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Brahd Khatrgan Panchpratikrmnasutrarth Taha16 Estrotsutrarth

Malak, Premchand Amarchand · 2009/11

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Printed by R. Y. Shedge, at the N. S. Press, 23, Kolbhat Lane,
Kalbadevi Road, Bombay.
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Published by Premchand Amarchand, Bikaner,
Martyar, Rangadi,

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WHAT
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॥ विज्ञापन ॥ विदितरहै श्रीभगवान महावीर स्वामीके ११ गणधरोंका नवगच्छ हुआ सामाचारी सवोंकी एकथी इसतरे सुधर्मा खामीसें पट्टप्रवाह चला, वाद जो जो आचार्योंकै नामसे गच्छ अलग २ होते गये लेकिन सामाचारी में फरक नहीं था वह गच्छोंकै नाम कल्प- सूत्रमैं लिखे हुये हैं कालदोपसे वह गच्छ लुप्त होगये मूल सुधर्मा खामीकी पट्टपरंपरामें त्यागी वैरागी आत्मार्थी ज्ञानगम्भित क्रियावंत श्रीउद्योतनसूरिः एक प्रभावीक आचार्य विक्रमसंवत् हजार सरू प्रवेशसमय विचरते थे उनोंके निजशिष्य वर्धमान और वाकी ८३ स्थविरोंके शिष्य गुरु पास विद्याध्ययन करते थे, किसी उत्तम समयमैं धर्मका विशेष उद्योग करणे गुरूनें सिद्धवडके नीचे एक निज शिष्य ८३ विद्यार्थियों एवं ८४ शिष्योंको सूरिमंत्र दे के आचार्यपद दिया वर्द्धमानसूरिः निज शिष्यके शिष्य जिनेश्वर- सूरिने उपकेशरिगच्छी आदिक पार्श्वनाथके शंतानी तथा और सब चैत्य द्रव्यभक्षक शिथलाचारी असंजतियोंकों ज्ञानयुक्त उग्र क्रियासें शास्त्रार्थमैं जिनाज्ञा विरुद्धता उनोंका कर्तव्य सिद्ध किया विक्रम संवत् एक हजार अस्सीकी शालमै अणहिलपाटणमैं दुर्लभ राजाकै समक्ष, तब राजानें इनोंका सिद्धांत शुद्धज्ञान और कठिन क्रिया देख कहा, गुरु खरतर हो, खर कहते क्रिया और ज्ञानसैं करडे, तर कहते जादा करके, अथवा खआकाशे, रकहते, रमंति, तर अतिशयेन, इतिखरतर, सूर्यकीतरे ज्ञानक्रियासैं, विशेष देदीप्यमान, इसवास्ते खरतर विरुद दिया, तेसै लोकभाषासें कहा तमें खराछो, चैत्यवासियोंको कहा तमेकुंअलाछो, इसतरे बृहद्गच्छ पदधारियोंकों खरतर विरुद मिला उस वख्त उनोंकै सवसंघनें चैत्यवासियोंका गच्छ छोडदिया १७ गोत्र जिनेश्वर सूरिः के उपासक भये, फक्त एक गोत्र उनोंकों मानते रहै तव चैत्यवासीकेइयक सावधान होकर श्रावकोंको अपणी ममतामें फसाणे कहणे लगे जिनेश्वर जो तुमकों कहगयाहैकै महावीरदेवके ६ कल्याणक कल्पसूत्र में लिखाहै, तथा, पंच हत्थुत्तरेहोत्था साइणा परि निव्वुएभयवं, यह तो जैसा लेख कल्याणकका वाचक नहीं किंतु यह पांच वस्तु उत्तरा फाल्गुणीमें हुयेहें इनकों पांच वस्तु सूत्रकार भद्रबाहूखामीनें कहाहै, ऐसाही पाठ जंबूद्वीप पन्नत्तीसूत्र में लिखाहै, यथा, उस मेणं अरहा कोसलिए पंचउत्तरा- साढे अभी इछठेहोत्यत्ति, तो ऋषभदेव खामीका राज्याभिषेक कल्याणक इस अपेक्षा ठहरताहै तो उस राज्याभिषेक कल्याणकका उपवास पोसह प्रमुखक्रिया जिनेश्वरनें तुमैं क्यों नहीं बतलाई इसवास्ते जिनेश्वरका पक्ष झूठाहै यह गर्भापहार तो निंदनीक कार्य छिपाणेलायक है इत्यादिक कुयुक्तियें लगाणेसैं केइयक अल्पज्ञ भोले गृहस्थी फेर इनों २ शिथलाचारियोंसे परिचय करणे लगे, जिनेश्वरसूरिः मालवदेशमैं विचरतेरहै इसवास्ते चैत्यवासियोंका दाव लगा ज्ञानवंत दृढसम्यक्तवंततो, इनकुयुक्तियोंसे सर्वथा डिगे नहीं, औसैं धीरे २ शिथलाचारी फैलणेलगे, जिनेश्वरसूरिः के पट्ट जिनचंद्रसूरिः भये जिनोंने संवेग रंगशालादिक अनेक ग्रंथ बणाये इसमें शिथलाचार निषेधक अनेक उपदेश किया इनोंके गुरुभाई श्रीअभयदेवसूरि इनोंके पट्टपरस्थापनभये इनोंनैं नवांगीवृत्ति, तथा आगम अठ्ठोत्तरी, जयतिहुअण ३२ स्तोत्र इत्यादि अनेक ग्रंथ रचै इनोंक जिनवल्लभ- सुरिः पट्टविराजै तब जगे २ चैत्यवासी पूर्वोक्त हठवादके प्रपंचसैं जोरसोर मचाया तव श्रीजिनवल्लभसूरिः नैं इनोंका शठा कदा ग्रह मिटाणे इनोंकों इसतरे निरुत्तर किये, यथा, भो भो पक्षपातियों जोजंबूद्वीपपन्नत्तीका लेख है सो हमकों मंतव्य है लेकिन अबल तो राज्याभिषेकका दिन कोणसाहै सो उस दिन पचख्खाण पोसा कियाजाय, और पोसहमैं चिंतन क्या किया जावेगा राज्यसंबंधी रथ, घोडे, हस्ती सेन्या सुभट युद्ध तोप बंदूक अस्त्र शस्त्र किसी कसूर दारकों ताडना बधबंधन बेडी डालना इत्यादिकही विचार कर्मवं- धनका हेतु आरंभकाही ध्यान होणेसैं कहो बिवेकविकलो भव्य जीवोंके कोनसा कल्याणका कारण होगा सो व्रत पञ्चखाण पोसह किस अपेक्षा भव्यजीव किस तिथीकों करै सो बतलावो और कल्पसूत्रके पाठके लिखे गर्भापहार तो भव्य जीवोंके कल्याणका हेतु है अबल तो गर्भापहारकी तिथी प्रगट है दुसरे सूत्रकारने तीन २ वखत दृढा २ कर ये पाठ लिखा है गर्भमें आये बाद ८३ मैं दिन इंद्रके हुक्मसैं गर्भापहार कल्याणक हुआ इसमें व्रत पच्चखाण पोसहमें जैसा चिंतन भव्यजीव करसकताहै हे जीव तीन लोकके नाथ तरणतारणभी कर्मोंके उदयसै जातिमद गोत्रमदके करणेसैं भिक्षाचर कुलमैं आकै पैदा भये इसवास्ते मेरे जैसे जीवकी तो बुन्यादही क्याहै तब वह इत्यादि ध्यानसैं कल्याणताकों प्राप्त होताहै इस न्यायगर्भापहार निश्चै कल्याणकारी होणेसैं कल्याणकहै अगर तुम उत्तराफाल्गुनी नक्षत्रमें भये ५ कल्याणकोंको ५. वस्तु कहते हो - गर्भापहार कल्याणकको निषेध करणे तो इस मैं तो वह दृष्टांत तुमारेमैं साबत होताहै यथा जैसे चोबेजी छच्चेजीवणणेकों चले आगे जाते दुव्बेलोकोंकै जजमानोंकैः क्षेत्र आगया, अब चोबेजी, घर २ प्रति जैयमुनामइयाकी जैदाऊदयालकी, जजमान चकानचक्की घुटवादे, करते फिरे जजमानोंने पूछा आप कोनसै ब्रायनहो, चोबेजी बोले चोबा, जजमान बोले, दुवे सिवाय ब्राह्मण होतेई नहीं अब जहां जिसके घरजावै उहां यही वात तब चोबेजी मारे भूखके, फिरते. २ थकगये तब बोले अरे सारे हम तो दुबेही थे, लेकिन मेरी भूआरांडने भूखसैं मरावेकों चोबा २. नाम धरदिया, हमभी इसीवास्ते तुमे चोवा बतला दिया, दुवेही समझ या पेटकी लाय तो बुझा, तब आटा दाल घी सक्कर भरपूर उसने दिया इसतरे दुवेवण २ खूबमालघर २ सैं चखते रहै एक दिन ३ कोई मथुराका बणिया उसही वस्तीमैं किसी व्यापारकेवास्ते चला आया चोबेकों पहचानके बोला अजी चोवेजी तुम तो छव्वेजीवणने गयाजी आयेथे इहां तो उलटे घरकेही दोय खोवैठे तव चोवा बोला अरे वणिये चूलेमें परो चोबा चूलेमें गिरो छन्वा चकानचक्की कराणे तो दुबाही अच्छा वह हाल तुमारा है एक गर्भापहारकों निषेधणेकों च्यवन १ जन्म २ दीक्षा ३ ज्ञान ४ जो जो कल्याणक तुमारे पूर्वाचार्य तथा समस्त जैनसंघ अनादिकालसैं मानते चले आये सो इस पेटभराईके ख्यालमैं चोवे जी मुजव निजमतव्यसै जिनाज्ञा भंगकर और मूल सद्दर्शन सद्ज्ञान दोनोंही खोवैठे चैत्यवासी होणेसै चारित्रका तो लेशभी नहीं था, तब जिज्ञासूनैं पूछा भो गुरू, शिथिलाचारी, चैत्यवासी, ये दोनों सदृशहै या कुछ फरक है, गुरूनें कहा शिथलाचारी अनंत शंशार नहीं रुलता लेकिन चैत्यद्रव्यभक्षक चैत्यवासी अनंत संसारी होताहै, फेर हे विवेक विकलो तुम प्ररूपणा करतेहो गर्भापहार, निंदनीक कार्यहै जिसकू कल्याणक नहीं मानना, अरे तत्वबुद्धिरहित पक्षपातियो जरा जिनाज्ञाकाकोप रखो, अगर गर्भापहार निंदनीककार्य होता तो क्षायकसम्यक्तवंत सूर्याभदेवता भगवान महावीर प्रभूके समवसरणमैं गणधर साधु साध्विये श्रावक श्राविकायें इंद्रादिक देवते इंद्राणीप्रमुख देवियें नरपतियोंके सामने भक्तिपूर्वक ३२ बद्धका नाटककरता गर्भापहार नाटक करकै दिखायाहै देख रायप्रश्नी उपांग इस अपेक्षाकू विचार अगर कल्याणक न होता निंदनीक होता तो १२ पर्पदाकै समक्ष ये गर्भापहारनाटक परमसम्यक्ती सूर्याभदेव कैसे कर दिखाता, इसवास्ते गर्भापहार कल्याणक न माननेसँ उत्सूत्रभाषकपणा सिद्ध होताहै तुम अपणा पक्षमैं ग्रहस्थोंको करणे सूत्रसैं विरुद्ध प्ररूपणा करतेहो इसवास्ते मैं भुजा ठोककर तुमैं समझाताहूं कै गौतमादिक गणधर श्रुतकेवली जो पाटानुपाट गर्भापहार कल्याणक मानते प्ररूपते चलेआये जिसकों क्यों स्वकपोलकल्पित कुयुक्ति- योंसे सूत्रपाठ विराधते हो इत्यादिक अनेक शुद्ध जिनवचनानुसार समझाणेसे अनेक भव्यजीव समझकर शुद्धश्रद्धानपर थिर हुये इनके पट्टपर श्रीजिनदत्तसूरिः हुये जिनोंने अपणे गुरूकी स्तुतिमैं लिखाहै हे गुरु ये अपूर्वमहिमा आपकीहै सो जो सूत्रविरुद्ध प्ररूपणा करणेवाले द्रव्यलिंगिये गर्भापहारका कल्याणक नहीं माननेवालोंकों नहीं दृष्टिगोचर हुवा असा जो सूत्रपाठ सो आप देखकै उनोंकै वास्ते प्रगटकर दिखाया आचारांगकी टीकामें पांच उत्तराफाल्गुनीमै हुये खातीमें निर्वाण पाये जैसा लिखाहै लेकिन् ५ वस्तु हुआ जैसा नहीं लिखाहै बाकीके ४ को कल्याणक कहै तो ५ मां कल्याणक खतःसिद्ध हो चूका, श्रीहरिभद्रसूरिरचित यात्रापंचासककी टीकामैं भी अभयदेवसूरि टीका करते सामान्य कथनसैं ५ कल्याणक दिखायाहै विशेष कथन उहां नहीं कराहै अगर प्रतिपक्षी जैसा कहेंगेकी अभयदेवसूरिने गर्भापहारका दिन क्यों नहीं c. N लिखा गर्भापहार कल्याणक होता तो दिनभी लिखते, अहो प्रतिपक्षियो, जब कल्प- सूत्रके मूलपाठसैं गर्भमें आयेवाद ८३ मां दिनगर्भापहारका लिखदियाहै इससे तिथि प्रगट सिद्धहै आसाढ सुदि ६ गर्भमें अवतरै तव आश्विनसुदि १३ तेरस गर्भापहार कल्याणक तिथी हुईया नहीं जो तुम यात्रापंचासककी टीकामै गर्भापहारका दिन नहीं लिखणेसैं क्या गर्भापहार आश्विनवदि १३ को नहीं मानोगे तिथी नहीं लिखणेसे कल्याणक नहीं मानोगेतो जैसे तो बहुतसैं लेखसूत्रोंमेंही नहींहै साधूपाणी रातकों कितना वजनमुजब रखै और संवेगी सबसाधू विद्यमान कालमैंभी रखतेहैं उपाशकदशा- सूत्रमें आनंदजीकै १२ कोटि सोनइये नगदीका वयानहै तो स्त्रीके गहना अणघटित सोना वासण बरतन प्रमुख उसके घरमैं थाया नहीं निशीतसूत्रमें वेप्रमाण ओघा रखणेवालेकों डंड लिखाहै लेकिन प्रमाण विलकूल लिखा नहीं तो फेर ओधेकी डंडी किस प्रमाण रखणेमैं आतीहै प्रवचन सारोद्धार पीछे वणाहै ओघे डांडेके मोगरा किस शास्त्रमैं लिखाहै पातरोंके किसमुजवरंग लगातेहो ये किस शास्त्रमें लिखाहै आनंदजीके ४० हजार गऊथी, कामदेवजीके ८० हजार वतलावो वछावछी होताथा उसकूँ रखेतो व्रतभंग वेचे तो कर्मादान लगे इत्यादि लेख शास्त्रोमैं हजारों नहींहै तो क्या मानोंगे नहीं गर्भापहारका दिन जब कल्पसूत्रमें लिखा मौजूदहै तो फेर जैसे उलटे प्ररूपककों क्या समझना सो वुद्धिवान् विचार सकतेहैं, तपगच्छके, कुलमंडणसूरिः अपणे वनाये ग्रंथमैं छकल्याणक महावीरदेवके मंजूर कियाहै वृहद्गच्छ खरतर इसकी सामाचारी आगमानुसार देखके परपक्षियोंने संवत् सोलेसेमैं अपणा सिक्का अलग जमानेकू किसीअकने सामाचारी भिन्न करकै ३० बोल कुछकेकुछ लिखडाला उनोंके आचार्योंनें खराव समझा तव वह चला नहीं, लेकिन किसी जगे उस १ का लिखा ग्रंथ रहगया, वह आधुनिक एकनें उसकों विधिमैं प्रकाशकर शुद्धसामाचारी ८४ गच्छकी एकथी उसमें भिन्न सामाचारी प्रगटकर जिनप्रतिमा निंदकमतकों छोड जिन- प्रतिमा कबूल तो करा लेकिन गुरुकुलवाससैं गीतार्थगुरुसैं आगम नहीं पढणेसैं और पिछले मतका मिथ्यात्व वासना रहणेसैं सोरठदेश शचुंजय तीर्थाधिराज जैसी भूमिकोंभी अनार्यदेशकी प्ररूपणाकरी, चतुर्दसीका विलकुल क्षय होणेसें १३ जो दर्शनतिथी, उसमें चारित्रतिथीकी क्रिया, उपवास, पोसह, पक्षीका ‘कर्त्तव्यमी करणासरूकरा, भोलेजीवोंने कबूल करलिया, लिखणेका तात्पर्य यह है की विवेकी जीवोंने कदा ग्रह छोड जिनाज्ञामुजव खरतरकी सामाचारी जाण कै इसकी क्रिया अनुष्ठान आचरण करणा देवचंद्रजी उपाध्याय जस विजयजी विक्रमसंवत् सतरे मैं कदा ग्रह मिटाणेका प्रयत्न करा था नवपदजीकी पूजामैं खरतर तपा दोनों रचित एकजगे करकै पढणा , ५ , संघमैं सरू करा दिया, थोडी भिन्नता विजयसेनसूरिःजी पूर्वोक्त कदाग्रही ग्रथं से जो पूर्वोक्त ३० बोलोंमेंसैं गुजरातमैं सरूकीथी, उसकू मिटाय, खरतर तपोंकों, सामा- चारीसें एककर देणा विचारा, लेकिन् आयुष्य दोनोंका पूर्ण होगया, अबभी समया- नुसार दोनों गीतार्थ मिलकै अकता. करसकतेहैं, मुक्ति पहुंचणे, दोनों साधुओनें स्त्री परिग्रह छोडाहै, भेदभाव मिटाणा आत्मार्थियोंकों कामहै, इस एकतासे, धर्मकी निश्चै- वृद्धि होगी, तपागच्छी कहतेहैं जिनवल्लभसूरिस्ने ६ कल्याणक, महावीर प्रभूके प्ररूपे, खरतर गच्छवाले कहतेहैं गणधरोंसेंही षट्कल्याणककी प्ररूपणा चली आतीहै, जिसकों चैत्यवासी शिथिलाचारियोंने उत्थापकर ५ की प्ररूपणा करी, उनोंमुजब ही धर्मसागरजी उपाध्याय विजयदानसूरिः जीके चेले. ३० बोलोंमें, ६ कल्याणकभी उत्थाप दिया, कुमतिकुद्दाल नामका ग्रंथ वणाया, औष्ट्रिक वगेरे अपशब्दोंकी वृष्टि करी, इससे पहिले तपगच्छका कोईभी ग्रंथ खरतर गच्छसैं भिन्न सामाचारीके कदा ग्रहका नहींहै, तब श्रीजिनचंद्रसूरिः पाटणमैं, सब वर्तमान उस वक्तके गीतार्थ आचार्य उपाध्याय, वाचक, पन्यासोंकों, एकठेकर, सभामैं धर्मसागरजीकों बुलाया, सब आये, धर्मसागरजी नहीं आये, तब ये बात, हीरविजयसूरि जीनें सुणी, और विजयदानसूरिःजीकों लिखा, विजयदानसूरिः मेडतानग्रमैं, जो प्रतियें इस कुमतिकुद्दाल ग्रंथकी पाई, सब जलशरण करदी, लेकिन कोई प्रति किसी जगे रहगई, ये वात सुण हीरविजयसूरिने, अपणे संघमैं, हुक्मनामा जारी किया, उसमें ७ हुक्महै, ये पत्र तो विकानेरवडे उपासरेके भंडारमै अभी मौजूदहैं, उसमें खरतर गच्छकों अपणे मंतव्यमुजव जिनाज्ञामुजव लिखाहै, आजकलकै ग्रंथभाषामैं बणाकै छपाणेवालों. जो जिनवल्लभसूरिः श्रीजिनदत्त- सूरिकों अपशब्द लिखा, तो फेर उन लिखणेवालोंकी पोलभी, केई २ पंडितोंनें खोलणेमैं कमी नहीं रखीहै, रैलिक इत्यादि, खरतर तपा दोनों पूर्वाचार्योंके रचै ग्रंथ दोनोंही गच्छवाले, वांचतेहैं, अगर अकता नहीं होती तो सभामैं, पढके कैसे सुणाते, घस अकता करणाही श्रेयहै. कोई आजकल ऐसाभी कहतेहैं साधवी व्याख्यान सर्वथा नहीं करे, ये कहणाभी असंगतहै, सूत्रोंमें साध्वियोंकों, इज्ञारे अंगोंकी पढणेवालियां फरमाईहै, व्याख्यान, साधवी, श्रावक, श्राविका, दोनों उपस्थितमैं, करसकतीहै, फक्त श्रावकोंकेसन्मुख नहीं करसक्ती, इसवावत तपागच्छी सेनप्रश्नमैं इसतरे लिखाहै. तथा साध्वी श्राद्धानामग्रे व्याख्यानं न करोतीत्यक्षराणि कुत्र ग्रंथेसंतीति, अत्र दशवैका- लिकवृत्ति प्रमुखग्रंथमध्ये, यतिः केवलश्राद्धीसभाग्रे, व्याख्यानं न करोति, रागहेतुत्वादि- - प्रति०२ ६ , , त्युक्तमस्ति, तदनुसारेण सांव्यपि केवलश्राद्धसभाग्रे व्याख्यानं न करोति, रांगहेतुत्वा- दिति ज्ञायते, इति ॥ १३॥ केईयक ऐसाभी कहतेहैं जो ग्रहस्थ १२ व्रतधारी नहींहै उनोंने प्रतिक्रमण क्यों करणा क्योंके प्रतिक्रमण तो व्रतोंमें अतीचार लगे, उसकू करणा योग्यहै, उत्तर, हे महोदय, जैसे सरकारी सेनाके सिपाही, कवायत, प्रेट, विकट, करते हैं, इसकारणकों समझो, ये करणा, उस आगामी कार्यसिद्धिकेवास्तेहै, जो व्यवहार साधेगा, वह किसी- नकिसीदिन, काललब्धिसैं, निश्चय आवश्यकका फलभी हासल करेगा, तैसेंही; यह प्रतिक्रमणकू, आवश्यक कहाहै, यदवश्यक्रियते तदावश्यकं, जो अवश्य करणा उसकूँ आवश्यक कहतेहैं, हमारे जैनसंघमैं, इस आवश्यकका अर्थ जाणनेवाले स्वल्पहै, केवलसूत्रोच्चारणमात्र, प्रतिक्रमण करते हैं, उनोंकों, फक्त द्रव्यआवश्यक समझणा, भावप्रतिक्रमण जवही सिद्ध होगा की, जब यह प्रतिक्रमणसूत्रके उच्चारतेसमय, अर्थोंपर लक्ष देतेरहेंगे, इसवास्ते मेनें, अर्थयुक्त छपानेका प्रयत्न कियाहै, विस्ताररुचिवाले कहैगैंकी संक्षेप अर्थ लिखाहै, सच्चहै, विस्तारअर्थनीचे लिखाजाणेसें, सूत्रका मूलअर्थ, अल्पज्ञोंके, समझमैं, आणा मुस्कल था, इसवास्ते सूत्रार्थही, अबोधिजीवोंके,बोधकेवास्ते लिखाहै, संक्षेपजाणेवाद, विस्तारार्थ जाणना सुलभ होगा, दूसरा आजकल जैनसंप्रदाईयोंका, खयालत, यहभी बहोतहै, इसपुस्तकके दाम जादाहै, छापेका क्या, अक पोथीदीकी,झंटहजार दो हजार नकल,तइयार होजातीहै, इसमें तो, हम इतनाही, कहणाकाफी समझतेहै, गर्भवंतीकी वेदना, वंध्यास्त्री क्या समझतीहैं, जो ग्रंथ बणातेहैं, लिखतेहैं, और शुद्ध करतेहैं, वही तत्वज्ञ, इसखरूपके वेत्ताहै,दामफक्त लगीहुई रकमके, साहूकारके व्याजअदातक,लगाणा वाजबहैं, हजार पुस्तक कितनेवर्षोंसें विकेगी, विवेकीजाणसक्ते हैं सीधा छपाणेसैं, टव्वार्थ छपाणेमैं, दामडोढेलंगेहैं, मेरे. धुरमैं प्रेस नहींहै, सो सस्तादाम वणादू, गुणकग्राहक तो अपूर्वपरिश्रम देख,मन और धनसे उत्साहता दिखलातेहैं, अक मुस्त सबकोई खरीदेतो, सवाया दाम लंगाके, मैं देसक्ताई, सत्यप्रतिज्ञाहै, अन्यथा तो, कृपणोंका स्वभावहै, दिलचासो कहै, यतः नापति रत्नानिस- मुद्रजानि, परीक्षका यत्र न संति देशे, आभीरघोषे किल चंद्रकांतं, त्रिमिवराटैप्रवदंतिगोपाः,' १, अर्थ, समुद्रके पैदाभयेरत्नपूजाप्रतिष्ठा नहीं पातेहैं, परीक्षक जिस देशमैं नहींहो; आभीरदेशकेघोष निश्च चंद्रकांतरत्नका गोवालिये तीनकोडी मोल कहतेहैं, तद्वत् , अस्तु, इस अर्थके लिखणेमैं दोष रहाहोय तो विबुधजन शुद्धकर पढेगें; मुझे इस प्रतिक्रमण- सूत्रकी टीका मिली नहीं, न सब स्तोत्रोंकी, लेकिन सद्गुरु, तथा वागवरदाकी कृपासे, भाषार्थ लिखाहै, शब्दोंका अर्थ अनेकांतहै, छापेके दोषसे जो अशुद्धियां रहीहोय, तो , महाशय क्षमेंगें.

, , (छपेहुये ग्रंथोंका विज्ञापन) नूतन रत्नसागर, मजबूत कागद आगेसैं बहोत उपयोगी वस्तुयें ज्यादा जैन- धर्मका सब धर्मकर्त्तव्य इसमें लिखाहै. ५) पूजामहोदधी, ३७ पूजा गायन विधियुक्त २) वैद्यदीपक, जैनवैद्यकीका अपूर्वग्रंथ ३५ हजार इसमें देशी युनानी डाक्तरी होमियोपथी सर्वविद्या इसमें मोजूदहै यथानामा तथागुणा ५) शकुनशास्त्र, श्रीजिनदत्तसूरिरचित, इसमें दोपग्गे, चोपग्गेका शकुनफल, अंगफुरकण, गिलेरीपडन, वस्तुकीतेजीमंदी, कालसुकाल देखणा, जमीन- श्रेष्ठनेष्ट इत्यादि अनेक विवरण, राजियेका दोहा ७) महाजनमुक्तावली, अश्वपति ६७६ गोत्रउत्पत्ति महेश्वरी, अग्रवाल, श्रावगी, हूंवड इत्यादिक ४ वर्णोत्पत्ती अनेक विवरण १॥ सत्ज्ञानचिंतामणि, शोलेचाणाक्यका अर्थ मनचिंता कहणेकी शकुनावली, जैनखरोदय भाषा, 1) सिद्धमूर्ति, मुसलमान, ईसाई, कवीर, दादू, नानक, इत्यादि मतोंसें मूर्ति- सिद्ध, आर्यासामाजियोंकों उत्तर, जैनधर्म सवधर्मोंसे आदिसिद्ध दर्शायाहै, सिद्धमूर्ति भाग दूसरा, ३२ सूत्रोंके मूलपाठसैं मूर्तिपूजासिद्ध दर्शाईहै, २२।१३ पंथियोंके ७४ प्रश्नोंका उत्तर, ३२ सूत्रोंमें जो फर्कहै, वहभी दर्शायाहै, 0 ग्रहस्थ व्यवहार, संसारनीति, धर्मनीति, धन कमाणका यह ग्रंथ है, १) करुणावत्तीसी, दादागुरुकी मंत्रयुक्त गायनपूजा, मनकामनासिद्धिमंत्र . गुणविलाश २२ समुदायका, इसमें १३ पंथीयोंकों उत्तर, भावनाविलास, २४ जिनसवइया, अणगार ३२ पांचसमवायसवइया, साधूकरणी, श्रावक- करणी, और वैराज्ञउपदेशके अनेक स्तवन सामुद्रकखप्नकल्पतरु, इसमें पुरुष और स्त्रियोंके अंगके शुभाशुभफल, स्वप्ना- आताहै उसका फल, 5) (पुस्तक मिलणेका पत्ता) १ वीकानेर मारवाड उपाध्याय श्रीरामलालजीगणिःकी विद्याशाली मोहल्लारांघडी. २ मुंबई विचला भोईवाडा, श्रीचिंतामणिजीका मंदिर वैद्य,वाचक श्रीजीवणमल्लजीगणि. ३ मुंबई पायधोणी जैनमांगरोलसभा, मेघजी हीरजी बुकसेलरपास. 2. १) ..

८ खरतर वृहद्छ अर्पणपत्रिका. श्रीमन् जं. यु. प्र. भ. श्रीजिनचारित्रसूरीश्वरजी वीकानेर. श्रीमन् जं. यु. प्र. भ. श्रीजिनचंद्रसूरीश्वरजी, जयपुर. श्रीमन् जं. यु. प्र. भ. श्रीसिद्धसूरीश्वरजी, वीकानेर. श्रीमन् जं. यु. प्र. भ. श्रीजिनरत्नसूरीश्वरजी लखनेऊ. श्रीमन् जं. यु. प्र. भ. श्रीजिनफत्तेंद्रसूरीश्वरजी बालोतरा. श्रीमन् संवेगी आचार्य श्रीजिनयशसूरिः श्रीमन् संवेगी मुनिराजपंडितप्रवर श्रीकृपाचंद्रजीमुनिः संबेगी श्रीमन् पं. प्र. तिलोकसागरजीमुनिः. श्रीमन् पं. प्र. सुमतिसागरजीमुनिः मणिसागरजीमुनिः श्रीमती संवेगण साझी लक्ष्मीश्रीजी पुण्यश्रीजी सोवनश्रीजी प्रतापश्रीजी विवेकश्रीजी सिणगारश्रीजी विमलश्रीजी प्रेम- श्रीजी प्रमुखठाणे १५१ खरतरगण धर्मोपदेशक यती वर्ग १०००१ जयतु रायसाहव श्रीवद्रीदासजी राजकुमार सिंहजी रायकुमारसिंहजी कलकत्ता. सेठ श्रीमान् चांदमलजी केसरीमलजी रतलाम. सेठ श्रीमान् जीतमलजीनथमलजी, लस्कर गवालियर सेठ श्रीमान् फूलचंदजी नेमिचंदजी, फलवर्धा औरभी दादागुरुदेवकेभक्त खरतरगछानुरागी सर्वश्रीसंघके येपुस्तक में अर्पणकर्ताहूं. अगर श्रीमान मु. मदतदेतेरहेगें तो जरूर में खरतरवृहद्गच्छकी जैसी सेवा वजाताहूं क्षयोपशम मुजवदिन २ अधिक २ तर वजाता रहूंगा. आपका कृपाभिलाषी जैनधर्मोपदेशक उपाध्यायश्रीरामलालगणिः वाचक. श्रीजीवण- मल्लगणिः शिष्य पं. फूलचंद्र पं. विजयचंद्र, चि. प्रेमचंद्र चि. अमरचंद्र, वृहत्खरतर भट्टारकगच्छ वीकानेर मारवाड विद्याशाला, ये सर्व पुस्तक सरकारके अनमुजब रजिष्टरहै कोई दूसरा छापेगा तो दंड भागीहोगा.

अनुक्रमणिका. पृष्ट. ३१ नवकार मंत्र इरियावहि .... लोगस्स .... ३ ३ .... .... .... .... पृष्ट. १ज्ञानादिगुणयुतानां १ यस्या क्षेत्रंसमाश्रित्य २ परसमयतिमिरतराणं ३ अड्डाइजेसु दीवसमुद्देसु .... ४ वरकणयसंखविडुम ४ सिरिथंभणयडियपाससामिणो १२ श्री सेढीतटनितटे १२ चउकसाय १३ अर्हतोभगवंत १४ करेमिभंते पोसह १५ ठाणे कमणे चंकमणे १५ संथारा उवट्टणकी १५ जगचूडामणि उपदेशमालासिझाय १५ निस्सही २ राईसंथारागाथा १६ देसावगासी पञ्चक्खाण, अहन्नंभंते० १७ चवदे नियमगाथा १७/पचक्खाणअर्थ १८ अठारे पापस्थानक .... ३.२ ३२ ३२ ३३ ३३ ३४ ३४ ३४ ३५ ३५ ४० ४३ ४४ .... .... ४४ .... करेमिभंते भयवं दसण्णभद्दो जयतिहुअण जयउ सामिहि कम्मभूमिहि नमोत्थुणं उवसग्गहरंपासं जयवीयराय जगगुरु अरिहंतचेईयाणं.... वेयावच्चगराणं वंदणवत्तियाए संसार दावानलस्तुति पुक्खरवर दीवढे.. सिद्धाणं वुद्धाणं वांदणा अतीचारकी ८ गाथा देवसियं आलोएमि पंदित्तु अब्भुटिओमिअम्भितर आयरिय उवज्झाए इच्छामोणुसडिं नमोस्तुवर्द्धमानाय जयमहायस सुवर्णशालिनी स्तुति चतुर्वर्णाय संघाय स्तुति यासक्षेत्रगतासंति कमलदलविपुलनयना ..." ४७ .... १९ लघुशांति २० दूजथुई महीमंडणं २१ .... .... .... .... |पंचमीथुई पंचानंतक २१ एकादशीथुई अरस्यप्रव्रज्या.... २८ चतुर्दशीथुई देंद्रेकि २९ तिजयपुहत्त स्तोत्र दोसावहार द्वाश्रयी २९ भक्तामरस्तोत्र ३० कल्याणमंदिरस्तोत्र ३० बृहच्छांतिस्तोत्र ३० जिनपंजरस्तोत्रं ३१ ऋषिमडलस्तोत्र ३१ जगद्गुरुस्तोत्र ४७ ५० ५१ ५२ ५३ ५४ ५६ ५९ ७२ ८४ ૨૨ ९५ १०२ ३ .... ....

१० . दशपचरक्खाणमूल आगार संक्षा गाथा सोगन दिराणेका पञ्चक्खाण पचक्खाण पारणेकीगाथा नवग्रहमंत्र पूजाशांतिविधि पांचूंतिथियोंकाचैत्यवंदन रोहणीतपचैत्यवंदन सीमंधरजिनचैत्यवंदन सिद्धाचलचैत्यवंदन सामायकलेणेकीविधि सामायकपारणेकीविधि देवसी प्रतिक्रमणविधि राई प्रतिक्रमणविधि सद्भक्त्या चैत्यवंदन अर्थ पक्खीप्रतिक्रमणविधि चोमासी प्रतिक्रमणविधि संवत्सरी प्रतिक्रमणविधि पृष्ट. पृष्ट १०५ सीमंधरस्तवन १२३ १०७ सिद्धाचलस्तवन १२३ १०७ वडास्तवन प्रतिक्रमणमैं कहणेका.... १२३ १०७ पार्श्वनाथजीका छोटास्तवन १२४ १०७/सप्तस्मरण १२४ ११३ अठपहरी पोसहविधि,देववंदनविधि,अष्टमी,१५२ ११४ पोसह पारणविधी १५६ ११४ दिनचोपहरी पोसह विधि १५६ ११४ रातचोपहरी पोसहविधि १५७ ११४ अष्टमीथुई दशमीथुई अमावसस्तुति १५७ ११५ नपपदथुई . १५९ ११५ पर्दूपणथुई ११९ ११७ अतीचार आलोयण. : १५८ ११८ सांधुप्रतिक्रमण सूत्र. १६७ १२१ दादासाहबका स्तवन ......१७५ १२२/दादासाहबका सवइया. १.७५ १२३ प्रशस्ति १७५ ... . .... .... .. ....

१ प्रथम ग्राहक महाशय. ५ ५ १ १ १ , .५ ५ १ जं. यु.- प्र. भ. १००८ श्रीजिनचारित्रसूरिः वृहत्खरतराचार्य, साधवी श्री सोवनश्रीजी फत्तेश्रीजी सा. श्री आनंदश्रीजी श्रीकल्याणश्रीजी पं. श्री गणेशचंद्रजीमुनिः चीदाशर सा. श्री गोपालचंद्रजी वांठिया, बीकानेर. सा. श्री पेमकरणजी मरोटी, बीकानेर. साधवीश्री प्रेमश्रीजी. सा. श्री जमुनालालजी कोठारी. रायसाहब वद्रीदासजीराज कुमार रायकुमारसिंह कलकत्ता. सा. श्री धनसुखदास मेघराज लूणिया बीकानेर, सा. श्रीइश्वरदास पूनमचंद चोपडा पीकानेर. सा. श्री मानमल केसरीचंदसांड वीकानेर. सेठ श्री मंगलचंदजी शिवचंद झावक. बीकानेर. सा. श्री फूलचंद नेमचंद गुलाबचंद गोलछा फलोधी. पं. प्र. श्री पूनमचंद सुमेरमलमुनिः बीकानेर. सा. श्री सुगुणचंद्र गंगाराम वेगाणी वीकानेर. सेठ श्री पूनमचंदजी दीपचंदजी सावणसुखा वीकानेर. सा. श्री सदाराम शिखरचंद गोलछा चीकानेर. सा. श्री शिववगसजी कोचरमुंहता बीकानेर. सा. श्री पूनमचंद आनंदमल कोठारी वीकानेर. सा. श्री उंकारजी भेरूलाल माणकलाल महिंदपुर. श्रीयुत हेमकरणजी मरोटी चंद्रपुर. सा. श्रीसूरजकरणजी अभाणी बीकानेर. सा. सहकिरण मरोटी मुकाम वधनूर. सा. केसरीमल सांखला तिवरी. सा. अमोलकचंदजी चोरडीया खजवाणा. सा. चुनीलालजी छाजेड किसनगड, १ १ .१ १ १ १ १

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श्रीधर्मशीलसद्गुरुभ्यो नमः खरतरबृहद्गच्छीयसार्थपंचप्रतिक्रमणे सूत्र नमस्कारअरिहंतोंको, नमस्कारसिद्धोंकों, नमस्कारआचार्योंकों, नमोअरिहंताणं, नमोसिद्धाणं, नमोआयरिआणं, नमस्कारउपाध्यायोंकों, नमस्कारलोकमेसर्वसाधुओंकों, येपांचनमस्कार, नमोउवज्झायाणं, नमोलोएसव्वसाहूणं, एसोपंचनमोकारो सर्वपापोंकानासकरणेवाला, मंगलफरसबोंमें, प्रथमहोयमंगल, १ सव्वपावप्पणासणो, मंगलाणंचसव्वेसिं, पढमहवइमंगलं,१ चाहताहूं हेक्षमाश्रमणसाधू, वंदनाकरणे शक्तियुक्त, शरीरसेति, इच्छामिखमासमणो, चंदिउजावणिज्जाए, निसीहिआए, मस्तकसें वंदनकरताहूं,१, इच्छाकतीहूंहेभगवान्, सुखसेंरात्री, सुखसेंदिन, मत्थएणवंदामि,१, इच्छकारभगवन, सुहराइ, सुहदेवसी, सुखसेंतपस्या, शरीररोगरहित, सुखसेतीसंजमकीजात्रा, सुखसेंनिभातेहो, सुखतप, शरीरनिरावाध, सुखसंजमजात्रा सुखनिरवहोछो, है खामीआपकेसुखशाता, है खामीसुखशाता, इच्छाकरकै, आज्ञादेओ, हेभगवान्, रस्तेगमनकरते पीछाहटताहूं, इच्छाकारेण, संदिसह, भगवन्, इरियावहियंपडिकमामि, गुरुकहे पीछाहट, प्रमाणमुजव, चाहताहूं, पीछेहटना, रस्तेभेचलते (पडिक्कमह), इच्छं इच्छामि, पडिक्कमिउं, इरियावहियाए, जीवकीविराधना, जाते, आते प्राणियोंकोंदाबाहो, बीजोंकोदाबाहो, विराहणाए, गमणा, गमणे, पाणकमणे, बीयक्कमणे, गीलीवनस्पतीदावीहो, ओस, कीडीनगरा, फूलण, पाणी, मट्टी, · मकडीकाजाला, हरियकमणे, ओसा, उत्तिंग, पणग, दुग, मट्टी, मक्कड, संताणा, दावाहो, जो कोइ मेनें जीवविराधाहो, एकेंद्रीयजीव, दोइंद्रीयजीव, तीनई- संकमणे, जेमेजीवाविराहिया, एगिदिया, वेइंदिया, ...तेइंदि- .

प्रतिक्रमण. , या, , , द्रिय,. चारइंद्रियजीव, पांचइंद्रियजीव, सन्मुख़आतेहणा, धूडसेंढका, जमीनपरघसा, चरिंदिया, पंचिंदिया, अभिया, · वत्तिया, लेसिया, सामलकिया, अडाया, परितापउपजाया, ' खेदपहुंचाया, : त्रासपहुंचाया, संघाइया, संघटिया परियाविया, किलामिया, उद्दविया, एकठिकाणेसें दूसरीजगेरखा, जीवितव्यसेंरहितकिया, उसकापापमिथ्या ठाणाओठाणसंकामिया, जीवियाओववरोविया, तस्समिच्छामि हुओमेरा, उसकाफेरशुद्धिकरणेकू, प्रायश्चित्तकरणेकू, विशेषपणेशुद्धिक दुक्कडं, तस्सउत्तरीकरणेणं, पायच्छित्तकरणेणं, विसोहीकर रणेकू, शल्यरहितकरणेकू, पाप, . कर्मोंका, समस्तपणेघातकरणेकू णेणं, विसल्लीकरणेणं, पावाणं, कम्माणं, निग्घायणठाए, करताहूं कायोत्सर्ग, ये१२वातवर्जके, उंचाश्वास, नीचाश्वासलेणेसें, खासीसें, ठामिकाउसग्गं, अन्नत्थ, उससिएणं, निससिएणं, खासिएणं, छीकसे, जंभाइखाणेसें,. डकारसें, अधोवायुनिकलणेसें, चक्करआणेसें, चक्करआणेसें, पित्त छीएणं, जंभाइएणं, वायनिसग्गेणं, भमलिए, पित्त . कीमू सें, जरासाअंगहिलाणेसें, जरासा खंखारके आणेसें, मुच्छाए, सुहुमेहिंअंगसंचालेहि, सुहुमेहिं खेलसंचालेहि, जरा आंखेटमकारणचलाणेसें. इनोंकोंआदिलेकर, आगारवर्जके, .. अखंडित मुहुमेहिं दिठिसंचालेहि, एवमाइएहिं, आगारेहिं, अभग्गो, अविराधित, हुओमेरा, कायाकाउत्सर्ग, जहांतक, '. अरिहंत, भगवं अविराहिओ, 'हुजमे, काउसग्गो, · जाव, अरिहंताणं . भग तोंकों, नमस्कारकरकै, नहीमेंपारपहुंचाउं, उहांतककायाळू, . एकठिकाणे, मौनसें, वंताणं, नमुक्कारेणं, नपारेमि, तावकायं, ठाणेणं, मोणेणं ध्यानसें, आत्माकू वोसराताहूं, झाणेणं, · , अप्पाणं वोसिरामि, लोककेविषैउद्योतकारी, धर्मतीर्थककरणेवालेजिन, .. अरिहंतोंको कीर्तनकरूंगा, लोगस्सउज्जोयगरे, धम्मतित्थयरेजिणे,: अरिहंतेकित्तिइस्सं, चोवींसोकेवलीभगवान,१, ऋषभफेरअजितकोवंदू, संभवअभिनंदन, फेर, चउवीसंपिकेवली,१, उसममजिअंचवंदे, संभवमभिणंदणं, च, उडएणं, १.

प्रतिक्रमण. ३ , सुमतीकों, पद्मप्रभुकोंसुपार्थकों, जिनवरफेरचंद्रप्रमकोवंदू,२, सुविधिफेरदूस सुमइंच, पउमप्पहंसुपासं, जिणंच चंदप्पहवंदे,२, सुविहिंच' रानामपुष्पदंतकों, शीतल, श्रेयांसकों, फेरवासुपूज्यकों, विमल, अनंतफेरजिनकों, पुप्फदंतं, सियल, सिज्जंस, वासुपुजंच, विमल, मणंतंचजिणं, धर्मकों, फेरशांतिकोवांदताहूं,३, कुंथु,अर, फेरमलिकों, वंदताहूंमुनिसुव्रतकों, नमि.. धम्म, संतिंचवंदामि,३, कुंथुअरंचमल्लिं, वंदेमुणिसुव्वयं, नमिजि जिनको, वंदताहूंअरिष्टनेमिकों, पार्थतैसेंफेरवर्धमानकों,४, एसेंमेनेस्तवेहुये, णंच, वंदामिरिहनेमि, पासंतहवद्धमाणंच,४, एवंमएअभि झडकायाहैकर्मरजमैल, क्षयकिये जरामरण, चौवीसोंहीसामान्यकेवलि थुआ, विहुयरयमला, पहीणजरमरणा, चवीसंपिजिण यों श्रेष्ठ, तीर्थंकरोमेरेपरकृपाकरो, ५, कीर्तनायोज्ञ, वंदनायोज्ञ पूजाकेयोज्ञ, जोइस वरा, तित्थयरामेपसीयंतु, ५, कित्तिय, वंदिय, महिया, जेएलो लोकमें, उत्तमसिद्धभये, निरोगता सम्यक्दर्शनकालाभ, समाधिप्रधानउत्तमदेओ६, गस्स, उत्तमासिद्धा, आरुग्गबोहिलाभ, समाहिवरमुत्तमंदिंतु, चंद्रमाकेसमूहोंसेंजादानिर्मल, सूर्योकेसमूहोंसेंजादाप्रकाशकारक, समुद्रकीतरे प्रधान चंदेसुनिम्मलयरा, आइचेसुअहियंपयासयरा, सागरवर गंभीर सिद्धभगवानोसिद्धिमुझकोंदो, गंभीरा, सिद्धासिद्धिं ममदिसंतु, इच्छाकरके आज्ञादेओ, हेभगवान्, जाणेआणेमेंभयापापकोंविचारूं, इच्छाकारेणसंदिसह, भगवन्, गमणागमणआलोजी, इच्छाकरके, आज्ञादेओ, हेभगवन्, प्रसादकरकै, समताकरणेकादंडकपढावो, इच्छाकारेण, संदिस्सह, 'भगवन् , पसायकरी, सामायकदंडकउच्चरावो कर्ताहूं हेपूज्यसामायक, पापकारीजोगकाप्रत्याख्यान, जहांतकनियममें, करेमिभंते सामाइयं, सावजंजोगंपञ्चख्खामि, जावनियम सेवाकर्ताहूं, दोप्रकारतेसेंतीनप्रकार, मनकरकै, वचनकरकै, कायाकरके..' पञ्जवासामि, दुविहंतिविहेणं, मणेणं, वायाए, .काएणं, नहींकरूं, नहींकराउं, उसपापोंसेंहेपूज्यपीछाहटताहूं, निंदताहूं, गुरुकी नकरेमि, नकारवेमि, नकारवेमि, तस्सभंतेपडिकमामि, : निंदामि, गरि , प्रतिक्रमण.. भगवान् दशार्णभद्र, . १, प्रासुकदाणदेनेसें, निजर, , साखनिंदताहूं, आत्माकू पापोसेंछुटाताहूं, हामि, अप्पाणं वोसिरामि, सुदर्शन, थूलभद्र, वज्रस्वामीआदिक, सफलकि - भयवंदसणभद्दो, सुदंसणो, थूलभद्द, वयरोय, सफली यागृहस्थावासछोडके, साधूइसप्रकारकैहोतेहैं, साधुओंकेवंदनकरणेसें. कयगिहचाया, साहूएवंविहाहुँति, १, साहूणवंदणेणं, नासहोताहैपाप, शंकारहितभावोंसें, निर्जराकोंकीहोतीहै, नासइपावं, असंकियाभावा, फासुअदाणे, समस्तपणेग्रहणहोताहैज्ञानादिकका, २, छद्मस्थपणेमनकीमूर्खतासे, कितनेमा अभिग्गहोनाणमाईणं, २, छउमत्थोमूढमणो, कित्तिय त्रभी, यादकरयेजीव, जोफेरनहींयादआवैमुझकों, मिथ्या, मेरा, मित्तंपि, संभरइजीवो, जंचनसंभरामिअहं, मिच्छा, मि, पाप, उनसबोंका, ३ जोजो, मनकरकेविचाराहो, अशुभ, वचनसें, भाषणकिया, दुक्कडं, तस्स, ३ जंज, मणेणचिंतिय, मसुहं, वायाए, भासि होथोडासाभी, अशुभकायासेंकियाहो, मिथ्याहुओमेरापापउनसवोंका, ४, यंकिंचि. असुहंकाएणकयं, मिच्छामिदुक्कडंतस्स, सामायकपोषधर्मअच्छीतररहेभये, जीवोंकाजाताहैजोकाल, सामाइयपोसहसंठियस्स, जीवस्सजाइजोकालो, वहसफलजाणना, वाकीसवसंसारफलके, कारणहै, ५, सोसफलोबोधव्यो, सेसोसंसारफलहेज, ५, अवचैत्यवंदन, जयवंतरहो, हेतीनभुवनमें, प्रधानकल्पवृक्ष, अथचैत्यवंदन, तिहुअण, वरकप्परुख्ख, जयवंत, जिनधन्वंतरवैद्य, जयवंततीनभुवनमेंकल्याणकेभंडार, पाप, जिणधनंतरि, जयतिहुअणकल्लाणकोस, दुरि रूपहस्तीकूसिंहजेसें, तीनभुवनकेमनुष्योंने, नहींउल्लंघीहेआज्ञाजिनोंकी, यकरिकेसरी, तिहुअणजण, अविलंघियाण, भुवण हेतीनभुवनकेखामी, करोसुखोंकों, हेसामान्यकेवलियोंकईश्वर, पार्थप्रभूस्तंभन त्तयसामिय, . कुणसुसुहाई, जिणेस, पासथंभणयपु, , ४, १ जय, जय, . , प्रतिक्रमण. ५ . मुख्ख, , दुर्वला कपुरमेरहेहुये,१, तुझकोस्मरते, पावै, जल्दी, प्रधान, पुत्रकलत्रस्त्रियादिकोंकों, रट्टिय,१, तइंसमरंत, लहंति, झत्ति, वर, पुत्तकलत्तहिं, धान्य, सोना, अणघडामयासोनासेंभराभया, मनुष्यभोगेराज्यकों, देखेअनुभवे, धन्न, सुवन्न, हिरन्नपुन्न, जण जइरजहिं, पिख्खहिं, मोक्षका, वेगिणतीकासुख, तुमारीकृपासेहेपार्थप्रभू, इसकारण, हेतीनभु असंखसुख्ख, तुहपासपसाइण, तिहुअ वनकेप्रधानकल्पवृक्ष, सुखोंकोंकरो, मेरेहेजिनराज,२ ज्वरसेंजर्जर, णवरकप्परुख, सुख्खहिकुण, महजिण,२, जरजजर, गलतकोढसेंशडेहुयेकान, गयेहैंहोठ, एसेकुष्टी, फूटीहैआंख, क्षीणभयेक्षयसें परिजुन्नकन्नु, नदुङ, सुकुट्टिण, चख्खुख्खीण, खए मनुष्य, शूलरूपीशल्यवंत, हेजिनतुमारे, स्मरणतथासरणरूप णखुन्नु, सल्लिअसूलिण, तुहजिण, सरणरसायणे रसायणसें, जलदीहोय, फेरनये, हेजगधन्वंतर, पार्थप्रभुमेरामी, ण, लहुहुति, पुणन्नव, जयधनंतरि, पासमहवि, तुहरो हरणेवालेहुओ, ३, विद्या, जोतिष, मंत्र, ओरतंत्रोंकी, सिद्धियें, विनायन गहरोभव, ३, विजा, जोइस, मंत, तंत, सिद्धिओ, अपय किये, 'तीनभुवनमेंअचरजकारी, आठप्रकारकीसिद्धि. सिद्धहोयतुमारेनामसें, त्तिण, भुवणभुअ, अठविहसिद्धि, सिज्झइतुहनामिण, फेरतुमारनामसें, अपवित्र, मनुष्यमी, पवित्रहोताहै नीचकुलकामीउच्चपदधराताहै, तुहनामिण, अपवित्तओवि, जणहोई, पवित्तओ, तं इसवास्तेतीनभुवनकेकल्याणकोसभंडारतुमकोहेपार्श्वपंडितोनेकहा, ४, दुष्टजो तिहुअणकल्लाणकोसतुहपासनिरुत्तर, ४, खुद्दप कियामत्रतंत्रजंत्रउनोंकोनिरफलकरताहै, जंगमऔरथावरजहरगृहमंगलादि उत्तइमंततंतजंताईविसुतई, चरथिरगरलगहुग्ग तलवारयुक्तवैरियोंकावर्गोंकोंगंजताहै, दुःखीजनोंकेसमूह, जोकीअनर्थमफसग खग्गरिउवग्गविगंजइ, दुत्थिअसत्य, अणथंघ योंकों, सुखीकरतेहैंदयाकरकै, उपद्रवोंकोहरो, श्रीपार्श्वदेव, श्रीपार्श्वदेव, इसकारण स्थ, नित्थारहृदयकरि, दुरियइहरउ, सुपासव, दु . " cor प्रतिक्रमण. आपदुरितगजकोंसिंहजेसेहो, ५, तुमारीआज्ञाथांभदेतीहै, डरावणेमदोन्मत्त रिअक्करिकेसरि, ५, तुहआणाथंभेइ, भीमदप्पुद्ध उत्कृष्टप्रधानदेवोंकों, राक्षस, यक्ष, नागकुमारोंकेवृंदोंकों, चौर, अग्नि फेरमे रसुरवर, रख्खस, जख्ख, फणिंदविंद, चोरा, नल, ज वकों, जलचरमकरादि, थलचारीसिंहादिक, डरावणेमारणेवालेपशू, जोगणियें, जोगी, लहर, जल, थलचारि, रउद्दखुद्दपसु, जोइणि, जोइय, इसहेतू, तीनभुवनमें, आपकीआज्ञाकोईनहींलोपसक्ता, उत्कृष्टपणेवत्तॊहेपार्श्वअच्छेखामी इय, तिहुअण, अविलंघिआण, जयपाससुसामिय, ६, मांगेभयेअर्थदेणेवाले, अनर्थोंकानाशकरणेवाले, भक्तिमेंभरेभये, ६, पत्थिअअत्थ, अणत्थहित्थ, भत्तिष्भरणिष्भर, खडेभयेहैंरूंजिनोंकै, मनोहरअंग, भुवनपतीव्यंतरमनुष्यवैमानिकदेव, जिनोंकासे रोमंचंचिय, चारुकाय, किन्नरनरसुरवर, जसुसे । वतेहैं चरणकमलदोनों, केसेकचरणहैं, धोडालाहैकलहरूपपापजिनोंने, वह, वइंकम कमल जुअल, पख्खालियकलिमल, सो, तीनभुवनकेखामी, श्रीपार्थमेरेमईनकरडारो, वैरियोंकावल, ७, जयवंतहो यो भुवणत्तयसामि, पासमहमदउ, रिउवलु, गीयोंके, मनकमलकेभमरे, जयवंतहोंडरसेडरकोंपिंजरकुंजर, जयवंतहोती मणकमलभसल, भयपंजरकुंजर, तिहुअंण नभुवनकेजनोंकेआनंदचंद्र, जयवंतहोतीनभुवनप्रकाशकसूर्य, जयवंतहोबुद्धिरू जणआणंदचंद, भुवणत्तयदिणयर, जयमइमेह पपृथ्वीकों, सींचनेमेघ, जयवंतहो, जगत्जीवोंकेदादा, हेमणपुरमेरहेपार्श्वनाथ, णि, वारिवाह, जय जंतुपियामह, थंभणयठियपास नाथ पणाकरोमेरे ८ अवयेलद्वारदिखातेहैं, बहुतभेदसेंविष्णु, अवर्णमाहेश्वर, नाह, नाहत्तणकुणमह,८, बहुविहवन्तु, अवन्नु, सु शून्यमतीबौद्ध, पंडितो वर्णनकियाषट्बुद्धिसें, मोक्षधर्मकेकाम, अर्थोकेअभिलाषासे, न्यारेर नु, वनिउंछप्पन्नहिं, मुख्खधम्मुकाम, स्थकामुनिरु अपणेरवनायेशास्त्रों में जोध्यानसेंध्यातेहैं, बहुतसेदर्शनोंमेरहेभये, बहुतसेतु नियरसत्थहिं,, जंझायई, बहुदरसणस्थ, बहुना ७, जयजो इय, , , प्रतिक्रमण. 9. , , " मारेनामप्रसिद्धकररखेहैं, वहजोगियोंकेमनकमलकाममरा, सुख, हेपार्श्वउत्क' मपसिद्धउ, सोजोइअमणकमलभसल, मुह, पास पपणेवधावो, ९, डरसेंव्याकुल, आपसमेंघसणेसेंरणझणकरतेदांत, थरहरंकांप पवद्धड, ९, भयविन्भल, रणझणिरदसण, थरहरियसरीर ताशरीर, तरलातीभईआंख, विषादकरकेशून्य, गद्गदअप्रगटवाणी, करुणदीन, उसके य, तरलिअनयण, विसन्नसुन्नु, गरिंगरगिर, करुणय, तइंस. संगशक्तिस्मरणकरणेसेंहोयनहींनासहोणेवालीवडीगुफा, मेरावुझावो, जल्दी हसत्तिसरंतिहुंतिनिरुनासियगुरुदर, महविझवि, सझस वहनिश्चैहेपार्श्वडर, इसवास्तेभयपिंजरकुंजरहो,१०, आपकोंदेखखुलेनेत्रपत्रउसके हिपास, भयपंजरकुंजर,१० पइंपासविवियसत्तनित्तपत्तं अंतसेफेलाया, हर्परूपआंसुओंकापूरउसमेंडूचे, वहोतदिनोंकादुःखदाहकों, वहाया मान तपवित्तिय, वाहपवाहपबूढरूढ, दुहदाह,सुपुल्लिय, मन्नहि तेहैं,मनमेंसंपूर्णपुण्य,अपणीआत्माकोंदेवतथानर, इसवास्ते,हेतीनभुवनकेआनंदचंद्र, मन्नुसउन्नपुन्न,अप्पाणंसुरनर, इयतिहुअणआणंदचंद, जयवंतपार्श्वजिनेश्वर,११,तुमारेकल्याणउत्सवकेविषै, सुघोषाघंटाकाटंकार, जयपासजिणेसर,११,तुहकल्याण महेसुघंटटंकार, विपि, संप्रेरित, वन्नरमालमाला, वडीभक्तिसें, इंद्रादिकरोमांचितहोके, हलफलजल्दी ल्लिय, वल्लरमल्ल महल्लभत्ति सुरवरगंजुल्लिय, हल्लुफलि भुवनमेंभी महोत्सव, इसकारणसेंतीनभुवनकेआनंदचंद्र, यपवत्तयंति, भवणेहिमहूसव, इयतिहुअणआणंदचंद, जयवंतहेपार्थसुखोंकीखान,१२;निर्मलकेवलज्ञानकेकिरणोंकेसमूहसें, विध्वंसकि जयपाससुहुन्भव, १२,निम्मलकेवलकिरणनियर, विहुरिय, या,अज्ञानकासमूह, दिखलायासमस्तपदार्थसार्थ, विस्तारदियाक्रांतिकासमूह, तमपहयर, दंसियसयलपयत्थसत्थ, वित्थरिअपहाभर, क पापोंसेंमैले, जोमनुष्यहीघूधूलोकउनपापियोंकेनेत्रोंकेअगोचर, अज्ञानअंधेरे लिकलुसिय, जणघुअलोयलोयणहअगोयर, तिमिरइनि कोंनिश्चेहरो, हेपार्श्वनाथतीनभुवनकेदिनकर, १३, तुमारेस्मरणरूपजलवृष्टिसें, पासनाह वणत्तयदिणयर,१३, तुहसमरणजलवरस, . करतेहैंअपणे, , , ८ प्रतिक्रमण. . सींचीभइमनुष्यकीबुद्धिरूपपृथ्वी, नयेरसूक्ष्मअर्थोंकाबोधरूपनयेअंकूरपत्र सित्तमाणवमहमेइणि, अवरावरसुहमत्थबोहकंदलदलरेइ सोभतेहैं, होवैज्ञानकाफलभरपूर, हरीजेदुःखदाह, ओपमारहित, इसवास्तेआप णि, जायइफलभरभरिय, हरियदुहदाह, अणोवम, इयमइमे मतिमेदनीकोंमेघहो, देओहेपार्श्वबुद्धिमुझें, १४, करीसंपूर्णकल्याणकीवेल, १, इणिवारवाह, दिसपासमइमम, १४, कयअविकलकल्लाणव काटदियादुःखकावन, २, दिखायास्वर्गऔरमुक्तिकारस्ता, ३ दुर्गतिमेंजाणेकों ल्लि,उल्लरियनुहवण, दाविअसग्गपवग्गमग्गदुग्गइगमवा रोका, ४, जगत्केजीवोंकेवापकेबरावर, जिसनेपेदाकिया, हितकारी, रमणीकधर्मः रण, जयजंतुहजणएणतुल्ल, जंजणियहियावह, रम्मधम्म, वहजयवंतपार्थप्रभु, जगत्जीवोंकेदादा, १५ तीनभुवनवनमेंनिवासदरी गुफामें,] सोजयउपास, जयजंतुपियामह, १५ भुवणारत्ननिवासद्, ऐसेजोपरदर्शनीदेवता, योगनियें, पूतना, क्षेत्रपाल, दुष्टदेवतादिक, प रियपरदसणदेवय, जोइणि, पूयण, खित्तवाल, खुद्दासुर, शुओंकासमूह, तुमारेकहेअर्थसेंभगेत्राससें, भययुक्त, वर्त्ततेहैं, इतनेकरतीनभु सुवय, तुहउत्तठसुनहसुङ, अविसंडुल, चिट्ठइ, इयतिहु वनवनमेसींहजेसे, हेपार्थ, पापोंकोंउत्कर्षपणेनासकरो, १६, धरणेंद्रकेफणोंकेदेदी. अणवणसींह, पास, पावाइंपणासइ, १६, फणिफणफारफु प्यमान, रत्नमईकिरणोंसें, रंगाहुआआकाश, प्रियंगुकेनयेअंकूर, पत्तेतमालके, नी रंत, रयणकर रंजियनहयल, फलिणीकंदल, दलतमाल, नी लकमलजेसीश्याम, कमठअसुरकेउपसर्गवर्गके, संसर्गसेअगंजित, जयवंत लुप्पलसामल, कमठासुरउवसग्गवग्ग, संसग्गअंगजिय, ज प्रत्यक्ष, जिनेश्वरपार्श्व,स्थंभनपुरमेंरहेभये, १७, मेरामनचंचलप्रमादसें, यपचख्ख, जिणेसपासथंभणयपुरट्टिय, १७, महमणुतरल, प्रमाणनहींहै, वचनभीठिकाणेनहींहै, निजशरीरभीअविनीत, स्वभावीहै. पमाणुनेय, वायाविविसंठुलु, नियतणुरविअविणय, स आलससेंपरवसहै, . तुमारामाहात्मप्रमाणहै, हेदेव, करुणाकर हाव,आलसविहिलंघलु, तुहमाहप्पपमाण, देव, कारुण्णप. प 3 , . , प्रतिक्रमण. ९ , , रिय, घराउ, राउल, केपवित्र, . इसवास्तेमुझेंमतकृपाकरणेसेंअवगिणो हेपार्श्व पालोविलापकरतेकों, १८ वत्तउ, इयमइंमाअवहीर, पास, पालहिविलवंतउ,१८% क्याक्याविचारानहींमनसें, दीनपणेसें, क्याक्यावचननहींबोला, क्याक्यानहींचेष्टाकरी, किंकिंकप्पिउणेय, कलण, किंकिंवनजंपिउ किंवनचिठि कष्टसेंहदेव, दीनताकूधारणकरकाया, कोणसारनहींकियावोसबनिर्फलगया, उ,किहदेव, दीणइमविलंबिओ, कासुनकियनिष्फल्ल, लुलताइ, मैंनेदुखकीआर्तपीडासें, तोभीनहींपाया, रक्षाकुछभीशरणनहींपाई, लल्ल, अम्हेहिंदुहत्तइ, तहविनपत्तउ, ताणकिंपि, पइंप आपप्रभुकेछोडदेणेसें, १९, तूंखामी, तूंमातातूंबाप, तूंमित्रप्यारकाकरणेवाला, हुपरिचत्तई, १९ तूंसामी, तूंमायवप्प, तूंमित्तपियंकर, तूंगति, तूंमत्ति, तूंहिजरक्षाकारक, तूंगुरु, क्षेमकाकर्ता, मेंदुखकेभारसेंभरा, तुंगइ, तुंमइ, तुहिजताण, तुंगुरु, खेमंकरु, हुंदुहभरभा रंककंगाल, हेराजेंद्र, मेंनिर्माज्ञ, लियाहै, तुमारेचरणकमल, निभग्गउ, लीणउ, तुहकमकमल, काहीशरण हेजिनमुझेंपालोअच्छीतरे,२०, तुमनेंकेईकियैनिरोगरोगरहित, सरण, जिणपालहिचंगउ, २०, पइंकिविकयनीरोय, लोक, केईपायेसुखसईकडों, केईबुद्धिवानहोगये, केईसर्वोत्तमहोगये लोय, किविपावियसुहसय, किविमइमंत महंतकेवि, केयोनेंसाधलियेशिवपद, केयोंनेगंजडालावैरियोंकावर्ग, केयोंने किविसाहियसिवपय, किविगंजियरिउवग्ग, केविज जसकीर्तिसेंसुपेदकरीपृथ्वीकों, हेप्रभुमुझेंनहींगिणताहै, किसकारण, हेपार्थ, सधवलिअभूअल, मइंअवहीरहि, पास, शरणागतवत्सल, २१, पीछाउपगारकराणेकीतुझेंवांछानही, हेनाथतेरेसिद्धहोगयेष सरणागयवच्छल,२१ पचुवयारनिरीह, नाहनिप्पन्नपयोग योजन, तूंहेजिनपार्थ, परोपकारकरणेतत्परहीहै, शत्रुपर ण, तुहुंजिणपास, परोवयारकरुणिकपरायण, सत्तु ओरमित्रपरसमबरावरहैचित्तकीवृत्ति, नमेपर, निंदकपर, सममनहो, . मतअपमानकर मित्तसमचित्तवित्ति, निदिअ, सममण, माअव केण, . नय, २ . १० प्रतिक्रमण. अयोज्ञहूंतोभी, मुझेंडेपार्थनिरंजनपापरहित, २२, मेंबहुतप्रका हीरि, अजुग्गओवि, मइंपासनिरंजण, २२, हुंबहुवि रसें, दुःखसेंतपामयाअंगहूं, तूंदुःखनासकरणेतत्परहै, मेंसुजनोंकेदयाकरणेका ह, दुहतत्तगत्तु, तुंदुहनासणपर, हूंसुयणहकर स्थानठिकाणाहूं, तूंनिश्चैदयाकरणेवालाहै, मेंहेजिनपार्थअखामिशाल णिकठाणु, तुनिरुकरुणाकर, हुंजिणपासअसा निर्नाथहूं, तूंतीनभुवनकानाथहैएसाहोकर, जोनहींधारताहै, मुझेविलापा मिसाल, तुतिहुअणसामिय, जंअवहीरहि, महंझ तकरतकों, येवातहेपार्श्वनहींअच्छीहै, २३, योग्यअयोग्यकाभेदाभेदहेनाथ, खंत, इयपासनसोहिय, २३, जुग्गाजुग्गविभागनाहु नहींदेखतेहैं आपजैसे, तीनभुवनकाउपकारकरणेकातेरास्वभावहै, करुणा नहु जोयहितुहसम, भुवणुवयारसहावभाव, करु दयारसमें श्रेष्ठहै.जैसे, समऔरउंचीनीचीजगेक्यामेघदेखताहै, जमीनकादाह, णारससत्तम, समविसमह किंधणनएइ, भुविदाहु समाते, इसवास्तहेदुःखियोंकेबांधव, पार्श्वनाथ, मेरीपालनाकर, स्तवनाकरतेकी समंतह, इयदुहबंधव पासनाह मइपाल, थुणंतओ, २४, नहींदीनोंकीदीनताकोंछोडके, औरभीकोइयोग्यताहोतीहै, २४, नयदीणहदीणयमुएवि, अन्नविकिविजुग्गय, जिसकोंदेखकेउपकारकियाजाय, उपकारमें उद्यमवंतमहापुरुषहोतेहैं, मैदी जंजोइयउवयारुकरइ, उवयारसमज्जइ, दीणह नसेंभीदीन फेरहीन, जिसकारण, तैनाथनेंमुझेंछोडा, इसकारणयोग्यमेंहीहं, दीण, नहीण, जेण तुहनाहिणचत्तउ, तउजुग्गअ निश्चैही, हेपार्श्वपालोमुझें, कल्याणजैसेहो, २५ अथओरभीयोग्यताका हमेव, पासपालहिंमई, चंगओ, २५ अहअनुविजुग्ग विशेषपणाभी, क्यामानतेहोदीनदुःखियोंका,.. जोदेखकेउपगारकरेगा, यविसेस, किविमन्नहिदीणह, जंपासविउवयारुकरइ, इसतरेतूंहेनाथसयोंका, .तोवोहीयोग्यताविशेष, निश्चे, कल्याणजिसकरकै, हेजि तुहनाहसमग्गह, सुचिय, किल, कल्लाणुजेण, जि. .

कि लालची, प्रतिक्रमण. ११ नतुमप्रशादकरतेहोतबतो, क्याऔरकरकैवहयोग्यताविशेष, इसवास्तेमतमेरा णतुम्हपसीयह, किंअन्नुणतंचेवदेव, मामइंअवही अपमानकर, २६, तुमारीप्रार्थनानहींहोयनिरफल, एसाहेजिन,में जाणताहूं, तोक्या रह, २६, तुहपत्थणनहुहोइविहल जिण, जाणउ, फेर, मेंदुःखियानिश्चै, सत्वरहित दुखेंहोणेवाला, उत्सुकमनफलका पुण, हुंदुख्खिर, निरुसत्तचत्त, दुक्कहु, उस्सुयमण, एकपलकमैयहभीजोकभीमिलजाय तोयहवातसञ्चहोय, तमन्नउ, निमिसेणएणएउविजइलष्भइ, सचंज, भूखलगेजव क्यागूलरफलताहै २७, हेत्रिभुवनखामी भुख्खियवसेणं, किंऊंवरुपच्चइ,२७, तिहुअणसा श्रीपार्श्वनाथ, मेनेंआत्माप्रकाशीमनकीवातकही, करोजोआपकेनिजरूपके मिअपासनाह, मइअप्पपयासिउ, किजउजनियरू परावर, नहींजानताहूंचहोतकहणा, दूसराकोई,हेजिन,जगत्मेंतुमारेवराब वसरिस, नमुटुंबहुजंपिउ, अन्नुण,जिण,जगतुहसमो र, चतुरओरदयाश्रयनहीं, जोमुझेंनहींगिणोगे, तुमहीज, अहहबडाखेद वि, दखिन्नदयासउ, जइअवगिन्नसि, तुंहिंज, अहह, क्याहोजाऊंगानिरफलमनोरथ, २८, जोतुमारेरूपसेंकिसहीप्रेत, पार्श्वयक्षव्यंत किंहोसियासउ, २८, जइतुहरूविणकिणविपेअ, पा रनेजोमेनेंआजदेखा, एसापार्श्वनाथकेरूपसेंठगा,तोभीजाणताहूंहेजिनपार्श्वतुमनेंमुझेंअंगीकार इणलंविउ, तउजाणुंजिणपासतुम्हहुंअंगीकरि किया, इसवास्तेमेरावांछित, जोनहींहोगा, वहतुमारीहलकाईहोगीइसवास्ते, रख्खो जनहोइ, सातुहओहावण, रख्खं यउ, इयमहइत्थिय, तेसेंनिजकीर्ति, नहींतुमकोंचाहिये, मेरेजैसेकीअवगिणना, २९, येमेरीयात्रा तहनियकित्ति, यजुज्जइ, अवहीरण, २९, हेदेवाधिदेव, जोसत्य हारिहजत्तदेव, इयन्हवणमहूसव, जंअणलिय, गु इसकारणमेरेपरकृपा गुणोंकाग्रहण, तुमारांमुनिजनोंनें, निषेधनहींकिया, इयमईपसी तुम्हमुणिजण, अणिसिद्धउ, णगहण, , एवम इयत्रात्रमहोत्सव, , " १२ प्रतिक्रमण, कर,हेपार्श्वनाथ, स्थंभणकपुरमेरहेभये, इतनेकरमुनियों मेंप्रधानश्रीअभय सुपासनाह, थंभणयपुरठ्ठिय, इयमुणिवरसिरिअ देवसूरिः,नवांगीवृत्तिकरणकेआनंदमेंवीनतीकरी, ३०, इतनेकरस्थंभनपार्श्वनाथ भयदेवविन्नवइआणंदिय, ३०, इतिश्रीथंभणपास जिनस्तवनंपूर्ण ॥ जिनस्तवनं ॥ जयवंतवामी, जयपावोस्वामी, ऋषभदेव, शत्रुजयपर, गिरनारपरप्र जयउसामी, जयउसामी, रिसह, सेत्तुंजी, उजंतपहू भुनेमजिन, जयपावोमहावीरप्रभुसाचोरकेमंडन, १, भरुचमेंमुनिसुव्रतप्रभू नेमजिण, जयउवीरसच्चउरिमंडण, १, भरुअच्छहिंमु खामी, मुहरिगांममें श्रीपार्श्वनाथदुःखपापकाखंडण, और महाविदेह णिसुव्वय, मुहरिपासदुहदुरियखंडण, अवरविदेहिं मेंतीर्थंकर. चारोंदिशामेंविदिसामेंजोकोईभी, गयेकालअनागतका तित्थयरा, चिहुंदिसिविदिसजिंकेवि, तीयाणागय ल,वर्तमानकालकेवंदूजिनेश्वरसर्वोकों, २, संपइअ,वंदूजिणसव्वेवि, २, कर्मभूमीमें, कर्मभूमीमें, प्रथमसंघयणधारी, उत्कृष्टएकसो, कम्मभूमिहिं, कम्ममूमिहि, पढमसंघयणि, उक्कोसय, सत्तर, जिनवर, विचरतेपावै, नवकरोड, सत्तरिसय, विहरंतलभइ, नवकोडिहिं, के केवली, नवहजारकोडिसाधुओंकीसंपदा, इसवक्तजिनवरवीस वलिण, कोडिसहस्सनवसाहूसंपय, संपइजिनवरवी मुनीश्वर, दोयकरोडप्रधानज्ञानी, साधूदोहजारकोडी, समुणि, बिहूंकोडिहिंवरनाण, समणहकोडिसहसदुअ, स्तवनाकरणी, हमेससूर्यउदयहोते, १, सत्ताणवेहजार, लाख, थुणिजिअ, निच्चविहाण, १, सत्ताणवइसहस्सा, लख्खा, छप्पन, आठकरोड, चारसेछायासी, तीनलोकमें, छप्पन्न, अठकोडीओ, चउसयछायासीआ, तिल्लुके , जिणवराण, , , स्वर्गमें, , . प्रतिक्रमण. १३ चैत्योंकोंवांदू, २, वंदनकरूंनवसयकोडि, पचवीसकोडि, लाख, चेइयेवंदे,२, वंदेनवकोडिसयं, पणवीसंकोडि, लख्ख, तेपन, अठाईसहजार, चारसे, अध्यासी, प्रतिमा, तेवन्ना, अठावीससहस्सा, चउसय, अठासिआ, पडिमा, ३, जोकोईनामकेतीर्थहैं पातालमें, मनुष्यलोकमें, ३, जंकिंचिनामतित्थं, सग्गे, पायाले, माणुसेलोए, जोजोजिनविहै, उनसवोंकोवंदनकरताहूं, ४, जाइंजिणविंबाइ, ताइंसव्वाइंवंदामि, ४, नमस्कारहो, अरिहंतोंकों, भगवंतोंकों, १, आदिद्वादशांगीकेकरता, नमोत्थुणं, अरिहंताणं, भगवंताणं, १, आइगराणं, तीर्थककरणेवाले, आपहीतत्वकेजाण, २, पुरुषोंमेंउत्तम, पुरुषोंमें तित्थगराणं, सयंसंवुद्धाणं, २, पुरिसुत्तमाणं, पुरिस सिंह, पुरुषोंमेंप्रधान पुंडरीककमलजैसें, पुरुषोंमेगंधहस्तीजैसेप्रधान, सीहाणं, पुरिसवरपुंडरीआणं, पुरिसवरगंधहत्थीणं, ३, लोकोंमेंउत्तम, लोककेनाथ, लोककेहितकारी, लोकमेंदीपक, लोगुत्तमाणं, लोगनाहाणं, लोगहिआणं, लोगपईवा समान, लोकमेंउद्योतकरणैवाले, ४, अभयदानदैणैवाले, तत्वरूपनेत्रों णं, लोगपज्जोअगराणं, ४, अभयदयाणं, चख्खु केदैणैवाले, मोक्षमार्गकेदातार, शरणकेदातार, बोधिवीजकेदैनैवाले, ५, मग्गयाणं, सरणदयाणं, बोहिदयाणं, ५, धर्मकैदैनैवाले, धर्मकेउपदेशकरता, धर्मकेनायक, धर्मरथकेसा. धम्मदयाणं, धम्मदेसियाणं, धम्मनायगाणं, धम्मसार. रथी, धर्मकेप्रधानचारगतिकेअंतकाचक्रवर्ती, ६, किसीसेंनासनहींहोयएसा हीणं, धम्मवरचाउरंतचकवट्टीणं, ६, अप्पडिहयवर प्रधानज्ञान, दर्शनकूधारणेवाले, चलीगईछमस्थावस्था, ७,. आपजीतेदुसरेकों णाण, दंसणधराणं, . वियदृछउमाणं, ७, वियदृछउमाणं, ७, . .जिणाणंजाव जीताणैवाले, आपतिरे दूसरेकेतारक, आपतत्वजाणादूसरेकोबोधदैणैवाले, आप ... याणं, तिन्नाणंतारयाणं, बुद्धाणंबोहयाणं, मुत्ताणंमो , , दयाणं, .

, बांधारहित, अहेय, १४. प्रतिक्रमण. छूटे,ओरोंकोंछुडाते, ७, सर्वजाण वाले, सर्वदेखनेवाले, उपद्रवरहितअचलरोगरहि अगाणं,८, सव्वन्नूणं, सव्वदरसीणं सिवमयलमरु, तअनंत, अक्षय, नहींहैफेरअवतारलैणा, सिद्धगति, अमणंत, मख्खय, मवावाह, मणरावित्ति, सिद्धिगह, नामजिसका, एसाठिकाणापायेहुये, नमस्कारहोजिनेश्वरोंकों, जीताहैसवडर, नामधेयं, ठाणसंपत्ताणं, नमोजिणाणं, जिअभयाणं, जोअतीतकालमेंसिद्धहोगये, जोहोंयगेआगामीकालमेंसिद्ध, ९ जेअअईआसिद्धा, जेअभविस्संतिणागएकाले, इसवख्तवर्तमानकालमेंहोरहेहैं, उनसर्वोकोंत्रिविधवंदनकर्ताहूं, १०, संपइयवहमाणा, सव्वेतिविहेणवंदामि, १०, जितनेचैत्यहैं, ऊर्द्धलोकमें, अधोलोकमें, तिच्छेलोकमें, जावंतिचेइआइं, उड्डेअ, तिरिअलोएअ, सर्वउनोंकोवंदनकरूं, इसजगेरहे उहारहेजिनोंकों, जितने कोईभीसाधू, सब्वाइंतांइवंदे, इहसंतोतत्थसंताइं, १, जावंतिकेविसाहू भरतमें एरवतमें, महाविदेहमें, सचोंकों प्रणामहो, मनवचनकाया भरहे, रवय, महाविदेहेअ, सब्वेसिंतेसिंपणओ, तिविहेण सें तीनदंडसेंविशेषरहित, १, नमस्कारअर्हतसिद्धआचार्यउपाध्यायसवसाधुओकों, तिदंडविरयाणं, १, नमोहसिद्धाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यः, उपसर्गफूहरणेवालेपार्श्वयक्षहैजिनोंके, एसेपार्श्वनाथकर्मसमूहसेंमुक्त, उवसग्गहरंपासं, पासंवंदामिकम्मघणमुकं, सांपकेजहरकूनासकरणेवाले, मंगलकल्याणकेगृह( मकान), १, विषधर विसहरविसनिन्नासं, मंगलकल्लाणआवासं, १, विसहर फुलिंगनामकेमंत्रकों, कंठमेंधारणकरैजोसदामनुष्य, उसकैग्रहरोगमरी फुलिंगमंतं, कंठेधारेइजोसयामणुओ, तस्सग्गहरोगमारी, दुष्टज्वरपाताहैशांतिकों, २, रहोदूरतुमारानाममंत्र, तुमारेकूप्रणाम दुट्ठजराजंतिउवसामं, २, चिठउदूरेमंतो, तुझपणामोवि करणामी,बहोतफलहोताहै, मनुष्यतिर्यंचभीजीव, पावेनहींदुःखदौर्भाग्य [दु बहुफलोहोई, नरतिरिएसुविजीवा, पावंतिनदुख्खदो " प्रतिक्रमण. १५ हाग], ३,. तुमारासम्यक्तपाणेसें, चिंतामणीरत्नकल्पवृक्षसेंभीअधिक जा हरगं, ३, तुहसम्मत्तेलद्धे, चिंतामणिकप्पपायवन्भहि दा, पाताहैनिर्विघ्नपणेकरकै, जीवअजरअमरठिकाणेकू, ४, इसतरे ए, पावंतिअविग्घेणं, जीवाअयरामरंठाणं, ४, इय कीस्तवनाहेमहायशवंत, भक्तिकेसमूहसेंपरिपूर्णरिदयकरकै, इसकारण संथुओमहायस, भत्तिभरनिन्भरेणहियएण, तादेव हेदेवदेओबोधिवीज, भवभवमेहेपार्थजिनचंद्र, ५, इतनेकरपार्श्वजिनस्तवनपूर्ण, दिजवोहिं, भवेरपासजिणचंद, ५, इतिपार्श्वजिनस्तवनं, जयपाओहेवीतरागजगद्गुरु, होमुझेतुमारप्रभावसें, जयवीयरायजगगुरु, होउममंतुहप्पभा हेभगवान्, भवोंसेंउदासपणा, मार्गानुसारीपणा, बंछितफलकीसिद्धि, वओ, भयवं, भवनिव्वेओ, मग्गाणुसारिआ, इहफलसिद्धि, १, लोगविरुद्धकामोंकात्याग, बडेमहापुरुषोंकीपूजा, परोपकारकाकरणा, फेरशु १, लोगविरुद्धच्चाओ, गुरुजणपूआ, परत्थकरणंच, सुह द्धगुरुओंकायोग, उनोंकेवचनकाअंगीकार, समस्तभवोंमेंअखंड, २, गुरुजोगो, तव्वयणसेवणा, आभवमखंडा, २, अरिहंतकेचैत्यकेवास्ते, करताहूंकायोत्सर्ग, पहलीस्तुतिएकजिनकी. अरिहंतचेझ्याणं, करेमिकाउसग्गं, सर्वलोकमेंजोअरिहंतोंकेचैत्यउनोंकेवास्तेकरताहूंकायाकाउत्सर्गपणा, सवलोएअरिहंतचेझ्याणकरेमिकाउसग्गं, श्रुतज्ञानभगवतकेवास्तेकरताहूंकायोत्सर्ग, सुयस्सभगवओकरेमिकाउसग्गं, वैयावच्च(टहल)केकरणेवाले, शांतिककर्ता, सम्यक्दृष्टिसमाधिकरणैवाले वेयावचगराणं, संतिगराणं, सम्मदिहिसमाहिगराणं, करताहूंकायोत्सर्ग, वंदनकरणेवास्तै, पूजाकरणेवास्तै, करेमिकाउसग्गं, वंदणवत्तिआए, पूअणवत्तिआए, सत्कारकरणेवास्तै, सन्मानकरणेवास्तै, बोधिलाभकेवास्तै, सकारवत्तिआए, सम्माणवत्तिआए, बोहिलाभवत्तिआ - १६ प्रतिक्रमण. उपसर्गरहितस्थान(मोक्ष)कैवास्तै, २, श्रद्धासें, निर्मलबुद्धिसें, चित्तथिरसें, धारणा- ए, निरुवसग्गवत्तिआए, २, सद्धाए, मेहाए, धीइए, धारणा पूर्वक, धेरबेरविचारकै, वधतेपरिणामसे, करताहूंकायोत्सर्ग, ३, ए, अणुप्पेहाए, वड्डमाणीए, ठामिकाउसरगं, ३, संसारदावानल(अग्नि)केदाहकोंपाणीजैसे, मोहरूपधूडकोंदूरकरणेहवाजैसे, संसारदावानलदाहनीरं, संमोहधूलीहरणेसमीरं, कपटरूपपृथ्वीकोंफाडणेतीखेहलजैसे, नमनकरताहूंवीरप्रभूकों, पहाडोंमेंसारमेरूजैसेधीर मायारसादारणसारसीरं, नमामिवीर गिरिसारधीरं, १ भावसेंनमस्कारकरणैवालेदेवदानवमनुष्योंकेखामीयोंके, मुगटमेंचपलकमलोंकीश्रेणियों भावावनामसुरदानवमानवेन, चूलाविलोलकमलाव से पूजेभये, अछीतरेपूरदियानमेभयेलोकोंकेमनवंछित, लिमालितानि, संपूरिताभिनतलोकसमीहितानि, कामना, मेंनमनकरताहूं, जिनराजपद(चरणोंकों),वह, ज्ञानरूपगहरापण, अछेपदों कामं, नमामि, जिनराजपदानि, तानि, २, वोधागाधं, सुपद केरचनारूपजलकेपूरसेंमनोहर, जीवोंकीअहिंसारूपअंतररहितलहरों मिलणेसें पदवीनीरपूराभिरामं, जीवाहिंसाविरललहरीसंगमा अगाधखरूप, सिद्धांतकीचूलारूपवेल, बडेपाठरूपमणीयोंसेंभरपूर, दूरहैकिनाराजिसका, गाहदेहं, चूलावेलं, गुरुगममणीसंकुलं, प्रधान वीरभगवानकेआगमरूप, समुद्रकू,आदरयुक्त,अच्छीतरेसेवताहूं, ३, जडसेंहिलतेभये, सारं वीरागम,जलनिधि, सादरं,साधुसेवे, ३, आमूलालोल, खुसबोदाररजकी बहोतसुगंधमें, आसक्त, चपलभमरोंकीपंक्तिओं, झंकारशब्दोंका धूली, बहुलपरिमला, लीढ, लोलालिमाला, झंकाराराव श्रेष्ठपणा निर्मलपत्रोंकैकमलरूपघरकीभूमीनिवासहै,एसे कांतिकैसमूहसें, सारा, मलदलकमलागारभूमिनिवासे, छायासंभार, सुशोभित, प्रधानकमलहैहाथमें, देदीप्यमानहारसेतीमनोहर, द्वादशांगीरूपवाणीकास सारे, वरकमलकरे, तारहाराभिरामे, वाणीसंदोह मूहजिसकाशरीरहै, मोक्षरूपवरदान, देओमुझेंहेदेवीप्रधान, ४, देहे, भवविरहवरं, देहिमेदेवसारं, ४, . दूरपारं, , SA प्रतिक्रमण. , विसाल, कोदेव, पुष्करवरनामद्वीपअर्धमें, धातकीखंडमें, जंबूद्वीपकेअंदर, पुख्खरवरदीवढे, धायइसंडेअ, जंबुदीवेअ. भरतक्षेत्रएरवतक्षेत्र महाविदेहमें, धर्मकेआदिकर्ताकोंनमस्कारकरताहूं, अज्ञानरूप भरहेरवयविदेहे, धम्माइगरेनमंसामि, १, तमतिमि अंधेरेकेसमूहकों नासकरणेवाले, देवतोंकागण मनुष्योंकेइंद्रोसेंपूजेभये, रपडलविद्धंसणस्स, सुरगणनरिंदमहिअस्स मर्यादामेंरखणेवालेकोवंदनकरताहूं, तोडाहैमोहकाजालजिनोंने, २, जन्म, वृद्धपणा सीमाधरस्सवंदे, पप्फोडियमोहजालस्स, २, जाई, जरा, मोत, सोगकोंनासकरणेवाले, कल्याण संपूर्ण विस्तार मरण, सोगपणासणस्स, कल्लाणपुख्खल, मोक्षसुखकेदेणेवाले, सुहावहस्स, कोण देवता, दानव, मनुष्योंकेइंद्रोंकेसमूहोंसेपूजेभये, श्रुतधर्मका दाणव, नरिंदगणचिअस्स, धम्मस्स सार, पायकरकै, जोकरे प्रमाद, ३, एसैसिद्धोंकू, हेज्ञानवंतोआदरयुक्त,नमस्कार सार, मुवलब्भ, करेपमायं, ३, सिद्ध, भोपयओ, णमो करताहूंजिनमतकों, वृद्धिपाओहमेसचारित्रधर्म, वैमानिकदेव,भुवनपती, ज्योतषी, व्यंतरदेव जिणमए, नंदीसयासंजमे, देवं, नाग, सुवन्न, किन्न तोकेसमूहसें, सच्चभावकरकै पूजेभये, सर्वलोककाज्ञानजिसमें कहाभयाहै रगण, सम्भूअभावच्चिए लोगोजत्थपइडिओ तीनलोक, मनुष्य, भवनपति, श्रुतधर्मवृद्धिपाओ जगमिणं, तेल्लकमच्चासुरं, धम्मोवहुउ, विशेषजयवंतहुओ, चारित्रधर्मकाप्रधानपणाजेसेहोयतैसेंवधो, ४, विजयओ, धम्मुत्तरंवहुउ, ४, सिद्धोंकों, बुद्ध(ज्ञाततत्वकों), संसारकेपारपहूंचेकों,गुणस्थानकेक्रमसेचढकमोक्षपहुंचैको,लो सिद्धाणं, वुद्धाणं पारगयाणं, परंपरगयाणं, लोग- ककेअग्रभागमेंप्राप्तमयोंकों, नमस्कारहमेस सर्व सिद्धोकों, जोदेवतोंकेभी ग्गमुवगयाणं, नमोसयासब्वसिद्धाणं, जोदेवा शास्वत जगत् ये, सासओ, ३ सिद्धभयेहैं, १८ प्रतिक्रमण. देवहैं, जिनोंकोंदेवताभीदोहाथजोडकैनमस्कारकरतेहैं, उसदेवकों,देवेंद्रोंने णविदेवो, जंदेवापंजलीनमंसंति, तंदेवदेवम पूजा, मस्तकसें वंदनकरताहूंमहावीरदेवकों, २, एकभीनमस्कार, हियं, सिरसावंदेमहावीरं, २, इकोविनमुक्कारो, जिनवरमें वृषभ(श्रेष्ठ), वर्धमानखामीकों, संसारसमुद्रसें, जिणवरवसहस्स, वद्धमाणस्स, संसारसागराओ, तारतेहैं मनुष्यकों और स्त्रियोंकों, ३, गिरनारपहाडके, शिखरके ऊपर, दीक्षा, तारेइनरंवनारिंवा,३, उर्जितसेल, सिहरे. दिख्खा, केवलज्ञान, मोक्षकल्याणकजिनोंकामयाहै, वह धर्मकेचक्रवर्ति ऐसे, अरिष्टनेमीम नाणं, निसीहियाजस्स, तंधम्मचकवहि अरिहा गवानकोंनमस्कारकरताहूं, ४, चार, आठ, दस, दोय, बंदीजेहुयेहैं, नेमिनमंसामी, ४, चत्तारि, अठ, दस, दोअ, वंदिआ जिनसामान्यकेवलियोंमेंप्रधानचौवीस, परमार्थसेंकृतार्थहुयेहैं, जिणवराचउव्वीसं, परमट्ठनिहिअट्ठा, सिद्धा सिद्धिमुझकोंदेओ, ५, सिद्धिंममदिसंतु,५, में चाहताहूं हेक्षमाश्रमण, वांदणेकू, शक्तिकरयुक्त, जीवहिंसारहित इच्छामिखमासमणो, वंदिउं, जावणिजाए, नि प्रयोजनवालामेरेशरीरसें, मुझकोहुक्मदेओ, मुझें, प्रमाणयुक्तक्षेत्रमें प्रवेशकरणे, दुसराकाम सीहियाए, १ अणुजाणह, मे, मिउग्गहं, २ निसी। छोडके,नीचेझुकके,कायासें,आपकेपांव कायासें स्पर्शकरणे माफकरणा,हेभगवंतआपकोंकोई, हि, अहो, कायं, कायसंफासं, खमणि, जोभे, कि खेदउपजायाहो, योडिग्लानि, बहोतसमाधिभावसें, हेपूज्य, दिन; लामो, अप्पकिलंताणं, बहुसुभेण, भे, दिवसो, व वीताहै, तपनियमसंजमखाध्यायरूपयात्रा, इंद्रियऔरनोइंद्रियसेंखेदरहितआपकाशरीर, इक्वंतो, ३ जत्ताभे, ४ जवणिज, च, भे,५ हेभगवन्खमाताहूं, हेक्षमाश्रमण, दिनसंबंधी अपराध, खामेमि, खमासमणो, देवसियंवइक्कम, ६, आवश्यक प्रतिक्रमण. १ ९ , जंकिंचि, , , आ तस्स, खमा क्रियाकरते, मेंनिवर्तताहूं(दूरहोताहूं), क्षमाश्रमण(साधुओं)की, दिनमेंहुई, वसिआए, पडिकमामि, खमासमणाणं, देवसिआ. आशातनाकरकै, तेतीस आशातनामेसें, जोकुछ, मिथ्याभाव ए आसायणाए, तित्तीसन्नयराए, मि- रूपआशातना, मनसंबंधीपाप, वचनसंबंधीपाप, शरीरसंबंधीपापइत्या च्छाए, मणदुकडाए, वयदुक्कडाए, कायदुक्कडा दि, क्रोधरूपआशातना, मानआशातना, मायाआशातना, लोभआशातना, सर्वकालसंबंधी ए, कोहाए, माणाए, मायाए, लोहाए, सव्वकालिआ सबमिथ्याउपचारआशातनाकरकै. सवधर्मकरणीउल्लांघनेरूप, आशातनाकरणेसें ए, सब्वमिच्छोवयाराए, सव्वधम्माइक्कमणाए, जो, मेरेजीवनें, अतिचार, कीयाहोय, उसका, हेक्षमा सायणाए, जो, मे, अइयारो, कओ, श्रमण, मेंप्रतिक्रमताहूं(लांघताहूं),आत्मासेंनिंदताहूं, गुरुकीसाक्षीनिंदताहूं, मेरीपापीआत्मा समणो, पडिकमामि, निंदामि, गरिहामि, अप्पाणं कों वोसराताहूं(छुडाताहूं), ७, वोसिरामि, ७, पक्षीचोमासीसंवत्सरीअतिचारगाथा, ज्ञानमें, दर्शनमें, चारित्रमें, अतीचारकीगाथा, नाणंमि, दंसणंमिअ, चरणमि, तपमें, तेसेंहि वीर्य(पराक्रम)में, आचरण, वोआचारकहाताहै, इसतरेयेआ तवंमि, तहय, विरियंमि, आयरणं, आयारो, इअए चारपांचप्रकारका, कहाहै, १, जिसकालमें पढणेकाहुक्महो, विनयबहुमान, सूत्रपढतेतपक सोपंचहा, भणिओ, १, काले, विणएबहुमाणे, उवहा रणा, तेसेंपढाणेवालेगुरूकोभूलणानहीं, अक्षरशुद्धवोलणा,अर्थशुद्ध,सूत्रअर्थदोनोंशुद्धपढणा णे, तहअनिएहवणे, वंजणअत्थतदुभए, प्रकारकाज्ञानाचारकहाताहै,२, केवलीकेवचनमेंशंकानहींकरणी, जिनमतविगर अट्ठविहोनाणमायारो, २, निस्संकिय, निकंखिय, औरमतकीइच्छानहींकरणी, निश्चिति आठ ।

२०' प्रतिक्रमण. भावणेअट्ट, ३ नाय बाहिरे, , , , दुगंछानहींकरणी, अन्यमतकाचमत्कारदेखमोहितनहींहोणा, सम्यक्तीकीतारीफकरणी, गिच्छाअमूढदिट्टीअ, उववूह, थिरीकरणे, स्थिरकरणा,मदतदेणा वच्छल,प्प जैनधर्मकीमहिमाकरणीयेदर्शनाचार, सावचेतीसें, मनवचनकायाजोगयुक्त, पांचसुमतिसें, पणिहाण, जोगजुत्तो, पंचहिंसमिइहिं, तीनगुप्तीसें, येंचारित्राचार, आठप्रकारकाहोताहै, जाणना तिहिंगुत्तीहि, एसचरित्तायारो, अठविहोहोइ, ४, वारेप्रकारकातपमें, छप्रकारअभ्यंतर, छप्रकारवाद्य, चतुरपुरुष, व्वो, ४, बारसविहंमिवितवे, सम्भितर, कुसल, तीर्थंकरोंकाकहा, दुगंछाभावरहित, आजीविकादोषरहित, जाणना, वह, तपाचार, ५, दिहे, अगिलाइ, अणाजीवी नायव्वो, सो, तवायारो, ५, चारप्रकारकाअहारकात्याग, कमखाणा, द्रव्यवगेरेखानपानकासंक्षेपकरण, अणसण, मूणोयरिया, वित्तीसंखेवणं, छविगयोंमेंकाछोडना, कायाकोंकष्टदेणालोचादिक, अंगउपांगसमेटरखणा,येवाह्यतपहै, ६, रसञ्चाओ, कायकिलेसो, संलीणयाय, वझोतवोहोइ, ६, गुरुकेपास प्रायश्चित्तपापोंकालेणा पायच्छित्तं ज्ञानज्ञानीकाविनय, टहलवंदगी, तैसेंहींपांचतरेकास्वाध्यायकरना, ध्यानकरणा, कर्म विणओ, वेयावच्चं, तहेवसझाओ, झाणं, खपानेकायाकोवोसराणानिश्चै, अभ्यंतरतपहोताहै, ७, प्रगट है, बलवीर्यजिनोंका, उस्सग्गोवि य, अम्भितरोतवोहोइ, ७, अणिमूहिय, बलविरि पराक्रमकरतेहैं, जो, जेसेंतीर्थकरदेवोंनेकहातेसेंसमायुक्त, प्रवतेंजेसेंशक्तिकेमाफक ओ, पडिक्कमइ, जो, जहुत्तमाउत्तो, मुंजइअजहाथाम, जाणना, वीर्याचार, नायव्वो, वीरिआयारो, ८ आपकीइच्छापूर्वक, हुक्मदीजिये, हेभगवान्, दिनसंबंधी अतिचारआलोचूं(प्रकासू), इच्छाकारेण, संदिसह, भगवन्, देवसिअंआलो, n .

प्रतिक्रमण. २१ , उम्मग्गो, - , सुए, , , आपकावचनकबूलकर प्रकाशताहूं, जोमेदिनसंबंधी, अतिचार, कियाहोय, इच्छं आलोएमि, जोमेदेवसिओ, अइआरो, कओ कायासंबंधी, वचनसंबंधी, मनसंबंधी, जिनागमविरुद्धवोलाहो, उन्मार्गसेवाहो, काइओ, वाइओ, माणसिओ, उस्सुत्तो, अकल्पसेवाहो, नहींकरणेयोग्यकियाहो, खोटेध्यानध्यानेसें,खोटेकामविचराहोय,अणाचारसें, अकप्पो, अकरणीजो, दुज्झाओ, दुन्विचिंतिओ, अणायारो, नहींइच्छणेयोगइच्छाकरीहो, श्रावककैजोउचितनहींसोकियाहो, ज्ञानमें, दर्शनमें, फेरचारि अणिच्छिअन्यो, असावगपाउग्गो, नाणे, दंसणे, च प्रदेशवतीरूपश्रावकधर्ममें, श्रुतमें, सामायकमें, तीनगुप्तिमें, चारकपायोंकरकै रित्ताचरित्ते, सामाइए, तिण्हंगुत्तीणं, चउण्हंक पांचअणुव्रतोंकअंदर तीनगुणव्रतोंकैअंदर, सायाणं, पंचण्हमणुब्बयाणं, तिण्हंगुणव्वयाणं, च चारशिक्षाव्रतोंकैअंदर, वारे प्रकारके श्रावकधर्मकैअंदरमें, उपहं सिख्खावयाणं, वारसविहस्स सावगधम्मस्स, जोदेशसँखंडितकियाहो, सर्वसेंविराधाहो, वहमिथ्याहोमेरा पाप, खंडियं, जंविराहियं, तस्समिच्छामि दुकडं, सभी दिनसंबंधी, दुष्टचिंतनकरणेसें, दुष्टवचनकहणैसें, दुष्टचेष्टाक सञ्चस्सवि, देवसिअ, दुचिंतिअ, दुम्भासिय, दुचिटि रणेंसें, वहमिथ्याहुओमेरापाप, अ, तस्समिच्छामिदुकडं, अथवंदित्तूसूत्रश्रावकातीचारलिख्यते, वांदणाकरकै, सर्वसिद्धपरमेश्वरकों, अथवंदित्तुमूत्र१वतातीचार, वंदितु सव्वसिद्धे, धर्मकेदाताआचार्यकों, उपाध्यायसेंसर्वसाधुओंकों, मेंचाहताहूंपापोंकोंप्रतिक्रमणे, श्राव धम्मायरिएअ, सव्वसाहू, इच्छामिपडिक्कमित्रं, कधर्ममेंलगेअतिचारोंकों, १, जोमुझकोंबतो अतिचारलगाहो, ज्ञानमें तेसें दर्शनमें नाणेतहदंस वगधम्माइआरस्स, १, जोमेवयाइयारो, चारित्रमें, सूक्ष्म(थोडा) वादर(वडा) अथवा, उसकोंनिंदताहूं गुरुसमक्षनिंदताहूँ, णेचरित्तेअ, सुहुमोअवायरोवा, तंनिंदेतंचगरिहा , २२ २ प्रतिक्रमण वंदित्तु. " २, दोप्रकारका परिग्रह, पापका, बहोतप्रकारका, आरंभवाला, मि, २, दुविहेपरिग्गहंमि, सावजे, बहुविहेअ, आरंभे, दूसरेसेंकरायाहो, ओरआपकीयाहो, प्रतिक्रमताहूंमेंदिनकेकियेसवअतिचारोंकों, ३, कारावणे, अकरणे, पडिक्कमेदेसिअंसव्वं, ३, जोबांधाहोइंद्रियोंकरकै, चारों, कषायोंकरकै, अप्रशस्त(बुरेभावोंकरकै), जंबद्धमिदिएहिं, चउहि, कसाएहिं, अप्पसत्थेहिं, रागकरकै, दोषकरकै, उसकोंनिंदताहूं, फेरगुरुसन्मुखजादाकरकैनिंदताहूं, ४, जाते रागेणव, दोसेणव, तंनिंदे, तंचगरिहामि, ४, आते, मिथ्यात्वीकेठिकाणेखडारहते, इधरउधरफिरते, उपयोगविगर, राजाओ मणे, निग्गमणे, ठाणे, चंकमणे, अणाभोगे, अभि रबहोतलोकोंकेआग्रहसें, पराधीनपणे, प्रतिक्रमताहूंगेदिनसंबंधीसवअतिचार, ५, ओगे, अनियोगे, पडिक्कमेदेसियंसव्वं, ५, जिनवचनमेंशंका,अन्यमतवांछा,तथाधर्मकेफलमेंसंदेहदुगंछा,मिथ्यात्वीकीप्रशंसा,तेसेंपरिचय संका, कंख, विगंच्छा, पसंस, तहसंथवो, मिथ्यात्वीकुलिंगीसें, समकितकेअतिचारमें, प्रतिक्रमता९मेदिनसंबंधीसव, ६, छक्काय कुलिंगीसु, सम्मत्तस्सअइआरे, पडिक्कमेदेसियंसव्वं, ६, छक्का केसमारंभ वर्तणेसें, आपरांधते, ओरदूसरेकेपासरंधाते, ओर जो, दोषलगाहो, अपणे यसमारंभे, पयणेअ, पयावणेअ, जे, दोसा, अर्थे, परायेकेअर्थे, अपणेपरायदोनोंकेअर्थ,उसकोंनिंदताहूं, ७, पांचअणुव्रतकेविषे, हाय, परहा, उभयट्ठा,चेवतंनिंदे, ७, पंचन्हमणु गुणव्रतोंकेविषै, फेर, तीनअतीचारलगाहो, शिक्षाव्रतमें, व्वयाणं, गुणव्वयाणं, च, तिन्हमइयारे, सिक्खाणं, फेर, चारअतिचार, प्रतिक्रमताहूंमें, दिनसंबंधी सव, ८, पहले, अणुव्रत, च, चउन्हं, पडिकमे, देसियंसव्वं, ८, पढमे, अणुब्व केविषै, बडेसोस्थूल, प्राणातिपातकी, निवृत्तिकाउल्लांधणेसें, जोआचरणसेवाहोय पाणाइवाय, विरईओ, आयरियम बुरेपरिणामोंसें, इसलगे, प्रमादकै, प्रसंगसें, ९, मारणा, वांधणा, अवयव, इत्थ, पमाय, प्पसंगणं, ९, बह, बंध, छवि अत्त , , , यंमि, थूलग, , , प्पसत्थे, , प्रतिक्रमण. २३ काच्छेदणा, जादाबोझालादणा, खाणेपीणेकाअंतरायकरणा, पहलेव्रतका, छए, अइभारे, भत्तपाणवुच्छेए, पढमंवयस्स, अतिचारमें, प्रतिक्रमताहूंमें, दिनसंबंधीसव, १०, दूसरेअणुव्रतमें, अहयारे, पडिकमे, देसिअंसव्वं, १०, बीएअणुव्व अति बडे, झूठेवचनकेत्यागरूप, विरतीकूउलंघनकरके, येम्मि, परिथूलग, अलियवयण, विरईओ, जोआचरणकियाहोबुरेभावोंकरकै, इसजगे, प्रमादके, प्रसंगसें, ११, विगरविचा आयरिअमप्पसत्थे, इत्थ,पमाय,प्पसंगणं, ११, सहस्सा, रेछीपीभईवातकरणेवालेपरराज्यविरुद्धगुनालगाणा, स्त्रीकीकहीवातजाहिरकरी, झूठाउपदेश, रहस्सदारे, मोसुवएसेअ, कूडलेहेअ, बीअवय झूठालिखतकिया, दूसरेव्रतकेअतिचारकों, प्रतिक्रमताहूंदिनसंबंधीसब, १२, तीसरेअणुव्र स्सअइयारे, पडिक्वमेदेसियंसव्वं, १२, तइएअणु तमें, वडा, परायेद्रव्यके, हरणेकी, विरतीकूउलंघनकरकै, जो आचरण व्वयंमि, थूलग, परव, विरईओ, आयरिअ, कीया, बुरेपरिणामोंसें, इस जगे, प्रमादकेप्रसंगसें, १३, चोरीकामाललेणा, मप्पसत्थे, इत्थ, पमायप्पसंगेणं, १३, तेनाहडप्पओ खोटीचीजकोंअसलीवणावेचणा, राजकामहसूलचोरणा, खोटेतोलरखना, खोटेमापर गे, तप्पडिस्वे, विरुद्धगमणेअ, कूडतूल, कूडमा- खणा, प्रतिक्रमताहूं[पापोंकोलांघताहूं]दिनकेकियेसब, १४, चौथाअणुव्रतमें, णे, पडिक्वमेदेसियंसव्वं, १४, चउत्थेअणुव्वयंमि, हमेस, परस्त्रीकेसंगगमनकरणेकीविरतीकोंलांघकै, जोआचरणकियाहो, अप्रसस्त निचं, परदारगमणविरईओ, आयरिअ, मप्पस- भावकरकै, इसजगेप्रमादकेप्रसंगसें, १५, कंवारीअथवाविधवाकेसंगरमण, दूसरेकी त्थे, इत्थपमायप्पसंगेणं, १५, अपरिग्गहिया, रखीवेस्यांसेंरमण, कामक्रीडा, परायेव्याहकराणा, कामभोगमेंजादाअनुराग, र, अणंग, वीवाह, तिव्वअणुरागे, चौथेवतकेअतिचारमें, चउत्थवयस्सइयारे हरण, २४ प्रतिक्रमण. राहोय, ओर सवत " N प्रतिक्रमताहूं, दिनसंबंधी सव, १६, इसकेवाद, अणुव्रत, पांचमें में, आच पडिक्कमे, देसियंसव्वं, १६, इज्ञो, अणुव्वए, पंचमंमि. बुरेभाव वर्तते, परिग्रहके प्रमाणकूउल्लंघकै, इस जगे प्रमादके यरिअ, मप्पसत्थंमि, परिमाणपरिच्छेए, इत्थपमाय प्रसंगसें, १७, धन, धान्य, क्षेत्र, मकानदुकान, रूपा, सोना, प्पसंगणं, १७, धण, धन्न, खित्त, वत्थू, रुप्प, सुवन्नेअ, कु रेकेधातू प्रमाणउपरवधादेखके, दासदासीदोपग्गे, जानवरचोपग्गे, प्रतिक्रमताहूं दिनसंवं विअपरिमाणे, दुप्पए, चउप्पयंमि, पडिकमेदेसि धीसवकों, १८, जाणेकेप्रमाणसे जादाजाते, दिशाओंमें अर्धदिसि, नीचीदिसि, सव्वं, १८, गमणस्सउपरिमाणे, दिसासुउर्दू, अहेअति, तिरच्छीदिसि, फेरप्रमाणवधाते, अंतररस्तेमेंभूलकेजादागयाहो, पहलेगुणव्रतमें मेंनिंदताहूं, रिअंच, बुड्डिस्सइ, अंतरद्धा, पढमंमिगुणवएनिंदे, १९, मदिरा और मांस और पुष्प और फल और अतरादि पुष्पमाल और १९, मजंमिअ मंसंमिअ पुप्फेअ फलेअ गंध मल्लेअ एकवेरभोगण चेर २ भोगण दूसरे गुणव्रतमें निंदताहूं, उवभोग, परिभोगे, बीअंम्मि, गुणब्धए, निंदे, २०, स वस्तुखाईहो,सञ्चितमिलीवस्तुखाईहो,विगरपकी, आधाकच्चाआधापक्का,आहारकियाहो, तुच्छ चित्ते, पडिबद्धे, अपोल, दुप्पोलियं, चआहारे, तुच्छो फलादिक खायाहोय, में प्रतिक्रमताहूं दिनसंबंधी २१, सहिभख्खणया, पडिक्कमेदेसिअंसव्वं, २१, अग्निकर्म, वनकर्म, पशुवेचणा, भाडाकमाणा, कूआदिखोदाणा इंगाली, वण, साडी, भाडी, फोडी, येवर्जनाकर्म व्यापार और निश्चै दांतका, लाखका, रसोंका, केसका, मुवज्जएकम्मं वाणिज्जंचेच. दंत, लख्ख, रस, केस, जहरका, शस्त्रोंका इसतरेनिश्चै, यंत्र पीलणेकाकर्म खसीकरणा और अग्नि विस, विसयं एवंखु, जंत पिल्लणंकम्म, निलंछणंच व दाहदेणा, सरोवरद्रह तलाव सुकाणा, सरदहतलावसोसं, २०, सचित्त सवको, दाणं, , तण, कहे, प्रतिक्रमण. २५ असती व्यभिचारणी हत्यारीस्त्रीका, पोषणवर्जना, २३, शस्त्र, असइ, पोसंचवजिज्जा, २३, सत्थ, अग्नि, मूसल, यंत्रमीलादिक, घास, काष्ठ लकड], मंत्र, जडी, गोलीचूरणवगेरेवस्तु, ग्गि, मुसल, जंतंग, मंत, मूल, भेसजे, दियाहो, दूसरेसें दिरायाहो, प्रतिक्रमता९दिनसंबंधीसवोंकों, २४, विगरछाणेजलसेंन्हाया दिन्ने, द्वाविएवा, पडिकमेदेसियंसब्वं, २४, न्हाणु,वण, उवटणा, रंगकरणा, केसरादिसेविलेपनशब्द,रूप,रस,गंध, कपडा,आसन, गहणा, वन्नग, विलेवणे,सद्द,रूव,रस,गंधे, वत्था,सण, आभरणे, प्रतिक्रमता(मेदिनसंबंधीसवोंकों, २५, कामभोगकीवातकरी, लोकोंकोंहसाया, वाचालप- पडिकमेदेसिअंसव्वं, २५, कंदप्पे, कुकुइए, मोहरि, गेज्यूंत्यूंवोला, शस्त्रतइयारकिये, भोगउपभोगकीवस्तुजादारखी, अनर्थदंडविरमणनामके, अहिगरण, भोगअइरित्ते, दंडंमिअणहाए, तीसरे,गुणव्रतमें, मेंनिंदताहूं, २६, मनवचनकायातीनप्रकारकेदुष्टव्यापारमें, अविन तइमि,गुणवए, निंदे, २६, तिविहेदुप्पणिहाणे, यपणेअधूरीसामायकपारी, तेसें, सामायकलेभूलजाना, सामायकखोटीरीतसेंकरी, पहले, वडाणे, तहा, सइविहूणे, सामाइअवितहकए, पढमे शिक्षाव्रतमैं में निंदताहूं, २७, प्रमाणक्षेत्रवाहिरसेंचीजमंगाई, दूसरकोंभेजा, शब्दखांसी- सिखावएनिंदे, २७, आणवणे, पेसवणे, सद्दे, करकै, रूपदिखाकै, कंकरादिनाखकैजणाना, देशावगासिकनामके, दूसरे, सिक्षाव्रतमें, स्वेअ, पुग्गलख्खेवे, देसावगासिंअंमि, वीए, सिखावए, मनिंदताहूं, २८, संथाराअच्छीतरनपडिलेहालधुनीतिवडनीतिकीभूमीनहींपडिलेही, संथारुच्चारविही, प्रमादसेंसेंनिश्चैभोजनकाफिकरकरे, पोषधकी विधिविपरीतकरणेसें, तीसरेशिक्षात्रतमें पमायतहचेवभोअणाभोए, पोसहविहिविवरीए, तइएसिख्खावए मेंनिंदताहूं, २९, साधूकेदणेयोज्ञवस्तूपरसच्चित्तवस्तूडालणा, निंदे, २९, सचित्तेनिक्खिवणे, सचित्तवस्तूसेंढांकणा, पराईवस्तुअपणीअपणीकोंपराईकहणी, गर्वयाईआंसें पिहिणे, मच्छरेचेव, ववएस, अण- निंदे, २८, २६ प्रतिक्रमण. वस्तवीताकैदानदैण चोथेशिक्षात्रतमेंनिंदताहूं ३०, सुविहितकेविषै, रोगीतपेश्वरीदुर्बल कालाइक्कमदाणे चउत्थेसिख्खावएनिंदे, ३०, सुहिएतुअ दुहिएसु- दुखीकैविषै, जोमैंनें,नहींखच्छंदचारी गुरुआज्ञाकारी ऐसैमुनिकोंअनुकंपा गोत्रीजाण दान, अ, जोमे, अस्संजएसु, अणुकपा, अपणसमझ, वा द्वेषसेंदियाहो, वहनिंदता, ओर वहगुरुसमक्षनिंदताहं, ३१, रागेणव, दोसेणव, तंनिंदे, तंचगरिहामि, ३१, साधुओंमेंसंविभाग, नहींकियाहो,तप, चरणसित्तरी,करणसत्तरी, युक्तहोतेहुयेमी, निर्दोपआ- साहसुसंविभागो, नकओ,तव, चरण, करण, जुत्तेसु, संते,फासुअदाणे हारादिदान उसवातकों निंदताहूं गुरुसमक्षविशेषनिंदताई,३२,इसलोकमेंपरलोकमें जीवणेकी तंनिंदेतंचगरिहालि, ३२, इहलोएपरलोए, जीवि मरणेकी वांछाकरणी, मनकाव्यापारसें, पांचप्रकारका, अतिचार, मत मरणेअ, आसंस, पओगे पंचविहो, अइआरो, माम- मुझे होणा, मरणांततक, ३३, कायोत्सर्गवगेरे कायाके व्यापारसें, जीववववगेरेकायासें, हुज, मरणंते,२३, काएणकाइअस्स, पडिकमे किये अतिचारकों, प्रतिक्रमताहूं वचनदोषकुं, मनदोषकू, देवतत्वमें शंका मनके अतिचारकों, वाइअस्सवायाए, सणसामाणसिअस्स, सर्व ब्रतोंके अतिचारकों, ३४, दोतरेकावंदन, १२ व्रत, दोतरेकी शिक्षा, तीनगारव, सदस्स वयाइआरस्स,३४, वंदण वय, सिक्खा, गारवेसु, चारसंज्ञा, चारकषाय, तीनदंड, तीनगुप्ती, पांच सुमतीमैं, जो जो अतिचार कलाय, दंडेसु, गुत्तीसुअ, समिईसुअ, जो अइआ- हुआहो, उसको निंदताहूं, ३५, सम्यकदृष्टी, जीव, जोकोई, पापसमा- रो, अतंनिंदे, ३५, सम्मद्दिट्ठी, जीवोजविहु, पावं, स- चरे [करें], किंचित् [थोडा], अल्प[थोडाभी]होयवंघ, जिसकारण नहीं, निर्दयपणे मायरइ, किंचि, अप्पोसिहोइबंधो, जेणननिळ्ध- हिंसाकाव्यापारकरताहुआ, ३६, उसकोभीमें, प्रतिक्रमणकरणेसेंयुक्त, पछताणकरणेयुक्त संकुणा, ३६, तंपिहु, सपडिक्कमणं, सप्परि आवं, गुरुदत्तप्रायश्चित्तकरता, श्रावकजलदीशमाताहै, व्याधि(रोगोंकू जेसेंअच्छासीखाभयावैद्य, सउत्तरगुणंच, खिप्पंउवसामेई, वाहिव्वसुसिख्खिओविजो, जं. सन्ता , " इय, निंदिअ, , , प्रतिक्रमण. २७ ३७, जेसें विषपेटमेंप्राप्तहोकेफेलेहुयेकों, मंत्रऔरजडीयोंकेजाणकार, विद्या- ३७,' जहाविसंकुछगयं, मंतमूलविसारया, লিজা सेनासकरदेता, मंत्रोंसें, उससेंवहजहरहोताहैविषरहित, ३८, इसतरेआठप्रकारकाकों हणंति, मंतेहिं, तोतंहवइनिविलं, ३८, एवंअचिहंक- कों, रागद्वेषसें, बांधेमये, गुरूकेपासअपनेपापप्रकाशता, निंदाकरता, जलदी, म्मं, रागदोल समज्जियं, आलोअंतोअ, लिंदतो, खिप्पं, हणदेताहै, अच्छाश्रावक, ३९, कराहैपापजिसनेंएसामीमनुष्य, पापोंकोंप्रका- हणइ, सुसावओ, ३९, कयपावोविमणुस्सो, आलो- शता, आत्मासाखसेंनिंदता गुरुकेपास, होताहै जादाकरकै, हलका, जेसें गुरुसगासे, होइअइरेग, लहुओ, . · ओ भारकूउतारकर, भारकाउठाणेवालाहोताहै, ४०, आवश्यककरणेसें, इससें, श्रावक हरिअभरुव, भारवहो, ४०, आवस्सएण, एएण, साव जोकेआरंभतथापरिग्रहसेंबहोतपापीहोय, पापरूपदुःखोंका नास, ओजइविबहुरओहोह, दुख्खाणमंतकिरिअं, का- करताहै, थोडेही, कालमें, ४१, आलोचनाकीरीति, बहुततरेकीहै, नहीं ही, अचिरेण, कालेण, ४१, आलोअणा, बहुविहा, नय यादआईहोय, अतिक्रमणकरणेकेवख्त, मूलगुणमें, उत्तरगुणमें, उसकों संभरिआ, पडिकमणकाले, सूलगुण, उत्तरगुणे, . तंनि- में निंदताहूं उसकोंफेरगर्हताहूं, ४२, वह धर्मश्रावकका, केवलीभगवानकाकहाभया, दे,तंचगरिहामि, ४२, तस्सधम्मस्त, केवलिपन्नत्तस्स, मेंउठाहूं, आराधनाकेवास्ते, निवर्ताहूं(दूरहुया)विराधनासें अन्भुडिओमि, आराहणाए, विरओमिविराहणाए, मनवचनकायात्रिविधपापसेंनिवर्ताहुया, मेंवांदताहूंचउवीसजिनोंकों, ४३, इसपाठ- तिविहेणपडिकतो, वंदामिजिणेचउव्वीसं, ४३, जावं- काअर्थ, नमोत्युणं पाठमें लिखाहै, तिचेइआइं उड्डे अहेअतिरिअलोएअ सव्वा ई ताई वंदे इहसंतोतत्थसंताई ४४ जावंतकेविसा- हू भरहेरवय मह विदेहेअ. सव्वेसिंतेसिंपणओ तिवि . , , , बोहिंच, २८ प्रतिक्रमण. वहोतकालसेंसंचाभया पापळूनासकरणेवाली, हेणतिदंड विरयाणं ४५, चिरसंचिय पावपणासणीइ, भवसतसहस्र(लाख)मथनेवाली, चौवीसतीर्थंकरोंकेमुखसें निकली भई, भवसयसहस्स महणीए, चवीसजिण, विणिग्गय, कथाओंकरकैवीतो, मेरे दिन, ४६, मेरे मंगलरूपहोअरिहंत, कहाइंबोलंतु, मे दिअहा, ४६, मम मंगलमरिहंता, सिद्धभगवान्साधु श्रुतधर्मफेरचारित्रधर्म, सम्यग्दृष्टीदेवता, देओसमाधि(चित्तकी सिद्धासाहू, सुअंच धम्मोअ, सम्मदिही देवा, दितुसमा हिंच थिरता), बोषि भवो भवधर्मप्राप्ति], ४७, निषेधणेयोअशुभकामकरणेसें, करणेयोज्ञ , . ४७, पडिसिद्धाणंकरणे, किचाण शुभकामनहींकरणेसें, प्रतिक्रमणहै, सूक्ष्मविचारपरश्रद्धानहींकरणेसेंतेसें, विपरीतप्ररूप- मकरणे, पडिक्कमणं, असद्दहणेय तहा, विवरीय- णाकरणेसें, ४८, खमाताहूं, सर्वजीवोंको, सर्वजीवखमणामेराअपराध, मित्रताहैमेरे परूवणाएअ, ४८, खामेमिसव्वजीवे, सव्जीवाखमंतुमे, मित्तीमेस- सर्व(भूतों)जीवोंसें, वैरभाव मेरे नहीं किसीसें, ४९, इसतरेमें, आलोचा(प्रकाशकिया) व्वभूएसु, वेरंमझनकेणइ, ४९, एव महं, आलोइअ, नि निंदाकरी गुरुसन्मुखगर्हणाकरी, दुगंछाकरीअच्छीतरे, त्रिविधप्रतिक्रमताहुआ, वंदना दिअगरहिअ. दुगंछिअंसम्म, तिविहेणपडिकंतो, वंदा- करताहूंमें जिनचोवीसोंकों, ५०, एसाश्रावकोंके सम्यक्तयुक्त १२ व्रतातिचारसूत्रसंपूर्ण ॥, मिजिणेचउव्वीसं, ५०, इतिश्रावकातीचारसूत्रं ॥, अथगुरूक्षामणा, इच्छापूर्वक, मुझेंहुक्मदीजिये, हेभगवान्, अथगुरुखामणा, इच्छाकारण, संदिस्सह, भगवन्, उठाहूं,में, अंदर, दिनकेअपराधकुंखमाणे, मेंयहचाहताहूं, अन्भुडिओ,मि, अम्भितर, देवसियंखामेळ, इच्छं, खमाताहूंदिनसंबंधी, जोकुछ, अप्रीतिभाव, जादाअप्रीतिभाव, मोजन, मेमिदेवसियं, जंकिंचि, अपत्ति, परपत्ति, भत्ते, पाणीमें, विनयमें, वेयावच्चमें, एकवेरबोलनेमें, बेर२बोलणेमें, उंचेआसन, पाणे, विणए, वेआवच्चे, आलावे, उच्चासणे, , खा- संलावे, , " तुम्भेजा- प्रतिक्रमण. २९ वरावरआसन, गुरुवातकरतेवीचमेंवोलाहो, गुरूकीवातपरवातकरीहो, जोकुछ, समासणे, अंतरभासाए, उवरिभासाए, जंकिचि- मेंविनय, रहितपणाकियाहो, सूक्ष्म अथवा, बादर(स्थूल), आपजाण- मझविणय, परिहीणं, सुहुमंवा, बायरंवा, तेहो, मेनहींजाणता, वहमिथ्याहुओमेरापाप(दुष्कृत], णह, अहंनजाणामि, तस्समिच्छामिदुकडं, आचार्य, उपाध्याय, शिष्य साधर्मी, कुलएकआचार्यका,गणवहु- आयरिय, उवज्झाए, सीसे, साहम्मिए, कुलगणेअ तआचार्यकापरिवार,जोमेनेंकियाकषाय, सर्वमनवचनकायासेंत्रिविधखमाताहूं, १, सर्व जेमेकेइकसाया, सव्वेतिविहेणखामेमि, १, सव्व श्रमणसंघरूप, भगवंतोंकू, दोहाथजोडकरमस्तकपर, सर्व स्ससमणसंघस्स, भगवओ, अंजलिंकरियसीसे, सव्वं पराधखमायकरकै, खमताहूं, सवोंकों, मैंभी, २, सर्वजीवोंकासमूह- खमावइत्ता, खमामि, सध्वस्स, अहयंपि, २, सव्वस्सजी- केसंबंधौकियेअपराध, भावसें, धर्ममें, स्थापनाकियाहै, अपणाचित्त, सौंकोंख वरासिस्स भावओ, धम्म, निहिय, नियचित्तो, सव्वंख- मायकरकै, खमताहूं, सवोंकों, मेंभी, ३, मावइत्ता, खमामि, सव्वस्स, अहयंपि, ३, मैं चाहताहूं, स्तुतिकरणेकू, नमस्कारहुओ क्षमावंतसाधुओंकों, इच्छामो, अणुसहिं, नमोखमासमणाणं, नमोहसिहा- नमस्कारहुओ वर्द्धमानखामीकों, चार्योपाध्यायसवसाधुभ्यः, ॥ नमोस्तुवर्द्धमानाय, (इओ) करणेवालेकोकेसाथ, उसकतॊकेजयसें मोक्षप्राप्तहोणेवाले, परास्तकर र्धमानायकर्मणा, तज्जयाव्याप्तमोक्षाय, परोक्षाय णेवाले कुतीर्थियोंकों, १, जिनोंकी खुलीहुई, कमलोंकीपंक्तिये तारीफ़कर कुतीर्थिनाम्, १, येषांविकचा, रविंदराज्या कमलकीश्रेणीकूधारणकरणे, सहसइसतरेसंगमिलणातारीफ क्रम, कमलावलिंद्धत्या, सहशैरिति संगतंप्रशस्यं . . , , , स्प- ज्यायः योज्ञचरण, , धातु, तुष्टिं, . चंद्रकों, ३० प्रतिक्रमण, लायककहाहुआ, हुओ मोक्षकेअर्थवहजिनेंद्र, २, . कषायरूपतापसेंपीड़ित कथितं, संतु, शिवायतेजिनेंद्राः, २, कषायतापार्दित प्राणीऑकूशांति, करताहै, जो, जिनराजके मुखरूपीमेघसेंनिकला, वह, जेष्ट जंतुनिवृत्ति, करोति, यो, जैनमुखांबुदोगता, स, शुक्र- महीनेमेंपैदाभयावर्षातकैजैसा, करो, संतोष, मेरेमें, विस्तारवाणी- मासोद्भववृष्टिसंनिभो, मंयि, विस्तरोगि- का, ३. निजश्वेत, सुगंधखसबोईसेंमस्त भमरेओरहिरण, मुखरूप राम, ३, स्वसित, सुरभिगंधालीढ, शृंगीकुरंग, सुखश हमेस, विभ्रमयुक्त, जो, धारतीहै, खुलेहुये कमल उच्चपर, शिन, मजनं, विभ्रती, या, बिभर्ति, विकचकमलनुच्चैः, वहफेरअचिंत्यमानप्रभाववाली, समस्तसुखकीकरणेवाली, प्राणोंकीमज- सास्त्वचिंत्यप्रभावा, सकलसुखविधात्री, प्राणभाजां. नवालीद्वादशांगीश्रुतअंगहैजिसका, श्रुतांगी, ४ इतिस्तुतिः, जयवंतहेमहाजसवंत २, जयवंतरहोहेमहाभाज्ञवंत, जयवंतवंछितसुभफलके, जयमहायस २, जयमहाभाग, जयचिंतिअसुहफ, देणेवाले, जयवंतसमर्थ, परमार्थकेजाणणेवाले, जयरहेजगद्गुरुगुणोसें लय, जयसमत्थ, परमत्थजाणय, जयरगुरुगरिम भारीहेगुरू, जयवंतदुःखसेंपीडितजीवोंकैरक्षाकरणेवाले, स्थंभणपुरमें विराज गुरु, जयदुहत्तसत्ताणताणय, थंभणयट्ठिय मानहेपार्थजिन, भव्यजीवहमेसडरावणेसंसारस्तोमका, डरकोंनहींगिणारते पासजिण, भवियहभीमभवत्थु, भयअवणंता एसेअनंतगुणी, तुमकोंत्रिकालनमस्कारहुओ, णंतगुण, तुझतिलंझनमोत्थु,. अच्छेअक्षररूपशालादेओ, द्वादशांगीजिनराजसेंपैदाभई, वहश्रुत सुवर्णशालनीदेया, द्वादशांगीजिनोद्भवा, श्रु देवीहमेसमुझकों, समस्तश्रुतज्ञानकीसंपदाकों, १, चारवर्णरूपसंघ तदेवीसदामा, . मशेषश्रुतसंपदं, १,.. चतुर्वर्णाय , , . - प्रतिक्रमणः ३१. का, देवीभवनकीवसणेवाली, समस्तपणेहणोपापयह, संघाय, देवीभवनवासिनी, निहत्यदुरितानेषा, करो सुख अखंडकों, जिसके क्षेत्रमें प्राप्तहुयेथके, साधू करोतुसुखमक्षतं, २, यासांक्षेत्रगतासंति, साध- तेसें श्रावकादिक, जिनराजकीआज्ञाकोंसाधतेरहेहुये, रक्षाकरो वः श्रावकादयः, जिनाज्ञांसाधंयंतस्ता, रक्षतुक्षे क्षेत्रकेदेवता, ३, त्रदेवता, ३, इतिस्तुतिः ॥ कमलकैपत्रजैसीविस्तारनेत्रोंवाली, कमलजैसैमुखवाली, कमलकैगांभ कमलदलविपुलनयना, कमलमुखी, कमलगभ- जेसीगौरवर्ण, कमलोंपरविराजमानभगवती, देओश्रुतदेवता, समगौरी, कमलेस्थिताभगवती, दद्याच्छृतदेवता, सुखकों, १, ज्ञानदर्शनचारित्रगुणोंकरकैयुक्त, पढणापढानाध्यानऔरसंजम, सौख्यं, १, ज्ञानादिगुणयुतानां, खाध्यायध्यानसंय- मैरक्त(मन), करो, भुवनदेवी, कल्याणहमेससवसाधुओंकै २ जिसके, मरतानां, विद्धातु भवनदेवी, शिवंसदासर्वसाधूनां, २ यस्याः, क्षेत्रकों अच्छीतरेआश्रयकरकै, साधुलोकसाधतेहैं क्रियानुष्ठान, वोक्षेत्रदेवताहमेस, क्षेत्रंसमाश्रित्य, साधुभिःसाध्यतक्रिया, साक्षेत्रदेवतानित्यं हुओतुमकों, सुखकेदेणेवाली, ३, परायेमतकशास्त्ररूपअंधेरेकोंसूर्यजैसे, भूयान्ना, सुखदायिनी, ३, इतिस्तुतिः, परसमयतिमिरतरणि, भवसमुद्र, जलकों, तिरणेकों, प्रधान, नावजैसे, रागरूपरजकोहवाजैसे, भवसागर, वारि, तरण, तरणिं, रागपरागसमीरं, वंदनकरताहूं देवमहावीरकों, १, रोककै, संसारकू, विहारकेकरणेवाले, दुःखसेहैं वंदेदेवं महावीरं, १, निरुद्ध, संसार, विहारकारि, दुरंत- अंतजिसकाएसेदुष्टभावरूपशत्रुगणकू नाशकरकै, हमेसकेवलियोंमेंप्रधान, तुमारा, भवोंका भावारिगणानिकाम, निरंतरंकेवलिसत्तमा, वो, भवा- वहणेवालामोहकेसमूहकोंहरो, २, संदेहकेकरणेवाले, . खोटेनयकेजोआगम, रूढी वहंमोहभरंहरंतु, २, संदेहकारि, : कुनयागम, वर, , ३२ प्रतिक्रमणे. वासे, , सेंगुप्त,ऐसेमोहरूपकादेवू, हरणे निर्मल, पाणीकेपूरजैसे, संसार, समुद्रकों, गूढ, संमोहपंक, हरणामल, वारिपूर, संसार,सागर समुत्त- तिरणे, नावसमान, एसावीरप्रभूकाआगम, उत्कृष्टसिद्धिकाकरणेवाला, नमनकर्ताहूं,३ रणोरु, नावं, वीरागम, परमसिद्धिकरं, नमामि, ३, जिसकीखसवोईकेसमूहलोभसें, खेंचेभयेचंचल, भ्रमरोंकीश्रेणी, ऐसेप्रधानकमलमेंहैनि- परिमलभरलोभा, लीढलोला लिमाला, वरकमलनि- वासजिनका, हार, अंधेरामें देदीप्यमान, जादासंसाररूप, कैदगृहकों, विच्छेद हार, नीहार, भासे, अविरलभव, कारागार विछि- करनेवाली, करो, कमलहैहाथमैं, मेरे, मंगल, हेदेवी, प्रधान, त्तिकारं, कुरु, कमलकरे, मे, मंगलं, देवि, सारं ४ इति अढाई संक्षाके, द्वीपसमुद्रकेविषै, पनरे अथ मुनिवंदन, ॥ अदाइजेसु, दीवसमुद्देसु, कर्मभूमीकेविषै, जितने, कोईभी, साधूहै, रजोहरण[ओघा], गुच्छ, रसकम्मभूमीसु, जावंत, केवि, साहू, रयहरण, गुच्छ, पात्रोंकों, धारणेवाले, १, पांचमहाव्रतकेधारणेवाले, अठारहजार, पडिग्गह, धारा, १, पंचमहव्वयधारा, अट्ठारससहस्स, शीलकेअंगकोंधारणेवाले, संपूर्णआचाररूपचारित्रकेपालक, उनसबोंको, निलाइसें, सीलंगधारा, अख्खयायारचरित्ता, तेसव्वे, सिरसा, मनसें, मस्तकसे, वंदनकरताहूं, १, मनसा, मत्थएण, वंदामि, १, शंख, मूंगे, लीलम, मेघ, जेसारंगवाला, दूरगया वर, कणय, संख, विहुम, मरगय, सन्निहं, विगय हैमोहजिनोंका, सत्तरऊपरसोतीर्थंकरोकों, सर्वदेवतोंनेपूजा, मेंवंदनकर्ताहं, मोहं, सत्तरिसयंजिणाणं, सव्वामरपूइयं, वंदे, १ श्रीस्तंभनकपुरभैरहेभये, पार्श्वनाथस्वामीकों, वहइनतीर्थ, पतीकों सिरिथंभणयडिअ, पाससामिणो, सेसतित्थ, सामीणं, तीर्थकेउन्नती(उदय)केकारण, सुर, असुरोंके, फेर, सर्वोके, १, तित्थसमुन्नइकारणं, सुरा, सुराणं, च, सब्वेसिं, १, प्रधान, सुवर्ण, घण, , , २, , प्रतिक्रमण. ३३ इनोंके, में, स्मरणार्थ, कायोत्सर्ग, करताहूं, सक्तीयुक्त, भक्ती एस, महं, सरणत्थं, काउसग्गं, करेमि, सत्तिए, भत्ती- करकै, .गुणसुस्थित, संघके, अच्छीउन्नतीकेवास्ते, करताहूं, कायोत्स- ए, गुणसुडिअस्स, संघस्स, समुन्नइनिमित्तं, करेमि, . का गै(कायाकूवोसराना), २, उसग्गं, अथजिनप्रतिमावंदन, श्रीसेढी, नदीके, तटपर, नगरप्र- अथचैत्यवंदन ॥ श्रीसेढी, तटिनी, श्रीसेढी, तटिनी, तटे, पुरव- धान, श्रीस्तंभनकनाममें, देवताकेवचनसें, श्रीपूज्य, अभयदेवसूरिः, रे, श्रीस्थंभने, खगिरी, श्रीपूज्या, भयवसूरि, पंडितोंकैखामीनें, अच्छीतरेआरोपणकिया, भलेप्रकारसींचनकिया,स्तवना विबुधाधीशैः, समारोपितः, संसिक्तः,स्तुतिभि,र्ज करकैजलसें, निरुपद्रवमुक्तिफल, देदीप्यमान, फणावलीपत्र, श्रीपार्थ, शिवफल, स्फूर्जत्, फणापल्लवः, पाव नाथकल्पवृक्ष, वहमेरे, देओ, हमेस, मनवंछित, १, मनसंवं कल्पतरु, समे, प्रथयतां, नित्यं, मनोवांछितं, १, आ धीपीडा, शरीरकीपीडा, हरोहेदेव, जीरानामपल्लीके, मस्तकौमणीजैसे, श्रीपार्थ, धि, व्याधि, हरोदेवो, जीरापल्लि, शिरोमणिः, पार्श्व, नाथ, जगत्केखामी, नमनकरणेसेंहेनाथ, मनुष्योंकेकल्याणकारीहुओ, नाथो, जगन्नाथो, नतनाथो. नृणांश्रिये, २, चारकषायरूप, प्रतिमल्लकोउखेडनेवाले, दुःखसैंजीतीजै, एसाकामदेवकेमां चउकसाय, पडिमल्लुल्लुरण, दुज्जय, मयणमाण नकोंमोडनेवाले, रसयुक्त, प्रियंगुजैसा,रंग, हस्तीजैसेचालजिनोंकी, जयवंत,. मसमूरण, सरस, पियंगु,वण्ण, गयगामी, जयज, पा पार्श्वनाथभुवनतीनके, खामी, १, जिनोंकेशरीरकीकांति, मुखमलजेसा, स्निग्ध स,भुवणत्तय, सामी, १, जसुतणुकंति, कडिप्प, .. [चीकणा] वह, प्रभु, पार्श्वनाथ, देओ, वंछित, २, .. णिद्धउ, सो, पहु, पास, पयत्थर, वंछिय, २, . , , - , प्रतिक्रमण. " हमेस, , सर्वसें, अर्हत, भगवंत, इंद्रोकरकैपूजित, सिद्धभगवान,फेर, मुक्तिभैरहेभये, अहंतो, भगवंत, इंद्रमहिता, सिद्धा,श्च, सिद्धिस्थिता आचार्यभगवान्, जैनशासनकी, उन्नतीकरणेवाले, पूजनीकउपाध्याय, आचार्या, जिनशासनो, नतिकराः, पूज्याउपाध्या भगवान्, श्रीसर्वज्ञकासिद्धांतअच्छीतरेपढाणेवाले, मुनिवर(प्रधान)रत्नतीनके यकाः, श्रीसिद्धांतसुपाठका, मुनिवरारत्नत्रयारा आराधक, पांचयह, परमेष्ठी, करो तुमको, "मंगल, १, धकाः, पंचैते, परमेष्ठिना, प्रतिदिनं, कुवतु,वो, मंगलं, १, अथपोसहका, प्रत्याख्यान, करताहूं, में,हेपूज्य,पौषधकों, आहार अथपोसहपञ्चखाण,॥ करे,मि,भंतेपोसहं, आहा- कापौषधकों, देशसे, सर्वसें, अथवा, शरीरकासत्कारस्नानादिकका, पौषध, रपोसह, देसओ, सव्वओ, वा, सरीरसंकार, पोसह, ब्रह्मचर्यकापौषधकों, सर्वसें, अव्यापारकापौषधकों, सव्वओ, बंभचेरपोसहं, सव्वओ, अव्वावारपोसह, सर्वसें, चारप्रकारकापौषध, सावध(पापकारी)जोगका, प्रत्याख्यान सव्वओ, चउव्विहेपोसहे, सावजंजोग, पच्चख्खा में, जहांतक, दिन, दिन, रात, अथवा, सेवाकरूंगामें, दुविध, मि, जाव, दिवसं, अहो, रत्ति, वा, पज्जुवासामि, दुविहं, त्रिविधकरके, मनसें, वचनसें, कायासें नहींकरूं, नकरा तिविहेणं, मणेणं, वायाए, कारणं, नकरेमि, नका उसकाहेपूज्य, प्रतिक्रमताहूं, निंदताहूं, गुरूकीसाक्षीनिंदताहूं, रवेमि, तस्सभंते, पडिकमामि, निंदामि, गरिहामि, आत्माकोंवोसराताहूं, अप्पाणंवोसिरामि, ठिकाणेसेंचलनाहिलना, फिरना, उपयोगसें, अथवानिरुपयोगसें, हरित ठाणेकमणे, चंकमणे, आउत्ते, अणाउत्ते, हरियका- वनस्पतीकासंघद्दकियाहो, बीजकायसंघट्टकियाहो, थावरकायकासंघद्दकियाहों, यसंघ, बीयकायसंघ, थावरकायसंघहे, , , उं, - प्रतिक्रमण. ३५ जूंवगेरेकासंघडकियाहो, सर्वइनोंमेंसें, दिनमें, खोटाविचारकियाहो, प्पइआसंघ, सव्वस्सवि, देवसिय, दुचिंतिअ, दु. खोटाबोलाहो, वेतरेवैठाहो, इच्छाकरकै, आज्ञादीजिये, चाहताहूं, भासिय, दुचिहिअ, इच्छाकारेण, संदिसह, इच्छ, उसका, मिथ्याहुओ, मेरा, पाप, तस्स, मिच्छा, मि, दुकडं, संथारारातकाविछाना, आधापीछाकिया, एकजगेसेंदूसरीजगेकिया, वेर२पांवोकोसमेटा, संथारा, उबद्दणकी, आउद्दणकी, परिअट्टणकी, वेरपसारा, जूंवगेरोंकीसंघटनाकरीहो, विनाआंखोंसेंदेखी पसारणकी. छप्पइआसंघट्टणकी, अचख्खुविस हुईजमीनपरदस्तपेशावकियाहो, सवरातसंबंधी, बुराविचाराहो, चुरावचनवो यकायकी, सव्वस्सविराइअ, दुचिंतिय, दुम्भासि लाहो, वेतरेबैठाहो, इच्छाकरके, हुक्मदेओ, चाहताहूंउनका, मिथ्या य, दुचिट्टिय, इच्छाकारेण, संदिसह, इच्छंतस्स, मि हुओ, मेरा, पाप, च्छा, मि, दुक्कडं,॥ जगत्में अथपोसहमेंकहणेउपदेसमालासिझाय ।। जगचू चूडामणी जैसे, ऋषभदेव, महावीर, तीनलोककेसिरमें, तिलकसमान, डामणिभूओ, उसभो, वीरो, तिलोयसिरिं, तिलओ, एकहीलोकमैआदित्य[सूर्य], एकहीनेत्रसमतीनभुवनके, १, एकवर्षत- एगोलोगाइचो, एगोचक्खूतिहुयणस्स, १, संवच्छ- क, ऋपभजिनराज, छमहीनेतकश्रीवर्द्धमानजिनचंद्र, इसतरे र, मुसभजिणो, छम्मासेवद्धमाणजिणचंदो, इय विचरे, विगरआहारकिये, यत्नकरोतपमें, इनोंकेउपमानकरके, २, विहरिया, निरसणा, जएज्जए, ओवमाणेणं, २, जो, पहले, तीनलोककेनाथ, सहनकिया, बहोतसे, नीचतुच्छलोकों जइ, ता,...तिलोयनाहो, विसहइ, बहुयाई, असरिस . . ...

३६ प्रतिक्रमण. , गणधर, , पढम, गण , मनुष्योंका, एसेजीवकोअंतकारकमरणजेसादुख, एसीक्षमा, सर्वसाधुओंने करणी जणस्स, इयजीयंतकराई, एसखमा, सव्वसाहु ३, नहींध्यानसेंचलायसके, बड़ेमवडाप्राक्रमकियावर्द्धमानजिनचंद्रनें, णं, ३, नचइज्जइचालेलं, महइमहावद्धमाणजिण उपसर्गहजारोंकरणेसेंभी, मेरूपहाडजैसेंनहींडिगागूंज चंदो, उवसग्गसहस्सेहिवि, मेरुजहावायगुं- हवासें, ४, कल्याणकारीविनयकरकैविनीत, प्रथम, जाहिं, ४, भद्दोविणीयविणओ, समस्तश्रुतज्ञानकेधरणहार, जाणतेहुयेभीउसश्रुतकेअर्थकों, हरो, समत्तसुयनाणी, जाणतोवितमत्थं, वि अचरजयुक्तहृदयसें, भगवानसेंपूछकेफेरसुणासव, ५, जोआज्ञाहुक्मदेवे म्हियहियओ, सुणइसव्वं, ५, जंआणवेइरा- राजा, नगरआदिककेलोकउसकुँमस्तककरकेचाहतेहैं, इसतरेगुरु या, पयइओतंसिरेणइच्छंति, इइगुरुजण जनोंकेमुखकाकहाहुआ, दोनोंअंजलीपुटसें, सुणनाचाहिये, ६, जेसें मुहभणियं, कयंजलिउड्डेहिं, सोयब्वं, ६, जह देवतोंकेगणसमूहमेंइंद्रशक्र, ८८ग्रहगण तेसें तारागणसमूहमेंजैसेंचंद्र, सुरगणाणइंदो, गहगणतारागणाणजहचंदो, जैसे, प्रजासमूहमें, नरेंद्रराजा, तैसेंसाधूओंकेसंघमेंभीगुरु, आचार्यआनंद- पयाण, नरिंदो, गणस्सविगुरु, तहाणंदो कारी, ७, वालकहैएसासमझराजाकों,' नहींप्रजा, अनादरकरतीहै, एसीहीओप. ७, वालुत्तिमहीपालो, नपया, परिहवइ, एसगुरु जिसवास्तेवयपर्यायसेंकमभीआचार्यकोअग्रेश्वरीकरकेविचरैसाधूतैसे उवमा, जंबापुरओकाउं, विहरंतिमुणीतहासो वहभी, ८, विशेषरूपवान, तेजवान, वर्तमानकालमेंप्रधानश्रुतवंत, मीठेव वि, ८, पडिख्वो, तेयस्सी, जुगप्पहाणागमो, महुर चनवोलणेवाले, वडेगहरे, धीरजवान, उपदेशदेणेमेतत्पर, ऎसैआचार्यहोतेहैं, वक्को, गंभीरोधिइमंतो, उवएसपरोय, आयरिओ, जय, मागुरूकीहै, . यहोतेहैं, १०, ई, , प्रतिक्रमण. ३७ ९, एककीकहीवातछिद्रदूसरेकोंनहींकहै, सौम्यमूर्ति, गुणकेसंग्रहकाखमाव, नियमा- .. ९, अपरिस्सावी, सोमो, संगहसीलो, अविग्गह दिधारणेवाले, विकथानकरे, स्थिरखभाववाले, प्रशांतहृदयऎसैगुरुगुणधारीआचा मईय, अविकत्थणो, अचवलो, पसंतहियओगुरुहो किसीभीकालमेंजिनवरेंद्र, प्राप्तहुयेअजरअमरस्थानमेंतबमा १०, कइयाविजिणवरिंदा, पत्ताअयरामरंपहंदा गैदेणेकू, आचार्यतीर्थचारसंघरूपकों, धारतेहैंसबज्ञानादिकसंपदासंपूर्ण, ११, , आयरिएहिंपवयणं, धारिजइसंपयंसयलं, ११, जिसकेपिछाडीचलतीहैएसीभगवती, राजाकीबेटीआर्याचंदनाजी, सहस्रलोकोंसेपूजापाती, अणुगम्मईभगवई, रायसुअज्जा, सहस्सवंदेहिं, तोभीनहींकरतीहैमानगर्वकों, जाणतीहैयेगुणकामहात्महैमेरानहींनिश्चै, १२, उसीदि तहविनकरेइमाणं, परिच्छइतंतहानूणं, १२, दिण. नकादीक्षालियाभयाकंगालकेभी, सन्मुखउठतीहै, साधवी, चंदनवाला, दिख्खियस्सदमगस्स, अभिमुहा, चंदणा, आर्या, नहींचाहतीहै, आसनकाग्रहनकरना, यहसबविनयसाधुओंका अज्जा, नेच्छा, आसणगहणं सोविणओस साधवियांकरतीहै, १३, वर्षसोकीदीक्षालीभईसाध्वियोंका, व्वअजाणं, १३, वरिससयदिक्खियाए, आजकेदीक्षालियेहुयेसाधुओंके, सन्मुखजाणा, द्वादशावर्त्तवंदना, ए अजदिक्खिओसाहू, अभिगमण, नमस्कारकरणादिक, आसनदानादिकविनयसेंसाधूपूज्यहै, १४, श्रुतचारित्ररूपधर्मपु विणएणसोपुज्जो, १४, धम्मोपुरिसप्पभ रुषोंसेंपैदाभयाहै, पुरुषोंमेप्रधानतीर्थंकरोंनेकहाइसवास्तेपुरुषधर्मवडाहै, लोकीकमें वो, पुरिसवरदेसिओपुरिसजिट्ठो, लोएविपहुपु भीसमर्थपुरुषहै, तोफेरक्याकहणालोकोत्तमधर्ममें, १५, संवाहनराजा, रिसो, किंपुणलोगुत्तमेधम्मे, १५, संवाहणस्सरनो, उसकेकाशीदेशवाणारसीनगरीमें, कन्याहजार, अधिक, तझ्यावाणारसीइनयरीए, कन्नासहस्स, महियं, अज, अज्जा वंदण, मंसणेण, प्रतिक्रमण. ता सु, , होतीहुई, निश्चै, रूपवंती, १६, तोभी, वह, राज्यलक्ष्मी, आसि, किर, रूववंतीणं, १६, तहविय, सा, रायसिरी, पलटतीकू, नहींरक्षाकरीउनोंसें, पेटमेंरहाहुआएकनें, रक्षा उल्लहती, नताझ्याताहिं, उयरट्टिएणइकेण, करीअंगवीरनामपुत्रनें, १७, स्त्रियां, अच्छी, वहोतरहतेभी, इयाअंगवीरेण, १७, महिलाण, वहुयाणवि, म- अंदरसे, यह, समस्त, घरकासारधनादिक, राजाकेनोकरपुरुषलेजा झाओ, इह, समत्त, घरसारो, रायपुरिसेहिंनिज- तेहैं, जिसघरमेंजबपुरसजहांनहींहोयतो, १८, क्यापरमनुष्योंकूबहो इ, जेणेविपरसोजहंनत्थि, १८, किंपरजणवहु तजणाणेसेंचाकवीकराणेसें, अच्छाहैआत्माकीसाक्षीसेंकियासुकृत, इहां जाणावणाहिं, वरमप्पसक्खियंसुकयं, इहभर भरतचक्रवती, प्रसन्नचंद्रराजाकाद्रष्टांतहै, १९, अन्यमतधारी हचक्कवट्टी, पसन्नचंदोयदिवता, १९, वसोवि वेषधारतेहेवोप्रमाणनहीं, क्योंकेअसंजमजीवघातादिपदमें वर्त्ततेहुयेकों, क्याहु- अप्पमाणो, असंजमपएसुवमाणस्स, किंप आवदलाणेवेषसें, क्याजहरनहींमारताहैखाणेसेंनिश्चमारताहै, २०, धर्म रियत्तियवेसं, विसनमारेइखजंतं, कीरक्षाकरताहैवेष, संकताहैवेषकरकैदीक्षितजैनकासाधूहूं, जैसेंउन्मा ख्खइवेसो, संकइबेसेणदिख्खिओमिअहं, गमेंपडतेहुयेचोरजारादिकसें, रक्षाकरताहैराजादेशकों, २१, आत्माका ग्गेणपडतं, रक्खइरायाजणवओय, २१, अप्पा कृत्यजाणतीहैआत्मा, जैसारहाहुआहैआत्माकीसाक्षीसेंधर्मादिकअनुष्ठान, जाणइअप्पा, जहडिओअप्पसक्खिओधम्मो, आत्माकरतूं वहतेसा, जैसेंआत्मासुखकीवहणेवालीहोय, २२, अप्पाकरेइतंतह, जहअप्पमुहावहहोइ, २२, जिसरसमयमेंजीव, समस्तपणेप्रवेशकरताहैजिनरभावकरके,. बहउसर जंजंसमयंजीवो, आविस्सइजेणरभावेण, सोतमि २०, धम्मर , . , प्रतिक्रमण क क , समयमें, सुभअथवाअसुभबांधताहैकर्म, २३, धर्मअगरमदकरकै तंमिसमए, सुहासुहंबंधएकम्म, २३, धम्मोमएणहूं हो, वहनहींहोताजेसेठंढगरमीऔरहवासेंहणीजताहुआ, एकवर्षतकभोज तो, तोनविसीउएहवायविजड्डिओ, संवच्छरम नविनाकिये, बाहूबलीराजऋषीतेसैक्लेशभोगताहुआ, २४, अपणी णसीओ, बाहुवलीतहकिलिस्संतो, २४, निअगं बुद्धिसेविकल्पित, विचारकरणेसें, स्वछंदबुद्धिसेंचलनेकरकै, मइविगप्पिय, चिंतिएण, सच्छंदवुद्धिचरिएण, हांसेंपरलोककाहितहोय, इसवास्तेकरणागुरूकैउपदेशसे, २५, अहंकारी तोपारत्तहियं, कीरइगुरुअणुवएसेणं, २५, थद्धो निरोपकारीकृतघ्न, विनयरहितअविनीत, गर्वितमानी, गुरूकूप्रणामनहींकरता, निरोवयारी, अविणीओ, गविओ, निरवणामो, एसासाधूजनोंके, निंदाकुरणेयोग्यहोताहै, मनुष्योंमभीदुष्टखभावीहैएसीहीलना साहूजणस्स, गरहिओ, जणेविवयणिजयलहइ, पाताहै, २६, थोडेमेंहीसत्पुरुष, सनत्कुमारचक्रीकीतरेकेईप्रतिबोधपातेहैं, २६, थोवेणविसप्पुरिसा, सणकुमारुव्वकेहवुझंति, इससरीरमेंथोडेकालमेंसमस्तहानीहै, जोनिश्चैदेवता उनोंकोंकहा, २७, जती देहेखणपरिहाणी, जंकिरदेवहिंसेकहियं, २७, ज मुक्तिजाणेवालासातलवकालआयूरहणेसेंपंचानुत्तरविमानवासीहोताहै,वहमीसंसारमेंजन्म इतालवसत्तमसुर विमाणवासीविपरिवडंतिसुरा लेताहै,इसवास्तेविचारणेसें,वाकीसब, इससंसारमेंशाश्वत्क्याह कुछनहीं, २८, कैसेंउस चिंतिजंतं,सेसं, संसारसासयंकयर, २८, कहतंभन्न कोंसुखकहणा, जोबहोतकालसेंमीजिसकादुःखभोगणाहोताहैदेवसुखसँफेरगर्भकादुःख, इसुक्खं, सुचिरेणविजस्सदुक्खमल्लिहियए, जंचम जोमरणकीवख्त, . 'भवनरकादिकपर्यटनकापीछैबंधहोताहै, २९, उपदेशहजारोंदै रणावसाणे, भवसंसाराणुबंधंच, २९, उवएससह- गैसैंभी, बोधदेतेहुयेभीनहींभीप्रतिबोधपाताईकोई, जेसेंब्रह्मदत्तराजा स्सेहिवि, मोहिजतोनवुझईकोई, जहभदत्त -- प्रतिक्रमणः . . जैसाउदाईराजाकोंमारणेवालाकोईनहींभीप्रतिबोधपाता, ३०, हाथीकैकानकीतरेचंच- राया, उदाइनिवमारओचेव, ३०, गयकन्नचंचला ल, नहींछोडणेसें इसराज्यलक्ष्मीकों, जीवस्वकर्मोंसेंयुक्तपापोंसें ए, अपरिच्चत्ताइरायलच्छीए, जीवासकम्मकलि- भारसेंभराहुआगिरताहैनीचेनरकमें, ३१, कहणेमेंभीजीवोंके, मल, भरियभरातोपडंतिअहे. ३१, बोत्तूणविजीवाणं, अच्छाओरदुष्करसेपापचरित्र, हेभगवान्क्यावहयेहै(उत्तर)हांवहीहै, सुदुक्कराइंतिपावचरियाई, भयवंजासासासा, प्रत्यादेशदृष्टांतनिश्चयेएसाही आतेरे, ३२, अंगीकारकरकैदोष, अपणा पच्चाएसोहुयणमोते, ३२, पडिवजऊणदोसे, निय अच्छीतरेफेरपावोंमें गिरकै, तदपीछेमृगावतीसाध्वीकों, पैदाभया ए सम्मंचपायवडियाए, तोकिरमियावईए, उपन्नंके केवलज्ञान, ३३, वलंनाणं, ३३, इतिपोसह । सझायसंपूर्ण ॥, अब रात्रीसंस्तारकगाथा, निषेधकर, निषेधकर, अथराईसंथारागाथा, निस्सिहि, निस्सिहि, मस्कारकरताहूंक्षमाश्रमणोंकों, गौतमादिक, महामुनीराजोकू, आ मोखमासमणाणं, गोयमाईणं, महामुणिणं, अणु ज्ञादेओ बैठणेकों, आज्ञादेओहेपरमगुरू, भारीगुण जाणहचिठिजा, अणुजाणहपरमगुरू, गुरुगुण रत्नोंसें, मंडितहैशरीरआपका, बहुतप्रतिपूर्णहै, पोहररात्री, रात्री रयणेहिं, मंडियंसरीरा, बहुपडिपुन्ना, पोरिसी, राई संस्तारकशय्याकरताहूं, १, आज्ञादेओसंथारेकी, संथारएठाएमि, १, अणुजाणहसंथारं, वाहुबहा मस्तकधर वाईकरवटपसवाडे, कुर्कटकीतरेपांवोंकोंपसार, अभ्यंतर(अंद णेणवामपासेण, कुकुडपावपसारेणं, अंतरंत र)तपमार्जनजमीनमें, संकोचितसंडासामें, इधरउधरपसवा पमजएभूमि, २, संकोइअसंडासा, उवदंतेय , ना न . भुजा वाईपर , आहार, , .. क . , प्रतिक्रमण. ४१ डाफेरतेशरीरकुंप्रमार्जना, दिव्य तेजउपयोगकू] उश्वासरोकणा,. कायपडिलेहा, दिव्वाईउवओगं, उसासनिरूह लोकमें, जोमुझकोंहोयजावैप्रमाद, इस, देहीसें, णा, लोए, ३ जइमेहुजपमाओ, इमस्स, देहस्स, इ इसरातको, वस्त्र, शरीर, सव, मनवचनकायासें, माइरयणीए, आहार, मुवहि, देहि, सव्वं, तिविहेण, चोसराया, ४, आश्रव(पापकारस्ता), कषायकाबंधन, लडाई, वोसिरिअं,४, आसव, कसायबंधण, कलहा, म लंकदैना, परायोंकीनिंदा, वेचेनी, खुसवख्ती, चुगली, कपटाईसें क्खाण, परपरिवाओ, अरइ, रई, पेसुन्नं, मायामो झूठबोलणा फेर, मिथ्यात्व, ५, बोसराऊंगा,इत्यादि, मोक्षमार्ग, अच्छेस्वर्ग सं, च, मिच्छत्तं, ५, वोसरिसुमाई, भुक्खमग्ग, संसग्ग केविघ्नभूत, दुर्गतिके, बंधनकेकारण, अठारेपापोंके विग्धभूआई, दुग्गइ निबंधणाइ, अठारसपाव ठिकाणे, ६, एकेला९में नहींहैमेराकोईभी, नहींमेंओरकिसीकाभी ठाणाई, ६, एगोऽहं नत्थिमेकोई, नाहमन्नस्सकस्स हूं, इसतरे अदीन मनसें, आत्माकू शिक्षाकरणा, इ, एवंअदीणमणसो, अप्पाणमणुसासए, ७, एगो. लामेराशाश्वतआत्माहै ज्ञान दर्शनकरकैसंयुक्त, वाकीकेमेरे मेसासओअप्पा, नाणदंसणसंजुओ, सेसामेवा बाहिरकेभावहै, सर्वहेसोसंयोगलक्षणहै, ८, संजोगकीजडसेंइस हिराभावा, सम्वेसंजोगलख्खणा, ८, संजोगमूलाजी जीवनें, पायादुःख परंपरासें, तिसवास्तेसंयोगकासंबंध, सवकों वेण, पत्तादुक्खपरंपरा, तम्हासंजोगसंबंध, सव्वं .. मनवचनकायासें बोसराताहूं, ९,. अरिहंततोमेरेदेवहै, तिविहेणबोसिरियं, ९, अरिहंतोमहदेवो, जावजी जीऊंउहांतकमलेसाधूगुरुहै, केवलीकाकहातत्वधर्महै, . इयसम्यक्तमेनें वंसुसाहुणोगुरुणो, जिनपन्नतंतत्तं, इयसमत्तंमए... जहांतक. ६ ४२ प्रतिक्रमण , ११, चारलो , . , - - ग्रहणकिया, १०, चारमंगलहै, अरिहंतभगवानमंगल, सिद्धभगवा गहियं, १०, चत्तारिमंगलं, अरिहंतामंगलं, सिद्धामंग नमंगल, साधूमंगल, केवलीभगवानकाकहा धर्ममंगल, लं, साहूमंगलं, केवलिपन्नत्तोधम्मोमंगलं, ११, : चत्ता कोंमेंउत्तमहै, अरिहंतलोकोंमेंउत्तम, सिद्धलोकोंमेंउत्तमहै, रिलोगुत्तमा, अरिहंतालोगुत्तमा, सिद्धालोगुत्तमा, साधूलोकोंमेंउत्तमहै, केवलीकाकहा धर्महसोतीनोंलोकमेंउत्तमहै, चार साहूलोगुत्तमा, केवलिपन्नत्तोधम्मोलोगुत्तमो, चत्ता सरण अंगीकारकरताहूं, अरिहंतोंकाशरणअंगीकारकरताहूं, रिसरणंपवजामि, अरिहंतेसरणंपवजामि, सि सिद्धोंकासरणअंगीकारकरताहूं, साधुओंकासरणअंगीकारंकरताहूं, केव धेसरणंपवजामि, साहूसरणंपवजामि, केवलि लीकाकहाधर्मअंगीकारकरताहूं, अरिहंतमंगलमेरेहै, पन्नत्तंधम्मसरणंपवजामि, अरिहंतामंगलंमझ्झ, अरिहंतमेरेदेवहै, अरिहंतोंकीकीर्तनाकरताहुआ, बोस अरिहंतामझ्झदेवया, अरिहंताकित्तिअंताणं, बो. राताहूंइसतरेपापोंकों, १, सिद्धपरमेश्वरमंगलमेरेहै, सिद्धभगवानमेरे सिरामित्तिपावगं, १, सिद्धायमंगलंमझ्झ, सिद्धायमझ्झ देवहै, सिद्धभगवानकीकीर्तनाकरताहुआ, बोसराताहूंइसतरेपापोंकों देवया, सिद्धायकित्तिअंताणं बोसिरामित्तिपावगं, २ आचार्यमंगलमेरेहै, आचार्य, मेरे, देवहै, २ आयरियामंगलंमझ्झ, आयरिया, मझ्झ; देवया, आचार्यमहाराजकी, कीर्तनाकरताहुआ, बोसराताहूंइसतरेपापोकों, ३,. आयरिआ, कित्तिअंताणं, बोसिरामित्तिपावर्ग, ३, उपाध्याय, मंगल, मेरेहै, . उपाध्याय,. मेरे, देवहै, उपाध्या उवझ्झाया, मंगलं, मझ्झ, उवझ्झाया, मझ्झ, देवया, योंकी, कीर्तनाकरताहुआ, वोसराताहूं, इसतरे, पापोंकों, ४, इझाया,कित्तिअंताणं, योसिरामि,त्ति, पावगं, ४, सा . . , .

दग, अ वणप प्रतिक्रमणः ४३ साधूमंगल, मेरे है, साधूमेरेदेवहै, साधुओंकीकीर्त हूणोमंगलं, मझ्झ, साहूणोमझ्झदेवया, साहूणोकि नाकरताहुआ, वोसराताहूं इसतरे पापोंकों, ५, पृथ्वी, जल, त्तिअंताणं, बोसिरामित्तिपावगं, ५, पुढवि, अग्नि, हवा, इनएकेकोंका सात जोनी लाखहै, वनस्पती गनि, मारुअ, इकिकेसत्तजोणिलख्खाओ, प्रत्येक, अनंतकाय, दस, चौदै, जोनी, लाखहै, १, विकलें तेय, अणते, दस, चउद्स, जोणि, लक्खाओ,१, विगलिं द्रियोंकेदोदोलाखहै, चाररलाख नारकीऔरदेवतोंके, तिर्यंचोंके होतेहैं दिएसुदोदो, चउरोश्यनारयसुरेसु, तिरिएसुहृति चारलाख, चउदहलाख, मनुष्योंकीयोनिहै, २, खमाताहूं, सर्वजीवों चउरो, चउदसलक्खाउ,मणुएसु, २, खामेमि, सब्वजी कों, सर्वजीवखमो(माफकरो)मुझें, मित्रताहैमेरेसर्वभूत(जीवोंसें), वैरविरोध वे, सब्वेजीवाखमंतुमे, मित्तीमेसव्वभूएसु, वैरंमझ्झ मेरेनहींकिसीसें, ३, इसतरेमेनेंआलोचनकिया, निंदाकरी, विशेषनिंदाकरी, दु नकेणवि, ३, एवमहंआलोइय, निंदिय, गरहिअ, गंछाकरीअच्छीतरे, मनवचनकायासेंप्रतिक्रमताहूं, वंदनकरताहूंमंजिनचोवीसों छियंसम्म, तिविहेणपडिकंतो, वंदामिजिणेचउव्वी कों, ४, क्षमणा, खमाणा, मेंनेक्षमाया(माफीमांगी), सर्वजी सं, ४, खमिअ, खमाविअ, मइखमिअ, ' सब्वहजी वोंकीनिकायोंसें, सिद्धभगवानकेसन्मुखप्रकाशकिया, मेरेकिसीसेंवै वनिकाय, सिद्धअसाखआलोयणह, मझ्झहवैर रनहींहभाइयो, ५, सर्वजीवकर्मोंकवस, चौदेराजलोकमेंजन्ममरण, नभाय, ५, सव्वेजीवाकम्मवस, चउदहराजभमंतु सेंभमतेहैं,उनसबोंकोंमेनेखमाया, मुझेंभी, वह, क्षमाकरो, ६, पूर्ण, तेमइंसव्वखमाविआ, मझ्झवि, तेह, खमंतु, ६, इति मेंणवचनकीशोभाहेपूज्य अथदेसावगासीकापचलाण, अहण्णभंते hos hun , ...

- ४४: प्रतिक्रमण. द्रव्यसें, भावसें . तुमारेपास, देशअवकास१०मावत, प्रत्याख्यानकरताहूं, वहइसतरे, तुम्माणंसमीवे, देसावगासियं, पच्चक्खामि, तंजहा, क्षेत्रसें, कालसें, द्रव्यसेतो व्वओ, खेत्तओ, कालओ, भावओ, ., वओ, देशावगासिकव्रत, क्षेत्रसेंइसजगे, कालसें, णं, देसावगासियं, खेत्तओणंइत्थ, कालओ जहांतकधारणाहै, भावसें, जहांतक, ग्रहोंसे, नहींग्रही, णं, जावधारणा, भावओणं, जाव, गहेणं, नगहेजा छलशाकनीआदिकसें, नहींठगाउं, जहांतक, और, किसीभी, मि, छलेणं, नछलेजामि, जाव, अन्नय, केणावि, रो.. रोगआतंकसेपरवशनहीहूं, समतापरिणाम, नहींपलटे, तहातकसमस्त गायंकेणए, समेपरिणामो, नपरिवडइ, तावअभि पणेग्रहणहै, अन्यत्रअनाभोगपणे, भूलजाणेसेंआगारहै, चैत्यकेसंघके गहो, अन्नत्थणाभोगेणं, सहस्सागारेणं,. महत्तरा काममेंजाणामोकलाहै, सवतरेशरीरअच्छाहैउहांतक,वेमारीमॅनहीं,. वोसराताहूं, १, गारेणं, सव्वसमाहिवत्तियागारेणं, वोसिरामि,.१, पांचथावरजीवयुक्त, द्रव्य अथ१४नियमसंभारणगाथा, सचित्त, १ दव घृततेलदहीदूधमीठा, असवारी, ४, पानसुपारीवगेरा, पोसाख, . सूंघने विगई, ३. बाण, ४, .तंबोल, ५ वत्थ, ६ कु कीसववस्तु, पहरणेपांवोंकीवस्तु, । विछाणेकीवस्तु, वदनपरलेपकीवस्तु समेसु, ७ बाहण, ८ सयण,९ विलेवण, १० ब्रह्मचर्य, १० दिसिकाप्रमाण, स्नानकेपानीकानियम, रोटीदालचावलसागादि बंभ, ११ दिसि, १२. न्हाण, १३ .:: भत्तेसु, १४१ सूर्यउदयभयेपीछेरघडीतक अथपञ्चख्खाणआगार,॥ 'उग्गएसूरे, नवकारगिणकेपारूंनहीं उहांतकनवकारसीव्रतमुझेहै, नवकारसहियं; 1. . , -- रं, प्रतिक्रमणं. ४५ पञ्चख्खाइकहते अंगीकारकरताहूंत्यागरूपव्रत, चारोंहीआहारोंकात्यागहै, पचख्खाइ, चउविहंपिआहा अन्नसबजातका, सागतरकारी, लड्डूवगेरेपकवान, कंदजमीनमेंका,दूध,दही,हींग,सों असणं, फ, निमक, सवतरेका, अशनकात्यागहै, दहीकापानी, जवकाधोवण, तुषोदक, पाणं, तंदुलोदक गरमजल शुद्धसवअप्पकायाकात्याग, खादिम, नालेर, खजर, दा खाइम, ख, सेकाअनाज, आंबा, केले, ककडी, अखरोट, विदाम, सबमेवे, सवतरेकेफल, खा- दमकात्यागहै, खादिम, पानवीडा, सूंठ, मिरच, पीपर, हरडे, बहेडा, आंवला, तुलछी, साइम, कपेला, कत्था, मोलेठी, तज, तमालपत्र, इलायची, लोंग, वायविडंग, अजवाण, अजमोद, कुलिंजन, कवावचीणी, कचूर, नागरमोथा, कांटासेलिया, कूमटिया, पान, सुपारी, पो- हकरमूल, जवासेकीजड, चावची, वंवूलकीछाल, धवकीछाल, खेजडकीछाल, ख- यरसार, येसवस्खादिमकात्यागहै,] भूलकरचीज डाललीयादआणेसेंडालदैतोपच्च- अन्नत्थणाभोगेणं, खाणभंगनहींहोय, खालेवेतोपञ्चखाणभंगहोय,] सूर्यकावरावरकालनहींमालमदै पच्छन्नकालेणं, णेसेंखाणे आवेतोपचख्खाणभंगनहीं,] पूरवदिशाडूंपश्चिमभूलकरसमझले दिसामोहेणं, चै, पञ्चक्खाणकाकालपूराहुयेपहलीखालेवेतोबतभंगनहीं,] अचानकउछलकर मेंकोईवस्तूगिरजायतोबतभंगनहीं] सहस्सागारेणं, साधूकेवचनसेंउग्घाडापोरसीआदिकभ्रमयुक्तसुणकरपञ्चखाणकालपूराहुवा साहुवयणेणं, जाणकैभोजनकरतोबतभंगनहीं] पञ्चक्खाणसेंजादानिर्जराकाकारणजिनमंदिर या श्रीसंघकाकोईवडाकाम महत्तरागारेणं, , ४६ प्रतिक्रमण. , आजाणेसेंपञ्चक्खाणकाकालपूराहुयेबिगरपहलेभोजनकरलैतोबतभंगनहीं] पञ्चक्खाणकाकालपूराहुयेपहलीशूलादिककोईवेमारीहोजावैऔरपरि सञ्चसमाहिवत्तियागारेणं, णामथिरनहींरहैआर्तध्यानहोजावैतबरोगमिटाणेदवालैतोबतभंगनहीं] गृहस्थकेदेखतेसाधूभोजनकरेनहींगृहस्थकैआणेसेंदूसरीजगेजाकरभो- सागारीआगारेणं, जनकरेतोएकाशणेकावतभंगनहीं, इसीतरेकिसीकीनजरलगतीहो वो च- लाआवैतबएकाशणेकापच्चख्खाणवालाश्रावकउठकरदूसरीजगेभोजनकरतो व्रतभंगनहीं] पगोकोंएकठाकरणेसेंपसारणेसेंथोडाआसनचलतोव्रतभंगनहीं, आउद्दणपसारेणं, गुरुमाहाराजकेआजाणेसेंएकाशनकाभोजनकरताखडाहोजायतोव्रतभंगनहीं] गुरुअन्भुट्ठाणेणं, येआगारसाधुओंकाहीहै, सरसआहारदुसरेसाधूकेवचगया, परठणे पारिठावणियागारेणं, में दोषजादासमझ, दुसरासाधूएकाशनेवाले साधूकू भोजन दुसरी वख्त- करणेका कहे, एकाशनेवालावोआहारकरलेवेतो, एकाशनव्रतभंगनहीं,] थालीवगेरेपात्रोंकेघृतादिकविगयकाअंसलगाभयाहैउसकोंपोंछभी लेवालेवेणं, डालालेकिन्वेमालमकुछलगारहगयाहोउसपात्रमें आयंबिलकेपच्चक्खा णवालाभोजनकरलैतोव्रतभंगनहीं आयंविलादिपञ्चक्खाणमें नहींखाणेयोज्ञद्रव्यविगयवगेरेकाखा उख्खित्तविवेगेणं, योज्ञवस्तूकेसंगस्पर्शहोगयाहो, वोद्रव्यखाणे आवैतोबतभंगनहीं] लेकिनजो विगयआदि पतला द्रव्य हाथसेंउठसकेनहीं एसेद्रव्य- स्पर्स हुआ होयतोखाणेसेंव्रतभंगनहीं] भोजनपुरषणेकीकुडछीआदिकके बेमालम विगयवगेरेद्रव्यसें गिहत्थसंसिडेणं, लपहोय उससेंपुरषदेतोव्रतभंगनहीं] । , .

. - प्रतिक्रमण. 4 थुन, सर्वथालूखीरोटी खाखरा किसीनेवैमालमघीसेंचोपडदियाहैलेकि पड्डुचमुक्खिएणं, न्ऊपरसेंदिखाईनहींदैखादभीषीकानहींमालमदै नीवीवालाखा लेवेतोबतभंगनहीं ऊपरसेंधारविगयलैतोबतभंगहोय १५] प्राणोंकानाशविचारणा, झूठ बोलनेका परिणाम, २ पराइचीजविनाआज्ञालेणा, ३ प्राणातिपात,१ मृषावाद, २ अदत्तादान, ३ मै विषयकीइच्छा, ४, बाह्याभ्यंतरधनादिइच्छा, ५, रातकाभोजन, ६, गुस्सा ४, परिग्रह, ५, रात्रिभोजन, ६, क्रोध,७, अहंकार, ७, कपटाई, ८, धनादिसंचयपरिणाम, ९, प्रीतीपुद्गलोंपर, १०, द्वेष, ११ मान, ७, माया, ८, लोभ, ९, राग, १०, द्वेष,११ लडाईकरना, १२, शठा कलंकदेणा, १३, निंदाकरणीगुणीनिर्गुणीकी, १४, कलह, १२, अभ्याख्यान, १३, परपरिवाद, १४, हासीकरणी, १५, हर्षकरना, १६, शोककरना, १७, चुगलीखाणी, १८ कपटसें हास्य, १५, रति, १६, अरति, १७, पैशून्य, १८ माया झठसेंठगना, कुगुरुकुदेवकुधर्मकीवांछा, मोसमिथ्यात्वशल्य, शांतिनाथप्रभुशांतिकस्थान,समस्तपणेशांति, रा । अथलघुशांति ॥ शांतिशान्तिनिशान्त, शांत गद्वेषरहितशांतभयेउपद्रवजिसकेनमस्कारकरकै, स्तवताहूंशांतिकेकारण, मंत्रों शांताशिवंनमस्कृत्य, स्तोतुःशांतिनिमित्तं, मंत्र केपदोंसेंशांतिकेवास्तेस्तवनकरताहूं, १, ओएसानिश्चयवाचकपदइसवचनसें, पदैःशांतयेस्तौमि, १, ओमितिनिश्चितवचसे, घेररनमस्कारहुओऐश्वर्यवालेयोग्यपूजाके, शांतिनाथभगवानमणी,रा नमोनमोभगवतेऽहतेपूजाम्, शांतिजिनाय, ज गादिकजीतणेहारे, यशवंत,खामीइंद्रियोंकेदमनकर्तामुनियोंके, २, सर्वचीतीश यशखिनेखामिनेदमिनाम् , २, सकला अतिशयरूपवडी, संपदाकरकैयुक्त, तारीफ(प्रशंसा)करणेलायक, तिशेषकमहा, संपत्तिसमन्विताय, शस्याय, , " यवते, प्रतिक्रमण. " 4 तीनलोककेजीवोंसेंपूजित, फेर, वेररनमस्कारहोय, शांतिनाथदेवकों, ३, सब त्रैलोक्यपूजिताय, च, नमोनमः, शांतिदेवाय, ३, सर्वा . देवतोंकैसमूहयुक्त, उनोंकेखामी६४इंद्रोंसेंपूजेहुये,देवतोंसेंभीनहींजीतेजावै, ती सरसुसमुह, खामिकसंपूजितायनिजिताय, भुव । नलोककेलोकोंकोंपालनेमेंउद्यमवंत, जादाकरकैसावधान, हमेसनमस्कारउनोंकों, ४, सव नजनपालनोचत, तमाय,सततं, नमस्तस्मै, पापोंकेसमूहकोंनाशकरणेवाले, सवउपद्रवोंकोअतिशयशांतिकरणे, दुष्टजो दुरितौधनाशनकराय, सर्वाशिवप्रशमनाय, दुष्टन ग्रहभूतपिशाच, शाकनीओकोंजादाकरकैमथनेकों, ५, जिसकाशांतिएसा हभूतपिशाच, शाकनीनां प्रमथनाय, ५, यस्येतिना नामरूपमंत्र, प्रधानसर्वोत्तमवचनकेउपयोगसेंकियाहैसंतोष, एसीविजयानामदे ममंत्र, प्रधानवाक्योपयोगकृततोषा, विजयाकुरु वीकरतीहैलोकोंकाहित, फेरइसीतरेनमीहुई,नमस्कारकरोउसशांतिकों, ६, हुओ तेजनहित, मितिचनुतानमततंशांतिम्, ६, भवतुन नमस्कारतुमकोंहेभगवती, विजयादेवीअच्छेजयवाली,दुसरेदेवोंसेंअजई, कोईभी मस्तेभगवति, विजयेसुजयेपरापरैरजिते, जगेअनादरनहींपाईजगत्में, जयवंतीहै, एसीस्तुतिकरणेसेंजयदेतीहै, ७, सबभी जितेजगत्यां, जयतीति, जयावहेभवति, सुखउपद्रवरहितमंगलकूदेणेवाली, साधुओंकोंफेर पिचसंघस्य, भद्रकल्याणमंगलप्रददे, साधूनांचसः हमेसउपद्रवरहित, चित्तकीशांति, धर्मवृद्धीदेणेवाली, जयपावो, ८, भव्यजीवोंकोंसिद्धिकर्ता दाशिव, पुष्टिप्रदे, जीयात्,८, भव्यानांकृतसिद्धे, चित्तकीसमाधि, मोक्ष, पैदाकरणेवालीभव्यजीवोंक, अभयदेणेमें, समस्तपणेरक्त, निर्वृति, निर्वाण, जननिसत्वानां, अभयप्रदान, निरते, नमस्कारहो, कल्याणदेणेवाली, तुझें, ९, भक्तजीवोंके, नमोस्तु, खस्तिप्रदे, तुभ्यम्, ९, भक्तानांजंतूनां, शुभा णकारिणी, हमेसतत्परहेदेवी, सम्यग्दृष्टिजीवोंकों, फेर, धीरज, प्रीति, ‘मति, वहे, नित्यमुद्यतेदेवि, सम्यग्दृष्टीनां, च, धृति, रति, मंति, अपरा ७, सर्वस्या- फेरसंघकों, तुष्टि, कल्या .

प्रतिक्रमणः , , ..४९ बुद्धि देणेकों, १०, जिनशासनमेंतत्पर, शांतिप्रभूकों वुद्धिप्रदानाय, १०, जिनशासननिरतानां, शांतिनता नमनकरतोंको,फेरजगत्केजीवोंकों, लक्ष्मीसंपदाकीर्तियशकों, वधाणेवाली नांचजगतिजंतूनां, श्रीसंपत्कीतियशो, वर्द्धनिज हेजयादेवीतुमविजयपाओ, ११, जल, अग्नि, जहर, सांप, दुष्टग्रह यदेविविजयख, ११, सलिला, नल, विष, विषधर, दुष्टन वडेराजरोग, लडाईकेडरसें, राक्षस वैरियोंकासमूह,मरी, चोरएवंसात ह,राजरोग, रणभयतः, राक्षसरिपुगणमारी, चौरेति ईति,प्राणघातीजीवादिकोंसें, १२, अवरक्षाकरोरनिरुपद्रवपणा, करोरशांति श्वापदादिभ्या, १२, अथरक्षरसुशिवं, कुरुरशांतिंच फेरकरोरहमेसइसीतरे, संतोषकरो, २ पुष्टिकरो करो, २ कल्याणकोंफेर, कुररसदेति, तुष्टिंकुरु,२ पुष्टिंकुरु, २ स्वस्तिंचकु करोआप, १३, हेभगवति, हेगुणवती, हेशिवशांतिरूप, तुष्टिपुष्टि रुरत्वं, १३, भगवति, गुणवति, शिवशांति, तुष्टिपु कल्याण, इसलोकमें,करो,२ मनुष्योंके, ज्योतिस्वरूपिणीएसा ष्टि,खस्ती, ह, कुरु, २ जनानाम्, ओमितिनमोन नमस्काररहुओ, सातशांतिमंत्रकावीजहै, ३ विघ्नविनाशकमंत्रवीजहै, १४, मो, हां ह्रीं हुं इ. यःक्षा ही, फुटफुट्रवाहा, १४, इसतरेजिनोंकानामाक्षर, मंत्रपूर्वक, अच्छीतरेस्तुतिकरीहुईजयादेवी, एवंयन्नामाक्षर, पुरस्सरं, संस्तुताजयादेवी, करतीहै शांतिकैकारणकों, नमस्कारहुओ,२ शांतिभगवानतिनोंकों, १५, रुतेशांतिनिमित्तं, नमोनमः, शांतयेतस्मै, इसतरे पूर्वाचार्योंकादिखायाहुआ, मंत्रोंकेपदोंसें गम्भित, इतिपूर्वसूरिदर्शित, मंत्रपदविदर्भित, स्तवा, शांतिनाथकी, जलवगेरेकाडरोंकोंनासकरणेवाला, शांतिवगेरेकोकरणेवाले, सलिलादिभयविनाशी, शांत्यादिकरच भक्तिवानमनुष्योंके, १६, जो इसस्तोत्रकों पढे हमेस, सुणे, मनमें स्मरण भक्तिमतां १६, यश्चैनं पठति सदा, शृणोति भाव स्तवना, शांते, पुन्न, सोवपण सीमंधरं, प्रतिक्रमण. करै, अथवा, सावधानयोगरखकर, वहनिश्चै शांतिकेपदकों . पावै यति, वा, यथायोग्यम्, सहि शांतिपदं या सूरिः श्रीमानदेवभी, फेर, १७, यात्, सूरिश्रीमान देवश्च, १७, इति शांतिस्तोत्रं, ॥ पृथ्वीमें अलंकारभूत पूर्ण, सुवर्णजैसी अथ दूज थुई ॥ मही मंडणं देहजिनोंकी, सामान्यकेवलियोकू आनंदकारीकेवलज्ञानकेघर, महाआ- देहं, जिणाणंदणकेवलं नाणगेह, महाणं नंदलक्ष्मी, बहोतबुद्धिसें विराजमान, अच्छीतरेसेवाकरूं, एसेसीमंधर दलच्छी, वहुबुद्धिरायं, सुसेवामि, तीर्थाधिपतीराजकों, १, पहलीतारदिये, जो, जीव, पेदाभयेजिनोंकों, तित्थरायं १, पुरातारका, जेह, जीवाण, जाया, होयगेजो, सबभव्यजीवोंकेंरक्षाकरताजिनराज, तैसेंइससमय भविस्संतिजे, सबभब्वाणताया, तहासंपयंजे जोजिनवर्तमानहै, सुखकोंदेओवहमुझे, तीनलोकप्रधानभगवान, जिणावमाणा, सुहंदितुतेमे, तिलोयप्पहाणा, २, दुःखसेंउतरनाहै जिसकाएसासंसारसमुद्रमेंजिहाजसमान, पापोंकीश्रेणी २, दुरुत्तारसंसारकूवारपोयं, कलंकावलि रूप, कीचड, उसकों धोणेको जलसमान, मनवांछितअर्थदेणेकूश्रेष्ठकल्पवृक्ष पंकपख्खालतोयं, मणोवंछिअत्थेसुमंदा समानकल्पजिनोंका, एसेजिनेंद्रदेवका आगमकोंवंदन कर्ताहूं अच्छाहैमहात्मजिनोंका, ३. रकप्पं, जिणंदागमंबंदिमोसुमहप्पं, ३, विको जिनराजकेमुखकमलमेंलीन, रूप, और मनोहरता, सेजिणंदाणणंभोजलीणा, कला, रूव, लावण्ण, और सौभाज्ञतासेंपुष्ट, करताहूंउसकाचित्तमेंभी, हमेसनिश्चयध्यान, सोहरगपीणा, वहंतस्सचित्तंपि, निचंपिझाणं, देवीभारती, देओ मुझें शुद्धज्ञानकों, ४, सुरीभारही, देहिमेशुद्धनाणं, ४, इति, . , , कला, प्रतिक्रमण. पांचज्ञानदर्शनचारित्रसुखादिअनंतकअच्छेप्रपंचरूपपर अथपंचमीस्तुति ॥ पंचानंतकसुप्रपंचपर मआनंदउत्कृष्टपणेदेणेसमर्थ, पांचअनुत्तर सीमातक देवसंबंधीजोपद मानंदप्रदानक्षम, पंचानुत्तरसीमदिव्यपद वीजिसकोवसकरणेमंत्रकीओपमा, जिसनेजादाकरकैसुदिपंचमीकाप्रधानत वीवस्यायमंत्रोपम, येनप्रोज्वलपंचमीवर पकोंकहा, औरउसतपकेकरणेवालोंके, श्रीसिंहमृगराजकालंछनहैजि तपोव्याहारितत्कारिणां, श्रीपंचाननलांछनः नोंकेवहविस्तारनकरोश्रीवर्द्धमानप्रभुकल्याणकों, १, जोपांचआश्रवकूरोकणे शतनुतांश्रीवर्द्धमानश्रियं, १, येपंचावरोध केसाधनमेंतत्पर, पांचप्रमादकूहरणेवाले, पांचअणुव्रतऔरपांचमहाव्रत साधनपरा, पंचप्रमादेहरा, पंचाणुव्रतपंचसुत्रत कीविधिउत्कृष्टपणेवताणेवालेआदरयुक्त, करकैकामदेवकासमस्तपणेज विधिमज्ञापनासादरा, कृत्वापंचऋषीकनिर्ज यउसकेवाद प्राप्तहुयेगतिपंचमी(मुक्ति)कों, वहयहहुओपंचमीकेव्रतकेधार यमथोप्राप्तागतिपंचमी, तेमीशंतसुपंचमीव्रत कोंकेसर्वतीर्थकरसुखकेकरणेवाले, २, पांचआचारमें प्रवीणएसेपांचमेंग भृतांतीर्थकराशंकरा, पंचाचारधुरीणपंचमग णकेअधिपतीनेअच्छीतरसूत्रमें, वहपांचज्ञानकाविचारकासारकरकैयुक्त णाधीशैनसंसुत्रतं, पंचज्ञानविचारसारकलितं पांचोंमें पांचफेरयह, दीपककीक्रांति जैसे, भारी कामदेवके अंधेरेमें, इग्या पंचेषुपंचत्विदं, दीपाभंगुरुपंचमारतिमिरे, ब्वेका रसका, रोहणीका, ओरपंचमीआदिकाफलकों प्रकाशकरणेमें चतुर ध्याताहूं दशी, रोहिणी, पंचम्यादिफलप्रकाशनपटुंध्यायामि जैनागमकों, ३, पांच स्थिरपणे, श्री जैनागमं, ३, पंचानां परमेष्ठिनां, स्थिरतया, श्री पांचमेरूजैसीलक्ष्मी, भक्तके ओर भव्यजीवोंके घरमें, बहुतसे, पंचमेरुधियां, भक्तानांभविनांगृहेषु, बहुशो २, परमेष्टीका, ५२ प्रतिक्रमण. अमृतकारी, मृतकृती, व्रत, . जो पांचदिव्यकों करतीहुई, नामधारी मनुष्यों के मनमें, यापंचदिव्यंव्यधात्, प्रहपंचजनेमने, आप रत्नोंकी पूतलीकीतरे, पंचमीआदि, तपस्यावानोंके, हुओ खारत्नपंचालिका, पंचम्यादि, तपोवतां. भवतु वह, सिद्धायिकादेवीरक्षाकी करणेवाली, ४, सा, सिद्धायिकानायिका, ४, . इति पंचमीस्तुतिः अरनाथभगवानकीदीक्षा, नमिना अथ एकादशीस्तुतिः ॥ अरस्यप्रवृज्या, नमि थजिनपतीकों ज्ञानकेवलहुआ, तेसें मल्लिनाथकाजन्म, दीक्षा, दूरकिया कर्ममल, जिनपतेानमतुलं, तथामल्लेर्जन्म, मपमलं, केवलज्ञान, असहाई, शुक्ल इग्यारसकों तत्काल, उल्लसित मनोहर, केवल मलं, बलक्ष्यैकादश्यां, सहसि, लसदुद्दाम क्रांतिवाली, पृथ्वीमें, कल्याणकोंका, खपाताहै, आपदाकू, कल्याणकोंकापंचक महसि, क्षिती, कल्याणानां, क्षिपति, विपदः, पंचकम अदोंकों, १, देवतोंके इंद्रोकीश्रेणी,आणे, जाणेसें, पृथ्वीकावलय[गोल], हमेस, दा, १, सुपर्वेद्र श्रेण्या, गमन, गमनै, भूमिवलयं, सदा स्वर्गकेरस्तेकीतरेहुआ, मेंकरूं, मेंकरूं औसैगरूरसें, जिसवख्त, मोक्षसहितसुख, हमा यत्रसलयं जिनराजोंकाभीप्राप्तहुआ क्षणभरजादासुखकोंनारकीकेदुखीभी, जिनेश्वरो जिनानामप्यापुः क्षणमतिसुखनारकसद, क्षितौक० २, जिना नेइसतरेजो, वचनकहे, अपणे,सिद्धान्तमें, फल, जोइज्ञारस एवंयानि, प्रणिजगहु, रात्मीय,समये, फलं, केवतकरणेवालोंकों, एसाफेर, जाणा, शुद्धसिद्धान्तमें, अवांछनीककष्टवाले, दृणा, मिति, च, विदितं, शुद्धसमये, अनिष्टारिष्टानां पृथ्वीमें, भोगे, बहोतहर्ष, देवताइंद्रोंसें क्षिति, रनुभवेयु, बहुमुदः, क्षितौक० ३, सुरासें युक्त, सब, समस्त, जिनचंद्रोंसें, हर्षितहोकर, तैसें, फेर, जोत द्राः, सर्वे, सकल, · जिनचंद्र, प्रमुदिता, तथा, च, ज्यो , , खर्गत्येवा, कया, यत्क ध्रसकि धर प्रतिक्रमण. ५३० पीदेव, समस्त, भुवनपतीदेव, संयुक्तहर्षसें, तप, जो, करणे तिष्का, खिल, भुवननाथा:, समुदिताः, तपो, यं, क वालेउनोंकै, करे, सुखकों, अचरजयुक्तदिलसें, तॄणां, विद्धति, सुखं, विस्मितहृदः, क्षितौक० ४, इति मौनेकादशीथुई ।, अथ श्रीजिनकुशलसूरिःरचितचतुर्दशीथुई ॥ द्रवनहुवा,अधर्म, दूरहुवा, अंधेरा, इंद्रकीधुनिसें, धसगया पृथ्वीमें देंद्रे, किधप, मप, धुधु, मिधोंधौं, धर्मकेपतीका, जयरशब्दसुणके, दमनदयाक्याफेरदानओरदर्शन, भक्तजनोंकों धप, धोरवं, दौंदौकिं दोंदों द्राग्डिदि देतेहुये, देतेहुये क्याकिसकूकर्मोंसें, कंगालोकू, कर्मोकायुद्धातियुद्ध, हटादि द्राग्डिदिकि, द्रमक द्रण. रण, द्रेन था, कैसायुद्ध, जिससेंझींकते, झींकते, झनझनाट, एसायुद्धातियुद्धप्राप्त, वं, झझि, झेंकि, झेंड़े, झणण, रणरण, निजभक्तजनोंकोंहर्षदायक, मेरुशिखरपरहुआसुखदाता पार्थजिनपतीकास्नान, १, निजकिनिजजनरंजनं, सुरशैलशिखरेभवतुसुखदंपार्श्वजिनपतिमजनं,१, निगोदशरीर, थावरशरीर, कटताहै, चारोंगतीकाअंधेराक्याधारणाजन्मनटकीतरेकुशलता, कटरेंगिन, थॉगिन, कटति, गिगडदांधुधुकिधुटनटपाटवं, गुणोंयोंकीगुणता, गुणोंकागण, रमनकरता, नरकनहीं, गुणसंबंधी गुणगुणण, गुणगण, रणकि, णे णे, गुणणगुण गुणसमूहका भारीपना, कैसाकर्मयुद्ध झींकते२ एसायुद्धातियुद्धप्राप्त गणगोरवं, झझि झंकि झें झणणरणरणनिज जो प्रभूकों निजकिया एसें निजभक्तजनोंकों सत्जनकिया, रचना करताहै मोक्षलक्ष्मी कि निजजनसजना, कलयंतिकमलाकलित, युक्तजो, · पापोंसें, रहित, एसे ईश्वरमहिमावंतपूजितजिनराज २ कलिमल, मुकुल, मीशमहेजिना हैं कि 3 : ठहि ठह्निकिठहिपहाताडयते तलिलोकि लों लों ने खि खिनि डेंखि डेंखि निवाचते ओंओंकि ओं ओं धुंगि, थोगिनि , , २, ठकि प्रतिक्रमण. - गै, . जिनमत अनंत महिमा धोंगि धोंगिनिकलरवे जिनमतमनंतं महि को विस्तारता जिनोंकों नमताहे देवता और मनुष्यउछवमें, मतनुता नमतसुरनर मुच्छवे, ३, खुंदांकि खुंदां खुखुडिदि खुंदां खं खुडिदि दो दों अंबरे चाचपट चटपट रणकिणेणे डण ण . . डंबरे तिहासर गमपधुनि निध वहवहवह देव सेवाकरते जिनराजकेसन्मुखनाटा पमगरस ससस सुरसेवता जिननाट्यरं रंभरंगसें कुशलहमेस देओ शाशनदेवता ४, कुशलमनिशं दिशतु शासनदेवता ४, इति चतुर्दशीस्तुतिः किसीसमयसंघव्यंतरोंकाउपसर्गहुवाउसफूंदूरकरणेयेस्तोत्रवणाया, ॥ अथ मानदेवसूरिकृततिजयपहुत्तस्तोत्रं ॥ तीनजगत्में, प्रभुताकुं प्रकाशणेवाले, आठ, महाप्रातिहार्यरूप, अति तिजय, पहुत्तपयासं, अह, महापाडिहेर, शयकरकैयुक्त, मनुष्यक्षेत्रअढाइद्वीपमेंरहेभये, स्मरणकरताहूंच जुत्ताणं, समयखित्तहिआणं, सरेमिचक्वं ऋजिनेंद्रोंका, १, प्रथमकोठेमे २५, जिणंदाणं, १, पणवीसाय, पनर, जैसेएकसोसित्तरजिनोंमेंप्रधानोंकासमूह, नासकरतेहेंसमस्तपा स,पन्नास, जिणवरसमूहो, पोंकों, भव्यजीवभक्तिकरकैयुक्तजिनोंका, २, वीस, पैताली रियं, भवियाणंभत्तिजुत्ताणं, २, वीसा, स, निश्चै, तीस, पिचहत्तर, जिनवरेंद्र, याला, विय, तीसा, पन्नत्तरी, जिणवरिंदा गह भूत, राक्षस, शाकनीआदिक, डरावणेउपसर्गोंकों, अतिशयपणेनाशकरै, ३, भूअ, रक्ख, साइणि, घोरुवसरगं, पणासेइ , तीसरेमें १५, दूसरेमें ८०, असिआ, चोथेमे ५०, नासेउसयलदु . पण ग्रह, २, प्रतिक्रमण. ५५ शत्रु, वडे, , , तहय, चेव, ५, ओं, , सित्तर, पैंतीस, अपिनिश्चै, साठ, पाच, निश्चै, १७० जिनवरकास सत्तरि, पणतीसा, विय, सट्ठी, पंचे, व जिणगणो मुदाययह, रोग, पाणी, अग्नि, सिंह, हत्थी, चोर, एसो, वाहि, जल, जलण, हर, करि, चौरा, रि, महा, डरोंकोंहरणेवालेहैं, ४, पचपन, फेर, दश फेर, पैंसठ, भयंहरओ, ४, पणपन्ना, य, दसेवय, पन्नही, तेसेंही, फेरनिश्चै, चालीस, रक्षाकरो, मेरे, अंगकी, देव, असुरों, चालीसा, रक्खंतु, मे, शरीरं, देवा, सुर, सें नमेहुयेसिद्धनिष्टितार्थ, ५, प्रणववीज, हसूर्यवीज, रअग्निवीज, हूंक्रोध, पणमियासिद्धा, र, सचंद्र, रअग्नि, सूंशमन, वीजयेसब तैसैं ओरनिश्चै ह्रींमाया, श्रीशोभा, स, र, सू, स, हरहूंहः तस्य चेव सरतूंस, समस्तपणेलिखेनामयुक्त, चक्र निश्चै सर्वतोभद्र, ६, रोहिणी, आलिहियनामगन्भं चकं किर सवओभ६,६, औरोहिणी प्रज्ञप्ती, वज्रशृंखला, तेसें, वज्रअंकुसा, पन्नत्ती, वजसंखला तहय, वजअंकुसिआ, चक्रेश्वरी, पुरुषदत्ता, काली, महाकाली, तैसें गौरी, चकेसरि, नरदत्ता, कालि . महाकालि, तहय गौरी, ७, गंधारी, महाज्वाला, मानवी, वैरौठ्या, तैसें, महाज्वाला माणवि, वइरु, अछुप्ता, मानसी, महामानसी, सोलेविद्या अच्छुत्ता माणसि, महमाणसिआ, विजा देवियोंरक्षाकरो, ८, ५भरत५एरवत५महाविदेह१५कर्मभूमीमें, देवीउरक्खंतु, ८, पंचदसकम्मभूमीसु, पैदाभयेसत्तरजिनराजश्सो १७०, तरेरकेरत्नोंकेपांचरंगोंकरकै, नंसत्तरिजिणाणसयं, विविहरयणाणवन्नो, शोभितएसे१७०जिनराजहरोपापोंकों, ९, चौतीस, अतीशय वसोहिअंहरउदुरिआई, ९, चखतीस, अह , ७, गंधारि, तहय, . उप्प उप ६ लीलम, सत्तर, + ५६ प्रतिक्रमण. जुक्त, आठ महापातिहायोंकरकैकरीहै, शोभा, सय जुआ, अट्टमहापाडिहेरकय, सोहा, तीर्थकर, विगत, मोह, ध्यांनकरणा,प्रयत्नकरकै, १०, तित्थयरा, गय, मोहा, झाएअव्वापयत्तेण, १०, प्रधान, वर्ण, संख, मूंगे, जैसीक्रांतिवाले, विग ओंवर, कणय, संख, विहुम, मरगय, सन्निहं, विग तमोह, सो, जिनवर, सर्वदेवतॉसेंपूजितवदित, यमोहं, सत्तरि, सयं जिणाणं सव्वामरपूइयंवंदे, क्षि,पृथ्वीवीज, प, जलबीज,उम्, तेजवीज,स्खा, वायुवीज,हा आकाशवीज, भुवनपती, खाहा, ११. ऑभुवणवा, वाणसंतर, जोइसवासी, वाणव्यंतरजोतपीवैमानिकवासी, जोकोईभीदुष्टदेवहसो, वहसर्वउप विमाणवासी, जे केविनुहदेवा, तेसव्वेउव शमभावकोंप्राप्तहुओमेरे, १२, चंदनकपूरकरकै, पट्टेपरलिख समंतुसेवाहा, १२, चंदणकप्पूरेणं, फलहेलि धोकरकै, एकांतरज्वर, ग्रह, मुद्(मोगा, साकनी हिजण, खालियं, पीयं, एगंतर, गह, मुग्गय, साइणि भूतादिकजादाकरकैनाशकरे, १३, इयएकसोसित्तरकाजंत्र, अच्छा भूयंपणासेइ, इयसत्तरिसयंजतं, सम्म मंत्र, दरवजेपरलिखकर, पापोंकावैरी विजयतंत्र, मंतं, दुवारपडिलिहियं, दुरिआरि, विजयतंतं, निःसंदेह, हमेसपूजनकरो, १४, निम्भंतं, निचमचेह, १४, इतिसप्ततिजिनस्तोत्रं ॥ दोषादिकडूंदूरकरणे समर्थ, नहींहैझठवचनमेंआदरप्रकाशकप्रसारजि दोसावहारदक्खो, नालियायररियासगोपस नोंका, ज्ञानादिकरित्नकेपैदाकर्ता,ऐसे, पार्वजिनेश्वर, जयवंतहोतीन रो, रयणत्तयस्सजणओ, पासजिणो, जयउज जगत्केनेत्रसमान, १, कियाहेपृथ्वीमंडलकूप्रतिबोधजिनोंनें, सापका यचख्खु, १, कयकुवलयपडिवोहो, हरिणं, करके, पीणेसें, १३, महणो, २, कंती न्याय प्रतिक्रमण. ५७ अंकितलांछनधारीपणा, कलाकेस्थान कियाहै, वैरियोंकेबंदो- कियविग्गहो, कलानिलओ विहिया, रविंद कामथन, खंडडालाहैरागकोंऎसैजयवंतहोपार्श्वजिनराज, २, क्रांती दीयराओजयउपासजिणो, करकैसमस्तपणजीततेहुये, झरता अत्यर्थपणेपृथ्वीकोआनंद अक्रूर, इनिजिणतो, सिंदूरं पुह विनंदणोकूरो जगत्जीवोंकोंअमृतवचनजिनोंका, शोभनकल्याणकारीजयवंतहो जयजंतुअमयवको, सुमंगलोजयउपहुपासो पार्श्वजिन, ३, नीलकमलपत्रकीतरेहरीक्रांति, इंद्रमंडलमेंकरीहैस्तवना ३, उप्पलदलनीलरुई, हरिमंडलसंथुओ पृथ्वीमेंआनंदकारी, पापरूपीरजकोंदलणेवालेमहावुध(सर्वज्ञ], कृपाक इलानंदो, रयणियरदारओमह, वुहो, पसी रोपार्थजिनराज, ४, नहींअहितवादकाविदग्धपणा, इजपासजिणो, ४, नाहियवायवियड्डो, पणेमेंस्थित, नागराजधरणेंद्रनेकरीहैपूजा, श्रीपार्श्वनाथदेव, यत्थो, नागरायकयपूओ, सिरिपासनाह देवतोंसेआदरितपूजितसुखदेओ, ५, राजावर्तनील देवो, देवायरिओसुहंदिसउ, ५, रायावह कमलकीतरैउज्वल, शरीरकीक्रांतिकामंडल महाभूति(किरण], भुवनप समुजल, तणुप्पहामंडलो महाभूई, असुरे तिदेवोंसेंनमीजतेहुये, पार्श्वजिनेंद्रज्ञानकेवेत्तासोजयवंतहो, ६, अ हिंनमिजतो, पासजिणंदोकवीजयत, ति ज्ञानअंधेरोंकोंक्षपाते, संसुखमुक्तिआरूढ, अठारेदोषशमाणेसैशांत, दुःखकोंदूरकर्ता, मिरासि, समारूढो, संतो, दुखावहो, जगत्मेथिर, अतिशयपणेकरनिरुपम श्रीज्ञानादिलक्ष्मी, जगत्मेंनेत्रसमानजिनोंका, जयंमिथिरो, बहुलतमा सरिससिरी, जयचक्खु, श्रुतसिद्धांतजयवंतपार्श्वजिनराज, ७, कवलग्रासकियाहै दोषोंकाआगर, मात्रडरकों . सुओजयउपासो, . ७, कवलीकय दोसायर, मायंडर ना ५८ प्रतिक्रमण. ह , रचा, स्तवन, तुहपासपढइजोतं, नाशकर्ता, अहो आश्चर्य,भगवानपांचोंशरीरोंसैरहित, चौदेलोककेआभरणजैसे, अहोतणुविमुक्क, लोआभरणीभू, वहश्रीपार्श्वजिनसर्वजिनोंमेंउत्तमस्मरणकरो, ८, पापोंकोंपार्श्वनाथहरो, पासजिणंसत्तमंसरह, ८, दुरिआइंपासनाहो, किरणोंसेंजैसेंसूर्य, आकाशभुवनमेंध्वजजैसे, दूरकियाहैअंधेरे सिहावमाली, नहोभवणकेउ, दूरंतमरासी कासमूह, मोक्षालयमें विराजमानहरोपापोकों, ९, इयनवग्रह ओ, सत्तमट्ठाणडिओहरओ, ९, इयनवग्गह स्तुतिकरकैगमित, जिनप्रभसूरिने, थुइगभं, जिणप्पहसूरीहिं, गुंफियं, थवणं, तुमारापढेहेपाईजोइसकों, अशुभभीनवग्रहनहींपीडाकरे, असुहाविगहानपीडंति, १० इति जिनप्रभसूरिकृतनवग्रहशांतिपार्श्वजिनदोषापहारस्तोत्रं, ।। रात्रिकू दूरकरणेसमर्थ, कमलकेआगरकोप्रकाशकरणेकिर दोसावहारदख्खो, नालियायरवियासगोप णोंकापसार, रत्नादेवीकापुत्रजमउसकापिता, पार्थजिन जयवंतहो सरो, रयणत्तयस्सजणओ, पासजिणोजयउ जगत्चक्षु(सूर्य], कियाहैकमलनियोंकोंप्रतिवोध, हिरण जयचख्खु, १, कयकुवलयपडिवोहो, हरणं केचिन्हसें विग्रह, सोलेकलाकाधारक, रचाहैअरविंदकमलकाव कियविग्गहो,. कलानिलओ, विहियारविंदमह डापणा, द्विजराजचंद्र, जयवंतहो, पार्श्वजिन अपणीक्रांतिसेंजीत णो, दियराओ, जयइ, पासजिणो, २, कंतीइनिजि ताहुआ, सिंदूरकीरक्तताकों, पृथ्वीकानंदन, क्रूरग्रह, जगत्कजीवोकोंमदरहितकर्ता, शंतो, सिंदूर, पुहविनंदणो, कूरो, जयजंतुअमयव वक्रगतिवाला, अच्छामंगलग्रहजयवंतहो,प्रभुपार्च ३, कमलदल(पत्र)समान को, सुमंगलोजयउपहुपासो, ३, उप्पलदलनी हरामनोहररंग, सूर्यमंडलकेसाथपरिचयजिसका, इलानामस्त्रीकुंआनंदकारी, लरई, हरिमंडलसंधुओ, इलानंदो, रयणिय प्रतिक्रमण. ५९ ६, , चंद्रमाकापुत्र, मेरेकू, बुधग्रह, प्रशादकरो, पार्श्वजिन नास्ति रदारओ, मह, बुहोपसीइज्ज, पासजिणो, ४, नाहि कमतसंबंधीवादमें विचक्षणवर्गौरहा, स्वर्गकाराजाइंद्रनेंकरीहैपूजा, यवायवियडो, नायत्थोनागरायकयपूओ श्रीपार्थनाथदेव देवाचार्यवृहस्पतिग्रहसुखकोंदेओ, ५, सिरिपासनाहदेवो, देवायरिओसुहंदिसड, ५, रूपेकेआवतजैसाउजला, शरीरकीप्रभाक्रांतिमंडल, मघासूभूतिसेंजन्मजिसका, रायावसमुज्जल, तणुप्पहामंडलो, महाभूई, असुरदैत्योंसेंनमीजताहुआ, पार्श्वजिनेंद्र कवी(शुक्र)ग्रहजयवंतहो, असुरेहिनमिजंतो, पासजिणंदोकवीजयउ, मनुष्यकीरासीपरआणेसें, दुखोंकादेणेवालाजगत्में स्थिर, कृ तिमिरासिसमारूढो, संतोदुखावहोजयंम्मिथिरो, व ष्णपक्षकीरातजैसीशोभाशरीरकी, जगत्चक्षुसूर्यकापुत्रशनि जयवंतहोपार्श्व, ७, हुलतमासरिससिरी, जयचख्खुसुओजयउपासो, ७, ग्रासकियाहै, दोषाकर(चंद्र), मार्तड(सूर्यका)रथ, नीचेकैशरी कवलीकय, दोसायर, मायंडरह, अहोतणु रसेविमुक्त(रहित), होलोका, भरणीनक्षत्रसेंपैदाभया, पार्थजिन शोभनीकराहूग्रह विमुकं, लोआ, भरणीभूअं, पासजिणंसत्तमंसर कोस्मरणकरो, ८, विघ्नोंकों, पार्श्वनाथ चोटी व्यापितआकाश, नवमाग्रहभुवन ह, ८, दुरिआई,पासनाहो सिहावमालीनहोभवण केतू, दूररहाराहूकीरासीसें, सातमेंठिकाणेरहाहुआ, हरो, केउ, दूरंतमरासीओ, सत्तमहाणहिओ, हरओ, ९, भक्तिवंत, देवता, जादाकरकेनमेहुये, मस्तकमुगुट, उसमेंरहीमणियोंकीक्रांति, भक्ता, प्रणत, मौलि, मणिप्रभाणा, उसकूप्रकाशकरणेवाला, खंडन कियाहैपापरूप, अंधकारकासमूहजिसनें मुद्योतकं दलितपाप, तमोवितानं, अच्छीतरेप्रणामकरकै, जिनराजकैचरणदोनों, युगकीआदिमें, सम्यकूप्रणम्य, जिनपादयुगं, युगादा, ९ , , मर ६० प्रतिक्रमण. -- स्तोष्ये, .. आधारभूत, भवरूपजलमें पडेहुये, भव्यजीवोंकों, १, वालंबनं, भवजले पततां, जनानाम्, १, जोभगवानस्तुतिकरेगये, समस्तवचनमयीशास्त्रकारहस्यउर्सकातत्वविज्ञान, यः संस्तुतः सकलवाङ्मयतत्वबोधा, उससेंपैदाहुईबुद्धिकीनिपुणताकरकै, देवलोककानाथजोइन्द्र, दुद्भूतबुद्धिपटुभिः, सुरलोकनाथैः, स्तोत्रोंकरकै, जगत्तीनलोककेप्राणीयोंके, चित्तकूहरणेवालेउदार, स्तोत्र, जगत्रितय, चित्तहरैरुदारैः, स्तवनाकरूंगा, निश्चै, मेंभी, उन प्रथमसामान्यकेवलियोंकेइंद्रकू, किला, हमपि तं प्रथमंजिनेंद्र,युग्मं, २, बुद्धिविगरभी, हेदेवतोंसेंपूजेभये, पगरखणेकावाजोट(पट्टा)तुमारा, बुद्ध्याविनापि, विवुधार्चित, पादपीठ, स्तवनाकरणे, अच्छीतरेउद्यमवंतभईहैबुद्धिमेरी, विशेषपणेगईलाजएसामेंहूं, स्तोतुं, समुद्यतमति, विगतनपोहं, बालकविगर, जलमेरहाहुआ, चंद्रमाकीपडिछाया, बालविहाय, जलसंस्थित, मिदुबिंब, और, कोन, इच्छाकरताहै, मनुष्य, एकाएक(तत्काल)पकडनेकू, ३, क, इच्छति, जनः, सहसाग्रहीतुं, कहनेकोंगुणोंकों, हेगुणोंकेदरियाव, · चंद्रमाजैसैमनोहर, वक्तुंगुणान्, गुणसमुद्र, शशांककांतान, कोनतुमारेसमर्थः, बृहस्पति, जैसैभी, बुद्धिकरकै, कस्तेक्षमा, सुरगुरु, प्रतिमोपि, 'बुद्ध्या, प्रलयकालकी, उछलता, मगरमच्छ, पैसैसमुद्रकों, कल्पांतकाल, पवनो, नक्रचक्र, कोनतिरणे, समर्थ, समुद्रकों, . दोनोंहाथोंसें, ४, कोवातरीतु, मल, मंबुनिधि, भुजाभ्यां, ४, बह, में, तोभी, तेरी, .. भक्तीके, वशसें, : हेमुनियोंकेखामी, सो, है, तथापि, · तव, भक्ति, वशा, . .न्मुनीश, मन्या, ३, .. हवासे,. भृत, प्रीत्या, :: धाम, वह, मनोहर, प्रतिक्रमण. ६१ करणेकों, स्तवना, शक्तिरहितभी, प्रवर्त्ताहूं[चलाहूं], कत्तुं, स्तवं, विगतशक्तिरपि, प्रवृत्ता, प्रीतिकरकै, आत्मशक्तिकों, विगरविचारे, हिरण, सिंहके, त्मवीर्य, मविचार्य, भूगो, मृगेंद्र, सन्मुखनहींजाताहैक्या, अपणेबालककी, प्रतिपालना(रक्षा)केवास्ते, ५, नाभ्येतिकिं, निजशिशोः, परिपालनार्थ, मैंथोडाज्ञानवाला, श्रुतज्ञानवंतोंके, समस्तपणे, हसनेका, ठिकाणा, अल्पश्रुतं, श्रुतवतां, परि हास, तुमारीभक्तीही, मुखर(वाचाल), करतीहै, जबरन्, मुझैं, त्वद्भक्तिरेव, मुखरी, कुरुते, बला, न्मां, जो, कोयल, निश्च, चैतमहीनेमें, मीठी, बोलतीहै, य, कोकिला किल, मधौ, मधुरं, विरौति, आंवकी, मांजर(कलि)का, समूह, एककारणहै, त, चाम्र, कलिका, निकरै, कहेतुः, ६, तुमारीअच्छीस्तवनाकरकै, भवोंकीपरंपरासे, वंधाभया, त्वत्संस्तवेन, भवसंतति, सन्निवर्द्ध, पाप, घडीकेछठेभागमें, क्षयपाताहै, शरीरधारियोंका पापं, क्षणात्, क्षयमुपैति, शरीरभाजां, ब्यापक फैलाभया] लोकमें, भमरेजैसाकाला, समस्तपणेजल्दी, आक्रांतलोक, मलिनील, मशेषमाशु, सूर्यके किरणोंसेंभेदनेकीतरे, रातका, अंधेराजैसैं७, सूर्यांशुभिन्नमिव, शार्वर, मंधकारं, ७, ऎसामानकरकैहेनाथ, तुमारीअच्छीस्तवना, में, यह, मत्वेतिनाथ, तवसंस्तवनं, मये, द, सरूकरताई, मंदबुद्धिभी तुमारे, प्रभावसेती, मारभ्यते, तनुधियापि तव, प्रभावात्, चित्तकों, हरणकरेगा, संतपुरुषोंका, कमलपत्र में, चेतो, हरिष्यति, सतां, नलिनीदलेंषु, चारु, .

६२ प्रतिक्रमण. ८, , ८, सब दोष समस्त दोषं , मोतियोंकी, क्रांति(छवि)कोंपाताहै, निश्चैजलकीबूंद, मुक्ताफल, द्युतिमुपैति, ननूदविंदु, दूररहो तेरी स्तवना नासपायाहै आस्तां तव स्तवन मस्त तेरीअच्छीकथाभी, जगत्केलोकोंकापापोंकोंहरताहै, त्वत्संकथापि, जगतांदुरितानिहंति, दूररहोसूर्य, परंतुउसकी करतीहैप्रभा, दूरेसहस्र, किरणः, कुरुतेप्रभैव, पद्मसरोवरमें, कमलोंकों, विकश्वरताकेभजणेवाले, ९, पद्माकरेषु, जलजानि, विकाशभांजि, ९, नहींहैजादाआश्चर्य, हेतीनभुवनकेभूषण, हेसवजीवोंकेनाथ, नात्यद्भुतं, भुवनभूषणभूतनाथ, सच्च, गुणोंकरकैपृथ्वीमें, आपकू, स्तुतिकरणेवाला, भूतैर्गुणै, वि, भवंत, मभिष्टुवंतः, वरावर, होताहै, आपके, प्रष्नकर्ताहै उसमेंक्याआश्चर्य, अथवाजैसें, तुल्या, भवंति, भवतो, ननु, तेन, किंवा, संपदावालेकेआश्रित, जोइसजगहोतोक्यानहीं, अपणेवरावरकरताहै, १०, भूत्याश्रितं यइहना, त्मसमंकरोति, १०, देखक, आपकों, एकनजरसें, देखनेयोज्ञ, दृष्ट्वा, भवंत, मनिमेष, विलोकनीयं, नहींओरजगे, संतोष, प्राप्तहोताहै, मनुष्योंकेनेत्र, नान्यत्र, तोष, मुपयाति, जनस्यचक्षुः, पीकरके, जल, चंद्रमाजसी, क्रांतिवाला, क्षीरसमुद्रका, पीत्वा, पयः, शशिकर, द्युति, दुग्धसिंधो, जल, समुद्रका, पीणेकों, कौनचाहताहै, ११, क्षारं, जलं, जलनिधे, रसितुं, कइच्छेत, ११, जो, शांत, रंगरूपीमनोहरछाया, परमाणुओंकरकैतेराशरीर, यैः, शात, रागरुचिभिः, परमाणुभिस्त्वं, खारा, प्रतिक्रमण. ६३ , ते, वक्रं, क, समस्त, रचाहुआहै, हेतीनभुवनमेंएक, तिलकसमान, निर्मापित, स्त्रिभुवनैक, ललामभूतः उतनेही, खलुनिश्चै. वहपरमाणूथे, पृथ्वीमें, तावंतएव, खल, तेप्यणवः, पृथिव्यां जोतेरेवरावर, दूसरा, नहींरूप, किसीमेंहै, १२, यत्तेसमान, मपरं, नहिरूप, मस्ति, १३, मुख, कहां, तुमारा, देवता, मनुष्य, औरनागकुमारोंके, नेत्रोंकोहरणेवाला, सुर, नरो, रग, नेत्रहारि, जीताहै, जगत्, तीनलोककों, जिसकीओपमादीजाय, निःशेष, निर्जित, जग, त्रितयो, पमानं, विवहैसो, कलंककरकैमैला, कहांचंद्रमाका बिवं, कलंकमलिनं, कनिशाकरस्य, जोंदिनमें, होजाताहै, पीला, पलास(खाखरा] कापत्रजैसा,ओपमारहितमुखतुमाराहै, यद्वासरे, भवति, पांड, पलाशकल्पम् , अछीतरेपूरामंडल, पूनमकेचंद्रकेकलाओंका, समूह, संपूर्णमंडल, शशांककला, कलाप, उजलेजोगुण, तीनभुवनकों, तेरे, उलंघनकरतेहैं शुभ्रागुणा, त्रिभुवनं, लंघयंति, वहगुणतुमकोंआश्रयकररहेहैं, हेतीनजगत्केईश्वर, स्वामीआपएकहीहो, येसंश्रिता, . निजगदीश्वर, नाथमेकं, कोनउनगुणोंकों, मनाकरसकताहै, फिरतेहुयोंकों, यथाजैसैंमनमाफक, निवारयति, संचरतो, यथेष्टं, १४, आश्चर्य, क्या इसजगे, जो, तेरा, देवतोंकीस्त्रियोंकरकै, चित्रं, कि, मत्र, यदि, ते, त्रिदशांगनाभि, पहुंचा, थोडाभी, मन, नहीं, विकारके रस्ते, नीतं, मनागपि, मनो, न, विकारमार्ग, , तव, कस्ता, . , इसतरे, , , , ६४ प्रतिक्रमण. प्रलयकालकी, हवाने, चलायमानकियाऔरपहाडोंकों, कल्पांतकाल, मरुता, चलिताचलेन, लेकिन्क्या,मेरूपहाडकाशिखर, चलायमानहुआकभी,जैसेतुमारामनकभीनहींचला, १५, किं, मंदादिशिखरं, चलितंकदाचित्, रहितधुंआ और वत्ती, रहित, तेलकापूरना, निर्धूमवर्ति, रपवर्जित, तैलपूर, लेकिन्समस्त, जगंत्तीनोंकों, प्रगटकरतेहो, कृत्लं, जगत्रय, मिदं, प्रकटीकरोषि, बुझणेकोंनहींप्राप्तहुवा हवासें, जिसनेंपहाडोंकोंभीचलादिया, गम्योनजातु मरुता, चलताचलानां, इसवास्तेतुमअलौकीकदीपकहो, हवामीजगतकोंप्रकाशकरणेवाले, १६, दीपोपरस्त्वमसि, नाथजगत्प्रकाश, १६, नहींअस्तकभीभी, प्राप्तहोतेहो नहींकभीराहुग्रसताहै, नास्तंकदाचि, नराहुगम्या, स्पष्ट करतहो, एकदम, एकवख्त, तीनलोककों, स्पष्टीकरोषि, सहसा, युगप, जगंति; नहीं, मेघ, मध्यभाग, रोका, इसवास्तेवडेप्रभाववालेहो, भोधरो, निरुद्ध, महाप्रभावः, इसकारणसूर्यसैंभीअतिशयमहिमातुमारीहै, हेमुनियोंकेइंद्र, लोकमें, १७, सूर्यातिशायिमहिमासि, मुनींद्रलोके, १७, हमेसउदयवाला, दलडालाहैमोहरूपवडाअंधेरा, नित्योदयं दलितमोहमहांधकार, काबूमनहींआयाराहुके, 'मुखकोंनहींमेघढकसकताहै, गम्यंनराहु, वदनस्यनवारिदानां, शोभरहाहै, तेरा, मुखकमल, ... फेर नहींक्रांतिवाला, विभ्राजते, तव, मुखाज, मनल्पकांति, विशेषपणेप्रकाशकरताहैतीनलोककू, इसवास्तेअपूर्वचंद्रबिंबतुमारामुखहै, १८, विद्योतयजगद, पूर्वशशांकबिंबम्, , दुपयासि, , नां , दर, , . १८, प्रतिक्रमण. ६५ , विवखतावा, - वन, क्यारातमें, चंद्रसेंकामहै, औरदिनमेंसूर्यसें, अथवा, किंशर्वरीषु, शशिनाहि, तुमारामुखरूपचंद्र, खंडनकिया, अंधेरेकोंहेनाथ, युष्मन्मुखेंदु, दलितेषु, तमस्सुनाथ, पकेभयेचावल, वनमें, शोभायमान, मृत्युलोकमैं, निष्पन्नशालि, शालिनि, जीवलोके, प्रयोजन(मतलव)क्या, मेघका, कैसामेघजलकेभारसेंझुकाभया, १९, कार्यकिय, जलधरै, जलभारनम्रः १९, ज्ञानजैसे, तुमारेमें, शोभादेताहै, कियाहैअनंतपदार्थोंपरप्रकाश, ज्ञानंयथा, त्वयि, विभाति, कृतावकाशं, नहींइसतरैतैसें, विष्णुरुद्रादिकदेवोंमें, अपणेरशासनकेखामियोंमें, नैवं, तथाहरिहरादिषु, नायकेषु, तेज, देदीप्यमान, मणियोंमें, पाताहै, जैसी, वडाईउनोंकीहै, तेजस्फुर, न्मणिषु, याति, यथा, महत्वं, लेकिन्नहींइसतरैफेर, काचकेटुकडेमें, किरणोंकरकैसंयुक्तहैतोभी, २०, नैवंतु, काचसकले, किरणाकुलेपि, मानताहूं, प्रधानता, विष्णुशिवादिकोंकोही, देखकरकै, मन्ये, वरं, हरि,हरादयएव, दृष्टा, देखकरकैउनोकों, दृष्टेषुयेषु, हृदयं, त्वयि, तोषमेति, क्यादेखणेसें, आपकों, जिसकरकैनहींदूसरा, किंचीक्षितेन, भवता. भुवि, येननान्या, कोई, मनमेरा, हरणकरताहै, हेनाथ दूसरेभवमैंमी, २१, कश्चि, मनो, हरति, नाथ, भवांतरेपि, २१, स्त्रिय, सइकडोंही, सइकडों, जनतीहै, पुत्रोंकों, स्त्रीणां, शतानि, शतशो, जनयंति, पुत्रान, नहींदूसरीस्त्री-पुत्र, तुमारीओपमाका, मातानेंजणा, जननीप्रसूता, नान्यासुतं, त्वदुपर्म, २०, मेरादिल, तुमारेमैं, संतोषपाया, पृथ्वीमें, . , , प्रतिक्रमण . अंडे, ममलं, .. सर्वदिशाओं, धारणकरतीहै, नक्षत्रोंको, सहस्रकिरणवालेकू, सर्वादिशो, दद्धति, भानि, सहस्ररश्मि, पूर्व दिशाही, उत्पन्नकरतीहै, देदीप्यमानहै, किरणोंकासमूहजिसका, २२, प्रा,च्येव, दिग जनयति, स्फुरदं, शुजालम्, २२, तुमकों, कहतेहैं, मुनीलोक, पुरुष, त्वा, मामनंति, मुनयः, परमं, पुमांस, सूर्यजैसाक्रांतिवर्णवाला, मलरहित, अंधेरेकोंदूरकरणेसें, मादित्यवर्ण, तमसःपुरस्तात्, तुमकोंही, अच्छीतरे, पायकरकै, मुनिजनमृत्युकोंजीततेहैं, त्वामेव, सम्यगु, पलभ्य, जयंतिमृत्यु, नहींदुसराकोईउपद्रवरहित, मुक्तिपदका, हेमुनियोंकेइंद्ररस्ताहै, २३, नान्याशिवः, शिवपदस्य, मुनींद्रपंथाः, २३, तुमकोंअक्षयकहतेहैं, परमेश्वरअचिंतकहतेहैं, गुणोंकीसंक्षारहितआदीश्वरकहतेहैं. त्वामव्ययं, विभुमचिंत्य, मसंख्यमाद्यं, ब्रह्मानिवृत्तिरूपसबकेईश्वरकहतेहैं, अंतरहित, कामदेवकोंनासकर्ताकेतूसमहो, ब्रह्माणमीश्वर, मनंत मनंगकेतुम्, हेयोगियोंकेईश्वर, जाणाहैयोगमार्गतुमनें, ज्ञानकेपर्यायसेंअनेकहो, उत्तमपुरुषएकहो, योगीश्वरं, विदितयोग, मनेक, मेकं, ज्ञानकाखरूप, निर्मलअठारेदोषरहित, जादाकरकैकहतेहैंसंतपुरुष, २४, ज्ञानखरूप, प्रवदंतिसंतः, २४, बुद्धआपहीहो, देवतोंसेपूजापाणेसें, फेरअपणीवुद्धिसेंज्ञानपानेसेती, वुद्धस्त्वमेव, विवुधार्चित, बुद्धिबोधात्, तूंहीशंकरहै, भुवनतीनकोंसुखकरणेसेती त्वंशंकरोसि, भुवनत्रयसंकरत्वात्, तूंहीविधाताहै, हेधीर्यधर, मुक्तिकेरस्तेकीविधिकाविधानवताणेसें(ब्रह्मा)हो, धातासि, धीर, शिवमार्गविधेर्विधानात्, प्रगटपणे, तूंही, हेभगवान, पुरुषोत्तमविष्णुनारायणहो, २५, व्यक्तं, त्वमेव, भगवन्, पुरुषोत्तमोसि, २५, - ममलं, , - : .

प्रतिक्रमण. निर्मल, इहां, नाम तुमकोंनमस्कारहो, तीनभुवनकीपीडाके, हरणेवालेहेनाथ, तुभ्यंनम, त्रिभुवनार्ति, हरायनाथ, तुमकोंनमस्कारहो, पृथ्वीतलमें, अलंकारसमानकों, तुभ्यंनमः, क्षितितला, मल, भूषणाय, तुमकोंनमस्कारहो, तीनजगत्के, परमऐश्वर्य(ठकुराई)वंतकों, तुभ्यंनम, स्त्रिजगतः, परमेश्वराय, तुमकोंनमस्कारहो, हेजिनराज, भवरूपसमुद्र सुकाणेवालेकों, २६, तुभ्यं नमो, जिन, भवोदधि, शोषणाय, २६, क्याआश्चर्य, जो, गुण, समस्त्रोंसें, कोविस्मयो, त्र, यदि, नाम, गुणै रशेषै, तूं, आश्रयकराहुआहै, रहितअवकाशपणे हेमुनियोंकेखामी, स्त्वं, संश्रितो, निरवकाशतया, मुनीश, दोष, अंगीकारकराहुआ, जुदेरतरेकेआश्रयोंसें, पैदाहुआगर्वसैदोषीजन, दोषै, रुपात्त, विविधाश्रय, जातगः, खप्ने भीउनोंसें, नहींकभीआप देखेगये, २७, खमांतरेपि, नकदाचिद, पीक्षितोसि, २७, उंचाअशोक, वृक्षकेआश्रयवैठेहुये, उंचेकिरणोंसें, उच्चैरशोक, तरुसंश्रित, मुन्मयूख, शोभताहै, रूप, निर्मल, आपका, अत्यंत जादा, माभाति, ममलं, रूप, नितांतम्, भवतो, प्रगट, उलसायमान, किरणोंसें, अस्तकरदिया, अंधेरेकासमूह, स्पष्टो, ल्लस, त्किरण, मस्त, तमोवितानं, सूर्यकीतरै, विव, मेषके, २८, पासरहाहुआ, बिंब, रवेरिव, २८, पयोधर, पार्श्ववत्ति सिंहासनकैविष, मणियोंकेकिरणोंकी, शिखा(पंक्ति)सेंविचित्र, शिखाविचित्रे, सिंहासने, मणिमयूख, जादाकरकैशोभताहै, तेराशरीर, सोनेकीकांतिजैसामनोहर विभ्राजते, तववपु, कनकावदातं, विय, द्विलस, , चल, , ३०, . ६८ प्रतिक्रमण. बिबहसो, आकाशमें, प्रकाशकरता, प्रकाशकरता, किरणोंकीशाखाओंकासमूह, बिंब, दंशुलतावितानं, उंचा, उदयाचलपहाडकेशिरपर, सूर्यजैसाशोभताहैतैसैं, २९, तुंगो, दयाद्रिशिरसीव सहस्ररश्मैः, '२९, मोगरेकेफूलजैसे, उजले,चंचल, सैचमरोंकी, मनोहरशोभा, कुंदावदात, चामर, चारुशोभं, विराजताहै, तेरा, शरीर, सोनेकीकांतिवाला, विभ्राजते; तव, वपुः कलधौतकांतं, उदयभया, चंद्रमाजैसा, निर्मल, झरणेकपाणीकीधारावहरहीहैजैसा उद्य, च्छशांक, शुचि, निर्झरवारिधार, उंचे, शिखर, मेरूपहाडकीतरे, सोनेका, मुच्चै, स्तट, सुरगिरेरिव, शातकौंभम् ,३०, छत्र, · तीन, तेरेपर, विशेषशोभताहै, चंद्रमाकीक्रांतिजैसा, छत्र, त्रयं, तव, विभाति, शशांककांत, तुमारेउपररहा, ढकदियाहै, सूर्यकी, किरणोंकाप्रतापजिसनें, मुच्चैःस्थितं, भानु, करप्रतापम्, मोतियोंके, समूहकी, रचनाकरकै, विशेषपणेवधगईहैशोभा, मुक्ताफल, विवृद्धशोभ, विक्षातकरताहुआ, तीनजगतका, परमेश्वरपणा, ३१, प्रख्यापय, त्रिजगतः, परमेश्वरत्वं, ३१, सोना, नयाअथवानवकमलौक, ढिगारकीक्रांति, उन्निद्र, हेम, नवपंकज, पुंजकाति, चारोंतरफउछलती, नसकेकिरणोंकी, प्रकाशपंक्तिमनोहर, पर्युल्लसन्न, खमयूख, शिखाभिरामी, चरण, पांव, तुमारे, जहां, हेजिनइंद्र,. धरेजातेहैं, पादौ, पदानि, तव, यत्र, जिनेंद्र, धत्ता, उहां देवता, समस्तपणे, रचनाकरतेहैं, ३२, पद्मानिः, तत्र, विवुधाः, परि, कल्पयंति, ३२, स्थगित, प्रकर, जाल, विकशित, . . , कमल, .

हेजिनेंद्र, मत्त, प्रतिक्रमण. ६९ इसतरै, जैसे, तेरी, अतिशयसंपदाहोतीहुई, इत्थं, यथा, तव, विभूतिरभू, . जिनेंद्र, श्रुतचारित्ररूपधर्मोपदेशकाजोविधान, जोतुमाराहैवेसानहींदूसरेदेवोंका, धर्मोपदेशनविधौ, नतथापरस्य, जैसीकांति, सूर्यकीहै, जादाकरकैहणाहैअंधेराजिसनें, यादृकप्रभा, दिनकृतः, प्रहतांधकारा, तैसीकहाँहै, ग्रह(तारा)गणकी, प्रकाशकरणेवालेहैंतोभी, . ३३, तादृकुतो, ग्रहगणत्य, विकाशिनोपि, ३३, झरतेहुयेमदकरके, मैला, औरचंचल, गंडस्थलसें श्योतन्मदा, विल, विलोल, कपोलमूल, मतवाला, फेरफिरतेहुये, भमरोंकैशब्दसें, जादावधगयाहैक्रोधजिसका, भ्रमद्, भ्रमरनाद, विवृद्धकोपम्, असाएरापतजैसीक्रांतिवाला, इम(हस्ती)उद्धत, अंकुससैंभीवसनहींसन्मुखआता, औरावताभ, मिभ, मुद्धत, मापतंतं, देखकरकैडर, होताहै, नहीं, आपकेआश्रयरहे(भक्त)जीवोंकों, . ३४, दृष्ट्वाभयं भवति, नो भवदा, श्रितानाम्, ३४, फाडडालाहस्तीकाकुंभस्थल, नीचेगिराउजलेखूनसेंलिपटेहुये, भिन्नेभकुंभ, गलदुजवलशोणितात, मोतियोंका; समूहसें, शोभायमान, जमीनकाभाग, मुक्ताफल, प्रकर, भूषित, भूमिभागः वांधीहैफाल, पांवोंकीगति, हिरणोंकामालकभी, सिंह - बद्धक्रमः, क्रमगतं, हरिणाधिपोपि, नहींदवासकताहै, · चरणदोनोंअचल, अच्छीतरेआश्रयकियाजिस तेरा, ३५, नाकामति, क्रमयुगाचल, संश्रितंते, प्रलयकालकीहवासेंउत्कट, अग्निकैजैसा, कल्पांतकालपवनोद्धत, वन्हिकल्पं, दावानलकी, सिलगीहुई, उजली, ऊंचीशिखाजिसकी, दावानलं, .ज्वलित, मुज्वल, मुत्स्फुलिङ्ग, प्रतिक्रमण. . wa सामनेंआताहुआ, नागद्मनी, तीनलोककोखाणकीइच्छावाला, सामने, आकरपडता, विश्वजिघत्सुमिव, संमुख, मापतंतं. आपकेनामकाकीर्तिरूपजल, शांतकरताहै, सवकों, त्वन्नामकीर्तनजलं, शमयत्य, शेषम्, लालआंखवाला, मदोन्मत्त, कोयलकेगलेजैसास्याह, रक्तक्षणं, समद, कोकिलकंठनीलं, क्रोधकरकैउद्धत, सांप, उंचाकियाहैफणजिसनें, क्रोधोद्धतं, फणिन, मुत्फण, मापतंतं, उलंघनकरताहैचरणदोनोंसें, समस्तशंकारहित, आक्रामतिक्रमयुगेन, निरस्तशंक, तुमारेनामकी, नागदमनी, हृदयमें, जिसपुरुपके, ३७, स्त्वन्नाम, हृदि, यस्यपुंसः, ३७, युद्धकरतेहुयेघोडेहस्तीगाजनेसें, डरावणेशब्दहोरहाहै, वल्गत्तुरंगगजगर्जित, भीमनाद, संग्राममेंसेन्या, बलवानभी, राजाओंकी, माजौबलं, बलवतामपि, भूपतीनां, उगतेहुयेसूर्यकी, पंक्तिसैंअपविद्ध(भेदनकियाहुवा), उद्यद्दिवाकर, मयूख, शिखापविद्धम् , तुमारीकीर्तनसेती, अंधेरेकीतरै, जल्दी, भेदनकोप्राप्तहोताहै भागजातेहैं ], ३८, त्वत्कीर्तिना, त्तमइवा, शु, भिदामुपैति, ३८, वरछीकेअग्रभागसेंभेदेहुये, हस्तिकेरुधिररूपपाणीकपूरमें, कुंताग्रभिन्न, गजशोणितवारिवाह, जलदीसें, तिरणेकोंआतुर, जैसासुभटडरावणे, वेगवतार तरणातुर, संग्राममैंजय, जीताहै, दुःखेंजीतीजै, शत्रुओंकावर्ग, युद्धे जयं, विजित, दुर्जय, जेयपक्षा, तुमारेचरणकमल, बनउसकेआश्रयसेंपाताहै ३९, स्त्वत्पादपंकज, वनाश्रयिणोलभंते, किरणोंकी, योधभीमे, प्रतिक्रमण. रहेहुये, स्थित, जिहाज, ४०, भुग्ना, समुद्र में, क्षोभप्राप्तकियाहैडरावणे, मच्छोंकाचक्र, अंभोनिधौ, क्षुभितभीषण, नक्रचक्र, जलचरजीवविशेष, डरकरणेवाला, वडामारीवडवानल(अग्नि) पाठीनपीठ, भयदोल्वण, वाडवाग्नौ, उछलतेतरंगोंकेशिखरपर, रंगत्तरंगशिखर, यानपात्रा, त्रासकों, छोडके, तुमारे, स्मरणसेती, जाताहैसमुद्रकेपार, ४०, स्त्रासं, विहाय, भवतः, स्मरणा, द्रजंति, उपजा, डरावणा, जलोदरकेवोझसें, टेढाभया, भीषण, जलोदरभार, शोककरणेकीदशाकोंप्राप्तहुवा, छोडीहजीणेकीआशा, शोच्यांदशामुपगता, श्युतजीविताशा, तुमारेचरणकमलकीरजरूपअमृतसें, लपटा खरडा]शरीरसा, त्वत्पादपंकजरजोमृत, दिग्धदेहा, मनुष्यहोताहै, कामदेवके, समानरूपवाला, ४१, माभवंति, मकरध्वज, तुल्यरूपा, ४१, पांवोंसेंगलेतक, बडीसांकलसें, वीटाहुआअंग, आपादकंठ, मुरुशृंखल, वेष्ठितांगा, मजबूतवडी, वेडीकीमहीनअणीसें, घसगईहैजांघजिसकी, गादंबृह, निगडकोटिनिघृष्टजंघा, तुमारेनाममंत्रकू, हमेस, मनुष्य, स्मरण याद करता, स्वन्नाम, मंत्र, मनिशं, मनुजाः,स्मरंतः, जल्दी, आपहीसें विशेषपणेगयाहैबंधनकाडर, साहोताहै, ४२, सद्यः खयं, विगतबंधभया, भवंति, मदवालाहत्यी, सिंघ, दावानल[वनकीआग], अहि(सांप] मत्तदिपेंद्र, मृगराज, दद्वानला, हि, दरियाव, युद्ध, जलोदर, कैदखाना, इनोंसेंउठाभय, संग्राम, वारिधि, महोदर, बंधनो, त्वं, . प्रतिक्रमण. ७२ उनोंका, जल्दी, नाश, पाताहै, डर, डरावणेवालानिश्चै तस्या, शु, नाश, मुपयाति, भयं, भियेव, जो. तुमारा, स्तवन, यह, · बुद्धिवान, बुद्धिवान, पढताहै, ४३, य, स्तावकं, स्तव, मिमं, मतिधान, धीते, ४३, स्तोत्ररूपमाला, तुमारी, हेजिनेंद्र, गुणोंकरकैगूंथीभई, स्तोत्रस्रज, तव, जिनेंद्र, गुणैर्निबद्धा, भक्तीकरकैमैनें, मनोहर५२अक्षररूपरंगविरंगेपुष्पोंसें, भक्त्यामया, रुचिरवर्णविचित्रपुष्पां, धारणकरेमनुष्य, जोइसलोकमें, गलेमेंप्राप्तहुईहमेस, धत्तेजनो. यइह, कंठगतामजस्रं, वहमानतुंगकों(उंचेमानकों), हमेसपाताहै, लक्ष्मीः, मोक्षकी, ४४, तंमानतुंग, मवशासमुपैति, लक्ष्मीः, ४४, इति, अथकल्याणमंदिर, कल्याणके, गृह, वडाउदार, पापडूं, कल्याण, मंदिर, मुदार, मवद्य, भेदि, डरतेकू, अभयदानदेनेवाले, निंदारहित, चरणकमल, भीता, भयप्रद, मंघ्रिपद्म, संसार, समुद्रमें, डूबतेहुये, जीवोंकों, संसार, सागर, निमज्ज, जंतु, जिहाजसमान, नमस्कारकरकै, जिनेश्वरका, जिनेश्वरस्य, १. जिसकाआप, देवतोंकागुरुबृहस्पति, महिमासमुद्रका, यस्यखयं, गरिमांदुराशेः, स्तवनाकू, अच्छीविस्तारबुद्धिवालाभी, नहींसमर्थ, करणे, स्तोत्रं, सुविस्तृतमति, नविभुर्विधातुं, तीर्थोकेईश्वरका, कमठकेगर्वकू, पूंछडियतारेजैसैहरणेकों, तीर्थेश्वरस्य, कमठस्मय, उनोंका, में, यह, निश्चै, अच्छीस्तवना, करूंगा, २, स्तस्या, ह, मेष, किल, संस्तवनं करिष्ये, २, युग्मम्, भेदणेवाले, , मनिंदित, समस्त, दशेष, १. पोतायमान, मभिनम्य, 1 धूमकेतो. , प्रतिक्रमणे. ७३ मेरेजैसे, कैसे, मनुष्य, , गिणणेकों, क्षमेत, , . सामान्यपणेसेंभी, तेरा, वर्णनकरणेकू, अहवाल स्वरूप], सामान्यतोपि, तव, वर्णयितुं, खरूप, हेस्वामी, होताहै, समर्थ, मस्मादृशाः, कथं सधीश, भवं, त्यधीशा, धीठ[ वेसरम]भी, घूधूकावालक, जोअथवा, दिनमेंअंधा, धृष्टोपि, कौशिकशिशु, यदिवा दिवांधो, रूपको प्ररूप नकरसके, क्या, निश्चै, सूर्यका, ३, रूपंप्ररूपयति, किं, किल, धर्मरश्मेः, ३, मोहकेक्षयसेती, अनुभववालाभी, हेनाथ, मोहक्षया, दनुभवन्नपि, नाथ, मयों, निश्चे, गुणोंकों, नहीं, तेरे, समर्थहोय, नूनं, गुणान्, गणयितुं, न, तव, प्रलयकालका, वमनकियाहुआजल, प्रगटभीजिसमैसें कल्पांत, वांतपयसा, प्रकटोपियस्मा, मापहोसकेकिससे समुद्रके, शंकाहै, रत्नोंका, ४, न्मीयेतकेन, जलधे, ननु, रत्नराशिः, ४, उद्यमवालासावधानहुआहूं, तेराहेनाथ, मूर्खअंतकरणवालाभी, अभ्युद्यतोस्मि, तवनाथ, जडाशयोपि, करणेकॉस्तवना, देदीप्यमान, असंक्षागुणोंकेआकर खानका], कर्तुं स्तवं, लस, दसंख्यगुणाकरस्य, वालकभी, भुजा, दोनों, पसारकर, वालोपि, निज, बाहु, युगं, वितत्य, विस्तार[चोडानलंबानकों, कहताहै, अपणीवुद्धिसें, दरियावका, ५, विस्तीर्णतां, कथयति, खधियां, बुराशेः, ५, जोयोगियोंसैंभी, नहींजाताहैकहा, गुणतेरे,हेईश्वर, येयोगिनामपि, नयांति, गुणास्तवे,श, कहणेकोंकैसे, होय, उनोंकेविषै, मेरा, अवकाशः[शक्ति], वक्तुंकथं भवति, तेषु, ममा, .. वकाश, क्या, नहीं, अपणी, , किं, न, १० प्रतिक्रमण. जो, यं, . वा, हो महिमा, " पद्म, सरोवरका, निलोपि, ७, हुआ, वहनिश्चै, विगरविचारा, काम, जाता, तदेव, मसमीक्षित, कारिते; बोलताहै, अथवा, अपणीबाणीसें, शंकावचन, पंखीभी, ६, जल्पंति, निजगिरा, ननु, पक्षिणोपि, ६, नहींचिंतनयोज्ञ, हेजिन, अच्छीस्तवनातुमारी, आस्ता, मचिंत्य, महिमा, जिन, संस्तवस्ते, लेकिन्नामभीरक्षाकरताहैसंसारसैं; आपका, तीनजगत्कों, नामापिपाति, भवतो, भवतोजगंति, तेज, धूपसें, हणीजगयेसै, पंथीजन रस्तागीर]कों, ग्रीष्मकालमें, तीत्रा, तपो, पहत, पांथजना, निदाघे, खुसकरताहै, ठंढपाणीकी, अनिल[ हवाभी,] ७, प्रीणाति, पद्म, सरस, सरिसो, हृदय दिलमें वर्ततेथके, तुमहेप्रभु, ढीलेहोजातेहैं, हृदतिनि, त्वयिविभो, शिथिलीभवंति, जीवोंकेक्षणमात्रमें, मजबूतभी, कर्मबंध, जंतोक्षणेन, निवडा अपि, कर्मबंधा, तत्काल, सांप, मईबंधन, असैहैंमध्यभाग, छूटगिरतेहैं, सद्यो, भुजंग,ममयाइव, मध्यभागः, वनमें, मोर, चंदनके, ८, मभ्यागते, वन, शिखंडिनि, चंदनस्य, ८, छूटहीजाताहै, मनुष्य, जल्दी, हेजिनेंद्र, मुच्यंतएव, मनुजा, सहसा, जिनेंद्र, डरावणे, उपद्रव, सइकडोंसें, तुमकों, देखतेही, रौद्रे, रुपद्रव, शतै, स्त्वयि, वीक्षितेपि, गोकिरण, गोपृथ्वी, गोगउ, इनतीनोंकेखामी,देदीप्यमानतेजवालेकू, देखणेसें, गोखामिनि, स्फुरिततेजसि, दृष्टमात्रे, चोरकीतरे, जल्दीतब, पशूछूटतेहैं, जादाकरकैभागतेहैं,तैसेंउपद्रवछूटजातेहैं, ९, चोरैरिवाशु, पशवः प्रपलायमानः , n आणेसें, , - Am Ans.

प्रतिक्रमण. ७५ वेभी, त्वंतारको, अनि, तूं ,तारणेवाला, हेजिन, कैसेहै, भव्यजीव, जिन, कथं, भविनांत, एव, तुमकोवहते ध्याते हैं, हृदय दिल]में, जोसंसारसेंपारउतरतेहुये, त्वामुहंति, हृदये, नयदुत्तरंतः, जोअथवामसकचमडेकीतिरतीहै, जोजलमेंयहनिश्चै, यहादृतिस्तरति, यजलमेषनून, अंदरमेंप्राप्त, हवाका, वह, निश्चै, प्रभावहै, १०, मंतर्गतस्य, मरुतः, स, किला, नुभावः, १०, जिससैं, रुद्रकुंआदिलेकरब्रह्माविष्णुभी, नासहोगयाप्रभावजिनोंका, यस्मिन्, हरप्रभृतयोपि, हतप्रभावा, वहभी, तैनें, कामदेवकों, खपादिया, क्षणभरमें, सोपि, त्वया, रतिपतिः, क्षपितः, क्षणेन, वुझादिया, पाणीकरकैअवजिसनें, विध्यापिता, हुतभुजा, पयसाथयेन, पीयानहीं, क्या, उसकुंभी, दुःखसेधारणकरणे आवैजैसेवडवानल[दरियावकीआगनें,] पीतन, किं, तपि, दुर्द्धरवाडवेन, ११, हेखामी, जादा, वडप्पणकुंभी, प्राप्त[अंगीकारकरेहुये, खामि, नतुल्य, गरिमाणमपि, तुमकों, प्राणीगण, कैसे, वडाअचरजहै, सोहृदयमेंधारणकर, स्त्वां, जंतवः कथ, हृदयेद्धानाः, तिरतेहैं, जल्दी, जादाहलकापणेसें भवसमुद्र, जन्मोदधिं, लघु, तरत्य, तिलाघवेन, विचारणेकीवातनहीं, जो, अथवा, प्रभावहै, १२, चिंत्योनहंत, महता, यदि, वा, प्रभावः १२, क्रोध• तैनें, हेप्रभु, क्रोधस्त्वया, यदि, विभो, प्रथम, निरस्तो, अचरज, विज्ञसकिया, तब, कैसे, निश्चै, कर्मरूपचोरोकू, कथं, किल, कर्मचौरा, स्तदा, बत, ध्वस्ता, प्रपन्ना, महो, , वडोंका, जब, पहलेही, दूरकिया, अथवा, यदि, , वितक, कर्णिकारों, - हेजिनेश्वर, ७६ प्रतिक्रमण. जलाताहै, इसलोकमें, जब, शिशर ऋतुभी, लोकमें, प्लोषत्य, सुत्र, वा, शिशिरापि, लोके, हरेकाले,दरखतवाले, वनोकू, नहीं, क्या, शीतकासमूह, १३, नीलद्रुमाणि, विपिनालि, न, किं, हिमानी, १३, तुगकोयोगीलोक, हेजिन, हमेस, सिद्धस्वरूप, त्वांयोगिनो. जिन, सदा, परमात्मरूप, गवेषणकरतेहैं, हृदय, कमलके, कलीमध्यभागमें, मन्वेषयंति, हृदयां, बुज, कोशदेशे, पवित्र, मलरहित, कांतिवालेकी, जब, अथवा क्याओरभी, पूतस्य निर्मल, रुचे, यदि, वा, किमन्य, कमलबीजकी, संभवे. पद, संभवि, पद, ननु, कर्णिकायाः, १४, तुमारेध्यानसें, आपके, भव्यप्राणी, क्षणमात्रमें, ध्याना, जिनेश, भवतो, भविना, क्षणेन, शरीरकोत्यागके, सिद्धावस्थाकों, जातेहैं, देहविहाय, परमात्मदशां, व्रजति, तेजअनिसें, पत्थर, भावकों, दूरकरके, लोकमें, तीवानला, दुपल, दुपल, भावं, मपास्य, लोके, सोनेपणेकों, थोडेसमयमेंही, भेलवालीधातूकीतरे, १५, चामीकरत्व, मचिरादिव, धातुलेदार, हृदयमें, हमेस, हेजिन, जिनोंके, विचारेजातेहोआप, अंतः, सदैव, जिन, विभाव्यसेत्वं, भव्यजीवोंका, कैसे, वहभी, नाशकरतेहो, भव्यैः, कथं, नाशयसे, शरीरं, येस्वरूप स्वभावही है, अर्थात्, 'मध्यस्थपुरुषोंका, निश्चै, एतत्खरूप, मथ, मध्यविवर्तिनो, हि, जोआपसकीलडाईकोशमादेतेहैं, वडेप्रभाववालेपुरुष, १६, यदिग्रहप्रशमयंति, महानुभावाः, १६, " यस्य शरीरका, , . तदपि, .

प्रतिक्रमण. ध्यातो, पाणीभी, अमृत, , रीश, आत्मा, पंडितलोकोनें, यह, तुमारेकू, अभेद एकता]बुद्धीसें, आत्मा, मनीषिभि, रयं, त्वद, भेदबुद्ध्या, ध्याणेसें, हेजिनेंद्र, होतेहैं, इसलोकमें, आपकेप्रभावसें, जिनेंद्र, भवती, ह, भवत्प्रभावः, असापीछेसेंविचारकरणेसें, मंत्रमणीसें, पानीयम,प्यमृत, मित्यनुचिंत्यमानं, क्या, नामकहतेअहोमित्रो, जहरकों, दूरनहींकरै,करैही, १७, किं, नामनो, विषविकार, मपाकरोति, .१७, तुमकोही, हेरहितअज्ञान, अन्यदर्शनीशैवादिकमी, त्वामेव, वीततमसं, परिवादिनोपि, निश्चैहेप्रभू, विष्णुब्रह्मामहेश्वरादिककी, बुद्धिकरकै, तुमकोंहीअंगीकारकरतेहैं, नूनविभो, हरिहरादि, धिया, प्रपन्ना, क्या, पीलियेका[पांडूरोगी, हेईश्वर, श्वेतभीशंखकू, किं, काचकामलभि, सितोपिशंखो, नहींग्रहणकरता देखता है, तरेरकेरंगकेपरावर्तन पलटे]सें, १८, नोगृह्यते, विविधवर्णविपर्ययेण, १८, धर्मोपदेशकी, पासके(नजीकके)प्रभावसें, धर्मोपदेश, समये, सविधानुभावा, दूररहो, मनुष्यतो, होताहै, तेरे, वृक्षभीशोकरहित[अशोक नामसैंप्रथमातिशय, १ दास्तां, जनो, भवति, ते, तरुरप्पशोका, उदयहोणेसें, दिनपती[सूर्य के, वोपृथ्वीओरवृक्षमी, अभ्युद्गते, दिनपतो, समहीरुहोपि, क्या अथवा जाग्रतअवस्थाकोंपातेहैं, नहींजीवलोक मनुष्यहीइकेले], १९, किं वा विवोधमुपयाति, नजीवलोका, अचरजहै, प्रभु, कैसे, नीचेमुखजिसका, गुंडी वींट, चित्रं, विभो, कथ, मवाङ्मुख, वृंतमेव, चारोंतरफ, गिरतेहैं, निरंतर एकमेकमिले, देवताफूलोंकीवरसात, विष्वक, पतत्य, विरला, सुरपुष्पवृष्टिः, वख्त, , प्रतिक्रमण. दधि, . उत्कृष्ट हर्ष, हेखामी, तुमारे, सामने, फूलोंकाअथवाअछेमनकेमनुष्योंका,जोहेमुनियोंकेईश्वर, त्वद्, गोचरे, सुमनसां, यदिवामुनीशः, जाताहै, निश्च, नीचेही, वाघऔरअभ्यंतरबंधन[पाप],२०,सुरपुष्पवृष्टिरअतिशय गच्छंति, नून, मधएवहि, बंधनानि, २०, युक्तठिकाणेगहरी, हृदयरूप, समुद्रसें, उपजी पैदाहुई, स्थानेगंभीर, हृदयो, संभवाया, अमृतपणेकों, तेरी, वाणीका, कहतेहैं, पीयूषतां, तव, गिरः, समुदीरयंति, पीकरकै, जिसकारण, संयोगकेभजनेवाले, पीत्वा, यतः, परमसंभद, संगभाजो, भव्य, पातेहैं, जल्दीही, अजरअमरताकों, २१, दिव्यध्वनीअतिशय, भव्या, ब्रजति, तरसा, प्यजरामरत्वं, २१, जादाकरकै, नीचेझुकके, ऊंचेउछलते, खामिन, सुदूर, सवनस्य, समुत्पतंतो, मानताहूं, कहतेहैं, देवतोंकेचमरोंकासमूह, वदंति, शुचया, सुरचामरौघाः, जोइनप्रभूकों, नमस्कारकरताहै, मुनियोंप्रधानपार्श्वनाथकों, येस्मै, नतिविद्धते, वहनिश्चैउच्चगतीकों, निश्चै, शुद्धभाववालेहोतेहैं, २२,१४ चमरातिशय, तेनूनमूर्द्धगतयः, खल, शुद्धभावा, २२, श्याम, गहरीवाणीवाला, उजले, सोनेरत्नमई, श्याम गंभीरगिर, मुज्वल, सिंहासनपररहेहुये, इससमवसरणमें, भव्यरूपमोर, तुमकों, सिंहासनस्थ, मिह, भव्यशिखंडिन, स्त्वां, देखतेहैं, उत्सुकपणेकरकै, गर्जनाकरताउंचा, आलोकयंति, मेरूपहाडके, शिखरपरकीतरेमोर, नयामेघ[वर्षातकूदेखे,तेसें,२३३५सिंहासनातिशय श्वामीकराद्रि, शिरसीव, नवांवुवाहम्, २३, पवित्र, मन्ये, मुनिपुंगवाय, हेमरत्न, रभसेन, नदंतमुच्चै, प्रतिक्रमण, तेरी, श्याम, मंडलकरकै, , क्रांतिजैसा, लप्त, कछवि, अथवा, तेरे, , ऊंचाजाताहुआ, कांति, उद्गच्छता, तक, शिति, द्युति, मंडलेन, छिपगई, पत्तोंकी, अशोकवृक्षहोतामया, च्छद, रशोकतरुर्बभूव, सानिध्यसेंभी, जो, हेरागरहित, सान्निध्यतोपि, यदि, वा, तव, वीतराग, तोफेरवैराग्यताकोप्राप्तहोय, कोननहींसचेतनपुरुषनिश्चैहोय, २४।६ भामंडलातिशय नीरागतांब्रजति, कोनसचेतनोपि, २४, अहोरलोको, प्रमादकोंछोडके, भजोइसपार्श्वप्रभूकों, भोभो, प्रमादसवधूय, भजध्वमेन, आयकरकै, मोक्षनगरीजाते, प्रतिसार्थवाहकों, मागत्य, निर्वृतिपुरे, प्रतिसार्थवाह, औसाकहताहै, हेदेव, जगत्तीनोंकों, एतनिवेदयति, देव, जगत्रयाय, जाणताहूंकेनादकरताहुवाआकाशमेंफैलकरके, देवदुंदुभितुमारा, मन्येनदन्नभिनभा, सुरदुंदुभिस्ते, प्रकाशकरणेमें, तीनभुवनमेंहेनाथ, उद्योतितेषु, भवता, भुवनेषुनाथ, तारामंडलकरकैयुक्तचंद्रमाने, धारणकियाहैअधिकार, तारान्वितोविधुरयं, विहताधिकार, मोतियोंकेगुच्छोंसें[समूहोसें]युक्त, उल्लसित तीनछत्रपरछत्रके, मुक्ताकलापकलितो, च्छृसितातपत्र, मिपकरकेस्यात्चंद्रनँतीनधाराहैशरीर, निश्चैनजीकआयाहै, २६, व्याजानिधाधृततनु, ध्रुवमभ्युपेतः, २६, आपप्रभूनेजादाकरकैभरदियाहै, जगत्तीनएकठाहोगया, खेनप्रपूरित, जगत्रयपिंडितेन, क्रांति, ओरयशकीतरेही, संचयकरकै, कांति, प्रताप, यशसामिव, संचयेन, , २५, आपका, प्रताप, प्रतिक्रमणः सोना, चांदीसें, नम, छोडके, अथवा, 4 प्रकर्षपणे रचाहुवा, रल, माणिक्य, हेम, रजत, प्रविनिर्मितेन, असेतीनगढोंसे, हेभगवानचारोंतरफ, सोभतेहो, २७, सालनयेण, भगवन्नभितो, विभासि, २७, मनोहरमालायेंफूलोंकी, हेजिन, नमेहुये, देवेंद्रोंकी, दिव्यसृजो, जिन, त्रिदशाधिपाना, रत्नोंसें रचितभी, मुगटोंकों, मुत्सृज्य, रत्नरचितानपि, मौलिबंधान, चरणोंकाआसरालेतेहैं, तुमारे, जो, दूसरीजगे, पादोश्रयंति, भवतो, यदि, वा, परत्र, तुमारासंगमहुयेवाद, पुष्प, पंडित, वादेवता, नहींरमतेहैंनिश्चै, २८, त्वत्संगमे, सुमनसो, नरमंतएव, २८, तुमहेखामी, भवसमुद्रसें, उलटेमुखवाला[विरक्त है जिनोकों, त्वंनाथ, जन्मजलधे, विपराङ्मुखोपि, जोतारतेहो, प्राणियोंकों, अपणे, पिछाडी लगेकों, यत्तारयस्य, निज, पृष्टलग्नान्, युक्तहैयेवातनिश्चै, पृथ्वीकीमट्टीसें, वनाघडाजोहै, संततुमाराहीवैसाखभावहै, पार्थिव, निपस्य, सतस्तवैव, अचरजहेहेप्रभु, जोहोआप, कर्मविपाकसैंशून्य,औरघडातोकुंभारकेकर्मयुक्तहै,२९, चित्रं विभो, यदसि, कर्मविपाकशून्यः, २९, तीनलोककेईश्वरहो, हेजनपालक, तोभीदलद्रीहोतुम,वा,दीक्षावादअल्प[वालरहितहोहेजनप विश्वेश्वरोपि, जनपालक, दुर्गतस्त्वं, क्या, जन्मरहितस्वभाव, निश्चैकर्मलेपरहित, तुमहेईश्वर किं, वा, क्षरप्रकृति, रप्यलिपि, स्त्वमीश, ज्ञानरहितकोभी, अच्छाबोधकराणेका, हमेस, कैसैंभी, निश्चै, अज्ञान, वत्य, पि, सदैव, कथंचि, देव, ज्ञान, तुमारा, देदीप्यमानहै, तीनलोककों, तीनलोककों, प्रकाशकरणेकाहेतुरूप, ३०, ज्ञानं, त्वयि, स्फुरति, विश्व विकाशहेतुः, सुमतो, युक्तंहि, अथवा, ३०, प्रतिक्रमण. ८१ १ घनौघ, धाराका, धारम्, भ्रश्य, अधिकबोझसेभरा, आकाशमें, धूलिरूपपाप, क्रोधसेती, प्रारभारसंभृत, नभांसि, रजांसि, रोषा, उडाई, कमठनें, वोकमठमूर्ख, जो. दुत्थापितानि, कमठेन, शठेन, यानि, कांतिमी, उससें, तेरी, नहीं, हेखामी, हणेगई, हणीजगईआसाउसकी, छायापि, ते, स्तव, न, नाथ, हता, हताशो, भरगया, फेर, इसपापरजसें, वोही, उलटा,. दुष्टआत्माकमठ, ३१, ग्रस्त, स्त्व, मीभि, रयमेव, परं, दुरात्मा, ३१, जोगाजता, बहोतजोरका, मेघकासमूह, बहोत, डरावणा, यद्गर्ज, दुर्जित, मद्भ, भीम, गिरती, विजली, मूसलजैसाजाडा, डरावणी, त्तडि, न्मुसलमांसल, घोर, उसदैत्यनें, छोडा, अववो, दुःखसेंतरणेमें,आवेऔसैपाणींकू, धारण किया, दैत्येन, मुक्त, मथ, दुस्तरवारि, दधे, उससें, उसका, हेजिन, दुःखेतिरणेवालाभवजल, कृत्यहुआ, ३२, जिन, दुस्तरवारि, कृत्यम्, ३२, लटकतेहैं, ऊपरकेवाल, विदरूपहै, शिकल, मनुष्योंकेमस्तकका, ध्वस्तो, लकेश, विकृता, कृति, मर्त्यमुंड, लटकताझंमका, धारणकियाहै, डरावणा, मुखसें, निकलतीअग्नि, प्रालंय, श्रृदू, विनियंदग्निः असैदैत्योंकासमूहप्रतें, आपकेवास्ते, प्रेरणाकरी, जिसनें, प्रेतवजाप्रति, भवंत, मपीरितो, या, वह, उसकेहीहुआ, भवोभवमें, भवरूपदुःखकाकारण, ३३, सो, स्याभव, त्प्रतिभवं, भवदुःखहेतुः, धन्यवहीहैं, हेतीनभुवनकेखामी, जो, धन्यास्तएव, मुवनाधिप, त्रिसंध्य- आपकाआराधतेहैं, विधिसें, दूरकियाहै, दूसरेकामजिसनें, माराधयंति, विधिव, विधुता, न्यकृत्याः, तेनैव, तस्य, भयद, वक्र, त्रिकाल, ये, , ११ ८२. प्रतिक्रमण. रूं , भव्यजीव, भुवि, . भवजल, तवः गोत्र, नहीं, भक्तिसेंउल्लशित, व्याप्त, शरीरभागजिनोंका, भन्योल्लस, त्पुलक, पक्ष्मल, देहदेशाः चरणदोनों, तेरे, प्रभू, पृथ्वीमें, पादवयं, तव, विभो, जन्मभाजः, ३४, पाररहित, समुद्रमें, हेमुनियोंकेईश्वर, अस्मि, नपार, भववारि, निधौ, मुनीश, जाणताहूंनहींमैनें, कानोसेंसुणा, तुमकोंकभी, मन्ये, नमे, श्रवणगोचरतां, गतोसि, सुणणेसें, फेर, तेरा, नामगोत्र, पवित्रमंत्रकरके, आकर्णिते, तु, पवित्रमंत्रे, क्या, अथवा, आपदारूप, सांपणी, वहविवंसप्राप्तहोंय ३५ किं, वा, विप, द्विषधरी, सविधंसमेति, ३५, जन्मांतरमेंभी, तेरेचरण, दोनों, हेदेव, जन्मांतरेपि, तवपाद, युगं, न, देव, जाणताहूं, मेंनें, पूजा, कैसे,दोनोंचरणवांछितदानदेणेमेचतुर, मन्ये, महित, मीहितदानदक्षं, तिसकारण, इसजन्ममें, हेमुनिपति, अनादरका, हजन्मनि, मुनीश, पराभवानां, हुआ, स्थानक[ घर में, मथनहोगयाचित्तकाअभिप्राय, इसजन्ममें, जातो, निकेतन,महं, भथिताशयानां, निश्चै, मोहअंधकारसें, ढके, नेत्रोंकरके, नूनं, न, मोह तिमिरा, वृत, पहले, हेप्रभू, एकवेरभी, देखेहुयेहो, पूर्व, विभो, सकृदपि, प्रविलोकितोसि, मर्मस्थानकू, भेदणेवाले, पीडादेतेहैं, निश्चै, मुझकों, अनर्थ दुःख], मर्मा, विधुरयंति, हि, मा, मनर्थाः जादाकरकैउद्यत, कर्मसंतति, कीप्राप्ति, कैसेंयहहोती, आपकादर्शनहोजातातो, प्रबंध, गतयः, कथ, 'मन्यथै, ते ३७,. मया, , तेने, नहीं, लोचनेन, विधो, प्रोद्य, प्रतिक्रमण. ८३ वत्सल, अथवाआपकोंपहलेसुणाभी, पूजाभी, देखाभी, आकर्णितोपि, महितोपि, निरीक्षितोपि, निश्चै, नहींचित्तमैं, मेनें, धारणकिया, भक्तिसें, नृनं, नचेतसि मयाविधृतोसिभत्त्या हुआहूं, उसकरकै, हेमनुष्योंकेबंधू, दुःखकापात्र, जातोस्मि, तेन, जनबांधव, दुःखपात्रं, जिसकारण, क्रिया, जादाफलदेणेवाली, नहीहोयभावशून्यतासें, ३८, यस्मा, क्रिया: प्रतिफलंति नभावशून्या, तूंहेनाथ, दुःखीजनका, हेशरणागतप्रतिपाल, त्वंनाथ, दुःखिजन, वत्सल, हेशरण्य, दयाके, पुण्य[पवित्र स्थानक, जितेंद्रियोंमें, श्रेष्ठ, कारुण्य, पुण्यवसते, वशिनां, वरेण्य, भक्तिसेंनमनकियाहै, मेरे पर, हेमहेश्वर, दयाकरकै, भक्त्यानते, मयि, महेश, दयांविधाय, दुःखकेउत्पत्ति[अंकूरकों, खंडनकरने, जल्दीपणा, कर, ३९, दुःखांकुरो, तत्परतां, विधेहि ३९, संक्षारहित अनंत], बलीके, शरणकाशरण, वोसरण, निःसंख्य, सार, शरणंशरणं, शरण्य, पायकरके, नाशकरेहुये, वैरी, प्रसिद्ध, चरित्रआपका, मासाद्य, सादित, रिपु, प्रथिता, वदातम्, तुमारेचरणकमलका, भी, वांझडाहै, त्वत्पादपंकज, मपि, प्रणिधान, वंध्यो, मारणयोगहुँ, जो, हेतीनभुवनमेंपवित्र, हा,वडाखेदहै, मेंमारागया, रागद्वेषसें, वध्योस्मि, चे झुवनपावन, हाहतोमि ४०, हेदेवइंद्रोंसेवांदणेयोज्ञ, जाणाहै, सर्व, वस्तुकासारआपने, देवेंद्रवंद्य, विदिता, खिल, वस्तुसार हेसंसारसेंतारणेवालेप्रभू, हेत्रिभुवननाथ, संसारतारकविभो भुवनाधिनाथ द्दलन, ध्यान, ८४ प्रतिक्रमण . रक्षाकरो, मद्य, हेनाथ, फल, , हेदेव करुणाकेद्रह, मुझेपवित्रकरो, बायख, देव, करुणाहद, मांपुनीहि, सीदाताहुआ, आज, डरदेणेवाला, संकटसमुद्रसे, ४१, सीदंत, भयद, व्यसनांदुराशेः ४१, जोहै, आपकेचरण, कमलकी, यद्यस्ति, नाथ भवदनि, सरोरुहाणां, भक्तीका, कुछभी, संतानपरंपरासें, संची[एकठीकरी]हुई, भक्तेः फलं, किमपि, संतति, संचितायाः वहमुझें, तुमाराएक, शरणकी, शरणवत्सलताहुओ, तन्मे, त्वदेक, शरणस्य, शरण्यभूया, हेखामी, आपही, तीनभुवनमें, इसलोकमें, दूसरेजन्ममेंभी, ४२, खामी, त्वमेव, भुवने, भवांतरेपि, ४२, इसतरेसें, समाधीयुक्तबुद्धिहै, विधिपूर्वक, हेसामान्यकेवलियोंकेइंद्र, इत्थं, समाहितधियो, विधिव, जिनेंद्र तेज[आकरा] उल्लासपाता, रोमांचरूप, कंचुकीयुक्तशरीरभागजिनोंका, सांद्रोल्लस, पुलक, कंचुकितांगभागाः तुमारीमूर्तिका, मलरहित, मुखकमलसें, वांधाहैध्यानजिनोंनें, निर्मल, मुखांवुज, बद्धलक्षा, जोसम्यक्स्तवना, तुमारीप्रभू, रच, भव्यजीव, ४३, येसंस्तव, तवविभो, रचयंति, भव्या, ४३, मनुष्यकेनेत्ररूप, कमलकों, प्रकाशनेचंद्रजैसे, अत्यंतदेदीप्यमान, स्वर्गकीसंपदा, जननयन, प्रभाखरा स्वर्गसंपदो, भोगके, वहगलगयाहै, कर्ममलकासंचयजैसा, थोडेकालमेंमोक्षकू, अंगीका, भुक्त्वा, तेविगलित, मलनिचया, अचिरान्मोक्षं, प्रपद्य रकरताहै, ४४, जैसासिद्धसेनकुमुदचंद्राचार्य-महेश्वरकेलिंगमेंप्रच्छन्नअयवंती ४४, इतिकुमुदचंद्रकृतपार्श्वस्तवनं ॥ पार्श्वप्रभूकीस्तवनाकरअयवंतीमें विक्रमादित्यनृपसमक्षलिंगखतःफटकेप्रगटकरी. लदिब, . कुमुद, चंद्र ते, प्रतिक्रमण सर्व, मेतत्, अहो२, इस, . अथवृहच्छांति ॥ अहोरभव्यजीवो, सुणो, वचन, योज्ञअवसरके, सब, यह, भोभोभव्याः, शृणुत, वचनं, प्रस्तुतं, जो, जात्रामें, तीनभुवनके, गुरु, वीतरागके, भक्तीकेभजनेवाले, ये, · यात्रायां, त्रिभुवन, गुरो, रहतां, भक्तिभाज: उनोंकी, शांतिहुओ, आपलोकोंकै, अरिहंतादिककेप्रभावसें, तेषां, शांतिभवतु, भवता, महँदादिप्रभावा, रोगरहितपणा, लक्ष्मी, धैर्य, बुद्धि, करणेवाली, लडाईके, नासकाकारण, दारोग्य, श्री, धृति, मति, करी, क्लेश, विध्वंसहेतु, काव्य, भव्यलोको, निश्चै, भरतऐवत, १ गयं, भोभो, भव्यलोका, इह, हि, भरतै,रा महाविदेहमें, पैदाहुये, सव, तीर्थकरोंके, जन्म, पत, विदेह, संभवानां, समस्त, तीर्थकृतां, ज कीवख्त, आशन, कापणेके वाद, अवधीज्ञानसें, जाणकै, न्म, न्यासन, प्रकंपा, नंतर, मवधिना, विज्ञाय, सौधर्मपहलेदेवलोककाखामी, सुघोषानाम, घंटा, हिलायांके, वाद, सौधर्माधिपतिः, सुघोषा, घंटा, चालना, नंतर समस्त, सुर, ओरअसुरोंकेइंद्रः, संग, ओरअसुरोंकेइंद्रः, संग, आयकरकै, विनययुक्त, सह, समागत्य, सविन अरिहंतपूज्यकों, लेकरकै, जायकरकै. मेरूपहाडके, य,महद्भट्टारकं, गृहीत्वा, कनकाद्रि, शिखरपर, किया, जन्मअभिषेक स्नात्र], शांतिकाशब्दपुकारतेहैं, गे, विहित, जन्माभिषेका, शांतिमुद्घोषयति, जैसे, तैसें,मैं, कियेमुजबकीनकल, जैसाकरकै, देवतोंका, कृतानुकार, मितिकृत्वा, महाज, समूह, जिसमार्गगये, वहमार्गहै, जैसें, भव्यजीवोंके, संग, आय नो, येनगतः, स,पंथाः, इति, भव्यजनैः, सह,समा, करके, स्नानकरणेकपाटेपर; स्नानकराकर, शांतिशब्दउंचेखरसें, सकल, सुरा, सुरेंद्रे, गत्वा, यथा, ततो,हं, , सुणो, खाहा, ओं अरिहंत, हतः, . ८६ प्रतिक्रमण. गत्य, लानपीठे, लात्रंविधाय, शांतिमुद्घोष, जाहिरकरताहूं, वहपूजा, यात्रा, खानादिक, महोत्सवके, वाद, यामि, तत्पूजा, यात्रा, स्नानादि, महोत्सवा, नंतर, असैंकरकै, कानदेकरके, तेजोअग्निबीज, मितिकृत्वा, कर्णदत्वा, निशम्यतां, पवित्रदिन, पवित्रमैं, खुसहुओ, खुसहुओ, झानऐश्वर्यवान, पुण्याहं, पुण्याहं, प्रीयंता, पुण्याहं, प्रीयंतां, प्रीयंतां, · भगवंतो, सबजाणणेवाले, सबदेखणेवाले, तीनलोककेखामी, सर्वज्ञा, सर्वदर्शिन, स्त्रिलोकनाथा,स्त्रि तीनलोकसेपूजित, तीनलोककेपूज्य, तीनलोंककेईश्वर, लोकमहिता, स्त्रिलोकपूज्या, त्रिलोकेश्वरा, तीनलोकमेंउजालेकेकरणेवाले, गईउत्सर्पणीके २४तीर्थंकरोंकेनाम, स्त्रिलोकोद्योतकरा: ओं श्री केवलज्ञानी १ निर्वाणी-२ सागर ३ महायश ४ विमल ५ सर्वानुभूति ६ श्रीधर ७ दत्त ८ दामोदर ९ सुतेजा १० स्वामी ११ मुनिसुव्रत १२ सुमति १३ शिवगति १४ अस्ताग १५ नमीश्वर १६ अनिल १७ यशोधर १८ कृतार्थ १९ जिनेश्वर २० शुद्धमति २१ शिवकर २२ स्य- न्दन २३ संप्रति २४ यह गई चोवीसीके तीर्थंकर एते अतीत चतुर्विशति तीर्थकराः ओं ऋषभ १ संभव ३ अभिनन्दन ४ सुमति. ५ पद्मप्रभ ६ . सुपार्श्व ७ चंद्रप्रभ ८ सुविधि ९ शीतलं १० श्रेयांस ११ वासुपूज्य १२ विमल १३ अनंत १४ धर्म १५ शांति १६ शांति १६ कुंथु १७ अर १८ मल्लि १९ मुनिसुव्रत २० नमि २१ नेमि २२ पार्श्व २३ वर्धमान २४ यह वर्तमान चोवीसीके तीर्थकर एते • वर्तमान चतुर्विशति तीर्थकराः ओं श्रीपद्मनाभ १ सूरदेव २ सुपार्श्व ३ खयंप्रभ ४ सर्वानु. अजित २ प्रतिक्रमण. उदय ७ मम १५ , मुनिप्रवरा, रिपु, भूति ५. देवश्रुत.६ पेढाल ८ पोहिल ९ शतकीर्ति १० सुव्रत ११ अमम १२ निष्कषाय १३ निष्पुलाक १४ . नि- चित्रगुप्ति १६ समाधि १७ संबर १८ यशोधर १९ विजय २० मल्लि २१ देव २२ अनंतवीर्य २३ भद्रंकर २४ यह, होणेवाले, तीर्थकर, २४, जिन, शांतहुये, शांतिककरणे एते, भावि, तीर्थंकराः, जिना:, शांताः, शांतिकरा वालेहुओ, साधूलोक, मुनियोंमेप्रधान, वैरियोंके, भवंतु, स्वाहा, ओं मुनयो, विजयमें, दुकाल, कांतारअटवीमें, विकट, रस्तेमें, रक्षाकरो, तुमारी, विजय, दुर्भिक्ष, कांतारेषु, दुर्ग, मार्गेषु, रक्षतु, वो, हमेस नित्यं, ॐश्रीनाभि १ जितशत्रु२ जितारि ३ संवर ४ मेघ ५ धर ६ प्रतिष्ट ७ महसेन ८ नरेश्वर सुग्रीव ९ दृढरथ १० वि- ष्णु ११ वसुपुज्य १२ कृतवर्म १३ सिंहसेन १४ भानु १५ विश्वशेन १६ सूर १७ सुदर्शन १८ कुंभ १९ सुमित्र २० विज- य २१ समुद्रविजय २२ अश्वशेन २३ सिद्धार्थ २४ यह,. वर्तमान, २४ तीर्थकरोंकेपिताकानाम, एते, वर्तमान, वर्तमान, चतुर्विशति, जिनजनका, ओश्रीमरुदेवा १ विजया २ सेना ३ सिद्धार्थी ४ सुमंगला. ५ सुसीमा ६ पृथिवीमाता ७ लक्ष्मणा ८ रामा ९ नंदा १०. विष्णु ११. जया १२ श्यामा १३ सुयशा १४ सुव्रता १५ अ- चिरा १६ श्री १७ देवी १८ प्रभावती १९ पद्मा २० वमा २१ शिवा २२ वामा २३. त्रिसला २४ यह, वर्तमान, २४, तीर्थंकरोंकेमाताकेनाम, एते, वर्तमान, जिनजनन्या, ओंगोमुख १ महायक्ष २ त्रिमुख ३ यक्षनायक ४ तुंबरु ५ कुसुम ६ मातंग ७ विजय ८ अजित ९ ब्रह्मा १०. यक्षराज ११ कुमार १२ षण्मुख १३ पाताल १४ किन्नर १५ गरुड प्रतिक्रमण. वर्तमान, १६ गंधर्व १७ यक्षराज १८ कुबेर १९ वरुण २० भृकुटि २१ गोमेध २२ पार्श्व २३ ब्रह्मशांति २४ यह, तीर्थंकरोंके, २४, यक्षोंकेनाम, एते, वर्तमान, जिनयक्षा, ओं चक्रेश्वरी १ अजितवला २ दुरितारि ३. कालीमहाकाली ४ श्यामा, ५ शांता ७ भृकुटि ८ सुतारका ९ अशोका १० मानवी ११ चंडा १२ विदिता १३ अंकुशा १४ कंदप्पी १५ निर्वाणी १६ बला १७ धारिणी १८ धरणप्रिया १९ नरदत्ता २० गांधारी २१ अंबिका २२ पद्मावती २३ सिद्धायिका २४ यहवर्तमान २४ तीर्थंकरोंकीआज्ञाकारिणी२४देव्योंकेनाम एतेवर्तमान चतुर्विशति तीर्थंकरशासनदेव्यः ओह्रीं श्रींधृति कीर्तिकांति बुद्धिलक्ष्मी मेधा विद्यासाधन प्रवेशमें, रहणेमें, अच्छीतरेगृहणकरणेसेंनाम, जयवंतहोवह, प्रवेश, निवशनेषु, सुगृहीतनामानो, जयंतिते,जि जिनेन्द्र, नंद्राः, ओं रोहिणी १ प्रज्ञनि २ वज्रशृंखला ३ वज्रांकुशा ४ चक्रे- श्वरी ५ पुरुषदत्ता ६ काली ७ महाकाली८ गौरी ९ गांधारी १. सर्वास्त्र महाज्वाला ११ मानवी १२ वैरोव्या १३ अच्छुप्ता १४ मानसी १५ महामानसी १६ रक्षाकरो, मेरी, हमेस, १६एतेषोडशविद्यादेव्यो, रक्षतु, नित्यं,खाहा, प्रणववीज, आचार्य, उपाध्याय, आदले, चारोंहीवर्णकों, श्रीशोभा, ओं, आचार्यो, पाध्याय, प्रभृति, चातुर्वर्ण्यस्य, श्रीश्र, साधुओंकेसंघकों, शांतिहो, तुष्टि, हो, पुष्टिहो, मणसंघस्य, शांतिर्भवतु, ओंतुष्टि, भवतु, पुष्टिर्भ, ग्रह, चंद्र, सूर्य, मंगल, बुध, बंतु, ओंग्रहा, श्चंद्र, सूर्यो, गारक, बुध, वृहस्पति, यह,१६विद्यादेवी, मे, , , सोम, यम, सोम, यम, राजाका प, प्रशन्नता, प्रतिक्रमण. ८९ शुक्रशनैश्वरराहुकेतुसहित लोकपालसंयुक्त, शुकशनैश्चरराहुकेतुसंहिताः सलोकपालाः वरुण, कुबेर, इंद्र, सूर्य, कार्तिक, गणे वरुण, कुबेर, वासवा, दित्य, स्कन्द, विना, श, जो; फेर, ओरभी,, गाम, सहरके, क्षेत्र, देवतादिक, जोहे, यका, ये, चा, न्येपि, ग्राम, नगर, क्षेत्र, देवतादय, यस्ते, सोसंब, खुसहुओ,२, अखूट, भंडार, कोठार, सर्वे, प्रीयंतां,२, अक्षीण, कोश, अक्षीण, कोश, कोष्ठागारा, नरपत, फेर, हुओ, लडका, दोस्त, भाई, स्त्री, य,श्व, भवंतुखाहा, ओपुत्र, मित्र, भ्रात, कलन,सु गोत्रिय,निजगोत्री, सगे, न्यातीवर्ग, युक्त, हमेस, फेर, ह हृत्,खजन, संबंधि, बंधुवर्ग, सहिताः, नित्यं, चा, मो, करणेवाले, हुओ, इस, फेर, पृथ्वीमंडलमें, द, प्रमोद, कारिणो, भवंतु, अस्मिं, श्व, भूमंडले, वसणेवालोंका, महाव्रतीसाधुसाध्वी, अनुव्रतीश्रावक, श्राविका, आयतन, निवासिनां, साधुसाध्वी, श्रावक श्राविका, ओंका, रोग, उपसर्ग, महारोग, दुःख, खोटेमनकेपरिणाम, मिटानेकू नां, रोगो, पसर्ग, व्याधि, दुःख, दौमनस्यो, पशमना, शांतिहुओ, संतोष, पुष्टता, धनादिककीवढोती, मंग, य, शांतिभवतु, ओंतुष्टि, पुष्टि, ऋद्भिवृद्धि, मांग, लीक, उत्सव, हुओ, हमेस, उत्पन्न, खोटे, त्सवा, भवंतु, सदा, प्रादुर्भूतानि, दुरितानि, पाप, समनहुओ, वैरी, वैरी, उलटे,मुखवाले, हुओ, पापानि, शाम्यंतु, शत्रवः, पराङ्मुखा, भवंतु, खाहा, लक्ष्मीशोभावंतशांतिनाथकू, नमस्कारशांतिके,करणेवालोंकों ती, श्रीमतेशांतिनाथाय, नमाशांतिविधायिने, त्रै, शां नलोकके,पती इंद्रोंके, मुकुटसेंपूजितहैचरणजिनोंका, १, लोक्ये, शामराधीश, मुकुटाभ्यर्चितां । प्रिये, १, शा, ठिकाणा, , त्यो, , , ९० प्रतिक्रमण. तिनाथ शांतिकेकरता, समवसरणलक्ष्मीयुक्त, शांतिदेओ, मुझेहेजगद्गुरुः, न्तिः, शांतिकरः, श्रीमान्, शान्तिर्दिशतु, मेगुरु,शां शांतिनिश्चै, हमेशउनोंके, जिनोंकेशांतिप्रभूकीमूर्तिपूजाघर होय, मर्दन, तिरेव, सदातेषां, येषांशांतिहे, २।२। ओंउन्म, करडाला,कष्ट, दुष्टग्रहोंकीचाल, खोटेस्वप्ने, दुःखोंकेकारणकूआदिले, ष्टरिष्ट, दुष्ट,ग्रहगति, दुःखम; दुनिमित्तादि,सं, संपादन[पैदाकरीहेहितकीसंपदा, नामकालेणाभी, उत्कृष्टवर्तेहैशांतिप्रभूका, पादितहितसंपत्, नामग्रहणं, जयतिशांते, ३, चारप्रकारकासंघ, नगरदेश, राजाअधिपती, राजाओंकेरहणेका श्रीसंघ, पौरजनपद, राजाधिप, राजसन्निवेशा, कंपनी, नगरकेआगेवानोंका उंचेखरसें, डद्घोषणाशांति, नाम् ; गोष्टी, पुरमुख्यानां, ध्याहरणे, व्यारेच्छां, कीकरे,४, श्रीसाधुजैनसंघकी, शांतिहोय, श्रीनगर, तिम्,४, श्रीश्रमणसंघस्य, शांतिर्भवतु, श्रीपौ, केलोकोंकीशांतिहोय, राजाऔरदिवानादिकअधिपतियोंकीशांतिहोय, रलोकस्यशांतिर्भवतु, श्रीराजाधिपानांशांतिर्भवतु, राजाकेघरमुकामोंकीशांतिहोय, साझेदारव्यापारियोंकीशांतिहोय, श्रीराजसंनिवेशानांचशांतिर्भवतु, श्रीगोष्टिकानांशांतिर्भवतु न्यायसभापंचनगरकेमुखियोंकीशांतिहो, ब्रह्मलोकोंकीशांतिहो, गोष्टिपुरमुख्यानांशांतिभवतु, ब्रह्मलोकस्यशांति, मंगलीकहो, श्रीपार्श्वनाथअच्छेदेवकोंधूपदीपादिकंयह ओहीश्रीश्रीपार्श्वनाथायखाहाः, एषा, शांति प्रतिष्टामें, यात्रा, सानादिककेअंतमें, शांतिकलंश, शांतिः, प्रतिष्टा, यात्रा, स्नात्रावसानेषु, शांतिकल, कोंग्रहणकरके, केशरचंदन, कपूर, अगर, धूप, वासचूर्ण, कु शंगृहीत्वा, कुंकुमचंदन, कर्पूरा, गरु, . धूप, बास, . कु, शमांजलिसंयुक्त, स्नात्रचोकीपर, श्रीसंघसंयुक्त, पवित्र, सुमांजलिसमेतः, स्लानपीठे, श्रीसंघसमेतः, शुचिः, . ओखा हा . . कु,..

प्रतिक्रमण. पवित्र, शरीर, फूल, कपडा, चंदन, गहणोंसें, सोभायमान, चं शुचिः, वपु, पुष्प वस्त्र, श्चंदना, भरणा, लंकृतः, , · चंद दनका, तिलक, करकै, पुष्पोंकीमालागलेमेंकरकै, शांतिशब्द न, तिलकं, विधाय, पुष्पमाला कंठे कृत्वा, शांतिमु उंचेवरसेंपुकारके, शान्तिकापाणी, शिरपरदेणा, असा घोषयित्वा, शान्तिपानीयं, मस्तकेदातव्य, मिति जिनराजकेअभिषेकमेनाचेरत्नमोतीपुष्पवर्षाकर, गावै, फेर, नृत्यंतिनृत्यमणिपुष्पवर्षसृजंति, गायंति च, मं मंगलगीतोंकों, स्तोत्रोंको, नामगोत्रोंकों, पढे, मंत्रोकों, कल्याण गलानि, स्तोत्राणि, गोत्राणि पठंति, मंत्रान् , कल्या केभजणेवालेनिश्चे, जिनराजकेअभिषेकमें,, मेंतीर्थकरकीमाता, णभाजोहि, जिनाभिषेके,१, अहंतित्थयरमाया शिवादेवी, तुमारेनगरकीवसणेवालीहूं, हमाराकल्याणहो, शिवादेवी तुह्मनयरनिवासिनी, अह्मशिवं,तु तुमाराकल्याणहो, अशुभउपशमहुआ, कल्याणहो, मशिवं, असुहोवसम, शिवंभवतुवाहा,१. शिव हुओसर्वजगत्का, परायाहितकरणेसावधानहुओप्राणीगण, मस्तुसर्वजगतः, परहितनिरताभवंतुभूतगणाः, दोष, पाओ, सबजगेसुखी, हुओ, दोषाः, प्रयान्तु नाश, सर्वत्रसुखी, भवतु, भवतु, लोकाः,२, कटतीहै, उपसर्ग कष्ट], क्षयहोजाताहै, विघ्नकीवेल, मनहै उपसर्गाः, क्षयंयान्ति, विनवल्लया, सोखुसवखतीकोप्राप्तहोताहै, पूजतेहुयेजिनेश्वरकों,३, इसतरेवडी प्रसन्नतामेति, पूज्यमानेजिनेश्वरे, इतिवृद्धशा शांतिसंपूर्ण, ॥ न्तिः समाप्ता,॥ कल्याण नास, लोकसव, . छिद्यते, मनः .

។ फेर, . ९२ प्रतिक्रमण. अथजिनपंजसअरिहंतकूनमोमेनमताहूं, सिद्धकू. ओं ह्रीश्रीअईयोनमोनमः, ओं हीश्रीश्रीसिद्धे नमोंमेंनमताहूं, आचार्यकूनमोमेनमताहूं भ्योनमोनमः ओं हीश्रीश्रीआचार्येभ्योनमोनमः, : ओं ही उपाध्यायकोंनमोमेनमताहूं, श्रीश्रीउपाध्यायेभ्योनमोनमः, ओं ह्रीश्रीश्री गौतमखामीकूआदिलेकरसवसाधूकोंनमोमेनमताहूं,१, यह गौतमखामिप्रमुखसर्वसाधुभ्योनमोनमः १, एष पांचपदोंकानमस्कार, सबपापोंकानाशकरणेवालाहै, मंगलीक, पंचनमस्कारः सर्वपापक्षयंकरः मंगलानां, च, सबोंका, पहला, होय, मंगल,२ स्वदेशमेजयपर सर्वेषां, प्रथम, भवति मंगलं,२, ओं ह्रीश्रीजयवि देशमें विजयकारी, सैपूजायोज्ञउत्कृष्टआत्माकोंनमस्कार, कमलप्रभाचार्य : जये, अहंपरमात्मनेनमः, कमलप्रभसूरींद्रो, भा कहताहैजिनपंजरकों एकाशनउपवासकरकै, तीनोंकाल, जो, षतेजिनपंजरं,३, एकभक्तोपवासेन, त्रिकालें, या. पढे, यह, मनवंछितसब, फलोंकोंवहपावै, निश्चल पठे, दिदं, मनोभिलषितंसर्व, फलंसलभते, ध्रुवं, जमीनपरसोवैशीलपालै, गुस्सा, लालचरहित, देवा ४, भूशय्याब्रह्मचर्येण, क्रोध, लोभविवर्जितः, घिदेवकेआगेपवित्रआत्मासे, छमहीनेसेंपावेफलनिश्चल,५, अर्हत वताओपवित्रात्मा, षण्मासैलभतेध्रुवं,५, अर्हतं कोंस्थापनकरोशिरपर, सिद्धकोंनेत्रओरनिलाडपर, आचार्यकान स्थापयेन्मूर्ध्नि, सिद्धचक्षुर्ललाटके, आचार्यश्रो केवीचमें, उपाध्यायफेरनाकपर, साधुओंकासमूहमुख, त्रयोर्मध्ये, उपाध्यायंतुघ्राणके,६ साधुवृन्दमुख, केआगे, मनकों, शुद्ध, करकै, फेर, · दहिणासूर्यवायाचंद्रस्वरकोंरोकके; स्याग्रे, मनः, शुद्धं, विधाय, च, सूर्यचंद्रनिरोधेन, सु दे . ।

प्रतिक्रमण. णनेवाले९, पाता पंडितजनसबकामसिद्धकरणे,७, दक्षिणदिशामेंकामदेवकेवैरी, वाये धीःसर्वार्थसिद्धये,७, दक्षिणेमदनदेषी वामपा पसवाडेरहैजिनराज, अंगकेसांधोंमेसर्वज्ञ, परमेष्टीनिरुपद्र बैंस्थितोजिना, अंगसंधिषुसर्वज्ञः, परमेष्टीशि वकरता,८, पूर्वमें, श्रीजिनरक्षाकरे, अग्निकोणमें जितेंद्रिय वंकरः,८, पूर्वाशां, श्रीजिनोरक्षे, दाग्नेयींविजितें भगवान्, दक्षिणदिशामेंपरमब्रह्म, नैऋतकूणमेंतीनकालकोंजा द्रिया, दक्षिणाशांपरब्रह्म, नैतिचत्रिकालवि पश्चिमदिशामेजगत्केखामी, वायबकूणमेपरमेश्वर, त्,९ पश्चिमाशांजगन्नाथो, वायवीपरमेश्वर, उत्तरदिशातीर्थंकरसव, ईशानकोणमेंफेरनिरंजन,१०, पाता उत्तरांतीर्थकृत्सर्वा, मीशानींचनिरंजन:१० लमेंभगवान्अहंत, आकाशमें पुरुषोत्तम, रोहिणीकोआदि लंभगवानई, नाकाशंपुरुषोत्तमः, रोहिणीप्रमु लेकर१६विद्यादेवियों, रक्षाकरोसवकुलकी,११, खादेव्यो, रक्षतुसकलं,कुलं११, ऋषभो, मस्तक क्षाकरो, अजितनाथनेत्रोंकीरक्षाकरो, संभवकानदोनोंकी, रक्षे, दजितोपिविलोचने, संभव कर्णयुगलं, नाककी, फेर, अभिनंदन, होठ, श्रीसुमतीरक्षाकरो नासिकां, चा, भिनंदना,१२, ओष्ठौ, श्रीसुमतीरक्षे दांतोंकोंपद्मप्रभप्रभू, जीभ, सुपार्श्वनाथदेवयह, त्, दंतान्पद्मप्रभोविभुः, जिव्हां, सुपार्श्वदेवोयं, तालूकीचंद्रप्रम, गलेकी, श्रीसुविधिनाथरक्षाकरो तालुचंद्र, प्रभोविभुः,१३, कंठं, श्रीसुविधीरक्षेत्, हृदयकीअछेशीतलरक्षाकरो, श्रेयांशभुजादोनोंकी, वासु हृदयंश्रीसुशीतला, श्रेयांसोबाहुयुगलं, वासु हाथदोनोंकी,१४, अंगुलियोंकीविमलरक्षाकरो, अनंत करदयं, १४, अंगुलीविमलोरक्षे, दनंतोसौ ऋषभ, मस्तककीर प्रभू पूज्य, पूज्य, ९४ प्रतिक्रमण ट, यहस्तनदोनोंकीभी, अच्छेधर्मनाथपेटओरहड्डीकी, शांतिनाभिमंड स्तनावपि, सुधर्मोप्युदरास्थीनि, श्रीशांतिर्नाभि लकी,१५, कुंथुगुदाकीरक्षाकरो, अररूंओरकम्म मंडलं,१, श्रीकुंथुर्गुह्यकरक्षे, दरोरोमकटीत रकी, मल्लिउरूओरपीठकी, जांधकीफेरमुनिसुव्रत,१६ मल्लिरुरूपृष्टिवंशं, जंघेचमुनिसुव्रतः,१६ पावोंकेअंगुलियोंकीनमिरक्षाकरो, नेमिचरणदोनोंकी, पार्थ पादांगुलीनर्मिरक्षेत्, श्रीनेमिश्चरणद्वयं, श्रीपा नाथसबवदनकी, वर्द्धमानज्ञानानंदआत्माकी,१७ जमीन वनाथासर्वांगं, वर्द्धमानश्चिदात्मकः १७, पृथिवी पाणी, आग, हवा, आकाश, मयीसंसार, रक्षाकरोसव जल, तेजस्क, वाय्वा, काश, मयंजगत्, रक्षेदशेष पापोसें, वीतराग, निरंजन, १८, राजद्वारपर, श्मशान पापेभ्यो, वीतरागो,निरंजनः,१८, राजद्वारे, स्मशा में, अथवा, युद्धमे, वैरियोंकेसंकटमें, वाघ, चोर, आगसांपादिक, भू संग्रामे, शत्रुसंकटे, व्याघ्र, चौराग्नि,सर्पादि, भू तप्रेतभयकेआश्रितपुरुषकू,१९, अकालमरणप्राप्तहोणेसें, दरिद्ररूप तप्रेतभयाश्रिते,१९, अकालमरणेप्राप्ते, दारिद्र्या आपदासेआश्रितकों, विगरपुत्रके, महादोषमें, मूर्खपणेमें, रोगपीडित, पत्समाश्रिते. अपुत्रत्वे महादोषे, मूर्खत्वे, रोगपीडि में, २०, डाकण, शाकणके, ग्रसितमें, महाग्रह समूहकेपीडामें, ते, २०, डाकिनी शाकिनी, ग्रस्ते, महाग्रह, गणार्दिते, नदीकेउतरते, रस्तेकीविषमतामें, व्यसनरूपआपदामेंस्मरणकरो,२१, ध्ववैषम्यै, व्यसनेचापदिस्मरेत् ,२१, प्रा, भातहीअच्छीतरेउठके, जोस्मरणकरे, जिनपंजरकों, उसकू, कुछभी, तरेवसमुत्थाय, यास्मरे, जिनपंजरं, तस्य, किंचि, डरनहीं, पावे, सुखसंपदाकों, २२, जिनपंजर, द्भयंनास्ति, लभते, सुखसंपदं, २२, जिनपंजर, ने, वा, , - नद्युत्तारे, प्रतिक्रमण, ९५ मनुष्य, नाम, यह, जो, स्मरणकरे, हमेंसनितप्रति, कमलकीप्रभाजैसीराज, नामे, दं, य, स्मरंत्य, नुवासरं, कमलप्रभराजें, इंद्रता, लक्ष्मी, वह, पावे, प्रभात, उठके, पढे, द्र, श्रियं, स, लभते नरः, २३, प्रातः, समुत्थाय, प, जोक्रियाकाजाणकार, जो, स्तोत्रयह, जिनपंजरनामका, ठेत् कृतज्ञो, यः, स्तोत्रमेत, जिनपंजराख्यं, आ, चाखे, वह, कमलप्रमा[नामकी, लक्ष्मीकों, मनवंछित, सादये, त्सकमलप्रभाख्यां, लक्ष्मी, मनोवांछि, पूरणकों, २४, श्रीरुद्रपल्लीनामका, प्रधानखरतरगच्छमें, त,पूरणाय, २४, श्रीरुद्रपल्लीय, वरेण्यगच्छे, देवप्रभनामकेआचार्य, पदकमलमेंहंसजेसें, वादीयोंकेइंद्रचूडामणि, देवप्रभाचार्य, पदाजहंसः, वादींद्रचूडामणि, यहजैनधर्ममें, जीओगुरु, श्रीकमलप्रभनामके, रेषजैनो, जीयाद्गुरु, श्रीकमलप्रभाख्यः २५ इति श्रीजिनपंजरस्तोत्रं सम्पूर्ण । अथ ऋषिमण्डलस्तोत्र ॥ आदिअक्षर[अ], अंतअक्षर[ह], इनोंकोजाणकर, अक्षर[निश्चल]व्यापकेजोरहा, आद्यं, ताक्षर, संलक्ष, मक्षरव्याप्ययस्थितं, आगकी, झालाकेसमान, अर्धचंद्राकार, विंदीऔररेफकीरेखीकरकै, युक्त १, अग्नि, ज्वालासमं, नाद, विदुरेखा,समन्वितम् १, आगकीझाला, समान, क्रांतिवाला, मनकेमलकों, जादाकरशुद्धकरता, अग्निज्वाला, समा, क्रांतं, मनोमल, विशोधकं, तेजवंत हृदयकमलमें उसपदकोंनमताहूंवहनिर्मलहै, २, अहैं, देदीप्यमानं, हृत्पद्मे, तत्पदंनौमिनिर्मलं, २, अह, जैसाअक्षरब्रह्मरूपका, वाचककहणेवालापरमेष्टहै, सिद्धचक्रयंत्रका, मित्यक्षरब्रह्म, वाचकंपरमेष्ठिना, सिद्धचक्र, अच्छावहवीजहै, सवतरेसें, अंगीकारकर्ताहूं, ३, , ओतेजबीमहंत, सर्वतः, 'मणिद्धमहे, :. ३, ओनमोहद्भयईशे, ६ . प्रतिक्रमण. , भ्य, सर्वसाधुभ्या, . ईश्वरकों, तेजवीजसिद्धोंकोंवेरनमस्कार, तेजबीजनमस्कारसवआचार्योंकों, ऑसिद्धेभ्योनमोनमः, ओनमःसर्वसूरिभ्यः उपाध्यायकू, · तेजबीजनमस्कार, ४, तेजबीजनमस्कार, सवसाधुओंकों, उपाध्यायेभ्य, ओंनमः, ४, ऑनमः, तेजबीजज्ञानकोंवेरनमस्कार, तेजवीजनमस्कारतत्वकीनिजरवालेकों, ओंज्ञानेभ्योनमोनमः, औनमस्तत्वदृष्टिभ्यः, कर्मसंचयकोंखालीकरताकोवेर२नम०, ५, कल्याणकेवास्तेफेरकल्याणहो, यहअर्ह चारित्रेभ्योनमोनमः, ५, श्रेयसेस्तुश्रियेस्त्वेत, दहदा, तादिपूर्वोक्तआठशुभ, ठिकाणे आठअच्छीतरेस्थापितकियेहुये, न्यारेॐहीबी द्यष्टकंशुभं, स्थानेष्वष्टसुविन्यस्तं, पृथग्वीजस, जादिकोंसेंयुक्त, ६, आदिपदशिखाकीरक्षाकरो, दूसरापदरक्षाकरोफेरमस्तककी, मन्वितं, ६, आद्यपशिखारक्षे, परंरक्षेत्तुमस्तकं, तीसरापदरक्षाकरोनेत्रदोनों, चोथापदरक्षाकरोफेरनाककी,, ७, पांच, तृतीयंरक्षेन्नेत्रेडे, तुर्यरक्षेच्चनासिका, ७, पं मापदफेरमुखकीरक्षाकरो, छठापदरक्षाकरोगलेकी, नाभिकेअंदर, चमंतुमुखंरक्षेत्, षष्ठंरक्षेच्चघंटिका, नाभ्यंतं, सातमापदरक्षाकरो, रक्षाकरोपावोंकाअंतआठमा, ८, पहलेप्रणववीजओं, अंतस सप्तमंरक्षे, द्रक्षेत्पादांतमष्टमं, ८, पूर्वप्रणवतः शां हित, संयुक्तरेफ, समुद्र, पांचोंकों, सात, आठ, दश, चार,अंकों, ता, सरेफो, धब्धि, पंचषान्, सप्ता, ष्ट, दश, तुर्याका, कू, आश्रित, विंदी, खर, पूज्यनामकाअक्षर न्, श्रितो, बिंदु, खरान्, पृथक्,९, पूज्यनामाक्षरा : आदिक, पांचों, ज्ञान, दर्शन चारित्रकों, आद्याः, पंचातो, ज्ञान, दर्शन, चारित्रेभ्यो, नमो, ही, संयुक्तअंतमें, [ह अच्छीतरेसेंशोभित,१०, ध्ये, ही, सांत, हसमलंकृतः,१० ओं, हां, ह्रीं, हूं, , अलग, नमस्कार, अंदर , प्रतिक्रमण. " घेराहुआ, नमा, . अ,सि,आ,उ,सा,ज्ञान,दर्शन,चारि जंबुवृक्षकाधारणेवालाद्वीप, क्षार लवण] समुद्रसें, त्रेभ्यो,नमः, जंबुवृक्षधरोबीपः, क्षारोदधिसमा, अहंदादिकअष्टकसेआठ, काष्टाधिष्टसैंशोभित, वृतः, अहंदाद्यष्टकैरष्टा, काष्टाधिष्टैरलंकृतः उसकेअंदरप्राप्तहुआमेरू, शिखरलाखोंसैंशोभायमान, ११तन्मध्यसंगतोमेरु, कूटलक्षैरलंकृतः, उचेमेंऊंचे,तररयोगसेंतारे, ताराओंकेमंडलसें,मंडित, १२, उच्चैरुच्चै,स्तरस्तार, स्तारामंडल,मंडितः, १२, उसकेऊपर,सकारअंत, बीजअंदरइसकेसब प्राप्त नमन, तस्योपरि,सकारान्तं, बीजंमध्यास्यसर्वगं, करताहूंमूर्तिअहँतकी, निलाडमेरहे, निरंजन, वहअक्ष, मिबिमारीत्यं, ललाटस्थंनिरंजनं, १३, अक्ष, य,मलरहित,शांतिरूप, बहुतकरकेजडताकोंदूरकिया, निरेच्छा,निर, य,निर्मलं,शांत, बहुलंजाड्यतोज्झितं, निरीहं,नि, हंकारी, सारमेंसारअतिशयपणेद्रढ, १४, नहींउद्भट, शुभ,साफ, रहंकारं, सारंसारतरंधनं, १४, अनुद्धतं, शुभंस्फी, सतोगुणी, रजोगुणीकहा, तमोगुणीप्राचीनज्ञानवंत, तेजवंत, तं,सात्विकं, राजसंमतं, तामसंचिरसंवुद्धं, तैजसं, रातकेसमान, आकारवंत,फेर,आकाररहित,रसयुक्त,रहितरस, शर्वरीसमं, १४, साकारं,च,निराकारं,सरसं,विरसं, एकअक्षरहीं, उत्कृष्ट, उत्कृष्टसेउत्कृष्टदूसरेसेंऊपर, परंपरासैंसर्वोपरि, परं, परापरपरातीतं, परंपरपरापरं, १६, एकवर्ण, सिद्धदोअक्षरफेर, तीनअक्षरआचारी,चारउपाध्याय,पंचाक्षरसर्वसाधू, महाअक्षर(ओं) त्रिवर्ण,तुर्यवर्णकं, पंचवर्ण,महावर्ण, वहदूसराओरसर्वोपरि, १७, संपूर्ण, कलंकरहित,तुष्ट, सवकामसेंरहित, सपरंचपरापरं, १७, सकलं, निष्कलं,तुष्टं, निवृतंभ्रां, भ्रांतिसेरहित, निरंजन, आकाररहित, लेपरहित, वीतगयाहैआश्रय, द्विवर्ण,च, १३ ९८ प्रतिक्रमण, अहंदा, , तिवर्जितं, निरंजनं, निराकारं, निर्लेपं, . . वीतसंश्रयं, १८, ऐश्वर्ययुक्तब्रह्मअच्छेज्ञानवंत, तत्ववेत्तासिद्धमहागुरु, ज्योतीख, १८, ईश्वरंब्रह्मसंबुद्धं, वुद्धसिद्धंमतंगुरु, ज्योती, रूप, बडादेव, लोकअलोककेप्रकाशक, १९, अर्हतना, रूपं, महादेवं, . लोकालोकप्रकाशकं, १९, म,फेर,अक्षरअंतका[ह], वहरेफयुक्त,अनुस्वारशोभित, चोथावर[ई] ख्य,स्तु,वर्णातः, सरेफो,बिंदुमंडितः, तुर्यखरसमा, करकेसंयुक्त, बहुतप्रकार अर्धचंद्राकारयुक्त, . हीइसवीजमेरहे, युक्तो, बहुधानादमालितः, २०, अस्मिन्बीजेस्थिता; सव, ऋषभादिक, जिनोत्तम, रंग, अपणेअपणेकरके, युक्त, सर्वे, वृषभाद्या, जिनोत्तमाः, वर्ग, निजैनिजैर्युक्ताः, ध्यानकरणाउहांअच्छीतरेसेंप्राप्तहोकर, नादहैसोचंद्राकार, ध्यातव्या, स्तनसंगताः, २१, नादश्चद्रसमाकारो,विं, विंदीहैसोनीलकेसमक्रांति, कलाहैसोसूर्यकेसमानअंतयुक्त, सोनेकीकां, दुनीलसमप्रभः, कलारुणसमासांत, स्वर्णाभः, तिसवचोतरफ, मस्तकपरसलीनईकारहै, विशेषपणेनी, सर्वतोमुखः, २२, शिरसंलीनईकारो, विनीलो, रंगकेअनुसारसंलीन, तीर्थकरकेमंड, वर्णानुसारसंलीनं, तीर्थकृन्मंड, लकूस्तवताहूं, २३, चंद्राप्रभुसुविधिनाथ, अर्धचंद्राकारस्थिति, लंस्तुमः, २३, चंद्रप्रभपुष्पदंतौ, नादस्थितिसमा, केआश्रित, विंदीमेंअंदरप्राप्तहुयेनेमि, मुनिसुव्रतकेवलियोंमेप्रधान, श्रितो, विंदुमध्यगतौनेमि, सुव्रतौजिनसत्तमौं, २४, पद्मप्रभऔरवासुपूज्य, कलापदमेरहेहुये, २४, पद्मप्रभवासुपूज्यौ, कलापद्मधिष्ठितौ, मस्तकपरजो,ई,उसमेंरहेसंलीन, पार्श्वमलिनाथजिनेश्वर, २५, सिरिईस्थितिसंलीनौ, पावमल्लीजिनेश्वरौं, २५, वाकीतीर्थकर संब, ह,ओरर,केठिकाणेसमस्तपणेजुडेहुये, - लरंगसेंकहा, वर्णतःस्मृतः, , , मामाहि, प्रतिक्रमण, ९९ शेषातीर्थकृतःसर्व, हरस्थानेनियोजिता,मा, मायाबीजअक्षरमेंप्राप्त, चोवीसोहीअर्हत, २६, गयाहै, याबीजाक्षरंपासा, श्चतुर्विशतिरहताम्,२६, गत, रागद्वेषमोह, सर्वपापसें विशेषपणेरहित, हमेससर्व, रागद्वेषमोहाः, सर्वपापविवर्जिताः, सर्वदासर्व, कालमें, वहहुओकेवलियोंमेंउत्तम, २७, देवऔरदेवतोंकाजो, कालेषु, तेभवंतुजिनोत्तमाः, २७, देवदेवस्ययच्च, चक्र, उसचक्रकी, जोक्रांति तेजी] उसकरकेढकाहुआसवअंग,नहीं, कं, तस्यचक्रस्य, याविभा, तयाच्छादितसर्वाङ्गं,मा, मुझेमारेगीफेरडाकनी, २८, देवओरदेवतोंकाचक्र०, नहींमुझेंमारे, माहिनस्तुडाकनी, २८, देवदेवस्यय०, नस्तुराकिनी, २९, देवदे०, मामाहिनस्तुलाकिनी, ३०, देवदे, मामाहिनस्तुकाकिनी, ३१, देवदे०, मामा हिनस्तु शाकिनी, ३२, देवदे०, मामाहिनस्तुहाकिनी, ३३, देवदे०, मामाहिनस्तु याकिनी, ३४, देवदे, मामाहि संतुपर्णणगा, ३५, देवदे, मामाहिनस्तु हस्तिनः, ६६, देवदे०, मामाहि संतुराक्षसा, ३७, देवदे, मामाहि संतुवहया, ३८, देवदे०, मामाहिसंतु सिंहका, ३९, देवदे०, मामाहिसंतु दुर्जना, ४०, देवदे०, मामाहिसंतुभूमिपाः, ४१, श्रीगौतमगुरूकाजोभेषहै, उसकीजोपृथ्वीमेंऋद्धि चमत्कार है, श्रीगोतमस्ययामुद्रा, तस्यायाभुविलब्धया,ता, उसकरकेप्रगटहुईजोजोति, मेंसबनिधानोंकाईश्वरहोगया, ४२, पाता, भिरभ्युद्यतःज्योति, रहंसर्वनिधीश्वरः, ४२, पाता, लकेवसणेवालेदेव, देवसबजमीनपरवसणेवाले, देवसबजमीनपरवसणेवाले, स्वर्गकेवसणेवाले, लवासिनोदेवा, देवाभूपीठवासिनः, खासिनो, भीजोदेवसब, सवरक्षाकरोफेरमुझेंड्सजगे, ४३, जोअवधिलब्धिधारी, पियेदेवा, सर्वेरक्षतुमामितः, ४३, येवधिलब्धयो जोफेर,परमावधिलब्धिधारी, वहसर्वमुनीराजदेव, मुझें, येतु,परमावधिलब्धयः, तेसर्वेनुनयोदेवाः, मांसं, ।

, , माया, कलिप्रिया, १०० प्रतिक्रमण. अच्छीतररेक्षाकरोहमेस, ४४, दुष्टमनुष्यभूतवेताल, पिशाच, रक्षतुसर्वदा, दुर्जनाभूतवेताला, पिशाचा, मुगलतैसे, वहसवशांतिपाओ, देवाधिदेवकेप्रभाव, मुद्गलास्तथा, तेसर्वेप्युपशाम्यंतु, देवदेवप्रभाव, सें, ४५, प्रणवमायाशोभाफेर,धैर्य,लक्ष्मी, गौरी,चंडिका,सरख, तः, ४५, ओह्रींश्रींश्च,धृतिर्लक्ष्मी, गौरी,चंडी,सरख, १ सांप २ अंगार ३ राजा, ती, जया,अंबा,विजया, नित्या, क्लिन्ना, अजिता,मदद्वा, ती, जयां,बा,विजया, नित्या, क्लिन्ना, जिता,मद, ४६, कामांगा, कामबाणा, फेर, सानंदा, आनंदमालिनी, वा, ४६, कामांगा, कामबाणा, च, सानंदा, नंदमालिनी, मायाविनी,रौद्री, कला,काली, माया, मायाविनी,रौद्री, कला,काली, कलिनि, ४७, यह, सब,महादेवियों, है,जो,जगत् ,तीनमें, या, ४७, एता, सर्वा,महादेव्यो, वर्त्तते,या,जगत्रये, मुझें,सब, देओ, तेजी, यश, धीरज,बुद्धि, ४८, तेज, मासर्वाः प्रयच्छंतु, कांतिं, कीत्ति, धृति,मति, ४८, दि, वंत, छिपाणेयोज्ञअच्छादुःखसेमिलनेवाला, श्रीऋषिमंडलनामकास्तोत्र, व्यो, गोप्यासुदुःप्राप्या, श्रीऋषिमंडलस्तवः,भा, कहातीर्थोंकेखामीनें, जगत्रक्षाकेवास्तेनिष्पाप, ४९, युद्धमें, षितस्तीर्थनाथेन, जगत्राणकृतेनघा, ४९, रणे, राजद्वारमेंअग्निमें, जलमेंदुष्टरस्तेमेंहाथीसिंहमें, मसाणोंमें,वन, राजकुलेवहौ, जलेदुर्गेगजेहरौ, श्मशानेविपि, डरावणेमें, स्मरणकरणेसेंरक्षाकरताहैमनुष्योंकी, ५०, राज्यभ्रष्टळूनिजरा, नेघोरे, स्मृतौरक्षतिमानवं, ५०, राज्यभ्रष्टानिजं, ज्य, पदभ्रष्टकूनिजपद, लक्ष्मीभ्रष्टकोनिजलक्ष्मी, राज्यं, पद्मष्टानिजंपदं, लक्ष्मीभ्रष्टानिजांलक्ष्मी, पाता इसमेंनहींसंकाहै, ५१, स्त्रीकाअर्थीपाताहैस्त्री, , , मनुष्यस्म, नराम, लिखकर, लिखित्वा, , , प्रतिक्रमण प्रामुवंतिनसंशयः, ५१, भार्यार्थीलभतेभायाँ, पुत्रकाअर्थीपाताहैपुत्र, धनकाअर्थीपाताहैधन, पुत्रार्थीलभतेसुतं, वित्तार्थीलभतेवितं, रणमात्रसें, ५२, सोना,रूपा,कपडा,कांसेपर, रणमात्रतः, ५२, खणे,रूप्ये,पटे,कांस्ये, जोफेरपूजै, तिनोंकेआठमहासिद्धि, घरमेंरहै, यस्तुपूजयेत्, तस्यैवाष्टमहासिद्धि, गुहेवसति, हमेस, ५३, भोजपत्रपरलिखकरयह, गलेके, मस्तकके, शाश्वती, ५३, भूर्जपत्रेलिखित्वेद, गलके, मूर्ति, वा भुजाके, धारणकियाहुआहमेसतेजवंत, सवडरकानासकरणेवा, वाभुजे, धारितंसर्वदादिव्यं, सर्वभीतिविनाश, ला, ५४, भूतप्रेतग्रहयक्ष, पिशाच, मुगल, मलकरके, कं, ५४, भूतैःप्रेतैर्ग्रहैयक्षः, पिशाचे, मुद्गलै, लैः, वायुपित्तकफकेउत्पातसें, छूटताहैनहींइहांसंका, ५५, वातपित्तकफोद्रेकैः मुच्यतेनात्रसंशयः, ५५, पृथ्वीपातालखर्गतीनोंपीठके, विद्यमानजोशाश्वततीर्थकर, भूर्भुवःखस्नयीपीठ, वर्त्तिनाशाश्वताजिना, उनोंकू,स्तवनेसें,वांदनेसें,देखणेसें, जोफलवहफलसिद्धांतमें, तैस्तुतैर्वदितैईष्टे, यत्फलंतत्फलं श्रुती, यहछिपानेयोज्ञवडास्तोत्र, नहींदेणाजिसकिसीकों, एतत्गोप्यमहास्तोत्रं, नदेयंयस्यकस्यचित्, मिथ्यात्ववासीकों देणेसें, ५७, मिथ्यात्ववासिनेदत्ते, बालहत्यापदेपदे, ५७, आयंबिलादिकतपकरके, पूजकरके जिनराजकीश्रेणी, आचाम्लादितपाकृत्वा, पूजयित्वाजिनावली, करणांवह सिद्धिकेवास्ते, आठ, हजारएक जाप, अष्टसाहस्त्रिकोजापा, कार्यस्तत्सिद्धिहेतवे, जोपढेदिनप्रति, उनोंकेनहीं, ५८, एकसोआठ,आगेप्रातसमय, वालहत्या पांवरमें, .

वधियावत्, त्मा, , १०२ प्रतिक्रमण.. ५८, शतमष्टोत्तरंप्रात, येपठंतिदिनेदिने, तेषांनं, होयव्याधिशरीरमें, आवेनहींफेरआपदा, ५९, आठमहीने, व्याधयोदेहे, प्रभवंतिनचापदः, ५९, अष्टमासा, कीअवधितक, प्रभातप्रभातफेरजोपढे, स्तोत्रयह, प्रातःप्रातस्तुय:पठेत्, स्तोत्रमेतन्, वडातेजवंत, जिनराजकीमूर्तिवहदेखे, ६०, देखनेसेंसच्च, महातेजो, जिनबिंबंसपश्यति, ६०, दृष्टेसत्या, अर्हत्काविंब, होय,सप्तमस्थानमें,निश्चल, पदकोंपावै, शुद्धआ, हतबिंबे, भवेत्सतमके ध्रुवं, पदंप्रामोति, शुद्धा, त्मा, परमआनंदसेंहर्षित, ६१, तीनलोककावंदनीकहोयध्या, परमानंदनंदितः ६१, विश्ववंद्योभवेध्या, णेवाला, मुक्तिपदकोंफेरभोगे, जायकरकेठिकाणेसर्वोपरि, कल्याणानिचसोनुते, गत्वास्थानपरंसो, वहभी, पीछाफेरनहींपलटे, ६२, यहस्तोत्र, वडास्तोत्र, पि, भूयस्तुननिवर्तते, ६२, इदस्तोत्रं, . महास्तो, स्तुतियोंमेंउत्तम उत्कृष्ट, पढणेसें, स्मरणकरणेसें, स्मरणकरणेसें, जापसे, त्रं, स्तुतीनामुत्तमंपरं, पठना, त्स्मरणा, जापात्, उत्तम, ६३, लभतेपद, मुत्तमं, ६३, इतिऋषिमंडलस्तोत्रं, तीनजगत्केंगुरूकू, अथनवग्रहशांतिस्तोत्रं ॥ जगद्गुरुंनम, नमस्कारकर, सुणकरसत्गुरूकाकहा, ग्रहोंकीशांतिकहूंगा,. श्रुत्वासद्गुरुभाषितम्, ग्रहशांतिप्रव, लोकोंकेसुखकेवास्ते, १, जिनेंद्रोंके, खेचर ग्रह], क्ष्यामि, लोकानांसुखहेतवे, १, जिनेंद्रा, खेचरा, जाणना, पूजणा, विधिक्रमसें, पुष्प, . ता, पावेपद, स्कृत्य, चंदन, ..

प्रतिक्रमण. १०३ शीतल, शंभव, पूजनीया, विधिकमात्, पुष्पै, विलेपन, धूपसे, मिठाइसें, प्रशन्नताकेवास्ते, २, पद्मप्रभूकासेवक, सूर्यहै, धूपै, नैवेद्यै, स्तुष्टिहेतवे, २, पत्नप्रभस्य, मार्त, चंद्रचंद्रप्रभूकासेवकहै, वासुपूज्यप्रभूकासेवकमंगलहै, ड,श्चंद्रश्चंद्रप्रभस्यच, वासुपूज्योभूमिपुत्रो, बुध, आठजिनेश्वरोंकासेवकहै, ३, विमल, अनंत, धर्म,अर, वुधो, प्यष्टजिनेश्वराः ३, विमला, नंत, धर्मारा, शांति, कुंथु, नमि, तैसें, वर्द्धमान, जिनेंद्रोंके शांतिः, कुंथु, नमि, स्तथा, वर्द्धमानो, जिनेंद्राणां, चरणकमलमें, वुधकोंस्थापना, ४, ऋषभ, अजित, सुपार्थ, पादप , वुधंन्यसेत्, ४, ऋषभा, जित, सुपा, फेर, अभिनंदन, सुमति, नाथ, व, श्चाभिनंदन, शीतलौ, सुमति, शंभव, शंभव, खा, श्रेयांसका, फेर, वृहस्पतिसेवकहै, ४, सुविधनाथका, कहा, मी, श्रेयांस, श्व, बृहस्पतिः, ४, सुविधे, शुक्रसेवक, मुनिसुव्रतकासेवकशनिश्चरहै, नेमिनाथकासेवकहोताहै, शुक्रा, नेमिनाथेभवे, राहू, केतुश्रीमल्लिपार्श्वनाथकासेवकहै, ६, दाहु, केतु:श्रीमल्लिपार्श्वयोः, जन्मलग्ने, च, रासीपरफेर, पीडाकरेजवग्रह, तव, अच्छीतरेपूजना, राशौच, पीडयंतियदाग्रहाः, तदा, संपूजयेद्धी, बुद्धिमानोंनें, ग्रहोंसंयुक्तजिनराजोंकों, ७, पुष्पचंदनधूपादिक, खेचरैःसहितानजिनान्, ७, पुष्पगंधादि, मिठाई, संयुक्त, जेसारंगवैसा, दानकरके, मिधूंपैः, फल, नैवद्य, संयुतैः, वर्णसदृश, दानश्च, वस्त्रोंकरके, नगदीदक्षणायुक्त, ८, सूर्य, चंद्र, मंगल, कथितः, सुव्रतस्यशनैश्चरः, जन्मलग्न, फेर, मान्, , सें, फल, - , १०४ प्रतिक्रमणः वासोभिर्दक्षिणान्वितैः, ८, आदित्य, सोम, मंगल, बुध, बृहस्पत, शुक्र, शनैश्वर, केतु, · आदिक,य, बुध, गुरु, शुक्राः, शनैश्चरो,राहुः, केतु, प्रमुखा,खे, ह, जिनपतीके, सन्मुख, रहो, ९, जिनराजकानामक, टा, जिनपति, पुरतो, वतिष्ठंतु, ९, जिननामकृतो, रकेउच्चार, देशनक्षत्र, रंगसे, स्तवना,फेर,पूजनेसैं,भक्ती, बारा, देशनक्षत्र, वर्णकः, स्तुता,श्च,पूजिता,भ- सें, ग्रह, होय, सुखवणेवाले, १०, जिनेश्वरोंके, आगे, तया, ग्रहा:, संतु, सुखावहाः, १०, जिनाना, मग्रता, खडारहके, ग्रहोंके, सुखके, कारण, नमस्कार, सो,वस्त भक्ती, स्थित्वा, ग्रहाणां, सुख, हेतवे, नमस्कार, शतं, भ, सें, जपनाआठआगेमनुष्योंने, ११, भद्रबाहुखामीकहतेहुयेयह, तथा, जपेष्टोत्तरंनरः, भद्रबाहुरुवाचेदं, पांचमें, श्रुतकेवली, पूर्वसें, ग्रह, पंचम, श्रुतकेवली, विद्याप्रवादतः, पूर्वाद्, शांतिकीविधि, कही, १२, हशांतिविधि, मंतः, १२, इतिनवग्रहशांतिस्तोत्रं, ११, विद्याप्रवाद, ।

सागा- दशपचक्खाण. १०५ अथ दशपञ्चक्खाण ॥ उग्गएसूरे, नमुक्कारसहियं, पञ्चक्खाइ, चउब्विहंपि, आहारं, असणं, पाणं, खाइम, साइमं, अन्नत्थणाभोगेणं, सहस्सागारेणं, वोसिरामि, १, आगार, २, पोरसिं, मुंठसी, पचक्खामि, उग्गएसूरे, चउन्विहंपि, आहारं, असणं, पाणं, खाइम, साइमं, अणत्यणाभोगेणं, सहस्सागारेणं, पच्छन्नकालेणं, दिसामोहेणं, साहुक्यणेणं, सव्व- समाहिवत्तियागारेणं, वोसिरामि, विगयंपचक्खामि०, आगार, ६, इसीतरे साढपोरसिंक पञ्चखाणहोताहै, २, सूरेउग्गए, पुरिमडूं, अवडुंवा, पञ्चक्खाइ, चउन्विहंपि, आहार, असणं, पाणं, खाइम साइमं, अण्ण०, सह०, पच्छ०, दिसा०, साहु०, मह०, सब०, विगइओ इत्यादि, आगार ७, ३, - पोरसिं, साढपोरसिंवा, पञ्चक्खाइ, उग्गएसूरे, चउब्विहंपि, आहारं, असणं, पाणं, खाइम, साइमं, अण्ण०, सह०, पच्छ०, दिसा०, साहु०, सव०, एकासणं, विआसणं, वा पञ्चक्खाइ, दुविहं, तिविहं, पिआहारं, असणं, खाइमं, साइमं, अण्ण०, सह०, रिआगारेणं, आउट्टणपसारेणं, गुरुअब्भुट्ठाणेणं, पारिद्वावणियागारेणं, मह०, सब०, देसा- वगासियं, इत्यादि, आगार ८, ४, पोरसि, साढपोरसिं, वापञ्चक्खाइ, उग्गएसूरे चउविहंपिआहार, असणं, पाणं, खाइम, साइमं, अण्ण०, सह०, पच्छ०, दिसा०, साहु०, सब०, एकासणं, एकलठाणं, पञ्चखाइ, दुविहं, तिविहं, चउविहंपिआहारं, अस०, सा०, अण्ण०, सह०, सागारि आगा- रेणं, गुरुअव्भुट्ठाणेणं, पारिद्वावर्णियागारेणं, मह०, सव०, देसावगासियं०, आगार ७, पोरसिं, साढपोरसिं, वा पञ्चक्खाइ, उग्गएसूरे, चउविहंपि आहारं, असणं, पाणं, खाइम, साइमं, अण्ण०, सह०, पच्छ०, दिसा०, साहु०, सब०, आयं बिलं पञ्चक्खाइ, अण्ण०, सह०, लेवालेवेणं, गिहत्य संसिडेणं, उत्तिविवेगेणं, पारि०, मह०, सच्च०, एकासणं, पञ्चक्खाइ, तिविहंपिआहार, असणं, खाइभ,साइमं अण्ण०, सह०, सागा०, आउदृणपसारेणं, गुरुअ०, पारिद्वा०, मह०, सब०, बोसिरामि, आगार, ८ । पोरसिं, साढपोरसिंवा, पञ्चक्खाइ, उग्गएसूरे, चउव्विहंपिआहारं, असणं, पाणं, खा- इम, साइमं, अण्ण०, सह०, पच्छ०, दिसा०, साहु०, सब०, निधिगइयंपञ्चक्खामि, अण्ण सह० लेवा०, गिह०, उखि०, पडुच्चमखिएणं, पारि०, मह०, सब०, एकासणं, पञ्च- क्खाइ: तिविहंपि आहारं, असणं, खाइम, साइमं, अण्ण०, सह०, सागारि०, आउद्द०, खा, , . १४ दशपच्चक्खाण. . . , , - १०६ गुरु०, पारि०, मह०, सब्ब०, देसावगासियंभोगंपरिभोगवा, पञ्चक्खामि, अण्ण०, सह०, मह०, सव्व०, वोसिरामि, इति नीवीपञ्चक्खाण, आगार, ९, सूरेउग्गए अन्मत्तलु पञ्चक्खामि, चउविहंपिआहारं, असणं, पाणं, खाइम, साइमं, अण्ण०, सह०, मह०, सव्व०, वोसिरामि, इति चउविहार उपवासपञ्चक्खाण, ९, सूरेउग्गए, अब्भत्तह, पञ्चक्खामि, तिविहंपिआहार, असणं, खाइम, साइमं, अण्ण, सह०, पाणहार पोरसिं, साढपोरसिं, पुरम , अवर्द्धवा, पञ्चक्खाइ, अण्ण०, सह०, पच्छ०, दिसामोहेणं०, साहु०, सव्व०, वोसरामि, इतितिविहारउपवास पञ्चक्खाण, पोरसिं साढपोरसिं, पुरमडूं, अवटुंवा, पञ्चक्खामि, उग्गएसूरे चउविहंपि, आहार, असणं, पाणं, खाइमं, साइमं, अण्ण०, सह०, पच्छ०, दिसा०, साहु०, सब०, एकासणं, एगठाणं, दत्तियं, पच्चक्खामि, तिविहं, चउविहंपि, आहारं, असणं, पाणं, खाइमं, सा- इमं, अण्ण०, सह०, सागा०, गुरु०, मह०, सब०, विगइयोपञ्चखामि०, देसावगासियं इत्यादि, इतिदत्तिपञ्चक्खाण, आगार ९, दिवसचरिमं, पञ्चक्खाइ, चउन्विहंपि, आहार, असणं, पाणं, खाइम, साइम, अण्ण०, सह, महत्त०, सव्व०, वोसिरइ, इतिरात्रिचोविहारपञ्चक्खाण, ॥ दिवसचरिमं, पञ्चक्खामि, दुविहंपि, आहारं, असणं, खाइमं, अण्ण०, सह०, मह, सब०, वोसिरामि, इतिरात्रिदुविहारपचक्खाण, पाणहारदिवसचरिमं, पञ्चक्खामि, अन्न०, सह०, मह०, सन्च, वोसिरामि, इतिपा- णहार पचक्खाण, ॥ भवचरिमं पञ्चक्खाइ, तिविपि, चउविहंपि, आहार, असणं, पाणं, खाइम, साइम, अन्न०, सह, मह०, सव्व०, वोसिरइ, इति अंतसमय पञ्चक्खाण, ॥ तेसें, गठिसहि, मुडिसहि, अंगुडसहि, प्रमुख, अभिग्रह, पञ्चक्खाणकेभी, यहचार आगार, अन्न० सह०, मह०, सब०, वोसिरइ,. पांचमाचोलपट्टागारेणं, साधूकेहोताहै, इतिअभिग्रहपञ्चक्खाण, साधुपञ्चक्खाणकरे, तव देसावगासीनहींपञ्चखे, ओरतिविहार, उपवासमें, आंबिलमें, नीबीमें, एकासणप्रमुखमें, पाणस्सका, छआगारपञ्चक्खे, सोदिखातेहैं, पाणस्सलेवाडेणवा, अलेवाडेणवा, अछेणवा, बहुलेणवा, ससित्थेणवा, असित्थेणवा, वोसिरइ, - --.

नवग्रहमंत्रेण जिनेंद्र पूजा. १०७ आठ, अहेव, १, . अथ आगारसंख्या। दो, निश्चै, नावकारसीमें, आगार, छव, होतेहैं, पोरसीमें, दो, चेव, नमोकारो, आगारा, छच, हुंति,. पोरसि,. सात, पुरमा में, एकासणेमें, ए, सत्तेवय, पुरमहे, एगासणंमि, सात, एकठाणेमें, आठ, आयंबिलमें, सत्ते, गठाणस्स, अट्टेवय, आयंबिलंम्मि; आगार, पांच, उपवासमें, छपाणाहारमैं, दिवसचरमभ- आगारा, पंचेव, अभत्तहे, छपाणे, चरमचत्ता वचरमचार, २, पांचचार अभिग्रहमें, निवीमें, आठनव रि, २, पंचचउरो, अभिग्गहे, अठ्ठन आगार, अल्पावरणमें, पांच, होय, वाकी वय, आगारा, अप्पावरणे, पंचउ, हवंति, से कोंमें, धार, ४, सेसु, चत्तारि, ४, निव्वीए, .. ... अथ सोगनदिलाणेका पच्चक्खाण । धारणा प्रमाण, पञ्चक्खाई अरिहंत सल्खियं, सिद्धसखियं, साहुसख्खियं, देवस- ख्खियं, अप्पसख्खियं, सह०, मह०, सव्व०, वोसिरामि, , अथ पच्चक्खाण पारण। नवकारसी, पोरसी, प्रमुख, पञ्चक्खाण, फासियं, पालियं, पूरियं, तीरियं कीट्टियं, आराहियं, जंचनआराहियं, तस्समिच्छामि दुक्कड, इति, - अथ नवग्रहमंत्रेण जिनेंद्र पूजा । पद्मप्रभुजिनेंद्रका, नामउच्चारणसें सूर्य, पद्मप्रभजिनेंद्रस्य, नामोचारेण भास्करः, शांति शांति च, पुष्टिं, नान्ना, नाम १०८ नवग्रहमंत्रेण जिनेंद्र पूजा. तुष्टि, फेर, पुष्टि, फेर, रक्षा कर, २, कल्याणकों, तुष्टिं, च, रक्षा, कुरु, २, . श्रियम् , १, इतिसूर्य चंद्राप्रभु, जिनइंद्रका, नामसें, तारागणाधिप [चंद्रमा], पूजा, चन्द्रप्रभ, जिनेन्द्रस्य, तारागणाधिप, प्रशन्न हुओ, शांति, फेर, रक्षा, करो, २, जय, निश्चल, प्रसन्नोभव, शांति, च, रक्षा, कुरु, जयं, ध्रुवम्, २, हमेस, वासु, पूज्यका, इति श्रीचन्द्रपूजा, सर्वदा, वासु, पूज्यस्य, सें, शांति, जय, कल्याण, रक्षा, करो, पृथ्वीपुत्र मंगल] अ ना, शांति, जय, श्रियं, रक्षा, कुरु, धरासूनो, अ शुभभी, शुभहुओ, ३, विमल, शुभोपि, शुभोभव, ३, इति औमपूजा, विमला, अनंत, धर्म, अर, शांति, कुंथु, नमि, तैसें, महावीर, नंत, धर्मा, राः शांति, कुंथु, नमि, स्तथा, महावीर, फेर, उनोंकेनामसें, शुभ, हुओ, हमेस, बुध, श्व, तन्नान्ना, भूया, सदा, बुधः, ४, इति ऋषभ, अजित, अमि श्रीवुधपूजा, ऋषभा, जित, सुपार्था, शीतल, नाथ, श्रेयांस, नंदन, शीतलौ, सुमतिः, संभवः, खामी, श्रेयांस, फेर, जिनोत्तम, इन, तीर्थंकरोंके, नामसें, पूजनीक, च, जिनोत्तमः ५, एतत्तीर्थकृतां, . नाना, पूज्यो, शुभ गुरु], शुभ हुओ, शांति, तुष्टि, फेर, पुष्टि, . फेर, करो,. . देव शुभः, शुभोभव, शांति, तुष्टिं, च, पुष्टिं, च, कुरू,. दे तोंकासमूह पूजेभये, सुविधि वगणार्चित, ६, इति श्रीगुरुपूजा, पुष्प नाथ, जिनइंद्रका, नामसें, दैत्यगणसें पूजित, दंत, जिनेन्द्रस्य, दैत्यगणार्चित, प्रस. शुभो, सुपार्थ, फेर, श्वा, भि नंदन, सुमति, संभव, देव - সৱ नान्ना, हुओ, फेर, रक्षा, फेर, , , करो, नवग्रहमंत्रण जिनेंद्र पूजा. १०९ शांति, फेर, करो, २, कल्याणकों, नोभव, शांति, च, . रक्षा, कुरु कुरु, श्रियम्,७, श्रीमुनिसुव्रत जिनइंद्रका, इति श्रीशुक्रपूजा, श्रीसुव्रतजिनेन्द्रस्य, नामसे, सूर्यपुत्र शनैश्वर], प्रशन्न हुओ, शांति, नान्ना, सूर्यागसंभव, प्रसन्नोभव, शांति, च, रक्षा करो, २, कल्याणकों, ८, रक्षां कुरु कुरु, २, श्रियम्, ८, इति श्रीशनैश्च श्रीनेमिनाथ तीर्थपतीका, नामसें, रपूजा, श्रीनेमिनाथतीर्थेशस्य नामतः, सिं राहु, प्रशन्न हुओ, शांति, फेर, रक्षाकरो, हिकासुतः, प्रसन्नोभव, शांति, च, रक्षाकुरु, कल्याणको, ९, राहुके कुरु, श्रियम्, २, इति श्रीराहुपूजा, राहो सातमें राशीपर रहा, दृश्यसंवर धजा] श्रीमल्लि ससमराशिस्था, दृश्यसंवरे, श्रीमल्लि पार्थका नाम, केतु, शांति, जयलक्ष्मीकों, पार्श्वयोन्निा, केतो, शांति, जयंश्रियम् , एसा कहकर, अपणे २ रंग, इति श्रीकेतुपूजा, इतिभणित्वा, कुशुमांजलि, डालणी, जिन ग्रहकी पूजा करणी, उससें, स कुसुमांजलि, क्षेपः, जिनग्रह पूजाकार्या, व पीडाकी, शांति होय, अब, सबका, फेर, व पीडाया, शांतिर्भवति,॥ अथ, सर्वेषां, वा ग्रहोंका, अकदिन,फेर, पीडाकी, यहविधिहै, नवको ग्रहाणा, मेकदा, पीडाया, . मयंविधिः, . नवको लिखना. ठे, गोल, ग्रह, उसजगेस्था ग्रहा, स्तनम ष्टक,, मालेख्यं, मंडलं, चतुरस्रकम् , आकारसें, कारण, १०, १०, खख, वर्ण, तेन स चोरस, n निश्चे,सू हि,भा, दक्षणसें, दक्षणमें, मंगल, ११० नवग्रहमन्त्रेण जिनेंद्र पूजा. पनकरना, अवकहाजाताहै, क्रमकरके फेर, ११, वीचमें, तिष्ठाप्या, वक्ष्यमाण, क्रमणतु, ११, मध्ये, र्य, स्थापनकरणा, पूर्व, चंद्रमा, स्करः,स्थाप्या, पूर्व, दक्षिणतः, शशी, दक्षिणस्या, बुध, पूर्व,उत्तरमें, फेर, १२, उत्तरमें, धरासून, बुंधः, पूर्वोत्तरेण, च, १२, उत्तरस्यां, बृहस्पति, पूर्वदिशामें, शुक्र, पश्चिममें, सुराचार्यः, पूर्वस्या, भृगुनंदनः, पश्चिमायां, स्थापना, राहुदक्षणपश्चिमकेवीचमैं, १३, शनिः, स्थाप्यो, राहुर्दक्षिणपश्चिमे, १३, पश्चिमउत्तरके,बीच, केतु, असें, स्थापनकरना, ग्रहो पश्चिमोत्तरता, केतु, रितिस्थाप्या, क्रमाद्, कू, पट्टेपरवाथालीमें, अग्निकोणमें, ईशानकोणमें,फेर, हमेस, हा, पट्टेस्थाले,थ वा,ग्नेय्यां, ईशान्यां, तु, सदा, , शनैश्चरकों, क्रमसें, न बुधकों, असा पढकर, डालना,फेर, बुधैः, २ उँआदित्यसोममंगल, बुध गुरु शुक्राः शनैश्चरो राहु, केतुप्रमुखाः खेदाः, जिनपतिपु पांचरंगकी, कुशमांजली, रतोवतिष्ठंतु, १५, इतिभणित्वा, पंचवर्ण, कुसुमां जिनराजकीपूजाफेरकरणी, १६, इसतरेसेंजै जलिक्षेप,श्व, जिनपूजाचकार्या, १६, एवंयथा सें,नामलेकियाअभिषेकसें, विलेपनसें, धूप, पूजनसे, फेर, नामकृताभिषेक, रालेपन,धूपन, पूजन, श्व, लसें,फेर, नैवद्य, अच्छेजिनराजोंके, नामसे, ग्रहोंकेइंद्र, वरकेदे लै, श्व, नैवेद्य, वरैर्जिनानां, नाम्ना, महेन्द्रा, वरदा णेवालेहुओ, १७, श्वेतांवरसाधूकोवस्त्रकाभोजनकादानदेणा, महोच्छव भवंतु, १७, साधुभ्योदीयतेदानं, महोत्साहो फ णा जनम्, नवग्रहमंत्रेण जिनेंद्र पूजा. जिनमंदिरमेंकराणा, चतुर्विधसंघका, आदरसेंपूजनकर जिनालये, चतुर्विधस्यसंघस्य बहुमानेनपू १८, १८, इतिपूजाविधिः, किस, अरिष्ट ग्रहमें, कोनसें जिनराजकी, किस, तरे, पूजा कस्मिन्, रिष्ट आहे, कस्य जिनस्य, कया, रीत्या, पूजा करणी, वह, कहतेहैं, सूर्यकीपीडामें, लालपुष्पोंसें, कार्यः, तदा, ख्याति, रविपीडायां, रक्तपुष्पैः, श्रीपमप्रभकी पूजा करणी, श्रीपद्मप्रभपूजाकार्या, ओंही नमोसिद्धाणं, तिसका, आठऊपर सो, जाप करणा, चंद्रमाकीपीडामें, तस्य, अष्टोत्तरशत, जपाकार्य:, चंद्रपीडायां, चंदनमिलाकर, सेवतीपुष्पसें, श्रीचंदाप्रभुकी, पूजाकरणी, चंदन, सेवंतपुष्पैः, श्रीचंद्रप्रभ, पूजाकार्या, तिसका, आठऊपर सो, जा उह्रीं नमो आयरिआणं, तस्य, अष्टोत्तरशत, ज मंगलकीपीडामें, केसरसें, फेर, लालपुष्पों पकार्यः, भौमपीडायां, कुंकुमेन च, रक्तपु श्रीवासुपूज्यखामीकी, पूजा करणी, प्पैः, श्रीवासुपूज्य, पूजाविधेया, ऑही नमो तिसका, आठऊपर सो, जाप करणा, बुध सिद्धाणं, तस्य, अष्टोत्तरशत, जपाकार्यः, बुध दूधसें, कीपीडामें, मिठाइ, श्रीशांति फलआदिसें, पीडायां नैवेद्य, श्रीशा फलादिता, दुग्ध, नाथकी, पूजा, करणी, तिनाथ, पूजा, कर्तव्या, ओही नमो आयरि आठऊपर सो, करणा, वृहस्स प करणा, " सें, खान, लान, , तिसका, जाप, . भोजन, कर्तव्यः, ใน ११२ नवग्रहमंत्रण जिनेंद्र पूजा. याणं, तस्थ, अष्टोत्तरशत, जपः, कार्यः, तिकीपीडामें, दही, जंबीरादिक, फलकरके फेर, पीडायां, दधि, भोजन, जंबीरादि, फलेन, च, चंदनादिक, विलेपनकरके, श्रीऋपमदेवजीकी पूजा, चंदनादि, विलेपनेन, श्रीआदिनाथपूजा, करणी, तिसका करणीया, ओह्रीं नमो आयरिआणं, तस्य, आठऊपर सो, जाप, करणा, शुक्रकीपीडामें, अष्टोत्तरशत, जप, शुक्रपीडायां, श्री सपेतपुष्प, चंदनादिकरके, श्रीसुविधनाथकी, पूजाकर श्वेतपुष्पै, श्चंदनादिना, श्रीसुविधिनाथ, पूजाका मंदिरमेंघीकादानजैनपंडितकोंचांदीकादान, या, चैत्येघृतदानकार्य, ओहीं नमोअरिहंता तिनोंका आठऊपर सौ, जाप, करना, शनैश्चरकी णं, तस्य, अष्टोत्तरशत, जपः, कार्य, शनैश्वर नीलपुष्पसें, श्रीमुनिसुव्रतस्वामीकीपूजा के पीडायां, नीलपुष्पैः, श्रीमुनिसुव्रतपूजा का तेलसेंस्नान, ओर दान, करना, र्या, तैललान, दाने, कर्तव्ये, ओहीं नमोलोए तिनोंका, आठऊपर सौ, जाप, सव्वसाहूणं, तस्य, अष्टोत्तरशत, जप, कार्यः, राहुकीपीडामें, राहुपीडायां, नीलपुष्पैः, श्रीनेमिनाथ पूजाकर रणी, तिनोंका णीया, ओहीं नमो लोए सव्वसाहूणं, तस्य आठऊपर सौ, जाप, करना, अनार अष्टोत्तरशत, केतु पीडायां, दाडिमा पीडामें, रणी, करणा, नीलपुष्पोंसें, नेमिनाथजीकी पूजाक केतुकीपीडामें, जपान कार्य:

तेन, नवग्रह, चैत्यवंदन. ११३ आदिकेपुष्पोंसें, श्रीपार्श्वनाथजीकीपूजाकरणी, दिपुष्पैः, श्रीपार्श्वनाथपूजा, कार्या, ओह्रींनमो लोएसव्वसाहूणं, इसपदकाआठऊपरसौ, जापकरणा, तस्यअष्टोत्तरशतं, जपाकार्यः, इतिनवग्रहपूजाविधिः, सर्वग्रहोंकीपीडामें, सर्वग्रहपीडायां श्रीसूर्य, सोमां, गार, बुध, बृहस्पति, शुक्र, शनैश्चर, राहु, केतवः, सर्वग्रहा, ममसानुग्रहाः, भवंतु, स्वाहा, ओह्रीं असिआउसायनमः स्वाहा, अस्यम- इसमंत्रका, आठऊपर, सौ, जाप, करना, उसकरके,नवग्र- नस्य, अष्टोत्तर, शतं, जपः, कार्यः, होंकी, तकलीपकीशांतिहोय, पीडोपशांतिः स्यात्, इतिनवग्रहपूजाप्रकार, अथ दूजचैत्यवंदन. अभिनंदन अर जिनवरू, जनमदूजदिनलीधो, सुमतिजिनचवियावली, शीतलकार- जसीधो, १ वासुपूज्यकेवल लह्यो, दूजदिवस सुखकार, इम अनंत चोवीसिये, अनंत कल्याणकसार २ दुविध ध्यान तज दो भजोए, धर्मशुक्ल उरधार, धर्मशीलपद कुशल निधि, प्रगटे गुण ऋद्धिसार, ३ इति दूज चैत्यवंदन, अथ पंचमीचैत्यवंदन, वीरजिनंद महिमा करै, सुदि पंचम केरी, ज्ञानआराहोइनदिने, लहो शिवपद सेरी, १ प्रथम ज्ञान पीछे क्रिया, ज्ञान विना पशु जान, देशे आराधक क्रिया, सर्वाराधक ज्ञान, २ ज्ञानतणी महिमा घणीए, भगवती अंग प्रमाण, व्रतविधि धारो गुरुथकी, ऋद्धि सार निर्वाण, ३ इति पंचमी चैत्यवंदन, अथ अष्टमीचैत्यवंदन, सुपाश शंभव अष्टमी, चविया सुखरासे, ऋषभ अजित सुमतिनमि, मुनि सुव्रत भासे, १ आ- ठम दिन ये जनमिया, दीक्षा ऋषभजिनंद, अभिनंदन श्रीपार्श्वनमि, अक्षय गति सुखकंद, २ अष्टमि आराधो भविए, अष्टकर्म हुय नास, धर्मशील कुशलातमा, ऋद्धि सार पद- वास, ३ इति अष्टमी चैत्यवंदन, अथ इज्ञारस चैत्यवंदन, तीन कल्याण मल्लीतणा, जन्म दीक्षावर ज्ञान, अरजिन पार्थ जिनेश्वरू, संजम धार्योवान, १ ऋषभ अजित सुमतिनमि, पद्मप्रभु वलिपास, भव- भय तोडी आपना, इज्ञारस शिववास, २ कर्मभूमि दश क्षेत्रनाए, सार्ध शत कल्याण, इज्ञारसव्रतविधि कर, ऋद्धिसार सुखथान, ३ इति इज्ञारस चैत्यवंदन, , , १५ १.१४ चैत्यवंदन. अथ रोहिणी चैत्यवंदन, रोहिणी तप आराधिये, वासुपूज्य जिनराज, वास चूर्ण चाढो प्रथम, अष्ट द्रव्य सुखसाज, १ निहुंकाले पूजा करो, गुरुगमसें आराध, धूप दीप अंगीरचो, राखो चित्त समाधि २ अशोकतरु आरोपि येए, अशोकनी हुय वृद्धि, रोहिणी तपथी रोहणी, ऋद्धि सार सुखसिद्धि ३ इति रोहणी चैत्यवंदन, अथ श्रीसीमंधर जिन चैत्यवंदन ॥ जय २ त्रिभुवन आदिनाथ, पंचम गतिगामी, जय २ करुणा संत वधु, भविजन हितकामी, १ जय २ इंद नरिंद वृंद, सेवित सिरनामी, जय २ अतिशय नंतवंत, अंतर गतिजामी, २ पूर्व विदेह विराजताए, श्रीसीमंधर खामि, त्रिकरण शुद्ध बिहुँ कालमें, नितप्रति करूं प्रणाम, ३, इति, अथ दूसरा. , . वंदूं जिनवर विहरमान, सीमंधर स्वामी, केवल कमलाकांत दांत, करुणा रसधामी, १ कांचनगिरि समदेह, कांति वृषलांछन पाय, चौरासी लख पूर्व आय, सेवै सुरराय, २, पूर्व विदेह विराजताए, पुंडरीकनी भाण, प्रभु यो दरशन संपदा, कारण पद कल्याण, ३ इति स्तुति, अथ शत्रुजय चैत्यवंदन ॥ जय २ शत्रुजय गिरी, अनंत सिद्धनो थान, विद्याधर चक्री मुनि, नमिविनमी निर्वाण, १ पुंडरीक प्रद्युम्न संब, नवनारद सीधा, वालीरामादिक भरत, सिवसुख पद लीधा, २ सेलगपंथग पंडुपुत्र, पंचद्रविड नरराज, मुक्त अनंता विमल गिरि, ऋद्धिसार शिव पाज, ३ इति शत्रुजय स्तुति. , , , अथ सामायकलेणेकी विधि ॥ पहली उंचे पट्टेपर, पुस्तक, या माला वगेरे की, थापना करणी, श्रावक, अंथवा, श्रावकणी, मुखपत्ती, तथा आसण लेकर, शुद्धपवित्र वस्त्र पहरकर, जमीनकू प्रमार्जकर, आसन सन्मुख विछाकर, वांये हाथमें, मुखपत्ति, मूंके सामने रख, दहणा हाथ, थाप- नाचार्यजीके, सामने करके, ३ नवकार गिणे, पीछे खमासमण देके, इच्छाकारेण संदि- स्सह, भगवन् ,सामायक, मुंहपत्ति पडिलेहूं, इच्छं मुंहपत्तीका, २५ बोल २५ अंगकी कहकै, मुंहपत्ती पडिलेहे, पीछे खमासण देके, इच्छाकारेण संदिस्सह, भगवन् , सामायक संदिस्साउं, इच्छं, फेर खमासण देके, इच्छा कारेण संदिस्सह, भगवन् , सामायक ठाउं, , देवसी प्रतिक्रमणविधि. ११५ , इच्छं, असाकह, दोनों हाथ जोड, १, नवकार गुणके, इच्छाकारी, भगवन् , सामायक दंडक, उच्चरावोजी, ३ वेर करेमि भंते कहे, पीछे खमासमण देके, इरियावही कहके, १ लोगस्स, अथवा चार नवकारका, काउसग्ग करे, पारके, प्रगट लोगस्स कहे, खमासमण देके, इच्छाकारण सं०, वेसणो संदिस्साउं, इच्छं, खमासमण देवे, इच्छा- का०, वेसणोठाउं, इच्छं, खमासमण देवै, इच्छाका०, सज्झाय संदिस्साउं, खमासमण देके, इच्छाका०, सझाय करूं, इच्छं, ८ नवकार गिणना, दो घडी ४८ मिन्टतक धर्मध्यान करणा, ॥ इति सामायक लेणेकी विधि ॥ . . . अथ सामायक पारणविधि प्रारंभ ॥ खमासमण देकर, इरियावही, ४ नवकारका, काउसग्ग, प्रगट लोगस्स कहकै, खमासमण देकर, इच्छाका०, भगवन् , सामायक पारणे, मुहपत्ती पडिलेहूं, फेर मुंह- पत्ती पडिलेहके, खमासमण देकर, इच्छाका०, भगवन् , सामायक पारूं, यथाशक्ति, फेर खमासण देकर, इच्छाका० सामायक पारिी, तहत्ति कहकै, दहणा हाथ, पूंजणींपर रखकै, अथवा, आसनपर रखकै, १ नवकार गिणकै, भयवंदसण्ण भद्दोकहे, पीछे दहणा हाथ, धापनाके, सामने करकै, १ नवकार गिणे, इसि सामायक पारण विधी, ॥ , अथ देवसी प्रतिक्रमणविधि प्रारंभ ॥ पहली सामायक लेकर, पाणी पीया होय तो, मुंहपत्ती पडिलेहे, ओर आहार किया होय तो, २ वांदणा देवै, दूसरे वांदणेमें, आवसि आए, पाठ, नहीं कहै, पीछे यथा शक्ति पञ्चक्खाण करे, खमासमण देकर, इच्छाका०, भगवन् , चैत्यवंदन करूं, जयतिहु- अणक है, अथवा ५ गाथा पहलेकी, २ गाथा पीछेकी कहकै, जंकिचिनामतित्थं, नमो- त्थुणं, सव्वाई ताई वैदेतक कहके, खडा होकर, अरिहंत चेइयाणं, वंदणव०, एक नवकारका काउसग्गकर, पारके, नमोर्हत्सिद्धा कहके, थुईकी १ गाथा कहै, फेर लोगस्स कहे, सव्वलोए अरिहंत चेइयाणं, बंदणव०, कहके, १ नवकारका काउसग्ग, पारके, थूईकी दुसरी गाथा कहे, पुख्खरवरदीवड्ढे कहे, सुअस्स भगवओ करेमि काउ- सग्गं, वंदणवत्ति०, एक नवकारका काउसरग करके, पारके, तीसरी गाथा थुईकी कहे, फेर सिद्धाणं बुद्धाणं, वेया वच्चगराणं, करेमि काउसग्गं, अन्नत्य १ नवकारका काउ- सग्ग, पारके, नमोहसिद्धाकहके, चोथी गाथा थुईकी कहे, फेर बैठकै नमोत्थुणं कहे. सव्वाइं ताई वंदेतक, फेर खमासमण देके, आचार्यजीनें वंदन, खमासमण देके, उपा- ध्यायजीने वंदणा, फेर खमासमण देके, सर्व साधूजीने वंदना, खमासमण देके, वर्तमान देवसी प्रतिक्रमणविधि. , , , भट्टारकनें त्रिकाल २ वंदना, इच्छाकारेण संदि०, देवसि पडिक्कमण ठाउं, असा कह, दहणा हाथ, पूंजणी अथवा आसणपर धरके, इच्छं, सव्वस्सवि देवसिय, दुच्चिं तिय. कहे, खडा होकर करेमि भंते कहे, फेर इच्छामि ठामि काउसग्गं, जो मे देवसियो, तस्सुत्तरी कहके, आठ नवकारका काउसग्ग कर, पारकै, प्रगट लोगस्स कहणा, बैठके तीसरे, आवश्यककी मुंहपत्ती पडिलेहे, दो वांदणा देवे, फेर खडा होके, इच्छाकारण संदिस्स०, देवसिअं आलोउं, इच्छं आलोएमि, जो मे देवसिओ, कहे, पीछे सात लाख वगेरे ३ पाठ कहणा, पीछे सव्वस्सवि कहके, दहणा गोडा ऊंचा करके, ३ नवकार ३ करेमि भंते कहके, वंदित्त सूत्र कहे, पीछे, दो वांदणा देणा, पीछे आयरिय उवझाए, कहे, पीछे करमि भंते०, इच्छामि ठामि काउसग्गं, जो मे देवसिओ कहे, तस्स उत्तरी कहके, २ लोगस्सका, अथवा आठ नवकारका, काउसग्ग करे, प्रगट लोगस्स कहके, सव्वलोए अरिहंत चेझ्याण०, वंदणवत्ति आए०, कहके, १ लोगस्स, अथवा चार नव- कारका, काउसग्ग करके, पुक्खर वरदी० कहे, सुयस्स भगवओ, करेमि०, वंदणव०, कहके, १ लोगस्स, अथवा चार नवकारका, काउसग्ग करे, सिद्धाणं वुद्धाणं०, कहके, सुयदेवयाए, करेमि काउसग्गं, अन्नत्थु कहके, एक नवकारका, काउसग्ग करकै, नमोर्हत् सिद्धा कहके, सुवर्णशालनी देयाद्, थुई कहे, पीछे खेत्र देवयाए, करेमि काउसग्गं, कहके १ नवकारका काउसग्ग करे, पीछे नमोर्हत्सिद्धा कहके, यस्याक्षेत्रं समाश्रित्य०, थुईकी १ गाथा कहके, प्रगट १ नवकार कहके, छठे आवश्यककी मुंह- पत्ती पडिलेहे, दो बांदणा देवे, पीछे, सामायक, चउवीसत्थो, वंदण, पडिक्कमणं, काउ- सग्ग, ओर पञ्चक्खाण, ये कहणा, पीछे इच्छामो, अणुसडिं कहके, नमोखमासमणाणं, नमोर्हत्सिद्धाचा०, कहके, पुरुषतो नमोस्तु वर्द्धमानायकी, स्तुति ३ गाथा कहै, ओर, स्त्री, संसारदावाकी ३ गाथा कहै, पीछै नमोत्थुणं, नमोहसिद्धातक कहके इग्यारे गाथासें, उपरांतका वडा स्तवन कहै पीछे ओंवरकणयकी १ गाथा कहै, पीछे आचा- र्यजीमिश्र, उपाध्यायजीमिश्र, सर्वसाधुजीने त्रिकाल २ वंदणा, पीछे दहणा हाथ, पूंजणी, अथवा, आसनपर रखके, अढाइजेसु दोसु समुद्देसु. रयहरण गुछ, पडिग्गहधारा, अठार सहस्स सीलांगधारा, अख्खिया यार चरित्ता, तेसवे, सिरसा, मणसा, मत्थेण वन्दामि, कहे, पीछे देवसी पाय च्छित्तविसोधवा निमित्तं, करेमि का- उसग्गं, अन्नत्थु०, चार लोगस्सकाकाउसग्ग करे, पीछे प्रगट लोगस्स कहै, पीछे क्षुद्रो- पद्रव उड्डाण निमित्तं करेमिकाउसग्ग; ४ लोगस्सकाकाउसग्ग करे, पीछे लोगस्स कहके, सिझायसंदिस्साउं, सझाय करूं, कहके, ३ नवकार गिणे, पीछे श्रीसेढीका चैत्यवंदन करै, नमोत्थुणं, नमोर्हत्सिद्धातक कहके, पार्श्वनाथ स्वामीका, छोटा स्तवन कहै, फेर थंभण यष्ठियपास सामिणो, २ गाथा कहके, श्रीस्थंभणा पार्श्वनाथखामी, आ- , राइ प्रतिक्रमणविधि, ११७ राधनार्थं करेमिका उसग्गं, अन्नत्य उ०, १६ नवकार, वा ४ लोगस्सका, काउसग्ग करे, पीछे प्रगट लोगस्स कहे, ८४ गच्छसिणगारहार, जंगम युगप्रधान, भट्टारक, दादा सद्गुरु श्रीजिनदत्तसूरिजी, आराधनार्थ, करेमिकाउसगं, १६, अथवा, ४ नवकारकाकाउसग्ग करके, प्रगट लोगस्स कहे, ८४ गच्छसिणगारहार, जंगम युगप्रधान, भट्टारक दादा सद्- गुरु श्रीजिन कुशल सूरिः जी, आराधनार्थं, करेमिकाउसग्गं, पूर्व रीतिसेंकाउसग्ग करे, लोगस्स कहे, फेर चउक्कसायका चैत्यवंदन करे, नमोत्थुणं, उक्सग्गहरं पासं पूरातक कहै, जयवीराय कहै, पीछे छोटी शांति कहै खमासमणदेमुहपत्ती पडिलेहे इच्छाकारण संदिस्सह, भगवन्, सामायक पारुं, यथाशक्ति, इच्छामि०, इच्छाकारेणसं०, सामायक पारिओ, तहत्ति कहके, दहणा हाथ, पूंजणी, आसनपर, रखके, १ नवकार गुणके, भयवं दसन्न भद्दो कहे, १ नवकार गिणके उठे, इति देवसी प्रतिक्रमण विधि, . अथ राइप्रतिक्रमण विधि ॥ पहले लिखी विधिसें, सामायक लेवे, पीछे जयमहायस०, कम्मभूमिका चैत्यवंदन, नमोत्थुणं, जयवीयराय, आभम खंडा तक कहे, पीछे खमासमण देकर, इच्छाकारणसं०, कुसमिण दुसमिणराई पायच्छित्तविसो हणत्थं, करेमिकाउसग्गं, ९ लोगस्स, १६ नव- कारका, काउसग्ग कर, प्रगट लोगस्स कहे, खमासमण देकर, आचार्यजी मिश्र, खमा समण०, उपाध्यायजी मिश्र, खमासमण०, सर्व साधुजीनें वंदणा, खमासमण०, वर्त- भट्टारककू, त्रिकाल, २ वंदणा, सव्वस्सविराइय० कहे, इच्छाकारेण संदिसह, नहीं कहे, फेरनमोत्थुणं, सव्वाइंतांइवंदेतक कहके, खडा होके, करेमि भंते कहके, पीछे इच्छामि ठामि काउसग्गो, जोमेराइयो०, येपाठ पूरा कहके, तस्स उत्त, अन्नत्यु, ४ नवकार, वा, १ लोगस्सकाकाउसग्ग कर, प्रगट लोगस्स कहे, फेर सव्वलोए अरिहंतचे०, वंदणव०, अन्नत्य०, चार नवकारका, काउसग्ग, फेर पुक्ख- खरवरदीवडे, कहे, ज्ञानाचार शुद्धिनिमित्त, करेमि काउसग्गं, २ लोगस्स, वा ८ नवकारका काउसग्गकर, सिद्धाणं बुद्धाणंका पाठ कहे, पीछे तीसरे आवश्यककी, उकडू, बैठकै, मुंहपत्ती पडिलेहे, पीछे २ वांदणा देवै, फेर राइयं आलोएमि, इच्छं आळोएमि, जोमे- राइयो, पूरा कहे, पीछे आजूणा चोपहुरा रात्रिमैं जिकमें जीव विराध्या होय, सात लाख०, ३ पाठ कहे, पीछे सव्वस्सविराइय, दुचिंतिय, पाठ कहे, पीछे, दहणा गोडा, ऊंचा करके, भगवन् , सूत्रमणूं, तीन नवकार, ३ करेमिभंते, कहके, इच्छामिठामि पडि कमिउं, जोमेराइओ, कहे, पीछे वंदितु सूत्रकहे, २ वांदणा देकर, अब्भुटिओमिका पाठ कहे, पीछे २ वांदणा देवै, पीछे आयरिय उवझाए कहे, पीछे करेमिभंते कहे, इच्छामि ठामि०, तस्सुत्तरी०, अन्नत्थ०, श्रीमहावीरखामी छमासी तप चिंतवणा निमित्तं, ११८ राइ प्रतिक्रमणविधि. करेमि काउसग्ग; अन्नत्थ०, छलोगस्स, वा २४ नवकारका काउसग्ग करे, प्रगट लो- गस्स कहे. पीछे छठे आवश्यककी मुंहपत्ती पडिलेहे, २ वांदणा देकर, पीछे सकल तीर्थकों नमस्कार करे, सो लिखते हैं, , अच्छी भक्तिसें, देवलोकमें, सूर्य, चंद्रके, विमानमें, व्यंतरोंके, सद्भत्त्या, देवलोके, रवि,शशि, भवने, व्यंतरा, निकायमें, ताराओंके, भुवनमें, ग्रहोंकेसमूह, पट- णां, निकाये, नक्षत्राणां निवासे, ग्रहगण, पट, लमें, नक्षत्रोंके, विमानोंमें, पातालमें, नागकुमारइंद्रोंकी, प्रगट, ले, तारकाणां, विमाने, पाताले, पन्नगेंद्रे, स्फुटम, मणियोंकी किरणोंसें, विध्वंसभयासघनअंधेरा, श्रीमान्तीर्थककर. णिकिरणे, ध्वस्तसांद्रांधकारे, श्रीमतीर्थकरा, ताओंके, हमेस, में, उहांके, चैत्योकोवांदताहूं, १, विजयार्द्ध, णां, प्रतिदिवस, महं, तत्र, चैत्यानिवंदे, १, वैताढ्ये, मेरूकेशिखर, रुचक, पहाडप्रधानपर, कुंडल, गजदंतोपर, मेरुशृंगे, रुचक, गिरिवरे, कुंडले, हस्तिदंते, वक्खारेपर, शिखरनंदीश्वर, कनकपहाडपर, नील, वस्कारे, कूटनंदीश्वर, कनकगिरी, नैषधे, नील, वंत, पहाडपर, चित्र, विचित्र, यमक, पहाडप्रधानपर, चक्र, वंते, शैले, चैत्रे, विचित्रे, यमक, गिरिवरे, वाल, हिमवंतपहाडपर, श्रीपहाडपर, विंध्याचलकेशिखर, वाले, हिमाद्रौ, श्रीम० २, श्रीशैले, विंध्यशृंगे, विमलाचलपहाडप्रधानपर, पावा, समेतशिखर, विमलगिरिवरे, ह्यर्बुदे, पावके वा, सम्मेते, पर, तारंगेपर, अष्टापद, स्वर्ण, तारकेवा, कुलगिरि, शिखरे, ष्टापदे, पहाडपर, सह्यपहाडपर, वैजयंत, विमल, पहाडप्रधान, सह्याद्रौ, वैजयंते, विमल, गिरिव, नैषध, चक्र, , आबू, कुलगिरि, शिखरपर, खा णशैले, राइ प्रतिक्रमणविधि. में, चक्र, अथवा, - केरले, पर, गुजरातमें, रोहणाचलपर्वतपर, आघाटमें, मेवाड, रे, गुजरे, रोहणाद्रौ, श्रीम०३, आधाटे, मेद, पृथ्वीकेतटमुकटमें, चितोड, तीनकूटमें, ला, पाटे, क्षितितटमुकुटे, चित्रकूटे, त्रिकूटे, ला, ट, नाट, फेर, घाट, में, दरखतोंकेंसघनतटमें, हेमकूटपर, विराट, टे, नाटे, च, घाटे, विटपि, धनतटे, हेमकूटे, वि, [वराड], कर्णाटकके, हेमकूटपर, विकटतरकटमें, रादे, कर्णाटे हेमकूटे, विकटतरकटे, चक्र, कूटपरफेरभोटियादेशमें, श्रीमालनग्रमें, मालवेमें, कूटेचभोटे, श्रीम०४, श्रीमाले, मालवे, वा, मलयवारमें, निषधमें, मेखलामें, पिच्छलमें, फेर, नेपाल, मलयिनि, निषधे, मेखले, पिच्छले, वा, नेपा, देशमें, नाहलमें, फेर, कुवलय, तिलकमें, सिंहल लंका]में, केरल, लेनाहले, वा, कुवलय, तिलके, सिंहले फेर, डाहालमें, कोशल [अयोध्या में, मारवाडमें, जंगल कोशलेचा विगलतसलिले, जंग देसमें, ढमालमें, अंग, चंपाकादेशमें, चंगालेमें, कलिंगदेशमें, लेवा, ढमाले, श्रीम० ५, अंगे, चंगे, कलिंगे, सु गयावाचीनजापानतातारमें, प्रयागमें, तिलंगदेशमें, गौडदेशमें, चौडदेशमैं, गतजनपदे, सत्प्रयागे,तिलंगे, गौडे, मुरंडमें, प्रधान, द्रविडमें, उडियादेशमें, फेर, पौंडमें, आर्द्रकदेसमें रंडे, वरतर, द्रविडे, उद्रियाणे, च, पौंड्रे, आर्द्र, माद्रदेशमें, पुलिंद्रमें, द्रविड, कुवलयमें, कनोजमें, माद्रे, पुलिंद्रे कुवलये, कान्यकुब्जे, सोरठमें, चंद्रावती, चंद्रमुखीमें, हथनापुर, सुराष्ट्र, श्रीम० ६, चंद्रायां, चंद्रमुख्या, गजपुर, पत्तनमें, फेर, उजेनमें, कोशांबीमें, कौशलामें मथुरा, मथुरा, पत्तने, चो, जयिन्यां, कौशव्यां, कौशला वा, डाहाले, चौडे,मु. द्रविड, में, - , यावकेतट, गढके अंदर, १२० राइ प्रतिक्रमणविधि. कनकपुर प्रधानमें, देवगिरीमें, फेर, काशीमें, रासक यां, कनकपुरवरे, देवगिर्या, च, काश्यां, रास- राजगृहीमें, दशपुरनगरमें, भदिलपुरीमें, तामलिप्तीमें क्ये, राजगेहे, दशपुरनगरे, भदिले, ताम्रलि वर्गमें, मृत्युलोकमें, पातालमें, पहाडके शिखर, स्यां, श्रीम०७, खर्गे मत्य, तरिक्षे, गिरिशिखर हद्रमें, स्वर्णदीके पाणीके तीर, पहाडकेअग्र, नागलोकमें, दरि- हृदे, स्वर्णदी नीर तीरे, शैलाने, नागलोके, जल दरख्तोंके, निकुंजमें, ग्राममें, अटवीमें, वनमें, निधिपुलिने, भूरहाणां, निकुंजे, ग्रामे, रण्ये, वने, फेर, थलमें, जलमें, विषम, त्रिकाल. वा, स्थल, जल, विषमे, दुर्गमध्ये, त्रिसंध्यं, श्रीम, श्रीमान्मेरूपर, कुलगिरीपर, रुचकपहाडप्रधानपर, शाल्मली ८ श्रीमन्मेरौ, कुलाद्रौ, रुचकनगवरे, शाल्म और, जंबूवृक्षपर, फेर, उज्जयनीमें, चैत्यनंदमें, रतिकर, रुचक, लौ, जंवुवृक्षे, चौ, जन्ये, चैत्यनंदे, रतिकर, रुचके कौंडल, मानुषोत्तरपर, इक्षुकार, जिनपहाडपर, दधि कौंडले, मानुषांगे, इक्षुकारे, दधि मुखपहाडपर, व्यंतरोंमें स्वर्गलोकमें, जोतिषीतारालोकमें, होय, मुखचगिरी, व्यंतरेखगलोके, ज्योतिलोके, भवंति, तीनभुवनके, गोलमें, जो, चैत्यालय, इसतरेश्री त्रिभुवन वलये, यानि, चैत्यालयानि, ९, इत्थंश्री जैन, मंदिरोंका, स्तवन, हमेस, जो पढे, प्रवीणपुरुष, जैन, चैत्य, स्तवन, मनुदिनं, ये पठंति, प्रवीणा: विशेषपणेउदयकल्याणहेतु, पापोंकों हरणकर्ता, भक्तिकापात्र, प्रोद्यत्कल्याणहेतुं, कलिमलहरणं, भक्तिभाज, तीनोंकाल, तिनोंकेशोभाकारीतीर्थयात्राकाफल, ओपमारहितसर्बो स्त्रिसंध्यं, तेषां श्रीतीर्थयात्राफल, मतुलमलं जिनाद्रौ, - , Aamom पख्खी प्रतिक्रमणविधि. १२१ . परिहोय, मनुष्यों, कामोंकी सिद्धि, ऊंचे, विशेपहर्षि जायते, मानवानां, कार्याणांसिद्धि, रुचैः प्रमुदि तमनसें, चित्तकोआनंदकारक तमनसां, चित्तमानंदकारी, १०, इति चैत्यवंदनं पीछे नमो खमासम णाणं, नमोर्हत्सिद्धा कहके, परसमय तिमर तरणिकी ३ गाथा कहे, स्त्रीसंसार दावाकी ३ गाथा कहे, पीछे नमोत्थुणं, सव्वाइंतांइंवंदेतक कहके, सव्वलोए, अरिहंतचेइयाणं०, वंदणव०, अन्नत्य०, १ नवकारका काउसग्गकर, नमो- हत्सिद्धा कहके, थुईकी, १ गाथा पहली कहे, पीछे लोगस्स कहे, सव्वलोए अरि०, वंदणव०, अन्नत्य०, १ नवकारका काउसग्ग, पीछे थुईकी गाथा दूसरी कहे, पीछे पुक्खरवरदी०, सुयस्स भगवओक०, वंदणव०, अन्नत्थ०, १ नवकारका काउसग्ग करके, तीजी गाथा थुईकी कहे, पीछे सिद्धाणं बुद्धाणं० कहके, वेयावच्चगराणं, अन्नत्थ०, १ नवकारका काउसग्गकर, चोथी गाथा थुईकी कहे, नीचे बैठके, नमोत्युणं सव्वाइंतां इंवंदेतक कहे, पीछे, तीन खमासमण देके, आचार्य, उपाध्याय, सर्वसाधू वांदे, कोई अढाइजेसु, दीवसमुद्देसुभी कहते हैं, जैसीभी संप्रदाय है, इतनी विधि कियां पीछे, थि- रता होय तो खमासमण देकर, इच्छाका०, चैत्यवंदन करूं, सीमंधर स्वामीका चैत्य- वंदन, नमोत्थुणं, नमोर्हत्सिद्धा. तक कहके, सीमंधरजीका, स्तवन कहे, थुई कहे महीमंडणं० १ गाथा, इसीतरे दक्षणमें मुखकरके, सिद्धाचलजीका चैत्यवंदन, स्तवन कहे, पीछे थुई कहे, सो थुई लिखते हैं, सेर्बुजगिरि नमिये ऋषभ देव पुंडरीक, सुभतपनी महिमा सुण गुरुमुख निरभीक, शुद्ध मन उपवासे विधिसु चैत्यवंदनीक, करिये जिन आगल टालीवचन अलीक, १, पीछे आगे मुजब सामायक पारे, इति राई प्रति- क्रमणविधि,॥ अथ पख्खी प्रतिक्रमणविधि लिख्यते, ॥ तहां पहले वंदित्तू सूत्रतक, देवसी पडिक्कमके, खमासमण देकर, देवसी आलोइयं पडिक्वंता, इच्छाका०, पक्खिय मुहपत्ती, पडिलेहूं, पडिलेहे, दो बांदणादेवे, पखोवइक्कतो पखियंवइकम, इत्यादिपाठकहे, पीछे, पुण्यवंतो, छींकजयणाकरजो, खासेसो, विवरे शु- द्धखासजो, मांडलमांहे सावधान सावचेतरहीजो, देवसीके ठिकाणे, पक्खीमणजो, तह- त्ति कहके, खडाहोके, इच्छाका०, संबुद्धाखामणेणं, अब्भुटिओमि, अभितर, पक्खियं खामेउं, इच्छं खामेमि पक्खियं, पन्नरसण्हं दिवसाणं, पन्नरसण्हंराईणं, जंकिंचिअप्पत्ति- यं०, तस्समिच्छामि दुक्कडंतक, पूरापाठकहे, इच्छाकारण, पक्खियं आलोएमि, जोमे- , १६ , , - , , , १२२ चौमासी प्रतिक्रमणविधि. पक्खियो, अइयारोकओ०, इय पूरापाठकहै, पीछे नाणमि दंसणम्मिय, वडाअतीचारकहे, उसमें पक्खीदिवसमांहे, जो कोई अतीचार लागोहोय, तस्समि०, ऐसाकहे, पीछेसब- स्सवि पक्खिय, इच्छांकारणसंदिस्सहकहे, तस्समिच्छामिनहींकहे, पीछेचउत्थेणपडिक्कमह, बांदणादेवे, इच्छाकारे०, देवसियं आलोइयं पडिकता, पत्तेयं खामणेणं, अब्भुटिओमि अन्भिन्तर, पख्खियं खामउं, इच्छंखामेमिपख्खियं, पन्नरसण्हंदिवसाणं, यहपूराकहे, फेर सबोंसें खमावै, पीछे २ बांदणादेवे, पीछे देवसियं आलोइयं पडिकंता, पक्खियं पडिक्क- मामि ३ नवकार ३ करेमिभंते, इच्छामिठामिकाउसगं, जोमेपक्खियो, अइयारोकओ, काइयोवाइयो, पूराकहके, साधूतो पक्खीसूत्रकहे, श्रावककहेसूत्रमणूं ३ नवकार गु- णके, तीनकरेमिभं० दोय वेर वंदित्तूसूत्रकहे, दूसरेकायोसग्गकरके सुणे, पीछे.३ नवकार ३ करेमिभंते कहकेदूसरीवेर वंदित्तुसूत्रकहे, पडिकमेदेसियं सर्वकेठिकाणे, पडिक्कमेपक्खि- यंसवंकहे, फेर खमासमणदेकर, इच्छाका०, मूलगुण, उत्तरगुण, अतीचार, विशुद्धिनि- मित्तं, करेमिकाउसग्गं, करेमिभंते, इच्छामिठामिकाउसग्गो, जोमे पक्खियो, पूराकहे, तस्सुत्तरी, अन्नत्थ०, १२ लोगस्स, अथवा ४८ नवकारका काउसग्ग १ नवकार जादा- गिणे, लोगस्स प्रगटकहे, २ बांदणादेवे, इच्छाकारेण०, समाप्ति खामणेणं, अन्मुठिओमि अभितर, पक्खियंखामेउं, इच्छं०, पन्नरसण्हंदिवसाणं, इत्यादिपूराकहे, पीछे इच्छाका०, पक्खीसमाप्त खामणाखा, खमासमणदेकर, ३ नवकारगिणके, पक्खीसमाप्त .खामणा- खाएं, इसतरे ४ वखत करे, नित्थारगपारगाहोह, इच्छामो अणुसटिं, पुन्यवंतो, पक्खीके लेखे १ उपवास, २ आंबिल, ३ निबी, ४ एकासणे, अथवा २ हजार सिज्झायकर, १ उप- वासकी, पैठपूरणा, पक्खीकीजगे देवसीकहणा, उपवासकियाहोय तो, पयठिअंकहे, नहीं कराहोयसो, तहत्तिकहे, इहांसेंआगे, वंदित्तुवाद, बांदणादेणा,सोसबविधि, देवसी मुजबकरे, आगे श्रुतदेवताकीस्तुतिसुवर्णशालिनीदे० कहे, फेरखेत्र० वादभवनदेवयाएकरेमिकाउ०, १ नवकारका काउसग्गकर, भुवणदेवताकीस्तुतिकहे, चतुर्वर्णायसंघाय, देवीभवनवासिनी, निहत्यदुरितान्येषा, करोतुसुखमक्षतम् १ असाकहे, बडेस्तवनकीजगे, अजियशंताकहै, छोटे स्तवनकीजगे, उवसग्गहरंकहै, छोटीशांतिकीजगे, बडीशांतिकहे, चोपहरीदिनका- पोसेवाला, पोसापारकेपीछेशांतिसुणे, रातपोसेवाला पोसारहतेसुणे, इतिपक्खीप्रतिक्रमण,॥ अथ चोमासी प्रतिक्रमणविधि ॥ विधितोसव पक्खी मुजब, इतना जादाहै, १२ लोगस्सके, काउसग्गकीजगे, २० लो- गस्सकाकाउसग्ग, पक्खीकी जगे, चोमासीका नामलेणा, तपकेठिकाणे, २ उपवास, ४ आंविल, ६ निबी, ८ एकासणा, ४ हजारसिज्झाय, इसमुजबकहणा, इतिचोमासींप्र- तिक्रमणविधि, ॥ " , , , 'स्तवन. १२३ अथ संवत्सरी प्रतिक्रमणविधि ॥ वाकीसवविधितो पक्खीमुजब, १२ लोगस्सके काउसग्गकीजगे, ४० लोगस्स, अ- थवा १६० नवकारकाकाउसग्गकरे, तपकीजगे, संवत्सरीके लेखे ३ उपवास, ६ आं- बिल, ९ निवी, १२ एकासणा, ६ हजारसिज्झायकर, ३ उपवासकीपैठपूरणा, पक्खीकी जगे, आगारोंमें, संवत्सरीका नामलेगा, इतिसंवत्सरी प्रतिक्रमणविधि, ॥ - .. , अथ सीमंधरस्वामीका स्तवन । पूर्व विदेह पुखलावती, जयोजगपतीरे, श्रीसीमंधरस्वाम, प्रहसमनितनमूरे, १ जगत्र- यभावप्रकाशता, भविप्रतिवोधतारे, उपगारीअरिहंत, २ प्र०, धननयरी धनतेनरा, धनते- धरारे, जिहांविचरेजिनराज, प्र० ३, धन्यदिवस धनतेघडी, देखतूंआंखडीरे, भक्तिवत्सलं भगवंत, प्र० ४, महरनिजरअवधारजो, पतितउद्धारजोरे, जिनहर्षधणेससनेह, प्र०.५, इतिपदं, ॥ अथ सिद्धाचलस्तवन ॥ भावधर धन्यदिनआजसफलोगिण्यो, आजमेंसजनआनंदपायो, हर्षधरनिजरभरविमल- गिरिनिरखकर, रजतमणिकनकमोतियनवधायो, भा० १, पगरउमंगधर पंथनितपूछता, धन्यदोयचरणजिहांचलतआयो, आजधनदीहजागीसुकृतकीदशा, आजधनदीहमेंसुजस- गायो, भा० २, दूरदुरगतिटरी, जात्रविधिसेंकरी, पुन्यभंडारपोतेभरायो, वदतजिनराज- मनरंग सुरगिरि शिखर, ऋषभजिनचंद्रसुरतरुकहायो, भा० ३, इतिपदं, ॥ अथ देवसीपडिकमणेमेंकहणेका बडास्तवन लिख्यते, भविका श्रीजिनर्विवजुहारो, आतमपरमआधारो रे, भवि०, श्रीजिन०, जिनप्रतिमा जिनसरखीजाणो, नकरोसंकाकाई, आगमवाणीनेअनुसारे, राखोप्रीतसवाईरे, भ० १, जेजिनर्विवस्वरूपनजाणे, तेकहिये किमजाणे, भूलातेहअज्ञानेभरिया, नहींतिहांतत्वपिछा- णेरे, भ० २, अंबंड श्रावक श्रेणिकराजा, रावणप्रमुखअनेक, विविधपरे जिनभक्तिकरता- पाम्यां धर्मविवेकरे, भ० ३, जिनप्रतिमाबहुभक्तेजोता, होयनिश्चेउपगार, परमारथगुण, प्रगटेपूरण, जोजोआर्द्रकुमाररे, भ० श्री० ४, जिनप्रतिमाआकारेजलचर, छैवहुजलधिम- झार, तेदेखीबहुलामच्छादिक, पामेंविरतिप्रकाररे, भ० श्री० ५, पंचमअंगेजिनप्रतिमानो, प्रगटपणेअधिकार, सूरियामसूरेजिनपूज्या, रायपसेणीमझाररे, भ० श्री०६, दशमेंअंगे अहिंसादाखी, जिनपूजाजिनराज, एहवाआगमअरथमरोडी, करियेकेमअकाजरे, भ० श्री. ७, समकितधारीसतियद्रोपदी, जिनपूज्यामनरंगे, जोजोएहनोअर्थविचारी, छठेज्ञाताअंगेरे, , 4 १२४ सप्तस्मरणानि. भ० श्री० ८, विजयसुरेजिमजिनवरपूजा, कीधीचितथिरराखी, द्रव्यभावविहुंभेदेकीनी, जीवाभिगमछेसाखीरे, भ० श्री० ९, इत्यादिकवहुआगमसाखे, कोइसकामतकरजो, जिन- प्रतिमादेखीनितनवलो, प्रेमघणोचितधरजो रे, भ० श्री० १०, चिंतामणिप्रभुपासपसाये, सरधाहोयजोसवाई, श्रीजिनलाभसुगुरुउपदेशे, श्रीजिनचंद्रसवाईरे, भ० श्री० ११, इतिपदं, ॥ अथ पडिकमणेमेंकहणेकाछोटापार्श्वप्रभूका स्तवन ।। तूंमेरेमनमें प्रभु तूंमेरेदिलमें, ध्यानधरूंपलरमें, पाशजिनेसरअंतरजामी, सेवाकरूंछिन में, तूं० १, काहूकोमनतरुणीसेंराच्यो, काहूकोचितधनमें, मेरोमन प्रभु तुमहीसेंराच्यो, क्यूंचात्रकचितघनमें, तूं० २, योगीश्वरतेरीगतजाणे, अलखनिरंजनछिनमें, कनककीरतसु- खसायरतुमही, साहिवतीनभुवनमें, तूं० ३, इतिपदं, श्रीसिद्धचक्राय नमः । अथ सप्तस्मरणानि ।। श्रीअजितप्रभूजीतेहँसर्वडर, शांतिप्रभूफेरजादाकरकेशांतस- अजियंजियसव्वभयं, संतिचपसंतसव्वग वंगयेहपाप, जगत्केगुरु शांतिगुणकेकरणेवाले, दोनों जिनवरोंकों, यपावं, जयगुरुसंतिगुणकरे, दोविजिणवरे, प्रणामकरूं, गाथाछंद, दूरगयाहै बुरेपरिणाम, पणिवयामि, ववगयमंगुलभावे, वेदोंनों विस्तार तपसे मलरहित स्वभाववालेहैं, ओपमारहितवडाहै तेहिं विउलतवनिम्मलसहावे, निरुवममह प्रभावजिनोंका, स्तवनाकरूंगा, अच्छीतरेदेखनेवाले, विद्यमानपदार्थोकू, २, थोसामि, सुदिङ, सम्भावे, २, गाहा, सर्वदुःखप्रशांतकर्ता, सर्वपापप्रशांतकर्ता, सव्वदुक्खपसंतीणं, सव्वपावप्पसंतिणं, हमेसअजितशांतिदोनोंप्रभू, नमस्कार अजित शांतिप्रभूकों, सया अजियसंतिणं, नमोअजियसंतिणं, ३ श्लोक छंद; अजितजिनसुखोंकोंप्रवीणेवाले, तुमारापु- ३ सिलोगों, अजियजिणमुहपवत्तणं, तवपु- १, १, गाहा, प्पभावे, A और मतीकेप्रवर्तक, , " सप्तस्मरणानि. १२५ रुषोत्तम, नामकीकीची है, तैसे, धीरज, रिसुत्तम, नामकित्तणं, तहय, घिद, मइप्पवत्तणं, तुमारा, केवलियोंमेंउत्तम, शांतिपणेकीकीती है ४, मागधिकाछंद, तवय, जिणुत्तम, संतिकित्तणं, ४, मागहिया, २५तरेकीक्रियाओंकेकरणेसैंसंचेहुये, कर्मोंकाक्लेश, उससेंमोक्षकरणेवाले, किरियाविहिसंचिय, कम्मकिलेस, विमुक्खयरं, अजितजिन, भरेहुये, फेर, गुणोंसें, महामुनियोंकों, सिद्धिगतीकेदेणेवाले अजियं, निचियं, च, गुणेहि, महामुणि, सिद्धिगयं, अजितप्रभूऔरशांति, महामुनियोंकेभी, शांतिककरणेवाले, अजियस्सयसंति, महामुणिणोविय, संतियरं. हमेस, मेरेको, मोक्षके कारणभूत, फेर, वंदनकरणेवालेकों, ५, सययं, मम, निव्वुइकारणयं, च, नमसणयं, ५, आ आलिंगनछंद, हेपुरुषो, जो, दुःखकामिटाणा, जोतुममांग- पुरिसा,जइ,दुक्खवारणं, जइविम- तेहो, सुखकाकारणतोतुम, अजित, शांतिका, ओर, भावकरकै, अजियं, संति, च, भावओ ग्गह, अर- अभयककरणेवालेका, शरणअंगीकारकरो, ६, मागधिकाछंद, अभयकरे, सरणंपवजह, ६, मागहिया, अर- रहित, ति, रतिरूप, अंधेरेसें, जरामरणजिनोंसें, दूरहुआहै, विरहिय, तिमर, मुवर, इ. जरमरणं, रह, पांवउनदोनोंकेनमनकराहै, देवता, दानव, पयओपणवइयं, असुर, गरुल, भुयगवइ, अच्छान्यायरूपनयोंमेंनिपुण, अभयदान जैसेअजितजिनकोंमेंभी,जो अजियमहमविय, 'मभयक सुनयनयनिऊण, पृथ्वीकेऔरस्वर्गभेपेदाहुयोंसेंपूजित, हमे- करणेवाले, शरणागतरक्षक, सरणमुवसरिय, भुविदिविजमहियं, वहफेरकेवलियों में उत्तमउत्तमइच्छा तंचजिणुत्तम मुत्तमनि लिंगणयं, सुक्खकारणं, गरुड, भुजंगपती(नागेंद्र], सय, रं, स, मैंभीनमनकरूं, ७, संगतछंद, य, मुवणमे, ७, संगययं, त्तम, अंधान, देओ, ८, गल, , १२६ सप्तस्मरणानि. रहित, सत्वधारी, शरलपणा, नरमाईपणा, क्षमा, निर्लोभता, समाधीके, सत्तधरं, अज्जव, मद्दव, खंति, विमुत्ति, समाहि, निधान, शांतिक कों, नमनकरूं, इंद्रीदमणे उत्तम, तीर्थककरणेवाले, निहिं, संतियरं, पणमामि, दमुत्तम, तित्थयरं, वहशांतिमुनिः, मुझें, शांति, समाधि, संतिमुणी, मम, संति, समाहि, वरं, दिसओ, ८, सोपानछंद, सावत्थीनग्रीमेंपहलेराजापणे, फेर, प्रधान, हस्तीके, मस्तककीतरे, सोवाणयं, सावत्थिपुधपत्थिवं, च, वर, हत्थि, मत्थय, तारीफलायक, विस्तारवाला, संस्थान[ शरीर], मजबूतकपाटकीतरेछाती, मद, पसत्थि, वित्थिण, संथियं, थिर, सिरस्थवत्थं, मय, झरता, लीलाकरताहुआ, अच्छेगंधहस्तीकीतरे, चलनेकीचालहैजिनोंकी, लीलायमाण, वरगंधहत्थि, पत्थाणुपत्थियं, स्तवनाकरणेलायक, हाथीकीसूंडकीतरेभुजा, तपाये, सोनेकीतरे, मनोहर, नहीं संथवारिहं, हत्थिहत्थबाहु, धंत, कणग, कहांसेंभीखंडित, शरीर, रचाभया, शीतल, रुवहय, पिंजरं, पवर, लक्खणो, वचिय, सोम, मनोहररूप कानोंकोंसुखकारी, मनकोरुचणेवाला, उत्कृष्ट, रमणीक, चारुरूवं, सुइसुह, परम, रमणिज, अच्छा, देवदुंदुभीका, शब्द[अवाज] सैंभी,मीठीअधिक,सुखकारीवाणीजिनोंकी, वर, देवदुंदुहि, निनाय, महुरय, सुहगिरं, ९ वेष्टकछंद, अजितप्रभू, जीताहैवैरियोंकागण, जीताहैसवडर, भवसमूह वेढो, अजियं, जियारिगणं, जियसच्चभयं, भवो केवैरी, नमनकरताहूं, मेंपांवउनदोनोंका, पापोकों, प्रशमाओमेरे, हरिलं, पणमामि, अहंपयओ, पावं, पसमेउमे, हेभगवान्, १०, रासालुन्धकछंद, कुरुजनपददेशमें,. हस्तना भयवं, १०, रासालुद्धओ, कुरुजणवय, हत्थि पुरके, नरेश्वर राजा]पहलीहोके, तिसकेवाद, बडेचक्रवर्तिपणेकेभोग तओ, , . महाचक्कवाहिभो रुयग, नि प्रधान, लक्षणोंसें, मणाभिराम, णार, ...नरीसरोपढम, सप्तस्मरणानि. १२७ भोगते, वडेप्रभावकारीपणेसें, जोबहत्तर; नग्र, प्रधान, हजार, ए, महप्पभावओ, जोवावत्तरि, पुर, वर, सहस्स, प्रधाननगर, निर्गम, देशोंके, पती मालक], ३२ राजा, प्रधान, वरणगर, निगम, जणवय, वई, बत्तीसाराय, वर, हजारों पीछे, चलतेहैं रस्तेमें, चवदे, प्रधान, रत, नव, सहस्साणु, जायमग्गे, चउदस, वर, रयण, नव, महानिधान, ३२ऋतुपद३२जनपदकल्याणका६४हजार, प्रधान, जोवनवती, महानिहि, चउसद्विसहस्स, पवर, जुवईण, सुंदरियोंकेपती, चौरासी, घोडे, हस्ती, रथ, सोहजार लाख, के, स्वा- सुंदरवई, चुलसी, हय, गय, रह, सय सहस्स, सा मी, छयानवे, गामोंकी, कोटीकेमालक, होतेहुये, जो, भरतक्षे- मी, छन्नवइ, गाम, कोडिसामी, आसी, जो, भार केदखंडमें, भगवान्, ११, वेष्टकछंद, शांतिप्रभूकोंस्तवताहूं, वहजिनशा- हम्मि, भयवं, ११, वेढो, संतिथुणामि, जिणंसंति तिकरो, मेरे, १२, रासानिंदितछंद, इक्ष्वाकुवंशी, विदेहदेशके, न-. विहेज, मे, १२, रासानिदियं, इक्खाग, विदेह, न रेश्वर, मनुष्योंमेंवृपम, मुनियोंमेंवृषभसमान, नयेशरऋतूकेचंद्र, रीसर, नरवसभा, मुणिवसभा, नवसारयससि, समानसंपूर्णमुखजिनोंका, अंधेरारहित, निर्मल, हेअजितउत्तम सकलाणण, विगयतमा, विहुयरया, अजिउत्तम, तेजगुणकरके, हेमहामुनि, हेअप्रमाणवलवंत, हेविस्तारकुलवंत तेअगुणेहि, महामुणि, अमियबला, विउलकुला, नमस्कारकरताहूंतुमकों, भवभयकेचूरणेवाले, हेजगत्शरण, मुझकों, पणमामिते, भवभयचूरण, जगसरणा, मम, तुमारासरणहै, १३, चित्रलेखाछंद, देवता, ओर दानवेंद्र, चंद्रमा, सूर्यसें, वंदि सरणं, १३, चित्तलेहा, देव, दाणविंद, चंद, सूर, वं त, हर्पित, प्रीतिमंत, वडे, उत्कृष्ट, मनोहररूप, तपायेहुयेरूपेकेपाटेजैसे, तुह, द, हह, जिह, परम, लहरूव, धंतरुप्पपट्ट, , , . , कलासैंभीजादे, सोम, १५७ सदा, सत्तेय, . १२८ सप्तस्मरणानि. सुपेद शुद्ध, चिकणे, स्वेत, दांतोंकीपंक्ति, हेशांति, शक्ति, कीर्ति, सेय, शुद्ध, निद्ध, धवल, दंतिपंति, संति, सत्ति, कित्ति, मुक्ति, युक्ति, गुप्तिहै, प्रधानजिनोंके, देदीप्यतेज, वंदनायोज्ञनाम, सर्व, मुत्ति, जुत्ति, गुत्ति, पयर, दित्ततेय, वंधेय, सव्व लोक, भावितात्मा, प्रभावनाकरणेयोज्ञ, प्रशादकरोमुझें, समाधि, १४ लोय, भावियप्पभावणेय, पइसमे, समाहि, १४, नाराचछंद, विगतमलचंद्रकी, शीतल, रहि, नारायओ, विमलससि, कलाइरेय, वि तअंधकार, सूर्यकी, किरणोंसैंभीजादे,तेज, देवतोंकेपतियोंके, गणसैंभीजादा, तिमिर, सूर, कराइरेय, तेयं, तियसवइ, गणाइरेय, रूप, पहाडोंमें, प्रधान, मेरूसेंभीजादे, मजबूतवल, १५, रूवं, धरणिधर, पवरा, यरेय, सारं, कुसुमलताछंद, सत्वसैं, अजितंकों, कुसुमलया, सया, अजियं, शरीरकेवलमैहमेसअजितकों, तपऔरसंजममें अजितकों, सारीरेयबलेअजियं, तवसंजमे अजियं, इस्तरेस्तवताहूंजिनराजअजितकों, १६, भुजंगपरिरंगितछंद, एसथुणामिजिणमजियं, १६, भुयंगपरिरंगियं, सौम्यगुणकरकै. पातानहींउनोंकों, नयासरदऋतूकाचंद्र, तेजगुण सोमगुणेहिं, पावइनतं, नवसरयससी, तेजगुणे करकपातानहींउनोंकों, नयासरदऋतूकासूर्यभी, रूपगुणकों, पातानहीं हिंपावइनतं, नवसरयरवी, रूपगुणेहि पावइ देवतोंकागणपती,[इंद्रभी], स्थिरतागुणकों, पातानहीं पहा नतं, तियसगणवई सारगुणेहि, पावइनतं धर डोंकापती, मेरू], खिजितछंद, १७, तीर्थप्रधानप्रवर्तक णीघरवई, खिजययं, १७, तित्थवरपवत्तयं, अंधेरेरूपरजलेंनहित, धीस्पुरुषोंनेस्तवनापूजाकरी, गिरगयापाप . तमरयरहियो धीरजणथुयच्चियं, चुयकलि मैलजिनोंसे, शौतिसुखकेप्रवाणेवाले, तीनकरणसेंदोनोंपदका, शां संतिमुहपवत्तयं, तिगरणपयओ, संति कलसं, , , असुर और गरु सप्तस्मरणानि. १२९ तिप्रभुकामें, घडेमुनिका, सरण, अंगीकारकरताहूं, ललितछंद, १८, महं, महामुणिं, सरण, मुवणसे, ललिययं, १८, विनयसें, नमेहुये, मस्तकपर, रचित, अंजलि, ऋपियोंके, विणओ, णय, सिरि, रइ, अंजलि, रिसिगण, समूहनेंस्तवनकरा अचलपणे, इंद्र, धनपती, चक्रवर्ति, संयुयं, थिमियं, विवुहाहिब, धणवइ, नरवई, स्तवना, वडीपुष्पादिकसेंपूजा, वहोतप्रकार, विशेषपणेउदयहु थुय, महिअचियं, बहुसो, अइरुग्गय आ,शरदऋतूकासूर्य, अच्छीअधिक सत्यप्रभा, तपस्यासें, सरयदिवायर, समहियसप्पभ, तवसा, आकाशमें, विचरणेवाले, अच्छीतरेखुसहोवामोहीजतेहुये, चारण गयणं गण, वियरण, समुहिय, चारणवंदि मुनियोंने,वंदनाकरीशिरसें, किसलयमालाछंद, १९, यं, सिरसा, किसलयमाला, १९, असुर गरु डोंसेसमस्तपणेवंदीजते, किन्नरऔरनागकुमारोंसेंनमनकरेहुये, लपरिवंदियं, किन्नरोरगनमंसियं, देवतोंकीकोटीसईकडोंसेस्तवीजतेहुये, साधुब्राह्मनोंकेसंघसेंसमस्तपणेवंदित देवकोडिसयसंथुयं, समणसंघपरिवंदियं, २०, स्वमुखछंद, भयरहित, पापरहित मलरहित, रोगरहित, २०, समुहं, अभयं, अणहं, अरयं, अरुयं, विद्युत्विलसित अजितकमासे, ऐसेअजितप्रभू, दोनोपांवनमनकरूं, अजियं, अजियं, पयउपणमामि, विजुपिल २१, आयेनजराणे प्रधान विमान, तेजवंत, छंद, दिव्व, कणग, सियं, २१, आगया घोडे, रथ, प्यादे, सइकडोंसें, सोरमचगया, भ्रमयुक्त, हुलियं, ससंभमो, पहकर, तुरय आणेसें, क्षोभायमान, मनोहर, हिलते कुंडल, खुभिय, ललिय, चलकुंडलं, सोना, वर विमाण, , सएहि, रह, अंगद, गया यरण, , १७ सोहंत, २२, जंसुरसं उत्तमसोना, रत्नोंसें, सप्तस्मरणानि. १३० मुकटसें, शोभायमान, मस्तककीमाला, वेष्टकछंद, २२, जोदेवतोंका तिरीड, मउलिमाला, वेढो, संघ, संयुक्तअसुरसंघ, वयरविरोधरहित, भक्ति अछीसेंयुक्त, घा, सासुरसंघा, वेरविउत्ता, भत्तिसुजुत्ता, आदरसें, सोभायमान, जल्दी, एकजगेमिले, अच्छीतरे, अचर भूसिय, आयर, विम्हि संभव, पिंडिय, जवंत, सबअनीकोंकेबलकासमूह, जादारूप उत्तमकंचण, य, सव्व वलौघा. परू रयण, वंत, देदीप्यमान गहणोंसें, तेजवंतअंगजिनोंका, शरीरसैंअ विय, भासुर भूसण, भासुरियंगा, गायस च्छीतरेसेंनमेहुये, भक्तिकेवससेंआये, अंजलियोंकरकैप्रेषित, मस्त मोणय, भक्तिवसागय, पंजलिपेसिय, सीस कसेंकियाहैप्रनाम, २३, रत्नमाला,छंद, वंदनकरकै, स्तवनाकर पणामा, २३, रयणमाला, बंदिऊण, थोऊण केदोनोंजिनकू, तीनगुण, ज्ञान*दर्शनरचारित्रहीफेरप्रदक्षणाकरकै, तोजिणं, तिगुणमेवय पुणो पया हिणं, विशेषपणेनमस्कारकरतेहुयेजिनोंकोंसुरासुर, हर्षितहोकर, अपने पणमिउणय जिणं सुरा,२, पमुइयास भवनमेंवहगये, २४, क्षेत्रछंद, उनमहामुनियोंकों, मैंभीहाथजो णाइ,तोगया, २४, खित्तयं, तंमहामुणि महंपि डवंदनकर्ताहूं, राग, द्वेष, डर, मोहकरके,रहित, देवता, दान पंजलि, राग, दोस, भय, मोह, वजिय, देव, दा व, राजाओंसेवंदनीक, शांतिपणाउत्तमहैजिनोंका, वडाहैतपजिनोंका, २५, नरिंदवंदियं, संतिमुत्तम, महातवनमे, २५, क्षेत्रछंद, आकाशके अंदर, विचरणेवालियां, मनोहर खित्तयं, अंबर अंतर, वियारणियाहिं, ललिय, हसणीकीतरे, गमनकरणेवालियां, पुष्ट कमरकरके, हंसबड्ड, गामणि. याहिं, पीणसोणिस्थण, भव णव, . , सप्तस्मरणानि. आवाशकेनिधानवालिया, समस्तकमलपत्र जैसे, आंखोवालियां, सालणियाहिं, सकलकमलदल, लोयणिआहिं, २६, दीपकछंद, पुष्ट, अंतररहित, स्तनोंकेबोझसें, विशेषपणेझु २६, दीवयं, पीण, निरंतर, थणभर, विणमियगा कगयागात्रलतावालियां, मणिओरसोनेकी, ढीली, लटकतीकणदोरेसें, यलयाहिं, मणिकंचन, पसिढल, मेहल, शोभित, कम्मरवालियां, प्रधान, खिणरशब्दकेनेउर, सहिततिलक, सोहिय, सोणितडाहिं, वर, खिंखणिनेउर, सतिलय कडेवाजूबंध, शोभायमानगहणेवालियां, आनंदकारीचतुर, मनहरणेवालियां, वलय, विभूसणयाहिं, रइकरचउर, मणोहर, सुंदरीयांदेखणेयोज्ञ, २७, चित्रक्षरछंद, ऐसीदेवसुंदरियोंसें, सुंदरदसणियाहिं, २७, चित्तक्खरा, देवसुंदरीहिं, पांवहै वंदनाकरके, वंदितजिनोंके, तुमाराअच्छापराक्रमकाचरण, पायवंदियाहिं, चंदिया, जस्सतेसुविकमाकमा, अपणे निलाडकरकै, मंडण अलंकार कैप्रकारकरकै, अप्पणो निलाडएहिं, मंडणोडणप्पगारएहिं, किसरप्रकारकरके, नीचेकैअंगसैंश्लय, पावोंकेतलेसें, नमने केहिं केहिवी, अवंगतिलय, पत्तलेहिं, नामए करके, धूघरोंसें, अच्छीसंगतगतासें, भक्तीकरकेस्थापनकिया, हिं, चिल्लएहिं, संगयंगयाहिं, भत्तिसन्निविष्ट, वेर हुओतुझेवंदना, वंदनाकोप्राप्तहोकरके, नाराचछंद, यंदणागयाहिं, हुँतुतेवंदिया, पुणो २, नारायओ, जिनचंद्र, २८, वहमें, झटकाहै अजितकों, जितमोहकों, जिणचंद, अजियं; जियमोहं, धुअस सबक्लेशकों, दोनोंपांव, विशेषपणेनमनकरूं, निंदकछंद, २९, वकिलेस, 'पयओ, पणमामि, निंदिययं, २९, ऋषिगण, स्तवना वंदित, ओर देवगणसें वहदोनों, थुअवंदिअस्स, रिसिगण, देवगणेहिं, , २ , २८, तमहं, , तो , खडूज, सज्ज, गीय, १३२ सप्तस्मरणानि, देवतोंकीबहुओंसें, दोनोंकेपांवनमनकिये, जिनोंकीजगत्मेंउत्त देववहूहि, पयओपणमियस्सा, जस्सजगुत्तम मआज्ञा, भक्तीकेवससेंआयकर,एकठीमिलीऐसी, सासणिअस्सा, भत्तिवसागयपिडियाहिं, देवअपछर, वह, देवस्त्रियोंकैवहुलतासें, सुरप्रधानोंकीखुसव देववरच्छर, सा, बहुयाहिं, सुरवररइगुणपिडि ख्तीकागुणएकठाभया, ३०, भाश्वरछंद, वंसरीकाशब्द, वीणाकेतालकामेल, य आहिं, ३०, भासुरयं, वंससद्द, तंतितालमेलए, त्रिपुष्कर मृदंग]का, मनोहरशब्द, मिलाकरकिया, कानमेंमानयुक्त, तिउक्खरा, भिरामसद्द, मीसएकए, सुयसमाणणेय, गीत, पांवोंमेंजालघंट[घूघरोंसे], घेरदार पायजालघंटियाहिं, बलय कणदोलेका, समूह, नेऊरके, मनोहरशब्द, मिलाकरकिया, मेहला, कलाव, नेउरा, भिरामसद्द, भिरामसद्द, मीसएकए, देवसंबंधीनाटकसैं, हावभाव, विभ्रम, प्रकारकरकै, नाचक देवनट्टियाहिं, हावभाव, विन्भम, प्पगारएहिं, नचि अंगकोधुमाकरकै, वंदनाकरती, उनोंकूतुमारेअछेपराक ऊण, अंगहारएहिं, वंदियाय, जस्सतेसुविकमा मरूपचरण, तिसकरकै, तीनलोकके, सर्वसत्वोंकों, शांतिकारक, उपशांतसर्व, कमा, तयं, तिलोय, सव्वसत्त, संतिकारयं, पसंतसव्व पाप, दोप, , मेरे, निश्चै, नमस्कारकर्ताहूं, शांतिउत्तमजिनकों, . ३१, पाव, दोस, मे, सहि, नमामि, संतिमुत्तमंजिणं, ३१, नाराचछंद, छत्र, चमर, स्थंभ, जवसेंमंडित, नारायओ, छत्त, चामर, पडाग, • जवमंडिया, धजाप्रधान, मगरमच्छ, घोडा, श्रीवत्सादिक, अच्छेलक्षण, दीप, झयवर, मगर, तुरग, सिरिवच्छ, समुद्र, मकानवामेरू, दिग्गजसें शोभित, स्वस्तिक, समुद, मंदिर, दिसागयसोहिया, सथिह, र के, पताका, - जय, सुलंछणा, दीव, , , सप्तस्मरणानि.. १३३ बैल, सिंह, श्रीवत्सादिक, सुलक्षणहैजिनोंकै, ३२, ललितछंद, वसह, सीह, सिरिवच्छ, सुलंछणा, ३२, ललिययं, खभावसें मनोहर, समभावकीप्रतिष्ठा, नहींहैदोषकीदुष्टता, गुणोंमें सहावलट्ठा, समप्पइट्टा, अदोसदुट्ठा, गुणेहिं वडे, कृपाकरणेमें श्रेष्ठता, तपस्या हैपुष्टता, लक्ष्मीऐश्वर्यादिकइष्टहै, जिट्ठा, पसायसिट्ठा, तवेणपुठ्ठा, सिरिहिंइहा, ऋषियोंसें, घेरेहुये, ३३, वाणवासितछंद, तेरेतपकरकैझडकाये, रिसिहं, जुहा, ३३, वाणवासिया, तेतवेणधुय, सर्वपापोंकों, सर्वलोकोंकेहितकामूल प्राप्तकराणेवाले, स्तवना, सव्वपावया, सव्वलोगहियमूलपावया, संधुया, अजित शांतिकेप्राप्तकराणेवाले, होमुझें शिवसुखके देणेवाले, ३४, अजियसंतिपावया, हुंतुमेसिवसुहाणदायया, ३४, अपरंतिकाछंद, इसतरे तपबल विस्तारवंत, स्तवनाकरीमैनें, अपरंतिका, एवंतववलविउलं, थुयंमए, अजितशांति, जिनकेजोडेकों, दूरगयाहै, कर्मरजमलकों, गती, अजयसंति, जिनजुयलं, ववगय, कम्मरयमलं, गइ, प्राप्तहुये, साश्वत, निर्मलकू, गाथाछंद, ३५, उनकोंबहोतगुणका, सासयं, विमलं, गाहा, ३५, तंबहुगुण, मोक्षकासुख, प्रशाद, उत्कृष्टसें, रहितविषाद, नाशकरो प्पसायं, मुक्खसुहेण, परमेण, अविसायं, नासेउ मेराविषाद, करो, सुणनेवाली परषदापर, मेविसायं, प्पसायं, ३६, उनोंकोंमुझें इनोंकों समृद्धि, पाओनंदिषेण समस्तपणे समृद्धि तमोएओयनंदि, पावेउनंदिसेणमभिनं श्रेणिकपुत्रनंदिषेण, पर्षदाकोभी सुखसमृद्धि, मुझकों, देओ, दि, परिसावियसुहनंदि, दिसउ, संजमकीसमृद्धि, ३७, गाथा, पख्खीमें, चौमासीमें, संजमेनंदि, ३७, गाहा, पक्खिय, चाउम्मासे, गयं, प्रशाद, ३६६ कुणज्य, परिसाविय, गाथा, गाहा, ममय, सप्तस्मरणानि.. - जोपढे, , संवत्सरीमें रात्रीमें, दिवसमें, सुणना, सवोंनें, उपसर्गका, संवच्छर,राइएय, दियएय, सोयव्वो, सब्वेहिं, . उवसग्ग, दूरकरणेवालायहइसकों, ३८, जोसुणे, निवारणो एसो, ३८, जोपढइ, जोनिसुणइ, दोनोंकाला वख्त, अजित, शांति, स्तवन, नहींहोय, उसके, उभओकालंपि, अजिय, संति, थुयं, नहुहुंति, तस्स, रोग, पहलेकेउत्पन्नभी, नाशहोजावै, ३९, रोगा, पुवुप्पन्नावि, नासंति, ३९, इति श्रीअजितशांतिस्तवनं उल्लसायमान, पांवोंके, नखमैसें, निकलीजो, क्रांतिकादंड, उसमिपसें प्राणी, उल्लासि, कम, नक्ख, निग्गय, पहादंड, च्छलेणं, गिणं, वंदनकरणेवालेकों,दिखाणेकीतरे, प्रकट, निर्वाण, मार्गकी वंदारूण दिसंत इव्व, पयर्ड, निव्वाण, मरगा कुंदपुष्प, ओरचंद्रकीतरेउजली, दांतोंकीक्रांतिकेमिससें, निकलेज्ञान, वलिं, कुर्दि, दुजल, दंतकंतिमिसओ, नीहंतनाणं, केअंकूर, कैसेहँदोनोंभी, दुसरेओर, सोलम, जिनकों, स्तनूंगा, केरेदोवि, दुविज, सोलस, जिणे, थोसामि, क्षेम मुक्ति केकरणेवाले, १, श्वयंभूरमण अंतकेसमुद्रके, पाणीकोंजोमा खेमंकरे, १, चरमजलहि, नीरं जोमिणु पेचाहताअंजलियोंसें, क्षयसमयकीहवाकों, जोउसकेसंगचलेचाहता जंजलीहिं, खयसमयसमीरं, जोजिणजाग चालसें, समस्त आकाशके लंबानकों, लंघचाहताहैजोपांवोंसें, सयलनहयलंवा, लंघएजोपएहिं, अजिय, अथवा, शांतिको, वह, समर्थहोय, स्तवनाकरणे, २, तोमीनिश्चे, महव, संति, सो, समत्थो, थुणे, २, तहबिहु, बहुमानउल्लसित, भक्तीकेसमूहसें, गुणोंकालेशमात्रकीर्ति, बहुमाणुल्लासि, भत्तिभरण, गुणकणमिवकित्ती, इच्छापूरणेचिंतामणीरत्नकीतरहै, सरा, . अथवा, अचिंत्यओरअनं. हामचिंतामणिव्व,. अल, महव, अचिंत्ताणः , अजित, इए, . . .

नमेजो देव, घसीजते, चरण कमल, हमेस, कित्ती, सप्तस्मरणानि. १३५ त सामर्थ सेंप्रभूदोनोंकी, फलेगा, जल्दीसव, बंछित, तसामत्थ ओसिं, फलहइ, लहुसव्वं, . वंछियं, निश्चयकरकेमेरे, ३, समस्त, जगत्कोंहितकारी, नाममात्रकर, निच्छियमे, ३, सयल, जयहियाणं, नाममित्तेण, ध्यांनसें, दूरकरडालतेहैं, जल्दीढुष्ट, अनर्थ, दुर्घटपणेकाथाट, झाणं, विहडइ, लहुदुठ्ठा, णह दोघहथह, उनोंकेमुगटसें, नमिरसुर किरी घि, पायारविंदे, सयय, अजितशांति, उनदोनोंजिनकोंवंदनकर्ताहूं, ४, फैलतीहैप्रधान मजियसंती, तेजिणंदेभिवंदे, पसरइवर कीर्ती, वढतीहै शरीरकीतेजी, भोगे, पृथ्वीपर मित्रता, वट्ठएदेहदित्ती, विलसइ, भुविमित्ती, होवै अच्छीचालचलण, देदीप्यमानहोयउत्कृष्टसंतोस, होयसंसारका, जायएसुप्पवित्ती, फुरइपरमतित्ती, होयसंसार, कटणा, जिनेश्वरकेदोनोंपांवोंकीभक्ती, हृदेमें विचारणेसेंसक्तीहोय, ५, छित्ती, जिणजयपयभत्ती, हीयचिंतोरसत्ती, मनोहरहैपांवोंकाप्रचार, देवसंबंधीअंगोंकाघूमाणा, प्रगटस ललियपयपयारं, भूरि, दिव्वंगहारं, फुडघणर घनरसभाव, ऊमदाश्रृंगारसारभूत, अनमिष देवतों कीरमणियां, सभाचो, दारसिंगारसारं, अणमिसरमणिज्ज प्रभूदर्शनमुस्कलसेंपाया,ऐसेंडरी, इसतरेनमस्कारकरतीअमंदपणेकरती दसणच्छेयभीया, इवपणमनमंदाकासिन उनोंनेकिया हुईनाटकउपहार, ६, हेमव्यजीवोस्तवनाकरोअजितशांतिकी, तेकयासेस होवहारं, ६, थुणहअजियसंती, सबोंकीशांति, सोनेकेरजजैसीपीली, विराजमानजाणोमूर्तिउनोंकी, उत्सा संती, सर कणयरयपिसंगा, छज्जएजाणमुत्ती, हकरकैआलिंगन, सरूकियानिर्वाणलक्ष्मीका, भसपरिरंभा, रंभनिव्वाणलच्छी, घणथण, घुसः , बहोत, सघनस्तन, चंदनकेशर अणेगं, जेसिं, ८, फुरइफुडफलंताणत , १३६ सप्तस्मरणानि. से अंकित, कादेसें, पीलामाकरणेकीतरे, ७, बहुतविधनयोंकाभंगजाल, णिकु, पंक, पिंगीकयन्ध, ७, बहुविहनयभंग, वस्तुनित्य, औरअनित्य, सद, असत् , अनिर्वचनीय, वचनीय,एक, वत्थुनिचं, अनिच्चं, सद्, सद्, णभिलप्पा, लप्पमेगं, ओरअनेक, ऐसेखोटेनयोंसेंविरुद्ध, अच्छाप्रसिद्ध, और, जिनोंका, इयकुनयविरुद्धं, सुप्पसिद्धं, च, वचन अवद्य[पापरहित] निर्जराकाहेतु, उनदोनोंजिनकास्मरणकर्ताहूंमें, ८, वयण मवय निजं, तेजिणेसंभरामि, फैलताहै तीनलोकमें, उहांतक, मोहकाअंधेरा, फिरतेहैंजगमें, पसरइतियलोए, ताव, मोहंधयारं, भमइजय संज्ञाहीन उहांतक मिथ्यात्वसेंछिपेहुये, उदयमानप्रगटफलंत अनंत मसन्नं तावमिच्छित्तछन्नं, ज्ञानकेकिरणोकापूर, प्रगटअजितशांतिके ध्यानरूपसूर्यनहींजहांतक, ९, नाणंसुपूरो, पयडमजियसंतीझाणसूरोनजाव, ९, शत्रु हस्ती सिंह দৃষ্ণা अग्नि चौरवैरी रोग अरि करि हरि तण्हं पहवु चोरारि वाही युद्ध, राजाकाकोपवादुकाल, मरी, डरावणेदुष्टउपसर्ग, नासहोय, समर, डमर, मारी, रुद्दखुद्दोवसग्ग, पलय, अजितशांतिकी, कीर्तनासें, जल्दी, जावै, करडावहोत, मजियसंती, कित्तणे, झत्ति, जंती, निवडतर, अंधेरेकासमूह, भास्कर सूर्य] काटणेवालेकीतरे, १०, एकठेहुयेपापरूप काष्ट तमोहा, भक्खरालंखियव्व, १०, निचियदुरियदा जिसकों दीप्त ध्यानरूपअग्निकी झाल प्राप्तकीतरेही गोरवर्ण दित्तझाणग्गि जाला परिगय मिवगोरं विचारणेकों घसणेसेंजेसीरेखा उसक्रांतीकी चिंतियंजाणरूवं कणय नियसरेहा कंतिचो मानूंचोरीकरली फिरती ओर स्थिर जो लक्ष्मी रंकरिज्जा चरथिरमिहलच्छि गाढसंथं मिय , ध्यानरूप सोनेके अत्यंतपणे थांम कररख १३७ व्व ११, सप्तस्मरणानि. एकीतरे ११, अटवीमें निवर्तित रस्ताभूलेको], राजासेंत्रासितकों अडविनिवडियाणं, पत्थवुत्तासिआणं दरियावकेलहरोसेंजिहाजफूटेकों, कैदोरहेकों, जलतीहु जलहिलहिरहीरं ताणगुत्तिट्टियाणं जलिय ईअग्निकीझालसें आलिंगतकों तुमाराध्यान करदेतेहैंजल जलणजाला लिंगियाणंच झाणं जणयइल दीशांति शांतिनाथ अजितनाथका १२, सिंहहस्तीइनोसेंव्याप्त हुसंतिं संतिनाहा जियाणं १२, हरिकरिपरि युक्त, पक्के, प्यादोंसें, प्रतिपूर्ण, जैसासमस्तभरतपृथ्वीकाराजछोडकै किन्नं, पक, पायक, पुन्नं, सयलपुहविरजंछड्डि, केसाकराज्य, आज्ञामाननेवाला, तृणकीतरे, प्रतिलग्न[समस्तपणेलगेजो उ, आणसज्ज तणमिव, पडिलग्गंजेजिणामुत्ति जिनमुक्तिमार्गकों, चारित्रअंगीकारकिया, हुआवेदोनोंमेरेपरप्रशन्न, १३, मग्गं, चरणमणुपवन्ना, हुतुतेमेपसन्ना, पूनमकेचांदजैसैमुखवाली, खुलेनेत्रकमलकेओपमावाली, स्तनोंके छणससिवयणाहिं, फुल्लनित्तुप्पलाहिं, भारसेंनमीहुई, मुट्ठीग्रहणकरणेयोज्ञपेटवाली, मनोहरभुजारूपल रनिमरीहं, मुडिगिझोदरीहिं, ललियभुयल तावाली, पुष्टकम्मरकेस्थलवाली, असीसइकडोंदेवतोंकीस्त्रियोंसें, याहिं, पीणसोणिस्थलीहिं, सयसुररमणीहिं वांदीजतेहुयेजिनोंकेचरण, १४, अर्श मस्सा], किटिभ, कोट, वंदियाजेसिपाया, किडिभ, कुड, गंठिया, वागांठे, कास, अतीसार, क्षय, ज्वर, व्रण, जिनावरोंकाविष, गंठि, कासा, इसार, खय, जर, वण, लूआ, श्वास, शोष, पेटकेरोग, नखोंमें, में, दांतोंमें, आंखमें, कूखमें, सास, सोसो, दराणि, नह, मुह, दसण, च्छी, कुच्छि, कानआदिरोग, बडेजिनवरदोनोंकेचरणोंका, सुप्रशाद, हरणकरो, १५, कन्नाइरोगे, महजिणजुयपाया, सुप्पसाया, हरंतु, १५, . १३, थणभ १४, अरिस, , , , १८.

चोमासीमें, १३८ सप्तस्मरणानि. इत्यादि, भारी, दुःखितत्राससें, पक्खीमें, इइ, गुरु, दुहितासे, पक्खिए, चाउमासे, जिनवरकाजोडास्तवनकरणेसैं, अथवा संवत्सरीमें, पवित्र, पढो, सुणो, जिणवरदुगथुत्तं, वच्छरेवा, पवित्तं, पढह, सुणह, खाध्यायकरो, इसकोंध्याओचित्तमें, करो, जाणो, विघ्न, एहझाएहचित्ते, कुणह, मुणह, विग्छ, जिसकरके, नाशकरोजल्दी, १६, इयविजयाराणीजितशत्रुराजा जेण, घाएहसिग्छ, १६, इइविजयाजियसत्तु केपुत्र, श्री, अजितनाथजिनेश्वर, तैसैं, अचिराराणी विश्वसे पुत्त, सिरि, अजियजिनेसर, तह, अइरा, विससे नराजाकेपुत्र, पांचमेंचक्रवर्तिईश्वर, तीर्थकर, सोलमें, शांतिनाथ, णतणय, पंचमचक्कीसर, तित्थंकर, सोलसम, संति, जिनमुझेवल्लभ, अथवाश्रीजिनवलभसूरिः स्तवताहै, करोमंगलमेराहरो, पाप जिणवल्लह, संतह, कुरुमंगलममहरउ दुरिय समस्तनिश्चै, स्तवनाकरतेकू, १७, मखिलंपि, १७, इतिद्वितीयस्मरणं ॥ नमस्कारकरकै, नमे, देवतोंकासमूह, मुगटोंकमणियोंकेकिरणसें, रंगे नमिऊण, पणय, सुरगण, चूडामणिकिरण, रंजि हुये, मुनियोंके, चरणोंकाजुगल[जोडा], बडेडर, विशेषपणेनास करणे, यं मुणिणो, मुणिणो, चलणजुयलं, महाभय, पणासणं, अच्छीस्तवनाकहताहूं, १, सडगयेहाथपांव, नख, मुख, दूरगई संथवं, वुच्छं, १, सडियकरचरण, नह, मुह, निव्वु बैठगईनासिका, विदरंगहुईलावण्यता, · कोढवडेरोगरूपअग्निकी, इनासा, कुट्ठमहारोगानल, फु लासें, समस्तपणेजलगयासवअंग, २, वहतुमारेचरणोंकीआराधना, रूप, लिंगनिद्दड्डसव्वंगा, २, तेतुहचलणाराहण, सलिलं, जलकीअंजलीउससें, वढाजोउमंग, वनकीदावानलसेजला, पहाडके जलिसेय, वदिउच्छाहा, वणवढ्ढा, गिरिपा थुणंतह, विवन्नलावन्ना, , .

५, , सप्तस्मरणानि. १३९ क्षकीतरे, पायाफेरलक्ष्मीकों, ३, खोटीहवासें, उछलता, जलनिधि, यवब्व, पत्तापुणोलच्छि, ३, दुव्वाय, खुभिय, जल, समुद्र, ऊपराऊपरीकल्लोलोंका, डरावणाशब्द, संभ्रातिडरसेंढीला निहि, उन्भडकल्लोल, भीसणारावे, संभंतभयवि गिरगयाअंग, नइयेलोकोनेंछोडाचलाणेकाच्यापार, ४, फटगईजिहाज संटुल, निजामयमुकवावारे, ४, अविदलियजा ऐसेपुरुष, क्षणभरमेंपातेहैं, वंछितकिनारोंकों, पार्थजिनराज णवुत्ता, खणेणपावंति, इच्छियंकूलं, पासजिण केचरणोंकाजोडा, नित्यअर्चे पूजै, जो, नमें, मनुष्य, करडी चलणजुअलं, निचंचिय, जे, नमंति, नरा, ५, खर हवासेंसिलगीहुईवनदावानल, झालोंकीश्रेणी, मिलीभईसमस्त, पवणुद्धयवणदव, जालावलि, मिलियसयल, वृक्षोंकीसघनताकू, जलाते भोलीमृगवधू [हिरणी], डरावणाशब्दकरती, दुमगहणे, डझंतमुद्धमयबहू, भीसणरव, डरावणेवनमें, ६, जगगुरूके, चरणदोनों, बुझादिया, भीसणमिवणे, ६, जगगुरुणो, कमजुयलं, निव्वाविय, समस्ततीनभुवनकों खाणेवाली, जोस्मरणकरे, मनुष्य सयलतिहुयणाभोयं, जेसंभरंति, मणुया, नहींकरे, ज्वलन अनि डरउनोंकों, ७, विलसताहुआफण भयंतेसिं७, विलसंतभोग डरावणा, देदीप्यमानलाल, नेत्र, तर २करतीदोजिह्वा, भीसण, फुरियारुण, तरलजीहालं, वडासांप, नयेमेघकीघटाजेसा, शस्त्रजेसाघातक, भयानकआकार, ८, उग्गभुयंगं, नवजलय, सत्थहं, भीसणायारं, ८, मानताहै, कीडे, जैसा, दूरसमस्तपणेहोय, विषम, जहर मन्नंति, कीड, सरिसं, दूरपरिच्छूट, विसम, वि कावेग, तुमारा, नामकाअक्षर, प्रगटसिद्ध, मंत्र, भारी, मनु सवेगा, तुह, नामक्खर, फुडसिद्ध, मंत, गुरुया, न नकुणह, जलणो, नयन, , , १४० सप्तस्मरणानि. , , , , , ध्यलोकमें, ९, जंगलमें, भील, चोर, पुलिंद मैणा], सार्दूल, रालोए, ९, अडवीसु, भिल्ल, तकर, पुलिंद, सहूल, सिंहोकाशब्द, डरावणेमें, डरसें, कांपता, कायर, लूटते सद्द, भीमासु, भय, विहुर, वुन्नकायर, उल्लूरिय रस्तागीरके, सथवारेमें, १०, नहींछिपाया, विभवसार धनमाल], पहिय. सत्थासु १०, अविलुत्त, विहवसारा, तुमाराहेनाथ, प्रणामसेंवहचोर, छोडदियाव्यापार, दूरगयेविघ्नजल्दी तुहनाह, पणाम, मुत्तवावारा ववगयविग्यासिग्छ पायेहितकारी, वंछितठिकाणेकू, ११, जलती, अग्निजैसे पत्ताहिय, इच्छियंठाणं, ११, पजलिया, नल नेत्रजिसके, दूरतकफाडाहै{जिसने, वडीकाया, नखवज्र नयणं, दूरवियारियमुह, महाकायं, नहकु जैसेंसें, घातकिया, फाडाहै, हस्तीका, कुंभस्थल, खाणेकों, १२, लिस, घाय, वियलिय, गयंद, कुंभत्थला, भोयं, १२, जादाकरकेप्रनमेहुयेभ्रमयुक्तराजा, नख, मणि, माणक, पणयससंभवपत्थिव, नह, मणि, माणिक, प्रतिम, प्रतिविवके, तुमारे वचन, शस्त्रोंकेधारणेवाले, सिंह पडिय, पडिमस्स, तुह, वयण, पहरणधरा, सीहं कोपेहुयेकोभी, नहींगिणताहै, १३, चंद्रजैसाश्वेत, दंतमूसलजिसके, कुटुंपि, नगिणंति, १३, ससिधवल, दंतमुसलं, लंबीसूडउठाकै, वधायाहैउमंगजिसनें, काबरेहै, नेत्र, दोनों, दीहकरल्लाल, वडिउच्छाहं, महुपिंग, नयण, जुयलं, पाणीसेभरी, नयेमेघकीघटाकेआकारवाला, १४, डरावणावडा, ससिलिल, नवजलहरायारं, १४, भीममहा, हस्ती, वहोतनजीकआयाभी, वहनहींगिणतेहैं, जोतुमारेचर गयंद, अचासन्नंपि, तेनविगिणंति, जेतुम्मच मुनिःपतिरूपऊंचाई परजोचढाहै, १५, युद्धमें, लणजुयलं, मुणिवइतुंगंसमुल्लीणा, १५, समरंम्मि, , , णदोनों, , विसहर, सप्तस्मरणानि. तीक्ष्ण, तलवारके, चोट, विशेषपणेवांधाहैउद्भुतबंध, जिसनें, तिक्ख, खग्गा; भिघाय, पवद्धउद्भुयकवंधे, वरछीयोंकेजखमसें, कटे, हस्तियोंकेवचे, छोडाहैसिसकारा, जादा कुंतविणि, भिन्न, करिकलह मुक्कसिकार, पउ जिसनें, १६, जीताहै, अहंकारवाले, वैरी, राजा, राजाओंके, रम्मि, १६, निज्जिया दप्पुद्धर, रिउ, नरिंद, निवहा, सुभट, यश, उज्वल, पातेहैं, हेपापोंकेशमाणेवाले, पार्थजिन, भडा, जसं, धवलं, पावंति, पावपसमण, पासजिण, तुमारेप्रभावसें; १७, रोग, पाणी, अग्नि, सांप, तुहप्पभावेण, १७, रोग, जल, जलण; चोर, · वैरी, सिंह, हस्ती, संग्रामादिडरोंकों, पार्थजिनकेनामकी चोरा, रि, मयंद, गय, रणभयाई, पासजिणनाम अच्छीकीर्तनाकरणेसें, विशेषपणेशमनहोतेहैंसव, १८, इसतरेमहाभयहर, संकित्तणेण, पसमंतिसव्वाई, १८, एवंमहाभयहरं, पार्थजिनेंद्रका, अच्छास्तवन, उदार, भव्यजनोंकूआनं पासजिणंदस्स, संथव, मुथारं, भवियजणानं दकर्ता, परंपरासे, निधानरूप, राजकाडर, यक्ष, दयर, कल्लाण, परंपर, निहाणं, रायभय, जक्ख, राक्षस, खोटेखन, दुष्टखन्न, ग्रहोंकीपीडामें, रक्खस्स, कुसमिण, दुस्सऊण, रिक्खपीडासु, संध्यासुवेसांझदोनोंमें रस्तेमें, कष्टानेसें, तैसेंरातमें, २०, संझासुदोसु, पंथे, उवसग्गे, तहयरयणीसु,२०, जोपढे, जोसमस्तपणेसुणे, रक्षाकरणेवाला, मानतुंगका, जोपढइ, जोयनिसुणइ, ताणंकयणोय, मानतुंगस्स हेपार्थपापोंकोंप्रशमावो, हेसमस्ततीनभुवनसेंपूजेभयेचरणोवाले. पासोपावंपसमेओ, सयल वणचियच्चलणो, २१ इतितृतीयंस्मरणसमाप्त वहजयवंतहो, जयवंत, तीर्थ, तीर्थकमालकवीरण कल्याण, जोइहां, बीया, नासकरो, १४२ सप्तस्मरणानि. तंजयओ, जयइ, तित्थं, जमित्थ, तित्थाहिवेणवी अच्छाप्रवर्तीया, भव्यसत्वोंके, संतान परंपरा]तकसुखपै . रेण, सम्मंपवत्तियं भव्वसत्त, संताणसुहजणयं दाकर्ता, १, नासकियासमस्त, क्लेश, समस्तपणेहणदियेखोटेपरिणा १, नासियसयल, किलेसा, नियकुलेसापस म, तारीफलायकशुभलेश्या, श्रीवर्द्धमानतीर्थकों, मंगलदेओ, त्थसुहलेसा, सिरिबद्धमाणतित्थस्स, मंगलंदि वह, अरिहंत, २, समस्तजलायाकर्मबीज, दूसरी, परमेष्ठी तु, ते अरिहा, २, निड्ढकम्मबीया, परमेहि गुणकीसमृद्धि, सिद्धादेवीत्रिजगत्प्रसिद्ध, गुणसमिद्धा, सिद्धातिजयपसिद्धा, हणंतु, दु दोषोंकों, तीर्थका, ३, आचारकों, आचरते, पांचप्रकारकों, स्थाणि, तित्थस्स,३, आयार, मायरंता, पंचपयारं, हमेसप्रकाशकरते, आचार्यमहाराजका, तैसैंतीर्थका, समस्तहणोकु सयापयासंता, आयरिया, तहतित्थं, नियकु तीर्थकों, प्रकाशकरत्तोंकों, ४, सम्यक्श्रुतके, वचाणेवाले, उपाध्यायका, तित्थं, पयासंतु, ४, सम्मसुय, वायगा, वायगाय, स्यादवादके, वचाणेवालेवाचकका, प्रवचनके, निंदक, निंदाकरणेवाले, सियवाय, वायगावाए, पवयण, पडणीय, कये दूरकरो, सर्व, संघका, ५, मुक्तिसाधनेकों, उद्यमवंत, वर्णतु सब्बस्स, संघस्स, ५, निव्वाणसाहणु, जय, साधुओंके, पैदाकिया, सर्व, साहाय, तीर्थकेप्रभावक, साहूणं, जणिय, सव्व, साहज्जा, तित्थप्पभावगा, वह, हुओ, परमेष्ठी, यत्नकर्ता, ६, जिनोंकेपिछाडी, ते, हवंतु, परमेद्विणो, जइणो, ६, जेणाणुगयं, मुक्तिकाफल, और, चारित्रमी, होय, तीर्थसंबंधीजो नाणं, निब्वाणफलं, च, चरणमवि, हवइ, तित्थस्सदं , " , , ज्ञान, , , , , कुशल, सप्तस्मरणानि १४३ दर्शन, उसका, अमंगलदूरकरो, सिद्धिकरो, ७, छद्मस्थ, जो, सणं, तं, मंगुलमवणेउ, सिद्धियरं, ७, नित्थम्मो श्रुतधर्म, समस्त, भव्यशरीरी, वर्गकू, किया, सुख, गुणों सुयधम्मो, सम्मग्ग, भव्वंगि, वग्ग, कय, सम्मो, गुण मैंअच्छीतररहे, संघकों, मंगल, सुख, इहां, देओ, ८, : सुट्टियस्स, संघस्स, मंगलं, सम्म, मिह, दिसओ,८, रमणीकचारित्रधर्म अच्छीतरेपायेभव्यजीव, ओरमुक्तिसुख, रम्मोचरित्तधम्मो, संपावियभव्वसत्त, सिवसम्मो, समस्त, क्लेसकाहरणा, हुओ, हमेस, सकल, संघका, ९, नीसेस, किलेसहरो, हवउ, सया सयल, संघस्स, ९, गुणोंकेसमूहसेंभारी, ऐसेगुरुओंके, शिवसुखकीबुद्धिवाले, करो गुणगणगुरुणो, गुरुणो, सिवसुहमइणो, कुणंतु, तीर्थका, श्रीवर्धमान, प्रभु, प्रकटकियेका, तित्थस्स, सिरिवद्धमाण, पहु, पयडिअस्स, कुसलं, समस्तका, १०, जीताहैप्रतिपक्षियोंकों यक्ष, गोमुख, समग्गस्स, १०, जियपडिवक्खा, जक्खा, गोमुह, मातंग, मुख, प्रमुख, श्रीब्रह्मशांति, संयुक्त, मायंग, गय मुह, पमुक्खा, सिरिवंभसंति, सहिया, करो, नयकी, रक्षा, मुक्ति, देओ, ११, अंचा, नासकरा, उपसर्ग, रिक्खा, सिवं, दितु, ११, अंबा, पडिहय, डिंबा, सिद्धिदाता, सिद्धाइका; प्रवचनकू, चक्रेश्वरी, वैरौट्या, सिद्धा, सिद्धाइया, पवयणस्स, चक्केसरि, वइरुवा, शांतिदेवता, देओ, सुक्खोंकों, १२, शोले, संतिसुरा, दिसउ, सुक्खाणि १२, सोलस, विजा, देवियां, देओ, संघकों, मंगल, विस्तारवाला, देवीओ, दितु, संघस्स, मंगलं, विउलं, अच्छुत्ता देवी,सहित, विक्षात, श्रुतदेवताके, संग, १३, सहियाओ, विस्मय, सुयदेवयाइ, समं, १३, गज , कय, नय. विद्या, अच्छुप्ता, हमेस, तित्थस्स, , . १४४ चोमासी प्रतिक्रमणविधि जिनशासनकी, कर, रक्षा, जक्ष, चौवीस, शासन, जिणसासण, कय, रक्खा, जक्खा, चउवीस, सासण, देवताभी, शुभभावहोकर, संताप, तीर्थका, सुरावि, सुहभाधा, संतावं, तित्थस्स, सया, प्रनाशकरो, १४, जिनप्रवचनमें, समस्तपणेरक्त, विसेपरहित, पणासंतु, १४, जिणपक्यणमि, निरया, विरया, कुपंथसें, सर्वथा, येसर्व, टहलवंदगीकीकरणेवालियां, जोतीर्थकी, कुपहाउ, सव्वहा, सव्वे, यावच्चकराविय, हुओ, शांतिकरणेवाली, १५, जिनसिद्धांत, सिद्ध, अच्छारस्ता, हवंतु, संतिकरा, १५, जिणसमय, सिद्ध, सुमग्ग, कीयाहै, भव्यजीवोंके, पैदा, साहाय, गायाहैचैन, विहिय, भव्वाण, जणिय, साहिजो, गीयरई, गायाहैजस, सपरिवारकों, सुखदेओ, १६, घरकी, गोत्रकी, गीयजसो, सपरिवारो, सुहंदिसओ, १६, गिह गुत्त क्षेत्रकी, जलकी, थलकी, बनकी, पहाडोंकी, वसणेवाली, देव, खित्त, जल, थल, वण, पव्वय, वास, देव और, देवियां जिन, आज्ञामें, रहेहुयोंका, दुःख सर्व, समस्त, देवी, ओ, जिण, सासण, हियाणं, दुहाणि, सव्वाणि, नाशकरो, १७, दश, दिग्पाल, संयुक्त, क्षेत्रपाल, निहणंतु, १७, दस, दिसिवाला, स, खित्तवालया, न वोंग्रह, संयुक्तनक्षत्रोंके, जोगणियां, राहू, ग्रह, वग्गहा, सनक्खत्ता, जोइणि, राहू, ग्गह, फास, कुलक, अर्धपहरके, १८, साथकालके, कंटकके, पास, कुलि, अद्धपहरेहि, १८, सहकाल, कंटएहिं, संयुक्तविष्टि, वत्स, येसब, सवजगे सविडि, वत्थेहि, कालवेलाहिं, सव्वे, सव्वत्थं सुखकों, देओ, सर्च, संघकों, १९, भवनपती, सुहं, दिसंतु, सव्वस्त, संघस्स, १९, भवणवइ, . , , न , काल, , . काल, ७ कालवख्त, M जोदेव, वेमाणियाय, , जए, कुपह, , सप्तस्मरणानि. १४५ बाणव्यंतर, ज्योतषी, वैमानिकादिक, वाणविंतर, जोइस, जेदेवा, ध धरणेंद्र, शकेंद्र, संयुक्त, खंडनकरो. पापोंकों, तीर्थका, रणिंद, सक, सहिया, दलंतु, दुरियांई, तित्थस्स, २०, चक्र, जिनोंका, जाज्वल्यामान, चलताहै, आगे, जादाकरनाश २०, चकं, जस्स, जलंतं, गच्छइ, पुरओ, पणासि किया, अंधेरेकासमूह, वहतीर्थके, भगवानकू, नमोरवर्द्धमानप्रभूकों, य, तमोहं, तंतित्थस्स, भगवओ, नमोरवद्धमाणस्स, २१, वह, जयवंतहो, जिनवीर, जिनोंकाअभीभी, सासन, २१, सो, जयउ, जिणोचीरो, जस्सजवि, सासणं, जगत्में, जयवंतहै, मुक्तिपंथ, साधनेकों, कुपंथ, नासकरणेकों, जयइ, सिद्धिपह, साहणं, नासणं, सर्वडर, मथनेकों, २२, श्री, ऋषभ, सेन, प्रमुख, हणा, सव्वभय, महणं, २२, सिरि, उसभसेण, पमुहा, हय, भय, निबंध, देओ, तिर्थकों, स, जिनवरोंके, निवहा, दिसंतु, तित्थस्स, सव्व, जिणाणं, गणधारी, १४५२, पापरहित, पंछित, सर्व, २३, श्रीवर्द्धमान स्वामी, गणहारिणो, णहं वंच्छियं, सब्वं, २३, सिरिवद्धमाण, तीर्थकमालकनें, तीर्थ, सुपुर्द किया जिनोंकों, अच्छा, तित्थाहिवेण, तित्थं, समप्पियं, जस्स, सम्म, सुधर्माखामी, समस्त, संघकों, २४, सुहम्मसामी, दिसड, सुह, सयल, संघस्स, २४, प्रकृती खभाव के, भद्रकजो, सकल, संघकों, भदियाजे, भद्दाणि, दिसंतु, सयल, पयइय, ओर, देवताभी, निश्चै, अच्छीतरे, तीर्थकर, गणधरोंका, कथन, इयर, सुरावि, हु, सम्मं, जिण, गणहर, कहिय, करणेवालोंकों, २५, इसकों, जोप, तीनोंकाल, दुःसाध्यकाम उसके, कारिस्स, २५, इय, जोपढइ, तिसंझं, दुस्सझं, तस्स, भय, देओ, सुख, कल्याण, देओ, संघस्स, , १९ : . आदरसंयुक्त, . , १४६ सप्तस्मरणानि, नहींकुछभी, जगत्में, जिनेश्वरकी[वा जिनदत्तकी]दी, आज्ञामेरहा, नस्थिकिंपि, जए, जिणदत्ताणाइडिओ, अच्छीसिद्धकामनावाला, सुखीहोय, २६, निट्टियहो, सुहीहोइ, २६, इतिचतुर्थस्मरणं॥ मदरहित, गुणसमूहरूपरत्नोंकेसागर, मयरहियं, गुणगणरयणसायर, सायरं, प्रणामकरकै, सुगुरु, जिनपारतंत्रकों, समुद्रकीतरे, स्तव पणमिऊणं, सुगुरु, जिणपारतंतं, उयहिव्व, थु. ताहूं, उनोंकोनिश्चै, १, समस्तपणेमथडालामोहजोद्धारकों, समस्तहण णामि, तंचेव, १, निम्महियमोहजोहा, नियति दिया, विरोध, विशेषपणेनासकियासंदेह, नमेहुयेशरीरधारियोंकेवर्गकुंदिया, रोहा, पणढसंदेहा, पणयंगिवग्गदाविय, सुखकानिधान, अच्छेगुणोंकाघर, २, पायाअच्छेजतीपणेकीशोभा, सुहसंदोहा, सुगुणगेहा, २, पत्तनुजहत्तसोहा, समर्थ, परतीर्थकू, पैदाकिया, संक्षोभ, तोडदिया, लोभ, समत्थ, परतित्थ, जणिय, संखोहा, पडिभग्ग, लोह, जोद्धारोंकों, दिखाया, अच्छावडेअर्थका, शास्त्रसमूह, ३, समस्तपणेहरडाला, जोहा, दंसिय, सुमहत्थ, सत्थोहा, ३, परिहरिय, शास्त्रबाधा, हणदियादुःखकादाघ, मुक्तिरूपअंबवृक्षकीसाखा, सत्थवाहा, यदुहृदाहा, सिबंबतरुसाहा, अच्छापायासुखकालाभ, क्षीरोदधिसमुद्रकीतरे, ४, संपावियमुहलाहा, खीरोदहिणिव्व, अग्गहा, ४, अच्छेगुणीजनोंनें, करीहै, पूजा, जल्दी, रहितपाप, : ग्रहण सुगुणजण, जनिय, पुज्जा, सज्जो, निरवज, गहि करीहै, : दीक्षा, . शिवसुख, साधनकरणेतइयारभये, : भवरूपपहाडकों, य, पव्वजा, सिवसुह, साहणसज्जा, भवगुरुगिर, चूर्णकरणेवज्रजैसे, ५, आर्य, सुधास्वामीप्रमुख, गुणोंकेसमूहके सुहम्मपमुहा, गुणगणनि , -- -- अगाध, चूरणेवजा, अज, , तिसंझं, नामं, ना, सूरिः, सप्तस्मरणानि. १४७ वहणेवाले, सुरेंद्रोंनेंकियावडीपूजा, उनोंका, तीनोंकालमें, नाम, नाम वहा, सुरिंदविहियमहा, ताण, क्या, नहींनासकरे, जीवोंकेपापोंका, ६, अंगीकारकिया, जिनदेवकों, मं, नपणासइ, जियाणं, ६, पडिवजिय, जिणदेवो, देवाचार्य दुःखसेंअंतवालेभवोंकेहर्ता, श्रीनेमिचंद्रसूरिः, देवायरिओ, दुरंतभवहारी, सिरिनेमचंदसूरी, उद्योतन, अच्छेगुरु, ७, श्रीवर्द्धमानसूरिः उज्जोयणसूरिणो, सुगुरु, ७, सिरिवद्धमाणसूरी, प्रकटकियाहै, सूरिमंत्रका, माहात्म, समस्तपणेह, पयडीकय, सूरिमंत माहप्पो, पडिहय, णदियाकपायकापसार, शरदऋतुकेचंद्रजैसे, सुखपैदाकरणेवाले, ८, कसायपसरो, सरयससंकुव्व, सुहजणओ, ८, सुखशीलिये, जोचोर, उनोंकोंपकडणेवाले, विशेषचलेहुओंकों, निश्चलकर्ता सुहसील, चोर, चप्परण, पञ्चलो, निचलो जिण जिनमतमें, युगप्रधानोंके, सिद्धांतके, जाननेवाले, नमनक- मयंम्मि, जुगपवर, सुद्धसिद्धंत, जाणओ, राहै, अच्छेगुणीजनजिनोंकों, ९, सन्मुख, दुर्लभ, पृथ्वीवल्लभ[राजा के, य, सुगुणजणो, ९, पुरओ, दुल्लह, महिवल्लहस्स; अणहिल, प्रगट, कहा[निरुत्तरकिया] विचारकै, अणहिल्ला, वाडए, पयर्ड, मुकावियारिऊणं, सिंहकीतरे, द्रव्यलिंगीगजोंकों, चैत्यवासएकजगेरहणानिषेधा, १०, दशमेंआ- सीहेणिव, दवलिंगिगया, .१०, दसमच्छे श्वर्यरूप, रात्रीमें, चमकतहुयेफैलेहुये, मनोमतीआचार्यमई, अंधकारकों, रय, निसि, विप्फुरंत, सच्छंदसूरिमय, तिमिरं, हणामथनकिया, दोषोंसें, नये सूर्यकीतरे, सूरिः[आचार्य] जिनेश्वरने, सूरिजिणेसरेण, सूरेणव, हयमहिय, दोसेण, ११, अच्छीकवितापणेसेंपाई, कीर्ति, प्रगटकरीतीनोंगुप्ती, विशेषशां कित्ती, पयडियगुत्ती, पसंत ११, सुकइत्तपत्त, पण पाटणमें, , गत १४८ सप्तस्मरणानि. तिसुभमुर्ति, विशेषकरनासकरा, परवादियोंकातेज, जैसेजिनचंद्रसूरिस, सुहमुत्ती, पहय, पर वायदित्ती, जिणचंद, जतीश्वरमंत्रीजिनोंके, १२, प्रगटक्रियानवअंगसूत्रका अर्थ, रनोंकेभंडार, जईसरोमंती, १२, पयडियनवंगसुतत्य, रयणकोसो, विशेषनाशकराउत्कृष्टद्वेषकों, भवासेंडरे, असेभविकजनोंकेमनकों, प्रणासियपओसो, भवभीय, भवियजणमण, कियाहैसंतोष, विशेषपणेगयादोषजिनोंसें, १३, युगप्रधानकालिकसूरिः कयसंतोसो, विगयदोसो, १३, जुगपवरागम केआगमकेतलकीप्ररूपणा, करणेमवद्धक कटिवद्ध], श्रीअभयदेव सारपस्वणा, करणवंधुरोधणियं, सिरिअभय सूरिः, सुनियोंमप्रधान, उत्कृष्टसमताकेधरणेवाले, १४, कियाहै देवसूरी, मुणिपवरो, परमपसमधरो, १४, कय श्वापदोंकोसंत्रास, सिंहकीतरेहिरणोंका, तोडा, संदेह, सावइसंतासो, हरिव्वसारंग, भग्ग, संदेहो, गय सिद्धांत मिथ्यावियोंका, अहंकारदलकै, चाखाहै, प्रधानकाव्योंकारस, दप्पदलणो, आसाइय, पवरकन्वरसो, १५, डरावणामवरूपगहनवनमें, दिखाया, दिखाया, गुरुवचनरूपरत्नोंका, भीवभवकाणणंमिय, दसिय, गुरुवयणरयण, निधान, समस्त, जीवोंके, गुरु सूरिजिनवल्लभजय संदोहो, नीसेस, गुरुओ, सूरीजिणवल्लहो वंतहै. १६, सर्वोपरिहाहै, सचरणपांववाचारित्र, चारअनुयोगोंसेंयुगप्र जयह, १६, उवरिट्टिय, सचरणो, चउरणओगप्प धान, इसीसेंसचरण चारित्र], असमतारूपरागकोंमयनकर, उंचेमुख, हाण, सच्चरणो, असममयरायमहणो, उडमुहो, दिखातेहुये, जिनोंकेहाय, १७, दिखलायारहितमलनिश्चल, इंद्रियों सहइ, जस्सकरो, १७, दंसियनिम्मलनिचल, दंत कासमूह, नहींगिणाप्रतिपक्षी८४श्वापदोंकाडर, भारीहेवा गणो, गणियसावओत्यभओ, गुरुगिरिगुरुओ समय, H पवर, मुव्वहइ, जयजिन सप्तस्मरणानि. १४९ णीवडेपहाडजैसीउंची, सूरिःश्रीजिनवल्लभहोतेभये, १८, युगप्रधाना सरहुव्व, सूरीजिणवल्लहोहुत्था, १८, जुगपवराग गमअमृतहहाथमें, संतोपितमनकियाहैभव्योंका, जिसकरकै मपीयूसपाण, पीणियमणाकयाभव्वा, जेणजि जिनवल्लभ, गुणोंसेमारीउनोंकोंसवतरेवंदनकर्ताहूं, १९, देदीप्यमान णवल्लहेणं गुरुणातंसव्वहावंदे, १९, विप्फुरिय, प्रधान, प्रवचन, शिरमेंमणिजैसे, वडी, दुर्धरक्षमाजिनोंकी, जोवाकी पवयण, सिरोमणी वुड्ड, दुब्वहखमोय, जोसे केसूरियोंमेंसेषकीतरे, सोभतेहैं, जीवोंकेरक्षाकरता, २०, सत्चारित्र साणंसेसुव्व, सहइ, सत्ताणताणकरो, २०, सबरिया करकेपूर्ण, सद्गुरु, पारपायाहैतंत्रोंके, वहणेवाले, जयवंतरहोश्री णमहीणं, सुगुरूणं, पारतंत, मुव्वहइ, जिनदत्तसूरिः श्रीनिधान, विशेषपणेनमताहै, मुनिःतिलक, २१, दत्तसूरि, सिरिनिलओ, पणय, मुणितिलओ, २१, इतिगुरुपारतंत्र्यपंचमस्मरणं, ॥ जल्दीहरोविघ्नोंकों, जिनेश्वरवीरकीआज्ञाके अनुसारचल सिग्धमवहरउविग्धं, जिणवीराणाणुगामिसं वालेसंघका, श्रीपार्थजिन, थंभन, पुरभैरहे, बंछित घस्स, सिरिपासजिणो, थंभण, पुरहिओ, निहि देणेवाले, १, गौतम, सुधा, प्रमुख, गणपति, यानिट्ठो, १, गोयम, सुहम्म, पमुहा, गणवइणो, रचाहै, भव्यजीवोंकेसुख, श्रीवर्द्धमान, जिनकेतीर्थमें, विहिय, भव्वसत्तसुहा, सिरिवद्धमाण, जिणतित्थ, खस्ति कल्याण] वहकरोनिरंतर, २, सकेंद्रादिक जिनेश्वरके सुत्थयंतेकुणंतुसया, २, सकाइणोसुराजे, जिणवेया टहलवंदगीकरणेवाले हैं, दूरकर, विघ्नोंकोंशीघ्र, हुओ वचकारिणोसंति, अवहरिय, विग्यसिग्घा, हवंतु वहसंघकोंशांतिकर्ता, ३, श्रीस्थमणपुर रहे, पार्श्वनाथखामीके, देवताजो, , यक्ष, " १५० चोमासी प्रतिक्रमणविधि. तेसंघसंतिकरा, ३, सिरिथंभणयट्ठिय, पाससामी, पदकमलमें विशेषपणेनमेंप्राणियोंका, समस्ततोडडाला, पापोंकावृंद, पयपउमपणयपाणीणं, निद्दलिय, दुरियविंदो, धरणेंद्रहरो, पापोंकों, ४, गोमुखप्रमुख, धरणिंदो, हरउदुरियांई, ४, गोमुहपमुख जक्खा, समस्तपणेहनदियाप्रतिपक्ष, पक्षीयोंकालक्षउनोंने, कियाअच्छेगुण पडिहयपडिवक्ख, पक्खलक्खाते. कयसुगुण, वंतसंघकीरक्षा, हुओअच्छीतरेप्राप्तमोक्षसुख, ५, अप्रतिचक्रा, संघरक्खा, हवंतुसंपत्तसिवसुक्खा, ५, अप्पडि देवीप्रमुख, जिनशासनके, देवतादिक, जिनकोंनमेंपुरुपोंका, चक्का,पमुहा, जिणसासण, देवयाइ, जिणपणया, सिद्धायिकादेवीसंयुक्त, हुओ, संघकी, विघ्नोंकहरणेवाली, ६, सिद्धाइयासमेया, हवंतु, संघस्स, विग्घहरा, शक्रकेआदेशमेंसाचोरपुरभैरहा, वर्द्धमान, जिनराजकाभक्त, काएसासचउरपुरडिओ, वद्धमाण, · जिणभत्तो, श्रीब्रह्मशांति, रक्षाकरो, संघकीविशेषयत्नसें, ७, सिरिबंभसंति, जक्खो, रक्खर, संघंपयत्तेणं, ७, क्षेत्रके, घरके, गोत्रके, शंतानके, देशके, देवताभी, देवियां, खित्त, गिह, गुत्त, संताण, देस, देवावि, देवया, उनोंका, निर्वाणपुरके, पंथीजन, भव्योंके, करो, सुक्खोंकों, ताओ, निव्वुइपुर,पहियाणं, भदाण, कुणंतु, सुक्खाणि, ८, चक्रेश्वरीचक्रधारिणी, विधि, पक्षके, छेदडाला ८, चक्केसरिचक्कधरा, विहि, पह, रिओ, च्छिन्न गरदन, धणियाणी, मुक्तिकेसरणमेंलगे, संघका, सर्वथाप्रकारे धरा, सिवसरणलग्ग, संघस्स, संघस्स, सव्वहा, हरो, विघ्न, तीर्थपति, वर्द्धमान, जिनेश्वरके, हरउ, विग्याणि, ९, तित्थवइ, वद्धमाणो, जिणेसरो, संग, अच्छेसंघकरकै, जिनचंद्र, अभयदेव, रक्षाकरो, जिन यक्ष, , , वैरियोंका, धणियं, ९, , .

, भयदेव, सप्तस्मरणानि. १५१ संगउ, सुसंघेण, जिणचंदो, भयदेवो, रक्खउ, जिण, वल्लभप्रभु, मुझें, १०, वहजयवंतहो, वर्द्धमान, जिनेश्वर, वल्लहोपहुमं, १०, सोजयत, वद्धमाणो, जिणेसरो, दिनेश्वरकीतरे, हणदियाअंधेरा, जिनचंद्र, अभयदेव, प्रभुतायुक्त, णेसरुव, हयतिमिरो, जिणचंदा, भयदेवा, पहुणो, जिनवल्लभ, जयवंतहो, ११, गुरुजिनवल्लभकेचरण, जिणवल्लहो, जयइ, ११, गुरुजिणवल्लहपाए, अभयदेव, प्रभुताके, देणेवालेकोंवादताहूं, जिनचंद्रयतियोंकेईश्वर, पहुत्त, दायगेवंदे जिणचंदजईसर, वर्द्धमान, तीर्थकीवृद्धिकरणेकू, १२, जिनदत्तआज्ञाकूअच्छीतरे वद्धमाण, तित्थस्सवुढिकए, १२, जिणदत्ताणंसम्म, मांने, करे, जो, करावै, मनसें, वचनसें, का मन्नंति, कुणंति,जेय, कारंति, कारंति, भणसा, वयसा, व यासें, जयवंतहो, साधर्मी, वहभी, १३, जिनदत्तगुण, उसा, जयंतु, साहम्मिया, तेवि, १३, जिणदत्तगुणे, ज्ञानादिक, निरंतर, जो, धरे, धरावै, दिखाया स्याद्वा नाणाइणो, सया, जे, धरंति, धारंति, दसिय, सिय दपद, नमताहूं, सौधर्मेद्रादिसाधर्मि, वहभी, १४, वायपए, नमामि, साहम्मिया, तेवि, १४, इतिषष्ठं स्मरणं॥ उवसग्गहरंपासं इत्यादि सतमस्मरणं ॥ , , पोसहविधि. , , अठपहरीपोसहविधि। प्रथम जमीन प्रमार्जकर एक खमासमण देकर इरियावही पडिक्कमै ४ नवकारका का- उसग्गकर प्रगट लोगस्सकहै फेर खमासमण देकर इच्छाकारेण संदिस्सह पोसह मुह- पत्ती पडिलेहूं, पडिलेहे इच्छाका० संदि० पोसह संदिस्साउं पीछे इच्छं कहके खमास० इच्छाका० सं० पोसहठाऊं खमास० झुकता हुआ खडा रहकै, मुखपर मुहपत्ती देकर ३ नवकारगिणे, इच्छकार भगवन पसाउकर पोसह दंडक उच्चरावोजी, करेमिभंते पोसहं ये पाठ ३ वेर उच्चरे पीछे खमासमण देकर इच्छाका० सामायक मुंहपत्ती पडिलेहूं दूसरी खमासमण देकर मुहपत्ती पडिलेहे फेरखमासमणदेके सामायक संदिस्साउं, फेर खमासमण देकर, खडा होकर, ३ नवकार, ३ करेमिभंते उच्चरे, खमासमण देकर वैसणो संदिस्साउं फेर खमासमण देकर वैसणोठाउं, फेर दोय खमासमण देकर, सिझाय संदिस्साउं, सिझाय करूं, खडा होकर आठ नवकारका सिझाय कर, फेर दोय खमासमणसे पांगरणोसंदिस्साउं, पांग- रणो पडिग्गहूं, इत्यादिसामायककी विधिकरै, लेकिन करेमिभंते उच्चरे वाद, इरियावही नहीं पडिक्कमैं, क्योंकी पहली पडिक्कमली इसवास्ते, पीछे चैत्यवंदन जयवीयरायतक करकै कुसुमण दुस्समिणका काउसग्गकर फेरराई पडिक्कमणाकरै, लेकिन इतना विशेष है ४ थुईसें देव वांदे पीछे, खमासमण देकर इच्छाका० सं० बहुवेलं संदिस्साउं फेर खमास० इच्छाका० बहुवेलं करूं, तीन खमास० आचार्यजीमिश्र, १ उपाध्यायजी मिश्र २ सर्व साधूजीने त्रिकालवं. फेर कम्मभूमि २ यह चैत्यवंदन करकै सिझाय करै फेर पडिलेहण करै दोय खमासमणसे इच्छाका० सं० पडिलेहण करूं, पीछे मुंहपत्ती पडिलेहे, पीछे दोय खमासमणसे, अंग पडिलेहण संदिस्साउं, अंग पडिले- हण करूं, इच्छं कहकै धोती कणदोरा पडिलेहके वस्त्र पहनें खमासमण देकर इच्छ- कार भगवन् पसाउकरी पडिलेहण करावोजी, पीछे थापनाचार्यकी पडिलेहण करै पीछे खमासमण देकर इच्छाका० सं० उपधिमुंहपत्ती पडिलेहूं इच्छं कहकै मुंह- पत्ती पडिलेहे, दोय खमासमणसे इच्छाका० सं० ओही पडिलेहण संदिस्साउं, ओहि पडिलहेण करूं पीछे २४ थडिलां इसतरे करै, आगाढे आसन्ने उच्चारे पासवणे अणहियासे १ आगाढे मझे उच्चारे पासवणे अणहियासे २ आगाढे दूरे उच्चारे पासवणे अणहियासे ३ ये शय्याके दहणेतरफ करै, आगाढे आसन्ने पासवणे अणहियासे १ आगाढे मझे पासवणे अणहियासे २ आगाढे दूरे पासवणे अणहियासे ३ ये ३ श- व्याके वायेंतरफ करै, आगाढे आसन्ने उच्चारे पासवणे अहियासे १ आगाढे मझे उच्चारे पासवणे अहियासे २ आगाढे दूरे उच्चारे पासवणे अहियासे ३, ये ३ दरबओके भीतर दहिणेतरफ पडिलेहे, आगाढे आसन्ने पासवणे अहियासे १ आगाढे मझे पासवणे .

देववंदनविधि. १५३ अहियासे २ आगाढे दूरे पासवणे अहियासे ३, ये तीन दरवओके भीतर बांयेतरफ पडि- लेहे, अणागाढे उच्चारे पासवणे अणहियासे १ अणागाढे मझे उच्चारे पासवणे अण- हियासे २ अणागाढे दूरे उच्चारे पासवणे अणहियासे ३ ये ३ दरवजेके बाहिर दहणे तरफ पडिलेहे, अणागाढे आसन्ने पासवणे अणहियासे १ अणागाढे मझे पासवणे अ- पहियासे २ अणागाढे दूरे पासवणे अणहियासे ३ ये ३ दरवजेके बाहिर पांयेंतरफ पडिलेहे, अणागाढे आसन्ने उच्चारे पासवणे अहियासे १ अणागाढे मझे उच्चारे पासवणे अहियासे २ अणागाढे दूरे उच्चारे पासवणे अहियासे ३ ये ३ दस्त पेसावकी जगे दहणे तरफ पडिलेहे, अनागाढे आसन्ने पासवणे अहियासे १ अणागाढे मझे पासवणे अहि- यासे २ अणागाढे दूरे पासवणे अहियासे ३ इसतरे २४ थंडिला पडिलेहे पीछे इच्छं कहकै कंबल कपडे आदिक पडिलेहकै पोसहसाला प्रमाणकै काजा विधिसैं परिठावै, खमासमण देकर इरियावही पडिक्कमे १ लोगस्सका काउसग्गकर प्रगट लोगस्सकहै पीछे खमासमण देकर इच्छाका० सं० सिझाय संदिस्साउं सिझाय करूं पीछे १ नवकार कहकै उपदेशमाला सिझाय जो पहले लिखा है सो पढे पीछे १ नवकार कह धर्म ध्यान करै, पूणपहर दिन चढेवाद उग्घाडा पोरिसी अथवा बहुपडिपुन्ना पोरिसी कहकै खमासगण देकर इरिया वही पडिक्कमकै १ लोगस्सका काउसग्ग प्रगट लोगस्स कहकै इच्छामि खमासम० इच्छका० सं० पडिलेहण करूं मुहपत्ती पडिलेहके पाणी पात्रादिक पडिलेहके रख्खे, फेर सिझाय ध्यान करै, ॥ अथ देववंदनविधि। ॥ कालवेला. देहरे आवस्सही कहकै जाकर ५ शकस्तवमै देवांदेसो लिखते हैं. तीन प्रदिक्षिणा देकर ३ वेर नमस्कार जमीनप्रमार्जकै पुरुप प्रभूकै दहणे तरफ स्त्री होय तो वायें तरफ वैठे इच्छाका० सं० भगवन् चैत्य वंदन करूं चैत्य वंदन कहै फेरनमोत्थुणं सव्वेचिविहेण वंदामितक कहके फेर खडा होकर इरिया वही पडिक्कमै १ लोगस्सकाका उसग्ग प्रगट लोगस्स प्रमार्जकर बैठे, ३।४।५ आदि चैत्यवंदन कहकै जंकिंचिनामतित्थं नमोत्थुणं खडा होकर अरिहंतचेइयाणं करे मिका० वंदणव० अन्नत्थु० १ नवकारका काउसग्ग करकै नमोर्हत्सिद्धाचा० कहकै थुईकी १ गाथा कहै, सो लिखते हैं, चउवीसै जिनवर प्रण हूं नितमेव, आठमदिन करिये चंद्राप्रभुनी सेव, मूरति मनमो है जाणै पूनमचंद, दीठां दुख जावै पावै परमानंद १, पीछे लोगस्स कहे, सव्वलोए अरि० वंदणव० अन्नत्थू० १ नवकारका काउसग्ग फेर थुईकी दूसरी गाथा कहै, मिल चउसठ इंद्र पूजै प्रभुजीना पाय, इंद्राणी अपछर करजोडी गुणगाय, नंदीश्वरद्वीपेमिल सुरवरनी कोड, अठाई महोच्छव करता होडाहोड २, फेर पुख्खर- वरदी० कहै सुयस्स भगवओ करेमि काउसग्गं वंदणव० अन्नत्थू० १ नवकारका का- १५४ देवबंदनविधि. उसग्ग पारकै, नमोह' कहके, सेचुंजा शिखरे जाणी लाभ अपार, चो मासे रहिया गणधर मुनिपरिवार, भवियणनैतारै देई धर्म उपदेश, दूधसाकरथी पिणवांणी अधिक- विसेस, ३ पीछे सिद्धाणं बुद्धाणं कहकै वेयावच्चगराणं० अन्नत्थु० १ नवकारका का- उसग्ग पारकै, पोसो पडिकमणो करिये व्रत पञ्चखाण, आठमतपकरतां आठकरमनीहाण, आठमंगलथायै दिनरकोडि कल्याण, जिनसुखसूरिकहैइम शासनसूरिसुहझाण ४, पीछे नीचै वैठकै नमोत्थुणं० फेर अरिहंतचेइयाणंक० वंदणव० अन्नत्थु०१ नवकारका का- उसग्ग थुईकी गाथा लोगस्स दूजी १ थुईकी गाथा, इसी तरे पुख्खरवर० तीसरी गाथा सिद्धाणं युद्धाणं० चोथी गाथा कहकै नीचे बैठ नमोत्थुणं कहै नमोर्हत् सिद्धा. कहकै वडा स्तवन कहै पीछे जयवीयराय कहै फेर नमोत्थुणं सव्वेतिविहेण वंदामि तक कहै, इति पांचेशकस्तवे देववंदनविधि ॥ [पीछै निस्सही कहकै पोसह सालामैं आकर, इरिया वही पडिक्कमकै १ लो- गस्सका काउसग्गकर प्रगट लोगस्स कहकै धर्म ध्यान करै, तिविहार उपवास किया हो तो पचख्खाणका वख्त पूरा हुये वाद जल पीणेकू पञ्चख्खाणपारे, खमासमण देकर इरिया वही पडिक्कमै फेर खमासमण देकर इच्छाका० सं० भगवान् पञ्चख्खाण पारवा मुंहपत्ती पडिलेहूं इच्छं कहकै खमासमण० मुंहपत्ती पडिलेहै फेर खमास० इच्छाका० सं० पाणहार अमुक पच्चख्खाणपारूं गुरु कहे पुणोत्तिकायव्वो फेर यथाशक्ति कहकै. खमासमण०, इच्छाका० सं०, पाणहारपारूं, गुरु कहै, आयारो नमोत्तव्वो, पीछे तहत्ति कहके, पारणेका पञ्चख्खाण पहली लिखा है सो ३ वेर पढके नवकार गिणके, चैत्य- वंदन करै, क्षणमात्र सिझायकर यथासंभव अतिथि संविभागकर, जलवावरे, उपधान- वाही पञ्चल्खाण पोरसी प्रमुखपार आहार करै आसण बैठा ही दिवस चरम पञ्चख्खे पीछै इरिया वही पडिक्कमकै चैत्यवंदन करे ये चैत्यवंदन आहार संवरणवास्ते है इतना विधान उपधानवाहीका है, फेर बहिर्भूमी जाणा होय तो वस्त्रवदलकर आवस्सही कहके उपयोगीपणे निर्जीव जमीनपर मलमूत्रपरठणेकै वख्त अणुजाणह जस्सुग्गहोकहकै पूर्व उत्तर सूर्य गामआदिक कू पीठ नहीं देता मलमूत्र परिठवै, शुद्धहोकर चोसिरामि ३वेर कहै, पोसही शालामैं निस्सही कहकै प्रवेशकर इरियावही पडिक्कमै खमासण देकर इच्छाका० सं० गमणाग- मण आलोयह इच्छं कहके गमणागमण आलोवै आवंति, जंतेहिं, जखंडियं, विराहियं, तस्समिच्छामिदुक्कडं, सांझकी पडिलेहणकी वख्त इरियावही पडिक्कमैं, फेरखमासमण, इच्छाका० सं०, पडिलेहणकरूं फेर खमास. इच्छाका० सं० पोसहसाला प्रमाणु, इच्छं कहकै मुंहपत्ती पडिलेहे, दोयखमासमणसैं अंगपडिलेहणसंदिस्साउं, अंगपडिलेहण करूं, दंडासणा, पूंजणी, प्रमुखप्रमार्जकै, पोसहशालाप्रमा, फेरकाजेकों देखे, वाद , .

देववंदनविधि. १५५ एकांतमैं, काजा, विखरता परठै, इरियावही पडिक्कमें, खमास० इच्छाकारेण संदिस्सह भगवन् पसाउ करी पडिलेहण पडिलेहावोजी, पीछै स्थापनाचार्य पडिलेहके थापे खमास. इच्छाका० सं० मुंहपत्ती पडिलेहूं, इच्छंकहकै, खमास० मुंहपत्ती पडिलेहे, पीछे दोय- खमासमणसे इच्छाका० सं० सिझायसंदिस्साउं, सिझायकरूं, क्षणमात्र सिझायकर, तिविहार उपवास किया होय तो, गुरुमुख पाणिहारका पञ्चख्खाण करे, उपधानवाही भोजनकरा होयतो दोवांदणा देकर चोविहार या पाणिहारपञ्चख्खे, पीछे खमासमण० इ. च्छाका० सं० उपधि थंडिलां पडिलेहण संदिस्साउं खमासमण० इच्छाका० सं० उप- धिथंडिलापडिलेहं इच्छं कहके दोयखमासमणसे इच्छाका० सं० वैसणोसंदिस्साउं वैसणो ठाउं कहके वैठे वस्त्रकंबलादिकपडिलेहे पूंजणीकू मुंहपत्तीसैं पडिलेहै धोती कणदोराप- डिलेहै उपधानवाही भोजनकगहोय वह पहले धोती कणदोरा पडिलेहेवाद वस्त्रकंबल- पडिलेहै पीछे आगे मुजव २४ थंडिला पडिलेहै पीछे पक्षी चोमासी संवच्छरी अथवा- देवसी पडिक्कमण करे देव सियंआलोएमि पाठकहे पीछे ठाणेकमणे चंकमणे ये पाठ कहै इच्छाका० सं० सिझायसंदिस्साउं सिझाय करूं ३ नवकारगुणे, प्रतिक्रमण कियेवाद सिझायकरै पीछे पूणपहर रातगये बहुपडिपुन्नापोरसीकहकै खमासम० इरियावही पडिक्कमै, [ अव रात्रीसंथाराविधि लिखते हैं, ] ॥ खमासमण० इच्छाका० सं० राईसंथारा मुंहपत्ती पडिलेहूं इच्छं कहके खमासमण मुंहपत्ती पडिलेहे खमासमण० इच्छाका० सं० राइसंथारासंदिस्साउं, खमासमण० इच्छा- का० सं० राइसंथाराठाउं, इच्छं कहके चउक्कसायका चैत्यवंदनकर जयवीरायतक पीछे जमीनप्रमार्जकै संथारा उत्तरपट्टा पाथरे फेर शरीरप्रमार्जके निस्सही २ कहके संथारेपरवैठे तीननवकार तीनकरेमिभंते कहकै णमोखमासमणाणं इत्यादि राईसंथारा पूराप?, वायां हाथ मस्तकनीचैदेकर सोवै निद्रा नहीं आवे जहांतक मुनियोंके गुणविचारे, शरीरपूंजके पसवाडाफेरे देहशंकावास्ते उठे तो आसज्जशब्द कहता देहशंका दूरकर पीछा आकर इरियावही पडिक्कमें जघन्यसेजघन्य ३ गाथाकी सिझायकरकै सोवे रातके पिछलेपहर ऊठके नवकारगुण इरियावही पडिक्कमे खमासमण देकर कुसुमिण दुस्सुमिणका १६ न- वकारका काउसग्गकरै फेर पूर्वोक्तविधिसैं सामायक लेवै लेकिन इरियावही नहीं पडि- क्कमे, दोयखमासमणमैं सिझायसंदिस्साउं सिझायकरूं ८ नवकारकी सिझायकरे फेरराई पडिक्कमणकरे राइयं आलोएमि कहेवाद, संथारा उवट्टणकी, आउट्टणकी, पसारणकी, छप्पइयासंघट्टणकी सव्वस्सविराइय दुचिंतिय दुभासिय, दुचिठिय इच्छंतस्समिच्छामिदु- क्वड, पडिलेहणकीवख्त पूर्वोक्तमुजब पडिलेहणकरे काजानिकाल इरियावही पडिक्कमै दोय- खमासमणसैं सिझायसंदिस्साउं सिझायकरूं उपदेशमाला पढे, . , चौपहरी पोसहविधि. ॥अथ पोसहपारणविधि लिख्यते ॥ [खमासमणदेयर, मुंहपत्ती पडिलेहे, खमासमण देकर, इच्छाका०, सं०, पोसह- पारूं, गुरु कहे पुणोत्तिकाययो, यथाशक्ति कहके खमास० इच्छाका० सं० पोसहपाधू, गुरु कहे आयारो न मोत्तब्बो, तहत्तिकहके, खमासमण० झुकताहुवा खडाहोकर ३ नव- कार गुणके, खमासम० मुंहपत्ती पडिलेहे फेर खमासमण० इच्छाका० सं० सामायक पारूं, गुरु कहे पुणोत्तिका० यथाशक्तिकहकै खमास० इच्छाका० सं० सामायकपाऱ्या गुरुकहे आयारो नमोत्तव्यो, तहत्तिकहके खमासमण देकर झुकता खडारहकर हाथजोड मुंहपत्ती मुखदेकर ३ नवकार गिणे संडासाप्रमार्ज गोडालिये वैठ मस्तकनमाय भयवं- 'दसण्णभद्दो, इत्यादि कहे, देहरे जाकर देवजुहारे साधूकू पडिलाभ अतिथिसंविभागकर शेषवचे आहारसैं आप आहार करे, इति अठपहरी पोसहविधिः ॥ ॥ अब दिनकों चौपहरी पोसहविधि। ॥पहिले उपगरण पडिलेहके काजानिकाल इरियावही पडिक्कमे खमासमणदे इच्छाका० सं० पोसहमुंहपत्ती पडिलेहे और विधि पहले लिखे सुजव लेकिन् पोसहदंडक उच्चरते जावदिवसं पज्जुवासामी कहे फेर सामायककी विधि सव करै चैत्यवंदन कुसुमिण दुस्स- मिणका काउसग्ग करके पडिकमणा राईकरे दोयखमासमणसे बहुवेलं संदिस्साउं, बहुवेलं करूं, अगर पहले गुरुसंग प्रतिक्रमण करा होय तो, पडिक्कमणकेवाद, जो कप- डादिक पडिलेहके रख्खाहोय तो पोसह सामायक विधी करै, दोय खमासमणसे बहुचे- लसं० बहुबेलकरूं, तथा जो गुरुसें अलग, प्रतिक्रमणकरा होय तो, गुरुपास आयकै, पोसहसामायककी सब विधि कर, आलोयणखामणादिकके वास्ते मुंहपत्ती पडिलेहके २ चांदणां देवै इच्छाका० सं० राइयं आलोउं फेर खमास० देके इच्छाका० सं० अ- भूठिओमि अ० सब पाठ कहै, पहले नवकारसीवगेरे पञ्चख्खाण किया होय तो उपवा- सकाकरे दोयखमासमणसे बहुवेलसं० वहुवेल करूं. इसतरे ३ प्रकारहै, पडिलेहणपहले- करीहै, तोभी खमासम० इच्छाका० सं० भ० पडिलेहण, संदिस्साउं, पडिलेहणकरूं, मुंहपत्ती पडिलेहे, पीछेदोखमास० अंगपडिलेहण संदिस्सा करकै मुंहपत्ती पडिलेहे, फेर खमास० इच्छा कार भगवन् पसाउकरी पडिलेहण पडिलेहावोजी, खमासमण० इच्छा- का० सं० उपधिमुंहपत्ती पडिलेहं कहके कोईभी वस्त्रविगर पडिलेहे रहा होय तो पडि- लेहे नहीं तो आसणपडिलेहे, दोयखमा० सिझायसंदिस्साउं सिझायकरूं उपदेशमाला- सुणे, वाकीविधि अठपहरी पोसहमें लिखेमुजव, लेकिन अठपहरीपोसहवाला पिछलीरातकों सामायकनहीं लेवे, चोपहरीपोसहवाला, पिछलेपहर, पञ्चख्खाणकियेवाद,. दोयखमास- मणदेकर, ओहिपडिलेहणसंदिस्साउं, ओहिपडिलेहणकरूं, लेकिन् थंडिलानहींकरै ये- दिनसंबंधीपोसहमैं विशेषविधिहैसोलिखीहै इति ॥

स्तुति. १५७ ॥ अथरातके चोपहरी पोसहकी विधि। किसीनें दिनका चोपहरी पोसहकियाहै, और सांझकू पडिलेहणकीवख्त, रातके पो- सहकरणेका फेर भावहुआ, तब पञ्चख्खाणकियेपीछे, दोयखमासमणसे, पोसहमुंहपत्तीपडि- लेहके ३ नवकार गिणके, पोसहदंडक ३ वेरउच्चरता, जावरतिं पज्जुवासामि, औसा- पाठकहे, पीछेसामायकआगेमुजवलेवै,दोयखमासमणमैं सिझाय संदिस्साकर ८ नवकारगिणे, वेसणासंदिस्सावे, पांगरणांसंदिस्सावे, पीछे दोयखमासमणसे इच्छाका० सं० ओहीर्थ- डिलां पडिलेहण संदिस्साउं, ओहीथंडिलां पडिलेहणकरूं, इच्छंकहके, उपधिपडिलेहे, आगेलिखाउसमुजब, तेसै, जो दिनकों पोसह नहीं किया, ओर उपवासकियाहुआ है, उसका रातके पोसहचोपहरीकाभाव हुआ, तव पिछले पहोर उपाश्रय आयकै प्रमार्जना करै, काजा परठके उपगरण पडिलेहके इरियावही पडिक्कमे पीछे चोविहारका पञ्चख्खाण- कर, दोयखमासमणसैं मुंहपत्तीपडिलेहके दोयखमासमणसैं, पोसहसंदिस्सावे, फेरखमा- सणदेकर ३ नवकार गुणके, पोसहदंडकमैं उच्चरते रतिं पज्जुवासामि पाठकहे अगर कुछदिनवाकीरहते पचरूखेतोदिवससेसंरतिं पज्जुवासामिकहे फेरदोखमासमणसैं सा- मायक मुंहपत्ती पडिलेहे, सामायकलेवे, दोयखमासमणसे, सिझायसंदिस्सावे, आठनव- कार गिणे, फेरदोयखमासमणसैं वैसणोसंदिस्सावे, फेरदोयखमासमणसे, पांगरणोसंदिस्सावे, फेरदोयखामासमणसे, पडिलेहणसंदिस्साकर, मुंहपत्ती पडिलेहे, फेरदोयखमासमणसे, ओही थंडिला पडिलेहण संदिस्साकर, जोविगरपडिलेहा उपगरण होय सो पडिलेहे अगर नहीं होय तो आसणपडिलेहे, इरियावहीपडिक्कमे २४ थंडिलां पडिलेहे, फेर प्रतिक्रमण करै, पिछलीरातकों फेर सामायक नहीं लेवे, इति रात्री ४ पहरी पोसहकी विशेषविधिः । ॥ अथ दशमीस्तुति॥ ॥ अश्वसेननरेश्वर वामादेवीनंद, नवकरतनु निरुपम नीलवरण सुखकंद, अहिलंछन सेवितपउमावइधरणिंद, प्रह ऊठी प्रणनित प्रतिपासजिनंद, १ कुलगिरिवेद्यढे कणयाचल अभिराम, मानुषोत्तरनंदी रुचक कुंडल सुखठाम, भुवनेसरव्यंतर जो इस वैमानियनाम, वरतेजे जिनवर पूरो मुझमनकाम, २ जिहां अंगइज्ञारे बारे उपांगछछेद, दशपयन्ना- दाख्या मूलसूत्रचिहुंभेद, जिनआगमषद्रव्य सप्तपदारथजुत्त, सांभलसरदहतां तूटे करम तुरत्त, ३ पउमाई देवी पार्श्वयक्षप्रत्यक्ष, सहुसंघना संकटदूरकरवादक्ष, तेसमरोजिनभक्ति सूरिकहे इकचित्त, सुखसुजससमापै पुत्रकलत्रबहुवित्त ४, इति ॥ अथ अमावसस्तुति ॥ ॥वीरं देवं नित्यं वंदे १ जैना पादा युष्मान्पांतु २ जैनं वाक्यं भूयाद् भूत्यै ३ सिद्धा- देवी दद्यात्सौख्यं ४ इति वीरजिनस्तुतिः ।। , - १५८ अतीचार, ॥ अथ नवपदस्तुति ॥ ॥ निरुपसुखदायक जगनायक लायक शिवगतिगामीजी, करुणासागर निजगुणआगर शुद्धसमतारस धामीजी, श्री सिद्धचक्रशिरोमणि जिनवर ध्यावेजे मनरंगेजी, तेमानव श्रीपालतणीपर पामे सुखसुरसंगेजी १ अरिहंत सिद्ध आचारज पाठक साधु महागुण- वंताजी, दरशण ज्ञानचरण तप उत्तम नवपदजगजयवंताजी, एहनो ध्यानधरंतालहिये अविचलपद अविनासीजी, तेसगलाजिननायक नमिये जिनये नीति प्रकाशीजी, २ आसू मासमनोहर तिमवलि चैत्रकमास जगीसेजी, उजवाली सातमधी करिये नवआविलनव- दिवसेजी, तेरेसहसवलिगुणनो गुणिये नवपद केरोसारोजी, इणपर निरमल तप आदरिये आगमसाख उदारोजी, ३ विमलकमलदल लोयण सुंदर श्रीचक्केसरिदेवीजी, नवपदसेवक भविजनकेरा विघनहरो सुरसेवीजी, श्रीखरतरगछनायक सदगुरु श्रीजिनभक्ति मुर्णि- दाजी, तासुपसाय इणपर पभणे श्रीजिनलाभ सुरिंदाजी, ४ इति नवपदस्तुति ।। ॥अथ पyषणस्तुति॥ ॥वलि २ हूंध्याउं गाऊं जिनवरवीर, जिनपर्वपयूषण दाख्या धरमनी सीर, आषाढ चौमासाहूंती दिन पञ्चास, पडिक्कमणोसंवच्छरी करिये त्रिण उपवास, १ चोवीसे जिनवरपूजा सतर प्रकार, करिये भलभावे भरिये पुण्यभंडार, वलिचैत्यप्रवाडे फिरतां लाभ अनंत, इम पर्चपजूषणसहुमें महिमावंत, २ पुस्तकपूजावीनववाचनाय वचाय, श्री कल्पसूत्र जिहां सुणतां पाप पुलाय, प्रतिदिनपर भावन धूप अगर उखेव इम भवि- यणप्राणी पर्चपजूषणसेव, ३ वलिसाहमीवच्छल करिये वारंवार, केइभावनाभावे केई तपसीशीलधार, अडदीपजूसण इम सेवित आनंद, सुयदेवी सानिध कहे जिन- लाभ सुरिंद, ४ इति ॥ ॥ अथ वृहदतीचारलिख्यते ॥ ॥नाणम्मि दसणम्मिय, चरणम्मितवेयतहवविरियम्मि,आयरणं आयारो, इयएसो पंच- हामणिओ १ अर्थ, ज्ञानाचार १ दर्शनाचार २ चारित्राचारं ३ तपाचार ४ वीर्याचार५, इस पांच विधि आचार, जो कोई भी अतीचार पक्षीके दिनोंमें सूक्ष्म चादरजाणमें अजाणमैं हुआ होय वह सव मन वचन कायासें कर मिच्छामिदुक्कड़, ॥ ज्ञानाचारके ८ अतीचार ॥ कालेविणए बहुमाणे, उवहाणेतहय निन्हवणे, वंजण अत्थतदुभए, अट्ठविहोनाण- मायारो १, ज्ञान कालवेलामैं पढा गुणा नहीं, अकालमै पढा, विनयहीन, वहुमान- हीन, उपधानहीन, श्री उपाध्यायजी पास नहीं पढा, वा दुसरेपास पढां, दुसरेको गुरु कहा, व्यंजन, अर्थ, वा तदुभय अशुद्ध पढा, देववंदन, प्रतिक्रमण, सिझाय करते, , , , .

" अतीचार, ફર્ષ अशुद्ध अक्षर, हस, दीर्घ, जादा, या कम, आगे, या पीछे पढा, सूत्रअर्थ अशुद्ध पढा, पढके भूल गया, तपोधनके धर्ममैं, काजा नहीं निकाला, दंडी नहीं पडिलेही, वसती नहीं शुद्ध करी, असिझाय, अनाध्याय, अकालवस्त, दशवकालिक प्रमुख सिद्धांत पढा गुणा योगवहेविगर पढा, ज्ञानका उपगरण, पाटी, पोथी, ठवणी, कवली, नवकर- वाली, सांपडा, सांपडी, वही दस्तरी, ओलिया, कागदकू, आशातना हुई, पावलगा, थूकलगा, शिराणेरख्खा, पास रहते भोजन या फरागत जाणाकिया, ज्ञान द्रव्य खाया, या संभाल नहीं करी, बुद्धिके अपराधसे नाश किया, विनाश होते संभाल नहीं करी, शक्ती होते भी सार संभाल नहीं करी, ज्ञानवंतसे अहंकार किया, और अवज्ञा आशा- तनाकरी, किसीको पढते गुणते देख द्वेप अहंकार अपघात अंतराय करा, मतिज्ञान श्रुत- ज्ञान अवधिज्ञान मनपर्यवज्ञान केवलज्ञान इन पांचों ज्ञानोंकी असईहनाकरी कोईतोता अटकते बोलतेंको हसा नकल करी, आपणे जाणकारीपणेका गरूर किया आठ तरेके ज्ञानाचारमै जो अतीचारमै पक्षीके दिनोंमें सूक्ष्म वादर जाण० अजाण० वह सबका त्रिविधिसे मिच्छामि० २ ॥ दर्शनाचारके आठ अतीचार ॥ ॥ निस्संकिय निक्कंखिअ, निश्चितिगिच्छाअमूढदिट्ठीअ, उववूह थिरीकरणे, वच्छल्लप्प- भावणे अट्ठ १ देव, गुरु, धर्ममें, निशंकपणा नहीं करा, तैसें एकांत निश्चय धरा नहीं, सवी मत अच्छे हैं, ऐसी श्रद्धा करी, धर्मसंबंधि ये फलमैं, निसंदेहबुद्धि रख्खी नहीं, चारित्रवंत, साधु, साधवीयोंके, मैले कुचीले वस्त्र, गावदेख, दुगंछाकरी, मिथ्यात्वीकी पूजा प्रभावना देख मूर्ख दृष्टिपणा किया, संघमैं गुणवंतकी अनुपबृंहणा, अथिरता- करणी, अवात्सल्यता, अप्रीति, अभक्ति विचारी, संघमैं थिरकरण, वात्सल्यता, शक्ति- रहते प्रभावना नहीं करी, देवद्रव्यका नास किया, विनासकरतेकों नही रोका, समर्थवंत होकै सार संभाल नहीं करी, साधर्मीसे लडाई करी, जिनमंदिरकी ८४ आशातना करी, गुरूकी तेतीस आशातना करी, विगर धोये वस्त्रसैं देवपूजा करी, तीन ठिकाणेविगर देवपूजा करी, वासडूंपा कलशका ठवका लगा, मूंकी वाफ लगी, स्थापनाचार्य हाथसैं गिराया, पडिलेहण करणा भूल गया, नवकरवालीकू पांव लगा, दर्शनाचारमैं जो अतीचार पक्षदि० मिच्छा० ॥ चारित्राचारके आठ अतीचार ॥ ॥पणिहाणयोगजुत्तो, पंचहिंसमईहिंतिहिंगुत्तीहिं, एसचरित्तायारो, अठविहोहोइनायब्बो १ इसिमिती १ भाषासमिति २ एपणासमिति ३ आयाणभंडमत्त निक्षेपनासमिति ४ उच्चार प्रस्रवण खेल जल संघाण परिष्टापनिकासमिति ५, मनोगुप्ति १, वचनगुप्ति, २, अतीचार. , , , - . कायगुप्ति, ३ पांचसमिती, तीनगुप्ति, अच्छीतरपाली नहीं, साधूके, हमेस, अष्ट प्रकारके चारित्राचारमैं, जो अतीचार पक्षी० मिच्छामि० ८ ॥ श्रीसम्यक्तके ५ अलीचार ।। ॥ विशेषकरकै श्रावकके धर्ममैं, श्रीसम्यक्तमूल १२ व्रत उससम्यक्तके ५ अतीचार संकाकखविगंछा पसंसतहसंथवोकुलिंगीसु सम्मत्तस्सअइयारे संकाश्री अरिहंतोका बल, अतिशय, ज्ञान, लक्ष्मी, गांभीर्यादिक, शाश्वती प्रतिमा, चारित्रियोंका चारित्र, जिनवच- नकी शंकाकरी, आकांक्षा, ब्रह्मा, विष्णु, महेश्वर, क्षेत्रपाल, गोगा, गोत्रदेवता, ग्रह- पूजा, विनायक, हनुवंत, इनोंकों आदिलेकर, ग्राम गोत्र देश नगरके जुदे २ देव- देहरोंका प्रभावदेखके रोगआतंक, इसलोकार्थ, परलोकार्थ, माना, पूजा, वौद्धसांख्यादि- कके संन्यासी, भरडे, भक्तलिंगिये, योगी, दरवेस, और किसीभी दर्शनीका, कष्ट, मंत्र- चमत्कार, देखके, परमार्थ जांणे विगर, भूला, प्रशंसा करी, कुशास्त्रसीखा, सुणा, सराध, संवत्सरी, होली बलेव, माहीपूनिम, अजापडिवा, प्रेतबीज, गौरतीज, विनायकचौथ, नागपांचम, झूलणाछट्ट, शीलशातम, द्रो आठम, नवलीनवम, अहवदशम, व्रतइज्ञारस, वच्छवारस, धन्नतेरस, अनंतचउदस, डाभीअमावस, आदित्यबार, उत्तरायण, नवोदक, जाग, भोग, उतारा करा, पीपलमैं पाणी डाला, डलाया, घरवाहिर कूआ, तलाव, नदी, समुद्र, कुंड, पुन्य हेतुस्नान करा, दान दिया, ग्रहण, शनिश्चर, माघ महिना कार्तिक- स्नान करा, अजाणका स्थापन करा, ओर कोईभी व्रत तोला किया कराया, विचि- किच्छा, धर्मसंबंधी फलमैं संदेह करा, जिन अरिहंत धर्मके आगर, विश्वोपगारसागर, मोक्षमार्गदातार, देवाधिदेवबुद्धिसें शुद्धभावसैं न पूजा न माना महातमोंके भातपा- णीकी दुगंछा करी कुचारित्रियोंकों देख चारित्रियोंपर अभाव हुआ मिथ्यात्वीकी प्रभावना देख प्रशंसा करी दाक्षिणतासे उसका धर्म माना श्रीसमकितमैं दुसरा कोई जो अतीचार पक्ष० सूक्ष्म वादर जाणतेअजाणते० मिच्छामि० ॥ प्राणातिपातविरमणव्रतके ५ अतीचार ॥ ॥ वहबंधच्छविच्छेए,अईभारे भत्तपाणबुच्छेए, द्विपद चउपदकों गुस्सेसे जवर जखम प्रहार मारा सख्तबंधनसे बांधा बहोत भारसे पीडा दी नित्छन कर्मकरा, चारापाणीकी वख्त सारसंभाल नहीं करी, लेणे देणेमें किसीकों लंघन कराया, वह भूखा और आप जीमा, विगरछाणापाणीवरता, अच्छीतरे छाणानहीं, छणायानहीं, विगर छाणे पाणीसैं न्हाया कपडाधोया इंधण विगरशुद्धकियेजलाया, सांप, कानखजूरा, सुलहली, खटमल, जूं, गोगीडे, साहते मरे, दुखदिया, अच्छेठिकाणे नहींधरा, चिमटी, मकोडे, दिमक, घीवेल, कातरे, चूडेल, पतंगिये, मींडक, अलसिये, इली, कूति, डांस, मच्छर, भगतरा, मख्खी, , " , - , , , अतीचार. प्रमुख, हरकोई जीव विनष्ट किया, चांपा, दुखदिया, माला हिलाते, पंखी, कउआ, चिडियोंके इंडे फूटे, ओर कोईभी, एकेंद्रियादिक जीव, विनासा, चापा, दुखदिया, हलते चलते ओर कोईभी कामकाज करते विद्धंसपणा किया, जीवदया अच्छीतरे नहीं करी, खंखारा सूकाया, सुला अनाज धूपमैं दिया, दलाया, भरडाया, खाट, पिलंग, धूपमैं झडाकाया, धरा, धराया, जीवाकुल जमीन, नींपी, निपाई, वासी गार रख्खी, रखाई, दलते, कूटते, नींपते, अच्छी जयणा नहीं करी, अष्टमी, चौदसका नियम तोडा, धूणी कराई, पहिला प्राणातिपात व्रतमैं जो कोईभी अतीचार पक्ष० १ ॥ थूल मृषावाद विरमणके ५ अतीचार ॥ सहस्सा रहस्सदारे, मोसवएसे अकूडलेहेय, सहसात्कार किसीकों अयुक्त एव छीपालगाया, किसीकों एकांत बात करते देख, तुम्हतो राजाके विरुद्धवात विचारते हो, इत्यादिक कहा, अपणी स्त्रीकी गुप्तवात कही, किसीकी गुप्तसला या मर्म• प्रकाशन करा, किसीको झूठी बुद्धि दी, झूठा खतलिखा, झूठी गवाभरी, धरवट दाबी, कन्या, जानवर, गऊ, जमीनसंबंधी, लेणैदेणे, व्यवसाय, वादविवाद, वचन कलह करते, वडा झूठ बोला, हाथ पांवोंकी गाली दी; करडके मोडे, अधर्म बचन बोला दूसरे थूल मृषावाद व्रतमैं जो कोई भी अतीचार पक्ष० २ ! ॥ अदत्तादानविरमणव्रतके ५ अतीचार ॥ : ते नाहडप्प ओगे, घरके चाहिर क्षेत खले पराई वस्तु विगर मंगाई, ली, दी, वापरी, चोरीकी वस्तु मोलली चोर डकेतकों संबल दिया शंकेत कहा विरुद्ध राज्याति- क्रमकिया, नये, पुराणे; सरस, निरस, सजीव, निर्जीव, वस्तूका भेल संभेलकरा खोटे- तोल मान मापसें. विवहार किया, महसूलकी चोरीकरी, बदलावदली करी, मा, वाप, वेटा, स्त्री, परिवारके विचमैं ठगाईसँ जुदी गांठकरी, किसीको हिसाब किता- वमैं, धोखादिया, गिरीवस्तुकों छिपायली, तीसरे अदत्तादान व्रतमैं जो कोईभी अतीचार पक्ष० ३. ॥ वदारासंतोष मैथुनव्रतके ५.अतीचार ॥ - 'अप्परिग्गहिया इत्तर, अणंगविवाहतिब्ब अणुरागेल अपरिगृहीतागमन, इत्वर. परिग्रही- तांगमन, विधवा वैश्यास्त्री कुलस्त्री, अपणी विवाहिता दो स्त्रियोंके चाहणेमैं, तफावत- रख्खा, सराग वचन बोला, आठम, चउदस, ओर किसी भी पर्व तिथीका, नियम तोडा, पुनर्विवाह किया, कराया, अनुमोदना करी, खोटे संकल्प विकल्प किये, कामक्रीडा करी, पराये विवाह जोडे, कामभोगमैं, तीव्र अभिलाषाकरी, खोटे खप्ने देखे, नट विट , २१ - १६२ अतीचार.. पुरुषसे हस्सीकरी, चौथे मैथुन चैतमैंजो कोई भी अतीचार पक्ष० वह सव म० व० का० ॥ परिग्रह प्रमाणवतके ५ अतीचार ॥ धण धन्न खित्त वत्थु, धन, धान्य, क्षेत्र, वस्तु, रूपा, सोना, कुप्पद, द्विपद, चोपद, नव प्रकारके परिग्रहका नियम ऊपर, वढोतरी देख, मूर्छासें, संक्षेप नहीं किया, माता पिता पुत्र कलत्रादिकके लेखे किया, परिग्रहप्रमाण लेकर याद नहीं किया, याद करकै भूलगया, नियम भूलगया, पांचमै परिग्रहप्रमाण व्रतमैं जो कोईभी अती- चार पक्ष० सूक्ष्म वा० जाणते अजा० ५ ॥ दिविरमण व्रतके ५ अतीचार ॥ . गमण स्सय परिमाणे० उर्द्धदिशि अधोदिशि तिरछीदिशि, जाणे आणेका नियम, जो कोईभी, अजांणपणे तूटा, एकतरफ घटाकर, दुसरे तरफ बधाई, भूल करकै जादा जमीन गया, प्रस्थाना दूर भिजवाया, छट्टे दिग् व्रतमैं जो कोईभी अतीचार पक्ष० ६ ॥ भोगोपभोगविरमण व्रतके भोजन आश्री ५ कर्मसेती १५ एवं २० अतीचार ।। सचित्ते पडिबद्धे० सचित्तकां नियम लेकर, जादा सचित्त लिया, तैसें सचित्त मिली वस्तु, विगरपका आहार, दुपक्क आहार, तुच्छ देवाओंका भक्षण किया, होला, ऊंवी, पहूंक, ककडी, भडथाकरा, सुलानाज प्रमुख भक्षण करा, सचित्त दवविगई, वाहण तंबोलवत्थकुसुमेसु, पाहण सयण विलेवण, बंभदिसिन्हाणभत्तेसु . १ ये चवदै नियम दिनप्रते, संभारे, संक्षेपे नहीं, लेकर नियम तोडा, २२ अभक्ष, ३२ अनंतकाय में, अद्रक, मूला, गाजर, सूरण, सेलरा, कची अमली, गोल्हफल खाया, चौमासे प्रमुखमैं, वासी मिस्सा [कठोल] की रोटी खाई, तीन दिनका दही खाया, सहत, महुआ, मख्खण, मट्टी, बैंगण, पीलू, पीचु, पपोटा, पीपी, जहर, वरफ, गडे, [ओले घोलवडा, अजाणेफल, ठीवरू, आचार, आमण, बोर, कच्चानिमक, तिल, खसखस, कच्चेकाचर खाये, रात्रि भोजन करा, लगबगती वख्त ब्यालूकरा दिन ऊगे विगरजीमा, तैसें पनरे- कर्मादान, अंगारकर्म, वनकर्म, साडीकर्म, भाडीकर्म, फोडीकर्म, दांतका व्यापार, लाखका व्यापार, रसका व्यापार, केशका व्यापार, विष [जहर का व्यापार, जंत्र पीलनकर्म, निन्छनकर्म, दावाग्निदेणा, . सरद्रहतलाव सू- काणा, इनमें ५ कर्म, ५ वाणिज्य, ५ सामान्य, महाआरंभ, लीहालेकराये, ईटपजावा, कुंभारकी निवाही पकाई, धाणी, चिणा, पकवान करके वेचा, वासी मक्खणतपाया, . , , , , , " , अतीचार. अंगीठी करी, करायी, तिलादिकका संचय किया, फागण. महीने उपरांत रख्खा, मुरगा, तोता, बुलबुल वगेरे पाला, ओर भी जो कोई बहोत सावध करडा कर्मादिक समाचरा, सातमैं भोगोपभोग व्रतमैं जो कोई भी अतीचार पक्ष० ७ ॥ अनर्थ दंड विरमण व्रतके ५ अतीचार ॥ कंदप्पे कुकुईए० कामदेवके वस विटकीतरे, हसी, कौतूहल, मुखादिअंगकुचेष्टा- करी, मूर्खपणेसैं, किसीकों, नहीं कहणे योग वात कही, खांडा, कटारी, कसी, कुहाडी, रथ, ऊखल, मूसल, अग्नि, चक्की आदिक तइयार करकै रक्खा, मांगणेसैं दिया, कणक वस्तु ढोर लिराया, ओर भी किसीतरेका पापका उपदेश दिया, स्नान दांतण, पग- धोणे पाणी, तेल जादा मंगाया, नदी प्रमुखमैं तिरा, राजकथा, देशकथा, भोजनकथा, स्त्रीकथा, पराई वातकरी, आर्त, रौद्र ध्यान ध्याया, कठोर बचन बोला, करडका मोडा, जिनावर लडाया, भैसा, सांड, मुरगा, मींढा, कुत्ता वगेरेकों, जुटते, लडतेकों, देखा, होड [सरत] लगाकर, दुसरे जिनावरपर, द्वेष भाव किया, मट्टी, निमक, कण, कपासिये, विगरकाम दवाया, उसपर बैठा, हरी वनस्पती खूदी, छाछ, जल, घी, रस, तेल, गुड, आम्लवेतस, गंधेविरोजादिकका वरतन उघाडा रक्खा, उसमें, चिमटी, कुंथु , मक्खी, चूआ, गिलेरी वगेरे जीवमरे, तोता वगेरे जीव, क्रीडावास्ते बांध रक्खा, वहोत नींदली, रागद्वेपसे एककू ऋद्धिपरिवारकी चाहना करी, एक… मरणा, नुकसान विचारा, आठमैं अनर्थदंडव्रतमैं जो कोईभी अतीचार पक्ष. ॥ सामायकवतके ५ अतीचार ॥ तिविहे दुप्पणिहाणे, सामायक लेकर मनमैं आतं, रौद्धकू विचारा, वचन पापकारी बोला, शरीर विगर पडिलेहे हि लाया, बख्त रहते भी सामायक नहीं लिया सामायक लेकर ऊघाडे मूंसे बोला, नींदली, विजली दियेकी उद्योती लगी, कण कपासिये मट्टी लूंण नीलण फूलण सब्जी वनस्पतीका संघट्ट हुआ, पुरुष तिर्यंचका संघट्ट हुआ, मुहपत्ती संघट्टी सामायक विगर पूरी पारी, पारणा मूलगया, नवमै सामायकव्रतमैं जो कोई " अतीचार पक्ष० ॥ देशावकासिक व्रतका अतीचार ॥ आणवणेपेसवणे० आणवणप्रयोग, पेसवणप्रयोग, सब्दानुपात, रूपानुपात, बहिःपुद्ग- लक्षेप, प्रमाणमुजवनियम किये जमीनमें, वाहिरक्षेत्रसैं कुछमंगाया, आपके पासमैं वाहिर- क्षेत्रमें भेजा, पुकारके, रूपदिखाकर, कंकर फैंककै, अपणापणा जणाया, दशमैं देशावका- सिकवृतमैं जो कोईभी अतीचारपक्ष० अतीचार... . , पोषधनुपवासनतकै ५ अतीचार ॥ संथारुचारविहि० पोसहलेकर संथारेकी जमीन वाहिरका थडिला दिनकों सोधना पडिलेहणां नकरी, मात्रा विगर पडिलेहे किया, विगरपूंजी जमीनमें परठा, परठेतविचारणा नहीं करा, अणुजाणह जस्सुरगहो- नहींकहा, परठेवाद तीनवेर, बोसरामि नहीं कहा, पोसहसालमें पैसते निकलते, निस्सही, आवस्सही, कहणा भूलगया, पृथ्वीकाय ? अप्पकाय २ तेऊकाय, वायुकाय, वनस्पतीकाय, त्रसकायका संघट्ट परिताप उप-. द्रवहुआ, संथारा पोरसीकीविधि परठणाभूलगया, प्रथम पोरसीमें नींदली विधिविगर संथारा विछाया, कालवेलाप्रतिक्रमण नहीं करा, पारणेका फिकरकरा, कालवेलामें देव वांदना भूलगया, पोसहदेरसैलिया, फजरमेंही पारलिया, पर्चतिथी आणेसें पोसहलिया नहीं इग्यारमैं पोषधोपवासव्रतमैं जो कोईभी अतीचारपक्ष० ॥ ॥ अतिथिसंविभागवतके ५ अतीचारः ॥ संचित्तेनिक्खवणे०, संञ्चित्तवस्तु, नीचे, ऊपर रहते, साधूकू, असूझता. दान दिया, नहीं देणेकी बुद्धि सें, सूझता पलटा कर, असूझता करा, अपणा पलटा कर पराया करा; विहरणका वख्त टले. वाद, देरी करकै, साधूकू बुलाया, अहंकारके वस दान दिया, गुणवंत आणेसै भक्ती नहीं करी, शक्तिरहतेभी साधर्मी वात्सल्यता नहीं करी,. ओर भी धर्मक्षेत्र कोई ..भी. कष्ट पाते कू, शक्ति रहते भी उद्धार नहीं करा, वारमैं अतिथि- संविभाग व्रतमें जो कोई भी अतीचार पक्ष०.१२ ॥ संलेषणाका ५ अतीचार.॥ इह लोए पर लोए. इह लोकासंसप्प ओगे, पर लोगा संसप्प. ओगे, जीविआ संसप्प ओगे; मरणासंसप्प ओगे, काम भोगा संसप्प ओगे, इह लोक मनुष्य भव, मान, वडाई, लोकोंकी सेवा, ठकुराई, वलदेव,. वासुदेव, चक्रवर्तिपदकी चाहना करी, पर लोकमैं इंद्र, अहमिंद्रादिक पदवी चाही, सुख आणेसें जीणेकी चाहना करी, दुःख आणेसैं मरणे की चाहना करी, कामभोगकी इच्छा करी, संलेषणाव्रतमैं जो कोई भी अतीचार पक्ष० ॥ ॥ तपाचार. १२ भेद बाह्यतपके ६ भेद, ॥ अण सण मुणोयरिया, वित्ती संखेवणं रसञ्चाओ, काय किलेसो संलीनयाय, बझो- यतवोहोई १, अण सण कहिये उपवास वह पर्वतिथिमैं शक्ति रहते किया नहीं, ऊनोदरी, ५।७ ग्रास कमखाया नहीं; द्रव्यसंक्षेप, विगयप्रमुखका परिमाण किया नहीं, आस- नादिक कायक्लेश नहीं करा, संलीनता, अंग उपांग समटके रक्खा नहीं, नवकारसी, , . अतीचार, १६५ पोरसी, गंठसी, मुंठसी, साढ पोरसी, पुरमट्ट, एकासणा, वैयासणा, निधी, ऑविल; प्रमुख पञ्चक्खाण पारणा भूल गया, बैठते नवकार गुणा नहीं, ऊठते दिवसचरम नहीं करा, नी बी, आंविल उपवासादिक तप करके कचा पाणी पीया, वमन हुआ, वाह्यत; पमें जो कोई भी अतीचार पक्ष० ॥ ॥६ अभ्यंतर तप ॥ पायच्छित्तं विणओ, वेयावच्चं तहेवसज्झाओ, झाणं उस्सग्गोविय, अभितरओं तवोहोई१, गुरूके पास मन शुद्धसैं आलोयण लिया नहीं, गुरुदत्त प्रायश्चित्त तप लेखे शुद्ध पहुं- चाया नहीं, देव, गुरु, संध, साधर्माका, विनय नहीं किया, वांचना, पूछणा, पीछेका उथलना. अनुप्रेक्षा, धर्मकथा, ये पांच भेद लक्षणका स्वाध्याय किया नहीं, धर्मध्यांन, शुक्लध्यांन, ध्याया नहीं, कर्मक्षयके वास्ते १०।२० लोगस्सका काउंसग्ग नहीं करा, अभ्यंतर तपमै जो कोई भी अतीचार पक्ष० ॥ ॥ वीर्याचारके ३ अतीचार ॥ अणगृहिय बलविरिओ, परक्कमइ जोजहुत्तठाणेसु, जंजइ अजहाथाम, नायचोवी- रियायारो १ पढणो, गुणणे, विनय, वेयावच्च, देवपूजा, सामायक, दान, शील, तप,- भावना, प्रमुख धर्मकृत्यमैं, मन, वचन, कायाका, विद्यमान बलवीर्यकू छिपाया, अच्छीतरे पंचांग खमासमण नहीं दिया, वैठै पडिक्कमणाकरा वीर्याचारमैं जो कोई भी अतीचार पक्ष० ॥ नाणाइ अट्ठ पइवय, समसंलेहणपनर कम्मेसु, वारस तव विरियतिगं, चऊवी सं- संय अइयारा, १ ज्ञान, दर्शन, चारित्रके, आठ २, एकेक व्रत, एवं १२ व्रतोंके तथा' सम्यक्तके, तेसै संलेपणाके, पांच २, कर्मादानके १५, तपके १२, वीर्यके ३, जैसे- एक सो २४ अतीचार, पडिसिद्धाणं करणे. जिनेश्वरके मना किये २२ अभक्ष, ३२ अनंतकाय, बहुवीज भक्षण, महाआरंभ, महापरिग्रहादिक, करा, नित्यकृत्य देव- पूजा, सामायकादिक, तथा तीर्थयात्रादिक नहीं करा, जीवाजीवादिक विचार मैं श्रद्धा नहीं करी, अपणी कुमतिसैं, उत्सूत्ररूपणाकरी, प्राणातिपात १ मृषावाद २ अद- त्तादान ३ मैथुन ४ परिग्रह ५ क्रोध ६ मान ७ माया ८ लोभ ९ राग १० द्वेष ११ कलह १२ अभ्याख्यान १३ परपरिवाद १४ पैशुन्य १५ अरतिरति १६ मायामृषा- वाद १७ मिथ्यात्व शल्य १८ इसतरे अठारे पापस्थानकमैं, जो कुछ किया, कराया, अनुमोदा; इसतरे श्रावकधर्म सम्यक्तमूल १२ व्रत अकसो २४ अतीचारमैं जो अती- चार पं० जाण० अजाणते वह सब मन वचनकायाकर मिच्छामि० ॥ , १ चोमासीमैं चोमासी दिवसमैं, संवत्सरीमै संवत्सरीका नाम लेगा, अलोयण. ॥ अथ आलोयण लिख्यते ॥ आजुणा चार प्रहर दिवसमें जे में जीव विराध्या होय सात लाख पृथिवीकाय सात लाख अप्पकाय सात लाख तेउ काय सात लाख वाउकाय दशलाख प्रत्येक वनस्पतिकाय च- उदे लाख साधारण वनस्पति काय दोय लाख बेइंद्रिय दोय लाख तेंद्रिय दोय लाख चौरिंद्रिय चार लाख देवता चार लाख नारकी चार लाख तिर्यंच पंचेंद्रिय चउदे लाख मनुष्य एवं चार गति चौराशी लाख जीवा योनिमें, माहारे जीवें जे कोई जीव हण्यो होय, हणाव्यो होय, हणतां प्रत्यें भलो जाण्यो होय, ते सव्वे हुँ मन वचन कायायें करी मिछामि दुक्कडं ॥ इति ॥ २६ ॥ ॥ अथ अढारे पापस्थानक आलोउं॥ प्राणातिपात ॥ १॥ मृषावाद ॥ २ ॥ अदत्तादान ॥३॥ मैथुन ॥ ४॥ परि- ग्रह ॥ ५॥ क्रोध ॥ ६॥ मान ॥ ७॥ माया ॥ ८॥ लोभ ॥ ९॥राग ॥ १० ॥ द्वेष ॥११॥ कलह ॥१२॥ अभ्याख्यान ॥१३॥ पैशुन्य ॥१४॥ रति ॥१५॥ अरति परपरीवाद ॥ १६ ॥ मायामृषावाद ॥ १७॥ मिथ्यात्वशल्य ॥ १८ ॥ ए अढारे पाप- स्थानक सेव्या होय, सेवराव्या होय, सेवता प्रत्ये भला जाण्या होय, ते सव्वे हुं, मनें, वचनें, कायायें करी तस्स मिछामि दुक्कडं ॥[इति] ज्ञान, दर्शन, चारित्र, पटी, पोथी, ठवणी, कवली, नवकरवाली देव, गुरु, धर्मकी आशातना करी होय पन्नरे कर्मा दानोंकी आसेवना करी होय राजकथा, देशकथा, स्त्रीकथा, भक्तकथा करी होय, ओर जो कोई पापपर निंदा कीg होय, कराव्युं होय, करता अनुमोयुं होय सो सर्ब मन वचन, कायायें करके, दिवस अतिचार आलोयण करके पडि कमणामें आलोउं तस्स मिछामि दुक्कडं इति आलोयणं ।।

. पगाम आउ साधुप्रतिक्रमणसूत्र. ॥ अथ साधुप्रतिक्रमणसूत्र ॥ चत्तारिमंगलं अरिहंतामंगलं सिद्धामंगलं साहूमंगलं केवलि पन्नत्तो धम्मोमंगलं १, चत्तारि लोगुत्तमा अरिहंता लोगुत्तमा, सिद्धा लोगु- त्तमा, साह लोगुत्तमा केवलिपण्णत्तो धम्मो लोगुत्तमो २ चत्तारि सरणं पव्वजामि, अरिहंते सरणं पव्वजामि, सिद्धे सरणं पञ्चजामि, साहूसरणं पव्वजामि, केवलिपएणतं धम्म सरण पव्वजामि ३ चाहताई पापसैंअलगहोणे दिनकासोणा, रातकूविगरस्वाध्यायसोणाऐसीसज्या, इच्छामि पडिक्कमिड सिज्जाए अत्यंतनींदकीसज्यासे पसवाडाफेरतेसंथारेमेंअजयणासैं दूसरापसवाडाफिराते निगामसिजाए संथाराजवणाए परियहणाए अजयणासें, शरीरवेप्रमार्जेसकोचणेसें, पसारणेसैं, जू, मांकड, आदिककीसंघट्टणासे, दृणाए, पसारणाए छप्पइयासंघणाए खासीकरतेअजयणासे, करडीशय्यासें, छींकसैं, वगासीखाणेसैं, पासकीजमीफर कुइए कुकराइए छीए जंभाइए आमोसे सणेसें, धूडवालीजमीनफरसणेसैं, आकुलव्याकुलपणेसैं, स्वप्नेमैमैथुनविचारसैं, ससररचामोसे आउलमाउलाए सोअणवत्तियाए स्त्रीकीवांछाकरणेसैंजोपापलगाहो, आंखोंकैविपर्याससैंजोदोषलगाहो, इत्थीविप्परियासिआए दिट्ठीविप्परियासिंआए, मनकेविपर्याससेंजोदोपलगाहोय पीणेकाभोजनका विपर्याससैंजोदोषल मणविप्परियासिआए पाणभोयण विपरियासिआ गाहो, जोमैनेदिनसंबंधी, अतिचारकियाहोय, उसकामिथ्याहुओमेरा ए जोमेदेवसिओ, अइयारोकओ तस्समिच्छामिदु पाप, विचारकरताहूं, गऊकीतरेफिरणेचरणेसैं, भिक्षाकेवास्तेजोदोपलगाहो, कडं पडिकमामि गोयरचरिआए भिक्खायरिआए उघाडेकिमाडोंकेउघाडणेसैं, ओढालेहुयेकों, विलाईभोगलसेंबंधद्वारके, खोल संघह उघाडकवाड उघाडणाए साणावच्छादारा ऐसें, ढकणेपरनिकालाहुआभोजनसैं, देवपूजावास्तुरखेअन्नसैं, भिक्षारियों णाए मंडीपाहुडिआए बलिपाहुडिआए ठवणापा , .. भिक्खाए, - १६८ साधुप्रतिक्रमणसूत्र. वास्तेरखाअन्नसें, आधाकमीशंकासे, एकदम, विगरविचारेअन्नसें, जीवजंतुकाविग हुडिआए, -संकिएसहस्सागारे आणेसणाए पाणेस रदेखाहुआपाणीसें, अन्नकेभोजनसे, पाणीकेभोजनसें वीजकेभोजनसैंदोषलगाहो जाए आणभोयणाए पाणभोयणाए वीअभोयणाए हरीवनस्पतीकेभोजनसें, आहारदियेवादकचेजलसेंहाथधोणेसें, देणेकपहलेकञ्चेजलसे हरियभोयणाए पच्छाकम्मियाए पुराकम्मिआए हायधोणेसें नजरसेंविनादेखलेणेसें, कच्चेजलसेंस्पर्शितआहारलणेसें, सचित्तमट्टीफरसते अदिहडाए द्गसंसिट्ठहडाए रयसंसह आहारलेणेसें, आहारदेतेनीचेगिरणेसें, आहारपरठणेसैंदोषलगाहो, उत्तमवस्तुमांगके डाए पारिसाडनिआए पारिठ्ठावणिआए ओहासण लेणेकीभिक्षासे, जोउद्गमदोषकरके, कहकरआहारकराणेसें, समस्तपणेअशुद्धआहारपाणी जंउरगमेणं उप्पायणेसणाए अपरिसुद्धं प ग्रहणकरनेसैं अथवाखायाहो, जोपरठणेयोज्ञनहींपरठणेसें, उसकामिथ्याहुओमेग़पाप, डिग्गहियं परिभुतंवा जनपरिवणि जनपरिठ्ठवणिअं. तस्समिच्छामिनुक्कडं प्रतिक्रमता विचारता हूं चारसमयकालकों, सूत्रअर्थरूपपढणागुणनानहींकरणेसें, दोनों पडिकमामिचाउकालं, सिझायस्सअकरणयाए, उभओ काल पात्रादिकउपगरणके नहींपडिलहणाकरणसे दुष्टपडिलेहणसे नहींप्रमाणेसें, कालं भंडोवगरणस्स अप्पडिलेहणाए दुप्पडिलेहणाए अप्पमजणाए दुष्टमनविगरप्रमाणसें, नहींकरणयोज्ञसें, . विधिउलांघणेसें, अतीचार, कुप्पमज्जणाए, वइकम, अड्यारे, अनाचार, जोमै दिनसंबंधी, अतीचारकियाहोय, उसकामिथ्याहु अणायारे जोमेदेवसिओ, अइयारोकओ तस्समिच्छा ओमेरापाप, विचारताहूं. एकप्रकारका, असंजमसें । प्रतिक्रमताहूं मिनुक्कडं, पंडिकमामि, एगविहे, असंजमे पडिकमामि दो, बंधनोंसें, रागस्नेहकेबंधनकरके, द्वेषकेवंधनकरके, प्रतिक दोहिं, बंधणेहिं रागवंधणेणं दोसवंधणेणं पडि मताहूं. तीन, दंडोंसें, मनदंडकरके, वचनदंडकरके, कायाकेदंडसें, कमामि, तिहिं, दंडेहिं, मणदंडेणं, वयदंडेणं, कायदंडेणं अइक्कम, को साधुप्रतिक्रमणसूत्र. १६९ प्रतिक्रमताई, तीनों, गुप्तियोंसें, मनगुप्तिसैं, वचनगुप्तिसे, कायाकी पडिकमामि तिहिं, गुत्तिहिं मणगुत्तिए वयगुत्तिए कायगु गुप्तीसें, पीछाहटताहूं, तीनसल्योंसें, कपटाईसल्यसै, तपकानियाणा त्तिए पडिकमामि तिहिंसल्लेहि, मायासल्लेणं, नीयाणास सल्यसैं, मिथ्यात्वदर्शनशल्यसँदोपलगाहो, पीछाहटताहूं, तीनगरूरीकरणेसैं ल्लेणं, मिच्छादसणसल्लेणं, पडिकमामि तिहिंगारवेहिं, ऋद्धि[ मेंसिद्धपूजनीक हूं, मुझेरसमिलताहै, मेरीकायानिरोगहैऐसे ३गरूरसैं, इड्डीगारवेणं, रसगारवेणं, सायागारवेणं पीछाहटताहूं तीनविराधनासैं, ज्ञानविराधनासे दर्शन[सम्यक्त]विराधनासैं, पडिकमामि तिहिंविराहणाहिं नाणविराहणाए दसणविराहणाए चारित्रविराधनासैं, पीछाहटताहूं चारकपायोंसेंहुयेदोषोंसें, क्रो चारित्तविराहणाए, पडिकमामि चउहिंकसाएहिं, धकपायसें, अहंकारकषायसें, कपटाईकपायसै, लोभकषाय हकसाएणं माणकसाएणं मायाकसाएणं लोहकसा सैं, पीछाहटताहूं, चारोंही, आहारसंज्ञासै एणं, पडिकमामि, चाहिं, सएणाहिं आहारसपणाए डरकीसंज्ञासैं, मैथुनसंज्ञासे, परिग्रहकीसंज्ञासे, पीछा भयसपणाए मेहुणसण्णाए परिग्गहसण्णाए पडि हटताहूं, चारों विकथाओसैं, स्त्रियोंकीकथासे, भोजनकीकथासै कमामि, चाहिं, विगहाहिं, इथिकहाए, भत्तकहाए, देसोंकीकथासे, राजाओंकीकथासैं, पीछाहटताहूं, चारों ध्यानोंसें देसकहाए, रायकहाए, पडिकमामि, चउहि, झाणेहिं, आर्चपरसंबंधीध्यानसँ परकूठगणामारणाध्यांनसैं, धर्मवस्तुकेध्यानसैं, शुक्ल अट्टेणंझाणेणं रुद्देणंझाणेणं, धम्मेणझाणेणं मुके कायकीसैं ध्यानमैंजोदोषलगाहो, पीछाहटताहूं, पांचक्रियाओंसें, गंझाणे पडिकमापि पंचहिंकिरियाहि काइयाए उत्सूत्रप्ररूपणाकरणेसैं, जादाद्वेषकरणेसैं, आत्मघातकरणेकीकियासैं, प्राणी अहिगरणियाए पाउसिआए पारतावणिआए प्राणा संज्ञासे, - , - २२ . १७० साधुप्रतिक्रमणसूत्रः जीवोंकीमारणेकीक्रियासैं, पीछाहटताहूं पांचकामगुणोंसेंहुयेदोपोंसें, शब्दसैं, यवायकिरिआए पडिकमामि पंचहिंकामगुणेहिं सद्देणं रूपसे छरससैं गंधसैं स्पर्शसे पीछाहटताहूं पांचमहाव्रत रूवेणं रसेणं गंधेणं फासेणं फासेणं पडिकमामि पंचहिम केहुयेदोषोंसें, प्राणीजीवोंकेमारणेसैंअलगहोणा, झूठवोलणेसैंअलगहोणा हव्वएहिं पाणाइवायाओवेरमणं मुसावायाओवेरमणं विनादातारकेदियेलेणेसैंअलगहोणा, मैथुनसैंअलगहोणा परिग्रहप्रकारसे अदिन्नादाणाओवेरमणं मेहुणाओवेरमणं परिग्गहाओ अलगहोणा, पीछाहटताहूं पांच समितिसे रस्तेकीसमितिसे बोल वेरमणं पडिकमामि पंचहिं समिई हिं इरियासमिईए भा गेकीसमितिसँ, आहारलेणेकीसमितिसैं, लेतेपात्रप्रमुख रखते धरते] सासमिईए एसणासंमिईए आयाणभंडमत्त निक्खेवणा समितिसँ, लघुनीति,वडनीति:श्रूक,खंखार,मैल,नाककामैल, गेरणेकीवख्त समिईए, उच्चारपासवणखेलजल्लसंघाण पारिट्ठावणि समितिसैं, पीछाहटताहूं, जीवनिकायासैं पृथ्वीकायासे यासमईए पडिकमामि छहिं जीवनिकाएंहिं पुढविकाएणं अप्पकायासै तेज[अग्नि] कायासें, वायूकायासैं, वनस्पतिकायासैं आउकाएणं तेउकाएणं वाउकाएणं वणस्सईकाएक त्रसकायासैदोषलगाहो, पीछाहटताहूं, छव लेस्यासैं, कृष्णमनपरि तस्सकाएणं पडिकमामि छहिलेसाहिं किन्हलेसा णामसे, नीलपरिणामसैं, कापोतपरिणामसे, तेजपरिणामसे, पद्मपरिणामसे, नीललेसाए काउलेसाए तेउलेसाए पउमलेसाए शुक्लपरिणामसे, पीछाहटताहूं, सात भयकेठिकाणेस, आठमदके मुकलेसाए पडिकमामि सत्तहिं भयहाणेहिं अहहिं ठिकाणसे नवब्रह्मचर्यकीगुप्तिसे दशप्रकारकेसाधूधर्मसे, मयहाणेहिं .नवहिंबंभचेरगुत्तीहिं दसविहेसमणधम्मे इज्ञारे श्रावकोंकीप्रतिमामैं दोषलगाहोय वारसाधुओंकी प्रतिमासे एगार सहिउवासगपडिमाहिं वारसहिंभिक्खु पडिमाहिं छव ए साधुप्रतिक्रमणसूत्र. १७१ तेरेक्रियाकस्थानोंसे चवदेजीवोंकेसमूहोंसें, पनरे तेरसहिंकिरियाठाणेहिं चउद्दसहिभूयगामेहिं पण्णरसएहिं परमाधाम्भिकदेवोसैं, सोलेसुयगडांगसूत्रप्रथम१६गाथासे, सतरेप परमाहम्मिएहिं सोलसएहिंगाहाहिं सतरसविहे कारअसंजमसें, अठारेप्रकारकेअब्रह्मचर्यसे उगणीसज्ञातासूत्रकेअध्ययनोंसें असंजमे अट्ठारसविहेअचंभे इगुणवीसाएनायझयणेहिं वीसअसमाधिस्थानकोंसें इकवीससबलचारित्रकेदोषोंसें वीसाएअसमाहिठाणेहि, इकवीसाएसवलेहिं, वाईसपरीपहोंसेंदोपलगाहो, तेवीससुयगडांगकेअध्ययनोंसें चउवीस बावीसाएपरीसहेहिं, तेवीसाएसुयगडझयणेहिं, चउवी, अरिहंतोसे पचवीसपंचमहावतोंकीभावनासे, छाईसदशाभुत साएअरिहंतेहिं पचवीसाएभावणाहिं छव्वीसाएदसा स्कंध,कल्पव्यवहारसे, उद्देसणकालसैंदोष सत्ताईसअणगारकेगुणोंमैंदो कप्पववहाराणं उद्देसणकालेणं सत्तावीसाएअणगा पलगाहोय, अठाईसआचारप्रकल्पमैंदोषलगाहो गुणतीसपापश्रुत रगुणेहिं अट्ठावीसाएआयारपकप्पेहिं एगुणतीसाए शास्त्रकेप्रसंगसैंदोपलगाहो, तीसमोहनीकेस्थानमैंदोषलगाहोय, इकतीससिद्धोके पावसुअप्पसंगेहि तीसाएसोहणीअट्ठाणेहि इगतीसाए गुणोंमैदोपलगाहोय, ३२ योगसंग्रहमैंदोपलगाहोय ३३ गुरूकीआशात सिद्धाइगुणेहिं बत्तीसाएजोगसंगहेहिं तित्तीसाएआ नामैंदोपलगाहोय, अरिहंतोंकीआशातनासे, सिद्धोंकीआशातनासैंदोष सिद्धाणंआसाय सायणाए अरिहंताणंआसायणाए लगाहो, आचार्योंकीआशातनासैंदोषलगाहोय, उपाध्यायोंकीआशातनासे णाए उवझायाणआसाय आयरिआणंआसायणाए दोषलगा, साधुओंकीआशातनासे साधवियोंकीआसातनासैंदोषलगाहोय जाए साहूणंआसायणाए साहुणीणंआसायणाए. श्रावकोंकीआशातनासे देवतोंकी सावयाणंआसायणाए सावियाणासायणाए देवाणं , आवकणियोंकीआशातनासे , - १७२ साधुप्रतिक्रमणसूत्र. आशातनासे, देवियोंकीआशातनासेंदोष, इसलोककीआशातनासे आसायणाए देवीणंआसायणाए इहलोगस्सआसा दोषलगा, परलोककीआशातनासैदोषलगा, केवलीप्ररूपितधर्मकी यणाए परलोगस्सआसायणाए केवलिपन्नत्तस्स आशातनासैंदोषलगाहोय देवलोक मनुष्यलोक असुरलोककीआशा धम्मस्सआसायणाए सदेवमणुआसुरस्सलोगस्स तनासैंजोदोषलगाहोय, सर्वप्राणभूत जीव सत्वोंकीआशातनासैदोष आसायणाए सव्वपाणभूअ जीव सत्ताणंआसायणा लगा, कालकी आशातनासैंदोषलगा श्रुतजिनोक्तकी आशातनासे, श्रुत ए, कालस्स आसायणाए सुअस्स आसायणाए सु देवताकी आशातनासैंजोदोषलगा, वाचनाचार्यकी आशातनासैंजोदोपल यदेवयाए आसायणाए वायणारिअस्स आसाय गा, सूत्रकूआगापीछा, · दोतीनवख्तसूत्रकुंवोलाहो, कमअक्षरवोलाहो, णाए जंबाइद्धं बच्चामेलिअंहीनक्खरिअं अञ्च जादाअक्षरबोलाहो, पदकमवोलाहो, विनयहीनपढाहो, योगतपविगर, उदात्त क्खरि पयहीणं विणयहीणं जोगहीणं घोस स्वरहीण, अच्छीतरेदियापाठ, दुष्टपणेअंगीकारकियाहो, अकालमैं किया हीणं सुइदिन्नं दुडुपडिच्छियं अकालेकओ पढनागुणना, कालमैंनहींकियापढणागुणना, असझाईकीवख्त पढना सझाओ कालेनकओसझाओ असझाइए कराहो, स्वाध्यायकी वख्तनहींस्वाध्यायकरा, उसकामिथ्याहुओमेरापाप झाइयं सझाइए नसझाइयं तस्समिच्छामिदुक्कडं नमस्कारहोचउवीस तीर्थकरोंकों ऋषभादिक महावीर णमोचउवीसाए तित्थयराणं उसभाई महावीरप स्वामीपर्यंतोकू निग्रंथकाद्वादशांग सत्य इसकेजैसानहींदुसरा, जवसाणाणं इणमेवनिग्गंथंपावयणं सचं अनुत्तरं केवलीकथितप्रतिपूर्ण, न्याययुक्त शुद्ध सल्यकाटणे केवलियंपडिपुन्नं नेआउयं - संसुद्धं । सल्लगत्त mer " तं साधुप्रतिक्रमणसूत्र. वाला सिद्धिकामार्ग मुक्तिकामार्ग . ' सुखअनंतकामार्ग मोक्षका णं सिद्धिमग्गं मुत्तिमग्गं निजाणमगं निव्वाण मार्ग नहींअसत्यविच्छेदरहित, सर्वदुःक्खोंकेनासकरणेकामार्ग मग्गं अवितहमविसंधि सव्वदुक्खपहीणमग्गं इसमैरहेजीव, सिद्धहोतेहैं, बुद्धहोतेहैं, छूटतेहैं, समस्तपणेपीछे इत्तहियाजीवा, सिझंति, वुझंति, मुचंति, परिनिव्वा जन्मनहीलेते, सर्वदुःक्खोंकाअंतकरतेहैं, उसधर्मकोंसईहताहूं प्रतीति यंति, सव्वदुक्खाणमंतंकरंति तंधम्मंसदहामि पत्ति कर्ताहूं, रुचिसैंधारताहूं, फरसताहूं, पालताहूं, पूर्वपुरुषोंकेतरेपालताहूं उस यामि, रोएमि, फासेमि पालेमि, अणुपालेमि, धर्मकों, सईहता, प्रतीतिकरता, रुचताहुआ, फरसता पालता पूर्वपु धम्म, सद्दहतो पत्तिअंतो रोअंतो फासंतो पालंतो अ रुपोंकेतरपालता, उसधर्मकों केवलीप्ररूपितधर्मकों उठाहूंसम गुपालंतो तस्सधम्मस्स केवलिपन्नत्तस्स अन्भुहि स्तपणे आराधनाकेवास्ते दूरहोताहूं विराधनाकरकै असंज ओमि आराहणाए विरओमि विराहणाए असं मकँसमस्तपणेजाणताहूं, संजमकुंअंगीकारकर्ताहूं अब्रह्मचर्य जमंपरिआणामि, संजमंउवसंपज्जामि अभंप कूसमस्तपणेजाणताहूं, ब्रह्मचर्यकुंअंगीकारकर्ताहूं, नहींकरणेयोज्ञकृत्य रिआणामि बंभंउवसंपन्जामि, अकप्परिआणा जाणताहूं, करणेयोजकृत्यअंगीकारकर्ताह अज्ञानफँसमस्तपणेजाणताहूं मि कप्पंउवसंपज्जामि अन्नाणंपरिआणामि क्रियाकों ज्ञानकुंअंगीकारक हूं अक्रियाकोंसमस्तपणेजाणताहूं नाणंउवसंपजामि अकिरियंपरिआणामि. किरियं सम्यक्तकोंअंगी अंगीकारकर्ताहूं मिथ्यात्वकोंसमस्तपणेजाणताहूं सम्मत्तंउवस उवसंपन्जामि मिच्छन्तंपरिआणामि ..

हूं " १७४ साधुप्रतिक्रमणसूत्र. कारकर्ताहूं अबोधकुंसमस्तपणेजाणताहूं . बोधकोंअंगीकारकर्ता पज्जामि, अवोहिंपरिआणामि बोहिंउवसंपन्जा अमार्गकोंसमस्तपणेजाणताहूं मार्गकुंअंगीकारकर्ताहूं जो मि अमरगंपरिआणामि मगंउवसंपज्जामि जं यादकरलिया औरजोनहींयादआया, जिसकोंविचारसेंनिवर्त्तताहूं, ओरजो संभरामि जंचनसंभरामि जंपडिकमामि जंचन नहीनिवर्ता हटा] उनसवोंका दिनसंबंधीपक्षीचोमासी संवत्सरीअतीचारोंकों पडिकमामि तस्ससव्वस्स देवसिअस्स अइयारस्स प्रतिक्रमताहूं, साधूईमैं संजती, विरक्त समस्तहणा पडिकमामि समणोहं संजय विरय . पडिहय त्यागकिया पापकर्म, नियाणारहित तत्वरूपनजरयुक्तहूं पच्चक्खाय पावकस्मे अनियाणा दिहिसंपन्नो कपट झूठ विवर्जित है मायामोसविवजिओ अढाइजेसु दीवसमुद्देसु पन्नरसकम्मभूमीसु जावंतिकेविसाहू रयहरण गुच्छ पडिग्गहधारा पंचमहव्वयधारा अहार- सहस्स सीलांगधारा अख्खआधारचरित्तातेसव्वे सिरसामणसाभत्थ- एणवंदामि, खामेमिसव्वजीवे सव्वेजी वा खमंतुमे मित्तिमेसव्वभूएसु वरंमझनकेणई १ एवमहं आलोइय निंदियगरहिय दुगंच्छियं सम्म, तिविहेणपडिक्कतो वंदामिजिणेचउव्वीसं २ इति साधु प्रतिक्रमणसूत्रं ॥

Brahd Khatrgan Panchpratikrmnasutrarth Taha16 Estrotsutrarth

Author
Malak, Premchand Amarchand
Title
Brahd Khatrgan Panchpratikrmnasutrarth Taha16 Estrotsutrarth
File name
Brahd Khatrgan Panchpratikrmnasutrarth Taha16 Estrotsutrarth
Text
OCR done
Citation
1913
Published
2009/11
Publisher
Mumbai, Nirnayasagar Press
Language
Sanskrit
Pages
189
Library
Sanmati Library
Classification
Sutra
DLI number
344376
Barcode
99999990234243.00
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