Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
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समर्पण
पूज्य पितामह
నారాయణాయణణణణణణణణణణణాయణం
श्री गोवर्धन जी शास्त्री
तथा
गुरुवर
Danes aparecerebes reservata
प्रो० चन्द्रशेखर जी पाण्डेय
( मू० पू० अध्यक्ष, सस्कृत विभाग, सनातनधर्म कालेज, कानपुर )
की
दिवंगत आत्माओं
को
सादर समर्पित
sapasrandirtavasrase
. . भूक्रयाभिनन्दनुस् काशीनाथमपदविहिताव्याजभक्तिपपूर्णो, गौरीमातस्तनझरगलत्पुण्यपीयूपपुष्टः । विद्याधाम पविततशुभाऽऽनन्दिनीसिद्धियुक्तो, देवः श्रेयो दिशतु सुचिरं कोऽपि गोवर्धनो मे ॥१॥ नमद्युन्दीनाथममुखबहुसामन्तनिकरै- रलं मौलिस्यूतोन्मुखमणिमयूखैस्तरलितः। प्रभा का मातन्वन नखंविधुरराजद पदयुगे, तदीयः पौत्रोऽयं नमति पितरं ब्रह्मधिपणम् ॥ २॥ कृतो विद्यारम्भः शुकमुखगलकृष्णचरिता- मृतास्वादेनेवाऽपवयसि यदक्के स्थितयता । गिरा गीर्वाणानामलभिकृपया यस्य विमला, तमेपोऽहं वन्देऽपरमिव गुरुं तातपितरम् ॥३॥ श्रीचन्द्रशेखरकृपातविमेव लब्ध्या, नाट्यं चकार सरसं भरतोऽपि हृद्यम् । अस्त्यद्भुतं किमिह तत्कृपयैव सैपा, व्याख्या कृतास्ति मयेकी दशरूपकेऽस्मिन् ॥ ४॥ सरस्वतीपूतसरःसु मजतोरदर्निशं ज्ञानतति वितन्वतोः । दिवि प्रकामं च सुरत्वमश्नतोस्तयोः पदोन्ने निहिता नया कृतिः।।५।। १. गोवर्धन इति व्याख्यानु पितामहा महोपाध्याया गोवर्धनशात्रिणः । एतेषां पितर' व्याकरणवाचस्पतयः श्रीकाशीनाथशास्त्रिणः, माता च गौरी नाम्नी । अत्र शब्द- शक्तिमूलकेन ध्वनिना (व्यसनया) पितामहानो देवदेवस्य गणपतेव उपमानोपमेय- भावो मज्यते । अपरच, 'प्रवितत' इत्यादिपदे 'मानन्दिनी' ति मपितामही, गोवर्धन- शाक्षिणा दारा: अस्मिन् पचे एव सिद्धिस्तया युक्त' इति योज्यम् । गण- पतिपते तु भासमन्तात् नन्दिनी एतादृशी (चासौ) सिद्धिर्गणपतिवधूः तया सह इति यथाप्रमंग योजनीयम् । गणेशपक्षे 'गोवर्धन' इति पदं 'गो पर्पयतीति' व्युत्पत्या सुष्टु परिणमति । 'कोपीति' पदद्वयेन भगवतो गणपतेः पितामहधरणानाच महामहित्वं योत्यत इति दिए । २. नखविधुरिस्यत्र जातावेकवचनम् । ३. अनेन मम प्रयभे गीर्वाण- वाणीगुरव पितामहपादा एव आसमिति सूच्यते । तरेव भागवत-कौमुदी-रघुवंशाइयो भन्या पाठिताः । ४. श्रीचन्द्रशेखरशाक्षिणः पाण्डेया अनुवादकस्यालद्वारशाख्ने नाट्यशास्त्रे व गुरष भासन् । ५. 'मया इत्पर्यः । ६. तयो, पितामहानां, चन्द्रशेखरशास्त्रिणां चेति भात शिवगणेशयोरिस्यपि प्रसोन म्यग्यत एव । ७. 'पदाजे' इति जातावेकवचनम् ।
विषय-सूची भूमिका १-४९ संस्कृत नाटक की उत्पत्ति व विकास-नाटक का मूल अनुकरणवृत्ति-भारतीय मत- वैदिक संवादों में नाटकीय तत्त्व-पाश्चात्य विद्वानों के मत-माणिनि, पतञ्जलि तथा काम- सूत्र से नारकों की स्थिति का संकेत-नाट्यशास्त्र का संक्षिप्त इतिहास-मरत-मरत के घ्याल्याकार-धनक्षय तथा धनिक का वेतिहासिक परिचय-नाट्यशास्त्र के परवर्ती अत्या अन्य का संक्षेप-रूपक उनके भेद व भेदक तत्त्व-कथावस्तु या इतिवृत्त-गर्थप्रति, अवस्था, सन्धि तथा सन्ध्या-संस्कृत नाटकों में दुखान्त नाटकों के अभाव का कारण- विष्कम्भक तया प्रवेशक-पताका तया पताकारयानक-संवाद के प्रकाश, स्वगतादि भेद- नेता के धीरललितादि तथा दक्षिणादि भेद-नायक का परिच्छद-नायिका भेद का आधार-स की पुष्टि-स के सम्बन्ध में मत-लोल्लट, शंकुक, भहनायक तथा अभिनव के मत-धनञ्जय का मत-सविरोध तथा उसका परिहार। धनक्षय व धनिक की मान्यताएं-व्यञ्जना का खण्डन-रस वाक्यार्थ है-रस तथा विभावादि में माव्यभावक सम्बन्ध है-धनअय के मत में लोलट, शंकुक तया भट्टनायक के मतो का मिश्रण-शान्त रस के सम्बन्ध में धनञ्जय के विचार। प्राचीन भारतीय रङ्गमय । प्रथम प्रकाश १-७२ मंगलाचरण तथा अन्य के उद्देशादि का विवेचन-रूपक परिमाषा व मैद-नृत्य तथा मृत्त के भेद-इतिवृत्त के दो भेद-पताका तया पताकारयानक-५ अर्थप्रकृतियों-५, अव- स्था-५ सन्धियाँ-मुखसन्धि लक्षण तथा १२ अझ-प्रतिमुखसन्धि लठण तथा १३ अङ्गा- गर्भसन्धि लक्षण ठया १२ अङ्ग-अवमर्शसन्धि लक्षण तथा १३ अग-निर्वहण सन्धि लक्षण तया १४ अङ्ग-वस्तु का दृश्य तया सूच्य भेद-मूक्ष्म वस्तु के सूचक ५ अर्योपो. पक-विष्कम्भक के दो भेद-प्रवेशका, चूलिका, अकास्य तथा अशावतार-वस्तु के सर्वश्राव्य, अश्राव्य तया नियतश्राव्य ये तीन भेद-आकाशभाषित-उपसंहार । द्वितीय प्रकाश ७३-१४२ नायक का लक्षण-उसके ४ मैद-धीरललित, धीरशान्त, धीरोदात्त, धीरोद्धत-शृङ्गारी नायक के ४ भेद-दक्षिय, शठ, पृष्ट तथा अनुकूल-उसके सहायक, विट, विदूषक, प्रति- [ २ ] नायक, नायक के सात्त्विक गुण-नाधिका के भेद, स्वीया, परकीया तथा सामान्या-मुग्धा, मध्या, प्रगतमा तथा ज्येष्ठा करिष्ठा आदि १३ भेद-अवस्था के आधार पर नायिका के स्वाधीनपतिकादि भेद । नायिका की सहायिकाएँ-नायिका के २० अलद्वार-नायक के धर्मादि कार्य में सहायक-नायक के व्यवहार ( दृत्ति ) कैशिकी, कैशिकी के ४ अङ्ग- सास्वती, उसके आ-आरमटी, उसके अर-नाटक में पात्रों के उपयुक्त सरस्त, शौरसेनी प्रावृत्त वया मागधीप्रास्त के प्रयोग का नियम-पात्रों के आमन्त्रण (सम्बोधन) का प्रकार। तृतीय प्रकाश १४३ १७५ नाटक--पूर्वरङ्ग-मारती वृत्ति-भारती के प्ररोचनादि भेद-प्रस्तावना ( आमुख ) के तीन प्रकार-वीय-नाटक का इतिवृत्त-नायकानुचित्त इतिवृत्तांश का परित्याग-- विधान-नाटक में वीर तया शृङ्गार रस-अदों में पात्रों की संख्या व प्रवेश तथा निर्गम- प्रकरण-नाटिका-भाण-प्रहमन-डिम-न्यायोग-समवकार-वीयी-अक-ईहामृग। चतुर्थ प्रकाश १७६-२८२ रस-विभाव-आलम्बन तया उद्दीपन-अनुभाव-भाव का लक्षण-सात्विक भाव- व्यभिचारी माव-३३ व्यमिचारियों का सौदाहरण लक्षण-स्थायीभाव तथा भाव-विरोध पर विचार-शान्तरस तथा उसके स्थानी शान्त का निषेध-भावादि का काव्य से सम्बन्ध- ग्यशबावादी के पूर्वपक्षी मत का उद्धरण-सिद्धान्तपक्ष की स्थापना-काव्य का वाक्यार्य स्थायीभाव ही है-रस सामाजिक में रहता है-रसास्वाद के प्रकार-आस्वाद का लक्षण तथा भेद-आठ रसो की सज्ञा-शान्तरस के विषय में पुनः विचार-झार रस-संयोग तया अयोग गुहार-अयोग गृङ्गार के ३ भेद-प्रवास, प्रणयमान तया ईमान-मान के हटाने के उपाय-कण तया अयोग कार का भेद-वीररस-बीभत्सरस-रौद्ररस-हास्यरस- हास्य के ६ भेद-अमुत रस-भयानक रस-करुणरस-प्रीति, भक्ति आदि कामही में अन्तर्भाव-भूषणादि का भी इन्हीं में अन्तर्भाव-उपसहार।
दो शब्द धनअय के 'दशरूपया' की यह हिंदी व्याख्या आज से कई वर्ष पूर्व ही प्रकाशित हो जानी चाहिये थी, पर समय के अनुकूल न होने से ऐसा न हो पाया। प्रकाशक महोदय ने आज से चार वर्ष पूर्व मुमसे इसकी हिंदी व्याख्या करने को कहा था। उन्हीं दिनों मैंने दरारूपा का कार्य आरम्म भी कर दिया था, किन्तु बन्दन विश्वविद्यालय के सूल भात् थोरियन्टल स्टडीज के निमन्त्रण पर मुझे भाषाविज्ञान विषयक गवेषणा के लिए वहाँ जाना पड़ा। इसलिए अनुवाद कार्य खटाई में पड़ गया। लन्दन से लौटने के बाद में पी. एच. डी. उपाधि के योसिस में व्यस्त रहा। जब मैंने • अपना आजीधिका-क्षेत्र ही बनारस चुना, तो प्रकाशक महोदय ने पुरानी बात याद दिलाई, और मुझे दशरूपक के अधूरे पड़े अनुवाद को पूरा कर देने को प्रोत्साहित किया। नाव्यशास्त्र के इतिहास में धनञ्जग का दारूपक एक महत्त्वपूर्ण अन्य है। भरत के नाट्यशास्त्र के रूपकविषयक सिद्धान्तों का संक्षिप्त किन्तु सर्वामीण विवेचन इसकी विशेषता है । यह अन्य माद के नाध्यशास्त्र तथा रसशाख के अन्य-प्रतापरद्रीय, एकावली, सादित्यदर्पण, नाट्यदर्पण, रसमभरी का उपजीन्य रहा है। से अन्य का हिन्दी अनुवाद आवश्यक था। अंगरेजी भाषा में हॉस ने इसका अनुवाद प्रकाशित कराया था, किन्तु वह फेवल कारिकाओं का ही अनुवाद है। मेरी ऐसी धारणा है, कि धनक्षय की कारिकाएँ स्वतः अपूर्ण हैं। धनिक के अवलोक के बिना वे अधूरी ही हैं, तथा । नाध्यशास्त्र का आवश्यक ज्ञान अवलोकयुक्त दशरूपक के अध्ययन पर ही हो सकता है। अतः यहाँ पर मैंने सावलोक दशरूपक की व्याख्या की है। फारिका, वृत्ति तया उदाहरणों की व्याख्या करने में मूल का सदा ध्यान रखा गया है। किन्तु मित-मिन स्थलों पर भावश्यकतानुसार मिलता मिल सकती है। फारिकाभाग तया वृत्तिभाग में एक ही बात के कहे जाने पर, तथा वृत्तिमाग में विशेषता म होने पर कहीं कहीं दोनों को एक साथ ही व्याख्या कर दी गई है। इसका कारण है, पुनरुक्ति दोष से बचना । वृत्तिमाग के शास्त्रार्थ स्थलों को स्पष्टरूप से सममाने की चेष्टा की गई है। इन स्थलों में मूल भाग की अवहेलना न करते हुए भाव को स्पष्ट किया गया है। ऐसे स्थलों पर पुनशक्ति को दोष न समझ कर कमी कमी एक ही बात को दो तीन ढङ्गमे गममाया गया है, जिसमे हिन्दी के पाठक संस्कृत साहित्य की शाखा प्रणाली को हृदयाहम कर सकें। उदाहरणों को व्याख्या में दो शैलियाँ मिलेंगी। कुछ स्थलों पर पद्यों का शाब्दिक अनुवाद ही किया गया है, तो अन्य स्थलों पर पद्यों के भाव को स्वतन्त्र रूप से स्पष्ट करते हुए पद्य की व्याख्या की गई है। यह शैलीभद्र विषय को ध्यान में रखकर किया गया है। व्याख्या में परिडताठपन को बचाने की कोशिश की गई है, तथा भाषा में इस दोष को न आने दिया है। किन्तु कुछ स्थलों पर, संस्कृत की शादिक परम्परा का अनुवाद ( विशेषरूप से) अक्षरश: स्पष्ट करने के कारण, परिडताउपन आ गया हो, तो क्षम्य है। माषा को प्रवाहमय रखने के कारण कहीं कहीं अरबी-फारसी के प्रचलित शब्दों का प्रयोग हो गया है, किन्तु यह उदाहरणों के अनुवाद में उनके भावों को अभिन्यजना को विशेष स्पष्ट करने में सहायक सिद्ध हुआ है और ऐसे ही स्थलों पर इनका प्रयोग किया गया है। इस अनुवाद को पण्डिन-मण्डली के सम्मुस रखते हुए में यह दावा नहीं करता कि यह अनुवाद दोषरहित है। अपनी वस्तु किसे बुरी लगती है। मुझे इसके कई दोष नजर न आये हो। मैं साहित्यशास्त्र के नदीष्णु विद्वानों से प्रार्थना करूँगा कि उन दोषों को निर्दिष्ट करने की कृपा करें, जिससे भावी संस्करण में मैं उन्हें हटा सकें। इस अनुवाद को मैं अपने संस्कृत-साहित्य के प्रथम गुरु, अपने पितामह महोपाध्याय पं० गोवर्धन जी शात्री की दिवंगत आत्मा को, तथा अपने भारतीय साहित्यशास्त्र एवं नाट्यशास्त्र के आचार्य प्रो० चन्द्रशेखर जी पाण्डेय एम. प., शास्त्री, भूतपूर्व अध्यक्ष, संस्कृतविभाग, सनातन धर्म कालेज, कानपुर की स्वर्गत आत्मा को, श्रद्धाञ्जलि के रूप में भेंट कर रहा हूँ। काशी दीपावली } भोलाशंकर व्यास भूमिका संस्कृत नाटक-उत्पत्ति व विकास मानव में स्वभाव से ही अनुकरण वृत्ति पाई जाती है। छोटे बचों की अविकसित चेतना में भी इसका वीज रूप देखा जाता है। मानव ही नहीं कई पशुओं में भी, विशेषतः धन्दरों में हम इस अनुकरणवृत्ति को मजे से देख सकते हैं। लन्दन के म्यूजियग के चिम्पेजोज हमारी तरह फुर्सी टेपिल पर बैठ कर प्याले-तश्तरी से चाय पीते है, और कभी कभी तो कोई चिम्पेजीज सुलगी हुई सिगरेट को देने पर अभ्यस्त व्यकि की तरह धूम्रपान भी करता हुवा देखा जा सकता है। वैसे में हार्विन के विकारावाद का उस हद तक कायल नहीं, जितना कि लोग उसके सिद्धान्त के रवड़ को खींच कर धदाते नजर आते हैं, पर इस विषय में मेरी धारणा आधुनिक जीवशास्त्रियों तथा मनःशास्त्रियों से मिलती है. कि चेतना को अविकसित स्थिति में भी हम अनुकरण- वृत्ति के पिठ पा सकते हैं। मैं इस भूमिका को लिखने में व्यस्त हूँ, पीले मेरी छोटी बची जिसकी अवस्था देढ वर्ष से भी कम ही है, मेरे चप्पलों को दोनों पैरों में पहनने की चेष्टा कर रही है। यही नहीं, मुझे रेडियो के वोल्यूग-कन्ट्रोलर को पुमाते देसकर, वह भी वोल्यूम-कन्ट्रोलर घुमाना चाहती है, यदि कभी कभी उसकी इस चेष्टा में याचा उपस्थित की जाती है, तो यह सदन के द्वारा उसकी प्रतिक्यिा करती है। चर्चा ही नहीं. यदों में भी दूसरे लोगों की चाल-ढाल, रहन-राहन, योलने का आदि का व्यायात्मक अनुकरण देखा माता है । यह क्यों! अनुकरण पत्ति का एकमात्र लक्ष्य आनन्द प्राप्त करना, मन का रसन करना ही माना जा सकता है । अज्ञात रूप से मेरी छोटी बच्ची भी हमारी घिया-प्रक्रियाओं का, व्यवहार का, अनुकरण कर, अपनी मनस्तुधि ही सम्पादित क्यिा करती है। हमारे नयुक, विहाँ घर-यूटों की हरक्तों धानक्ल कर अपने दिल को बहलाया करते है। दिल पहलाना ही इसका एकमात्र कारण है। दिल बहलाने वाली परतु में हमें एवाप्रचित करने की क्षमता होती है, और युध क्षण तक वह हमें फेरल मनोराज्य में ही विचरण कराती है। उस विषय के अतिरिक दूसरे विषयों से जैसे हम कुछ क्षणों के लिए थलग से हो जाते हैं। यहाँ में साधारण 'मनोरमन' पीपात यह रहा हूँ, पाय के रसास्वाद को हम शत प्रतिशत रूप में इस कोटि का नहीं मान सकते, क्योंकि उगर्ने 'दिल पहलाने के अलावा कुछ और भी है, और यह ए और उसमें कम महत्वपूर्ण नहीं।
[ २ ] पाव्य या कला में भी अनुकरणनि को मूल कारण मानना अनुचित न होगा। सम्भवत इसीलिए पाश्चात्य दार्शनिक अरस्तू ने तो 'क्ला को अनुकरण" ही माना। जहाँ तक नाटक का प्रश्न है, उसमें तो अनुकरण स्पष्टत दिखाई पड़ता है । धनंजय की नाव्य तया रूपक की परिभाषाएँ इस यात को अच्छी तरह स्पष्ट कर देती हैं - 'श्रवस्थानुकृतिनाट्यम्', 'रूपकं तत्समारोपात्' । काव्य और ललित कला; विशेषतः नाटक, मानव तथा मानवेतर प्रकृति का अनुकरण कर उसके द्वारा आनन्द की उत्पत्ति या रसोद्बोध करते हैं। वे केवल पाह्य प्रकृति का ही अनुकरण नहीं करते, किन्तु मानव की यन्त प्रकृति को, उसके मानसिक भावों को भी अनुकृत करते हैं । एक कुशल मूर्तिकार या चित्रकार न केवल किसी सुन्दरी के अवयवों का सुन्दर चित्रण कर सजीवता की अनुकृति करता है, किन्तु उसके मुखमण्डल, नेन आदि का टइन या अदन इस प्रकार का करता है, कि वे उसके मनोगत भावों की व्यञ्जना कराने में समर्थ होते हैं। इसी तरह कुशल पवि अपने पात्र के मनोगत रागादि को भी ठीक उसी तरह वर्णित करता है, जैसे उसके बाहरी रूप को। नाटक की सफलता भी तभी मानी जाती है, जब कि नाटककार ने पाओं की श्राभ्यन्तर प्रकृति को सुन्दर तथा मार्मिक रूप से अभिव्यक किया हो । भारतीय अलवारशास्त्र में रस-सिद्धान्त की महत्ता इसी ओर सङ्केत करती है, और एश्य काव्य के क्षेत्र में रस की यात्मरूप में प्रतिष्ठा भरत मुनि के भी बहुत पहले ही-नन्दिकेश्वर या और किन्ही आचार्यों के द्वारा हो चुकी थी। इस प्रकार नाटक का एकमान लक्ष्य मानव तथा मानवेतर प्रकृति का चित्रण हो है। अाजकल की समाजशास्त्रीय प्रगति ने काव्य के उद्भव के विषय में कई नई बातें सोश निकाली हैं। उनका कहना है, कि श्रादिम सभ्यता घाले लोगों में प्रकृति के रहस्यात्मक तत्त्वों की ओर निक्षामा का भाव रहता है। वे इसे समझने की चेष्टा करते हैं। यह शिशासा-वृत्ति आदिम सभ्यता वाले छोगों में जादू की धारण को उत्पन्न करती है। जादू को समाजशास्त्री काव्य या सहीत के ही नहीं, भाषा के विकारा में भी एक महत्वपूर्ण तत्व मानते हैं। जादू के द्वारा प्रकृति को अपने वश में करने की प्रक्रिया में नृत्य, गीत तया उत्सव की दूसरी वर्मकाण्डपद्धति का प्रयोग कई यादिम सभ्यता पाली जातियों में पाया जाता है । समाजशास्त्री इन्हीं उत्सवों में नाटक के भी पौर इंटने की घटा करेंगे । अस्तु, भारतीय परम्परा के अनुसार जैसा कि नाट्यशास्त्र में बताया गया है, नाटक की उत्पत्ति प्रेतायुग में मया के द्वारा की गई थी। सतयुग में लोगों को पिन्हीं मनोरञ्जन के साधनों की आवश्यकता न दी। प्रेतायुग में देवता रोग प्रद्या के पास गये, और उनमे प्रार्थना की कि वे किसी ऐसे वेद की रचना करें, जो शूदों के द्वारा भी अनुशीलिन हो सके, क्योंकि शदों के लिए नियम् का कोई साधन न था, वेदाध्ययन 1. Art is imitation -Aristotle. . ।
उनके लिए निषिद्ध था। इस पर ब्रह्मा ने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद के आधार पर ही पधम वेद-नाय्यवेद-की रचना की। इस पश्चम घेद में चार अश पाये नाते हैं -पान्य, गीत, अभिनय तथा रस । इन चारों तत्वों को ब्रह्मा मे क्रमश प्रहक्, साम, यजुः तथा अथर्ववेद से गृहीत किया। इसके बाद प्रशा नै विश्कर्मा को एक नाट्यगृह बनाने का आदेश दिया, तथा भरत गुनि को इस कला को सम्पादित करने वया उसकी शिक्षा देने को कहा। प्रमा ने भरत मुनि को सौ शिष्य तथा सौ अप्सराएँ भी इसलिए सौंपी, कि मुनि उन्हें नाट्यकला की व्यावहारिक शिक्षा दें। इस काम में शिव तथा पार्वती ने भी हाथ बँटाया। शिव मे नाव्य में ताण्डव नृत्य का, सथा पार्वती ने लत्य नृत्य का समावेश किया। नाट्यवेद के विकास के विषय में यह कल्पना कम से कम एक बात की पुष्टि अवश्य करती है, कि भरत के नाट्यशास्त्र की रचना के पूर्व भारतीय नाटक तया भारतीय रममन्ध पूर्णत' विकसित हो चुके थे । पर, भरत का नाट्यशास्त्र कर लिखा गया । इस प्रश्न का उत्तर हमें खोजना पडेगा । भरत के नाट्यशास्त्र की रचनातिथि, सया महत्ता पर हम आगे प्रकाश डालेंगे । यहाँ तो हमें केवल यह बताना था कि भारतीय परम्परा नाटकों की देवी उत्पत्ति मानती है । नाटकों के कई तत्वों में से दो तत्य विशेष प्रमुख हैं, संवाद या अभिनय । संवाद पाले तत्व को हम, भारत के प्राचीनतम साहित्य-ग्वेद, मैं हूँ सकते हैं। इस तरह नाटक के बीज वेदों में मले से मिल सकते हैं। ऋग्वेद में लगभग १५ सूक ऐसे हैं, जिनमें सवाद का तत्व पाया जाता है । इन्द्र-मरुत्-संवाद ( ११६५; १।१७० ), विश्वामिन-नदी-संवाद ( ॥३३ ), पुरुरवसु-उर्वशी संवाद ( 1०1९५), तथा गम-यमी-संवाद ( १०१०) इनमें प्रमुख है । वैसे दूसरे सवादों का भी उस किया जा सकता है, जैसे इन्द्र, इन्द्राणी तथा पृषाकपि का संवार ( १००६), अगस्त्य तथा उनको पक्षी लोपामुद्रा का संचाद ( १११७९)। इन संवादों के आधार पर मैक्स- मूलर ने यह मत प्रकाशित किया था, कि इन सूत्रों का पाठ, यज्ञ के समय इस हा से किया जाता रहा होगा, कि अलग अलग अस्विक् अलग पात्र (मरुत् या इन्द्र)बले मन्या (संपादों)का शंसन करते हॉो । प्रोफेसर सिको लेकी ने भी इस मत की पुष्टि की है, तथा प्रमुग्वेद पाल में अभिनय की स्थिति मानी है। उनका मत है, कि उस काल में देवताओं के रूप में, यादि के समय, नाव्याभिनय अवश्य होता होगा।' लेची तण मैक्समूलर ही नहीं. धोएदर तथा हतेल भी इसी मत के हैं। कि अग्वेद के सूफों में अभिनय तथा सवाद के तत्त्व विद्यमान हैं, जो नाटकों के योग हैं। हतेल का मत है कि वैदिक सूफ गेय रूप में प्रचलित रहे है । अत विभिल बकाभों १. प्राह पाज्यं ऋग्वेदान् सामन्यो गीत मेव च । यजुर्वेदाइभिनयान् रसानापर्वणा दपि ॥ (भरत नामशान.) ३ पीय संस्कृत ड्रामा पृ १५-१६. २६० भूक [४] के भेद का प्रदर्शन एक ही गायक (या पाठक) के द्वारा नहीं हो सकता था। इसलिए ऐसे सूतों का, जिनमें एक से अधिक पका पाये जाते थे, अनेक पाठने के द्वारा पदा जाना थसम्भव नहीं । इस प्रकार ये सूक्त नाध्यकला के प्रारम्भ कहे जा सकते हैं। प्रोपदर नो ऋग्वेद से कुछ सूक्त उपस्थित किये हैं, जिनको वे नाटक का मादिम रूप मानते है, तथा गेय' एवं श्रमिनय दोनों तत्वों को वहाँ इंदते हैं । ऋग्वेद के माइक सूक्त (७.१०२) के बारे में वे कहते हैं, कि ब्राह्मण लोग मेटकों से भरे ताराय में खडे होकर इस सूक्त को गाते होंगे। ऋग्वेद के नवम मण्डल के ११२ में सोम सूत के विषय में भी उनका यही मत है । किन्तु ये दोनों ऊपरी मत निसार हैं। ६. कोय ने इन दोनों मतों का खण्डन किया है। वे इन संवादों को नाटकीय संवाद न मान कर कर्मकाण्ड तथा पौरोहित्य धर्म के संवाद मानते हैं । यस्तुत' कर्मचण्डीय परिपाटी को नाटकीय मान घेठना ठीक नहीं। साथ ही श्रोएदर आदि विद्वानों का यह कहना कि ये सूफ गाये जाते थे, ठीक नहीं जान पड़ता । गेय तत्व के लिए तो सामवेद के मन्त्र थे। ऋग्वेद के मन्त्रों का 'उद्रीय' न होकर 'शंसन' होता था। हाँ इतना माना जा सकता है, कि ऋग्वेद के इन संवादों में नाटक के बीज विद्यमान हैं, पर इन्हें नाटक का स्थानापन मानना ठीक नहीं। मो० पोएदर आदि के मत का खण्डन अन्य विद्वानों ने भी किया है। श्री सीताराम जी चतुर्वेदी ने अपने 'अभिनवनाव्यशास्त्रम्' में बताया है, कि नाटक स्वतः एक यह है, अतः इसे ऋग्वेद के उन सूतों का आधार मानकर किसी दूसरे यह का श्रा कैसे माना जा सकता है। साथ ही भौएदर आदि नाटक, नृत्य तथा संवाद सभी को एक मान घेठते हैं। कोरा नान या कोरा संवाद नाव्य कदापि नहीं हो सकता, क्योंकि नाय में सात्विक, आशिक, पाचिक तथा आहार्य चारों प्रकार के अभिनयों के द्वारा समुष्टि की जाती है। उन्होंने अपने मत का प्रदर्शन करते समय यह भी बताया है कि यूरोप वाले विद्वान् प्रत्येक स्थान पर विकासवाद का सिद्धान्त लागू करते हैं, और भारतीय नाटकों की परम्परा का अध्ययन भी इसी आधार पर करते हैं। ऐसा करना ठीक नहीं जान पडता । कुछ भी हो, प्राग्वेद के संवादों में नाटक के बीज मानने में कोई अनुचित बात नहीं है। नाच को नाटक का पूर्वरूप मानने वालों में मैकडोनल भी है। उनकी कल्पना है, कि संस्कृत के नट तथा नाटक शब्द 'नट्' धातु से निकलते हैं। यह धातु संस्कृत के 'मृत' (नाचना) घातु का ही प्राकृत या देशीरूप है । किन्तु यह मत ठीक नहीं है । संस्कृत में नट् तथा नृत् दोनों भिन्न धातु हैं, साथ ही नाव्य, नृत्य तथा नृत्त तीनों शन्दों का अर्थ भी अलग अलग है। दशरूपकार ने पाश्यार्थमय अभिनय के द्वारा रससृष्टि करने को नाव्य माना है (वाक्यामिनयं रसायं)। इसी तरह केवल शब्दार्थ का अभिनय कर मावप्रदर्शनमात्र करने को मृत्य तया चाल लय के साथ इस्त- पार सघाला का नृत्त का है। वे बताते हैं कि ये तोना भिन्न भिन है-श्रव्यद् . भायाश्रय नृत्यमन्यत् वाललयाश्रयम्'। यह दूसरी बात है कि नृत्य तथा गृत्त दोनों हो, जिन्हें हम क्रमश शास्त्रीय मार्ग तथा देशी भी कह सकते है, नाटक के उपस्कारक हो सकते हैं । इसी यात को दशरूपककार कहते हैं:- मधुरोद्धतमेदेन तद्यं द्विविधं पुनः । लास्यताण्डवरूपेण नाटकाद्युपकारकम् ॥ दशरूपककार की साक्षी पर मैकडोल का नाच और नाटक को एक मान लेने वाला मत पाराशायी हो जाता है। एक पूसरा मत प्रो. पिशेल का है, जो भारतीय नाटकों की उत्पत्ति पुतलियों के नाच, पुतलिकामृत्य-से मानते हैं। प्रो. पिशेल ने यडे विस्तार के साथ यह बताया है, कि यूनान में प्राचीन नाटकों के पहले पुत्तलिका का प्रचलन नहीं था, अत वहा माठकों को इसका विकसित रूप नहीं मान सकते । भारत में इनका प्रवार बहुत पुराना रहा है। महाभारत में पुतलियों का वर्णन मिलता है। बथासरित्सागर में भी इन पुतलियों का बड़ा वर्णन है। प्रो. पिशेल ने तो भारतीय नाटक के सूत्रधार की संज्ञा' को गी इनसे जोड़ने की चेष्टा की है। वे कहते हैं, कि पुतलियों को नाते समय नवाने वाला उनकै डोरों को-सून को-पीछे से पकड़े रहता है। इसलिए यह "सन- घार' कहलाने लगा और यही नाम नाठक के प्रयोका को भी दे दिया गया। प्रो. पिशेल के इस मत का सम एक दूसरे पाचात्य विद्वान् रिज़वे ने ही कर दिया है। 'सूत्रधार' शब्द की पिशेल पाली ध्युत्पत्ति के शरे में कहा जा सकता है कि 'सूत्रधार' नाटक की फमावस्तु, नायक, रस आदि का सून ( सक्षेप) मे वर्णन करता है, इस 'लिए सूत्रधार कहलाता है, डोरे को पकड़ने के कारण नहीं। शारदातनय ने अपने 'भावप्रकाश में इस शब्द की व्युत्पत्ति करते हुए लिखा है सूत्रयन् काव्यनिष्क्षिसवस्तुनेतकथारसान् । नान्दीपलोकेन नाम्धन्वे सूत्रधार इति स्मृतः ॥ डॉ. पिशेल एक दूसरा मत भी रखते हैं। इस मत के अनुसार नावकों का विकास छाया-नाटकों से हुवा है । दाक्टर कोनो भी इस मत के समर्थक हैं। सस्कृत में कुछ छायानाटक पाये जाते हैं, जिनमें 'दूताद विशेष प्रसिद्ध है। छायानाटक में महीन पर्दे के पीले वास्तविक अभिनेताओं या मूर्तियों के द्वारा अभिनय दिपाया जावा है, सामाजिक पर्दे पर उनकी छायामान देखता है । दूतागद आदि सस्कृत के दो चार परवर्ती छायानाटकों के आधार पर भारतीय नावकों का विकारा छायानाटकों से मानना क नहीं जान पड़ता। म विद्वान् घोरपूजा या इन्द्रप्पज उत्सव जैसे धार्मिक उत्सवी से नाटक का विरा मानवे है, पर यह ठीक नहीं। संस्कृत के कई नाटकों में वीररस नहीं पाया जाता. घोरपूजाला कैसे कहा जा सकता है। न यूनानो नाटयों की तरह भारतीय नारक धार्मिक उत्सव से ही विकसित हुए हैं। उ लोग भारतीम नारों को मूमानी - [६] माउकों को देन कहते हैं। वे यह भी यताते हैं कि सस्कृत नाटकों में पर्दे के लिए प्रयुक्त यवनिका शम्द 'यवन' से बना है, जो 'यूनानी' के लिए प्रयुक्त होता था। श्रत इस शब्द से मारतीय नाटकों के यूनानो नाटकों के ऋणी होने का सकेत मिलता है। पर यह कल्पना बहुत दूर की है। यूनानी नाटक तो सुले मैदान म होते थे, वहा फाई पर्दा भी नहीं होता था। फिर भारत के नाटकों के पर्दो को 'यवन' से शब्द से सम्बद्ध करना, यूनानी नाटकों से कोई सम्पर्क नहीं रखता जान पाता। इस मत के प्रतिष्ठापक वेबर का खण्डन दा कीय ने ही कर दिया है। भारत की प्रत्येक साहित्यिक कलात्मक या शास्त्रीय समृद्धि में यूनानी वोज दूढना पायास्य विद्वानों का प्रमुख-किन्तु नि सार-लक्ष्य रहा है। वेदों के बाद महाभारत तया रामायण में नाटकों का प्रद्धेत इंढा जा सकता है। कीय के मतानुसार महाभारत तथा रामायण के नट शन्दो ही के श्रापार पर सस काल में नाटकों का अस्तित्व नहीं माना जा सकता । रामायण में नाटक तथा नट शब्दों का प्रयोग पाया जाता है। प्रारम्भ में ही अयोध्या के वर्णन में महर्षि वाल्मीकि ने बताया है कि यहाँ नाटक को मण्डलियाँ तथा वेश्याएँ यों ( वधूनाटकसपैश्च रायुकाम् )। राम के अभिषेक के समय भी रामायण में नटो, नर्तकों, गायकों अदि का उपस्थित होना तथा अपनी कलाकुशलता से लोगों को प्रसन करमा लिखा है नटनर्तकसंघाना गायकानां च गायताम् । यतः कर्णसुखा पाचा शुभाव जनता ततः॥ महाभारत में नद, शैलूप भादि शब्दों का प्रयोग हुचा है, और उसके हरिवंश पके ११९७ अध्याय तक तो नाटक खेले जाने का भी सङ्केत है । बजनाभ नामक दैत्य का वध करने के लिए श्री कृष्ण तथा यादवों ने कपट-नटों का वेष धारण कर उसको पुरी में जाकर रामायण का नाटक खेला । रामायण नाटक के अतिरिक्त इन्होंने कौवेररम्भाभिसार नाटक भी खेला । नाटक कामभिनय इतना मुन्दर हुमा, कि दैत्यों व उनकी पक्षियों ने सुवर्ण के आभूषण खोल खोल कर नटों को दे दिये । इसके पश्चात् प्रयुम नै पानाभ का वध किया तया उसकी पुत्री प्रभावती से उनका विवाह सम्पन हुमा। इस कया से यह पहत मिलता है कि महाभारत-काल में नाटक का सर्वांगीण आप विधमान या । यह निसन्देह है । डॉ. ए. वीर कीय हरिवश तथा महाभारत (हरिवणेतर महामारत) के रचनाकाल में यहा भतर मानते हैं । वे कहते है कि 'महाभारत में कहीं भी नाटक के होने या खेले जाने का सहेत नहीं है । जहाँ तक हरिवंश का प्रश्न है, वह याद का क्षेपक है । हरिवंश की इस नाटक वालो कया का इतना महत्व नहीं, क्योंकि हरिवशको रचना-तिथि अनिश्चित है। डॉ. क्रीय हरिवंश को ईसा की दूसरी या तीसरी शती से पहले रखने को राजी नहीं।' महाभारत प रामायण के पाद पोर प्रन्यो, तपा जैन प्रन्यों एवं वात्स्यायन के गे.एबी.कोष-संसामा परिएछेद ३ पृ १०.
[७] कामसूत्र में भी नाटकों का तथा नटों का सङ्केत मिलता है। ईसा की दूसरी शती के घहुत पहले भारत में नाटकों का अस्तित्व न मानने वाले पाचात्य पण्डितों के आगे धारयान के अयशान से निम्न पकियाँ उपस्थित की जा सकती है 'फुशीलवा वागन्तवा प्रेक्षणक मेषां दधुः । द्वितीयेऽतनि तेन्या पूजा नियत लमेरन् । ततो यथाद्ध मेष दर्शन मुत्सर्गी था । व्यसनोत्सयेषु चैपां परस्परस्यैककार्यता। (का. सू० १, ४, २८-३१) अर्यात. बाहर से आये हुए नट पहले दिन नागरिकों को नाटक दिखाकर उनका ठहराव या मेहनताना (पूजा) दूसरे दिन लेवें । यदि लोग देखना चाहे तो फिर देखें नहीं तो नटों को विदा कर दें। नगर के नटों व आगन्तुक नटों दोनों को एक दूसरे के कर तथा यानन्दं में परस्पर सहयोग देना चाहिए। इस से भी पहुत पहले पाणिनि के अष्टाध्यायी सूत्रों में ही शिलाली तथा प्रसव के मटसूत्रों का उल्लेख मिलता है --पाराशर्यशिलालिभ्या मिनु- नटसूधयो। ( ४१३१०) फर्मन्दशाश्यादिनिः ( ४३११११) । इससे शिलाली तथा पशाच इन दो थाचार्यों के नटसूत्रों का पता चलता है । डॉ. कीय, मो० सिखों लेवी भी गवाही पर इन दोनों शब्दों में व्यग्य मान कर इन्हें किन्हीं 'याचार्यों (गाय्याचार्यों ) का नाम मानने से सहमत नहीं है । लेवी के मतानुसार 'शिलाली' का अर्थ है जिसके पास शिलाकी हो शय्या है, और कोई चीज सोने को मही' और 'कृशाश्व का भय है जिनके घोडे दुपले-पतले है । पर इस तरह का अर्थ निकालना कोरा मनगढन्त ही जान पड़ता है । पीय यह भी सकेंत करते हैं कि 'मट' शब्द का पाणिनि में पाया जाना पुत्तलिका नृत्यादि की पुष्टि कर सकता है । पाणिनि पा काल वे चौथी शताब्दी ई. पू. मानते हैं तथा पाणिनि में 'नाटक' शब्द के अभाव को उस काल में भारतीय नाटकों के न होने वा प्रमाण मानते हैं। किन्तु 'नटसूत्र' शब्द पस्तुत कि ही सैद्धान्तिक सूत्रों का सोच करता है, जिसमें नटों के लिए किया प्रमिन्या. फला-कौशल का विवेचन किया गया होगा । श्रत "शिलाली च 'कृशाश्व' पा लेवी की तरह उटपटाँग अर्थ लेना, या पीप की तरह 'नाटक' शब्द या 'नाटक' के पर्यायवाची शब्द ही पर अड़े रहना पक्षपातशुन्य नहीं मजर पाता। महाभाष्यकार पताकि मैं तो स्पष्ट रूप से 'करावध' तथा 'वलिबन्धन' इन हो ययाचों से सम्बन नारकों का उलेस है। महाभाष्यवार पराबलि का समय निश्चित है, कि ये अमिमिन (शुवशी रामा) के पुरोहित तथा गुरु थे । ये लिपते हैं कि फस पहले मर चुका है। इसी तरह पलि का बन्धन भी थतीत काल में हो चुका 'किन्तु ये नट दर्तमान काल में भी हमारी आँखों के सामने कस को मारते है, सया पलि को याँधते है इह तु कथं यमानशालता कस घातयति धलि यन्ययसीति पही-पृष्ठ ३१॥
[-] चिरहते कसे विरयद्धे च चलो । अत्रापि युक्तम । कथम् । ये वाघदेते शोमनिका (सौमिका) नामैते प्रत्यक्ष कसं घातयन्ति, प्रत्यक्षंच पाल चन्धयन्तीति।' प्रो. वेदर तथा प्रो. स्यूडर्स पतलि के इस स्पष्ट सईत को भी उटपटॉग हा से सामने रखते हैं । वेवर के मतानुसार पतपलि का सचेत इत्तलिका रूप में सक्ष तथा बालिवन्धन से है। सूडर्स के मतानुसार शौमिका' या शोमनिका' शब्द इस मात का स्पष्ट प्रमाण है, कि ये नट बिना किसी संवाद (Dialogue) के कंसवध या पलियन्यन की नकल दिखाते ये । चाद के साहित्य में संवाद प्रयोछामों के लिए "प्रन्थिक' शब्द का प्रयोग मिलता है । पर इसनी संचातान, और यह गजनिमीलिका- यित क्यों, जव कि महर्षि पतञ्जलि की प्रकियाँ माध्याभिनय के स्पष्ट सहेत हैं। कुछ भी हो, महामाष्यकार पतअलि के पहले ही से कवि भास से लेकर बीसवीं 'शती के कुछ संस्कृत नाटकों तक संस्कृत नाटकों की एक मनुष्य परम्परा पाई जाती है, जिसमें किन्हीं प्रीक नाटकीय पीजों को ढूंदना दुरामह तथा हठधर्मिता ही होगी । संस्कृत साहित्य का नाटक-श्रग इतना समृद्ध है, कि मात्रा तथा गुण दोनों घटियों में विश्व के नाटक साहित्य में उसका विशिष्ट स्थान है । संस्कृत में सैकड़ों एक से एक सुन्दर नाटक लिखे गये, जिनमें असंख्य नाटक अभी भी अन्धकार में पड़े हैं। उनमें से कुछ नाटकों का संकेत किन्हीं अलङ्कार शास्त्र तथा माव्य शास्त्र में दिये बदाहरणों से मिलता है। कई नाटक अमी २ अन्धकार से प्रकाशित हुए हैं । भास के नाटकों का ही लोगों को १९१३ ई. के पहले पता नहीं था जब कि म.म.स.गणपति शास्त्री ने उनको प्रकाशित किया । भास, कालिदास, शदक, अयोप, भवभूति, मुरारि विशाखदत्त, मटनारायण, राजशेखर, जयदेव आदि प्रमुख नाटककारों के अतिरिक जयदेवोत्तर काल ( १२५०-१९५०) के सेकड़ों नाटककार ऐसे हैं जिन्होंने सुन्दर कलापूर्ण नाटक लिखे है । यह दूसरी बात है, कि जयदेवोत्तरकाल के नाटककारों में कई नाटककार सिद्धान्त व प्रक्रिया के सामनस्य का निर्वाह भपने नाटकों में न कर पाये । माटकीय सिद्धान्त प माटकीय प्रक्रिया के सामनस्य की अन्तिम सीमा हम जयदेव का प्रसभरापव मान सकते हैं । मेरा तात्पर्य यह नहीं, कि इस काल के सारे ही जातक समचीय प्रक्रिया में खरे न उतरेंगे, किन्तु अधिकों की ऐसी ही दशा है । साथ ही इस काल में भाग-रूपकों को बहुतायत ने भी नाटक-साहित्य की विविधता को इस क्षति ही पहुंचाई । इस काल के प्रमुख नाटककारों में वामन मा याण, शेष कृष्ण, मधुरादास, युवराज रामवर्मा भादि हैं, जिनके ममशः पार्वतीपरिणय, सवय, अपमानजा नाटिका, अनविजय भाष भादि रचनाएँ है । संस्कृत के इस दिशाक भाव्यसाहित्य के समुद्र से कुछ रखों को निकाल कर उनका महत्त्व घताना मना कठिन है । कालिदास, शुदक सपा मवमति की कविनयी तो समस्त संस्कृत भाटककारों की १.महामान्य २६॥
[] मूर्धन्य है हो । पैसे संस्कृत की प्राचीन परम्परा के पण्डित मुरारि को भवभूति से बढ़ कर मानते जान पड़ते हैं । तभी तो वे कहते है :- (१) मुरारिपदचिन्तायां भयभूतेस्तु का कथा। (२) मपमूति मनाहत्य मुगरि मुररी कुरु ॥ पर भवभूति जैसी रागात्मक उापना मुरारि में वहाँ, वहाँ तो शास्त्रीय पाण्डित्य ही विशेष है। कालिदास का पद निर्मित है, और उसका 'अमिज्ञानशाकुन्तल' समस्त वाम्य (साहित्य) का सार-'एसेम्स है, इस बात का उद्धोष प्राचीन पण्डितों ने मुक्तकण्ठ से किया है:- काव्येषु नाटकं रम्यं तत्र रम्यं शकुन्तला । तत्रापि च चतुर्थोऽदा तत्र श्लोकचतुष्टयम् ॥ संस्कृत के इस विशाल तथा सुन्दर नाट्य साहित्य की समृद्धि का श्रेय किसी हद तक भारत के नाव्यशास्त्र जैसे नाटक के सिद्धान्त-ग्रन्थों-लक्षणप्रन्यो-को भी देना होगा । स्वयं कालिदारा गुनि भरत के नाटकीय सिद्धान्तों से पयप्रदर्शन पाते रहे होंगे। नाट्य-शास्त्र का सशिम इतिहास. साहित्य में लक्षण मन्यो लक्ष्य प्रन्यों का चोली दामन का साथ है । दोनों एक दूसरे के सहयोगी धन कर साहित्य की श्रीवृद्धि में योग देते हैं । यद्यपि साहित्य के आदि विधायक लक्ष्य प्रन्य, वाव्यनाउकादिही है, किन्तु वे जहाँ एक ओर लक्षण भन्यों को प्रोत्साहित करते हैं, वहाँ उनके द्वारा नियन्त्रित भी होते हैं । लक्ष्य प्रन्यों में रचयिता की उच्चसलता, मनमानी को रोक्ने थामने के ही लिये लक्षण प्रन्यों को रचना हुई। ये लक्षण प्रन्य भी स्वयं अपने पूर्व के लक्ष्य प्रन्यों की विशेषताओं, उनके भादर्शो को मान यनावर लिखे गये, तथा उन्हीं 'मानों को भावी काम्यों या नारकों का निकपीपल पोपित किया गया । चाल्मीकि, व्यास धादि कवियों के काम्यों ने ही भामह को अलंकार-विभाजन का मार्ग दिखाया । अन्यथा, रामायण, महाभारत या अन्य पूर्वपती कवियों को कविता के अभाव में भामह के लिए कविताकामिनी के इन सौन्दर्य विषायक उपकरणों का पता लगाना असम्भव नहीं होता क्या ? अरस्तु 'पोयतिया' तथा 'हतोरिया' को तमी जन्म दे सका, जब उसके आगे एक और होमर के 'इलियड' तथा 'मोडेसी' एवं सोफोहोज के नाटक, तया तत्कालीन प्रोक पण्डितों की भाषणशैलियाँ प्रचचित थी । इन लक्ष्यों के अभाव में लक्षण की स्थापना हो ही कैसे रामती यो। ठीक यही यात संस्कृत के माव्यशास्त्र के विषय में फही जा सकती हम पता चुके है कि संस्कृत का नाट्यशास्त्र संस्कृत के नाटक साहित्य की समृद्धि का सादी है । भान हैड हजार वर्ष से भी अधिक पूर्व लिसा गया मरत का नाट्यशास्त्र इस बात की पुष्टि करता है कि मरत के पूर्व ही घई प्रौद नाटक लिखे जा चुके होंगे, जो काल के गर्त में लीन हो गये और माज हमें मास ही सबसे पुराने संस्कृत नारकर दिखाई पड़ते हैं।
१. ] जैसा कि हम आगे चलकर यतायेंगे प्रारम्भ में नामशाग्न सथा अनवार शास्त्र दो भिन्न शान थे । राजशेसर को काध्यमीमांसा में इसका स्पष्ट उल्लेख है । यही नहीं रस की चिोचना नाट्य अर थी, अककरशान में इस प्रवेश पहले तो निषिद्ध था, याद में इसे गौण रूप देकर प्रवेशस्वीकृति दे भी दी गई। थम्य अन्य में रस की मान्यता ने नाट्यशान तथा अलङ्कारशास्त्र के बीच की खाई पाट दी । पालत' परवर्ती अलंगारशास्त्र के अन्यों में नाट्यशास्त्र का भी समावेश होने लगा जिसके उदाहरण स्वरुप म साहित्यदर्पण जैसे अन्य रख सकते है । यहाँ पर हम नाट्यशास्त्र के इतिहास पर कुछ शब्द कहते समय शुद्ध अलवारशास्त्र के लेखकों पर सरत करना टीक नहीं समझंगे। , (१) भरत!-भरत का 'नाट्यशास्त्र' नाट्यशास्त्र पर सर से प्राचीन मन्य है। 'नाट्यशास्त्र पर ही नहीं रहारशास्त्र सोत, नृत्य तथा नाटक सभी का इसे प्राचीन सम पथप्रदर्शक मानना होगा | भरत का नाम प्राचीन ग्रन्थों में मरत के परवर्ती प्रन्या दो प्रकार से मिलता है-एक वृदभरत या श्रादिभरत, दूसरे केवल भरत । माट्या शास्त्र के विषय में भी कहा जाता है कि नाशास्त्र के दो अन्य मिन्ते है, एक नाट्यवेदागम, दूसरा नाट्यशास्त्र । पहला प्रन्थ दादासाहसी, तथा दूसरा अन्य पर साहसी भी कहलाता है । शारदातनय के मतानुसार 'पट्साहवी' प्रथम प्रन्म का ही संक्षिप्त रूप थी। एवं दादशसाद शोकैरेक तदर्घतः । पड्भिः लोकसहनै या नाट्यवेदस्य संग्रहः ।। (भारप्रकाश) नाठीशान के रचयिता भरत का क्या समय है, इस सम्बन्ध में विद्वानों के कई मत हैं। विद्वानों में कई उनके नाव्यशास्त्र का रचनाकाल ईसा के पूर्व द्वितीय शताब्दी मैं मानते हैं, कई इससे भी पूर्व । दूसरे विद्वान् भरत का समय ईसा की दूसरी या तीसरी शती मानते हैं । कुछ ऐसे भी विद्वान् है जो भरत का काल तो दोसरी या चौपी शती मानते हैं, कि तु नामाशास्त्र के इस रूप को उस छाल का नहीं मानते । स. एसके दे के मतानुसार नाट्यशास्त्र के राहीत थाले अध्याय चौथो शतान्दी की रचना है, किन्तु नाव्यशास्त्र में कई परिवर्तन होते रहे झेंगे, और उसका उपलव्य पस्करण आठवीं शती के अंत तक हुया जान पड़ता है। कुछ भी हो इतना तो अवश्य है कि भरत प्राचीनतम अलहारशास्त्री, रसशास्त्री, पनायान ही हैं, जिनका प्रय हमे प्राप्त है । भरत के विषय में कुछ ऐसे घाय और प्राभ्यन्तर प्रमाण हमें मिलते हैं, जो उनके कालनिर्धारण में कुछ सहायक हो सकते हैं । हम पहले याय प्रमाण ही लेंगे । वेसे तो कालिदास का भी समय मतभेद से रहित नहीं पर अधिकतर विद्वान् उसे चौथी शताब्दी (ईसपी) का ही मानते हैं। कालिदास के विफमोर्वशीय नाटक में एक स्थान पर स्पष्ट रूप में भरत का निर्देश मिलता है। निर्देश ही नहीं, भरत उस काल तक इतने प्रसिद्ध हो चुके थे कि कालिदास । - । [ ११ ] के 'समक्ष भरत के नाटक के अभिनय का राहत करते हैं । तात्पर्य यह है कि नाट्याचार्य भरत कालिदास से पूर्व हो पौराणिक व्यक्तिन धारण कर चुके थे, वे ऋषि थे, उन्होंने स्वयं ब्रह्मा से नाध्यद सोश या । नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में पाई जाने वाली नाटक की उत्पत्ति की घटना का सूक्ष्म सङ्केत कालिदास के पथ से भी मिल सक । है । विषमोर्वशीय नाटक के प्रथम श्रद का यह पय यों मुनिना भरतेन यः प्रयोगोभवतीप्यष्टरसाश्रयो नियदः। ललिताभिनयं वमद्य भर्ता मरुतां द्रधुमनाः स लोकपालः॥ नाट्यशास्त्र के अन्तर्गत कुछ ऐसे स्थल हैं, जो उसको प्राचीनता को और पुष्ट करते हैं। नाट्यशास्त्र में ऐन्द्र व्याकरण, तथा यास्क के उद्धरण है, किन्तु पाणिनि के नहीं । अत' नाट्यशान उस काल की रनना है, जब ऐन्द्र व्याकरण का महत्त्व पणिनीय व्याकरण के द्वारा घटाया नहीं गया था । नाट्यशास्त्र कई प्राचीनतम सूनों य श्लोकों का उद्धरण मिलता है अनानुवंश्ये पायें भवतः। ततश्लोकः, श्यादि- भाषा व विषयप्रतिपादन की दृष्टि से भी भरत का नाट्यशास्त्र प्राचीनता का घोतक है। फलत भरत भी भरतमुनि के नाम से प्रसिद्ध हो गये हैं । भरत का नाम्पशास्त्र कहाँ कहीं सूनपरिपाटी या आधय लेता है। टीकाकारों ने भरत की रचना कई स्थानों पर 'सूर' तथा उन्हें 'सूबकृत' कहा है । नान्यदेव भरत के लिए 'मुनहत्' शब्द का प्रयोग करते रहते हैं -'कलानामानि सूनकदुक्तानि यथा--' । अभिनव गुप्त भी भरत फे नाट्यशान को 'भरतसून' कहते हैं.- पपिंशकं भरतसूनमिदं विवृण्वन् । अनुमान है भरत का नाट्यशाल कालीदास से लगभग दो शताब्दी पूर्व का-ईशा की दूसरी शतीका है। भरत या नाट्यशास्त्र ३७ अध्यायों या अन्य है । भरत के माटपशास्त्र के विषय में प्राचीन टीकारों का मत है कि यह ३६ अध्यायों में विभक है । अभिनय गुप्त भी अभिनव भारती में उसे 'पट्निशक-३६ अध्याय पाला-ही मानते हैं । किन्तु इसके साथ ही अभिनव ३७ अध्याय पर भी 'भारती' लिखते है, साथ ही १रा अध्याय या अलग से मालाचरण इसका सकैत करता है कि अभिनव ३६ अध्याय की परम्परागत मान्यता को स्वीकार करते हुए भी इस अध्याय की ब्यारया करते हैं। इतना ही नहीं नाटयशास्त्र के उत्तर दक्षिण से प्राप्त प्राचीन हस्तलेसों में भी यह भेद पाया जाता है। उत्तर की प्रतियों में ३७ अध्याय है, जर कि दक्षिण के हस्तलेखों में ३६५३७ दोनों अध्याय एक साप हो ३६ अध्याय में पाये जाते हैं । इसय या कारण है ? पुन लोगों के मतानुसार ३६ में अध्याय दो अध्यायों में विभक. परमा भारती के रनयिता अमिनागुरुपादापर्य यो हो ममीट पा, यद्यपि ये पुरानी १६ सभामा परिपाटी को सादा भा नहीं करना चाहते थे । अभिमवगुप्त अपने शरमाता का मेल नाटयशालये ३६ अध्यायों में मिलास्ट शेष ३६ सालों ..
[ १२ ] या सङ्कत परते जान पड़ते हैं । इन तत्वों पर स्थित श्रनुत्तर' सत्य का राप्त कर के लिए उन्होंने ३६ , श्रयाय में से ही ३७३ अध्याय की रचना की हो । ३० वें अध्याय की 'अभिनवभारती' का मङ्गलाचरण इसा सहेत दे सकता है:- श्राकाहाणां प्रशमनविधेः पूर्वमायायधीनां धाराप्राप्तस्तुतिगुरुगिरां गुह्यतत्त्वप्रतिष्ठा। ऊर्यादन्यः परभुवि न पा यत्समानं चकास्ति मोदानन्तं तदह मधुनानुत्तरं धाम पन्दे ॥ नाट्यशास्त्र के प्रथम अध्याय में नाटक व नाट्यशास्त्र (नाव्यवेद) की उत्पत्ति का वर्णन है, जिसमा सद्धेत हम दे चुके हैं। याद में रहभूमि-समय के प्रकार, रामद के विभिन्न प्रो-रङ्गशीर्ष, रहमध्य, रणदृष्ट, मत्तवारणी, तथा दर्शकों के बैठने के स्थानों का विशद वर्णन है । चतुर्य तथा पञ्चम अध्याय में पूर्व विधान का वर्णन है। इसके दाद भरत ने चारों प्रशर के अभिनयों का क्रमश वर्णन किया है। हम आगे देखेंगे कि नाट्यशास्त्र में अभिनय चार प्रकार का माना गया है। सात्विक, शाहिक, पाचिक तथा आहार्य । भाट्यशास्त्र के छठे तया सातवें अध्याय में सात्विक अभिनय का विचार किया गया है। इसके अन्तर्गत भावाभिव्यक्ति थाती है। रसों, भावों, विमानों, अनुभावों व सधारियों का विचार भरत ने यहीं पर किया है। प्रागे के ६ अध्यायों में, ८ रो १३ अध्याय तक, प्राणिक अभिनय का विवेनन है। १४ अध्याय से २० अध्याय तक वाचिक तथा इसके बाद माहार्य अभिनय की विवेचना की गई है । भरत के इसी विभाजन को लेकर आगे के नाट्यशास्त्री चले हैं । गरत के नाव्यशास्त्र के विषय में एक और यात । कुछ लोगों का यह भी मत है कि नाट्यशास्त्र के रचयिता भरत न होकर भरत का कोई शिष्य था। यह मत अभिनव गुप्त के समय में भी प्रचलित था। अभिनव ने इस मत का डटकर सम्डन किया है, तथा इस बात को सिद्ध किया है कि नाट्यशास्त्र भरत की ही रचना है। अपने खग्डन का उपसंहार करते हुए अभिनव ने 'भारती' में लिखा है - 'पतेन सदाशिवब्रह्मभरतमतत्रयविवेचनेन ब्रह्ममतसारताप्रतिपादनाय मतत्रयोसारासारविरेचनं तमन्थसण्डप्रक्षेपेण घिहितमिदं शास्त्रम्, न तु मुनिरचितमिति यदाहु नास्तिकधुर्योपाध्याया स्तत्प्रत्युक्तम् । भरत के नाट्यशास्त्र या सूत्रों पर कई टीकाएँच व्याख्याएं लिखी गई जो नाट्यशास्त्र के विकास में सहायक हुई । इनमें कई तो अनुपलब्ध हैं । भरतटीमा, हर्षकृत पार्तिक, साक्याचार्य राहुलाकृत कारिवाएँ, मातृगुप्तकृत टीश, योर्तिघरकृत टीका उनमें से हैं, जो उपलब्ध नहीं, इनमें से कुछ के उद्धरण ३ मत 'भारती में मिलते हैं। भरत के प्रसिद्ध सून 'विमावानुभावव्यभिचारिसंयोगात् रसनिपत्तिः' को व्याख्या करनेवालों में लोल्लट, शंफुट, मानायक, व अभिनवगुप्त प्रसिद्ध है। अभिनव ने 'भारती' की रचना की है। क्या लोलट, शकुक व भट्टनायक ने भी भरत के नाट्यशास्त्र पर कोई व्याख्याएँ लिखी थी। 1 [१३] (२) लोलट:-अभिनवगुप्त ने अभिनव भारती में भट्ट लोप्लट के मतों का उल्लेख किया है । सम्भवतः लोलट ने भरत नाट्यशास्त्र पर कोई व्याख्या लिखी होगी, जो उपलब्ध नहीं । लोल्लट ने ही सर्वप्रथम भरत के रस परक सिद्धान्त की व्याख्या को । भरत के प्रसिद्ध सूत्र 'चिभाषानुभाष व्यभिचारिसंयोगाइ रसनिप्पत्ति.' की व्याख्या में उसने 'संयोगात्' से 'कार्यकारण भावरूपसंबंध' तथा 'निष्पति' से 'उत्पत्ति' अर्थ लिया। उन्होंने रस की स्थिति रामादि अनुकार्य पात्रों में मानी, न कि नटों या सहदयों में। लोलट मीमांसक थे, तया अभिधाबादी थे। वे अभिधाशक्ति को ही समस्त काव्यार्थ का साधन मानते है। उनका मत था कि शब्द के प्रत्येक अर्थ की प्रतिपति अभिधा से ठीक उसी तरह हो जाती है, जैसे घाण अकेला ही काय को भेद, शरीर में घुसकर, प्राणों का अपहरण कर लेता है। मम्मट ने इसी मत को इस प्रकार उद्धृत किया है:-'सोऽयमिपो रिय दीर्धदीर्घतरोऽभिधान्यापार' लोल्लट के मत का मात्र कुछ हद त रु दशरूपकार धनन्जय एवं अपलोकमार धनिक पर भी पाया जाता है। लोखट के रामय का पता नहीं, किन्तु यह निक्षित है कि लोलट ध्यानाबाद तया ध्वनिबाद के उदय के बाद रक्खे जा सकते हैं। यदि ध्वनिकार मानन्दवर्धन से मिल है, तो लोमट धनिकार तथा प्रानन्दवर्धन के बीच के समय में उत्पन हुए है, अन्यथा वे आनन्दवन के समसामयिक हैं। इस तरह लोमट का समय ईया की नवी शती माना जा सकता है। जैसा कि लोहाट के नाम से ही स्पष्ट है, वह काश्मीरी थे। (३) शहका-यभिनव ने भारती में हो शक के मत का भी उल्लेस किया है। शक ने गी भात पर कोई व्याख्या लिखी होगी। शक की भरतस्त्र की व्याख्या 'अनुमितिवाद' के नाम से प्रसिद्ध है। शक नैयायिक थे, तया उन्होंने निभावादि साधनों एवं रसरूप साध्य में अनुमाप्य-अनुमापकभाव को पल्पना की है। इस प्रकार ये रस को अनुमेय या अनुमितिगम्य मानते हैं। इसके अतिरिफ ये एक कल्पना और करते हैं-'चिनतुरगादिन्यया' की कल्पना । इस कल्पना के अनुसार नट सच्चे रामादि नहीं है, चे चित्र में लिखे घोड़े की तरह राम है। इस कल्पना को दशरूपककार ने भी अपनाया है यह हम ययावसर बताएँगे। शक ने 'रस' की स्थिति राहदयों या सामाजिकों में मानी है, ठीक वैसे ही जैसे घोड़े के चित्र को देख कर अनुभव होता है। शकुक ने ही सब से पहले लोजष्ट के 'उत्पत्तिवाद तथा सहृदयों में रसानुभय न मानने वाले सिद्धान्त का खण्डन ख्यिा है। शाक भी काश्मीरी थे। वे लोहट के ही समसामयिक रहे होंगे। राजतरहिणी मतानुसार शाक ने भुवनाभ्युदय प्रम्य लिसा था, तथा वे कारमोरराज अजि- वापो केराग्यकाल में ये:- अथ मम्मोत्पलकयो भूदारणो रणः । वनप्रवाहा यवासीद् विवस्ता सुभटौहतः ॥
[ १४ ] कयि बुधमनासिन्धुशशाङ्कः शङ्ककाभिधः । यमुद्दिश्यकरोत्काव्यं भुचनाभ्युदयाभिधम् ॥ (रा० त० ४,७०३-४ शाजघरपद्धति तथा सूक्तिमुक्तावली में शङ्कुक को मयूर का पुन कहा गया है, तथा निम्न पद्य को उसके नाम से उद्धृत क्यिा गया है। दुर्गाराः स्मरमार्गणाः प्रियतमो दूरे मनोऽयुत्तुकं गाढं प्रेम नवं घयोऽतिकठिनाः प्राणाः फुलं निर्मलम् । स्त्रोत्यं धैर्यपिरोधि मन्मथसुहृत् कालः कृतान्तोऽतमो नो सख्यधतुराः कथं नु विरहस्सोदव्य इत्थं शठः॥ क्या ये मयूर 'सूर्यशतक' के रचयिता ही है ! यदि ऐसा हो तो शहक सातवीं शती के आसपास रखे जा सकते हैं। किन्तु, नाट्यशास्त्री शकुक को इस काल का मानने में आपत्ति है । स्पष्ट हैं, दोनों शकुक एक नहीं है । भरत के व्याख्याकार, अनुमिति- पाद के प्रतिष्ठापक तथा भुवनाभ्युदय काय के रचयिता शहक एक ही है, और हम उन्हें नौं शती का मान सकते है। (v) महनायक:-रासून के तीसरे म्याख्याकार गहनायक हैं, जिनके मत का विशद उस्लेख अभिनवगुप्त ने किया है । अभिनयगुप्त, जयरथ, महिममा तथा रुय्यक ने भट्टनायक के मत का उल्लेख किया है, साथ ही इन लोगों ने भट्टनायक की रचना 'हृदयदर्पण' या भी निर्देश क्यिा है । भानायक का 'हृदयदर्पण' स्वतन्न ग्रन्थ था, या मरत के नाटयशास्त्र की टीश इस विषय में दो मत रहे है। डॉ. एस. के. दे मतानुसार हृदयदर्पण टोका न होर अलारशाह का स्वतन्त्र प्रन्य था । हृदयदर्पण उपलभ तो नहीं, पर मुना माता है कि इसी एक प्रति दक्षिण में यो, और उससे स्पर है कि यह नाट्यशाप्त की रीता ही थी। यह प्रति भी अब उपलब्ध नहीं है। मानायक भी लोहट तया शक, महिमभट्ट एवं कुन्तक सी भाँति अभि- पावादी ही है. ये ध्याना वृत्ति या ध्वनि जैसी पल्सना से राहमत नहीं । भट्टनायक भनन्दवर्धन के हो समकालीन है । सम्भवतः वे भी श्रानन्दवर्धन के आश्रय फारमौर. राज भवन्तिवर्मा ( ८५५-८८४ ई.) के ही राजकवि थे। मानायक रम के सम्बन्ध मै 'मुक्तिवादी सिद्धान्त के पोषक हैं। वे वाध्य में भाववाच्य एवं गेजस्वदो व्यापारों को कल्पना करते हैं । इस पर भी नायक 'संयोगान्' का अर्थ 'भाभ्यमा सम्पन्ध' मानते हैं, 'निष्पत्ति' से उनका तात्पर्य भुक्ति' (शास्वाद) से है। भट्टनायक रस की स्थिति सहृदय में पूर्णत सिर करते है । वे ही साधारणी करण' के मिशान्त के सर्वमपम प्रवर्तक है, जिसका विस्तार अभिनव ने किया है। मानायक सौख्यमतानुयायो है, वे अपने रससम्बन्धी सिद्धान्त में सारयदर्शन का हो मात्रय लेते हैं। पनजय घ पनिक के मत पर मानायक के प्रभाव को हम अयायसर विरोलिकरंगे। - [ १५ 1 (५) अभिनवगुप्तपादाचार्य:--भिनवगुप्त एक और प्वनिसम्प्रदाय के रास्थापक प्राचार्य हैं, तो दूसरी ओर नाट्यशास्त्र के प्रसिद्ध आचार्य । इसके अतिरिक्त अभिनय का एक तीसरा भी व्यचित्य है, वह है उनका शैय दर्शन के प्राचार्य का व्यचित्य । अभिनवगुप्त ने ध्वनिचाद या नाट्यशास्त्र पर कोई स्वतन्त्र मन्थ न लिखकर टीकाएँ लिखीं है । आनन्दवर्धन के 'ध्वन्यालोक' पर उनकी 'लोचा' टीका तथा भरत के नाट्यशास्त्रपर उनकी 'अभिनवभारती' (भारती ) श्रमूल्य प्रन्य हैं। यद्यपि ये दोनों टीका मन्य हैं, तथापि इनका महत्व किन्ही आकर-प्रन्यों से कम नहीं, विद्वरसमाज में ये दोनों अन्य (टीकाएं ) अलङ्कारशास्त्र तथा रसशान के मूर्धन्य प्रन्थ हैं। इनके अतिरिक्त अभिनव ने तन्त्रशास्त्र तथा शेष आगम पर अनेक प्रन्थ लिखे है। इनमें 'तन्नालोक' तथा ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका' पर लिखी 'विमर्शिनी टीका विशेष प्रसिद्ध है। अन्तिम रचना अभिनव गुप्त ने १०१५ ई० में की थी। इनके अतिरिक्त अभिनव ने एक तीसरे अन्य को भी देन अतहारशास्त्र को दी थी, ऐसा जान पड़ता है। अभिनय- गुप्त को यह तीसरी साहित्यशास्त्रीय रचना 'काव्यकौतुकविवरण' थी जो अब अनुप- लब्ध है। अभिनव के कुल प्रन्थ ४०-४१ के लगभग है। अभिनव के गुरु पिता, कुल, तथा समय के विषय में थभिनव ने स्वयं अपनी रचनाओं में सईत किया है। थभिनव के पिता नरसिंहगुप्त या चुखुलक थे ।' उनके गुख भठेन्दुराज' तया भत्तौत थे। इनके पिता स्वयं शैव धागम के प्रकाण्ड पण्डित तया शिवभक्त भी थे। गुरु भन्दुराज कवि भी थे, क्योंकि अभिनव अपने 'लोचन' में उनके पद्यों को उद्धृत करते हैं । म तौत प्रसिद्ध मीमाराक माने जाते हैं, सम्भवतः अभिनव ने उनसे मीमासाशात पढ़ा हो। साहित्यशास्त्र का अध्ययन अभिनव ने मोन्दुराज से हो किया होगा। अभिनवगुप्तपादाचार्य एक और शैव दार्शनिक थे, दूसरी और साहित्य में व्या. नागादी तया ध्वनियादी । अत. उनका रसपरक सिद्धान्त शैवदर्शन तथा व्यसनाबाद की माधारमिति पर स्थापित है। ये रस को व्यंग्य मानते हैं, तथा भरतसूत के 'संयो. गात्' तथा 'निष्पत्ति' के 'व्यायव्यप्रकभावरूपात्' तथा 'अभिव्यक्ति अर्थ करते है। १. तस्यात्मज श्चुखुलकेति बने प्रसिद्धचन्दावदाताधिषणो नरसिंहगुप्तः । यं सशानररामजनशुवित्त माहेश्वरी परगलंकुरते स्म गति ॥ (तन्त्रालोक ३७) २. भन्दुराजचरणाजकृताधिवागहृयश्रुतोऽभिनवगुप्तपदाभिधोऽहम् ॥ (घन्यालोकलोचन) ३. दृष्टभ्यहो. पाण्डेय 'अभिनवगुरा हिस्टोरिकल एण्ड फिलोसोफिकल स्टडी' इसो विषय या विशद नीचन मेने अन्यत्र अपने 'ध्वनि सम्प्रदाय और उसके सिद्धान्त' नामक गवेषणापूर्ण प्रवन्ध फे प्रथम भाग में किया है, जो शीघ्र ही प्रकाशित होगा।
[१६] वे रस को स्पिति सहृदय में मानते हैं तथा रसदशा को शैवों की विमर्शदशा' से जोदते जान पड़ते हैं। धनञ्जय व धनिक को अभिनवगुप्त के सिद्धान्तों का पता था या नहीं, यह नहीं कहा जा सकता, क्योंकि ये दोनों अभिनय के समसामयिक ही है। पर, इन्हें आनन्दवर्धन के व्यक्तिवादी मत व रससम्बन्धी मत का पूरा पता या, जो अभिनव रो भी पहले रस के व्यंग्यत्व की स्थापना कर चुके थे। तभी तो इन्होंने दशरूपक की कारिका में तथा अवलोकपत्ति में व्यधना जैसी तुरीया वृत्ति की कल्पना का, तथा रस के व्यंग्यत्व का डटकर विरोध किया है, इस हम देखेंगे। रस की चर्वणा, तथा निष्पत्ति के मत के अतिरिक्त अभिनव ने एक और नई स्थापना की है, वह 'शान्त रस' की स्थापना है। भरत नाट्यशास्त्र में आठ ही रसों का हवाला है। किन्तु भरत के ही आधार पर अभिनव ने 'भारती' में शान्त रस जैसे नवम रस की स्थापना की है, जो अभिनव के शैवदर्शन वाले सिद्धान्त को सर्वथा अभीष्ट थी। धनञ्जय व धनिक शान्त जैसे नवम रस को नाव्य में स्थान - नहीं देते इसकी विवेचना हम भूमिका के अगले भाग में करेंगे । अभिनवगुप्त का समय दसवीं शती का अन्त तथा ग्यारहवीं शती का पूर्वभाग है। अभिनव को ईश्वरप्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी' को रचना १०१५ ई० में हुई थी, इसका निर्देश स्वयं अभिनव ने ही किया है। इति भवतितमेशे यत्सरान्ते युगांशे, तिधिशशिजलधिस्थे मार्गशीर्पावसाने। अगति विद्वितबोधा मीश्वरप्रत्यभिज्ञां ध्यवृष्ठत परिपूर्णा प्रेरितश्शम्भुः पादैः॥ इस पद्य के अनुसार यह रचना कलिसंवत् ४०९० अथवा १०१५ ई. में हुई थी। अभिनवगुप्त का रससिद्धान्त ही मम्मट से लेकर जगमाय पग्डितराज तक मान्य रहा है। संस्कृत के अलवारशास्त्र व नाट्यशास्त्र में अगिनवगुप्त की गणना पहली घेणीके प्राचार्यों में होती रही है । (६) धनजया प्रस्तुत अन्य दशरूपक' के रचयिता धनजय विष्णु के पुत्र ये। ये मालना के परमारनंश के राजा मुन्ध (वाक्यतिराज द्वितीय) के राजकपि थे, जिनका समय ९७४-५९५ ई. माना जाता है । धनजय ने अपने पिता व ता का निर्देश अपने अन्य के हो अन्त में किया है:- विष्णोः सुतेनापि धनजयेन विद्न्मनोरागनियन्धहेतुः। आविष्ठत मुखमहीशगोष्ठीदग्भ्यभाजादशल्प मेतत् ॥ पनजय को 'पशुरूपक' की फारिकाएँ भरत के नाटपशास्त्र के ही सिदान्तों का संक्षेप है । यही कारण है कि दो एक स्थानों पर किये गये पुछ परिवर्तनों के अतिरिक, जो प्रमुखतः नायिभेद तथा गार रस के विषय में हैं,-धनप्रय भरत के नाट्यशास्त्र का ही आश्रम लेते हैं। वैसे धनजय प्राज्ञिक, वाचिक या माहार्य अभिनय के उस विस्तृत वर्णन में नहीं आते, जो हमें नाटपशाम में उपलब्ध होता है । धनजय [ १७ ] या प्रमुख लक्ष्य बस्तु, नेता तथा रस के विश्लेषण एवं रूपों के प्रमुख दशभेदों के वर्णन तक ही सीमित है । धनञ्जय को अभीष्ट भी यही था, क्योंकि उनका लक्ष्य तो केपाल 'नाट्यानां किन्तु किश्चित् प्रगुणरचनया लक्षणं सहिपामि- यही रहा है । पनमय के नाठकसम्बन्धी, रससम्बन्धी या अन्य मतों का विशद विवेचन अगले पृष्ठों में किया जा रहा है। धनञ्जय के दशरूपक तथा इनके भाई के द्वारा इसी के कारिकाभाग पर लिखी वृत्ति अवलोक का एक विशेष महत्व है । भगाय व धनिक के घस्तुविभाग, पाँच अर्थप्रकृति, अवस्था तथा सन्धियों के अगाविभाजन, अर्थोपक्षेपकों का वर्णन, नायक व नायिकाओं का अवस्यानुरूप मनोवैज्ञानिक विभाजन, उनके सहकारियों का वर्णन, रसव उनके साधनों का विश्लेषण का प्रभाव पाद के अलवारशास्त्र व नाटयशास्त्र के प्रन्यों पर स्पष्ट परिणक्षित होता है। विद्यानाय के प्रतापन्द्रीय का नायकनायिकामेद इसका स्पष्टतः ऋणी है । विश्वनाथ के साहित्यदर्पण के तृतीय परिच्छेद का नायक- नायिकाभेद तथा पाठ परिच्छेद का दृश्यकाव्यविवेचन दशरूपक ही प्रभावित यही तक नहीं भामुदत्त की रसमपरी, रसतरङ्गिणी, भावसिन की रसबरसी आदि रस पनायिबागेद के अन्य भी इसके प्रभाव से अश्ते नहीं । १६ वीं शताब्दीका गुणचन्द्र व रामचन्द्र का लिखा हुआ नाट्यशास्त्र का मन्य 'नाटयदर्पण' गी दशरूपक पो किसी हद तक उपजीव्य बनाकर चलता है । दशल्पक पर धनिक, पहुरूपमा नृसिदभा, देवपाणि, क्षोणीधरमिन, तया कूरवीराम को टीकाएँ हैं । इनमें घनिक की अवलोक नामक वृत्ति ही प्रसिद्धि पा सकी है। (७)धनिका-निक 'दशरूपक' कारिकाओं के रचयिता धमषय के ही छोटे भाई थे । अबलोक के मत्येक प्रकाश के अन्त की पुष्पिका से यह स्पष्ट है कि ये विष्णु के पुत्र पे- इति श्रीविष्णुसूनोर्धनिफस्य शती दशरूपायलोके रसविचारो नाम चतुर्थः प्रकाशः समाप्तः ॥ कुछ लोगों के मतानुसार कारिवागाग तया प्रतिभाग दोनों एक ही व्यक्ति की रचनाएँ है । कई अलद्वारमन्यों में दरारूपक को घनिक की रनमा यताया जाता है । यही कारण है कि कारिपाकार तथा तिकार को अभिषता वाला प्रान्त मत प्रचलित हो गया है । अवलोक में ऐसे कई स्थल है जो इस बात का पर निर्देश करते है कि पारिपामाग तथा पृत्तिभाग दो मिस मिलध्यपियों की रचनाएँ है। पनिक के मतों का विशेष विवेरन हम भागे करेंगे। वैये पनिफ पर अमिधाबादी सपा व्यसनाविरोधी है। वे रस के सम्बन्ध में भानायक के मत को मारते है, यद्यपि दरा मत में मोलद व शक के मतों का कुछ मिश्रण कर लेते हैं । ये शान्त रस फो नार में स्थान नहीं देते। उनके इन सिद्धान्तों को हम आगे देखेंगे। पनिक ने 'भवलोक के अतिरिक्त साहित्यशास्त्र पर एक पूसरे अन्य को भी रचना की थी, यह काम्य निर्णय या । धनिक अपनी गृत्ति के चतुर्पधारा स्वयं इस - [ १८ ] अन्य का उल्लेख करते हुए इससे ७ कारिकाएँ उद्धृत करते हैं-'यथायोचाम काम्यनिर्णये- सम्भात यह अन्य कारिकायों में या । धनिक स्वयं कवि भी थे । वे स्थान २ पर उदाहरणों के रुप में अपने पद्यों को भी उद्धृत करते हैं। (6) विश्वनाथ:-साहित्यदर्पणकार विधनाय महापात्र अलङ्कारशास्त्र के श्राचार्यों में माने जाते हैं । साहित्यदर्पण में इन्होंने नाटयशास्त्र सम्बन्धी मतों का भी उल्लेख किया है । उनके प्रन्थ का पाठ परिच्छेद दृश्यराव्य का विवेचन करता है । विश्वनाथ व्यञ्जनावादी हैं, तथा रस के विषय में उनके सिद्धान्त अभिनवगुप्त के मत की ही छाया है । हाँ, वे एक दसवें रस-वात्सल्यरस-यो स्थापना करते हैं। विश्वनाथ का समय चौदहवीं शताब्दी में माना जा सकता है, क्योंकि साहित्य- दर्पण में उदाहृत पद्यों में एक पद्य में अलाउद्दीन-सम्भवत अलाउद्दीन खिलजी-का वर्णन मिलता है । विश्वनाथ महारवि चन्द्रशेसर के पुनथे । जो पलिगराज के सान्धिविप्रहिक थे। विश्वनाय ने साहित्यदर्पण के अतिरिक्त कई काव्यनाटकादि की रचना की थी, जिनरा उल्लेख दर्पण में मिलता है। (९) रामचन्द्र-गुणचन्द्रकृत 'नाट्यदर्पण:- 'नाटयदर्पण' के ये दोनों रचयिता हेमचन्द्राचार्य के शिष्य थे । इनका समय १२ वीं शताब्दी माना जा सकता है । 'नाटपदर्पण' का नाटयशास्त्र के अन्यों में एक दृष्टि से महत्त्व है । वह यह है कि नाटयदर्पण में कई प्राचीन एवं अनुपलभ्य काव्यों तथा नाटकों के उद्धरण पाये जाते है । विशाखदेव या विशाखदत्त के देवीचन्द्रगुप्तम् जैसे कई महत्त्वपूर्ण अनुपलब्ध नाटकों का पता इसी प्रन्थ से मिलता है । कहा जाता है रामचन्द्र ने लगभग १०० प्रन्यों की रचना की थी, जिनमें कई नाटक तया काव्यप्रन्य थे । रामचन्द्र के तीन चार अन्य प्रकाशित हो चुके हैं । नाग्यदर्पण का प्रकाशन गायक्वाइ ओरियन्टल सीरिज से हुवा है। संस्कृत के नाटको व नाटयशावपरक प्रन्यों के इतिहास पर दृष्टिपात करते समय हमें यह पता चलता है कि १३-१४ वीं शती के बाद सैकड़ों नाटकों की रचना हुई पर एक भी प्रन्थ नारपशास्त्र पर नहीं लिया गया । इसका क्या कारण है या दृश्यकाव्य वस्तुत' रसमस की वस्तु है, खाली पदने की नहीं । यवनों के भारत में आने से भारत की पला को कुछ धका अवश्य पहुँचा, विशेषकर संस्कृत दृश्यकाव्यों के रहमय को । साय ही कवियों की प्रवृत्ति भी पाण्डित्यप्रदर्शन च जटिलता की ओर इतनी हो गई कि-रङ्गमञ्च से धीरे धीरे सम्पर्क छूटता गया । इसके बीज हम मुरारि के अनर्धरामय में ही देख सकते हैं। दूसरी ओर रङ्गमञ्च का प्यान रसने पाले नाटकों में से भी कई नाटयशास्त्र में वर्णित परसन्धियों के अड्डों ( सन्ध्या ) के निर्वाह के फेर में इतने पड़ गये कि स्वतन्न कला में ये धाधक से हो गये । महनारायण के वेणीसहार, तथा हर्ष की रमावली में इन सन्ध्यहों का पूर्ण निर्वाह देसा जा सकता है। १. सन्धी सर्वस्वहरणं विप्रहे प्रागनिग्रहः । अरावहीननृपती न सन्धिर्न च विप्रहः । १ नाटक [] यह दूसरी बात है कि यह निर्वाह हर्ष की रमावली के सौन्दर्य को पुष्ण नहीं कर पाया है । साथ ही मरम्पगयादी भारतीय पण्डितों प ऋत्रियों ने भरत या अमि- नवगुप्त की नाटयशास्त्र सम्बन्धी तथा रससम्बन्धी मान्यताओं को अन्तिम मान लिया या । वे इन्हीं का अध्ययन, मनन १ विवेचन करते रहे । नाट्यशास्त्र च रसशास्त्र में नई कल्पना, नई उद्भावना, नये विचारों के प्रदर्शन की लगन न रहो । फलत' नये प्रन्थ न बन पायै ! हम देख चुके हैं 'भारती' के याद के नाटयशाम के अन्य या तो भरत के नादयशास्त्र का संक्षेप है, या दशहा को नकल । रससिद्धान्त में ये अभिनव के पृष्ठगामी हैं । साथ ही ऐसे प्रन्यों की गणना एक, दो, या अधिक से अधिक तीन ही है । इस गणना में हम को रस व नायिकाभेद के संस्कृत प्रन्यों को लोप देते है। (३) धनञ्जय कृत कारि व धनिककृत वृत्ति (अन्य का संक्षेप) जैसा कि हम पता चुके हैं दशरूप : कारिकायों में लिखा हुचा प्रन्य है। धनजय ने इसके कारिका भाग की रचना की है। इसको 'अदलोक' नामक पति के रचयिता धनिक है। दशरूपक चार प्रकाशी में विभक्त मन्य है। इसके प्रयम प्रकाश में रूपयों का वर्णन, पथावस्तु या वस्तु के ६४ संध्या का वर्णन, तथा अर्थोपक्षेपकों का वर्णन, किया गया है। द्वितीय प्रकाश नायक तथा नायिका के भेद, उनके गुण, शियाएँ तथा उनके सहनरों का वर्णन है। इसी प्रकाश में नाटकीय वृत्तियों का वर्णन किया गया है। तृतीय प्रकाश में दशरूपों में प्रमुख नाटक का विशद रूप से सलक्षण पिरलेपण किया गया है । तदनन्तर अन्य मौ रूपकों के लक्षणों का निर्देश है। चतुर्थ प्रकाश में रस की विवेचना है। प्रथम, द्वितीय, तृतीय एवं त्वतुर्थ प्रकारा के पारिका भाग में ममरा ६८,७२, ७६, तथा ८४ कारिकाएँ है। इस गणना में श्रन्त के दो पदया, प्रशस्ति के पय छोप दिये गये हैं। पारिका भाग में ७ पद्यों को छोड़कर बाकी सारी पारिवाएँ अनुष्टुप् छन्द में हैं। धनिककृत वृत्ति गद्य में है। इसी प्रतिभाग में लक्षणों के उदाहरणस्वरूप फई भाज्यों तया नाटकों से पद्यों को उद्धृत किया गया है। अवलोक के अभाव में दशरूपक की कारिफाएँ अपूर्ण हैं, इसी से दशरूपक की 'अवलोक' इति का महत्व स्पष्ट हो जाता है। यहाँ पर सावलोक दशक की स्परेसा संक्षेप में दे देना यावश्यक होगा। प्रपम प्रकाश पारम्ग में मनलचरण के पश्चात् कारिकावार ने दशरूपक फ्री रचना के रद्देश्य को बताया है। यही वह यह भी सईत करता है कि पशल्पक कुछ नहीं भरत के नाट्यशास्त्र के मतों का ही संप है। तदनन्तर यह 'रूपकों में रस ही प्राण वानु है' इस मत का निर्देश करता है। इसका के पल की भांति, इस प्राय का ४९०० [२०] भी पल 'रस' सिद्ध हो जाता है। भारतीय शास्त्रपरम्परा में शान के ४ अनुपन्ध' माने जाते हैं, इन्हें 'अनुवन्ध चतुष्टय' कहते हैं। ये अनुवन्ध है-विषय, अधिकारी, सम्बन्ध तथा प्रयोजन है। दशरूपककार ने प्रारम्भ में ही इनका विवेचन किया है। दशरूपक का विषय क्या है, इसके अध्ययन का अधिकारो कौन है, इस अन्य का विषय से क्या सम्पन्ध है, तथा इस प्रन्य रचना का क्या प्रयोजन है। प्रथम प्रकाश की चतुर्य कारिका में घनाय ने बताया है कि इस प्रत्य का विषय नाट्यवेद है। वह नाट्यवेद, जिसकी रचना में विरिधि, शिव तया पार्वती ने योग दिया है, जिसकी प्रयोगरचना भरतमुनि ने की है। ऐसे दिव्य, शिाल नाट्यवेद का संक्षेप, इस ग्रन्थ का विषय है, और उसका सक्षिप्त रूप रराना धनपय का अभीर प्रयोजन । उद्धृत्योद्घृत्य सारं यमखिलनिगमानाट्यवेदं विरचि श्य यस्य प्रयोग मुनि रपि भरतस्ताण्डवं नीलकण्ठः । शर्वाणी लास्य मस्य प्रतिपद मपरं लदम का कर्तुमीप्टे नाट्यानां किं तु फिञ्चित् प्रगुणरचनया लक्षणं संक्षिपामि ॥ इसके बाद की कारिका में घनाय ने अधिकारी का सङ्केत करते हुए बताया है कि पण्डित लोग तो भरत का नाट्यशास्त्र ही पढ़ सकते हैं। हाँ, मन्दबुद्धि यहाँ अपनी गति नहीं पाते इसलिए उन लोगों के लिए ही नाट्यवेद का संक्षेप किया गया है। व्याकीणे मन्दबुद्धीनां जायते मतिविभ्रमः। तस्यार्थस्तत्पदै रेव संक्षिप्य क्रियतेऽखसा॥ आगे चलकर धनजय नाय्यवेद,-शाम ही दशरूपक-के सम्बन्ध का निर्वाह परते हुए उसके प्रयोजनरूप 'आनन्दास्वाद' का सङ्केत करते हैं। थनुवन्ध चतुथ्य के प्रकाशन के बाद फारिकाकार प्रस्तुत विषय की ओर बढते हैं। श्रारम्भ में नाटप, रूप, तया रूपक को परिभाषा दी गई है, तथा रूपकों के दस भेदों का उद्देश-नाममात्र के द्वारा उनका सङ्कीर्तन-किया गया है । इनके लक्षण अागे तृतीय प्रकाश में दिये गये । इसके बाद नृत्य तया नृत्त, के परस्पर भेद व इनके प्रकारों का सङ्केत है,क्योंकि ये रूपकों के अन्तर्गत प्रयुक्त होते हैं, उसके उपकारक व शोभाविधायक हैं। सदनन्तर रूपक के ३भेदकों-वस्तु, नेता तथा रस का निर्देश पर वस्तु की विवेचना भारम्भ की जाती है । यस्तु के आधिकारिक तथा प्रासनिक दो भेद बताकर पताका के प्रसङ्ग में पताशस्यानकों का वर्णन किया गया है। फिर वस्तु के भेदों तया उसकी पाँच भर्यप्रकृतियों, पाँच अवस्याओं, पाँच सन्धियों, ६४ संघ्यहों का सलक्षण वर्णन है। फिर विष्कम्भक, प्रदेशक,चूलिका, श्रङ्कास्य तथा अड्वावतार इन ५अर्थोपक्षेपकों का निर्देश है। द्वितीय प्रराश में रूपरों के दूसरे भेदक नायक या नेता का विवेचन है। नायक के गुणों का उल्लेस करने पर उसके ४ भेद, धीरोदात्त धीरशान्त, धीररलित तथा १ अनुबन्ध उसे कहते हैं, जो हमें किमी शान में प्रात्त होने की प्रवृत्ति के प्रयोजकज्ञान का विषय है अर्थात् वह घस्नु जो हमें किसी प्रवृत्ति की ओर ले जाते है।-प्रवृत्तिप्रयोजाशनविषयत्व मनुवन्धत्वम् ।'
[२१] धीरोद्धत्त के लक्षण उपशित किये गये हैं। इसके बाद पताकानायक-पौठमर्द, तथा अन्य नेतृराहचरों का वर्णन है। तदनन्तर नायक के सात्त्विक गुणों का, सलक्षण वर्णन है। नायक के बाद नायिका का विषेचन प्राप्त होता है। नायिका के तेरह भेदों का सलक्षण वर्णन करते हुए उसके अवस्थानुरूप स्वाधीनभर्तृकादि पाठ मेदों का भी लक्षण किया गया है । तप नायिका के वीस यलद्वारों-शारीरिक, अयाज, तथा स्वभावज अलङ्कारों का-वर्णन मिलता है। इसके बाद नायक के परिच्छद ( Paraphernalis) का वर्णन कर उसके व्यापाररूप चार नाटयवृत्तियों-कैशिकी, रावती, धारभटी तथा भारती का निर्देश किया गया है। इसी सम्बन्ध में प्रथम तीन वृत्तियों के प्रमों का सलक्षण वर्णन है । तदनन्तर कौन पात्र किसे किस तरह सम्बोधित करे इसका उल्लेख है। तृतीय प्रकाश में काम्य की स्थापना या प्रस्तावना के प्रकारों का वर्णन है । यही भारती वृत्ति तथा उसके अगों का वर्णन है । तदनन्तर प्रस्तावना के तीन प्रकारों- कोद्वात, प्रत्तक, तथा अवलगित का निर्देश है । इसके बाद तेरह बाध्यही का वर्णन है । इसी प्रकाश में रूपकों के प्रकरणादि अन्यभेदों का लक्षण बताया गया है। दशरूपक के चौथे प्रकाश का विशेष महत्त्व है । इस प्रकाश में रस की विवेचना की गई है । रस की परिभाषा बताने के बाद उसके साधनों-विभाव, अनुभाव, सात्विक भाव तथा व्यभिचारियों का विस्तार से वर्णन किया गया है। अबलोककार ने उन्हें सुन्दर उदाहरण देकर स्पष्ट किया है। तदनन्तर स्थायी भाव के स्वरूप का वर्णन है। यहीं प्रतिकार ने रसविरोध तथा भावविरोध के सम्बन्ध में अपने मत उपन्यस्त किये हैं। इसके बाद याठ भावों तथा पाठ रसों का उल्लेख करते हुए 'शम' नामक स्थायी भाव की स्थिति मा नाट्य में सण्डन किया गया है । इसी प्रसङ्ग में रस के व्ययत्व वाले व्यनिवादी सिद्धान्त का डटकर खण्डन किया गया है । धनिकार के मतों वो उदाहत करके पुतिगर उनके व्यसना पृत्ति वाले मत का खण्डन करता है, तथा यह सिद्ध करता है कि व्यायार्थ जैसी कोई पस्तु है ही नहीं, यह सब तात्पर्य ही है। यहीं वह रस के भावनावादी सिद्धान्त पर जोर देता है तया विभावादि को भावक एवं रस फो भाव्य मानता है । रस के स्वरूप तथा भेदों की विवेचना करने के बाद अन्य की परिसमाप्ति हो जाती है। यहाँ हमने दशरूपककार के कारिका भाग हा वृत्तिगाग के विषय का सक्षेप देने की चेष्टा की । दशरूपक्कार व प्रतिकार के नाट्यशास्त्र एवं रस सम्बन्धी अभिनव सिद्धान्तों या मान्यताओं का विशद विवेचना हम भूमिका के अगले भाग में करेंगे। रूपक, उनके भेद व भेदक तत्व भंगरैगो में जिस अर्थ में 'दामा (Drama) शब्द का प्रयोग होता है, उस भर्य में संस्कृत साहित्य में पक' शब्द का प्रयोग पास माता है । से अधिकतर इस माग्त शब्द का अर्थ 'नाटक शम्द के द्वारा किया जाता है, किन्तु नाटक रूपों [ २२ ] का एक भेद-मान है, यह स्पकों के दश प्रकारों में से एक प्रगर है। वैसे यह प्रचार रूपक का प्रमुख भेद है । जब हम काव्य की विवेचना करने बैठते है, तो देखते हैं कि काव्य के दो प्रकार हो सकते है-एक श्रव्य वाम्य, दूसरा दृश्य काव्य। पहला वाम्य मुनने या पदने को पस्तु है, इसमें प्रवणेन्द्रिय के द्वारा युद्धि एवं हृदय का सम्पर्क काव्य के साथ होता है। दूसरा वाव्य मुख्य रूप से देखने की वस्तु है, थैसे यहाँ भी पानों के संलाप में भ्रष्यत्व रहता है। श्रव्य काव्य का कोई रङ्गमञ्च नहीं, पह अध्ययन- कक्ष की वस्तु है, जब कि दृश्यकाव्य रामच को वस्तु है, उसका लक्ष्य अभिनय के द्वारा सामाजिकों का मनोरञ्जन, उनमें रसोरोघ उत्पन्न करना है। यही दृश्य काव्य 'रूपक' कहलाता है । इसे 'रूपक' इसलिए कहा जाता है कि इसमें मट पर तत्तत् पार का, रामादि का आरोप कर लिया जाता है। उदाहरण के लिए 'भरत-मिलाप' या 'रामराज्य के चसचित्रों में एक मटविशेष-प्रेम श्रदीय-पर रामा, टसकी अवस्था का, पारोप किया गया है। प्रमुख रूप से रूपक के दरा भेद किए गये हैं। वैसे तो रूपकों से ही सम्बद्ध १८ उपरूपक माने जाते हैं और भरत तथा विश्वनाथ ने उनका उल्लेख किया है, किन्तु धनजय च धनिक ने उपस्पको वा वर्णन नहीं किया है । यह दूसरी बात है कि तृतीय प्रकाश में प्रसङ्गवश उपरूपक के एक प्रमुख भेद-नाटिका-का विवेचन मिलता है । प्रकरणिका, माणिका, हल्लोश, धीगदित, रासक श्रादि दूसरे उपरूपकों का वहाँ कोई सईत नहीं। वस्तुत इनमें से कई भेद रूपकों के ही श्रवान्तर रूप हैं और कुछ भेद ऐसे भी हैं, जिनका सम्बन्ध काव्य से न होकर प्रमुखत सहीत कला व नृत्य-कला से है । रूपकों के ये दस भेद-पस्तु, नेता, तथा रस के आधार पर किये जाते हैं। किमी एक रूपक-प्रकार की स्थावस्तु (Plot), उसका नायक-नायक को प्रकृति, तथा उसका प्रतिपाद्य रस उसे अन्य प्रकारों से मिन्न करता है। इसी प्रकार इन दसों रूपों में से प्रत्येक एक दूसरे से, वस्तु, नैता, व रस की दृष्टि से भिश है । ये दस रूपफ-ये है। माठक, प्रकरण, माण, म्यायोग, समनवार, रिम, हामृग, श्रम चीथी भौर प्रहसन । नाटक मथ प्रकरणं भाण व्यायोगसमयकारडिमा। ईहामृगाचीथ्यः प्रहसन मिति रूपफाणि दश । पशुस्मककार की पद्धति का वर्णन करते हुए हमारे लिए ठीक यह होगा कि पहले इन तीन भेदकों-वस्तु, नेता तथा रस का विश्लेषण कर दे, फिर प्रत्येक रूपक की विवेचना करें । इन तीन भेदकों के विषय में अधिकतर यह माना जाता है कि ये नाटक के तीन सत्त्व है, ठीक वैसे ही जैसे भरस्तु ने रूपक के प्रमुख रूप से प्रासद १.रूप तत्समारोपात् ॥ (कारिका) नटे रामायवस्थारोपण वर्तमानलादपक मुखचन्द्रादिवत् ।। (रारूपयवलोफ) ३. नहा रसस्तेच मेएफ-(नई) [२२] (Tragedy ) में ६ था माने हैं । अरस्तु के मतानुसार रूपक के छः मन 1. इतिास, २. प्राचार, ३. वर्णनशैली, ४. विचार, ५. दृश्य तथा ६. गीत है। कुछ विद्वान् इन्हें तत्त्व मानने से सहमत नहीं । ये इन्हें केरल 'भेदक' पहना टीक समझते हैं। किसी रूप के साथ उनके मत से १. कथा, २. संवाद और ३. शानिर्देश ये तीन हैं। इन्ही तीनों में घरस्तू के रूपक यो छदाँ म मन्तावित हो जाते हैं। हमें यहाँ भेदकों का ही वर्णन करना अभीय है। (१) कथा, घस्तु या इतिवृत्त:-रूपों का पहला भेदक वस्तु है । इसे ही क्या, इतिवृत्त, पयावस्तु ( Plot ) आदि नाम से भी पुकारते हैं । वस्तु दो प्रकार की होती है. एक आधिकारिक, दूसरी प्रासनिक । आधिकारिक फयारस्त मूल पस्तु, तथा प्रासहिक कथावस्तु गौण होती है । थाधिकारिक वस्तु की यह संज्ञा इस लिए की गई है, कि इसका सम्बन्ध 'अधिकार' नायर के फलस्वामित्व, या फलप्राप्त करने की योग्यता से है । आधिकारिक वस्तु रूपक के नायक के फल की प्राप्ति से सम्बद्ध होती है, बद नायफ के जीवन को उस महासरिता से सम्बर है, जो निचित पल की, निश्चित लक्ष्य की ओर पढ़ती है । प्रारातिक वस्तु इसी महासरिता में गिर कर उसके प्रवाह में अपनापन यो देने वाले, किन्तु थाधिकारिक वस्तु को गति देने वाले द्र नदी, नंद व नाले हैं। उदाहरण के लिए रामायण की वस्तु में रामचन्द्र की कथा श्राधिकारिक घस्तु है, मुग्रीव या शवरी की घया प्राप्सनिक । प्रासनिक धातु फे भी दो भेद किए जाते है-~पताका तथा प्रकरी । जो कथा काव्य या रूपक में परायर चलती रहती है-सानुयन्य होती है उसे पताका कहते है । इस पताका फया पस्तु या नायक अलग से होता है, जो अधिकारिक वस्तु के नायक का साथी होता है, तथा उससे गुणों में कुछ ही न्यून होता है । इसे 'पताका- नायक' कहते है । उदाहरणार्थ, रामायण का गुपीत, या मालतीमाधव का मकरन्द पताका-मायक है, हगा उनी कया पवाया । जो कथा काय या रूपक में कुछ ही फाल तक पलकर शक जाती है, यह 'प्रकरी' नामफ प्रासारिक कथा वस्तु होती है । रामायण की शबरी वाली कहानी 'मकरी' है। जैसा कि हम पहले पता चुके हैं पताका र भकरी प्राधिकारिफ क्या के प्रवाह में ही योग देती है। सुप्रोव व शपरी की कहानी राम कथा को आगे बढ़ाने में सहकारी सिद्ध होती है। इरा इचिवृत्त के मूल तथा प्रकृति के विषय में भी नाव्यशास्त्र के प्रन्यों में साईत दिया गया है। इतिहस मूल को दृष्टि से तीन तरह का होता है:-१ प्रख्यात, २ उपाय रामा ३ मिश्र। प्रख्यात इतिवृत्त रामायण, महाभारत, पुराण या वृहत्कथादि ऐतिहासिक अन्यों के आधार पर होता है। इस प्रकार का इतिवृत्त प्रसिद्ध कयासे सम्बद्ध रहता है। उदाहरणार्य, भवभूति के उत्तरचरित तथा मुरारि के अनपराधव की कथा रामायण से मी गई है। कालिदास के 'अभिज्ञानशाकुन्तलम् की कथा महाभारत तथा पासुराण से बात है । भास के स्वप्नवासवदत्तम्, प्रतिक्षायौगन्धरायणम् विशाखदत्त [ २४ ] का मुद्राराक्षस ऐतिहासिक इतिवृत्त से सम्बद्ध है। इनका मूल गुणाव्य की हत्या में भी है। जैसा कि हम देखेंगे, नाटक के लिए यह परमावश्यक है कि उसका वृत्त प्रख्यात हो । दशरूपककार ने इतियत्त के मूल के विषय में लिखते हुए कहा है। इत्याचशेप मिह घस्तुविभेदजातम् , रामायणादि च पिभाव्य वृहत्कथा च । श्रासूनये त्तदनु नेटरसानुगुण्या- चिनां कथा मुचितचारुवचःप्रपञ्चैः ।। प्रख्यात इतिहत्त के निर्वाह में कवि या नाटककार को बड़ी सावधानी बरतनी पड़ती है । वह कथा के प्रख्यात इतिवृत्त में अपनी कल्पना के अनुसार हेरफेर करके उसकी वास्तविकता को नहीं बिगाड़ सकता । ऐमा करने से सामाजिदों की वृत्ति को दुःख होता है। उदाहरण के लिए बझाली कवि माइकेल मधुसूदनदत्त के 'मघनादवघ' में मेघनाद का उच श्रादर्श रूप में उपस्थित करना प्रत्यात इतिवृत्त को ठेस पहुँचाता है। इसी तरह का हेरफेर कथा के प्रख्यातत्व को क्षुण बरता है। इसका तात्पर्य यह नहीं कि कवि प्रख्यात इतिवृत्त में कोई हेरफेर कर ही नहीं सकता। यदि प्ररयात इतिवृत्त की गति कुछ ऐगी हो कि वह नायक के गुणों, उराके धीरोदात्तत्व में बाधक होती हो, तो ऐसा दशा में रस के अनौचित्य दोष को हटाने के लिए क्या के उस अंश में कवि मजे से परिवर्तन कर सकता है। शकुन्तल नाटक में विवाह के बाद भी शकुन्तला को भूल जाने की दुप्यन्तवाली घटना पमपुराण में है। वहाँ दुर्वासाशाप का कोई हवाला नहीं। यह पटना दुष्यन्त के कामुकत्व को स्पष्ट कर उसके चरिन को नीचा गिरा देती है। कालिदास ने दुष्यन्त के धीरोदात्तत्व को अक्षुण बनाए रखने के लिए दुर्वासाशाप की कल्पना कर ली है। इसी तरह भवभूति ने भी अपने 'महावीर- चरित' में रामभद्र ( रामचन्द्र ) के धीरोदात्तत्व की रक्षा के लिए पालिवघ की प्रसिद्ध घटना में हेर-फेर कर दिया है। प्रख्यात घटना है कि राम ने वालि का वध छल से किया था, पर यह रस के ठीक नहीं पड़ता, न राम के उदात्त चरित्र के हो। शत भवभूति ने यह कल्पना की है कि वालि स्वय रामचन्द्र से लड़ने पाया और मारा गया। उत्साय इतिवृत्त फपि का स्वयं का कल्पित होता है-उत्पाय कविकल्पितम् । इस इतिवृत्त का प्रयोग कई प्रकार के रूपों में जाता है, यथा प्रकरण, भाण, प्रहसन । शुद्रक के मृच्छकटिक, भवभूति के मालतीमाघव आदि की कथा उत्साय ही है। मिथ इतिमत्त की पृष्ठभूमि प्रख्यात होती है, पर उसमें बहुत-या यंश कस्थित भी होता है। हाक के समस्त इतिशत को हम कछ स्थितियों में याँट लेते है। इवित्त को पाँच अर्यप्रकृतियों, पाँच अवस्थामा तया पाँच सन्धियों में विभक्त किया जाता है। १ विचिन्तयन्ती य मनन्यमानसा तपोधन वेसिन मामुपस्थितम् । स्मरिष्यति त्वां म स घोषितोऽपि सन् का प्रमत्त प्रथम कृता मिव (शाकुन्तल, चतुर्थ भार) . ५ कार्य फलागम [ २५ ] अर्यप्रकृतियाँ अवस्थाएं सन्धियाँ १ बीज प्रारम्भ २ विन्दु यन प्रतिमुप ३ पताना प्राप्पयाशा गर्भ ४ प्रकरी नियताप्ति विमर्श उपसंहृति अर्थप्रकृतियों नादकीय इतिवृत्त के पाँच तत्त्व है। सारे नाटकीय इतिरत्त इन नाट- कीय तत्त्वों में विभक्त होते हैं। वीज, वृक्ष घोज की तरह वह तत्त्व है, जो अङ्कुरित होकर नायक के कार्य या फल की और पढ़ता है । विन्दु वह स्थिति है, जब वीज पानी में गिरे तेल के बूंद की तरह फैलता है । इस दशा में इविकृत का बीज फेल कर व्यक्त होने लगता है। पता के अन्तर्गत पताका नामक प्रासनिक इतिवृत्त, तथा प्रकरी में दूसरी प्रासङ्गिक वस्तु होती है, यह हम बता चुके हैं। अवस्थाए नाटकीय इतिहरा की गति को व्यक्त करती है। हम देखते हैं मानव का जीरन एक सीधी रेखा की तरह अपने लक्ष्य तक नहीं पहुँचता । यह टेड़ा मेढ़ा होता हुन्मा, अपने उद्देश्य तक पहुँचता है। मानव का जीवन सद्धर्ष से भरा हुआ ये सवर्ष ही उसे गति देते हैं। सङ्घर्ष की चट्टानों को तोडता, उन पर विजय प्राप्त करता, पाशा और उल्लास के साय मागे बढ़ता है। मोक्ष जैसे परमानन्द की स्थिति का विश्वासी भारतीय निराशावादी नहीं, गड्डों रो वह डरता नहीं, सवर्ष तो उसकी परीक्षा है। यदि यह उनसे निराश भी होता है, दुखी भी होता है, तो यह निराशा, वह दुख क्षणिक होता है। उरादुर के काले पर्दे के पीछे सुख, आशा, उल्लास, यानन्द का दिव्य प्रकाश लिमा रहता है। भाव यह है, भारतीय को इस बात में पूर्ण विश्वास है कि भीवन के राहों, चिन्नों पर अवश्य विजय प्राप्त करेगा, उसे अपने लक्ष्य तथा उद्देश्य की प्रामि में सफलता मिलेगी, इसमें लेशमात्र भी सन्देह नहीं। भारतीय जीवन के 'फ्लागम' में पूर्ण विश्वास करता है। मानवजीवन का लक्ष्य ही धर्म, अर्थ, काम तथा मक्ष चतुर्वर्ग फल प्राप्ति है। हम भारतीयों की धारणा पाचात्यों की तरह निराशावादी नहीं रही है । यह दूसरी बात है कि यहाँ भी कुछ निराशावादी सिद्धान्त अकरित हुए, पर आशाराद के प्रताप में वे कुलस-से गये। धान्य या नाटक का इतिवृत्त कुछ नहीं मानव-जीवन का प्रतिविम्य है। नाटक मानवप्रकृति का दर्पण है।' भारतीय नादक साहित्य में, (संस्कृत नाटकसाहित्य में) भारतीय मानन-जीवन पूर्णत प्रतिविम्यित हुवा है। यह दूसरी बात है कि उनमें मार्षदेशिकता, सार्वकालिकता, तया मानव-जीवन के शाश्वत-मूल्यों का भी प्रदर्शन है। भारतीयों के आशावादी दृष्टिकोण के हो कारण यहाँ के नाटकों के नायक के लिए फल माप्ति प्रारस्यक है। नाटक श नापक सदों तथा विनों को कुचलता, पददलित परता दुर्घर्ष गति से श्रागै यो, तथा अपने लक्ष्य को प्राप्त करे। परत यहाँ के इतिहत्तों का अन्त फल प्राप्ति में ही होगा, नायक की सारस्ता में ही [२६ ] होगा; फाप्रभार में या उसकी असफलता में नहीं। यही कारण है कि निराशावादी प्रीस की तरह भरत ने दुःखान्तक्यिों या त्रासदों ( Tregedy ) को जन्म नहीं दिया। यहाँ के नाटकों का इतिवृत्त सदा सुखान्त रहा है। यहाँ के समस्त नाटक उल्लासान्त या मुखान्त ( Comedies ) है। किन्तु प्रोस देश के प्रासदों की महत्ता की यहाँ कमी नहीं। भारतीय नाटक वस्तुतः उस अर्थ में 'कॉमेडोज़ नहीं, तो भर्व इसका वहाँ लिया जाता है। वहाँ 'कॉमेडी' के अन्तर्गत व्यंग्यात्मक प्रहसन पाते हैं। इस कोटि में हमारे भाण या प्रहसन पायेंगे। ट्रेजेडी के अन्तर्गत वे महापुरुषों के उदात्त चरित्र को हमारे सामने रखते हैं। ये महापुरुष विरोधी शक्तियों पर विजय प्राप्त नहीं कर पाते, फलत उनका करुणमय पतन पताया जाता है। निराशावाद का इस प्रकार का परिणाम आवश्यक है। यह दूसरी बात है कि इन महापुरुषों के चरित्र में कुछ ऐसी कमी अवश्य चित्रित की जाती है, जो उन्हें असफलता की ओर ले जाती है। शेक्सपियर के हेमलेट या मेकरेय उदात्त एवं महापुरुष हैं। किन्तु उनके चरित्र में कुछ कमी भी है, जो उन्हें मृत्यु के गर्त में ले जाती है। नाटक की समाप्ति के साथ सामाजिक के हृदय में उन महापुरुषों की नियतिगत दुरवस्था पर दया उमद थाती है, वह उनके प्रति सहानुभूति दिखाता है। दूसरी ओर वह जीवन के निराशामय वातावरण के विश्वास की पुष्टि करता है, कोरा भाग्यवादी बन जाता है। प्रीस की 'दुःखान्तकियाँ' हमें नियतिवादी पनाती है, संस्कृत के 'सुखान्त' हमें पुरुषार्थवादी। किन्तु इसका मतलब यह नहीं कि सस्कृत के नाटकों में सर्षों या विनों का चित्र उपस्थित करने में कोई कसर रहती है। सहर्ष व विनों का दुर्दम्य रूप उपस्थित करने में संस्कृत नाटककार कुशल है, और उसका नायक भी उन पर विजय पाने में सपल । यही कारण है कि यहाँ नाटकों में एक ओर प्रीस देश को 'दुखान्तकियों के तत्त्व की भी स्थिति होती है। यही कारण है कि कुछ लोगों ने संस्कृत के नाटकों को कोरे सुखान्त म कहकर 'मुखोन्मुष दुःखपरक' ('Tragi-comedy ) माना है। इस सब विवेचन से हमारा तासर्य यह है कि नाटकीय इतिवृत्त की ऊपर की पाँच अवस्थाओं में भारतीय दृष्टि से 'फलागम' का विशेष महत्व है। नाटकीय कथा वस्तु को पहली अवस्था प्रारम्भ है। इस अवस्था के अन्तर्गत नेता में किसी वस्तु की प्राप्ति की इच्छा होती है, यह दूसरी बात है कि उसन प्रकाशन कोई दूसरा पात्र करे। एमरी अवस्था प्रयत्न है, जब नायक उस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए यत्नशील होता है। तीसरी अवस्था प्रात्याश में, विघ्नादि के विचार कर लेने के बाद नायक को लक्ष्य प्राप्ति की सम्भावना हो जाती है। चौथी अवस्था-नियताप्ति में उसे सफलता का पूरा विश्वास हो, जाता है और पाचवी अवस्था में यह 'फ्लागम' तक पहुंच जाता है। उदाहरण के लिए शकुन्तला नाटक में 'यसं- शयं क्षत्रपरिग्रहक्षमा' आदि के द्वारा राजा में शकुन्तला की प्राप्ति की इच्छा के द्वारा प्रारम्भ अवस्था व्यक्त की गई है। तदनन्तर वह उसकी प्राप्ति के लिए दूसरे व सौसरे अह में प्रयत्नशील है। यहाँ 'प्रयल' नामक अवस्था है। चतुर्थ श्रा में amine दुर्वासा का शोष दिनस्य में उपस्थित होता है, किन्तु वहीं हमे पता चलता है कि उनका शोष शान्त हो गया है, और समानिक को नायक दुष्यन्त की शकुन्तला प्रामि का सम्भापना हो जाती है। यहा प्राप्त्याशा नाम रया है। छठे थाह में मुद्रिका के फिर से मिल जाने पर रायुन्तला प्राशि नियत हो जाती है। यह प्राप्ति गले श्रद में होता है, या यहा 'नियताप्ति है। सात अा में नायक य नायिस का मिलन हो जाता है, नायक को पल प्राप्ति हो जाती है। यहा करागम' नामक अनस्था पाई जाती है। अर्थप्रति तथा श्रवस्था के अतिरित नाटक सो स्थावस्तु में पाच सन्धिया भी होती है। इन्हें सन्धिया गरिए रहते हैं। ये पांच अर्थप्रकृतियों च पचि अवस्थाओं के मिश्रण से बनती है अर्थपरतयः पञ्च पञ्चायस्थासमन्विताः। यथासंख्येन जायन्ते मुसाधा. पञ्च सन्धयः॥ (प्रथम प्राश, बा.२२) जैसा कि ऊपर, पांचों अर्थप्रकृतियों, प्ररथाओं तथा मन्धियों के नामनिर्देश में बताया है इनरा कमरा एक दूसरे से सम्बन्ध है। चीन तथा प्रारम्भ मिलकर मुरा को, बिन्दु तथा प्रयत्न गिलका प्रतिमुख को, पतारा तया प्राप्त्याशा मिलकर गर्भ यो, प्रारी तथा नियताति मिलकर विमर्श को, एवं कार्य तया पागम मिलकर उप- सहति या निर्वहण को जन्म देते हैं। जैसे. शकुन्तला नाटक में प्रथम मद से लेकर द्वितीय के उस स्थल तक जप सेनापति थला जाता है, तथा दुप्यन्त कहता है- 'विश्राम लभतामिद च शिथिलल्यावन्ध मसानु" मुग्य सन्धि है। तद- मन्तर तृतीय श्रद के अन्त तक प्रतिमुरा सन्धि है । चतुर्थ असे पाच अंक के उस स्थल तक जहा गौतमी शकुन्तला या अवगुण्ठन हटाती है, गर्भसन्धि है। पाच पक्ष के शेष अंश तथा सम्पूर्ण पाठ भर में विमर्श सन्धि है। तदनन्तर सक्षम अह में निर्वहण सन्धि पाई जाती है। एक दूसरा उदाहरण हम रत्नावली से ले सकते हैं। रश्नावली के प्रथम व द्वितीय श्र, के उस स्थल तक जहा रानावली (सागरिका) वस्वराज उदयन का चित्र बनाना चाहती है, मुखसन्धि है। दूसरे ग्रह के शेष भार में प्रतिमुख सन्धि है । वृतीय श्र में गर्मसन्धि पाई जाती है। चतुर्थ श्रय में अग्नि काण्डवाली घटना तक विमर्श सन्धि है, तदनन्तर निर्वहण । पाँचों सन्धियों को ६४ सम्पयों में विभक्त किया गया है। हग यहा सन्ध्या के नामनिर्देशन में न जायेंगे। सन्ध्यों के इस विशाल विभाग के विषय में विद्वानों के दो मठ हैं कुछ लोग इन्ट जरिल तया अनावश्यः मानते हैं । डॉ ए बी कोच को मायता है कि नाटकीय इतिहत्त की दृष्टि से यह त्रिभारन कोई वास्तविक मूल्य नहीं रखता। दट यो मतानुसार प्रत्येक सन्ध्या का प्रयोग अपनी हो सन्धि में करना उपयुक्त १ कीय-सस्कृत ड्रामा २९९ ।
[२८] है। किन्तु, दूसरे विद्वानों के मत से सभ्यहों के लिए यह नियम निर्धारण ठीक नहीं । साथ ही यह भी श्रावश्यक नहीं कि नाटकादि में इन ६४ सन्ध्यझों का, सभी का प्रयोग किया जाय । वैसे भटनारायण के वेणीसहार जैसी नाटक-कृतियां ऐसी पाई जाती है, जिन्होंने इन सन्ध्यशों का पूरा निर्वाह करने की चेष्टा की है। पर इसका परिणाम यह हुआ है कि महनारायण को वेणीसहार के द्वितीय श्रङ्क में भानुमती-दुर्योधन वाले प्रेमालाप की रचना जबर्दस्ती फरनी पड़ी है । यह काव्य के रस में न केवल बाधक हुआ है, अपि तु उसने दुर्योधन के चरित्र को उपस्थित करने में गडवडी कर दी है। फयावस्तु के इस विभाजन के विषय में कीव या मत है कि जहां तक सन्धियों, का प्रश्न है, उनका विभाजन इसलिए ठीक है कि इनमें नाटकीय सा पर जोर दिया गया है, किस प्रकार नायक विघ्नों पर विजय प्राप्त करके फलप्राप्ति की ओर बढ़ता है यह इस विभाजन का लक्ष्य है किन्तु अर्यप्रकृति की कल्पना व्यर्थ की जान पडती है। सन्धियों को कल्पना कर लेने के बाद अर्थप्रकृति का विभाजन अनावश्यक है। साथ ही पाच सन्धियों का पांचों अर्थप्रकृतियों व पाचों अवस्याओं से क्रम से मेल मिलाने की योजना दोपपूर्ण है। पांचों सन्धियां कथावस्तु में आवश्यक है, विशेष कर नाटकको यस्तु में, क्योंकि उसे 'पञ्चसन्धिसमन्यित' होना ही चाहिए। यह दूसरी बात है कि कई रूपक ऐसे हैं, जिनमें पाचों सन्धिया न होकर चार या तीन ही सन्धिया पाई जाती हैं। हम यहां नाटक की इन पांच सन्धियों की गति को एक रेखाचित्र से व्यक्त कर देते हैं। गर्भ मुख प्रतिमुख विमर्श उपसंहति (निर्वहण) कथावस्तु के विभाजन पर विचार किया गया। हम देखते है दृश्य काव्य रगमय को वस्तु है । उसे रङ्गमध को थावश्यक्ता के अनुसार दृश्यों का नियोजन करना होता है। क्या-सूत्रों में कई ऐसे भी होते हैं, जिन्हें मच पर नहीं दिखाया जा सकता। कुछ को तो इसलिए कि उसमें समय विशेष लगता है, और कुछ को इस. लिए कि वे दर्शकों पर बुरा प्रभाव डाल सकते हैं। कुछ ऐसे भी क्या-सूत्र होते हैं, जो पथा-निर्वाह के लिए जरूरी तो है, पर इतने जरूरी नहीं कि उन्हें मच पर बताया जाय । इस तरह हम दो प्रकार के कया सूत्र मान सकते है-1 दृश्य, तथा २ सूच्य। दृश्य क्यासून मय पर दिखाये जाते है, उनका अभिनय पिया जाता है, सूच्य क्यासूत्रों की पात्रों के सवाद के द्वारा सूचना मात्र दे दी जाती है। ये सूचना देने वाले पात्र प्राय अप्रधान पात्र होते हैं। कभी-कभी सूच्य कथासूत्रों की सूचना नेपथ्य से भी दी जाती है। इन क्यासूनों के सूचनाप्रकार 'अर्योपक्षेपक कह .
[ २ ] लाते हैं, क्योंकि ये सच्य अर्थ को भाक्षिप्त करते हैं। अर्थोपक्षेपक पाच प्रकार के होते हैं -१ विष्कम्भा, २ प्रवेशक, ३ चूलिका, ४ अङ्कास्य तथा ५. अशावतार । इन पायों प्रकार के भोपक्षेपकों में विश्यम्भक तथा प्रवेशक का विशेष महत्त्व है इन्हीं का प्रयोग नाटकों में प्राय देखा जाता है। हम इन दोनों को विवेचना याद में करेंगे। पहले, चूलिकादि तीन श्रापक्षेपकों को ले लें। चूलिका में सूख्य अर्थ की सूचना नेपथ्य से, या यवनिका के भीतर से दी जाती है । अवास्य वहां होता है जहां किसी अङ्क के अन्त में किसी ऐसी यात की सूचना दी जाय, जिससे अगले अङ्क वा प्रारम्भ हो रहा हो । भवावतार में पहले श्राद्ध के पात्र पूर्व अङ्क के अर्थ को विच्छिम किए बिना ही दूसरे पक्ष में आ जाते हैं। अवरस्य या प्रकरवतार में पानों के सवाद के द्वारा सूच्य अर्थ की सूचना दी जाती है। विष्फाक तथा प्रवेशक में भी विष्कम्भक विशेष प्रधान है। प्रवेशक विष्कम्भक का ही दूसरा रूप कहा जा सकता है, जहा नीच पात्र होते है, तथा उसका प्रयोग प्रथम अह के प्रारम्भ में नहीं होता । विषम्भक अर्थापक्षेपक में दो पान होते , मे दोनों पान गौण अथवा अप्रधान पान होते हैं, कि तु दोनों (या एक) उच्चकुल के होते है। विष्कम्भक के द्वारा भूतकाल की या भविष्यत् काल में होने वाली घटना का सङ्कत किया जाता है। इसका प्रयोग कहीं भी हो सकता है। यहा तक कि विष्कम्भक नाटकादि के पारम्भ में, प्रथम श्रह के प्रारम्भ में भी प्रयुक सकता है। इस प्रकार का विष्कम्भक या प्रयोग भवभूति के मालतीगाधर में देखा जा सकता है । विष्कम्भक दो प्रकार का होता है-शुद्ध तथा मित्र । शुद्ध विष्कम्भक के सभी पात्र मध्यम श्रेणी के तथा संस्कृत वजा होते हैं। मिन विष्कम्भक में मध्यम श्रेणी तथा निम्न घेणी, दोनों तरह के पात्र होते हैं, तथा प्राकृत का भी प्रयोग होता । शान्तला नाटक में चतुर्थ शुद्ध विष्कम्भक पाया जाता है, जहा कण्व ऋपि का एक शिष्य नाकर हमें बताता है कि कब लौट आये हैं। प्रवेश भी विष्कम्भक की भाति सूचक अह है। इसके पात्र मी निम्न श्रेणी के होते है, तथा प्राकृत भाषा बोलते हैं। प्रवेशक प्रयोग नाटक के प्रारम्भ में कभी नहीं होता, यह सदा यो पा के बीच प्रयुक्त होता है। अमिशानशाकुन्तल नारक में छठे श्रक के पहले प्रवेशक का प्रयोग पाया जाता है । इसी सम्बन्ध में पताकास्थानक को भी समझा दिया जाय। नाटरफार कमी सवाद या पटना में कुछ ऐसी रचना करता है, जिससे भाषी पस्तु या घटना को सूचना मिल जाती है। पशरूपकमर ने पताकास्थानक के दो भेद माने है-अन्योक्ति रूप तया समासोतिरूपा रलाली से राजा के विदा होते समय नेपथ्य से 'मातोऽस्मि पद्मनयने समयो ममैप पर फरोति के द्वारा-उदयन के द्वारा-सागरिका के भावी माघरसन की सूचना दी गई है। यहा भयोकिपमति पाला पतामस्मानक है। अन्योधिपद्धति वाले पसाकास्थान में प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत दोनों का इवित एक पा होता है, ये 'तुस्पतिास होते । प्रस्तुत उदयन-सागरिय-म्यापार को पनमा - ..
[२०] (सूचना) अप्रस्तुत दिनकर-पद्मिनी-व्यापार के द्वारा कराई गई है। रत्नावली में ही एक दूसरे स्थान पर समासोक्तिरूप पताकास्थानक भी पाया जाता है। रामासोक्ति रूप पताकारयानक में प्रस्तुत पक्ष तथा अप्रस्तुत पक्ष में विशेषणों को समानता होतं है, वे 'तुल्यविशेषण' होते है। रलावली में कलियों से भरी हुई उद्यानलला के देयते समय की उदयन की उक्ति 'उद्दामोत्कलिकां विपाण्डुरसचं प्रारब्ध- जाम्भ क्षणात् देव्याः करिष्याम्यहम्' के द्वारा भावी सागरिकादर्शन से जनित देवीकोप की सूचना दी गई है। यहा रता के विशेषण अमस्तुत कामविदग्धा नायिका में भी अन्वित हो जाते हैं। पाश्चात्त्य शास्त्रियों को भाति यहा के नाटययात्रियों ने संवाद ( Dialogne) को अलग से तत्त्व नहीं माना है। इसम तात्पर्य यह नहीं, कि ये इसका विवेचन नहीं करते। वस्तुत वे इसा पिवचन वस्तु के साथ ही करते हैं, तथा इसे पस्तु का ही अन मानते जान पड़ते हैं। पानी का संवाद' हमारे यहा पई तरह का माना गया है.-प्रकाश, स्वगत, अपयारित तया जनान्तिक । प्रकाश वह उक्ति है, जो सर्वधाव्य हो, जिसे सारे पार सुन सकें। स्वगत पद उत्तित है, जो रसमय के अन्य पानों को सुनानी अभीट नहीं । अपवारित तमा जनान्तिक घुछ ही लोगों को समय पर स्थित कुछ ही पानों को, सुनाना अभीष्ट होता है । अपवारित में पात्र किसी दूसरे एक ही पात्र को अपनी मात मुनाना चाहता है। जनान्तिक में दो पात्र भापस में UN मन्त्रणा करते है। सामाजिक के लिए तो ये सारे ही सवाद थान्य होते है। इनके अतिरिक्त कभी कभी नेपप्य से भाकाशभाषित का प्रयोग भी किया जाता है। (२) नेता तथा पात्र:-रूपों का दूसरा भेदक नेता है । गेता शब्द के गाय नायक या रारा परिकर आ जाता है । नायिका, नायक के सायी, नायिका की ससियाँ प्रादि, मलिनायक और उसके साथी, सभी 'नेता' के अङ्ग माने गये हैं । भाटकादि के इतिवृत्त का नायफ यही बन सकता है, जिसमें विनीतत्वादि अनेक गुण' विद्यमान हो । नायक को नाम्यशान में चार प्रकार का माना गया है। यह प्रकार-भेद गायक की प्रकृति के आधार पर किया गया है । ये नारों प्रकार के नायक धोर' तो होते ही है। धीरल के अतिरिफ इनमें अपनी २ प्रकृतिगत विशेषता पाई जाती है । नायक का पहरा प्रकार 'ललित' या घीरललित है, दूसरा 'शान्त' या पौरशान्त (धीरप्रशान्त), तीसरा 'उदात्त' या धीरोदात और चौथा 'उद्धत' या 'धोरोक्त' । इनके उदाहरण प्रमश घत्सराज उदयन, भारत, राम तथा भीमसेन दिए जा सकते हैं। (1)धीरललितः-धीररलित रामपाट की या दूसरी चिन्ताओं से मुक्त होता १.इन गुणों के लिए दशरूपक के द्वितीय प्रकाश की पहली दो कारिकाएँ | उनकी पतिदेखिए।
है। वह सनीत, मृत्य, चिन्न श्रादि कला का प्रेमी और रसिक गृत्ति का होता है। प्रेम उसका उपास्य होता है, पह भोगविलास में लिप्त रहता है, तया शाय- अनेकपाली घाला होता है। धीरललित नायक अधिकतर राजा होता है। उसका राज्यकार्य मन्त्री आदि सभाले रहते हैं और यह मन्त पुर की चहारदीपारी में प्रेम प्रौदा किया करता है । यहीं पर यह नई नई सुन्दरियों के प्रति अपने प्रेम-प्रदर्शन की धुन में रहता है । उसके इस व्यापार में पद्द अपनी महादेनी-महारानी-से सदा डरता हुआ, शक्ति होकर, अत्त होता है । भारा तमा हर्षवर्धन का वत्सराज उदयन ऐसा ही धीरललित नायक है । रक्षावली तथा प्रियदर्शिका का नायक इन सय गुणों से युक्त है। (२) धीरप्रशान्त-धीरप्रशान्त प्रकृति वा नायक धीरललित से सर्वथा भिन्न होता है । पुल को दृष्टि से यह शान्त प्रकृति का होता है । शान्त प्रकृति प्राय मााण या पैश्य में ही होती है । श्रत यह शिव निकलता है कि धीरप्रशात कोटि का नायक या तो माझग होता है या मेश्य (श्रेष्ठी)। यह सरी पात है कि चह चारुदत्त या धव की ताह पलाप्रिय भी हो । प्रकरण नामक रूपकभेद का गायक प्राय धीरप्रशान्त ही होता है । शहक के गृछकटिक वा नायक 'पारदक्ष' राथा भवभूति के मालतीमाधव प्रकरण का नायक माधव धीरमशान्त है । दोनों ही पुल से प्राहाण हैं । कुछ लोगों के मतानुसार युधिष्ठिर, बुद्ध या जीमूतराहन को भी इसी कोटि में मानना ठीक होगा, क्योंकि वे शान्त प्रकृति के है । अवलोकदार धनिक ने इस मत का अच्छी तरह सण्डन किया है । धनिक के मतानुसार वे धीरोदात है। (३) धोरोदात्त:-धीरोदात्तप्रकृतिका नायक भी माय राजा या राजकुलोत्पल होता है। यह निराभिमानी, अत्यन्त गम्मीर, स्थिर तथा भविषस्थन होता है, जिस मत को यह धारण कर लेता है, उसे छोड़ता नहीं है। धीरोदात नायक, नायक के सम्पूर्ण भादशों से युक्त होता है। नाटक का नायक इसी प्रति का चुना जाता है। उत्तर- रामचरित के रामचन्द्र या अभिज्ञानशाकुन्तल का दुष्यन्त धीरोदात्त नायक है। (४) धीरोद्धतः--धोरोखत नायक घमंडी, ईापूर्ण विक्त्यन यथा एली होता है। यही कारण है कि यह 'उद्धत' कहा जाता है। परशुराम या भीमसेन धीरोद्धत कोटि के नायक है। रूपका प्रत्येक नेता इन कारों में से किसी एक भार का होता है। हम भागे पत्तामगे किस्सि पिस रूपक का नेता रिस फिस प्रकृति का होता है। १) राम य दुम्यन्त या धीरोदात्तव ममश नि पद्यों से स्पष्ट हो जाता है.- "यदि जानीमपि। माराधनाय लोकस्य मुगतो नास्ति में व्यथा ॥ (उत्तररामचरित, प्रथम प्रह) (स)स्वनिरमिलाप सिधते लोकहतो, प्रतिदिनमण्या ते तिरेय विधेर । अनुभवति हो मूल पादपस्तीशमुष्ण शमयति परितापं घाययोपाश्रितानाम् ॥ (शातर, द्वितीय भा) ।
। [ ३२ ] नायक का एक दूसरे ढा का वर्गीकरण भी किया जाता है । यह वर्गीकरण उसके प्रेमव्यापार एवं तत्सम्बन्धी व्यवहार के अनुरूप होता है। प्रेम की अवस्था में नायक के दक्षिण, शठ, धृष्ट तथा अनुकूल ये ४ रूप देखे जा सकते हैं। ये रूप अपनी परिणीता पत्नी के प्रति किये गये उसके व्यवहार में पाये जाते हैं । दक्षिण नायक एक से अधिक प्रियाओं को एक ही तरह से प्यार करता है। रलावली नाटिका का वत्सराज उदयन दक्षिण नायक है। शठ नायक अपनी ज्येष्ठा नायिका के साथ बुरा वर्ताव तो नहीं करता, पर उससे छिप छिप कर दूसरी नायिकाओं से प्रेम करता है। धृष्ट नायक धोखे घाज है, वह ज्येष्ठा नायिका की पर्वाह नहीं करता, क्भी २ सुने श्राम भी इसरी नायिका-कनिष्ठा से प्रेम करता है। एक ही नायक में भी तीनों अवस्थाएँ मिल सकती हैं। रत्नावली का उदयन चैसे कई स्थान पर दक्षिणरूप में, कई स्थान पर शठरूप में तथा कई स्थान पर धृष्टरूप में सामने आता है । फिर भी उसमें प्रधानता दक्षिणत्व की ही है। अनुकूल नायक सदा एक ही नायिका के प्रति श्रासक रहता है । उत्तररामचरित के रामचन्द्र अनुकूल नायक है, जो केवल सीता के प्रति भासत है। नायक के अन्तर्गत आठ प्रकार के सात्विकगुणों की स्थिति होना आवश्यक है। ये गुण है -शोभा, विलास, माधुर्य, गांभीर्य, स्थैर्य, तेज, लालित्य तथा प्रौदार्य । नायक का शत्रु प्रतिनायक होता है। यह धोरोद्धत प्रकृति का होता है। जैसे महावीरचरित तथा वेणीसंहार में, रावण तया दुर्योधन प्रतिनायक हैं। ये राम तथा युधिष्ठिर की पलप्राप्ति में बाधक होते हैं। नायक पासायी पताकानायक, पीठमर्द कहलाता है। यह बुद्धिमान होता है तथा नायक से कुछ ही गुणों में न्यून रहता है। पीठमर्द सदा नायक की सहायता करता है। रामायण का सुप्रोव, तथा मालतीमाधव का मकरन्द 'पीटमर्द' हैं। नायक के दूसरे सहायक भी होते हैं। नायक के राजा होने पर राज्यकार्य, तपा धर्मकार्य में उसके.सहायक मन्त्री, सेनापति, पुरोहित आदि होते हैं। प्रेम के समय राजा या नायक के सहकारी विदूषक तथा विट होते हैं। विदूषक संस्कृत नाटक का एक महत्त्वपूर्ण पात्र है। पैसे तो यह नाटक में हास्य तथा व्यंग्य की रचना कर नाटकीय मनोरंजन का साधन बनता है, किन्तु उसका इससे भी अधिक गंभीर कार्य है। यह राजा के अन्तःपुर का भालोषक भी पनकर भाता है । कभी कमी वह अपने संवाद में ऐसा संकेत करता है, जो उसकी तीक्ष्णबुद्धि का संकेत कर देता है, वैसे मोटे तौर पर वह पेटू तया मूर्ख दिखाई पाता है। विदूषक ब्राह्मण जाति का होता है, उसकी वेशभूषा, चाल-दाल, व्यवहार तथा यातनीत का ग हास्यजनक होता है। यह ठिगना, सल्वाट तथा दंतुल होता है। विदूषक प्राकृत भाषा का प्राथय लेता है । सस्कृत नाटकों में पह मोदकप्रिय तथा अपने पेट्रपन के लिए मशहूर है । दिपक राजा (नायक) का विश्वासपात्र व्यक्ति होता है, बिसे राजा अपनी गुप्त प्रेम-मन्त्रणा तक बता देता है। वह कभी कमी राजा के गुप्त प्रेम-म्यवहार में सात भी होता है। शकुन्तला मनिषक तथा मुश्वभरेक का ।
, [ ३३ ] मैत्रेय इसके उदाहरण हैं । ध्यंग्य, हास्य तथा आलोचक-प्रवृत्ति की दृष्टि से चिदूषक की तुलना शेक्सपियर के 'फालस्टाफ ( Falstaff) से की जा सकती है। किन्तु विदूषक में कुछ मिलता भी है, कुछ निजी व्यकिल भी हैं, जो 'पालस्टाफ के व्यक्तित्व से पूरी तरह मेल नहीं खाता। विदूपक के अतिरिक विट भी राजा या गायक का नमसुहृत् होता है। विट किसी न किसी क्ला में प्रवीण होता है, तय वेश्याओं के व्यवहारादि का पूरा जानकार होता है। भाण नामक रूपक में विट प्रधान पान भी होता है, जहाँ यह अपने अनुभव सुनाता है । कालिदास व भवभूति में विट नहीं है। हर्ष के नागानन्द में, तथा मृच्छकटिक में विट का प्रयोग पाया जाता है । राजा के और भी कई सहायक होते हैं दूस, कुमार, प्रावियाक आदि, जिनका प्रयोग नाटककार आवश्यकतानुसार किया करते हैं । (नायिका-मेद)-नाटादि रूपक में नायिका सा भी ठीक उतना ही महत्व है, जितना नायक का, विशेष करके शृङ्गार रस के रूपको में । नाटिका में तो नायिका का विशेष व्यक्तित्व है । नायिका का वर्गीकरण तीन प्रकार का होता है । पदले ढंग का वर्गीकरण उसके तथा नायक के संवन्य पर आधुत होता है । दूसरे ग का वर्गीकरण एक ओर उसकी उम्र और अवस्था, दूसरी ओर नायक के प्रतिकूलाचरण करने पर उसके प्रति नायिका के व्यवहार के आधार पर किया जाता है। तीसरा वर्गीकरण उसकी प्रेमगत दशा के वर्णन से संबद्ध है। हम यहाँ इन्हीं को क्रमश लेंगे। नायिका को मोटे तौर पर तीन तरह का माना जा सकता है -१स्वीया या स्यकोया, नायक की स्वयं की परिणीता पली, जैसे उत्तररामचरित की सीता । २ भन्या, वह नायिका जो नायक की स्त्री नहीं है। अन्या या तो किसी व्यक्ति को अनूठा कन्या हो सकती है, या किमी की परिणीता पत्नी । अनूठा कन्या का रूप हम शकतला, मालती या सागरिका में देख सकते है । परनी या अन्य पत्नी का नायिका के रूप में प्रयोग नीति व धर्म के विरुद्ध होने के कारण नाटकादि में नहीं बताया जाता । ३ सामान्या, साधारण श्री या गणिका। कई रूपों में विशेषत' प्रकरण, प्रकरणिका तया माण में गणिका भी नायिका के रूप में चित्रित की जा सकती है। मृच्छकटिक की नायिका बसन्तसेना गणिका ही है । अपस्या के अनुसार नायिका-1 मुग्धा. २ मध्या तया ३ प्रौदा या प्रगल्भा । मुग्धा नायिका मासयोयना होती है, यह घडी मोली, प्रेम करामों से महात, सपा प्रेम- मीमा से सरी-सी रहती है। यह नायक के समीप अरेली रहने में हरती है,तथा नायक के प्रतिकूलाचरण करने पर उस पर मोघ नहीं करती, बल्कि स्वयं और गिराती है । मच्या नायिका राम्प्राप्ततारुण्यकामा होती हैं, उसमें कामवासना उद्भूत हो जाती है। नायक के प्रतिपूलाचरण करने पर वह मुर होती है। ऐसी दशा में उसके सोन रूप होते है - घोरा, २ अधौरा, ३ घोरापीरा । धौरा मम्या प्रतिकूलावरण वाले नायक को रिलट याश्यों के द्वारा उपाभ देती है । अधीरा कटु शन्दों का प्रयोग करती है। धौराधीरा माया एक और रोती है. दूसरी ओर नायक को व्यंग्य भी मुनाती है। इस [३४] प्रकार मध्या तीन प्रकार की होती है। प्रौढा या प्रागरमा नायिश प्रेमका में दक्ष होती हैं, प्रेमीडा में वह कई प्रकार के थनुभव रसती है। मृतापराध प्रिय के प्रति उमा आचरण मा की माँति ही तीन तरह का हो गक्ता है। श्रत यह भी होन प्रकार की होती है --१ धीरा, २ थधीरा, ३ घोराधीरा। धीरा नौटा प्रिय को कुछ नहीं कहती, यह केवल उदासीन इत्ति धारण कर लेती है। इस प्रकार वह नायक की कामसीहा में हाथ नहीं बंटाती और उसमें वापक-सी होर अपने शोध की व्यसना करती है । अधीरा प्रौढा नायक को डराती, घमकाती और यहाँ तक कि मारती-पीटती भी है। धीराधीरा प्रौढा मध्याधीराधीरा की भांति ही व्यग्योक्ति का प्रयोग करती है। इसके साथ ही मध्या तया प्रौटा के तीन तीन भेदों का फिर से ज्येष्टा तथा कनिष्टा के रूप में वर्गीकरण किया जाता है। ज्येष्ठा नायिका नायक की पहली, तथा कनिष्ठा उसकी अभिनव प्रेमिका होती है । उदाहरण के लिए रत्नादली नाटिका में पासवदत्ता ज्येष्टा है, सागरिका वनिष्टा । इस प्रकार मया के ६ भेद तथा प्रौटा के भी ६ भेद हो जाते है । मुग्धा नायिश फेदल एक ही तरह की मानी जाती है। उसे इन भेदों में मिला देने पर इस दर्गीकरण के अनुसार नायिका के १३ भेद होते है ।। नायिका का तीसरा वर्गीकरण उसको दशा को उपस्थित करता है । इसके अनुसार नायिका आठ तरह की होती है --१ स्वाधीनपतिका, २ चासकसचा, ३. विरहोत्क- ठिता, ४. खण्डिता, ५ कलहान्तरिता, ६ विप्रलब्धा, ७ प्रोषितप्रिया तथा भि- सारिका । स्वाधीनपतिवा का नायक सर्वथा उसके अनुकूल होता है, जैसे वह उसके आधीन होता है। वासकसजा नायिका नायक के आने की राह में सजधज कर बेटी रहती है । नायक के आने के विषय में उसके हृदय में पूर्ण श्राशा होती है । विरहोत्क- ण्ठिता का नायक ठीक समय पर नहीं पाता, थत उसके हृदय में खपली मची रहती है, श्राशा तया निराशा का एक सपर्ष उसके दिल में रहता है। पण्डिता का नायक दूसरी नायिका के साथ रात गुजार कर उसका अपराध करता है, और प्रात' जब लौटता है, तो परस्त्रीसम्भोग के चिहों से युक्त रहता है जिसे देखकर खण्डिता कुछ होती है। फलहान्तरिता नायिका कलह के कारण प्रिय से युक्त हो जाती है, तथा गुस्से में भाकर प्रिय का निरादर करती है। विप्रलच्या नायिका सरेतस्थल (सहेट) पर प्रिय से मिलने जाती है, पर प्रिय को नहीं पाती, वह प्रिय के द्वारा गी गई होती है। प्रोषितप्रिया का प्रियतम विदेश गया होता है। अभिसारिका नायिका सजधजकर या सो स्वयं नायक से मिलने जाती है, या दूती आदि के द्वारा उसे अपने पास घुला लेती है। भापक के गुणों को भौति नायिका में भी गुणों की स्थिति मानी गई है। नायिका मैं ये गुण भूषण या प्रकार कहलाते हैं, तथा गणना में बीस है। इन पीस थलंकारों में पहले तीन शारीरिक है, दूसरे सात अयला, या वाशे दस स्वभावज है। ये हैं भाद, हाव, हे, शोमा कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रगल्पता, चौदार्य, धैर्य लोसा दिलाय, विच्छिति, विनम, क्लिविचित, मोधयित, कुटमित, विचोक, ललित, तथा हित ।
५ [ ३५ ] नायिकानों में राजा की पटराज्ञी महादेवी कहलाती है। यह उच्चकुलोत्पन्न होती है। राजा को रानियों में कई निम्नयुल की उपपलियाँ भी हो सस्ती हैं । इन्हें स्थायिनी या भोगिनी कहा जाता है। राजा के अन्त पुर में कई सेवक होते हैं। फजुकी इनमें प्रधान होता है। यह प्राय वृद्ध माझा होता है। कधुकी के अतिरिक्त यहाँ बौने, सुबहे, नपुंसक (पर्पयर ), किरात यादि भी रहते हैं। अन्त पुर में रानियों की कई राशियाँ, दासियाँ आदि भी वर्णित की जाती है । इसी सम्बन्ध में कई नाट्यशान के प्रन्यों में पानी के नामादि का भी समेत किया गया है, दशरूप में इसका अगाव है । इनके मतानुसार गणिका का नाम दत्ता, सेना या सिद्धा में अन्त होना चाहिए, जैसे मृच्छकटिक में वसन्तसेना का नाम । दास- दासियों के नाम तुसम्बन्धी पदायों से लिये गये हो, जैसे मालतीमाधव में कलहंस राथा मन्दारिया के नाम । वापालिकों के नाम पष्ट में अन्त होते हों, जैसे मालतीमाथव या अधीरपण्ट । नाटगदि में कौन पान किसे किस तरह सम्बोधित करे, इस शिपता का सङ्केत भी नाट्यशास्त्र के प्रन्यों में मिलता है। सामन्तादि राजा को 'देव' या 'स्वामिन' कहरो है, पुरोहित या मादाण उसे "आयुष्मन्' कहते हैं, तथा निम्न कोटि के पात्र 'भ' । युवराज गी 'स्वामी' पहा जाता है, तथा दूसरे राजकुमार 'भद्मुस' कहे जाते देवता तथा प्रापि-मुनि 'भगवन्' कहलाते हैं, तथा मन्त्री एवं ब्राह्मण 'आर्य' नाम रो सम्बोधित किये जाते है। परनी पति को 'मार्यपुन' कहती है। विदूषक 'राजा' या नायक को 'वयस्य' कहता है, वह भी उसे 'वयस्य' ही रहता है। छोटे लोग घटे लोगों को 'तात' कहते हैं, बड़े लोग छोटे लोगों को 'तात' या 'वत्स' । मध्यवर्ग के पुरुष परस्पर 'हो' कह कर सम्बोधित करे निम्न वर्ग के लोग 'हण्डे' कहकर । विदूषक महादेवी या उसकी राशियों को 'भवती' कहता है। सेविकाएँ महादेची या रानियों को 'भधिनी' या 'स्वामिनी रहती है। पति पत्नी को 'थार्या' यहता है। राजकुमारियाँ 'गदारिका' शब्द से सम्बोधित की जाती है । गणिका अजुस, कुहिनी या घझा को 'श्रम्या' पहती है। राखियाँ परस्पर 'हला' रहती है, और दासियों को 'हना कहकर सम्बोषित किया जाता है ३ रस तथा भाव:-भारतीय नाट्यशास्त्र में रसवियेचना का विशेष स्थान है। हम यता पुके हैं किस तरह श्य पाध्य में 'रस' की स्थिति भरत के भी पहले से । चली आरही है । दृश्यकाव्य के तीन भेदयों में एक 'रस' भी है। 'रस' यी व्यसना करना, सामाजिकों के हृदय में रसोदेक उत्सभ करना दृश्य काव्य का प्रमुख लक्ष्य है। रपराज्य में नदों का यही उद्देश्य है कि उनके अभिनय के द्वारा सामाजिकों में रसोहीथ हो। रस क्या है। इस विषय में यहाँ तो हम इतना ही पहना चाहो कि साध्य के पटन,अषण या दर्शन से जिस श्रानन्द का अनुभव हमें होता है, पद्दी प्रानन्द 'रस' पहलाता है। यह रस ग्नि साधनों के द्वारा होता है । इस प्रश्न के उत्तर में भी यहाँ हम इतना ही कहना चाहेंगे कि 'रत की निष्पति, विभाव, अनुभाव तथा म्यभिचारी [ ३६ ] के संयोग से होती है ।' भरत मुनि ने 'रस' को चर्पणा के साधनों के विषय में नाट्य- शास्त्र में यही मत व्यफ किया है -विभावानुभायन्यभिचारिसंयोगाद रस- निष्पत्तिः।' विभागादियों तथा रा के परस्पर सम्बन्ध पर हम आगे विचार करेंगे, जहाँ लोखट, शकुक, भट्टनायक, अभिनव तथा धनिक के मतों को विवेचना की जायगी। पहले हम यहाँ इनता समभलें कि सहृदय सागानिकों के हृदय में 'भाव' रहता है। यदि आधुनिक मनोविज्ञान से सहायता ली जाय, तो हम छहेंगे कि 'भाग' गाना- मानस के अर्धचेतन, या अवचेतन भाग में छिपा रहता है । 'भाव' की भूति हमारे व्यावहारिक तथा लौतिक जीवन से ही होती है, भारतीय पण्डित के मत से वह पूर्वजन्म का लौकिक जीवन भी हो सकता है। हम स्वयं अपने जीवन में क्रिमी से प्रेम करते है, किसी के प्रति क्रोध, उत्साह, परणा प्रदाशत करते हैं, किसी शेर या सॉप को देख कर डरते हैं या किसी कोदी के विकृत शरीर को देखकर जुगुप्सा वा अनुभव करते हैं । यही नहीं, दूसरे लोगों को भी इस प्रशर के भार प्रदर्शित करते देखते हैं। लौकिक तथा व्यावहारिक जीवन में, जब हम इस प्रकार के अनुभव वार-वार प्राप्त करते हैं, तो उनका प्रभाव हमारे चेतन मन पर पड़ता हुआ धीरे-धीरे हमारे अवचेतन मन के अन्तराल में अपना नीड बना लेता है। और जब हम काव्य नाटकादि में तत्तत् भाव का चित्रण पढ़ते या देखते हैं, तो यह लिपा भाव उभर फर चेतन मन की लहरों में उतराता नजर थाता है । यही भाव काय में वर्णित विभावादि के द्वारा पुष्ट होवर रस रूप में परिणत हो जाता है, वह चेतन और अचेतन मन को जैसे कुछ समय के लिए एक करके, उनके बीच की यवनिका को जैसे हटाकर हमें हृदय की उम चरम सोपान सीमा तक पहुँचा देता है, जहाँ हम मनोराज्य में विचरण करते है, जहाँ आनन्द ही श्रानन्द है। और भारतीय रसशास्त्री के मत में यह आनन्द जिसे 'रस' की संज्ञा दी गई है, लौकिक होते हुए भी अलौकिक है, वह दिव्य है, तथा "ब्रह्मास्वादराहोदर' है। पर 'रस' के साधन, 'भाव' को 'रस' रूप में परिणत करने वाले, ये विभावादि क्या है। मान लीजिये, हम एक नाटक देख रहे हैं, कालिदास के शकुन्तला नाटक के प्रथम दृश्य को दिखाया जा रहा है । मर पर दुष्यन्त श्राता है, वह आश्रम के पादपों को सींचती शकुन्तला को देखता है। शकुन्तला भावण्यवती है, घडे को उठाकर नवमल्लिका को पानी पिराते समय उसके अङ्गों का इस प्रकार का आफुचन प्रप्तारण होता है कि वह उसके सौन्दर्य को बढ़ा देता है। भैरे से हर के उसका इधर उधर दौदना, काँपना, भोलें हिलाना और चिल्लाना भी दुष्यन्त को उसकी और और अधिक आकर्षित करता है । और आगे जाकर दुष्यन्त तथा शकुन्तला के इसी श्रह में परस्पर विदा होते समय शकुन्तला का दर्भ से पैर के क्षत होने का बहाना बनाना, या लतामों में आँचल के न उलझने पर भी उसे मुलगाने का उपक्म करना, शकुन्तला के प्रति दुष्यन्त के आकर्षण को परिपुष्ट रूप दे देता है। कण्व ऋषि के माधम का एकान्त उपवन तथा मालिनीतीर आदि भी दुष्यन्त के मानस [ ३७ ] मैं शकुन्तला के प्रति रति भाव को व्यक्त कर उसे 'भार' के रूप में परिणत करने में कारण होते हैं। इस प्रकार हम देखते हैं दुष्यन्त के मन में 'रस' व्यक्त होता है, श्रत दुष्यन्त शार' रस का प्रास्वादपर्ता है, वह 'पति' भाष श्राश्रय है। इस भाव को 'रस' रूप में परिणत करने का प्रमुरा साधन शकुन्तला है, किन्तु इसके साथ शकुनाला की चेष्टाएँ तथा उस दृश्य श देश-कालादि भी सहायता करते हैं। ये दोनों विमान कहलाते हैं। शकुन्तला दुप्यन्त के 'रति' भाव का आलम्बन है तथा देश-कालादि इसके उद्दीपन । जप दुष्यन्त के मन में 'रति' भाव का अनुभव होने लगता है, तो उसके शरीर में गई चिक्ष उत्पक्ष होते हैं, उसका चेहरा खिल उटता है, कभी उसकी पोखें बार बार शकुन्तला की और अपने श्राप उठती हैं, वह फिर उन्हें समेटता है, इस प्रकार की दुष्यात की चेष्टाएँ 'यगुभाव' कहलाती हैं, क्योंकि ये 'रति' भागानुभूति के बाद पैदा होती हैं या उस 'भार' का अनुभव सामाजिकों को कराती हैं। तीसरे साधन समारिभाव या व्यभिचारिमार है। हम देखते हैं, शकुन्तला के प्रति रति' गाव उत्पन्न होने पर, दुष्यन्त कभी सोचता है कि शकुन्तला प्रापिपुत्री है, प्रत गह उसके द्वारा परिणययोग्य नहीं, मह निराशा तथा चिन्ता । अनुभव करता है। कभी उसे अपने मन पर विश्वास होता है, तथा शकुन्तला के विश्वामिन पुत्री थाले वृत्तान्त को सुनकर हर्प तथा प्राशा होती है। इसके पहले ही उसमें उत्सुकता होती । इस प्रकार गे सभी प्रकार की भावानुभूतिया ने अस्थायी भाव हैं, जो थोडे समय तक रहते हैं, और फिर लुप्त हो जाते है । एक क्षणिक गार उठता है, लुप्त हो जाता है, इसर। उठता है, लुप्त होता है, इस प्रकार एक स्थायी भाय में कई छोटे भाग सचरण करते रहते हैं। ये भाव स्थायी भाव के सहकारी कारण हैं। इनकी स्थिति ठीक वैसी ही है, जैसे समर में दरों के उदय व अवसान की। स्थायी भाव समुद्र मे, रागरिभाव तरहें। चूंकि ये भाव क्षणिक तथा अस्थिर हैं श्रत ये रावारी या व्यभिचारी पहलाते हैं। गिनती में ये सधारी भाव ३३ हैं, जिनको नामादि मन्य में देखे जा सकते हैं। हग देखते हैं 'भाव' ही 'ररा पा पोज है, रस का मूल रूप है। रस के अणु पा'न्यूलियस' ( Milens ) यही भाष' है। गाव क्या है, इसे हम बता चुके हैं। भार को क्षणिक राधारिभावों से अलग करने के लिए स्थायो भार भी कहा जाता है। साहित्यशाधियों ने भाठ या नौ तरह के भाव माने हैं। धनजय नाटक में पाठ ही भार मानते हैं, जैसा कि हम श्यागे 'धनजय को मान्यताएं' शीर्षक भूमिश भाग में यतायेंग। भिना दननोन रसशालियों को नो भाव अभीष्ट है। ये भाव है.- रति, रत्साह. जुगुप्ता, मोध, हास, विस्मय, भय तथा शोक। इनके अतिरिकमा भाव हे 'शम'। इन्ही भावों की परिणति प्रमश घाट यानी रसों में होती है भार, पीर, वीभता, रौद्र, हारय, अद्भुत, भयानक, पक्षण सपा मय भाव 'शम' का १ भाग जावर विश्वनाप ने 'वाल' भार को हया गात्सल्य रस की भी की। दो तरह सगोस्वामिन् में 'उरचलनोलमणि में माधुर्य' रग (भफिरस) - [३] रसरूप 'शान्त' । इन पाठ रसों में-शान्त की गणना न करने पर चार प्रमुख हैं, चार गौण । ऊपर की सूची के प्रथम चार प्रमुख हैं, द्वितीय क्रमशः प्रथम चार में से एक से उद्भूत माने जाते हैं। यया हास्य को भार से, अद्भुत को वौर से, भयानक को वीभत्स से तथा करण को रौद्र से उद्भुत माना जाता है। इस प्रकार मार- हास्य, वीर-अद्भुत, वीभत्स-भयानक, रौद्र-करुण इन रस-युग्मों की स्थिति हो जाती है। इनका सम्बन्ध मन को चार स्थितियों से लगाया जाता है। रसास्वाद के समय सामानिक का मानस या तो विकसित होता है या फैलता है या शुन्य होता है या उसमें विक्षेप की रिया होती है। इस प्रकार इन चार स्थितियों में से प्रत्येक का अनुभव ऊपर के एक एक रस-युग्म में प्रमश पाया जाता है । यया, महार हास्य में मानस विवामित होता है, उसमें मन का विकास पाया जाता है। इसी तरह चीर- अद्भुत में मन के विस्तार, वीभत्स-भयानक में क्षोभ तथा रौद-फरुण में विक्षेप की स्थिति रहती है । भूमिका-भाग में हम यहाँ प्रत्येक रस के स्वरूपादि या विवेचन कर व्यर्य को कलेवर वृद्धि करना ठीक नहीं समझने । इनके लक्षणादि मूलमन्य में देखे जा रसनिष्पत्तिपर विभिन्न मत हम देख चुके कि भरत मुनि के मतानुसार विभाव, अनुभाव तथा सधारिमाव के संयोग से रस को निष्पत्ति होती है। रसनिष्पत्ति के विषय में भरत के इरा सूध को ब्याख्या करते हुए लोल्लट, शङ्कर भट्ट नायक तया अभिनवगुप्तपादाचार्य ने अपने अपने रस सम्बन्धी सिद्धान्तों को प्रतिष्ठापित क्रिया है । धनंजय का रस सम्बन्धी मत कोई मवीन कल्पना नहीं है । धनंजय तया पनिक के मत का विवेचन हम यहा न कर अगले भूमिका-भाग में करेंगे कि किस तरह उसने लोहट, शङ्कक एवं भट्ट नायक के मतों का समन्वय उपस्थित किया है। (.)लोल्लट का उत्पत्तिघाद:-लौलट का रस सम्बन्धी मत, साहित्य शास्त्र में, उत्पत्तिबाद' के नाम से विख्यात है। लोलट रस को विभावादि के द्वारा उत्पन्न मानते हैं। विभावादि उत्पादक है, रस उत्पाय। इस प्रकार लोलट विभावादि को रस का ठीक उसी तरह कारण मानते हैं, जैसे पटरूप कार्य के मुद्दण्डवत्रादि कारण हैलोलट की इस मत सरणि पर मीयांसकों का प्रभाव है । लोल्लट स्वयं मीमासक है। यही कारण है कि वे यहां कार्य कारणवाद, साधारण के कार्य कारण वाद की कल्पमा कर उत्पतिवाद' को जन्म देने है। उदाहरण के लिए, भा लोल्लट के मत से जो रति भाव, नायिका 'थालम्बन विभाव' के द्वारा उत्पादित होता है, उपवनादि उद्दीपन विभाव के द्वारा उदीप्त होता है, आलिङ्गनाक्षादि अनुभावों के द्वारा अनुभूत होता है, तया औत्सुक्यादि सधारियों के द्वारा पुष्ट होता है, वही रति भाव रस रूप में की कल्पना की। कार प्रकाश में भोज ने केवल एक हो रस माना, हार । पाकी सारे रस भोज के मत से तार के ही विवर्त है। भवभूनि सभी रसों को काण का विवर्त मानते हैं।
[३६] उत्पर होता है। यह रस नट या सामाजिक के हृदय में पैदा नहीं होता है। राम या दुष्यन्तादि पाच ही इस रस न अनुमय करते हैं। वैसे नट उनको नकल करता है, उनकी वेशभूषा में थाता है, पैसा व्यवहार करता है, इसीलिए सामाजिक उसे राम या दुष्यन्त समम बैठते है। यह समगना भी भ्रान्ति जनित है। राज्ये राम या दुष्यन्त को चाँदी मान लें, तो राम या दुष्यन्त यना हुया वह नट वह शुक्ति (सीप) जिसमें हमें रजत की प्रान्ति हो जाती है। सामाजिक को इस श्रान्ति से ही क्षणिक श्रानन्द मिल जाता है। लोल्लट का यह मत निर्दष्ट नहीं कहा जा सकता । सामाजिक में रस की स्थिति म मानना इसका सबसे बड़ा दोष है। क्योंकि राम या दुष्यन्त जैसे पत्रों में ही रस मानना तथा सामाजिकों में रस की स्थिति का निषेध करना ठीक नहीं जान पड़ता । देखा जाय, तो राम या दुप्यन्त तो अतीत काल में ये, वर्तमान काल में तो उस नाटकादि के रस का प्रास्वादकई सामामिक ही है । यनि सामाजिक घो रसास्वाद न हो, तो यह मादकादि के प्रति प्रत्त ही क्यों होने लगा। यही नहीं, विभावादि परस्पर साधारण ढार के कार्य वारण पाद की कारमा करना भी एक दोष है, जिसका खण्डन हमें अभिनयगुप्त के मन में मिल सस्ता है। लोल्लट के मत के प्रथम दोप का निर्देश व उसके मत स खण्डन करते हुए शङ्कक ने नये मत को प्रतिष्ठापित किया। (२) शाहक का अनुमितिवाद:-लोलट के उत्पत्तिवाद या सर्व प्रथम खण्डन नैयायिक शकुक ने किया है। शक ने अपने मा को प्रतिधरना में भरत के रससूत्र की नई न्यारया उपस्थित की। उसके मतानुसार विमार, अनुभाष तथा व्यभि- चारिभाव रस की अनुमिति कराते हैं। जैसे हम पर्वत में धुएँ को देखकर 'पर्वत अग्नि- मान है, क्योंकि यह धूमवान् है' इस परामर्श के द्वारा पर्वत में यह स्थिति की अनुमिति कर लेते हैं, वैसे ही नट में रामादि के से अनुभावादि देखकर हम यहा रस की स्थिति का अनुमान कर लेते है। इस प्रकार विभायादि रस के अनुमापर है, रस अनुमाप्य । उनमें उत्साध-उत्पादक-भाव न होकर अनुमाप्य-अनुमापक-सम्बन्ध है। इसी सम्बन्ध में शक नै चितुरगादिन्याय की कल्पना भी की है। जैसे चित्र का पोडा, वास्तविक घोड़ा न होते हुए भी उसे घोड़ा मानना ही पड़ता है, वैसे ही गट स्वयं राम या दुष्यन्त नहीं है, फिर भी सामानिक वरो चिननुरग की भाँति राम या सुप्यन्त समझता है । तदननार सामाजिक नट के द्वारा रत्यादि भार या प्रकाशन देराता है, और यह यनुमान कर लेता है कि उसके हृदय में सत्यादि गाव रसरूप में परिणत हो रहे हैं । सामाजिक इस अगिति या अनुभव करते समय, हरा अनुभव के रसपूर्ण होने के कारण स्वयं भी रसानुमा करता है। इस प्रकार हम देशाते है कि राहुकमा वास्तविक रस रामादि पानी में ही मानता है, शिन्तु यह लल्लन की भाति घामानिकों में उसका राया प्रभाव मदों मानवा शक मत इसने पर भी निर्दष्ट नहीं कहा जा सकता । रस यो अनुमितिगम्य मानना हो नहीं जा पता । यह अनुभम सिद्ध है कि रा नया प्रमाण संवेष्य है, यह - ।
[४०] ज्ञान का विषय है । अत प्रत्यक्ष ज्ञान को न मानकर रसास्वाद में अनुमिति की कल्पना करने में कोई साधक प्रमाण नजर नहीं आता। (३) भट्ट नायक का भुक्तिवाद:-भा नायक अपने मत में रसास्वाद के विषय में उत्पत्ति, अनुमिति या अभिन्यक्ति वाले सिद्धान्तों को नहीं मानते। वे रस के विषय में 'भुक्ति' के सिद्धात को जन्म देते हैं । उनके मतानुगार विभावादि रस के भोजक हैं, रस भोज्य । मह नायक ने काय के सम्बन्ध में 'अभिम शक्ति के अतिरिक्त दो अन्य व्यापारों की कल्पना की है । ये दो नये व्यापार हैं -भाषकल व्यापार, तथा भोजकत्व व्यापार। भट नायक ने इन दो नये व्यापारों को करना कर हमें रग के स्वरूप को स्पष्ट रूप से समभाने की चेष्टा की है। यह दूसरी बात है कि भट्ट नायक का मत भारतीय रसशास्त्र में मान्य न हो सका हो, किन्तु उसने जिन रग सम्बन्धी गूड बातों का राङ्केत किया है, उन राउपयोग उसके विरोधी अभिवनगुप्त तक ने किया है। ररा को अलौकिक रूप देने तया साधारणी करण के सिद्धान्त को जन्म देने का श्रेय भह नायक पो ही जाना चाहिए। भट्ट नायक के मत से सामाजिक या श्रोता सर्वप्रथम काय की अभिधाशक्ति के द्वारा उसके वाच्यार्थ का ज्ञान प्राप्त करता है। तदन तर भावकत्व व्यापार के द्वारा वह रामादि पात्रों की भावना के साथ अपनी भावना का तादात्म्य करता है। इसी व्यापार द्वारा रामादि पान अपना व्यक्तित्व छोड कर साधारणी कृत हो जाते हैं। इस दशा में पहुँचने पर समाजिक की बुद्धि में रजस् तया तमस् गुणा का प्रभाव नष्ट हो जाता है, वहाँ केवल सस्व गुण का उद्रेक पाया जाता है। रस दशा में सामाजिक समस्त लौकिक इच्छाओं से स्वतन्त्र हो जाता है । इस दशा में जो रसास्वाद होता है, उसका साधन भोजकत व्यापार है। भा नायक के इस सिद्धान्त पर सारयदर्शनका प्रभाव परिलक्षित होता है। भट्ट नायक के इस गिद्धान्त में अभिनवगुप्त ने जो दोष निवाला, वह यही है कि मट नायक की भावकत्व व्यापार तथा भोजक्ल व्यापार की कपना का कोई शास्त्रीय प्रमाण नहीं। (४) अभिनवगुप्त का व्यक्तिवाद:-भात के रससूत्र के विषय में अन्तिम मत अभिनवगुप्त का व्यजनावादी मत है। रसशात तथा अलवारशास्त्र में यह मत अपनी दार्शनिक तथा मनोवोहानिक थाधारभित्ति के कारण अत्यधिक प्रसिद्धि पा सका है। जैसा कि हम देख चुके हैं अभिनवगुप्त व्यअनावादी तया ध्वनियादी भालद्वारिक है। आनन्दवर्धन के द्वारा प्रतिष्ठापित सिद्धान्तों के अनुसार चे रस को ध्वनि का ही एक प्रमुख भेद-रसध्वनि मानते हैं। इसी कारण वे रस को व्यग्य मानते हैं, तया उसे अभिधा या लक्षणा के द्वारा प्रतीत न मानकर व्यसनाति के द्वारा अभिव्यक्त मानते हैं। काव्य या नाटकादि में प्रयुक्त विभाव, अनुभाव तथा सणारिमाय परा के अभिव्यक है, रस अभिव्यय । इस प्रसार अभिनव विभावादि तया रस में परस्पर ध्यार-ध्यशक-भाव मानते हैं।
[४१ ] हम देते हैं कि लौकिक सा में अपने जीरन में हम कई पार के अनुमा प्राप्त करते हैं। ये अनुमर हमारे मानस में रत्यादि भावा यो स्थिति को जन्म देते हैं । प्रत्येक राहदय के मानस में ये रत्यादि भाय टीक उसी तरह छिपे परे रहते हैं, जैसे नये शराय में छिपी मृत्तिा की सीधी पास। जय शरार में जल डाला जाता है, तो गतिमा को गन्ध अभिव्यक्त हो जाती है, वह यहीं याहर से नहीं पाती, न पानी उस गन्ध को उत्पन्न हो करता है। ठीर इसी तरह जव सहृदय पान्य पढ़ता है या नाटकादि का अवलोकन करता है, तो उस काव्य नाटकादि में वर्णित विभागादि उसके मानस के शव्यस भाव को व्यक्त कर देते हैं, और वह शाप रसरूप में व्यक्त हो जाता है। इस प्रहार गदय हो सका आस्वाद फर रास्ता है, क्योंकि इसके लिए पूर्व सहकार अपेक्षित है। यह रस लौकिक भावानुभा से सर्यया मिन होता है, यही कारण है कि इसे अलौकि विशेषण से विभूषित पर, महास्वादसहोदर बताया जाता है। इस दशा में गहदय थानन्दधन का अनुभव करता है। इस दशा की तुलना योगी की दशा से की जा सकती है। दोनों दशानों में पूर्ण भानन्द या अनुभव होता है। अभिनवगुप्त की गह कल्पना रस की तुलना शैव वेदान्त की "विगर्श' दशा रो वरती जान पड़ती है, जहाँ साधक 'शिवोऽहम्' का अनुभव करता है। इस दशा में पहुँचने के लिए यह थावश्यक है कि विभावादि अपने येयक्तिक रूप पोछड, साथ सामाजिक भी नियतिक्ता धारण कर ले। उस समय दुष्यन्त शकुन्तला, राम सीता अपने घ्यपि रष को छोडकर येल नायक तथा नायिका के रूप में हमारे सामने पाते हैं, साथ ही हम मी केवल रसानुभावयता बन जाते हैं। इस प्रकार विभागादि केवल विषय-गान तथा सामाजिक केवल विषयि-मात्र रह जाता है। इसे ही साधारणीचरण पहा जाता है। अभिनवगुप्त ने 'भारती' रपष्ट बताया है कि साधारणीकरपा येवल भासम्बन विभार या पाभय था ही नहीं, सभी तत्वों का- अगुभावादि का भी होता है । साधारणीकरण के कारण ही रसानुभूति होती है, क्योंकि उस दशा में वैयविक रागद्वेषादि पा लोप हो जाता है । सानुभूति का प्रानन्द अलौकिक है। इसका स्वाद प्रपाणक दे श्रास्वाद की भाँति है। प्रपाणक में इलायची पालीमिर्च, मिथी, केशर, कर यादि के मिश्रण से एक अभिनव स्वाद की सृष्टि होती है, जो प्रत्येक वस्तु के अलग अलग स्वाद से सर्वथा भिन्न है। वैसे हो, विभावादि सभी वा श्रास्वाद मिल कर रसको विशेष प्रसार की चर्वणा को जन्म देता है। जैसा कि हम याने धनजय एव धनिक की मान्यताएँ' शीर्षक भूमिका भाग में देरोंगे, दशरूपक्कार रस को ध्यान मानार तात्पर्यप्रतिगम्य मानते हैं, साथ ही विमत्वादि एवं रस में परस्पर भाज्य-भारक-माय मानते है। उन्हें ध्वनिशादियों या रससम्बन्धी सिद्धान्त मान्य नहीं । x रूपक के तीन भेदक तत्त्वों की विवेचना की गई। इनके अतिरिक्त नाटवादि रूपों में भारतीय पत्तियाँ, सङ्गीत, नृत्य, का भी प्रमुख स्थान है। दशरूप x [ ४२ ] सङ्गीत तथा नृत्य की वेिचना नहीं की है। भरत के नाट्यशास्त्र में इन दोनों का झमश' चाचिक तथा श्रानिक अभिनय के अन्तर्गत विवेचन किया गया है। दशरूपककार ने सात्त्विक अभिनय-रस का ही विवेचन किया है । संस्कृत के कई नाटकों में हम सहीत तथा नृत्य का पिनियोग पाते हैं। शकुन्तला में प्रारम्भ में नटी का सङ्गीत तथा पष्ठ अङ्क में हसपदिका का गीत है। मालविकाग्नि मित्र में मालविका का नृत्य है। पर दशरूपक में ही नहीं, बाद के अलङ्कारशास्त्र के उन अन्यों में भी जो नाट्यशास्त्र के रूपक्सम्बन्धी विवेचन का प्रयोग करते है, सजीत व नृत्य का विवेचन इसलिए नहीं मिलता, कि वे इन्हें सोत-शास्त्र के विषय समझने लगे थे। नाटकीय वृत्तियों को एक और नायर का व्यापार बताया गया है, दूसरी और रसों से भी उसका सम्बन्ध स्थापित किया गया है । वृत्तियाँ चार है:-वैशिकी, सात्वती, प्रारभटी तथा भारती । भारती, दशरूपककार के मतानुसार शाब्दिक वृत्ति है, उसका प्रयोग विशेषत आमुख या प्रस्तावना में पाया जाता है। कैशिको वृत्ति का प्रयोग झझार रस के अनुकूल होता है । इसके चार श्रम होते हैं:-गर्म, मर्मस्फिन, नमस्फोट तथा नर्मगर्भ । इन ग्रहों को विवेचना मूल प्रन्य में द्रष्टव्य है । सादती वृत्ति वीर, अद्भुत तया भयानक के उपयुक्त होती है । इसका प्रयोग करण तथा शहार में भी किया जा सकता है। भारभटी वृत्ति का प्रयोग भयानक, वीभत्स, गैद रसों में होता है। इस भाग को समाप्त करने के पूर्व हम दशरूपकों की तालिका के साथ उनके वस्तु आदि भेदकों का सङ्केत कर देते हैं, जो उनके परस्पर भेद को स्पष्ट कर देंगे। १ नाटक-पञ्चसन्धियुक्त पौराणिक या ऐतिहासिक वस्तु, ५ से १० तक अङ्क, धीरोदात्त नायक, भार या चीररस, कैशिकी या सात्वती गृत्ति । २ प्रकरण-पचसन्धियुक्त कल्पित वस्तु, ५ से १० तक अब धीरप्रशान्त नायक, भतार रस, कैशिकी पत्ति। ३ भाण-पूर्तचरितविषयक कल्पित वस्तु, एक अ. कलावित् चिट नायक, एक हो पान की उजि-प्रत्युक्ति का प्रयोग (Alono-acting) चीर तथा सार रस। ४ प्रहसन-कल्पित वस्तु, एक अष्ट, पाखण्डी, कामुक, धूर्त प्रादि पात्र, हास्य रस । ५ डिम-पौराणिक वस्तु, चार प्रह, विमर्श रहित चार सन्धियों में विभक्त वास्तु, धीरोद्धत नायक, हास्य तथा भार से मिल ६ रस, सात्वती तथा भारमटी वृत्ति। ६ व्यायोगः-प्रसिद्ध पौराणिक यस्तु, गर्भ तया विमर्श रहित तीन सन्धियों, एक था धीरोद्धत नायक, हास्य तथा भार से भिन्न ६ रस, सात्वती तथा प्रारभटी वृत्ति, इस रूपक-भेद में श्रीरात्र कम होते हैं, पुरुष पात्र अधिक । ७ समयकार-देव-दैत्यों से सम्बद्ध प्रसिद्ध पौराणिक दस्तु, विमर्श सन्धि का अभार मागे चार सन्धियों की स्थिति, ३ अठ, धीरोदात्त तथा धीरोद्धत प्रकृति के २ नायक; वीर रस, सात्वती तथा भारभटी वृत्ति । १ नृत्य तथा आंगिक अभिनय का विवेचन नंदिकेशर के अभिनयदर्पण में विशेषरूप से हुआ है।
[ ४३ ] ८ पोथी-कल्पित पस्तु, एक अङ्क, भारप्रिय नायक, बार रस, कैशिकी यति । श्रक-प्रसिद्ध पौराणिक वस्तु, एक नक, प्राकृत पुरुष नायक, वरुण रस, सात्वती वृत्ति। १० ईहामृग-मिश्रित फ्यावस्तु, चार अg, गर्भ व विमर्श से रहित तीन सन्धियाँ, धीरोद्धत नायक, शार रस। रस-विरोध तथा उसके निराकरण पर भी कभी ऐसा देखा जाता है, एक ही काम में एक से अधिक रसों का समा- पेश कर दिया जाता है। ऐसी दशा में कवि को यह ध्यान रखना पड़ता है कि कहीं ये रस परस्पर विरोधी तो नहीं, तथा प्रमुख भाव या रस को क्षति तो नहीं पहुंचाते । स्थायी भाव या भाव की परिभाषा निवद्ध करते समय दशरूपकार बताता है कि वह लवणाकर के समान है, जो सभी वस्तुएँ आत्मसात् कर लेता है, उन्हें भी खारी बना लेता है। स्थायी भाव यही है, जो सजातीय तथा विजातीय भावों से क्षुण्ण न होता हो। विरुदैरविरदेषी भावैधिच्छिद्यते न यः। बारमभाचं नयत्यन्यान् स स्थायी लवणाकरः।। गावों या परस्पर विरोध हो तरह से हो सकता है या तो वे भाव एक साथ एक या-म में न रह सकें या एक दूसरे के पाधक यन बायें, उनमें वाध्ययापक्भाव हो। जहाँ व्यभिचारिया या प्रश्न है उनका स्थायी के साथ कोई विरोध नहीं हो सकता. साथ ही ये एक साथ न रह सकते हो, यह भी बात नहीं है, क्योंकि येतो स्थायी भाव के ही 'अयन र कान्य में थाते हैं। उनमें परस्पर याध्यबाधक्भाव भी नहीं माना जा सकता, क्योंकि अल होने के धारण व्यभिचारिभाव स्थायी भाव के विरोधी नहीं हो सकते। जहाँ तक स्थायी भाव या रस को विरोध का प्रश्न है, यदि उनके बालम्बन अलग अलग है, तो कोई विरोध नहीं होता । उदाहरण के लिए मालतीमाधव में मार रस है, उसके पश्चम में योभत्स का चित्रण है। ऐसी स्थिति में क्या यह विरोधी है। नही, मालतीमाषय में एक साय हार तथा धौमास का उपनिषन्धन विरोधी इसलिए नहीं पड़ता कि इन दोनों के पालम्बन भिन्न भिन्न हैं। महार या पालम्बन मालती है, तो धीभरस पा श्मशान । वहीं गैर रस का उपनिबन्धन है, जहा अधोर- 'पष्ट पापालिग माधव के क्रोध का पालम्धन बनता है। यदि अलग अलग वारसम्बन बनाकर, विरोधी रसों का उपनियन्यन किया जाय, तो विरोध नहीं होता, न चे एक दूसरे के पाधा ही होते हैं। दो परस्पर विरोधी रसों के विरोध-परिहार का एक हा यह भी है कि दोनों के पीच ऐसे रस का समावेश कर दिया जो दोनों का विरोधी न हो। इसी यीच एक प्रश्न उठना सम्भव है। जहाँ एक हो ररा प्रमुख हो, यहाँ अन्य पिरोधी या अविरोधी रसों को उसका मा मान फर, विरोधाभाव मानना ठीक है। पर - - [१४] ऐसे भी काव्य है, जहां कई रसों का समप्राधान्य देखा जाता है, इन कायों में रस विरोध का परिहार कैसे किया जाय! त्तिकार धनिक इस शाके उठाते समय कई ऐसे काव्य-पद्य-उपस्थित करते हैं, जहाँ एक से अधिक भावों का समप्राधान्य देखा जाता है। वृत्तिकार इस शङ्का का निराकरण करते हुए बताते हैं कि पस्तुत इन स्थलों में भी प्रधान भाव तथा प्रधान रस एक ही है, दूसरे उपन्यस्त रस या भाव गौण ही होते हैं । हम निम्न दो उदाहरणों को ले सकते हैं:- (१) एकचो कभइ पिना अण्णत्तो समरतरणिग्योसो। पेम्मेण रणरसेण अमडस्स डोलाइ हिनम् ॥ (२)पकेनादणा प्रविततरुषा घीक्षते व्योमसंस्थं भानोविम्बं सजललुलितेनापरेणात्मकान्तम् । अहरदेदे दयितविरदाशकिनी चक्रवाकी दो सड़ीणों रवयति रसौ नर्तकीच प्रगल्भा ॥ यहाँ पहले उदाहरण में हम देखते हैं कि कोई योद्धा समर-याना के लिए तैयार है। युद्ध में जाने के पहले यह प्रिया से विदा ले रहा है। विदा होते समय प्रिया रोकर अपने दुःख फी व्यसना कराती है। एक थोर धिया का रोना उसके हृदय में प्रेम का सञ्चार करता है, दूसरी ओर युद्ध के सूर्य का शब्द हृदय में वीरता का सम्धार करता है। इस प्रकार योद्धा का दिल जैसे प्रेम और वीरता के हिडॉले पर, सन्देह- दोला में झूल रहा हो। शा करने वाला यहाँ दोनों रसो-भार तथा पोर-का सम- प्राधान्य मानता है। धनिक इस शहा का निराकरण करते बताते है कि यहाँ वीररस पी ही प्रधानता है, Pार रस तो गौण है, तथा उसी का पोषक घन कर आया है। ऊपर की गाया का 'भदस्य' ( भडस्स) पद भी इसी बात का सङ्केत करता है। दुसरे उदाहरण में, सन्ध्याकाल के समय सूर्यास्त से उत्सम किसी चळवाकी की विरह दशा का वर्णन है। सूर्यास्त हो रहा है, सूर्य का यिम्प पश्चिम में डूबने जा रहा है, रात्रि के प्रागमन को आशक्षा से भविष्यत् प्रियविरहशदिनी चकवी सूर्यविम्व को एक आँख से गुस्से के साथ देख रही है। उसकी दूसरी आँस प्रिय पर टकी है, और उस आँख में आँसू भर भाये हैं। इस तरह चकनी, एक कुशल नर्तकी की तरह एक साय को रसों की व्यथना करा रही है। यहां हम देखते हैं कि चची एक ओर शोध का अनुभव कर रही है, दूसरी ओर विरहविग्धता का । इस प्रकार इस पत्र में एक साय रति, शोक तथा कोष की व्यञ्जना हो रही है। शक को उठाने वाले के मत से यहाँ तीनों भावों का समन्नाधान्य है। धनिक इससे सहमत नहीं। यहां रसविरोध का निराकरण करते हुए वे बताते हैं कि इस काव्य में प्रमुखता भविष्यद्विपलम्भ की है, अत' यहाँ भनेकतात्पर्य की समप्रधानता नहीं है। 'एकनाणा' इत्यादौ तु समस्तमपि चाफ्यं भविष्यद्विपलम्भविषय- मितिम विदनेकतात्पर्यम्।
[ ४५ ] रस-शान के अन्य प्रन्यों में कौन-कौन रस किम सि रस का विरोधी है, इसका विराद वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए भार का रोदः शान्त तथा करण से विरोष है। पशरूपककार का प्रमुख लक्ष्य नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का एक छोटे से पैमाने में रामावेश फर देना है। यही कारण है धनमय एवं धनिक अनावश्यक विस्तार में जाना अभीष्ट न रामफ कर परस्पर विरोधी रसों की पूरी तालिका नहीं देते । फिर भी रसविरोध तथा उसके परिहार जितना कहा गया है, वह सूनरूप होते हुए भी महत्त्वपूर्ण है। धनञ्जय तथा धनिक की मान्यताएँ साहित्यशास्त्र, नाट्यशास्त्र तथा रस शास्त्र के सम्बन्ध में कुछ स्थलों पर धन अय तथा धनिक ने दशरूपक में अपने सिद्धान्तों को व्यक्त किया है । धनिक की ये मान्य- ताएँ हम तीन शीर्षका में वोट देते हैं (१) धनिक नया धनमय के द्वारा व्यअनाति का निषेध । ) रस की निष्पति के सम्बन्ध में धनिक शामत । (३) धनिक क्या धनषय के द्वारा नाट्य में शान्त या निषेध । (१) धनञ्जय तथा व्यसनावृत्तिः :-धनजय तथा धनिक दोनों ही भाई मीमांसकों के द्वारा अत्यधिक प्रभावित है। ये अभिधा, लक्षणा तया तात्पर्य इन तीन हो पत्तियों को मानते जान पड़ते हैं। निवादी को नई वल्पना, व्यसना मा तुरीया प्रति उन्हें स्वीकृत नहीं। भाद्र मीमासक व्यजना वृत्तिगम्य प्रतीयमान अर्थ को तात्प- र्यार्थ से मिल नहीं मानते । उनका मत है कि प्रतीयमान अर्य की प्रतीति तात्पर्य वृत्ति से ही हो सकती है । धनिवादी रस को ध्याय मानते है, तथा उसकी प्रतीति के लिए प्यजना व्यापार की रूपना करते हैं। धनिक ने चतुर्य प्रकाश में इसी मत वा सण्डन फरते हुए अपने इरा मत की प्रतिष्ठापना की है कि स्थायी भार ( रस भी) निभावादि के द्वारा प्रतीत माझ्या ही है, जैसे किसी वाक्य रूप में अभिहित या प्रकरणादिरी पुद्धिस्थ किया, कारकों से युक्त होकर, पाक्यार्थ बन जाती है । पाच्या प्रकरणादिभ्यो बुद्धिस्था वा यथा फ्रिया । पाक्याची कारवोर्मुक्तः स्थायीभावस्तधेतरैः ।। धनाय की इस पारिता का वाल्यार्थ कुछ नहीं, तात्पर्यार्थ ही है, तथा वृत्तिकार । धनिक में इसे स्पष्टत तात्पर्यशक्तिगम्य गाना है। इसो कारिया के उपोद्घात के रूप में वृत्तिकार धनिक में सर्वप्रथम पनिकार के मत को उपस्थित किया है, जो काव्य तथा रस में, या विभावादि तथा रस में वाच्य- चाचरुभाव, या लालक्षक भाव नहीं मानते। वेदलील देते है कि रस के याचक शारादि शब्दों का प्रयोग कान्य में नहीं होता, यदि ऐसा होने पर रसप्रतीति हो तो घाच्यवाचक सम्बन्ध मान सकते हैं। साथ ही, मान लीजिये शारादि शब्दों का प्रयोग हो भी, तो ररा प्रतीति हो ही यह आवश्यक नहीं । साथ ही, वाच्यवाचकभावं - [ ४४ ] ऐसे भी काव्य है, जहा कई रसों का रामप्राधान्य देखा जाता है, इन काव्यों में रस- विरोध का परिहार कैसे किया जाय ? वृत्तिकार धनिक इस शड्डा के उठाते समय कई ऐसे काव्य-पद्य-उपस्थित करते हैं, जहाँ एक से अधिक भावों का समप्राधान्य देखा जाता है । वृत्तिकार इस शङ्का का निराकरण करते हुए बताते हैं कि वस्तुत' इन स्थलों में भी प्रधान भाव तया प्रधान ररा एक ही है, दुसरे उपन्यस्त रस या भाव गौण ही होते हैं । हम निम्न दो उदाहरणों को ले सकते हैं:- (१) एकत्तो रुबइ पिया अण्णत्तो समरतरणिधोसो। पेम्मेण रणरसेण अभडस्स डोलाइ हिअन्नम् ॥ (२) एकेनाणा प्रविततरुपा पीक्षते व्योमसंस्थं भानोविंम्ब सजललुलितेनापरेणात्मकान्तम् । अश्वेदे दयितविरदाशदिनी चकवाकी दो सङ्कीणों रचयति रसौ नर्तकीय प्रगल्भा ॥ यहाँ पहले उदाहरण में हम देखते है कि कोई गोदा समर-याना के लिए तैयार है। युद्ध में जाने के पहले वह प्रिया से विदा ले रहा है। विदा होते समय प्रिया रोकर अपने दुख की व्यजना कराती है। एक ओर प्रिया का रोना उसके हृदय में प्रेम का सञ्चार करता है, दूसरी ओर युद्ध के तूर्य का शब्द हृदय में वीरता का समार करता है। इस प्रकार योद्धा का दिल जैसे प्रेम और वीरता के हिडॉले पर, सन्देह- दोला में भूल रहा हो। शहा करने वाला यहां दोनों रसों-झार तथा वीर-का सम- प्राधान्य मानता है। धनिक इस शहा का निराकरण करते बताते हैं कि यहाँ पीररस की ही प्रधानता है, भार रस तो गौण है, तथा उसी का पोषक वन कर पाया है। ऊपर की गाथा का भटस्य' (भडस्स) पद भी इसी बात का सङ्केत करता है। दूसरे उदाहरण में, सन्ध्याचल के समय सूर्यास्त से उत्पन किसी चकवाकी की विरह दशा का वर्णन है। सूर्यास्त हो रहा है, सूर्य का यिम्य पश्चिम में इयने जा रहा है, रात्रि के आगमन की आशा से भविष्यत् प्रियविरहशाहिनी चकवी सूर्यविम्य को एक श्राँस से गुस्से के साथ देख रही है। उसकी दूसरो प्रॉस प्रिय पर टको है, और उस प्राँस में आँसू भर आये हैं। इस तरह चकी, एक कुशल नर्तकी की तरह एक साय दो रसों की व्यपना करा रही है। यहां हम देखते हैं कि चकवी एक और शोध का अनुभव कर रही है, दूसरी थोर दिरहविदग्धता वा । इस प्रधर इस पद्य में एक साय रति,शोक तथा प्रोध की म्यधना हो रही है। शहा को उठाने वाले के मत से यही तीनों मावों का सगप्राधान्य है। धनिक इसमे सहमत नहीं। यहा रसविरोध का निराकरण करते हुए वे बताते है कि इस काव्य में प्रमुखता भविष्यद्विप्रलम्भ की है, प्रत' यहाँ भनेकतात्पर्य की समप्रधानता नहीं है। 'एकेनाया इत्यादौ तु समस्तमपि पाक्यं भविष्यप्रिलम्भविषय- मिति म कचिनेकतात्पर्यम् ।
प्रयोग हो मी तो रस प्रतीति हो ही यह आवश्यक नहीं। साथ ही, वाच्यवावकभाव - धावकभाव, या लक्ष्यलक्षक भाव नहीं मानते। ये दलील देते हैं कि रस के वाचक शारादि शब्दों का प्रयोग काश्य में नहीं होता, यदि ऐसा होने पर रसमतीति हो तो वाध्यवाचक सम्बन्ध मान सकते हैं। साथ ही, मान लीजिये महारादि शब्दों का [ ४५ ] रस-शास्त्र के अन्य प्रन्यों में कौन-कौन रस क्मि मि रस का विरोधी है, इसका विशद वर्णन मिलता है। उदाहरण के लिए गर या रौद्र, शान्त तया करुण से विरोध है । दशरूपककार का प्रमुध लक्ष्य नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का एक छोटे से पैमाने में समावेश कर देना है। यही शरण है धनभय एवं घनिक अनावश्यक विस्तार में जाना अभीर न समझ पर परस्पर विरोधी रनों की पूरी तालिका नहीं देते। फिर भी रसगिरोध तथा उसके परिहार जितना कहा गया है, वह सूत्ररूप होते हुए भी महत्त्वपूर्ण है। धनञ्जय तथा धनिक की मान्यताएँ साहित्यशान, नाट्यशास्त्र तथा रस शास्त्र के सम्बन्ध में पुउ स्थलों पर धनमय राया धनिक ने दशहपक में अपने सिद्धान्तों शे व्यक्त किया है। धनिक यी ये मान्य- साएँ हम तीन शीर्यकों में बाँट देते हैं:- (१) पनि तया धनजय के द्वारा व्यपना वृत्ति का निषेध । (२) रस की निष्पत्ति के सम्बन्ध में धनिक का भत । (३) धनिक तथा धनप्रय के द्वारा गाय्य में शान्त का निषेध । (१) धनञ्जय तथा व्यअनावृत्तिः-धनाय तथा धनिक दोनों ही भाट गीमासकों के द्वारा अत्यधिक प्रभावित हैं। ये अभिधा, लक्षणा तथा तात्पर्य इन तीन ही प्रतियों को मानते जान पड़ते हैं। नियादी की नई क्सना, व्यञ्जना मा तुरीया पति उन्हें स्वीकृत नहीं । मामीमांसक व्याना तिगम्य प्रतीयमान अर्थ को तास- यो से भिन्न नहीं मानते । उनका मत है कि प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति तात्पर्य धृत्ति से ही हो गकती है। अभिवादी रस को व्यय मानते हैं, तथा अगरी प्रतीति के लिए याना व्यापार यो कम्पना करते हैं । धनिक ने चतुर्य प्रकाश में इसी मंत्र का सण्डन करते हुए अपने इस गत की प्रतिष्ठापना की है कि स्थायी भाव ( रस भी ) विभावादि के द्वारा प्रतीत वाच्यार्य ही है, जैसे किसी वाक्य रूप में अभिहिरा या प्रकरणादि से पुद्धिस्य किया, धारकों से युक्त होकर, पापयार्य बन जाती है। याच्या प्रकरणादिभ्यो वुद्धिस्था वा यथा फ्रिया । धाक्यार्थः कारकैर्मुक्तः स्थायीभावस्तथेतरः॥ धनाय की इस कारिका का वाक्या कुछ नहीं, तात्पर्यार्थ ही है, तथा वृत्तिकार धनिक ने इसे स्परत तात्पर्यशक्तिगम्म माना है । इसी कारिया के उपोद्घात के रूप में प्रतिकार धनिक में सर्वप्रयम ध्वनिकार के मन को गस्थित किया है, जो काव्य तथा व में, या विभाषादि तथा रस में वाव्य- N .- [४] (1) कुछ लेग शान्तरस को मानते ही नहीं, क्योंकि भरतमुनि ने उसके विभावादि का प्रतिपादन तथा लक्षण नहीं किया। (२) कुछ लोग शान्तरस' का इसलिए प्रभाव मानते हैं, कि अनादिकाल से आये हुए रागद्वेष का नट होना असम्भव है। (३)कुछ लोग शान्त का अन्तर्भाव चौर, वीभत्स श्रादिरसों में ही कर लेते हैं। धनधय पतराते है कि वे शम भाव या शान्त रस का निषेध केवल नाटकादि रूपकों में ही करते हैं। शम में समस्त व्यापारों की परिसमाप्ति होनी चाहिए, यह व्यापार समाप्ति अभिनीत नहीं हो सकती। अत अनभिनेय होने के कारण, शान्त की स्थिति नाटक में अस्वीकृत करनी ही पडेगी। इसी सम्बन्ध में एक प्रश्न और उठता है कि पुद्ध, युधिष्ठिर, जीमूतवाहन आदि में शान्त रस की स्थिति देखी जाती है । कुछ लोग उन्हें धीरप्रशान्त कोटि के नायक मानने की भी भ्रान्ति कर बैठते है। जो लोग मागानन्द नाटक में शान्तरस मानते हैं, उन्हें धनिक निम्न उत्तर देते हैं - हम देखते हैं कि नागानन्द का नायक जीमूतवाहन एक ओर मलयवतती में प्रेम करता है, दूसरी ओर विद्याधर चक्रवर्तिल प्राप्त करता है। ये दोनों बातें शम भाव के विरुद्ध पड़ती है । यस्तुत' जीमूतवाहन दयावीर है, तया मागानन्द में वीर रस ही है । इस वीररस का मलयवती-प्रेम, तथा विद्याधर चनवतित्पलाभ से कोई विरोध भी नहीं जान पड़ता। इस सब निर्णय से स्पष्ट है कि नाटक में शान्त रस की स्थिति नहीं मानी जा सकती। भारतीय रद्गमञ्च श्य काव्य या रूपक रामश्च पर अभिनीत किए जाने की वस्तु है । यही कारण है कि रामच के साथ उसका पनिष्ठ सम्बन्ध है। भरत के नाट्यशास्त्र में आज से लगभग दो हजार वर्ष पहले के भारतीय रङ्गमञ्च की एक मॉडी देखी जा सकती है। धनजय ने रङ्गमञ्च का सकेत नहीं किया है । हम देख चुके हैं धनप्रय का लक्ष्य सम्पूर्ण नाट्यशास्त्र के विषयों को विशद विवेचना नहीं था। इस भूमिरा-भाग को समाप्त कर देने के पूर्व दो शब्द भारतीय रङ्गमश्च को बनावट, प्रकार, साजसथा के विषय में कह देना अनावश्यक न होगा। भरत ने नायशास्त्र में नाट्यगृहीं का विशद वर्णन किया है। उनके मत से नाटकादि का अभिनय तीन प्रकार के नायगृहों में होता था। ये उत्तम, मण्यम तथा निकृष्ट श्रेणी के होते हैं। पहला १.८ हाथ लम्बा, दूसरा ६४ हाय लम्बा, तथा तीसरा ३२ हाय सम्या होता है । इनमें दूसरा टीक राममा गया है। समस्त नाट्यगृह को दो भागों में बाँट दिया जाता है. समय तथा दर्शकों से येठने की जगह । दर्शकों के बैठने की जगह में ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा राहों के बैठने की अलग अलग जगद होती थी । प्रत्येक वर्ण के व्यक्तियों के येठने की जगह पर उसका सरेरा करने - [४] पाला स्तम्भ होता पा। मानणों के पेटने की जगह स्वत स्तम्भ होता था, क्षत्रिय, रय तथा शद्रों के मंटने की जगह प्रमशः रक, पीत सया नीत स्तमा। पंठने के भासन लकड़ी या १२ के होते थे। सामानि के घटने की जगह के सामने रह या रमय होता पा । द्वितीय श्रेणी के नारपरह में यह रह पाठ दाप सम्या और पाठ हाप चौदा होता था। इसके भासिर में ही होता था। समय के पीछे पटी या अवनिका होती थी, इसके पीछे नेपभ्य गृह होता था । जरो गार्ग, रामप्य तथा सष्ट इन सीन मागों में विभाजित किया जाता था। रज के दोनों ओर मत्तवारणी होती थी, जहाँ पात्र प्रवेश करता था। भरत के नायन में सोम तरह के नायडों पा लेस है:-अपम नाट्यगृह दीर्घ चतुरन होता था, जिसे दम रपटेग्युलर' पद सकते है, इराकी लम्बाई अधिक घ चौड़ाई कम होती थी। दूपरे टाका नाय्यद विष्ट चतुरस होता था. जिसे हम 'स्क्वायर पद सकते हैं, जो सम्याई य चौदाई में परावर होता था। तीसरे टाका नाटायह तितौना होता था, इसे "यस यहा गया है। इनमें प्रत्येक में सामाजिषों के बेटने की जगह मा तथा रमय के विभिन्न मागों का विभाजन उसकी पनाषद तथा सम्बाई-चौपाई के आधार पर किया जाता था। हम पता चुके है भारतीय समय की अभिामि के साथ ही साथ संस्कृत के मादकों का विकास हुश्रा 1 पालिदास, शक, हर्ष, भवभूति मादि के नाटक रणगय पर मजे से रोले जा सकते है, वे पोरे पाय-नाटक नहीं 1 धीरे धीरे भारतीय ररमच का हास होता गया, किन्हीं कारणों से इन्द राजाश्रय या लोकाश्रय न मिल पाया। फलतः नाटकों में सिदान्त और प्रगिया वीष्टि से समन्यय न हो पाया। संस्कृत नाटक धीरे धीरे पाय-नाटक से यनते गये और उनका एक मात्र लक्ष्य नाट्यशास्त्र के सिद्धान्तों का उदाहरण के रूप में प्रकाशन हो गया। इन नाटकों में धीरे धीरे भव्य काव्यल बढ़ता गया। इस प्रकार यवनों के भारत में आने के बाद ही भारतीय रागय वया संस्कृत नाट्य साहित्य दोनों अपनी प्राचीन समृद्धि को खो चुके थे। newso शुद्धिपत्र पति छ गुर समर्पण (पिछरा पृष्ठ) २७ महामहिलं महामहिमत्वं विषमत्वविशेषरोन विषमत्वेन २२ इस तरह में पर इस तरह मैं ८२ ३८ पट पर्यत १ २४ सन्यताप्र. संयताम १०४ ३. रत्कातित शीर्ण. पतित शीर्ण. २९ मसिभि ससीमित ९ नीता नौती २१४ १८ সাগৰাথ হরহাম मुत्यायाधे तयोगे ३२५ ३८ तयुषम् तदयुक्तम् ॥श्री श्रीधनञ्जयविरचितं दशरूपकम् धनिकलतापलोकसहित चन्द्रकला हिन्दोव्याख्योपेतं च T रारपनि , 71 प्रथमः प्रकाशः। इछ सपाचारं प्रमाणयद्भिरविघ्नेन प्रकरणस्य समाप्त्यर्थमिष्टयो प्रकृताभिमसदेवतयो- मंगर घर क्रियते श्लोकदयेन- नमस्तस्मै गणेशाय यस्कण्टः पुष्करायते । मदामोगधनध्यानो नीलकण्ठस्य ताण्डवे ॥१॥ यस्य कण्ठ मुकरायते - मृदावदावरति, मदाभोगेन' पनवान = निधिध्वनि , नीलकण्ठस्य = शिवस्य, ताण्डये = उद्धरो मृते, तस्मै गणेशाय नम । अत्र खण्डरलेषा क्षिप्याराणोपमाच्छायालहार जातकण्ठस्य - मयूरस्य ताण्डये मया रोपण्यनि पुस्करा यत इति प्रतीते । सस्कृत के प्रकारों में ऐसी परिपाटी तथा शिष्टाचार प्रचलित है कि मथारम्भ के पूर्व चे अपने इदेवता का स्मरण महलाचरण के रूप में किया करते है। इसी शिष्टाचार को प्रमाण गानकर उसका पालन करते हुए प्रकार धराशय ने यहाँ सर्वप्रथम मङ्गलाचरण को अमतारणा की है। उनका प्राय बिना किसी विन के पूरा हो जाय, इसीलिए अपने इष्टदेवता (गणेश तथा विष्णु) यो दोस्रोको से कामस्कार किया गया है। वाले शिव ताण्डव नृत्य करने पर मदजल परिपूर्णता से गम्भीर तथा धीर ध्वनि याला गणेश का भण्ठ मृदा समान आचरण करता है। उन भगवान गणेश को नगस्कार दी। यहाँ 'नीलकण्ठ' शब्द का अर्थ 'मयूर' भी होता है। मयूरपक्ष के अर्थ करने पर 'मदामोगरनभ्यारस पद के 'धनवान' हरा खण्ड को लेकर उसका अर्थ पध्वनिलिया जा सकता है। इस खण्डइलेष अलकार के द्वारा शिव तथा गणेश पर मयूर सथा मेघ का उपमानोपमेय गाव माशिम दो जाता है। अत यह श्लेष के द्वारा उपमा धाया व्यजित हो रही है। भाव यह है कि जैसे मयूर के ग्राण्डव के समय मेषधनि मुना के समान पोती से शिव के उया रस्य के समय गणेश की गम्भीर बदनि मी धी ३.
ylione दशरूपकम् ही प्रतीत होती है । नृत्य के समय मृदङ्ग भी प्रयुक्त होता है, क्योंकि वह उसकी ताल मौर गति या नियामक है दशरूपानुकारेण यस्य माधन्ति भाषकाः। नमा सर्वविदे तस्मै विष्णवे भरताय च ॥२॥ मत्स्यकूर्मादिप्रतिमानामुद्देशेन, अयत्रानुकृतिरूपना कादिना यस्य भावका = प्यातारो रसिकाच, मायन्ति = हृष्यन्ति, तस्मै विष्णवेऽभिमताम, प्रकृताय भरवाय . htant natu 640 V जिन भगवान् विष्णु के मत्स्यादि दशावतारों के प्रवणादि से मावुक भत्त प्रसन्न होते है, उन सर्वत्र भगवान् विष्णु को नमसंगर दो तथा जिन महर्षि भरत के द्वारा निधून दश (नाटकादि) रूपक-भेदों के अवलोकन और पर्यालोचन से सदश्य सामाजिक प्रसन्न होते हैं, रन गुनि मरत को मी नमरसार हो। भोतु' प्रतिनिमित्त प्रदश्यते- कस्यचिदेष कदाचिद्दयया विषय सरस्वती विदुषः। घटयति फमपि तमन्यो प्रजति जनो येन पैदग्धीम् ॥ ३॥ त फैचिद्विषय प्रकरणादिरूप कदाधिदेव करयचिदेव कवे सरस्वती यापयति येन प्रकरणादिना विषयेणान्यो जनो विदग्धो भवति । Vकिसी भी मान्य के प्रति पाठक या थोना को प्राकष्ट करना आवश्यक है।सीलिए उसको प्रवृत्त करने के लिए बताया जाता है कि प्रकरणादिरूप किसी विषय या भय को हर कोई कवि सागपूर्ण नहीं बना पाता। यह तो देवी सरस्वती की ही करा है कि वह किसी किसी विज्ञान के किसी विषय को कमी-कमो इस दङ्ग से घटिन पर देती है कि उस विषय के पोहोचन से दूसरा मनुष्य धानी तया विदग्ध हो जाता है। स्वप्रवृत्तिविषय दर्शयति- उपत्योत्पत्य सार यमखिलनिगमानाट्यवेद घिरिश्चि- धके यस्य प्रयोग मुनिरपि भरतस्ताण्डव नीलकण्ठः। शर्घाणी लास्यमस्य प्रतिपदमपर जन्म का कर्तुमी मास्याना फिन्तु किञ्चित्प्रगुणरचनया लक्षण सक्षिपामि ॥४॥ सनाव्यवेद पेदेभ्य सारमादाय प्रदा कृतवान् यररावद्धममिनय भरतधकार करणामहारानकरोत् , हरस्ताण्डवमुद्रत, लास्यं सुकुमार नृत्त पार्वती, कृतवती तस्य सामस्स्येन लक्षणे क क शक, देकदेशस्य तु दशरूपस्य सक्षेप नियत इयर्यः । Vअन्य के भारग्म के पूर्व यह मी अपेक्षित है कि अपने विषय पा उल्लेख कर दिया जाय । मत दशरूपककार धनजय अपने अन्य के विषय तथा उसकी पोलोचना में नामित सरणि का सहन करते है। समस्त देने के जिस सार को लेकर भगवान् ममाने नाट्य नामक (पक्षम) देवकी रचना की जिस वेर से सम्पद अमिनय प्रयोग को हाय तथा पाक के समायोग एव विक्षेप के द्वारा मरत मुनि ने (भ्यावहारिक रूप में) पावित किया जिसमें भगवान शिव ने तण्डव (त) नृत्य का सपा मगवती पार्वती ने हास्य (कोमल) नृत्य का समावेश किया, इस -- + प्रथमः प्रकाश . . . .. नाव्यवेद के सम्पूर्ण लक्षण को कौन कर सकता है । यद्यपि देवताओं और महापुरुषों के द्वारा निगम इस नाट्यशास्त्र की सिद्धान्तसरणि का विवेचन अस्मादश लौकिक प्राणियों के लिए, असम्भव है, फिर भी उन नादयों को लक्षणों को लेकर कुछ कुछ संक्षेप करता हूँ। विषयायप्रस पौनश्यत्य परिहरवि- व्याकोणे मन्दबुद्धीनां जायते मतिविभ्रमः। तस्यार्थस्तत्पदैस्तेन संक्षिप्य मियते असा ॥५॥ व्याकी = निक्षि पिस्तीणे च रसशाले मन्दबुद्धीनां पुंसां मतिमोहो भवति, सेन तस्य नाब्यवेदास्यार्थस्तत्पदैरेप संक्षिप्य माशुपत्या कियत इति ।। नाट्यवेद का विवेचन तो सगवान् मक्षा तथा भरत मुनि कर चुके हैं, तो फिर से उसी का वर्णन करना क्या पिष्टपेषण न होगा; इस आशया का उत्तर देते हुए अन्धकार कहता है कि नाट्यशाल (राशास्त्र)मा विस्तृत तथा गइन है, अतः मन्दबुद्धि वालों को इखिमम हो जाता है, वे धासविक शान को प्राप्त नहीं कर पाते । इसलिये इस अन्य मैं उसी (गरतमुनिप्रणीत ) नाट्यवेद के अर्थ को लेकर उन्हीं पदों के द्वारा सीधे ढंग से सक्षिप्त कर दिया है । तः यह अन्य कोई स्वतन्त्र अभिनव अन्य न होकर उसी का छोटा रूप है। इसलिए इसकी रचना में कोई पिएपेपण नही। इदं प्रकरण दशरूपशानफलम् । दशरूप किं फलमित्याह- पानन्दनिस्यन्दिपु रूपके व्युत्पत्तिमा फलमपघुद्धिः। योऽपोतिहासादिवदाह साधुस्तस्मै नमः स्वादुपराङ्मुसाय ॥ ६॥ तन केचित- 'धर्मायकाममोक्षेपु चक्षण्य कलासु च । करोति कीति प्रोतिं च साधुकाव्यनिषेषणम् ॥ इत्यादिना त्रिवर्गादिव्युत्पत्ति काव्यफलस्पनेच्छन्ति तमिरासेन, स्वसंवेद्यः परमानन्द रूपो रसास्वादो, मशरूपाणी फलं न पुनरितिहासादिवत् त्रिवर्गास्दव्युत्पत्तिमात्रमिति दर्शितम् । नम इति सोस्तुण्ठम् । हमारे अन्य का विषय या प्रकरण दशरूपक (रूपक के नाटकादि दस भेद ) है तथा इस प्रकरण का फल है इन दस रूपकों पर शान । किन्तु दशरूप का फल क्या है, इस प्रश्न के उपस्थित होने पर बताते हैं शिरूपकों के पर्यालोचन का लक्ष्य केवल युत्पत्ति या ौकिक पान न होकर रसरूम अलौकिक आरसार या अनुभव है। V रूपक (अलोकिक आनन्द से प्रवण रहते है। इनका लक्ष्य (फल) सहृदय को अलोकिक मानन्दरूप रस का आस्वाद कराना है। कोई अपनि विद्वान इन रूपकों का फल केयक इतना ही मानता है कि इनसे व्युत्पत्ति होती है, टोक वैसे ही जैसे इतिहास, पुराण आदि के पठन से लौकिक शान मात्र होता है। इस तरह के मत वाल विशन् रस के आस्वाद से परापमुग है। उसमें सदयता या रसिकता का सर्वथा अभाव है। ऐसे विद्वान को एमारा नमस्कार है। कुछ लोगों का कहना है कि 'सत्काव्य के सेवन करने से धर्म, अर्थ, काम तथा मोक्ष में पर्व फलाओं में विदग्धता मात होती है तथा सभ्यता में श्रोति तथा प्रीति का सनिवेश रोता है।' इस मत पा लोप पाल्य का पल था प्रोजन धर्म आदि विवर्ग का गनदी मानवेरे।
4 दशरूपकम् इस मत का सण्डन करते हुए धनश्चय यह प्यासित करना चाहते हैं कि दशरूपकों के अनुशीलन का फल स्वसवेच परमानन्दरूप रसास्वाद है, इतिहासादि के अध्ययन की तरह नहीं जो कोरे त्रिवर्गादि शान का ही कारण है। यहाँ इस मत के प्रवर्दक (भाचार्य भामह) को जो नमस्कार किया है वद उनका मजाक उडाने के लिए है। 'नाय्यानो लक्षणे उशिपामि इत्युक्तम् किं पुनस्तनाट्यमित्याह- । अवस्थानुष्ठतिर्नाट्य- पाव्योपनिवदघोरोदाताद्यवस्थानुकारयनुनिघाभिनयेन तादात्म्यापति य्यम् । नाटयों का संक्षिप्त रक्षण देवा हूँ' ऐसा पहने पर, नाट्य क्या है यह मक्ष उठाना स्वाभाविक है, अतः उमको स्पष्ट करते हुए कहते हैं कि 'अवस्था के अनुकरण को ही नाट्य कहते हैं। जहाँ वाग्य में निबद्ध या वर्णित धीरोदात्त, पारोदत, धौरबलित, धीरप्रशान्त प्रकृति के न्हयकों (तथा तत्तत्प्रकृतिगत नायिकाओं तथा अन्य पात्रों) का माहिक,वाचिक, आहार्य तथा साविक इन चार दग के अमिनयों के द्वारा अवस्थानुकरण किया जाता है, वह नाट्य है। अवस्थानुकरण से यह तात्पर्य है कि चाल-ढाल, वेश-भूषा, आलाप-प्रलाप भादि के मारा पानों की मयेक अवस्था का अनुकरण इस ढग से किया आव कि नटों में पात्रों की तादात्म्यापति हो जाय । जैमे नट दुम्पन्न की प्रत्येक प्रवृत्ति की ऐमा अनुकृति करे कि सामाजिक उसे दुष्यन्त हो समझें। नाट्य के समद दुष्यात और नर का भेद न रहे उनमें परस्पर सभेदप्रतिपत्तिो जाय। 1-रूपं दृश्यलयोच्यते। तदेव माय हरयमानतया रूपमित्युच्यते नीलादिरूपवत् । vपही नाट्य रूप भी कहलाता है। गाय केवल पम्प काव्य न होकर रामच के ऊपर अभिनीत भी होता है, अन यह दृश्य है, देखा जा सकता है। जैसे हम नीले-पीले भादि रंग को देखते है तथा हमारे चरिदिय के विषय को रूप कहते है, उसी तरह पोषण होने के कारण नात्य रूप भी कहलाता है। रूपके तत्समारोपात्-~ नटे रामायवस्थारोपेण धर्तमा स्वापक मुसवन्द्रादिवत् इत्येकस्मिार्थे प्रवर्तमानस्य शम्पयत्य पुरन्दर शम' इतिवत्प्रवृत्तिनिमितभेदो दर्शित । यही नाय रूप रूपक मी कहलाता है, क्योंकि उसमें भारोप पाया जाता है। जैसे रूपक अलकार में हम देखते है कि मुरा पर चद्रमा का मारोप कर दिया जाता है-मुखचन्द्र (मुखरूपी चदमा) वैसे ही नाट्य में नट पर रामादि पात्रों की अवस्था या भारोप किया जाता है, मद इसे रूपक भी कहते हैं । जिस तादाद, पुरन्दर, शक सोनों नामों से पुकारते है, वैसे ही एक हो अर्थ में नाट्य, रूप सथा रूपक तोनों शब्दों का प्रयोग होता है, इसे बताया गया है। -वधैव रसाश्रयम् ॥७॥ (सानात्रिस्य वर्तमान दशप्रकारकम्, एवेत्यवधारणं शुद्धाभिप्रायेण । माटिकाया' संकीर्णत्वेन यक्ष्यमाणत्वात् । रसों पर भाभिन पह नायव दम ही सरह का होता है। शुद्ध नाट्य केवल दस ही तरह का होता है, इस अदधारण के लिए हो (ख)का प्रयोग किया गया है। नाटिका - ?
. प्रथमः प्रकाशा का समावेश रूपक के शुद्ध भेद्रों में नहीं । उनका वर्णन संकीर्ण रूपों में भाग किया जायगा, इसीलिए रूपक केवल इस तरह के माने हैं। तानेव दशभेदानुदिशति- M/नाटकं सप्रकरणंभाणः प्रहसन डिमः। व्यायोगसमकारो वौथ्य हामृगा इति ॥८॥ दन दरा गेदों का उल्लेख करते है:-नाटक, प्रकरण, माण, प्रहसन, डिम, व्यायोग, समयकार, पीथि, मह, ईहामग'। ननु- 'डोम्बी श्रीरादितं भाणो भाणीप्रस्थानरासकाः । काव्यं च सा नुत्यस्य भेदारस्युस्तेऽपि भाणकर । इति रूपान्तराणामपि मायादयधारणपपत्तिरित्याशइयाह- अन्यद्धावायं मृत्यम्- रसाश्रयणाय्यादापाययं नृत्यमन्यदेव तत्र भावानममिति विषयमेदान्नृत्यमिति नृतेर्गानिक्षेपार्यत्वेनातिराहुल्याप्तत्वारिषु च नर्तकम्मपदेशालोकेऽपि म 'मन प्रेक्षणी- याम्' इति व्यवहारालाटकादेरन्यन्नृत्यं तनपत्याच्छोगदितादेरवधारणोपपत्तिः । नाट- फादि च रसविषयम् , रसस्य च पदापीभूतविभावादिकरांसर्गात्मकयाक्यार्थहेतुकरवावा. फ्यायोगिनयात्मकत्वं रसाश्रममित्यनेन दर्शितम् । नाव्यमिति र 'नट भमस्पन्दने इति नटेः किभियतनायत्वात्सात्विकबाहुल्यम्, अत एव तत्कारिपु नव्यरदेशः । यथा च गाविदेपावे समानेऽम्यनुशरात्मकरन मृतादन्यन्नरय तया वाक्याभिनयात्मका. मास्यात्पदाभिनयात्मकमन्यदेय मृत्यमिति इस विषय में पद पाशाहो साती है कि कोई कोई अन्धकार मा मत मिन्न है, जैसे 'गल्प के टोम्बी, भीगदित, माण, माणी, प्ररथान, रासक तथा काय ये सात भेद होते है, वे माण की तरह ही होते है। इस तरह तो दूसरे रूपक मी सिद्ध होते है, पिर 'रूपफ दस बीस प्रकार अवधारण करना ठीक नहा जान पड़ना; मका उत्तर देते हुए प्रत्यकार कहते है कि मृत्य नाट्य से भिन्न है)मावानय नृप विलकुछ अलग पौन है। नाट्य पा रूपक रसों पर माधित है, जबकि मृत्य भाव पर माभित है, अतः ये दोनों मित्र- मिर नाट्य रसाभितरे, प्रत्य मानायितः इसलिये उनमें विषयभेद तमा नृत्य गप्प की गुत्पति''पा से हुई है जिसका भरगावविशेष जिसका तात्पर्य आदिक गमिनय काटता है,(जर कि नाट्य में चारों तरह के अभिनय पाये जाते है), साय हो नृत्यरत्न विशारदनक दलाते है (मट नही); साथ ही गल्प केवल देसने भर पी चीज है, यर्श सदीय कुछ नहीं होता कथनोपकथन मा यहाँ ममार रखता सौकिक म्यगार में 'यहाँ १. नात्य में पानों का सहीन खिय सरते हुए रसी परिपुष्टनावी वाती है, मार धे परम परिसीमारे, सिमाप में रेल गारों को ममियाना रहती। गाय में अपनोपरयन नायक होणार कि भूप में केवल गाविपादिसे से मारम्मश्ना दौसी है। नाटय या रूपाउनादरण शाकुन्तल नाटक ,मन्य मापदप कर ६ दशरूपकम् - प्रेक्षणीयक (दृश्य ) है ऐसा प्रयोग मृत्य के लिए पाया जाता है, इसलिए नाबादि रूपको से नृत्य सर्वथा भिन्न वस्तु है अत 'दत ही रूपक है। यह अवधारण योगदिनादि के विषय में सगत बैठ जाता है । नाटकादि रूपक कोरे भाव पर आश्रित न होपर, रसपरक होते हैं। रस समस्त काव्य के उस वाक्याथ से निष्पन्न होता है, जो काव्य में प्रयुक्त पदों के अर्थरूप विभाव, मनुभाव तथा व्यभिचारी भावों के ससर्ग से युक्त होता है, इसलिए वाक्यार्थरूप अभिनय का पाया जाना (अथांत वाचिक अभिनय की समा)ही रसामय है इस रात का संकेत किया गया है । नाय' शब्द की व्युत्पत्ति 'नट अवस्पन्दने' धातु से हुई है, जहाँ नट धातु का अर्थ अवस्पन्दन, या कुछ २ चलना है, अतः नास्य में सात्विक अभिनय की छुटता होती है, इसीलिए. नाट्यविशारद नट कहलाते हैं। जमे गात्रविक्षेप के समान रूप से दोनों में पाये जाने पर भी मृत्य नृत्त से सर्वथा भिन्न इसलिए है कि प्रथम में अनुकरण पाया जाता है, दूसरे में नहीं, वैसे ही वाक्यार्थरूप (वाचिक) अभिनय वाले नाट्य से पदार्थरूप अमिनय वाला मृत्य भी अलग चीज है। प्रसहान्नृत्तं व्युरपादयति- "नृत्तं ताललयाश्रयम् । तानवधरपुटादि, लयो द्रुतादिः, तन्मानापेक्षोऽनविक्षेपोऽमिनयरान्यो समिति । ऊपर के विवेचन में प्रसव 'नृच' वा उस्लेस हो गया है, अतः उसकी व्युत्पतिकी माती है । नृत्त ताल तथा एय पर धाधित होता है। नृत्त में केवल भविशेष पाया जाता है, अभिनय वा बहाँ अभाव रहता है। यह नृत्त ताल के आधार पर मात्रा का अनुसरण करता तथा लय के आधार पर गति (दुत, मन्द या मध्य ) का आश्रय लेता है। इसमें किसी भी प्रकार के अभिनय की ससा नहीं होती, कौरा गात्रविक्षेप रहता है, जो ताल तथा लय के द्वारा नियमित होता है। अनन्तरो द्वितीय व्यारे- प्राथं पदाभिनयो मार्गो देशी तथा परम् ॥ ६ ॥ वृत्य पदार्याभिनयामक मार्ग इति प्रसिद्धम्, नृतं न देशीति । द्विविधस्यापि दैविध्यं दर्शयति- हन्दी नृत्य तथा नृत्त की पुन व्याख्या करते हुए बताते है कि 'पहला पदार्थामिनयरूप नृत्य मार्ग भी कहलाता है, तथा दूसरा (मृत्त) देशी भी कहलाता है। शास्त्रीयपरति से समन्वित पदाभिनयरूप गात्रविक्षेर नृत्य कहलाता है। यह शास्त्रीय होने के कारण मार्ग भी कराना है। नत में कोरा गात्रविक्षेप है, भो ताललयसमन्वित है, पर शासीय नहीं, मत. ससे 'देशो' के नाम से भी पुकारते है। मधुरोट्तमेदेन तयं द्विविधं पुनः। लास्यताण्डधरूपेण नाटकायुपकारकम् ॥१०॥ 1. ताल सड़ीन में स्वर मी मात्रा का तथा मत्त में पाविश्वेप को मात्रा का नियामक होता से सङ्गीत में १६ मात्रा के पद में पहली, पाँचवी और तेरहवी पर हाल दिया जाता है, नवीस ली छोड़ दी जाती है, इसी तरह नृत्त यो मी ताल दी जाती है। हय मृत की गति को दोड, मन्द या मध्यम करने की सूचना देती है। १.मार्ग या नूत का पदाहरण दक्षिण में प्रचलित 'भरतनाट्यम्' या कथक नृत्य पा उदयशंकर के मावनुष्य है । देशी या मृत्त के उदाहरण है रोक्नर जमे मोरों या गरा। . + .
प्रथमः प्रकाश । , सुषमार द्वयमपि तास्यम्, उद्धतं द्वितयमपि ताण्डवमिति । प्रसमोफस्योपयोग दर्शति-तच माटकायुपकारकमिति, मृत्यस्य क्वचिदवान्तरपदार्यामिनयन नृत्तस्य च शोभाहेतुत्वेन नाटकापाउपयोग इति । ये दोनों ही फिर से दो ढाके होते है --मधुर सथा टदत, मधुर लास्य कहलाता है, और उस्त ताण्डव । ये दोनों तरह के नृत्य तथा नृत नाटकादिरूपकों के उपस्कारक होते हैं। ये दोनों प्रसङ्गोक्त मृत्य और मृत विषय के उपयोगी है इसलिए 'नाटकायुपकारया' पद का प्रयोग किया है। नाटकादि में पदार्थाभिनय के रूप में भावाथय नृल का तथा शोमाजनक होने के कारण नृत का प्रयोग पाया जाता है।' शास्त्रीय नृत्य में कोमल गावों तथा उद्धत भावों को ध्याना में मित र सरणि का आश्रय लिया जाता है। इसीलिए इसे दो तरह का माना है मुकुमार लास्य और उद्धत ताण्डव । इसी सरह देशी भूत्त का भी हाल है। लोर नृतों में प्रयुक्त भैरोजी, माताजी के मृच जिन्हें हम गाँवों में देखते हैं, उद्धत होते है ! जय कि साधन या होली के अवसर पर प्रचलित कामिनियों के लोक नृत्य मधुरता तथा सुकुमारता लिये होते है । अनुकारात्मकत्येन रूपाणाममेदास्किम्तो भेद इत्याराइपाह- पस्तु नेता रसस्तेषां भेदकः- पस्तुभेदामायकदादसमेदानुपाणामन्योन्य भेद इति । सभी रूपों में अनुवरण पाया जाता है अत उनमें कोई भेद नहीं दिखाई देता, पिर पर भेद क्यों किया जाता है, इस भेद के कारण क्या है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए कहते है:-इन रूपको को एक दूसरे से भिन्न करने पाले तीन तत्व है-वस्तु, नेता तथा रस। बस्तुभेद नायक भेद तथा रसभेद पौष्टि से दोनों परस्पर भेद है। 'पस्तुमेदमाह--- -यस्तु च द्विधा। पस्तुभेद को बताते हुए कहते है कि-पस्तु दो तरह की होती है।। कपमिरयाई- Vतमाधिकारिफ मुख्यमङ्ग प्रासङ्गिक विदुः ॥ ११ ॥ प्रधानभूतमाधिकारिफ यथा रामायणे रागसौतात्तान्त , तदभूत प्रासहिक यमा तव विभीषणगुप्रीचादिपतान्त इति । इममें मुख्य पस्त भाधिकारिक (फयावरत) कहलाती है तथा बगरूप वस्तु प्रास- शिक( कथावस्तु) कहलाती है। नाटकादिरूपरों में प्रपानभूत कथा वो वापिंगारिक कहते हैं, जैसे रामायण याय में राम तथा सीता का शव । इमो आधिशारिक क्या के भरून में जिन उपकथाभों का समावेश होता है, ये प्रासादिक बहराती है, जैसे रामायण में ही विमोषण पात्तान्त, समीर या पत्रात या ऐसा दी दूसरी पथाएँ । निसरयाऽऽधिकारिफ लशयति- नधिफारा फलरधाम्यमधिकारीच तत्प्रमुः भिर्युतममिव्यापि घृत्तं स्यावाधिकारिकम् ॥ १२ ॥ फलेन स्वस्यासिवन्पोऽपिकार पनुस्वामी चाधिकारी तेनायिघ्रोणाधिकारिणी निरा पानपर्यन्त मीयमानमितियरामापितारिकम् । r - दशरूपकम् भाषितारिक शम्मी गुरपत्ति करते हुए सक्षम करते हैं। 'पल पर स्वामिय प्राप्त करना अधिकार कहलाता है, तथा उस फल का स्वामी अधिकारी कहलाता है। उस फल या फलभोक्ता के द्वारा फल प्राप्ति तक निर्वाधिक पृत्त या क्या माधिकारिक वस्तु पहाटाती है। उदाहरण के लिए सबथ, सौतामाति तथा रामराज्य की स्थापना रामायण कथा का पल है, इसको स्वामी या मौना राम रे, मत. आरम्म से रावणवध, सीताप्राप्ति तथा राज्याभिषेक मक दोषथा भापिसारिक वयावरहै। प्रायशिक व्यायटे- प्रासगिकं परार्थस्य स्वार्थो यस्य प्रसङ्गतः। यस्येतित्तत्य परप्रयोजनस्य. सतस्ताप्रहारस्वप्रयोमनसिदिस्तरमासनिकमिति प्रशनिते। • सब प्रप्तहोपारा प्रारानिक वस्तु की व्याख्या करते हैं। जो फया या पूर दूसरे (आधिकारिक के) प्रयोजन के लिए होती है, किन्तु प्रसार से विसका स्वयं का फल भी सिद्ध हो जाता है, यह प्रासहिक वृत है। प्रासङ्गिक पिता प्रमुख ध्येय माधिकारिक पूरा पसनिर्वहणता में सहायता प्रतिपादित ररना है, किन्तु असत. चराका स्वर का मी फल होता है, जैसे मुग्रीनाथा का प्रयोजन बाटिस हा राज्याम, पण विमीपप्रवृत्त का प्रयोजन लङ्काराज्यप्राप्ति। प्रातिकमपि पताकाप्रकरीमेदाइद्विविधमित्याह- सानुबन्धं पताकाप्यं प्रकरी च प्रदेशमा ॥ १३ ॥ । दूर यदनुवर्तते प्रासनिक सा पताका वादिवसान्तवत-पतावासाधारणनायक विहवतदुपकारित्वात, यदप सा प्रकरो श्रमणादितान्तवत् । यह प्रासनिक इतिवृत्त भी पताका तथा प्रारी दो तरह का होता है। जो प्रासनिक कथा अनुसन्धसहित होती है, तथा रूपक में दूर तक चलती रहती है, यह पताका कहलाती है। तया जो कया केवल एक ही प्रदेश तक सीमित रहती है, यह पकरी कहलाती है। रामायण की कक्षा में सुप्रीव व विमोषण का वृत्तान्त पताका है, वह दूर तक चलती है, वह मुख्य नायक के पटाका चिद यो तरह आधिकारिक कथा तथा मुख्य नायक को पोषक होती है।( पताका का नायक मिन्न होता है तथा यह पताकानायक कहलाता है।) रामायण में छोटे-छोटे वृत्त प्रकरी है जैसे समगा शबरी आदि की.काएं। पताकाप्रसोन पताकास्पान ध्युत्पादयति-- प्रस्तुतागन्तुमाघस्य वस्तुनोऽन्योक्तिसूचकम् । ✓ पताकास्थानकं तुल्यसंविधानविशेषणम् ॥ १४ ॥ प्राकरणिकस्य भाविनोऽर्थस्य सूचकं रूपं पटाकावद्वतीति पताकास्पान तब तुस्येतिवतवया तुरूपविशेषणतया च द्विप्रकारसु-भन्मौफिसमायोजिमेदात् । यमा रहावस्याम्- 'यातोऽस्मि पपनयने समयो ममेष सुप्ता मयेव गवति प्रतिमोपनीया। प्रत्यायनाममितीव सरोहिण्या सूर्योऽस्तमस्तकनिविष्टकर' करोति ।' - पताका के साथ ही यहाँ पताकापान की व्युत्पति करते हुए पाते है कि 'वहाँ प्रस्तुत भावी वस्तु को समान इस था समान विशेषण के द्वारा भन्योकिमय सूचना हो, बसे .
1 प्रथमः प्रकाश . पताकास्यानक कहते हैं।' कवि कभी-कभी रूप में एक स्थान पर भविष्य में पटित होने वाली पटना का सङ्केत घर देता है । यह सूचना पनाका या धजा की भाँनि भावी वृत्त की सूचना देती है, इसलिये पताकास्थानक कहलाती है। यह सफेन या ती घटनाओं को समानता के आधार पर होता है या फिर उनमें समान विशेषणों के पाये जाने के कारण होता है। एक में (प्रथम भेद में ) भन्योति या अप्रस्तुतप्रशंसा का आश्रय लिया जाता है, दितीय में समासोक्ति काारतावली नाटिका को निम्न पध में समान इतिवृतरूप अन्योक्ति प्रणाली वाला पतापात्यानक पाया जाता है। 'हे पा के नेत्र वाली (पम जैसे नेत्रवारी), मेरे जाने का समय आ गया है, यह मैं जा रहा हूँ। प्रात राल तुम्हें सोने से मैं ही जगाऊँगा। अस्ताचल के मस्तक पर भाविरिण से दुर या पूर्व इस प्रकार पचिनो को (अपने लौट आगे या विश्वास दिला रहा है। पहा पर सूर्य-पधिनी वर्णन के द्वारा भायो उपयन-रसावतीरूप वृत्तात को अन्योक्तिमय व्यसना, पताकास्थानक ही है। हमी नाटिका के निम्न पप में समान विशेपण पाहा पताकारणानक भी पाया जाता है। यथा च तुल्यविशेषणतया- 'उद्दामोरकलिका विपाण्डुरवं प्रारम्भ क्षणा- पागास पसनोद्गमैरविरलैरातन्वतीमात्मन । अयोधानलतामिमा समदनां मारीमिवान्यां धुर्व पश्य कोपविषादलद्युति मुरी देण्या करिष्याम्यहम् ॥ १. प्रश्न होता है यहाँ एरर्णन मी जर प्रसार में प्रातुन है, तो फिर अप्रस्तुनप्रया में होगी। सुदर्शनाचार्य टीका में यहाँ स्पष्टत पमहिनीमूर्यचात से नायनायियावृत्तान्त मी मनीति में अयोक्ति या अप्रस्तुप्रशसा गधार मानते है। यही विकार पनिर मी पहते है। दमारे मसानुमार यह अयोक्ति गूनामात्र है, जिसका म्यग्य उपमा मानव र उपमानोपमेय भाव माना जा सकता है । सन्ध्याकाल के प्रसार में पहे गये इस पप में प्रारम्किलो राकमहिनी वृत्तास रपष्ट है। उसे अप्राकरगिक गानने पर अप्रस्तुनप्रसमा दो साती है। यदि नायर नायिया वृत्तात को गातुन मान रेंगे, तो सारी गावटी हो जायगी। यहाँ मी रामाशोजि रने, पोरि समासोति में समान कार्य भी होता है। मैं रस मन से सहमत नहीं है। नाशि में यह राजा को उकिशाम के समय कदीर मा प्रारगिक तथा परतुलाध उसे ही माना होगा। माती मरण नाना नापिपानात बोबा चना से मानर वातु से उपमा मतदाररूप यग्य गान सेंगे। यो गरबद आगे के उदाहरण में भी पोगी। पपि यहा समासोति ठीक रेट जाती है। पर अप्रतुन नादर-नायिका रूप असामान्य रूप में गेका सागरिका-दयारूप विशेष' अर्थ में परिपथम विस माना जाय,तो पनाकास्थानक मानने में इस कारण माना होगा। यदिलिप विपरप, तो पर मारिश पाव निरामय हमारे समझ में दो में कौन यहीद, एक उतिचाप दूसरा द्रस्यविगा। अप्रस्तुमास समाप्तौलि मानने को साग हा मारण पनिक दो विपर।पत यहा दोनों में दग्या प्रतिबिना तातिए स परत में अन्योलमा रोगी (दति राहिला -१), में भरत परदेसिपे ना शा. २१, ३१-३५)। दोनो गरे मोहा मान पदहरसी चिदाका २५० १० दशरूपकम् मैं नाती वलियों वाटी, पीले रंग बाग, सिल्नी हुई हम उपवनता को देग रहा हूँ जो पायु के निरन्तर वेग के कारण अपनी विशालता को व्यक्त कर रहार तथा मदन नामक पौधों से आस है। इसे देखते हुए हुए ऐमा प्रतीत होता है कि शामवासना से परष्टित, पीले पड़ी हुई, जमाई हेनी, सकाम दूमरी स्त्री को देरा रहा हूँ जो निरन्तर नियाम हे ऐकर अपनी बामपोहा पोम्यक्त कर रही हो। अत्र में ऐसी धन्यना करता हूँ किम हता यो देसर में अन्य की की देसने के समान देवीबासकदा का अपराध पर रहा तथा इस अपराध से मैं निश्चय हो देवी के मुख को क्रोध से भारत कान्तिवालाना दूंगा। पहा लता के वर्णन में तुरुयविशेषों के द्वारा भपर नायिका की सूचना दी गई है, जो रानादली संपर भावी वृत्त को संदेतित परती है । अत: यहां दूसरे दंगका पताकास्थानक है। १.हम देखते हैं, पनजय तथा धनिक के दल दो सरह पा पनावासना मानते हैं। एक तुस्येनिवृतरूप, दूसरा स्थाविशेषणरूप । प्रथम का उदाहरण 'यातो:रिम पपनयने इत्यादि पचारे, दूसरे का 'उद्दामोख लिया आदि पम 1 भरत पव विश्वनाथ दोनों ही चार चार तरह के पताकास्थानक मानते हैं । विश्वनाथ की परिभाषाएँ भरत के होलोकों की नकल है, बही 'परिवौर्यते' की जगह 'परिकीर्तितम्' कर दिया है, वो 'पने को अगइ 'उच्यते', उनमें कोई तात्विक मनर नहीं है। मरती परिमापाया है। 'जहाँ किसी एक अर्थ (वस्तु) के चिन्तन के समय नाटकादि के भावी पदार्थ होने के कारण उसी चिदों वाले अन्य अर्थ का भी प्रयोग किया जाय, वहाँ पठाझास्थान होता है। (१)जहाँ सहसा ही प्रेमानुकूल व्यापार (उपचार) के कारण उत्कृष्ट प्रयोजनसिद्धि हो, वो पहला पताकास्थानक होता है। (२) अत्यधिक रिलष्ट उम्दी वाला, भनेकार्थकोषक, नायकादि का मगलसूचक पताका. स्थान दूसरे दंग का होता है। (३)जो वका या अर्थ अन्यफ, किन्तु सनिश्चय हो, तथा लिष्ट उपर से पुल हो, पहा तोमरा पताकास्थानक होता है। (४) जहा दो अर्थ वाले दिरष्ट वचनवियास का प्रयोग कान्य में हो, सथा पर प्रधाने. तर भय की प्रतीति कराए, वह चौथा (अन्य) पनाकास्थानक होता है। यत्रा चिन्त्यमानेऽपि तडिंगार्थ प्रयुज्यते । आगन्तुकेन भावेन पतास्थानक च तव ॥ सहसेवार्थसम्पतिणुगवत्युपचारत 1 पताकास्थानकमिद प्रथम परिकार्यते ॥ वचसाऽतिशयश्लिष्टं काव्यबन्धसमामयम् । पनाकास्थानमिद दितीय परिकीर्तितम् ।। अर्थोपक्षेपण ययुरीन सपिनय भवेत् । मल्टप्रत्युत्तरोपेत तृतीयमिमिष्यते॥ चर्चा वचनविन्यासः सदिय काम्ययोजितः । उपन्याससपुतश्च तचतुर्थमुदाहनन् । (नाट्य शा०२१।११-३५) यहाँ जर सक इनके उदाहरण न दिये जाय, विषय स्पष्ट न दोगा। विश्वनाप के उदाहरण यों है:- (१)रसावली में वासवदत्ता के रूप में सागरिका को लनापाश से मरता देव पर, राजा पहले उसे वासवरतारी समानता है। बाद में सागरिका को पहचान लेने पर उसकी गुणवती अर्थसम्पति ( उत्कृष्ट प्रयोजनसिदि) होती है। (२)बेणीसंहार में सूत्रधार के 'रक्तप्रमापितमुर क्षतविग्रहाच, स्वस्था भवन्तु कुरु राजसुनाः समस्या में भनेकार्यबोधक श्लिष्ट शब्दों से नायक को मगलकामना की गई है। . ~ प्रथमः प्रकाश ११ एपमाधिकारिकविविधप्राशिकमेदात्रिविधस्यापि त्रैविध्यमाह- प्ररयातोत्पाद्यमियत्यमेदान्नेधापि वनिधा। प्रख्यातमितिहासादेश पाद्यं कविकल्पिगम् ॥ १५ ॥ मिश च सकराताम्यां दिव्यमर्यादिमेदतः। इति निगदव्याख्यातम् । - इस तरह इतिवृत्त आधिकारिख, पताका तथा मकरी (प्रासगिक के दो भैइ) चीन प्रकार है. यह फिर से तीन तीन तरह का होता है। यह तीन तरह का इविस्त प्रख्यात, उपाय सथा मिथ इस तरह फिर से तीन शोन प्रकार का है। प्ररथात इतिहास, पुराण भादि से गृहीत होता है, उत्पाद्य कवि की स्वय की कल्पना होता है, तथा मिथ में दोनों की खिचड़ी रहती है। साथ ही यह वृत्त दिग्य, मयं सथा दिग्यादिव्य होता है। तस्येतियत्तत्य किं फलमित्याह- कार्य निधर्मस्तच्छुञ्जमेकानेकानुबन्धि च ॥ १६ ॥ পাকা কল নব মানুষ মিনু ব্য। इस इतिवृत्त का प्रयोजन या फल गया है, इस प्रश्न का उत्तर देते हुए बताते है कि इसका फल (कार्य) धर्म, अर्थ तथा कामरूप दिया है। यह फल कभी तो इनमें से एक ही हो सकता है, कभी दो वर्ग और कमी तीनों वर्ग । (३) वेणीसंहार के दूसरे अफ में जब राजा (दुर्योधन ) मानुमती से कहता है कि मेरी दोनों जॉप ( गुगल) हो तुम्हारे बैठने को पर्याप्त है, तो ठीक उसी वक्त 'कञ्चकी उपस्थित होकर कहता है-'देव, सोद डाला। इस प्रकार यहाँ सामाजिक एक बार 'पोस मेव करमौर ममोरुयुग्म' सुनने के बाद हो कयुकी की उक्ति 'देव, मन्नम् सुन कर सहम जाता है। मागे राजा जप पूरला 'किसने', तो कभुकी उत्तर देता है-'भीमसेन ने। और फिर धीरे पता चलना है कि मोम ने राजा का रथ लोड डाला है। इस तरह यहाँ ठीसरा पतामा स्थान है। हसका दूसरा उदाहरण उत्तररामचरित से दिया जा सकता है- राम -' यदि परमसा विरह' के बाद हो 'फन्नुको-देव, उपस्थित ', में सामाजिक रिया उपस्थित का सब समझ बैठता है, जो माषी घटना था सूचक है। देसे कती को पुरा के उपस्थित होने की सूचना देने बारा है। (४)ीया उदाहरण उदामीरकलिका दी, जिसे धनिक ने दिया है। इस तरह धनग्य य थनिक बाय दूसरा एताकास्थानक गरत व विश्वनाथ का चौथा है। पर उनका पहला भयोक्तिनाला (१)सुत्पतिवम पतावास्थानक पर के तीनों में से पिम में भाएगा ! वा पहले और तोतरे में तो नहोभा सकता। क्या 'पमनयने दिलष्ट मानकर उसे दूसरे प्रकार ये पताारसााक में मान सकते है। पितु परिभाषा में मात 'भतिशपति' का विषय देते है। 'पाठeo' आदि पप का 'बतिसलिए नही कदा जा सकता। तो हमारे मन से या उदारण मरत के दूसरे पनामस्मानर में भी नहीं भा पाश। स, धनंजय का यह भेद मन्य प्रकार का है। अगर इसे चोये ही प्रकार का मान लिया जाय, तो पद र संगति में जापगी। पर फिर भी धनंजय ने दूसरे पनागरधान को गरी भारत बना रहता है।
दशरूपकम् - तत्साधनं प्युनादयतिन म्घल्पोडिएस्तु तद्धेनुज विस्तार्यनेकया। स्तोकोद्दिष्टः कार्यसाधक पुरस्तादनेकप्रकार विस्तारी हेतुविशेषो योजयद्वी यथा रत्नावस्या मत्सराजस्य रमावली प्राशिनुमासदेवो यौगन्धरायशव्यापारो विशम्भक न्यस्तः–'यौगन्धरायण- संदेह (दोपारन्यस्मात्-' इति पठति) इत्यादिना 'प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनी दिहतो' इस्यन्तैन । यथा च वेणीमहारे द्रौपदोकेशसंयमनहेतुर्भीममोधोपचितयुधिष्टिरोत्साही पोशमिति । तच महाकार्यावान्तरपायहेतुभेदादनेकप्रकारमिति । इस विवर्गरूप फल के साधन की विवेचना करते हुए बताते हैं कि 'रूप के आरंभ में अपरूप में संकेतित यह ताप जो रूपक के पल का कारण है तथा इतिवृध में अनेकरूप में पक्षरित होता है, योग कहलाता है। अपरूप में निर्दिष्ट हेतु की वृस के चार्य (पल) का सापक है, तथा वृक्ष के दोर की तरह पदिन होर अनेरशाख १क्ष की गीति वृक्ष के रूप में विद्ध होता है, वह पारिभाषिक का में बीज नहटाता है। रानामती नाटिका के वृत्त का कार्य उदयन व रत्नावती या निल्न करा देना है, जो मत्री योगपरायण को अभीट है। नारिका के रिफम्मर में ही यौगन्धरायाकी ६ वेग, पिसे माग्य की भी मनुकूलता प्राप्त है, भोज के रस में सामने रक्पी गई है। यौगन्धरायग इसमें क्या सन्देह २ते हुए तथा 'अनुकूल माग्य यहीं से भी बार इष्ट वस्तु को प्राप्त करा देता है (दोपादन्यस्मादपि०) इत्यादि उक्ति से आरम करके 'स्वामी की उननि के कार्य को मारम परतण देव के द्वारा सहायता मिलने पर मैं अपने कार्य में सफलता प्राप्त करूंगा' इस उक्ति सकमीज का सकेन करता है। वेणीसहार नाटक में द्रौपदी का केश सयमन नाटक का फल है। इस कार्य का हेतु माम के कोष से परिपुष्ट युधिमिर का उत्साह है, यही इस नाटक का बीज है। यह बात भी महाकार्य तथा अवान्तरवार्य हेतु होने के कारण दो तरह का है। अवान्तरबोजस्य संज्ञान्तरमाह- अवान्तरार्थविन्दे विन्दुरच्छेदकारणम् ॥१७॥ यथा रत्नावल्यामवान्तरप्रयोजनानगपूजापरिसमाप्तौ कथार्थविच्छेदे सायनन्ताकार्य- हेतु'-'उदयनस्येन्दोरिवोदीक्षते । सागरिका-(श्रुत्वा) यह एसो सो उदयणगरिन्दो जस्स अई तादेण दिग्णा। (यमेष स उदयननरेन्द्रो यस्याह तातेन दत्ता) इत्यादि। विन्दु-बले तैलबिन्दुवप्रसारित्वात् । महाकार्य बीज का सकेत हो चुका है, भर अवान्तरीब की दूसरी सशा (नाम) बताते हुए कहते हैं कि जहां किसी दूसरी कथा (अर्थ) से विच्छिन्न हो जाने पर इतिवृत्त को १. नेगीसदार नाटक में बीज 'सस्या भवंतु मयि जीवति धार्तराष्ट्रा.' इस भोमोक्ति मन्थायस्तार्णवाम्म नुतनुपरस्ट मन्दरधानपीरः। कौगाघातेपु गर्जत्लयपनघटान्योन्यसघट्टच ॥ कृष्णाक्रोधाप्रदूत कुरकुगनिधनोखातनिर्गलबार। कनारमसिइनादप्रनिरसितमो दुन्दुभिरताडितोऽयम् ।। तथा 'मोधयोतिरिद मदएरुखने यौधिष्टिरं घृम्भते तक सचित हुआ है।
V । प्रथमः प्रकाश १३ जोदने और आगे बढ़ाने के लिए जो कारण होता है, वह विन्दु कहलाता है। जैसे रत्ना- वली नाटिका में वासवदना के द्वारा कामदेव को पूरा एक अवान्तर वृत है, इससे एक अर्थ समाप्त हो जाना है और कथा में विशृद्ध लता मा जाती है। इसे सश्लिष्ट या शृखलाबद्ध करने के लिए वहाँ नेपथ्य से मागर्धा को फि के द्वारा 'मदाराम उदयन के चरणों की दाट शेग इसी तरद, देख रहे हैं जैसे चन्द्रमा की किरणों की' यह सबना देपर सागरिका के रूप में वहाँ रहती हुई रत्नावली के द्वारा 'क्या यही वह राजा उदयन है, जिसके लिए पिताजी ने मुझे दे, दिया है यह उक्ति कहलवा कर काथा का अच्छेद (संधान ) यार दिया है। यह मच्छेदकारण बिन्दु धूत में आगे जासर ठीक वैसे ही प्रसारित होता है असे तेल की बूद पानी में फैलती है। रसीलिए इसे विन्दु कहते है। 27-7.56 इदानी पताकार्य प्रसादपुरकमोफ मार्थमुपसंहरनाइ- बोजविन्दुपताकाख्यप्रपारीकार्यलक्षणाः । अर्थप्रस्तयः पञ्च ता पता परिकीर्तिताः ॥ ८ ॥ अप्रत्यः - प्रयोजनसिद्धिहेतवः। पताया तथा प्रहरी का वर्णन ग्रन्थकार ने ग्राम के अनुसार नहीं किया था, इसलिये अर काम को ठीक करने के लिए उपसहार करते हुए पाँच अर्थप्रकृतियों का विवेचन करते हैं:- रूपक में बीब, बिन्दु, पताका. प्रकरी तथा कार्य पे पाँच अर्थप्रकृतियाँ होती हैं। अर्थ पति से तात्पर्य उन तत्वों से है जो प्रयोजन मिद्धि के कारण होते है।, अर्थ से तात्पर्य प्रयोजन या वस्तु के फल से है, ये पाँचों उसी अर्थ को प्रकृति से संबद्ध क्षेते है। प्रश्न होता है नाटकीय कथावस्तु में विन्दुक होता है, या अनेक बिन्दु को परिभाषा के अनुसार विन्दु जहाँ कयास, एक प्रयोजन सिदि के पूरे होने के कारण टूट जाता २, वर्षों से जोड़ कर भागे पढ़ता है। इस तरह तो विन्दु अनेक हो सकी है। हमारे मन में किसी नाटक में बिन्दु अनेक हो सकते हैं।- २. अर्थप्रकृति को स्पष्ट करते हुए पतिक बनाते हैं कि ये (रूपक के नायक यो) प्रयोजन सिमि के हेतु ई-प्रयोजनसिद्धिहेतवः। परम परिभाषा पर एक आपत्ति होती है। अर्थप्रहतियापार है:-दीज, विन्दु, पताका, मकरी तथा कार्य। जहाँ तक पहली चार गर्थ. प्रकृतियों की बात है, २ प्रयोजनासद्धिहेतु है हो । पर पाँचको प्रकृति पर आते हो निक की परिमापा गढ़बड़ा जाती है। कार्य नामक अर्थप्रकृति स्वयं प्रयोजन' है। फिर 'प्रयोजन' स्वय उसो का सिद्धिए फैते दन सकता है। या तो ये दोनों प्रयोजन भिन्न होने चाहिए या फिर कार्य से इतर चार हो अर्थप्रकृति में प्रयोजनासवितुष मानना चाहिए। पनिक की भोलि विश्वना भो 'प्रयोजनसिद्धिनवः' कहकर चुप रह जाते हैं। बतुतः वै पधु परिच्छेद में धनिक बोनकस करते है। इस समस्या को एक ढंग से सुलझाया जा सरावा है। कार्य या प्रयोजन दो तरह के माने जाने चाहिए । एक प्रमुस कार्य जो नाटक वा पास कार्य है, जैसे रामकया में रावण का दूसरा अवान्तरका जैसे विभीषण का मिलना मादि। ऐसा मानने पर अवान्तर कार्य प्रमुख कार्यका प्रयोधन का सिद्धिहेतु न जायगा । पर क्या धनंजय, धनिक तथा विश्वनाथ को गद्द अमीष्ट था। गदि ऐसा हो तो उन्हें सकेत करना चाहिए मा। इससे भगाय में गस गन को दुष्ट ही मानेगे। ३.पहा पठाका तीसरी तया प्रतिरोधी यमति मानी गई है। पतापा उहाहरण रामस्या में मुनीर-चामन तथा प्रहरीका सबरी कृतान दिया है। इस तरह सो समस्या में रोका पात पहले शाता है, समोर का बाद में रामकश में इस निशान से प्रकरी दशरूपकम् श्रन्यवस्थापञ्चकमाह-- अवस्था पञ्च कार्यस्य प्रारब्धस्य फलार्थिमिः। श्रारम्भयनमात्याशानियतातिफलागमाः ॥ १६॥ पाँच अर्थप्रकृतियों का निर्देश पर देने पर अब पाँच अवस्थाओं को बताते हैं -पल की इच्छा घाले नायकादि के द्वारा प्रारब्ध कार्य की पाँच अवस्था होती हैं-भारम्म, यान, माश्याशा, नियताप्ति तथा फलागम। ययोद्देशं लक्षणमाह- औत्सुक्यमात्रमारम्भः फ्ललामाय भूयसे । इदमह सपादयामीत्यध्यवसायमात्रमारम्भ इत्युच्यते, यया रत्नावस्याम्-'प्रार• म्मेऽस्मिस्वामिनो वृद्धिदेतो देवे चेय तहस्तावलम्वे ।' इत्यादिना सचिवायत्तसिद्धे वत्सराजस्य कार्यारम्भो यौगन्धरायणमुसेन दर्शित । रही पाँचों के नामानुसार लक्षग बता रहे हैं ~अत्यन्त फटलाभ की उत्सुकता मात्र ही भारम कहलाती है। किसी भी पल की प्राप्ति के लिए नायकादि में इन्टा होती है तथा उसके प्रति उत्सुकता होती है। इस उत्सुका मात्र का पाया ज ना ही आरभ है क्योंकि प्राप्ति के लिए की गई चेष्टा का समावेश 'यत्न' नामक दूसरी अवस्था में हो जाता है। मैं इसे एकै। सिर्फतनी चेष्टा ही भारभ है, जमे रत्नावली नाटिका में 'स्वामी की उन्नति के हेतु का भारम पर लेने पर तथा भाग्य के द्वारा इस तरह सहायता दिये जाने पर आदि उक्ति के द्वारा वत्सराज उदयन के उस कार्यारम की सूचना योगंधरायश के मुंह से दिलाई गई है, जिसकी सिद्धि मंत्री योगधरायग पर आश्रित है। यहाँ योगपरायण ने उदयन-रत्नावली-मिलन रूप फल के प्रति उत्सुकता प्रशिंन को है। अथ प्रयत्न- प्रयतस्तु तदप्राप्ती व्यापारोऽतिस्पराधितः ॥२०॥ सत्य पलत्यापातापाययोजनादिरूपश्चेशविशेष प्रयत्न एथा समावस्यामाले ख्याभिलेखनादिर्घत्सराजसमागमोपाय -तहावि त्यि भएणो दसणुवाश्रो ति जहा- सहा लिहिन जधासमीहिश्र करिस्सम् । (तयापि नास्त्यन्यो दर्शनोपाय इति यया तथालिख्य यथासमोहित करिष्यामि।) इत्यादिना प्रतिपादित । उस फल की प्राप्ति न होने पर, उसे पाने के लिए बड़ी सेजी के साथ जो उपाय तीसरी मति को जायगी, पताका चौथी। इसे वैसे सुलझाना होगा। इस सपने मत को हमने सषि के प्रकरण में पुरनोट में सकेनित किया है, वह देखना चाहिए । १ दशरूपकार के मन से अयाति तथा अवस्था का भेद स्पष्ट नहीं होता। ये दोनों हो कथावरण में पाई जाती है। पर मासिर इनमें अन्तर क्या हमारे मतानुसार बीज आदि पाँच अर्थपति वरतु के उपादान कारण है। इसे इस वस्तु का 'मेगरियन' या सकने है।महामाये पांच अर्थप्रकृति होगी, कथा वा ढाँचा खड़ा हो जायगा । अवस्था नायक की मनोरणा से संबर है, यह तय अवस्था की परिभाषा से स्पष्ट है। इस प्रकार यह जचता है किराति नाटकीय सवस्तु र औपदानिक विमान (Thysical dirision) है, जर कि ५ भवरमा नाय को मनोशा की दृष्टि से वस्तु का मनोवैज्ञानिक विभाजन Rayehological division) हैरिस मत के लि भै प्रो. वान्तानाप शाही लग पाणीद।
प्रथमः प्रकाश योजनायुक्त व्यापार या पेष्टा होती है, यह प्रयास है। प्रयान के अन्तर्गत गायक या नायिका पनी अमीप्सिन पशु यो शाम वरने के व्यापार में संलग रहते है। जैसे रत्नावरी में नापिया सागरिका वामान को प्राप्त करना चाहती है,स प्राप्ति के उपाय रूप में वह वत्सराज के चित्र या बालेपन करती है। यही सेनारिया में यग नामक बरसा पाई जाती है। 'वत्सराज नदयान के दर्शन वा पोई दूसरा उपाय नहीं, फिर भी मैं जैसे तैसे उनका चित्र पनाकर इच्छा को पूर्ण धरती।इम रक्ति दे दारा परन यो गूमना दी गई है। प्राप्त्याशापाह- उपायापायशहाभ्यां प्राप्त्याशा प्राप्तिसंभवः। उपायत्यापायशङ्कायाय भागदनिधारितवान्ता फलप्राप्ति प्राप्त्याशा । यया रला. वल्या तृतीये वेपपरिव गिसरणादौ रामागमोपाये सति पासवदत्तालक्षणापायश. डाया-एव जदि थालवादाली विम आपच्छिम अण्णदोण पइस्सदि मासव- पता' ('एवं ययकाललातालीवागत्यान्मतो न नेप्यति वासवदत्ता।) इत्यादिना दशि- तरवादनिर्धारितवान्ता समागमप्राप्तिका । जहाँ उपाय तया रिष्न की नाशका के कारण फलप्राति के विषय में कोई ऐकान्तिक निश्चय नहीं हो पाता, फल प्राप्ति की सभापना उपाय य विनाशका दोनों में दोलायमान रहती है, यहाँ पायाशा नामक अवस्था होती है। जैसे लावली नाटिका के तीसरेक में रत्नावली के वेष बदल कर अभिसरण करने वाले समागम के उपाय के होने पर भी, विदूषर की अगर बकाल वायु की तरह बीच में ही भाकर देवी वासवदता दूसरी और न के जाय तो ऐसा ही होगा इस उक्ति के द्वारा वासवदत्ताजनित विन की आशका दिखा कर रामागमायाप्ति के अनेकान्तिक निश्चय की सूचना दी गई है। यहा विदूषक की इस यक्ति से नायक तथा सामालिकों को यह स देह हो जाता है कि कही पलमाप्ति में कोई विन उपस्थित न हो जाय। नियताप्तिगाह- अपायाभावता प्राप्तिर्नियताप्तिः सुनिधिता ॥ २१ ॥ স্বাৰাহুবহানিফা সন্নিবিষ্টনি। অন্য নাম—নিঃ घक ---सागरिका दुलर जीविस्सद (सागरिका दुष्कर जीविष्यति ।) इत्युपकम्य 'किप उपाय चिन्तेसि ।' ('कि नोपाय चिन्तयसि ) इत्यनन्तरम्, 'गजा-वयम्य । देवीप्रसादन मुक्त्वा मान्यमत्रोपाय पर यामि ।' इत्यनन्तरादार्यविन्दुगानेन देवीलक्षणा- पायस्य प्रसादनेन निवारणानियता फलप्राप्ति सूचिता । जप पिन के अभाव के कारण पक्ष की प्राप्ति निश्चित हो जाती है तो नियताति नामक अवस्था होती है। हम देख चुके हैं कि प्राप्रयाशा में पलप्राप्ति के बाद में नायक का मानस सन्देश से विचरित रहता है। किंतु नियताति में प्राप्ति निश्चित हो जाती है, उसका मानस एक बात को ('पल प्राप्ति श्रवश्य होगी' से) निश्चित कर लेता है। जैसे १ भारतीय नाटक सभी गुरान्त होते है। अत एसात निश्चय के बाद सदा पछासि ही होगी। भारतीय नाट्यशास्त्र की कसौटी पर पाश्चात्य ढग के दुमत नाटकों की मीमासा परन पर 'पकप्राप्ति नहीं होगी इस निश्चय की दशा में नियवाप्ति मानी जा सकेगी। किन्तु नियतातिशादमीयुरपचि मी तुखान्त रूपको केही मनुरूप है।
64 रो १६ दशरूपकम् रत्नावली नाटिका में रनावती के तहखाने में बद रिये जाने पर उसकी दशा का विषय में विचार करते हुए विदूषक बनाना है कि 'सागरिका वही मुश्किल से जिन्दगी काटगी इसके बाद वह राजा से पूछता है-'तुम उसके छुटकारे का कोई उपाय क्यों नहीं सोचते हैं इसके उत्तर में राजा कहता है--'मित्र, इस विषय में देवी वासवदता को सुश वरने के अलावा कोई उपाय नहीं दिखाई देता। यहाँ भावी (च) अङ्कयौ घना दिदु के रूप में चित इस देवीप्रसाद से धारापदज्ञानिक समाप्त हो जायगा। इस प्रसाइन की भावना के कारण पलप्राप्ति की निश्चिति सूचित की गई है। पलयोगमाह- समप्रफलसंपत्तिः फलयोगो यथोदितः। यथा रत्नावल्या रत्नावलीलाभचनपतिवावाप्तिरिति । समस्त पल की प्राप्ति हो जाने पर फट्योग (पठागम) कहलाता है। इस लक्षण मै पल के साथ समल' विशेषण प्रयुक्त हुआ है। इसका तापर्य यह है कि अधूरे पल मिलने तक 'नियताप्ति' अवस्था ही मानी जायगी। रत्नावली नाटिका में दयन रत्नावटी श लाम तथा तजनित चक्रवतित्वप्राप्ति नाटिका का फागम है। 113 संधिलक्षणमाह- थर्थप्रयतया पक्ष पञ्चायस्थासमन्धिताः॥२२॥ यथासययेन जायन्ते मुखाद्याः पञ्च सधया। अयंप्रकृतीना पदाना ययासहयेनावस्याभि ययभियोगात् यथासलथेनेव पक्ष्यमाणा मुखाया पय संधयो जाय ते । रूपक की अर्थप्रकृति तथा अवस्था का वर्णन करने पर उन दोनों के मिश्रण के सभून साथियों का वर्णन करते है। चीज, विन्दु, पताका, प्रकरी तथा कार्य पे पाँच अर्थप्रकृतियाँ जय क्रम से भवस्था, परन, प्राण्याशा, नियताप्ति तथा फलागम इन पाँच अवस्थाओं से मिलती हैं, तो क्रमश मुख, प्रतिमुख, गर्भ, विमर्श तथा उपसहति (उपसंहार) इन पाँच सधियों की रचना होती है। २ धनञ्जय के मन से पाचौ अर्थ प्रकृतियों में से एक एक, अवस्था के एक एक अग से मिलकर ५ सधियों का निर्माण करती है । सधि की परिभाषा तो धनजय मरी ही देते हैं, कि अदा एक अवान्तर भयोजन पूर्ण हो जाय और मुख्य प्रयोजन से जोड़ते हुए कयाशी को आगे के प्रयोजन से सम्बद कर लिया जाय, वहां वह सम्बध सपि कहलाता है। पर परि भाषा में तो काही अर्धप्रकृति तथा अवस्था के मिश्रण की बात नहीं है। धनजय की परिभाषा के मतानुसार तो यह मिश्रण सिद्ध नहीं होता। भरत में इस बात का कोई सकेन नही मिलता।(दे० ना० शा०२१-३६-३७) विश्वनाथ ने भी धनजय केही मत का अनुसरण किया है, वे मी यही कहते है - यथामख्यमवरपाभिराभियोगात्तु पनभि । पनवेतिवृत्तस्य मागास्यु पश्सथय ।(साद ६७४) पर यह योग मानने पर एक गहरड़ी हो सकती है। प्रकरी का सम्मध विम' या अवमर्श से माना गया है। पर कहीं यह गर्म में पाई जाती है। उदाहरण के लिए राम की कथा में शारीत्तान्त प्रारी माना जाता है। पर राम कथा में यहां गर्भसधि ही चल रही १जो सुग्रीव के मिलन तक चलती है। फिर तो सारा सिदान्त गडबडा जायगा। हमारे मन से यह पाच भयंप्रकृति, लथा पाच अवस्था का मेल ५ सधि मानकर मेल मिलाने को कोशिश में ही सारी श्रुटि की जड़ है।
प्रथमः प्रकाशः संघिसामान्यलक्षणमाह- अन्तरेकार्थसंपन्या संधिरकान्वये सति ।। २३ ।। एकैन प्रयोजनेनान्चितानां क्यांशानामवातरकप्रयोजनसंवन्धः संधिः । सन्धि का सामान्य लक्षण बनाते हुए कहते हैं कि किसी एक प्रयोजन से परस्पर संबद्ध (अन्वित ) फयांशों को जय किया दूसरे एक प्रयोजन से संबद्ध किया जाय, तो यह सम्यन्ध सन्धि कहलाता है। पर और कथाशों का सम्मान अर्थप्रकृति के रूप में कार्य से है, दूसरी भोर अवस्था के रूप में पलाग से दोनों को सम्बर करने पर सभि हो जाती है। के पुनस्ते संधयः-- मुपमतिमुसे गर्भः साधमर्शोपसंहतिः । ये सन्धियों कौन सी है १ --मुख, प्रतिमुग्य, गर्भ, अवमर्श (मि) गथा उपसंहृति (उपसंहार या निर्यहण)। गयोद्देशं शायणगाई- मुसं पीजसमुत्पत्तिर्नानाथरससम्मया ॥ २४ ॥ अनि मादर्शतस्य योजारम्भसमन्वयात् । वीमानामुत्पत्तिकप्रकारयोजनस्य रसस्य च हितुर्मुखसपिरिति ध्यार तेना- निवर्गफले प्रत्सनादौ रसोत्पत्तिहेतोरेव योजामिति । नाम मे टमका रण बनाते हुए करते है। 'मुरासन्धि में नाना प्रकार के रस को ' उरपर करने वाली बीजोत्पत्ति पाई जाती है। बीजारम्भ के रिये प्रयुक्त होने के कारण इस मुखसन्धि के यारद रंग हैं। मुखसन्धि में ही काफ के सज को सनना दी जाती है। यही बाज का ग या नाटक के विगित रसों को उत्पन्न करता है, उनका हेतु है। अन्य रूपों में तो धर्मादि मेरो कोई एक वर्ग हेतु या बीज के रूप में होता है, किन्तु प्रहसन, भाण आदि मैं स्पष्ट रूप से झोर वर्ग ( पुरुषार्थ ) हेतु के रूप में नहीं दिखाई देता । सझा समाधान करते हुए बताते है कि यहाँ भा हास्य आदि रस की उत्पति तो होता ही है, अतः रसोत्पत्तिहेतु ( रस का आरवन, समाज का उपहास्य पक्ष) ही वोग गाना जायगा । अस्य च बीमारम्बार्थयुतानि दोसामानि भवन्ति तान्याह-- उपक्षेपः परिकरः परिन्यासो विलोभनम् ॥ २५ ॥ उशिरमाप्ति समाधान विधान परिभावना। उमेदभेदकरणान्यन्वर्थाग्यथ लक्षणम् ।। २६ ।। इसमें बीज के आरम्भ के लिए प्रयुक्त द्वादश अग होते हैं, उन्हों का वर्णन करते हैं- उपोप, एरिकर, परिन्यासु, विलोभन, युक्ति, प्राप्ति, समाधान, विधान, परिमाबना, उन्नेद, मंदसधा करणाइन मुस के यारह अष्टों के नाम भन्यर्थ है, अब इगका लक्षण कहेंगे। एतेषां संज्ञाभ्याख्यातानामपि सुखार्थ लक्ष क्यिते-- चोजन्यास उपक्षेप:- पया रनावल्माम्--(नेपथ्ये) द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेदिशोऽप्यन्तात । थानीय मटिति घटयति विधिभिगममिमुखीभूतः ।। (१) संभया' इत्यपि पाठ। - दशरूपकम् इत्यादिना यौगन्धरायणो वत्सराजस्य रत्नावलीप्राप्तिहेतुभूतमनुकूलदेवं स्वव्यारारं बीजस्पेनोपक्षिप्तवानित्युपक्षेप । रूपक के आरम्भिक अश में जब कवि वीज कान्यास करता है, तो उसे उपक्षेप कहते हैं । जिस प्रकार काक वृक्षादि के फ्ल की च्या से भूमि में शौज का निशेप करता है, । उसी प्रकार पवि भी कार्यरूप पल के हेतुरूप पीज का निक्षेप रूपा के प्रथम माया प्रथम भाग में किया करता है। जैसे रत्नारलो नारिया में मच पर प्रवेश करने के पहले ही यौगन्धराया अपने कार्य को बीजरूप में डाल देता है। पौधरोपण का कार्य बत्सराज उदयन तथा रत्नावरी शामिला देना है, तथा वह इनके मिलाप के लिए व्यापार में सलग्न है, निसमें उसे दैव की अनुकूलता भी प्राप्त है। इस बीडला व्यापार की धनना यौगन्धरायण ने निम्न नेपथ्योक्ति के द्वारा दो है 'अनुकूल होने पर देव अपनी ईप्सित वस्तु को दूमरे द्वीप से, समुद्र के पीव से, या दिशाओं के अन्त से कहीं से भी लाकर एकदम मिला हो देता है। इस प्रकार रत्नावली प्राप्ति रूम कार्य के बीज का ग्यास शेने से यहाँ उपक्षेप है।' परिकामाह- -सदाहुल्यं परिक्रिया। यथा तव-'अन्यथा क सिद्धादेशप्रत्ययप्रार्थिताया सिंहलेधादुहितु' समुद्र प्रपह- भामग्नोस्थिताया फलकासादनम् । इत्यादिना 'सर्वपा शान्ति स्वामिनमभ्युदया।' इस्पन्तेन यो पलेरेव बरकरणात्परिकर । जव योजन्यास का यास्य पापा जाय तो उसे परिकर या परिक्रिया कहते हैं । जहां बीज की सूचना देकर पात्र उस पीजन्याम की पुष्टि भादि करते हुए, उसे दृढ करे उसे परिवर कहेंगे। जैसे रत्नावती नाटिका में ही यौगन्धरायण अपने पल के बीज काय हिस्य प्रकाशित करते हुए बीजोत्पत्ति को पनावित करता है। एमबी सूचना यौगन्धरायण की इन उक्तियों से होती है-(पदि देव अनुकूल न होता) सो मिद्ध पुरुषों के वचनों पर विपास करके सिंहलपति कोनिम पुरी यो पाराम उदयन से विवाहित करने के लिए प्राधित किया गया, बद जदाज के ट ज ने से समुद्र में मग्न होने पर मो एक दस्ते के सहारे कैसे लग माती' तथा ऐमा ज्ञात होता है सामी की प्रति सर ताई से हो रहो उति सामी का सब तरह से स्पर्श कर रही है। परिन्यासमाह- तनिष्पत्तिः परित्यासा- यथा तद--- 'प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनो वृद्धिदेतौ दैवे चेत्यं दत्तहस्तावलम्थे । सिद्धान्तिर्नास्ति सत्य तथापि स्वेच्छाचारी भोत एवास्मि भर्तुः ।।' इत्यनेन यौगन्धरायण वयापारदेवयोनिपत्ति मुखवानिति परिणाम ।। जिन्यास के चाहुरुषरूप परिकर की सिदि या परिपकावस्था (निपति) हरि- रत्नावण के हवा से माने गले जदार के टूट जाने पर, हर जाने की खबर सिय करार देवसरात उसे योगरायण सागरिका के रूप में वासवाचा की दासी बनाकर रख हैना है। वह से जानता है कि सागरिका ही रत्नावगे तथा उसे पूर्ण वास है उसकी या पूर्ण होगी, क्योंकि देव उसके अनुकूल है। क प्रथमः प्रकाश . न्यास कहलाती है। धीरे धीरे रूपक के पास को अपने पलपीन के विषय में और अधिक विपास हो जाता है। जब उसने किया दो शिदिवा एलना दी जाती है तो उसे परिन्यास कदते है। जैसे यौगन्धरायण यो आने व्यापार तथा देव दोनों पर यह पूर्ण विश्वास है कि उसे सिद्धि पाप होगी, उमका बीज अवश्य विपन्न होगा ! इसवी पचना या निग्नपथ के द्वारा देता है- अपने स्वामी पत्सराज उदयन की मन्नति के लिये मैने यह कार्य (रत्नावली मिलापरूप) शुरू कर दिया है, इस कार्य में देव भी मुझे इस वाद हाथ से सहारा दे रहा है (पि जान के टूटने पर भी रत्नावली चार मेरे हाथ लग गई) और मार्य सिद्धि के विषय में भी मुझे कोई सदनही तना होने पर भी मैं यह मनमानी दात (रत्नावली संगोपन) करने के पारण स्वामी से भर रहा। यहा योगधरायण भी अपनी सिद्धि के प्रति पूर्ण आस्था है। बीज डाल देने तथा उसके बास्य के बार जिस तरद रुपक पो मिति तथा पीज-नि पनि यी नास्था होती है, उसी तरह रूपक के पास की भी। जा रहस्सरी अभिव्यसना भाता है, तो वह परिन्यात नामक नाट. कीय सत्व यदलाता है। दिलोभनमाह- -गुणाण्यानं विलोभनम् ।। २७ ।। यपा रानावल्याम- "अस्तापास्तसमस्तभाति नभम पारं प्रयाते रवा- चास्थानी समये समं नृपजन' सायंतने रांपतन्। संप्रत्येप सरोरुहद्युतिगुष पादस्तिवारीवितुं प्रीत्युत्कर्षकतो इशामुदयनस्येन्दोरियोदीक्षते ।' इति यतालिकमुखेन चन्दतुल्यवत्सराजगुणवर्णनया सागरिकायाः समागमहेत्वनुराग- पीशानुगुण्येनैव विलोमनाद्विलोमनमिति । यथा च वेणीसंहारे- 'मन्यायस्तार्णवाम्भः प्लुत हरवलन्मन्दावानघोरः कोणापातेषु गर्जप्रलयपनघटान्योन्यसंघचण्डः । कृष्णासोधाप्रबूत कुरकुननिधनीमातनिर्यातवात' फेनारमसिंहनादप्रतिरसितसस्नो दुन्दुमिस्ताडितोऽयम् ।' इत्यादिना 'यशोदुन्दुभि 'इस्यन्तेन द्रौपया विलोमनाविलोमन मिति । जय (फल से संबद्ध किसी वस्तु के) गुणों का वर्णन किया जाय तो उसे विलोभन कहते है। कोई भी व्यक्ति किसी वस्तु के गुणों के कारण ही उस पर सुम्म होता है, रूपक में भी नायकादि को पल की भोर तुम्ब करने के लिए बदि उसके गुणों का आल्यान करता है। नायवादि में इष्टप्राप्ति या होम उत्पन्न करने के कारण यह सच 'विलोभन' कहलाता है। स रत्नावपोनारिका में ही बैतालिक चन्द्रमा तथा वन्सराज के समान गुणों के वर्णन के द्वारा सागरिका का विलोभन करते है, जो समागम (उदयन रत्नावको मिलन ) के हेतुरूप अनुराग चीनको सागरिका के हृदय में बता रहे हैं। इस प्रकार निम्न पत्र में विलोभन पाया जाता है- (1) गुणाख्यानात्' इत्यपि पाठ।
दशरूपकम् अस्त होने के समय समस्त शोमा (सेज) से शून्य मूर्य के आकाश के पार चले जाने पर, सभी राजालोग शाम के समय एकत्रित होकर प्रीति तथा उन्नति के विधायक व सराज उदयन के, कमल को शोमा का अपहरण बरने वाले, चरणों का सेवन करने के लिए राजभण्डप में उसी तरह कार देख रहे हैं, जैसे प्रोति तथा उन्नति के विधायक, चद्रमा की, कमल की शोमा को छीन लेने वारी, किरणों को बाट देख रहे हों। (यहाँ शाम के समय मा चन्द्रोदय के साथ ही साथ वत्सराज उदयन के गुणों का वर्णन किया गया है। पादान् के दिल्ट प्रयोग से अनुप्रापित उपमा अलंकार चन्द्र तथा उदयन के उपमानोपमेय भाव को व्यक्त करता है।) अथवा, जैसे वेणीसदार नाटक में युपिटिर के द्वारा युर घोषणा दिये जाने व रणदुन्दुभि के बजने से द्रौपदी का विलोमन किया गया है। निम्न पध में मीम ने रणदुन्दुमि के गुणों के आख्यान के द्वारा नाटक की नायिका द्रौपदी का विलोभन दिया है। यह दुन्दुभि किसने बनाया है, जिसकी बावाज हमारे सिंहनाद के समान है । इसका और लथा गभीर शब्द मथन के समय चचल तथा पुग्ध समुद्र-जल से विद्रो (गुहाओं) के भरने से शब्द करते हुए चचर मेदराचल के गंभोर गर्जन के सश, तथा जब एक साथ सैकडों ढक्काएँ तथा हजारों भेरियां पाई जाती है तो ऐसी प्रचण्ड आवाज होती है जैसे गरजते हुए प्रल्प के मैध परस्पर टकरा रहे हो। यह रणदुन्दुभि कौरवों के प्रति उत्पन्न द्रौपदी के कोष का अग्रदून है, तथा कुरुकुल के भावी सदार का उत्पातसूचक प्रलयकालीन गंझावात है। अथ युतिः सप्रधारएमर्थानां युनि:- यथा रत्नावल्याम्-'मयापि चैनो देवीहस्ते सबहुमान निक्षिपता युकमेवानुष्ठितम् । कषिप्त च मया यया पाश्य क्युकी सिलेश्वरामात्येन वसुभूतिना सह कथंकथमपि समुद्रादुतार्य कोशलोच्छित्तरे गतस्य रुमण्यतो घटित ।' इत्यनेन सागरिकाया अन्त पुरस्याया वत्सराजस्य मुसेन दर्शनादिप्रयोजनावधारणाद्वाऽव्यसिंहलेश्वरामात्ययो स्वनायकसमागम हेतुप्रयोजनानावधारणाशुकिरिति । जहाँ अधों का (पाय के अभीष्ट तथ्यों का)भयधारण या समर्थन किया जाय, पदों युक्ति होती है। जैसे अत पुर में स्थित सागरिका बड़े मजे से वत्सराज के दृष्टिपथ में आ सकती है, इस प्रयोजन का समर्धन परने से तथा वामन्य एव सिहलेश्वर के मत्री वसभूति के सागरिका (रलावली) तथा वस्मराज के समागम के प्रयोजन के समर्थन करने के कारण वही युक्तियो व्यंजना न पत्तियों में की गई है - मैने भी सागरिया को सम्मानपूर्वक देवी वामबरा के हाथों सौर कर ठोक दिया है। मैंने यह भी कह दिया है कि मधुरी पाभ्य सिंबलेश्वर के मंत्री वमुभूति के साथ रिमी सरद समुद्र में इसने से बच गया है और कौशल के जीतने के लिए प्रस्थित सेनापति रुमण्वान् पेसाय है।' यहाँ 'मने यह ठीक होनिया सवाक्य से योगधरायग ने अपने कार्य श समर्थन (अवधारण) रियारे, मन यहाँ युक्ति नामक नावि तत्व है। 4-5 भय प्राप्ति -प्राप्तिः सुखागमः । यथा वेणीसहारे-'चेटी-भटिणि ! परिचितो विक्ष कुमारो लासीयद' (भनि । परिकुपित इव कुमारो लक्ष्यते ।) इत्युपश्मे 'मोम - प्रथमः प्रकाश मध्नामि फौरवशतं समरे न कोपाडुशासनस्य रुधिरं न पियाम्युरस्तः । संचूर्णयामि गदया न गुयोधनोरू संधि करोतु भवता नृपतिः पणेन ।। प्रौपदी-(श्रुत्वा सहयर ) गाध श्रादपुब्बं व एदं पण ता पुणो पुणो भए । (नाय ! अभुतपूर्व खल्येतद्वधर्म सानः पुनर्मण) इत्यनेन भीमकोध जान्वयेनैव सुख. माया द्रौपयाः प्रशिरिति। यथा च रत्नावस्याम्-शागरिका-(श्रुत्वा सहर्ष परिपत्य सस्पृह पश्यन्ती) फ्धं श्रयं सो गया उदयणो जस्स अहं तदेश दिण्णा ता पप्पेसणसिद में श्रीविदं एतस्स दसणेग बहुमदं संजादम् । (क्यमयं स राजोदयनो यस्याहं तातेन दशा तत्पर- प्रेषणदूषितं मे शीनितमेतस्य दर्शनेन बहुमतं संजातम् ) इति सागरिकायाः सुखागमा- स्पासिरिति। जहाँ ( फल की प्राप्ति की भाशा में) मुख का भागम हो, यहाँ प्राप्ति नामक गुखांग होता है। जैसे वेगासदार नाटक के प्रथम अमेजर सेविका द्रोपदा को यह सजना देता है कि कामिनि, कुमार भीमसेन गुर से नजर आते हैं, और जद मीम निम्न उक्ति पाना है- महतोष यो चारण में सौ कौरवों को युद्ध में गमय । शासन को छाती से खून को न पासुयोधन को दोनों जोपों को गदा से न तोहूँ। तुम्हारे राजा युधिष्ठिर शिसो (भी) स पर (कौरवों से ) सथि करते रहें, मुझे इसकी कोई पद नही। सक द्रौपदी इय के साथ कहता है-'सामिन् , ऐसा वचन पहले कभी नहीं मना, इस. लिये फिर से { बार बार ) कदिए। यो गौम के शोध के समय के कारण द्रौपदी को सुखप्रालि होती है। इसलिए कि भीम उसकी प्रतिशा पूर्ण कर उसकी वरी वेणी को अवश्य आरम करेगा), भगः प्राहि मानी गई है। सरवा, जैसे रनावती गारिका में तालिकों को सक्कि भुनकर सारिका दर्ष के साथ स्थर उपर सतह दृष्टि से देखती कहती है-'क्या यही वह राजा उदयन है, जिसके लिए पिताजी ने मुशे दे दिया है। सरसो दूसरे लोगों की सेवा करने से कवरित मेरा जीवन इसके दर्शन से सफल हो गया है। यदों सागरिका को मुरा को प्राप्ति हुई है, अतः यहाँ भी प्रालि है। घपसमाधानम- पीजागम: समाधानम्- यथा रसायल्याम्-'पासवदा-तेण हि उनणेहि में उपभरणाई । ('तेन छुप- नयम उपकरणानि ।') सागरिकाभरिणि एवं सायं सथम् । ('मनि । एतत्सर्व समार।') वासवदत्ता-(निरुप्यास्मगतम् अहो पमादो परिप्रणाम जस एव देवपदादो पमतेश रहतीदि तस पजेप कर दिलिगोमरं आमदा, मोटु एम दाप । (प्रकाराम) हले सागरिए कोरा तुम अप पाहणे परिश्रमभणूस चारि मोण इहागा ता ताई ये गए। (भही प्रमादः परिजनस्य यत्र रोना प्रयलेन रयते तस्यैष कप रशियोवरमागता, भवतु एवं सारत् । बेटि शापरिक रूप एएमय पराघाने परिजने मदनीराये सारिको मुश्रपेडागता स्मात गच्छ।') यु. परमे 'सारिका-(स्यातम् ) सारिमा दाप मए गुपंगवार हत्ये सगस्पिदा पेविषतुं दशरूपकम् च में पापल सा मरिसमा पेरियम् ।' ('सारिका तापमया मुसँगवाया हस्ते राम- पिता गितुं न मे पुतानं दलक्षिता प्रेक्षिाये।' इत्यनेन । पापपदराया स्वायत्री- অসাংলিশীয়া সুলতানাসরিন থ বয়ঃ- पमहेतार्थीजस्योपादानारसमाधानमिति । यया च येणौसहारे-भीम-गया पायारामतनये धूययामचिरणेव कालेन 'कानुअनामितवादाभिपातगणिते युगनस्य मुयोधनस्य । स्त्यानावनधनशोणितशोणपाणिरत पियति कास्तर देवि मीम ॥' इत्यनेन वेणीपहारहेतो झोपवीजस्म पुनपावागारसमापानम् । चीज का उपादान फिर से बीज का युति के हारा व्यवस्थापन समाधान कहलासा है। जैसे रत्नावली नाटिका में सागरिया रयन को देपन की या से मदना के स्थान परमा बाटी, उसकी यह इच्छा बीतागम के रूप में इन छियों से। वासवता-तो पूजासामग्री मेरे पाम ल भाभी। सागरिया-वामिनि, यह सरसवार है। पासवदत्ता (देखार अपने आप ) दासियों का प्रमाद फैसा रे, निती (राजा) दृष्टि से बचाने के लिये हम यह प्रयरन से इनकी रक्षा करते हैं, उसी के प्रतिपय में (य).8 भा रही है। ठीक है मैं मामले को यो समाज संगी। (प्रकर) अरी सागरिफे, सब दासियों के दूसरे काम में संगा होने पर सारिका को छोडर तुम यहाँ मदनोतव में के मा गई । इसलिए वहीं चली। सागरिका-(स्वगत) मना तो मैने सुमाता के हाथों सौर रक्खी है, तथा वत्सराज को देखने की मेरी उत्सुकता है, इसटिए मैं विपकर देतूंगी। यहाँ एक ओर वासवदत्ता रत्नावली तथा वसरात्र के परस्पर दर्शन का प्रतीकार करती १ सया दूसरी और सागरिका मैना को समकता के हाथों सौर कर छिपकर उसे ( राजा को) देखती है। यहाँ रत्नावरी (सागरिका) वो इस चेश में बसराजसमागम के हेतुरूप बीज का उपासन दिया गया है, अन' यहाँ समाधान नामक मुपाग है। अथवा, जैसे देशीसंहार नारक में निम्न कि के द्वारा द्रौपदी को भाश्वस्त करता हुआ भीम कौरवसहार की सूचना देकर पीज का समाधान पर रहा है। 'टीक है । देरि पाचालराजपुति सनो, योदे ही दिनों में चरल दार्थों से पुमाई दुई गरा के प्रहारों से दी आधों वाले दुर्योधन के पनेचिकने खून से रंगे हाथों वाला भीम तुम्हारे बालों को संवारेगा। या वेणीसदार के कारण मौम के क्रोध (ज) का बार बार उसान हुआ है, अतः समाधान है। समाधान के द्वारा पात्र दूसरे लोगों को इस बात का विश्वास दिलाता है कि फ्लप्राप्ति अवश्य होगी। अथ विधानम्- -विधानं मुखदुःखत् ॥२८॥ स्था मालतीमाधवे प्रथमेढे-माधव- 'गान्त्या मुहुर्वलितक परमानन त दातन्तशतपत्रनिर्भ पहन्या ।
प्रथमः प्रकाशः २३ दिग्मोऽमृतेन च विषेण च पदमलाच्या गाट निसात व मे हृदये काम। यद्विस्पयस्तिमितमस्तमितान्यमाय- मानन्दमन्दममृतप्नवनादिवाभूत् । तत्सनिधौ तदधुना हृदयं मदीय- महारचुम्बितमिय व्ययमानमास्ते ॥' इत्यनेन मालत्यवलोकनत्यानुरागस्य समागमदे तोीजानुगुण्येनैव माधवस्य सुखदुः सकारित्वाद्विधानमिति यथा च वेणीसहारे-द्रौपदी-गाय पुणोति तुम्मेहिं अहं आमच्छिम समासा- सिदना । ( नाथ पुनरपि स्वयाहमागस्य रामाधासयितव्या ।' ) भीम --मनु पाचाल- राजतनये किमद्यायलीकावासनया। 'भूय परिभवतान्तिलबाविधुरिताननम् । अनि शेषितकौरव्यं न पश्यसि वृकोदरम् ॥' इति सम्प्रामस्य मुखदु सहेतुत्याद्विधानमिति । जहाँ (मायकादि के हरम में मुख तथा दुरा पैदा हो, वहीं विधान कहलाता है। फलामियी इच्छा गुसतया दुसया नायकादि में रह रहकर सवार किया करती है, रसी को विधान के नाम से पुवारा जाता है। जैसे मालतीमाधव नाटक में मालती को देखने के बाद माधव मुख बस का अनुभव करता है, इसका पता न पषों से लगता है। माधव-रे शुके हुए वृन्त बाले बगल के समान, टेढी गरदन पाले उस मुख का बदन करती हुई, रोमयुक्त आँखों वाली जाती हुई मारती ने अमृत और विष में (पक साप) इशा दुभा कटाक्ष (रूपी सीर) जैसे मेरे हृदय में बडुन गहरा गया दिया है। उस मालवी के नदीक होने पर मानी असुन के सेवन से बो भैरा हदय विस्मय के कारण स्पन्दन हो गया था, तथा उसने दमरे भावों का अस्त हो गया था, एक वा आनन्द से मन्द गति वाला हो गया था, वही मेरा हृदय मन (उसके अभाव में ) इस तरह वहार रहा है,मानो अंगारों का सपर रहा। यहा मालनी तथा माधव मावी अनुराग तथा समागम का हेतु गापवरुन मालवीदर्शन गीज के अनुरूप होने के कारण माधर में गुरुवार को उत्पन्न कर रहा है, अत यहाँ विधान नामक मुसाग है। मथवा जैसे वेगौसदार में संपाममनित यख नया दुरा का वर्णन पर भौम ने विधान का निवेश किया है। दौपदी-नाय, इमशिर भी आकर मुझे आश्वासन दिला जाना। भीम-भरे पाचालराजपति, भब भी पुढे आश्वासनो की या जरूरत है। हाकी महानि तालाजा से रहिन मुप पाले मेरको कौरवों से निपग काने दुम पिर नदेखोगी। ries अप परिमारना परिमायोतादेश:- या रवावस्याम्-सागरिका-(रक्षा सविस्मयम् का पयायो ने भो पूर्भ पबिहेवि मपि एप ट्रिठद पजेव पूनासम् । ('प्रत्यक्ष एवानरः २४ दशरूपकम् पूजां प्रतीशते । तत् अहमपीह स्थितधैनं पूजयिष्यामि।' ) इत्यनेन परसराजस्यानरूप. तयापहवादनस्य च प्रत्यक्षस्य पूजामणस्य लोकोत्तरवादद्भुतरसादेशः परिभावना । यथा च वेणीसंहारे-द्रौपदी-वि दाणि एयो पलमजलपरत्यमिदमसलो खणे खणे समरदुन्दुभो ताडीदि । ('किमिदानीमेष प्रलयजलघरस्तनितमासलः क्षणे क्षणे समरदुन्दुभिस्ताज्यते' ) इति लोकोत्तरसमरदुन्दुभियनेपिस्मयरसादेशाद्वीपया' परिभावना। जहाँ अद्भुत आवेश हो अर्थात् पाथर्य की भावना पात्र में पाई जाती हो, यहाँ परिभाव या परिभावना होती है। जैसे रलावली नाटिका में मदनपूजा के समय स्वयं उदयन की उपस्थित देखकर पिकर देखनी हुई सागरिका आश्चर्य के साथ कहती है-'अरे, क्या प्रत्यक्ष कामदेव हो पूजा ग्रहण कर रहा है। तो मैं भी यहीं से इसकी पूजा करूंगी।' यहाँ बसराज को कामदेव बनाकर उसी सा वो सचा का निराकरण (माहवन) किया गया तथा प्रत्यक्ष अनग के द्वारा पूजामण अलौकिक है इसलिये सागरिका की उक्ति में अभिव्यजित अद्भुत रस के भावेश के कारण यहाँ परिमावना' नामक मुखांग है। अथवा जेते वेगीसंहार में समरदुन्दुभि की लोकोत्तर धनि को सुनकर द्रौपदी में अद्भुत रस का आवेश पाया जाता है, जिसको व्यजना द्रौपदी को इम उक्ति हो रही है-इस समय प्रलय की मेघध्वनि के समान गोर ध्वनि वारा यह समर दुन्दुभि क्षण-क्षण में क्यों बजाया जा रहा अथोछेद- -उद्देदो गृढभेदनम् । यथा रत्नावल्या रसराजस्य कुसुमायुधम्मपदेशगूढस्यो तालिकवचसा 'अस्तापास्त' इत्यादिना 'उदयनस्य' इत्यन्टेन वोजानुगुण्येनेवोद्भेदनादुभेदः । यथा च वेणीसंहारे-'आर्य किमिदानीमध्यवस्यति गुरु ।' इत्युपश्मे ( नेपम्ये) यत्सत्यवतभाभीमनसा यत्नेन मन्दीकृत यद्विस्मर्तुमपीहित शमवता शान्ति फुलस्येच्छता । सइयूतारणिसंभृतं नृपसुताकेशाम्बराकर्षणः घोघज्योतिरिदं महरस्तुभवने यौधिष्ठिरं जृम्भते ॥ भीम'-(सहर्षम् ) जृम्भता वृम्भतां संप्रत्यप्रतिहतमार्यस्य कोपज्योति । इत्य- नेन छनस्य प्रौपदीकेशसंयमनहेतोयुधिष्ठिरकोपस्योद्भेदनादुर्योदः । जहाँ अब तक छिपे हुए (गूढ) यीज को प्रकट कर दिया जाय अर्थात् गुढ का भेदन हो, उसे उद्भेद कहते हैं। पहले की स्थिति तक नौज का पोषण हो रहा है, अनुकूल भूमि, जल तथा सच को पाकर बीज यहाँ फूट पहना है-कवि नीज का सकेत तो पहले ही कर देता है, किन्तु मोजके साधनादिकामवमुण्ठन, स्पष्ट इसी के अतर्गत हयता है।) जैसे रत्नावरी में कुसुमायुध के व्याज से बरमराज की वास्तविक सग पिी थी, किन्तु वैतालिक को उक्ति में 'उदयन राम के द्वारा उस गृह वस्तु का भेदन होने से पा उद्रेद है। पागूरभेद बाज का ही सहायक या साधन है। मयश जसे 'हे मार्य भव रहे भाई क्या करना चाहेंगे-सहदेव के यह पूटने पर 03; नेपथ्य से निम्न पर सुनाई देता है- । + मयमा प्रकाश . अपने सरयक्त के भंग से हरने वाले युधिष्ठिर ने जिस कोप को मन्दा कर लिया था, कुछ को शान्ति की रच्या वाले शान्तिप्रिय राभा ने जिस कोष को भुलाने को भी इच्छा की, युधिसिर की वही कोपारि, जो द्रौपदी के बालों पक्षों के सेंचने से, पुनरूपी अाणि ( काट- दण्ड ) से उत्पक्ष दुई ३, कौरवों के धने (द ) जंगल में फैल रही है। इसे सुनकर इस के साथ भाग कहता है-'पूज्य आता को क्रोधाग्नि अव बेरोकटोक फैले, पेरोकटोक कैले।' यहाँ द्रौपदी के बालों के बांधे जाने के कारणभूत युधिष्ठिरकोप का सखेदन किया गया है, जो अब तक गूढ ही रहा है। श्रय करणा- करणं प्रकृतारम्भ:- सपा रत्नायल्याम् गानो कुमाउद ता भ्रमोहदसणो मैं भविस्पति ति । दिलं जे पेविरोदय ता जाव ग कोनि में पैक्सह ता गमिस्सम् । ( नमस्टे कुसुमायुध. तदमोपदर्शनी मे भविष्यसोति । र यत्प्रेक्षितम्य वधावन कोऽपि मां मेशते तद्रमि- प्यामि । ) इत्यनेनानन्तरातिनिधिदर्शनारम्भगारकरणम् । यथा च वेणीसंहारे-तत्पशालि गरछामो ययमिदानी फुरुकुलक्षयाय इति । सह- देवः--थार्य : गच्छाम इदानी गुरुजनानुभाता विक्रमानुरूपमायरितुम् ।' इत्पनेनानन्त- रास्तूयमानरामामारम्भणाकरणमिति । सर्वत्र चेहोशप्रविनिर्देशयैषम्यं शिया- स्याविवक्षितत्वादिति। रूपक की कथा के अनुरूप प्रकृत कार्य का जहाँ बारम्म हो, वहाँ करण होता है। (करण के द्वारा मादी अंक केतकी पाना मी कराई जाती है) जैसे रसायनो में, कामदेव, मेरे लिए सफलदर्शन बनोग । जो गुदो देखना चाहिए था, वह देसलिया । सब में इस दंगो चली जाऊँ कि मुझे कोई न देख पाये। रसावली की इस उक्ति महारा भाषी स में वर्णित निविभ-दर्शन-प्रयका के प्रारम्भ को व्यसना कराई गई है, अतः करण नामक मुसाह। और जैसे वेणीसंहार में-(भीम) 'तो द्रौपदि, अब हम कौरवों के नाश के लिए जा १२।(सइदेव) मार्य, गुरुजनों की आशा पाकर पराक्रम के मोग्य कार्य करने को चले। कयनोपयन के द्वारा मापी अक में प्रस्तूयमान युद्ध का भारम्म व्यजित रे, मतः करण है। यदा भीम व सहदेव दोनों के वाक्यों में सभी नगर (दोनो स्थानों पर ) देश तथा विधेयके कग में म्यतिकम पाया जाता है। वाश्य में पहले उदेश (कुरुपुष्टक्षपाय, विमानरूपमापरितुम् ) या प्रयोग होना चाहिए, बार में विधेयरूप किया ( गामः) । चिन्तु स पापय में पहले किपा (ग) का प्रयोग किया गया है, बाद में उद्देश का, १५ दोष नजर आता है-स शक के उपस्थित होने पर इसका निराकरण करते हुए विवार पनिक कहते हैं कि हम क्रिया कति मा दिक्षित न होकर, कल्प' या विक्रमानुसार विक्षित है, अतः वही विधेद होने के कारण यहाँ में प्रयुक्त माहै। पप भेदः- --भेदः प्रोत्साहना मता ॥ २६ ॥ स्या येशी सार-बाप । माक्त अगसनोपरिमाहीविदोषा अनपेक्छि- सय परिवमिश्राप भी अपमधागोगा बीयन्ति विपशाई। (म.सा दशरूपकम् खलु याज्ञसेनीपरिगवोद्दीपितकोपा अनपेक्षितशरीरा परिममिष्यथ यतोऽप्रमत्तसचरणी यानि भूयन्ते रिपुबलानि । ) भीम -अयि सुक्षत्रिये । 'अन्योन्यास्फालभिन द्विपक्षपिरवसासान्द्रमस्तिषप ममाना स्यन्दनानामुपरिकृतपदयासविक्रान्तपत्तौ । स्फीतासमपानगोष्ठौरसदशिवशिवातूर्यनृत्यत्कयन्धे सम्मामैकार्णवान्त पयसि विचरितु पण्डिता पाण्डुपुत्रा ॥' इयनेन विषण्णाया द्रौपद्या झोघोरसाइवीआनुगुण्येनैव प्रोत्साहनाद्भेद इति । एतानि च द्वादशमुखाङ्गानि वीजारम्भद्योतकानि साभापारम्पर्येण पा विधेयानि । एतेषामुपक्षेपपरिकरपरिन्यासयुक्त्युद्वेदसमाधानानामवश्यंगावितेति । जहाँ प्रोत्साहन पाया जाय, अर्थात् पान को पीज के प्रति प्रोत्साहित किया जाप, घहो भेद होता है। जैसे वेणीसहार के निम्न कथनोपक्थन में क्रोध उसाह रूप पीज के अनु-रूप वचन के द्वारा मौम विषण्ण द्रौपती को प्रोत्साहित करता है । मत यहाँ भेद नामक मुसाश होगा। द्रौपदी-नाथ यशसेनी के पराभव से उद्दीप्त वोप वाले होकर, अपने शरीर को भूल कर युद्ध में न लडना, क्योंकि बुओं की सेना सावधानी से भूमे जाने योग्य है ऐसा सुना जाता है। मीम-अरी सुत्रिये । पाण्डव के पुत्र उस सग्रामरूपी समुद्र के जल के बीच घूमने में कुशल हैं, जिसमें आपस के टकराने से टूटे हुए हाथियों के खून, चना और मस्तक के सान्द्र पोचट में मम रयों के ऊपर होकर पनाति सेना पार हो रही हो तथा जिसमें जीभर कर खून पी पीकर पानी में बिहाती हुई अमल शुगालियों के सम्दरूपी तूर्य की ताल पर कापनाच रहे हों। गुरु के ये १२ अगवीज नामक अर्थप्रकृति तथा भारम्भ नाममा अवस्था के यजक है इनका पाटन साक्षात् रूप से या परम्परा से नारक या रूपक में किया जाना चाहिए । इन बाहर में से भी उपठेप, परिकर, परिन्यास युक्ति, उद्भव समाधान इन अहो का मुस्वसधि में उपादान सर्वथा आवश्यक है। भय साझ प्रतिमुख सचिमाह- लक्ष्यालक्ष्यतयोग्नेदस्तस्य प्रतिमुरा भवेत् । बिन्दुप्रयतानुगमादगान्यस्प त्रयोदश ॥ ३०॥ सस्य वीजस्य किंचिवक्ष्य किंचिदलक्ष्य इवोद्भेद-प्रकाशन तत्प्रतिमुखम् । यया रत्नावल्या द्वितीय वत्सराजसागरिकासमागमहतोरनुरागवीनत्य प्रपमाडोपक्षिहस्य सुसजता विदूषकाभ्यां जायमानतया किंचलक्ष्यस्य वासवदत्तया च चित्रफनका तेन विचिदुखीयमानस्य श्यादृश्यरूपतयोझेद प्रतिमुखसधिरिति । पेणीसहारेऽपि द्वितीयेऽए भीष्मादिवधेन किंचिजक्ष्यस्य कर्णायवधाचालक्ष्यस्य प्रोपोजस्याने। 'सहगृत्यगण पदाधव सहमित्र ससुत सहानुजम् । स्वबलेन निहन्ति युगे न चिरारपाण्डमत मुरोधनम् ॥' (.) तदाऽलक्ष्य इवोद' इति पाटान्तरम् ।
प्रथमः प्रकाशः २७ इत्यादिमिः 'दुःशासनस्य हृदयक्षतजाम्मुपाने दुर्योधनस्य च यथा गदयोगाने । तेजस्थिना समरसूनि पाण्डवानो होगा जयद्रयक्षेऽपि तथा प्रतिज्ञा इस्पेवगादिभिधोदः प्रतिमुखसंचिरिति । मा प्रसझोपात्त प्रतिमुल सभि या अगों सहित वर्णन करते है~-उस चीज का कुछ-कुर दिखाई देना और बुद्ध दिखाई न देना और इस उदयालपप रूप में फूट पड़ना (उदिन होना) प्रतिमुख संधि का विषय है। इस संधि में पिन्दु नामक अर्थप्रकृति तथा प्रयान नामक अवस्था का मिश्रण होता है। इसके तह अङ्ग होते हैं। (मुखमाथि में बीज बोया जाता है, इसे उचित वातावरण में पोषण मिलता है । बस पोषण के दाय प्रतिगुरु सपि में पाकर मद फूटने लगता है, किन्तु जिस तरह पाले पइस निकलता वीशङ्कर कुछ-कुछ सरपट अवस्था में होता है, ठीक वैसे बीज का भार शेटे पररूप में प्रतिमुख संधि में उद्भिन होता है।) जैसे रनावली के प्रथम अङ्क में वत्मराज व सागरिका के (भावी) रामागम के देवरूप जिम अनुरागवीज पोनीया गया है, उसे दूसरे अङ्क में सुसगता व विदूषक जान जाते हैं, इसलिए वह कुछ-कुर प्रगट हो जाता है, तथा नियफलफष्धान्त के कारण याप्तपदधा को द्वारा कुछ-कुछ गृहीत हो जाता है। इस प्रकार पोर के अकुर का दृश्य और कुछ अदृश्य रूप में उदिन होना प्रतिमुखता है। बेणीसंहार में भी युविहिरवा कोपबीज भीमादि के मरण से साक्ष्य हो गया है, किन्तु समोरण आदि के पथ के न होने से अक्ष्य है। इस लक्ष्यालय रूप में उतर उद मतिमुसीयाना परता है। 'पाण्ड का पुत्र युधिष्ठिर यही जरदी भृत्यों, पान्धों, मित्री, पुर्ण तथा अनुजों से एक मयोधन को अपनी सेना के रा युद्ध में (निधय हो) मार डालेगा । ( इत्यादि वायों के द्वारा, जिनसे योज-युविहिर योप-रदय हो रहा है), तथा, दुर्योधन की निग्न कि के पारा महाधिन का साहस बीज को आरक्ष्य रस रहा है, मतिमुग्यमा अभिव्यजित है- पुरस्थल में कोई तेजस्ती शण्डवों की प्रविश शासन के दय के खून पी पीने के विश्य में जैसी थी, तथा यदा से दुर्योधन यो जाप को तोदने के रषय में भैसी थी, सोही जयप के वध के विषय में समझो जानी चाहिए। (भाव यह है जैसे पाम्पब मौसासन का हौसून पौ मकै, न मेरी डा हो गया के मोइसके बीजपरी भी न मार सकेंगे, उनकी निशा रीमहो सकेगी।यों दुर्योधन पायों के लिए प्रयुक्त तिखो वा दाग उनी अशक्तता की विडी उड़ाना दषा, सया उन्दै गोरा वाक्प्ताइसो पताता हुवा व्यग्य पस रहा है।) अस्य य पूडोपक्षिप्तपिन्दुरुपयोजनयत्नागितानि प्रयोदशानि भवन्ति, तान्याह- विलासा परिसर्पध विघृतं शमनर्मणो। १. रोहार के दिशा में योधन के पुशीको गति है, बिहे विशाम दो पारेर विर बल रिजयी होगा।
4/118) २९ दशरूपकम् नर्मद्युतिः अंगमन निरोधः पर्युपासनम् ॥ ३१ ॥ पज्र पुष्पमुपन्यासो घर्णसहार इत्यपि । पहले अक में जिस बीज को डाल दिया है, जो विन्दु के रूप में प्रकटित होने वाला है, उस बीज तथा प्रयन से अनुगत इस प्रतिमुससधि के वो तेरह अङ्ग होते है उनका वर्णन करते है -विलास, परिसर्प, विधूत, राम, नर्म, नर्मद्युति, प्रगमन, निरोध, पर्युपासन, पन, पुष्प, उपन्यास तथा वर्णसहार। यथोद्देश लक्षणमाह- रत्यर्थेदा पिलासः स्याद्- यथा रत्नावल्याम्-'सागरिका-हिश्र पसीद पसीद किं इमिणा मामासमेत फलेग दुल्लहमणप्पत्यणाणुयन्धेण। ('हृदय, प्रसीद प्रसीद किमनेनायासमात्रफलेन दुर्लभजनप्रार्थनानुव धैन ।' ) इत्युपकने 'तहायि पालेखगद त अण कदुम अधासमी हिद करिस्पम् , तहावि तस्स गरिय अण्णो दसणोवाउत्ति। (तथाप्यालेखगत त जर्न कृत्वा ययासमोहित करिष्यामि । तथापि तस्य नास्त्यन्यो दर्शनोपाय ।) इत्येतैर्दत्स राजसमागमरति चित्रादिजन्यामप्युद्दिश्य सागरिकायाश्चेष्टाप्रयत्नोऽनुरागवीशानुगतो विलास इति । उही का नाम के साथ-साथ लक्षण बहते- रति की इच्छा को विलास अग कहते हैं।' (महाँ नायक नायिका में परस्पर एक दूसरे के प्रति रति का इच्छा व्यक की गई हो वह दिलाम होगा) जैसे रखावली में सागरिका वत्सराजसमागमरनि की च्या को लेकर चित्रादि के द्वारा ही उसे प्राप्त करने की चेष्टा करती करती है। यह चेष्टा प्रयत की अवस्था से सब है तथा यहाँ रत्नावली का अनुरागरूपी बीज साथ साथ म्यजित हो रहा है, मा रति को रच्या से यहाँ विलास है। इसकी व्यजना सागरिका को निम्न उक्ति से होती है-'हृदय, प्रसत्र हो, प्रसन्न हो, दुर्लभजन (वत्सराज उदयन) की इस इच्छा के आग्रह से क्या लाभ, जिसका पल केवल दुख हो है-अर्थाद जिस वत्सरार उदयन को कभी प्राप्त नहीं किया जा सकता, उसकी इच्छा करना केवल दुप के हो लिप है। फिर भी उसे चित्रित कर इच्छानुसार अवश्य करूंगी, फिर भी उसे देखने का कोई दूसरा उपाय नहीं है।' - अथ परिस- -दृष्टनशानुसर्पणम् ॥ ३२॥ परिसर्पः- यथा वेणीसहारै-'कधुकी-योऽयमुयतेषु बलव'मु अयचा किं बलवस्सु वासुदेव सहायेवरिष्वद्याप्प तपुरमुखमनुभवति इदमपरायथातथ स्वामिन- (1)'प्रगमणम्' इत्यपि पाठ 1 (२) 'रत्युस्येहा' इत्यपि पाठ । १ सस्कृत टोकावार प्रदशनाचार्य प्रत्या'पा म 'गरताच्छा' करते है, रितु रवि हा असामान्यनिष्ट होनाटीक होगा, मुरत के प्रकरण में विशेषनिधी यह हमारा मत है। वैसे वारस्यायन मैथुन कर तरह के मानते है-दर्शनादि भी। सेरिन लौकिक अर्थ में भरत वैवल एक ही प्रशर या मैथुन है।
प्रथमः प्रकाश 'पाशवप्रहणादकुठपरशोस्तस्यापि जेता मुने- स्तापायास्य न पाण्डसनुभिरर्य भीष्म शरै शयित । प्रौढानेशचनुरारिविजयभान्तस्य चैकाकिनी थालस्यायमरातिलूनयनुप प्रीतोऽसिमन्योधात् ।। इत्यनेन भोमादिधे यस्याभिमन्युवमानस्य बलवता पाण्डवाना वासुदेवसहा पानो मामलक्षणमिन्दुवोजप्रयत्नान्वयेन कम्भुविमुखेन वीजानुसर्पण परिसर्प इति । पथावरलावल्या सारिकावचनविदर्शनाभ्यो सागरिकानुसगोजस्य नष्टस्य 'धासौ घरसी इत्यादिना वत्सराजेमानुसरणात्परिसर इसि । अध पीज एक घार र हो गया हो, किन्तु फिर दिखाई देकर नष्ट हो जाय, और उसकी खोज पी जाय, तो यह खोज परिसर्प कहलाती है। जैसे वैणीसहार में दितीय अंक में गोमादि के मरण से बीज दृष्ट हो गया था, बिल्नु अभिमन्यु के बध से वह फिर से नष्ट हो गया। किन्तु कृष्ण को सहायता से युक्त, बलदान पाण्डवों के सुखरूप विन्दु, बीज तथा प्रयत्न के सम्पर्क से कोडको के मुख से निम्न पथ में फिर से बीज की खोज की गई है, इसलिये यहाँ परिस नामक प्रतिमुखांग मानना होगा- जिन मुनि परशुराम का परशु शसमण के समय से कभी किसी के भागे कुण्ठित न दुआ, बन्दी परशुराम को जीतने शले भीष्ण का सदुपुत्रों के द्वारा बाणों से गिरा देना इस दुर्योधन को इसी न बना 521 ) वो दुर्योधन अनेकों प्रौद्ध धनुर्धर शत्रुओं के विजय से थके ४२, शशुरों के द्वारा माटे गये धनुप पाठे, मकेले पालक अभिमन्यु के मारे जाने प्रसन . और जैसे रनावली में, मैना के वचन तथा चित्रदर्शन के द्वारा सागरिका र मयुराग बीज कम से १ तथा ना हो गया है, उसी यो दह गहा है, वह पहा " पदकर सराज के द्वारा घोब की जाती है, अत यहाँ परिसर्प अहहै। अय विधूतम्- -विधूतं स्यादति:- सा रत्नावल्याम्-सागरिका-सहि अहि मे सतायो बाधेदि। (पति! अधिर्फ मे पतापो याधते ।) (मुसता दोपिकातो नलिनीदलानि मृणालिकाधानी- पात्या भाई प्रदाति / सागरिका-हानि पिन्ता ) साह । श्रवणोई एवाई मारणे ताण श्रायासेसि भणागि-(समि। अपनयतानि किमकारण भात्मानमायास पशि निनु भणामि-) ‘ সেক্সী লৰা হই ঘরী গুণ। विभसदिविसम पेम्म मरण सरण शवर एकम् ॥ (दुभिजनानुरामो सरजा गुर्षी परवरा श्रारमा ! प्रियाति विषम प्रेम माण शरणं केवलमेकम् ।) इत्यनेन सागरिकाया प्रीशान्यमेन शीतोपचारविधूजनाद्विधूतम् । स्था व पेणीसंहारे गानुमत्या स्वप्नदर्शनेन दुर्योधनस्यानिशिया पाय- विजयराणाकारतेनिधननामिति । जहाँबाति दोपहा विश्न नामक मोहा है। (प्राधिया लापक ३० दशरूपकम् बोज के नष्ट होने पर पाब उसमे दुसित होरर सय को अलक्ष्य मान र उसको च्या छोड़ देता है, इसी को विधूत कहते हैं जहाँ रति का विधूनन कर दिया गया हो1) जैसे रत्नावली में सागरिका का अनुराग बीज भरति के कारण विधुत पर दिया गया है । कामपोडासतप्त सागरिका अपनी ससो मुसगता से कहती है-'सरिख मुा वटी ताप-पीटा हो रही है। (सुसगता बावली से कमल के पत्तों और मृणालों को हार इसके अङ्ग पर रखती है)। सागरिका-(उहें पैरती हुई) ससि, रहें हटाले, प्यर्थ में ही क्यों अपने आपकी तकरीफ दे रही है। मैं मच कहती हूँ-६ प्रियससि, दुरंभ व्यक्ति के प्रति प्रेम, गहरी लाज, पराधीन भात्मा, (इस प्रकार की स्थिति में प्रम विषम है, ठीक नहीं है, अर तो केवल एक मरना ही (मेरी) शरण । यौँ सागरिखाने वीजा दय से शीतोपचार फी हटा दिया है, मत यह विधूत है। और जैसे वेणीसहार में दूसरे अङ्क में दुरा स्वप्न देखने पर दुर्योधन की पत्नी भानुमती की रति इसलिए विधूत हो जाती है कि या तो वह दुर्योधन के अनिष्ट से आशकित हो जाती है, या पाण्डवों के विजय की आशंका से मयमीत हो उठती है। अयशम -वच्छमा शमा सस्या परतरुपशम शमो यथा रत्नावल्याम्-रापा-वयस्य । अनया लिसि तोऽहमिति यत्सत्यमारमन्यपि मे बहुमानस्तत्कय न पश्यामि ।' इति प्रको 'सागरिका- (आत्मगतम् ) हिप्रभ ! समस्सस मणोरहोवि दे एत्ति भूमि ण गदो।' ('दय ! समावसिहि मनोरथोऽपि त एवावती भूमि न गत ।' )इति किंचिदरल्युपशमाच्छम इति । जब उस भरति की शान्ति हो जाती है, पर शम नामक प्रतिमुखाग है। जैसे रत्नावली में, जर सागरिका अपने प्रति राग की रवि जान लेती है, तो उसकी भरति शान्त हो जाती है क्योंकि उसे वत्सराज को प्रति को आशा हो जाती है। यह शम नामक प्रनिमुखार इन पक्तियों से स्पष्ट है- राजा-मित्र, इसने मेरा चित्र बनाया है, इस बात से सचमुच मुझे अपने भाप पर गर्व है, तो अब मैं इस चित्रफ्लक को क्यो न देखूगा। सागरिका (सुनकर-अपने माप) हरय, आश्वस रह, तेरी इच्छा मी इतनी ऊंची मजिल तक न पहुँच पाई है। - M 4 मथ नर्म- परिदासपचो नर्म- यया रनावल्याम्-'मुसलता--सहि 1 अस्स कए तुम श्राधदा सो प्रश्न पुरदो चिदि। ('ससि । यस्य कृते समागता सोऽय पुरतस्तिष्टत' ) सागरिका-(सास्यम्) सुखङ्गदे । कस्स कए अहं पाप्रदा । ('सुसाते ! फस्स कृतेऽदमागता।') सुसद्दा-- अइ थप्पसदिदै । पित्ताशस्स ता गेण्ड एदम् । ('अयि आरमशदिने ! मनु चित्रफलकस्य । तद्ग्रहाणैतन् ।') इत्यनेन धौभावित परिहासवचन मर्म । १ यहाँ धनिक ने 'शीतोपचारविधूननाद विघ्नम् रिखा है हमारा मन है कि गाथा मैं प्रिय को दुर्लभ बताया है, तथा इसके द्वारा भरति पी ग्यन्नना हो रही है, अन हमें "विधूत' का कारण यो टोक जान पड़ता है-प्रियाय दुलमलेन आरमारउश्यादिना च रचितेन प्रेम्णी विषमत्वेनारतेशन विधुत, या विषमत्वविशेषगेन प्रेम्गो विधननादितम् ।' H प्रथमः प्रकाश ३१ यथा च येणीसंहारे-- दुर्योधनोटोहस्तादपायमादाय देव्याः समर्पयति पुनः ) मानुपति-(अर्थ दत्वा ) हला । उवणेहि मे कुसुमाई जाव श्रवरण पि देवाणं सवार- णिोमि । ('हला उपाय मे रुमानि यावदपरेपामपि देवानां सपर्या निवर्तमामि ।'1) (हस्तौ प्रसारयति, दुर्योधनः पाण्युपनयति, भानुमत्यास्त स्पर्शजातकम्पाया हरतारपुष्पाणि पतन्ति । ) इत्यनेन नर्मणा दुःस्वप्नदर्शनोपशमार्थ देवतापूजाविधनकारिणा बीजोद्वाटना- स्परिहासस्य प्रतिमुखात्य युकगिति । गर्म से तात्पर्य परिहास के वचनों से है। (गर्भ के अतर्गत पात्रों का परिदास पाया जाता है। जैसे रत्नावली नाटिरा में इस बाताराप से नर्म की व्यसना हो रही है। 'मुसंगता जिसके लिए तुम आई हो, वह तुम्हारे सामने ही है। सागरिका-(रत्नावरी ) सुमाता, मैं किसके लिये भाई हूँ। संगना-परी अपने आप पर बइम करने वाली, इस चित्रफल के लिये। तोबसे ले लो। पद परिहास पचन यहाँ बीज से सबद्ध है, यहाँ मम नामक प्रतिमुखांग है। और जैसे सार में, जा भानुमती देवपूजा पर रही है, तो दुर्योधन वहाँ पहुँच कर चुपचाप दासी के शाब से अर्धपात्र रेकर भानुमती को सौपता है। मानुमती (सर्प देखकर) श्री दासी, जरा फूल भी, मै दूसरे देवताओं की पूजन कर ल। (भानुमती पुष्प लेने को पाय बढाती है, दुर्योधन पुरुषों को सौपता है, उसके स्पर्श से कम्पित भानुमती के हाथ से फूल गिर जाते है ।) या भानुमती दुःस्वप्नदर्शन की शान्ति के लिए देव-पूजा कर रही है, विन्तु पर दुर्योधनस्त परिवासरूप न उस पूजा में विश्न उपस्थित कर बाज का हो, उदादन कर रहा है। मह परिहास प्रतिमुरसाग रूप नर्मदाह। प्रय नर्भयुतिः- --विस्तजा शुतिर्मता ॥३३॥ यथा रत्नावस्याम्-'सुसाता~राहि अदिगिहरा दाणि सि मम् जा एवं पि महिणाहरयापलम्बिदा कोयं ण मुद्यसि । ( सहि 1 अतिमिरेदानीमसि त्व येवमपि भर्ना इस्तावलम्बिता फोपं न गुपसि।') सागरिका-(सधूमामीपनिदस्य ) सुराइदे। पाणि मि विरगति ।' ('मुसाते । इदानीमपि न विरमणि') इत्यनेनावरागयीजो- द्वाउनान्वयेन पतिर्नर्मजा युतिरिति दर्शितमिति । धैर्य की स्थिति नर्मगुति फहलासी है । ( नर्मति की अन्तर्गत पात्र में पैर्य का सयार पाया जाता है।" असे रनावती की निम्न पक्तियों में धृति के द्वारा अनुराग बीज उभाटित हो रहा है, यदी परिदास से सत्पन्न घुक्ति (नमयुति ) पाई पानी है। सुसंगता-ससि, तुम अब बड़ी निष्ठुर दो गई दो, नौ स्वामी के इस प्रकार हाथ से पकड़े जाने पर भी गुरसे योनही सोडती। सागरिका (टेदी भौहे करके, कुल इस कर)-सुसंगला, ममी प नही रहती। थप प्रगमनम- उत्तरापागमनम्- यथा रनावस्याम्-दिपक-गौ पाय ! शिशा बासे। (मो वयस्य ! (१)'प्रगयणम्' इत्यपि पाठ ३२ दशरूपकम् - . राजा-हे मृणारहार, दिया । ) राजा-(सोनुकम् ) वयस्य ! विमेतत् । विदूषक-भो । एदं वखु त भए भगिदं तुम एव श्रान्निहिदो को अग्णो कुगुमाउहन्यवदेसेग णिवी अदि ।' ('भो ! एतरखलु तयन्मया मणितं त्वमेवालिखित कोऽन्य कुमुमायुपायपदे- शेन नियते।') इत्यादिना 'परिच्युतस्तत्कुचाम्ममध्याम्कि शोषमायासि मृणालहार । । न सूक्ष्मतन्तोरपि ताकस्य तत्रावकाशो मवत किमु स्यात् ।। इत्यनेन राजविदूषक्सागरिकासुसजतानामन्योन्यवचनेनोत्तरोत्तरानुरागबीजोद्धाटना- प्रगमनमिति । जहाँ पात्रों में परस्पर उत्तरोत्तर वचन पाये जायें (जिनसे पीज का साहाय्य प्रति. पादिव दो), वहाँ प्रगमन होता है। जैसे रत्नावली नायिका में विदूषक व राजा, सागरिका व मुसगता के परस्पर उत्तरोतर वचन भनुराग बीज को प्रगट करते हैं, मत यहाँ प्रगमन है। मगमन की व्यवना विदूषक व राजा की इस बातचीत से हो रही है- विदूषक-मित्र, बडो सुशी की बात है, तुम्हारी वृद्धि हो रही है। राजा-(कौतुक से ) मित्र, क्या बात है। विदूपक-अरे, यह वही है जो मैने वहा था कि इस चित्र में तुम्ही चित्रित हो, कामदेव के नाम से और दूसरे सिम्यक्ति को दिपाया गया है। उसके वक्ष स्थल के रोच से गिर कर क्यों सूख रहा है। मरे जहाँ तेरे साम तन्तु के लिए भी जगह नहीं, वहाँ तुम्हारी गुजाय कैसे हो सकती है। श्रय निरोध- -हितरोधो निरोधनम् । यथा ररनावल्याम्-'राजा-घिड्मूर्स। प्राप्त कथमपि देवात्कण्ठमनीतैव सा प्रकटरागा। रत्नावलीव कान्ता मम हस्ताघ्रशिता भवता॥' इत्यनेन वत्सराजस्य सागरिकासमागमरूपहितस्य पासपदाताप्रवेशसूचकेन विदूषक- पवसा निरोधानिरोधनमिति । हित की रोक (रोध) हो जाने पर निरोधन होता है । (प्राप्तव्य वस्तु की प्राति से नायकादि को रोक दिया जाय उसमें अवरोध उत्पन्न कर दिया जाय, यहाँ निधन होगा।) जैसे रानावरी में सागरिकासमागम व-सराज का अभीष्ट हिन है, कि तु वासवरचा के प्रवेश की सूचना देकर विदूषक उसमें अदरोष उलन कर देना है। अतः वहाँ निरोधन है, निसको व्यजना राजा की निग्न उक्ति से होती है 'भूस तुझे विस्कार है। किसी तरह देव की कृपा से प्राप्त, अनुराग से युक्त (बिसका प्रेम प्रकट हो गया है), प्रिया ( सागरिका ) को मैं कण्ठ से भी न ल्गा पाया था कि तूने उसे एमी तरह हाथ से गदा दिया जैसे देववश प्राप्त, उज्ज्वल रत्नावले (रत्नमाला) को गले में गलने के पहले होगवा दिया जाय ।' अप पर्युपासनम्- पर्युपास्तिरनुनयः- यथा रत्नावल्याम्-'राजा- प्रथमः प्रकाश प्रसीदेति घूयामिदमसति को न पटते करिष्याम्ये मो मुनीति भवेदभ्युपगम' म मे दोपोस्तीति खमिदमपि हि शस्यसि मृपा किमेतस्मिन् वक्तुं क्षममिति न वेनि प्रियतमे इत्यनेन चिनगतयोयिकयोदर्शनात्कुपिताया यासवदत्ताया अनुनयन नायकभोरतुरा- गोद्धाटान्वयन पर्युपासनमिति । (नायकादि के द्वारा किसी का) अनुनय-विनय पर्युपास्ति था पर्युपासन कहलाता है । (प्राय को निरोध पर मायकादि उस अवरोध के निवारण के लिए, इस अग के अंतर्गत अनुनय करते है।) जसे रत्नावली नाटिका में, वत्सराज व सागरिका का एक चित्र में भालेखन, देखकर वासवदा मुख हो जाती है । राजा उसका अनुनय करता है। यह अनुनय उन ( वत्सराज सागरिका) दोनों के प्रेम को प्रकट कर उसका साहाय्य सपादित करता है, अत २६ पर्युपालन है। इसकी व्यवना राजा की कि के निम्न पत्र में हुई है। हे वासवदत्ते, 'तुम खुश हो जायो' यह बाहना इसलिए ठीक नहीं है, कि तुम नाराज नहीं हो। मैं ऐसा फिर कभी नहीं करूंगा' यह कहने पर अपराध स्वीकार परना हो जाता है। मेरा कोई दोष नहीं है ऐसा कहने पर तुम इसे भी झूठ समझोगी । इसलिये दे भियतमे, इस मौको पर मुझे क्या कहना चाहिए यह भी नहीं जानता।' अप पुष्पम् - - -पुष्प पाक्यं विशेषवत् ॥ ३४॥ यया रत्नावस्याम्-( राजा सागरिका हस्ते गृहीत्या स्पर्श नाटयति ) विदूषक: भो ! एसा भम्पा सिरी ए समासादिदा । ('भो । एपापूर्वा श्रीस्त्वया समासादिता।') राजा-वयस्य । सत्यम् । धीरेषा पाणिरायल्या पारिजातस्य पक्षाव । कुतोऽन्यथा सवत्येष स्वैपच्छामृतद्रव ॥ इस्यनेन नायकयो साक्षान्योन्यदर्शनादिना सविशेशनुरामोद्धाटनायुप्पम् । जहाँ विशिष्ट पाक्यों द्वारा चीजोपाटन हो, अथवा जहाँ पर वाय विशेष रूप पोजोधाटन से करे, यह पुष्प कहलाता है। (प्रथम अंक में निक्षिप्त बीन पल्लविन होकर, सभंग में पुष्पौरपति भारता है-जिस तरह छ में पुष्पाविर्भाव भावीपसमाति का सामान्य सम्पादित परता है, से रूपक में यह प भी है।) भैसे रस्नाला माटिका में प्रयन व सागरिका का अनुराग परपर दर्शन मादि से रिप रूप में प्रकट हो जाता।रस पुष की सूसना विदूषक र पासराज का निम्न कपनौर रूपन देता है। (राजा सागरिका को हाय से सर्श करने का अभिनय करता है।" विषय-मरे मित्र, अमने तो अपूर्व मोशे पा लिया है। रामा-मित्र सच बहते हो। यह थी, और इसत्रा हाय कर का यहवरे। नहीं भी, या (1) खेद म्यान से मदद को पैसे (कारो) छोडवा। 4 दशरूपकम् अथोपन्यास उपन्यासस्तु सोपायम्- यथा रत्नावल्याम्-'सुसङ्गता-मा! अल साए मए वि भहिणो पसाएण सीलिद एच ता कि कश्णामअरोण श्रदो वि मे गयो पयायो नकोस ए यह एत्य थालिहिथ ति कुविधा मे पिथसही सावरिया ता पसादीभदु ।' ('भत ! अल शङ्कया मयापि भर्नु प्रसादेन नोडितमेव तल्कि कर्णाभरणेन, भोऽपि मे गुरु प्रसादो यरकप लय हमत्रालिखितेति कुपिता मे प्रियसखी सागरिका तप्रसाद्यताम् ।') इत्यनेन सुसजतावसा सागरिका मया लिखिता सागरिकया च विमिति सूचयता प्रसादोपन्यासेन वीजोद्रेदादुपन्यास इति। उपाययुक या हेतुप्रदर्शक पाक्य उपन्यास कहलाता है। जैसे रत्नावली में सुसगता यह बता कर कि चित्र में सागरिका मैंने आलिखित की है और सागरिका ने सुम, इस वाक्य में प्रसन्नता (हेतु) का उपन्यास परवीन पा उद्भद दिया है। बत सुमगता की इस उक्ति में उपन्यास है- 'स्वामिन् , सन्देह न करें, मुझे भी तो आपको खुशी से प्रसन्नता है, इस वर्णाभूषण की क्या जरूरत है। इससे ज्यादा खुशी तो मुझे इसमें होगी किमाए मेरी प्यारी सखी सागरिका को सुश करें, क्योंकि वह मुझ से इसलिए नाराज है कि मैंने उसे इस चित्र में मालिपिन कर दिया। -यजं प्रत्यक्षनिष्ठुरम् । यथा रत्नावल्याम्-'पासवदत्ता-(फलक निर्दिश्य ) अज्जउत्त! एसावि जा राह समीवे किं वस तअस्स वियागम् । ('आर्यपुत्र ! एषापि या तव समीप एतरिक वसन्तकस्य विज्ञानम् ।' पुन 'अज्ज उत्त । ममावि एप वित्तकम्म पेक्वन्तीए सीसपेमणा समुपग्गा ।' (आर्यपुत्र ! ममाप्येतचित्रकर्म पश्यत्या शीर्षवेदना समुत्पक्षा।' ) इत्यनेन पासवदत्तया वत्सराजस्य सागरिकानुरागोदिनात्मत्यक्षनिष्ठुरा- भिवानपत्रमिति। जहाँ नायकादि के प्रति कोई पात्र प्रत्यारूप में रिष्टुर पधन का प्रयोग को वह पत्र के समान लीग व मर्मभेदी)वाश्य बन कहलाता है। से रत्नावली में वासवदत्ता उन दोनों के प्रम को जान कर फर होती हुई निम्न बद्ध वचनों को वत्सराज से कहती है, यहाँ बन्न प्रतिमुरारा है। (चित्रफ्लक को रिसार) आर्यपुत्र, या (सागरिया) तुम्हारे पास धो (चित्रित) २, क्या यह तुम्हारे मित्र वसन्तक (विदूषक) दी करामात (कौशल, विज्ञान) है। xxx आर्यपुत्र, मेरे मौरस चिरगर्म को देख कर सिरदर्द माया। अय वर्गसहारः- चातुर्ययोपगमन पर्णसहार इष्यते ॥ ३५॥ यथा वीरचरिते तृतीये- परिपदियमपीणामेष यो युधानि । सह नृपतिरमात्यलोमपादय वृद्ध (1) प्रसादनमुपन्यास ' इति पाटावरम् । 1 प्रथमः प्रकाश ३५ .३ श्रयमविरतयझो प्रावादी पुराण: प्रभुरपि अनकानामहो याचनास्ते । इत्यनेन म पक्षत्रियामात्यादीनां संगतानां वर्णानां बरसा रामविजय शंसिनः पशु- रामदुर्मयस्यादोहयाचनाद्वारेयोझेनाद्वर्गसंहार इति । एतानि च प्रयोदश प्रतिमुखाहानि मुतसंध्युपतिमचिन्दुलक्षणावान्तरपोजमहायोजन प्रयत्नानुगतानि विधेयानि । एतेषां च मध्ये परिसर्पप्रशमवनोपन्यासपुष्पाणा प्राधान्यम् , इतरेषां यथासंभव प्रयोग इति । जहाँ पारों वर्ण (माझगादि वर्ण) एक साथ एकनित हो, यहाँ पर्णसंहार होता है। जोसे महावीरचरित के मृतीय अङ्क में महापक्षत्रिय, अमात्य भादि ( चारों ) वर्ण सहे होकर पकनों के पास रामविजय की आशसा बाके परभुराम के गुरसे शो शान्ति की प्रार्थना करते है। मत यहाँ वर्षसहार है, जिसपी सूचना उस अद्ध को निम्न पप से हुई है। 'यह पियो वा समाज, यह भूमा सुधानिय ; समात्यगण के साथ राजा, और भूद्र ओमपाद, और यह निरन्तर यश ने बाले, पुराने (विख्यात) मारमानी जमकों के राजा (राजा जनक) मी द्रोहादित आपकी प्रार्थना करते हैं।' मातिमुखसन्धि के ये तेरह अड, मुससन्धि के द्वारा वाले गये बिन्दु रूप दूसरे गरेम, मशरीष तथा प्रयत्न के साथ-साम उपनिश्श किये जाने चाहिये। इनमें से परिस, प्रथम, क्य, उपन्यास तथा पुष्प प्रधान , बाकी अगों का भयोग यथा संभव हो सकता है। स्य गर्भसंधिमाह- गर्भस्तु एनएस्य वौजस्यान्येपणं मुहुः । द्वादशाह पताका स्थान पा स्याप्राप्तिसंभवः ॥ २६ ॥ प्रतिगुरपा बस्यालक्ष्यरूपतया स्तोफोदिनस्य गीजस्य सविशेषोभेदपूर्वका सान्त रायो लाभ पुनर्विच्छदः पुनः नि पुनर्विद पुनव तस्यैवान्वेपणे वारंवार सोs. निर्धारितकान्सफाशप्रारत्याशात्मको गर्भपिरिति । क्षत्र चौत्सर्गिकरपेन प्रामावा पताकाया अनियम दर्शयति-पताका स्याल या' इत्यनेन । प्राप्तिसंगवस्तु स्यादेवेति दर्शयति- 'स्पात्' इति । यया रस्नावस्यो तीये परसराजस्य पासपतालक्षणापायेन तद्वेष- परिपदसागरिकाभिसरणोपायेन व विपकवयसा वागरिकाधाप्रयाशा प्रथम पुनर्वासक- पत्तया विदः पुन प्राप्ति पुनर्विच्छेद पुनरपायनियारणोपायान्वेषणम् 'नास्ति देवी- प्रसादनं मुलाप पायः इत्यनेन दर्शितमिति । वय बीज के दिसने के याद फिर से दो जाने पर उसका भन्येण पार-धार किया जाता है, जो गर्मसधि होती है। यह गर्भसंधि यादब पाली-होती है। इसमें पैसे सो पताका (अर्थप्रति ) या प्रातिसम्मय (बरया) का मिश्रण पाया जाता है, किन्तु पताफा का होना अनिवार्य नहीं पह हो भी सकती है, नहीं भी। किन्तु माशिसंभव का होना बहुत पस्नरी है। निसको यो पनिमुरासन्धि में भी पता और कभी पुराता (याका में देखा गया है, क्योकि वह खुद धोना फूटा है, बदी मोरयो भार विशेष रूप से टपणा है। तुम विरदिन नदी है, इसमें कमी मोदिक (स) होता है,पिर से उसकी पानिहोर(बिर) हो जाता है, और इस प्रकार बार-बार यहीको । दशरूपकम् खोज की जाती है। यहाँ प्राप्ति की सम्भावना वो होता है, किन्तु पल का ऐकान्तिक निश्चय नही हो पाता। यह गर्भसन्धि की विशेषता है। यहाँ पताका का होना बावश्यक नहीं है। इसका निदर्शन पताका हो या न हो' (पताका स्थान वा) इसके द्वारा किया गया है। प्राहिसमव तो होना ही चाहिए इसकी सूचना स्यात्' के द्वारा की गई है। जैसे रत्नावली के सोसरे अङ्क में दत्सराज की परप्राप्ति में वासवदत्ता के द्वारा वित होता है, किंतु सागरिका के अभिसरण के उपाय से विदूषक के वचन सुनकर राजा को प्राप्ति की आशा हो पाती है। पहले वासवदत्ता उसमें विच्छेद उपस्थित करती है, फिर से प्राप्ति होनी है, फिर विच्छेद हो जाता है। फिर विप्न के निवारण के उपाय तथा पल-हेतु का अन्वेषण किया जाता है। इस अन्वेषण की व्यजना राजा को रस उति से होती है-'मित्र, भय वासवदता को मानने के भलावा और कोई उपाय नही है। स च द्वादशाको भवति । तान्युद्दिशति- अभूताहरणं मार्गों रूपोदाहरणे ममः। संग्रहधानुमानं च तोटकाधियले तथा ॥ ३७ ॥ उदेगसंभ्रमाक्षेपाः लक्षणं च प्रणीयते। इस गर्भसनि के बारह महोते हैं -अभूताहरण, मार्ग, रूप, उदाहरण, कम, संग्रह, अनुमान, सोटफ, अधिबल, उद्वेग, संभ्रम, भाषेप इन बङ्गों के लक्षण (लागे) पताये जाते हैं। यपोश लक्षणमाह- अभूताहरण छन यथा रत्नावस्याम्-'साधु रे श्रमच्च वसन्तम साधु भदिसइदो तए प्रमच्ची जोगन्धरामणी इमाए संपिविग्यचिन्ताए।' ('साधु रे अमात्य पसन्तक साधु अति. रायितस्वयामात्यो चौगभरायणोऽनया अधिविप्रदनिन्ठया। इत्यादिना प्रवेशकेन गृहीतवासवदत्तावेवाया सागरिकाया वत्सराजाभिसरण चा विदूषकसुसमतालिप्तकाशन- मालानुवादवारेण दर्शितमिरयभूताहरणम् । जहाँ हम या कपट हो यों अभूताहरण होता है। (कपट के द्वारा जहाँ प्राप्ति कराने को पेष्टा को भाय) जैसे रानावटी में वासवदना का वेष बना कर सागरिका वरसराग के समीप अभिसरण करती है, इस बम की सूचना प्रवेश को दारा विदूषक तथा काञ्चनमाला पनी हुई मतगता के कथनोपकथन से दी गई है- १ ममाल्य पसन्तक हुम र कुशल हो। इस सपि वियर फी चिन्ता के द्वारा तुमने ममात्य पौगन्धरायण की मी जीन किया। भय मार्ग--- -मार्गस्तत्त्वार्थकीर्तनम् ॥ ३८॥ मा एमाल्या--विदूषक-दिठिा पाखि समोहिदन्मधिकार कर सिद्धी । ( "दिष्टया पर्धचे समीहिताभ्यधिकया कार्यसिद्धया।' ) राजा-वयस्य कराल प्रियाया। विदूषक-प्ररेण सभं जेव्च पेविषम प्राणिहिति । (भचिरेग स्वय मेर प्रेक्ष्य हास्यसि ।' ) रामा दर्शनमपि भविष्यति । विषा-(सगर्वम् ) कीस नामविसदि पास देउवहमिदविहाफदिबुद्धिविहयो अई प्रमच्चो। (कर्ष न भवि- प्रथम.प्रकाशः - यति यस्य त सपहस्तिहस्पतिवुद्धिविभयोऽहममात्य ।') राजा-तथापि कमिति श्रोतुमिच्छामि । विदूषक --(कणे कथयति ) एबम् ।' ('एवम्') इत्पनेन यया विदूषकेण सागरिकासमागमः सूचित तथैव निश्चितरूपो रायो निपैदित इति तत्त्वार्थ - कथनान्मार्ग इति । जहाँ निश्चित तत्व का (अयंप्राप्ति रूप तत्व फा) कीर्तन हो, यह मार्ग है। (यहाँ नायकादि के प्रति किसी शुभचिन्तक पान के द्वारा प्राप्ति के मार्ग की सूचना दी जाती है।) जैसे रणावली में यासवदत्ता के वेष में सागरिकाभिसरण को सूजना देकर, विदूषक सागरिकासमागम का निणय राजा को दिला देता है। इस प्रकार तखानिवेदन के कारण निम्न पहियों में मार्ग नामक गांद है। 'विदूषक-बही पुशी की बात है, तुम्हारी कार्यसिद्धि के ईप्सित से पूर्ण होने है राप्दारी पूटिदो रही है। रामा-वयस्य, प्रिया कुशल तो है। विदूषक-धि दी खुद ही देखकर सारी बात जान लोगे। रामा-क्या दर्शन मोहोगा। विदूषक- घमण्ड से ) क्यों नहीं होगा, जब तुम्हारा मुझ जैसा मोरे, जिसने पति के मुद्विवेयर को मी तुरुछ समझ कर ईस दिया है। राजा-फिर जरा फिस दम से यह होगा, इसे सुनना चाहता हूँ। विदूषक (कान में करता है) ऐसे।' थप रूपम्- रूपं वितर्फवाक्यम्-- यषा रत्नावल्याम्-'राजा-अहो फिमपि कामिजनस्य स्वगृहिणीसमागमपरिमा विनोऽभिम जन प्रति पक्षपातस्तथाहि-- प्रणयविशद दष्टि पपने दाति ने शरिता घटयति धन कटारले रसाम पयोधरी। पति पहुशो गच्छामीति प्रयत्नवाप्यहो रमयतितो सतस्या तथापि हि कामिनी॥ कथं चिरपति बसन्तक किं मुसलु विदित स्यादय पत्तान्तो देव्या ।' इत्पनेन रमाबलीरामागमप्राप्त्याशानुगुण्येनेव देवोशायाच विसस्थिमिति । जहाँ प्राप्ति की भतीपा करते समय नायकावितरितमय वाक्यों का प्रयोग की, ससेस्प कहते हैं।(माक्षि की प्रतीक्षा में कमी-कभी यह भी डर बना रहता किकी कोई शिर उपस्थित न रो माय, इस सि विचार की सूचना रूप में होती है।) से रानावरी में यह वितक कि कहीं वासवदया ने इस बात को न बान लिया हो, रना समागम की प्राण्याशी सादाप प्रतिपादित करता है। यह वितरूपान पंकियों में चित। 'राम-अपनी गृहिणी (पानी) के समागम से परिमारित धमी मनुष्य का नये म्परिक (मईसिय)प्रति किसी दूसरे होगा पथराव होता, अमेयचपि (विपकर) संकेत गमिसरणार्थ भाई दुई प्रेमिका, सोने के कारण नायक के कोमोर प्रेममीनमा से महादेव पाली, 3 माटाकाये हमय प्रेम से सोको और - . दशरूपकम् छाठी से नहीं मानी तथा बड़ी कोशिश से रोके जाने पर भी बार-बार 'मैं जाती है। इस तरह जाने का डर दिखाती है, तथापि पद कामी मनुभ्य को अत्यधिक सुरा पहुँचाती है, यह बहे माश्चर्य की बात है। प्रयोदाहरणम्- -सोत्कएँ स्यादुदाहतिः। यथा रत्नावल्याम्---'विदूपम-(सहर्षम् ) हो ही भोः, कोसम्बीरमलाहेगाव ण तादिसो घथस्सस्स परितोसो असि यादिसो मम सश्रासादो पिअपश्रणं मुणिय भविस्सदि ति तक्कैमि । (हो ही भो कौशाम्बोराज्यलाभेनापि न वादशो पय- स्थरय परितोष पासीत् यादृशो मम सकाशातिप्रयवचनं श्रुत्वा भविष्यतीति तर्पयामि।') इत्यनेन रत्नावली प्राप्तिवार्तापि कौशाम्बोराज्यलामादतिरिच्यत इत्युत्कर्षाभिधानादुपाह- तिरिति । उकर्ष या उन्नति से युक्त वाक्य उपाहति या उदाहरण कहलाता है। जैसे रत्नावली में विदूषक ररनावरी प्राप्ति की बात को गौशानीराज्य-लाम से भी बदकर बनाता है, मत. निम्न वाक्य सोत्कर्ष होने से उदाहरण का सूचक है- 'विदूधक-वर्ष के साथ) हा.हा, मेरे पास से प्रियवचन सुन कर तुम्हें जितनी प्रसन्नता होगी, उतनी कौशांबी के राज्य लाभ से भी न हुई होगी।' 15.7-5 श्य झम'- फ्रमः संचिन्त्यमानाप्ति:- पया रत्नावस्याम्-'राजा-उपनठप्रियासमागमोत्सवस्यापि मे किमिदमत्यर्थमु. ताम्यति चेतः, अथवा- तीन स्मरसंतापो न तथादौ पायते यथासने । तपति प्राषि सतरामभ्यर्णजलागमो दिवसः ॥ विदूषक -(आकर्ण्य) भोदि सागरिए । एसो पिमवअसो तुर्म स्नेव उदि. सिम माटाडिमरं मन्तेदि। ता निवेदेमि से शहागमणम् । (भवति सागरिक । एप प्रियवयस्यरत्यामेवोद्दिश्योरकस्ठानिर्भरं मन्त्रयति तभिवेदयामि तस्मै तवागमनम् , इत्यनेन वत्सराजस्य सागरिकासमागमममिलषत एवं भ्रान्तसागरिकाप्राप्तिरिति कमः। जहाँ माति (इट यस्तु की प्राठि)का चिन्तन किया जाय, तथा पद वस्तु प्राप्त हो जाय यहाँ कम नामक गर्भसन्धि का अङ्ग होता है। जैसे रानावली में निम्न पक्तियों में वत्सराज सागरिका के समागम की अभिलाषा ही कर रहा था, कि प्रान्त सागरिका (सागरिका के रूप में वासवदा) या जाती है, अतः कम है। 'राजा-प्रियासमागम के उत्सव के नजदीक मा जाने पर भी मेरा हित स्तना व्यास देचेन क्यों हो रहा है। अथवा, कामदेव की तीन पीडा आरम्भ में उनना नहीं सताती जिवना इष्ट वस्तु के माने के काल के मजदीक होने पर(सच है) बादलों के बरसने के पहले का दिन बरसात में बता करता है। विदूषक-(मन कर) भरी सागरिक, पइ प्रियवयस्य तुम्हें हो तोच करके रहे उरकण्ठित रंग से चिन्ता कर सारे सरिये, मैं सुन्दारे मागमन को अपना इन्हें दे देता हूँ।'
प्रथमःप्रकाशः । अय नमान्तर मतभेदेन- --भावशानमथापरे ॥ ३६॥ यथा रलावल्याम्-'राजा--(पमृत्य) प्रिये सागरिके। शीतांशुर्मुसमुत्पले तव दशौ पदानुकारौ कौ रम्यगर्भनिर्भ तवयुगलं वाह मृणालोपमरे । इयादादाखिलाशि रमसानिशइमालिशयमा , महानि त्वमनङ्गतापविधुराण्याहि निर्यापम ।' इत्यादिना द६ तदप्यरत्येव विम्वापरे' इत्यन्तेन यासवदत्तया वत्सराजभावस्म ज्ञातवारकमान्तरमिति। दूसरे लोगों के गत से शाम को परिमाया मिन है । वे (दूसरे लोग) मा के शान को प्रम मानते हैं। इस मत के अनुसार जहाँ दूसरे पान के द्वारा नायकादि के भाव का शान हो जाय, यहाँ कम होता) जैसे रत्नावली में वासवदता (कोकि सागरिका की जगह स्वय सत स्थल पर भा जाती है) निम्न पद से बत्सराज उदयन के रलावली विषयक मनुराग- भारको जान जातीक्षितः कम है। राना-(नजदीक जावर) यि सागरिक, तेरा मुख चन्द्रमा है, तुम्हारी दोनों अति रमल तुम्दारे दोनों करतल पम के समान है, तुम्हारी दोनों जायें केले के गम के सश है, और गन्दारे दोनों दाय (बाजू ) मृणाल के समान है। इस तरह तुम्हारे सारे या मुझे भाडाद देने पाले है, बाहादकराखिलागि, मामी, माओ, निशक और शीघ्रता से मेरा मालिकन पर कामता से पीडित में अओं को शान्त करो 1xxxrस विम्वापर में वर मीभीतरीही। अथ संप्रह'--- संग्रहा सामानोक्ति- यथा रत्नावस्पाम्-'साधु परस्य । साधु इदं ते पारितोषिकं फटके ददामि । इत्पाभ्यो सामदानाभ्यो विदूषकस्य सागरिकासमागमकारिण- संहासंह इति । जहाँ नायकादि अनुपूल आपरण करने वाले पान को साम घ दान से मान करें, बहसास व दान की उकि संग्रह कालाती है। जैसे पानावली में राजा मागीका का समागम घराने पाले विदूषक को साम व दान से सात करता है, मत सदर है। रामा-ययस्य हात अन्या, बहुत अच्छा मैं तुम्हें पद कदा इनाम देता हूँ। भयानुमानम्- अभ्यहो लिङ्गतोऽनुमा। यया रनावस्याम्-'राजा-पिर मूर्ख ! परत एवायमापतितोऽस्माइमन । 'समारदा प्रति प्रणयबहुमानारप्रतिदिन बया प्रिया मुवामय स्फुटमसहना जीवितमसौ प्रकृत्य प्रेम सालिकमविषाय हिमपति ।। विरामी पपास चामता किंकास्मदितिन पाणामि नागरिमा उप ।" 1 1 दशरूपकम् दुकर जो पस्सदि ति तक्कैमि।' ('भो पयस्य । पासवदत्ता किं करिष्यतीति न जानामि सागरिका पुनर्दुष्कर श्रीविष्यतीति तर्पयामि ।') इत्यत्र प्रकृष्टप्रेमस्खलनेन सागरिकानुरागमन्येन पासवदताया मरणाभ्यूहनमनुमानमिति । जहाँ किन्हीं हेतुओं (लिगों) के आधार पर नायकादि के द्वारा सर्क किया जाय, यहाँ अनुमा या अनुमान होता है। (घूम पर्वत में अग्नि की सचा का अनुमाएक लिग है। 'यत्र यत्र धूम तत्र तत्र बसि व्याप्ति के आधार पर यह पर्वत में अग्नि की सचा सिद्धर देता है-पर्वतोऽय बधिमान् (धूमाव ) 1 इमी तरह महा कि ही हेतुओं से किसी भी बात का अनुमान तर्कसरणि के भाधार पर हो, यहाँ अनुमान नामक गर्माग होगा। यया, रनावली नाटिका में सागरिका से प्रेम करने से राजा प्रकृष्ट प्रेम से स्खलित हो गया है, इसलिए इस बात को जान कर वासदण जिन्दी न रह सकेगी, इस प्रकार प्रष्ट प्रेमसलन हेतु के द्वारा पासवदत्तामरण का तर्क अनुमान है, जिसको सूचना निम्न पत्र में हुई। 'राजा-विकार है, मूर्ख, तुमने ही यह सारा अनर्थ हमारे सिर डाला है। क्योंकि, (इम दोनों का) प्रेम दिन प्रति दिन प्रेम के सम्मान करने से बढ़ गया था, मेरे द्वारा अब तक कभी न किये इस अपराध को किया देखकर यह प्रिया वासवदत्ता से बर्दाश्त न परतीई थाज सचमुच जीवन वा त्याग कर देगी। प्रकृष्ट (बहुत बढे हुए) प्रेम है (एक व्यक्ति का) गिरना (दूसरे के लिए) असहनीय हो होता है।' विदूषक-हे मित्र, वासवदत्ता क्या करेगी, यह तो नहीं मानता, हा स रिका मी मुश्किल से जिदीद सकेगी इतना अनुमान जरूर करता हूँ।' अयापिषतम्- अधिक्लमभिसंधिः- यथा रत्नावल्याम्-काश्चनमाला-मष्टिगि । इमं सा चित्तसालिमा। ता पसन्तअस्स सण करेमि (मत्रि ! इय स चित्रशालिका तसन्तकस्य सज्ञा करोमि।) (छोटिको ददाति) इत्यादिना पासवदत्ताकाधनमालाभ्या सागरिकासुराहताचेपाभ्या राजविदूषध्योरभिसधीयमानत्वादधिषलमिति । जहाँ किन्हीं पात्रों के द्वारा नायकादि का अभिप्राय जान लिया जाय, वहाँ अधिवल होता है। जैसे रत्नावली नाटिका में वासवदा व काधनमाला सागरिकाभिसरण की बात जान कर सागरिका तथा संगतता देव बनाकर संकेत स्थल (चित्रशाला) को जाती है। यहाँ ये दोनों राजा प विदूषक से मिलती है तथा उनका अभिप्राय जान लेती, श्रत मधिरत है। कायनमाला कीस उक्ति से रसको सूचना दी गई है। 'भद्विगि, यह वह चित्रशाला है। तो मैं वसन्तक को संकेत करती।'(ताली का सकेत - अप तोटकम्- -संरचं तटकं प्रचा॥४०॥ यथा रत्नावल्याम्-'वासवदत्ता-(उपमृत्य) भज्जउक्त । जुत्तमिश सरिसमिणम् ।' (पुन सरोपम्) अग्नउत्त उठेहि किं भजवि पाहिआईए सेवादुक्समणुभवीअरि, बचणमाले ! एदेण नेप पारेण पघिन आणे हि एण दुव्यम्हण। एद पिदुटटकाण १. यहां राजा व विदूषक दोनों की उक्ति में अनुमान' पाया जाता है।
प्रथम प्रकाश
अम्गदो कोहि ।' ('मापुन । युमिद सदशमिदम् । भार्यपुत्र उत्तिष्ठ
किमद्याप्याभिजात्मा सेवा समनुभूयते, साधनमाले ! एतेनैव पारीन बदमानय दुष्ट
ब्राह्मणम् एतामषिदुष्टपासेन थपिन पाहि एण दुकन्याममत कुछ।') इत्यनेन
वासवदत्तासरस्ववचसा सागरिकासमागमान्तरायभूतेनाऽनियतप्राप्तिकारण सोटकमुकम् ।
मोध से युक पचन वोटक फहलाता है। जैसे रस्नाली में सागरिकासमागम के विष्ट
उपस्थित करते हुए पासवदता कुद्ध वचन के द्वारा उदयन की इष्टमाप्ति को अनिश्चित बना देती
है। अत यह तोटक है। वासवदचा को इस उक्ति में सौटक ई-आगे बढ़कर) आर्यपुत्र,
यह ठीक है, आपके सदृश है। (फिर रोप से) मान्न नसो, या भइ भी कुटो नाता सेवा
दुध का अनुभव करती है । काञ्चनमाला, इसी पास से इस दुष्ट माण (वसन्तक) को बाथ
कर है झा, और इस दुष्ट लड़की को भी भागे कर।'
यथा च येणीसहारे-
'प्रयानपरियोधित स्तुतिमिरय शेपे निशाम्'
মাবিনা
भृतायुषो यावदह सावदन्ये किमायुयै"
पन्तैनान्योस्य कर्णावत्याम्नी परव्यययसा सेनामैदकारिणा पाण्डपविश्यमाया
शाचित तोटकमिदि।
और जैसे घेणी सहार में कर्ण और मधलामा के परस्पर फुल वचनों के कारण कौरवों की
सेना में हो जाता है, और इससे पाविजय को प्राप्त्याशा को सहायता शेती है, भत
यही तोटक है। इसका अरमात अपामा को 'तुम भान स्तुतियों के प्रपरनों से जगामे हुए, रात
को सोयोग सक्ति से लेकर जा तक मैं मायुध धारण किये हा तर तक दूसरे भायुर्षों से
क्या लाम' इस उतिक पाया जाता है।
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ग्रन्थातरे तु-
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तोटफस्यान्यथामाय ग्रुपतेऽधिपल वुधा।
यथा रस्नावस्याम्-'राजा-देवि एवमपि प्रत्यापथ्यलोक कि विशपयामि-
'धातापतामपनयामि विलक्ष एवं
लाक्षारता परणयोस्वर देवि मूर्धा ।
कोपोपरागजनिता त मुखेन्दुमिम्ये
तु शपो यदि पर करुणा मपि स्यात् ॥
दूसरे नाट्यशास्त्र के प्रमों में अभिवत यतोष दोनों के रक्षण मिन बताये गये है।
इसके विद्वानों के मतानुसार सोट का टटटा ही अधियल है। दशरूपककार के मन से
कुरुवचन तोटक है, मत हुवचन मा उलटा मिनीत व दीन पचन, अभिवत है। ये दूसरे
नाट्यशाली बीन बचनों को भविषल मानते है, मे रानावरी में राजा की इस रक्ति में-
'देवि, इस तर मेरे मपराप के प्रत्यक्ष देश देने पर क्या ममं कर साहार
शित रोकर मै अपो सिर से तुगारोनी रों की मटका (सामा) योगको या
सद रामसेतोष रूपी से पकाई पूर्व मुरादी गाईको
गेमी । सताई, जय नारी विपया मेरे पति हो जाय।'
सरन्धया यत्तु तोटर्फ सगुदाद्धवम् ॥ ४ ॥
४२ दशरूपकम् - . P . श-4-57 यया रत्नावल्याम-रामा-प्रिये वासवदत्ते । प्रपीर प्रसाद । पासवदत्ता- (अभूमि धारयन्ती अबठत्त ! मा एवं भण अग्णसवन्ताइंसु एपाई अश्वराई ति।' (मार्यपुत्र रमण । अन्यसंमान्तानि खल्वेतान्यक्षराणीति ।। यया च वेणीसंहारे-गजा-अये मुन्दरक। कश्चिकशलमाराणस्य । पुरुष कुसल सरीरमेत्तकेण । ('कुरालं शरीरमात्रण।') राजा-किं तस्य किरीटिना हता धौरेयाः, क्षत सारथि , भमो वा रथ । पुरुष'-देव ! ण भग्गो रहो भग्गों से मगोरहो । ('देव न भग्नो रप । भन्नोऽस्य मनोरय') राजा-(संत्रमम् ) कयम् ।' इत्येवमादिना सरन्यवचसा तोटकमिति । इन दूसरे पण्डितों के मत से संरब्ध (उद्विग्न) वचन घोटक है। जैसे रत्नावली में- 'राजा-प्रिये, वासवदत्ते, प्रसन्न हो, प्रसन्न हो। वासवदत्ता--(भासू भर कर) आर्यपुत्र, ऐसा मत कहो। ये अक्षर और दूसरे के लिए हो गये है। और जैसे वेणीसंहार में- राजा-अरे सन्दरक, मङ्गराज कर्ण कुशल तो है। पुरष-उनका केवल शरीर कुशल है। राजा-क्या इनके घोड़े अर्जुन ने मार दिये, सारथि घायल कर दिया, या रथ तोर दिया। पुरुष-देव, उनका रप नहीं, मनोरथ तोड़ डाला। राजा-(उद्विग्न होवर) कैसे।' भयोग- उद्भगोऽरिकता भीतिा- यया 'रत्नावस्याम्-'सागरिका-(भारमगतम् ) कहं अकिदपुण्णेहि असणी इच्छाए मरि पि ॥ पारीभदि ।' ('कयमकृतपुण्येरात्मम इच्छया' मर्नुमपि म पार्यते।') इत्यनेन पासवदत्तात' सागरिकाया भयमियुद्वेग । यो हि यस्यापकारी स तस्यारिः। "यया प घेणीसंहारे-सूत'-(ध्रुखा सभयम् ) कथमाखन एवासौ कौरवराम- पुत्रमहावनोत्पादमारतो मारुतिरनुपलभ्यसंशय महाराजा, भवतु दूरमपहामि स्यन्दनम् । राविषयमनार्य हुशासन इवास्निप्यनार्यमाचरिष्यति । इस्परिकृता भीतियद्वेग । शत्रुओं के द्वारा किया गया भय उद्वेग कहलाता है। जैसे रत्नावली में वासवदता सागरिका का अपकार करने माग बनारसकी शत्रुहै। जब यह सागरिका को पकड र हे जाती है तो सागरिका को भय होता है, अतः यह उदेग है। सागरिका की हम उफि में इसी का सकेत है- 'क्या पुण्य न करने के कारण इच्छा से मरा मी नहीं जाता।' और जैसे वेणीसंहार में हल को निम्न उक्ति उसके भयो प्याक है। (सुनकर हर के. साथ) क्या यह कौरव राजकुमारों के महान् वन के लिए भीषण झाझावात (प्रलय वात) के समान भीमसेन समीप हो आ गया है और महाराज बेहोश है। ठीक है, २ को दूर ले आता शायद यह दुशासन की तरह इनके साथ भी अनुचित व्यवहार पर बैठे।' भय सत्रमा- -शहाबासौ च संभ्रमः। . Ty प्रथमः प्रकारी: . यमा रतवल्याम्-'विदुधका-(परयन ) का लण एस ( ससंभ्रमम ) कर्भ देवी पासवदत्ता भत्ताणं गापादेवि । ('का पुरेसा ! जयं देवी पासवतामा व्यापा. दयति' ! ) राजा-(संघममुपसर्पन ) कासो कारो।' इत्यनेन पासवदशाबुदिरही. ताया सागरिकाया मगराया सनम इति । पया य वेणीसंहारे-नेपथ्ये फलकन' ) अश्वत्थामा-(मसंभ्रमम् ) मावल ! मातुन । कम । एप बातु प्रतिक्षामनमोः किरीटी समं शरवर्षदुर्योधनराधेयाभि- दवति । सर्वथा पीते शोणित दुशासनस्य भीमेन ।' इति शङ्का । तथा प्रविश्य संभ्रान्त सप्रहार') सूतः प्रायती भायतो कुमार' । इति शास' । इत्येताभ्यो धारा- शक्षाभ्यां इरासमोणक्यसूचकाभ्या पाण्वविजय प्राप्त्याशान्चितः संधर इति । जहाँ पात्रों में शंका एवं भय का संचार हो, यहाँ संभ्रम मामा जाता है। जैसे रानावली में पासवचा को पुद्धि से गृहीत सागरिका के मरने की माशका निम्न सक्ति में आई जाती है, अतः सदा संभ्रम है। विदूषक-(देसकर) पर कौन है । (परा कर) क्या देवौ वासाचा अपने आप को मार की है। मामएस्पा कर रही है। राजा--(पराइट के साथ भागे पढने हुए) र कहा है, यह कहा है। और जैसे वेणीसंहार में, तीसरे अंक में त्रास तथा शंका द्रोण तथा दुशासन के मथ की पूना है, इनसे पाण्डवों की विजय की प्राप्त्याशा मन्वित है, अतः यदा समम नामक गर्भार है, जिसकी रचना निम्न स्थल पर हुई है। 'नेपथ्य में कोलाहल ) अश्वत्थामा (घबराकर )-मागा, मामा, पढे दुख की बात है। भाई को प्रतिक माहोने से डरा हुवा यह अर्जुन काणों की वर्ण के साथ दुर्योधन व कर्ण पापोया करता। भीम ने सचमुच हुशासन कर खून पी' ही लिया। यही नपत्यामा पो रहा है कि भीम दी अपनी प्रतिमा पूरी न कर ले। भागे जद बीट या पाण्यासन का सारथि गामस्थामा के शत भार उडे मनाने को मारता है.--'कुमार दायासन की एका करो, उसे बचानो, तो पास की अभिव्यजना होती है। अथालेपः- गर्भवीजसमुद्रेदादाक्षेपः परिकीर्तितः ॥ ४२ ॥ या रवावल्याम्-'राजा-यस्य देवीप्रसादन मुश्खा नान्यत्रोपाय पश्यामि ।' पुनः ममान्तरे 'सर्वषा देवीप्रसादनं प्रति निष्प्रत्याशीभूता मा पुनः तस्तिमिह स्पिन देवोमेद गत्ता प्रसादयामि । इस्पनेन देवीप्रसादामा सागरिकाउमामाििखि गर्भ- पानोपादाक्षेपः। पाप पेणीसंहारे-न्दरक-प्रहला किसोप देण्यं उआउशामिस पतु एवं जिम्मरिदविदुरयप्रणपोनसा परिमुदपिदामादिदोषदेवर निशाच्या हास्दमूलप वियपाहिले पणतीकेएगाहकसमा परिणामेष्टि ' ('ममश किमन देषसुपानमामि म सश्वेतावितषिदुरपचमीय परिभूतपितामहरितो- पदेशाइरस राइमिग्रोरसाइमामूलस्य यूटपिपशाचिनो पाशालीकरामहशमत परो परिणमति' इत्यनेन दीप्रमेय पक्षोन्मुसतयाक्षिप्त इस्पाइप। एनि द्वारा गर्माहानि मारावस्येनोपनिषत्पनीबानि । एकच सो ४४ दशरूपक - भूताहरणमार्गतोटकाघिवलापाणा प्राधान्यम् इवरेपो यथासमव प्रयोग इति सानो गर्भसधिरुरु । जदा गर्म एव वीज, मथवा गर्म के बीज का उद्भेद हो, जहां धीज को विशेष रूप से प्रकट किया जाय, यहां साक्षेप कहलाता है। जैसे रत्नावली में राग की निम्न अति से यह स्पष्ट होता है कि सागरिका प्राप्ति वासवदा की पसनद्रा पर ही माथिन है। इसके दारा उदयन गर्भ पीज को प्रकट कर देता है, अत यहा भाक्षेप है। राजा-मित्र, भव देवी पासवदता को मनाने के अलावा मुझे कोई उपाय नजर नही माता !xxxदेवी के प्रसन्न होने के बारे में हमें बिलकुल बाधा नहीं रही हैxxx तो पहाडे रहने से क्या फायदा । जाकर महादेवी को ही क्यों न प्रसन्न करूं। और जैसे घेणीमहार में,सन्दरक की निम्न उक्ति के द्वारा पीर की पलोन्मुखता का भाक्षेप कर उसे प्रकट कर दिया गया है--'अथवा मैं ईश्वर को क्यों दोष हूँ। यह तो उसी षड्यन्त्र रूपी विपक्ष का फल पक रहा है, जिमका पोज पिपुर के रचनों की अवहेलना करना था, जिसका अंकुर भीष्मपितामह के हितोपदेश का तिरस्कार या, जो शकुनि के प्रोत्साइन को बड पर टिका था ए जिसरा फूल द्रौपदी के बालों को घसीटना था।" ये गर्भसपि के बारहों अंग प्राप्त्याण के पौषक तथा प्रदर्शक के रूप में निबर होने चाहिएँ। इनमें अभूताइरण, मार्ग, तोटक, अधिवल तथा माक्षेप प्रमुख हैं, बाकी का यथासमव प्रयोग हो सकता है। यहां तक गर्मसधि के अङ्गों का वर्णन किया गया । श्रयावमर्श:- फ्रोधेनावमृशेषत्र व्यसनादा पिलोभनात् । गर्भनिर्भिन्नयीजार्थः 'सोऽवमर्श इति स्मृतः॥४३॥ अवमर्शनमवमर्श' पर्यालोचन तप झोधेन वा व्यसनाद्वा विलोभनेन था भनित ध्यमनेनाणेन' इत्यवधारितकान्तफलप्राप्त्यवसायारमा गर्भसध्युद्भिषबीजार्यसबन्धो विम विमर्रा, यथा रखापरयां चतुर्थेऽमिविश्वपर्यन्तो वासवदत्ताप्रसपत्या निरपाय रत्नावलीप्राप्स्यवसायात्मा विमर्शी दर्शित । यथा च वेणीसहारे दुर्योधनाधिराफभीमसे मागमपर्यन्त 'तीन भोममहोदधौ कथमपि द्रोणानले नित कर्णाशीविषभोगिनि प्रशमिते शल्यपि याते दियम् । भीमेन' प्रियसाइसेन रमसादापायग्रेपे वय पर्वे जीवितसशय षयममी वाचा समारोपित ॥' इत्यत्र 'स्वल्पावशेष ध इत्यादिभिजियप्रत्यर्थिसमस्तभीष्मादिमहारयवधादव धारितकान्तविजयावमर्शनादवमर्शन दर्शितमित्यवमर्शसधि । जहां कोष से, प्यसन से या विष्टोमन (लोम) से जहां फल प्राप्ति के विषय में विचार या पोलोचन किया जाय; तथा जहां गर्भघि के द्वारा बीज को प्रर्गट कर (फोह) दिया गया दो, वह भवमर्श संधि कहलाती है। अवम शुनरी युत्पति भव' उपसर्ग पूर्वक 'मम' पातु से 'एम्' प्रत्यय से हुई, जिसका अर्थ वही है जो इसके 'युट् काले रूप अवमर्शन का है। दोनों का अर्थ है विचार, (1) सोऽयमोऽउपइइति पाठान्तरम् । - प्रथमः प्रकाश . T विवेचन या पोलोचन । यह फलप्राप्तिी पोलोचना क्रोध, व्यसन या विलोमन के द्वारा हो सकती है। यह चीज जरूर होगी इस प्रकार फलपाति के निश्चय का निधारण बहस पाया जाय तथा गर्मसन्धि के द्वारा प्रकटित बीग से नहीं सम्पन्न पाया जाता है, वह पोलो । चन (विम) अत्रमर्श कहलाता है। जैसे रहगावली के चौधे अंक में वासवदत्ता की प्रसन्नता से रश्नावली की प्रति दिना किसी दिन के समव है, इस विमदों की सूचना अग्निदार तथा इससे लोगों के भगवर करने के वर्णन तफ दो गई है। और जैसे वेणीसंहार में, दुर्योधन के खून से लथपथ होकर भीमसेन भाता है, उस वर्णन तवा विमा (अमर) सन्धि है। यहा अधिधिर नीचे के पथ में 'जीन बहुत घाली बची है (सपावशेषे जयै ) के द्वारा, समस्त शभुओं, भीष्मादि महारथियों बध से बर विजय निश्चित रूप से निर्धारित होगई है, इस बात की पोलोचना करता है, अतः वमर्शन दिखाया गया है-- 'किमी ताद माग्मरूपी महासमुद्र को भी पार कर लिया, द्रोगरूपी माग्न भी इस चुका है, पर्ण रूपी बहरीला सांप मी शान्त हो चुका, और शल्य मी स्वर्ग चला गया। इतना होने पर तथा विजय के पौड़ा रह आने पर सादसी मीमसेन ने शोधता के साथ हम सब को पाणी के द्वारा जीवन को सशब से मुक्त बना दिया है।' तस्यारसग्रहमाह- तनापपादसफेटो विद्रवद्रयशक्तयः थुतिः प्रसङ्गमदतनं व्ययसायो पिरोधनम् || ॥ प्ररोचना विचसनमादानं च त्रयोदशी । इस यमर्श सधि के अगों का वर्णन करते हैं: अपवाद, 'संफेट, विदव, द्रव, पाकि, घुति, प्रसंग, पलन, म्यवसाय, विरोधन, प्ररोचना, विषलम और भावान-अव. मर्श के ये तेरद अंग होते हैं। यो लक्षणमा बोपण्यापदादा स्यात- यमा रनावल्याम्-'सुमारता-सा तु तवस्मिणी महिलाए उच्चाणि गादित्ति पवाद करिअ वरपिदे श्रदरते ण जाणीदि कहिपि गोदेशि । ('मा खलु तपस्विनी महिन्योजयिनी नीयत इति प्रादं कृत्वोपस्थितेऽर्धयने न ज्ञायते प्रापि नीति) "विदूषक'-(सोगम् ) अदिणिपिणं का कदं देवीए ।' ('प्रतिनिर्पणं सनु कृत देण्या) पुन 'भो पमस्त मा छु अण्णधा संभावदि सा खु देवीए नही पेरिदा पदो अप्पिथं ति कहिदम् ।' ('भो वयस्म 1 मा खत्वम्यया सभावम सालु देव्योज्जयिन्यां प्रेषिता अतोऽप्रियमिति कथितम्') राजा-भदो निरनुरोधा मयि देवौ।' 'इत्यनेन यासंबदतादोपप्रत्यापनादपवाद। गया व येण्यसहारे-'युधिष्टिर-पाचालक ! कहिदासादिया तस्य इसमना पाएपदस्य पदयो ? पाचालक- येवले पषीस एव दुसरमा देवीकेशपाशस्पर्श- पातकप्रधानतरुपलभ्य । इति दुर्योधनस्य दोषपस्यापनादपवार इति । जहां किसी पात्र के दोपों का वर्णन किया प्राय, महा अपमान होता है। नावली में रामा सागरिका के प्रति वासवदयाल व्यवहार को मनरा मामषदचा के दौर का वर्णन करता, महाभपवाद है। 1 3 ४६ दशरूपकम् सुसंगवा-उन्हें उज्जैन ले जाया जा रहा है इस तरह की अफवाइ उहा कर देवी पासवाचा के द्वारा प्राधी रात के समय पता नहीं वह बेचारी (सागरिका) कहा ले जाई गई।' विदूषक (घबराकर)-देवी ने बड़ो कठोरता को है।xxxहे मित्र, कोई दूभरी बात न सगशना, वह तो सचमुच देवी ने उस्जयिनी भेज दो है, इस लिये यह समाचार अप्रिय है ऐशा हमने कहा है। रामा-भरे, देवी वासवत्ता मेरे प्रति बढी निकरुण है। और जैसे वेणीसहार में निम्न वानालाप में दुर्योधन के दोषों का वर्णन है, भात अपवाद नामक अवमर्शग है। 'युधिष्ठिर-पाचालक, क्या उस नीच कौरव. दुर्योधन के मार्ग का पता चला। पांचालक-उसका मान ही नहीं देवी द्रौपदी के केशपाच के पथ रूपी पाप का प्रधान कारण वह दुष्ट स्वयं भी पा लिया गया है। अय संफेट- -संफेटो रोपभापणम् । यया वेणीसहारे-भो कौरवराम ! कृतं वधुनाशदर्शनमन्युना मैप विषाद कृथा-पर्याप्त पाण्डवा समरायाऽहमसहाय इति । पञ्चानो मायसेऽस्माक य मुयोध सुयोधन । दशितात्यातशत्रस्य तेन वैस्तु रण्यत्सव ॥ इस्य श्रुत्वाऽसूयारिमा निक्षिप्य कुमारयोटिमुजरा धार्तराष्ट्र कर्णदुःशासनवधातुल्यावेव युवा,मम । अप्रियोऽपि प्रियो योद्ध स्वमेव प्रियसाहस ॥ 'इयुत्थाय च परस्परमोधाघिक्षेपपरुषवाकलहप्रस्तारितघोरसम्प्रामौ-'इत्यनेन भीमदुर्योधनयोरन्योन्यरोपसभापणाद्विजययोजान्वयेन संफेट इति । रोप से युक्त पातचीत (रोपभापण) संफेट नामक पिमान है। वैसे देणीसहार में निम्न उक्तियों में भीमसेन तथा योधन के रोप संभाषण के कारण सफ्रेट है। यह रोषसंभाषण पाण्डवों की.मावी विजय से बन्वित है। 'भीम-ए कौरवराज, माई के नाश के कारण उत्पन शौक व्यर्थ है। इस तरह शौक मर करी कि पाण्डव पुर में सरल है और मैं असहाय ह । दुर्योधन, हम पांचों में से जिस किसी को तुम अच्छा लड़ाका समझो, कवच धारण किये हुए तारों से युक्त उसी के साथ तुम्हारा दर युद्ध रूपी उत्सव हो जाय।। (इसे सुनकर दुर्योधन भीम व अर्जुन दोनों को भोर मसूपाभरी दृष्टि डाल कर (भौम 8) करता है। 'वैसे तो तथा दुशासन दोनों के मारने के कारण तुम दोनों मेरे लिए बार मनकारी)0) वैसे तुम बहे अप्रिय हो किन्तुलि भी दने के लिए तुम्ही रिय हो, क्योकि तुम प्रिय साहस दो।(इस तरहठ कर एक दूसरे के प्रति गुस्से से परुष शब्दों का प्रयोग करते हुए नया पोर संग्राम को विस्तारित करते हुए माम ब. दुर्योधन (गदायुर में भाये गये। 3 22.151 विदयो पक्षयणदि- प्रथमः प्रकाश *Pr T 7 1 यथा लितरामै- ग 'सेनापत्य मुखानि भाम पदशामस्यन्तमायासित पाल्ये येन हमासूमवलयप्रत्यर्पणे मोडितम् । युध्माकं य स एष विशिवरारितासस्थलो मूच्र्थापोरतम प्रवेशपिपयो बट्टा तवो नौयते ।' यथा च रतावस्याम- 'होणां हेमशानियमिव शिखरररियामाधान 'सान्द्रोयानमामालपनपिशुनिनादयन्ततीभिताप । कुर्वन्नीयामहीनं समजलधरश्यामलं धुमपात- रेप सोपातयोपिजन इह सहसपोस्थितोऽन्त पुरेऽमिः इस्यादि, पुन । 'वासवदत्ता-अबवत क्लु बह भत्तणो कारणादो भणाम एसा भए गिरियणहिप्रवाए सजदा सागरिया विवयदि ।' ('आर्यपुत्र 1 रूल्यह- मात्मन करणाणामि एपा ममा निणयया संपता सागरिका विषयते । ) इत्यनेन सागरिकापपवन्यामिमिचिंद्रव इति । किसी पात्र का मारा जाना, जाना (बन्दी हो जाना), सादि (अर्थात् भय से पलायन वादि फरमा) पिद्रव कहलाता है। जैसे बलितराम गाटक में-- "निरालय ने नचपन में सामवेद पढ़ते हुए तुम्हारे मुंह को गन्द करके बहुत तकलीफा दी थी, जिसमें अक्षयों की माला को विपाकर फिर से वापस देकर खेल किया था, बद्द तुम्हारा हृदय-यह प, जिसका पक्ष स्थल तीरों से बिंध गया है और जो मूच्चों के अन्धकार के कारण बेबस हो गया, बोध पर ले जाया जा रहा है। और जैसे रलावली नाटिका में सागरिका के कयन, मरण की आशंका, तथा अनिरूप भय के वर्णन के कारण निम्न स्पल में विश्व नामक विमोगी। जो अपनी लपटों के किनारों से जैसे महलों के सोने के कगरों को शीमा को धारण कर रक्षारी अपने सीम साप की सूचना पने पाग के पेटौ यो अम माग को झुलसा कर दे रहा है। ऐसा ममि एकदम मतपुर में फैल गया है। इसके पूर्व से कोडापर्वत पानी से भरे बादलों के समान कागदो गया है, तथा इसके ताप से अन्त पुरको त्रियाँ भयभीत होष्ठी है। वासवदत्ता-पायपुत्र, मैं अपने लिए नहीं कहती, निष्करण मेरे द्वारा बन्दी बनाई दुई यह सागरिका मर रही है (जल रही है। स्यपद- --द्रयो गुरुतिरस्यासि ॥ ४५ ॥ ययोत्तरचार- 'पद्धास्ते म विचारणीयचरितास्तियन्तु हु वर्तते सुन्दनीदमनेऽप्यसग्डरशम्रो लोके महान्तो हि ते । यानि श्रोग्यदोमुखान्यपि पदायासम्सरायोधने मक्षा फौलमिन्दस्वदमने वाप्यमिको जन " १.१ मारङ्ग अनुपाकविका नाम मारा था।
दशरूपकम् इत्यनेन लको रामस्य गुरोस्तिरस्कार कृतवानिति दवः । यया व वेणीसहारे-'युधिष्ठिर-भावान् कृष्णामा सुभद्राधात ! शातिप्रीतिर्मनसि न कृता क्षत्रियाणां न धर्मों रूढ सत्य तदपि गणितं नानुजस्याऽनेन । तुरुप कामं भवतु भवत शिष्ययो स्नेहबन्ध छोऽय पन्या यहसि विगुणो मन्दभाग्ये मयीत्यम् ।। इत्यादिना पलभर गुरु युधिष्ठिररिताकृतयानिति द्रवः । जहाँ पड़े व्यक्तियों (गुरुओं) का तिरस्कार हो, वहाँ प्रव नामक विमोग होता है- जैसे उत्तररामचरित में निम्न पत्र में लव पूज्य रामचन्द्र का तिरस्कार करता है अत' द्रव है- बहे लोग भत' उनके चरित्र की चर्चा करना ठीक नहीं। कैसे मौकों रहने दो। ताड़का (मन्द की सी) के मारने पर भी अरण्डित यावाले वे लोग महान् हैं। खर के साथ युद्ध करते समय मुरको बिना फेरे ही जो पीछे तीन कदम रखे गये और गालि (रमन) के वर के समय जो कौशल बनाया गया, उसे मी सगो लोग जानते हैं।' और जैसे देणीसंहार में, युधिष्ठिर पूज्य बलभद्र का तिरस्कार करता है, अत' द है- 'भगवन् कृष्णामज, मुमदा के माई, पलराम न तो तुमने आति की प्रीति काही विचार किया, न क्षत्रियधर्म हो का विचार किया। हारे छोटे भाई कृष्ण का अर्जुन के साथ जो प्रेम है, जो मित्रता है उसका भी कोई सयाल नहीं किया औक है, पर तुम्हारा दोनों शिष्यों (भीम व दुर्योधन ) के साथ समान स्नेह होना चाहिए। पिर यह कौन सा पताव है। तुम मुशमदमाग्य के प्रति इस तरह माराज हो।' -4 १ घिरोघशमनं शक्ति- यथा रत्नाश्याम्-'राजा- सयाजेशपथै प्रियेण दरसा चिप्सानुकृत्याधिक पैलक्ष्येण परेण पादपतनैक्य साक्षीनो मुहुः । प्रवासत्तिमुपागता नहि वया देवी पदत्या यथा प्रशाश्येव तयैव धाप्पसलिन कोपोऽपनीत त्यम् । इत्यनेन सागरिका नामविरोधिवासवदत्ताकोपोपशमनारक्ति । यथा चोत्तरचरिते लप प्राह- "विरोधो विश्रान्त प्रसरति रखो नितिघन- स्तदोदरय वापि मजति विनय प्रहयति माम् । मटित्यस्मिनटे किमपि परपानस्मि यदि महाघस्तीर्यानामिव हि महतो कोऽप्यतिराम ।। विरोधका शान्त हो जाना शक्ति कहलाता है। जैसे रत्नाव में निम्न पच में सागरिशलाम का विरोर करने वाली बासबदल के कोष यो शान्ति का सकेत मिलता है, मावरम है। 'मूठी उपयों है, प्यारे वचन से, अधिक प्रेम के बाद से, भत्यरिक बतासे, पैरों पर गिरने HTea -- - प्रथम प्रकाश से वश बार बार सखियों के वचनों में देदी वासवदत्ता वैसी सत्र न हो सकी जैसा उसने खुद ही रोकर अपने मार के पानी से धोकर ही क्रोध को निकाल दिया। और जैसे उत्तर रामचरित में राम को देखकर लच कहता है- 'मेरा विरोध शान्त हो गया है, एक शात सघन रस जैसे हृदय में फैल रहा है, वह देवता पता नहीं कहाँ चली गई है, विनम्रता मुझे शुका रही है। यदि रहे देखते हो मैं एक दम पराधीन हो गया हूँ तो बढ़े व्यकियों का प्रभाव ठीक उसी तरह महाय तथा महत्वपूर्ण होता है, जैसे पवित्र स्थानों का। अथ युति तर्जनोजने धुतिः। पथा घेणीसंहारे- एतय यवनमुपश्रुत्य रामानुजस्य सकलनिकुप्रपूरिताशातिरिक सद्घान्तसलिलवरशसंकुल बासोसनाप्राहमालोय रार सलिले भैरवं च गजिस्ता 16." कुमारसकोदरेणाभिहितम- जन्मेन्दोरमले कुले ध्यपदिशपद्यापि धत्से गर्दा मां दुशासनकोप्णशोणितसुराक्षीय रिपु भाषसे । दन्धिो मधुकैटभद्विपि रावयुदत घेटसे । मासान्नुपशो पिहाय समरं पधुना लीयसे ।' मादिना वोरिया 'सत्मसम्' इत्यनेन दुर्वचनअलावतोडनाया दुर्योधन- বসলীলনামি খালিয়াঘিনীখাইব্য মীমায় খুবিধা। किसी पान का सर्जन तथा वजन करना पुति कहलाता है। जैसे वेसहार में मौमसेन दुर्वचन तथा जलावलौहन (सरोवर के पानी के गथने ) से दुर्योधन को मयभीत (सर्जित तथा उद्वेजित ) करता है, तथा ये तर्जन व उद्वैजन एक और दुर्योधन के पानी से पाहर निकलने के तथा पाण्डव विजय के कारण है । सत यहाँ पुति है। इसका सकेन इस 'कण के इस पचन को सुनकर सारे निकुज से गरी दिशाओं के पिरे सरोवर के पानी को दिनकर, जो करे दूर सैकड़ों जलजन्तुओं से युक्त था, या जिसके मगर और यदियाल हर से हूबते-उतराते थे, तथा जोर से गर्बना करके कुमार भीमसेन ने पदा- अपने आपको चद्रमा के निर्मल कुल में उत्पन्न करता है, तथा सभी भी गदा धारण किये है शासन के गरम खून की शराब से मस्त मुझे शत्रु कहता है, पगण्ड से अधा होकर मधुकैटभ के शव झा के प्रति भी बदत व्यवहार करता है, (और हे नीच मानर, मरे र से युद्धभूमि को दोदकर भर कोच में पिता। अपप्र- गुरुकीर्तन प्रसङ्गा- यथा मावस्याम्-'देव यासौ सिंहलेवरेण स्वदिता रमावली नामाथुमती यासपद मामुपपुस्य देवाय पूर्वप्रापिता सती प्रतिदया।' इत्यनेन रमावस्या পাসনালিসামােিনা সময়ানুবদিন সব। उपाकियाम्-चालक-एक पायता गुभो भावविशनपत्य मत पाखदतो पावादिनु रामायण सोप्रदि एदेश विज गनिमा पसन्दसेमा अवश्य . T दशरूपकम् सोमेण पावादिति। (एष सागरदयस्य मुत 'पार्यविनयदास ना पारदत्तो व्यापादयितुं पप्यस्यानं नीयते एतेन जिन गणिका पसन्तना मुवर्णलोभेन व्यापादितेति।) चारुदत्त:- मखशतपरिपूर्त गोत्रमुद्भासितं यत् सदसि निविडचैत्यग्रपोच पुरस्तात् । मम निधनदयायां यमानस्य पापै- स्तदसाशमनुष्यैर्युष्यते घोषणायाम् ॥' इत्यनेन चारुदत्तवधाम्युयानुकूल प्रभारीर्तनमिति प्रसङ्ग । जहाँ पूज्य व्यक्तियों (गुरुओं), मातापिता आदि का संकीर्तन हो, यहाँ प्रसंग नामक विमशाग होता है। (अथवा जहां महत्वपूर्ण (गुरु) वस्तु को चर्चा हो यहां प्रसा होता है)। जैसे रत्नावली नाटिका में योगन्धरायण निम्न उक्ति के द्वारा प्रसग से गुरु (पूज्य, सिंहलेषर) का संकीर्तन करता है (अथवा राजा के प्रति महत्वपूर्ण समाचार को कहता है , इस 'गुरु कीर्तन के द्वारा रत्नावली के लाम के अनुकूल सम्बन्धियों का प्रकाशन किया गया है, मन यह प्रसंग है-स्वामिन्, देवी वासवदता को बलाहुमा सुनकर पहले से ही प्रापित जी रत्नावको नामक पुषी सिंहलेश्वर ने स्वामी को दी,"(पदी बढ़)। और जैसे मृच्छकटिक में, जर चाण्डाल चादत को बसन्तसेना के वध के दण्ड के लिए मारने से बारहे, तर उनकी घोषणा मनवर चारुदत अपने कुल, शील, तण गुदय का स्मरण कर प्रसंग से उनका कीर्तन करता है, अतु पुरुषीर्तन होने के कारण निम्न स्थल में वहाँ मी प्रसग नामक भवमशीग। 'चाण्डाल-यह सागरदत्त का पुत्र, मार्य दिनयदच का पौत्र, चारुदत्त वर्ष के लिये पभ्यस्थान ले जाया जा रहारसने सोने के लोम से गणिका बसन्तसेना को मार दिया है। चारुदत्त-जो मेरा गौर (कुल) चैत्यों के मधोषों के द्वारा समा में सैकडों हवन से पवित्र तया देदीप्यमान होता था, वही माज मेरै मृत्यु को अवस्था में पर्तमान होने पर (पापडालों जैसे) नीच तया पापो (अयोग्य) मनुष्यों के द्वारा घोषणा के रूप में घोषित किया जा रहा। अप छलनमू- -इलनं चापमाननम् ॥४६॥ थपा रखावल्याम-राश-अहो निरनुरोधा मयि देवी।' इत्यनेन वासवदत्तये- शसंपादनाद्वत्सराअत्यावमाननाच्छसनम् । यथा प रामाभ्युदये सौताया परित्यागेना बमाननापछलनमिति । जहाँ कोई पात्र किसी दूसरे की अवज्ञा (अवमान) करे, यह एलन कहा जाता है। जैसे रत्नावती में वासवरसा रस्नावठी समागम में वित्र उपस्थित करती, इस प्रकार या वत्सराज को ईप्सित घरतु का सम्पारन नही करने के कारण उसकी अवज्ञा करती है, मत अवमान के कारण यहाँ छलन नामक पदाहर। इसकी म्यञ्जना राजा को सक्ति a " 1 L TE १. 'गुहकीर्तन' को म्युत्पत्ति, गुरूया कोन मो हो सकती है, गुरु चैतत् सोतन मा हो सकती है। हमने कोठक में गुरुकोन के कर्मधारय वाले अर्थ को भी स्पष्ट कर दिया है। से शाहरणों को देखते हुए दोनों पुत्पति होस वसी है। - प्रथमः प्रकाश - , - - n h 'रे, देवी पासवदशा मेरे प्रति मष्टी निष्करण है।' अथवा जैसे रामाभ्युदय नामक नाटक में सीता को छोष्ट कर देसको अवश (अवमान) की गई है, भलन है। अथव्यवसाय'- 4 व्यवसाया सशायुक्ति:-- यया रलावल्याम्-'ऐन्द्रजालिक- कि परणीए मित्रको शामा महिहरो जले जलमो । ममम्मि पोसो दाविषजउ देहि आणत्तिम् ॥ .. भहचा किंबहुम्म जरिएक- मम पइण्णा एसा भगामि हिभएण जमसि दम् । तं ते दामि फुर गुरुणो मन्तप्पहावेण ।' (किं घरपयां मृगाक पाका महौधरो अले जपलन' । मध्या प्रदीपो दर्यता देखाशमिम् ।। अथवा किंबहुना जलियतेन । मा प्रतिपा ममामि दयेन यताउसि तत्ते दर्शयामि स्फुट गुरोर्मन्नप्रगावेण ॥') इत्यनेन्द्रजालिको मिष्यामिसंभ्रमोत्यापनेन वत्सराजस्य हृदयस्यसागरिकादर्शनास फूलो स्यशफिमाविकृतवान् । यथा र वेणीसंहारे- 'नून तेनाय योरेण प्रतिज्ञाममोक्षणा । यभ्यते केशपाशस्ते सचास्याको क्षम" इत्यनेन युधिष्टिर स्वदण्डशक्तिमाविश्करोति । जहाँ कोई पात्र अपने सामथ्र्य के विषय में कहे, (जहाँ स्वशायुक्ति पाई जाय), यहाँ व्ययसाय मामफ अवमान होता है। जैसे रत्नावली के चतुर्थ भ में द्विजानिक ही भाग फेला कर वत्सराज के इशप में स्थित सागरिका के दईन के बनुपूल अपनी शक्ति को प्रकट करता है। सती प्रस्नालशे सालों में हुई है, ऐजालिक की प्रक्रिया है:- 'माशा दीजिये, क्या मैं पृथ्वी पर चन्द्रमा, माकाध में पर्वत, गल में माग, और मेध्या के समय प्रदीप (पनि का प्रारम्म) दिखा । अपवा में ज्यादा होय पयो मारूं। मेरी प्रतिभा पर, मैं हृदय से कर रहा है, आप जो कुछ देखना चाहते है, गुरुजी के मन्त्र के प्रभाव के कारण मैं वही आपको दिखा सकता हूँ। और जैसे येणीसंहार के निम्न पत्र में, युधिष्ठिर भौम की वीरता का वर्णन करते हुए अपनी दण्डकि को प्रकट कर रहे है- 'प्रतिभा के पूर्ण न होने ये एका देस बौर थोमसैन के द्वारा मात्र तुम्हारा या ना (फेशपा) र गोपा जाये। और इसके पूरी करने में पूर्णतया है। १. यह मूल में 'पदेपा,किन्तु वहाँ पहमान का प्रयोग निक्रयता मरिष्य के भय में हुमा-मानसामीप्यमाना। H -- ।' , । । पैरारूपकम् सम विरोधनम्- -सरधानां विरोधनम् । पया वेमीसंहारे-राजा-रे रे मरतनय किमेव वृद्धस्य राज पुरतो निदितम्य मात्मकर्म ग्लाष! अपिब- कृष्टा केशेषु भार्या तव तव च पशोस्तस्य राजस्तयोर्वा । प्रायक्ष भूपतीनो मम भुवनपतेराशया धूतदासी । अस्मिन्वेरामुयन्धे तय किमपकृत तेर्हता ये नरेद्रा बाहोवायांतिसारदविणगुरुमद मामनि वेव द ॥ (भीम कोष नाटयति ) अर्जुन -प्रार्य प्रसीद किमत्र कोन! प्रप्रियाणि करोत्येष वाया शको न कर्मणा । इतमातृशतो दुःखी प्रलापरस्य का व्यया । भीम -भरे भरतकुलकला। श्रयैव किं न विसूजेयमह भवत दुशासनानुगमनाय कटपलापिन् । विप्न गुलमरुतो यदि मकराम- निर्मिधमानरणितास्थिमि ते शरीरे॥ भन्यच मूट। शोक श्रीवायनसलिलयसारित्याजितोऽसि भातुर्वक्ष स्थलविदलने यच साशीकृतोऽसि । भासोदेवर नृपते कारण जीवितस्य मुझे युष्मकुलकमलिनीकुमरे भीमतेने ॥ राम-दुरात्मन् भरतकलापसद पाण्डदपशो ! नाइ भवानिव विक यनाप्रगल्भ' । - T । यन्ति मचिरारसुप्त बाधवास्वो रणाये। मद्राभिनयशोऽस्थिवेशिकामा भीषणम् ॥ इस्मादिना सरन्थयो मदुर्योधनको स्वशत्युक्तिविरोधनमिति । अहाँ कुद पात्रों के द्वारा परस्पर स्वशफि का प्रकटीकरण हो, वहाँ विरोधन नामक अपमान होता है। (यहाँ मूल के संरधाना' के साथ ४७ वी कारिका के प्रथम चरण का स्वशवत्युकि पद अनुवर्तित हो जाता है। जैसे वेणीसंहार में निम्न सल में कुछ भीम व दुर्योधन दोनों अपनी-अपनी शक्ति को वचनों द्वारा प्रकट करते हैं, मत विरोधन है। 'राजा (दुर्योधन)-२वायु के पुत्र इस तरह बूढे राजा (राष्ट्र) के सामने अपने निन्दनीय फर्म की प्रशंसा क्यों करता है। और मी- हरी तुझं पशु की, उस राजा (सुभिरिकी और उन दोनों को सी को, उस शु में जीती हुई दासी (बीपी)को, लोक के स्वामी मेरी मात्रा रामानों के सामने वालों (१)'परम्भौति' इत्यपि पाउ ।
त । प्रथमः प्रकाश ५५ से सेंचा गया। इस पर मैं बता तो सही उन राजाओं ने तेरा क्या विमान था, जो युद्ध में मारे गये। दोनों भुजाओं के अतिशय बलरूपी धन के भारी मद वाले मुझे जीते बिना ही (इतना) धमण्ड! (भीम गुस्से का अभिनय करता है ) अर्जुन--पार्य, प्रसन्न हो, कोष कामा व्यर्थ है। यह दुर्योधन वापो से हमारा अप्रिय (दुरा) कर रहा है, कम से बुरा करने में यह अशक्त है। सौ भाइयों के मरने के कारण यद दुखी है, इसके प्रलाप से हमें कोई दुख (मोध ) नहीं। मोम-भरे भरतकुलक्लक ! हे कटुमलादिन् , क्या मैं तुझे आज की दुशासन के अनुगमन के लिए न भिजा (मैं तुझे आज ही अवश्य मार दाल) काश, मेरे हाथों के भग्रभाग के द्वारा तोडो जाने वाली शन्द करती हुई इटियों वाले तेरे शरीर में पूज्य तराष्ट्र व गांधारी विश न करते होते। और मी मूर्ख, तुम्हारे कुलरूपी कमलिनी को नष्ट करने वाले हाथी, मीमसेन के युद्ध होने पर (भी) उस दुष्ट राजा के जीवित रहने का कारण यह है कि सूने मार के पक्ष स्थलको फटते समय साक्षी होकर देखा और औरतों की तरह औरओं के द्वारा शोक कात्याग कर दिया। राजा-तुर भरतकुलापसद मीच पाण्डव, अरे वैरी तरह मैं बैंग मारने वाला नहओं हूँ, किन्तु-तेरे बन्धद अब अदीदी तुझे युद्धभूमि में सोया हुवा देखेंगे। तेरा वक्षस्थल, व इथिओं का बाचा मेरी गदा से टूय एषा होगा और छह दशा में तू बहा भीषण प्रतीत होगा।' भय प्ररोचना- सिद्धामन्त्रणतो भाविदर्शिको स्यात्परोचना ॥ ७ ॥ गमा पेणीसंहारे-पाचालक -अइ च देवेन चक्रपाणिना' इत्युपक्रम्य 'कृतं सदेहेन, पूर्वन्तो सलिलेन रत्नकलशा राज्याभिषेकाय ते মূলববিসির ভাই কার । राम शातकटारमारकरे क्षत्रनुमोच्छेदिनि मोबान्धे च वृकोदरै परिपतस्माजी कुत संशम ।। इत्यादिना मालानि गर्नुमाशापयति देवो युधिष्ठिर सायन्तेन प्रौपदीसमयमा *धिहिरराज्याभिषेकयो विनोरपि सिसस्वेन दर्शिका प्ररोचनैति । जहाँ कोई सिद्धपति अपमे पचनों के द्वारा माथी पटना की सूचना इस तरह दे जैसे यह सिद्धपदो प्ररोघना नामक अपमान होता है। जैसे वेणीसंहार में पावासका (दून युधिष्ठिर यो पास आकर भगवान कृष्ण का बचन मुनाता है कि भीम की विजय में कोई संदेवामी, भोर बाद में सेवको को बाधा देता है कि महाराज युधिधिर ने अप के उपलक्ष में मंगल कार्यों करने की आशा दी है। इसके द्वारा द्रौपदी को कैशयमन रूप ज्या युधिष्ठिर फै गग्यामिक कप दो मापी पटनाभी को सूचना सिमका में दी गई है। भत यहाँ प्रसनना है।पाशाठक की रक्ति का निम्न बैंश इसकी सूचना देता है- 'मामि भगवान् काग ने मुझे माहा दी हैxxसन्देश को पावरपका मी दारे राम्पामिरेक के लिए लायब्र से पूर्ण हो। द्रौपदीगो दिनों से छूटे हुए शो के बाँधने के लिए उत्सर ममारे। म पारा के दारा मन्दाय बाहे, यात्रियरूपी दक्ष को मसाइने वाले, पाशुराम क्या और से भन्ने मौमसेन के पुर(में धरने पर सन्देश की {भाया। 1 . . दशरूपकम् भव विचलनम्- पिकरथना पिचलनम्- यथा वेणीसंहारे-भीमा-सात । भम्ब ! सकलरिमुजयाशा यन यदा मुतस्ते , तृणमिव परिभूतो यस्य गर्वेग लोक। रणशिरसि निहन्ता तस्य राधासुतस्य प्रणमति पितरौ या मध्यम पाण्डवोऽयम् । अपिचतात। चूर्णिताशेषकौरव्य क्षीयो दु शासनासजा । भसा सुयोधनस्यो:भीमोऽय शिरसाऽञ्चति ।' इत्यनेन विषयवीजानुगतस्वगुणाविष्करणाद्वियलनमिति । यथा च रत्नावस्याम्-यौगन्धरायण - देय्या मवचनायथाऽभ्युपगद पत्युर्वियोगस्तदा सा देवस्य कलत्रसघटनया दुःख मया स्थापिता । तस्या' प्रीतिमयं करिष्यति जगत्स्वामित्वलाम' प्रमो सत्य दर्शयितु तथापि पदन शक्नोमि नो लम्बया ॥' इत्यनेना यपरेणापि यौगन्धरायणेन 'मया जगत्स्वामित्वानुष यो कन्यालाभो वत्स राजस्य कृत ।" इति स्वगुणानुकीर्तनादिवतानमिति । जहाँ कोई पात्र भारमलाया करे तथा दींग मारे, वहां विचलन नामक विमोग होता है। जैसे देणीसंहार में भीम अपने गुणों का आविषरण करके टींग मारता , मत या विचलन है। भीम-तात, माता, जिस कर्ण में, तुम्हारे पुत्रों की समस्त शवों को जीत लेने की माशा पादुई थी, जिसके घमण्ड के द्वारा सारा संसार तिनके कीवर तुच्छ समारा गया था, उसी राधा के पुत्र कर्ण को गुरभूमि में मारने वाला, यह मध्यम पाण्डव (मजुन) आप दोनों (धृतराष्ट्र व गाधारी) माता पिताओं को प्रणाम कर रहा है। और भी तात, विसने सारे कौरनों को चूर्णित कर दिया है, जो दुर्योधन के खून से मस्त हो रहा है, तथा जो अयोधन भी जाधों को (बन्दीही) तोड़ने वाला है, पर भीम सिर के द्वारा तुम्हारी पूरा करता है (न्हें प्रणाम करता है। और से रत्नावली में, यौवरायण निम्न उति में, वत्सरान के प्रति मेरा कितना उपकार है, इस बात की व्यंजना कराते हुए मपने गुणों का कोर्दन करता है, अव विचलन नामक विमोंगरे। 'मेरे बचन में विश्वास कर देवी वासरमण मे पति के वियोग को प्रास किया, और फिर महाराज को (नई) पानी दिलाकर मैने उसे दुसित बना दिया। फिर भी कुछ मोदो, सामी वासराज की बगा-स्वामित्व प्राप्ति उसे अवश्य प्रसार करेगी, यह सच, फिर भी बना कारण मैं उसे (देवी को)मपना मुख नहीं दिखा सकता।'xxx'मैने बत्सराम के लिए ऐसा कन्याम कराया जो संसार के स्वामित्व वोदिलाने वाला। - . . . - प्रथमा प्रकाश अपादानम्- -प्रादान कार्यसंग्राम यथा येशीसहारे--गीम ननु भी समन्तपञ्चकशरिग | रसो नाई न भूतं रिपुरुधिरजलालापिटा प्रकामं निस्तीनोकप्रतिकाजलनिधिगहन कोषन क्षत्रियोऽस्मि | भो मो राजयवीरा समरशितिनियादग्यशेषा कृतं - खासेनानेन लोनईतकरितुगान्तहितैरास्यते यत् ।। इस्पनेन समस्तरिएक्वकार्मस्य सगृहीतत्वावादानम् । यथा वरनावल्याम्-'यागीका-(दिशोऽवदोरय) दिहिया समन्तादो पजलिदो भान हुनहो करिसदि दुखायमाणम् । ('दिष्ठया समन्ताप्र- पपलितो भगवाहतपदोऽध करिश्मति साखसानम्'1) इश्यनेनान्यपरेणापि दाखा ५सानकार्यस्य सहादरदानम् । यया य-~अमरस्वामित्यनाम प्रमो' इति दर्शित भेदम् । इत्येतानि श्योदशावमानि ततैयारपवादशक्षियवसायप्रणेचनादामानि प्रधानानीति। जय भाटककार उपसंहार की ओर बढ़ने की कामना से नाटक या रूपक की वस्तु के कार्य को सगृहीत करता है भात् समेटने की घेष्टा करता है, तो यह अयमोंग बादान कहलाता है।। जवे येपासदार में दुर्योधन को मारकर लौटता इश भीम निम्न उक्ति के द्वारा समल शहुमो के वायी कार्य का समादार करता है मत पादान है। 'गरे समतपक में पूपने पाले में दो राक्षम है, न भूत ही। मैं तो पर मोधी पात्रिय है, जिसके गम के सनरूपी जल में शराबोर हो चुके हैं और जो मदती मतिया के समुद्र को पार कर चुका है। वे युदरूपी अग्नि को न्वाला में जलगे से बने हुए और राजाभो, तुम्हारा हमर व्यय मिससे तुम मरे हुए हायी व घोहों को आप में विपकर 7 . 1 और जैसे रत्नावली में दुख सागरिका उलठो भाग को देखकर यह समझती है किसके স্ত স্কা জাল হী সায়া খনৰষাৎ স্কাই ফর মাই -- ই, যা कोर जले हुये बग्नि देवता माज मे सामन्त कर दी। और जैसे पौगरायण की अनीश कि रागा को गणत्वामित प्राप्त होगा। विमर्श के ये ११ मा है। इनमें से अपवाद, शक्ति, व्यवसाय, परोचना व भादान में पीर मग मा ।14-10- अप निवेदनसषि- योजयन्तो मुवापर्धा यिप्रकीर्णा पापणम् ॥४८॥ ऐफार्यमुपतीयन्ते यत्र निहतं द्वितत् । यथा येशीसहारेकरी-उपराज्य सहर्षम् ) महाराज वर्षसे वर्षसे, रम বল স্কুল এঘনকুলগামীকুনয়ঙ্করী ঘলকান্ধি। নাবিলা प्रौपदीशसमनादिगुसराप्यादिवोजाना निनिस्पानोपशिशानामकतया योजनम् । पाप रानापाको सागरिकानावतीचमुभूतियाप्रयासनामर्षानो मुखसम्यादित - दशरूपकम् प्रकीर्णाना पसराजेककार्यत्वम् । 'वसुभूति -(सागरिक नियोपचार्य) बान्त्रम्य सुसरशीय रामपुन्या । स्यादिना पर्शितमिति निर्वहनसधि। रूपक की कथावस्तु के बीज से युक्त मुख भादि बर्थ जो भए तक इधर उधर बिखरे पड़े हैं, जब एक अर्थ के लिए एक साथ समेटे जाते हैं, या एकत्रित किये जाते है, तो यह निर्वहण सधि होती है। जैसे वेगोसहार में कक्षुकी इस एक्ति के द्वारा दोपदी के वेश संयमन, दुयोरन वध मादि मुससभि भारि के भी को बो अरतक नाटक में अपनी अपनी जगह दिखरे पड़े थे, एक एक्ष्य की दृष्टि से एकत्रित करता है- (आगे बढ़कर सुशी से) महाराज की विजय हो, सुयोधन के खून से लाल शरीर वाले ये कुमार, भीमसेन है, जो पहचान में नही आरहे है। भौर जैसे रानावरी में सागरिका, स्नादली, वनभूति, पाभच्य आदि के कार्यो (अर्थो) का जो मुखसधि आदि में सर-उधर विटके पड़े थे वत्सराज के ही कार्य के लिए समाहार होता है। इसकी सूचना दमुभूति की इस उक्ति के द्वारा दी जाती है-(सागरिका को देख कर, एक ओर) गाभ्रव्य, यह तो रादपुत्री (रत्नावली) जैसी दिखाई पड़ती है।' अप तदानि- सधिविरोधो मथन निर्णयः परिमाषणम् ॥ ४॥ प्रसादानन्दसमया कृतिमापोपगृहनाः। पूर्वभावोपसद्वारी प्रशस्ति चतुर्दश ॥ ५० ॥ इस निर्वहण सधि के १४ अग हैं -सधि, वियोध, प्रपन, निर्णय, परिभाषण, प्रसाक, मानन्द, समय, कृति, मापा, उपगृहन, पूर्वमाव, उपसहार सपा प्रशस्ति । यपोद्देश लक्षणमाह- सधि:जोपगमनम् - यथा रमावस्याम्-'वसुभूति यात्रश्य ! सुसरशीय रामपुश्या । यात्रम्य - ममाविमेव प्रतिम ति।' इत्यनेन नायिकाबीजोपगमात्सपिरिति । यथा व वेगासहारे-भीम-भवति यावेदिखभवे ! स्मरति भवती यत्तमयोका- महजनमितवण्डपदाभिषात सचूर्णितोहयुगडस्य सुयोधनस्म । स्स्यानाचनपशोणितशोधपानि रुत्तसयिष्यति कास्तव देवि भीम ।' जब घीज की उसावना की जाती है, तो यह सघि मामक निर्वहांग होता है। जैसे रत्नावली नाटिका के चतुर्थ अंक में वसुभूति तथा वामन्य सागरिका को परपान मेते है। यहाँ नायिका रूपोज को उतावना की गई है, मत सपि है। वमभूति तथा वामन्य की यह बातचीन इसकी चार 'बमभूमि-बाभ्रव्य, यह तो राजकुमारी (रत्नावली) के सदृश है। बाभ्रव्य-मुझे मी ऐसा ही मालम पड़ता। और जैसे वेगौसंहार में भीमसेन दुर्योधन के खून से गिहाणे झोपदी का रेश संयमन करते हुए उसे अपनी पिछले रिशा चार दिलाता है। यहॉ भीम को निम्नति के द्वारा मुखसपि में उपशिल मीन को फिर से उतावित किया गया है, मत सपि नामक निर्वहणार है। @atta १/115 M - प्रथमः प्रकारा . 'यज्ञवेदी से उत्पन्न दौपदि ! मैंने जो कहा था, वह ना पार है। बचल हाथों से धमाई गई गदा के प्रहारों से टूटी नाँधी वाढे दुर्योधन के पो स्किने खून से रंगे हाथों याला भीम तुम्हारे वालों को संवारेगा।' सप वियोधा-- -~घियोधा कार्यमार्गणम्। यमा रमावस्याम्-'वसुभूतिः-(निम्त्य ) देव इन इयं कन्युका १ राजा-देवी जानाति । वासवदत्ता-ममत्त । एसा सागरादो पाविप्रति मणिभ श्रमशोगन्ध. रामणेण मम हरने मिहिंदा यदो और सागरिप्रति सदावादि। ('भार्यपुत्र ।। एषा सागरारामेति मणिवाइमात्मयोगंधरायग्रेन मम हस्ते बिदिता अत एव धामरिति शब्यते।') राजा-(श्रारमगतम्) चौगन्धरायणेन न्यस्ता, कपमसौ ममानिवेय करिष्यति । इत्यनेन रलावलीलक्षणकार्यान्वेषणाद्विमोधः । या च वेणीसंहारे-भीमा-मुवत मुचतु मामार्यः क्षणमेकम् । युधिष्ठिरः-- किमपरमवशिष्टम् । भीमा-सुमहदवशिष्टम् , संश्ममि वावदनेन दुशासनयो. मितीक्षितेन पाणिना पायाच्या दुःशासनावाट केशदत्तम् । युधिष्ठिरसारणत भवान् , अनुभवतु सपरितमी वेणोदारम् ।' इत्यनेन केशसंयमनकार्यस्यान्वेपणादियोमः इति । जहाँ नायक अय तक छिपे हुए अपने कार्य को फिर से मोज करने लगता है, उसे विवोध कहते हैं। जैसे रसावली के चतुर्थ अर में वनभूति व यामन्य सागरिका की पहचान कर वसवो विषय में उदयन से पूछते हैं, वही निम्न वार्तालाप के द्वारा रखावली रूप कार्य की फिर से सौज होने के कारण विमोप नामक निर्वहणार है:- "सुभूति-(देख कर ) देव, यह कन्या कहाँ से पाई है। राजा-देवी वासवदधा जानती।। वासवदधा-आर्यपुत्र, यह पन्या समुद्र से पाई गई है,इतना कह कर अमात्य योगापरायण ने मेरे हाथों सौप दी है, इसीलिये इनका नाम सागरिका दिया गया है (इसे सागरिका ५मा जाठा राजा--(स्वगत) यौमत्वराय ने सीपी, बह गुशसे निवेदन किये बिना कैसे बारेमा (कैसे सौंप सकता। और जैसे वेणीसंहार में, मोम के दारा प्रौदही में देशगमन रूप कार्य का अन्वेषण किय जा रहा है, मता पाट अंक के निम्न स्थल में विवोध है। 'मीर-41 मुझे क्षण भर के लिए छोड़ दें। सुपिपिरपिर क्या बच गया है। भीम-सबसे बड़ी चीज रह गई है, मैं शासन के सून हे व हाय डायासन के बारा पकड़ा गया द्रौपदी का पूराती हैं। इथितिर-आप जाये, तपस्विनी द्रौपदी वसयमन का अनुमद को।' अप पनाम्- प्रथनं तदुपदेपो- Trre'L. यथा बनायास्याम्-'यौगन्धरायणः-देव1 क्षम्यतो गोलस्थानिवेश मौतस्य: तम् ।त्पनेन वाजत्य रत्नावलीप्रापपर्योपोपाइथनम् । यथा च येणीसंहार-भीमा-पाशालि ! न सानु मयि जीवति संइया इशा- + N दशरूपकम् प्रकीर्णानां पासराजेनर्यायस्वम् । 'वसुभूति-(सागरिछ निर्वयोपकार्य) मात्रम्प सुसाशीयं रामपुन्या । इत्यादिना दर्शितमिति निर्वहणसधि । हपक की कथावस्तु के धीज से युक्त मुख आदि अर्थ जो पब तक इधर उधर विखरे पड़े हैं, जब एक अर्थ के लिए एक साथ समेटे जाते हैं, या एकत्रित किये जाते हैं, तो यह निर्वहण सधि होती है। जैसे वेगोसदार में कशुको इस प्रक्ति के द्वारा द्रौपदी के केश संयमन, दुर्योधन व आदि मुखसधि भादि के बीजों को, ओ भबतक नाटक में अपनी अपनी जगह बिखरे पड़े थे, एक लक्ष्य की दृष्टि से एकत्रित करता है- (भागे बदकर सुशी से ) महाराज की विजय हो, योधन के खून से लाल शरीर वाले ये कुमार, भीमसेन है, जो पहचान में नहीं आरहे है। और जैसे रनावली में सागरिका रानावली, यमुभूति, बाभव्य आदि के कार्यों (अर्थो) का जो मुखसधि आदि में वर-उपर छिटके पड़े थे वत्सराज के हो कार्य के लिए समाहार होता है। इसकी सूचना वनभूति की इस उक्ति के द्वारा दी जाती है-(सागरिका को देख कर, एक और गाय, यह दो राजपुत्री (रत्नावो) जैसी दिखाई पड़ती है।' श्रय सदशानि- सधिर्षिोधो प्रथन निर्णयः परिभाषणम् ॥ ४६॥ प्रसादानन्दसमयाः कृतिमापोपगृहनाः। -- पूर्वमावोपसहारो प्रशस्तिश्च चतुर्दश ॥ ५० ॥ इस निर्वहण सधि के १४ अंग है -सधि, विरोध, प्रपन, निर्णय, परिभाषण, प्रसाद, मानन्द, समय, कृति, भाषा, उपगृहन, पूर्वभाव, उपसहार तथा प्रशस्ति । सपोद्देश लक्षणमाह- सधि जोपगमनम्- या मावस्याम्-'मुभूति -बानभ्य ! सुसाशीय रामपुश्या । मात्रय ममापोवमेव प्रतिम ति।' इत्यनेन नायिकादीप्रोपगमात्सपिरिति । यथा व वेगोसहारे-भीम-भवति यावेदिसभवे । स्मरति भवती यत्तमयोतम्- चमहजब्रमितचण्डगदाभिघात संचूर्णितोहयुगलस्य सुयोधनस्य । स्स्यानावनधनशोणितशोणपागि इत्तसमिप्यति कास्तप देवि भीम ॥' जप पीज की उद्भावना की जाती है, तो वह सधि नामक निर्वहणोग होता है। जैसे रत्नावली नाटिका के चतुर्थ औक में बमुभूति तथा वामस्य सागरिका को पहचान लेते है। यहाँ नायिका रूप बीज की उदावना की गई है, मत सधि है । यसमति तथा मानव्य की 'वभूति-वाभन्य, यह तो राजकुमारी (रत्नावली) के साश है। वाभव्य-मुझे भी ऐसा ही मालूम पडता है।' और जैसे वेणीसंहार में भीमसेन दुर्योधन के खून से रंगे हाथों द्रौपदी का रेश संयमन करते हुए उसे अपनी पिछी प्रतिष्ठा याद दिलाता है। यहाँ भीम को निम्न गति के द्वारा मुखसपि में उपक्षिप्त बीज को फिर से उमानित किया गया है,भा सीमामक निवंहगाई है। 9/115 1 - - - प्रथमः प्रकाश 'यज्ञवेदी से उत्पन्न द्रौपदि। मैंने जो कहा था, वह तुम्हें यार है। चञ्चल दायों से घुमाई गई गदा के प्रहारों से टूटी जाँघों वाई दुर्योधन के घने चिकने खून से रंगे हाथों वाला भीम तुम्हारे दालों को संवारेगा।' अथ वियोधा- -वियोधा कार्यमार्गणम्। पथा रदावश्याम्-'मुभूति-(निरूप्य ) देव इन इयं कन्यका ! राजा-देवी शानाति । वासनद-मजठात 1 एप सापरादो पाविमति भणिभ श्रमयजोगग्ध राप्रणेण गम हस्ये मिहिंदा अदो ज्वेव नागरिमप्ति सहावीभदि । ('मार्यपुत्र । एषा मागरारप्राप्तति मगिरवाऽमारय यौगंधरायणेन मम हस्ते निहिता अत एव सागरिवति शब्यते।') राजा-(मामगतम्) यौगन्परायणेन न्यस्ता, कपमसौ ममानिवेद्य करिष्यति । इत्यनेन रश्नावलीलक्षणकार्यान्वेषणादियोधः। क्या च वेणीसंहारे-भीमा--मुमत मुधत मामार्य क्षणमेकम् । युधिष्ठिरः-- किमपरमवशिष्ठम् ! भीमा-मुमहरवशिष्टम् , संयमयामि तावदनेन दु शासनशी णितोसितन पाणिना पायाया दुःशासनावपृष्टं केशहस्तम् । युधिष्ठिरः पातु भवान् , भवभरच तपस्विनी पेणीवारण ।' इत्यनेन पेशसंयमनार्यस्यान्वेपणादियोपः इति । जहाँ नायफ अय सफ छिपे हुए अपने कार्य की फिर से खोज करने लगता है, बसे वियोध कहते हैं। जैरो रक्षाबली के चतुर्थ भक में सुभूति व वानन्य सागरिका को पहचान कर उसके विषय में उदयन से पूछते है, यहीं निम्न वार्तालाप के द्वारा रसापलीरूप कार्य को पिर से सौज होने के कारण विदोष नामक निर्वहणार है:- 'बसुभूति-(देस पर) देव, यद्द कन्या कहा से भाई है। राजा-देवौ वासवदसा जानती है। पासवदत्ता-आर्यपुत्र, यह कन्या समुद्र से पाई गई तना कह कर अमात्य यौगन्धरायण में मेरे हाथों सौपदी, सीलिये इनका नाम सागरिका दिया गया है (इसे सागरिका पाहा जाता है)। राजा-(स्वगत) यौगन्धरायण ने सौपी, वा मुझसे निवेदन शिये रिना कैसे करेगा कैसे सौंप सकता। और जैसे देणीसंहार में, मोम के शरा द्रौपदी के फेशसंयमान रूप कार्य का अन्वेषण किय जा रहा है, भतः षष्ठ अंक के निम्न स्थल में वियोग है। 'नौम-माय मुझे क्षण भर के लिए छोड़ दें। युधिहिर-फिर क्या बच गया। मीम-सबसे बड़ी चौन रद गई, मैं शासन के सून से रंगे हाथ से दुशासन के बारा पकड़ा गया द्रौपदी का जूड़ा तो बोध । यथिविर -आप जाइये, तपस्विनी द्रौपदी केशसयमन या अनुभव करे।' अपमपना- प्रथनं वदुपक्षेपो- Butra या रानावस्याम्-'योगमायणः-देव ! सभ्यता यद्देवस्यानिदेय मयतस्कृत तम् । इत्यनेन पावराजत्य रामावलीमणकार्योपझेपावथनम् । यथा च वेणीसंहारे-भीम-पाचाति ! न खलु मयि श्रीवति संइतव्या दुःशा- ८० . दशरूपकम् प्रकोणांनी परसराजकार्यार्थत्वम् । 'वसुभूति'-(सागरिको निर्वयोपकार्य ) गाम्य सुसटशीय रामपुत्र्या। दत्यादिना दशितमिति निर्धहणसंधिः । हपक की कयावस्तु के घीज से युक मुख भादिअर्थ जो अब तक इधर, उधर विखरे पड़े हैं, जब एक अर्थ के लिए एक साथ समेटे जाते हैं, या एकत्रित किये जाते है, तो यह निर्वहण सधि होती है। जैसे वेगोसहार में कञ्चको रस उक्ति के द्वारा द्रौपदी के केश संयमन, दुर्योधन व आदि मुखसपि भादि के बीजों को, जो अबतक माटक में अपनी अपनी जगह.शिखरे पड़े थे, एक लक्ष्य की दृष्टि से एकत्रित करता है- (आगे बढ़कर सुशी से ) महाराज की विजय हो, सुयोधन के खून से लाल शरीर वाले ये कुमार, भीमसेन है, वो पहचान में नहीं आरहे हैं।' • और जैसे एरनादली में सागरिका, रत्नावली, धनुभूति, मामन्य मादि के कार्यो (भों) का जो मुखसन्धि आदि में वर-उधर छिटके पड़े ये वासराज के ही राय के लिए समाहार होता है। इसकी सूचना मुभूति की इस उक्ति के द्वारा दी जाती है--सागरिका को देख कर, एक भोर) बाभ्रव्य, यह तो राजपुत्री (रत्नावली) जैसी दिखाई पड़ती है।' अप तदनानि- संधिविरोधो प्रथनं निर्णया परिभाषणम् ॥ प्रसादानन्दसमयाः कृतिमापोपगूढनाः।- पूर्वमावोपसंदारी प्रशस्तिश्च चतुर्दश ॥५०॥ इस निर्वहण संधि के 18 अंग हैं:-संधि, वियोध, प्रथन, निर्णय, परिभाषण, प्रसाद, आनन्द, समय, कृति, भाषा, उपगूहन, पूर्वमाद, उपसंहार सपा प्रशस्ति । यथोहेशं लक्षणमाह- 'संधि:जोपगमनम् - 80140 यथा मावस्याम्-'वसुभूति'बालभ्य ! सुसाशोयं रामपुश्या । पात्रम्या- ममा अवमेव प्रतिम ति । इत्यनेन नायिकायोमोपगमार्क्सपिरिति । यथा व मोसंहारे-भीम. भवति यावेदिसंभवे । माति भवती पत्तन्मयोकम् - चचहुजभ्रमितचण्डगदाभिघात- संचूर्णितोहयुगलस्य मुयोधनस्य । स्यानावनधनशोणितशोणपाणित इसंसयिष्यति चास्तव देवि भीमा जरदोज की उद्भावना की जाती है, तो वह संधि नामक निर्वहांग होता है। जैसे रत्नावली नाटिका के चतुर्थ अंक में वमुभूति तथा काभ्रव्य सागरिका से पहचान लेते हैं। यहाँ नायिका रूपोज को समावना की गई है, मतः सपि है। मुभूति तथा बाभ्रव्य की यह बातचीत इसकी सूचक है:- बमभूति-वानन्य, यह तो राजकुमारो (रत्नाडी) के सदृश है। बाभ्रव्य-मुझे भी ऐसा ही मालम पढ़ना।' और जैसे गीसंहार में भीमसेन दुर्योधन के खून से गे हाथों द्रौपदी का देश संयमन करते हुए उसे अपनी पिवती प्रतिया याद दिलाता है। यहाँ भीमपी निम्न कि के पार मुस्सन्धि में उपक्षिप्त पीवको फिर से उद्भावित किया गया है, भवः सन्धि नामक निशान है। . 4 9/11 - 7 . - मथम प्रकाश . 'यज्ञवेदी से वन दोपदि मने की रक्षा था, वह तुम्हें याद । चनल हायों से घुमाई गई गा के महारों से दी जाँघों बाठे दुर्योधन को पो चिम्ने स्न से रंगे हाथों याला मीम इदारे बालों को संवारेगा।' सप वियोपा- -धिोधा कार्यमागंणम्। यथा रखापल्याभूति -(निप्य ) देव का इयं कन्यका । राजा-देवा जानाति । वासवदत्ता-मजता । एजापागणदो पाविति मणिम अमयशोगन्ध- राश्ररोण मम इसे मिहिंदा थदो व सागरिमति सारोमदि। ('मार्यपुर। एषा सागराप्राति मणिरवाऽमास्पयोगधरामणेन मम इस लिहिता अत एव नागरिऐति राज्यते ।' ) राजा-(धारमगतम् । यौगन्धरायणेन स्पस्ता, कपमसौ ममानिवेध करिष्यति । इत्यनेन रहनावलीलक्षण कार्यान्वेषणाद्वियो । स्था च येणीसंहारे-भीम -मुरत मुचतु मामार्य क्षणमैकम् । पुधिष्ठिर - किमपरमयशिरम् । गो-महाशिम , सयमयामि ताबदतेन तु शासनशो- पितोक्षितेन पाणिना पायामा दु शासनावराट केहस्तम् । युधिष्ठिर गायतु भवान् , अनुभवतु तपस्विनी वेगोदाम । इत्यनेन शगयमनकार्यल्याम्पेपणादियोप इति । जहाँ नायक भर तक छिपे हुए अपने कार्य की फिर से सोश फरने छात्रा है। से विरोध करते हैं। रखावली के चतुर्थ भा में बमुभूति व वाःय प्रामरिका को सहचान बर दरावो विषय में बदयन से पूछते है, यह निम्न वार्तालाप के द्वारा रसावलीप कार्य मारिर से सौज होने के कारण विदोष नाममा निवेदणारे 'बाभूति-(देस पर) देव, यद मन्या कहा से भाई है। राजा-देवौ वासवदया जानती है। वासवदत्ता--आर्यपुत्र, यह कन्या समुद्र से पाई गई है, इतना कह कर अमात्य यौगन्धरायण ने मेरे दार्थो सौंप दी है, इसीलिये इनका नाम सागरिका दिया गया है (से सागरिका कहा जाता राना-(स्वगत) यौगन्धरायण ने सौपी, यह महसे निवेदन किये बिना कैसे घरेगा (कैसे सौंप सकना) और जैसे वेणीसंहार में, भीम के द्वारा द्रौपदी के केशसंयमन रूप कार्य का अन्वेषण किय जारमा मत पत्र भक के निम्न स्थल में विवीध है। 'गीम-प्राय मुझे पण भर के लिए छोड़ दें। युधिधिर-पिर क्या बच गया है। भीमपाइ रवी चीन र गई है, मैं शासन के खून से रंगे हाथ से सामान के हारा पकड़ा गया द्रौपदी का जूड़ा सौ बाँध हूँ। सुधिसिर-माप जारये, तपस्विनी द्रौपदी वेशप्सयमन का अनुभव करे।' - अप प्रपनम्- प्रथनं तदुपक्षेपो- 810 यथा रस्तावस्याम्-'यौगन्धरायण --देव । क्षम्यता यदेवस्यामिवेध मर्मतत्या- तम् । इत्यनेन वत्सराजस्य बनावलीप्रापण कार्योपशेपाथनम् । यथा च वेणीसहारे-भौम --पाधाति । नसलु मयि जीवति संव्या दुशा- द दशरूपकम् प्रकीर्णानी परसराजकार्यात्वम् । 'वभूति -(सारिको निर्वयोपकार्य ) माघ्रम्य मुसरशीय रामपुण्या।' इत्यादिना शितमिति निर्वहणसघि । रूपक की कथावस्तु के चीज से युक्त मुख आदि अर्थ जो अब तक इधर उधर विखरे पड़े हैं, जब एक अर्थ के लिए एक साथ समेटे जाते हैं, या एकत्रित किये जाते हैं, तो यह निर्वहण सधि होती है। जैसे वेणीसहार में कचकी इस क्ति के दारा द्रौपदी के फैश सयमन, दुर्योधन व आदि मुखसधि आदि के रीजों को, यो अरतरु मारक में अपनी अपनी जगह बिखरे पड़े थे, पक एक्ष्य की दृष्टि से एकत्रित करता है- "मागे बढ़कर सुशी से) महाराज की विजय हो, मुयोधन के खून से लाल शरीर वाले पे कुमार, भीमसेन है, जो पहचान में नहीं आरहे है। और जैसे रत्नावली में सागरिका, रत्नावली, वभूति, मानव्य आदि के कार्यो (अर्थों) का जो मुखसधि मादि में घर-उधर शिटके पड़े थे वत्सराज के ही कार्य के लिए समाचार होता है। इसकी सूचना वमुभूति की इस उक्ति के द्वारा दी जाती है-(सागरिका को देख कर, एक भोर) गाय, यह तो राजपुत्री (रत्नावली) जैसी दिखाई पड़ती है।' मप तदहानि- सधिषियोधो प्रथनं निर्णयः परिमापणम् ॥een । प्रसादानन्दसमया• कृतिभापोपगृहना। पूर्वमायोपसहारो प्रशस्तिथ चतुर्दश ॥ ५० ॥ इस निर्वहण सधि के १४ अंग है -सघि, वियोष, प्रथन, निर्णप, परिभाषण, प्रसाद, आनन्द, समय, कृति,भापा, उपगृहन, पूर्वभाव, उपसहार तथा प्रशस्ति ययोद्देश लक्षणमाह- सधिर्वीजोपगमनम्- यथा रमावस्याम्-'वसुभूतिः-मात्रय ! मुसरशीय रामपुश्या । धान्य ममापवमेव प्रतिभ ति।' इत्यनेन नायिसमीत्रोपगमात्सपिरिति । ययाच वेगासहारे-भीम-भवति यज्ञवेदिसभवे । स्मरति भवती यात मोक्तम्--- चवहुजनमितचण्डगदाभिघात संचर्णितोहयुगलस्य सुयोधनस्य । स्त्यानावनपनशोणितशोणपाणि हत्तसयिष्यति कचोस्तव देवि भीम ॥" जर पीज की उड़ापना की जाती है, तो वह सधि नामक निर्वहांग होता है। जैसे रत्नावली नाटिका के चतुर्थ भैक में वमुभूति तथा बाभ्रव्य सागरिका को पहचान केते है। पाँ नायिका रूपपीज की उद्भावना की गई है, मा अपि है। वनभूति तथा समय की परसाराससफोक्रे- 'बमभूनि-बाभ्रव्य, यह तो राजकुमारी (रत्नावली) के सदश है। वानन्य-मुझे भी ऐसा ही मादा पडता है।' और जैसे वेगोसंहार में भीमसेन दुर्योधन के खून से रंगे हाथों द्रौपदी का श संयमन करते हुए उसे अपनी पिछी प्रतिज्ञा दाद दिलाता है। यहाँ मीम की निम्न उक्ति के द्वारा मुखप में उपक्षिप्त बोझ को फिर से उमावित किया गया है, मत सचिनामक निर्वइगा है। । mari Baath 9/11 " प्रथमः प्रकाश 'मीम-देव अजातानु, माद भी नीच दुधिन पड़ों है, मैने उस दुष्ट दुर्योधन के शरीर को जमीन पर दिया और अपने शरीर पर चन्दन के समान था खून लगा लिया। चारों समुद्रों के जर की सीमा वादी पकी के साथ राज्यमी को आर्य में प्रविशापित कर दिया। इस गुरु की आग में नौकर, मित्र, पोदा, यहाँ तक कि सारा अबकुल जल गया है। राजन् , भव मो दुर्योधन का केवल नाम भर बचा , जिसे भाप बोल रहे है। frma अप परिगापगम्- परिमापा पियो जल्पा- यथा रत्नापल्याम्-‘रनापली--(मात्मगतम् ) काबराहा देवीए पा रामगोमि सई इंखिदुम् (कृतापराधा देव्यै न श कोमि मुख दर्शयितुम् ) पासवदत्ता-(सारं पुन हि प्रसा) पनि अयि गिलुरे । इदाग पि यन्भुसिहं दंसेही । (अपवाय) धनात! लवामि का अवं इमिणा शिसंसायेण तालई श्यहि से पन्यणम् । ('एहि यि निारे ! इदानीमपि पन्धुनेई दर्शय । आर्यपुत्र ! अन्ने सवयनेन शंयत्वेन समय- परयाल्या पन्धनम् ।') राजा-यपाइ देयो । (पन्धनमपनयति) वासवदता- (पसुभूति निदिश्य ) अन! अमथजोगभरायणेण दुचणीकदिक्ष जेल जाणन्तेगा पि गावक्सिदम् ।' ('आर्य । श्रमास्ययौगन्धरायणेन दुर्जनोकतास्ति येन जानतापि नाच- शितम् ।) इत्यनेनान्योन्यवयनारपरिणापणम् । स्या र पेणीसहारे-'मीम'-पाटा येनासि राज सदसि शुना, सेन दुरशास- ननेन ।' स्यादिना 'कासौ भानुमती योपहसति शण्डयकारान् ।' इत्यन्तेन भाषणात्य. रिभाषणम् । जहाँ पात्रों में परस्पर ज पाया जाम, उसे परिमापा कहते है। (पहा मह परसर जए-आपस की बातचीत कार्य की सिद्धि के विषय में पाई जायगी) जैसे रनावशी में इस स्थल पर मन्योन्य वचन के बारम परिमापण नामक नियंग है। 'रनायको-(सगत ) मैंगे देवी शसवदता का अपररष किया है। इसलिए उसे मुंह नही दिया सपाली। वासवदचा (आर भरकर फिर से दाब,पैराकर)यर था, को निचर, अब भी स्नेह को प्रकट कर दे। (एक और) मार्यपुत्र, में इस प्रकार के कठोर म्यवहार के कारण लज्जित हूँ, सलिए जरा सका बन्धन तो खोल दो। राजा-असा देश कहे। (धरोहता है)। पासवदत्ता (पाभूति को बोर) बार्ग, श्रमाय योगधरायण ने मुझे पुरा उना दिया है, बिन्होंने जानठे हुए भी इस बात को नहीं कहा। और जैसे वेणीराहार में मौम स्वयं ही बार बार अपने कार्य में विषय में जान करता, भत भौम फी निम्न एति में भी परिभाषा नामक निर्वहणांग है। 'भीम-जिस नीच मनुब शासन ने तुम्ई राजाओं की सभा में पसीटा ! xxxx पह भानुमती का, जो पाण्डवों की पानी की सी उदाती है। अम प्रसाद -~-प्रसाद पर्युपासनम् । थपा रानावस्याम्-'देव । क्षम्यताम् । इलादि शितम् । - दशरूपकम् सनविलुलिता वैणिरात्मपागिना । तिष्ठतु तिष्टतु । स्वयमेवाहं संहरामि ।' इत्यनेन द्रौप दौफेशसंयमनकार्यस्योपदेपाझपनम् । उस कार्य का उपसंहार (उपप)करना प्रयन कहलाता है। 'प्रधन' के अतर्गत नाटककार अपने समस्त कार्य को एक रपान पर समादन कर देता है। बसे रहनावरी में योगधरायण की निम्न उक्ति वत्सराज के कार्य रत्नावली-लाम का उपसार कर देती है:- स्वामिन् , मैंने यह कार्य मापसे निवेदन किये बिना ही किया, अनु दमा करें। और भैसे धेगोसहार में, निम्न उक्ति के द्वारा भीम द्रौपदी के देणीसंहार रूप कार्य का समाहार करता है, पर यहाँ भी मथन नामक निर्वहणय है। 'पाशालि, मेरे होते हुए (जीवित रहते हुए)दुशासन के द्वारा विखराई गई वेगी का अपने हाथ से संवारना ठीक नहीं । इरो, दरो। मैं सुद इसे संवारता हूँ।' भप निर्णय ५ -उनुभूताण्यातु निर्णयः॥१॥ यया रत्नावस्याम्-'यौगन्धरायणः-(कृताउलि ) देव श्रूयतान् इयं सिंहलेभर- दुहिता सिद्धादेनोपदिश-योऽस्या पाणि प्रही यति स सार्वभौमो राजा भविष्यति, तस्प्रत्ययादमामि स्वाम्य बहुशः प्रार्यमानापि सिंहलेश्वरेण देन्या पासवदत्तायाधि. तखेदं परिहरवा मदान दत्ता तथा लावणिके देवी दग्धेति प्रसिद्धिमुत्पाय सदन्तिकं पात्रम्य प्रहित । इत्यनेन यौगन्धरायण स्वानुभूतमर्थ एयापितवानिति निर्णयः। यथा च वेणीसंहारे-भीमा--देव देव भजातशत्रो ! काद्यापि दुर्योधनहतक मया हितस्य दुरात्मन- भूमौ क्षिपवा शरीरं निहितमिदमसकचन्दनाभं निजाने लक्ष्मीराय नि पिज्य चतुरुदधिपय सोमया सामुा । मृत्या मित्राणि योधा कुरुकनमखितं दग्यमेतद्रणामी मामेकं यद्भवोषि शिविप सदधुना धार्तराष्ट्रस्य शेषम् ।' इत्यनेन स्वानुभूतार्थ कपनाभिर्णय इति । षष भायकादिषपने द्वारा विद्यारित या संपादित (अनुगूत) कार्य विषय में वर्गन करते है, तो यह निर्णय कहलाता है। जैसे रनावली नाटिका में योगरायण निम्न उक्ति के द्वारा कार्य से संगम अपने अनुमदों को, या कार्यताम अपने कार्यों को राम से वर्णिन करता है, मत' यहाँ निर्गय है। 'योगभरावण-(र चोदार) देव, धनिये सिद्ध व्यक्ति ने इस सिलेवर पुत्री रत्नावती के पारे में पह महा था कि जोमका पागिनइण रेगा, पर सार्वमीम (चक्रवती) राजा बनेगा। उस सिमादेश के विश्वास के कारण मारके लिए हमने बरबार उसकी माँग सिंहलेश्वर से की, लेकिन सिंहलेश्वर ने बह इमलिए न दी कि ऐसा करने से पासपर कैरिटमोस होगा। हमने छठे हो यह खबर पेला दो कि देवी यासपदधा लावागत (वन)में जल गई और फिर वामन्य को सिंइवर के समीप (रलावलीको माँगने के प्रस्ताव के साप) भेजा। और अभ संहार में मोम को निम्न उक्ति में उसके द्वारा अनुभून अर्थ का कयन एमा निर्णय :- .
वासवदत्ता (आप भरपरपिर से हाथ वरपरका,भी निर, अब मोवस्नेद राजा-सा देवी को। (बापौलता)। पासवदत्ता (वभूति की ओर) थामे, अमात्य पौगथरायण ने मुझे रापना दिया, जिन्दनि जानतेए मीरापातको महीपादा। धौर जैसे वेणीसहार में भीम खर्य दीवार पर अपने कार्य के विषय में उत्पन करता, भत भीम की निम्न कि में मोरिभाषा नामक निर्वहण गरे। "भीम-जिस नीच मनुष्य दुशासन ने तुराजामौकी समा में घोटाxxxx भानुमती कदा,जो पाण्डवों की पत्नी की ईसी उड़ानी है। प्रथमः प्रकाश 'भीमदेव अजातशत्रु, मब भी नीच दुर्योधन कहाँ है, मैंने उस दुष्ट दुर्योधन के शरीर को जमीन पर दिया और अपने शरीर पर चन्दन के समान यर सून लगा लिया। चारों समुद्रों के जल को सीमा वाली पृथ्वी के साथ राज्यलक्ष्मी को प्रार्य में प्रतिष्ठापित कर दिया। इस युद्ध की आग में नौकर, मित्र, योमा, यहाँ तक कि सारा कुष्कुल जल गया है। राजन् । अब तो दुर्योधन या केवल नाम भर स्या से आप बोल रहे हैं।' 5/1456 अथ परिमाणम्- परिमापा मिथो जएपः- यया रत्नावल्याम्-'रत्नावली-(श्रामगतम् ) कावराहा देवीए ण समयमोमि मुह दंसिटुम् (मृतापरापा देव्यै न राजोरिम मुख दर्शयितुम् ) वासवदत्ता-(सानं पुन दि प्रसार्य) एहि अयि गिटारे । इदानी पि बन्धुसिणेहं दशही। (अपवाय) अनउत्त। लम्मामि पर अहं इमिणा णिसंसप्तरोण ता लहुं भवणेहि से यन्धणम् । ('एहि अयि निठुरे । इदानीमपि यन्न्नेई दर्शय । आर्यपुत्र ! अये खल्वहमनेन नृशंसत्वेन तलव पनयास्या पन्धनम् ।') राजा-न्यथाई देवी। (वन्धनापनयति) पासपपत्ता- (वमुभूति निदिश्य) अन! अमयमोगन्धरायण दुमणीपशि जेण जाणन्तेण यि गावस्सिदम् । ('मार्य । अमात्ययौगन्धरायणेन दुर्जनीकृतास्मि येन जानतापि नाच. शितम्। इत्यनेनान्योन्यववनात्परिभाषणम् । यया व वेणीसहारे-भीम--फूटा येनासि राशी सदसि नृपशुना, लेन दु शास- ननेन । इत्यादिना 'कायो भानुमती मोपहसति पाण्डवदारान् ।' इत्यन्तेन भाषणाल्प- रिभाषणम् । जहाँ पात्रों में परस्पर जप पाया जाय, उसे परिभाषा कहते हैं। (यहाँ यह परस्पर जल्प-आपस की सरयीत-वार्य की सिदि के विषय में पाई जायगी जपे रानावली में इस स्थल पर अन्योन्य वचन के कारण परिमापण नामा निर्वहांग है। रस्तावली-(समत) मैने देवी पासवरसा या अपराध किया है, इसलिए एसे मुंह को प्रकार दे । (एक और) आर्यपुत्र में इस प्रकार के कठोर व्यवहार के कारण लज्जित हूँ, इसलिए जरा इसका इन्धन तो सोल दी। नही दिया सरती।
. दशरूपकम् सद्विविधः, शुद्धः सङ्कीर्णोत्याह- पकानेककृतः शुद्धा सकीणों नीचमध्यमः। एकेन दाभ्यां या मध्यमपात्राभ्यां शुद्धो भवति, मध्यमाधमपात्रेयुगपत्प्रयोजितः सङ्कीर्ण इति । एक अथवा अधिक (पो) मध्यम श्रेणी के पात्रों वाला विष्फामक एक कहलाता है, मध्यम श्रेणी के तया अधम श्रेणी के पात्रों के द्वारा प्रयुक्त विष्कम्भक सण (पा मिश्र) कहलाता है। (ध्यान रखिये विषम्मक में मध्यम श्रेणी के पात्रों का होना जरूरी है। मिश्र (सदीर्ण विष्फम्मक में कम से कम एक मध्यम श्रेणी के पात्रा होना से विषम्मक बनाता है यदि दोनों ही पात्र अधम होंगे, तो वह विष्कम्मक न रहेगा, प्रवेशक नामक अर्थोपक्षेपक हो जायगा।) (यपि ५९ वी कारिका में प्रवेशक की गणना अन्त में है, किन्तु विष्फम्मक से भेद बताने के कारण तथा दूसरे महत्त्वपूर्ण अर्थोपक्षेपक होने के कारण, इसका वर्णन धूलिकादि से पूर्व किया पा रहा है।) भप प्रवेशक- तद्देषानुदात्तोक्त्या नीचपात्रप्रयोजितः ॥६॥ -प्रवेशोऽकदयस्यान्ता शेपार्थस्योपसूचका। तद्वदेवेति भूतभविष्यदर्यज्ञापकत्वमतिदिश्यते, अनुदास्तोक्त्या नीथेन मीच पात्रः प्रयोजित इति विष्कम्भलक्षणापवाद, अद्वयस्यान्त इति प्रथमा प्रतिषेध इति । प्रवेशक भी उसी तरह (विष्कम्भक की तरह) अतीत और भावी कयांशों का सूचक है। इसमें प्रयुक्त कि उदात्त नहीं होती, (इसकी भाग सदा प्राकृत होगी, तथा यह प्राकृत भी शिष्ट (शौरसेनी) प्राकृत न होकर मागधी, शकारी आदि अशिष्ट प्राकृत होगी) तथा इसमें नीच पात्रों का प्रयोग होता है। प्रवेशक की योजना सदा दो पड़ों के बीच ही की जाती है, तथा यह भी शेष अर्थों (कांशों) का सूचक है। (यहाँ विष्कम्भक तथा प्रवेशक का भेद बता देना भावश्यक शेगा, भत. इसे नीचे साया मा रहा है:- तुलना मेव विष्कमक प्रवेशक १. यह भतीव भादौकांशेकापूचक है। १. यह मौ भनीत व मापी काशी का सूचक है। २.समें एक मध्यम शत्र या दो. मध्यम, २.एके शो पाएको माप पात्रों का प्रयोग होता है। कोटि के होते हैं। ३ इसकी भाषा संस्कृत व शौरसेनी १.इसको भाषा संस्कृत कमी नही होगी। प्राकृत भी निम्न कोटि की दोगी बया मागधी, शकारी, आमीरी, चाण्डाली, पैशाची मादि। प्राक होगी।
प्रथमः प्रकाश विम्फम्मक ४.इसका प्रयोग नाटक (रूपफ) के प्रथम अंक के पहले भी हो सकता है (जैसे मालतीमाधव नाटक में वृद्धा तापसी की उक्ति वाला विमा), दो जयों के बीच में भी (जैसे शान्तल के चतुर्वक प्रवेशिका ४. इसका प्रयोग सदा दोभको के भौच में होगा। रूपक के थादि में इसका प्रयोग कमी मो नहीं होगा। इसका प्रथम अंक में कभी मी प्रयोग नहीं होगा। (अंकद्रय स्थान्त इति प्रथमाके प्रतिषेध इति)। के पहले), ५. उदाहरण-मे शाकुन्तल का चतुर्भ ५. उदाहरण-जैसे शाकुन्तल के षा अंक के । अङ्कका विष्फम्मका पहले का प्रवेशक। थथ चूलिका- अन्तर्जवनिकासंस्यैश्चलिकार्यस्य सूचना ॥ ६१॥ नेपथ्यपाणार्थसूचनं चूलिका, ययोत्तरचरिते द्वितीयाहस्यादौ- नेपथ्ये ) स्वागतं तपोषनायाः (ततः प्रविशति तपोधना) इति नेपथ्यपात्रेण पासन्तिच्याऽऽ- यीसूचनाच्चूलिका। यथा या धीरचरिते चतुर्याद्वस्यादौ-(नेपये ) मो मो वैमानिका प्रदत्यन्त प्रवत्यन्तां मालानि- शाश्वान्तेवासी जयति भगवान्कौशिकमुनिः सदमाशोतेथे जगति विजयि शनमधुना । विनेता क्षबारेमभयदानवतधरः शरण्यो लोकानो दिनकरफलेन्तुर्विजयते ॥' इरमन नेपथ्यपानदेयः रामेण परशुरामो जितः' इति सूचनास्तूलिका । जहाँ अयं ( कथावस्तु )की सूचना चयनिका के उस बोर चन्दर शैठे पायों के द्वारा दी जाय, यहाँ चूलिका नामक अर्थोपवेषक होता है। नेपथ्य पात्र के द्वारा अर्थ की रचना चूलिका कहलाती है, जैसे उत्तररामचरित के दूसरे भक के शुरू में मानेयी के आगमन पर वनदेवी नेपथ्य से उसका स्वागत करता है-'नेपथ्य में ) तपोधना भगवती का स्वागत हो। (सब इपौधना मंच पर प्रवेश करती है। इस प्रकार मेपथ्यपान बाहन्ती के द्वारा मानेयी के भागमन की सूचना दी गई है, अतः यह चूलिका है। अथवा बसे भवभूति के दूसरे नाटक धीरचरित (महावीरचरित) के चतुर्य क के बारम में नेपथ्यस्थित देवता रसवात की सूचनादेते है किदाशरथि राम ने परशुराम को जीत लिया है। (अपप्य से)हे देवताओं, मगल कार्यों का बारग्म करो, धारम्भ करो। ऋचाव के शिष्य मगवान् ऋषि विश्वामित्र की जय हो । सूर्य के पक्ष मैं अब मी विजयी शास्त्रिय (शत्र) विद्यमान है, उसको जय हो। क्षत्रियों के अनु, परशुराम को जीतने वाले (ठीक करने का समस्त संसार को अप्सयान देने का जिन्होंने वन धारण कर लिया है, ऐसे लोगों के शरण्य, पूर्ववश के चन्द्रमा (भगवान् रामचन्द्र) की जय हो। १. यपि मूल पाठ में पद्म में 'जयतितथा 'विजयो' पर्दो का वनगाने लट् का प्रयोग फितु हिन्दी अनुवाद में सुन्दरता छामे के लिए इमने यहाँ 'जय शै' यह अनुवाद किया है, वैसे शाब्दिक अनुवाद 'जय होगा। ।
दशरूपकम् प्रयाहात्यम्- श्रदान्तपारकास्यं छिन्नावस्यार्थसूचनात् । धान्त एव पात्रमहान्तपायं तेन विश्लिष्टस्योत्तरामुखस्य सूचनं सदरोनोतराहा. पतारोवास्यमिति, यथा वीरवरित द्वितीयाहादतारोऽहास्यमिति, यया वीरचरिते द्विती- यान्तेि-(प्रविश्य) सुमन्त्रः-भगवन्तौ पसिष्टविश्वामित्रौ भवतः सभार्गवानाह- यत। इतरे- भगवन्तौ ? । मुमन्त्रः-महाराजदशरथस्यान्तिके । इतरे-तदनु- रोधातव गच्छामः' इत्यसमाप्तौ (ततः प्रविशन्त्युपविष्टा वसिष्धविश्वामित्रपरशुरामा) इत्यत्र पूर्वाकान्त एवं प्रविछेन सुमन्त्रपाण शतानन्दजनकल्यार्थविच्छेदे उत्तरामुख. सूचनादास्यमिति । जहाँ एक अंक की समाप्ति के समय उस में प्रयुक्त पात्रों के द्वारा किसी छूटे हुए अर्थ की सूचना दी जाय, बहरेसकास्य पहलाता है। के अन्त के पात्र भकान्तपात्र कहलाते है, जो इस प्ररार के पात्र के दारा विदिलष्ट कथावस्तु सी. जिसका वर्णन अगले अंक में भादगा सूचना दी व उत्तरकावतार कास्य कइलाता है जैसे वीरचरित के दूसरे अंक के अन्त में सुमन्त्र (पात्र ) माकंर शतानन्द तथा जना मी पापा का विच्छेर कर, भावी अंक के पारम की सूचना देता है, अतः यहाँ कास्य है। जैसे- (प्रदेश र समन्त्र-पूप वशिष्ठ तथा विश्वामित्र, मापसे भार्गव (शनानन्द के साथ दूसरे-वे कहो। मुमन्त्र-महाराज दशरथ के पास । पूसरे-उनके भनुरोध से नहीं चलते है। (कमात) (इसके बाद भगला -तर वशिष विश्वामित्र तथा परशुराम रेठे हुए प्रवेश करते १-इस प्रकार भारम्भ होता है। . -- . अपारावार- . अदावतारस्वकान्ते पातोऽदस्यायिभागतः ॥ १२ ॥ एभिः संसूचयेसून्यं श्याम प्रदर्शयेत् । यत्र प्रविधरामेण सूचितमेव पूर्वादाविरितार्थताहान्तरमापतति प्रदेशकविष्क- भ्मकादिरासोडावतार, यथा मान वकाग्निमिने प्रथमावान् विपक-तेण हि दुवेवि देवीए पेसागेहं गदुम राहोदोषभरणं करिम तत्पभवदो दूई विसाजेय अथवा मुद. तो जेवण उरथायिस्सदि। ('तेन हि द्वापपि देव्या प्रेक्षागेई गरवा सहीत कोप- करणं कृत्वा तत्रभवतो दूसं विसर्सयतम् , अथवा सदासद एनमुत्पापविध्यति ।') इत्युपमें मादधरणादनन्तरं सर्वाभ्येव पात्राणि प्रथमाएपमान्तपात्रसंझान्तिपर्शने दियापारमन्त इति प्रथमावाविच्छेदेव मितोयबस्थावतरमादशावतार इति । जहाँ प्रथम ब की बात का विधेद किये बिना दूसरे आर को यस्तु पले, वहाँ महावतार होता है। सूप्य वस की शुधना इन (अर्थोपपो) द्वारा देनी चाहिए, र (सरप अर्थों) का मच पर भड़ों के द्वारा मन करे।
प्रथमः प्रकाश जब प्रथम अंक के पास किसी बात को सूचना दें, तथा वे ही पार उसी का कथावस्तु) को लेकर उसे रिना विच्छिन्न किये ही दूसरे अंक में प्रवेश करें, तो पो प्रवेशक व पिफम्मक भादि नही होता, यह भावतार है। जैसे गालविकामिगिन में प्रथम अंक के अन्त में विदूषक इस वापय के द्वारा मावी क्षेत्र को परतु की रचना देता है- 'तो तुम दोनों देवी के नाट्यगृह में जाकर संगीत को साज-सजा और कर पूज्य मित्र के पास दूत भेज देना, अथवा गदंग का शदन्हें यहाँ से उटा देगा।' पसके बाद मृदंग राम के अनने के बाद दूसरे अंक के भारंभ में सारे ही पात्र प्रथम क में थगित पानों (हरदय तथा गणदास) के शिष्यशिक्षाकम का दर्शन करते हैं। इस तरह पहले मेक की कथा विभिन्न रूप में होतीय अंक में मदतरित हुई है, भतः कावतार है।' । . १.पनंजय के इस बकावतार तथा झारप के बारे में हमें उसका मत चिन्टय दिखाई देता है। पनिक तो पत्ति में धनंजय की ही मात कहते हैं। साप हौ इति में दिये दोनों के उदा. हरण में हमें कोई भेद नहीं दिखाई देवा। दोमो दीपनंजय की बहावतार पाली परिभाषा में मा जाते है। पटना पनंजय घ पगिक दोनों ने अफास्य को स्पष्ट करने में कसर रक्सी है। भरत फे नाट्यशास में पश्चम अर्थोपपक अंकास्प नहीं कहा गया है। वे इसे कमरा करते हैं। यद्यपि दोनों का अर्थ एक हो, पर परिमापा में भेद है। भरत के मतानुसार 'असमस वहाँ होता है, जहाँ किसी को वा पुरुष के बारा अंक की शया का संक्षेप आरम्म में ही कर दिया आय। "विडिलरमुख भकरय खियाका पुरुषेग वापि संक्षिप्य पूर्व तमुख मिष्यते ॥(मा.शा.२१११५) विश्वनाप के साहित्यदर्पण में पञ्चग मोपोषक के रूप में पहले अंकमुख काही वर्णन किया गया है। विश्वनाथ यो मतानुसार जहाँ एक ही अंक में (दूसरे) अंकों की सारी कथा को सुनना हो, पर अकमुख है। यह नाडकीय कथावस्तु के बीज का सूचक है। पन्न स्यादा एकारमनंगानां सूचनाऽखिला। पदमुख मित्याहु बीजापरण्यापर च तद ॥ (भा.द.३-५९) साहित्यदर्पण की यह परिभाषा भरत पर दी माधन होने पर भी विशेष स्पष्ट है। सा.द. में इसका उदाहरण मालतीमाधव के प्रथम क का भारंभ दिया गया हैगी कामन्दकी । अवलोकिता मालती तथा माधवं के अनुराग की सुनना प्रसंगवश दे देती है। सा.द. का यह लक्षण व उदाहरण, साथ ही से कमुख कहना ठीक ऊँचा है।' साहित्यदर्पणकार ने कास्य को भी धनंजय य धनिक दाली परिभाषा देकर 'यदी उदा- हरण दिया है। अंकमुख के बाद वे अापक्षेपक का धनंजय सम्मत यह पाम मैद भी करते ३। पर थे पनंजय के मत से सहमत नहीं दिखाई देते। अपर की कारिका के आगे के ही कारिमार्थ की पूचि में वे लिखते है।-स्तम्भ धनिकमतानुसारेपोकम् । भन्ये तु 'अदावतारेणे. घेदं गतार्थ इत्याहुः । विश्वनाथ को स्वयं को भी यह धनिक शिरोपी मत ही पसन्द है। पर वे अपने मत्थे न मदकर 'मन्ये शम्द का प्रयोग कर देते है। वस्तुतः धनिक ; बाला मत अवैधानिक ही है। धनंजय तथा पनिक यहाँ मरत का अनुसरण करते दिखाई नहीं देते। गन्यथा या दिन हो पाती। यहाँ यह भी संकेत कर दिया जाय कि मरत अंकमुख का वर्णन अकारतार के बाद करते हैं। ठीक यही विश्वनाथ ने किया है।जय ने पहले भारत को लिया है, बाद में भैशावतार को 101 . - ७० दशरूपकम् पुननिघा वस्तुविभागमाह- नाट्यधर्ममपेदयेतरपुनर्घस्तु निघेप्यते ॥ ३ ॥ वस्तु फिर तीन तरह की होती है। नाटक (रूपक, नाट्य) की प्रकृति का निरीक्षण करके कथावस्तु फिर से तीन तरह की मानी जाती है। धेन प्रकारेण धं तदाह- सपा नियतस्यैव थायमेधाव्यमेव च। सीन प्रकार को किस तरह, इसे कहते हैं -कुछ सपके लिए सुनने लायक (सर्व- भाव्य) होता है, कुछ परिमित लोगों (नियत छोर्गों) के लिए सुनने लायक (नियतभाग्य) होता है, कुछ किसी भी पान के पुनने लायक नहीं (भाग्य) होसा। सर्यधाव्य प्रकाश स्यादधान्य स्यगत मतम् ॥ १४॥ सर्वधाव्य यस्तु तरप्रकाशमित्युच्यते । यत्त सर्वस्यामान्य तत्स्वगतमितिशब्दा. भिधेयम् । सर्वप्राव्य को प्रकाश तथा अश्राव्य को स्वगत कहते हैं। सर्वश्राय वस्तु-सर्वमान्य कपनोपकथन प्रकाश बहलाता है, जो सर्वमान्य (क्पनीप कथन) नही होता यह स्वगत कहलाता है। नियतमाध्यमाह- दिघाऽन्यनाट्यधर्मास्य जनान्तमपवारितम् । अन्यत्तु नियतश्राव्य द्विप्रकार जनातिकापवारितमेदेन । दूसरा नाव्यधर्म-नियत माज्य परतु-दो तरह का होता है मनात (जनान्तिक), तथा अपवारिता तन जनान्तिफमाह- निपताकाकरणान्यानपवार्यान्तरा फयाम् ॥ ६५ ॥ अन्योन्यामन्त्रणं यरस्याज्जनान्ते तज्जनान्तिकम् । यस्य न भाग्य तस्यान्तर असाइल पकानामिकत्रिपताकालाग कर कृत्वाऽन्येन सह यन्मन्यते सज्जनान्तिकमिति । जहाँ (मन पर) दूसरे पात्रों के विधमान होते हुए भी दो पात्र आपस में इस सरह मन्त्रणा करें कि उसे दूसरों को न सुनाना अभीष्ट हो, तथा दूसरे पात्रों की ओर पिताकाकर' के द्वारा हाय से संकेत कर (दर्शकों को) इस बात की सूचना दी जाय कि उनका धारण किया जा रहा है, यहाँ जनान्तिक नामक नियतम्राज्य (रुपनोपकथन) होता है। जिस पात्र को कोई बात नहीं मुनामी है, उसकी भोर राय की सारी अंगुलियों ऊँचीकर मनामिका भंगुली को रैदा रसना त्रिपतारा कहताता है, ऐसे दंग से हाथ धरना त्रिपताकाकर' का लक्षण है। इस रंग से अन्य पात्रों का अपवारण कर बातचीत करना बनानिक है।
प्रथमः प्रकाराः अपापयारिखम्- रहस्य कश्यतेऽन्यस्य परावृत्यापचारितम् ॥ ६६ ॥ परायान्यस्य रहस्यकपनमपवारितमिति । जदा गुद को दूसरी ओर कर कोई पाय दूसरे व्यक्ति को गुप्त या कहता है, उसे अपवारित कहते है। नाट्यम के हो मसंग में साफाशमाप्ति का वर्णन करते हैं। नाय्यधर्मप्रसादापाशभाषितमाह- कि अवीयेपमित्यादि विना पात्रं प्रवीति यत् । श्रुत्येवानुत्तम येकस्तत्स्यावाकाशमापितम् ॥ ६७ ॥ रुपयार्थ। जहाँ कोई पात्र 'क्या कहते हो इस सरह कहना हुमा दूसरे पान के बिना ही पासचीत करे, सथा उसके कया के कई दिना मी सुनकर कथमोपकथन करे, यह खाकाशमापित होता है। (एक पात्र वाले रूपक-माण-में इस माफाशमापित का प्रयोग बहुत पाया जाता है। काज के पवामिनय (Mono-acting) में मी इतका अस्तित्व है।) अन्यान्यपि नाट्यधर्माणि प्रपमकल्पादीनि विदुदाहतानि तेपामगारतीयत्यानाम- লাগঞ্জিলী ৰাখিনাবাংলালামলামা লীগণহরি- कुछ लोगों ने प्रथम कप भादि और नाटयों को भी माना है, ये भरत नाट्यशास्त्र के मतानुसार नई, तथा उनका केवल नाम हो प्रसिम है तथा कृप देशभाषा में १, मत मादयधा नहीं है, इसलिए उनका रक्षण नहीं दिया है। अब इस नाटक की कमावस्तु श उपसंहार करते हुए कहते है। त्याधशेपमिह परतुधिमेदज्ञातं रामायणादिच यिभाव्य गृहत्कथां च । पासूनयेत्तदनु तरसावगुण्या- चित्रों कथामुचितवायचाभपञ्च ॥ ६ ॥ इति धनजयकृतदशरूपकस्य प्रपम प्राशसमाप्त । प्रयुक्त होने 0000000000 १. पृत्तिकार (मवलोक्कार ) धनिक 'वैश्चिदुदाहृतानि के द्वारा इनके पूर्ववर्ती नाट्यकारों या उस करते है, जो प्रथम करप बादि अन्य नाव्ययमों को गानते हैं। यह मत मरत के पाद के नाट्यग्रालियों का, किन्तु मरत-सम्मत नही इसबा सकेत भी यही मिलता है। 'उदाहतानि पर स्पष्ट बताता है कि मन से प्रवर्तकों के नाट्यशान पर भय भी रहे होंगे। कौन थे, उनके अन्य कौन कौन से थे, ये गाते समो अन्धकार में हो पड़ी है। समवत मरत के नात्यवान के पतिकारों में से ही किन्ही के मन हों।
दशरूपकम् पस्तुविभेदजातम्-यस्तु - पर्णनीयं तस्य विभेदजातं नाम गेदा। रामायमादि वृहत्कथा च गुणान्यनिर्मिता विभाव्य धानोच्य। तदनु - एतदुत्तरम्। निति-नेता वदयमाणलक्षण', रसाथ तेपामानुगुग्याच्चित्राम् = चिनरूपां, कयाम् - आरयायिकाम् । वारूणियानि वासि तेषां प्रपत्रविस्तरैरासूत्रयेदनुप्रययेत् ।तहत्कथामूल मुद्राराक्षसम्- , 'चाणक्यनाम्ना सेनाय शकटालाए रहा। कृत्यां विधाय सहसा सपुत्रो निहतो नृप ॥' योगानन्दयश शेषे पूर्वनन्दसुतस्ततः । चन्द्रगुप्त कृती राजा चाणक्येन महौजसा ।' इति बृहत्कथायां चितम् , धौरामायणोकं रामकथादि जेयम् । ॥ इति श्रीविष्णुसूनोधनिकस्य कृती दशरूपावलोके प्रयमः प्रकाश समाप्तः ॥ (कवि) इस तरह कथावस्तु के समरत भेदों का पालोपन कर तथा रामायण (महामारत, पुराण) आदि एवं बृहस्कथा का अनुशीलन कर नेता (नायक) तथा रस के अनुरूप सुन्दर कया को उपयुक्त तथा सुन्दर कथनोपकथन के द्वारा निबद्ध करे। (नाटकावि रूपको करना पौराणिक कथाओं के माधार पर ही नहीं होनी, वे लौकिक कथाभों तथा ऐतिहासिक सथ्यों के आधार पर भी हो सकती है, इसीलिए गुणादय की हत्कथा को मी रूपक की कथा कामोतीमूल माना है। जैसे मुद्राराक्षस नाटक रामूल हत्कथा हो है- "शकटार के पर में छिपकर उस चाणक्य ने कृत्वा (डाकिनी) को पैदा कर राजाको पुत्रों सहित एक दम मार डाला । योगानद के दौति के शेष रह जाने पर (मर जाने पर), पूर्वनन्द का पुत्र, चन्द्रगुप्त उस महापराक्रमी चाणक्य के द्वारा राजा बना दिया गया। इस प्रकार का सकेत हत्कथा में मिलता है। रामकथा रामायण में कही गई है।
अध द्वितीय प्रकाशः। रूपकाणामन्योन्य भेदविनये वस्तुभेदं प्रतिपायेदानी नायकभेदः प्रतिपाद्यते । नेता विनीतो मधुरस्त्यागी दक्षा प्रियंवदा ।। रतलोका शुचिगमी रुढयंशः स्थिरो युवा ॥१॥ बुद्धयुस्साहस्मृतिप्रशाफलामानसमन्वितः । शरो इद्ध तेजस्वी शास्त्रंचनुध धार्मिकः ॥२॥ नेता नायको विनादिगुणसम्पको भवतीति । तन विनीतो यथा परिचरिते- 'यग्रह्मवादिमिरपासितवन्यपादे विद्यातपोदतनिधौ तपता वरिष्ठे। .. वैवात्कृतस्त्वयि मया विनयापचारस्तान प्रसीद भगवायगशलिस्ते ॥ ..) रूपों में (नाटक, मकरण आदि वक्ष्यमाण रूपका-भेदों में) परस्पर भैर का कारण वस्तु नेता तथा रस का भर है, (जैसा कहा भी गया १ वरतु नेता रसातैषी भेदका) मतः इनके भेद गवाने के लिए वस्त, नेता तथा रस के मकारभेदों का निर्देश भावश्यक दी जाता है। प्रथम प्रकाश मैं यरतभेद का प्रतिपादन किया गया, अब नायकभेद का प्रतिपादन करते हैं। ४.नायक विनन, मघर, त्यागी, चतुर (45), मिय घोलने पाला (भियद) लोगों को खुश करने घाला (रलोक), पवित्र मनपाटा (राधि), बाराचीत फरने में कुशल (पाग्मी), कुलीन घंश में उत्पन्न (पश), मन शादि से स्थिर, युवक अवस्था चाला होता है। वह दि, उत्साह, स्मृति, प्रशा, फटा सपा मान से. युफ होता है, शूर, सेजस्वी, पाशाता सथा धार्मिक होता है। नेता अर्याद नायक विनमता भादि गुणों से भूषित रहता है। (चिकार पनिक इन्दी गुणों को क्रमशः उदाहत फरता है।) (१)नायक विनय हो, जैसे भवभूति के महावीरचरित में रामचन्द्र विनय है। उनकी विनम्रता की अभिव्यकि इस द्वारा:- १. भारतीय नाट्यशास्त्र के अनुसार नाटया (रूपक) के परंतु, नेता तथा रस ये तीन तस्व माने आते हैं, इदी के आधार पर किसी रूप को पालोचना की जाती है। पाश्चारण पति कथावस्त, परित्रचित्रण, पाथनोपकपन, देशकाल, शैली, उदेश्य एन छातौ को मानती है, तथा उसके साथ रंगमंच' (अभिनयता) नायक सातवें सत्र का मी समावेश करती हैं। भारतीय परति के इन तीनों तत्वों में पाश्चात्य पद्धति के ये समी तत्त्व भन्तर्भूत हो जाते हैं। चरित्रचित्रण का समादेश नेता के साथ किया जा सकता है यह दूसरी बात है कि भारतीय कायों व नाटकों के रसपरक होने से केवल चरित्रचित्रण या शीलचिय मात्र यही नाटककार मा लक्ष्य नदी रहा। 'नेता' शब्दमें मारतीय नाव्यशाषी नायक के अतिरिक्त नायिका, पौठमद भादि सभी पात्रों को अन्तर्मावित करते है, यह स्पष्ट है। कयनोपकथन का समावेश भारतीय परति पतु के ही अन्तर्गत करती है, किन्तु यह रस का व्यशक होने के कारण उसका मो अंग माना शा सकता है। देशकाल, पदेश्य तानों का समावेश रसमें हो जाता है। मभिनेयता सो नाटक की खास प्रति है अतः उसे अलग से तख मानना पुनरक्ति दोष दोगा-फिर वाचित, पांगिक, आहाय तथा सास्तिक अभिनय के द्वारा एनका मो आदान भारतीय नाट्य पति ने किया है। १०० दशरूपकम् प्रमों के द्वारा जिनके पवित्र चरणों की उपासना (लोगों के द्वारा की गई है, जो विपा एवं तप के निवि है, वा तपस्वियों में श्रेष्ठ है ऐसे आपके प्रति मैने सौभाग्य नमस्कार मादि विनयापचार किया है। हे भगवन् बाप प्रसन , आपको मेरा यह समस्कार है। मधुर-प्रियदर्शन । यया तव- 'राम राम नयनाभिरामदामाशयस्य सदृशी समुद्वहन् । अप्रतक्ष्यगुणरामणीयकः सर्दयव हृदयामोऽसि मे ।।" (२) नायक गपुर अर्थार शिवदर्शन (दर) होना चाहिए, बेमे वहीं महावीरचरित में रामचन्द्र के माधुप वा पनिरचन किया गया है हे सुन्दर राम, हृदय के समान, नेत्रों को अच्छी लगनेवाली, सुदरता को धारण करनेवाले दम सर्वथा मेरे हृदयङ्गम हो (तुमने मेरे हृदय में स्थान पा लिया है)। तुम्हारे गुणों की तकना तपा विचार बुद्धि से परे ₹ (तुममें अनेकानेक गुम है), अत एव तुम मुन्दर (शात होते। त्यागी सर्वस्वदायक । यथा- 1 'स्वच कर्ण शिविर्मास नीव जीमूतवाहन । दिदौ दधीचिरस्थीनि नास्त्यदेय महात्मनाम् ।। (३) नायक त्यागी अर्थात् समस्त वस्तुओं (यन, मन, धन) को देने वाला हो, किसी मी सासारिक वस्तु के प्रति उसका मनुचित मोइन हो। महात्माओं को सौ स्यागशीलता का पदाहरण नीचे त्याग गुण को स्पष्ट करने के लिए देते है - कर्ण ने त्वचा, शिरिने मांस, जीमूतवाहन ने बीवन (जीव), तथा दधीचि ने हड्डियों को दिया । महात्मा लोगों के लिए कोई भी चीज अदेय नहीं। दक्ष भित्रकारी। यथा वीरचरिते- 'पूर्जद्वजसहस्रनिर्मितमिव प्रादुर्भवत्यप्रतो रामस्य निपुरावकृतिविपर्दा तेजोभिरिद धनु । शुण्डार' कलभेन यद्वयले वत्सेन दोर्दण्डक- स्तस्मिनाहित एवं गर्जितगुण कृष्ट च भा च तत् ॥ (४) नायक दक्ष होना चाहिए। दक्ष से तात्पर्य किसी भी कार्य को एकदम पुती से करने (क्षिप्रकारिता से। नायक मुस्त और दीर्घसूत्री न होकर शिकारी होना चाहिए। इसका उदाहरण महावीरचरित से रामर के विषय में दिया जाता- समस्त देवताओं के वेज से समिद, विपुर नामक दैत्य का अन्त करनेवाला, शिव का पिनाक धनुष बी मानों हजारों कदवाते कमेर मों से बना हुमा रे-राम के सामने प्रकरित होता है (राम के सामने पडायस राम ने उस अवल धनुष पर इसी तरह अपना हाप रखा, असे हाथी का रचा मह रखता है, भौर सशद प्रत्यशापाले उस धनुष सेवा तथा तौर हाहा। ‘प्रियवद-प्रियभाषी । यथा तव- 'तिजमदग्नित स भगवान्देव' पिनाकी गुरु- वीर्य यत्तु न तद्विरा परि ननु व्यक्त हि तत्कर्मभिः । त्याग समसमुद्रमुद्रितमहोनिर्व्याजदानावधि सत्यमझतपौनिर्भगवत किं घान लोकोत्तरम् ॥' - - - - - द्वितीयः प्रकाश (५) नायक प्रियदर अर्याद प्रियवचनों को मोड़ने वाला होता है। बोपदी महावीर चरित में रामचन्द्र परशुराम से बात करते समय अपनी प्रियंवदता का परिचय देते है आपकी उत्पति महषि जमदग्नि से है (महर्षि जमदग्नि सापके पिता है), भगवान् शिव भापके गुष है। भापको वोरता कार्यों से ही प्रकरित है, उसे पाणी के द्वारा नहीं पड़ा मा सकता (यह वाणी के मार्ग में नहीं मा सपनी)। सातों समदों के द्वारा सोमित पृथ्वी की बिना किसी भ्यान के दान देना मापके त्याग का एचक है। सत्य, मम तया तप के निषि (सत्यनिष्ठ, महानिष्ट तथा तपोनिध) मापको ऐसी कौन पातुरे, बो भलौकिक न हो। रफलोक । यया तत्रैव- 'प्याटाता यस्तवायं तन्म स्तनायेय स्वामिनस्ते प्रसादार । राजन्वन्तो रामभद्रेण राज्ञा । म्यनेमा पूर्णकामायराम ॥ ११) नायक रकलीक होना चाहिए गर्थात समी लोग उसो एध रदै। जैसे महावीर परित में राम के भाचरण से लोग उसे पुश है, उनमें अनुरक है, इसको सुचना इस पप के द्वारा दी गई है। मपने महाराज भारकी कृपा से, हम लोग अापके इस पुत्र रामय के द्वारा राजा वाले होकर कुशलता प्राप्त कर, समस्त रस्याओं को पूर्ण कर (आनन्द से ) रह रहे हैं। पापका यह पुत्र तीनों वेदों की रक्षा करने वाला है। एवं शौचादिष्वप्युदाहार्यम् । तत्र शौचं नाम मनोनर्मल्यादिना कामायनभिभूतत्वम् । यया रपो- 1 ४ . 'शा व शुभे पस्य परिग्रहो पा सिं या मदभ्यागमकारणं है। श्रावदर मत्या पशिना रघूर्णा मन परतीविमुखप्रति । (0) इसी परिपाटी से मापा के भय गुणों-चौचादि-या मी उदाहरण दिया जा सकता शीन का तात्पर्य मन की निर्मलता है, जिससे मन काम यादि दोषों से युक्त हो सके। से देश के पोटश सर्ग में कुरा गपनी शुचिता का प्रकाशन करते कहता है- देशमै, तुम कौन हो, रिसकी पत्नी दो, तुम्हार मेरे पास भागे का क्या कारण है ? वशी मन पाडे जितेन्द्रिय रघुवंशियों के मन को परली विपुल समान कर इन बातों का धर दो। En वाग्मी । यया हनुमनाटके-1 'बादशेल न विदित न च धार्मुकस्य श्रेयस्यमय तनिमा तत एप दोष । चापलं परशुराम मम क्षमस्व हिमाय दुर्विउसितानि मुदे गुरुणाम् ॥ (८)नायक बातचीत करने में कुशल होना चाहिए जैसे रामनदा निम्नानुमबारक के पथ में परशुराम को प्रत्युत्तर देते हुए राम अपनी याग्मिता का परिचय देते है। रे परशुराम, न तो मुझे अपने हाथों के रस का ही पता था, न शिवजी के इस पर की कमजोरी सलिए यह गलती हुई। अब मेरी चपलता को क्षमा कर।गधी की नपत चेष्टाएँ लोगों को प्रसन्न ही करती। ! 1- - H . FRE ४६ दशरूपकम् रूढवंशो यथा- ये चत्वारो दिनकरकुलक्षसन्तानमल्ली मालाम्लानस्तवकमधुपा जज्ञिरे रामपुना । रामस्तेषामवरमभवस्ताडकाकालरानि. प्रत्यूपोऽय सुचरितकयाक दलीमूलकन्द।' (१) नायक उच्च वर्ग में उत्पन्न हो, जैसे रामचन्द्र यो कुलीनता का व्याक निम्न पथ है- सूर्यवश में उत्पन्न क्षत्रिय सतानों की मालतीमाला (अथवा पक्ष की कलियों की माला) के लरक के अनुरागी भवरे, जो चार राजकुमार उत्पन्न हुए, उन चारों में सबसे बड़े रामचन्द्र है, जो लाडकारूपो कालरात्रि के प्रातःकाल है, तथा द६ मूलकन्द है, जिससे सुन्दर चरित्र पाली यगाथाओं की कन्दलियों पैदा हुई है। स्थिरो वामन नियामिरवचल' । यथा वीरचरिते- 'प्रायश्चित्त चरिष्यामि पूज्यानां षो व्यतिक्रमात् । न स्वेव पूषयिष्यामि शस्त्रप्रहमहाप्रतम् ।।" यथा वा भर्तृहरिशतके- 'प्रारभ्यते न खलु विघ्नभयेन नावे- प्रारभ्य विघ्नविहता विरमति मघ्या । विप्न पुन पुनरपि प्रतिहप्यमाना प्रारब्धमुत्समगुणास्त्वमिवावहन्ति ।' (१०) मायक स्थिर होना चाहिए अर्थाद वह पाणी, मन तथा शरीर से चचल न हो जैसे मरावीर चरित मैंदरी- मैंने भाप पूज्य लोगों का उल्लंघन किया है, इसलिए मैं प्रायश्चित का आचरण करूँगा। इस तरह मैं शनमरण करने केपदे प्रण को दूपित नदीकरूंगा। अपवा बैसे महरिशक में,-- नीच कोटि के पति के विप्नों के सर के हो कारण कोई काम नहीं करते । मध्यमकोटि के व्यक्ति काम तो शुरू करते हैं, पर विमा से पराभूस होकर उमें बन्द कर देते हैं। तुम मेसे उधमगुण (चमकोटि के व्यक्ति विनों से बार-बार पराभूत होने पर भी प्रारंभ किये हुए कार्य का वहन करते रहते है। युवा प्रसिद्ध । पुद्धिानम् । गृहीतविशेषकरी तु प्रहा । यथा मालविकाग्निमित्रे- 'यद्यत्प्रयोगविषये भाविकमुपदिश्यते मया तस्य । ततद्विशेषकरणात् प्रत्युपदिशतीत मे याला ॥ स्पष्टमन्यत्। नायक के इन उपयुक्त पुणे विचन कर बाकी गुणों के उदाहरण देना वृत्तिकार - बावश्यक नहीं समझता । नायक का युवक होना भी मत्यावश्यक गुण है, विशेष पर गार रूपएक नएकादि में यह सर्वथा अपोजिसपासमारतादि उपए की सुपापरयास परमरूप में विकसित पाये जाते हैं। नायक के विषय में प्रयुक्त 'युवा' विशेषण स्पष्टी। नायक मैं इदि, प्रज्ञा आदि का भी अस्तित्व होना चाहिए, इसे कारिशकार धनंजय बनाते हैं। मामतौर पर इदि प्रया का एक अर्थ समझा जाने से एक साथ दोनों के प्रयोग पर पुनकि दोर को आशकापी जा सकती है। इसका निराकरण करने के लिए प्रतिकार दोनों के भेद से बनाते हुए करते है फिरि का अर्थ दान भयान शान तामाय है। प्रहा 1 5 r द्वितीय- प्रकाश विशेष शान भी उत्पन्न करने वाली है, अयाद किसी गृहीत शान में अपनी ओर कुल मिलाकर उसे विशिष्ट रूप देने वाली मत किया नाम है। जैसे मालविकाग्नि मित्र में- 'नरपकला के प्ररोग में मैंने जो जो दंप (मादिर) उल्ने बना है, वह पाला उनको , विशिष्ट मना बनाकर ऐसा प्रयोग करती है मानों मुझे फिर से सिखा रही है। और माती सब स्पष्ट है। M 4 - । नेतृविशेपानाह- मेदेवतुर्थी ललितशान्तोदात्तोद्धतरयम् । अय नायकों के भेदों का वर्णन करते हैं --यह नायक रहित, पान्त, ददात सया SET कार के भेदों के कारण RT RE का होता है। (पहा यह ना लेना जरूरी है कि भारतीय नाको फै नायक में पौरता (घर्ष) का दोना परमावश्यक है, प्रत्येक प्रसार के नायक में धौरता होनी ही चाहिए, यही कारण है कि नायकों के समी भेदों के साथ पार' विशेषण जरूर गाया जाता है। इस तरह नायक-भेद ४ तरह का माना जाता है-धीरललित, पौरशान्त, घोरोदात्त तथा धौरोमन) यथोहिश रक्षणमाह- . ४ निधिन्तो धोरललिता फलासक सुपी मयुर ॥३॥ सविधादिविहितयोगोमत्याधिनतारहित अतएव गीतादिकल्पाविष्ठो भोगमवणय भारप्रधानत्याच सुकुमारसत्त्वाचारो सूरिति ललित । यया रक्षावल्याम्- 'राज्य निर्जितशा योग्यसचिवे न्यस्त सगस्तो मर पम्पक्पालनलालिका प्रशमिताशेपोपसर्ग प्रजा । प्रयोतस्य सुमग यसम्तसमयस्त्व चेति नाना पूर्ति काम काममुपेत्यय मम पुनर्मन्ये महाउत्सव ॥ कम से इनका Sण नामसहित यताते हैं -धीरललित यह मापक है जो सर्वथा निमिन्त रहता है। यह कोमल स्वभाव का होता है, सुखी रहता है या कलाओं (नृत्यगीतादि)मैं जासक रहता है। धीरललित नायक के योगक्षेम का पिता उसके मन्त्री आदि के दारा की जाती है, अत' १पत्तिकार ने नायक के भाको गुणों को उदाहत करना विस्तार के भय से ठीक नहीं समझा है। दो एक के उदाहरण हम यो ले सकते है (1) युवा जैसे -हिममुक्तच दरुचिर रुपयको मदयन विज्ञान जनितमानकेनन । अभदरमसादितमुरी महोत्सब प्रर्मदाजनस्य स चिराय माधव ॥ । (२) घर जैसे --पुम्वि स्विस मप गुजंगम धारयैना कुर्मराज तदिदं तिय दीया। दिवसरा गुरुत सम्पति संदिपोषी देव करोति दरकाक मात्रयम् ॥ । (६) उत्साही जेसे - झमिष्यति क्लेिष वामनी मावदित्य महसन दानवा ।' तावदस्य च मगौ नमस्तने पिता शशिमण्डल मम ॥ (४) तेजस्वी जैसे -र्य समेत्य च ललाटरेखया विमत सपदि शामुविसहन् । चण्डमारुतशिव प्रदीपवच्चेदिषस्य निरवादिलोचनम् ॥ सीह बाकी गुणों के कारण महाकायों व नारों से ते जा सकते हैं। १ औ वस्तु अभी तक नहीं मिली है उसका मिलना गोग तथा मिती ई बीज की रक्षा करना शेम कहलाता है-(भाप्तस्य प्राप्तियों, प्रास्य परिरक्षण क्षेन- गन E । दशरूपकम् । बह इस प्रकार की चिन्ताओं से रहित रहता है। इस चिन्तारहिता के कारण पर गीतादिकलाओं का प्रमी तथा भोगविलास में प्रवण रहता है। उममें भंगाररस को प्रधानता होने के कारण पर मुकुमार माचरणदाला सथा कोमल समाव वाडा शेता है। वैसे रत्नावली नाटिका का नायक वत्सराज उदयन सी पीरललित कोटि का नायक है। 'राज्य के सारे शा बीते जा चुके हैं, भव कोई भी शत्र ऐसा नहीं जो राय में विप्न उपस्थित करे। राज्य शासन का सारा भार मुयोग्य मत्री योगपरायण को सौंप दिया है। प्रजाओं को अशी तरह से लालित व पारित किया गया है, उनके सारे दुख-उपसर्ग- (अकाल आदि नियों) शोव हो चुके हैं। मेरे हृदय को प्रसन्न करने के लिए प्रपोत को पुत्री वासवदत्ता मौजूद है, और तुम मजूर हो । इन सब वस्तुओं के नाम से ही काम (इन्द्रा) धर्य को प्राप्त हो । अथवा इन सब वस्तुओं के विधमान होने पर कामदेव मजे से आयें, मैं तो यह समझता हूँ, कि मेरे लिए यह बहुत बडे उत्सव का अवसर उपस्थित हुवा है। मैं कामदेव के उत्सव का सागत करने को प्रस्तुत हूँ। 301015 अर्थशान्त- सामान्यगुणयुक्तस्तु धीरशान्तो द्विजादिक । विनयादिनेतृमामान्यगुणयोगी धीरशान्तो द्विादिक इति विप्रवणिक्सचिवादीनो भारणनेतृणामुपलक्षण विवक्षितं चैतत् , तेन नैश्चिन्त्यादिगुगसंभयेऽपि विप्रादीना शान्ततव, म लालित्य, यया मालतीमाधव-मृच्छकटिकादौ माधववारुदत्तादि । 'वत उदयगिरेरिबैंक एष स्फुरितगुणधुतिसुन्दर कलावान् । इह जगति महोत्सवस्य हेतु- नयनवतामुदियाय पालचन्द । इत्यादि । यया वा- 'मसशतपरिपूत गोत्रमुद्भासित यत् सदसि निबिडवैत्यब्रह्मयोपे पुरस्तात् । मम निधनदशायर्या धर्तमानस्य पाप स्तदसएशमनुष्यपुप्यते घोषणायाम्' (इत्यादि)। धीरशान्त (धीरप्रशान्त ) यह मायक है जिसमें सामान्य प्रकार से उपर्युक माप कगुणों का समावेश है। यह प्राह्मण, वैश्य या मविपुग्न आदि होता है। विनय मादिमापकगुणों का सामा या जिसमें पाया जाय, मी ब्राह्मण, वैश्य, मविपुत्र भारि (दिजादिक) दोपह धौरशान्त नायक कहलाता हैं । धौरशान्तता प्रकरण (रूपक का ए मेर) के नायक का है। यामात कहना मावश्यक है कि प्रकरण रूपक के नायक में चारे उपर्युक्त निश्चिततादि (बिनका समावेश धोरललित की परिभाषा में किया गया है) पाये जाये, फिर भी प्रामणादि जाति के नायकों में शान्ता माननी ही होगी। एचपि प्रकरण १ यहां यासकेन करना बनुचितम होगा कि मारिका के मायक सभी पौरललित होते है। वैसे मालविकाग्निमित्र आदि कुछ नाटकों के नायर मी इस कोटि में आ सकते है। सोच लोग पौरोरा मानना पसन्द करेंगे। विक्रमोर्वशीय का पुरवा पौरोशन हो माना जाता चाहिए। -- । - 9- 1 - 7 " - - द्वितीय प्रकाश ७६ के नायक निश्चित पलाप्रिय आदि होते हैं, फिर भी बै बलित कोटि के नहीं माने जाने पाहिए, परेशान हो मानना होगा, क्योंकि प्रासादिको प्रकृति हो शन्त होती है। मालतीमाधव का माधव, मृच्छकटिक, चारदर आदि (पथा मेरे मन्दारवतीमा प्रकरण का मस) ये सभी शाह कोटि के हैं। सती अभियंजनात पयों होती (भगवती गायक का परिचय देते हुए कहती है) नेवाले लोगों को प्रसन्न करने बारा, पलापूर्ण, शान्ति से युक्त शलब मा जिस तरह उदयगिरि से उदित होता है, उसी तरह देदीप्यमान गुणों को शान्ति से मनोहर, कलाओं में पारंगत यह बोला माधव, संसार के नेत्रधारियों के लिए महान् सरसर (प्रसन्नता का कारण बनकर सस कुल में उत्पन हुवा है। अपया जैसे, (पृथ्ट्रकटिक में चारदात वय अपना परिचय देता है-)ो मेरा कुल समानों में चयों के सपन देदोषों से ध्वनित होता था, तथा सेवा बन यों के द्वारा पवित्र रहता था, वही बाज मेरी मृत्यु के समीप होने पर ऐरो नाच मनुष्यों (चाण्डालों) के द्वारा घोषणा में पोषित किया जारहा है। अय धीरोदात्त मदासस्योऽतिगम्भीर क्षमायानविकरथना ॥४॥ स्थिरो निगूढाहद्वारो धीरोदात्तो हदमतः । महासस्व शोमोवाचनभिभूतान्त यत्त', अविरत्यन अनात्मापन, विगूढा- दहार-विनयच्छमारलेप , इटबत मारतनिर्वाहक, धीरोदात्त न्यया नागानन्दे-- "जीमूतवाहन - शिरामुख स्यदत एवं रकमयापि देहे मम मासमस्ति । कृतिं न पश्यामि तपैप तापक्किं भक्षणात्य विरत गयरमन् ।' यमा राम प्रति- 1 'पाहतस्याभिषेकास विएस्य बनाय च । म मया लक्षितस्तस्य स्वरूपोऽप्याफारविनम' याच फेलोचिस्यादीनां सामा यगुणानागपि विशेषलक्षणे क्ववित्सकीर्तन वत्तेप सनाविषयप्रतिपादनार्यम् । गनु च वय जीमूतवाहनादिन गन दादानुपात इयुच्यते । मौदात्य हि नाम सारण मृत्ति, तप विजिगीपुरल एबोपपद्यते जीमूतवाहनस्तु निजिंगीत व कविना प्रतिपादित । यथा- 1 ' तिभाति पितु पुरो भुवि यथा सिंहासने किं तथा यत्सवाइयत मुख हि चरणी तातस्म कि राज्यत । १अथवा से मेरेमगारपतीबाट प्रकरण का मशादत- वेगन रचियतकंपयन जटिलितान् यायस्याकेचित चिद साख्यं च वेदान्त मिद च गणित, पाणिनीय पठन्त । साहित्य तजम्मधुरतमधुर कैविवादादयन्त स्तिरयस्मद्गृहेष्वा विमलमतयो बालशिष्याः मुखेन । (प्रथम शंक) - 1 TM , । 1 60 . , - - दशरूपकम् "किं भुले भुवनप्रये धृतिरसो भुक्तोग्मिते या गुरो- रायास' खलु राज्यमुस्मितगुरोस्तास्ति कविगुण ॥ इस्यनेन । 'पित्रोविधातुं शुश्रूषां त्यक्त्वैश्य प्रमागतम् । वनं याम्यहमप्येय यथा जीमूतवाहन' ।।" इत्यनेन च । अतोऽस्यात्यन्तशमप्रधानत्वात्सरमाणिस्त्वाय वीतरागवच्छान्तता । अन्यथानायुक्तं यतथाभूतं राज्यसुखादौ निरमिलाप नायकमुपादायान्तरा दयाभूतमल- यवत्यनुरागोपवर्णनम् । यचोकम्-'सामान्यगुणयोगी द्विजादिधीरशान्त इति । तदपि पारिभाषिकस्वादवास्तवमित्यभेदकम् । यतो वस्तुस्थित्या बुद्ध-युधिष्टिर-जीमूतवाहना- दिम्याहारा शान्सलामाविर्भावयन्ति । अनोच्यते-यतावदुक सवोत्कर्षेण वृत्तिौदात्यमिति न तजीमूतवाहनादौ परिही- यते । नोकरूपैच विजिगीपुता य' केनापि शौर्यत्यागदयादिनाऽन्यानतिशेते स विजि- गीषु , न य परापकारेणार्यप्रहादिप्रवृत्त. तयात्वे च मार्गदूषकादेरपि धीरोदात्तत्व. प्रसक्ति । रामादेरपि जगपालनीयमिति दुष्टनिप्रहे प्रवृत्तस्य नास्तरीयकत्वेन भूम्यादि लाभ' । जीमूतवाहनादिस्तु प्राणैरपि परार्थसम्पादनाद्विश्वमप्यतिरोत इत्युदात्ततम । योसम्-'तिष्ठन्भाति' इत्यादिना विषयसुखपराङ्मुषतेति तत् सत्यम्-कार्पप्यहेतुपु स्वसुखतृष्णामु निरभिलापा एव जिगीपत्र , तदुकम्- 'स्वगुलनिरभिलाप खिचसे लोकहेतो प्रतिदिनमथवा ते तिरेवरिपव ।। अनुभवति हि मूर्ना पादपस्तीप्रमुष्णं शमयति परितापं छाययोपाश्रितानाम् ॥ इत्यादिना । मलयवत्यनुरागोपवर्णनं वशान्तरसाश्रयं शान्तनायको प्रत्युत निषेति । शान्तत्व पानइंकृतम्, तच्च विप्रादेरौचित्यप्राप्तमिति पस्तुस्थित्या विप्रादेः शान्तता न स्वपरि- भाषामात्रेण युद्धजीमूतवाहनयोस्तु कारुणिकत्वाविशेपेऽपि सामनिष्कामकणवादिधर्म- स्वाझेद । अतो जीमूतवाहनादेर्षीरोदातत्वमिति । धीरोदास कोटि का नायक महासत्व, अत्यन्त गंभीर, षमाशील, अविकरयन, स्थिर (अचंचल मन घाला), निगृद अहकार पाला, तथा हरवत होता है। महासत का अर्थ यह है, किधीरोदाप नायक का अन्त फरण (अन्त सत्त) कोथ, शेक आदि विकारों से अभिभूत नहीं होना चाहिए । अविकत्थन का अर्थ यह है कि वह अपनी ही प्रशसा करने वाला न हो।निगाहकार का तात्पर्य यह है कि उसमें महकार व वाभिमान भाश्य हो, किन्तु वह दिनप्रया के द्वारा वाया हुका वरा छिपाया हुवा हो। दूत से तात्पर्य यह है कि उसने जिस राव का प्रण कर लिया है, उसका भन्त तका निर्वाह करने वाला हो। धीरोदार नायक का उदाहरण हम नागानन्द के नायक बीमूनवाइन के रूप में ले सकते.- १ ध्यान रखिये विकलन होना जो धीरोदात के लिए दोष है (गुण नहीं ), वहाँ धीरोद्धत नायक के लिए दोष नही है। - । এর P -- २१ द्वितीयः प्रयाशः 'हे गरुड, अभी भी मेरी नसों के किनारों से खून टपक रहा है, अमो मो मेरे सरीर में गाँस र वा दुवा है, तुम भी अभी नहीं हुए हो, ऐसा मेरा अन्दावा है। किराया कारण है कि तुम मुझे) साने से रक गये हो। अथवा जैसे राम के विषय में (उनकी विषय में ) यह उक्ति है:- जर उन्हें अभिषेक के लिए युटाया तब और कर उन्हें बन के रिर विकावी गई तब, दोनों द मैने उनके ( राम ) पेहरे पर कोई भी ( मोदर सा मी) विकार नही देखा । 'नायक के स्थैर्य, पृडता आदि गुणों का वर्णन नायक के सामान्य छग में किया जा चुका है, भता बनया औरोदात्त के लक्षण में पुनः वर्णन पुनशक्ति दोष है इसका या समाधान करते दुर रहते है कि धीरोदात में ये सामान्य गुण विशिष्ट रूप में पाये जाने चाहिए, इस अवधारण के लिए इनकी फिर से गणना की गई है। इसका खास कारण पारोदा मेंशन गुणों को अधिकता बताने के लिए। धीरोदात नापक के उदाहरण के रूप में ऊपर विद्याधरराज के पुत्र जीमूतवाहन प्रतिय सागशीलों तथा दानियों में से एक है, तथा उसमें विषयादि के प्रति सांसारिक जीव की भांति मिधा न होकर, विरक्ति का मार पाया जाता है। मागानंद के रचयिता वर्षन ने मौ 'जीमूतवाहन मा चित्रण विषय शिरफ के रूप में किया है। इन बातों को देखकर पूर्वपक्षी को जीमूतवाहन के चारोदातत्त्व के विषय में शका हो उठती। इसी का संकेत यहाँ चिकार ने किया है। नागानन्द प्रादि नाटकों में जीमूतवाहन कादि नाटकों को धीरोदाच पयों कहा जाता ११ भौरोवाट नायक में सदाता प्रधान गुग है। उदाता का तात्पर्य उस मचि है जो सबसे बहार पत्कृष्टता प्रकट करती है अर्थात् अन्य लोगों से उत्कृष्ट होना ही उदारता है। यह उदात्तता सभी हो साती है, जब मायक में दूसरों को जीतने शो र उनसे उत्कृष्ट होने की) या विषमान हो। किन्तु जीमूतवादन मैं पर पिजिगीषा नही पाई जाती । कपि संवर्धन ने उसपर चिनिनिंगीपुरूप में दिया है। इसका प्रमाण जौमूतयाहन की यह पति दी जा सवतीरे- पिता के सामने जमीन पर बैठने से जो शोमाथी, क्या पैसी सिंहासन पर बैठने से पिता के चरणों को सेवा से जो राख था, क्या वह राज्यप्राति से हो सकता है। तीनों लोकों के मोग से मी क्या वह धैर्य (सन्तोष) मिल सकता है, जो पिता के जूठन (मुक्तोशित) से पिता से विमुक्त मेरे लिए राज्य मी बोहा (मारारूप) हो गया है, इसमें भी कोई पूण दी है। 'कमागत (श परम्परा मा ) ऐश्वर्य को छोड़कर माता-पिता की सेवा करने के लिए में बन में वैसे ही मारहा हूँ, जैसे जीमूतवाइन गया था। " रल उदाहरणों से रपष्ट है कि जीमूतवाइन में विरहटा और शांति की प्रधानता पाई जाती है, साथ ही यह परमदयाल मी है अतः हसे रागहीर (बौतरराग) को माति शान्त मानकर धीरप्रशान्त कोटि का नायक मानना ठीक होगा। इसके अतिरिक्त दर्षन को नाटकीय फयावस्तु में कुछ दोष मी नजर आता है। इस तरह के शात या विकारहीन प्रकृति वाले नायक को बैकर, जो राज्यमुख आदि से सर्वथा उदासीन है, भागे जाकर मळ्यवती के साप उसके अनुराग का वर्णन करका अनुचित प्रतीत होता है। इसके साथ ही भारत की परिभाषा-सामान्यगुणों से युक्त प्रावणादि वीरमति कोटि का नायक है'- मी मिथ्या है। क्योंकि सामान्य गुण-शौर्य, दक्षता, साइक्लादिना आदि शान्त तथा जीराग म्यक्ति में १. भादि शम से महरिनिर्वेद, आदि नाटकों का मा समावेश किया जा सकता है। .ल.
२ पशरूपकम् - मही पाय वा सकते । अत यह परिमापा ठोस तरह से पारप्रधान की विशेषता को व्यक्त नहीं कर पाती, तथा से अन्य धीरोदाचादि से अलग करने में समर्थ नहीं भान पहनी है। अमल में वास्तविक स्थिति यह है वि डर, युधिभिर, जीमूतवाहन मादि के नाम तथा इनके वृत्तान्त शान्त रस का आविर्भाव करते हैं।मत शान्त कोटि में ही मानना ठीक होगा। (समाधान) इस का का उदर देते हैं -उदारताका सात्पर्य तुम साकसि मानते हो, ठीक है। सर लोगों से उत्कृष्ट होने दी इस पृत्ति का गोमूतवाहन धादि मैं ममाव नही है। बाहाँ तक दूसरों को जीतने की इच्छा के होने का प्रदा है, विजिगीषुता एक ही तरह की तो होती नहीं । विनिगीषु उसे माना जाता है, जो गैर्य, लाग, दया भादि गुपों से दूसरों को जीव लेता है, उनसे बदलाता है। विजिगीषु इम उसे नहीं मान सनते, जो दूसरों का नुक्सान बरने या पन छानने में प्रवृत्त है । ऐसा मानने पर तो डाकुओं को पारोदार मानने का दोष उपस्थित शेगा। यह टोक नही। राम आदि धीरोदात्त नायरों में संसार के पालन करने का गुण पाया जाता है, क्योंकि वे दुर्यों को दण्ड देने में प्रवृत्त है। वैसे प्रसंगवश उन्हें राज्य भादि का भी काम हो जाता है। जर दुष्टों का सहार र संसार का पालन करने वाले राम उदात्त है, तो जीमूतवाहन तो प्राणों को देवर भी परोपकार में व्यस्त रहता है, यह सारे सप्तार को अपने परोपकार से जीत लेता है, मत वह उन दोनही, उदासतम रे। पूर्वपक्षी ने ऊपर के दो पो (तिष्ठन् मानि० ) को देकर जीमूतवाहन को विषयपराएनुसता प्रकट की, वह ठीक है । असल में संसार को अपने कार्यों से जीतने की इच्छावाले सदात्त नायक 'कृपणता को उत्पन्न करनेवाली अपने मुख की इच्छाओं से उदासीन तथा विरक्त (निरभिलाष) ही रहते हैं पैसा कि शाकुन्तल के नायक दुष्पल के लिए वदा गया है अपने सुरों के प्रति निरमिलाप होते हुए भी तुम प्रजा के लिए तकलीफ सहा करते हो। अयथा यह तो तुम्हारी दैनिक क्रिया-प्रक्रिया ही है। वृक्ष अपने सिर से तीन आतप को सहता है, किन्तु रप में भाये लोगों के ताप को छाया द्वारा शाम्त कर देता है। पूर्वपक्षी ने जीमूतवाहन तथा मलयवती के अनुराग के निधन को देप माना है। सरा उत्तर देते हुए प्रतिकार (सिद्धान्ती) श्वे हैं कि मलयवनी के अनुराग का वर्गन जो शान्तरस के उपयुक्त नहीं है, इस बात का घोतक है कि नायक शान्त नही है, परिक वह जीमूतवाइन की भीरशान्तता का निषेध करता है। शन्त का ओ पारिभाषिक अहम लोग लेते हैं, वह है महकार कान होना, यह माझगादि में उचित है। इसलिए वास्तविक दृष्टि से प्राक्षणादि में शातता पाई जाती है, यही नहीं कि कोरी परिभाषा से ही वे धीरशान्त मान लिये गये हो। बुद्ध की वरुणा सथा जौमूनवाइन की करुणा में भी भेद है, एक की करुणा निष्कामरे, दूसरे को सकाम । अत वन दोनों में भेद है। इसलिए गैमूनवाइनादि धीरोदारा दी है। १.धारवान नायक के ऊपर के दो उदाहरण (माश्व व चारुदत्त) रहार रस पाले हैं। यो मेरे दधीविस्तर' से धीरप्रशान्त नायक का परोपवार वाला रूप दिया जा सकता है, जो जीमूतवाहन व दीचि के अमर धीरोगत व धीरप्रशान्तस्व को स्पष्ट कर देगा। असहत शिरद भूभद्भिदा त मश्विना, वनय दमलें मार्ग सो विदा पुरदुलया। स्व मळमकरोर देह धीमान् मुखेन च वाजिनो वामय मवान् प्रापच्चभी परार्थपटु 'त। N N . । t -- द्वितीय' प्रकाश , . अय धीरोद्धत वर्षमात्सर्यभूमिठो मायाच्चापरायपाः ॥ ५॥ धीरोद्धतस्यहवारी चलवण्डो चिकत्थतः । दर्प - शौर्यादिमदा, मासर्यम् = असहनता, मन्त्रवलेनाविद्यमानवस्तुप्रकाशन माया, छप-बशनामात्रम्, चल धनपस्थित , पण्ड = रौद्र, स्वगुणशसी = विकल्पनो धीरोद्धतो भवति, यथा जामदग्न्या-विरागीद्धारसारनिभवनविजय-' इत्यादि । यया च रावण - लोक्येश्वर्यलक्ष्मीइठहरणसहा वाहनो रापणस्य !' इत्यादि । धीरललितादिशब्दाश्च ययोपगुणसमारोपितारस्थाभिधायिना, परसपममहोशा- दिवस जात्या मधिदयस्थितरूपो ललितादिरस्ति, तदा हि महावाविप्रवन्धेषु विरुद्धानेक रूपाभिधानमसङ्गतमेवस्या, जातेलपायित्वात् , तथा च भरभूतिनक एव जामदग्न्य - V'माक्षणातिश्मत्यागो भवतामेप भूतये। जामदग्न्यश्च यो मित्रमन्यथा दुर्मनायते ॥' इत्यादिना रापण प्रति धीरोदानवेन 'कोलागोद्धारसाा-' इत्यादिभिध रामादीप्रति प्रथमं धीरोद्धतत्वेन, पुन -'पुण्या ब्राह्मणजाति' इत्यादिगिध पौरशान्तत्येनोपयर्णितः, न चारस्यान्तरागिधानमनुचितम् , अागतनासाना नागान्तरापेक्षया महासत्यावरण्य- वस्थितत्वात् । अमिनस्तु रामारेकमान्योपातान् प्रत्यारपत्लादारम्भोपात्तारस्थातोऽत्र- स्थान्तरोपादानमन्याय्य, यथोदात्त वाभिमतस्य रामस्य छ ममा चालिबधादमहासत्त्वतया स्वावस्थापरित्याग इति । पक्ष्यमाण च दक्षिणाययस्थानाम् 'पूर्वा प्रत्यन्ययाइत ' इति निटयसापेक्षत्वेनाधि- वादुपासालस्यातोऽस्थान्तराभिधानमहानिनोरयविरुद्धम् । धीरोद्धव नायक प्रमण्ड (दर्प) और ईO (मारस) से भरा हुमा, माया और कपट से युक, घमण्डी, चवळ, फ्रोधी तथा बाराधी होता है।। दर्ष का तात्रय चोय भादि का पमण्ड है, मात्सर्व का तात्पर्य दूसरों की मसदनता है। मम बन से ही वस्तुओं को प्रकट करना माया कदलाता है, दूसरों को ठगना एल पदलाता है। चा से मतलब है, जो स्थिर न हो। इन गुणों के अलावा पारोस्ल कोधी और अपनी खुद को मारने वाला होता है। जैसे धोरचरित के परशुराम बीपपने आपको कैलाश के उठाने तथा तीनों लोकों के जीतने में समर्थ मानते है, तथा रावण विसको मुजाएँ तीनों लोकों के ऐश्वर्य पी लक्ष्मी को हठ से अपहत मारने में समर्थ हैं।' भायक के धौरतति, धौरप्रशात, पौरोदात्त तथा धोरोसत कोटि के होने के विषय में एक भारत हो सकती है कि नायक का पूरा जीवन-चित्रण एक ही कोटि का होगा। इस तरह वो मन्तादि धीरोदात मायकों में जो कलाप्रियता तथा रागमयता बताई गई है, तथा जी धीरललित का गुण है-ठीक नहीं बैठेगी। वस्तुत ऐमा मानना ठीक नहीं। इसी बात को २१ष्ट करते हुए पुत्तियार बताता है कि धौरालित आदि पारिमाषिक शब्द तदपकरण में पणित गुणों से समारोपित अवस्था के भिधायक है। इस तरह एक ही नायक में कमी ललित घाली अवस्था, कभी शान्त पाली अवस्या, कमी उदास वाली अवस्था और कमी हत पाली अवस्था पाई जा सकती है। (यह दूसरी बात है कि 'प्राधा केन भ्यादेशा मरन्ति' इस न्याय के माधार पर उसकी धोरलहितादि संशा किसी एक गुण सो विशिष्टता के कारण देशरूपकम् की जाती है। जैसे बैंक (गो)को दम विभिन्न अवसाओं में पछटा, देश और सदन नामों से पुकारते है, ठीक उसी तरह नापक के विषय में मी कदाजा सकता है। उदाध, लसित मादि जाति (उदाइल या हलितत्व) के रूप में नायक में स्थित नहीं है। जिस तरह गौ में मत्सत्वादि जाति न होकर गौत्व जाति है, वरस, वृषभ, महोध केवल बेल के गुण से ही नायक में नायव जाति है, उदास, हलित आदि उसके गुग है। भगर ललित भआदि को लरितवाहि भाति मानकर तरकोटि के नाक में भविनामादेन स्थित माना जाय तोरिएकरी नायक में अनेक तरह के रूपों (ललित, सदाच मादि)का निरूपण मनुचित होगा! महाकवियों ने अपने कायों व नाटकों में एक हो नायक को कां रूपों से युक्त निरूपित किया, जो परस्पर विरुवारे-किन्तु यह विरोषि-समागम सङ्गत इसलिए नहीं लगता कि ये ललितादि गुण है, तथा एक होम्यक्ति में विभिन्न समयों (भवस्थामों) पर विभिन्न गुणी की स्थिति पाई जा सकती है। लेकिन अगर हलित मादिको जाति मान लिया जाय, तो जानि भविनाशी, मत जहाँ लसिद्धव जाति का अस्तित्व, वहाँ उदात्तव जाति कैसे पाई जायगी। (जबकि गुण विनाशी तथा क्षणिक है अत परस्पर विरोधी गुणों का चिन्न-भिन्न अवस्याओं में एक ही नायक में पाया जाता अनुचित तथा असत नहीं है।) उदाहरण के लिए मवभूति के महावीरचरित से परशुराम के पात्र को ले लीजिये। भरभूति के पत्थराम में कई एर्गों का समावेश पाया जाता है। एक ओर रावण के प्रति निम्न संदेश भेजते हुए परशुराम का धीरोदाघव प्रकट किया -मारणों के अपमान को बोद देना तुम्हारे ही कल्याण के लिए है। परशुराम वैसे तुम्हारा मित्र है, लेकिन (माह्मणों का अपमान करने पर) वर कुद्ध होता है। दूसरी ओर राम के प्रति 'केलासोटारसार-मामि उकि का प्रयोग करते उसका पोरोक्त-रूप प्रकट किया गया है। तीसरी भोर फिर 'प्राणजाति पवित्र इस प्रकार धीरात के रूप में उनका विषण हुआ है। इस तरह अलग अलग अवस्थाओं में परशुराम का चित्रण अनुचित नही है । यहाँ परशुराम प्रधान भापक न होकर महावीरचरित के प्रधान नायक राम अगभूत नायक है । बङ्गभूत नायकों में महासत्वादि गुण प्रशननायक की अपेक्षा न्यून तथा मध्यरस्थिती होते । मत ऐसे भागभूत मायर्को का मिन-मित्र अवस्थाओं का चित्रग सर्वथा उचित जान पड़ता है। लेकिन अदाँ तक प्रधान नायक का प्रश्न है, उसके बारे में ऐसा करना ठीक नही होगा। जैसे मान रोजिये किती प्रपप (काग्य पामारक) में रामादिको प्रशन नायक निषर किया गया। ऐसे हल पर माध के अन्य पात्रों के प्रति प्रधान नायक को जो अवस्था भारम्भ में कवि ने गृहीत की है, उसी का निर्गद अन्त तक होना ठीक है, दूसरी अवस्था का प्रण यहाँक १ पृत्तिकार का माष यह कि घदे से घाव जाति पृथक नहीं की जा सकती, क्योंकि व्यक्ति तथा जाति का अदिनामाब सम्बन्ध है। रितु गुण के विषय में ऐसा नही है पहा काला, लाल, नीलाई तरह का हो सकता है। घरे में कृष्णव रतव आदि जाति मानना होक नही होगा महाराभ्यकार भी गुण को जाति नहीं मानते-चतुष्टया शम्दाना प्रवृति। गौरभुशवलोदित्य इति । नायप में अविनामात्र सम्बन्ध से नायकत्व की ही स्थिति है ललितादि गुणों को नहीं। मत ललितादि गुण तो केवल तपदवस्या के रूपक है। भर्य माव' यथा घटानेपरवादिजाति वस्तुस्थित्यादिनामावेन तिलति, किन्नु हादि. गुणस्तु भवस्थाविशिष्ट पव, तय भाषके मायकवजाति रविनाभावेन लिइति, सलिनादिगुणास्तु मवत्पानिरूपका पवेति दिक) २से परशुराम माग्यशान को प्रष्टि से धीरप्रशांत पारे।
द्वितीयः प्रकाश नहायेगा। जैसे राम जैसे धीरोदात्त नायक के मबन्ध में कपट से बालिका वध करना उनके महासत्व में दोष उत्पन्न कर देगा और ये अपनी अवस्था छोरो (क्योकि छलादि फा भामम धीरोदत नायक का गुण है), (अतः ऐसे अवसरों पर मल कवि प्रबन्ध में उचित रेफेर कर ऐसे स्थल को नायक को धीरोदात प्रकृति के अनुरूप बना लेते है।।" लेकिन मागे वर्णित दक्षिण, शठ, धृष्ट इन नायक भेदी का एक ही नायक में मिन-भिन्न भवस्थामों में विषण अनुचि नहीं, चाहे वह नायक प्रधान मायक हो या महाभूत नायक हो। इस प्रकार के भेदों का आनय एक अवस्या के बाद दूसरी भवस्था के लिए लिया ज सकता है। इसका कारण यह है कि ये अवस्थाएं एक दूसरो को अपेक्षा रखती है, परस्पर सापेशिक है 1 से एक ही नायक पहले ज्येष्ठा नासिका के प्रति सदश्य रहता है, अतः दक्षिण नायक रहता है। परीकभी दिप-छिप कर फनिष्ठा से मार बेटा वारता है, हो जाता है। बाद में जर उसको चालाकी साफ तौर पर ज्येटर के दारा पकड़ी जाती है, तो यह घट नायक की कोटि में या जाता है। अतः दाक्षिण्य मादि गुणों का अवस्थामेद से प्रभान नायक में भी समावेश परना अनुचित तथा विश्व नही है। अथ मारनेवस्था- स दक्षिमा शठो घृष्टा पूर्वी प्रत्यन्यया हतः ॥ ६ ॥ नामकप्रकरणात्पूर्वा नायिका प्रत्यन्ययाऽपूर्वनायिकयाऽपदतचित्तस्यवस्थो वक्ष्यमा गभेदेन र चतुरवस्थः । तदेवं पूर्वोकामा चतुर्णा प्रत्येकं चतुरवस्थत्वेन पोडशपा नायक । जय नायक किसी नवीन (कनिहा) नायिका के द्वारा हृतचित्त हो जाता है, तो यह पूर्ण (ज्येष्ठा) नायिका के प्रति दक्षिण, शठ या घट (प्रकृति का) होता है। पहा नायक के प्रकरण में मूल धारिका में प्रयुक्त 'पूर्वा रथा अन्यया इन विशेषणों से इनके विशेष्य नायिका' का मध्यावर पर लेना पडेगा । यह नायक बब किसी नवीन नायिका के प्रेम में फंस जाता है, तो पहली गायिका के प्रति इराका ग्यवहार कई प्रकार का हो सकता है। सीपबहार के माधार पर भंगारी नायक के दक्षिण, शठ तथा धृट ये भैद किये गये हैं। कुछ ऐसे मी नायक ( अनुकूल) होते हैं, जो एक ही नाविया के प्रति आसक्त रहते है (जैसे उत्तररामचरित के रामचन्द), रस भेद का वर्णन मी आगे किया जा रहा है। इस पर नायिका के प्रति व्यवहार की टि से नायक को चार तर या माना जा सकता है। पर और ललितादि चार प्रकार के नायकों के भेद बताये। प्रत्येक प्रकार का नायक दक्षिण, ठ, धृष्ट या अनुकूल हो सकता है, इस तरद (vxx=14) नायक मो मैदर तरह के हो जाते है । तन- दक्षिणोऽस्या सहव्यः- १. मतिनायक (अङ्गभूत नायक) का चित्रण भिन्न-भिन्न अवस्था में करना उचित है, इसका स्पष्टीकरण मेरे 'गुम्मवयम् महाकाव्य से दिया जा सकता है:- () भौरीदास:-पस्य प्रयाणसमये मतिभूतां तद कीर्तिप्रकाण्डमरू हिमरश्मिगौरम् । अश्वः पलौनपरिधर्षणजातालाव्याजानिजोदरशीनीयते स्म" (२)धीरललित:-रम्यापि तद्भवननिष्क्रुटमेत्य सघो रोमानितात्र कुचमन मुचकम्पैः। किम्पाणिपरलदविलासभरे रिमस्य वाभुगमो दितिसतस्य जहार चेतः॥ (३) पौरोखतः-मीती बदीपसरसर्वकशामियाना दातार याषिकान्तिपुरि सान्ती। तन्मन्दुरागणमेवनानापरी किं मानो म देवभिषजावपि देववन्धौ ।।
1 V ५६ दशरूपकम् योऽस्या ज्येष्ठायां हृदयेन सह प्यत्रहरति स दक्षिणः । यथा ममव- 'प्रसीदत्यालोके किमपि स्मिपि प्रेमगुरवो रतिरोडा कोऽपि प्रतिदिनमपूर्वोऽस्य विनय । सविधम्म फश्चितपयति च किचित्परिजनो न चाहं प्रत्येमि प्रियससि किमप्यस्य विकृतिम् ॥' यथा था- 'उचित प्रणयो चरं विहन्तुं वह्व' सण्डनहेतवो हि दृया। उपचार विधिर्मनस्विनीना ननु पूर्वाभ्यधिकोऽपि भावशून्य' ॥", दक्षिण नायक वह है जो नवीन नायिका से प्रेम हो जाने पर भी पूर्वा नायिका के प्रति अपने व्यवहार में कोई कमी नहीं आने देता, तथा उसे इस बात का अनुभव नहीं होने देता, कि यह उससे कुछ उदासीन हो गया है। सर में यह पूर्वा नायिका के प्रति सहृदय रहता है, ज्येष्टा नायिका के प्रति मी हृदय से व्यवहार करता है। दक्षिण नायक के उदाहरण के रूप में वृत्तिकार थनिक सपने ही मनाये हुए पच मी रखते है। सखियाँ किसी नायक की अन्याशक्ति के बारे में बार पार, मा आकर ज्येडा नायिका को चेतावनी दे जाती हैं। पर नायक का व्यवहार ज्येष्ठा के प्रति लना सहृदयता- पूर्ण है कि उसे इस बात का विश्वास ही नहीं हो पाता कि उसका प्रेमी अब रितो दूसरी नायिका के प्रति भासद होगया है। इसी बात को नायिका स्वय अपनी एकससी से बह रही है। वह मुझे देखते ही सुश हो जाता है, तथा नाना प्रकार से (क्या क्या) रतिकोडाएँ किया करता है, नो प्रेम से मरी रहती है। उसी विनम्रता प्रतिदिन 'अपूर्व रूप लेकर मानी है।हर रोज बह एक नये प्रेम, नई सुशो, नई तदजीब के साथ मुझसे मिलना । लेकिन दूसरी और मेरे विश्वासपात्र सोई सेवक (सखियों भो) कुछ दूसरो को मात करते हैं। विश्वासपात्र सेवकों से मुझे यह पता चला है कि अब वे कही दूसरी जगह लासक्त हो गये है। चूंकि सेवक विश्वासपात्र है, इसलिये मैं ऐसा भी नही मान सक्ती कि वे झूठ बोलते हैं। और श्वर हे सखि, मैं स्वयं उसके विकार तथा परिवर्तन का विश्वास नहीं कर पाती हू। अथवा, प्रेम को मने से खत्म किया जा सकता है। एक से प्रेम होने पर किसी दूसरी प्रेयसी के प्रेम को खत्म करना उचित है । इस तरह प्रेम की समाप्ति के, प्रेम के खण्डन के, का कारण हम लोगों ने देखे है। लेकिन कुछ कुशल लोग ऐसा न कर पहले की प्रेयसी के प्रति पहले से भी ज्यादा प्रेम दिखाते हैं। मानिनी प्रेयसियों के लिए नायक की यद उपचारविषि, नायक का यह व्यवहार, चाहे पहले से ज्यादा हो, फिर भी भाव दगा मेम से शून्य होता है अथराठ- -गूढविप्रियकृच्छुठः। दक्षिणस्यापि नायिकान्तरापहृतचित्ततया विप्रियकारित्वाविशेषेऽपि सहृदयत्वेन शाद्विशेषः, यथा- 'शयग्न्यस्या काश्चीमणिरणितमाकर्म्यसहसा यदाधिध्यमेव , प्रशिथिलभुजप्रन्थिरभव । तदेतत्वाचने पृतमधुमयत्वहुवचो- विषेणापूर्णन्ती किमपि न सती मे गणयति ।।
द्वितीयः प्रकाशः पास नायक यह है, जो ज्येष्ठ नापिका का पुरा सोसा है किन्तु दिप-ट्रिप पर करता है। नपान नायिका से प्रेम हो जाने पर कोटिपा नायक पदयी नायिका से सर का कर दिपी भंगारचेयाएँ किया करता है। प्रथम नायिका की अप्रिय बातो और पिग दोनों तरह के गायक समान रूप से करते हैं। प्रथम नायिश इस बात को पसन्द नहीं करेगी कि उसका नायक किसी दूसरी नायिका से प्रेम करे, पाई वसा व्यवहार सत्यतापूर्ण ही क्यों ग शे। तर दोनों में विभियकारिए समान रूप से पाया जाता, पिर पी दक्षिण में सहायरख पाया जाता है, वह हदय से ज्येष्ठा नायिका का दिल दुसाना गई। चाइम पर कि चाहे बाहर से मीठी गाठो पायें भले ही वर लेता हो, दिल से साफ नहीं होता। इस प्रकार दक्षिण व शाठ नायक में परस्पर और पाया जाता है। नायर का उदाहरण यह दिया जा सकता है। नायक वाचायक है। ज्येष्ठा का मालिंगन परते समय ही यह यानिष्ठा मी घरधनी यो आवाज सुनकर उधर उन्मुख होने के धारण मारिंगन को शिक्षित कर देता है। पर पड़ी ज्येष्ठा रस बात को सताए पाय, इसलिये वह मीठी-मोटी बातों में उसे उड़ा देता है । ज्येष्ठायी एक सपोरस बात की ताद जानी रे, और किसी दूसरे मौके पर बह गायक को पालाश पर्दाफाश करती नायक से रह रही है। अरे दुष्ट, तू मेरी ससी के सामने अनुकूल नायक बनने का दोंग रचा करता है, लेकिन असल में तु. है । उस दिन एकदम दुसरी गायिका को पारधनी को मणियों को भावान सुनकर मेरी सरसी का मालिंगन करते बरते दी तूने अपने बानुपाशी ढोला कर लिया। मैं इन बातों को क्या पहूँ। तू बदा पूत, रेग्नेह और मिठाप्त मरे वया नेमे घी और शहद का मिश्रण है। जिस तरह पी और शहद पिसावर मारने पर व्यक्ति पूर्णिन होने लगता है, क्योंकि उचित मात्रा में न तेने पर उनका मिश्रण सिंप हो जाता है और चाटने वाले व्यक्ति की निश्चेतन मना देता है, वैसे ही तेरे (रे) स्नेह तथा प्रेम के मिश्रण का भास्वाद कर मेरी ससी मदमस्त हो जाती है, और उस मस्ती में इतनी बदहोश हो जाता है कि मेरी इन चालारियों में बारे में भी पुरु नहीं जान पानी। श्रय पृष्ठ व्यत्तागपैरतो धृष्टो- यथाऽमशतके- 'लाहालक्ष्म ललाटपटमभित' फेयूरमुद्रा गले । पात्रे यजरपालिमा नयनयोस्ताम्बूलरायोऽपर । दृष्ट्या घोपविधायि मण्डनमिद प्राप्तथिर प्रयो लीगतामरसौदरे मृगश खासा समागिता ॥' फभी नायक ट्रिप-दिप कर कनिका नायिका के साथ शारचेष्टाएँ फरता है, और उसकी इन पेष्टाक्षी का निशान उसके शरीर पर लगा रहता है। येहा नापिका के सामने जय उसके ये अनविकार प्रकट हो जाते है और उसे नायक की पि कर की गई मारी चेष्टार्थों का मान हो जाता है, वो नायक पृट कहलाता है । (रष्ट नायर इवना ढीठ है कि वह इस तरह जनविकारयुक्छहोकर भी ज्येष्टा के सामने जाने से नहीं हिचकिचाता) धृष्ट नायक का उदाहरण अमरकशतक से दिया गया है। निष्ठा के साथ रतियोषा कर मौसा के थिों से शौगित हो, नायक ज्येष्ठा ) समीप आया है। उसे देखकर रात में भी गई नायक की सारी हरकते ज्येशा को माना हो गई है। ऽयेश के मन में इसे देखकर क्या - ।
दशरूपकम् भाव उठते हैं, उनरी अमिन्यभना इस पप में ज्येष्ठा के अनुमानों तथा सास्तिक भावों के -1 1 रात को रतिक्रीडा करते समय कनिष्ठा नायिका के रूठने पर नायक ने उसके चरणों पर सिर रखकर उसे मनाया था, इसलिए उसके ललाटतट पर नायिका के चरणों के अलतक का निशान हो गया था। रतिक्रीडा के समय नायिका के काजू पर गला रखकर वह सोया या इसलिए उसके गले में अहर (मन्द) का चिद हो गया था। उसने नायिका के नेत्रों का चुम्बन किया था, इसलिए मुख में कज्जल की कालिमा लगी हुई थी और उसके नेत्रों का चुम्बन नायिका ने किया था, इसलिये उसने नेत्रों पर ताम्बूल की ललाई लगी थी। सुबह जब नायक कनिष्ठा के पास से ज्येष्ठा नायिका के पास लौटा तो वह ऐसी साज-सज्जा से विभूषित था जो ज्येश को क्रुद्ध कर देने वाली शे। प्रिय के इस मण्हन को देखकर हिरन के समान चम्चल नेत्र वाली नायिका के श्वास लीला कमठ तक बाकर रुक गये, अथवा नायिका के पास लीलाकमल के समान मुख के अन्दर ही अन्दर समाप्त हो गये, यह पूरी तरह सास भी न ले सकी। भेशान्तरमाह- -ऽनुकूलस्त्वेकनायिकः॥७॥ यथा- 'अद्वैत सुखदुःखवोरखगतं सर्वास्ववस्थामु यद्- विधामो हृदयस्य यर जरसा मस्मिनहार्यों रस। कालेनावरणात्ययात्परिणते यत्स्नेहसारे स्थित । भद्रं तस्य समानुषस्य क्यमेप्येक हि तत्प्राप्यते ॥ किमवस्थ' पुनरेपो वस्सरागादि टिकानायक स्यात् । इत्युच्यते-पूर्वमनुपजातना- यिकान्तरानुरागोऽनुकूल, परतस्तु दक्षिण । ननु च गूढविप्रियकारित्वाद्वपक्ततरविधि- यत्वाच शाव्यपाष्टर्येऽपि कस्मान भक्त , न तथाविधविप्रियत्वेऽपि पत्सराजादेराप्रवन्ध- समाप्तेष्टा मायिन प्रति सहृदयत्वाद्दक्षिणतेव, न चोभयोज्येष्ठाकनिष्ठयो यस्य मेहेन न भवितव्यमिति वाच्यम्, थविरोधात् । महाकविप्रवन्धेषु च-- 'माता तिष्ठति कुन्तलेश्वरमुता बारोराजस्वसु- धूते रानिरियं जिया कमलया देवी प्रसाद्याद्य च । इस्यन्त पुरसुन्दरी प्रति मया विज्ञाय विज्ञापिते देवेनाप्रतिपत्तिमूढमनसा विना स्थित नाडिका ॥' इत्यापावपक्षपातेन सर्वनायिकामु प्रतिपात्युपनिवन्धनात् । तथा च भरत-- 'मधुरत्यागी राग न याति मदनस्य नापि वशमेति । अवमानितप नायर्या विरज्येत स तु भवेज्येष्ठ ॥ इत्यत्र न रागं याति न मदनस्य वामेति इत्यनेनासाधारण एस्यों स्नेह निषियो दक्षिणस्येति, अवो वत्सराजादेराप्रबन्धसमाप्ति स्थित दाक्षिग्यामिति । पोइशानामपि प्रत्येक ज्येष्ठमध्यमाघमत्वेनायचत्वारिंभायवभेदा भवन्ति । 1 - स r " द्वितीय प्रकाश जो नायक एक ही नायिका के प्रति भासक रहता है, (स्वप्न में भी दूसरी नायिका के प्रेम की यात मही सोचता), यह अनुएल नायक है। जैसे उतररामचरित के रामचन्द्र अनुकुम शोदि के मायक है। इसका उदाहरण उत्तररामचरित का यह पवलिा जा सकता है --लौतामा प्रेम समय त्या दस दोनों दो अनस्यामों में एक सा है, उसमें कोई मी पर आया पद्दर दशा में एक-सा रहा है। सीता या बह मेन ददय को शान्ति देने वाला है, तथा प्रौदावरपा (पृद्धारस्य) के भाने पर भी उसकी सरसता में कमी नहीं दी है। अच्छे व्यक्ति का रेशा अच्छा करयाकारी प्रेम, जो समय के म्यतीत को पर, परिपक्व स्नेह में स्थित है, क्योंकि समय ने शेष के पर्दे को इदा दिया है, किसी तरह हो पार किया जा सकता है ? राहारी नाप के भदोपमेह को गाहो जाने पर यह प्रश्न उपस्थित हो सकता है । जाटिका (पाप नायर रसराज उदया आदिवा सि कोटि का माना होगा ! (घरसराज में कमी दक्षिणाव कमी शहर और भी धृष्टत्व पाया जाता है, शालिए एक हो गायर में मिल भदवाओं के पाये जाने से योविनिर्धारण के विषय में शङ्का उपस्थित होना सम्भव है। सीमा का उपर देते पुर प्रतिकार पनिक पड़ता है। रसावलानाटिका यादि के मापफ पसराज मादि का जब तक किसी दूसरी नायिका से प्रेम सही शे पास से मिलाही मागना होगा-(जैसे कामदेवपूजा तक वरसराज अनुकूल वाद का नायक ) उप्तके दाद मा नायिका से प्रेम को गाने पर यह पश्चिण बन जाता है। इस पर पूर्वपक्षी यह रक्षा कर सकता है, कि वत्सराज रिप-छिप कर पासवदत्ता का सिनिय करता है, तथा इसका पता पासपदाको पल जाता है वत्सराज को चाटाको प्रयट पो ही जाती , इसलिए यह शठ तथा क्यों ना घर देते दुए कृत्तिकार यादताकि दत्सराज को पाठ या भूत्र नहीं माना जा सकता । पचपि बरसराज रशावली ( सागरिका )से मेम करके वासवदक्षा का अपराध करता है, फिर भी सम्पूर्ण नाटिका में पसराज का म्यबदार अपनी श्येष्ठा नायिका मासवदत्ता के प्रति सहृदयतापूर्ण हो रहा इसलिए वह दक्षिण कोरि का ही नायक है। यदि इस विषय में पूर्वपक्षी की यह मापत्ति हो कि ज्येष्ठा मोर कनिष्ठा दोनों के प्रति नायक का लेइ हो। ठीक नहीं क्योंकि नामक का वास्तविक सइ पक से ही हो सकता है) हो ऐसा कहना ठीक नदी कि दोनों से स्नेद करने में शा विरोध नहीं दिखाई देता साथ ही महाकवियों ने अपो कायों में समी नायिकाओं के साथ दक्षिण नायक के एक से पनपातशय प्रेम का चित्रण किया है। इसका उदाहरण पद पद्य दिया जा सकता है- १ज किसी राजा के असर को पायुवी कला से अमरपुर पौराशि की स्थिति वर्णन भारता है, तथा राजा किस राजी के पर्श रात दिवाने, इस विषय में मादेश चाहता है। राजा नीचे की बात सुन कर दो तीन पडी तक किसी बात का निर्णय नहीं कर पाता, क्योंकि । यह दक्षिण प्रकृति का है, तथा उसका रवि सभी रानियों के साथ सहृदयतापूर्ण है। # फुन्त मेश्वर की पुत्री रजोदर्शन के बाद भाज शुद्ध हुई है, अत राजा का बड़ा जाना धर्मानुकूल है। बहराज की दिन की आज बारी है कि माप उसके यहाँ रानि बितायें। कमला ने भान की रात जुएं में जीत ली है और मप्रसन्न महारानी (देवी) की भी भाज सुश चरना है। जब बनाने की सारीमा जानकर मैंने अतपुरको रानियों के विषय में राजा से यइ अर्ज किया तो वे किंकर्तव्यविमूदासे होकर दो तीन पट्टी राक धुर से बैठे रहे। पाट्याचार्यभरत ने भी ज्येः (दक्षिण) नायक की परिभाषा यों निबद्ध की है- पेट गायक मधुर तथा लागोता है, यह राम (विश्य) में भासत नहीं होता, न कागदेव के १२० 1 1 दशरूपकम् वशीभूत ही होता है और सामान (निरस्कार) परने पर वह नारी (ज्येष्ठा नायिका) से विरक्त हो जाता है। इस परिमापा में 'पर राग में भासत नहीं होता, नामदेव के वश में ही होता। इसके द्वारा एक नायिका में दक्षिण नायक का असाधारण स्नेह का होना निषिद्ध किया गया है। इसलिये वरसराज उदयन पूरे काव्य (रत्नादली) में दक्षिण कोटिका नायक है। नायक पहले सोरह तरह के बताये गये। ये पिर ज्येष्ठ (हम), मध्यम वया अपम कोटि के मौहो सकते हैं मत इनके ४८ भेद हो जाते है। सहायानाह- पताकानायकस्त्वन्यः पीठमदों विवक्षणः। तस्यैवानुचरो भक्तः किश्चिदूनच उद्गुणैः ॥८॥ । प्रागुकासहितिवृत्तविशेष पताच तशायक पौठमर्द प्रपानेतियतनायकस्य सहाय, यया माम्तीमायवे मकरन्दा, रामायणे सुप्रीवः । काव्य में नायक के कई साथी व सहायक उपनिवद किये जाते हैं। इनमें प्रधान पताकानायक होता है। इसे पीठमर्द भी कहते हैं। पताकानायक चतुर तथा बुद्धिमान् होता है क्या प्रधान नायक का अनुचर तथा मक होता है। यह प्रधाननायक की अपेक्षा कुछ ही गुणों में कम होता है। कथावस्तु के भेद का वर्णन करते समय आधिकारिक तथा प्रासनिक दो तरह की वस्तु बताई गई है। इसमें आधिकारिक का नायक प्रधान नायक होता है। प्रासनिक के दो भेद-पताका व प्रकरी। इसी पताका नामक प्रासङ्गिक कथावस्तु का नायक पीठमई कदलाता रे सा रह प्रधान नायक का सहायक होता है। जैसे मालतीमाधव का मकरन्द तया रामायण का सपीद, जो क्रमश माधव व राम के सहायक है, तथा उनके गुणों की पुष्टि से कुछ ही कम हैं। सहायान्तरमाह- , एफविद्यो पिटश्याम्यो, हास्यथ घिदूपकः। गीतादिविद्यानां नायकोपयोगिनीनामेकस्या विद्याया वेदिता विट, हात्यकारी विदूषकः, अत्य विकृताकारवेषादित्व हास्यकारित्वेनैव लभ्यते । यथा शेखरको नागानन्दे विटा, विदूषक प्रसिद्ध एव । मायक के दूसरे भी सहायक होते हैं, इनमें विट पह है, जो किसी एक विद्या में निपुण होता है, और विदूषक नाटक का मजाकिया पात्र होता है। नायक के लिए उपयोगी गीत, नृत्य भावि विधाओं में से किसी एक विधाका जानने वाला विट तथा हास्यकारी पात्र विदूषक होता है। विदूषक के अजीब तरह के आकार व वेशभूषा हास्य के पैदा करने वाले हैं। नागानन्द नाटक का शेखरक विट है, विदूषक तो प्रसिद्ध है। र मृच्छकटिक में शकार का सार्थ दिन है (ओं वखन प्रकार के खिलाफ वसन्तसेनाको सहायता करता है), तथा चारदच का साथी मैनेय विदूषक है। अथवा से मेरे मन्दारवठी बलदत्त में विदूषक -'पहरण वेजराभो । इहिदक्खु मर- मुण्ठमीरिजुदंण शेण अम्हाण सम्बरोमाग । मासबभरतपाई गछावण क्तु वेजरामरस , .
द्वितीयः प्रकाश अर्थ प्रतिनायकः- सुन्धो धीरोदतः स्तब्धः पापरुज्यसनी रिपुः ॥ ६ ॥ तस्य नायकस्येत्यंभूतः प्रतिपक्षनायको भवति, यया रामयुधिष्ठिरयो रावणदुर्योधनौ । मापक की फलपाति में विश करने पाला, नायक का शत्रु प्रतिगायक होता है। यह मसिनापक होमी, धीरोदव, घमन्दी, पापी सपा म्पसनी होता है। उस नायक का 13 प्रतिनायक इन विशेषनाओं से दुक होता है। जैसे राम तथा युधिष्ठिर केशव समशः रावण तथा दुर्योधन है। अथ सात्विका नायकगुणा:-- शोभा विलासो माधुर्य गाम्भीर्य स्थैर्यतेजसी। ललितीवायमित्यष्टी साधिका पौरुपा गुणाः ॥१०॥ मायक में पुरुपरपयुक्त माठ सायिक गुणों का होना आवश्यक है। ये धाठ साविक शुपा है।-बारेमा, विलास, माधुर्य, गाग्मीय, स्थैर्य, तेग, ललित तया औदार्य । तब (शोभा यया)- नीचे घुणाधिके स्पर्धा शोभायां शौर्यदक्षते । नीचे घृणा यथा वीरपरिते- उत्तालताडकोत्पातदर्शनेऽप्यप्रकम्पितः । नियुषस्तत्प्रमाथाय सेणेन विचिकित्सति ।। गुणाधिक स्पर्धा यथा- 'एवां पश्य पुरः स्थलोमिह किल कीडाकिरातो हर कोदण्डेन किरीदिन। सरभर्स चूदान्तरे ताडितः। स्याकये कथाद्धतं हिमनिघायदी सुमद्रापते. मन्द मन्दमकारि येन निजयोदोर्दण्डयोमण्डलम् ।। शौर्यशोभा यया ममैव- 'मग्नः स्वैरपि सन्यतामचरणो मूविरामक्षणे स्वाधीनमणिताशननिचितो रोमोवम धर्मयन् । भमानद्वलयभिजान्परमटान्सन्तर्जयनिष्ठुरं धन्यो घाम जयत्रिया पृथुरणस्तम्मे पताकायते।। दक्षशोभा यथा धीरचरित- ' स्फूप्रसन्ननिर्मितमिष प्रादुर्भवायमतो रामस्य त्रिपुरान्तकृतिषिपर्वा तेजोभिरिद्धं धनुः । १. [जेले प्रतिनायक शुम्म देख (मेरे 'शुम्पवयम्' महापाप में) सी प्रकार को विशेषतामों से एक- माक्प्रत्यगुप्तरदिशा मशिगस्या भनन् निमाय समरेस महेन्दश्चः। धके कुचीयभूमः करजेश्च पाते रापाटितान् पद्धवरः मुरवे व तासाम् ।। (३) धर्य इति पालन्तरम् । (३) 'सत्वया' इति पालन्तरम् । । - । दशरूपकम् शुण्डार पठभेन यद्वदवले यत्सेन दोर्दण्डर- 11 3 स्तस्मिनाहित एव गणितगुण कृष्टं घमा च तत् ॥' शोभा नामक साविक गुण यहाँ होता है, जहाँ नायक में शौयं सया दपवा पाई जावे तथा नीच व्यक्ति के प्रति घृणा य स्वयं से रुधिर व्यक्ति के प्रति स्पर्धा - पाई जाती हो। । . का पद्य है। m जैसे महावीर चरित के नायक रामचन्द्र में नीच के प्रति घृणा पाई जाती है। ताह के पेड के समान ऊँची ताइका के उसाव को देख कर मौ रामचन्द्र कम्पित व मयमीन न हुए। फिर भी उसे मारने के लिए नियुक्त होने पर ताटका के सी होने के कारण ये कुछ विचार करने रगे। दूसरे के अधिक गुणों को देखकर उसके प्रतिस्पर्धा होना भी नायक का शोमा नामक सात्त्विक गुण है। उदाहरण के रूप में यहाँ महादेव के, अर्जुन गुगों से प्रमावित होकर उससे स्पर्धा करने से सम्बद्ध निम्न पथ लिया जा सकता है। 'स सामने की स्थली को रा गौर से देखो। यही वह जगह है, जहाँ अर्जुन (किरीटी) ने धनुष के द्वारा हीला से मील बने हुए महादेव के सिर को तेजी से चोट पहुँचाई थी।' हिमालय में इस प्रकार की-मुभद्रा के पति अर्जुन की अद्भुत कथा सुनकर जिन महादेव ने अपनी दोनों भुजाओं को धीरे धीरे मण्डलाकार घरके सहलाया-(उनकी जय हो)। जहाँ नायक में अतिशय वीरता पाई माय वहाँ शौर्यशोमा होगी, जैसे चिकार धनिक का स्वयं का यह पच । नायक रणस्थल में बुरी तरह घायल होकर गिर पड़ा तथा मूच्छिन हो गया है। किंतु मूछों के समान होते ही वह फिर से रणस्थल में था जाता है, इसी विषय यद्यपि उस दौर के पैरों के अप्रमाग अपनी ही अनादियों से बंध गये है, फिर भी मूच्या के समाप्त होते ही वह उठ रादा होता है। उसका शरीर घावों से तथा उनमें लगे शसों से परिपूर्ण है। वीरता का सवार होने के कारण उसके रोग: सड़े हो गये है, जैसे उसने रोमो फा कवच धारण कर लिया है। हारे हुए अपने सैनिकों को बद फिर से जोश दिला रहा है, तथा शत्रु-सैनिकों को निष्ठुरतापूर्वक फटकार रहा है। वह जयरमी का निवासस्थान (अथवा जयरमी का रोनरवरूप) उत्कृष्ट वीर पप है, जो इस महान् युद्धस्थल के स्तम्म पर पताका के समान फहरा रहा है।' मायफ में चतुरता का पाया जाना एक सात्विक गुण है तथा इसका समावेश भी शोमा में ही होता है । दक्षशोमा जैसे वीरचरित के राम मै- । 7 समस्त देवताओं के से समिड, त्रिपुर नामक दैत्य का मन्त्र करने वाला, शिव का पिनाक धनुष-जो मानों हजारों कडकड़ाते बोर वज्रों से बना हुआ है-राम के सामने प्रकटित होता है (राम के सामने पढ़ा है । वत्स राम ने उस अचल धनुष पर रसी सरए अपना हाथ रखा, जैसे हाथी का बच्चा संट रखता है, और सशद प्रत्यक्षा वाले एस धनुष को सेवा तथा तोड डाला। प्रय पिलास'- प्रति सधैर्या दृष्टिय विलासे सस्मित पचः ॥ ११ ॥ १ दशलककार धनजय व उनके भाई वृत्तिकार पनिक दोनों धाराधीश मुज के समा पणित थे। सम्भवत पनिक ने इस पत्र में मुज को ही वीरता का वर्णन किया हो। 7 - द्वितीयः प्रकाश - . PRI मुक्त - । यथा- दृष्टिस्तृशोहतजगत्रयसत्यसारा धारोद्धता नमयती गतिर्धरित्रीम् । कौमारनेऽपि गिरिवरगुरतो दयानो पीरो रसः, किायमेस्युत एव ॥ नायक का दूसरा साविक गुण पिटास है। विलास नामक साविक गुण पद है, जाय नायक में धैर्ययुक्त सटि तथा धर्षयुफ गति पाई शाय, पूर्व उसकी याणो मिति से हो। उतररामचरित में चन्द्रदेतु लव यो देशकर उसको गति तथा वृद्धि के विषय में दर्शन माता कहता है:- न जर पर देखना है तो ऐसा मान पटवारे से इसकी नमाने नीनों सपा को वीरता को तुन्य समहा रवाया है। इसकी धार और हरन नाल औसे पृथ्वी शेगी मुका देती है। वैसे तो यह मुगाररावस्था में हो, पिर भी पदाह के समान गुरुत्व पारण दिये हुए है। इसे देखकर सा सन्देह होता है कि यह स्वयं वीर रस ही आ रहा है, या स्वय मूर्तिमान दर्पा श्रय मापुर्यम्- श्लफ्णो विकारो माधुर्य मंझोमे सुमहत्यपि । महत्यपि रिकारहेती मधुरो विरारो माधुर्यम् । यया- 'क्योले मानश्याः करिबलभदन्ततुतिमुपि।।। हमरस्मेरं गण्डोहमरपुलकं धकनकमलम् । मुहुः पश्यञ्चश्वरजनिचरसेनापलरल अठाहन्यि ददति रघृणा परिद ' नायक का तीसरा साविक गुण गाधुर्य है। जप यदुत थो गोभ के होने पर भी भामूली सा विकार गायक में पाया जाय, तो यह माधुर्य पहलाता है। असे गाये के पक्ष में परदूषण के युद्धार्थ उपस्थित होने पर भी समय में बहुत ज्यादा पिकार नहीं पाया जाता। उनमें बहुत धोडा विचार मा है, यह इस पद के बारा दनित होता है। रघुकुल के नायक रामचन्द्र दायों के बच्चे थे. पोमल पति की पान्ति बाले, जानकी के अपोल में, गुस्तफराते ए तण रोमाथित गण्डापल घाले अपने मुखकमले को गर भार देखते हुए तथा राइसों की सेना के कोलाहल को मुनते दुर; अपनी जटाओं के मूढेको छ अथ गाम्भीर्यम्- गाम्भीर्य यत्प्रमावेन धिकारो नोपलक्ष्यते ॥ १२॥ विषारोपलम्भाद्विपारानुपलन्धिरन्येति माधुर्यादन्यद्वाम्भीर्यम् । 'यथा--12271115"f 'आहूतस्याभिषेकाय विसृष्टस्य बनायचा. में मया लक्षितस्तस्य स्वल्पोऽप्याकारविभ्रम ।' गाग्मीर्य नायक का यह सात्विक गुण है, जथ विकार के महान हेतु के होने पर भी उसका कोई प्रभाव नहीं पड़सा, अथ युष भी विकार दिखाई नहीं पड़ता। -- जा: . । ६ ४ २ दशरूपकम् माधुर्य तथा गाम्भीर्य दोनों गुण एक इसरे से मिन्न है। माधुर्य गुण में विकार भवाय पाया बाता है, यह दूसरी बात है कि हाबड़ा कोमल होता है। गाम्भीर्य गुण में विकार का सर्वथा अमाव होता है । गाम्भीर्य गुग के उदाहरण के रूप में रामचन्द्र के विषय में कहा गया यह श्लोक दिया जा सकता है। बस उन्हें अभिषेक के लिए मुलाया गया तर और जब उन्हें वन के लिए विदा किया गया तर, दोनों वक्त मैंने उनके ( राम के चेहरे पर कोई मी (सोड़ा सा मी) विकार नहीं देखा। अप स्यैर्यम्- व्यवसायादचलनं स्थैर्य विनकुलादपि । यथा पौरचरिते- "प्रायश्चितं चरिष्यामि पूज्यानी दो व्यतिकमात् । न त्वं दूपयिन्यामि शत्रप्रहमहामतम् ।' यै वह साविक गुण है, पर नायक भनेको दिनों के होने पर भी उनमे उबळ नहीं होता हो, वह अपने व्यवसाय (मार्ग) से कभी भी विचलित नहीं होता हो। जैसे महावीर चरित का यह पय स्थैर्य का म्यजक है। मैने आप से पूज्य लागों की अवहेलना की है, अत में प्रायश्चित करूगा । मैं राममहण के रहे इन को इस तरह दूति नहीं करूंगा। अथ तेज'- अधिनेपाघसहनं तेजःप्राणात्ययेवपि ॥१३॥ 'पूत नूतनकूप्माण्डफलानों के भवन्त्यमी । अहुलीदर्शनाद्येन न जीवन्ति मनस्विन' ।' तेज नामक साविक गुण वह है, जब माया तिरस्कार आदि को मरते दम तक नही सहे। बैम, बताभो तो सही कितने लोग ऐसे है, जो नये कुम्हरे के फलों की तरह है। मनस्वी व्यक्ति दूसरे लोगों के अंगुलीदर्शन आदि इशारों नही जीते हैं। प्रय ललितम्- काराकारचेप्यात्वं सहज ललितं मृदु । स्वामनिक भारो मूड, तथाविधा ङ्गारचेच हलितम् । यया- स्या ममैव- 'लावण्यमन्मयविलासविजृम्भितेन स्वामाविकेन सुकुमारमनोइरेण । रियाममेव सखि योऽपि ममोपदेया , तस्येव किंम विषम विधीत तापम् ।। स्थामाविक कोमलदा से पुकारपरक पेष्टाओं कामायक में पाया जाना, ललित भायक साविक गुण कहलाता है। स्वाभाविक मार कोमल होता है, समाविक रहारी चेष्टा ही हरित नामक सास्तिक गुण है। असे प्रतिकार का स्वर्व का निम्मोक पच नायक के सलिन नामक गुण का भि 1 द्वितीयः प्रकाशः हे सरि, गन्दाता तथा कामविलास से युक्त, घाभाविक कुमारता तथा मनोहरता वाले उस नायक के द्वारा मेरेदोक्या सदो उपदेश देने वाले के भी हदय में विषम तार नहीं किया जा सकता है क्या याद उसका लापश्य, उकुमारता तथा मनोहरता ऐसी है कि वह मेरेही 1 कामजन्य ताप उत्पन्न नहीं करता, पस्कि किसी भी देखने वाली रमणी के इसी प्रकार का वाम कर सकता। थयौदार्यम्- प्रियोक्त्या जीविताहानमीदार्य सदुपमहः ॥ १४ ॥ प्रियदयनेन सहा जीवितायधेदनिमौदार्य सतानुमत्य । यथा नागानन्दे - "शियमुखः स्यन्दत एव रकमयापि देहे मम मौसमस्ति । एप्ति न पश्यामि तवैव तावकि मक्षणाय पिरतो गात्मन् ॥' सदुपमझे यया- 'एते वयममी पाराः कन्येय कुलजीवितम् । पूत येनार या कार्यमनास्या पापस्तुपु ।' जहां भापक प्रिय वचनों के m माण राक देने को मरतन हो, तथा सग्मन व्यक्तियों को अपने माधरण से अनुकूल बना ले,पहा उसमें औदार्य साविक गुण मामा जाता है। इसका उदाहरण नामानन्द नाटक से जीमूनवाइन के रूप में दिया जा सकता है । जीमून- माइन के औदार्य की म्याना इस पद से हो रही है- 'हे गरड, ममी भी मेरो नसों के किनारों से खून टपक हो रहा है, भभी भी मेरे शरीर में मांस मचा हुआ है, तुम मी ममी तृप्त नहीं हुए दो, ऐसा मेरा भन्दाआ। फिर क्या कारण है कि तुम (मुझे) साने से एक गये दो।' - सजनों के अपने अनुकूल बनाने का (सर्पग्रह का ) उदाहरण यों दिया जा सकता है। ये हम, यह हमारी पत्नी और हमारे कुछ का प्राण यह लड़की, इम समी गाय वस्तुओं के प्रति विरक है (माम मातुओं में कोबाया नहीं रखते , जिस किसी से तुम्हारा काम . , नायक के वर्णन के साथ ही साय नायिका का वर्णन मी प्रमगोपात्र उसका विवेचन करते:- अम नायिका स्वान्या साधारणस्त्रीति तद्गुणा नायिका निधा। सद्गुणेति । अयोपसम्मवे नायकसामान्ययुगयोगिनी नायिकेति, स्वस्त्री, परखी धारणनीस्पनेन दिमागेन त्रिधा ।। गायिका नायक के ही सामान्य गुणों से पुरू होती है। यह पौन वाह की होती है-स्वकीया, अन्या (परकीया), सथा साधारण स्त्री। (स्वीया जैसे उत्तररामचरित को सोता; साधारण श्री जैसे गुचकटिक की वसन्तसेना, परकीया का वर्णन काम्या व नाटयों में गोरस पो भालमन के रूप में नही किया जाता। से संस्कृत के कर मुक्तक परों में कावित्रण पाया जाता है। जैसे, वानोरकुलाहानशकुनिकोलाइस मण्वन्त्याः। गृहकपातायावाः सीदन्ति भगानि) t द्वितीयः प्रकाश । मुग्धा नववयःकामा रतौ घामा मृदु अधि । प्रथमावतीर्णताहण्यमन्मया रमणे वामशोला मुखोपायप्रसादना मुग्धनायिका । मुग्धानायिका भवस्था तथा वामवासना दोनों में नई रहती है, रति से यह पाम रहती है अर्थात रति से कतराती है तथा नायक से मानादि में क्रोध करने में भी कोमल होती है। मुग्धानायिका पद है जिसमें गौवन तथा काम दोनों का पहला आदिमाय पाया जाता है, जो सुरतकोहा से डरती है तथा इसे सरल दर से खुश की जा सकती है। सन्न वयोमुग्धा यया- 'विस्तारी स्तनभार एष गमितो न स्वोचितामुमति रेयोनासिकृतं चलित्रयमिदं न स्पष्टनिनोनतम् । मध्येऽस्या परशुरायतामपिशा रोमावली निर्मिता रम्य गोयनशिपव्यतिफरोन्मिभं पयो पर्तते ।।' वयोमुग्धा का उदारण यों दिया जा सकता है। नायिका बय सन्धि की अवस्था में है। इसी घय सधि का वर्णन करते हुए कवि वहताकि नायिका की यौवन तथा शिव के परस्पर मिश्रण से उत्पन्न अवस्था मही मुदर।सका स्तनमार बढ़ रहा है, किन्तु अभी अपनी उचित क्षति को नहीं प्राप्त हुआ है। रेखाओं के द्वारा प्रकाशित निम्नीमत ये तीन रेखाएँ (विवलि अभी स्पष्ट नहीं दिखाई पड़ रही है। इसके मध्यमाग में लग्यो तथा भाषी भूरी कोमल रोमवाली बन गई है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि नायिका इस समय वय सन्धि में वर्तमान है। यथा च ममैव-- . 'उच्चसन्मण्डलप्रान्तरेखमायकमलम् । थपर्याप्तमुरो मृद्धेश सत्यस्या स्तनद्रयम् ॥' वर्षामुग्धा का दूसरा उदाहरण शिकार धनिक स्वयं अपना पच देता है- 'इस नायिका के स्तनों की प्रान्तरेस गोलाई के फूलने से स्पष्ट दिखाई पड़ रही है, तथा वे कली के समान भरेर एवं बंधे हुए है। स्तनों को यह अपर्याप्त अवस्था इस नायिका की उर म्पल वृद्धि की सूचना देती है।' फाममुग्धा यथा- 'दृष्टि सालराता निभात न शिशुनीडासु वादरा श्रोत्रे प्रेषयति प्रवर्तितसखीसम्भोगवातास्वपि । पुंसामलमपेतशकमधुना नारोहति प्राश्यया थाला नूतनयौवनव्यतिकरावटभ्यमाना शनै । (काममुग्धा) मुग्धा माविका फायवासना एवं कामसम्बन्धी विचारों के विषय में भी मुग्ध (अनमिन-सी, मौली एती है। जैसे निम्न पद्य मैं नायिका धीरे-धीरे यौवन में पदार्पण कर रही है ।। वह बचपन की घेटाों को छोड़ रही नायिका को इस वय सन्धिमय अवरमा में होने वाले मनोविकारों का कवि ने बड़ा सुन्दर वर्णन किया है। रसकी नजर पहले बड़ी चमक थी, लेकिन अब वह अलसाई-सी मजर भाती है (उसकी 1 - 1 + 1 पशरूपकम् इष्टि ने भल्सना धारण कर रक्सी है)। पहले बचपन में, वह छोटे बचों के खेलों से आनन्द प्राप्त करती थी, लेकिन अब छोटे बच्चों के खेलों में वह कोई दिलचस्पी नहीं लेती। वयस्क त्रियों की बात सुनने में पहले उसे कोई मजा नहीं माना था, लेकिन अब अपनी सखियों को सम्भोग की बात करते सुन कर वह अपने कान उन बातों की और गाठी है। सम्मोग की बातों को सुनने में अर उसे कुर-कुछ दिल वस्त्र होने लग गई है। बची होने पर वह रिना किसी हिचक के पुरुषों की गोद में बैठ जाया करती थी, लेकिन सब पहले की तरह पुरषों को गोद में नहीं बैठती। नि मन्देह यह राला धीरे-धीरे नवीन यौवन के भाविर्भाव से युक्त हो रही है। रतवामा यथा- 'व्याहता प्रतिवचो न सन्दधे गन्तुमैच्छदवलम्यितांशुका । सेवते स्म शयन पराहमुखी सा तथापि रतये पिनाकिन ॥' (रसवामा) मुग्धा नायिका मुरतोगसे प्रोडरती है। यही कारण है कि वह सुरत के समय सदा वामवृति का माचरण करती है। इस उदाहरण प्रतिकार पनिक कुमारसम्भव के अष्टम सर्ग से, शङ्करपार्वती सम्भोग वर्णन से दिया है। बब शङ्कर उससे कुछ कहते थे, तो पार्वती कोई भी जवाब नहीं देती थी। जब वे उसे विठाने को या भानिङ्गन करने को उसबा वक्ष पक्ह लेते थे, तो वह जाने की कोशिश करती थी । शकर के साथ एक ही शस्या पर सोने पर भी बद दूसरी ओर मह करके सोती पी। इस प्रकार वामदत्ति का आचरण करने पर भी पार्वती शकर को अच्छी लगती थी तथा तन में रति की वृद्धिही करती थी। मृदु' कोपे यथा- 'प्रथमननिते वाला मन्या विकारमजानती क्तिवचरितेनासज्याहे विनम्रभुजैव सा । चियुकमलिक चौन्नम्योचैरकृतिमविभ्रमा नयनसलिलस्यन्दिन्यो रुदन्त्यपि चुम्बिता ।' (कोपमृदु) मुग्धा नायिका पति के अपराध करने पर भी उस पर गुस्सा करना नहीं जानती और अगर कही वह गुस्सा करती भी है, तो उसका गुस्सा बदा इलका होता है, उसे भासानी से सुश किया जा सकता है। मुग्धा को इसी विशेषता को स्पष्ट करते हुए निम्न उदाहरण दिया T जा राकताहै- - नायक ने किसी दूसरी नायिका के पाम डाकर अपराध किया है। मपराध करके वा प्रथम नायिका के पास आवाजो मुम्पा नायिका है। इस यकस नायिका को नायक पर गुस्सा तो भा रहा है, लेकिन इस गुस्मे के पहले पहल आने के कारण वह यह नहीं जानतीकि इस गुस्से को किन विकारों से प्रकट किया जाय। यह नायिका इतनी मोटी किकरा मान के अम्मों का प्रयोग करना उसने अभी सीसा हो नहीं है। स्वर नायक कोलना तो पता चल गया है, कि नायिका ने उसको मन हरकतों को इरा समय है,खसके दिल में कुछ कुछ गुस्सा भी है। इस गुल्मे को खतम करने के लिए वह धून नायक, बदा नम्र होकर उसे पोद में बैठा लेता है, तथा उसकी छुट्टी और दाणे को ऊंचा कर लेता है और -- द्वित्तीय. प्रकाशा उस स्वाभाविक विलास वाली रोती हुई नायिका के मासुभी से भोगे हुए अधर भोष्ठ को चूम लेता है। एवमन्येऽपि लमासंतानुरागनिबन्धना मुरधान्यवहारा नियन्धनोया, यया--- । 'नमध्ये संस्कार कुसुममपि याला विषहते न नि बास सुधूर्जनयति तरङ्गन्यतिकरम् । नवोढा पश्यन्ती लिखितगिव भर्तु प्रतिमुख मरोहदोमाया न पियति न पार चलयति । इसके अलावा गुग्धा की दूसरी गृहारी चेष्टा, जो उसके लल्जा से ढंके हुए अनुराग की घोतक है, करियों के द्वारा वशित की जानी चादिए। यो ला के कारण आपूत अनुराग को अभिष्पजना मुग्धा नायिका में दारी. किस तरह की जा रही है, इसका वर्णन एक कवि ने किया है। नायिका नबोला है, अभी अभी विवाद के बाद नायक के पर आई है । एक और वह राग के कारण पति को देखना चाहती हैदूसरी और सज्जा के कारण अपनी उत्सुकता को विपाती है। इसीका वर्णन यहाँ किया गया है।माविपालिसी पात्र से पानी पी रसीद,(अथवा जोधुपान र दी है), समीपस्थित नायक के मुख की परमार उस पार पर पड़ रही है तथा पेय पदार्थ में उसका प्रतिबिम्ब दिवाई दे रहा है। नायिका उसे एकरप देखती है। पर मायक मी नायिका के समीपस्य होने के कारण अनुरागवश स्तब्ध हो रहा है, मत. तसका प्रतिविम्त ऐसा प्रतीत होता है जैसे चित्रित को मोति घालवाहीन । नायिका में राग की भावना बद्ध होने कारण उससे रोगाश्च सटे हो गये है, तथा नायक के प्रतिबिम्ब को देखने में वह इतनी तरलीन है कि बीच में फूल जैसी छोटी सी वस्तु से रिन को भी ददाश्त नहीं कर सकती। उसकी साँस एक गये है, यह निश्याप्तौ के द्वारा रौ को शोभा को सष्टि भी नहीं कर पाती है, क्योंकि नायिका में सम्म नामक साविक भाव की उत्पधि हो गई है। पेय पदार्थ के पौने या पानपात्र के दिलाने मुलाने से नायक के मुख के प्रतिविद का भोपाल हो जाना जरूरी है, इसलिए पहन तो पीती ही है, न पान को दिलाती है। मध्योधघोषनागला मोहान्तसुरतक्षमा ॥ १६ ॥ सम्भाप्ततारण्यकामा मोहान्तरतयोग्या मध्या । तर यौवनवती यया- 'थालापान्धविलासो पिरलयति ससदाहुविशिषियातं नीतीप्रन्यि प्रविना प्रतनयति मनाङ्गप्पनिलो नितम्म उखुप्पत्पाईमूत्चशिरारम्रो नूनमन्त स्मरण स्पृष्टा पोदण्दयोव्या हरिणशिशुशो दृश्यते यौयननी ॥ कोपा नायिका का दूसरा भेद मन्या है। मध्या में पौवन कामवासना प्राप्त हो चुकी होती है, वह पीयन व कामवासना दोनों की रष्टि से पूर्ण रहती है। सभा सुरतमोडा को यह मोद के अन्त तक सदन कर सकती हैं। ठीक इसी से मिलता जुलता भार तुलसा ने मा विनाली में नियमसिया है- 'रामको न जानकि कपन नमानी परधाड़ी। या ते स स भूलि गरेर पीरो छ यरत राहा अपमध्या- 1 दशरूपकम् (यौवनवती मध्या) कामदेव ने सचमुच ही अपने धनुष के किनारे से हम हिरन के बच्चे के समान माँस वाली नायिका के यौवन की काति को छू दिया है, ऐसा माराम पडता । पाल यही बातें बनाती थी, पर अब इसकी बातें कम हो गई है, जैसे इसके भौहों के विलास ने इसके बालाप-प्रलाप को कम कर दिया है।जा यह चलती है, तो इसकी चाल सुन्दर देग से हाथ के मकाने से मशोभित रहती है। इसकी कमर (मध्यभाग) बड़ी पतली है और इसके पुढे (नितम्ब) बड़े भारी) ये नितम्ब अपो भारीपन के कारण नौतीको ग्रन्थि को पड़ा पतला बना देते है। इसके मोटे मारी नितषों के भागे नौवी की प्रथि पड़ी पतली नजर आती है। इसके पक्ष स्थल के दोनों किनारे (दिन व दिन) पुष्पित होते जा रहे अर्थाद इसका उर' स्थल दोनों घोर से बदता जा रहा है, तथा उसमें कुचों थी अमिरि हो रही है। नायिका कोस दशा को देसकर ऐसा जान पड़ता है कि वामदेव ने अपने धनुष से इसकी योपन या को छू दिया है। इससे यह भी न्याय प्रवरित होता है, कि नायिका को देखते हो कामोद्दीपन हो जाता है। पामवती यथा- 'स्मरनवनदोरेणोढा पुनर्गुरुसेतुभि- यदपि विभूतास्तिष्ठन्यारादपूर्णमनोरया । तदपि लिखितप्ररयर परस्परमुन्मुखा नयननलिनीनालाकृष्ट विषन्ति रस प्रिया ॥" (कामवती मध्या) यौरनमती मध्या नापिकाओं में कामसम्बपी विभित्र प्रकार के मनोरथ उत्पन्न हो रहे है। ये अपूर्ण मनोरथ कामदेव की नवीन नदी के चढाव आने के कारण उस चदाव के द्वारा दूपते उतराते दृष्टिगोचर होते है । नायिका एना अदि कई प्रकार के पढे गड़ सेतों के द्वारा कामदेव की नदी के प्रकार कीरोन कर हन मनोरों को गाँध दारा नियमित कर देती है। इस प्रकार नियमित किये जाने पर भी ये मनोरथ नहीं मानते, और मध्या नायिका की चेष्टाओं में इसको ब्याना ही हो जाती है, कि वे कामवासना से युक्त है। ये नायिकरि पैसे लज्जादि के द्वारा मभौरयों को नियमित र देती हो, फिर मास्तम चित्रलिखित से) अपने अङ्गों के दारा एक दूसरे को और उन्भुरा होकर (नायक का दर्शन करती हुई नायक दर्शनरूप रस का पान इसी तरह करती है, मानो नेत्ररूपी कमल के बालों से उसके रस को खीचकर पा रही है। (इसिनी नरिनौनाल के रस का पान किया करती है, गध्या नायिका नजरों से प्रीतम के दर्शन रूपो रस का पान करती है, इस प्रकार यहाँ इंसिनी व नायिकाओं का उपमानोपमेय भाव भीम्यंग्य है।) मध्यासम्भोगो यथा- 'तान चिन रहसमए गदिलाण विन्भमा विराति। जाद कुवलयदलसच्छहार मउलेति मगाइ ।' (तावदेव रतिरामये महिलानां विग्रमा विराजन्ते। यावल कवल्यदल्स्वधामानि मुकुलयन्ति नयनानि ॥') एवं धौरायाधीरायो धीराधीरायामप्युदाहार्यम् । १ T -- + द्वितीय प्रकाश. १०१ (मोहान्तसुस्तक्षमा मध्या) रति के समय स्त्रियों को शृङ्गारचेगा तभी तक सुशोभित होती है, जब तक कि कमलों के समान वय काति वाले उनके नेत्र मुकुलित नहीं हो पाते । इसी तरह मध्या के कोप सम्बधी उदाहरण दिये जा सकते हैं। कोप के समय मध्या के धीरा, अधीरा तथा पौराधीरा ये तीन रूप पाये जाते हैं। ध्यान रसिये कोपेमृदु ' तथा 'मुखों पायप्रसादना होने के कारण मुग्धा नायिरा में इस हा के बोई गैद नहीं पाये जाते।) अथास्मा मानत्ति:-- rl धीरा सोत्पासपकोक्त्या, मध्या साधु कृतागसम् । पदयेद्दयितं फोपाधोरा परुपाक्षरम् ॥ १७॥ नायक के अपराध करने पर (अन्य नायिका से प्रेम करने पर) धीरा मध्या ताने सुनाकर उसका दिल दुखाती है, धीराधीरा मन्या रोतीभी है, साथ ही साने भी सुनाती है। तीसरी कोटि को अधीरा मध्या रोती है तथा नायक को फड़े पचन सुनाती है। मध्याधीरा फुत्तापराचं प्रिय सोमासवनोपल्या खेदयेत् , यया माधे- 'न खलु ययममुष्य दानयोग्या पिवति च पाति च यासको रहस्त्वाम् । मज विटपममु पदस्य तस्यै भवतु यत सदशोधिराय योग । मध्याधीरा) मध्यापारा वापराप मिग को ताने मारती है। जैसे शिशुपालवध के सातवें सर्गका निम्न एम 'किसी नायक ने अन्य नायिका से प्रेम करके तथा उसके पास रात्रियापन करके अपराध किया है। वहाँ से लौटने पर ज्येमा गायिका को पास आपर यह उसे सुश करने के लिए, पछय (किसी सटा का कोमल पत्ता) उसके प्रसाधनार्थ देना चाहता है। नायिका उसे ताना मारती हुई कहती है --कीजिये, श्म इस पछवदान के उपयुक्त पात्र नहीं है। जो कोई 'तुम्हारी प्रिया हो, जो एकान्त में तुम्हारा पान (चुम्बन ) करती हो, मया (प्रेम करके। तुम्हारी रक्षा करतो हो, जारये, उसे ही यह पळव (विटम) अथवा यह भूतारो रसिक वो विटों की रक्षा करता है-सौपिये। ताकि रम से पम दोनों समान गुण वालों का योग हमेशाके लिए दो भाय। यह पुग्दारी प्रिया तुम जैसे विटों का पान मारती है तथा रक्षा करती है, इसलिए 'चिटप' है, और इधर यह पल्लव भी 'विटप दे तो क्यों न दोनों विटपों का योग करा देते हो। (यहाँ 'चिटप शम्न में इलेष है-जिसका अर्थ पव, नथा यामी रसिक व्यक्ति (छैला) दोनों होता है। घोराधोरा साश्च सोत्प्रासवमोक्त्या खेदयेत् , यथाऽमशतके- 'बाले नाय विमुष्ट मानिनि रुप रोपामया किं कृतं खेदोऽस्मामु न मेऽपराम्यति भवान्सर्वेऽपराधा मयि । तस्कि रोदिपि गद्देन पचसा कस्याप्रतो त्यते नन्वतन्मम मा हामि दयिता नास्मीत्यतो त्यते । (धीराधीरा मण्या) Fधीरा मध्या एका मोर रोती है, साथ ही नायक के दिल को ताने मनावर मी दुसाती है। जैसे अपरकशतक का यह प्रसिद्ध पर- . १ -- १०२ दशरूपकम् " नायक बय नायिका से प्रेम करने के कारण अपराधी सिद्ध हो चुका है। जब वह घर पर आता है तो ज्येष्ठा नायिका को मान व रोख से युक्त पाना है। उसे मनाने के लिये वह कुछ कहना चाइना है इसलिए उसे वेवल सम्बोधित करता है बाले'। इसके पहले कि यह कुछ कर पाये नायिका-मया कहना चाहते है-इस बात की पाना कराते हुए केवल 'नाय' इस प्रकार जवाब देती है। यहाँ यह भी प्यग्य है कि अर आप मुझसे प्यार नहीं करते है इसलिए में आपको मिय' कहते कुछ हिचकिचा रही हैं। हाँ मैं आपकी दासी हूँ और आप मेरे स्वामी । इस पर नायक दहता है-'मानिनि, रोष को छोड़ दो। शेष करके मैंने क्या किया है-व्यग्य है इससे तुम्हारा क्या बिगडा है।' 'तुम्हारे रोष करने से हमें दुःख हो रहा है। 'भापने मेरा कोई अपराध नहीं किया है, सारे अपराध मैने होतो किये है। अब नायक कुछ उत्तर नहीं दे पाता, तो कहता है-'तो पिर तुम गद्द वचनों से क्यों रोती हो। मैं किसके आगे रो रही हूँ।' 'यह मेरे स मने रो रही हो ना!' 'मैं तुम्हारी क्या हूँ।''प्रिया' 'नहीं, मैं तुम्हारी प्रिया नहीं हूँ। इसीलिए तो रो रही हूँ।', अधीरा साधु परुपाक्षरम् , यथा- 'यातु यातु किमनेन तिष्टता मुंच मुच ससि मादर कृथा । खण्डिताधरकलकित प्रिय शक्नुमो न नयननिरीक्षितुम् ॥' (अधीरा मध्या) भधारा मध्या एक और रोती है, दूसरी ओर अपराधी नायक को क्टूक्ति मी मनाती है। जैसे निम्न पच में- नायक अपराध करके नायिका के पास लौटा है औराकर नायिका को प्रकुपित देखता है। उसे मनाने के लिए बडो कोशिश करता है, पर वह प्रसन्न नहीं होती। अन्त में, लाचार होकर बह वापस लौट रहा है। इधर नायिका की सखियों दोनों में समझौता कराना चाहती है। ये लौटते हुई नायक से रुकने के लिए मिन्नने करती है। नायिका रेसे मौके पर सखियों से पाइ रही है। इसे माने दो। इसके ठहरने से क्या फायदा है । हे सखि से छोड क्यों नहीं देती। इससे ज्याश मिन्नने मत करो। ओ प्रिय दूमरी नायिका के दन्तक्षत अरसे कलहन हो चुका है, से हम माँखों से देखने में असमर्मा है-उसे हम देख भी नहीं सकती, प्रेमालाप परतिकोड़ा करना तो दूर रहा एवमपरेऽपि मोडनुपहिता स्वयमनभियोगकारिणो मध्याव्यवहारा भवन्ति, यया- 'स्वेदाम्भ कणिशचितेऽपि चदने जातेऽपि रोमोदमे विशम्भेऽपि गुरी पयोधरमरोस्कम्पेऽपि वृद्धि गते । दुर्वारस्मरनिर्भरेऽपि हृदये नैवाभियुच प्रिय- स्तन्वनया हटकेशकर्षणघनाश्लपामृते लुब्धया। स्वतोऽनभियोजकत्व हटकेशकर्षणपनाउषागते लुधयेत्युत्प्रेक्षाप्रतीते । मध्या नायिका के इस तरह के म्यवहार काव्य में उपनिर होते हैं। ये व्यवहार लज्जा भादि से निपे नही रइटे ( क्योंकि यह पात मुग्या में पाई जाती है तथा इनके द्वारा मायिका सपं नायक को अपनी और मर करती है।' सयमनमियोगकारण = सुरतेस्वकीय-( मध्या) प्रदृश्यप्रयोजका,प्रियस्वयमेव मुरते atar समीहने मध्येनिभाव । (सुमनाचार्य प्रभा टीका) . . h द्वितीयः प्रकाशः मध्या नायिका के इन व्यवहारों में से एक नित्र उपस्थित किया जाता है। नायिका के सम्मुख नायक मौजूद है। नायक के समीपस्थ होने के कारण कामवासना तीन रूप से उसे सता रही है। पर वह यह चाहती है, कि नायक स्वयं रविनोदा में प्रवृत्त हो। इसलिये स्वयं प्रिय के प्रति कोई शहारी चेष्टा नहीं करती है कामोद्दीपन के कारण नायिका के मुल पर पसीने को मुर्दे शलक आई है, तथा उसके रोगटे राड़े हो गये हैं। उसे बहुत ज्यादा सम्म हो रहा है, तथा उसके स्तनों का कपकपी और बढ़ गई है। नायिका केहदय में काम का बैग इतना बढ़ गया है, कि अब रोके भी नहीं एक पाता। इतना सब होने पर मी तन्वही नायिका ने प्रिय को इसलिए मालिशित न किया कि वह उस आनन्द की इछुक थी, जो नायक के द्वारा छपूर्वक वालों को पकटने और जोर से आदलेप करने से मिल सकता था। कवि कल्पना (स्प्रेक्षा) करता है मानो वह हठ-कोशकर्षण तथा पनाइलेष रूपी अमृत को अत्यधिक हस्छुक (मुग्धा)ी। इस प्रेक्षा के द्वारा नायिका का स्तय क्रीडा में प्रवृत्त न होना व्यरित है। प्रय प्रगल्मा- यौवनान्या स्मरोन्मत्ता प्रगल्भा वयिताङ्गके। विलीयमानेयानन्दादताम्मेऽप्यचेतना ॥१८॥. प्रारमा नायिका में योयन का इतना प्रवाह होता है, कि यह मानों अन्धी सो हो जाती है। कामसम्बन्धी भाव भी उसमें इतने अधिक रहते हैं, कि जैसे वह उनमें ही पागल हो गई हो। यह बड़ो हीद (प्रगम)लजारहित होती है। रतिक्रीड़ा के समय यह प्रिय के पन में ऐसी चिपकती है, जैसे उसमें विलीन हो जायगी, और रतिकीड़ा में उसे इतना भानन्द आता है कि सुरतकीदा की भारम्भिक अवस्था में ही वह अचेतन-सी हो जाती है। (सी नायिका को अन्य अलङ्कारशास्त्रीय नाट्यशाली मौदा मी कहते है।) गाढयौवना यशा मर्मय- 'अभ्युनतस्तनमुरो नयने य दो बके ध्रुवावतितरां पचनं ततोऽपि । मध्योऽधिकं तनुरतीच गुरुनितम्बो मन्दा गतिः किमपि चाहतयौवनायाः ।। (गादयौवना या यौवनान्धा प्रौदा) सम्मा बारमशार पाक ने रुपअपमा पाप दिया है। इस नायिका के स्थल में स्तन बहुत ज्यादा रे दुरई, नेत्र कानों तक फैले हुए (लम्बे) व दे है। इसकी मोह बड़ी टेढ़ी है. और इसके वचन उससे मी स्यादा देदे (म्यग्ययुक्त) है। इसकी कमर बड़ी पतली है, तथा नितम्ब बहुत ज्यादा भारी है। इस अद्भुत यौवन वाली नायिका को चाल कुछ धीमी ( मन्धर) दिसाई देती है। ययाच- 'स्तनतटमिदमुत्ता निनो मध्यः समुन्नतं जघनम् । विषमे गृगशाबाच्या पपुपि गये क प न स्पलति । नापिका के योदनान्धस्व का दूसरा उदाहरण यह भी दिया था साना है। इस माथिका केसन चेहै, कमर नीनी (पतली), और जबरपल पिर ठा हुआ है। इस तरह इसका शरीर विषम-पानीमा है। हिरन के समान नेत्रवासी रस चायिका के इस विषम १०४ दशरूपकम् तथा नवीन शरीर में कौन नहीं फिसलना है। अर्णद जी भी इसे देखता है वही कामासक्त हो जाता है। विषमस्थली में कोई भी व्यक्ति चलते ममय फ्सिल सकता है, इसकी मी व्यग्य रूप में प्रतीति हो रही है। भावप्रगल्भा यथा- 'न जाने सम्मुखायाते प्रियाणि वदति प्रिये । सर्वाप्यनानि कि यान्ति नेतामुत कर्णताम् ॥' (भावनगरमा या हमरोन्मत्ता प्रौदा) नायक के समीपस्थित होने या उसरी याद आने पर प्रौटा अत्यधिक भावमन्न पाई जाती है। इसका उदाहरण यह है- कोई प्रौदा नायिका अपने नायक के समीपस्य होने के शिपय मैं सखियों को बताते हुए कहती है-जन रिय मेरे सम्मुख आकर प्यारी बातें कहा बरहे है, तो मुझे उहें देखने और उनकी बातें सुनने के अलावा कुछ नहीं सूझना । क्या मेरे सारे ही मन उस समय भोलें या नेत्र हो जाते हैं। रवप्रगल्मा यथा- 'कान्ते तल्पमुपागते विगलिता नीवी स्वयं यघना द्वास प्रश्ठयनेसलागुणधृत किसिनितम्बे स्थितम् । एतावत्सखि वैधि केवलमह तस्यासने पुन' कोऽसौ फास्मि रत किं कमिति स्वस्यापि मेन स्मृति ।' (रतनगरमा, जैसे) किसी प्रौदा नायिका से उसकी सखियाँ नायक के साथ उसकी सुरतजीड़ा के बारे में पूछती है। नायिका उसका उत्तर देते हुए कहती है। सरित क्या बताऊँ, जर पिय शय्या पर सुरतकाढा के लिये आते है, तो मेरी नीवी या धन अपने आप ही सुल जाता है। मेरा भोवल रिसी तरह कुदलाई परधनी के दोरे से रुक कर नितम्ब में ठहर जाता है। हे मसि, रस में इतना भर जानती। उसके पार तो मैं उसके भमों के पो से भानन्द में इतनी विभोर हो जाती है. कि मैं कौन ह, वह कौन है, सुरतकीटा क्या है, सो है, इन सारी बातों का जरा सा भी खयाल मुझे नहीं आता। एचमन्येऽपि परित्यकहीयन्त्रणा पैदग्भ्यधाया प्रगरभाव्यवहारा वैदितल्या । यथा--- 'कन्नित्ताम्यूलात करिदगरूपहाइमलिन' शचिच्चूर्णोद्गारी कचिदपि च सालक्षकपदः । चलीभगाभोगेरलपतित शीर्णकुमुमै खिया सर्वावस्य कथयति रत प्रच्छदपट ।।" प्रगामा के दे व्यवहार सजा से सर्वथा रहित होते है, सथा उनमें अयधिक चतुरता (विदग्धता) पाई जाती है। इस तरह के प्रोदा न्यवहारों का ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। जैसे- किसी नायिका ने, रात्रि में नायक , साथ विभिन्न प्रकार की कामशास्त्रोक्त रिपियों (आसनादि) से रनिकोड़ा की है। प्रात काङ उसको शशके चार को देखने से इन सारी विधियों का पता लग जाता है। इसी विषय में कवि करता है, कि शय्या का चादर (प्रवदपर) को (नायिका) के विभिन्न प्रकार के धरत की सूचना दे रहा है। पारर पर हीती द्वाम्बूल का निशान ना है, तो वह कही भगुरु के भारार-पा(जोलनों पर द्वितीयः प्रकाशः ५०५ 7 लगाया जाता है) से मलिन हो रहा है। कहीं उस पर नायिका के खलाटतट पर लगाया हुआ चूर्ण विखर गया है, सोयही गदावर का पैर चितित है। दूसरी जगह चादर पर नायिका सो विवली के कारण सिलवटे पड़ी है और सही उसके बालों से गिरे हुए हुए फूल पड़े है। इस तरह ये सारे चिह नायिका को नाना प्रकार की सुरतकीटावी व्यअना कर रहे हैं। (इस पथ में वात्स्यायनोक्त विभिन्न प्रतिविमियों-नुरू, विपरीत भादिको व्यग्ना परा कर नायिका का प्रौढरप प्रारित किया गया है। मुग्धा या मध्या मुरत में इस प्रकार का सहयोग नहीं दे सक्ती, यद सहम जानते ही होंगे।) अथास्या योपचेष्टा- साहित्यादरोदास्ते रतो, धीरेतरा धा। सन्तये ताडयेत, मध्या मध्याधीरेच तं घदेत् ॥ १६ ॥ राहावहिरयेनम्यागारमारणेनादरेण च उपचाराधिस्येन वर्तते सा सापहि स्थादरा, वायुदासीना गुद्धा-पापेन भवति । मायक के अपराध परने पर प्रौड़ा या प्रगाभा नायिका जिस प्रकार से कोप फरती है, उसके भाधार पर उसके धारा, अधीरा तथा धीराधीरा ये तीन भेद किये जा सकते हैं। धीरा प्रगतमा अपना कोप दोसरह से नफटित कर सकती है, या तो यह गायक या जरूरत से ज्यादा आदर कर उसे जित को, या फिर सुरत के प्रति उदासीनता दिसा पर रतिशीदा में नायक को सहयोग न दे। धीरा भगरमा गुरसे में होकर नायक को पीटती है तथा सिदकती है, धीराधीरा मगरभा का व्यवहार मध्या अंसा ही होता है, अर्थात् घर सान मार कर नायक को फटकारती है। सावदित्यादरा धोरा प्रगल्भा यह नायिका रेजोकोपी दशा में अपनी स्थिति को छिपा पर नायक के प्रति बोरणावर दिसाती है, दूसरे प्रकार की धारा रति में उदासीन रहती है। साहित्यादरा यथाऽमरुशतके- 'एकमासनसस्थिति परिहता प्रत्युद्दमारत स्ताम्यूलाहरणछलेन रभसापोऽपि सविमित । थालापोऽपिन मिश्रित परिजन व्यापारयात्याऽन्तिके का प्रस्तुमचारतचतुरया कोप कृतार्थीकृत ।' (सावविधारा) असे ममावशतक के निम्न पद मैं- नायक अप कर नाविका के पास शेरा नापिश अपने सौप को इस चरता से बताती है कि नायक को पता तो लग नाद, पर मे साफतौर से नजर न भावे ! जब नाय भाया, तो उसे दूर से ही देख कर पार करने के लिए उठ सही हुई, और इस तरह नायक के साथ एक दो भासन पर बैठने से सने अपने माप शेषा लियानायक के साथ एक साथ न पैठ घर पर कोप यो म्याना पर रहो, पर बहने के आदर के बहाने बह उसे दिपा मारा।नायक से बानि परना चारतारे, लेकिन दम ताम्बूल हाने पाने से कतरा कर, उसने बारिश में भी विल अल रिया। नायक के सेवा-आभूषा के लिए वह बार-बार नौकरों को पास में पुती दी रहो, और इस तरह उसने गायफ से सवयीत मी नको मसर नाना प्रकार से नायर की गुषा मादिर चतुर नारिका मोरको सरकारला १०६ दशरूपकम् रतावुदासीना यया- 'श्रायस्ता कलहं पुरेव फुरते न संसने वाससौ भमभूगतिखध्यमानमघरं धत्तेन पेशप्रहे। अशान्यर्पयति स्वयं भवति नो चामा हठालिङ्गने सन्व्या शिक्षित एष सम्प्रति कुत' कोपप्रकारोऽपरः ॥' (रति में उदासीन-रताबुदासीन ) जैसे निम्न पद में- अपराधी नायक पर माकर नायिका को प्रसन्न करने के लिए रतिनीहा में प्रवृत्त होता है। पर नायिका कोप के कारण मरतक्रीड़ा में नायक का सहयोग न देकर दासीन इति से स्थित रहती है। पहले रतिक्रीडा के लिए नायक के पकड़ने पर तथा वरु को काला करने पर कलह करती थी, पर अब वह उस तरह से कलह नहीं करती है। जब नायक रतिक्रीड़ा के समय केशमह करता था, तो वह मोहे रेदी करके उसके गवर को दोनों से कासकरती थी, पर पर ऐसा भी नहीं करती। सब नायक के द्वारा हठ से बालिगन करने पर वह अपने अनों को स्वय नायक को सौप देती है, पहले की तरह उसरा विरोध नही परती। इस तन्दो नायिका से यह नये दा का कोप, पता नहीं, कहाँ से सीख लिया है। इतरा त्वधीरप्रगल्भा कुपिता सतो सन्तय॑ साढयति । यथाऽमशतके- 'कोपात्कोमललोलयाहुलतिकापाशेन पट्टा नीत्वा केलिनिकेतनं दयितया सायं सखीना पुर। भूयोऽप्येवमिति स्सलत्कलगिरा संसूच्य दुधेष्टितं धन्यो हन्यत एप निहुतिपर प्रेयान्रुदन्त्या हसन् ।' (अधीरा प्रगश्भा) अधीरा प्रगत्मा अपराधी नायक को गुस्से से फटकारती है और पीटती है। जैसे अमरकशतक में- अपराधी नायक के घर पर आने पर राम के वक्त नायिका उसे कोमल य चल पाहुभो को लताओं के पाश से, गुस्से के कारण मजबूतो से बाँधकर क्रीनगर में ले जाती है। वहाँ पर सखियों के सामने स्खलित पाणी के द्वारा उससे कहती है-ऐसा कर करोगे और रस वरह उसके अपराध को सूचित करती है। रोती हुई नायिरा के द्वारा सज्जित दया सिता पुभा यापन्य नायक पौरा जा रहा है। घोराधीरगल्भा मध्याधीरेव तं वदति खोटपासवकोश्त्या । यथा तव- 'कोपो यत्र भृकुटिरचना निग्रहो यत्र मौन यत्रान्योन्यस्मितमनुनयो रशिपात प्रसाद। तस्य प्रेम्णस्तदिदमधुना शसं पश्य जातं त्वं पादान्ते लुठसि न च मे मन्युमोश सुनाया। (धीराधीरा प्रगल्भा) धौतपीरा प्रगस्मा उमे मध्या धीराचीराकोए दाने मारली है। वैसे अमरकशतक का हनिम्न पच- मपराधी नायक नायिका को प्रतत्र करने के लिए रही मि रहा। उसी का तर कुप नापिका रही है- मारदेखो, भर उस प्रेम का अन्त हो चुका है, जिस प्रेम में द्वितीयः प्रकाश कोर, भौहों को देदा करना, चिमइ तथा मोम का व्यवहार होता था, तभा वह को एक दूसरे की और इसकर अनुनय करने व देखने भर से समाप्त हो जाता था। अब तो वह प्रेम हो समास हो चुका है, फलतः) तुम मुझे प्रसन्न करने के लिए पैरों में लौट रहे हो, और मुझ दुष्ट का गुस्सा शान्त ही नहीं होता। देवा ज्येष्ठा कनिष्ठा चेत्यमुग्या द्वादशोदिताः। मध्याप्रगल्भामैदानां प्रत्येक ज्येष्ठाकनिष्ठावभेदेन द्वादश भेदा भवन्ति । मुम्पा स्वकल्पैन । पयेष्ठाकनिष्ठे यथाऽमरुशतके- 'दृष्टचकारागसंस्थिते प्रियतमे पयादुल्यादरा- देकस्या नयने निमौल्य विहितीनुवन्धलः । ईपवितफन्धरः सदुलक प्रेमोन्मसन्मानसा- मन्तरािलसहकपोलफलश्यं धूतोऽपरा घुम्पति ।' न चानयोर्दाक्षिण्यप्रेमभ्यामेव व्यवहारः, अपि तु प्रेम्णापि यथा चैतत्तपोक दक्षिण- लाणावरारे । एषां च पौरमध्या-धीरमध्या-धीराचीरमध्या-धीरगल्भा-अधीर- प्रगल्भा-धीराधीरप्रगल्भाभेदानां प्रत्येकं ज्येष्ठाकनिष्ठाभेदावादशना पासवदता-मान- लोवत्यवन्धनायिकानामुदाहरणानि महाकविनयन्धेष्वनुसर्वव्यानि । मुग्धा के अलावा दूसरी नायिकाएँ-तीन तरह की मण्या तथा तीन तरह की प्रगपमा-ज्येष्ठा तथा फनिष्ठा इस प्रकार दो तरह की होती है-इस तरह सथ मिलाकर ये १२ प्रकार की होती है। (यान रखिये ये भेद मुम्भा के नहीं होते, वह केवल एक ही तरह की होती है।) स्पेठा तपा कमिण का शहाण अमरशतक का यह पत्र दिया जा सकता है- मायक ने देखा कि उसकी ज्येहा सपा कनिष्पा दोनों गायिका, एक आसन पर बैठी है। इसलिए यह आवर के साथ (कुछ मग से) धोरे धीरे पीछे से वहश पहुँचता है। यहाँ शाकर यह कोग करने के दौंग से व्या नायिका के नेत्रों को दोनों रायो से न्द कर देसा है। इसके गार पर पूर्व नायक अपनी गरदन को जरा देदी करके, रोमाञ्चित होकर उस निछा मारिका को पूम लेता है, जिसका मन प्रेम के कारण उपलसित हो रहा है, पपा जिसके कपोष्ठ फलकमान्तरिक ईसा के कारण घोमिा दोरहे। नायक का पेशा के प्रति फेद दाक्षिण्य म्पबहार (सरपतापूर्ण पवार) पाया जाता हो और प्रेम निमा के प्रति दोरी, रेसा मानना हौस नदी म सा होता हो। वस्तुमः नायक का येहा के मतिमी मेम पाया जाता है। क्योंकि दक्षिण मापक के एवण के समय पर पाया गया कि उसका प्रेम कमी से हो सकता है। इस प्रकार भीरमाया, साधारमण्या, पौधोरमध्या, पौरमपरमा, मोरप्रगश्मा, पोरापोरगरमा रन पर प्रकार की नारिकाभों के पुनः पैठा व कनिष्ठान दो भेदों के अनुसार बारह भैाहीये । इन १२ भेदों के वारण महासदिरों को रचनामों में बासक्रवा रहनार के रूप में पायेचा सरो। 1.लिये-नानिति कुन्त पक्षका शारोHE वारि साइन पप घरमा दशरूपयम् । प्रयायत्री- अन्यत्री कन्यकोढाच नान्योढाऽङ्गिरसे फचित् ॥ २० ॥ पन्यानुरागमिच्दात पुर्यावगाडिसमयम् । नायिका का दूसरा भेद आय सी (परकीया) होता है। यह अन्य स्त्री दो तरह की हो सस्ती हैं-किसी की अविवाहित पुत्री (कथा) तथा किसी दूसरे व्यक्ति की परिणीता स्त्री। नारकादि में खङ्गी (प्रधान) रस के भालायन के रूप में अन्योढा (अन्य परिणीता) परकीया का वर्णन कभी भी नहीं करना चाहिए। कन्या के प्रति अनुराग अनौरस का भी ना हो सकता है, अारस का भी। अस कन्या के अनुराग वर्णन में कोई दोष नहीं है। नायकान्तरसम्यधिन्यन्यादा यथा- दृटि हे प्रतिवशिनि क्षणमिहाप्यस्मिन्गृहे दास्यसि प्रायेणात्य शिशो पिता न विरगा कौपीरप पास्यति । एकाकिन्यपि यामि तदरमित स्रोतस्तमालाकुछ नीर भास्तनुमालिन तु जरठरहेदानलप्रन्थय ।। (नायकान्तर सम्बन्धिनी पाकीया) (कभी कोई परिणीता सी भी रिसी उपनायक से प्रेम करने लगती है।कोरिक शास्त्रीय मर्यादा की दृष्टि से यह अनुचित भले ही हो, पर ऐमा लोक में देखा अवश्य जाता रस लिए रस शान में इसका दृष्टान देना जरूरी हो जाता है। संस्कृत के कई मुक्तक पप इन परकीयाओं की चेष्टाओं पर मिल सकते हैं। हो अङ्गारस में इनका निधन सरिए अनुचित माना गया है कि इस प्रकार का प्रेम नैतिकता के विरुद्ध है यहाँ इसी का एक उदाहरण देते है को परकीया नायिका उपपति के साथ रनिक्रीडा करने के लिए सहेट की भर जा रही है। अपनी वास्तविकता को छिपाने के लिए वह दूर के झरने से पानी लाने का बहाना बना रही है। अपनी रात को पक्का करने के लिए वह पहले से ही एक पक्षीसिन से इस तरह से कहती है कि प्रत्येक व्यक्ति उसके कथन के वाच्यार्थ पर विश्वास कर ले। हे पहोसिन, जरा हमारे इस घर पर मो नजर दालनी रहना । स लड़के के पिता प्राय' कुएं का पारा पानी नही पोरे (खारा पानी नही पीयेंगे।) इसलिये मैं अकेली ही दूर के उप्त झरने से पानी लाने जा रहा, जो समाल के पेडों से मावत है। पवाद नदी, एक दूसरे से घने सटे हुए पुराने मल की प्रन्थियों मेरे शरीर कोसरोंच डालें। यहाँ परकीया की इस जिते पर प्रकटित होता है कि नायिका उपनायक से की जाने पाली रनिक्रीडा के समय वेदशनक्षत व नखवत को छिपाने के लिए पहले से दोपनी पृधभूमि तैयार कर रही है। साथ ही अपने परिणेता पति के लिए दिये गये 'अस्प शिशो पितास प्रयोग से कोई कोई सत्य यह भाव भी प्रकटित होता मानते हैं कि यह मेरा 'प्रिय'नदी। इय त्यनिनि प्रधाने रसे न चिनिय व येति न प्रपचिता। कन्यका तु पित्राचा यत्तत्वादपरिणीताप्यन्यत्रीत्युच्यते तस्यां पित्रादिभ्योऽलभ्यमानायां मुलमायामपि परोपरोधस्वकान्ताभयारप्रच्छन कामित्व प्रवर्तते, यया मालत्यो माघवस्य सागरिकाया व वत्सराजस्येति । तदारागय स्वेच्छया प्रधानाप्रधाारससमाश्रयो निवधनीय । यथा रखानलीनागान दयो सागरिका गलयवस्याराग इति ।
द्वितीयः प्रकाश १०६ इस परकीया नायिका का प्रधान रस में निबन्धन करना उचित नहीं, इसलिए विस्तार से वर्णन नही किया गया है।' कन्यका को अन्य लो ( परीया) इसलिये कहा जाता है कि यह शादी न होने के पहले • पिता आदि के आधीन होता है । उस कन्या को पिता बादि के द्वारा निगृहीत होने के कारण यद्यपि प्राप्त नहीं किया जा सकता, फिर मी वर सुलभ है, फलतः नायक चिप चिप पर उससे प्रेम करता है, क्योंकि पर नायिका दूसरे लोगों के वश में होती है, या फिर नायक अपनी ज्येा नायि(खकान्ता) से डरता है। जैसे एक दग का विषा प्रेम मालतीमाधव में मावर का मालती के प्रति है, दूसरे दंग का रश्नावलो नाटिका में सागरिका के प्रति वत्सराज उदयन का है। एक स्थान पर 'परोपरोध तथा दूसरे स्थान पर 'सकान्ताभय' विप प्रेस के कारण । कवि इस प्रकार के प्रेग को अपनी इच्छा से प्रधान या अप्रधान दोनों प्रकार के रसों में निवड, मर सकता है। जैसे रत्नावली व नागानन्द में ग्राम सागरिया श मलयवती का प्रेम । रवापसी गाटिका में सागरिका का प्रेम प्रधान रस में निवास कि नागानन्द में मलयवती व जीमूतवादन का प्रेम प्रधान रस में निराश नहीं हुआ है, क्योंकि वहाँ प्रधान रस जीमूतवाइम की दयावीरता का अभिन्यजक वीर रस है।' साधारणसो गणिका कलामागलयधौययुक् ॥ २१॥ · । तीसरी श्रेणीकी नायिकालाधारणही है, यह मणिका होती है, जो फलाचतुर,प्रगमा तथा धूर्त होती है। तघनदारो बिस्तरतः शास्त्रान्तरे निदर्शितः । दिगानं तु- सकाममुसार्थाशस्वतन्नाईयुपण्डकान । रक्तच रजयेदाट्यानिस्यान्माचा विचासयेत् ।। २२ ॥ इसका व्यवहार दूसरे शाक्ष (वात्स्यायनादि) में विस्तार में दिखाया गया है। यज्ञ उसका सारेत भर दिया जाता है। जो लोग शिपकर कामति करना चाहते हैं, जिनसे पदी सरलता से पैसा मुंडा जा सकता है, पो येथएफ (सूर्य) है, आजाद हैं, घमण्डी हैं, या नपुपक हैं, ऐसे लोगों में गगिका टीक इसी तरह पयहा पाता है, जैसे पह उन्हें सचमुच प्रेम करती हो, किन्तु उसी पक, सक पप तक कि उनके पास पैसा है । जय बह देख लेती है, कि पेगाव (नि) हो गये है, तो वह उन्हें अपनी मा के द्वारा पर से निकलया देती है। सं ये कामयन्ते ते घामा' श्रोत्रियाणिग्लिनिप्रगतया, गुस्साएं अप्रयासापा- सपन गुरुपयोगनो या, 'मी मूसे स्वतन्त्र निरकुश, अयुरहात, पण्डो घातपण्डाई', १.सर के एक प्रतिवादी रसयाली रूपगोस्वामी ने गमा माधुरस में मौस मेंदी परकीयामा उपाशन उचित माना है, पर बहु गोपिकाष कृष्ण के प्रेम तक ही सीमित :- मेष्टरसहिनि रसे कविमिः परोडा, तोलापुमा कुरुमन्तरेण । मापारविविधतारिताना फंसारिणा रसिकमण्यसरेण ।। (उन्नउनीटमगि में उर, १.९५) १. प्रभा निगमनायाका रस सम्पावत्यनुररावास्यानरस-(शाहार) समाय. मी पूनवाइनएपमापनापास प्राधान्येन शान्तरसनापरवादिति दिवेकर-पार पना चिन्द रेश्योति धनम्म पनिक दोनों के मन के यह विकर पाता,जोमान्तरस समका रस नहीं मानते। (दे.भाश, आ. ३५) ये नागानर का रस पीर मानते है:- गोदासीनसानसास्ति गारहरन चारतियताप्लेनrat दशरूपकम् एतान्वहुवित्तान् रोव रअयेदयिम्-तप्रधानलात्तवृत्त, गृहीतार्यान्कुदिन्यादिना निष्कासयेत् पुनः प्रतिसन्यानाय । इदं तासामौत्सर्गिक रूपम् । जो लोग झिा छिप कर कामतृषि करते है या प्रेम करते हैं, जैसे बेदसारी घोत्रिय, बनिये, सन्यासी या दूसरे लोग; दिनसे मुख से बिना किसी प्रवास के धन प्राप्त हो सकता है। जो " मूर्ख है स्वतन्त्र अर्थात निरकुश हैं, मइयु अर्थात मारी है, पण्डक अर्थाद वानपण्डादि रोगों से पीडित (नपुंसक) है, इनके पास बहुत पैसा होने पर गणिका उनके प्रति अनुरक्त-सी होकर उन्हें प्रसन्न करती रहती है। उनले सारा पैसा लिया जाता है, तो वह उन्हें मा (कुहिनी ) के द्वारा घर से निकलवा देती है। यह उनसरा सामान्य (मोत्सनिक) लक्षण है रूपकेषु तु- (१)रक्तव त्याहसने, नेपा व्यिनृपाथ्ये । प्रहसनवर्जिते प्रकरणादी रक्षा विधेया। यथा मृच्छकटिकायां वसन्तसेना चारुदत्तस्य । प्रहसने लरफापि हास्यहेतुत्वात् । नाटकादौ तु दिव्यपनायके नैव विधया । प्रहसन से भिन्न रूपक में गगिकाको नायक के प्रति अनुरक रूपमें ही चित्रित करना चाहिए (चाहे प्रहसन में उसका बननुरागी रूप हो सकता है)। नायक के दिव्य कोटि के होने पर या राजा होने पर रूपक में गमिका का निषन्ध नहीं होना चाहिए। परसन से भिव प्रकरण आदि रूपकों में इसका अनुरागी रूपी निब किया जाना चाहिए। जैसे मृच्छकटिक में वसन्तसेना गणिका चारुदत्त के प्रति अनुरक्त है। प्रहसन में इसको अननुरक भी बनाया जा सकता है, क्योंकि वही वह हास्यरस का अवलम्बन है। . हिम्गनायक तथा नृपनायक बाले नाटकादि में इसका समावेश उचित मही। श्रय भेदान्तराणि-- थासामष्टावधस्पाः स्युः स्वाधीनपतिकादिकाः॥२३॥ स्वाधीनपतिका पासकसमा विरहोत्कण्ठिता खण्डिता क्लहान्तरिता विप्रलच्या प्रोपितप्रिया अभिसारिकेत्यष्टौ स्वस्नीप्रभृतीनामवस्था । नायिकाप्रभृतीनामप्यवस्यारूपत्वे सत्यवस्पान्तराभिपानं पूर्यासां पमित्वप्रतिपादनाय । श्रथाविति न्यूनाधिकव्यवच्छेदः । सभी तरह की नायिकाएँ अवस्था भेद से आठ ही तरह की होती है:- स्वाधीनपतिका, पासकसभा, विरहोक्कण्ठिता, सन्दिता, कलहान्तरिता, विपलब्धा, प्रोपिद्रप्रिया, तथा अमिसारिका। वैसे तो नायिकाओं में नायिकाव आदि (आदि से मुग्धा, पथ्था आदि का समावेध होगा) मी उनको अवस्था के घोतक हो नहीं है, फिर भी इन दूसरे दर को अवस्थाओं का प्ररिपाइन इमलिये किया गया है कि पहली अवस्थाओं को धर्मी माना गया है,न अवस्थामों को धर्म। जिस प्रकार पमी व धर्म, गुगी व गुण, विशेष्य र विशेषण दो मिन मावों का प्रतिपादन करते है, वैसे ही मुग्धादि अवस्था विशेष्य है, स्वापानमः कादि अवस्थाएं विशेषताये अवस्थाएं माठ दोहै, न ज्यादा, न कम इस पर जोर देने के लिए 'मावे' रस मधारण का प्रयोग हुवा है। इसी को भागे स्पष्ट करते है कि ये अवस्थाएं माठ से कम नही हो सकती, क्योंकि इनमें से किसी का भी एक दूसरे मैं भन्ताव नहीं हो सकता। न च पासकसम्बादेः स्वाधीनपतिकादावन्वर्भाव, अनासपधियत्वाद्वासकसमाया ने (1) रूपके लनुरोध कार्यो प्रहसनेतरे' इति पाठान्तरम् ।
द्वितीयः प्रकाशः स्वाधीमपतिमालम् । यदि चैष्यप्रियापि स्वाधीनपतिका प्रोषितप्रियापि न पृपावाच्या, न चेयता व्यवधानेनासत्तिरिति नियन्तुं शक्यम् । न चारिदितप्रियव्यलोकाया राण्डि- तास्वम् । नापि प्रवृत्तरतिभोगेच्छाया प्रोपितप्रियात्वम् । स्वयमगमनानायकं प्रत्यप्रयोज- यत्वाशामिसारिकात्वम् । एवमुत्कण्ठिताप्यन्यव पूर्वाभ्य । यौचित्यपातप्रियागमनसमया- तितिविधुरा न पासपसमा तथा विप्रलब्यापि चासकस जापदन्यैप पूर्वाभ्य, उक्त्या नायात इति प्रतारणाधिक्याच वासरसमोराण्ठिायो पृथक् । क्लहान्तरिता तु यद्यपि विदितव्यली तथाप्यगृहीतप्रियानुनया पश्चात्तापनगाशितप्रसादा पृथगेव खण्डिताया । तत् स्थिसमेतदष्टायवस्था इति । वासकसज्जादि नायिका कोरिका भन्ताव स्वाधीनपतिकादि दूमरी कोटि में नही किया जा मकना । वातकसम्जा और स्वाधीनपतिबा एक नहीं मानी जा सकती (स्वाधीनपतिवाद की स्थिति वाससजा में नहीं पाई जा सकती ), क्योंकि स्वाधीनपविया का पति उप्तके समीपस्थ होता है, जब कि बासकसजा का पति (प्रिय) आसन्न या नायिका के समीपस्य नही होता । वासरसन्ना नायिका का पद भेद है, जबकि नायक आने वाला है और उसकी प्रतीक्षा में यह साज-सम्मा से निषित हो रही है, इस प्रकार यासकसना एव्यनिया (जिसका पति माने वाला है। अगर इस एपरिप्रया को मी स्वाधीनपतिका गान लिया जायगा, तो फिर प्रोपित प्रिया को भी अलग से मानने की क्या जरूरत है। देखा जाय तो एण्यत्प्रियव उसमें भी पाया जाता है। यदि सप्तका उत्तर यद दिया जाय, कि वासराजा तथा सके मिय के बीच का देशकाल का व्यपान कम है, तथा मोपिवप्रिया तथा उसके भिय के बीच का देशकाल का व्यवधान लादावोहम इस व्यवधान की कोई निश्चित सीमा नदी पता सके कि यहाँ तक समीपता (आदि) मानी लायगी और इसके बाद दूरी। हमारे पाग म्यवधान के कोरिनिर्वाण की कोई तराभू तो नहीं है। साथ ही खण्डिता जैसे भेद को मी मला मानना ही होगा, क्योंकि पण्डिता वही है जिसे प्रिय के अपराध का पता लग जाता है। जिसे प्रिय के अपराध का पता नही चलता (मविदितप्रियव्यरीका), वा समिताल से युक्त नारी हो सकता। जोनायिका किसी नायक के साथ रतिक्रीटा में प्रपती दारति की रमा से युक्त है, उसे प्रोधितप्रिया नही माना जा सकता। साप दी ऐसी नायिका सो गमिसारिका भी मही हा जा सपा, बोंकि वह सुर नायक के पास नहीं जाती, तथा छरा, नायक के प्रति प्रयोजकाल नही पापा बता मिसारिश में नायक को अपने पास लगने का या स्वयं उसके पास जाने का धर्म पाया गया इस तरह उत्कण्टिता (विरदीप डिवा) भी उपर्युत स्वाधीनपतिक, पासरममा, प्रोविधिया, सस्टिवा या अमिसारिका से मित्रबनाविध नायक के भाने के उचित समय के म्यतीत हो जाने पर उससे न भाने से म्याकुल राती है, वह पासकसभा नही मानी जा सरदी से वितो कटिना हो मानमा होगामी र विप्रष्टमा भी वासासमा कौवरह दूसरी भाषा पारी नापिकामों से मित्र हो। विमलयाशा प्रिय मानेका पादा परकमी नही आया. RRIो प्रतारणा (एल) ही भषिकता पार माती, इमलिए विमटायावासकमरमा तरा उत्पटिश दोनों से मित्रपिता ना पत्रा मपने प्रिय के परमारीसाभोग रूप भरा को जान जाती है, सन्तति में भी यह बात को गडिता के समान हो पाई मन्त्रीमा गापा से अनुनय ग्निय करने पर भी नहीं माननी, दया ममग्न नरी रोगी पार जानापर माता का प्रमत्रहो माता। इस है ११२ दशरूपकम् प्रकार कलदान्तरिता पण्डिता से भिन्न सिम होती है । इस प्रकार यह सिद्ध हो गया कि नायिकाभों में आठही भवस्था है। तर- श्रासनायत्तरमणा हटा स्वाधीनमश्का। यथा- 'मा गर्वमुद्रह पोलतले चास्ति कान्तस्वहस्तलिखिता मम मञ्जरीति। श्रन्यापि किन सखि भाजनमीदशानां वैरी न चेद्भवति वेपथुरन्तराय ॥' जिस नायिका का प्रिय समीप में रहता है तथा उसके गाधीन होता है तथा जो नायक की समीपता के कारण प्रसन्न रहती है, यह स्वाधीनमतका कहलाती है । जैसे, कोई सखी किसी स्वाधीनमतका के गर्व को देखकर उससे कह रही है। मेरे कपोलफलक पर प्रिय के स्वय के हार्थों से चित्रित पत्रावली (मारी) विद्यमान है-यह समझ र घमण्ड न करो। हे सखि, अगर कान्त के समीपस्थ होने तथा उसके पास से जनित कम्म रापन कर विन न परे, तो क्या कोई दूसरी नायिका ऐसी ही पत्रावलियों का पात्र नही बन सकती। दूसरी नायिका भी कान्त के अपने हाथ से चित्रित पत्रावरी से युक्त हो सकती, मितु कान्त के स्पर्श के कारण उनमें इतना कम्प हो जाता है, कि कान पत्रावली नही लिस पाता। (व्यग्य है-क्यों घमण्ड करती हो, पति के समीपस्स दोने पर भी तुम किसी प्रकार के कम्पादि सात्त्विक भाव का अनुभव नहीं करती, तुम्हारी सदयत्व शून्यता है। सच्चे राग को तुम क्या जानो।) यथा मासकसम्मा- मुदा पासकसजा स्पं मण्यत्येष्यति प्रिये ॥ २४॥ स्वमात्मानं घेश्म च हपेण भूपयत्येष्यति प्रिये चासकमना । यया- 'निजपाणिपालवतटस्खलनादभिनासिकाविवरमुत्ततिते । अपरा परीक्ष्य शनपर्मुमुदे मुख्वासमास्यस्मल्वसन ।' पासकसज्जा यह नायिका है, जो प्रिय के आने के समय हर्ष से अपने पापको सजाती है। पासकसजा प्रिय के भाने समय के समीप रोने पर अपने पापको व अपने घर की सुरी से सजाती है। इससे बदाहरण शिशुपालवध के नवम सर्ग का यह पच दिया जा सकता है:- कोई नायिका अपने हाथ रूपी पहल के किनारे से इसटित होने के कारण नासिका के शिदों की भोर डरे हुए मुख-कमल के वायु (मुखश्वास ) के द्वारा धीरे से अपने मुंह की मुगन्धिी परीशा करके प्रसन्न हो रही थी। श्रय विरहोसण्ठिना- विरयत्ययलोफे तु घिर(१)दोत्कण्टितोन्मनाः । (1) विरहोरमस्टिता मता' इति पालन्तरम् । r द्वितीयः प्रकाश यया- 'सखि स विजितो वीणावाये कयाप्यपरलिया पणितमभवत्ताभ्या तन क्षपाललितं ध्रुवम् । कथमितरया शालीपु स्खलत्कुसुमास्वपि प्रारति नभोमध्ये पोन्दौ प्रियेण विलम्ब्यते ॥' पिप (पति) के अपराधी न होने पर मी देर करने पर जो नायिका उत्कठिन मन में उसकी प्राश करती है, वह विरहोस्कण्ठिता है। किसी नायिका के प्रिय के आने का समय व्यतीत हो चुका है। आधी रात होने को आई, पर वह अमी तक नहीं आया है। इससे नायिका बडो उत्कण्ठित होकर अपनी ससी से कह रही है। हे सखि, ऐसा जान पडता है किमी दूसरी ली ने वीणा आदि पार्थो के द्वारा उसे जीत लिया है। सवार हो उन दोनों में रात भर कोटा करने की शान हो चुका है। अगर ऐसा नहीं होता, तोहरसिहार फे फूल के घर जाने पर मी भोर चद्रमा के भाका के बीच में भा जाने पर मी, मेरा प्रिय क्यों देर कर रहा है। सय खण्डिता-- शातेऽन्यासनविकृते सण्डितेयोकपायिता ॥२५॥ यथा- 'नवनरापदम गोपयस्यशुपेन स्थगयसि पुनरोष्ठ पाणिना दन्तदरम् । प्रतिदिशमपरस्त्रीसाशसी विसर्पन् नवपरिमलगन्ध पेन शक्यो धरीतुम् ॥' जय नायिका को किसी दूसरी घी से सम्भोग करने का नायक का अपराध पता हो जाय, तथा इस अपराध के कारण यह ईया से पलुपित हो उठे, सो बह पण्डिसा कहलाती है। से शिशुपाल के ग्यारहवें सवा निम्न पत्र । कोई नायक अपराध परके नायिरा के पास लौटा है। वह अन्य गाविवादच अपने नखक्षन वदन्तक्षन पो उत्तरीय आदि से चिपा रहा है। नायिका यह सब समझनी कहती है। तुम अपने उतरीय से मवीन मरक्षा के पिय से युल अहयो वा रहे दो। अन्य बीके दोनों से काटे हुए मोठ (परोष्ठ) छोहाय से दंक रहे हो। लेकिन चारों दिशाओं में पेलता भा, अन्यत्री के सम्मोग को सूलना देने वाला यह नवीन परिमलगन्ध (सुगधि) रिसके द्वारा दिपाया जा सकता है। तुम नसत व दन्तया को साय विभो, तुम्हरी देर से पाने राणे यह नई शुरु किसी दूसरीखी के साथ कोई रनिकोका की एनना देरी। अप यरहान्तरिता- फलद्धान्तरिताऽमदिधूतेऽनुशयातियुक्। यथा--- निवाचा पदनं दहन्ति हदय निलमुन्मप्यते निद्रा नति न दृश्यते प्रियमुसं नरांदिप स्यो । माशोपमुपैति पादपतित प्रेयास्तपोपेक्षित सरसगुणमालम्म दयिते मान पयंकारिता १५६ ११४ दशरूपकम् लहान्तरिता नायिका यह है, जो नायक के अपराध करने पर क्रोध से उसका तिरस्कार करती है, याद में अपने व्यवहार के विषय में पश्चात्ताप करती है। विसी नायिका ने अपराधी नायक के प्रति मान दिया है। बाद में अपने व्यवहार पर पश्चाताप करती हुई नायिश अपनी सखियों से कह रही है । प्रियतम के अपमान के पश्चाताप के कारण जनित निवास से सारे मुप की जा रहे है, हृदय जैसे ब्रह से हिल रहा है- उमवित हो रहा है, रात में नींद भी नहीं आती, प्रियतम का मुंह मी दिसाई नहीं देता, (क्योंकि वह रुष्ट होरर लौट गया है) रात दिग रोने के सिरा कुछ नही भूपता । हमारा शरीर सूख गया है, इधर हमने पैरों पर गिर कर अपराध की क्षमा मांगते हुए प्रिय का भी निरसार कर दिया। हे सखियों, बताओं तो सही, तुमने विस गुण को सोच कर हममे प्रिय के प्रति मान करवाया था। अथ विश्लल्या- विमलग्योक्तप्तमयमप्राप्तेऽतिविमानिता ॥ २६ ॥ यथा- 'उत्तिष्ठ दूति यामो यामो यातस्तथापि नायात । यास्त परमपि जीवेजीवितनायो भवेत्तस्या' ।।" प्रिय के दसमकेत समय पर उपस्थित न होने पर जो नायिका अपने आपको अत्यधिक अपमानित समझती है, वह विप्रलक्या कहलाती है। नायिका सङ्केतस्थल (महेट) पर बढ़ी देर से दत्तमन नायक की प्रतीक्षा कर रही है। उसके न आने पर मुंपला कर वह अपनी ससी (दूती) से कर रही है। हे दूति, अब उटी मधिक देर तक इलजार करना व्यर्थ है। चलो चले। एक पहर इन्तजार में बीत गया पर फिर भी वह नही आया । जो नायिका इसके बाद भी जिन्दी रह सके, उप्ती का वह प्रिय (ोक्तिनाथ) हो सकता है। अथ प्रोपितनिया-- दूरदेशान्तरस्थे तु कार्यतः प्रोपितप्रिया। यथाऽमस्शत- 'आरिप्रसराप्रियस्य पदवीमुवीक्ष्य निर्विष्णया विधान्तेषु पयिष्यह परिणतो ध्वान्ते समुत्सर्पति । दत्वक सशुचा गृह प्रति पद पायनियास्मिभरो माभूदागत इत्यमन्दवस्तिप्रीव पुन:क्षितम् ॥' जिस नायिका का प्रिय किसी कार्य से दूर देश में स्थित होता है। यह प्रोषितप्रिया (मोषित मनुका) कहलाती है। बसे भमरकाशनक में- किमी नायिग शरिश विदेश। २६ दिनों से उतरी प्रनाक्षा कर रहो। उसको उसकमा हानी है कि वह प्रिय के आने के रास्तों की और सडौ होकर नजर साला करती है। जहाँ तक उसकी नजर आती है, वहाँ तक वह प्रियतम के मार्ग (पदवी) का दुसी होर सबलोकन प्रिया करती है। जब शाम पद जाती है, चारों और अंधेरा सपने लगता है, सारे रारदे बन्द हो जाते हैं राहगीरों का बन्ना बन्द हो जाता है, तो वह शोक से अपने एक पैर को घर की और पाती है, शेकिन इसी एम वर मोरिनपविता पान्थवधू पा द्वितीयः प्रकाश सोचकर कि कही वह ा न गया हो, अपनी गरदन को जरा देदी करके फिर पीछे (रास्ते) की और देख लेती है। अथाभिसारिका- फरमाताऽभिसरेत्कान्तं सारयेदाऽभिसारिका ॥२७॥ यथाऽमशतके- 'उरसि निहितस्तारो हार कृता जघने पने कलकलवती काचो पादौ रणन्मणिपुरी। प्रियमभियरस्येवं मुग्धे त्वमाहतडिण्डिमा यदि किमपिकनासोत्कम्म दिश समुदीक्षसे ।' यया- 'न च मेऽवगच्छति यथा लघुता करुणा यथा च कुरुते स मयि । निपुण तथैनमुपगम्य घदेरभिदूति सं शाचिदिति संदिदिश ।' जो नायिका कामपादित होकर या तो स्वयं नायक के पास अभिसरण करे, या नायक को अपने पास बुलावे, यह अमिसारिका कहलाती है। जमे अमम्मसतक में- अपनी सम्पूर्ण साम-समा से विभूषित होकर कोई नायिका प्रिय के पास अभिसरणार्थ जा रहारबर के मारे पद इधर-उधर काँपती नजर से देस होनी है कि कही कोई देखती नही रहा है। नापिका की इसी दशा को देख कर कपि उससे कह रहा है। भोली रमणी, तुम बडे टाट बाद से प्रिय से मिलने जा रही है। तुमने तर स्थल पर सुदरशर पहन रपया है, घने अपनस्थल पर सशद करपनी पहन रक्सी है और तुम्हारे पैरों में मणिनूपुर आणणायमान हो रहे हैं। इस प्रकार मुम्हारे हार, यरधनी व नूपुरों या कलरव तुम्हार जाने यी रचना लोगों को दे रहा है। दे मोती, जब तुम इस तरह दिौरा पीटती हुई (सुले आग) प्रिय के पास अभिसरणार्थ जा रही हो, तो फिर डर के मारे कॉपती चारो और पयों देवरही हो। (यहाँ प्रथम सादरण में नायिका का वह रूप बताया गया जब वह स्वयं अभिप्तरण कर रही है। अब दूसरा उदाहरण शिशुपाल वध के नाम सर्ग से दिया जा रहा है, जड़ों गायिका नायक को अपने पास पुलाने के लिए दूना भेज रही है।) और जमे- है सीएम उस के समीप जाकर तट से इस कुचलता से बातचीत करना कि वह अपने भापको स्पुता का अनुभव न करे तथा मेरे प्रति दया का माव परते। कोई नायिका अपनी दूतो को इस तरह सदेश दे रहीश।' चिन्तानिःश्वासपेदा वर्ण्यग्लान्यभूषणैः। युक्ताः पडत्या देवाये प्रोडौज्वल्यप्रदर्पितः ॥ २७ ॥ परत्रियौ सुकन्यको सपतात्पूर्व पिरोत्कण्ठिते पवाद्विपूपनदिना राहामिसर- १. अवलोस्कार पनिकस पप की नापिया को अभिसारिका मानवे, यह रपटही है।मपटकाकार मनिनाप सोय की का में भाषिका को इलदान्तरिता स्वीकार बरते ३-नावित तुकदारिता 'क्रोमकान्त परागुप पत्राचारसमन्विता' पति (९) मारे मानुमार से मभिसारिका हो मानना ही होगा।
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दशरूपकम
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न्यानभिसारिके कुतोऽपि सकेतस्थानमप्राप्ते नायके विप्रलम्धे इति व्यवस्था व्यवस्थित-
चाऽनयोरिति-अस्वाधीनप्रिययोरवस्थान्तरायोगात् ।
यतु मालविकाग्निमिनादौ 'योऽप्येव धीर सोऽपि दृष्टो देव्या पुरत' इति मालवि-
कावचनानन्तरम् 'राजा-
दाक्षिण्यं नाम विम्वोष्ठि नायकानां कुलवतम् ।
तन्मे दीर्घाक्षि ये प्राणास्ते त्वदाशानिवन्धना ॥"
इत्यादि, तत्र पण्डितानुनयाभिप्रायेण, अपितु सर्वथा मम देव्यधीनत्वमाशय
निराशा मा भूदिति कन्याविनम्मणायति ।
तथाऽनुपसजातनायकसमागमाया देशान्तरन्यवपानेऽप्युक्तष्टितात्व मेवेति न प्रोपि-
तथियात्वम् अनायत्तप्रियत्वादेवेति ।
इस सम्बन्ध में इन आठौं नायिकाओं के सामान्य भूपों का उश्लेख करना
आवश्यक है। इनमें अन्तिम (विरहो कण्ठिता,स्वण्डिता,कटहान्तरिता, विप्रलब्धा,
मोपितप्रिया तथा अभिसारिका) नायिकाओं में चिन्ता, निवास, रोद, अमा, वैवषय
तथा ग्लानि ये अभूपण (दीनताजनक चिक) पाये जाते हैं। आरम्भिक दो नायिकाओं
स्वाधीनपतिका तथा वासकसजा में कहा, उसवलता तथा हर्ष विद्यमान रहते हैं।
स्वकीया नायिका के आठ प्रकार बनाने के बाद यहाँ परकीया का इस प्रकार रूप बताना
जरूरी है। कन्या ता परोढारूप परकीया नायिका सकेतस्थल पर प्रिय से मरने के पूर्व
रिहोरकण्ठिता मी तथा बाद में विदूषक, दूती, सखो आदि के सा प्रिय के पास विपकर
जाने के कारण अभिसारिका की कोटि में आती है। कभी नापक सङ्केतस्थल पर नही मा
पाता, तोच विप्रलम्बा हो जाती है। इस तरह परकीया नापिका की तीनही भवस्तार
होती (आउ भवस्था नहीं क्योंकि इनका प्रिय स्वाधीन न होने के कारण दूसरी अवस्याएँ
इनमें नही पाई जा सकती।
मालविकामिमित्र नाटक में एक स्थान पर मालविका के यह कहने पर कि 'तुम इतने
भीर हो, पर देवी महारानी) के आगे तुम्हारी हालत क्या थी, यह हम देख चुके राजा
अप्रिमित मालविकायो मनाते तथा विश्वास दिलाते हुए कहता रिम के समान ओठ
बाली मालविके, उच्चकोदि के नायकों काकुलात दक्षिणरहना (सानायिकाओं के साथ सहर
यतापूर्ण राव करना) है। हरड़ी भाखों वागे, मेरे प्राण तो तुम्हारी ही माशा से निबद्धौ ।'
इस स्थल पर मालविका में खण्डिनाव की प्राप्ति करना अनुचित होगा। यह कमी नही
सोचना चाहिए कि यहाँ मालविका राजा के देवी के प्रति प्रेम के कारण ग्योल होकर सण्डिता
हो गई है। यह स्थल तो रवि ने इसलिए सनिलिष्ट किया है, कि राजा मालविका को यह
विश्वास दिला देना चाहता है, कि में देरी के बिलकुल अधीन ऐली मावा करके
निराश मत होना।
परीया नाशिका के प्रिय के समागम न होने के पूर्व हो प्रिय के दूर देशस्थ होने पर उसे
प्रोधितप्रिया नहीं माना जायगा, क्योंकि वह उसका उल.ण्ठित है, अतवह उल ठिता
हो मानी पायगे, क्योंकि अभी तक प्रिय उमे प्राप्त नहीं हो सका है, या उनके अधीन नहीं है।
अयामा सहायिन्य
दूत्यो दासी सखी कारुत्रियी प्रतिवेशिका।
लिगिनी शिल्पिनी स्व च नेवमित्रगुणान्विनाः ॥ २६ ॥
द्वितीयः प्रकाश ११७ - दासी = परिचारिका । सखी रनेहनिया । कार= रजकोप्रतिः । पायो- उपमातृमुता। प्रतिवेशिकामप्रतिरहिणी। लिहिनी -मिनुस्यादिका शिलिनी - चिम- । बारादिनी । स्वयं चेति दूतीविशेश नायमिनाणां पीठमादीनां निमार्थत्वादिशा गुणेन युकाः। तथा च मालतीमाधवे कामन्दकी प्रति- 'शापु निष्ठा सहनश्च बोधः प्रागल्भ्यमभ्यस्तगुणा च वाणी । कालानुरोधः प्रतिभानवत्वमेते गुणा' पामदुधाः निया ॥ इन नायिकाओं का नायक के साथ समागम कराने वाले सहायक ये लोग हैं:- दृतियों, दासी, सपी, नीच जाति की औरते, पाय की बेटी, पड़ोसिन, सन्यासिनी, शिलिपणी, स्वयं नायिका ही (स्वयं सूती के रूप में), ये सभी दूतियाँ मादि नायक के मिरा-पीटमर्द, विध, विदूपकादि के गुणों से युक्त होता है। एमी के उदाहरण रूप में प्रथम उदाहरण मालतामात्र से कामन्दको (लिहिनी-तपस्विनी) का दिया गया है जो माधव के प्रति मालवी को भाकृष्ट करने का प्रयत्न करती है:- शासों में निठा होगा, सहज ज्ञान, प्रगश्मता, गुणवती वाणी, समय के अनुरूप प्रतिमा फा होना, ये गुण सभी किसानों में इदानुसार सफरता दिराने बाळे होते हैं। (यहाँ भगवती कामन्दकी माया के गुणों का वर्णन सामान्य उक्ति के द्वारा कर रही है।) तत्र सती यथा- 'मृगशिशुशस्तस्यास्तापं कर्म कथयामि से दहनपतिता दृष्टा मूतिर्मया नहि चैधवी । इति तु विदितं नारीरूपः स लोक्शा सुधा तप शरतया शिल्पोवो विधेविषरिष्यते ॥ वही मातीमान में सखी दूती कप में माधव के पास जाकर मालती की विरह जनित भवस्था का वर्णन कर रही है। माधव, उस दिन के शारक यो समान आँसों वाली मालती के विरताप को कैरो कहूँ, उसरा वर्णन करने के लिए मेरे पास कोई शाम ही नहीं। अगर सही मैंने चन्द्रमा की मूर्ति को आग में रहो देवा होता, मैं बसा तो, पर मैंने भी मूर्ति (चन्द्रकला ) को कभी पशि में पहो देवा नदी । हो मैं इतना भर जानती हैं, कि मावती रहो मुन्दर है, मालदी का यह रमवीरूप सारे ससार को दहिये लिए असर के समान है, पर ऐसा मानस पड़ता है, कि तेरी दुपता के कारण प्रभावी पर सबसे सुन्दर बलाकृति यौही घरबार हो जायगी। यथा - 'सचं जाणइ दळु सरिराम्मि जणगि जुमए राओ। मरत | तुर्म मणिसं मरणं पि सलाइणि से।' ('सत्यं जानाति द्रष्टुं गहरो जने युज्यत्ते रागः । नियता म खो मामिष्यामि मरणमपि सापनीयमस्या') और से-कोर पूती (सपाति) नायक के पास आकर मायिका विरामनित दशा मोन करनी है-यह बात देखने में टी, योग्य यदि के प्रति प्रेम करना उचित ने योग्य पति के प्रति प्रेम किया, यह माया)। अगर वह मर जाय, तो मर माप, मैं तुम्हें कुछ न कर योग्य व्यक्ति से प्रेम र इसके सिर में उसका मर गागा भी साईदीहोगा।
दशरूपकम् स्वयं इती यथा- 'महु एहि किं णिवालय हरसि णियं घाउ दवि मे सिचप्रम् । साहेमि कस्स मुन्दर दूरे गामो भई एका' ('मुहुरेहि किं निवारक हरसि निजं वायो यद्यपि मे सिंचयम् । साधयामि वस्य सुन्दर दूरे प्रामोऽहमेश) इत्यायुधम् । स्वय दूती जैसे-कोई नायिका किमी पान्यादि के साथ उपभोगकी इन्चासे उसे मुनाकर पह रही है। हे निगोडे वायु, तुम बार बार बाते हो, मेरे वक्ष को (आंचल को) क्यों कर रहे हो । यद्यपि तुम मेरे आँचल को कर रहे हो, फिर भी है शुन्दर में किसे प्रसन्न करूँ, गाँव तो दूर है, और यहाँ मैं बिल्कुल अकेली हूँ। (इस शून्य स्थल में पान्य के साथ वी गई रतिक्री को कोई न देख पायगा, इस बात ही व्यजना स्वय दूतो वो उति कर दी है। आंच को रिलाकर वह चेष्टा से भी पान्य को आमन्त्रित कर रही है-यह सत्यहत्यसवेव सत्व है।) अय योपिदलकारा यौवने सत्त्वज्ञाः स्त्रीणामलङ्कारास्तु पिंशतिः। यौवने सत्त्वोद्भूता विंशतिरलद्वारा प्रोगां भवन्ति । भावो हावश्च हेला च त्रयस्तम शरीरजाः॥३०॥ शोभा कान्तिध दीप्तिश्च माधुर्य च प्रगल्भता। औदार्य धैर्यमित्येते सप्त भावा अयनजाः ॥ ३१ ॥ तर भावहानहेलानयोशाजा, शोभा कान्तिीतिर्माधुर्य प्रागल्भ्यमौदार्य धर्यमित्य- याजा सप्त। लीला विलासो विच्छित्तिपिंधमः किलकिञ्चितम् । मोहायितं फुट्टमितं वियोको ललितं तथा ॥३२॥ विहतं चेति विझया दश भावाः स्वभावजाः। तानेव निर्दिशति- निर्विकारात्मकात्साघादायस्तरावधिक्रिया ॥ ३३ ॥ तन विकारहेतौ सत्यध्यविकारं सत्वं यथा फुमारसम्भवे---- 'श्रुताप्सरोगीतिरपि क्षणेऽस्मिन्हर' प्रसंख्यानपरो बभूव । आत्मेश्वराणां नहि जातु विना समापिभेदप्रभवो भवन्ति ।" रियों में यौवनावस्या में सवज (स्वाभाविक) पीस मलशा माने जाते हैं:- भाव, हाव, हेला पे तीन शरीरथ (शारीरिक)भलकार हैं। शोमा, कान्ति, दीप्ति, माधुर्य, प्रगरमता, औदार्य, धैर्य ये सात सावज भाव घे अलकार है, जो क्षियों में भयान रूप से पाये जाते हैं, अर्थात् इन्हें प्रकटित करने में मापिकाओं को कोई पान नहीं करना पड़ता।रीला,विलास, विच्छित्ति, विनम, किलकिजित, मोहायित, पुE. मित, विश्वोक, ललित, विहन ये दस मात्र स्वभावज भाव है, अर्थात् स्वमान से ही द्वितीयः प्रकाश ११६ स्त्रियों में स्थित रहते हैं। इन्हीं का आगे एक एक को लेकर लक्षण उदाहरण दिया जाता है। निर्विकारात्मक सत्य से जय विकार का सर्व प्रथम विस्फुरण पाया झाता है, तो इसी प्रकार के प्रथम स्फुरण को 'भाव' कहते हैं। मानवप्रकृति में सत्व, रजस् तथा तमस् वे सोन गुण माने आते हैं। इन गुणों में से सत्व की यह विशेषता है, कि विकार को उत्पन्न करने वाले कारण के विद्यमान होने पर भी विकार नहीं हो पाता (विकारहेती सति विनिय ते येषां न चेतांसित रथ धोराः)। इसी को पहले नायक के गुणों में गाम्गीय कहा गया है । इस सल का उदाहरण कुमारसम्मन का यह पप दिया जा सकता है- अप्सराओं के सङ्गीत यो सुनकर भी महादेव उसी क्षण समाधि में स्थित हो गये। जितेन्द्रिय तथा जिनामा व्यक्तियों की समाधि को कोई भी बिन्न मन नहीं कर सकते। तस्मादविकाररूपात्यत्वात् यः प्रथमो विधारोऽन्तर्थिपरिचर्ती वीजस्योच्छूनतेव स भावः। यथा- 'दृष्टिः सालसतो विमति न शिशुझोडासु बद्धादरा यो प्रेषयति प्रवर्तितसखाराम्भोगयाास्वपि। पुंसामहमपेतशडमधुना नारोहति प्राग्यथा याला नूतनयौवनव्यतिकरावष्टभ्यमाना शनै। इस प्रकार सत्त्व अयस्था है, जबकि यति सर्वथा निर्विचार रहता है। इस अवस्था के बाद विकार की जो सर्वप्रथम अवस्था पाई जाती है, जिसमें विकार बसा यरफुट रूप से रहता है 'माव' कहलाती है। यह विकार शरीर के अन्त में ही छिपा रहता है, और इसकी तुलना बीज की उच्नता से की जा सकती है। जिस तरह पानी, मिट्टी भादि सयोग से महरित होने के पहले बीज कुछ उच्चून हो जाता है। इस समय बीज में विकार तो होता है, पर यह विकार बीज के अन्तस् में ही होता है, इसी प्रकार नायिका के अन्त में पाया जाने वाला (हार) विकार 'भाव' भाग से अभिहित होता है। इस 'मार' नामक शारीरिक मलद्वार वा उदाहरण यों दिया जा सकता है । मुग्धा नायिका में सर्वप्रथम विकार का सुरण हो रहा है। कदि उसी का वर्णन कर रहा है। इसी नजर पहले बड़ी चाल थी, लेकिन भर व मनसाई-मी नजर भाती है ( उसकी दृष्टि ने अलसता पारण कर है)पहले चपन में, वह छोटे बच्चों के खेलों से भानन्द प्राप्त करती थी. लेकिन अब छोटे पच्चों के खेलों में वह कोई दिलचस्पी नही लेती। बयस्क लियों की बात सुनने में, पहले उसे कोई मजा नही माना था, लेकिन अब अपनी सखियों को सम्मोग की बात करते मन कर बहमने कान उन बातों को और लगाती है। सम्मोय की बातों को सुनने में था उसको कुर कुछ दिलचस्पी होने हम गई है। पानी होने पर वह बिना किसी हिचक के पुरषों को गोद में बैठ जाया करती थी, लेकिन अब पहले की तरह पुरषों की गोद में नही पैठनी निःसन्देद यह माला और धीरे नदोन यौवन के आविर्भाव से युक्त हो रही है। अथवा दर नायिरा नवीन योवन के द्वारा अवसित या अवर( अष्टन्यमान हो रही है। यया या पुमारसम्भवे- 'हरस्तु विधिपरिलुप्तधैर्यश्चन्दोदयारम्भ इवाम्बुराशिः । उमागधे विम्यापपरोष्टे व्यापारयामास विलोचनानि ।'
१२० दशरूपकम् अथवा कुमारसम्भव में महादेव में विकार का प्रथम स्फुरण पाया जाता है। इसी का वर्णन कालिदास ने यो रियारे शामदेव वे वाण मारने पर महादेव का धैर्य कुछ कुछ उसी तरह सप्त हो गया, चन्द्रोदय को भारम्भिक दशा में समुद्र की तरह महादेव का मन चनन हो रठा। उन्होंने सिम्याफ्ल के समान अधरोष्ठ वाले मुदर पार्वती के मुख की और अपने नेत्रों को दाण। यथा वा ममैव- 'तंघिय पण ते श्वेय लोअणे जोव्वण पि त चेम। अण्णा अणालच्छी अग्ण विथ कि पि साहेद ॥ ('तदव वचन ते चैव लोचने यौवनमपि तदेव । अन्यानलक्ष्मीरन्यदेव विमपि साधयति ।') अथवा जैसे धनिक की बनाई दुई निम्न प्राकृत गाया में भी नायिका के 'भाव' नामक शरीरज बलकार का वर्णन है उस नायिका की बातचीत (वचन ) मी वही है, नेत्र भी वही है, यौवन भी बहो, इनमें कोई भी परिवचन दिखाई नहीं देता। लेकिन उसके शरीर में भित्र प्रकार वो वाम- शोमा दिखाई पड़ती है, जो दूसरे ही ढङ्ग का प्रभाव (लोगों पर ) डालती है। अथ हाव- अरपालाप. सङ्गारो हावोऽतिधिकारकृत् । प्रतिनियताविकारकारी प्रहार स्वभावविशेषो हाव' यथा ममैव- 'ज किं पि पेच्छमाण भणमाण रे जहातहच्चेत्र। गिजभान ऐहमुद्ध वनस्स मुद्ध णिश्रच्छेह ॥' ('यत्किमपि प्रेक्षमाणा भणमाना रे यथातथैव । निाय स्नेहमुग्धा वयस्य मुग्धा पश्य । ) नारिका में बातचीत कम करने की अवस्था का होना तथा झार का होना हाय' कहलाता है। यह हाव' आँस, भौह वादि में विकार उत्पन्न करता है। निधित बड़ों में विकार करने वाला भृगार 'डाव' कहनाता है, यह दाव स्वाभाविक तथा शरीरज अलङ्कार है। जैसे धनिक की हो या गाथा नायिश के 'हाई कोयना वरती- हे मित्र, उस नायिका के देखते हुए या बोलते हुए, दोनों का जो कुछ असर होता है. यह एक-सा ही होता है। या तो तुम स्नेहमुग्धा भोली नायिका को दृष्टिपात करती देसी, या रोलजी देखो, एक सा अनुभव होगा । यहाँ नायिका का इष्टिपात भी माहाददायक है इस प्रबार उसमें 'हाव की स्थिति सचिन की गई है। प्रय हेला- स एप हेला सुव्यक्तङ्गाररससूचिका ॥३॥ हाव एव परभूयोविकारत्वात्सुव्यताररससूचशे हेला । यथा ममैव- 'वह मत्ति से पभत्ता सव्वा विन्भमा थणुभए। संसइअदालभावा होइ चिर जह सहीण पि॥' ('तथा मरित्यत्या प्रवृत्ता सर्वात विभ्रमा स्तनो दे। सशयितयालमावा भवति चिर यथा सखीनामपि ) द्वितीयः प्रकाशः १२१ यही 'हाव जय कार रस को प्रकद रूप में अच्छी तरह मिम्यक्त करने लगे, तो 'हेला' नामक शरीरज बलकार धन शापगा। 'हेला' में नायिका के विकार स्पष्ट रूप में परिलक्षित होते हैं, तथा प्रकट रूप में कार घेटा के घोतक होते हैं। जैसे पनिक की स्वयं की इस गाया में- ज्योहा रसके स्तन दिन होने लये, त्योही इस नायिका के सारे बड़ों में इस से विलास विभम मवृत्त होने लगा, कि इसकी सखियों भी एक बारगी रसके पालभाव के बारे में संशय करने लग गई। 15/1157 अयायलजाः सप्त तन शोभा- रूपोपभोगतारुण्यः शोभानानां विभूपणम् । यया कुमारसम्भवे- 'तो मारमुखी तर निवेश्य वाला क्षणं व्यलम्यन्त पुरो निषण्ण भूतार्यशोभाहियमाणमेनाः प्रसाधने सन्निहितेऽपि नार्यः । इत्यादि । यया घ शाकुन्सले-~- "अनागतं पुष्प किसलयमलून कररहे- रनाविद्धं रक्ष मधु नयमनास्यादितरसम् । अपण्डं पुण्यानां फलमिव च तद्रूपमनपं न जाने मोकारं कमिह समुपस्यास्यति विधिः ॥' ' अयसन अलकार सात माने गये हैं। इनमें प्रसमाव शोमा अमर का वर्णन पहले किया जा रहा है। प, विलास तथा यौवन के कारण जय नायिका के साक्ष विभूपित हो उदते हैं, तो उस अलक्षार को 'शोगा' नामक अपनज अपार कहते हैं। कुमारसम्भव के समम सर्ग में पार्वती को विवाह के लिए सजाया जा रहा है। इसी का वर्णन करते समय कयि कुलगुरु बानियत करते हैं:- इस हा पार्वती को पूर्व दिशा की और मुंह करके विठग कर अन्य खियाँ उसके सामने देश कर एक क्षण के लिए ठिक सी गई-पार्वती का प्रसाधन करने से रुक सो गई। पार्वती को नैसर्गिक शोभा को देस कर पे सम्प-दो गई, उनके क्षेत्र लजित हो गए, कि रस लगिक सौन्दर्य के लिए इन गाद्य प्रसाधनों की क्या जरूरत है और इस तरह प्रसाधन सामग्री के समीप रहने पर भी वे एक इम के लिए पार्वती का मसायन न कर सका। भौर जैसे शकुन्तला के स्वाभाविर सौन्दर्य रूपमा भरद्वार का वर्णन करते हुए--- इस सम्मुत स्थित बाला की शोभा देख कर ऐसा क्झा जा सकता, कि यह वापूस, बिसे भर तक किसी ने नहीं पात, यह यह कोमश किसलवारे जिसे किसी के नसी ने नहीं तोगार-मही सरोंचा है, पर बह रात है जिसको भी देषा भी नहीं गया है, तथा यह परमपा पदसियो रस को किसी ने नहीं ससारे रसका यह अलग रूप- भनिन्य सौन्दर्य-जैसे पुण्यों का भराण्ड एक है। पता नहीं समा रस फल का उपभोका रिसे बनायेगा। भप कान्ति:- मन्मपाथापितछाया सैव कान्तिरिति स्मृता॥ ३५ ॥ 1. 'मन्मयायाचित- इति पाठान्तम् । - १६० 1 १२२ परारूपकम् शोभेव रागावतारपनीकता कान्ति । यथा- 'उन्मीलदने दुदीप्तिविसरैटूरे समुत्सारित मिल पीनकुत्वस्यलस्य च रुचा हस्तप्रमाभिहतम् । एतस्या पलविदुक्ष्ठकदलीकल्प मिलत्कौनुका दप्राप्तासुख पेव सहसा देशेषु लग्न तमः ॥' यथा हि महाचेतावर्णनावसरे भयाणस्य । शोभा में नायिका में कामविकार नहीं होता । जब कामाविर्भाध के बाद इसकी कान्ति और अधिक थढ़ जाती है, तो यही शोभाराग (काम) के उत्पन्न होने से सधन होने के कारण कान्ति नामक भला होती है। जैसे निम्न पच में नायिका में ममथ का महतरण होने से उसरी मनोहारिता और सघन हो गई है। एसको इस कान्ति को देख कर मानव या चेतन प्राणी तो क्या अधिकार भी उसके मङ्गों के पास को प्राप्त करना चाहता है। लेशिन नायिका से अपने पास भी नहीं फटकने देती। वह अपने प्रफुल्लित मुख रूपी चन्द्रमा की प्रकाश-किरणों से उसे (धेरे को)दूर भगा देती। उसे अपने मोरे मारी पक्षोजों को कान्ति से फोड़ देती है, और हाथ की कान्ति से सूप पीटती है। इस तरह वह अपने मङ्गों का मुख प्राप्त करने वाले कामुक अधकार को दूर से मार मगाती है। उइण्ड कामी की माँति चोट खाने पर भी अधकार पीछे नहीं हटता, वह एक बार नायिका के मस्पर्शका सुख पाना ही चाहता है, और इस बार वह कोष से नायिका के पीछे पड़ हो तो जाता है। मला एक बार तो उसका- अपमान करने वाली नायिका को मजा चखा दो दिया जाय। इसलिए करूविक पक्षी के कण्ठ के समान सपन काला मधकार, कौतुक के साथ एक दम उस नायिका के बालों में भाकर मानों रोष रो चिपट गया है। भावयह है कि उस नायिका का मुख अपूर्वकान्ति से युक्त है जैसे पूर्णच द्रमा हो, इसके वक्षौज पूर्णत उन्नत है, उसके हाथ भी सुन्दर है, तथा उसके केश अधिकार के समान पने काले हैं।' कान्ति का दूसरा उदाहरण हम बाण की कादम्बरी के महाश्वेतावर्णन में देख सकते हैं। अथ माधुर्यम्- अनुल्यणत्यं माधुर्यम्- यथा शाकुन्तले- 'सरसिजमनु विद्ध शैवलेनापि रम्य मलिनमपि हिमांशोलचम लक्ष्मी तनोति । इयमधिकमनोज्ञा वल्कलेनापि तन्वी किमिव दि मधुराण मण्डनं नाकृतीनाम् ।।' नायिका में अनुभवणता या रमणीयता का होना माधुर्य नामक भाव कहलाता है। से शकुन्तला के वर्णन मैं शाकुन्तल नाटक में- शेवल से युक्त होने पर भी कमल अन्दर ही लगता है। चद्रमा का काला कर भी १ जप कोई व्यक्ति जबदस्ती पीछे पड़ता है, तो भगाने की कोशिश की जाती है, मोटी चीज पाथर, सौटे भादि से उसे फोड़ा जाता है, और हाथों में मारा-पीटा जाता है, नायिका औक यहोवाद अधिकार के साथ करती है, यह स्पष्ट है।
द्वितीयः प्रकाश १२३ उसकी शौमा ही बढाता । यह (शकुन्तला ) वकल पहनने पर भी बचे मुन्दर लग रही है। मधुर प्राकृतियों के लिए कुछ मो मण्डन बन जाता है।" अथ दीप्ति- -दीप्तिः कान्तेस्तु विस्तरः। । 1 - . 1 ३ दिया पसिध णिअन्तसु मुहसमिझोपहाविलुसतमणिवहे । अहिसारिमागे विग्यं करोसि अण्णाण विहयासे ॥ (प्रसीद परय निर्वतस्य मुखशशिम्योत्स्लाविलुप्मतमोनिवहे । अभिसारिकाणां विनं करोष्यन्याराामपि हताशे')' कान्ति नामक भाव का विस्तार-उसका विशेष पाया जाना, दीप्ति नामक भाव कहलाता है। जैसे १ रमणो, सुश हो जाभी, देखो तो तुम्हारे मुख रूपी धन्द्रमा को न्योता से अन्धकार नष्ट हो रहा है। कोट चलो, हे मूल (तारे), तुम दूसरी अभिसारिकाओं-अधिकार में पिय का अभिसरण करती हुई कृष्णामिसारिकाओं-के गौ प्रियामिसरण में REE क्यों कर रही हो? श्रय प्रागल्भ्यम्- निस्साघसत्वं प्रागल्यम्- मन लोभपूर्वकोजागार गावरां तदभावः प्रागल्भ्यम् , यया ममैव- 'तथा मोडादिधेयापि तथा मुग्धापि सुन्दरी । फलानमोगयातुयें सभावाचार्यकं गता। मन के सोमादि कान पाया जाना मागवन्य मामक भाव कहलाता है। से पनिक काय का यह पच-- पपषि पद बन्दरी उनी अधिक बापू तथा भोली ।फिर मी समा में कलाप्रयोग की चतुरता का प्रदर्शन करते समय बाचार्य को प्राप्त हो गई। अपौदार्यम्- -पोवार्य प्रायः सदा ॥ ३६॥ पा-- "दिई । बुदिानाए साल काऊण गेहपापारम् ।। गहएपि मशुदुरले भरिमो पाअन्तमुत्तस्स "" ('दिवस घालु दुखिताया सकलं कृत्वा गृहण्यापारम् । गुरुपनि मन्युरो गरिमा पन्ते सुप्तस्य । यसा या-भूगरे सहसोद्रता' इत्यादि। सदा प्रेम से पुके रहना मायक मति अनुकूल पहना, औदार्य महकाता है। जैसे न भर भर का कामकार करके पो दर, नायिका के भारी क्रोध व दुसय पापातिकतने पर शान्त हो गये। अपामे 'भूम सहसोमवार देदी होवर दी हुई) वारि रहाहरप में। 11 in . १२४ दशरूपकम् श्रय धैर्यम्। चापलाऽपिहता धैर्य विदृत्तिरविकत्यना। चापलानुपइता मनोवृत्तिरात्मगुणानामनाख्यायिका धैर्यमिति यया मातीमाधवे- 'ज्वलनु गगने रात्रौ रात्रावसरडकर शशी दतु मदन' किंवा मृत्यो परेण विधास्यति । मम तुदयिता यस्तातो जनन्यमलान्बया कुममलिन न स्वेवाय जनो न च जीवितम् ॥ घालता से रहित, तथा अपने स्वयं के गुणों की प्रशसा से रहित मनोवृत्ति को धैर्य नामक भाव कहते हैं। जैसे मालनीमाधव की मालती में धैर्य भाव पाया जाता है।- हर रात आकार में पूर्ण पद्रमा प्रकाशित होकर मुशे अलाया वर(मला करे) कामदेव (मुझे) जगवा करे, देव गृत्यु से नदकर अधिक क्या बिगाड़ सकता है। मुझे तो अपना प्रिय, अपने पिता, पवित्र बर में उत्पन्न अपनी माता तथा अपना निर्मल कुल अभीष्ट है, या जन (अपने भाप) तथा यह अपना जीवन प्रिय नहीं है। अथ स्वाभाविका पश, सत्र- प्रियानुकरण लीला मधुराग पिचेष्टिते ॥३७॥ प्रियकृतानो पारवेषचेष्टानां भारिणीनामजनाभिरनुकरण लीला । 7 यया ममैव- 1 'तह दिटठ तह भणिय ताए णिमद तहा तहासोणम् । अवलोक्य सइव्ह सविम्भम जह सवत्तीहिं ।' 'तथा हष्ट तथा भणित तया नियत तथा तथासीनम् । । भवलोकित सतृष्ण सविभ्रम यथा सपनीभि ।) अब वस स्वाभाविक भावों का उल्लेख करते हैं। मायिका के मपुर गङ्गों की घेष्टाओं के द्वारा मिप (नायक) के धाग्वेषचेष्टादि का शमारिक अनुकरण करना लीला मामक भाव कहलाया है। जैसे धनिक की स्वयं को इस गाथा में- उस नापिका का प्रेक्षण, गोलचाल नियन्त्रण, या पेठमा इस दंग का है, कि इसकी सौते विकास तुष्णा के साथ उसे देखती है। यया पावन दित वदति याति तथा थपासो' इत्यादि । मथवा से, 'जैसे वह बोलता है, वैसे ही यह मौलती है, तथा जैसे बह चलता है, वैसे ही पर पलती है।मादि। भर दिलस- तात्कालिको विशेषस्तु विलासोकियोतिषु । एपितावलोकनादिकालेन क्रियायो पचने च सातिशयविशेषोत्पत्तिचिलाय । यथा मान्तीमावे- 'भत्रान्तरे किमपि पाविमचातित्त चित्र्यमुसितविभ्रममायताया। . ।
द्वितीयः प्रकाश १२५ t H+ वाहरितालिफविकारविशेपरम्प- भावार्यकं विजयि मान्मथमाविरासीत् मिय के दर्शनादि के समय नायिका की अनचेष्टाओं समा बोलचाल में, जो विशेष प्रकार का साकालिकाविलास पाया जाता है, उसे विसासकहते हैं। जैसे मालतीमाधव में- इसी बीच में, लायो भाँखों पास मालती का कामदेव समन्धी विजयी भाचार्यल प्रकट भा, जिसकी विचित्रता वाग्विलास से बढ़ गई थी, जो विलास व विधम से एक पा, तथा जो অধিক কান্তি মণী ঈ দলে বিগ ময়ী বা ধা। सय विच्छिति श्रावाल्परचनाऽल्पापि चिच्छित्तिः कान्तिपोपकृत् ॥ ३ ॥ स्तोकोऽपि वेपो बहुतरकमनीयताकारी विच्छिति । यथा कुमारसम्भवे-- 'कर्णार्पितो रोध्रफपायरूले गोरोचनामेदनितान्तगौरे । तस्मा कपोले परभागलाभाद्रपन्य यपि यवधरोह ।' थोड़ी सी पेषभूषा व सार-समा भी जहाँ कान्ति को अधिक पुष्ट करती है, वहाँ विधिति नामक भाय होता है। जेश कुमारसम्भव में पार्वती के वर्णन में-18 प्रसाधन करते समय पार्वती के कान में लगाया गया यब का प्ररोह, लोभ पूर्ण के कारण स्रो तथा गोरोचन की पत्रावली से अत्यधिक गोरे उसके कपोल पर विशेष सुन्दरता माम कर (ोगों की ष्टि को अपनी और माइट कर रहा था। अप विश्रम- विभ्रमस्त्यरया काले भूपास्थानविपर्ययः ।। गया- 'भभ्युदते शशिनि पेरालझान्तदूती- सलापसंवलितलोचनमानसाभि समाहि मम्हनविधिविपरीतभूषा- विन्यासासितसतोचनमानाभिः ॥ ययावा ममद- 'युवाध्या बहि भन्तमरामादिभूपया । भालेजनं शोलामा पोले तिलक कृतः ॥ शादी के कारण समय पर मामूणों का उलट-पलट पहन छेना विशाम कछाक्षा है। जैसे- चन्द्रमा के उदय होने पर, प्रिय माया की दूवियों के अन्दर बचनों से सलसित नेत्र मन वाली नायिकामों नै बाभूषण-मण्टन इस से रिया, कि उनसे माभूपयों को विरोध प्रकार से पहना देपर (धनका विपरीत रिला देवकर) ससिया (स पण। " अपया से पनिक का स्वयं का यह पर- प्रिय मावरू सेसार माया जानर, मारकरी नायिका ने, रिसकर मारकार्य समाप्त नोंदुमा पा, बार में ममन, माँसों में साधारस बहतका सा कपील पर तिलक या लिया। 1 . r , 4 .
१२६ दरारूपकम् श्रय किलकिषितम्- क्रोधाश्रुहर्पमीत्यादेः सद्धरा किलकिश्चितम् ॥३६ ॥ अया ममत्र-. F 1- रतिमोडायूते कथमपि समासाद्य समय मया रब्धे तस्या क्वणितक्लकण्ठामघरे । कृतभ्रूभाासौ प्रकरितविलभादित स्मितकोधोद्धान्त पुनरपि विघ्यान्मयि मुष्पम् ॥ नायिका में एक साथ कोष, पशु, हर्ष सया मय कासाक्ष्य पायाजाना किलकित्रित कहलाता है। जैसे धनिक के रस पथ में- रनिकीता के समय शुओं खेलते समय किसी तरह समय पाकर मेरे द्वारा उसके अपर को श्रीव लेने पर, टेली मौहों वाली उस गायिका ने पारफल का से अतुट आवाज करते हुए, लग्जा, रुदन, मुसकराहट तथा कोष के मछुट मिश्रण से उद्धात मुखको मेरी ओरकर दिया। थिय मोधयितम्-। मोहायितं तु तद्भावभावनेटकथादिषु । इष्टकयादिषु प्रियतमकथानुकरणादिषु प्रियानुरागैण भावितान्त' करणतं यया पगुमस्य- 'विषतिन्यपि नृपे तत्वादेशेन चेतसि । पीडादलित यके मुखे दुमवशैव सा !!' यथा घा- 'मात कहृदये निघाय मुधिर रोमांचिताही मुह ग्रंम्भामन्थरको सुललितापानां दधाना दृशम् । सुप्तवालिखितेव शून्यहृदया लेखावशेषीभव स्यात्मद्रोहिणि किं हिया कथय मे गूढो निहन्ति स्मर ।' 1 . यया या ममैव- -- -- 7 - 'स्मरवथुनिमित्त गूढमुक्षेतुमस्या सुभग तद कयायो प्रस्तुताया सखिभिः । भवति विततरछोदस्तपीनस्तनामा । ततवलयितबाहुम्मित' साइभई ।' प्रिय की कथादि का श्रवण मननादि करते समय उसके भाव से प्रभावित हो जाना एकतान हो जाना मोहधायित कहलाता है। गला. हे शित.ऐले.प.मी.--अमर चित्र को देखने, सम्पत्ति में पाके मारे से एक होकर परस्य ममी हुई इस नायिका ने अपने मुख रूपो चन्द्रमा को लज्जा के कारण कुछ टेडा कर दिया। T J रखी (माई), मकिस हदय में बैठाकर पड़ी देर से रोमात्रित होकर अपनीट को जिसी पुतलियों धमाई के कारण निश्चल हो गई है, तथा जो सुन्दर अपान वाली है-धारण करती - द्वितीय प्रकाश दुई, सोई-सी, चित्रित-सी, सूप हुदय होकर केवल मूर्तिमती बन गई हो। हे आरमद्रोहिणि, स्या कामदेव गुप्त रूप से तुम्हे परेशान कर रहा है, लज्जा क्यों करती हो, मुझे बताओ तो सही। अथवा जैसे धनिक के इस पध में-- कोई दूती या ससी नायक के पास जाकर नायिका की दशा का वर्णन करती हुई कहती है-ई सुन्दर युजक, जब सखियाँ इस नायिका को कामपीड़ा के शत झारण को जानने के लिए तुम्हारी बातचीत छेडती है, तो वह अपनी पीठ को मरोड कर पान स्तनों को ऊंचा करती दुई, हाथी को पलाकर समेटती हुई, अङ्गभा तथा नमाई से युक्त हो जाती है। अय पृष्टमितम्- सानन्दान्त कुहमित पुग्येरकेशाघरग्रहे ॥ ४०॥ यथा- 'नान्दीपदानि रतिनाटकचित्रमाणा- मामाभराणि परमाण्यपया हमरस्य । द?ऽघरे प्रणयिना विधुताप्रमाणे सीकारशुष्करुदितानि जयन्ति नार्या ।' रतिकोटा में नायक के द्वारा केश तथा अधर को महण करने पर दिल से प्रसा होने पर भी पय मायिका बाहर से क्रोध को, तो वह कुट्टमित भाव कहलाता है। प्रियतम के द्वारा अपरदशन करने पर हाय को फटकारती नायिका का सत्कार से युक्त पए सस रोना विजयार ( सत्कृष्ट है), जो रतिक्रीडा के नाटकीय विलासों का नान्दीपद (मालाचरण) है, तथा कामदेव (सर) के परम आनाशर-मादेश-३। अथ विश्वोक- गर्घाभिमानादिऐऽपि विनोकोऽनादरक्रिया। यथा ममैव- 'सव्याज तिलकालकान्विरलयल्लोलागुलि सस्पृशन् पारधारमुपश्चय ययुगप्रोदधिनीमवलम् । यमातरहिताधितशा सावज्ञमालोकित तद् दधीरितोऽस्मि न पुन कान्ते कृतार्थीकृत ॥' जय मायिका गर्व तथा अभिमान के कारण इष्ट वस्तु के मति भी शनादर दिखावी है, तो उसे विख्योक नामक भाव कहते हैं। जैसे धनिक के स्वरचित निम्न पच में नापिका कीस चेटा में हे प्रिये, तुम्हारे सिलकालकों का कपट से स्पर्श करते हुए, तया चचल महुलियों से कुच्युपल पर बदुर नाले मन को बार-बार छूकर उहावे हुए, मेरी और तुमने भी टेदी मोदी वाली वृष्टि से अशा के साथ देखाः रस गर्व से तुमने मैरी अवहेलना ही की मुझे सफल न किया। (अथवा, तुमने उस गर्व से मैरी अवहेलना परना चाहा, लेकिन वास्तव में मेरी शान दुई, परन् तुम्हारे निधोक भाव के कारण इस शोमा को देखकर मैं सफल हो गया। श्रय ललितम्- सुकुमाराङ्गविन्यासो मरणो ललित भवेत् ॥ ४ ॥ 1611157 " । मा दशरूपकम् यथा ममैव- - + . - - 4 'सभ्रूभ करक्सिलयावर्तनरालपन्ती सा पश्यन्ती ललितललित लोचनस्याघलेन । विन्यस्यन्तो चरणकमले लीलया स्वरयाते- निस्सीत प्रथमवयसा नर्तिता पहजासी॥ कोमल तथा स्निग्ध प्रकार से भागों का विन्यास ललित मामक भाव कहलाता है। वैसे धनिक के सीनिम्न पच में- उस कमल-से नेत्रवाटो नायिका को जैसे बिना सहीत ही शैवन के प्रथमाविर्भाव ने नचा दिया है। दूसरा आचार्य तो किसी कलाभिनेत्री को सहीत व ताल पर नाचता है, लेकिन यह नायिका यौवन के माविर्भाव होने पर इस तरहका माचरण कर रही है, जैसे बिना साल के ही नाच रही हो। वह मौहे टेढो परके, हाय रूपी किसलयों को फैलाती हुई रात करती है, माखों के थपा से बड़ी मधुर-मधुर दह से देरानी है, और चलते समय अपने चरणकमलों को बड़ी लीला (भाव) के साथ छठाती है। एक कुशल नर्तकी जैसे ताल व सहीत के माधार पर अझ, उपार तथा भार का विशेषादि बरती है, वैसे ही यह भी कर उस पर भी बढ़ाई यह किया नायिका पिना सहीत व ताल के दो मृत्यकल का प्रदर्शन कर रही है। भय विहतम् - प्राप्तकालं न यद्याद्रीडया विहतं हि तत् । प्राप्तावसरस्यापि वाक्यस्य लवया यदवयनं तदिहतम् यया- 'पादाहटेन भूमि किसलयविना सापदेशं लिखन्ती भूयो भूय झिपन्ती मयि सितशवले लोचने लोलतारे । वर्ष होनम्रमीपस्फुरदधरपुटं पाश्यगर्भ दधाना या नौवाय विधिस्पितमपि हृदये मानसं तहुनोति ।' जहाँ मापिका समय थाने पर भी सदनुपूल वाक्य का प्रयोग मा के कारण मही कर पाती, वहां विहत मामक भाव माना जाता है। जैसे, कोपल के समान कान्ति बाके पैर के अंगूठे से पम्पी को सिौ पाने से कुरेदती हुई भौर मैरी और बार-बार चन्द्र बनौनिका बाले सफेद भूरे क्षेत्रों को फेंकती हुई, उस नापिका ने, जिसका मुं(भपने भाप में किसी पचन को दिपाये था, जिसके मोठ कुछ-कर फरक रहे थे, तथा ओस्मा से मन हो रहा था, गुश से हदय में स्थित पात को भी नयरा, पर बात मानसोपादित कर रही है। अथ मेट' कार्यान्तरमहायानाह- मन्त्री रषं पोमयं षापि सपा तस्यापंचिन्तने ॥ १२ ॥ सस्य नेतुरचिन्तायां तवानगपादिलक्षणाया मन्त्री छात्मा षोभय पा महाय' । हायक के मारी सहापों का वर्णन किया जा चुका है। अब उसके दूसरी कार्यों केसहायकों का वर्णन करते है:- परि नायक राजा होता है तो इसके माहि-राजनीति माविकीरिना करने में मन्त्री .. 1 1 द्वितीयः प्रकारा १२६ या यह स्वयं सहायक होता है। कभी-भी मन्त्री व मायक स्वयं दोनों हीन राजनीति सम्बन्धिना (तन्त्रावार मादि की) चिन्ता में व्यस्त रहते हैं। तन विभागमाह- मन्त्रिणा ललितः, शेषा मनिस्वायत्तसिद्धया। उसलक्षणो ललितो नेता मन्न्यायतसिद्धिः। शेपा धीरोदात्तादयः अनियमन मन्दिा स्वेन बोमन वाजीकृतसिद्धय इति । उपर्युक्त धीरोवातादि नायकों में धीरललित के समस्त कार्यों की सिद्धि मन्त्री के ही आधीन होती है। अन्य नायकों की निधि मन्त्री तथा स्वयं दोनों पर निर्भर रहती हैं। (यहाँ यह स्पष्ट है कि पौरपशान्त के सम्बन्ध में यह बात लागू नही हो सकेगी। धर्मसदायास्तु- ऋत्विपपुरोहितौ धौ तपस्विब्रह्मवादिनः ॥ ४३ ॥ प्रम = वेदस्तं वदन्ति व्याचक्षते वा तच्छीला ब्रह्मवादिनः, आत्महानिनो वा । शेपाः प्रतीता। गायक के धमाचरण में अस्विक् ( यजनक ) पुरोहित, वपस्वी वया प्रशानी महाएमा सहायक पनते हैं। दुष्टदमनं दण्डः तरसहायास्तु- सुहत्कुमारादविका दण्डे सामन्तसैनिकाः।।" स्पष्टम् । मायक के राजा होने पर उसकी दण्डविधान में सहायता करने बाले मित्र (राजा), युपराज, आहविक (पनविभाग के लोग अथवा भरण्यनिवासी) सामन्त तथा सनिक होते हैं। इस प्रकार नाटक की रचना करने वाले कवि को तरसम्बन्ध में उन-उन सहायकों का नियोजन करना उचित है। जैसे कहा गया है- एवं सत्तत्कार्यान्तरेणु सहायान्तराणि योज्यानि, यदाह- अन्तःपुरे वर्षवराः फिराता भूकवामनाः॥४४॥ म्लेच्छाभीरशफाराधा स्वस्वकार्योपयोगिना । शकारो राज्ञः श्यालो हीनजातिः । राजा फे रनिवास में वर्षवर (गपुंसक व्यक्ति), किरात, गूंगे तथा पौने व्यक्ति, धादि का सनिवेश किया जाना चाहिए। ग्लेच्छा, मामीर, शकार (राजा का नीच जाति में उत्पल साग)ये सभी अपने-अपने कार्य में राजा के लिए उपयोगी है। १. अपने राष्ट्रको चिन्ता 'तन्त्र' तथा परराष्ट्र की चिन्ता वाप' सालाती है। मिलाये माप का पर पथ- तन्त्रावापविदा योग भण्डलान्यचितिष्ठता। मुनिग्रहानरेन्द्रेग गोन्द्रा इन शत्रवः।। (२.८८) २. जैसा सिरसावली के अन्तर्गत उदयन के अन्तःपुर का वर्णन :-- नष्ट वर्षयरमैनुष्यगणनामावादपास्म अपा- मन्तः सयुकिकनुकस्य विशति त्रासादयं वामनः। पर्यन्तामतिमिनिजस्व सदृर्श नाम्नः किरातःकता कुम्ना नौवतयेव यान्तिश्नमेक्षणा नि:। ।
१३० दशरूपकम् - - विशेषान्तरमाह- ज्येष्ठमध्याधमत्वेन सर्वेषां च त्रिरूपता ॥ ४५ ॥ तारतम्यायथोक्तानां गुणानां चोत्तमादिता।, एप प्रागुताना नाय मनायिकादूतद्तीमन्त्रिपुरोहितादीनागुत्तममध्यगाधमानेन विरूपता, उत्तमादिमावद न गुणसख्योपचयापचयेन किं तहिं गुणातिशय तारतम्येन । इन नापकों के भेद को पुन बताते कहते हैं -ये सभी नायकादि ज्येष्ठ, मध्यम तमा अधम के भेद से तीन वरह के होते हैं। इनमें उपर्युक गुणों के तारतम्य के आधार पर ही इनकी यह उत्तमता, मध्यमता या अधमता निर्धारित की जाती है। इस प्रकार नायक, नायिका, दूत, दूनी, मन्त्री पुरोहित यादि सारेको नाटकीय पान उत्तम, मध्यम व अधम रूप से तीन प्रकार के माने जाते हैं। यह उत्तमरवादिकोरिनिर्धारण गुणों को सख्या बीमो या अषिकता के कारण न होकर गुणों की विशेषता के तारतम्य के माधार पर स्थित है। पच नाध्ये विधातव्यो नायफासपरिच्छद. ॥ ४६॥ इस प्रकार नायक को उसके परिच्छद (साथियों-नायिकामन्त्रिदूतादि) के साप नाटक में समिविष्ट करना चाहिए। उको नायक तयापारस्तूच्यते- तन्यापारात्मिका पुत्तिाश्चतुर्धा, तत्र कैशिकी। गीतनृत्यविलासाचैर्मृदुः शृङ्गारचेपितः ॥ ७॥ 1 प्रवृत्तिरूपो मैतृव्यापारस्वभावो वृत्ति, साब पशिकी-सात्वती बारमटी-भारतीभेदा- चतुर्विघा, तासा गीतनृत्यविलासकामोपभोगाद्यपलक्ष्यमाणो मृदु ारी कामफला- वच्छिनो व्यापार कैशिसरी । सा तु- इस प्रकार नायक का वर्णन करने पर नायक के व्यापार तथा सत्सम्बधिनी पति का उल्लेख करना जरूरी है, अत उसे ही बताते है। नायक के व्यापार की धार सरद की पृत्तियां पाई जाती हैं--(कैशिकी, सावती, आरभटी सथा भारमी) इनमें से कैशिकी वृति गीत, नृत्य, विलास भादि शनारमयी चेष्टाओं के कारण कोमल होती है। पति का तात्पर्य नायक का वह ब्यापार या स्वभाव है, भो नायक को किसी विशेष भोर प्रवृत्त करता है। ये प्रतिया चार -कशिकी, सावतो, आरमटी तथा भारती। इनमें से गीत, नृत्य, विलास, कामक्रीडा प्रादि से युक्त कोमल तथा मारी व्यापार, जिसका फल काम (पुमधार्थ ) १ कैशिको इत्ति कहलाता है। नर्मतस्फिअत्तत्स्फोटतद्गर्भश्चतुरङ्गिका। तदित्यनेन सर्वत्र नर्म पराश्यते । इस कैशिकी वृति के पार भन्न माने जाते हैंनर्म, नर्मस्फिन, नर्मस्फोट तथा नर्मगर्भ। कारिका के 'त' शब्द से सभी जगह नर्म का अवय अभीप्सित है। । 1 १. 'सपरिमह' इत्यपि पाठ।
द्वितीय प्रकाश १३१ M घेदग्ध्युमीडितं गर्म प्रियोपच्छन्दनात्मकम् ॥ ४ ॥ हास्यनेय सङ्गारभयेन पिहितं विधा। शात्मोपक्षेपसम्भोगमाने. शहार्यपि निधा ॥ ६ ॥ शुद्धमह भय देवा या पाग्येपचेष्टितः। सर्व सहास्यमित्येव नर्मापाशधोदितम् ॥ ५० ॥ अपाम्य इटजनापर्जनरूप परिहासो नर्म, तय शुद्धहास्येन समारहास्येन सभगहास्येन च रचितं विविधम् , मारपदपि स्वाारागीवेदा राम्भोगेच्छाप्रकाशन- सापराधप्रियप्रतिभेदनैत्रिविधगेक, भयनापि शुद्धरसान्तरापगावाद्विविधम् , एव पडषियस्य प्रत्येक चाग्यवेटाम्यतिकरणाशदशविधत्तम् । मिया नायिका (या, नायिका पदम दिय) के घिरा को प्रपन करने वाला विलासपूर्ण व्यापार गर्म कहलाता है। यह तीन प्रकार का होता है-हास्य से युक्त नर्मशार से युक्त नर्म, तया भय से युक्त नर्म। इनमें प्रथम भेद हास्य से युज होता है। दूसरा नारी नर्म तीन प्रकार का होता है, आरमोरोप-परफ, हायक या नायिका स्वय के मेम को प्रकट करते हैं। २ सम्भोगपाक, जहाँ सम्भोग की इस प्रकट मी जाय, तथा मानपरक, जहाँ प्रिय के भनिए फरने पर नायिका मान करवी है । भययुफ नर्म दो ताह का होता है-TE ARE # ये कामकार के नर्म याक्, थेप तथा चेष्टा के विविध प्रकाराम के अनुसार १४ प्रकार के हो जाते हैं। इन सभी नर्मकारों में हास्य का समावेश को रहता ही है। नम इस इसी मबार (परिहास ) को कहते हैं जा प्रियजन को प्रसन्न करने वाला सभ्यतापूर्ण ( अमाम्य ) बहार है। इसरा प्रमुख तत्व शास्य है, अव यह हास्य कभी तो केवल रूप में, फेवल कार से युक दौर तथा कमी भय से युक्त होवर पाया जाता है। इस बहन के तीन प्रकार होते है-शुबहाल्प, २. शारीदास्य, भपयुक्त हास्य । दूसरे दङ्ग का भारी हास्य-१ पानापनिवेदन, १ सम्भोगेच्या प्रकाशन, ता मान इस प्रकार तीन तरह का होता है। मय वाला दास्य भो तथा २ रसातरोग (किसी दूसरे रसपा अगभूत होकर इस तरहदी तरह का होता है। इस तरह शुरु हास्य (महाराहास्य के तीन भेद (२) भयक दास्य मे दो भेद (१)कुल ६ भेद न के मसले पाते। नर्स का प्रकाशन करने के साधन बीमामा ये तीन तरहयो-सरदन आधार पर नौ के भेद १४६१८ दो जाते हैं। तन पचोदात्यनम यथा- 'पत्यु शिरवद्रफलामनेन स्टोति सख्या परिहासपूर्वम् । सा रयिता चरणी , वाशीमाश्येन तां निर्वसन जघान ।। वेपनर्म गमानन्दे विदूषकोषकत्यतिकरे । जियान यथा मालविकामिमित्र वस्वमायमानस्य विदूषकस्योपरि निपुणिम सर्पनाकारण दण्डकाष्ठ पातयति । एष पक्ष्यमाणेष्वपि धाग्वेषधापरखमुदाार्यम् । १. इन नमभेदों में से पोहास्य रूप नर्भ का उदाहरण (कुमारसम्मन के सक्षम सर्ग से) यो दिया जा सकनारे। भरणों में अलत लगा देने पर ना सखी ने पार्वती से परिहास के साथ मा आयस 7 . 1 १३२ । देशरूपकम् दी किस पैर से पति के सिर की चन्द्रकला का पा करो तो पार्वती ने कुछ न करते हुए उसे फूल माला से पीट दिया। देषनर्म जैसे नागानन्द नाटक में विदूषक तथा उरक के समाप में। चेष्टान (भियानम) जैसे मालविकाग्निमित्र में बीपते हुए विदूषक के ऊपर दण्डकाष्ठ हास र निपुणिका साँप का प्रम उत्पन्न कर देनी है। इसी तरह दूसरे भेदों में भी वाक्, वेष वा घेष्टा के उदाहरण दिये जाने चाहिए । (यहाँ मोटे तौर पर ही प्रकार के नर्म के उदाहरण दिये जाने है।) भरवदामोपक्षेपनर्म यया- 'मध्याह गमय त्यज श्रमजल स्थित्वा पय पीयता मा शुन्येति विमुख पान्य विवश शीत प्रपामण्डप । तामेव स्मर घस्मरस्मरशरवरवां निजप्रेयसी त्वञ्चित्त तु न रजयन्ति पथिक प्राय प्रपापालिका भारमोपक्षेप रूप भारी नर्म का उदाहरण- कोई प्रपापालिका किसी पथिक के प्रति अपना अनुराग निवेदन करती हुई कहती है-- हे राहगार, जरा ठहरो, दुपहरी फाट लो, पसीना सुग्गलो, और ठहर कर पानी पीली यह प्याक सनी, यद समझ कर छोज न जामी।रेपथिक, यहाँ सौ पहा उपहा प्रपामण्डप विद्यमान है। (अरे तुम तो ठहरते ही नही ) अच्या, कामदेव के तोरण घातक बाणों से हरी अपनी उसी प्रेयसीही को याद करो। ठीक है, तुम्हारे चित्त को प्रपापालिका प्रायः प्रसन्न मही कर पाती। सम्भोगनर्म मया- 'सालोए चिध सूरे परिणी घरसामिअस्स घेतूण । गच्छन्तस्म विपाए धुपद हसन्ती हसन्तस्स ." ('सालोके एव सूर्ये गृहिणी गृहस्वामिकस्य गृहीत्वा । भनिच्छतोऽपि पादौ धुनोति हसन्ती हसत ॥') ३.सम्म गनमै का उदाहरण- पर्य के दृष्टिगोचर रहते हुए सी (दिन में दरी) गरिणी सटे हुए गृहस्वामी के धरों की पकड़ कर, उसके इच्छा न करते हुए भी इंसती हुई दिला रही है। माननर्म यथा-- 'तदवितयमवादीयन्मम व प्रियेति प्रियजनपरिभुक्त यहुकूल धान । मदधिवसतिमागा कामिनो मण्डनधी- प्रेजति हि सफलत्व बलमालोकनेन ।' ४ माननम का उदाहरण (माय के पलाश सर्ग में वैसे- भपराधी नायक से नायिका यग्य में कह रही है। तुम बोपदा करते थे कि मैं तुम्हारी पारी है, वह बिलकुल सच है।क्योंकि तुम अपनी प्यारी के द्वारा पहने दुकूल दोपहन कर रहो मेरे घर पर पापे हो। ठीक है, कामी व्यक्तियों की वेशभूषा का महार वरलमानों (प्रियाओं के देखने से फल हो जाता है। यदि मैं तुम्हारी प्यारी न होती तो तुम यर भारताने घोरेपोमाते। - -- द्वितीयः प्रकाश 1 TV (नाषक भूल से दूसरी नायिका के दुन को पहन कर प्रातः काल ज्येडा के पास कोटा। यह पड़े मी तथा व्यंग्य मरे दङ्ग से मानपूर्वक परिहास कर रही है।) गयनर्म यथा रावल्यामाख्यदर्शनासरे--मुसाता-जाणिदो मए एको सञ्चो पुत्तन्तो सगं चित्तम्लएण हा देवीए गिदईसम्' ('कालो मयैप सर्वो • धृत्तान्तः सह चिन्नपलनेन तद्देव्यै निवेदयिप्यामि । ) इत्यादि । ५. भयनम, जसे रक्षाबली नाटिका में चिप्रदर्शन के अवसर पर गुसनता की यह उक्ति- 'उच्चा। मैंने यह सारी यात मान ली। मैं इस बाव को इस चित्रफलक के साथ देवी वासवदा को निवेदित करूंगी।' मारा नयनर्म यथा ममैव- "अभिव्यकालीका सकलविफलोपायविभव- चिरं ध्यात्वा सद्यः कृतकृतकसंरम्गनिपुणम् । इतः पृष्ट पृष्ठे मिमिदमिति सन्त्रास्य सहसा ताप्लेष भूतः स्मितमधुरमालिङ्गति वधूम्' ६. भवनम का दूसरा गेद पद है, जहाँ भय किती रस का मन बन जाय । यहाँ क्षार के भारभूत मयन का उदाहरण थनिक ने स्वरचित एचके रूप में दिया है:- नायक का अपराध प्रकट हो गया है इसलिये नायिका बड़ा मान किये। नायक कई प्रकार से ज्वे मनाने के उपाय परता है, लेकिन वह असफल ही होता है। इसके बाद वह उसे प्रसन्न करने का कोई तरीका सोचने के लिए नही देर तक सोचविचार करता है, फिर युक्ति सोच लेने पर एकदम छूटे हर का नदी निपुणता से महाना करने पर यह पीछे क्या है, यह पापीछे क्या है इस तरह नायिका को एकदम टरा देता है। इससे पर कर गायिवा उसकी और झुकती २, पर पुस्कराइट व मधुरता के साथ श्राश्लेषकर, सायका का मालिशन करता। अथ नर्मस्फिल--- नर्मस्किनः सुखारम्मो भयान्तो नवसङ्गमे। - यथा मालविकाग्निमिने सडेते नायकममिसत्तायां नायिकायां नायका- "विसज मुन्दरि सामसाध्वस ननु चिराप्रति प्रणयोन्मुखे । परिगृहाण गते सहकारता लमतिमुकलताचरितं ममि ।। मरिका उसे कहते हैं, महा मायक नापिकाको प्रथम समागम के समय पहले यो सुप होता है, किन्तु पाद में मय होता है कि कहीं कोई (पिनादिप देम्यादि) उमके भेद को ग पाछे। सारिकासमिर नारक में सतिस्थल पर नायक के प्रति अभिसरणा माई हुई माविका से मिमित्र कहतार:- मन्दरि मालविके, नवसङ्गमानित मय को छोड़ दो। यही देर से मैं तुम्हारे प्रेम के प्रति उन्मुरा हूँ। इसलिए राहकार (मान)मो हुए मेरे लिए तुम अतिमुक लता के साथ म्यवहार का माचरण करी।से मतिमुक्त लता मानन्ध का मालिशन करती है, बेहोस भी मेरा बानि करो। मालविकसम देवीए, भमेण भयो बि पि ध प पाम (म देण्या मनात्मनोऽपि प्रियंका पारयानि।) इत्यादि।
दशरूपकम् मालविका-स्वामिन् , महारानी (देवी) के डर से मैं अपने लिए भी प्रिया नहीं कर पाती। अय नमस्फोट 1 मर्मस्फोटस्तु भावानां सूचितोऽपरसो लवे॥ ५५ ॥ यथा मालतीमाधवे-मकरन्द-1 गमनमलस शून्या धष्टि शरीरमसीछव सितमधिक किंम्वेतस्यारिश्मन्यदितोऽश्वा । भ्रमति भुवने फेन्दपांजा विकार व यौवनं ललितमधुरास्ते ते भावा क्षिपन्ति च धीरताम् ।' इत्यत्र गमनादिनिर्मावलेशर्माधवस्य मालत्यामनुराग स्तोक प्रकास्यते । नमस्फोट पह है, जहाँ सात्त्विकादि माओं के लेशमात्र से किजित् मान रस की सूचका कर ही जाय। बेने मालती माधव में मकान्त निम्नप के मारामायण के अलम गमनादि साक्षिक-भावलेश का वर्णन कर उसके मालतीविषयक अनुराग को सूचित करता है- इसकी चाल अलसाई ,टि मनी-सोहै, रौर में सदाता व स्वस्थता नहीं दिखाई पडती, साँस पोत से चलनी नालों को देखते हुए ऐसा अनुमान होता? किस्सा यह (कामपीड़ा) कारण हो सकता है, इसके अतिरिक्त और कारण दो। क्या सकवारे सारे संसार में कामदेद की आशा प्रसारित है, और योपनावस्या नदी विकास होतो। नाना प्रकार के रमणीय व मधुर शहारी भाव युवकों के धर्य को समार कर हौ देते। थप नर्मगर्म- छन्ननेहप्रतीचारो नर्मगोऽहेतवे । अद्भः सहास्पनिहास्यैरेमिरेपाऽत्र फैशिकी ॥ २ ॥ ययाऽमरुशतके- 'इष्टदेवसनसस्थिते हिवतमे पथादुपेत्यादरा- देवस्या नपने निमीत्य विहिवमीडानुबन्धच्छल । पक्तिकधर पुलक मोलसन्मानसा- मन्तसिलसत्कपोलार्म धूर्पोऽपर पुम्वति ।' पया (च) शिपदशिकायो गर्भाडा वत्सराजवषमुसातास्याने साक्षाद्वत्सराजप्रवेश। जहाँ किसी प्रयोजन के लिये नायक हिप का प्रवेश करे, उसे नर्मगर्भ कहते हैं। शिकी के ये असहाय तया निहाँस्य (हास्यरहित) दोनों का हो सकते हैं। अमरकशकश पच में- मायने देखा कि उसकी यंडा तथा कौनष्ठा दोनो नारिकार एक आसन पर देही है।सलिए या मादा के साथ (वा कुछ मयं से ) धोरे शेरे पीछे से बहो पहुँचता है। वहाँ जाकर र कोदा करने के दोग से ये नायिका के नेत्रों को दोनों पापों से बन्द कर देगी। इसके बाद बहराई नायक अपनी गरदन को बारा टेली करके, रोमाबित होरर, स निमाविकाधम देता है, जिसका मन भैम के कारण उसिमोर तथा नि पो आन्तरिक कारपसर्गतिहीहti Irn .
द्वितीय प्रकाश १३५ अथवा जैसे प्रियदर्शिका (यकृत) नाटिका के गाद में वत्सराज के रूप में सुसमता के प्रवेश होने की स्थान पर वत्सराब स्वय हो रङ्गमा पर था जाता है। श्रथ सात्वती- घिशोका सात्वती सत्यशोयत्यागदया धैः। संलापोत्थापकायस्यां साहात्या परिवर्तकः ।। ५३ ।। शोकहीन' सत्त्वशौर्यत्यागदयाहादिभावोत्तरो नायकल्यापार' सात्वती, तदनानि यसलापोत्याएकसाद्वात्मपरिवर्तकाव्यानि । सावती गृत्ति यह है, जहाँ नायक का व्यापार शोकहीन होता है, तथा उसमें साथ, शार्य, स्याग, दया, फोमलता, हर्ष मादि भावों की स्थिति होती है। इस सारवती वृत्ति के सलाप, उरयापक, साहात्य तथा परिवर्तक ये चार बन होते हैं। . संसापको गभीरोक्तिनानाभावरसा मिथा! यथा चीरचरिते-'राम स य किल सपरिवारवातिव्यविजयावर्जितेग भायता नीललोहितेन परिवस्सरसहनान्तेवासिनेतुभ्यं प्रसादीकृत परशु ! परशुराम'-- राम राम दाशरथे । स एवायमाचार्यापादाना प्रिय परशु । रामप्रयोगपुरसीकलहे गणानां सैन्यस्तो विजित एव मया कुमारः। एतावतापि परिरभ्य फ़तप्रसाद' प्रादादमुं प्रियगुणो भगवान्गुरुमै । इत्यादिनानाप्रकारमावरसेन रामपरशुरामयोरन्योन्यगमीरवचसा संलाप इति । मलाप (संथापक) साश्वती पृत्ति का वह भा है, जहाँ पानों में परस्पर माना भाव वारसयुक्त गम्भीर उक्ति पाई जाती है। जैसे मदारचरित में राम व परशुराम की परस्पर गम्भारोक्ति में सम्णपक पाया जाता है- राम-समेच स्वामिकातिकय के विजय से प्रभावित भगवान् शङ्कर ने सैकडों वर्षों तक शिष्य बने आपको जो परशु प्रसाद रूप (पुरस्कार रूप ) में दिया है, यह वही परशुहै। परशुराम-राम, राम, यद वो पूज्य गुरुवर का प्रिय परतुरे- रक्ष प्रयोग को कीडा वा युर करते समय मैंने देवगणों को सेना से युक्त कुमार कार्तिकेय को ओत पिया गा। इस विजय से हो प्रसन होकर मेरा मालिङ्गन कर गुणों से प्रपन्न होने वाले मेरे गुरु मगवान् शङ्कर ने या परशु मुझे दिया है। ,.. अयोत्यापर - उत्थापकस्तु यन्नादौ युद्धायोत्थापयेत्परम् ॥ ५ ॥ यया वीरचरिते- "आनन्दाय च विस्मयाय च मया दयेऽसि दुखाय पा तृष्ण्यं तोऽध सम्प्रति मम त्वदर्शने गा| स्वत्सारत्यमुखस्य नास्मि विषय किया यहुम्याइते- रस्मिन्दिवनामदारविजय यादौ घगुर्जुम्मृताम् ।। । .
दशरूपकम् जहाँ एक पात्र दूसरे पात्र को पुट के लिए उत्तेजित (उत्यापित) करे, वहाँ उस्थापक नामक साविकी-अङ्ग होता है। वही महावीरचरित में परशुराम रामचन्द्र से कह रहे है 'तुम मुझे आनन्द के दिए दिखाई दिये दो, या विस्मय के लिए, या दुख के लिए- में नही कर सकता हूँ। आज तुम्हें देख कर मेरी बासें तर कैसे सकती । तुम्हारी सहति (समागम ) के मस का तो मैं विषय नही हूँ। अधिक क्या कहूँ। जमदग्नि के पुत्र परशुराम के विजय से प्रसिद्ध म ( तुम्हारे) दाप में यह धनुष चैम्मित हो।' अप साहात्य- मन्नाथदेवशफ्त्यादेः साहात्यः सदमेदनम् । मनशक्त्या यया मुद्राराक्षसे राक्षससहायादीनां चाणक्येन स्वयुद्धपा भेदनम् । अर्थशपत्या तत्रैव यथा पर्वतामरणस्य राक्षसहस्तगमनेन मलयकेतुसहोत्यायिभेदनम् । देवशक्त्या तु यथा रामायणे रामस्य देवशक्त्या रावणाद्विभीषणस्य भेद इत्यादि । शत्रु (प्रतिनायक) के सह का नहाँ मन्त्रशकि, अर्थशक्ति, देवशति वादि के बारा भेदन किया जाय, यहाँ साहाय नामक साविकी-अङ्ग होता है। (यहाँ नायक या नायक के साथी किन्दी शक्तियों से प्रतिनायक के साथियों को फोड कर उसकी शक्ति कम कर देते है।) जहाँ मत्रणा या पुद्विवल के आधार पर भेदन हो यह भेदन म शक्ति के द्वारा होता है। असे मुद्राराक्षस नाटक में चाणक्य अपनी बुद्धि से राक्षस के सहायकों को फोट लेता है। अर्थ शक्ति के आधार पर भर्षादि (द्रव्यादि) के माधार पर भेदन किया जाता है। जैसे उसी नाटक में पर्वतक के आभूषण के राक्षस के दायों पहुँचने से मलयकेतु के साथ उसका भेदन हो जाता है। देवशक्ति, जैसे रामायण में रामचन्द्रको अक्षौकिक शकिभथवा देवशक्ति) के कारण विभीषण का रावण से भेद हो जाता है। अप परिवर्तक- भारम्घोत्थानकार्यान्यकरणात्परिवर्तक । ५५ ॥ प्रस्तुतस्योद्योगकार्यस्य परित्यागेन कार्यान्तरकरण परिवर्तक । यथा धीरचरिते- 'हरम्बदन्तमुसलोल्लिसितकभित्ति पशे विशाखविशिखवणलाञ्छन मे। रोमाञ्चकभुक्तिमतवीरलाभाद् यत्सस्यमय परिरमधुमिच्छति स्वाम् ।। जहाँ किसी एक कार्य का भारम्भ किया गया है, किन्तु उस कार्य को छोड़कर जहाँ दूसरे ही कार्य को किया जाय, यहाँ परिवर्तक नामक या होना है। असे महावीरचरित में राम को चोरता से चकित होकर परशुराम उनसे युद्ध न कर निमार मालिशन करना पारतदेह पारिदतकार- परशुराम-यह जलकुल सच है कि गणेशमी के दान रूपीमुमलों के द्वारा चिहित, तपा कार्तिकेय के अनेकों बार्गो के पार्यों से युक मेरा वक्षस्थल, तुम जैसे अमुर वौर के मिलने से रोमानित रोकर सुगलिङ्गन करना चाहता। राम-भगवन् । परिम्भणमिति प्रस्तुतप्रतीपमेतत् । इत्यादि। राम-'भगवन् । यह परिरमण को प्रस्तुत विषय से विपरीवारे।
- द्वितीया प्रकाशा पात्तीमुपसंहरजारभटीलक्षणमाह-~ पभिरश्चतुर्धेय सात्वाधारभटी पुनः " मायेन्द्रजालसग्राममोधोद्धान्तादिचेएितैः ॥ ५६ ॥ संक्षितिका स्यात्संक्टो घस्तूत्थानावपातने। माया = मन्नयलेनाविद्यमानस्तुप्राशनम् , तन्त्रबलादिन्द्रजालम् । भय सापती मा उपसंहार करते हुए, भारमटी वृत्ति का लक्षण बताते हैं। इस तरह सावती के चार आता है। भारभदी यत्ति में माया, इन्द्रजाल, सग्राम, क्रोध, उद्घान्त आदि चेटाएँ पाई जाती हैं। इसके, सतिप्तिका, सम्फेट, घस्स्स्थापन सया अवपातन ये धार न होते हैं। माया घर है, जहाँ भवास्तव वस्तु को मशक्ल से प्रकाशित किया जाय, यही कार्य जय तन्त्र पल से किया जाय तो बहन्दजाल पहलाता है। F - . । संक्षिसपस्तुरचना संक्षिप्तिः शिल्पयोगतः॥ ५७॥ पूर्वनेतृनिवृत्त्याऽन्ये नेयन्तरपरिग्रहः । मृदंशदलचर्मादिद्रव्ययोगेन यस्तूस्थापन सक्षिप्ति यथोदयनचरित किलिअहस्ति- योग । पूर्वनायकापस्थानित्यापस्थान्तरपारप्रहमन्ये सक्षितिश मन्यन्ते । यया वालिनि- । इत्या सुमाव , यथा च परशुरामस्यौद्धत्यनित्या शान्तस्वापादनम् "पुण्या प्राण- जाति-इत्यादिना । समितिका में भाटककार शिव का प्रयोग कर सहित यस्तु की रचना करसा है। पुष लोगों के मस से समितिका पदा होती है, जहां पहला मायक निवृत्त हो जाय सया दूसरा नायक आये, या फिर नायक की एक भवस्था छोड़ कर दूसरी अवस्या का प्रदम किया पाय। मिट्टी, बास, परोपमो पारिसे किसी मकान आदि वस्तु का निर्माण समिति या समितिका कहलाता है, जैसे उदयनपरित में किलिकति का प्रयोग कुछ लोग गायक की पदको अवस्था को छोड़ कर दूसो वरया का प्राइश करना संक्षितिका मानते हैं। जैसे पानि मी निति पर सुग्रीव नायक के रूप में गृहीत होता है और जैसे परशुराम को सतना ही निपत्ति पर 'मादाग बासी पवित्र 'स तरह शान्तत्व का प्रण किया जाता है। प्रय राफेट--- संघटस्तु समापाता संग्थयोयोmy ke}} यथा माधवाश्मोरपष्टयोमारतीगाए।निसोध रामायणप्रतियवस्तु । नही दीकुद पात्रों का परस्पर समाधास-एक दूसरा का मधिशेप, पाया जाता, पहसम्फेट कहलाता है। श्री मातीमा में मात्र तथा पौरपर पापकमरे के प्रति स्रोकर विश्लेष रानीरज रामायण ये आधार पर बनाई कभावरों में पनार व समता परस्पर सम्फेट अन्तर्गत भावा। १८० १३८ दशरूपकम् श्रथ वस्तत्यापनम्- मायाद्युत्थापित वस्तु षस्तूत्यापनमिष्यते । यथोदात्तरापदे- 'जीयन्ते जमिनोऽपि सान्द्रतिमिरमातेदिययापिगि भास्वन्तः सरला रवेरपि च कस्मादकस्मादमी। एतायोप्रश्व पर प्ररुधिरराष्मायमानोदरा मुप स्याननकन्दरानलमितस्तीवाडरवा फेरवा ॥ A । इत्यादि। T मन्ययल के द्वारा माया से किती घस्तु की उत्थापना करना वस्तूरयापन कहलाता है। जैसे उदासराघव के इस वणन में- यह क्या रात है कि सारे संसार के अन्धकार को जीतने वाली प्रकाशमान सूर्य की किरणे मी आकाश में व्याप्त होते हुए सपन अधकार समूह से एक-म बीत ली गई है, और करघों के कंचों विदों से निकले खून के पीने से पेट को खूब भरे हुए, जोर से चिहाती ये सियारनियों पर अपने मुखविवर भाग को खोर रही है। अथाऽवपात- श्रयपातस्तु निष्कामप्रवेशवासविद्रः ॥ ५ ॥ यया रनावल्याम्- 'कण्ठे कृखाऽवशेष कनकमयमय गवलादाम कर्पन भाखा द्वाराणि हेलावलचरणवललिहिणीयस्वाल । पत्तातहो गतानामनुरातसरणि राम्श्रमादयपारे प्रभ्रष्टोऽय तथा प्रविशति नृपतेर्मन्दिर मदुरात ॥ नष्ट वर्षवरैर्मनुष्यगणनाभावादकृत्वा प्रपा- मन्त कथुकिमशुकस्य विशति प्रासादय धामन । पर्यन्तायिभिनिंजस्य सदश नान किराने कृत कुल्ला नीचतयेद यान्ति शनरात्मैक्षणाशदिन ॥" किसी भी पानादि के रङ्गमञ्च पर प्रवेश करने से पारणमच से चले जाने से दूसरे पात्रों में जो भय तथा भगदड मचती है यह अपवात कहलाता है। जैसे रहावली नाटिका में मन्दुरा (साल) से बन्दर के टूटने पर अन्त पुर के लोगों को भगदहका निम्न पणन- कण्ड की सोने की मीर को तोड़ कर, मची हुई जजीर को घसीटता हुभा अपने पैरों की किरिणी को टोला से फेंके हुए पैरों से सजाता हुआ यह बन्दर, वाजिशाला से छूट कर माग कर कांदारों को पार करता हुआ महाराज के मइल की मोर घुस पाहै। इसे देखकर हाथी भातरित हो गये है और मय से घबडाये हुए घोड़ों के सांस (अश्वपाल ) इसके मार्ग का पीछा कर रहे है। पर को छूटा देख कर ववर (हिंजड़े)लजा को छोड़ कर भाग खड़े हुए है-उनका सध्या त्याग कर मग जाना ठीक है क्योंकि उनकी गिददी मनुष्यों (लो या पुरुष) में नहीं होती। यह पौना डर कर कनुको के बड़े भामे (कचुक) में छिप रहा। पर-उधर कौनों द्वितीयः प्रकाशः १३६ . r - . में जाकर विप विरतों ने अपने नाम को अनुकूल कार्य (किर अतति, जो बौनों में घूमते है। किया है। कुबड़े अपने भापके देखे जाने के डर से नीचे होकर धीरे-धीरे चल रहे है। यथा च प्रियदर्शनाया (प्रियदर्शिकायाम् ) प्रथमे विन्ध्यकत्ववस्कन्दे । , और जैसे प्रिपात पदर्शिका नाटिका के पहले अङ्क में विध्यकेतु के आक्रमण के समय डेरे का वर्णन उपसंहरति- पभिरङ्गेश्चतुर्धेयम् , नार्थवृत्तिरतः परा। 'चतुर्थी भारतो सापि याच्या नाटकलक्षणे ॥ १० ॥ फैशियी सात्वती चार्थवृत्तिमारमटोमिति । पठन्तः पञ्चमी वृत्तिमौगटाः प्रतिज्ञानते ॥ ६ ॥ सातु लक्ष्ये कचिदपिन दृश्यते,न चोपपद्यत्रे रसेपु, हास्यादीना भारत्यात्मकत्वात्, नीरसस्य च काव्यायस्याभावात् । तिन एवेता अर्थरराय । भारती तु शब्दत्तिरामु. सात्वात्तत्रैव वाच्या। इस प्रकार भारमटी वृत्ति में चार ना होते हैं। इन तीन पुत्तियो कैशिकी, साविती तथा भारमटी, के अतिरिक और कोई भी भर्धयत्ति नहीं होती। नाटक के सम्बन्ध में भारती नामक चौथी धृत्ति का भी उल्लेख फाना मावश्यक हो जाता है। उसका उल्लेख नाटक के लक्षण में किया जायगा। वैसे अर्थवृत्तियों तीन ही है कैशिकी साश्वती, तथा भारमटी । उट के मतानुपायी नाट्यशास्त्री एक अलग से पांचवी पुत्ति मानते हैं। (बह में स्वीकृत नहीं)। भारतीयरिका 'अर्थ रूप रस (५) में कहीं भी सनिदेश नहीं होता, वह रस में मही पाई जातोरात्यादि मारतीपरक होते है। तया कोई भी कान्या नौरस नही होता। मतः सारे दो काम्यायों का समावेश रसपरक शिश्यादि पत्तित्रय में हो जाता है। भारती में पार सरकुनमायामापो होते हैं सपा दौथी मादि उसके वक्ष्यमाण मग होते है। वस्तुत. मारतीत नाटक के आमुए का बर है, सलिए वह स्वण में पाये जाने के कारण शक्ति २। मन उसका वर्णन यहाँ रसपरक अर्थवृत्तियों में न कर नारक लक्षण के अवसर पर करना योग्य है। अधिया तो ये वोन हा मानी या सरती है। अत्तिनियममाद- श्रद्वारे कैशिकी, घोरे सावत्यारभटी पुनः रसेरोटेच योभत्से, मृधिसत्र भारतो ॥ ६ ॥ पति का सम्बन्ध माया के व्यापार से है, बता रसपरक होने के कारण उनका किस किस रस में प्रयोग होता है यह बताना रषित होगा। शिक्षा का प्रयोगार में, सालती का दौर में, या मामी कारोद ए गोमास HTRIAN भारततिका (सासि रोने के बाल समोसा में प्रयोग होगा। {यार से हाय दोर से मसुत्र, रोदसे करण, व गोमत भयानक रस कायहरल में मार लिया जा सकता, बोकमारादि से निम्नया हमद। 1 ।
दशरूप देशभेदभिजवेपादिस्तु नायकादिव्यापार प्रतिरित्याह-- देशभाषाक्रियानेषलक्षणाः स्युःप्रवृत्तयः । । लोकादेवायगम्यता यथोचित्यं प्रयोजयेत् ॥ ३॥ धृति के साथ ही साथ नाटकीय प्रवृत्ति का भी उल्लेख कर देना आवश्यक है। देश तथा काल के अनुसार नायक की भिन्न भिन्न मापाभिव मिन येष, भि मिल क्रिया प्रकृति कहलाती हैं। इनका ज्ञान नाटककार (कवि) लोक से हो प्राप्त कर सकता है कि किस देश में कैसी भाषा, कैसा घेष व कैसी क्रिया-पैप्पा पाई जाती है। इसका ज्ञान प्राप्त कर ऋषि उनका सदनुरूप सनिवेश अपने नाटक में करे। तत पाय प्रति विशेष- पाठ्यं तु संस्कृतं नृणामनीवानां एतात्मनाम् । लिङ्गिनीनां महादेव्या मन्त्रिजावेश्ययोः क्वचित् ॥ ६४ ॥ धिचिदिति देवीप्रमतीनो सम्बन्ध । महातक उनकी भाषाके नाटक में घोटने (पाठप) का मरन दे, इस विषय में एक विशेषता यह है कि-नाटक में कुलीन कृतारमा पुरषों की भाषा संस्कृत ही होनी चाहिए। तपस्विनियों, महारानी, मनिपुत्री तथा वेश्याओं के सम्बन्ध में कहीं कहीं संस्कृत पाठयका सनिवेश किया जा सकता है। स्त्रीणां तु प्राप्त प्रायः सौरसेन्यधमेषु च । प्रकृतेरागत भाकृतम् - प्रकृति सस्कृतं तद्भव तत्समें देशोत्यनेकपनम् । सौरसेनी मागधीच स्वशानियते । नीमाओं का पाठय प्रायः पाहत-शौरसेनी प्राकृत होता है। और अधम जाति के अकुलीनपान भी प्राकृत ही बोलते हैं। मान शम कीम्रपति यह है कि जो सभाप से आया हो (मकते रागव), अथवा इसकी दूसरी भ्युत्पत्ति प्रकृति अर्थाद सस्कृत से उत्पन्न' (प्रकृति सस्कृत तद्भव)। ये प्राकृत धम्म तद्भव, तरसम, देशी इस प्रकार अनेक प्रकार के होते हैं। शौरसेनो तथा मागधी माने अपने देशकालानुसार नाटक में प्रयुक्त होती है। पिशाचात्यन्तनीचादी पैशा मागधं तथा ॥ १५ ॥ यद्देशनोचपात्रं यत्तद्देशं तस्य भाषितम् । कार्यतचोत्तमदिनी कायो भाषान्यतिकमाः ॥ ६ ॥ . स्पष्टार्थमेतत् । पिशाध तथा अत्यन्त अधम पात्रो (दालादि) की भाग देशाची या भागधी होजो नासपात्र मिस देश का रहने वाला है। इसी देश को बोला के अनुसार उसको पाठय भाषा नाटक में नियोजित की जाय । पैसे कमी उत्तम आदि पात्रों की भाषा में किसी कारण से म्यतिक्रम भी गया जा सकता है कि उत्तम रामाकृत बोलें या अधम पाच संमत मोठे, (पर यह सदा नहीं हो सकता।)। 'शूरसैनी 'शौरसेनी स्यपि पाझे।। - . " , ६ 119 द्वितीय प्रकाश २४१ 11 -- T T । श्रामन्यामन्यौचित्यनामन्मणमाह- भगवन्तो वरयांच्या विद्यापिलिगिनः। विमामात्यामजाधार्या नटीस्नभृतौ मिथः ॥ ६७ ॥ भार्याविति सम्बन्धः। मार कान पान किस पाल को रिस तरह सम्बोषित करे इसे बताते है:- उत्तम पानों के द्वारा विद्वान्, देवर्षि तथा तपस्वी पात्र 'भगयन्' इस तरह सम्बोधित किये जाने चाहिए। विप्र, अमाप सपा गुरुजनों पा बरे माई (लमज) को पे 'मार्य इस सरह सम्बोधित करें। नदी व सूत्रधार आपस में एक दूसरे को 'भाप' घ'आ। इस तरह सम्बोधित करें। रथी सूतेन चायुष्मान्पूज्यैः शिष्यात्मजानुजाः । परसेति तात: पूज्योऽपि सुगृहीतामिवस्तु ते ॥ ६ ॥ अपिशब्दात्पूज्येन शिष्यात्मजानुभास्तातेति वाच्या', सोऽपि तेस्तातेति सुराही- तनामा चेति। सारथी अपने रथी पीर को वायुप्मान कहे, तथा पूज्य लोग शिष्य, पुत्र या छोटे माई बादि को भी शायुष्मान' ही कहे, अथवा 'यस' या 'तात' है। शिष्य, पुत्र, छोटे भाई आदि पूज्यों को 'तात' या 'सुगृहीतनामा' आदि कह सकते हैं। भावोऽनुगेन सूधी च मार्येत्येतेन सोअपि च ।' सूत्रधार पारिपाकेन भाव इति वक्तव्य । स च प्रिपा मार्प इति । पारिपार्मिक सूत्रधार को 'भाषकहे, तथा सूमधार पारिपार्मिक को 'मा (मारिप) के नाम से सम्बोधित करे। देवः स्वामीति सुपति त्यति चाधः ॥ ६ ॥ थामन्त्रणोया पतिवज्येष्ठमध्याधः खियः। विवरेबादित्रियो भर्तृयदेव देवरादिभिर्वाच्याः। Tसम नौकर राजा को 'देव या स्वामी' करें और अधम मृत्म इसे 'मष्टर' (मतः) कई । सेठ, मपम या अधम पान नियों को ठीक उसी साह सम्बोधित करें, जैसे उनके पत्तियों को। विद्वानों, देवताओं आदिवासियों को देवर आदि उनके पति के अनुरूप सम्बोधित करें जैसे ऋषि पतियों, परिदनियों या देवियों को 'भगवति' करें, मापापियों या पूज्या बियों को 'मायबई। सत्र नियंप्रति विशेष- समा इलेति, मेप्या च हसे, येश्योऽनुका तथा ॥७॥ कुहिन्यम्वेत्यनुगतः पूज्या पा जरती जनः । विदूषण मयती रातो चेटीवि शायते ॥७॥ ज्या बरसी अम्बेति । समन्यत् । १. वीम्यगते पाया मम्मेतिरने' इति पासताम् । 1 * - १४२ दशरूपकम् नियों के सम्बोधन में जो विशेषता पाई जाती है, उसका उल्लेख करते हैं सखियों एक दूसरे को 'हलो' कहें। नौकरानी (प्रेन्या)'' कहे, वेश्या को मजुझा' कहा जाय । कुहिनी को लोग 'भाव' कहै, तथा पूज्य वृशाखी को भी यही कहें। विदूषक रानी व सेविका दोनों को 'मवती' शब्द से सम्बोधित करे। चेष्टागुणोदाइतिसापभाषा- नरोपतो नेतृदशाविभिन्नान् ।। को धक्तमीशोभरतो न यो धा यो घान देव शशिखण्डमौलि. ॥७२॥ दिध्यात्र दर्शितमित्यर्थः । चेथ लोलाद्या', गुणा विनयाया", उदाहतय सस्कृत प्रकृताया उक्तया, सत्त्व निर्वियात्मक मन', भाव' सत्त्वस्य प्रथमो विकारस्तेन दावादयो युपलक्षिता । TF । २ - . M ॥ इति धनजयकृतदरारूपस्य द्वितीय प्रकाश समास । T F - नायक की विभिन्न दशाओं के अनुरूप चेष्टा, गुण, उदाहरण (बाद), साव तथा भावों का निशेष वर्णन कौन व्यक्ति कर सकता है, जो नाश्यचार्य महर्षि भारत या देव चन्द्रशेखर नहीं। अर्थात् इसका निशेष सात वर्णन करने में तो महपि भरत तथा देवाधिदेव महादेव ही समर्थ है। मन मेरे जैसा युधितो केवल दिखात्र वर्णन कर सकता है। ~ लीलादि चेष्टा, नियादि गुण, सस्कृत भात भादि उलियों, निर्विकारात्मक मन, तथा सत्त्व का प्रथम विकार भाव इन नार्य की विशेषताओं के उल्लेख के द्वारा कारिकाकार ने हाव आदि दूसरी विशेषताओं का सत किया है, जो उपलक्षण से इस प्रसङ्ग में गृहीत होगी। (यहाँ भनाय में मादक को इन विशेषताओं का सविर (दिङमात्र) वर्णन हालिया है। T द्वितीय प्रकाश समाप्त " . - अध तृतीयः प्रकाशा पहुवाव्यतया रसविचारातिलचनेन वस्तुनेतरसानां विभज्य नाटकादिषुपयोगः प्रतिपायते-- प्रकृतित्वादथान्येषां भूयो रसपरिग्रहात् । सम्पूर्णलक्षणत्वाध पूर्व नाटकमुच्यते ॥ १ ॥ उदिष्टधर्मकै हि नाटकमनुद्दिष्टधर्माणा प्रकरणादीनां प्रति शेपं मतीतम् । प्रथम प्रकाश में नाटकीय कथावस्तु का निवेचन किया। तदनन्तर दिवीय प्रकार में दूसरे नाटकीय तत ता(नायक) का रापरिमद वर्णन किया। अब नाटक का तीसरा अह प्रसहोपात्त है। किन्तु रस के विधनन में दशरूपकार धनशय को कई बातें कहनी है। अत विस्वारी विषय रोने के कारण उसका उछान कर दस्तु, नेता तथा रस के भेद के व्यापार पर नाटकादि रूपकों का वर्णन तथा उनमें इनके विभाग का उपयोग रिस प्रकार होता है, इसका प्रतिपादन किया गया है। (वहाँ सूची कसरन्याय' से रस के विस्तारी विषय को छोट कर पहले संक्षिस व अस विषय का विवेचन भारम्भ किया गया है।) पहा सर्व प्रथम हम नाटक (रूपफमेद) का विवेचन कर रहे हैं। इसके तीन कारण है। पहले तो नाटक ही अन्य रूपकभेदों की प्रकृति अयवा मूल है, उसीमें पहाता या रस के परिवर्तन करने से प्रकरणादि रूपकों की दृष्टि हो जाती है। दूसरे, नाटक में रस का परिपाक पूर्ण रूप से सया अनेक रूप से पापा जाता है- उसमें महार या पीर कोई मी रस बली रस हो सकता है, तथा अन्य सभी रस बङ्ग रूप में समिविष्ट किये जा सकते हैं। सीसरे, यस्तु प नेता के भो छक्षण हम कह चुके है, तथा रस के जिन बसों का वर्णन हम आगे करने जा रहे हैं, ये सभी लपण नाटक में पाये जाते हैं। नाटक के पक्षण का उद्देश हो चुका है, उनसे युक्त नाटक हो वन प्रकरणादि रूपकों का मूल कारण है, जिनका ममी वर्णन नही किया गया है। कारिका का शेष भरा स्पष्ट हो है। 1 पूर्घरटं विधायादी सुधारे चिनिगते । प्रयिश्य तददपरः काव्यमास्थापयेनटः॥२॥ এ মজিদ খুদণ্য ধন্যবাদ স্য संविधाय विनिगते प्रश्न राप्रपारे तद्वदेव वैष्णवस्यानकादिना प्रविश्यान्यो मट' काव्याय स्थापयेत् । सबकाच्यार्यस्यापनात् सूननास्यापक। अप नपार पूर्वर का विधान करने के याद रामच से चला जाता है, सो उसी को सरह (की वेशभूषा याला) दूसरा नट मर पर प्रदेश का साम्य की प्रस्थापना करे। वह शम्द को दुरपति स प्रकार है-'पूर्व रयतेरिमन्'-जिसमें सामादिको को पा मानन्द मिले। इस प्रकार पूरा का तात्पर्य नाशाला से है। नाखवाला में नाटकाहि रस के मारम में औपचारिक किशर (प्रयोग, म्युस्थापनाधि-महाचरण, देवतास्तयनादि- माती, यापूर्वक काम) गेरत महलावाद के करने पर मापार और गाहो उसी की तरह मवेश में भार को इमरानर १४४ शरूपकम् - नारकादि कथावस्तु के काया की स्थापना या सूचना करता है। यह नट काम्या को स्थापना या सूचना करने के कारण वारक कहलाता है। दिव्यमस्य स तद्पो मिथमन्यतरस्तयोः । सूचयेदस्तु योजं षा मुखं पात्रमथापि धा ॥३॥ स स्थापशे दियं वस्तु दिव्यो भूला मयं च मार्यरूपो भूला मिथ च दिव्यम- पयोरन्यतरो भूत्वा सूययेत् वस्तु भोज मुशं पान या ! यह स्यापक कथावस्तु के अनुरूप ही येशभूषाधना कर प्रवेश करे। यदिपाद देवतासम्बन्धी (दिग्य) हो तो वह दिव्य रूप में मात्र पर प्रवेश करे। परि पह मानवसम्बन्धी (मत्र्य) हो तो वह नट मत्य रूप में भाये। कथावस्तु के मिन्न (दिल्यादिश्य) होने पर (जैसे रामादि की कथा में) यह या तो दिग्य रूप में या मर्य रूप में ला सकता है। मन पर भाकर काण्या की स्थापना करते समय वह काम्प (रूपक) की कथावस्तु, उसकी योज नामक अर्थप्रकृति, मुख (रलेप के द्वारा)या प्रमुख पात्र की सूचना दे। इस प्रकार का पार्थ की पुज्य के भेद से ४ प्रकार की हो जाती है। इन्ही पा प्रकारों को प्रतिकार पनिक मित्र र नाटकों के स्थापना प्रकारों को लेकर पक्षात पर है। परख योदात्तरापवे- । 'रामो मूभि निधाय काननमगान्मायामिनाहा गरो- स्तपस्या भरतेन राज्यमखिल मात्रा सहयोरिकतम् । सौ सुप्रीयविभोषणावनुगती नीता पर सपद ग्रोवृत्ता पशमन्परप्रभृतयो यस्ता समस्ता विष" ।' (१)वद्धजना, जैसे डायराघव नाटक में निम्न पप के द्वारा नट नाटक की समस्त मावस्तु का राक्षित सा देता है अपने पिता को बन जाने की आशा को माला की तरह सिर पर पारण कर रामचन्द्र पन के लिए रवाना हो गये। रामचद्र की भक्ति के कारण मरा ने माता कैथी के साथ ही समस्त राज्य का परित्याग कर दिया। रामचन्द्र ने अपने अनुचर सीव तग विभीषण को अनुपम सम्पत्ति से विभूषित कर दिया, तथा रावण आदि समस्त उत्कट शवों की ना कर दिया। बीज यया रमावस्याम 'द्वीपादन्यस्मादपि मध्यादपि जलनिधेर्दिशोऽप्यन्तात् । भानीय झटिति पटयति विधिरभिमतमभिमुखीभूत (२) असूचना, जैसे रहारली नारिका में स्थापक मारकीय कथावस्तु के बाकी सबमाता- अनुकूल होने पर अपने अभीष्ट अर्थ को किसी दूसरे द्वीप से, समुद्र के रोष है, था रिशाभी के मन से मोशावर एकदम मिलता है। (यहाँ देरी भनुकूलना के कारण समुद्र में खोई रत्नावली मी योगाधरायण को मिल १ दायराघव न रक म परम्प है। इसके रचरिता कवि मायुराव थे, इसका पता अवश्य चलता। n : A - र तृतीयः प्रकाशा १४५ जाती है, इस बीज की भोर सङ्केत किया गया है। इस प्रकार यौगन्धरायण के भमौष्ट रत्नावली उदयन-समागम रूप फल के बीज की सूचना यहाँ दी गई है।) मुखं यथा- 'श्रासादितप्रकट निर्मलचन्द्रहासः प्राप्तः शररामय एप विशुद्धकान्तः । उत्साय गाठतमसं घनकालमुकं रामो दशास्यमिव सम्मृतपन्धुजीवा ।" (३) गुखसुचना-दशरूपक के रचयिता या वृत्तिकार ने यहाँ मुख शद को स्पष्ट नहीं किया है। साहिरयदर्पणकार के मतानुसार मुख में शेष के द्वारा वस्तु की सूचना दी जाती ३(मुख श्लेपादिना प्रस्तुतवृत्तान्तप्रतिपादको वाग्विशेषः) । यहाँ दिये गये. उदाहरण से भी विषनाप महापान का मत पुष्ट होता है। मुखरचना में वरतु का वर्णन इलेष के द्वारा किया जाता है। यहाँ निम्न पच में स्थापक भारती वृत्ति में शरमाल का वर्णन कर रहा है। यह शरस्काक का वर्णन सिष्ट शब्दों में हुआ है, जिससे सार ही रामचन्द्र की तथा उनको नारकीय वस्तु पी मोरावना होती है। विशुम तथा गुन्दर यह शरवाल, जिसमें चन्द्रमा का निर्मल प्रकाश प्रकटित हो गया है, तथा जिसने पन्धुशीव (दुपहरिया ) के फूलों को धारण कर लिया है (जिसमें दुपहरिया के फूल फूलते है), रापन मन्धकार दारे प्रचण्ड वांकास को उखाड कर ठोक उसी तरह राप्त हुआ है, जैसे चन्द्रमा के निर्मल हास से युक्त (अथवा जिन्होंने रावण के निर्मल पन्द्र- पास पड़ा को परत पर दिया है) विशुन या मुन्दर रामनन्द्र, पापों के जीवों को फेर से लौटाते हुए; अत्यधिक अचान (तम) वाले, उग्र तया सण्न काले राक्षप्त रावण को मारकर मास पुर। पानं यथा शाकुन्तले-- 'नास्मि गीतरागण हारिणा प्रसमं हतः । एप राजेय दुष्यन्तः सारशेगातिरंड्सा ।' (४) पात्रचना-समें स्थापक किसी पार की (नेता या गन्य किसी पात्र की) एबना देते हुए प्रपग अङ्क में इसके भावी प्रवेश का सङ्केत देता है । जैसे शाकुन्तक में, (नट नटी, गीतको अन्दर राग से मैं उसो सरह आकृष्ट शेमया है, जैसे इस तेज गवारो रिण के दारा यह राजा भ्यान आकृष्ट किया गया है। (शान्त के प्रथम मा में इस सूचना के बाद रय पर बैठे दौड़ते हरिणका पीछा करता हुआ राजा दुष्यन्त मध पर प्रविष्ट होता है। इस प्रकार स्थापक नर की पर स्थापना-पार. स्थापना (पायचना)बासायगी।) राप्रसाद्य मधुरीमोम काव्याश्च। मातुं फश्चिदुपादाय भारती पृत्तिमानयेत् ॥ ४॥ रास्य प्रशस्ति झाल्यार्यानुगताथै लोक पृता 'भौगुपयेन कृतस्य भुवा व्यापमाना हिया स्तन्युगभूमास परीनिमुन्गं पुनः । १८९० सृतीय प्रकाश जाती है, इस बीज की और सङ्केत किया गया है। इस प्रकार योगधरायण के सभीष्ट रत्नावली उदयन-समागम रूप फल के बीज की सूचना यहाँ दी गई है।) मुखपथा- "यासादितमकरनिर्मलचन्द्रहास प्राप्त शरत्समय एप विशुद्धकान्त । उत्थाय गाटतमस पनकालमुप्रै रामो दशास्पमिय सम्भतथ धुजीव ॥ (३) मुखमचना-दशरूपक के रचयिता या पुचिकार ने यहाँ मुख शब्द को स्पष्ट नहीं किया है। साहित्यदर्पणकार के मतानुसार मुख में शेष के द्वारा वस्तु की सूचना दी जाती सुख श्लेपादिना प्रस्तुतवचा तप्रतिपादको वाग्विशेष)। यों दिये गये उदाहरण से भी विश्वनाथ महापात्र का मत पुष्ट होता है। मुखसूचना में वस्तु का वर्णन श्लेष के द्वारा किया जाता। यही निम्न पध में स्थापक मारती वृत्ति में शररसाल का वर्णन कर रखा है। यह सरकार का वर्णन शिष्ट शब्दों में हुभा है, जिससे साथ ही रामचनको तया उनको नाटकीय वस्तु की भी प्रचना होती। विशुद्ध तथा शुन्दर पर शरवाल, जिसमें चद्रमा का निर्मल प्रकाश प्रकटित हो गया है, तथा जिसने रघुजीव (दुपहरिया) के फूलों को धारण कर लिया है (जिप्समें दुपहरिया फूल फूलले १) सघन पर वाडे प्रचण्ड वर्षाकाल को उखाड कर ठीक उसी तरह ITH हुआ है, जैसे चद्रमा के निर्मल हास से युक्त (अपवा जिन्होंने रावण के निर्मल चद्र 'सि सद्ग को ध्वस्त कर दिया है), विशुद्ध तथा सुन्दर रामचन्द्र, बापों के जीवों की पर से लौटाते दुर, अत्यधिक महान (तम) घाले, उम तथा सधन काले राक्षस रावण को मारकर प्राप्त हुए। पानं यथा शाकु तले- तास्मि गीतराग हारिमा समहत । एप राय दुष्यन्त सारगातिरहसा ।।' (पात्रबना-समें स्थापक किसी पात्र को (नेता या अन्य किसी पात्रकी) सूचना देते हुए प्रथम वर में उसके भावी प्रवेश का सङ्केत देता है । मै शाकुन्वल में, (न कार रहा। रेनरी, रे गीत की दर राग से मैं ठौर उसी तरह भाइष्ट हो गया है, से इस तेज देगबाछे परिण के बारा यह राजा दुम्यान आकृष्ट किया गया है। (शाकुन्तल के प्रथम मङ्क में इस सूचना के बाद रथ पर दौड़ते हरि का पीछा करता आरामा दुप्पन मय पर प्रविष्ट होता है। इस प्रकार स्थापक नट यी यह स्थापना-पान पपना ( पात्राचना कसावगी1) रन प्रसाध मधुरी शोके फाण्यार्थस्वको। मानु कश्चिपादाय मारती वृत्तिमाश्रयेत् ॥४॥ रहस्य प्रास्ति काम्यानुगताः गेले त्या 'भौरमुक्येन तत्तरा महमुना ज्यादर्तमाना दिया - तस्य भूमनस्य वचनैनीताभिमुन्य पुन । १८० * १४६ दशरूपकम् हष्क्षाप्रे घरमात्तमाध्यसरसा गौरी नवे सहमे सरोहत्पुलका हरेण हसता टिष्ट शिवा पातु व ॥ इत्यादिभिरेव भारती वृधिमाधयेत् । स्थापक नट सर्वप्रथम काव्य के अर्थ की सूचना देने वाले मधुर सोकों के द्वारारारय । सामानिकों को प्रसन्न कर, किसो धातु को वर्णित करते हुए मारती वृत्ति का प्रयोग करे। सबसे पहले कान्या से युक्त लौकी से रनपास्ति कर, स्थापक निम्न पथ के सदस भारती इत्ति का प्रयोग करे। जैसे रनावटी नाटिका में निम्न पध में भारती पूचि का आश्रय लिया गया है। नववधू पार्वती के हृदय में अपने पनि शङ्कर से मिलने की उमुकना है, इसलिए वह तेजी के साथ पति के पास जाना चाहती है, पर दूसरी ओर नारीसहज लज्जा उसे वापस लौटा रही है। इस दशा को देखकर पार्वती के मापध सखियों आदि से अनेक प्रकार के वपनों से शक्कर के प्रति उ मुख करते है, और उन वचनों के द्वारा वह फिर से शङ्कर के समुसले जाई जाती है। जब वह भागे बदती है, तो अपने पति को देखकर भय तथा प्रम दोनों से युक्त शे जाती है। इस नव सहम के समय उसके रोमान खड़े हो जाते है। शङ्कर पार्वती को सामने देख कर इंसते हुए उसका मालिगन कर लेते है। इसते हुए शहर के द्वारा तर माशिलष्ट शाई हुई पार्वती सामाजिकों की (आप लोगों की रक्षा करे। सातु- भारती सस्थतप्रायो पाग्यापाये नटाधयः। मेदै प्ररोचनायुकैथीप्रहसनामुखै. ॥ ५॥ पुरुपविशेषप्रयोज्य संस्कृतबहुलो वाक्यप्रधानो नटायो व्यापारो भारती, परोचना पीयोप्रहसना मुखानि चास्यामझानि । नट के द्वारा प्रयुक्त संस्कृत भाषा घाला घाण्यापार भारती पृत्ति कहलाता है। इसके प्ररोचना, पीयी, प्रहसन तथा भामुख ये चार भेद पाये जाते हैं । ययोदेश लभणमाद- उन्मुखीकरण तन प्रशंसातःप्ररोचना। प्रस्तुतार्थप्रशसनेन प्रोतृणां प्रत्त्युमुखीकरण प्रोचना । यथा रमावल्याम्- 'श्रीहर्षों निपुण' कवि परिषदप्येषा गुणग्राहिणी लोके हारिच वत्सरानचरित नाट्ये च दक्षा वयम् । परत्वे कमपीह पाञ्छितपरप्राप्ते पद किं पुन मशाग्योपचयादय रामुदित सर्वो गुणाना गण ॥' अब नाम के साथ साथ उनकी परिभाषा भी देते हैं:- काबादिको प्रयास के द्वारा सामाजिकों को उसकी ओर उमुस करना, मन को क्षाकृष्ट करना प्ररोषना कहलाता है। जैसे रत्नावली नाटिका में निम्न पद्य में नट अपने नाटक की प्रशसा कर सामाजिकों को भाकृष्ट करना चाहता है इस नाटिका का कवि यो हव है जो कविता में बगनिपुग है। सामाजिक की यह समामी गुपो का प्रण करने वाली है। नाटिका की कथावर व मराज उदयन के परित्र . - । उनके तृतीय प्रकाश पर आत है, नो संसार में अतीव मनोहर (समझा जाता है। साथ ही हम लोग भी गायकला में बटे दक्ष है। कहाँ तक करें एक पक साधन से भी ईप्सित फल की माक्षिी सकती है, तो फिर यहाँ तो मेरे सौभाग्य की वृद्धि से हारे ही गुणों का समूह एकत्रित हो गया है, इसलिए मारक के सफल होने में कोई स देइ हो नहीं । चौथी प्रहसन चापि स्वमसझेऽभिधास्यते ॥६॥ घीय्यङ्गान्पामुखाङ्गत्वादुच्यन्तेऽच, तत्पुन । सूत्रधारो नटी ते माप घाऽध विदूषकम् ॥ ७॥ स्वकार्य प्रस्तुतातेपि चिनोक्त्या यत्तदामुसम्। प्रस्तावना घा तर त्यु फथोडात प्रवृत्तकम् ॥ ८ ॥ प्रयोगातिशयाय पोथ्यमानि त्रयोदश। भसाहोपात्र पोथी तथा प्रहसन का वर्णन हम आगे करेंगे 1 से पीथी तथा आमुख दोनों भारती भेदों के मन एक ही है, इसलिए उन भेवों का वर्णन हम यहीं कर रहे हैं। भामुस उसे कहते हैं, जहाँ सूत्रधार टी, मार्प (पारिपाधिक) या विदूपक के साथ थात करते हुए विचित्र उकि के द्वारा प्रस्तुत का गए कर (वस्तु का सभेत करते हुए) अपने कार्य का वर्णन करे। इसी धामुरा को प्रस्तावना के नाग से भी पुकारते है। इसके फयोहात, प्रवृत्तक तथा प्रयोगातिशय ये तीन धर पाये जाते हैं। वीथी के तेरा होते हैं-(जिनका वर्णन हम इनके याद करेंगे)। . संत्र कोद्धात - स्वेतिवृत्तसम घाफ्यमर्थ धा यत्र सूभिण ॥६॥ गृहीत्या प्रपिशेरपान क्योमातो दिधैय सः। चाय यथा रखावल्याम्-'योग परायण -दीपदन्यस्मादपि--' इति । वाश्यार्थ यया येणीसहारे-सूनपार - निर्वाणवेरिदहना प्रशमादरीणी मदतु पाण्डतनया सद केशवेन । रफपसाधितमुप क्षतविग्रहाय स्वस्था भय तु पुरुराजगुता' समृत्या । सूपधार के समान घटना बारे पारप को पा पारया को लेकर तदनुकूल उकि फा प्रयोग करते हुए जब कोई मादकीय पान मञ्च पर (प्रथम पर मैं) प्रवेश करता है, तो उस प्रस्तावना को कमोबात कहते हैं। उपर्युक भेष के आधार पहयो तरह हो आता है-याश्यमूलक तया पाश्यायमूलक । वाक्य का प्रयोग रनावतो माटिका में पाया जाता है, जहाँ यौपायण सूत्रधार केही वाक्य-दीपारपस्मारपि-नायादि का प्रयोग अपनी जिम करते हुए प्रविष्ट शश। बाध्याय का प्रयोग से संसार की मसारना (भामुख) में मिलता है। मीमसेन सगर के काय के भय को लेकर रानुकल अतिकमयोग करते हुए प्रविष्ट होता से निगरथल में- धार। माओं के मन होने से पादव के राय भागन्दर, जिनके रियों को माप १ यास्म याश्यामपया प्रशुद गत्र सत्रिण' इति पाय त्तरम् । - - दशरूपकम् इझ चुकी है। परिजनों से एक औरव, चिन्होंने लडाई झगडे को समाप्त कर दिया है, क्या सारी पप्पी को प्रसार तथा परिपुष्ट कर दिया है, स्वस्थ रहें। (सपरिजन कौरव जिनके शरीर क्षतविक्षत हो गये है, खून से पृथ्वी को रंगकर, स्वर्ग में निवास करें।) ततोऽर्थेनाह-'भीम'- लाशागृहानलविपाशसभाप्रवेरी 1 प्राणेषु वित्तनिचयेषु च न प्रहत्य । श्राकृटपाण्डववधूपरिधानकेशा स्वस्या भदन्तु मयि जीवति धार्तराष्ट्रा ।। भीमा- लाक्षागृह में भाग लगाकर, विष के अन्न को देकर तथा समा में हमें तोडा मैं जीतकर, हमारे माण एव सम्पति पर प्रहार कर, क्या वे धृतराष्ट्र के पुत्र मेरे जीते जी स्वरुप र सकते हैं जिन्हें ने पाण्डवों की बधू द्रौपदी के वस्त्र तथा केशों को आकृष्ट किया है। अथ प्रवृत्तरम्- कालसाम्यसमाक्षिप्तप्रवेशः स्यात्प्रवृत्तकम् ॥१०॥ प्रवृत्तकालसमानगुणवर्णनया सूचितपात्रप्रवेश प्रवृत्तकम् , यथा- 'भासारितप्रकटनिर्मलचन्द्रहास मास' शरत्समय एष विशुद्धकान्त । उत्साय मठतमस पनशलमुप रामो दशास्यमिव सम्भूतक धुनीव ॥ प्रवृत्तक नामक भामुख भेव यह होता है, जहाँ ऋतु के वर्णन की समानता के आधार पर रलेप से किसी पान के प्रवेश की सूचना दी जाय। जैसे निम्न पच में शरत् का वर्णन करने के साथ ही साथ दिन्ट शब्दों के द्वारा समान गुणों का वर्णन करते हुए राम के प्रवेश की सूचना दी गई। विशुद्ध तथा सुन्दर यह शराल, जिप्समें चद्रमा का निर्मल प्रकाश प्रकटित हो गया है, तथा जिसमें वधुजीव (दुपहरिया) के फूल फूल गये है सघन अधकार से पूर्ण वर्षाकाल को पसार कर ठीक उसी तरह भाया है, जैसे चद्रमा निर्मड हाप्त से युक्त (अथवा, जिन्होंने रावण के निर्मल चद्रहास सड्ग को घस्त कर दिया है), विशुर तथा सुन्दर रामचन्द्र माधवों के जीवों को फिर से लौटाते हुए, अत्यधिक अशन (तम) वा उम्र तथा सघन काले राक्षस रावण को मारकर पाये है। भय प्रयोगाविशय- एपोऽयमित्युपक्षेपात्स्वधारमयोगत । पायप्रवेशो यत्रैप प्रयोगातिशयो मतः ॥ ११ ॥ यथा 'एष रामेव दुष्यन्त 'इति । 'यह यह वा रहा है। इस प्रकार के पवन को प्रयोग कर जहाँ सूत्रधार किसी पात्र का प्रवेश करता है, वह प्रयोगातिशय नामक भामुख है। बैसे शाकुन्तन में जैसे यह राजा दुष्यन्त इस सूचना के कारण प्रयोगातिश्य है। १ निम्न पध किस नाटक है यह पता नहीं। धनिक ने भी यहाँ नाटक का हल्लेख मही किया है। वैसे हम पच को धनिक ने दो स्थान पर इसी प्रकार में उसृत किया है।
- - सृतीयः प्रकाशः १४६ अथ पीव्यहानि- उद्धात्यकावलगिते प्रपञ्चत्रिगते छलम्। यायल्यधिवले गण्डमवस्यन्दितनालिके ॥ १२ ॥ असत्प्रलापव्याहारमृदयानि प्रयोदश। चीयों के शिन तेरह अहो का सचेत पर किया गया, घे ये हैं।--उदात्यक, भव. लगित, अपच, मिगत, पल, पापकली, अधिवल, गण्ड, अवस्यन्दिरा, नालिका, असमलाप, व्यापार और मृदय । तन- गूढार्थपदपर्यायमाला प्रश्नोत्तरस्य या ॥१३॥ यत्रान्योन्यं समालापो घोद्धात्यं तदुच्यते। गूढार्थ पदं तत्पर्यायश्चेत्येवं माला प्रश्नोतरं चेत्येवं वा माला द्वयोगशिप्रत्युको राद्विविधमुद्रात्यकम् । तनाद्य विक्रमोर्वश्या यथा-'विदूषक - भो बधस्स को एसो कामो जेण तुम पि दूमिजसे सो किं पुरीसो भादु इत्थिान ति। ('भो चयस्य! क एष कामो येन स्वमपि सूपसे स किं पुरुषोऽयवा स्त्रीति ।) राजा-सखे । मनोजातिरनाधीना सुखेष्वेव प्रवर्तते । हस्य ललितो मर्ग काम इत्यभिधीयते ॥ विदूषक-एवं पिण जाणे ('एवमपि न जानामि ।' ) राजा वयस्य इच्छाप्रभव' स इति । विदूषक-कि जो ज इच्छादि सो ठं कामेदिति । (कि यो यदिच्छति स तत्का- मयतीति ।) राजा-अथ किम् । विदूषकः-ता जाणिदं जह मई सूधारसालाए भोअणं इच्छामि । (तजातं ययाऽहं सूपफारशालायां भोजनमिच्छामि।") जी दो पात्रों की परस्पर बातचीत इस धन की पाई जाय, कि वहाँ या तो गूढार्य पदा तथा उनके पर्याय (अर्थ) की माला पन लाय, या फिर प्रश्न तथा उत्तर की माला पर गाय } कमी कमी एक पात्र के द्वारा प्रयुक्त गूढार्थ पदों को दूसरा पाम नहीं समक्ष पाये, तथा यह वप्तका म्यास्यान करे, उसके एयाय का प्रयोग करें, तो वह पहले धनका उदाय या उदास्यक होता है। कोरपात्र अपनी अधि में शिम्हीं पातों पर प्रश्न पूछकर उसके साथ ही उचर देता जाता है, यह मरनोसर माला दूसरे हफा उहायक है। इस तरह उपायक दो तरह का होता है। पहले दा के उदास्यक का उदाहरण विक्रमोर्वशीय नारक के नीचे दिया जा रहा है, जहाँ रामा 'काम' के विषय में गदा पदों का प्रयोग कर फिर वप्तका ग्यास्पान करता है:- विदूषक-रेयस्य, २६ काम कौन है, जिससे तुम इसीहोरसे, पुरुष दयाहौ। रामा-मित्र, प्रेम का यह सुन्दर मार्ग जो केवल मुख की और दीप होता, तथा मन में उत्पन्न होता है, काग कहलाता है। विदूषक--मैं यह भी नहीं जानता। राज-मित्र, बर काम रब्धा से वत्पर होगा। विदूषक-तोया, जो जिसमे हम्सा करता है, उसकी वह कामना करता है। " . १५० "दशरूपवम् राबा--और नहीं तो क्या! विदूषक-तो समझ गया, जैसे मैं सूपकारशाला(भोजनशाला) में भोजन की इच्छा करता हूँ।' द्वितीयं यथा पाण्डवान दे 'का प्राध्या गुणिना क्षमा परिभव' को ग स्वकुम्य स्त' - किं दुःख परसथयो जगति क मान्यो य थाश्रीयते । को मृत्युर्व्यसन शुच जहति के यनिर्जिता शत्रा फैक्षिातमिद विराटनगरे छपस्थिते पाण्डवे ।' दूसरी तरह के उद्धायक का उदाहरण पाण्डवानन्द नाटक से निम्न पथ के रूप में दिया जा रहा है जहा प्रश्नीचर को माला है- सबसे अधिक प्राध्य रस्तु क्या है गुणियों को क्षमा। परिभव या तिरस्कार क्मेि कहते है। यह तिरस्कार जो अपने ही कुल के पापों के द्वारा किया गया है। इस क्या है। दूसरे के शरण में रहना ही दुरा है। संसार में प्रशंसनीय कौन है। जिसका आश्रय लिया जाता है, जिसकी शरण में दूसरा आता है । मौत किसे कहते हैं ? व्यसन को धोक या त्या कौन कर सकते हैं। जो भाने शत्रुओं को जीत लेते है। ये सारी बाते फिनने मान ली। विराटनगर में भाव रूप में छिपकर रहते हुए माण्डवों ने। अयावलगितम्- यकत्र समावेशात्कार्यमन्यत्मसाध्यते ॥ १४ ॥ प्रस्तुतेऽन्यन,पाऽन्यत्स्यात्तचापलगित द्विधा। तनायं यथोत्तरनरिते समुत्पभवनविहारंगभदोहदाया सीताया दोहदवाञ्च (ण) प्रविश्य जनापवादादरण्ये त्याग । द्वितीय यथा छलितरामे-'राम-लक्ष्मण तातवियुकामयोप्या विमानस्यो नाई प्रवेश शनोमि तदवतीर्य गच्छामि ।। कोऽपि सिंहासनस्याप स्थित पादुकयो पुर। जटावानक्षमाली च चामरी च विराजते । इति भरतदर्शनकार्यसिद्धि ।। । जहाँ एक ही क्रिया के द्वारा एक कार्य के समावेश से किसी दूसरे कार्य की भी सिद्धि हो जाय, वह पहले हम का अपलपित होता है। अथवा एक कार्य के प्रस्तुत होने पर वहम होकर दूसरा हो यह अवलगित का दूसरा प्रकार है। इस तरह अवलगित दो तरह का होता है।। असे पहले दा के गवळपित उदाहरण वरचरित (मभूवि के उत्तररामचरित) से दिया बा सकता है, जहाँ वनविवार को दोहर इच्या बालो गर्भवती सीता के दोहद को पूर्ण करने के बाप से बन में ले जार जनापवाद के कारण यहाँ छोड़ दिया गया है। यहाँ एक कार्य के समावेश (सौताशेददानि से दूसरा कार्य बनत्याग मो सिसो गया है। ।।दूसरा प्रारम लितराम नाटक में देप सकते हैं यहाँ राम इसलिए पैदल जाना चाहते हैं कि पिता से वियुक्त अयोध्या में विमान से प्रवेश करना ओक नहीं। यह इस प्रस्तुत दरख के होते हुए बहें आगे मरत के दर्शन (दूसरे कार्य) को सिधि हो नातीहै। 'राम-रक्षण, एप पिताजी के द्वारा वियुक्त अयोध्या में मैं विमान पर ठकर प्रदेश नहीं कर सकता। इसलिए उतर कर पैदल ही चलता हूँ। १लितराम नारक अनुपकम्प, तथा इसके रचयिता का भी पता नही। T .
। 7 । तृतीया प्रकाश अरे, सामने सिंहासन के नौवे, पादुकाओं के सामने कोई जटाधारी, अक्षमाला तथा चामर वाला व्यकि दिखाई पड़ रहा है। - श्रथ प्रपञ्च- सद्भुतं मिथ स्तोत्रं प्रपञ्चो हास्यन्मतः ॥ १५ ॥ असतेनान पारदायर्यादिनैपुण्यादिना याऽन्योन्यस्तुति स प्रपथ । यया कर्पूरगाम-भैरवानन्दः- रण्शा चण्डा दिक्खिदा घम्मदारा मन मस पिलाए खनए । भिक्या भोम पम्मपण्ड च येजा बोलो,धम्मो क्रूर णो होइ रम्मी। ('रण्डा चण्डा दीक्षिता धर्मदारा मद्य मारा पीयते सायते च । मिक्षा भोग्य चर्मराहच शप्या कौरो धर्म कस्य न भवति रम्य ॥' । प्रपा यह धीम्या है, जहाँ पाय आपस में एक दूसरे की ऐसी अनुचित प्ररसा करे, जो दारय उत्पत करने पाठी हो। पारिका के अदभूत अर्थ या वारपर्य परस्त्रीलोद्यपदा भादि निपुर्णता से है, इसकी परस्पर स्तुनि जहाँ होगी, यह प्रश्न यह लाता है। जैसे राजशेखर के करमजरा सटुब में यापालिया भैरवानन्द अपने विषय में हास्यमप अनुचित प्रतापरते हुए शहता है बताये तो सही, यह कौल धर्म किसे अच्छा न हमेगा, जहा विषवा दीक्षित खिये धर्मपतियाँ मन जाती ३, साने पीने को मास म मिलता है, मिझा का भोजन प्राप्त होता है, चमके कटे की शय्या होती है। श्रय निगतम्- श्रुतिसाम्यादनेकार्ययोजनं विगत विह। नटादिनितयालाप. पूर्षरतें तदिप्यते ॥ १६ ॥ . यथा विरमोर्वश्याम 'मत्तानां कुसुमररोन पट्पदाना राब्दोऽय परणतनाद एप धोर। पैलासे सुरगणसेविते राम तान, विनय कामधुराशर गीता नहाँसद की समानता के कारण अनेक अधों (परम्ओं) की एक साय योजना की जाप, पद निगरा नामक वीप्या होता है। यादि सीन पार्श के बालाप के कारण पूर्व में भी निगरा पाया जाता है। शित स्थान विमोशीय नाटक से निम्न पथ के रूप में दिया गया। राग, मसरामो के सीन को गाकर शरमान्य के आधार पर भमरों के बम्पल रनार या मोरिल यी हावीदीयौरा करना है, मन यह विगत है। फूलों के रस से मस मोरों का यह कपड, पोषिलो गम्भीर काटी। देवनानी के सम्मापरी भोर से सेविठणस पर पर सिरिया मगर मारी में गायो। । , १ दशरूपकम् अप छलनम्- प्रियाभैरप्रियैर्वाश्यचिलोभ्य छलनाच्चलम् । यथा वेणीसंहारे-भीमार्जुनौ- क्र्ता चूतच्छलाना जनुमयशरणोद्दीपनः सोऽभिमानी रामा दुशासनादेर्मुरुमुजरातस्यागराजस्य मित्रम् । कृष्णाकेशोत्तरीयध्यपनपनपटुः पाडवा यस्य दासा कास्ते दुर्योधनोऽसौ कथयत पुरुषा द्रष्टुमभ्यागतो स्व।।" जहाँ कोई पात्र थाहर से प्रिय लाने घाले, किन्तु वस्तुतः अप्रिय धापयों के द्वारा दूसरों का विलोभन करके उनके साथ छल करे, यह पल नामक वाया है। जैसे वेगोसदार में भीमसेन तथा अर्जुन पुर्योधन को ढूंढते हुए निम्न सक्ति मा प्रयोग करते है, ओ ऐसे अप्रिय बालरों से युक्त है, बोगहर से प्रिय-से मासूम पड़ते हैं:- चूतकीम के समय छल करने वाला, लाक्षागृह को बराने वाला, शासनादि सो घोटे भाइयों का पूज्य अग्रज (गुरु), अराज कर्ण वा मित्र, वह अभिमानी राजा दुर्योधन, जो द्रौपदी के बाणे व उत्तरीय को खोलने में चतुर है, तथा जिसके पाण्डव सेवक है, कहाँ है। पुरुषों, हमें बना दी, इम उसे देखने को आये है। श्रय वारली- यिनिवृत्त्यास्य पाली दिखिः प्रत्युतितोऽपि पा ॥ १७ ॥ अस्येति धास्यस्य प्रान्तस्य साक्षस्य विनिवर्तनं वाली द्वित्रिी उक्तिप्रत्युक्तय', तत्राचा यथोचरचरिते-वासन्ती- वं जीवितं स्वमसि मे हृदयं द्वितीय त्वं कौमुदी नयनयोरमृतं स्खयो। इत्यादिभि प्रियशप्तरनुष्य मुग्धां सामेव शान्तमथवा किमत परेण ।। अफिप्रत्युतितो यथा सावल्याम्-'दिदूपक-भोदि मणिए में पि एवं चचार सिक्खावेहि । (भवति मदनिके मामप्यता चरी शिक्षय' ) मदनिका हदासण क्सु एसा चचरी । दुवदिसाऽर्थ क्तु एदम् । (हताश न पल्वेषा पर्चरी द्विपदि. सडकं सस्वेतत् ।') विदूषर-मोदि किं एदिणा राण्डेण मोदया फरोमन्ति । ('भवति किमेतेन सण्डेन मोदवा नियन्ते!) मदनिका-पहि, पटीयदि पर एपम् । ('नहि पयते सस्वतन् ।) इत्यादि। जहाँ वाश्य की विनिति पाई वाय, मर्यात् साकार वारय को पूर्ण न कर उसको अपूरा ही कहा जाय तथा उसके भाव को गम्प रख दिया जाय; अयमा बहाँको पा तीन वा इजिभक्ति का प्रयोग पाओं द्वारा किया जाय, वहाँ धारली मारक दीप्या होता। (इस पर वापी शेतरीहोती है।) पर प्रारबाहीच उदाहरण उतरचरित के तृतीय ब से दिया गया है, जहाँ सौना के साथ लिये गये राम के बटौर वर्णन करते हुए वासन्ती (बनदेवता) राम १ 'छलना इस्यरि पाठः।
- J . तृतीय' प्रकाश तुमने सीता से कहा था कि तुम मेरा जीवन हो, मेरा दूसरा इदा हो, मेरे नेत्रों को इस करने वाली चर्चा का दो, मेरे श्रहों को बीइन देने वाला अमृत शे, इस तरह के सैकड़ों प्रिय पायों से उस मोली सीता को मुलाये में डालकर, दाय, तुमने उसी को (बनवास दे दिया ), मयका शान्त हो, इससे आगे के विषय में बदना व्यर्थ है। दूसरे प्रकार की पाकेली में दो तीन पार क्ति प्रत्युक्ति पाई जाती है, जैसे सावली नाटिया के निम्न स्थल में- विदूषस-रे मानियो मुझे भी यह राग (चरी) सिवा दो ना। मदनिका-सूखे यह चरी नहीं है, यद द्विपदीसण्डक' है। विदूषक-भरी, या रस एण्ड (शबर) में लहू इनाये जाते हैं। मदनिका-गी, इसे तो पदामाता है-गाया जाता है। अयाधिवला अन्योन्यवाक्याधिपयोक्ति स्पर्धयाऽधिवलं भवेत् । यथा पेणीसंहारे--- अर्जुन- सकलरिपुजयाशा यन पक्षा सुतैस्ते तृणमिव परिभूवो यस्य गण लोक । रणशिरसि निहन्ता तस्य राधासुतस्य प्रणमति पितरौ वा मध्यम' पाण्डुपुत्र 11 अदा नाटकीय पात्र एक दूसरे के प्रति वापयों का प्रयोग करते समय स्पर्धा अपने आधिक्य की कि उसे अधियह कहते हैं। जैसे वेणीसंहार के निम्न स्थल पर अर्जुन, भीम व योधन का परस्पर याताप इस तर का पाया भाता है कि वे एक दूसरे को पा करते हुए अपने पानिपा की सूचना करते हैं। भन-३ पिता-माता, (धृतराष्ट्र व माप जिस कर्ण में पापके पुत्रों की समस्त शक्षु माँ को जीतने की भाशा की हुई थी, और जिसने घमण्ड से सारे ससार को तिनको को तरह नगण्य समझ रसा था, उसी रथापुत्र को पुरस्थल में मारने वाला यह मध्यम पाण्डव भजन माप दोनों को प्रणाम करता है। . इत्युपश्मे 'गजा-अरे माह भवानिव विकत्थनाप्रगल्भ' । किन्तु- प्रक्ष्यन्ति न चिरात्मप्त यान्यवास्या रणाये। भगदाभिमवक्षोस्थिवेणियामा भीषणम् ।' इस्यन्तेन भीमदुर्योधनयोरन्योन्यवास्यस्याधिक्योतिरपिपलम् ।। राजा-अरे, मैं तुम्हारी पर भारमप्रशसा करने में पता नहीं है। लेकिन मैगी गदा से टूटी पक्ष स्थल की पवियों के समूह के कारण मीषण दिखाई पड़ते हुए तनुशारे पाभर शोध या पुरभूमि में सोया पायेंगे।। श्रीगण्ड- गण्डा प्रस्तुतसम्यन्धिभिनाय सदसोदितम् ॥ १० ॥ पपीत्तरपरिते-राम- इस गैहे लक्ष्मीरियममृतवतिर्नयनयो- रगावस्या पर्ची पुषि यहमदनरस । १ पर्चरी, विपदोसाक मादिगांगों का लिया है, से शुरू या. इमरी भादि। २०६० --- 1 M . 7 १५४ दशरूपकम् 'अयं वाहु कण्ठे शिशिरमरणो मौतिकप्तर किमस्या न प्रेयो यदि परमसास्तु विरहे ।' (प्रविश्य) प्रतीहारी-देव उअत्यिदो। ('देव उपस्थित ।') राम'-अयि किए। प्रतीहारी-देवस्स पासणपरिचारमो दुम्मुहो। (देवस्यासभपरिवारको दुर्मुख' ।') इति । जहाँ प्रस्तुत विषय में सम्बद्ध व से भिन्न वस्तु एकदम उपस्थित हो जाय, पहा गण्ड होता है। (गण्ड वखत वह वाक्य है, जहाँ नाटककार भावी घटना का सकेत किसी मिन विषय पर दे जाता है। पाश्चात्य नाटों को 'इमैटिक मारनी' से या कुछ कुछ मिलता जुलता है) जैसे उत्तररामचरित में राम के 'रसका विरद बदा असम रे' यह कहते ही 'देव यह उपस्थित इस वाक्य के द्वारा मित्राय की एकदम उपस्थिति पाई जाती है। राम-या सीता मेरे घर की लक्ष्मी है, मेरी आँखों को आनन्द देने वाली अमून की शलाका है।सका स्पर्श अगों को इतना शीतल लगता है जैसे सघन चन्दन का लेप हो। सौता का यह राहु कण्ठ में इस तर मालूम देता है जैसे शीतल तथा कोमल मोतियों की माला हो।सीता की कौन वस्तु मुन्दर दया प्यारी नहीं लानी, केवल इसका विरह ही असा है। प्रतीहारो (आकर.)-महाराज, उपस्थित है। राम-अरे कौन। प्रतीहारीम महाराज, आपका' सेवक दुर्मुस । अपावस्यन्दितम् - रसोरस्यान्यथा ध्याख्या यत्रापस्यन्दित हि तत् । यथा लितरामे-'सीता-जाद का खु सुम्हेहि मजुमाए गतवं तर्हि से .रामा विणएण पमिदव्यो । ('जात कल्य सलु युवाभ्यामयोध्यायों गतव्य तर्हि स राजा विनयेन नमितव्य । लव-अम्ब स्मिाताभ्यो राजोपजीदिन्या भवितव्यम् । सीता-जाद सोमम तुहमण पिदा । ('जात स खलु युक्यो पिता।') लव-किमा पयो रघुपति पिता ।। सीता--(साशइम्) जादा कर पर तुद्माण, समलाए बन्द पुहवीए । ("गात न खलु पर युवयो , सक्लाया एवं पृथिव्या ।') इति । जहां भावावेश (रस)के कारण किसी पाश्या प्रयोग कर दिया जाय, को बाद में उप्स वाक्य की प्याश्या दुसरे ही बङ्ग से पर वास्तविकता को हिश दिया जाय उसे अवस्पन्दित कहते हैं। बैसे चलिराम नाटक के निम्न स्थल में मावादेश में सब के सम्मुख सीता के मह यह बात निकल जाती है कि 'राम तुम्हारे पिता है, पर वह बाद में इसकी म्याख्या दूसरेर दह से कर देता है, कि तुम्हारे ही नहीं सारी पृथ्वी के पिता हैं।" सीता-तात, कल तुम्हें अयोध्या माना है, वहाँ रामा को नम्रता से मधाम परमा। लव-माना, क्या में राजा के नौकर पदनारे। सोबा-तात, वे तुम्हारे पिता हैं। लव-क्या रघुपति इमारे पिता है। सीता--भावा के साथ) दाल तुम्हारे ही नही, सारी पृथ्वी के। M १५५ - M तृतीयः प्रकाशः यथ नालिका- । सोपहासा निगूढार्था नालिकै महेलिका ॥ १६ ॥ • गया मुद्राराक्षवे'चर: हो बाप मा कुर्म किं पितुह उपमानो जाणादि' किपि अारिसा जणा जागन्ति । ( 'हो माझण मा कुप्य, किमपि तदोपाध्यायो जानाति किमप्यस्मादशा जना जानन्ति ।' ) शिष्यः-किगस्मदुपाध्यायस्य सर्वशत्यमप- हर्तुमिच्छसि । चरः- यदि दे उपमाओ सव्वं जाणादि सा जाणादु दाव कस्स चन्दो अणमिप्पेदो ति । ('यदि त उपाध्यायः सर्व जानाति तनानातु तावत् , कस्य चन्द्रोऽनभिप्रेत इति ।' ) शिष्यः-फिमनेन तेन भवति ।' इत्युपगमे 'चाणक्या-चन्द्र- गुप्तादपरकान्पुरुषाशानामि ।' इत्युकं गवति । हास्य से युक, दिपे अर्थ वाली पहेली भरी उक्ति को ही मालिका कहते हैं। जैसे विशाखदत के मुद्राराक्षस नाटक में हाथ से युक्त तथा गूदार्थ पदेली 'रताओ चन्द्र •किसे अच्छा नहीं लगता इसका प्रयोग कर के द्वारा किया जाता है जहाँ चन्द्र का हाथ चन्द्रप्त (मौर्य) से है। घर:-अरे मामण, गुस्सा न करो, कुछ तो तुम्हारे आचार्य चाणक्य जानते है, कुछ इस जैसे लोग ही जानते हैं। शिभ्य-माग मारे गुरु की सर्वशता को चुनौती देने की इच्छा करते हो। चरमार तुम्हारे आचार्य सारी बातें जानते हैं, तो इता कि किस व्यकिको चन्द्र चन्द्रमा चन्द्रगुप्त) अच्छा नहीं लगता। शिष्य--इसे मानने से क्या फायदा। चाणकम-बांद्रग से बप्रसन्न लोगों को मैं जानता हूँ। थथाऽसत्मालाप:- असम्बद्धकथाप्रायोऽसत्यलापो यथोत्तरः । ननु चाराम्यद्धार्थत्वेऽसातिनाम वायदोप'उमाता-उत्स्यमायतपदोन्मादशैश- पादोनामसम्बद्धालाक्तिव विभावी यया- ''अभिमन्ति विदार्य यमकुहराण्यासतो पामुक- . राहुल्या विष_रान्गणयतः संस्पृश्य दन्ताकरान् । एक त्रीणि नवाट सप्त पडिति प्रचस्तसंख्यामा र पायः प्रौधरिपो· शिशुत्वविकाः धैर्यासि पुष्णन्तु यः ॥' जहां उटपटगभसम्बद्ध उक्ति सथा प्राप पाया जाप, पह असष्पलाप नामक पीप्यत होता है। सम्पर प्रलपित के बारे में यह शङ्का की जा सकती है, कि नाटक में इसका पाया आना दोष, कोकि असम्मर कसा में बसाति नामक वाक्यदीप ला जायगा । इस शाका निरा- करण करते हुए अधिकार पनिक कहते है कि हनीद, मदमल, मागड तथा' बालक पार्यो की बातचीत में असम्परमपित पाया जाना स्वाभाविक हो। से निम्न स्थल में बालक कार्तिकेय का भसम्पर प्रलाप स्वामाविक है। बाल कार्तिकेय रालोला के कार शिशिव के में हरकते हुए वाकी १. 'यपोतरम् स्वपि पाऊ। 1 . x . TH म - शरूपकम् प्रकाशमय मुखों को गोठों पर से पाई देते हैं। उसके बाद वे उसके जहरीले तथा चित्रविचित दाँतों के घरों को भली से छु-कर गिनते है।-एक, तीन, मो, भाठ, सात, छ । इस तरह कार्तिकेय को गणना में संक्षा का कोई कम नहीं पाया जाता। फोन के शव कार्तिकेय की संख्या व्यतिक्रमयुक्त बचपन से तुतलाई दुई वागी आपोगों के हवाग को पुष्ट तथा अमिट करे। यथा- 'हंस प्रयच्छ मे कान्ता पतिस्तस्यास्त्वया हता। विभाक्तिकदेशेन देय यदभियुज्यते ॥' ययापा- भुषा हि मया गिरय सातोऽर पहिना पियामि वियत् । हरिहरहिरण्यगर्भा माइनास्तेन वृत्पामि । और बैले प्रिया विरह के कारण बम पुरूरवा की रस इत्ति में- 'हेस, मुझे मेरी प्रिया को लौटा दे, उसकी चाल दूने छौनी। मेरी प्रिया के एकदेश (गति) को लेने वाले वेरे द्वारा मुझे जो कुछ लौटाने योग्य , से लौटा देना ठीक होगा।' अथवा निम्न वन्मादौचि में- मैंवतों को खा चुका हूँ. भाग से नहा चुका है, आकाश को रहा है। प्रमा, विष्णु, गदेश मेरे पुत्र है।लिए मैं नाच रहा हूँ। भय व्याहार'-- अन्यार्थमेव व्याहारो हास्यलोमकरं वचः ॥ २० ॥ यथा मालविवाग्निमिने लास्यप्रयोगावसाने-मालरि निर्गन्तुमिच्छति ) विपकमा दाव उवएससुद्धा गमिम्ससि ।' ('मा तावत् उपदेशशुद्धा गमिष्यसि') इत्युपझने 'गणदास-(विदूषक प्रति ) श्रार्य उच्यता यस्त्वया कमभेदो लपित। विदूषकः-- पढम पदूसे वागस्स प्या भौदि सा तए लधिरा (मालविषय स्मयते)।' ('प्रथम प्रत्यूषे घ्राह्मणस्य पूजा भवति सा तया लहिवा।) इत्यादिना नायकस्य विप्रधनायिकादर्शनप्रयुक्तन हास्सलोभकारिणा वचनेन व्याहार' । जहाँ हँसी के लोम को उत्पन्न करने वाले ऐसे धास्य का प्रयोग हो, जिसका अर्थ कुछ और ही हो, यह स्याहार जाता है। जैसे मालविकागिमित्र में मालविका द्वारा लास्य के प्रदर्शन किये जाने के पार बद बाना नारतो ।प्स पर विदूषक कहता है- 'तम प्रदेश से गुर होकर (हमसे यह सौख कर) न चले लाना। गणदास--विवक से ) आर्य कोई गलती हुई शेती करें। विदूषक-पहले पाट प्रान काल में नाग की पूजा की जाती है। उसने उस पूजा का (मालविका मुसकुराती है।) 'पहा माविका की विश्वास में डाल कर चाय को उसका दर्शन कराने के लिए प्रयुक्त चन का प्रयोग विदूषक ने किया रे,जो हास्यकारी है। मत पड़ो म्यादार नामक पीपारे। व्हान किया। -- तृतीयः प्रकाश १५७ , । अर्थमुवम्-- दोपा गुणा गुणा दोषा यत्र स्युर्मुद हि तत्। यथा शाकुन्तले- 'मेदच्छेदकशोदरं लघु भवत्युत्यानयोग्य पषु सत्त्वानामुपलक्ष्यते विकृतिमचित्तं भयोधयो । उत्कर्ष स च धन्विना यदिषयः सिध्यन्ति लक्ष्ये चले मिथ्यैव व्यसनं वदन्ति मृगयामीदग्विनोद कुतः । इति मृगयादोपस्य गुशीकर। जहाँ कोई पात्र गुणों को दोष पता कर तथा दोषों को गुण बता कर कहे, बद्ध पर पीध्यार है। जैसे शाकुनाल के इस पत्र में राजा मृगया को दोपों को गुणों के रूप में रखता है:- लोग इस भृगया को इह में ही ध्यसन (आदत) मताया करते है। भला इस बैसा भानन्द को मिल सकता है। देशो, मृगया से शरीर की सारी ची कम हो जाती है, पेट पतला हो जाता है, तथा शरीर उठने बैठने के योग्य दो भाता है। दूसरी और मृगया खेलने से अगली पशुओं के पिच व भाकृति में भय तथा कोष के समय क्या-क्या विकार होते है, इसका शान प्राप्त होता है। तीसरे, मृगया खेलने में चाल लक्ष्य को विश करना पड़ता है, अन उसके बाण चावल लक्ष्य को विद करने में सिद्ध हो जाते हैं, और यह पतधारियों की बहुत बड़ी विशेषता है। यथाच- . 'सततमनिर्वतमानसमायाससहसमूलसकिएम् । पतनिश्मविश्वास जीपति राजा जिगीपुरयम् ।।" इति राज्यगुणस्प दोषीमाव। अपश से निम्न पर में राज्य के गुणों को दोष के रूप में वर्णित किया गया है- सभी को जीतने वाला पहरामाटे कद के साथ ही रहा है-सका मन कर्मी शन्त परपर नहीं रखता, भनेक व्यपाएं इसे पलेश दिया करती है, लेनदी भादही माती, किसी के प्रति यह विकास दो करता है। उभयं वा- 'अन्त' सारतोदयव्यानिन प्रादुर्भवचन्त्रणा सर्वत्र जनापवादयविता जोतन्ति दुच सदा । भव्युगममति कृतेन न राता नैवासया पालो पुच्युफरियेशून्यइपयो धन्यो अनः प्राकृतः । इति प्रस्तापनासानि कमी-कभी दोम-गुणों का दोषीमार दोषों को मार एक-एक भाप भी पाये भावे- सपरिचना व या गाहे सारतालिए सरा दुसौ एने बाई साजन होग, बोदमे कोगों के द्वारा गई निन्दा से हरा करते, इख के साथ भावनयापना करते है । वन सौभाग्यशागतोमा पाल (मशानी) पुसकी मौके दशरूपकम् वो पात को भी नहीं सोच पाना, बो अच्छे या बुरे काम से कभी प्याकुल नहीं होता और भले हरे के शान से निसका पश्य रहता है। पपामन्यतनेनार्य पात्र पाक्षिप्य सूनभृत् ॥ २१ ॥ प्रस्ताघनान्ते निर्गच्छेततो पस्तु मपञ्चयेत् । सूत्रधार इस प्रकार प्रमोचना, बीथी, प्रहसन, आमुख भादि किसी के द्वारा (भारती वृत्ति का मामय लेते हुए) काय्यार्थ अथवा नाटकीय पात्र की सूचना है। उसका आक्षेप तथा परिचय दे देने पर प्रस्तावना के अन्त में यह रमश से निष्कान्त हो जाय सया तदनन्तर कथावस्तु को पश्चित को तर-अभिगम्यगुणयुको धीरोदात्तः प्रतापवान् ॥ २२ ॥ 'कीर्तिकामो महोत्साहस्त्रय्यास्त्रातामहीपति । प्रख्यातघशो राजपिदिन्यो वा यत्र नायक ।। २३॥ तत्परयात विधातव्य वृत्तमाधिकारिकम् । यतिवृत्ते सयवागसम्बादकारिनीविशानप्रशिद्धाभिगामिवादिगुणेर्युक्तो रामायण महाभारतादिप्रसिझो धीरोदात्तो राजर्षिदिव्यो ग नायकस्त प्रख्यातमेवार नाटक प्राधि कारिक वस्तु विधयमिति। पहा नाटक (रूपविशेष)ही का प्रकरण चल रहा है। थस नाटक के ही नायक तथा तत्सम्बन्ध पस्त का हो सङ्केत करते हुए कहते हैं। नाटक का नायक या को भसि कुल में उत्पन्न राजपि भूपति होता है, जो उत्कृष्ट गुणों से युक्त होता है, धीरोदाच प्रकृति का तथा प्रतापशील होता है । यह यश तथा कोति की कामना किया करता है, उत्साह से युछ होता है सपा तीनों वेदों (पैदिक परम्परा) का रएक होता है। अपवा नाटक का नायक कोई दिव्य-देवता-धो सकता है, जो इन सभी विशेषताओं से युक्त होता है। उस नायक के विषय में इतिहास पुराणादि में प्रसिद्ध फयावस्तु को ही नाटक की प्राधिकारिक घस्तु रखना चाहिए। (यदि कवि उसके सम्बन्ध में रसानुकूष्ठ कोई करिपत घस्तु का सनिवेश करना चाहता है, तो घहमासनिक रूप में ही की जानी चाहिए।) जिस इतिहास प्रसिद्ध (प्रख्यात) पूध में इस तरह का, इन गुणों व विशेषताओं से सम्पन्न, नायक हो, यही पूत नाटक के उपयुक होता है। जिस कथा (इतिवृत्त) में सत्यवारी नीतिशास्त्र में प्रसिद्ध उच्च गुणों से युक्त तथा अनुचित कार्य न करने पाका रामायण महाभारवादि इतथा आदि प्रन्यों में भी--में प्रसिद धीरोदात्त कोटिहाराजा या यि नायक पाया जाता है, उसी प्रसिर कया को यहाँ नाटक को माधिकारिक पारस्त बनाना ठीक होगा। (जैसे शक तक की कथा का नायक दुभ्यन्त धीरोदात्त राजर्षि है, कथा महाभारत में प्रसिर है। उत्तररामचरित की कथा मी रामायणादि में प्रख्यात है, तथा इसके नायक धीरोदास राजति है, से अवतार के कारण उन्हें दिव्यशक्ति सम्पच रोने से दिन्य मी माना जा सकता है। मुद्राराक्षस का नायक चन्द्रगुप्त धीरोदत्त राजा अवश्य है पर दूसरी पाती कि इसमें-जिस रूप में यह यहाँ चित्रित मा १-उच्च कुलीनता नही मिलती है। फिर भी बरकी सरादासी के पुत्र होने के कारण-प्रख्यातशय उसमें परितहीही नाता है। कपा मोरकवादि में प्रस्याउ हो।)
. 11 - 1 तृतीयः प्रकाश १५४ । यत्तत्रानुचितं किञ्चिनायकस्य रसस्य घा॥२४॥ विरुद्ध तत्परित्याज्यमन्यथा या प्रकल्पयेत् । यथा छद्मना बालिवधो मायुराजेनोदात्तराघवे परित्यक्त । वीरचरिते तु रावण. सौहदेन वाली रामवघार्थमागतो रामेण हत इत्यन्यया त । गायक की प्रकृति ( धीरोदाराचा) तथा नाटक के प्रमुख रस (वीर, या शार') के प्रतिफूल जो कोई यात उस इतिवृत्त में पाई जाती हो, कवि को चाहिए कि उसे इस तरह से परिवर्तित कर दे कि नायक के चरित्र का वह दोप न रहे, या रस का बन प्रतिकूल तरय हट जाय । इस तरह की जो कोई अनुचित वात हो या तो उसे छोड़ हीदे या परिवर्तित करके नये रूप में रख दे। जैसे मायुराज ने अपने नाटक बदातराघव में राम के द्वारा छल से बालिका वध सर्वथा छोड़ दिया है, उसने इस घटना का हवाला दो नही दिया है। भवभूति के वीरचरित में रावण की मित्रता के कारण पाली राम के वध के लिए आता है, और राम से मार देते हैं, इस तरह वह पटना पदल दी गई। या ध्यान देने की बात है सिराम लेते दिश्यावतार तथा धीरोदाच राषि के बल सपा सारिका चरिच में बारि को गुल से मारना कल है। (इम ग्रीका दूसरा पदाहरण अमिशान शाकुन्तल से ले सकते हैं। परपुराण में जहाँ से यह कथा हो गई है दुर्वासा वाली पदमा-चार-चा उल्लेख नहीं। इस प्रकार शकुन्तला को मिना किसी कारण भूल जाना दुष्यन्त की कामुकताब उम्परता को सिखकर ससके भारोरा को दूषिन कर देता है। कमिवर कालिदास ने चौरीदास दुग्यत के परिष को पालपित रसने के लिए दुर्वासा शाप को करना की:-रमरिम्यति स्वान स दौषितोऽपि सन् कया प्रमत्तः प्रयता मिया) भार्यन्तमेचं निधित्य पञ्चधा तदिभज्य च ॥ २५ ॥ सण्डशः सन्धिसंज्ञांध विमामानपि सण्डयेत् । अनौचित्यरसविरोधपरिहारपरिशुद्धीकृतसूचनीयदर्शनीयवस्तुविभागपलानुसारेणोप- पलसवीजबिन्दुपताकाप्रवारीकार्यलक्षणार्थप्रकृतिकं पधावस्थानुगुण्येन पञ्चधा 'विभजेत् । पुनरपि चौफस्य भागस्य द्वादश प्रयोदश चतुर्दशेत्येवमाशान् सन्धीना विर्भागान्सुयात् । गायक के रमपिता को चाहिए कि उस रात कया का भादि य अन्त कहां | इसका निधप कर ले। नाटक किस विशेष घटना से भारम्भ करेगा, और कहां जाकर समाह करेगा, इसे निधिन फर ऐने पर उसे सारी क्या को पोच भागों में पोट लेना चाहिए। पं पति पद ही पचि सन्धिया-गुस, प्रतिमुस, गर्म, विमा, य निर्षद हैं। इन सन्धियों को विभागों, बहरे में भी विभाजित कर देना चाहिए। बहरराव नायक के भनौनिल व शिष परिवार से नाटीय इतिवृत परियार ही माप तपा कवि रस शत स विभाग कर पयावानु में किन नि रादीचरो पए पर विपना, किन- नियों को नदी (मदिन-दिन वो रिफम्मादिके द्वारा गरनारा देना 11 मनुमार पर नियुक्ति में गौर, विन्दु, पारा, प्रबरी तथा कारन प्रहानियों को फायना करे, म प्रभार ये उपाय पटुको बारमादि पाँच कवरसामोरेमाप पदमों में- मुगदिपार सधियों में-पॉटसरिसके पार १. रूपकमर पनन गन्त्र को रस नहीं मानते, म यहाँ मो नही हिसारे। बम मारक में शान के मोमो मोर करते। -- १६० दशरूपकम् मुख व गर्भसन्धि को बारह, मतिमुख व विमर्थ को देह तथा निर्वहस, सन्धि को चौदए बड़ों में विभक्त कर दे। [नारकीय कथावस्तु के आरम्म से लेकर अन्त के विभागों को हम एक रेखाचित्र के द्वारा ज्यक कर सकते। गर्म 10 । ... T - प्रतिमुख निवरण मारकीय यथावर एक सरल या सीधी रेखा की तरह एक ही दिशा में नहीं चलती। प्रतिमुख तक रह सीधी चलती है और फिर वह फलवासिया में उन्नतिशील होती है। गर्भसधि इसकी चरम सीमानिसके अन्तर्गद सदर की स्थिति पर बातो। तदनन्तर पानी पाती।विमर्च के पार फिर रसोधी होकर नायक के कार्य नथा फलप्राप्ति की और उन्मुख होती है। पाशाप नास्पालियों में कुछ लोग इसी तरह की प्राँ स्थितियों माटक की कथावस्तु मैं मानते है। पर पूसरोपात रेस महामन्त सदा सान्त न होता है। कुछ लोग सीन ही अवस्था मानते है-आरम्भ (Begining), सर्व तथा ससको परम स्थिति (Climax) तथा मम्त ( Denorement)] धतुम्पटिस्तु सानि स्युरङ्गानीत्यपरं तथा ॥२६॥ पताकावृत्तमायूनमेकारिनुसन्धिभिः। अङ्गान्यत्र यथालाममसन्धि प्रकरौं न्यसेत् ॥२७॥ अपरमपि प्रासनिकमितितमेगावरान्पिभिन्नमिति प्रयानेतियतादेव विधिवत मिरनसन्धिभिषून पतातिपत्त न्यसनीयम् । बङ्गानि च प्रधानाविरोधेन यमालाभं न्यस नामानि । प्रकरीतिपत त्वपरिपूर्णसन्धि विधेयम् । इस प्रकार षाधिकारिक इतिवृत्त के अर होते हैं। दूसरा प्रासनिक इतिहत है। इसके पताका नामक भेद में पांचों सधियो हो यह मावश्यक नहीं। वह प्रधान इस की अपेण, एक, दो, सीन या चार सन्धियों से न्यून हो सकता है। इसमें पधा वापक रूप से बारें का समावेश हो सकता है। प्रारणिक काके प्रकरी नामक भेद में सविसनिवेश महीं होना चाहिए। दूसरा मासनिक इतिवृत्त एकादि सरियों से या हो भाव प्रधान विप से एक तीन या पार अनुसपियों से न्यून का में पताका निकृष्ट का विन्यास करना चाहिए। इसके 'मायावश्यक रूप में रसे भा सकते हैं, इस तरह कि प्रशान इतिपय जिनका विरोध न पड़े। प्रकरी नामक प्रालिक हतिवृत्त मैं सांप को परिपूर्णता को जहरत नही मत प्रस, सधि का दिन नहीं चाहिए। तषेध विमले- भादौ विष्कम्भकं कुर्यापशंषा कार्ययुक्तिः। इसमत्र अर्ययुद्धि- अपेक्षित परित्यज्य नोरस पस्तुविस्तरम् ॥२८॥ - ।
- - तृतीयः प्रकाश यदा सन्दर्शयेच्छेपं कुर्याविष्कम्भक तदा। यदा तु सरस घस्तु मतादेघ प्रवर्तते ॥ २६ ॥ श्रादानेव तदाकः स्यादामुसाक्षेपसंध्या इतिवृत्त का इस प्रकार विभाजन कर लेने पर कवि नाटक के आरम्भ में कार्य की युक्ति के अनुसार या तो विकभक की योजना करे या भई की व्यवस्था करे। यह योजया कार्य के आधार पर होगी। परि भारम्भिक स्थांश मौरस है कि उनकी पावश्यकता नाटक की वस्तु को गतिविधि देने के लिए होती ही है, तो ऐसी दशा में कवि को चाहिए कि नीरस कि तु आवश्यक वस्तु विस्तार को घोडकर जब वद धावा फे शेषाश को रगमन पर दिखाना चाहे तो बद उस नीरस कमांश को सूचना देने के लिए, विष्फम्भक का सन्निवेश करे। यदि कथावस्तु में भारम्भ से हरसमय वस्तु पाई जाती है, तो ऐसी दशा में विष्पग्मक का प्रयोग करना ठीक नहीं। ऐसी स्थिति में शुरू में ही मतका सन्निवेश करना चाहिए तथा प्रयोपातिशय पादिमागुख मेवों के आधार पर भारएम में ही पात्रप्रवेश कर देना चाहिए। (जैसे मालतीमाथव के मारम्भ में नीरस वस्तु की सूचना के लिए विष्कम्मा की योजना पाई जाती है, जहाँ भगवती (तापसी) भाकर भूत परतु की पूचना देती है, तम प्रकरण भारम्भ होता है । शाकुतह में भारम्म से ही सरस फवारस्तु का सनिवेश पाया जाता है, नाटक बसे तुरू किया गया है। ८ सच- . r प्रत्यारानेएचरितो बिन्दुन्याप्तिपुररस्तः ।। ३० ॥ सदो नानाप्रकारार्थसविधानरसाश्रयः। रमप्रवेशे साशानिर्दिश्यमानगायकव्यापारी यिन्दूपझेपार्यपरिमितोऽनकायोजनादि- पानराधिकरण उत्सम इना। विषम्भक यश का भेद यता एप कहते हैं कि आज में नाटकादि के गायक का परित प्रश्यप रप से पाया जाता है। या तो यह स्वय माता है या मच पर पटिस घटना उसके परिप से पापात् सम्यम होती है। उसमें विन्दु नामक अर्थ प्रकृति याप्त पाई जाती है या वह नाना प्रकार के नाटकीय प्रयोजन के सम्पादन तथा रस दोनौका मामय होता है। पान के समय पर प्रवेश करने पर जहाँ साक्षात् रूप से नायफ का व्यापार मश्च पर दिखाया जाता है, मदागिन्दु का परिपाय माता है, तशभनेक प्रकार के प्रयोजन का विपान रहता है तण जिसमें रस स्थित रहता है, उसे मा करते है। पूंकि इसमें बिन्दु, नायक का बार तपासादि ठीक उसी तरह एते है से गौर मैं-सीलिए इसे 'म' (गौर, उत्सक) (उपमान के भार पर) कहा माना। तन- अनुमावविभायाभ्यां स्थापिना व्यभिचारिभिः ॥३१॥ शादीतमुन कर्तव्यमदिन परिपोषणम् । FEArtणस्थायित रामारपायिनेति रमानारस्थायिनो प्रहाम् । गृहीत. गुरु परम्परम्यतिरियर्थः। इस प्रकार पाया के पार कविको चाहिए कि नाटक के सीरम को पुष्ट - ।
१६२ दशरूपकम् पनाये, उसका परिपोपण करे।यह रस की पुष्टि पह अनुमाय, विमाय सपापभिधारि- माप एवं पायी भाष के द्वारा करें। इनमें से यद कुछ को ले सकता है, पर हो छोड़ सकता है, हम वाद उन विभिन्न अनुभागे, रिभाषा तथा समारियों या गिग य त्याग यह आवश्यकतानुसार कर सकता है। पड़ाँ मूलधारिका के दिन' इस पद से महीरम के साथ ही साथ एसके साथीमार का मी महग रोखावा, इमलिए कारिया थापिना' पद से रसान्तरपायी-तिस्थायी से मित्र स्थायीमा-का प्राण करना चाहिए । गौतमुकाम पर मिश्रित रोने से। न चातिरसतो घस्तु दूरं विच्छिमतां नयेत् ।। ३२ ।। । रसंघा न तिरोदध्यादस्त्पलदारलक्षणः। कथासंध्योपमादिलक्षणभूषणादिभिः । रस का इतना अधिक परिपोप भी न किया जाय कि कथावस्तु दी विच्मि हो जाय; धौरन पर पलशर या नाटकीय रणों से रस को ही तिरोहित कर दिया जाय। निाटक के सम्बन्ध में रस व वस्तु दोनों महत्वपूर्ण वस्तु, अतः दोनों में ममुचित सन्तुलन परने से ही नाटक । परिपूर्णता होगी। एफोरसोऽही कर्तव्यो धौरहार एच था ॥ ३३॥ अहमन्ये रसाः सर्प फुर्यानियहणेऽभुतम् । मनु न्य रसान्तरस्थायिनेस्यनेनैव रसान्तराणामत्वमुत्तम् , तप-यपरसान्तर- स्थायी स्वानुभावविभावम्यभिचारियुको भूयसोपनियप्यते तत्र रसान्तराणामान्थम् , कैव- लस्थाप्युपनिवन्धे तु स्थायिनो व्यभिचारितव । नाटक में बङ्गी रस एक ही उपनिवद होना चाहिए। वह या तो मार हो सकता है पा पोर'। म रूप में और सभी रसों का निधन हो सकता है। निर्वहण सन्धि में अद्भुत रस का उपनिबन्धन किया जाना चाहिए। पाँ दूसरे रसों के भाव के विषय में इस कारिका में भी उपदेख किया गया है, उसमें पूर्वपट्टी को पुनरक्ति दोष दिखाई पड़ता है। इसी शडा को एठाते हुए यह करता है। 'कपर की ११ वा कारिका में स्थायी (भाव) का रसान्तरगत निर्दिष्ट हो चुका है। स्थायी काही परिपाक रस है, अतः उससे ही मझो रस में दूसरे रसों की अङ्गता स्पष्ट होते जाती है। (फिर-रिसे रसान्तरों का अङ्गी रस में अङ्गत्व निर्दिष्ट करना, पुनरुति नहीं है, तो और क्या) इसी का उत्तर देते हुए सिद्धान्तपक्षी बताता है कि वस्तुतः यह बात नहीं है। ३१वा कारिका के स्थायी के उपलेख में रस का समावेश नदारोवायोकि दोनों को अवस्था मिन्न है। जो किसी दूसरे रस का स्थापी इस खासे उपनिद किया जाय, कि वह अपने अनुकत अनुमाव, विभाव तथा म्यभिचारी से युक्त हो, तथा उसका निरन्धन अच्छी तर किया गया हो, वहाँ दूसरे रसों का बहल माना जायगा। जो केवल ( मनुभावाशिन) स्थायी का निधन हो वहाँ स्थायी का बङ्गल है, तथा वहाँ स्थायी भार एक प्रकार से म्यभिचारी माद काही काम करता है। १, नाट्यशास्त्र में परत ने नाटकों के सम्बन्ध में १२ एवण मानेर नाट्यारङ्कार मी करते है । अलकारों से तात्पर्य शम्दार धार व अर्यालद्वार से है। २. ध्यान रखिये धनश्य शान्त रस को नहीं मानते, न उसका सत्रिवेश अङ्गी रूप में नाटक में हो मानते हैं। t , है . T तृतीयः प्रकाशः १६३ दूरावानं यचं युद्ध राज्यदेशादिविप्लवम् ॥ ३४॥ संरोध भोजनं स्नानं सुरतं चानुलेपनम् । अम्वरग्रहणादीनि प्रत्यक्षाणि न निर्दिशेत् ॥ ३५॥ अनचोपनियादीत, प्रमेशनादिभिरेव सूचयदित्यर्थः । इस प्रकार रस का यस्तु में सनिवेश कर लेने पर, कवि को इसे समझ लेना होगा कि कुछ पातें मश्च पर यताने की नहीं है। यथा-कम्मी सफर, बध, युद्ध, राज्य व देश की क्रान्ति, पुरी का घेरा डाल देना, भोजन, स्नान, सुरत, उयटन लगाना, वस्त्रों का पहनना आदि वस्तुओं को प्रायर रूप से मञ्च पर नहीं बताना चाहिए।' इन मातों का उपनिवन्धन पड़ों के द्वारा कभी न करे, हाँ प्रवेशकादि सूचकी के द्वारा इनकी सूचना दी जा सकती है। नाधिकारियधं वापि त्याज्यमावश्यकं न च । अधिकृतनायकवधं प्रवेशकादिनापि न सूचयेत् , आवश्यकं तु देवपितृकार्यायवश्य- मेव कायस्कुर्यात् । अधिकारी नायक के वध की सूचना प्रवेशकादि के द्वारा भी न दे, वैसे आवश्यक यस्त देय-पितृ-कार्य भादि का नियन्धन अवश्य करे, उस भावश्यक वस्तु की उपेठा न करे। एकाहाचरितकार्थमित्थमासग्ननायकम् ॥ ३६॥ पारिनचतुरेई नेपामन्तेऽस्य निर्गमः । एकदियसप्रवृत्तैक्ययोजनसम्पचमासननायक्मयाहुपानप्रपेशमई फर्यात् , तेषां पात्रा- मिपरसमास्यान्ते निर्गमः कार्यः। भाय भर के विभाजन उसकी वस्तु की समय-सीमा तथा पात्र संख्या का उल्लेख रते कहते हैं:- एक ब मैं घरतु की योजना इस दन की हो कि वह केवल एक ही दिन की रिना (परित) से सम्पद हो, साथ ही एक ही प्रयोजन या एकही अर्थ से सम्बद्ध ।'उसमें नाटश का नायक भासच-समीपश्य-हो तथा अधिक पात्रों की भीड़ का प्रयेशन कराया जाय, केवल तीन या चार ही पात्र पहा प्रवेश करें। मध के अन्य में इन सारे पायों का निर्गम कर दिया जाय-ये सारे दी पान अल के समाप्त होते समय मञ्च से निप्यान्त हो जाये। १. प्रत्रस्य इत्यपि पाठः। २. पायात याद रखने की है कि पाश्चास भाग्यशाल, वध, युद्ध, संगर्ष आदि भीमा पर दिखाना अनुचित भी समझते पक्कि त्रासद (Tragedles) मायनों में की मम पर अवश्य दिसावे। १. पालाय यान नामशान मरस्तु नै नाटकों के लिए 'अन्विति-त्रय' (श्री यूनिरोग) भारम्यता मानो। भारतीय मारपनास में मन में एक ही दिन को पटना का, सपा की प्रयोजन का सनिदेश, कमशः कालादिति (निये था यम) तथा कायोबिति (नियो भावान ) से सम्पद है। इसके अतिरिक्त भारतीय नाटक के म पीकपा (निन यो का रिमाइन नहीं होता है। यान्विति (निय मात्र पोस) गोमो पूरा करती है।
१६४ दशरूपकम् पताकास्थानकान्यम्र विन्दुरन्ये च योजयत् ॥ ३७n एवमझा प्रकर्तन्याः प्रवेशादिपुरस्टता । पञ्चाङ्कमेतद्वर दशाङ्क नाटक परम् ॥ ३८॥ इत्युक्त नाटकलक्षणम् ।। इस नाटक में भावी भावों के सूचों-पताकास्थानकों का भी सनिवेश होना चाहिए। इसमें बिन्दु नामक अर्थ प्रकृति का प्रयोग हो, सपा यन्त में बीज का परामर्श पाया जाय। इस प्रकार महों की योजना की जाय, जिनमें पात्रों का प्रवेश ध निर्गम समुचित रूप से किया जाय। नाटक के अबों की संख्या पास गया इस मों की होती है। इसमें पाँच भों का नाटक निम्न कोटि का होता है, इस पदों का श्रेष्ठ । [नाटकों को देखने पर पांच से लेकर दस तक मङ्गों वाले नाटक पाये जाते है। अधिकतर संस्कृत नाटक सप्ताहै -यथा शाकुन्तुल, उत्तररामचरित, गुदारासस । वेणीसंहार में छ भङ्क है, तश विक्रमोवशीय में पाँच । वैसे इनुमत्राटक में चौदह तक भक्त पाये जाते हैं। पर मोटे तौर पर नाटक में अङ्क संख्या ५ से १० तक पायी जाती है। यहाँ तक नाटक के रक्षण कहे गये। अथ प्रकरणे वृत्तमुत्पायं लोकसंश्रयम् । अमात्यविप्रयाणिजामेक कुर्याच नायकम् ॥३६॥ धीरप्रशान्त सापाय धर्मकामार्थतत्परम् । शेप नाटफवत्सन्धिप्रवेशकरसादिकम् ॥ ४० ॥ कविशुद्धिविरचितमितिपत्त लोक्सधयम् = अनुदातम् अमात्यायन्यतम धीरप्रशात नायक विपदन्तरितार्यसिदि कुर्यात् प्रकरणे, मत्री ममात्म एव । सार्थवाहो वणिग्वि शेष एवेति स्पष्टम यत् । माटक के पाद प्रकरण का लक्षण तथा विशेषताएं बताते है:- प्रकरण का इतिवृत्त कतिपत तथा लोकसमय होता है। लोकसंश्रय का तात्पर्य यह कि पद राजा आदि की कथा न होकर मध्यम वर्ग के सामान्य व्यक्ति की कथा होती है। इसका नायक मन्त्री, माझग या धनिये में से कोई एक हो सकता है। यह नायक धीरप्रशान्त कोटि का होता है, तथा विप्नों से युक्त होता है। यह नायक धर्म, अर्थ सपा काम (त्रिवर्ग) में तत्पर होता है। इसके अन्दर सन्धि, प्रवेशक तथा रसादिका समावेश ठीक नाटक की ही तरह होता है। इसका इतिवृत्त कवि दिविरचित तया लारसत्रय अर्थात अनुरात होता है। मत्री भादि में से कोई एक इसका नायक होता है, यह चौरमशान्त होता है तथा उसके धाय की सफलता विनों से अन्तति होती है। मत्री अमात्य ही होता है, सार्थवाह बनिया है। और सब स्पष्ट है। धकारिक प्रकरण की कथा करिपत है तश लोकसमय भी। इसका मायक पारुदा आमाण है और इसका रस : मालतीभाषव की कथा भी कपित है। इसका मायर्क भी सामगतथा पौरप्रशत है। दोनों में बार्य सिदि विपद तहित है- एक कारकरी दुष्टता के कारण, दूसरे में मालती के पिता के पैर तथा निपति की पिपना के कारण, जिसमें माउती अधोरपण्ट कापालिक ये पदे में फंस जाती है। नायिका तु द्विधा ने कुलस्त्री गणिका तथा । .
ir 4 तृतीयः प्रकाशः १६५ कचिदेव कुलजा वेश्या झापि यं कंचित् । फुलजाभ्यन्तरा, वाया वेश्या, नाविनमोऽजयोः। भाभिः प्रकरणे धा, सङ्कीर्णं धूर्तसङ्कुलम् ॥ ४२ ॥ वेशो मृतिः सोऽत्या जीवनमिति परया वैविशेषो गणिका । यदुक्तम् ......... आभिरभ्यर्थिता पेश्या रूपशीलगुणान्विता। लभते गणिकाशब्दं स्थानं न जनसंसदि।' एवं च कुलजा धेश्या उभयमिति नेधा प्रकरणे नायिका। यया धेश्येच तरहदो) कुलक्षेत्र पुष्पखूषितके, ते द्वेऽपि मृच्छकटिकायामिति । कितवदूतकादिधूर्तसलं तुच्छ- कटिकादिवत्सद्धीर्णप्रकरणमिति। प्रकरण के नायक की मायिका दो तरह की हो सकती है-पांतो वह कुलीन स्त्री हो या गणिका हो । किसी प्रकरण में अकेली कुलस्त्री ही नायिका हो सकती है, कहीं 'भकेली वेश्याही किन्ही प्रकरण में एक साथ दोनों-कुलसी व गणिका नायक रूप में पाई जा सकती है। कुलसी माम्यन्तर नायिका होती है, वेश्या मादरी नायिका इस प्रकार प्रकरण की नायिका या तो कुलस्त्री या गणिका या दोनों "होगी इनका व्यतिकम नहीं किया जा सकता। इस तरह प्रकरण तीन तरह का हो जाता है- कुठजानिष्ठ, गणिकानिछ, उभयानिष्ट । जिस प्रकरण में धूत-पिट शकारादि की समावेश होता है यह प्रकरण सङ्कीर्ण (मिधिरा) होता है। वेश्या शब्द की व्युत्पति यत्ताते हुए पत्तिकार बताता है कि जिसका भरणपोषण-वैश- ही जीवन , मह वेश्या कहलाती है। गणिका वेश्यों को दो भेद है। जैसा कि कहा गया है।-न व्यक्तियों के बारा-प्राथित रूप शील तथा गुण से मुक्त वेश्या ही गणिका कहलाती है तथा पद सभामों में स्थान प्राप्त करती है। इस त प्रकरण में-कुलमा, घश्या, दोनो-तीन तरह की नायिका होती है। जैसे तरस प्रकरण में वेश्या गायिका पुष्पषितक में कुलजा नायिका है, तथा गृग्छकटिक में दोनों है । पूर्त, जुआरी आदि पात्रों से सास होने पर प्रकरण सकोण कोटि का होता है, जैसे सटिक !! [ मालती माधव की नायिका मालती कुलजा दे, पृच्छकरिक या मास के चारदपकी बसन्तमा पेश्या है, चारुद व वारणी कुटजा।]. अप नाटिका-- सदयते नाटिकाप्यत्र सझोणान्यनिवृत्तये। भत्र केचितू- 'अनयोष पन्धयोगादेको भेदः भयोमियः । प्रख्यातहित्यतरो या नाटीसंज्ञापिते काव्ये " इत्य भरतीय श्लोकम् 'एक्ो भेद होतो : गाटिकास्थ्य ईतर स्वप्रख्यातः प्रकर- शियागो माटोसंहया द्वे प्रय्य प्रोत्रित इति व्याचा प्रकरणियामपि मन्यन्ते तद- सत् । देशलक्षणमौरनभिधानात् । समानलक्षणस्वे या मैदोभायात, वस्तुरसनीयवाना मकरणानेदार प्रकरणिकायाः, अतो दिशाया नाटिकाया य मुमिना लक्षणं कृतं तत्राय: मानिमाया-शुदलणगहरादेव सशक्षणे सिदै लक्षणकरणं सदीपानां नाटिकव फर्न: म्पति नियमाय दिलायो। . . त " . • १६६ दशरूपकम् यहाँ नाटक तया प्रकरण दोनों के लपण का निर्देश करने के बाद इनके सङ्कीर्ण भेद नाटिका (उपरूपक) का उल्लेख करते हुए कहते हैं कि दूसरे उपरूपक का निराकरण करने के लिये यही पर सङ्कीर्ण (मिश्रित) नाटिका का लक्षण कर देते हैं। कुछ लोग सङ्कीर्ण उपरूपकों में नारिका, तथा प्रकरगिश दो भेदों को मानते हुए प्रकर- णिका नामक भेद को भी मानते हैं। इसके प्रमाण स्वरूप वे मरत के इस श्लोक को देते हैं 'भनयो- 'साम्ये'। इस छोक का अर्थ वे पो परते हैं कि 'मारक व प्रारण इन दोनों के योग से काव्य के दो भेद होते है-एक भेद प्रख्यात है-नाटिका, तथा दूसरा अमसिर प्रकरणिका। दोनों नारी इस सशा से भाभिहित होते है। सिकार पनिक को यह मत स्वीकार नहीं वे तो प्रारणिका की अलग भेद मानने से सहमत नहीं। उनका कहना है कि मरत के उन शोक में प्रकरगिका का नाम ( उदेश) क्षण दोनों नहीं पाये जाते। इसका कारण यह है कि प्रकरण के समान ही लग प्रकरणिका में पाये जाते हैं तथा उनमें कोई भिन्नता नहीं 1 सा रोप्रारणिका के वस्त्र, रस तथा नायक प्रकरण से अभिन्न होते है। नाटिका का क्षण मुनि मरत ने इसलिए किया कि वे उस पर कुछ जोर देना चाहते हैं। वैसे तो नाटिका का लक्षण र रूपकों (नाटक प्रकरण) के लक्षणों के सहर मिश्रण से सिद हो जाता है, परपर भी उसका भलग से लक्षणकरण इस बात का नियमन करता है कि सङ्कीर्ण उपरूपक त्रोटकादि में विशेषत कवि को नाटिका की ही योजना करनी चाहिए। समेव सहर दर्शयति-। तन पस्तु प्रकरणान्यटकामायको नृप.॥४३॥ प्रख्यातो धीरललित. शारोगी सलक्षणः । उत्पातिरत्तत्व प्रकरणधर्म, प्रख्यातनपनायकादित्व तु नाटकपर्म इति, एव प नाटकप्रकरणनाटिकातिरेकेण वस्स्वाद प्रकरणिकायाममावादापात्रभेदात् यदि भेद स्तन (सदा)। इसी सर को बताते हैं कि-नाटिका की कथावस्तु प्रकरण से हो जाती है अर्थात् यह कविकक्षित होती है। उसका नायक नाटक से गृहीत होता है, यह राजा होता है। वह प्रण्यातवंश तथा धीरललित होता है। इसका परिसर होता है। करिशत प्रतिवत का होना प्रकरण की विशेषता है, प्रख्यात नृप का नायक होना माटक की विशेषता । इस तरह नाटक, प्रकरण, नाटिका के अतिरिक्त वस्तु भादि के भेद के जमाव से प्रकरणिका कोई मछग भेद नही जान पड़ता। वेसे मों व पात्रों के भैद से ही हा माना जाय, तो फिर भेदगणना मसोम हो जायगी। कोपरूपों के अनेक व मनन्त भैरोबाचंगे। स्त्रीप्रायचतुकादिभेदक यदि चेष्यते ॥ ४ ॥ एकदिन्यापात्रादिभेदेनानन्तरूपता। तत्र नारिकेतिबीचमात्ययौचित्यप्राप्त बोरधानत्वम् , केशिकत्याभयत्वाच तपा- संध्ययाऽपावमर्शत्वेन चदाइलमप्यौयित्यप्राप्तमेप । घी माय (सी पात्रों की प्रधानता) ज्या धा ये नाटिका की विशेषता है। इनके कारण प्रकरणिकाको भित्र माना जाय तो एक, दो, तीन मदों या पात्रों के भेए से मनन्तप- माहोजाये।
३ तृतीयः प्रकाश नाटिकाको संशा में सीत्व का प्रयोग इस बात का सूचक है कि इसमें खीपात्रों को प्रधानता है। इसमें केशिको इति का आश्य लिया जाता है, उसके नादि चार अङ्ग है, तथा नाटिका में अवमर्श नामक सन्धि बहुत अल्प होती है, इसलिए इसमें चार अक्षों का सनिवेश उचित हो जाना पड़ता है। विशेषस्तु:- देवी तर भयेज्येष्ठा प्रगल्भा नृपवंशजा ॥ ४५ ॥ गम्भीरा मानिनी, इच्छाचदशान्नेतसङ्गमः। नाटिका में कुछ विशेषता होती है:-- इसमें दो नायिका होती हैं। ज्या नायिका देवी (महारानी) होती है, जो रामश में उत्पस तथा प्रगल्भ प्रकृति की होती है। वह बड़ी गम्भीर तथा मानिनी होती है। नायक का फनिष्ठा गायिका के साथ सगम घड़े कष्ट से होता है, घर सङ्गम इसी ज्योता देवी के अधीन होता है। प्राप्या तु- नायिका तारशी मुग्धा दिव्या चातिमनोहरा ॥ १६ ॥ वादशीति नृपवंशजत्यादिधर्मातिदेशः। नायिका भी ज्येष्ठा की भांति ही नृपवंशजा होती है, किन्तु यह मुग्धा होती है-- (मगरम, गम्भीर या मागिनी नहीं) यह अत्यधिक मनोहर तथा सुन्दर होती है। हरनावली नाटिका का नायक राजा उदयन है, उसकी ज्येा नायिका वासवदत्ता पवंशजारे । प्रकृति से वह गम्भीर, प्रगाम, तया मानिनी है । उदयन व रत्नावली का समागम सी के वश में है। रनावली (सागरिका ) मी परशोत्पत्र है-पद मुग्धा तथा मुन्दरी है। अन्तःपुरादिसम्यन्वादासना श्रुतिदर्शनैः। अनुरागो नघावस्थो नेतुस्तस्यां यथोत्तरम् ।। ४७ ।। नेता तन प्रपतत देवीमसेन शहितः। तस्पो सुग्धनायिकायामन्त पुरसम्बन्धराशीतकसम्बन्धादिना प्रत्यासघायो नायकस्य देवीप्रतियन्धान्तरित उत्तरोत्तरो नवावस्थानुरागो निवन्धनीयः । अन्त पुर आदि के सायाध के कारण यह नायिका राजा के प्रतिपय तथा टिपय मैं भवरारित होती है। उसे देखकर या उसके बारे में सुनकर राजा उसको प्रेम करने लगता है। यह प्रेम-अनुराग आरम्भ में नवीन होता है, धीरे-धीरे यह परिपक होता जाता है । मायक या पर सदा महारानी के भय से सहित रहता है-(फलतः उसकी धनुरागधेष्टा हिप हिप कर पला करती है।) इस मुम्पा नायिकाको सन्तपुर में सहीत मादि के समय नामक समीप पावर इसके पनि प्रेम करने का है। यह प्रेम देवी के प्रतिबन्ध के कारण विपा रहता है, पर उत्तरोघर पहला रहा है। नाटिका में नायक के इस प्रकार के भनुराम रानापन होना चाहिए। फैशिफ्यद्धर्मिध युक्ताईरिय नाटिका ॥४॥ प्रत्यकोपनियसानिहिलक्षणकैशियतुष्टयक्ती नाटिदि। इस नाटिया में काक के पार, फिज, नरफोट थान भक होते है, व्या तदुपयुष चार बगे की योजना की जाती है। 1."प्राप्यान्यस्यति पार। + + । । (231157 १६७ • माटिका पद है जो हर बार में उपर्युक्त लक्षण वाले पैरिको इत्ति के चार महो मर्मादि का सनिवेश किया जाय। [ नाटिका के उदाहरण स्वरूप-रत्नावली, प्रियदशिका, विश्णकृत कर्णसुन्दरी, आदि कान्य दिये जा सकते हैं। इसी का एक विशेष प्रकार का भेद सट्टक माना जा सकता है, जहाँ केवल प्राकृत भाषा का ही प्रयोग होता है सट्टक का उदाहरण रामशेखर की रपूरमरी है। श्रयमाण- भाणस्तु धूर्तचरितं स्थानुभूतं परेण घा। यत्रोपपर्णयेदेको निपुणः पण्डितो घिटः॥ ४ ॥ 'सम्योधनोक्तिप्रत्युक्ती पुर्यादाकाशभाषितैः। सूचयेद्वीरशृङ्गारौ शौर्यसौभाग्यसंस्तवै। ॥ ५० ॥ भूयसा भारती वृत्तिरेकाई पस्तु कल्पितम् । मुखनिर्वहणे साङ्गे लास्याहानि दशापि च ॥५१॥ धूर्ताधौरातबारादयस्तेषा चरितं यनैक एव विटः स्वकृतं परकृतं वोपवर्णयति स भारतीवृत्तिप्रधानवादाण । एकस्य चोषिप्रत्युजय याकाशभापितराराद्वितोत्तरत्वेन भवन्ति । अस्पटलाश्च वीरशारौ सौभाग्यशौर्योपवर्णनया सूचनीयो । बर प्रसहोपात्त भाण नामक रूप का लक्षण उपनिबद्ध करते हैं:- भाग यह रूपक है जहाँ कोई भस्यधिक चतुर तथा बुद्धिमान् (पण्डित) विट (एककलापारस्त व्यक्ति) अपने द्वारा अनुभूत अथवा किसी दूसरे के द्वारा अनुभूत धूर्तचरित का वर्णन करे। यहां पर सम्बोधन, उछि व प्रत्युतिका सविधेश शाकाश. भाषित से किया जाता है। यहां पर कोई दूसरा पात्र नहीं होता। यही विट भाकात. भाषित के द्वारा किप्ती से भाषण पा कथनोपकथन करता दिखाया जाता है। भाण के द्वारा सौभाग्य तथा शौर्य के वर्णन कर मार तथा धीर रस की सूचना दीपाती है। इसमें मारती वृत्ति की प्रधानता पाई जाती है तथा एक ही बाकी योजना की जाती है। इसकी कथावस्तु कविकस्पित होती है। इसमें पांचों सन्धियां नहीं बताई जा सकती, मतः मुख तथा निर्वहण पे पो ही सन्धियां पाई जाती है। इन दो सन्धियों के पदों की योजना इसमें की जाती है, तथा दस हास्याङ्गों का सनिवेश भी होता है। 'महापून, चौर, जुभारी मादि लोगों के चरित्र का स्वर अथवा परत वर्णन विट के द्वारा किया जाय, वर मारतो वृति को प्रधानता होने के कारण माण कहलाता है। एक ही रिमाकाशमाषित केशारामारावा तथा उत्तर देकर उतिपयक्ति का प्रयोग करता है। यहाँ रस को पता नहीं पाई जाती मत तौमाग्य एवं शौर्य के दर्गन के द्वारा क्रमशः महार व बीर रस की पूचना दी जाती है। [इस प्रकार माण को विशेषताएं:-- १. इसकी वसुपरिपतवचरितपरक होती है, जिसमें मुख व निवरण समिदोती। १. इसका नायक विट होता है, यही एक पात्र इस रूपक में पाया जाता है। पर कानोपकथन का प्रयोग भारासमाषिकेशारा करता है। ३. इसमें मारतो ति पाई जाती है। .
तृतीयः प्रकाश ४. और नया पृवार रस को सूचना दी जाती है। ५. इसमें केवल एक पक्ष होता है। लास्याहानि- गेयं पदं स्थित पाध्यमासीनं पुण्यमण्डिका। प्रच्छेदकस्निगूढं च सैन्धवाप्यं द्विग्डफम् ॥ ५२॥ उत्तमोत्तमर्फ चान्यदुलप्रत्युक्तमेव च । लास्ये दशविघं होतदगनिर्देशकल्पनम् ॥ ५३ ॥ शेष स्पष्टमिति । माण के सम्बन्ध में दस लास्याओं का वर्णन किया गया है ये दस लास्या-संगीत के भेद है। इनका वर्णन करमा भावश्यक समस कारिकाकार बताते हैं कि लास्य में इन दस आने की कएपना की जाती है:-भोयपद, स्थितपाठप, आसीन, पुष्पाण्डिका, परदक, निगूढ, सैन्धव, हिगूढक, उत्तमोत्तमक तथा उक्तमत्युक्छ। ((१) पेयपदा-जो पुरमीयत नायक के सामने घीणा के द्वारा शुष्कगान गाया गाय, बदमेय पद है। (सन्नीभाण्ड पुरस्कृत्योपविष्टरमारानेपुरः । शुष्कगान गैयपदस्) (२) स्थितपाठय-स्थितपास वह है-जहाँ नायिका मदन से उठत होकर प्राकृत में गीत पढ़ती है। (स्थितपाय तदुच्यते गदनोजापिता पत्र, पठति माफर्त स्थिता ।) (२) मासीन-जहाँ किसी भी वाप'फी रिपति न हो, तथा शोक र चिन्ता से युक्त सो गात्र को फैलाती दुई गीत गाये, वह मासीन हास्यांग है। (निखिलातोपरदितं शौकचिन्तान्विताऽवण | सुप्रशारितगात्रं यदासी दासीर मेव तद ॥) माण कर अवस्था में-पाशाय पति के एकाभिनय (मोनो-एपिंग)से मिलता है। उसमें भी इसी की सरह एकही पात्र अभिनय करता संतसाहित्य के रूपक-साहित्य में माण का विशेष स्थान रहा है। आठवी शती से लेकर १७ थी बारवीं शती के सैकड़ों माण दिए गये । दामनमट्ट पण, युवराजरामदा मादि अनेकों ने माणों को एक सुन्दर साहिरियक रूप दिया। माण के द्वारा कति सामाजिक कुरीतियों पर भी देखा गएरा ध्या कसता है। सामाजिक कुरीतियों का पर्दाफाश करने के लिए कदि के पास भाण द महसद ये दो ने अन्नथे। किन्तु दोनों की प्रणाली में गहरा भेद है। भाण की यंग्यप्रणाली वही गम्भीर व उदात्त होती है, प्रहसन की छिछली। यही कारण है कि भाष का रस हास्य नहीं होता है, महसन का हाल होता है। संस्कृत के भागों में अधिकतर वेश्यामों के वर्णन उनके बाजारों के वर्णन, उनसे सम्पद दूसरे ६ जुमारियों के वर्णन मिलेंगे। माणों में सर्वत्र गार की प्रधानता मिली, वीर बहुत कम । इनके मासिक पुणेन मी गार से प्रयावित होते है, चंद्र पुरराज समयमों के एक भाग के इस वन में- नयाँ पोश नगस्थली विवरितस्यप्रधाराधरणीकचकवाससं पाव रसौ रक्त सर्प चम्पति । पान्तविरमाकल्य्य रजनी चौगतिरेगादिव म्यारामानुज माननं विरूपति भ्याटमार १. 'सक्षणम्' इति पायनरम् ।
1 पशरूपकम् (४) पुष्पाण्टिका यह गेय जिममें दायों का प्रयोग होता है, विपिछद पाये जाने है, तथा स्त्री एव पुरष को विपरीत चेष्टा पाई जाती है, पुष्पण्टिका है। (आतोधमिश्रित गेर्य छन्दासि विविधानि च । स्रोऍसयोविपर्यासचेष्टित पुष्पगण्डिका ।) (५) प्रच्छेदक-रवि यो भयास मागवर प्रेमविच्छेद के कोष में शोक से सब तो वीणा के साथ गाती है, वह पच्छेदक कहलाता है। ( अन्यासइ पति मला प्रेमविच्छेदमन्युना । वीणापुरस्सर गान खिया प्रच्छेदको मन 11) (६) निगूट-बहाँ खोवेशधारी पुरष नाचे व गायें बदमधुर गान विगूढक कहलाता है। (खोवेशधारिण पुसा नाय्य लिइण विगृहरम् 1) (७) सैन्धव-वहाँ कोई नायक सङ्केतस्थल पर प्रिया के न माने पर, प्राकृत में इस प्रकार वचन कहता है कि उसका करण (गतप्रकार) स्पष्ट रहता है, उसे सैथव कहते हैं। (कश्चन अष्ट सङ्केन मुव्यचकरणान्वित । प्राइन वचन वक्ति यत्र सव सैघा दिदु ॥) (८) द्विगूढ-मुख तथा प्रतिमुख से युक्त चनुरसपद गीत दिगूढ है। (चतुरनपदं गीत मुखप्रतिमुखान्वितम् , दिगूदम् ॥) (१)अमोघमक-रस तथा भाव से युक गीत उत्तमोचमक पदलाता। ( रस भावास्य मुखमोचमक पुन) (१०) उमयुक्त-जही मान तथा प्रसाद हो, नायक का तिरस्कार हो, रस से युक्त हो, हाव तथा हेल से युक्त हो, तथा चियप के कारण जी मुन्दर हो, जिसमें इक्ति प्रत्युकि पाई जाती हो, तथा उपारम्भ हो एव मुठी बाते हों, जिसमें महारचेष्टा पाई जाती हो, ऐसा गीत उत्तपयुक्त कहलाता है। (कोपप्रसादजमपिरयुक्त रसोचरम् । हावहेलान्वित विघलोका थमनोहरम् ।। अतिप्रायुत्तिरयुक्त सोपालम्भमटीएए । विरासाविता मुक्तप्रत्युक मुच्यते ॥) अथ प्रहसनम्- - तत्महसनं त्रेधा शुद्धचैरतसकरी। तदिति-भाणवद्वस्तुसन्धिसन्ध्यरास्यादीनामतिदेश' । तत्र शुद्ध धावत्- पाण्डिविषप्रभृतिचेटचेटोविटाकुलम् ॥ ५४॥ घेष्टित वेपमापाभि. शुद्ध हास्यबोन्वितम् । पासण्टिन शाश्यीप्रन्यामृतयः, विप्राधास्यन्तमृजवा, आतिमानोपजीविनो पा प्रदसनाहिहास्यविभावा', तेषां च यथावरस्वथ्यापारोपनियन्धन घेटचेटीव्यवहारयुक्त शुद्ध प्रड्सनम् । प्रहसन मामा रूपभेद पस्तु, सन्धि, सभ्यता, सथा टारयादि में भाण की ही तरह होता है। यह राक्ष विकृत तथा पर इन भेदों से तीन TREET होता है। इनमें राम महसन में पाखण्डो, माझण, आदि नौकर और नौकरानियो (पेट तथा घेही)का अमघट होता है ये इसके पात्र हैं। इनके घेश, या इनकी भाषा अनुरूप पेटा यहाँ पाई जाती है, क्या इन पचन (कथन पकपन)दारपयुक्त होता है (तथा मह हास्यपूर्ण वचन से युक होता है।)
तृतीयः प्रकाश पासण्डी का अर्थ होगी संन्यासी-बौद्ध जैन आदि भिक्षुओं से ई-आक्षण इहे भोले भाले पात्र होते है, अथवा ये केवल अपनी जाति पर हो भाभित रहते हैं। ये महसन के हास्य रस के विमान हैं। इनके उपयुक्त व्यापार का निबन्धन, जर्दा सेवक सेविका का व्यवदार भी पाया जाता है शुद्ध फोरि का महसत है। विकृत तु- कामुकावियवोपैः पण्ढकन्चुकितापसः ॥ ५५ ॥ विकृतम् , सकराद्रीच्या सकोर्ण धूर्तसङ्कलम् । सामुकादयो भुजाचारभटाया तद्वेषभाषादियोगिनो यन पाठक कितापसद्वादय- स्तद्विकृतम्, स्यस्वरूपप्रच्युतविमानतात । बोध्यस्तु सकीर्णनात सङ्कीर्णम् । रसस्तु भूयसा कार्य पच्चियो हास्य एव तु ॥ ५६ ॥ इति सम्। जहां ऐसे नपुसक, फाकी या तपस्वी पात्र निवन हो, जो कामुक लोगों के यचन व पेप का प्रयोग करें, यह महसन हित कहलाता है। धूर्त व्यक्तियों से पूर्ण प्रहसन सीर्ण कदष्टाता है। इस प्रहसन म केवल हास्य रस का ही प्रयोग करना चाहिए । यह हास्य रस पूरी तरह से अपने भेदों में उपनियम होना चाहिए। जहाँ पर नपुसक, युद्धशा यकी और तरपा (मुजग) कामुक के समान उनकी भाषा वे या प्रयोग गरे वहाँ वे अपने स्वरूप से गिर जाते हैं । इस प्रकार के विमान के उपनिर धम के कारण यह इसन विकृत कहलाता है। सझौण में वीव्यहाँ का मिश्रण पाया जाता है। (इसमें एसित, अपहसित, अपदसित, अपक्षसिरा, अतिदसित, दिसित इन साक्ष्य के रूपों फा पूर्णन सनिवेश होता है। अष दिम--- दि वस्तु प्रसिद्ध स्थाइत्तयः कैशिफी यिना! नेतारो ऐपगन्धयक्षरक्षोमहोरगाः॥ ५७ ॥ भूतप्रेतपिशाचाद्याः घोडशात्यन्तमुद्धताः। रसरहास्यश्वमा पद्मिदीप्तः समन्यितः ॥ ५ ॥ मायेन्द्रजालसनाममोधोद्धान्तादिचेष्टिता। चन्द्रसूर्यापरागध न्याय्ये रोदरसेऽहिनि ॥ ५ ॥ चतुरवधतुस्सन्धिनिर्विमर्शा सिमा स्मृतः। 'सिम सताते' इति नायकससातम्यापारासाकस्वाड्डिम, तनेतिहाससिमितिवृत्तम् । तपय कैशिफौवस्तिन, रसाय धीररोश्यीभत्साअवरुदणभयानका पट्, स्थायी तु रोदो न्यायप्रधान, विमर्शरहितामुखपतिमुरागर्भनिर्वहणाख्याश्चत्वार सन्यय साI , मायेन्द्रजात्रानुभावसमाश्या (य)। शेष प्रस्तावनादि नाटकवात् । एच-- '१६ निपुरदाहे तु लक्षण ब्रह्मणोदितम् । ततत्रिपुरदाय दिमस प्रयोजित ।। इति भरतमुनिना स्वयमेव त्रिपुरदाइविस्य तुल्यत्व दर्शितम् । डिम नामक रूपक की कथायस्तु प्रसिद्धनामायणादि से गृहीत होती है। इसमें कैशिकी के प्रतिशित मन्य कृतियों साती, आरमीच मातीका समावना होता है। इसमें मेता देवता, गन्धर्व, पर रास, नाग आदि मार्येतर जाति के दाते है । श्या भूस, प्रेत, पिशाध श्रादि पानों का भी समापेश होता है। इसके पास सप्या में होते है तथा ये पड़े दत होते हैं। इसमें MAY प हास्य के अतिरिक्त बाकी छ रसों का । १७२ दशरूपकम् प्रदीपन पाया जाता है। इसका अङ्गी रस रोद होता है तथा इसमें माया, इन्जाल, घुद्ध, मोप, उहाम्ति धादि घेष्टाको तथा पाद्रमहा एष सूर्यग्रहण का हश्य दिसाया जाता है। इसमें केवल चार महोते हैं, पथा विमर्श सन्धि के अतिरिक्त धाकी चार सन्धियां पाई जाती है। 'हिम सझाते इस धातु से मिसका अर्थ पात-प्रतिषान करना है, टिम राष्ट्र की भ्युत्पति होती है । अत टिम का तात्पर्य मह रूपक है बड़ी नायक का सद्दात व्यापार हो। इसका रतिवृत्त इतिहास प्रसिद्ध होता है, कैशियरी से तर तीन पतियों पाई माती है, क्या वीररौद्र वीमरसमदमनकरणमयानक ये छ' रस पाये जाते हैं। इनमें प्रधान स्थायी रस रोद ही होना चाहिए। विमर्श सन्धि इसमें भी होती। मुख, प्रतिसस, गर्भ तया निवरण ये चार सन्धियाँ भङ्गों सहित पाई जाती है। इसमें भाग, इन्द्रजाल मादि भनुमावों का आश्रय लिया जाता है। पाको प्रस्तावना आदि नाटक को ही तरह होती है। यही पार महर्षि भरत ने स्वयं त्रिपुरदाह की कयावरत की तुझ्यता के बारे में बताई है:- 'अक्षा ने त्रिपुरदार में हप्तो लक्षण को बताया है। इसलिए त्रिपुरदाह दिम संशक है।' श्रय व्यायोग स्यातेतिवृषो घ्यायोगः ग्यातोदतनरामयः॥६॥ होनो गर्भविमर्शाभ्यां दीप्ताः स्युडिमवद्रसाः। अस्रोनिमित्तसंग्रामो जामदग्न्यजये यथा ॥ ११ ॥ एकाहाचरितैकाको व्यायोगो बहुभिर्नरः। व्यायुज्यन्तेऽस्मिन्वय पुरुषा इति प्यायोग, सत्र हिमवद्रसा' पट् हास्यबार- रहिता । वृत्यात्मकत्याच रसानामवचनेऽपि शिवीरहितेतरवृत्तित्वं रसदेव लभ्यते । अस्त्रीनिमित्तश्चात्र संभामो ययापरशुरामेण पितृवधकोपात्सहसार्जुनवप कृत । शेषस्पष्टम् । ज्यायोग की कथावस्तु इतिज्ञापप्रतिम होती है, तथा किसी प्रसिद्ध उद्भत व्यक्ति (पौराणिक व्यपिस्व) पर भाभित होती है। इसमें गर्भ तथा विमर्श पे दो सन्धि महीं होती। रसों की दीति हिम की तरह ही होती है, अर्थात् हास्य व प्रकार से भिन्न रस इसमें हो सकते हैं। इसमें युद्ध वर्णित होता है, पर वह युद्ध स्त्री प्राप्ति के कारण नहीं होता, जैसे जामदग्न्यजय नामक प्यायोग में परशुराम का युद्ध स्त्री निमित्तक नहीं है। ज्यायोग की कया एक ही दिन की होती है तथा उसमें एक ही भह होता है। इसके पात्रों में अधिक संख्या पुरुष पात्रों को होती है। जिसमें अनेक पुरुष प्रयुक्त हो (व्यायुध्यन्ते भस्मिन् पइकः पुरुषा') (स व्युत्पति के आधार पर व्यायोग श्य निप्पन हुआ। इसमें हिम की तरह पायथनारजितका रस होते हैं । रस पृत्ति से अभिन्न ई मत वषषि कारिका में ग्यायोग की प्रति का नन्छेख नही, पर रस के अनुकूल कैशिौरहित अन्य वृत्तियों की स्थिति पर होती है। यहाँ युर वर्णित होता है, जो अस्वीनिमिचक होता है, जैसे परशुराम ने पिता के वध से कुपित होकर सहसाईन को मारामभ्य सरस्पष्ट है।। भय समवकार- कार्य समयकारेऽपि श्रामुखं नाटफादिवत् ॥ ६२॥ रयातं देवासुरंधस्तु निषिमास्तु सन्धयः! वृत्तयो मन्दवैशिफ्यो नेतारो देवदानवाः ॥ ३॥ द्वादशोदाचविख्याताः फलं तेषां पृथक्पृथक्त्।
तृतीयः प्रकाशः यहुधीररसाः सर्वे यवदम्भोधिमन्थने ॥ ६४ ॥ अत्रिमिस्त्रिफपटरित्र झारनिधिद्रवः । द्विसन्धिरका प्रथमः कार्यो द्वादशनालिकः॥६५॥ चतुर्द्धिनालिकायन्त्यो नालिका घटिकाद्वयम् । वस्तुस्वभावदेवारिकृताः स्युः कपटास्त्रयः ॥ ६६ ॥ नगरोपरोधयुद्धे धातारन्यादिकविद्रयाः । धर्मार्थकामै गारो नान विन्दुभवेशकौ ॥६७॥ पोयङ्गानि यथालाभं फुर्यात्ग्रहसने यथा। समवकार में मी नाटक की तरह आमुख की योजना करना चाहिए । इसकी कथा देवताओं घ दायों से सम्बद्ध प्रसिद्ध पस्त होती है। इसमें विमर्श सन्धि नहीं होती। कैगिकी से भिम पृत्तियां पाई जाती है तथा इसके नेता-पान-देवता व दानव होते हैं । ये नायक इतिहास प्रसिद्ध होते हैं तथा सख्या में होते हैं। इन सब का पाल भित भिन्न होता है। ये सभी नायक धीररस से पूर्ण होते हैं, जैसे समुद्रमन्थन में पाये जाते हैं। (इस प्रकार इसका रस पीर होता है। इसमें शीम श्रद होते हैं जिनमें तीग चार कपड, तीन प्रकार का धर्म, अर्थ य काम का गार तथा तीन चार पात्रों में भगदक प विश्व का सयोजन किया जाना चाहिए। इसके पहले अर्थ में मुख व मतिमुख ये यो सन्धिमा होमी चाहिए सभा इसकी कथा २४ घड़ी (१२ नाटिका) की होनी पाहिए। याकी के दोषों में क्रमश सभा २ नारिका की कथा होनी चाहिए। मालिका से मराठय दो यही से है। इसमें जिन तीन कपों की योजना होती है ये परत, स्वभाव तथा साधुओं के द्वारा विहित होते हैं। इसमें मगरीपरोध, युद्ध, पात, अग्निवादि उत्पातों के कारण विद्रय (पलायन) का वर्णन होता है। इसमें धर्म, भर्य तथा काम तीनों तरह का प्रकार पाया जाता है, तपा बिन्दु नामक भर्यप्रकृति, प्रवेशका नामक सुधक (अर्थोपरोपक) नहीं पाया जाता । प्रहसन की तरह इसमें पयायश्यक वाथ्यगों की योजना की जानी चाहिये। समयकीयन्तेऽस्मिन इति रामय कार । तत्र नाटकादिचदामुखमिति समस्तरूप- पाणामामुखप्रापणम् । विमर्यवर्जितायवार सन्धय', देवासुरादयो द्वादश नायका, तेषां च फलानि पृथक्पृथग्भवन्ति यथा समुद्रमन्यने वायुदेवादीनांसदम्यादिलामा वीरयाशील अभूता सर्वे रसा, प्रयोडा, तेषां प्रथमो बादशनालियनिततिरप्रमाण , यथासंध्यं चतुर्दिनालिकावन्स्यौ, मालिका च घटिकाद्रयम् । प्रत्याई च व्यासंख्य कपडा तया नगरोपरोधयुद्धबाताम्म्यादिविद्रयाणां मध्य एक्को विवव कार्य । धर्मार्थकामशाराणा- मेकक रहार प्रत्यामेव विधातम्या । चीप्यमानि च यथालार्म कार्याणि । बिन्दुप्रपेशको नाटकोकावपि न विधातव्यो।दस्य समवकार। 'इसमें काम्य के प्रयोमन घिटकाये माते समदीय प्रस्मना त समबार । सम्युरि सयकार नपा होगा। इसमें नाय की सही मामला होगा। मारिका का 'मपि यह बताता है कि सारे रूपों में भामुख भवास होना चाहिए । विमर्श परित धार समिया हो, तथ देव देत आदि १२ मादक पात्र होते है। इन पात्रों में परमिशत। से समामन्थन में विष्णु आदि नेताओं को कमर लक्ष्मी आदि की 1.नास्ति' इत्यपि पाठ।२ 'नाहिसा इत्यपि पार। 1 ।
श्रय बोथी- दशरूपफम् फल प्राप्ति होती है। इसमें वीर अशी रत होता है, पानी रस भर होवे है, तथा शौन भई होते है। इनमें से प्रथम अङ्क का इतिवृत्त १२ नालिका का होता है। बाकी दो सा क्रम चार नालिका व दो नालिका के इतिवृत्त से शुद्ध होते हैं। नागिन का तात्पर्य दो घटी है। इर अङ्क में तीन कपट तथा नगरोपरोप, युर, वान, अग्नि आदि जनित विद्रों में से एक एक निदव पशिन होना चाहिए । धर्म, अर्थ तथा दाम इन तीन तरह के भतारों में से हर म में एक एक म्यूझार मी योजना होनी चाहिये। बोभ्यहाँ का प्रयोग आवश्यकतानुसार किया जाना चाहिए। नाटक के बारे में बिन्दु प्रवेशा का वर्णन किया गया है, पर यही उनकी योजना नहीं की जानी चाहिए। यह समवकार का लक्षण है। घीयो तु कैशिकोवृत्तो सन्ध्यगाइँस्तु भाणवत् ॥ ६ ॥ रस. सच्यस्तु शृङ्गारः सशेदपि रसान्तरम् । युवा प्रस्तावनात्यातैररद्धात्यकादिभिः ।। ६६ ॥ पच घीधी विधातव्या द्येकपानमयोजिता। पिथोवद्वियी मार्ग महाना पतिर्वा भागवतार्या । विशेषस्तु रस' भारोऽपरिपूर्ण स्वायसा सूच्य', रसान्तराण्यपि स्तोक पर्शनीयानि । केशिकी वृत्ती रसौचित्यादेवेति । शेप स्पटम्। पीधी कैशिरी त्ति में निबद की जानी चाहिए । उसमें सम्धि उसके सङ्ग तथा बमाण की तरह होते हैं-अर्थात् मुख निर्वहण से दो ही सन्धियों होती है तथा फेवल एक भारः । इसका सूप रस शहार होता है, वैसे वह दूसरे रसों का भी स्पर्श कर सकता है। यह प्रस्तावना के उदायक मादि उपर्युक बों से युफ होती है। इस सरह पीथी में दो-एक पानों की हो योजना करनी चाहिए। दोधी माग को कहते है - यह रूपक्रभेद मार्ग की तरह बोषी कहलाता है। इसमें सयहो का निवेश भाण की तरह होना चाहिये । भेद यह है, किसमें कार रस रोजा, उसका पूर्ण परिपाक न होने के कारण यह सूच्य होता है और रसों का मी थोदा- बहुत स्पर्श करना चाहिये । कैशिको वृत्ति महाररस के औचित्य के कारण ही विधेय है। या-उत्पष्टिका प्रप्यात गृत युद्धशा प्रपञ्चयेत् ॥ ७॥ रसस्तु फरणा स्थायी नेता प्राप्ता भरा। भागवत्सन्धियत्ययुतिखापरिदेवितैः॥७९॥ घाचा युद्ध विधातव्य तथा जयपराजयो। उत्पष्टिका इति मार कान्तर्गताहव्यपच्छेदार्थम् । रोप प्रतीतमिति । समयवा वरसष्टिका नामक रूपभेद में इतिधुत्त इतिहास प्रसिद्ध होता है, पर कवि को उसमें अपनी शुदि से हेरफेर कर लेना चाहिए। इसका स्थायी रस करुण होता है, तथा इसके नेता-पाय-माइत (सामान्य) मनुष्य होते हैं। इसके सपि, कृषि समाग की तरह होते हैं-धर्माद इसमें केवल मुख तथा निर्वहण सन्धिा होती हैं। भारती कृति पाई जाती है या एक होता है। करुण रस होने के कारण नमें खियों सदन होना चाहिम इसके पानों में धारयुद्ध की एप जय सपा परागक की योजना की खानी चाहिये। कारिकार ने भारी उत्सष्टिका इसलिए हारेविनायक मनर्गत पगित भई से सीमिता साहोचाय बासकारिता स्पष्ट है।
. तृतीयः प्रकाशः अथेहामा मिश्रमीहामृगे वृत्तं चतुरई निसन्धिमत् ॥७२॥ नरदिव्यावनियमानायकप्रतिनायको। प्यातौ धौरोक्तावत्यो विपर्यासादयुक्त कृत् ।। ७३ ॥ दिव्यस्त्रियमनिच्छन्तीमपहारादिनेच्छृतः। गाराभासमध्यस्य किश्चित्किञ्चित्मदर्शयेत् ॥ ७ ॥ संरम्भं परमानीय युद्ध व्याज्ञानिधारयेत् । पधप्राप्तस्य कुर्वीत धधं नैय महात्मनः ॥ ७५ ॥ सुगपदलभ्या नायिका नायमोऽस्मिसीहते इतीहामृग । स्याताख्यातं वस्तु अन्त्य = प्रतिनायको विपर्यसाद्विपर्ययज्ञानादयुक्तकारी विधेय । स्पध्मन्यत् । ईद्वारा की फया मिश्रित प्रश्यात य करिपत का मिश्रण होती है। इसमें चार भक्त होते हैं तथा तीन सन्धियाँ-अर्थात् गर्भ व अवमर्श नहीं होती। नर तथा देवता के नियम से इसमें गायक व प्रतिमायक की योजना होती है। ये दोनों इतिहास मसिद्ध तथा धीरोखत होते है। प्रतिनायक ज्ञान की प्रान्ति के कारण अनुचित कार्य करने वाला पर्णित होना चाहिये। यह किसी दिव्यस्त्री को-जो उसे नहीं चाहती, भगा कर ले जाना चाहता है-इस तरह कवि को चाहिये कि कुछ-कुछ इसका जारामास भी प्रदर्शित किया नाय । इन नायक व प्रतिनायक के विरोध को पूर्णता धक ले जायर किमी बहाने से युद्ध को हटा दे, उसका निवारण कर दे। उसके वध के समीप दोने पर भी उसका वध कभी न कराये। हामृग का यह नाम इसलिये रखा गया है कि इसमें नायक दिरन की तरह-किसी भलभ्य नायिका को मात करने वोहच्या परता है। इसकी कथावस्तु प्ररपात व उत्पाय का मिमण होती है। कारिका का 'सत्य' शुष्प प्रतिनायक का सूचक है, जो मिथ्या शान के पारण मनुचितकारी होना चाहिए। पाको राष्ट है। इत्थं विचिन्त्य दशरूपकलक्ष्ममार्ग- मालोक्य वस्तु परिभाव्य कविप्रवन्धान । कुर्यादयतपदलरतिभिः प्रबन्ध पाफ्यपदारमधुरै मुटमन्दवृत्तः ॥७६ ॥ सटम् । ॥ इति धनशमतदशपरस्य तृतीय प्रकाश समाप्त ॥ कवि को चाहिये कि इस तरह से दशरूपक के एपों से शिक्षित मार्ग को अच्छी वह समम कर, फायर का निरीक्षण कर तथा प्राचीन कवियों के प्रयन्धों का अनुमोदन फा, स्वाभाविक (अपमन) भएदारों से युक्त, तथा प्रगट पुष सरल पन्द पाले, उदार एच मधुर- अर्थ की पमता वाले हया रमणीप-यावयों के द्वारा प्रयन्य (क) की रचना करे। हतार प्रकाश -00-00- 7 अध चतुर्थः प्रकाशः। अयेदानी रसभेद प्रदश्यते- विभावैरनुभावैध सात्त्विकैयभिचारिभिः। भानीयमानः स्वाधवं स्थायी भायो रसः स्मृतः॥१॥ वक्ष्यमाणस्वभावैविभावानुभावव्यभिचारियास्विकं काम्योपात्तरभिनयोपदर्शितैः श्रोतृप्रेक्षकाणामन्तर्विपरिवर्तमानो रत्यादिर्वक्ष्यमाणलक्षण' स्थायी स्वादगोचरताम् = निर्भरानन्दसविदात्मतामानीयमानो रस, तेन रसिरा' सामाजिक , पान्य तु तथा विधा मन्दाविदुन्मौलनदे॒तुभावेन रसवत् श्रायुतमित्यादिव्यपदेशवत् । रूपों की विशेषता का विवेचन करते हुए प्रथम प्रकाश में वस्तु का सालोपा वर्णन किया गया, तथा द्वितीय प्रकाश में सपरिकर नायक की विवेचना की। तीसरे प्रकाश में रूपत्रों के विभिन्न प्रकारों के रक्षण रताये गये। अब रूपकों के मानन्दभूत रस की विवेचना भावश्यक हो जाती है, क्योंकि रूपकों के तीन तत्त्वों में से एक 'रस' भी है। अत भव यहाँ चतुर्थे प्राश में धनत्रय रस के भेदों का प्रदर्शन करते है। विमाव, अनुभाव, साविक भाव एष व्यभिचारियों के द्वारा जब रस्यादि स्थायी भाव भास्वाप-तर्वणा के योग्य बना दिया जाता है, सो वही रस कहलाता है। काव्य में प्रयुक्त अथवा नाटकादि अभिनय के द्वारा प्रशित विमार, अनुभाव, व्यभिचारी माव तया साविक मावों के द्वारा-जिनका लक्षण व स्वभाव आगे इसी प्रकाश में वर्णित किया। जापगा-जब मोताओं (घय काय के सम्र में) तथा दर्शकों (रूपकों के सम्बध में) के हाय में परिवर्तनशील रत्यादि रसायो भाव-जिसका लक्षण हम भागे करेंगे, भास्वाध पा स्वादगोचर होता है, तो वही रस कहलाता है। काय या नाटक का यह स्वार अनुपम मानन्द से युक्त चेतना वाला होता है। रस का स्वाद सेने माले रसिक, मत सामाजिक इसी नाम से कदे जाते है।स प्रकार की मलौकिक निर्भर भानन्द-चेतना को प्रकट करने के कारण उसके हेतु शेने से, मन्य या दृश्य पान्य रसवर' कहलाता है, ठीक उसी तरह जैसे 'मायुधृत' इस उदाहरण में घृत को 'मायु' कहा जाता है। सितार का अभिप्राय यह है कि पृत मनुष्य की वायु तया बल बढाता है इस बात को देख कर घृत में आयु का हेतुत्व स्पष्ट है। इसलिए उपचार या लक्षणा शक्ति के आधार पर हम पृत को मी वायु कह देते हैं, एक तौर से प्रत में भायुष्ट को उपचरित करते हैं। ठीक इसी तरह काम्य मानन्दरूप घानस्वरूप रस को प्रकट करने का कारण है इसलिए उसमें कार्यकारण मावजन्य रक्षणा क बाधार पर होहम का उपचार कर 'रसवर छाव्यम्' इस प्रकार का प्रयोग करते हैं।' १ यहाँ ध्यान देने की बात है कि धनत्रय व धनिक दोनों ही मीमांसक मोडर के मजानुयायी है। उनके मतानुसार विवादि रस के हेतु है, तथा उसमें वे पररसर उपाय- उत्पादक सच मानते हैं। वायव भानीयमान ' का दूसरा पद भी रसी पात का सच करता है। मरन के प्रति सत्र 'विभावानुमादम्पमिचारिसंयोगार रमनिम्पत्ति की विभिन्न माल्या भूमिका माग में द्रष्टव्य है। यहा पर पर कर देना होगा कि यनिवारी साहित्यशास्त्री रस को प्यास मानते हैं, वाध्य तथा उत्पाद नहीं, अन उनकी रसको परिमारा में इसका स्पष्ट उस्लेख दौरा- विमा नुमावेश्वब्यक समारिणा तया। रसना मवि रत्यादि स्थायी भाव सचेतसाम् ॥ (साहित्यदर्पण) . । चतुर्थः प्रकाशः तक विभाव- शायमानतया तम चिमायो भावपोषकत् । बालस्वनोद्दीपनत्वप्रमेदेन स च द्विधा ॥२॥ भव रस के हेतु भूत विमानादि में सर्वप्रथम विभाव का ही विवेचन करते हैं:- विभाव शब्द की व्युत्पत्ति विमाध्यत इति' इस प्रकार होने से इसका अर्थ यह है, कि विभाव यह है, जिसका ज्ञान हो सके। जिसे विभावित करके सामाजिक रसास्वाद करता है, वह विभाष है। यह विभाव भाव (स्थायी भाव) को पुष्ट करने वाला है, उसे रसरूप में परिणत करने वाला है। यह विमाय, मालम्बन तथा गोपन इस भेद से दो सरह का होता है। 'एक्मयम्' 'एवमियम्' इत्पतिशयोफिरूपयाव्यव्यापारहितविशिरूपतयाँ शायमानी विभाव्यमान समालम्बनत्येनोद्दीपनत्वेन वा यो नायकादिरभिमतदेशकालादिर्वा स विभाव । यदुकम्-'विभाव इति विज्ञातार्य इति' वाद्य ययात्वं यथावसरं च, च रसेपू. पपादयिष्यामः । अमीषा वानपेक्षितवाह्यसत्त्वाना शब्दोपयानादेवासादिततभावाना सामान्यारमनां स्वस्वसम्बन्धित्वेन विभाविताना साक्षामायकयेतसि विपरिवर्तमानानामाल- म्पनादिमाव इति न वस्तुशन्यता 17 यन्य काव्य में वर्णित या दृश्य काव्य में मय पर प्रदर्शित दुष्यन-शकुन्तला या राम सौता का रूप धारण करने वाले पात्रों को होम पेसामान चैते है। जिस रूम में काम्य में दुष्यन्तादि का व्यापार उपनियोता है, वद अतिशयोधिपूर्ण रहता है, पर इस अतिशयोक्ति कप वर्णन के द्वारा मवि विशिष्ट दुप्यन्तादि के रूप मोदी सम्पादित करता है, और सामाजिक पर समझता है कि 'दुष्यन्त इस तरए का है, राम रस तरए फा' 'शकुन्तला इस तरह कोरेसीवा रस तरह कीस प्रकार के विशिष्ट रूप में सामाजिकों के शान का विषय पनाने पाले, उनके द्वारा रिभावित होने वाले विभाव बहलाते है। ये लम्बन रूप में नायकातिपन्त-शकुन्तला, राम-सीता मादि हो सकते है, या नदीपन रूप में प्रदेशकाक भावि, मालिनीतट, मल्यानिल, पसन्त ऋतु, पुष्पवाटिका मादि होते हैं। विभाव का अर्थ १, सामाजिकों के द्वारा पायमान अर्थ, जैसा कि किसी प्राचार्य ने पहारे-'विमार का अर्थ बिसका अर्थ ज्ञात हो। माकन व होपन विमान रसादि के भेद के भनुसार,रसों के वर्णन करते समय वर्णित दंगे। विभागों के शायमानस्व के विषय में कोई पूर्वपक्षी पर सवा कर सबना है, कि काम्य के विभावादिकोशों तक ही सीमित रहते है, उनकी वास्तविक सहा तो होसी ही मारा-पयोंकि श्य पान्य में भी तुम्यन्तादि वास्तविक न होकर मवालविकर,ठीक यही मात मालिनीतयामि गोपन निमार के खिरकदी सरही है तो फिर उनकी पखव्यता के चरण इनका प्रत्यक्ष पान नहीं हो पाता, मत' काग्य के विभावादि मैं शापमानव पटित नही होता । रसी शहर का उतर देते हुए सिकार पनिक काते, कि राज्य में वर्णित विमानों के बारे में ही वो पात माग नही होगी, जो किशन के विषयरून विभागों के बारे में। सीरिक जान में उनके भौतिक सयको मावश्यकता होती है-मुल के पान में प्रत्यक्ष रूप से यम न होनी चाहिएरितु काव्यग विमाओं को बा सत्व-भौतिक सचाकी माश्यकता नहीं होती, क्योंकि काम्यगत विमार्यों की भावना, उनका पान को मान्य युक २३९० 7 . ।
" . शब्दों के द्वारा हीरोखाता है, साथ ही सौकिक शान के विषय विशिष्ट होते है, जबकि काव्यगत विमान सामान्यरूप (सामा थारमना ) होते हैं। ये विभाव अपने अपने रस के अनुकूल विमावित होते है, तया सहइप के चित्त में रत तरह घूमते रहते हैं, जैसे वह इनका साझा धान प्राप्त कर रहा हो। इन्ही विशेषताओं से युक्त विमानों को हम मालम्बन व उद्दीपन भाव कहते है। किन्तु यह स्पष्ट है, कि समय के हृदय में इन विमानों के सामान्य रूपमा साक्षात शान होता है, इसलिए इनमें वस्तुरायठा पदी मानी ला सकती। शुओं के द्वारा, जब हम किसी भी वरतु के बौद्धिक शान को प्राप्त करते रे, तोपा प्रत्यक्ष-सा हो होता है। 1 तदुक्क भर्तृहरिणा- शम्दोपहितरूपांस्तान्बुदेविषयतां गतान । प्रत्यक्षमिव कसादीन्सापनरदेन मन्यते ॥ इति । पिट्सचीकाप्युफम्-पभ्यय सामान्यशुभयोगेन रसा निपयन्त इति । सी.पुष्टि में मदेर के वाक्यपदीय की यह कारिका दी जा सकतीरे- 'वाक्यादि में जर'कस' आदि शब्द का प्रयोग करते हैं, तो शप के कहने के साथ हो साप रे शर्म सादि के रूप को अदि का विषय बना देते है। फिर पुदिगत कसादिकम लोग प्रत्यक्ष कर की गार वाम कारक बादि साधन के रूप में या हमारे शान के हाक (सापक) के रूप में प्राण करते हैं। पटसहस्राकार ने भी यही बात कही है-' विमाव, सामान्य गुणयुक्त होकर हो रसको निम्पन्न करते है। तित्रालम्बनविमानो यथा- 'अस्या' सर्गविधौ प्रजापतिरभूच्चन्द्रो नु कान्तिप्रद भारकनिधि स्वय न मदनी मासोन पुष्पाकर । वेदाम्याराजड मय नु विपयन्यासकौतूहले निर्मातु प्रभवे मनोहरमिद रूप पुराणो मुनि' इसमें पालम्बन दिमाव नायक के सामाजिक के लिए नायक व नापिका दोनों । पर कि नायक के लिए नायिका आधापन है, नायिका के लिए नायक। किन्तु मोटे तौर पर मालमन दियाद का विवेचन करते समय नायक से रस का पाश्रय माना जाता है। ससके लिए प्रारमन नायिका होती है। यहाँ पर सोहका सदाहरण रिया मारहा। दिकमोर्वशीय नाटक में पुरुरवा उर्दशी को देखकर मुग्ध हो जाए। निम्न पत्र में पर माहमन दिपाव कप उबंधी का वर्णन कर रहा है- डोग कहते है कि संसार के प्राणियों की रचना अशा करते है, पर इस उर्वशी को देखकर तो ऐसा करना होती है, किसकी रचना इस परतिक हे खूमट माके दारा नहीं की पश्योंकि दो बार बार पड़ने से बड़ा शुष्क हृदय वाला पहापि मा सिका व भोगविजास-विषय के प्रति कोई कुदाल नहीं रह गया है, इस रमणी के ऐसे मनोहर रूप को बनाने में इसे समर्थ शे सकता है। यदि इसकी सष्टि करने में कोई मा १.लौक्ति हान र कान्यसम्पती शन में सभी सादियशाली यह भेद मानते है, कि एक में व्यक्ति र विशिष्ट (इन्दिविडुअल) का शन होता है, दूसरे में जाति या सामान्य (ldes) सो को भारतीय साहिस्मशाखौ साधारणीकरण' कहता। प्लेटो काय विषय-शिष्टन मानकर सामान्य मानता व से Idea) कहा है। पदो मत छोपेनापर श,बोकला पाय धनिपाच (the Ides of such things) को मानता। ग १ . चतुर्थः प्रकाशः PE रहा होगा, ची मैरी ऐसीक्सना, कि वह या तो स्वयं चन्द्रमा ही होगा, जो कान्ति को देने वाला है या फिर भार को क मात्र फोश-कामदेव रहा होगा, या में दोनों न रहे शेती फिर इसकी रचना फूलों से लदे वसत मास ने की होगी इतनी मुन्दर रचना करने की सामय पदमा, कामदेव या वसन्त ऋतु में हो रे, वह बूढे स्पट भक्षा में कहा। उद्दीपनविभावो यथा-- 'भयमुदयति चन्दधन्द्रिवधीतविश्व परिणतविमाननि प्योम्नि कर्पूरगौर । भाजरजतशामापधिभियस्य पान जगदम-मृणालोपसरस्थ विभाति । पदीपन विमान के अन्तर्गत देशकास आदि का समावेशझोता है। किसी भी बालम्बन विमार के कारण सनद स्थायीभाष को ये उद्दीपन रिमा और अधिक सगोत्र का रसत्य को पहुंचाते हैं। गान लीजिये, शकुन्तला को देखकर दुष्यन्त के मन में रति माव उद्या शेवाद, यहाँ शकुन्तला मालपन है। मालिनीतट, पसन्त ऋतु, सताकुम, कोकिल की काकली अादि विमाव है, जो उस रति भाव को दुध्यन्त के मन में उदीत करते। अपन विभाष कहलाते हैं। यहाँ परिकारूप उद्दीपन विभाव का उदार देवे है:- कपूर के समान वेत यह चदमा, जिसने सारे विश्व को चादनी से भी दिया है, निर्मलता से युक्त (जिसको निर्मलता प्रकट हो गई) आकाश मैं दिन हो रहा है। इसकी कीमत चाँदी की शलाका के समान श्वेत किरणों के द्वारा सारा संसार ऐसा अथोभित होता है, मानी निर्मल गुणाल तन्तु के पिंजरे में रखा हुआ हो। अनुभायो विकारस्तु भावसंसूचनात्मक विभाव का विवेचन करने पर प्रसपाट अमुगाव कालपण अताते है- रत्यादि स्थायी भाव की सूचना करने वाले विकार (जो दुप्यन्तादि मानय में पाये जाने हैं) अनुमान कहलाते हैं। स्थायिभाषानाभावयन्त सामाजिकान् अभूविक्षेपकटाक्षादयो रसपोपकारिणोऽनु- गावा, एते चाभिनयकाव्यसोरप्यनुभावयता साक्षानावकानामनुभवकर्मतयानुभूयन्त्र इत्यनुभवनमिति चानुभावा रसिक ग्यपदिश्यन्ते । विकारों भावसंरचनात्मक इति तु लौकिकरसापेक्षया, इह तु रोषा कारपत्वमेव । यथा ममैव-: । 1f 'उम्भाननमुलसाकुचत लोकप्रमाल म स्वेदाम्म पितासमष्टिविगलवदी परोभावया । धन्य कोऽपि युवा स यस्य पदने व्यापारिता सई 1317 ! मुग्धे दुग्धमहाम्बिफेनपटलप्रख्या कटाक्षच्छया । ---h इत्यादि यथार समुदाहरिभ्याम अनुमान, इस शो ध्युत्पत्ति वह को वाती है, कि सामाजिकों को रयादि स्वापिमाव मनुभव कराते हैं। 'रम्हें देखकर सामालिकों को यह अनुभव हो जाता है, किमुक मनुमा शुदकी दूसरी म्युपति यह भी की जाती है 'अनुपश्चार मन्तीति भनुमाया की आश्रय में स्थायी भाव के दोने के बाद पैदा होते हैं। इसलिए स्वायो मात्र का कार्य मी का छात्र है। विभाव, अनुमाव, व्यभिचारीको समयी भाव का - ३ 7 . ५ १५० देशरूपकम् पान-दुष्यन्तादि में, अमुक स्थापी भाव पर हो रहा है। ये अनुमाव भूििक्षप, क्या भादि (भागय के) शारीरिक विकार, तपा रस को परिपुष्ट करते हैं। अभिनय (दृश्य काग्य) या काव्य में इन अनुभवों का प्रत्यक्ष अनुभव करने वाले सामाविकों के अनुमब के विषय होते हैं इसलिए अथवा ये रस्यादि स्थायी भाव के बाद होते है इसलिए घे भनुभाव कहलाते है । रसिकों में ये इसी नाम से पुकारे जाते हैं। कारिका में मनुमावों को मावसमूचक विकार कहा गया, यह लौकिक रस को प्रष्टि से ही कहा गया है, काम्य में तो ये मी रसपोप के कारण ही होते है। (लोक में नायक नायिका का जो प्रेम देखा जाता है, वह किक रस है। वहाँ भूविशेष मादि उस रस (प्रेम) से उत्पन्न होते हैं, मत के कार्य है। नाटक व मान्य का रस, जिसको चौंगा सामाजिकों द्वारा की जाती है, भलौकिक रस है। यह अनुमाव के विना उत्पन्न नहीं हो सकता, अत पहाई कारण ही मानना मेक होगा।) अनुमारों के उदाहरण के लिए पनिक का स्वरचित पथ लिया जा सकता है, जो किसी युवा को देखकर रति भाव से आविष्ट अन्दरी के अनुभावों का वर्णन किया गया है। हे भोली सुन्दरी, पर कोई भी युवक सचमुच धन्य है, जिसके चेहरे को और (मने) कामवासना से पूर्ण होकर मुंह से माई लेते हुए, स्तनतट को ऊँचा उठाकर मुशोभित होते कुप, भौहों को लता चालनासाथ ।इए, अपने शरीर को पसीने के जल से नहलाते हुए तथा लजा का स्याग करते हुए, रोमाशित होकर, दुग्ध-महाप्तमुद्र के फेनसमूह समान कान्ति बाले कटाक्षी की शोमा को व्यापारित किया। जिसकी और तुमने इस तरह के भाव से कटाक्ष-पात किया, पर दुतक सचमुच माग्यशाली है। लभनुमान को हम प्रत्येक रस के भरसर पर माइत करेंगे। हेतुकार्यात्मनो. सिद्धिस्तयोः संन्यवहारतः॥३॥ पे विभाव सपा अनुभाष रस (लौकिक रस) के कारण सथा कार्य है तथा लोकायवहार में इनका प्रत्यारूप देखने के कारण ये व्यवहार सिद्ध है-(भत इन पक्काण नहीं किया गया है।) तयोविभावानुभावयोलोंकिकरस प्रति हेतुकार्यभूतयो' संव्यवहारादेव सिद्धत्वान पृथातक्षणमुपयुज्यते । सदुकम्-'विभावानुभावी लोकससिद्धी स्वयात्रानुगामिनी लोक समायोपगतलाच म पृएग्लक्षणभुच्यते' इति । ।। ये दोनों रिमा र मनुमार को मेकिक रस हेतु तरा कार्य है, लौकिक व्यवहार से सिर, मत इनका पृथक् स्वयकरण मावश्यक नहीं। जैसा कि कहा गया है-'विमाव सानुमाव लोसम्परा के द्वारा प्रमाणित है, तथा लोकम्यवहार के अनुसार पाये माने-कोल्याणानुगामी है साथ ही कोकराव से युक, इन कारणों से उनका पुषक ध्वनीकरा गया है। - सुखदुःखादिक िवस्तापभाषनम्। अनुकार्यानयत्वेनोपनिवप्यमाने सुखदुःखादिरूपी बस्तहास्य भावचेतसोभावन पासम भाव । तम्-'अहो धनेन रसेन गन्धेन या सर्वमेतद्भावित पासितम्' इति । काय कारण, काम तथा सरसरोकारण माना जाग है, से काव्य थे ये समी कारण है। परवा भी बाद रखने शेरे,कि भारावन के शारीरिक विकार 'मनुमा नहीं माने जाते। 'मा के भन्नत मारत्या शौरन विमान के मङ्ग।
चतुर्थः प्रकाश मत्त रसान्मास्यम्भाव' इति 'कवेरन्तर्गत भावं भावयन्भाव' इति च तत् अमि- नमकाल्पयो प्रवर्तमानस्य भाषशब्दस्य प्रतिनिमित्तककथनम् । ते व स्थायिनो व्यभि- चारिणति वक्ष्यमा प्रयास कारिका में विमाव व मनुभाव के साथ सारिवा तथा व्यभिचारी का उल्लेख हुआ है। सावरु मया व्यमिधारी दोनों के साथ स्थायी की भाँति 'भाष' शब्द का प्रयोग पाया जाता है, जैसे साविक भाव, व्यभिचारी भाव, स्थायी माव। इसलिए यहा 'भाव' शब्द की परिभाषा देना आवश्यक हो जाता है। उसीका लक्षण बताते हैं:- काप्य या अभिनय में उपनिबद्ध माधय (दुप्यन्वादि) के सुख दुःख, हशोक भादि भावों के द्वारा सामाजिक के हृदय का उस ही भाव से मावित होना-उस माव तथा सामाजिक के भाव की एकतानता 'भाव' कहलाती है। नाटक में जिन व्यक्तियों का मनुकरण किया जाता है, वे वास्तविक रामादि या दुष्यन्वादि रेते है। कविहीं में सुख दुख मादि मावों का उपनिबन्धन करता है, जिनका निरूपण नर करता है। इन अनुकार्य व्यकियों के मुख दुःखादि भाव की भावना-वासना सदस्य रदय के द्वारा होतो, रस वासना को भाव कदते है ।(मान लीजिये, शकुन्तला से विरक्ति दुग्यन्त को देखो देख कर व उसके चौक में पद्य अङ्क में चित्रलेखन के द्वारा जो पहलाते देख कर दुष्यन्त के दुख के साथ हमारी एकनानता होती है। जैसे दुभ्यन्व के पादि माव ने हमारे मानस को मावित या वासित कर दिया है। ठीक यही बात एक भाचार्य ने दी है.-भरेस रस या गन्ध से यह सर कुछ मावित हो गया, वासित हो गपातायाठीक से ही है जैसे अगरी आदि की पूप जी अगरवचो में माश्रित है, फर होने पर सार समोरच प्रदेश को वासित मार देता है, वैसे अनुकार्य शमादि में भाभित सादि, सामाजिक के पदय को वासित कर देते है।" माइ की व्युत्पति दूसरे दा से भी की गई है-'मान वह है जो रसों को माक्टि करताया 'मार मह है पो कवि के मान्तरिक मार को मावित करता है। इसलिए पूर्वपक्षीया शका कर सकता है, कि प्राचीन भाचार्यों को मार के समय में यह पुत्पति पिर परमो नई पनि दो गई यह कैसे मानी झाप। सोका उत्तर देते हुए पनिक का सनारे किये दो व्युत्पत्तियाँ उस माव शम्दी की गई है, जो अभिनय व काम्य का तक या मोधक है, तथा इसका प्रयोग नही देनो कायों से सम्पर भाव के लिए है। मैने (पनिक ने जिस असे मार की युरपत्ति दी है पर रसिक के हृदय में भावित मार की दृष्टि से दोनों का विषय मिन होने से इस गुरपति का प्राचीनों की युति समाई विरोध नहीं पड़ता। ये भाव दो तरह के होते हैं:-स्थायी इमा व्यभिचारी, निका वर्णन माग किया जायेगा। पृथग्भावा भपन्यन्येऽनुमाघरोऽपि सारिपफाः॥४॥ सत्यादेच समुत्पनेस्तच्च तद्भावभावनम् । परगतदु सहदिभावनायामत्यन्तावालान्तरणलं पर पदाह-परत नाम भनयमय तर रामादितमनस्त्वानुत्पद्यते, एतदेवास्य सत्वं यत सिन प्रहस्तिन चारोमायादयो नियन्ते तेन सात्वेन निर्माता सास्विकारत एष मावास्तव उत्स्यमानस्या- पशुपतये ऽपि भाषा भावांगपनामधडापलायामा इदि रियमपाम् । इति । पति साविकमा में मनुभाषाव है, अनुभाषी ही ताद मामय के शिक्षा दशरूपकम् है, फिर भी सात्विक भाव अलग से भाव माने जाते हैं। इन सात्विकों को 'भाव' संशा इसलिए दी जाती है कि ये साव (मानसिक स्थिति) से हो उत्पन्न होते हैं। साथ का अर्थ है, अनुकार्य रामादि के दुःखादि भाव से भावक के दिन काभावित होना। दूसरे लोगों के दुख, वर्ष आदिको भावना में जब भावक का अन्त करण अत्यधिक मनुकूल व एकतान हो जाय उसे 'सत्त्व' कहते हैं। जैसा कहा गया है-'सत्त्व का अर्थ है मन से उत्पन्न, यह सत्य मन की एकामता से उत्पन्न होता है। मन का सत्त यही है कि जब वह दुखी या हर्षित होता है तो अश्रु रोमान आदि निकल पाते हैं। ये अनुरोमानादि सरस से निवृत्त होते , बत' साविक भाव कहलाते हैं। इसलिए सत्त से उत्पन्न होने के कारण ये बतु मादि-किन्तु ये मात्र के सूचक है-माव कहलाते है, दूसरी और ये विकार रूप भी है इसलिए अनुभाव भी है। इस तरह भादि एक भोर सात्तिक माव व दूसरी और अनुमाव इन दो रूपों से युक्त होते हैं। (निम्नोक्त माठ सात्विक भावों के अतिरिक्त और विकाररूप अनुभावदो होते है।) - . - -- - स्तम्भमलयरोमाञ्चाः स्वेदो पैवर्ण्यवेपथू ॥५॥ अधुपैस्पर्यमित्यष्टी, स्तम्भोऽस्मिनिफियाङ्गता। प्रलयो भएसंशत्वम्, शेपाः सुव्यक्त लक्षणाः॥६॥ ये सारिषक मावभाठ है:-रतम्भ, प्रलय (अचेतनता), रोमान, स्वेद, वर्ष (मुंह का रफीका पर जाना), पेपथु (फम्प), अश्रु, जैस्वर्य (भावाज में परिवर्तन)।. स्तम्म का अर्थ है बलों का निष्क्रिय हो जाना, तथा अष्टप का अर्थ है संश-चेतना- का नष्ट हो जाना। याकी माम सट ही हैं। गया- वेइ सेअदषदनो रोमधिय गत्तिए पवइ ।.. विललुटु मलम छह पाहोथलीए रत्ति ।। मुहऊ सामलि होई खरो चिमुच्छद विघग्घेण। मुद्धा मुहल्ली तुझ पेम्मेण साविण धिमा। ('वपते स्वेदददना रोमाचं गात्रे यपति । विलोलस्ततो घलयो लघु बाहुवल्लया रणति ।' मुखं श्यामल भवति सप्पं विमूच्छति विदग्धेन । मुग्या मुखवली तव प्रेम्णा सापि न घेर्य करोति') उदाहरण के रूप में एक ही उदाहरण में सारे सात्विक भावों का पडेख करते? हे युवक, रे प्रेम के कारण वा माविका बिलकुल धैर्य धारण नहीं करती। उसके चेहरे पर पसीना मा जाता है, उसके शरीर में रोगटे उठ खाते है, तथा वह कॉपने गी। उसका चाल कहा (हार्य का वस्य) वारूपी लता में मन-मन्द शम करता है। इसका मुंह काला पक्षपाता है, तथा क्षण भर के लिए मूदित हो जाती है। इसकी गुखरूपी लता कुछ मापीरबरी बरती। प्रध्यभिचारिण, समसामान्यलक्षणम्- विशेषादाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणा। स्पायिन्युन्मानिर्ममा कलोला इष पारिधी ॥७॥ 1 १८३ १ चतुर्थः प्रकारा' यथा सारिधी सत्येव को उद्भवन्ति पिलीयन्ते च तद्वदेव रत्यादी स्थायिनि सत्येवाविर्भावतिरोभावाभ्यामाभिमुरयेन चरन्तो वर्तमाना निदादयो व्यभिचारिणो मावा। वय प्रसङ्गमास व्यमिचारियों का सामान्यलण यताते हैं।-जोभाय विशेष रूप से, अर्थात् भाभिमुरुप से, स्थायी भाव के अन्तर्गत ऋभी उटते और कभी गिरते- हूयते-उतराते नजर आते हैं, वे व्यभिचारी भाव होते हैं। ये भाव स्थायी भाव में इसी तरह उन्मन तथा निमग्न होते हैं, जैसे समुद्र में तर उठवी है व विलीन हो जाती है। जैसे समुद्र में दो लहरे पैदा होती है और विलीन होती है, वैसे ही रत्यादि स्थायी भाव मैं ही निर्वेदादि व्यभिचारी भाव भावित होते है तथा तिरोहित हो जाते हैं, इस प्रकार व्यभिचारी भार विशेष रूप से स्थायी भात्र में दी उठते व विलीन होते रहते हैं। ये भाव ३३ होते हैं। A - निवेदग्लानिशाधमतिजदताहदैन्योयचिन्ता- वासेामगाः स्मृतिमरणमदा: मुप्तनिद्रावियोधाः। हा पीडामारमोना मुमतिरलसतागतकोवाहित्या व्याभ्युन्मादी धिपादोसुकचपलयुतारिशदेते भय ॥८॥ ये प्यापारी भाव ३३ होते हैं -निर्देव, ग्लानि, पश, भ्रम, पति, जढ़ता, ६, न्य, पीय, चिन्ता, ग्रास, ईप्या, समर्प, गर्व, स्मृति, मरण, मद, सुत, निद्रा वियोध, जीडा, अपरमार, मोह, मति, अलसता, घेग, सर्क, भवहिरया, व्याधि, उन्माद, विपाद, उपसुकता (भोरसुक्य)तथा धपलता। पर निवेद तस्पज्ञानापदीयादेनिदा स्वारमाननम् । सब चिन्ताश्रुनिश्वासपैवोच्दासदीनता ॥६॥ (नियेंद) तापमान, भापति या ईया के कारण स्वयं का तिरस्कार, निर्वेद नामक पमिधारी माव कहलाता है। इसके पिछ(भनुमाव) पिस्ता, अधु, पैवर्य, उपास सपा दीनता है। तत्वज्ञानानिदो यथा- 'प्रा लिया सालकामदुपास्तत किं दत्त पद शिरसि विद्विपतो तत किम् । सम्प्रोणिता प्रणयिनो विभवस्तत कि फाल्प स्थित तनुभृतां तनुभिस्तत रिम् । तत्वज्ञान से निद असे- मगर समादामों को पूर्ण करने वाली सम्पत्ति प्राप्त हो जाय दो बमसे या! वों के सिर पर पैर रख दिया गया हो, चीन गिदारो तो रासे क्या मित्रों स्नेहो माधों को पनादि से दुष्ट कर दिया, तो क्या हम शरीरधारी मनुष्यों के शरीर मारप जीवित रहे तो मौक्या काम !
दरारूपकम् । आपदो यया-- "राज्ञो विपन्धुवियोगदुःस देशघ्युतिदुर्गममार्गखेदः । आस्दायतेऽस्या कनिष्फगया फ्ण मयतचिरजीविताया ।' भारधि से निदबैसे- राजा के लिए विपति, पाथियों के वियोग का दुस, देश का खो देना, तथा दुर्गम मार्ग में घूम कर कष्ट सहना (विरोषी पाते है । )। पर मेरे द्वारा कईये परवाली, चारपत रहने बाली, इस (प्रकृति-स्वभाव) का यह फल चखा या रहा है। ईर्ष्यातो यथा- 'न्यकारो ह्ययमेव मे यदरयस्तत्राप्यसौ तापस सोऽप्यचैव निहन्ति राक्षसभटापोवत्यहो रावण । धिग्धिक्शजित प्रबोधितवता किं कुम्भकर्णेन या स्वर्गग्रामटिकाविलुष्टनपर पीनै क्मिमि नै ।' ईया से निर्वेद, जैसे राम से हारते हुए रावण की निम्न उक्ति में- यह मेरा सबसे पटा अपमान है,कि मेरे बसे वीर के भी शव हो सकते है, और फिर सड भी है, तो यह तापस बारा, और फिर पर यही-मेरे घर में हो, लहा में आकर रासस वोरों को मार रहा है। इस तिरस्कार व अपमान को सह कर भी रावण जिन्दा है, यह बहुत बडे दुख को रात है।द को बीतने वाले मैवनाद को-उसको वीरता को-धिकार अथवा कुम्भकर्ण को नींद से जगाने से भी क्या काम हुआ, और स्वर्ग के छोटे गाँव को लूटने में निपुण मेरे में मोटे काय मी पर है। पोरनारयोर्व्यभिचारि निवेदो यथा--- 'ये पाहतो न युधि वैरिकठोरकष्ठ- पोटोच्छलद्रुधिरराजिविराजितांसा । नापि प्रियापृथुपयोधरपत्रमन- सहातकुडमरसा खलु निष्फलास्ते । आत्मानुरूप रिपु रमणी वाऽलभमानस्य निर्वेदादियमुक्ति । एव रसान्तराणाम- प्यङ्गमाव उदाहार्य। पौर तपा महार रस के म्यमिचारिगाररूप निदरा उदाहरण, मैसे- जोराय, न तो युद्ध में वैरियों के कठोर कण्ठसट में उपलते हुए, खून से एग्रोमित भाग वाले है, और न प्रिया के पोन सनी की पत्रावलो के कुलूम रस से गीले ही हुए है। निसन्देश पाय निफ्ट हो।' पर उक्ति ऐसे व्यक्ति के निवेश को एचक है, जिसे न तो अपने लायक नही मिला है, न कोई गुनरी प्रिया हो प्राप्त हुई है। वैसे यहाँ चौर तथा महार के म्पमिचारिभूत निर्वेद का उदाहरण दिया गया, वैसे दूसरे रसों के अङ्गरूप में भी इसका उदाहरण दिया जा सकता है। रसाना स्वतन्त्री निर्वेदो यथा- 'करत्व भो क्थयामि दैवहतक मां विद्धि शाखोटक पैराग्यादिव दक्षि साधु विदित फरमायत घृयताम् ।
२८ ') F < चतुर्थ प्रकाश पामेनान घटस्तमभ्यगजन सर्वात्मना सेवते म छायापिपरोपकारभारणीमार्गस्थितस्यानि विभावानुमावरसाशानमेशाशासोनिदो निदर्शनीया । निद स्वतन्त्र रूप में मी पाया जा सकता है, जहाँ वह किसी रस का बड़ा नहीं सका। स्वतन्य निर्वेद का उदाह, जैसे- कोम्पति शासोटकपू से प्रसपूछ रहा है, तथा हरवत्तर देता है। इस प्रकार वार प्रत्युत्तर रूप में शातोटक पक्ष का निवेद पताया गया है। 7 'तुम कौन हो, माई' कहता हूँ, मैं अमागा शासोटक हूँ तुम तो वैराग्य से बोल रहे हो।' 'तुमने ठीक समझा' ऐसा क्यो' 'तो सुनो देखो, स्थाबाई और एक गद का पेठ है। राहगीर उसे हर तरह से सेते हैं। यद्यपि में सड़क पर खड़ा है, तथापि मेरी शका भी दूसरे का उपफार नहीं कर पाती। (मप्रस्तुत प्रशंसा के द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति का निर्वेद सूख्य है, जोगदिल से तो परोपकार करना चाहता है, पर उसके पास परोपकारापहने के साधन नदी-1) , यह निर्वेद विभाष, अनुभाय तथा रसू के मारूप में तथा स्वतन्त्र रूप में अनेक प्रकार का दिखाया पा सकता। प्रय ग्लानि- ins रत्यापायासन्टद्भिग्लानिर्निमाणतेह व। 4वार्यकम्पानुत्साहक्षामागधननियाः ॥१०॥ निधुवनकलाभ्यासादिभ्रमभदमनादिमिनिपाणताह पनि । अस्यां व पैय. मेकम्पानुस्साहादयोऽनुभावा । सुरत वादि से अमित परिश्रम, सपा तया अधा के द्वारा लो निपाणवा हो जाती है, उसे ग्लानि भाव कहते हैं। इसके अन्तर्गत वर्ष काम गर्नुसाद मरा यधन, व किया का मन्द हो जाना-नुभाष पाये जाते हैं। यथा माये- TV 'ललितनयनतारा क्षामवरेन्दुविम्या, रजनय इव निद्राकान्तनीलोसालाश्यः । विमिरमिष दयाना सिनः केशमाया नवनिपतियदेम्यो यान्त्यसूतावाप' हशेष निर्वदवयम् । कलानि का उदाहरण माप के एकादश सका निम्न पप दिया गया।- देखो, मात काल होते ही ये वारविलासिनियों, जिनके नेत्रों की पुलिया निकम्प ही गई है। रिनो मुख रूपी चदरियर पर गये है। होणकातिको ग १ )और बिनको नीलकमल के समान नौद के कारण मन्दर मोहें मुरझा गमयकार के समाच फैले भने काले केशपाश को धारण करती हुई, राजामों के घर में इसी पर और हो मात हाल के कारण प्रकाशन सारो वाली पाक चन्द्रम्य दालो, परान्त न्दीवर से पुल, मगर मप रात्रियों राजगह से मापत बार। ग्लानि के विषय में रसाङ्गता या अनाज और सोए सम्माजानी चाहिए, पैसा इम निवेश के मारे में कर चुके हैं। (प्लानि) . - "T 41 T #SH + मि ज चतुर्थः प्रकाश - - , मार्ग में चलने के कारण या सुरत के कारण जानित खेद को श्रम कहते हैं । इसमें स्वेद, मर्दन भादि अनुभाव पाये जाते हैं। T", "ATTE-STOP मागंजनित बम, जैसे उत्तररामचरित में (राम सीता से कहते हैं),1 se दे सौते, यह बदी स्थान है, जहाँ मार्ग में चलने के कारण उत्पन खेद से मालसाए मनोहर एव मुग्ध श्रों को, जो कुम्हलाद सित तु के समान दुईल. थे, तथा जिहें मैने गाल आलिङ्गनों के द्वारा सवादित किया ( दवाया) -मेरे वक्षस्थल पर रख कर तुम सो गई थी। रतिशमी यथा माधे- 'प्राप्य ममयरसादतिभूमि दुर्वहस्तनभरा सुरतस्य । शअमु श्रमजलाईललाटशिष्टकेशमसितायतस्य - इत्यायुत्प्रेक्ष्यम् । imiri रतिश्रम, जैसे शिशुपाल वध के दशम सर्ग में- झाले तथा लाले कालो कालो जमियों, जिनको स्तन का 'भार' "करना बहा कठिन हो गया था, ममय राग के कारण पुरत को पराकाण को प्राप्त कर (अत्यधिक भरतीसा करके), पसीने की दो से गीले कनाट पर चिपके हुए बालों को धारण करती हुरे, थक गई । यम के विषय में रसारियादिसावरह समझ लेना चाहिए, 1- अथ धृति शानायथा भर्तृहरिशतके । 7. . H 1 सन्तोपो ज्ञानशक्त्यादे तिरष्यप्रभोगत् ॥ १५FTTTES Tara वयमिह परितुमा पल्क्लेस्व च लम्या सम इह परितोपो निर्विशेषो विशेष । स तु भवतु दरिद्रो यस्य तृष्णा विशाला मनसि च परितुष्टे कोऽर्यवान् कोही शक्षितो यमा रमावल्याम्- 'राज्य निर्जितशत योग्यसचिवे न्यस्त समस्तो भर सम्यक्पालनपालिका प्रशमिताशेयोपसर्गा प्रजा प्रद्योतय सुता वसन्तसमयस्त्वं चेति मीनापति - pr| फाम काममुपैस्वय मम पुनमन्ये महानुत्सक rar STAR इस्यायुधम् -1(ति) शन, शकि, भावि के कारण जहाँ पेसा सन्तोष हो माय, जो बिना किसी ममता के कर्मभोग को भोगे, यह सन्तोष ति(धैर्य) कहलाता है। 1 शान से दि जैसे मतहरियत में कोई एवोपी सम्पतिवार से कहता बमोगल बस्कतों से हो सन्तुष्ट मोरम सम्पति से प्रसन्न हो । स तरह प्रभार मौर मारा सन्तोष समान है। मरहम ोगों में कोई विशेष मन्तर नही है। जिससे सम्मा पहत पदी होती, बह दरिद्र हो सकता है। मरेबामन दी सन्ततोकौन अपपि हाली, भोर कौन दरिद्र! । '- . E - + . १५८ शरूपकम् शक्ति से नित धृति, असे रसापटी नाटिका के उदयन में धृति माव की स्थिति- राज्य सिरि बीते या मुकाम वीई मा एसानहावीरायमै विप्न सपस्थित करे। राज्यशासन का सारामार मुयोग्य मन्त्री योगतरायण को सौंप दिया। प्रमाओं को बस्छी तरह से ललित व पालित किया गया है, उनके सारे देख-उपसर्ग- (कालादितिया शान्त हो चुके है। मेरे हदय की प्रसव रिसन के लिए प्रयोत की पुत्री पासवदा मौजूदा है और 'म (वसन्तक) मौजूद हो। इन वस्तुओं के नाम से ही काम (छाय की प्राप्त हो । अपवा इन सब पलुओं के विद्यमान होने पर कामदेर मजे से भाये, मैं तो यह समझता हूँ कि मेरे लिए यह बहुत बड़े उत्सव का भरसर सपस्थित हुआ है। कामदेव के उत्सव का स्वागत करने को प्रस्तुत है। सीर और मी समझना चाहिए। भय जडवा- अप्रतिपत्तिर्जडवा स्वादिष्टानिष्टदर्शनश्रुतिमिा'! अनिमिपनयननिरीक्षणतूष्णीमावादयस्तत्र॥१३॥ माया- बारामाच्या एवमालि निगृहीतसाध्वसं शहरो रहसि सेग्यतामिति । सा सखीभिरुपदिष्टेमाकुला नास्मरत्नमुखवर्तिनि। प्रिये ॥' । (असा) इप्सित पाशासित सकेसनेमा:सुनने से मोजानाषस्पा सपा- किंकतम्यविमहता हो जाती है, उसे जड़ता कहते हैं। इनमें नेत्रों का अपलक टहर जाना, सुप रहना इत्यादि अनुभाव पाये जाते हैं। दर्शन बनित जनता, जैसे कुमारसम्भव में पानी के निम्न वर्णन में- रसखा, एकान्त में चित्त को स्थिर करके इससे शहर के प्रति माचरण करना । इस तर सखियों के द्वारा दिये गये उपरिकार के सम्मुख होने पर व्याकुल पार्वती बिलकुल पाद मकर पाई। 'F" भनिष्टप्रवणाधयोदात्तराघवे-'राक्षस'- तावन्तस्ते महात्मानो निहता किन राक्षसा। षामायकता यावारिशिरसाएषणा ॥ द्वितीयः-गृहीतधनुषासिमाना। प्रथम-किमेकाफिनैव ।। द्वितीय अदृशा प्रत्येति । परय सावतोमहकमा सद्यरिचषशिरपत्रमयकाकुलाकुलाः। क्यन्याः केवलं आवारतातला रणाणे ॥ 1-ससे पचव तामेवेविषकिंगसाणियति । पनिहमवजनित बड़सादासाघव नाटकम- राक्षस-मिनरावसों के सेनापति रा, खरगपूर, डिम प्रतल्प भरावली सकसने मार गिराया। दितीय- भरीराम में। अमक्या भको नाममार गिराया। बिसीप-रिना देखे कौन विश्वास करमानी, इमारो सारी सेना पुबभूमि में वापस .
चतुर्थः प्रकाशा १८६ जाद के वृक्ष के समान सम्बे-सम्वे उन फरन्थों मण्डों) के रूप में रची रद गई, जो (रुण्ड) सिर के एकदमबाट जाने से पैदा हुए गडदों में घूमंदे तथा दुबकी लगाते गाय पायों से व्याकुल हो रहे थे। प्रथम-मित्र, यदि यही बात है, तो मैं इसमवस्था में कर 'ही वया सकता हूँ? 'थय प्रसत्तिरुत्सवादिभ्यो होऽधुस्वेदगद्दा । 'प्रियागमनपुरजननोत्सवादिविमावैधेत प्रसादो हर्षः। तत्र चानुस्वेदगगदादयोऽनुः भाया यया- सायात दयिते मास्थलमुवामुत्प्रेक्ष्य दुर्लयत हिन्या मरितोपवाष्पफलिलामासज्या दृष्टिं सुखे । पत्वा पीलुशमीकरीरस्वलान्स्वनाचलेनादरा- दुष्ट करमस्य फेसरसटाभारामल रजः ॥' निवेदवदितरतुभेयम् । . , उत्सप आदि के कारण जनित प्रसस्ता हर्ष कहलाती है। इसके अनुमाव अधु, स्वेद सथा गदगद हो जाना है। प्रिय के भागमन पुत्रोसत्तिमादि विमानों से मनमजी प्रसन्नता होती है, दोष कहते है। इसके मम, वेद, गदर आदि अनुभाव है। जैसे प्रिय के भागमन से प्रसन्न युवती का निम्न पच में वर्णित का चित्रण-- प्रिय बड़े दिनों में पर लौट कर आया है।मार्ग में उसने अगम्य तथा दुर्लभय मरुभूमि को पार किया है। मरभूमि की इस गहन पद्धति का विचार कर गृहिणी ( मान्यवधू) ने खसके मुख की और प्रसन्नता व सन्तोष से माय माहओं से मीनिगाह डाली। मासिर मेरे लिए पुस मरुभूमि की गहनता की भी मोहन-करके आये हो, यह भाव-भी यह अमिष्य है। लेकिन इसमें प्रमुख साधन ती वाट मो मरुभूमि के दुर्भप कासार को पार कर नायक को यहाँ तक के आया है, अतः यह भी तो प्रशंसा का पार है। गायिका मपमै भाचल में पील, शमी तथा करीर की पत्तियों को लेकर बड़े भार से अपने हाथों से खिलाया है और फिर उस ऊँट की गादन में, अयाल पर लगी इस भूल को इटकार देती है। बोरवाते दीक निवेदको हो तर धमझो खानी चाहिए। "भय दैन्यम्- दीर्मत्याधैरनीजस्य दैन्यं कार्यामुजादिमत्-१४॥ दारिद्रपन्यकारादिविभावरनौमस्कता चेतसो दैन्यं सत्र व कृष्णतामस्निवसनपरा. माइयोग्नुमावाः । यथा-" 'पदोऽन्यः पतिरेप मशकगतः स्थूणावशे ग्रह कालोऽभ्यर्णवागमः शालिनीयलस्य वातपिको पलात्सविरतलविन्दुपटिका मग्नेतियांकुला रदा गर्भमरासी सुतपसमूधिर रोदिति। शेष पूषन्। - । १ ' P - S M11 प - . . दशरूपकम् (न्य) पुदिहीनता आदि कारणों से कान्ति तथा भोज का पीण हो जाना, पैन्य कहलाता है, इसमें कालापना, मलिनता धादि मनुभाव पाये जाते हैं। दारिद्रय, भरमान आदि विमारों से भनित चित्त का मन्दकान्ति होना दैन्य कहलाता है, इसके अनुमाव है -कृष्णचा, बलों व दोनों का मलिन रहना आदि। जैसा निम्न पद में किसी मुढ़िया के दारिद्रय का तथा तन्ननित दैन्य का वर्णन है, पति तो बडा बूदा है और हर दम खटिया में पड़ा रहता है। घर पर केवल स्थूणा (यूपी) के ही भापार पर टिका है, वह भी गिरने वाला है। बरसात का मौसम पात है । स्थर विदेश में गये बेटे की कोई कुशल-खरर भी नहीं आई। बडे यत से तेल को को चौड़ कर तेल की एक छोटी सी एंडिया भरी थी, क्षय, वह भी फूट गई। इन सारी बातों को सोच कर तथा यह को गर्म के मार के कारण भटसाई। देख कर म्याकुछ सास बढी देर तक रोती रहती है। अयोग्यम्- दुरोऽपराधदीर्मुश्यकौर्यश्चण्डत्वमुग्रता। तन स्वेदशिर कम्पतर्जनाताडनादय ॥१५॥ यथा धीरचरित जामदग्न्य उत्कृत्योत्कृत्य गर्भानपि शकल्यत' क्षत्रसन्तानरोपा- दुद्दामस्यकविंशस्यवधि विशसत सर्वतो राजवश्यान् । पित्र्य तद्रतपूर्णहदसवनमहान दमदायमान- कोषाम' कुर्वतो मे न खलु न विदित सर्वभूते स्वभावू ।' (ोग्न्य) अपराध, दुष्टता, क्रूरता आदि के कारण दुष्ट व्यक्ति के प्रति जो कोध आता है, धो कर्कश भाव उत्पन्न होता है, उसे उप्रता कहते हैं। इसके अनुभाव है--स्वेद, सिर को हिलाना, लोगों को डराना, धमकाना तथा पीटना, भादि। 1 जैसे महावीरचरित की परशुराम की निम्न उति में- 1 क्षत्रियों की सम्तान के प्रति भनित रोर के कारण गर्भ में स्थित भूगों को भी काट-काट कर इकडे करते हुए, सपा समस्त राजवंशोत्पन्न क्षत्रियों को २१ र मौत के घाट उतारने वाले दुम वेज वाले, मेरा स्वभाव समस प्राणियों द्वारा विदित न हो यह बात नहीं है, बल्कि र एक व्यक्ति मेरे इस स्वभाव को जानता है कि मैंने राजसंशोलन पनियों के एक से भरे वालाकों में तर्पणादि करके अत्यधिक भानन्दित होकर अपनी क्रोध रूपी अमि को शान्त किया है, तथा इस प्रकार पित-कार्य-आर-तर्पणारि-विहित किया है। प्रय चिन्ता- ध्यान विन्देहिताना शून्यताभ्यासतापकृत्।। यथा- पक्षमाप्रमथिताश्रुषि निकच्यफलस्पर्धिभिः वन्त्या हरहासहारि हृदये हारावलीभूषणम् । पाले पालमृणाक्नालवलयालद्वारकान्ते करे विन्यस्पालनमायताक्षि कृती कोऽय त्वया स्मर्यते ॥3 R स्वभाव - M .
र दशरूपकम् (अस्या) घमण्ड, दुष्टता, समा कोष के कारण किसी दूसरे पति की उसि का नसाह सकना असूया कहलाता है। इसमें दोष से युक उठि का प्रयोग, बस यति के प्रति मनादर, मुकुटि, क्रोध, शोक भादि चिड पाये जाते हैं। गर्वजनित असूया जैसे महावीरचरित कीस उक्ति में बहा रावण के.ग का सरलेख किया गया रावण ने जनक से अर्थों मन कर सोता की मांग, पर फिर भी लामौ रावण को फल प्राप्ति नसको । रस्कि- उनसे शचना करने वाले विरोधी दशरथ के पुत्र राम को वह कन्या मिल गई । शत्रु की गति, स्वय के मान तथा पक्ष वा प्वस, प्रथा खोरजका रस तरह राय से चला जाना, मला वह षमण्डी जापति यदा कैसे स६ सकेगा। दौर्जन्याद्यया- 'यदि परगुणा न क्षम्य ते यवस्व गुणाने महि परयशो नि दाम्यागेरठ परिमार्जितम् ।। विरमसि न चेदिच्छादपप्रसकमनोरयो दिनकरकरान् पाणिच्छर्नुदन्ड्रम मेप्यसि ।' दुष्टताजनित मशा, बेते- अगर तू दूसरों के गुणों को नहीं सह सकता, तो सुरही गुणों के मन का प्रयास कर । दूसरों को निन्दा कर कर रस बहाने से उनके यश को हटाने को, इसे धोने की, चेष्टा करना क नहीं है। इच्छा र देव से भरे मनोरथ वाला दूसरों की निन्दा करने से नहीं रुकेगा, तो सूर्य की किरणों को हाथ के धनों से रोकने की चेष्टा करता हुमा खुरही थक कर शान्त हो जायगा। दूसरे परास्ता पुरुषों को निन्दा कर तू उनका उसी तरह कुछ मी नहीं बिगार पायेगा, जैसे सूर्य की किरणों को रोकने की कोशिश करने पर भी बनें कोई नहीं रोक पाता। "- T - । + - मन्युना यथाऽमशतके- T 'पुरस्तन्थ्या गोत्रस्खलनचकितोह मतमुख प्रत्तो बेलच्यास्किमपि लिखितु देवहतक। स्फुटो रेखान्यारा' कपमपि स ताहापरिणको गता येन व्यकि पुनरवयव सेव तरुणी॥ ततवाभिनाय स्फुरदयणगण्डस्थलरुचा मनस्विन्या रोषप्रणयरमसाट्दगिरा। अहो चित्र चित्र फुटमिति निगद्याथुक्लुप, । पाप्रमान में शिरवि निहितोपामचरण ।' प्रोपरनित मसूया, बसे भमरकत के इस पपश्य में- कोई नायक किसी मित्र से अपने प्रति भावरित ज्येष्ठा नायिका केकी का वर्णन करते बहरहारबातचीत के सिलसिले में उस सुन्दरी-येा नापिका के सामने मेरे मुह से एक दम दूसरी नायिका का नाम निकल गया। उसके मुंह से निकलते ही देख कर मैं नकित हो गया और ही यह ज्येष्ठा नाविका, उस दूसरीमारिवा के प्रति मेरे प्रेम को न ताटले, इसलिए मै ससा से मुंदमाना किले का लिखनेला गयाापरा मैं मन्दभाग्य था, मेरे द्वारा भी w T । - । G .. -- F . चतुर्थः प्रकाशः १६३ चित्र लिखा गया, उसीरेखाएं हो कुछ इससे बन गई कि वह कनिश उस रेखाचित्र के द्वारा सम्पूर्ण अङ्गों से युक्त सह दिखाई पौ-वह उसीका चित्र बन गया। व उस चित्र को देख कर वह ज्येष्ठा नायिका सारी बात समझ गई। उसके कपोल पर क्रोध के कारण साठी दौड़ आई, ३ फरकने, लगे, तथा उसकी वाणी रोष व प्रेम से गदर हो गई। उस मालिनी में गिरासे हुए 'अहो, एटा आश्चर्य है, बड़ा आचर्य है, (अथवा, अशे का सन्दर दिर है। यह कह कर, ममात्र के समान अपने बायें चरण को कोष से मेरे सिर पर डाल दिया। प्रधाम अधिक्षेपापमानादेरमोऽभिनिविष्टता।। तत्र स्वेदशिर फम्पतर्जनाताडनादयः ॥ १८ ॥ यथा वीरचरित- 'प्रायश्चित्त चरिष्यामि पूज्याना वो व्यतिस्मात् । मस्य दूषयिष्यामि शखग्रहमहानतम् ॥' (श्रम) विष्कार, अपमान भादि को म सह सकना अमर्प कहलाता है। इसमें स्वेद, सिर को हिलाना, हर्जन, ताइन आदि अनुभाव पाये जाते हैं। 'जसे महावीररिव में- आप ने पूयों का तान करने के कारण में प्रायश्चित करूंगा। शस्त्रपान करने की माइती प्रतिमा को मैं यों ही दूषित न करूंगा। यथा वा वेणीसहारे- 'युमच्यासनल नाम्भसि मया ममन नाम स्थित ग्रामा नाम विगर्हणा स्थितिमता मध्यनुजानामपि । मोधोलासितशोणितारुणगदस्गोच्छि दत' फौरवा-- नयेक दिवस ममासि न गुरुर्नाह विधेयस्तव ॥ पथमा जैसे वेणीसहार की भोमन की निम्म उक्त में- भीमसेन पुधिहिर के पास सहदेव के द्वारा रद रात कदला रहै-आप की भार के उरलहन न करने के कारण मैं अब तम भापको माया के सहन रूपी जल में मम रहा, अब तक मैने मापको आशका लहुन न किया। और इसीलिए आपकी आश में स्थित दूसरे छोटे भाइयों के नाम मैंने (भोगनिदा व तिरस्कार प्राप्त किया। पर भाग तो मैं कौरवों से सारा बदला चुका लेना भाइता। इसलिए पन से रंगी गदा को क्रोध से घुमाते हुए तथा कोरयों का नाश करते हुए मेरे, सिर्फ एक दिन के लिए, खाली भाज भर के लिए, न तो भाप 7 बड़े माईदार, और न माप का भागाकारी सेवक (विधेय) दी।' । अप पर्व- डा गोऽभिजनलावण्यरलेश्वर्यादिभिर्मदा। फर्माण्यावर्पणावशा सचिलासागयोक्षणम् ॥ १६ ॥ - यथा वीरचरिते- 'मुनिरयमय वीरस्ता दशस्तप्रिय में विरमद परिकम्म अतरे क्षत्रियासि । २५० ~- , - है १ I - 1 ११६४ दशरूपकम् तपसि विततकीतेंदवण्इलनोग्ण परिचरणसमयों राघव' क्षत्रियोऽहम् ॥ (गर्व) उच्च कुल, सुन्दरता, बल, ऐश्वर्य भादि के द्वारा जनित मद को गर्व कहते हैं। 'इसमें ऐंठ, दूसरों की अवज्ञा करना, अपने अगों का विलास के साथ देखना आदि अनुमाव होते हैं। पैसे महावीरचरित में- राम परशुराम से भरी हुई सोता को सावना बंधाते का रहे:- यह मुनि परशुराम इलने वीर की पह मेरे लिए अच्छी राव है, मुझे प्यारी लग रही है। लेकिन सीते, तुम क्षत्रिया हो इसलिए यह धोनता व कप ठीक नहीं, इस फम्प को रोक लो । तपस्या में यश प्राप्त करने वाले, तथा घमण्ड से जिसके हाथों में सुबली चल रहो, ऐसे व्यक्ति को परिचर्चा करने में मैं-त्रिय राम-मलीमौवि समर्थ हूँ। . यया वा तत्रैव- बामणा तिम्मत्यागो भवतामेव भूतये । जामदग्न्यद वो मित्रमन्यथा दुर्मनायते॥' अपका गहरी वरिपरित नाटक में परशुराम मरा राण को भेजे गये निम्न सन्देश में- मामलों के प्रति अपराध करने को छोड देना, तुम्हारे ही कल्याण के लिए है। रमदमि का पुत्र परशुराम तुम्हारा मित्र है। यदि तुम माझयों का अतिक्रम करना नही चोदते, तो पदाकोपी। अथ स्मृति- सदशमानचिन्तायैः संस्कारात्स्मृतिरत्र च । झातत्वेनार्थभासिन्यां भ्रूसमुनयनादयः ॥२०॥ यथा- 'मैनाक किमय रणद्धि गगने मन्मार्गमव्याहतं शतिस्तस्य कुत स पनपतनाष्ट्रीतो महेद्रादपि । ताय सोऽपि सम निजेन विभुना जानाति मा रावण- मा ! मात, स जटायुरेप जरसा लिटो व वाचति ।' (स्मृति) जप किसी समान पदार्थ के ज्ञान या उसको चिन्ता आदि कारणों से, जिस पस्त । का ज्ञान हम पहले कर चुके हैं उस पूर्वानुभव का संस्कार मन में उद्युद्ध होता है, तो इसी को स्मृति कहने हैं। स्मृति में हम पहले ज्ञात किसी वस्तु का ज्ञान फिर से प्राप्त करते हैं। स्मृति पूर्वज्ञान के द्वारा अपने शेय पदार्थ या प्रमेय को पाद दिलाती है। इसके अनुभाव, भौहों का ना करना मावि है। जैसे, सीता को रथ से भगाकर ले जाता हुआ रावण विसी विशाल शरीर को उसके मार्ग का स्वरोध करते देखता है। इसे देखकर वह सोच रहारे-या मेरे मप्रतिहत मान को, आकाश में, यह मैनाक रोक रहा है। पर मैनाक में मेरे मार्ग को रोकने की ताकत का से माई, पाटोद के पापाव से मोटा हुआ है, परकर समुद्र में विषा है। परगामी चतुर्यः प्रकाशः -- - १६५ नमो हो सकता, क्योंकि वह अपने स्वामी विष्णु के माय मुझ रावण को खूब जानता है। गह ही नही, गरुड का स्वामी विष्णु भी मेरे बल को खूब जानता है, इसलिए मेरे रास्ते को रोकने की हरफत गरुद मी कमी नहीं करेगा। (तो फिर यह कौन हो सकता है।) आहार - पता चल गया, यह तो मूहा जटायु है, जो मेरे हाथों अपनी मौत को बुला रा है। यया वा मालतीमायवे-'माधया-मम हि प्राकनोपलम्मसमावितात्मजन्मन' संस्कारस्यानवरतप्रबोधात् प्रतीयमानस्तद्विसदृश प्रत्ययान्तरेरतिरस्कृतप्रवाह नियतमा- स्मृतिप्रत्ययोत्पत्तिसंतानस्तन्मयमिव करोति यतिसारूप्यतश्चैतन्यम् -- 'लीनेव प्रतिविम्वितेच लिपितेवोत्कीर्णरूपेव च प्रत्युव च वप्रसारपटितवान्तनिसातेव च । सा नयेतसि कीलितेव विशिखयेतोगुव पधमि- घिन्तासततितन्तुजालनिविदस्यूतेव लमा प्रिया । भषया मालतीमाधव की निम्न वक्ति में- । मापद-प्राक्तन शान के साबरकार से उत्पन्न सस्कार के बार बार प्रशुद्ध होने के कारण मन में प्रतीत होता हुआ, तथा जिससे भिन्न दूसरे शनानुभवों के द्वारा जिसकी धारा को रोका नहीं गया है, ऐसी प्रियतमा स्मृति रूप शान को परम्परा मेरो समस्त आत्मा को जैसे मालती की युति में ही परिणत कर रहा है। मालती को एकाग्रचित होकर स्मृतिपथगत बनाते सुर मेरा बिच जेसे मालसीमय शे गया है-ऐसा प्रतीत हो रहा है, जैसे मालती मेरे मन में घुल मिल गई हो, अथवा जैसे वह मन में प्रतिविम्बित हो गई, अश्वा मन के त्रिफलक पर रित्रित दी गई हो, या किसी शिल्पकार ने इस मन में स्कूण के द्वारा उसकी मूर्ति को खोद दिया (उत्कीर्ण कर दिया। दो। प्रथया पर इसमें जह दी गई हो, या फिर बेसे वनहार (चूने आदि के मजबूत लेप) के द्वारा उसकी मूर्ति को मन में ही चुन दिया गया हो, अथवा जैसे मन में लोद दो गई हो। मालतो हमारे चित्त में इसी तरह २० गई है गानी कागदेव के पाँच गाणों ने हमारे चित्र में उसे कोल दिया है, अथवा चिता कर मार उसका विचार करने ) यो परम्परा रूपी धागों के जाल के दारा उसे मन में समान रूप से सा दिया है, मानौ चिन्ता के धागों ने उसे मन में अनुस्यूत कर दिया है। भय मरणमू- मरणं सुप्रसिद्धत्यादनर्थत्वाच नोच्यते। यथा- 'संप्राप्तेऽपधिवासरे क्षणमनु त्वरमवातायन वारंवारमुपेत्य निष्क्रियतया निधित्व किंचिचिरम् । संप्रत्येव निवेद्य रेलिकुररी सारं सतीभ्य शिशो- मधिष्या सहकारवण करण पाणिग्रहो निर्मित । इत्यादिवशाराश्रयालम्बनत्वेन मरणे व्यवसायमानमुपनिवन्धनीयम् । मरण) मरण लोकासिम है, तथा अन सूचक है, इसलिए इसकायत नहीं किया गया है। जैसे मोषितमत'का नायिका के स त में- मायक दिवेश चला गया है। उसके पाने का दिन आ गया है। इस दिन नायिका की पया अवस्था यो, इसी का वर्णन करते हुए उसकी सखियों नायक से नही है। बड़े दिनों .
. * १६६ दशरूपकम् से प्रतीक्षा करते करते, भाखिर तुम्हारे आने का दिन समीप बाया। उस दिन नायिका पार पार तुम्हारे पाने के मार्ग की ओर के वातायन के पास जा जा पर सड़ी रही। उस समय उसका शरीरनिस्क्रिय-सा हो गया, यही देर तक वह तुम्हारे आने की बाट देखती रही पर तुमन आये। यह देखकर उसने बडी देर तक कुछ सोचा। फिर बाँखों में बास मरकर शलाके लिए पाली हुई कुररी पक्षिणी को एक दम सखियों को सौंप दिया, और छोटी सी माधवी लता का करुणामरा विवाह भाम के पेड के साथ कर दिया। मार के लम्बन में कभी भी मरण का वर्णन नहीं करना चाहिए। वहाँ केवल मरण की तैयारी भर का सङ्कत किया जा सकता है। ऊपर के पद्य के वन की । तरह महार में मरण का व्यवसायमात्र ही निकर करना चाहिए। अन्यत्र पामचारो यथा वीरपरिते-'पश्यन्तु भवन्तस्ताडकाम्- T हृन्मर्मभेदिपतदुत्ववपत्रसवेगतत्क्षणकृतस्फुरदाभया । नासाकुटीरकुहरद्वयतुल्यनिर्यध्वनदमुक्प्रसरा मृतैव ।' दूसरे रसों में मरण का यथेन्३ पणन हो सकता है जैसे वीरचरित में- 'आप लोग ताराको देख-यह ताडया तो मरहोगई है। इसके हप के मर्म का भेदन करने वाले, राम के तेज बहुपत्र (पाण) ने वैग के साथ ही साथ उसी क्षण हमके अहो का मा कर दिया है, और इसके दोनों नाक के नथुनों (नाक की दो गुफाओं से समान रूप से इदनों से युक्त, उदर राम करता हुआ रक्तप्रवाह निकल रहा है। होत्को मद पाना स्खलदगववोगतिः ॥ २१ ॥ निद्रा हासोऽय रुदितं ज्येष्ठमध्याघमादिषु ।। (मद) मधपान से उपक्ष हर्ष को मन कहते हैं। इसमें अई, पचन य गति खलित होने गती है, अE, पाणी व पाल खड़ाने लगती है, यह मद तीन तरह का होता है, ज्येष्ठ, मध्य तपा अधम जिनमें क्रमशनिदा,हास तया रुदन ये अनुभाव पाये जाते हैं। यथा माघे- 'हावहारि हसित वचना! कौशल इशि विकारविशेषा । चरिरे भृशमजोरपि षष्वा कामिनेय तहणेन मदेन ।' इत्यादि । जैसे माप के दशम सर्ग में- अत्यधिक उत्स्ट मद ने मुग्धा नायिका में रावभाव से मनोपरासी, पचनों के कौशल, भासों में विकार (क्राष्टिपात) को टोक उसी तरह उत्पन्न कर दिया, जैसे तरण नायक ने मुग्धा में मोन मावों को उत्पन्न कर दिया है। इसरार के नशे में मुग्धा नाविकाओं की हो यह दशा यी, तो फिर मदमस्त प्रौदा नायिकाओं सहायरल सो, वचनमही तया तिरछी दृष्टि से देखने की सीक्या करें। अथ सुतम्- 11 सुप्त निद्रोद्गपं तत्र वासोवासक्रिया परम् ॥ २१ ॥ या- 'लघुनि तृपकुगरे क्षेत्रकोणे ययानो । नवक्टमपलस्तरे सोपधाने । । 1 F ए -- . A . । म चतुर्थः प्रकाशा - 1 है - It " परिहरति सुधुन हालिनद्वन्द्रमारात् कुत्यक्लशमहीमावद्धरेवस्तुपास!) (सुप्त)। निद्रा के कारण जनित स्थिति को 'सुप्त' कहते है। इसके अनुभाव पास या रावास की क्रिया है।" जी के खेत के एक कोने पर मनी पास की छोटी झोपड़ी में, नये पुआल के विशेने पर, जिस पर (प्रभाल का हो) तकिया लगा है, सोयै हुए कृपकदम्पति को, कृषकसन्दरी के कुचकला की गर्मी के कारण वहाँ लगी हुई उडक जगा रहा है। वायु में सुपार (शीतलता) है, कृपकरमणी के स्तनकलशों की गमी से ठंडक प्रतीत होता है, और उस हकमा अनुभव करते ही एकदम्पति जग जाते है। अथ निद्रा- मनस्संमीलनं निद्रा चिन्तालस्यलमादिभिः । तघ जुम्भागमद्गाक्षिमोलनोत्स्थातादयः ॥ २३ ॥ m निद्रार्धनिमीलितहशो मदमन्यराणि । नाप्यर्थवति न य योनि निरर्थकानि । अयापि मे गृगशो मधुराणि तस्या- स्तान्यक्षाराणि हृदये किमपि ध्वनन्ति ।' 7 (निद्रा) ar चिन्ता, आलस्य, परिश्रम आदि कारणों से मर का सामीलन निया कहलाता है। इसके अनुमाय है, जमाई लेना, महों का पलसाना, आँखों का मोच लेना, सोना आदि। असे निम्न पप में नायिका की निद्राजनित अवस्था का वर्णन है। उस दिन के समान नैत्र नातो गुदरी के वे मधुर अक्षर, जो नाद के कारण आगों के माय बन्द होने के कारण, मद से मथर-मथर भीमे-धीमे रूप में उच्चारित किये गये, और गि न तो सार्थक ही कहा जा सकता है, म निरर्थक है- आज भी मेरे पदय में कुछ ध्वनि कर रहे है। यथा च मापे- 'प्रहरफमपनीय स्वं निदिदासताचे प्रतिपदमुपहूत पेनचिजागृद्दीति । गुहुरविशदवर्णो निया शून्यर यो दददपि गिरम तयुध्यते नो गनुप ॥ मीरने माप एकादश सग के सवर्णन में- किसी पारेवार ने अपना पहरा जगार पूरा कर दिया है । बा अपने पारे को समाप्त कर यह सोना चाहता है, और इसीलिये गार गार दूसरे स्थल को (जिसका परा पाने बामा 'उठो, दो' इस सरह पुकार रहा है। रमादमा नीर से असष्ट वर्ग शोय वाली में बार तो दे रहा है, पर जग नहीं रहा। 1. रानादय' इति पालन्तरम् । । - A दशरूपकम् अप विवोध TH -- विबोध. परिणामावेस्तत्र म्भातिमर्दने । (विपोध) परिणाम अयोदयवस्था के परिवर्तन आदि के कारण विवेध उत्पा होता है, मौद की अवस्था के बड़े जाने पर विदोष होता है। इसके अनुसाव, जमाई लेना, तथा बाँखें मसलना है। यथा मापे- 'चिररतिपरिवेदप्राप्तनिद्रासुखाना चरममपि शयित्वा पूर्वमेव प्रबुद्धा । अपरिचलितगाना कुर्वते न प्रियाणा- मशिथिलभुनचकालेपभेद तरुण्य ॥ बेसे माप के एकार सर्ग के दो इस वर्णन में- तरुण तथा तरुणियों ने रात को नही देर तक मुरतकीहा की। इस मौ मरतकौडा के कारण पककर तरुण तथा तरुगियोंने दोनों नींद के सुख को प्राप्त किया । सुरतकोश को पकावट के कारण नींद के ख में डूबे प्रियतमों के पहले ही मच्छी तरह सोकर जगी हुई सुन्दर युवतियां अपने शरीर को नहीं दिलानी जाती, तथा अपने पाहुओं के गाढ परिरग्मण को नहीं छोड़ती। उनै एक तो इस बात का डर है कि कहीं प्रिय की निद्रा में बाधा न पड़े, साथ प्रेम के कारण दे प्रिय के मालिंगन को भी नही छोडना चाहता। अथ प्रोडा- दुराचारादिमिनीडा पाष्टर्याभावस्तमुनयेत् । सायोतागायरणवैवाधोमुखादिभिः ॥ २४ ॥ (पीडा) पर पुरे भाचाणों के कारण प्रीया उत्पन होती है। एता का समाप्त होना घोडा को उत्पत्र करता है। देदा मुंह करके अहों को छिपाना, मुँह के राग का फीका पड़ना, नीचा मह कर लेना आदि इसके अनुभाव है। यथाऽमशतके- 'पटालने पत्यो नमयति मुख जातविनया हठश्लप थापत्यपहरति गात्राणि निभूतम् । ने शन्नोत्याख्यातु स्मितमुखरासीदत्तनयना हिया ताम्यत्यात प्रथमपरिहासे नववधू ।' असे भमरकशनक के निम्न पच में- कोई नई पानी पति के समीपस्थ होने पर यही जिन हो रहो। सीमा एक चित्र यहाँ उपस्थित किया गया है। पति उसे रिठाने के लिए या मालिन करने के लिए उसके भोपड को पकड़ लेता है, इसे देसम्म सहुककर मपने मुह को नाँचा कर लेती है। जब पति भारदस्तो उसका भाहिजन करना मारदा है, तो यह चुपके से मङ्गों की इा देती। अपनी सखियों को रंसदे देखा वह उनके मुंह की और दृष्टि डालती है, पर काम के मारे कुछ कर नहीं पाती। इस तरह नई पत्नी के साथ पहले पहल परिहास रिया जाय तो वह हमारे कारण मन ही मन परेशान रहती है। - .
चतुर्थ प्रकाश अथापस्मार- श्रावेशो ग्रहदु खायैरपस्मारो यथाविधिः (धि) भूपातफम्पमस्वेदलालाफेनोहमादय ॥ २५ ॥ (अपरमार) प्रारब्धयश प्रहभनित दुख आदि के कारण जो आयेश मा जाता है, उसे अपरमार कहते हैं । जमीन पर गिर पड़ना, पिना, पसीना मा जाना, मुह में लाला और फेन का भर जाना, मादि अपस्मार के अनुभाव हैं। -- यथा माघे-- 1 'आश्लिटर्मि रसितारमुचोलाकारवृहत्तरजम् । फेनार्यमान पतिमाएगानामसावपस्मारिणमाशश !' बसे माप के तृतीय सर्ग में- कृष्ण ने भूमि का आलिङ्गन करते हुए (पृथ्वी पर गिरे हुए), भुजाओं के समान नही एमी चबल तरों वाले (चल मुजाओं वाले ), और से शाद करते हुए चिल्लाते हुप), फेनयुफ (जिसके मुंद से झाग निकल रहे है), समुद्र ( नदियों के पति) को अपरमार रोग से पादित समझा। अयमोह मोहो विचित्तता भीतिदु गावेशानुचिन्तनै । तत्राशानधमाघातपूर्णनादर्शनादय ॥२६॥ 1 (मोह) भय, दुख का आवेश तथा चिन्ता के कारण चित्त का मस्त व्यस्त हो जाना मोह कहलाता है। इसमें मशान, भ्रम, चोट का 87 जाना, सिर का चकरामा, दिखाई न घेना आदिअनुभाव पाये जाते हैं। पया कुमारसम्भवे- 'तामाभियङ्गप्रभवेन वृत्ति मोहेन सरसम्भयतेन्द्रियाणाम् । भशातभर्तृभ्यसना मुहर्त कृतोपकारेच रतिर्वभूव ॥ जैसे कुमारसम्भव के एतीय सर्ग में- समस्त पतियों की वृत्ति को स्तम्भ कर देने वाले तीन पराभव से ननित मोह के धारा नए उपपारी पापा स्पोन्निनाद के कारणधरमपम भात कामदये को मृत्यु के बारे में कुछ न जान सकी। यथा चोत्तररामचरिते- 'विनिम्नु शक्यो न मुखमिति या दुखमिति पा प्रमोहो निद्रा वा किमु विपतिसर्प किमु मद। सप स्परों स्परों मम हि परिमूद्रियगणो विकार कोऽप्यन्तडयति तापच परते।' अथवा, जैसे उत्तररामनहित में-(राम सीता से कह रहे हैं- 'मैं यह निश्चय ही नहीं कर पाता कि यह सुस है था इस है। अथवा पा मोरया निदा, या फिर जहर का मसरी या नशा सरे प्रत्येक स्पर्क में कोई ऐसा कार मेरे मन्त T .
mah m - . T H दरारूपकम् करण को स्तम्भ कर देता है, तथा ताप पैदा करता है, जिसके प्रभाव से मेरी सारी इन्द्रियाँ मद पट जाती है। श्रय मतिः- भ्रान्तिच्छेदोपदेशाभ्या शास्त्रादेस्तत्त्यधीमतिः। (मति) 'शादि में भाति के हट जाने तया उपदेश के कारण जो तवज्ञान की बुद्धि होती है, उसे मति कहते हैं। यथा किराते- 'सहसा विदधीत न क्रियामविवेक परमापदो पदम् । पृणते हि विट्टम्यकारिण गुणलुग्धा स्वयमेव सपद ॥' यमाच- पण्डिता साहसिरा भवन्ति श्रुत्वापि ते सतुलयति तत्वम् । तत्त्व समादाग समाचरन्ति स्वार्थ प्रकुर्वन्ति परस्य चार्थम् ॥' जैसे किरातार्जुनीय के द्वितीय सर्ग में-युधिष्ठिर कहते है - किसी भी काम को बिना सोचे समझे काम नहीं करना चाहिए । दिदीनना, शान का अभाव, परम भापत्तियों का कारण । सोच विचार पर काम करने वाले व्यक्ति के गुणों से माकृष्ट होकर सम्पति सुर को उसका नरण करती है। और जैसे, बुद्धिमान तथा विद्वान् व्यक्ति साहसी (किसी भी काम को एक-म कर लेने वाले ) नहीं होते किसी बात को सुन लेने पर भी वे उसके तत्व की आलोचना करते हैं। सत्त्व के ग्रहण करने के बाद शेने स्वार्थसमधी या परार्थसम्धी कार्य का व्यवहार रूप में माचरण करते है। अपालस्यम्- श्रालस्य श्रमगर्भादेाड्य जम्भासितादिमत् ॥ २७ ॥ 'चलति धि पृष्टा य इति पचन क्यचिदालीनाम् । श्रासितुमेव हि मनुते गुरुगर्भभरालसा सुतनु ॥ (भाटस्य) परिश्रम, गर्भ भादि के द्वारा जनित जादर को भालस्प कहते हैं। जमाई लेना, एक अगह पैठारहमा आदि इसके अनुभाव हैं। जैसे धनिक की सनिर्मित निम्न मायाँ में- गम के अति मार के कारण समसार हुई सुनरी विसी तरह चलती अवश्य , तथा सखियों के पूछने पर किसी तरह उत्तर भी भवस देतो है, पर सच पूछो सो पर एक जगह पर ठाराना चाहती है। अयावेग- श्रावेगः सम्भ्रमोऽस्मिन्नभिसरजनितेशननागाभियोगो घातात्पास्पदिग्धस्त्वरितपदातिर्षपजे पिण्डिताजा। मायाभियोगौ इति पाठातरम् । १ यथा ममैय- . 1 चतुर्थः प्रकाश २०१ उत्पातात्यस्तताहेप्वहिताहितझते शोफहर्षानुभाया पोधूमाफुलास्यः फरिजमनु भयरतम्भकम्पापसाराः॥ २८ ॥ (पारंग) चुदादि से डर के राजाओं का माना, शापात, जोर की धर्षा, उत्पात, अग्नि, हापी भादि के द्वारा जनित वंस से लोगों में जो संग्रम या हदयटी पाई जाती है, उसे आपेग नामक सवानी भाव करते हैं। अभिसार पा राजविद्यादि जनिरा भावेर में शस, दाधी शादि का सम्मदं पाया जाता है। शावात जनित भावेग में लोग धूलिधूमरित होते हैं तथा उनकी पाट पढ़ी तेज होती है। जोर की वर्षों से उत्पन्न भायेग में प्रस्थान साचित रहते है । उत्पात जनित आयेगम अट शिथिल हो जाते हैं। यदि भावेग शत्रुजनित (पकृत) है तो शोक, तथा यह सुझात है तो हर्ष अनुभाव पाया जाता है। अग्निगनित बायेग में मुंह का धुसे ग्याकृठ चित्रित करना यावश्यक है। तथा दस्तिजनित आयेगमें भय, स्तम्भ, फम्प तया भगदड-ये अनुभाव पाये जाते है। अभिरारो राजविद्रयादितदेसुरावेगी यया ममैव--- "श्रागच्छागच्छ सनं कुरु परतुरगं सनियहि त मे राश बासी कृपाणीमुपनय धनुषा किं विमाप्रविष्टम् । संरम्भीशिदिवाना क्षितिभूति गहनेऽन्योन्यभेनं प्रतीरखन वाद स्वामिस्टे स्वयि चक्तिदशा विद्विपामातिरासीत् ॥" इत्यादि। कृषिकार इन्ही विभिन्न कारणों से जनित जावेगों के उदाहरण प्रमशः सपस्थित करते हैं। पहले पहल अमिसर या राजविवादि जनित भाग के उदादरण के रूप में स्वनिर्मित पप देते है:- हे राजन्, मुम्हारे रसे (या तुमसे पार कर) गइन पर्वत में भगे हुए तुन्धारे शत्रु कमी-कभी सोते समय स्वप्न में तुम्हें देष लेते हैं। जब वे तुम्हें कम में देखते हैं, तो एकदम इसमहार जग जाते है और चहल नेत्रों से एक दूसरे को देखते हुए इस तरह का वरते हैं । 'भाभी, पर बाओ, मेरे श्रेप घोटे को सजा दी, सदी करो, मेरा खड्ग कशे, कटार (धुरी) ले आओ, धनुष से क्या होगा, मरे क्या (शष्ट राजा नगर में) घुस पाया है।' , 'तना तनुनाणं शत्रं शन्न रयो रयः । इति मुश्रुविरे विद्युद्गा मुभटोलयः ॥ 'वच, कवच, एल, एख, रथ, रथ' इस प्रकार की योद्धाओं की उत्कट पतियाँ चारों तरफ सुनाई देती थी यहाँ पुरस्सल में मटों की भावगइशा का वर्णन है। अयाया- 'प्रारम्बा तरुयुग्मकेमु सहसा संत्यज्य सेकक्रिया- मैतास्तापसकन्यकाः किमिदमित्यालोकयन्त्याकुला। श्रारोहमयुटनामांध बच्यो चायमा मध्यमी सद्यो मुक्तसमायो निजपावेतोमपादं स्थिता ॥ वातावेगौ यथा-'वाताहतं वसनमाकुलमुत्तरीयम्' इत्यादि । । । २६० २०२ शरूपकम् 7 प्रयवा जैसे, पुत्रों के समान स्नेह से पाले गये पक्षों को सेव क्रियाको एक दम छोड़ कर ये तपस्वी के यार यह क्या हो गया इस प्रकार व्याकुल होकर देख रही है। प्रशचारी शिभ्य उनके वृक्षों पर चढ़ कर देख रहे है, तथा महर्षि लोग अपनी प्रमाधि को एक दम छोड़ कर अपने भासन पर ही बिना मोहे (मौन धारण किये हुए) भी पैरों को ऊँचा रके खड़े हो रहे हैं। (किसी राना की सेना, या माततायियों का समूह भायम के समीप भाया | उसके कारण सारी आश्रम-शान्ति मा हो गई है। इसी सम्भ्रम से ननित भावेग का उदाहरण है।) वावजनिन आवेग जैसे 'इदा के देज झोंके से पत्र तथा दत्तरीय चाल (व्याकुल ) हो रहा है। घर्षपो यथा-- - देवे र्पत्यशनपचनव्यामृता वहिहेतो- । गैहाद्गह फलकनिचित सेतुभि पहभीता। नीधप्रान्तानविरलजलान्याणिभिस्ताडयित्वा शूर्पच्छनत्यगितशिरसो योपित सधरन्ति । दृष्टिजनित मावेग जैसे- चारों भोर पोरों से बारिश हो रही है। घर की जियों मोवन बनाने में व्यस्त है, पर भभि के लिए वे एक पर से दूसरे पर लकड़ी के तख्तों से परे हुए सेतुओं (पुलों) के दारा जाती हैं। इन पुलों पर चढ़ कर वे इमलिए जाती है कि कहीं कोचट में न समायें। वे निरन्तर घने जल वाले पटलपान्तों को दायों से पीटती हुई, सूप के घर से अपना सिर बैंक कर भोजन बनाने के लिए भाग लेने घर-घर घूम रही हैं। उत्पादजो यथा--- 'पौलस्त्यपीनभुजसम्पदुदस्यमान- कैलाससम्ञमविलोलश प्रियाया। धेसि यो दिशतु निहुतकोपचिह- मालिङ्गनोत्पुलकमासितमिन्दुमौले ॥ उत्पारजनित भावेग जैसे- पुरस्स्य के पौत्र रावण की पुष्ट मुद्धामओ से कैलास के उठाए जाने पर बरी पार्वती के नेत्र चपल हो उठते हैं। उनका कोप कम पड़ जाता है, तथा शिव के प्रति उत्पन्न प्रणयकोप के चिलिप लाते रे। वे मय तया सम्मम से महादेव का मालिङ्गन कर लेनी है, जिसके कारण महादेव (दुमौलि) का शरीर रोमानित हो उठता है । महादेव का यह पार्वती-आलिङ्गन मानित पुलक माप लोगो को पस्याण प्रदान करे। अहितकृतस्त्वनिष्टदर्शनश्रवणाभ्या तययोदात्तराघवे-चित्रमाय ( ससम्भ्रमम् ) भगवन् कुलपते रामभद्र परिवायतो परिवायताम् । (इत्याकुलता नाटयति ) इत्यादि। पुन "चित्रमाय:-- मृगस्प परित्यज्य विधाय विकटं वधु । नीयते रक्षणाऽनेन लक्ष्मणो युपि राशयम् । भदितकृत भादेग अनिष्ट घरत के दर्शन या यवा से होता है, जैसे उदारापर नाटक में- चित्रमाय (राम के साथ)-भगवान् रामचद्र, रक्षा कीजिये, रक्षा कीजिये।
, चतुर्थः प्रकाशः (आकुलता का अभिनय करता है, हिरण के रूप को छोड़ कर तथा विकट शरीर को धारण कर, यद राक्षस पुर में हमण को संशय से युक्त (उसके जीवन मी सन्देहमय) मना रहा है। राग:- यत्सस्थागयचारिधः प्रतिभयं गन्ये क्यं राक्षसात् यस्तोंग निर्विरीति मनसवारस्येत मे सम्नमः । माहासीर्जनकारगामिति मुहुः महाद्गुरुयोचते न स्थातुं न च गन्तुमाकुलमतेपेढस्य में निधयः ।। इस्यन्तेनानिष्टाप्राप्तिकृतसम्भ्रमः । इटप्राप्तिकृतो याव(मविश्य पराशेपेण राम्भ्रान्तो धानरः) वानरः-महाराश्र एदं तु पवणणदणागमणेण पहरिस-' ('महाराज स्तत्पनु पवनन्दनागमनेन महर्प- ।) इत्यादि देवास हिमाणन्दजगणं विलिदं महुवणम् । ('देवस्य हृदयानन्दजननं विदलितं मधुवनम् ।) इत्यन्तम् । राम-निर्मयता के समुद्र मत्स एक्ष्मण को राक्षस से भय को यह मैं कैसे मान ले। और यह मुनि (चित्रमाय)र कर लक्ष्मण को बचाने के लिए चिता रहा है, तोसे भी सूर कैसे मान लिया जाय । मेरे मन में मी संग्रम है दी। गुरु ने स्नेह से यह उपदेश दिया था कि 'सीता को अफेलो कभी मन छोडना'। इन सारी बातों को सोच कर मैं किंकर्तव्यविमूढ़ हो गया हूँ नया मेरी प्रद्धि व्याकुल हो गई है। मैं न तो हरने के ही न लक्ष्मण की सहायता करने जाने कैदी बारे में नि-धय कर पा रहा हूँ। हितकात संभ्रम, जैसे उदात्तरापव नाटक में दो यवनिका को हटाकर प्रविष्ट व्याचल मानर अप्रीव को पचगा देता है-'महाराज, पनुमान के आगमन से प्रसन्न पानरों ने आपके दय को प्रसन्न करने वाले मधुवन नामक उपवन को हजार दिया है।' यथा या वीरचरित- 'एहि वत्स रघुनन्दन पूर्णचन्द्र चुम्वामि मूर्धनि चिरस्य परिष्वजे त्वाम् । भारोप्य वा हदि दिशानिशमुहामि वन्देऽथवा चरणपुष्करकवयं ते ।' अथवा, मेमे महावीरचीत में- समान अन्दर वा राम, भाभी, घर आओ। मैं तुम्हारे सिर को नदी देर तक यू साहारा लिन पाईअथवा तुम्हें अपने ददय में विटा कर दिन-रात धारण किया करूँ, या तुम्हारे दोनों चरणकमलों की बन्दना । वहिजो यथाऽमशतके - 'क्षिसो हस्तानलमा प्रसभमभितोऽप्यादयानाशुकान्त गृहन्यरोवपास्तवरणनिपतितो गैक्षितः राम्भमेण । भालिझन योऽवधूतत्रिपुरयुवतिभिः साधुनेत्रोत्पलामिः कामीवापरापः स पहतु दुरितं शाम्भवो वः शरामिः॥ है २०४ दशरूपकम् मिजनित आवेग जैसे अमरकशतक में- त्रिपुरासर के वध के समय महादेव के बाणों से फैला हुआ प्रचण्ड अग्नि आप लोगों के पापों को बला दे। महादेव के वाों का यह अधिकामो पुरुष के समान (अपराधी नायक के समान) त्रिपुरासुर की स्त्रियों के समीप जाता है, जब वह जाकर उनको हाथ से (लपटों से) एकरता है, तो वे इसे अलग हटा देती है, पर यह उनके वन का अवल पकडने लगता है, तो इसे बहे जोरों से पीटती है, जब वह उनके केश पकड़ने लगता है, तो हटा दिया जाता है, जर वह ( उन्हें खुश करने के लिए) पैरों पडता है, तो वे संभ्रम के कारण उसे देखती भी नहीं, तथा मालिङ्गन करने पर वे उसका तिरस्कार करती है। इसी प्रकार और से भरे कमल के तमान नेत्रों दालो त्रिपुर-युवतियों के द्वारा अपराधी कामो की तरह तिरस्कृत महादेव के बाणों का बमि आपके दुष्का को भस्म कर दे। यथा वा रत्नावस्याम्- 'विरम विरम यह मुघ धूमाकुलत्वं प्रसरयसि किमुच्चरधिपा चक्वालम् । विरहहुतभुजाऽहं यो न दग्ध प्रियाया' प्रलयदहनभासा तस्य किं त्वं क्रोषि ॥' अपदा जैसे रसावली नाटिका में- सागरिका को ममि से पचाने के लिए उचत उदयन पनि से कह रहा है। 'हे थपि, शान्त हो जाभी, इस धुएँ को माकुलता को छोड़ दो। लपटों के इस ऊंचे समूह को क्यों फैला रदे दो। भरे मुझे प्रिया के विरह को अमि हो न बला पा, तो पिर प्रलय काल की भमि के समान तेज से तुम मेरा क्या बिगाड लोगे। करिजो यया रघुपरो- 'सच्छिषवन्धहुतयुग्यशन्य भन्नाक्षपर्यस्तरथ क्षणेन । रामापरित्राणविहस्तयोधं सेनानिदेशं तुमुलं चकार ।" परिमवणं व्यालोपलक्षणार्थ, तेन व्याघ्र एकरवानरादिप्रभवा आवेगा घ्यारयाता । करिज मावेग जैसे रघुवश में- उस हाथी ने अपने सारे बन्धन तेजी के साथ तोद दिये, दद माला से शून्य था। उसने एक ही क्षण में सेना के रथों को पुरी को तोर कर शित-मित कर दिया। हाथी के भय से बरी खियों को बचाने के लिए सारे योसा जुर गये थे, तय सारे सेनानिवेश में मीपण व्याकुलता व कोलाहल का सम्रार हो गया था। कारिका के करिज भावेय' के 'करि' शम से सारे ही पशुओं का उपलक्षण हो जाता है। इसलिये व्याघ, शूकर, वानर मादि के भय से उत्पन्न आवेग पी मी ध्याख्या हो जाती है। कोई पूर्वपक्षो यह रहा परेकि भावेग अन्य पशुओं के कारण भी हो सकता है, तो उसीका उत्तर देते हुए चिकार ने इसे स्पष्ट किया है। अप वित- तर्का विचारा सन्देहा(शिरोहुलिनर्तकः । (वितर्क) सन्देह के कारण अनित विचार को त कहते हैं। इसमें मौहे, सिर व भंगुलियों कीमता पाई जाती है, ये इसके भनुमार।
चतुर्यः प्रकाश - यथा- fम लोमैन विठवित स मरतों येनतदेवं कृतं सब स्रोलघुता गता रिमयया मातेव मे मध्यमा । मिप्यतन्मम चिन्तितं द्वितयमप्यार्यानुमोऽसौ गुरु- माता तातकरयमित्यनुचितं मन्ये विधाया कृतम् ॥ जैसे, नीचे के पक्ष में लक्ष्मण तर्क कर रहे है:- क्या को मरत लोम के वशीभूत हो गया है। जिससे उसने पर कार्य (राम का पनवासविषयक किया है। या फिर मेरी मशही माँ कैकेयी दो अन्य रियों की भाति एक दम तुच्छ समाव शाली हो गई । मेरा ये दोनों माते सोचना शुगर। आखिर मरत मार्य राम के छोटे भाई तथा मेरे अग्रज है, साथ ही माता कैकेयी पूज्य पिता की पली है। मत राम में मनुज, वा दशरथ के कछत्र से ऐसी अनुचित मिरा नहीं हो सकती। ऐसा प्रतीत होता है कि यह सारी अनुचित दात विधाता की दी करतूत है। अथवा 'कसमुचिताभिषेकादाय प्रच्यावयेद्गुणज्येष्ठम् । मन्ये ममप पुण्य सेवावसरः कृतो विधिना ।। अथवा, राम वनवास को सुनकर लक्ष्मण के तर्क का दूसरा उदाहरण- समस्त गुणों से उत्कृष्ट पूज्य रामचन्द्र को उनके योग्य ठाभिषेक से कौन च्युत कर सकता है मुझे ती ऐप्ता मालम होता है कि मेरे दी पुण्यों के कारण विधाता ने मुझे रामचन्द्र की सेवा करने का अवसर दिया है। भयावहिल्या- लजार्विक्रियागुतायरहित्याविक्रिया।' (अवरिया) पदप के भाव या विकार को मा आदि के द्वारा छिपाना भवहिस्या कहलाता है, इसके अनुभाव है। आने में विकार उत्पन होगा। यया कुमारसम्भवे- एवंवादिनि देवी पार्वे पिवरधोमुसी। लीलागलपत्राणि गणयामास पार्वती।" जैसे, कुमारसम्भव के षष्ठ सम्र में पार्वती या यह अबदित्या नामक सवारीमा जब नारद पार्वती तथा शिव के भारी विवाद के विषय में हिमालय से बात कर रहे थे, ती पात में ही बैठो हुई पार्वती गपना सिर नीचा करने लीलाकमल के पत्तों को (हिमालय पनारद को बालों में कोई कुतूहल न मताली-गी, तथा लज्मा से अपने भाव को छिपाती हुई गिन रही थी। अथ ध्याधि-- दयाधयः सन्निपाताधास्तेपामन्यत्र विस्तरः ॥ २ ॥ (प्याधि) सरियात बादि रोगों को व्याधि कहते हैं। प्याधियों का विशेष विवरण दूसरे स्थल पा, मायुर्वेद के प्रपों में किया गया है, भत' वहीं पर है। -- । 1 M २०६ । दशरूपकम् । दिमानं तु यथा- 'मच्छिन नयनाम्वु यन्भुषु कृत चिन्ता गुरुभ्योऽपिता 1 दत्त देन्यमशेषत परिजने ताप" सखीवाहित । अद्य व परनिति प्रजति सा वास पर खिद्यते 'विधन्धो भव विप्रयोगजनितं दुःखं विभक तया ॥" यहाँ उसका सकेन मात्र कर दिया जाता है- । कोई सखी नायक के पास जाकर इसके वियोग से उत्पन्न नायिका की मरणास दशा का वर्णन करते कह रही है। पहले तो तुम्हारे वियोग में वइ नायिका दिनरात रोपा करती थी, चिन्ता करती थी, दीन प्रतीत होती थी, तथा विरहताप से उत्तम रहती यो। पर अब तो इसकी दशा ही बदल गई है। जा तुम्हारे वियोगजनित दुख को पद न सह पाई, तो उसने अपने सारे दुख को दूसरे लोगों में बाँट दिया। अपने नेत्रजलों के निरन्तर धाराप्रवार को उसने बान्धवों में बाँट दिया है। उसने चिन्ता पर के वडे व्हे-मातृ-पित्रादि को अस्ति कर दी है। उसने अपनी सारी दीनता नौकरों को दे दी है, तथा अपने विरहताप को सखियों के पास रख दिया है। उस नायिका की मरणासन्न अवस्था देखकर दायरो रहे है। बदे-मू चिन्तित है, नौकर परेशान है, तथा सखिया विठ्ठल है। वह आज या कल परम शान्ति को प्राप्त होने वाली है, केवल साप्त हो उसे परेशान कर रहे हैं, उसके बाकी सारे दुःख मिट गये है। इसलिए उसके विषय में कोई भी सोचने की बात नहीं है, उसके बारे में तुम निश्चिन्त रहो, उसको कोई दुख नहीं, क्योंकि दूसरे लोगों ने उसके दुख कोमय लिया है। तुम्हारे वियोग में दुखी नायिका कुछ ही समय की मेहमान है, यह यग्य है। अयोन्माद'- अप्रेक्षाकारितोन्माद. समिपातग्रहादिभिः। यस्मिन्नषस्था रुदितगौतहासासितादयः॥ ३०॥ (उन्माद) त्रिदोषजन्य सनिपात, ग्रह आदि कारणों ने पुदि का अस्तग्यस्त हो जाना तथा विवेकहीन कार्य करना उन्माद कहलाता है। इसमें रोमा, गाना, हंसना, पेठ गिर पाना आदि अनुभाव पाये जाते हैं। यया-'मा' ! क्षुद्रराक्षस । तिष्ठ तिष्ठ, क् मे प्रियतमामादाय गच्छसि इत्युपरमे 'क्यम्- नवजलधर सक्षमोऽय न इसनिशाचर सुरधनुरिद पूरा न तस्य शरासनम् । भयमपि पटुर्धारासारो न घाणपरम्परा उनकनिकालिग्या विद्युप्रिया न ममोर्वशी ॥ इत्यादि । से विक्रमोर्वशीय में उर्वशी के अन्तान से विरहित पुरूरवा की इस सन्मादोक्ति में- 'भरे नीच राक्ष, दरगारमेरो प्रिया को लेकर कहा जा रहा है। क्या यह तो पानी के भार से मुका हुआ नया बादल है, वह हीर राक्षस नहीं है। यह तो दूर तक फैला हुआ इन्द्रधनुष है, उस रात का धनुष नहीं है। भोर यह भी देन बारिश की है, माणों न 1,'स्थान:' इति पा..
- -- -- चतुर्य प्रकाश २०७ यो वर्षा नहीं है। जिसे मैं उर्वशी समझ रहा हूँ, परमी मेरी प्रिया उर्वशी नदी है, किन्तु मुवर्णशीरोटी की रेय के समान चिवनी एन्दर बिजली है।' अथ विपाद प्रारब्धकार्यासियादेविपादः सत्यसक्षयः। निःश्यासोलासहत्तापसहायान्वेपणादिएत् ।। २१ ॥ (विपाद) भारम्भ किये हुए कार्य के पूरे म होने पर व्यक्ति का साय, पण, मन्द पर जाता या नष्ट हो जाता है। इसी 'सावसपय' को विवाद कहते हैं। इसके अनुगाम है।- निधास उसास, हदय में साप होना, सहाय को ढूंढना आदि। यथा वीरचरिते-'हा मार्य ताडके। किं हि नामसत् अम्युनि गजन्त्यलानि, प्रावाण लपी। नन्वेष राक्षसपते स्पलित प्रताप प्राप्तोऽहत परिभतो हि मनुष्यपोतात् । दृष्ट स्थितेन च मया स्वजनप्रमायो दैन्य जरा च निरुणद्धि पर करोमि । जैसे पौरचरित में राक्षसपति रावण या विषाद- ये ताडके ! यह क्या मायर्थ ई कि समुद्र के पानी में लौकियां दूर रही है, पर पत्थर तर रहे है। ऐसा मावस होता कि राइसों के स्वामी रावण का प्रताप मन्द पद गया है। तमी तो इस मनुष्य के पस्चे से उसको हार हो यो। मैने जीवित रहते हुए पापयों का नाश खुद अपनी पाखों से देखा है। दीनता और पदावस्था दोनों ने मुझे (मेटी शक्ति को रोक दिया है, मैं अब क्या करूं। अयोपयम्- कालातमत्वमोत्सुक्यं रम्येच्छारतिसम्धमः। पत्रोच्चासत्वराश्यासहचापस्वेदविभ्रमाः ॥ ३२ ॥ (ौस्सुक्य) किसी मनोहर भिक्षापा, सुरव या सम्भ्रम के कारण समय को म सह सकता एसुकता (औरसुक्य) कहलाती है। उडास, स्वरा, श्वास, हसाप, पसीना, प्रम ये अनुभाष भोसुक्य में पाये जाते हैं। यया पुमारसम्भवे- 'श्रात्मानमालोक्य च शोगमानमादर्शविम्ये स्तिमितायताशी। हरोपयाने त्वरिता बभूव स्त्रीणा प्रियालोपलो हि वेष ॥' जैसे इमारसम्मव में- शिव के पास पाने के लिए तैयारी करती हुई लव लाने नेत्र वाली पार्वती अपने सुदर रूप पो दर्पण में देखती है, तथा शिव के पास जाने के लिए शोमता करता है। सच है खियों को मुदर वेश भूषा तमी सफल है जब कि वह प्रिय के नयनपय में प्रदरित हो। त्वनि' इति पा..
२०६ दशरूपकम् यथा वा तत्रैव- 1 । ५ 'पशुपतिरपि ता यहानि कृच्छादनिनयदद्विसुतासमागमोल । कमपरमवश न विप्रकुर्युर्विभुमपि तं यदमो स्पृशन्ति भावा ॥' अथवाजेसे उसी काव्य में- पार्वती के समागम की उत्सुकता वाले पशुपति महादेव ने भी उन दिनों को पही कठिनाई से किसी तरह गुजारा । जब इस तरह के रतिविषयक माव महादेव जैसे परम सक्षम देवता को हो चञ्चल कर सकते हैं, तो दूसरे साधारण मानद को चल तथा सवय क्यों नहीं बना सकते। अथ चापलम्-- मात्सर्यपरागादेवापलं त्वनपस्थितिः। तत्र मसनपारुण्यस्वच्छन्दावरणादयः ॥ ३३ ॥ (चापल) मारसर्प, देप, राग भादि से मन का स्थिर न रहना चापल है। इसमें भर्सना, कठोरता, स्वच्छन्दता, भादि का भाचरण पाया जाता है। यथा विकटनितम्बाया- 'अन्यासु तावदुपमर्दसहामु शर लोल विनोदर मन सुमनोलताम् । | पालामजातरजस कलिकामवाले म्यर्थ कदर्थयसि किं नवमलिकाया' " से विकटनितम्बा के इस पत्र में जहाँ प्रमर की चचलता का वर्णन किया गया है। है, भँवरे, तुम वही दूसरी पुष्पलताओं पर जाकर अपने चचल मन को हलामी जो तुम्हारे मोझे तथा मदन को सह सकें। अरे मूर्स, इस नवमलिता की कोमल (बाला) कली को, जिसमें भमो पराग भी उत्पन्न नहीं हुआ है, भ्यर्थ ही क्यों निगार रहे हो । मरे भमी तो इसके विकास का समय भी नही माया अप्रस्तुतप्रशंसा के दारा क्सिी रागो नायक को जो अप्राप्तयौवना बाग नायिका मोती भौगना घाइता, कवयित्री सचेत कर रही है। रे तुम कहीं प्रौद नापिकाओं के साप जाकर विहार करो, रस भोली-भाली पाला को, पो ममी तुपर्म से भी युक नही दुर्ग, पयों नष्ट करना चारते हो।' ययापा- "विनिकपणरणलठोरदंष्ट्राइकचविशइरकन्दरोदराणि । अहमहमिक्या पतन्तु फोपात् सममधुनैव किमत्र मन्मुखानि ॥ अथवा प्रस्तुतमेव तावत्सुविहित करिष्ये । इति । धन्ये च चित्तत्तिविशेषा एतेषामेव विभावानुभावस्वस्पानुप्रवेशान पृथग्दाच्या । 1 - . . १ मिलाइये-विहारीका प्रसिरदोहा-(ओसी पर की छाया है) नहिं पराग, नहिं मधुर मधु, नहि विकास हिमाल । अटी कली हो यो भाने कौन हवाल ॥ (निदाता) चतुर्य प्रकाश २०३ अपवा, रावगी निम्न उति में- बार-बार पीसने के कारण शद करती हुई कोर डाटों पी करवत से भीषण कन्दरा घाले, मेरे सारे मुंष, गुस्से से, सहमहमिका के साथ (पहले मैं खाऊ, पहले मैं साऊँ) एक साथ ही यहाँ इस वानर सेना पर गिर पड़े। अपना अवसर के अनुरूप कार्य को ठीक तरहसे करूंगा। पूर्वपक्षी इस विषय में यह शायर साना है कि चित्तवृति के तो कई प्रकार पाये जाने हैं, जिनमें से कई का एश्लेए यहाँ नहीं दिया गया है। इसोका उत्तर देते हुए कहते हैं कि इस बात से हम सहमतोकिदशरूपककार के द्वारा निर्दिष्ट चितवृसियों के अतिरिक्त चित्तवृत्तियों भी लोकव्यवहार में पाई भाती है, पर ये सब दही के अतर्गत होकर विभाव था अनुमाव के रूप में प्रविष्ट होती है इसलिए उनका अलग से उक्लेख करना ठीक नहीं समझा गया। (इस समय में पह निर्देश पर देना अनावश्यक न होगा कि भरतसम्मत ३३ सधारियों को हो तभी माचार्या ने गाना। केवल मानुमिथ ने 'रसतरक्षिणी' में 'एल' नामक ३४ ३ सवारी की कल्पना की है। यही के माधार पर हिदी के रीतिकालीन कवि व मालबारिश देव ने भी 'छलका अलग से उल्लेख किया है। पर ऐसा करने पर तो सधारियों की संख्या में अमवस्था हो जायगी, क्योंकि सधारियों की संख्या मनगिनती है। भरतसम्मत २३ सवारी सो पातुन केवल उपलक्षण मान , अन मोटे तौर पर उपलक्षणार्थ यही सरया मान लेना विशेष को होगा। अथ स्थायी-- विरुद्धरधिरुदैर्वा भार्यविच्छिद्यते न या। नात्ममा नयस्यन्यान् स स्थायी लषणाकरः ।। ३४ ।। सजातीयनिजातीयभावान्तरैरतिरस्कृतत्वेनोपनियध्यमानो रत्यादि स्थायी यया पृहरक्यायो नरपानदत्तस्य मदनमधुकायामनुराग तत्तदवान्तरानेकनायिसनुरागैरतिर. स्कृत स्थायी । यया च गालतोमायवे श्मशानाके वीभत्सेन मालत्यनुरागस्यातिरस्कार - 'मम हि प्रास्नोपलम्भसम्भावितात्मजन्मन संस्कारस्थानवरतप्रयोगात् प्रतीयमानस्तद्विस- से प्रत्ययान्तरतिरस्कृतप्रवाह प्रियतमास्मृतिप्रत्ययोत्पत्तिसंवानस्तन्मयमिव करोत्य. न्ततिसारूप्यतर्थतन्यम्' इत्यादिनोपनिबद्ध । तदनेन प्रकारेण विरोधिनामविरोधिना यसमावेशो न विरोधी। सात्विक भाव तथा सधारी माव के विवेचा के बाद स्थायी भाष का विवेचन प्रसङ्गमास दै, पता तसीको पार करने के लिए धननय ने निम्न कारिका गवतरित की- स्थायी भाव को स्पष्ट करने के लिए समुद्र (लवणार) की उपमा ले सकते हैं। समुद्र के अन्तर्गत कोई भी सारा या मीठा पानी मिलकर तनुप हो जाता है। समुन सगस्त वस्तुओं को भारमसात करके, आमरूप ना लेता है। वैसे ही स्थायी भाष भी पाकी सभी भाषों को आरमरूप बना लेता है। स्थायी भाव हम उसे कहते हैं, भो रस्यादि) माव अपने से प्रतिकूल अथवा अनुकूल किसी भी तरह के भाव से विछिन्न नहीं हो पाता, तथा दूसरे समी प्रसिफूल या अनुष्ठ मावों को आत्मरूप बना लेता है। घद रसादि माव जो सगातीय या विजातीय अन्य भावों से तिरकत नहीं हो पाता, स्थायी भाव कहलाता है। जैसे इरफथा में मदनमञ्चका के प्रति नरपाइनदत्त के राग का २७ द० -- दशरूपकम् वर्णन किया गया है, वहीं दूसरे नायकों का भी अन्य नापिकाओं से प्रेम वर्णित है, किन्तु नावाहन के दलथा के प्रमुख नायक होने से उसय रवि भाष, अन्य नायकों के रति मावो से तिरस्कृत नहीं हो पाता। इस प्रकार हत्कथा में समातीय भाव उस रवि भाव को विग्विन नहीं कर पाते हैं। इसी तरह मारतीमाश्व के परम व पE में वर्णित श्मशान का बीभत्स वर्णन, तथा वीमत्स रस माल्ली के प्रति उत्पन्न माधव के रवि माव को तिरस्कृत नहीं कर पाता। इस प्रकार यहाँ स्थायी माव विज्ञानीय या प्रतिकूल भाव के द्वारा मी विच्दिन नही हो पाना । माघन का रनि भाव वीमस के द्वारा विचित नहीं होता, यह माधव की उमौ अङ्क को इस क्ति से स्पष्ट है-'प्राक्तन शान के साक्षात्कार से उत्पन्न सरकार के बार बार प्रमुख होने के कारण मन में प्रतीत होता हुभा, तथा इस शान से भिन्न मरे शानानुमकों के दारा हिसको धारा को रोका नहीं गया है, ऐसी प्रियतमा-स्मृति-रूप-दान को परम्परा मेरी भारमा को बने मालती की वृति में ही परिणत कर रही है। मालतो को प्रकाशित होकर स्मृतिपय का विषय बनाते हुए मेरा चित्त जैसे मालदीमय हो गया है। प्रश्न हो सकता है कि दो मादौ का एक साथ वर्णन (समावेश ) विरोधी शेगा, इसी को बताते हुए कहते हैं कि इस प्रकार महाविभावरूप में अनुकूल या प्रतिकूल माव को सही स्थायी भाव का मन बनाकर समाविष्ट करना विरोधीन हो सकेगा। समाहि-विरोध सहानवस्थाने यायवाभाशे र भयरूपेणापि न तावा- दात्म्यमत्यैकरूपत्वमेवाविर्भावात् । स्थायिनां च भावादीनां यदि विरोधस्तत्रापि न तावत् सहानवस्यानम्-रत्यायुपरने घेतसि सरसूत्रन्यायेनापिरोधिनां व्यभिचारिणी चोप- निवन्ध' समस्तमाक्स्वसवेदनसिद्ध, यथैव स्वसंवेदनसिद्धस्तयेत् काव्यव्यापारसंरम्भे. णानुकार्येप्यावेश्यमान स्वचेतसम्भेदेन तथाविधानन्दसंविदुन्मीलनहेतु सम्पद्यते तस्मान तावद्धावानां सहानवस्थानम् । इली विरोध कीपष्ट करते हुए बताते है:- भावों में परस्पर विरोध दो तरह से हो सकता है। या तो भाव एक ही स्थल पर साय सार्थ नरपात हो (सहानवस्थान), या फिर उनमें परस्पर पायापक भाव हो, अर्थात एक भाष दूसरे भाव की प्रतीति में उपस्थित करता हारिन स विषय में यह राउ प्यान में रखने की हैसियदि उन मारों को मनोति एक रूप में होतो, यदि ये एक- रूप में भावित होते है, तो फिर इन दोनों दशाओं में भी विरोध नही शेण । माद यही कि यदि दोनों मादों को प्रतीति मला मलग हो रही हो, तो ऐसौदण में विरोध हो सकता है, पर उनकी प्रीति मिमितरूप में होने पर विरोध नहीं माना जायगा क्योंकि विरोध होने पर तो मिश्रण हीमोसवेगा। पदि कोई यह कहे कि स्थापी मार्यो कर दूसरेभाको सहारी मावों के साप विरोध हो मला है, नो या नहीं क्योंकि ऊपर बताया जा चुका है कि विरोष दोसी दशाओं में हो सकता है। समारीमाव तया स्थायी भाव में कोई विरोध नहीं क्योंकि तौसाथ साथ अवस्थित रहते ही है,नमें सहानवस्थान बाला नियम लागू नहीं होता। लौकिक भरदार में हम देखते हैं कि रति आदि पार्यों से पुक्क भ्यक्ति के पित्त में चिन्ता आदि यमिधारी मात्र मरिम्स रूप में पाये बाते है। जैसे एक सूत्र में माता बनाते समय कई पुष्प गंग दिये आते है। वैसे ही 'सासूत्रन्याय से रतिभार में कई मभिचारी भी उपनिवर होते है। इस रतिमावयुक्त रित्त में दूसरे व्यभिचारी मागेका बाविमांव होता, पर सधी सारव के अनुमवगम्य है। शक यदीपातइम पात्रय या नाटक के अनुयाय राम, - । क N चतुर्थ: प्रकाश यस मा पा पादः के भारों के विषय में कर सकते हैं। यह पात नहीं है कि काव्य के अनुकार्य रागादि को भावानुभवस्या इमारी व्यावहारिक भावानुमवदशा से सिल होता पाव्य यापार के निधन के द्वारा भाों तथा सवारियों का जो प्रादुर्भाव अनुकार्य रामादि में उपनिकम किया जाता है, यह रस को अलौकिक साबित को मद्ध करने में इसलिए समर्थ हो जाता है कि समादि के वित्त के साथ हमारे चित्त का तादात्म्य हो जाता है। रामादि में उपनिवर स्थायी भाव तथा समारियों का यह सहावस्थान (एक साथ वर्णन ) हमारे पित्त में रस का आविर्भाव करता र अब उन दो मैं सदायस्थान ( एक साथ रहने को अयोग्यता) नहीं है। स्थाया और व्यभिचारी भार एक साथ नहीं रह सकते, ये कैसे माना जा सकता २, योकि सा माना अनुभवावर दोगा। माध्यबाधकमावस्तु भावान्तर या तरतरस्कार सच न स्थायिनामविरुद्धन्यामि चारिभि स्यायिनोऽविरुद्धत्वात् तपामझत्वात्-प्रधानविरुद्धस्य चाहत्वायोगात्, भान न्तर्यविधिलमध्यनेन प्रकारेणापास्त भवति । तथा च मालतीमाधये झारानन्तर वीभत्सोपनिबन्धेऽपि न किचिरस्य तदेवमेव स्थिते विरुद्धरसकालम्वनस्पमय विराधे हेतु, स त्वविरुद्धरसान्तरव्ययघानेनोपनियन्यमानी न विरोधी। । सहानवस्थान के बाद विरोध की दूसरी शर्त है-दाध्यसाधकमाव । जश एक भाव दूसरे भाव का तिरस्कार कर दे, उसकी प्रतीति हो न होने दे, वहाँ उनमें परस्पर रायबाभकभाव माना जायगा। यह बाध्यबायकमा स्थायी भावो अपने अपने परिक्ष यभिचारिया के साथ नहीं होगा। माव यह है कि प्रत्येक स्थायी भाव के कुछ नियत सवारी माने गये है। जहाँ समारियों का स्थायी भाव के साथ समावेश होगा, वहाँ बाध्यापकभाव नही हो सकता । क्योकि सहारा भीव सदा स्थायी भाव क अदा होते है और होने के कारण ये स्थायी भाव के पिरोपी नदी हो सकते। मसीसे विरुद्ध भाव सका न हीनदी सकना, बद उसका अङ्ग बनने के योग्य नही। इस तरह स एव के बाद दूसरे का वर्णन भी विरोधी नही यह बता दिया गया है। भावो का आन तयविरोध भी सीप दिया गया।सोको स करने के लिए मालतीमाभव मानाइसे पौभत्स व हार के दो विरोधी भावा-जुगुप्सा तथा रति-को एक साथ समावेश उदाहत करते हुए बताते हैं। मालतीमाधव में एक बोरगार का वर्णन है, उसी के बाद धीमरख का उपनिवपन किया गया है, यहाँ कोई भी विरोध या रस्य नही है। इनमें परस्पर विरोध न माने जाने का कोई कारण है। दी, विरोधी रसो का एक ही सम्पन को लेकर किया गया निवन्धम विरोध का धारण हो सकता है। मान लीजिये एक हो आउम्मन मालतो- प्रति रति तथा जगप्सा दोनो भावों की प्रतीति हो रखती हो, तो यह विरोध होगा। पर श्मशान की दृश्य के प्रति जुगसा, मालती के प्रति उत्पन्न एति की बाधक नही हो सकती, क्योंकि दोनों भावो, योनों रसों में मालम्पन मिर-मिल है। लेकिन एक ही मालपन के प्रति दो विरोधी रसों मा समावेश कभी कभी भविरुद्ध भी हो सकता है। यदि उन दोनों विरोधी रसों के चमें किसी ऐसे रस का समावेश कर दिया जाय नी दोनों का विरोधी न हो, तो ऐसी दशा में उन रतों में विरोध नही होगी। यथा--'अण्णाहुणाहुमहेलिभहुनुहुपरिमलुमुसुश्रन्धु । गुगुकन्तह भगत्पणभात , फिर गन्धु॥ (नितान्तावास्य श्लोकस्य मया न लिख्यते।) " . s ॥
२१२ दशरूपकम् इयत्र बीमसरसस्याइभतरसान्तरम्यवधानेन भारसमादेशो न विरुद्ध प्रकारा- न्तरेण काश्रयविरोधः परिहर्तव्यः । मनु यौकतात्पर्येणेतरेषां विरुद्धानामविरुद्धाना च न्यग्भूतत्वेनोपादानं तत्र भवत्वन- स्वेनाऽविरोध, यत्र तु समप्रधानत्वेनानेरस्य भावस्योपनिवन्धनं तत्र कथम् ! जैसे "अण्णणामहेलिभ भादि गापा में एक साप बीमत्स रस तथा भारत का समादेश किया गया है, किन्तु महाररस का समावेश करने के पहले बीमत्स रस के भभूत दूसरे रस का, जो दोनों का विरोधी नहीं है-समावेश किया गया है, अतः इसके व्यवधान के कारण पामत्स व हार का एक सार वर्णन विरोधी नहीं है। अथवा एक मामय के प्रति दो विरोधी रसों के समावेश वाला विरोध किसी दूसरे दङ्ग से भी हटाया वा सकता है। इस सम्बन्ध में पूर्वपक्षी एक या उदाता है। वह इस बात से तो सहमत है कि जो किन्ही भी विरोधी या अविरोधी भावों का एक ही तात्पर्य को लेकर (एक विषय में) इस तरह उपनिबन्धन किया जाय, कि दूसरे भाव कुछ निम्न कोटि के दर्शाये गये हों, वे म्पग्भून हो गये हों, वहाँ वे न्यग्भूत माव, प्रधान मार के भदो जाते है, अतः उनमें परस्पर विरोध मही होगा। लेकिन पूर्वपक्षी को इस विषय में सन्देश कि जहा एक साथ कई भाव समान रूप में उपनिर हों, वहाँ भो अविरोध हो रहेगा। इसीलिए वह सत्तरपक्षी से पूना चाहता है कि अनेक मावों के समाधान रहने पर उनका समन्न अविरोपी से रहेगा। इसको स्पष्ट करते हुए परिकार ने पूर्वपक्ष के मत की पुष्टि में ६ पर दिये है, जहाँ पूर्वपक्षी के मत से करें परस्पर विरोधी भावों का समप्राधान्य उपनिषद्ध किया गया है। यथा-'एकत्तो वह पिया अण्णासो समरतूरणिग्पोसो। पेम्मेग रणरसेन अ भस्स डोलाइ हिममम् ॥' (एकतो रोदिति प्रियाऽन्यत' समरतूर्यनिषों । प्रेम्णा रणरसेन च भटस्य दोलायित हदयम् ॥) इत्यादौ रत्युत्साइयो, यथावा- १. युद्ध में जाते हुए प्रिय के वियोग की भाशा से एक ओर प्रिया रो रही है, दूसरी और युद्ध की तूर्य-ध्वनि सुनाई दे रही है। प्रिया के मनुराग के कारण वीर योद्धा का हृदय या चाहता है पर यही रहे, सदने न जाय, पर दूसरी ओर युर का उत्साह उसे रणभूमि में जाने को बाध्य कर रहा है। इस तरह योदा का हृदय प्रियानुराग तथा युमोसार से दोलायित रहा। इस गापा में एक मोर पोरा के इदय में रति नामक स्थायी भाव का चित्रण किया गया है, तो दूसरी और वीर रस के स्थायी मात्र उत्साह का भी समावेश पाया जाता। पैसो दशा में एक ही भाश्रय में दो भावों का समान रूप से चित्रण किया गया। प्रिया प्रतिबनित रवि तथा युद्ध के प्रति बनित उत्साह दोनों इस गाश में समान रूप से प्रधान है, कोई भी एक दूसरे का अङ्ग नहीं है। यहाँ इनमें परस्पर विरोध कसे न होगा! 'मात्सर्यमुत्याय विचार्य प्रार्यमार्या समर्यादमिदं पदन्त । सेया नितम्बा किस भूषणामत स्मरस्मेरविलासिनीनाम् ।। इत्यादौ रविशमयो, यया चार २.हेमानमायो । मात्सर्य को छोड़कर ता अन्यौ तर विचार कर मर्यादापूर्वक इस बात पर अपना निर्णय दीदिये कि लोगों को पर्वतों को दरटियों का सेवन करना पारिप या कामदेव की गानों मे रमणीय विलासिनियों के निवास : । -- रोगा! - . -- । चतुर्थः प्रकाशा यहाँ 'पर्वती को तलइटियों के सेवन के द्वारा समपा निवेद भाव का नया विलासिनियों के नितम्बों के सेवन के द्वारा रति भाव का उपनिबन्धन किया गया है। ऐसी दशा में रति गाव तथा शम भाव दोनों का सममाभान्य स्पष्ट है। यदा मी सनमै मविरोध कैसे होगा। 'इयं सा लोलाशी त्रिभुवनललामकबराति स चार्य दुष्टात्मा स्वसुरपकृत येन मम तत् । इयत्तीय कामो गुपरयमितः प्रीपदहन, तो पेपवायं कमिदमिति भ्राम्यति मनः ॥' इत्यादौ तु रतिरोधयो. किसी नाटक से रावण की उक्ति है:- ३. जर रावण सीता का अपहरण करने माया है, तो सौता तथा लक्ष्मण को देख कर नई सोच रहा है। एक और सो समस्त ससार की अन्दरता का समाना-या चम्बल ऑखों वाली अन्दरी है और दूसरी और यह वही दुष्ट पति मौजूद है, जिसने मेरी बदिन मा भपकार किया है। इस सन्दरों के प्रति तीन कामवासना उत्पन्न हो रही है, और पर इस दुष्ट के प्रति गहान् कोपामि ममलित हो रहौर। और पर मैने रस सन्यासी के वेष की धारण कर रखा है। यह कैसे हो सकता है यह सोच कर मेरा मन किसी निर्णय पर स्थिर नया होती, वह धूम रहा। यहा एकदा मामय में एक साय रति व झोप नामक स्थायी भायों का निबन्धन किया गया है। यह निवन्धन समप्राधान्यरूप में है, क्योंकि मदरी के प्रति रजि, तथा स्वसा के मपकारी दुष्ट के प्रति कोष दोनों ही प्रधान रूप से चित्रित किये गये है। यहाँ रति व कोप का परस्पर विरोध कैसे निराकृत होगा। 'श्रन्त्री कल्पिसमाइलपतिसरा घोहस्तरकोत्पल- म्यको सभूत पिनशिरसा इत्युपडरीकसज, एता. शोणितपकमजुप संभूय कान्तः पिय- नत्यस्थिनेहसुरो कपालचपके प्रीताः पिशाचाहना ।। इत्यादाकामयत्वेन रतिशगुप्लयो, ४.किसी श्मशान का वर्णन है। पिशानिनियों ने अतादियों को गले और हाथ में लपेट रखा है, जैसे उन्होंने मङ्गलसूक्ष पहन रखा हो। उन्होंने अपने कानों में जियों के दायों के काक कमल खोस लिये दे त्रियों के हाथों को कानों में इसी तरह-खोसे हैं, जैसे रमणियों कमल का परवंस धारण करती हैं। सो तथा शिराओं के द्वारा मुसको के हदय के कमलों को पिरोकर उनकी माला बनने पहन रखी। अथवा भानों के मस्तको तथा छाकमलों की माला उन्होंने पहन रखी है। होंने अपने शरीर पर खून के पने फरम को लगा रहा है, इस तरह उत्सव के अनुरूप महल देषभूषा बना कर (मङ्गलमन्त्र पहनकर कमल का भार धारण कर, माला पहन कर तथा काम लगा कर) ये पिशाचों को स्त्रियों अपने प्रिय पिशाचों के साथ प्रसन्न होकर, कापाल के पान पार्टी से परिषस्नेह (पी)को मदिरा का पान कर रही है। यहाँ एक शो आय-पिशाचाहनाओं में एक साथ सम्मान रू, रति तथा अशा दोनों भावों का निबन्धन हुआ है। यहाँ भी इनमें परस्पर विरोध कैसे हो सकेगा। 'एक ध्याननिमीलनान्मुरितं चर्दिसीय पुन' पार्यस्या पदमादमस्तनतटे महारभारालसम् ।। . ." । .
। . हरारूपकम् भन्यदूरविष्टचापमदनरधानलोद्दीपित शम्मोभिक्षरस समाधिसमये नेत्रनय पातु व ॥' इत्यादौ शमरतिकोषानाम् , ५ महादेव समावि में स्थित है। इधर समीपस्थित पार्वती के प्रति उनके मन को चपल, करने के लिए कामदेव बाण मारता है, और महादेव के नेत्र एक साप सुल पड़ते हैं । महादेव के तीनों नेत्रों को विभिन्न दशा का वर्णन करते हुए कवि कहता है कि उनका एक नेत्र तो ध्यान में मग्न होने के कारण मलित (द) है। उनका दूसरा नेत्र पार्वती के मुखरूपी कमल तथा स्तन पर टिक कर हार के बोझ से मठसाया सा हो गया है, मां पार्वती को देख कर उनका दूसरा नेत्र रति भाव का अनुमद कर रहा है। महादेव का तीसरा नेत्र दूर में बैठ कर पनुष को चढायै र कामदेव के प्रति उत्प, क्रोधरूपो भनि से प्रचलित होता है। रेस तरह समाधि के समय महादेव के तीनों नेत्रों में तीन भिन्न भित्र रसों की स्थिति हो रही है। महादेव के ये सीन नेत्र श्राप लोगों को रक्षा करें। पदों एक हो आश्रय-महादेव में एक साथ आम (समाधिविषयक), रति (पार्वतीविषयक), तया कोप (कामविषयक) नतीन भावों का निपम समप्रधान रूप में हुआ है। यहाँ मी शर्म, रति तया कोष में परस्पर कोई विरोध नहीं है यह कैसे माना जा सकता है, क्योंकि इन तीनों में प्रस्तुत विरोध माना जाता है। "एकेनाचगा प्रविततता चीक्षते व्योमसस्थ भानोविम्ब सजलजुलितेनापरेणात्मकान्तम् । प्रहरछेदे दयितविरहाशहिनी चक्रवाकी । हो सकीणी रपयति रसौ नर्तकीव प्रगलमा ।। इत्यादौ च रतिशोकोयानां समापाम्येनोपनिबन्धस्तरकथ न विरोध ६ सूर्य अस्ताचल का नुमेन करने का है। विमान्त को समीर जानकर चक्रवाको समक्ष लेती है कि राजा अपने प्रिय से वियोग होने वाला है। वरास बियोग का एकमात्र कारण सूर्य को ही समझती है। कही यह कुछ देर और ही जाती अस्त होने की बलीयो पदी आखिर यह मुझे शिव से वियुक्त करना क्यों चारताचक्रवाकी मोम से मरेर एक मेत्र से आकाशस्थित पूर्व-मण्डल की भोर-श्री मस्त होने को है- देख रही है। दूसरे नेत्र में मौसमर कर वह खेपने प्रिप को देस रदीर बीमा रातभर के लिए उससे दूर हो जाने वाला है। इस प्रकार सूर्य के प्रशी कोष तथा प्रिय के मावी विरह के कारण धोकमिभित रति इन रो मायो । समार क साथ चक्रवाकी के हदय में हीरntiदिनावसान के समय, प्रिय के विरह की भाशा बासी रकवाकी एक कुशल वकी समान दोमित रसो रौद्र (को) स्याहार (रति) को मिमित रूप में एक सापप्रकर करवित तर एक कुशल मका एक साथ हो परीर क विभिन्न बालों के समान के द्वारा मित्र मित्रासोममना करने में समर्थ होती है तथा यह इसकी कम-निपुणता की उपष्टता है, इसी तरह चकाकी मी, धाम के समय, एक साथ एक-एक के बारा भग भाव को ध्यसमा करती। इस पथ मैं बवाश को मात्रय बना कर एक सार्थ कौर (पर्यविषयक) तथा शौरपूर्ण रति (कान्तविश्यक) का समावेश किया पंथा । बसोडिने प्रतिकार का नोकि यह रवि, गोकसया कोर तीनों का पनिषचन प्रधान सेना समान रूप से हुआ। 1 .
. I - चतुर्थः प्रकाशः रसीद में इस पत्र में मिबद्ध रति, शौक सपा कोप में परसर विरोम विस तरह नहीं माना जायगा। पूर्वपक्षी ने उपयुक्त छ पों के बार ऐसे स्थल उपस्थित दिये, आदर्श उसके मतानुसार पफ साय कई मिन मावों का समप्रधानरूप से समावेश किया गया है। ऐसी दशा में इनमें विरोप है या नहीं। पूर्वपक्षी वर्ष ती यही विशेष से स्वीकार करता है। इसी का घर बैते दर, पूर्णपक्षी मीशा का परिदास करते हुए सिकार धनिक नहीं पक्षों को एक-एक लेवर सिमान्तपक्ष को प्रतिष्ठित करते है। ॥ भनौच्यते--अत्राप्यक एवं स्थायी, तथा 'हि-एकत्तो' रश्रइ पिया' इत्यादी स्यायोभूतोत्साहव्यभिचारिलक्षणपितभावहेतुसन्देहकारणतया कणसभामृतूर्ययोरुपादान धोरमेव पुष्णातीति भटस्येत्यनेन पदेन प्रतिपादितम् । न च यो समप्रधानयोरन्योन्य- मुपायोपकारकभावरहितयोरेकनारयमावो युज्यते, किचोपरान्ते संमामे सुभदाना कार्यान्तरकरणेन प्रस्तुतसंभागोदासीन्यन महदनौचित्यम् । अतो भर्नु संपामफरसियतया सौर्यमेव प्रकाशयन् प्रियतमारणो वीरमेव पुष्णाति । इस विषय में हमारा यह तर में भी ध्यान से देखा जाय ती रथायी माव दोन दोरर एक ही है, चाहे वे दो या अधिक दिखाई देते हों। इन पर्यो में प्रधान स्थायी भाव एक ही नित्रित किया गया है, अन्य भाव उपके की महरूप में उपनिवड दिये गये। रथा उन भावों का समाधान्य मानना औक नही करेगा। इस मत को रपट करने के लिए पूर्वपक्षी उपयुदत छ हो उदाहरणों को एक-एक कर लिया जा सकता है, तथा उनके भयोलोचन से यह मत और अधिक पुष्ट हो जाता है। सबसे पहले एकचो मारिमा रस माली गाय को ले लीजिये, जहाँ भट में एक साथ प्रियानुराग (रवि) या दुबोसारमा सबार हो रहा है। क्या यशदोनों का समप्रधान्य। नदी।इस गाथा का प्रधान स्थायी भाव पत्सार, इस उत्साह स्थायी भाव मा वितर्क नामक व्यभिचारी भाव का समावेश किया जाता है और इस वितर्क का कारण भट का पद सन्देश कि बसे यहाँ रहना चाहिए या जाना चाहिए। योद्धा के हृदय का संथमारत हो माना वितक का कारण है, तथा वितके नामक व्यभिचारी उत्साह का बड़ा मन कर आया है। साथ ही गाथा में एक और प्रिया के करुण रुपन तथा दूसरी और युद्धतूर्य का निवन्धनं हुआ है, ये दोनों वीर रस को ही पुष्ट कर रहे हैं। दो भिन्न उपकरणों-करामवन तयों पुरवा का उपादान इसीलिए किया गया है कि यही तो थौदा के दरय को दोशापित करने वाला है, उसके हाय मैं सन्देश गएन करने वाला है, अतः करुण रदन तया युद्धाम दोनों एक ही स्य-साहसायी भाव के साधन । माया में 'म' सप्रयोग हुमा (मसाप दोलाइ दिनसम्), जिसका अर्थ है वीर योगा। इसलिए प्रकरण में धीर1 धोरा के उनित उसार स्थायी भाव को ही प्रधानता प्रतिपादित है। और अधिक स्पृष्ट मरते हुए हम कर सकते हैं कि वीर योगा के हृदय में केवल मन्देइ भर हुआ है, उसने जाने जाना छोड नहीं दिया है, भद्रः छरसाई को ही प्रधान मार तथा दौर को ही बड़ी रस मानना होगा। २. वस्तुत: इस पप मैं दो ही मावों का समावेश है-ति तथा बोध का शौक की अथग के माद मानना ठीक न होगा। पइ तो भविष्यत् विप्रलम्म हार के स्थायी भाव रवि में अन्नमांचित हो पाता कारके दो सङ्गीणौ रचयति रसौ से मी यही सिद्ध होता है। ।
२१६ शिरूपकम् पूर्वपक्षी इस बात पर ज्यादा जोर देता है कि दोनों मार समप्रधान रूप से उपनिवर किये गये है। इसीका उचर देते हुए दृधिकार बनाता है कि यदि यही दो माव समप्रभान है तो इसका अर्थ यह है कि वे एक दूसरे के टपकारक नहीं। समप्रधान होने पर उनमें उपकार्य- उपकारक-माव माना हो नहीं जा सकता । ऐसी दशा में उनका समावेश अलग अलग वाक्यों में करना हो ठोक होगा। जब वे दोनों एक दूसरे के साथ सम्बर ही नहीं है, दोनों रामान रूप से प्रधान है, तथा एक दूसरे से स्वतन्त्र है तो उनका एक ही वाक्य में प्रयोग ठीक नहीं है, ऐसा करना दोष ही होगा। हो, एक भी माव के उपकारक अङ्गभूत भावों का वर्णन एकरी वाश्य में करना ठीक है । ऐसी दशा में यदि यहाँ दोनों मावों का समपधान्य मान लेते ₹ तो ऐसा समावेश दोष होगा। वोर पुरषों का युद्ध के उपस्थित होने पर किसी दूसरे काम में फंस जाना तथा सग्राम के प्रति सदासीन हो जाना बहुन अनुचित है। ऐसी दश में वीर पुरुष का पुर के उपस्थित होने पर,मो प्रियानुराग के प्रति महत्स देना भनुचित ही माना जायगा। इसलिए प्रिया का करुगविप्रलम्भ एक तरह से वीर योद्धा के संग्रामप्रेम तया शौर्य को ही प्रकाशित परता है तथा वीररस की दो पुष्टि करना है। इस पर स्पष्ट है कि 'एकचो रुमा पिसा' इस गाथा में प्रमुखता धीर रस तथा उत्साह भाव की ही है, प्रियाविषयक विप्राम्भ (करणविपरम्म) इसौका भन्न तथा पोषक भाव है। एवं मात्सर्यम्' इत्यादावपि चिरप्रवृत्तरतिवासनाया हेयतयोपादानाच्छमकपरत्वम् 'चार्या समर्यादा' इत्यनेन प्रकाशितम् । दूसरे उदाहरण मात्सर्पमुत्सार्य बादि पच में भी यही दशा है। वहाँ भी दोनों भाद- शम तथा रति-समप्रधान नहीं हैं। यहाँ भी चिरकाल से प्रवृत्त कामवासना सथा रति को उज्य सपा नगण्य बढाने के कारण शम होपो प्रधानता सिरदोती। कवि यहाँ शम मार कोरी प्रधान मानता है और 'आर्या समाद इस पददय के द्वारा उसने साफ पता दिया। कि वह इस बात का निर्णय पदव को समटियाँ अच्छी है, पा रमणियों के नितम्म, पूज्य सम्मान्य व्यक्तियों से ही पूछता है, तथा इसका मर्यादित निर्णय सुनना चाहता है। यह इस पात का प्रकाशन करता है कि यहाँ रति मार शम मार काही पोषक है। एवम् 'इयं सालोलाशी' इण्यादावपि रावणस्य प्रतिपक्षनायकतया निशायरत्वेन मायाप्रधानतया च रौद्रव्यभिचारिविषादविभाववितकहेतुतया रतिरोधयोपादानं रौद्र- परमेव । 'अन्न कल्पितमालप्रतिसरा' इत्यादौ हास्यरसैकपरस्वमेव, 'एक ध्याननिमील. नान्' इत्यादौ शम्भोर्भावान्तरलाक्षिप्ततया शमस्थस्यापि योग्यन्तरशमाइलाण्यप्रति. पादनेन शमैकपरतव 'समाघिसमये इत्यनेन स्फुटीकृता । 'एकेनाक्ष्णा' इत्यादी तु समस्तमपि वाक्यं भविष्यदिनलम्मविषयमिति न क्वचिदनेवतात्पर्यम् । तीसरा दारण 'र्य सा टोलायो' रावण की उक्ति है। इसमें एक साथ रति तथा कोष, इन दो मावों का समावेश किया गया है। पूर्वपक्षी वहाँ इन दोनों भारों का समप्राधान्य मानना है किन्तु रावण के विषय में यह ठीक नहीं जान पड़ता। रावण पहले तो प्रतिपक्ष नायक सरे वह राक्षस है, तीसरे मायावी है। इन सब सों को देखने से पर पता घनना है कि यहाँ का बड़ा रस रोद्रोहै।रौद् रस के म्यमिवारी भाष विवाद का, तथा इसके (विरार के) मालमन सोता रमण के लिय में उपत्र वितर्क के बारा रति तथा कोपनदो भाषा का समावेश हुमा है।बत 'क्या किया जाय, एक भारतीय सुन्दरी, दूसरी और यह उपमा, तथा दोनों विमित्र भावों के मालम्पन है। यह विक रौद्र रस की चतुर्थः प्रकाशः हो पुष्टि करता है । इस तरह रति माव भी रौद्र रस का ही पोषक दै तपा उसी का मन है। 'य सा लोडाक्षी' सपथ में क्रोध ही प्रमुख स्थायी मात्र है यह स्पष्ट है। चौधे उदाहरण में, पिशाचिनियों का वर्णन करते हुए कवि ने एक साथ बीमस व शृङ्गार का समावेश 'अन्दै कस्पितमहलपतिसत इस पत्र में किया है । यहॉ मी जुगुणा तथा रति भाव का समप्राधाना नहीं है, जैसा पूर्वपक्षी मानता है। यहाँ पर तो पिशाचिनियों को हास्यरस का यालाइन बनाया गया तश जुगुरसा व रति दोनों उसके आज बने हुए हैं। 'भा, पिशाचिनियाँ विष ठार से सजधज कर उत्सव में सम्मिलित होती हुई पानगोष्ठी का मनुभव कर रही है। यह व्यइस पिशाचिनियों के प्रति दास भाव को प्रतीति करा रहा है। मत पूर्वपक्षी की शङ्का का पहो भी निराकरण हो ही जाता है। यहाँ भी केवल एक ही अर्थ प्रधान , वह दै हास्य रस तथा उसका स्थायी हास । पाँचवा उदाहरण 'एक थाननिमौर नात' आदि है। इसमें रति, शम तथा शोध इन मादौ की स्थिति वर्णित की गई है। यहा मो पूर्वपक्षोन तीनों का समप्राधान्य मानता है। यहाँ महादेव के वर्णन में समाधि के शम भाव के अतिरिक्त दूसरे भागों का समावेशासलिए किया गया है कि कपि यह बताना चाहता है कि समाधिस्य होने पर भी महादेव को श्रम भाव की अनुभूति साधारण योगियों से विलक्षण है। इसलिए इस सार पध में शम ही प्रधान है, या रति माव व कोष दोनों भाव शमपरक दी है। पकनाराणा प्रविततरषा सबके उदाहरण में क्रोध, शोक तथा रति माद का समावेश है। यहाँ भी इन तीनों का समप्राधान्य नहीं माना जा सकता। सारे पद्य का एक ही विषय है और पद यह कि शाम के समय बाकी अपने प्रिय के भावी वियोग की बाराशा से दुखित हो रही है। ऐसी दशा में समस्त बास्य गावी विप्रलम्भ का हो सूचक है। इसलिए कोष या शेक के अर्थ का कोई अलग तात्पर्य नहीं निकलता। शोध (सूर्यविषयक) तथा शोक दोनों रति केही भाग जाते है। श्रा यहाँ भी प्रधानता एक ही माव की सिद्ध होती। यत्र तुपादिवाक्येषनेक्तात्पर्यमपि च वाक्याभेदेन स्वतन्त्रतया चार्थम्पर- तित्यदोष' 1 यथा--- कुछ ऐरोमो स्मल होते है, जो एक ही वाक्य के द्वारा अनेक तात्पर्यो यो गति होती है। पैसे स्थलों पर दो भिन्न भावों का एक साथ समावेश पूर्वपक्षी दोष माने, तो उसका निराकरण करते र कृत्तिकार कहते है कि जिन स्थलों में श्लेष आदि से बनेकार्थ वापयों में का तात्पयों को प्रतीति होती है, वहाँ उसी वाक्य के अलग-अलग प्रतीत सापया स्वतन्त्र है, वे एक दूसरे से संस नहीं है, बत उनमें दो अर्थ माने जायेंगे । ऐसी दशा में उनमें दोष नहीं रहेगा। भाव पर कि इलेप के द्वारा एक ही वास्य से ही या अधिक अयों की प्रतीति होगी। जहाँ इन दोनों अयों में अपमानोपमेयामाबादोगा वहाँ तोलपमेयपक्ष वाले अर्थ १. इसी सम्बन्ध में एक उदाहरण और लिया भा सकता है- फपी बनक्या करिकलभातधुतिमपि स्मरस्मरस्कारोडुमरपुरुफ ववकमलम् । मुडः पश्यावृण्वन रजनिचरसेनाकलकल जगज्यपाधि द्दयति रघृणा परिवृद्ध । (इस पद के अनुवाद के लिए देखिये द्वितीय प्रकाश में माधुर्य का उदाहरण) यहाँ पर राम में एक और रति तथा दूसरी और उत्साह का वर्णन क्यिा गया है। कपर कि 'एक्सी मा आदि गाथा को भौति यही मी उसाइको प्रमुख मा मानना टीका होगा । रति भाव महापौर रस का हो पौषक अग है, यह स्पष्ट है। (अनुवादक) २८ २१८ दशरूपकम् को प्रधानता सिर हो ही जाती है । यदि दोनों ही अर्थ स्वतन्य है, तो फिर तचर प्रकरण में तच अर्थ की प्रधानता सिद्ध हो सकती है। इस तरह श्लेषादि के द्वारा दो या अधिक भावों का एक साथ समावेश विरुद्ध नही होगा श्लेष के एक उदाहरण को लेकर इसे स्पष्ट करते हैं- 'लाघ्याशेपतनु सुदर्शनकर सर्वाशलीलाजित- प्रैलोक्यों चरणारविन्दललितेनाकान्तलोको हरिः । विभ्राणां मुखमिन्दुसुन्दररचं चन्द्रासचभुर्दघत् स्पाने या स्वतनोरपश्यदधिको सा रुक्मिणी घोऽवतात् ॥' इत्यादौ । तदेवमुक्तप्रकारेण रत्याद्युपनिवन्धे सर्वप्राविरोधः । यथा वा धूयमाण- रत्यादिपदेष्वपि वाक्येषु तत्रैव तात्पर्य तथा दर्शयिष्याम । जर कृष्ण ने रुक्मिणी को देखा, तो उहें पता चला कि वर उनसे भी अधिक सुन्दर है, उनके भी शरीर से अधिक है। कृष्ण का तो केवल हाय ही पुन्दर (मदर्शनकर) है, (के हाथ में उर्शन चक्र है, लेकिन रक्मिणी का समस्त शरीर मतीद प्रशसनीय तथा रमणीय है । कृष्ण ने ससार को केवल चरणारविन्द को ही सुदरता से जीता है, अर्थात उनका केवल चरण हो ललित है, जो सुदरता में ससार की होड कर सके. (कृष्ण ने वामनावतार में चरणकमल के द्वारा सारे लोकों को नाप लिया है, लेकिन रुक्मिणी ने सारे मंगों की शोभा से तीनों लोकों को जीत लिया है। कृष्ण की देवल भाँख ही चद्रमा के समान है, की सारा मुंह कुरूप रे,(कृष्ण परमात्मा के अवतार होने के कारण, उनका वाम नेत्र पद्रमा है); लेकिन रुक्मिणी सुन्दर कान्तिवाले मुख-चन्द्र को धारण करती है। इस तरह कृष्ण का केवल छाप ही सुन्दर है पाँव दो गौमामय है, तथा भाख हो चतुल्य है, जबकि रुक्मिणी फा पूरा शरीर सुन्दर है, उसके सारे अग शोमा से तीनों लोकों को जीत लेते है, तथा उसका पूरा मुख चन्द्रमा जैसा है, इसलिए कृष्ण रुक्मिणी को अपने से अधिक पाते हैं। बह रुक्मिणी जी कृष्ण से अधिक सुन्दर तथा उत्कृष्ट है, आप लोगों की रक्षा करे। स्यादि उदाहरणों में वाश्या अनेक पाये जा सकते हैं, पर उनके दो अर्थ होने के कारण भदोष ही मानना होगा। इस तरह से उपर्युक्त प्रक्रिया से कान्य में रति भारि स्थायी मावों के स्पनिरन्धन में विरोध नहीं आता । इस विषय में यह भी पूछा जा सकता है कि नहा रत्यादि पदो का काव्य में प्रयोग होता (रत्यादि पद अभूयमाण होते हैं), 'वहाँ भी तात्पर्य रति आदि मावों में दौरोता है, क्योंकि विभाव आदि साधनों के कारण हो भावों का भाक्षेप होता, पदों के साक्षात प्रयोग के कारण नहीं। रत्युत्साहजुगुप्साः मोधो हासा स्मयो भयं शोका। शममपि केचित्पाहुः पुटिनाटयेपु नैतस्य ॥ ३५॥ ये स्मायी भाव भाठ होते हैं। रति, उत्साह, जुगुप्सा, कोष, हास, स्मय, भय तथा शोक । कुछ आचार्य शम जैसे नवें स्थायी भाव को भी मानते हैं, किन्तु इस भाष की दुटि नाव्य (रूपको) में नहीं होती। हमारे मतानुसार यह भाव माव्यानुकूल नहीं है। मत नाशाख की रष्टि से स्थायी भाव केवल आठ ही है। पाम जैसे मवे स्थायी भाव सपा उसके रसदान्त-को अलग से मानना हमें सम्मत नहीं। १ यो पदमी म हो सकता है कि जहा रत्यादि पद का काव्य में साक्षा प्रयोग (भूयमाण) होता है, वहाँ भी तात्पर्य (फिर से) उन्ही भाओं में शेगा। 10 २१६ पतुः प्रकाशः (इस प्रकार धनजम के मत से मार, धौर, चौमरस, रोद्र, दास्य, अमन, भयानक तथा पक्षण दे आठ ही रस होते हैं। उसे शान्त रस स्वीकार नहीं, क्योंकि यह रूपकों के अनुपयुक्त है।) इह शान्तरां प्रति घादिनामनेरविश विप्रतिपत्तय , तन केचिदातु -नास्त्र शान्तो रस तस्याचार्येण विभावाद्यप्रतिपादनालक्षणाकरणात् । अन्ये तु वस्नुतस्तस्यामा वर्णयन्ति-अनादिवालप्रवाहायातरागद्वेषयोच्छेत्तुमशक्यत्वात् । अन्ये तु वीरवीभत्सादा- पन्तर्भाय वर्णयन्ति । एवं पदन्त शममपि नैच्छन्ति । यथा तथास्तु । सर्वथा नाटका- दामिनयारमनि स्थायित्वमस्माभि शमस्य निषिभ्यते, तस्य समस्तथ्यापारपरिणय- रूपस्याभिनयायोगा। शान्त रस के विषय में विज्ञान के कई मिन भिन्न मत पाये जाते है। शान्त रस के विरोधी इसका निषेध से करते है। कुर लोगों का कहना है कि शान्त सारस है हीनदी नाट्यशास में आचार्य भरत ने केवल शारादि माठौरसों के विसावादि साधनों का वर्णन किया है। नादयशाल में शान्त रस फेन तो विभावादिश वर्णित है, न उसका समण ही दिया गया है। ऐसी दशा में यह स्पष्ट है कि गुनि गरस शान्त नया रसनही मानते। यदि शान्त यो मसग से रस माना जावा, या १६ रस होता, तो मरत उसका वर्णन अवश्य करते । शान्त को अलग रस मानना प्रस्थानविरुष तथा बाचार्य भरत के मत के प्रतिबाल है। मत शान्त जैसा रस नहीं है। दूसरे लोग उसका वास्तविक अभाव मानते हैं। पहले मत या तो केवल नाव्य में (या चाय में मी) उसकी सचा नहीं मानते, पर ये दूसरे मतावलम्बी शम की शता भ्यावहारिक क्षेत्र में भी नही मानते । की दलील है कि शान्त रस वो स्थिति तमी यो पाती है, जब कि व्यक्ति के राग-देष का नाश हो जाय । राग तथा देष मनुष्य में अनादि काल से चले भा रहे है, मन उनको भारयन्तिक निवृत्ति होना असम्भव है। जप अनादि काल से चले भाते हुए राग-द्वेप का माश असमय है तो फिर शान्त रस कैसे परिपुष्ट हो सकता है। कुछ लोग ऐसे मोहै, जो शम या शान्तपरक चिक्षिी स्थिति तो मानते है, पर से अलग से स्थायी भार नहीं मानते। उनके मतानुसार शम को वीर दीभत्स आदि में मन्तावित किया जा सकता है। यथा संसार के प्रति घृणा, मो शम का एक तत्व बीमत्स के अन्तर्गत भा जाता है, इसी तरह अनश्वर परम तत्व के प्रति उन्मुखता वीर के स्थायी उत्साह का अङ्ग बनाता है। इस तरह शातको माग से रस नहीं माना जा सकता। जा ये तीनों मत वाले विद्वान् शान्त रस को ही नहीं मानते तो उसके स्थायी भाव कम धो कैसे स्वीकार करेंगे। इसलिए वे शम की भी इच्छा नहीं करते। र उनका मत कुछ भी हो, तथा लोषिक रूप में उम को माना जाय पान माना जाय, इससे हमें कोई मतलब नहीं। हम लोग तो यह गान कि शम स्थायी (शात रस ) रूपक (मभिनय) के सर्वथा भानुपयुक्त है। नारकादि रूपों में अभिनय की प्रधानता है, अभिनय ही इन रूपको की मात्मा है। अत अभिनयपरक रूपों में हम शम का निये सचमुन में कर रहे है। इसका खास कारण यह कि शम में व्यक्ति की समस्त छौकिक प्रक्रियाओं का लोप हो जाता है, (एक वीतराग समाथिदशा शम में पाई जातो)। इस प्रकार की दशा का अभिनय करना असम्भव है। इसलिए अभिनय की मशक्यता के कारण ही इम नाटकादि मैं शम स्थायी की स्थिति स्वीकार नहीं करते। यतु विभागानन्दादौ रामस्य स्थायित्वमुपवर्णितम् , तु मध्यवस्यनुगगेणा- .
२२० दशरूपक घन्धप्रवृत्तेन विद्याघरचकववित्तप्राप्या विरुद्धम् । न कानुनाविभावालम्वनौ विषया- नुरागापरागावुपलब्धौ, श्रतो दयावीरोमाइस्यैव वन स्थायित्व तत्रैव भारस्यारत्वेन चक्रवर्तित्वावाप्तेष फलत्वेनाविरोधात् । ईन्सितमेव च सर्वन कर्तव्यमिति परोपकारप्रवृत्तस्य विजिगीषोर्नान्तरीयकत्वेन पल सम्पद्यत इत्यावेदितमेव प्रात् । अतोऽटादेव स्थायिन । कुछ लोग (पूर्वपक्षी) रचित नागानन्द नाटक में शत रस मानकर उसका स्थायी शम मानते है, वह ठीक नहीं है। नागानन्द नाटक में सारे प्रबन्ध में आरम्म से अन्त तक जोमूतवाहन ( नायक) का मलयवती के प्रति अनुराग निगाहा गया है, तथा उसे अन्त में विद्यापरचक्रवर्तित की प्राप्ति होती है। ये दोनों ही गाते शम के विरुद्ध पड़ती है। शम की स्थिति में अनुराग का वर्णन तथा बाद में किसी लौकिक फल की प्राप्ति होना विरो। शम में तो व्यक्ति विषयों से विमुख राता है, तथा किसी लौकिक पल की रुघा नही रखता, पदि उसे कोई इच्छा होती भी है तो वह पारसौकिक पल (मोक्ष) कीहो। इसी दशा में नागानन्द का स्थायो भाव शम से हो सकता है। एक ही अनुकार्य जीमूतवाहनादि के विभाव तथा मालम्बन एक साथ विषयानुराग (विषय के प्रति आसक्ति), तथा विषयापराग (विषयों से विरक्ति) दोनों नहीं हो सकते। या तो उसमें विष्यासक्ति ही हो सकतीया विषष-विरक्ति हो । जीमूतवाहन में विषय राग स्पष्ट है, अत विषय-दिरक्ति रूप शम नहीं हो सकता। तो फिर नागानन्द का स्थायी क्या है ? या प्रश्न सहज ही उपस्थित होता है। इसी का उत्तर देते हुए पृधिकार कहते है कि इस नाटक में वीर रस का स्थायी साइश स्थायी भाष साह को स्थायी भाव मान लेने पर मलयवती विषयक प्रेम (महार ) उसका मापन जाता है तथा चक्रपतिस की प्राप्ति भी उसका फल हो जाता है। इस प्रकार उत्साए स्थापी भार का गभार तथा ऐहिक पल प्राप्ति से कोई विरोध भी नहीं पडता। बो भी कुछ किया जाता है उसकी राधा अवश्य होती है, सारे कर्तव्य ईप्सित होते है, इसलिए परोपकार में प्रवत वीर को, जो दूसरे लोगों को परोपकारादि से जीत लेना चाहता है, फल प्राप्ति होना तो भावश्यक हो है, पर हम पहले ही दिनीयप्रकाश के शोरोदात्तनायक के प्रकरण में बता चुके हैं। ननु च- 'रसनाइसलमेतेपो मधुरादीनामिवोत्तमाचार्य । निर्वेदादिप्वपि तस्यकाममस्तीति तेऽपि रसा ॥' इत्यादिना रसाम्तराणामप्यन्यैरभ्युपगतत्वात् स्यायिनोऽप्यन्ये कल्पिता इत्यद- धारणानुपरति । इसलिये यर स्थित है कि केवल माउरो स्थायी भाव है। पूर्वपक्षी को इस संख्या (माठ) के अवधारण पर भापति है। दर कहता है कि नि आदि भावो की भी रस मानना ठीक होगा। नाटकादिम निर्वेदादि मावों का आवार किया हो जाता है, उनको चर्वणा ठीक उसी तरह होती है, जैसे रस्यादि स्थायी भावों को। भास्वार विषय होने के कारण मधुर, अम्ल आदि रस कहलाते है, क्योंकि उनका (सन (वार) प्राप्त किवा बाता है। यह (सन निवारि मानों में मौ पूरी तरह मौजूद है, इसलिए ये मोरसाइनको रस मानने में कोई मापत्ति नहीं होनी चाहिए। 'म अहिले सार) कर विशनों ने दूसरे रसों को भी स्वीकार किया रे, भोर रस तरह उन एन रसों के दूसरे स्थायी माव की मी करपना होनी है। मत धनभय का कारिका में केवल भाठामद गिमानासपा प्रतिकार का भी 'मटायेइस तरह सलाका भचारण करमाक नहीं चतुर्थः प्रकाश २२१. - बैठ पाता । उन दिनों से यह मत विरुद्ध जान परता ससी पूर्वपक्ष रूप शंका के करते हुए पनज ने आगे की कारिका अवतरित की है:- अयोच्यते- 'निर्वेदादिरतादूयादस्थायी स्वदते कथम् । परस्यायध तत्पोपस्तेनाप्टी स्थापिनो मताः ॥ ३६॥ इस पता पुके हैं कि स्थायी भाव यह है जो विरुद्ध या प्रविष्ट भावों से विधि नही हो पाता, यह समुद्र की तरह उन्हें भारमसात् कर देता है । यह सादूप्य (इस घरह से विरुद्ध या अविरुण भावों से विभिन्न न होने का गुण) नियंदादि में नहीं पाया माता भितः स्थाची की दातें पूरी न उतरने से निर्वेदादि को स्थायी कैसे मान सकते हैं, तथा उनकी सर्वगा फैसे हो सकती है। यदि निरंदादि की काम्य' नाटकादि में पुष्टि होती भी तो यह रस के स्थान पर पैरस्य (रतविकार) उत्पन्न करेगी। अतः उन्हें रस के स्थापी नहीं माना जा सकता, इसी लिए हमने पाठ ही स्थायी माने हैं। (अताया विरुद्धाविरुद्धाविदित्वस्य निर्वेदादीनाममावास्यायित्वम् , अत एव ते चिन्तादिस्वस्वव्यभिचार्यन्तरिता अपि परिपोपं नोयमाना परस्यमानहन्ति । न च निष्फलावसानवतेपागस्थायित्वनिवन्धनम्, हासादीनामप्यस्थायित्वसमाव । पारम्पर्येण तु निदादीनामपि फलपत्वात् , भतो निष्फलत्यमस्यागिसे भयोजन भवति किन्तु विरुद्धरविरविरतिरस्कृतत्वम् । न च वनिर्वेदादीनामिति न ते स्थायिनः, ततो रसत्पमपि न तेषामुच्यते श्रवोऽस्थायिलादेवतेपासरराता। स्थायी भाव की सबसे बड़ी विशेषता यह कि वह विरोधी सथा अविरोधी भारों से विच्छेदित नही होता। निर्वेदादि भाव दूसरे भावों से विछिन्न हो जाते है इसलिए हम 'रिव्यविश्वविदितनी माना जा सकता। इसके अभाव के कारण बिर्वेदादि स्थायी मी नही बन सकते । कुछ कापि लोग निवेदादि के साथ चिन्ता आदि अपने-अपने विरोधी ध्यमिचारियों का समावेश कर काव्य में उनको पुति कराते हैं, जिन्तु बहो ये पुष्ट नहीं हो. पाते । चिन्तादि समारियों के द्वारा दूसरे विरोधी रसों से अलग कर दिये जाने पर मी निर्वेदादि की पुष्टि रा में स्थान पर वैरण ही उत्पन्न करती है।जो चर्वणा सहदयों को मारादि (रत्यादि) के परिपोष से दोती है, तथा जो मानन्द सरितका गुभव इनसे होता है, वह निर्वेदादि से नहीं। यदि कोई यह कई कि निवेदादि माओं का मस्त (परिणाम) फलरदित इसलिए उनको स्थायी नहीं माना जा सकता, तो पहरात नहीं है। निफावसानस के हो कारण इनको स्थायी न मानने पर तो हास आदि मार्यो को भी स्थायी नहीं मानना पडेगा। हास भादि मावों के परिणाम मोपलादित है, क्योंकि इसके माधय को मनोरजन के अतिरिक्त ऐरिकाया पारलौकिक पल प्राप्ति नहीं होती। और थान से देखा जाय तो निवेदादि मौपाकरहित नही है क्योंकि।निर्वेदादि किसी न किसी स्थायो के मन का आते है। यह स्थायी फारहित नहीं होता। इस पर परम्परा से मील कलयुज हो । पाते हैं। इसलिए को भी मार निष्फल है; वेस्थायी नहीं है, यह कोई नियम नही फलरहितता को हम पायोन मानने का कारण (प्रोजक) नहीं मानदे। यदि किसी मार को स्थायी घोपित न करने का कोई कारण है, तोवर। केवल यही कारण हो सकता है कि अमुक मार विरोयो तथा अविरोधी भाशे से रिस्कृत हो जाता है। विरोधी तथा विरोपी भावों से निरस्लम होना ही यह प्रसौटी है जिस पर भाव के स्थायिल को परख होता है, . . २२२ दशरूपकम् यही सप्तका प्रयोजक है। निर्वेदादि मानों में यह बात नहीं पाई जाती, भता वे स्थायी नहीं है। जब ये भाव ही नहीं तो उनके रस (शान्तादि) मी नही हो सकते, बहे निदादिष्वपि तव काम मरतीति तेऽपि रसा'के भार पर रस मी मही कहा जा सकता । जब इनमें से कोई भाव स्थायी नहीं तो वे रस भी नहीं है। अत स्पष्ट है कि स्थायी भाव तथा उनके रस माठ ही है। खायी भावों व रसों का निर्धारण हो जाने पर, उनको सल्या नियत कर देने पर, एक प्रश्न उठना स्वभाविक है, कि रसव स्थायों का काव्य-नाटक से क्या सम्बन्ध है। काव्य या नाटक के द्वारा रस की प्रतीति किस तरह से, किस प्रक्रिया से, कौन से व्यापार से रोती है। इसके विषय में विद्वानों के कई मत है। धनत्रय प धनिक के रोिपी मों में प्रमुख मत ध्वनिरादियों का है जो रस तथा कान्य में व्यासन्यजक भाव समध मानते १. वया रस समय के लिए भभिधा, लपणा तथा तात्पर्य इन तोन वृत्तियों (शम्दक्तियों) से भिन्न तुरीया पूति-यजना-की करेपना करते हैं।' धनिकार तथा आनन्दवर्धन दोनों ही रस की बाव्य, लक्ष्य या तात्पर्यार्थ मानने से सहमत नहीं, वे इसे भमियम मानते हैं । धनजय तथा धनिक मीमासक हैं, वे अभियावादी है, तथा लोडर के दीपदीर्घतराभिधान्यापार को भी मानते है जहाँ अभिधान्यापार बाण की तरह काम करता माना गया है--सोयमिपारिव दोदोर्पतरोमियान्यापार । स्थायी माव तथा रस की प्रतीति को वे तात्पर्य या वाक्याथ ही मानते है। इसलिए सनिवादियों की भ्यशना या उसके मापार पर रस या भाव की यासता का खण्डन करने के लिए वृत्तिकार 'वाच्या प्रकरणादिम्योपस कारिका के पहले ध्वनिवादी के पूर्वपक्षी मत यो विशद रूप से रखना है, जितके उत्तर में रस कारिका में धनजय ने अपना सिद्धान्तपक्ष प्रतिष्ठापित किया है।] क पुनरेतेपो पाव्येनापि सम्बन्ध न तावद्वात्यवाचकमाव' स्वशन्दैरनावेदि- तवाद , नहि शारादिरसेपु याव्येषु शारादिराम्दा रत्यादिशन्दा चा धूयन्ते येन तेषां तत्परिपोषस्य पाभिधेयत्वं स्यात् , यत्रापि च धूयन्ते तत्रापि विभाषादिद्वारकमेय रसत्वमेतेषा न स्वशब्दामिषेयत्वमाण । प्रश्न होना स्वाभाविक है कि स्थायी भावों तथा उनके रसों का काध्य से किस प्रकार का समन्ध है। यह तो स्पष्ट कि कान्य (नाटकादि) के दीदारा-देख कर (या सुनकर) सदस्य रस की चर्वण करदे है, किंतु रस चर्वणा काव्य का साक्षाच अर्थ, वाच्यार्थ , रुपया है, भयरा इससे मी मित्र कोई दूसरा भय इसे माना जाना चाहिए। इस प्रश्न का घर अनि तथा म्यजनाभी कलपना काने पाले आचार्य इस प्रकार से है। उनके मतानुसार कान्य दशा रस में दाव्यवाचक भाव सम्मथ नहीं मान सकते, न तो रस वाच्य हैन काव्य (काम्य ही नहीं मान्य में वर्षित विमावादि मी) इसका वाचकहो। शब्द कीभर तक दो शक्तियों मानी जाती रही,अमिधा तथा लक्षणा, जिनके साथ प्रात्पर्य नामक दास्यवृत्ति का भी समावेश किया जाता है। अभिषा शक्ति के दारा शब्द तथा उसके मथे मे यो सम्पर स्थापित किया जाता, बहसम्मद दाभ्यापक भार समान्य कदछाता है। से गौः शम्द 'सामा दिनान् पसुका वाचक है, विशिष्ट पशु उसका बाप । काष्य तपारस के विषय में ऐसा नहीं कहा जाता। । 1 - १. ध्वनिवादियों के इस मन का रिवचन भूमिका भाग में एम्य है।
चतुर्थः प्रकाशः मार लीजिए, कि काव्य (अर्थात काम्य प्रयुक्त सम्म) रस के वाचक, तथा मुख्या (अमिधा ) पति के द्वारा साक्षात रूप में उसका बोध कराते है, तो ऐसी दशा में कार, पौर आदि शब्दों का प्रयोग तताय में अवश्य होना चाहिए। तभी तोरस वाच्य रूप में मनीत हो सकता है। रितु काव्यगत वास्तविकता इससे सर्वथा भित्र है। हम किसी भी हारादि रस के काथ्य को ले लें। ऐसे कान्दों में महारादि शमों या उनके स्थायी भाव रत्यादि के बात शनों का प्रयोग नहीं होता, पैमा प्रयोग किसी भी काव्य में नहीं सुना जाता है। वाध्याय को प्रतीति तभी होगी, जब उसके साक्षात वाचा शमा प्रवणेंद्रिय से सन्निका हो । जब काव्य में गार पा रति (रस अथवा इसके भाव) या साशार प्रयोग ही नहीं होता, तो पिर रस या स्थायी माद की पुष्टि को वाध्य से मान सकते हो, पह समिधेवल वो कोटिको प्रहण दो कर्म कर सकता है। मान लीजिये, कुछ स्पलों पर ऐसे शादों का प्रयोग देसा मी जाता,कितु यहाँ भी यह नहीं बहा जा सकता कि तत्व भाव या वरस की प्रतीति बन शमों के प्रयोग केही कारण है। भाव या रस का परिपोप विमाष मनुमाव तथा सधारी के कारण होता है। अत सम्दी के प्रयोग होने पर भी वहाँ उस काव्य में वर्मित निमावादि के मारण ही रस प्रतीनि होती है, साली दो के वारा ही रस याध्य नही हो सकता 1 ( यदि किसी काम्य में खेल रत्यादि माव या शहारादि रस के पाचक शब्दों का प्रयोग कर दिया जाय, और विभावादि का सुपार सनिवेश न हो पाय, तो रसचणाहीही न सकेगी। साथ ही ध्वनिवादों के अनुसार तो कभी-कमी काय के माव या रस के वशद या प्रयोग-वशम्दनिवेदित दोष भी माना गया है।' (एम विवेचना से यह स्पष्ट है कि मात्र मा रस की प्रतीति बभि से मानना वास्तविकता से दूर जाना है, जब कि काम्यादि में उसके अमिपावक या पाचक शुदा ही नहीं। इस तरह घटादि राष्ट्र के ग्यारणाभाव में 'घटादि' के अर्थवी प्रतीति मार लेने का प्रसग उपस्थित हो सकता है। वस्तुत काश्य रस या भाव का वाचा कमी नहीं माना जा सकता ।) नापि लक्ष्यलशकभाव तत् सामान्याभिधायिनस्तु-लक्षकस्य पदत्याप्रयोगात् नापि शितलक्षणया तट्यतिपत्ति । यथा गडागा घोप' इत्यादौ रात्र हि स्यार्थ पोतोलक्षणे पोपस्यारस्थानासम्मवात्स्वाथै स्रालतिर्गहाशब्द स्वार्थाविनाभूतत्वोपलश्चित तटमुपल- १ उदाहरण के लिए- शयिता सविधेऽप्यनीश्वरा सफ्टीत महो मनोरथान् । दयिता पिताननाम्दुज दरमीशत्रयना निरीक्षते ।। (पण्डितराज) भपडा, सपन कुज छाया सुखद, सीतल मद समीर । मनी, जात अजों वी, वा नगुना के तौर ॥ (बिहार) इन दोनों पक्षों में रति मात्र या हार रस के पाचक शब्दों का प्रयोग नही है, तथापि सहदयों को संयोग तथा विपतम्भ गकार को क्रमश प्रतीति हो रही है, यह अनुभवसिद्धही है। २ पकारिम्बाधरीही तो हा प्राधाकुचामुदा। सखे मनसि निस्त दी मावी रवि रजायत ।। (अनुवादस्य) इस पद्य में वर्णित रति भाव या शृङ्गार रस 'भावो रति' इसके प्रयोग के कारण प्रतीत महा हो रहा है, अपितु यहाँ 'स्व मनिवेदित दोपही है। इसके स्थान पर 'सने मनसि निस्त मधुमित्रमजावत' इस पाठ के कर देने पर भी भावप्रतीति में कोई भेद न आयगा, प्रत्युत दीप भो न रहेगा । यहाँ तदाच कोई शम्म नही है ।
२२४ दशरूपकम् क्षयति । अत्र तु नायकादिशब्दा स्वायें स्सलद्तय' कमिवान्तरमुपलक्षयेयुः ।। को वा निमित्तप्रयोजनाभ्यां विना मुख्ये सत्युपचरितं प्रयुञोत ? अत एव 'सिंहो माणवक' इत्यादिवत् गुणहत्यापि नेयं प्रतीति। काय तथा उसके कार्यभूत रस में वाच्यवाचकमाव का निराकरण करने के बाद पूर्वपशी उसके लक्ष्यरक्षकमाद का निराकरण करता है। काव्य तथा रस में एयरक्षभाव भी नहीं है। न तो काय लपक ही है, न रस लक्ष्य हो। अभिया के बाद दूसरी शम शक्ति लक्षणामभिपा का निराकरण करने पर कुछ लोग रस को पइय मानकर उसको लक्षणा ध्यापारगम्य माने, तो यह मन भी ठीक नहीं।' (सहम देखते हैं कि किसी वार में प्रयुक्त को साक्षात् अर्थ को लेने पर प्रकरण मैं सोक नहीं बैठ पता, तो हम उस दशा में मुख्यार्थ का स्याग कर देते हैं, तथा दूसरे अर्थ की प्रतीति करते हैं। यदि यह दूसरा अर्थ किमी न किसी तरह मुरया) से सम्बद्ध रहता है, तथा इस प्रकार के शम्द से मुख्या का साथ होने के कारण वैसे अमुख्याय की (जो कि मुरयार्थ से सम्मर) नानि कराने में कोई न कोई कारण (रूदि या प्रयोजन)विद्यमान रहता है,तो यस अर्थ की प्रतीति को इस रक्षयाव्यापारगम्य मानते हैं, क्योंकि वह दूसरा अर्थ मुख्याति केरा प्रतीत नहीं हो पाया इस वरह लक्षणा शक्ति के क्रियाशेक होने में तीन शतों का होगा मावश्यक है-मुख्यााप, तपोग, कति अथवा प्रयोजन । इसी रात को मम्मद ने काव्यप्रवाश में कहा है- मुख्यावाचसपोगो रूदिनोऽय प्रयोजनार। बन्योयरिक्ष्यते यत् सा लक्षगारोपिता क्रिया। (काम्यप्रकाश २-१) लक्षणा कारम प्रसिद्ध उदाहरण ले सकते है:-गडापा घोष',नही 'महा' का समिधा शक्ति के द्वारा प्रतीत वाच्यार्थ है 'हा की पारा, गहा का प्रवाहमर कि गहर में भाभीरों की बस्ती (पोप) स्थित नहीं रह सकती। प्राह तो कमी भी किसी रस्ती का आधार नहीं हो सकता। फलत मुख्या का साध हो जाता है, वाध्याय ठीक नहीं भरता। इसके बाद इसकामे गहा के तौर पर माभीरों को परती 'यह सेना परताभिया के काल सनिन शम्द तक ही सीमित रह सकने के कारण, इस अर्थ की प्रतीति किमी दूसरी पत्ति 'रक्षणा' के द्वारा होती है। यहाँ 'गगातीर' 'गङ्गाप्रवाई के समीप है, इस तरह उन दोनों में पौगी, साथ ही राशन का प्रयोग करने का यह प्रयोजन है कि गानोर में भी महारवार को शीतलता वा पवित्रताकीप्रतिपहिरो। इस तरह गायोष' में लसणारे) कान्य तथा रस में हवलशकमाव इसलिए नहीं माना जा सकता कि स्क्षणा व्यापार सामान्यशाद (गादि) का प्रयोग विशिष्ट धर्मवाले पदार्थ (गजानीरा) में किया आता है।(मोटे तौर पर सामान्य का मर्थ गानेशले शदका विशिष्ट अर्थ में प्रयोग सक्षा) यदि रस को वाम्य का लक्ष्य मानें, तो शम्य में ऐसे रुक्षक शब्दों (पदों)मा प्रयोग होना । चाहिए, बो (मुख्या वृद्धि न सही, पक्षणा से हो)रस की प्रीति कराने। काग्य में ऐसा नही ना, इसलिए लक्षिनलमा (भजागा)दारसको पुष्टि या प्रनीति होती है, १ इस सम्बाध में यह संदेन कर देना अनावश्यक न रोगा कि 'अभिधापत्तिमात्रिका' के रचयिता मुकुलमह ने रसको एवागम्य ही माना है। 'दुवारा मदनेषयो' बादि सदाहरण को लेकर वे इसमें विधम्मकार को रक्ष्य मानते लिखते है:- 'तात्पर्योलगेचनसामन्यांच विप्ररम्मकारस्याप इत्युपादानारिमा रक्षणा।' (ममिपाधिमात्रिका .१४) . चतुर्थः प्रकाशः ऐसा नहीं रहा जा सकता। इसे स्पष्ट करने के लिए इस लक्षणा के प्रसिद्ध उदाहरण गङ्गायाँ पष.' लेकर उराको अर्थ प्रक्रिया की तुलना रगप्रनीति की प्रक्रिया से घर सबते है । ससे साफ होगा कि रस एशगान्यापार का विषय है ही नहीं। 'गनाया घोष.' इस सदाहरण में हम देखते है कि 'हा' का माथ्यार्थ (स्था, मुख्यार्थ) गड़ा का खोत या गला का प्रवाह है। किन्तु गहा के स्रोत पर बोष की स्थिति असम्भव है। र तरह से 'गङ्गा शप इस वाक्य में अपने को प्रतीति कराने में असमर्थ है, उसकी गति स्मलित हो जाती है। यह अपने स्वार्थ यो प्रतीति नही करा सकता, तो अप स्वार्थ से सम्बर (अविनाभूत ) गङ्गातट को सचित पाता है। ठीक यही मान ररा के बारे में कहना ठीक ना शेगा । पाप में वर्णित दुष्यन्तादि नायक, तपा ननसे सम्बय विभाषादि ही रस के मरयायक है, यह तो सर्वमान्य है। ऐसी दश में दुष्यन्तादि के अभिधायक शम्मदी रस के लक्षक हो सकते है। अब दुयन्तादि यों के द्वारा रस लक्षित होता है, तो पणा के हेतुत्रय के अनुसार सबसे पहले दुभ्यन्तादि शमों के मुख्या दुष्य-नादि का हो पाप होना भावश्यक ही है। पर नाटकादि में इम्यन्तादि पदों में मुख्या साथ स्वीयार लेने से तो बनी गहनदी से नायगी। दुष्यन्तादि शब्द दुग्यन्तादि की प्रतीति कथमपि नदा कराते, यह सो विरोधी पक्ष को भी मान्य नहीं होगा। अतः स्पष्ट हो जाता है कि काव्य के नायकादि शब्द खन्दाति नही है। ये स्पलदगति नहीं है, तो दूसरे अर्थ-लक्ष्या (रस) की प्रसीति कसे करायंगे, वे रस को शित कर ही कैसे सकते है। साथ ही लक्षणा के प्रयोग में कवि या प्रयोजन का होना भी भावश्यक है, पर यहाँ म ती शद स्खलद्गति ही है, न प्रयोजन ही दिखाई देता है। यदि कोई व्यक्ति यह कहे कि अभिया तया शुधा लक्षणा से रस की प्रतीति न होती है, तोरसको उपचार प्रतीत या गोणी लक्षणा के द्वारा प्रतिपादित मान लिया जाय, तो ऐसा कहना भी ठीक नही। यदि वाच्यत्वेन रसप्रतिपति'स्मारादा वलवाध्यबारकमाउमामव्युत्पनचेतसामप्य- रसिकानां रसास्वादो भवेत् । न च काल्पनिकत्वम्-मविगानेन सर्वसहदयाना रसास्या- घोसते । अव येचिदभिधालक्षणागीणीभ्यो याच्यान्तरपरिकल्पितशक्तिभ्यो व्यतिरिक व्यशावलक्षणं शब्दव्यापार रसालारस्तुतिपयमिच्छन्ति । (जिस सरह शुद्धा सक्षणा में गुस्यार्यवाय, तद्योग तया प्रयोजन कारण होता है, उसी १. साणा के द्वारा तुरीयरक्षाविनिविष्ट व्यंग्याथै की प्रतीति कराने की चेष्टा करने वाले आचार्यों का खण्टन ध्वनिवादियों ने इसी भाषार पर किया है। पाव्यप्रकाशकार मम्मटकी निम्न प्रसिक कारिका इस सम्बन्ध में प्रदत भी नासवती है, जहाँ व्यंग्य को (जिसमें रस भी सम्मिलित है) लक्ष्य न मानने के कारण बताये गये है:- कपन मुख्य, नाप्यत्र याची योगः फल्न नौ। न प्रयोजन गैलगिन् न पशब्द, स्खल तिः।। (काव्यप्रकाश कारिका ११,५१..) २. प्रामाफर मीमांसफ गौणी की अलम है वृत्ति मानते है, जबकि माह मीमांसक (तया यंजनावादी मी) से सझणा के ही अन्तर्गत मानकर लक्षणा के शुमा तया योगी, ये दो भेद, उपचारागिमितत्व या उपचार मिमितत्व के आधार पर पर है। प्रभार मीमांसकों मा यह मत प्रतापरूद्रीयकार विद्यानाथ ने उकृत किया है :- गोणातिरक्षणानी मिति प्राभारातधुरम् । तस्या लक्षणायामन्तावाद । प्रतापराद्रीय (के.पी. त्रिवेदी स.प्र.४. २६६० , २२६ दशरूपकम् सरर गौणी में भी ये तीन वारण अवश्य होते है। गुदा तथा गौणी का परस्पर प्रमुख भेद यह है कि शुदा में तघोग किमी तान्येतर सम्बन्ध (कार्य-कारण, सामीप्य, अङ्गारिमार आदि सम्बध) के कारण होता है, जब कि गौणी में वह सादृदय समय पर भापत होता है। इसी को उपचार मी कहते हैं। जहा दो भिन्न पदार्थों के भयधिक सादृश्य के कारण उन दोनों में भेदप्रतीति को दिपा दिया जाय, उसे उपचार करते हैं -'मरयन्त विशालिनयो सादृश्या तिशयमदिना भेदप्रनीतिस्थगन मुपचारः। मुख चद्र' (मुस घद्रमा है), पौवाहीक' (पजापी बैल है) "सिंहो माणवक (बधा शेर है) आदिमें मुख तथा चन्द्र गौतथा वाहीक माणवक तथा सिंह इन परस्पर अत्यत मित्र पदार्थों में क्रमश मादकत्वादि, मौरयादि, तथा शेयर्यादि के सारय के कारण अभेद स्थापित कर दिया गया है। यह सादृश्य हो मुरय वृत्ति के स्थान पर उपचरित दृत्ति का, वाचक शब्द के स्थान पर उपचारक शम के प्रयोग का निमित्त तथा प्रयोजन है। प्रयौता वाहीक के साथ 'गो' का प्रयोग इस निमित्त से करता है कि भौता की इस बात की प्रतीति हो जाय कि (यह ) पजाबी उतना ही मूर्य है, जितना पशु-ल।) हम देखते है कि जहाँ कही 'सिंदो माणवक' मादि उदाहरणों में गोगी (उपचार) प्रति का प्रयोग होता है, वहाँ किसी निमित्त हथा प्रयोजन की स्थिति अवश्य होती है, वहाँ शौर्यादि के सादृश्य पीप्रतीति कराना प्रयोजन होता है। यदि किसी सादृश्यपी प्रतीतिमराना नहोता. सो मुख्य के स्थान पर अमुख्य पद का प्रयोग उन्मत्तलपित ही होगा। अब किसी भी अर्थ (माणवकादि)का वाचक शब्द विधमान, सो ऐसा कौन होगा जो बिना किसी निमित्त या प्रयोजन के रूपचरित शब्द (सिंहादि) का भी प्रयोग करे। रसादि को उपचारधि का विषय नहीं माना जा सकना । जैसे 'सिंहो माणवक' में सिंह तथा माणवक (पचा) में समान शौर्य देखकर उस शौर्य के सादृश्य की प्रतीति पराना, उपचारपति का प्रयोजन है, वैसे रस तथा काय में भी कोई सादृश्य है तथा उसकी प्रतोति कराना पति को अभीष्ट है, ऐसा नहीं कहा जा सकना । काय तया रस में कोई अतिशय सादृश्य है ही नहीं, जब ऐसा सादृश्य। हो नहीं, तो उसकी प्रतीति कराने वश मी प्रश्न उपस्थित नहीं होता।' मगर विरोधी पक्ष के समन को हम मान भी लें कि काय रस की प्रतीति भमिधाशकि + १ काम्य में मुख्यार्थबाप होने पर ही तो हम रस को उपचारगम्य मान सकते हैं, पर काम्य में प्रयुक्त पदादि में मुख्यालय स्वदतिख-' होता ही नहीं है। प्रस्युन गुख्या से होरस की नीति तीसरे क्षण में होती है। इसीलिए व्ययाय को (रस को भी) गोणीकृत्ति का विषय नहीं माना जा सकता हैइस रात कोपनिकार ने इस कारिकामै निरस किया। मुख्या इसि परित्यग्य, गुणात्यार्थदर्शनम् । यरिश्य पल तत्र शम्दो नैन सिल्दति ॥(वयालोक उघोतकारिका १०) सो को अभिनवगुप्त ने अपने 'लोचन' में ठीक उसी उदाहरण को खेवर स्पष्ट किया है, विसको वृत्तिकार पनिक ने पर पूर्वपशी के मत मैं उन क्विारे आचार्य अभिनवगुप्त ने बताया कि सिंदीप उदाहरण में भी उपचार के द्वारा सिंह' शब्द का अवय 'बटु' से चरित हो माता, किन्तु उसका प्रयोइन-गोपतिशययी तोनि-ती उपचारागम्य माना नीबा सकना (डीक यही बात रसके बारे में महोबा सकती)उपचार के प्रयोजन कोमा उपचारगम्य मानने में तो भनवस्था दोरमा जायगा। 'यदि च सिरी बइति शौयातिशय प्रगयितन्य खाद्गतिवं शम्दस्य, तहिं मनौति नैव कुर्यादिति किंवा तस्य प्रयोग । उपचारणकरिष्यतीति चेर, तत्रापि प्रयोजना तर मन्वयम् । तत्रापचारेश्नरस्या, अब न तत्र सातित्वम् ।' (लो १ २७६) (मद्रास से) - चतुर्य, प्रशिः २२७ के द्वारा कराते है, तथा काव्य या काव्योपात राष्ट्र रस के वाचक है, तथा रस वाच्यार्थ, तो इस मत को मानने पर यह भी मानना होगा कि जिस किसी व्यक्ति को उस उस पद के साधार, सतित भय का है, उसे रसचर्वणा अवश्य होगी। हम दो बादमियों को ले लेते है, दोनों को शप्प तथा उनके मुत्पार्थ का व्यावहारिक शान है। उनमें से एक सरप १.दूसरा सदस्य नहीं है। इस पर काम्य को लेकर उनको मनाते हैं। वे दोनों काय का मुख्याधे समर लेते हैं। पर सदय व्यक्ति इसके उपनिषदभूत रस या भी आनन्द प्रदाता R नरसिमासिकम्यक्ति को इस काव्य में कोई बाद नहीं आता। यदि रस वाच्य थे पा मुख्या हो होना, तो मुरयार्थ को समझने वाले व्यक्ति रोमी रसास्वाद होना चाहिए था । पर वास्तविकता पर नही है। पाध्यबारक मात्र मात्र का शान से गाने भर से अरसिक व्यरियों को रसास्वाद नदी हो पाता। भाम युक्ति से यह स्पष्ट हो जाता है कि ररा वाच्यार्य नहीं है, न काव्य प रस में वाध्यवाचा माव ही है।' कुछ लोग ऐसे भी है जो काम्योपात शम्दों के द्वारा रस प्रतीति को किमी दूसरे होटंग से समझानेपा प्रयत्न करते हैं। ये लोग रस की शस्परिक मानते है। इन लोगों का यह मताकि यदि अपने काष्य के शब्दों को अपने इप्सित रस का काल्पनिक सईत मान लेता समान न शम्मी के प्रयोग से अमुक काव्य में भमुक रस की प्रतीति होगी, ऐसी पानावर लेता है। पर यह मत भी ठीक नहीारत को काल्पनिक नही मान सकते। यदि रस कास्पनिक होता, तो फिर उसकी प्रतीति कुछ ही लोगों को हो पाती, जिन्हें काव्य के रचयिता कविको उस पना-उप्स कसित सहन का पता है। कि, ऐसा नहीं है। इस सात में कोई विरीप नदी कि सभी रसिकों को एक साथ रस का भास्वाद प्राप्त होता है । मन रस कारपनिक नहीं है। इस पर फे तक के गापार पर कुछ लोग (वादी) रस, मलद्वार सपा बखरूम (व्यंग्य या प्रतीयगान) अर्थ की प्रतीति व्यवस्वरूप नये शमग्यापार (ध्याना शक्ति) के द्वारा मानते हैं,जीवाच्यादि की मतीति के लिए फलित अभिशा, लक्षण या गौरीशति से सर्वथा मित्र है। (यहाँ यह बता दिया जाय कि ध्वनिदादी काव्दार्थ के तीन रूप मानते है-रस, वस्तु तथा अलङ्कार । रस रूप कायार्थ में काव्य में उपाच शम्दों का मुख्या त्यादि भाव या कारादि रस की व्यसना कराता है, पर सहायड्दय के भावाद का विषय बनाता है। पारूप काग्या में वाध्य का वाच्यार्य, जो स्वय वस्तुरूप या अहङ्काररूप होता है, किसी पर की व्यसना कराता है। अबकाररूप काव्याथे में काव्य का वस्तुरूप या भलधाररूप वाल्यार्थ, अङ्कारको ध्यानाकरता एक्स वा अनहार व्यक भी हो सकते है, यस्य मिलाइये-शम्दाशासनपानमानव-न वेबठे। वेचते स तु काव्यात खरेख केवलम् ।। (ध्वन्यालोक कारिका १०७) २ बहथार्थ के कारपनिक मानने के मत को प्रकारातर से विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में मो उक्त किया है, तथा उसका खण्डन किया है, यद्यपि विश्वनाथ कापना के स्थान पर वहाँ 'वचनपुरि' का प्रयोग करते- कित्र, वरुविक्रयादी तर्जनीतीशनेन दशसंख्यादिवत् राखनवृमिवेयोऽप्यय न भवति । (सादियदर्पण परचोद ए ३२०) ३ मिला- तस्माद अमिधातास्वयंरक्षणाव्यतिरिक पर्योऽसौ व्यापारी धननयोतनभ्यभानमत्याय गावगमनादिसोदरप्यपदेशनिरूपकोऽभ्युपगन्तव्य । (लोचन, ३.१९५-मद्रास संस्करण) . 1 1 -- 1,दशरूपकम् भी। रस सदा म्यङ्गय ही होता है, उसका व्यजक, काव्य का मुख्दार्थ ( वाच्यार्य), वस्तुरूप होगा या मलबाररूप। करर मनिवादो ने बताया है कि प्रतीयमान प्रर्थ भनिधादि के द्वारा प्रतीत हो ही नहीं सकता। उसके लिए व्यवना नामक व्यापार को करपना करनी ही पडेगी, इसे स्पष्ट करने के लिए निक ने पूर्वपक्षी के मन को तोन उदाहरणों से स्पष्ट किया है। इन तीनों उदाहरणों का प्रयोग भानन्दवर्धन ने अपने 'आलोक (वन्यालोक) में किया है। धनिक ने उन्दी के आधार पर पूर्वपक्ष को स्पष्ट किया है।) तथा हि विभावानुभावव्यभिवारिमुखेन रसादिप्रतिपत्तिपजायमाना कयमिव पाच्या स्यात् यथा फुमारसम्भवे- 'विश्वती शैलसुतापि भावमा स्करद्वालकदम्बकल्पः । साचीकृता वास्तरेण तस्यौ मुखेन पर्यस्तविलोचनेन ।' इत्यादावनुरागजन्यावस्याविशेषानुभाववगिरिजालक्षण विभावोपवर्णनादेवाशाब्दापि भारप्रतीतिरदेति, रसान्तरेष्वप्ययमेव न्यायः, न केवलं रसेष्वेव यावद्वस्तुमात्रेऽपि । इम बता नु हैं कि रस को प्रतीति काव्योपाच शब्दों के द्वारा नहीं होती। वह तो विभाव, अनुमाव तथा व्यभिचारी के निधन के द्वारा होती है। मन' काव्योपात शम्भों या काय का उसे बाया से माना जा सकता है। इसे सट करने के लिए हम कुमारसम्भव के तृतीय सग से निम्न पचले सकते है:- कोमल तथा बोटे चचल करम के समान सन्नर भकों से भाव को प्रकट करती हुई पार्वती भी, ( उस समय, बब कामदेव ने शिव को अपने बाण का लक्ष्य बनाया) घर उधर चलता। से फेंके हुए नेत्र वाले सुन्दर मुरा से कुव रेदी होकर बैठी थी। इस पत्र में शिव विषयक रति भाव के मालम्पन विभावरूप पार्वती का वर्णन किया गया पार्च पीरूप विभात में अनुराग के कारण उत्पन्न अवस्था वाले मनुभावों, अङ्गों का पुलक, नेत्रों का चालल्य, मुख का साचीकरण आदि का वर्णन किया गया है। इस प्रकार बासम्भव विभाव (पार्वती) का उसके अनुभावों के साथ वर्णन मशार की प्रतीति करा रहा है। यद्यपि यहा रति भाव या शहार रस का वाचक शमनहीं, फिर भी हार की प्रतीति उत्पन हो ही रही है। यह बात मार के बारे में ही नहीं है, दूसरे रसों के विषय में मो लागोती है। रस ही नही वड या अलङ्कार भी वहाँ मतीयमानरूप में प्रतीत होते है, वहाँ शद के मारक न होने पर भी उनकी प्रतीति होती ही है। हम वरनुमात्र था अबारमात्र का एक एक उदाहरण ले सकते है, बहा रस की प्रधानता नहीं है। यथा-भम धम्मिभ घीसद्धो सो सुणहो भन्न मारिभो सेण । गोळाणकच्छावासिणा दरिभक्षीण ।' ('भ्रम धार्मिक विधन्धा सवाध्य मारितस्तेन । गोदावरीनदीकच्छकुश वासिना रसिंहेन') इत्यादौ निषेधप्रतिपतिरशाम्दापि व्यकशक्तिमूलैव । पस्तुभाषजी- 'दे धार्मिक, अब तुम आनन्द से गोदावरी के तौर पर घूमा करो, मह तुम्हे चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं : गोदानदो के कवर पर कुल में रहने वाले रलवान सिंह ने उस कुत्ते को मात्र मार सका है, जिसके सर से तुम यहाँबानेसे पराया करते थे )" १.धूमई मर निहचिन्त के धार्मिक गौशातीर बाकर की कुग में मारथो सिंहाभोर ।। (मनुवार) चतुर्थ प्रकाश:- किती नायिका का उपपति से मिलने का सवतस्थल गोदावरी के तौर मा कुज है। पर एक यामिक युष्पचयन भी लिए वहाँ जा जाकर उनके चौरसादि से कार्य में विज्ञ उपस्थित फार देता है । नायिका ससका आना रोकने के लिए एक कुत्ता पाल लेती है, जो वापस को फुग में आने नहीं देता, उसे भौंक कर डराता है। पर पार्मिक भी तो अपनी पूजा आदि पार्मिक क्रिया में पिता कैसे कर सकता था? 4 कुशे से नहीं पहराता । उसका पुष्पचयन करना जारी रहता है, और साथ ही इमारे नायक-नायिका का दुर्भाग्य, कि उनका शुम कार्य सदा टोक दिया जाता है। नाविश इस बूढ़े पार्मिक से बचने की नई योजना बनाना है। एक दिन यह बड़ी सुशी से धार्मिक को यह सुशखबरी सुनाती है कि उसे परेशान करने वाले फुत्ते को गोदातीर के कुश में रहने वाले और नै मार पाया है, अब शामिक को सताने वाला कुत्ता नदी, इसलिए बद मजे से गोदातीर पर भ्रमण पारे। पर वाच्य के इस तरह नियोजित करने पर भी गायिका का अभिप्राय यह है कि इस खबर को सुन कर भार्मिक महाराज शेर के खाये जाने के डर से वहाँ भाना छोड़ दें। नायिका के इस वाक्य का स्यामार्थ तो यह है :-पच्यू, उपर पैर मी न रखना, नहीं तो जान खतरे में होगी। चाहे गाया में प्रकट रूप में 'य िमजे से अमण करों' इस वाध्यरूप विभि का प्रयोग हुआ है, पर यक्षार्थ 'रह कभी न भानास निषेप की प्रतीति कराता है। इस प्रकार गाषा में विषिरूप बाध्य पख के दारा निरुप यस वस्तु की व्यसना कराई गई है। इस गाया में निषेध का स्पच प्रयोग नहीं है । कान्य में 'मम' (ग्रम) का प्रयोग हुआ है 'ण मम' (न भ्रम) का नहीं। इसलिए शाब्दिक या कान्य रूप में तो वियही प्रतीत दरोगा । किन्तु यह सहदयानुभव सिम है कि यह कुलटा नायिका अपने चौयरत का निराध सघार चाहने के कारण पाक्षिक का गोदातीर पर जाना पसन्द नही परतो, तथा कुशे के मारे जाने को छी खर उदारही। इसलिए गापा का निवेषरूप अपुष्ट हो जाता है। गाया में निषवाचक शम्दों के ममाव के कारण निषेध प्रतीति मशाद दो माननी होगी। मतः उसे अमिषाविषयक न मान कर, व्यजना शक्तिविषयक मानना पड़ेगा। तशलारेपपि- 'सावण्यन्तिपरिपूरितदिश्मुखेऽस्मिन् मेरेऽधुना तब मुखे तरलायतासि । सोमं पदेतिनमनागपि तेन मन्ये मुध्यक्तमेव जलराशिरयं पयोधित इत्यादिपु 'चन्द्रतुल्यं तन्वीवदनारविन्दम्' इत्यापुपमायलद्वारप्रतिपशिय॑धरुत्य- नियन्मनीति । न चासावपतिजन्या-अनुपपद्यमानार्यापेक्षाभावान् । नापि वाक्यार्यत्वं व्ययस्य-तृतीयकक्षाविषयत्वात् । तथा हि'भ्रम धार्मिक इत्यादी पदार्थविषया- मिधामणस्यमकशातिान्तरियासरकसंगात्मकविधिषिपरगावयार्यकातिमान्ततृतीय- फामान्तो निषेधात्मा भ्यालक्षणोऽयों व्याकरापोनर एफटमेवावभासवे भता नाचौ वापयार्यः। टीक यही सात भलवाररूप प्रतीयमान म के बारे में फहीमा समता है। जैसे निम्न दादाण में- रेममा नेपाली गन्दरी, समस्त दिशामों को अपने साक्ष्य (सौन्दर्य) को चन्ति से प्रयोग पाने वाले, मुरकरावे दुर तुम्हारे मुख को देखकर मी यह समुद्र विष्ट (भ २३० । 1 . दशरूपकम् नहीं होता, इस बात को देख कर मैं मानता हूँ कि समुद्र सचमुच ही बड़राशि (पानी की सम्म मूस) है। तुमारा मुख पूर्ण चन्द्रमा है। समुद्र पूर्णिमा के चन्द को देखकर चञ्चरव पुग्ध होता ही है। पर तुम्हारे मुसरूपी पूर्णचन्द्र को देख कर उसका पुग्ध नहीं होना उसके 'जदराशिव की पुष्टि कर देता है। तुम जसो भनिन्ध मन्दरी को देख कर किसका मन चनल न होगा। यदि कोई व्यक्ति चल न हो, तो वह मेरी समक्ष में मूर्स है। इस पथ में 'नायिका का मुख पूर्ण चन्द्रमा है इस रूपक अलकार की प्रतीति हो रही है, पर पच में इस ढा को पदावली नहीं कि इस अर्थ को शादिक या वाच्य कहा जा सके। मत: इस रूपक मलद्वार रूप अर्थ को अभिधा का विषय न मान कर व्यवनाप्रतिपायरी मानना डोक होगा । ऊपर के पच में नायिका का मुखकमल चन्द्र के समान है' यह उपमादि अलङ्कार की प्रतिपति व्यवना के हो द्वारा होती है। (कुछ लोग म्याथार्य को अर्धापत्तिप्राश मान लेते हैं। मीमासकों ने यथार्थ सानो सानरूप प्रमाणों में एक नये प्रमाण की कल्पना की है। यह प्रमाण अापत्ति कहलाता है। जहाँ बाक्य का अर्थ ये नहीं बैठ पाना हो मोर राहर से वाक्य में प्रयुक्त मर्दो में अनुपपय मायता हो, वही अापत्ति प्रमाण के द्वारा अर्थ की प्रतीति मानी जाती है। उदाहरण के लिए 'मोटा देवदर दिन में नहीं खाता' (पीनो देवदत्तो दिवान मुद्दे) इस वाक्य में 'देवदत्त कमी साता ही नहीं ऐसा अर्थ नहीं ये सकते । क्योंकि वह साना ही न खाता होता, तो मीरा न रद पाना, पतला हो जाता । इसलिए यहा 'बर्थात वह रात में खाना (मर्याद रात्री गुरे) समर्थ की प्रवीति अर्थपत्ति से हो जाती है। इसी सरगि से भ्याथार्थ-रसादि- की भी प्रतीति हो हो सकती है यह व्यसनाविरोधी का मत है।) जिस तरह पीनी विदो दिवा न म इस वाक्य का ,देवदत्तविषयक राधिमक्षण रूप अर्थमापत्ति प्रमाण वेध है, ठीक वैसे ही रस भी अपत्ति के द्वारा कान्योपात वाक्यों से प्रतीत हो मायगा, यह मत मानना ठीक नहीं। वस्तुतः रसपणा अर्धापत्तिवेप या अर्थापधिजन्य नहीं है। अर्यापत्ति वहाँ हरा होगी, वहाँ भर्थ हो नहीं पैदवा हो। कायौपाट शन्दों का दाच्यार्य तो ठीक बैठहो जाता है। अतः वहाँ भयोत' की नापत्ति नहीं करनी पड़ती। रसादि को चर्वणा के पूर्व वहाँ भनुपपद्यमानार्थल होता ही नहीं। रसादि की प्रतीति में, अर्थ शान ठीक नहीं बैठने पर ही पर्यापति हो सकती है। न्यायाा रसादि को वाक्यार्थ भी नहीं माना जा सकता, क्योकि व्यय की प्रतीति सदा तीसरे क्षण में होती है, वतीय कक्षा का विषय है। हम इसे स्पष्ट करने के लिए कोई मी कान्य ले सकते है। उदाहरण के लिए 'भम धार्मिक' वाली गाय से लें। सबसे पहले रस पारा 'अम'धार्मिक विनय आदि पदों में से प्रत्येक पद का अभिधा पति के द्वारा स्वतन्त्र रूप में राज्यार्थ प्रतीत होगा। जब काव्योपात समस्त पद स्वतन्त्र रूप से वाक्य के पो की मपनी-अपनी अभिश से अपना-अपना पाया पता चुहेंगे, सब फिर सारे वाक्य में किया तथा कारक के संसर्ग या भन्दय के द्वारा वाक्याथै की मौत होगी। इस तर या तक पहुँचने में दो क्षण हये। पहले क्षण में, पहली कक्षा में, शब्द अपने निजी मायाका खान होकर प्रत्यायन करायंगे दूसरे क्षम में, दूसरो कक्षा में, वे धारक क्रिया के भाधार पर (भपा भाकाहा, योग्यता तथा बासत्ति के आधार पर) अन्वित होंगे तमा सम्पूर्ण वाक्य फिर पाया की प्रतीति करायेगा। इसके बाद म्याचार्य की, रसादि की मवीति हो सकेगी। इस तरह पयार्थ सदा हतीय कक्षाविषयक रोगा। 'मम पार्मिक' में पहले मकग-मनग पद का अर्थ हुमा,फिर सारे वाक्य का 'बहो जरूर घूमो, निश्चिन्त होकर पूमी' म विरिका वारसा कातर तीसरे धग में जाकर वहाँ कभी न जाना' यह निषरूप चतुर्थ प्रकाशः २३१ ध्याचा प्रतीत हो सकेगा। इस तरह यह विषरूप म्यङ्गया तृतीय कशा का विषय है। या सर्वमान्य है कि राम, मि तथा पमं एक ही क्षण तक रहते हैं। 'शमधुरिकर्मगा विरम्य- व्यापारामाव' इस न्याय के अनुमार पदाप्रस्यायक अमिषा केवल धाच्या तक ही सीमित रहती है। दूसरे क्षण का वाक्या भी बुद्धि के सात का विषय उसी क्षण तक रहता है। तमसीसरे क्षण में प्रशिको जिस भर्थ वा सान होता है वह न तो वाच्यार्य ही है, न वाक्यार्थ हो। वह इन सब से मिन्न पाया है, जिसको प्रतिपति ध्यानाशफि को भाधीन है, यह स्पष्ट ही प्रतीत हो जाता है। ननु र तृतीयरक्षाविषयत्वमभूयमाणपदार्थतारपर्येषु विष भुत्व' इत्यादिवास्येषु निषेधार्यविपयेषु प्रतीयत एप वास्यास्य । न चान व्यरत्यादिनापि वाक्यार्थस्वं नेप्यते तातदिन्पत्याइने । तन, स्यार्यस्य द्वितीयायामविधा तस्य तृतीयकाभा- पात् , रौब निषेपका । तत्र द्वितीयकमाविषी किमारकरांसर्गानुपपत्ते भरणापितरि बफरि पुत्रस्य विषभरणीयोगामात् । रसवदारयेषु च विभागप्रतिपतिलपणद्वितीयपक्षायां रसानरगमा । स समय में, नात्पर्य में म्याना का समावेश करने वाला वनिगदी के सम्मुख यह पति रहता है। हम सभाय से से विर मुंदर मा पारस गुदै शुरुमा '-'चाई षि सालो, पर इसके पर कमी न साना'। इस वाक्य में "विष गुरुव' (जहर सालो) इसका प्रयोग हुआ है, यहाँ पदार्थ रूप में विधि का प्रयोग हुमा ३, कितु पदार्थ का सारपर्य निषेध रूप में ही है । 'म के घर कमी पाना न साना' यह निषेधरूप वाक्पार्थ तीसरे क्षण में ही प्रतीत होता है। या विष मुद्भव' इस वाक्य को रस बात का उदाहरण माना जा सकता है कि तात्पर्य रूप वाक्याचे सूत्रीय कशामा विषय भी हो सकता। यदि कोई कहे कि यहाँ १ माक्या के विषय में योगासकों के दो दल हैं। भाट्ट मीमांसक यह मानते है कि वाफ्याय या प्रवीति माराहा, योग्यता तथा सनिधि के आधार पर वाक्य में प्रयुक्त पदों को ज्यों के अजित होने पर तात्पर्य इति मेरा होता है। तथा या वाक्या पदार्थ से सर्वथा मित्र होता है-'विशेषवपुरपदार्थोऽपि वास्यार्थ'। ये लोग सबसे पहले अभिधा के द्वारा पदार्थ (पाच्या) प्रतीति, तदनमा तात्पर्य प्रति के बारा वाक्यार्थ प्रतीति मानते हैं। भतरममिहितान्वयवादी करा माता है। दूसरे लोग जो प्रभाकर म के भनुयायोरे इस वृत्ति को नहीं मानते । चे अभिषा से हो वाक्यार्थ प्रतीति मी मानते है। उसके मतानुसार को को किसी भी काम समय में होना १-पदों का प्रयोग, पदों के स्वतन्त्र वाच्यार्य का शान मो अवध्यतिरेक से ही करते है। 'देवदर गाय सामी, 'घोडा भो, पोहा ले जाओ, गाय से भाभी' यादि वाक्यों को सुन कर दो बचा भाषा सीखतारे, तथा ससद का ग्रहण 'भावापदाप से करता है। पर बारीकी में पहुंचने पर प्रभाकर भी इस वाध्या रूप वापया के 'सामाय तथा विशेष दो रूप मानते मान परते रे । देखिये, कादपाश उमासार वाक्याथ तो दोनों ही मानते है, इसमें समानता है। हो, उनको प्रतिपत्ति की सरणि या प्रक्रिया में दोनों सम्प्रदायों में परस्पर भेद है।दो लोगों के मतानुयायो भालङ्कारियों ने-जिनमें धनञ्जय व पनिक भी शामिल है-व्यायाध को वाक्यार्थ या तारपर्य में ही शामिल करने की चेष्टा की है। लोगौरा विरोध ऊपर किया गया है। निरारी में इसी विरोध को पनिक के पूर्वपक्ष के रूप में रखा।
२३२ दशरूपकम् निषेधार्थ रूप अर्थ वाक्या नहीं है, तो ऐसा खुद व्यजनावदो मी मानेंगे। व्यपनावादी स्वप ध्वनि यो तात्पर्य से भिन्न मानते है, तथा यहाँ तात्पर्य है। अत यहाँ पर ध्यानावादी मी वाक्याथ नहीं है, ऐसा न करेंगे। वे भी यहाँ वाक्या मानगेही! यदि दिरोचिपक्ष, इस तरह से तृतीय कशास तात्पर्य वृद्धि का विषय तथा दाक्य माने तो टोक नहीं। 'विष मुंब' मैं पहली कक्षा में विप' तथा 'मुत्र के व्यस्त पगे के अर्थ यी प्रतीनि होती है। दितीय रक्षा में वास्य अपयरित होकर प्रकरणसम्मत अर्थ गरी प्रतीति करना है। इसी प्रकरणगत अन्वित भय को पात्रयाये पहेंगे। इस वाश्य को लेने पर हम देखते है कि पि सालो यही तक दितीय कक्षा नहीं है। जातक वाक्याथै दितीय कक्षा में विधान नहीं हुआ है, ता तक तृतीय कक्षा का प्रश्न ही नहीं उठता। कहने का तात्पर्य यह है कि विष खाली' तक पूर्ण रूप से वाक्य का प्रकरण घटित नहीं हो पाता, विषिरूप अर्थ पूर्ण वाक्या नहीं होने के कारण मई को भाकाहा बनी ही रहती है। इस तरह दितीय कशा यही समाप्त नहीं दो जाती, पर तो 'उस शत्रु के घर पर भोजन न करमा' इस निषेधार्थ रूप वाक्या पर जाकर विधान होती है। मन निषेर को प्रनीति दितीय कदाविषयक हो है। मत दिनीय कक्षा के समाप्त होये बिना हो म निरूर अर्थ में तनीय का मानना अनुचित है, उसमें तृतीय कक्षा का सर्वथा अभाव है। प्रकरण के पोलोचन से पता चलता है कि इस वाक्य का प्रयोग पिता ने अपने पुत्र के प्रति किया है। दितीय कक्षा में वाक्यार्थ शान होते समय पर हम देखते है कि यह वाक्य पिता ने पुत्र से कहा है, जो यह कमी नहीं चाहेगा कि उसका पुत्र विष साले सो हमें यह पता लगता है कि यहाँ मुश्व' किया के साथ 'कर्ता' (ख) तथा म(वि) इन कारकों का अवय ठीक तरह उपपत्र नहीं होना। क्योंकि यह स्पष्ट रेकि पिता का पुत्र के प्रति यह आदेश नहीं है कि 'सचमुच विष सालो, किन्तु यह कि शत्रुके घर न खाना । इमलिए पूरा अर्थ दियीय कक्षा पाही विषय है। और यह नियम है कि रसादि यथार्थ सदा तृतीयवक्षानिविष्ट ही है। यह निश्चित है। रत से युक्त वाक्यों में हम देखते हैं कि वाक्या विभाग, अनुभाव या समारो परक होता है। विभावादि के धान बाली दिलीप कक्षा में हो रस प्रतीति नहीं हो जाती, क्योंकि विमावादि तो रस को व्यजना के साधन है, अन मनका प्राग्माव दोना पावश्यक है। विभावादि के साथ साथ ही, दिलीय कक्षा में , रस प्रतिपसि कभी नही होगी।' तदुकम्-'थप्रतिष्ठमविधान्त स्वार्थे यापरतामिदम् । पाश्य विगाहते तत्र न्याय्या तत्परताऽस्य सा॥ या स्वार्थविधा त प्रतिष्ठा तावदागतम् । तरप्रसर्पति तत्र स्यात्सर्वन ध्वनिना स्पिति ॥' इत्येव सर्वन रसानो ध्यात्वमेव । यस्त्वलकारयोस्तु कचिद्वाच्यत्वं कवियत्व, सत्रापि यन्त्र पारस्य प्राधा येन प्रतिप्रतिस्तत्रैव ध्वनि, अन्यत्र गुणीभूतव्यज्यत्वम् । जैसा किनिकार ने कहा मीरे- 'र तक वाक्य अपने अर्थ पर समाप्त नही हो पाता, तथा पूरी तरह ठीक नहीं बैठता, तथा किसी दूसरे अंध तक अर्थ को उपपन्न करता है, तब तक उस अर्थ तक वाक्य का पास्या ३ ध्यान रखिये विमाताशिकारण से रसरूप कार्य तक पहुँचने का कम मसलक्ष्य भले ही हो पर वाँक्रम का सर्वथा अभाव नहीं चाहे पद क्रम 'शतपत्रपत्र' के भेदन के साथ सरित हो। 'शतपत्रपत्रमेयायेनाकलना। । - - .
पतुर्थः प्रकाशः २३३ माना जायगा। वाक्याथै केटीक न बैठने पर जहाँ कही वाक्या ठीक बैठे पड़ी तन (विपत आदि वास्यों में निधरूप अर्थ तक) तत्परतावाश्यार्थपरता मानी जायगी। लेकिन जहाँ याक्य, वाश्या में भार समाप्त हो जाता है, तथा अर्थ पूर्णतः प्रतिदिन यस उपपन्न हो जाता है, और पाय किमी अन्य अर्थ या बोध कराने के लिए पिर से आगे बढता है, तो ऐसे स्थलों पर वाक्यार्थ तो पहले ही विश्रान्त हो चुका है, मत यह अन्य अर्थ ध्याय ही होता है, ऐसे स्थलों पर ध्वनि का हो विषय होता है।' इन कारिकाओं के आधार पर स्पष्ट है कि विमायादि रूप वाक्याथ के विधान्त होने पर प्रनीत रस प्यायदाद, वायार्थ नहीं। वस्तु तथा अलङ्कार के बारे में दूसरी पात है।' वे यही व्याग भी होते हैं, वहीं वाच्य भी, किन्तु रस सदा व्यङ्गय ही होता है। लेकिन वस्तु सला अलङ्कार के म्यगय रूप में भी जहाँ यह गावाच्या से प्रधान है, वही ध्वनि होगी, और स्थानों पर बाच्या के समपाश होने पर या पाच्या के प्रधान होने पर व्यायवे गौण होगा, अतः ये काव्य गुणीभूत म्याथ ही पहलगे।' १. ध्वनिवादी काव्य के धीन भेद करता है:-ध्वनि (उचम), गुणीभूत म्याग (मध्यम) क्या चित्रकाम्य (अधम ) यह भेद व्यापार्थ यो प्रधानता या भप्रधानता के भाधार पर किया जाता है। (१)पनि कायमै ध्यानार्थ पाध्याय से अधिक माफारी तथा प्रधान होता है- 'द मुचम मतिशयिनि व्यहवाच्या ध्वनियंधे. परितः। - नि शेषच्युतचन्दन रतगत निर्गुष्टरागोऽधरी मेने दूर भगाने पुलकिता सन्त्री तवयं सनु। मिथ्यावादिनि दूति बान्धदजनस्याशातपाटोद्रमे दापी स्नातु मिनो मतासिन पुनरतस्यायमस्पान्तिकम्। 'हे मान्धयों की पीसनानने वाली मुडा ति, तू यहाँ से पावली में नहाने गई थी, उस धम के पास नगई। तेरे लनों के प्रान्त माग का सारा हरिचन्दन सिर गया, तेरे मपर भौठ की खाली मिट गई है, दोनों नेत्रों के किनारे भान रहित है, तथा तेरा यह दुल शरीर मो पुलकित हो रहा है।' यहा'तू जरा अधम के पास न गई इस विधिरूप वाध्याय से 'ये सरचिव वापी स्नान से नहीं है, अपितु तू मेरे पिय के साथ रमण करके लाई ?या स्वयार्थ प्रतीत होता है, जो काग्य में वाण्या से प्रधान है। मत व्यगाथार्थ के वाव्या से प्रधान रोने के कारण पदों पनि काध्य है। (२) गुणीभूत व्यङ्गम में व्यस्मार्थ वाच्यार्थ से प्रधान नहीं होता। (मत्ताशि गुपीभूतन्यतय व्यङ्गये तु मध्यमम्) । -- वाराणसणिकोलाइट मुणन्तीए । परकम्मवावाए गए सीअन्ति कहाई॥ (पानीरोटीनशकुनिवौडादल मृण्वन्या। गृहकर्मव्यापृताया वध्वा सादरपहानि ॥) 'वसत कुश में उस्ते पक्षियों के कोलाइल को सुनती हुई, घर के काम में व्यस्त, बहू के भारशिवित हो रहे है।
२३४ दशरूपकम् तदुक्तम्-'यत्रार्य शब्दो वा यमर्यमुपसर्जनीकृतस्वायौँ । ध्यत पायविशेष स थनिरिति सूरिभि कयित ।। प्रधानेऽन्यत्र वाक्याथै यत्राङ्ग तु रसादय । काव्ये तस्मिालकारो रसादिरिति मे मति' ।' जैसा कि धनिकर ने कहा है "जिस काव्य में शम्द अथवा उसका वाच्यार्थ, अथवा दोनों एक साथ, अपने वाच्यार्थ को तथा स्वय को गौण बना कर किसी अलौविक रमणीयता वाले व्यह्रथा को अमिन्यजित करते है, उस काम्य को ध्वनि कहा जाता है। मात्र यह है कि ध्वनि काव्य में या तो शब्द अपने वाच्यार्थ को गौण बना कर व्याथार्थ को प्रधान रूप में प्रतीनि कराता है। या वाच्यार्थ स्वयं को गौण बना कर व्यगया को प्रतीति दराता है, या शम्द और अर्थ दोनों एक साथ वाच्यार्थ तथा स्वयं को गौण बना कर व्यङ्गप की प्रतीति कराते है। (ध्यान रखने की पात है, इसीके आधार शदशक्तिमूलक, अर्थशक्तिमूलक, तथा उमयशक्तिमूलक, ये तीन पनिभेद किये जाते हैं।" जिस बाध्य में पाक्या (वाच्यार्थ) के प्रधान होने पर, रसादि (रस, वस्तु, पालद्वार, अथवा रस, मावादि ) उसके अङ्ग बन जाते हैं, उस काव्य में रसादि रसवर भादि भरद्वार बन खाते , ऐसा हमारा मत है। (इन स्थलों पर जहाँ व्यथार्थ वाच्या काही जाता है, गुणीभून व्यङ्गप नामक कान्य होता है।" यया-उपोहरागेण' इत्यादि । तस्य च वनेर्विवक्षितवाच्याविरक्षितवारयरवेन द्वैविध्यम् , अविवक्षितवाच्योऽप्यत्यन्ततिरस्कृतस्तार्योऽयान्वरसमितवाच्यवेति द्विधा । विवक्षितवाच्यच असलक्ष्यक्रम' प्रमोत्यवति द्विविधा, तत्र रसादीनामसलक्ष्यफमध्व. निस्व प्राधान्येन प्रतिपत्ती सत्यां धात्वेन प्रतीतौ रसवदलकार इति । से 'उपोदरागण भादि पप में व्यङ्गया पाच्या या अङ्ग हो गया है, तपा प्रधानता वाम्या को दी है। पूरा पप यों है यहाँ शकुनि कोलाहल सुन कर अगों का शिथिल पर जाना वाघ्या है। प्रवरणादि के वश से शकुनियों के उड़ने के कारणभूत, वेतस कुल में उपपति के आगमन की व्यापार्थ रूप में प्रतीति हो रही है। यहाँ यह व्यद्यार्थ प्रथम तो उतना चमत्कारयुक्त नहीं है, जितना कि 'कहों के शिथिल पड़ पाने वाले वाच्यार्य । दूसरे यह ग्याथार्थ वाध्या का साधन बन कर उसे स्पष्ट करता है। यथार्थ की प्रतीति होने पर ही 'मङ्गों के शिथिल पड़ने घटित होता है।यथार्थ यहाँ पाच्या या उपकारक हो गया है। इस प्रकार म्याथार्थ के प्रभान (गौण होने के कारण पर्यो गुणोभून व्यङ्गय है। (३)चित्रकाव्य मैं शम्दालकार या अर्थानद्वार रूप वाच्या लना अधिक होता है कि ध्यया सर्वधा नगण्य बन जाना है, वैसे- विनिर्गत मानद मात्ममन्दिरा भवायुपशुन्य पच्छ्यापितम् । ससम्मनपानिलागला निमोठिताक्षौर मिया मरावतो। साव के निकलने की खबर सुनते ही द्रवमरावती को अगला को बन्द करा देता भा, मानो भमरावती दर के मारे बखि बन्द कर लेती थी ।इस अर्थ में उप्रेश रूप अर्यालद्वार बालापाच्याही प्रधान है.इयग्रीव की वीरता वाला थाय नगण्य ।
चतुर्थः प्रकाश २३५ उपोदरारोग विलोलतारकं तथा गृहीतं शशिना निशामुखम् । यया समस्त तिमिरातुर्क तया पुरोपि रागात् गलितं न लक्षितम् ॥ 'चन्द्रमा के उदय का वर्णन है। उदयकालीन ललाई लिए चन्द्रमा पूर्व दिशा में उदित होरमारे, उसकी किरणों से सारा अन्धकार नष्ट हो गया है। लला (1) को धारण करने वाले चन्द्रमा ने राम के प्रारम्भिक अंश को, जिसमें तारे झिलमिला रहे थे, इस तरह प्रण किया कि उसकी ललाई (वार) के कारण राधि ने अपने सारे अपकार रूपी घरू को फिसलते बनाना। इस प्रस्तुन थापा चन्द्रवर्णन के द्वारा कवि ने यहाँ गायक- नायिका-व्यवहार रूप मपरतुत व्यायाको प्रतीति कराई है। यहाँ पर समासोक्ति मामक सरकार है। ध्याय रूप में रामों से शिष्ट प्रयोग के कारण नायक-नापिका-म्यवहार- समारोप प्रतीत हो रहा है। प्रेम को धारण करते हुए नायक (चन्द्रमा)ने चाल पुतलियों मा नायिका (निस) के मुख प स सरह चूम लिया कि उस नायिका ने प्रेम के भावेश के कारण आगे से गिरते हुए (गलित होते हुए) अपने समस्त वकको मीन जाना। नायक के घूमने पर राग के कारण नायिका के पक्ष एक दम शिथिल हो गये, और इसे राग के वशीभूत होने के कारण मापिका गान भीग पाई। रस तदाहरण में व्ययाय गोग ही है, पयोंकि प्रधानता प्रस्तुत चन्द्रोदय वर्णनरूप वाच्याओं को दी। अतः यहाँ गुणीभूत व्यापही है। नया यह व्यापार्य समासोकि रूप अलङ्कार का उपनिरत्यक है। इस ध्वनि के सर्वप्रथम दो भेद-विवक्षितवाच्य (अभिभामूलक, तथा अविवक्षित. • वाच्य (साणमूहक) भविषधितशय के भी दो भेद होते हैं। अत्यन्त तिरस्कृतवाच्य तथा अर्थान्तर संक्रमितवाय । विवधिनवाच्य ध्वनि के असंलयकम तथा सलक्ष्यक्रम (मोत्य) ये दो भेद होते हैं। जब काव्य में रसादि की प्रतिपत्ति प्रधानरूप से हो, असंलक्ष्य कम पनि होती है। यदि रसादि मारूप में प्रतीत होते हों, वो वा ध्वनि नही होती, वहाँ पर रसवर भलदार ही होता है। २. ध्वनि मोटे तौर पर १८ भेद माने जाते है।इनमें भी पहले पहल लक्षणा के आधार पर दो भेद, तथा अभिश के आधार पर दो भेद होते हैं। इन्हें क्रमशः अर्थान्तर संक्रमित. वाच्य, भायन्त तिरस्कृतवाक्य, असेलक्ष्यक्रम म्याथ तथा सलक्ष्यत्रम व्यङ्गप कहा जाता है। ध्वनि के भेदोपभेदों के विशेष प्रपञ्च के लिए धन्यालोवा या काव्यप्रकाशादि द्रष्टव्य है। यहाँ दिमाररूप में इन चार ध्वनिगेदों को स्पष्ट कर देना पर्याप्त होगा। अविषधिसताय्य ध्वनिः-हाँ लक्षक पद के द्वारा प्रतीत प्रयोजनरूप यथार्थ काव्य में प्रधान था, वहाँ लक्षणामूलक अविवक्षितवाच्य ध्वनि होती है। लक्षणा के दो भेद होते हैं:-क्षगलक्षगा तथा उपादान लक्षणा। अतः इन्हीं के भाधार इस पनि के भी दो भेद हो जाते है | लक्षणादाले व्यायार्थ की प्रधानता हो तो यही अश्यन्त तिरस्कलवाज्य होगा। उपादान लक्षणा में अर्थान्तर संक्रमितपाय पनि होगा। इन दोनों के उदाहरण कमशः ये है:- (क) आयन्तविरस्कृतवाण्या- उपकृत पत्र किमुच्यते. शुजनता प्रयिता भवता परम् । विदधदीश मेव सदा सखे मुखित मारस्व तत. शरदो शतम् ॥ इस पद में किसी अपकारी व्यक्ति के प्रति कहा जा रहा है।-'मापने इमारा बड़ा उपकार किया, कहाँ तक करें। आपने नही सजनता बताई है। भगवान करे भाप इसी - २३६ दशरूपकम् अनोच्यते- पाच्या प्रकरणादिभ्यो बुद्धिस्या का यथा किया। पास्याः कारकैर्युक्ता स्थायीभावंस्तथेतरैः॥ ३७॥ ध्ननिवादी के इस पूर्वपक्ष का-जिसके अनुसार रस भ्यङ्गय है, तथा व्यवनाशक्ति प्रवि. पाप है-खण्डन करते हुए धनजय निम्न कारिका में अपने सिमान्तपक्षका अवतरण करने २:- किसी धाक्य को सुनकर या पदकर उस पाक्य के प्रकरण-वका, श्रोता, खेश, झाल आदि का ज्ञान प्राप्त करके, इस प्रकरण के द्वारा हम वाक्य में प्रयुक्त तरह वपकार करते सैकड़ों वर्ष सुखो रहें।' यहाँ इस वाच्या के बाद आपने हमारा बड़ा अपकार किया है इस लश्यार्थ के प्रतीत होने पर तदीयकोटि में व्यग्यार्थ प्रतीत होता है मो उस व्यक्ति की नीचता ध्वनित करता है । भव' यहाँ वाच्यार्थ के पूर्णतः तिरस्कृत हो जाने से भस्यन्त तिरस्तराच्य ध्वनि है। (ख)अर्थान्तरसमितवाग्य:- मुस विकसितस्मिन वशिदवक्रिमप्रचित, समुच्छलितविभ्रमा गतिरपालसस्था मति । उरो मुकुलितसन अपनमसरन्धोपुर बतेन्दुवदनातनी तहणिमौद्गमो मोदते ॥ यौवन से गुरु किसी नायिका को देखकर, उसके यौवन के नूतन प्रादुर्भाव की स्थिति का वर्णन करते हुए कवि कह रहा है। इस चन्द्रमुखी नायिका के शरीर में यौवन का राम प्रसव हो रहा है। यौवन स चगुर महोभाग्य है कि वारस चन्द्रमुखी यो शरीर में प्रविष्ट हुआ है। इसीलिए यौरन फूला नदी समाता । यौवन के प्रादुर्भार के समस्त चिद इस नायिका में दृष्टिगोचर हो रहे है। इसके मुख में मुस्कराइट विकसित हो रही है। जिप्त तरह फूल के रिकसित होने पर सुगन्ध फूट पड़ती है, वसे हो इसके मुख में सुगन्ध भरी पडी है। इससे नायिका पधिनी है यह मीभ्यजना हो रही है। इसकी मांखों मे बीपन को भी पा में कर लिया है। इसकी टेदी चितरन सब लोगों को वश में करने की धमता रखती है। जब यह चलता है, तो ऐसा जान पड़ता है कि दिलास भोर लीला एक पड रहे हों। इसमें विलास तशीला का पार्य है। अतु' इसका प्रत्येक आमनोहर सी डि एक जगह स्पिर नहीं रहती। यौवन के भामम के कारण इसका मन अत्ययिक अधीर तथा चल हो गया है। पहले तो भोछेपन के कारण लोगों के सामने प्रियतम को देखकर इसकी इदि मोदित रहती थी, किन्तु अब वैसी नही रहती। गुरुजनों के सामने अब मो वैसे तो मोशपूर्ण हो रहती है, पर प्रियतम को देखकर मन से अधीर हो उठती है। इसके यस्थल में लन मुकुलित हो गये हैं।कली वरद ये स्तन मी करिन है तथा पालिङ्गन योग्य है। इस वचनस्थल के मद उमर बाये है। इसका मत्यधिक रमणीय हो गया है नसरबाडा को देखकर यह बान परता.किनापिका ने यौवन में पदार्पण कर लिया। यहाँ 'मोद"विकसित वशित' 'समुच्चडित''मुकुलित' आदि शब्दों का लाक्षणिक प्रयोग हुमाइनस योवन का नायिकाको पाकर अपने आपको सीमाम्यशाली समदाना, मुख का मुगन्धित होना, भादि भादि महायों की प्रगति होती, जिन्हें ऊपर पद्य की दाख्या में सर कर दिया गया है। यहोदे पर अपने वाच्यार्य को रखते हुए पक्ष्या की प्रतीविकराकर यहाई प्रतिपकिराटे।
चतुर्थः प्रकाशः कारको की सहायता से पापय में सापाद उपास शब्द के पाच्यार्य के रूप में किया का शार प्राप्त करते है।कमी कभी याश्य में मिया का सापाव पाचफ शब्द उपार नहीं होसा, शिर भी प्रकरणानुयूछ क्रिया का (मुहिश्य झिया का) अभ्याहार कर ही लिया जाता है। इस प्रकार वाश्य में पाहे किया पाप्य दो, या पुदिस्य हो, पही वाक्य का पापवार्य है। ठीक इसी तरह विभागानुभारम्यभिचारी के द्वारा स्थायी भाव काव्य के पाश्यार्थ (सारपर्ष) के रूप में प्रतीत होता है। स्थायी भाव मी पाय में पुनिस्य क्रिया की भांति वाध्य न होकर प्रकरण सवय है। यथा लौरिसना स्येषु भूयमामियेषु 'गामभ्याज' इत्यादिषु भभूयमाणरियेषु ---- 'द्वार द्वारम्' इत्यादिपु स्तशब्दोपादानारप्रकरणादिवशामुद्धिसनिवेशिनी लियच कारको- पचिता काव्येयपि कचित् स्थशब्दोपादानात् 'प्रोत्ये नवोडा प्रिया' इत्येवमादौ कविध प्रकरणादिवशानियतामिहितविभावायविनाभावाचा साक्षाद्वारकचेतसि विपरिपर्तमानो रस्यादि स्थापी स्वस्यपिंगावानुभाषव्यभिचारिभिस्तत्तमन्दोपनीत सस्कारपरम्परया परं मौदिमागीयमानी रत्यादिवाक्यार्य । दम देखते हैं किसी भी कौकिक पाश्य में दो प्रकार के पदों का प्रयोग होता है, एक कारक पर द्वारे निया पदही को महरि तथा दूसरे याकरणों ने सिद्ध पद तथा साध्य पद पशयास्य का तात्पर्य यही होगा, जो ममी तक सिद्ध नहीं है, किन्तु साध्य है। मत निया में हो पाया तात्पर्य निहित होता है। विमीमी वाक्य में किया वाक्यार्थ (तत्पर्य) का होगा आवश्यक है, चाहे उस क्रिया के वाचक शप का प्रयोग वाक्य में दुमा पोया नहुभा हो। उदाहरण के लिए हम दो औफिस याक्यों की लेते हैं, एक में क्रिया पान्य विरपितयाच्य-जहो भनिभा मारा प्रतीव वाच्यार्थ हो व्यङ्गपा प्रवीति कराता परों विवक्षितवाय ध्वनि होगा। इसके प्रकिया के माधार पर दो भेद होते है। एक में पाच्या से ग्यङ्गयातक पहुंचने काम सक्षित दोवा, दूसरे (रसादि) में यह 'शतपत्र पत्रभेदन्याय' से मसंसदय होता है। इस तरह इसके लक्ष्यकम याथ तथा लक्ष्यकम ध्याय दो भेद होते है। इसके हम हिन्दी काव्य से दो उदाहरण दे रहे। (ग) संयमभ्यङ्गप- पत्रादी तिथि पारये वा घर के चपास । नित प्रति पून्यौ ही रहत, भानन बीप जास ।। पहोपाध्याय से गायिका गुस पूर्ण चाद' इस अलझार (रूपक अलकार) की व्ययार्थप्रतीति होरदोहै। यहाँ परखरूप पाच्या से रूपक मलसाररूप न्यायार्थ तक का कग पच्ची तरह लक्षित हो जाता है। (प) असमयक्रमस्या- सपन कुखपाया सुखद सीतल सुरभि समोर। मनी आत जी बहै, वा यमुना के तीर॥ यशेवाच्या द्वारा विप्रलम्भ कार को व्यसमा दोरही है। वाच्या स्मृति तथा मौरसायनामक समारभावों को प्रतीति कराकर उनके मारा विश्लम्म मार की अभिभ्याना कराता है। वाध्याय से इस रसरूप व्यापार तक पहुँचने का क्रम लक्षित नहीं है। अत चर्चा असलइयक्रम ध्यङ्ग्य ध्वनि । ध्यान रखिये, इन चारों पदाहरणों में व्यस्याही वाच्यार्थ से प्रधान है, मन पनि काय रे । ऐसा न होने पर काव्य में यही हो पाता, वागुशोभूत पाप हो जाना है। । , २३८ दशरूपकम् है, धूयमाण है, दूसरे में बह वैवल बुद्धिस्य है, प्रकरणवैध है। गा मध्यात्र' (गा ले जाओ) इस धाक्य में या ऐसे ही दूसरे लौकिक वाक्यों में 'सम्याज' आदि किया यमाग है, वक्ता इस क्रिया के बाचक शब्द का साक्षात् प्रयोग करता है, तथा मोता को वह शब्द वर्णशकुली केशारा सुनाई देता है। दूसरे वाक्यों में किया का साक्षात् उपादान न मी पापा जाय, जैसे 'दार दार' इस वाक्य में क्रिया यमाग नहीं है, दत्ता उसका साक्षात् प्रयोग नहीं करता पर प्रकरणवश 'दरवाजा सोलो' या 'दरवाजा बंद करो' अर्थ लिया जा सकता है। दोनों हो वाक्यों में चाहे शब्द का प्रयोग हो, चाहे प्रकरण के द्वारा दो किरा बुद्धिस्य हो जाय, दोनों स्थानों पर कारकों के द्वारा पुष्ट होकर क्रिया ही वाक्यार्थ का रूप धारण करती है। कारकपरिपुष्ट किया हो वाक्यार्थ या वाक्य का तात्पर्य है। टीक पदी मात काव्य के विषय में लागू होती है। काव्य में कभी कभी तो रत्याहि भाव के बावक शब्दों का साक्षात् प्रयोग पाया जाता है, जैसे 'प्रीत्यै नधोना प्रिया' जैसे उदाहरगों में रति भाव के वाचक शब्द (प्रोत्यै) का साक्षात् उपादान पाया जाता है। दूसरे उदाहरणों में जो गार रस वारति माव के प्रतिपादक है, ऐसे सम्मों का उपादान नहीं भी हो सकता ऐसे काव्यों में प्रकरण आदि के आधार पर हो कान्य के द्वारा वाच्यरूप में उपात (अभिहित) विभाव, मनुभाव, तथा सवारी मावों के साथ स्थायी भाव का अविनामात्र सम्बन्ध होने के कारण, रत्यादि स्थायी माव सहाय के चित्त में ठीक उसी तरह पुरित होने लगता है, जैसे प्रकरणादि के कारण किसी वाक्य में प्रयुक्त कारकादि के द्वारा उनसे अविनामावतया सम्बर क्रिया को प्रतिपति होती है। इन रवादि स्थायी भावों के तप लिमादों, अनुमावो या सहारियों का तो लाग्य में साक्षात् शम्द से उपादान होता है, ये तो साक्षात् वाच्यरूप में प्रतिपन्न होते ही हैं, ये सस्कार परम्परा के कारण, विभावों के पूर्वानुभव के आधार पर रत्यादि स्थायी भाव को पुष्ट करते है । इस प्रकार कान्य में वाच्यरूप में उपास, विभावादि के द्वारा प्रतीत, काव्य में बाच्यरूप से उपास अपवा प्रकरणादि के द्वारा बुद्धिस्थ रूप में प्रतीत रत्यादि स्थायी भाव, किसी म्यजना नैसी कल्पित शक्ति का विषय न होकर, कान्य का वास्तविक पारा ही है। म चाऽपदार्यस्य वाक्यार्थत्वं नास्तीति वाच्यम्-कार्यपर्यवसायिरवात्तातर्यशके । सपा हि-पौरुषेयमपौषेयं पाक्यं सर्व कार्यपरम्-अतरपरत्वेऽनुपादेयत्वादुन्मत्तादिवा- क्यदत् । फाव्यशब्दानां चान्वयव्यतिरेकाभ्यां निरतिशयसुखासाव्यतिरेकेण प्रतिपाद्य- प्रतिपादकयो प्रवृत्तिविषययो प्रयोजनान्तरानुपलब्धे स्तानन्दोतिरेव कार्यत्वेनावधार्यते, सतिनिमित्तत्वं च विभावादिसंसृष्टस्य स्थायिन एवावगम्यते, अतो चाक्यस्याभिधान- शक्तिस्तेन तेन रसेनाकृष्यमाणा तप्तस्सापेक्षितावान्तरविभावादिप्रतिपादनद्वारा स्वप. र्यवसायितामानीयते, तत्र विभावादय पदार्थस्थानीयास्तसंसंये रत्यादिपियार्थः । तदेतत्वाव्यवाक्यं यदीयं ताविमौ पदार्थवाफ्यायो । रसादि प्रतीयमान अर्थ दास्य में प्रयुक्त पदों के बादाय सोरे नहीं, अतः मयूयमाण पदों वाले अर्थ को वाक्यार्थ कैसे माना जा सस्ता है। वास्प तो पदों का तहात , अतः पोधाच्याओं का समूह हरी वाश्या कहा जा सकता है। ऐसी दशा में 'म थामिक' आदि उदाहरणों में निचवाची पद के न होने से निवेश को पदार्थ भाव के कारणवाक्या नही माना जाना चाहिए । ठीक यही बात रस के सिय में की जा सकती है। यदि पूर्वरक्षो इस प्रकार की दलोड दे, तो टोक नहीं मपदार्थ रसादि को माक्सा नहीं माना जा सकता, यह करना ठीक नहीं है। क्योंकि तात्पर्य शक्ति का पर्यवसान वक्ता के प्रयोजन (कार्य) तक रहत 1 . पतुर्थः प्रकाशः २६ है। जिस प्रकार अभिषा शक्ति का साध्य नाच्या लक्षणा शक्ति या साध्य लक्ष्या है, ठीक वैसे ही सात्पर्य शकि वसा के कार्य को प्रशिक्षित करती है। अतः जहाँ तक पता का कार्य प्रसारित होगा, वहीं तक तात्पर्यशक्ति का क्षेत्र होगा। यदि वक्ता का कार्य 'निषेधरूप है, यदि पता को निपेमार्थ ही अभीष्ट है तो तास शक्ति को सोमा वहाँ तक मानी जाय गो, उसका चौतन कराने के बाद दो तात्पर्य फिझौग होगी। संसार में जितने पाक्यों का प्रयोग होना, चाहे वे किक माषा के वाक्य हों, या वैदिक वाक्य हो, किसी कार्य को लेकर मात है, उस प्रयोजन की सिदिदी उस वाक्य का पक्ष्य होता है। यदि वाश्य में कोई कार्य या प्रयोजन न होगा, तो उन्मच प्रपित की तरह उस वाक्य का लौकिक उपयोग न हो सकेगा। पार्यहीन वाक्य या प्रयोग करने पर वक्ता, घोला को किसी प्रकार के भाव को प्रतिपत्ति न करा सकेगा, वह उन्मन्समाप के समान निरर्थक पानसमूह (नकि पाक्य ) होगा। अत: स्पष्ट है कि किसी भी लौकिक या वैदिक वाक्य में कार्यपरत्व होना मावश्यक है। कान्य में शमों के द्वारा विभावादिम की प्रतीति होती है, तथा विभावादि स्थायी भाव नथारम की प्रतीति कराते हैं। मी दशा में का-य के शो (कार में मयुक्त वाक्य) का विमावादिप अधे से अन्वय व्यतिरेक रूप' सम्बन्ध है। यदि काव्य में सदभिधायक शम्दों का प्रयोग होगा तो विमावादि की प्रतीति होगी, अन्यथा नही । इस प्रकार काव्योपात्त शम्दादिदी विमायादि की नीति कराते है। इन काम्योपासनों या विभावादि में ही निरतिशय सुरस का भारवाद-रस रूप अलौकिक मानन्द की चर्वणा-गदी पाया जागा, अपितु वह 'रस' इनका प्रतिपाय है। इस प्रकार काव्यप्रयुक्त शब्दों की प्रचि, उनका प्रयोग, विमातादि स्थायो मात्र एवं रस के लिए होता है। इनमें भी विभायादि स्थायी भाव तथा रस के प्रतिपादक है, रस व माव उनके प्रतिपाय ! काव्य, कान्यौपाचशम्म, विमावादि, स्था स्थायी भाव एवं रस के परस्पर सम्पन्ध की पोलोचना करने पर माल्यरूप वाक्य का दमें मोवल एक ही पाय वा प्रयोजन दिखाई पडता है, वह है सहदय के चित्त में मानन्दौरभूति करना । इस प्रयोजन के अतिरित काव्य का और कोई प्रयोजन दिखाई नहीं पड़ता, अन्य किती मी काग्य प्रयोजन की उपलब्धि नहीं होती, इसलिए मानन्दौति को ही काय कामाय माना जायगा। यह आनन्दौद्भषि विभावादि से युक्त स्थायी के ही कारण होती है। काव्य में विसावादि से युक्त स्थायी भाव की पोलोनना करने पर ही राहाम फोभानन्द की प्राशिदीती। इस प्रकार इम देसते है कि कान्यप्रयुक्त वाक्य को प्रतिपादक शक्ति (तात्पर्य शक्ति) काय के प्रतिपाद्य वसद रस के द्वारा प्रष्ट होती, कार्य रूप रस उस शकि को क्रियमाण होने को बाध्य करता है। इसलिए वास्य की प्रतिपादव तात्पर्य शक्ति को रस रूप स्वार्थ की प्रतीति कराने के लिए विगाबादि अन्य साधनों की आवश्यकता होती है, तथा उन विभागादि के प्रतिपादन के वारा ही यह शक्ति रस पी प्रवीति करा कर पर्यवसित होती है। रस प्रतीति की सरगि में काव्यमयुक्त पर्दो के अर्थ (पदा) विमावादितथा इन बिमावादि से समृष्ट स्यादि स्थायी भाव काव्य का वाक्या है। इस प्रकार बह धान्य वाक्य हो, जिसके विमान पदार्थ है, और स्थायी भाव पारया (त स्पष्ट है कि स्थायी भाव तथा रत की प्रतीति व्यङ्गय न शेकर, काम्य वा वाश्याथै है, तथा उसकी प्रतीति व्यना नामक परिपत शतिका विषय न होकर, तात्पर्य शक्ति का क्षेत्र है।) १. एक वस्तु के होने पर, दूसरी वस्तु का होना, तथा एक के अभाव में, दूसरी वस्तु कान रहना, स्मन्वयष्यतिरेक सम्बन्ध बनाता है। (तसत्त्वे वत्स अन्वयः, तदमारे तदमाव: व्यतिरेकः।) .
दशरूपकम् है, ध्यमाग है, दूसरे में वह देवल बुद्धिस्थ है, प्रकरणदेघ है। 'गा मभ्याज' (गा ले जावी) इस पालय में या ऐसे ही दूसरे लौकिक वाक्यों में 'अभ्याज' आदि क्रिया यूपमाग है, वक्ता इस क्रिया के वाचक शम का साक्षात प्रयोग करता है, तथा प्रोता को पद शब्द वशफुली के द्वारा मनाई देता है। दूसरे वाक्यों में क्रिया का साक्षात उपाशन न भी पाया जाय, बैसे 'दार द्वार' इस वाक्य में किया यूयमाण नहीं है, वक्ता उसका साक्षात प्रयोग नहीं करता पर प्रकरणवश 'दरवाजा खोलो' या 'दावाजा बरकरी' अर्थ लिया जा सकता है। दोनों ही वाक्यों में चाहेश का प्रयोग हो, चाहे प्रकरण के द्वारा ही किया बुद्धिस्थ हो जाय, दोनों स्थानों पर कारकों के द्वारा पुष्ट होकर क्रिया ही वाक्यार्थ का रूप धारण करती है। कारकपरिपुष्ट किया हो वाक्यार्थ या वाक्य का तात्पर्य है। ठीक यही बात काव्य के विषय में लागू होती है। काव्य में कभी कभी तो रत्यादि भाव के वाचक शब्दों का साक्षात प्रयोग पाया जाता है, जैसे 'प्रात्यै नवोदा प्रिया' जैसे उदाहरणों में रवि माव के वाचक शम्म (प्रीत्यै) का साक्षात् उपादान पाया जाता है। दूसरे उदाहरणों में जी महार रस यारति माव के प्रतिपादक है, ऐसे शब्दों का उपादाम नही भी हो सकता है। ऐसे कायों में प्रकरण आदि के आधार पर हो काय के द्वारा वाच्यरूप में उपाच (अभिहित) विमार, भनुमाव, तथा सभारी मानों के साथ स्थायी मार का अविनागाव सर कारण, रत्यादि पायो माव सहृदय के चित्त में ठीक उसी तरह स्फुरित होने लगता है, जैसे प्रकरणादि के कारण किसी वाक्य में प्रयुक्त कारकादि के द्वारा उनसे अविनामावतया सम्बर क्रिया की प्रतिपत्ति होती है। इन रत्यादि स्थायी भावों के तटव विभादों, अनुभावो या सधारियों का तो काव्य में साक्षात शम्द से उपादान होता है, ये तो साक्षात वाच्यरूप में प्रतिपन्न होते ही है, ये सरकार परम्परा के कारण, विभावों के पूर्वानुभव के आधार पर रत्यादि स्थायी भाव को पुष्ट करते हैं। इस प्रकार कान्य में वाच्यरूप में सपास विभावादि के द्वारा प्रतीत, काम्य में वाच्यरूप से उपात्त भयवा प्रकरणादि के द्वारा द्विस्थ रूप में प्रतीत त्यादि स्थायी भाव, किसी व्यजना नेमी कस्पित शक्ति का विषय न होकर, काव्य का वास्तविक पापयार्थही है। नचापदार्थस्य वाक्यार्थत्वं नास्तीति वाच्यम्-पार्यपर्यवसायित्वात्तात्पर्यशक्त । तथा हि-पौरुषेयमपौरुषेय वाक्यं सर्व कार्यपरम्-श्रतत्परत्वेऽनुपादेयतादुन्मत्तादिवा- क्यवत् । काव्यशब्दानां चान्वयम्यतिरेकाभ्यां निरतिशयसुखास्वादन्यतिरेकेण प्रतिपाथ- प्रतिपादकयो प्रतिविषययो प्रयोजनान्तरानुपलब्धेस्तानन्दोतिरेव कार्यरवेगावधार्यते, सदुभूतिनिमित्तत्वं च विभावादिसंसृष्टस्य स्थायिन एवावगम्यते, अतो पाक्यस्याभिधान. शक्तिस्तेन तेन रसैनाऽऽकृष्यमाणा तत्तस्वार्यापेक्षितावान्तरविभावादिप्रतिपादनद्वारा स्वप. यवसायितामानीयते, तर विभावादय' पदार्यस्थानीयास्तरससृष्टो रस्यादिपियार्थ। तदेतत्काव्यवाक्यं यदीयं साविमौ पदार्यवाक्यायौं । रसादि प्रतीयमान भर्थ वाश्य में प्रयुक्त पदों के वाच्यार्थ तो है ही नहीं, अत' मधूयमाण पदों वाले अर्थ को वाक्यार्थ कैसे माना जा सकता है। वाक्य तो पदों का सात है, अत' पदों के वाच्यार्यों का समूहही वाक्याथै कहा जा सकता है। ऐसी दशा में 'प्रम धार्मिक' मादिदाहरणों में निषेषवाची पद के न होने से निधेष को पदार्थ भाव के कारण वाक्या नहीं माना जाना चाहिए । ठीक यही बात रस के विषय में की जा सकती है। यदि पूर्वरक्षा इस प्रकार की दशेड दे, तो औक नहीं भरतार्थ रसादि को वाक्यार्थ नहीं माना पा सकता, यह करना टोक नहीं है। क्योंकि तात्पर्य शक्ति का पर्यवसान वत्ता के प्रयोजन (स) तक इत .
चतुर्थः प्रयास मिस प्रार अभिमा शक्ति का साध्य वाच्यार्य , लाया शक्तिमा साध स्याः २.सरोक से तात्पर्य तिबका के कार्य को प्रतिपारित करती है। मत: जहा तक बक्ता का कार्य प्रसारित होगा, यही शक्ति का क्षेप होगा यदि वक्ता का कार्य निषेधरूप', यदि बचा को निषेपार्थ हो भमोष्ट तो तात्पर्य शकिपी सौमा यहाँ तक मानी आप गी, वसा पोतन कराने के बारही ताल शक्तियोग होगी। संसार में जितने याक्यों का प्रयोग होता है, चाहे वे लौकिक भाषा के वाक्य हो, या यदिक वायरों, किसी कार्य को लेकर मासे है, उस प्रयोजनको सिर दो उम बायका सहय होता है। यदि वाक्य में कोई कार्य या प्रयोजन न होगा, तो उन्मस प्रलवित की तरह इस बार काफिक उपयोग न हो सकेगा। कार्यहीन पाय का प्रयोग करने पर वक्ता, घोसा को किसी प्रकार के माव की प्रतिपति न फरा सकेगा, ३ मतमले समान निस्पक वानसमूह (मकिपाश्य) शेगा। पत: समिती मी लौकिक या वैदिक काय में कार्यपरत्व होना मावश्यक है। फाम्य में शमी के दाए विभावादि की प्रतीति होती है, या विभागादि स्थायी भान सथा रस की प्रीति कराते हैं। ऐसी दशा में काम्य के शो (काय में प्रयुक्त पाप) काविमादादिरूप असे अनय व्यनिरेक रूप' सम्प। यदि काव्य में पदभिधायक रादों का प्रयोग होगा तो विभावादिको प्रनीति होगी, अन्यथा नही । इस प्रकार काव्योपात शम्दाविती विमायादि को प्रतीनि करावेरे। इन पाध्योपास शब्दों गा रिमावादि में दो निरतिशय अस का भारवाद- रूप मलौकिक मानन्द को चणा-नही पाया जाता, अपित यह 'रस' इनका निपाप। इस प्रकार काव्यप्रयुक्त शब्दों की प्रवृचि, उनका प्रयोग, पियायादि स्थायी भाव एवं रसके लिए शिक्षा है। इनमें भी विभावाति स्थायी मार स्था रस के प्रतिपादक है, सब भाव उनके प्रतिपाय । काम्य, कान्योपास, विभाषाल, तथा स्थायी माय एवं रस के परस्पर समय की पर्याप्लोपना करने पर मजव्यरूप वाक्य का हमें फेवल एक ही कार्य अथवा प्रयोजन दिखाई पड़ता है, वह सहदय के चित्त में भानन्दौरभूति करना। इस प्रयोजन के अतिरिक्त काव्य का और कोई प्रयोजन दिखाई नहीं पड़ता, अन्य किसी भी काम्यप्रयोजन की उपलब्धि नहीं होती, इसलिए आनन्दोभूति को ही फाय का कार्य माना जाएगा। यह मानन्दोभूति मिभावादि से युक्त स्थायी केही कारणतीहै। काव्य में विमावादिप्ते युक्त स्थायी भाव की पर्या लोचना करने पर ही सहदय को मानन्द की प्राप्ति होती है। इस प्रकार हम देखते है कि काम्यप्रगुरू वाषय की प्रतिपादक शक्ति (सात्पर्य शक्ति) काव्य के प्रतिपाय तत्तत् रस के दारा आकृष्ट होती है, कार्य रूप रस उस क्ति को क्रियमाण होने को बाध्य करता है। इसलिए वाक्य की प्रतिपादक सात्पर्य शक्तिको रस रूप स्वार्थ की प्रीति कराने के लिए विगावादि अन्य साधनों की भावश्यकता होती है, तथा उन विमावादि यो प्रतिपादन के मारा ही वह शक्ति रस को प्रतीति करा कर पर्यवसित होती है। रस प्रतीवि को सरशि में काग्यप्रयुक्त पद के अर्थ (पदार्थ) विमावादि है, तथा इन विभावादि से संसट यादि स्थायी भाव काव्य का पाक्वार्थ है। रस प्रकार यह काव्य वाक्य ही है, जिसके दिमाष पदार्थ है, और स्थायी भाष वारया। (Ar: स्पष्ट है कि स्थायी भाव तथा रस को प्रतीति व्यायन होकर, शाम्ब का पानया या उसको प्रतीति म्याना नामक इस्पित शक्ति का विषय न होकर, तात्पर्यशकिका क्षेत्र है।) १.५ वस्तु के होने पर, दूसरी वस्तु का होना, सण एक के अभाव में, दूसरी वस्तु कान बना, मन्वयष्यतिरेक सम्बन्ध कहलाता है। (जससे तसा अन्नयः, तदभावे सदभावः प्यतिरेकः।" .
। । २६० दशरूपकम् न चैवं सति गीतादिवस्मुखजनकरवेऽपि वाच्यवाचक्भावानुप्रयोग विशिष्टविमावा- दिसामनीविदुषामेव तयाविषरत्यादिभावनावसामेवस्वानन्दोदते , तदननातिप्रसशोऽपि निरस्त ईदृशि च वाक्यार्यनिरूपणे परिवरिश्ताभिधादिशतिचशे व समस्तवाश्यार्या- दगते शक्त्यन्तरसरिकल्पनं प्रयासः ययावीचाम काव्यनिर्णये- हम देखते हैं कि गीतादि के पथ के बाद मुख (मानन्द ) उत्पन्न होता है। पर गीतादि उस सुख के वाचक नदी, न वह सुख गीतादि का वाच्यती।टीक इसी तरह काव्य तथा उससे प्राप्त सुख (निरतिशय आनन्दरूप रस) के बारे में यहा जा सकता है। अतः पाण्य तथा रस के विषय वाच्यवाचक भाव का उपयोग नहीं हो पाता। यदि पूर्वपक्षी ऐसी युक्ति दे, द्वो ठीक नहीं। गीतादि तथा दगिन सुख वाला दृष्टान्त वाव्य तथा रस के बारे में देना ओक नहीं होगा। हम देखते है कि काव्य से प्रत्येक व्यक्ति को रस प्रतीति नहीं होती। जो योग विशिष्ट विमावादि रामप्रौशशान रखते हैं, तया उस प्रकार के स्वादि भार की मावना से युक्त है, केवल उन्ही साक्ष्यों के हृदय में काव्य को मन कर तसद रसपरक भानन्द की प्रतीति होती है । इससे यह भी स्पष्ट हो जाता है कि इन विभावादि के शान से रहित सथा रत्यादि मावों की भावना से शून्य, बरसिकों को मानन्द की प्रतीति नहीं होनी । इस प्रकार हमें पता चलना है कि रस के वाक्यार्य रूप में निरूपित कर देने पर मब तक বালিণী মা লাব্বান্ধিী না থাকূপ জমি খবি (নাবেষক, কয়লা কি ঔ द्वारा ही समस्त भूयमाणपदार्थ या भभूयमाणपदार्थ की प्रतीति दी जाती है। इसलिए भ्याना बेप्ती अलग से शक्ति की कल्पना व्यर्थ का प्रयत्न है। इसी बात को इम काव्यनिर्णय' नामक दूसरे अन्य में बता चुके हैं। 'तात्पर्यानतिरेकाच व्यधनीयस्य न ध्वनि । रिमुक्तं स्यादश्रुतार्यतात्पर्येऽन्योकिपिणि ॥ १॥ पनिकने काव्यनिर्णय से उद्धृत इन कारिकाओं में से प्रथम पाँच कारिकायों में व्यानावादी पूर्वपक्ष को उद्धृत किया है, तथा गद की दो कारिकाओं में सिद्धान्तपक्ष को प्रनिशापना की है। इनमें भी चतुर्थ कारिका में धनिक का सिदान्तपक्ष वादविवाद के रूप में भा गया है। अतः १, २, ३ तथा ५ कारिका में ही पूर्वपश्व है। यजना तया ध्वनि के विरोपियों का कहना कि काव्य में प्रतीयमान या व्यसनीय अर्थ का समावेश तात्पर्य में ही हो जाता है। इसलिए प्रतीयमान अर्थ की प्रतीति तात्पर्यशक्तिके शाहोहो जाती है, फिर इसके लिए व्यजना जैसी शक्ति की कल्पना, या रस प्रतीयमान अयं को ध्वनि कहना ठीक नहीं। इन निविरोधियों से इस पूछना चाहते है कि जहोवक्ता तात्पर्य भूयमाण नहीं है, उसका काम्य में साक्षात प्रयोग नहीं हुआ है, पर फिर भी अन्योक्ति के कारण मनौवमान अर्थ पी यजना हो हो रही है, ऐसे स्थलों पर अश्नुत- पदा में वाक्याथ ( तात्पर्य ) कसे माना जा सकेगा। (वैसे 'रम्प भो कथयामि देवदतके मा विधि शाखौटक' आदि पूर्वोदाइन पद को हेलीजियोस एम में करने वाला कविशाखोरक जैसे जड वृक्ष के निवेदश वर्णन कर रहा है। यहाँ कवि की राधा मैं तात्पर्य हो सकता है, शास्त्रोटक के निद में नहीं है, क्योंकि वहाँ बता का भयोजन नहीं है। मलिए व्यहार्य का र धनिक ने दशरूपक को अवलोक वृत्ति के अतिरिक्त काव्यनिर्णय' नामक मलद्वार- प्ररकी रचना की थी। कितु सेद का विषय है कि धनिक का कान्यनिर्गर अनुपलब्ध है। काम्दनिर्णय मैं धनिक ने म्यहनाचि का विशेष रूप से खण्डन किया था, इसका पता इस पुति में समय वाष्यनिर्णय की कारिकाभों से चलता है।
पतुः प्रकाश तस्पर्य में भन्तनाव नहीं हो साता। मना को परेशा होने पर शनि की भी सिद्धि विषं गक्षय पूर्वो यचं पणुतादिपु । प्रसज्यते प्रधानत्यानित्र के वार्यते ॥ ३ ॥ तात्पर्यवादी 'विर माश्य, मा चास्य गृह मुक्षया (विन खायो, इसके घर मोजन न गरी) इस बार से भाभार पर व्यजना तथा पनि मा समावेश नाप शशि तथा तात्पर्य करते हैं। वनका कहना है कि प्रारणशान के बाद पता के पिशारि हितेषी होने पर 'जहरणको चाल विध्यर्थ ठीक नही बैठना, क्योंकि कोई पिता मा मित्र पुत्रमित्रादि से यह न पडेगा । भारः इसका निशाला लेगा पदेगा। मह निषेधार्थ भयमाणपत है, तथा अनिवादी मी यो क्षारपर्थ मानना ही है। प्रतीयमान रसादि भो टोक इसी तरह अभूयमाग. पद साप (वाक्या हो गाने जाने चाहिए। इस मनिविरोधी गत की दलील पर रार देते हुए वनिती रहता है कि जो अमयमाणपदादि में आप रोगता रपये गानते २.वामी टोक नही, क्योंकि मक्षय इस वाक्य से प्रनीत भर थिसका प्रयोग पुत्रादि के लिए किया गया है, वो भी जहर साहेने से मी बरा शत्रु भौचन है" यह प्रीयमार अर्थ तात्पर्यशक्ति के बारा प्रतीत नहीं हो पाता, मला या पनि ही है तथा इसकी प्रतीति न्याना म्यापार से होती है। इस अर्थ में अमित यो कौन मना कर सकता है। प्यनित्स्यायी वाश्यगर्यान्तरामयम् । तत्परसं त्यविधान्तौ तब विधान्त्यसम्भवात् ॥५॥ पनि यही होगी, जदा स्वाथ (वाक्य का तासा) एक मार समाप्त हो गया हो, पद विमान्त हो गया हो, तथा नाक्य किसी दूसरे तात्पपार्थमित प्रतीयमान अर्थ का मामय है। जैसे 'भ्रम धार्मिक वाक्य में तात्पर्य विपर्य में हो विमान्त हो जाता है, किन्तु वाक्य निषेध- पपतीपमान भी मी प्रतीति बराता है। ऐसे रपटों पर ही पनि हो सकेगी। यदि स्वार्य विमान्त नहीं हो सका है, तो उसकी विश्रान्तिसीमा तक तात्पर्य माना जायगा । पर इस बात से निविरोधी सदमागही अनिविरोधी धनिक का कहना है कि नहा कही व्याय माना बाताव पाय या धनि मानना ठीक नहीं होगा, क्योंकि किसी मो वाक्य के पापा या तात्पर्याय की पियान्ति होना असम्भव है-काव्य के प्रयोषन पर ही पाकर वर विमान्त होता है। (म तृतीय पारिया में वापरत्व ववित्रानो' तक पूर्वपक्षी ध्वनियादी का मत है, 'तन्न विधायसम्मवान्' पर सिमान्तपक्षी पनिक का मत है। आगे की चतुर्थ झारिका में भी सिदान्त पदा हो उपनिर हुआ है। पनाम कारिफा में फिर पानवादो का मत है, एवं सातम कारिका में पुन' सिद्धान्त पक्ष की प्रतिष्ठापना) "इस सम्बन्ध में यह कह देना होगा कि मम्मट आदि ध्वनिवादियों ने इस वाक्य के मिषरूप को व्यान मानकर तात्पर्य ही माना है। विश्व अक्षय पाये वाश्याथै या निवार्थ के 'मा चास्य गृहे मुल्या. इस उत्तरार्थ परक मानवे हैं तथा 'च' से सम्पम दोने के कारण दोनों वाक्यों को उद्देश्यविधियार से सम्पद मान लेते हैं। भास उदाहरण बो व्याना का उदाहरण घे मी नहीं मानते। मम्मट गहरे तात्पर्य में अप्रमाणपदत्व भी नहीं मानते, गोंकि इस बाक्य के उपराई में 'मा चास्य ग बस्था में निषेध स्पष्टत" वाम है। (देखिये-सायप्रकाश मास ५, पृ.२८८) | 40 ३१६० २४२ दशरूपकम् एतावत्येव विधान्तिस्तात्पर्यस्येति किंतम् । यावस्कार्यप्रसारित्वात्तात्पर्य न तुलाधृतम् ॥ ४ ॥ धनिवादी तात्पर्य के अविश्रान्त होने पर तो तात्पर्य शक्ति का विषय मानता है, तथा उसके विश्रान्त होने पर भी अर्यान्तरप्रतीति होने पर उसे व्यगधार्थ मानते हुए व्यचना तथा ध्वनि का विषय मानता है। इस विषय में सिद्धान्त पक्षो इससे यह पूरता है कि किमी भी (अमुक) वाक्य में तात्पर्य यहीं तक है, बस इसके आगे नही, सप्तकी यहाँ विश्रान्ति हो जाती है, इस बात का निर्धारण सिने कर दिया है । वस्तुतः किती मी धास्य के वाक्पार्थ या वात्पर्य को कोई निश्चित सीमा निरद नहीं की जा सकती। तात्पर्य तो जहां तक का का प्रयोजन (कार्य) होता है, वहीं तक फैला रहता है, इसलिए वह इतना ही है, इससे अधिक नहीं ऐसा दौल या माप जोख नहीं है। तात्पर्य को किसी तराजू पर रख कर नहीं कहा जा सकता, कि इतना तात्पर्य है, बाकी अन्य वस्तु । इसलिए तुम्हारा म्यतय मी तात्पर्य ही में अन्तनि- विष्ट हो जाता है। भ्रम धार्मिक विश्रब्यमिति श्रमिकृतास्पदम् । निावृत्ति क्यं वाक्यं निषेधमुपसर्पति ॥ ५॥ ध्वनिवारी 'भम धार्मिक विश्रयः' वाली प्रतिम गाथा को लेकर निम्न युक्ति के बापार तात्पर्यादी से वाद करता है कि इस गाथा में निषेषरूप अर्थ वाक्या नहीं माना जा सकता। इस गाथा में पाक्य 'मिक्रिया' की प्रतीति कराता है। नायिका धार्मिक को 'मजे से घूमो' यही कह रही है। रस गाथा का वाक्य विध्ययपरक ही है, अतः सात्पर्य विष्य में होगा। वाक्य में तो स्पष्टतः निषेध का उछेख नहीं, वह भ्रमणक्रिया के दोधक पद से ही युक्त है। । अमपनिदेष के रोधक पद का वहां प्रयोग नहीं है। इसलिए ऐसा वाक्य निषेध परक केसे हो सकता है। अब निषेधारक पर्थ की प्रतीति तात्पर्य से भिन्न वस्तु है । मारे मत में पद व्यथार्थ है, या व्यजना शक्ति के द्वारा प्रतिपराध है। प्रतिपायस्य विधान्तिरपेक्षापूरणादि । वनुर्विवक्षिताप्राप्रविधान्तिर्न पा कयम् ॥ ६॥ पनिदादी के मत का खण्डन, तथा तात्पर्य प्रति की स्थापना का वपसंहार करते हुए पनिक सिमान्दपक्ष का निधन कर रहे:-आप होग'भ्रम धार्मिक विषयः' इत्यादि गाथा मैं केवल इसलिए विध्यर्थमात्र को तात्पर्य मान लेते हैं कि पहाबपेशा की पूर्णता हो आती है। जब कोई थोड़ा इस शक्य को सुनदा है, तो वह विध्यर्थरूप में अर्थ लगा लेता है, तथा उसे पापाय पूर्ति के लिए किसी अन्य पद की भावश्यकता नहीं पड़ती। इसलिए ध्वनिवारी इस विष्य में तात्पर्य की विधान्ति मान लेते है। दीको मोता की इष्टि से यही 'विश्रान्ति हो भी, तोभी बता (कुन्टा नायिका) का अभिप्राय दो वियक नही है। यदि विध्य तको भर्य मान लें, तो वक्ता के अभिप्राय की प्रतीति न हो सकेगी, तया वाक्य का सच्चा अर्थ तो . दक्षा का अभिप्राय दी है। जातक वो नायिका का माशय-'तुम वहाँ कभी न जाना, नहीं •दो तुम्हें शेर मार डालेगा'-शा नहीं होता, तर वास्या की अविवान्ति क्यों नहीं होगी। वस्तुका रस रस में सकी कुन्टा नायिका के अभिप्राय को, निधरूप ईको, जान सेने पर दो तात्पर्य की विश्रानि हो सकेगी, उसके पूर्व कदापि नहीं। पौषेयस्य वाक्यस्य दिवसापरतन्त्रता । धभिप्रेततात्सर्यमतः काव्यस्य दुज्यते ॥ ७॥ इति । कोई भी चौकिक दापौरुषेय वाक्य किसान किती विवक्षा पर आश्रित रहता है। जब 7 चतुर्थः प्रकाशः - छोई धसा किसी भी वारपा प्रयोग करता है, तो यह किमी पात को कहना चाहता है। शैकिक वाक्य में तापपर्याय उसी वस्तु में होगा, जो कक्षा का अभिप्राय है। ठीक यही बात काव्य में माँ घटित होती है। झाग्य में रसादि अर्थ (जिन्हें ध्वनिवादी व्याय पहते है), राम्य के या रवि के मभिप्रेत , भन. वे तात्पर्य हो है। अतो न रखादीनां काव्येन मह म्याराव्यप्रस्मात्रः । किं तर्हि भाव्यभावकसम्बन्ध ? काव्यं हि मावर्फ, भाज्या रसादयः । ते हि स्वतो भवन्त एव मादकेषु विशिभविभावादि मता वाथ्येन गाभ्यन्ते। अतः यह सिद्ध हो गया कि पाप का रस के साथ न्याय व्यजक सम्बन्ध नहीं ,न दो काध्य स्याम ही है, नरसादिव्यावदी। तोपिरान दोनों में कौन सा सम्बन्ध है। काभ्य सथा रस में परस्पर भाभ्यगावक मात्र या मायभावक समन्ध है। काव्य भाषक है, रसादि माग्य । सहदय के मानस में स्थायी भाव पारस को पर्वमा होती है, इसीचर्वणा की 'पावना' मोमरते हैं। सीके भाधार पर काम्य भावक है, रस उसके भाष्य । रसादि सहदप के हदय में अपने आप ही पैदा होते है, तथा सय रस के अनुकूल विशिय विभागों के द्वारा काय उनकी भावना कराना। म चान्यन शब्दान्तरेषु भाव्यभायरलक्षणसम्बन्धाभावात् काव्यशब्देष्वपि तथा भाव्यमिति वाच्यम्-भावनाकियावादिमिस्तथाझीकृतत्वात् । किन्ध मा मान्यन तथास्तु अन्वयम्यतिरेकाभ्यामिद वयाचगमात् । तदुचम्- काय तथा रस के भा-यमावक सम्बन्ध के विषय में पूर्वपक्षी एका वठा सकता है कि दूसरे शब्दों तथा उनके मयों में माध्यमावक रूप सम्बन्ध नही पाया जाता । काव्य के शब्द मी. इतर शब्दों की ही सरए ३, इसलिए काज्य तथा उनके अर्थ रसादि में मी माव्यभावक छहण सम्बन्ध का अभाव ही होना चाहिए। धनिक का कहना है कि पूर्वपक्षी के भारा यह रहा उदाना ठीक नहीं। मावना नामक क्रिया को मानने वाले भावनाबादी मौमासको ने 'भावना' किया में भाज्यभावक सम्बन्ध माना ही है। उनके मतानुसार 'स्वाकामीयजेत' या 'पुत्रकामोपजेत' इत्यादि तिराणोदित वाक्यों के प्रमाण के अनुसार पायादि क्रिया से स्वर्गादि २. काव्य तयारस के परस्पर सम्बन्ध, एवं विमावादि त्या रसादि के परस्पर सम्बन्ध के विषय में रसथान में चार मत विशेष प्रसिद्ध है। ये मत महलोहट, धडक, महनामक, तथा अभिनवगुप्तपादाचार्य के है। इन मतों का सक्षिप्त विवेचन इसी अन्य के भूमिका माग में द्रष्टव्य है । भट्टनायक ने म्यानावादियों का खण्डन करते हुए विमावादि एव रस में परस्पर 'मोग्यमोजक' सम्बन्ध माना। नन्होंने इसके लिए अमिधा के अतिरिक्त 'भावना तथा मोजकरबन दो व्यापारों की कल्पना की थी। मट्ट नायक के अनुपलब्ध अन्य ददया दर्पण' में इसका विवेचन किया गया था। धनिक का काम्य तथा रस में मान्यमावक सम्बन्ध गागना भट्ट नायक का ही प्रभाव है। सम्भवता यनिक को हृदय दर्पण का भी पता हो। वैसे ध्यान से देखने पर पता चलता है कि रसव काव्य के सम्बन्ध के विषय में धनिक का कोई स्वतन्ध गत नही रहा है। वह प्रमुखत भट्ट लीडर के 'दीपदीपतरल्यापार तथा भह नायक के मावना व्यापार से प्रभावित दुवा है, जिसमें धनिक ने तात्पर्यशक्ति वाला गत भी पिला दिया है, जो भट्ट कोल्लट का दीदीतर अभियाव्यापार' ही है। एक स्थान पर धनिक सडक के भी भणीर, महावे दुष्यन्तादि को 'मुपमयविरद' के समक्ष रख कर गक के चित्रवरगादि. न्याय काही मामय - २४४ दशरूपकम् की प्राप्ति होती है। इस प्रकार मौमासक मागादि किया तथा स्वादिषन में 'भावना' क्रिया की पसना करते हैं। यागादि क्रिया रूप कारण के द्वारा स्वर्ग प्रावि रूप कार्य निष्पन्न होता है। यागादि किया मावक है, स्वर्गप्राप्ति माच्य । इस प्रकार मौमासक दानिकों ने इस सम्बन्ध को माना ही है, इसलिए यह भाज्यमावक सम्मन्य की करपना शालानुमोरित है। शम्मी के अन्य लौकिक प्रयोग में, या अन्य लौकिक स्थलों पर यह मान्यमावक समन्ध नहीं होता, यह तो काव्य सपा सके सम्बन्ध में दीपटित होता है। इस बात की पुष्टि काव्य तथा रस के परस्पर अन्वयव्यतिरेक सम्बन्ध से हो जाती है। कान्य में रसादि मानक मदों का प्रयोग नहीं होगा तो किसी तरह मी रस की भावना' (चर्वणा)न हो सकेगी, या उसके होने पर सद दयहृदय में रसादि अवश्य माबित होंगे, इस भन्वयन्यतिरेक मणि से यह स्पष्ट है कि काव्य तथा रस में मान्यमारक सम्बन्ध है। 'मायाभिनयसम्बन्धान्भावयन्ति रसानिमाम् । यस्मात्तस्मादमी भाषा विशेश नाट्ययोफूभिः । इति । जैसा कि कहा भी गया है- भाव, मावों तथा अभिनय के द्वारा, अथवा भावों के अभिनय के द्वारा रसों की भावना करावे हैसोलिए नाट्यप्रयोक्ता इन्हें भाव रहते है। इससे यह सिर कि स्पापी पाच रसो की भावना कराते हैं। मत रस मान्य है, यह भी स्पष्ट हो जाता है। इसके माधार पर काव्य तथा रस में माव्यमावक सम्बन्ध स्थापित हो जाता है। कथ पुमरग्रहीतसम्बन्धेभ्य पदेभ्य स्पाय्यादिप्रतिपत्तिरिति चेत् । लोके तयादि- घशायुक्तस्त्रीपुसादिषु रत्यावविनाभावदर्शनादिहापि सयोपनिवन्ध सति रत्याश्निाभूत चेपादिप्रतिपादकशब्दभवणादभिधेयाऽचिनामावेन लाक्षणिको रत्यादिप्रतीति । यथा च काव्यार्थस्य रसमावकत्वं तथाऽने पक्ष्याम । काव्योपात्त पदों से रत्यादि स्थायी भावों को प्रतीति के विषय में पूर्वपक्षी फिर प्रश्न उठातारक मान्योपात पदों का रत्यादि भावों से कोई सम्बन्ध नहीं है, मन्य शब्दों तथा उनके अयों में अमिधा व्यापार इसलिए काम करता है कि वे अर्थ उम उन पदों के सतिन अर्थ होते है । स्थायी काम्योपात्त शब्दों का सङ्केतिन न तो है ही नहीं । मत रत्यादि से कोई सम्बनने से कान्यौपाल पर स्थायी भादिभावों या रस की प्रतीति कैसे करायीस शङ्का का उपर सिमान्तपक्षी यो देता है ।इम ससार में दो प्रेमियों को देखते है, या सी पुरषों के परस्पर अनुराग को देखते हैं। ये सी पुरुष नाना प्रकार को प्रेमपरक चेष्टाओं से युक्त दिखाई देते है। इनकी ये चेष्टाएँ देखकर भविनाभाव सम्बध से इम (स्यादि का भी दर्शन कर लेते हैं। उन अनुरागपूर्ण चेष्टाओं को देखकर इम उबके परस्पर प्रेम को मान लेते हैं। ठोक यहोपात कान्य के विषय में कही ना सकती है। काव्य में हसत स्थायी माव की घटाएं नियम की माती काव्य में प्रयुस शमन चेटामों के वाचक है। इस प्रकार कन्योपाच एमके उनने से चेष्टाओं की प्रजाति होती है और चेटार अविनाभाव सम्बन्ध के द्वारा त्यादि स्थायी मार की नीति कराओ। इस प्रकार कान्योपादों के मन से अभिषेव खेटादि से समय रस्त्यादि की प्रतीनि लाशगिक है, उसे लवणासतिगम्य मानना होगा। कान्य का वायार्थ रस की भावना केसे कराता है, हम आगे जायेंगे। सास एष स्वायत्वासिकस्यैव पर्तनास। गानुकायंस्य बुचरवायान्यस्यातत्परत्वतः | सी चतुर्थः प्रकाशः ः प्रतीतिमंदियारागपासमतः। लौकिकस्य स्थरमणीसंयुनस्येच दर्शनात् ।। ३६ ॥ रस्यादि स्थायी भाव स्वाय होता है, सहृदय उस आरशाद करते हैं, इस लिए लौकिक स्वाद के विषय 'राम' की माति यह भी रस कहलाता है । यह रस रसिक सहदय में ही पाया जाता है, अनुकार्य राम, दुष्यन्त, सीसा, या सवन्तला में यह नहीं पाया जाता । रस का स्वाद रस की पर्वणा रसिकों को, दर्शक सामाजिकों को, ही होती है, अनुकार्य पानों को नहीं । अगुकार्य पात्रों को तो केवल कया भर ली जाती है, काम्य का प्रयोजन 'सामानिकों को रसास्याद ना ही है। काग्य के अनुकार्य रामादि सो भूतकाल के हैं, उन्हें सचर्या हो हो कैसे सकती है। वस्तुतः रसथर्वणा नाटकादि काग्य के दया सामाजिक में ही मानी जा सकती है। यदि अनुकार्य रामावि मैं मानी जायी, तो घे भी टीक उसी तरह होगे, जैसे हम आमतौर पर ध्यावहारिक संसार-धेत्र में, अपनी नायिका से युक्त किसी मायक को देखते हैं। किन्हीं दो प्रेमी भेमिका को जारी चेष्टा करते ऐप हमें रस प्रतीति नहीं होती, हमें या तोला होगी, याईयो, राग पा द्वेष । यदि अनुकार्य दुष्यन्तादि में रस मान ले, तो सामालिकों को रसास्वाद नहीं हो सकेगा, मायुत उनके हृदय में लम्भा, ईया, राग या द्वेष की उत्पत्ति होगी। नारी चेष्टा देसकर यदे छोगों को हम होगी, दूसरों को ईप्यादि। मतः अनुकार्य नापकादि में रस मानने पर दोप लाने के कारण सामाजिक में ही रसस्थिति माननी होगी। काम्यापारितो रसिकरती रत्यादिः स्थायीभावः स इति प्रविनिर्दिश्यते, सच स्वायता निर्भरानन्दविदात्मतामापायमानो रसो रसिम्वति पर्तमानत्वात् , नानु कार्यरामादिवर्ती पत्तलासस्य। काव्य के वाध्या के द्वारा उद्भादित रत्यादि स्थायी मार जो रसिवी के हदय में रहता है, कारिका 'स..(द) पद के द्वारा निर्दिष्ट हुभा है। दो मा जब भास्वाद का विषय पनता है, सामाजिक के दृश्य में भलोकिक भानन्दपन चेतना को विकसित करता है, तो रस कहलाता है, क्योंकि वह रसिक सामाजिकों में हो रखता है। नाटकादि काव्य का प्रत्येक द्रष्टा रसचदेगा नही कर सकता, उसके लिए रसिक (सदस्य) होना आवश्यक है । अतः रस की थिति रसिक में ही होती है। रसिक तो यमान है, अनुकार्य रामादि अतीत काल से सम्बक है, अतः रस को स्थिति अनुकार्य रामादि में नहीं मानी जा सकती। अथ शब्दोपहितरूपरपेनायर्तमानस्यापि वर्तमानयदवभारानमिष्यत एव, तथापि तदवभासस्यास्मदादिभिरननुभ्यमागत्यादरात्रामवाऽस्वादं प्रति, विभावत्वेन तु रामादेवर्तमानवदवमासनमिष्यत एवं 1 किव न काव्यं रामादीना सोपजननाय कविभिः प्रवते, भीि तु सइदयानानन्दयितुम् । स च समस्तभावकस्वसंवेद्य एच । मदि धानुकार्यस्य रामादेः भारः स्यातको नाटकादौ तदर्शने लौकिक व नायक मारिणि स्वकान्तासंयुफे दृश्यमाने सारवानयमिति प्रेक्षाणां प्रवीतिमात्रं भवेत्र रसाना स्वादः, सत्पुरुषाणां च लना, इतरेषां स्वस्थानुरामापहारेच्चादयः प्रसज्येरन् । पर्ष चारति रमादीना व्यायवापास्तम्। अन्यतो सम्पसत्ताक घरवन्येनापि व्यज्यते प्रदोपेनेव घटादि, न तु तदानीमेवानिध्यक्त्वागिमतेरापायस्वभावम् । भाष्यन्ते च विभागादिभि प्रेशर रसा इत्यापेदितमेव ।
दशरूपकम् कोई कहे कि काव्य में तो अनुकार्य रामादि का वर्णन वर्तमान की तरह ही किया जाता है, तो ठीक है। काव्य में उपात्त शम्दों के द्वारा रामादि अनुकार्य पात्रों का रूप इस तरह उपस्थित किया जाता है कि साक्षात रूप में वर्तमान नशेने पर भी नाटकादि में वे ही वर्तमान है, इस तरह का मामाप्त होता है । कवि तथा सामाजिक दोनों को हौस प्रकार की प्रतीति बष्ट मी है, (अन्यथा रस प्रतीति न होग)। इतना होने पर पौरामादि का वर्तमान के रूप में आमास हम लोगों (सामाजिकों ) को ही होता है, अतः अनुकार्य रामादि की आस्वाद (रस) की दृष्टि से सत्ता है ही नहीं, आस्वाद की दृष्टि से वे अवर्तमान ही है। रामादि का वर्तमान के रूप में वर्णन, निमाव के रूप में किया जाता है, अतः वर्तमान के रूप में भवभाष सामाजिकों को रस प्रतीवि का कारण (विमाव) है। विभाव रूप में उनका इस प्रकार निबन्धन कवि व सामाजिक दोनों को प्रमोट है। साथ ही यह मी गाव ध्यान देने कोरे कि ( भवभूति मादि) कवि रामादि को रस प्रतीति के लिए काव्य की रचना नहीं करते। कवि काव्य की रचना इसलिए करता है कि उससे सहदय सामाजिक भानन्दित हो, उन्हें रसास्वाद हो । इस रस का अनुभव समस्त सहृदय के स्वतः प्रमाण का विषय है। मगर यह मान भी लिया जाय कि कार (रस) की प्रतीति भनुकार्य रामादि को होती है, तो नाटकादि के दर्शन पर दर्शकों को वैसे ही कोई भी रसास्वाद न होगा, वैसे लौकिक प्रेमी को अपनी कान्ता से युक्त देखकर दर्शकों को केवल इतनी हो प्रतीति होती है कि यह युक्फ भार से युक्त है। रसासार की बात तो जाने दीजिये, ऐसी अवस्था में देसने वाले सज्जन व्यक्तियों को लम्जा होगी, क्योंकि दूसरे लोगों की भारी चेष्टा देखना उन्हें पसन्द नहीं। दूसरे विलासी दर्शकों को ईग्यो, अनुराग, देष शेषा, शायद उन्हें यह मी रया हो कि ऐसी मुन्दर नायिका का अपहरण कर लिया जाय । अतः रस को नायकादि अनुकार्य पात्रों में नही माना जा सकता। इस निष्कर्ष से यह भी निराकृत हो जाता है कि रस न्याय है। रस को न्याय मानने बाले लोगों के मत का खण्डन रत दर से भी हो जाता है। व्यगना उसी वस्तु को हो सकती है, जो पहले से ही स्वतन्त्ररूप से विधमान हो, तथा किसी दूसरी वस्तु से व्यजित हो। उदाहरण के लिए घट की सत्ता प्रदशेप से पहले ही है तथा स्वतन्त्र है, तभी तो प्रदीप घट को (अन्धकार में)व्यजित करता है। रसादि पहले से ही होते तो विमावादि या काव्योपास सम्दादि उनको व्यसना करा सकते थे। अतः रस की पूर्व सा न होने पर, व्यसनावादी उसे म्यहाथ नहीं मान सकते। विसावादि के द्वारा रसों को भावना (मारवाद या चर्वणा) दर्शकों, सामाजिकों में होती है, यह बात हम पहले ही बता चुके है। ननु च सामाजिकाधयेषु रसेपु को विभावः कथं च सीतादीनां देवीनों विभावत्वे- नाऽविरोध ? उच्यते- धीरोदाताधघस्थाना रामादिः प्रतिपादक। विभावयति रत्यादीस्वदन्ते रसिकस्य ते ॥ ४०॥ माजिकों में हम की स्थिति मानने पर यह प्रश्न उठना स्वामाविकी कि उनके विभाव कौन था सीता मादि पूज्य देवियों को शारादि का विमान मानने में दर्शकों के लिए दोर क्यों नहीं होता। इस प्रकार सामाजिकों की रसचदंगा के विभाव कौन । तपा सीतादि को विभाव मानने में अविरोध से साबित होगा। इन्दी परनों का उत्तर निम्न कारिका में दिया जाता। नाटकादि में वर्णित अनुमाय रामावि तदनुकूल धीरोदास मादि प्रथा चतुर्थ' प्रकाश प्रतिपादक हैं। ये रामादि सामाजिकों में रस्यादि स्थायी मार को विभाषित करते हैं, रवादि स्थायी भाव की प्रतीति कारण पाते हैं। ये पादि स्थापी भाव ही रसिक सामाजिक के द्वारा भारतादित दिये जाते हैं। नहि यायो योगिर इन ध्यानरपा प्याला मातिस्विी रामादीनामवस्थामितिहा- सदुपहियमन्ति, कि रादि सर्वोक्सापारणा स्योत्प्रेक्षाकृतसभिधी पीरोदातायतस्था" पचिदानयमाप्रदायिनी (1)पति । पनि रामादि वा वर्णन डीक उसी तरह से नहीं करते, नेता पुरागैतिहास में होता है। २वि योगियों की तरह ध्यान करके मानवधु के द्वारा रामादि के अतीत परित्र का प्रत्यक्ष दर्शन करके उनको अवस्था का वर्शन ठीक उसी तरह नहीं करते, जमा इतिहास में पाया जाता है तो फिर पति कैसा वर्णन करते है । वपि सो कौशिगवार के आधार पर दोसनका निबन्धन करते है। अपनी प्रेक्षा (कल्पना) रामादि में ससम् प्रकार की उन धीरोदाचादि अवस्थाका चित्रण करते है, जो किही अनुभून राजादि (मामय) में ववि ने देखा है। इस प्रकार सपि अपने ही लौकिक जीवन में प्रत्यक्ष किये राजा भादि में धीरोदातादि परया देय पर उममें कुछ पाया सागवेश पर रामादि मौ अरस्था का निएपन करते है। ता एप च परित्यच विशेषा रसहेतवः। काप्प में पणिस ये रामादि ही जय अपने विशेष प्यपि (रामस्वादि) को खोद कर सामान्य (नायकमान) रूप धारण कर लेते हैं, तो सदय के दपप में रस प्रतीति पराने के कारण (विभाव) यन जारी हैं। तर सीतादिशब्दा' परित्यजनस्तनमादिविशेषा सीमायाचिन शिमिवानिष्ट पुर्यु स्मियं तर्युपादीयन्त इति चेत् । उच्यते-- पोडतां गुण्मयेर्यदलानां द्विरदादिभिः ॥ ४१ ॥ द्वी स्वोत्साहः स्वदते नवच्योतणाम नादिमिः । कारिका से स्पष्ट है कि सौना, शकुतला बादि पात्र अपने विशिष्ट व्यक्तित्व को छोड कर सामान्य रूप को धारण कर लेते है, दूसरे शब्दों में वे साधारणीकृत हो जाते है। इस सम्मप में यह मार सकता है कि मान्य में सीतादि शद जनक्तनयादि के विशेष व्यक्तित्व को छोटकर विकी मात्रा बोध कराने लगते है, यह मान लेने पर उनका रिसी भी तरह का पनिट नही होगा। तो फिर काव्य में इनका उपादान क्यों होता है। जब सीता वहाँ परिस्थत जनवानगयारव धारण करती है, तो फिर उसके प्रति आदरादि का भाव न हो सयेगा, सया नससे रसाबाद मौके होगा। इसीका उतार देते हुए बहते है? छोटे परचे मिट्टी के बने हुए हाथी, घोडे भादि से खेलते हैं। वे उन्हें सश्वे हाथी, मच्चे धोये ही समझ कर खेलते हैं, तथा उनसे आनन्द प्राप्त करते हैं। ठीक इसी सरह काम्प के घोसा सामानिक भी अर्जुा बादि पात्रों के द्वारा उन पात्रों में उत्साह देश फर स्वयं नासा का मास्वाद करते हैं। यद्यपि आर्जुनादि, गृण्मय द्विरदादि की सरह ही भयास्तविक है ऋयल प्रतिकृति मात्र है, तथापि सामाजिकों को उनसे जानन्द प्राप्ति होती है। एतदुत भयति-नान लौकिकारादिवस्यादिविभावादीनामुपयोग, कि तईि प्रतिपादितप्रकारेण लौकिकरसविलक्षणत्वं नाम्बरसानाम् ।। यदाइ-'अष्टौ नाट्यरसा' स्मृता'इति।
1 दशरूपकम् इस विषय में यह कहा जा सकता है कि वाव्य का शहर ठोक उसी ताद नहीं है जैसा शैकिक शृङ्गार । लौकिक शृङ्गार में जैसे स्त्री आदि विमानों का प्रयोग होता है, उस सरर काव्य में नहीं होना है। तो फिर यहाँ क्या होता है। काश्य का रस (नाट्यरस) सांसारिक रस से सर्वथा विलाश, तथा भिन्न है, इसको हम बता चुके हैं। जैसे रहा भी है कि नाट्यरस सरया में केवल पाठ ही होने है। फाच्यार्थभावनास्वादो नर्तकस्य न पार्यते ॥ ४॥ नर्तक (नट) को रसास्वाद होता है या नहीं, इस विषय में हमारा मत यह है कि नर्तक को भी रसास्वाद हो सकता है। हम नर्तक के फाच्या भावना-रस-के भारवाद का निपेध नहीं करते। नर्तकोऽपि न लौकिकरसेन रसवान् भवति तदानी भोग्यत्वेन स्वमहिलादेरमहणात काव्यार्थभावनया स्वस्मदादिवत्काव्यरसास्वादोऽस्यापि न चार्यते ।। नाटकादि में अनुकार्य रामादि के अनुकरण नट भी लौकिक रस से रसयुक्त नही माने जा सकते, क्योंकि वे नाटक में अनुकरण करने वाली महिला को भोग्य रूप में ग्रहण नहीं कर सकते । अत उनमें लौकिक रस की स्थिति नहीं मानी जा सकती। वैसे वाध्याय की भावना के द्वारा नर्तक को मी रसास्वाद हो सकता है, पर उस दशा में नर्तक भी हमारी तरह सामाजिक होगा। भाव यह है यदि नतेक सहदय है, तो सामाजिक के रूप में, सामाजिक के दृष्टिकोण से, पर रसास्वाद कर सकता है। उसे कथमपि रसास्वाद नहीं होता; ऐसा हमारामत नहीं है। पथ च काव्यात्स्वानन्दोभूति किमात्मा चासाविति व्युत्पाद्यते- स्वादः काव्यार्थसम्मेदादात्मानन्दसमुद्भवः। विकासविस्तरक्षोभविक्षेपास चतुविधा ॥४३॥ शृङ्गारवीरवीभत्सरौद्रेषु मनसः ममात्। हास्याद्भुतमयोत्कर्षकक्षणानां त एव हि ॥४॥ श्रतरतज्जन्यता तपामत एघावधारणम् । काव्य से मानन्द कैसे उत्पञ्च होता है, तथा यह मानन्द किस प्रकार का होता है, रसीको स्पष्ट करते- कायार्थ के ज्ञान के द्वारा आत्मा में (सहदय के हृदय में) विशेष प्रकार के आनन्द का उत्पन्न होना स्वाद कहलाता है।यह स्वाद चार प्रकार का माना जाता है- चित का विकास, पित्त का विस्तर, सिसका सोम, सथा चित्त का विषेप। चारों प्रकार के मनोविकार विकास, विस्तर, सोम तथा विक्षेप-क्रमशः शशार, पीर, बीमरस तथा रोदरसों में पाये जाते हैं। ये चारों मनाप्रकार ही क्रमश हास्य, अद्भुत, भप सया करुण में पाये जाते हैं। इस प्रकार मार तथा हास्य में विकास, धीर तथा भद्भुत में विस्तार धीमरस तथा भप में जोभ, एव रोख तथा करुण में विशेप की स्थिति होती है। इसीलिए हास्यादि चार रसौ को शारादि पार रसों से उत्पत्र माना जाता है, तथा धाड हो रस है। इस प्रकार की अवधारणोफि भी इसीलिए कही गई है, क्योंकि मन की चार स्थितियों से पार द्वारादि तया चार सजन्य हास्वादि का ही सम्पग्ध घटित होता है, (नौ या इस वाली रस संख्या का नहीं)। काठ्यार्थेन - विभावादिसमस्या यात्मन भावकचेतय सम्भेदे अन्योन्यराक्ष- लने प्रत्यस्तमितास्वपरविभाो सति प्रबलतरदानन्दोति स्वाद, तस्य न सामान्या- .
चतुर्यः प्रकाश २४१ रमक्वेऽपि प्रतिनियाविशावादिकारणजन्येन सम्भेदेन चतुर्धा रितभूमयो भवन्ति । तद्यथा--हारे विकारा , धीरे पिरतर, योभासे झोग, रौ विक्षेप इति । तदन्येपा অনুগ যােৰামৰিগালী বশীকগােিডীয়ালী র ( বলাযী বিষয়- चायतस' सम्मैदा, अत एव~- वाराद्धि भवेदास्यो रौसाय करुणो रस । पौरापाहतोत्पत्तियीभासाच ममाना ।" इति हेतुहेतुमद्भाव एव पम्मोदापेक्षया दर्शित न कार्यकारणभावाभिप्रायेण तेषां कारणान्तरगन्यत्वात् । काय का घारतावक अर्थ विमावादिकों से युक्त स्थायी माष है, अत काव्या शमसे इस पारिका में विमावादियुक्त स्थायी मान रूप अर्थ का सात्पर्य है। स काम्याथ के दारा राहदय के विप में भतुकार्य रागादि के सदृश अवस्या का संचलन हो पाता है। सहदय स्थायी भाव रूप काव्या का अनुशीलन कर 'ख' तथा 'पर' के दिमाग को भूल जाता है, जसका विस साधारणौल हो जाता है। इस स्थिति में सहदय को जिस महान् मानन्द को प्रतीति होती है, वही स्वाद (रस) कहलाता है। यह स्वाद चैसे तो सभी रसों में सामान्य रूप से पाया जाता है, फिर भी अलग-अलग रस के अलास के विमाय पाये जाते हैं, लिलिए इस भेद के कारण सदाय के चित्त की चार प्रकार की स्थितियों पाई जाती है। मंडे-शहार में विकास, वीर में विस्तर, पामास में क्षौम, तथा रोद में विक्षेप । शारादि (ल चार एसों से इतर हास्य, अदभुत, भयानक, तथा करुण न चार रसों में मौ-जिनकी अष्टि अपने-अपने विमानों के अनुसार दोतीरे-वे ही चार विकासादि चित्तभूमियों मश मिलती। इसीलिए शहारादि के हास्यादि का कारण इसी सम्भेद के भाधार पर माना जाता है। "बार से हास्य, रोदसे करुण, चौरसे अभुन, तथा भीमस से भयानक रस की उत्पत्ति दोनो।' इस बचन में गारादि को कम। हास्यादि का हेतु, तथा हास्यादि को देवमान् माना है, इसका केवल यही कारण है कि इनमें एक सी चित्तभूमि पाई जाती है, जो दूसरे रसों में नही। इस भेद को लाने के लिए ही इस कार्यकारण भाव का उल्लेख हुआ है। इस कार्यकारण भाव के प्रदर्शन का यह अर्थ नहीं है कि एक बनयो कारण है, तथा दूसरे कार्य, क्योंकि दास्यादि यो कारण (रिभाव) हारादि के कारणों (विभाा ) से सर्वथा भिन्न है। साराष्टतिर्या तु स हास्य इति कीर्तित।' इत्यादिना विकासादिसम्भदेवत्वस्येव फुटीकरणात , अवधारणमप्यत एव 'अष्टौ' इति सम्मेदान्तराणामभावात् । ननु च युक्त कारवीरहास्यादिषु प्रमोदात्मके याश्यार्यसम्भेदात् धानन्दोद्भव इति, कणादौ तु दुःखालके कमिवासी प्रादुण्यात् । तथाहि-तम करुणात्मककाम्य माया साविर्भावोऽनुपातादयश्च रसिकानामपि प्रादुर्भपन्ति, न चैतदानन्दात्मकन्ये राति युज्यते । सत्यमेतत् किन्तु सारश एवासावानन्द' सुखदुःखात्मको यया महरणादिषु सम्भोगा स्थाया पुरमिते स्त्रीणाम्, अन्यथ लौकिवात्तणावाप्यकरण तथाबमोत्तरोतरा रसियानां प्रवृत्त । यदि च लौकिकरणबहु सात्मरुत्यमेवेह स्यासदा न कावदन २५० दरारूपकम् प्रवर्तेत, तत करणैकरसाना रामायणादिमहाप्रपन्धानामुच्छेद एव भवेत् । अनुपाताद- यश्वेतिहत्तवर्णनावर्णनेन विनिपातितेपु लौशिकवैशव्यदर्शनादिवत् प्रेक्षकाणां प्रादुर्भवन्तो न विरुध्यन्ते तस्मादसान्तरवत्करुणस्याप्यानन्दात्मकत्वमेव । 'हार के अनुकरण को हास्य रस कहत है। इस उक्ति के द्वारा विकासाहि के सम्भेद को ही सष्ट किया गया है। इसीलिए यह अवधारण भी दिया गया है कि रसों की सरया आउ हो होती है, क्योंकि चार चित्तभूमियों के आठ ही रसभेद हो सस्ते हैं, नौ या दस नहीं । साथ ही मन की चिप्तभूमियों भी चार ही प्रकार को पाई जाती है। रस का स्वरूप, उसकी सरया, तया उनकी चितभूमियों का निर्देश करने पर रस के भानन्द स्वरूप के विषय में एक प्रस उठता है। जैसा कि बताया गया हैरत की स्थिति में सहदय की चित्तवृष्टि बलौकिक आमन्द से युक्त हो जाती है, यही मानन्दावाद रस है। अब हम रसों की ओर देखते हैं तो हमें पता चलता है कि हार, वीर हास्य भादि रसों (बदमन को भी ले सकते है) में देखने वाले को मुख मिलता है। ये रस एखारमको अतःन रसौ चाले काग्य के अर्थ से सहृदय के मानस में मानन्दोत्पति होना ठीक भी है। लेकिन यही बात करुण आदि रसों के विषय में कहना ठीक नहीं। दुखात्मक करुण, श्रीमत्म, भयानक तथा रौद्र रसों से आनदोत्पत्ति कैसे हो सकती है। पूर्वपक्षी अपने मन को और अधिक स्पष्ट करते हुए कहता है कि रणारमक वाग्य को सुन कर रसिक व्यकि ऑप गिराते है, रोते है, इस प्रकार उनके दाय में दुख का माविमर्माव होता है। अगर करणादि को बानन्दरूप माना जाय, घेव्यानन्दामक होते, तौरसिक को उनके मास्वाद के समय रीना नहीं चाहिए। इसौ शहाका उत्तर देते हुए प्रतिकार धनिक सिदान्तपक्ष निवद करते है तुम्हारा यह बहना बहुत ठीक है कि करुण कायों के भरण रो रसिक लोगों को दुख होता, तथा रोते है, भोर गिराते हैं। पर लौकिक करणादि से काव्यगत करणादिका भेद है। काव्यगत करुणादि दुखपरक होते हुए भी आनन्दारमक हैं। जैसे सुरत के समय त्रियों का कुमिन, उनके नक्षत, दन्तयत , प्रहारादि रसिकों को मुख तथा इस से मिश्रित मानद प्रदान करते है, टोक वे दो करुण रस में रप्तिकों को मानन्द को प्रतीति होती है। साथ ही लौकिक करुण से काव्यका करुण रस मित्र है, इसीलिए रसिक डोग करुण काम्प के प्रति अत्यधिक प्रवृत्त होते है। अगर काव्यगत करुण रस भी सौस्कि करण रस की तपसारमक ही होता, तो कोई भी व्यक्ति ऐसे शश्य का अनुशीलन न करता । ऐसा होने पर तो करुण रसपरक कायो-रामायण जैसे महाकाव्यो का उच्छेद हो रोजापगा। ऐसे शयों को कोई पूछन होगी। पर बात इसरोही है। लोग रामायणादि करुण रसपरक कायों को बड़े चाव से पद्धते-सुनते रे, तथा रसासाद ग्रहण करते है, अत' करुण रस कान्य मी आनन्दोत्पति अवश्य करते है, यह सिद्ध है। ऐसे कथा के वर्णन को इनने पर रसिक सामाजिक दुख का अनुभव करके और उसी तरह गिराता है, जैसे लौकिक ध्यवहार में किसी दुखो व्यक्ति को देख कर हम लोग बासू गिराते हैं। श्रत सामाजिकों का देते वर्णनों को सुन कर मार गिराना रत का पा श्रानन्द का विरोधी नही है। इन सब बातों से स्पष्ट है कि महारादि रसों की तरह इरुण रस से भी भानन्दोत्पत्ति होती है, यह भी मामन्दामहै। पहले की एक कारिका में शान रस का रसत्व तथा छम का स्थापित निषित किया गया है-'रुममपि देचिर प्राइ पुष्टिनाटयेषु नैतस्य'। यहाँ पर उसी शम स्थायी भाव प्रथा चतुर्थः प्रकाशः . शान रस के विषय में पुनः सिंहावलौरन पर इन सिहानपक्षका लेख किया जाना है। शान्तरसस्य चाऽनभिनेयत्यात ययपि नाट्येनुप्रयेशो नास्ति तथापि सूक्ष्मातीता- दिवस्तूनां सर्वेषामपि शत्प्रतिपायताया विद्यमानत्वात् काव्यविषयत्वं न निवार्यते अत. स्तदुच्यते- शमप्रकोऽनिर्वाच्यो मुदितादेस्तदात्मता ॥ ४५ ॥ हम बता चुके हैं कि शान्त रस हा अभिनय नही हो सकता। इसलिए नाटक में शान्तरस का प्रवेश, शान्तरम का निकनन नहीं होता। यधरि नाटक में शान्तरंस नही पाया जाता, पिर मी सूक्ष्म, अतीत भादि सभी वस्तुओं की प्रतिपति शम के द्वारा कराई जा सकती है, अतः वे मी काव्य के विषय तो हो हो सकती है। साम, अतीत प्रादि वस्तुएँ मान्य का विषय नही हो सकनी, एमारा यह मत नहा है। इसी को पारिवापार यो स्पष्ट करते हैं:- पाम नामक स्थायी भार का प्रकर्ष-शान्तरस अनिर्वाय है, इसका वर्णन नहीं किया जा सकता, क्योंकि दुःख, मुख, चिन्ता, राग, द्वेप सभी से परे है, पया यह मुदिता, मैत्री, फरणा एवं उपेक्षा से प्रतीत होता है। - शान्तो हि यदि सावत्- . 'नयर दुवं न सुख न चिन्ता न परागौ न च काचिदिया। रसस्तु शान्त' कथितो मुनीन्द्र- सर्वेषु गावेषु शगप्रधान. ।' इत्येवंलक्षणस्तदा तस्य मोक्षावस्थामामेवात्मस्वरूपापतिलक्षणाया मादुर्भागात , तस्य घ स्वरूपेणानिर्वचनीयता श्रुतिरपिस एप नेति नेति' इत्यन्यापोहरूपेणाह । नर तथाभूतस्य शान्तरसत्य सहदया स्वादयिवार सन्ति, अथापि तदुपायभूतो मुदिताम- श्रीकरणोपेक्षादिलक्षणस्तस्य च विकासविस्तारक्षोभविक्षेपरूपतेवेति तदुवस्येव शान्तरसा- स्वादो निरूपितः। शा-तरह का निम्न जण माना जाता है.- 'जदाई प भी नही है, मुख भी नहीं है, न चिन्ता न देष, न कोई राग है, नाई श, वा शान्तरस है, ऐसा मुनी मरत ने कहा है। समस्त भावों में शम स्थापी मान प्रधान होता है। यरिशान्तरस का यही लक्षण है, तो यह अवस्था केवल मोशावस्था में हो माहोकती ३, बब कि मामसरूप की प्रालि हो जाती है। यह मोक्षादरारूप पारमाप्ति स्वरूपतः अनि- वचनीय है, उसका वर्णन करना अशक्य है। इसकी अनिर्वचनीयता का प्रमाण भगवती धति है जा कहा गया है कि वह आत्मरूप यह नहीं है, यह नहीं है। जब शान्त रस सांसारिक विषयों से विराग वाला है, तो फिर उससे रसिक सदयो को-कौकिक सामाजिको को कोई भानन्द नहीं मिलेगा। पैराग्ययुफ शान्तरस का आस्वार रागी कौकिक रसिक नही करेंगे। वैसे शान्तरस अनिर्वचनीय है, तथा उसका वर्णन नहीं हो सकता, जिमी किसी तरह यहाँ पर शान्तरस के वास्ताद का औपचारिक निकरण किया ही वाताहै। शान्तरस के उपाय है चिन की चार प्रकार की वृत्तियाँ-मुदिता, मैत्री, पणा तथा उपेक्षा । ये चारोपियों नितको पूर्वोक्त चार भूमियों-विकास, विस्लर, होम तथा विप-काही मतिरूप। अत' उनले कारण शारत में चारों प्रकार की चिशभूमियों का निरूपण किया जा सकता है।
२५२ दशरूपकम् इदानी विभाषादिविषयावान्तरकाध्यन्यापारप्रदर्शनपूर्वक प्रकरणेनोपसंहार प्रतिपाद्यते- पदार्थरिन्दुनिदोमायादिस्वरूपको। काव्यादिमावसञ्चार्यनुभावप्रयतां गतः॥४६॥ भाषितः स्वदते स्थायी रसः स परिकीर्तितः। भर रसादि का विवेचन कर लेने पर प्रकरण का उपप्तशार करते हुए विमावादिरूप इतर कान्यव्यापारों का प्रदर्शन करते हैं चन्द्रमा जैसे विभाव, निवेद जैसे सधारी भाव सथा रोमात्र से अनुमानों के द्वारा भावित स्थायी ही रस है। काग्य में प्रयुक्त पदी का अर्थ इन्दु (चन्द्रमा) आदि विभाव परक, निर्वेद आदि भाव परक तथा रोमाशादि मनविकार परक होता है। ये ही चन्द्र, निर्वेद, रोमाश आदि प्रमश विभाव, सञ्चारी तथा अनुभाव के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनके द्वारा जव स्थायी रस भावित होता है, तो वह रस कहलाता है।' अतिशयोक्तिरूपकाव्यव्यापाराहितविशेषचन्द्रायेरुद्दीपनविभावै प्रमदाप्रमृतिभिराल म्बनविभावनिर्वेदादिभिर्व्यभिचारिमावे रोमाचाथुभूपकटाक्षाद्यैरनुभावरषान्तरव्यापारतया पदार्थीभूतैर्वाक्यार्य स्थायीभावो विभावित = भावरूपतामानीत स्वदते स रस इति प्रामप्रकरणे तात्पर्यम् । काव्य व्यापार में भतिशयोक्ति के रूप में वर्णित चद्रमा, नदीतीर, भादि भोपनविभाव, रमणी आदि मालम्बनविभाव, निर्वेदादि व्यभिचारी भाव, रोमान, मनु, मूरोप, पाव भादि अनुभाषों की दो प्रतीति कराई जाती है। अत चन्द्रादिमी काम्योपात शन्दों के पदार्थ है अपने द्वारा अविनामाव सम्बन्ध से विभाषादि पी प्रवीति कराते है। ये पदादि विमावादि ही वाक्यार्थरूप स्थायी भाव को मावनाविषयक बनाकर आस्वाधरूप में प्रतिपन्न करते हैं, तो पर पायी भाव रस हो जाता है। भाव यह है सहाय सामाजिक तत्सत् कान्य में वर्णित नद्र, निर्वेद, मनु मादि विभाव, सधारी भाव स्था अनुभावों को काम्योपात पदार्थ के रूप में प्रहण करता है, फिर ये पदार्थ सदय ४क्ष्य में स्थित स्थायी भाव को भावनागम्य बनाते है, और सहदय सामाजिक को मास्वादरूप मानन्द को प्राप्ति होती है। यही भास्वाद रूप थानन्द रस है।मत रस कुछ नहीं विमावादि के द्वारा भादित (भावनाविषयीकत ) स्थायी भाव को ही परिपुष्ट पारे विशेषलक्षणान्युच्यन्ते तत्राचार्येण स्थायिनो रत्यादीनां शतारादीनां च पृपग्लक्ष- णानि विभावादिप्रतिपादनेनोदितानि । अत्र तु--- १. भूमिका भाग में हम देख चुके है कि भरत के माध्यमत्र 'विभावानुमावन्यभिचारि सयोगाद रसनि पति के सयोगाद' पद का अर्थ भलग २ आचार्यों ने भाग र लगाया है। मासडर के मतानुसार उसका अर्थ है-उत्पाप-उत्पादकमाव, शाक के मत से इसका अर्थ है अनुमाथ्यानुमापकमार, मह नायक के अनुसार इसका अर्थ 'भोग्यमोजकमाव' है तथा अभिनवगुप्त या ध्वनिवादी के मत में 'व्यमध्यवकमाव । धनञ्जय 'संयोगाव' को 'भावित' पद से सष्ट कर 'भाव्यभावकसम्बन्ध' मानते हैं। जिस तरह लोण्य गहुक, भट्ट नायक तया अभिनवगुप्त के मतों को क्रमश उत्पत्तिवाद, अनुमितिवाद, मतिवाद तथा अभिव्यक्तिवाद (पाम्पतिवाद) कहा जाता है, धनभय के रसवादी मत को वैसे ही भावनावाद' कहा जा सकता है। पर हम बता चुके है कि धनञ्जय ता पनिक का रस समधी मत कोई स्वतन्त्र रस्पना ना, मरितु महलोल तथा मह नायक के मा कोसिचदी। । - २५३ चतुर्थः प्रकाशः लक्षणक्यं विभाधेश्यादभेदाद्रसभाषयोः ॥१७॥ क्रियत इति वाक्यशेष । भव तक सामान्य रूप से रस तथा स्थायी भाव का विवेचन किया गया। भव भाउ स्थायी भावों तथा माठ रसों का विशेष लक्षण निबद्ध करते है। भरत मुनि ने नाट्यशास्त्र में स्थायी भाव तथा रसों का लक्षण अल्प मलग किया है। इस कारण यह है कि उन्होंने विभावादि के वर्णन यो द्वारा उनका वर्णन किया है। विभावादि के द्वारा प्रतिपादन करने के कारण उनका पृथक् पृथक लक्षण किया गया है । पर यहाँ हम दोनों का एक साथ ही रक्षण करते है। रस सुधा उसके भाव (स्थायी भाव) का विमाय (मालम्बन तथा उद्दीपन) एक ही होता है, तथा उनमें कोई भेद नहीं है, अपितु अभेद है, क्योंकि भाव की ही परिपुर स्थिति रस कही जाती है, अस. उनका कण एक ही किया जाता है। भरत मुनि की तरह अलग अलग लक्षण नहीं किया गया है - तत्र सावकार - रम्यदेशकलाकालयेपभोगादिसेवनः । प्रमोदात्मा रतिः सैप यूनोरन्योन्यरक्तयोः । प्रहष्यमाणा मारो मधुगदविचेष्टितैः ॥ ४ ॥ इस्त्यमुपनियध्यमानं काव्यं नारास्वादाय प्रभवतीति फट्युपदेशपरमेतत् । सबसे पहले शहार तथा उसके स्थायो रतिमा का सौदाहरण सक्षण उपनिबद्ध करते हैं। परस्पर अनुरक्त युपक नायक नायिका के हृदय में, रम्य देश, काल, कला, येश भोग, आदि के सेवन के बारा भारमा का प्रसार होना रति स्थायी माय है। पही रति स्थायी भाव नायक या नायिका के नहीं की मधुर चेष्टाओं के द्वारा एक दूसरे के हृदय में परिपुर (महर्पित) होकर शृङ्गार रस होता है। इस प्रकार रम्य देशादि के द्वारा परिपुष्ट रति के उपनिबद्ध करने पर काथ्य से मारपी धरणादौती, इसलिए यह लक्षण कवियों के उपदेश के लिए किया गया है। तत्र देशविभावों यथोत्तररामचरिते- 'स्मरसि पुतनु तस्मिन्पर्वते लक्ष्मणेन प्रतिविहितसपर्यायुस्थयोस्तान्महानि । स्मरसि सरसतीर तम गोदावरी घा स्मरसि च सदुपान्तेष्वावगोतनानि ।' भर देश, कास आदि को रमणीयका रूप गीपन निमाव को स्पष्ट करते हुए तपन रिमार के द्वारा कैसे रति भार का पुरण तथा गहार को चर्षगा होती है, से वापरणों के बारा स्पष्ट करते है। देवरूप विभार का उदाहरण, चैडे सत्तररामचरित नाटक में, निम्न पत्र में राम तथा सीमा के परस्पर अनुराग रूप रति माव की गोशपरीतीर रूप देश के द्वारा गार के रूप में धर्वगाहोरही है। हेनर शरीर कालो सौता, पर्वत पर पारा पूमीसभी सामग्री के मखत कर देने के कारण मरे से राते हुए, हमारे इन दिनों को तुम पार करतान। अपवा सरसडीर वाली गौरीशे तया उसके पास हम दोनों के घर पर परिममा (वार)ोगाद करताना दशरूपकम् -- कलाविभावो यया- 'हस्तैरन्तर्निहितवचनै सूचित सम्यगर्थ पादन्यासलंयमुपगतस्तन्मयत रसेषु ।। शाखायोनिदुरभिनय पविकल्पोऽनुवृत्त- भवि भावे नुदापि विषयान् रागबन्ध स एव ।' कला विभाव का उदाहरण, असे मालविकाग्निमित्र के इस पर मैं, जहाँ मालविका की नयकला के द्वारा अमिमित्र के दाय में सरित स्थायी भाव भार रस के रूप में परिपुष्ट हो रहा है- इस मालविका ने अपने उन छायों के सञ्चालन के द्वारा भाव के अर्थ को ध्याना पैक तरह से करा दो है, जिन के समान में जैसे शम्द (वचन ) दिप बैठे है। जिस तरह शम के सुनने पर उसके भर्थ की प्रतीति होती है, वैसे हो इसके इस्तनपाठन से अर्धन्याना हो रही है, मानों वचन इसके हाथों में छिपे है। जब यह एक क्रिया के बाद थोड़ी देर द्रुत, मध्य या विलम्बित विश्राम (लय) का आमय लेती है, तो जैसे रसक पदन्यास ने ख्य कोरस के साथ तमय बना दिया है। दर्शक इसके 'लय' तक पहुँचने पर रसमल हो जाता सरसमान सा पदन्यास के सफर का शारीत अखन, तथा चेष्टाकत ये मालिक के तीन प्रकार, तया वाचिक मादाय एवं साविक) कोमक अभिनय जोशखा बाला (हाय के विचित्र सशासन वाला) है प्रत्येक माव के प्रशाशन के साथ साथ हृदय में विषयों को प्ररित कर रहा है। यही अनुराग है,यही राग पाथेम कहा जा सकता है। म - 'व्यक्तियंजनघातुना दशविधेनाप्यत्र लब्धाऽमुना विस्पष्टो द्रुतमध्यलम्बितपरिच्छिविधाऽलय । गोपुच्छप्रमुखा प्रमेण यतयस्तितोऽपि सम्पादिता- स्तत्वौद्यानुगताच पायविघय सम्यक् प्रयो पर्शिता ।। अथवा, इस दूसरे उगहरण में जहाँ सहीत को कुना के विमान का वर्णन पाया जाता है मृण्यकटिक का पप है। सहीत शास्त्र में प्रसिददस प्रकार के वजन धातुओं पुष्प, कल, नल, निष्फोटित, सदृष्ट, रेफ, अनुराध, अनुस्खनित, विदु तथा अपमृष्ट के सीमावादन के समय माव को ध्याना कराई गई है। वोगासदन में दुत, मध्य तथा समित इस प्रकार तीनो तरह को गीत की सय स्पष्ट सुनाई दे रहो है । लय के कालोर में कोई गड़ाही नहीं है। बीणावादक ने गोपुच्छ, समा, तथा स्रोतोगतान तीन प्रकार को पतियों में सय की मधि के नियमों को क्रम से सम्पादित किया है। गोपुच्छादि यतियों के प्रयोग के नियम में कोई क्रममा नहीं हुमा है। साथ ही वीजावादन के समय वच, भोप वा भनुगत इन रीन प्रकार की वापविधिरों को १ रुय तीन प्रकार का होनारे-नियानन्तररिभातिय स त्रिविधीमत । एवो मध्यो विलमव द्रुत शीघरमो मत । दिगगादिगणी हेयौ तस्मान्मध्यविलम्बिदी। १ महिको वाचिक व पादाय स त्विकस्तथा । यस्त्वमिनयो विप्राश्चतुर्पा परिकल्पित' त्रिविधवारको शेव शारीरो मुखमलया । तया बेष्टाकतव शाखामोपानसयुत ।। विवाय त्रीनमिनयागाडिकोऽत्राभिधीयते । तस्य शाखारो पूर्व प्रधान सितयं मतम् । तत्र शाखेति सिस्यावारिचित्रा करवर्तना ॥ (सङ्गोतरनाकर) m चतुर्थः प्रकाशः भी अच्छी तरह दर्शाया है । इस प्रकार समस्त व्यञ्जन पातुओं या, सय के जिप्रकारका तीन तरदको यनियों तथा वाचविधियों का प्रयोग बता रहा है कि वीणा बजाने वाला व्यक्ति चौगावादन की शाला में अत्यधिक निपुण है। चालविभावो यथा फुमारसम्भवे- 'प्रसूत रायः कुसुमान्यशोक स्कन्धानभायेव सपखानि । पादेन नापेक्षत सुन्दरीमा सम्पर्कमाशिजितनपुरेण ॥' काल ( समय ) के विभावप का उदाहरण, जैसे कुमार सम्भव के तृतीय सर्ग में वमन्त के माविभाव के वर्णन में वसन्त के कारण पशुओं तक में रतिमाय के सहार का वर्णन दिमालय प्रदेश में शिवजी के आश्रम के आसपास बसन्त के फल आने पर अशोक के मुक ने शाखाओं के कंधों तक पझवो क्या पुष्पों को एकदम उत्पन्न कर दिया । उस मशोक दृश नै भूपुर से हसन सुन्दरियों के चरण की मो अपेक्षा न की। प्रायः यह प्रसिमर कि शौक में पुष्पोपत्ति रूप दोहद रमणियों के चरणापात के कारण दोता है। जैसा कि कहा भी जाता है-'पादापातादशोक' । अतः रमणियों के रणायात का होना मावश्यक है। किन्तु शिवजी की पार्वती के प्रति मावष्ट करने के लिए मस्थित काम की सहायता करने याला वसना इस तरह से दिमालय में फैल गया कि वसन्त के सारे हि एकदम उपस्थित हो गये। अशोक के पाउन तथा पुष्प, जिनका माविमान वसन्त ऋतु में होता ,निकल आये, तथा उनने सुन्दरियों के पादापान को भी प्रतीक्षा की। इत्युपगमे- 'मधु द्विरेफ कुसुमकपाने पपौ प्रियां स्वामनुवर्तमानः । पण सपनिमीलिताची मृगीमफरहयत कृष्णसारः ।।' काम के सखा यसन्त के एनम पैल आने पर पशु-पक्षियों में भी रति का सार होने लगा, ( मनुष्यों की तो तो निराग)1 भवरा अपनी प्रिया के साथ रह पा फूल एक दी पार से पराग या दवा न करने लगा, ठीक से ही जैसे कोई विलासीपुरक अपनी प्रिया के साथ एक ही चषक से मधुरान करता है। काश हिरण अपने स्पर्श के कारण पन्द्र मोखो बाली (जिसने माय पद करती है) एगी को अपने सीन से एपलाने लगा । हमर तथा प्रमीक पुष्प-पार से मधुशन करना, तथा मृग का गी को अपने सौर से सुजलाना तथा गृगी का उसके रपच को पावर भारद कर देना मार रस के ही अनुभार। पविभागो यथा सत्र- 'अशोकनिर्भसितपमरागमा हेमतिकर्णिकारम् । सुणरतापीकृतसिन्दुवार बसन्तपुष्पाभरणं पहन्ति । देशका विभाव, जैसे कुमार-सम्भव निम्न शाहरण में पानीए भागाम और दीपन विमाव का वर्णन किया गया जो शिव मानष्ठ में रति को पुकारला- वर पानीशाके चरणों में सोमायोजनमा गागासने मारे, तो वतने वक्षन विकसित माँ के भाभूषणों को परम क्या था जमके ये मापोवारली कुरामों के पेयालो मारे मोदरमौर थे। इसने जिन चोक पुषी भोपानरमाया, २ भराग मागिताओमा को मौसवितार1 गोदापूर भी लाना, मीन । उसलायत र भागोगेकी - । दशरूपकम् कान्ति को खींच लिया था। ये दोनों पीले रंग के होते है। तथा सिन्दुदार के फूलों के द्वारा उसने मोतियों की माला बना रखी थी। इस तरह अशोक, पगिशर तथा सिन्दुवार के कुसुमों से बना पार्वती का भामरण (वसन्तामरण) पद्मराग, मवर्ग तथा मोतियों के बने माभूपर्णो-सा लग रहा था, वैसा ही नहीं, किन्तु उससे भो कहीं पर घद कर। उपभोगविभावो यथा- 'चक्षुल्तमपीकणं कालितस्ताम्यूलरागोऽयरे विश्रान्ता कबरी कपोलफलके लुझेव गानयुतिः । जाने सम्प्रति मानिनि प्रणयिना औरप्युपायक्रम- ममो मानमहातकस्तरणि ते चेतास्यलीवर्धितः ।" उपभोग-विमाव, जहाँ नायक या नायिका के उपमोग विमार के द्वारा उनकी रति को व्यवना हो। जैसे निम्न पद्य में- कोई नायिका मायक से दुखी थी। पर रात के समय नायकने पदी मान-मनौती करके उसका गुस्सा हलका कर दिया। फलत दोनों रद्विकोटा में भी प्रवृत्त हुए। मुबह नायिका को सखी ने उसके शरीर पर रति के चिद देखें, तथा यह अनुमान लगा लिया कि नायक ने उसे सुश कर लिया है। इसी बात को सखी नापिका से कह रही है। रे तरुणि, तुम्हारे आँखों का कजल-कण लुप्त हो चुका है, तुम्हारी आँसों का सारा कजल तो नहीं, पर उसका कुछ हिस्सा मिट गया है, यह रवि से ही हो सकता है। तुम्हारे नीचे के मोठ (अधर, न कि ऊपर का मोठ)को ताम्बूल के कारण उत्पन्न ललाई जैसे किसी ने निगल ली है, अर्याद अधर का ताम्बूलराग भी नष्ट हो गया है। तुम्हारी कररी (केशपाश) कपोल पर इस तरह पढी है, जैसे एक गई हो (रति के कारण तुम ही नहीं, तुम्हारी कसरी भी यक गई। तुम्हारे केश असयत है। और तुम्हारे शरीर को क्रान्ति मी जैसे नष्ट हो गई है. शरीर को शोमा मी मन्द फट गई है। ये सारी बातें बताती है कि रात को तुमने नायक के साथ सुरतकोता की है। पर तुम तो कल मान किये बैठी थी न! ऐसा प्रतीत होता है, मेरा यह अनुमान है कि हे मानिनि, तुम्हारे प्रियतम ने भनेक उपायों द्वारा, तुम्हारे चित्तरी स्थली पर पता हुभा (उगा हुआ) मान का बड़ा वृक्ष बासिर सोरही गिराया। नतरे चियों से यह स्पष्ट है कि नायक ने किसी न किसी तरह तुम्हारे गुस्से को दाही दिया। प्रमोदात्मा रतिर्यया मालतीमाधवे-- 'जगति जयिनस्ते ते भावा नवेन्दुकलादयः प्रकृतिमधुरा सन्त्येतान्ये मनो मदयन्ति ये। मम तु यदिय याता के विलोचनचन्द्रिका नयनविषयं जन्मन्येकः स एव महोत्सवः ॥' प्रहार के रूप में यह बताया गया कि रति स्थायी भाव में मारमा (हृदय) प्रसन्न रहता है, वह वासित होता है। अनुर रति भाल की सी विशेषता को सदाहत करते है। मालती को देखने पर माधव की दशाके वर्णन के द्वारा रवि केस प्रमोशामाय को स्पष्ट करते है।- मन को प्रसन्न करने वाले, उसमें मद का सहार करने वाले कई सुन्दर भाव संसार में देखे जाते है। नवीन चन्द्रमा को कना जैसे स्वामाविक चातुर्य वाले भनेको दूसरे भाव उत्कृष्ट हैं, जिनसे लोगों का मन मस हो उठता है। लोग उन्हें देखकर अपनी भाखों का उत्सर चतुर्थः प्रकाशा २५७ मना है। पर मेरे विषय में पास ही दूसरी है। मेरे दृष्टिपथ में तो चन्द्रिका के समान नेत्रों को आहादित करने वाली यह माहती भवतरित हो गई है। इसलिए मालती का नयनों का विषय बनना मेरा बहुत बड़ा सौमाग्य है। मेरी तो ऐप्ती धारणा है कि इस जन्म में मेरे लिए केवल एक ही रात महान् सर को रही है, और वह है मालतो का मेरी माँसों के माग से गुजरना। युपतिविभावो यया मालविकाग्निमिने- 'दीर्घाझं शरदिन्दुकान्तिवदनं पाहू मतासयोः संक्षिा निविडोगतस्तनमुरः पाप्रमटे छ। मष्णः पाणिमितो नितम्वि जपत पादापालापुरती छन्दो नर्तयितुर्यथैव मनसः स्पष्टं तयारस्या वपुः ।। अवविविमाव, जदा नायिका के यौवन का सके युवतिय का वर्णन किया जार । जैसे मालविकामिमित्र नाटक में नाचती हु माविका यी मदा का तथा उसके धारा स्पष्ट दिखाई परदे उसके यौदन का वर्णन- मारती हुई मालविका को देख कर मणिमित्र पररा-सका मुख शरद के चन्द्रमा के समान मन्दर है, जिसमें उम्मी-सादी गति है। इसके दोनों हाथ कन्धों के पास से मुके हुए है, तया रसका वक्षःस्पह दुषित हो रहा है, जिसमें निविड़ (पने ) तण हे हुए स्तन दिसाई देते है, एवं इसके दोनों पार्षमाग सिमटे से हैं। मालविका का मापभाग (नमर) स्तना पतला है कि पानि (मुट्ठी) से नापा जा सकता है, इसका जघनकाल मिसम्य के भारीपन के कारण मासके दोनों पैरों को बलियों गति की (चौवनाविर्भाव के कारण, या नृत्य के कारण बनित ) अस्तव्यस्तता से कुटिल (रेदी)को काम सौन्दर्य को देख कर प्रसन्नता तथा सुशी से नाचते हुए गन का जैसा अभिप्राय हता है, ठीक उसी अभिप्राय के अनुरूप इसका शरीर बना हुआ है। यूनोर्षिभावी यया मालतीमाधवे- भूयो भूयः सविधनगरीरप्यया पर्यटन्तं राहादा भवनवलमातमवातायनस्था। साक्षात्कामं नमिष रतिर्माणवी माधर्व य- द्वाडोत्कण्ठा तुलितललितैरकस्ताम्यतीति ।। दोनों युवकों नायकनाविकाओं का विभाव, जहाँ दोनों के यौवन का वर्णन किया जाए। जैसे मालतोमाषव के प्रथम अङ्क का निम्न पथ, जहाँ माद तथा मालती दोनों के यौवन का वर्णन किया गया है:- समीप की गच्ची से बार-बार धूमते इप, साक्षात् भगिनव काम के समान सुन्दर माधव को मइस के को इसे बार-बार देस कर रति के समान दर मारती अत्यधिक घमण्ठित होकर अपने कोमल तथा मन्दर अहों से पीदित रहती है । सुन्दर माधव को देख- देख कर इन्दरी मालती रसके प्रति पाकुष्ट हो गई है, तथा उसको प्राति के लिए समण्ठित तपास उलण्ठा के कारण उसके भइ विरदपीड़ा से पोखिन है। अन्योन्यानुरागो या तत्र- 'सान्त्या मुहुलिसकन्धरमाननं त- पाउतवन्तशतपत्रनिमं बहत्या।
दशरूपकम् दिग्धोऽमृतेन च विषेण च पक्षमलाया पाढं निखात इव मे हृदये कटाक्ष ।' नायक तथा नायिका का परस्पर मनुराग, जैसे वहीं मालतीमाघर में। मारव अपने मित्र मकरन्द से कह रहा है। टेढी टहनी वाले कमल के समान अन्दर टेदी गईन वाले मुख को धारण कर, खाती हुई सस सुन्दर नेत्रों वाली मालती ने एक साथ अमृत तथा विन से बुझा हुआ कटाक्ष (बाग) जैसे मेरे हृदय में खूर गहरा गढ़ा दिया हो। जर टेढो गर्दन करके चलती हुई मालती ने मेरी तरफ तिरछी दृष्टि से देखा, तो मुझे आनन्द भी हुआ, तथा पौड़ा मी, मुझे एक साथ अमृत या विष से मुझे बाग की चोट का अनुभव हुमा, बेसे मेरा इश्य एक मधुमय पीड़ा का अनुभव कर रहा हो । मधुरा विचेष्टितं यथा तत्रैव- "स्तिमितविकसितानामुमसलताना मसूणमुकुलिताना प्रान्तविस्तारभाजाम् । प्रतिनयननिपाते विचिदाकुधितानो विविधमहमभूवं पात्रमालोकितानाम् ॥' अहो की मधुर चेटाएँ, पैसे मालतीमाधव मैं ही मारुती की मधुर चेष्टामी का वर्णन- मालदी के दृष्टिपातों का मैं अनेक प्रकार से पात्र मना। मेरी भोर कर ढासे मालती ने देखा। मालती के ये दृष्टिपात कमी बन्द होते थे, और फिर विकसित हो जाते थे, उसी भौगों की सवार सुशोभित हो रही थी, तथा उसके पे नेत्र कोमल, स्निग्ध तथा कुछ-कुछ बन्द थे। मालती के वे नेत्रपाद कोनों पर विस्तार वाले थे, अर्थात कानों तक फैले हुए नेत्रों के फोनों (कनसियों से वह देखती थी, एव प्रत्येक नयनपात के बाद ये कुछ-कुछ भावुचित हो जाते (सिमट जाते थे। मालती ने मौह मचा कर दी नेत्रों के द्वारा स्निग्य तथा कमी माहोते एव भी विकसित होते कटाक्षपात को नाना प्रकार से मेरी भोर किया। ये सत्त्वजार स्थायिन पर घाटो शिपयो ये व्यभिचारिणश्य। एकोनपश्चाशमी हि भाषा युफ्त्या निवसार परिपोपयन्ति। (स्यायिनम्) आलस्यमीयं मरणं जुगुप्सा तस्याध्यादतविपद्धमिटम् ॥ ४en प्रनिराधाभिचारिणघाटी स्थायिन अौ सात्विवाथेत्येवोनपचारात् । युक्त्या मारलेनोपनिवष्यमाना महार सम्पादयति। बालस्योऽयजुगुप्सामरणादीन्येकालय. नविभावालयारेन सापादारवेन चोपनियध्यमानानि विरुष्यन्ते । प्रकारान्तरेण पाविरोध प्राक् प्रतिपादित एव। पाठ सावन (सारिदक) भाव, पाठ स्थापी माव, और तेंतीस म्यभिचारी मार्यो- इन ४९ मार्यो का काम्य में युधिषक निधन भार की पुष्टि करता है। मारो प्रारूप में हन ९ भाषों का पुतियुक्त निवाघन हो सकता । किन्तु इस विषय में एक बात मान रखने की है कि भाटस्य, भौय दया मरण नामक सवारी तथा .
चतुर्थः प्रकाशः शुगुप्सा भामक स्थायी का एक ही मालम्यन दिमाव को माधय धनाकर किया गया उपनि बन्धन विरोधी होता है। तीत व्यभिचारी, पाठ सायो तपा माठ मालिश भाव ये ४९ माव है । युक्ति का भी अङ्गरूप में उपनिबद्ध होना । रूप में निबद्ध होने पर वे गार रस को परिपुष्टि करते है । भारस्य, भौग्य, मरण, जुगुप्या भादि का एक ही आउम्बन विभाग को आश्रय बनाकर निधन, अपवा बन्दै रस का सामान बन पना देना गृङ्गार रस के विषय पड़ता है। अन्य प्रकार से निकपन करने पर विरोध गद्दी होगा, इसे इस रवा चुके हैं। विभागस्तु (पारस्य) अयोगो चिप्रयोगश्च सम्भोगधेति स प्रिया । श्रयोगविप्रयोगविशेषत्यादिप्रलम्भस्यात्सामान्याभिधायित्वेन विप्रलम्भशब्द उपच- स्तित्तिर्मा भूदिति न प्रयुक्त , तया हि-दत्या सईतमप्राप्तेऽवध्यतिरमे साम्येन नायिकान्तरानुसरणाच विप्रलम्भशन्दस्य मुख्यप्रयोगो वचनार्यत्वात् । हार का विवेचन कर टी पर अब के विभाजन का उलेख करते कार रस तीन प्रकार का होता है।-अयोग, विप्रयोग तया संयोगा विकाम शब्द का प्रयोग सलिए नहीं किया गया है कि विमलम्म सामान्य नायक पनागिया के संयोगामाद को दी अभिक्ति परता है । उसके दो विशेष प्रकार पाये जाते 2-अयोग (ोक नायक-नायिका में पूर्वानुराग की अदरसा में पाया जाता है), तथा वियोग । विमला साद इतना सामान्य है कि कही उसका उपचार के द्वारा दूसरा अर्थ 'प्रवानारूप अर्थ न लिया जाय, इसलिए भी भयोग तथा विप्रयोग को अलग अलग रवाया गया। सामिप्रति विप्रलाभ शब्द का प्रयोग, सदेत सल पर का वादा करके मायक के न पहुँचने पर तथा नायिका के यहाँ पहुँचने पर नापककृत प्रवनना के लिए देखा जाता है। विमलम्म का मुख्य प्रयोग यहोरे । इसीलिए ऐसीना पिका को विमलया कहते हैं। मत कही यह अर्थ न से लिया बाय, इसलिए विप्रलम्म' शम्म का प्रयोग बचाया गया है। तत्राऽयोगोनुरागेऽपि नवयोरेकविसयोः ॥ १० ॥ पारतन्त्र्येण देघाहा विप्रकासनमः। योगोऽन्योन्यस्वीकारस्तदभावस्त्वयोग -पारवन्ध्येण विकदिवपिनायायातवा- सागरिकामाळरयोर्यत्सराजमाधवाभ्यामिव देवागौरीशिपयोरियासमागमोऽयोग । पयोग AANE की स्थिति यह है, जहाँ दो नवयुपको (भायक-नायिका) का एक दूसरे के प्रति परस्पर अनुराग होता है, उनका चित्त एक दूसरे के प्रति माकृष्ट रहता है, किन्तु परतन्त्रता (पिता, माता आदि के कारण), या दैव, के कारण ये एक दूसरे से दूर रहते हैं, उनका सम नहीं हो पाता । योग कार की स्थिति में छोनों में एक दूसरे के प्रति पूर्वानुराग की स्थिति होती है, पर उगका मिलन किन्हीं कारणों से नहीं हो पाता। योग का मरनायक-नायिका का परस्पर समागम इस समागम के अभाव कोही भयोग कहते है । यह भयोग पा तो पिता-आदि के भाषीन होने के कारण, परत होने के कारण रोगामित्रादि भी अनुमति न होने से यह समागम नही हो पाता । जैसे रमावली माटिका में सागरिका देवी वासवदत्त के आधीन है, मत वहां दोनों का योग वासवरचा की परतन्त्रता २६० दारूपकम् के कारण नहीं हो पाता । मातीमाधव की मालती पिता के माधीन है, तथा उसके पिता की माभव के कुल से आता है, अतः वहाँ भी पारत के कारण प्रारम्भ में प्रयोग शाही रहती है। देव के कारण नायक-नायिका के अयोग का उदाहरण शिव तथा पार्वती के प्रयोग पौले सकते है, जो शिव के प्रतिज्ञा कर लेने के कारण देववश दोनों का समागम नहीं हो पाना, बैसा कि कुमारसम्भव के पथम सर्ग तक उपनिरहुआहै। दशावस्थ स तत्रादावभिलापोऽध चिन्तनम् ॥ ५ ॥ स्मृतिर्गुणकथोगप्रलापोन्मादसज्वराः। घडता मरण चेति दुरवस्थ यथोत्तरम् ॥ १२॥ थभिलापा स्पृहा तत्र कान्ते सर्वाङ्गसुन्दरे। राष्ट्र भुते या तत्रापि विस्मयानन्दसाध्यसाः ॥ ५३॥ सासारप्रतिकृतिस्वामछायामायासु दर्शनम् । श्रुतिव्याजात्सबागीतमागधादिगुणस्तुते ॥ ५४॥ इस योग कार की इस अवस्थाएँ होती हैं -अभिलाप, चिन्तन, स्मृति, गुण. कपा, उग, पाप, उन्माद, सम्पर, अडता तथा मरण। इनकी प्रत्येक उत्तर अवस्था पहछे से अधिक तीव्र होती है अभिलाप वह अवस्था है अब कि सर्वाङ्गसुन्दर नायक के प्रति नायिका की समागमरूप इच्छा उत्पन्न होती है। यह इच्छा उसको सापात् देखने पर पा उसके चित्र को देखने पर, अथवा उसक विषय में सुनने पर होती है। इस दशा में आश्चर्य, भानन्द, सम्नम आदि भावों की प्रतीति होती । मायफ या मायिका फादर्सन साचात् रूप से, चित्र के द्वारा, स्वम के द्वारा पा इन्जाल आदि माया के बारा हो सकता है । अपना वह सखियों धादि के गीत, या ममा भादि के गुणस्तवन के मुमने के बहाने से भी हो सकता है। अभिषो यथा शाकुन्तले- 'प्रसशय क्षत्रपरिप्रहक्षमा यदायमस्मामभिलापि मे मन । सवां दिस देहपदेषु वस्तुषु प्रमाणमन्त करणप्रत्तयः ॥' मामिलाप का उदाहरण से अमिशान शाकुद्र में शकुन्तला को देखने पर दुष्यन्त को इसके प्रति रया हो बात है यह सुन्दरी तापसझम्या निसंदेह क्षत्रिय के द्वारा परिणयन के योग्य है, क्योंकि मेरा पनि मन रसके प्रति मभिलाष युक्त हो रहा है । पन्दे के स्थकों में बाट तथा पवित्र यात्रपाले व्यक्तियों की भत करण-प्रतियों ही प्रमाण होती है। मुझे अब तक इसके विपर मैं यह सन्द था कि यह सामगकन्या है या क्षत्रियकन्या है। यदि यह मामणकन्या होती, नो क्षत्रिय इससे विदाइ का ही सरता, पर मेरा मन इसके प्रति श्रमिधा युक्त हो रहा है। मेरा मन भायधिक पवित्र है, मन मेरा मन इस बात का प्रमाण है कि यह पत्रिय के द्वारा विवाह करने योग्य अवश्य है। विस्मयो यथा- 'स्तकवालोक्य धन्वश्या शिर कम्पयते युवा । रुयोरन्तरनिर्ममा टिमुत्सादयनिय । विस्मय (भाव)का उदाहरण से- उस कोमन महों वाली दरी के स्तनों को देखकर (व ) गुरुक शिर को पाने .
चतुर्थः प्रकाश २६॥ लगता है, मानों उसके स्तनों के भीन में फंसी हुई अपनी दृष्टि को जबर्दस्ती भाइर निकाल रहा हो। इस नायिका के स्तनों का विस्तार-भार तथा उसके द्वारा मनुमित छाडिन्य की रश्पना पर, तथा उनके मालिगनयोग्याव को भान कर पुक्क अत्यधिक माश्चर्य चकित हो जाता है, वह श्राश्च से सिर हिलाने ष्टगता है। मानन्दो यथा विमशालमधिरायाम्- 'सुधायद्यारपवनचकोरी कयलिता किरज्योत्लामच्छा लवलिफलपाकप्रणयिनीम् । उपपारामं प्रविण नयने तर्कय मना- गनाकारो कोऽयं गलितहरिण' शीतकिरण । भानल, मेले राजरोसर की विशालमथिला नाटिका में नायक नायिका को देखकर भानन्दित हो जाता है। इसी म्यजना नायक को इस अति से हो रही है:- पारा स परकोटे के अगले दिसे पर से घटि डालो। कुछ अनुमान को समायोकि RIकाश के बिना ही, उस परकोठे पर बिना हिरण बाला (दिराका हिरण का मटक मल गया), यह चन्द्रमा कौन है । परनन्द्रमा चारों और स्वण्य चाँदनी यो टिका रहा है, और लवलीलता के एक पलों के समान धेत उस चन्द्रिका को अमृत का मास समाप्त कर महण करने वाले. उपवन चकोरी के द्वारा उसका पान किया गया। यहरे नायिका दमा के समान सुन्दर सुखमास को देखकर नायक यह वयार रहा समाश फेरिना ही परकोडे पर चन्द्रमा कैसे हो सकता और यह भी फिर निपल चन्द्रमा । नायिका के मुख सौ चन्द्रमा समश कर तथा उसकी कान्ति को चन्दिका समक्ष कर पवन के प्रकार सप्तकी ओर रकवी छाये है, या उसकी शान्ति का पान कर रहे, इसके बारा प्रान्तिमान मलद्वार की मनीति होती है। साथ्वसं यथा मारसम्भवे-- 'तीक्ष्य वेपथुमती सरसायष्टि- मोपणास पदमुद्धृतमुदहन्ती। मागानन्दव्यतिकराकुतिरोष सिन्धु' शैलाधिराजतनया न मयौ न तस्थौ । सम्प्रम, जैसे शिववी सामने देखकर कुमारसम्भव में वर्णित पार्वती की दशा- शिव शैभपने सामने देखकर सरस हो वाली हिमालय की पुत्री पार्वती कापने लग गई । इस शान से बड़े जाने के लिए उठाये हुए एक पैर को भारण करती हुई पार्वती सनी सम्भ्रान्त हो गई कि यह मार्ग में पर्वत के रोक दिये जाने के कारण चन्चल तथा न्याकुल नदी के समान मती पदों से जा हो सकी न रहो हर ही सनी। यथा पा- 'व्याहवा प्रतिश्ची न सन्दधे गन्तुमैच्छदालम्विताशुका । स्वते स्म शयनं परामुखी या तपापि रतये पिनाकिन ।' अथवा, जैसे कुमारसम्भव में पार्यतीत भवसा का वर्णन- अबशर पुकारते थे. तो पदारनही देती थी, जर पर उसके मावत को पर लेते थे, तो वह उठ माना चाहती थी, मोर एक शप्पा पर सोते समय पह दूसरी मोर मुंह का सीती थी । र यपि बशर मा तिमोटा में विरोधे दी धरती थी, भिन्तु पिर भीनीया शाराशर गैरति (मनुराय)मोदी न बरती।
२६२ दशरूपकम् सानुभावधिमावास्तु चिन्ताधाः पूर्षदर्शिताः। गुणकीर्तनं तु स्पष्टत्वान व्याख्यातम् । चिन्ता धाविकातो हम अनुमाव व विभावों के साथ पूरी तरह वर्णन पहले ही कर चुके हैं। भाचार्यों ने प्रायः इन्हीं दश अवस्थाओं का निदर्शन किया है । वैसे इन अवस्थाओं के अनेक प्रकार देखे जा सकते हैं और उनका पर्शन महाकपियों के प्रबन्धों में मिल सकता है। यहाँ गुणीवन का अलग से लइण या व्याख्या नहीं है, इसका कारण यह है कि वह स्पष्ट । महाकवियों के प्रान्धों में जो दूसरी दशाएँ पाई जाती है, उनका दिशा निदर्शन यहा किया जाता है। दशावस्थत्यमाचार्य प्रायोवृत्त्या निदर्शितम् ॥ ५५ ॥ महाकथिप्रवन्धेषु दृश्यते तदनन्तता। दियानं तु- दृष्टे श्रुतेऽभिलापाय किं नौत्सुक्यं प्रजायते ॥ ५६ ॥ अमाप्ती किन निवेदो ग्लानिः कि नातिचिन्तनात् । शेष प्रच्छषकमितादि कामसूत्रादवगन्तव्यम् । पया प्रिय के दर्शन पा श्रवण से जनित अभिटापा से औरसुक्य पैदा नहीं होता, प्रिय के न मिलने पर निर्वेद तथा उसके विषय में अत्यधिक चिन्तन से ग्लानि उत्पन महीं होती क्या है इस तरह अभिलाष दशा में लोसुक्य, निर्वेद सया ग्लानि की अवस्था भी पाई जाती है। श्रयोग की दशा में छिप कर अनुराग किया जाता है, तथा दूसरी बो गाउँ पाई जाती है, उनका शान वात्स्यायन के कामसूत्र से प्राप्त करना चाहिए। अथ विप्रयोग- घिप्रयोगस्तु विश्लेषो रूढविनम्भयोविधा ।। ५७ ॥ मानप्रवासदेन, मानोऽपि भणयेययोः। प्राप्तयोरप्राप्तिर्विप्रयोगस्तस्य द्वौ भेदी -मान प्रवासष। मानविप्रयोगोऽपि द्विविध:- प्रणयमान ईर्ष्यामानश्येति । विप्रयोग या वियोग प्रकार में नायक तथा मायिका का समागम नहीं होता। यह समागमामाव एक बार समागम हो लेने के बाद की दशा का है। यह वियोग पा तो बहुत अधिक (रूड) हो सकता है, या खाली प्रेम का ही एक बहाना हो सकता है। इसके अनुसार यह दो तरह का हो जाता है प्रयास रूप वियोग, बोस्ट होता है, जब कि मायक विदेश में होता है, तथा मानरूप वियोग, जब प्रियङ्गत अपराध के कारण मायिका मान किये बैठी रहती है। मानपरक वियोग या तो प्रेम के कारण होता है, पाईयों के कारण। मिले हुए नायक नायिका का भय हो जाना विप्रयोग (वियोग) कहलाता है। इसके दो भेदरे:-माद या प्रवासामान भी दो तरह का होता है-मणयमान ज्या भ्यांमान । तत्र प्रणयमानः स्यात्कोपाषसिवयोईयो । ५८ ॥ 1.कोपादेशितयो' इति पावन्तरम् ।
- पतुर्थः प्रमाशः प्रेमपूर्वको पीयर प्रणयः, सशको मानः प्रणयमानः स च दयो यकयोभवति । तन्न नायकस्म यथोत्तररामचरिते- 'अस्मिक्षेप लताहे त्वमभवत्यन्मादयः सा हंसः कृतफोनुशा पिरमहोदापरीसकते। भायान्त्या परिदुमनायितमिव त्यां पौष यहस्तया घातांदरविन्दशमलनिभी मुम्पा प्रमामालि.' मायक माविका में से एक के पा दोनों के कोप युक्त होने पर, मुद रहने पर मणयमान वाटा यिप्रयोग होता है। मेगपूर्वक दूसरे को वश में करना प्रणय पाता है। इस प्रणय को मा करने वाला मान प्रणपमान कहलाता है। यह नायक तथा माविका में पाया जाता है। नायक के प्रणयमान का उदाहरण बसे तररामचरित करत पक्ष में राम का मान- बनवी वासन्ती राम को पुरानी बातें याद दिला रही है। ठीक इसी साल में तुम सीता के मार्ग को देखते हुए, उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। इधर गोदावरी के तौर पर गई सीता, नदी की रेती पर ईसा से रोसने लग गई थी, और इसीलिए देर हो गई थी। वर पद भौटकर मार तो उसने तुग्रेस तरह देसा, जैसे तुम फर से हो । इसलिए तुम्हें प्रसन्न करने के लिए इस सीवाने कातरता के साप कमल सी कली के समान हायों की मजति बाँप कर अनमोले दस से प्रणाम किया था। नायिकाया यथा धौयास्पतिराजदेवस्य- 'प्रणमपिता सदा देवी ससम्मानिमित- त्रिभुवनगुरुमीत्या सथः प्रणामपरोऽभवत् । ममितशिरसोगालोके तया चरणाहता- पयतु भवतस्यक्षस्यैतद्विलक्षमतस्थितम् । नायिका का प्रणयमान, जैसे भीवाश्यतिरामदेव के इस पथ में- सोनों छोकों के पूज्य महादेव ने जब देवी पार्वती को प्रणयमान के कारण देखा, वो वे सम्मम तथा भाव से युक्त होकर, के मारे सिर मुका कर एकदम प्रणाम करने लगे, जिससे पार्वती सत्रो बाय। पर महादेव के सिर को नीचा कर लेने पर पार्वती ने गहा (पार्वती की सौत) को देख लिया। तर सो पद और अधिक शेगई, तथा इसने अपना चरण महादेव के सिर पर गिराया। इससे महादेव बड़े लज्जित हुए । तीन भाँखों वाले महादेव का पद लजित दोमा आप लोगों की रक्षा करे। उमयः प्रणयमानो गया- 'पणमइविधाण दोवि अलिभपसुशाण मापदन्ताणम् । मिश्चणिरुदणीसासदिष्णप्रयाण को मलो। ('प्रणयपितयो योरप्यलीप्रसुप्तयोर्मानवतोः। निवलनिस्वनिधारादतवर्णयो को म') गायक तया नापिका दोनों का प्रणयमान, जैसे इस गाथा में- बताओ तो सही, प्रणयमान किये रेटे, छेदी सोये हुए दोनों मानौ प्रिय तथा प्रिया में, बिनने मिना दिने ने अपने शारा रोक रक्खे है, तथा कानों को एक दूसरे के निश्वास २६४ दरारूपकम् को सुनने के लिए, यह जानने के लिए यह सोया है या नहीं, खड़े कर रखे है-कौन अधिक मरल (जोरदार ) है। नायक तथा नायिका दोनों एक सामान किये है हम मूठ सो रहे हैं । इस तरह का मान करने में जोरदार कौन है यह निर्णय करना कठिन है, दोनों दो मान करने में बहे प्रबल है। यीणामीशितो मानः कोपोऽन्यासगिनि पिये। श्रुते पाऽनुमिते दृष्टे, श्रुतिस्तत्र सस्त्रीमुखात् ॥ ५६ ॥ उत्स्वप्नायितमोगाइगोनस्खलनकल्पितः। निघाऽनुमानिको, दृष्टः सादादिन्द्रियगोवरा ॥ ६॥ ईयोमान' पुन ब्रीणामेव नायिकान्तरसहिनि स्वकान्ते उपलब्धे सस्यन्यारा ध्रुतो वाऽनुमितो दृष्टो वा (यदि) स्यात् । तत्र प्रवर्ण सखीवचनात्तस्या विश्वास्यत्वाच । प्रिय के किसी दूसरी नायिका के प्रति भासा होने पर खियों में बो कोष होता है, वह ईयांकृत मान होता है। पह नायक की अन्यासकिया तो स्वयं आखिों से देखी हो, अयया यह अनुमान करछे (नायक के शरीर पर परकी सम्भोगादि चिह्न मादि देखकर इसका अनुमान कर ले अथवा किसी के मुख से सुन ले। इस सम्बन्ध में प्रिय की अन्यासक्ति की श्रुति सखी के मुंह से हो सकती है । प्रिय की प्रन्यासक्ति का अनुमान हीन तरह से हो सकता है या तो नायक स्वप्न में उस मन्य नायिका का नाम ले ले, या फिर नायिका उसके शरीर पर अन्य को भोग के चित्र देसले, या नायक गलती से ज्येष्ठा को पुकारते समय उस कनिष्ठा का नाम के बैठे (गोत्र स्खलित कर बैठे)। उसका अन्य नायिका से प्रेम धरूप में तर होगा कि जब कि नायिका स्वये अपने आँखों से देखने, या कानों से उन्हें प्रेमालार करते हुए सुन ले। ईयोमान केवल खियों में ही पाया आता है (नायकों में नही)। नायक को किसी दूसरी नायिका को प्रेम करते देखकर, सुनकर, या अनुमानकरके यहOमान होता है। इसमें सुनना सखी के वचनों से होगा, क्योकि सखी विश्वस्त होती है, इसलिए मूर नहीं कर सकती। यया ममैव-- 'सुश्रु खं नवनीतकल्पहृदया केनापि दुर्मन्त्रिणा मिथ्येव प्रियशरिणा मधुमुखेनास्मामु चण्डीकृता । किं स्वेतद्विमृश क्षण प्रणयिनामेणाक्षि कस्ते हित' किं धात्रीतनया वयं किमु सखी किंवा किमस्मत्सुहृत् ।। मानवती नायिका को नायक कर रहा है। हे सदर भौ वाली सुन्दरी, पता तो सही बुरी सलाह देने वाले रिस व्यक्ति ने जो बाहर से मोठी मोठी गाते करने वाला है, और झूठे से तुम्हारा प्रिय करने वाला है, तुम्हारे प्रिय कार्य करने का दिखावा करता है, मक्खन के समान कोमल हृदय वालो तुम्हें हमारे प्रति मानवती (चण्ग)बना दिया है। राम यह दौ सौच को, कि तुम्हारे सारे प्रिय व्यक्तियों में सुम्हारा सच्चा हितैषी कौन है तुम्हारा सच्या हितेषी, तुम्हारी धाय की लडकी है या हमरे,या फिर तुम्हारी ससोहैया हमारे मित्र । उस्स्वप्नायितो यया दस्य- 'निर्मग्लेन मयाम्भसि स्मरभरादाली समालिक्षिता कैनालेवमिदं तवाच कथितं राधे मुधा ताम्यसि ।
चतुर्थः प्रकाश इत्युत्स्वप्नपरम्परासु शयने श्रुत्वा वचः शाणिः सव्याज शिथिली: कमल्या कण्ठप्रहः पातु " उत्स्वप्नायित, जहाँ नायक स्वप्न में पानायिका का नाम ले ३४, और नायिका उसे सुन है। जैसे, कद्र कवि के ए पप में- पानी में हुए मैने काम के बोझ के कारण किसी तरह उस ससी का मालिङ्गान कर लिया था, हैराथे, तुमसे यह छठी पात कि मेरा प्रेम उस ससी से है, किसने बाद दी, तुम बिना बात ही क्यो दुरीदो रही हो । निद्रा के समय स्वप्न में कहे गये विष्णु (कृष्ण) हर वचनों को गुनकर किमी न किसी बहाने से लक्ष्मी (रुक्मिणी) ने अपने हाथ को उनके कण्ठ से हटा लिया, कण्ठमाइ को शिथिल कर दिया। इस तरह से कमला कोदारा शिथिलित विष्णु का कण्ठप्रद तुम्हारी रक्षा करे। भोगादानुमितो यथा-- 'नवनरापदम गोपयस्यंशुषेन स्थगयसि पुनरोष्ठं पाणिना दन्तदष्टम् । प्रतिदिशमपरस्त्रीसाशंसी विरार्पन गवपरिमलगन्धः केन शस्यो परीतुम् ॥ भोगावातुमित अन्यासगि, जैसे शिशुपालनप के पवादश सर्ग के इस पत्र में- कोई नायिका अपराधी नायक के शरीर पर परसी राम्मोग के चिद देखकर से शिकती बह रही है। तमास बत्र से नायिका के नधशत से युक्त मह को छिपा रहे हो; तथा उसके दांतों से काटे हुए मपरोष्ठ की हरण से टक रहे हो। पर यह तो बताओ, अन्य स्त्री सम्भोग को सूचना देता दुभा, चारों दिशाओं में फैलता इमा यह नवीन मगन्ध किस ढक से छिपाया था सकता है। यह गन्य ही बता रहा है कि तुम अन्य नायिका का उपभोग करके आ रहे। गौतस्सलनकरिपतो यथा- 'केलीगोसम्खलणे विकुपए केभयं श्राणन्द्री । दुछ उग्रम परिहास जाया सचं विश्र पठण्णा I ('केलोगोयस्खलने विकुप्यति फैतषमजानन्ती। दुष्ट पाय परिहास जाया सत्यामिव प्रमदिता ।') गोत्रस्खलन के द्वारा अनुमित भन्यासक्ति, जैसे निम्न गाथा में- कोई नायिका नायक के गोवरखलन को सुनकर रोने लगी है। यह देखकर सखी काह रही है। मन्यासक दुध, मजाक तो देखो, तुम्हारी परली सचमुच वी तरह से रदी रे क्रीडा समय तुम्हारे गौनरपलन के कारण, छल को न भागती हां वह मान कर रही है। दृष्टो यथा श्रीमुनस्य- 'प्रणयकुपिता दृष्ट्वा देवी ससम्माविस्मित- बिगुवनगुरुमीत्या सद्यःप्रणामपरोऽभवत् । ममितशिरसो गमालोके तथा चरणाहता- यवतु भवतस्म्यक्षस्यैत दिलनमवस्थितम् ॥ इष्ट मन्यापति, बेसे वाक्पनियाज मुन्न का यह पच- सोनों लोकों के पूज्य महादेव ने जब देवी पार्वती को प्रणयमान के वारण कुपित देखा, ३४९० दशरूपकम् तो वे सम्भ्रम तथा पाश्चर्य से युक्त होवर, टर के मारे सिर झुकाकर, एकदम प्रणाम करने लगे, जिससे पार्वती प्रसन्न हो बाय । पर महादेव के सिर को नीचा कर लेने पर, पार्वती ने गङ्गा (पार्वती की सौत) को देख लिया । देव तो वह और अधिक कुपित हो गई, तथा उसने अपने चरण को महादेव से सिर पर मार गिराया। इससे महादेव पडे लजित हुए । सोन आँखों वाटे महादेव का यह लजित होना आप लोगों की रक्षा करे। एपाम्- यथोत्तरं गुरुः पड्भिरुपायेस्तमुपाचरेत् । साग्ना मेदेन दानेन नत्युपेक्षारसान्तरौ ॥६॥ एषाम् = श्रुतानुमितदृष्टान्यसङ्गप्रयुतानामुक्ताना मानानां मध्ये उनरोत्तरं मानो गुरुशेन निवार्यों भवतीत्यर्य । तम्मानम् । उपाचरेत-निवारयेत् ॥ ६१ ॥ तत्र मियपचः साम, मेदस्तत्सत्युपार्जनम् । दाने व्याजेन भूपादेः, पादयोः पतनं नतिः ॥ १२ ॥ सामादौ तु परितीणे स्यादुपेक्षावधीरणम्। रमसपासहपदिः फोपभ्रंशो रसान्तरम् ॥ ६३॥ फोपचेष्टाश्च नारीणां प्रागेव प्रतिपादिताः। श्रुत से लेकर र अन्यासक्ति तक प्रत्येक परवा प्रमाण से सिम मायक की भन्यासक्ति पूर्ववती से अधिक कठिन होता है । मायिका के इस ईामान को पावरह से हटाया जा सकता है-साम, भैद, दान, मति (प्रमाण), उपेश, या रसान्तर (अन्य रस के द्वारा) मधुर प्रिय पपनो का प्रयोग साम नामक पाय है। उसकी सखी का सहारा लेना भेद है, तथा गहने बादि के बहाने शुश कर लेना दान है। पर गिरना मति कहलाता है। यदि सामादि चार उपाय काम न करे तो नायिका के प्रति उदासीनता यातना, उपेक्षा कदलाती है। पीयवा में उत्पन्न भय सपा वर्ष आदि केशारा कोप को नष्ट कर देना रसान्तर कहलाता है। वियों की फोपवेष्टाओं का वर्णन वो हम पता हो चुके हैं। सत्र प्रियवव साम यपा ममेव- "स्मितग्योनाभिस्ते पालयति विश्व मुखराशी घरास्ते पीयूपदवमिव रिमुवन्ति परित' । पपुस्ते लावण्यं विरति मधुरं दिशु तदिदं कुतरते पारायं मुतनु दयेनाय गुणितम् ॥' प्रिय वचनों का प्रयोग सामरहलाता है, बेमे धनिक कार्य का यह पप- है इन्दर बड़ों वाली प्रिय, तेरा मुम्वरूपी चादमा सारे संमार से अपनी पुस्वरादरी चाँदनी से देव पना देना हेरी दृष्टि से हार अरसरकारनेर शरीर सर दिशामों में मधुर सौन्दर्य (चाय) को विसर ररा। इन सब बातों को देखने माप्रय हो कि आवरेस्य के साथ कठोरना का सम्मल वहाँ से हो गया है यथा- 'इन्दौरेण नयनं मुरासम्युजेन कुन्देन दन्तमपरं नवपाल वैन ।
धतुर्थः प्रकाशः कलिका देते हुए देख कर ज्येष्ठा नापिका ध्यदय मुनाठेर कर ૨૬૭ अङ्गानि चम्पकदलैः स विधाय येधाः कान्ते फथं रचितवानुपलेन चेतः ।।" अथवा, बसेस पच में- हे सुन्दरी, उस मशा ने तैरे नेत्रों को नील कमल से, मुख को लाल कमल से, दाँतों को कुन्द केली से, अधर को नई छाल कोपल से, तथा मङ्गों को चम्पे को पंखुड़ियों से बनाकर हृदय (चित्त) को परथर से कैसे बनाया ? नायिकाससीसमावर्जनं भेदो यया ममैव- 'कृतेऽप्याशाभने कथमिव मया ते प्रणतयो धृताः स्मित्वा हस्ते विस्जशि रुपं गुत्रु बहुराः। प्रकोपः कोऽप्यन्यः पुनरयगसीमाव गुणितो वृया यम निग्धाः प्रियसहचरीणामपि गिरः ।। नायिका की ससी के द्वारा उसे बस में करने की चेटा भेद पारलाता है। भेद का उदाहरण जैसे थनिक कादी निम्न पर्य- गायक मानवती नायिका से कह रहा है । हे सुन्दर मौदों वाली रमणी, मात्रा का माह कर देने पर भी मैंने किमी तरह तुम्हें कई बार प्रणाम किया था और तब तुम हँसकर गुरसे को हाथों हाप छोड देती थी । ऐसा गनेकों बार हुआ है । पर इस बार वो पता नही, तुम्हारा यह गुस्सा दूसरेदी ढह का है, यह अत्यधिक बढा चढा तथा निःसीम दिखाई पड़ रहा है, जिस कोष में प्रिय सखियों के मथुर स्नेहपूर्ण वचन भी व्यर्थ हो गये है। पहले नौ मैं चरणों में गिरकर हो तुम्हें सुश कर लिया करता था, पर इस बार तो सखियों का अनुनय भी व्यर्थ हो रही है, पता नहीं आज पेसो भषिक मुद्ध क्यों हो रही हो। दानं ब्याजेन भूपादेर्यया माधे- 'मुहुष्पदसिलागिपालिनाद- वितरसि नः कलिम्न किमर्थमेनाम् । थधिरजनि गतेन धाति तस्याः शठ कलिरेव महांस्त्वयाऽद्य दत्तः ॥' आभूषण आदि के बहाने से दान के द्वारा प्रसन्न करने की चेष्टा, जैसे शिशुपावन के सप्तम सर्ग में- कोई नायक रात मर दूसरी नायिका के पास रहा। बाब लौट चार थापा दो नापिका मान किये थी। उसे प्रसन्न करने के लिए बह किसी कठा की कलिका को टाटो समान लिए देना चाहता है। रही है-देश, भैयरों के गुजन से मानों उपसित (जिसकी इंटी बढ़ाई कली को हमें बार-बार क्यों दे रश है। भरे इथ, उस नायिका दे. पर परामर ग कर तूने पहले हो हमें इस महान् दुःख तथा क्लेश को (कलि को दे दिया। पादयोः पतनं नतिर्थया- 'उरकोदिविलम्ग चिहुरं अस पाअपडिया। हिअ गाणपउत्यं उम्मोअंति चिय कोइ ।' (नपुरकोटिदिलम विरं दयितस्य पादपतिदल। हदय मानपदोत्वमुन्मुफमित्येव कथयति ।) .
दरारूपकम् नापियरों पर गिरना नविप्रहावा- रस गापा में- प्रिपा के पैरों पर गिरे, प्रिपा र देशको प्रिया रेनपुरों में इसा गरे, सपा को एपना दे रहे ,रि नायिका के मानौ हप की मब मान से गुटकारा मिल गया है। उशा सवधारणं यपा- 'किंगतेन नहि युष्मनु नेवरे मा गरियो । भानयनमननीय परं वा निप्रियाणि जनयानुनेय ॥ दिया के प्रति सानता दर्शना पक्षाशलाया है, मे- किसी नायिका के पास अपराधी मिप भापमान किया। उसे मनाने लिए मायक अनेक उपायपरता है, परम्प बाते है । तर यह वही से उपेक्षा दिमाकर पनामाताहै। उसके चडे जाने पर नायिका का मान रण्डा पदवी और एमपनी सखी (नी)को उमे बुला करने को कर रही है। यह यला मी गया धोया, टमके पास जाना भी टोक नहीं है, क्योंकि उसने भरार रिया है। पर ना होने पर भी पर समर्थ रेसर कुछ रित अनुचित कार्य कर सकता है। इसटिर समर्थ के पति कठोरता दिखाना, उसके प्रति अब भी मान दिये बेटा रहना, टीक नहीं है। गि, तुम बागी और किमी तरह से मना कर भाभो, अथवा हम लोगों का अपराध करने वाले पकि (नायक) को मनाया भी कमा सकता। रमसमासह दे रसान्तरात्कोपभ्रंशो यथा ममैव- 'अभिव्यकालीक. सकलविफल पायविभव- चिरं प्याला सय कृतकृतकसम्मनिपुणम् । इस पृष्ठे पृछे किमिदमिति सन्तास्य सहगा कृताप्लेप धूर्त स्मितमधुरमालितति वधूम् ।। भय इपं आदि के द्वारा किसी दूसरे रस की उत्पति के कारण कोष का शान्त होना, वैसे पनिकायहस्सरचित्र पत्र- मापक का अपराध प्रकट हो गया है, इसलिए नादिया बड़ा मान किये है। मायकई प्रकार से उसे मनाने के उपाय करता है, लेकिन यह असफल होता है। इसके बाद पर उसे प्रसार करने का कोई तरीका सोचने के लिए बडी देर तक सोचविचार करता है। फिर तरीका सीख लेने पर एक दम हठे घर का बदी निपुणता से बहाना परके वर 'वह पीछे क्या है, यह इधर पीछे क्या है इस तर नायिका को एक दम डरा देता है। इससे हर कर नायिका रसको भोर झुस्ती है, वह मुस्कराहट व मधुरता के साथ मालिङ्गन. करती हुई नायिका का आलिशान करता है। अप प्रवासविप्रयोग- कार्यता सम्भ्रमाच्छापात्प्रयासो मिनदेशता ॥ ६ ॥ द्रयोस्तमाधुनिःश्वासकार्यलम्यालकादिता। सच भाषी भषन भूतसिधाचो धुद्धिपूर्वकः ॥६५॥ भार कार्यज समुद्रगमनसेवादिकार्यवशप्रस्ती धुद्धिपूर्वकत्वादतमविष्यवर्तमानतया विविधा। अक्ष प्रवासजनित विप्रयोग कालवण निक्र करते हैं।- किसी काम से, किसी गायबी से, या शाप के कारण मायक-नापिका का अलग- चतुर्थः प्रकाशः अलग रहना, उनका भि-मिन देश में स्थिा होना, प्रयास किप्रयोग है। इसमें नायक तथा नायिका धोनों ही में मथु, निःश्वास, दुषलता, पाल कान संथारे जाने के कारण खम्या होना, धादि अनुभव पाये जाते हैं। यह मास विनयोगहीन तरह का होता है-भाषी (भविष्यत्), भवत् (वर्तमान) तथा भूत; जय कि प्रयास होने घाला हो, हो रहा हो, था हो चुका हो। इसमें पहले दया नायक हा प्रवास किसी कारण से होता है जैसे नायक समुद्रयात्रा में गया हो अथवा कदी नौकरी आदि के लिए विदेश गया हो। यह प्रवास मी बुद्धि के अनुसार तीन तरह का होता है-भूत, भविष्या तया वर्तमानरूप इन्हीं के उदाहरणों को कामशः साते है:- तत्र यास्यत्वासो यथा- 'होन्तपहिथस्स जामा भाउच्छणजीनधारणरहस्सम् । पुच्छन्ती भमइ परं परेमु पिनविरहसहिरोमा ।' (भविष्यत्मविश्स्य जाया थायुक्षणजीवधारणरहस्यम् । पृच्छन्ती भ्रमति गृहाद्गृहेश प्रियविरदसहीका (1) पहला दादरण यास्याप्रवास का है, जब कि प्रिय विदेश गया नहीं है, किन्तु जाने वाला है- पिय के भावी विरह की मार से दुखी मादी पथिक की पक्षी पडोस के लोगों से पति के चले जाने पर जीवन को धारण करने के रहस्य के बारे में पूनगी दुई पर-पर पूम रही। गरछनासो यमायतकै- 'प्रहरनिरती मध्ये पाहस्ततोऽपि परेऽथया दिनकृते गते धास्त नाप त्वमा समेष्यसि । इति दिनयतप्राप्य देशं प्रियस्य सियासतो हरति गमनं यालालापैः सयाणगलबलः। गम्यस्प्रषास, जबकि पति विदेश मा रहा है। इसका उदाहरण जैसे अमरकशतक कर पर पथ- "हे नाथ, सुग एक गहर के बाद, पा दिन के मध्या में, या अपराध में, या सूरी के बरत होमे तक तो कोर भाभोगेन, आँसओं को गिराते हुए सबक नेत्रों से इस प्रकार के पचा करती हुई नायिका को दूर (सौ दिन में प्राप्य ) देव को जाने की इच्छा वाले प्रिय का जाना रोक रहो। यथा वा तत्रैव- 'देशैरन्तरिता शतव सरितासुस्तिो कानने- मेनापि न याति लोचनपथं कानोति जानथपि। उहीवश्चरणाववसुभः कृत्वाऽश्रुपूर्णे दशौ तामाशां पथिकस्तथापि किमपि ध्यात्वा विरं तिति ।" अपना वही बसस्कशतक के निम्न पच में- प्रिया भनेकों देशों, सैकडों नदी व पहाड़ों पाछे बालों से अन्तति है, और यह काने पर भी बदष्टिगोमर नहीं हो सकीस बात को पथिक भलीभांति जानता है। पर खना आनने पर भी गरदन ऊँची करके, भासों में सांस भरे हुए, तथा भाषे चरण के द्वारा पप्वी २७०. दशरूपकम् को रुद्ध वरके ( उस और प्राधा पाँव ठाकर) व प्रवासी नायक उस देश को दिशा की ओर पता नहीं क्या सोचता हुआ रदी देर तक सदा रहता है। गतप्रवासो यया मेघदूते- 'उत्सझेपा मलिनवसने सौम्य निक्षिप्य वीणा मगोत्राई विरचितपदं गैयमुगानुकामा । तन्त्रीमा नयनसलिलैः सारयिला क्यंचिद्- भूयो भूयः स्वयमपि कृतां मुर्छनां विस्मरन्तो ॥ आगच्छदागतयोस्तु प्रवासाभावादेष्यत्प्रवासस्य च गतप्रवासाऽविशेषादिप्यमेव गतप्रवास, जर पिय विदेश चला गया हो, जैसे मेघहत में- हे मेघ, मेरे घर पहुँच कर तुम प्रिया को इस दशा में पाओगे। वह अपनी गोद में या किसी मैले कुचैले कपड़े पर वोणा को रख कर उसके हो दारा बनाए हुए मेरे नाम से अङ्कित गीत (पद) को गाने की इच्चा कर रही होगे। पर इसो समय उसे मेरी याद आ गई होगी, इसलिए वह रोने लगी होगी। आँसुओं से गोली वीणा को किसी तरह संवार कर अपने द्वारा मनाये हुये गीत को मूछना को बार-बार भूलती हुई, बइ तेरे इपिपय मैं भवतरित होगी। कुछ लोग प्रवास के और भो भेद मानते है-जैते आगरपतिका, पागच्छरपतिका, तथा एम्पत्पतिका । किन्तु ये भेद मानना ठीक नहीं। भागतरतिका तथा भागछरपतिका में प्रास विप्रयोग का अभाव ही है, क्योंकि सयोग हो चुका है, या हो रहा है। एष्यत्पतिका का समावेश गतप्रवास में होहो जाता है। अतः प्रवास के तीन मद मानना ही ठीक जान पढना है। द्वितीया सहसोत्पन्नो दिश्यमानुपविप्लपात्। उत्पातनिर्यातदातादिजन्यविप्लवात् परचक्रादिजन्यविप्लवाद्वा बुद्धिपूर्वकत्वादेकरूप एव संभ्रमशः प्रवासः ययोर्वशीपुरवसोविक्रमोर्वश्या यथा च कपालकुण्डलापहतायो मालत्या मालतीमाधवयोः। सम्भ्रमजनित प्रवास वह होता है, जहाँ देवी या मानुपी विश्व के कारण नायक- भायिका एक दम एक दूसरे से वियुक्त कर दिये गये हों। उत्पात, विजली गिरना, सूफान आना मादि को गहरदी से, या किमी दूसरे राजा के बाक्रमण से, परिपूर्वक नियोजित प्रवास सम्भ्रमजनित प्रवास कहलाता है। जैसे विक्रमोर्वशीय में पुरावा और नवंशी का वियोग, अथवा जसे मालती के कपालकुण्डला के द्वारा रलिये बाने पर मालनीमा माधव का वियोग। स्वरूपान्यावरणाच्यापजा समिधापि ॥१६॥ यया कादम्बा वैशंपायनस्येति । मृते लेकर पाया अल्पग्छोक एष सा। घ्याधयत्वानकारः, प्रत्यापनेतु नेतरः ॥ १७ ॥ यथेन्दुमतीमरणादजस्य करुण एव रघुवंशे, कादम्बयों तु प्रयमं करुण आकाशसर- स्वतीवचनादूर्व प्रवासकार एवेति । 1. 'निराथयात्' इति पाठान्तरम् ।
चतुर्थः प्रकाश २७१ नायक तथा नायिका के समीप होने पर मी जहाँ उनका स्वरूप-सका स्वभाव पारूप-शाप के कारण बदल दिया भाष, पद शापज प्रथाम कहलाता है। जैसे कादायरी में शाप के कारण वैशम्पायन (पुण्डीक) तपा महारयेता का पियोग। भधाय धिप्रयोग तथा करण का भेद पताते हुए कहते हैं-एक व्यक्ति (नायक या गायिका) के मर जाने पर जहाँ दूसरा यकि पटाप करे, यहाँ प्रवास विप्रयोग नहीं माना जा सकता, यही हो जोक गाय तया करण रस ही होगा। जय आलम्पन हो विद्यमान नहीं है, तो वहाँ शार नहीं माना जा सकता है। किन्तु मरण के याद मी देवी पाक्ति से पुनः जीवित हो जाने पर करण नहीं होगा। उदाहरण के लिए रघुवंश के भरम सा में दुमकी के मरने पर मन का शिलाप करण दो है, प्रवास दिप्रयोग नही) कादरी में पहले तो वरुण , किन्नु आकाशवाणी के इन शेने के बाद पुण्डरीक तथा महादेता का सिंगोग प्रहार रही है। वन नायिका प्रति नियमः-- प्रणयायोगयोगत्का, प्रवासे मोपितमिया । फलहान्तरितेायां पिपलब्धा च पण्डिता ॥ ६॥ भय इस सम्बन्ध में नापिकासी के नियम का नियन्धन करते हैं। प्रयणमान में नापिका विरहोस्फटिता होती है। प्रवास रिप्रयोग की दशा में यह प्रोपितप्रिया होती है, तया ईयामान पाले विप्रयोग में यह कलहातरिवा या विमलया या समिता होती है। इस तरह विश्योग की सुधा में नायिका की पाँच प्रकार की अवस्थाओं का निर्देश किया गया है। अथ संभोग- अनुपली नियेते यमान्योन्यं विलासिनौ । दर्शनस्पर्शनादीनि स संमरेगो मुदायितः ॥ ६ ॥ ययोतारामचरिते- मपि तिमपि मन्द मन्दमामतियोगा- दविरलिनकपोल जपतोरममेण । सपुलरपरिरम्भव्याटवैकेक्दोष्णो- रविदितमसयामा रात्रिरेच व्यरंसीत् । भयोग या विप्रयोग की विवेचना के बाद संघ सम्भोग का लक्षण निवड करते हैं:- जाँ नायक व मायिका एक दूसरे के अनुकूल पोकर, विलासपूर्ण होकर, दर्शन, स्वान आदि का परस्पर उपभोग करते हैं, यहाँ प्रसन्नता तथा उलास से युक सम्भोग होता है। मेरो ससररामचटि गाटक मैं राम तथा सीता का पम्भीष महार- हे सीते, तुम्हें याद है पद बही सल है, जहाँ हम दोनों एक दूसरे के पास अपने कपोलो को सटाकर सो रहे थे, सभा पता नहीं क्या क्या कायरहित (विना सिलसिले की) नाते कर रहेथे । इमने अपने एक एक से एक दूसरे को बना थालिन का रखा था तथा इम पुलकित हो रहे थे । इप्त तर एक दूसरों को हाथ से आलिङ्गन बर तथा एक दूसरे के कपोल से कपील सटाकर, सोये हुए तथा बात करते हुए हमने सारी रात गुजार दी। रात को पहरों के प्यतीत होने की भी खबर में न रही कि कितनी रान गुजर चुकी है। इस तरह रात ही गुजर गई, पर गारी गर्ने सपा न हुदै।
- ૨૭૨ दशरूपकम् अथवा । 'प्रिये किमतन्- विनियेतुं शक्यो न मुखमिति वा दुखमिति या प्रमोहो निद्रा पा बिग विविसर्प किमु मद । तर स्पर्श स्पर्श मम हि परिमूदेन्द्रियगणो विवार कोऽप्यन्तयति च तापं च कुरुते ॥' अथवा, जैसे वहीं- हे प्रिये, यह क्या है। मैं इस रात का निर्णय हो नहीं कर पाता कि यह तुम्हारा पर्थ मेरे लिए सुरु है या दुस, यह मोह है या मार को होगी। अपरा तुम्हारा पर्श होने पर मैरे शरीर में विष का सवार हो रहा है, या कोई नशा फैल रहा है। हमें सर्श करने पर, तुम्हारे कर स्पर्श पर, मेरे हृदय में एक विशेष प्रकार का विकार उत्पन्न होता है, जो मेरी इन्द्रियों को निष्क्रिय रना देता है, अन्तस् को जड़ बना देता है, तथा बलन (ताप) उत्पन्न करता है। यया च ममैव-- 'लावण्यामृतवर्षिणि प्रतिदिश कृष्णागरुश्यामले वर्षाणामिव ते पयोधरमरे तन्वति दूरोलते। नासावंशमनोज्ञकेतकतनुपरगर्भोलस- पुष्पनीस्तिलक सहेलमलमारिवापीयते ।' अथवा, जैसे धनिक के स्वय के इस पध में- कोई नायक नायिका को यौवनश्री को वृद्धि का वर्णन करता हुमा चाटूकि का प्रयोग कर रहा है। हे कोमल अों वाली सुन्दरी, हर दिशा में लावण्यरूपी अमृत को बरसाने वाले, तथा कृष्णागर को पत्र रचना से काले रेसन का मार खून उठा हुआ है, जैसे हर दिश में अमृत के परसाने वाले काले मेघ (माकाश में) माये हों। रे स्तनों के मार के उठ जाने पर ये तेरे बालरूपी भरिनाकरूपी बस से अपना नाक के कारण सुन्दर केतक के समान रहमाले, भौहों को पतुदियों से सुशोभिन पुष्प की शोभा वाले इस तिलक-तिलक के समान स तुम्हारे नाक के तिलक पुष्प के रस का जैसे पान कर रहे है। धेपास्तत्र प्रवर्तन्ते लोलाद्या दश योषिताम् । दाक्षिण्यमार्दयमेम्यामनुरूपाः प्रियं प्रति ॥ ७० ॥ ताय सोदाइतयो नायकनकाशे दर्शिता । इस सम्भोग महार में नापिकाओं में प्रिय के प्रति लीला भादि दस चेप्टाएँ पाई जाती है। ये वेष्टाएँ दाक्षिण्य, मृदुता या प्रेम के उपयुक होती हैं। इनका विवेचन उदाहरणसहित नायकप्रकाश (दिनीय प्रकाश) में कर दिया गया है। रमयेचाटुकृत्वान्तः फलाकोडादिभिध ताम् । न प्राग्यमावरेकिंचिधर्मभ्रंशकरंन॥७॥ प्राम्य सम्भोगो रहे निषिद्धोपि पाध्येऽपि न कर्तव्य इति पुनर्निपिप्यते । यथा रत्नावल्याम्- "पृष्टस्त्वयैष दयिते स्मरपूजान्याएतेन हस्तेन । उद्विमापरतरकिरालय इव लक्ष्यते शोक इत्यादि।
चतुर्थ प्रकाशा नायकनायिका शिकीतिनाटकनाटिलक्षणापुर कविपरम्परावगतं स्वयमौचित्य सम्मादनानुगुण्येनोत्प्रेक्षितं चानुसादयानः सुरविः लागुपनिवघ्नीयात् । नायक को नायिका के साथ कला, मीडामादि साधनों से रमण करना चाहिए। मायक को रमण करते समय उसकी चाटुकारिता करनी चाहिए, तथा कोई भी ऐसा पवहार नहीं करना चाहिए जो ग्राम्य हो या नर्म (कार) को नष्ट करने वाला। प्राम्प सम्मोग समन पर निषिद्ध है दो पर काव्य में मी निविदा है इसलिए इसका निषेध पुनः किया गया है। मारा उपनिकलन, जैसे नावली में- प्रिय पासवद, कामदेव की पूजा में व्यस्त रेहाय से हुभा हुआ यह अशोक ऐसा मालम पड़ता है, बसेसमें फिर कोई अधिक कोमल किसलय निकल आया हो।' नायक, नापिका, कैशिकी नि, नायक, नाटिका आदि के लक्षणों से युक्त, कविपरम्परा के शात, अथवा कवि के स्वयं के द्वारा भौचित्य के अनुसार उपनिषद गगार का प्रयोग कति की काव्य में करना चाहिए। थप पीर- पीर प्रतापविनयाध्ययसायसत्व- मोहाविपादनयविस्मयविक्रमायैः। उत्साहभूः स च दयारणदानयोगा- ज्वेधा किला मतिगतिमहः॥ ७२ ॥ प्रतापसिनयादिभिरिभावित करणायुद्धदानायैग्नुभारिशो गर्वतिहर्षामर्षस्मृतिमति- वितर्वप्रमृतिभिर्माक्ति उत्साहः स्पायो त्वदवे-भाषक्मनोविस्तारानन्दाय प्रभवतीत्येष घो। तर दयावीरो यथा नागानन्द जीमूतवाहनस्य, युद्धवीरो घोरचरिते रामस्य, दानवीरः परशुरामबलिप्रभृतीनाम्-'त्याग' सप्तसमुद्रमुदितमही निजिदानावधि' इति । (दीरा) मसाप, विनय, कार्यकुशलताल, मोह, अविषाद, नथ, विस्मय, तथा शौर्य भादि विमानों से पीर रस की पुष्टि होती है। यह धीर रस उत्साह नामक स्थायी भाव से माधित होता है तथा दयाधीर, रणवीर तथा दानधर इस वरह तीन तरह का होता है। इसमें मति, गर्य, पति तथा प्रहप ये सधारी विशेष रूप से पाये जाते हैं। प्रताप विनय मादि विभावों के द्वारा उत्पा, करुणा, युद्ध, दान आदि अनुमावों के द्वारा ध्यक्तएवं गई, पति, क्षम, स्मृति, मरि, दिनक मादि ध्यभिचारी मागे के द्वारा माक्ति उरहार स्थायी भाव नर सहृदय के मन का विस्फार बार उन्हें बानन्दित पर, उनके द्वारा मास्यादित होता तो यह वीर रस के रूप में परिपुष्ट होता है। स्याबोर का उदाहण, जैसे नागानन्द नाटक में जीमूतवाइन की वीरता (दयावीरता युद्धदौर जैमै महावीरचरित में रामचन्द्र या उरसाद, तथा दानवीर से परशुराग, रति आदि लोगों का दानसम्बन्धी उत्साह । जसे परशुराम के लिए राम रहते है। -'सावी समुद्रौं तक फैली ही पथ्वी को निकपररूप से दान देना भापके त्याग का परिचायक है। 'सर्वप्रन्थिविमुत्तन्धि विकसदक्ष स्फुरत्कौरतुर्भ निर्यवामिसरोजकुमलटोगम्भीरणामध्यनि ।
२५४ दशरूपकम् पानावराप्तिसमु मुफेन परिना मानन्दमारोक्ति पायाव मवर्धमानमहिमाय मुरारेषु ।' दानवीर का ही एक उदाहरण देते है-दानवराज बलि से दान देने समय भगवान् वामन ने अपने शरीर को विराटरूप में परिवर्तित कर लिया। उनके छोटे छोटे शरीर के जोड़ों की सधियों खुल पड़ी, दे लम्बे होने लगे, उनके बढ़ते हुए वा स्थल पर कौस्तुभमणि धमक्ने लगी, और उनकी नामि से निकलते हुए कमल के कुड्मल को कुटी से (वहाँ बैठे हुए प्रदा की) गम्मीर वेदगान की धनि मनाई देने सपने अनुकूल दानपात्र को पाकर अत्यधिक उरमुक दानाराज बलि भगवान् विष्णु के शरीर को आनन्द से देखने लगे। इस तरह बलि के द्वारा मानन्दित होकर देखा हुआ, पोरे पोरे बढ़ते हुए महास सथा माश्चर्य वाला मुरदेष के I भगवान् विष्णु का विराप शरीर भाप लोगों को रक्षा करे। यया च ममैव- लक्ष्मीपयोधरोत्सा कुष्ठमारुणितो हरे । यलिरेष रा येनास्य भिशापानीकृत कर। विनयादिषु पूर्वमुदाद्दतमनुस पैयम् । प्रतापगुणावर्तनादिनापि वीराणा भावात्य आयोवाद । प्रस्वेदरकवदननयनादिकोषानुभावरहितो युद्धवीरोऽन्यया रौद्र । अथवा से पनिक का स्वयं का पर- पादानपराज बलि ही था, जिसके मागे जाकर विष्णु भगवान ने अपने उस हाप को, जो सक्ष्मी के स्तनों के काम से अरुण हो गया था, मिक्षा का पात्र बनाया। विनय मादि के उदाहरण म धीरोदाच नायक के पक्ष में दे चुके हैं। पुराने विद्वानों के मतानुसार वार के प्रताप वीर, गुणवीर, पावर्जन पौर आदि भेद भी होते है। पुद्धवीर पही है, जहाँ भाषय में प्रस्वेद आना, मुंह का लाल हो जाना, नेत्रों का लाल होना आदि क्रोध के अनुभाव न पाये जायें। यदि ये अनुभाव पाये जायेंगे, तो वहाँ और रस न होगा, रौद्र रस होगा। अथ वीभत्स- चीभरस. कृमिपूतिगन्धिवमथुप्रायैर्जुगुप्सैकभू- रुदेगी रुधिरात्रिकोकसवसामांसादिमि क्षोभणा। पैराग्याजघनस्तनादिपु घणाशुद्धोऽनुभायैर्वृतो नासावधिकृणनादिमिरिहावेगातिशङ्कादयः ।। ७३ ।। अत्यन्ताहृय कृमिपूतिगधिप्रायविभावरुद्भूतो जुगुप्सास्थायिभावपरिपोषणलक्षण सगी बीमत्स यथा मालनीमायवे- 'उस्कृत्योत्कृत्य कृति प्रथममय पृयूच्छोयभूयासि मासा- न्यसस्फिक्पृष्यपिग्दाद्यवयदसुलभान्युप्रतीनि जग्ध्वा । आर्त पर्यस्तनेन प्रकटितदशन प्रेतर करा- पस्यादस्थिसस्थ स्थपुरगतमपि प्रध्यमव्यममति ।'
चतुर्थः प्रकाशः २७५ कृमि (कोरे), पूरी दुर्गन्ध, पमन भाषि विमानों से, शुगुप्ता स्थायी भाव से उत्पन्न होने घाछा थीभास नगी वीभत्स होता है। एन, तादि बलियो, तथा चर्चा प मांस भादि विभावों से सोमण धीमरस रप होता है। जपन, राम कादि के प्रति शग्य के कारण सरपर पूणा से शुद्र मीमरस होता है। धीमरस रस के अनुभाव नाक को टेढ़ा करना, सिकोड़ना आदि हैं, तथा सधारी भाव आवेग, अति, मात्रा, आदि हैं। भत्यधिक बुरे तथा सुन्दर, कोड़े, दुर्गन्ध मादि विभागों के द्वारा उत्पन्न, जुगुप्सा स्थायी भाव की पुष्टि पदेगी बीभरस कहलाता है। जैसे मालतीमाषय के श्मशान में श्मशान के रस वर्णन में- देशों तो सही, यह दरिद्र प्रेत पहले तो शव से चमड़े को उत्साह रहा है। चाहे को उसाप-उसाद कर कन्धे, मूल्द, पीठ भादि के अहो में मरे से प्राप्त, अत्यधिक फूले हुए, वही पुरी दुर्गन्ध पाले, मांस को सा रहा है। उसे पाकर बात फैलाता हुआ, यह दीन दरिद्र प्रेत, बिसके दात साफ दिखाई दे रहे है, अङ्क में रसे हुए घर से, दो के बीच से निकाले हुए एपेली को भी मानन्द से पा रहा है। कधिरान्त्रकीकरावसामांसादिविमायः क्षोमणो पौभत्सो यथा चौरचरिते-- 'अन्नप्रोतहल्कपालनलकफरकणवण- प्रायशिसभूरिभूषणरपराधोपयन्त्यम्वरम् । पोतोचर्दितरफफमधनप्राग्भारपोरोक्षस- पालोलस्तनभारभैरवयपुरन्धोद्धतं शवति ।। सून, अतदियों की मास मादि विमानों से धोमण कोमरस उत्पा शेता है। जैसे महावीरचरित के निम्न पध में- राम को देख कर तारका राक्षसी उनकी ओर दौड़ती पा रही है। इस पथ में उसोका वर्णन है । तारका राक्षसी ने भैदियों के धागे में बड़े-बड़े कपालों की माला को पो रक्खा है, इन कपालों की गलियों में अत्यधिक भीषण शद करते हुए Uषक लगे हैं, और बनके दिलने से उन कपालों के भूषणों के शम्द से बाईका सारे भाकाश को शदायमान बना रही है। जग सादका भाती है, तो अंतदिरों में पोमे हुए सपालों को पुरुषों की आवाज सारे भाकाश में प्यार हो जाती है।(राम को देख कर ) वह ताइका अपने दोनौ सनों को दिलाती उनकी और बड़ी उयतता के साथ दौड़ती है। उस समय उसका शरीर, पोकर फिर से डाले पए खून के कोच से सने हुए भत्यधिक चपल स्तनों के पौस से पड़ा भावना लगता है। इस सरह सरावने शरीर पाली, ताइका, बाकाश को भूषणों से शन्दित करती नदी तेजी से दौड़ रही है। रम्येष्वपि रमणीनधनस्तनादिषु पैराग्यामृणा शुद्धो बीभत्तो ययाः- 'शाला यास वेति मांसपिण्णी पयोधरौ। मासास्पिकूटं जघनं जनः कामप्रहातुरः॥ न चाय शान्त एव विरफ-यतो धीमत्सपानो चिरज्यते । रमणियों के अन्दर बघनस्थल तथा सन आदि बद्धों के प्रति वैराग्य के कारण वो घृणा पाई जाती है, का शुद्ध दौमत्त है, जैसे- देशरूपकम् काम केशारा पाविष्ट मातुर प्यत्ति, मुंह की लाला को मुखको मदिरा समझता है, गांस के पिण्डों को स्तन मानता है, तया मांस और इड्डी के उठे हुए हिस्से को अपन देखा आय तो रमणियों के कोई अङ्ग सुन्दर नहीं बलिक मास, हड्डी वादि करिसत पदार्थ है। इस पध में वैराग्य शान्त रस ही नहीं है। वस्तुतः यहाँ पर वापस हो । किन्तु वही तो विराग (वैराग्य) का कारण है। प्रय रौदः- मोधो मत्सरवैरिवैकृतमये पोषोऽस्य रोद्रोऽभुजा क्षोभः स्वाधरदशकम्पभ्रुकुटिस्वेदास्यगगर्युतः । 'शोल्लासधिकत्यनांसधरणोघातप्रतिक्षामहै- रसामर्पमदी स्मृतिथपलतास्यौग्यवेगादयः ॥ ४ ॥ मात्सर्यविभावो रोद्रो यया चौरचरिते- 'वं ब्रह्मवर्चसधरो यदि वर्तमानो यद्वा स्वजातिसमयेन धनुर्धरः स्याः। उप्रेण भौस्तव तपस्तपसा दहामि पक्षान्तरस्य सदृशं परशुः करोति ।। (रौद्र रस) मत्सर, अथवा घरी के द्वारा किये गये अपकार आदि कारणों (विभाषों) से क्रोध उत्पन्न होता है। इसी क्रोध स्थायी भाव का परिपोष रोदस है, जिसका साथी सोम है। शव को बार-बार धमकाना, पदी टीगे माना, जमीन पर चोट मारना, प्रतिज्ञा करना क्षादि इसके अनुभाव हैं। रोदरस में अमर्प, मद, स्मृति, चपलता, असूया, औग्य, पेग भादि सधारी भाव पाये जाते हैं। मात्सर्व विभाव से उत्पा रौद्र, जैसे मारचरित के इस पच में (परशुराम को रक्ति) अगर तुम महातेज को धारण करने वाले हो, माक्षण हो; अका परि तुम अपनी जाति के व्यवहार के अनुकूल धनुर्धारी बने हो; तो दोनों दशा में मैं तुम्हारे तेज का खण्डन करने में समर्थ हैं। तुम्हारे तपस्वी प्रामण होने पर, में अपने उप तप से तुम्हारे तप को जला दूंगा (बलाता हूँ. भोर तुम धनुर्भात क्षत्रिय हो तो (दूसरी दशा में) मेरा पसबारे उपयुक्त पाचरण करना। पदिम यात्रिय रो, वो मैं तुम्हें इस पर जीत कर, मौत के पाटस्वार दूंगा। बरियतादिया घेणीसंहारे- 'साक्षापहानल विद्यालयमाप्रदेश प्रायोऽ वित्तनिचयेषु पनः प्रहत्य । आकृष्टपाडववधूपरिधानशा स्वस्था भवन्तु मयि पीवति धार्तराष्ट्र ॥ इत्येवमादिविभावे प्रस्वेदराननयनायनुसावरमादिभिधारिभिः सोधपरिपोषो गैर, परशुरामभीमसेनदुर्योधनादिव्याहारेषु धीरचरितवेणीसंहारदिनुपन्तभ्यः ।
चतुर्थः प्रकाराः . राम के द्वारा कृत अपकार के कारण जनित रोग, जैसे वेणीसंहार को भीमसेन की राप्त उकि में- साधारह में भाग लगा कर, पि का मौवन देकर, तथा समा में अपमान करके इम पाण्डयों के प्राणों पर, तथा सम्पचि पर कौरवों ने अत्यधिक प्रहार किया है। यही नहीं, उन्होंने पाण्डयों को पनी द्रौपदी के वक्ष या बालों को भी बैश। इस प्रकार हमारा अत्यधिक अपकार करने वाले कौरव, गुझ मोमाइन के जिन्दै रहने कुशल कैसे रह सकते। इस तरह के विभागों के द्वारा बनित, मस्खेतरकवदन, रतनमन भादि अनुभावों, सया मम मादिष्यभिचारियों के हारा उप कोष स्थायी भाव हो परिपुष्ट होकर रोद रस मानता है। परशुराम, मौमसेग, दुर्गापन भावि के व्यवहार रोद रस के वदाहरण है। इनको इम बोरचरित, वेणीसंहार भादि नाटकों में देख सकते है। थ्य हात्या- विरुवाहतिवाग्वेरात्मनोऽथ परस्य धा । हास: स्यात्परिपोपोऽस्य हास्यनिप्रशतिः स्मृतः ॥ ५७ ॥ मात्गस्थान विकतवेपमापादोन परस्थान या विभावानवलम्बमानो दसस्तसारियो- पारमा हास्यो रसो पियानो भवति, स चोत्तममध्यमाधमप्रकृतिभेदात्पदियः । (हास्य रस) स्पर्य या दूसरे के आकार, पाणी, तथा घेप में विकार देख फर हास की उत्पत्ति होती है। इस हास स्थायी भाव का परिपोप हास्य रस कहलाता है। इस हास्य रस की तीन महतियो तीन भेद होखे दें। अपने विकृत वैष, मापा मादि को, या दूसरे के विकत वेष, भाषा, सादि को देख कर, मरिमावों के द्वारा जनित स्पायी मार दास, ना परियट होता है, तो हास्य रस देता है। यह दास्य रस उत्तम, मध्यम तथा अपम इन तीन प्रातियों के आधार पर वक्ष्यमाण छ रूप वाला होता है। मात्मस्पो यथा रावण:- 'जात में पपेण भस्गरजसा तचन्दनोचूलन हारो वक्षसि यज्ञसूत्रमुचित विला जटाः कुन्तलाः । रुदासः सफलैः सरावलयं चित्रांशु वल्कल सौतालोचनहारि कल्पितमहो रम्य वपुः कामिनः ।। बारमस्य पैपादि का विकार देख कर उत्पन्न दास्य, वैसे रावण की इस उक्ति में- मेरे शरीर पर लगी इस कठोर भस्म से चन्दन की भूषा की गई है। यह वपस्वी का पाना-यशोपवीत-स्पद पर कार का काम कर रहा है। ये उलझी हुई लम्बी जटाएं कोमल कुन्तल है । न सारे रुद्राक्षो से शरीर पर रहों के कड़ों की तुलना की जा सकती है, सथा यह वल्कल वम इन्दर रेशमी गस बना हुआ है। सौता के क्षेत्रों का मात्र करने शाका किनारा घन्वा रही (काम सम्बन्धी) मी शाषण ने (ग) मना ख्यिा है। जिस तरह कोई कामी किसी रमणी को बार करने के लिए सदर येषमा धारण करता है, टीक वैसे ही मैने इस संन्यासी के वेप को बना रखा है।
दशरूपकम् । A परस्यो यथा-- 'मिक्षो मांसनिपेवणं प्रकुरुपे ! किं तेन मयं गिना कि ते मद्यमपि प्रियम् ! प्रियमहो वारदानाभिः सह । वेश्या द्रन्यरुचिः फुतस्तक्धनम् ! एतेग चौर्यग वा चौर्यदूतपरिग्रहोऽपि भवतो ! नष्टस्य काऽन्या गतिः ।। किसी दूसरे व्यक्ति के नाफार आदि के विकार को देख कर उत्पन्न हास्य, नेसे निम्न पथ में- मिक क्या तुम मांस का सेवन करते हो तो फिर तुम्हारे मप के रिना फेसे काम चलता होगा! क्या तुम्हे मदिरा भी प्यारी है। पर मदिरा तो वेश्याओं के सम्पर्क होने पर ही अच्छी लगती है। वेश्याएँ तो पैसे को प्यार करती है, धन के प्रति आसक्त रहती है, तुम नापडङ्ग भिखारी के पास पैसा कहाँ से आता है। पैसा तुम्हारे पास या तो जुएँ से पा सकता है, या चोरी से, तुम कोई औविकोपार्जन का कार्य, व्यवसायादि तो करते नहीं। तुम जैसे भिक्षुक को भी चोरी, जुमारी का व्यतन क्या! एक बार (समाज तपा माचरण से) नष्ट व्यक्ति के पास दूसरा चारा ही क्या है। (इस पप में प्रश्नोतर को एक ही व्यक्ति का माना जा सकता है, या फिर प्रश्न किसी दूसरे का, और उत्तर भिक्षुक का स्वयं का।) स्मितमिह चिकासिनयनम् , किञ्चिलदयरिजंतु सितं स्यात् । मधुरस्वरं चिहलितम् , सशिरकम्पमिदमुपहसितम् ॥६॥ अपहसितं साक्षातम् , विक्षिप्ताङ्गं भवत्यतिदसितम् । दे दे दसिवे चैपा ज्येष्ठे मध्येऽधमे क्रमशः ॥ ७७॥ उत्तमस्य स्वपरस्यविकारदर्शनात् स्मितहसिते, मध्यमस्य विहसितो-पहसिते, अधमस्याऽपहसितातिहसिते । उदाहतयः स्वयमुत्पेक्ष्याः। यह हास्य तीन प्रकृतियों के अनुसार प तरह का होता है। स्मित हास्य यह है,जहाँ प्राली मेन ही विकसित हो । इसित वह है, जहाँ दाँत कुछ कुछ नजर आ जाय। मधुर स्वर में हँसना विहसित कहलाता है, तथा सिर को हिलाकर हँसना उपहसित होता है। अतों में खास भर आवें, इस तरह हँसना अपहसित होता है, तथा अङ्गों को फेंक महंसना पतिहसित कहलाता है। इनमें दो दो प्रकार के हसित क्रमश ज्येष्ठ, मध्यम तथा अधम प्रकृति के होते हैं। अपने व दूसरे के विकार को देखकर स्मित व इसित होना उत्तम दारय है, विसित तथा उपरसित होना मध्यम है, वथा अपहसित या अतिदसित होना मधम । उदाहरण अपने भाप समझे जा सकते है। व्यभिचारिणयास्य- निद्रालस्यथमग्लानिमूर्खाध सहचारिणः (ध्यभिचारिणः । इस हास्य रस के म्यमिचारी निम्न है- निदा, बालस्य, मम, हानि क्या मूर्धा पे म्यमिधारी भाव हास स्थायी भाव केसार हैं। . r चतुर्यः पाराः भपाहता- अतिलोकी पदार्थ: स्याविरमयारमा रसोऽदभुतः ॥७॥ कर्मास्य साधुवादाचवेषयुरवेदगादा। शपायेगपतिमाया भवन्ति व्यभिचारिणः ॥ ७ ॥ लोकगीमातितरदायवर्णनादिरिमारितः यादानुगारपरिष्टो गियर स्थायिभारो हपविगादिमादितो रसोऽहतः । यया- 'दोईण्टाधितचन्द्रशेखरपमुण्डायगोस्त- पधारष्यनिराधालयरितप्रस्तारमादिधिमः ! दापर्यताकपालसम्पुटमिलनाडभागोदर- माम्यत्पिण्डितयाम्डिमा कपमसौ नाथापि विधाम्यति ।।" इत्यादि। (भगत रस) मौकिक पदापों के दर्शन आपणादि से बहुत रस टापस होना है, जो विस्मय गामक स्थायी माप का परिपोष है। साधुपाद (उस पदार्थ की मशंसा करना), भास् आना, कांपना, गाद हो आना, इसके अनुमाव है। अद्भुत रस में हर्ष, शायेग, एति खादिम्पभिचारी पाये जाते हैं। लोकमामा को गतिमान करने वाले मासिक पदार्थ के वन मादि से जनित, साधाद भादि मनुमारों के द्वारा परिपुष्ट दिसाय स्थायौ भादव आदि म्यमिचारियों के सहयर होने पर मयुत रस के रूप में परिणत होता है। रामचन्द्र के धनुष तौटने पर हमण वरदे हैं। अभी मी मार्य रामचन्द्र के द्वारा शिवधनुष वो तोर दिये जाने को रारम्पनि, पता, क्यों विश्रान्त नहीं हो रही है।राम ने अपने दोनो मुगलों से शिवजी के पनुष को चढ़ाकर उसे तोड़ दिया है और इससे या रसारपनि डायद पनि ऐमी प्रतीत होती है, जैसे भार्य रामचन्द्र के दालचरित्र पताना का विडियो हो-यह पनि बालक राम में हो इतना बल है, इसकी सूचना देहोस धनुष की रक्षार पनि दो कपालों के सम्पुट से घने बने हुए इस भयाण्डरूपी मा फेबीच पूमकर तथा गंज गंज कर और अधिक गम्भीर हो गई है। श्रथ मयानक:- पिस्तस्परसत्रादेर्भयभारो भयानक सर्पाहवेपथुस्वेदशोपचित्यलक्षणः।। देन्यसम्ध्रमसम्मोहन्नासादिस्तत्सहोदरः ॥ ८० ॥ रोदशब्दप्रयणादौइयत्त्वदर्शनाच्च भयस्यायिभावप्रभवो भयानको रस, तत्र सर्याश- धेपथुप्रगतयोऽनुभावा देन्यादयस्तु व्यभिचारिण। (मयानक रस) किती व्यक्ति के स्वर, शरीर, आदि का डरावनापन देकर भय नामक स्थापी भाष होता है, उसी का परिपोय मयानक रस है। इसके अनुभाव है।-सारे शरीर का १ 'वैवष्य-' इत्यपि पाठ।
२८० दशरूपकम् कापना, पसीना छूटना, मुंह सूखना, मुंह का पीला पहना, चिन्ता होना मादि। इसमें दैन्य, सम्मम, सम्मोह, प्राप्त मादि म्यभिचारी पाये जाते हैं, वे इसके सहोदर हैं। रौद्र शम्द के मुनने या रौद्र शरीर के देखने पर जनित भय स्थायीभाष से भयानक रस उत्पन होता है। इसमें शरीर का कॉपना आदि अनुभाव होते है, तथा दैन्य मादि व्यभिचारी। भयानको यथा- 'शस्त्रमैतत्समुत्सृज्य कुब्जीभ्य शनैः शनैः । यथातथागतेनैव यदि शक्रोषि गम्यताम् ॥' यथा च रखावल्या प्रागुदाहृतम्-'नष्ट वर्षवर' इत्यादि। भयानक का उदाहरण, जैसे इस पप से- इस शरू को छोड़कर, धीरे धीरे करदे की तरह दुबक कर, किसी भी तरह यहाँ से आ सको, तो तुम चले जाओ। अयदा, जैसे रत्नावली में रदर के वाजिशाला से छूटने पर मन्तपुर को मगददश वर्णन-'नष्ट वर्षपरै ' आदि जिसका उदाहरण पहले दिया जा चुका है। यथा च- 'स्वगेहास्सन्यानं तत उपचित काननमयो गिरि तस्मात्सान्द्रामगद्दनमस्मादपि गुहाम् । तदन्वज्ञान्योरभिनिविशमानो न गणय- त्यराति कालीये तब विजययानाचकितधी ।।' अथवा, जेसे इस पय में- तुम्हारी विजययात्रा से चकित इस्विाहा राव राजा डरकर घर से मार्ग पर, मार्ग से धने बहल में, यहाँ से भी पने पेड़ों से घिरे पर्वत पर, तथा पर्वत से गुफा में जाकर लिए गया है। पदा भी जाकर यह अपने भों को अहो में समेट लेने पर भी यह नहीं गिन पाता, यह नही सोच पाता, कि तुम्हारे डर से कहाँ छिपे। घर से भागते भागले पर्दन की गहन गुफा तक पहुँच जाने पर भी उसका भय नहीं मिटा , वह अभी तक भी तुम्हारेर से, कि कहीं विजययात्रा में प्रवत तुम्बारी सेना वहाँ न भी पहुँच बाय, विपने को हो सोचा करता है। श्रय करण- इएनाशादनिशाती शोकामा फरणोऽनु तम् । निश्श्यासोच्छ्वासरदितस्तम्भमलपितापः ॥ ८ ॥ स्वापापस्मारदेन्याधिमरणालस्पसम्धमाः। विषादजस्तोन्मादचिन्ताद्या व्यभिचारिणः ॥२॥ इएस्य भुप्रभृतेविनाशाद निरस्य तु बन्धनादे माझ्या शोरप्रकर्षज करण, तम- विति तदनुभावनिश्वासादिकथनम् , व्यभिचारिणय स्वापापम्मारादयः । (बरुण रस) र पस्तु के नाश पर या अमिष्ट वस्तु की प्राति पर सत्पत्र शोक स्थापी भाव की पुष्टि करुण रस है। निधाम, उष्ट्रास, हदिन, स्तम्म, प्रलपित कादि इस रस के १ 'अ' इति पालन्तरम्।
चतुर्थः प्रकाराः २८१ अनुगाय है। कश्य रस में रवाप, अपस्मार, दैन्य, आपि, मरण, भालस्य, सम्भ्रम, विपाद, जहता, उन्माद, चिन्ता आदि व्यभिचारी माप पाये जाते हैं।' te पापय मादि के नारसे, या अनिष्ट, कैद आदि की प्राप्ति होने से थोकका परिपोष करण होता है। इसमें उसमें निःश्यासादि अनुमाव तथा रवाए, अपरमार आदि म्यभिचारी माय पाये जाते है। इटमाशास्करणो यमा कुमारसमवे- 'प्रयि जोषितनाथ जीवसोत्यभिधायोत्थितया तया पुर। दशे पुण्याकृति क्षितौ हरकोपानलभस्म फैशलम् ।। इत्यादि रतिप्रलापः । भनिरालाले सागरिकाया ययमाद्यथा रक्षावस्याम् । रहनाश से उत्पन्न करुण म कुमारसम्भव के रतिविलाप में- हे स्वामी, हे प्राशनाथ, तुम जीवित तो शेन, इस तरह चिठा कर खदी गई रति ने भर सामने देखा, तो महादेव के कोषरूपी भमि से जलाई हुई पुरुष के साकार पाली भरम फी ही पृथ्वी पर पड़ा पाया, उसकी केवल राख भर दिखाई पड़ी। मनिष्ट प्रापिरो, जो रमाइली नाटिका में सागरिका के कैद हो जाने से। भीतिभक्त्यादयो:भाषा मृगयातादयो रसा। हपोत्साहादिषु स्पष्टमन्तर्भाधान कोविताः॥२३॥ स्परम् । पशिभूषणादीनि सामादोन्येकपिशतिः। लक्ष्यसंध्यन्तराण्यानि सालझारेपु तेषु च ॥८॥ 'विभूषणं चाभरसंहतिश्च शोमाभिमानौ गुणकोन २' इत्येवगादीनि पत्रिंशर (विभूषणादीनि ) कान्यलक्षणानि 'साम भेदः प्रदानं च' इत्येवमादीनि संध्यन्तराण्येक- विशतिरुपमादिवलकारेधु हर्पोत्साहादिपु चान्त वाण पृथगुप्तानि । य इति घनश्यकृतदशरूपकस्य चतुर्थः प्रकाशः समासः ।। कुछ लोग प्रीति, भकि भादि को स्थायी भाव मानते है तथा मृगया, जुओं आदि को रस मानते हैं। इनका समावेश हपं, उत्साह आदि स्थायी भावों में हो ही जाता है। अत: इनका पृयक विवेचन करना ठीक नहीं समझा गया है। काप्य के ३६ भूपोंमकार के साम, भेद आदि सन्ध्यातरों सादि का भी घसा से विवेचन या क्षण नहीं किया गया है। इसका कारण यह है कि ारपोसाहादि भायों में ही इनका भी समावेश हो जाता है। "भूषण, मारवति, शोभा, अभिमान, गुणकोसन' धादि ३६ विभूषण, श्री विकाव्य. पक्षण भी कहलाते है या साम, भेद प्रदान प्रादि २१ सन्ध्यन्तरइन दोनों का अन्तमाप १, कमसभ्यन्तराट्यानि' इत्यपि पाठः ।
[२४] १२४ पृष्ठम् २६८ ५१ २७१ ६८ ५२ २६५ ८३ १०६ १५० २७३ ६२ १५२ श्लोक किंगतेन नहि युक्त- कि धरणीए मित्रहो किमपि किमपि मन्दम् कुलबालिआए पेच्छ कृतगुरुमहदादिक्षोभ- कृतेऽप्याज्ञाभ कृशाधान्तेवासी जयति कृटा देशेषु भार्या कैलीगोताखलणे कैलासोद्धारसार- कोपात्कोमललोलपराहु- कोऽपि सिंहासनस्याधः कोपो यन चुकुटिरचनः धान्धर्यस्य मोशात् कचित्ताम्बूलाक्त क्षिप्तो हस्तावलमा सर्वप्रन्थिविमुक्तसन्धि- गमनमलसं शून्या दृष्टि चभुलुप्तमपीकणम् चचगुजभ्रमितवण्डगदा चलति कयचित्रा चाणक्यनाम्ना तेनाथ चिनवर्तिन्यपि नृते चिररतिपरिखेदप्राप्तनिद्रा चूर्णिताशेषकौरव्यः - अगति जयिनस्ते ते अंकिंपि पेच्छमाणं जन्मेन्दोरमले कुले जातं मे पुरुषेण भस्म जीयन्ते जयिनोऽपि शातिप्रीतिर्मनसि न कृता ज्वलतु गगने रात्रौ रात्री पेउरकोडिविलग्गं तं वीक्ष्य घेपथुमतो विन वर्ण ते च्चे तत उदयगिरेरिषक एव सतवाभिज्ञाय तथा मीनाविधेयापि दवितपमवादीयेन्मम तनुत्राणं तनुपाणं सवास्मिगीतरागे सहमति से पभत्ता २०३ २७३ १३४ २५६ २२,५६ २.. ७२ १२६ १९८ ग्लोक पृष्टम् तह दिल्लं तह मणि तां प्राङ्मुखीं तत्र निवेश्य १२१ ताव चित्र रइसमए तावन्तस्ते महात्मान' १८८ तिष्ठन्भाति पितुः पुरः ७९ तीर्णे भीष्ममहोदधौ तीव्र स्मरसंताप तीवाभिपाप्रभवेन तेनोदितं वदति याति १२४ त्यत्रत्वोत्थितः सरमसम् त्यागः सशसमुद्रमुद्रितमही- वय्यानाता यस्तवायम् यस्यन्ती चलशफरी १९१ प्रैलोक्यैश्वर्यलक्ष्मी त्वचं वर्ण: शिबिर्मासम् त्वं जीवितत्वमसि मे त्वं ब्रह्मवचेसघर: २७६ दाक्षियं नाम विम्योष्ठि ११६ दिश्रहं खु दुक्खिाए १२३ दीर्घाझं शरदिन्दुकान्ति दुःशासनस्य हृदयक्षतजा दुलहजणासुराश्रो लमा दूरावीयो धरणीधराभम् दृष्टिं हे प्रतिवेशिनि १०८ दृष्टिः सालसतां विभर्ति ९७११९ दृष्टिस्तृणीरतजगमयसत्त्वसारा दृष्ट्रकासनसंस्थिते प्रियतमे १०७, १३४ देमा पसिथ गिअन्तसु देव्या मद्वचनाद्यथा देव वर्पत्यशनपवन- २०३ देशरन्तरिता शतष २६९ दोर्दण्डाश्चितचन्द्रशेखर २७९ द्रक्ष्यन्ति न चिरात्सुप्तम् द्वीपादन्यस्मादपि १२,१७,१४४ धृतायुषो यावदहम् न खलु षयममुष्य न च मेश्वगच्छति यथा ११५ न जाने संमुसायाते मन्वेष राक्षसपतेः स्पलितः न पन्दिता साहसिकाः न मध्ये संस्कारम् नम्जलधर सनसोध्यम् २५ २५६ १२. ४९ २७७ ४८ १२४ २६७ १२० ७८ २०७ १३२ २०१ १४५ ११.
पृष्ठम् नबरखपदमारम् 11३,१७४, २६५ नष्टं वर्षवरमनुष्यगणना १३८ नान्दीपदानि रतिनाट: १२७ निवासा बदन दहन्ति ११३ निजपाणिपक्षवतटस्खलनात् निदाघमीलिताशी निर्मग्नेन मयाऽम्भसि २६४ निर्वाणवैरिवहनाः १४७ ननं तेनाय धीरेण ५१ न्यकारी हयमेव में गदरया १८४ पदमाममथिताथुरिन्दु- पञ्चाना गन्यसेकम्- पटालाने पत्यो नमयति १९८ पणकुविधाण दोइदि २६३ पत्य शिरपन्द्रकलामनेन १३१ परिव्युतस्तस्कुचकुम्भमध्यात् ३२ परिदियगृपीणामेप ३४ पशुपतिरपि तान्यहानि २.८ पादाहन भूमिम् १२८ पिनोविधातुं शुश्रूषाम् पुण्या माझणजातिः ८३ पुरस्तन्च्या गोत्रस्खलन १९२ पूर्वन्तो रालिलेन पौलस्त्पपीनभुजसंपदु २०२ प्रणयकुपितां दृष्दा देवीम् १७३, १७४, २६३, २६५ प्रणयविशद इष्टिं वक्ने प्रयमजनिते बाला मन्यौ ८ प्रयत्नपरिघोषितः ४१ प्रसीदत्यालोके किमपि प्रसीदेति यामिदमसति प्रहरकमपनीय १९७ प्रहरविरती मध्येवाहा प्राप्ताः त्रियः सकलकाम १८३ माता फयमपि दैवात् ३२ प्राप्य मन्मयरसादति १८७ प्रायवितंचरिष्यामि १९४,९३ प्रारम्यौ तपनका २०१ लोक माह्मणातिकमत्यागः ८३, १९४ भूत मूतनकूष्माण्ड- मम पम्मिअधीसद्धो २२८ मिक्षो मोसनिऐवणम् २७८ मुक्ता दि मया गिरयः १५६ भूमौ क्षिप्या शरीम् सूयः परिभवशान्ति- भूयो भूयः सविधनगरी- भूभने सइसोद्गता १२३ मखशवपरिपूर्व गोत्र- मज्म पटणा एसा गतानो कुसुमरसेन १५१ मध्नामि कौरवशर्त समरे मधु द्विरेफः फुसुमैकपात्रे २२५ मध्याई गमय स्यन श्रमजलम् १३२ मन्यायस्तार्णवाम्भः मनोजातिरनाधीनों १४९ महु एदि कि शिवालय ११८ मा गर्वमुखह कपोलतले 1૧૨ मातः के गुपये निधाय १२६ मात्सर्यमुत्सार्य विचार्य २१२ मुनिरयमय बोरस्तादशः १५३ मुक्षक सामलि दोई १८२ मुगुपहसितामिवालिनाद मृगरूपपरित्यज्य मृगशिशुशस्तस्याः ११७ मेदश्छेदकशोदरं लघु मनाकः किमयं रुणद्धि यत्सत्यप्रतमभीकमनसा यदि पररणा न क्षम्यो १९२ यद्ब्रह्मवादिमिरूपासित- यद्यत्प्रयोगविपये यद्विस्मयस्तिमितम् यातु यातु किसनेन १०२ यातो विक्रमवाहुरात्म- ६१ मातोऽस्मि पानयने यान्त्या मुहुर्वलितकन्धर- युम्मच्छासनलहनाम्गसि ८० १९३ प्रारभ्यतेन सनु प्रारम्भेऽस्मिन्स्वामिनः १३, १४, १५ बाले नाथ विमुच्च १.१ पाशेर्पजन विदितम् में चत्वारो दिनकर- येनाल मुखानि ये वाहवो न पुषि मोगानन्दयमा श्रेषे ४७ १८४