Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner

Kori Digariya

Dolat Ram Sharma · 2010/12

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कोरी डिगरियां
[ कथा संग्रह ]
लेखर
दौलतराम शर्मा
गयाप्रसाद एण्ड सन्स,आगरा

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गयाप्रसाद एण्ड संस
प्रकाशन विभाग
प्रकाशक
सिटी स्टेशन रोड, प्रागग
लेखक
दौलतराम शर्मा
मुद्रप
जगदीश प्रसाद एम०ए०
एज्यूकेशनल प्रेस, प्रागग
प्रावरण
रिपारमा स्टुडियो, दिल्ली
सस्परण
१ अवयर, १९६२

प्राक्कथन प्रस्तुत कहानी संग्रह प० दौलतराम जी की कहानियो का प्रथम सकलन है । इनमे से कतिपय उत्कृट कोटि को पत्रिकामो मे छप चुकी हैं अथवा अाकाशवाणी पर प्रमारित हो चुकी हैं । राष्ट्रीय कार्यों मे सक्रिय भाग लेने के कारण जब कभी समय मिल गया लेखनी उठाकर लिखना प्रारम्भ कर दिया। पजाब निवासी होकर सिन्ध को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और फिर वहीं के होकर जीवन यापन करने लो, छोडा भी तब जब मजब्री हो गई। भारत विभाजन हो गया और सिन्धवासिया के साथ राजस्थान आ गए और तब से राजस्थान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति के संचालक रूप में कार्य कर रहे हैं। राष्ट्रीय आन्दोलन मे कई वार जेल यात्राएँ की और फिर निकलकर काम में जुट गए । थकान या निराश होना आपने कभी सीखा ही नहीं । जीवन के सट्टे मीठे अनुभव आपके पास हैं, यह कहानियां इसो कर्मट जीवन के अनुभवो का अभिव्यक्तिकरण है। आपके पास बडी-बडी डिगरियां नही, नेतागिरी पत्रा में लम्बे चौडे वही साने नहीं परन्तु अटूट लगन और हृदय को सवेदना अवश्य है । मन में एक टोस है, मस्तिष्क में एक प्रौड राष्ट्रीय एकता की भावना है और जातिवाद का मूलोच्छेदन करने को साकार प्रेरणा है । उनके लिए पशु-पक्षी, स्त्री-पुरप, भारतीय-अभारतीय सभी एक परमात्मा को अमूल्य देन हैं और वह इसके पक्षपाती हैं कि सभी को मिलजुलकर रहने का अधिकार है।

[ २ ] सम्भव है पडित जी की कहानियो मे क्ला की कुछ कमी दिखाई दे परन्तु हृदय की सरल, सुगम और भवाध अनुभूति का प्रवाह उनम मवश्य मिलेगा । जीवन के विभिन्न पहलुप्रो की अभिव्यक्ति इन कहानियों मे बडे स्वाभाविक रूप में मिलती है । सतान प्रेम का सहजरूप "निम्मो" मे मिल जाएगा। मानवता मे सहयोग भौर सहकार की भावना 'वटवारा' मे खूब निखरी है। इसी प्रकार 'वचन के मोल' मे चरित्र को दृढता और भारत की धर्म प्रवण जनता का रूप बडी अच्छी तरह उभर कर ऊपर पाया है । जीवन के व्यक्तिगत और सामूहिक चित्र अन्य कहानियो मे प्रस्फुटित हुए हैं। यत्र तत्र गम्भीरता के साथ हास्य भौर व्यग्य भी बड़ा शिप्ट और स्वस्थ है। हिन्दी मे व्यग्य और हास्य की कहानियो की वास्तव मे बडी जमी है। छोटी होने पर भी 'पडौसी' और 'स्पेशलिस्ट' इस दिशा मे प्राशायुक्त प्रयास है । पशु पक्षियो के सम्बन्ध मे प्रेमचन्द जी के बाद कम लिखा गया है । 'निम्मो' तथा 'बटवारा' इस कमी को पूरक हैं। हमे इस नवागत का स्वागत करते हुए भविष्य में अधिक आशा करनी पाहिए। डाइरेक्टर साहित्य एकाडेमी, उदयपुर । सोमनाथ गुप्त

१६
२६
३६
अनुक्रम
--कोरी डिगरियाँ
२-निम्मो
३--जीवन दान
४-रेशमी रुमाल
५-पटवारा
६-टूटा घडा
७-प्रायश्चित्त
८-वचन का मोल
६-पजू का पता
१०-स्पेशलिस्ट
११-पडोसी
७६
१२

कोरी डिगरि यह भारत है, यह भारत है, कहते कहते मेरी गाँस सजल हा पाइ-और उनस टप-टप आँसू गिरने लगे। प्रात काल का समय था। रेल अपनी रफतार के साथ दौडी जा रही थी। पजाब की ठढी हवा और वर्षा से मेरा शरीर सिकुड गया था, जो अब राजस्थान की राश्क हवा और रजाई की गर्मी से फिर चेतना प्राप्त कर रहा था । मन करता था यं ही रेल चलती रहे, और मैं उस सुन्दर दृश्य का स्मरण बार वार करता रहूँ । यो तो जीवन म अनेक घटनाय मैंने देखी है, जिन्होने मुझ पर गहरा प्रभाव डाला है परन्तु ऐसी घटना मैंने पहले कभी न देखी थी। यही कारण था, कि अवाक् ही मेरे मुंह से निकल गया, यह भारत है, यह भारत है। उस दूसरे दर्जे के डिब्बे में केवल दो सीट थी। मभवत वह डिव्या पहले दर्जे के डिब्बे से बदल कर दूमरे दर्जे का बनाया गया था। नहीं तो साधारणत जो डिव्या दूसरे दर्जे वालो को पांच

दिया जाता है, वह तीसरे दर्जे के डिब्बे से भी गया वीता होता
है। हाँ तो मेरे “यह भारत है, यह भारत है," कहते ही सामने
वाली सीट पर लेटा हुना यात्री, "इसमे क्या शक है, इसमे क्या
शक है," कहता हुमा उठ बैठा, और मेरी ओर ध्यानपूर्वर
देखने लगा।
कुछ समय तव हम दोनो मौन रहे, मैं सोच रहा था, कि
इन्हे वह घटना कहूँ भी या नही । मैं एक अपरिचित से ये एका-
एक खुल जाना पसद नही करता था।
"यह भारत है, यह भारत है, कहते-कहते पाप रुक क्यो
गये" मेरा सह यानी वडी ही नम्रता से वोला।
"यूं ही, परन्तु हाँ मैं एक ऐसी घटना देख कर आया है,
जिसकी स्मृति मात्र से मेरे मुख से निकल पडा । यह भारत है,
यह भारत है।' कहते-कहते मैं भी उठ बैठा ।
"अगर आप को कोई आपत्ति न हो, तो वह घटना मुझे भी
कहे, जिसने आप को इतना प्रभावित किया है।" सह-यात्री
जिज्ञासु रूप मे वोले।
"क्यो नही | भारत माता तो सबकी माता है और उसमे
रहने वाले सभी भाई भाई है । उन सब के दुग्म पुख भी समान
हैं। तव वह घटना जो मेरे मन को पुलक्ति पर रही है, आपको
कहने मे क्या हानि है '-मैंने प्रेमपूर्वव कहा ।
TIP

तो फिर कहिये। "हाँ तो, मेरे हैं, एक वाल मित्र, नाम है उनका नीलकण्ठ । काफी डिगरिया पाये हुये है । वी० ए०, एम० ए०, लॉ पता नही, और भी उन्होने कौन-कौन सी डिगरिया ले रखी है। मुझे तो वे सदा बुद्ध कहते है । क्योकि मैने उन जैसी डिगरिया प्राप्त नही की पर सच्ची बात यह है, कि यह सव डिगरिया प्राप्त करने के बाद भी, एक टिगरी लेना उन से छूट गई है, वह है “जीवन कला"। कुछ समय पहले उनकी पत्नी श्रीमती गिरिजा ने मुझे तार दे कर बुलाया। इस से पूर्व भी, वह कई बार इसी प्रकार बुला चुकी थी। परन्तु अब मैं उन घटनामो को भूल सा गया था। तार पाते ही वह सब घटनायें याद हो आई , मुझे लगा, अवश्य ही फिर कोई खट-पट हुई है। सच बात तो यह है, कि उनका श्रीगणेश ही ठीक ढग से न हो पाया था। तब मुझे विवाह से पूर्व लिसा गया वावू नीलकण्ठ का पर याद हो पाया जो शेखी से लिखा गया था। उन्होने लिखा था- 'तुम अच्छी प्रकार से जानते हो कि अभी मुझे बहुत सारी डिगरिया प्राप्त करनी है जिनके लिए काफी धन की प्राव- श्यक्ता है, जो दुर्भाग्य से मेरे पास नही है । इसलिए धन प्राप्ती का सुगम मार्ग मैंने ढूढ निकाला है और वह है विवाह करना । भाग्य से ऐसा एक घर भी मिल गया है जिसके धन से मैं शिक्षा जारी रख सकता है। हाँ इतना और भी कह सकता हूँ, सात

कि मेरी भावी पत्नी भी वडी ही सुन्दर और सुशील है। आशा
है तुम अपनी मगल कामनायें भेजना न भूलोगे।'
तुम्हारा
नीलकठ
मेरे घर पर पहुँचते ही श्रीमती नीलक्ठ ने कहना शुरू
किया।
'आप मुझे ही बार-बार समझाते हैं। उन्हें तो एक शब्द
भी नही कहते । उनके सामने तो आप भी भीगी बिल्ली बन
जाते हैं । मैंने उनके सग इतने वर्ष बिता दिये, आप एक सप्ताह
तो रह देस' मुझे उनका राज-पाट नही चाहिये । राज पाट
की कौन कहे, भगवान उनके दर्शन भी न कराये। कौन सा
क्प्ट है, जो मुझे उन्हाने नहीं दिया। मेरी तो छोडो, उन्हें अपने
वच्चो पर भी दया नहीं आई। श्रीमति गिरिजा जी ने बडे दुस
से
कहा।
मुझे जैसे काठ मार गया हो, मैं चुपचाप सुनता जा
रहा था।
थोडा रक्कर वे फिर वोली।
'पाधी रात का समय था 1 कडाके की सर्दी पड रही थी।
पूरे कपडे न होन के कारण बच्चे थर थर काप रहे थे। मगर
वह हमे एक दूसरी गाडी पर बैठा कर स्वय किसी और गाडी मे
प्राय

बैठ गये । आप अनुमान नहीं लगा सक्ते, कि उन्हें साथ न
पाकर हमारी क्या गति वनी होगी । अन्त में हम कहाँ कहाँ
भटक कर घर पहुंचे, यह एक अलग वडी दास्तान हैं।
आज पूरे छ महीने हो गये है, परन्तु उन का कोई समा
चार नहीं । जाते समय वह घर म एक पैसा भी नहीं छोड गये
थे, जिससे मै वच्चा की संभाल करती। किस प्रकार यह छ
माह मैंने मह्नत मजदूरी कर बन्चो की पालना की है, यह मेरा
मन ही जानता है। आप सुन, ता दुख से पागल हा जायें ।
सच है, "जिस तन लागे, वे तन जाने, और न जान पीड
पराई ।' यह कहते कहते गिरिजा जी फट-फूट कर रोन लगी।
मगर मेरे पास कोई शन्द न था, जिससे उनक दुखो मन
को धीरज बंधाता। इसलिये मेने साचा, कि दुल स्पो बादलो
के खुल कर वरस जाने मे ही कल्याण है । उनके रोकने म नहीं।
पूरे आध घन्टे तक जब वे दिल खोलकर रो चुकी, तब वे
फिर एक से एक बढ कर दर्द भरी कहानी कहने लगी।
'सदियो के दिन थे। हमारे पडोस म एक कन्या की शादी
थी। स्त्रियों के बहुत कहते सुनने पर मैं भी दोनो वन्चो के साथ
वहाँ चली गई, रात के दस भी न बजे होंगे, कि मैं लौट आई।
अभी घर मे पैर ही रखा था, कि वे एक खूखार शेर की तरह
मुझ पर भपटे । पहले तो वही बुरी तरह से पीटा, और अन्त मे

घर से निकाल बाहर किया। वच्चे मारे भय के चीस रहे थे।
मार पीट तो रोज की वात थी, परन्तु वह बिना किसी दोप के
घर से बाहर और वे भी रात्रि के समय निकाल सकते है, ऐसा
मैने पहले कभी न सोचा था । सारी रात मै बच्चो को गोदी मे
लेकर बाहर बैठी रही मगर उन्होने हमारे लाख पुकारने,
चीसने पर भी दरवाजा न खोला, और न खोला।'
मैंने चाहा, वह थोडा जल पी कर सुस्ता ले, और फिर जा
कहना हो कहे परन्तु उन्होने न तो जल पिया, और न ही
मेरी प्रार्थना पर ध्यान दिया। मानो वे खून आसूं पी रही
हो, सुस्ताना तो उनके भाग्य मे ही नहीं था।
'एक रात मैं दोनो बच्चो को साथ लेकर नदी की ओर
चल पड़ी । सोचा था, पहले दोनो वच्चो को नदी में फेंक दूंगी,
वाद मे स्वय कूद पड गी। मगर बच्चो का चाँद जैसा मुखडा मुझे
प्राशा और धीरज बँधाता । मन चाहता, में उलटे पाव लौट
जाऊँ । मगर जब फिर यह नर्व भरा जीवन याद आता, तो पर
आगे ही आगे बढते जाते । गणेश उन दिनो दस वर्ष का था । वह
मेरे आगे-आगे चल रहा था। मुन्नी मेरी गोदी मे थी। उन
। निर्दोष बच्चो को यह ज्ञान भी न था, कि स्वय उनकी जननी
उन्हे मौत घाट उतारने जा रही है । गणेश चलते-चलते
पूछता, माँ हम कहाँ जा रहे है । अभी हमे और कितना चलना
है ? परन्तु मैं क्या उत्तर देती मेरा आँचल आँसुयो से भीग गया
1
दस

था, और मैं चुप-चाप चल रही थी। इतने मे हम नदी पर श्रा गये। क्या देखती हूँ, कि एक सुन्दर बालक नदी पर बैठा वासुरी वजा रहा है । मैं डर गई, वह स्थान छोड़ कर थोडो आगे बढी । मेरा खून खौल रहा था, मैं मोह माया का त्याग कर चुकी थी। परन्तु क्या देखती हूँ, कि वह सुन्दर वालक वहाँ भी सडा है। उसकी मनमोहनी सूरत, वासुरी का मधुर अलाप, मानो मुझे कह रहे हो, लौट जाओ, वह्नि लौट जाओ। प्रात्म-हन्या महा- पाप है । यह सुनते ही मैं स्वस्थ हो गई। मैंने दौडकर गणेश को चूमा । मुन्नी को थपथपाया । परन्तु वह मेरे कधे पर सिर रसे गहरी नीद में सो रही थी। हम घर को चल दिये, मेने मुड कर देवा-सुन्दर बालक अलोप हो चुका था। बडी दर्द भरी कहानी है । ऐसी ही अवलाओ के लिये राज्य ने तलाक बिल बनाया है। अन्यथा भारत की परम्पराग्रो को देखते हुये ऐसे विल की आवश्यकता न थी।' सह्योगी बडे दुःखी मन से वोले। 'परन्तु अभी आप ने सुना ही क्या है सारी वात मुन जायें, तो दु.स से रो पडे'-मैने उत्तर दिया । 'मगर इस जुलमो सितम का कोई कारण भी तो होना चाहिये ।' सह्योगी ने फिर प्रश्न किया। 'कुछ नहीं, अपनी असफलनानो की टीस जो अपनी पत्नी पर ग्यारह

निकालते । थोथी डिगरियो का अभिमान जिससे उन्हे सारी
दुनिया मूखों और 'ताडन के अधिकारी' दीसती। वह दो चार
माह से अधिक कही नौकरी भी न कर पाते । उन्हें लगता कि
सारी दुनिया उनके विरुद्ध पड्यन कर रही है। उन जैस योग्य
व्यक्ति को लोग टिक्ने नहीं देते । इस वहम मे वे वडो वडो का
अनादर कर देते जिससे अन्त मे उन्ह नौकरी से हाथ धोना
पडता।'
'अजीव खोपडी है, आपने उनकी पत्नी को कानून वी
सहायता लेने को क्यो नही कहा ।' साथी जोश से बोले ।
'कहा क्या नही ? उनके हितचिन्तको ने उनसे अनेक बार
क्हा । मगर उन्होने किसी की न मानी। उल्टा वे नाराज हो
जाती । तय हितचिन्तका का क्षमा मागनी परती।'
'यह भी खूब रही । नारी स्वभाव भी वडा विचिन है ।'
सहयागी आश्चर्य से बोले ।
'फिर क्या हुना" सहयागी योडा रक पर बोले ।
"हाँ, तो जव वे सब दर्द भरी घटनाएँ कह चुकी, तो मैने
। कहा, मुझे तार देकर आपने क्यो बुलाया है । मेरे योग्य सेवा
कोि ? तव उस वीर नारी ने जो उत्तर दिया, उसे सुन कर
मैं अवाक रह गया।
'मुझे न तो पीहर जाना है, नहीं सुसराल वालो का आधार
लेना है । मैं महनत वरूँगी, चसी पीसगी, मगर किसी के आगे
बारह

हाथ नहीं फैलाऊंगी। आपको बुलाने का केवल यह भाव है कि अगर उनका कही पता लग जाये तो मुझे सूचना दिनो के वाद महीनो, और महीनो के बाद वर्ष बीत गये, पर वाबू नीलकण्ठ का कही पता न लगा, न उन्होंने ही कोई समाचार दिया लिया । इधर गणेश भी युवक हो चुका था, और एक अच्छे कारोबार मे लग गया था। वह हर प्रकार का प्रयत्न करता, जिससे उसकी जननी प्रसन्न रहे । परन्तु उनके चहरे पर न तो कभी किसी ने खुशी पाई, और न तन पर अच्छा कपडा, वे तपस्विनी की भाँति आयु विताने लगी। अचानक मुझे गणेश का एक पत्र मिला जिसमे लिखा था। 'पिताजी घर लौट आये है । वे आप से मिलना चाहते है । वन पडे तो शीघ्र यहाँ आकर उनसे मिले।' इस सक्षिप्त पत्र को पाकर मेरे हर्प का पारावार न रहा। जिस व्यक्ति के तलाश करने के लिये वर्षों से दौड धूप की जा रही थी, और कही पता नहीं लग रहा था वह एका एक कैसे घर लौट आया । जो हो, मै शीघ्रता मे स्टेशन की ओर लपका और मुझे जो पहली गाडी मिली, उसी पर सवार हो कर उनके गाँव जा पहुँचा। परन्तु मेरा मन धडक रहा था। मैंने सोचा, बावू नीलकण्ठ अब वाफी बदल गये होंगे। हो सकता है, न भी बदले हो, और हम मोह माया मे पड़े लोगो को सत्य उपदेश देने साये हो । मन की उडान से उडता, इधर-उधर की सोच- - तेरह

.
विचार करते जैसे ही मने उनके आँगन मे पैर रखा तो क्या
देखता हूँ, उनके आँगन मे कुछ कागजो की होली हो रही है ।
गणेश और मुन्नी जार जोर से हंस रहे है । 'माँ हमने पिताजी
के पर काट दिये, अब वे हमे छोड कर कही नही जायेंगे । न ही
तुम पर अत्याचार करगे।'
'देखो गरगेश, तुमन वडा अन्याय किया है । तुम मेरे जीते जी
उनका अनादर नहीं कर सकते । हँसो बन्द करो और उन स क्षमा
मागो । वेटा पहले मुझे जान से मार दो, वाद मे उन से प्रश्न
उत्तर करो।
उधर बाबू नीलकण्ठ को अब खुल चुकी थी। वे रुंधे हुए
कण्ठ से वोले 'गिरिजा, तुम नारी नही देवी हो । मुझे क्षमा
परो । गणेश ने इन दिगरियो को जला कर अच्छा ही किया है ।
इन डिगरियो के अभिमान ने मुझे वही का न रखा था । न मैं
घर म सफल हो पाया था, न वाहर । और तो और मानवता भी
मुझे छोड गई थी। मैं विना छाटे बडे का लिहाज क्येि सबका
अनादर कर देता था। वाश मेने कही जमकर नौकरी की
होता तो आज क्सिी उंचे पद पर पहुँचा होता ।
मेरे इस झूठे अभिमान के कारण, तुम्ह और बच्चो को
क्तिना क्प्ट, क्तिना
योग सहना पडा। अफसोस
मुझे
ज्ञान हुया है कि कोरी टिगरिया ही सब कुछ नही । जीवन यो
सफल बनाने के लिये और भी अनेक बातो की जरत है।' यह
चौदह

वहते कहते वाव् नीलकण्ठ गिरिजा की ओर बढे, मानो उनके
पर इने जा रहे हो।
परन्तु देवी गिरिजा ने उन्ह यह मौवा न दिया और स्वय
आगे बढ़ कर उनके चरण छू लिये । राम जाने, क्सि भूल का
कारण इतने वर्षों का वियोग बना । 'अव मेरे चरण छू कर
और दोप क्यो चढाते हो ।' देवी गिरजा गद्गद् हृदय से बोली।
इम सुन्दर मिलन को देख कर मेरी ग्राँग्बो से प्रानन्द अथु
गिरने लगे। मैंने आगे वढ वर उस वीर रमरमी को प्रणाम
दिया।"
सह यानी भी कहने लगे-'श्रीमान जी, यही तो भारत है।'
।

निम्मो

"निम्मो निम्मो ! निम्मो !!!
"वेटो । तू कहाँ है ? मैं क्व से तेरी खोज कर रही हूँ ? पर
तू है कि मिलती ही नही । राम उन दुष्टो को सुमति दे, जिन्होंने
मेरी प्यारी बेटी को मुझसे जुदा किया।"
हॉफ्ती हुई वलवती, व्यथा-कातर होकर पुकार रही थी।
जिस प्रकार श्री राम पचवटी से सीता के हरे जाने के बाद
विरह मे बन के पेड पौधो और पक्षियो से पूछते फिरते थे कि
मेरी सीता कहां है? मेरी प्राण-प्यारी कहाँ है ? उसी प्रकार
ममता की मारी वात्सल्य-मयी वलवती जगल मे मारी मारी
फिर रही थी। उसे न तन की सुघ थी और न भूख प्यास की
चिता । झाडियो में उलझ उलझ कर उसके सारे कपड़े फट गये
और काटो से दोनो पैर छलनी हो गए, फिर भी वह पुकारतो
जाती थी-"निम्मो ! निम्मो !! निम्मो !!! प्यारी बेटी ! तू कहाँ
है ?" पुकारते पुकारते उसका गला बैठ गया । होठो पर पपड़ी
जम गई पर उसका मातृत्व तडफता रहा, अपनी कलेजे की कोर
को देखने के लिए।
बलवती की शादी हुए पूरे दस साल हो गए। उसकी आयु
पच्चीस वर्ष की हो चली है । लेकिन वह अभी उस मीठे फल से

वचित है, जिसे पाकर नारी जीवन धन्य हो उठता है । उसका पति स्वस्थ और सुन्दर है । सौ मे एक है । वह स्वय भी अनिंद्य सौन्दर्य की स्वामिनी है । पुस्प तो पुरुष, नारियाँ भी उसका निर्दोष रूप निरख कर रोझ जाती है। स्वभाव की इतनी सरल और सीधी कि कोई भी अपनी बात मनवा ले और वाणी की इतनी मीठो कि जैसे मिश्री घुली हो । पर उसके मन की छट पटाहट की कौन जाने ? रह रह कर उसे अपनी सूनी कोख का ध्यान हो पाता है । वह सोचती है कि उसकी गोद कब भरेगी' कब एक रुनझुन करता प्रसवकमाला और नदलाला सा वालक उसके आगन को अपनी आह्लादकारी किलकारियो से भरेगा। एक दिन जब वलवती खेत से चारा लिए लौट रही थी तो उसन हिरणो के एक झुड को देखा । झुड में एक हिरणी अपने बच्चे को दूध पिला रही थी। वह ध्यान मग्न होकर उस सुन्दर मृग शिशु को देखने लगी। उसने बडे बडे मुदकारी नयन बड़े भल लगे। आज उसे पता चला कि ससार मुन्दर नारियो के बडे बडे } नैन निहार कर क्यो उन्ह मृग नयनी कहता है ? चपलता से छौने का दूध पीना उसे इतना सुहावना लगा कि उसपी छातिया भी पवम गई । उसे लगा कि उसके स्तन दूध से भर गए हैं और कोई चचल वालक उन्हें चपड चपड करके पी रहा है । उसका मातृ हृदय वात्सल्य से भर गया। अठारह

-
इस काल्पनिक सुख को अनुभव करती हुई वह ध्यानावस्थित
होगई और जैसे ही उसकी तद्रा टूटी उसे कुत्तो का शोर सुनाई
पडा । उसने देखा कि शिकारी कुत्तो का एक दल विकराल काल
की तरह हिरणो की ओर झपटा पा रहा है। उसे देखकर
हिरण भागे, पर छौने की मा कैसे भाग सक्ती थी? काल
इतना निकट था कि क्षण भर की देरी भी उन दो निर्दोप जीवो
की हत्या का कारण हो सकती थी। बलवती चारे का गठ्ठर एक
ओर फेक्कर तीर की तरह झपटी और उस छौने को उठा
लिया। छौने को सुरक्षित जान उसकी मा मृगी भी जान बचा-
पर भागी। पर जाते समय उसने इस कमलनयनी को देखा
मानो कह रही हो, बहिन, अव तू ही इसकी मा है। मरते
दम तक इसवी रक्षा करना । क्षण भर मे हिरणो का दल दृष्टि-
पथ से ओझल हो गया।
छौने को गोद मे लेते ही बलवती को रोमाच हो पाया।
कपडे की थोडी सी ओट कर उसने चोली खोलदी और एक
पुत्रवती नववधू की तरह उसे दूध पिलाने लगी। उसके स्तनो से
गगा-जमुना की पवित्र धाराएं वह निक्ली । उसे लगा कि आज
उसवा नारी जीवन सफल होगया । उसने स्नेह से अनेक वार
उस चचल छौने को चूमा । तब कही जाकर उसके मन की प्यास
मिटी । उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा । वह अनोखा उपहार
पाकर निहाल होगई । उसके पग घर की ओर बढ चले।
उन्नीस

अब बलवती का एकाकी जीवन समाप्त हो गया। उसके
घर का प्रागन और मन दोनो भर गये । जहाँ पहले उसके घर
मे क्टखनी शून्यता छाई रहती थी अब वहाँ सारे दिन बच्चो की
टोलियाँ जुडने लगी। उसके घर आने वाले वाल समुदाय ने छौने
का नाम रखा निम्मो।
निम्मो ने प्रकृति प्रदत्त अपनी प्रियदर्शी सुपमा और चाचल्य
से सवको मोह लिया। वलवती तो खैर उसे प्यार करने
वालो में सबसे आगे थी ही, पर गली भर के नर नारी भी उसे
चाहने लगे। बाल क्रीडाप्रो के बीच वह धीरे धीरे बढ़ने लगी।
उसकी उछल कूद और विशेषत बडी बड़ी आँखें और गले मे
रुन झुन करती हुई दो घटिया तो राहजातो को मस्त कर देर्ती ।
बलवती इस वरदान को सहेज कर रखती । उसे हरदम यह
ख्याल तग करता रहता कि उसकी निम्मो भूखी न रह जाय ।
कोई पास पडोस का छोक्रा उसके वही कुछ कर न दे । उसके
पास खडी रहकर भर पेट खिलाती। उसके मृदुल अवयवो पर
हाथ फेरकर वह स्वर्गीय सुखानुभूति पाती । सारा दिन निम्मो ।
निम्मो " करते बीतता।
बलवती का समस्त मातृत्व निम्मो पर उमड पड़ा । और
निम्मो भी उसके भाव समझती। यदा कदा बलवती का अपने
पति से झगडा हो जाने पर वह
जाती और निम्मो यो
खिलाने वैठती तो निम्मो, अपने होठा को पड फ्डाकर उसके
बीस

?
होठो से छुपा देती, मानो यह पूछती हो कि आज मैय्या | उदास
क्यो हो
इस पर बलवती की उदासी न भागती तो निम्मो अपनी
क्रिया को अनेको रूपो म दुहराती जाती खाना न खाती । अत
में बलवती को अपनी निम्मो का इतना प्यार देखकर, अपने प्रति
इतनी सहानुभूति का अनुभव कर और उसका खाना न खाने के
लिए रूठना पिघला देता । वह उसे उठाकर छाती से लगा लेती
और मुस्कराकर जोर से कहती।
"अरी मरी ले खाले । नाराज क्यो होगई ?" और निम्मो
पुलक्ति नयनो से अपनी मा को देखती देखती सारा चारा पानी
चटकर जाती।
निम्मो और बलवती
पशु और मानव
मा-वेटी,
दुख मुख की सगिनी
मनुष्यत्व की भावना का चरमोत्कर्प।
निम्मो छोटी कब तक रहती। वह मा की छन-छाया मे
बड़ी होने लगी। पशु मुलभ उसके उत्पात भी बढने लगे।
बलवती अपनी पडौसिनो से शिकायत सुनती सुनती हैरान ।
कोई कहती-अाखिर यह भी कोई बात है ? बेटी होगी तो
इक्कीस

तेरी । नाशगई, हमारा आटा क्यो खा जाती है ।
कोई कहती-"मरी ले जाये तेरी इस निम्मो को । अाज
यह दूध उलट आई।"
आखिर मे इन उपालंभो की शृखला इतनी बढ़ गई कि जब
एक वर्ष बाद उसका पति छुट्टी पर घर आया तो लोगों ने उसकी खूब
खबर ली । इससे उसे गुस्सा आगया । पति-पत्नी दोनो मे निम्मो
को लेकर झगडा होगया । वह कहता कि इसे निकाल कर घर से
वाहर करो। क्या बबाल पाल रखा है। जिसे देखो वही इसकी
शिकायत लिए आता है । बलवती कोई जवाब न देकर रो देती ।
वह घर वाले की यह बात कैसे माने ? भला अपनी लडकी
को भी घर से निकाला जा सकता है । ना. ना ऐसा न तो
करूंगी और न होने दूंगी। ये अडोस-पडोस के लोग तो निर्दयी
है। इन्हे क्या मालूम मैंने निम्मो को कैसे पाला है ? कितना इसे
अपनी छाती का दूध पिलाया है । इसने तो मेरा सारा दुःख ही
हर लिया।
कई बार कहने पर भी न मानी तो एक दिन बलवती के पति
ने निम्मो को कही जंगल मे छोड पाने की योजना बनाई । वह
उसके पैरो पडकर रोई और खूब रोई । बोली-
"निम्मो बेटी है। यह पाप न करो । इसे मैने अपना दूध
पिलाकर पोपा है।"
वाईस

इसका कुछ ऐसा असर पड़ा कि निम्मो घर से निकाली न
जा सकी।
छुट्टी समाप्त हो जाने से बलवती का पति नौकरी पर
चला गया।
मा बेटी की बनी रही।
निम्मो दो साल की होगई । उसके.घूमने फिरन की सीमा
गाव के सेतो तक बढ गई । वह स्वयं ही खेतो मे जाकर चर
पाती । गाव के कुत्ते उसे कुछ न कहते । उनका मुकाबला करना
वह वालपन से ही सीसी हुई थी।
निम्मो के विरुद्ध शिकायतो का अत न हुआ । खेतो से
शिकायते पाने लगी कि यह धान चर पाई । पौधो को कुचल
पाई। इसे कसाइयो के हवाले करो। कहीं-कही से यह भी सुनाई
पडने लगा कि इम वार इसने खेत पर पग रखा नही कि काट
कर रख दंगा।
वलवती यह सुनकर वेहाल ' वह अब हरदम शक्ति रहने
लगी। कौन जाने, कब क्या हो जाये ? अत मे निम्मो को कोई
मार डालेगा इस भय से उसने स्वय ही उसे जगल मे छोड आने
की सोची । लोगो को गात करने के लिए दो चार बार वह उसे
जगल मे छोड भी पाई । पर वह क्या करे ? उसके घर पहुँचने
से पहले ही निम्मो उसे आगे खही मिलती । या न मिलती तो
तेईस

वह स्वय जाकर ढूंढ लाती । मन भी तो कहे का नहीं रहा । इस जरा सी जुदाई से ही उसका मन निम्मो के लिए तडफने लगता। वह उसे गले से लगाती, गोया वर्षों बाद बेटी अपनी ससुराल से आई हो। तव तग आकर एक दिन किसानो ने निम्मो को घेर लिया और खूब वेदर्दी से पीटा। निम्मो मार खाकर अधमरी हालत मे घर लौटी तो उसे देख- कर बलवती चीखे मारकर रोई और उससे चिपट गई । मन कुछ शात हुआ तो निम्मो घायल अगो को साफ करते हुए उसने कहा- "निम्मो री ' तू उन क्साइयो के बीच क्यो गई ? पर तुझे क्या पता कि यहाँ आदमी कोई नही बसता । उसे निम्मो की मा की ये आँखे याद आई जब उसने जगल मे छोडकर भागते समय देखी थी। जो उससे पूछ रही थी-क्या इसी बूते पर तूने निम्मो को गोद लिया था ? धिक्कार है ऐसी मानवता को । ) बलवती तिलमिला उठी और पाहत निम्मो को गोद मे लेकर जगल की ओर चल पडी। लगभग पाच मील जाकर एक पेड़ के नीचे रुकी। निम्मो मार खाने और चलने के कारण बुरी तरह थक गई थी, इसलिए वह वेहोश होकर गिर पड़ी। चौवीस

बलवती कलेजे पर पत्थर रखकर जगत-रक्षक के भरोसे
निम्मो को छोडकर लौट आई । सारी रात रोती रही । एक
छन को भी उसकी आँख न भपी। बार-बार उसे निम्मो का
ध्यान हो आता।
उसकी बेटी निम्मो।
हा, निम्मो मर रही है।
प्रात होते ही बलवती उठी और निम्मो से मिलने चली।
उसने सोचा अब वह स्वस्थ हो चुकी होगी। अत उसे लेकर
आगे चल पडूगी । इस गाव का कभी मुंह भी न देलूंगी।
जब वह कल वाले पेड के पास पहुंची तो उसे निम्मो दिखाई
न दो । उसके मस्तिष्क का सतुलन जाता रहा। उसे आखो मे
अँधेरा आता हुआ लगा।
पागल बलवती वियोगिनी की भाति इधर उधर चक्कर
लगाने लगी। मातृ हृदय की इस असह्य पीडा ने समस्त वायु-
मडल को आकुल बना डाला।
व्याकुलमना वह पगली घूमती घामती नहर के किनारे
पहुँची । नहर मे उसे कुछ तैरता हुआ दिखाई दिया। वह निम्मो
की लाश थी।
निम्मो रात भर बलवती को खोजती-खोजती नहर मे फिसल
गई, वाहर न निकल सकी।
बलवती ने अपनी थोडी सी चेतना शक्ति के सहारे लाश को
पहचान लिया । वह निम्मो ' निम्मो !! पुकारती हुई उस पर
कूद पडी।
पच्चीस

जीवन-दान

तार पढते ही वृद्ध चिल्ला उठा-
"उफ ! यह कैसा अधेरा! मेरो जमीन गई, जायदाद
गई और गया वतन, पर मैंने पीछे मुडकर भी न देखा। मन में
एक सतोप था कि चलो धर्म तो बचा । भारत मा की वेडिया
तो स्टी। मगर अब यह अन्याय तो मुझसे सहा नहीं जायेगा।"
वृद्ध केवलराम का कलेजा तिलमिला उठा। उसकी आँखो
मे पुत्री की भोली सूरत घूम गई, एक के बाद एक विचार उठ
कर उसे विदग्ध करने लगे-
"मैंने कमला की एक न मानी । वह कितनी रोई थी ?
लेकिन मैंने कुल और धन के अभिमान में उसको एक भी न
सुनी । वह मन मसोस कर रह गई । मैंने उसके मन के विरुद्ध
एक साहूकार के लड़के के साथ वोस हजार दहेज का वचन
देकर उसकी मगनी करदी। पर हाय ! क्या पता था कि ऐसे
दिन भी हम अभागो को देखने होंगे। बीस हजार तो क्या वीस
रपये भी हमारे लिए जुटाने कठिन हो जायेंगे ? और ये धनवान
लोग पूर्वजो की मान मर्यादा त्याग कर केवल धन के तराजू से
हो मानवता लेंगे। धिक्कार ! सौ सौ बार धिक्कार! पर ग्राज
दूसरो को धिकार देने से बनेगा भी क्या? स्वय मुभी को
सत्ताईस

धिक्कार है, जिसने रमेश जैसे होनहार युवक को केवल इसलिए
स्वीकार नहीं किया कि वह एक गरीव विधवा का लडका है ।
अब याद आता है वह दिन जव वे दोनो-कमला और रमेश कालेज
से एक साथ आत थे-तो देखने वाला के मुंह से हठात यह बात
निकल जाती कि कितना सुदर जोडा है ।"
पर अव चारा ही क्या था? केवलराम अपना सिर थाम कर
रह गया।
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नियति जहा अत्यत दयालु है, वहाँ वह क्रूर भी कम नहीं ।
जिस चमन मे कल वुल-बुलें चह चहाती थी, वही आज विया
वान हो रहा है। जिस नगर की हर शाम दीपावली होती थी,
वहाँ अाज चारो तरफ अधेरा ही अधेरा छाया हुआ है । जहाँ
हिन्दु मुसलमान मिलकर खुशिया मनाते थे, वहाँ जगखोरो ने
कुछ ऐसी शरारत की कि भाई भाई का प्राण लेवा हो गया।
परिणामस्वरूप देश के दो टुकडे हो गए । हिन्दुस्तान, पाकिस्तान ।
हिन्दू धडा धड सिन्ध छोडने लगे। लाड के प्रसिद्ध जमीदार
भाई केवलराम न जव यह दुर्दशा देखी तो वह भी अपनी पत्नी
और पुत्री के साथ अजमेर या वसा ।
यू तो पाकिस्तान बनने की दुर्घटना से सभी को तरह तरह
के कष्ट और अपमान सहने पडे है, परन्तु जमीदारो की आप
वीती अकथनीय है । व्यापारी और पढे लिखे तो इधर उधर
अट्ठाईस

भटक कर कही न कही काम पर लग गए, मगर जमीदार लोग
न नौकरी करना जानते थे और न व्यापार । फिर ये करें तो
क्या? इनकी विद्या और व्यापार तो इनकी धरती थी, जिसके
वल पर ये राजाओ जैसा ठाठ रखते थे। ये बहुत दूर की भी
नहीं सोचते थे। बस माल भर का अन धन रखकर बाकी
किसानो और जमीन मे लगा दते। इसलिए जब ये भारत मे
आये तो इनके पास नकदी नाममान की ही थी। भाई केवल
राम के सवधी ने जव यह सुना कि अब उसके पास वीस हजार
तो क्या, वीस सौ भी नहीं तो उसने अपने तेवर वदले और
अपने पुन की सगाई तार से सूचना देकर समाप्त करदो । पत्र
लिखना भी गवारा न हुआ।
केवलराम यह अमानवीय प्रहार न सह सका । उसे अपने
अत समय मे वे सभी याद आये जो कभी उसके सामने हाथ
वांधे खडे रहकर दानी, देश भक्त, धर्मवीर और भी पता नहीं
क्या क्या खिताब देते थे। पर आज जिनकी सूरत दिखाई नही
पड़ रही।
इसी समय मे पूर्ण अममर्थ देवलराम ने असहाय अवस्था
मे अपनी पुत्री कमला की गोद म सिर रसकर प्राण छोडे । विसी
ने भी उसकी लाग पर दो ऑन न गिराये । रोई तो केवल
कमला
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उन्तीस

वमला जैसे ही अपने पिता के कर्मकाण्ड से निवृत्त हुई, उसे
पुरानी स्मृतियो ने आ घेरा । उसे रह रह करके पुराने दिन याद
आने लगे और वह कलेजा मसोस कर रह जाती।
"भारत छोडो' आदोलन जब सिन्ध मे आया तो वह कोई
१५ १६ वर्ष की होगी। उसने इतनी छोटी उम्र म भी अपने
राहपाठी रमेश के साथ वह कर दिखाया जो वडे बडे नेता भी न
कर सके । उन्होने मिल कर लडके लडकियो का एक दल बनाया
जिसने स्वातत्र्य युद्ध मे कमाल कर दिखाया। क्तिने ही लड़के
और लडकियाँ जेलो मे गए। बतो की मार सही । लम्बी लम्बी
सजाएँ काटी पर अग्रेजशाही के सामने नत न हए । स्वय कमला
और रमेश भी दो वार जेल हो पाये।
फिर उमे वे दिन भी याद आये जब वह रमेश से मिलवर
समाज सुधार के बड़े बड़े स्वप्न देखा करती थी । रमेश के सामन
एक दिन कहने लगी-"रमेश में ऐसे नर राक्षस से शादी न
क्स्गी जो दहेज गे माग रे क्योकि यह मेरा ही नहीं समस्त
नारी जाति का अपमान है।'
पर आज उसके मन की दुनिया बिलख बिलग्न कर क्रन्दन
कर उठी, जिस जिसका उसे आज आभास हुआ कि नारी
कही कही पर कमजार भी है ।
इस दुख दर्द मे कमला को रमेश की याद हो पायी । इच्छा
तीस

हुई वि अपने सहपाठी को मन की व्यथा पत्र रुप मे लिख कर
ही भेज दे तो जी कुछ हलका हो जावे। पर लिखे क्सि बूते से ।
वह आज राजकुमारी से रक बन चुकी है और रमेश अपनी
योग्यता और निष्ठा से दिल्ली में एक बडे सरखारी पद पर पहुँच
गया है । क्या वह उसे पहचान सकेगा? उसके मन की बात
सुन सकेगा?
कमला के भीतर से एक आवाज आई--"अरी, वह तुम्हारा
पत्र पाते ही दौड कर पायेगा । उसे दर्द की पहचान है।" और
कमला ने अनेक मानसिक द्वन्दो, संघर्पो और कुठानो में मग्नपत्र
लिखकर डाक मे छोड दिया।
रमेश ने जब लिफाफे पर परिचित हस्ताक्षर देखे तो उसे
रोमाच हो पाया। उसने धडकते कलेजे से लिफाफा खोला और
एक सास में सारा पन पढ गया। कमला वा सौम्य रूप उसकी
आँखो मे घूम गया । उसके दर्द की अनुभूति से श्वास कुछ क्षणो
के लिए तेज होगई । उसने एक सप्ताह के अवकाश का प्रार्थना-
पन दिया और अपनी कमला से मिलने पहली ट्रेन से चल पड़ा।
जव सबट मे कोई अपनी महानुभूति और हाथ बंटाने आगे
आता है तो दर्द एकाएक और वोझिल हो जाता है । मुख से एक
शब्द भी नहीं निकल पाता । यदि कही कोई हरक्त होती है तो
आंखो मे
इकत्तीस

यही हुआ कमला मे । जब उसने रमेश को अपने समक्ष खडे
पाया तो मूक्ता ने उसे जक्ड लिया । साधारण शिष्टाचार के
शब्द भी उससे न कहे गए । अविरल अश्रुधारा से उसने रमेश
का स्वागत किया।
रमेश श्वेत साडी से अविष्टित कमला के दुख विदग्ध मुख
को निहार कर ठगा सा रह गया । उसने आगे बढकर बिलखती
कमला को छाती से लगाया और उसकी पीठ थपथपाते हुए,
प्यार से कहा-
"पगली । रो रही है । वस बन्द कर यह पागलपन !"
रमेश कमला को अपने सहारे कमरे में ले गया । उसे बैठा-
कर, पास मे रखे गिलास के पानी से मुंह धुलवाया । जब वह
पूर्णत आश्वस्त हो चुकी तो कहा-
"वता, मुझे क्या करने को कहती है ?" पर कमला मूक
प्रपनी बड़ी-बडी आँखो से वह रमेश को देखती भर रही।
"वोलेगी नही । चुप्पी तो थी ही । उसे तोडने के लिए तो
तुमने मुझे पन भेजा था।"
" कमला अधूरे वाक्य कह सकी थी कि उसे
वाहर से किसी ने पुकारा। रमेश ने आगे बढ़कर देखा पोस्टमैन
था। उसने एक तार का लिफाफा उसके हाथ मे दिया और
हस्ताक्षर लेकर वह चला गया।
"रमेश तुम
बत्तीस

कमला ने लिफाफा खोलकर तार पढा। वम्बई से आया
था। उसमे लिखा था-"मैं पिताजी की भूल का प्रायश्चित करने
के लिए सिगापुर से बम्बई आ पहुँचा हूँ। क्षमादान के लिये
अजमेर पहुँच रहा हूँ"-निर्मल ।
कमला सिर पक्ड कर बैठ गई। उसे समझ न पाया कि वह
क्या करे? इतनो विक्षुब्धता देख कर रमेश ने पूछा-
"तार कहां का है ?"
उत्तर में कमला ने तार रमेश के हाथ मे दे दिया। उसने
पहा । परेशानी को समझकर उमने कहा-
"अच्छा कम्मो । तार वाले को भी पाने दो। तुम अब
आराम से सो जानो ताकि मानसिक थकान कुछ तो कम हो।"
कमला विना कुछ कहे अपने बिस्तर पर जाकर लेट गई।
रमेश भी कई घटे को लबी यात्रा से थका हुआ था, मो उसने
भी अपना विस्तर बंद खोलकर विछाया और सो रहा ।
रात तो वितानी थी ही।
x
x
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सुबह निर्मल आया, और उमने विना विमी पूर्व भूमिका
के कहा-
"कमला मुझे क्षमा करो। धन और दहेज मुझे नहीं
नाहिए। मैं मानता हूँ कि आपके पिता जी की मृत्यु का कारण
तेतीस

यही हुआ कमला मे । जब उसने रमेश को अपने समक्ष खडे
पाया तो मूक्ता ने उसे जकड लिया । साधारण शिष्टाचार के
शब्द भी उससे न कहे गए । अविरल अश्रुधारा से उसने रमेश
का स्वागत किया।
रमेश श्वेत साडी से अविष्टित कमला के दुख विदग्ध मुख
को निहार कर ठगा सा रह गया । उसने आगे बढ़कर बिलखती
कमला को छाती से लगाया और उसकी पीठ थपथपाते हुए,
प्यार से कहा-
"पगली | रो रही है । बस वन्द कर यह पागलपन ।"
रमेश कमला को अपने सहारे कमरे मे ले गया। उसे बैठा
कर, पास में रखे गिलास के पानी से मुंह धुलवाया । जब वह
पूर्णत प्राश्वस्त हो चुकी तो कहा-
"वता, मुझे क्या करने को कहती है
पर कमला मूक
प्रपनी बडी बडी आँखो से वह रमेश को देखती भर रही ।
"बोलेगी नहीं । चुप्पी तो थी ही । उसे तोडने के लिए तो
तुमने मुझे पत्र भेजा था।"
।' क्मला अधूरे वाक्य कह सकी थी कि उसे
वाहर से किसी ने पुकारा। रमेश ने आगे बढकर देखा पोस्टमैन
था। उसने एक तार का लिफाफा उसके हाथ मे दिया और
हस्ताक्षर लेकर वह चला गया।
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"रमेश तुम
बत्तीस

कमला ने लिफाफा खोलकर तार पढा। बम्बई से आया
था। उसमे लिखा था -"मैं पिताजी की भूल का प्रायश्चित करने
के लिए सिगापुर से बम्बई आ पहुँचा हूँ। क्षमादान के लिये
अजमेर पहुँच रहा हूँ"-निर्मल ।
कमला सिर पकड कर बैठ गई । उसे समझ न पाया कि वह
क्या करे ? इतनो विक्षुब्धता देख कर रमेश ने पूछा-
"तार कहाँ का है "
उत्तर मे कमला ने तार रमेश के हाथ मे दे दिया। उसने
पढा। परेशानी को समझकर उमन कहा-
"अन्दा कम्मो | तार वाले को भी पाने दो। तुम अव
आराम से सो जानो ताकि मानसिक थकान कुछ तो कम हो।"
कमला बिना कुछ कहे अपने विस्तर पर जाकर लेट गई।
रमेश भी कई घटे की लवी याना से थका हुआ था, मो उसने
भी अपना विस्तर बंद खोलकर विछाया और सो रहा।
रात तो वितानी थी ही।
X
X
X
सुवह निर्मल पाया, और उसने बिना किसी पूर्व भूमिका
के कहा-
"मला मुझे क्षमा करो। धन और दहेज मुझे नही
चाहिए। मैं मानता हूँ कि आपके पिता जी की मृत्यु का कारण
तेतीस

.
मेरे पिता जी थे और उनके जाने की क्षति पूर्ति भी अव असभव
है । पर यदि आप मेरे हाथ पकडेंगी तो मैं निश्चय-पूर्वक कह
सक्ता हूँ कि आप मुझे सच्चा साथी पायेगी।"
रमेश के आ जाने से कमला को काफी धीरज और सहारा
मिला था, इसलिए जब रात को सोई तो सुबह उठने पर उसने
अपने पापको तरो ताजा पाया। उसने निर्मल को एकाएक कोई
उत्तर न दिया । वह गभीर बनी रही। उसने सरसरी दृष्टि से
देखा और पाया कि वह वास्तव में पश्चात्ताप से जल रहा है
उसके कहने में किसी भी प्रकार की कृत्रिमता नही है ।
कमला ने अपने को साध कर सयत स्वर मे कहा
"भाई निर्मल ' काश | तुम्हारा यह विचार और इतनी
'इच्छा शक्ति कुछ समय पहले होती तो शायद हमारे जीवन
वहाव किसी दूसरी ओर होता, पर अब मैने शादी करने वा
चार ही त्याग दिया है । यह निर्णय मैने उसी दिन कर लिया
जिस दिन दहेज रूपी नाग ने टस कर मेरे पिता जी के प्रारण
ये थे।"
"तो ।" निर्मल ने थके वटोही वी भाँति निराश होकर
कुछ कहना चाहा।
"अब मैं दहेज जैसी कुप्रथा को समाप्त करने मे ही अपना
जीवन लगा दूंगी।" कमला ने अपनी बात कही।
7
चौंतीस

।' "और मेने इसी लक्ष्य सिद्धि के लिए अपना जीवन-दान क दिया है । मेरे पिता ही का? असन्थ्य पिता इस आग मे जल र हैं । कन्याएं रो रही है । समाज हाहाकार कर रहा है। को भी इमे पागे वटवर वद नहीं करता। भाई रमेग को भी मैं इसी लिए बुलाया था। भान्य से आप भी आ गये।" कमला इतना कहकर रमेा और निर्मल के चेहरो पर आने वाल- भावनामो को परखा और फिर म्हा-"आओ इस मुमगलवा- वेला में हम तीनो प्रण करे कि आजीवन अविवाहित रहा एव नया समाज बनायेगे जिसमे मानव का मुल्य पंसो से नहीं मानवता से प्राया जायेगा।" x x और ग्राज मला, रमेन तथा निर्मल अपने अपने टग में न समाज ने मृजन और निर्माण में लगे हुए हैं। x -

-
मेरे पिता जी थे और उनके जाने की क्षति पूर्ति भी अव असभव
है । पर यदि आप मेरे हाथ पकडेगी तो मै निश्चय पूर्वव क्ह
सक्ता हूँ कि आप मुझे सच्चा साथी पायेंगी।"
रमेश के आ जाने से कमला को काफी धीरज और सहारा
मिला था, इसलिए जब रात को सोई तो सुबह उठने पर उसने
अपने यापको तरोताजा पाया । उसने निर्मल को एकाएक कोई
उत्तर न दिया। वह गभीर बनी रही। उसने सरसरी दृष्टि से
देखा और पाया कि वह वास्तव मे पश्चात्ताप से जल रहा है ।
उसके कहने मे किसी भी प्रकार की कृत्रिमता नही है ।
कमला ने अपने को साध कर सयत स्वर मे कहा
"भाई निर्मल । काश तुम्हारा यह विचार और इतनी
दृढ इच्छा शक्ति कुछ समय पहले होती तो शायद हमारे जीवन
का वहाव किसी दूसरी ओर होता, पर अब मैने शादी करने का
विचार ही त्याग दिया है । यह निर्णय मैंने उसी दिन कर लिया
) था जिस दिन दहेज रूपी नाग ने डस कर मेरे पिता जी के प्राण
लिये थे।"
"तो
।' निर्मल ने थके बटोही की भांति निराश होकर
कुछ कहना चाहा।
"अब मै दहेज जैसी कुप्रथा को समाप्त करने म ही अपना
जीवन लगा दूंगी।" वमला ने अपनी बात कही।
.
चौतीस

"और मैंने इसी लक्ष्य सिद्धि के लिए अपना जीवन-दान कर
दिया है । मेरे पिता ही क्या? असख्य पिता इस आग मे जल रहे
हैं । वन्याएँ रो रही है । समाज हा-हाकार कर रहा है । कोई
भी इसे मागे बढकर वद नही करता ! भाई रमेश को भी मैंने
इसी लिए बुलाया था। भाग्य से आप भी आ गये।" कमला ने
इतना कहकर रमेश और निर्मल के चेहरो पर आने वाली
भावनाओं को परखा और फिर कहा-"प्रानो इस मुमगलकारी
वेला मे हम तीनो प्ररण करे कि आजीवन अविवाहित रहकर
एक नया समाज बनायेंगे जिसमें मानव का मूल्य पैसो से नही,
मानवता से आका जायेगा।"
x
x
और आज कमला, रमेश तथा निर्मल अपने-अपने ढंग से नये
समाज के मजन और निर्माण में लगे हुए है ।
x
पतीस

रेशमी रुमाल चडीगढ के बारे म मेने वाफी सुन रखा था । परन्तु पजाव की इस सुन्दर राजधानी को देखने का यह मेरा पहला ही अव- सर था। हिमालय के प्राचल मे वसी हुई यह नगरी और उसकी स्थापत्य कला हर दर्शक या मोह लेती है। हम दिन भर के थके मादे जैसे ही विश्राम गृह मे लौटे वि छमाछम वर्षा होने लगी, जिसने वातावरण को एक्दम मनमोहक बना दिया। वर्षा थमते ही चडीगढ का महिला समाज अपने जीवन साथियो के सग वर्पा या पानन्द लूटने के लिये विशाल राजपथो पर चहल कदमी करने निकल पड़ा। उनका सुरुचिपूर्ण शृगार देखकर समझ मे नहीं पा रहा था कि एक लडाकू कौम की नारियां भी इतनी शृगारिक हो सकती हैं। पता नही क्य तक मैं इस विचार मे सोया रहा। इतने मे मेरे मित्र न निस्तब्धता भग करते हुए पहा "मित्र अाज तो कुछ ऐसा सुनायो, जिसस मन गुदगुदा उठे।" "क्या मुनाऊं? ' मैंन पूछा। "वस, हो कोई प्यार म सरापार कहानी।" "तो मुनो।" मैंने जमकर बैठने हुये कहना शुरु विया - - सेती

"मेरी थी एक सहपाठिन । नाम मनोरमा। हँसमुख और
खुश मिजाज । सिधी कवि की यह उक्ति उस पर सोलह आने
पूरी उतरती थी मि यूं तो मनुष्य सव मनुष्य हैं, परन्तु किसी-
किसी मनुष्य मे खुशबू आती है वहार को। पिछले पांच वर्षों से
हम न केवल एक दूसरे के मित्र थे अपितु प्रेरक भी। यही कारण
था कि हम दोनो हर परीक्षा मे न केवल उत्तीर्ण ही होते पर
महाविद्यालय मे प्रथम श्रेणी मे भी पाते।"
"पर पता नहीं क्यो, उसकी एक पडोसिन को हमारी यह
मित्रता फुटी पास भी न भाती थी। वह हम लोगो के खिलाफ
तरह तरह की बाते गढती और फिर उन्हे मोहल्ले की स्त्रियो को
नमक मिर्च लगाकर बताती।"
“एक दिन की बात है कि हम दोनो छत पर खडे नीचे रोड
पर चलने वालो को देख रहे थे कि अचानक पडोसिन को अपनी
मोर घूरते हुए देखा। हमे लगा मानो वाज निर्दोष पक्षियों पर
झपटा कि मपटा । म फौरन वैठ गये । वैठने के बाद भी उसकी
गिद्धदृष्टि हम दोनो पर जमी रही। तब मनोरमा को एक तरकीब
सूझी । वह छत पर लेट गई और लेटे ही लेटे सडक के रोलर
की तरह लुढक्ते लुढकते सीढियो तक जा पहुंची। मैंने भी
उसका अनुवरण किया। नीचे आकर हम दोनो खूब से और
आधे घटे तक हंसते ही रहे ! तब जाकर वही शाति मिली।"
पड़तीस

"वाह ! खूब छकाया " कहते हुए मित्र ने ठहावा
लगाया।
"पर वह सहज मे मानने वाली न थी । वह हर मौके की
तलाश में रहती, जिससे हमे गपशप लडाते देख सके और भर
पेट हमारा मजाक उडा सके । पूरी काइया थी।" मैंने मुस्कराते
हुए कहा।
"कहे जाओ। आज ऐसी ही कहानी सुनने को जी चाहता
था।" मित्र ने उत्कठित हो कर रहा ।
"हा तो इस प्रकार हमारी मित्रता मे रंग चढता ही गया ।
हम एक दूसरे को देव विना एक दिन भी न रह सकते थे। मैं
उसमे इतना तन्मय होगया था कि अनचाहे उसका नाम मेरे
मुह से निकल जाता । मैं स्कूल मे, घर मे तथा कही भी जाता
तो उसी का स्प मेरे सामने आता । कभी कभी ऐसा भी होता
कि मै क्सिी मित्र से बात करते करते यह भी भूल जाता कि मैं
उससे बाते कर रहा हूँ या मनोरमा से । तब मुझे अपनी स्थिति
वा आभास होने पर वडा सकोच होता। जब मैं अपनी मन
स्थिति मनोरमा से कहता तो उसकी स्थिति अपने से भी अधिक
विकट पाता । उसको वाते सुनकर मुझे रोमाच हो आता और
यो लगता कि हदय गगन से प्रेमस्पी वर्षा की फुहारे मधुर
निनाद से गिर रही है । मैं उसमे अानन्द निमग्न होकर नहा
रहा हूँ । ग्रोह । वह स्वर्गीय और अनिर्वचनीय सुखानुभूति ।"
उन्तालीस

"मित्र ! मेरे पांवो को तो मानो पाखे लग गई थी। वे विना मेरे से पूछे आप ही आप चलते और उसके घर पहुँच जाते ! फिर वर्षा हो या तूफान, गर्मी हो या सर्दी, उन्हे वहाँ जाने से कोई भी न रोक सकता था। वहाँ पहुँचने के पश्चात् मुझे पता चलता कि मैं कहाँ हूँ । मनोरमा के माता पिता मुझ पर वडे कृपालु थे । हम लोगो ने भी उन्हे कभी ऐसा अवसर नही दिया था कि वे हम पर रत्ती भर भी शका कर सके।" "एक बार गर्मी की छुट्टियो मे परिवार सहित जब वे अपनी जमीदारी पर गये तो मुझे भी अपने साथ लेते गये । प्रभात का सुहावना समय था ! ठडी ठंडी पुरवया चल रही थी। हमे जमी- दारी पर ले चलने के लिए एक वैलगाडी खडी थी । मनोरमा के पिता तो घोडे पर और वाकी हम सब वैलगाडी मे बैठ गये । मनोरमा मेरे से सटी हुई बैठी थी। यह पहला ही अवसर था जबकि हम इतने नजदीक बैठे थे। इस नजदीकी से हमे एक विचिन सी गारीरिक उप्णता का अनुभव हुआ । मैंने मनोरमा की अोर देसा। लज्जा से उसका कमल-सा मुखडा और भी आरक्त हो उठा । उसी समय प्राची मे अनत रूप राशि लिये हुए वालारण का उदय हुया । मैं कभी मनोरमा के मुस को और, और कभी वालरवि की ओर देखता। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्मिने क्सिका स्प चुराया।" "जमीदारी पर पहुँचने के बाद मनोरमा के पिता जी ने मेरे चालीस रहने के लिये अलग एक कमरे का प्रवध कर दिया था। उन दनो के सुख का वर्णन कर सवने मे मै असमर्थ हूँ। वह तो गूंगे का गुड है । आधुनिक ढग से निर्मित वगला । आस-पास भोले- भाले हिन्दू मुसलमान किसानो के घर । सामने मौज मे वहती हुई सिध नदी। दूर दूर तक फैले हुए हरे-भरे खेतो ने मेरा मन हर लिया। हम सब मिल कर साय प्रात सिन्धु नदी पर घूमने जाते। कभी कभी केवल हम दोनो होते तव प्रात कालीन मद और शीतल हवा हमारे शरीरो को और भी प्रफुल्लित कर देती, तब हम किसी सुन्दर स्थान पर बैठ जाते और जीवन के हर पहलू पर गम्भीरतापूर्वक विचार करते ।" "कभी-कभी हम खेतो पर भी चले जाते । मनोरमा क्सिान रमरिणयो से, और मैं किसान युवको से उनके दुख सुस को जानने का यत्न करते । पठन-पाठन तो चलता ही। कुछ समय हम गौशाला मे भी चले जाते, जहाँ पशुप्रो के संवध मे जान- वारी करते । सबसे सुखमय समय वह होता, जब रोटी-पानी निवृत्त होकर सब लोग वगले की छत पर आ जाते, तव मनो- रमा अपने मुमधुर कंठ से मुन्दर गीत गाती । खासकर चांदनी रात मे वह अपना प्रिय गीत-"जोगी मत जा, मत जा, पांव पडू मैं तेरे" पूर्ण आवेश मे पाकर गाती तो उस शात वाता- वरण मे भी मीठा दर्द भर जाता । जैसे सचमुच कोई निर्मोही इकतालीस

जोगी उस प्रेम दिवानी को छोड़ कर चला जा रहा हो । तब हम
सव को आँखे सजल हो पाती।"
"इस प्रकार सुख के सागर मे हमारी नाव बढ रही थी।
अचानक मनोरमा गंभीर रहने लगी। मै इसका कारण समझ
नहीं सका । एक दिन शाम को नदी पर हम दोनों घूम रहे थे।
वातो ही बातो मे सुहावना झुटपुटा हो पाया । अचानक मनोरमा
मेरे एक हाथ को अपने दोनो सुकोमल हाथों मे लेकर, कुछ क्षणो
तक प्रवाहमान नदी की ओर देखती रही, मानो जल देवता को
साक्षी रखकर कोई प्रतिज्ञा की हो। उसके इस स्पर्श से मुझे भी
रोमाच हो पाया, पर कुछ कह न सका । हम निःशब्द घर की
ओर लौट आये।"
"इस प्रकार कुछ दिन और बीतने पर, एक दिन वह मेरे
कमरे में पाई। उसके मुस से ऐसा प्रतीत होता था कि वह
क्सिी बीहड वन प्रातर मे फँसकर वाहर निकल नहीं पा रही।
उमने बैठते ही प्रश्न कियाः-
"आज की स्थिति में विवाह करना आवश्यक है क्या ?"
एक युवक उस युवती को क्या उत्तर दे, जिसे वह हृदय से
प्यार करता हो। जो उसके प्रति अपनी प्रेमिल भावनाओं की
अभिव्यक्ति तो न कर पाया हो पर उसका रोम रोम उसमे रमा
हुआ हो। फिर भी मैंने हिम्मत वटोर कर कहा-"मनुष्य एक
न्यालीस

सामाजिक जीव है। समाज से अलग उसकी कोई सत्ता नहीं,
फिर भी आज की स्थिति मे युवक विवाह न करे तो समाज को
कोई आपत्ति नहीं हानी चाहिए ।
"तब इस मानवी दह का क्या होगा?' मनोरमा ने प्रकृतिम
गभीरता से पूछा।
"सभव है ऐसा कोई समय रहा हो जबकि आर्यों ने सख्या
और जन बल वटाने के लिए दम मतानो का विधान बनाया हो ।
पर मेरे विचार से माज वह स्थिति नहीं है । इसलिए अच्छा
नागरिक वह कहलायेगा जो आज का रग डग देखवर अविवा-
हित रहे और यदि विवाह करे तो सयमित रहते हुए सतान की
चिता न करे। अगर फिर भी उसका मन न माने तो अधिक से
अधिक दो सतानो पर सतोप करें।
"और इसके वाद'
"नरक " मेरा उत्तर सुनकर वह चुपचाप लौट गई । पर
मैंने देखा कि वह जीवन के उस चौराहे पर पहुँच चुकी, जहां में
आगे वटने के लिए कोई न कोई रास्ता चुनना ही होगा।
एक सप्ताह वाद । उस दिन शाम होते न होने प्राकाम में
जल भरी काली वदलिया घिर आई थी । वातावरण कुछ ऐसा
मोहक हुआ कि म दोनो अपनी अपनी उन्मुक्त भावनाप्रो मे
तेतालीस

विचरते हुए घूमने निकल पडे । एकाएक मनोरमा ने मौन तोडा,
बोली-"मैं तुम्हे प्यार करती हूँ।"
"भला यह भी कोई बतलाने की बात है ?" मैने मुस्कराकर
कहा।
"पर मैं चाहती हूँ कि हमारा पवित्र प्रेम विकृत न हो।
शाश्वत रहे । हम आज की तरह आजन्म प्यार करते रहे ।
हमारे निकट रोग शोक न पाये । हम सदा स्वस्थ रहे।" मनो.
रमा ने बदलियो के पार देखने का प्रयत्न करते हुए कहा । मानो
उसे ऊपर आकाश मे कोई दिव्य दर्शन हो रहा हो।
"मै तुम से पूर्ण सहमत हूँ, मगर इसे शाश्वत रखने के लिए
उपाय क्या है ?"
"यही कि हम सदा के लिए जुदा हो जाये ।"
"तो फिर ऐसा ही हो।"
और मनोरमा ने मुझे एक रेशमी रुमाल देते हुए कहा-
'यह मेरे प्यार की निशानी है ।"
"फिर 2" मेरा कथा श्रोता मिन पूछ बैठा ।
"फिर क्या? परस्पर प्यार करने वाली दो प्रात्माए पहली
और अतिम बार एक दूसरे से मिली और सदा के लिए जुदा हो
दवालीस

"पर, जोगी मत जा, मत जा, वा क्या हुया ? अपने हाथो
ही जोगी को विदा कर दिया। मित्र ने कहा।
"दोन्त । यही तो समझने की वात है ।" मैंने उठने हुए
पतालोस

बटवारा "चाचा 'ओ चाचा' किसी ने कोमल स्वर से पुकारा । "क्या है वेटी। रमजानी चाचा ने अावाज पहचान कर पूछा। "चाचा ' अव नहीं सहा जाता "कुछ कहे भी ।" "बच्चे रो रो कर पागल हो रहे हैं । वे जो वार-चार कहते थे कि गायें गई तो क्या हुअा कर्ज से तो मुक्ति मिली। वही प्राज ठडी आहे भरते है । भगवान के लिए साहूकार से मेरी 'लक्खी' (गाय) झुडा लायो। गौरी ने अपने जेवरो की पोटली चाचा के सामने रखते हुए कहा । "या मौला । गरीवा पर ऐसा कहर? वेटी। मेरे रहते हुए यह नहीं होगा । अपने जेवर उठालो । लक्खो को साहूवार ले गया तो क्या ? मेरे घर यह दूसरी लक्खी सड़ी है । इसे ले जामो। जैसे यहाँ, वैसे वहां।" "नहीं चाचा नहीं ऐसा नहीं होगा । जैसे लक्ष्मण- रहीम । रहीम से दूध छीन कर मेरा भला कैसे होगा हाय मेरा वह गेरू (गाय का बछटा) जिसे भर पेट दूध पिलाया वरती थी। उस वैजनान को साहवार के घर एक धार भी नसीर संतालीस

नही होती । बेचारा सूखकर काटा हो गया है ।" यह कहते कहते
अत मे गौरी के प्रासुमो का बांध टूट पडा ।
"न रो बेटी । न रो 'हम गरीव रो रो कर जिदगी से
गुजार सकेगे"
.
.
"चाचा । मेरी लक्खी लादो उस कसाई से ।"
"देख गौरी । साहकार का गहने देने से अच्छा है कि एक
दूसरी गाय खरीद ली जाय । चाचा रमजानी ने सुझाव रखा।
"तुम नही समझ सकते। दूसरो की आँखो मे जो गाय है,
वह मेरे लिए मा जाई सगी बहन के समान है । चाचा ' वह दिन
भूल गए जव लक्खी ने शेरू की जान को बचाने के साथ ही
मेरे लक्ष्मण वो भी बचाया था। उस समय को याद करते ही
मेरे तो रोगटे खडे हो जाते है ।
'चाचा रमजान ने कोई उत्तर नही दिया । गौरी
भाव विभोर होकर रोते रोते कहने लगी-
"उस समय लक्ष्मण यही कोई सवा साल का होगा । लक्खी
को ब्याहे भी कोई दो तीन दिन हुए थे। पूनम की रात थी। वर्षा
को निक्ट आया देस हम खेत का काम शीघ्र ही समाप्त करने के
लिए दिन रात काम में लगे रहे। उस दिन भोपड़ी के बाहर
बछडे के पास ही लक्ष्मण को सटिया पर सुलावर हम दोनो खेत
में काम करने लगे। मेरी यह लक्वी भी वही पास मे बैठी जुगाली
"
प्रतालीस

कर रहो यो । उम गात रानि मे उसके गले को घटी रह रह
वज उठती । उसका मधुर निनाद दूर तक फ्ल जाता । अचानक
घटो वजना वद हो गई। हमने सोचा शायद गाय घरती पर
गर्दन टिकाकर सो गई है। पर फिर वह एकाएक जोरो से बजने
लगी, मानो गाय सरपट दौड रही हो । सतरा पाया जान हम
दोनो भोपडी की योर भागे। हमने देवा तीन भेडियो ने बछड़े
और लक्ष्मण पर हमला बोल दिया था। लक्वी ने रक्षा का और
मार्ग न देख दोनो वन्चो को अपने व्युह में ले लिया और चक्कर
पर इतनी तेजी से दौटने लगी कि भेडिये चाहकर भी अदर न
घुम सके और इतने मे हम मदद के लिए पहुंच गए।"
लक्वी की यह गाया मुनकर चचा रमजानी के वोल न फूटे।
गौरी ने कहा-
"बोलो चाचा रोमी देवता गाय को उस नियो के पास
रहने दं"
म्वीकृति नवा सिर हिलाते हुए वचा रमजानी गौरी की
गाय लेने के लिए अपने घर से बाहर हो गए।
गडा रोड के उस पार जहां आज भारत और पाक्स्तिान
की सीमाएं मिलती हैं, थोडी दूर पर राम-मर नाम का एक गाव
बमा हुआ है। जहां मदियो से हिन्दु मुसलमान वडे प्रेम से रहते
चले आ रहे हैं। राम मर रहवामियो का जीवन भी वडा

अजीब है, समय पर वर्षा होगई तो उनकी खुशियो का क्या कहना ? जिधर देखो उधर हरियाली ही हरियाली नजर पाती। मानो थर पारकर का सुप्त सौदर्य जागकर करवट ले रहा हो। ऐसे समय मे किसान सेतो मे हल जोतने निक्ल पडते । चरवाहे ऊँटो की लम्बी गर्दनो मे वधी घटियो के स्वर ताल पर कजली गाते, ढोरो को चराते हुए जगलो मे रम जाते । गावो की बहुएँ और पनिहारिन मदभरे नयनो मे कजरा डाले, सोलह शृगार किए लवालब तालाबो से पानी भरने निकल पडती। वे रेतीले टीलो पर कभी ऊपर चढती और कभी नीचे उतरती हुई , अपने रग विरगे वस्नो मे इतनी शोभायमान प्रतीत होती कि मानो स्वर्ग की अप्सराए भूतल पर उतर आई हो । सिरो पर चमक्ते हुए क्लश । सुडौल क्सा हुआ शरीर, पीठ पर नागिन की तरह लहराती हुई सुदीर्घ चोटी पायलो की भनकार के साथ जब कभी इस टाग पर और कभी उस टाग पर ताल देती हुई दिखाई देती तो इस मोह दृश्य को यदि स्वय कामदेव देख पाते तो सुध बुध खो वैठने । फिर आदमी की तो हैसियत ही क्या १ परन्तु जिस वर्ष वर्षा नही होती, तो उनके दुखो का पार न रहता । अपने पेट के लिए तो इधर उधर से अनाज खरीद लाते पर चौपायो के लिए चारा लाना सहज नहीं था। फिर भी जिस किसी तरह उनसे बन पडता वे अपने पशुधन को जी जान से रक्षा करते । जब वे उनकी रक्षा करते क्गाल हो जाते तो अत में उनकी पचास गाली देखकर साहूकार भी कर्ज नही देते तो वे अपनी आखो के सामने भूख से तडपते हुए पगुनो को मरते देखते । कर कुछ नही पाते। रामसर के लोगा ने जब अपने सिघ मे लोगी तूफान के विषय मे सुना तो वे भयभीत हो उठे। उन्ह लगा कि शीघ्र की कोई महामारी आने वाली है जो हमारे खेतो, पगुनो और हमारी खुगियो को हडप जायेगी । इस भय के कारण घर मेनारिया जो वनचरो की भाति आनदपूर्वक नेतो मे आया जाया करती थी, अव घरो मे वद रहने लगी । जहाँ पशुओ को उन्मुक्त होकर विचरने दिया जाता था वहां अब उन्हे लोग वाडो मे वद रखने लगे। जहां घरो के दरवाजे खुले पडे रहते थे, वहाँ उनमे भारी भरपम ताले लगाये जाने लगे। जहाँ राहगीर हजारो के जेब- रात और स्त्रियो के साथ अमावस को रात जगल में पड़ाव डाल कर काट लेते थे, वहां अब दिन दहाडे डाके पडने लगे। मानो सिन्ध पर क्सिी शैतान ने अपना रग जमा दिया हो और उनके भय से इन्सानियत डगमगा रही हो । प्रेम और एक्ता थर्रा उठी हो। फिर उन्होंने अचानक यह भी सुना कि अगरेज भारत छोड कर चले गये हैं । जाते जाने वे भारत माता के दो टुपडे पर गए। हमारा प्याग परपावर भी बिना हमारी राय के इक्यावन

पाकिस्तान में मिला दिया गया है । वे गरीब समझ नही सके कि
ऐसा क्यो क्यिा गया। जबकि हमारा रहन सहन, हमारी भाषा,
हमारे गीत सब राजस्थानी है । तव फिर किस आधार पर हमे
पाकिस्तान में मिला दिया गया? वे क्वल ठडी आहे भर कर
रह जाते।
इधर रामसर के हिन्दू अभी सोच ही रहे थे कि वे सिन्ध के
अन्य हिन्दुओ की भाति भारत जावे या पाकिस्तान मे कि
अचानक ही पाक सरकार की एक विज्ञप्ति निकली-"हिन्दू
चौपाया माल लेकर भारत नहीं जा सकते।' बस फिर क्या
था? चारो ओर खलबली मच गई। जिन गरीबो का धन ही
पशु थे वे कैसे उन्हे छोडकर भारत जाते ? पर दूसरी ओर धर्म
सक्ट भी था, कौन जाने कब क्या हो जाये । लीगी गुण्डो व
हाथो कव वह वेटियो की पावरू धूल मे मिल जाये ? उन हैवानो
के सामने ग्राम के नेक मुसलमान भी क्या कर सकगे?
?
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गौरी के लिए यह समाचार आत्महत्या के समान था। वह
किसी भी हालत मे अपनी लक्खी गाय को पाकिस्तान मे छोडने
को तैयार नहीं थी। उसे हर प्रकार से समभाया गया । डराया,
धमकाया । पजाव की दर्दभरी घटनाय सुनाई गई । पर वह न
मानी । लक्वी के गले से लगकर रोने लगी। उसके पति गोपाल
यायन

जव सब प्रकार से समझाकर हार चुके तो अत मे वह चचा
रमजानी के पास पहुंचे।
चचा रमजानी पहले से ही गौरी का हाल सुन चुके थे। वे
कोई ऐसा मार्ग निकालने की तलाश मे थे कि जिससे साँप मर
जाये और लाठी न टूटे । उन्होंने व्यथा भरे स्वर मे गोपाल
से कहा-
"गोपाल । तुम घर चला । देखो म कोई न कोई राह खोज
रहा हूँ। मालिक महरवान हे । वह कोई उपाय तो सुझा
येगा ही।
इसके बाद काफी रात गए रमजानी अपने इकलौते बेटे और
उसकी बहू से कोई मनणा करते रह ।
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दूसर दिन जब सब लोग एक दूसरे से मिलकर राते विलखते
जुदा होन लगे तो बडा हृदय विदारक दृश्य उपस्थित होगया।
भला जव एक पक्षी भी अपना घोसला छोडने को तैयार नही
होता, तब वे तो मानव थे। उन्होने कितनी ही सदिया गर्मिया
उन झोपडा मे रहकर विताई थी । दीपावली और ईद मिलकर
मनाई थी। भला वे, चुपचाप उन घरो को कैसे छोड देते"
गौरी गाय के गले में वाहे डाले जार-जोर से रुदन कर रही
थी। उसका रोना देखकर वहां पास मे खडे अन्य लोगो की
तिरेपत

आखे भी नम हो पाई । होती क्यो नही, ये तो 'राजनैतिक स्वार्थो से दूर विशुद्ध मानव थे । इतने मे वहाँ पर चाचा रम- जानी आये और उन्होने कडक कर कहा- "ठहरो। यह सव क्या है ?" लोगो ने देखा कि चाचा के चहरे पर एक विचिन आज और तेज दमक रहा है । गौरी और अन्य सभी रोना भूल कर चाचा को देसने लगे। उन्होने कहा- "गौरी । गाय के सभाल के लिए भाई गोपाल मेरे साथ रहेगा । देखे मेरे जीते जी कौन उसको छेडता है। रहीम, गौरी और लक्ष्मण के साथ भारत जायेगा । पाक कुरान की वसम है कि हम जल्दी तुम सवको वापिस बुला लेंगे। भाईचारे और प्रेम से अंगरेजो की खोदी हुई खाई को पाट देंगे।" इतना कह- कर चाचा रहीम की ओर घूमकर बोले "वेटा जायो । वीर राजपूतो की तरह जायो । जब तक दो विरहणियो की आहे और दो पिताओ के वरलाप उस वनावटी सीमा को मटियामेट न करदे । हमारे हल प्रात वाल की सुन्दर वेला मे सीमा के नाम पर छोडी हुई जमीन को न रौंद डाल । - . "बेटा । विश्वास और धैर्य से उस घडी की प्रतीक्षा करो, जब तक कि दोनो ओर की जनता प्रेम और भाई चारे से मिल घउप्रान

न जाय । हमारी गायें फिर स्वच्छन्दता स वहाँ हरी हरी घास न
चर और हमार मतवाले युवा झम झूम कर वरसाती नतु म
मधुर गीत न गाय । तब हम राजनैतिक गुण्टो को वता मक्गे
कि हम सब हिन्दू मुसलमान भाई है।
और अन
मे
चाचा ने कहा-
मजहब नहीं सिखाता आपस म वैर करना हिन्दी है हम,
वतन है हिन्दास्ता हमारा ।
X
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रामसर क हिन्दुग्रा का वह काफ्लिा धीर धीरे भारत की
पार वढ चला । जव वह पासा स प्राभल होगया तो वटवार
स विदग्ध चाचा रमजानी भा अपने अन्य साथिया सहित गाव
की ओर लौट पडे।
F

टूटा घड़ा

?
"रहने भी दो। क्या रोज-रोज जाने की रट लगाये रहते
हो आग लगे इस रेल को, जो नित्य कितने ही लोगो को परदेशी
बनाती है । फल जैसे दिलो को तोडती है । बेरहम पत्थर-दिल
वही की ? मुझमे पूछो, तुम्हारे जाने से मुझ पर क्या गुजरती
है ? न जाने कलेजे में क्या होने लगता है ?" अजीत कौर ने
स्ठते हुए कहा।
“धत् पगली : मैं बहुत दिनो के लिए थोडे ही जा रहा हूँ ।
छुट्टियो मे तो आऊँगा ही। और भला बताना तो कलेजे मे क्या
होने लगता है ?" मैंने हँसते हुए कहा ।
"यही तो कठिनाई है कि मै दिखा नही सवती । केवल
महसूस करती हूँ । वस यो समझो वि गू गे का गुड है। फिर भी
जब तुम जाने की बात करते हो तो यो लगता है कि कोई सुखद
स्वप्न टूट गया हो। दिल कहता है, कही एकात में बैठकर जी-
भर रो लूं। पर तुम हो कि ।"
"पत्थर
।" मैंने अजीत कौर का वाक्य पूरा करते हुए
कहा-
"देखो जीत । कुछ धीरे बोलो । कोई मुनेगा तो क्या क्हेगा
तुम बच्ची तो हो नहीं । जैसा मन मे आया कह गई । जवान
को काबू में रखना चाहिए।"
.
..
सत्तायन

"क्या हृदय की बात कहना पाप है ?" अजीत दुगनी जोर
से बोली- "मैं तो कहूँगी, एक बार नही हजार बार कहूँगी। मैं
तुम्हे नहीं जाने दूंगी, नहीं जाने दूंगी।"
अंत मे अजीत को रुपासी हो पायो ।
अव उस पगली को कौन समझाये कि नौकरी वाला तो
जायेगा ही । रुक नही सक्ता भले ही मन का पंछी न जाने के
लिए हजार फडफडाये।
कितनी भोली है यह अजीत एक माह के अदर ही उसने
मेरे साथ घनिष्ठ नाता जोड लिया । मुझे समझाने में देर तो
लगी पर वह मान गई, यही मेरे लिए सतोपजनक था ।
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जव ठीक वीस दिन पहले मैने अपने मा बाप के घर को
वर्षो बाद आकर खोला, तब सारे गाव के बाल-वृद्ध, नर-नारी
मेरे प्रति ममत्व और अपनत्व जताने आये थे। उनमे एक स्त्री
ने मेरी बलाएं लेकर कहा-"बेटा बहुत दिनो बाद आये । तुम्हे
क्या मालूम ? तुम्हारी मा और मैं कितनी गहरी सहेलिया थी ।
हम दोनो मे सगी वहनो जैसा प्यार था । मैं तुम्हे अकेला नहीं
रहने दूंगी।" फिर उसने पुकारा--"जीतू री ! ओ जीतू !! इधर
तो पा । वहाँ लडकियो मे मुंह छिपाये क्या खडी है ? तू इसे
जानती नही री ! यह रणजीत है । तुम दोनो बचपन मे एक साय
खूब सेलते थे और कितना प्यार था दोनों में। जा तो कुए से
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प्रावन

एक घडा पानी ले आ । फिर दोनो मिलकर घर साफ कर लो । इतने मे मैं रणजीत के लिए नाश्ता तैयार करती हूँ।" यह कह कर अजीत की मा वहाँ से चली गई । मैं घर मे यो ही इधर- उधर हेरा-फेरी करता रहा । इतने मे अजीत पानी का घडा सिर पर रखे आ पहुँची। पर सकोचवश वह यह निश्चित न कर सकी कि घडा रखे कहाँ ? उसके मनोभाव को ताड कर मैंने आगे बढकर घडा उतरवाना चाहा । पर मै घडे को ठीक से पक्ड भी न सका था कि अजीत ने उसे छोड़ दिया। टूटता हुई आशाप्रो की भाँति हम दोनो को भिगोता हुअा कडी जमीन पर विखर कर घडा चूर-चूर हो गया। "यह क्या किया आपने ?" अजीत ने रोनी सूरत बना कर कहा। "मैंने किया या तूने ?" यह यह मै मुस्कराया । अजीत और भी जोर से खिलखिला पड़ी। बोली- “अब मा से हड्डी कौन तुडवायेगा?" ?" 'यह कहते हुए अजीत की मा ने प्रवेश किया । दोनो हाथो मे कुछ खाने पीने की चीज थी। "अरे क्या हुआ "मा। यह घडा उतारते समय हाथ से छूटकर अजीत ने हिम्मत कर कहा । "तो अोर ले आ । वोई इसी के भरोसे थोडे ही है ।" अजीत उनसठ

-
की मा ने वात को आई गई करके मुझे प्यार से नाश्ता
करवाया। बीच बीच मे मेरे विषय में जानकारी भी लेती जाती
कि तुम इतन दिन कहाँ रहे ? कैसे पढे ? इतनी तकलीफ पाकर
भी हमे याद नहीं किया । हम कोई वेगाने थोडे ही थे।
अजीत पानी का दूसरा घडा लेन के लिए इठलाती हुई जा
चुकी थी।
अपना वाल मिन पाकर मेरा जीवन गुलाब के फूल की तरह
पुप्पित हा उठा । हर काम मे आनद आता । अगो के गुब्बारे
छूट छूट कर जीवन के प्राकाश मे मडराने लगे। इतने दिनो तक
मैं जिस पारिवारिक सुख के लिए तरसता रहा था, वह यहाँ मान
से सहज ही म मिल गया।
हम सेतो पर साथ साथ जाते और काम करते । वह मुझे
लोक गीत सुनाती और मै उस कहानियां सुनाता। उसका
माधुर्य पूर्ण कठ स्वर मुझे प्राप्लावित कर देता । जब तक वह
१ गाती तब तक मैं अवर्णनीय सुख की तद्रा मे लवलीन रहता।
उठती हुई फ्मला वाल खेत म जब वह मुझे जलपान करवाती
तव मै धरती से ऊपर उठ कर विसी अन्य लोक में सो जाता।
मैं मन ही मन कहता-यह इतन दिन क्यो न मिली।
अजीत अपन माता पिता की इकलौती बेटी थी। पिता पती
करते थे। अजीत का यह ग्राम काश्मीर और पजाव की सीमा
साठ

पर था जिससे अजीत ने काश्मीरियो का सौन्दर्य, पजाबियो
का सुडौल शरीर एव ग्रामीणो का भोलापन विरासत मे पाया
था। अपने उस छोटे से गाँव मे वह राजकुमारी मी लगती थी।
कही विवाह हो अथवा अन्य कोई आनन्द का त्यौहार उसे अव
श्य बुलाया जाता । इन उत्सवो मे जब ढोलक पर थाप लगाकर
"परदेशिया माहिया घर आ, असा राह विच अखियां विछाइया
मैं" पजावी लोक गीत गाती तो श्रोतागण भाव विभोर होकर
उसकी स्वर लहरियो मे बह जाते । वह प्रसन्न वदना तो इतनी
थी कि छोटी छोटी बातो पर ही खिलखिला पडती।
प्रति शनिवार को ग्राम पाने का वचन देकर मैं शहर लौट
जाता । बडो कठिनाई से सप्ताह बीतता।
जव जव मैं लौटकर आता, सध्या के ममय अजीत
मेरी प्रतीक्षा मे खडी छत पर मिलती। मुझे देखते ही वह दौड
कर पाती और कहती-
"
"अाज गाडी लेट थी क्या? मैं कब से राह देख रही हूँ
"नही तो । अाज तो हमेशा से कुछ पहले ही आया है।"
मैं कहता।
"भूठ भी क्या वोलते होयो क्यो नही कहते कि किसी
सरोज मनोज ने रोक लिया था। वे पढ़ी लिखी जो ठहरी।
इकसठ

और मै कोरी गवार ।" अजीत रूठकर कहती । मैं उमे सम
झाते हुए कहता।
"अरी तेरी और उनकी क्या वरावरी? यहां देवी सौंदर्य
और वहाँ पाउडर से ढका पीलापन ।'
"अच्छा जो, उडाने में भी खूब हो।"
"उडाना कैसा ? सच कह रहा हूँ । तुम जिम किसी शहरी
सरोज मनोज के लिये कह रही हो, उनके लिए प्यार का मत
लव पैसे के अलावा कुछ नही है । और तुम
1"
"अच्छा अच्छा ' वस करो।" यह कह कर वह अनोखी
चितवनो से देखती हई मेरे साथ हो लेती।
कुछ महीना के बाद जब एक सोमवार को मैं अपनी नौकरी
पर जाने लगा तव मैन डरते डरते कहा-
-
"अजीत । मुझे सरकार छ माह के लिये एव ट्रेनिंग मे
दूसरे शहर मे भेज रही है । इस बीच मे हमारा मिलना शायद
न हो सके।"
भयभीत मृगी सी होवर अजीत ने कहा-
"मेरो मानो तो यह वैरिन नौकरी ही छोड दो । घर जमीन
सभालो । यही तुम्ह जरा सी मेहनत से माला माल कर देगी।
क्या दिन रात नौकरी म पिलते हो। और सुनो, पता नही, प्राज
बासठ

कल वापू और मा मेरे बारे में दिन रात क्या सोचते और पापस
मे कहते रहते है ?
ऐसे समय मे तुम्हारा छ माह के लिये दूर जाना मुझे
अच्छा नहीं लगता।
पर मै तो विवश था, सो अजीत को व्यथित मन छोडकर
चल दिया। और जब मैं प्रशिक्षण अवधि पूर्ण कर घर आया
तो मन मे असीमित उछाह था। अभिनव ललित कल्पनाएँ एव
सरस और सजीले स्वप्नो को अन्तराल मे सजोये हुए था, जिनकी
स्वामिनी थी अजीत अजीत मेरे भावी जीवन की
प्रफुल्ल वदना जीतू किलकती और हंसती पर इस बीच
यदा कदा एक पैनी पास जैसा भय मेरी रगीन कल्पनायो और
सुहाने सपनो को रौदता हुअा कलेजे मे पैठ जाता ।
छ माह से वन्द पडे घर को जव खोला तो आस लगाये था
कि अजीत मुक्ता पछी की तरह उडती हुई मेरे पास आयेगी।
पर वह नही आयी। पायो उसकी मा। इधर उधर के समाचार
लेकर वह लौट गई। मेरी स्मृति तर से लिपट कर लहरी हुई
वेलि अजीत की उसने कोई चर्चा नही की। और न मै ही कुछ
पूछ सका । मैं पूछ भी कैसे पाता? मुझे तो यह वदला हुआ रंग
देखकर वाठ मार गया था। रात गेसो न सका। अजीव अजीव
आशकानो और विचारो वे गहरे समुद्र मे डूबा रहा। रह रह
कर हृदय मे एक ही वात उठती होती-जीतू को क्या होगया ?
तिरेसठ

दूसरे दिन सुबह मै नहा धोकर अजीत की बाट जोहने लगा।
सूरज चलकर सिर पर आगया और पश्चिम में ढलने लगा, पर
पर वह न पाई । मै कुछ भी खा पी न सका। मेरे अतस् मे
व्याप्त प्यार को चिता नागिन ने खूब दाँत लगाये और इतने
लगाये कि वह प्यार ही न रहा ! तडपता हुमा कदन मान रह
गया।
जव रहा न गया तो शाम को अजीत के घर पहुँचा। वह
रसोई मे थी। उसे निहार कर मै दग रह गया। छ माह के
जरा से अर्से मे क्या से क्या होगई। बस यह समझ लीजिये कि
सूखी हुई बेल । मुझे पाया जान कर अपने घुटनो पर छुडी टिका
कर रोने लगी। रोटिणं बेलते हुये उसके दोनो हाथ ठहर गये।
उसकी मा ने मुझे घर के प्रागन मे अपने पास बैठाते हुये
-
कहा-
"बेटा । यह रात से रो रही है।"
अजीत के रोने का वारण मैं जानता था, इम लिये उत्तर मे
कुछ न कहा।
"रात को ही यह तुमसे मिलने पाना चाहती थी। पर वेटा
मैंने इसे रोक दिया।"
"पहले तो न रोस्ती थी"
"पहले बात और थी। अब इमको मगनी हो चुरी है।'
अजीत बी मा ने महज भाव से कहा।
चौसठ

"मैंने
"सब खेल समाप्त । अव क्या है इस गाँव मे
छाती पर पत्थर रखते हुये मन ही मन कहा । अजीत की मा
कहती रही-
'कैसी अजीब लडकी है ? रात भर तुमसे मिलने को तावड
तोड करती रही । और अब जब तुम स्वय ही आये हो तो, यह
नमस्ते तक नहीं करती।"
मेरे पास अव कुछ कहने के लिये क्या था ? कुछ देर और
बैठ कर खाली मन चला आया। घर घुसकर बैठने को जी मे न
आई । अदर घुटन महसूस करते हुये उन खेतो की ओर चल पडा
जिनकी हरियाली मे निरतर दो वर्षों से प्रेम की गीतिकाएं गाता
पा रहा था। पर अब वही हरियाली कुछ कटाक्ष सा
करती नजर आई। इधर उधर वृक्षो पर शाम हो जाने से
आश्रय लेने वाले पक्षियो की चहचहाट मुझे युगो से गाया जाने
वाला विरह गीत सा लगा । डूबते भास्कर की प्रतिम मयूखें मेरे
विरह ताप से रक्तिम हो उठो और प्राची मे पार्थिव अशुमाली के
साथ साथ मेरे जीवन फ्ग का वालारग भी अस्त हो गया।
जब मरे मन और भग्न हुदय से सध्या की काली चादर ओढकर
मैं घर की ओर लौट रहा था तो अजीत मेरे पास से गुजरी।
एक क्षण भी न व्हरी । प्रोह
मैंन म्क्कर पुकारा-"अरी अजीत
वह न रखी। अपनी राह चलती हो गई।
पैसठ

.
X
X
X
मन मे पाया क्या यही वह अजीत है जो कभी घटो मेरी
प्रतीक्षा करती हुई गाया करती थी कि 'परदेशिया घर आ, असा
राह विच अखियां बिछाइये ने' नहीं नही
यह वह
अजीत नही है कोई और ही है
1"
रात को सो न सका । वदलते हुये जमाने की वेदर्दी ने कलेजा
चाक कर डाला । इच्छा हुई कि अभी यह गाँव छोड हूँ पर मेरी
नियुक्ति कही और होनी थी। इसलिए सरकारी आदेश प्राप्त
होने तक कहीं भी न जा सकता था।
x
एक दिन मैने देखा अजीत के घर में चहल पहल शुरू हो
गई है । मकान को सफेदी से पोता जा रहा है। किसी ने बताया
वि अब अजीत की शादी होगी। उसका मगेतर किसी जमीदार
का बेटा है। सारी स्थिति को समझ कर मैंने घर से निकलना
कतई बन्द कर दिया ताकि उसकी शादी में कोई विघ्न न पडे ।
वह खुशी खुशी अपने घर जाये ।
व्याह के दूसरे दिन अजीत मेरे घर आई । वोली-"रण
वीर तुम्हारी अजीत मर चुकी है। उसे भूल जाना ।" मुझे
लगा यह अजीत नही उसकी आत्मा में व्याप्त अनन्त वेदना की
पुवार है।
"याद तो मेरे साथ है उसकी।" मैंने पायठ से कहा।
"सब भूल है।"
छयासठ

"यह न कहो । तुम्हारा जीवन मगलमय हो। यह मेरी एक
मान गमना है।"
अजीत नत सिर खडी रही।
"अखिर प्रेम का अर्थ त्याग ही तो है । मैं तुन्हारे योग्य न
था । जो हुआ अच्छा है । रही वात भूलने की यह कभी नहीं हो
सकेगा। तुम्हारी नही उम अजीतकौर की मधुर स्मृतियाँ
ही मेरा जीवन है । पथ का पाथेय है।"
लास न व्हान पर भी आँखो से अथु लुढक पडे। वह दृश्य
देखने के लिये अजीत ठहर न सवी । चली गई और हमेशा के
लिये चली गयी।
जिस दिन अजीत अनेक मधुर यादगारो को अपने मृदुल
हद प्रातर मे सजोये विदा होने वाली थी, उसी दिन मुझे भी प्राप्त
आदेश के अनुसार अपने नये नियुक्ति स्थल के लिये प्रस्थान
करना था। सो मैं अजीत को मा को प्रणाम करने के बाद
अजीत से भी मिला और धीरे से कहा-"देखो, अजीत इस बार
घडा फटे नही।"
इसके बाद मैं उसी रेल पर सवार होने के लिये चल दिया,
जिमे अजीत हमेशा कोसा करती थी और घटो अनथके भाव मे
मेरी प्रतीक्षा करते हुये गाया करती थी-
"परदेशिया घर या, असा राह विच अंखियां विछाइया ने।"

जोवन पर भी पडा । अपने काम से आया और हाथ मुह धोकर
होटल मे रोटी साई और पड़ रहे । किसी से लेना न देना ! कोई
मतलव नहीं कि दुनिया मे क्या हो रहा है । अपनत्व दिखाने
वाले कभी कहते "अकेले हो । क्सिी लडकी से शादी कर घर
वसालो।" उत्तर मिलता "क्सि लिए? कुछ क्ट गई और वाकी
भी क्ट जायेगी।" पर हितचितवो ने बाकी न क्टने दी। उमवे
लाख ना ना करने पर भी एक लडकी टू ढ कर विवाह रचा
दिया। कमाऊ लडका सभी चाहते है । लड़की वालो ने देखा
दहेज का कोई भझट है नहीं। लडका जवान और सभी तरह से
ठीक । सो चट मगनी पट व्याह कर दिया । डर था कि लडका
कही 'न' न कर दे। दोस्तो और उनकी पत्नियो ने कोई कमी न
रहने दी । विवाह में समय पर काम आने वाले माता पिता,
भाई बहिन सभी वराती बन गये !
फिर एक दिन ।
मैं अनेक सभागो में व्याख्यान देकर थका हुआ घर लौटा
तो देखा कि गोपाल की बहू मेरी पत्नी के पास बैठकर सिसव'
रही है। मैं अवाक रह गया। चिंता हुई कि जीवन में रोते तो
वहुत है और सारी उन । पर यह इतनी जल्दी क्यो ? मैंन पासो
के इशारे से पत्नी से पूछा कि यह क्या ? वह बोली-
"रो रही है अपनी तकदीर को।"
"क्यो"
सत्तर

"इसका बहना है कि उन्ह कोई वात पसद नही । साना
पह्नना, वोलना कुछ भी तो नही भाता । यह अकेले अकेले ऊब
जाती है तो पास पडास की क्सिी औरत से बोलते वतलाते देखता
है तो गोपाल इसे आवारा कह कर झिडक देता है । अच्छा खाना
वनाये तो घर दो दिन मे ही चौपट करके छोडेगी यह सुनने को
मिलता है। वाहर धूम पाने को कहती है तो कभी साथ नही
देता । कैसे वह खुश हो ? यही समस्या इसे उलझाये हुए है।"
पत्नी स गोपाल के दाम्पत्य जीवन का वृतात सुनकर उसकी
वहू पर मुझे दया सी आई । सोच विचार कर मैने उसे बुलाया
और कहा
?
'बहू की तुमन क्या दशा कर रखी है ? यही उसके खेलने
खान के दिन है और तुम उसे सुखा रहे हो अपने नीरस व्यवहार
से । भला ऐसा कैसे हो सकता है ? भगवान ने तुम्हे पढी लिखी
और रूपवती वहू दी है । उमे खुश रखो और तुम भी खुश रहो।
क्यो जिन्दगी को नरव बना रहे हो? तुम से तग पाकर वह
कुछ कर बैठी तो जीवन भर पछताओगे।"
पर गोपाल पर मेरे कहने का कोई असर न पडा । वह उठ
कर चला गया।
x
x
१६३० के तूफानी दिन ।
सारा देश "इन्कलाब" के जोशीले नारे से गूंज रहा था।
x
इकहत्तर

देशवासी सदियो पुरानी गुलामी की जजीरे तोड फेकना चाहते थे। खून मे एक उबाल और कार्य मे लगन की अथाह शक्ति थी। पूज्य बापू को पकड कर सीकचो मे वद कर दिया गया था। सिंध- वासी भी इस आदोलन में पीछे न थे। अचानक एक रात को अपने साथी के साथ मुझे भी कारागार भेज दिया गया । जेल के एकात वातावरण मे मनुष्य अतर्मुखी अधिक हो जाता है इससे उसकी प्रवृतिया प्राध्यात्म की ओर मुडने लगती है। ससार असार लगने लगता है। अभी पूरा वर्प भी न हुआ था कि एक दिन आग की तरह यह खबर फैली कि "गाधी-इरविन" पैक्ट हो गया । हमे तत्वाल मुक्त कर दिया गया। हजारो देशभक्त एक साथ जेल से बाहर आ गये । जनता मारे खुशी के झूम उठी । प्रातःकाल जुलूस निकला । नौ बजे रात को समाप्त हुआ । छुट्टी पाते ही मैं घर की ओर लपका । गोपाल टकराया। चेहरा मुरमाया हुअा। वाल सूखे और आँखे सड्डो में। 1 मैंने पूछा- "यह क्या रे गोपाल !" "कुछ नही । भैय्या ! पहले मेरे साथ घर चलो।" "क्यो ? सव कुशल तो है ?" यह कह कर गोपाल के साथ हो लिया। घर पहुँचते ही गोपाल ने गद्गद् कंठ से आवाज लगाई- यहत्तर "लीला ! देख भैया आये हैं।" "झूठ ! भैया नहीं आयेगे । तुमने उन्हे नाराज कर दिया था।" दीवार की ओर मुंह किए पलग पर लेटी लीला ने उतर दिया। 1 - । मैं जहाँ था, रुका रहा। लीला के स्वर मे क्रोध, घृणा और अविश्वास था। मैंने गोपाल को कुछ न कह कर मर्मान्तक दृष्टि से देखा । वह मेरे पैरो की ओर झुका पर मैंने उसे बीच मे रोक कर कहा-"अब भी नही संभलोगे?" भैया ! और शर्मिन्दा न करो। मैं तो खुद ही पश्चात्ताप की आग मे जल रहा हूँ। काश । मैं आपकी नेक सलाह उसी वक्त मान लेता ! लीला को आप शात कीजिए । इसे कई दिनो से ज्वर आ रहा है । वेहोशी मे यह पता नहीं क्या-क्या बकती है ?" मै लीला के पास बैठ गया। उसके शरीर से ज्वर की गर्मी निपल रही थी। मैने धीरे से कहा- "लीला । मैं सचमुच पाया हूँ । तुक कैसी हो?" लीला मेरी आवाज सुनकर उठ बैठी। उसने अपने अस्त- व्यस्त वाल और कपडे ठीक किए । क्षण भर के लिए उसके चेहरे पर हँसी आई और फिर फूट-फूट कर रोने लगी। काफी रो लेने पर उसका मन हल्का हुना। अब मैंने समझा कि केवल गोन देखने और कुंडली मिल तिहत्तर

जाने से कुछ नही बनता यदि वर-वधू के स्वभाव प्रतिकूल हो।
'लीला । मुझे क्षमा करो। अव मै भरसक प्रयत्न करूंगा
वि तुम्हे समझ सकें।" गोपाल ने कहा।
"रहने भी दो । इतने दिन यह सब नहीं कर सके । अव षया
करोगे ? किसी एक बात मे भी तो हम एक नहीं।"
इस प्रकार दोनो एक दूसरे को कहते सुनते रहे। अत मे
मैने उन्हे यथायोग्य कह सुन कर समझाया ।
जेल से आते ही मैं फिर अपने कार्यो में व्यस्त हो गया।
गोलमेज कान्फ्रेंस के असफल होने के बाद फिर से राजनैतिक
आकाश मे सघर्प के गहरे बादल छा गए। भारत सरकार ने
सोचा कि गाधी जी के इगलैंड से लौटने से पूर्व ही उनके पर
काट दिए जायं । गगनक प० नेहरू और सरहदी गाधी को पक्ड
लिया गया। फिर क्या था? दोनो पार से युद्ध के ढोल बज
उठे। पुलिस अपनी वदूके और लाठिया ठीक करने लगी। दीवान
सत्याग्रहियो ने “देखना है जोर कितना वाजुए कातिल मे है ।"
गाना शुरु कर दिया । एक दिन पुन मै सीक्चों के भीतर परिचित
स्थान मे था। मसार की माया महा ठगनी से फिर एक बार नाता
टूट गया। “रामजी । यह ससार बना ही नहीं" कहने वाले
योग वाशिष्ठ को पढना शुरू किया।
इस बार नौकरशाही बोई समझौता करना न चाहती थी।
चौहत्तर

परिणामस्वरुप अन्य मित्रो के साथ पूरा वर्ष जेल की रोटी
खानी पड़ी।
मुक्ति के दिन अनेक मित्र जेल द्वार पर लेन के लिये आये।
उनमे गोपाल और लीला भी थे। दोनो के चेहरों पर नई जिंदगी
अठखेलियां कर रही थी। लीला की गोद मे फूल सा सुकोमल
शिशु था । उसे निहार कर मैं मुस्कराया । लीला ने नीची नजगे
से उस शिशु को मेरे हाथो मे थमा दिया । मैंने उसे ऊपर उछा
लते हुए कहा - "तुम दोनो का यही प्रायश्चित है क्या
सब खिलखिलाकर हंस पडे।
"

वचन का मोल

रामपुर की उस भगी स्त्री का गोरा चिट्टा रग, बडी-वडी
पानीदार अाँख, गठा हुमा शरीर, कही कोई कसर नही और
खुला हुआ ललाट, सहज मे ही देखने वाले के मन मे शक पैदा
करती थी कि और चाहे जो हो, पर भगिन तो नहीं हो सकती।
मैं इसी असमजस मे पडा था कि मेरे साथी ने मुझे बताया
कि
यह भगिन जन्म से मुसलमान है, पर इसका पति एक हिन्दू
है। यह जहाँ हिन्दू देवी देवतानो को पूजती है, वहीं मुसलमान
पीर फकीरो की भी बडी इज्जत करती है। इसके घर में
दिवाली और ईद दोनो ही त्यौहार बडे चाव से मनाये जाते है ।
छप्पन के साल की याद आज भी उन लोगो को भयभीत
कर देती है, जिन्होंने उसके भयानक दुष्काल को देखा था।
लाखो मनुष्य कोडे मकोडो की तरह मरे थे । वर्षा के न होने से
चारो और सूखा पड गया था। मध्य भारत, पजाब और दूसरे
प्रातो का जहाँ अनेको नदियाँ बहती है जब यह हाल था तव
भला राजस्थान के मरुप्रदेश की क्या दुर्दशा हुई होगी? यह
सहज ही सोचा जा सकता है।
इन्ही दिनो राजस्थान का एक भगो परिवार अकाल से
पीडित होकर, पेट की ज्वाला गात करने के लिए सिंध की ओर
सतत्तर

जा रहा था । रात हो जाने से वह एक ग्राम मे रुक गया और ग्राम के बाहर भगी बस्ती के पास खुले मैदान मे आकाश के नीचे उसने अपना डेरा डाला। जब इसकी खवर वस्ती के मुसलमान भगियो को लगी, तब उन गरीबो ने इन अतिथियों की यथाशक्ति सेवा की। यद्यपि वे मुसलमान भगी थे, पर गरीबो मे प्रभु ने जो सहज स्नेह और अपनत्व बाँटा है, उसको इन लोगो ने जी भर कर लुटाया । धनवानो से बडे मंहगे भावों पर अनाज लाकर अपने अतिथियो को खिलाया। वहाँ के धर्मा- भिमानी हिन्दू यह दृश्य देखते ही रह गए । अपने घरो मे सब कुछ होते हुए भी अतिथियो से अन्न तो दूर पानी तक के लिए न पूछा दूसरे दिन जव यह दुखी भगी परिवार अपने मार्ग पर बढने लगा तव उन मुसलमान भगियो ने बडे स्नेह से दो-चार दिन और सुस्ता लेने के लिए कहा-आखिर बहुत कहने सुनने पर वे रुक गये और दो-चार दिन मे ही इस तरह हिलमिल गए मानो वर्षों के मित्र हो। तव मुसलमान भगी परिवार के सर्वेसर्वा वृद्ध ने सोचा कि इस प्रेम को स्थायी रूप क्यो न दे दिया जाये। उस हिन्दू भंगी परिवार मे एक सुदर कन्या थी । आयु भी यही कोई सोलह-सग्रह साल की होगी। लडकी असीम सौदर्यमयी थी। अगर मर्यादा और माछूत का प्रश्न न होता तो कोई भी ठाकुर-ब्राह्मण उसे अपनी पत्नी वनाने मे अभिमान मानता। पठत्तर

वद्ध ने बडे नम्र भाव से कन्या दान की प्रार्थना की, परन्तु
वेचारा हिन्दू भगो यह बात सुनते ही काप उठा। आज तक
उसके कुल में ऐसी व्याह-शादी की घटना न हुई थी। उसने यह
तो अवश्य सुना था वि राजपूतो ने अपनी बेटियाँ मुसलमानो
को व्याही पर किसी भगी ने ऐसा किया हो, यह कभी न
मुना था।
इधर उसने सिध के मुसलमान जागीरदारो के बारे मे
इतने खौफ्नार किम्मे मुन रचे थे कि वे कामी और शैतान
गरीवो की जवान बहू-बेटिया को जबरन अपने घरो मे डाल
लेते हैं। अगर कोई इन्कार करता है ता वह उसे जेल तक
भिजवा देते हैं।
फिर उसने सोचा यासिर भगी की कन्या विसी भगी के
हो तो घर जायेगी। यह जाति पाति धर्म भेद सब टोग है । तव
उसने एक राह हँट निकाली और वृद्ध मुसलमान भगी मे हाथ
जोडकर कहा कि मैं इस गर्त पर कन्यादान करना चाहता हूँ
कि मेरी पुत्री मे जो लडक्यिां पैदा हो, वे हिन्दु भगियो से ही
व्याही जायें।
वृद्ध ने यह गर्न मानली।
दूसरे ही दिन वह परिवार कन्यादान देकर पागे वटा।
अभी पूरे दो साल भी न हुए थे नि भगवान की कृपा से
मुसलमान भगो दे घर भी एक लड़की का जन्म हुआ। फूल सी
उन्यासी

सलोनी चांद सी प्यारी। प्रकृति के असीम सौन्दर्य को विधाता ने उसी के निर्माण में लगा दिया था। वह अपनी मा की गोद मे बिलकती तो सुख का सगीत छिड जाता ! मा वाप ने उसका नाम रखा "गुलाव" गुलाब अपने मा वाप के प्यार का मधुर जल पाकर वढने लगी और पूनम के चाँद की तरह पूर्ण होती गई । और एक दिन उसके मुख विधु पर सोलह क्लाएँ उजागर हो उठी । उसका सौन्दर्य सगीत बनकर गूंज गया। रस लोलुप झूम उठे । वह प्रसिद्ध हो गई। उसके पिता को ब्याह की चिंता हुई। ग्राम के राजपूत और मुसलमान जो कभी भूलकर भी भगी यस्ती के पास न फटक्ते थे अव गुलाब के पिता से मिलने आते और घटो मीठी मीठी वातें करते । कभी कभी कामुक दृष्टि से घर मे इधर-उधर घूमती हुई गुलाव को देख पाते तो जगत और मर्यादा उन्हे आगे न बटने देती। वे क्समसावर रह जाते। पर मुसलमान जागीरदारो और मौलवियो को गुलाब की प्रतीय कमनीयता का पता चला तो फिदा होगए। अपने अपने तौर तरीके से उसे पान के लिए सभी ने उसके बाप को समझाया कि इस्लाम के नाते हम सभी भाई हैं । हम मे कोई भी भगी सैयद और गेय नहीं है । अमीर गरीब या भी कोई प्रश्न नही । इम- प्रस्सी

२
लिए तुम अपनी लडकी किमो भगी को न देकर हमे दे दो।
राज करेगी राज को व्यर्थ ही उसको अपने गन्दे और जलील
पेशे में धमीट रहे हो
उतर मे गुलाब के पिता में एक ही बात कही कि वह गुलाब
किमी मुसलमान को न देकर, हिंदू भगी के साथ व्याहने के
लिए वचनबद्ध है।
यह सुनते ही मौलवियो ने इम्लाम खतरे में है का नारा
आग की तरह फैला दिया।
वेचारा मुसलमान भंगी समझ नहीं सका कि क्यो एकाएक
इस्लाम सतरे में पड गया' मुल्ने मौलवियो के द्वारा उसके
खिलाफ यह नारा बुलदी देवकर उसे आश्चर्य हुा । उसे सत्रह
साल पहले की याद आयी कि उसके हिन्दू लड़की से व्याह
करने पर किसी भी हिन्दू ने एतराज नहीं उठाया था, ये मुमल
मान ही इस प्रकार क्यो बौखला रहे हैं ? लाचार वह हिन्दुओं
के पाम सहायता के लिए गया कि वे इस मजह्वी तूफान में
उमे बचायें पर मुसलमानो के डर से हिन्दुओ ने कुछ न मुनी ।
वह निगम न हुा । अपने मालिक पर गहग भरोना रखकर
जिम विसी तरह दिन निकालता रहा ।
गुलाब के पिता पर इस्लाम की जोरदार दुहाई का असर
न होना देसकर थैलियो के मुंह खोलकर उमे डिगाने का विफल
प्रयास दिया गया । जमीन देने के वायदे भी आये। पर वह
,
इस्पासो

पूर्ववत् अपनी बात पर अडिग रहा । अत में उसे मार डालने
की धमकी दी । उसने यही कहा कि मुझे मरना मजूर है, पर
वचन भग नही करूगा। खुदा
मुझे बनाया है। मर्द की
मर्दानगी यही है कि वह अपना कौल वचन मरकर भी पूरा करे।
तूफान की भयदायिनी गति देखकर सभी अपने आप में
समाये रहे । जो सहानुभूति रखते थे, वे भी। क्या यही सस्कृति
की रक्षा है?
गुलाव के पिता ने अपनी बात पर अड़े रहकर खोज जारी
रखी । अत मे अनेक कठिनाइयो के बाद उसे नौजवान हिन्दू भगी
मिल ही गया । उसने मालिक का लाख शुक्रिया किया।
एक रात को गुलाव के हाथ पीले हो गए किसी को खबर
न लगी।
तारो की झिलमिलाहट मे गुलान अपनी मा और वचन
वद्ध वीर पिता से सदा के लिए जुदा होगई ।
जुदा होते समय गुलाब फूट कर रोने को हुई कि उसके पिता
ने छाती से लगाकर रहा-
"मुस्वरा बेटी कि मेरा प्रण पूरा होगया।'
x
x
x
K
सुवह गुलाव के व्याह की बात पैली। लोगो को विश्वास न
हुआ । जाच की गई । वात सही थी, मो मही निक्ली । प्रश्न
उठा कि अब क्या
"तौहीन की है। उसे मार डाला जाये।"
१
वियासी

2"
मजही पागला न गुलाब के पिता के घर को घेर लिया ।
उसे ललकारा कि वाहर निक्लो और उसके घर को आग लगादी।
गुलाब की भा ने ग्राग की लपटो को वढते देसकर कहा-
"चलो भागो ।'
"पर यहाँ बाहर कौन सी प्राण रक्षा होगी।"
"तो
"तो क्या ? इन हिंसर पगुनो के बीच जोकर रहने से भी
क्या होगा? मानला पाज वच भी गए। पर क्ल ये लोग फिर
हमे मारने के लिए दौडग और मार टालेंगे।"
"पगली रोती है "
"गुलाव
"उसके लिए न पवरा । वह गई अपने पर।"
"सुनेगी कि
"यही कहेगी कि मेरे वाप और मा को अग्नि देवता ने
पापियो के हायो न मरने दिया।"
और दोनो आलिंगनबद्ध होगए।
प्राग की ऊंची ऊंची लपटो ने उन दोनो को घेर लिया
धर्माध, कामी मानव वाहर इस प्रतीक्षा मे खडे रहे कि
इस्लाम का बैरी जरा निकले तो पर वचन का मोल चुकाने
वाला अपनी प्रेयसी माय उनकी परड से दूर और बहुत दूर
जा चुनाया।
m

पंजू का पता

पजू ने कांपते हाथो से मुझे पत्र दिया, जिस मे लिखा था,
राम गली
हैदरावाद (सिन्ध)
मेरे प्रिय !
मुझे बडे दुःख के साथ लिखना पडता है कि आज हमारी
शादी हुए पूरा सप्ताह बीत चुका है, परन्तु दासी को अपने घर
ले जाना तो दूर, आपने दर्शन तक नहीं दिये । मैं दिन रात
प्रतीक्षा में रहती हूँ कि आप प्राय और मुझे ले जाये । अधिक
क्या लिखू मुझे न दिन को चैन, न रात का पाराम है। हर समय
याप की याद सताती है । कृपया इस पत्र को पढते ही आयें, और
अपने घर ले जाये।
अापकी दासी
चचला
पंजू ने पूछा अव आपकी क्या राय है, मैं जाऊँ क्या ?
परन्तु मैं खुद भी समझ नहीं रहा था! इस लिये केवल "ह"
अच्छा देखा जायगा, यह कर उसे टाल दिया।
अभी वठिनता से चार-पांच दिन बीते होंगे कि वह एक और
पत्र ले माया-लिखा था । 'अफमोस ! आपने मेरे पत्र का
पिचासो

कुछ भी जवाब नहीं दिया। मै आपसे कह देती हूँ कि आपने
उत्तर न दिया और न घर ले गये तो मैं विवश होकर यात्म हत्या
पर लूंगी, फिर न कहना कि मैंने आपके खानदान को
लजाया है।
नापती
चचला
इन पनो को देये आज पूरे चार साल होने आये है फिर
भी मुझे वह हर होली पर याद आते है और याद आता है पजू
का अपनी स्त्री की जुदाई मे उदास चेहरा
हैदरावाद (सिन्ध ) की बात है। मैं जिस मकान म रहता
था, उस मकान के मालिक म्यूनिसिपल कौसिलर और वडे भारी
जमीदार थे । उन्ही का एक बीस साल का नौजवान नौकर था।
नाम था पजू । पजू वडा ही मजेदार यादमी था, उसकी मालकिन
के सिवा वाकी मोहल्ले की सभी स्त्रियाँ उस पर वडी प्रसन्न रहती
थी। कारण पजू तनरवाह तो अपनी मालकिन से लेता था,
मगर काम माहल्ले भर का करता था।
।
होली मे अभी कुछ दिन थे। प्रकृति एक नवयौवना की तरह
हर दिल मे एक नई मस्ती भर रही यो। गली के बच्चों ने अपनी-
अपनी रग विरगी पिचकारियां ठीव कर ली थी। युवतियों वडे-
बूढो की प्रांस वचा पर अपने पतियो से कह रही थी, बडे वो
हो जी, पिछले साल तुम भाग गये मगर इस साल रग डाले बिना
छियासी

-
मानूंगी। मैं भी सोच रहा था कि जा हा मैं भी अब की बार
ली खेलूंगा'
दोपहर का वक्त था। मैं भोजन के उपरान्त एव समाचार
विलकर बैठा ही था वि
ग्रा
वैठा
मन वहा-पज् क्या बात है? मालक्नि सकुछ भगडा हुगा
है क्या
"नहीं तो
"फिर क्या बात है
"माना ता कहूँ
"हाँ हा तुम वेशक कहा । मेरे वस की होगी तो जरूर
7
"
।
"यस मै अापवे क्या नहीं? पर आज गरीबो की सुनता ही
कौन है ?' पजू गमगीन मुख बना कर बोला ।
"अरे । पर कुछ कहो तो सही, मैं भी तो जानूं कि क्या वात
है ?" मैंने समाचार पत्र एक ओर रखते हुये कहा।
"वात क्या है । यह तो आप भी जानते हैं। आप के सिवा
मेरे और पौन है । अाज ही चने की मां, भुंगडे की मौसी मुझ
से कह रही थी कि अगर आप अगुना हो जायें तो मेरी शादी
आज हो सकती है ।' पञ् वडी नम्रता मे वोला ।
फिर थोडा रख कर पजू ने मेरे पर पकड लिये । म हैरान
सतातो

था कि इस मस्तराम को क्या उत्तर दूं जो दूसरो के वर्तन मल-मल कर जीवन निर्वाह करता है । आठ आठ दिन तक स्नान नहीं करता, उसे भी शादी का शौक चर्राया है। मुझे गुस्सा या रहा था उन स्त्रियो पर जो पजू से काम लेने की सातिर उसे हवाई किले दिखाती थी। शायद पजू से कहा गया था कि जब तक मैं हाँ न करदूं मेरे पैर न छोडे जायें, लाचार मुझे हाँ करनी पडी और इसी होली पर शादी करा देने का वचन देना पडा तय कही जाकर उसने मेरे पर छोडे । रात होते होते यह वात मोहल्ले भर मे फेर गई। हर स्नी मुख पर यही बात थी कि पजू की शादी होली पर होगी। फला वावू ने गरीव पर दया कर सब प्रवध कर दिया है । पजू की मालकिन को वधाइयाँ मिल रही थी । इधर पजू ने सब काम- काज छोड कर खूब नहाना धोना शुरू कर दिया था। उसकी मालकिन यह सब देख कर आपे से बाहर हो रही थी। मगर मालिक जानता था कि ऐसा नौकर जो गधे की तरह सारा दिन काम करता है, जिस पर खाली रोटी कपडे पर हमारे पास पडा है, सारी दुनियां मे चिराग लेकर दंढने पर भी नहीं मिलेगा ! मैने अपनी जान छुडाने के लिये यह वहाना दिया था, परन्तु इस प्रकार वात फैलते देख मैने सोचा अच्छा तो पंजू की शादी हो ही जाय ! पंजू के भाग्य कहिये या "निर्वल के वल राम" कहिये सब आप से आप हो गया। प्राशा मे अधिक एक अच्छे मठासी 1 घर की कन्या मिल गयी। ब्राह्मण को बुला कर ग्रह आदि सब शाध लिये गये । लग्न घरा ली गयी। खर्च की जवाबदारी पजू की भामियो और नौजवाना ने अपने ऊपर ले ली, बंड वाले भी मुफ्त मे आ गये । उन्होन सोचा ऐसी मशहूरी का मौका फिर कौन जाने कभी प्राप्त हो या न भी हो। शाम का वक्त, हाली का दिन । मित्र मण्डली की आँखो मे मस्ती छा रही थी। आगे आगे बंट भी सुरीली तान मे वजता जा रहा था, पीछे पजू की सजी हुई गाडी थी। पजू ने भी मागा हुआ सूट पहन रखा था। मुंह बोली वहन विवाह के गीत गा रही थी। पीछे-पीछे वराती चल रहे थे जिन मे हर प्रकार के लोग साहूकार, गरीब, जन सेवक और कर्मचारी थे । लडकी वाले भी यही पा गये थे, इस लिये इधर बरात निक्ली, उधर लडक्यिो ने बहू को पिया प्राप्ति के लिये सिगार कराना शुरू किया । वडी सजधज और धूम धाम से शादी हुई। पजू का अपना कोई घर तो था नहीं, इस लिये बहू अपने घर चली गई। दोस्त भी रात के बारह बजे तक हो हुल्लड करते रहे । आखिर मब थक कर अपने अपने घर को गये । मैंने भी सुख वी सास ली, क्योकि पज् का विवाह निर्विघ्न समाप्त । । हुआ था। दूसरे ही दिन सारी दुनिया की तरह मैं भी अपने कामो में लग गया। विस की शादी और सी शादी, सब भूल भाल नवासी

गया । मेरी आँख तो तब खुली जब पंजू ने एक सप्ताह बाद
लिफाफा दिया, जिसका जिक मैं ऊपर कर चुवा पत्रों का
यह क्रम चल ही रहा था कि “सुख मे रैन बसेरा करने वाले
सिन्ध मे" जिन्ना साहब का तूफान पाया, जिसमे "इस दिल के
टुकडे हजार हुए कोई यहाँ गिरा, कोई वहाँ गिरा"।
पता नहीं पजू कहाँ है और कहाँ नहीं ? काश उसे बता दिया
जाय कि उस की शादी तो होली का हुत्लड थी और वह भी
उसकी मालकिन के छोटे भाई के साथ । परन्तु इस बात को मैं
आज भी नहीं समझ पाया, कि वह कौन वियोगिन थी जो अपने
हृदय की टीस इस प्रकार पत्रो मे निकालती थी, जिसमे गरीव
पजू मजन बना जा रहा था।
M
नचे

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"स्पेशलिस्ट"

-
कुछ दिनो से मेरी एक दाढ मे दर्द चला आ रहा था । और
दिन प्रति दिन वढता ही जा रहा था। अपने राम ने सोचा,
श्रीमती जी से क्यो न राय ली जाय, कारण वे इस अखाडे में
मुझ से बहुत पहले उतर चुकी थी और अब पूरी डाक्टर वन
गई थी।
यूं भी अपने राम लेडीज फर्स्ट के पक्षपाती है तव उन्ह कैसे
भुलाया जा सकता था। जो हो हम ने डरते डरते अपना केस
रखा । पर क्या कहने उनके उत्तर के । उनका उत्तर विलकुल
सिपाहीयाना था। उन्होंने हंसते हुए कहा-
"यह भी कोई घबराने की बात है । मर्द होकर घबराते हो।
छि।'
पर अफसोस उन्हे हमारी वेदना का पता न था, नहीं तो
शायद वे ऐसा उत्तर न देती।
पैतालीस साल पहले की बात है। हम यही कोई
लगोटी वाधना सीवे थे। अचानक एक दिन हमारे ग्राम मे भूचाल
सा आ गया, जिसे देखो उसी के मुंह पर एक ही बात थी । कुएं
पर, खेत पर, घरो मे, बाजार मे, वम यही चर्चा थी कि लाला
रामलाल वा लडका दांतो का स्पेशलिस्ट बन कर पाया है,
तिरानवे

अपने राम भी साथियो को लेकर दुकान पर जा डटे । हमने
देखा कि डाक्टर साहब को राह चलने वाले भी बडे ध्यान से
देखते है और तो और सदा लम्वा चूंघट निकालने वाली
भाभियां भी जब दूकान के सामने आती है तव बिन मांगे दर्शन
देती है । तब हमारी उत्सुक्ता का वढ जाना स्वाभाविक
ही था
पुरानी मेज पर कुछ लोहे के औजार और शीशियाँ
रसी थी । डाक्टर साहब बडी शान से लालटीन छाप सिगरेट पी
रहे थे। हौले-हौले काफी लोग जमा हो गये, मानो अभी
मदारी वा खेल शुरू हुग्रा । अचानक हमारी पीठ पर थप्पड़
पडा । मुडकर देखने की भी किसे हिम्मत थी, कारण इस थप्पड
को हम पहचानते थे। मैं घर लौट पाया, पर डाक्टर की मुन्दर
छवि कुछ आँखो मे ऐसी समा गई, कि रात भर उन्ही के स्वप्न
लेता रहा।
मन में कोई
दो चार दिनों में ही पास-पास के ग्रामों में यह खबर फैल
गई कि फला ग्राम में दांतो का स्पेशलिस्ट पाया है । दूर दूर से
दांतो के रोगी पाने परन्तु दूर मे ही देय कर चले जाते । डाबटर
की दुकान पर कोई न चढ़ता, राम जाने क्यो उन
गया थी, या डाक्टर को आँपो ही आग्यो मे तोलते थे कि
यह कुछ जानता भी है या नहीं।
ग्रामीणो या मरल स्वभाव तो आप जानते ही हैं। ये
धौरानवे

शहरियो की तरह पडोस मे वसने वालो के लिये यह नहीं कहते कि हम क्या जाने कि कौन रहता है, आगे पूछो बल्कि वे घर पर जा कर छोड आते है । इसी परम्परा को हम ने अपनाया । जो कोई डाक्टर को पूछता, हम बडे उल्लास स उसे डाक्टर साहब की दुकान पर पहुंचा पाते । अव कोई कोई रोगी टाक्टर से प्रश्न उत्तर भी करने लगे थे, परन्तु इलाज कोई न कराता ' एव दिन हम कुछ लडके मजे ले लेकर डाक्टर का स्वाग कर रहे थे कि दूर से एक मरीज आता दिखाई पड़ा जिसका मुंह एक अोर से सूजा हुअा था । हम ने सोचा, हो न हो यह डाक्टर को अवश्य पूछेगा। हमारी धारणा ठोक निकली । उस न डाक्टर का पता ठिकाना पूछा-वस फिर क्या था ही मन मागी मुराद मिल गई और हम वदरो को भाति आगे अागे उछलते कूदते चलने लगे । राह मे जो भी लडका मिलता उमे प्रांखो ही प्रांसो मे इशारा हो जाता । दूकान पर पहुँचते पहुँचत लडको को खासी भीड हो गई । मरीज को दूकान दिखाकर हम सब सामने के थले पर बैठ गये। - मगेज से थोडा सा समाचार ले पर डाक्टर ने इधर उधर देसा, मानो उसे मन के तराजू पर तौल रहा हा कि इतना बोझ उठा भी सवंगा या नहीं, फिर उम न कस कर तेहमद को वाधा, कमीज की वाह ऊपर चढाई , और कमीज वो भी एसा ही करने के लिये पहा, मानो दो पहलवान कुस्ती के लिये अबाडे में उतर . पिच्यानवे

रहे हो । यह सब हो चुक्न के बाद उस ने कील निकालने वाली
पकड यो मजबूती से पक्डा । हम सब सास रोक कर उठ
खडे हुए । कुछ लडवे और निक्ट हो गये। मेरे जैसे वीर यह दृश्य
देख कर और पीछे हट गये । सामने कुएँ पर जल भरने वाली
स्त्रियो ने जल भरना रोक दिया। डाक्टर ने मरीज़ के मुंह में
पक्ड डाली । मरीज एक दम चिल्लाया "पारिया ओए, मार
दिना" पर डाक्टर ने उसकी पुकार को अनसुनी कर दिया । उस
ने सोचा सीधी उँगली घी नही निकलेगा | उस ने एक हाथ
मरीज वी कमर पर डाला, और दूसरा पक्ड मे, तव पीछे की
पोर हट कर जोर से दाढ को खीचा । मरीज भी कोई वावून
था पूरा जाट था। उसने भी "आम रक्षा" में एव जोर का
धक्का दिया। टाक्टर चारो याने चित्त ' डाक्टर गिरते ही लड़के
भाग खडे हुए, कुएँ पर ग्वडी म्बियाँ बैठ गई । डक्टर कपडे साफ
करता उठा, एक गिलास पानी पिया, मरीज को भी पिलाया
और फिर पकड़ में हाथ डाल कर शेर की तरह मरीज को घूरने
लगा।
डाक्टर ने पंतग बदला। अब की बार उसने गर्दन में
हाथ डाला। अब दोनो मचेत थे। डाक्टर इस बार मात ग्वाना
न चाहता था, ग्रागिर उसने भी पचनद वा पानी पिया था।
मगर हुआ वही, जा होना था। दोनो एक साथ गिरे, मगर हाँ
यून पवारे ये माय दाद भी निश्ल पायो । पून बहता देय
छियानवे

कर सब लड़ये भाग खडे हुए, और उन सब से आगे था लेखक। हा तो, हमे भी श्रीमती जी एक स्पेशलिस्ट के पास ले गई। वे सरदार जी तो थे ही, पर शक्ल सूरत मे भी पूरे मरदार थे। बम्बई मे कोई दगल हा रहा था । रेडियो उसी कुश्ती का आँखो देखा हाल कह रहा था उस समय वह रेडियो मुन रहे थे। रेडिया पर जव लागो के ताली पीटने की आवाज आती, तो डाक्टर साब उठ खडे हाते, ताली बजाते और अपना वाजू ठोक्ने । हम ने मन ही मन श्रीमती जी के पूर्वजो को गालियाँ दी, सोत्रा गम जाने, क्सि जनम का बदला लेने यह मे यहाँ ले आयी है । दाढ निक नेगी या नहीं, यह तो अभी नहीं कहा जा सक्ता मगर हड्डी-पमली अवश्य चूर-चूर हो जायगी, इसमे तनिक भी नक नहीं । मगर पाठक, इन पैतालीस सालो मे विज्ञान इतना आगे बट गया है, कि हम नही सलामत घर लौट पाये । सत्तानवे पडोसी

ग्राज मैं जैस ही कवियो की तरह, कागज, पेन, सामने रख
पर आँख बन्द कर कुछ मोचने लगा, श्रीमती जी ने दूर से ही
आवाज लगाई, भाजी न लायोगे, तो सानोगे क्या, मेरा
मैने आँख खोली, और रोप से कहा-"तुम भी खूब हो ।
दो पैसे की सब्जी के लिये मेरी लाख रुपये की कहानी ऊपर
नीच कर दी।
"रहने भी दो, अपनी कहानी । जिन कहानियों के लिये
आर्य समाजी परितो की तरह तुम निरवार का ध्यान लगाये
रहते हो, ऐसी वीसो कहानियाँ साकार रूप में मेरे सामने चूहो
की तरह दोडती रहती हैं । सुनूं तो तुम्हारी कहानी-
श्रीमतीजी ने यहा-"कुछ लिखा भी हो, तो सुनाऊँ । मेरा तो
सभी गुड गोचर होगया। यही कुछ हास्य रस पर सोच रहा था"
मैंने कहा
।
"हास्य रस क्या होना है, यह तो मैं नहीं जानती। पर हाँ,
हमारा एव पडोसी था। उसकी हरकतें देख कर हम वच्चे खूब
हँसा करते थे। मारे हंसी के पेट मे वल पड़ जाते थे। कहो तो
सुनाऊँ
"जरूर-जर, तुम एक नही अनेव मुनाओ। परन्तु जरा
सब्जी ले पाने दो।"
"वाह साहा बाह् । अपनी बात के लिए तो घटो सर
निन्यानवे

नंगे मगर मेरी वात के लिए सब्जी का बहाना । जानो मै
सुनाती।"
"ऐसा कभी हो सकता है, जल मे रह वर मगर से वैर ।
हो मैं सुनता हूँ।"
अच्छा तो सुनो। आप क्या ये वाप सुन्दरोजी को तो
जानते ही होंगे।
"कर्नया की मा को तो खूब जानता हूँ। बाप को कहाँ
जानता हूँ।" मैंने जरा अाँखो मे मस्ती ला कर कहा ।
"रहने भी दो, अरे हां मैं भूल गई, मेरी शादी से पहले ही
वह स्त्री वच्चे छोड कर देश चला गया था।"
"लडती होगी क्नया की मा, विचारा भाग निकला होगा।
पुरप गरीव जाति जो ठहरी।"
"याय, उस गरीव ने तो खूब सम्हाला था? उसकी बातें ही
ऐसी थी कि सारे दिन गली के बच्चे हो हो क्यिा करते थे।
कोई कोई स्त्री तो क्या की मा से कहती देखो बहिन, तुम्हारा
लडका सारे दिन बच्चो मे पेलता रहता है । इसे विमी काम पर
भेजो न ' दाढी मछो वाला हो गया है, फिर भी बच्चो से खेलते
गर्म नही पाती । दूमरी कहती-"अरी कहती क्या है ? यह तो
इसके 'वह' है" तव पहली सिलसिला कर हंस पड़ती।
सो

एक बार कनैया की माँ ने रेलवे के बडे बाबू से कह कहा
कर उसे चौकीदारी दिलवा दी। नौकरी तो उसने दस-पाँच
दिन ही की, मगर की वडी शान से । क्या मजाल कनैया की माँ
उससे बात कर सके । एक दिन की बात है । सुदरो जी रात भर
नौकरी देकर घर लौट रहे थे। मार्ग मे एक माल गाडी खडी
थी। आप गाड़ी के नीचे से निकल कर रेल की पटरी पार कर
रहे थे कि पीठ मे लोहा लग गया । बस फिर क्या था, सुन्दरोजी
गर्म हो गये। पहले तो दिल खोल कर गाडी पर थूका । जब
थूक न रहा, तव लाते लगानी शुरू कर दो, लाते मारते मारते
जब हजरत हाफने लगे, तब आस पास से पत्थर ले आये, और
दनादन पत्थर मारने लगे-मानो गोली मार रहे हो । जव
पत्थर भी न रहे तब लाठी से, गाडी के डब्बे से अपना बदला
चुकाने लगे। आवाज सुन कर गार्ड के वाबू दौडे पाये । तब कही
जावर सुन्दरो जी रुके । फिर भी अरमान तो रहा ही, बाबू न
पाते । तो आज वह न थे, या क्मबस्त गाडी का डब्बा न था।
-
इस घटना के बाद, कई दिन तक सुन्दरो जीटाँगो पर तेल
की मालिश करवाते रहे।
रविवार का दिन था। सुन्दरो जी जगल से लकडी लाने
गये। जैसे ही एक पेड पर चढे, एक मिड ने काट खाया । आप
मारे गुस्से के लाल पीले हो गये । दूसरे दिन प्रात. ही ५ बजे
उठे, दिन भर की रोटियाँ पक्वाई, और जगल की राह ली।
एक सौ एक

-
शाम को थके माँदे जब घर लौटे, तो किसी ने पूछा- क्यो
सुन्दरो जी, आज दिन भर कहाँ थे? आज नौकरी पर भी
नही गये?
सुन्दरो जी बडे उत्साह से बोले-रहा कहाँ ? जगल मे मिडो
का वंश नाश करता रहा। कल एक ने काटा था, गयी वहाँ
होगी -जरूर मरी होगी।
कही शादी विवाह होता, सुन्दरो जी सबसे पहले पहुँच जाते,
और वह भी स्त्री वेश मे । स्त्रियां घूमकर खेलती होती-राजस्थानी
स्त्रियाँ-सबके मुंह पर कपडा रहता ! रात का वक्त होता,
सुन्दरो जी भी घूमर मे घुस माते और किसी न किसी स्त्री का
हाथ पकड कर खेलने लगते । दूसरी सब तो नाच मे मग्न होती,
पर यह चक्कर दिलाने मे प्रवीण । तब वह स्त्री घवरा कर पास
वाली से कहती, "वाई, मुझे तो यह सुन्दरो जी दिसे" तब
सुन्दरो जी भी भाग निकलते, और हम बच्चे हो-हो कर उसके
पीछे दौडते । कहना न होगा, कि वीसो बार ऐसा करते पक्डे
गये, मार खाई, मगर उसने अपनी पादत न छोडी।
मैंने उक्ता कर वहा वन्द करो इस सुन्दरो जी महाभारत
को । “श्रीमती जी आंखे तरेरती हुई वोली-अभी तुमने सुना
ही क्या है । वह ऐसी ऐसी हरकतें करता था, कि तुम हँस हंस
कर गोल-गप्पा हो जायो।
।
एक सौदो

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शाम को थवे माँदे जब घर लौटे, तो किसी ने पूछा- क्यो
सुन्दरो जी, आज दिन भर कहाँ थे? आज नौकरी पर भी
नही गये?
सुन्दरो जी बडे उत्साह से वोले-रहा कहाँ जगल मे मिडो
का वश नाश करता रहा। कल एक ने काटा था, गयी वहाँ
होगी ~जरूर मरी होगी!
कही शादी विवाह होता, सुन्दरो जी सबसे पहले पहुँच जाते,
और वह भी स्त्री वेश मे। स्त्रियां घूमकर खेलती होती-राजस्थानी
स्त्रियाँ-सबके मुंह पर कपडा रहता ! रात का वक्त होता,
सुन्दरो जी भी घूमर मे घुस माते और किसी न किसी स्त्री का
हाथ पकड कर खेलने लगते । दूसरी सब तो नाच मे मग्न होती,
पर यह चक्कर दिलाने मे प्रवीण । तब वह स्त्री धवरा कर पास
वाली से यहती, "वाई, मुझे तो यह सुन्दरो जी दिसे" तव
सुन्दरो जी भी भाग निकलते, और हम बच्चे हो-हो कर उसके
पीछे दौडते ! वहना न होगा, कि वीसो वार ऐसा करते पक्डे
गये, मार खाई, मगर उसने अपनी आदत न छोडी।
मैंने उपता कर वहा वन्द करो इस सुन्दरो जी महाभारत
को। "श्रीमती जी अखि तरेरती हुई बोली-अभी तुमने सुना
ही क्या है । वह ऐसी ऐसी हरकतें करता था, कि तुम हंस हंस
कर गोल-गप्पा हो जायो।
-
एक सौदो

Kori Digariya

Author
Dolat Ram Sharma
Title
Kori Digariya
File name
Kori Digariya
Text
OCR done
Citation
1962
Published
2010/12
Publisher
Agra Gaya Prasad And Sans
Language
Sanskrit
Pages
109
Library
Bhartiya Vidya Mandir Shoudh Pratisthan,bikaner
Classification
Literature
DLI number
514660
Barcode
4990010022356.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
WYKgjtAxiQ2
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Kori Digariya