Allahabad University

Sri Brahmopnishad Saar Sangraha Deepika

Sudhindra Nath Vasu · 2006/05/05

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SHYAMA CHARAN SANSKRIT SERIES No.
THE
BRAHMOPANISAT-SARA SANGRAHA
श्रीब्रह्मोपनिषत्सारसंग्रहदीपिका
25330
DAL
11923
ATALOGUZ
PUBLISHED BY
SUDHINDRA NATHA VASU
FROM THE PAŅINI OFFICE, BHUVANESWARI ASRAMA, BAHADURGANI,
ALLAHABAD
PRINTED BY APURVA KRISHNA Bose, AT THE INDIAN PRESS,
1916

. FOREWORD. Shortly after the annexation of the Punjab, Babu Spånd Charana Basu went to, and settled in, Lahore ; and, after serving a couple of years as Headmaster of the American Mission School there, entered Government service. When the Educational Department was established in the Punjab, he was selected to fill the important post of Head Clerk. It was in that capacity that he had to organise that department, and worked hard for the spread of Education in that province. He zealously promoted the cause of Female Education to which Sir Robert Montgomery, on the eve of his retirement from the office of Lieutenant-Governor of the Punjab, bore testimony as follows:-- “Baboo Syama Charan of the Educational Department has always zealously supported the cause of Female Education. In testimony of which I give him this. I trust he will rise still higher in his own department. This certificate has been unsolicited by him. January 9th, 1865. (Sd.) R. MONTGOMERY." Sir Donald McLeod, who succeeded Sir Robert Montgomery, was a renowned Oriental Scholar. He wanted to orientalise Education in the Punjab, and wrote a letter to that effect to the Directer of Public Instruction. It was due to Babu Syama Charapa's influence that the Punjab was saved that calamity. The Lieutenant-Governor's letter was, however, at his suggestion, forwarded to the Anjuman-i-Prınjab, a literary Society, that was, through his and Dr. Leitner's exertions, brought into existence. It was at a meeting of this Society, that he suggested the formation of an institution which took the shape of the Punjab University. On his death, which occurred in August 1867, at the early age of forty, the Indian Public Opinion, which was, at that time, conducted by Sir Lepel Griffin and Dr. Leitner, paid a tribute to his memory as follows:- "We deeply regret to hear of the death of Babu Syama Charan Bose, one of the most enlightened and respectable members of the excellent Bengali Colony, which we have in our midst at Lahore. The deceased gentleman took considerable interest in all matters affecting the welfare of his adoptive country and, together with other Bengalis, threw himself actively into all movements which some time ago reflected credit on this province. He was a Vedantist by persuation, a most amiable man and an accomplished English scholar. 48 Head Clerk of the Educational Department, much of the credit assigned to its chief deservedly belongs to the well-known native gentleman, whose loss, we are sure, is sincerely felt in the community to which he belonged." Rai Bahadur Sris Chandra Basu, District and Sessions Judge, U. P., and Major B. D. Basu, I. M. S. (Retd.), have started the present Series of Sanskrit texts, and inscribed the same to the memory of their father. The publication has been entrusted to the Panini Office. MANAGER, PANINI OFFICE.

विज्ञापनम् , तस्य । पुरा पंचनदेषु इंग्लंडाधीश्वरेण विजितेषु तत्र प्रतिष्ठिते च तदुदारशासने, प्रजानामु- पचिकीर्षया प्रधाननगरे लवपुरे शिक्षाविस्ताराय राजकीयो शिक्षाविभाग आस्थापितः। महवी च धूर्महाधुरंधरे गुणशालिनि श्रीश्यामाचरणवसुमहोदये विचिक्षिपे गुणपक्षपातिभी राजपुरुषैः । तेन च महाभागेन शिक्षाविभागं सर्वथैव संवर्द्धयवा पंचनदेषु विश्वविद्यालयस्थापनस्य प्रस्तावः समुत्थापितः तस्मिंश्च प्रदेशे देवभाषासमुन्नति-स्त्रीशिक्षाविस्तार-मारतीयधर्मप्रवृद्धि-तत्परः मफलप्रयासश्च, मंपि वेदान्यतत्त्वनिष्णाव-निर्मलहृदयः बहूनुपाकरोत् । मनस्विनश्च तस्य पिचर- सानुरागिणोस्तद्गौरवानुप्राणितयोः पुत्रयोः ज्यायान् वाणीशोऽपि श्रीमान्-श्रीशचंद्रः बहु- भाषाशितः शाखपारंगतः स्वगुरुप्रामार्जितरायबहादुरीपाधिः अधुना बदायूँ स्थप्रादेशिक- न्यायासनमलंकरोति परमवैदान्तिकः । कनीयांश्च आई-एम-एस-पदभूषितः संलब्धमेज- रोपाधिकः समाप्तराजकार्यकालः सानुवादहिन्दूशास्त्रमन्थसम्पादको ज्ञानप्रांशुः श्रीमान् वामनदासः । स चाधुना महता प्रयत्नेनामुद्राङ्कितानि दुर्लभप्रायाणि हस्तलिखितानि गीर्वाववादीपुस्तकानि संगृहीत्व श्रीश्यामाचरण-संस्कृत-ग्रंथावलि-नाम्ना मुद्रापयितुं प्रकाशयितुच समारब्धवान् । तस्याः श्रीश्यामाचरण-सस्कृतप्रथावल- रयं तृतीयो प्रन्धः- इति व्यवस्थापकः पाणिनिकार्यालयः ।

शुद्धिपत्रम् पत्रम् पंक्तिः अशुद्धम् सूर्या शुभम् सूरी १ १६ १३ ६ ६ भासते रहित सम्या भासयते रहितः सम्यग तैलं निर्ण २८ २२ येषु सत्यं असत्यं सूर्य स या हवे अनिर्वाच्यः ३६ अधस्ताद ७ ६ र्येषु सर्व सत्यं सूर्य सयाहवै पिनिर्वाच्यः पि धीर्य मोह न्द्रि व्योमम् धौ तरे अनेक ववत धैर्य मोहा " अधस्तात् ८ १ ” १६ "अधस्तात् १ " व्योमन् द्यौः तरं अनेक वक्त श्रुते॥ मति जिह्वेम नान्य न्वति जिहे " प्र सानुवाद श्री ब्रह्मोपनिषत्सारसंग्रहदीपिका । भूमिका - यह ब्रह्मोपनिषत् सारसंग्रहदीपिका पहले ही पहल छप रही है । न इस का मुद्रित संस्करण देखने में आया था, न एक पाथी छोड़ के दूसरी हाथ में आयी । जिस के आदर्श पर यह सानुवाद ग्रन्थ छापा जाता है, वह पुस्तक गंगोत्री की यात्रा में उत्तर- काशी के तीर्थ में मिली थी। वहाँ के स्वामी विश्वेश्वरानन्दजी ने जिनका लाट स्वामी इस नाम से भी परिचय मिला था कृपा पूर्वक इस का उपहार दिया था। उसी क्षण यह सङ्कल्प मन में पैदा भया कि इस प्रतिग्रह का परिशोध तब ही होगा जब स्वामीजी के हाथ पर एक मुद्रित ब्रह्मोपनिषत्सारसंग्रहदीपिका पुस्तक अर्पण किया जायगा। "ब्रह्मकृपा हि केवलम्" । आज उनकी कृपा से वह मनोरथ पूर्ण होने को है। बड़े आनन्द की बात है कि न केवल शुद्ध मूल ही मूल का प्रत्युपहार दिया जायगा, पर सूद सहित दिया जायगा। वह सूद का स्वरूप हिन्दी अनुवाद है। अंग्रेज़ी में भी अनुवाद अंग्रेजी जानने वालों के लिए स्वतन्त्र छप गया है। आशा की जाती है कि इन दोनों सानुवाद संस्करणों से बहुतेरे ब्रह्म-विद्या के जिज्ञासुओं को लाभ पहुँचेगा। प्रयाग के “हिन्दू-शास्त्र-ग्रन्थमाला" ( Sacred Books of the Hindus) के प्रकाशक पाणिनीय कार्यालय (Panini Office, Allahabad ) की अध्यक्षता से इन संस्क- रणां का प्रकाश हा है।

[ २ ] जैसे विष्णुपुरीजी ने भक्तिरत्नावली का संग्रह कर के कान्तिमाला नाम की एक टीका भी रच डाली थी, वैसे ही सम्भव है कि उपनिषत्-सार-संग्रहकार और दीपिका- कार भी कदाचित् एक ही हैं। उपनिषत्-सार के पाठकों के मन में कदाचित् जिज्ञासा आवे कि उपनिषदों का सार तो पढ़रहा हूँ, पर यह उपनिषद् शब्द का अर्थ क्या है ? क्यों यह नाम पड़ा ? तो इसी प्रसङ्ग से कुछ लिखा जाता है । इस शब्द की व्युत्पत्ति कोशों में ऐसी पाई जाती है। उप+न+सद्+विप् प्रत्यय से शब्द बना है। सद् धातु के कई प्रकार के अर्थ हैं। उपसर्ग के योग से अर्थ-विशेष की प्राप्ति होती है। विशरणर्थक सद्धातु से तो यह अर्थ होगा कि जिस विद्या से अज्ञान का नाश होता है उस का नाम उपनिषद-विद्या । अथवा- जिल से ब्रह्मविद्या की प्राप्ति होती है उस अध्यात्म-शास्त्र का नाम उपनिषत् अथवा, समीप में बैठ कर एकान्त में गुरु शिष्य का ब्रह्म-विचार-रहस्य जिस में है वह शास्त्र । ऐसे कई एक अर्थ पाये जाते हैं। वेद के दो मुख्य विभाग माने जाते हैं। एक कर्मकाण्ड, दूसरा ज्ञानकाण्ड कर्मकाण्ड-विचार जिस शास्त्र में है उसे पूर्वमीमांसा कहते हैं । झानकाण्ड का विचार जिस में है उसे उत्तरमीमांसा कहते हैं। उपनिषदों में ब्रह्मसूत्र में और गीता में इस शानशास्त्र का खूब विचार भया । इस शास्त्र की प्रसिद्धि वेदान्त नाम से भी है, क्योंकि वेद के उत्तरभाग में ज्ञानकायद्ध का विचार भया है । इस वेदान्त को अधिगम करने के लिये उपनिषदों का ब्रह्मसूत्र का और गीता का अध्ययन होता है इन्हीं तीनों के समाहार की संज्ञा प्रस्थानत्रयी है। आदौ उपनिषद्, फिर ब्रह्मसूत्र; अन्त में गीता । बादरायण-कृत सूत्रों में उपनिषदों में जो महावाक्यादि दे आये हैं उनका युक्ति-पूर्वक विन्यास और विचार है। गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को समझाने के लिए जो शिक्षा का निचोड़ है। इसी से मीता की प्रसंशा में यह कहा गया है। सर्वोपनिषदो गावो दोग्धा गोपालनन्दनः । पार्थो वत्सः सुधीर्मोक्ता दुग्धं गीतामृतम्महत् ॥ सब उपनिषद् गौ हैं। श्री कृष्ण दुहने वाले हैं । अर्जुन बछड़ा है। गीता रूप अमृत को दुहा गया, इसको विद्वान् पीते हैं। उपतिपदों की संख्या बहुत है। किसी मत में १९८० है। ऋगवेदीय उपनिषद यजुर्वेदीय ...

... ... " ... ... [ ३ ] सामवेदीय अथर्ववेदीय ११८० पर ये सब नहीं मिलते। १०८ उपनिषदों के नाम मुक्तिकोपनिषद् में दिये हैं। १०८ उपनिषद् देवनागरी के अक्षरों में छप भी गये हैं। . मुख्य कई एक उपनिषदों पर श्री शङ्काराचार्य जी ने भाष्य लिखा है। यथा- ऋगवेदीय ऐतरेय यजुर्वेदीय ईशावास्य कठवल्ली तैत्तिरीय श्वेताश्वतर बृहदारण्यक सामवेदीय केन छान्दाग्य अथर्ववेदीय मुण्डक माण्डूक्य " । इनके सिवा कैवल्य, ब्रह्मबिन्दु, नृसिंहतापिनी, नारायण, मैत्रायणी, उपनिषदों पर भी शङ्कराचार्य के भाष्य गिने जाते हैं । कोई शिष्य अपने बनाये ग्रन्थों को गुरु के नाम से प्रसिद्ध कर देते हैं । सम्भव है कि जितने भाष्य शङ्कराचार्य जी के नाम से गिने जाते हैं सब उनके बनाये न हो। ऐसे कुछ नये रचित लेखों की भी उपनिषद् के नाम से प्रसिद्धि हो गई है, जो स्पष्ट आधुनिक हैं । यथा “अल्लोपनिषद्” यह मुसलमान बादशाहों के समय का रचा जान पड़ता है। ऐसी किम्वदन्ती है कि दक्षिण देश का एक पण्डित दिल्ली में बादशाह का दरबारी पण्डित बनाया गया था। उसका नाम शेख भावन था। वह मुसलमान हो गया था । अपने को निन्दा से बचाने के लिए और दूसरे पण्डितों को अपने साथी करने के उद्देश्य से शेख भावन ने एक अल्लोपनिषद् बना डाला । लुप्त उपनिषदों मे का यह भी एक माना गया। इसी तरह जब जिसका जी चाहा उसने उपनिषद् बना ली। अब और एक बात की जिज्ञाका पाठकों के चित्त में आ सकती है। हाँ, मुख्य उप- निषदों का प्रामाराय तो सब लोग मानते हैं। तत्त्वमस्यादि महावाक्यों को असल वेदा- न्तर्गत स्वीकार करते हैं। फिर सम्प्रदाय बहुत क्यों देख पड़ते हैं ? कारण यह है । विद्वानों की समझ और रुचि के अनुसार महावाक्यादिकों का अर्थ भिन्न भिन्न तौर से होने लगा। इसी से कई एक सम्प्रदाय खड़े भये।

[ ४ ] मुख्य तीन वेदान्ती सम्प्रदाय हैं । अद्वैतवाद, विशिष्टद्वैतवाद और द्वैतवाद। अद्वैतवाद-सर्व खल्विदं ब्रह्म-तत्त्वमसि-अहं ब्रह्मास्मि । इत्यादि महावाक्यों पर जो मत श्री शङ्कराचार्य ने चलाया उसको अद्वैतवाद कहते हैं । उस वाद का निष्कर्ष यह है । "ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या जीवो ब्रह्मैव केवलम्" । केवल ब्रह्म ही सत्य है । जो व्यक्त जगत् देख पड़ता है सो मिथ्या है । जीव और ब्रह्म एकही है। इस वाद के प्रवर्तक श्री शङ्कराचार्य जी का जन्म दक्खिन में मलावार प्रदेश में अब से १२०० वर्ष के लगभग समय में हुआ था। विद्वान् लोग कहते हैं कि इन्हीं के तर्क के प्रभाव से बौद्धों की जड़ भारत वर्ष से उखड़ गई । इन्होंने दिग्विजय करते हुए सेतु-बन्ध से कश्मीर तक वेदान्त की जय-पताका उड़ाई। मुख्य उपनिषदों का,वेदान्त- सूत्रों और गीता के भाष्य की रचना की। हिमालय में बद्रीनाथ जी के मन्दिर के कुछ इधर जो जोशीमठ नाम से अब तक प्रसिद्ध है, सो उन्हीं का प्रतिष्ठित वेदान्त-पीठ है । और भी तीन पीठ स्थापित किये । जगन्नाथपुरी द्वारकापुरी और शृङ्गेरी में । शङ्कराचार्य के प्रवर्तित इस जगन्मिथ्या वाद का दूसरा नाम मायावाद है। इस जीव-ब्रह्म का अभेद वाद और मायावाद सब आस्तिक विद्वानों को नहीं रुचा।काई २०० वर्ष परे श्रीरामानुजाचार्य इसके विरोधी खड़े भये । इन्होंने बौद्धायनादि पूर्वाचार्यों के मत को पुष्ट कर दूसरा वाद चलाया, जिसका नाम अब विशिष्टाद्वैत है । इनका सिंद्धान्त यह है। चित् (जीव) अचित् (जड़) और ईश्वर तीनों सत्य हैं चित् और अचित् ब्रह्म का शरीर है। ब्रह्म शरीरी है। प्रकृति और पुरुष मिल के एक ब्रह्म है। जैसे चना एक और उसमें दो दाल हैं। दोनों मिल कर एक चना बनता है। इसी तरह प्रकृति पुरुष भित्र भी हैं एक भी हैं। इसी से विशिष्टाद्वैत नाम पड़ा है। श्रीरामानुजाचार्य के वेदार्थ-संग्रह में यह श्लोक आया है। वासुदेवः परं ब्रह्म कल्याणगुणसंयुतः। भुवनानामुपादानं कर्ता जीवनियामकः । अब वासुदेव इस नाम का क्या अर्थ है । सर्वत्र वसति इति वासुः। वासुश्च असौ देवश्च वासुदेवः । सर्व व्यापक सर्वभूतान्तरात्मा स्वयंप्रकाश परमात्मा का नाम वासुदेव । वे सब कल्याणा के आधार हैं। सबलोक के उपादान कारण हैं । अर्थात् सब लोक उन्हीं के शरीर से निकले हैं। वही कर्ता हैं । अर्थात् उन्होंने गढ़ा भी है। इसी लिए वे उपादान और निमित्त कारण दोनों हैं। जीवों के नियामक हैं। बिना नियामक के सृष्टि चल नहीं सकती। अतः नियामक । और ब्रह्म । - । भगवत्प्रसाद से जीव जब परम गति को प्राप्त होता है तब भगवान में लीन होकर एकरूप होजा सकता है। श्री रामानुज मी दक्षिन में मदरास के समीप प्रदेश के थे।

[५] द्वैत वाद- । . पर द्वैत वादी यह ऐक्य नहीं मानते हैं। उनके मत में ईश्वर और जीवका सदा भेद बना रहता है। वे महावाक्यों का अर्थ भी अपने अनुकूल लगाते हैं। इस द्वैत वाद के प्रवर्तक भी उसी दक्षिखन देश के हैं। इनका नाम श्रीमध्वाचार्य था। ये श्रीरामानुज के परे पैदा हुए थे। शकान्द ११२१ में इनका आविर्भाव हुआ था। इन तीनों-सम्प्रदायों का जन्म स्थान दक्विन में हुआ। वहीं से चारों ओर भारत- वर्ष में इनका विस्तार हुआ। ब्रह्मोपनिषत्सार-संग्रह-दीपिका में जो श्रुतियाँ संगृहीत हैं उनकी दीपिका नाम टीका में सगुण उपासना की ओर झुकाव लक्षित होता है । ३१वी श्रुति में सगुण उपासना की अन्यतम विधि दी गई है। आत्म-समर्पण से बढ़ कर और क्या बलिदान जीव दे सकता है ? सो जब जीव ने यह भेंठ चढाई तब वह मोक्ष-पद का अधिकारी हुआ । यही आत्मसमर्पण रूप यज्ञ है परा भक्ति और परम ज्ञान जाकर एक ही जगह मिलता है। भक्त कहता है । मैं बिछुरा हुआ हूं। मुझसे विरह सहा जाता नहीं। ठाकुर जी ! आप अपने में मुझे मिला लीजिये। ज्ञानी कहता है। मैं भूला था। अपने को पृथक् समझा था, भला अब तो मालूम हुआ कि मैं भिन्न नहीं हूं। मैंने अज्ञानता से अपने को जुदा माना था। मैं कहाँ हूं ? आप ही तो हैं । या कहिये मैं ही हूं। तो आप अलग कहाँ हैं । मेरी भूल चली गई । सो अन्ततो गत्वा फल एक ही मिला । आनन्द-प्राप्ति मुख्य उद्देश्य दोनों श्रेणियों के खोजियों का है। अपनी अपनी रुचि के अनुसार साधक भिन्न भिन्न मार्ग को लेते हैं। शिव महिम्नस्तोत्र में अच्छा कहा है । “रुचीनां वैचित्र्याजुकुटिलनानापथजुषाम् । नृणामेको गम्यस्त्वमसि पयसामर्णव इव ॥" अपनी रुचि के भेद से मनुष्य सीधी टेढ़ी राह को लेता है । पर जैसे सब नदियाँ घूम घाम कर समुद्र में जा पहुँचती हैं इसी प्रकार सब उपासक हे परमेश्वर आप ही को पहुंचते हैं। शानी और भक्त दोनों को सकल वासना और अहन्ता के परित्याग करने का उपदेश है। बिना इनको त्याग किये संसार से मुक्ति कहाँ ? इन्हीं बातों का उपदेश ब्रह्मोपनिषत्सारसंग्रह में दिया गया है । सनातन से यही विधान चला आया है। यह नव विधान नहीं है। क्या उपनिषदों में, क्या गीता में वही उपदेश है। भक्तया त्वनन्यया शक्य अहमेवम्विधोऽर्जुन । ज्ञातुं द्रष्टुञ्च तत्त्वेन प्रवेष्टुञ्च परतंप ॥ गीता ११ ।२४ - । -- ।

श्रीः श्रीगणेशाय नमः ॥ श्रीब्रह्मोपनिषत्सारसङ्ग्रहदीपिका। यस्मिन्सर्वं यतः सर्व यः सर्व सर्वतश्च यः॥ यश्च सर्वमयो नित्यं तस्मै सर्वात्मने नमः॥ इह खलु सर्व खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन ॥ पुरुष एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यम् ॥ नारायण एवेदं सर्वं यद्भूतं यच्च भाव्यमित्यादिश्रुतिप्रतिपादितब्रह्मतत्वप्रद्योतक- सकलोपनिषत्सारब्रह्मविद्यासारसंग्रहश्रुतिसमुदायार्थज्ञातृबोधनाय यथामति दीपिका प्रद्योत्यते ॥ द्यां मूर्धानमिति ॥:- द्यां मूर्धानं यस्य विप्रा वदंति खं वै नाभिं सोमसूर्यों च नेत्रे दिशः श्रोत्रे यस्य पादौ तितिश्च ध्यातव्योसो सर्वभूतान्तरात्मा ॥१॥ असौ प्रकाशात्मा परमेश्वरः ॥ सगुणनिर्गुणस्वरूपतया व्यवस्थित इति ॥ ध्यातव्यो निर्णतव्यः ॥ तत्रादी सगुणात्मानं विवृणति॥ असौ कथंभूतः सर्वभूतान्तरात्मा ॥ सर्वभूतानि चराचरात्मकं विश्व अतः आत्मनि देहे यस्य । असो कः। विप्रा वेदविदः यस्य ब्रह्मणः द्यां स्वरितिमूनि मस्तकं वदन्ति उपदिशन्ति ।वदन्ति त्वनुवर्तनीयं । वै निश्चयेन खं नभ इति नाभिं । सोमसूर्या चन्द्रादित्यौ नेत्रे । दिशः श्रोत्रे करें । क्षितिश्च भूरिति यस्य पादौ वदन्ति । एवमेव चिद्रूपोत्तमाङ्गादिवर्णतया निर्गुणात्मानं वर्णयति । सर्वभूता- न्तरात्मा सर्वभूतेषु, समस्तावयवांत आत्मा चिद्रूपतया संप्रतिष्ठित इत्यर्थः । १ । एतदेव पुनरपि सगुणनिर्गुणात्मव्याख्यानतयाऽन्या श्रतिढयति ।

हि निश्चये एप सकलकषिविषयो नारायणः सर्वात्मकतया वरीवति । एष कथंभूतः। सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूतानि बीजांकुरवदंतरात्मनि हृदये यस्य । अथवा सर्वभूतेषु अंकुरजीजन्यायेन विद्रूपं यस्य तद्यथा । अस्येति संयोजयेत् । अग्निरस्य नारायणस्य मूर्द्धा मुखं भवति । चन्द्रसूया चक्षुषी भवतः । दिशः श्रोत्रे श्रवणे । वेदा ऋग्यजुःसामा- थर्वणः । अस्य वाग्विवृता वचनसमुदायो भवति । वायुरस्य प्राणः । विश्व दृश्यादृश्या- त्मकं स्थावरंजगमात्मकंच जगत् अस्य हृदयं । मनः सङ्कल्पविकल्पस्वरूपं भवति । पृथिवी- पातालादिसप्तपुरवती भूमिः । पद्भ्यां अस्य चरणौ भवतः । एतल्लक्षणतया सर्व ब्रहोति सिद्धमिति भावः ।। अथेदानीमस्य सर्वभूतात्मनो ब्रह्मणः पूर्वापरदिग्भागा अपि ब्रह्मवेत्याह श्रुतिः । ब्रह्मैव वेदममृतं पुरस्तात्पश्चाद्ब्रह्म दक्षिणतश्चोत्तरेण ॥ 'अधश्चोर्ध्व प्रसृतं तद्धि ब्रह्म ब्रह्मेवेदं विश्वमिदं वरिष्ठम् ॥३॥ (मुण्डक २।२।११।) वेदं चिद्रूपं अमृत कालाद्यपरिछिन्नं ब्रह्मैव पुरस्तात् अग्रतो भवति । पश्चादपि महोव । दक्षिणतश्च ब्रह्मैव । उत्तरतश्च ब्रह्मैव, अधश्च ब्रह्मैव । अर्ध्वं च ौव । अत्र दशदिङ्मययत्प्रसृतं विस्तरः। तदपि ब्रझैव । हि निश्चये इदं सदसत् दृश्यादृश्यं चराचरम् स्थूलं सूक्ष्मं च विश्वमपि ब्रह्मैव । अनेन प्रकारेण शेयज्ञानं वरिष्ठं श्रेष्टमित्यर्थः ।। इदानी ब्रह्मणः स्वरूपविषयमाह। बृहच्च तदिव्यमचिंत्यरूपं सूक्ष्माच्च तत्सूक्ष्मतरं विभाति ॥ दूरात्सुदूरेण तदिहांतिके च पश्यति हैव निहितं गुहायाम् ॥४॥ (मुण्डक ३. १७) तत्प्रसिद्ध ब्रह्म विभाति विशेषेण भासते । चकारः समुद्ययार्थः । तत्कथंभूतं बृहत्स्थू- लम् । यदुक्तं देदस्तुती । थुपतय एव से न ययुरंतमनततया । त्वमपि यदंतराण्डनिया ननु सावरणा इति । दिव्य स्वर्गादिकझानेन किञ्चिदनुमेयम् अतएवाचिंत्यरूपं इत्येतया- परिजेयविग्रहम् । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरम् परमाणुतोपि सूक्ष्मतरं अत्यंतसूक्ष्मम् । अथवा प्रणवोऽर्धामागतोऽप्यणु । अनेन स्वरूपमुक्तं विषय चाह । च पुनस्तदेय ब्रह्म दूरात्सुदूरेण अत्यन्तदूरमेव विभाति विराजते । यत इन्द्रियादिभ्योपि परतरं अगोचरं वास्ति । तदेव ब्रह्म इह प्रत्यक्षम् अन्तिके समीप एव यतस्तस्य चिद्रूपस्य सन्निधानतयाऽयोऽयस्कान्त- मणिवजीवादिदेहावसानं सर्व चेष्टते । ह निश्चये । ब्रह्मविदः सदेव ब्रह्म गुहायां निहितं कले- घरराजधानीमध्ये हृदयकमलासनोपविष्टं परति तदनुमापकैः तद्विधलक्षणतया निर्ण- तात्यर्थः । ४।

पुनरपि तस्य स्थितिमाह श्रुतिः । एको देवः सर्वभूतेषु गूढ़ः सर्वव्यापी सर्वभूतान्तरात्मा ॥ सर्वाध्यक्षः सर्वभूताधिवासः साक्षी चेता केवलो निर्गुणश्च ॥५॥ ( श्वेताश्वतर ६ । ११) तदेव ब्रह्म अकर्तृकत्वान्नपुंसकलिङ्गविषयम् कर्तृत्वाच्च पुंल्लिङ्गविषयम् । यतः अकर्ता घ स्वभावेन कर्ता चैव स्वभावतः इति न्यायात् तदेव ब्रह्मास्ति । कथंभूतः देवः क्रीड़नकः कथं क्रीडति एक एवानेकीभूय दीव्यति । तथा चैकोहं बहुस्यामिति श्रुतेः। सर्वभूतेषु गूढः अनेकदेहावरणानि कृत्वोपविष्टः । कुत्रोपविष्ट इत्यत आह सर्वव्यापी स्वं वत्सर्वव्यापकः । सर्व- व्याप्यपि सन्कुत्र तिष्ठतीत्यत आह सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूतानामाब्रह्मतृणपयन्तानां सकल- देहानामंतर्बहिरनुरोमं अंतरेव तिष्ठत्यात्मा स्वरूपं यस्य । कर्माध्यक्ष इत्यपि पाठे तु अयमर्थः उपाधिमधिष्ठाय तद्धर्मानीक्षते इत्यध्यक्षः भूतानां तत्कर्मणं तत्फलभोगानां च साक्ष्येव भव- त्यात्मा निरवयवत्वानिष्क्रियत्वाञ्च स्वयं कर्म किञ्चिन्न करोति नापि भुंक्त इत्यर्थः। सर्वा- ध्यक्षः सर्वजनानामध्यक्षः अधिकारी सालमनोरज्वालम्बकः । सर्वभूनाधिवासः सर्व- भूतानां समस्तजगतो निवासः ननु चेदीहग्विधं ब्रह्म तदानुलिहं स्यात् तस्मात्तदपि बंधन- विषयमेव नेत्याहयतःसाक्षी यःकश्चित्साक्षिभूतो भवेत्सोऽननुलिप्तो भवेत् तस्मान्मुक्त एव सः॥ ननु साक्षीमात्रत्वं कथं यतः चेता चिद्पः । अतरव केवल अनुलेपकारणदेहादिबुद्धिप- र्यवसानसकलपदार्थव्यतिरिक्तः। अतएव निर्गुणः सत्वादिगुणातीतः। चकारः समुदायार्थः॥५॥ ननु चैतद् ब्रह्म चिद्रूपादिगुणविशिष्टं तदानों स्थूलादिशून्यान्तविश्वं कुतः प्रवृत्त- न्तदाहश्रुतिद्वयम् ॥ तस्माच देवा बहुधा संप्रसूताः साच्या मनुष्याः पशवो वयांसि ।। प्राणापानी ब्रीहियवौ तपश्च श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्य विधिश्च ॥६॥ (मुण्डक २ 111) चकार एवकारार्थः तस्मात्प्रसिद्धाद् ब्रह्मण एच देवा ब्रह्माविष्णुमहेश्वरेन्द्रवलियमा- दयः बहुधा अनेकवर्णा अनेकगतयोनतकर्माणः संप्रसूताः समुत्पन्नाः । तथैव साध्यादिदेव- मनुष्यपशुपक्षिणश्च तस्मादेव जाताः । प्राणापानावित्युपलक्षणं अण्डजादिचतुर्विधसृष्टि- चेष्टार्थं प्राणापानादिदशविधो वायुस्तस्मादेव समुत्पनः । ब्रीहियवावित्युपलक्षणं एतादृशवि- श्वपरिरक्षणार्थं व्रीह्यादिकं बहुविधमन्नमपि तस्मादेव जातं । च पुनः तेषां भूतानां चलप्रक- तीनाकत्र स्थित्यर्थ बलीवर्दगोदामवत्तपः श्रद्धा सत्यं ब्रह्मचर्यादिविधिश्चैतेषां विधानं च तस्मादेव जातमित्यर्थः ॥६॥ अतः समुद्रा गिरयश्च सर्वे अस्मात् स्पंदते सिंधवः सर्वरूपाः॥ अतश्च सर्वा ओषधयो रसाश्च येनैष भूतैस्तिष्ठते ह्यतरात्मा ॥७॥ (मुण्डक २ । १।६) अतो ब्रह्मणः समुद्रा अस्य जगतः परिभूषणार्थे समस्तरत्नाकराः तथैव गिरयः सुमेरु- हिमाचलादयः सुवर्णाद्याकरा अस्य जनस्य व्यवहारार्थं संजाताः । अस्माद् ब्रह्मण एव सर्व- रूपाःसिंधवः नाम गुणविशिष्टा गङ्गादिसरितः अस्य जगतः पापादिशोधनार्थ स्वर्लोकप्राप्त्यर्थं चस्पंदन्ते । च पुनः अतो ब्रह्मणः सर्वा ओषधयः अस्य लोकस्य दुष्कृतकर्मफलभोगयथाप्रा- तबहुविधरोगनिवृत्त्यर्थं समुत्पन्नाः । अस्माद् ब्रह्मण एवास्य विश्वस्य सुकृतकर्मफलभोगार्थं मधुरादिषट्रसाश्च समुत्पन्नाः। ननु तद्ब्रह्म किमत आह येनहेतुना भूतैः कारणादिकार्यान्तैः पदार्थैस्तिष्टते जीवंत इत्यर्थः । ननु तद् ब्रह्म कुत्र वर्तत इत्यत्राह । अप्रच्छिन्नस्वरूपः सर्वेषां प्राणिनामंतरात्मा हृत्कमले.पर्युपविष्ट इत्यभिप्रायः ॥७॥ नन्वनेन ब्रह्मणा भित्तिरागलेखनीयुतचित्रकृञ्चित्रघजगच्चित्रमुत्पादितं किं नेत्याह श्रुतिः॥ यथा सुदीप्तात्यावकाद्विस्फुलिङ्गात्सहस्रशः प्रभवंते सरूपाः॥ तथाक्षराद्विविधाः सौम्यभावाः प्रजायंते तत्र चैवापियांति॥८॥ (मुण्डक २ ।।1) यथा सुदीप्ताल्दुकर्षण प्रज्वलितात्पावकात् वहर्विस्फुलिङ्गा अग्निकणाः सहरूशः अनेकशः प्रभवंति जायंते कथंभूताः सरूपाः कनककङ्कणादिवन्मृद्घटादिवच्च जलार्मि- वञ्च तद्रूपाः तत्रैव लीयंते चेति शेषः । हे सौम्येत्येकवचनमुपलक्षणम् हे सत्वस्थिता लोकाः तथैवाक्षरादविनाशिना ब्रह्मतत्वात् विविधा नाना प्रकारा भावा भूतानि तद्रूपाणि प्रजायंते तत्र चैव ब्रह्मतत्त्व एव च अपियांति लीयंत इत्यर्थः॥ ८॥ नन्वद्भुतशक्तिमद्ब्रह्म कथं ज्ञेयमित्यत्राह। एषोणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्शुद्धे विभवत्येष अात्मा ॥६॥ (मुण्डक ३ । १।१।) एष आत्मा प्रत्यक्षरूपः स्थूलरूपः अणुश्च सूक्ष्मतमश्च अतएवाद्भूतस्वरूपं ब्रह्म चेतसा शुद्धमनसा वेदितव्यः यस्मिन् शुद्धमनसि प्राणःश्वासरूपो वायुः पञ्चधा प्राणपान समानोदानव्यानादिप्रकारैः संविवेशोपविष्टो भवति । यस्मिंश्च प्रजानां समस्तभूतानां- प्राणः श्वासः चिर शुद्धमशुद्धमतदच उक्तं चोपनिषत्सु । मनाहि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धंचाशुद्ध मेव च । अशुद्धं कामसंकल्प शुद्ध कामविवर्जितमिति । सर्वशब्देन च दशविधकारणादि च नेयम् एतत्सर्वोतप्रोत सेनैव सर्वेषां प्रवृत्तिरिति भावः यस्मिन् विशुद्ध सति आदर्श प्रतिविम्बमिव एष आत्मा प्रकाशस्वरूपं ब्रह्माविर्भवति प्रादुर्भवतीत्यर्थः ॥९॥ नन्वेकमेवाद्वितीयं ब्रह्मेत्यादि श्रुतिसमुदाये न ब्रह्मण एकत्वमुक्तं चेदेवं तदुश्चनीचत्वं स्थूलसूक्ष्मन्वं चास्य कथमित्यत्राह ।

अग्निर्यथैको भवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपं बभूव ॥ एकस्तथा सर्वभूतांतरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥ (कठवल्लो ५।।) यथैको अग्निभवनं गृहं प्रविष्टो दाहको भवेत् तदा रूपं रूपं गृहस्योञ्चनीचस्थूल- सूक्ष्मस्थानान्देव रूपाणि तेषु तेषु प्रतिरूपस्तत्तदनुरूपो बभूव जायते तथैवैको नारायणः सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूतेषु तिष्ठमानः रूपं रूपं अंतरुदारमनस्कतया बहिश्च गजमशक- देहेषु उच्चनीचजातिषु च प्रतिरूपस्तद्रूपस्तादृग्रुपश्च जातो भवतीत्यर्थः ॥१०॥ ननु सर्वव्यापको नारायणस्तदानुलिप्तः स्यादेव नेत्याह श्रुतिः । सूर्यो यथासर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यतेचाक्षुपैर्वाह्यदोषैः ॥ एकस्तथा सर्वभूतांतरात्मा न लिप्यते लोकदुःखन बाह्यः ॥११॥ (कठवल्ली ५।११।) यथा सर्वलोकस्य चक्षुः यतश्चक्षुषामंतर्देवतारूपेण सूर्यो निवसति । तत्प्रकाशेन नेत्रं पश्यति अतएव सर्वलोकस्य चक्षुः सूर्यः चाक्षुषैर्नेत्रोद्भवैर्वाह्यदोषैः मांसरुधिराश्रुभिः अथवा पवित्रापवित्रपदार्थर्न लिप्यते तथा सर्वभूतान्तरात्मैको नारायणा न लिप्यते यतः सर्वलोकानामध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकरूपेण त्रिविधेन दुःखेन बाह्याः व्यतिरिक्तो मुक्त एवेत्यर्थः॥११॥ ननु चेदेकमेवाद्वितीयं ब्रह्म तदा स्वर्गादिकं किं पृथग्भासते इत्यत्राह श्रुतिः । न च दिवो देवजनोन गोता न चान्तरिक्षाणि न च भूमय इमा ॥ यस्मिन्निदं सर्वमोतप्रोतं च प्रोतं तस्मादन्यन्नपरं किञ्चनास्ति ॥१२॥ दिवः स्वमहोजनस्तपः सत्यमिति स्वर्गलोकास्तस्माद्ब्रह्मणः पृथक न संति न च तद्रोप्ता देवजनः तत् स्वर्गादिपालको ब्रह्मादिदेवगणाः पृथगस्ति न चान्तरिक्षाणि अमेकप्रका- रत्वाद्वहुवचनम् भुवो लोकः पृथगस्ति । न चेमा भूमयः सतपातालसहितो भूर्तीकः पृथ- गस्ति किन्तु यस्मिन् ब्रह्मणि सर्वमिदं सकलं चराचरं देवतियंगादिरूपं जगत् ओतप्रोतं-च यथा पटः सूत्रतंतुभिरोतः प्रोतश्च नानाभिधाना जायते तद्वदनकरूपाभिधानैब्रह्मैव भातीति भावः अतः कारणाद्ब्रह्मणोन्यदिदं नास्ति अथैव तस्माद् ब्रह्मणः परं किञ्चन नास्तीत्यर्थः ॥ १२ ॥ ननु कीदृशं ब्रह्मास्तीत्यत आह । न तत्र सूर्योभाति न चन्द्रतारकं नेमे विद्युतोभान्ति कुतोयमग्निः ॥ तमेव भांतमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१३॥ (मुण्डक २ । २।१०) - ( ४ ) अतो ब्रह्मणः समुद्रा अस्य जगतः परिभूषणार्थे समस्तरत्नाकराः तथैव गिरयः सुमेरु- हिमाचलादयः सुवर्णाद्याकरा अस्य जनस्य व्यवहारार्थं संजाताः । अस्माद् ब्रह्मण एव सर्व- रूपाःसिंधवः नाम गुणविशिष्टा गङ्गादिसरितः अस्य जगतः पापादिशोधनार्थं स्वर्लोकप्राप्त्यर्थ चस्पंदन्ते। च पुनः अतो ब्रह्मणः सर्वा ओषधयः अस्य लोकस्य दुष्कृतकर्मफलभोगयथाप्रा- तबहुविधरोगनिवृत्यर्थं समुत्पन्नाः । अस्माद् ब्रह्मण एवास्य विश्वस्य सुकृतकर्मफलभोगार्थ मधुरादिषट्रसाश्च समुत्पन्नाः। ननु तद्ब्रह्म किमत आह येन हेतुना भूतैः कारणादिकार्यान्तैः पदार्थैस्तिष्टंते जीवंत इत्यर्थः । ननु तद् ब्रह्म कुत्र वर्तत इत्यत्राह । अप्रच्छिन्नस्वरूपः सर्वेषां प्राणिनामंतरात्मा हृत्कमले पर्युपविष्ट इत्यभिप्रायः ॥७॥ नन्वनेन ब्रह्मण भित्तिरागलेखनीयुतचित्रकृच्चित्रघजगचित्रमुत्पादितं नेत्याह श्रुतिः॥ यथा सुदीप्तात्पावकाद्विस्फुलिङ्गात्सहस्रशः प्रभवंते सरूपाः॥ तथाक्षराद्विविधाः सौम्यभावाः प्रजायंते तत्र चैवापियांति॥८॥ (मुण्डक २।१।१) यथा सुदीप्ताल्दुकर्षेण प्रज्वलितात्पावकात् वह्नविस्फुलिङ्गा अग्निकणाः सहस्रशः अनेकशः प्रभवंति जायंते कथंभूताः सरूपाः कनककङ्कणादिवन्मृद्घटादिवञ्च जलामि- वञ्च तद्रूपाः तत्रैव लीयते चेति शेषः । हे सौम्येत्येकवचनमुपलक्षणम् हे सत्वस्थिता लोकाः तथैवाक्षरादविनाशिनी ब्रह्मतत्वात् विविधा नाना प्रकारा भावा भूतानि तद्रूपाणि प्रजायंते तत्र चैव ब्रह्मतत्त्व एव च अपियांति लीयंत इत्यर्थः॥ ८॥ नन्वद्भुतशक्तिमद्ब्रह्म कथं शेयमित्यत्राह । एषोणुरात्मा चेतसा वेदितव्यो यस्मिन्प्राणः पञ्चधा संविवेश । प्राणश्चित्तं सर्वमोतं प्रजानां यस्मिन्शुद्धे विभवत्येष श्रात्मा ॥६॥ (मुण्डक ३ । १।।) एष आत्मा प्रत्यक्षरूपः स्थूलरूपः अणुश्च सूक्ष्मतमश्च अतएवाद्भूतस्वरूपं ब्रह्म चेतसा शुद्धमनसा वेदितव्यः यस्मिन् शुद्धमनसि प्राणःश्वासरूपो वायुः पञ्चधा प्राणपान समानादानव्यानादिप्रकारैः संविवेशोपविष्टो भवति । यस्मिंश्च प्रजानां समस्तभूतानां- प्राणः श्वासः चित्र शुद्धमशुद्धमतदच उक्तं चोपनिषत्सु । मनोहि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धचाशुद्ध मेव च । अशुद्धं कामसंकल्प शुद्ध कामविवर्जितमिति । सर्वशब्देन च दशविधकारणादि च ज्ञेयम् एतत्सर्वोतप्रोत सेनैव सर्वेषां प्रवृत्तिरिति भावः यस्मिन् विशुद्ध सति आदर्श प्रतिविम्वमिव एष आत्मा प्रकाशस्वरूपं ब्रह्माविर्भवति प्रादुर्भवतीत्यर्थः ॥९॥ नन्वेकमेवाद्वितीयं ब्रह्मेत्यादि श्रुतिसमुदाये न ब्रह्मण एकत्वमुक्तं चेदेवं तदुश्चनीचत्वं स्थूलसूक्ष्मत्वं चास्य कथमित्यवाह ।

) (कळवल्लो ५ ।।) (कठवल्ली ५।११।) अग्निर्यधैको भवनं प्रविष्टो रूपं रूपं प्रतिरूपं बभूव ॥ एकस्तथा सर्वभूतांतरात्मा रूपं रूपं प्रतिरूपो बहिश्च ॥१०॥ यथैको अग्निभवनं गृहं प्रविष्टो दाहको भवेत् तदा रूपं रूपं गृहस्योञ्चनीचस्थूल- सूक्ष्मस्थानान्येव रूपाणि तेषु तेषु प्रतिरूपस्तत्तदनुरूपो बभूव जायते तथैवैको नारायणः सर्वभूतान्तरात्मा सर्वभूतेषु तिष्ठमानः रूपं रूपं अंतरुदारमनस्कतया बहिश्च गजमशक- देहेषु उच्चनीचजातिषु च प्रतिरूपस्तद्रूपस्तादृग्रूपश्च जातो भवतीत्यर्थः ॥१०॥ ननु सर्वव्यापको नारायणस्तदानुलिप्तः स्यादेव नेत्याह श्रुतिः । सूर्यो यथासर्वलोकस्य चक्षुर्न लिप्यतेचाक्षुषैर्बाह्यदोषैः ॥ एकस्तथा सर्वभूतांतरात्मा न लिप्यते लोकदुःखेन बाह्यः ॥११॥ यथा सर्वलोकस्य चक्षुः यतश्चक्षुषामंतर्देवतारूपेण सूर्यो निवसति । तत्प्रकाशन नेत्रं पश्यति अतएव सर्वलोकस्य चक्षुः सूर्यः चाक्षुपैर्नेत्रोद्भवैर्वाह्यदोषैः मांसरुधिराश्रुभिः अथवा पवित्रापवित्रपदार्थेन लिप्यते तथा सर्वभूतान्तरात्मैको नारायण न लिप्यते यतः सर्वलोकानामध्यात्मिकाधिभौतिकाधिदैविकरूपेण त्रिविधेन दुःखेन बाह्याः व्यक्तिरित्तो मुक्त एवेत्यर्थः ॥११॥ ननु चेदेकमेवाद्वितीयं ब्रह्म तदा स्वर्गादिकं किं पृथग्भासते इत्यत्राह श्रुतिः। न च दिवो देवजनो न गोप्ता न चान्तरिक्षाणि न च भूमय इमा ॥ यस्मिन्निदं सर्वमोतप्रोतं च प्रोतं तस्मादन्यन्नपरं किञ्चनास्ति ॥१२॥ दिवः स्वर्महाजनस्तपः सत्यमिति स्वर्गलोकास्तस्माद्ब्रह्मणः पृथक् न संति न च तद्रोप्ता देवजनः तत् स्वर्गादिपालको ब्रह्मादिदेवगणाः पृथगस्ति न चान्तरिक्षारण अमेकप्रका- रत्वाद्वहुवचनम् भुवा लोकः पृथगस्ति । न चेमा भूमयः सप्तपातालसहितो भूर्तीकः पृथ- गस्ति किन्तु यस्मिन् ब्रह्माण सर्वमिदं सकलं चराचरं देवतिर्यगादिरूपं जगत् ओतप्रोतंच यथा पटः सूत्रतंतुभिरोतः प्रोतश्च नानाभिधाना जायते तद्वदनेकरूपाभिधानैौव भातीति भावः अतः कारणाद्ब्रह्मणोन्यदिदं नास्ति अथैव तस्माद् ब्रह्मणः परं किचन नास्तीत्यर्थः ॥ १२ ॥ ननु कीदृशं ब्रह्मास्तीत्यत आह । न तत्र सूर्योभाति न चन्द्रतारकं नेमे विद्युतो भान्ति कुतोयमग्निः । तमेव भांतमनुभाति सर्वं तस्य भासा सर्वमिदं विभाति ॥१३॥ (मुष्टक २१२।१०) - । सूर्यः तत्र स्वप्रकाशे ब्रह्मणि सूर्याने दीपवत् सूर्यादीनामभाववादद्वितीयत्वाच न भाति । एवमेव चन्द्रोडुगणे सौदामिन्यश्च न भांति यत्र मर्यादयः प्रकाशस्वरूपा न भांति तत्रदाश्रितोयमग्निः कुतो भासते। तमेव भांतंतद्ब्रह्मव भांतं प्रकाशमानं अनुपश्चात्सूर्यानु- सोमवत्सर्व सूर्यादिकं भाति । एतद्विवृतिर्यथा तस्य ब्रह्मण भासा तेजसा सूर्यादिवत् इदं सर्व मायारूपेणध्वांततमसा वृतं स्थावरान्तं विश्वं विभाति विभागतया भासते इत्यभिप्रायः॥ ३॥ ननु न तद्भाससे सूर्य इत्यनेन श्रीमद्भगवद्वाक्यन सूर्यादीनामपि तत्पृथक्सत्ता स्यादित्यनु- मीयते नेत्याह श्रुतिः। न तस्मात्पूर्व न परं तदस्ति न भूतं नोतभव्यं यदासीत् ॥ महत्पादेनैकमूर्धा च व्यासं स एवेदमावरीवर्ति भूतम् ॥१४॥ तस्माद् ब्रह्मणा व्यतिरिक्तं तन्न पूर्वमासीत् परमपि तन्नास्ति स्यात् यद् ब्रह्मव्यतिरिक्त भूतमपि नास्ति उतभव्यं भविष्यदपि न स्यात् अत्रैतदृढ़ीकरणार्थं पुनरुक्तम् । पुनः किमस्ती- त्याह येन ब्रह्मणा महद्विस्तीर्ण विश्वं पादेनैकमू व अध ऊर्ध्वञ्च व्याप्त स एवेदं भूतं संपन्नं विश्वमावरीवर्ति आसमंताद् ब्रह्मादितृणावसानं तद् ब्रह्मैव वर्तते इत्यभिप्रायः॥ १४ ॥ ननु सर्व खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किंचनेति श्रुतिवाक्ये चेत् सत्यम् तदा तत्सर्वेषी दर्शनग्रहणवचनविषयं किं न जायते इत्यवाह श्रुतिः । न चक्षुषा गृह्यते नापि वाचा नान्यदेवैस्तपसा कर्मणा वा ॥ ज्ञानप्रसादेन विशुद्धसत्वस्ततस्तुतं पश्यति निष्कलं ध्यायमानः (मंद्रकश्रुतिः) तद्ब्रह्म चक्षुषा न गृह्यो दृश्यते यतादर्शनः त्रिपुटीविषयः तत्र त्रिपुड्यभावाद् दर्शनाभावः । एवमेव नापि वाचा वर्ण्यते न चान्यैर्देवैरिन्द्रियैर्शायते न तपसा नियमैःन कर्मा नित्यनैमित्तिककर्मणा वशीक्रियते । ननु पुनस्तत्केन लभ्यत इत्यत आह शानमेव भगवत्प्रसादः तेन विशुद्धसत्वा निर्मलमनस्को मानव इति शेषः ततस्तु तस्मादनन्तरं तं श्रीभगवंत पश्यति सर्व खल्विदं ब्रह्मेति भासते कथंभूतः पुरुषः आदौ निष्कलं गुणातीतं ब्रह्म ध्यायमानश्चिन्तयान इत्यर्थः, तस्मादीगज्ञानी यः स परमानन्दनिमग्नः स्यादित्याह धृतिः ॥१५॥ यो योनि योनिमधितिष्ठत्येको यस्मिन्निदं संच विचैति सर्वम् ॥ तमीशानं वरदं देवमीड्यं निचाय्येमां शांतिमत्यंतमेति ॥१६॥ (श्वेताश्वतर ४ ! ११) य एक एव यानि योनि सकलदेहमध्ये तिष्ठति येन हेतुना इदं सर्व विचरति चेयते यः सर्वः सर्वमयो भवति तं श्रीभगवन्तं ईशानं कर्तुमकनु व्याकर्तुं समर्थ वरदं देवं कीड़कं (७) । ईडय स्तुतियोग्य निचाय्य निर्णीय इमां शांति द्वैतशमनेन परमेश्वरभासनेन च परमानन्द- सत्तामत्यंतं निःसीमां एति प्राप्नोति ॥१६॥ पुनरप्येतदेव विवृणोत्यन्या श्रुतिः । अणोरणीयान्महतो महीयान्नात्माऽस्य जन्तोनिहितो गुहायाम्॥ तमक्रतुं पश्यति बीतशोको धातुः प्रसादान्महिमानमात्मनः॥१७॥ ( कठवल्ली २ १ २०१) यः परमेश्वरः प्रणेलाग्रसहस्रभागादपि अणीयान्सूक्ष्मतरः तथा च महतो ब्रह्माण्डादपि स्थूलतमः नन्देतादृशः परमेश्वरः क इत्यत्र आह अस्य विश्वस्य आत्मा । ननु सं कुत्र वर्तते इत्यत आह जंतोः प्राणिनो गुहायां हृदयसिंहासने उपविष्टः। तमक्रतुमकर्तारं तत्त्ववित्पश्यति ईश्वरस्य कर्ता कार्य कुतः स्यात् चेदियं त्रिगुणमयी माया सा तु मायैव तस्माद्विश्वाभावात्केवलेश्वरस्थितित्वाच मोहशोकावकाशो नास्तीति निश्चिनोति ततो वीतशोको निवृत्तशोकमाहः स्यात् । परमेश्वरस्य झानात्मप्रसादादात्मनो ब्रह्मणो महिमान स्वकीयमाहात्म्यं च पश्यतीत्यर्थः ॥१७॥ ननु चेदयं परमेश्वरः सर्वात्मा तदा समस्तप्राणिसुलभः स्यान्नेत्याह श्रुतिः । नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुनाश्रुतेन ॥ यमेवैष वृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनुं स्वाम् ॥१८॥ (कठवल्ली २ १ २३ ।) अयमात्मा प्रवचनेन बहुकीर्तनेन न लभ्य । न लभ्य इति सर्वत्र योज्यम् न मेधया व्यावहारिकमहामत्यापि च पुनः बहुना श्रुतेन अतिशास्त्रश्रवणेनापि न । ननु सर्वे वेदाः सर्वे मुनयः एतानेवोपायात्कथयति तत्र निर्णयमाह । एष आत्मा यमेवानुग्रहता वृणुते वांछति तस्यैवैष आत्मा स्वां तनु स्वस्वरूपं विवृणुते दत्तेत्यर्थः ॥ १८॥ अथेदानीमात्मज्ञानिनामेव परमानन्दोदय इत्याह श्रुतिः । एको वशी सर्वभूतान्तरात्मा एकं रूपं बहुधा यः करोति । तमात्मस्थं येन पश्यति धीरास्तषां सुख शाश्वतं नेतरेषाम् ॥१६॥ (कठवल्ली ।।१२।) या वशी जितेन्द्रियो भूत्वा स्वतंत्र एकः सन्सर्वभूतांतरात्मा य एक रूपं नटवद् बहुधा करोति तमीश्वरं अात्मस्थं सर्वभूतहृदयस्थं ये शानिनो अनुपश्यति जानति त एव धीराः शोकमोहरहिताः तेषामेव शाश्वतं सनातनं सुखम् इतरेषामनात्ममानिना नेत्यर्थः ॥१९॥ तदेव हृदयति श्रुतिः ।

नित्यो नित्यानां चेतनचेतनानामेको बहूनां यो विदधाति कामान् ॥ तमात्मानं येनुपश्यति धीरास्तेषां शांतिः शाश्वती नेतरेषाम् ॥२०॥ (कठवल्ली ५११३।) योऽनित्यानां देहानां मध्ये नित्योऽविनाशी । चेतनानां प्राणेन्द्रियाणं च चेतनश्चेत- यिता। च पुनरेकः सन् बहूनामसंख्यानाम् जनानां कामान्मनारथान् विदधाति करोति ददाति । तमेव प्रसिद्धं श्रीनारायणं आत्मानं सर्वभूतात्मानं ये आत्मज्ञानिनोऽनुपश्यंति विजानति तएव धीराः । सेषामेव शाश्वती सदावर्तिनी शान्तिः परमानन्दावाप्तिर्जायते नेतरेषां देहाभिमानिनामित्यभिप्रायः ॥ २० ॥ ननु श्रीनारायण इतरमाणिवाकरचरणादिभिः किं व्यपहरति नेत्याह श्रुतिः। श्रपाणिपादो जवनो ग्रहीता पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः ॥ स वेत्ति विश्वं न च तस्यास्ति वेत्ता तमाहुरय्यं पुरुषं पुराणम् ॥२१॥ (श्वेताश्वतर ३ । १६) स परमेश्वरः अपाणिपादः करचरणादिरहितोपि ग्रहीता सर्वग्राहकः । जवनश्च वायुवत् सर्वत्र गंता च । अचक्षुः सर्व पश्यति । अकर्णः सर्व शृणोति विश्वं दृश्यादृश्य जगत् अन्तर्बहिश्च वेति जानाति तस्य ब्रह्मणो वेत्ता ज्ञापको न कश्चिदस्ति । तमेव श्रीनारायणं क्रीडाकार्यमावतः श्रीवासुदेवादिनामक परमार्थतस्त्वनामकम् अत्र्यं आदि- कर्तारम् पुराणं चिरंतनं अथवा पुरापि अयं नवीनं नतु जीर्ण पुरुष बलवत्तरसत्तया सत्वादित्रिगुणमयो मायाजेतारमात्मानं ब्रह्म ब्रह्मविद आहुर्वर्णयंतीत्यभिप्रायः ॥२१॥ नन्वेको नारायणः स्वात्मानं बहुविधं विधाय तिष्ठतीत्यत्राह । श्रोत्रस्य श्रोत्रं मनसो मनो यद्वाचो ह वाचं सउ प्राणस्य प्राणः॥ चक्षुषश्चक्षुरिति मुच्य धीराः प्रत्यास्माल्लोकादमृता भवति ॥२२॥ (केनोपनिषत् ।। २१) यः श्रोत्रस्य कर्णस्य मध्ये कर्णभूय स्थितः । मनोमध्ये मनः । वचो मध्ये वाक् । स एव प्राखस्यमध्ये प्रायः। चक्षुर्मध्ये नयनं इति मुच्य वुवा शात्वा तिष्ठति तएव धीराः अस्मालोकादितो लोकात् देहाद्वा प्रैत्य प्रकर्षण एत्य गत्वा आवरणमलात्मकाहंवासनां संत्यज्याऽमृताः जन्ममरणादिवश्याः पुनर्न भवंतीत्यर्थः ॥२२॥ इदानों शुद्धो देव एको नारायणा न द्वितीयोस्ति कश्चित् इति नारायणापनिषदि वर्णितं तदेव दृढ़यति श्रुतिः। यस्मात्परंनापरमस्तिकिञ्चिदस्मान् नाणीयोनज्यायोस्ति कश्चित् ॥ वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येकस्तेनेदं पूर्ण पुरुषेण सर्वम् ॥२३॥ (श्वेताश्वतर ३ । । ।) ।

यस्माद् ब्रह्मणः परं सूक्ष्मकिञ्चिन्नास्ति।अपरं चस्थूलं किञ्चिन्नास्ति । यस्माद् क्षणो ऽणीयोऽश्रेष्ठं किञ्चिन्नास्ति । ज्यायःश्रेष्टमपि किश्चिन्नास्ति । स्तब्धी नोवृक्ष दोशने दिवी- त्युपलक्षणं दिवादिषु सकलभुवनेषु स एनेको नारायणस्तिष्ठति उपविष्टो भवति । पुनरपि तदेव प्रकटयति तेन प्रसिद्धेन पुरुषेण पुरि पुरि वसतीति पुरुषस्तेन ब्रह्मणा इदं सर्वं सद- सत् परमपरं चराचरं दृश्यादृश्यं विश्वं इक्षुरसशर्करादिवत्पूर्ण व्याप्तमित्यर्थः ॥२२॥ ब्रह्मणो व्यतिरिक्तं किञ्चिन्नास्तीत्याह श्रुतिः । नान्योतोस्ति कर्तानान्योतोस्ति द्रष्टा नान्योलोस्ति श्रोता नान्योतो- स्ति मंता। नान्योतोस्ति विज्ञाता एप त बारांतर्याम्यमृतः ॥२४॥ (वृहदारण्ये ३१७:२३१) अतो ब्रह्मणोऽन्यस्तद्वतिरिक्त इतरः कर्ता नास्ति । तथैवानो ब्राणोऽन्य इतरो द्रष्टा नास्ति । एवमेवातोऽन्यः श्रोता नास्ति। च पुनरता ब्रह्मणोऽन्यो मंता विमई को नास्ति । अतोऽन्यो विशाता निर्णता नास्ति अनेककरनयनादिमनीपावसानसकलकरणामतत्वं तदाधिष्टातृत्वं च तस्येति वर्णितम् । हेलोवेतिशेषः । एष अपनस्वरुपः अमृतः जन्ममरणादिपविकार- रहित ते तवांतर्यामी आब्रह्मास्तम्मपर्यन्तानां प्राणिनां सर्वत्र सर्वरूपे भूत्या गुरुवदुपदेशको हृन्मध्ये स्थित इत्यर्थः ॥२४॥ तटस्थलक्षयामाह । यतो वा इमानि भूतानि जायते येन जातानि जीवन्ति ।। यत्प्रयंत्यभिसंविशति तद्विजिज्ञासस्व तद्ब्रह्म ॥२५॥ (तैत्तिरीय ३११/३१) वा निश्चये यसो ब्रह्मण इमानि भूतानि जायंते येन जातानि जीवंति यज्ञमणि जातानि संप्रयति लीना भवंति च पुनरभिविशंति समुद्रे तरक्षा इव तन्मयो भवति है चित्तेतिशेषः । तद्विजिशासस्व जानीहि यत्तदेवब्रह्मत्यभिप्रायः ॥ २५ ॥ तथैवान्यच्च लक्षणमाह। मनोमयः प्राणशरीरनेता प्रतिष्ठितोन्तर्हदयं निधाय ॥ तद्विज्ञानेन परिपश्यति धीरा अानन्दरूपममृतं यद्विभाति ॥२६॥ (मुण्डक २२७१) स परमेश्वरो मनोमयो मनोरूपी भूत्वा प्राणशरीरनेता प्राणस्य दशविधस्य शरीरांतस्थस्य वायाः शरीरस्य च नेता अश्वसारथिवत्प्रेरकः । स एव महाराजवत् देहप्रसादांतर्वर्सिहदयसिंहासनं निधाय प्रतिष्ठितः सर्वत्राज्ञां करोति । तदेव ब्रह्म धीरा ब्रह्मातिरिकाभावक्षानतयाऽमेाहिता विज्ञाने नेहशेन निर्णयेन परिपश्यंति जानन्ति । ननु की- दृशं पश्यतीत्यत्राह । तेषां ब्रह्मज्ञानिनां तद्ब्रह्म आनन्दरूपं यथा नटकृतं शृंगारादिरसभा केवलं नानंदविषयः अपि तु भयानकरौद्ररसभावोप्यानंददो भवति तद्वदुःखादिष्वपि सुखरूपं यत अमृत रोगात्मकं यमदूतकृतदुःस्त्रयुतमरणास्पृष्टं विभाति विशेषेसात्म- भूतस्वरूपतया भासत इत्यर्थः ॥ २६ ॥ ननु चेत्सर्वत्र स एव नारायणस्तदा कथन्न दृश्यते तत्राह श्रुतिः। एप सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ॥ दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥२७॥ ( कठवल्ली ३।१२।) स्थूलदेहे दृष्टिर्येषां तैर्दैहदृष्टिभिः एष प्रत्यक्षोऽयमात्मा न प्रकाशते सर्वेषु भूतेषु ब्रह्मादितृणपर्यन्तेषु देहेषु गूढात्मा देहजवनिकया गूढो गुप्तः आत्मास्वरूपं यस्य । च पुनः सूक्ष्मचैतन्ये दर्शनं दृष्टियेषां तैश्चैतन्यदृष्टिभिः पुरुषैः एष प्रकाशस्वरूप आत्मा दृश्यतेनु- मीयते । कया अश्यया सात्विक्या सूक्ष्मया वुद्धरा धारणवत्या धिया पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वादिति न्यायवत् । चेकश्चिञ्चिद्रूपो न विद्यते तदा जड़स्वरूपा-देहादिबुद्धरताः सर्वे मावाः कथं चेष्टां कुर्युः तस्माच्चिद्रूपं ब्रह्मवास्ति इत्यभिप्रायः ॥२७॥ ननु देवादयोपि कर्तृत्वादिप्रकृतयः स्वतंत्राः संति कथं सर्व भावा जड़स्वभावा- स्तत्राह श्रुतिः । भीषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः ॥ भीषास्मादिन्द्रश्चाग्निश्च मृत्युर्धावति पंचमः ॥२८॥ (तैत्तिरीय रा८111) अस्मादितिपञ्चमी षष्टीविषयेऽस्य ब्रह्मणो भीषा भयेन सूर्यः उदेति प्रकाशते । अस्य भीवेन्द्रो वर्षति । अस्य भीषाग्निः प्रज्वलति । चेत्ते स्वतंत्राः स्युस्तदास्वकीयपूर्णबलवत्वं कथं न प्रकाशयेयुः। एवमेव पंचमा मृत्युर्यमास्य भीषैव संहर्तेति शेषः । अनेन ब्रह्मादिस्थावरांताः सकलपदार्थाः कंदुकवत्कीड़ा विषयाः । क्रीड़कस्तु स्वतन्त्रः स्वयमेको नारायण इत्यभि- प्रायः॥ २८॥ इदानी यतः सर्वगुणविशिष्टश्चिद्रूपः । स्वतंत्रोयमेकः श्रीनारायणस्तस्मात्तस्य शरणत्वमेव महानुपाय इत्याह । यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदान्प्रहिणोति तस्मै ॥ तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुनुर्वै शरणमहं प्रपद्ये ॥२६॥ (श्वेताश्वतर ६।१८) यः श्रीनारायणः पूर्वसृष्टगदी जलमध्यस्थस्वनाभिकमले ब्रह्माणं प्रजापतिम् विद- धाति उत्पादितवान् । यो वै निश्चये तस्मै ब्रह्मणे वेदान् प्रहिणोति प्रतिपादितवान् । हर्षे तमेव श्रीभगवंतं नारायणदेवं क्रीडोपादानोत्पादकम् आत्मबुद्धिप्रकाशं आत्मनि स्वस्वरूपे जीवात्माने स्वकीयोचमरहस्यस्थाने चैतन्यरूपेण तथैव बुद्धौ च धारणावत्यां सूक्ष्म- केवलं नानंदविषयः अपि तु भयानकरौद्ररसभावोप्यानंददो भवति तन्दुःस्वादिष्वपि सुखरूपं यत अमृत रोगात्मकं यमदूतकृतदुःनयुतमरणास्पृष्टं विभाति विशेषेखात्म- भूनस्वरूपतया भासत इत्यर्थः ॥ २६ ॥ ननु चेत्सर्वत्र स एव नारायणस्तदा कथन दृश्यते तत्राह अतिः। एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ॥ दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥२७॥ ( कठवल्ली ३/१२) स्थूलदेहे दृष्टियेषां तैर्देहदृष्टिभिः एष प्रत्यक्षोऽयमात्मा न प्रकाशते सर्वेषु भूतेषु ब्रह्मादितृणपर्यन्तेषु देहेषु गूढात्मा देहजवनिकया गूढो गुप्तः आत्मास्वरूपं यस्य । च पुनः सूक्ष्मचैतन्ये दर्शनं दृष्टिर्येषां तैश्चैतन्यदृष्टिभिः पुरुषैः एष प्रकाशस्वरूप आत्मा दृश्यतेनु- मीयते। कया अश्यया सात्विक्या सूक्ष्मया बुद्धगा धारणवत्या धिया पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वादिति न्यायवत् । चेत्कश्चिचिद्रूपो न विद्यते तदा जड़स्वरूपा-देहादिबुद्धताः सर्वे भावाः कथं चेष्टां कुर्यः तस्माचिद्रूपं ब्रह्मैवास्ति इत्यभिप्रायः ॥२७॥ ननु देवायोपि कर्तृत्वादिप्रकृतयः स्वतंत्राः संति कथं सर्व भावा जड़स्वभावा- स्तत्राह श्रुतिः । भीषास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः ॥ भीषास्मादिन्द्रश्चाग्निश्च मृत्युर्धावति पंचमः ॥२८॥ (तैत्तिरीय २१111) अस्मादितिपञ्चमी षष्टीविषयेऽस्य ब्रह्मणो भीषा भयेन सूर्यः उदेति प्रकाशते । अस्य भीषेन्द्रो वर्षेति । अस्य भीषाग्निः प्रज्वलति । चेत्तेस्वतंत्राः स्युस्तदास्वकीयपूर्णबलवत्वं कथं न प्रकाशयेयुः। एवमेव पंचमी मृत्युर्यमास्य भीषैव संहति शेषः । अनेन ब्रह्मादिस्थावरांताः सफलपदार्थाः कंदुकवकीड़ा विषयाः । क्रीड़कस्तु स्वतन्त्रः स्वयमेको नारायण इत्यभि- प्रायः॥ २८॥ इदानी यतः सर्वगुणविशिष्टश्चिद्रूपः । स्वतंत्रोयमेकः श्रीनारायणस्तस्मात्तस्य शरणत्वमेव महानुपाय इत्याह । यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदान्प्रहिणोति तस्मै । तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुक्षुर्वे शरणमहं प्रपद्ये ॥२६॥ (श्वेताश्वतर ६।१८) यः थ्रीनारायणः पूर्वसृष्टगदी जलमध्यस्थस्वनाभिकमले ब्रह्माणं प्रजापतिम् विद- धाति उत्पादितवान् । यो वै निश्चये तस्मै ब्रह्मणे वेदान् प्रहिणोति प्रतिपादितवान् । हर्षे तमेव श्रीभगवंतं नारायणदेवं क्रीडोपादानोत्पादकम् आत्मबुद्धिप्रकाशं आत्मनि स्वस्वरूपे जीवात्मनि स्वकीयोचमरहस्यस्थाने चैतन्यरूपेण तथैव वुद्धौ च धारणावत्या सूक्ष्म- । घियि च मानस्वरूपेण प्रकाशः प्रकाशते । तं शरणं शरणाहं वै निश्चये मुमुक्षीवोपाधितो मुक्तिमिच्छुरहम् अहंकारप्रकृति वः प्रपद्ये शरणं व्रजामि अहंकारात्मिकी जीवोपाधि संत्यज्य अहमपि चिप एवेति निर्योय तन्मयोभवामीत्यर्थः ॥२९॥ अतएव स भगवान्नारायणः सर्वभूतान्तरात्मास्तीत्याह श्रुतिः । भगवानपि विश्वात्मा भूते भूते व्यवस्थितः ॥ एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥३०॥ भगवानपि अद्भुतैश्वर्यसंपन्नः विश्वात्मा सोऽयं सर्वभूतांतरात्मा श्रीनारायणः भूते भूते अनुदेहं व्यवस्थितस्तत्त्वविद्भिदृश्यते । कथमित्यत्राह । एकधा चिद्रूपेण । बहुधा देवादिरूपेण । जलचन्द्रवत् । यथा सागरसरोवरनदीतडागकूपवाप्यादिजलाशयप्रति- बिंबिता बहवश्चंद्राः संति परमार्थतस्तु विंचरूपी चन्द्रमा एक एघ भक्तीत्यर्थः ॥ ३० ।। समाधानाविधशक्तिमत्वादपरिमेयगुणवते नमस्कार एव विधेय इस्याह श्रुतिः। य एकोहि सर्वजनेषु नित्यं चरत्यशांतेषु सुशान्तरूपः ॥ प्राणात्मनांतर्बहिरंशुमालिरूपेण तस्मै सततं नमोस्तु ॥३१॥ य एको देवः श्रीभगवानारायणः अन्तर्बहिश्चाकाशवत् अशांतेषु जलप्रकृतिषु सर्व- अनेषु सकलकलेवरेषु सुशान्तरूपोतिनिश्चलस्वरूपो जीवादिदेहान् चेष्टते प्रकाशयति । कथमित्यत्राह अन्तः प्रावात्मना प्राणस्वरूपेण बहिश्चांशुमालिरूपेण सूर्यात्मना च तस्मै गुणातीताय ब्रह्मणे सततमनवच्छिन्नं नमः अहं प्रत्ययसमर्पणमस्तीत्यर्थः ॥३॥ इदानीमस्य ब्रह्मणस्तद्विदश्चमाहात्म्यमाह श्रुतिः। एतदेवाक्षरं पुण्यमेतदेवाक्षरं परम् ॥ एतदेवातरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥३२॥ (मैत्रेयी ६ । २) एतदेव पूर्वोक्तं अक्षरं अविनाशि स्वरूपं ब्रह्म पुण्यं पवित्रं यद्वा पुण्यस्यापि पुण्यकर्तृ अथवा पुण्यफलदायकं । च पुन एतदेवाक्षरं परं सर्वोत्कृष्टमुपासनाविषयं । च एतदेवाक्षर ब्रह्म शात्वा सर्वगतं ब्रह्मेति बुद्ध्वा यो ब्रह्मवेत्ता पुरुषः यत्फलं विषयं चेच्छति तस्य ब्रह्मा- स्य तत्फलं विषयश्च भविष्यत्येवेत्यर्थः ॥ ३२॥ पुनरपि तदेव दृढयति । सदानन्दं रुक्मवर्ण कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान्पुण्यपापे विहाय परेव्यये सर्वमेकीकरोति ॥३३॥ समानदश्च तत्सदानन्दं सञ्च सत्यस्वरूपं च यत्सत्यतयाऽसत्यं जगदपि सत्य- बद्भाति आनन्दश्च यदानन्दस्वरूपतया निरानन्दोपि देह आनन्दयुतो भवति। तत् रुक्मवर्ण केवलं नामंदविषयः अपि तु भयानकरौद्ररसभावोप्यानंददो भवति तद्वदुःखादिष्वपि सुखरूपं यत अमृत रोगात्मकं यमदूतकृतदुःस्त्रयुतमरणास्पृष्टं विभाति विशेषेणात्म- भूतस्वरूपतया भासत इत्यर्थः । २६ ॥ ननु वेत्सर्वत्र स एव नारायणस्तदा कथन हश्यते तत्राह श्रुतिः। एष सर्वेषु भूतेषु गूढोत्मा न प्रकाशते ॥ दृश्यते त्वग्र्यया बुद्ध्या सूक्ष्मया सूक्ष्मदर्शिभिः ॥२७॥ (कठवल्ली ३।१२।) स्थूलदेहे दृष्टिर्येषां तैर्देहदृष्टिभिः एष प्रत्यक्षोऽयमात्मा न प्रकाशते सर्वेषु भूतेषु ब्रह्मादितृणपर्यन्तेषु देहेषु गूढात्मा देहजवनिकया गूढो गुप्तः आत्मास्वरूपं यस्य । च पुनः सूक्ष्मचैतन्य दर्शनं दृष्टिर्येषां तैश्चैतन्यदृष्टिभिः पुरुषैः एष प्रकाशस्वरूप आत्मा दृश्यतेनु- मीयते । कया अश्यया सात्विक्या सूक्ष्मया वुद्धा धारणवत्या धिया पर्वतो वह्निमान् धूमवत्वादिति न्यायवत् । चेत्कश्चिचिदपो न विद्यते तदा जड़स्वरूपा-देहादिबुद्धताः सर्वे भावाः कथं चेष्टां कुयुः तस्माञ्चिद्रूपं ब्रह्मवास्ति इत्यभिप्रायः ॥२७॥ ननु देवायोपि कर्तृत्वादिप्रकृतयः स्वतंत्राः संति कथं सर्व भाषा जड़स्वभावा- स्तत्राह श्रुतिः । भीपास्माद्वातः पवते भीषोदेति सूर्यः । भीषास्मादिन्द्रश्चाग्निश्च मृत्युर्धावति पंचमः ॥२८॥ (तैत्तिरीय २१८31) अस्मादितिपञ्चमी षष्टीविषयेऽस्य ब्रह्मणो भीषा भयेन सूर्यः उदेति प्रकाशते । अस्य भीवेन्द्रो वर्षेति । अस्य भीषाग्निः प्रज्वलति। चेत्ते स्वतंत्राः स्युस्तदा स्वकीयपूर्णबलवत्वं कथं न प्रकाशयेयुः। एवमेव पंचमा मृत्युर्यास्य भीषैव संहर्त्तति शेषः । अनेन ब्रह्मादिस्थावरांताः सकलपदार्थाः कंदुकवत्कीड़ा विषयाः । क्रीड़कस्तु स्वतन्त्रः स्वयमेको नारायण इत्यभि- प्रायः॥ २८॥ इदानी यतः सर्वगुणविशिष्टश्चिदूपः । स्वतंत्रोयमेकः श्रीनारायणस्तस्मात्तस्य शरणत्वमेव महानुपाय इत्याह । यो ब्रह्माणं विदधाति पूर्व यो वै वेदान्ग्रहिणोति तस्मै ॥ तं ह देवमात्मबुद्धिप्रकाशं मुमुनुवै शरणमहं प्रपद्ये ॥२६॥ (श्वेताश्वतर ६।१८) यः श्रीनारायणः पूर्वसृष्टवादी जलमध्यस्थस्वनाभिकमले ब्रह्माणं प्रजापतिम् विद- धाति उत्पादितवान् । यो वै निश्चये तस्मै ब्रह्मणे वेदान् प्रहिणोति प्रतिपादितवान् । हर्षे तमेव श्रीभगवंतं नारायणदेवं क्रीडोपादानोत्पादकम् आत्मबुद्धिप्रकाशं आत्मनि स्वस्वरपे जीवात्मनि स्वकीयोत्तमरहस्यस्थाने चैतन्यरूपेण तथैव बुद्धौ च धारणावत्या सूक्ष्म- ।

(११) धियि च ज्ञानस्वरूपेण प्रकाशः प्रकाशते । तं शरणं शरणार्ह वै निश्चये मुमुक्षर्जीवोपाधितो मुक्तिमिच्छुरहम् अहंकारप्रकृति वः प्रपद्ये शरणं व्रजामि अहंकारात्मिकी जीवोपाधि सत्यज्य अहमपि चिद्रूप एवेति निर्योय तन्मयाभवामीत्यर्थः ॥ २९ ॥ अतएव स भगवान्नारायणः सर्वभूतान्तरात्मास्तीत्याह श्रुतिः। भगवानपि विश्वात्मा भूते भूते व्यवस्थितः ॥ एकधा बहुधा चैव दृश्यते जलचन्द्रवत् ॥३०॥ भगवानपि अद्भुतैश्वर्यसंपन्नः विश्वात्मा सोऽयं सर्वभूतांतरात्मा श्रीनारायणः भूते भूते अनुदेहं व्यवस्थितस्तत्त्वविद्भिदृश्यते । कथमित्यत्राह । एकधा चिद्रूपेण । बहुधा देवादिरूपेण । अलचन्द्रवत् । यथा सागरसरोवरनहीतडागकूपचाप्यादिजलाशयप्रति- बिंबिता बहवश्चंद्राः संति परमार्थतस्तु बिंबरूपी चन्द्रमा एक एष भक्तीत्यर्थः ॥ ३०॥ तस्मानानाविधशक्तिमत्वादपरिमेयगुणवते नमस्कार एव विधेय इत्याह श्रुतिः। य एकोहि सर्वजनेषु नित्यं चरत्यशांतेषु सुशान्तरूपः ॥ प्राणात्मनांतर्बहिरंशुमालिरूपेण तस्मै सततं नमोस्तु ॥३१॥ य एको देवः श्रीभगवानारायणः अन्तहिदचाकाशयत् प्रशांतेषु जलप्रकृतिषु सर्व- मनेषु सकलकलेवरेषु सुशान्तरूपोतिनिश्चलस्वरूपो जीवादिदेहान् चेष्टते प्रकाशयति । कथमित्यत्राह अन्तः प्रावात्मना प्राणस्वरूपेण बहिश्चांशुमालिरूपेण सूर्यात्मना च तस्मै गुणातीताय ब्रहाणे सततमनवच्छिन्नं नमः अहं प्रत्ययसमर्पणमस्तीत्यर्थः ॥३॥ इदानीमस्य ब्रह्मणस्तद्विदश्चमाहात्म्यमाह श्रुतिः। एतदेवानरं पुण्यमेतदेवाक्षरं परम् ॥ एतदेवाक्षरं ज्ञात्वा यो यदिच्छति तस्य तत् ॥३२॥ (मैत्रेयी ६।२।) एतदेव पूर्वोक्तं अक्षरं अविनाशि स्वरूपं ब्रह्म पुण्यं पवित्रं यद्वा पुण्यस्यापि पुण्यकर्तृ अथवा पुण्यफलदायकं । च पुन एतदेवाक्षरं परं सर्वोत्कृष्टमुपासनाविषयं । च एतदेवाक्षर ब्रह्म ज्ञात्वा सर्वगतं ब्रह्मोति बुवा यो ब्रह्मवेत्ता पुरुषः यत्फलं विषयं चेच्छति तस्य ब्रह्मा- स्य तत्फलं विषयश्च भविष्यत्येवेत्यर्थः॥ ३२ ॥ पुनरपि तदेव दृढयति। सदानन्दं रुक्मवर्ण कर्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयोनिम् । तदा विद्वान्पुण्यपापे विहाय परेव्यये सर्वमेकीकरोति ॥३३॥ समानन्दश्च तत्सदानन्द सच्च सत्यस्वरूपं च यत्सत्यतयाऽसत्यं जगदपि सत्य- पद्भाति आनन्दश्च यदानन्दस्वरूपतया निरानन्दोपि देह आनन्दयुतो भवति। तत् रुक्मपर्ण । ( १२ ) प्रकाशस्वरूपं कर्तारं सकलविधि धातारं ईशं परमैश्वर्ययुतं पुरुषं पुरि देहाख्यै नगरे महाराजवदूसंवर्द्धितम् ब्रह्मयोनि ब्रह्मण वेदस्य योनिमुत्पत्तिकारखं तद्ब्रह्म यो विद्वा- न्सपुण्यपापे पुण्यं च पुण्येन स्वर्गमाम्नुयादिति श्रुतिः। तस्मात्युष्यमपि बंधकारणम् पापं च पापेन दुर्गतिमाप्यते इति श्रुतिः तस्मात्तदपि बंधनविषयं ते उभे विहाय संत्यज्य अव्यये विनाशिनि परे सूक्ष्मतमे ब्रह्मणि सर्व सकलं विश्वमेकीकरोति एकं रूपं तन्मयं जानाति स्वान्मानं चेति शेषः।। ३३॥ पुनरपि ब्रह्मविवरणमाह श्रुतिः- अचित्तं चित्तमध्यस्थमचिंत्यं गुह्यमुत्तमम् । तत्र चित्तं निचयेत तच लिङ्गं निराश्रयम् ॥ ३४ ॥ ( मैत्रेयी ६ । १६ ।) अचित्तं संकल्पविकल्परहितं चित्तमध्यस्थं हृन्मध्ये उपविष्टम् अचित्यं अतएवा- परिमेयं गुह्य गोप्यं समस्तालभ्यं उत्तमं सर्वोत्कृष्टम् । यदुक्तं भगवद्गीतासु । द्वाविमा पुरुषा लेोके क्षरश्चाक्षर एव च । क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते ॥ उत्तमः पुरुषस्न्वन्यः परत्मामेत्युदाहृतः।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ तस्माक्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः । अतोस्मि लेोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः ॥ इति ॥ तत्रैव पुरुषोत्तम ब्रह्मणि चित्तं शुद्धमनः निचयेत् विमर्शतया प्रविशेत् विदुषेतिशेषः । च पुनस्तद् ब्रह्म लिचिलमा तदपि निराश्रयं निराधारं निरंजन अथवा लिंग्यमितिपाठः । लिजय नानाविधैर्लिंगैलेक्षणलक्ष्यमनुमेयमित्यर्थः ॥ ३४॥ तस्माद् ब्रह्मण एव ब्रह्मैव भवतीत्याह श्रुतिः- वह्वेश्च यद्यत्खलु विस्फुलिंगाः सूर्यान्मयूखाश्च तथैव तस्य । प्राणादयो वै पुनरेव तस्मादत्युच्चरंतीह यथाक्रमेण ॥३५॥ (मैत्रेयी ६ । २६ ।) खलु निश्चये यथाग्नेश्च यद्यत् ये ये विस्फुलिङ्गा अग्निकणा जायंते तन्मयाश्च भवन्ति तथैव सूर्यान्मयूखा मरीचयो जायते तन्मयाश्च भवंति वै निश्चये एवमेव तस्माद् ब्राह्मण इह संसारे यथाक्रमेण अनुक्रमम् प्राणश्चैतन्यान्मा जीवस्तदादीनि पंचविंशति तत्वानि अत्युचरंति उत्पद्यन्ते तन्मयानि च कनककुण्डलादिवत्सागरोमिवञ्च भवंतीत्यर्थः ।॥३५॥ पुनरपि लक्षणैरेतद्ब्रह्म वर्णयति श्रुतिः- दिव्योह्यमूर्तः पुरुषः स बाह्याभ्यंतरोह्यजः अप्रायोामना। शुभ्रोडक्षरात्परतरः परः ॥ ३६ ॥ (मुण्डक २ । ३।२।) दिव्यो निर्मलात्मा प्रकाशस्वरूपः अमूर्ताऽन्यप्राणिवत्कलेवररहितः पुरुषः पुरि देहे निवसमानः सपव बाह्याभ्यंतरः अंतर्बहिराकाशवत्तिष्ठमानः अजो जन्मादिषड्- - विकाररहितः अप्रायो नाशरहितः अमनाः संकल्पविकल्परहितः शुभ्रः निर्मलस्वरूपः सत्वरूपो वा च पुनः अक्षरो जीवात्परतरः उत्तमः पुरुषोत्तमः पर एतादृशः परमेश्वरो- स्तोत्यर्थः॥३६॥ एतदेव शेयमित्याह श्रुतिः । एतज्जानीथ सदसद्वरेण्यं परं विज्ञानाद्यद्वरिष्ठं प्रजानाम् । यदचिमद्यदणुभ्योह्यणु च यस्मिल्लोका निहिता लोकिनश्च ॥३७॥ मुण्डक २।२।२।) एतदेव पूर्वोक्तं ब्रह्म हे लोक इति शेषः जानीथ एतत्कथंभूतं सत् अस्तीत्यपि तदेव । पु० । असत् नास्तीत्यपि तदेव यद्वा सत् । सत्यमपि तदेव असत्यमपि तदेव । च पुनर्वरेण्यमुपासनायोग्यं अथवा सदसद्वरेण्यमित्येकं पदम् । सदसतां देवा- दितृणपर्यंतानां प्राणिनां वरेण्यं याच्यं वरदायकं च पुनः विज्ञानाद् बुद्धः परं यो बुद्धः परतस्तु स इति स्मृतेः । यद्ब्रह्म प्रजानां सकलप्राणिनां मध्ये वरिष्टं श्रेष्ठं यतः सकलप्राणिनो मायाशवलाः तत्तु मायारहिनं अतएव श्रेष्ठं तथैव यद्ब्रह्म अर्चिमत् वैश्वानरवद् ब्रह्मादिज्वालायुक्तम् । च पुनः अगुभ्योप्या सूक्ष्मतरं । च पुनः यस्मिन् ब्रह्मणि लोकाः पूर्वादया निहिताः प्रतिष्ठिताः तथैव लोकिनश्च ब्रह्मादयोपि लोकपालाश्च स्थिता इत्यर्थः ॥ ३७॥ पुनरपि तदेव वर्णयति श्रुतिः। तदेतदक्षरं परं ब्रह्म सप्राणस्तदवाङ्मनः तदेतत्सत्यं तदमृतं तद्वेयं सौम्य विद्धि ॥ ३८॥ (मुण्डक शसस) यस्य ब्रह्मणे निरामयनिर्विकारनिर्विकल्पनिराश्रयनिरंजननिरालम्वनिर्लेपनिरवयवा- गृहनिर्गुणनिष्कलानंताभयाचित्याचलाच्युतातींद्रियामितापरानीशानीहाक्षयाव्ययेत्येतन्मा. हात्म्यमुपवर्णित्तम् तत्पदार्थ एतत्तव पदार्थ अस्ति तत्वमसीति श्रुतिः । चेत्पदार्थ त्वं पदार्थमेव तदा तत्पदार्थमपि विनाशविषयमेव नेत्याह, यताक्षरमविनाशि॥ अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् । विनाशमध्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्ह- तीति श्रीभगवत्स्मृतेः। तस्यैव परंब्रोति कथयति इदानों तत्पदार्थ विवृणोति सः तद्ब्रह्म । प्राणश्चैतन्य जीवाप्यस्ति अनेन बुद्धिरपि ग्राह्या तद् ब्रह्म मनो भवति अनेन प्राणादयापि गृह्यते । अथवा मन अतिवाहिको देहः । अनेनाधिभौतिको देहोपि गृह्यते अनेनैव पंचमहा- भूतान्यपि व्याख्यातानि । तदेतदेवेति सत्यं तदमृतं दिक्कालाद्यनवच्छिन्नं तदेव वेद्यं झयम् । अथवा वेदवाच्यं सौम्य शांतात्मन् शुद्धं मनः एतदेव विद्धि जानीहोत्यर्थः ॥३८॥ पुनरप्येतदृढयति श्रुतिः ।

-- यस्मिन् द्यौः पृथिवी चांतरिक्षमुत मनः सह प्राणैश्च सर्वैः । तमेवैकं जानीथ अात्मानमन्या वाचो विमुंचथामृतस्यैव सेतुः॥३६॥ (मुण्डक १२ श) यस्मिंश्चिद्रूपे ब्रह्माणि द्यौः स्वर्लोकादिपंच सप्त वा लोकाः पृथिवी अतलादि सप्त पातालयुतो भूर्लोकः अंतरिक्ष भुवा लोकः । उत हर्षे । मनः शुद्धं अशुद्धं च सर्वैः प्राणैश्च सह अनेन जीवादिदेहान्ता गृह्यते सकल विराड् यदाधारोस्तीत्यर्थः । हे लोकाः । एकं केवलं तमेव प्रीवात्मानं जानीथ अन्या वाच इतरान्सर्वधर्मान् विमुंचथाः विशेषेण सम्याज्ञानेन एतेषां धर्माणां फलवांच्छां मा कुरुत ॥ तदुक्तम् श्रीमद्भगवद्गीतासु-सर्वधर्मान् परित्यज्य मुंचथ मामेकं शरणं बजेति । अत एष एवामृतस्य मोक्षस्य अथवा ब्रह्मधाम्नः सेतुः सुगमो मार्गः॥ एष निष्कंटकः पंथा यत्र संपूज्यते हरिरित्युक्तेः । अयमेवाभिप्रायः ॥ ३९ ॥ पुनरपि तस्यैव महिमानं विवृणाति श्रुतिः । यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्येष महिमा भुवि । दिव्ये ब्रह्मपुरे ह्येषः व्योम्न्यात्मा प्रतिष्ठितः ॥ ४० ॥ (मुण्डक २।२।७।) यः परमेश्वरः सर्वज्ञः सर्व दृश्यादृश्यं विश्व जानातीति सर्वशः सर्वविश्व सर्वप्रच्छ- माप्रच्छन्न जगत् विंदति व्याप्तोतीति सर्वविच्चास्ति यस्य ब्रह्ममा भुवि भूरित्युपलक्षणम् भूलो- कादिचतुर्दशभुवनेषु एष प्रत्यक्षोयं महिमा स सर्वभूतान्तरात्मा प्रतिष्ठित उपविष्टो भवति । कुत्र दिव्ये शुद्ध ब्रह्मपुरे हृदये तत्रापि सव्योम्न्याकाशे हृदयाकाश इत्यर्थः ।। ४० ।। पुनरष्येतदेव विचारयति श्रुतिः। हिरण्मये पुरे कोशे विरजं ब्रह्मनिष्कलम् । तच्छुभ्रं ज्योतिषां ज्योतिस्तद्यदात्मविदो विदुः ॥ ४१ ॥ (मुण्डक २।२।१) को ब्रह्मा ईशः स्वामी यस्मिन्पुरे ब्रह्मपुरे हृदये ब्रह्मास्ति । हिरण्ये प्रकाशस्वरूपे शुद्धहृदये कथं भूतं विरजं रजस्तमोगुणहीनं निष्कलं द्वैतोपाधिरहितं शुम्रम् । निर्मलं वा सत्वमयमस्ति तदेव ब्रह्म ज्योतिषां प्रकाशात्मनां सूर्यादीनां जीवादीनां वा ज्यातिः प्रकाशते । तत्प्रकाशेनेव तत्सर्व प्रकाशते । तत्किमित्यत्राह । यद्ब्रह्मात्मविदो विदुः जानंती- स्वर्थः॥४१॥ पुनरप्येतदेव वर्णयति श्रुतिः। प्राणो ह्येष सर्वभूतैर्विभाति विज्ञानदो भवते नातिवादी। प्रात्मक्रीड श्रात्मरतिः क्रियावानेष ब्रह्मविदां वरिष्ठः ॥ ४२ ॥ (मुण्रक ३111) एप प्राणश्चैनन्यान्मा सर्वभूतेषु सर्वभूतेषु विभाति कीदृशः भवते उत्पादिताय जीवाय विज्ञानदो ज्ञानप्रतिपादकः । नातिवादी अत्यन्तवक्ता आत्मकीडः सर्वभूतात्म- त्वादात्मनैवात्मनि क्रीडा यस्य। यथा क्रीडकोपि स्वयमेव क्रीडापि स्वयमेव कीडनीयो विषयोपि स्वयमेव अतएवात्मन्येव रतिः द्वितीयाभावात् । क्रियावान् आत्मरतिरपि सर्व- कर्ता एष सर्वभूतांतरात्मा ब्रह्मविदां वेदविदां वरिष्ठो वर्णनीय इत्यर्थः ॥४२॥ नन्वेतादृक्प्राणविशिष्टं ब्रह्म लग्धुक उपायः इत्यत आह । सत्येन लभ्यस्तपसा ह्येष अात्मा सम्यग्ज्ञानेन ब्रह्मचर्येण नित्यम्। अतः शरीरे ज्योतिर्मयोहि शुभ्रो यं पश्यंति यतयःक्षीणदोषाः॥४३॥ (मुण्डक ३१) एष स्वरूपप्रकाश आत्मा सत्येन समदर्शनतया ऋतं च सूनृता वाणी सत्यं च समदर्शनमितिश्रुतेः लभ्यो लन्धु शक्यः यतः पुरुषस्तदेव समतामाप्नुयाद्यदैवात्मानं सर्वत्र विजानीयादितिभावः पुनः तपसा सर्व ब्रह्मेतिनियमेन सम्यगतिशयतया मानेन विवेकेन । ब्रह्मचर्येण ब्रह्मार्पणमेवचर्या सर्व कर्म तेन । अथवा ब्रह्मण एव च चर्चातया ब्रह्मगोष्ठ्या च । अथवा ब्रह्मण्येव चर्या गतिर्येषां ते संतःसत्संगमेनेत्यपरपर्यायः। कदैतत्कर्म कार्यमित्यत आह । नित्यं सदैव । ननु चेकश्चिदेतानुपायान् कुर्वोत तदा किं जायते इत्यत्राह अतः शरीरे शरीरांत एव हि निश्चये शुभ्रो निर्मलः ज्योतिः प्रकाशश्चैतन्य तन्मयश्चिद्रूपोस्ति यं यतयः सत्यादिभिरुपायैरहर्निशं यत्नवंतः तैरेव क्षीणदोषाः क्षीणा नष्टा दोषाः शत्रुमित्रस्वकीयपरकीयनानाविधभावदृष्टिअविवेकाहंकारासत्प्रलापासत्संगा येषांते पश्यंति जानतीत्यभिप्रायः॥४३॥ एतदेव दृढयति ॥ सत्यमेव जयति नानृतं सत्येन पंथा विततो देवयानः । येनाक्रमंत्षयो ह्याप्तकामा यत्र तत्सत्यस्य परं निधानम् ॥४४॥ (मुण्डक ३।१।६) सत्यमित्युपलक्षणम् सत्यादिकं समदर्शनाधुपायकदंबकं जयति सर्वोत्कृष्टत्वेन वर्तते नानृतं एतद्वैपरीत्यं सत्यादिना देवयानः देवस्य ब्रह्मणः स्थानं यानं गम्यं यत्र स देवयानः पंथा मार्गो वितता विस्तृतो भवति । हि निश्चये। येन मार्गेण प्राप्तकामा निष्कामाः संतः ऋषया देवज्ञाः ब्रह्मानिनः आक्रमत्यटति गच्छंतीत्यर्थः ॥ उक्तं च गीतायां-आपूर्यमाय म- चलप्रतिष्ठं समुद्रमापः प्रविशति यद्वत् । तद्वत्कामा यं प्रविशति सर्वे स शान्तिमानोति न कामकामीति ॥ यत्र मार्गे सत्यस्य सत्याधुपायवृंदस्य परं निधानं परमकारणम् तत्प्रसिद्ध ब्रह्म वरीवति ॥४॥ अपि चैतस्मिन्नुपायवर्ग एष एव महानुपाय इत्याह ॥

यच्च किंचिद्राजादिकं दृश्यते यच्च किंचिदिन्द्रादिकं श्रूयते । तत्सर्व अंतर्बहिर्व्याप्यैको नारायणः स्थितः ॥ ४५ ॥ सकले जनेनालिन् जगति दृश्यमाने विश्वं यश्च किंचिद्राजादिकं दृश्यते यञ्च किंचि- हिंद्रादिकं श्रूयते तत्सर्वमंतर्बहिप्प्यैको नारायणः स्थितो भवतीति शास्त्रनिष्पन्नोतिसमी- चीनोपाय इत्यर्थः ॥४॥ नन्वस्य श्रीनारायणस्य स्वरूपं किमित्यत्राह ।। यतो वाचो निवर्तते अप्राप्य मनसा सह । श्रानन्दं ब्रह्मणो विद्वान्न बिभेति कुतश्चन ॥ ४६ ॥ तैत्तोरिय२।४।१।२।१।१।) यतो यस्मादानन्दस्वरूपाद्वादो ब्रह्मादीनां वाण्या निवर्तते वक्तुं न शक्नुवंति मनसा सह ब्रह्मादीनामपि मनो न विपयितुं शक्नोति किं कृत्वा अप्राप्याज्ञात्वा चेइशान सेषां स्यात्, तदा विमर्शनवचनविषयं किं न स्यात् । विनातारमरे केन विजानीयादिति श्रुतिः त- स्माद् ब्रह्मणस्तदानन्दमानन्दस्वरूपं आनन्दो वै ब्रह्मेति श्रुतिः । यो विद्वान्न तुमायकः (नानु- मापको वा पाठः) स कुतश्च नरकादिभ्यो भूतादिभ्यश्च न विभेति भयं न विदधाति द्वितीया? भयं भवतीति श्रुतेः द्वितीयाभासतो न भीत्यवकाश इत्यर्थः ॥ ४६॥ ननु श्रीभगवद्धाम यद्वदंति तत्कीहशमित्यत्र आह ॥ सर्व वेदा यत्पदमामनति तपांसि सर्वाणि च यद्वदति । यदिच्छतो ब्रह्मचर्यं चरति तत्ते पदं संग्रहेण ब्रमीमि ॥४७॥ (कठवल्ली २।१५।) सर्वे वेदा यस्य ब्रह्मणः पदं धाम आमनंति प्रशंसति सर्वाणि तपसि च मासोप- वासचांद्रायणादयो नियमा यद्धाम वदंति यन्निमित्ता भवंति यद्धामेछंतः पुरुषाः ब्रह्मचर्य ब्रह्मचर्यादिकानाश्रमांश्चरंति धारयति तद्धाम हे लेोका इति शेषः । संग्रहेण संक्षेपेण बबीमि कथयामि ॥४७॥ तदेव स्तातीत्याह। एतदालम्बनं श्रेष्ठमेतदालंबनं परम् । एतदालम्बनं ज्ञात्वा ब्रह्मलोके महीयते ॥ ४८॥ (कठवल्ली २॥ १७१) एतदालम्बन धाम श्रेष्ठं एतदालम्बनं धाम परं परात्परम् एतदालम्बनं धाम ज्ञात्वा विनाशि ब्रह्मस्वरूपं निर्योय पुरुषस्तस्मिन् ब्रह्मलोके ब्रह्मधाम्न्येव महीयते पूज्यते इत्यर्थः॥४८॥ पुनरपि तस्य ब्रह्मणा दुर्मीयत्वं वर्णयति श्रुतिः ।

आसीनो दूरं व्रजति शयानो याति सर्वतः । कस्तं सदामदं देवं मदन्यो ज्ञातुमर्हति ॥४६॥ (कठवल्ली २।२।।) यः परमेश्वर आसीनः स्वस्वरूपाधानीपरि निविष्टः दूर वमति सवै दृश्या- दृश्यं स्वनगरे सिंहासनोपरि निविष्टो महाराजः संकलपृथिवीवृत्तांतमिवं व्यानोति जानौती- त्यपरायः । च पुनः यत्र शयानः सुप्तः सर्वतों याति जागति सर्वपश्यति मातीत्वयः। तं परमेश्वर कथंभूतं संदामदम् सदैव मदिरोन्मत्तवन्मदः स्वस्वरूपमेनत्वं यस्य तै सदों न्मत्तस्वभावम् । यद्वा सदामदम् । सदैवाभिमानशून्यं । ननु उन्मत्ततापवनवलेन का भूतप्रवेशेन अथवा मदिरापानेन तत्र तस्य केनोन्मत्तत्वं आतमित्ववाह । देवक्रोडक यतस्तस्य सदोन्मत्तत्व सविधान न तु विक्षिप्तं । एतादृशं नहा मदन्या ब्रह्मय इसरोकातु निर्वतुमर्हति योग्यो भवति न कश्चनेत्ययः॥४२॥ कश्चिदेतवेत्ता स्यात्सोपि कृतार्थो भवेदित्याह श्रुतिः। अशरीरं शरीरेषु अनवस्थेष्ववस्थितम् । महांतं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥५०॥ (कठवल्ली २।२२), अशरीरं अन्यप्राणिवत् शरीरं न यस्य तम् अनवस्येषु अनियेषु अथवा अवस्था जाप्रत्स्वप्नसुषुप्तितूर्यारूपाण्येषां यतः एता अवस्थाश्चिद्रूपबुद्ध्युद्भवाः देहास्तु जड़स्व- रूपा तादृशेषु शरीरेश्ववंस्थित तिष्ठत । अथवा अशरीरमवस्थितं देहाभिमानरहितं यतः महांतं महद्रूपतया स्वल्पपदार्थेषु देहेषु कदाभिमानत्वं न स्यात् यतस्तं विमुं सर्व- व्यापकं तमेव सर्वभूतात्मानं मत्वा धीर एताहा परमेश्वरकी न शौचर्ति शैकिमोहाविष्टो न भवतीत्यभिप्रायः॥५०॥ एतदेव हृदयति। अशब्दमस्पर्शमरूपमव्ययं तथा रसं नित्यमगंधवञ्च यत् । अनाद्यनन्तं महतः परंध्रुवं निचाय्य तं मृत्युमुखात्प्रमुच्यते ॥५१॥ ( कंठवली ३६) यदशब्दशब्दरहितं वायभावात् यता नीरूपस्य वाणी कुतःच पुनः अस्पर्श स्पर्शविहीनं रूपाभावात् यतोऽरूपं रूपशून्य । अतएवाव्ययम् जन्माभावात् । तथाऽरसं रस आनन्दः । यदानन्दस्वरूपाद्विषयानंदस्तुच्छ एव । तस्मात् नित्यमगंधव गधों वासना तया हीनं अनादि अकारणं अनंतमंतहीनं महतः परं स्थूलस्वरूपाद्विरजः परं वा देहादि- कात्परं । ध्रुवं सनातनम् तं । तत् एतादृशं ब्रह्म निचाय्य लिणार्य पुरुषो मृत्युमुखात् संसारात्प्रमुच्यते मुक्तः स्यादित्यर्थः ॥ ५१ ॥ इदानों निर्णयोपायमाह।

९ ) यत्प्राणेन न प्राणिति येन प्राणःप्राणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५६॥ ( केन १८) यद् ब्रह्म प्राणेन न प्राणिति चेष्टते येन ब्रह्मणा प्राणः प्राणीयते चेष्टते तदेव शेष वैवत् ॥५६॥ अर्थतादृशं ब्रह्म ये जानति ते कृतार्था इत्याह । न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चनुषा पश्यति कश्चनैनम् । हदा मनीषा मनसाभिक्लुप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवंति ॥५७॥ ( कट ६६ ) (श्वेताश्वतर ४।२०) अस्य ब्रह्मणो रूपं कस्यचित्संदृशे दर्शनाय न तिष्ठति अस्ति । एतदेव प्रकाशयति । कश्चन पुरुष एनं ब्रह्मचक्षुपान पश्यति । स पुरुषः कथंभूतः हुदा प्राणेन इत्प्राणयोः परस्पर संबंधात् मनीषा मनीषया बुद्ध्या नाना ज्ञानेन तथैव मनसा संकल्पविकल्पाभ्यां च अभि- क्लप्तो निश्चित आवृतः । तस्मादीदृशं य एतद् ब्रह्म विदुर्जानंति ते अमृता जन्ममरणरहिता भवंतीत्यर्थः॥ ५७॥ ननु चेत्तद् ब्रह्म जन्ममरणादिहीनं तदा तस्य कथं तत्परतत्रत्वमित्याह । एषो हि देवः प्रदिशोनु सर्वाः पूर्वोहजातः सतु गर्भेश्रन्तः। स विजायमानःसजनिष्यमाणः प्रत्यङ्मुखस्तिष्ठति विष्टतो- मुखः ॥५८॥ हि निश्चये एष प्रकाशस्वरूपः स्वतंत्रोस्ति । कथंभूतः देवः स्वक्रीडया नटवत्क- चिजायते क्वचिच म्रियते क्वचिद् व्यवहरति क्वचिद्राजा क्वचिदनुचरः क्वचिद्धनी कचिद्दरिद्रो जायते । तस्मात्सुत एव स्वयं क्रीडावशतया पूर्वः पूर्वः हि निश्चये जातः उत्पन्नः। तदनु तस्येच्छ्या सर्वा दिशश्च प्रदिशश्चोपदिशश्च जाताः स एव सर्व अंतर्गर्भ । गर्भान्तर्वर्तते । स एव विजायमानो जन्मरतः तथैव स एव जनिष्यमाणो । जन्मेच्छुः एवं स एव प्रत्यङ्मुखो बहिनिष्क्रमणसंमुखः स एव विष्ठतोमुखः गर्भजालावृतवक्तस्तिष्ठति स्वयमेव सर्वत्र सर्वरूपतया क्रीडतीति भावः ॥५८॥ पुनरप्येतदेव व्याचष्टे। परीत्य लोकान् परीत्य भूतान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च । प्रजापतिः प्रथमजमृतस्यात्मनात्मानमभिसंबभूव ॥५६॥ परीस्य परित इत्य गत्वा व्यापकीभूय लोकान् चतुर्दशभुवनानि तथैव परीत्यव्याप्य भूतानि सकलजनान् परीत्य व्याप्य सर्वा दिशश्च विदिशश्च प्रजापतिः प्रजानां सकलचरा- - -- ( १८ ) अंगुष्ठमात्रःपुरुषोन्तरात्मा सदा जनानां हृदये सन्निविष्टः । तं स्वाच्छरीरात्प्रवृहेतमुंजादिवेषीकां धैर्येण तं विद्यात्॥५२॥ (कठ ६।१७) मगुंष्ठमात्रपरिमाणः अथवा अंगानि उषित्वा च्याप्य तिष्ठति मात्राभिः कलाभिर्यः सः पुरुषः परमेश्वरः कथंभूतः अंतरात्मा अन्तर्धाममध्ये आत्मा स्वरूपं यस्य ।यःसर्वजनाना समस्तलोकानां हृदये हृदयाकाशे सन्निविष्टः। तं श्रीनारायणं स्वाच्छरीरात्स्वकीयशरीरात् प्रवृहेत पृथक्कुर्यात् जानीयात् । कस्मादिव मुंजात् इषीकां मुंजतृणगुलिकामिव । केन धैर्येण सात्विक्या धृत्या । उक्तं च भगवद्गीतासु । धृत्या यया धारयते मनःप्राणेन्द्रियक्रियाः। योगेनाव्यभिचारिण्या धृतिः सा पार्थ सात्विकीति । तमेतादृशं नारायणं विद्याजानीयात् यदेव पुरुषो देह व्यतिरिक्तमात्मानं जानीयात्तदैवायमात्मा निर्णयः स्यादिति भावः ॥५२॥ ननु यदलक्ष्यमतर्व्यमरूपं निरंजनं तत्केनानुमीयते इत्यनुमानलक्षणमाह श्रुतिः। यद्वाचाऽनभ्युदितं येन वागभ्युद्यते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५३॥ (केन ।) यद्ब्रह्म वाचानभ्युदितं अवाच्यं । येन ब्रह्मणा वागभ्युद्यते वक्ति । तदेव ब्रह्म हे चित्तेतिशेषः त्वं विद्धि जानीहि । नेदं साकारं देवादिकम् । साकारमनृत्तं विद्धि निराकार तु निश्चलमिति स्मृतेः । एतत्किमित्यत्राह । न यदिदं साकारं देवादिकमुपासते ॥५३॥ पुनरप्येतदेवाह । यन्मनसा न मनुते येनाहुर्मनोमतम् । तदेव ब्रह्मत्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५४॥ (केन ११) यद् ब्रह्म मनसा न मनुते न विमृश्यते । येन ब्रह्मणा मनोमतं विमर्शयुतं तत्त्वविद माहुः तदेव ब्रह्मत्वं विद्धि जानीहि नेदमेतत् । यत्तत्किं । यदिदं विश्वमयमुपासते ॥५॥ पुनरप्येतदेव वृणाति । यच्चक्षुषा न पश्यति येन चतंषि पश्यति । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५५॥ (केन ११६) यद्ब्रह्म चक्षुषा न पश्यते दृश्यते । येन ब्रह्मणा चक्षं षि नयनानि पश्यति तदेव ब्रह्म शेष पूर्ववत् ॥ ५५॥ पुनरप्येतदेव वक। ।

. यत्प्रागोन न प्राणिति येन प्राणःप्राणीयते । तदेव ब्रह्म त्वं विद्धि नेदं यदिदमुपासते ॥५६॥ ( केन 10) यद् ब्रह्म प्राणेन न प्राणिति चेष्टते येन ब्रह्मा प्रायः प्राणीयते चेष्टते तदेव शेषं पूर्ववत् ॥५६॥ अर्थतादृशं ब्रह्म ये जानति ते कृतार्था इत्याह । न संदृशे तिष्ठति रूपमस्य न चक्षुषा पश्यति कश्चनैनम् । हृदा मनीषा मनसाभिक्लुप्तो य एतद्विदुरमृतास्ते भवंति ॥५७॥ (कळ ६६ ) (श्वेताश्वतर ४।२०) अस्य ब्रह्मणो रूपं कस्यचित्संदृशे दर्शनाय न तिष्ठति अस्ति । एतदेव प्रकाशयति । कश्चन पुरुषएनं ब्रह्म चक्षुषान पश्यति । स पुरुषः कथंभूतः हृदा प्राणेन हृत्प्राणयाः परस्परं संबंधात् मनीषा मनीषया बुद्ध्या नाना झानेन तथैव मनसा संकल्पविकल्पाभ्यां च अभि- क्लप्तो निश्चित आवृतः। तस्मादीदृशं य एतद् ब्रह्मा विदुर्जानंति ते अमृता जन्ममरणरहिता भवंतीत्यर्थः॥ ५७॥ ननु चेत्तद् ब्रह्म जन्ममरणादिहीनं तदा तस्य कथं तत्परतत्रत्वमित्याह । एषो हि देवः प्रदिशोनु सर्वाः पूर्वोहजातः सतु गर्भेश्रन्तः। सविजायमानःस जनिष्यमाणः प्रत्यङ्मुखस्तिष्ठति विष्टतो- मुखः ॥५८॥ हि निश्चये एष प्रकाशस्वरूपः स्वतंत्रोस्ति । कथंभूतः देवः स्वक्रीडया नटवत्क- चिजायते क्वचिच म्रियते क्वचिद् व्यवहरति क्वचिद्राजा क्वचिदनुचरः क्वचिद्धनी क्वचिद्दरिद्रो जायते । तस्मात्सुत एव स्वयं क्रीडाक्शतया पूर्वः पूर्वः हि निश्चये जातः उत्पन्नः। तदनु तस्यैच्छया सर्वा दिशश्च प्रदिशश्चोपदिशश्च जाताः स एव सर्व अंतर्गर्भ । गर्भान्तर्वर्तते। स एव विजायमानो जन्मरतः तथैव स एव जनिष्यमाणो । जन्मेच्छुः एवं स एव प्रत्यङ्मुखो बहिनिष्कमणसंमुखः स एव विष्ठतोमुखः गर्भजालावृतवक्तस्तिष्ठति स्वयमेव सर्वत्र सर्वरूपतया क्रीडतीति भावः ॥५८ ॥ पुनरप्येतदेव व्याचष्टे। परीत्य लोकान् परीत्य भूतान् परीत्य सर्वाः प्रदिशो दिशश्च । प्रजापतिः प्रथमजमृतस्यात्मनात्मानमभिसंबभूव ॥५६॥ परीत्य परित इत्य गत्वा व्यापकीभूय लोकान् चतुर्दशभुवनानि तथैव परीत्य व्याप्य भूतानि सकलजनान् परीत्य व्याप्य सर्वा दिशश्च विदिशश्च प्रजापतिः प्रजानां सकलचरा- ( २० ) चरभूतानां पतिः पालकः श्रीनारायणः कः ऋतस्य सत्यस्य पांचभौतिकस्य विश्वस्य प्रथमजः प्रथमं जातः आदिकारणं । आत्मना स्वरूपेण हेतुभूतेन आत्मनश्च स्वरूपं अभि- संबभूव अभितोतर्बहिः संभाक्तिवाद् समस्तस्थावरजंगमात्मकं स्वस्वरूपं जगत् स्वयमे- घोत्पाद्य स्वयमपि प्रविष्ठवानिति भावः तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशदिति श्रुतेः॥ ५९॥ नमुभिधप्रकृतिषु लोकेषु अात्मनेपि मिश्वाः स्युर्नत्याह श्रुतिः । एक एवात्मा मंतव्यो जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु । स्थानत्याद्यतीतस्य पुनर्जन्म न विद्यते ॥६॥ ब्रह्मविन्दुः) एक एवात्मा जाग्रत्स्वप्नसुषुप्तिषु मंतव्यो शेयः तत्र स पवैक आत्मैतस्मिन्न- वस्थात्रये मिश्रितो बद्धो जन्ममृत्युयोग्यो भवति स्थानत्रयाद्भूर्भुवः स्वः स्वरूपा- त्रिगुणमयादवस्थात्रितयाद्व्यतीतस्य पारंगतस्य सूर्यावस्थायिनः पुरुषस्य पुनर्जन्म न विद्यते नित्यमुक्तो ब्रह्मस्वरूप एव भवतीत्यभिप्रायः ॥ ६०॥ ननु तत्त्वविदस्तद्ब्रह्म निरंजनमिति कथयति तत्र यत्किंचिवस्तुस्यात् तत्तु श्वेतलाहितपीतकृष्णरकं स्यादेव अतस्तत्रास्तु मीयते ब्रह्मेत्याकाशपुष्पक्च्छशशृङ्गवञ्च पचनवैदग्ध्यमेव स्यात् नेत्याह श्रुतिः । वालाग्रशतसाहस्रं तस्य भागस्य भागशः। तस्य भागस्य भागार्द्ध तत् ज्ञेयं च निरंजनम् ॥ ६१ ॥ (श्वेताश्वतर शह) पालस्य केशस्याग्रं शिरः तस्य लक्षसंख्याका भागा विधेयाः तत्रैको भागो ग्राह्य- स्तस्य भागस्यांशस्य भागा भागशः बहवो भागीः खण्डाः कार्याः तेष्वेको भागो ग्राह्यः तस्यापि भागद्वयं कार्य तस्यापिमामाई कार्यम् तत्र यदेकं भागार्द्ध तद्भागा परिमाणं निरंजनास्यं ब्रह्म विद्वद्भिज्ञेयम् तस्याप्यस्यैतादृशं सूक्ष्मत्वं स्यात् तस्य श्वेतपीतादि- रागता कयं शेया तस्माद्वेदाः वैदशाश्च ब्रह्मया निरंजनमिति चंदति तस्मादन्यन्नास्ती स्वभिप्रायः॥ ६१॥ नन्वीहक सूक्ष्मतरं वस्तु प्रा तदा तस्य सर्वव्यापकत्वपर्याप्तिः कथमित्याह । तिलान्ने तु यथा तैलं पुष्पे गंधमिवार्पितम् । पुरुषस्य शरीरे तु से बाह्याभ्यंतरे स्थितः ॥ ६२ ॥ (ध्यानकिन्तु ... विलामिधानेऽन्ने यथा दैळे सर्वव्यापक वर्तते यथा पुसे संघमर्पित सर्वव्यापक- वया स्थितं वयैव पुरुषाध्य वैराजस्य पुरुषस्य शरीरे विस्वमिधाने प्रक्षाले निज- : नायो नारायसो वाद्याभ्यंतरे अंतर्बहिश्च व्यापको भूत्वा स्थितः तस्मावलक्ष्यमाहा- सत्यमेव ब्रह्मेति भावः ॥६॥ पुनरप्येतदेव हड़यति श्रुतिद्वयम् । पुष्पमध्ये यथा गंधं पयोमध्ये यथा घृतम् । तिलमध्ये यथा तैलं पाषाणेष्विव कांचनम् ॥ ६३ ॥ (ध्यानविन्दु ५।) यथा पयोमध्ये क्षीरमध्ये घतं व्यापकं भवति यथा तिलमध्ये तैलं यथा पाषाणेषु शैलचूर्णेषु काञ्चनं व्यापकं भवति अथवा पाषाणेषु लोहपासु कांचचं धातुर्लाह- मित्यर्थः॥६३॥ एवं सर्वाणि भूतानि मणिः सूत्र इवात्मनि । स्थिरबुद्धिरसंमूढो ब्रह्मविद् ब्रह्मणि स्थितः ॥ ६४ ॥ ( ध्यानविन्दु ६ ।) ब्रह्मप्रोतानि भवन्ति यथा मणिगणे सूत्रव्यापकं भवति एवमेव समस्तेषु स्थूलसूक्ष्मेषु भूतेषु ब्रह्म सर्वव्यापकं भवति एवंविधब्रह्मज्ञानेन ब्रह्मवित्सर्वभूतांतरात्मा ब्रह्मवेत्ता ब्रह्मणि स्थितो ब्रह्मैव भवति स्थिरबुद्धिनिश्चलधी अतएवासमूडोऽमोहरहित इत्यर्थः ।। १४ ॥ पुनरप्येतदेव व्याख्यायते। वृक्षं तु सकलं विद्यात् छाया तस्यैव निकला। सकले निष्कले भावे सर्वत्रात्मा व्यवस्थितः ॥ ६५ ॥ (ध्यानविन्दु ८।) वृक्षं सकलासहितं विद्याजानीयात् तस्य वृक्षस्य छाया निष्कला तत्र वृक्ष तु मूलशाखाप्रशाखापत्रपुष्पफलत्वप्रसादिभिर्बहुविध छायां त्वैकेव च पुनः वृक्षनेत्रविषय छाया तु न तथा तस्माद् वृक्षच्छाययाः सकलनिष्कलत्वमुक्तम् तत्र सकले निष्कले च भावे सर्वत्रैवात्मा श्रीनारायणो व्यवस्थितः प्रतिष्ठितो भवतीत्यर्थः ॥६५॥ ननु बहव आत्मानो मा भवंतु परंतु द्वावात्मानौ सत्यतया वतते इत्यत्राह श्रुतिः। द्वा सुपौँ सयुजी सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते। तयोरेकं पिप्पलं स्वावस्यन्योऽनश्नन्नभिचाकशीति ॥६६॥ (मुण्डक ३।११। श्वेताश्वतर ४।६।) छौ उभौ सुपर पक्षिसौ सुपर्णाविति वृक्षापेक्षयोक्तम् परमार्थतस्तु जीवात्मा परमात्मानौ सयुजौ सदा संयुक्तौ सखायौ परस्पराविरोधिनी समान सामान्यतया तिष्ठन्तौ अधका समान सहसानेन तत्रैकवच मानेन देहाहमिति झानेन अन्यश्चामानेन नाहं देह ( २२ ) इति मानेन युक्तौ वृक्ष वृक्षते न पश्यति इति वृक्षः तं तस्मात्देहस्य वृक्षसमानता पर्शिता । उक्तं च गीतासु ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छंदांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् । परिषस्वजाते आलिंगितवंती तयोर्जीवात्मपरमात्मनो मध्यादेकी जीवात्मा पिप्पलं अश्वत्थे न श्वस्तिष्ठतीत्यश्वत्थं देहं इति यः स्वादुरसपूर्वकं अतीन्द्रिय- द्वारा भुनक्ति अन्या द्वितीयः परमात्मा अनश्नन भोगमकुर्वाण: अभिचाकशीतिसन्निधानतया तिष्ठति तत्रेतयागंगागंगाजलवन्नामतएव द्वित्वम् न तु परमार्थ वस्तुतस्तु द्वादेव चिद्रूपी तत्र चैतन्यमेकमेव तस्माञ्चिद्रूपतया नामतएव तया दः वस्तुतस्त्वेकमेव ब्रह्मति मावः॥६६॥ इदानी पूर्वश्रुतिवदात्मद्वयनिषेधिन्युत्तरा श्रुतिश्च । अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजा जनयन्तीं सरूपाः। अजो ह्येषोऽजुषमाणोनुशते जहात्येनां भुक्तभोगामजो- न्यः॥ ६७॥ (श्वेताश्वतर १) अजां जन्मशून्यां भ्रांतिमात्रामेव मायां एकामद्वितीयां लोहितशुक्लकृष्ण रजासत्वतमामयी रक्तश्वेतश्यामवर्णा बह्वीः प्रजाः नानाविधाः नानावर्णाः नानाप्रकृतिः सृष्टिजनयंतीमुत्पादयंती कार्यकारणकतृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते इति कृष्णस्मरणात् कथं भूताः प्रजाः स्वरूपास्तद्रूपा यथा तस्यास्त्रिगुणत्वं तथैव प्रजाप्युत्पादिता तत्र पूर्वोक्त जीवात्मपरमात्ममध्यात् हि निश्चये एको जीवात्मा अजः चिद्रूपत्वाजन्मादिषड्विकाररहितः न जायते म्रियते वा कदाचिदिति श्रीभगवत्स्मृतेः एनां त्रिगुणमयों मायां । दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्ययेति श्रीकृष्णास्मरणात् । अनुच तत्परो भूत्वा जुषमाणः सेवमानः पुरुषः सुखदुःखानां भक्तित्वे हेतुरुच्यते इतिकृष्णस्मरणत् अथ पूर्वोक्तः परमात्मा अजो जन्मादिशून्यश्चिन्मयत्वात् पनामसपिणी भुक्तभोगां प्रथमेन जीवात्मनोच्छिष्टीकृता वेश्यामिव जहाति त्यजति यद्यपि परमात्मा मोहिनी मायामिंद्रजालवद् दृष्ट्वा मायासबल- जीवभावत्वं प्राप्नोति न्यूनोऽपि स्वविमर्शतकात्मस्वस्वभावं प्राप्त इत्यर्थः ॥६॥ नन्वीहश्या ब्रह्मजिज्ञासायाः कोर्थ इत्यत्राह । श्राहारार्थ कर्म कुर्य्यादनिंद्यं कुर्यादाहारं प्राणसंधारणाय । प्राणाः संधार्यास्तत्त्वजिज्ञासनार्थ तत्वं जिज्ञास्यं येन भूयो न जन्म ॥६८॥ भोजनार्थ कर्म व्यवहारं कुर्यात् यतस्तेन विना भोजनप्राप्तिः कुतः स्यात् कर्म कथंभूतं अनिचं शाालोकादिवाच्यम् ननु यस्येतादृशं बंधनम्भवेत् तद्भोजनमेव किमर्थ कुर्यात् तत्राह पुरुषस्तदाहारं मोजनं कुर्यात् कस्मै प्राणसंधारणाय प्राणस्य संधारणम् संदीपनं -- ( ४ ) तथैव विजानताम् विनातारमरे केन विजानीयादिति श्रुतिः झानेन निश्चयवां पुरुषार्ण विज्ञातं तद्ब्रह्मानिर्वाच्यमुपलक्ष्यमशेयमिति तैरेव निर्णीतमित्यर्थः ॥ ७१ ॥ ननु चेदेतद् ब्रह्माशेयं तदा तत्प्राप्तिपरिश्रमो निरर्थक इत्यत्राह । यदा सर्वे प्रमुच्यते कामा येस्य हृदि श्रिताः । अथ मोमृतोभवत्यत्र ब्रह्मसमश्नुते ॥७२॥ (कठवल्ली श्रुतिः ६१४) यदा यस्मिन् काले अस्य पुरुषस्य हृदि हृदये स्थितैः श्रिताः मृतोत्थिताः सर्वे कामाः विशेषणा सुतैषणा सुखैषणा श्रेयैषणा स्वर्गेषणेत्यादिसकलकामनाः प्रमुच्यन्ते अमुं संत्यज्य पलायंते अथानन्तरं मर्यो मरणशीलः अमृतोभवति कामकामिन एव देहसंबंधतो जन्ममृत्य्वादि इतिभावः । ततो तत्रैव जन्मनि ब्रह्मत्वं समश्नुते ब्रह्ममयोभवतीत्यर्थः ॥७२॥ पुनरपि ब्रह्मणा दुर्शेयत्वं श्रुत्वा भ्रांतचित्तान्पुरुषानाश्वासयत्यन्या श्रुतिः । तमेवमात्मानं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषति । यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन ॥ ७३ ॥ (विहदारण्य ४।४।२२।) यझेन दानेन तपसा नियमेन अनाशकेन निष्कामेन यतः कामेनैव पुण्यनाशः अनाशकेनेति सर्वत्र योज्यं तैरेव शुद्धाः संतो ब्राह्मणाः वेदनाः वेदानुवचनेन वेदश्रुतिस- मुदायेन तमेव प्रसिद्धमात्मानं सर्वभूतात्मानं विविदिषन्ति जानन्तीत्यर्थः ॥ ७३ ।। पुनरप्येतदेव दृढयति । द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥७॥ (ब्रह्मविन्दुः १०।) द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये एकं यत् शब्दब्रह्म वेदशास्त्र अपरं परं ब्रह्म च तत्र द्विविधब्रह्म- झाने को हेतुरित्यत्राह यः शब्दब्रह्मणि वेदशास्त्रे निष्णातः निःशेषतया स्त्रातः वेदशास्त्रको भवति स परंब्रह्माधिगच्छति अनुमानद्वारा दर्पणे स्वमुखमिव प्रामोतीत्यर्थः ॥७४ ।। अथेदानी ब्रह्मक्षाने सुगमोपायमाह श्रुतिः । यदा पंचावतिष्ठते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचिष्टेत तामाहुः परमां गतिम् ॥७॥ (कठवल्ली ६:१०) यदा पंच शानानि झानेन्द्रियाणि अवतिष्ठते निष्कामानि भवंति मनसा सह मनोपि निष्कामं स्यात् तेनानेन कर्मेन्द्रियाण्यपि वर्णितानि यत इन्दियाणां मनोवशत्वात् बुद्धिश्च न विचिष्टेतानेकशानं न कुर्यात् तां तदवस्था परमां गतिमाहुर्वदति वेदविद इत्यर्थः ॥५॥ योगमार्गिणामप्येतदेव दृढ़यति श्रुतिद्वयम् ।

- ( २२ ) इति मानेन युक्तौ वृक्ष वृक्षते न पश्यति इति वृक्षः तं तस्मात्देहस्य वृक्षसमानता पर्णिता । उक्तं च गीतासु ऊर्ध्वमूलमधः शाखमश्वत्थं प्राहुरव्ययम् । छंदांसि यस्य पनि यस्तं वेद स वेदवित् । परिषस्वजाते आलिंगितवंती तयोर्जीवात्मपरमात्मनो मध्यादेकी जीवात्मा पिप्पलं अश्वत्थे न श्वस्तिष्ठतीत्यश्वत्थं देहं इति यः स्वादुरसपूर्वकं अतीन्द्रिय- द्वारा भुनक्ति अन्यो द्वितीयः परमात्मा अननन् भोगमकुर्वाण: अभिचाकशीतिसन्निधानतया तिष्ठति तत्रेतयागंगागंगाजलवन्नामतएव द्वित्वम् न तु परमार्थ वस्तुतस्तु द्वावेव चिद्रूपी तत्र चैतन्यमेकमेव तस्माञ्चिगृपतया नामतएव तयार्भेदः वस्तुतस्त्वेकमेव ब्रह्मति मावः॥६६॥ इदानी पूर्वश्रुतिवदात्मद्वयनिषेधिन्युत्तरा श्रुतिश्च । अजामेकां लोहितशुक्लकृष्णां बह्वीः प्रजा जनयन्तीं सरूपाः। अजो ह्येषोऽजुषमाणोनुशते जहात्येनां भुक्तभोगामजो- न्यः॥ ६७॥ (श्वेताश्वतर ४१) अजां जन्मशून्यां भ्रांतिमात्रामेव मायां एकामद्वितीयां लोहितशुक्लकृष्णां रजःसत्वतमामयी रक्तश्वेतश्यामवर्णा बह्वीः प्रजाः नानाविधाः नानावर्णाः नानाप्रकृतिः सृष्टिजनयंतीमुत्पादयंती कार्यकारणकतृत्वे हेतुः प्रकृतिरुच्यते इति कृष्णस्मरणात् कथं भूताः प्रजाः स्वरूपास्तद्रूपा यथा तस्यास्त्रिगुणत्वं तथैव प्रजाप्युत्पादिता तत्र पूर्वोक्त जीवात्मपरमात्ममध्यात् हि निश्चये एको जीवात्मा अजः चिद्रूपत्वाजन्मादिषड्विकाररहितः न जायते म्रियते वा कदाचिदिति श्रीभगवत्स्मृतेः एनां त्रिगुणमयों मायां । दैवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्ययेति श्रीकृष्णस्मरणात् । अनुच तत्परो भूत्वा जुषमाणः सेवमानः पुरुषः सुखदुःखानां भक्तित्वे हेतुरुच्यते इतिकृष्णस्मरणात् अथ पूर्वोक्तः परमात्मा अजो जन्मादिशून्यश्चिन्मयत्वात् एनामसद्रूपिणी भुक्तभोगां प्रथमेन जीवात्मनोच्छिष्टीकृता वेश्यामिव जहाति त्यजति यद्यपि परमात्मा मोहिनी मायामिंद्रजालवद् दृष्ट्वा मायासबल- जीवभावत्वं प्राप्नोति न्यूनोऽपि स्वविमर्शतयैकात्मस्वस्वभावं प्राप्त इत्यर्थः ॥६७॥ नन्वीहश्या ब्रह्मजिज्ञासायाः कोर्थ इत्यत्राह । श्राहारार्थ कर्म कुर्य्यादनियं कुर्यादाहारं प्राणसंधारणाय । प्राणाः संधाऱ्यास्तत्त्वजिज्ञासनार्थ तत्वं जिज्ञास्यं येन भूयो न जन्म ॥६८॥ भोजनार्थ कर्म व्यवहारं कुर्यात् यतस्तेन विना भोजनप्राप्तिः कुतः स्यात् कर्म कथंभूतं अनिंद्य शास्त्रलोकादिवाच्यम् ननु यस्येतादृशं बंधनम्भवेत् तद्भोजनमेव किमर्थ कुर्यात् तत्राह पुरुषस्तदाहारं भोजनं कुर्यात् कस्मै प्राणसंधारणाय प्राणस्य संधारणम् संदीपनं तथैव विजानताम् विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति श्रुतिः शानेन निश्चयवां पुरुषाणां विज्ञातं तद्ब्रह्मानिर्वाच्यमुपलक्ष्यमशेयमिति तैरेव निर्णीतमित्यर्थः ॥ ७१ ॥ ननु चेदेतद् ब्रह्मानेयं तदा तत्प्राप्तिपरिश्रमो निरर्थक इत्यत्राह । यदा सर्वे प्रमुच्यते कामा येस्य हृदि श्रिताः । अथ मोमृतोभवत्यत्र ब्रह्मसमश्नुते ॥७२॥ (कठवल्ली श्रुतिः ६१ ।) यदा यस्मिन् काले अस्य पुरुषस्य हदि हृदये स्थितैः श्रिताः मृतोत्थिताः सर्वे कामाः वित्तैषणा सुतैषणा सुखैषणा श्रेयैषणा स्वर्गेषणेत्यादिसकलकामनाः प्रमुच्यन्ते अमुं संत्यज्य पलायंते अथानन्तरं मर्यो मरणशीलः अमृतोभवति कामकामिन एव देहसंबंधतो जन्ममृत्य्वादि इतिभावः । ततो तत्रैव जन्मनि ब्रह्मत्वं समश्नुते ब्रह्ममयोभवतीत्यर्थः ॥७२॥ पुनरपि ब्रह्मणा दुर्शयत्वं श्रुत्वा प्रांतचित्तान्पुरुषानाश्वासयत्यन्या श्रुतिः। तमेवमात्मानं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिति । यज्ञेन दानेन तपसानाशकेन ॥ ७३ ॥ (विहदारण्य ४ । ४ । २२।) यक्षेन दानेन तपसा नियमेन अनाशकेन निष्कामेन यतः कामेनैव पुण्यनाशः अनाशकेनेति सर्वत्र योज्यं तैरेव शुद्धाः संतो ब्राह्मणाः वेदशाः वेदानुवचनेन वेदश्रुतिस- मुदायेन तमेव प्रसिद्धमात्मानं सर्वभूतात्मानं विविदिषन्ति जानन्तीत्यर्थः ॥ ७३ ।। पुनरप्येतदेव दृढयति । द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये शब्दब्रह्म परं च यत् । शब्दब्रह्मणि निष्णातः परंब्रह्माधिगच्छति ॥७॥ (ब्रह्मविन्दुः १७।) द्वे ब्रह्मणी वेदितव्ये एकं यत् शब्दब्रह्म वेदशास्त्र अपरं परं ब्रह्म च तत्र द्विविधब्रह्म- शाने को हेतुरित्यत्राह यः शब्दब्रह्मणि वेदशास्त्रे निष्णातः निःशेषतया स्त्रातः वेदशास्त्रको भवति स परब्रह्माधिगच्छति अनुमानद्वारा दर्पणे स्वमुखमिव प्राप्नोतीत्यर्थः ॥७४ ॥ अथेदानी ब्रह्मशाने सुगमोपायमाह श्रुतिः। यदा पंचावतिष्ठंते ज्ञानानि मनसा सह । बुद्धिश्च न विचिष्टेत तामाहुः परमां गतिम् ॥७॥ (कठवल्ली ६।१०1) यदा पंच शानानि ज्ञानेन्द्रियाणि अवतिष्ठते निष्कामानि भवंति मनसा सह मनोपि निष्कामं स्यात् तेनानेन कर्मेन्द्रियाण्यपि वर्णितानि यत इन्दियाणां मनोवशत्वात् बुद्धिश्च न विचिष्टेतानेकशानं न कुर्यात् तां तदवस्थां परमां गतिमाहुर्वदंति वेदविद इत्यर्थः ॥७५ योगमार्गिणामप्येतदेव दृढ़यति श्रुतियम् ।

( २६ ) तत्त्वविद इति शेषः। न कर्मणा नित्यनैमित्तिकादिधर्मेण वान्द्रायणादिवतसमुदायेन च । न प्रजया पुत्रादिकृतश्राद्धादिना । न धनेन धनसाध्येन यज्ञादिना वा । किंतु एकेन केवलेन त्यागेनाहंतात्यागेन अमृतत्वं अमृतो जन्ममृत्यादिरहितोऽविनाशी नारायणरतद्भाव अमृतत्वं श्रीनारायणसायुज्यताम् । आनशुः प्राप्नुयु रित्यर्थः । तस्मात्त दविनाशीस्वरूपं ब्रह्म कथंभूतं नाकं परेण नाकात्स्वर्गादपि परं श्रेष्ठम् विभ्राजते प्रकाशते नयनादिसकलपार्षदद्वारा सर्व करोतीति भावः । यद्यत्र ब्रह्मणि यतयाऽहंतात्यागेन यत्न- पंतस्त एव संन्यासिनः परमहंसा विशति तदात्मतया सर्व जानंतीत्यभिप्रायः॥ ७८ ॥ पुनरप्येतदेव हदयति। वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परांतकाले परा मृताः परिमुच्यंति सर्वे ॥७॥ (मुण्डक ३।२।६१) ये वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः वेदान्तशास्त्राणं विज्ञानेन सुनिश्चितो निर्णीतोर्थः पर- मार्थोब्रह्म यैस्ते संन्यासयोगेनात्मत्याग्मेपायेन यतया यत्नवंतः। तेनैव शुद्धसत्वाः निर्मलामन्तः- करखा । यतः समस्तपापविधायिन्यहंतेवेति । तस्मादहंतात्याग एव शुद्धकारणमिति भावः। ते सर्वे ब्रह्मलोकेषु । ब्रह्ममयेषु लोकेषु परांतकाले परः परश्चासावंतः । कल्पांतस्वात्मवि- नाशः यतो यावदहता वर्तते तावदेव देहात्मसंसारस्थितिरपि वर्तते स एव कल्पः सस्थाहकारस्यांतो नाशः कल्पांत इति कथ्यते तस्य काले समये यावेदवाहंताविनाशः स्यात् तदेव कल्पांतकालस्तस्मिन् सति परामृता अत्यन्ताविनाशिरूपाः परिमुच्यते परितो जीवभावादिबंधनेभ्यो मुक्ताः संतो ब्रह्मसायुज्यमाप्नुवंतीत्यभिप्रायः ॥ ७९ ॥ अनेन पूर्वोक्तन श्रुतिसमुदायेन ब्रह्मशाने आरोहक्रम उक्त इदानीं ततोपि सुगम मवरोहमार्गमाह श्रुतिः। तदेव निष्कलं ब्रह्म निर्विकल्पं निरंजनम् । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा ब्रह्म संपद्यते ध्रुवम् ॥८॥ (ब्रह्मविन्दुः) तदेव पूर्वोकं ब्रह्म निष्कलं निर्विकल्पं निरंजनम् यस्तद् ब्रह्माहमिति सात्वा ध्रुवं- निश्चये संपद्यते ब्रह्मैव भवति ब्रह्मविद् ब्रह्मैव भवतीति श्रुतेः॥८॥ तदेव दृढ़यति। न निरोधो न चोत्पत्तिर्न बंधो न च शासनम् । न मुमुक्षा न मुक्तिश्च इत्येषा परमार्थता ॥८१॥ (ब्रह्मविन्दुः) (२७ ) निरोधो मृत्युभवति न चोत्पत्ति जन्मबंधनम् नवशासनं यमदण्डो न मुमुक्षा मो- सुमिच्छा मुक्ति:ोक्षः सर्व ब्रह्मेति शानवत् इति शेषः इत्येपैवेयगेव परमार्थता सस्यता भवतीत्यभिप्रायः।। ८१॥ तस्मादीहरज्ञान एव नित्यं यत्नं कुर्यादित्याह । घृतमिव पयसि निगूढं भूते भूते च वसति विज्ञानम् । सततं मंथयितव्यं मनसा मंथानभूतेन ॥२॥ (ब्रह्मविन्दुः) पयसि दुग्धे तमिव भूते भूत अनुभूतं चराचरे जगति निगूढगुप्तं विज्ञानचिद्रूपं ब्रह्म विज्ञानमानन्द ब्रह्मेति श्रुतेः वसति तिष्ठतीत्यर्थः तस्माद्ब्रह्म सततं सदैव मंयितव्यं विमर्श- यितव्यं । केन मनसा शुद्धचित्तेन किंभूतेन मंधानभूतेन मंथानस्थानस्थितेनेत्यर्थः ॥८॥ ननु तद्ब्रह्म कथं मन्धयितव्यं तत्राह । सर्वभूतादिवासं च यद्भूतेष्ववसर्पति । सर्वानुग्राहकत्वेन तदस्म्यहं वासुदेवः ॥८३॥ (ब्रह्मविन्दुः) यद् ब्रह्म सर्वभूताधिवासं,सर्वभूतानामधिवासंआराधस्तत् यद् ब्रहाभूतेषुअवसर्पति निवसति तद्ब्रह्माहमस्मि केन सर्वानुग्राहकत्वेन सर्वमनुगृहात्यात्मौपम्येन जानाति इति सर्वा- नुग्रहकस्सस्य भावस्तत्वं तेन च पुनः अहं वासुदेव इति परिक्षानेन मंथयितव्यमित्यर्थः।।८३॥ तद्धिपरीतधर्मिणा निदंति । असूर्या नाम ते लोका अंधेन तमसा वृताः। तांस्ते प्रेत्याभिगच्छति येके चात्महनो जनाः ॥८॥ (ईशावास्योपनिषत्) असूर्याः सूर्यादिप्रकाशरहितालोका नरकविषया अंधेन तमसा गाढ़ांधकारेणावृता युक्ता भवंति । ते प्रेत्य देहं संत्यज्य तान्नरकानभिगच्छंति ते के ये केपि जना आत्महन आत्मघातिन आत्माभावात् देहाभिमानिन इत्यर्थः ॥९॥ पुनरप्येतद् दृढ़यति । न तं विदाथ इमा जजान यद्यस्माकमंतरं बभूव । नीहारेण प्रावृता जल्पाश्चासुतृप उक्थशासश्चरंति ॥८५॥ (यजुर्वेद) हे लेोका यूयं तं न विदाथ न जानीथ तं कं यः ! इमा अनेकयानीर्जजान उत्पा- दितवान् तमाशाने को हेतुः यदस्मात्कारणाधुमाकं तेन ब्रह्मणा सहान्तरं भिन्नत्वं बभूव । ..

4. (२८ ) अतएव भवतश्चरंति पुनः पुनर्जन्ममरणादि प्राप्नुवंति नीहारेसा मोहांधकारेण प्रावृताः नित्यमात्मानं त्यक्त्वा अनित्यं परं देहमात्मानं मन्यमानाः अतएव जल्पाः निंद्या अतएव असुतृप उदरभरणमात्रेप्सवः उक्थशासः वेदोक्तविधिनिषेधरज्जुभिर्बद्धा इत्यर्थः ॥८५॥ पुनरप्यभिमानिनो लोकान्निन्दति । श्रविद्यायामंतरे वर्तमानाः स्वयं धीराः पण्डितमन्यमानाः । जघन्यमाना अपि यति मूढ़ा अंधेनैव नीयमाना यथांधाः॥८६॥ (कठवल्ली २२१) अविद्यायां आत्मन्यनात्मशानं अनात्मन्यात्मशानं अविद्या । त्यांतरे ईश्वरात्पृथ- क्त्वे वर्तमानाः अहंकादि इत्यादिनिर्णये स्थिताः । च पुनः स्वयं धीराः एतत्कार्यमस्म- द्वशे वर्तते इति धैर्यवन्तः । च पण्डितमन्यमानाः वयं पण्डिता इभिमानवंतः । जघन्य- मानाः अहंतयानुक्षणं तमोमयक्रोधनिष्ठाः । अतएव स्वयं मूढाः सर्वकर्तेश्वर इत्यज्ञानिनः मन्त्रादिद्वारा युष्मान्मोक्षयिष्याम इत्यन्यान्कथयंतः । ते के यथांधाः पुरुषा स्वयं गंतुमसमर्था अंधेनाचक्षषा पुरुषेण नीयमाना हस्तान् गृहीत्वा चाल्यमानाः कुत्र गमिष्यन्ति अपि तु कुत्रचिद् गर्ते पतिष्यति तथैवांतर्मूढाः स्वयं भगवन्मार्गानभिशा बहिः पाण्डित्याभिमानिनो- न्यान्मूढान् शिष्यान् प्रमादयतीत्यभिप्रायः ॥८६॥ ब्रह्मवित्तु सदैव निर्दोष इत्याह । यथा प्रदीप्तं पर्वतं नाश्रयंति मृगा द्विजाः । तब्रह्मविदो दोषा नाश्रयंति कदाचन ॥ ८७॥ (मैत्रायसी) यथा प्रदीप्त दावाग्निना प्रज्वलितं पर्वतं मृगाः द्विजाः पक्षिणश्च नाश्रयंति दूरादेव नश्यति । तद्वत् तथैव ब्रह्मविदः चित्प्रकाशवतः पुरुषस्य दोषाः पुण्यपापादयः रागद्वेषा- दयश्च कदाचन नाश्रयंतीत्यर्थः॥८॥ तस्मात्परोहि योगो मनसः समाधिरितिन्यायाद् ब्रह्मज्ञानमपि मनोविषयमेवेस्याह श्रुतिः। चित्तस्य हि प्रसादेन हंति कर्म शुभाशुभम् । प्रसन्नात्मात्मान स्थित्वा सुखमव्ययमश्नुते ॥ ८८ ॥ (मैत्रायणी ) हि निश्चये पुरुषः शुभाशुभं शुभं कर्म पुण्यादिकं निष्कामतया हंति नाशयति अशुभ कर्म अकरणतया हंति नाशयति । केन चित्तप्रसादेन चित्तस्य मनसः प्रसादः प्रसन्नता यदा स्थात् यदास्य पूर्णत्वं स्यात् तत्पूर्णत्वं पूर्णात्मकब्रह्मप्राप्त्यैव जायते नत्व- पूर्वसांसारिकपदार्थप्राप्त्या यतः सांसारिकविषयादिप्राप्तौ सत्यां पुनरपि तृष्णा जायते अपूर्णविषयत्वात् तस्माद्यदैव ब्रह्मप्राप्तिः स्यात् तदेव प्रसन्नता स्यात् । ननु सा ब्रह्मप्राप्तिः कीदृशी इत्यत्राह । यदा सर्वत्रात्मक्षानं जायते तदा ब्रह्मप्राप्तिर्विया चेछन सर्वत्रात्मैवेति ज्ञातं तस्य कामना कावसिष्टा तस्माद्यदैव चित्तं निष्कामं स्यात् तदैव प्रसन्नत्वं जायते ततः पुण्यादिके पापादिके च निष्कामं स्यात् ततः शुभाशुभकर्माभोगविषयं स्यात् तस्मात्प्र- सन्नात्मा प्रसन्नचित्तः पुरुषः परमानन्दरूपे आत्मनि ब्रह्मणि स्थित्वा अव्ययमविनाशि सुखमश्नुते प्राप्नोतीत्यर्थः ॥८॥ तस्मात्सत्यतया दृढ़यति । चित्तमेव हि संसारस्तत्प्रयत्नेन शोधयेत् । यच्चितस्तन्मयो भवति गृह्यमेतत्सनातनम् ॥ ८६ ॥ ( मैत्रायणी) हि निश्चये चित्तमेव मन एव संसारः संसरतीति संसारः जन्ममृत्युसुखदुःखादि- प्राप्तिः तन्मयः प्रयत्नेन यत्नतयेव निष्कामतयैव शोधयेत् शुद्धं कुयात् यतः सकाममेवा- शुद्धं तस्मात्पुरुषः यश्चितः यस्मिन् विषये चित्तं स्यात् तन्मयस्तद्रूप एव भवति यस्य ब्रह्मविषये चित्तं स्यात् स तद्रूपो भवति यस्य विषयादिक चित्तं स्यात्स तन्मयो भवति उक्तं चं श्रीभगवद्गीतासु-यं यं वापि स्मरम्भावं त्यजत्यंते कलेवरम् । तमेवेति च कौतय सदा- तद्भावभावितः इति। वसिष्ठेपि। मुक्ताभिमानी मुक्तोहीति । गीतायाम्-देवान्देवयजो यांति पितृन्याति पितृवताः । भूतानि यांति भूतेज्या यांति मद्याजिनापि मामिति । तस्मादेतद्रुह्यपरमरहस्यं सनातनम् ब्रह्मादिभिरप्यपरिहारार्थ तैरपि मतं चेत्यभिप्रायः॥ ८१ ॥ एतदेव दृढ़यति। समासक्तं यथा चित्तं जंतोर्विषयगोचरे । तच्चेदेवं ब्रह्मणि स्यात्तत् को न मुच्येत बंधनात् ॥१०॥ (मैत्रायणी ) यथा जंतोः पुरुषस्य चित्तं मनः विषयगोचरे विषयादिषु समासक्त अत्यन्ततत्परं भवति चेदेवमेवतञ्चित्तं ब्रह्मपरं स्यात् तदा कश्च पुरुषः बन्धनात् संसारात् । नमुच्येत मुको भविष्यतीत्यर्थः॥१०॥ तस्माद् बंधमोक्षो मनोविषय एवेत्याह । मनो हि द्विविधं प्रोक्तं शुद्धं चाशुद्धमेव च । अशुद्धं कामसंकल्पाच्छुद्धं कामविवर्जितम् ॥ ११ ॥ ( ब्रह्मविन्दुः) मनदिचत्तं द्विप्रकारं एक शुद्धम् द्वितीयं अशुद्धं तत्र कामसंकल्याकामनाचिं- न्तया अशुद्धं मलिनं बंधविषयं भवति कामनावर्जितं शुद्धं निर्मलमाक्षविषयं भवति मोक्षो विषयवैरस्यं बंधो वैषयिको रस इति स्मृतः ॥११॥ एतदेव हदयति । लयविक्षेपरहितं मनः कृत्वा सुनिश्चलम् । यदा यदुन्मनीभावं तदा तत्परमपदम् ॥ १२ ॥ (मैत्रेयी) यदा यस्यामवस्थायां मनश्चित्तं लयविक्षेपरहितं यथा चित्ताख्या हंसः तस्य द्वौ पक्षौ लयः द्वितीया विक्षेपः तत्र लयो निद्रा विक्षेपो जागरणं संकल्पकर्म ताभ्यां पक्षाभ्यां रहितं हीनं सुनिश्चलं निर्वीतदीपवदत्यंतनिश्चलं कृत्वा विधाय यदुन्मनीभावो मनसारमनस्कत्व- मुन्मन्यवस्था यदा स्यात् तदा तत्परमं पदं ब्रह्मधाम भवतीत्यर्थः ॥ ९२ ॥ तस्मान्मनोविरोध एव परमोपाय इत्याह श्रुतिः । तावन्मनो निरोधव्यं यावद् हृदि गतक्षयम् । एतज्ज्ञानं च मोक्षं च शेयोन्यो ग्रन्थविस्तरः ॥ १३ ॥ ( ब्रह्मविन्दुः । मैत्रेयी) तावत्तदवधि मनो निरोधव्यं यतश्चलप्रकृतित्वादनेकविपयेषु धावति तेभ्यो विषये- भ्यो अनित्यत्वाऽसंबंधित्वदोषोपदेशेन नियमनीयम् यावद्यदवधि तदुपदेशाभ्यासात् हृदि आत्मनि तन्मनःक्षयमनस्कत्वं गतं प्राप्त स्यात् तत एतदवस्थाविषयं ज्ञानं ब्रह्मज्ञानं मोक्षं मुक्तिश्च एष एवं सारातिसारः अन्यशेषः शास्त्रसंग्रहः ग्रन्थविस्तरः कविकौशल्यविस्तार इत्यभिप्रायः॥९॥ तस्माद् ब्रह्मज्ञानं परमसुखदमित्याह श्रुतिः । समाधिनितमलस्य चेतसो निवेशितस्यात्मनि यत्सुखं भवेत् । न शक्यते वर्णयितुं गिरा तदा स्वयं तदंतःकरणेन गृह्यते ॥ १४॥ ( मैत्रायणी) समाधिनितमलस्य समाधिः सर्वं ब्रह्मेतिचित्तैकाग्र्यं तेन निध/ता अत्यन्त- निवृत्ता आवरणमायिकोमिका मला यस्य चेतसः शुद्धमनसः । च पुनः आत्मनि ब्रह्मणि निवेशितस्य स्थितस्य यत्सुख परमानदो भवेत् । नु तत्कीदृशं सुखं वर्तते इत्यत्राह तत्सुखं गिरा देववाण्यापि वर्णयितु [ शक्यते तदा तस्मात् ब्रह्मविदा स्वयमेव तत्सुखं अन्तःकरणेन शुद्धमनसा वस्वरूपे

गृहाते झायते । उक्तं च वसिष्ठेन । न शास्त्रापि गुरुणा दृश्यते परमेश्वरः। दृश्यते
स्वात्मनैवात्मा स्वया सत्वस्थया धियेति ॥ १४ ॥
तस्माञ्चित्तैकाग्यमेव संसारक्षय इत्याह ।
श्रपामापोग्निरग्नौ वा व्योम्नि व्योम न लक्षयेत् ।
एव मंतर्गतं यस्य मनः स परिमुच्यते ॥ ६५ ॥
(मैत्रायणी)
यथा अपामपः जलांतःक्षिप्तं जलं यथाग्निरग्नौ यथा व्याम्नि व्याम अखण्डाकाशाs-
भिन्नघटाधवच्छिन्न घटाद्याकाशं न लक्षयेत् न लभ्यते एवमेव यस्य ज्ञानविदो मन:-
स्वात्मस्वरूपे ब्रह्मणि अंतर्गतमंतलोंने स्यात् स पुरुषः परिमुच्यते मुक्तो भविष्यतीत्यर्थः॥१५॥
एतदेव दृढ़यति ।
मन एव मनुष्याणां कारणं बंधमोक्षयोः ।
बंधाय विषयासक्तं मोक्षो निविषयं स्मृतम् ॥ १६ ॥
(ब्रह्मविन्दुः)
मन एवाऽशुद्ध शुद्धं च एतदेव मनुष्याणां बंधमक्षियोः कारणं हेतुर्भवति यतो
विषयासक्तं बंधाय चेन्मनः सांसारिकपदार्थेषु मग्नं स्यात् तदा बद्धमेव जानीयात्
निर्विषयं विषयवासनाहीनं माक्षः ॥९॥
पुनरप्येतदेव दृढ़यति ।
यस्तु विज्ञानवान्भवत्ययुक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाण्यवश्यानि दुष्टाश्वा इव सारथेः ॥ १७ ॥
( कठवल्ली १ ॥३।५)
तु पक्षांतरे परोक्षज्ञानपक्षे यः पुरुषो विज्ञानवान्सवं ब्रह्मेति निश्चयवान्भवति
कथंभूतः प्रयुक्तेनास्थिरेणाशुद्धेन मनसा युक इति शेषः तस्य पुरुषस्य सदैवेन्द्रियाणि
सारः सूतस्य दुष्टाश्वा दुर्वाजिन इव अवश्यानि वशीभूतानि न स्युः॥१७
पुनरप्येतदेव वैपरित्येनानुवर्णयति ।
यस्तु विज्ञानवान्भवति युक्तेन मनसा सदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यानि सदश्वा इव सारथेः ॥ १८ ॥
( कठवल्ली १।३।६।)
तु अपरोक्षशानपक्षे पक्षान्तरे यः कश्चित्पुरुयो विज्ञानवान्सर्वं ब्रह्मेति निश्चयी युक्तेन
स्थिरेण शुद्धेन मनसा युक्तश्च भवति तस्य सदैव इंद्रियाण्यंतर्बहिः करणानि सारथे
रथवाहिनः सदश्या सुशीला हया इव वश्यानि स्ववशीकृतानि भवंतीत्यभिप्रायः ॥९८॥

( ३२ )
यस्त्व विज्ञानवान्भवत्यमनस्कः सदाऽशुचिः ।
न स तत्पदमाप्नोति संसारं चाधिगच्छति ॥६॥
( कठवल्लो १।३।७।)
तु पक्षांतरे यो विज्ञानवान्सर्वं ब्रह्मति निश्चयकारी अमनस्की मनाहीनः सदाशुचिः
नित्यमेवापवित्रः स पुरुषस्तत्पदं तस्य ब्रह्मणः पदं धाम नाप्नोति किंतु संसारं पुनःपुनर्जन्म-
मृत्यादिभावं चाधिगच्छति प्राप्नोतीत्यर्थः ॥१९॥
यस्तु विज्ञानवान्भवति समनस्कः सदा शुचिः । सतु तत्प-
दमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते ॥१०॥
( कठवल्ली ३।३।८1)
यो विज्ञानवान् ब्रह्मशाता समनस्कः मनोयुक्तः जितचित्तो भवति कीदृशः सदा
नित्यमेव शुचिः तु निश्चये से पुरुषः तत्पदं प्रसिद्धं ब्रह्मधाम आप्नोति यस्माद् ब्रह्म धान्न
ब्रह्मविद्भूयो न जायते पुनर्जन्म तस्य न भवति यतो यावन्मनःस्थितिर्भवति तावद्द्ब्रह्मभुव-
ननिवासः ततः पुनर्जन्मापि स्यात् यदा स्वात्मनि ब्रह्मरूपे लीनं स्यात् वासनावासितं स्यात्
तदा ब्रह्म-धामप्राप्ति जानीयात् तदा पुनर्जन्म न भवेत् । उक्तं च भगवद्गीतासु। आब्रह्मभु-
पनॉल्लोकाः पुनरावर्तिनार्जुन । मामुपेत्य तु कौंतेय पुनर्जन्म न विद्यते ॥१०॥
विज्ञानसारथिर्यस्तु मनःप्रग्रहवान्नरः।
सोऽध्वनः पारमाप्नोत तद्विष्णोः परमंपदम् ॥१०१॥
(कठवल्ली १।३।।)
तु पक्षांतरे यो नरः पुरुषः पुरुषत्वबलेन धीरः इंद्रियाश्वयुतशरीराख्यरथोपविष्ट
इति शेषः । विज्ञानसारथिः विज्ञानं शुद्धबुद्धिः सारथिः रथवाही । यस्य मनःप्रग्रहवान्
विशुद्धचित्ताभिधरश्मियुतश्च भवति स पुरुषः अध्वनः संसारमार्गस्य पारमाप्नोति। न नु
सत्यारं किमित्यत्राह तद्विष्यः सर्वव्यापकस्य ब्रह्मणः परमं पदम् सर्वोत्कृष्टधाम भवती-
स्पर्थः॥१०॥
ननु सा ब्रह्मधामप्राप्तिः कीदृशी तत्राह!..
यथा निरीन्धनो वह्निः स्वयोनावुपशाम्यति ।
तथा वृत्तिक्षयाच्चित्तं स्वयोनावुपशाम्यति ॥ १०२ ॥
(मैत्री ६ । २४ ।)
यथा येन प्रकारेण निरॊधमा पहिर्दग्धकाष्ठोग्निः स्वयानो पवनात्मनि कारणे शनैः
शनैरुपशाम्यति लीयते तथैव वृत्तिक्षयात्वंकल्पविकल्पाख्यव्यापारसंहारतः चित्ताभिधं
चैतन्यं स्वयोनौ कारसे उपशाम्यति तत्सायुज्यमामोतीत्यर्थः ॥१०॥

। ( ३३ ) प्रणवो धनुः शरोह्यात्मा ब्रह्म तल्लक्ष्यमुच्यते । अप्रमत्तेन वेद्धव्यं शरवत्तन्मयो भवेत् ॥ १०३ ॥ (मुण्डक २ २॥ ४॥ प्रणवःोकार:धनुरचापोभवति।हि निश्चितं प्रात्मा जीवात्मा शरो बाणा भवति। प्रणवाख्ये धनुषि आत्माख्यः शरः संयोज्यः । पुनस्तद्ब्रह्म लक्ष्यं वेधयोग्यं चिह्नमुच्यते कथ्यते । तल्लक्ष्यं अप्रमत्तेन सावधानेन स्थिरचित्तेन पुरुषेण वेद्धव्यं वेध्यम् । ततो जीवात्मा शरवत् यथा स्थिरचित्तवृत्तियुक्तशरो लक्ष्येण साकं सायुज्यमामोनि तथैव ब्रह्मलक्ष्येण सह तन्मयस्तदाकारो भवेदित्यर्थः॥१०॥ तत्राप्यपरां युक्तिं विवनोत्यन्या श्रुतिः। लक्ष्यं सर्वगतं चैव शरः स्यात्सर्वतोमुखः । वेद्धा सर्वगतश्चैव विद्धं लक्ष्यं न संशयः ॥ १०४ ॥ यथा लक्ष्यं सर्वगतं सर्वव्यापकं भवति तथैव जीवात्माख्यः शरोपि सर्वतोमुखः सर्वत्राहमेवेति शाता स्यात् । घेद्धा सर्वगतश्चैव यदा वेद्धरूपशराख्य आत्मा यतः शरो जडात्मकाष्ठमयो भवति । जेन सह वेद्धा स्वचित्तात्मना बलात्मना च सह- गामी न स्यात् । बाणः कुत्र गमिष्यति । तस्मात् शररूपेण वेद्धव सर्वव्यापकः स्यात् तदा तल्लक्ष्यं ब्रह्मविद्धं स्यात् यतो वेधाख्यः शरः सर्वत्राहमिति भावतया सर्वव्यापके ब्रह्मणि लीयेत ब्रह्ममयः स्यात् । तदाशिष्ट ब्रह्मैव स्यात् । एतदेव ब्रह्मात्मफलक्ष्यवेधनं भवति । अत्र कश्चित्संशया नास्तीत्यर्थः ॥१०॥ ननु तल्लक्षं कुत्र वर्तते इत्यत्राध्वानमुपदिशति श्रुतिद्वयम् । इन्द्रियेभ्यः परा ह्या अर्थेभ्यश्च परं मनः । मनसस्तु परा बुद्धिबुद्धेर्यस्तु महान्परः ॥ १०५ ॥ ( कठवल्ली ३ । १०) आदावेतस्मात् दृश्याच्छीरादिंद्रियाणि चक्षुरादीनि ज्ञानेंद्रियाणि वागादीनि कमैंद्रियाणि चापराण्यप्रस्थानि वर्तते। तेभ्यः हि निश्चये अर्थाःशब्दस्पर्शादयो विषयाः तन्मात्राणि च परा अप्रस्था भवंति । तेभ्यो मनः संकल्पविकल्पकारिचित्तांतःकरणं परमप्रस्थं भवति । तस्माद् बुद्धिःनिश्चयकारिणी धीः परा अग्रस्था भवति । तस्या यो महानादिशानक्रियात्मकम् महत्तत्त्वंस परोऽप्रस्थो वर्तते ॥१०५॥ महतः परमव्यक्तमव्यक्तात्पुरुषः परः । पुरुषान्न परं किञ्चित्सा काष्ठा सा परागतिः॥ १०६ ॥ (कउवल्ली ३।११।) - ( ३४ ) तस्मादव्यक्तं कार्यकारणत्पादकं प्रधानं परमग्रस्थं भवति । तस्मात्पुरुषः सर्वातीतं सर्वमयं च ब्रह्मास्ति । तस्मात्परं न किंचिद्वर्तते । यतः सैव काष्ठा मर्यादा वर्तते । सैव परा गतिः परमगतिश्च भवति तदेव लक्ष्यं जानीयादित्यर्थः ॥१०॥ ननु जीवात्मपरमात्मानौ चिद्रूपावेध तत्र चेजीवात्मा लीयते तदा परमात्मनाशप्रसंगः स्यादित्यवाह। दृढ़संभूतमाकाशं लीयमाने घटे यथा । घटो लीयेत नाकाशं तइज्जीवो घटोपमः ॥१०७॥ (ब्रह्मविन्दुः १३!) यथा घटे माकाशं दृढ़संभूतं संभावितं स्थितं भवति ततः तस्मिन्नेव घटे लीयमाने भग्ने सति घट एव लीयेत नश्येत न त्वाकाशं नश्यति तद्वत्तथैव जीवात्मापि घटोपमः घटसमानो मायासबलजीवभाव एव नश्यति नतु चैतन्यम् तस्माच्चिद्रूपं जीवात्मपरमा- मसंक्षं ब्रह्माविनाश्येवेति भावः ॥१०॥ ननु चेज्जीवात्मपरमात्मानावेकरूपावेव तदा जीवात्मा घटोपमः कथमित्यत्राह । घटवद्विविधाकारं भिद्यमानं पुनः पुनः । उद्भानं न च जानाति स जानाति च नित्यशः ॥१०॥ (ब्रह्मबिन्दुः १४ ।) जीवात्मा आत्मानं देहं घटवद्विविधाकारं देवतियंगादिरूपम् तथैव पुनः पुनर्मिद्यमानं जन्ममरणादिवशं उद्भानं म्रियमाणं मृतं वापि न जानाति अन्यत्कुतः च पुनः स परमात्मा नित्यशः सर्वजानाति । एष एव जीवात्मपरमात्मनार्भेद इत्यर्थः ॥१०॥ अनया पूर्वोक्तश्रुत्या जीवात्मस्वरूपं वर्णितम् । अथेदानी परमात्मस्वरूपं वर्णयति श्रुतिः। यत्तददृश्यमग्राह्यमगोत्रमवर्णमचक्षुः । अश्रोत्रं यत्तदपाणिपादं नित्यं विभुं सर्वगतं सुसूक्ष्म। तदव्ययं यद् भूतयोनि परिपश्यंति धीराः ॥१०॥ (मुण्डकश्रुतिः १ ।।६।) यत्तदनिर्वाच्यं ब्रह्म अदृश्य । अग्राह्य । अयोत्रं गोत्रसंज्ञाहीनं । अवर्णम् तथैव देहा- भावादचक्षः लोचनहीनः । अश्रोत्रं श्रवणशून्यं । यत्किं दृश्यादृश्यं तदेव चिन्मयत्वात् अपा- णिपादं हस्तचरणादिवर्जितम् नित्यं निराकारत्वात् विभुं व्यापकं सर्वगतं सर्वशं सुसूक्ष्म सूक्ष्मतरं तत्प्रसिद्धं तथैवाव्ययम् । तत्किं यत् ब्रह्म धीराः जितमनस्काः पुरुषाः परिप- श्यंति परितो जानंति । कथंभूतं भूतयोनिम् भूतानां चराचराणां लोकानां योनि पटस्य तंतवश्व उत्पत्तिकारणमित्यभिप्रायः॥१०॥ तस्मात्सर्वकारणं प्रौवेत्याह। ५ - -- यथा पृथिव्यामौषधयः संभवंति यथा सतः पुरुषात्केशलोमानि। तथाक्षरात्संभवंतीह विश्वं नानाविधं देवनरादिरूपम् ॥११०॥ (मुण्डक ।।१।७1) यथा येन प्रकारेण पृथिव्यामोषधयः वृक्षरतागुल्मशस्यतृणादिकानि संभवति उत्पद्यते पृथिवीमयानि च भवंति । यथा सतः पुरुषात्केशलामानि उत्पद्यते तन्मयानि च भवंति । तथैवेह संसारे अक्षरादविनाशिनो ब्रह्मणः नानाविधमनेकप्रकारं देवनरादि- रूपम् अमरकिन्नरनरवानरतरुवरसरोवरखेचरादिरूपं विश्वं जगत् समवति खायते कनककुण्डलादिवत् तद्रूपं च भवतीत्यर्थः ॥११०॥ ननु सर्व ब्रह्मेति वेदा वदंति लोकानां विश्वासः किं न संभवति तत्राह । तेषामेवैष ब्रह्मलोको येषां तपो ब्रह्मचर्येषु सर्वम् । प्रतिष्ठितं तेषामसौ विरजो ब्रह्मलोको न येषु जिह्ममनृतं न माया ॥१११॥ (प्रश्न १ । १५) तेषामेव पुरुषाणां ब्रह्मलोको ब्रह्मधाम भवति तेषां तपो ज्ञानं भवति यस्य ज्ञानमयं तप इतिश्रुतेःतयैव ब्रह्मचर्य ब्रह्मण्येव चर्या सर्व ब्रह्मेत्याचरणम् चतथैव येषु सत्यं यथार्थस्थितिः प्रतिष्ठितं स्थिरं भवति । यतो जगत् द्वितीयेंदुवज्रान्तिमात्रमेव यर्थाथतस्तु ब्रह्मैव भवतीति भावः। तेषामेव पुरुषाणामसौप्रकाशस्वरूपो विरजास्त्रिविधमलव्यतिरिक्तोब्रह्मलोको भवति । येषु जिॉकौटिल्यं सकामं कर्म नास्ति। अनृतं सत्यं नानाविधजगत्परिज्ञानं च नास्ति माया- दंभः बाह्यकरणानि संयम्यांतःकरणेन विषयस्मरणं च नास्ति । उक्तं च श्रीमद्भगवद्गीतासु "कर्मेन्द्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् । इन्द्रियान्विमूढ़ात्मा मिथ्याचारःस उच्यते" इति ॥१११॥ अथैवंविधतया सूर्यमयूखा इव समुद्रे तरंगा इव वह्नौ ज्वाला इव सर्व दृश्या- दृश्य जगद् ब्रह्मण्येव वर्तते इत्याह । एवंह वै तत्सर्व परे अात्मनि संप्रतिष्ठतं पृथिवी च पृथिवी मात्राश्चापश्चापोमात्राश्च । तेजश्च तेजोमात्राश्च । वायुश्च वायु- मात्राश्चाकाशं चाकाशमात्राश्च । चनुश्च द्रष्टव्यं च । श्रोत्रं च श्रोतव्यं च । घ्राणश्च धातव्यं च । रसश्च रसयितव्यं च । त्वक्च स्पर्शयितव्यं च । वाक् च वक्तव्यं च। हस्तौ च दातव्यं च । पादौ च गंतव्यं च। पायुश्च विसर्जयितव्यं । चोपस्थं चानन्दयितव्यं च। मनश्च मंतव्यं च । बुद्धिश्च बोधव्यं चाहंकारश्चाहंकर्तव्यं च । ।

चित्तं च चेतयितव्यं च । तेजश्च विद्योतयितव्यं च । प्राणश्च विचेष्टितव्यं च ॥११२॥ (प्रश्न ४८) एवं पूर्वोक्तप्रकारेण ह वा निश्चये एतदादि प्रच्छन्नाप्रच्छन्नस्वरूपं सवंसकलं जगत् परे आत्मनि परमात्मनि ब्रह्मणि संप्रतिष्टते सम्यक निश्शेषतया प्रतिष्ठते प्रकर्षण स्थिति करोति । यथा पृथिवी च भूमिः पृथिवीमात्रारच गंधः। आपो जलं आपामात्राश्चरसः। तेनो- ग्निश्च तेजोमात्राश्च रूपं च वायुश्च वायुमात्राश्च स्पर्शश्च आकाशं च आकाशमात्राश्च शब्दश्चाचक्षुश्च नयनं चद्रष्टव्यं च दृश्यं च ।श्रोत्रंच श्रवणं चश्रोतव्यं च श्राव्यं च । प्रायश्च नासिकाश्च घ्रातव्यं च प्रेयं च । रसश्च स्वादश्च रसयितव्यं स्वादयितव्यं । त्वक् च चर्म च स्पर्शयितव्यं च स्पृश्यं च वाक् च वाणी च वक्तव्यं च वाक्यं च हस्तौ च दातव्यं च पादा च गंतव्यं च। पायुश्च विसर्जयितव्यं त्याज्यं च ।उपस्थं शिश्नं च आनन्दयितव्यं चाहाद्यं च । मनश्चित्तं च मंतव्यं च संकल्पविकल्पानि च बुद्धिश्च बोद्धव्यं । ज्ञेयं च अहंकारश्चाहं कर्तव्यं च । चित्तं च चैतन्यं चचेतयितव्यं चेत्यं च । तेजश्च प्रकाशश्च विद्योतयितव्यं च प्रकाश्य च प्राणश्च विचेष्टितव्यं च विचेष्टनीयं चेत्यादि सर्व यत्किंचिद्वस्तु तद्ब्रह्मण्येव प्रतिष्ठितमित्यर्थः ॥ ११२ ॥ ननु पूक्तिया श्रुत्या सर्व ब्रह्मैव प्रतिष्ठितम् तदा तद् ब्रह्म स्वयं कीदृशमित्यत्राह। एष हि द्रष्टा स्प्रष्टा श्रोता घ्राता रसयिता मंता बोद्धा कर्ता विज्ञानात्मा पुरुषः ॥११३॥ (प्रश्न ४) एष पूर्वोक्तस्वरूपपुरुषः । पुरि पुरि वसतीति पुरुषः। सर्वभूतान्तरात्मा द्रष्टा प्रेक्षका श्रोता घ्राता रसयिता स्वादयिता मंता संकल्पयिता बोद्धा बोधकती विश्वानात्मा चिद्रूपो भवतीत्यभिप्रायः ॥११॥ पुनरप्येतदेव महिमानं विवृणेति । सयोहबैतदच्छायमशरीरमलोहितं शुभ्रमक्षरं वेदयते । यस्तु सौम्य स सर्वज्ञः सर्वो भवति ॥११४॥ (प्रश्न ४।१०) सपरमेश्वरोस्ति।सका हनिश्चये यो भवति यतो निर्वाच्यः अनामरूपत्वात् वैनिश्चय तदनिर्वाच्यम् ब्रह्म अध्यायं छायारहितं यतोऽशरीरं अतश्वालाहितम् अरुणादिरागरहितं शुभ्र निर्मलम् अक्षरमविनाशि ब्रह्म यस्तु पुरुषो वेदयते जानाति हे सौम्य शांतात्मश्रितं स पुरुषः सर्वमः सर्वं ब्रह्म जानाति सर्वश्च सर्वात्मा भवतीत्यर्थः ।। ११४ ॥ पुनरप्येतदेव वश्यति श्रुतिः। ।

यस्मिन्सलीयते शब्दस्तत्परब्रह्म गीयते । ध्रुवं हि चिन्तयेद् ब्रह्म सोमृतत्वाय कल्पते ॥११५॥ यस्मिन्यत्र वस्तुनि शब्दोवेदः संलीयते नेति नेतीति निीय श्रांतो भवति तत्वविद्भि- स्तत्परं ब्रह्मति गीयते । हि निश्चये यः पुरुषः ध्रुवं सनातनं तत्परब्रह्म सर्वभूतात्मना चिन्तयेत् निर्णयं कुर्यात् स पुरुषः अमृतत्वाय मुक्तये कल्पते समर्थो भवतीत्यर्थः । ननु जगदमाववादिनां ब्रह्मवादिनां ब्रह्मविदां जगद्भासते न वा तत्राह ॥११५॥ ब्रह्माद्यं स्थावरांतं च पश्यतो ज्ञानचक्षुषा । तमेकमेव पश्यंति परिशुद्धं विभुं द्विजाः ॥११६॥ (चूलिका १६ ।) द्विजा ब्रह्म शानाख्यं संस्कारेण संस्कृताः ब्रह्मशाः शानचक्षुषा ज्ञानमेव दिव्य चक्षुः तेन तं पूर्वोकं परिशुद्धं निर्मलं निरुपाधि विभु व्यापकम् सर्वत्र सर्वस्मिन् एकमेवाद्वितीयं ब्रह्म पश्यति । द्विजाः कथंभूताः ब्रह्माद्यस्थावरांतं च जगत्पश्यतः द्वितीयं चन्द्रवज्रान्ति मात्रतया वीक्षेतः । संगीतं श्रीमद्भगवद्गीतासु । या निशा सर्वभूतानामिति ॥ ११६॥ ननु जगत्सत्यतया भासते अथवा द्वितीयं चन्द्रवर्द्रान्तिमात्रमेव भासतु परन्तु तद्विश्वं किमाधारं कुत्र लीयते इत्यत्राह श्रुतिः । यस्मिन्सर्वमिदं प्रोतं जगत्स्थावरजंगमम् । तस्मिन्नेव लयं याति वुवुदाः सागरे यथा ॥११७॥ (चूलिका १७ !) यस्मिन्ब्रह्मणि इदं सर्वं दृश्यादृश्यं प्रोतंतंतुपटवत् स्थिरं भवति अर्थाजगद्ब्रह्माधार भवति तस्मिन् ब्रह्मण्येव जगल्लयं याति सागरे बुद्बुदा इव बीयते इत्यभिप्रायः ॥ ११७ ॥ ननु यथा कस्यचिद्राक्षः स्वदेशे व्यापकतया स्थितस्य कस्मिंश्चिद्विषये राजधान्यपि- स्त्येव तथैव ब्रह्मणा व्यापकतयाऽनुरोमं स्थितस्य राजधान्यपि कुत्रास्तीत्याह । अथास्य पुरुषस्य चत्वारि स्थानानि भवंति।नाभिः हृदयं कंठो मूर्द्धति । तत्र चतुष्पादं ब्रह्म विभाति । जागरितं स्वप्नं सुषुप्तं तुरीयमिति। जागारते ब्रह्मा स्वप्ने विष्णुः। सुषुप्तौ रुद्रः। तुरीयं ब्रह्माक्षरं ।सादित्यो विष्णुश्चेश्वरश्च पुरुषः स प्राणः। सजीवः सोग्निर्जाग्रतस्तेषां मध्ये यत्परं ब्रह्म विभाति ॥११८॥ (अलविन्दुः ।) " अथानन्तरं अस्य पुरुषस्य ब्रह्मणः चत्वारि नाभिः हृदयं कंठा मूर्द्धति स्थानानि राजा धान्या भवंति तत्र तेषु चतुर्यु स्थानेषु ब्रह्म विभाति विराजति कथं भूतं चतुष्पादं पद्यते क्रोडाचमत्कारं ज्ञायतेनेनेति पादाश्च चत्वारः पादा क्रीड़ा । क्रीडाविक्षेपा यस्य तत्पादानाह जागरितं समस्तेन्द्रियं विषयाजाग्रदवस्था तथैव स्वप्नं मनाविषया स्वप्नावस्था तथैव सुषुप्तं बुद्धि विषया सुषुप्तावस्था तथैव तुरीयं ब्रह्मविषया चतुर्थावस्थेति । तत्र जागरिते ब्रह्मा भूत्वा सर्गोत्पादनतया क्रीडति । स्वप्ने विष्णुभूत्वान्तःकारणाख्ये सर्ग निधाय पालयति । सुषुप्तौ रुद्रो भूत्वा सर्ग संहरति । तुरीयं स्वयमेवाक्षरं ब्रह्म तिष्ठति । स एवादित्यः स एव विष्णुः स एवेश्वरः स एव पुरुषः स एव प्राणः स एव जीवः स एवाग्निः स एव जाग्रतः जाग्रदवस्थायी तेषां मध्ये यत्परं ब्रह्म विभाति विविधस्वरूपतया विविधचरितत्वेन च भासत इत्यर्थः॥११८॥ अनया पुर्वोक्तश्रुत्या चतुर्विधावस्थायित्वात्सगुणं ब्रह्मोक्तम् इदानी तूर्यातीतं निर्गुणं परं वर्णयति श्रुतिः। खयममनस्कमश्रोत्रमपाणिपादं ज्योतिर्मयं तत्रलोका न लोका। वेदा न वेदा । देवान देवा । यज्ञा न यज्ञा। माता न माता। पिता न पिता । स्नुषा न स्नुषा । चंडालोन चंडालः। पौल्कसो न पौल्कसः । श्रमणो न श्रमणः । पशवो न पशवस्तापसो न तापस। इत्येकमेव परं ब्रह्म विभाति ॥११६॥ (ब्रह्मविन्दुः) तत् ब्रह्म स्वयं विभाति अमनस्कं मनःकृतसंकल्पविकल्परहितं अश्रोत्रं श्रोत्रेन्द्रि यादिविवर्जितं तथैव पाणिपादं करचरणादिकर्मेन्द्रियहीनं । तथा च ज्योतिर्मयं चिद्रूपं ब्रह्मणि लोका न लोका न भवंति किन्तु वीजान्तद्रुमवद् ब्रह्ममया भवंति । पौल्कसोऽमे- ध्यवृत्तिकरः । श्रमणः तत्र संन्यासी । इत्येकमेव परं ब्रह्म सर्वस्वरूपेण विभाति विराजती- स्यर्थः॥ ११९॥ तस्मात्कर्ता कारणं कार्यं ब्रह्मैव भवतीत्याह । जनो रूपं रसं गंधं शब्दस्पर्शाश्च मैथुनम् । एतेनैव विजानाति किमत्र परिशिष्यते ॥१२०॥ ( कठवल्ली ४ । ३।) जनायं लोकः रूपं रसं गंधशब्दस्पर्शाश्च मैथुनं योषित्संगाह्लाद इत्येतानि एतैनैव चिद्रूपेण ब्रह्मणा विजानाति चिन्वति तस्मादत्र किं परिशिष्यते किंचिन्न यतो जनरूपेण कापि स्वयमेव । चिद्रूपेण कारखं हेतुरपि रूपादिना कार्यमपि स्वयमेवेत्यर्थः ॥१२०॥ पुनरप्येतदेव विवृणाति ।

स्वप्नान्तं जागरितांतं चोभी येनानुपश्यति । महान्तं विभुमात्मानं मत्वा धीरो न शोचति ॥१२१॥ (कठवल्ली २४) अयं लोकः स्वप्नस्यादिमते च तथैव जागरितांतं जगरितस्याप्याचं तौ एतावुभौ येन चैतन्यान्मकेन ब्रह्मणा हेतुभूतेनानुपश्यति तमीदृशं महान्तं सर्वोत्कृष्टं विभु व्यापक आत्मानं सर्वभूतात्मानं मत्वा ज्ञात्वा धीरः आत्मभानेन धीर्यवान् न शोचति मोहशोकादि- वशो न भवतीत्यभिप्रायः ॥१२॥ ननु चेद्ब्रह्मविन्मोहशोकादितंत्रो न भवति तत्र को हेतुरित्यत्राह । हंसः शुचिषद्वसुरंतरिक्षसद्धोता वेदिषदतिथिदुरोण सत् । नृषद्वरसहतसद्व्योमसदब्जागोजा तजा अद्रिजा भृतम्॥१२२॥ (कठवल्ली ५।२।) हंसः सर्वान्पापान्दुःखांश्च हंतीति हंसः यद्वा क्षीरनीरपरीक्षया हंस इति कथ्यते क्षीरमात्मस्वरूपंनोरं । मायास्वरूपं तत्रापि मायातःस्वात्मस्वरूपं पृथक्कर्तुं समर्थः अथवा हंसावतारतया च हंस इति कथ्यते । तस्माद्धंसः श्रीनारायणः कीदृशः । शुचिषत् पवित्र- निर्मलविषयासीनः । तथा वसुः सनातनरूपः अंतरिक्षसत् यत्किंचित्सदसद्वस्तु तन्मध्ये तिष्ठमानः।होता संसाराख्ययनकर्ता। वेदिषत् यज्ञस्थाल्यामपि निविष्टः । अतिथिरपि स एव दुरोणसत्मायनिवर्तकः। तथैव नषत् यद्यपि सर्वत्र ब्रह्मैव निवसति तथापि मनुष्येषु प्रकाश- तया निविष्टः। ऋत सत् ऋतं सत्यं येन सत्येन सर्व सत्यं भवति तत्रापि निवसमानः व्योम सत् आकाशवास्यपि स एव अब्जा जलमध्येपि निविष्टः गोजा पृथ्यांतर्निवासकृत् । ऋतजा ऋतं च सूनता वाणी तत्रापि वसति । अद्रिजा पर्वतादिष्वपि तिष्ठमानः । तदेव ऋतं सत्यं भवति अतो मोहशोकसुखदुःखादिविषयेषु ब्रह्मैव भवति तस्मात्मोहद्यवसरः कुत इत्यर्थः ॥ १२२॥ ननु प्राण एवात्मा किं यतोनेनैव पुरुषो जीवतीत्यत्राह । न प्राणेन नापानेन मों जीवति कश्चन । इतरेणानुजीवंति यस्मिन्नेतावुपाश्रितौ ॥१२३॥ (कठवल्ली ५१) कोपि पुरुषः न प्राणेन न जीवति नापानेन ननु सर्वे जीवाः पुनः केन जीवंति तबाह एते प्राणिनः इतरेण चिद्रूपेण जीवंति चेष्टां कुर्वति। ननु तत्किं ब्रह्म तबाह यस्मिन् ब्रह्मणि एतौ प्राणापानावुपाश्रिता तदाधारी भवतः । यत एतयोरपिस्वकीयं चैतन्यं नास्ति। ननु प्राणोपि चेज्जड एव तदायं जड़ात्मानन्देहं कथं चेष्टयते इत्यत्राह यथेन्द्रिज.लमंत्रश- ( ४० ) तैकमुद्रिकेतरमुद्रिका प्रेरयति चालयति च तथैव । तद् ब्रह्मचैतन्यतया जहात्मापि प्राणी जड़ात्मानं चालयतीति भावः ॥१२३॥ पुनरप्यन्याभावात्तदेव ब्रह्मानुवर्णयति । यस्मिन्निदं सर्वविदेति सर्वं यस्मिन्देवा अपि विश्वे निषेदुः। तदेव भूतं तदु भव्यमानमिदं तदक्षरे परमे व्योमम् ॥१२४॥ (महानारायणः ।।२।) यस्मिन्ब्रह्मणि इदं दृश्यादृश्य यदाधारं भवति यः सर्ववित् सर्वशोपि सन्सत् सर्व सकलं एति व्याप्नोति तथैव यस्मिन्ब्रह्मणि अपि अध्याश्रित्य विश्वे देवाः सर्व देवादयः निषेदुर्निविष्टाः तदेव ब्रह्मभूतं अतीतं उ निश्चये तदेव ब्रह्म भव्यमानं भविष्यद् भवति तदे- घेदं वर्तमानमपि तदेवं भवति अथवा तदिदं सर्व अक्षरेऽविनाशिनि परमे व्योमन् परमाका- शस्वरूपे ब्रह्मणि वरीवर्तीत्यर्थः॥१२॥ पुनरप्येतदेव विवृणोति । येनावृतं खं च दिवं च महीं च येनादित्यस्तपति भ्राजमानः । यदंतः समुद्रे कवयो वदति तदक्षरे परमे प्रजाः ॥१२५॥ ( महानारायणः १।३।) येन ब्रह्मणा खमंतरिक्षं च आवृतं पूरितं भवति । तथैव दिवं द्यौ एवमेव महीं येन ब्रह्मणा आदित्यः सूर्यस्तपति किं भ्राजमानः प्रकाशमानः । यद् ब्रह्म समुद्रांतर्वर्तते तत्त- स्मिनक्षरे परमे ब्रह्मणि प्रजाः प्रकर्षण मानाविधतया जाता ब्रह्मादिस्थावरांता यानयो भवंतीति कवयो ब्रह्मविदो भवंति कथयन्तीत्यर्थः ॥१२५।। यतः प्रसूता जगतः प्रसूतिस्तोयेन जीवान्विससM भूम्याम् । यत्रौषधीभिः पुरुषान्पशृंश्च विवेश भूतानि चराचराणि ॥१२६॥ ( महानारायणः ।।४।) यतो ब्रह्मस्वरूपात्स्वात्मनः प्रसूताजीवान जमतश्च विश्वस्य प्रसूतिरुत्पत्तेर्हेतोः तोयेन वर्षाजलेन सह भूम्यां पृथिव्यां विससर्ज त्यक्तवान् ततश्च ओषधीभिरनादिभिः सह पुरुषान् मनुष्यादीन् पशून्मृगादीन् तथैव चराचराणि भूतानि विवेश प्रविष्टवान् तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशदिति श्रुतेः ॥१२६।। अतःपरं नान्यदणीयसं हि परात्परं यन्महतां महान्तम् । अनेकमव्यक्तमनन्तरूपं विश्वं पुराणं तमसः परस्तात् ॥१२७॥ ( महानारायणः ।।५।) हि निश्चये अतो ब्रह्मणः परं अन्यत्परं अशीयसं सूक्ष्मं नास्ति । च पुनः परात्परं च नास्ति । च महतां महान्तं स्थूलतरे च नास्ति। तथैव तदेव अनेक नानाविधं अव्यक्तमन- काशं अनन्तरूपमाग्रंतरहितं विश्वं विश्वमयं पुराणं पुरातनम् तमसः मायांधकारात्पर- स्तात्परं भवतीत्यर्थः ॥१३॥ पुनरपि तद्ब्रह्मगुणवर्णनं करोति । तदेवैतत्तदु सत्यमाहुस्तदेव ब्रह्म परं कवीनाम् । इष्टापूर्त बहुधा जायमानं विश्वं विभनि भुवनस्य नाभिः ॥१२८॥ (महानारायणः ।।) ब्रह्मैवं तदिदं चराचरं जगदपति उ निश्चये ब्रह्मविदस्तब्रह्म सत्यं यत्सत्यतयाऽ सत्यं जगदपि सत्यवदानि इत्याहुर्वदति । च पुनस्तदेव ब्रह्म कवीनां वेदशास्त्रकर्तृणां वक्तृणां च परमनिर्वाच्यं । तत्किं यद् ब्रह्म विश्व सकलं जगद्विभर्ति धारयति विश्व कथं- भूतं इष्टापूर्त इष्टा च यज्ञादिभिश्च पूतं च कृपतड़ागप्रतिष्ठादिपुण्यकर्मभिश्च बहुधा देवराजादि स्वर्देवभूदेवनरराजादिरूपेणानेकधा जायमानं प्रादुर्भूतम् तत्किंभूतं भुवनस्य चतुर्दश भुवनांगिनो ब्रह्माण्डस्य नाभिर्मध्यं मध्यस्थमित्यर्थः ॥१८॥ पुनरप्येतदेवानुवर्णयति। तदेवाग्निस्तद्वायुस्तत्सूर्यस्तदु चन्द्रमाः । तदेव शुक्रं तदब्रह्म तदापः स प्रजापतिः ॥१२६॥ (महानारामणः । .) तदेव ब्रह्मैवाग्निरस्ति तदेव शुक्रं सदसतार्बोजं तदेव विस्तीर्णरूपिणी प्रकृतिः तस्मात्सर्वं तद्ब्रह्मवेत्यभिप्रायः ॥१९॥ चिन्मयस्याद्वितीयस्य निष्कलस्वाशरीरिणः । उपासकानां कार्यार्थं ब्रह्मणो रुपकल्पना ॥१३०॥ (रामपूर्वतापिनी ।) स्पष्टमेतत् ॥१३०॥ ननु तद्ब्रह्म ब्रह्मादिस्थावरांतारूपान कुत्रचित्स्थापयित्वा प्रकाशयति किंवा तत्कालमेव विधाय प्रकाशयतीत्यत्राह । यथैव वटबीजस्थः प्रकृतश्च महाद्रुमः । तथैव रामबीजस्थं जगदेतचराचरम् ॥१३१॥ ( रामपूर्वतापिनी १५) यथैव वटबीजस्थः वटपादपस्य बीजं तस्मिन्तिष्ठति यः स प्रकृतश्च प्रकर्षेण कृतः मूलाग्रंकुरशाखाप्रशाखा पत्रपुष्पफलबीजांतसंपादितो महाद्रुमः तथैव रामबीजस्थं रामः आब्रह्मतृणपर्यन्ते जगति सर्वभूतान्तरात्मना रमति क्रीडति रामः अथवा सकल जगत्- सर्वभूतांतरात्मना रमयति नर्तयतीति रामः यद्वा येऽत्र रामाख्ये ब्रह्मणि योगिनो रमंति विश्रमयंतीति रामः। उक्तं च “रमन्ते योगिनो यत्र सदानन्दे चिदात्मनि इति राम- पदेनासो परं ब्रह्माभिधीयते इति तस्माद्रामेति नाम्ना परं ब्रह्मेत्युच्यते । तञ्च तत् बीज- मुत्पसिकारणं तत्स्थमेतद् दृश्यादृश्यं चराचरं जगद् भवति । यथा बीजस्थो वृक्ष आदा- वपि वीजात्मनै भवति ततोकुरोत्पत्तौ बीजरूपेणा जायते पुनरप्यंते बीजात्मनैव तिष्ठति एवमेवादौ तद्ब्रह्माख्यबीजस्थं तन्मयमेव-सकलं चराचरं जगदासीत् । मध्यपि तद्रूपेणैव प्रादुर्भूतम् अन्तेपि तदात्मनैव तिष्ठतीत्यर्थः ॥ १३१ ॥ इदानीमनेकनामकमेकं ब्रह्मैवैत्याह । स एव ब्रह्मा स शिवः शक्रः सोक्षरः परम : स्वराट् । स एव विष्णुः स प्राणः स आत्मा परमेश्वरः ॥ १३२ ॥ ( महानारायणः ११ । १३ ।) सोऽतयं महिमा श्रीनारायणः ब्रह्म नानाविधजगदुत्पादको भवति स एव शिवास्ति स एवेंद्रोस्ति स एव पूर्वोक्तोऽक्षरोविनाशिस्वरूपः अनेन ज्ञातमन्यत्सर्व विनाशिरूपम् ॥ १३२॥ स एव सर्वं यद् भूतं यच्च भव्यं सनातनम् । ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पंथा विमुक्तये ॥ १३३ ॥ (कैवल्योपनिषत् ।) सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । संपश्यन्ब्रह्मपरमं याति नान्येन हेतुना ॥ १३४ ॥ ( कैवल्योपनिषत १०।) पुनरप्येवमेव मुक्तिमार्ग इत्याहः । यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत् । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यं तत्त्वातत्त्वाधिकं च तत् ॥१३५॥ ( कैवल्योपनिषत् ) यत्परब्रह्म सर्वात्मा तत्त्वमेचंत्वमेव तत् यस्य विश्वस्य चराचरस्य जगतः महदायतनं परमाश्रयो भवति सूक्ष्मादणुतोपि सूक्ष्मं नित्यं निश्चलं तत्वात् पृथिव्यप्तेजोवाप्वाकाश- शब्दस्पीकपरसगंधचक्षुश्रवणत्वासनाघ्राणवाकपाणिपादपायूपस्थमनोब्रह्माहंकारचित्ता २ जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादि प्रपंचो यत्प्रकाशते । तब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबंधैः प्रमुच्यते ॥ ॥ ( केवड्यानियत १७१) जाग्रन्स्वप्नसुषुप्त्यादि प्रपंचं यत् यन बैतन्यरूपंण प्रकाशयने प्रायत तद्मशा- हमिति झात्वा सर्वबंधः अन्नमयप्राण्मयमनामयविज्ञानमनिममयावरणात्मकः प्रमुच्यते मुक्ता भवतीत्यर्थः ॥ १३६ ।। पुनरपि सगुणनिर्गुणद्वारतद्वर्णयति । त्रिषु धामसु यद्भोज्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवत् । तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोहं सदाशिवः ॥१३७॥ (कंचन्योपनिषत् - त्रिषु धामसु भूर्भुवः स्वरिति तेषु यद्वा जाप्रम्बमन्युप्स्यवस्था इति त्रिषु स्थानेषु यत्किंचिद्भोज्यभाग्य अथवा या भोक्ता भागकर्ता वा भागश्च यत् यो भवेदस्ति । तेभ्यो विलक्षण व्यतिरिक्तः श्रीनारायणः एतेषामसत्यत्वात् । यदुत्तं वालेष्ठेन "झानं श्रेयं परिशाता त्रितयं नास्ति वास्तवमिति" अतएव साक्षी साक्षीभूत्वा स्वस्वरूपचमत्कारप्रेक्षकः यत- श्चिन्मात्रः अतएव सदाशिवः सर्वदा मानन्दस्वरूपः यः साहमिति मत्वा पुरुषः सर्वबंध- मुक्तो भविष्यतीति पूर्वेण संबंधः ॥१३॥ पुनरपि ब्रह्मणः सर्वमयत्वप्रतिपादयति । न भूमिरापो न च वह्निरस्ति न चानिलो नास्ति न चांवरं च ॥ एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कलमद्वितीयम् ॥१३८॥ (कैवल्योपनिषत २३ :) यत्परमात्मरूपं गुंहाशय गुहासु सर्वभूतहृदयेषु आशयस्थानं यस्य तत्सर्वभूतान्त- रात्मकं निष्कलं गुणातीतं अद्वितीयमेकं एवं विदित्वा ज्ञात्वा भूमिर्न भवति । आपो न जल- मस्ति। वह्निश्चाग्निर्नास्ति।नचानिलः पवनास्ति । न चांवरमाकाशमस्ति । यथाकाशे विंबीभूतं सूर्य दृष्ट्वानेकघटादिषु प्रतिबिंबिता बहवः सूर्या विम्बात्मनः सूर्यादन्यभावनया भिन्नात्मका न भासते अपि तु तन्मया लभ्यते । एवमेव भूम्यादयस्तस्माद् ब्रह्मणे भिन्नात्मका न प्रका- श्यंते अपि तु तदाकारा एव दृश्यते इत्यर्थः ॥ १३८ । तस्मात्सर्वयझेभ्यो झानयज्ञः श्रेष्ठ इत्याह । समस्तसाक्षी सदसद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्मरूपम् ॥ ध्यायेज्जगदबीजजगन्निवासं विश्वं जुहोति वसुधादिशिवावसानम् ॥१३॥ ( कैवल्योपनिषत् २४ ।)

( ४४ ) यः पुरुषः आदौ जगबीजं मूलकारणं जगतो निवास आधारश्च तद्ब्रह्माग्निरिति- भ्यायेत् तत्तसिन्ब्रह्मस्वरूपे वह्नौ वसुधादिशिवावसानं वसुधायाजातोयस्तृणादिसएवा- दिर्यस्य शिव एवावसानमंतश्च यस्य तद्विश्वं जुहोति जुहुयात् तद्रूपतया जानीयात् यतो- कुरतया बीजमेव तिष्ठतीति विमर्शात् । सुवर्णकुण्डलयकारगासदृशं कार्यमिति न्यायाचे- त्यनेन मंत्रेण ज्ञान यज्ञ कुर्यात् यदुक्तं गीतासु “श्रेयान्द्रव्यमयाद्यज्ञात् ज्ञानयज्ञः परंतप । सर्वं कर्माखिलं पार्थ ज्ञामे परिसमाप्यते” इति । सपुरुषः समस्तसाक्षि सकलकर्मणां साक्षि- भूतं सदसद्विहीनं अनिर्वाच्य नासदासीनोसदासीत्तदानीमिति श्रुतेः जगत्सद्वासद्वा गणयति परःकोपि सदसत् । तवैवाज्ञानाद्वा प्रभवति हि मिथ्यामतिरियम् । स किंसद्वासद्वा किमितिसदसद्वेति चन्वति । न वक्तुं जिह्वस्त्वयि तु सदसद्भ्यां विरहिते इति न्यायाच्च शुद्धविश्वोपाधिकलंकशून्य परमात्मरूपं ब्रह्म प्रयाति तन्मयो भवति ॥ १३९ ॥ परमार्थतो ज्ञानवानेव मुक्तिभागी नात्य इत्याह । कथ्यते स एव योगी स एव ज्ञानी च । यत्पूर्णानन्दैकरसबोधस्तद्ब्रह्माहमिति कृतकृत्यो भवति ॥१४॥ (परमहंसः ३।) मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । मयि सर्व लयं याति तद्ब्रह्मास्यहमद्वयम् ॥१४१॥ ( कैवल्योपनिषत् १५।) अणोरणीयान्महतोमहीयान्नात्माहं विश्वं विशुद्धः । पुरातनः पुरुषोहमीशो हिरण्मयोहं पुरुषोहमस्मि ॥१४२॥ ( कैवल्योपनिषत् २०।) नारायणोहं पुरुषः शिवोहं ब्रह्माहमस्मि सकलोहमस्मि । पूर्णोहमस्मि पुरुषोहमस्मि ज्ञानोहमस्मि सत्योहमस्मि ॥१४३॥ अपाणिपादोहमचिंत्यशक्तिः : पश्याम्यचक्षुः सशृणोम्यकर्णः । अहं विजानामि विविक्तरूपो न चास्ति वेत्तामम चित्सदाहम् ॥१४४॥ ( कैवल्योपनिषत् २१ ।) वेदैरनैकैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् । न पुण्यपापे मम नास्ति नाशो न जन्मदेहेन्द्रियबुद्धिरस्ति ॥१४५॥ ( कैवल्योपनिषत् २२।)

विज्ञानं ब्रह्मचंद्वेद तस्माचतो न प्रमायति । शरीरे पाप्मनो हित्वा मर्वान्कामान्ममश्नुते ॥१४॥ { तेत्तीरिय २।५।।) स आत्मा विज्ञयो सदोज्वलोविद्या नत्कार्याहीनः स्वात्म- बंधहरः । सर्वदाद्वैतरहितः अानन्दरूपः सर्वाधिष्ठानसन्मात्री निरस्ताविद्यातमोमोहोहम् ॥१४७॥ (नृसिंहोत्तरतापिनी २।) यं यं लोके मनसा संविभर्ति। विशुद्धः कामः कामयते यांश्च कामान् । तं तं लोके जयते तांश्च कामान् । तस्मादात्मज्ञं झर्चयेद भृतिकामः ॥१४॥ (मुण्डक ३।१०।) यस्य देवे पराभक्तिर्यथादेवे तथा गुरौ । तस्यैते कथिता ह्यर्थाः प्रकाशंते महात्मनः ॥१४६॥ ( श्वेताश्वतर २२३) स यो ह वै तत्परमं ब्रह्म वेद ब्रह्मैव भवति नास्याब्रह्मवित्कुले भवति तरति शोकं तरति पाप्मानं गुहाग्रंथिभ्यो विमुक्तोऽमृतो भवति ॥१५॥ इतिश्रीब्रह्मोपनिषत्सारसंग्रहदीपिका समाप्ता। श्रीः।

॥ श्रीगणेशाय नमः॥ श्रीब्रह्मोपनिषत्सारसङ्ग्रहदीपिका । । भाषार्थ (१) वेदश्च ब्राह्मण स्वर्ग को जिस ब्रह्म का शिरोरूप वर्णन करते हैं। आकाश को नाभिरूप वर्णन करते हैं । चन्द्र और सूर्य को नेत्ररूप वर्णन करते हैं । दिशाओं को कर्ण- रूप वर्णन करते हैं । पृथ्वी को चरणरूप वर्णन करते हैं । सकल वस्तुओं में चैतन्यरूप से प्रतिष्ठित उस अन्तर्यामी परमात्मा को ध्यान करना चाहिये । टिप्पणी-इस श्रुति में ब्रह्म का ध्यान सगुण और निर्गुण उभय रूप से विहित हुआ है। उनकी विराट् मूर्ति का वर्णन करके फिर चैतन्यरूप सर्व-भूत-हृदयस्थ परमात्मस्वरूप भी वर्णन किया गया है। अधिकार-भेद से अपनी समझ और रुचि के अनुसार लोग ध्यान करें। दोनों प्रकार की व्यवस्था पाई गई है। ब्रह्म के इसी द्विविध रूप को और एक दूसरी श्रुति समर्थन करती है। (२) अग्नि जिसका मस्तक, चन्द्र सूर्य जिसके नेत्र, दिशा जिसके कान, चारों वेद जिसके वचन हैं, वायु जिसके प्राण हैं, दृश्यादृश्य जगत् जिसका हृदय है, क्षिति जिसके पैर हैं वह ब्रह्म सब वस्तुओं का अन्तः प्रतिष्ठित आत्मा है। (मुण्डक २११४) टिप्पणी-पुराणादि में भी ऐसे ही वचन पाये जाते हैं। यथा-द्यौर्मूर्धानं यस्य विप्राः स्तुवन्ति । खं नाभि चन्द्रसूर? च नेत्रे। दिशः श्रोत्रे चरणौचास्य भूमिः । सोऽचिन्त्यात्मा सर्वभूतप्रसूतिः । वायुपुराण नवमाध्याय श्लोक-संख्या १२० श्रानन्दाश्रममदित पुस्तक ) अब इस सकल वस्तुओं के अन्तरात्मारूप ब्रह्म के आगे और पीछे के दिगविभाग भी ब्रह्म ही है सो भी श्रुति कहती है । (३) चैतन्यरूप कालादि से अपरिच्छिन्न ब्रह्म ही पूर्व में है, पश्चिम में भी है, दक्षिण में है, और उत्तर में है, नीचे भी, ऊपर भी फैला है, यह उत्कृष्ट दृश्यादृश्य चराचर स्थूल सूक्ष्म जगत्-ब्रह्म ही है।

। ( ४८ ) अब आगे इस श्रुति में ब्रह्मस्वरूपका वर्णन है- (४) वह ब्रह्म बड़े स्थूल हैं, दिव्य हैं, अपरिमेय हैं, फिर सूक्ष्म से भी सूक्ष्म हैं। बहुत दूर हैं फिर बहुत समीप भी हैं। ब्रह्मज्ञ सब के हृदय-सिंहासन में प्रतिष्ठित उनको दर्शन करते हैं। (मुण्डक २१११७) टिप्पणी-विरुद्ध धर्म का धारण ब्रह्म की शोभा है। अब दूसरी श्रुति से ब्रह्म की स्थिति का वर्णन दिखाया है। (५) वह ब्रह्म एक है । प्रकाशात्मा है । सब वस्तुओं में छिपा हुआ बैठा है। सर्व- व्यापी (घट घट में वर्तमान) है। सब वस्तुओं का अन्तःप्रतिष्ठित चैतन्य रूप आत्मा है। सब का अध्यक्ष है । सब में निवास करता है । सब का साक्षी है। चैतन्य रूप है। अकेला और निर्गुण है। (श्वेताश्वतर ६।१११) टिप्पण-दिव्य शब्द का दीपिकाकार ने दिवु क्रीडायाम् इस धातु से सम्बन्ध रक्खा है । सो ब्रह्म इस जगत् में क्रीड़ा करते हैं-अर्थात् खेल खेलते हैं इस लिये वह दिव्य हैं । हैं तो एक पर बहुरूपिया बन कर क्या क्या खेल दिखलाते हैं। मूल में सर्वाध्यक्षः ऐसा पाठ दिया है। पर मुद्रित उपनिषत् में कर्माध्यक्षः यह पाठ बहुधा मिलता है । अर्थ यह है कि उपाधिस्थ होकर ब्रह्म सब का कर्म निरीक्षण करते हैं। इसी से साक्षी मात्र हैं । निर्लिप्त हैं। मध्यस्थ-उदासीन हैं । केवल (अलग) हैं। निर्गुण हैं (अर्थात् सत्वादि गुणतीत हैं)। अब ब्रह्म से विश्व की उत्पत्ति का क्रम दिखाते हैं। (६) उस ब्रह्मसे सब ब्रह्मा, विष्णु, महादेवादि देव उत्पन्न हुए हैं । साध्यादिदेवता और मनुष्य और पशु-पक्षी उत्पन्न हुए हैं। प्राण वायु, अपान वायु, धान्य, यव, तप, श्रद्धा, सत्य, ब्रह्मचर्य ये सब और इन सब का विधान भी ब्रह्म से उत्पन्न हुए। (मुण्डक २०१७) टिप्पणी-प्राण और अपान से यह समझना चाहिये कि अण्डजादि चार प्रकार की सृष्टि की चेष्टा प्राणापान ही से प्रवृत्त होती है। धान और यव से सब प्रकार के अन्न समझना चाहिये । इन सृष्ट जीवों का कथन करके उनके स्थिति कराने वाले धर्मों का भी वर्णन किया गया । सत्यादि विना कैसे इनकी धारणा हो सकती है। धर्म ही जगत् को धारण करता है । सृष्टि-रक्षार्थ उसकी भी आवश्यकता समझ कर धर्मोत्पत्ति की गई। (७) ब्रह्म से सब समुद्र पर्वत उत्पन्न हुए, सब छोटी बड़ी नदियाँ बहने लगी, ब्रह्म ही से सब ओषधियों की बिरई, सब प्रकार के मधुरादि षट रस उत्पन्न हुए । उसी ब्रह्म के कारण सब पदार्थ जीते हैं। वह ब्रह्म सब के हृदय में बैठा है। (मुण्डक २।१।।) - - अब प्रश्न यह है कि जैसे दीवाल पर चित्रकार चित्र खोंच कर रचता है, क्या इसी तरह ब्रह्म ने इस जगत् का चित्र स्वयं रचा है। या इनकी उत्पत्ति और किसी उपाय से हुई है ? इस प्रश्न का उत्तर इस श्रुति ने दिया है। (८) जैसे प्रज्वलित अग्नि से हजारों एक रूप की अग्नि-कणिकायें निकलती उसी तरह हे महाशयो ! नाना प्रकार के पदार्थ उस अविनाशी ब्रह्म से उत्पन्न होते हैं। फिर उसी में लीन हो जाते हैं। (मुण्डक २।३।) अब प्रश्न है कि ऐसे अद्भुत-शक्ति ब्रह्म का झान कैसे होवे ? इसका उत्तर श्रुति देती है। (९) यह प्रत्यक्ष रूप, स्थूल रूप और सूक्ष्म रूप शुद्ध मन से परिक्षेय है। इस मन में पांच प्राण प्रविष्ट हैं। उसी में श्वास और चित्त सब कपड़े में सूत की नाई बुना है। जब वह मन शुद्ध होवे तब दर्पण पर प्रतिविम्ब की नाई ब्रह्म झलकने लगता है। (मुण्डक ३।१।) भला सब श्रुतियों में ब्रह्म तो एकही कहा गया है, तो ब्रह्म का उच्च-नीचत्व और स्थूल-सूक्ष्मत्व क्योंकर हो सकता है। इसका उत्तर कहते हैं। (१०) जैसे एक ही अग्नि घर में लग कर नाना वस्तु के रूप को धारण करता है, ऐसे एक ही आत्मा हर एक जीवों में स्थित हो कर नाना रूप धारण करता है। (कठवल्ली ११) भला नारायण तो सर्वव्यापक हैं। तो उनको पदार्थों से अनुलिप्त हो जाना चाहिए । इस पर श्रुति कहती है कि यह बात नहीं । (११) सूर्य सब का चक्षु है। पर नेत्र के दोष उसको नहीं लगते। इसीतरह सब वस्तुओं के अन्तरात्मा ब्रह्म भी लोगों के दुःख से बाहर हैं । लिप्त नहीं होते। (कठवल्ली ५११) टिप्पणी-एक सूर्य ही सब के नेत्र में देवतारूप वास करता है। उसी के प्रकाश से आँख देखती है। भला ब्रह्म यदि एक अद्वितीय है तो स्वर्गादिक पृथक् क्यों भासता है। इसका उत्तर- (१२) न तो स्वर्ग लोक, न स्वर्ग लोकाधिपति देवता लोग ब्रह्म से अलग हैं। न भुवीक न भूलक उनसे पृथक् हैं । उसी ब्रह्म में ताना बाना की नाई वे सब बुने हुए हैं। उस से बाहर कुछ भी नहीं है। प्रश्न । भला अब कहिये ब्रह्म कैसा है ? । है । (१३) न उस ब्रह्म के सामने सूर्य का प्रकाश होता है । न चन्द्र का। न उसके सामने बिजुली की चमक । आग की कौन कहे। उसी के प्रकाश से सब का प्रकाश उसी की चमक से सब चमकते हैं। (मुण्डक २।२।१० भला, भगवद्गीता में भगवान् ने कहा है कि ब्रह्म को न सूर्य प्रकाश करता है न चन्द्र न अग्नि । इस कथन से यह सूचित होता है कि ब्रह्म से इनकी सत्ता पृथक् है । श्रुति उत्तर देती है। यह बात नहीं। (१४) न ब्रह्म से कोई पहले हुआ न पीछे है । न कुछ हुआ न होगा। यह विश्व उसके पैर के तले और सिर के ऊपर जो कुछ (ब्रह्मा से तृण पर्यन्त ) है वह सब उसी से व्याप्त है। प्रश्न । भला सर्व खल्विदं ब्रह्म नेह नानास्ति किञ्चन । यह श्रुति-वाक्य सत्य है तो वह ब्रह्म सब लोगों का क्यों नहीं दर्शन का विषय या ग्रहण का विषय है। इसका उत्तर- (१५) न वह आँखों से देख पड़ता है। न वाक्य से उसका कथन हो सकता है। वह न और इन्द्रियों से, प्राप्य है न तपश्चर्या से, न नित्य-नैमित्तिक कर्म से लभ्य है । ज्ञान- रूप भगवत्-प्रसाद से ही शुद्धचित्त होकर गुणातीत ब्रह्म को ध्यान करते करते "सर्वं खल्विदं ब्रह्म" (जो कुछ है यह सब ब्रह्म है ) ऐसा उसको सूझने लगता है। (मुण्डक श्रुति) (१६) जो ब्रह्म हर एक जीव में स्थित है, जिसमें ये सब विचरते हैं। उस वर- दाता परेश स्तुत्य देव को निर्णय कर साधक अत्यन्त शान्ति को पाता है श्वेताश्वतर ४ । ११) (१७) वह सूक्ष्म से सूक्ष्म है, बड़े से बड़ा है । वह विश्व का आत्मा है। जीवों के हृदय में स्थित है । तत्त्व के जानने वाले उसको अकर्ता मानते हैं। भगवत्प्रसाद से उनके माहात्म्य को वह समझता है । और उसका शोक और मोह सब छूट जाता है। अच्न, ब्रह्म यदि सबका आत्मा है, तो सब जीवों को सुलभ होना चाहिए। श्रुति का उत्तर। (१८) यह आत्मा बहुत कीर्तन से नहीं मिलता, न व्यावहारिक मिथ्या बुद्धि से, न बहुत शास्त्र-श्रवण से । यह आत्मा जिसको चाहता है उसी को मिलता है। उसी को आत्मा अपना स्वरूप प्रकट करता है। (कठवल्ली २ । २३ ।) अब श्रुति से यह पाया जाता है कि आत्मज्ञानी को परमानन्द का लाभ होता है । (१९) वह एक स्वतन्त्र है। सकल जीवों का अन्तर्यामी आत्मा है। अपने एक रूप को बहुत रूप कर दिखाता है। जो धीर मनुष्य अपने हृदय में उसको देखते इन्हों को नित्य सुख है । दूसरों को नहीं। (कठवल्ली ५। १२) (२०) जो अनित्य देहों में नित्य है। चेतन प्राणेन्द्रियों का चेतयिता है । जो एक होकर बहुतों की कामना पूरा करता है। उस परमात्मा को जानता है । उसी को नित्य शान्ति है । दूसरे को नहीं। (कटवली ५ ! १३) अच्चन, वह परमात्मा जीवों की नाई क्या हाथ पैर से काम करता है? है है - (२१) वह बिना हाथ पैर का है। पर चलता है और पकड़ता । वह बिना आँख का है पर देखता है। बिना कान का है पर सुनता । वह जगत् को देखता है पर उसका जाननेवाला कोई नहीं है । ब्रह्म के जाननेवाले उसको पुराण आदिपुरुष कहते हैं। (श्वेताश्वतर ३ । १६) (२२) वह परमात्मा सबके कानों का कान है। मन का मन है। बोली की बोली है। प्राण का प्राण है । आँख की आँख है । उसको जो जानता है वह धीर है, जब प्राणी इस लोक को छोड़ कर चला जाता है तब जन्म मरणादि के अधीन नहीं होता। ( केनोपनिषद् ।।५) (२३) ब्रह्म से सूक्ष्म दूसरा कोई नहीं है । न उससे स्थूल दूसरा कोई है । न उससे कोई कनिष्ठ है न ज्येष्ठ है । उद्यान में सूखे हुए वृक्ष की नाई सब स्वर्गादि लोकों में वह खड़ा है। उस पुरुष से यह सब विश्व भरा हुआ है। (श्वेताश्वतर ३ ।) (२५) ब्रह्म को छोड़ कर दूसरा कोई न करनेवाला है, नदेखनेवाला है, नविचार करनेवाला है, न जानने वाला है। वही तुम्हारा हृदयस्थ अन्तर्यामी जन्ममरण-रहित आत्मा है। (बृहदारण्यक ३।७।२३) टिप्पणी-जीवों के कर्मेन्द्रिय ज्ञानेन्द्रिय बुद्धवादि सबका अधिष्ठाता आ ब्रहर- स्तम्बपर्यन्त प्राणियों का हृदयस्थ परिचालक ब्रह्म है । तथा च गीतायाम्- ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति । भ्रामयन् सर्वभूतानि यन्त्रारूहानि मायया। १८ । ६१ ॥ आगे की श्रुति में ब्रह्म के तटस्थ लक्षण का वर्णन (२५) जिससे ये सब भूत (वस्तु) उत्पन्न हुए हैं। जिसके हेतु से जीव जीते हैं। जिस में लीन हो जाते हैं। तन्मय होते हैं । उसको ब्रह्म जानो। (तैत्तिरीय ३।१।१) टिप्पणी-स्वरूप लक्षण और तटस्थ लक्षण दो प्रकार के लक्षण होते हैं । इन्हीं दो लक्षणों से वस्तु-स्वरूप का बोध होता है। जब वस्तु का स्वरूप ही लक्षण है तब उसको स्वरूप-लक्षण कहते हैं। जैसे सत्यं ज्ञानमनन्तं यह ब्रह्म का स्वरूप-लक्षण है। - ( ५२ ) जगत्-जन्मादिकारणत्वं यह ब्रह्म का तटस्थ लक्षण है। स्वरूप लक्षण से जिज्ञासु को उतना वस्तु बोध में सहारा नहीं मिलता, जितना तटस्थ लक्षण से। घट को कलश कहने से जिज्ञासु को क्या पता मिल सकता, यदि उसने कलश को न देखा हो। पर ऐसा उसे समझावे कि विशिष्ट आकृति-युक्त जलपात्र को घट कहते हैं तो उस वर्णन के सहारे से पता लगता है। (२६) वह मनोरूपी परमेश्वर हृदय में स्थित होकर प्राणवायु और शरीर को चलाता है। उस ब्रह्म को ज्ञानी लोग अच्छी तरह निर्णय करते हैं कि वह आनन्द स्वरूप अविनाशी है। (मुण्डक २ । २ । ७१) भला, नारायण तो सर्वत्र हैं पर देख क्यों नहीं पड़ते ॥ इस प्रश्न का उत्तर । (२७) ब्रह्म सब वस्तु में गुप्त रहते हैं । प्रकट नहीं होते । हाँ सूक्ष्म-दृष्टि जिन को है वे अपनी सात्विकी सूक्ष्म बुद्धि से उनका अनुमान करते हैं। (कठवल्ली ३ । १२) आगे की श्रुति में यह कहना है कि स्वतन्त्र एक ब्रह्म ही हैं और सब उनके अधीन है- (२८) ब्रह्म के भय से वायु बहता है। उन्हीं के भय से सूर्य उगता है । उन्हीं के भय से इन्द्र और अग्नि और पाँचवाँ देवता यमराज दौड़ते हैं। ( तैत्तरीय २।८।१) अब कहते हैं कि नारायण का शरण तरने का बड़ा उपाय है। (२९) जिन्हों ने ब्रह्मा को पहले उत्पन्न किया और वेदों को उसके पास पहुँचाया उस श्रीभगवान् का शरण लेता हूँ। वह मेरी बुद्धि को प्रकाश करते हैं। (श्वेताश्वतर । ६।१८) ३०) श्रीभगवान विश्व के आत्मा हैं । हर एक वस्तु में स्थित हैं । वह हैं एक पर बहुत देख पड़ते हैं। जैसे एक चन्द्र जल में बहुत देख पड़ता है। (३१) वह श्री भगवान् एक शान्तरूप सब चञ्चल-स्वभाव प्राणियों के भीतर बाहिर विराजते हैं। उसको सदा अनुक्षण नमस्कार । (३२) वही अविनाशी पवित्र करने वाला है, वही सर्वोत्कृष्ट है । उस अविनाशी ब्रह्म को जो जानता है वह पूर्ण काम होता है । (मैत्रेयी ६ । २) (३३) वह सत्य और आनन्दस्वरूप प्रकाशवान् कर्त्ता ईश्वर वेद का कारण पुरुष है। उसका जानने हारा पुण्य और पाप दोनों को दूर कर उस अविनाशी सूक्ष्मतम ब्रह्म में सब विश्व को एक रूप देखता है।

(३४। वह ब्रह्म सङ्कल्प-विकल्प-रहित है। हृदय में स्थित है । अपरिमेय है । अगम्य है। उत्कृष्ट है। उसमें विद्वान् अपने चित्त को प्रविष्ट करे। वह निराधार निरञ्जन लक्षणों से अनुमेय है। ( मैत्रयी ६ । १६) (३५) अग्नि से जैसे स्फुलिङ्ग बाहर निकलता है, सूर्य से जैसे किरण । इसी तरह ब्रह्म से प्राणादि यथाक्रम बाहर निकल आते हैं। ( मैत्रेयी । २६) (३६) वह पुरुष प्रकाशस्वरूप कलेवर-रहित बाहर भीतर स्थित जन्मादि पड्वि- कार-रहित नाशरहित सङ्कल्प-विकल्प-रहित निर्मलस्वरूप पुरुषोत्तम है। (मुण्डक २।२।२) टिप्पणी-पुरि देहे शेते इति पुरुषा-हर एक जीव अपने अपने देह में अधिष्ठित है इस कारण पुरुष कहलाता है। और विश्व देह में अधिष्ठित परमात्मा भी पुरुष पदवाच्य है । हाँ, वह उत्तम पुरुष है, इसी से उनका नाम पुरुषोत्तम है। भगवद् गोता अध्याय १६ । १७ । १८ । १९ । दलाक से मिलान कीजिए॥ (३७) हे विद्वज्जन ! उस ब्रह्म को जानो । वह देवादि-तृण-पर्यन्त सब छोटे बड़े का पूजनीय है । अथवा वह सत् भी है असत् भी है । बुद्धि के बाहर है सब प्राणियों में श्रेष्ठ है । वह वैश्वानर की नाई ज्वाला-युक्त है । सूक्ष्म से भी सूक्ष्म उसमें सब ब्रह्मा- ण्डादि लोक और लोक-वासी लोग स्थित हैं। (मुण्डक २।२।२।) टिप्पणी-मूल में सदसद् वरेण्यं है । टीका में एक अर्थ यह है कि वह सत् और असत् और वरणीय है। दूसरा अर्थ यह भी हो सकता है कि सदसता वरणीयम् ॥ चूंकि वह सदसत् दोनों कहा गया है। इसी से तो विज्ञानाद् परं भी वह है। मनुष्य-बुद्धि के अगोचर है । अनिर्वचनीय है। (३८) हे शान्त जिज्ञासु ! वही अविनाशी ब्रह्म है । वह प्राण अर्थात् जीव है । वाक् है मन है। आधिदैविक और आधिभौतिक देह है। वह सत् दिकालादि से अपरिच्छिन्न ज्ञान का विषय है। (मुण्डक २।२।२) (३९) उस चिद्रूप ब्रह्म में भूर्भुवः और स्वर् लोक स्थित हैं । और मन और प्राण भी । उसी को एक आत्मा जानो और दूसरी बात सब छोड़ दो । वही मोक्ष का सुगम । । । मार्ग है। (मुण्डक २।२।५) टिप्पणी-इसी प्रपत्ति मार्ग का उपदेश गीता में चरम मन्त्र से श्रीकृष्ण भगवान ने अर्जुन को उपदेश किया है।

( ५४ ) सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज॥ अहं त्वासर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥ (अ०१८।६६) एष निष्कंटका पन्था यत्र सम्पूज्यते हरिः॥ इत्यादि वचन पाये जाते हैं। (४०) वह परमेश्वर सर्वज्ञ है, सर्व व्यापी है। जिसकी महिमा चतुर्दश लोक में प्रकट है। वह अपने राजधानी शुद्ध हृदयाकाश में विराजता है। (मुंडक २।२।७) टिप्पणी-सर्वज्ञ और सर्वविद् यह दो विशेषण हैं। इसी से टीकाकार ने सर्व- विद् का अर्थ सर्वव्यापी दिया है। (४१) प्रकाशस्वरूप ब्रह्मपुर अर्थात् हृदयाकाश में स्थित वह शुभ्र निर्मल सूर्यादि का ज्योतिः स्वरूप ब्रह्म है । उसको आत्मज्ञानी जानते हैं। (मुण्डक २।२।६) (४२) यह चैतन्यात्मा सब वस्तुओं में विराजता है । और उत्पन्न जीवों का शानदाता है। अतिवाद नहीं करता। आत्मा ही से लीला करता है। आत्मा ही में मगन रहता है। वह क्रियावान् है । अर्थात् सर्वकर्ता है । वेदज्ञों का पूज्य है। (मुण्डक ३।।४) अब जिज्ञासु का प्रश्न है कि ऐसे चैतन्यात्मा ब्रह्म को लाभ करने का कोई उपाय भी है? उत्तर- (४३) सत्य से, तपश्चर्या से, अच्छे शान से, ब्रह्मचर्य से, ब्रह्म का सदा लाभ हो सकता है, इस शरीर में ज्योतिः रूप स्वच्छ पुरुष है। दोषरहित यत्नशील संयमी उस को ज्ञान-दृष्टि से देखते हैं। (मुण्डक ३।११५) टिप्पणी-'सत्यं च समदर्शनम्” इस परिभाषा से समदृष्टि का नाम सत्य है। सत्य में विषम दृष्टि नहीं पाई जाती है। ब्रह्मचर्य का अर्थ टीकाकार ने इस तरह किया है। ब्रह्मार्पणमेवचर्या सर्वकर्म ।। अर्थात् जो कुछ कर्म करे सब ब्रह्म को अर्पण करे । अथवा ब्रह्म ही की चर्चा । सदा ब्रह्म-गोष्ठी में व्याप्त रहना ही ब्रह्मचर्य है, अथवा ब्रह्मण्येव चा गतिर्येषां ते सन्तः। ब्रह्मचर्येण सत्सङ्गेनेतियावत् । ब्राह्मणों का सत्सङ्ग ब्रह्मचर्य का बोधक है। (४४) सत्य ही का जय है, मिथ्या काजय नहीं होता। सत्य ही ब्रह्ममार्ग को लैजाता है। निष्काम ऋषि लोग सत्य के रास्ते चलते हैं। उस मार्ग में सत्यादि उपाय-समूह का परम कारण ब्रह्म है।

-- (४५) जो राजादिक पृथ्वी पर देख पड़ते हैं । जो स्वर्ग के अधिपति इन्द्रादि सुन पड़ते हैं। एक नारायण सब को भीतर बाहर से व्याप कर स्थित हैं । टिप्पणी नराणामयनं यस्मात् तेन नारायणः स्मृतः।। (वायुपुराणे आनन्दाश्रममुद्रित ५। ३८1) भगवान जीवों के आश्रय हैं। गति हैं। इसलिए परमेश्वर के हजारों नामों में एक नाम नारायण भी है। अब जिज्ञासु का प्रश्न यह है कि उस नारायण का स्वरूप क्या है ? - -- (४६) मन और वचन दोनों वहाँ नहीं पहुंचते । उससे हट आते हैं। जो उसको आनन्दस्वरूप जानते हैं वे किसी से नहीं डरते हैं। (तैत्तिरीय ३ | ४ ! १ ॥२।६।१।) टिप्पणी-डर तो दूसरे से होता है। जब सानो को आनन्दमय ब्रह्म छोड़ और दूसरा कुछ भासता ही नहीं तब उसको भय किस से होगा। (४७) भला ब्रह्मधाम कैसा है ? यह प्रश्न जिज्ञासु के मन में आया । उत्तर-जिस स्थान की प्रशंसा सव वेद करते हैं। जिस पद की प्राप्ति करने के लिये सब प्रकार की तपश्चर्या को करते हैं। जिस पद को कामना करके ब्रह्मचर्य का पालन करते हैं उस स्थान को संक्षेप रूप से मैं कहता हूँ। ( कठवल्ली ।।२।१५) टिप्पणी-प्रतिज्ञा तो श्रुति में की गयी। पर पूरी श्रुति यहाँ नहीं उद्धृत की गयी । इस कारण पाठकों को उत्तर नहीं मिला । मूल उपनिपद के देखने से रहस्य खुलता है। संग्रहकार और टीकाकार दोनों ने मन्त्र को प्रकट नहीं किया । गुरुमुख से ही मन्त्रराज का उच्चारण उसका श्रवण और अर्थज्ञान होता है यह प्राचीन शैली है ॥ (४८) यह आलम्बन (आश्रय) श्रेष्ठ है । यह आश्रय बड़े से भी बड़ा है। इसका ज्ञान प्राप्त कर साधक ब्रह्मधाम में सत्कृत होता है। (४९) वह (ब्रह्म) बैठा हुआ दूर चला जाता है । लेटा हुआ सब ओर पहुँच जाता है । उस सदानन्द देव को उसको छोड़ और कौन जान सकता है। ( कठवल्ली १।२।२०।) टिप्पणी-सदामदं सदानन्दं । यदि सदा+अमदम् । ऐसा प्रश्लेष करें तो सदा अहङ्कार शून्य ऐसा अर्थ होगा ॥ पर प्रायः सब मुद्रित उपनिषद् पुस्तकों में मदामदं ऐसा पाठ देखने में आता है। वह समद और अमद भी है। विरुद्ध धर्म का होना उसमें सम्भव है ।। (५०) वह अशरीर है-अन्य प्राणी की नाई शरीरयुक्त नहीं है । और जाग्रदादि अवस्था से भी वह रहित है। वह व्यापक है। सर्वभूतान्तरात्मा है। उसको जो धीर जानता है उसको शोक मोह नहीं होता। (कठवल्ली १।२।२१) ।

। ( ५६ ) (५१) ब्रह्म शब्द-रहित हैं। स्पर्श-रहित हैं। रूप-रहित हैं। रसरहित हैं। गंध- रहित हैं। अविनाशी हैं। आद्यन्त-रहित हैं। देहादि स्थूल रूप से परे हैं । सनातन नित्य हैं । ब्रह्म को इस प्रकार निर्णय कर संसार से मुक्त होवे ॥ (कठवल्ली १।३ । ११) ब्रह्म-निर्णय का उपाय आगे कीश्रुति में कहा है। (५२) अन्तरात्मा पुरुष अङ्गुष्ठ प्रमाण है । जीव के हृदय में स्थित है। जैसे मूंज में से सरकंडा निकालते हैं। वैसे अपने देह से, इस अन्तरात्मा को जाने और धैर्य से निकाले। (मुण्डक १।६।१७) टिप्पणी-अङ्गुष्ठ प्रमाण से सूक्ष्मता पाई जाती है। यहाँ मूंज से सरकंडा निकालने की नाई आत्मा को देह से पृथक निकाले । अन्य श्रुतियों में भी दूध से माखन काढ़ने की नाई, तिल से तेल निकालने की नाई देह से आत्मा को पृथक करे, ऐसा उपदेश दिया गया है । ध्यान निर्मथन से आत्मा को काढ़े। मैं देह नहीं हूँ। मैं देह से स्वतन्त्र हूँ॥ निर- न्तर ऐसी भावना साधक करता रहे । तब स्फुरेगा कि मैं और ही कुछ हूँ। यह साढ़े तीन हाथ का हाड़-मांस का पुतला नहीं हूँ। देह के दुःख से अपने को दुःखी नहीं मानेगा। इसके नष्ट होने से अपने को नष्ट न समझेगा ॥ (५३) ब्रह्मवाक्य से वर्णनीय नहीं है । पर वाक्य ब्रह्म ही की शक्ति से उच्चरित होता है । उस निराकार गूढ़ देव को ब्रह्म जानो, न कि इस (साकार ) को जिस को लोग पूजते हैं। (केन । ४) (५४) जिसको मन नहीं समझ सकता। मन की बोध-शक्ति जिस ने दी है। उसी को ब्रह्म जानो । न कि जिसको लोग पूजते हैं । (केन १।५।) (५५) जिसको आँख से कोई नहीं देखता। पर जिसकी शक्ति से आँख को दृष्टि- शक्ति भई है। उसी को तुम ब्रह्म जानो, न कि जिसको लोग पूजते हैं। ( केन १।६।) (५६) जो प्राण वायु से नहीं जीता पर जिसकी शक्ति से प्राण वायु को प्राण- शक्ति मिली है। इसी को तुम ब्रह्म जानो, न कि जिसको लोग पूजते हैं। (केन १८) (५७) उसका स्वरूप दृश्यमान नहीं है । कोई इसको आँख से नहीं देखता । यह प्राख से, बुद्धि से और मन से बना हुआ समझा जाता है जो उसको वैसा जानते हैं वे ही अन्म-मरण से मुक्त होते हैं। (कठवल्ली १ । ६ ।)

। । (५८) यह प्रकाशमान पुरुष लीला करते हैं । कभी जन्मते हुए देख पड़ते हैं, कभी गर्भ के भीतर, कभी गर्भ से गिरते देख पड़ते हैं। गर्भ-जाल से लिपटे हुए देख पड़ते . हैं। उसने दिशा और विदिशाओं को उत्पन्न किया है (महानारायण २।) (५९) सब लोकों को व्याप्त करके, सब वस्तुओं को व्यान करके, सब दिशा और विदिशाओं को व्याप्त करके आदिकारण पाञ्चभौतिक विश्व का पालक ब्रह्म प्रकट हुए । (महानारायण २११) (६०) जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं में आत्मा एक ही है। भूर्भुवः स्वः तीनों लोक के ऊपर है । जिसने ब्रह्म को ऐसा जाना है उसका पुनर्जन्म नहीं होगा । (ब्रह्मबिन्दु ११) (६१) एक बाल के अग्र-भाग के लक्ष भागों के बहुत भाग करो उसके भी टुकड़े का टुकड़ा करो। ऐसे सूक्ष्म से सूक्ष्म (अर्थात् अन्तिम) निरञ्जन भगवान् हैं। (श्वेताश्वतर ५। ६) टिप्पण-ब्रह्म को निरञ्जन कहते हैं। क्योंकि उनमें अञ्जन (रङ्ग) नहीं है। ऐसे सूक्ष्म में कैसे रङ्ग लगता है। अगरणीयान् श्रुति का यह समर्थन करता है। हाँ वह महतो महीयान् भी तो है, वह अवाङ्मनस-गोचर है। (६२) भला ऐसी सूक्ष्म वस्तु को सर्वव्यापक करके कैसे माना है ? सुनिये । तिल में जैसे तेल, फूल में जैसे गंध, वैसे ही जीव के शरीर में बाहर भीतर से ब्रह्म स्थित हैं। (ध्यानबिन्दु) (६३) फूल में जैसे गंध, दूध में जैसे घी, तिल में जैसे तेल, सुवर्णकर के पाषाण में जैसे सोना। ( ध्यानबिन्दु ५) टिप्पणी-भाषा के भजनों में भी ऐसे भाव देखने में आते हैं यथा । तोरे राम तोर में तू काहे न भजत रे॥ज्यों दूधवा में रहतु है माखन बिन मथले कहु काहे न कढ़त रे । ज्यों तिलवा में रहत है तेल बिनु पेरले कडु काहे न लहतु रे ॥ इत्यादि। (६४) इसी तरह सूत्र में मणि कीनाई सब वस्तु ब्रह्म में पिरोये हुए हैं। स्थिर बुद्धि मोहरहित ब्रह्म का खाता ब्रह्म में स्थित है। अर्थात् ब्रह्मभाव को प्राप्त है। (ध्यानबिन्दु ६) (६५) वृक्ष तो कला सहित जानों पर उसकी छाया तो कला रहित है। परमात्मा तो सब अवस्था में स्थित है। (ध्यानबिन्दु ८} - .

। ( ५८ ) टिप्पणी कला का अर्थ अंश है । वृक्ष के तो मूल शास्त्रा, पत्रादि तो कला हैं। पर उसकी छाया में अंश नहीं है। ब्रह्म में दोनों धर्म हैं अणेारणीयान् महतो महीयान् की नाई विरुद्ध धर्म का समावेश ब्रह्म ही में हो सकता है। भला बहुत आत्मा न हों पर दो का तो उल्लेख पाया जाता (६६) दो सुन्दर पक्ष वाले पक्षी साथी मित्र एक ही पेड़ पर प्रीति से वास करते हैं। उन दोनों में एक तो अच्छे स्वाद का फल खाता है । दूसरा नहीं खाता, केवल देखता रहता है। (मुण्डक ३ । १ । १ श्वेताश्वतर ५। ६) टिप्पण-मूल में समान शब्द आया है, समान का अर्थ तुल्य अर्थात् एकही है। पर समान का अर्थ मान-सहित भी हो सकता है। अर्थात् जीव तो देह पर अभिमान रखता है। ब्रह्म का देह में अभिमान नहीं है। चैतन्यांश साधारण धर्म है। अभिमान-शून्य जब जीव हो जोयगा तब वह भी भोग- रहित होकर ब्रह्म भाव प्राप्त करेगा । जब तक अभिमान है तब तक भेद रहेगा । चिड़ियों के दृष्टान्त से जीव-ब्रह्म का वर्णन किया है- अब आगे की श्रुति से भी आत्मैक्य का प्रतिपादन करते हैं । (६७) जन्मरहित प्रकृति रक्त, श्वेत कृष्ण वर्ण है। अर्थात् रजः, सत्व और तमा- गुणमय है । एक रूप के बहुत सन्तान उत्पत्ति करती है। अजन्मा पुरुष इस प्रकृति के साथ साहचर्य कर फिर इसको त्याग देता है। टिप्पणी-इस श्रुति में रूपक से पदार्थ-विचार भया है । अजा का अर्थ वकरी। अज का अर्थ वकरा॥ तीन रंग की एक विचित्र वकरी बहुत बच्चे जनती रहती है। बकरा संसार-सुख को सेवन कर अलग हट जाता इस प्रकार बकरी बकरा के रूपक से प्रकृति-पुरुष की लीला को समझाया है। संवको कदाचित् यह भद्दा रूपक न रुचेगा। कभी कभी अश्लील असत् श्लेषोक्ति का भी प्रयोग कोई २ ग्रन्थकार कर बैठते हैं। देखिये हठ प्रदीपिका में लिखा है। गङ्गायमुनयोर्मध्ये बालरण्डा तपस्विनीय । बलात्कारेण गृह्णीयात् तद्विष्णोः परमं पदम् ॥ 'भला योगग्रन्थ में ऐसे विधान का औचित्य क्या है। यदि इसका शुद्ध अर्थ वहीं न लिखा होता तो पढ़ने वाले वहक जाते ।। इड़ा भगवती गङ्गा पिङ्गला यमुना नदी। इडापिफुलयामध्ये बालरण्डा च कुण्डली ॥

और भी इसी प्रकार का बीभत्स दृष्टान्त लीजिये। गोमांस भक्षयेद् यस्तु पीत्वा चामरवारुणीम् । कुलीनं तमहं मन्ये इतरे कुलघातकाः॥ इषका अर्थ तो यह है। गोशब्देनोदिता जिह्वा तद्प्रवेशो हि तालुनि । गोमांसभक्षणं तत्तु महापातकनाशनम् ।। जिह्वाप्रवेशसम्भूतवहिनोन्पादितः खलु। चन्द्राद् भवति यः सारः स स्यादमरवारुणी ।। अभक्ष्य विधान और अपेय विधान से तो बचे। पर ऐसे व्यर्थ वाक्य-प्रयोग से क्या उत्कर्ष लाभ हुआ? अब आगे ब्रह्मजिज्ञासा का उद्देश्य कहते हैं। (६८) भोजन सामग्री सम्पादन के लिये वर्णाश्रम धर्मोचित व्यवहार कर्म करना चाहिये ॥ भोजन का प्रयोजन तो प्राणधारण है ॥ जीने का उद्देश्य तत्त्वज्ञान का अनुसन्धान है। तत्वज्ञान का प्रयोजन यह है कि फिर जन्म न होवे॥ अब कहते हैं कि तत्वज्ञान सुलभ नहीं है । (६९) बहुतेरों ने तो परमेश्वर को सुना तक नहीं । पौरों ने तो सुना । पर नहीं जाना । बोलने वाले कभी कदाचित् देखने में आते हैं। ब्रह्मज्ञान लाभ करने वाले को महाकुशल होना चाहिये। टिप्पणी-सगुण ब्रह्म को जान कर निर्गुण उपासना में तत्पर होवे। ऐसे साधक बहुत कम मिलते हैं। अब प्रश्न यह है कि जब ब्रह्मनिर्णय इतना दुर्लभ है तो उसके पीछे पड़ने में कौन सा खिंचाव है? (७०) स्थूल सूक्ष्म ब्रह्म का निर्णय जब होजाता है तब हृदय के मोह और शोक के पाश कट जाते हैं । सब प्रकार के सन्देह दूर होजाते हैं। ब्रह्मा के सब कम्मो का क्षय हो जाता है । अर्थात् कर्म-फल उसको भोगना नहीं पड़ता। (मुण्डक २।२८1) (७१) जिस पुरुष को यह धारणा हुई है कि मुझे ब्रह्म का बोध नहीं हुआ। समझना चाहिये कि उसको ज्ञान होगया है। जिसने मान लिया कि मैंने ब्रह्मबोध कर लिया है उसे समझना चाहिये कि वह अभी तक नहीं पहुँचा । अपने को जिसने ज्ञानी मान लिया है,। उसने अभी तक तत्त्व नहीं पाया। जिसने समझा है कि मैं नहीं जानता वही शानी है। (केन ११) ।

( ६० ) टिप्पणी तात्पर्य यह है कि जो मन-मोदक से अपना पेट भरलेते हैं, और जिनको ब्रह्मज्ञानी का घमंड आगया है उनकी निन्दा इस श्रुति में पाई जाती है । (७२) जब पुरुष के हृदय की सब कामनायें छूट जाती हैं तब वह अमर हो जाता है। यही ब्रह्म का लाभ का होजाना है। (कठ २।६।१४।) टिप्पणी-अमर हो जाता है-अर्थात् जन्म-मरण से छुटकारा होजाता है। हाँ, ब्रह्म दुज्ञेय है । तो कदाचित् साधक निराश होजावे इस लिये आगे की श्रुति में कुछ आश्वासन भी दिया गया है । (७३) ब्राह्मण निष्काम यच करके, दान करके, तपश्चर्या करके ब्रह्म-ज्ञान साध सकते हैं। टिप्पणी-मूल में अनाशकेन यह विशेषण पद आया है । उसका अर्थ नाशरहित है। सकाम यज्ञादि का फल नश्वर है । पर निष्काम होकर करे तो उसका फल स्थायी होता है। इसी से कहा है कि निष्काम यचादि से अमरत्व को देने वाले ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति होती है। (७४) दो ब्रह्म को जानना चाहिये, शब्द ब्रह्म प्रौर पर ब्रह्म ॥ मनुष्य शब्द ब्रह्म में निपुण होकर परब्रह्म को लाभ करते हैं। (विन्दुब्रह्म १०) टिप्पणी-शब्द-ब्रह्म का अर्थ है वेद, जब मनुष्य वेद, शास्त्र में पारंगत होता है तब परब्रह्म के लाभ में उसकी योग्यता होती है।' अब ब्रह्मज्ञान का सुगम उपाय आगे की श्रुति में बताया गया है । (७५) जब पाँच ज्ञानेन्द्रिय और मन निकाम होकर क्रिया करते हैं, और बुद्धि भी इधर उधर बहुत नहीं दौड़ती है। ऐसी अवस्था को परम गति कहते हैं। (कठ ६।१०) टिप्पणी-पाँच ज्ञानेन्द्रिय के कहने से पाँच कर्मेन्द्रिय की भी प्राप्ति हो गई। अर्थात् पाँच ज्ञानेन्द्रिय और पाँच कर्मेन्द्रिय और मन और बुद्धि ये सब स्थिर होकर काम करते हैं। बिना निष्काम भये स्थिरता कहाँ। योगाभ्यासियों के लिये ब्रह्म मार्ग का दिग्दर्शन। (७६) प्राण (जीव के देह में) अनेक नाड़ियाँ हैं जो (प्राण) हृदय में दीप की नाई प्रकाश कर रहा है । नाड़ियाँ बहुत रङ्ग की हैं। सफेद, काली, गाढ़ी, नील, कपिला, थोड़ी लाली लिये हुए। (मैत्री ६ । ३०) टिप्पणी हजारो नाड़ियां हृदय से देह में ऊपर नीचे चारों ओर फैल गई । उनमें एक प्रधान सुषुम्णा नाम की नाड़ी ऊपर की ओर गई है। उसी नाड़ी के द्वारा प्राणात्मक जीव सूर्य्यलोक भेद कर प्राण भाव को त्याग कर मनोभाव को भी अतिक्रम कर ब्रह्मभाव प्राप्त होता है। तब साधक को यह जान पड़ता है कि मैं ब्रह्म हूँ। इस रहस्य को योगाभ्यासी कुछ समझेगे। (७७) समान वृक्ष पर जीव असमर्थ होकर शोक माह में डूबा है। पर जब सब के पूजित भगवान् को और इसकी महिमा को देखने लगता है तब शोकरहित हो जाता है। टिप्पणी-६६ संख्या की श्रुति में द्वौ सुपर्णी इत्यादि रूपक से जीव-ब्रह्म का भेद दिखाया गया है । उसी के साथ की यह श्रुति है । अभिमान युक्त देही शोक मोहादि से सन्तप्त रहता है। जब तक अहम्भाव है तब तक हाय हाय करता रहता है। जब भक्ति के उद्रेक से अथवा ज्ञान के उद्रेक से भगवदर्शन उसको भया । तब भगवच्छरमा प्राप्त होकर या भगवन्मयत्व को प्राप्त होकर शोक से छूट जाता है। अष्टावक्र गीता का एक श्लोक टीका में उठाया है। वह यह है। अहं कतैत्यहमान महाकृष्णाहिदंशितः। नाहं कर्त्तति विश्वासामृतं पीत्वा सुखी भव ॥ जीव अभिमानी बन कर मैं कर्ता हूँ ऐसे अभिमान कप काले सांप से दंशित होता है । मैं कर्ता नहीं हूं ऐसा विश्वास रूय अमृत पान कर विष नष्ट कर जीव सुखी होवे । अतएव अहन्ता-त्याग ही ब्रह्मप्राप्ति का महान् उपाय है। (७८) न नित्यनैमित्तिक कर्म से, न पुत्रादि के श्राद्धादि क्रिया से, न धन-साध्य यनादि से जन्ममरण छूटता है। केवल अहन्ता के त्याग ही से छूटता है। ब्रह्म स्वर्ग से परे अवस्थित एकान्त स्थान में विराजते हैं। वहां केवल यति लोगों का प्रवेश है। (७९) जिनका चित्त निर्मल है। जिन्होंने वेदान्त-ज्ञान से परमार्थ को निर्णय कर लिया है। ऐसे यति संन्यास योग से मुक्त होकर कल्पान्त काल में ब्रह्मलोक को पहुंच जाते हैं। टिप्पणी-मूल में परान्तकाले यह पद आया है। इसका शब्दार्थ कल्पान्त काल है, जब ही अहन्ता का विनाश भया, तब ही शानी का कल्पान्त काल आ पहुंचा समझना चाहिये। (८०) जब साधक को यह शान प्राप्त हुआ कि मैं निष्कल, निर्विकल्प, निरञ्जन, ब्रह्म हूं तब वह ब्रह्मभाव को पहुंच जाता है। टिप्पणी-निष्कल पद पहिले आ चुका है। जिसका अंश नहीं हो सकता, 7 । अखण्ड निर्विकल्प जिस अवस्था में मातृ झेय, ज्ञान का एक भाव होता है वह निर्वि- कल्पावस्था है। निरवच्छिन्न एकतानभाव को भी निर्विकल्पभाव कहते हैं। निरञ्जन । जिसको कोई रङ्ग नहीं लगा। - ।

। ( ६२ ) ब्रह्म के इन भावों का अनुभव ब्रह्म ही को है। (८१) न मृत्यु, न जन्म, न जन्म का बन्धन, न यम-दण्ड, न मोक्ष की इच्छा, न मुक्ति (ब्रह्मज्ञ को भावता है) यही परमार्थ-भाव है। टिप्पणी-ब्रह्म-भाव का यह स्वरूप-कथन है। सप्तम भूमिका पर जब साधक पहुँच जाता है तब यह दशा होती है। (८२) जैसे घी में गुप्त रहता है, ऐसे ही प्रत्येक जीव में ब्रह्म गुप्त है । जैसे मथन करने से दूध से घी कढ़ता है, वैसे मनोरूपी मंथन-दण्ड से सतत मथन करना चाहिए। टिप्पणी-(६३) श्रुति की टिप्पणी में हिन्दी भजन को देखिए । अब कैसे मथन करना चाहिए उसका उपदेश करते हैं। (८३) वासुदेव सब वस्तुओं में वास करते हैं, सब वस्तुओं में वर्तमान हैं, सब पर अनुग्रह करते हैं। तो वह मैं ही हूँ। (ब्रह्मविन्दु) टिप्पणीः-उपासक का उपास्य के साथ तादात्म्य होना यही पराभक्ति है। "सोऽहं" मन्त्र का अजपाजप भी मन्थन का प्रकारान्तर है। भक्तिमार्ग और ज्ञानमार्ग अन्त में जाकर एक जगह मिला है, इसके विपरीत रास्ते चलनेवाले की निन्दा आगे की श्रति में है। (८४) जो आत्मघाती हैं वे मरने के पीछे उस नरक-लोक को जाते हैं, जहां सूर्य का प्रकाश नहीं होता-जहाँ घना अँधेरा है। (ईशावास्योपनिषत्) टिप्पणी-आत्मघात से केवल देहघात का अर्थ नहीं है। पर जो आत्मा का अपलाप करते हैं। प्रत्यक्ष देह को केवल जानते हैं । देही जो देहाध्यक्ष है उसको उड़ा देते हैं। वे भी आत्मघाती हैं। असुर्या ऐसा पाठ, अच्छे पुस्तकों में पाया जाता है । यह प्रसु- शब्द सूर्य से सम्बन्ध नहीं रखता । पर असुर शब्द से बना है। आसुरी अर्थात् असुरों के पास योग्य नरक आत्मघाती का वासस्थान है। (८५) हे सब लोग-तुम उनको नहीं जानते जिन्होंने ये सब जीवों को पैदा किया । अचानता के कारण ब्रह्म से तुम्हारा पृथक्त्व (भेद) भया । इसी कारण तुम लोग जन्म मरण को भोगते हो । मोहान्धकार से अन्धे होकर तुम नित्य आत्मा को त्याग कर अनित्य देह को आत्मा कर के मानते हो । इसी से तुम निन्दा के योग्य हो । तुम लोग इन्द्रिय को तृप्त करने में लगे हो और वेदोक्त विधि-निषेध से फँसे हो। (यजुर्वेद) टिप्पणी-सकाम कर्म-काण्डी को आवागमन का पचड़ा लगा ही रहता है। अब अभिमानियों की निन्दा आमे की श्रुति में की गई है । । ।

( ६३ ) (८६) अविद्या में डूबे हुए अपने को धीर और पण्डित मानने वाले। अहङ्कार के कारण तमोगुण के कारण से क्रोधी चकरियाते फिरते हैं और दूसरों को बहकाते हैं। जैसे कोई अन्धा अन्धे को राह दिखावे। (मुण्डक १।२८ कठ ३ । २।५) टिप्पणी-मूल पुस्तक में जंघम्यमानाः पाठ है। पर प्रायः सब मुद्रित कठोप- निषत् में दंद्रम्यमानाः ऐसा पाठ पाया जाता है । जंघम्यमानाः का अर्थ टीका में यों दिया है। अहन्तयाऽनुक्षणं क्रोधयुक्ताः । अहङ्कार से सदा क्रोध से भरा। अब दिखाया जाता है कि ब्रह्मच पुरुष सदा ही निर्दोष रहता है। (८७) जैसे आग लगे पहाड़ पर न पशु, न पक्षी ठहरते हैं । वैसे ब्रह्मक्ष पुरुषों में दोष नहीं रह सकते हैं। (मैत्रायणी) (८८) चित्त की प्रसन्नता के कारण शुभाशुभ कर्म से साधक बचता है। प्रसन्न चित्त होकर ब्रह्म में स्थित होकर साधक नित्य सुख को प्राप्त करता है। (मैत्रायणी ४ । ४) (८९) चित्त ही संसार है। चित्त को बड़े यत्न से शुद्ध करे। जैसा जिसका चित्त वैसा ही मनुष्य तन्मय हो जाता है, यह रहस्य है । यही सदा से चला आता है। (मैत्रायली ३१२) टिप्पणी-श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है ? यं यं वापि स्मरन् भावं त्यजत्यन्ते कलेवरम् । तंतमेवेति कौन्तेय सदा तावमावितः॥ अर्थ । हे अर्जुन ! जिस विषय को स्मरण करता हुआ मनुष्य अन्तकाल में शरीर छोड़ता है उसी विषय के संस्कार से वह वैसा ही जन्म पाता है। (गीता ८६) योगवाशिष्ठ में मुक्ताभीमानी मुक्तोहि । बद्धो चद्धोभिमन्यपि ॥ किंवदन्ती च सत्यैव । या मतिः सा गतिर्भवेत् ॥ इत्यादि ऐसे बहुत जगह इस का समर्थन है। (९०) जिस तरह विषय की ओर जीव का चित्त लग जाता है वैसा यदि ब्रह्म में लगे तो कौन जीव बन्धन से न छूटे। (मैत्रायणी ४१२) (९१) मन दो प्रकार का होता है। एक तो शुद्ध, दूसरा अशुद्ध । कामना के जाने से अशुद्ध । कामना-रहित रहने से शुद्ध ॥ (ब्रहाविन्दुः ।)

( ६४ ) (१२) मन को लय और विक्षेप से रहित कर जब स्थिर करे तब साधक अमनस्क दशा को पहुंचता है । वह तब ही परमपद ब्रह्मधाम प्राप्त करता है। (मैत्री ६ । ३४ ।) टिप्पणी-यहाँ मन को हंस के रूपक से वर्णन करते हैं । लय और विक्षेप मन के दो पक्ष हैं । निद्रा तो लय है । और विक्षेप है जागरण ॥ जब मन के दोनों पक्ष कट गये तब मन की एक विलक्षण दशा होती है । उसको उन्मनी कहते हैं, अमनस्क उसका पर्याय है। चित्तवृत्ति-निरोध से जो अवस्था पातञ्जल योग के आदि सूत्र में दी है सो यही वेदान्त का उन्मनीभाव और प्रकार से कहा गया है। उस दशा को योग-मार्ग से कोई पहुँचते हैं । कोई वेदान्तप्रोक्त साधन से पहुँचते हैं। (१३) सो मनोरोध ही उत्तम उपाय है- तब लौं मन को रोकता रहे, जब लौं मनोवृत्ति का क्षय न हो जाय ।। यही ज्ञान है, यही मोक्ष है। बाकी तो पोथी का बढ़ाना है । (ब्रह्मबिन्दु ५ । मैत्रेयी ६ ॥३४) (१४) चित्तैकाट्य रूप समाधि से जिसका चित्त शुद्ध निर्मल होगया है और जो ब्रह्म में स्थित हुआ है उस सुख का वर्णन नहीं करते बनता। अन्तःकरण ही में उस का अनुभव कर साधक आनन्द करता है। (मैत्रायणी १ । ३४) (९५) जैसे जब जल में जल मिल जावे, या आग में आग, या आकाश में आकाश। मिलने के पीछे एक दूसरे से अलग नहीं देख पड़ता । इसी प्रकार जब मन ब्रह्म में लीन हो जाता है तब पुरुष मुक्त होजाता है। मैत्रायणी ६।३४) (९६) मन ही मनुष्यों के बन्धन और मुक्ति का कारण है। जब मन विषय में लगता है तब बद्ध है। जब विषय से अलग है तब मुक्त है । (ब्रह्मबिन्दु २) (९७) जिसका मन अस्थिर है और जिसको तत्वज्ञान नहीं हुआ उसके इन्द्रिय वशीभूत नहीं होते। जैसे बदमाश घोड़े सारथि की लगाम को नहीं मानते ॥ (९८) जिस का मन स्थिर रहता है और जिसको तत्त्वज्ञान भया है । उस.पुरुष इन्द्रिय सब उस के वश में रहते हैं, जैसे सूधे घोड़े अपने. सारथि की लगाम को मानते हैं। (कठ ३।३।६) (१९) जिसका मन तत्त्वज्ञान से हीन है वह सदा अशुचि रहता है। वह ब्रह्मधाम को नहीं पहुँचता । उसको जन्म मरण का पचड़ा लगाही रहता है। (कठ ।।३।७) । ( ६५ ) (१००) जिसने चित्त को जीत कर तत्त्वज्ञान प्राप्त किया है । वह सदा शुचि है। वह ब्रह्मपद को प्राप्त करलेता है। फिर उसका जन्म नहीं होता। (कठ १।२।८) (१०१) जिस मनुष्य का सारथि बुद्धि है । जिसका लगाम मन है। वह संसारमार्ग के पार उतर जाता है, जहाँ सर्वव्यापक ब्रह्म का परम धाम है ॥ (१०२) जैसे बिना ईंधन के आग अपने कारण पवन में ठंडी होजाती है । वैसे ही जब वृत्ति नष्ट होजाती है तब चित्त अपने कारण महाचैतन्य में लीन हो जाता है। (मैत्री ६ । २४) (१०३) ओंकार धनुष है । जीवात्मा बाण है । ब्रह्म पर बाण चलावे । बड़ी साव- धानता से बेधना चाहिये । जैसे तीर लक्ष्य में धस जाता है वैसे जीवात्मा परमात्मा में प्रवेश कर के आप उसमें डूब जाय ॥ (मुण्डक २।२।४) (१०४) जब लक्ष्य सर्वव्यापक हो और बाण का मुख भी सब ओर हो। तीर चलाने- वाला तो सर्वत्र पहुंचा रहे । तब निःसन्देह लक्ष्य बिध जायगा ॥ टिप्पणीः-ब्रह्म व्यापक है। जीव तन्मय होने के लिये अपने सोपाधिक भाव को छोड़ कर ब्रह्म में डूबे । जब मिट्टी की भीत पर तीर पहुँच कर निशानी में घुसजाता है तब वह नज़र नहीं आता है। ऐसे ही जीवात्मा ब्रह्म में बैठ कर उसी में लीन हो जाता है। (१०५) इन्द्रियों से ग्रागे रूपरसादि विषय खड़े हैं। इन विषयों के आगे मन पहुंचा है। मन के आगे बुद्धि और बुद्धि के आगे महान् है । ( कठवल्ली ३ । १० (१०६) महान् से परे अव्यक्त (प्रकृति) है और प्रकृति के आगे पुरुष है। पुरुष से परे कोई नहीं । वही शेष सीमा है। वही परम लक्ष्य है। अब शङ्का भई कि दोनों जीवात्मा और परमात्मा चिद्रूप हैं। अब यदि परमात्मा में जीवात्मा लीन होजाय तो ऐसा तो न हो कि परमात्मा की क्षति हो। उत्तर-(१०७) जैसे घट-स्थित आकाश घट के भग्न हो जाने पर महाकाश में मिल जाता है। घटोपाधिक आकाश मात्र नष्ट हो जाता है। वैसे जीवोपाधिक चैतन्य मात्र अलग भासमान नहीं होता; पर साधारण धर्म चैतन्य का नाश नहीं होता है। (ब्रह्माबिन्दु १३) (१०८) जैसे घट का नाना रूप है। वैसे जीव भी बहुत आकार के देह धारण किये हैं। नाश का स्वरूप उसको नहीं मालूम है पर महाचैतन्य परमात्मा को इस बात का बोध है। (प्रमाबिन्दु १४) टिप्पणी-जीवात्मा और परमात्मा में इतना ही भेद है । एक तो अक्ष है। दूसरा सर्वज्ञ है। - । । ( ६६ ) (१०९) वह अनिर्वाच्य ब्रह्म अदृश्य है। उसको कोई धर नहीं सकता। उसके कुलगोत्र नहीं हैं । उसको नेत्र नहीं । कान नहीं । न हाथ है, न पैर है । वह नित्य वर्तमान है। व्यापक है। सर्वज्ञ है । अति सूक्ष्म है। अविनाशी है, वह चराचर सृष्टि का कारण है। (११०) जैसे पृथिवी में वृक्ष लतादि उत्पन्न होते हैं। जैसे जीते देह में सिर के बाल पौर देह के रोम बढ़ते हैं। वैसे अक्षर पुरुष (ब्रह्म) से नानाविध देव नर रूप विश्व उत्पन्न होता है। टिप्पणी-यहाँ ब्रह्म विश्व के उपादान कारण माने गये हैं। नैयायिकों के मत में ईश्वर निमित्त कारण हैं। परमात्मा नित्य पदार्थ हैं । जैसे कुम्हार मिट्टी को नहीं पैदा करता पर मिट्टी से घट बनाता है वैसे ही ईश्वर बने बनाये परमाणु से सृष्टि को रचते हैं। पर वेदान्त का मत है कि ब्रह्म ही से सब निकला और बना भी उन्हीं से। अर्थात् उपादान और निमित्त दोनों कारण ब्रह्म ही हैं। (१११) जो तपश्चर्या करते हैं, ब्रह्मचर्य की रक्षा करते हैं, जो सत्य का पालन करते हैं वे ही ब्रह्मलोक को पहुंचते हैं । जिनमें असत्य, छल, कपट, और दम्भ नहीं है उन्हीं के लिये ब्रह्म-धाम है। (११२) उस परमात्मा में सब स्थित हैं । पृथिवी और उसका सूक्ष्मांश गन्ध । जल और उसका सूक्ष्मांश रस । तेज और उसका सूक्ष्मांश रूप । वायु और उसका सूक्ष्मांश स्पर्श । आकाश और उसका सूक्ष्मांश शब्द । आँख और देखने की वस्तु । कान और सुनने . के शब्द, नाक और सूंघने की चीज़। रस और चीखने के खाद्य । चर्म और स्पर्श करने का द्रव्य । जिह्वा और बोलना। हाथ और पकड़ना। पैर और चलना। गुह्य देश और मलत्याग । जननेन्द्रिय और मैथुन का आनन्द । मन और मनन का विषय । बुद्धि और बुद्धि-विषय । अहङ्कार और अहङ्कार-विषय । चित्त और चित्त का विषय । तेज और प्रकाश करने का विषय । प्राण । और प्राण क्रिया। ये सब ब्रह्म में स्थित (प्रश्न) (१९३) ब्रह्म ही देखता है । छूता है । सुनता है । सूंघता है। चीखता है । मनन करता है। समझता है । यही चैतन्य पुरुष है। (११४) उस अशरीरी पुरुष की छाया नहीं होती। न रक्तादि वर्ण है । वह स्वच्छ, अविनाशी, चेतयिता है। सर्वज्ञ है। सब कुछ है । (११५) जिस पुरुष के वर्णन में शब्द नहीं निकलता, उसी को परब्रह्म कह कर चारो वेद मान करते हैं। उसको जो सनातन समझते हैं वे जन्म-मरण से रहित हो जाते हैं । (११६) ब्रह्मविद् द्विज अपने शान नेत्र से ब्रह्मा से लेकर जड़ पदार्थ तक सब के एक ही शुद्ध निर्मल व्यापक ब्रह्म रूप देखते हैं। (१९७) ब्रह्म में यह बराचर जगत् पिरोया है। (समुद्र में बल्ला की नाई उसी में लय हो जाता है।) ।

( ६७ ) (११८) (देह में) ब्रह्म के चार (पीठ) स्थान है। नाभि, हृदय, कंठ और मस्तक । इन्हीं स्थानों में चतुष्पाद ब्रह्म विराजते हैं । जागरण, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय । जागरण में ब्रह्म । स्वप्न में विष्णु । सुषुप्ति में महेश । चतुर्थ पीठ में अक्षर ब्रह्म ।वही सूर्य है । वही विष्णु, वह शिव । वह प्राण है । वह जीव है। वह अग्नि है । वह सदा जाग्रत् है। उन सब में ब्रह्म प्रकाशित हैं। (ब्रह्मोपनिषत् ) पिछली श्रुति में सगुण ब्रह्म का वर्णन कर अब तुरीया के परे प्रतिष्टित ब्रह्म का वर्णन करेंगे। (११९) वह स्वतन्त्र अपने प्रकाश से विराजता है । वह अमनस्क अर्थात् मनोहीन | बिना कान का है। बिना हाथ पैर का है, ज्योतीरूप है। उस तुरीयातीत धाम में कोई लोक लोक नहीं हैं । वेद वेद नहीं । देव देव नहीं यज्ञ यज्ञ नहीं, माता माता नहीं, पिता पिता नहीं, पतोहू पतोहू नहीं, चाण्डाल चाण्डाल नहीं । डोमड़ाडोमड़ा नहीं, श्रमण (बौद्ध संन्यासी) श्रमण नहीं। पशु पशु नहीं । एक ब्रह्म ही सभों में प्रकाशित है। (ब्रह्मोपनिषत्) (१२०) मनुष्य को रूप रस, गन्ध, शब्द, स्पर्श, मैथुन इन सब का शान ब्रह्म ही से होता है। ब्रह्म छोड़ और कुछ रह नहीं जाता है। (कठवल्ली ५।३) (१२१) जिस परब्रह्म से स्वप्न का आना और जागरित का अन्त मनुष्य देखता है। उस महाव्यापक को देख कर धीर मनुष्य को शोक नहीं होता। (कठवल्ली २ ॥ ४) (१२२) ब्रह्म हंस हैं। पवित्र हैं, सनातन हैं, अन्तरिक्ष में विराजमान, हवनकर्ता हैं यज्ञस्थल में विराजते हैं, वह अतिथियों में, मनुष्यों में प्रकाशमान हैं । सत्य में विराजमान हैं । आकाशचारी हैं। जल में पृथ्वी में विराजमान हैं। सूतृत वचन में झलकते हैं। पर्वतों पर चमकते हैं। (ऋग्वेद ।) टिप्पणी-यह मन्त्र ऋग्वेद में आया है । ( यजुर्वेद में १० । २४ । और १२ । १४ भी आया है। ) तैत्तिरीय पारख्यक १० । १० में भी है। कठोपनिषत् से तो यहाँ संगृहीत भया है। यह आदित्योपासना सम्बन्धी ऋक सूयार्थ्य मन्त्र रूप मध्याहू काल में पढ़ा जाता है, अर्थात् इस मन्त्र को पढ़कर ऋग्वेदी मध्याह्न में सूर्यार्घ देते हैं। पर सायनाचार्य ने और महीधर ने अपनी ऋग वेद की और यजुर्वेद की टीका में ब्रह्म पर सम्बन्ध भी लगाया है। दीपिकाकार ने हंस का कई प्रकार अर्थ दिखाया है। सकल पाप और दुःख का हननकर्ता हंस है । क्षीर नीर का पृथक् कर्ता जैसा हंस पक्षी प्रसिद्ध है। ऐसा क्षीर जो आत्मस्वरूप है और नीर जो मायास्वरूप है इनका - । ( ६८ ) पृथक् कर्ता ब्रह्म है । सूर्य के पक्ष में हंस सूर्य का नाम है क्योंकि वह गमनशील है। हन् धातु गत्यर्थक भी है। पौराणिक हंसावतार भी नारायण का हुआ है, सो हंस से उस अवतार की भी सूचना पाई जा सकती है। सूर्य के पक्ष में अन्तरिक्ष शब्द का अर्थ तो सहज ही है। पर ब्रह्म पक्ष में सदसत् यावद् वस्तु है। सब में विराजमान यह अर्थ है। दुरोणसत् सायनाचार्य ने दुरोण का अर्थ पाकशाला के अग्नि में विराजमान सत् ऐसा अर्थ दिया है। ब्रह्म पक्ष में वरणीय स्थान में बरसत् । आदित्य पक्ष में वरणीय मण्डल में विराजमान । अद्रिजा सूर्य पक्ष में उदयाचल से निकले हैं ऐसा अर्थ, गो शब्द पृथिवी वाचक है और रश्मि वाचक भी है। भाषा का अनुवाद 'प्रायः दीपिका के अनुसार किया गया है। गायत्री मन्त्र का जैसे सूर्य पर और ब्रह्म पर व्याख्यान होता है वैसे ही इस मन्त्र का भी। (१२३) कोई शङ्का करे कि प्राण ही को मानें इस से पृथक् जीव की सत्ता को क्यों मानें न प्राण से, न अपान ही से मनुष्य जीता है। किसी दूसरे ही की शक्ति से मनुष्य जीते हैं। जिस पर ये दोनों प्राणापान ठहरे हैं। (१२४) जिस पर यह विश्व ठहरा है, जो सब को व्यापे है, जिस पर देव लोग भी आश्रित हैं। वह भूत, वर्तमान और भविष्य कालरूप है। वह अविनाशी महाकाशरूप (महानारायण १।२) (१२५) ऋषि लोग कहते हैं, वह ब्रह्म पृथिवी आकाश और स्वर्ग को व्यापे है। उसके बेज से सूर्य चमकता है। वह समुद्र के बीच में है। उसी से सब जीव पैदा हुए हैं। (महानारायण १।३) (१२६) उसने सब जगत् को पैदा किया है। जल में, पृथिवी में सब पेड़ पत्तों पशु, मनुष्य चराचर जीव में वह बैठा है। (महानारायण १।४) (१२७) इस से अधिक सूक्ष्म और कोई नहीं है। न इससे कोई बड़ा है। यह नाना प धारण करता है। अव्यक्त (अप्रकट) है, विश्वरूप है, सनातन है। माया के घोर अन्धकार के बाहर है।

( ६९ ) (१९९) वह अग्नि है । वह वायु है। वह जल है, वह सूर्य है, वह चन्द्रमा है । वह सदसत् का बीज है । वह प्रजा का सृजनहार है। (महानारायण १।७) (१३०) ब्रह्म चैतन्य रूप हैं । एक हैं निरंश हैं। विना शरीर के हैं। उपासकों के सुभीते के लिए उनका रूप माना जाता है । ( रामपूर्वतापिनी १ । ७) (१३१) जैसे वट-वृक्ष के बीजं में बड़ा पेड़ सूक्ष्मरूप से बना बैठा है वैसे ही रामजी के बीज में यह चराचर जगत् बना हुआ बैठा है। (रामपूर्वतापिनी १।१५) अब कहते हैं कि नाना नाम से ब्रह्म की प्रसिद्धि है पर वह एक है। (१३२) वह ब्रह्मा है शिव, इन्द्र, अक्षर, परम स्वराट हैं। वह विष्णु, प्राण, परमेश्वर हैं। (महानारायण ११ । १३) टिप्पणी-स्वराट का अर्थ है जो स्वयं प्रकाशमान है । दूसरे के प्रकाश से नहीं चमकता । सूर्य चन्द्रमा नक्षत्रादिक ये सब भगवान् की ज्योति से चमकते हैं। पर भगवान् की ज्योति उनकी निज की है। (१३३) वही सब है । जो हुआ है । जो होगा । वह सनातन (नित्य) है। उनको जो जानता है वह मृत्यु को जीत जाता है । मुक्ति का दूसरा रास्ता नहीं है ।। (कैवल्योपनिषत् ८) (१३४) जो आत्मा में सब वस्तु देखता है । और सब वस्तु में आत्मा देखता है। वह ब्रह्म के पास पहुँचता है। दूसरा कोई उपाय नहीं है। (कैवल्योपनिषत् १०) (१३५) परब्रह्म परमात्मा चराचर जगत् के आश्रय हैं। आधार हैं। वह सूक्ष्म से सूक्ष्म हैं । नित्य हैं । तत्त्वों से परे है। टिप्पणी-साङ्ख्य में २५ तत्त्व की गिनती है। पुरुषोत्तम तो छब्बीसवाँ है। (भगवद्गीता १५ । १८) (१३६) जाग्रत् स्वप्न सुषुप्ति इन तीनों अवस्थाओं का प्रपञ्च जिस ब्रह्म से प्रका- शित होता है-वह मैं हूं-इस बात का ज्ञान जब हुआ तब ज्ञानी सब बन्धन से छूट जाता है। (कैवल्योपनिषत् १७) टिप्पणी-ब्रह्म से जो सब कुछ प्रकट हुआ है उसी को प्रपञ्च कहते हैं। जब जीव और ब्रह्म का ऐकात्म्य ज्ञान होता है तब जन्ममरण से छुटकारा होता है ।। (१३७) भूलोक, भुवर्लोक और स्वर्गलोक इन तीनों लोकों में भाग, भोग की सामग्री और भोग करनेवाला-इन तीनों से न्यारा द्रष्टा चैतन्य आनन्दस्वरूप ब्रह्म मैं हूँ॥ (कैवल्योपनिषत् १०) - ( ७० ) (१३८) ब्रह्म पृथ्वी नहीं हैं । न जल हैं । न अग्नि हैं, न वायु हैं, न आकाश हैं। वह कळाहीन हैं अर्थात् निरंश हैं। वही एक है, दूसरा कोई नहीं। ऐसे ब्रह्म स्वरूप को जान कर॥ (कैवल्योपनिषत् २३) (१३९) ब्रह्म का ध्यान करे कि वह द्रष्टा है। सत् और असत्-दो में एक भी नहीं कह सकते-वह परमेश्वर हैं । सर्वव्यापकहैं। भूमि की सृष्टि के पहले रहा और उसके संहार के पीछे रहेगा। इस विश्व का हवन उस ब्रह्म को करे। अर्थात् अपने समेत इस विश्व को ब्रह्म से पृथक् न समझे। अपने सब का उसमें होम कर देवे॥ यही महा ब्रह्म-यक्ष है, यही ज्ञान-यज्ञ है। (कैवल्य-२४) (१४०) वही शानी, वही योगी कहाता है जिसको ब्रह्मैक्य का पूर्णनन्द का अनु भव हुआ है। वह तब कृतार्थ होता है। (परमहंस ३) (१४१) मुझी से सब कुछ पैदा हुआ है । मुझी में सब स्थित है । मुझी में लीन हो जाता है। मैं ही वह अद्वितीय ब्रह्म हूं। ( कैवल्य १५) दूक्ष्म से सूक्ष्म है। बड़ा से बड़ा है । सनातन भ्राजमान पुरुष मैं ही हूं। ( कैवल्य २०) (१५३) बिना हाथ पैर का हूं। मेरी शक्ति की सीमा नहीं है । विना आँख देखता हूं, बिना कान के सुनता हूं। मैं ज्ञानस्वरूप हूं। मैं सब जानता हूं । पर मेर जानने वाला कोई नहीं है। मैं नित्य चैतन्य रूप हूं। (१४५) सब वेदों के द्वारा मैं यहूं; वेदान्तकार हूं', वेद का ज्ञाता हूं। न मुभ को पुण्य लगता है. न पाप । न मेरा जन्म न मेरा नाश होता है। न मेरा देह है। इन्द्रिय, न बुद्धि। ( कैवल्य २२) (१४६) जिस ने जान लिया है कि ब्रह्म विज्ञानरूप हैं और जिसका चित्त उस विज्ञान से नहीं गिर जाता । उसके देह का पाप सब छूट जाता है । उसका सब अभि- लाष पूर्ण हो जाता है। (१४७) उसको आत्मा करके जानना। सदा प्रकाशमान । अज्ञानता से पृथक है । इसका बन्ध नहीं है। नित्य अद्वैत रूप है । आनन्द रूप है। उसी में सब स्थित है। उसका ज्ञान का अन्धकार दूर होगया है जिसका अहंभाव चला गया और (१४८) ब्रह्मज्ञ उन लोकों को पहुंचता है जहाँ वह जाना चाहता है । सब उसकी पूरी हो जाती है । अतएव समृद्धि के चाहने वाले आत्मनानी की पूजा करें।

टिप्पण-यह फल श्रुति है।
(१४९) --जिसकी भक्ति इष्टदेव में है और अपने गुरु में समान रूप से है उस
हात्मा का सकल मनोरथ पूर्ण होता है।
(श्वेताश्वतर ६ । २३)
(१५०) जो ब्रह्मज्ञ है, वह ब्रह्म है। उसके कुल में ब्रह्मज्ञान से रहित कोई नहीं
दा होता है । वह शोक से रहित होता है। पाप से मुक्त रहता है। संसार के बन्धन
छूट जाता है।
(मुण्डक ३।२।१)
टिप्पणी-यह फलश्रुति है ॥
इति श्रीब्रह्मोपनिषत्सारसंग्रह-दीपिकाभाषानुवाद समाप्त ॥

Sri Brahmopnishad Saar Sangraha Deepika

Author
Sudhindra Nath Vasu
Title
Sri Brahmopnishad Saar Sangraha Deepika
File name
Sri Brahmopnishad Saar Sangraha Deepika
Text
OCR done
Citation
1923
Published
2006/05/05
Publisher
Bhuvneswari Ashram Allahabad
Language
Sanskrit
Pages
85
Library
Allahabad University
Classification
Literature
DLI number
486635
Barcode
5990010121710.00
Scanning centre
IIIT, Allahabad
VMLT id
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