्ध न होने पर पश्चाताप करने से । 9. साधु-साध्वियो की सार-संभाल न करने सकने पर पश्चाताप करने से । 10. त्यागी मुनियों को विहार करवाने न जाने पर पश्चाताप करने से । दस प्रत्याख्यान नवकारसी-सूर्योदय पश्चात एक मुहूर्त तक कुछ नही खाना। पोरसी-एक प्रहर दिन चढे तक कुछ नही खाना । डेढ़पोरसी-डेढ़ प्रहर दिन चढे तक कुछ नही खाना। दोपहर-आधे दिन तक कुछ नहीं खाना । एकासन-दिन में सिर्फ एक बार एक जगह वैठकर खाना । नीवी-एकासन की तरह पक्ष बार विगमय रहित भोजन करना। एकलठाणा-दिन में एक बार, एक जगह मौन से एक घन्टे खाना। आयंबिल-एक धान (अलुणा व लूखा) पका हुआ एक वार खाना । चरमप्रत्याख्यान-दिन अस्तं होने के एक घन्टे पहले खाना पीना । उपवास-तिविहार (पानी के अलावा नही), चौविहार (खाना-पीना कुछ नही।) अभ्रिह-अभ्रिह पूरा होने के पहले नही खाना। नोट :--श्रावक को वर्ष में एक बार दस प्रत्याख्यान अवश्य करने चाहिए। श्रावक-निष्ठा पत्र मै तेरापंथ धर्म शासन का अनुयायी श्रावक हूँ/श्राविका हूँ। इसका मुझे गौरव है। मैं इसे जीवन-विकास का तथा समस्याओं के समाधान में सबसे बड़ा आलम्बन मानता हूँ । अत: अपने दायित्व-निर्वाह तथा आस्था की पुष्टि के लिए मैं इन संकल्पों को स्वीकार करता हूँ। 1 मैं आचार्य भिक्षु की मर्यादा, तेरापंथ धर्म-शासन तथा शासनपति के प्रति समर्पित रहूगा। 2. मै गासन की अखण्डता के लिए सतत जागरूक रहेगा । दलबदी को प्रोत्माहन नहीं दूंगा। 3. मैं सामन से बहिर्भूत व्यक्ति (टालोर) को प्रश्रय नहीं दूंगा। 4. में आनायं की आज्ञा के प्रतिन प्रवृत्ति को समर्थन नहीं दूंगा। 112 मार की गमा
महामंत्र-साधना
नमस्कार महामंत्र जैन परम्परा का विशिष्ट मंत्र है, इस मगल मत्र के
द्वारा लाखों नही, करोडो व्यक्ति लाभान्वित हुए है । यह मगल कामनाओ से
भरा मन्त्र जगत् मे मागल्य की वृद्धि करता है । मागल्य की भावनाओ को
बढाता है। इस मत्र के पीछे अनन्त साधको की साधना है, अत इसकी
नियमित साधना से साधक के सभी मनोरथ पूर्ण होते है।
गमो अरिहंताणं :
मै अरिहन्तो को नमस्कार करता हूँ।
जिन्होने राग-द्वेष रूप कर्म शत्रु का नाश केवल ज्ञान (ब्रह्मज्ञान)
प्राप्त कर लिया है, वे तीर्थकर भगवान अरिहन्त कहलाते है ।
रगमो सिद्धाणं :
मै सिद्धो को नमस्कार करता हूँ।
जो अष्ट कर्मो की सर्वथा क्षय करके निजात्मरूप मे अवस्थित हो गए है,
जन्म मरण की शृखला को तोडकर सिद्धी, मोक्ष, निर्वाण प्राप्त कर
चुके है वे सिद्ध कहलाते है।
रगमो पायरियाणं :
मै धर्माचार्य को नमस्कार करता हूँ।
ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप और वीर्य मे पाच प्रकार के आचार, जो स्वय
विशेष जागरूकता से इनका पालन करते है और अपने शिष्यो से पालन
कराते है वे आचार्य कहलाते है ।
रगमो उवझायाण :
मै उपाध्याय को नमस्कार करता हूँ।
विशेषत धर्म शास्त्रो के अध्ययन-अध्यापन कार्य को सम्पादित करने
वाले उपाध्याय कहलाते है।
णमो लोए सव्वसाहूणं :
मै लोक के सव (शुद्ध) साधुओ को नमस्कार करता हूँ।
13. एक घडी संवर करने का क्या फल है ?
46 करोड 39 लाख 62 हजार 9620 पल्य का देवायुष्य वधता है।
14. नवकार मत्र की एक माला स्थिर चित्त से पढ़ने का क्या फल है ?
19 लाख 63 हजार 267 पल्य का देवायुष्य वधता है ।
15. एक बार अनुपूर्वी शुद्ध चित्त से पढने का क्या फल है ?
जघन्य 66 सागर, उत्कृष्ट 500 सागर के पाप कटते हैं।
16. बेला करने से कितने उपवास का फल ? 5 उपवास का
17. तेला करने से कितने उपवास का फल ? 25 उपवास का
18. चौला करने से कितने उपवास का फल ? 125 उपवास का
19. पचोला करने से कितने उपवास का फल ? 625 उपवास का
नोट :- ऐसे ही एक-एक व्रत और वढाने से पाच गुणा अधिक समझना।
हर तपस्या पर प्रहरसी करने से दुगुना लाभ होता है ।
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गगारीमा
जप-साधना
विशिष्ट अक्षरो के सयोजन का नाम मत्र है । मत्र अपने ध्वनि संघर्ष
के द्वारा विविध शक्तियो को आकर्षित करता है । अत जीवन विकास क्रम मे
'जाप' महत्वपूर्ण साधना का अग बन जाता है। कुछ मत्र एकान्त आत्मविजय
मे सहायता करते है और कुछ मत्र भौतिक शक्तियो का आह्वान करते है,
किन्तु हमारा उद्देश्य आत्म शुद्धि रहना चाहिए।
जप-साधना विधि
1. जन अनुष्ठान के लिए दृढ आस्था और आभ्यन्तर पवित्रता की अत्यत
आवश्यकता है।
2. जप काल मे सीमित द्रव्य, एकासन, आयस्बिल उपवास आदि अवश्य
होने चाहिए।
3 मन. स्थैर्य के लिए नियत आसन मे बैठकर (पद्मासन, सिद्धासन,
सुखासन) नासाग्र या भृकुटि पर ध्यान केन्द्रित करना चाहिए ।
4 जप काल मे नियत समय (पश्चिम रात्रि, प्रात शौच निवृत्ति के बाद
या पूर्व रात्रि) तथा नियत स्थान भी अपना स्वतत्र महत्त्व रखता है ।
उपयोगी जप-मत्र
नमस्कार मंत्र के एक-एक पद का रगो के साथ चिन्तन करे ।
ओम्-अ-सि-आ-उ-सा नम.
यह नमस्कार मत्र के पाचो पदो का वाचक मत्र है।
2. अहिंसा विकास के लिए
धम्मो मगल मुक्किठ्ठ अहिंसा सजमो तवो।
देवावि त नमसति जस्स धम्मे सया मणो।।
कषाय विजय (आत्म विजय) के लिए--
एगे जिये जिया पच, पच जिये जिया दस ।
दसहा हु जिणिताण, सव्व मत्तू जिणामहं ।।
1
-
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जो मुनि पंच महाव्रत पालक, अठारह सहस्त्र गुण धारक तथा परमो- पकारक है वे मुनि साधु कहलाते है । इस महामंत्र के पांच पद है और 35 अक्षर है । इसमे किसी व्यक्ति विशेप को नहीं किन्तु गुणीजनों को नमस्कार किया गया है । अरिहन्तो के 12, सिद्धो के 8, आचार्यों के 36, उपाध्याय के 25 एव साधुओ के 27 गुण होते है । इस तरह कुल 108 मनको की माला का जप किया जाता है। 108 गुण पाच पदों की वदना मे अलग-अलग बताए गए है। एसो पंच णमुक्कारों सव्व पावप्पणासणो। मंगलाणं च सव्वेसिं पढ़मं हवइ मगलं ।। यह नमस्कार महामंत्र सब पापों का नाश करने वाला और सब मंगलो मे प्रथम मंगल है । रग व स्थान का ध्यान रखते हुए श्वासोच्छवास के साथ माला जपने की विधिया। रंग : णमो अरिहंताणं : श्वेत रग में अरिहन्तों का ध्यान णमो सिद्धाण . लाल रंग मे सिद्धो का ध्यान णमो आयरियाणं : पीले रग मे आचार्य का ध्यान णमो उवज्झायाण : नोले रंग मे उपाध्याय का ध्यान णमो लोए सव्वसाहूण : कृष्ण रग मे साधुओं का ध्यान स्थान: अरिहन्त भृकुटी पर सिद्ध मस्तक के मध्य भाग पर (तालु स्थान) आचार्य हृदय पर उपाध्याय नाभि पर साधु पैरो के अगूठो पर श्वास: श्वास ग्रहण करते हुए णमो अरिहताणं श्वास छोड़ते हुए णमो सिद्धाणं पुन. श्वास ग्रहण करते हुए णमो आयरियाणं श्वास छोडते हुए णमो उवज्झायाणं पुनः श्वास ग्रहण करते हुए णमो लोए श्वास छोड़ते हुए सव्वसाहूणं नोट :- यदि श्वास का क्रम इतना लम्बा न हो सके तो एक पद को दो भागो मे बांट ले । जैसे श्वास ग्रहण करते हुए णमो और छोड़ते समय श्वास मे अरिहताणं अथवा श्वास को हृदय चक्र पर रोक कर महामंत्र का जप करे। 0 116 गंगाशहर की गगा n 11 संकट निवारक मंत्र- ओम् अ-भी-रा-शि-को नमः इस मत्र की माला से भूत-प्रेत जनित कष्ट बहुत जल्दी दूर होते है। यह मत्र आज भी अपना चमत्कार दिखाता है। इसमे पाच घोर तपस्वियो की स्तुति है- 1. अ--अमीचन्दजी स्वामी 2. भी-भीमराजजी स्वामी 3. रा-रामसुखजी स्वामी 4. शि-शिवजी स्वामी 5. को-कोदरजी स्वामी 12. ओम् भिक्षु- यह मत्र श्रद्धावान लोगो के लिए महामत्र का कार्य करता है। इसका सवा लाख जाप करने से अवश्य चमत्कार होता है। प्रारम्भ भादवा सुदी तेरस या दीपावली से करे । ग्रह शाति के लिए तीर्थकरों का जाप तीर्थकरो के नाम परम मागलिक है। इनके जाप से शासन सेवक देव (यक्ष) और देविया (यक्षी) प्रसन्न होते है । समय पर वे सकट निवारण के लिए साक्षात् उपस्थित भी होते है । प्रतिदिन प्रात और साय निम्नोक्त विधि से एक आसन में बैठकर माला जाप किया जाता है। । ग्रह नाम दिशा माला रग जाप - 1 1 सूर्य लाल 2. चन्द्र श्वेत 3. मगल 4. बुध पूर्व उत्तर पूर्व पूर्व ईशानकोण पूर्व पश्चिम पूर्व या पश्चिम पूर्व लाल पीला पीला श्वेत 5. वृहस्पति 7,000 11,000 10,000 4,000 19,000 16,000 23,000 18,000 7,000 6. शुक्र 7. शनि श्याम 8 राहु श्याम 9. केतु नीला तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 119 A - - 4. ब्रह्मचर्य विकास के लिए- देव दाणव गधव्वा, जक्ख रक्खस्स किन्नरा। वंभयारिं नमसति, दुक्कर जे कसेन्ति त ।। 5. विघ्न विनाश के लिए- नमिऊण असुर सुर, गुरूल भुयग परिवदिये । गय किलेसे अरिहे, सिद्धायरिय उवज्झाव सव्व साहूण ।। 6 लोगस्स उज्जोयगरे- यह पाटी चौबीस तीर्थकरो की स्तुति रूप मे है । इस पाटी का कम से कम 7 बार रात को सोते समय ध्यान करना चाहिए। इस मगल मंत्र के ध्यान से स्वप्न नही आते । शासक-सेवक सभी देव और देविया इससे प्रसन्न रहते है । इसकी पूरी माला फेरी जाए तो विशेष लाभ होता है । 7 उपसर्ग हर स्तोत्र- यह भद्रबाहु स्वामी द्वारा रचित महा प्रभावक मत्र है । इसका साधन पौष वदी 10 से प्रारम्भ होता है । इसका बीज मन्त्र है- 'ओम् ह्री श्री नमिऊण पास, विसहर, वसह, जिण, फुलिग ह्री श्री नमः।' इसकी एक माला पद्मासन मे बैठकर पूर्वोत्तर दिशा मे फेरे, फिर 'उपसर्गहर स्तोत्र' का जितना पाठ हो सके उतना पाठ करें। उसके बाद प्रतिदिन 27 बार रात को इसका जाप करना अनिवार्य है। 8. पार्श्व स्तुति मन्त्र- ओम् ह्री श्री अर्ह श्रीचिन्तामणि, कामधेनु, कल्पवृक्ष, पुरुपादानी, श्री पार्श्वनाथ-धरणेन्द्र-पद्मावती-सहिताय, मम मनो वाछित, पूरय, पूरय जय-विजय कारणाय नमः । विधि- उपवास सहित पोप बदी 10 को यह जाप आरम्भ किया जाता है । फिर 27 बार जाप करना चाहिए । 9. गौतम स्तुति :- सुख शान्ति वर्द्धक मन्त्र ओम् नमो भगवतो गोयमस्स सिद्धस्स बुद्धस्स अक्खीण महाणसस्स, भगवन् । मम मनोरथ पूरय-पूरय स्वाहा । 10. पैसठिया छंद- यह प्रभावशाली मत्र है । इसका मन में सदा ध्यान रखते हुए 7 बार, 11 बार या 21 बार जाप करना चाहिए। 118 गगाशहर की गगा इण परे श्री जिनवर संभारिए, दु.ख दारिद्रय विध्न निवारिए, पच्चीसे पैसठ परमाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ॥5॥ इण भणता दुःख नावे कदा, जो निज पासे राखे सदा, धरिये पचतणु मन ध्यान, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।।6।। श्री जिनवर नामे वांछित मिले, मन वांछित सहु आशा फले, धर्मसिंह मुनि नाम निधान, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।।7।। श्री पैसठिया यन्त्र 22 3 9 15 16 14 20 21 2 8 1 7 13 19 25 18 24 5 6 12 10 11 17 23 4 तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 121 मंत्र इस प्रकार है- 1. ओम् ह्री श्री नम पद्मप्रभवे, मम ग्रह शान्ति कुरु कुरु स्वाहा । 2. ओम् ह्रीं श्री नमश्चन्द्रप्रभवे, मम ग्रह शान्ति कुरु कुरु स्वाहा । 3 ओम् ह्री श्री नमो वासुपूज्यप्रभवे, मम ग्रह शान्ति कुरु कुरु स्वाहा । 4. ओम् ह्री श्री नमो शान्तिनाथाय, मम ग्रह शान्ति कुरु कुरु स्वाहा । 5. ओम् ह्री श्री नमो श्रेयांसप्रभवे, मम ग्रह शान्ति कुरु कुरु स्वाहा । 6. ओम् ह्री श्री नमो ऋषभनाथाय, मम ग्रहशांति कुरु कुरु स्वाहा । 7. ओम् ह्री श्री नमो सुविधिनाथाय, मम ग्रह शान्ति कुरु कुरु स्वाहा । 8. ओम् ह्री श्री नमो मुनिसुव्रतनाथाय, मम ग्रह शाति कुरु कुरु स्वाहा। 9. ओम् ह्री श्री नमो नेमिनाथाय, मम ग्रह शांति कुरु कुरु स्वाहा । 10. ओम् ह्री श्री नमो पार्श्वनाथाय, मम ग्रह शान्ति कुरु कुरु स्वाहा। (नोट :- सागर भजनावली से) मंत्र सिद्ध करने का मुहूर्त उत्तराफाल्गुनी, हस्त, अश्वनी, विशाखा, मृगशिरा इन नक्षत्रों मे रवि, सोम, बुध, गुरु, शुक्र इन वारों मे और द्वितीया, तृतीया, पंचमी, सप्तमी, दशमी, एकादशी, त्रयोदशी, पूर्णिमा इन तिथियों मे मन्त्र सिद्ध करना शुभ होता है। श्री पैसठिया छन्द और यंत्र श्री नेमीश्वर सभव स्वाम, सुविधि धर्म शान्ति अभिराम । अनन्त सुव्रत नेमिनाथ सुजाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।।1।। अजित नाथ चन्दा प्रभु धीर, आदीश्वर सुपार्श्व गभीर, विमल नाथ विमल जग-जाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।।2।। मल्लिनाथ जिन मगल रूप, पंचबीस धनुष सुन्दर स्वरूप, श्री अरनाथ नमू वर्धमान, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ॥3॥ सुमति पद्म प्रभु अवतस, वासुपूज्य शीतल श्रेयांस, कुंथु पार्श्व अभिनंदन भाण, श्री जिनवर मुझ करो कल्याण ।।4।। गंगाशहर की गंगा 120 अणुव्रत गीत 1. 2. सयममय जीवन हो। नैतिकता की सुर-सरिता मे जन-जन मन पावन हो । अपने से अपना अनुशासन, अणुव्रत की परिभाषा, वर्ण, जाति या सम्प्रदाय से मुक्त धर्म की भाषा । छोटे-छोटे सकल्पो से मानस परिवर्तन हो ।। मैत्री-भाव हमारा सबसे प्रतिदिन बढता जाए, समता-सह-अस्तित्व, समन्वय-नीति सफलता पाए । शुद्ध साध्य के लिए नियोजित, मात्र शुद्ध साधन हो ।। विद्यार्थी या शिक्षक हो मजदूर और व्यापारी, नर हो नारी, बने नीतिमय जीवनचर्या सारी। कथनी-करनी की समानता मे गतिशील चरण हो । प्रभु बन करके ही हम प्रभु की पूजा कर सकते है, प्रामाणिक बन कर ही सकट-सागर तर सकते है। आज अहिंसा शौर्य-वीर्य सयुत जीवन-दर्शन हो । सुधरे व्यक्ति, समाज व्यक्ति से, राष्ट्र स्वय सुधरेगा, "तुलसी' अणु का सिंहनाद सारे जग मे पसरेगा। मानवीय आचार-सहिता मे अर्पित तन-मन हो ।। 3 4. 5. लय-चैत्य पुरुष जग जाए अनुशासन गीत 1 1 जय ज्योतिर्मय चिन्मय दीप जले। जय अनुशासन अन्तर मन से स्वर निकले ।। निज पर शासन फिर अनुशासन हो यह शाश्वत वाणी, जय शासन जय अनुशासन की धार बहे कल्याणी ।। जय जागृति की सहनाणी, चिर सजोए मानस सपन फले ।। अनुशासन है जटिल पहेली आज समूचे जग मे, व्यक्ति समाज राष्ट्र सारे ही उलझ रहे पग-पग मे ।। है अह भरा रग-रग मे, तम गहराता कैसे सूर्य तले ॥ 2. तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 123 - संघ गीत जय-जय धर्म-संघ अविचल हो । सघ संघपति प्रेम अटल हो । 1. हम सबका सौभाग्य खिला है, प्रभु यह तेरापथ मिला है। एक सुगुरु के अनुशासन मे, एकाचार विचार विमल हो ।। 2. रढ़तर सुन्दर सघ सगठन, क्षीर-नीर-सा यह एकीपन । है अक्षुण्ण सघ-मर्यादा, विनय और वात्सल्य अचल हो ।। 3. संघ-सपदा बढती जाए, प्रगति-शिखर पर चढती जाए। भक्षव शासन नन्दन वन की सौरभ से सुरभित भूतल हो । 4. 'तुलसी' जय हो सदा विजय हो, सघ चतुष्टय बल अक्षय हो । श्रद्धा भक्ति बहे नस-नस मे, पग-पग पर प्रतिपल मगल हो ।। लय- अमर रहेगा धर्म हमारा चैत्य पुरुष ! चैत्य पुरुष जग जाए। देव! तुम्हारा पुण्य नाम मेरे मन मे रम जाए। 1 ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ ॐ उद्गाता, अर्ह अह अह अह अहं अर्ह त्राता। ॐ ह्री श्री जय ॐ ह्री श्री जय विजय ध्वजा लहराए ।। 2. ॐ जय भिक्षु भिक्षु जय ॐ ॐ ह्री श्री ह्री श्री ह्री श्री, विध्न शमन ॐ व्याधि शमन ॐ क्ली क्ली क्लीं क्ली क्ली क्ली। नाम मंत्र तव व्रण संरोहण सतत अमृत बरसाए ।। 3. मिटे विषमता मन की, तन की, अनुभव की, चिन्तन की, पल-पल पग-पग मिले सफलता तन्मयता चेतन की। नाम मत्र तव भयहर, विषहर साम्य सिन्धु गहराए ।। 4 आत्मा भिन्न, शरीर भिन्न है तुमने मत्र पढ़ाया, आत्मा अचल अरूज शिव शाश्वत, नश्वर है यह काया । आत्मा आत्मा के द्वारा ही आत्मा मे लय पाए ।। तुम निरूपद्रव हम निरूपद्रव तुम हम सब है आत्मा, तव जागृत आत्मा से हम सब बन जाए परमात्मा । ॐ ह्रा ह्री हह ह्रौ ह्र ह्रः अन्तर मल धुल जाए ।। लय- नैतिकता की सुरसरिता मे 5.
- 1. 2 सिरियारी रो संत तेरापथ रो भाग्य-विधाता, श्रमण सघ रो सक्षम त्राता, लाखा आखडल्या रो तारो हार हिया रो लागे । म्हान सिरियारी रो सत प्यारो-प्यारो लाग ।। सत्य सिराणे सदा राखतो त्यागरी सारी सुविधावा, जिनवाणी पर जीवन जामा झोक्यां बलिहारी जावा । बाणी साधना सिद्धि स्वयं ही, चीर चल्यो सब बाधावा, आत्म-समर रै अमर वीर री म्है गौरव गाथा गावा। पावा सुमिरण स्यू सुखमाता, बण ज्यावा हा ताजा-माता, दाता ज्ञान-चक्षु रो, सूरज सो उणिहारो लागे ।। त्याग तपोबल प्रवल मनोबल चकित-चकित मानव रहग्या, खड्या हुआ अवरोध जिता ही अपणे आप सभी ढहग्या । प्रति स्रोत मे बढयो, भले ही अनुस्रोत मे सब बहग्या, पुण्य पौरसो तेज भोर सो, धोर विरोधी भी कहग्या । मन सकल्प-शक्ति ही भारी, धार्मिक जन जुग-जुग आभारी, मावस रात मे बो पूनम सो उजारो लागे । पथ चलाणो लक्ष्य नही हो, चल्या चरण बस पथ बण्यो, कुण जाणे किण पुल मे दीपा मा अलबेलो पुत्र जण्यो। बचपन स्यूं बूढापै ताई रह्यो सुरगो वण्यो-ठण्यो, ढिगला-ढिगला रतन निकाल्या, नही निरर्थक पहाड खण्यो। शासन मे अनुशासन थाप्यो, मानदण्ड स्यू जाय न माप्यो, व्याप्यो जन-जन रै भन-मन मे मोहनगारो लागे । बिन बैराग भेष साधू रो भार गधे पर हाथी रो, काख मिणकलो कठ, कठे वो अणमोलो संयम हीरो। बड़े घराणे रो चाहे वैधव्य सरावं कुण की रो, समझदार समझ है खोटे सिक्क री कीमत जीरो। 3 4 तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 125 3. आज अपेक्षा अपने से अपना अनुशासन जागे, ऐसी क्रान्ति घटित हो मानव उच्छृखलता त्यागे ।। स्वर्णिम भविष्य है आगे, शम सम श्रम से जीवन-क्रम बदले ।। जिस विद्या से भारत ने आध्यात्मिक गौरव पाया, अखिल विश्व का एक मात्र जो पथ दर्शक कहलाया ।। पा अनुशासन की छाया, उसी दिशा मे फिर युग चरण चले ।। 4. लय:-जय-जय जगमग विद्या ज्योति जले 3. प्रयाण गीत प्रभो ! तुम्हारे पावन पथ पर जीवन अर्पण है सारा । बढे चलें, हम रुके न क्षण भी, हो यह दृढ सकल्प हमारा ।। 1. प्राणों की परवाह नहीं है, प्रण को अटल निभाएगे, नही अपेक्षा है औरों की, स्वयं लक्ष्य को पाएंगे । एक तुम्हारे ही वचनो को, भगवन् प्रतिपल सबल सहारा ।। 2. ज्यों-ज्यो चरण बढ़ेंगे आगे, स्वतः मार्ग बन जाएगा, हटना होगा उसे बीच में, जो बाधक बन आएगा। रुक न सकेगी मुड न सकेगी, सत्य क्रान्ति की उज्ज्वल धारा ।। आत्म शुद्धि का जहा प्रश्न है, सम्प्रदाय का मोह न हो, चाह न यश की और किसी से भी कोई विद्रोह न हो । स्वर्ण विघर्षण से त्यो सत्य, निखरता सघर्षों के द्वारा ।। 4. आग्रह-हीन गहन चिन्तन का, द्वार हमेशा खुला रहे, कण-कण मे आदर्श तुम्हारा, पय-मिश्री ज्यो घुला रहे । जागे स्वयं जगाए जग को, हो यह सफल हमारा नारा ।। 5. नया मोड़ हो उसी दिशा मे, नयी चेतना फिर जागे, तोड़ गिराएं जीर्ण-शीर्ण, जो अन्ध रूढ़ियों के धागे । आगे बढ़ने का यह युग है, बढना हमको सबसे प्यारा ।। 6. शुद्धाचार विचार-भिति पर, हम अभिनव निर्माण करे, सिद्धांतों को अटल निभाते, निज-पर का कल्याण करे । इसी भावना से भिक्षु का 'तुलसी' चमका भाग्य सितारा ।। लय चेतन चिदानन्द चरणो मे 124 गगाशहर की गंगा 3 । 4 गण आपां रो आपा गण रा, ओ आछो अनुबन्ध है, धाग मे पिरोई माला सारीसो सम्बन्ध है। युवका बालका भाया बाया मे जागे ए सस्कार ।। एक है आचार, एक आचारज री आण है, एक ही विचार एक कायदो एक काण है। अपणे एकता ही एकता रो सारो कारोबार। आण-काण लोप कर शान अपणी सावली, साध और श्रावका करै बावली। उणनै 'रीडी वाला सेठिया' रो जाब जोरदार ।। 5. मे बात 6. राखणी, सघ री री शालीनता में लीनता है बारीकी स्यू झाक आख पूरी-पूरी राखणी। 'महता बाववाला ऊमजी' रो ओकल्यो आचार ।। पासथा पर आच श्रद्धाशील किया किया आण दै, ऐर-गैर बात ऊपर ध्यान कियां जाण इण मे 'पटवाजी' रो पोज आवे सामने साकार ॥ 7 दै। 8. 'आचलिये' री आसथा रू 'पन्न' री मरदानगी, 'गोठीजी' रो ज्ञान, 'भवरो' वीरता री बानगी। री इकतारी 'दफ्तरी' सो धार-फार ।। हनुमन्त री 9 10. नै भक्ती 'दुगड-दूलजी' री 'बादरिय' री बादरी, 'विरधोजी जीरावला' री री बहस बडी पाधरी। 'चन्दू बाई' री चतुराई आवं याद वारबार॥ आपणो है काम एक केन्द्र आराधणो, एक तान एक ध्यान, राधा-वेध साधणो। शेप सारी बाता गौण, चाहे लाख हो हजार ।। उतरती आलोचना सुणवान बहरा कान हो, उतरती-पडती करवाने बन्द ही जवान हो। आपां खरखवा रहवा, आठू पहर खवरदार। अपछदा अवनीत श्रावक-धाविका या साध हो, 'जय जिनेन्द्र' दूर स्यू आ मरयाद हो। तोड देणी है तुरन्त जिल्ला-बन्दी री कतार ।। 12 आपणी तपस्वी मुनि श्री गगारामजी 127 5. । आ है सांवरियै री वाणी, अनुभव रे छकण स्यूं छाणी, काना घणी सुहाणी झालर-सो झणकारो लागे । संविधान जद गढ्यो, बढ्यो जस, हुई बगावत भी सागै, घबराहट रो काम नहीं, चढ़ चल्यो स्वय नाजुक धागे चंदो वीरो, चंदू वीरा फतू च्यारा रै ठागै, भैलो आर नही थारै म्हारै जो पैर धर्यो आगे। रुकग्या चरण सतजुगीजी रा, सुणता रैग्या संत सधीरा, आखे - झाखे बावलिये रो काम करारौ लागे ।। 6. तू कद दीक्षा लेसी ? जब तक जिवे मेरण्या मगर री, दुलहिन रोवै न्याय दूल्हो रोवै कुण सी दुविधा हेरी। सुण्यां बात सजम री ताव चढे तब दीक्षा मे देरी, एक मर्या दोन्यां नै लेणी पड़सी अण-सण री सेरी। इण विध कर कर कडी कसौटी, चुपकै खीची सब री चोटी, ज्यूं-त्यू मूंडणो बाबै नै जैर खारो लाग ।। लय- म्हाने गगाजी रो पारणी खारो-खारो लागे । शासन कल्पतरु 1. शासन कल्पतरु उतर्यो मोहरां रो चरू, राखो राखो रखवाली। बाबे भिक्खू रो उपगार, माना जीवन भर आभार, ज्यांरी सावरी सूरत, तेरापथ रो आधार ।। अलबेलो शासन आपा रो, सारा रे मन भावणो, मनहारो प्राणा स्यू प्यारो, लागे घणो सुहावणो। इणरी ऊजली आभा स्य लेवां जीवन उजार ।। मात-पिता-सो आसरो, ओ नन्दनवन सो वास है, आश्वासन है दूवला रो, सबला रो विश्वास है। अनुपम शीतधर सो है वण्यो सब ऋतुआ मे सुखकार ।। 2 126 गगाशहर की गगा
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13. आ है 'कमधेनु' गाय देख्यां लागे सोहणी, ओ है रत्ना रो भण्डार वणणो रखिया रोहणी। ओ है आम्र-कुज 'तुलसी' छाया शीतल सुप्यार। ओ है द्राक्षा, कुज-'तुलसी' छाया शीतल सुप्यार ।। लय-भलकै भानुड़े सो भाल 1. 2. अमर गीत अमर रहेगा धर्म हमारा। जन-मन अधिनायक प्यारा, विश्व विपिन का एक उजारा। असहायों का एक सहारा सब मिल यही लगाओ नारा ।। धर्म धरातल अतुल निराला, सत्य अहिंसा सरूप-वाला। मैत्री का यह मधुमय प्याला, सत्पुरुषो ने सदा रुखारा ।। व्यक्ति-व्यक्ति में धर्म समाया, जाति-पांति का भेद मिटाया। निर्धन-धनिक न अन्तर पाया, जिसने धारा जन्म सुधारा ।। राजनीति से पृथक् सदा है, द्वेष-राग से धर्म जुदा है । मोक्ष-प्राप्ति का लक्ष्य सदा है, आत्म-शुद्धि की: बहती धारा। आडम्बर मे धर्म कहां है, स्वार्थ-सिद्धि में धर्म कहा है। शुद्ध साधना धर्म वहां है, करते हम हर वक्त इशारा ।। धर्म नाम से शोषण करते, धर्म नाम से निज घर भरते । धर्म नाम से लड़ते-भिडते, कैसा धर्म बना बेचारा ।। प्रयलकार वाजे, तुफानों की हो आवाजे । पलट सव जग रीति-रिवाजे, पर इसका ध्रुव अटल सितारा ।। धर्म नाम पर डटे रहेगे, सत्य-शोध मे सटे रहेगे । 'तुलसी' सब कुछ स्वय सहेगे, कांटे कुटिल कर्म की कारा ॥ 3. A. 5. . 6. पवन भी 7 लय-बना रहे आदर्श हमारा 128 गंगाशहर की गगा
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