Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Drasthant Sagar Part-ii

Sharma Pt.dwarka Datt · 2011/01

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ओ३म् दृष्टान्त-सागर द्वितीय भाग । जिसको लावदीपुर निवासी श्री पं० शंकरलालजी गौड के पुत्र श्री पं० द्वारकादत्त शर्मा, गोडेन्द्र, उपदेशक श्री श्रा०प०नि०स० संयुक्त मान्त ने रचा और साहित्यरत्न वाचस्पति मिश्र हल्दौर निवासी से शुद्ध करा कर- म० श्यामलाल वर्मा आर्य बुकसेलर बरेली ने प्रकाशित किया इस पुस्तक का शपने घराने का सर्वाधिकार महाशय श्यामलाल वर्मा धार्य युवामेयार परेतो कोई। All rights reserved मयमधार मान १८२१ ६०. ... मूल्य ॥

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Printed by C M Dayal, at the Anglo-Arabic
Press, Mall Road, Lucknow
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विषय-सूची। । - विषय पृष्ठ ईश स्तवन १ - ... ... r .. विषय पृष्ठ. १६ निर्मोही राजा २० नन्द धर्म २१ लिसिति मुनि की सचाई ३७ २० देव जान्स का त्याग ३८ २. राम का भाव २४ देश भक्ति २६ विपद् में मित्र भी . ६ ४० १ ईश्वर कहाँ है भौर क्या करता है। २ मनीराम को घर में करना ३ एक लाख रुपये की षक यात ४ डाकू गुरु ५ एक स्त्री की बुद्धिमत्ता ६ सनातनधर्मियों के धाद्ध की लीला ७ मृत्यु पौर स्वप्न - ६ - स्याग देते है ... १० ३ ११ पारस पत्थर २४ धर्म का मादिलोत । वेद है ... . . ८ नौशेरवाँ का इसात 1 १७ । सचाई १० सत्य १८ ... १६ . 1 १२ सत्संग १३ वर्तमान भारतीय वीर १४ बुद्ध और एक दुड़िया १५ प्रकृति का बन्धन '१६ गफली पतिमता १७ माता का दूध १८ मूंग प्रेम २८ एक कन्या और वेद रक्षा ४७ १६ २६ मनुचित प्रेम का परिणाम ४८ १. विषयों की असलियत ५० ३. प्रमचर्य ३२ तुलसी वैराग्य २० ३३ राजा मुन और भोज २१ ३४ मज को वशिष्ठ उपदेश ६ ३५ पुन को पिता की पहिचान । २३ ३६ ईश्वर प्रेम ५६ १५ साहित्य मन्दिर २८ २९ एक जापानी साधु २६ ३. सकराचार्य और मन मिभ६३ . . Com २ पृष्ठ . ... शेस चित्री .. पुरुषों की दशा विषय-सूची । विषय. विषय. पृष्ठ ४. फारसी का ७२ । ६३ एक की पूजा ४१ उर्दू लिपि ६४ पतिव्रत धर्म और योगवल १०४. ४२ जज साहब और कुत्ता ६६ सिकन्दर और मारत वर्ष ४३ घड़ी सुधरवाई चार घूसे ३६६, अन्याय का उचित दगद ११. ४४ बाबू साहन ६७ भारत का वरमा व्यवसाय ११. ४५ कुजड़ी और वकील... ६८ पहरो का भारत , ...॥ ११२। ४६ मससरा ६१ पतिनत का पल ७५० गहनों मे खियों का प्रेम ११५ ४८ गुरड़ी का दाना ७६. . ७१ भेद से हानि, ४५ प्राचीन तथा नवीन ७२ अफीमची की पीनक ११७ ७३ तीर्थयाना और चतुरा सी ११६ ५. पण सेठ ७४ मूर्मा भी ५१ पुजारी रोड फ्ल्प ७५ सुगी कोन है ? ... तक नरगामी ७६ माम का उपदेश १२४ ५२ विचार .. ७७ चीर स्त्री १३ पुगडरीकाक्ष ७८ हम कैसे , उच्च हों. १२५ k४ पिण्ड भरना ७६ विद्या बल ५५ दो बहनों का सवाद Eo एकादशी व्रत 1-१२६ ६६ ८१. लाला की चतुराई ५७ वीरवल की बुद्धिमत्ता १६८१ मुर्ख कौन है ? ५३२ । १८ ममली जीपन ८३ जो ईश्वर नहीं कर KE भमरीका युवकों की गकता वह हम कर देश भकि सक्ते हैं। ६. निगश मत हो १.२ ८४ तुख्मतामीर कि सोहबत ६१ वड़ा कौन है। का भमर' १३४ ६३ परोपक 4 । . M H ... . 4 ५६. प्रेम । १३० J १०. 1 - . 1 T 1 विषय. पृष्ठ १४८ । १४६ । . विषय-सूची। पृष्ठ विषय - दो मूर्ख पहाड़ी ६३ जय से प्रपिचार से .८५ यादशाह मुखेमान का विशेष हानि न्याय १४ एक बुढ़िया ८८ ईश्वर जो करता है ६५ दमन पच्चा ही फरसा है... ८६ चालाकी से हानि १४१ ६. साधु और दया १४४ १८ इन्द्रि निमह ११ मापस फी फूट से नारा १४५ १६. मेरा स्वप्न १.२ निन्यानवे का फेर . १.० रात लोकोक्ति १५१ १६ रस्तेय ६७ शौच ... १५३ ११४ .. - १५५ १४७ ... - .

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दृष्टान्त-सागर
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द्वितीय भाग।
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ईश-स्तवन
पावका नः सरस्वती बाजेभिर्वाजिनीवती, यज्ञं वष्ट थियानमः।
पवित्र करनेवाली, बलों से वल्रती, विद्यारुपी, धनदात्री
सरस्वती हमारे यज्ञ को पूरा करें।
१-ईश्वर कहाँ है और क्या करता है
एक दिन अकबर बादशाह ने अपने मन्त्री वीरवत मे प्रश्न
फिया कि-"बतलायो ईश्वर का है। थोर क्या करता है?"
पीरबल ने उत्तर दिया कि-"आपक प्रश्न का उत्तर एकमताह
में दूंगा।" शाम तक बोरयल दरबार मे रहे और शाम को जय
अपने गृह पर प्राय तो मन ही मन विचारने लगे कि क्या करना
चाहिए । ध्यान मे पाया कि पहले अपने इष्ट मित्रों से पूछ । यदि
यह प्रश्न सुगमता से ही हल हो जाय तो यहुत अच्छा है,
अन्यथा जैसा धागा देखा जायगा । इसी विचार से अपने सब
मित्रों में प्रनहिया. पन्त लता मनगटन माने

- * शान्त-मागर * + कारण एक दिन अपने घर में निकले बार उत्तर दिशा को गमन किया। कुछ दूर जाकर देखा कि विशाल तानाब है जिस क चहु और पिता तिमिले नधन वृत है मजा जोर लाहलहा रहा है जिनो मानन्द को (मन ही मन अनुभव किया, अहाहा! क्याही रगणीक म्धान है, सुपर सुगन्ध युक्त वृक्षों के पुष्पों में सुगन्ध का ध्याना और सुगन्ध शानल बायु का धीरे धीरे चाताना और जज फा निमन होता और उसके अन्दर सूर्य भगवान को किरणों का प्रवेश होकर भिात ना मन को अपनी ओर आकर्षित करता था। सो स्थान में तीन थे। फि अपने बाई और रष्टि डाली तो एक नाथ पधा दिखाई पड़ा। मन में विचारा कि इसमें पुई कि तू फोन है, फिका जाडका है और यहाँ कने पाया ? पास जाकर पूछा-'ऐ जड़के 'तू कोन है ?" जड़के ने कहा-"मैं एक 'प्रनाथ लड़का' वीरवन ने कहा-" तू किसका जड़का है" इसके उत्तर में लड़के ने कहा-"कि मै ना जानता , मुझे यह भी मालूम नही कि में कय और किस प्रकार लाया गया ।", लडक के मामन कुछ अनाज के दाने पड़े थे, जिनमे से बह एक एक. नाना उठाता और ना लेता था। बोरल ने कहा- हे जड़क ! इस प्रकार मत खा, किन्तु ऐसा कर कि इन्हें उठा और मन कर एक बार हो वा जा, तप तेरा पेट शीघ्र भरजायगा। बड़क ने कहा-"कि जनाध मौत का कुछ ठिकाना नहीं, नहीं मालूम किस स्नाले में सर पर प्रा धर्म और मै दान साफ ही करता रह जाऊँ । घर का गहूँ न उधर का । जैसा कहा है कि-"दोनों दीन से गये पाँढे नये, नामांडे ।" इस लिए तो मेरा युक्ति ही टीक है, कि एक दाना उठाया और खा तिया।" यह सुन कर धीरयत वड़ा प्रसन्न हुया, और मन में सोचने लगा, कि शादशाह के प्रश्नों का जवाब इस जड़के से लेना चाहिए, सम्भव है इसकी - * द्वितीय-भाग* . सममा जार, और उत्तर दे दे। वीरवन ने लड़क सेवा कि-"माई एक प्रशश मेग है, मेगनी किन्नु अस्तर मादशाह फा के प्रार यह यह है कि सर कहां और क्या करता है " बाड़ ने महा-"प्रशसका उत्ता में दूंगा पाप मुझे दरबार में ले चलें।" बोरबज उसे अपने घर ले गया और पाद नियात्रों से निवृत्त करा उसे मोग्न कराया. अच्छे नत्र प्रादि पहनाये मोर पुत्रत् समझ उसे अपने घर रन लिया, श्रर प्रश्नों के उत्तर का दिन प्राया। वीरवल को फिर चिन्ना दु:, लड़ से फला कि-"फल प्रश्नोत्तर का समय है । म यह पततामा उत्तर तो तुम ठोगे फिर मेरा क्या नाप हागा वादगाई करेंगे के इस लड़के ने तो उत्तर दिया आपने नों, मुझे सरे दरार अपनी दशा पराजित मोर नादिम होना पडेगा।" लड़के ने कहा- ती नहीं, मै अतजाये देता है। प्रार जिन ममय बादशाह के दरशार में जायें और वह अपने प्रश्नों का उत्तामांगे, तो पार कह दें कि हर मैने ता प्रापके पड़े पड़े प्रश्नों का हन किया है, फिर यह ना मन ही क्या दे , जरासे वे तक इस का उत्तर दे सकते हैं।" इतना सुन कर योग्यत के मनमे पाया कि लड़का कहता तो ठीक है। रात मेसो रहे, प्रान उठनित्यप्रनि के कार्यो मे निष्ट ठीक पमय पर दावार में पहुँचे । तब यादशाह ने नौगवत से कना-"अाज हमारे प्रश्नों के उत्तर का दिन है। बताया क्या जयाय नाये।" तय ता धीरयल ने कहा कि-"हुजूर मैन श्राप बडे बटे पश्नों का हल किया है, ऐसे प्रश्नों को नो बच्चे भा इल कर देते है। बादशाह-सुध की पर भी ऐसे प्रश्नों को हल कर सकते है। चारचल-ही जनाव मेरे ही पास एक अनाथ बचा है जो इनको इन कर सकता है। . ५ - *ष्टान्त-सागर * , गया 1 यम, ईश्वर यही करता है कि शरण में राजा को रक और रफ कागजाचनाते समय नहीं लगता।" A 1 . २--मनीराम को वश में करना एफ वार गजा जनक याज्ञवल्क्य मुनि के पास, पधार और कहा-“हे भगवन् । कौन उपाय है जिससे मेग मन वश में हो और हरिभक्तिमे लगे।"ऋषिने कहा-'गजन् ! विना दक्षिणा के उपाय न बताया जा सकता, इस लिए कुछ दक्षिगा दीजिए।' महाराज जनक बोले-"भगन् । यदि आप चाहें तो मैं अपना विशाल राज्य श्राप को दक्षिणास्वरूप भेट कर सकता हूँ । याज्ञवल्क्य बोले-यह राज्य तुम्हारा नहीं है, यह ता चलती फिरती माया है, यही राज्य पहले तुम्हारे पितामह के पाल रहा, अब तेरे पास है, जब तेरे पितामह के पास न रहा तो तेरे पास कैसे रह सकता है और तेरा कैसे हो सकता है। अत. राज्य नेरी वस्तु नहीं है, कोई ऐसी वस्तु दान दो जो तुम्हारी' अपनी हो। -मे म्गरा धन आप के अर्पण करता हूँ। अपि बोले-यह धन भी तुम्हारा नहीं है, क्योंकि तेरे पूर्वजों ने प्रजा मे हमे सचिंत किया है, वह तो प्रजा की धरोहर है, वह तेरा नहीं है। प्रजा फा धन प्रजा का ही है, वह उस के हित में व्यय होना चाहिए, तेरा इस पर पथा अधिकार है। रक्षक को भक्षक न होना चाहिए। प्रत• जो दक्षिणा तू देना चाहता है, उसे मै स्वीकार नहीं कर सकता। रामो कहने लगा-"महात्मन् ! यह हाथी, घोड़े ही है माप इनको दक्षिणा में ग्रहण कीजिए।" ऋषि - - " - - * द्वितीय-भाग * इन पर भी तेग अधिकार नहीं है, यह भी तू। दूसरी जगह से मैंगों का प्रभवा पकड़ कर अपने पास रम्न छोडे है प्रॉज तेरे पास है नहीं मालूम कल कहाँ जायेंगे। अब तो राजा की आँखें 'खुला उसे दुनिया ये सारे पदार्थ अपने से भिन्न प्रतीत होने लगे। फिर कहा- 'मै अपतन आपक अर्पण करता है। पि ने कहा- , "तन के देने में माम न बनेगा, तन नो पफमात्र मृत वस्तु है। इस देने मे हरिभक्ति न हो सकेगी, यदि देते हो तो हमको अपना मन दो।" राजा प्रसन्न होकर बहने लगा 'फि भगवन् ! मै अपना मन प्रापको अपगों परता हूँ। ऋषि ने कहा-"प्रस्तु, जादो रहे व प्राप्ति मघय होगी।" राजा जनक चले गये और शि-भक्ति मे लग गये। परन्तु उन्होंने देखा कि मन पूर्ववत् ही चचल है और श्वर से विमुख है तो फिर वह ऋपि के पास प्राये और काने लगे-'अय भी चिर प्राप्ति नहीं हुई, मने की व्यवस्था पूरवत् ही चली जाता है।' भूपि न कहा-'गजन ! तूने अभी मन यो कार्य नहीं किया, इसलिए हरि भक्ति में नहीं लगा। यदि तूने मन दे दिया होता तो फिर, तुम्हारे मन में यह बात घाई नहीं सकती थी कि हरि भक्ति में नहीं लगा प्योंकि जो वस्तु अपनी नहीं होती दुसरे को दे दी जाती है तो फिर उस में अपनी भावना होना निता त कठिन है। जब तुमने मन दे दिया तो अपनी श्रार से इस में कोई विचार प्रादुभूत न होना चाहिये। ..इसलिप गलन ! जानी और अभ्यास करते हुए मन मे कही तू मेरा नहीं है । किन्तु याजघरस्य महाराज का है।" मन से बह रहो त ईश्वर का है। ईश्वर ही तेरा मालाधार है, ईश्वर ही तेरा सहायक है, ईश्वरेच्चा ही तेरा कत्तन्य है। हे मन! विरेच्छा को पालन कर, श्विर तेरे साथ हो, ईश्वर की छाया तुम पर हो, तरछा से बाहर मत जा । तर - -

८
* दृष्टान्त-मागर *
.
का और ईश्वर तेरा है। गन्न प्रकार मन में कहा जाये
और उसमें एक तरग उत्पन्न कर दी जाय तो फिर यह भी
समझने लगता है डिमे ईश्वर के माधीन है। इस प्रकार इस
को चारनार करके समर्पण करने से और यार यार यही
कदने से कि तू ईयर का है। मन गान्त होकर तन्मय हो जाता है
उपनिपद कदनी है-
यस्तु विज्ञानवान् भवति गुक्तन मनमा मदा ।
तस्येन्द्रियाणि वश्यन्नि सदश्वा इव सारथेः ।। ।
जव मन यह समझ लेना है कि में सिर को दे दिया गया
है, तो वह वाघ पदार्थों - विनुख छो ईश्वर में जग जाता है
स्थितेषु राज्ञः परमण्डपेषु शान्तिर्भवत्येव नित्य विनान् ।
तथा हृदण्जे परमेश भक्तौ पलायते कामज मर्व द्वन्द्वम् ।।
-शेर-दिल बदस्त आबुई कि इज्जे अकबर अस्त ।
अज इजारा काचा यकदिल वेहतर अस्त ॥
-
३-एक लाख रुपये की एक बात ,
एक साधु ने पफ शहर मे घूम कर यह आवाज लगाइ, कि
में एक यात एक लाख रुपये मे बचता है। जिसका चाहिए लेजे।
वात क्या है मानो पारस मणि से भी यहुमूल्य है। जो किसी
नगर निवासी ने उनसरी दान को मोल न लिया तब वह साधु
उस नगर के राजा के पास गया और दर में भी वही आवाज
लगा फर कहा-"ले चादा ले, हम नेरी नगरी से जाते हैं। हमें
"शोक है कि हमारी बात का कोई खरीदार न हुमा।" यह कह

* द्वितीय-भाग * है - ५ साधु चलने लगा, राजा ने अपने मन्त्रियों में साधु की बात खरीदने को कहा उन्होंने उत्तर दिशा नहीं मालूम क्या बात है। निरर्थक एक लाख साया दे देना त्रुद्धिमत्ता नहीं है। तब राजाने का नती, अपाय लेना चाहिए। यह रह राजाने फकीर को चुला एक लाख करया दे दिया रपया पाने पर साधु ने कहा- विना विगरे कोई काम न करना चाहिए । यप याही एक घात एक ताम्ब रुपये की माधु के जाने पर 'राजा न अपन मकान, काडी, वन, पर्दे पुस्तकादि सय वस्तुओं पर यही वाक्य लिगा दिया। कुछ समय बाद गजा को 'फम्न पुलवाने की प्रावश्यय ताड़ी यह यात जान कर राजा के किना शत्रु ने फस्त बोलने वाले से मिल फात पोलने के औजारों को विष मे वुभना टिंगा । जम वह राजा के पास गया मय गजा ने अपने हाथ के नाचे पतीली शिया ती थी। ज्योंही उसकी दृष्टि उपरोक्त वचन पर पड़ी फिर क्या था हाथ पांव काँपने लगे मुख पोना पड़ गया। राजा ने उसकार भाव देख कर पूछा कि माई फ्या, यात है ? सच सच कहदो हमने तुम्हे जीवन दान दिया। यह सुन उसने नारा वृत्तान्त राजा से ज्यों का त्यों कह सुनाया। गजा ने अपने मन्त्रियों तथा धापने सेवक श्रादि पुरुषों को बुलाकर कहा-"देखो, उन एक लाख रुपयो से हमारी जान बची इस लिए विना विचारे कोई काम न करना चाहिर " असमीक्ष्य न कर्तव्य कर्त्तव्यं सुसमीक्षितम् । विना विचारे जो करै सो पाछे पछताय ।। काम विगार आपनो जग में होत हँसाय ।। . 4 - - - ... है * हटान्त-भागर * , २ ४--डाकू गुरू एक दिन पक सेठ का मानक सुन्दर, वस्त्र-श्रामृपm पहने झुए घर के द्वार पर खेल रहा था, उस समय एक डाक उसे मूर्ख जान कुछ मिठाई का लोम देकर वहाँ से उठा लेगया और किसी सघन वन मे ले नाकर उसके मय यस्त्र प्राभूपगा उनार फर नासो से पट्टी बांध चलता हुआ, तब चालक बड़ा दु.सी और माता पिता को याद कर फूट फूट कर रोते चिल्लान नगा! इतने में यहाँ एक गुरुश्रा निग्ले, पोर उसकी दशा दंग कर कहने लगे-रे गालका क्या हुआ जो इतना रोता विलयता है" बालक ने प्रादि में अन्त तक अपना साग वृत्तान्त कह सुनाया और अपने माता पिता से मिलने की इच्छा प्रकट की । गुन्स ने बालफ की, अाँख खोल दी और कहा यदि व हमे एक दे तो तुझे तेरे घर पहुंचा दे। बालक ने कहा-"महाराज में पाम तो कुछ है नहीं हाँ मेरे माता पिता धनी हैं वे आप को अवश्य कुछ गे श्राप मुझे यह पहुंची दीजिए।" गुरू ने कहा-'यह तो हम नहीं मानते।' कारश यह था कि गुरू को उस के घर का पता हात न था, नाहते। कुछ मिल जाये वही अच्छा है ! जब वाजक ने देखा कि गुरु जी नहीं मानते तो एफ अंगठी जो उसके हाथ में शेष रई यो झट उतार कर देदी। गुरु जी ने अंगूठी लेती और जग येल की पूँछ जो घही पास हो कर रहा था बालक के हाथ पकड़ा दी और कहा एक को छोडना मत यह नुमको तुम्हारे घ पहुँचा देगा । बालक दिन भर बैल की पूंछ पकड़े पकड़े फिरत रहा । वेल कभी माड़ी, कारो में जाता, ठीक मार्ग पर नई चलता था जब सरदी और यकावट से विचारा वालक अत्या 1 ।

* द्वितीय-भाग * । दुखी हो गया तो उसने विनाग कि चार ती रमे याबहुत जल्दी ने बाये थे परन्तु मे जननी देर घूमते हो गई घर अभी तक न प्राया। घिनारे चालक ने बल की पॅकबाड़ दी । भूख प्यास से व्याकुल ही माता पिता को याद कर दिन भरके दु खोदी सोच बालक फूट फूट कर रोने लगा, तय बनके एक मञ्च तपस्वी ने उस पर दया करके पूछा- "हे बालक ! तू फ्यो गता है ?" पालक अपना सारा दुग्बड़ा उस तपस्वी के आगे रोया, और रोते र ते उम महात्मा के पाचो पर गिर पड़ा। महात्मा उस की दशा देख और सुन कर बड़े अधीर हुए । एक तो, अंधेरी गघी का समय जिसमें अन्कार के कारण कुछ सूझना ही न था. दुसरे बनले पशु सिंह श्रादि का संयकर नाद, तीसरे साल कीन दशा में अन उस महात्मा ने विचाग कि इस समय वातक को इसके स्थान पर नहीं पहुंचा सकते रात्रिभर से सुरक्षित स्थान में रस, मात काल मर्योदय होने पर इसके मकान पर पहुँचा देंगे। महात्मा ने चालक से कहा-"कि ऐ वालक इस समय एक तो, अंधेरी गत है तुझे माग नही सूझ पड़ेगा, दूसरे नेरा शरीर शिथिल हो रहा है, तासरे भयकर पशुप्रो का डर चौथे मार्ग कठिन है। इस लिए उचित यही है कि एक वृक्ष पर चढ़ना, गनि योतने पर सूर्योदय हो, तर पर पहुंचा दो। दान्ति-यह है कि पट वेषधागे लोग भोले भाले लोगोको वहफाते हैं और कहते हैं कि माई यदि गुरु लोभी हो तो वामन समा, यदि 'कामी हो तो कृप्या के समान, यदि कोचो हो परशुराम के तुल्य समझो । यस जहाँ ऐसी टपटी दो चार याते r - . । ܒܝ - १२ * दृष्टान्त-सागर * - - । - । - साथ हो लिए, कुछ दिन तो जब तक इनका मतलय मयता रहा साथ राना, जब अपना स्वार्थ कम सधत्ते देशा ती छोड़ दिया, फिर उन विचारे लोगो को वशे खान रे सिवा और नहीं मिलता। ग्रियपाठक यही तो दिन के डाकुहै। वेले के हाथ में से जो कुछ धन पड़ा ऐंठा फिर चा चैतको पूछ हाथ में दे दी। किसी के हाथ में रुद्राक्ष की माला, किसी के तुलसी की, किसी के मुद्रा डाल दी और कह दिया बल जायो मौज करो । अब सिवाय : धके खाने, दुर दुर फैिट फिट करन के दूसरा उपाय नहीं जो पाराम से चै म । 'पारस खाना सरावो सब । इमलिए- पाखण्डितो विकर्मस्था न्हालत्ति काञ्छयान । ईतृकान्नकटत्तीश्च वाइमात्रेणापि नार्चयेत् ।। वेद विरुद्ध कर्म करनेवाले, फूड यकनेवाले तथा वगुप्ता और विडाल की वृत्ति पने याने नकलची गुरों का बागीमात्र से मी सत्कार न करना चाहिए । मात्म भेद चिन फिरे भटकते, सब धोखे की घाटी में । । कोई धातु में ईश्वर मानत, काई पत्र कोई माटी में ॥ 'न कोई जल में कोई, कोई जगलं कोई घाटी में । कोई तुलसी रुद्राक्ष काई, कोई मुद्रा कोई लाठी में । भगत कबीर कोई कह नानक, कोई शंकर परिपाटी में । कोई नीमार्क रामानुन है, कोई वल्लभ परिपाटी में ॥ कोई दादू कोई गरीब दासी, कोई गेरू रग की हाटी में।। कहै पाजाद भेप जो धारे, चले नरक की भाटी में ।। । - . " 1 द्वितीय-भाग * ५-एक स्त्री की बुद्धिमत्ता एक नगर में भजनलाल नामक एफ मेठ रहता था । दव- योग से उनके कोई सतान भी न थी। कजूम वह इतना था कि धनवान होते हुए भी अपने पाम नौकर नान रखना था। पर न्तु भाग्य से उन्हें एक नतुग स्त्री व्याही गई भी। एक बार रात को थारह बजे नेट जी के मकान में चोर स चिवार से घुमे कि सेठ जी को मार कर मान ले नौ दो ग्यारह हो जाये । जव सेठ जी को चे चोर मारने लगे तक बुद्धिमती सेठानी ने कहा-"भाई तुम इन्हे मारो मत, चलो मे तुम्हें तहमाना बतलाप देती है।" बस चोरों को और क्या चाहिए था, सेठानी के पीछे पीछे बन दिए । सेठानी ने तहखाने के नीचे उतार इन्हे सन्दुक दियालाय सन्दूकों को देख कर चोर मोहिन हो गये और ताली माँगने लगे। मेठानी ने कहा-"तालियाँ ऊपर रह गई है में अभी जाती है।" चोरो ने कहा--"जल्द जावो।" यह सुनते ही सेठानी बाहर पाई, और ऊपर मे नहरमाने के ढकन चन्द कर पुलिस को सूचना दे दी । गात काल पुलिस ने ढमन पोला और चोरो को पकड़ लिया। और उस चतुरा स्त्री को पुरस्वार दे, चोरों को टड दिया। ठीक है चुद्धि से ही सारे कार्य सिद्ध होते है। बुद्धिर्यस्य बल तस्य निद्धे सु कुतो बलम् । -- ६-सनातन धर्मियों के श्राद्ध की लीला पहले सतयुग मे चारो वर्णों का यथावत् पालन करनेवाला, पियो के तुल्य अपना जीवन व्यतीत करनेवाला श्येनजित

१४
* दृष्टान्त-सागर *
--
राजा था । उनके देश में अंग उपाम सहित चारो वेदो को
जननेवाला सुमिन नाम का एक ब्राह्मण रहता था। उनकी स्त्री
जाश्री नाम वाली भी बड़ी पतिव्रता थी। दैवयोग ने उन दोनों
की मृत्यु हुई। स्त्रो पुरुष कर्मों के वश हुए। स्त्री जयश्री ने
कुतिया का योनि प्राप्त की और मित्र ब्राह्म भी बन की यानि
में गया और वह दोनो अपने पुत्र के य- दी जन्म । सुमित्र के
सुमति नाम वाले पुत्र ने अपनी स्त्री चन्द्रवती से कहा-"कि है
मनोहर हास्य करनवालो । प्रान मेरे पिता को वर्गीका दिन
है। इसलिए, पान ब्राह्मणों को भाजन कराना उचित है,तूं
शीत्र ही भाजन बना कर तयार कर।" चन्द्रवती पति की
आशा पासुस्वादु माजन बनाए । इतने में एक सर्प आया और
खोर के पात्र म मुह डाल कर चज दिया। यह देन करब्राह्मणों
के मर जाने के भय से कुतिया ने उस खीर को छू दिया।
यह देख चन्द्रवती ने उस कुतिया की जलनी लकड़ी मे
अन्ती र पूजा की । और दूसरी बार भाजन बना कर ब्राह्मणो
का खिताया, जूठन नक भी बाहर न डाली । इमलि र उन कुतिया
का भारे दिन भूखी रहना पस। रात्री को अपने पति बेल के
पास जाकर बाली-- "हे नाथ । प्राज मैं बहुत भूखी है। किसी
ने मुझे भाजन तक न दिया, प्रबना एक ग्रास भी मुह तक
नहीं गया , इस लिए मुझे भूख बहुत मता ही है। और दिन
तो मेरा पुन मुझे मोजन देता था ; आज ना उसने जूठन तक
भी न दी। प्राज तीर में मर्प का विप गिर गया सो बड़े बड़े श्रेष्ठ
भासण मर जाते यह विचार फर मैने चीर को छू दिग, इस के
घदले प्राज मुझे बाँध कर ग्व पीटा, इस पीटने के कारण प्राज
मेरा शरीर बहुत दुस रहा है, मेरी कमर टूट गई झमा "
यह सुन कर वह पल बोला- "हे सुभगे। मैं भी प्रापक ,
-

- २ - । * द्वितीय-भाग * क्या करूँ, प्राज दिन भर में खेत में चलाश गा, और मेरे पुत्र ने मुम, भूखे का मुह बाँध कर बहुत माग । इम ने यह श्राद्ध वृया ही किया, क्योकि मुझे तो प्राज बड़ा ही फट रहा ।" मारितःस्वात्मजेनाह मुख घद्धा वुमुक्षितः । नृथा श्राद्धं कृतं तेन जालास्य मम कष्टता ॥ उन दोनों माता-पिता, (कुतिया-चैल) क इस प्रकार कथन को सुन कर और अपन माता पिना(कुतिया चैल) को भोजन दिया। पाठक ! मृतक श्राद्ध पक्षाभिमानियो को जब तक मृतक की यानि का ठीक ठीक पता न हो, तय तक यथायोग्य श्राद्ध, 'करनी प्रासम्भव है । इसलिये घेदिक मर्यादानुमार जीवित माता, पिता, गुरु, अतिथि प्रादि को श्रद्धा पूर्वक मत्कार करना ही समा श्राद्ध, तथा उन्ह सर्व प्रकार से तृप्त करना ही यथार्थ तपयदे। माता पिता गुस्श्चैव पूजनीगस्मदा नृणाम् । क्रिपारतस्या ऽ फलाः म यस्यैते नादतात्रयः॥ । माता, पिता, गुरु को सदा पूजा करे । जो इन तीनो का प्रादर अकार नहीं करता उसकी सब क्रिया निप्पाल जानी है। क्योंकि- , यस्माता - पितरौ केशं महेते काम्भवे नृणाम् । न तस्य निस्कृतिः शश्या वर्त वर्ष शतरपि । माता, पिता जाहेश सन्तान पालन पापंण में सहन करते है उसका पदला सौ वर्ष में भी नहीं चुका सकने । परन्तु प्राज - - + -- - T 1 - ,

१६
* दृष्टान्त-मागर*
विपरीत इस माता पिता की जीवित अवस्था में विशेष
न कर मृत्यु होने पर, दाल, भात से उनका स्वागत करते हैं।
,
-
--
७--मृत्यु और स्वप्न
पफ राजा ने राधी को स्वस क्षमा मिषद ए मिद के
भय से मदान में भाग रहा है। दौड़ने टोड़ने उसे एक वृक्षा
मिल गया और उस पर वह चढ़ गया तब कही उमे कुछ
शान्ति मिली। परन्तु जय नीचे की ओर दृष्टि डाली तो क्या
देखता है कि पफ सर्प मुह बोले बैठा है और दूसरी ओर
फाला और श्वेत दो चूह उस वृक्ष की जड़ को लोसना
कर रहे हैं। वृक्ष के ऊपर मधु मक्खियो का एक छत्ता है
ऊपर देस रहा था कि छत्ते मे से मधु की पक वूद उसके मुख
में टपफ गई, लारे दुख भूल गया, मधु का स्वाद ले हो.
रहा था कि इतने में उसकी माँस खुल माई । अब
घह
सोचता
है कि यह क्या स्वस था।
दान्ति-वह मैदान जिसमे राजा भाग रहा था मृत्यु है.
वृक्ष मनुष्य की आयु' है, सर्प मृत्यु की चिन्ता है। और टो
चूहे गत दिन है जो मनुष्य की प्रायु को काट रहे है। मक्खियाँ
शरीर, के रोग है । इतने क्ट होने भी मनुष्य इनको भूल
जाता है, किस लिप की मधु की गूंद मुस में टपके । यह मधु
विन्दु वह क्षणिक और तत्कालिक रुख है जिसके वशीभूत
हो अपने सर्वस्व को मनुष्य खो बैठता है।
८-नौशेरवाँ का इंसाफ़
बादशाद नौशेरवां न्याय के लिए बड़ा प्रसिद्ध था। कहते हैं

। * द्वितीय-भाग कि उसने अपने मकान पर पक जज़ीर बँधवा रक्सी थी और खुनी आना थी कि जिसको भी मेरे राज्य में कुछ शिकायत हो यह इस जजीर को हिलादे. उसके सुख दुख की कहानी को अवश्य सुना जायगा। एक दिन एक वृद्धा स्त्री का पुत्र बादशाह के पुत्र की गाड़ी के नीचे दब कर मर गया। वृद्धा ने उस मकान पर जाकर जज़ीर हिलाई और अपने पुत्र के मरने की दुखमरी कहानी कह न्याय की याचना की और कहा- "जिस प्रकार मेरा पुन ग है उसी प्रकार यह गाड़ीवाला भी मारा जावे। राजा ने न्यायानुसार अपने पुत्र को मारे जाने की प्राक्षा दे दी। उस समय वृद्धा का हृदय प्रेम से भर प्राया,. राजपुन को उठा कर उसे छाती से लगा लिया और कहा-"कि यही मेरा पुत्र है।" । निन्दन्तु नीति निपुणाः यदि वास्तु वन्तु, । लक्ष्मीः समाविशतु गच्छतु ' वा यथेष्टम् । अद्यव वा मरणमस्तु 'युगान्तरे वा, न्याय्यात् पथ, प्रविचलन्ति पदं न धीराः॥ 1- - ६--सचाई एक बार एफ कबीर पन्थी ने झूठी साक्षी दे दी उस झूठ का प्रायश्चित करने के लिए सब कवीर गन्धी भूखे रहे। इल सचाई का प्रभाव । इतना गहरा पड़ा कि छत्तीसगढ़ का राजा भी क्वीर पन्धियों में शामिल हो गया। निस्सन्देह सचाई में बड़ा वल है। उपनिषदों में स्थान स्थान पर इसकी महिमा बनानी है। 1 - ---

* हटान्त-सागर
।
सत्यमेव जयति नानृत मत्येन पन्या- पिततो देवयानः ।
येनाकामन्त भूपयाह्याप्त कामा: मत्तद् सत्यस्य परम निवानम् ।।
+
१०-सत्य
मैक्ष्येगा पिप्यामि पुन म प्रतिक्रियाम् ।
अन्त नाभिधास्यामि चारित्र्यभ्रंगकारणात् ।।
राजा रात्यनत फा यह नियम था कि जो नस्तु उसके नगर
के बाजार में मिशने प्रानी थी, यदि वह दिन भर न बिक सके
तो शाम को राजा उस वस्तु को मरीद लेता था।
एक बार एफ लुहार लोहे की शनि की मूर्ति पना कर.
वेचने लिप लाया और उसका मूल्य एक जाख रुपया कक्षा,
उस मूर्ति में यह गुगा पताया कि जो इमे सरीदेगा उससे
धर्म, यश, लक्ष्मी प्रादि सब विदा हो जायेंगे । जय उस मूर्ति
को किसी ने न खरीदा तो नियमानुसार शाम को राजा ने
एक लाख रुपया देकर खरीद लिया।
श्राधी रात को अब राजा मो रहा था एक सुन्दर स्त्री ने
प्राकर कहा-"मे पापणी लक्ष्मी है, अब आपके यहाँ शनिश्चर
आ गया है, जहाँ यह होता है मै यहाँ नहीं रहती इसलिए मैं
जाती है, अय में रह नही सकती।" राजा ने यह सुन कर
सचमी को विदा किया। इमी भांति धर्म, कर्म, यश प्रादि भी
राजा से जुदा हुए । प्रात को सत्यदेव भी पाये और जाने को
कहा। राजा ने सड़े होकर सत्य का हाथ पकड़ लिया और
कहा-"लक्ष्मी, धर्म, यश, जायें तो जायँ परन्तु आपको
में न जाने दूंगा।" सत्य के न जाने से, लक्ष्मी प्रादि सन
कौट प्राप।

* द्वितीय-भाग १६ 1 - --- लक्ष्मी नहीं सर्वस्व जाये, मत्य छोडेंगे नहीं। अन्धे बनें पर 'सत्य से सम्बन्ध तोडेंगे नहीं।' निज सुत मरण स्वीकार है, पर वचन की रक्षा रहे । है. कौन जो उन पूर्वजों के मत्य की सीमा करे ।। सपदि विलयमेनु, गालक्ष्मी स्परि पतत्वथवा कृपाणधारा । अपहरततरा शिः कनान्तो मम मतिनमानागेपेतु सस्यात् ।। सत्येन सुखं खलु सभ्यते सत्यालोर न भाति बलु पातकम् । सत्यमिति द्वे अध्यक्षरे-मा सत्यगलीकेन गूहयः ।। रास्ती मूजिय ग्जाए खुदास्त । फम न दीदम'कि गुमशुद अजरहे सरत ।। 4 - - , ११-त्याग म० गवार के विषय,म गना ने कहा कि यदि म गवाधर हमारे दरवार में प्रावे तो हम उन्हें एक लाख रुपया देंगे। परतु वह अपनी विद्या और योगाभ्यास मे मस्त था, राजा के यहाँ जाना स्वीकार न किया। एक बार जब घर में खाने को एक दाना मीन रा, तो उनकी स्त्रीने हाथ जोड़ प्रार्थना की-हे नाथ! घर मे खाने को कुछ भी नहीं रहा, प्रत. एक धार पाप गजा यो दरगार में जायँ।' वह स्त्री का कहना मान कर घर से निकल नदी पर आया और खेपट को पार करने के लिए कहा । खेवट ने उत्तराई के पैसे मांगे। म० गदार ने उत्तर दिया कि मेरे पाम तो एक पेसा भी नहीं है। प्रेवट कहने लगा--"क्या तू ऐसा गदाधर जो तेरे पास एक पैसा भी नहीं है और राजा तुझे .

. * दृष्टान्त-मागर* सत्यमेव जयति नानृतं मत्येन पन्था- पिततो देवयानः । येनाकामन्त अपयोद्याप्त कामाः मत्तद् सत्यस्य परमं निवानम् ॥ + " १ -- । १०-सत्य भक्ष्येणापिष्यामि पुनाम प्रतिक्रियाम् । अन्त नाभिधास्यामि चारित्र्यभ्रशकारगात् ।।- राजा सत्यमत का यह नियम था कि जो वस्तु उसके नगर, के बाजार में बिकने आती थी, यदि वह दिन भर न बिक सके तो शाम को राजा उस वस्तु को नरोद लेता था। एक बार एक लहार लाहे की शनि की मूर्ति बना कर वैचने क लिए लाग और उसका मूल्य एक लाख रुपया कहा, उस भूर्ति में यह गुगा' बताया कि जो इने सरोदेगा उससे धर्म, यश, लक्ष्मी प्रादि सय विदा हो जायेंगे। जय उस मूर्ति को रिसी ने न खरीदा तो नियमानुसार नाम को राजा ने एक लाख रुपया देकर खरीद लिया। प्राधी गन को जब राजो सो रहा था एक सुन्दर स्त्री ने "ग्राफर कहा-"मे पाएकी लक्ष्मी हूँ पर आपके यहाँ शनिश्चर । जा गया है, जहाँ यह होता है में यहां नहीं रहती इसलिए मैं जाती है , अत्र में रह नहीं मस्ती।" राजा ने यह सुन कर कक्ष्मी को विना किया। इसी मांति धर्म, कर्म, यश प्रादि भी गजा से जुदा हुए । अत को सन्यदेव भी आये और जाने को कहा । राजा ने खड़े होकर सत्य का हाथ पकड़ लिया और कहा-"जक्ष्मी, धर्म, यश, जायें ता सायँ परन्तु आपको में न जाने दूंगा।" सत्य के न जाने से, लक्ष्मी आदि सन . लौट आए।

* द्वितीय-भाग* १६ - -- लक्ष्मी नहीं सर्वस्व जाये, मत्य छोडेंगे नही । आन्धे गर्ने पर सत्य से सम्बन्ध तोडेंगे नहीं ॥' निज सुत मरण स्वीकार है, पर वचन की रक्षा रहे। है कौन जो उन पूर्वजों के सत्य की सीमा करे ॥ सपदि विलयमेनु राज्यलक्ष्मी स्परि पतत्वथवा कृपाणधारा । अपहरतुतगं शिरः कृतान्तो मम मतिनमानागेपेतु सस्यात् ।। सत्येन सुख खलु लभ्यते सत्यात्तोप न भवति खलु पातकम् । सत्यमिति द्वे अप्यतरे मा सत्यमलीन गृहय-।। गरती मूजिय रजाए खुदास्त । कस न दीदम कि गुमशुद अजरहे रास्त ॥ । - -- J + - ११- त्याग म०पवाघर के विषय मे गजा ने कहा कि यदि म० गदाधर क्षमारे दरबार म प्रायें तो हम उन्हें एक लाख रुपया देंगे। परन्तु वह अपनी विद्या और योगाभ्याम मे मस्त था, राजा के यहाँ जाना स्वीकार न किया। एक बार जब घर में खाने की एक दाना भी न रहा, तो उनकी स्त्री ने हाथ जोड़ प्रार्थना की-हिनाय! घर में जाने को कुछ भी नहीं रहा, अत एक धार प्राप गजाये टरमार मे जायें।' घर स्त्री का कहना मान कर घर से निकल नदी पर पाया और ग्वट को पार करने के लिए कहा। नेवट ने दसराई के पैसे मांगे। म० गदार ने उत्तर दिया कि मेरे पास तो एक पसा भी नहीं है। 'घट कहने लगा-"जा तू ऐसा गदाधर है जो तेरे पास एक पैसा भी नहीं है और राजा तुम 1

* दृष्टान्त-मागर
१४-वुद्ध और एक बुढ़िया
एफ बुढ़िया का इकलौता पुत्र मर गया । उसको पता लगा
कि महात्मा बुद्ध यहाँ ठहरे हुए है। बुढ़िया अपने पुत्र के
मृतक शरीर को लेकर महात्मा बुद्ध के पास गई और.
कहने लगी- "भगवन् मेरे इस मृतक पुत्र को जीवन प्रदान
कीजिए ।
-
महात्मा ने उत्तर दिया-"बुटढी मै तेरे पुत्र को जीवन प्रदान
कर दूंगा परन्तु तू एक काम कर' वह यह कि तू थोड़ी सी
राई ऐसे घर में ले पा जिस घर मे श्राज तक कोई मरा न हो।"
बुढ़िया सारे नगर मे दर दर भटकी, परन्तु ऐसा घर न मिला
जिसमे कोई मग न हो। बुढ़िया लौट कर बुद्ध के पास आई
और कहने लगी-"भगवन् । मुझे कोई घर ऐसा न मिला जिस
में एफ ने एक मृत्युन हुई हो।" नव महात्मा बुद्ध ने कहा-
"पे भोली बुड्ढी । यह ससार नाशवान् है कोई सर्वदा के लिए
यहां नहीं पाया। आगे पीछे सबको इस जगत से चल देना है।"
महात्मा के यह वचन सुन कर चुढ़िया को परम शान्ति लाभ
हुई। और वह अपने स्थान फो चली गई ।
यदा मेरुः श्रीमान् नियतति युगान्ताग्नि निहतः,
समुद्रा शुष्यन्ति ' प्रचुर, निकर ग्राहनिलयाः ।
धरा गच्छत्यन्तं धरणिधर पदैरपि धृता,
शरीरे का वार्ता, करिकरम कर्णाग्र चपले ॥
चयं येभ्यो जाताः चिर परिगताः एव खलुते,
समं यैः समृद्धाः स्मृति विषयतां तेडपि गमिता।
।

**द्वितीय-भाग * २३ इदानी' ये ते स्मः प्रतिदिवममामन्न पतनान , 'गता स्तुल्यावस्था सिकतल नदी तीर तमभिः ॥ ग 4 । . १५-प्रकृति का बन्धन एक राजा जिसको मोक्ष की विशेष इच्छा थी, एक महात्मा के पास गया और कहने लगा-"भगवन् । मुझे मोक्षमार्ग पतलाइये।" महात्मा ने कहा-"फिर माना।" राजा फिर गया उसे फिर आने को कहा, एक दो गार गजा फिर गया, तब भी उसने फिर ही 'धाने को कहा। इसी प्रकार गजा जय कई बार वापस पाया तो उमे अत्यन्त जिज्ञासा हुई। गजा अपने सेवकों के साथ फिर जय महात्मा के पास गया तो महात्मा ने राजा के सहित सबकी मुझमें प्राधड़ी, और कहा कि-"हे राजन इन सबकी मुश्के सोल दे!" राजा ने कहा-"महाराज, मै कैसे पोल सका है मै तो स्वय वधा पडा है।" तब महात्मा ने राजा को पतलाया कि यही प्रकृति की दशा है। इसका जो उपाशक होता है उसे इसी प्रकार जाड़ देती है। यदि तुम मोक्ष चाहते हो तो श्वर का भजन करो। प्रकृति का उपासक बनने से तुम्हारा मोक्ष न होगा। क्योंकि यह तो स्वय जड़ वस्तु वह तुम्हारे बन्धनों को कैसे फाट मफती है। प्रभु चितन ही भव बन्धनाच्छेदक है। यदि किया जाय तो करलो, अन्यथा इसी भवसागर में नाफ एफड़ पकड़ गोते जगायो। . है। 4 1 + १६-नकली पतिव्रता किसी नगर में एक स्त्री',और एक पुरुष रहता था । पुरुप ने ..

, १ २६ *दृष्टान्त-सागर * हैं कि सात दिन मे श्राऊँगा। लो दो पैसे लेजानी बाजार से पाल) और घुइँया ले प्रायो । आज पूरी धराऊगी । लड़का हुक्म बजा लाया, जैसे कहा था लड़के ने चमे ही कर दिया। तब फिर लड़क ने प्रवा चाची और कुछ काम है १ स्त्री घोली नी वेटा बटी भोजन करके जाना । लड़या तो कोई बहाना बना बूढ़ के पास पाया और जो कुछ देखा भाला था सध दृढ़े से प्राकर कई दिया। इधर सूर्य भगवान् भी दिन भर के शके प्रस्ताचात को गमन करने की तयारी में है, उधर पतिव्रता ने सोचा कि दिन भर परिश्रम करके सारी वस्तुएँ मनाई है, कुछ खाकर तो देर । मन ही मन यह भी विचार करती गई कि कोई,देव नलेजोकभी इसी -उडे,इस लिए पहले किवाड यन्ट कर दूं पीछे जमा होगा देखा जायगा ! पिचाई छन्द पर आसन विहा लोटे में पानी ले, थाल में फिन्नी, भरी जो जो बस्त्ऍ पाय शाला में बनाई थीं थोडो थड़ी रक्खी । बैठने को ही थी कि सहसा आवाज जगी, फिनाई खोलो । स्थी मरसा चौक पड़ी (मन ही मन) पति तो ग्राम को गये थे यह कौन है, फिर एक आवाज- खागी, किवाड़ खोलो पति का स्वर पहचान गई, झटपट, कुछ वस्तु घर फर कुछ सधर कर किवाड़ बोले और पुरप से कहने लगी-"पाप तो सात दिन को कहगये थे, क्या बात हुई जो आज ही वापस लौट प्राप।" , कहिए कैसी तबियत है । पुरुष ने कहा-"जव मै कुछ दूर पहुँचा नो मार्ग में मुझे एक ज्योतिषी मिल गया और मुझ कहने लगा कि आज तुम्हारी मृत्यु है तुम जाते कहाँ हो । घर को वापस लौट जाओ।" मुझे स्वय भी प्राज ऐसा ज्ञात होता है कि माज ~ A -- प्रवाश्य * द्वितीय-भाग * २७ . माँगा। इतना कहके उसने एक लम्बी साँस लिया और घास से पृथिवी पर गिर मृतवत् पड़ गया। तवतो स्त्री ने कहा-"पा हो! जैसा म्वामी कह रहे थे वेसा ही हुआ । पास जाकर सिर पड़ 'कर उठाया तो श्राप सूखे लोक सदृश उठे. इसी प्रकार पाँच उठाया तो वही दशा । स्त्री थी चतुर उसने सोवा देखू तो जिन्दा तो नहीं हैं, और आँखों में उँगली कग्दी इन हजरत ने और विशेष मकर साध लिया। जब स्त्री ने समझ लिया कि यह मर हो गया, तब कहने लगी जो होना था वह तो हो ही गया अब यह सजीव तो हो ही नहीं सकते, इस लिए पते कुछ नाले, क्योंकि दिन अस्त होगया, क्षुधा भी लगी है, 'सई सांझ मुर्दे को कहाँना रोवें।' मृस में रोया भी नो नहीं जायगा।" बाल किवाड़ बद किये प्रासन विहाय, लोटे में पानी ले, जो जो अच्छे अच्छे पदार्थ बनाए थे ग्वाने प्रारम्भ किए । इधर यह मियाँ मिळू भी जीभ से पानी डाल रहथे, और सोचते जाते थे, कि हमे भो थोड़ा सा मान मिल जाता, क्या करें पराधीन है। स्त्री सती जाती थी और कहती थी अहा! लङ्क तो बड़े ही स्वादिष्ट बने हैं, फिन्नी का भी क्या कहना है और तरकारी के विषय मे तो कुछ कहना ही नहीं है । चित्त में प्राता है कि सय को खालूँ परन्तु नहीं एकादशे तक काम प्रावेग ! सब कुछ ना पी कर किवाड़ सोल दिए और चीख कर दानों हाथ बड़ाम से उस फो छाती पर मार कर कहने लगी-"साई स्वर्ग सिधारियाँ पुछ मैनू भी मक्खो" तब तो यह गुल गपाड़ासुन परमहल्ले के पुरुष इकट्ठे हो गये कहने लगे--"क्या हुचा फ्या ।" इधर सद पड़े पड़े सोच रहे थे, एक दुहत्तड़ तो छाती में मारही दिया दूसरा मार देगी तो काम तमाम हो जायगा, क्योकि पहले तो मै सहार गया । उधर स्त्री पुरुष इन इशरत के लिए प्रांतू पा रहे * दृष्टान्त-सागर * 1 - ३ । . थे और शहते थे मिड़ा चुरा हुवा, बड़ा भजामानस था जा इन की अर्थी यना 'राम राम सत्त' की आवाज लगने लगी इस स्त्री ने फिर वही "साई धर्म सिधारियाँ कुछ मैंन मी भएखो कहा। तब इन महात्मा न सोचा ऐसायसर कहाँ मिलेगा, जह बहुत से स्त्री पुरुप इन्हे हो । कम से कम स का चरित्र तो शात हो जायगा। तब श्राप उत्तर में चाले-"ती सदा सड़ खाइयाँ और लड्डू भी चलो।" लीजिए महोदय प्राज कत की स्त्रियों के यह ढग है। दुष्टा भार्या शठ मिनं भृत्यश्चोत्तरदायफ। मम च गृहे वासो 'मृत्युरव न संशयः ।। दुष्ट स्त्री, धर्त मित्र, उत्तर देने वाला नौकर, साँप बाले घर में रहना ये अवश्य ही मृत्यु की निशानी हैं। तिरिया चरित्र जाने ना कोय, पति को मार के सत्तो होये । । . - M -- . . , 7 राव वे १७-साता का दूध शृंदी का इतिहास बतलाना है कि यव सूरजमल हाड़ और रानारतनसिह शिकार खेखते हुए पैर मार से परस्पर ला कर एक दूसरे के हाथ से दोनों मारे गये। जब दूंदी मे मारे जाने का ममा नगर श्राया तो उनकी साध्वी स्त्री सती होने की पाना चाहने की इच्छा से अपनी सास के पास गई ।ता सास ने कहा कि-"सना मेरे पुत्र को मार डाले और मेरा पुः राना दोन मारे।यह यात नितान्त असम्भव है, क्योकि उस अपना दूध पिलाया था, सम्भन कि वह मेरा कायर व धुजदिन बने । परन्तु हॉ, एक दिन जब वह पालक ३ मैने दूध पीकरें . -- 11 *द्वितीय-भाग * २६ था मै शान कर रही थी और वह सो रहा था सोते सोते रोने जगा, तर एक दामी ने अपना स्तन उसके मुह में दकर चुप कर दिया था । मैने जघ यह देखा तुरन्त उमे उलटी फराकर 'दासी का दुध उसके पेट में से निपाल ता दिया था, परन्तु फिर मी सम्भव है कि दासी के दूध का प्रश पेट मे शेष रहा हो और उसी के प्रभाव में मेग पुत्र कायर बन गया हो, तो प्राश्चर्य नहीं। तुम अभी -कुछ समय ठहरो दुसरा समाचार प्रा जाने दो।" कुछ समय पश्चात् दूत ने पाकर समाचार दिया कि राय जी राना को मार स्वर्ग सिधारे है । यह सुन कर सामने अपनी पुत्रवधू को प्रसन्नता पूर्वक कहा कि अब तुम सती हो सकती हो, मेरे पुत्र ने मेरा दुध लजाया नहीं।" क्षत्राणी सदा धरती है गर्भ में बालक, पैदा कर संसार में नर-धर्म पालक । दीनों का बने त्राण, दो दुष्टों का भी घालक, अन्याय निवारक हो, शुभ न्याय चालक । ऐसा न हो क्षत्रिय तो कीट ही जानो, जनने में वृथा कष्ट सहा मातु ने मानो। . । T 1 १५--पूँठा प्रेम • एक युवक साधुओं की विशेष सेवा शुचपा फिया करता था, एक बार एक साधुने युवक से फरा-"नेटा' तुम होनहार हो यह संसार जो दु स्त्र के पजे में फंस रहा है, इसकोछुड़ाने का प्रयत क्रो और इसके उपकार में लग जायो।" युवक "महाराज! मैं अपने पिता माता के इकलौता पुत्र है, वे मुमविना ने कहा- १ -

*हटान्त-सागर
-
देखे स नाचित रह सकते है , अभी दो वर्ष विवाह को धोते.
है. पर छोटा सा बच्चा है, नी मेरी बड़ी मेवा दहत करनी है,
और करती है, शामिन् ! तुम ही मेरे प्राणाधार हो, तुम्हारे,
पिना मदला की तरह तड़कता रहती । तुम्हारे जीवन
से मेगजीन है । जो कुछ को तुम ही हो ।फिर भला महाराज,
पे० माता-पिता, स्खा यर्थ को छोड़ना कितना पान है, और
फिर ऐसी दशा में भला से मैं मनार का उपकार का
सकता है।"
साधु ने कहा-बेटा ! पाप उसके लिये है जो घर मे ससार
में घनाचार और मकारी निवाने की निमलता है। फिर भी
युवक की समझ में न आया।
गाधु ने युवक को पहले प्राणायाम सिवाया, और कहा कि
हन तुम्हें उनक प्रेम का परिणाम दिशायेंगे, फिर देखो कि
उनका तुम पर कितना प्रेम है।
4 दिन माधु ने उससे कहा-"मिश्राज तुम क्रिमी रोगमा
बहाना कर देना और कल को प्राण चढ़ा कर पड़ जाना।" युवक
ने ऐसा ही दिया गोर मृतग्त् लेट रहा । घर के लोग रोो पीटने
लगे, हाकार मच गया, गडोम के लोग भी सहानुभूति
प्रकट करने के लिए पाए । और कहने लगे देसो फैमा अच्छा
लड़ाया, अपने माता-पिता के अकेला ही था, अब इसके
माता पिता से जीवित रहेंगे । और यह सुदरी स्त्री कैसे
रहेगी नो एक घड़ी भी हग विना व्याकुल हो जाती थी।
जर साधु ने यह समाचार सुना तो साधु भी युवक के घर की
ओर चल दिए, घर आकर साधु ने देख भाज कर कहा-"कि
तुम्हारे लड़के को हम जीवित कर देंगे । पहले एक गिलास में
'ध जाओ।" साधु ने सबके सामने पक चुटकी राख दूध मे डाली
,
T

-
* द्वितीय-भाग*
और कुछ पढ़ने लगा। फिर साधु ने कहा--"अच्छा जो इसको
गिवेगा वह तो मर जायगा, परन्तु यह जीवित होजागया।" इसको
मश माता-पिता, स्त्री प्रादि से कहा, परन्तु दूध पीने को कोई
प्यार न हुमा। मित्र मण्डल तो पहले खिसक गया, जब यह
स्शा देवी ता साधु ने कहा कि मैं पीलू तब तो सब प्रसन्न हो
गले हाँ, महाराज साधुओं का जीवन ता पर उपकार के लिए
हो होना है । तब साधु न उनम्बर से का-"सम्बन्धियों की झूठी
गम खजा फॅने हुए युवक ! ध्यान से देख कि वे तुझ को
कितना प्रेम करते हैं, जिनके लिए ससार से पृथक् हुआ वैठा है।
33 इस झूठे सम्बन्ध का परित्याग कर और ससार का उपकार
कर।" युवक उठ येठा और यह संसार की भलाई में गया
पाटक । शास्त्र कहते है कि मि के लिए झूठे माता-पिता को
छोड़ दी और ईश्वर भक्ति करते हुए ससार सवा मे तत्पर हो
जावा।
धनानि भूमौ परापश्च गोष्ट नारीगृह द्वारजना श्मशाने ।
देश्चिता, पग्लोक मार्गे धनुगो गच्छति जीव एकः॥
।
१६-निर्मोही राजा
एक बार एक निर्मोही राजा' पुष धृमना हुआ पक
महात्मा की पुटिया पर जगल में गया, जहां पर इसने महात्मा
से कहा-"महाराज जल पिता नीजिए।" महात्मा ने कहा--"तुम
कौन हो" लड़के ने उत्तर दिया कि-"में निर्मोही राजा का
लड़का हूँ।"
महामा-क्या तुम निर्मोहो गवा के लड़के हो।
.
-

* दृष्टान्त-सागर 15 . - -- 'लडा-जी हाँ। महात्मा-यह बात तो असम्भव है कि राजा भी हो और वह मोहन रखता हो। लड़का-महाराज श्राप सत्य मानिए, मै मठ नहीं कहता श्राप जाकर परीक्षा कर लें गजा निर्मोही ही है। महात्मा-अच्छा तुम जाल पिना, अपने देश आदि का पता बतादो, मै परीक्षा ले जाता है, तुम जाकर कहना नहीं। लड़का नहीं महाराज, जय तक श्राप लौट कर वापस न प्राप, मै श्रापकी कुटिया से नहीं जाऊँगा, फिर भला पतला- चेगा कौन महात्मा-निर्मोही राजा देश में पहुँचा, पूहता पूछता राजा के महल में गया । वह क्या देखता है कि वहां किसी को ' किसी से मोह नहीं है, सब अपना अपना कर्तव्य पालन कर रहे हैं। कोई किसी को रोकता नहीं, कोई किसी से लड़ता नहीं जिसका जिधर चित्त चाहता है उधर वे रोक टोक धूम माता है। इतने में खास ज्योढ़ी पर महात्मा पहुँचे, ग्रोर देना कि अन्दर से एक दासी निकली आ रही है, महात्मा ने कहा- तू सुन चेरी युवाज की, बात कहूँ मै तोय। “युक्गज सायो माराज ने, पडा है आश्रम मोय ।। महात्मा ने कहा-ऐ दाली! मेरी बात सुन, तेरा जो राजा का लड़का था उस सिंह ने खा लिया है और मेरी कुटिया पर पड़ा है। दासीने उत्तर दिया- न मैं चेरी युवराज की, न कोई मेरो युवराज ! मारब्ध के वश पड़ी, करत फिरत हूँ'वाज ॥ 1 । t

३
३
.
*द्वितीय-भाग *
संस्कृत में कहा है।
बनानि वन काहानि नद्याः वदन्ति मगमे ।
संयोगेन वियोगेन का कस्य परिदेवना ।।
अर्थ -न तो मैं युजगज की चेरी है और न मेग फोई
युवराज है । प्रारब्ध की शृखला मे जकड़ी दुई काम कर रही हैं,
जिस प्रकार दरिया में लड़ियां बन से यह कर परस्पर
मिलती है, पृथक हो जाती है, इसी प्रकार ससार मे हमारा
मिजाप है । अनहदगी है। फिर अलहदगी मे दुख सा।
महात्मा- (मन ही मन) क्योंकि यह दासी है, इसलिए
इसे गजपुत्र के मरे फा रज नहीं है । चलो, गना के लड़क की
खी से कहें, उसे तो रज होगा। जिसको मारी आयु उसके
सहारे से पेट भरना है। इस लिए उसकी स्त्री से जाफर
कहने लगे
तू सुन सुन्दरी चातुरी, मम आश्रम पर जान ।
हनन कियो मृगराज ने, तेरो श्री भगवान् ।।
युवराज की स्त्री काता है-
नदी पार ज्यो नाब है, विछुड जात मघ लोग ।
कौन नार भरतार कोन, विधि ने किया संयोग ।
'महात्मन् ! जैसे नदी पार जाने के लिए नाव में मनुष्य इकडे
हो जाते हैं और पार जाकर सब पृथक पृथक माग पर चलने
लगते है ऐसे ही मेरा और पति का सम्बन्ध था। मरने के
पश्चात् कौन किस की स्त्री और कोन सि का पति होता है।
चिन्ता फिस बात की, प्रारब्ध से सम्बन्ध हुआ अब प्रारब्ध ने
हो पृथक कर दिया, जो ईश्चर को स्वीकार था।
-
--

* दृष्टान्त-सागर * 1. - १ । 4 - महात्मा-फिर मन हा मन) हा !खी भी ऐसी ही निकली; जिस को अपने पति की मृत्यु का भी रंज नहीं ।'सम्भव है, कुछ दान में काला हा. चला उनकी माता से कहें यह तो नौ मास पेट में रम चुकी है, उफो अवश्य रज होगा, यह सोच कर महल में जाकर कहने लगे- तू सुन रानी गर की, बात कहूँ दृढ़ होय । पुत्र संहारो सिंह ने, पाश्रम पड़ो है मोय ॥ हे गानी ! मेरी बात सुन, तेरे पुत्र का सिंह ने मार ढाला और मेरी कुटिया पर पड़ा है। रानी-तरुवर पर पक्षी घने, रात बितावन आय । भौर फटी उड जात हैं, कोऊ किसी को नायें ।। है भूपि जी महाराज! वृक्ष पर सहनों पक्षी रात को विथाम लेने भाते हैं और प्रात काल होते ही उड़ जाते है। छापने अपने माग पर हो तोते है, कोई किसी को पूंछता भी नहीं। एक कवि ने भी तिसाद मानायाचिते ग्या मर्भ देवेन संगमः कृतः। मायान्ति पुनन्ति, काकस्य परिदेवना ।। अकस्मात् ही मेरे गर्भ मे प्रारम्प ने उसका मेल कर दिया ऐसे ही कोई आते हैं और काई जाते हैं, फिर किसका रंज, शोकमारब्ध्र में ऐसा ही लिखा था ( जब इसको भी महात्मा ने निर्मोही देखा तो महात्मा मन मे कहते हैं। महात्मा-(मन ही मन) संम्भव है गनी को यह हो कि मेरे और पुत्र हो जायगा । इस लिए रज न किया हो । चलो राजा - . - - 1

* द्वितीय-भाग *
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के पास चलें, उसको अवश्य ही 'रज होगा, जिसका युवा
युवराज चल यसो । राज सिंहासन का स्वामी नेत्रों से प्रोमल
हो गया, वह तो अवश्य ही रोवेगा । अब अन्तिम निर्णय है
इसकी भी परीक्षा लेनी चाहिए।
महात्मा-गजन् पुत्र आपका, खाय गयो मृगराज ।
या कारण चिन्ता बढ़ी, साँच कहूँ महाराज ।।
हे राजा साहब ! अापके होनहार युवराज को जिसके
अभिषेक का आप प्रत्य कर रहे थे, उसे अाज सिंह ने मार
डाला। मुझे कहने हुए भय लगता है, इस जिर भय स्वाता
राता कह रहा हूँ कि अव राज फोन करेगा?
राजा-पि तप क्यो छोडिया, फाहे बढाया शोग ।
रैन बसेरा जगत है, मी मुसाफिर लोग ।
है ऋपि जो ! प्राप तप छोड़ कर क्यों भागे, और क्यो रज
कर रह है। क्या प्राप कामालूम नहीं है कि यह जगत मुसाफिर
। खाना है , गत्री व्यतीत करने का स्थान है । इमी लिए एकत्रित
हुए है, कि गत्री व्यतीत कर सभी अपना अपना मार्ग लेंगे।
क्या मुमाफिर खाने से जाते समय किमी को रज होता है ?
फिर रज किस बात का ?
मातुलो यस्य गोविन्दः पिता यस्य धनुर्धरः ।
प्रभिमन्युः हताः माणा का कस्य परिदेवना ।।
जिसफी मामा रुपा था, और पिता अर्जुन था। ऐसे चोर
का पुत्र अभिमन्यु भी जब प्राणों को न बचा सका अर्थात्
मरगया, तो फौन किसके लिए किसमा रजकरे।
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।

*दृष्टान्त-सागर * - । यह चला चली का संसार है, इसका रज न करना चाहिए जामो ऋषि जी रंज को छोड़ो और कुटिया पर जाकर पर- मात्मा का भजन करो। ऐमी बातों का विचार ही न किया करो। जिसकावर बाहेगा वनी गदी का स्वामी होगा । हम तो परमात्मा की आज्ञा पालन करते श्राप है, सो जब तक प्राण है आशा का पालन करते रहेंगे । इस बात को सुन कर महात्मा दग रह गया । और लजित होकर युवराज की बात सच मान कर राजा से कहने लगा-“हे राजन् ! मैने जो कुछ प्राप से कहा है मूठ कहा है, केवल परीक्षाथ कहा था, क्योंकि व्यापक पुत्र ने मुझ से कहा था कि मैं निर्मोही राजा का पुत्र हूँ। जिसको सुन कर मुझे विश्वान न हुआ था, इस बात के निश्चय करने के लिए इतना कहना पड़ा। क्षमा करना।" राजा ने अपि को मचा जान कर कुछ न कहा मृपि प्रसन्नता से अपनी कुटिया को चला गया और राजपुत्र को सब समाचार सुनाया। राजपुत्र प्रसन्न हुश्रा, ओर प्रणाम करके चल दिया-- शिक्षा-इसका यह फल निकलता है कि हम भी राजा की तरह ईशार की प्राशा का पालन करना अपना कर्तव्य समझ , और किसी को अपना पराया न विचारे, सर्वदा धर्मानुसार कार्य करते रहें। .. , . २०-नगद धर्म एक मेट ने अपना धन जमीन में गाड़ रखा था, फिसी फो पता तक न था। एक बार इसके जड़के को रुपये का पता जग गया । उसन पृथिवी को खोद कर रुपया निकाल लिया और रुपयों के बराबर ही तौल कर पत्थर रुपयो की जगह गाड़ दिए । कुछ दिन पश्चात् जय उस सेठ ने पृथिवी को खांदा पर *द्वितीय-भाग * - . धन न पाया तव धाइ मार मार कर रोने लगा और कहने लगा- "मेरा धन कहाँ गया है, उसके विना तो में प्रागा खोदूंगा।" लड़के ने कहा-"पिताजी रोने क्यों हो, प्रापको उसे किसी काम में तो जगाना ही न था, यह गवने मात्र को था। देख लो उतने ही तौल पत्थर वहाँ गड़े हैं।" घराये निहादन चे संगो चेजा। जय रखना ही हुआ तो क्या पत्थर और क्या रुपये। धर्म ‘रखने के लिए नहीं है, किन्तु सेवन करने के लिए है। २ . । । २१-लिखित मुनि की सचाई शम्न और लिखित नाम के दा भाई थे। चे नदी के तट पर किसी यन में पृथक पृथक अपने प्राश्रम में रते थे। एक घार "लिखित मुनि, अपन बड़े भाई शत्र के प्राश्रम मे गया और यहाँ आकर भाई की आज्ञा यिना फल तोड़ कर या लिए । जय भाई को यह बात मालूम हुई तो उसने कहा-"कि तुमने मेरी प्राशा विना फज तोड़ कर खा लिए, तुमने चोरी की, इसलिए तुम राज दराड के भागी हो, जानो, राजा के पास जाओ और दण्ड की प्रार्थना करो।"भाई की बात सुन लिसित मुनि राजा सुदुम्न की सभा में गये और राजा से अपना अपगध सुना दण्ड की याचना की। राजा ने सत्य समझ कर मुनि को क्षमा प्रदान की, परन्तु लिखित मुनि ने न माना और दोनों हाथ कटवा लिए फिर अपने बड़े भाई शस्त्र के स्थान पर पाए और उनसे क्षमा माँगी। । भाई के क्षमा प्रदान कर देने पर अपने प्राश्रम में तप करने लगे। यदि भूल कर अनुचित किसी ने काम करडाला कभी। तो वह स्वयं नृप के निरंट दण्डार्थ जाता था तभी ।। . - .

*हटान्त-सागर *
अब भी लिखित मुनि काचरित वह लिखित है इतिहास में।
अनुपम सुजनता सिद्ध है जिमके अमल - श्राभास में ॥
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२२--देवजान्स का त्याग
एक घार यादशाह सिन्दिर अपने बहुत से साधियो सहित,
देवजान्स से जगल मे मिलने को गया, वहाँ जाकर देखा कि
देवजान्स टूटी सी झोपड़ी में टूटी खाट पर सूर्य की ओर मुख ।
किये लेटा हुआ है।
सिकन्दर ने सम्मुख खड़े होकर अपना परिचय दिया, और
हाथ जोड़ कर कहने लगा-"कि महागन ! श्राप की जो इच्छा
होसो मॉगिए मै आपकी सेवा मे लव कुछ उपस्थित कर सकता
हूँ।" तप देवजानम ने कहा कि-"गजन् ! मुझे किसी वस्तु
की इच्छा नहीं है। बादशाह ने बार बार मांगने की हठ, की।
देवजान्स ने कहा-"यदि राजन् ! तुम्हारी इच्छा देने की ही है तो
मेरी धूप छोड़ फर एक और हो जाये इसक सिवा में और कुछ
नहीं चाहता।" यह सुन कर बादशाह और उसके साथी बड़े
विस्मित हो धन्य धन्य कहने लगे। ठीक है।
निरीक्षाणा मिशि सूणमिव तिरस्कार विषयः।
त्याग के लिये सस्कृत साहित्य मे पत्रे के पत्रे भरे पड़े हैं।
पेमे ही महाराज चाणक्य का त्याग प्रसिद्ध है, चन्द्रगुप्त
जैसे प्रतापी राजा का महा मन्त्री, चंड़ा बुद्धिमान, शास्त्रों
में पारगत था परन्तु एक कवि ने उन के निवास स्थान का
वर्णन करते हुए लिखा है।
।।
P

। . - । * द्वितीय-भाग * उपल शालमेनद् भेदकं गोमयानां ।। षटुभिरुपहतानां वहिषा स्तोम एपः ॥ शरणमपि समिद्भि शुष्यमाणा भिराभिः । विनमित पटलान्तं दृश्यते जीर्णकुड्यम् ।। यह सूखे हुए उपले फाडने का पत्थर है और एक और यह शिष्यों ने समिधाओं का ढेर जाकर लगा दिया है और इनका वापर भी इन शुष्क समिधाओं मे ढका हुप्रा टूटा सा दृष्टिगत झोता है। १ - ~ - २३--राम का भाव मर्यादा पुरुपौत्तर भगवान् गम ने जिस समय लका पर चढ़ाई की, नय विभीषण उन से मिलने के लिए प्राया। राम ने जय विभीषण का प्रात देसा तो खड़े होगये और लकेश कहकर यादर पूर्वक प्रामन पर बैठाया | समय पाकर सुग्रीय ने गम से कहा.कि- "जिसको भाप ने लश्श कक्षा है नए लकश तो नहीं है यदि कता को नया अाप की सीता को वापस कर पाप में मषी करले अथवा क्षमा मांगे तो आप दोनों में मे एक काय तो अवश्य करेंगे फिर आप फा विभीषण को लकश कहना मे सत्य हो सकता है।" - - । । राम ने सुग्रीव में गयण में जया फा गय । विभीषण को दिखा देगा और रावण को प्रयाया की राजगदी छोड़ दूंगा।" प्रतिभा पालन और वचन इदाता सी का माम है।

* दृष्टान्त-मागर *
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२४-देश भक्ति
एक जापानी युवक की माता वृद्धा थी इसी कारण वह जंग
में नहीं जा सकता ! जब उम वृद्धा को यह मालूम हुमा
कि
मेरा पुत्र मेरे ही कारण देश हित के लिए जग में नहीं जा
सकता । तो उस वृद्धा ने रात्री को अपने प्यारे देश के हित के
विचार से स्वय ही प्राय सो दिए । जय जड़क का मालुम हुया
कि मेरी माता देश के हित के लिए मर गई तय लड़का भी सहर्ष
देशरक्षा के लिए जगम चला गया।
प्रभागे भारत ! तुझ में कय ऐसे सपूत जन्म लेंगे ?
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२५-विपत में मित्र भी त्याग देते हैं
भारत के एक सुप्रसिद्ध अल कार वेत्ता महा कवि का कथन:,
है कि मैने एक सघन घन में एक सुन्दर वृक्ष को देखा।
कहते हैं कि वृक्ष के मूल (जड़ ) में अनेक प्राणी विराजमान थे
इस फी अत्युत्तम पत्तवशालिनी शाखाओं पर फोकिलाएं
मधुर स्वरसे सुन्दर गति अलापरही हैं । किसी २ शाला पर शुक
और सारिका विगजित है। और वृक्ष के मृदुत सुन्दर पुष्पों
पर भौंरे गूंज रहे हैं इसक नीचे बैठे हुए मयूर भी अपने केकारव
के साथ २ नृत्य कर मुग्ध कर रहे है।
एक प्रकार का अग्नि जो वन में वाँसों को रगड़ आदि मे
उत्पन्न होकर किसी२ समय पचास २ कोस तक वन कक्ष को
जला देता है उसे सस्कृत में दावाग्नि कहते हैं।
अकस्मात् एक घार यन में दावाग्नि लगा और बन के छोटे।
पड़े वृक्षों को फूंकता हुप्रास पुष्फल परिवारवाले वृक्ष के समीप
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* द्वितीय-भाग * । आया नव उन भयानक एश्य को देख फर कविराज महोदय के मुख से यह पध निकला जिसको यथा प्राप्त नीचे उद्धृत करते हैं । रोलम्न विम्विनं विघटित धूमाकृतैः काफिलैः । मायूचलितं पुव रममात्कारैरधीरैर्गतम् ॥ एकेनापि सुपल्लवेन तरूणां दावानलोपप्लवः । मोट: कोन वित्त मुश्चनिजनः मूनापि यो लालितः ।। भावार्थ-भारे निमेरमान भी न उहरे, धुएँ मे याकुत ।हुई २ कोकिलाएँ भी न उइ सी मोरों ने तो पहले हो मे अग्नि की भयानक माला को देन प्रस्थान कर दिया था। नाने भो झा पर उदारी मार चलते ही नो बने, सु-दर २ पल्जयों से । परजवित उस वृक्ष ने इकेले ही वन की अग्नि का इमता सदा । इसको चरिताध करते हुए कविगज कहते है कि चिपकान में कौन नहीं त्याग देता, अधिक क्या करें जिसको बड़े लाड़ प्यार पाला पाया है वह मी तो वित्ति म त्याग देता है। " २६-पारस पत्थर हिमालय पर्वत की गुफा मे एक, मयासी महात्मा योग सिद्धि के लिए योग के माधनों का अनुष्ठान किया करते थे। योग सिद्धि के साधनो की ममाप्त करक जर यह भ्रमणार्थ प्रयाग की और बल दिए ता मार्ग में चलते चलते उन्हें पक पारस पयर हाथ लगा । पहाड़ी लोगो में पूने पर महात्मा जी को यह शान हो गया कि यह वही पारस पत्थर है जिसके सयोग से लादा सोना हो जाता है ' महात्मा ने यह सोच कर कि किसी दरिद्रो भक्त को दे देंगे पद पथर अपनी माली में - - - - - ४२ । * दृष्टान्त-सागर * रस लिया। दिमालय पहाड़ से उतर कर वह नीचे एक नगर में पाये। उस दिन यह महात्मा अधिक भूपे थे पर इनका यह प्रय धा कि आवश्यक्ता को स्वय निज मुख में नहीं करते थे । उस दिन यह सारे नगर में घूमे परन्तु सिग्मी ने भी धन की आकृति को देख कर भोजनार्थ न पहा ! पति उस नगर में गाने में स्वर्ण के द्वार, माला, कन्टे, कमर मे नगड़ी और हाथो में फंफण पहने बहुत से मोटे ताजे धनि हो देना परन्तु इन योगीराज अतिथी का सत्कार एक भी धनी ने न किया । अन्त. तोगत्वा महात्मा अपने प्रण को पूरा कर इस विशाल नगरद्वार निकल कर याहर जंगल की ओर चल दिए चलते चलते द्वार से मिली हुई पक भड़भूजे को दूकान दिसा दो भड़भूजे ने इन महात्मा की प्राकृत को देख कर नमस्ते का हृदय में स्नागात किया और कुशल मन के पश्च त् भोजन के लिए प्राग्रहपूर्वक निवेदन करते हुए कहा "कि महाराज! आज मेरे ग्रह को ही अपने चरण रज से पवित्र कीजिये।" महात्मा ने भी इग्भिक्त जान कर इसके यहाँ भोजन करन स्वीकार कर लिया। भोजन के अनन्तर महात्मा जी ने सोच अहो ! इस विशाल नगर मे सहनो धनिक रहते है परन्तु धार्मिर यही एक पुरुप है। यदि यह विशेष ऐश्वर्य सम्पान होजाय त इस से भी विशेष ईश्वर मक्त, धर्मोपदेशक अतिथियो की सेवा किया करेगा। महात्मा जी ने फिर भी सोचा कि यह ऐसी दरिद्रावस्था में भी इतना धर्म परायण है सो निस्सन्देह यह पुरप ऐश्चर्य-सम्प हो कर धर्म कर्म में इस से भी विशेष तत्पर रहेगा । इस लिए यह पारस पत्थर जो हमारे पास है कुछ दिनों के लिए इसे ही - - म * द्वितीय-भाग * दे दें, घूम कर जब मैं वापस आऊँगा तब इस से लेकर वहीं एख दूंगा। महात्मा भड़भूजे में कहने लगे कि-"जब तक मैं देशाटन से मल, तय तक तुम जितना चाहो उतना, सोना इस पत्थर से लोहा छुओ कर एनालो । विसी को देना मत । मै पाते ही तुर- त तुम मे यह पत्थर ले लुगा।" इतना कह कर वह प थर हरि भक्त भड़भूजे के हवाले कर आप देशाटन को चल दिए और कह गये कि मैं अठारह मास में वापस पाऊँगा । महात्मा जी को विदा पर यह भडभूजाभी बजार में एक लोहा बेचने पाने की दुकान पर गया और प्रथा,-"कहा भाई लोहे का क्या भाव है " उत्तर मिला-"दन सेर।" भड़भूना बोला-"परसों तो वारा सेर भाव था, घगज दस सेर रह गया।" भड़भूजे ने सोचा कि जब मस्ता होगा तरी सरोद लूँगा पेमे हो दो मास विता दिए । फिर लोहे की दुकान पर गया पौर पोला-"लाला लोहे का पया मात्र है?" उत्तर मिला-"पाठ सेर ।" यह भड़भूजा पाठ मेर की चा देख घर फोघापस चक्षा माया और बोला-"जब सस्ता होगा ना ही लेंगे।" ऐगे ही यार पांच मामात गये। एक दिन फिर दूकान पर गया, और जोहे का भाव पूछ। । उत्तर मिला छ मेर । ता तो गह महमूना पहुत बाराया, परन्तु फिर भी अपने विनार पर हद एका परिणाम यह हुआ कि ऐसे ही करते करते अठारह मास दीत गये, महात्मा भी पा गये और अपना पारस पत्थर मांगा ना तो भड़भूजे ने रो रो कर बड़ी कठिनता से यह पत्थर महात्मा जी को दिया। दान्ति-वह पारस पत्थर जो मनुष्य देव है, सच्चि- AN

* दृष्टान्त-सागर *
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+
दानन्द परमात्मा ने इस जीवात्मा रूपो भड़भूजे को यह मनुष्य
शरीर रूपी पत्थर दिया और कहा, कि इस मनुष्य शरीर रूपा
पारस पत्थर के संयोग से जितना चाहे उतना धर्मसग्रह रूपी
स्वण बनाले । परन्तु खबरदार शतायुयै पुरुप | शत जीवेम:
शरद.। सौ वर्ष के पश्चात् यह देह रूपी पारस लेलँगा । अज्ञानी
मनुष्य, भै भाज धर्म करता हूँ, कल करता है। इसी प्रकार
अपने जीवन को विता, अन्त समय पछताते हुये प्रागा त्याग
फरते हैं। इस लिए जितना ही शीघ्र ही इस शरीर से सुयश
(धर्म) कमाना चाहिए।
महार निद्रा भय मैथुनश्च, सामान्य मापशुभिर्नराणाम् ।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो धर्मेण हीना पशुभिम्समानाः ।।
नामुन हि महायार्थ पिता-माता न तितः।-
न पुत्र दाग न ज्ञातिधणे गच्छति केवलः ।।
२७-धर्म का अादि स्रोत वेद है
एक किसान अपने खेत में नहर की छोटी नाली से पानी दे
रहा था। किसान से किसी मरुस्थत निवामी ने पूछा कि-"हे
भूमिपते । प्राज फज धर्षा भानु तो है नहीं, फिर तेरे खेत में
यह जल कहाँ से आता है ?" किमान ने उत्तर दिया-"भाई
मेरे रोल में जो पानी भर रहा है वह नहर छोटे धम्बे से
घाता है ।" मरुस्थत निवानी ने फिर पूछा कि-"भाई उस
बोट थम्ने में जल कहाँ मे पाया " किसान ने उत्तर दिया-
'उपमें पड़े यम्ये म पाया है।"
उसने फिर पूछा-"बड़े बारे में कहाँ से आया तो उत्तर

4 * द्वितीय-भाग * ४५ दिया कि-"उस में नहर मे श्राता है जो कि मायापुर कनम्बल से निकल कर कानपुर तक लम्बी ले पाई गई है।" '. मरुस्थत निवासी ने फिर पूछा कि-"भ्राता जी घड़ी नहर में जल कहां से भाया । किसान ने उत्तर दिया -"गगा में मे।" तो फिर गगा में कहाँ मे पाया ? उत्तर मिला कि उम में ज: हिमालय पर्वत से पाया है।" यह सुन कर अनुमन्यान- मिय उस मसम्थल निवामी पुरुष ने कहा-"भ्राता तुमने पहले हो क्यों न कह दिया कि मेरे खेत में जो जल मारहा है वह हिमालय पर्वत से प्रारदा है।" । दार्शल-ममम्त मत मतान्तर रूपो नहरें, नदियां, और नातियाँ है इन मे जा कुछ भी धर्मरूपी जल है वह सब वेद रूपी हिमालग से उत्पन्न हुआ। यदि, तोरेत, यूर, जिदायस्था, कुरान शरीफ, इजोल, प्रादि में जो धार्मिक शिक्षा हो तो भी यह वेद ही की समझनी चाहिये । सम्पूर्ण मत मतान्तर रूपी दीपकों में जो धर्म रूपी प्रकाश है वह चेद रूपी सूर्य का है। पवमानस्य विश्ववित्मते सर्ग असूक्षत । सूर्यस्येव न रश्मयः ।। सामवेद-उत्तरार्चि जिस प्रकार सूर्य की रश्मियां उदय हो कर मनुष्य प्रादि मागियों को प्राँखों में प्रकाश उत्पशा करती है उसी भांति परमामा से वेद प्रकट हो पर संप मनुस्यों को सन्मार्ग में प्रवृत्त करते हैं। न च वेदाहते फिश्चिच्छास ब्रह्मा विधापक्म् . - . - ।

* दृष्टान्त-मागर* 1- मानने वाला महापुरुप है, यस फिर क्या था, जिस प्रकार' चन्द्रमा को देखकर समुद्र उचलता है उसी प्रकार कुमारिलभट्ट के मुग्नरूपी चन्द्र को देखकर समुद्रसपी गजपुभी का हृदय ভৰা भोर तुरन्त नेत्रों मे अश्रुधाग यह निकली । राजपुत्री रोते हुए कहने लगी- कि रोमि क गच्छामि को वेदानुद्धरिष्यति । पया करूँ, को जाऊँ कौन ऐसे समय में वेदों की इवती- हुई नौका को पार लगावेगा। इन शब्दो को सुनकर महागज कुमारिलम का गला भर प्राया और कहा- मा विमपि वरारोहे भट्टाचार्योऽस्मि भूतले ।. हे राजपुत्री! तू तनिक भी मत घबरा, मुझ कुमारिल ला वैदिक धर्मी अभी पृथ्वी पर है। भट्टाचार्य जी ने अपने कथनानुसार वैदिक धर्म का प्रचार कर शहर स्वामी के लिए भी माग साफ कर दिया था। . . । -- - . २६-अनुचित प्रेम का परिणाम यह तो श्राप पर विदित ही है, कि सूर्य को देख कर कमल खिलता है। प्रात कात हुआ, मन्द मन्द शीतल सुगन्ध पधन जगत को शालि देने तमा, पुष्प प्राहादिन हो शाग्यानो में पुष्पित होन लगे। भगवान् सूर्य अपनी सहनश स्वर्णमयी किरणों को लेकर पूर्व दिशा से उदय हुआ। ब्रमर भी धूं

*द्वितीय-भाग
करता हुधा सुगन्ध अनुभव करने के लिए कमल पुष्प पर जा
बैठा, गन्न अनुभव करते करते सायकाल होगया, सूर्य अस्त
हुधा, और भ्रमर देव कमल पुष्प में यन्द होगए । यदि वह
चाहता तो कोमल कमल को भेदन कर बाहर निकल जाता,
पर इन्द्रियारामी भ्रमर प्रेम वश में ऐसे फंसे कि बाहर न निकरत
सके, क्योंकि-
पन्धनानि खलु सन्ति बहूनि प्रेम रज्जु कृत बन्धन मन्यत् ।
- दासभेद निपुणोऽपि पडघि पकजे भवति कोश निपद्धः ।।
यों तो ममार में बन्धन अनेक हैं, परन्तु प्रेम धन्धन
मयसे हो, निराला है। पड़े बड़े शाल के लट्ठों को भेदन
करने की सामर्थ्य रखता हुअा भ्रमर कोमल कमल में बँध
जाता।
इधर रात्री हुई, उधर भ्रमर राज कमल पुष्प में बन्द हुए २
लोचने लगे, रात बीत जायगो. प्रात काल होगा, सूर्य उदय
होगा और यह कमल खिल जायगा, कमल कोश में पड़े हुए
, यह साच ही रहा था कि वन्य हस्ती ने कमल को उग्नाड़ पार
अपने मुस में रख लिया-
गत्रिर्गमिप्यति भविष्यति सुप्रभातं, भास्वानुदेप्यति
इसिष्यति पकजालम् । इत्थ विचिन्तयति कोशगते दिरेफे,
हा इन्त हन्त नलिनी गज उज्जहार ॥
इसी प्रकार पड़े पड़े तपस्वी इन्द्रियों के पश हो अनुचित
मेम का परिणाम भोगते है, और इन विष्टा समान विषयों में
फंसफर अपने अमूल्य मनुष्य जीवन को नष्ट कर देते हैं।

५० * दृष्टान्त-सागर * ३०-विषयों की असलियत - + + एक राजा के गृह में एक ही पुत्र था, जिसे राजा प्राणों से भी अधिक प्यारा समझता था। जब व बड़ा होगया तथ एक धार उस रात पुत्र ने अपने मन्त्रो की कन्या का देसा और उस कन्या पर आशक्त होगया । व्याबिका बहाना करमहल में जा पड़ा' माता-पिता पूछने लगे - वेटा, कहो तो सही क्या हुआ। जो दुःव तुम्हे हाउसका प्रतिकार करें ।" विशेष पूछने पर राज- पुत्र ने कहा कि मेरा विवाह या तो मन्त्री स्मृता के साथ कर दीजिए अन्यथा मेग मर स्वीकार कीहिए । राजा ने कहा- "यह कौनसी बड़ी बात है, जो कुछ तुम कहोगे वह ही कर दिया जायगा।" राजा ने अपने मन्त्री को बुलाकर अपने पुत्र की बात कह सुनाई । मन्त्री ने उत्तर दिया--" अच्छा महागल, प्रापकी पाशा शिरोधार्य है पन्तु इस विषय में मै अपनी कन्या से और पूछD क्योंकि उसकी इच्छा के विरुद्ध भी कार्य करना ठीक न होगा।" मन्त्री अपने स्थान पर गया और अपनी कन्या से मारा वृत्तान्त कह सुनाया । कन्या ने कहा-"पिता जी ग्राप गजास जाकर कह दे कि मेरा पुत्री श्राप के पुन से विवाद होने से प्रथम पकात स्थान में मिलना चाहती है।" राजा ने मन्त्री द्वारा यह समाचार सुना और अपने पुत्र से कहा कि-"तुम से पहले मन्त्री सुता मिलना चादती है, इलजिए तुम फिगी नियत स्थान पर मिली 1" पिता की धात सुनफर राजपुत्र मन्त्री सुता से नियत स्थान में मिलने गया सह पारित भी । मन्त्री सुता ने उस दिन जुलाय मल-मूत्र से लथेड़ 1 + * द्वितीय-भाग * ले रफरखा था 'और अपना सारा शरीर । रकसी या । सारे कमरे मे दुर्गन्ध ही दुर्गन्ध फली हुई थी। राज पुत्र ने जद कमरे में भागे पढ़कर देना तो मन्त्री सुता को मल-मूत्र में भरा पाया दुर्गन्ध अनुभवकर उलटे पाँच लौट आया मन्त्रीसुता ने कहा कि-"गजपुन पोरे क्यो लौट रहे हैं, आगे भाइये जिस वस्तु को श्राप देखकर पीछे हटे है क्या वह वस्तु मुझ से पृथक है ? यह साग शरीर ही तो मल-मूत्र का पुतना है।' राजपुत्र उसी समय विषयों को घृणित जान पर । और दुख मूलक समझ फर सवदा के लिए अरचि करगया। जिम काल मे चित्त की वृत्तियां, विपयों की ओर दौड़ती हैं उस काल में ऐसा समझना चाहिए- भृन माग्न मातङ्ग पतन शकरी गणान् नेक्षसे । , चित्तवृत्ते कि विनप्टान विषयाशया ॥ न म 2 ३१-ब्रह्मचर्य (ब्रह्मचर्य प्रतिष्ठाया वीर्यलाभः) एक बार महामुनि न्यास देव जी ने अपने एक मात्र प्रिय,पुत्र शुकदेव को अपने श्रापम पर बुला कर कहा-'हे पुत्र ? हमारे पितामह का नाम तो हमारे पिता से भोर हमारे पिता का हम से और हमारा नाम तुम से जगत में स्थिर है । तुम्हारे पश्चात् यश विच्छेद हो जायगा इस लिए तुम विवाह करके ग्रहस्थ सुरस का अनुभन कर अपना नाम जगत में स्थिर करो।" । F 1 1 .

*दृष्टान्त-सागर* - 4 - - 1 महात्मा शुक्रुदेव ने कहा मि-"पिता जी ! मुझे तो प्रह सुन्न अनुभव नहीं करना है, यश विच्छेद हो नी होय, परन्तु शुकदे। उम् यथार्थ मुख मे घश्चित नहीं होना चाहता जिसे यथार्थ सुध को घह अनुभव फर चुका है और जो वर्णमातीत है।" इतना कह कर शुरुदेव वन को चलते बने, उनको नौटाने के लिए महामुनि व्याल भी पीछे २ हो लिए। शिम मार्ग से शुकदेव गये थे उसी मार्ग में नर्मदा नदी। पढ़ती थी , नदी पर एक,राजा की खो-कन्या,मगनियां स्नानार्थ आई थी। शुक्रदेव उनक बीच में से नर्वदा के पार होगये परन्तु नियों ने शुकदेव को देप फर परदा न किया। थोड़ी देर पश्चात् जब व्यास जी नदी के तट पर पहुँचे तय उनको देख कर महिला गण ने परदा कर लिया। प्याव्याम जी शुकदेव का विचार'तो भूल गये और योपित समुदाय के प्रति कहने । लगे-'हे पुत्री बहनो, माताभो ! इसका क्या कारण है कि तुम सब ने मुझ को तो देख कर परदा किया और शुकदेव को देखकर परदा न दिया" यह सुन कर एक स्त्री न कहा--"महाराज, हम यह जानती है कि भाप महर्षि व्यास है और वेदान्त शास्त्र के परम प्राचाय है। महाराज ' आपने शुरुदेव को उत्पन्न किया, श्राप यह जानते है कि स्त्रियाँ फिस कार्य में लाई जाती है, ,परन्तु शुकदेव इस विषय में निरा बच्चा है । इस लिए हमने आपसे परदा किया, और उनसे न किया। प्राहा ! क्या ही हमारे पूर्वजों का उच्चकोटि प्रमचर्य था, क्या ही अनुपम आत्मिक पल होता था, यह सुकदेव के जीवन से स्पष्ट प्रतीत हो गया होगा। 1 । - -- . । 1 - . - - । है 4- *द्वितीय-माम * धर्म्य यशस्य मायुष्य लोकद्वय रमायनम् । "अनुमोदामहे ब्रह्मचर्य मेकान्तं निर्मलम् ।। मायुस्तेजोवलं वीर्य प्रज्ञा श्रीश्च महायशः, पुगयं च मत्मियत्व च वर्द्धते ब्रह्मचर्यया । 17 1 . - ३२--तुलसी वैराग्य 1 11 - - - एक बार महात्मा तुलसीदास जी को अक्षरात्री के समय "खी प्रसग की इच्छा हुई । मन्मथ की मार से विह्वल हुए २ तुलसीदास विषय सुख भोगार्थ अपनी सी क निकट जाने के लिर स्वसुरगृह को चल दिए मार्ग में गगा नदी पड़ती थी, गगा पार कर जय मकान के पास पहुंचे तो क्या देखने है कि सारा नगर सो रहा है। जिस गृह में इन्हें जाना था उन का भी द्वार पद पाया। इधर उधर देखते ही थे कि किस उपाय से गृह के भीतर जॉय । दीवार पर लटकती हुई एक रस्सी दृष्टिगत हुई, यह एसे ही पकड़ कर मकान के ऊपर, अढ़ गये और छत फाड़ अपनी स्त्री को जा जगाया और कहा कि- 'प्यारी तेरे कारया ही इस समयभाया है।" ': स्त्री अपने पुरुप पतिदेव को देख कर शय्या से उठ बैठी और कहा महाराज देखि तो Rधी, रात्री यमी गयी हो रही है, बादलों की गड़गड़ाहट प्रोसिलो की फरपडायट मनुष्य का हदय भयभीत होता है। प्रस्तु, महारास भाप मुझे अपने पार्शनों में विशेष अनुगृहीत पिया अपने शरीर की , %A -

*टान्त-सागर *
किंचित मात्र परवाह न करते हुए मापने दर्शन दिए में विशेष अनु.
गृहीत है। परन्तु श्वामिन् ! आपका जितना प्रेम मुफ से है यदि
यही प्रेम-भक्ति यथाथसुख प्राप्ति सलिए परब्रह्म परमात्मा से
होती तो नि सन्देह श्राप का विशेष उपकार होता।"
कहते है कि महात्मा तुलसीदास जी उसी समय अपनी सी
को गुरु कह कर वन को चले गये।
जितना मेम इराम से, उतना हरि से होय ।
चला जाय चैकुण्ठ को, चाँइ न पकडे कोय ।।
३३-राजा मुञ्ज और भोज
जिम समा राजा भोज का पिता मरणासन्न था, उस समय
उसने अपने कनिष्ट माता मुस को बुला कर कहा-"भाई! जन
माज पढ़ लिख कर चतुर हो जाय तब इस का अभिषेक कर
देना मैं तुम्हे मोज को मौरता ह" इतना कह कर रोजा भोज
के पिता ने पक्षत्व प्रास किया ।
। इनके मरने के पश्चात् मुज गही पर घेठा, भोज को
एक प्रसिद्ध विद्यालय में पढ़ने के लिए भेजा और स्वय गज्य
व्यवस्था देखने भालने लगा। एक दिन मुस अपने मन्त्री सहित
विद्यालय में गया, परीक्षा लेने पर भोजका अन्य सय बिंद्यार्थियों
में सर्वोपरि पाया | राज्य लोम कुछ ऐसी चैसी पत्तु नहीं होती,
इसी राज्य लोभ के कारण सहस्त्रो राजाओं के प्राण गप फितने ही
राजाओं ने, अपने भाइयो को कल कराया, माता पिता को फैद
किया, उन्हें भूखों मारा, इमारी स्वनी में बह शक्ति नहीं जो इस
पाप पुच का वर्णन लिख सके । अस्तु ।
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.
--
.
।

- * द्वितीय-भाग * मुख ने राजे भग्न में प्राते ही भोज को क्रेल किर जाने की प्राज्ञा दी। सारे नगर में हाहाकार मच गया, प्रजा तैया मन्त्रियों ने मुझ को कितनी ही मिन्नतें की और कहा-"महाराज, भोज अमी यच्चा है वह पाप का क्या कर सकता है।" अन्त तो । गत्वा भाज को बध करने के लिए वधिकों क हाथ सौंपा गया भाज ने मध्य स्थान में जाकर निम्न लिखित श्लोक अपने चचा के पास लिन कर भेजा। . १ . -- - मानपाता क महिपतिः कृतयुगेऽलंकार भूतोगतः । सेतुर्येन महोदधो विरचितः क सौदशास्यान्तकः॥ . भन्येचापि युधिष्ठिरः प्रभृतयो ह्यस्तंगताः भूतले । नैकेनापि समंगता सुमती मन्ये त्वया यास्यति ॥ सतयुग में मान्धाता नामी बड़ा प्रतापी गजा जो पृथिवी का भूपण समझा जाता था, वह कहाँ है ? जिम राम ने समुद्र का पुज बाँधा और रावण का वध किया वह अब कहाँ है ? हे राजन और भी बड़े बड़े शूरवीर युधिष्ठिर भीष्म, भीम, हरिश्चन्द्र प्रादि राजा हुए यह मेदिनी किसी के साथ न गई, परन्तु चाचा जो ज्ञात होता है आप के साथ यह अवश्य जायगी । मुअ ने जब यह पत्र पढ़ा तब कुछ ज्ञान हुआ, और भोज को गही दे आप घेराग्य धारण कर वन को वजा गया । राजा भोज अपने समय का-अद्वितीय शासक हो चुका है। । 'बड़ा विद्वान् , साहसी, धीर, वीर, गम्भीर हुश्रा और विद्याप्रेमी मोइनना था कि इसने अपने राज्य में दिवोर्ग करा दिया था। -विमोऽपियो भवेन्मुखः स तिष्ठतु पुराष्टिः । कुम्भ कारोपियो विद्वान स तिष्ठतु पुरे मम ।। । . ॥ ३ *ष्टान्त-मागर * कुम्हार भीयदि विद्वान् हो तो मेरे राज्य में रहे और ब्राह्मण मूर्ख हो तो नगर मे यादर चला गय। इसके शासन काल में मजा में इतना विद्याप्रेम बढ़ा लकड़हारे जुलाहे तक कथि हो चुके हैं। -- । , 1 . . । ३४--अज को वशिष्ठ-उपदेश न मलिन चेतस्युपदेश वीजपरोहोऽवजत एक समय नारद मुनि हाथ मे बीणा लेफर विमान पर चढ़े हुए गाते यजाते दक्षिण सागर के तटपर स्थित गोकरय पासी शंकर को गाना बजाना सुनाते श्राफाश मार्ग मे जारहे थे। नारदमुनि की घीयामे दम्प के पुष्पों का हार लटक रहाथा, ॥ वायु के झकोलोंसे हिलकर वह हार अज के साथ विहार करती। हुई रानी इन्दुमती के वक्ष स्थल पर गिरा उसके भाधान से आज की प्राण प्रिया, इन्दुमती के प्राण पखेरु प्रयाण कर गए । राजा अज इन्दुमती के शव को गोद में लेकर अनेक प्रकार से विलाप करने जगा उस समय के दश ग्रह्यनिष्ट वशिष्ठ गुरु उपदेश देने माप और. कहने लगे। धनानि.भूमौ पशवश्व गोष्ठे नारी गृह द्वार जनाश्मशाने । देहश्चितायां पग्लोक मार्गे धर्मानुगो गच्छति जीव एकः ॥; हे राजन ! सम्पूर्ण धन-दौलत पृथिवी पर पड़ा रह जाता है हाथी घोडे घेल गाय पाटि पंशु सब यहीं अपने थानो की शोभा बढ़ाते रहते हैं। समस्त धन्धु बान्धव श्मशान भूमि तक ही जाकर रह जाते है और क्या कहूँ प्राणप्पारीस्त्रीजा हमारे दुख में दुखी । 1 १ 1. - .

1- * द्वितीय-भाग* और सुग्व में सुनी होती है वह भी भवन के हार तक ही साथ देनी है । यह शरीर जिसपर में बड़ा बमड रहता है स्वरप काज में ही भस्मशात हो जाता है। यह जोष क्यल शुभाशुभ को ही अपने साथ लोक में जाता है। 4 - - ममम तो सही तेरे पितामह प्राटि पड़२ प्रसिद्ध राजा इस ससार में बाली हाथ चले गए परन्तु यह स्त्री पुत्र धनादि किसी के साथ न गए और न तेरे साथ जासकते हैं, इसलिए उसक मरने की चिन्ता मत करो, देहभारियों के साथ विपत्ति लगी ही रहती है। रोने मे क्या तुम्हारे माने से भी वह नहीं लौट सक्तो। जव अपना शरीर और प्रारमा नियुक्त होने वाले है तो पुत्र फलन आदि के अलग होने का दुस्न कैमा तुम जैसे विद्वानों को शोक न करना चाहिए। - अज को विशेष समझाया परन्तु आज न समझा और रो २ कर फहने जगा- 'नवं पल्लव संस्तरेऽपि ते मृदु येत यदङ्ग मर्पितम् । तदिदं विपहिप्यसे बाथवद, चामोरु चितादिरोहणम् ।। हे पारी नवीन, पत्तों के पिछौने पर भी लेटे हुए यह सुकुमार शरीर दुखता था, तो बता यह तेरा शरीर चेता परकी कठिाता को फैसे सहेगा । इस प्रकार प्रज फा मन मलिन ही, रहा । कमल पत्र मिवाम्भसा, वशिष्ठ का उपदेश उस पर किञ्चित्मान भी प्रभावन जमा सका। ठीक है जिन चित्तके सासारिक विष्टा समान विषयो में । - , 3 + J ३ ।

५८
* दृष्टान्त-मागर *
लगे हुए है उन मलिन चेता पुरुषो की यही
होती है।
1-
.
-
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३५-पुत्र को पिता की पहचान
एक व्यापारी ने अपनी स्त्री के साथ रात्री को मैथुन लिया।
मोग करने से वीर्य ठहर गया और वह व्यापारी प्रात काल
ही उठ कर किसी बन्दरगाह को व्यापारार्थ चला गया । २५-३०
चर्प के पश्चात् बहुन सा यन संचय कर अपने स्थान को
। चापस पाया। इधर जड़फा भी जन्म लेकर २५ -३० वर्ष का
हो चुका था।
'घय एक ही स्थान पर व्यापारी यह जद्रका दोनो बैठे है.
न तो पिता को यह समाचार मालूम है कि यह मेरा पुत्र हैं
और न उस लड़के को ही ज्ञात है कि यह मेरा पिता है।
उस पतिव्रता स्त्री ने दानों को परस्पर परिचय कराया,-
अर्थात् अपने पति को समझाया कि हे स्वामिन् यह प्रापका
यह पुत्र है जिसको आप गर्भ मे छोड़ गए थे और अपने पुत्र
को समझाया कि हे पुर्व यही तेरा पिता है। फिर पिता को
पुत्र का और पुत्र को पिता का ज्ञान हो गया।
पिता पुत्र रदुभयोदृष्टत्वात् ।
इसी भांति विक मा प्रकृति प्रार' पुरुष का ज्ञान कराने
। बाला है।
.
-
।
।

* द्वितीय-भाग । ३६-ईश्वर-प्रेम एक राजा सम्पूर्ण राज्यकार्य मन्त्री पर निर्भर छोड़ वयं भीग विनास में लगा रहता था। राजभक्त मन्त्री कार्य- श इमके शयनागार के द्वार पर घटो खड़ा रहता पर यह एडलिक नरेश कुछ भी ध्यान न देता था। एक दिन मन्त्री कुत्र कागज्ञात लेकर हस्ताक्षर करने के र राजा मra मं गया, द्वार पर राडे होकर राजा क स्नचर मेयक में कहा कि-"भीतर-जाकर कहा कि प्रापका न्त्री एक माप कार्यवश प्राया हुण्या द्वार पर खड़ा राजा, उस समय रानियों के साथ चौसा खेलने मे तागा था घकने मन्त्री का सन्देश राजाम कह सुनाया|राजा ने उत्तर दिया F-"मन्त्री में कह दो, प्रभो दो घटे तक ठहरे, दो घटे पश्चात् रचय ही बुला लूंगा।" मन्त्री दो टे की जगह तीन घंटे तक टा रहा, फिर भी रोजा ने स्मरण न मिया, इसी प्रकार ची कई घटे तक घेठा रहा, वैठे २ मन्त्री के हृदय में विचार पन्न हुप्रा फि अहाजितनी मेवा में हम गजा की करता हूँ दि रतनी ही मेवा मे जगत पिता परमात्मा की करता तो 'सन्देद सिर मुझ पर सन्तुष्ट होते । मंत्री राज द्वार को उसी समय ' छोड़ अपने स्थान को वा ग्राम और स्त्री पुत्रों से कहा कि-"चार घटे के भीतर जितना द्रव्य तुम लेजाना चाहते हा यहाँ से अन्य स्थान में नगयो, नहीं मालूम मेरे चले जान पर राजा इस घर को क्या शा,करे।" । चार घटे के बाद मन्त्री ने अपने कई मज्जले मकान पर -- . 4 + ६० दृष्टान्त-सागर * चढ़कर नकारा बजा दिया कि ग्रानो' जिसका जी चाहेमा माफर मन्त्री सदन को लूट लो, बस फिर क्या था देखते हैं देखते लोगों ने सारा धन-धान्य , अपने अधिकार में कर लिया मन्धी लॅगोट शंधाय में तेगाले नगर से निकल कर भन्यो राजा की सीमा में जाकर पर्ण कुटी बनाश का अवलम्ब जगदीश की भक्ति में तत्पर हो गया। दो तीन दिवस पश्चात् जब "गज्य कार्य में गड़बड़ीं, मचने लगी तब उस विषयी राजा को मन्त्री की अावश्यकता प्रतीत हुई राजा ने अपने हिनपी मन्धी'को धुलाने के लिए उच्च कर्मचारी भेजे पर चद्द तीन वैराग्य सम्पन वह मन्त्री न पाया, अन्त में मन्त्री को लियालाने के लिए राजा स्वय तयार हुआ। राजा के जाने की तयारी देख रानियां पूछने लगी राजन श्राप कहां जाते है ? राजा ने उत्तर दिया - कि हमारा,प्रधान मन्त्री सन्यासी हो गया है, उसे किसी प्रकार समझा फर यहाँ राजधानी में लायेंगे | गजा की बात सुनकर रानियो ने कहा- "महाराज ऐसे धर्मात्मा पुरप के दर्शन तो हम भी करना चाहती है प्राप अपने साथ , हमे भी ले चलिए।" राजा रानियो और सेना को साथ लेकर चल दिया, चलते २ उसी स्थान पर पहुंचा जहाँ मन्त्री रहता था। मन्त्री ने राजा की माते देव राजा का यथोचित स्वागत किया राजाने अपने राज्य भक्त, मन्त्री की दशा देख कर पूछा कि-हे मन्त्रिन तू एफ मायनिक राजा का मन्त्री था और तेरे सुख के सामान कितने मारी ) तू जो उस गजा के आश्रम को छोड़ फर यहाँ जंगल में ईश्वरे. की शरण में पड़ा है. ताजा + W

६
* द्वितीय भाग *
मन्नी ने उत्तर दिया-"हाँ राजन् ! ईश्वर को शरण में आने
[इतना ता अल्प समय में अर्थान् दो चार दिन , में ही
बज गया कि मैं आपके द्वार पर बड़ा हुपा घटों प्रापकी
'तीक्षा में पाँव पोदा करता था किन्तु मेरी एक भी सुनवाई न
तिी थी। आज श्रीमान् सपरिवार स्वय मेरे स्थान पर मुझे
गदग्नीय समझ फर इस उजाड़ जगल में समुपस्थित
प हैं। दो तीन दिन की माई ता इतनी है मागे जो कुछ
चलें फिर पूछ लीजियेगा।"
।
--
३७-साहित्य-मन्दिर
कथा प्रसिद्ध है कि एक र ईसा और पीटर
२ चले जारहे थे। एक गांव में कुछ ग्रामीण मिल कर
नि गारहे थे । मा वहाँ खड़ा हागगा ओर घड़ी उसुकता
। उस गान को सुनो लगा
दूसरी जगह ईश्वरीय भक्ति
भरे गीत गाये जा रहे थे, या वहाँ से चुर चाप अागे यद
रा | -पीटर ने हैरान होकर क्राइम मे पूछा कि-"इम का
त्या कारण है कि अाप ने ग्रामीण गौतों को ईश्वरीय
गिनों से विशेष पसन्द किया " क्राइस्ट ने उत्तर दिया-"मेरे
त्र, जहाँ वा भक्ति के भजागाये जाते थे यहाँ कोई पुगन्ध
थी। वस्तुत इमी लिए साहित्य मन्दिर में फिन्दी २ धार्मिक
इन्दिरों को अपेक्षा अधिक सुगन्ध !"
,
11
३८-एक जापानी साधु
जापान के एक छोटे गांव की झोपड़ी में एक नाटे कद का
.

६२ * दृष्टान्त सागर * 1 M - जापानी रहता था। उसका मामोशियोथा मोशियो बड़ा धीर, घोर, अनुभवी और ज्ञानी साधु था । वह दोन दुनियाँ से को सरोकार न रस्ताथा दिन्तु अपने विचार रूपी समुद्र में हुई लगाना रहता था! प्रान राम के गांव का जड़को को यह निशुल्क शिक्षा देता था। जो कुछ मिल जाता वह उत्ती में मस्त रहता था। दुनियां की व्यहारिक दृष्टि से वह एक प्रकार का निखट या क्योंकि इप पुरुष ने ससारं का कोई बड़ा काम नहीं किया था उस की सारी आयु गान्तिमय व्यतीत हुई, लोग समझते थे कि वह एक साधारण पुरुष है। एक बार अकस्मात् दो तीन फसलो के न होने से इस माधु के पार्श्ववर्ती देश में बड़ा भयानक दुर्भिक्ष पड़गया। लोग बड़े दुखी हुए । लाचार हो इस निधन साधु के पास सहायतार्थ भाग वह उनकी सहायता को तयार होगया। पहले वह प्रोमा का नामक शहर के डे २ धनाढ्य पुरपों के पाम गया और उन मे सहायता मांगी । इन भने मानुषों ने वचन तोदे दिया परन्तु उसे पूरा न किया । भोशियो फिर उनके पास कभी न गया। उस ने राजा के मन्त्रियो को इन दुर्भिक्ष पीड़ित पुरुषों की सहायता के लिए प्रघ्र लिने परन्तु वहाँ से भी सुन समय व्यतीत हो जाने पर उत्तर न पाया । योशियो ने अपने और पुस्तक नीलाम करदी जो कुछ मिळावह उन भादमियों को धार दिया । भला इतने अल्प धन उनका क्या हो सकता था परन्तु मोशियो का हृदय प्रध शिवरूप हो चुका था। प्रोशियों ने कहा कि सब लोग हाथ मे बस लेकर तयार हो जानी और सायरा फा मडा सट्टा करदो। इस के विरुद्ध पिसी ने जवाग तक में 1 चस्त्र ५ * द्वितीय-भाग * दिलाई रगावत का झंडा बड़ा हो गया प्रोशियो भी एक बांस बाप में लेकर सय के मागे २ चल दिया, और राजा के टुर्ग(किले) पर हल्ला बोल दिया । इस साधु जनरल की सेना को कौन रोक सकता था। जब राजकीय दुर्ग के अध्यक्षा (सरदार ) ने देना तो उसने रिपोर्ट की और प्राशा मांगी कि नोशियो और, उसकी जगी मौज पर फैर की जाय, प्राशा हुई कि प्रोशियो तो प्रकृति के सिन्ज.वर्फ पढ़ने वाला है वह किसी विशेष घात के लिए चढ़ाई करके भाया होगा, उसे पाने दो, रोको मत । जव योगियो, दुर्ग के भीतर प्रविष्ट ट्रा तय दुर्गाधरक्ष ने मस्त उनग्ल को पकड़ कर राजा के सामने उपस्थित किया। (उस समय प्रोशियो ने कहा- 'वे गज भडार जो नाज से भरे हुए हैं, इन गरीयो की सहायता के लिए क्यों न खोल दिये जोय। प्रोशियो की जबात मे देवाशक्ति थी, जो काम कर गई । 'राजा ने प्राशा दीहि गल्ले के कोटे तुरन्त खोल दिये जायें, और सारा प्रश्न इन गरीबों को बाँट दिया जाय । भोशियो कृतकार्य हुना, उम्ने जिम्म कार्य के लिए अमर बांधी थी पर दिखाया। गरीबों की विपत्ति का अन्त हो गया। प्रोगियों को हृदय की स्वच्छता, सचाई, और दृढ़ता सम्मुरम् कोई पुरुष शत्ति जमी न रह सकी। जो पुरुष दूसरे प्रसहाय पुरुषों की सहायता करता है, पर ईश्वरोग हाथ रहता है और अपने मन्सूबे में पूरा उतरता है। स । 1. . ३६-शंकराचार्य और मण्डन मिश्र शकर दिग्विजय नामक काव्य महत्व का प्रथ है । उसमें -मी शकर और मनमिश्र का सपाद विशेष मनोरजक है। हम ।

* दृष्टान्त-सागर * पाठकों के मनोरक्षनाथ ज्यों का त्यों आते हैं। इस से विशेष शिक्षाये भी ग्रहण की जा सकता है। मण्डनमिथ पुर्व-मीमांमा क अनुयायी अर्थात् कर्मकाण्डी थे। उनका पण्डित्य-सौरभ-दिगन्त व्यापी था। शकराचार्य ने उन्हें शास्त्रार्थ में परास्त कर अद्वत येदान्त (नवीनचेदान्त) का अनुशयी धनाना चाहा । उस समय शकर प्रयाग में थे। वहीं से उन्होंने नर्मदा नदी के तट पर धनी हुइ माहिष्मती नगरी को प्रस्थान किया। वहीं पर मण्डनमिश्र रहते थे। ततः तस्थे भगवान् प्रयागात्तं मण्डन पण्डितमाशुजेतुम् । गच्छन् स्वसृत्या पुस्मालुलामहिष्मती मण्डनमण्डिता सः॥ माहिष्मती में शकर नगर के बाहर एफ चाग में ठहरे और प्रान्हिक कृत्यों से निवृत्त होकर मण्डनमिश्र का निवाम-स्थान ढूँढ़ने चले । मार्ग में उन्हें मण्डनमिश्र की दो दासियां मिली, जो माल भरने जारही थीं। उन से शकर ने मण्डनमिश के स्थान का पता पूछा, दामियों ने उत्तर दिया- स्वतः प्रमाण परतः प्रमाण कीराङ्गना यन गिर गिरन्ति, द्वारस्थ नीडान्तर सन्निरुद्धा जानीहि तन्मण्डन मिश्रधाम, फल प्रदं कर्म फल प्रदान काराङ्गना यत्र गिरं गिरन्ति, द्वारस्थनीडान्तर सन्निरुद्धा जानीहि तन्मण्डन मिश्रधाम :- जगद् ध्रुवं स्याज्जगदध्रुवं स्यात्कीराङ्गना यत्र गिर गिन्ति, द्वारस्थ नीटान्तर सन्निरुद्धाजानीहि सन्मण्डन मिश्रधाम | धेद स्वत. प्रमाण है यापरत प्रमाण-पथात् वेद ईश्वरी शान है अथवा मनुप्य छत? - -

"
में
* द्वितीय-भाग *
६.
,' सुख दुखरूपी कर्मफल कर्म करनेवाला स्वयं भोगना है अथवा
'जगत्पिता परमात्मा देता है।
ससार नित्य है अथवा अनित्य ?
इस प्रकार के प्रश्नोत्तर तोता और मैना जिस द्वार पर
पिंजड़े में बन्द हुए करते हों वही मण्डन मिश्र का स्थान जानिए।
दासियों द्वारा स्थान का पता जान कर शकरमण्डन मिश्र के
धार पर पहुंचे, द्वार बन्द था।
कुछ देर पश्चात् मण्डन के दर्शन हुए। शकर और मण्डन
परस्पर 'जो उत्तर 'प्रत्युत्तर हुए। वे पढ़ने योग्य हैं।
विशेषता यह है कि जो कुछ मगडन ने फहा या पूछा उसका
भाय दूसरा ही अर्थ करके शकर ने उत्तर दिए । देखिये-
मण्डनमिश्र-"कुत्तो मुगडी" मुण्डी अर्थात् सिर मुंडाये हुए
- कहां से आये १ इनका यह भी प्रथ होता है कि शरीर के किस
भाग से मुण्डन कराया है।
शकर-"प्रागनान्गुण्डी" गले तफ मुण्डन कराया है।
मण्डन-"पन्यास्ते पृच्च्यते मया" मे तेरा मार्ग पूछना है।
यह कर्म वाच्य प्रयोग है यदि कर्म वाच्य मइम का अनुवाद
किया जाय तो 'तेरा मार्ग मुझ से पूछा जाता है यह अर्थ होगा
इसी. पिछले अर्थ को लक्ष्य करके शंकर ने उत्तर दिया।
शकर-"किमाह पन्था." मार्ग ने क्या यहा इस प्रकार के
विपरीत प्रर्य सुन कर मगडन शुद्ध हो गये और बोले ।
मेरम-माता मुगडेत्याह" मार्ग ने कहा कि तेरी माता
मुन्दा
।
-
C

६६ ६ * शन्त-सागर * -- . १ । . 4 . 'शकर-'तथैवदि बहुत ठीक कहा पुर्षोक उत्तरप्रत्युत्तरका एकश्लोक बन गया। यथा-कुतो मुण्ड्या गलान्मुण्डी पन्धास्ते पृच्छयते मया। किमाह पन्यास्त्वन्माता मुरडेत्याह तथैवहिः ।। शकराचार्य ने "तथैवदि" कह कर दूसरा श्लोक पढ़ा। पन्मानं स्वमपृच्छरश पन्थाः भत्पाद मण्डन । स्वन्मातेत्या शब्दोऽयं न मां याद मच्छकम् ।। मगडनतूने हीमार्ग से प्रश्न किया। तुझको मार्ग ने उत्तर दिया कि तेरी माता मुण्डी है, मैने तो मार्ग से कुछ पूछा ही नहीं, हम लिए मार्ग का उत्सर मेरे लिए नहीं,किन्तु तेरे लिए ही है । अाक्ष भार्ग ने तेरी माता फो मुगडा धनाया । यह सुनकर मण्डन और विशेप अब हुए चोर कहने लगे- मयम "अहो पोता किमुसुरा" क्या तुमने शराब पी है ! यहां पर 'पीक्षा' के अर्थपो गई और पीले वर्ण पाती, दोनों होते हैं। शंकर-'नश्वेतायत.स्मर' नहीं सुरापीत, नहि होतीवेत, होती है उस रण को स्मरण कीजिए। मण्डन-"किं त्वजानासि तद्वर्ण" क्या तुम उसके रग को जानते हो? शंकर-"अह धर्म मवान् रसम्" मैं फेल उसके वर्ण को जानती हूँ, पर पाप तो उसके स्वाद से भी परिचित है। इ!क्त घाफ्यों के मेल से एक श्लोक बन गया । अहो पीता किमुसुरा नैव श्वेता यतः स्मर । कि जानासि तवर्ण महं वर्ण भवान् रसम् ।। N - F * द्वितीय-भाग ३ ६७ अयता गण्डन भोर भी प्राग गबूला होगर और यह श्लोकार्ट ग । 'भगान-"मत्तो जात फलजाशी रिपरीतानि भाषसे"पलज नामफ मान का सा घाना तू मत्त ( मतवाला ) होकर प्रद घंट पाने कर रहा है। "मत्तोमा का अर्थ पागज हो गया और गुम से उत्पन्न हुभा भी होता है। मांग खाना निषिद्ध है अतरस घृणित प्राक्षेप को सुन कर शकर ने उत्तर दिया- 7 . 7 - . मत्य ब्रापि पिववत् त्वत्तो जातः कलंगभुक् । तुम प्राने पिता फलनाशी होकर विपरीत घात फाते "हो, वैसे ही तुझ मे उतान छुपा कजजाशी विपरीत पति फरता है ना डीक ही करता है। क्योकि-यथा पिता तथा पुत्र । मण्डन-कन्यां वहमि दुर्बुद्ध गर्दभे नापि दुर्थशम् । शिखा यज्ञोपवीताभ्या कस्ते भागे भविष्यति ।। इननी मारी गुदड़ी जिमे गधा भी 'कठनता से ढा मकेगा, तुम लिप फिरसे हो पा शिक्षा और यज्ञापवीत क्या इतने भारी है जो तुम में नहीं उठते । शकरकन्धा वदामि दुवुद्ध तब पित्रापि दुधराम् । शिवा यज्ञोपवीताभ्या अनेर्भारो भविष्यति ॥ रे मूर्ख ! में जो गुदडी लिए फिरता हूँ यह तेरे वाप से भी पठिनता से उठाई उठेगी, शिला और यज्ञोपवीत से तुम ही 'नहीं फिन्तु श्रुति ( घेद ) को बोझ मालूम होगा क्योंकि श्रुति में लिखा है कि संन्यासी की शिक्षा, यज्ञोपवीत फी भाव- श्यकता नहीं। . - ।

६
*टान्त-सागर
अथ परिबाड् विवरण वासा मुण्डो परिगृहम् ।
मण्डन-त्यक्वा पाणिगृहीतां स्वामशक्तः परिग्क्षणे ।
शिष्य पुस्तक भारेच्छोपाख्याता ब्रह्मनिष्ठता ॥
अपनी विवाहिता स्त्री का पान पोषण न कर स
इमलिए उसे छोड़ कर शिष्य और पुस्तकों के बोझ को र
फरनेवाले तेरी मलनिष्पता भली प्रकार जान ली।
शंकर-गुरु शुश्रूषणातस्या समावर्त्य गुरोःकलात् ।
त्रिपः शुश्रूषमाणस्य व्याख्याता कर्म निष्टता ।।
गुरू की सेवा शुभूषा में मालनी गुरुकुल से समाय
फरा फर खियों की सेवा करने वाले तेरो धर्म निछा तो बहुत
अच्छी तरह जान जी गई।
मण्डन-स्थितोऽसि योपितां गमें ताभिरेव पिवर्धितः ।
बहो कृतघ्नता मूह ! कथं ता एव निन्दसि ।।
रे मूर्स जिन जियो के गर्भ में तू रहा और जिन्होंने
पाला पोपा तूअर उनकी ही निन्दा करता है, इस कृतघ्नता
भी यही डिझाना है।
शंकर-पामा स्तन्यं त्वया पीतं यामा जार,
तासु मुर्खतम स्त्रीषु पशुचद्रा
जिनसा तूने दूध पिया
मै तू पशु क समान रमरा
हो गई।
.
मयड?"
१

- + मन्यासी - :- द्वितीय-भाग ६९ गाईपत्य, दाक्षिग्य और पाहवतीय इस प्रकार की अग्नि का नाश कर तू धीरहत्या (इन्द्रहत्या) का पापी हुआ है क्योंकि श्रुति में लिखा है- वीरहा । वा एषदेवानां योऽग्नीमुद्वासयति । इम तीना प्रकार की अग्नि को त्याग देता है। शकर-आत्महत्या मवाप्नस्त्वमविदित्वा परमं पदम् । परमपद को न जान कर तू तो अात्महत्या का पापी हुश्रा । 'यसभेव स भवति' इत्यादि श्रुति प्रमाण है। 'मण्डन-दौवारिकान् वञ्चयित्वा कथं स्तेन वदागतः । चोर की भांति ज्योढ़ीवानों को धोखा देकर कैसे माया? शकर-भिक्षुभ्योऽनमदत्वात्वं स्तेन वद्भोक्ष्यसेकथम् । अतिथियों को प्रश्न न मिला कर चोर की भांति कैसे खाता है! मण्डन- ब्रह्म क च दुवाः क संन्यासः क वा कलिः । स्वाइन्न, भक्ष्यकामेन घेपोऽय यागिना धृतः ।। 'फहाँ ब्रह्म, कहाँ दुर्बुद्धि, कहाँ सन्यास, कहाँ कलि गृहस्यों को धोखा देकर सुस्वाद भाजन करने के लिए यह सन्यासी का रूप तूने धारण किया है। शंकर-क स्वर्गः क दुराचारः काग्निहोत्रं क वा कलिः । मन्मे मैथुन कामेन येपोऽय कर्मिणां धृतः ।। फदा म्यर्ग, फहां दुराचार, कहाँ अग्निहोत्र, महो कति, मेरी 1 - . ।। 1 . ।

14
*दृष्टान्त-सागर
।
11-
अथ परिवाइ विवरण वासा मुण्डो परिगृहम् ।
मण्डन-त्यत्वा पाणिगृहीतां स्वामशक्तः परिरक्षण ।
शिष्य पुस्तक पारेच्छोफख्याता ब्रह्मनिष्ठता ॥
अपनी विवाहिता स्त्री का पालन पोपण न कर सका
इसलिए उसे छोड़ कर शिष्य और पुस्तकों के घोझ की रक्षा
फरनेवाले तेरी ब्रह्मनिष्टता भली प्रकार जान ली। .. ।
शकर-गुरु शुश्रूपणालस्या समावर्त्य गुरोःकुलान् । '.
स्त्रियः शुश्रूपमाणस्य व्याख्याता कर्म निष्टता ।।
गुरुपी सेघा शुथूपा में मालनी गुरकुल से समाधर्तन
करा कर स्त्रियों की मेवा करने वाले तेरो धर्म निष्ठा तो यहुत
अच्छी तरह जान ली गई।
मण्डन-स्थितोऽसि योपिता गर्ने, ताभिरेव विवर्धितः ।,
अहो कृतघ्नता मूढ ! कथं ता एवं निन्दसि ॥
रे मूर्ख जिन स्त्रियों के गर्भ में तू रक्षा और जिन्होंने तुझे
पाला पोपा तू अय उनकी, ही निन्दा करता है, इस कृतघ्नता की
भी कहीं ठिकाना है।
शंकर-यामा स्तन्य त्वया पीतं यासा जातोस योनितः ।
तासु • मुर्खतम स्त्रीषुः पशुबद्रमसे कथम् ।।
जिनका तूने दुध पिया और जिनसे तेा जन्म हुआ जन्त
में तू पशु के समान रमण करता है, इस हतता मी तीबई
हो गह।
मण्डन-वीर इत्या मामोसि पतीनुदास्य यत्नतः ।।
.
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NA MAH द्वितीय-भाग* - वास्तिनरः । यतितव्यमेव खलु तस्य जये निजपक्ष रक्षण- - यरैर्भगवन् । M भगमन् ! जो अपने मत का खण्डन करे चाहे यह स्त्री हो अथवा पुरुष, अपने पक्ष की पुष्टि करने के लिए उसके विजय मे सापर होना चाहिए। इस के अतिरिक्त सरस्वती ने प्राचीन समय में भी स्त्री पुरुषों के शास्त्रार्थ होने में प्रमाण दिया। अतएव गार्यभिधया कहलसह याज्ञवल्क्य मुनिण्डकरोत् । जनकस्तथा सुलभयाऽवलयाकिमती भवन्ति न यशोनिधयः,। महामुनि याशवलस्य ने गागी और महाराज जनक ने सुलमा के साथ शास्त्रार्थ किया था, क्या ये लोग यशस्वी म थे ? "तब शास्त्रार्थ के जिए 'शकर तयार हुए और उस शास्त्रार्थ में वति ( वेद ) वाश्यों पर विचार किया गया। अब सा कथा प्रवतेस्म तयोरुभयोः परस्सर 'जयोत्सुकयोः । मति चातुरी रचित शब्दभरी श्रुति विस्मयी कृत विचक्षणयोः॥ अब वह पाद प्रारम्भ हुआ जिस में एक दूसरे के विजय के लिए उत्सुक था । बुद्धि चातुर्य, शब्दगाम्भीर्य और श्रुति प्रमाण बड़ाही पाश्चर्य दायक था। जय सरस्वती ने शकर मे स्त्री पुरुप विषयक प्रश्न किए तो उनसे उत्तर तक न हो सका। स्त्री शिक्षा के विरोधी जो अपनी सम्पूर्ण शक्ति को इसके विरुद्ध ही लगा देते हैं फिश्चित् ध्यान दें। ( 'A 1 । - 11 n * दृष्टान्त-सागर * स . -- श्राहूत किया। -- ४ 7 J . . समझ मे केवल विपय सेवन की कामना में कर्म कागियों का यह रूप तूने बना रक्खा है। इस प्रकार द्विरुक्तियों की मात्रा जय विशेष यदी तष मण्डन की स्त्री सरस्पती को मध्यस्था धनाकर शकर ने मगन को शास्त्रार्थ मे परास्त किया, तप सरस्वती ने शकर को शास्त्रार्थ के लिए ( सरस्वती शंकर वाद) सरस्वती-अपितु 'स्वयाय न ममग्रजितः । प्रथिताग्रणीर्मम पतिदहम् ॥ वपुरमस्य न जितं मतिमन् । अपि माविजित्य कुरु शिष्यभिमम् ।। हे शकर! आपने मेरे प्रसिद्धानणी पतिदेव को अभी पृक्ष नहीं जीता क्योंकि उनकी श्रद्ध देह में हैं, जय माप मुझे शास्त्रार्थ में परास्त करदें तव इनको शिप्य बनाइएगा। शंकर-पदवादि वादकलहोत्सुकता, प्रतिपद्यते हृदयमित्यमले। तदमाम्मत नहि महायणसो, महिला जनेन कथयन्ति कथाम् ।। तुमने जो शास्त्रार्थ के लिए अपना विचार प्रकट किया है सो ठीक नहीं है क्योकि यशस्वी जन स्त्रियों के साथ वार्तालाप नहीं करते। सरस्वती-स्वमतं मभेचुमिइ यो यतते स वधूजनोस्तु यदि- , . । । । --- 1

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* द्वितीय-भागे*
खना हमने सुना है कि तुम अपने साथ यहाँ जोरू पदमाश
(खते दो और मांड का बच्चा भी धनते हो यह हरकत निहायत
सुराग है अब तुम्हारे पाप का फोन एतयार करेगा तुम्हारे लड़के
ने नकाल जाटिन से सुअर व नय लिया है सा घेटे को अपने
काँसी दे देना नहीं तो बांस की नोयत पहुंचेगी सो घेमौका होगा,
क्योंकि इस पास फावुल भूत है।
४२-जज साहव और कुत्ता
एक वकील माहम किसी मुअामले में जज साक्ष्य से बहस
कर रहे थे । और जज साहब का कुत्ता उन के पास बैठा था।
जज का ध्यान यस से जो उचटा तो अपने कुत्ते को प्यार करने
लगे। वकील साहब चुप हो गए जज ने कहा पाप अपनी यात
कहिपचुपक्या हो गएवकील ने कहा-"जो श्राशा, क्षमा किजिए
मै इस लिए चुना गया था कि शायद आप अपने इस मित्र से
रस मुकदमे विषय में कुछ मलाद करते हो।"
।
४३-घडी की सुधरवाई चार घुसे
एक मनुष्य किसी घड़ीसाज़ की दुकान पर गया और
अपनी घड़ो धान के लिए देकर पूँकने लगा, तानो घड़ी की
उधरवाई क्या लोगे?
घदोमाज-भाई साइय, घड़ी की सुधरपाई तो घड़ी की
क्रोमत से भी दुगनी लगेगी ।
मनुष्य-कोई हानि नहीं तुम सुधार दो। मैंने एक मादमी
दा घूमे लगा फर उस से यह घड़ी छीन ला थो, तुम्दै दो के
प

। - ७२ * दृष्टान्त-सागर * -- -Raranate 7 1 ४०-फ़ारसी का छारसी एफ फारसीदां मुशी से किसी पुरुष ने पूछा, मुंशी जो पाप रोटी फिस चीज से खाते हैं । यह चेतुका प्रश्न सुन कर मुशी जी मुझना कर वोले, और फिस चीज़ से सायेंगे खाते है दस्ते से। यह सुन कर जितने पुरुष पास बैठे थे सब हंसने लगे। J ४१-उर्दू लिपि विरादर अजीज अजजान सलामत बाद दुवा के चाजहहो कि हम यहाँ तुम्हारी नौकरी की फिक्र करते है और तुम्हारे सानी निकाह की तजवीज करते हैं, पस तुम जल्द चले अयो। और पालिद को पान के साथ खाने के लिए उमदा चूना ( जो यहाँ नहीं मिलता ) लेते प्राना । वह थोड़े मे मुरब्बे भी चाहते हैं। इस का बहुत खयाल रखना हम ने सुना है कि तुम वहाँ अपने पास चोर वा पदमाग रखते हो, शायद गांजा भी पीते हो तो यह हर फत निहायत खराध है। अब तुम्हारी बात का फोन एतमान करेगा। तुम्हारे लड़के ने थकान हामिल से सौ रुपया लिया सो घनिए को अपने यहां से दे देना, नहीं तो नालिश को नौवत पहुंचेगी तो वेमौका होगा, क्योंकि उसके पास कामिल सबूत है पढागया विरादर अजीज प्रजन सलामत याद दुवा के वाजे होषि हम तुम्हारी टोकरी की फिक्र करते हैं और तुम्हारी नानी निका। की तजवीज करती है पस तुम जल्द चले प्रायो अपने वालिद फोमां के साथ खाने के लिए उमदा जूता (जो यहाँनहीं मिलता) नेते धाना घह फोड़े से मरने भी चाहते हैं इस का पहुत खयान 1

* द्वितीय-भाग*
खना हमने सुना है कि तुम अपने साथ यहां जोरू बदमाश
खते हो और सांड का बच्चा भी धनते हो यह हरकत निहायत
राम है अब तुम्हारे पाप का फोन पतपार करेगा तुम्हारे लड़के
नकाल जाटिन से सुधर घ नथ लिया है सो घंटे को अपने
नॉमी दे देना नहीं तो बांस की नौबत पहुँचेगी सो घेमौका होगा,
योकि इस पास कावुल भून है।.
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४२-जज साहव और कुत्ता
एक धकील साह किसी मुपामले में जज साहब से बहस
कर रहे थे । और जज साहब का कुत्ता उन के पास बैठा था।
नज का ध्यान यहस से जा उचटा तो श्रप कुत्ते को प्यार करने
नगे । यकीन मादव चुप हो गए जज ने कहा आप अपनी बात
दिपचुप क्यो हो गए। वकील ने कहा-"जो प्राशा, क्षमा किरिय
में इस लिए चुना गया था कि शायद प्राप अपने इस मित्र से
(स मुकदमें क विपय में कुछ सलाह करत हो।"
।
४३-घडी की सुधरवाई चार घूसे
एक मनुष्य किती घड़ीसाज़ को दुकान पर गया और
यपनी घड़ो सुधरने के लिए देकर पूछने लगा, पताओ घड़ी की
सुधरवाई क्या लोगे?
घड़ीपाल-भाई साहय, घड़ी की सुधरवाई तो घड़ी की
कीमत में भी दुगनी लगेगी।
मनुष्य-फाई हानि नहीं तुम सुधार दो। मैने एक आदमी
के दा घूमे जगा फर उस से यह घड़ी छीन ली थो, तुम्देदों के

*दृष्टान्त-सागर*
स्थान मे चार से लगा हूँगा। घड़ीसाज चुप हो गया और
मुफ्त में ही बड़ी सुधार कर चुपके से उसक इवाले की,
४४-बाबू साहब
एक धाबू साहब को बीमारी की दशा में उन के मेधक ने
औषधी के धोखे मे स्याही पिलादी । जय सेवक ने बाबू साहब
से
कहा कि-"अपगध समा हो, मैंने अाज भाप को प्रोपधी के
स्थान मे स्याही पिनादी है।" बावू माहब ने उत्तर दिया-"कुछ
हर्ज नहीं, हम ब्लाटिंग पेपर निगल लेगे।"
-
४५ -कुँजडी और वकील
पक कुंजड़ी ने किसी वकील मे पुछा कि-"क्यों साहब यदि
किमी का नौकर अपने मालिक के नाम किसी दुकान से कुछ
सौदा ले जावे और दाम न दे, तो नालिश करने में दाम नौकर
देगा अथवा मालिक " वकील साहब ने कहा-"मालिका तब
कुंजड़ी ने कहा कि-"अाज एक महीना हो चुका श्राप का नौकर
एक रुपये का सौदा लाया था, उसका दाम प्राप दीजिये।"
वकीज ने खिसिया कर एक रुपया जेब से निकाल कर कुँजड़ी
को दे विदा किया।
दूसरे दिन घफीज ने इस विषय का विल बनाकर कुँजदी
के पास भेजा कि जो रुपया कत्त लेने का मस्जिदा एम से पूछा
था उसका मेहनताना २५) रुपया होता है भेज दीजिए ।
जड़ी बड़ी पड़ताई और दाम वापस कर क्षमा मांगी।
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* द्वितीय-भाग * . ४६- मसखरा किसी गांव में एक ममखरे मे किसी ने पूछा-"भाई, इस गांव का ठेकेदार कौन है ?" मसतरा बोला-"किसका ठेका पूछते हो, कोई भांग का ठेका ..कोई गांजे का, कोई घास का, कोई अफयून का, कोई शराय का ठेका लिए है।" - तप उसने कहा-"मैं यह नहीं पूंछता किन्तु यह जानना चाहता हे इस गांर का ठाकुर कौन है।" ममखरा योला-"किन किन को बताऊँ। किमी के या सालिगरामे, किसी के श्रीकृष्णा, किसी के बाल मुकुन्द, फिनी के गोपीनाथ, किनी के महादेव इत्यादि साफ यहाँ टाकुर ही टाकुर है पाप किसको जानना चाहते हैं।" उसने कहा-"भाई यह नहीं किन्तु इस गाय का मजा कौन है'" तय फिर ममखग बोला-"कल एक चमार इस गांव में मर गया था सो उसकी चमारिन रोगे कर हाय गजा, हाय राजा कह रही थी, इससे में जानता हूँ कि प्रपो अपने घर के सही राजा है। यदि सब नदी, तो चमार राजा कल मर गया ।" . - r - -- । ४७--शेखचिल्ली एक दिन शेखचिल्ली अपना गधा बेचने के लिए बाजार को लिए जा रहा था। शेखचिल्ली ने देखा कि गधे की पूछ कीचड़ में मनी है, झट फाट कर अपनी थेली में रख ली और बाजार में पहुंचा। जहां याजार लग रहा था, यहाँ एक मनुष्य पूछा-"इस गधे को फौन लाया है"शेखचिल्ली बोला- 1 7 १ * दृष्टान्त-सागर* "तुम इसके दाम चुका दो पूछ की फिक्र न करो, मैने उसे काट कर अपनी थैली में रख लिया है यह देखो मौजूद है।" इस यात को सुन कर सब हॅस पड़े। . - T अपनी गाद -2 ४८-गुदड़ी का टुकडा जाड़ो की गत में एक चोर किसी गृहस्थ के घर में चोरी फरनं घुसा, गृहस्थ विचारा विशेप दरिद्री थी वहां पहुंचते ही चोर ने सुना-यह गुदड़ो का टुकड़ा मुझे दो अथवा पञ्चे को में ला हे नाय! आपके नीचे पयाल है और मेरे नीचे जमीन मानी है चोर ने जब दम्पति का इस प्रकार यात करते सुना तब उस गुहस्थ की दुर्वस्था पर चोर का हृदय पिघल गया और दूसरी जगह से चुरा कर लाये हुए वस्त्रों को उनक ऊपर दाज कर वहां से रोता हुआ चला गया- कन्था खयहमिदं प्रयच्छ यदि वा स्वा गृहाणार्भक, रिक्तं भूतलमत्र नाथ गवतः पृष्ठे पलालोच्चयः । दम्पत्योरिति जल्पतोनिशियदा चौरः, प्रविष्टन्तदा, लेकर कर्पटमन्यतस्तदुपरि क्षिप्त्या :, रुदनिर्गतः ।। हा दरिद्रते । तेरी भी हद्द हो गई, एक पापात्मा चार के कठोर हृदय में अपनी छाप मारी, इस प्रभागे भारत में इस ममय हरोड़ों स्त्री-पुरुष इस पूर्वोक्त श्लोक के उदाहरण हो रहे हैं, पर समर्थ पुरुषों का भी उनकी हीन दशा पर बहुत ही न्यून ध्यान जाता है। हो हन्त हता मनाचिता ! . - . - * t * द्वितीय-भाग * ७७ -- माचीन गुरुप, । ४६-प्राचीन तथा नवीन पुरुषों की दशा नवीन पुरुष । १-धर्म (प्रधान) शारीरिक, १-धर्म ( गांगा ) इन्होंने अपनी प्रामिक, मानसिक और बुद्धि अनुसार धर्म को गोरा ससारिक सुखों का समावेश तथा अन्य बातों को प्रधान धर्म में ही समझते थे। मान रक्या है, आत्मा का २-सादगी जीवन । प्रश्न धर्म में शेप अन्य सप 'ई-आवश्यकता धर्म मे पृथक ४-सत्यनिष्ठ। २-चमक दमक के प्रेमी ५-मति भाव के प्रेमी । ३-प्रावश्यक्ता अधिक। ६-धन को, जीधन का अग ४-मिश्रित मत्य क प्रेमी। समझने घाले। ५-भ्रातृ भाव को मुख से ७-अपने तथा दूसरों के हित प्रतिपादन करने वाले। ६-धन कोरेग्नर समझने घाले। चल, कपट से रहित, फिन्तु ७-स्वार्थान्ध। 'चतुर, निपुग्य। ८-चाजवाज, बेईमान । न्यून। तत्पर । । ५०-कृपण सेठ नगर में एक जूस मकावीचून मेंठ जी रहते थे। वह यहां तक जूस थे कि यदि कोई वा घार्ता गर म दातो ता म विचार में सुनरे तमा न जाते थे कि कदाचिन् यहां जाकर पैसा, घरेला कशा में चढ़ाना पड़े। एक बार उसी नगर क बहुत में पुरुषों ने मिगफर कथा पंडाई बड़े चार से सुनने जाते और कहा करते यारो का तारही मच्छी होती है और अन्त मे घशात भी मिलता है या - . ।

*दृष्टान्त-सागर *
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T
करें हम ता होट ही चाटते रह जाते है बड़ी ही
स्वादिष्ट होता है।
एक बार इन सेठ जी की मेठानी ने कहा कि-"सब लोग
फथा सुनने जाया करते हैं तुम भी सुन पाया करो।"
आप पोते-"चाह | पसा जो देना पडेगा यह कौन देगा,
कथा के लिए मेरे पास पैसा वैसा नहीं है। बड़ी कठिनता
से तो एक पैमा पैदा होता है दिन भर में कपड़े का
एक प्राध सरीदार (ग्राहक) प्रागग तो दो चार पैसे,
वसूल होगये, फिर प्राहक से भी घंटों जिर जिर करनी
पड़ती है। तू कहती है कथा सुनने जाया करो । फया में
क्या धरा है दुकान पर मैठने हैं नो बार 'पमे पैदा करने
है। कथा में जामो और अपनी नींद खोनो। जब कषा
सुन कर पायो तो पिटे से चले प्रामा, हम ऐमी कधा
नहीं सुनसे । हमे तो यह कथा प्रच्छी लगती है जिस
मैं चार पैमे पैदा हो ।" जब मेठानी ने बहुत समझाया
तो बोले-"पच्छा तो प्राज तेरे कहने सेचले जायेंगे।"
दूमरे रोज रात को कथा प्रारम्भ हुई संप लोग इकडे..
होगए, सोचे पाले में भी पानी दुकान लगालो, गायिका
जी कथा कहने लगे परन्तु यह फजूस साहय जरा देर मे
पोचे, अच्छी जगह न मिती तो वहीं एक दीवार के सहारे
से बैठ गए कुछ देर तो श्राप फया सुनते रहे लेकिन फिर
भोसी देर के पश्चात् श्रीन जग गई घोर घेठे धैठे सुपर
की तरह घुर्गने जगे । कथा समाप्त हुई और सर लोग
चरणामृत ले अपने अपने 'घर चले गए । यह हसरत
कहीं पसी भागद पेठे थे जो घागणामृम पांटने वाले को न
दोस सके । कुत्ता प्राया और सोते हुए के मुँह पर
१

* द्वितीय-भाग * । , - 1 दीवार का भाग समझ कर टाँग उठा पेशाव करके बजता वना । जव इन इजात की आँख खुली और होठों पर जो जोन फेरी तो कुछ 'सारी सा जान पड़ा, सोचने लगे पोहो ! वाणामृत वटा पन्तु हम मो गए थे इसलिए पोछे से पचा खुचा हमारे भाग में प्राया, इस कारण खारी था । सच है-"सोये सा ग्वोधे, जागे सो पाये।" कहते कहने , अपने घर पहुंचे । सेठानी ने पूछा-"कहो लाला जी कथा सुनी " तो प्रार पोले कथा तो सुनी चरणामृन भी मिला परन्तु हम वहां जाकर सो गए इसलिए चरणामृत कुछ खारो सा ही हमारे हिस्से में माया । पर हम फज का जायेंगे और सोचेंगे नहीं। दूसरे दिन मेट सी कथा म सर से पहले ही पहुंचे और पण्डितजी के पास शासगढ़ी में लग कर बैठ गए । पण्डितजी ने नित्य नियमानुसार कथा प्रारम्भ फरदी। इधर इन हजरत का पालम्प ने गाया और लगे घुर्गट भरने, सोते २ स्पन्न देखने लगे कि दुकान पर बैठे हुए कपड़ा बेच रहे हैं और गजों पटे का दिसाव किताय हो रहा है। आप फहते हैं कितने मज्ञ फपटा फाट् ? प्राहक दस गज देदो । ५० जी की चपन का सिंग हजरत के हाथ में था, यस मिलना शुरू किया, एका, दो, तीन, चार, पांच, छ, सात, घाउ, नौ, मोर लो यह दस एफ एम में पटित जो को चपन उड़ादी और योजे लो दागन श्री सद्यो । परितजी बोले-"अरे मूर्ख तूने यह क्या किया? बने । तो मेरी नपान ही फाड़ दो, कथा सुनने पाया है या रुपमा पेनगे?" यह योजा-"प्रजी पण्डितजी, क्या फर मुझे नींद प्राग" उस समय तो जो ट्रमा सो मा बोजद कथा समाप्त दाने को तो आप पप में पहले ही पल पढे कि . -I - ॥

* दृष्टान्त-सागर -1 कदाचित् कथा मे कुछ चढ़ाना पड़ जाय। लोगों ने कहा-"मेठ जी बैठो चरणामृत लेकर जाना, अश्व प्राप्ती हुई जाती है।" तो आप क्या बोले-"अच्छा भाई मै लघुशका तो हो, आऊँ।": बस फिर क्या था हजरत लघुशका के बहाने नौ दो ग्यारह हो गए और अपने घर जा अपनी सेठानी से बोले -'मैं तो तुझसे पहले ही यहता था कि मुझे कथा एनने मन भेज ! ६०) की और टुक गई ,पण्डितजी का चपफन फट गया अब उन के लिए नया बनवाना पड़ेगा। श्राज से मै कभी कथा सुनने न जाऊँगा।" श्लोक-कृपणेन समो दाता न भूतो न भविष्यति । स्पृशन्नेव विना याति परेभ्य न प्रयच्छति ।। कृपण के यरायर कोई दानी ही नहीं, न हुआ और न होगा, पयोंकि दूसरे मनुष्य यों ही कुछ दान कर देते है पर कृपण के लिए भोगना तो दर किनार उसे छूता तक नहीं । वह अपना धन ज्यो का त्यो दूसरों को ही दे डालता है। अर्थात् दूसरों के लिए छोड़ मरता है। ऐसे कृपण प्राज भारत मे सैकड़ों दृष्टि गत होते हैं। हम तो यही महंगे कि वढना उमी का ठीक है जिम से हो फज शाम । कजूम मक्खीचूम का बढ़ना नही अच्छा ।। दो०-रहे न कोडी पाप की, ज्यो आये त्यों जाय । लाग्वन को धन पायके, मरे न.कफन पाय ॥ - . म है . - 11. । - १ । - . . नान कनय शुद्ध होता है। * द्वितीय-भाग * ५१-पुजारी करोड कल्प तक नरकगामी पकपाश्रीगमनन्द्र जी महागज से एक कुत्ते ने पक मनुष्य भी कुछ शिकायत की और कहा-"महागज, इम मनुष्य ने मुझे निरपराध माग है, आप इसे दण्ट दीजिए।" तब भगवान राम से कहा-"अरे कुत्त तुम्ही यताप्रो स मनुष्य को क्या दण्ड दिया जाय ।" तब कुत्ते ने कहा- मठपति याको करहु प्रभु, कृपासिन्यु गुण ऐन । है प्रभु श्राप हम मनुष्य को मन्दिर का पुजारी धना दीजिए यही दण्ड उग्म के लिए उपयुक्त है, क्योंकि मैं भी पूर्वजन्म में का पुजारी ही था। भब हम पुगम स्मृतियों के यह पाम्प उद्धृत करते है जिन में पुजारी जी के लिए मार्शला का विधान है। श्वान श्वपचं प्रेतयूभ्रम् देव द्रव्योपजीविनम् । रपृद्धा, मठपतिचैत्र सवासा • जलमाविशेत् ॥यानवल्क्य इचा, भगी, 'चिना पा धुमाः देवता : या 'द्रव्य स्वाने लाले और पुजारी इन को छूकर मनुष्य घस्त्रों के महित तर कहीं शुद्ध होता है। भभोज्य मठिनामन्न भुक्त्वा चान्द्रायणं नरेत् ।। रपृता देवतवञ्चयः सवासा जलमाधिशेत् ।। पद्मपुराण पुरी माना चाहिए यदि वा ले तो अदायगा मत करे । और पुजारी को छूकर तो कपड़ों के सहित मन्दिर १ जन में स्नान करे, , 'का श्रप्रन । || ८२ *दृष्टान्त-मागर* - in . । , पत्रं पुष्पं फल तोयं द्रव्यमन्न मठस्य च । । नानाति नरकान् पोगन् सेवेत बैंकावणाविहार जो मनुष्य देवमन्दिर का पत्र, पुष्प, फल, जल और दुव्य (चढ़ाया ) खाता है वह इक्रोम यार नरक का वासी होता । नरकायत मतिश्चेत पौरोहित्य समाचरेत । वर्षयावकिमन्येन मठचिन्ता दिनत्रयेत् ।। पञ्चतन्त्र यदि नरफ जाने पी इच्छा हो तो एक वर्ष तक पुजारी का काम करे अथवा तीन ही दिन मन्दिर की चिन्ता करे। य उच्छेन्नरके गन्तुं सपुत्रं पशु पान्धवम् । तं देवश्वधिय कुर्यात गोपु चब्राह्मणेषु च ॥ जिने पुत्र, पशु और अपने याधुओं के सहित नरप भेजना हो उसे मन्दिर का पुजारी यनादे। • निर्मात्य शंकरादीनां म चारहालो भवेद्धवम् । कल्प कोटि सहस्राणि पायते नरकाग्निना ।। ' पद्मपुरांश जो विप्र शिवपर चढ़ा हुआ पटाई एक बार भी ना लेता है घर अवश्य चाण्डाल हो जाना ई पोर .फरोह काप तक नरव को प्राग में जलता रहता है। चिनिन्नवान् देवलकान मारविज्ञपित्तथा । ' : विश्णेन च जीवन्त्यो वाः स्युई व्यमव्ययोः ॥ ० H + १ - . । मद्ध

* द्वितीय-भाग *
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F
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1
विकिन्सा करनेराले, (हकीम और मन्दिर के पुजारी
पौर मास येचनेवाले दुकानदार, ग्रालय को देव और पितृ
कार्य में भोजनार्थ निमन्त्रय मूल कर भी न है ।
आदित्य चण्डिका विषणु रुद्रं चैव महेश्वरम् ।
उप मुखान्ति ये द्रव्य तेवै नरक गामिनः ॥
१ पु०
जो रुद्र चण्डिका, विष्णु और सूर्य का चढ़ास खाता है पद
नाकगामी होता है।
देशाचन एरो 'विप्रो वित्तार्थे वत्मरः त्रयम् ।
असौ देवलको नाम इव्य कन्येषु गर्हितः ।।
मिताक्षरा
जो विन तीन वर्ष तक मन्दिर का पुजारी यन कर धाले
. उसे देवजा कहते हैं । ऐसे मनुष्य को देवकार्य तथा पितृकार्य
से भोजन कभी न कराए।
हमें पुमारियो की नरकयात्रा पर शोक है। क्योंकि मन्दिर
के पुजारी साध इनाना भयकर अन्याय । क्या यम महागज का
इन पुजारिया में हार्दिक राप तो नहीं है ? जिसके कारण यह
५ मार्शल्ला का विधान है।
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५२-विचार
किमी गांव में एक जाट रहता था। पाघह यड़ाचतुर, परन्तु
भागसेस्रो मूर्ख मिली थी जो कि भूतप्रेतादिको मानती थी। एक

-- है * हटान्त-सागर , पौर दिन देवयोग मे उमेयर भागया तो अपने पति से कहने लगी- "फि दूसरे गांव में जो भगन (दइया) रिडत चमार रहता है उसे लिवा जाओ और उसे मुझे दिखाओ, यह कुछ कर देगा तो मुझे अवश्य पाराम हो जायगा।" जाट ने सोचा कि रिडक क्या करेगा काई इकोम नी जो दवा देदेगा। उसके पास जाने में क्या होगा। क्योंकि जाट था चतुर और अच्छे लोगों के पास बैठना था। कहने लगा-"अच्छा तो मेरे लिए कुछ थाड़ा सा भोजन बनादे मै बाहर जाऊँगा, उमे यातो लिया फर की लाऊगा यदि वह न 'प्राया तो उसमें कोई दा नेता प्रॉऊँगा।" स्मा उठा और ज्वर को ही दशा में कुछ थोड़ासारलुना जाट के लिए पना दिया, घई इलुया स्वा पीकर चलना हुश्रा किसी दूसरे गांव में नीम क पेड़ के नीचे जाकर सागया जध सोकर उठा तो सामने लगा कि उत्तर तो बनाना चहिये, अन्यथा उपमे जाकर क्या कहूँगा । जय शाम को अपने घर sarry तो स्त्रो ने पूछा-रिडकूनहीं पाया ? घद योला-रिडकूनी नहीं प्राया किन्तु एक दवा बना दी है। यदि न उमे करले तो अंगाय नाम हो जायगा परन्तु मुझे पेला मालूम होता है तू उस फो न कर सकेगी। स्त्री योलो-नहीं, तुम बतलायो, जो होगी मैं जरूर कर लूगी । तब जाट ने कहा- दया तो यह है कि तीन साधुओ को नित्य प्रति भोजन करा कर स्वय भोजन किया कर । स्त्री बोली-यह कितनी बड़ी बात है। अब क्या था वही काय प्रारम्भ हो गया। श्राज और कल और यह भी अच्छी हो गई एक थार ऐसा हुआ कि तीन दिवस तक कोई साधु नहीं श्राय तो बड़ी कठिनता पड़ी। अब कहने लगे क्या करें या भूख मरा, हम भूखों, मरे जाते है । तब पुरुष ने सोच कर कामा- सुनती भी है, उसने यह भी कह दिया था कि जिस दिन को - 1 - -*- २ द्वितीय-भाग * ६५ माधु न मिले तो खाँड (मीठा ) के माधु घाजार से पनपा कर ले श्राना और भोग लगकर भाजन कर लिया करना । तब तो स्त्री ने कहा-ऐसा क्यों नहीं कर लेते । वह बाजार गया और खांह के साधु वरचाकर ले प्राया । इतने में उधर असली साधु भी आ पहुंचे तो श्राप कहने लगे-पारये महाराज, श्राप की बड़ी प्रतीक्षा शी, प्राप भोजन कर लें। जो खाँड़ के साधु 'बनवा कर लाया था यह तो घर में रखना दिये 'और स्त्री से कहा-जल्दी भोजन पना में अभी स्नान करके प्रामा है। उसके संये ने बाड़ के साधु देख कर कहा-माँ मै तो साधु नाऊँगा। मां ने कहा-बेटा एक तुम साना, एक में पाऊँगी एक तेरे पिता जी खावंगे। अब तो साधु परस्पर फहन लगे भाई — यह घर तो मनुष्य खाना मालूम पड़ता है चला यहाँ से निकल चलें अन्यथा अाज प्राण गये साझो। यच्चे ने फिर रिरियाकर कहा-मां मे मो साधु खाऊँगा। उनकी मां ने फिर वही उत्तर दिया तर तो साधुओं को पूण निश्चय हो गया कि यह घर मनुष्य सांना है। यश्च के यह शब्द सुनते ही साधु जगल की प्रोग् मागे, गाँव से बाहर गये होगे कितने में जाट भी स्नान करके भागयासाधुओं को न देख स्त्री से पुछने लगा, सायु कहाँ गये स्त्री बोली-प्रभी तो यहीं बैठे थे नहीं मालूम कहां गये । ज ट ने पूछा- 'तुमने कुछ कहा तोनहीं था स्त्रिीवाली-नहीं, मैं ने तो कुछ भी नहीं पहा यह लड़का फह रहा था कि मां साधु खाऊँगा। मैं ने यह 'कह दिया कि घेटा एक तुम साना, एक तुम्हारे पिताजी खायेंगे और एक मै खाऊँगी । पुरुष कुछ समझदार या समझगया। बोला- कितनी दूर गए होंगे, स्त्री बोली-अभी,गांव में ही होंगे। तष मो यह जैसे कुएँ पर से पाये थे वैसे ही रस्सी हाथ में: लिए ही जगल को प्रोर साधुओं के पीछे दौड़ा। साधनों - .

दृष्टान्त-सागर * . जय इमे पोछे दौड़ते देखा तो कहने लगे भाई अनी माफ़त में फैमे देपो वह सालामागा चला आ रहा है। प्राज यांचाईगा नहीं जरूर प्राए लेगा। जय साधु मागते २ थक गये तो परम्पर कहने लगे भाई जैसा करे श्रो.भगवान् ! माना तो है ही, माही जायँ भय तो भागा जाता नही । तय जाट पास जाक्षर गोता-महाराज मुझे। तीन दिन से भोजन नहीं मिला। तय तो उनके और गद्दे सदे भी प्राण पखेरू उड़ गये। साधुनों को जाट ने बहुत कुछ समझाया और कहा-माप चल कर भोजन करलें । परन्तु यद कहाँ सुनने वाले जीव थे। निगश हो जाट अपने घर को' पापस जौट आया। अम यह विचारिये उन साधुयो की भूल थी प्रथा उस पुरुष या स्त्री की या बच्चं की। ठीक नतीजा निकाल प्रायेगा किसी की भूल न थी गचल निवार में भेद था। 1 । - - । ५३-पुण्डरीकाक्ष, एक समय पुण्डरीकाजी शारित्या भरद्वाज, च्यवर आदि ऋषियों के पास इस उद्देश से गप कि चले इश्वर प्राप्ति के लिए इन महात्मानो से कुछ मान प्राप्त करें। शागिडल्य प्रादि ऋषियों के पास जाकर 'चोले-"महागज! ईश्वर प्राप्ति के लिए कुछ शान दीजिए।" तब ऋपियो ने पहा फि-"पहले तुम ज्ञान प्राप्त करने के अधिकारी बनो और तीन वर्ष तक योगाभ्यास तब तुम को कुछ बताया जा सकता है।" . -- ।

. * द्वितीय-भाग * पुगउरीक योगाभ्यास करने लगे, एक बार ऐसा हुआ फि एहरोकजी का भूख प्यास ने व्याकुल कर दिया इधर, भर अन्नचिन्ता में घूमने लगे। अरुस्मात् एक चमार मार्ग जाता मुधी इन्हें मिल गया, इन्हो ने अपनी क्षुधा की निवृत्ति लिए माजन मांगा। उस चमार ने इन्हें भरपेट भार्जन' राया। जब इनकी जाति वालों को यह समाचार मिला कि एडरीक जी ने एक चमार के यहाँ भोजन का लिया है तो पनि वालों ने इन्हें अपने से पृथर्क कर दिया, श्रोर इन में वेशेष घृणा करने लगे, यह महाराज चमारों के पास गए और कहने लगे-मुझे अपनी जाति में शामिल करलो। चमारो कहा-महाराज प्रापही हमें अपने में नामित कर लीजिए। सब पुगडरीफजी की तृशंकुवत् दशा हो गई । इधर क रहे न -- . - . इसकी समझ में एक न एक दिन पुगडरीक जी, चने जारहे थे, इन्हें एक चमार को कुमारी कन्या ने देखा और इन पर मोहित हो गई 'अपने नर वालो से कहने लगी में अपना विवा? पुराउरोकजी के नाय करूँगी । घर वालों ने पुत कुछ समझाया परन्तु माई । प्रत में इस चर्मकार न्या का विवाह पुण्डरीक के साथ होगया । कन्या के माता पिता ने दहेज में पुण्डरीक जी को एक तोता और सुअर- पदया, यह लेकर स्थान को चले गए परन्तु जाति बहिटन होने के कारण अपने स्थान पर न रह सक और धान्य केसी द्वीप में जाकर रहने लगे, वहाँ नखाने को प्रन और नरहने प्रस्थान था परन्तु यह अपने साथ तोता और सुघर ले गए थे, होने ने बहुत सा अपनी चोंच में जाकर इकट्ठा किया सुमर ने अपनी थोबड़ी से बहुत सी जमीन खोद डाली।

। . . ५६ * हष्टान्त-सागर * जय इसे पोछे दौड़ते देखा तो पहने जगे भाई अच्छी प्राकृत में फंसे देखो वह लाला भागा चला आ रहा है। आज यह छोड़ेगा नहीं जरूर प्राण लेगा। जब साधु भागते २ थर गये तो परस्पर कहने लगे। भाई जैसा करे श्री भगवान् ! मरना तो है ही, मर ही जायें अध तो भागा जाता नहीं। तर जाट पाम जाकर बोला-महाराज मुझे तीन दिन से भोजन नहीं मिला। तथा तो उनके और रहे,सहे भी प्राण पखेरू उड़ गये। साधुओं को जाट ने बमुत कुछ समझाया और कहा-श्राप चल कर भोजन करलें. परन्तु यई, कहाँ सुनने वाले जीव थे । निराश हो जाट अपने घर को वापस लौट आया। प्रय गह' विचारिये उन साधुश्रो की भूल थी अथवा उस पुरुष या स्त्री की या बच्चं की। ठीक नतीजा निकल मायगा फिसी की भूल न थी अचज विचार में भेद था। । -- । 4 , r t , IN - - ५३-पुण्डरीकाक्ष एक समय पुण्डरीफजी' शाण्डित्य, भरद्वाज, च्यवन प्रादिपियों के पास इस उद्देश मे गए फिचले ईश्वर प्राप्ति के, लिए इन महात्माप्रो से कुछ ज्ञान प्राप्त करें। शाण्डिल्य ध्याटि पियों के पास जाकर घोले-"महाराज! ईश्वर प्राप्ति के लिए कुछ शान दीजिए।" तप ऋषियों ने कहा कि-"पहले तुम शान ' प्राप्त करने के अधिकारी बनो और तीन वर्ष तक योगाभ्यास तुम को कुछ बताया जा सकता है।" --

हुमा कि
साथ परुंगी। घर वालों ने बहुत कुन समझाया परन्तु
इसकी समझ में एक न माई । प्रत में इस चर्मकार
* द्वितीय-भाग *
पुण्डरीक पगपास करने लगे, एक यार ऐसा
पुण्डरोकजी. को भूत-प्यास ने व्याकुज कर दिया इधर
उधर भन्नघिन्ता में घूमने जगे। अकस्मात् एक चमार मार्ग
में जाता दुमा इन्हें मिल गया, इन्हों ने अपनी क्षुधा की निवृत्ति
के लिए भोजन मांगा। संचमार ने इन्हें भरपेट भोजन
कराया। जब इनकी जाति वालो को यह समाचार मिला कि
पुण्डरीक जी ने एक चमार के यहां भोजा कर लिया है तो
जानि बालों ने इन्हें अपने से पृथक कर दिया, और इन से
विशेष घृणा करने लगे, यह महाराज चमारों के पास गए
और कहने लगे-मुझे अपनी जाति में शामिल करलो चमारों
ने कक्षा-महाराज प्रापही हमें अपने में शामिल कर लीजिए।
भर पुराडरीकजी की तृशकुवत् दशा हा गई । इधर क रहे न
एक दिन पुराडरीक जी चले जारहे थे, इन्हें एल चमार
को कुमारी कन्या ने देखा और इन पर मोदित हो गई अपने
पर वालों से कहने लगी में अपना विवाद पुण्डरोकजी- के
कन्या का विवाह पुण्डरीक के साथ होगया । कन्या के
माता पिनाने दहेज में पुण्डरीक ओ को एक तोता और सुअर
दिया, यह लेकर अप स्थान को चले गए परन्तु जाति
बाहित होने के कारण अपने स्थान पर न रह सक और धान्य
किसी झोप में जाकर रहने लगे, वहान खाने को अन्न और नरहने
स्थान धा परन्तु यह अपने साथ तोता और सुअर ले गए थे,
होने ने बहुत सा मन अपनी चोच मे लाकर इकट्ठा किया
और सुधर ने अपनी थोबड़ी से बहुन सी जमीन चोद डाली।
उघर के
:
I.

*दृष्टान्त-मागर* पुण्डरीक जो ने उनमें अन्न वाया, समय पाने पर फसल अच्छी हुई, अय यह प्रानन्द से अपनी चमग्या पत्नीक सहित रहने लगे। इधर अनावृष्टि हो गई मनुष्य भूग्न-प्याल में बहुत ध्यान हो गए और अन्न की चिन्ता में इधर उधर घूमने लगे, प्रश्न में पुण्डरीक जी के पास जा प्रर्थना कर कहने लगे-महाराज | कुछ सहायता करो, हम भूख-प्यास से व्याकुल है । पुण्डरीक जी ने कहा-मै स्वजाति को मवा फरूंगा मुझे तुम, लोगों ने अपने से पृथक कर दिया है अप तुम्हारा और मेरा क्या सम्बन्ध है। निराश हो सघ लोग शागिडत्य जी के पास गए और कर जोड़ विनय पूर्धक फहा-महाराज ! हम क्या करे, अनावृष्टि के कारण पेश में अकाल पड़ गया, अन्न उत्पन्न नहीं हुमा भूखों के कारणे मरे जाते हैं। परन्तु पुण्डरोक के यहाँ विशेष अन उत्पत्र दुपा है यह हमें देते नहीं हम से घृणा करते हैं। महाराज ऐमा उपाय बताइये जिनसे वह फिर हमारी और पाजायें और हमारी सहायता करें। तब शारिशल्य श्रादि ऋपियों ने कहा इसका एक ही उपाय है कि उन का प्रायश्चित करलिया आय, चना उनका प्रायश्चित करने । तव सय मनुष्य और ऋपि मिजकर पुण्डरोक के पास गए और उनका प्रायश्चित कर अपने में मिला लिया प्रायश्चित करते समय शाण्डिल्य अपने निम्नलिखित ग्लोक' पढ़ा जोकि ब्रह्मवैवर्तपुराण अध्याय ३१ श्लोक १५ में लिखा है मपवित्रः पवित्रो वा मर्वावस्था गतोऽपिवा ।। 'यःस्मरेत्पुण्डरी काक्ष स वाह्याभ्यन्तरः शुचिः ॥ इस श्लोक को पढ़ कर उस चमारी लड़की के हाथ का बना हुवा दाल भात लपने सहर्प मिल कर खाया। , । । ।

* द्वितीय-भाग *
.
इस श्लाक का अर्थ पौगणिक पण्डित विष्णुारक किया
करते हैं और कहा करते हैं कि कम त क से हों- नयन जिनके
ऐसे विष्णु महाराज के स्मरण करने से बाहर भीतर सय शुद्ध
हो जाता है।
परन्तु जहाँ यह श्लोक है वहाँ यह पुण्डरीक की कथा भी
आई और उस कथा अन्तर्गत ही यह श्लोक है। ऐसा
अर्थ कदापि नहीं है जैसा हमारे भाई समझते है ।
५४--पिण्ड भरना
एक सेठ और सेठानी किसी जगह रहते थे। एक पण्डे ने
- सेठानी से कहा-"तुम अपने पती को गया करने मेज दो।"
- सेठानी ने सेटजी से कहा कि-'तुम इस घर्ष गया पी में
जाकर अपने पितरों का पिगड भर प्रायो, पराडा जी कह गये
हैं।" सेठजी बोजे-भात जानती है कि वहाँ कितना खर्व
हागा। कम से कम कुछ भी न लगेगा तो १००, माये तो
। प्राश्य ही जग जायेंगे परन्तु मैं एक फौड़ा भी खत्र करना नहीं
चाहता, तू कहती है गया कर भाभा, भला में गया कैसे कर
भाऊँ।" जब सेठानी ने बहुत जिद्द की तो प्राप चलने को
उद्यन
और चार पाने पैसे लेकर गया की गमन पिया।
स्त्री गेली-"मला तुम चार पाने में गया कैसे कर मानोगे ?"
तो कहने लगे-इन्हीं चार प्राने से फमाता कमाता गया
पहुँच जाऊँगा।" आखिर प्राप चल पड़े और कुछ दूर किसी
नगर में जाकर चार पाने का पुत्र शाक-मूली इत्यादि मोन
लेकर पेच लिया, चार पाने के पांच पाने होगप, पांव माने
1

* दृष्टान्त-सागर * 1, r - 1- - लड़के ने भीतर जाकर पण्डा जी की, मान सेठजी को ज्यो की त्यों सुना दी1 सेह-कह दो कि इस समय वित्त ठीक नहीं है, फिर ग्राना। लड़के ने द्वार पर जाकर पण्डा जी से सेठ की बात सुनाई। पण्डा--यह कह दो कि मैं चिक्त्सिा (लाज),करना भी जानता हूँ एक गाली दे दूंगा तुरन्त पाराम हो जायगा । ( सेठजी मनही मन कहने लगे भाई बड़ी कम्बख्ती भाई एक पैसा भी देना नहीं चाहता)। सेठ-जामो समे कह दो, वह असाध्या हो चुके हैं प्रो कोई दम के महिमान है, आप क्या चियित्मा करेंगे। पण्डा--अच्छा तो भाई हम भी अव क्रियापर्म फराकर ही जायेंगे, पुस्तक पना हमारे पास है, अच्छा है , अन्त्येष्ठि में इमारा हाथ भी लग जायगा, जाभो कह दो। लड़के ने सेठजी से जाकर कहा-पिताजी पगडा तो ऐसे बह रहा है। सेठ-अच्छा तो मेरी अर्थी व दनायो और तुम दोनों माँ बेटा रोने लगो। स्त्री-भवा हम से रोने लगे, धैमै तो रोया भी नहीं जाता। मजा तुम पोने पांच पाने के पीछे क्या तमाशा बना - 1 . . - 4 - ८. - - म - । - * द्वितीय-भाग * - सेठ-मैं ए पैसा तक भी न दूंगा त था तो रोने लग, मन्यथा मैं सलाना भी जानता है। सोटा उठा कर मार दूंगा अभी रोने लगेंगी। अब सेटानी जो सोचने लगी यदि मैं म रोई तो यह मार मार स्लागारल लिए रोने में ही भलाई है। मेठानी रोने लगी, पास पास क पुरुषों ने प्रर्थी बनाई और राम गम सत्त है , राम गम सत्त है' रहते हुए श्मशान घाट को ले चने, पोई पीछे पगडी भी राम राम सत्त है, गर्म राम मत है' कहता हुआ यहीं पहुँच गया और चिता तयार कराई। Fri पगडी जी ने लड़के से कहा कि-"माई लड़के । अपने पिता जी में पूछो बह पौने पांच प्राने देने हैं या नहीं। लड़का-पिताजी, पण्डा पौने पाँचः प्राने का सोना स्वर्ण) मांगता है। । 'सैठ-मैं एक कौड़ी भी न ढुंगा, तुम अपना काम करो। सेट जी को चिता पर रख उन पर पड आदि प्रच्छी नरह- जागा दिए। पण्डा-भाई लड़के व फिर पछ देखो देते हैं या नहीं, मयथा फिर स्वाहा स्वाहा पाहुतियाँ लगने लगेंगी। लड़के ने, निना के पास जाकर सेठ जी से कहा-पण्डा जो कुछ कह रहे हैं। 'मेठ-कने दो, मै एक कौड़ी भी न दूंगा, तुम भाग जगायो । लड़के ने फस का कना लेकर उस में अग्नि न फेंक मार कर सर की ओर से रोकी और भी अग्नि लगा - . 4 - 1 - - ।

१२ * दृष्टान्त-सागर'* लड़के ने भीतर जाकर पण्डा जी की बात सेठजी को ज्यों की त्यों सुना दी। मेठ-कह दो कि इस समय चित्त ठीक नहीं है, फिर - भाना । N . न लड़के ने द्वार पर जाकर पराडा जी से की बात कह सुनाई। पण्डा--यह कह दो कि मैं चिक्त्सिा (इलाज) करना भी जानता हूँ एक गाली दे देगा तुरन्त पाराम हो जायगा। ( सेठजी मन ही मन कहने लगे भाई बड़ी कम्बख्ती भाई पक पैसा भी देना नहीं चाहता)। सेठ-जानो उससे कह दो, वह प्रसाध्य हो चुके है और कोई दम के महिमान हैं, आप क्या चिकित्सा करेंगे। पण्डा-अच्छा तो भाई हम भी अघ क्रियाकर्म कराकर ही जायँगे, पुस्तक पत्रा हमारे पास है, अच्छा है अन्त्येष्ठि में। हमारा साथ भी लग जायगा, जायो कह दो। लड़के ने मेठजी से जाकर कहा-पिताजी परहा तो ऐसे ऐसे वह रहा है। सेठ-अच्छा तो मेरी अर्थी वर्थी बनानो और तुम दोनों माँ बेटा रोने लगो। स्त्री-मता हम से रोने लगे, 'पसे तो रोया भी नहीं जाता। भला तुम पौने पांच पाने के पीछे क्या तमाशा पना 1 - 4 4 1 M " , . --- 16 . . 1 । - - - । * द्वितीय-भाग* १३ 'सेर में एक पैसा तक भी न दूंगा तू या तो रोने लग, अन्यथा मैं रुलाना मी जानता है। एक सोटा उठा कर मार दूंगा अभी रोने लगेगी। प्रध सेठानी जी सोचने लगी यदि में न रोई तो यह मार मार रलावेगा इस लिए रोने, में ही भलाई है। मेठानी गेने लगी, प्रास पाम के पुरुषों ने अर्थी यनाई और राम राम सत्त है, सम गम सत्त' पाहत हुए श्मशान घाट को ले चले, पीछे पीछे पण्डा भी 'राम राम सत्त है, गम राम मत है' कहता हुमा यहीं पहुँच गया और चिता तयार कराई । पण्डा जी ने लड़के से कहा कि "माई लड़ापने पिता जो मे पूछो वद पौने पाँच प्राने देते हैं या नहीं। लडका-पिताजी, पण्डा पौने पांच पाने का सोना (स्वर्ण मांगता है। मेठ-मै एक कौड़ी भी न ढुंगा, तुम अपना काम करो। 'सेठ जी को चिता पर उन पर गन्डे अादि अच्छी तरह लगा दिए । पण्डा-भाई लड़के प्रय फिर पछ देयो देते हैं या नहीं, अन्यया कि स्याहा म्यादा पाहुतियां लाने गी। लड़के ने चिता के पास जाकर मेठ जी से कहा-पण्डा जो कुछ कह रहे हैं। मेड-पने दो, मै एक कौड़ी मी न दूंगा, तुम भाग जगायो । जड़के ने फल का ना लेकर उम में अग्गि रम्य फक , मार कर मर की भोर में पैरों, को और भी प्रति क्षमा . , .. -- .

-
दृष्टान्त-सागर *
दी। तम पराडा जी सेठ के मामने जाकर रहने लगे-"मैं तो
तुझ से याचगा करन पाया था। तू अपनी हठ का
पका है, पौने पांच पाने के लिए मरन को उद्यत हो गया,
अथ मैं तेरे सामने हैं, तू जो चाहे तो माँगने ?"
सेठ जी वाले- "नहीं महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिए,
वेधल वह पौने पाँच प्राने ही बख्श दीजिए।"
पगडा-जा दुर्बुद्धे ! तूने कुछ भी न मांगा, जा तुझे पौने
पांच पाने का स्वर्ण ही दिया।
पाठक ऐसे भी मनुष्य संसार में है जो मामूली सी
चान पर (पोले पाँव आने पर) प्राण देने को तयार होंगे।
कुंडलिया-द्रव्य पाय के देत नहिं, और करै नहि भोग ।'
निश्चय ताकी सम्पदा, होत और के भोग ।
होत और के भोग दण्ड पहु राजा माँगे ।
अग्नि लगे जरिमाय चोर पंचक ले भागे ।
भॉति भाँति के दुःख उसी के कारण पावें।
वा धन ही के काज मरे दुर्गति में जावे ॥
५५-दो बहनों का संवाद
प्रश्नोत्तरी-
दुतारी 1-जाना क्यों न साया गया क्यों न गाया
-गतान धा ।।
4

है"
* द्वितीय-भाग *
।
दुन्तारी-रोटी क्यों जली? माला क्यो सड़ी ?
इन्दिरा-फेरी गई थी
दुनारी-पधिक क्यों न मोया ? मेम क्यों न गई ?
इन्दिरा-साया न था।
* दुलारी-ब्राह्मण क्यों न हाया ? धोधन क्यो पिटी ?
इन्दिरा-धोती न थी।
दुलारी-योरा फ्यो 1 सिया १ पट्टी क्यों न वेधी
.इन्दिरा-शा न था।
दुलारी-पधिक प्यासा क्यों ? गधा उदासा क्यों?
इन्दिरा-लोटा न था ।
दुलारी-माला क्यों न ढूँढा ? वर्फी पथो न बनी ?
इन्दिरा-पाया न था ।
दुलारी-पान क्यों सड़ा' 'घोड़ा क्यों अड़ा
इदिरा-फेग न था।
इलारी-उदास क्यो धनी ? भुजिया-क्यों न पनी?
''इन्टिग-सोया न था।
हुजारी-मार क्यों न साया? वजीर स्यों न पखा?
इन्दिरा-दाना न था।
नोट-पाठक यह प्राचीर बातें जो हमारी पहनों तथा माता-
ओ में श्री नाएक पान पर और प्रश्नोत्तरी छिड़ी, इसी
कारण उन बुद्धि तीन ओर मनागुणी होती थी।
८
.
-
.
-

*धान्त-सागर* पाठक इस का नाम था मैत्री, और यह भारतीय प्राचीन शिक्षा का फन था अब तो भाकाश-पाताल का अन्नर है। T - 3. । । ५७-बीर बल की बुद्धिमत्ता एक पार मुसलमानों ने मिल कर बादशाह अकबर से प्रार्थना की-हुसूर हम इन ने बड़े २ विद्वान और अनुभवो पुरुष । है, भाप हमारे मुकाविले में एक माधारण पढ़े लिखे हिन्दु को । बड़े २ अधिकार दिए हुए है, नही मालूम क्या कारण है जा हुजूर कर अपनी जाति का कुछ मी पक्ष नहीं। नव बादशाह प्राशा दो कि अच्छा ना कार्य हिन्द कर सकते हैं यदि तुम उस कार्य को कर सफने हो तो तुम को यह अधिकार दिय जायेंगे, इस लिये अमुक तारीख-को तुम सा हमारे प्रश्नों का उचर देने के लिये राज दरबार में उपस्थित हो। + यह माशा पाकर मर अपने स्थान को को गरे योर नियन तिथि की प्रतीक्षा करने लगे। तिथि भी प्रागई तब सय मुसल. मान अधिकारी राज दरबार में उपस्थित हुए।' बादशाह ने. एका-"क्या तुम हमारे प्रश्नों का उहादोगे सपनेहा करदी। बादशाह ने पूछा-'अच्छा पवायो कि मय न दरबार में उपस्थिन मनुष्यों के चित्त में क्या बात है ?" यह सुनकर सब चुप होगए । उन मुसनमान अधिकारियों में से एक ने कहा-हुजा इस के उनदक नि मलाइ मिना चादि ।" Rशा गान। गया । स प्रकले २ मकान पर गए । पोडगे बादशाह को क्या पक्षादेंगे एक सप्ताह समास होने को पक्षियों को . १ 4 1 । -- " - * द्वितीय-भाग 'कुछ भी समझ में न प्राया । अलिम दिन सप राज दरकार में उपस्थित हुए। पादशाह ने प्रचा-'कहो यश उत्तर लारे" तो चाले-"दुजूर इनका उत्तर ही क्या लाभला दुसरेके मन की बात कोन जान सकता है।" बादशाहपोला-हिन्दुयो म यही तो विगे- पता है ये दूसरे के मन की बात बता देते है । देखो हम प्रोग्यल को तुम्हारे सामने हो बुलाकर पूछने है । वीरपल बुलाया गया और यही प्रश्न जो उन से किया था पहा । बोरवज बोला- "इजर यह क्या प्रश्न है नर उपस्थित मनुष्यों के चित्त में यही कि हुजूर का इकबाल हमेशा कायम रहे।" फिर क्या था । सपने कहा-ठीक है, सय के चित्त में यही बात है । बादशाह चाला-देखो दिन्दुयों में मही विशेषता है । जय बादशान 2. अपने महल में पहुँचे ना' उनकी बेगम ने मी घरी पोत मागने रक्सी, जो कि उव का भाई सलावत उस से पह गया था। पादशाह बोला- 'सुना वीरयात के बगवर इन में कोई मी बुद्धिमान नहीं है मैने पर प्रश्न किया था, उस का उत्ता तो ६ई दे न सका।" अंगम गोली-"प्रापक प्रश्नही अडबड हुआ फाते हैं, कोई रियाजा प्रान कीजिए फिर देसिप कौन इचर देशा है।" बादशाह वौजा-"अच्छा दमकत पेसा ही प्रश्न करेंगे। भान होते ही सब का चुनाया योर कहा-" -"देखो में इस साराज पर एक रमा खींचता हूँ, कागज भी न फट और रघड़ भी न लगे, किन्तु रेखा घट जाय !" सर क सब हैरान थे पया करें बोले-"हुजूर यह रेन्त्रा इस प्रकार केमे घट सकती है , . - *:- - बादशाह बोला-वस यह मी प्रश्न हज नहुधा फिर पौरपल को शुलपाया और कहा कि-"तुम इस रेखा को छोटो करो।' घोल मे तुरन्त पेन्सिल से एसी रेखा के पास एक पत्री रेखा ,

T
* दृष्टान्त-सागर,
खींच दी। देस कर सब यडे विस्मित हुए और कहने लगे-माई
चीरवर बड़ा तीन बुद्धि है।
--
--
लाधनमुद्र
-
4
५८-अमली जीवन
जब जापान में इस बात की आवश्यकता हुई कि सियो के
प्राकममा को समुद्र में कुछ जहाज दुवा कर रोक दिया जाय ! तो
'जापान के गजा मेकाडा ने कहा-'मै प्रजा पर पिसी प्रकार,
से पतात्कार नहीं कर सकता", जिनका ऐसे जहाजो के
म इयना स्वीमार हो वे अग्नी इच्छा पूर्वक प्रार्थना
पत्र लिखकर पेश कर।
फिर क्या था, सहस्रो प्रार्थनापत्र, अावश्यकता से भी
अधिक, एक दिन में प्रागर। परन्तु अव इन प्रार्थनापत्रों में से
चुनाय को आवश्यकता हुई। जिन प्रार्थनापत्रों को जापानी
युवकों ने अपने शरीर से संधिर निकाल कर लिखावे ।
नकाल ही स्वीहत होगप ।
जय जहाजो के साथ यह लोग अपने देश की रक्षा क
निमित्त प्राण दे रहे थे। तो एक जहाज के कप्तान से किसी ने
का कप्तान काय 1 श्राग को जो काम करना था वह तो कर
चुके, अब धाप अपने प्राण बचा कर नले जाइये। तब कप्तान ने
मृत्यु को तृण समान मानते हुए उत्तर दिया,"क्या मैंने लौट
जाने के लिए अदा पर आने को प्रार्थना पत्र भेजा था ?"
यह है मामती जीवन
-

1
* दितीय-भाग *
नैन-द्विदन्ति शस्त्राणि, नैनं दहति पावकः ।
न चन होदयन्मापा नयशोपयति मारुतः ॥
मुझको काटे कहाँ है वह सलवार ।
दाग दे मुझको कहाँ है वह नार ॥
गरम मुझको करे कहा है वह पानी।
हवा में क्षेत्र ताव सुखाने की ।।
मौत को मौन न भायेगी।
कसद मेरा जो करके थायेगी ।
H
-
4
५६-अमरीकन युवकों की देशभक्ति
एक थार अमरीका में विद्या सम्बन्धी पोज के लिए
जीवित मनुष्यो को चीरने की प्रापश्यकता हुई। कई मनुष्य
अपनी अपनी छातियां खोल कर सामने खड़े होगप और कहने
जगे-"ला हमें चीरा, इमे झाटो, ईश्वर कर हमारी जान शाय,
हमारी जीवितही चीर फाड़ शुभ हो । यदि इस से विद्या की
उन्नति हो और दूसरों का भला हो तो हमें चीरने में एक क्षण
को भी देरी न की जाय।"
पाचक गण ! इसे प्रेम कहें, या धोरता फर्दै, इसका नाम है
अर्मजा जीधन | जब तक हमारे भारत में भी इन शुभ विचारों
मनुम्पन बनगे तब तक देशोन्नति का स्थान मात्र देखना।
4
.

* दृष्टान्त-सागर *
६०-निराश मत रहों
अली बाबा एक यान ही निर्धन मनुष्य थे और उनका
समय बहुत बुरी तरह व्यतीत होता था। उनका बड़ा भाई बड़ा
धनवान था और अली याश से विशेष र्या रहता था, उनकी
उन्नति को किसी दशा मे देन न सकता था।
भाग्य का फेर किसी फी समझ में नहीं पाता, अली धारा
के दिन फिरे । एक दिन प्रली धावा जगल में जकड़ी काटने
गए थे, वहां उन्हें एक सेना सी आती दिखाई दी। चितारे डर के.
मारे एक वृक्ष पर चढ़ गए और छिप कर बैठ गए । वह कोई
सेना न थी किन्तु उसी जगल में रहने वाले डाकुओं का एक,
समुदाय था, जिन्होंने अपने रहने को यहां स्थान बना रक्खा
था और 'लूट मार का जो धन लाने, वह वहां जमा करते
रहते थे।
डाकुप्रो के सरदार ने एक स्थान पर खड़े होकर कहा-
"खुलजाय शम शम्" यह कहते ही एक घड़ा द्वार खुजा और वे
डाकू उम के भीतर प्रवेश कर गए। जब वे निकले तव सी
सरदार ने वही 'शम शम्' शी प्रावाज़ लगाई। द्वार खुजगया.
और वह समुदाय जंगल की ओर चलागया।'अलो याया वृक्ष पर ।
चढ़े चढ़े सब कुछ देखते रहे और अपने मन में कहने लगे
यह 'शम शम्' तो खूब अच्छा है। चट वृक्ष पर से उतरे और
मार पर जाकर वही 'शम शम्' की आवाज लगाई, द्वार खुल
गया, - अली शवा द्वार के भीतर चले गए। भीतर जाकर देखा
बहुत माल-प्रताप भरा हुआ है । अली चाचा के वर्ष का
ठिकाना न था । फूले अगं न समाए। जिन गधों को यह लकड़ी-
M
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- , . - , । द्वितीय-भाग* बादमे के लिए ले गए थे उन पर अच्छी तरह प्रशफियाँ 'बादी और अपने घर का रास्ता लिया अपने घर पहुँचे । फिर पया था अली धाया मालामाल हो गए । ईश्वर की जोमा अपर- पार। एक एक से एक एक को बंद कर बना दिया । दाग किसी, किमी को मिकन्दर बना दिया । अलीपाश के भाई को जप यह समाचार मिजा तो यड़ा सुखी ग्रा, भावज तो जज कर गये हो गई 'पाठक | आज जो टुरड़ों के लिए मोहताज है, फल राजगही का स्वामी यमा दिखाई देता है, आज जिस के सर पर राजमुकुट सुशोभित है, न सम्भव है वह गली गली मारा मारा फिरे । यही ससा की गति है नहीं मालूम ईश्वर क्या से पया करदे । प्रतपय मनुष्य को धन धाय पूर्ण होकर उन्मत्त न होना चाहिए और न दुखी दरिद को निराश होना चाहिए, जो जिस अवस्था में है उसको उसी अवस्था में रह कर परमात्मा को धन्यवाद देते हुए प्रानन्द से रहना चाहिए। -- + . भ - । ६१-बड़ा कौन है? " एक बार बादशाह अकबर ने दरगारियों से पूछा कि सब से पधिक उत्तम पत्ता कौन सा है। एक ने कहा, पीपल का, दुसरा बाला कत्रनार का और तीसरे ने सब से अधिक बड़ा कलेक रत्ते को बताया, परन्तु प्रकार की समुष्टि न हुई, पादशाह ने 11 , . - - २०६ * दृष्टान्त-सागर * "कि सब मिल कर राजा का पलंग उठाकर घमुक' बगीचे में रख प्रायो, मै भी साथ ही चलती हैं।"दासियों ने इस चतुराई, से पलॅग उठाया कि राजा को कुछ खबर न हुई । सबेरा हुआ राजा जंच सो कर उठा तो अपन को बगीचे में पाया रानी को पास पठी देव बड़ा क्रुद्ध हुअा और फांसी की प्राशा दी। रानी ने हाथ, जोड़कर कहा-"स्वामिन् ! अपराध क्षमा हो मैने श्राप की प्राशा का पालन किया, स्त्री को पति से अधिक प्यारी और सुख देते वाली को वस्तु नहीं है, आप के अतिरिक मुझे कोई वस्तु प्यारी न थी, आप मेरे ही थे इन कारणा आप को उठा लाई !" राजा रानी के चातुर्य को देन या प्रसन्न हुश्रा और कहने लगा-प्यारी. मैं तो तुक से अप्रसन्न नहीं था यही बात देखने के लिए मैंने तेरी परीक्षा ली थी ... पत्यो नित्यं नानुरक्ता कुशला गृह कर्मणि ] पुपसूः सुशीला याः मिया पत्युः सुयौवना ।। जो स्त्री नित्य पति में प्रेम, गृह कार्यों में दक्ष, पुत्रवती, सुशील शोभा युक्त 'शरीर वाली होती है वह अपने पति को प्यारी होती है। इमं धर्म यर्थ नारी पालयन्ति समाहिता। अरुन्धतीव नारीणा, स्वर्गे लोके . महीयते ॥ - , जो स्त्री एफ मन होकर अपने धम'का पालन करती है पE अरुन्धती की तरह स्वर्ग में अाहता होती है। + - म . 1 . 11 -- . पाना है योगबल को नहीं जानती। अभी यह इस बात को सोत्र ही ठिकाना न रहा। स्त्री के वावर प्राने पर वह ' योगी उसके * द्वितीय-भाग १ १०७ ६४-पतिव्रत धर्म और योगबल एक,योगी पन में वृक्ष के नीचे या था, सहसा दो कौवों नाली मुझ पर काय कार मचा कर यागी को कुद्ध कर दिया। व्योहो उसने अपनी तीक्ष्ण दृष्टि ऊपर की ओर की, त्यों ही वह दोनो कौवे मर का वृक्ष से नीचे गिर पड़ा योगी अपना ऐसा प्रभाव देख कर बड़ा गर्वित होगया। एक बार यही योगी किमी गाँव मे एक पृहस्थ के द्वार पर भिक्षाध गया. माता भिक्षा दे दे की अनाज नगाई। भीतर से स्त्री-कण्ठ से उत्तर मिला, जरा ठहरो। योगी है, यह प्रमागिनी स्त्री मुझे ठहरने को कहती है । मेरे रहा था कि भीतर में फिर प्राधाज पाई-बेटा क्रोध मत कर यहां कौवे नही रहते । अब तो योगी के आश्चर्य का पर गिर पड़ा और कहने लगा-मां तमने यह बात कैसे जानी? श्रो बोली-मैं एक साधारण सी हूं किन्तु मैंने सर्वदा अपने धर्म का पालन किया है। प्रभो मैने जब तुम्हें हरने को कहा पात मे अपन रम्य पति की सेवा में लग रही थी। पति सेवा ही मेरा धर्म है, अपने धर्म का पालन करने के कारण मेरा हृदय इतना निर्मल होगया कि मैं इसरों क मनो त भाव जान जाती हूँ। पति शुश्रूषेव नी कान लोकान् समश्नुते । । 'दिनः 'पुनरिहायाता , सुखानामम्युधिर्भवेत् । - - यावत्स्य । पति की सेवा करने से यौन उत्तम जोक को प्राप्त नहीं करती, से स्वर्ग से अधिक सुख यहीं प्राप्त होता है।

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* द्वितीय भाग - - . . -- - hi १ था, उस १५० हाथ लम्चे सूत का भार केवल पत्तोमर था, पर डाका जिले क सुर गाँव में १७५ हाथ लम्बेसून का भार १ रत्ती पाया गया था। ढाके के रजिडेन्ट ने सन् १८४६ ई० मे एक पुस्तक लिपी यो। उल में लिखा है कि एक बार कवल प्राध सेर में २५० मील लम्बा सून तसा किया गया था। (व.) एम कारीगर ने बादशाह, प्रशयर को मलमल का एक थान बॉम को छोटा मो नकी म न कर भेंट किया था। वह पान तता लम्बा चौड़ा था कि अम्बारी सहित हाधी डक लाता था। (ग) ढाके मे जा खाम मलमल एनती थी उसका थान १० गक्ष लम्बा और एक हाय बौड़ा होता था, इस १० गन যায় যখন চা পা জয়ন ২ ন্যরা ওই নারী গ্রামে कालिपटा मापक यान अंगूठी कछिद्र में से पारा जाता था। । ' (গ), ঘৰ এক গান মাষী মরমর জ্ঞা पर धान भट में दिया था, जब उम धान की मात तह पनाकर छोरगजर की तरकी ने पहना तर भी उसका सारा शरीर मजकमा रहा महाकवि माघ । घरों की सूक्ष्मता का Mirar हुये लिया है। इपि स्पष्टतरेण यन्त्र पच्छेषु नाग कुन मण्डलेछु । सारा साम्य धुम्माणि न मागतः केवल मतोऽपि बार एक कवि ने और भी जिला है की देरी प्रादि की कारीगरी गाउँ काँ। नजरिया की कुशलता सका। - - . - L 'ष्टान्त-सागर * 2 71 7 करने के लिए रख दिया और आप स्वयं पति के चरण दवाने लगी। उस स्त्री का एक डेढ़ वर्ष का बक्षा खेलते खेलते प्रति की ओर बढ़ने लगा, अनायास ही वो का पैर अग्नि में जा पड़ा पतिव्रता स्त्री ने अपने पति को छोड़ कर जाना उचित न समझा परन्तु अग्नि की क्या सामर्थ्य जो उसके पुत्र को जाला सके। सुतं पतन्तं मसभीक्ष्य" पावके, न बोधयामास पति पतिव्रता पतिवता 'शाप भयेन पीड़ितों, हुताशनश्चन्दन ... पङ्कशीतलः ।। पतिमता ने अपने पुत्र को अग्नि में गिरते देख कर भी पति को न जगाया पर पतिव्रता के शाप के डर से प्रति चन्दन की भाँति शीतज हो गई और उसके पुत्र को न जलाया। इस अपने धर्म की रक्षा करना स्त्रियों का मुख्य कर्तव्य है। अनुल्या ने रामायण में सीताजी को कैसे सुन्दर शब्दों में इस धर्म की महिमा प्रकट की है कह पिवधू सरल मृदुधानी । नारि धर्म कछु जात बखानी ।। माता-पिता-भ्राता....हितकारी । मित सुग्व-मद सुन राजकुमारी ॥ अमितदान भत्ता अधम सो नारि जो सेवन तोही 17 धीरज भर्म मित्र भरु नारी । 7 14 " वैदेही । * अद्वितीय-भाग 4 " मापत काल परख ये चारी। द्ध रोगवश जड़ धनहीना । अन्ध बधिर रोगी अतिदीना ॥ ऐसेह पति कर किये अपमाना - २. नारि पाव यमपुर 'दुरव नाना ॥ 'एक ही धर्म -एक व्रत नेमा में काय बनन मन पतिपद प्रेमा ।। या भार समुत्सृज्य रहश्चरति , केवलम् । ग्रामे वा शूकरी सूयाकुली वाश्वविद् भुजा ।। अनुकूला न वादिष्ट दशा माध्वी पतिवता। एभिरेव गुणयुक्ता श्रीरेव, स्नी, न संशयः॥ : । ग 7 4 , ७०-गहने से स्त्रियों का प्रेम Us बार रात्री को किसी के घर में आग लग गई- पुरुष । । बच्चों को गोद में उठा कर घर के बाहर निकल भाग और स्त्री को निकाला । स्त्री रोने लगी. हाय, मेरे कपड़ों का सड़क जल जायगा गहनों को सन्दकची जल गई तो फिर ऐसे गहने कहा धनंगे । * पुरुष ने बहुत समझाया परन्तु यह रोती ही रही। कहा कि मेरो सन्देवचीन रजनने पावें चाहे कपड़ों का सन्दुक जान -- M +

*हान्त-सागर *
-
जाय, जसे भी यने सन्दूकची निकालनी चाहिए । स्त्री को अधिक
रोते देख कर वह मनुष्य गहनो की सन्दुक्रची निकालने घर
में घुसा । जब तक वह लौटा न था कि उसके कपड़ों में
प्राग तग गई, कपड़ों की भाग बुझाने में गहनों की सन्दूकची।
छूट गई, वह पुरुष बड़ी कठिनता में बाहर प्राया और
अचेत होकर गिर पड़ा शरीर में छाले पड़ गए थे, वो चिकित्सा
करने पर भी अच्छा न होसका, अन्त में ससार से कूच
'कर गया ।
धिकार है। ऐसी स्त्रियों को जो अपने पति को गहने और -
फपड़ों की चिन्ता मे डालती है।
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१
v
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७१-भेद से हानि
एक यदई धन में लकड़ी काटने के लिए गया । वः धन में
जाकर बैठ गया और विचारने लगा कि कुल्हाड़ी मे पेटा नहीं
है इस लिए किसी वृक्ष से दहन काट कर फेंटा बनालू । बढ़ाई
चन में सब वृक्षों पर हो पाया परन्तु पिसी वृक्ष ने अपना रहना
"न काटने दिया। क्योकि वे जानते थें यदि इसकी कुल्हाड़ी
मैं बेटा पड़ गया तो इंमाग सर्वनाश किए बिना न छोड़ेगा ।
'अस्तु अन्त में एक पुराने वृक्ष ने कहा-भाई घबराओं मत यह
*हमको कहा तक फाटेगा क्योंकि हम तो संख्या में बहुत
अधिक है।
2 "अन्त मे पढ़ा ने "एक सूखे वृक्ष में रहना काट कर अपनी
कुल्याड़ी में वेंटा डाल लिया। रियाया देखते देखते बदई नि

* द्वितीय-भाग"* । - + सोरा वन काट डाला तवं घनों ने कहा-"भाई बिना भेद वई कुंभी नहीं कर सकता था यदि हम सूपे वृक्ष से टहना न काटने देते तो आज हमारा सर्वनाश क्यों होता।" {" " यत्नात्मीयो जनो नास्ति, भेदस्तत्र न विद्यते । . कुठारे दण्ड निर्मुक्ते, भिद्यन्ते सरवः कथम् ।। अपने श्रादमियों के बिना कभी भेद प्रकट नहीं हो सकता, यदि कुल्हाड़ी में से उटा निकाल लिया जाय तो फिर वृक्षों को काटना कठिन ही है। -- कुठार मालिका दहा कम्पिता मकला, दमाः । .. वृद्धस्तररूवाचेद स्व:जातिनैव दृश्यते ॥ । कुरहाड़ी को देख कर, सारे वृक्ष कांपने लगे तो एक पुराने वृक्ष ने कहा-भाई यहाँ अपना काई नहीं है। 2 , - . " -- । - । F TH - M . ७२-अफ़ीमची की पिनक' एक अफीमची सायकाल के समय अफ़ीम घोर पर पोकर 'पाखाने को हाजत होने परं घरदी टॅटो मे जा डटे। पाखाने के अपर छत का परनाना था, इत्तफाक से अफ़ीमची सादर की बीवी को पेशाप लगा तो उसने अपने नित्य नियमानुसार छत के परनाले पर जा कर पेशाय किया। नीचे उन हजरत के सर पर घनघनाते हुए प्रागिरा, तो प्राप पोर्नफ से उचक नूत की तरह मिनमिनाते हुए गोले- . 1 * दृष्टान्त-सागर 1 - । घल्लाहक्या खूब मालूम होता है कि रहमने बारी शुरू हो गई। यह बात भीमची साहय की पुत्र वधू जो पहली हो । वार अपने घर आई थी, टट्टी के ऊपर,क्त पर सड़ी हुई सुन रही थी, बहू ने चोर के छिपने की शका की, वह खूब जोर से एक साथ ही चोर चोर करके चिल्ला पड़ी, बहादी पाबाज़ सुन फर उसका पति और सास भी दौड़ी, मारो, लेना है, दौड़ी, चौर है चोर है कर के हल्ला मचा दिया । "। एक हंडिया जो कोठे पर रक्खी थी जिसमें किसी ने छोटे पश्चे का पाखाना डाल राख मे ढक दिया था। उस बहू ने जब और कुछ न पाया तो उस हँडिया को उठा कर अफीमची के सर पर तान फर'मारो तो इंडिया भड़ौफ से 'फूट गई । अफ्रीमची, साहार के शरीर पर पाखाना ही पाखा होगया, और मुंह के चल खुड्दी में गिरपडे। सामने के तीन दांत टूट कर मुंह खिड़की सा बन गया और जो प्राता गया, अंधेरे में विना पूछ जांच कर दे घूसा और दे जूता परने लगी। सैकड़ों मोचीपत्र मियों की चाँद पर पड़े। हल्ला-गुल्ला सुन कर पुलिस वाले भी श्रा पहुंचे और जप दीपक जलवा कर उन्होंने देखा तो घर के मालिक मियाँ वुर्दघार अनी पड़ एए कल्हा रहे है। सब लोगों ने बड़ा खेद प्रकट किया। यह सब अफोम कर दी फल है। इसके अतिरिक्त और क्या क्या हानियाँ इस से होती है। देखिए- भफीना निद्रालुर्भवति मलरोवी 'च मनुजो, विधत्ते,प्रेतत्व गमयति च स्वासो नहिं कचित् । थनाते तस्मिन्वै भवति बलहीनः प्रभुरपि, - 1 1 , 1 n . . " - ग -- प *द्वितीय-माग तथैवाग्नेन्द्रिय : भवति धननाश: प्रतिदिनम् ॥ अफ़्यून ख़ाने वाले को रहता है 'ददोगम । तनहे नही जोफ से उठता नहीं कदम ।। गर्दनः झुकाये रहते हैं पीनक में दम - यदम । 'आँखों में ढलका चेहरे पर ज़र्दी कमर में खम ॥ दो चुसकियाँ जो पी तो मिठाई की चाट है। दुनिया की नियामतों से तबीयत उचाटा है।' कवित खून को सुखाय देवै जिगर जलाय देवै धातु को फार मुरदा करिडारे है,। कान,को मुंदाय दे नाक को दवाय देवै ,नैन मुरझाय देव दृष्टि को प्रहारे है ॥ चाम मकु- चाय देवै गले को बिठाय देव जीम को रुकाय देव मौत को सम्भारे है। फायदा अफीम से न किसी को हो गित्र लोगों खाय जो अफीमशीघ्र मौत को पुकारे है। - - AF 1 - " . ३ - . 1 7 . ७३--तीर्थ यात्रा और चतुरा स्त्री एक बार एक ब्राह्मण अपनी स्त्री सहित तीर्थ यात्रा के लिए गया। यात्रा अधिक लम्पी थी। कहीं रेल, कहीं डॉली, वाना पड़ता था। फी २ तो इतना दुर्गम मार्ग' किचलनातफ कठिन हो जाता था, 1 .

१२२ * दृष्टान्त-सागर Y ने कहा- नक्कू नहीं नरेन्द्र होगा। स्त्री बोली-नहीं जो सुनार बनाते हैं। एक ने कहा क्या नथ नय? दुसगोला-नहीं भाई नयी होगा। स्त्री नथ पहरने के छिद्र पर हाथ रख कर बोली इस पर उनका नाम है । एक वोला-जत्थू। फिर भी कहा-यह भी नहीं जिस में फूल पहना जाता है। एक पुस्प ने कहा-ठीक है भाई नकछेदा होगा। तय स्त्री ने कहा हाँ यही नाम है। नाम पतामालुम, होने पर थाने मे लड़के के सो जाने की रिपोर्ट लिम्ना दी, लड़का हाय मागया और उने उसके घर पहुंचा दिया गया परन्तु जो' गहना लड़का पदने था घद किसी ने उतार लिया था। देखो उस खी'ने अंज्ञान शकितनी आपत्ति उठाई। : - 1 , . . " १ - ७५-सुखी, कौन है? एक चपरामी फी स्त्री बड़ी चतुर थी, वह अपने घर को सब कार्य बहुत सोच समझ कर करती थी। सात रुपये मासिक श्राय औरतीने प्राणों खाने वाले निर्वाह हो तो कसे हो?' यही सब कुछ सोच समझ कर यह स्त्री रोटी बनाने में जो लकड़ी जलती थीं उसका कोयली वुझाकर मासिक कोयले घालों क हाथ बेच देती थी और म्याटे का चोकर दाल की चोई भी इकट्ठा करके कहारी के हाथ यनिये की दुकान पर भेज देती और उसके दाम मंगा लेनी थी। इसी तरह उस स्त्री ने कुछ ही महीनों में मौ रुपये इकट्ठे कर लिए । पक दिन किसी जगह पर १५) रुपये मासिक की नौकरी खाली दुई, परन्तु उस नौकरी लिए १००) की नकद जमानत देनी पहती थी पुरुष घर प्राकार रुपये की चिता में पढ़ रहा। सी अपने पति को उदास - - "स्वामिन् मुझे अपने जेवर की विलपुलं चिता नहीं, आप शोक *द्वितीय-भाग * दल कर बड़ी चिन्तित हुई और उसके पास जा.हाथ जोड़ कर गोली माणनाथ ! प्रान प्राप, उदास क्यों दिखाई देते हैं ? हिए स्वामिन् कोई का तो नहीं है ? प्राप का मुख प्राज्ञ मै मजिन क्यों देख रही हैं ?', पति ने मय समाचार सुनाया, कहने लगा-" हाय क्या करू यदि मेरे पास सौ रुपये होते तो अच्छी नौकरी मिल जाती " स्त्री ने सुनते ही अपना सं जेवर भतार कर अपने पति के सामने रख दिया और कहने लगी- से ले जाएँ और जमानत देकर नौकरी प्राप्त करें।" यह बोला-"यारी मेरा यह धम नहीं कि तेरे शरीर की शामा उतार कर नौकरी की तब स्त्री ने उत्तर दिया-"स्वा- मिन् ! स्त्री के शरीर को भा पति मे ही है जेवर मे नहीं, स्त्री का धर्म है कि यदि पति के सुग के लिए प्रागा भी देना पड़े तो मी निषेध न करे फिर जेवर की तोशन ही पया, यह तो शरीर कामिल है।" 4 1 म वह बोला-"तुझे धय है ! प्राज कल तो पेमी ही स्त्रियां अधिक है जो जेवर के लिए अंगने पति में रात दिन तकगर सती हैं, 'सोते उठते बैठते उन्हें जेवर का ही ध्यान, क्षेवर को कया, अपना जेवर देना तो एक और रहता परन्तु और यशेष बनाने के लिए देवासुर संग्राम मन्नाती रहती हैं।" उस घपराती ने सी के कहने पर भी जेगर 7 लिया नों मेर उमा स्त्री ने यह सौ रुपये जो उसने एकत्रिन- फिर ग्रे पने पति को निकाल लाकर दे दिए। यह बड़ा दी प्रसन हुमा मोर जमानत दे नौकरी पर चला गया । 1 ।

- 4 * दृष्टान्त-सागर * यदि हम कहें कि हाय ! यह प्रकाश थाहर के प्रकाश से मिले कर अपवित्र न हो जाय पोरं यह विचार कर उस प्रकाश की रक्षा के निमित्त कमरा बन्द करदें, चिकें गिरादे परदे डालदें, द्वार बन्द करदें, खिड़कियां जगाझरोखे बन्द कायें ता प्रकाश तत्काल ही जाता रहेगा और अन्धकार ही अन्धका हो जायगा । ठीक यही दशा "भारत में रही, इसी कुटिल नीति का हमने भाश्रयण किया, हम एकदम ससार से अलग हो गप, हमारा शान परिमित हो गया, हमारे विचार सचित भाव से परिपूर्ण हो गए, हमने जो कुछ समझा केवल अपने को ही समझा, यह समझना ठीक भी था परन्तु दूसरों से अपना सम्बन्ध विच्छेद ठीक न था, जिसका फल हमारा, अन्यक्रम में पतन हुमा, अविद्या के सिवा अन्य कुछ' न लगा । लोगों ने कहाँ तक बातें जमाई, कश्मीर के लिए, कहा-गया। अगर फिर दौमवर रूए 'जमीन अस्त ।:: हमी नस्तों, हमी . नम्तो हमी. नस्त'। 4 जापानी जब तक जापान में बन्द रहे निर्वल और पराधी पने में जय अन्य अन्य देशों में गए । चितवान् বখা) स्वत हो गए घहता पानी निर्मला, खडा सो गन्दा होय। भावे दरिया पहें तो बेहतर । इन्सारवाँ - रहे. "तोरपेहतर ॥ पानी न पहे-तो, उस में दुर्गन्ध आये... । खंजर न चले तो गोरचा खाये ॥ - -- । ,

* द्वितीय-भाग
गिर्दिश से नदी मेरो महि को पाया।
गर्दिश से फलक ने ऊरूज, पाया ।
।
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६७ विद्या बल
'एक कन्या जिम की अवस्था,११ घर्ष , की थी अपने पिता
के साथ कहीं जारही थी । एक, बड़े, स्टेशन पर गाड़ी घदली
और उन्हें दूसरी गाड़ी में सवार होना पड़ा। डाफ गाड़ी छोटे
छोटे स्टेशनों पर महीं सकती। एक स्टेशन पर गाड़ी खड़ी
T. उस लड़की का पिता पानी लेने के लिए गाड़ी से उतरा,
पानी घोला कुछ दूर था जब तक घई पानी चलि से पानी नि
जे पाया था कि गाड़ी छूट गई, दोनों टिकट पिता के ही पास
पे। गाड़ी जय अगले स्टेशन पर ठहरी नव वह जड़फो स्टेशन
भास्टर से यह कहने के लिए गाही से उतरी कि मेरा टिकट
मेरे पिता के पास है और यह पिछले स्टेशन पर रह गई।
पिता के पाछे जाने पर उस लड़की ने अपना सय घर
बतार कर बांध लिया था-उतरते समय भी उसने अपना शेयर
पास ही एका । स्टेशन मास्टर से जाकर कहा-मेरे
पिता पीछे रह गए हैं और मेरा भी टिकट हन्दी के
पास है।
Teी कधी रही थी कि गड़ी गई लड़कों में दौड़ कर
गाड़ी का नम्बर जिम में यह बैठी थी एक ककड़ी से टमार्ट
पर लिन लिया और स्ट्रेशन मास्टर दिखताया कि मैं
इस नम्बर के अन्य
अपने,
ܕ
।

- . " *शान्त-सागर * रह गया है प्राप तार द्वारा मेग मुनयाच उतरना और मेरे पिता को भी तार.दे दें कि तुम्हारी हफा इस सेशन पर बड़ी है, किसी बात की चिन्ता न करो। चार घंटे पश्चात दुसरी गाड़ी में उसका पिता,आगगा और अपनी लड़की को साथ ने अगले स्टेशन पर जा उतरा वहां जाकर प्रसयाव को भी स्टेशन मास्टर में कद कर लिया। विद्या क वल से ही उस लड़की ने अपने पिता को भी मापत्ति में बताया और अपना जेवर भी अपने पास रंक्खा और मागे जाकर असया भी मिल गया। यदि वह लड़को पढ़ी लिखी न होती तो इसका इतनी युद्धि न होती, और सब प्रकार से प्रापत्ति में पड़ कर नामा प्रकार के दुख उठाती । देतो. उसको अवस्था मी ११ वप की थी इसलिए प्रतीत होता है कि पढ़ी लिखी लड़की चाहे वह जिस अवस्था की हो बुद्धिमती, हो जाती है और - समय पड़ने पर अपनी अवस्था से अधिक प्रयस्था पाली स्त्रियो से अच्छा है " १ काम कर लेती है। r - A प विद्या नाम नरस्य रूपमधिक मच्छन्न गुतं धनं । " : विद्या भोगकरी यशः सुखकरी विद्या गुरूगांगुरुः ।। विद्या. बन्धुजनो विदेश गमने विधा परं दैवतं । विद्या राजसु पूज्यते ननुधन विद्या विहीनः पशुः।-- विद्या मनुष्य को विशेष रूपान करती है। विद्या गुप्त धन है, मोगत्यश-और सुख के देने घाली दे, विद्या गुरुत्रों की भी 'गुरु है, विदेश में विद्या ही बन्धु है। राजदरवारों में विद्या का ही मान होता है, धन का नहीं । विद्याविहीन मनुष्य पशु है।

-
3
* द्वितीय-भाग*
"विद्या विनयो येतो हरति न चेतांसि कत्य -मनुजस्य ।
काञ्चनमणि संयोगोनो जनयति कस्य लोचना नन्दम् ।।
विद्या और विनय से युक्त पुरुष किस के चित्त को नहीं
भाकर्षित करता, कान और मणि के सयोगका देखकर किसकी
घाँखें प्रफुल्लित नहीं होती ?
-कुन विधेयो यत्नो विद्याभ्यासे मदोप, दनिरी
7 अवधारणा क कार्या खल पर योपित्परधनेषु ।।" ।
(मु०) यत्न कहाँ करना चाहिए (उ०) विद्याभ्यास में अच्छे
भोपयों और परोपकार में (प्र० ) उपेक्षा कहां करनी चाहिए
(उ०) दुष्ट, घर दारा और परधन में 1.
.
-
।
८०-एकादशी व्रत
एक दिन एकादशी का व्रत था वीररल ने यादशाह का कहता
भेजा कि प्राज मै गज सभा नहीं पाऊँगा । दूसरे दिन जय
पोरवल समा मे गये तो बादशाह ने पूछा-धीरयत कल क्या
काम था?
वीरवल पृथ्वीनाथ ! कल एकादशी मत था।
"बादशा-(सकर । एकादशी क्या चीज है?
चोरयन कुछ कहना ही चाहता था कि एक मुमनमा सर
हार बोल उटा-जहांपनाइ। एकादशी मुहम्मद साहय
बौक है।

. *Eष्टान्त-सागर । वीरवल वोला- जी हां, ठीक है, पर उसको रसते हिन्दी है। बादशाह सुनकर चुप होगप । . , .- -- 1 -- 1 ८१-लाला की चतुराई । एक राजा ने अपने मन्त्री से पूछा कि चारों घणे अर्थात् ब्राह्मण, क्षमिय, घेश्य, शूद्र में कौन चर्य चतुर होता है ? मन्त्री बोला-राम् ' विशेपत वेश्य, लाला चतुर होते है। तब राजा ने कहा-अच्छा इस बात की परीक्षा करनी चाहिए। दूसरे । दिन शहर में घूमने निकले नो एक गली में एक लाला का मकान मिजा । लाला की स्त्री कह रही थी कि अब निर्वाह फैसे हो, लड़के वाले भूखों मरे जाते हैं । लाना नी ने कहा-घयराती फ्यों है जिस दिन , राजा के यहाँ नौफा हो गया मालामाल फर दूगा। राजा यह बात सुनकर, पापल लौट आया और अगले दिन लाला को पुलाकर कहा मि-बान से तुम नौकर किए गय, परन्तु १०) मासिक से 'विशेष न मिलेगा। काम इतना होगा कि तुम प्रस्तपात में बैठे रहो करना । लाला ने राजा को धन्यवाद दे अस्तयल का मार्ग लिया। दूसरे दिन प्रात सरफर घोड़ों की लीद उराफर लाला सूंघने जगे, यह देशकर प्रस्तबल में रहने वाले लोग डरे । सानी से जाफर पूछा-लाला जी आप यह पया कर रहे है ? लाला बोला-पुछ नहीं ? राजा ने मुझ से यह देखने को कहा है और इसी काम के लिए नौकर रखा है कि देखो, घोड़ों को " - । 1 % AR * द्वितीय-भाग * नित्य प्रनि मयाजा तथा दाना ठोक २ दिया जाता है अथवा नहीं । यह बात सुनार वे सय घबरा गए और हजारों की भेट ताला जी को देने लगे। एक महीना पश्चात् राजा ने लाला जी को बुना कर पूछा ता मालूम हुआ कि लाला जी ने पास हजार रुपये कमा लिए है, राजा को बड़ा प्राश्वर्य हुमा । दृमरे दिन राजा ने लाला को प्राज्ञा दी कि तुम नदी के बट पर बैठे २ लहरें गिना करो। लाना बोला-यहुत अच्छा । इतना कह कर लाला घाट पर जा बैठा पोर जो जहाज अथवा नाय 'पानी तो उसे रोक देते और कहते कि ठहरो, जब हम नरें गिन लैंगे तब तुम्ह निक्लने दंगे। बिचारे व्यापारी जहाजो के कने के कारण अपनी हानि समझ कर हजारों रुपये लाला जो को भेंट देते थे। महीन के पश्चात् राना ने उसमे पूछा कि जाता का क्या कमाया? तर लाला ने अपनी कमाई २ लाख रुपये बताई । तब गजाने सोचा कि ग्रंप ऐसा काम देना चाहिए कि जिसमें काई शकल ही भामदनी को न हो। तीसरे महीने में राजा ने १०० मन मातीचूर के लड्डू बनवाकर पफ घर में ग्य दिये और लाला जी का देख रेन के लिये रस दिया। 'लालाजी तानों की रक्षा करने लगे। रोज लाला का मो फाम था के लड्डुओं को इधर से उधर यंदलते ' रखें लड्डों के दलन बदलने में उन से जो चूरा झता माने भर भिजवा देते । महीने के अन्त में राजा ने लाला को बुलाकर फिर मामदना को यात पूछी तो माणूम हुआ कि इस नौकरी में जाला जीको २०० रुपये की प्राय हुई है। इस यात का राजा ने स्वीकार किया कि निस्सन्देह लाला चतुर पाते है . + 1 १३४ * दृष्टान्त सागर १८४-तुख्म तासीर कि सोहबत का असर . एक राजा ने अपने पण्डित जी से पूछा-"महाराज ' तुरुम तालीर कि सोहबत का असर?" पण्डित जी ने उत्तर दिया- "तुम तासीर ।" राजा ने कहा-"नहीं महागज सोहबत का श्रसर ।" परन्तु महाराज ने नहीं माना, उस समय तो राजा चुप हो गया परन्तु पुछ विशेष दिन व्यतीत होने पर अपने खास स्थान के चारो, ओर द्वारों पर जुए का सामान, रण्डी, । शराय, मांस आदि रखवा दिया और वहां कुछ मनुष्यों को नियत कर पाशा दी कि जय पण्डित जी महाराज श्रावे तो उन सेफहना-"महाराज इन चार यातों में से एक कर लीजिये, तप भीतर जा सकोगे अन्यथा नहीं।" परिडतजी पहले द्वार पर जवाये तो द्वार पर उपस्थित मनुष्यों ने कहा "पण्डित जी महाराज! एक प्याला शराब पीते जाए तब भीतर जाइएगा । इसी प्रकार सब द्वारों पर परिजत जी का अपनी २ रीति से स्वागत किया गया परन्तु जय पण्डित जी चौथे द्वार पर पहुंचे तो भीतर जाना चाहा, मनुष्यों ने भीतर जाने से रोका और कहा-महाराजा भाइये दो हाथ ही फेकते जाइए इधर इन के चित्त में भी ध्यागया कि जुना इतना बुरा नहीं है, अच्छा दो दो हाथ खेल ही लें तय ही भीतर जायेंगे। - - 1 7 पगिडत जी खेल में इतने लीन हो गये कि भीतर जाना भी भूल गए । अब जुआ खेलते,२ इन महाराज को प्यास जगी। मदिरा वालों ने अच्छा अवसर जान फर पानी के र मदिरा पिला दी। फिर क्या था नशा अपना । नशे की झोंक में यह महाराज अन्य काम भी 11 न . . * द्वितीय-भाग* दुर्दशा से अपने स्थान भेजे गए । दूसरे दिन जय महाराज राजा से मिले तयाराजा ने पूछा-"कहिए महाराज? तुख्म तासीर कि सोहात का असर।" तब महाराज बोने-"पृथिवी नाथ ! जैसे भाप कहते हैं, पर ही ठीक है।" श्रीकृष्ण के पाक्य- पद्मयोनिः समुत्पन्नो ब्रह्मा लोक पितामहः । तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माजातेग्कारणम् ।।.. कैवर्ति गर्न सम्भूतो व्यासो नाम महामुनिः । तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माजातरकारणम् ।। भिल्लिका गर्भ सम्भूतो वाल्मीकिश्च महामुनिः । तपसा, ब्राह्मणो जातस्तस्माजातेरकारणम् ।।. क्षत्रिया गर्भ सम्भूतो विश्वामित्रो महामुनिः ।। 71 तपसा ब्राह्मणों जातस्तस्माजातेरकारम् ॥ हरिणी गर्भ सम्भूतो ऋष्यशृंगो महामुनिः । तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माजातेरकारणम् ।। उर्वशी गर्म सम्भूतो वशिष्ठो हि महामुनिः । तपसा ब्राह्मणो जातस्तस्माजातेरकारणम् ॥ (भारतलार) . ८ । +- । * ८५-चार यार पक धार शेख, सैयद, मुगल, और पठान यह चारों मिलकर परदेश को चले । चलते चलते मार्ग में एक यारा में ठहरे दोपहर -- HRS १. I - -- १३८ * दृष्टान्त-सागर लड़का मेरा नहीं है। इस लिए आपके पास मैं'न्यायार्थ उपस्थित हुई है। आप मेग जीवित यशा मुझे दितादें।" यह सारी बातें हो जाने पर, दूसरी स्त्री बोली-"महाराज ! यह स्त्री. विलकुल झूठ, कहती है और आप को धोखा देकर आप सच्ची होना चाहती है। इसी का लड़का मरा है मेग नहीं, मेरो जीवित लड़का मेरे पास है। इस प्रकार दोनों स्त्रियों को पाते सुन कर सुलेमान,वड़ा चकर में, पड़ा। उनके कहने पर यह विश्वास न कर सका कि फौन झूठी है और कौन सी सन्धी तक उसने एक नई युक्ति सोची, सोच कर अपनी सभा के सब उच्च अधिकारियों को बुला कर उनमे कहा कि-"इस समय ठीक ठोक निश्चय नहीं होता, कोन वार झूठी है और कौन सी सच्ची । इस लिए तुम इस जीवित बच्चे के दो टुकड़े करके प्राधा अाधा दोनो को दे दो।" । -- - . बादणाद की प्राशा को सुन र जिस स्त्री का बया,मर 'गया या अपने चित्त में सोचने लगी, कि मेरा बचा तो मर ही गया इसका भी, मर जाय तो अच्छा है । यही बात सोच कर उसने यादशाह से कहा-"महाराज ! आपने जो प्राशा दी है, बिल्कुल ठीक है, मुझे स्वीकार है।" परन्तु बादशाद की वातें सुन कर दुसरी स्त्री के नेत्र भर पाए, फूट फूट, कर रोने लगी। रोते रोते घह स्त्री कहने लगी-"महाराज ! जड़के के दो टुकड़े,न फराए जायें किन्तु प्रापइस लड़के को इसी स्त्री को दे दीजिए।" 1 , बादशाह ने सोचा, यदि यह जीवित लड़का इसका ही होता तो यह इस प्रकार मेरी बात को स्वीकार न करती-चौर यह दुसरी सी इस प्रकार विशेष दुखीन होती। क्योंकि पुत्र प्रेम माता को विशेष होता है। इस लिए बादशाइने जीवित लड़का है . 1 * द्वितीय-भाग- , निसका धा उसी फो दिलादिगा। यह स्त्री प्रसन्नता पूर्वक अपने बाके को लेकर अपने घर चली गई और दुसरी स्त्री सिरियानी कर रह गई। -- प्राय. ८८-ईश्वर जो करता है अच्छा ही करता है 'किसी नगर में एक महात्मा गहते थे। नगर के यहुन नष्प महात्मा के पास ज्ञान का उपदेश लेने पाते थे, नो मानी सब ही श्रेणी के पुरुष पाते थे। : एक धनाढ्य महात्मा के उपदेश को विशेष ध्यान से सुनता जो महात्मा जो कहते वेदवाक्य समझ कर उस पर श्रद्धा गा। कुछ दिन पश्चात् उम धनाढ्य को स्त्री रुग्ण हुई उसने पनी स्त्री का सारा वृत्तान्त महात्मा से जा सुनाया। महात्मा ने-"वया । श्वर के भरोसे पर रमो, वह जो कुछ करता है काही करता है। इत्तिफाक में कुछ दिन पश्चात् उस, नाढय फी स्त्री मा गई। यात छिड़ो पर महात्मा ने फिर वही कही कि-"जो श्यर करता है अच्छा ही करता है। ईश्वरीय । ऐसी ही थी, इस लिए सतोष करो और ईश्वर का स्मरण ते रहो।" फिर कुछ दिन पश्चात् उस धनाढ्य का लड़का रुग्ण हुश्रा स प्रसार संसार से चल यला, धनाढ्य उसके की मृत्यु भौर भी विशेष दुखी हुा । एक दिन जब वह महात्मा के सगया, तब फिर महात्मा ने समझाया-'पा' पुत्र की यु का शोच करना वृथा है, परन्तु हां, हम यह जानते हैं १४० * दृष्टान्त-सागर * 1 me । - पुत्र शोक से बढ़ फर मलार में योई दृमग शोक नहीं है तव में सतोप करो और ईश्वर पर विश्वास रफ्ती, इसमें भी ईश्वर ने तुम्हारे लिए भलाई ही रपसी होगी । ईश्वर जो करना अच्छा ही करता है।" इस बार महात्मा की बात सुनकर धना- को बड़ा क्रोध माया, क्योंकि जिस का पुत्र मा गया हो फिर उसको ऐसा झानोपदेश भला प्रतीत नहीं होता, फिन्तु-ग्नि घी सा काम करता है । अब उस धनाढ्य ने अपने चित्त में सोच जिया कि इन महात्मा का जरूर मारूँगा क्योंकि बार बार, ऐसी बात तो सुनने में न प्रावगी। रहै न वॉस, बजे न बाँसुरी। अगली रात को घहा धनाढ्य एक छुरी लेफर महात्मा के मारने के लिए उसके स्थान पर पहुँचा । द्वार वन्द था । धनाढय ने द्वार खटखटाया । वट खट शब्द को सुनकर महात्मा किवाड़ खोलने के लिए शीघ्रता मे चने, परन्तु अंधेरा होने के कारण मार्ग में पड़ी हुइ पफ लकड़ी में ठोकर खाकर गिर पड़े और विघाडो तक न पहुंच सके । महात्मा के पैर में इतनी अधिक चोट आई कि यह वधुत देर तक बेहोस अवस्था में रहीं. पड़े रहे । बहुत देर तक जब कोई किवाड़ खोलने,न भाया तो पर धनाढ्य अपने स्थानको वापस लौर श्राया। फिर कई दिन पश्चात् उस धनाढ्य का शोक और क्रोध कुछ न्यून हुआ तो वह महात्मा के स्थान को इस अभिप्राय से- चला कि देखें, कि महात्मा कहीं अन्यत्र तो नहीं चले गए। यदि है तो उस दिन द्वार खोलने के लिए क्यों नहीं पाए थे। महात्मा क पास धनगर ने पहुँच कर देखा कि यह विशेष कर में हैं, तव धनाढ्य ने महात्मा से पूछा--"महाराज ! मा के ५ ,

*द्वितीय-भाग
बोट कैसे लगी-?" महात्मा ने सब बाते सुना दी। और अन्त में
कहा-"यचा 1 में नहीं जानता कि ईश्वर ने यह कष्ट 'मुझे क्यों
दिया है। परन्तु इतना अवश्य जानता हूँ कि जो ईश्वर करता
है वह अच्छा ही करता है । मुझे जा कष्ट में पहना पड़ा' इस में
मेरी कुछ मलाई ही होगी।" इतना सुनते ही धनाढ्य की भाँच
हिजो अप उसको मालूम हा गया कि इनार जो करता है अच्छा
ही करता है, वह अपने दिल म पड़ा दुयो मुश्रा ।
धनाढ्य ने महात्मा से कहा-"महाराज ! जो श्राप करने है
डोक हो कहते है । उस दिन मै प्राप को जान में मारने पाया
था। यदि श्राप उस दिन द्वार खोल देते ता नहीं मालूम क्या २
अनर्थ होते । परन्तु ईश्वर ने श्राप के पैर तोड़कर पाप की
प्राण-रक्षा की और मुझे ब्रह्महत्या मे यवाया ।
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६६-चालाकी से हानि
बुगदाद में एक बड़ा चालाक नाई रहता था. जो अपने
कार्य तथा बाते पनाने में विशेष चतुर था । यहाँ के पड़े धनियों
फो उसने अपने जाल में ऐसा फंसाया था कि उसे छोड़
और दुसरे, गाई से, वाल धनवाना पमन्द न करते थे। इस
लिए उसे कुछ गर्व भी होगया था।
पक दिन एक नाग गधे पर नदियां लादे दुप
उस नाई की दुकान के सामने जा रहा था। नाई ने जका
हारे से लकड़ियों का सौदा करके चार पाने में सरोद जी ।
जब एसने सब लदहिया नाई के द्वार पर साल दी और प्रान
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7 1 , " . . * हटान्त-सागर पैसे मांगन लगा तो ना वोजा-"तुमन मुझे सब लकड़ियाँ क्यों नहीं दी? क्योंकि मेने सर फा ही सौदा किया था।" जफड़हाग सब ताड़ियाँ दे चुका था। उसने कहा-" अब मेरे पास पक जकड़ी भी नहीं है, जितनी लकड़ियां थी, मैं मय दे चुका ।" यह सुन कर नाई ने गधे की पाखर (गोन) यी और गुली उठा कर कहा कि-"यह मुझे दो।" विचारे लकड़हारे में उसे बहुत समझाया, कि भाई पाखर (गोन) लकड़ियों के साथ नहीं विका करती, परन्तु उसने एक नमानी और पाखर में ही ली। • लकडहाग रोता: पीटता काजी के पास पहुँचा । नाई भी उसके माथ साथ ही काजी के यहाँ गया ! काजी बसना से, बाल पनवाया करता था इस लिए नाज़ो ने उस विचारे की पास पर ध्यान न दिया। लकड़हाग निराश होकर दूसरे क्राज़ी के पास गया और भारनी धान सुना कर न्याय के लिए प्रार्थना की। वहां भी घही दशा हुई। उसने भी उमाधिचारे की कुछ बात न स्नी ।' अन्त मे पत्र प्रकार से लाबार होकर लकड़हारे को खलीफा के न्यायालय में न्यायार्थ प्रार्थनापत्र पेश करना पड़ा। खलीफा अपने न्याय के लिए बड़ा प्रसिद्ध था और था भी न्याय प्रिय । उसने 'लकड़हारे की बाते सुन कर उसके कान में कुछ बातें कह दी, यह प्रसन्नता पूर्वक अपने स्थान को 1 । चन्ता गया. -- - कुछ दिनों पश्चात् यही लकधाग फिर उसी नाई की "दुमान के सामने गया और बड़ी नम्रता से सलाम किया, ।

द्वितीय-भाग समारहार ने अपने हाव भाव ऐसे बना लिए मानों पहली बाते बिजकुजशी भूल गया हो। 4 . नाई. यह देश कर, विशेष प्रसन्न हुमा और जाना कि यह पहली सारी बातें भूल गया है । लकड़हारे ने नाई से कहा- "भाई साह, मेरा विवाह होने वाला है इसलिए तुम मेरी और मेरे साथी की शामत बाटो, जो कुछ तुम कहोगे मैं घही दे, दूंगा।" माई, पेरा गरा उटन पुच्चू की हजामत नहीं “पनाता था इसलिए कहने लगा-"मैं तुम्हारी और तुम्हारे साथी को दामन नो पना दूंगा, पन्तु एक रुपया लूंगा।" लकड़हारे ने नाई की यात स्वीकार करती। : जकड़हारा अपने माथो गधे को पहले दी पाहर पाँध माया या, यही हजामत बनवाने यगय नाई ने उसकी हजामत चना दी और कहा कि- 'अपने साथी को भी बुला लीजिए।" लफादार ने अपने साथी गधे को नाई के सामने जा खड़ा रिया प्रो महाEि-"यह मेरा साथी है, इसकी हजामत बना दो। यह देख कर नायड़ा विगड़ा और पाहा कि-"कही गमे की मो जामत यननी है। मैं इस गधे की हजामत नहीं मना सस्ता "अन्त में उसका झगड़ा उमी खलीफा के न्यायालय पिनारा गया। मायालय में जाकर खजीफा से जकड़धार में पा-"हुजूरी सिनाईने वायदा किया था शिमै तुम्हारी और तुम्हारे साथी की हजामत बना दूंगा, मेग साथी यदी गधा है। य यह नाई मेरे साथी की हजामत नहीं बनाता" स्वलीपा ने नाई से पूछा कि-"कहा लकड़हारा सब कहता है अथवा सूबाई योजा-"पद ठीक कहना है, परन्तु मै यह नहीं जानता था कि इसका साधी गम है .यह इसकी हजामत धन- R + १४४ *दृशन्त-सागर * जलाने चायगा । हुजूर ही लोचें कि कहीं गधो की हजामत बनती है।" यह सुन कर खलीफा ने उत्तर दिया कि-"निम्हान्देह गधोधी हजामत नहीं मानती यह में मानता हूँ, परन्नु की लकड़ियो के साथ पार भी तो नहीं विकरती। अब तो तुम्हे लड़हार के साशी की हजामत गश्य बनानी पडेगी।" खोफ़ा भी प्राज्ञा सुन सैकड़ो मनुष्यों के सामने उस धूर्त पौर चालाक नाई को गधे की हजामत बनानी पड़ी। उसकी सारी चौलाकी और ग मिट्टी में मिल गया | ५ - व ~ . " - ६०-साधु और दया 1. एक दिन एक साधु नदी में स्नान कर रहा था- साबुने देखा कि नदी में पर्फ बिच्छु यत्रा जा रहा है, बिच्छू उस समय तशा जीवित था, साधु को उस बिच्छू की दशा पर दया भागई, पयोकि साधु दयालु था। जैसे ही साधु ने विच्छ यो हाथ से उठी कर स्निारे पर रखना चाहा बसे ही उसने साधु के हाथ में डक मार दिया । विच्छू के काटते ही साधु विलविला उठा और दर्द के कारया विम्ल हो गया, यहाँ तक कि बिच्छू लाधु के हाथ में फिर पानी में गिर पडा । माधु दयालु, था. उस को फिर दया प्रागई और उमे पानी में में उठा लिया। सिंधू ने अपने स्वमा- प्रानुसार फिर इक माग, परन्तु साधु ने इस बार उनके ईक को गहन कर लिया ो तुरन्त किनारे पास दिया । नदी के शिनारे पर पड़ा हुआ पक पुरुप यह सय कौतुके देव महा था। 'उममें माधु में कम-"मेवात्मम् । श्राप पैसे दुष्ट जीव परे दया 'क्यों करते है। जो उपकार के बदेले बाप के दाय में डक मारता 1 4 । 4 * द्वितीय-भाग * १४५ है ?" साधु रे उत्तर दिया कि-"ईश्वर ने मेरा और इस विच्छू का स्वभाव प्रथक प्रथक बनाया है । मेगस्वभाव दया करने का और इसका डक मारने का है, इसको कष्ट में पड़ा हुआ देखकर मुझ से न रहा गया मैने इसकी रक्षा के निमित्त इसे नदी में से निकालना चाहा परन्तु जब इसने डफ मार कर मुझे विफल कर दिया, मैने घबरा कर छोड़ दिया। उसी समय मैने विचागकि देखोमण समय तफ भी विच्छू अपने स्वभाव को नहीं भूलता, सक मारना नहीं छोड़ता तो फिर कितनी लजा की बात होगी, यदि मै मनुष्य हाकर तनिफ से कष्ट से अपना स्वभाव छोड़ दूं । यही विचार कर मैने दया से विच्छ को नदी से निकाल पर किनारे पर रख दिया । मनुष्य को चाहिए यदि उस पर कितने ही कट क्यों न पड़ें अपने धार्मिक स्वभाव को न छोड़े। तुम उन साथ भलाई ही करो जो तुम्हारे साथ बुराई करने पर उतारू होजाते है । जय दुष्ट प्रपनी दुष्टता से बाज नहीं पाता, तो साधु पुरुष अपनी साधुता से क्यों याज पाये। ६१--यांपस की फूट से नाश ។ पक जंगल में तीन मांड (विजार) साथ २ ही सरा करते थे। और गत्री हो जाने पर भी एक ही स्थार..पर सोने थे। उन में एतना प्रेम था कि एक घड़ौमी एक दूसरे से मथक न रहते थे।

. १४६ * दृष्टान्त-सागर* जिस जगल में यह साँड रहते थे उसी जंगल में एक', सिह भी रहता था ।बड़ इन सांडों को दूर से देखता और चाहता या कि में इनको मार कर ना जाऊँ । परन्तु ये तीनों सदा एक साथ ही रहते थे इस लिये सिंह को उन्हें मारन का साहस न होता था। एक दिन पक चालाक लोमड़ी ने सिंह से प्राकर कहा- "पाप इतने उदास क्यों रहते हैं।' मिद ने अपनी उदासी का। वृत्तान्त लोमड़ी से कह सुनाया। लोमड़ी पैसे भी बड़ी धूर्च और चालाक होती है, कहने लगी-"अप घबराइए नहीं भी जोकर उन में परस्पर फूट उपन्न कर दूंगो, फिर आप इच्छानुसार उनको मार कर खाजाइपगा।" तामड़ी सिंह के पास से चल कर सांडों के पास आई और उन से यात चीत करने लगी। पहले एक मांड मे चुपके से कहां-"देखो तुम बड़े यत्तवान और परिश्रमी हो परन्तु तुम्हारे साथी बड़े ही लाजचा है ये सब प्रच्छी २ घास स्वयं खा जाते है और तुम्हारे लिए गन्दी 'घास छोड़ देते हैं, ये चाहते हैं कि तुम कमजार हो जानो। तुम इन का साथ क्यो नहीं छोड़ देते । इन से प्रधा रह कर अच्छी २ धान प्रानन्द से चरा करो।"" एक में ऐसी बातें बना कर लोमड़ी दूसरे के पास गई, और उससे भी ऐसी ही यातें करने लगी। ये बेवकुफ साँद लोमड़ी के झांसे में प्रागर और परस्पर डाद करने लगे। रेप के कारण उन में परस्पर लड़ाई होने लगी, जहाँ पे साथ रहते थे अथ प्रथक २ रहने लगे । फिर क्या था, सिंह को धन पडी, इसने सांड को इकला पाकर मार डाला और खा गया । इसी प्रकार सिंह ने एफ एफ फर के उन तीनों को खा लिया, पचा खुचा लोमड़ी के हिस्से में पाया। , 1 + A N f .

* दिनीय-भाग * १४७ ठीक है प्रापस की फ़ट (बर भाव ) ऐसा ही होता है इसने जिस राष्ट्र, प्रान्त, नगर, गांर, घर और व्यक्ति में स्थान पर लिया उस का सर्व नाश कर के ही छोड़ा है । 7 - r + {" 1 A , ६२-निन्यावे का फेर एक गांव में एक मोची रहता था, चमड़े का काम करके आपना घोर अपने कुटुम्ब का पालन करता था परन्तु माची माहर को गाने का बड़ा शौक था। जूते यनाता तो गाता, खाली बेठता ता गाता, इस प्रकार यह अपना अपना स्त्री और अपने पों का चित्त प्रसन्न किया करता था। उसके पड़ोस में एक महाजन रहता था जिसे रात भर निद्रा नहीं पाती थी। यदि पिछले पहर नींद प्रा भी जाती तो मोचो साहब अपना राग छेड़ कर जगा देते थे। महाजन को रात दिन यहा रोगा रहता था कि मुझे नींद नहीं अंती यह जिम वस्तु को चाहता अपने रुपये स.मोल ले लेना परन्तु नींद एक ऐसी वस्तु है, जिमको मोल भी नहीं आ सकता था। एक दिन महाजन ने मोदी से पूछा --"क्यों भाव तुम सान्न भर में कितना रुपया पैदा करते हा।" माचो न मुस्करा कर उत्तर दिया-"मैन कभी गिना नहीं हैं, परन्तु किसी न किसी प्रकार दिन फटते ही जाते हैं, परमेश्वर नित्य प्रति भोजन दे - देता है।" महाजन ने उस से कुछ और हाते पूही और तत्पश्चा मोची को सौ रुपये देकर विदा किया और कहा कि इच. - " २ . MA १४ * दृष्टान्त-सागर * .'.. - रुपयों को सम्भाल कर खर्च करना । मोची सौ रुपये पाकर इतना प्रसन्न हुआ मानो दुनियां की न्यामते हाथ लग गई । वह रुपयो को अपने घर ले पाया और उन्हें धरती मे गाड़ दिया, रुपये मिलने से मोनी साहय प्रसत तो हुए परन्तु, उन का गाना-बाना सब जाता रहा । रुपये का इतना ध्यान हो गया कि रात्रि दिन नींद नहीं पाती थी, यदि अचानक पास से दिल्ली भी गुजरे तो चोर का ही सुभा होता था। अन्त में दिक होकर बिचाग मोची महाजन के पास गया और कहने लगा-सेठजी आप अपना रुपया ले लीजिए और, मेरी नींद मुझे पापस कर दीजिए । 1 ५ १ . - है १३--जरा से विचार से विशेष हानि दो मनुष्य जहाजी कारखाने में मिल कर लकड़ी चीर रहे थे। जकड़ी चीरते समय लकड़ी में एक छोटा सा कीड़ा दिखाई दिया, 'कठिनता से प्राध इंच लम्बा होगा। एक मनुष्य ने कहा--"इस जफड़ी के टुकड़े में घुन जग रहा है या इसको जहाज में लगादें।" दुसरा मनुष्य बोला-"कोई हानि नहीं दिखाई तो देगा नहीं, लगादो।" पहला मनुस्य फिर योला-"संच है, यदि यह मागे जाकर • सुन गया तो किसी 'समय जहाज के नाश हो जाने । सम्भावना है। । , । + , - 1 - * द्वितीय-भाग में दूसरा वोला-"राम राम कहो, भला कहीं ऐसा हो सकता है। यह ठीक है कि टुकड़ा विशेष मूल्यवान नहीं है परन्तु इसे फेंक देना भी तो बुद्धिमत्ता नहीं है । दस योस जगह घुन जगा होता तो कोई घात थी, घुन का ख्याल मत करो।" अाखिर यह धुना हुवा लकड़ी का टुकड़ा जहाज में लगा दिया गयादमघर्प तक जहाज भी प्रकार चलता रहा, इतने दिनों में घुन भी इतना बढ़ गया था कि जहाज विलकुज ही बोदा हो . । 1 - जब जहाज के कप्तान ने यह दशा देखी तो उसे वापस अपने देश भेजने का विचार हुमा क्योंकि जहाज्ञ में रेशम चाय प्रादि लदा श्रा था और बहुत मे मुमाफिर भी सवार होने वाले थे लौटते समय मार्ग में तूफान भाया जहान में छेद हो गया जिस के द्वारा पानी जहाज़ के भीतर भरने लगा। माझियों ने दिन । रात पानी निकालने में परिश्रम किया, परन्तु पानी पाना बन्द न हुभाजितना पानी निकलता उससे कही अधिक भीतर मर जाता । अन्त मे जहाज पानी से भर गया और माल अमान और मुसाफिरों को ले हया। देखिए । जरा से विचार मे क्तिनी जाने गई यदि जहाल पनाते समय ही धुन का विचार कर लिया जाता तो क्यों इतनी हानि होती? प 1 1 १४-एक बुढिया एक गांव के रहने वालों का यह विचार था कि यहां पर फा भूत रहता है, जो मनुष्यों को मार डालता है। पनाम । 'T १५० * दृष्टान्त-सागर * 1 चुरा यधार्थ में यात यह थी कि एक समय कोई चोर घटा कर लिए जा रहा था, एक चीते गे, उसका पीछा किया.वह घटा उस चोर के हाथ मे गिर पड़ा जिसे घाटर उठा कर ले गए योग कभी उसे वजा देते थे। h प्रादमी के मारे जाने का समाचार और घंटे के शब्द फो सुन कर मनुष्य भयभीत हो गए उन्होंने यह प्रसिद्ध कर दिया कि जब घटाकर्ण भूत को क्रोध प्राता है तो यह मनुष्यो को मार डालता है और घटा पाता है। भय के कारगा गाँव चाले गांव छोड़ छोड़ कर भाग गए। एक बुढ़िया इस बात की टोह में थी,, उसको मनोज करने से मालूम हो गया कि भूत ऊन कुछ नहीं है किन्तु बन्दर घटा बजाया करते हैं। वह गांव के मुखिया के पास गई और योली-"ठाकुर साहब ! यदि प्राप-मुझे कुछ परितोपिक दें तो, मै घटाकर्ण को यहां से भगा सकती हैं।" बुढ़िया की पात सुन कर मुखिया बड़ा प्रसन्न हुधा और कुछ धन उसे पारितोषिक रूप से दिया। बुढ़िया कुछ फल लेफर मन में पहुंची और पन्दरों को खिलाए । इधर बदर भी फल खाने के लिए मुके तो उधर उनके हाथ से घटा गिर पड़ा । बुढ़िया घटा लेकर गांव में' वापस भागई उस दिन से 'घटा बजना बन्द हो गया और बुढ़िया की पाव भगत दोने लगी। + - -- * द्वितीय-भाग * -- - । - . ६५-दमन एक बार लन्दन के किमी व्यापरी का एक महात्मा से झगड़ा हो गया । पद्द महात्मा उम व्यापारी के घर पहुंचा और चाहा कि शान्ति से लेन देन का मुअामला तय करले भौर अदालत में न जाना पड़े। व्यापारी ने उसे दूर से आते देख कर गालियाँ दी और अपने नौकर से कहा, उससे कहदो "दम नहीं मिलगे" महात्मा ने द्वार पर पहुँच कर- शान्ति से उत्तर दिया- "मित्र ? परमात्मा तुम्हारे मनका सुमार्ग पर जावे।" इस उत्तर को सुन कर व्यापारो उस महात्मा के वशीभूत होगया, उसने महात्मा को भीतर बुलाया और अपनी क्रूरता के लिए क्षमा मांगी और पूछा कि-"श्राप शान्ति में गालियो को कैसे मह लेते है " '-महात्मा ने कहा -"मित्र स्वमान से मैं भी घड़ा गरम था परन्तु मैं जानता था, ऐसा स्वमात्र पाप के गड्ढे में गिरा देने वाला है। मैने दृढ़ सकल्प कर लिया कि मैं ऊँचान घोलूंगा। क्योंकि विषयी मनुष्य प्राय: जामे में याहर हो जाते है । तब मैने नियम पना, लिया कि इतने मे ऊँचा नहीं योना करूँगा केवल इसी एक साधन से में अपने आप को वश कर लिया है।' पाठक हमारे भीतर, हर समय तफान उठते रहते है। बाध इन्द्रियों में विषयों की ओर प्राकर्षित करती है और हमारे अन्दर प्रशान्ति उत्पन्न कर देती है। प्रशान्त.चेता पुरुष कभी भी किसी कार्य को उत्तमता में नहीं कर सकता! संसार में जितने भी महात्मा प्रादुर्भूत हुए है उन्होंने सर्वदा जगत को जीतने से अधिक कठिन अपने प्राप"को जीत लेगा की माना। ।इसे शार में दमन करते हैं। ।

* Eष्टान्त-सागर *
अंगूठी निकल पड़ी। इधर वह फांसी पर चढ़ायी गयी उधर
अँगूठी को लेकर मनुष्य भागते, २ फाँसी के स्थान पर पहुंचे
और जोर से कहने लगे 'प्रगूठी मिल गई उसे फांमी मते
दो।, लोगों ने ली को बुलाया परन्तु वह न बोली वह मर
चुक्षी धी। लोगो ने उसी स्थान पर उसका स्मारफ बना दिया
और शताब्दियों तक जब २ मनुष्य उसके स्मारक को देखते
तो निर्दयी राजा को कोसते थे।
पाठक ! पवित्रता बलात्कार से लोगों के हृदयों में स्थान
कर लेती है। यह एक प्राकर्षण शक्ति बन जाती है । दूर दूर
से दुरात्मा लोग अपनी कालिमा को छुड़ाने के लिए जिस
की ओर आकर्षित हो जाते हैं। संसार में जितने धर्मनिष्ट पुरुष हुए
हैं उनके हृदय मे शोच (शुद्धि) अतिशय विधमान थी।
4
।
1
f
६८-इन्द्रिय निग्रह
एक बार एक किसान की स्त्री अपने बच्चे को लेकर किसी
फाम मे खेत पर , गई। वहाँ जाफर स्त्री ने अपने बच्चे को
सुत्तर दिया और स्वय कार्य में तत्पर होगई। उस सोते
यचे को हुमायु उठा कर उड़ गया और एक दुरोह पर्वत के
शिग्यरस्थ वृक्ष पर अपने घोंसले में जा रवा, इस भयानक
दशा को, देख कर बच्चे की माता पीछे पीछे भागी किसान
भी अपना अपना कार्य छोड़ फर बच्चे को छुड़ाने के लिए
दौड़े भागते भागते वे सब एक भनक गढ़े के किनारे
पर जा पहुँचे किमान बच्चे को बचाने के लिए अपनी जान जोनों
में डालने के लिए तयार थे। परन्तु उस दुरुह शिसर पर
।
4

*द्वितीय-भाग *
१५५
,
बढ़ना विशेष कठिन था. एक किसान ने ऊपर जाने की
हिम्मद की परन्तु निगश हो वापस लौट पाया,- इसी भांति
अन्य किसानो ने भी चढ़ने का साहस किया परन्तु अपने
अपने मनसूर्व में कोई भी कृतकार्य न हुआ। दीघ साम लेने
लगे, अन्त में दूसरी ओर एक स्त्री को चढ़ते हुए देखा जो
चिट्टान से होकर वगंधरं प्रागे बढ़ी चली जाती थी। नीचे
लब के हृदय कम्पित हो रहे थे, कि वह स्त्री पर्वत के शिविर
पर जा चढ़ी प्रसन्नता से वश्चे को उठा का दृढ़ता से घरो को
अपनी छाती से लगा लिया, अरं बही ना यश्च को लेकर
एवत के शिखर से उतरने लगी, नीचे से सब डर रहे थे और
कहते थे कि वञ्च सहित नीचे गिर कर चकना चूर हो
आयगी परन्तु यह निरभीकता पृथक नीचे उतर आई । पाठक
अहाँ सभी किमानों का साहस निफन गया वहाँ एक अयदा
अपने कार्य में कृतकार्य हुई, यह क्यों ? इसलिए कि यह यश्चे की
माता थी और उसके प्रेम के सामने सारी इन्द्रियां वश मे हो
'चुकी थी, न्यूनाधिक विवेकी पुरुष अपनी इन्द्रियों को कापू
'करके जगत में अटल कीति को प्राप्त करते हैं।
२
86-मेरा स्वप्न
एक रात को मैं सोया तो मनीष ख्याप देवा ।
वो ख्वाब मैने देखा साहिय पुर इज तराय देखा ।
भावे हैं कुछ, सनावर और लम्बे बालबाले ।
'सा क्रीट मुकटधारी 'सूरज महताब देखा
.
*-*-

* दृष्टान्त-सागर HA 7 r पहले है रामरघुकुल भूपण , वो सीता माता। लक्ष्मण कमान खींचे और पुर प्रताप देखा। 'पीछे है कृपा उनके और माथ पाँचो पांडव । गर्दन झुकामे सबको चशमे -पुर, धाम देखा । हैरान होके उनसे पूछा कि प्रालि जाहा ।- यह माजराही क्या है। जो मैं जनाप देखा। स्वामी हो सब जगत् के सब दुनियाँ सर झुकाए । चेहरों पै. फिर तुम्हारे ग़म वे हिसाय- देखा ।। तर राम मुझसे बोले सुन भो ?, नादान बच्चे। मन्ता को. इयने अपनी बे दाना भाप, देखा ।। लागार बदन हैं माके मुंह पर है छाई जर्दी । व्यभिचारी यजमाना खाना खगव देखा ।। लक्ष्मण जी बोले असुरों से भूमि की थी खाली ।। पोधा फिर • आज हमने उनका सहसय देखा। गन्तान देवतों की, 'सत्र की राक्षसों के । । हा शोक! मांस साते पीते शराय देखा। लक्ष्मण न कह चुके थे भगवान् कृष्ण बोले । भारत का हाल हमने भी ला जवाब देखा ॥ वेदों का पाठ करना गीता का. ज्ञान छोड़ा। हा ! हीरे सोहनीलला पढ़ते किताव देखा ॥; अर्जुन यो भीम, बोले वीर्य वो बल को खोया ! 6 - - ३ . - - -

-
दुःखों में फिर तडफत सपको बेताब, देखा ।-
मुधरेगा न कदापि भारत खराव देवा ।।
* द्वितीय भाग
बच्चों के ऐनके और लगते खिजाप देखा ।।
हिम्मत यहाँ तलक है चूहों में डर,के भागे।
नामों पै तो बहादुर लगते खिताय देखा।
हितकर जो इनका भाया उमको जहर पिलाया।
भारत निवासियों को राहा ! कमात्र देखा।
जिन्दे पिता के प्रागे बेटे लगे हैं माने।
मुमकिन न था कभी भी जो इन्कलाम देखा।
माज्ञामों को बडों की नहीं मानता है कोई।
कर जोड करके प्रछा भगवन दया यता दो।
में जो देश भारत यों पुर भजाय देवा ।
मिन ब्रह्मनर्य विद्या और धर्म के एखने
-
१००-शत लोकोक्ति
-
--
२ पाप काजमहा काज-अपना कार्य अपने
होगा।
ने धागे नाप न पीछे पगहा-मागे पीई की
४ भांधी ग्राम है-यो दिन का काम
पाहार व्यवहार मे लजासी-जाने
प

- mbo *ष्टान्त-मागर * ६ श्राप मरे जग परला अपना स्वार्थ सर से प्रथम देखा जाता है। ७ भात्रों के अन्धे नाम नैन सुख-गुणों के विरुद्ध नाम । ८ ईद के चाँद होगये तुम्हारे दर्शन भी नहीं होते। ६ उल्लू की दुम फाखता-वे जोड़ कथा। १० ऊँट के मुंह में जोरा-पेटू,फा थोड़ी चीज्ञ से क्या होता है ११ ऊँची दूकान.फीफा पकवान नाम विशेप काम थोडा। ऊधो तुम्हें द्वारका जाना है-प्रापिर तुम्हें ऐसा करना है अन्धो में काना सरदार-मुखों में थाडा जानने वाला चतुर N है होता है। M 44 - १४ अन्धेर नगरी अनघूझ राजा-महा अन्याय होता है। २५ प्रन्धी पीसे कुत्ते खाय-कुछ प्रवन्ध नहीं। १६ फमाऊ पूत किमे अच्छा नहीं लगता काम करने वाले को सप चाहते है। १७ कभी नाव लडे पर कमी लट्ठा नाव पर-संयोग से एक दुसरे को मदद की प्रारश्यकता है। १८ माठ की हांडी एफ ार हो चढ़ती है-धोखे में काम -*- यारस्त्रार नहीं होता। १६ काले के आगे दिया नहीं जनता-चत्तवान् के पागे निर्यन कुछ नहीं कर सकता। २० कागा चले न की चाल-विना समझे अनुकरण करना। २० पात माय मुगल बन पाये], बोजन खाग शानी किसी की अनुचित नंदल। १२ भाव २ कर मर गये सिरहाने T धरि ही पानी - " *द्वितीय-भाग । - ।' २३ काबुल में गधे नहीं हाते क्या?- अच्छी जगह भी बुरे होते हैं। २४ काम को काम सिखाता है-करते २ काम प्राजाता है २४ किस विते पर तत्तापानी-किस भरोसे पर कार्य छेड़ा था। १६ फानी के विवाह में सौ जाखो-जिस कार्य मे शमा हो उस में विघ्न हो जाता है। २७ कुछ दाज में काला है-सन्देह है। २८ कगाली में घाटा गीला-दुय पर दुख पड़ना २६ सरी मॅजूरी चोखा काम-पुरे दाम देना और अच्छा काम लेना। ३० खलोमा ने फास्यता माग्ली-छोटे फाम पर धमड करना। ३१ खिचड़ी खाते पोचा उतरा-बड़ा ही कामन है।' ३२ खेती खसम सेती-अपने हाथ से खेती अच्छी होती है। ३ गधो को गुजफन्दा है गॅवार को पापड़ अपात्र को पान समझा। गगावक्त फिर हाथ प्रातानहीं- -समय पर चूकना नहीं चादिए। गाँव गये की बात-जसा हो जाय । घर का भेडी लका ढावे-आपसी फूट से पडी हानि होती।। र ध्याइ पकड़ो फो डोले-~काम के ममय पर लापर- चाी करना पीरों को तेजा मलीदा-प्रामो का आदर न . L . - R - . तेही नाक पटी-बुरे काम का तुर र फाजिना पर रन पर कोई नहीं ले गया-यश तोमन -- .

*ष्टान्त-सागर ६ पाप मरे जग पाला-पना स्वार्थ सब से, प्रथम देखा जाता है। ७ मांखों अन्धे नाम नैन सुख-गुणों के विरुद्ध नाम । ८ ईद के चाँट होगये--तुम्हार'दर्शन भी नहीं होते। ६ उल्लू की दुम फाखता-वे जोड़ कथा।' २० ऊँट के मुंह में जीग-पेटू का थाड़ी चीज से क्या होता है। १ऊँची दूकान फीका पकवान नाम विशेष काम थोड़ा। १२ ऊधो तुम्हें द्वारका जाना है-प्रापिर तुम्हें ऐसा करना २३ अन्धों में कानों सरदार-मूखों में थाड़ा जानने वाला चतुर " 11 होता है! है - t - १४ अन्धेर नगरी पनवूझ राजा महा अन्याय होता १५ अन्धी पीसे कुत्ते खायेंक प्रबन्ध नहीं। ३६ कमाऊ पूत किसे अच्छा नहीं लगता--काम करने वाले को सय चाहते है। १७ कभी नाव लडे पर कभी लट्ठा नाव पर संयोग से एक 'दूसरे को मदद की श्रावश्यकता है। १८ काठ की होडी एक कार हो चढ़ती है. धोखे में काम भारम्बार नहीं होता। १६ काले के पागे दिया नहीं जलता-यलवान के प्रागे निर्बल कुछ नहीं कर सकता। २. फागा चने म को चाल-विना समझे अनुकरण करना। . २१ फावुल गय, मुराल बन पाये, बोजन लागे शानी किमी.मी अनुचित नकल । ५२. आव २रमरगये सिर हाने। परि हो पानी करना। T , - P . - m *द्वितीय-भाग* २३ काजुल में गधे नहीं होते क्या ? -अच्छी जगह भी बुरे होते हैं। २४ काम को काम सिम्बाता है-करते २ काम प्राजाता है। २४ किस विते पर तत्तापानी-किस भरोसे पर कार्य छेड़ा था। २६ फानो के विवाह मे सौ जोखो-जिप्त कार्य में शका हो उस में विघ्न हो जाती है। २७.कुछ दाल में काला है--सन्देह है। कगाली मे नोटा गीला दुध पर दु ख पड़ना । २६ खरी मॅजूरी चोखा काम---पूरे दाम देना और अच्छा काम लेना। ३० सलीका ने फारखना माग्नी-छोटे फार्म पर घमंड करना। '३१ स्प्रिंचड़ी खाते पोचा उतरा बड़ा ही कोमल है। ३२ खेनी स्वसम मेती-अपने हाथ से खेनी अच्छी होती है १३३ गधो को गुलकन्द .. ३४ गॅवार को पापड़ - अपान को पान समझn' ३६ गांवक्त फिर हाय प्रातानहीं-ममय पर चूकना नहीं चाहिए। ३६ गांव गये'को वात-जसा हो जाय । ३७ घर का भेदी काढावे-पापस नहीं फूट से बड़ी हानि " होती है। " - " ३८ घामयाद पर कहों को डोते-~काम के समय पर लापर घाही करना। । २६ घर के पीरों को तेज का मजीदा-अपनों साधादर न 14 . . . . - । - . ४० पीकते नाक काटी-बुरे काम का तुरत फल मिलना ४१ हानी पर सरकार नहीं ले गयायश तोमन चाहिए।

* दृष्टान्त सागर-* न ८५ जानी तो कारी मरगई नवासे के नौ२ व्याह-क्यों व्यर्थ शेखी 17 मारता 1 . ८६ नीचे की लास नीचे ऊपर की ऊपर-दग रह जाना ! ८७ नीमन की बरकत-ईमानदारी से धन वृद्धि । ; ८८ पढ़े तो हैं गुणो नहीं-व्यावहारिक अज्ञानता। ८६ पौ बारह है-खुप नारा है। १० पञ्चकहे सो विल्ली सो बिछी-पञ्चों का झूठा कहना भी सच ।' J । - 1 " ६१ न्यारा पूत परोसी दाखिल-न्यारा रहने से अपना नहीं रहता। ६२, फूल न पाती देवी हा हा कोरी पाने मनाना। ६३ बजाज की गठरी झीगुर मालिक दूसरों की वस्तु पर घमड करना। ६४ दाने २पर मुदर है जिसके मागका है उसे मिलता है। २४ थूक का चाटना अच्छानहीं-कह कर लौटना अच्छा नहीं! ६६ जो बोले सो घी को जाय--कहे सो करे । ६७ चूनी कहे मुझे धोसेखो-योग्यता से बढ़ कर दावा करना १८ चोली दापन का साथ छूट नहीं सकता-उनका साथ छूट नहीं सकता। । . . , . ।

Drasthant Sagar Part-ii

Author
Sharma Pt.dwarka Datt
Title
Drasthant Sagar Part-ii
File name
Drasthant Sagar Part-ii
Text
OCR done
Citation
1921
Published
2011/01
Publisher
Anglo Arabic Press Mall Road Lucknow
Language
Sanskrit
Pages
149
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
546595
Barcode
4990010025055.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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WY3pxFU8mCd
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