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आत्मबोध

Shankaraachaarya · 2005/07/25

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श्रीगणेशाय नमः ।
आत्मबोधः।
N
(श्रीशंकराचार्यविरचितो वेदांतग्रंथः)
काशीस्थराजकीयप्रधानपाठशालापरीक्षेती-
फलाँखग्रामानिवासिपाण्डतामीहरच.
न्द्रकृतभाषाविवरणसहितः ।
सोयम्
श्रीकृष्णदासात्मजक्षेमराजेन
मुम्बय्यां
स्वकीये"श्रीवेङ्कटेश्वर" मुद्रणालये
मुदायित्वा प्रकाशितः।
संवत् १९८०, शके १८४५.
सर्वाधिकार "श्रीवेङ्कटेश्वर" यन्त्रलयाधीशने स्वाधीन रक्खा है.

यह पुस्तक खेमराज श्रीकृष्णदासने बम्बई खेतवाही .वी
गली खम्बाटा लैन, निज "श्रीवेंकटेश्वर स्टीम् प्रेसमें अपने लिये
छापकर यहीं प्रकाशित किया।

भूमिका । एतदात्मबोधनामकम्प्रकरणम्परमपूज्यवेदान्त- शास्त्राचार्यश्रीमच्छंकराचार्यप्रणीतम् अस्य चा- त्मबोधसाधकत्वेन संसारविच्छेदजनकतया मुमु- रुपयोगितास्तीति सर्वजनप्रसिद्धम् आत्मबोध. श्च धर्मार्थकाममोक्षरूपचतुर्विधपुरुषार्थान्तर्गत मोक्षसाधकः स चातिदुरूहबृहद्वेदांतप्रकरणेश्चिर- साध्योऽतःश्रीमदाचार्यैः सुखत आत्मबुद्धया एत- लघुप्रकरणनिरमायि एतस्यापि भाषारसिकसाधा- रण्येन प्रसिद्धिमीहमानैः श्रीमुंबापूःस्थश्रीकृष्ण- दासात्मजखेमराज-श्रेष्टिभिर्भाषोद्धृतयेऽहमयोजि मया चैतद्यथामति भाषायामुद्धत्य विच्चरणयो- रर्यत इति शम् ॥ लाँखग्रामनिवासी-काशास्थराजकीयप्रधानपाठ- शालापरीक्षात्तर्णिः, पं० मिहिरचन्द्रशर्मा.

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॥श्री॥ आत्मबोधः भाषाटीकासमेतः। श्रीगणेशाय नमः। ॐ तपोभिः क्षीणपापानां शांतानां वीतरागिणाम्॥ मुमुक्षूणामपे- क्ष्योऽयमात्मबोधो विधीयते ॥ १॥ नत्वा ब्रह्म चिदानंद भाषायामात्मबुद्धये ॥ मया मिहिरचंद्रेण आत्मबोधोवितन्यते ॥१॥ भा०-कृच्छ्रचांद्रायण और नित्य नैमित्तिक उपासनाआदिके अनुष्ठान ( करना ) रूप पोंसे अथवा-नेत्रआदि इन्द्रियोंके निग्रह- प तपसे-क्षीण भये हैं पाप जिनके अर्थात् राग- ष आदि अंतःकरणके दोषोंसे रहित और (६) आत्मबोधः। शान्त-अर्थात् क्षोभरहित और वीतराग अर्थात् इसलोक और परलोकके भोगोंकी इच्छासे शून्य जो मुमुक्षु-पुरुष हैं-अर्थात जिनको जन्म-जरा- मरण-संसाररूप ग्रन्थिके छेदन करनेकी अभि- लाषा है उन मुमुक्षु पुरुषोंको है अपेक्षा जिसकी ऐसा यह आत्मबोधप्रकरण विस्तारसे वर्णन करते हैं-अर्थात् जिससे आत्माका ज्ञान हो ऐसा प्रकरण लिखते हैं ॥१॥ बोधोऽन्यसाधनेभ्यो हि साक्षान्मो- क्षैकसाधनम् ॥ पाकस्य वहिवज्ज्ञा- नं विना मोक्षो न सिद्धयति ॥ २॥ भा०-कदाचित् कहो कि तप जप योग आ- दिसे-मोक्ष हो सकता है तो आत्मज्ञानको मोक्षका साधन कैसे कहते हो-सो ठीक नहीं-क्योंकि- अपने स्वरूपभूत जो आत्मा-उसका बोधई मोक्षका कारण श्रुतियोंसे सिद्ध है और व भाषाटीकासमेतः। (७) उपासना तो अन्तःकरणके शोधक हैं-इससे- आत्मबोधको मोक्षका साधन होने में-दृष्टान्त कहते हैं कि जैसे एक अग्रिही-पाकका-साक्षात् कारण है-इसीप्रकार अन्यसाधनोंसे अर्थात जप तप-मंत्र आदि नानाप्रकारके कर्मोकी अपेक्षासे बोध-मोक्षका एकहीअसाधारण साधन है-इसमें ज्ञानके विना-मोक्ष सिद्ध नहीं होता तात्पर्ययह- कि जैस जगत में-पाकके काष्ठ अन्न-जल-आदि सहकारि कारण हैं-इसीप्रकार परम्परासे जपतपहै आदिभी मोक्षके सहकारी कारण हैं-साक्षात् कारण नहीं-सोई-इन श्रुतियोंमें लिखाहै कि नसेही मोक्ष होता है-ज्ञानके विना मोक्ष नहीं ता-प्रकाशरूप ब्रह्मको जानकर-सब पाशों- बंधन] की हानि होतीहै-इससे-ज्ञानके विना क्ष सिद्ध नहीं होता-यह सिद्धान्त है ॥२॥ (१) ज्ञानादेव तु कैवल्यम्-ऋते ज्ञानान मुक्ति। (२) ज्ञात्वा देवं सर्वपाशापहानिः ।

(८) आत्मबोधः। अविरोधितया कर्म नाविद्या वित निवर्तयेत् ॥ विद्याऽविद्यां निह- न्त्येव तेजस्तिमिरसंघवत् ॥३॥ भा--कदाचित् कहो कि विचित्रशक्तिवाले कमौकेही द्वारा जनकआदि सिद्धिको प्राप्त हुए इससे-कमौके द्वारा अज्ञानका नाश क्यों मानते हो सो ठीक नहीं क्योंकि जो पदार्थ जिसका विरोधी नहीं होता वह उसके नष्ट करने में समर्थभीनहींहोता इससेअज्ञानकेअविरोधीकर्म अज्ञानकोनष्टनहीं कर सक्ते--औरकर्मसहीजा-क आदि संसिद्धिको प्राप्त भये--वहांससिद्धिशका से, अन्तःकरणकी शुद्धि लेते हैं मुक्ति नहीं- बातको--दृष्यन्तसे-स्पष्ट करते हैं कि-अज्ञई अविरोधि होनेसे कर्मअविद्याकोनिवृत्त नहीं भाषाटीकासमेतः। सक्ता-क्योंकि ये दोनोंजडपदार्थ हैं-इससे-मैशुद्ध बोध-मुक्तस्वरूपब्रह्म हूं-इसप्रकारका जो विद्यारूप ब्रह्म और जीवात्माकी एकताका ज्ञान है-वही-मैं मनुष्य हूं-सुखी हूं-दुःखीहूं-इत्यादि अविद्यारूप अज्ञानका इसप्रकार निवर्तक है जैसे-सूर्य आदिका प्रकाशरूप तेज अन्धकारका निवर्तक होताहै- तिससे आत्मज्ञानके प्रकाशकालमेंही सम्पूर्ण अज्ञानका नाश होजाताहै ॥३॥ परिच्छिन्न इवाज्ञानात्तनाशेसति केवलः॥स्वयं प्रकाशते ह्यात्मा मेघापार्येऽशुमानिव ॥ ४॥ भा०-कदाचित कहो कि-आत्मा प्रतिशरीर- परिच्छिन्न है-अर्थात् जन्मसेही-नाशवान तीत होता है तो जीव ब्रह्मकी एकताके ज्ञानसे ज्ञानकीनिवृत्ति कैसीबनसक्ती है-सोठीकनहीं गोंकि, अज्ञानसे यद्यपि आत्मा परिच्छिनके

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(१०) आत्मबोधः।
समान प्रतीत होता है तथापि अज्ञानके नाश
होते ही अपरिच्छिनके समान स्वयम्प्रकाशरूप
होजाता है-इस बातको दृष्टान्तसे स्पष्ट करते
हैं कि -सर्वत्र व्यापक रूप अद्वितीय आत्मा-
अज्ञानसे कल्पित देव मनुष्य आदि-शरीरोंके
अध्यास (भ्रम) से परिच्छिन्न (आच्छादित)
के समान-प्रतीत होता है-औरजब-तत्त्वमसि-
आदि महावाक्योंके द्वारा-आत्मा और ब्रह्मकी
एकताका ज्ञान हो जाता है--तब अज्ञानके किये-
मिथ्या अध्यासरूप आरोपका नाश-होनेसे-आ-
त्मा केवल-अर्थात् सजातीय-विजातीय-स्वगत
आदि तीनों भेदोंसे रहित-स्वप्रकाश ब्रह्मरूप
प्रतीत इस प्रकार होता है जैसेआवरणाल्प-मेघोंका
नाश होनेपर-प्रकाशरूप सूर्य प्रतीत होता है
इससे यह सिद्ध है-अज्ञानके नाश होते ही-आ-
त्मा-स्वयं प्रकाशमान ब्रह्मरूप हो जाता है॥४॥

भाषाटीकासमेतः। (११) अज्ञानकलुषं जीवं ज्ञानाभ्यासादि निर्मलम् ॥ कृत्वा ज्ञानं स्वयं नश्येजलं कतकरेणुवत् ॥५॥ भा०-कदाचित् कहो कि अज्ञानके नाशसे केवल ब्रह्मरूप आत्माका होना असम्भवहै-क्यों कि-अज्ञानके नाश करनेवाली जो वृत्ति हैं-उन- के ज्ञानसे-दैतकी प्राप्ति होयगी ब्रह्मज्ञानकी नहीं सो ठीक नहीं-यद्यपि-जीवात्मा अज्ञानसे मलिन है तथापि वास्तवमें-शुद्ध-है इस बातको दृष्टान्त- से स्पष्ट करते हैं-कि कर्ता भोक्ता सच्चिदानंद- स्वरूप आत्मा-यद्यपि अज्ञानसे-अपनेको कर्त्ता भोक्ता जीवरूपभ्रमकेद्वारा मानताहै इससे अज्ञा- नसे-मलिनभी जीव-ज्ञानके अभ्याससे-निर्मल है, अर्थात्-की-भोक्तासे भिन्न-सच्चिदानन्द- कूटस्थ साक्षीरूप-ब्रह्म है-इस पूर्वोक्त ज्ञानाकार (१२) आत्मबोधः। जो वृत्ति हैं वे ज्ञानको उत्पन्न करके इस प्रकार नष्ट हो जाती हैं जैसे कतकरेणु निर्मली बूटि जल- को निर्मल करके आप भी नष्ट होजाती है इससे ज्ञानके अभ्याससे जीवात्माके निर्मलहोने में कुछ भी संशय नहीं है. ॥५॥ संसारः स्वप्नतुल्यो हि रागद्वेषा- दिसंकुलः॥ स्वकाले सत्यवदा- ति प्रबोधेऽसत्यवद्भवेत् ॥६॥ भा०-कदाचित् कहो कि साक्षात्प्रत्यक्षरूप से जब संसार सत्य प्रतीत होता है तो आत की केवलरूपताके ज्ञानसे अद्वैत ब्रह्मज्ञान के हो सक्ता है. सो ठीक नहीं.क्योंकि,मिथ्या जर से आत्माकीअद्वैततामें हानि नहीं होसकती इन बातको स्वप्नके दृष्टांतसे सिद्धकरते हैं कि राग आदिसे युक्त जो स्वमके तुल्य संसार है ।

भाषाटीकासमेतः। (१३) निद्राके समयमें स्वपके तुल्य जोअपनी स्थिति उसके समयमें सत्यके समानयद्यपि प्रतीत होता है तथापि प्रबोधके होनेपर अर्थात् आत्मा और ब्रह्मकी एकताका जो ज्ञान उसके अनंतर क्षणमें ही असत्य (मिथ्या) के समान होजाता है इसी- से मिथ्याभूत जगत्से आत्माकी अद्वैततामें कोई नि नहीं है ॥ ६॥ तावत्सत्यं जगद्भाति शुक्ति- का रजतं यथा ॥ यावन्न ज्ञायते ब्रह्म सर्वाधिष्ठानमद्वयम् ॥ ७॥ भा०-जगत्के अधिष्ठान कूटस्थ साक्षीरूप मात्माका जबतक ज्ञान नहीं होता है तबतकही नसार सत्यके समान प्रतीत होता है इसबातको पृष्टांतसे स्पष्ट करते हैं कि जैसे जबतक नीलपृष्ठ त्रिकोणाकारशुक्तिका ज्ञान नहीं होता तबतक

(१४)
आत्मबोधः।
ही शुक्ति ( सीपी) का रजत (चांदी) सत्यके
समान प्रतीत होता तिसी प्रकार जबतक सब
अधिष्ठान अद्वैत ब्रह्मका ज्ञान नहीं होता .
तबतकही जगत् सत्य प्रतीत होता है और
ब्रह्मज्ञानके होतेही शुक्ति रजतके समान मिथ्या
प्रतीत होने लगतीहे ।। ७॥
सांचदात्मन्यनुस्यूते नित्येविष्णो
प्रकल्पिताः॥ व्यक्तयो विविधाः
सर्वा हाटके कटकादिवत् ॥ ८॥ प
भा०-तिसस संपूर्ण जगत् ब्रह्ममें कल्पित
इस बातको दृष्टांतसे दृढ करते हैं कि, सन्ि
आत्मा स्वरूप और अनुस्यूत अर्थात् जैसे मू
मणि और मणिमें सूत्र अनुगत हैं इस प्रक
ओत प्रोत और नित्य और व्यापक (चराच
मस्थित) और सबके उपादान कारणरूह ।

भाषाटीकासमेतः। (१५) ना प्रकारकी जो देव, मनुष्य, पशु,कीटआदि यक्ति हैं अर्थात् मूर्तिमान नामरूपात्मक जगत ई वेसब इसप्रकार का पत हैं जैसे सुवर्णमें कटक, कुंडल आदि कल्पनामात्र हैं वस्तुतः सुवर्णही सत्य है-इससे नामरूपात्मक जगत् मिथ्यारूप है और शुद्धरूप आत्मा सत्य है इसमें कोई संदेह नहीं है ॥ ८॥ यथाकाशो हृषीकेशो नानोपा- धिगतो विभुः॥ तद्भदाद्भिन्नव- झाति तन्नाशे सति केवलः ॥९॥ -कदाचित् कहो कि,प्रपंच मिथ्याभी है जीवभेद सत्य है तो प्रपंचके अधिष्ठान- मात्मामें सत्यता और अद्वितीयरूपता ति होसकती है सो ठीक नहीं क्योंकि तो आत्मा अद्वितीय है और दर्भ (१६) आत्मबोधः। कल्पित है इस बातकोही दृष्टांतसे स्पष्ट करते हैं कि जैसे व्यापकरूप आकाशघट मठ आदिउपा- धियोंमें प्रविष्ट होकर तिस २ उपाधिके भेदसे घटाकाश मठाकाशरूप प्रतीत होताहै इसी प्रकार संपूर्ण इंद्रियों ( अंतःकरण आदि ) का ईश्वर (प्रेरक) विभुनाना प्रकारको जो देहआदि उपाधि हैं उनमें प्रविष्ट हुआ उन उपाधियोंके भेदसे भिन्न २ प्रतीत होता है और उपाधियोंके नाश होनेपर केवल ( एक ) ब्रह्मरूप प्रतीत होताहे ॥९॥ नानोपाधिवशादेव जातिनामा- श्रमादयः ॥ आत्मन्यारोपिता स्तोये रसवर्णादिभेदवत्॥१०॥ भा०-कदाचित् कहो कि यदि मैं ब्राह्मण चारी-संन्यासी हूंइत्यादिजातिवर्णआश्रम-

भाषाटीकासमेतः। (१७)
नाना प्रकारके धर्मोंसे युक्त आत्मा प्रतीत होताहै
तो असंग कैसे कहतेहो सो ठीक नहीं-क्योंकि-
जाति-वर्ण-आश्रम-आदि धर्म असंगआत्मामें
कल्पित है-वास्तवमें नहीं-इस बातका दृष्टांतसे
वर्णन करते हैं कि-पूर्वोक्त नाना प्रकारकी देह
आदि उपाधियोंकी महिमासेही असंग आत्माके
विषै-जाति-नाम-आश्रम आदि-इसप्रकार आरो-
पित हैं-अर्थात् भ्रमसे प्रतीत होतेहैं-जैस-जलके
विषे-रस-(कटु-कषाय-लवणआदि)और-रक्त
पीत श्यामआदिरंग-प्रतीत होतेहैं-अर्थात-तिस
तेस-रस रंग-की एकतासे जलकाभी वही रंग
तीत होताहै-इसी प्रकार जातिआदिकोंकेसंग-
कतासे आत्मामें भी भ्रमसे जाति-वर्ण-प्रतीत
होते हैं.वस्तुतः आत्मामेभी जातिआदि कोई भी
धर्म नहीं है ॥ १०॥

( १८) आत्मबोधः। पंचीकृतमहाभूतसंभवं कर्मसचि- तम्॥शरीरं सुखदुःखानां भोगाय- तनमुच्यते ॥ ११॥ भा०-अब अविद्यासे कल्पित उपाधियोंके स्वरूपकोकहते हैं कि,पंचीकरणकिये-जोपृथिवी- जल-तेज-वायु-आकाश-पांचमहाभूतह-जगत्के परिणामी उपादानरूप उनसे है-उत्पत्तिजिसकी ऐसा जो प्रारब्धकर्मसे संचित (रचित) स्थूल शरीर है वह आत्माके सुख दुःखोंका जो भोग उसका आयतन (स्थान) कहाता है ॥ ११॥ पंचप्राणमनोबुद्धिदशेंद्रियसमन्वि- तम् ॥ अपंचीकृतभूतोत्थं सूक्ष्मां- गं भोगसाधनम् ॥ १२॥ भा०-अब सूक्ष्म शरीररूप उपाधिको कहतेहैं कि-प्राण-अपान-उदान-व्यान-समान-औरसंकल्प भाषाटीकासमेतः। (१९) विकल्परूप अन्तःकरणके-वृत्ति है नाम जिसका ऐसा मन, और निश्चयात्मक अंतःकरण- की वृत्तिरूप बुद्धि, और श्रोत्र, त्वचा, चक्षु,जिह्वा,प्राण ये पांच ज्ञानेंद्रिय और वाणी, हस्त, पाद,गुदा, लिंग, ये पांच कर्मेंद्रिय-इन सत्रह तत्त्वोंसे युक्त, और पञ्चीकरण नहीं किये पांच सूक्ष्म महाभूतोंसे उत्पन्न, जो सूक्ष्म शरीर है वह आत्माके भोगोंका साधन हेतु] है-यह आत्माकी तीसरी उपाधि है ॥ १२॥ अनाद्यविद्यानिर्वाच्या कारणो- पाधिरुच्यते ॥ उपाधित्रितयाद- न्यमात्मानमवधारयेत् ॥ १३ ॥ भा०-अब कारणशरीररूप तीसरी उपाधि- को कहते हैं कि अनादि जो सत्य असत्य कहनेके अयोग्य और जगतकी उत्पत्ति करनेमें समर्थ -- (२०) आत्मबोधः। माया है-यदि वह माया सत्य है तो ज्ञानसे नष्ट न होगी और असत्य है तो उससे जगत्की उत्प- त्ति न होगी इससे सत्य असत्यरूपसे अनिर्वच- नीया है ऐसी जो समष्टि व्यष्टिरूप जगत्-स्थूल सूक्ष्मरूप शरीरआदिका उपादान कारण माया है वह कारण उपाधि कहाती है इन-पूर्वोक्त स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीररूप उपाधियोंसे भिन्न आत्माका निश्चय करै अर्थात् इन तीनों उपाधियोंके साक्षीरूप आत्माको इस प्रकार भिन्न समझे जैसे घटआदिका द्रष्टा घटआदिसे भिन्न होता है ॥ १३॥ पंचकोशादियोगेन तत्तन्मय इव स्थितः॥ शुद्धात्मा नीलवस्त्रादिन योगेन स्फटिको यथा॥ १४ ॥ मा०-कदाचित् कहो कि पूर्वोक्त तीन उपाधि na भाषाटीकासमेतः । (२३) प्रतीत होते हैं-स्वभावसे आत्मामें कोईभी धर्म नहीं है और पूर्वोक्त श्रुतिमें जो आत्माको अन्नर- समय कहा है वह सूक्ष्म ब्रह्मरूप वस्तुके ज्ञानार्थ है क्योंकि आत्मा एक है और कोश अनेक हैं- और कोश उत्पन्न और विनाशी हैं आत्मा अवि- नाशी है और-कोश धर्मी है आत्मा धर्मरहित है स्न कारणोंसे आत्मा कोशरूप कैसे हो सक्ता है और आत्माकी जो तिस २ कोशरूप प्रतीति है ह इसप्रकार भ्रमसे है जैसे स्वभावसे शुद्ध स्फटिक नील पीत वस्त्र आदिके योगसे नीला और पीला प्रतीत होताहै ।। १३ ॥ वपुस्तुषादिभिः कोशैर्युक्तं युक्त्या- वघाततः ॥ आत्मानमंतरं शुद्ध विविच्यात्तंडुलं यथा ॥ १५॥ भा०-यद्यपि कोश और आत्माकी एकरूप- (२४) आत्मबोधः। ताके अभ्याससे आत्मा कोशरूप प्रतीत होता है तथापि कोशोंसे पृथक् आत्माके विवेक करनेसे आत्मा शुद्धरूप प्रतीत होसक्ता है इस बातको दृष्टांतसे स्पष्ट करते हैं कि,जैसे तुष (भूसी) आ- दीसे युक्त भी चावलोंका शुद्ध आकार कूटना आदि युक्तिके द्वारा भिन्न शुक्लरूप प्रतीत होता है तैसेही अन्नमयआदि कोशोंकी विचारसा युक्ति- के द्वारा कोशोंके भीतर व्यापकरूप आत्माके शुद्धरूपकी प्रतीति होती है और अन्नमय कोश पंचमहाभूतोंका कार्य होनेसे घटआदिके समान आत्मा नहीं होसक्ता और अन्नमयकोश (देह) को आत्मामानोगेतो वर्तमानशरीरमें जो सुख- दुःख भोगेजाते हैं वे विना कर्मकेही मानने पडेंगे और इस शरीरके जो पुण्यपापरूप कर्म हैं उन का विना फल भोगेही नाशमानना पडेगा इस प्र कार अकृतका अभ्यागम और कृतका नाशरूप .

भाषाटीकासमेतः। (२५) दोष हो जायगा-क्योंकि शरीररूप आत्मा जन्म- से पूर्व और मरणके अनंतर नहीं रहता है इससे अन्नमयकोशरूप आत्मा नहीं है और अपंचीकृत पांच महाभूतोंका कार्य जडरूप जो प्राणमय- कोश है वह भी आत्मा नहीं है क्योंकि वह जड है और आत्मा चेतन है-और स्थूलदेहके समान मनोमयकोशभी आत्मा नहीं है क्योंकि मन संकल्प विकल्पात्मक है और आत्मा संकल्प- विकल्पसे रहित है और मन सत्वगुणका कार्य है और आत्मा नित्य है-और विज्ञानमयकोशभी आत्मा नहीं है क्योंकि विज्ञानमय सत्वगुणका कार्य है और परिणामी है और आत्मा परिणामी से भिन्न है-और आनंदमयकोशभी आत्मा नहीं है क्योंकि अविद्यावृत्तिवाला वह घटआदि- के समान जड है और प्रिय मोद आदि वृत्ति गेंसे युक्त है और आत्मावृत्तियोंसे रहित और नित्य है (२६) आत्मबोधः। इसप्रकार पंच कोशोंसे भिन्न जो परमात्मा है वह सच्चिदानंद साक्षीरूप है ॥ १५॥ तदा सर्वगतोऽप्यात्मा न सर्वत्रा:- वभासते ॥ बुद्धावेवावभासेत स्व- च्छेषु प्रतिबिंबवत् ॥ १६ ॥ भा०-यदि आत्मा व्यापक ब्रह्मस्वरूप हैं तो सर्वत्र प्रतीत होना चाहिये इस शंकाका उत्तर देते हैं कि आत्मा तीनों कालोंमें सब वस्तुओंमे व्यापकरूपसे वर्तमान भी है तो भी सर्वत्र प्रती नहीं होता अर्थात् अस्ति, भाति, प्रियरूपर सदैव संपूर्ण घट आदि पदार्थों में यद्यपि अनुभ रूप आत्मा व्यापक है तथापि ज्ञाता (जाननेव ला) रूप आत्माबुद्धिके विषे ही इस प्रकार भार ता हैजैसे स्वच्छ पदार्थमें ही सूर्य आदिका प्रति बिंब पडता है मलिनमें नहीं अर्थात् सत्वगुणक .- भाषाटीकासमेतः। (२७) कार्य होनेसे शुद्ध जो बुद्धि है उसमें इस प्रकार आत्माका भान होता है जैसे घट पट कांच आदि मृत्तिकाके कार्यों में निर्मल जोदर्पण उसमें ही मुख आदिका औरअपनी किरणोंके द्वारा सर्वत्र व्यापक सूर्यका जलमें ही प्रतिबिंब पडता है घट आदिके विषे नहीं-इससे यह सिद्धभया कि देह आदि रजोगुण तमोगुणके कार्य हैं उनमें आत्माकी ति नहीं होसकती ॥ १६॥ देहेंद्रियमनोबुद्धिप्रकृतिभ्यो वि- लक्षणम्॥तवृत्तिसाक्षिणं विद्या- दात्मानं राजवत्सदा ॥१७॥ भा०-देह इंद्रिय आदिके विषे वर्तमान भी त्मा उनसे भिन्न है इस बातको दृष्टांतसे स्पष्ट ते हैं कि देह दश इंद्रिय मन बुद्धि और प्रकृति या)इनसे विलक्षण अर्थात् देहआदि माया- (२८) आत्मबोधः। के कार्य और जड, परिणामी, दृश्य हैं और आ- स्मा इनसे भिन्न चेतनरूप, परिणाम रहित, अह- श्य, सत्यरूप है और देह आदिकी वृत्तियोंका साक्षी है-अर्थात् देहकी बाल्यावस्थारूप वृत्ति और रूप आदिमें नेत्र आदिकी वृत्तियों के साक्षी आत्माको सदैव राजाके समान जाने जैसे सभामें स्थित राजा सभामें स्थित संपूर्ण मनुष्योंकासाद प्रेरक है और उनसे भिन्न है इसी प्रकार आत्म कोभी देह आदिसे भिन्न और देह आदिका साई रूप जानै ॥१७॥ व्यापृतेष्विद्रियेष्वात्मा व्यापारी- वाविवेकिनाम् ॥ दृश्यतेऽभ्रेषु धा- वत्सु धावन्निव यथा शशी।। १८ भा•-कदाचित् कहो कि आत्मा भी व्यवह वाला देह इंद्रिय आदिके संघातमें प्रतीत होक भाषाटीकासमेतः। (२९) से साक्षीरूप नहीं होसकता क्योंकि साक्षी से भिन्न होताहै जिनका साक्षी होताहै.सोठीक क्योंकि अज्ञानियोंको भ्रमसे आत्मा व्यव- के समान प्रतीत होताहै वस्तुतः आत्मामें भी व्यापार नहीं है इस बातको दृष्टांतसे स्पष्ट हैं कि नेत्र आदि इंद्रिय जब अपने अपने गरोंमें व्यवहार करती हैं अर्थात् अपनेरविष- ग्रहण करती हैं तब इन्द्रियोंके व्यवहार कर- आत्माभी व्यवहार करनेवालेके समान प्रवेकियोंको प्रतीत होताहै अर्थात्मूर्खपुरुष माकोभीव्यवहारी मानलेते हैं और वह उन- मानना इसप्रकार भ्रमसे है कि,जैसे मेघोंके नेपर चंद्रमाभीचलताप्रतीतहोताहै-और बु- सन् मनुष्य-मेघोंकेसमान चंद्रमाको चलता ते हैं और न आत्माको व्यापारी मानते हैं कि वस्तुतः आत्मा व्यापाररहित है ॥१८॥ .

(३०) आत्मबोधः।
आत्मचैतन्यमाश्रित्य
यमनोधियः॥ स्वकीयार्थेषु वर्त-
ते सूर्यालोकं यथा जनाः ॥१९॥
भा०-कदाचित् कहो कि हेह इन्द्रिय आ
जडपदार्थ व्यापारी हैं तो चेतनभी मानने चा
और देह इन्द्रिय आदि चेतन होयँगे तोवे आ
रूपभी हो जायँगे सो ठीक नहीं-क्यों कि चे
आत्माके आश्रयसे ही देह इन्द्रिय-अपनेर र
हारमें वर्ते हैं इस बातको दृष्टान्तसे प्रगट करते
कि आत्माकी चेतनताका आश्रय लेकर दे
इन्द्रिय-मन-बुद्धि-ये अपने अपने विषयोंमें
प्रकार वर्ततीहैं जैसे सूर्यके प्रकाशके आश्रर
सम्पूर्ण जन अपने अपने व्यवहारमें वर्तते हैं-इर
देव इंद्रिय आदि स्वतःचेतन नहीं किन्तु आत
को चेतनता ही उनमें प्रतीत होती है इसीसे
आत्मरूप नहीं होसक्त ॥ १९ ॥

भाषाटीकासमेतः। (३१) देहेंद्रियगुणान्कर्माण्यमले सच्चि- दात्मनि ॥ अध्यस्यंत्यविवेकेन गगने नीलिमादिवत् ॥२०॥ भा०-कदाचित् कहोकि आत्मा चतनरूप है तो भी उसमें जन्म-मरण-यौवन-वृद्ध-काण- बधिर-दर्शन-श्रावण-आदि व्यवहार प्रतीत होनेसे आत्मा-जन्ममृत्यु-वाला प्रतीत होता है-सो ठीक नहीं-क्योंकि,पूर्वोक्त जन्म-मृत्यु आदि-व्यवहार जोआत्मामें प्रतीत होते हैं वे-अविवेकसे आत्माके विषे आरोपित हैं वस्तुतःआत्मा देह-इंद्रियआ- दिके धाँसे रहितहै- इस बातको दृष्टांतसे दृढ रते हैं कि दह-और इन्द्रियोंके जो अन्ध,बधिर, मादि धर्म और गमन-वचन आदि जो कर्म हैं नको-निर्मल अर्थात् अज्ञानके कार्य-देह-इंद्रिय- नाम-रूप-संसार-आदिमलसे रहित सच्चित्-आ- दस्वरूप-आत्मामें-अविवेकसे मूढ पुरुष इसप्र- (३२) आत्मबोधः। कार आरोप करते हैं जैसे रूपरहित आकाशमें अविवेकसे नील पीत रंगोंका अज्ञानी पुरुष आरोप करतेहैं-वस्तुतः आत्मामें जन्म-मरण आदि कोई भी धर्म नहीं है ॥२०॥ अज्ञानान्मानसोपाधेः कर्तृत्वा- दीनि चात्मनि ॥ कल्प्यतेऽम्बुगते चन्द्रे चलनादिर्यथाम्भसः॥२१॥ भा०-कदाचित् कहो कि,देह आदिके जन्म आदि धर्म आत्माके विषय,मत हो-परंतु मैं क- ती-भोक्ता-पुण्यवान-पापीसुखी-दुःखीहूं-इत्या प्रतीतसे आत्मा की और भोक्ता प्रतीत होत' और नैय्यायिक आत्माको कर्त्ता भोक्तामा भी हैं सो ठीक नहीं क्यों कि, कर्तृत्व-भोक्त आदि अन्तःकरणके धर्म हैं वे अन्तःका और आत्माकी एकरूपताके अध्यास (भ्रम) भाषाटीकासमेतः। (३३) मात्मामेंआरोपित(माने)हैं इस बातको दृष्टान्तसे पष्ट करते हैं कि मनकी उपाधि जो कर्तृत्व- मोक्तृत्व आदि धर्म हैं-उनसे आत्माका सच्चि- निंदरूप आच्छादित (ढका)है-इससेआत्मा- यथार्थ रूपको न जानकर-नैयायिक आदि ज्ञानी पुरुष-कर्तृत्व-भोकृत्व आदि धर्मोकी आत्माकावषे अज्ञानसे इस प्रकार कल्पना करते जैसे-चलने आदि जलके धमाको जलमें प्रति- बेम्बित चंद्रमामें मान लेते हैं इससे आत्मा न कर्ता हे न भोक्ता है ॥२१॥ रागेच्छासुखदुःखादि बुद्दों स- न्या प्रवर्तते ॥ सुषुप्तौ नास्ति त- नाशे तस्माद्बुद्धेस्तु नात्मनः॥२२॥ भाषा-अब राग-इच्छा-आदि जो अन्तः- के धर्म हैं वे भी अज्ञानसेआत्मामें कल्पित इस बातको अन्वयव्यतिरेक युक्तिसे कहते हैं (३४) आत्मबोधः। कि, विषयोंकी विशेष अभिलाषारूप अ सामान्य अभिलापारूप इच्छा-और सुखदुः कर्तृत्व- भोक्तृत्व-आदि-संपूर्ण- धर्म- जाग और स्वप्न अवस्थाके विषे-युद्धि रहती है। रागआदि प्रवृत्त होते हैं-और सुषुप्ति-अवस्था अपने कारणरूप.अज्ञानमें बुद्धिकालयहोनेसे के भाराग आदि धर्म प्रतीत नहीं होता अर्था बुद्धिके होने पर रागोंका होनारूप अन्वय बुद्धि नाश होनेपर-रागोंका न होनारूप व्यतिरेक अन्वय-व्यतिरेकों से पूर्वोक्त रागआदिधर्म-बुर्ति के-आत्माके नहीं ॥२२॥ प्रकाशोऽकस्य तोयस्य शैत्यम- मेथोष्णता ॥ स्वभावः सच्चिदा- नंदनित्यनिमलतात्मनः ॥ २३ ॥ भा-कदाचित् कहो कि यदि आस भाषाटीकासमेतः। (३५) वभाव रागआदिरूप नहीं तो आत्माका स्वभाव सा है-इस शंकाके उत्तर में-दृष्टान्तोंसे आत्मा- स्वभावका वर्णन करते हैं कि, जैस सूर्यग काश स्वभाव है और जलका शीत स्वभाव है- गौर अग्निका उष्णस्वभावहै-इसीप्रकार आत्मा- का सचित्आनन्द-नित्यनिमलस्सनावर३॥ आत्मनः सचिदंशश्च बुद्धेदृत्ति- रिति हयम् ॥ संयोज्य चाविवेके- न जानामीति प्रवर्तते ॥ २४ ॥ भा-कदाचित् कहोकि में लाई ओ में हूं इस ज्ञान का आश्रय आत्मा प्रतीत होता [उसको निर्विकार सच्चिदानन्द कैम कह पक्त इस शंकाके उत्तरमें लिखते हैं कि,आत्माका -चित्-अंश जो बुद्धिकी वृत्तिमें पड़ता है र अज्ञानरूप आनन्दका अंशजो नदि कीवृत्ति (३६) आत्मबोधः। है-इन दोनोंको अविवेकसे मिलाकर मैं-जान हूं-मैं सुखीहूं-इत्यादिव्यवहारोंमें जीव प्रवृ होता है-और वस्तुतः असंग आत्मामें ज्ञान श्रवण-सुख-दुःख आदि-नहीं होसक्ते-क्योंकि ज्ञान और सुखाकारवृत्ति बुद्धिका परिणाम । इससे ज्ञान आदिका आश्रय बुद्धि है आत्म नहीं-आत्मामें जो इनकी प्रतीति है वह बुर्ति और आत्माकी एकताके भ्रमसे है,इससे आत निर्विकार सच्चिदानन्द रूप है॥ २४॥ आत्मनो विक्रिया नास्ति बुद्धेवों- धो न जात्विति ॥ जीवः सर्वमलं ज्ञात्वा कर्ता द्रष्टेति मुह्यति ॥२॥ भाषा-अब इस पूर्वोक्तकाही विशे वर्णन करते हैं-आत्मामें कोई विकार ने क्योंकि इस श्रुतिके अनुसार आत्मा-नि १ निर्गुणं निष्क्रिय शान्तं निरवयं निरंजनम् ।

भाषाटीकासमेतः। (३७) क्रियारहित-शांत-पापरहित-और निरंजन (निर्मल) है। और इस स्मृतिमें भी लिखा है कि, आत्मा अव्यक्त चिन्ताके अयोग्य और विकाररहित है-और बुद्धिमें-कदाचित् भी बोध (ज्ञान) नहीं है क्योंकि बुद्धि मायाक कार्य होनेसे जड है-तथापि-अन्तःकरणमें प्रतिषि- म्बित चतनकी चेतनतासे संपूर्ण देह इंद्रिय आदि जडपदार्थ-चेतनरूप प्रतीत होतेहैं इससे अन्तः- करण और आत्माके अभेदज्ञानसे वुद्धिके कती आदि धर्म-भ्रमसे आत्मामें प्रतीत होते हैं- जीव सबको अपने मेंजानकर मैं कर्ताहूं-और हू-इस प्रकार मोहको प्राप्त होता है ॥२५॥ रज्जुसर्पवदात्मानं जीवं ज्ञात्वा- भयं वहेत्॥ नाहं जीवः परात्मेति ज्ञातं चेन्निभयो भवेत्॥ २६॥ १ भव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकायोंऽयमुच्यते ।

(३८) आत्मबोधः।
भाषा-अब आत्मामें मिथ्या आरोपरूप
अज्ञानके फल और तत्त्वज्ञानके फलको दिखातेहैं
कि जैसे अंधकारसे युक्त देशमें मनुष्य रज्जुकोही
सर्प समझता है इसी प्रकार आत्माको जीव जान
कर भयकोप्राप्त होता है-अर्थात् जैसे रज्जुसर्पके
ज्ञानसे भय-कम्प होते हैं इसी प्रकार विकाररहित
आत्माको जीव माननेसे आत्मामें अनेक प्रकार
के-संसारके दुःखरूप भय प्रतीत होते हैं अर्थात
आत्माका अज्ञानी जन्म-मरणरूप भयको
प्राप्त होता है और वह भय जीव और आर
द्वैतज्ञानसे होता है क्योंकि-इस श्रुतिमें ।
है कि, दूसरेसे भय होता है और जो कि
त्भी भेद करता है उसको भय होता है-
आत्माको न जाने तो बडीही नष्टता होती
१ द्वितीयादै भयम्भवति-उदरमन्तरं कुरुतेऽय तस्य
भवति-न चेदिदावेदान्महती विनष्टिः

भाषाटीकासमेतः। (३९) और इस स्मृति भी कहाहै कि, किंचि- तभी भेद करे तो रोख नरकमें जाता है-और व में जीव नहीं किन्तु परमात्माहूं-ऐसा जानता -अर्थात तत्त्वमसि आदि महावाक्योंके विचा. रसे जीवको सच्चिदानन्द परब्रह्म स्वरूप समझता हे तब मनुष्य निर्भय होता है-सोई इस श्रुति- में लिखा है कि, जो ब्रह्मको जानता है वह ब्रह्मही होता है ॥२६॥ आत्मावभासयत्येको बुढ्यादी- नींद्रियाणि च॥ दीपो घटादिव- स्वात्मा जडैस्तैनावभास्यते ॥२७॥ -कदाचित् कहो कि, यदि आत्मा बुद्धि दिके निकट है तो बुद्धि आदि उसे क्यों नहीं नते-सो ठीक नहीं क्योंकि जडरूप बुद्धि १ ईषदप्यन्तरं कृत्वा रौरवं नरकं व्रजेत् । २ ब्रह्मविद् ब्रह्मवैभवति ।

(४०) आत्मबोधः।
आदिको असंग आत्माका ज्ञान नहीं होसक्त
इस बातको दृष्टान्तसे कहते हैं-कि एक
आत्मा मन-बुद्धि-चित्त-अहंकार और इनि
आदिका इस प्रकार प्रकाश करता है जैसे।
आदि पदार्थों का दीपक प्रकाश करता है अं.
अपने आत्मा स्वरूप-वह परमात्मा बुद्धि आ
जड पदार्थों से इस प्रकार प्रकाशित नहीं होता जै
घट आदिसे दीपकका प्रकाश नहीं होता।॥२७
स्वबोधे नान्यबोधेच्छा बोधरू-
: पतयात्मनः॥न दीपस्यान्यदी-
पेच्छा यथा स्वात्मा प्रकाशते॥२.
भा०-कदाचित् कहो कि, यदि बुद्धि आ
आत्मा प्रकाशित नहीं होता तो उसका प्र
किससे होता है-इस शंकाके उत्तरमें बो
अत्माका स्वयंही ज्ञान होता है-इस ब
दृष्टान्तसे दृढ करते हैं कि आत्मा स्वयं

(४१) भाषाटीकासमेतः। रूप है इससे बोधरूप आत्माके बोधमें अन्य बोधकी इसप्रकार अपेक्षा नहीं, जैसे-एक दीप- को अपने प्रकाशके लियेअन्यदीपककी अपेक्षा नहीं-इमसे स्वात्मास्वयंप्रकाशितहोताहै ॥२८॥ निषिध्य निखिलोपाधीनेति नेती- ति वाक्यतः॥ विद्यादैक्यं महावा- क्येर्जीवात्मपरमात्मनोः॥२९॥ भा०-कदाचित कहो कि, यदिआत्माकास्व- नही साक्षात्कार (प्रत्यक्ष) है तो यत्नके विनाही व मुक्त होजायँगे तो श्रवण-मनन-आदि जो के उपाय हैं वे सब व्यर्थ हो जायेंगे ठीक नहीं. क्योंकि अपरोक्ष रूपसे आत्माके चैतन्यका ज्ञान है-वह सामान्य । होनेसे मुक्तिका साधन नहीं है किंतु वाक्योंसे उत्पन्न जो जीव और ब्रह्मकी ताका ज्ञान वही मुक्तिका कारणहै-इसकाही

(१२) आत्मबोधः ।
वर्णन करते हैं कि, नेतिनेति इस वाक्यसे सम्पूर्ण
उपाधियोंका निषेध करके तत्त्वमसि आदि महा-
वाक्योंसे जीव और परमात्माकी एकताको जाने
अर्थात् इस व्याससूत्रके अनुसारही वह
यह उपदेश है कि, नेति २ यह आत्मा नहीं २
इत्यादि श्रुतियोंके वचनोंसे अतत् ( आत्मासे
भिन्न)का निरसन (त्याग) करै अर्थात् आत्मासे
भित्रको जड और अनित्य समझे इस प्रकार
स्थूल सूक्ष्म और कार्य कारणरूप नामरूपात्मक
जगतको अनित्य जाननेके अनंतर इन महा-
वाक्योंसे जीव और परमात्माकी एकता
जानें उस एकताके ज्ञानकोही मुक्तिका
कहतेहैं कि वह ब्रह्म तूहे-यह जीवात्मा ब्रह्म है
प्रज्ञान ब्रह्महै-मैं ब्रह्म हूं और महावाक्योंसे एक
१सएश आदेशो नेतिनेतीत्येतन्निरसनम् ।
२ तत्वमस-अयमात्मा ब्रह्म-प्रज्ञानं ब्रह्म-अहं ब्रह्मासि

भाषाटीकासमेतः। (४३) ताके ज्ञानका प्रकार वह है कि, दोनोंपद एक अर्थमें जहां वाच्यवाचक भाव संबंधसे वर्ते(कहें) उसे सामानाधिकरण्य कहते हैं और वाच्य उसको कहते हैं जिसकाशब्दके उच्चारण करतेही ज्ञानहा जैसे घटके उच्चारणसे घडेका-और वाचक उसको कहते हैं-जिसके उच्चारणसे पदार्थ जानाजाय जैसे पूर्वोक्त उदाहरणमें घट शब्द-अर्थात् घटश- ब्द और घडेका वाच्य वाचक भाव आदिसंब- धहै वह संबंध तीन प्रकारका है १ सामानाधि- करण्य-२विशेषण विशेष्यभाव-३-लक्ष्यलक्षण 'व-उनमें सामानाधिकरण्य, मुख्यसामानाधि- रण्य और बाधसामानाधिकरण्य भेदसे दो- कारकाहै-जिस वस्तुका जिस वस्तु के संग सदैव भेदहो वह मुख्वसामानाधिकरण्य, जैसे डेलेके वर्ण और भूपणके सुवर्णका-और जहां किसी शको बाधकर अभेदहो वह बाधसामानाधि-

(४४) आत्मबोधः।
करण्य-जैसे भूषणके नामरूपको बाधकर दोनों
पूर्वोक्त सुवर्णीका अभेद होताहै-अथवा जहा दो
पदोंका परस्पर भेद हो और अर्थ एकहो वह।
बाधसामानाधिकरण्य होताहै । जैसे-घट और
कुंभ शब्दमें वहां शब्द भेद होनेपरभी मृत्तिका-
रूप लक्ष्य एक है-वा जैसे सोऽयं देवदत्तः
(वह यह देवदत्त है जो काशीमें देखाथा) इस
वाक्यमें सः अयं देवदत्तः ये तीन पद हैं उनमें
सः पद तिस परोक्षकालमें दृष्टका बोधकहै और
अयं यह पद वर्तमान कालवृत्तिका बोधक हैऐ
दोनों पदोंका भिन्न २ अर्थ है परन्तु दोनों पदों
तात्पर्य एक देवदत्तमें है इससे देशकाल
विशेषणके परियागसे देवदत्तरूप पिंड मात्र
बोध होताहै-इसप्रकार तत्त्वमसि आदि
वाक्योंमें परोक्ष आदि विशेषण विशिष्ट चे
तत्पदका वाच्य अर्थ है और अपरोक्ष आदि वि

भाषाटीकासमेतः। पण विशिष्ट चेतन त्वंपदका वाच्य अर्थ है इन दोनों पदोंका अर्थ भिन्न २ है और तात्पर्य शुद्ध तनके विपेहै इससे परोक्ष अपरोक्ष आदि विशे- णोंके त्यागसे चेतनरूप अर्थमें दोनोंका सामा- धिकरण्य है यह सामानाधिकरण्य प्रथम है नौर दूसरा विशेषणविशेष्यभाव संबंध यहहै कि, से सोयं देवदत्तः-यहां सः अयं ये दो पद देव- त पदके विशेषण हैं और देवदत्त विशेष्य है और ये दोनों अपने २ देश कालरूप अर्थको छोडकर देवदत्तके स्वरूपको बोधन करते हैं इसी कार तत्त्वमसि आदि महावाक्योंमें भी तत्प- अर्थ परोक्ष आदि विशेषणसहित है-और पदका अर्थ अपरोक्ष आदि विशेषण सहित न है विशेषणोंको त्यागकर दोनोंका असि इस पदमें सामानाधिकरण्य है-तीसरा संबंध यलक्षण भाव है कि, जैसे सोयं देवदत्तः यहां आत्मबोधः। सः अयं इन दो पदोंसे देशकाल आदि विशेष- णोंको छोडकर देवदत्तमात्र लिखा जाताहै इसी- प्रकार तत्त्वमसि आदि महावाक्योंमेंभी तत्पदा अर्थ-अद्वितीय-परोक्ष व्यापकचेतन है और त पदका अर्थ-सद्वितीय अपरोक्ष परिच्छिन्न चेत है इन विरुद्ध धर्मोको त्यागकर एक चेतन : विरुद्ध धर्मरहित लक्ष्य अर्थ है वह लिखाजाता इस प्रकार पूर्वोक्त तीनों संबंधोंसे लक्षणाके द्वा जीव और ब्रह्मकी एकता सिद्ध होती है -और र लक्षणा जहत्, अजहत्, जहदजहत, भेदसे ती प्रकारकी है जैस गंगामें घोसियोंकाग्राम है। गंगाके प्रवाहरूप वाच्य अर्थ में ग्रामकाअसं इसलिये गंगापदकी अपने प्रवाहरूप वाच्य को छोडकर तीरमें लक्षणाहै क्योंकिजहांपद संपूर्ण अर्थको छोडदे वह जहत् लक्षणा व है और महावाक्योंमें चेतनरूप अर्थ दो भाषाटीकासमेतः। (१७) एक है इससे अर्थका त्याग न होनेसे जहत् लक्षणा नहीं होसकती-और अरुण (लाल) दौडताहै यहां लाल रंगमें दौडना असंभव है इससे अरुणप- दकीलालघोडे में लक्षणा है यहांअरुणपदकीअपने 'लालरूप अर्थको नछोडकरलालघोडेमें अजहत् लक्षणा होती है। क्योंकि जहां अपने अर्थको न छोटकर पद दूसरे अर्थको कहे वहां अजहत् लक्षणा होती है-यह लक्षणाभी महावाक्योंमें नहीं हो सकती। क्योंकि उनमें संपूर्ण वाच्य अर्थका - नहीं है-और जहां किंचित् अर्थका त्याग कंचित्का ग्रहण हो वह जहदजहत् लक्षणा है वह लक्षणाही महावाक्योंमें इसप्रकार है।जैसे-सोयंदेवदत्तःइसवाक्य में देशकाल दुष्ट कृश आदि विशेषणों का त्याग है और पत्र देवदत्तका ग्रहण है ऐसेही तत्त्वमसि (४८) आत्मबोधः। आदि महावाक्यों में समष्टि, व्यष्टि,स्थूल, सूक्ष्म आदि विरुद्ध अंशको त्यागकर व्यापक अखंड चैतन्यमात्रका जहदजहत लक्षणासे बोध होताहै इसकोही भागत्यागलक्षणा कहते हैं ॥२९॥ आविद्यकं शरीरादि दृश्यं बुद्ध.. । दवत्क्षरम् ॥ एतद्विलक्षणं वि- द्यादहं ब्रह्मेति निर्मलम् ॥ ३०॥ भा०-कदाचित कहो कि,चेतन असंगहै इस- स्थूल आदि उपाधियोंके न त्यागकरने में क्या हानि है सो ठीक नहीं क्योंकि उपाधियोंके त्याग विना अखंड सत् चित् आनंदका ज्ञानइसम नहीं हो सकता जैसे अज्ञानसे आरोपित स निषध विना रज्जुका ज्ञान नहीं होताहै वातका वर्णन करते हैं कि,अज्ञानसे कल्पित शरीर आदि दृश्य( देखने योग्य ) जड पदार उनको बुबुद(बुलबुला)के समाननाशवान

भाषाटीकासमेतः। (४९)
मझे और इनसे विलक्षण अर्थातनित्यनिमलअ-
पने जीवात्माको मैं ब्रह्म हूं ऐसेसमझेअर्थात् उपा-
धिरूप मलोंसे रहित ब्रह्मरूप मैंहूं यहजान॥३०॥
देहान्यत्वान्न मे जन्मजराका-
र्यलयादयः ॥ शब्दादिविषयः
संगो निरिद्रियतयान च॥३१॥
भा०-अब महावाक्योंसे उत्पन्न हुई जो जीव
और ब्रह्मकी एकता उसके मननका प्रकार कहते
हैं कि,स्थूल और सूक्ष्म शरीरसे में भिन्न हूं इससे
मेरेमें जन्म जरा कृशता मरण आदि नहीं हैं और
आदि पदके देनेसे क्षुधा, तृषा आदि जो देहके
धर्म हैं वेभी आनंदरूप,असंग मेरेमें नहीं हैं और
मैंई द्रियोंसे रहित हूं इससे शब्द स्पर्श रूप रस
आदि विषयोंके संगभी मेरा संबंध नहीं है
दान में असंग निर्मल स्वभावरूप ब्रह्म हूं ऐसे
न करे॥३१॥

, (५०) आत्मबोधः। अमनस्त्वान्न मे दुःखरागद्वेषभ- यादयः॥ अप्राणो ह्यमनाःशुभ्र इत्यादि श्रुतिशासनात् ॥३२॥ भा०-अब आत्मामें मनके धर्मोंका निषेध कहते हैं कि, मैं मनसे भिन्न हूं इससे मेरे । में दुःख-विषयों में प्रीतिरूप राग द्वेष (बैर ) संकल्प, विकल्प, मोह, शोक, भय आदि जो मनके धर्म हैं वे मेरेमें नहीं हैं-और क्षुधा तृषा आदि जो प्राणोंके धर्म वेभीमेरेमें नहीं हैं क्योकि,मैं मन प्राणोंसे भिन्न हूं-इससे श्रुतिने भी आज्ञाकी है कि,परमात्मा प्राणसे भिन्न है और मनसे भिन्नेह और शुभ्रअर्थात्अविद्याके मलों । रहित है और अखण्ड सचिदानंदरूप निर्विकार । चेतनरूप है ॥३२॥ एतस्माज्जायते प्राणोमनः सर्वेन्द्रि- - भाषाटीकासमेतः। (५१) याणि च ॥ खं वायुज्योतिरापश्च पृथ्वी विश्वस्य धारिणी॥ ३३ ॥ भा०-अब प्राण आदि परमात्मासे उत्पन्न होनेसे अनित्य हैं । इस बातका वर्णनकरतेहैंकि, इस प्रत्यक भिन्न अर्थात् अन्तःकरणके साक्षी वा प्रेरक-वा असत् जडदुःस्वरूप संसारसे विपरीत सत् चित् आनंदरूप ब्रह्मम्मे क्रियाशक्तिरूप प्राण और ज्ञानशक्तिरूप मन ( अंतःकरण ) और मंपूर्ण इंद्रिय और आकाश वायु अग्नि जल और स्थावर जंगमरूप विश्वके धारण करनेवाली पृथि- दी यह संपूर्ण प्रपंच-अनादि अविद्याके द्वारा- पूर्वोक्त ब्रह्मसेही उत्पन्न होताहै ॥ ३३॥ निर्गुणो निष्क्रियो नित्यो निर्विक- ल्पो निरंजनः॥निर्विकारो निराका- रो नित्यमुक्तोऽस्मि निमल॥३४॥ - (५२) आत्मबोधः। भा०-प्रकृतिरूप माया और मायाके कार्य बुद्धि, और सत्त्वगुण,राग, इच्छा,आदिसे रहित रूप,निर्गुण-और देह आदिकी कियासे रहितरूप निष्क्रिय-और देह आदिसे भिन्नरूप नित्यचेत- नरूप-और विकल्पसे रहित अर्थात मनसे भिन्न निरंजन अर्थात् मायाके मलसेरहित-और विका- रसे रहित-औरनिराकारअर्थात्आकाशकेसमान निखयव-नित्यमुक्तअर्थात् मोहआदिजोअज्ञा- नसे कल्पित बंधनहें उनसे रहितऔरनिमलअ- ज्ञानसे कल्पित अविद्यारूपमायाके बंधनसे रहि- त-मैं हूं इसप्रकार अपने आत्मरूपको जानै३४॥ अहमाकाशवत्सर्वबहिरंतर्गतोऽ- च्युतः ॥ सदा सर्वसमः शुद्धो निःसंगो निर्मलोऽचलः॥३५॥ भा०-कदाचित् कहो कि, जीवात्मा निर्गुण ।

भाषाटीकासमेतः। (५३)
आदिरूपहो परंतु देहवान् प्रतीत होताहै इससे
परिच्छिन्न हो जायगा सो ठीक नहीं इसशंकाका
उत्तर आत्माको असंग दिखाकर देते हैं कि,जगत्-
के संपूर्ण जो जड दृश्य पदार्थ हैं उनकेभीतर में
आकाशके समानगत (व्यापक) हूं-और सबसे
भिन्न एकरस चेतन रूपहूं-कदाचित् कहो कि,
सबके नाशसे आत्माकाभी नाश होजायगा
भी ठीक नहीं क्योंकि मैं अच्युत हूं अर्थात् संपूर्ण
कल्पित जगत्के नाश होनेपर मेरा नाश नहीं है।
क्योंकि में अधिष्ठानरूपह-कदाचित कहो कि,
अधिष्ठानरूपसे तू सत्य अविनाशी है परंतु अंतः-
करणमें तो आपकी सत्ता और चेतनता दोनों
प्रतीत होती हैं और घट आदिमें केवल सत्ताही
प्रतीत होती है यह विषमता आपमें है सो औक
नहीं क्योंकि मैं सदैव(सब काल) में संपूर्णपदा-
थाके विष सम (तुल्य)हूं और सत्त्वगुणके कार्य

(५४) आत्मबोधः। होनेसे स्वच्छ अंतःकरण आदिमें सत्ता और चेत- नता दोनों प्रतीत होती हैं और तमोगुणके कार्य मलिन घट आदिमें सत्ताही प्रतीत होती है इसमें मुझ आत्माका कौन अपराध है-और मैं शुद्ध अर्थात् पुण्य पापसे रहित हूं और असंग अर्थात् वस्तुतः सबके संबंधसे रहित हूं-और निर्मल हूं अर्थात् संशय आदि मलोंसे रहितहूं-और अचल हूं अर्थात् सच्चिदानन्दरूप आदि अपने धर्मोंसे चलायमान नहीं होता ॥ ३५॥ नित्यशुद्धविमुक्तैकमखडानंदम- द्वयम् ॥ सत्यं ज्ञानमनंतं यत्परं ब्रह्माहमेव तत् ॥३६॥ भा०-अब त्वंपदार्थ जीव, और तत् पदार्थ ब्रह्मका जो लक्ष्यपूर्वक वर्णन किया है उन दोनोंके अभेदका चिंतन (विचार) करते हैं कि भाषाटीकासमेतः। नित्य अर्थात् भूत भविष्यत् वर्तमान कालमें बाधारहित-शुद्ध अर्थात् अविद्या आदि मलसे रहित-विमुक्त अर्थात् संसाररहित-एक अर्थात् सजातीय भेदसे शून्य-अखंड अर्थात् देशकाल वस्तुके परिच्छेदसे शुन्य-आनंद (सुखरूप)अद्वय अर्थात् विजातीय और स्वगत भेदसे रहित-इस प्रकारका जो सत्य, ज्ञान, अनंतरूप परब्रह्मका स्वरूप है वह इस श्रुतिमें भी कहा है वही सचिदा- नंदरूपमैं हूं इस प्रकार जीवात्मा और परमात्माकी एकताकी चिंता करै ॥३६॥ एवं निरंतराभ्यस्ता ब्रह्मेवास्मे- ति वासना ॥ हरत्यविद्याविक्ष- पात्रोगानिव रसायनम्॥ ३७॥ भा०-इस प्रकार चिरकालपर्यंत किये अभ्या- Song १ सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म।

(५६)
आत्मबोधः।
ससे दृढ हुये जीव ब्रह्मकी एकताके ज्ञानसे उत्पन्न
हुई विद्या-उसीसमय अविद्या और विद्यासे
उत्पन्न जन्ममरण आदिरूप संसारको नष्ट कर-
देती है इसका वर्णन करते हैं कि इस पूर्वोक्त
रीतिसे बहुत कालतक निरंतर अभ्यास (मनन)
का ब्रह्मही मैं हूं यह वासना अर्थात् देह और
आत्माकी एकताके ज्ञानकी तुल्य जो ब्रह्म और
आत्माकी एकताका दृढ ज्ञान वह अविद्याके
किये चित्तके विक्षेप अर्थात् आत्मा और ब्रह्मका
भद ज्ञान आदि उनको इस प्रकार नष्ट करती है
जैसे रोगोंको रसायन (औषध) सेवनसे नष्ट
करती है ॥३७॥
विविक्तदेश आसीनो विरागो
विजितेंद्रियः ॥ भावयेदेकमा-
त्मानं तमनंतमनन्यधीः॥३८॥

भाषाटीकासमेतः। भा०-अब ब्रह्म और आत्माकी एकताके विचा- रका साधन कहते हैं कि, एकांत स्थानमें स्थित और विराग अर्थात् शब्द स्पर्श आदि विषयोंकी इच्छासे रहित-और विशेषकर जीती हैं इंद्रिय जिसने वह पुरुष अनन्यवृद्धि होकर अर्थात अपने एक आत्मामेंही बुद्धिको लगाकर उप एक अनंत अर्थात् देशकाल वस्तुके परिच्छेदसे शून्य वा नाश रहित अत्माकी भावना (विचार) करै कि, जो सब भूतोंमें स्थित चेतनरूप ब्रह्म है वही में अन्य नहीं यह निश्चय करै-इस प्रकार चिंतन करनेसे ब्रह्म और आत्माकी एकताका दृढ निश्चय हो जाताहै ॥३८॥ आत्मन्येवाखिलं दृश्यं प्रविलाप्य धिया सुधीः॥ भावयेदेकमात्मा- नं निर्मलाकाशवत्सदा ॥३९॥ , (५८) आत्मबोधः। भा०-कदाचित् कहो कि, यदि दृश्य देखने योग्य)प्रपंच व्यवहारदशामें प्रत्यक्ष वर्तमानहै तो एकताकी भावना कैसे होसकती है-इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं कि, शुद्ध है अंतःकरण वा बुद्धि जिसकी ऐसा मुमुक्षु आत्माके विषे अर्थात् कारण- रूप विवेकवाली बुद्धिमें संपूर्ण दृश्य (दीखते ) जगत्को लय करके एक आत्माकी निर्मल आकाशके समान भावना (विचार)करै अर्थात शरत्कालके मेघ रहित आकाशके समान आत्माको भी स्वच्छ और एक रस समझेऔर लयका प्रकार यह है कि पृथ्वीको जलमें जलको अग्निमें-अग्निको वायुमें-वायुको आकाशमें- आकाशको अव्याकृत (मूल प्रकृति ता माया) में और अव्याकृतको ब्रह्ममें लयकरै-फिर शुद्ध ब्रह्म व्यापकरूप मैं हूं ऐसा चिंतन करें ॥३९॥ - भाषाटीकासमेतः। (५९) नामवर्णादिकं सर्व विहाय पर- मार्थवित् ॥ परिपूर्णचिदानन्द- स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४० ॥ भा०-अब संपूर्ण दृश्य प्रपंचके त्यागसे समा- धिक विषे जो विवेकीकी स्थिति उसका वर्णन करते हैं कि, परमार्थ (मोक्ष वा ब्रह्म) का ज्ञाता विवेकी पुरुष-नामरूप आदि संपूर्ण दृश्य जाति मूर्ति आदिप्रपंचको त्यागकर-परिपूर्ण(व्यापक) अधिष्ठान-अंतर्यामी-सत् चित् आनंद स्वरूप साक्षी शुद्ध-चेतनरूपसे टिकता है अर्थात् परिपूर्ण आदि स्वरूपही अपने जीवात्माको मानताहे- और आत्माका जो ज्ञानी है उसकी स्थिति इस वनचमेंभी भगवान्ने वर्णन की है कि, जैसे पवन रहित देशमें दीपक निश्चल रहता है वही श्यथा दीपो निवातस्थो ने गते सोपमा स्मृता । योगेन यत. चित्तस्य युजतो योगमात्मनः ॥

(६०) आत्मबोधः। उपमा उस योगीकी है जिसका चित्त वशमें है और जो अपने योगमार्ग ( चित्तकी वृत्तिको रोकना ) में लगरहाहै॥ ४० ॥ ज्ञातृज्ञानज्ञेयभेदः पुरात्मनि न विद्यते ॥ चिदानन्दैकरूपत्वादी- प्यते स्वयमेव हि ॥४१॥ भा ०-कदाचित् कहो कि, समाधिमें पृथिवी आदि दृश्य प्रपंचके लय होनेपर भी ज्ञाता-ज्ञान ज्ञेयका भेद त्रिपुटीरूप प्रपंचके विद्यमान रहते पूर्वोक्त दीपककी उपमा योगीमें कैसे घटसकती है इस शंकाके उत्तरमें कहते हैं कि, सविकल्पक समाधिमें यद्यपि ज्ञाता,ज्ञान, ज्ञेयका भेद प्रतीत होताहै परन्तु निर्विकल्पक समाधिमें प्रतीत हुआ जो परब्रह्मरूप परमात्मा है उसमें ज्ञाता,ज्ञान,ज्ञेय काभेद प्रतीत नहीं होताहै क्योंकि, यह परमात्मा चिदानंदरूप होनेसे स्वयं एव (आपोआप) भाषाटीकासमेतः। (६१) प्रकाशित होताहै अर्थात् उसके ज्ञानसे लिये किसीभी ज्ञान आदिकी अपेक्षा नहीं है॥४॥ एवमात्मारणौ ध्यानमथने सततं कृते ॥ उदितावगतिज्वाला सर्वाज्ञानधनं दहेत् ॥४२॥ भा०-इसप्रकार ब्रह्म और आत्माकी एक- ताके ज्ञानार्थ जो प्रयत्न उसके फलका वर्णन करते हैं कि इस प्रकार आत्मा(मन)को नीचेकी अरणि और ओंकारको ऊपरकीअरणि(मथनेकी लडकी) करके निरंतर ध्यानरूप मथन करनेपर उदित (उत्पन्न ) हुई जो अखंड ब्रह्माकार वृत्ति रूप ज्वाला वह संपूर्ण अज्ञान और अज्ञानकार्य जन्ममरण आदि संसाररूप ईधनकोदग्ध(भस्म) करदेती है सोई इस श्रुतिमें लिखाहे कि १ आत्मानमराणे कृत्वा प्रणवं चोत्तराराणिम् ॥ ज्ञाननिर्म थनाभ्यासादरकर्म स पंडितः।

(६२) आत्मबोधः। मनको नीचेकी और ओंकारको ऊपरकी आणि बनाकर ज्ञानके मथनेसे जो कर्मोको दग्धकरता है वही पंडित है ॥४२॥ अरुणेनेव बोधेन पूर्वसंतमसे हृते । तत आविर्भवेदात्मा स्वयमेवांशुमानिव ॥४३॥ भा०-उत्पन्न हुई पूर्वोक्त ज्वाला अज्ञानरूप ईंधनको दग्ध करता है और तभी आवरण रहित आत्माका प्रकाश होताहै इन दोनों बातोंको दृष्टां- तसे स्पष्ट करतेहैं कि जैसे अरुणा(मूर्यका लारथी) के उदय होनेसे प्रथम जो गाढ अंधकार उसका नाश होनेसे सूर्यका अखंड प्रकाश होताहै इसी प्रकार बोध (एकताका ज्ञान )से अज्ञानरूपअंध- कारकी निवृत्ति होनेपर आत्माकाभी सूर्यके समान प्रकाश होताहै अर्थात् साक्षावब्रह्मज्ञान होजाताहै भाषाटीकासमेतः। (६३) सोई गीतामें लिखाहै कि, जिनका वह अ- ज्ञान, ज्ञानले नष्ट होगयाहै उनको ब्रह्मका ज्ञान इसप्रकार प्रकाशित होता है जैसे सूर्य का प्रकाश होता है ॥४३॥ आत्मा तु सततं प्राप्तोऽप्यप्राप्य- वदविद्यया ॥ तन्नाशेप्राप्तवद्धा- ति स्वकंठाभरणं यथा ॥४४॥ भा०-यदिश्रुतिआदि प्रमाणोंसे आत्मा साक्षात् अपरोक्ष है तोनित्यप्राप्त है क्योंकि अप्राप्त और परोक्ष नहीं होता है तो ऐसे ब्रह्मकी अज्ञानके नाशसे प्राप्ति कैले कहते हो सोठीक नहीं क्योंकि नित्य प्राप्त भी आत्मा अविद्यासे अप्राप्तके समान और अविद्याके नाशसे प्राप्तके समान प्रतीत होता है इस बातको दृष्टन्तसे वर्णन करते हैं कि,यद्यपि १ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः । तेषामादि- त्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ।

(६४) आत्मबोधः। ज्ञानहष्टिसे आत्मा निरंतर प्राप्त है तथापि अवि- याले अज्ञानियोंको अप्राप्तके समान-और अवि- याके नाश होनेपर प्राप्तके समान-इस प्रकार प्रतीत होता है जैसे अपने कंठका भूषण अज्ञान से आप्राप्त और ज्ञानसे प्रात होजाता है ॥४४॥ स्थाणौ पुरुषवद्भ्रांत्या कृता ब्रह्म णि जीवता ॥ जीवस्य तात्त्विके रूपे तस्मिन्दृष्ट निवर्तते ॥४५॥ मा ०- कदाचित् कहो कि, जिसका अपरोक्ष साक्षात्कार है वह ब्रह्मही नित्य प्राप्त है जीवात्मा नित्य प्रात नहीं हो सका सो ठीक नहीं क्योंकि अज्ञानसे भ्रमकेद्वारा परमात्माही जीवभाव- को प्राप्त हो जाता है वस्तुतः कोई जीव नहीं है इस बातको दृष्टांतसे वर्णन करतेहैं कि जैसे स्था- णुमें अंधकारके विषे भ्रांतिसे पुरुषको तुल्यता प्रतीत होती है इस प्रकार ब्रह्ममें भ्रमसे जीवभाव भाषाटीकासमेतः। (६५) प्रतीत होता है अर्थात् अनादि अज्ञानसे ब्रह्मही जीव प्रतीत होने लगता है और महावाक्यों के द्वारा जीवका जो वह तात्त्विक ( सचा) रूप है उसकेसाक्षात्कार करनेसे (जाननेसे)वह जीवभाव इस प्रकार निवृत्त हो जाता है जैसे स्थाणुके ज्ञान- से पुरुषभ्रमकी निवृत्ति हो जाती है ॥ ४५ ॥ तत्त्वस्वरूपानुभवादुत्पन्नं ज्ञान- मंजसा ॥ अहं ममेति चाज्ञानं बाधते दिग्भ्रमादिवत् ॥४६॥ भा०-कदाचित् कहो कि, विवेकियों को भी अई-मम-( मैं मेरी) इत्यादि व्यवहारकीप्रतीतसे संसारकी निवृत्ति कैसे होगी सो ठीकनहीं-क्यों- कि, अज्ञानसउत्पन्न वा पूर्वोक्तव्यवहारतत्त्वज्ञा- नसे नष्ट हो जाता है इस बातका दृष्टान्तपूर्वक वर्णन करते हैं कि, वास्तविक सच्चिदानन्दरूप (६६) आत्मबोधः। जीवका जो यथार्थस्वरूप उसके अनुभव (ज्ञान) से उत्पन्न हुआ जो तत्त्वमसिआदि महावाक्यों- के द्वारा जीव और ब्रह्मकी एकताका दृढज्ञान उससे सुखपूर्वक ही अहं-मम-इस-अज्ञानका इस प्रकार बोध होता है जैसे-दिशाओंका भ्रम पूर्व- में सूर्योदयके ज्ञानसे नष्ट हो जाता है ॥४६ ॥ सम्यग्विज्ञानवान्योगी स्वात्म- न्येवाखिलं स्थितम्॥एकं च सर्व- मात्मानमीक्षते ज्ञानचक्षुषा ॥४७॥ भाषा-अब निवृत्त हुआ है अज्ञान जिनका ऐसे विवेकियोंकी दृष्टिका वर्णन करते हैं- कि-संशय और विपरीत ज्ञानसे-रहित जो ब्रह्मके साक्षात् ज्ञाता योगी हैं-उनको-ज्ञान- रूप-कूटस्थ-साक्षी- स्वरूप-अपने-आत्माके विषेही-संपूर्ण दृश्य प्रपंच-स्थित-(कल्पित) दीखता है-और-संपूर्ण जगत्को ज्ञान- भाषाटीकामेसतः। (६७) दृष्टिसे-एक-आत्मस्वरूप-ही देखतेहैं-अर्थात् आत्मासे भिन्न जगतको-शशशृंग-और आकाश पुष्पकेसमानकल्पित समझकर-आत्माके-स्वरू- पको ज्ञानदृष्टिसे देखते हैं ॥४७॥ आत्मैवेदं जगत्सर्वमात्मनोऽन्य न्न विद्यते ॥ मृदो यहवटादीनि स्वात्मानं सर्वमीक्षते॥४८॥ भा०-कदाचित् कहो कि,प्रत्यक्षसे प्रतीतइस जगत्को आत्मासेभित्रकैसे कहते होसो ठीकनहीं क्योंकि,यद्यपि उपादेय (कार्य)उपादान(कारण) से-भित्रभी प्रतीत होताहैतथापि-पूर्वोक्तबाघसा- मानाधिकरण्यसे-अभेद-प्रतीतहोताहै-इस बात- को दृष्टांतपूर्वक वर्णन-करतेहैं-कि,यह संपूर्ण ज- गत्--आत्माही ई-क्योंकि,आत्मासे उत्पन्नहोनेसे आत्मासे अन्य इस प्रकार नहीं है-जैसेउपादान

(६८) आत्मबोधः।
रूप मृत्तिकासे उत्पन्न हुई घट आदि -मृत्तिकासे
भिन्न नहीं हैं-इसप्रकार संपूर्ण जगत्को आत्मस्व-
रूप ही देखताहे-अपनेसेभिन्न नहींदेखता॥४८॥
जीवन्मुक्तिस्तु तद्विद्वान्पूर्वोपा-
धिगुणांस्त्यजेत्॥ सच्चिदानन्दरू-
पत्वाद्भवेद् भ्रमरकीटवत्॥४९॥
भा०-अब ज्ञानीकी वास्तव दृष्टिको-कह
कर-जीवन्मुक्ति-अवस्थाका वर्णन करते हैं कि
जीवन्मुक्त-पुरुष तो पूर्वोक्त जीव और ब्रह्मकी
एकताकोजानकरतचज्ञानसेपूर्व जो उपाधियोंके
गुण थे-उनको-श्रवण-आदिद्वारा मायाके धर्म
जानकर-विवेकसे त्यागता है-और-फिर-इस
प्रकार सच्चिदानन्दरूप होजाता है जैसे भंगीना-
मका कीट-भ्रमर-कीटके भयसे-भ्रमरकीटरूपही
हो जाता है ॥ १९॥

भाषाटीकासमेतः। (६९) तीा मोहार्णवं हत्वा रागद्वेषा- दिराक्षसान् ॥ योगी शांतिसमा- युक्तो ह्यात्मारामो विराजते ॥ ५० ॥ भा ०-अब जीवन्मुक्तकी स्थितिका वर्णन करते हैं कि, आत्माके विषे है आराम (स्थिति) जिसको-ऐसायोगी-मोहरूपीअज्ञानकेसमुद्रको तरकर और राग द्वेष आदि राक्षसोंको हतकर- शान्तिसे युक्त हुआ-विराजमान होता है -इस श्लोकका श्लेषसे दूसराभी अर्थ-होसकताहै कि जैसे-श्रीरामचद्रजीने-समुद्रको तरकर और रावण आदि राक्षसोंको हतकर और सीतासे संयुक्तहोकर राजसिंहासनपर-स्थिति कीथी इसप्रकार ब्रह्म- ज्ञानका साधकयोगी तवज्ञानके द्वारा-मोहरूपी समुद्रको तर-और उन राग-द्वेष आदि-राक्षसोंको इतकर जिन्होंने शांतिरूप सीताको चुराया था, (७०) आत्मबोधः। फिर-शान्तिसे-युक्तहुआ श्रीरामचंद्रके समान विराजमान होताहै-अर्थात्-निववृत्तिरूपसिंहा- सनपर बैठता है॥५०॥ बाह्यानित्यसुखासक्तिं हित्वात्म- सुखनिर्वृतः ॥ घटस्थदीपवत्स्व- च्छः स्वांतरेव प्रकाशते ॥ ५१ ॥ भा०-अब लक्षणसे जीवन्मुत्ताकी अवस्थाका दृष्टान्तसे-वर्णन करतेहैं कि,नेत्रआदिबाह्यइन्द्रि योंके संबन्धसे उत्पन्न हुआ जो विषयानन्दरूप अनित्यसुख उसके विषे आसक्ति (प्रीती)को त्यागकर-आत्मसुखसे निवृत्तः सुखी)हुआ स्वच्छ रूपसे अपने अन्तःकरणमें इसप्रकार-साक्षात ब्रह्मरूप प्रकाशता है जैसे घटके विषे स्थित दीपक-घटके भीतर ही प्रकाशता हे-बाहर न।

भाषाटीकासमेतः। (७१) सोई-गीतामें-लिखा है कि हे अर्जुनाजबमनकी सब कामनाओंको त्यागता हैतब अपने आत्मा- में ही-मन्तुष्ट हुआ-स्थितप्रज्ञ-(स्थिरबुद्धि ) कहाता है ॥५१॥ उपाधिस्थोऽपि तद्धर्मेन लिप्तो व्योमवन्मुनिः ॥ सर्वविन्मूढव- त्तिष्ठेदसक्तो वायुवच्चरेत् ॥ ५२॥ भा०-उपाधियोंमें-स्थित भी-उपाधियोंका साक्षीरूप मुनि अर्थात्-वेदान्तशास्त्रका मनन करनेवाला तत्त्वज्ञानी-उपाधियोंके सुख-दुःख आदि धर्मोंसे इसप्रकार लिप्त नहीं होता- जैसे आकाशधूलिआदिसे लिप्त नहीं होता और सबका ज्ञाता भी वह मूढकेसमान-टिकता है- और-विषयोंमें आसक्त हुआ वह वायुके समान १ प्रजहाति यदा कामान्सर्वान्पार्थ मनोगतान् । आत्मन्ये. वात्मनावष्टः स्थितप्रज्ञास्वदोच्यते ॥

(७२) आत्मबोधः। विचरता है अर्थात्-जैसे वायु सुगन्धित पदार्थों में प्रीतिसे रहित होकर गमन करता है इसीप्रकार ज्ञानी भी-विषयोंमें प्रीतिको त्यागकर अपने स्वरूपमें विचरता है ॥५२॥ उपाधिविलयाद्विष्णौ निर्विशेष विशेन्मुनिः॥जले जलं वियहयो- नि तेजस्तेजसि वा यथा॥५३ ॥ भा०-अब ज्ञानीकी विधेय-कैवल्यमुक्तिका वर्णन करते हैं कि, देह आदि उपाधियोंके लय (नाश)होनेसे वेदान्तका मनन करनेवाला मुनि पृथिवी आदि विशेषोंसे रहित व्यापकरूप विष्णु ( परब्रह्म) में इसप्रकार प्रविष्ट होता है-अथांत परब्रह्मरूप होजाता है जैसे नदीका जल समुद्रके जलमें दीपक आदिका तेज अग्निमें और घटका आकाश महान् आकाशमें प्रविष्ट होजाता है , भाषाटीकासमेतः। (७३) अर्थात् जैसे जल आदिमें मिले जल आदिएकरूप होजातेहैं-इसीप्रकार परब्रह्म में मिला जीवात्मा पर- ब्रह्मरूप ही होजाता है-भित्ररूप नहीं होता॥५३॥ यल्लाभान्नापरो लाभो यत्सुखाना- परं सुखम् ॥यज्ज्ञानान्नापरं ज्ञानं तब्रह्मेत्यवधारयेत् ॥५४॥ भा०-अब आठश्लोकोंसे उस परब्रह्मका निरू- पण करते हैं-विदेह मुक्ति में जिसकी प्राप्ति होतीहै कि, जिस परब्रह्मके-लाभ- अर्थात् प्राप्तिसे- दूसरा लाभ नहीं अर्थात् परमपुरुषार्थरूप उस लाभमें संपूर्ण जगतके लाभ अन्तर्गत हैं- और जिसके सुखसे दूसरा सुख नहीं- क्योंकि, सर्वोत्तम उस सुखमें जगत्के तुच्छ सुख अन्तर्गत होजाते हैं और जिसके ज्ञानसे उत्तम दूसरा ज्ञान नहीं अर्थात् मोक्षका हेतु होनेसे ब्रह्मज्ञा- (७१) आत्मबोधः। न ही अत्यन्त श्रेष्ठ है-उसको ही ब्रह्मस्वरूप- निश्चय करै ॥५४॥ यदृष्ट्वा न परं दृश्यं यद्भूत्वा न पुनर्भवः॥ यज्ज्ञात्वा न परं ज्ञानं तब्रह्मेत्यवधारयेत्॥ ५५॥ भा०-जिसब्रह्मको देखकर-दूमरा पदार्थ देख- ने योग्य नहीं क्योंकि,अधिष्ठानरूपब्रह्मकेसाक्षा- कारसे ब्रह्ममै कल्पित संपूर्ण जगत्का साक्षा- त्कार हो जाता है--और जिस ब्रह्मरूप होनेसे-- दूसरा-होना नहीं अर्थात् फिर संसारमें जन्म- नहीं होता है सोई गीतामें लिखा है कि, जिस ब्रह्ममें जाकर फिर निवृत्त नहीं होते वह मेरा-सर्वोत्तम धाम है-और जिसको जानकर दूसरा ज्ञान नहीं क्योंकि, कारणरूप ब्रह्मको जा- यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ १ भाषाटीकासमेतः। (७५) नकर-कारणसे भिन्न कार्यकी सत्ता-नहीं रहती अर्थात् कारणके ज्ञानसे समस्तकार्य जाना जाता है उसको ब्रह्म-निश्चय करै अर्थात् जानै॥५॥ तिर्यगूलमधः पूर्ण सचिदानंद- महयम् ॥अनंतं नित्यमेकं य- त्तद्ब्रह्मत्यवधारयेत् ॥५६॥ भा०-कदाचित् कहो कि, विदेहमुक्तिकी अ. वस्थामें-जिस ब्रह्मको तत्त्ववेत्ता प्राप्त होता है-वह परिच्छिन्न है वाअपरिच्छिन्न अर्थात्-अव्यापकहे वाव्यापक-यदि-परिच्छिन्न है तोनाशमान होनेसे परमपुरुषार्थ-सिद्ध न होगा-और अपरिच्छिन्न है तो सर्वत्र विद्यामान होनेसे उसको प्राप्ति न बनेगी- इसशकाके उत्तरमें-परिपूर्ण-नित्य-आनन्दरूपब- झका वर्णनकरते हैं कि,जो सच्चिदानन्द ब्रह्म-तिर्य- अर्थात् पूर्व पश्चिम-उत्तर-दक्षिण-और-ऊपर नीचे-पूर्ण है और देशकाल-वस्तुके-परिच्छेदसे (७६) आत्मबोधः। रहित है-और-नित्य ( सत्य ) और सजातीय. विजातीय-स्वगत-तीनों भेदोंसे रहित है-उस ब्रह्मका मुमुक्षु पुरुष-निश्चय करै ॥५६॥ अतड्यावृत्तिरूपेण वेदांते ल- क्ष्यतेऽव्ययम् ॥ अखंडानंदमे- कं यत्तद्ब्रह्मत्यवधारयेत् ॥५७॥ भा०-आत्मासे भिन्नकी व्यावृत्ति (निषेध) रूपसे-जो ब्रह्म-अविनाशीरूपसे-तत्त्वमसि आ. दि महावाक्योंकेद्वारा-लेखाजाता है और जो अखण्डआनंद-एक-सुखरूप है-उसको मुमुक्षु पुरुष ब्रह्म जानै॥ २७॥ अखंडानंदरूपस्य तस्यानंदल वाश्रिताः॥ ब्रह्माद्यास्तारतम्येन भवंत्यानंदिनोऽखिलाः॥५८॥ भा०-कदाचित् कहो कि,ब्रह्मा इन्द्र आदि भी

भाषाटीकासमेतः। (७७)
देवता आनंदके-भोक्ताशास्त्रमें-कहे हैं तो ब्रह्म-
कोही सर्वोत्तम आनन्दरूप कैसे कहते हो-सो-
ठीक नहीं-क्योंकि,ब्रह्माआदिकोंको जोआनन्द
हे वह भी ब्रह्मानन्दका लेश है-उससे परे कोई
आनन्द नहीं इस बातका वर्णन करते हैं कि उस अ.
खण्डानन्दरूप ब्रह्मानन्दके लेशकेआश्रय होकर-
ब्रह्मा आदि संपूर्ण देवता-तारतम्यते अर्थात्
अपने अपने पुण्यके अनुसार न्यूनाधिक-भावसे
आनन्दवाले होते. अर्थात् उसअपरिच्छिन ब्रह्म-
का जोआनन्द उसका ही अंशब्रह्मा आदि देव-
ताओंके आनन्दमें झलकता है-और ब्रह्मानंदकी
अपेक्षा उनका आनन्दक्षुद्र प्रतीतहोताहे-अतएव
ब्रह्मानन्दसे परे कोई आनंद नहीं ॥१८॥
तयुक्तमखिलं वस्तु व्यवहारस्त-
दन्तिः ॥ तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म
क्षीरे सर्पिरिवाखिले ॥५९ ॥

2 (७८) आत्मबोधः। भा०-कदाचित् कहो कि, वह आनन्दरूप ब्रह्म-कहां रहताहै जिसका लेश ब्रह्मा आदिके आनन्दमें है-इस शंकाके उत्तरमें सर्वव्यापी ब्रह्मको दृष्टान्तके द्वारा देशकालसे रहित वर्णनकरते है-कि, तिस-सच्चिदानन्दरूपसे घट पट आदि संपूर्ण वस्तु युक्त हैं अर्थात घटपट आदि संपूर्ण पदार्थ प्रकाशित होते हैं और वचन ग्रहण गमन त्याग आनंद आदि संपूर्ण व्यवहार उस ब्रह्मसेही युक्त(सिद्ध ) हैं सोई गीतामें लिखा है कि, संपूर्ण इन्द्रियोंके गुणोंका प्रकाशक और संपूर्ण इन्द्रियोंसे रहित वह ब्रह्महै तिससे ब्रह्म संपूर्ण वस्तुओंमें इसप्रकार व्यापक है जैसे संपूर्ण दूधमें घृत व्यापक होकर रहताहै ॥१९॥ अनण्वस्थूलमह्रस्वमदीर्घमजम- १ सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम् ।

भाषाटीकासमेतः। (७९) व्ययम् ॥ अरूपगुणवर्णाख्यं तब्रह्मेत्यवधारयेत् ॥६०॥ भा०-इसप्रकार प्रपंचमें व्यापक भी परमा- स्माको असंग होनेसे प्रपंचके धर्मों में स्पर्शका अभाव वर्णन करते हैं--आत्मा अणुरूप नहीं अर्थात् सूक्ष्मरूप नहीं और श्रुतिमें जो आत्मा को अणुरूप कहाई-वह इसलिये है कि, आत्मा जाननेके अयोग्य है-अर्थात जाननेको कठिन है और आत्मा स्थूल (महान् ) नहीं -क्योंकि, जिन घट पटआदि पदार्थों में महान् बुद्धि हो तो वे अनित्य हैं और श्रुतिमें जो आत्माको महान्से महान कहाई वह सबके अधिष्ठान आत्माकी श्रेष्ठताके तात्पर्यसे है कुछ महान् पदका परिमाण अर्थ नहीं और आत्मा ह्रस्व और दीर्घ परिमाण से रहित और अज अव्यय अर्थात् जन्म और , (८०) आत्मबोधः। मरणसे रहितहे और रूप-गुण-ब्राह्मण आदि वाँसे रहित है वह ब्रह्म है ऐसा मुमुक्षु पुरुष निश्चय करे ॥६॥ यदासा भासतेऽर्कादिर्भास्यैर्यत्तु न भास्यते ॥ येन सर्वमिदं भाति तब्रह्मत्यवधारयेत् ॥६॥ भाषार्थ-जिस ब्रह्मकी-भासा (तेज) से सूर्य आदिका प्रकाशहोता है और प्रकाश करने योग्य सूर्य आदि जिस ब्रह्म को प्रकाश नहीं करसक्त- और जिससे यह संपूर्ण जगत्प्रकाशित होताहै वह ब्रह्महे ऐसा निश्चय मुमुक्षु पुरुष करै अर्थात् प्रकाश करनेवाले सूर्य आदिका भी प्रकाशक ब्रह्मको समझे ॥६॥ । स्वयमतर्बहिर्व्याप्य भासयन्न- ॥ भापाटीकासमेतः। (८१) खिलं जगत् ॥ ब्रह्म प्रकाशते वह्नि- प्रतप्तायसपिंडवत् ॥६२॥ भा०-इसप्रकार विदेह केवल्यमें स्थितिको कहकर-परम पुरुषार्थके (मोक्ष) तत्त्ववेत्ताके- निश्चयको कहते हैं-पूर्वोक्त ब्रह्म-ब्रह्मरूपसे जगत्के बाहर-भीतर व्यापक होकर-संपूर्ण जगवको प्रकाश करता हुआ स्वयंभी-इसप्रकार प्रकाशता है जैसे-अग्निसे तपायमान-लोहके पिण्डमें-सर्वत्र व्याप्त होकर अग्नि-प्रकाशित होता है । ६२॥ जगद्विलक्षणं ब्रह्म ब्रह्मणोऽन्यन्न किंचन ॥ ब्रह्मान्यदाति चन्मि- थ्या यथा मरुमरीचिका॥६३ ॥ मा०-ब्रह्म जगत्से विलक्षण है-अर्थात् जड- - (८२) आत्मबोधः। मिथ्या और दुःखरूप जगत्की अपेक्षा सचिव आनंदरूप ब्रह्म भिन्न है-और ब्रह्मसे अन्य कुछ भी नहीं है और जो ब्रह्मसे भिन्न-घट पट आदि पदार्थ प्रतीत होते हैं वे-इसप्रकार मिथ्या हैं जैसे-मरु- देशके रेतमें-मरीचिका ( अर्थात् जलके कण- अथवा तेजका पुज) प्रतीत होता है-वास्तवमें ब्रह्मही सत्य है उससे भिन्न सब मिथ्या है॥६३॥ दृश्यते श्रूयते यद्यब्रह्मणोऽन्यन्न तद्भवेत्॥ तत्त्वज्ञानाच तब्रह्म सच्चिदानंदमहयम् ॥ ६४ ॥ भा०-फिर भी पूर्वोक्तका ही प्रत्यक्ष-स्वरूपसे वर्णन करते हैं-कि, ब्रह्मसे भिन्न जो कुछ दीखता है वा-कानोंसे सुना जाताहै-और मनसे स्मरण किया जाताहै वह सब ब्रह्मसे भिन्न नहीं है-और तत्त्वज्ञानसे वह ब्रह्म सत् चित-आनन्द-अद्वैत- स्वरूप है।। ६४॥

भाषाटीकासमेतः। (८३) सर्वगं सच्चिदात्मानं ज्ञानचक्षुर्नि- रीक्षते॥ अज्ञानचक्षु क्षत भा- स्वंतं भानुमंधवत्॥६५॥ भा०-कदाचित् कहो कि, सच्चिदानंद ब्रह्म- सर्वव्यापकहै-तो सर्वत्रक्यों नहींदीखता-सो ठीक नहीं-सर्वव्यापी भीब्रह्मतत्त्वज्ञानियोंको दीखताहै अज्ञानियोंको नहीं कि, सर्वत्र व्यापक भी सत् चित्-आनन्द-रूप आत्माको-वही पुरुष देखताहै जिसके ज्ञानरूपीनेत्र विद्यमानहैं और जो अज्ञा- नचक्षु है अर्थात् जिसकी दृष्टि अज्ञानसे आवृतहै वह पुरुष अपने सच्चिदानंदरूप आत्माको इस- प्रकार नहीं देखता (जानता) है जैसे प्रकाश- मान सूर्यको नेत्रहीन ( अंधा) पुरुष नहीं देखता है ।। ६५॥ श्रवणादिभिरुद्दीप्तो ज्ञानाग्निपरि-

(८) आत्मबोधः।
तापितः॥ जीवः सर्वमलान्मुक्तः
स्वर्णवद्दयोतते स्वयम्॥६६॥
भा० कदाचित कहोकि ज्ञानचक्षुपुरुषोंकाविवे-
कसे देह इंद्रियोंमें अध्यासरूपमलके दूर होनेपरभी
पूर्व जन्मकेअध्याससे संसारकी वासनाके वशीभूत
होकर फिर भी अहं मनुष्यः (मैं मनुष्य हूं )ऐसा
देहरूप बंधन प्रतीत होताहै तो आत्मस्वरूप में
स्थिति मुक्ति कैसी होसकतीहै इस शंकाका उत्तर
देते हैं कि-श्रवण,मनन,निदिध्यासन आदिसे
भली प्रकार प्रज्वलित जो ज्ञानरूप अग्नि तिससे
परितापित (युक्त )जो जीव है वह संपूर्ण मलोंको
त्यागकर अर्थात् अज्ञानसे निवृत्त होकर सुवर्णके
समान स्वयंही प्रकाशरूप होता है भावार्थ
यह है कि, सच्चिदानंदरूप होकर प्रकाश होनेपर
में मनुष्य हूं यह अभ्यास फिर नहीं होता है॥६६॥

भाषाटीकासमेतः। (८५) हृदाकाशोदितो यात्मा बोधभा- नुस्तमोऽपहृत्॥ सर्वव्यापी सर्व- धारी भाति सर्व प्रकाशते॥६७ ॥ भा०-कदाचित् कहो कि इस प्रकार शुद्धहुई आत्माका क्या रूप होताहै और कहां प्रकट होता है और किसको प्रकाशता है इस शंकाका उत्तर देते हैं कि,इसप्रकार जीव ब्रह्मकी एकताके ज्ञान- से शुद्ध हुआ निर्मल बोधरूप सूर्य ( आत्मा ) हृदयाकाशमें उदय होकर अंधकाररूप अन्त:- करणके मलको हरता (नाशता)है और सबका प्रकाश करता है आप स्वयंप्रकाशरूप है कदा- चित्कहोकि हृदयाकाशकोपरिच्छिन्न(नाशवान्) होनेसे आत्मा भी तिसकेसंग परिच्छिन्नहोजायगा इस शंकाका उत्तर देते हैं कि, आत्मा सर्वव्यापी है अर्थात् जगत्में पूर्ण है और सबका आधार है (८६) आत्मबोधः। अर्थात अज्ञानके कार्य जगत्का अधिष्ठान है तात्पर्य यह है कि भ्रमरूप हृदयाकाश व्यापकरूप आत्माका नाशक नहीं होमकता ॥ ६७॥ दिग्देशकालाद्यनपेक्ष्यसर्वगं शी- तादिहन्नित्यसुखं निरंजनम् ॥ यः स्वात्मतीथं भजते विनिष्क्रियास सर्ववित्सर्वगतोऽमृतोभवेत् ॥६८॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्य-श्रीमच्छं- कराचार्यकृत आत्मबोधः समाप्तः॥ मा०-अब आत्मतत्त्वज्ञानको तीर्थरूप वर्णन करतेहैं और कर्म और सब तीर्थ और सब देवता. ओंकी सेवाका जो फल है उसकी अपेक्षा उत्तम फल आत्मज्ञानरूप तीर्थका है क्योंकि,आत्मा. की सेवासे संपूर्ण सेवाओंकी आकांक्षा शांत हो- जाती है-कदाचिक्कहो कि तत्त्वज्ञानीभीस्वाभा, भाषाटीकासमेतः। (८७) विक पापोंके दूर करनेकेलिये प्रयागआदि तीर्थोंका सेवन करते हैं तो आत्मज्ञानको स्वर्णके समान प्रकाशमान और संपूर्ण मलसे रहित कैसे कहते हो इस शंकाके उत्तरमें आत्म- रूप तीर्थमें स्नानके कर्ताको कुछ भी कर्तव्य नहीं इसका वर्णन करते हैं कि, दिशा (पूर्व आदि) और देश (कुरु आदि) काल ( भूत आदि) इन सबकी अपेक्षा से रहित और सर्वत्र व्यापकरूप- और शीत आदिके नाशक अर्थात् शीत उष्ण आदि द्वंद्वके नाशक और सर्वदा सुखरूप और निरंजन अर्थात् मायाके कार्य जगतरूप मलसे रहित जो आत्मारूप तीर्थ उसको जो मनुष्य क्रिया (कर्म) ओंसे रहित होकर भजता हैं अर्थात् सब कर्मोंको त्यागकर जो आत्मतीर्थके विचारमें तत्पर रहता है सर्वमें व्यापक हुआ और (८८) आत्मबोधः। सबका ज्ञाता वह अमृतरूप होजाता है अर्थात् जो आत्मतत्वका श्रवणमनन निदिध्यासन आ- दिके द्वारा विचार करते हैं वे सबके ज्ञाता हैं और जो जन्ममरणरूप संसारके अभावका फल उन- को मिलताहे वह किसी तीथार्टन आदि कर्म कर- नेवालेको नहीं मिलताहै अतएव मुमुक्षु पुरु- षोंको आत्मतीर्थकी सेवा करना अत्यंत आव- श्यकहै ॥ ६८ ॥ इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमच्छं. कराचार्यकृतात्मबोधस्य पंडितमिहिरचंद्र..' कृतभाषाविवृतिःसमाप्ता ॥

क्रय्यपुस्तकें (वेदान्त-ग्रन्थाः) नाम कि. रु. आ. अपरोक्षानुभूति-श्रीशङ्कराचार्यकृत और स्वामि श्रीविद्यारण्य मुनिकृतदीपिका सहित तथा श्रीयुत पं० रामस्वरूपजी कृत भाषाटीकाममेत । जिसमें संक्षपसे वेदान्तप्रक्रियाका सरलरीतिसे भली प्रकार वर्णन है अष्टावक्रगीता-भाषाटीकासहित-श्रीअ- शवक्रमुनि प्रणीत गुरुशिष्य संवादमें ब्रह्मविद्या जाननेका अतिसरल सुगमो- ०-१२ पाय है अवतगीतामूल-श्रीमत्परमयोगिवर श्रीदत्तात्रेयप्रणीत रेशमी गुटका to (९०) जाहिरात । अवधूतगीता-भाषाटीकासमेत. १- ८ अद्वैतसुधा. ०-१२ अध्यात्मप्रदीपिका-श्रीअष्टावक्र मुनि- विरचित अत्युत्तम ज्ञानमय वेदान्तो- पदेश. आत्मबोध-भाषाटीकासमेत । वेदान्तमें. प्रवेश करनेवालेको शीघ्रबोधहोताहै गणेशगीता-पं० ज्वालाप्रसादजी मिश्र- कृत भाषाटीकासहित. (गणेशपुरा- णोक्त) गोविन्दाष्टक-आनन्दगिरिकृत संस्कृत टीका तथा पं० कन्हैयालाल शर्मकृत भाषाटीकासमेत. जीवन्मुक्तिगीता-भाषाटीकासमेत । इस छोटेसे ग्रन्थमें ज्ञानोपदेश उत्तम वर्णित है. १

ग्रन्थ है.
जाहिरात। (९१)
तत्त्वबोध-भाषाटीकासमेत । यह वेदा-
न्तका प्रथम श्रेणीका सर्वोत्तम
३
देवीगीता-( देवीभागवतान्तर्गत )
भाषाटीकासहित । शाक्त लोगों याने
देवी भक्तोंके लिये नित्य पाठ करने.
योग्य है.
नारदगीता-मूलमात्र
१
नारदगीता-भाषाटीकासहित.
निर्वाणाष्टक.
०-१
पञ्चदशी-सटीक-पं रामकृष्णाख्य विद्वान्
तत्त्वकी विवेकव्याख्या टीका सहित. २-८
पञ्चदशी-पं० मिहिरचन्द्रकृत अत्युत्तम
भाषाटीकासहित । जिसमें-तत्त्वविवेक,
भूतविवेक, महावाक्यविवेक,
A
१

(९२) जाहिरात । कूटस्थदीप, नाटकदीप, योगानन्द, आत्मानन्द, अद्वैतानन्द विद्यानन्द, विषयानन्दादिमें वेदान्तमार्ग भलीभाँति दर्शायाहै पञ्चदशी केवल भाषामात्र आत्मस्व- रूपजीकृत । उपरोक्त सर्वालंकारोंसे विभूषित है पञ्चदशगीता-भाषाटीकासमेत । जिसमें श्रीमहाभारतान्तर्गत-काश्यपगीता, शौनकगीता, अष्टावक्रगीता,अध्याय ४, नहुषगीता अध्याय २, सरस्वती गीता, युधिष्ठिरगीता अध्याय ४, बकगीता, धर्मव्याधगीता तथा श्रीकृ- ष्णगीतादिकका एकत्र संग्रह है. .-१२

जाहिरात।
प्रश्रोत्तमुक्तावली-मापाटीकासहित ।
इसमें अतिश्रेष्ठ १२२प्रश्न और उनके
यथार्थ उत्तर हैं (गुरुशिष्य संवाद)
०-३
प्रश्नोत्तरी-( प्रश्नोत्तरमणिरत्नमाला )
श्रीमच्छंकराचार्य कृत मूल तथा पं०
नन्दलालशास्त्रोकृत भाषाटीकासमेत.
(गुरुशिष्यसंवाद)
२
प्रश्रोत्तररत्नमाला-सटीक
पुरचनोपाख्यान-भाषाटीकासहित ।
बहुत ज्ञानमय अपूर्व वेदान्त है.
अमसूत्र-(शारीरक ) शांकरभाष्यसहित,
इसमें शांकर भाष्यकी गोविन्दराज
कृत रत्नप्रभा, सर्वतंत्रस्वतंत्र वाच
स्पतिमिश्रकृत भामती, आनंदगिरि

(९४) जाहिरात । कृत न्याय निर्णय यह तीनों टीकाएँ संयुक्त हैं. १२-० ब्रह्मसूत्र-शारीरक) “वेदान्तदर्शन" प्रभुदयालकृत वेदान्ततत्त्वप्रकाश भाषाभाष्य समेत । मुमुक्षुओंको अति सुगमतासे मुबोध ज्ञानोपयोगी. बहुत सरल भाषामें है ब्रह्मसूत्र-माध्यभाष्य श्रीमदानन्दतीर्थ विरचित । जयतीर्थ मुनि विरचित तत्त्वप्रकाशिकाटीका-सहित. ५- ० ब्रह्मसूत्र-( वेदान्तदर्शन ) भाष्यानुसार सरल भाषाटीकामें है. भगवद्गीता-चिदनानन्दी “गूढार्थदीपिका" भाषाटीका । श्रीमत्परमहंस परिवाज- MAR जाहिरात। काचार्य पूज्यपाद श्रीस्वामी १. चिदनागन्द-गिरिजी महोदयने सर्व । मांसारिक लोगोंके उपकारार्थ "श्रीम- च्छांकरभाष्य"के अनुसार पदच्छेद-अ- न्वयांक-तथा-पदार्थसहित निर्माण किया है । यह मुमुक्षुगणों को अति सर- ल सुबोधयुक्त है. तथा विलायती कपडे- की मनोहर जिल्द बँधी है. भगवद्गीता-आनन्दगिरिकृतभाषाटीका- सहित । जिसमें-अन्वयकरके भावार्थ स्पष्ट कियागयाहै.ग्लेज कागज तथा रफ भगवद्गीता सान्वय ब्रजभाषा दोहासहित। अत्युत्तम ग्लेजकागज १-८

(९६) जाहिरात।
" तथा रफ कागज
भगवद्गीता-वैष्णव हरिदासजीकृत
भाषार्थ तथा दोहा चौपाइयोंमें (परमा-
नन्द प्रकाशिका.)
१-०
पुस्तक मिलनेका ठिकाना-
खेमराज श्रीकृष्णदास,
"श्रीवेंकटेपर"स्टीम् प्रेस-बबई

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आत्मबोध

Author
Shankaraachaarya
Title
Aatmabodh
File name
आत्मबोध
Text
OCR done
Published
2005/07/25
Publisher
Kshhemaraaja, Shriivenkateshvara Yantraalaya, Mumba-ii
Language
Sanskrit
Pages
95
Library
University Library,gurukul Kangri Vishwavidyalaya
Classification
RELIGION THEOLOGY
DLI number
477187
Barcode
99999990173026.00
Scanning centre
C-DAC, Noida
Digital publisher
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