Government College, Kota

Kavyaprakash Rahasyam

Joshi, Sri Pt. Sitaram Jayram · 2012/04

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DING TEXT
॥श्री ॥
हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला
२३८
॥ध्रा ॥
काव्यप्रकाश-रहस्यम्
(अशोधित परिवर्धित सस्करणम्)
तौखम्बा संस्कृत सोरीज आफिम,
वाराणसी-१

LENDING TE
Government College Library
БОТАН. ,
POE
Class No... 991.210.7...
Book No. 9.623 (Vol. No..........
Accession No. 216.86.....

॥ श्रीः॥
हरिदास-संस्कृत-ग्रन्थमाला
२३८
P: G. SECTI2R
॥ श्रीः॥
काव्यप्रकाश-रहस्यम्
(काव्यप्रकाश-प्रश्नोत्तरी)
रचयिनारी
साहित्यशास्त्राचार्य:----
श्री पं० सीताराम-जयरामजोशी, एम० ए०
काशीहिन्दू विश्वविद्यालयसंस्कृताध्यापक्चरः
तथा
श्री पं० देवदत्तशास्त्री विद्यानिधिः
अम्बालास्थ दी० कृ० कि० स० ध० संस्कृतकालैजाध्यापक
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चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-१
सं० २०१६ ]
[ई. १९५९

प्रकाशफ:-
चारसम्बा संस्कृत सीरीज आफिस
पोस्ट माक्स नं.८, पाराणसी
मूल्य ११.५. नए पैसे
पुनर्मुदादिया सर्वेऽधिसरा प्रकाराकानाः
Chowkhamba Sanskrit Serics Offico,
P. O. Box, Varanasi.
1959
(प्रतिसंस्थतं द्वितीयं संस्करणम्)
विधापिलाम प्रेम, वाराणसी-१

भूमिका नत्या जगद्गुरुं देवं विद्यां तां ब्रह्मण कलाम् । कान्यप्रकाशगुह्यस्य प्रस्ताव क्रियते मया ।। काव्यप्रकाशरहस्य-नामाऽयमेव ग्रन्थ पूर्वरूप परिवृत्य किञ्चिन्नुतन वैपपरिधानेनाधुना जिज्ञासूना विद्यार्थिना तथा चान्यपिचक्षणाना पुरतो चरीरर्ति। तनत्या प्रथमपडुल्लासा अतिसक्षिमतया निहितत्वान् परीक्षा र्थिना छानाणा ग्रन्थरहस्यवोधनायातीयापर्याता इति मत्या ग्रन्थप्रकाशन- निर्बन्धादेव परिसबोधक्षमा यथा भवेयुस्तथा कृत्या तेऽन पिनिवेशिता । अपरञ्चार साहित्यिकीप्रथिता काऽपि स्पृहणीयपरम्पराऽपि प्रथितु पारितेति जिज्ञासूना तदतीर मुदमारहेदित्याशासे | सामोल्लासादारभ्य ग्रन्थसमाप्तिपर्यन्त तु श्रीदेवदत्तशास्त्रिता रचना पूर्वपदेव सन्निधापिता । ग्रन्थगौरवभयात् स भागोऽनास्पृष्टो वर्तते । ग्रन्थविस्तरेण तन्मूल्यमपि स्वाभाविकमेव वृद्धिमाप्नुयात्तथाभूते च सति नि स्वच्छानाणा कृते ग्रन्थ प्रापणकाठिन्य जायतेति प्रधानभाग एवान परिवर्नितस्तिष्ठति । आशसे चाय नूत्नरूपेण जिज्ञासूना मनोरञ्जने तथा ग्रन्थस्य सम्यग्बोधरिधाने प्रभवेदिति । प्रन्थकृत्परिचयस्तस्य चरित्र-देश-कालवर्णनेन समासेनैवान विहितश्चे- सोपि तेपामुपकारक्षमो सम्पद्येतति मत्वाऽतिसक्षेपेणैान विधीयते । ग्रन्थस्यास्य प्रणेता राजानपदलाञ्छन श्रीमान् मम्मटभट्ट काश्मीरान- लञ्चकार स्वनिवासेनेत्या न वैमत्य विदुपाम् । भीमसेनदीक्षितनिर्मित- सुधासागराख्यया ग्रन्थस्यास्य टीस्येदमपि विदित न 'अस्य पिता जैय्यटनामधेय ! व्याकरणमहाभाग्यप्रदोपकैय्यटस्तथा वेदभाग्य कृदुव्यटश्चास्यैव द्वौ कनीयासौ भ्रातरावास्ताम् । स स्वभातृभ्या सह वाराणस्यामध्ययनाध्यापनमफरोदिति । तथा च भीमसेन श्रीमान् कैयट औरटो ह्यपरजो यच्छानतामागतो भाष्याब्धि निगम यथारममनुव्यारयाय सिद्धिं गत ॥

इति स्टीकाया प्रस्तापश्लोकेषु कथयति । अन कैयटोपाध्य चैयाकरण सन् स्वप्रदीपप्रस्तावे आत्मान जैयटात्मजमभिधत्ते । उव्वर तु स्त्रीय वेदभाये यनटात्मनमात्मानमभिव्यनक्ति । अतोऽस्य मम्म भातृत्व विद्वद्भिपिशङ्कित सदनिर्णीत वर्तते । सशास्त्रविशारदोऽपि मम्मटाचार्योऽय प्रधानतया वैयाकरणाग्रणीरेव वभूय, यदृढीकरण काव्यप्रकाशस्थितनैकविधप्रमाणपरम्पया सुशकम् । न केवल भीमसेनेनैन किन्तु तत्पूर्वैरपि टीकाकृद्भिरानन्ददेवनाथतर्क- पञ्चाननप्रभृतिभिरय मम्मटभट्टो वाग्देव्या अवतारत्वेन वर्णित । उबटोक्तमन्त्रभाष्यप्रस्तागतश्लोकेन (भोजे पृथ्वी प्रशासति' इत्यु क्तत्वात् ) मम्मटरय भोजराजसमकालिकत्वमपि ज्ञापित भवति । अय धारेश्वरो भोनराज सृष्टान्दीय १०१८-१०५५ वर्षपर्यन्त महीं शशासति शिलालेसस्थितानेकप्रमाणोपन्यासद्वाराऽऽधुनिकैरैतिहासिक निश्चप्रचम् । काव्यप्रकाशेऽपि मम्मटभट्टनैनोदात्तालङ्कारोदाहरणावसरे 'यद्विद्वद्भयनेषु भोजनृपतेस्तत्त्यागलीलायितम्' इति भोजनृपतेर्णन' कृत्वा तत्समकालिकत्व प्रकटीकृतम् । यदि भोजनृपते समकालितकत्वमस्य मम्मटाचार्यस्य न स्वीक्रियेत तर्हि तस्मादर्वाचीनत्य त्ववश्यमेवाङ्गीकरणीयम् । एवमय काव्यप्रकाशस्य निर्माता स्पृष्टाब्दीयेकादशशतकस्योत्तरार्धात् ( ई० १०५०) प्राचीनो न | रसृष्टादनीयद्वादशशतकस्य पूर्वार्धे ( ई० ११४०) वर्तमानराजानकरय्यक वर्येण काव्यप्रकाशस्य टीका सङ्केतनामिका विरचितेति, साप्यधुना पुण्यपत्तने भाण्डारकरसशोवनमहालये उपलभ्यते इति द्वादशशतकारम्भा पूर्वमेव काव्यप्रकाशस्य प्रचारोऽभवदित्यनगन्तव्यम् । काव्यप्रकाशस्या परा दीका सकेतनामिका गुर्नरदेशस्थ माणिक्यचन्द्रसरिणा विरचिताऽ धुना सम्मुद्रय प्रकाशितोपलभ्यते । अतो द्वादशशतकस्यारम्भादेव काव्य प्रकाशस्य पठनपाठनप्रणाली भारतवर्षे प्रचलिताऽऽसीदित्यनुमेयम् । एर मम्मटभट्टेनाय काव्यप्रकाशग्रन्थ सृष्टान्टीयैकादशशतकस्योत्तरार्ध- भागे (ई० १०५०-११०० ) कदाचिद्विनिर्मित इति जिज्ञासुभि [३] अलङ्कारनये काव्यप्रसशस्य तदेव स्थान यद् व्याकरणे महामा- प्यस्य वेदान्ते वा शारीरक्शाङ्करमा यस्य दृश्यते अत्तोऽस्य नाम आर इति सूपपन्नम् । अस्यापि ग्रन्थस्यालङ्कारप्रन्थान्तराणामिर नय एनाशा सन्ति 'कारिकात्तिरदाहरण चेति । तत्र द्वाचत्वारिंशदधिकैक्शत- सहयाना कारिका सूनबनाढसन्दर्भा वर्तन्ते । वृत्तिरपि गद्यामिका मिताक्षरा सारगर्भा दुरूहा अत एर परिणाययितु दु शका वर्तते । अन्थोऽय मम्मटभट्टवर्येण क्थमपि समातिं न नीत परिक्रालङ्काराव- धिरेन विरचित । शेपस्तु तच्छिायभूतेन राजानकालक्सृरिणालटार्येण वा समाति नीत इति ग्रन्थस्यास्यान्तिमश्लोकसन्दर्भेणानन्दकविना काश्मीरकेण राजानकरय्यस्चर्येण तथा माणिक्यचन्द्रसरिणाऽपि प्रकटीकृतम् । श्रीमदानन्द स्वीयनिदर्शनारयटीकाया क्थयति-त श्रीमम्मटाचार्यवय परिकरारधि | प्रवन्ध पूरित शेषो विधायालद- सूरिणा इति इत्यमेव सोमेश्वर-जयन्तभट्ट-कमलार-सरस्वतीतीर्थ- प्रभृतिभिरप्युच्यते। अन्धस्यास्याशत्रितये तृतीयाश उदाहरणात्मको मम्मटकृतिन । तेन तत्समयप्रसिद्धक्वीना अन्यत उद्धृतोऽस्ति । शेपाशद्वयविपयेऽपि तदेक. कर्तृक द्वित॒कम् इत्यत्र टीकाकाराणा चमत्य दृश्यते । प्रायेण वङ्गीया कारिकापर्तृत्व भरतमुनी समारोपयन्ति । तदितरे न क्षमन्ते । भिन्नक्र्तृ- कत्वस्य प्रतिपादयितारस्तु कथयन्ति 'कतिपयरारिका प्रकाशग्रन्थगता भरतप्रणीतनाम्यशास्त्रेऽधुनोपलभ्यन्ते । तथा च ग्रन्थस्यास्य प्रथम- कारिकावृत्त्युपक्रमानसरे 'ग्रन्थकृत्परामृशति' इति प्रथमपुरुपपूर्वकनिर्देश कारिकाकर्तुतिभिन्नत्यमुपपादयति । दशमोल्लासे च रूपलक्षणे 'सम- स्तरस्तुतिपय श्रौता आरोपिता यदा' इति कारिकाया बहुवचनग्रहण तथा चास्या वृत्तौ 'घनचनमविवक्षितम्' इत्युप्पादन क्र्तृपृथक्त्वबोध- कमेवेति । इतरेऽनेत्य समादधते--सार्द्धशतकारिकासु द्वे तिस्रो वा कारिका भरतमुनिप्रणीता नाट्यशास्त्रत सन्श्यन्ते । तास्तत एन बुद्धिपूर्व मम्मटार्येणरद्धृता इत्यरसेया । कुत्. । नैरेव. वामनानन्दवर्धनाचार्यप्रन्थे- [१] भ्योऽपोहगेव ऋदिपकालोन उट्टन्य तिन्दिा अपरत्र सुपीमियाः । प्रयन पनि गन्नु नहाल्पानांना मरलपाटोपरगायनाननन्त- कन्तुविश्यम्परे तारोप्यमानाना बाहन्माहवचननुन् । वृत्तावपि प्रथनं बनवलना मटीरियल, या तु चननवित्रतिनि- लनिन्दनरोयनागानां हित्वदामाद द्विवापि सनस्तवन्तुनिपर- पन्य प्रतिनिधोपनार्य 1 रन ऋरिकन्टनालगन्य मन्नद- नवे मनानानिकान्वागतमन्ने । (३) यदि वृभिनवपंचने वईि दत्र पृथइनङ्गलाचरन माञ्चं चन्न उपने। (ब) यदि चरिचर्तृवं नरखनुनरिवर्दि ठदुच मरतेन इति वृश्चिकालिन सहन्ना (ग) रानोलाई नालतकारिन संवन् साङ्गनेतरिक तु शुद्धं नाल तु पंच त्यत्र पूर्वन्न पठेन सन्मालम्प निर्दिष्टं ददिबन्नोपनान्न गोव्यात स्वत्र कारिया जत् पोकलेन- अनानुनको कारिबन्धकमंन्त्रविन लन्दन्यं परियति कारिदिन्यो नन्नटनहमति निन् । दीपावली निद्विषय मीनारानजयरामनामी हिन्दी साहित्यदर्पण डॉ. सत्यव्रत सिंह एम० ए०, पी-यच० डी० ऐसे लाक्षणिक प्रन्यों के विषय में अब तक किए गए रहस्यप्रन्यिभेदक प्रयत्नों में जिस भाषा शैली का प्रयोग किया गया है वह ऐसी उलमन से भरी और अव्यवस्थित-सी पाई जाती है कि जिससे विषय स्पष्ट होने के बदले और जटिल-सा हो जाता है । परिणाम यह हुआ है कि छात्रगण विषय को ही उत्तरोत्तर क्लिष्ट समझ कर हार-सी मान बैठते हैं । क्योंकि बहुत परिश्रम करने के पश्चात् भी सन्देह को निवृत्ति नहीं हो पाती। धात्र-समाज का यह काठिन्य ध्वस्त करने के उद्देश्य से साहित्यशास्त्र के प्रकाण्ड मर्मज्ञ विद्वान् , लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर श्रीमान् डॉ. सत्यव्रत सिंहजी ने पहले सर्वबोभ्य सुगम भाषा में मूल का व्यवस्थित अनुवाद अस्ति किया है तत्पश्चात् अपनी विमर्शनाम्नी व्याख्यात्मक विशद टीका प्रस्तुत की है, जिसके द्वारा विषय की दुरूह प्रथियों का वस्तुत' सम्यक् समुन्मोचन बन पड़ा है। इसमें कहीं भी मूल की उपेक्षा हुई नहीं प्रतीत होतो। छोटे-छोटे वाक्योंवाली सरस, सरल एव विषय के अनुरूप ललित भाषा का प्रयोग करके नाट्यशास्त्रकार, अभिनवभारती कार, भावप्रकाशनकार, काव्यानुशासनकार तया रसाणवसुधाकर के रचयिता आदि भनेक साहित्यमर्मज्ञों के मतों की सहायता से भ्रामक मत-मतान्तरों के निरासपूर्वक इस कौशल से विषय का यथार्थ स्वरूप प्रतिपादित किया गया है कि एक बार पढ़ लेने मात्र से वह हृदयपटल पर अक्ति-सा हो जाता है। अन्यान्य प्रों के उदाहरण मौर मतों से छात्र सरसतापूर्वक विषय की व्यापकता का सप्रहण कर सकते हैं। प्रय के आरभ में लगभग १०० पृष्ठों को समालोचनात्मक भूमिका है, जिधमें एक ओर कतिपय अलकारों पर वैज्ञानिक शोधसबधी दृष्टिकोण है और दूसरी ओर प्रमुख अलकारों का स्वरूप तया परस्पर वैषम्य सकेतित किया गया है। न्याख्याकार के इस स्तुत्य एव सफल प्रयास द्वारा छात्रों एव अभ्यापकों का समानरूप से हित होगा ऐसी आशा है । छपाई गेट अप आदि आधुनिकतम । मूल्य अत्यल्प १२) प्राप्तिस्थानम् चौखम्बा संस्कृत सीरीज आफिस पोस्ट वाक्स नं०८, वाराणसी-१ कार्य दव हादक- महाकवि दाणमा रचित 'कादम्बरी' पर एक नवान रवना- कादम्बरी : एक सांस्कृतिक अध्ययन डॉ० श्री वासुदेवशरण अग्रवाल प्राध्यापक काशी हिन्दू विश्वविद्यालय प्रस्तुत अन्य के उल्लंसनाय कुछ मुस्य विशेषताएँ- १ कादम्बरी का सम्पूर्ण कयासूत्र इस प्रकार सुरक्षित मात्रमेव । सभकी परम्परा में कहीं भी त्रुटि नहीं आने पाई। २ अनुवाद करते समय अाधुनिक हिन्दी भाषा का प्रवा, कृष्टतरा प्रकृति इस प्रकार व्यवस्थित की गई है कि पाटक उमने माध्यम : उम्कृष्ट सस्कृत शैली का रसमय लालिन्य ग्रहण कर सके। ३ गुप्तयुग की सास्कृतिक मामग्री का भण्डार कदम्बरी में सुरक्षित हे उसकी तुलनामक व्याख्या साहित्य, कला और इतिहास के आधार पर इस प्रकार का गई है कि प्रयम बार ही वा" के शब्दों पर नया प्रकार पडा है। ४ ऐसे प्रत्येक स्पल और कठिन शब्दों की सुस्पष्ट व्यास्या पाटकों को इस अन्य में प्राप्त होगी जिन पर भान तक के किमी टीकाकार ने प्रकारा नहीं दाता। ५ कादम्बरी की रचना में कवि का मूल प्रयोजन क्या या, श्रारम्भ में राजा का नाम शूदक क्यों रखा गया, अच्छोद सरोवर क्या है, महावेता और कादम्बरी किस-किस के प्रतक है, श्रादि और भी महत्वपूर्ण प्रश्नों का प्रन्य के अत में श्राध्यानिक दृष्टि से विवेचन किया गया है। क्यानक और काव्य के विधान एव रस के निधान की दृष्टि से इदम्बरी अपने आपमें पूर्ण है । किन्नु टमसे भी श्राो को अपने युग की मि ममत्या श ममाधान बाण महोदय कादम्बरी द्वारा करना चाहते थ उनका भी लेखक ने मुप्रयोजन स्पष्टीकरण कर दिया है । पाटक देखो कि कालिदास और बार के सम्मुत युा का सास्कृतिक समन्या समान ही थी। अन्य के प्रारम में ३५२ अनुददों का विस्तृत विषयसूची और अन्त में पुछ विशिष्ट शब्दों की अनुमय भी दाई है। वान्पर्य यह कि कादम्बरी के सिर में इम एक अन्य को हाय में लकर पार इस विषय में अन्य किसी अन्य की अपेपा नहीं की। हमारा विश्वास है कि एक बार देखकर ही बार भी इसे सचमुच पटनगय, मनन य एव सग्रह य मममी। विद्यार्थी, अध्यापक एव साहिर-प्रेमियों को अविलम्ब इस महत्वपूर्ण टपादय पन्यरत का सप्रह करना चाहिए । छाप आदि आधुनिनम् । मूल्य १३॥) प्रप्तिन्यानम्--चौसम्मा सस्कृत सीरीत आफ्मि, वाराणसी-२ ॥ श्रीः॥ बल्ल काव्यप्रकाश-रहस्यम् न्यायसू वेदान्तमा सुखरू श्रीरामप्रणिहितधीविहितगुरुप्रणतिराप्ततत्प्रणुतिः। श्रेयस्कामो युजे प्रकाशरहस्याववोधाय ॥ यस्थाः कटाक्षमात्रेण शेमुपी सम्प्रसीदति । तां चिच्छक्तिमयी देवी शारदां समुपास्महे ।। अथ प्रथमोल्लासः प्रश्नः १-काव्यप्रकाशस्थमगलश्लोकस्य व्याख्याप्रसङ्गेन तन्महत्त्वं प्रतिपाद्य तत्स्थपदानां विग्रहव्याकृतिपुरःसरं समालोचना कार्या। उ०१-'ग्रन्थारम्भे विघ्नविघाताय समुचितेष्टदेवतां अन्यकृत्परामृशति' इति प्रास्ताविकी वृत्ति । तदनन्तरं- नियनिकृतनियमरहितां हादैकमयीमनन्यपरतन्त्राम् । नवरसरुचिरा निर्मितिमादधती भारती क्वेर्जयति ॥ इति मङ्गलश्लोकः । एकप्रयोजनोद्देश्यप्रवृत्तावनेकपदसमुदायो ग्रन्थः, तदा- रम्भे च विघ्नविघाताय समाप्तये वा स्वेटदेवतामङ्गलस्यावश्यकतया प्रकृतप्रन्यस्य काव्यपरतया कविनिर्मिनभारतीत्यध्यवमिनां तदधिष्ठात्री भगवी वाग्देवीं विधा. तृप्तष्टितो व्यतिरेकेशोपश्लोकयति । तत्र सृष्टिस्तावत् नियत्या दैवेन कृत्ता ये निय- मास्तैः सहिता भवति, कोइ निर्मितिस्तु तद्विलक्षगा। नियतिश्च पदार्थानाम- साधारणो धर्मः, अदृष्टं वा 'दैवं दिष्टं भागधेयं भाग्यं स्त्री नियतिविधिः' इत्यम- रोक्तप्रकारेण दैवम् अदृष्टपदबोध्या वा नियतिः। चन्द्रस्य नियतिकृतनियमस्तु तदाहादकत्वं शीतरश्मित्वं च । कविस्नु तदवमान्य विरहोत्पीडितानां कृते २ काव्यप्रकाश रहस्यम् चन्द्रस्य दाहकरवमुष्णरश्मित्वं च वर्गयति । अत' कविनिर्मिती नियतिकृत- नियमो नास्ति तेषामप्रतिहतगतित्वात् । तथा च ब्रह्मण सृष्टौ त्रिगुणामिमा प्रकृति सत्त्वरजस्तमोमयी अत एव सुखदुःखमोहस्वभावा साङ्ख्यनये सुप्रसिदा सर्वेषा चानुभवसिद्धा 'सत्वाने सुखजननम्, रजसो दुःखम्, तममो मोह' इति सारय प्रतिपाद्यते । कार्य। करुणमयामकयो रसयोरपि दुःखमोही न भवत किन्तु सर्वदाह मात्रमेव । कयमिति चेत् १ सुरते दन्तनख पवादिम्य इव । अत कविष्टि सव हादैक- मयी आहादमात्रस्वभावाऽनुमता। दु खमोहयोरभावाद् ब्रह्मण सृष्टेरुकृष्टतरा भीष्टतमा च। घटस्य निर्मागे कार्य तत्कर्तु कुलारस्य स्वातन्त्र्य न दृश्यते । तत्र का कारणपरतन्त्रोऽस्ति । तत्र घटस्योपादानकारण मृत्तिकैव । सहकारिकारणानामपि घनिर्माणेऽतीवावश्यकतास्ति । यथा दण्डवक्रचीवरादीनाममावे कुठालो घट निर्मातु न प्रभवेत् । इत्थ तत्र कर्ता स्वाद् अन्यानि यानि कारणानि तेपा परतन्त्रो भवति । कविनिर्मितौ च कविप्रविमाया पर न किञ्चिदपि तत्रापेक्ष्यते । मत कवे सृष्टिरनन्यपरतन्त्रा मता। 'परतन्त्र'शब्दोजाधीनपर्याय एवेति समालोचनायामप्रे स्पष्टीवियते । ततश्च ब्रह्मण सृष्टी पडूसा एव सुविध्रुता । अत्र काव्ये रसानामाधिक्य नव इति । ते भृगाराद्या नव । अथवा प्रतिकाव्य नदीना वा । लोके ये पडूमा सन्ति ते सर्वे एव प्राणिमात्राणा हृद्या न प्रतीयन्ते । यया कटवादीना हेयतयाऽनभि रचे । अत सा सृष्टि पसरचिरा इति वक्तु न शक्या। कामे तु सर्वे रसा' सदैव हृद्या एव । नतो रचिरा मनस आहादमावतनका । अत एव कथिता नवरसरचिरेति । एतादृशीं विलक्षणस्वरूपा कविनिर्मितिमादधती करिती जयति सर्वोत्कर्षेण वर्तते । स्वावधिकोवर्षप्रकारकज्ञानननकीभूनो घ्यापारो नम पदार्थ । भगवत्या सर्वोत्कृष्टतया वर्णनात् सर्वान्त पातिन कवेनमस्कार आधि- प्यते इति ता प्रत्यस्मि प्रणत इति । अत्रेदमपि विस्पेग वोदव्यन् । 'नियति०' इत्यादि विदोपणे मीमांसा- न्याय-साड्यवैशेपिक-वेदान्ताभिमतमपञ्चसृष्ट्यपेक्षया कविसृष्टवैचित्र्य प्रति पाद्यते । तथा हि नियतिवम् । तच स्वकृतसुकृतदुप्पतकर्मरूपम् । तैश्च कर्म निरामीन मोगानुकूला शक्ति साध्यते। तदनुसारिणी च गतिरिति सा नियति- ३ प्रयमोल्लासा नियतेति मीमामकसृष्टि । कविसृष्टस्तु न जन्मान्तरकाधीनता । तस्य तत्काल- प्रतिमामात्रजन्यत्वात् । सुखदु समोहस्वभावात् साहयमते प्रकृतिधर्माणा सत्त्व रजस्तममा परिणामेन सर्वस्यापि सुखदुखमोहात्मता । इयन्तु हादैकमयी । चीम सादिन्य सर्वेभ्योऽपि सुखस्यैवोत्पत्ते । परमाण्वादीति नैयायिकाभिमतसृष्टे लक्षग्य प्रागेव प्रति गदितम् । पसेत्यनेन वैशेषिकमत सृष्टयरिकत्वं प्रदर्शितम् । न्यायसूत्रेषु प्रमागप्रमेयादिविचारो, न पदार्थविभाग । स वैशेषिक एव दृश्यते । वेदान्तसृष्टयपेक्षया वैचित्र्यमाह-न च हृद्यैव तैरिति । वेदान्तनये ब्रह्मण सुखस्वरूपता । कथमिति चेत्, इच्छान्तरानधीनेच्छाविषयत्वं तावत्सुखत्वम् । इतरासा जलेच्छादीना तृप्तीच्छाद्यधीनत्वम् । तृप्तीरछायाश्च सुखेच्छाधीनत्वम् । सुखेच्छा खात्माधीना । तस्य विच्छान्तराधीनत्वं नास्ति इति तत्रैव सुखस्य विश्रामात् । तस्य सुखस्वरूपना जगतश्च ब्रह्मण एव परिणामत्वात् सर्वस्यापि ब्रह्माभिततया सुखत्वेऽपि तस्यैव ब्रह्मणो वृश्चिकादिपरिगामेन न सुखल्पता । अपि त्वात्मत्वेन रूपेगेयुक्त न च हृधेवेति । अत्र श्लोकेऽस्मिन् त्रीण्येव पदानि विग्रहव्याकृतिपूर्वक विशेपेण समालोचना- होणि । तानि त्रीगि-१ हादैकमयीम् । २ अनन्यपरतन्त्राम । ३ नवरसरुचि- राम्' इति । त्रीण्यपीमानि पदानि 'निर्मितिम्' पदस्य विशेपणानि । 'निर्मितिम्' पदन्तु 'आदधती' इति क्रियापदस्य कर्म भवति । अत सर्वाणि द्वितीयान्तानि । । हादैकमयीम् -अत्र विग्रह हादेन एक्मयी हादैकमयी ताम् । सुप्सुपेति समास । अभेदवचने तृतीया 'प्रकृत्यादिम्य उपसङ्घयानम्' इति वार्तिकार । यथा 'धान्येन धनमयो ग्राम ' इतिरत् । तत्र 'एकमया'-तिपदं सङ्ख्यावाचक शदात् 'तत्प्रकृतवचो मयट्' इति सूत्रे प्रकृतार्थे तद्धित-'मयट' प्रत्ययः । प्रकृतमियस्य प्राचुर्येण प्रस्तुतमित्यर्थो बोद्धव्य । एक्मेव वस्तु प्रकृत प्राचुर्येण प्रस्तुत यस्था सा एक्मयी। केचिद् एक्पद सरयावाचि न गृहीत्वा मानपर्याय गृलन्ति । तदा 'हादैकमयी' इत्यस्य हादमानस्वभावा इत्यों भवति । अनेन दुस्खमोही निराकृतौ भवत । २ अनन्यपरतन्त्राम्-अन्यस्य कविभारतीभिन्नस्य (समवाय्यसमवायिनि- मित्तरूपकारणस्य) परतन्त्रा अधीना न भवति ताम् अनन्यपरतन्वाम् । तत्रेत्यं विचारणा भवति यत् अन्यपरशन्दयो पुनरुक्तिदोष सम्भवति या नवैति । . .

४ . काव्यप्रकाश-रहस्यम् तत्र बीज किल 'परतन्त्र'शब्दस्य कोऽर्थ । पराधीनाधीनपदयोभिन्नपर्य्यायो वा । तत्रामरस्तु-'परतन्त्र पराधीन परवान्नाथवानपि । अधीनो निम्न आयत्तोऽ स्वच्छन्दो गृहकोऽप्यसौ' इति वक्ति, तत्र केचित् चत्वारि पूर्वपदानि पराधीन- वाचकानि । तथा च पञ्चानन्तरोदाहृतपदानि अधीनवाचकानीति प्रतिष्ठन्ते । तेषां मते 'भन्यपर'शब्दयोरभिन्नत्वेन पौनरुत्यापत्ति । तत्परिहाराय कवे स्तत्प्रतिभायाश्चान्यो य आत्मन (भारत्या ) पर , तदायत्तत्वरहिताम्, इति वदन्ति । तत्तिविरुद्ध तथा क्लिष्टमपि प्रतीयते । अमरोक्तनवानामपि पदाना- मेकपर्यायवे स्वीकृते प्रश्नोऽय न सम्भवत्येव । अन्यैश्च तथा स्वीकृतमस्तीति तत्यनुसारितयाऽतीव समीचीनमिति प्रतिभाति । ३ नवरसरुचिराम्-नव नवसरयाका रसा शृङ्गारादयो यस्या सा, अथवा नवा प्रतिकाव्य नवीना रसा यस्यामिति वा 'मवरसा सा चासौ रुचिरा मनोहरा च ताम्-एव बहुव्रीहिगर्भ कर्मधारय । 'शीतोष्ण जलम्' इत्यादिवद् विशेषण- योरपि मिथो गुणप्रधानभावविवक्षया 'विशेषण विशेष्यण बहुलम्' इति कर्मधारय समास । नवाना रसाना समाहार इति समाहारस्तु न । 'अकारान्तोत्तरपदो द्विगु स्त्रियामिष्ट' इति 'निलोको' 'पञ्चमूली' इतिवत् 'नवरसी' इत्यापत्ति । अथवा नवरसेन रुचिरा इति तृतीयातत्पुरुष । नवरसेत्यत्र नव अवयवा यस्य स नवावयव स चासो रसश्चेति नवरस इति शाक्पाथिवादित्वाद् मध्यमपद- लोपी कर्मधारय । अथवा नवा प्रतिकाव्य नवीना रसा , अन नवाश्च ते रसा- श्चेति कर्मधारये 'नवरसा' इति बहुवचनान्तसमास । तदनन्तर तृतीयातत्पुरुषे कृते नवरसै रुचिरा नवरसरुचिरेति समास , ताम् नवरसरुचिराम् । वृत्तौ च 'न च हृद्यैव ते -इति । हृद्या इति वहुव्रीहिगर्भर्मधारयस्य तथा तैरिति तृतीया- तत्पुरुषस्य सङ्केतितत्वात् । नन्वेतादृशे गुरुकर्मणि प्रेक्षावतामिष्टदेवताप्रणतिरवश्य दृश्यते युक्तिमती च । तदनेन स्तुतिमात्रमाचरता यन्त्र कृता, तदवलेपनादज्ञानाद्वा, उभयथाऽप्यनवधेय- वचनता प्रसक्ता । अथ कृतच, तकि स्तुतिवन्नोपनिबद्धा, विशेषाभावात्सव वा किन्नोपनिवद्धति चेद् उच्यते । न खलु नतिमात्रोपनिबन्धे स्तुतिर्निबद्धा भवति । स्तुतिनिबन्धे तु अर्थानतिरपि निवदैव । यतो जयत्यर्थेन वक्तुर्विषयस्य वैशिष्टया- नमस्कार आक्षिप्यते । तेन 'ता प्रत्यस्मि प्रणत' इति लभ्यते। यत्तूत्तमकाव्य- प्रथमोल्लासः स्वसिद्रये व्यङ्ग्यदर्शयति-'जयत्यर्थेन' चेत्यादि इनि वृत्यवतारणम् तद्युक्तम् । प्रणामरूपन्यङ्गयस्यानतिशयत्वेन ध्वनित्वाप्रयोजकत्वात् , तदर्थ चातिशयिनो न्यतिरेकारद्वारस्यैवोपन्यासौचियात् । इति । ३०२-कान्यस्य किं प्रयोजनम् ? उ०२-इहेतिग्रन्थेऽभिधेय सप्रयोजनम् इत्याह । अभिधेयमुद्दिश्य सप्रयोजनत्वं विधीयते इत्यर्थ । अभिधेय प्रतिपाद्यो विषय काव्यलक्षणादिरूप सप्रयोनन सफलम् । अन्यथा निष्फले कर्मणि प्रवृत्तिर्न स्यात् । ततश्चैतद्ग्रन्थस्य काव्याङ्गतया काव्यसाफल्यद्वारैव साफल्यमिति काव्यस्य तावत् साफल्य दर्शयति काव्यमिति- काव्यं यशसेऽर्थकृते व्यवहारविदे शिवतरक्षतये । सद्य परनिर्वृतये कान्तासम्मिततयोपदेशयुजे ।। इति । अत्र 'कृत्' 'विद्' 'युज' शब्दा भावे शिवन्ता । काव्य लोकोत्तरवर्गनानिपु- जस्य कवे कर्म लोकोत्तरवर्णनमिन्यर्थ । इतरफलापेक्ष्या प्राधान्याद् यशस प्रथममुद्देश । अर्थकृते द्वितीय पुरुषार्थलाभाय । सम्प्रदादित्वादावे किए। च्यवहारविदाचारज्ञानम् । राजमदसि कथ पर्तित यमित्यादि । शिवादितरदमन- लम् । अमङ्गल्मरणादिशब्दानामनुच्चार्यत्वात् ‘स कथाशेपता यात समालिय मरु सखमितियत् । श्रीमन्नारायणादिस्तुत्यपूर्वद्वारा:मालपरिहारो मयूरक्वैरिव सूर्यशतकेन । स हि कुष्ठरोगपरिपीडित पद्यशतकन सूर्य स्तुत्वा दिव्य वपुराप्त । वानिति लोके प्रसिद्धि । सहृदयस्य तु काश्रवणानन्तरमेव सकर प्रयोजनेवृत्तम्दी- स्थायिभावास्वादनसमुद्भूत वैद्यान्तरसम्पर्कशून्ये रसास्वादरूपमानन्द् सद्य परीन्तरं तिं निर्मिमोते । उपदेशयुजे इति राजादिगतविधीपालनादिसमुश्विानरूप- परिज्ञान रामादिवद्वर्तनमिष्टसाधन न तु रावणादिवदित्युपदेश च सत्कृत्यपुते प्रवृत्युपदेशाय दुष्कृत्यषु निवृत्युपदेशाय भवति च । काव्यास्वादनकाले कवेरपि सहृदयाम्त पातितया रसास्वाद । ननु नीतिशाखादेरपि उपदेशपरतया तत्रैव प्रवृत्ति' स्यात् । किमिति काव्ये इत्यत आह 'कान्तामम्मिततयति। तथाहि शब्दस्तावत् त्रिविध प्रमुसम्मित , सुहृत्सम्मित कान्तासम्मितश्च । तत्रायो यथा शब्दप्रधानो वेद स हि प्रभुरिव ६ काव्यप्रकाश-रहस्यम् 'स्वमिथ कुरु' इति न समाज्ञापयति। ततश्च नियुक्ताना सन्ध्यावन्दनादौ प्रवृत्ति- भवति । सुहृत्सम्मितो यथा पुराणेतिहासादि । स तु सुहृदिव 'एव कृते इष्ट, एव कृते चानिष्टम्' इति सदसन्मार्गमात्र प्रदर्शयति । न त्वादिशति । तृतीयस्तु ताभ्यां विरक्षण काव्यलक्षण । स हि कान्तेव सरसकोमलैचोभि स्वाभिमुखीकृयो- पदेश ग्राहयति । ततश्च सुकुमारमतीना नीरसशास्त्रेवशश्यप्रवेशाना राज कुमाराणा सोक्र्येण कृत्याकृत्यप्रवृत्तिनिवृत्युपदेशायास्योपयोग । क्टुकोपधादिव बालानां शर्करायामिवानापि इतरापेक्षया सादरा प्रवृत्ति स्यादिति सर्वथैव काव्यस्य सफल त्वम् । यदाहु 'धर्मार्थकाममोहेषु वैचक्षण्य कलासु च । करोति प्रीति कीर्तित साधुकाव्यनिपेवण मिति । काव्याद्यश प्रभृति लभ्यत इति एतद् दृष्टान्तेन दर्शयति-कालिदासादीना- मिति । श्रीहर्षादेरपादानात् । धावक इति कविनाम स हि रवारलीनान्नी नाटिका श्रीहर्पनाम्ना प्रणीय बहुधनमवाप्तवानिति लोकवाद । समनन्तरमेवेति सद्य परस्यार्थ , काव्यश्रवणाव्यवहितोत्तरक्षणे इत्यर्थ । विगलितमपक्रान्तम- न्यद्वेद्य घटादि यस्मिन् मानन्द चर्वणादिपर्यायम् । प्रभुसम्मितशब्दप्रधानवेदादि- शास्त्रेभ्य इत्येतस्य, सुहृत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्पुराणेतिहासभ्यश्चेयस्य च विल्क्षण- मित्यत्रान्वय । वैरक्षण्ये हेतुमाह शब्दार्थयोरिति । रसस्य शृङ्गारादेरङ्गभूतो व्यापारो व्यञ्जनादि शब्दार्थयोस्तन्निष्पाद्यरसाभिन्यक्षकमात्रतयाऽप्रधानत्वाद्गुण- भावेन रसस्यैव प्राधान्यमित्यर्थ । अत एव शब्दार्थप्रधनवदुष्पयादिन्योऽस्य । यथायोगमिति-कवेरपि सहृद्यान मतत्वेन रसास्वाद इति भाव । स.५ तदेक्वेद्यत्वात् । तत्पुर शब्द अस्य द्वेधा . न बताये गति का प्रभाव व्याख्यानम् । तथाहि वेदस्याऽपौरुषेयत्वात्तद्गता तदनम् एव प्रयोजका इति शाब्दीभावना प्रबर्तिकेति वेदस्य शब्दप्रधानत्वम् । यद्वा वेदगतानुपूर्वीपाठेनैवापूर्वमुत्पद्यते न तु पर्यायशब्दै यथा 'अग्निर्माळे' इत्यत्र न 'वह्निमीळे' इति । अतस्तस्य शब्दप्रधानखम् । अत्रेद वोध्यम् । शन्दप्रधान- वेदस्य नियत प्रवर्तक वेऽपि नरकादिभयात्सन्ध्यावन्दनादौ प्रवृत्ति न पुनस्सा- हात् । गुर्वाज्ञाजन्यप्रवृत्तिवत् । पुराणेतिहासानाञ्च सुहृत्सम्मितार्थतात्पर्यवत्वेन प्रवर्तकत्वेऽपि न तेभ्यो नियमेन प्रवृत्ति , काव्ये तु नियमेन प्रवृत्तिरुत्साहपूर्विका चेति विशेष । न तु केषाञ्चित् कान्येऽपि प्रवृत्तिर्न दृश्यते तत्कयमिति चेन्न ।

प्रथमोल्लासः ७ रसास्वादे वासनायाः कारणत्वात्तदुक्तम् 'निर्वासनास्तु रसान्तः काष्टकुड्या- श्मसग्निभाः' इति । प्र० ३–'सकलप्रयोजनमौलिभूतं समनन्तरमेव रसास्वादसमुद्भूतं विगलितवेद्यान्तरमानन्दम्' इति वृत्तिः कारिकागतस्य कस्य पदस्य सम्भवति इति ध्यास्यायतां समीचीनतया सर्वमिदम् । उ०३-कारिकायां 'काव्यं यशसे०' इति प्रयोजननिवेदनावमरे 'सद्यः- परनिर्वृतये' इत्यपि प्रयोजनमन्यतरदुत्तम् । तस्य वृत्तिग्रन्ये यद्ध्यात्यानं तद्- पोऽयं प्रश्नः। 1 अत्र सद्य-शब्देन 'समनन्तरमेव काव्यश्रवणाव्यवहितोत्तरक्षण एवं' इति निप्पन्नम् । परनिर्वृतये -परा चासौ नितिश्चेति कर्मधारयसमासे कृते श्रेष्टार्थक- परशब्देन 'विगलितवेद्यान्तरम्' इति निप्पलम् । 'सकलप्रयोजनमौलिभूतम्' इत्यपि 'पर'शब्दादेव निष्पद्यते । निर्वृति'पदस्यानन्दपर्यायः सर्वविश्रुतः । स च रसास्वादनसमुद्भूतः। सफलेषु यशःप्रभृतिषु प्रयोजनेषु फलेषु मौलिभूतं शेखरायमागमिति सफलप्रयोजनमौलिभूतम् । सद्यः समनन्तरमेव कान्यश्रवणस- मनन्तरमेव विलम्बासहत्वात् काव्यश्रवणाव्यवहितोत्तर काल एव रसास्वादनसमु- द्भूतम् रस्यते आस्वाद्यते प्रकाश्यतेऽनेनेति रसो रत्यादिस्थायिभावः । तस्या- स्वादनं नाम विभावानुभावव्यभिचारिभिः संयोजनं तेन समुद्भूतं निप्पट- मित्यर्थः। अथवा रस्यते इति रसः पानकरसन्यायेन चर्यमाणः । आस्वा. दनमास्वादः सुखस्वरूपम्, समुद्भूतः स्वप्रकाशो ज्ञानरूपोऽनुभूयमानरूपो दा । अत्र रसास्वादनसमुद्भूतमित्यन त्रयाणां पदानां कर्मधारयः। रसश्च तदा- स्वादनञ्च तत्समुद्भूतश्चेति । विगलितवेद्यान्तरं विगल्तिमस्तमितं वेद्यान्तरं स्वातिरिक्त विषयान्तरं यत्रेति । अन्य वेच वेद्यान्तरम् । स्वस्यात्मनो ज्ञानरूप- विषयादन्यद् घटपटादि तज्ज्ञानविषयो यत्र नास्त्येव तपा। पदार्थज्ञाने घटो विषयः ज्ञान विषयि । मन्त्र ज्ञानरूप आनन्द एव विषयो विषयी ति उभौ तदात्मकावेव । अत एवोच्यते 'स्वविषयातिरिक्तवेद्यान्तरसम्पर्कशून्यम्' इति । मतः सर्वेयं पंक्तिः समासेनैवेत्थं व्याख्यायते । सस्वयेतादृशेषु फरेषु सकर- फलमूर्धाभिषिक्तः काव्यश्रवणाव्यवहितोत्तरक्षण एव विभावानुभावन्यभिचारि- परिपोपितः साधारणीकरणात्मकनालौकिवव्यापारेण स्वत्वपरत्वादीनां प्रमोपेण . ८ पाप्यारारहस्यम् स्वगामणनुभयन्यो महाररावर रमारमो मामि । पराप्रपानता नितिरानन्द प्रधानसम्परम्। पर सादिपारी रमायावी-'भाप सम्पायनगर्भ भागमहारः मापरी'"पुर- मावोगदमिपः । पंधानपांगम्पो मारवादमदोदरः । शेकोपरचमारमा.भिमभिः । स्थामारपदभिप्रायनापमारने मलि। २०४-पास्यस्य पारपमभिधाय वाफ्यादीनां पारमर पार लिमणिन्यायेन दण्टयमचीयल्यायेन येति मनिपादपत। उ०४-चाम्पाय पोशनं निराप समाह-final. समासाम्पयंपापानिपपायाम रनिदेशालाकारित समोर पुमान् कापनिर्मानापारानुमायामपनि मिला प्रतिमासापर्यापागामारस्पा । मनम-frभा गारगंगmfor- म । भूगोपविधापामगे पायदंग पनि । गाभा गा. परिपा दंगापुरमादामापा गाभा । समग- Fre दिपा तत्र मुभा रवि दुरंभ गुनमा माया पापभिमननु र प्रमागध। निगम पापमापात् रूपति मिमिंगामामुरागभीपापो पनिटापनपनि लिपप । पायापारिसमा नीन भावाप. मगिरम् I minमगाणगगरम REL भरिमाणात Refree पण निरिमनु farmirrir गीसामग्माufig mins मम Irailer Marathi Lim सिगरमgarmirat Marwrittergentifift नाभि form of Hererna mere- प्रथमोल्लासः लोकेति । तत्र स्थावरजगमात्मको रोक । तस्य चोपचारात् लोकवृत्ते पर्यवसा- नम् । लोकव्यवहारानभिज्ञस्य वर्गनाविस्तारचातुर्यस्यासम्भवात् । शास्त्रं व्याकरणादि । अशास्त्रज्ञनिर्मितकाव्यस्य च्युतिसस्कृतत्वं छन्दोभङ्गादिदोषमस्त- तयोपहसनीयतैव । काव्य महाकविसम्बन्धि रघुवशादि । कायस्य निर्माणे विस्तृतौ च पौन पुन्येन प्रवृत्तिरभ्यास काव्यस्य तृतीय कारणम् । तत्र हेतुमाह- काव्यज्ञेति । काव्यज्ञा काव्यनिर्मातार काव्यवेत्तारश्च । तेषा शिक्षया रहस्योप- देशेन । अकाव्यज्ञाना शिक्षया कविसमयादिक न ज्ञायेत । 'इति' शब्द सकलो. पस्थापनाय । तस्य काव्यस्योद्भवे निर्माणे विस्तारे च हेतु | काव्यत्वावच्छिन्न- जन्यतानिरूपितजनकतावच्छेदकताप्रतियोगिकपर्याप्त्यनुयोगितावच्छेदक त्रित्व- मिति भावः । एतदेव वृत्तावाह हेतुर्न तु हेतव' इति । प्रत्येकपर्याप्तत्वे हेतव इति स्यात् । 'न तु हेतव' इत्यनेन न स्वरूपयोग्यताया निषेध । किन्तु फलोपधाय- ताया । तृगारगिमगिस्थले तृणधरित कारादिसामग्रीसमवधाने दाहवत् भत्र शक्त्याद्यन्यतमघटितलेखन्यादिसामग्रीसचे लोकोत्तरवर्णनात्मक काव्य न जायते। कारणत्वं कार्यान्यवहितप्राकक्षणवृत्यस्यन्ताभावप्रतियोगित्व व्यापकत्वस्वरूपम् । यत्र-यन्त्र कारण तत्र तत्र सर्वत्र कार्यमिति न नियम । कपालादीना सत्वेऽपि घटाद्यभावदर्शनात् । सामग्रीत्वे तु व्याप्यस्वरूपम् । सामग्रीसत्वेऽवश्य तत्सत्त्वात् । ततश्च शक्त्यादिपु प्रत्येक स्वरूपयोग्यतारूपकारगत्वे स यपि न तत्र सामग्रीत्व दण्डचनचीवरादोनामिव । अपि तु तत्समुदायवृत्ति । ततश्च काव्यत्वावच्छिन्न जन्यतानिरूपितजनकतावच्छेदकत्वमेकत्वविशिष्ट समुदायत्वम् । तद्वन्त शक्ति निपुणताभ्यासा इति बोध । प्र०५-कारिकायां 'इति हेतुस्तदुद्भवे' इति यदुदितं तथाच वृत्ती 'त्रय समुदिता न तु व्यस्तास्तस्य काव्यस्योद्भवे निर्माणे समुल्लासे च हेतुर्न तु हेतध' इति यदुक्तं तस्याशयं निशदं प्रतिपादयत । उ०५-'इति हेतुस्तदुद्भवे' इति । इतिशब्द पृवात्तपरामर्शक । शक्ति- निपुणताभ्यासा इत्यर्थ । तस्य काव्यस्य उद्भवे निर्माणे हेतु । अत्र हेतुशब्दो- सरैकवचनार्थ । एक्त्व तस्य कुत्रान्वय इत्याशङ्काया प्रययाना प्रकृत्यान्वित. स्वार्थबोधकत्वनियमात् । हेतुपदार्थ हेतुविशिष्टव्यत्तौ हेतु वे वा अन्वयो वाच्य पर पदार्थ पदार्थेनान्वेति न तु पदार्थैकदेशेनेत्येव व्युत्पत्तिस्तस्यार्थ । पदार्था- कान्यप्राशरहत्यम् नरनिष्टकारतानिपतरियतामन्यारेन शन्दबुदिव वहिब प्रति मुरून विरयन मन्बने पस्थितिनुरिति उन्मन्यु रत्तिवलाईव पर बनी नित्यः न्वयानिमार "निन्यो ' इति न प्रयोग धन्यस्य प्रकारतासमनाधिक रन मुरमविश्वासम्न्धन पस्थितरनावात् । प्रकृत च पदायस्पैकवत हनुवन्दपरशर तस्य प्रतासमानाधिकरवन व्युत्पतिविरोधी भादित हेतुविरिष्टे र यादवदन्नयो दार। सच शारित अटबत्या पुरात मनि का इन महानिरिक्रति दिनदेयम् । तन 'ददा मनाच' इत्यादी मन पदत्तक व समितिका वन्दय । तया च एका विशिष्ट यानिति करस्य ताराममिविकर तान्नोवदा इनिदेवायोजन चात्र ददाना रड- मनामनिरात्र पेडशिन गृड वि, उदिने डहोनि इत्यादिनि परसर विरोध नामामप्यनिति चारविनिरास ! मनपरि तुमरिस्पले दह प्रति हस्र अर मन्वा स्वतन्त्र छोयामकतावमावि इति यवैश्विदुत प्रक पहा फनीपधायकता' इति न तया, किन्नु अत्र घटोरधारकता पप चिरेव ( प्रति कुलालदकदाडनीदरादना फलेवासकताया व्याप वृचिन्दन तत्र कसन्देिकत्व प्यनारे पर नांदुरत्तिदन्) इति दोघननेर प्रजनन् । तथा च घर पति कर ना दण्डानामनामादिदन बहुत्वेधी कार वादच्छे दक दण्डात्र यया एक तथैदानारि कार डावच्दकने विशिष्ट सनुदायत्वमेक- मे देव दोष पर्यवन्यति । 'कमच्छुिकातानिस्ताप पकतावच्छे- दक यदेक परिशिष्ट मनुदायब तहन रनिनिपुभवाम्याया' इति । ननु 'नोक कार पर्यटक सचिनुनि त्यस्ता कानात्र प्रति कर ईघोडा दयाईना करन तृ मिसिलगर तृय कर इमरच्या इमादीना मनुदायन कार वालाति व्य तदारयात्र मद इति चेडुच्यते । घद प्रति कुलदडरवादीना पा समुरारचेन कारतति तत्रैक- स्थानमा का नेत्यद्य एवं तृस्तारवन व इसाच्या इत्यादिसहि- वन मा ना दाहो ने सदन इति पतन का एव काल इशाळादि- सहितरपन्यतमय रोक चरन रूपकाच्या प्रति करता नाम्नि । किन्तु शनि तान्यारना चारादिदत् सनुदायवन कारवेर इम्पनजान्नुच्यन् ।

प्रथमोल्लासः ०६-काव्यस्य लक्षणं सोपपत्तिकं निपुणं निरूपयत । उ०६–'तददोपौ शब्दार्थो सगुणावनल्ड्क्ती पुन कापि' इति कारिका एवमस्य कारगमुक्त्वा सम्प्रति कायस्वरूपमाह 'तददोषौ' इति । शब्दार्थों तदि- त्यन्वय । दोप साहात्परम्परया वा रसप्रतिवन्धर । गुण समवायवृत्या काव्य- शोभाकर । गुणाना रसनिष्ठ वात् तद्याक्मधुरादिवर्गपर गुण पदमुपचारात् । ननु सालङ्कारस्वरिशेषगानुपन्यासात् अनरङ्कारे का यक्षगमतिव्याप्तमित्यत आह- 'अनलकृनी पुन कापि' इति । सर्वत्र सावकारावर श दार्थों का यम् । कचित्तु स्फुटालङ्कारविरहेऽपि न नान्यत्वदति । ननोऽल्पार्थत्वात् । तस्यास्फुरत्व एव पर्यवसानात् । यत्तु नीरसेऽप्यस्फुटालङ्कारे काव्यत्वमिति तन । रसालङ्कारयोरेव चम कारहेतु वात् । तथा च रसवत्त्वे स्फुगलकारविरहपि न काव्यत्वहानिन तु रसाभावे । कापीत्यस्य यत्र रसादीनामवस्थान तत्रेत्यर्थ । नीरसेऽप्यनलद्वारे किं- निमित्तश्चमकार स्यात् तस्मादलङ्कारमात्र व न विशेषणम् । किन्तु स्फुगलकार- रसान्यतरत्वम् । यत्तु नबीना दोपाणा दु परिहरतया 'वाक्य रसामक काव्यम्' इति सदोष- स्यापि काव्य वमङ्गीकुर्वति । तथा हि निर्दोष काव्य प्रविरलविषय निर्विषय वा स्यात् । 'कीटानुविदरलादिसाधारण्येन काव्यता । दुष्टे वपि मता यत्र रसाद्य- नुगम स्फुट ' इति । तत्र दोषसामान्याभाववत्त्वस्यैव तलक्षण वात् । अय विशिष्ट स्वरूपमाह-तददोपाविति । अदोपौ शब्दार्थो काव्यम् । अत्रा- दोपपदेन दोपसामान्याभाववव चेत्वाव्यलक्षणमुच्यते तदा 'न्यकारो झयमेव' इयादिश्लोक्स्य विधेयारिमर्शदोपदुष्टतया काव्यत्व न स्यादिति चदिष्टापत्ति । तादृशकाव्यस्यैततरणोद्देश्यावच्छदकानाक्रान्त बाचेतत्काव्यसामान्यरक्षणम्, अपि- कृयायप्रवृत्तिनिवृत्त्युपदशपर्यवसायियदाआदिप्रयानक्लाकात्तर वर्णनात्म- कस्य काव्यस्य । न हि दुष्टेषु कान्यपु यशभादिप्रयोजकता सम्भवति । नन्वेव तर्हि दुष्ट काव्यमिति व्यवहार कयम्, तस्य भवन्मतकाव्यत्वादिति चेन्न। दुष्टो हेनुरितिवत् तस्यौपचारिक्त्वनादेषात् । तत्र च हेतुपदेन हतुवाभिमतस्य ग्रहणात् । ततश्च 'न्यकारो ह्ययमवे'त्यत्र न तादृशविशिष्टकाव्यत्वमिन्येव सिद्धा- न्त । एतेन 'कीटानुविदरतादिसाधारण्यम कान्यतत्यादिमतमपास्तम् । शब्दार्याविति । तच कायव शब्दार्थोमयन्यासकम् । तथा हि काम्य काव्यप्रकाश रहस्यम् पठतीत्यादि प्रयोगदर्शनेनार्थस्य पठनासम्मवाच्छब्दपाठमात्रेण तथा व्यवहारा- छब्दे, शब्दपाठमाण काव्यप्रयोजनस्य रसास्वादस्य प्रवृत्तिनिवृत्योर्वा भभावेना पीत्युभयत्रावश्य स्वीकार्यमिति भाव । यत्तु कैश्चिरछब्दमात्र एव कान्यत्वमि रयुक्तम्, तन्न । मूलमात्राध्येतु काव्यज्ञ इति व्यवहारादर्शनात् । किन्तु शब्दापेक्षया अर्थाश्रितानामरक्षाराणा गुणाना दोषाणामशचिमूरध्वने आधिक्येन प्रतिपाद नादर्थस्याकाव्यत्वे विस्तरस्यानुपयोगात्तत्रापि काव्यत्वमवश्य स्वीकार्यमेव । 'कान्य श्रुतम् अर्थो न ज्ञात' इत्यादी प्रयोगोपपत्तिस्तु 'समुदाये प्रवर्तमान शब्द एकदेशेऽपि वर्तते' इति भाग्योक्त्या एकदेशे व्यवहारमादाय, यथा वस्यैकदेशे दग्धे वस्त्र दग्धमिति यथा तैल भुक्त, धृत भुक्त, पूर्व पाञ्चाला इत्यादौ । सगुणाविति । ननु गुणानामुत्कर्षमानाधायकतया काव्यलक्षणे तदुपन्यासो भ्यर्थ इति चेन्न । दोपाभावस्य हेयतापादकरवाभावेऽपि नोपादेयतापादकत्वम् अपि तूपेक्षणीयकत्वम् । हि निर्गुणस्य दोषाभावमात्रेणोपादेयता दृश्यते। तादृशो- पेक्षणीयविषयाणा बहुशो वर्तमानत्वात् । सगुणत्व तु समवायवृत्त्या काव्यशोभा. करत्व लक्षणेऽवश्य वाच्यम् । अलङ्काराणा तु लोकवत् सर्वदाऽनवस्थानात् तेषा सयोगवृत्या वर्तमानतया कचित् (यत्र रसस्य स्फुट प्रतीति ) तदभावेऽपि न काव्यबहानि । तथापि 'न कान्तमपि निर्भूष विभाति वनिताननम्' इति 'दिशा अलङ्कारा काव्यशोभाकरा इति तेपा स्थितिरावश्यकीति अत उक्तम् 'अनल्ड्कृती पुन-क्वापि' इति । प्र० ७–'अनलड्कृती पुन कापि' इति काव्यलक्षणा स्फुटं प्रति- पाद्य सोदाहरणविमर्शपुर सरं सुष्टु व्याख्यायताम् । उ०७–'तददोपौ शब्दार्थों सगुणावनल्ड्कृती पुन छापि' इति काव्य- लक्षणम् । तत्र 'अनलकृती' इति द्विवचन 'शब्दार्थो लक्षयति । अतस्तस्य विग्रह 'न विद्यतेऽलकृतिर्ययोस्तौ' इति सम्पद्यते । अत्र नजपदमल्पार्थकत्वेन बोध्यम्, न स्वभावार्थकम् । नमोऽर्था पट् प्रकीर्तिता यथा-'तत्सादृश्य तदन्यत्व तदल्पत्व विरोधिता। अप्राशस्त्यमभावश्चेति । अल्पार्थकत्वमत्र 'अस्फुटार्थत्वम्' तेन सह पुन कापि इति पदद्वयेन वृत्तिं दर्शयति यत्सर्वत्र सालङ्कारी, चित् स्फुटालङ्कारविरहेऽपि (रसवत्वे) न काव्यवहानिरिति । अत्रेद बोध्यम् । नीरसेऽप्यस्फुटालङ्कारे काम्यत्वमिति तन्न। रसालङ्कारयोरेव चमत्कारहेतु.

प्रथमोल्लास: त्वात् । तथा च रसवत्वे स्फुगलङ्कारविरहेऽपि न काव्यत्वदति नतु रसाभावे । अत 'कापि' इत्यस्य यत्र रसादीनामवस्थान तत्रेत्यर्थ । नीरसेऽप्यनलद्वारे किनिमित्तश्चमकार स्यात् । तस्मादलङ्कारमात्र व न विशेषगम् । किन्तु स्फुग- राररसान्यतरत्वम् । अलङ्काराणान्तु लोकवसर्वदाऽनवस्थानात् तेषा सयोग-- वृत्या वर्तमानतया क्वचित् (यत्र रसस्य स्फुरप्रताति ) तदभावेऽपि, न काव्यत्वहानि । तथापि 'न कान्तमपि निर्भूप विभाति वनिताऽऽननम्' इति दिशा अलङ्कारा काव्यशोभाकरा इति तत्सत्ताऽप्यपेक्षिता । अत उक्तम्-'अन. लकृती पुन छापि' इति । अत एव चन्द्रालोककारकृतोऽयमारोप --'अही- करोति य काव्य शब्दार्थावनलड्कृती । असौ न मन्यते कस्मादनुष्णमनट कृती' इति, अन चरितार्थो न भवति । अत्र ननोऽभावार्थ मनसि निधायोत तेन । काव्यप्रकाशेऽलङ्काराणामभावो न कदापि प्रतिपादित । रसादिस्थले स्फुटा- लङ्कारविरहत्वमेव । अगोदाहरणेन स्वाभिमत विशदीकरोति यथा-'य कौमारहर' इति पद्यम् । नन्वत्र चैत्रहपासु मालतीकदम्बविकास कथम् ' तयो प्रावृपेण्यत्वादिति चेन्न । वसन्तस्य कुसुमाकरत्वात् सर्वेपा कुसुमाना तत्र विकाससम्भवादिति केचित् । परन्तु वसन्ते मालतीवर्णनस्य कविसमयविरुद्धतया नैतत् सम्यक् । अत एवं कदम्बानिला इत्यस्य 'कदम्बाकारा अनिला' इति व्यारयानेन न निर्वाह । कदम्बसमाधानेऽपि मालतीवर्णनस्य 'मालत्यास्तु विशेषत' इति विशिष्य कवि- समयविरुद्ध वात् । अत चित्राननयुक्ता चपा इत्येवोत्तर वतन्यम् । ततश्च वर्षावसाने चित्रानक्षत्रयुक्तासु क्षपासु मालतीकदम्ववर्णन सम्यगेव । भत्रोदाहरणे स्फुनो न कश्चिदलकार । तथाहि कारणाभावेऽपि कार्योत्पत्ति विभावना । उस्कण्ठा प्रति वरगतनवीनत्वादि कारणम् । तदभावेऽप्युत्कण्ठारूप- कार्योत्पत्तिविभावमा । स च नवीन वाद्यभावो नाभावमुखेन 'स एव हि वर' इत्यादिना वर्गित इति तस्यास्फुट वम्। अथा 'कारणाभावे कार्योत्पत्तिविभावना' इत्यत्र 'कारण्तावच्छेदकधर्मावच्छिन्नप्रतियोगिताकाभावपर्गन विभावनेति तदर्थ । उत्कण्टा प्रति कारणस्य घरगतनवीनत्वाद्यभावे यद्यपि स एव हि वर' इत्या- दिनार्थादापतितस्तथापि न स शब्दतो वर्गित इति विभावनाया अस्फुटरवम् । कारणसम्वेऽपि कार्यानुत्पत्ति -विशेषोति । तथा च प्रकृतेऽनुत्कण्ठाकारणाना काव्यप्रकाश-रहस्यम् चरगतोपभुक्तवादीना सत्वेऽपि उत्कण्ठामावरूपकार्यानुत्पत्ति । यद्यपि द्वितीया. भावस्य पूर्वाभावप्रतियोगित्वरूपत्वादुत्कण्ठामावाभाव उत्कण्ठारूप 'चेत समु स्कण्ठते' इत्यादिनोत, तथापि नोरकण्ठाभावाभाधरूपेणेति तस्या अस्पुरत्वम् । यद्वा कार्यतावच्छेदकधर्मावच्छिनाभाववर्णने विशेपोक्ति ततश्चानोत्कण्ठाभावरूप कार्याभावस्यार्थादापतितत्वात् तस्या अपि अस्फुटत्वम् । 'चेतो न समुत्कण्ठते इति २' इत्युक्ता तु सा स्यात् । यवत्र दर्पणकार 'अन विभावनाविरोपोक्तिमूलस्य सन्देहसङ्कराद् अर रस्य (सङ्करालङ्कारस्य) स्फुटत्वमिति तत्प्रामादिकम् । विभावनाविशेपोवत्योरस्फु- टरवेन तयो सङ्करस्याप्यस्फुटत्वात् । नन्वत शृङ्गाररसस्य स्फुटत्वाद्रसवदरद्वार स्पुट इति चेन्न । रसस्यात्र प्राधान्यात् । अप्राधान्य एव तस्यारकारस्थागीकारत्वात् ॥ इति । प्र०८-फान्यभेदानुक्त्वा ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गययोश्च स्वरूपं प्रदर्य सोदाहरणं भवन्मतं विशदीक्रियताम् । उ०८-काव्यप्रकाशकृता काव्यस्य नयो भेदा प्रतिपादिता उत्तममध्य माधमभेदेन । तमोत्तमराव्यस्य ध्वनिवाव्यमिति अपरपर्यायम् । तस्यरूपमाह- 'हदमुत्तममनियिनि व्यगये वाच्याद् ध्वनिर्बुधै कथित ' इति । अरयान्वयार्थ एवं भवति । इद काव्यम् वाच्या अभिधावृत्तिप्रतिपाद्यादा ध्यगन्धे ध्यानापृत्तिप्र तिपायेऽर्थे अतिशयिनि अधिकचमत्कारकारिणि सति उत्तमम् । तदेव युधै ध्वनि. पण्डिते 'ध्वनिर्' इत्युच्यते । यथा-उदाहरणम्-'नि दोपप्युतचन्दन०' पद्यम् । अत्र 'चन्दनस्य स्तनतटे नि शेपच्यवनमधरस्य रागराहित्यम्, नेत्रयो प्रान्तभागेऽनजनत्वम्, तनो शरीरस्य कृशता तथा च रोमायोद्गम' एतानि लक्षणानि दूतीसम्भोगस्य तथा वापीस्नानस्य च समानानि । अन नायिका तस्या प्रियकरसकाशे दूती प्रेपितवती इति 'दूति' इति सम्वोधनेन सूचित भरति, सा दूती नायिका प्रयाग य 'मया नायक प्रति गत्वा बहुधा प्रसादितोऽपि नागतःस मतोऽहं वापी स्नातु गता सदनन्तरमशागते'ति दूया कथन 'मिध्यावादिनि' इत्युक्तवानापिका तदनृतं मन्यते कथयति च स्वयाऽमशाधरणेन यान्धव. मनाना कीदृश पीडागम सात इति न ज्ञातम् । अतिपीडाफर तयाचरणमि- दानी सभातम् । इति क्ययिरा नायरस्य प्रतारणा दूतीसम्भोगेन नापिकापा विप्रलम्मोहीपन मानी पीढी छ व्यञ्जयितु नायकस्य कृते 'अधमराब्दस्य प्रथमोल्लासः १५ प्रयोगं करोति । येन वं वापी स्नातुं न गताऽसि, तस्याघमस्यान्तिकमेव रन्तुं गताऽसीति वाच्यादतिरायिनि व्यङ्गये सति तस्योत्तमकाव्यत्वं ध्वनिकाच्यत्वं वा। गुणीभूतन्यङ्ग्यस्य मध्यमकाव्यस्य लक्षणं तु ग्रन्यकृता एवमुक्तम्-'अताशि गुणीभूतव्यङ्गय व्यङ्ग्ये तु मध्यमम्' इति । अताशि वाच्यादनतिशायिनि वाच्या- पेक्षयाऽतिशयितचमत्कारानाधायके व्यङ्ग्ये यत्र व्यङ्ग्यं वाच्याद् गुणीभूतमित्यर्थः। तदा तत्कायं मध्यमं गुणीभूतव्यङ्गय वोच्यते । न्यायस्य वाच्यादनतिशयस्तु द्विप्रकारको न्यूनत्वेन तुल्यत्वेन च । अत्र न्यूनत्वस्योदाहरणं दत्तम्। 'प्रामतरुण तरुण्या नववक्षुलमारीसनाथवरम्। पश्य- न्या भवति मुहुर्नितरां मलिना मुखच्छाया'। इति । यत्र 'नवचेतसमञ्जरीमण्डित- करं ग्रामतरगं मुहुः पश्यन्त्यास्तरण्या मुसच्छाया नितरां मलिना भवति' इति दाच्यार्थः। ध्यङ्गयार्थश्च दत्तसंकेता काचिदुपनायिका तत्र न गता, उपनायस्श्व अधुनैव चक्षुललतासङ्केतस्थाने गत्वैव प्रतिनिवृत्तः इति 'नवे'तिपदेन 'मञ्जरीस- नायकरम्' इति पदेन च व्यज्यते । न्यायमिदं 'वारंवार ग्रामवरण पश्यन्त्या- स्तरग्या मुखच्छाया मलिना भवति' इति वाच्यार्थानातिरमणीयम् । अत एवं चमत्काराऽजनकम् । व्यङ्गयमत्र गुणीभूतं वाच्यमेवातिशयितम् । एवमिदं मध्यम- काव्यस्योदाहरणम् । तुल्यप्राधान्यस्योदाहरणं 'ब्राह्मणातिकमत्यागो भवतामेव भूतये । जामदग्न्यस्तथा मित्रमन्यथा दुर्मनायते' इति पञ्चमोल्लासे दत्तम् । अत्र जामदग्न्यः सर्वेपां सनिराणामिव रहसां क्षणाक्ष्यं करिष्यतीति व्यङ्ग्यस्य 'अन्यथा दुर्मनायते' इति वाच्यस्य समं चमत्कारित्वमिति तयोस्तुल्यप्राधान्यम् । इदमपि गुणीभूतव्यजयमेव । प्र०९-व्याख्यायतामियं निनोद्धृता वृत्तिगता पङ्किः काव्ये ध्वनिव्यवहारस्य समूलताप्रतिपादनाय 'इदमिति काव्यम् । युधैया- करणैः प्रधानभूतस्फोटरूपन्यद्यब्यक्षकस्य शब्दस्य ध्वनिरिति व्यय. हारः कृतः। ततस्तन्मतानुसारिभिरन्यैरपि न्यग्भावितवाच्यव्यङ्ग्य- व्यसनक्षमस्य शब्दार्थयुगलस्य' इति । उ०९-अनान्ते 'शब्दार्थयुगलस्व'त्यनन्तरं 'ध्वनिरिति व्यवहारः क्रियते' इत्यध्याहृतं बोध्यम् । 'इदं' पदेन काव्यमिति प्रोत्तमेव । अत्र ध्वनिकाव्यमिति ज्ञातव्यम् । ध्वनिव्यवहारस्य समूलतामाह-बुधैरिति । वुधा अन्न वैयाकरणाः पतञ्जलिप्रमृतयः । तथा च तदनुसारिगोऽन्येऽपि बालारिका आनन्दवर्धनाचा- काव्यप्रकाश-रहस्यम् र्यादय । वैयाकरणाना मते ध्वनिशब्दस्य प्रयोग प्रतिपाद्यते । प्रधानभूतस्फोट रूपन्यङ्गयव्याकस्य शब्दस्येति । अस्य विग्रह 'प्रधानभूतो य स्फोट, तद्रूप यद्वयङ्गय तद्वयाकस्य शब्दस्यति, अर्थप्रत्ययरूपफलोत्पादकत्वात् स्फोटस्य प्राधा- न्यम् । स्फुटयति प्रकाशयति अर्थमिति स्फोट । शब्देषु ये वर्णा सन्ति ते क्षणिका आशुविनाशिन । अर्थबोधे प्रयेकवर्णाना कारणवे राजादिपदघटित कवर्णादपि राजविषयकवोधापत्ति । वर्णसमुदायस्य कारणत्वे 'योग्यविभुविशेषगुणाना स्वीत्त रोत्पन्नगुणनाशत्वादुत्तरोत्तरवर्णोत्पत्तिक्षणे पूर्वपूर्ववर्णध्वसेन कारणाभावाद् बोधो न स्यात् । अत पूर्वपूर्ववर्णसस्कारसहितचरमवर्णश्रावणप्रत्यक्षस्य कारण वस्वीका रेऽपि सस्कारस्थितेरक्रमिकतया एकस्माच्छब्दात्तावन्मात्रव्यु ममवर्णवच्छन्द- जन्यार्थबोध स्यात् । ततश्च 'नदी' 'दीन' इत्येतयो समानवर्णतयाऽन्योन्यमन्योन्य बोधयेत् । इत्यर्थबोधे स्फोटाख्य ब्रह्मैव (शब्दब्रह्मैव) कारणम् । अतो घटादि भिर्वर्णसमुदायरूपै सगिर्क पर्दै स्फोटरूपो नित्य शदो व्यज्यते । अत एवं वैयाकरणाना मते शब्दो नित्य । तेन चाभिव्यक्तेनार्थ प्रतीयते । ताशस्य प्रधानीभूतस्फोटव्याकस्य वर्णसमुदायस्वरूपस्य घटादिशब्दस्य ध्वनि ' इति वैयाकरणाना सज्ञा। अस्याशयस्तु शब्दानुशासने स्पष्टीकृत । तद्यथा-'अय गौ' इत्यत्र क शब्द किं यत्साम्रालालक्कुदखुरविषाणार्थरप स शब्द' नेत्याह । द्रव्य नाम तत् कस्तहि शब्द । येनोच्चारितेन सानालाइमूलककुदतुर- विपाणवत सम्प्रत्ययो भवति स शब्द । स एव लोके ध्वनिपयाय यथा शब्द मा कुरु, शब्दकार्यय माणवक , इत्यत्र ध्वनि मा कुर ध्वनिकार्यय माणवक इत्येवार्थो बोध्यते । अतो 'ध्वनि शब्द' इति महाभाष्ये प्रतिपादितम् । ततश्च यतो वैयाकरणैरेव व्यवहार कृतस्तस्मादन्यैरपि युधरानन्दवर्धनाचार्यप्रभृतिभिरा- लङ्कारिक स्वतन्यालोकप्रभृतिषु प्रन्येषु न्यग्भावितमुपसर्जनीकृत अप्रधानीकृतं वाच्य मुल्योऽर्थो येन तादृशस्य व्यङ्गयस्य व्याने पनने समस्य योग्यस्य समर्थस्य शब्दार्थयुगलस्य तदुपस्योत्तमकाव्यस्य ध्वनिरिति व्यवहार क्रियते इत्यर्थ । रसस्यान काव्ये प्राधान्यात् शब्दार्थयोश्च तद्वयक्षकरवात् अस्माभिरपि तयोर्च- निरिति व्यवहार कृत इत्यापनम् । इति प्रथमोहास समाप्त अथ द्विनीयोल्लासः प्र०-शब्दाना कतिधा वृत्तिः स्वोनियते ? अलङ्कारतरनयेषु अस्मिन्विषये किमभिप्रेतम् ? अलङ्कारनये को विशेष.? इत्येतत् सर्व सोपपत्तिकं प्रतिपादयत । उ०१-स्याद्वाचको राक्षगिक शब्दोऽत्र व्याकविधा' इति कारिका । प्रवेति काम्ये । शास्त्रे वैयाकर गाना मते बोधजनकतामान शक्ति । 'गङ्गाया घोप' इत्यादी गङ्गाशब्दस्य तौरवोधकताऽस्तीति तदुपस्थिति शक्तिरभ्यैव । सा च शक्तिदिविधा प्रसिद्धाऽप्रसिदा च । तत्राद्याऽभिधेत्युच्यते । द्वितीया लक्ष. गेति च । व्यञ्जनाऽपि यद्यपि ते स्वीकृता, परन्तु तस्या स्फोटप्रतीत्यनुकूलता, नार्थप्रतीत्यनुकूलता । अर्थाभिधायकत्व तु स्फोटस्येति, शब्दस्य शकात्मकरवा- वैकविध्यम् । नैयायिकास्तु गङ्गायां घोप इत्यत्र शक्रया प्रवाहावच्छिन्नविषयकोपस्थिती सस्यामेकसम्बन्धिज्ञानेन तीरविषयकोपस्थिती नियूंढायां तच्छाकरुपनप्रयासो ध्यर्थ ही बदन्ति । तमालङ्कारिका । गङ्गाशब्देन शक्त्या प्रवाहज्ञाने सति रक्षणया च तीरस्यो. पस्थितौ वृत्तायां शैत्यपावनस्वादिप्रतीतिर्न स्यादिति तत्प्रतीतये 'व्याना'नामिका वृतीया वृत्तिरुपास्यते। न च शैत्यपावनत्वादिप्रतीतिर्मानसीति वाच्यम् । सर्वासा- मिव एतस्मा अपि मानसत्वेऽपि गङ्गाशब्दान्बयव्यतिरेकाभ्यामेव तजन्य- स्वस्य वक्तम्यतया प्रतीतेश्च वृत्ति विना शब्दजन्यरवासम्भवान्मध्ये तव्ययोजिका म्यअनावृत्ति स्वीकियते इति वाचकव्याक्लक्षकात्मतया त्रैविध्यं शब्दस्य । वारपर्यार्थोऽपि केचित् । आकाड्सायोग्यतासविधिवशाद्वाच्यादीनामर्थानां वत्तरपर्दोंधे सति सम्बन्धज्ञान वाक्यन भवति तत्र शत. 'शब्दबुद्धिकर्मणा विरम्य व्यापाराभाव ' इति नयन क्षीणतया सम्वधप्रतीतये वाक्यपर्याप्ता तद- म्यप्रतीतीरछयाऽनुसारितत्वे सति तरप्रतीतिजननयोग्यत्वरूपा तात्पर्याख्या वृत्तिः स्वीक्रियने इस मीमासका । तर पदपर्याप्ता अभिधा ज्ञाता सती कारगम् । सारपर्याख्यवृत्तिस्तु स्वरूपसती कारणमिति विशेष.। एवमस्वीकारेऽश्रुतपूर्वाभि- भवकविविरचिताद्वाक्यकदम्बका बोधो न स्यात् । न च नैयायिकाभिमाकाकु- २का०प्र० काव्यप्रकाश-रहस्यम् यैव सन्बन्धज्ञाननिर्वाहेऽलं तारपारयवृत्त्या इति वाच्यम् । देवदत्तस्य दर्शनमित्यादौ देवदत्तकर्तृकतकर्मकोभयवोधानुकूलाकासासावेन तत्रान्यतर- पोषस्य दुरुपपादत्वात् । ननु पवित्रच्छारूपतात्पर्यज्ञानेनैवान्यतरबोधे किमर्थमतिरिक्ता वृत्तिः स्वीकि- यते-इति चेन्न । तादृशेच्छाया लौकिकवाक्येषु वक्तुं शक्यत्वेऽपि वैदिकवाक्येष्व- पौरुपाणां तेषां वक्कुरभावात् । तदिच्छाज्ञानासम्भवात् । न चाध्यापकेरछाज्ञानाधी- नमेव तज्ञानमिति वाच्यम्। अध्यापकस्याव्युत्पन्नदशायामपि व्युत्पन्नानां तदुचा. रितवाक्याद् बोधदर्शनात् । अत आकाक्षाऽनिर्वाया। ववित्रच्छारूपतात्पर्यज्ञाना- सिद्धा वाक्यपर्याप्ता तात्पर्याख्या वृत्तिः स्वीक्रियते-इति अभिहितान्वयवादिनः । अवान्विताभिधानवादिनः-विषयतासम्बन्धेन शाब्दबुद्धित्वावच्छिवं प्रति विषयतासम्बन्धेन वृत्तिज्ञानाधीनोपस्थितेः कारणत्वात् पदनिष्टशक्यनिरूपकस्य सम्बन्धस्य प्रतीतिर्न स्यात्, यदि संसर्गताभिन्नविपयतासम्बन्धेन वृत्तिज्ञानाधी. मोपस्थितेः कारणत्वमुच्यते, तदा कारणतावच्छेदकताधिक्यमयुक्तं गौरवं स्यात् । अतो लाघवारपूर्वोक्त एक कार्यकारणभाचो वाच्यः। ततश्च पदनिष्टशक्यनिरू- पकत्वे सम्बन्धस्य प्रतीतिर्न स्यात् । इति सम्बन्धविशिष्टार्थे एव पदानां शक्तिः । ननु तर्हि तस्यापि पृत्तिनिरूपत्वे पदेनैव सम्बन्धज्ञानाच्छाब्दबोधस्या- पूर्वानुपपत्तिरिति चेन्न । सम्बन्धत्वरूपेण सम्बन्धे ज्ञातेऽपि सम्बन्धविशेषस्य पदेनाप्रतीतेः । इति। प्र०–सविस्तरं सोपपत्तिकं व्याख्यायताम्-'तात्पर्यार्थोऽपि केपुचित्' तथा 'वाच्य एव वाक्यार्थ इत्यन्विताभिधानवादिनः । उ०२-तारपर्याधोऽपि केपुचिदिति । भन्न पदैः, शम्स्या उपस्थितानामर्थानां पश्चादन्वयः-रवीकुर्वाणा अभिहितान्वयवादिनः । 'गङ्गायो घोष' इत्यादी शक्त्या प्रवाहरूपार्थे उपस्थापिते 'शब्दबुद्धिकर्मणां विरम्य व्यापाराभाव' इति नयेन शक्ते विरतत्वालक्षणया तीररूपेऽर्थे ज्ञाते प्रयोजनस्य शैत्यपावनत्वादेर्व्यञ्जनया प्रतीति- भवति । अत्र च सम्बन्धप्रतीतिः केनेत्याशङ्कायां नैयायिका:-'यपदेन विना यस्या- ननुभावकता भवेद् आकावा', इत्युक्ताकासाज्ञानेनैवाधिकरणरूपार्थोपस्थिति- रित्याहुः। परमेवं स्वीकारे देवदत्तस्य दर्शनमित्यादौ 'कर्तृकर्मगोः कृति' इति फर्तृकर्मोभयरूपाएं पष्ठया विधानात्सन्देहोत्परया सम्बन्धमतरस्यमावप्रसार , १९ द्वितीयोल्लासः यदि च नैयायिकाभिमतवेक्निच्छारूपतात्पर्यज्ञानस्यैव कारणस्वमुच्यते तदपि मीमांसकमते अपौरुपेयवेदे शुकाद्युच्चारितवाक्ये च वक्त्रिच्छाया अभावाद, तादृशवाक्ये तात्पर्यज्ञानं न स्यात् । न च तत्राध्यापकेच्छाज्ञानेनैव तात्पर्यवोध इति वाच्यम् । अध्यापकानामव्युत्पन्नदशायामपि व्युत्पन्नच्छात्राणां बोधदर्श- नात् । ततश्च मीमांसकाभिमत-'तदन्यप्रतीतीच्छ्याऽनुचारितत्वं सति तव्यतीति- जननयोग्यस्वरूपा तात्पर्याख्या चतुर्थी वृत्तिः सम्बन्धज्ञानायावश्यं कल्पनीयेत्याहुः। एवञ्च देवदत्तस्य दर्शनमित्यादौ न दोषः। तदेवापपादयति-आकाढायोग्य- तेत्यादिना । प्रतीत्यपर्यवसानमाशङ्का । अर्धावाधो योग्यता । पदानामव्य. वधानेनोपस्थितिः सन्निधिः । सैवासत्तिर्नाम । इत्यादिसहमारिकारणताज्ञानेन वच्यमाणजातिगुणनियामंज्ञारूपाणामन्योन्यं सम्बन्धे 'जनयितव्ये तात्पर्यार्थः तात्पर्यारयवृत्तिः, तया प्रतीत. विशेषवपुः वाच्याद्यपेक्षया विरगशरीर. घटः मानयेत्यादो घटपदेन समीपस्थाच्छिद्रत्वविशिष्ट्रघटप्रतीतिवत्कर्मवादिसम्बन्धरूपो ऽपदार्थोऽपि शक्त्याऽप्रतिपाद्यमानो वाक्यार्य सम्बन्धः समुल्लसति बोध- विपयो भवति । अन्विताभिधानवादिनस्तु बावापोद्वापाभ्यामेव घटादेोधदर्शनात् कथाप्रसङ्गे उच्चारितानां घटादिपदानां वैदेशिरस्य वोधाजनकत्वात् पदार्थान्तरेणान्वितानामे- वाभिधानं बोध । ततश्चाधितो घटो घटपदशक्य इति तेषां मतम् । तन्मते च विषयतासम्बन्धेन शाब्दबुद्धित्वावच्छिन्न प्रति विषयतासम्बन्धेन वृत्तिज्ञानाधीनो- पस्थिति कारणमिति नियम । तदुक्त 'शाब्दी याकाड्डा शब्देनैव प्रपूर्यते' इति । एवञ्च सम्बन्धज्ञान वृत्ति ज्ञानाधीनोपस्थितिप्रयोज्यमेवास्ति । वृत्तिश्च शक्ति चगा वा। तयोश्च स्वस्वार्थमुपस्थाप्य विरतस्वाद्विरतयोः पुनरत्यानाभावात् । शाब्दबोधे सम्बन्धज्ञानस्य केनापि वस्तुमशक्यत्वात् प्रतीतेश्च दर्शनात् सम्बन्धविशिष्टेऽर्थे पदानां शक्तिरिति वदन्ति । तदेवोक 'वाच्य एव वाश्यार्थ' इति । प्र० ३–'साक्षात्सङ्ग्रेनितं योऽर्थमभिवत्ते स वाचकः' इति याचक- शब्दलक्षणस्य निर्दोषता प्रतिपाद्यताम् । उ०३-अत्र 'अभिधत्ते' इत्यस्य अभिधया बोधयतीत्येवमेवार्थस्वीकारे वाचाशब्दवृत्तिच्यापारस्यामिधात्वेन स्वज्ञाने स्वज्ञानस्यापेक्षितत्वात् भामाश्रयो दोषः स्यात् । अतः केवलं बोधयतीत्येवार्थो वाच्यः । अयं बोधयति स वाचका २० काव्यप्रकाश रहस्यम् इत्येवोच्यमाने 'गङ्गाया घोप' इत्यादौ तीररूपार्थबोधकत्वाद् गगाशब्दस्य वाघ फरव स्यात् । अत सङ्केतितमिति । सङ्केतच ईश्वरेच्छा अनादिता पर्यरूपो वा प्राय । प्रकृत गङ्गाशब्दे मतभेदेनोभयोरप्यभावान्न दोष । एवमपि पावट्या दिपदपु पचाना क्याना समाहार पञ्चवटाति समासात् पशामिन्नवटसमुदायवि शिष्टस्य देशसामायबोधादतिव्याप्ति । अत उक्त सातादिति । उपस्थियन्तरा व्यवधानन यर्थ । एक्च्च देशविशेषस्यैव प्रतीते सत्वान्नातिव्याप्ति । सासादर्थ योधयतीत्यवमुयते तदा द अङ्गुल्यौ निदिश्य आनये याद्युञ्चारिते द्विस्वसण्याक- पदार्थानयनस्य येधाचष्टायामतिव्याप्ति स्यादत सङ्केतितमिति, चेष्टास्थले आधु निकाना सज्ञया परिभाषाव न तु सङ्केतित वमिति न दोप । प्र० ४-व्यारयायतामियं पड्डिस्तस्या आशयं बोधयितुम् । 'इहागृहीतसंफेत्रम्य शब्दस्यार्थप्रतीतेरभावात्सङ्केतसहाय एर शब्दाs- विशेष प्रतिपादयतीति यस्य यत्राव्यवधानेन सङ्केतो गृह्यते स तस्य वाचक' इति । उ०४-सङ्केत एव शक्ति सा च कुत्रचित् स्वरूपसती कारणम् । यथा वही दाहानुकूला शक्ति अज्ञाताऽपि वह्निसम्बन्धमात्रेणावश्य दाह जनयति । पदे भर्य धानुकूल शक्तिस्तु ज्ञाता सत्येव कारणम् । अत एव वनौपधिवर्गस्थाने कपदानां सङ्कतमहाभावे न बोध । सा शक्तिर्यस्य शब्दस्याव्यवहितोत्तर यमर्थ बोधयति तस्मिनर्थे तस्य शब्दस्येति स शब्दस्तदर्थवाचक । तदेवाह इहेति निर्दिष्टपलया। प्र०-याण्यायतां 'सोतितश्चतुर्भेदोजात्यादिर्जातिरेयवा' इति । उ०५-सङ्केतविपयीभूतोऽर्थ कतिविध इति विभाग दर्शयति-सङ्केतित चतुर्भद इति । सङ्केतप्रहविषयोऽर्थश्चतुर्विधो भवति जारयादिरिति । जातिगुणक्रियासज्ञारूपेणे यर्थ । अत्रेद विचार्यते । कि व्यक्ती शक्तिस्त जाती१ ननु प्रवृत्तिनिवृत्तियोग्यतया मनियाकारितया व्यक्तावेव शक्तिरिति । गामानयत्यादिवाक्यन गोग्यक्रेवानयनादिदर्शनात् । जातश्चानयनासम्भवाद् भप्रयोजस्वच गोपदस्य सारनादिविशिष्टगोव्यक्तावेव शक्तिरिति केमिद्वदन्ति । परमेवमुच्यमाने गोम्पफर्नानात्वात् प्रतिव्यक्तिशफिकल्पनेन शक्त्यानन्य सा द्वितीयोल्लासः २१ एकस्मिनावि गोस्वज्ञाने जाते कालान्तरेऽन्यगोदर्शनेन गोरूपार्थस्योपस्थिते सादात् साध्याभावववृत्तित्वलज्ञगो व्यभिचारश्च । यतो गृहीतसङ्केतायां व्यक्ती विनटाया व्यस्त्यन्तरेऽपि बोधदर्शनानष्टव्यक्तिगततव्यक्ति वाभाववयत्तयन्तर धृत्ति वात् । किञ्च धर्मविशेषपुरस्कारेण शक्यग्रहे व्यक्तिमानबोधस्वीकारे 'गौ , शुक्ल, चल, डित्य , इत्यादीनां व्यक्तिरूपेणैव बोधा पर्यायतापत्तिरिति उपाधी प्रकारीभूते धर्म गोत्वादिरूपे शक्ति । गोत्वे शक्तः स्वीकारे च गा वस्यैक्यान्नान त्य व्यभिचारौ। स चोपाधिविविध । वस्तुधर्मों घटत्वादि वक्तृयदृच्छापन्नि- वेशितो नामरूपो डित्यादि । तत्र वस्तुधर्मोऽपि द्विविध । सिद्ध साध्यश्च तत्र साध्य क्रियारूप अधिनयगादारभ्याध श्रयणान्त मध्ये विधायमानो दाँ परिवर्तनकारादि । इथ साध्यस्तु पूर्वापरीभूतैकदेशोऽधिश्रयगाध श्रयणादि क्रियारूप । यदाहु-'या िपदमसिद्ध वा साध्यत्वेनाभिधीयते । आश्रितक्रम- रूपत्वात् सा क्रियेयभिधीयते' इति । सिद्धस्तु द्विप्रकारक । पदार्थस्य प्राणप्रदो विशेषाधानहेतुश्च । पदार्थस्य प्राणप्रदो नाम निरवच्छिन्नविशे यतानिरूपिन प्रकार. ताश्रय ! धर्मान्तराणां यो धर्मितावच्छेदक , यस्य च धर्मितावस्त्र दकम यन्नास्ति सैव जाति । जननेन प्राप्यते या सा। यास्थितिसम्बधिनी यर्थ । यथा नीरो घर इत्यादौ घरे विद्यमाना घत्त्वरूपा। यद्यपि गोत्वसमालिक्मेव शुसादे सम्बन्धि वमस्तीति नत्रापि जातित्वमापतितम् । तथापि पाकाद्यत्तर शुक्लादि सम्बध कदाचिदपैति न तु गोत्वस्य सम्बन्ध इति प्राणप्रदत्य गोत्वादे । नदुक्त वाक्यपदीये( मर्तृहरिणा) 'गौ स्वरूपेण न गौ नाप्यगौ गोस्वाभिसर धातु गौरिति । अयमर्थ गौर्यक्ति स्वरूपेण न गोव्यवहारविषय नाप्यगोव्य- पहारविषय । गोस्वाभिसम्बन्धात्तु गोव्यवहारविषय । विशेषाधानहेतुर्गुण । गोरवादिना लब्धसत्ताक वस्तु शुग्लादिनेतरेभ्यो प्यावार्यने । नीलादयो हि घटादिक सजातीयरक्तादिघरेभ्यो व्यावर्तयनि । डित्यादिशब्दानामिति । ननु तत्र क्वचित् डित्यवरूपो धर्म पित्रा डविथपदेन सङ्केतिते विस्थपदेन व्यवहारसम्भवात् तत्र डियादिसज्ञाशब्दानां स्वरूपम् अन्त्यबुद्धिनिर्माद्यम् अन्त्यबुद्धया पूर्वपूर्ववर्णश्रावगप्रयक्षजन्यसस्कारसहितचरम वर्णश्रावणप्रयक्षे निश्चयेन बुद्धिसवेद्यमिति नैयायिका । 'पदे न वा विद्यन्ते वर्णेष्ववयवा न च' इयुषया अखण्डपदस्फोटस्य स्वीकारात् सहतक्रममिति वैया- काव्यप्रकाश-रहस्यम् करणाः अक्रमस्फोटास्यं शन्दस्वरूपं वक्त्रा यदृच्छ्या डिव्याद्यर्थपूपाधिस्वेन करप्यत इति सोऽयं संज्ञारूपो यहच्छात्मक इति । अत्र प्रमाणमाह-'गौः शुक्ल थलो दित्य इत्यादौ चतुष्टयी शब्दानां प्रवृत्तिरिति महाभाष्यकारः इति । शब्दानामधैं या प्रवृत्तिः सेत्य प्रकारचतुष्टयवती नन्वेवं सति परमाण्वादोनां जातिवं स्यात्र गुण. रवम् । तादृशपरिमाणस्य यादस्थितिसम्बन्धित्वाद् इति सत्यम् । जातिशब्दा एवैते । वैशेषिकमतानुसारेण तु तत्र गुणस्वव्यपदेशः । जात्यादिरिति पक्षमित्थं व्यारयायेदानी जातिरेव वेति पक्षं निरूपयति । ननु पटादिनिष्टानां शुक्लादिगुणानां गुडतण्डुलादिनिधानां पाकादिक्रियाणा भेदस्थ प्रत्यक्षतः सिदौ नानात्वं स्यादिति चेज। वस्तुतस्तेषामेकरूपत्वात् । भेदप्रतीतिस्त्वाथ्यौपाधिकीति । गुणक्रियायदृच्छाशब्दानामाश्रयभेदाद्देप्रीतिः यस्तुत एकरूपत्वमेव । यया एकस्यैव मुखस्य खड्गे तारल्यादिविशिष्टा, मुकुरै स्वच्छा, तैले मलिना प्रतीतिः, न तु तत्र मुखानां वस्तुतो भेदः । एवं हिमगतशी- पल्यं चाकचश्यादिविशिष्टं, दुग्धगतं स्वच्छ, सजगतं मलिनमिति भेदेऽपि अभि. नाभिधानप्रत्ययोपत्तियेन शुक्लादिना तत्सामान्यं नाम जातिः। तत्रैव लाघवा- रसङ्केतोऽङ्गीकर्तव्यः। क्रियायामपि गुडतण्डुलसूपपाकादीनां वस्तुतो भेदेऽपि येन पाकरवादिनाऽभेदः प्रतीयते तदपि जातादेवान्तर्भूतम् । संज्ञाशब्दस्थले बाल- तरुगतरशुकोदीरितानां हित्यादिशब्दानां भेदः । शरीराणामवयवोपचयापचय- सद्भावात् व्यक्तिभेद एव वा, एवं सत्यपि येन डिस्यत्वादिनाऽभेदप्रतीतिः, ठदपि सामान्यमेवेति जातिरेव प्रवृत्तिनिमित्तमित्याहुः । नैयायिकादयस्तु--न व्यक्ति- मात्रे शक्तिः नापि जातिमात्रे, भाये आनन्त्यायभिचाराच, अन्त्ये व्यक्तिप्रतीत्य- भावप्रसङ्गात् । तस्माजातिविशिष्टव्यक्तावेष शक्तिः । ततश्च शक्यतावच्छेदकं गोल्वादिकं जातिरिति नानन्त्यमिति वदन्ति । तद्वानिति व्यक्तीनामानन्त्या- जातेश्चानयनाद्यसम्भवानातिविशिष्टन्यतावेव शक्तिरिति । बौद्धास्तु-(सौगताः) 'यरसत्तक्षणिकं यथा जलधरः सन्तश्च भावा अमी तस्मात्ते सगिकाः' इति सिद्धान्तरीत्या भावमात्रस्य क्षणिकत्वाजातिव्यच्योरपि तथात्वानित्यत्वाभावाद् आनन्त्याच जातौ व्यक्ती वा सङ्केतस्य वक्तुमशक्यतया तद्भेदाभावे तदनुगताया- मतबावृत्तौ लाघवात्सङ्केत इति वदन्ति । तत्र किमयुक्तं किं युक्तमित्यादि रस- न प्रदर्यते। .

द्वितीयोल्लासः २३ ननु हित्यमानयत्युक्त सङ्केतसम्बन्धेन डित्यपदवन्तमानयेति बोधदर्शनात तत्र डिस्थपदस्य प्रकारीभूतत्वात् तस्य जातिवाभावेन कथं जातावन्तोवर इत्यरचेराह- प्रतिक्षणं भिद्यमानेषु डित्याद्यर्थेषु वेति । वस्तुतस्तु यत्र सादाबातेः प्रकार- त्वामावस्तत्र परम्परया जातिः प्रकारतया स्वीक्रियते यथा दण्डीत्यादौ प्रकारी- भूनस्य दण्डस्य जातिवाभावेन महाभाष्योत्तरीत्या जातिगुणक्रियासझारूपचतु- विधशब्दे एवान्तर्भावस्यावश्यं वकन्यतया गुणे किया संज्ञायां चा सर्वयाऽन्त- र्भावासम्मवाद्दण्डे प्रकारीभूतस्य दण्डत्वस्य जातित्वमादाय परम्परया दण्दिशब्द- स्यापि जातिवाचकत्वाजातिशब्देऽन्तभावो भवति तथैवात्रापि 'डित्य' पदस्य जातिरयामावेऽपि डित्यपदे प्रकारीभूतस्य डित्यपदत्वस्य जातित्वेन परम्परया जित्यपदस्यापि जातिवाचकत्वान्तर्भावो भविष्यत्येवेति न दोप । प्र० ६-सोपपत्तिकं व्याख्यायनामियं कारिका- मुरयार्थशाधे तद्योगे रूढिनोऽथ प्रयोजनात् । अन्योऽर्थो लक्ष्यते यत्सा लक्षणाऽरोपिता किया। उ०६-मुस्यार्थवाधे इति । मुखमिव मुरयः शाखादिवायत् । प्राथमिक- प्रतीतिविषयो वाच्यार्थ इत्यर्थः । तस्य वाधेऽनुपपत्तिग्रहे । तद्योगे इति-तस्य लपणीयार्थेन सह योगे सम्बन्धे, रूदित प्रयोजनाद्वाऽन्योऽयों यया वृत्या लक्ष्यते सालमा नाम । 'अथ' शन्दस्यार्थ अथवा वेति । 'लक्ष्यते यत्सा' इत्यनेन 'यया वृत्या लक्ष्यले सा' इति बोध्यम् । इति कारिकापा अन्वयः । अय विशेषप्रदर्शनम् । मुस्थार्थवाधे इति । अत्र मुस्योऽयों न व्युत्पति- रम्यः । अन्यथा गोशब्देन 'गच्छुतीति गौ.' इति व्युत्पत्या गमनक्रियाकारित्व. रूपा प्रतीतेः गोव्यक्तधिसिद्धये रचणाऽऽप्रयणीया स्यात् । लोके सु व्युत्पत्ति- लम्योऽयों नैव प्रतीयते । अपि तु गोशब्दश्रावणप्रत्यहाव्यवहितोत्तरकाले गोरूपार्य- स्य पोधो भवति इति तत्र गोशब्दस्य वाचस्वमेव । तस्य बाधे वाच्यार्यस्य बाधे सतीति यावत् । तद्योगे । वेन मुख्यार्थेन योगे सम्बन्धे । सर्वयाऽसम्बदार्थप्रतीठो तत्र शब्द उपस्थितिमान्दबोधानुकूलन्यापारद्वयकल्पनेन गौरवं स्यात् । सम्बन्भे च सति -- नानपापा- २४ काव्यप्रकारा-रहस्यम् वज्ञानाधीनलपयार्यस्योपस्थिती तन शाब्दयोधानुस्म्यापारमाणपरिप्रहेको पस्थिरयनुकूलव्यापारकानासहित्यप्रयुक्त राघवम् । तत्र एपणापा जिद् अन्वयानुपपत्तिस्तारपर्यानुपपत्तिश्च कारणमित्युक्तम् तस तारपर्यानुपपायव कार्य निर्वाहे उभयत्र कारणावकरुपने गौरवात् । तथाहि-'काम्यो दधि रयताम्' इत्यादाविव 'यष्टी प्रवेशय' इत्यत्रापि तारपानुपपत्तिरस्त्येव । न हि यष्टी बहिः सस्थाप्य प्रविविक्षत्सु यष्टी प्रवेशति प्रयोग मियते । आयतदेशावधिससयोग प्रवेशपदार्थ स प यष्टिधारिणामिव यीनामप्यतीति तापर्यानुपपतिरस्येवेति तस्या एकोपादानरक्षणाधीजता । रूढित इति-कर्मणि कुतर' इत्यादी कुर माहिरूपमुरयार्थप्रहमन्तीय समुदायमा विवछकायादिरूपोऽर्थ प्रतीयते । राजपुरुषइत्यादिवषयवयवशक्तिमहोत्तरमेव समुदायशक्तिप्रदो भवति सयापिन सवावयवार्थोऽत्र समुदायार्थघटक' रथन्तरादिपदेषु रथसृपदजन्यतरपदार्थो पस्थितिपूर्वक एप समुदायशक्त्या सामविशेषरूपोऽर्थो योध्यते । परन्तु न सत्र रयादीना समुदायार्थेन पश्चित् सम्यन्ध । असु शमादिरूपायन सापधानाया दिसम्बन्धी विधकरवादेरस्तीति रटि । पूर्वग्र सुन रुविरिति भेद । 'मणि फुशल' इत्यादी कुशलादिपदे मुशमशादानतुदेषरूपा वियचयत्यादिना सम्प न्धमद्रावात् तदर्थस्य सक्षपाया मतीति । रच निरुवा एपणा हाधिता मध्यादभिधानवत्' इरयुक्तदिना प्राधान्यतो रपयार्थस्य पौध । पशु कहिन साहसिक 'इस्यय करिङ्गाब्दस्य तरेशवासिनि एसरयुतम तय। 'जनपर भाग्दा पनियादम्' इति सूरे जनपदपनियवाक्योरित्युव या परिवादिशब्दाना देने देशवामिनि ध यापास्यव स्वीकारात् । अनादितापवती निमा। सदुदाहरण 'कर्मणि पुशर ' इति । सत्ता तन मुरुषार्थप्रतीतिप्पयादितत्यादि रूवियम् तेन च सम्यन्धानपणास्वम् । अय प्रपोजनात्-अपया 'गमायां ' इयत्र प्रवाहे घोपाधारयमनु पपणम् । प्रवाहस्य तीरे सामीप्यादिसम्यग्ध । पपायनायाधतिशयप्रतीकि प्रयोजनमितीय प्रयोजनयती एपणाच म्यापारो पपरि अनिष्टस्तथापिस पाद भारोप्यते इति सारोपिता प्रियरयाहु । प्र.---याज्यायन्तामिमाम्तिय पारिका प्रत्यदुतसरण्या पसमापन पत्र लपोपीयेत।

द्वितीयोल्लास: (१) स्वसिद्धये पराक्षेप. परार्थ स्वसमर्पणम् । उपादानं लक्षणं चेत्युक्ता शुद्धैव सा द्विधा ।। (२) सारोपाऽन्या तु यत्रोक्तो विषयी विषयस्तथा । विषय्यन्त कृतेऽन्यस्मिन् सा स्यात्साध्यरसानिका।। (३) भेदायिमौ च सादृश्यात्सम्यन्यान्तरतस्तथा । गोणी शुद्धौ च विज्ञेयो लक्षणा तेन पड्विधा । उ०७-यदा प्रयोजनवत्या रक्षगाया प्रवाहरूपार्थेन तीरविषयकोपस्थितिनं भवति उदा कय गङ्गापदनिष्टलक्षगाज्ञानाधीनतीरविषयकोपस्थिरिरिति चेदन यूम । 'बाब्दी शाकाहा शब्देनैव प्रपूर्यते' इति सिद्धान्तात् शब्द विनार्थ योधनासम्भवात् गङ्गाशब्दे उपस्थापक्ता आरोप्यत इति। साऽत्र रसगा द्विविधा। यन्त्र शक्यास्यान्वयसिद्धये परार्थस्योपस्थापन सा उपादानरक्षगा। यत्र परार्थी न्वयबोधार्थ शक्यार्थस्य त्याग सा रतितलक्षणा चेति । 'कुन्ता प्रविशति' इत्यादौ (भावृतदेशावच्छिन्नसयोगानुपूलो व्यापार प्रयशपदार्थ ) प्रवेश कुन्तधारिपुरुषाणामित्र कुन्तानामप्यस्ति । न खलु कुन्तधारिपुरुपा कुन्तान् यहि सस्थाप्य प्रविशन्नीति कुन्तानुपादाय कुतधारिपुरुषा र यन्ते इत्यो पादानरपणा। भत्र हि नैयायिका-अरुणादिपदानामारुपये शक्ति आरुण्य विशिष्टे रक्षणेत्याहु । हेनश्चात वदन्ति । 'शश्यघटिते शतिर्म स्वीक्रियते' इति कथमिति चेत् , शक्तिर्नामेश्वरेच्छा सा चानुमेया । घरपदेचारणेन घनरूपार्थस्यो पस्थित्या घरूपार्थे ईश्वरच्छा कल्पयितु शक्या। भारुण्यविशिष्टे तु 'गुण- गुगिनो समाय' इति समवायसम्बन्धज्ञानाधीनोपस्थिति वियत्यवेति 'अनन्य लभ्यो हि शब्दार्थ' इत्युक्त्या तत्र रक्षणय शक्तिरिति वदन्ति । तथैव जाति शक्तिवादिनो मीमालका-गोत्ये शक्ति गोत्वविशिष्टज्यको 'विशेष्य नाभिधा गर क्षीणशक्तिविशेषणे इत्युक्त्या शतेवक्तुमशक्यत्वेन जातिव्यक्त्यो समवाय- सम्बन्धस्य क्लसत्वाच्छषयसम्बन्धरूपा लक्षणे याहु । परन्तु एहणायों कार स्य प्रयोजनस्य ईश्वरेच्छाया अनादितात्पयरूपरूढेवा अभावेन तत्र रक्षगाया अनवस- राद् । व्यक्ते प्रतीतिस्तु व्यक्ति विना जातेरनुपपन्नत्वेन 'यन विना यदनुपपत्न तत्तेमाशिप्यते' इति श्रापादेव तदेवानुमानम् । व्याप्येन गोवेन घ्यापकस्य गोत्वविशिष्टस्य व्यक्तेरनुमानम् । 'कुन्ता प्रविशन्ती' त्यादौ कुन्ता कुन्तधारि- काव्यप्रकाश रहस्यम् पुरुषव्याया नमवन्तीति नानुमानावयर । अनुपपपस्यापेस्टान्नान्नदयति । कियतामियति । भास्पातार्य कर्म वृधावर्य वृतिः, तस्यान सानपान कराक्षेप । बुर्विया कृते सविषयस्वेन कमंग भाक्षेप एवं प्रशिपिगमित्य- दावपि शेयम् । या 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुरे इत्यादी दिवाभोजनम् पमुपायमाप लक्ष्य रानिमाजन पनीयत इत्योपादानटपरयाहु । सध। तथाविधवापर स्पले पदामागलगाया वानुमराम्यतया (टायांपायर धुतरपलेऽप्पयांपाय कार्यनिहि रघगाया म्यर्थवाद । 'गाया घोप' इग्यादी नीररय घेवापारय सिप पार्थस्य प्रवाहस्य सर्वथा स्याग इन्सपा सरगए पंप एसानुग्यात् एगलपमेन्युष्यते । तदुर साहिरपदपी-'उपर देशमा देपा एगटएगे नि । उपलवगरवध-अविद्यमान सदवारकम् । सदाहरणम् 'काम्वन्तो देवदत्तस्य गृहा' इति । स सदानी स्टस्य कारपेदानीमरियमन म्वेऽपि देवदास्य गृदस्यतरगृहाच्या म्यागृत्ति । 'गाय परपत्र मनारदेन सारस्पा) एरितेऽपि गायए प्रतीनि , पमुमादिनीराया वृत्तिरिति एरपनि । भनोदाहरणपऽपि राय सनातन-भेदादिमी पेनि । सारयसग्यन्घरगा गौरी सदितरमाय चमूसा गुदेपर्य । 'गनापी घोष' उपग्र प्रगहनीपो पापाप धधर्मकारयोire भारप्पम् औदासीन्य भारतीनि भरपावरदेदरवारयिर प्रयाहरयन सरप योध, न मु प्रमादरवन प्रवाहस्य तीन तीरस्पनि । मनु सारे प्रवाहार बाधितमिति कय प्रवाहवन सारस्योपरिपनिरिनि । ममममममम तार মধাহ বাঘিয়ারি খাবার মাথায়। सीरादीनां गादिश प्रतिपादन साधन प्रमहरन रिपोपम्पिनी व पायनरयादेखभ । गमातरे परदायाधुपयमार्ग:भियपेर तारारितिरिति प्रयोजनस्य पपाश्नायादेनं प्रतीनिरिंग एप भेद । एप गटगाया भेसपमुपवा गहरभदानानि । परोपविषयतावादरिम आरोपमरताराम मेमोर स्थिविरत सारोपा पगा। भारीप्यमानासरिय निर्गमनापमाना रसगा। मोदी' इति सारोपमा उमाम् । प्रायने। दीक द्वितीयोल्लासः इत्यत्र गोरखावच्छिन्नप्रतियोगिताभेदाभाववान् वाहीक इति बोध , वाहीक- स्वावच्छिन्नप्रतियोगिताकभेदाभाववान् वाहीक इति बोधो वा । आद्येऽसम्भव , वाहीके गोरवावच्छिन्न प्रतियोगिताकभेदस्यैव सत्वात् । अन्त्ये घटो घट इतिवदभेदान्वयानुपपत्ति । प्रकारतावच्छदकविशेष्यतावच्छेदक्योर्भेद एवाभेदा- न्वयस्य नियमात् । केचित्तु रक्षणाया जाध्यमान्द्यादिक्माश्रित्य जडो वाहीक इति बोधमाहु । तत्रोच्यते । किंगता जाड्यमान्द्यादयो गुणा लक्ष्यमाणा प्रतीयन्ते । गोगता वाहीकगता बा। गोगताश्वेत् सर्वथा बाघ गोगतगुणस्या- न्यत्राविद्यमानत्वात् । बाहीकगताश्चेत् सामान्याधिवरण्य न सगच्छेत । शक्येन साक सम्बन्धाभावश्च नहि गुणाभिन्नत्व बाहीकस्यास्ति तयोर्गुणगुणिनो समवाय- सम्बन्धस्य नियतत्वात् । यदि च गोगतजाइयवृत्तिजाडयत्वबजाइयपर्यन्त लक्ष- णाङ्गीक्रियते तदापि सेवानुपपत्ति भन सजातीयगुणाश्रयत्वेन वाहीकार्थ एव लच्यते इत्येव साउ । तथा च गोगतजाध्यवृत्तिजाट्यत्ववद्वाहीकगतजाव्यवति रक्षणा। ततश्च तयोरभेदान्वये स्वप्रकारकारोपविशेष्यत्वसम्बन्धेन गोस्वावच्छिन्नो वाहीक इति बोध । जाध्यमान्द्यादिप्रतीतिश्च रक्षणाया प्रयोजनम् । उक्तश भर्तिके-'मानान्तरविरोधे तु मुण्यार्थस्य परिग्रहे । अभिधेयाविनाभूतप्रती तिलक्षणेत्युच्यते । लक्ष्यमाणगुगैर्योगाद् वृत्तेरिष्टा तु गौणता'। 'गङ्गाया धोप' इत्यादी मुरयार्थस्य प्रधाहस्य स्वीकारे प्रवाह घोपाधारवासम्भवात् प्रत्यक्षादि. प्रमाणान्तरेण विरोधे सति अभिधेयेन प्रवाहरूपार्थनाविनाभूतं सम्बद्ध यत् सटादि तरप्रीतिकरणीभूतो व्यापारो रक्षणेन्युच्यते । गौर्वाहीक इत्यत्र रक्ष्यमा- पस्य बाहीकस्य गुणैर्नाड्यमान्द्यादिभियोगाच्छक्यसम्बन्धाद् वृत्तौणता इष्टा गौणी रक्षणा भवतीत्यर्थ । अविनाभावश्वान सम्बन्धमात्र न तु ध्याप्ति । तथा सति मजा मोशन्तीत्यादौ मञ्चस्थपुरुषाणा मञ्चेन साक व्याप्यव्यापकमावस्या- सावात् लक्षणा न स्यात् । ननु क्रोशनस्य क्रियायाश्चेतनकर्तृवन क्रोशनकाले मवस्यपुरुषाणा मद्धेन साफ च्याप्यन्यापकभावोऽस्त्यवेति चेद् अनुमानेनैव प्रतीतिसिद्धी लक्षणाया व्यर्थव स्यात् । आयुघृतम् इत्यत्र आयुष्कारण घृतमिति कार्यकारणसम्बन्धसद्भावेन शुद्धा रक्षणा । चतुषूक्तोदाहरणेषु रून्यभावात् प्रयो- जनमाह अनेति । गोर्बाहीक इति आरोप्यमाणारोपविषययोरुपादानात् सारो- पात्यले तादृष्यप्रतीति प्रयोजनम् । गौरयमि यारोप्यमागेनारोपविषय निगी स्व- रूपे साध्यवसानोदाहरणे अभेदप्रतीतिश्च प्रयोजनम् । एवमायुश्रुतमित्यत्रोमयोपा- - काव्यप्रकाश रहस्यम् दानात् सारोपोदाहरणे दुग्धाद्यपेक्षया वैसादृश्येन प्रतीतिः । भायुरेवेदमिति साध्यवसानोदाहरणे नियमेमायुर्जनकरवप्रतीतिः प्रयोजनम् । सम्बन्धान्तरे शुद्ध लक्षणेत्युक्ते तत्र सम्बन्धान्तराण्याह-चित्तादादुपचार इत्यादि । सथा १ उपादानलक्षणा, लक्षणलक्षणा, सारोपा, साध्यवसाना, शुद्धा, गौणीयुकभेदेन पविधा लक्षणा । इति । Ho -गौरनुसन्ध्यः' इत्यादिकं जातिशक्तिवादिनो मीमांसका उपादानलक्षणामुदाहरन्ति । फाव्यप्रकाशे तन्निरासः कृतः। तथा च 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुक्त' इत्यत्रापि तैरुपादानलक्षणेय स्वीकृता। तदेतदुभयं प्रकाशकारोक्तरीत्या सोपपत्तिकं निराकरणीयम् । उ०८-मण्डनमिश्राः 'गौरनुयभ्यः' इत्यादिकमुपादानलसणाया उदा. हरणमाहुः । अनुयभ्यः आलग्भ्यः हन्तव्य इत्यर्थः । गौरनुयन्भ्योऽजोग्निपो. मोयः' इत्यादि तारिदं वचनम् । मीमांसकानां मते जातौ शक्तिः । गौरनुबन्य इत्यत्र गोस्वस्य जातेः श्रुतिविहितानुबन्धनक्रिया कथं सम्भवेदिति जातेरनुवन्ध्या- महत्वात् शक्तेश्च 'विशेष्यं माभिधा गच्छेत् क्षीणशक्तिविशेषणे' इति न्यायेन गोस्व. योधनेन विरतत्वात् , व्यक्तिं विना जातेरनुपपन्नत्वाच जात्या व्यक्तिलक्ष्यते। ततश्च- गोस्वरूपमुख्यार्थमादायैव गोव्यक्तिलेदयते इत्युपादानलक्षणेयम् इति पदन्ति । तदेतदपेशलम् । लक्षणाकारणस्य रूढः प्रयोजनस्यात्राभावात् । न सत्र प्रयोजनं विचिदस्ति । रूढि काचित् । येन लक्षणाया अवसरः। ननु तर्हि भवन्मतेऽपि व्यक्तः प्रतीतिः कथमिति चेदापादेवेति वदामः । माक्षेपोऽत्रानु- मानम् न तु लक्षणा। व्यक्तिं विना जातेरनुपपन्नस्वादित्यविनाभावेन व्याप्तिर्द- र्शिता। वृत्तिप्रयोज्योपस्थितिः शब्दादौ कारणम् । यथा च व्यक्तीशाक्षेपेण प्रतीतिस्तदुदाहरणद्वारा स्फुटीकरोति । यथा 'क्रियताम्' इत्यत्र कर्ता (कृतिः साश्रया गुणत्वादित्यनुमानेन कर्तुभिः ), कुर्वित्यत्र र्म (कृतिः सविषया कृति. स्वादित्यनुमानेन महाभ' ) अथवा तत्रायस्थले कर्मणः, द्वितीये कर्तुः लकारे- गाभिधामात् कर्तृकर्मणोरेवाक्षेपात्प्रतीतिरिति । उत्तरीत्या गुरोर्मते अर्थाक्षेपे दृष्टा- न्तमुक्त्वा भट्टमते शब्दाक्षेपे दृष्टान्तमाह-'प्रविश' इत्यत्र 'गृहम्' इति कर्मपई, "पिण्डीम्' इत्यत्र 'भक्ष्य' इति क्रियापदम् यथाऽऽक्षिप्यते तथैव जात्या व्यक्ति - द्वितीयोल्लासः २९ अपरे तु 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुक्ते' इत्यादौ रात्रिभोजन लक्ष्यते तत्र भोज- नाभावसमानाधिकरणपीनत्वयुक्तोस्कर्पस्य प्रतीते प्रयोजनस्य सत्वात् , तत्र दिवा. भोजनरूपमुख्यार्थमादायैव रक्ष्य रात्रिभोजन प्रतीयते इत्ययोपादानरक्षणेत्याहु । तल । 'पीनो देवदत्तो दिवा न भुक्त' इति प्रत्यक्षस्थरेऽपि दिवाभोजनाभाववत पीनत्व रात्रिभोजन विनाऽनुपपत्रमित्यनुपपत्या रात्रिभोजनप्रतीते । तथा चात्र पदामावालक्ष गाया वक्तुमशक्यतया दृष्टार्थापत्येव श्रुतस्थले अर्थापत्यैव कार्यनिर्वाह लक्षणाया व्यर्थ वात् । यमानुपपद्यमान शब्द शब्दान्तर कल्पयति सा श्रुतार्था पत्ति । यथा 'द्वारमि ति शन्द 'पिहि' इति क्रियापदम् । यत्र च ट भुतो वार्योऽनुपपन्नोऽर्थान्तर कल्पयति सा अर्थापत्तिरिति, स्थलेऽत्र मतभेदेनोभयमपि सम्भवति । भ०९-'अनयोर्लक्ष्यस्य लक्षकस्य च न भेदरूपं ताटस्थ्यम् । सटादीनां गादिशब्दै. प्रतिपादने तत्त्वप्रतिपत्तौ हि प्रतिपिपादयिषित प्रयोजनसम्प्रत्ययः । गगासम्बन्धमात्रप्रतीतो तु 'गङ्गातटे घोप' इति मुख्यशब्दाभिधानाल्लक्षणाया का भेदः। इतीयं पतिः प्रकाशप्रन्याशयं विशदीकुर्वता भवता समीचीनतया व्याख्येया। उ०९-'गायां घोप इत्यत्र घोषाधिकरणस्वसिदये गनाशब्द' स्वार्थ प्रवाहरूप सर्वथाऽर्पयतीति सैषा लहितरक्षणा । तन्मूलच त्यपावनस्वाधतिशयमतीति प्रयोजनम् । इत्थमुभयरूपा उपादानलखणा लक्षण- लक्षणा चेति शुदैव । तत्र सादृश्यसम्बन्धमूला रक्षणा गौणी, तदितरसम्बन्ध मूला राना । 'गङ्गायां धोप' इत्यत्र प्रवाहतीरयो परस्परब्यावृत्तधर्मप्रकारक योधविषयताटस्थ्यमौदासीन्यमिति मुकुलमा । ते तु 'गौर्वाहीक' इत्यादि गोण्या लक्षणाया शक्यार्थरच्यायो साश्यास्यसम्बन्धेनाभेदप्रतीतिरस्ति। शुद्धा. यां तु वाय्यार्यरक्ष्यार्थयोéद प्रतीयते तदेवौदासीन्यापरपर्याय भेदप्रतीतिरूपं वाटस्थ्य शुदाया गौणीतो भेदक्म् । न तूपचार मिश्रणमित्याहु । तदेव निराक्तुमा हानयोरंक्ष्यस्य तटस्य टक्षकस्य प्रवाहस्य न परस्परण्यावर्तकरूप ताटस्यमिति 'गाय घोष इत्यत्र प्रवाहरवेन तीरस्योपस्थिनिर्भवति। न तु प्रवाह वेन प्रवाहस्य सौरत्वेन तीरस्योपस्थिति । तथासति विशकलितयोस्नयो दरूपं ताटस्म्य स्यात् । बता सक्यतावच्छेदकप्रकारकलयविशेभ्यक एव बोधो भवति । ननु तीरे तटस्य - ३० काव्यप्रकाश-रहस्यम् प्रवाहत्व याधित तस्कयमुच्यते प्रवाहस्वेन तीरस्योपस्थितिरिति चेन्न । समवाय सम्बन्धेन तीरे प्रवाहस्य बाधितस्वऽपि स्वप्रकारकारोपविशेष्यत्वसम्बन तस्थितौ बाधाभावात् । तीरादीना गङ्गादिशब्द प्रतिपादने तत्वेन प्रवाहवेन प्रतिपत्ती तीरस्योपस्थिती होत्यपावन वादे म प्रतिपिपादयिपितप्रयोजन सम्प्रयय । गङ्गासम्बन्धमात्रप्रतीतो गङ्गातटे घोप इत्याधुच्यमानेऽभिधयेव तीरा देरपस्थितिरिति प्रयोजनस्य शैयपावनत्वादेन प्रतीतिरिति र सणाया भेद । प्र० १०-विशदं व्याख्यायन्तां निम्नोल्लिखितपय । 'अन्न दि स्वार्थसहचारिणो गुणा जाड्यमान्द्यादयो लक्ष्यमाणा अपि गोशब्दस्य परार्थाभिधाने प्रवृत्तिनिमित्तत्वमुपयान्ति इति केचित् । स्वार्थसहचा रिगुणाभेदेन परार्थगता गुणा एव लक्ष्यन्ते न तु परायोऽभिधीयते इत्यन्ये । साधारणगुणाश्रयत्वेन परार्य एव लक्ष्यते इत्यपर' । इति । उ०१०–'अत्र'-शब्देन 'गोर्वाहीक' इत्योति योध्यम् । स्गर्थे यादि । अत्र मुख्याधस्य गो वस्य वाहीके बाधितस्यात् तासहचारिणो गुणा जाड्यमा पा दयो एक्ष्यमाणा वाहीकार्थाभिधाने प्रवृत्तिनिमित्तीमवन्ति । शक्यतावनेर करव प्राप्नुवन्नीयर्थ । ततश्च जडो वाहीक इति केचिदाहुस्तदसम्यक । तया हि गोम्देन तावत् किंगता गुणा रक्ष्यन्ते? गोगता याहीगता या गोगतरये हि याध प्रसज्येत । न हि गोगता गुणा याहीक सम्मवन्ति । अय पाहीकगता स्तरसामान्याधिरण्य न सहच्छेत । नाह गुणाभिन्नत्व याहीकस्यास्नि सपोर्गुण गुणिनो समवायस्य वरतृप्तरवात् । अनद परमपते-गशदादाहीकार्य प्रीयते न वा । प्रतीयते चेदाहीको चाहीक इति घटो घर इतियदभेदान्वयानुपपत्ति । उद्देश्यविधेययोर्भेद एवाभेदा वयस्य नियमात् । भय न प्रतीयते इति याप्यते वदा पछाम । किं तहिं गोशम्देन प्रतीयते । रगतगुणा न सम्भवन्ति सामान्याधि करण्यानुपपत्ते । अथ यदास्वगतनाट्यवृत्तिपट्यायरमाध्यपर्यंत एपणा प्रियते तदा सैवानुपपत्ति तदपि न सम्यक् । इद पुनरम सावम् । गोशम्देन साधारण सध्यतावरपदक जाटयमा पादिकमाधिय बाहीको रयते । साधारण्य गोवाही कोमयगत पाटयगतजाध्याययावन । गोशग्दरय गोगत गाय वृत्तिजाध्यायवक्षा दीकगतजात्यावधति पणा । उता सयोरभेदान्वयन पदो वादीकशी योध। संदेवाह-साधारणगुणाभयरवेन परायं एप प्रतीयते इप्यन्ये। तदुधमन्य:- द्वितीयोल्लास. ३१ 'भभिधेयाविनाभूतप्रतीतिर क्षणोच्यते । रयमाणगुणैर्योगाद् वृत्तरिष्टा तु गौणता' इति । लक्ष्यमाणा जाइयमान्धादयो गुणास्तैोंगे शक्यसम्वन्धे सति गौणी लक्षणेति तदर्थ । अन्न चाविनाभाव सम्बन्धमानम् । तु व्याप्ति । 'गाया घोप' इत्यादी प्रवाहतीरयोग्र्याप्तिग्रहेऽपि 'मजा नोशन्ती'त्यादौ तदभावात् न खलु मचाना तस्यपुस्पैनाविनाभाव । किञ्च तयोरविनाभावे याक्षेपेर्गव तत्प्रतीतेन तर लक्षणोपयोग । प्र० ११.-'तत्र व्यापारो व्यञ्जनात्मक' इति कारिकांशेन लक्षणा मूलव्यञ्जनाव्यापार प्रस्तुत्य ग्रन्थकृता यदुक्तं 'विशेषा म्युम्तु लक्षिते' तटादौ ये विशेषा पावनत्वादयस्ते चाभिधातात्पर्यलक्षणाभ्यो व्यापागन्तरेण गम्या । तञ्च व्यजनध्वननद्योतनादिशब्दवाच्यमवश्य- मेपितव्यम् । इत्येतद् ग्रन्थकृत्प्रतिपादनं तदुक्तसरण्यव शङ्कासमाधा नपूर्वकं सम्यग्विविच्यताम् । उ०११-तत्र लाक्षणिक पाब्दे प्रयोजनप्रतीतिसमर्थो व्यञ्जनात्मको व्यापार। भनु रत्तगर्यैव प्रतीतिर्भविष्यति किमिति व्यञ्जना स्वीक्रियत इयत आह- यस्य प्रतीतिमिति । यस्य शैत्यपावनत्वादे प्रतातिमाधातु जनयितु लक्षणा स्वीक्रियते 'गङ्गाया घोप' इयवरूपो लाक्षणिक प्रयोग कियत तत्र लाक्षणिक- शब्दैक्गम्य गहाशम्दान्वयव्यतिरेकानुविधायित्वादिति भाव । शैयपावनत्यादि रूपे फले व्यञ्जनादपरा क्रिया व्यापारो नत्यर्थ । तथाहि नाभिधाम्यापारो वत्तु शक्यः, समयाभावात् । समय सङ्केत । 'गङ्गाया घोष' इत्यादी गङ्गादिपदानां शैत्यपावन वादी सङ्केताभावात् सतितार्थे एवाभिधाया प्रसरात् । भापि लक्षणाव्यापार । लक्षणातूना मुरयार्थवाधादीनामभावात् । तदेवाह-लक्ष्य न मुख्यमित्यादिना। तीररूपोऽर्थो गङ्गापदशक्यो नास्ति । न वा तीरे धापाधार- त्वादेर्वाध । नापि पावनत्वादिना तीरस्य सम्बन्ध प्रयोजनान्तर वा, किञ्च महाशब्दस्तीरमिव पावनस्वादिक दोधयितु नाईति इति न । वाग्याथस्य बाधे सति इतरायंप्रतीतेवक्तु शक्य वान धाग्न तथा शब्द स्खलद्गति । स्वरन्ती गतिर्यस्य एवमूत । बाघग्रह एवं नास्तीति तात्पर्यम् । किन र सणाया क्यजित् स्वीक्रियमाणायामपि सन्न रूढयभावात् प्रयोजनान्तर वक्तव्यम् । तस्यापि प्रयो जनान्तरमित्यनवस्था स्यात् । ननु मास्तु प्रयोजनमात्रे लक्षणा । पावनस्वादिवि- काव्यप्रकाश रहस्यम् शिष्टे वीरे लक्षणायां नोक्तदीपः । न च तत्र प्रयोजनाभाव इति वाच्यम् । 'गङ्गा- यास्तटे घोपः' इत्यतोऽधिमार्थप्रतातिरेव प्रयाजनवादत आह-प्रयोजनेनेति । प्रयाजनविशिष्टे तार लगा न सम्भवति, कुतः १ इत्याह ज्ञानस्येति । अयं भावः । कार्यकारगयाः पोपर्यस्य व्यवस्थितत्वेन 'नीलो घट' इत्यादी घटविषय- कप्रत्यक्षोत्तरं (ज्ञाता घर इति) विषये ज्ञाततात्पत्तिरूप फल भवतीति भाट्टाः। सैव प्रकटता नाम । घटविषयकज्ञानवानहमित्याचारकानुव्यवसायापरपर्याया सवि. तिरेव फलमिति मुरारिमिश्रमतानुयायिनः । एवञ्च तीरोपस्थित्युत्तरभापिन्याः शैत्यपावनस्वादिप्रतीतेः समानकालिकत्वं न सम्भवतीति न प्रयाजन विशिष्टे लगा वक्कु शक्यते, तदाह विशिष्ट लक्षगा नैवमिति । तटादौ लक्षिते सति पावनत्वादयो विशेषाः प्रतीयन्ते तपतीविकरणीभूतो व्यापारो ध्यानध्वननयो- तनादिशब्दवाच्यः अवश्यं स्वीकार्यः। प्र०१२-व्याख्यायतामियं कारिका- यस्य प्रतीतिमाधातुं लक्षणा समुपास्यते फले शब्दकगम्येऽत्र व्यञ्जनान्नापय किया । उ०१२-व्यञ्जनानिरूपणावसरे सा व्यञ्जना द्विधा-शब्दनिष्ठा अर्थनिष्ठा चेति वदयते । तत्र शब्दनिष्टा पुनरपि द्विधा 'अभिघामूला लक्षणामूला च। तत्र यद्यप्यभिधायाः प्राथम्यादुपजीग्यत्वार तन्मूला प्रथमं निरूपयितुमुचिता तयापि मुप्रसिदवादसणायाः प्रकृतत्वाच तन्मूलामेव प्रथमं निरूपयति 'वत्र न्यापा- रो व्यञ्जनात्मकः' इति । तत्र लाक्षणिकशब्दे व्यापारो व्यसनाप्रमशानुकूलः । लसणादिनैव तपतीती किं तयेत्यत आह-यस्य प्रतीतिमिति । अनया कारिक- यार्थापत्तिरूपप्रमाणे प्रदर्शितं भवति। अत्र 'लक्षणा' इति पदं लघणया लाक्षणिक- शब्दपरम्। यस्य शैत्यपावनस्वादिरूपफलस्य प्रतीर्ति अनुभवरूपामाधातुं अनयितुं लक्षणा लाणिकः शब्दः समुपास्यते आधीयते । सत्यपि वाचकशब्दे (गङ्गाया घोषः' इत्यत्र) तं विहायादियते । शब्दैक्गम्ये लाक्षणिकशब्दमात्र- गम्ये (न स्वनुमानादिगम्य) अत्र तस्मिन्फले (नान्यतस्तव्यतीतिरपि तु तस्मादेव शब्दात् ) शैत्यपावनस्वादिप्रयोजनविषये व्यञ्जनाद् न्यानं विना व्यञ्जनं विहाय अपरा किया अन्यो व्यापारो न इत्यर्थः । किन्तु व्यञ्जनात्मक एव व्यापार इति मावः। एवं लाक्षणिके शब्द प्रयोजनबोधषमो व्यञ्जनाभिषो म्यापारः।

द्वितीयोल्लास ३३ ननु लक्षणयैव प्रयोजनोपस्थितिनिर्वाहेऽल व्यवनये याह-यस्य प्रतीतिमाधातुमिति। केवल तपमान यदि प्रतिपिपादयिपित तहि 'गङ्गावटे घोष' इत्येव वाच्यम् । अतस्तस्य प्रयोजनान्तर वक्तव्यम् । तत् सिद्धये एव लाक्षणिकशन्दप्रयोग । सा च प्रयोजनसिद्धि गङ्गाशब्दे सत्येव भवति, नान्यथा । अत शब्दनिष्टो व्यञ्जना भिधो व्यापार तत्प्रतीतये स्वीक्रियते । यतस्तस्य व्यापारान्तरेण प्रतीति वस्तु न शश्या इति। प्र. १३-'हेत्वमावान्न लक्षणा' इत्यस्य क आशय । उ०१३-'गङ्गाया घोष ' इयत्र गहाशब्दस्य लाक्षणिकप्रयोग शैयपावन स्वादिप्रयोजनप्रतिपत्तये कृत । तत्र व्यवनाहते नान्यो व्यापारस्तव्यतीति माधातु प्रभवति । तथा हि नाभिधा समयाभावात् । समय सकेत । अभिधा सकेतसहायैवोपयुज्यते । 'गङ्गाया घोप ' इत्यादौ गङ्गादिपदाना शैत्यपावनत्वादी सकेताभावात् सकेतितार्थे एवाभिधाया प्रसरात् । नापि रक्षणायापार । अत उक्तम् 'हे वभावान लक्षणे ति । रनणाया किल मुस्यार्थवाध तद्योग रूढिन योजनान्यतरच कारणम् । तदेत मुख्यार्थवाधत्रयम् । न ह्यत्र तेपा सत्ता तदवोप पादयति 'लक्ष्य न मुख्यम्' इति कारिकया। तद्यथा-'रक्ष्य न मुरय, नाप्यत्र बाधो, योग फ्लेन नो । न प्रयोजनमेतस्मिन् न च शब्द स्खलद्गति' इति । 'गङ्गाया घोष' इत्यत्र गङ्गाशब्दस्य प्रवाहो मुख्योऽर्थ । तद्वावस्तीरसम्बन्धश्च । तीरस्य लक्षणयोपस्याने भुरयशब्देन प्रतिपादयितु शक्यस्य शैयपावन बाई प्रतीति प्रयोजनमिति गङ्गाशदेन यथा तो लक्ष्यते तद्वद्यदि तट मुरय स्यात् तस्यात्र बाध प्रयोजनस्य च शैयादेस्तटेन सम्बन्ध स्यात्, तस्य च प्रयोजनान्तर च किञ्चिद्भवेत्तदा गङ्गाशब्द प्रयोजन र क्षयेत् । न झन तट मुग्योऽयं । नापि तत्र घाध । तटे घोषाधारवस्य सत्वात् । न च गटाश दार्थस्य तटस्य पावनीयस्वाद्येलक्षणीयधर्म सम्बध (योग फोन नो) तरे तपामभावात् । नापि प्रयोजनान्तर येन लक्षणा स्यात् । किश गङ्गाशब्दो न तटमिव प्रयोजन प्रतिपादयितुमसमर्थ । वाच्यार्थस्य वाध सति इतरार्थप्रतीतेक्तु शक्यत्वाच पात्र तथा शद स्खरगति । स्खलन्ती गतिर्यस्य । एवभूत । वाधप्रह एव नास्तीति तात्पर्यम् । ३कर०० ३४ काव्यप्रकाश-रहस्यम् प्र० १४-समुपपाद्यताम् 'एवमप्यनवस्था स्याद् या मूलक्षयका रिणी' इति कारिकांशः। उ०१४-प्रयोजनस्य रच्यत्वमेव नास्तीति 'हेत्वभावान रक्षगे'त्यादिना प्रतिपादितम् । किञ्च लक्षणाया कथञ्चित् स्वीक्रियमाणाया तत्र रूट्यभावात्प्रयो जनान्तर वक्तव्यम्, तस्य पुन प्रयोजनान्तरमिति अनवस्था स्यात् । बीजाकुर न्यायेन अनवस्था नदोपायेत्याशङ्कयाह 'या मूल्यकारिणी मूलक्षतिकारिणी वेति प्रयोजनपरम्पराया लक्षणास्वीकारे प्रयोजनान्वेषणस्यापर्यवसानेन प्रस्तुतस्य पावनत्वादेस्तीरादेर्वा वोधानुदयप्रसङ्ग । 'मूल क्षतिकरी चाहुरनवस्था च दूपणम्' इति बीजाकुरवदनवस्था न दूषणमित्यपास्तम् । प्र० १५-'प्रयोजनेन सहितं लक्षणीयं न युज्यते' इत्यस्य कोऽर्थः । उ०१५-ननु न केवल प्रयोजन लक्ष्यते किन्तु प्रयोजनसहित तटादि, इत्यतो नोक्तदोषप्रसग । अत आह-पावनत्वादिधर्मयुक्तमेव तट लक्ष्यते । 'गङ्गा यास्तटे घोप ' इत्यतोऽधिकस्यार्थस्य प्रतीतिश्च प्रयोजनमिति, इति शीतपावनादि- विशिष्टे तटे लक्षणा, तम्कि व्यञ्जनयेति । ननु शैत्यपावनत्वादियुक्तमेव तट गगाशब्देन रयते तत्किं व्यञ्जनया' न चात्र प्रयोजनाभाव इति वाच्यम् । गङ्गातटे घोप इयतोऽधिकार्थप्रतीतिरेव तत्प्रयोजनत्वादित्यत आह-प्रयोजनेन सहितेति । अत्र लक्षणीय लतणाजन्यज्ञानविषय (तटम् ), प्रयोजनेन प्रयो जनीभूतज्ञानविषयेण (पावनत्वादिना) सहित न युज्यते इत्यन्वय । कुत इग्याह-ज्ञानस्येति । अयमर्थ । कारणकार्ययो पौर्वापर्य वतृप्तम् । प्रत्यक्षा- देनीलादिविषय । तत्फलञ्च विषये ज्ञाततोत्पत्ति । विषयविनाशिस्मृत्युपपत्ते रात्मनि वा नीलविषयकज्ञानवानहमिति अनुव्यवसाय । शैत्यपावनत्वादिप्रती- तिश्च तीरोपस्थित्युत्तरभाविनीति तयो सामानाधिकरण्य न सम्भवतीति । प्र० १६-व्याख्यायतां सूत्रमिदं 'ज्ञानस्य विषयो ह्यन्य फलमन्य दुदाहृतम्' इति । उ०१६-अत्र 'हि' शब्द प्रसिद्धार्थकतया दृष्टान्तार्थकः । 'अन्य'शब्दो ज्ञाना. दन्य इत्यर्थक । एवमन्यदित्यपि ज्ञानादन्यदित्यर्थकम् । तथा विषयो ज्ञानादन्यस्तथा ज्ञानस्य फलमपि ज्ञानादन्यत् । फलफलिनो च यथा द्वितीयोल्लास समसमयसमुत्पादासम्भवात् । तत्र दृष्टान्तमाह-प्रयतादेरिति । सक्षमिन्द्रिय प्रति यदुत्पद्यते ज्ञान तमन्यतम् । इन्द्रियार्थसन्निकर्षजन्यज्ञानमित्यर्थ । आदि पदेनानुमानादेग्रहणम् । अम्बरमामासकमनेनाह-प्रस्टनेति । घरज्ञानानन्तर 'ज्ञातो घट" इति प्रत्ययात् तम्ज्ञानेन तस्मिन्य ज्ञतताऽपरनाम्नी प्रजाना जायते इति अध्वरमामासकीमामा । एवञ्च 'यधर्म प्रकटता पूर्वमीमामकै प्रयज्ञादि ज्ञानस्य फलम् इयुच्यते' इति भाव । तार्किकमतेनाह-सवित्ति रिति । सति च घटहाने 'घटमह जानामि' इति प्रययरूपा अनुभवमायापापर्याया सवित्ति र्घटज्ञानाजायते इति तार्किकतर्क । एवञ्च 'ज्ञातृधर्म सवित्ति तार्किक मुरारि मित्रादिभि मयज्ञादिज्ञानस्य फहमियुच्यते' इति भाव । तथा च एतयो (प्रयक्षस्य ) विषयफलयो प्रयवानिवत्व यया सुयक्त तथा रक्षा मन्य ज्ञानात् तफर स्य पावन कादिज्ञानस्यान्य वमवश्यमपिठ-यमिति भाव । यथा करणत्वेन ज्ञानाद् विषयो भिद्यते क्या कार्य वेन फलमियर्थ । अन्यथा तीरत्व पावनत्वज्ञानयोरभेदे जापानकमावानुपपत्तेरिति । एवञ्च रक्षणासन्यज्ञानविष यत्वेन त फलस्य औत्यपावनस्वादे विषय व न युक्तमित्यर्थ । प्र० १७-अभिधामूलव्यञ्जना ग्रन्यकारोक्तदिशा प्रतिपाद्यताम् । उ०१७-तत्र कारिक-अनेकार्थस्य सदस्य वाचाचे नियन्त्रिते। सयोगाद्यैरवाच्यार्थधोकृयातिरश्चनम्' इति । तया च सयोगो विप्रयोगश्च माहचर्य विरोधिता । अर्थ प्रकरण लिङ्ग शब्दस्यान्यस्य सनिधि । सामय॑मौचिती देश कालोव्यक्ति स्वराय । शब्दार्थस्यानवच्छेदे विशेषस्थति हेतव' । इत्युक्तदिशाऽग्रे व्याख्यानाय प्रक्रमते । इत्थ लगामूल व्यञ्जकत्वमुव वाऽभिधामूलमाह-अन केति। अनेक अर्या वाच्य वेन यस्य तस्यानेकार्थस्य नानार्यकस्य शब्दस्य वाचकवे भभिगाया प्रकरणादिमि नियन्त्रिते एकत्र सीमिते सति भवाच्यार्थ सदाभिधया प्रतिपादयितुमशक्य । तद्रीकृत् तव्यतीतिहेतु या व्यापति व्यापार सामधन व्यवनमियर्थ । वय भाव । एक्स्य वसमूहामन पदस्यानेका नैव शक्ति । शक्यतावच्छेदकभेदेन तद्भेदात् । ततश्च यस्मिन्नर्थ तात्पर्यग्राहक प्रकरगादिकमवतरवितहोचरशक्या तदर्योपस्थापनम् । अन्यस्याश्च विरोधानम् । वया निरुद्धतयाऽभिधया बोधयितुमशक्यायस्य बोधने प्रभवन्ती वृत्तिचना नाम। इयज्ञाभिधामूला सान्दी व्यथनेयुच्यते इति वाध्यम् । न तु श्लेषपदाभिधात एवं काव्यप्रकाश-रहस्यम् द्वितीयार्थग्रहः स्यादिति शानिवारणायोक्तं वाचकत्वे नियन्त्रिते इति । 'नच संयोगादिनाऽभिधावद् व्यञ्जनापि नियन्यतामिति वाच्यम् । संयोगादिकमति- क्रम्य वोधकत्वेन तसिद्धः। संयोगादीनां वाचकरवनियामकवे भर्तृहरिसम्मतिमाह-संयोग' इत्यादिना। संयोगः प्रसिद्धसम्बन्धः। विप्रयोगो विभागः। साहचर्य संभूयावस्थानम् । सादृश्यं वा । विरोधिता सहानवस्थानम् । अर्थः प्रयोजनम् । प्रकरणं वस्तृश्रोतः बुद्धिस्थता । लिङ्ग संयोगातिरिक्तसम्बन्धेन परपतच्यावृत्तो धर्मः असाधारणो धर्मों वा । व्यक्तिलिङ्गं पुंस्त्वादि । सामर्थ्य कारणता। औचिती योग्यता । देशकाली तद्विशेषौ । स्वरः उदात्तादिः । एवमेतैः शब्दवाच्यार्थस्यानवच्छेदे कतमोऽर्थोऽत्र विवक्षित इति संदेहे सति विशेषस्मृतिहेतवः विशेषस्य विवक्षितार्थस्य या स्मृतिर्ज्ञानं तदेतवः तजनका भवन्तीत्यर्थः । तत्र संयोगः प्रसिद्धार्थस्य गुणविशेषरूपः सम्बन्धस्तेनाभिधानियमनं यथा 'सशङ्खचक्रो' हरिरित्यत्र शङ्खादिसंयोगेनानेकार्थस्य हरिशब्दस्याच्युतेऽभिधा नि. यम्यते। अन्यहरिपदार्थे तरसंयोगाभावात् । विप्रयोगस्तावत्तत्सम्बन्धध्वंस: तेन यथा 'अशङ्खचक्रो' हरिरित्युच्यते । सम्बन्धस्य प्रतियोगिपूर्वकत्वात्। साहचर्य सहचरता तेन यथा रामलक्ष्मणाविति रामपदस्य लक्ष्मण साहचर्येण दाशरथी । विरोधः सहानवस्थानं वध्यघातकभावश्च यथा रामा नगतिस्तयोरिति रामार्जुन- पदयोः भार्गवकार्तवीर्ययोः । अर्थः प्रयोजनम् तेन यथा 'स्थाणुं भज भवच्छिदे' इत्यन्न भवच्छेदनरूपप्रयोजनवशात् स्थाणुशब्दस्य हरे । प्रकरणं वक्त्तृश्रोतृयुद्धि- स्थता, तेन यथा 'सर्व 'जानाति देव' इत्यत्र देवशब्दस्य राजनि । यत्तु 'युप्मदयें' इति व्यारया तस्या अपि प्रकृते राजादावित्यर्थः । किंचा सग्योध्ये राजादावि. त्यर्थः । लिङ्गं संयोगातिरिक्तसम्बन्धेन परपक्षच्यावृत्तो धर्मः । तेन यथा 'कुपितो. मकरध्वजः' इत्यत्र मकराकारध्वजसमुद्राभ्यां घ्यावृत्तेन समवायसम्बन्धववा कोपेन मकरध्वजशब्दस्य कामे, यत्तु लिङ्गं चिह्नमिति तत्र कोपस्य कामचिस्याभावात् । असाधारणधर्मस्य चिद्वत्वात् । सशङ्खचक्र इत्यनातिय्याप्तिप्रसगाच । शब्दस्यान्य. स्य सविधिः। नियतार्थकशब्दान्तरसामानाधिकरण्यम्। अतो भवच्छिदे इत्यादाव. प्रसङ्गः। न च सशङ्खचको हरिरित्यतातिव्याप्तिः। शसचमशब्दसामानाधिकरण्या- भावात् । यद्वा हरीशक्षचके सति संयोगादोहरणे तात्पर्यम् । तेन यथा 'देवस्य त्रिपुरारातेरियन त्रिपुरारातिशब्दसामानाधिकरण्याद् देवशब्दस्य शम्भुरूपेऽ.

द्वितीयोल्लास.. मरे, अन्यस्य देवशब्दार्थस्य राक्षस्त्रिपुरारातित्वाभावात् । यत्तु देवतान्तरस्या तथामावाच्छक्तिनियमन शम्भाविति तन्त्र युक्तम् । देवतान्तरे देवशब्दस्य शक्ति भेदाभावाद् उदाहरणासामञ्जस्यापत्ते । सामर्थ्य कारणत्वम् । तेन यथा 'मधुना मत्त कोकिल' इति। मन मधुशब्दस्य वसन्ते । भन्यस्य मधुशब्दार्थस्य कोकिर मादनासामर्थ्यात् । भौचिती अर्हता तया यथा-'पातु वो दयितामुखम्' इति । अनोत्कण्ठितमनोरथसाधनौचित्येन 'मुख' शब्दस्य साम्मुख्य न तूपायादौ। यद्य ध्यत्रापि सामध्यं सम्भवत्येव तथापि मधुनेत्यत्र तृतीययेव तद्वोधाभावेऽपि भौचि तीमात्रज्ञानादेव शक्तिनियनमसङ्कीर्णम् इति। देशेन यथा 'भात्यात परमेश्वर 'इति । अत्रेति राजधानीरूपाद् देशात् परमेश्वरपदस्य राजनि । कालेन यथा-'चित्रमानु विभाति' इति । अन्न चिन्नभानुपदस्य दिवा दिवाकरे, रजन्यामाशुशुक्षणौ वह्नौ वा । व्यक्तिलिङ्ग पुस्त्वादिस्तया यथा 'मिन भातीति' भत्र नपुसकलिङ्गात् मित्रपदस्य सुहृदि । 'मित्रो भाती'त्यत्र पुलिङ्गास्सूर्ये । स्वरस्तुदात्तादिदे बाहुल्येनार्थप्रती तिकृद् दृश्यते । यथा 'इन्द्रशत्रो वर्धस्व' इति । अत्र 'इन्द्रशत्रो' इत्यस्यान्तो. दात्त वे पष्टीतत्पुरुषव्यक्तौ इन्द्रस्य शातनकर्मत्व लक्ष्यते । पूर्वपदान्तोदात्ताबहु श्रीहौ च 'इन्द्र शातयिता यस्य' इति इन्द्रस्य शातनकर्तृत्व लक्ष्यते । काव्ये तु नैव बाहुल्यम् । काव्येपदात्तादीनां नार्थविशेपनियामकता ।मत एवोक्त-'काग्यमार्गे स्वरो न गण्यते' इति । अत्र स्वरपदेनोदात्तानुदात्तस्वरितात्रय । ननु काव्येऽपि स्वरो विशेषप्रतीतिकृदस्त्येव । यथा 'ममामि कौरवशतम्' इत्यादौ काकुस्वरादिना विशेषार्थावगतेरिष्ट वात् । अतोऽत्र स्वरशब्देनोदात्तादेरेव विवक्षितत्वात् । यद्वा अभिधानियामको स्वर वेदे एवानुशासनात् न तु काये । 'स्वराय' इत्यादि ग्रहणादभिनयापदेशौ गृह्यते । अन्ये चोत्तान्तर्भूता। अभिनयश्च साक्षादिवा कारादिप्रदर्शिका हस्तादिक्रिया तया यथा 'एदहमेत्त०' इति प्राकृत पद्यम् । अस्य छाया- 'एतावन्मात्रास्तनिका एतावन्मात्राभ्यामक्षिपन्नाभ्याम् । एतावन्मा श्रावस्था एतावन्मानैर्दिवस' इति । नत्र विकसितमुकुरिताभिनयविशपा स्तनस्य पीनत्वमुकुलिताद्यर्थविशेषेऽभिधा नियम्यते । एवं विशेषपादत्रयेऽपि अपरेशोऽभिमतनिर्देश तेन यथा । 'इत स दैत्य प्राप्तश्रीनेत एवार्हति क्षयम् । विषवृत्तोऽपि सवय स्वय छेत्तुमसाम्प्रतम्' । अत्रापदेशेनेद शब्दस्याभिधा वक्तरि नियम्यते । इथ सयोगादिनार्थान्तराभिधायकत्वे निवारितेऽपि यत्रधचिदनेकार्थ शब्देनार्थान्तरप्रतिपादनम् तत्र नाभिधा,एकत्रार्थे तस्या नियतस्वात्। नापि रक्षणा, - ३८ काव्यप्रकाश रहस्यम् मुरयार्थवाधाद्यभावात् । किं वजन व्यञ्जनमेव व्यापार । तस्य च श दाग्वय व्यतिरेकाम्या शा दत्वमिति उपरिष्टारप्रतिपादितम् । 'भदात्मन' इत्यभिधामूर- व्यञ्जनाया उदाहरणम् । अत्र प्रकरणादाजरूपाय नियन्त्रिते द्वितीयगजरूपार्य प्रतीतिरमिधामूलव्यञ्जनया। तद्युक्तो व्यञ्जनाव्यापारयुक्त वान्दो व्याक । ननु शब्दमात्रस्य व्यजकत्वे कथ शब्दार्थयुगलस्य काव्यस्य ध्वनिलमित्यत आह- यदिति, तथेति । अर्थोऽपि व्याकस्वशक्यप्रकृतार्थवोधानन्तरमेव व्यायाधबोधा दर्थस्य सहकारित्वमित्यर्थ । इति द्वितीयोलास समाप्त pe- अथ तृतीयोल्लासः प्रश्न :-अर्थव्यञ्जकताप्रतिपादनाय व्याप्यायतां निम्नोल्लिखित. सूनवचनम्- वस्तृ-योद्धव्य-काकूनां वास्यवाच्यान्यसन्निधे प्रस्तावदेशकालादेवैशिष्ट्यात्प्रतिभाजुषाम् । योऽर्थस्यान्यार्थधीहेतुापारो व्यक्तिरेव सा ॥ इति । उ०१-पूर्व शब्द निरूपिते उपोद्घातेन शब्दव्यञ्जनाया निरूपितायां प्रसङ्गेनार्थव्यञ्जना निरूपणीया। तदेतदाशङ्कयते शब्दे निरूपितेऽवसरोऽयमर्थनिरू पणस्य । किज,अर्थे धर्मिणि निरूपिते तद्धर्मों व्यजना सुनिरूपा भवति । तत्कुत स्तमना याहत्य व्यञ्जनानिरूपणमिति। तदेना शङ्कामपनिनीपुरुक्त स्मारयति- 'अर्था प्रोक्ता पुरा तेषाम्' इति। अर्था याच्यरप्यव्यङ्गया । अर्थस्य सनिकृष्ट तरत्वेऽपि तेपामित्यनेन योग्यतया वाचकादय शदा परामृश्यन्ते । शिप्यावधा नाय प्रतिनानीते–'अर्थव्यञ्जकतोच्यते' इति । ननु सर्वेपामित्यादिना (सर्वेपा प्रायशोऽर्थाना व्यञ्जकत्वमपीप्यते' इति कारिकार्धेन यत्पूर्वमुक्तम् ) पूर्वमर्थाना व्याकता प्रोक्तेव । तदन्या कीदृशी सेत्याकालायामाह-वस्तृबोद्धव्येति । य परप्रतिपत्तये वाक्यमुच्चारयति स वत्ता। स च कविस्तन्निबद्धो नायकादिश्च । बोदव्य प्रतिपादनीयो जन अन्तर्भावितण्यर्थत्वात् । कायत्यर्यान्तरमिति काकु । 'कै शब्दे' इति धातु । अथवा कातिह्वा । तद्व्यापारविशेषसम्माद्य वात् शोक भीत्यादिभिर्वनेर्विकार । तथा च साझाटाणा पदाना समूहो वाक्यम् । शश्योऽर्थो वाच्य । अन्यस्य वक्तृबोइव्यभिवस्य सविधि भन्यसविधि । वाक्यवाच्या या सहितोऽन्यसनिधि वाक्यवाच्यान्यसविधि ।तेनेतरेतरद्वन्द्वे एक वगावो नपुसकत्व न । प्रस्ताव प्रकरणम् ।देशोविननादि ,कालो वसन्तादि । आदि शब्दप्रायश्चेष्टादि । तेपा वैशिष्टयाद्वैलक्षण्यात् । तच्च वस्त्रादि प्रत्येक सम्बध्यते । तेभाजुपाम् प्रतिभा वासना । नवनवोन्मेषशालिनी बुद्धि प्रज्ञा वा। तद्वताम् काव्यवासनापरिपकबुद्धीनाम् । सहृदयानामिति यावत् । याऽन्याधी । अन्यो वाग्यरक्ष्यध्यतिरिक्तो योऽर्य व्यङ्गयरूपस्तदीस्तव्यतीति त तुर्योऽर्थस्य वाच्य लक्ष्यव्यङ्गयरूपस्य त्रिविधस्यार्थस्य व्यापारो व्यक्तिरेव । व्यग्यतेऽनति करण.

४० काव्यप्रकाश-रहस्यम् व्युत्पत्या व्यञ्जनवेति सूत्रार्थः । अत्र वैशिष्ट्यादिति पञ्चम्यर्थः सहकारिरूपं हेतुस्वम् । तच तदभावे व्यअनानुदयाद्वोध्यम् । एवं चक्नादिवलक्षणहेतुमा या प्रतिभाशालिनामन्यार्थधीस्तदेतुर्ष्यापारस्वमस्याः स्वरूपमिति योग्यम् । वदयमाणोदाहरणेषु वैशिष्टयविशेषोऽविदग्धानां दुज्ञेय इति सूचपन् धृति. कृदाह-क्रमेणोदाहरणानीति । वक्तृवैशिष्टयाद्वारयस्य व्यजकत्वमुदाहरति- 'भइपिहुलं' इति प्राकृतपद्येन । अस्य छाया-'अतिपृथुलं जलकुम्भ गृहीरवा समागताऽस्मि सखि त्वरितम् । भ्रमस्वेदसलिलनिःश्वासनिःसहा विधाग्यामि क्षणम्' इति । जलाहरणवरमनि नदीगहने उपनापकोपभुक्तायाः धर्मजर नि: श्वासाद्युपभोगचिहेनोपभोगं सम्भावयन्ती सखी सग्योध्य कस्याश्चिदुत्तिरियम् । अत्र प्रमाणान्तरेणासतीत्वेऽवगते सति व्यभिचारिणी बदतीति वक्तृवैशिष्टयाद् वाच्यघटितवाक्यार्थस्य चौर्येण कृतं रतं गोपायतीति सामाजिकान् प्रतिमा. शालिनः प्रति व्यायमिति भावः। अग्य वक्ग्री कामिनी । तस्या दुशीलस्वरूप. चैशिष्टयं विजानन्तं चौर्यरतगोपनं व्यक्तीभवति । अन शब्दपरिसिसहरवा. दर्यस्यैवेयं वृत्तिः। योद्धन्यवैशिष्टयावाच्यस्य प्यास्यमुदाहरति-'श्रोणि' इति पपेन अस्य छाया-'ग्नि दील्यं चिन्ताऽलसवं सनिःश्वसितम् । मम मन्दभागि. न्याः कृते ससि स्वामपि अहह परिमवति' इति । कृतस्वकामुपसम्भोगो दूसरी प्रत्युपभोगचिस्तं सम्भोगं ज्ञातयत्या नायिकाया उक्तिरियम् । अत्र दूसी योदया। तस्या अन्यदापि दृष्टदुष्टचेष्टापाः वैशिष्टयेन तस्याः कागुकोपभोगो व्यज्यते। कावैशिष्टपाद्वान्यस्य ग्यारसमुदाहरति-'तयाभूनाम्' इति येणी. संहारनाटस्थपणेन । सत्र प्रथमारे पुरनिग्रहाधनुधमेन युधिष्टिरमुपालभमानं भीमं प्रति सहदेवस्य 'आर्य, कदाचिन् सियते गुर.' दरयुपासम्मनिपेधपरया. क्यस्योत्सरे 'गुरः किं रोदमपि जानाति' इत्युपाय भीमसेनोनिरियम् । 'सिप्रे' वि. गुरुः सातादनभियोग्यो युधिष्ठिरः। दृश्यममुना कारणेन म्लाने मयि सेदं मात्सयं भजति अद्यापि एवंविधदुरयरथायामपि अशा कुरपु गेदं मारसय न भजतीति सोपदासः कामा । 'मन्त्रि शाः। मणि 'गरिन योग साम,पण A *.vi.

- तृतीयोल्लासः ४१ तु योग्यम्' इति व्यज्यते । ननु पात्रापानवैपरीत्येन खेदस्य करणारणरूप- वाक्यार्थस्य अयुक्ततयाऽपर्यवसन्नस्य पर्यवसानरूपसिद्धो व्यङ्गयोपस्थापनद्वारा काकुरेव प्रभवतीति काकोर्वाच्यसियङ्गत्वे तद्वारीभूतस्य व्यङ्गयस्यापि तथात्वेन गुणीभूततया गुणीभूतव्यङ्गयमिदमुदाहरणं न तु ध्वनिरित्याशङ्कय निराकरोति- 'न च वाच्यसिद्धयङ्गमत्र' इत्यादिना वृत्तौ। अत्र नेति प्रश्नकाक्वाऽपि वाक्याप्रतीतिपर्यवसानात्, यां काकुं विना वाक्यार्थबोध एवं नोपपद्यत तयै- वाक्षिप्तस्य गुणीभावात् । यथा 'मथ्नामि कौरवशतम्' इत्यत्र भीमसेनादितादृश. वक्तरि । तदेतदुक्तं 'प्रश्नमानेगापि काकोर्विश्रान्तरिति । वाक्यवैशिष्टयाद्वाच्यस्य व्याक्त्वमुदाहरति-'तइआ मह' इति प्राकृतपद्येन तस्य छाया-तदा मम गण्डस्थलनिमग्नां दृष्टिं नानपारन्यत्र । इदानी सैवाह तौ च पोलौ न सा दृष्टि' इति । नायिकाभयानिकटवर्तिनीमन्यां प्रियतमा साक्षादपहाय नायिकाकपोलगतं तत्प्रतिविम्ब नायिकामुखावलोकनमिषेण सादरं दृष्ट्वा तत्प्रतिविम्बापगमे तादृशनिरीक्षणनिवृत्तं नायकं प्रति दृष्टिविकारेण ज्ञात- रहस्याया नायिकाया उक्तिरियम् । तथा च वाश्यमनेक पदम् । तेनात्र तदे दानी पदात्मकवाक्यवैशिष्टयात् 'मत्सखी पोल विम्वितां पश्यतस्ते दृष्टिरन्याशी, चरितायां तु तस्यामन्यादृशीत्यहो मच्छन्नकामुकत्व तवेति व्यज्यते । वाच्यवैशिष्टयाद्वाच्यस्य व्यञ्जक्त्वमुदाहरति-'उद्देशोऽय सरस०' इति पद्यम् । अन्न नर्मदोद्देशरूपस्य तद्विशेषणीभूतवातकुक्षादिरूपस्य च वाच्यस्य- यथोक्तविशेषणस्य वैशिष्टयात् 'सुरतार्थ प्रविशे'ति व्यज्यते । अन्यसन्निधिवैशिष्टयावाच्यस्य व्यञ्जकत्वमुदाहरति-'णोलइ अणो०' इति प्राकृतं पद्यम् । अस्य छाया-'नुदत्यनाईमनाः श्वश्रूमा गृहभरे सकले । क्षणमात्रं यदि सन्ध्यायां भवति न वा भवति विधाम' इति । गुरुजनसान्निध्येन विशिष्य वक्तुमशानुवन्ती काचित् तटस्थतयेच सनिहितमुपनायक प्रति सङ्केतकालसूच. नाय प्रतिवेशिनी सम्बोध्य श्वश्रूपालग्भमाह । अन्यसनिधि. सन्निहितोऽन्यः तेनाह प्रतिवेशिनी प्रति प्रवर्तिते वाक्ये प्रच्छापुरुषरूपस्यान्यस्य सविधेवैशिष्टयात् सन्निहितं प्रति सन्ध्या सङ्केतसमय इति व्यज्यते । प्रकरणरूपप्रस्ताववैशिष्ट्याद् वाच्यस्य व्यञ्जकत्वमुदाहरति-'सुब्बइ समा- गमिस्सदि' इति प्राकृतं पद्यम् । छाया-'ध्रयते समागमिप्यति तव प्रियोऽध ४२ काव्यप्रकाश रहस्यम् प्रहरमात्रेण । एवमेव किमिति तिष्ठसि तत्सखि सजय करणीयम्' इति । उपपति प्रत्युपसतुं प्रस्थिता नायिका प्रति प्रियप्रत्यागमनवातां श्रुतवल्यास्तत्सरया जनान्तरसन्निधानेऽभिसरणनिवारणोक्तिरियम् । अत्र प्रकरणस्य प्रस्तावस्या भिसारसम्बन्धिस्वरूपवैशिष्टयादुपपतिं मयभिसतुं न योग्यमिति व्यज्यते । देशवैशिष्टयाद्वाग्यस्य व्यञ्जकत्वमुदाहरति-'अन्यत्र यूय कुसुमाव०' इति पद्येन सखीवेपधारिणा स्वोपनायकेन सहागतां प्रियसखीं दृष्ट्वा सखी प्रति नायि काया उत्तिरियम् । अन देशस्यातिविरिक्ततादिरूपवैशिष्टयाद् वक्तृवैशिष्टयादि सहितात्सख्या 'प्रच्छन्नकामुको युप्माभि प्रहेय' इति प्रियसखी प्रति व्यज्यते । अत्र कुसुमावचायमुद्दिश्यान्यदेशाधिकरणकत्वस्य विधेयत्वेन प्राधान्यादेशलक्ष ण्यादेव व्यञ्जकत्वम् । 'उद्देशोऽय' इत्युदाहरणे तु देशस्य विशेषणरवेनाप्राधान्या स्प्रधानीभूतवाच्यस्यैच चैरक्षण्यायक्षकावमिति भेद । कालवैशिष्ट्याद्वाच्यस्य व्यक्त्वमुदाहरति-'गुरुअणपरवस०' इति प्राकृत पद्यमस्य छाया-'गुरुजनपरवश प्रिय किं भणामि तवमन्दभागिनी अहकम् । अथ प्रवास व्रजसि बज स्वयमेव श्रोप्यसि करणीयम्' इति । अत्र 'अद्य' पदप्रतिपाद्य मधुसमयवैशिष्ट्याद् वक्कुरवस्थाविशेषसहितोदितादिदानी यदि ब्रजति तदा अह तावन्न जीवामि, तव तु न जानामि गतिमिति प्रिय प्रयनुरक्त्या व्यज्यते । आदिग्रहणाचेष्टालीलादे । तत्र चेष्टा यथा-(चेष्टावैशिष्टयाद्वाच्यस्य व्या कत्वम् )'द्वारोपान्तनिरन्तरे' इति पद्यम् । स्वगोचरचेष्टाविशेषेण नायिकाया स्वविषयकभावमवधारितवतो नायकस्य ससाय प्रयुत्तिरियम् । अत्रोरुसमास गादिचेष्टावैशिष्ट्यात् प्रच्छन्नकामुकविषय माकूतविशेषो ध्वन्यते । तत्र प्रथमार्धन स्पृष्टकमारि गनम् । शिरोंशुक पुरत आनीतमित्यनेन गूढमागच्छेरिति, अध तिप्ते चले लोचने वाचस्तन निवारित प्रसरणमित्येताभ्या सूर्यास्तसमये कोला हलरहिते काले समागन्तव्यमिति, सोचिते इयनेन पारितोपिकमालिङ्गन करोमीति व्यज्यते । यधप्येकत्रैवोदाहरणे भेदान्तराण्यपि सन्तीति तदेवोदाहरणा न्तर सम्भवति तथापि नि सन्देहव्युत्पतये प्राप्तावसरतया पुन पुनरुदाहियते । “क्तृबोम्यादीनां प्रत्येकमेव न स्यञ्जकत्व, किन्तु मिलितानामपीति द्रष्टव्यम् । द्वयोर्व्य किव यथा-'अत्ता एल्थ.' इति प्राकृतपद्यम् । छाया 'श्वश्रूरन ति अत्राह दिवसके प्रलोकय । मा पथिक रायन्ध शय्यायामावयोनिम तृतीयोल्लास. ड्वयसि' इति । अत्र गृहे श्वश्रूरह च । श्वश्रूव जरत्तरत्वेन दधिरा, निपन्दा च । जनान्तरसञ्चारस्तु नास्त्येव । अतो यथेष्ट मम शव्यायामेव स्वपिहीति व्यङ्गयं व्यभिचारिणोर्वक्तृबोव्ययोवैशिष्टयात् प्रतिभाजुषा प्रतीयते । एव निकादिभेदा स्वयमदगन्तव्या । -- ननु अर्थमात्रव्यञ्जवे शब्दार्थयुगलरूपकाव्यस्य व्यञ्जकत्व न मिमि- त्यत आह- "शब्दप्रमाणवेद्योऽयों व्यनरत्यर्थान्तर यत । अर्थस्य व्यञ्जकत्वे तच्छन्दस्य सहकारिता । इति शब्दरूपप्रमाणेन वेद्य प्रतिपादितोऽर्थ वायरच्यव्यङ्गयरूप अर्थान्तरं व्यङ्ग्यलक्षण व्यनक्ति प्राशयति तत् तस्मात्कारणात् अर्थस्य बनाये शब्दस्य सहकारिता विशेषगीभाव इति सुत्रार्थ । प्र० २-अन तृतीयोटासे 'तथाभूतां दृष्ट्वाः' इत्युदाहरणे वृत्तानु- क्तम्-'अत्र मयि न योग्यः खेद , कुस्पु तु योग्य इति काक्त्या प्रका- श्यते' इति। तत्र क आशयो ग्रन्यकृत ससमीचीनतया प्रतिपाद्यताम् । उ०२-अत्र 'गुरु खेद मयि भजति नाद्यापि कुरुवि ति काकोवैशिष्टयान्मयि न योग्य, कुरषु पुनर्योग्य मात्सर्यमिति व्यज्यते । नन्वत्रोक्तेन काकुच्यह पेन वा यस्य सिद्धि शोभनवनिष्पत्ति क्रियते। तथा चापराङ्गतया व्यदय गुणीभूतम् अतो न ध्वन्यन काकुरिति, चेत् न, उक्तव्यङ्गयस्य क्रोधप्रकर्षपर्यवमननया वाच्यस्यैव तदङ्गत्वात् (वन्यङ्गत्वात् )। ननु काकोबांच्यसिध्यङ्गत्वम्, यथोक्त झळकीकरमहाशय स्वीये च्याख्याने यथा-अन्न काकोर्वाच्यसिध्यगत्व न व्यगया. र्यादेपद्वारा अपि तु न भजति इति प्रश्नमात्रोपस्थापनद्वारैव । तेन हि वाच्यार्थे पर्यवसने सति व्यङ्गयप्रतीतिरिति कुतो गुणीभूतव्यङ्गय वशगा।' इति । तदेतदु चम् नच वाच्यमियगमन काकुरिति गुणीभूतव्यगन्य शङ्कयम्, इति । तथापि काकारितव्यङ्गयगुणीभूतव्यद्ययो प्रभेदता कथमपनेया इति चेत् न । अत्र नेति प्रश्न कायाऽपि कुरषु पुनर्योग्य मात्सर्य इति वाक्यार्थप्रतीतिपर्यवमानाद यो काकु विना वाश्यार्थबोध एव नोपपद्यते तयैवाक्षिप्तस्य गुणीभावाद । ।

काव्यप्रकाश-रहस्यम् यथा 'मध्नामि कौरवशतम्' इत्यादी भीमसेनादौ तादृशे वरि । देवदुधम् । प्रश्नमानेणापि काकोर्विश्रान्तेरिति । अनान्ये एवं कथयन्ति-कुरषु न मनदिर इति नकाकुः किमर्था, ततः प्रश्नरूपः किमर्थ एवेहाक्षिप्त इति तस्यैव गुर्गामायो न्याय्यः, ननु क्रमेणाऽपि काचा व्यङ्गयो गुणीभूतो भवति । अतएव गुणीभूत विभागे कायाक्षिप्तमिति आहुः । इति तृतीयोहासः समाप्तः ।

अथ चतुर्थोल्लासः H० - लक्षणामूलन्यगयध्वनेस्तथाऽभिधामूलव्यङ्गयध्वनेश्च म्ब- रूपं सोपपत्तिकं निरूप्य तयो दानपि सोदाहरणं प्रतिपादयत । उ०१-अत्र काव्यप्रकाशे द्वितीयतृतीयोल्लासयोः शब्दार्थयोनिर्णयः प्रति- पादितः। तददोषौ०' इति कान्यलक्षणे निरूपितौ शब्दायौं निरूप्य दोपगुणा. लङ्काराणां स्वरूपमभिधानीयं क्रमप्राप्तमिति कृत्वा दोषा: हि अपकर्पजनकाः, गुणाश्वोत्कर्षहेतवः तथा अलङ्काराश्योपकारका इति तेषां निरधिकरणस्यासम्भवात् कस्मिन्नधिकरणे एते उत्कर्ष जनयन्ति इत्यादि जिज्ञासा जायत एव । अत आश्र. यत्वेन धर्मिणः प्राधान्यम् । अत एवाहुः । 'उद्देश्यतावच्छेदकरूपेणोद्देश्ये ज्ञाते सति एव किञ्चिद्विधातुं निपेढुं वा शक्यते इति तस्मात् काव्यस्वरूपमनिरूप्य धर्मितावच्छेदकरूपेण धर्मिणमसंसाध्य तद्गता धर्मा विधातुं न शस्यन्त इत्युपजी- न्यत्वाद् ध्वनिरूपकाव्यस्वरूपं निरूप्यते । अविवक्षितवाच्यो यस्तत्रेति । अत्र सामान्यरूपेणाज्ञातस्य विभागो न सम्भवति । विभागो नाम स्वसमभिव्याहृतप- दार्थतावच्छदवच्याप्यपरस्परासमानाधिकरणयावधर्मप्रकारकज्ञानानुकूलो व्यापार यावत्पर्यन्तं पदार्थतावच्छेदकं न ज्ञायते तावत्पर्यन्तं तद्व्याप्यधर्मज्ञानं न जायते इति पदार्थतावच्छेदकज्ञानं पूर्वमपेक्षितम् । अतश्च ध्वनिपदार्थतावच्छेदक- स्याज्ञाने तदैविध्यविभागकथनमसङ्गतमिति तदाह यत्र ध्वनाविति । यद्यपि पूर्व ध्वनिलतगं न कृतं परन्तु यत्पदघटितवाश्येन ध्वनेरुद्देश्यत्वबोधनादुद्देश्यता- वच्छेदकरूपेणाऽज्ञाते सति तस्योद्देश्यता न सम्भवतीत्यनुवादसामर्थ्यादेव यन्त्र वाच्यमविवक्षितं प्रधानकवितात्पर्याविषयीभूतं तद्धनिरिति क्ल्पनीयमिति भावः । लक्षणायां तात्पर्यानुपपत्ति' अन्वयानुपपत्तिरिति बीजद्वयम् । तन्न तात्पर्या- नुपपत्तौ सत्यामर्थान्तरसमितवाच्यो ध्वनिः । 'खामस्मि वच्मी'ति श्लोकेन नान्वयानुपपत्ति किन्नु यथा क्यनस्यानुपयोगमात्रम् । अतस्तत्र वचनत्वेन सामान्येन वचन विशेष्यस्य उपदेशस्य प्रतीतिरिति वाच्यार्थः । अर्थान्तरे स्ववि- शेषे सक्रमितः । अन्वयानुपपत्तिमूलस्थले तु 'उपकृत'मित्यादौ उपकारादि- वांग्योऽर्थः अत्यन्तं तिरस्कृतो नाम बाधितः । अतो वाच्यार्थादन्यदेवापाराटिक लगयतीति सोऽश्यन्ततिरस्कृतवाच्यो ध्वनिः। अत एवात्र जहवनगा। पून तु अजहरणा।

काव्यप्रकाश-रहस्यम् अभिधामूलव्यङ्ग्यप्राधान्ये शून्यं वासगृहमित्यादौं वाक्यार्थप्रतीतेः रस प्रतीति प्रति कारणत्वात् तन्नान्वयानुपपत्तितात्पर्यानुपपत्ती न स्तः । अपि तु तत्र तात्पर्य सत्यपि तावन्मात्रे तात्पर्यविश्रमाभावात् तद्गतेन व्यञ्जनाच्यापारेण रसा-' 'दिरपि प्रत्याय्यत इति विवक्षितान्यपरवाच्यो नाम ध्वनिः । स चासँहदयक्रम व्यङ्गय लक्ष्यक्रमव्यङ्ग्यश्चेति द्विविधः । आद्यो रसादिः । यतस्तत्र विभावानु भावच्यभिचारिसंयोगाद्रसनिप्पत्तिरिति सूत्रानुसारेण संयोगस्य रस प्रति हेतुत्व प्रतीत्या हेतोश्च पूर्वभाविवनियमेन क्रमोऽस्त्येव । परं सामाजिकैाक्यार्थप्रती. त्यात्मकत्वेनैव रसादिप्रतीतेरनुभवात्क्रमोन प्रतीयते । उत्तरत्र तु अनुरणनन्यायेन 'उन णिचले त्यादौ निप्पन्दत्वेनाश्वस्तत्वम् । इत्यादिक्रमेणैव प्रतीयत इति सँलक्ष्य- क्रमव्यङ्गयध्वनिः । यत्र कैलासालयेत्यादिश्लोके पश्येत्कश्चिदिति श्लोके च शृङ्गारः भावशबलता वा प्रतीयते सा च 'सदा अायता मिति 'स्वद्विषोरण्यवृत्ते'रिति च पदोपस्थापितपार्वतीराजादिविषयकरत्यादिकमुपकरोतीति उपकारकलक्षणमला- रत्वं तेषां सब गुणीभूतव्यगयाभिधाने वक्ष्यते । शून्यं वासगृहमित्यादिश्लोके काकार्य मिति श्लोके च भृङ्गारः भावशवलता वा प्राधान्येन प्रतीयते न तु तदपेप- यापि श्लोकप्रतिपाद्यं प्रधानं किञ्चिदस्ति अतः स एव सरुपक्रियते नस्वन्यमुप- करोतीति सोऽलङ्कार्यः। म०२--रसलक्षणनिरूपणाय व्याख्यायेतामिमे कारिके-- कारणान्यथ कार्याणि सहकारीणि यानि च । रत्यादेः स्थायिनो लोके तानि चेन्नाट्यकाव्ययोः ।। विभावा अनुभायास्तरकथ्यन्ते व्यभिचारिणः । व्यक्तः स तैर्विभावाद्यैः स्थायीभावो रसः स्मृतः॥ उ०२-तन्त्रानादिसंसारसम्बन्धानुभूतनानाभावानां प्रत्यात्मसंस्काररूप- तथा स्थितिर्वर्तते सरसु चैतेपु भावेषु कारणकलापसमवधाने तेपामुद्रोधो भवति। अत एव ते स्थायिन उच्यन्ते। यद्वा काव्य आप्रबन्धसमाप्ति अविच्छेदेनेतररस. विरुद्धाऽविरुद्धभावैरतिरस्कृतत्वेन च वर्तमानतया ते तथोच्यन्ते । यदाहुः- अविल्दा विरुद्धा वा यं तिरोधातुमक्षमाः । आस्वादाकुरकन्दोऽसौ भावः स्थायीति सम्मतः॥ तेपाञ्च स्थायिनां यमालम्ब्योद्गमो भवति यश्च ते उद्दीप्यन्ते ते लोके कारण- ४७ चतुर्थोटासा पदव्यवहार्याः काव्ये विभावयन्तीति व्युत्पत्याऽऽलम्बनोद्दीपनरूपा विभावा उच्य- न्ते । तत्र नायिकादिरालम्बनविभावः । उद्यानादिकमुद्दीपनविभावः । तस्कार्य- भूताश्चानुभावाः। अनुभावयन्ति स्वगतान् रत्यादीन् परात्मस्वापादयन्तीत्यनु- भावाः । अथवा अनुभवरत्यादेः पश्चाद्भवन्तीत्यनुभावाः । एतेन तेपो कार्यत्वमुक्तं भवति । व्यभिचारिणः सहकारिकारणानि । यदुक्तम्-'विशेषादाभिमुख्येन चरन्तो व्यभिचारिणः इति । विशेषाइत्यादेरुद्रेकात् नहि रत्युत्पत्तिमात्रेण चित्तो- न्मादादीनामवसरः । आभिमुरयेनानुकूल्येन । एतैश्च विभावानुभावव्यभिचारिभि. मिलितैय॑क्त आस्वादयोग्यतामापादितो रत्यादी रसः । व्याख्यातमन्यत् । प्र० ३-काव्यप्रकाशोतरसवादप्रपञ्चस्तेनैवोक्तदिशा व्यारयाय तेषां हेयोपादेयते अपि सविस्तरं प्रतिपादयत । उ०३-अत्रेद विवृण्वत इति । भट्टलोल्लटप्रभृतयः इति सम्बन्धः । 'वि- भावानुभावव्यभिचारिसंयोगानसनिप्पत्तिः', इति भरतसूत्रे हेतौ पञ्चमी । हेतु- स्वञ्च कारकत्वं ज्ञापकत्वं वा। ज्ञापकत्वेऽपि तद्विपयकानुमितिजनकज्ञानविषयत्वं वा, तद्विषयकप्रत्यत्तजनरज्ञानविषयत्वं वा, तद्विपयक्शाब्दजनकज्ञानविषयत्वं वा । तत्र कारकत्वमतानुयायिनो भट्टलोल्लूटप्रभृतयः । तेपामयमाशयः । रत्यादयो हि न समवायेन नटे सामाजिके वा सम्भवन्ति । तदानीं तयो- स्तदुत्पादकसामप्रयभावात् । शिक्षाभ्यासादिमात्रेण रामादिरूपतां दर्शयतो नटस्य इत्युत्पादकसामग्रया लेशोऽपि न शक्यते वित्तुम् । सामाजिकेऽपि सीता- दिगतपूज्यत्वबुद्धेर्जागरूकतया प्रत्युत वैरस्यप्रसङ्गः । अतः सीतादिदर्शनेन तरकार्यभूतेन भ्रूविक्षेपादिनाऽनुभावेन सहकारिणा चौत्सुक्यादिनाऽनुकार्ये रामा- दावेव रतिरुत्पद्यते । सैव चरति निरतिशयसुसास्वादरूपो रसो नाम । नटे तु न तस्य वास्तविकी स्थितिः। किन्तु तग्य तद्रूपेण रूपितत्वादत्यन्तं सदृशयो. स्तयोर्भेदस्याप्रतीतेः सा भ्रमरूपैव । कथमन्यदीयसुखकारणैरन्यस्य रसोत्पत्तिः स्यादिति । ततश्च सूत्रे कारकहेतुत्वम् तन्मते विवक्षितम् । निष्पत्तिः उत्पत्तिः। एतदे- वाह वृत्ती विभावैरित्यादिना। तत्र वासनारूपतया सूक्ष्मतया वर्तमानान् स्या- यिनो रत्यादीन् विभावयन्ति मास्वादाङ्करयोग्यतां नयन्ति इति व्युत्पत्याऽऽल.

काव्यप्रकाश-रहस्यम् म्वनोह पनभेदेन विविधो लल्नोद्यानादिर्विभाव । तथाविधास्ताननुभावयन्ति इत्यनुभावा क्टाक्षादय । प्रभृतिपदात्- स्तम्भ स्वेदोऽथ रोमाश स्वरभद्गोऽय वेपथु । वैवयंमथुप्रलय इत्यष्टौ साविका स्मृता ॥ इति सात्विकाना सङ्ग्रह । तथाविधाच रयादीन् विशेषेण चारय तीति व्यभिचारिणो निर्वेदादय । यदाहु 'विशेपादाभिमुख्येन घरन्तो व्यभि चारिण' इति । अत्राहु । अनुकार्ये रामादौ रसोत्पत्यङ्गीकारे कथ सामाजिकेषु रसोदोध । कयञ्च तैपा नाट्यादी प्रवृत्ति । न च रामादिङ्गारदर्शनेनैव सामाजिकाना रसोरोध इति वक्तु युक्तम् । लौकिकारादिवत्तस्य धमस्काराहेतुत्वात् । किश रामादिगतरतरेव रसत्वे रसस्यानन्दामकरवात्तद्गतक्रोधभीत्यादेरपि सुखस्व वाच्यम् । तच्चैतदनुभवविरुदम् । नहि लौकिकदु सकारणे सुखोत्पत्ति कचिदपि परिदृश्यते । अतो न पूर्वोक्तलक्षणो रस । नापि सूने कारकहेतुश्वमर्थ' किन्तु विभावादिभिरक्तरूपै सयोगादनुमाप्यानुमापकभावसग्य धात् रसस्य निप्पत्तिरनुमितिरिति सूनस्यार्थ इति श्रीशङ्घकादीनां द्वितीय मत सदाह 'राम' इत्यादिना । अस्य हार्य । प्रथम मटे लोकप्रतीतिभ्यो विलक्षणतया रामोऽयमिति प्रति पद्यते । तथा गृहीते च तस्मि पक्षे भूविहेपादिकार्यकारिस्वेन हेतुना 'सीताविषय करतिमान् भ्रूविक्षेपादिकारिरवाद इति रतिमच भूयो गृहीतव्याप्तिकै सामाजि कैरनुमीयते । ननु नटे भूविक्षेपादीमा कृत्रिमत्वात् क्य तैरनुमितिरिति चेन्न । अभ्यासपाटववशन रोमानो क्ण्टादीनामभिनयाद्वस्तुत कृत्रिमैरपि भावना महिम्ना तथाऽप्रतीयमानस्तरालम्बनोद्दीपनकारण स्थायिनो रत्यादेरनुमानस्य सुवचरवात् । सैवानुमिति सामाजिक क्रियमाणा रस । तत्र नटे रामोऽयमिति प्रतिपत्तलोकस्य चैटण्य प्रदर्शयति । राम पुयति । इद तावत् निश्चयारमक ज्ञानम् । तत्र राम एवायमि यताऽयोगव्यवच्छेद । अयमेव राम इत्यनान्ययोग व्यवच्छेदः सूचित । मिथ्यानानमाह यज्ञानम् । तच्च न रामोऽयमियोत्तर कालिके याधे रामोऽयमियनेनोक्तम् । यासीनमियाजन्य ज्ञानमाहार्यम् । राम स्यादा न वाध्यमिति सशय । रामसदृशोऽयमिति सारश्यधी । एभ्यो .

चतुर्थोल्लासः विलक्षण नटे रामोऽयमिति प्रतिपत्ति । सा च नटे रामत्वचाधग्रहेऽपि रामसह- शाकारेण चित्रगतेश्वेऽश्वाकृतिमत्त्वेनाश्व इतिवद्वतीति । दृष्टस्य जातेबर्बाधे आकृतिप्रकारो बघ । यथा पिष्टकमय्यो गाव क्रियन्तामियादी जायाकृति व्यक्तय पदार्था इति तस्य पदार्थस्वागीकारात् । 330 अनाहुभट्टनायकादप । नटस्य हि नटखन ज्ञाने तत्र सौ सोमाविष्यकाति- धिता, चितुरगन्यायेन रामस्वेन गृहीतेऽपि राम सीताविषयकरतिमान् इत्य नुमि या सामारिकाना कम रसोद्बोध तत्र तेपामुदासीनत्वात् । स्वात्मनि रति. मत्वज्ञाने च सम्याना ब्रीडातङ्कादिप्रसङ्ग केन वार्यत । एवञ्च पक्षोऽप्रत्यक्ष । म च पक्ष विनाऽनुमितिर्वक्तु शक्यते । अनुमित्यसम्भवे च कुनो रसास्वादार्थिना सामाशिकाना तत्र प्रवृत्ति स्यात् । किञ्च प्रयतमेव चमकार हेतुनानुमितिरित्य- नुभवविरोधश्च । तथा सति कथ रस साहात्करोमि इत्यनुव्यवसाय स्यात् । तस्मान पूर्वोक्त सम्यक् । अपि तु विभावादिभि सयोगादो यभोनकभावरूपा दसस्य निष्पत्तिभॊग इति सूत्रार्थ । ननु कथमन्यगतैर्बिमावादिभिरन्यगत एवं स्थायी अन्येन भोक्य इति चेदाशङ्कयते तत्र वदामः-इह खलु काव्यस्य शदात्मकस्य त्रयो व्यापारा । अभिधा, भावकत्व भोजकत्व चेति । तत्राभिधा- तत्तत्पदार्थोपस्थितिप्रयोजिका । भावकत्र साधारणीकरणपरपर्यायम् । तेन व्यापारेण विभावादय स्थायी च साधारणीक्रियन्ते । अर्थाकामिनीवादिसामा. न्येनोपस्थाप्यन्ते । ततश्च भावनावशेन स्वगतपरगताशत्वयोर्मोपाढतिवमात्र पुरस्कारेण बोधो भवति तैश्च साधारणीकृतविभावादिभिस्तथाकृत एवं स्थायी मुज्यते । भोगश्वानन्दात्मको रसपदच्यवहार्य । एवञ्च प्रत्यक्ष एव रस । न च शब्दान्वयव्यतिरेकानुविधायितया तर शादत्वमपीति वाच्यम् । सङ्करप्रसङ्गात् । शाब्दत्वप्रत्यक्षयोर्युगपदनवस्थानात् । एनदेवाहन ताटस्थ्येनेति । तटस्थ उदासीनो नो रामादियां । नटगतत्वे वाघो, रामादिगतत्वे सभ्यानामौदासीन्यम् । तृतीयमपि निरस्यति नारमगते. नेति । रसो न प्रतीयते नानुमितिविषयीक्रियते तथा सति सामानिशाना ब्रीडा• तङ्कादिभमनात् । किसानुमितिरपि न सम्भवतीति प्राक् प्रतिपादितम् । नोत्पद्यते विमावादीनामास्तर वात् । रसस्य च समूहालम्बनत्वात् । नाभिव्यज्यते न न्यानयोपस्थाप्यते । रसस्य पूर्वमसिदत्वात् । सिइस्येव दरसम्मवादिति भाव । अपि तु काये नारचे चभिधातो (लक्षगानोऽपि) अन्येन भावात्मनाम्ना ४का०प्र० काव्यप्रकाश-रहस्यम् साधारणीकरणेनालौकिकव्यापारेण भाव्यमान साधारणीक्रियमाण साचोनेकेति सवस्योद्रेण रजस्तमसी अभिभूयाविर्भावेन प्रकाश्यमानो य मानन्द तदात्मिकैव सवित् ज्ञानम् तस्य विश्रान्तिवेद्यान्तरसम्पर्कशून्यतयाऽवस्थान सत्सतत्वेन स्वरूपेण भोगेन भोजकत्वव्यापारणेति । अभिनवगुप्तपादादीना मते सर्व भट्टनायकवदेव । विशेषस्तु 'दशमस्त्वमसी'- त्यादी एकत्रैय शाब्दप्रत्यक्षयोईष्टतया शब्दान्वयव्यतिरेकानुविधानस्यैव ध शाम्द- स्वायोजकत्वेन, तस्य च श्रव्ये वर्तमानतया अभिधादेश्व विरतत्वेन तत्र म्यद्य. स्वमपि । नापि तन्मते भावकत्वभोजक वारय व्यापारद्वय करप्यते प्रमाणाभावात् भुक्तानातिरिक्तत्वस्यानुभवविरुदत्वात् । इति तदेतद्विवृण्वते लोके इति । प्रमदादिभि प्रमदोद्यानकटाक्षोत्कण्ठादिभिरालम्बनोद्दीपनकारणकार्यसहकारिभि' स्थायिनो रत्यादेरनुमानेऽभ्यासपाटववतां सामाजिकानामित्यप्रिमेणान्वय । अत एवं सवासनानामेव रसास्वादो नेतरेपामरसिकानामित्युक्त भवति । यदाहुः-- सवासनामा सभ्याना रसस्यास्वादन भवेत् निर्वासनास्तु रङ्गान्त काष्ठकुड्याश्मसन्निभा । इति काव्य उतरूपे नाट्ये 'आशिको याचिकश्चैवमाहार्य साविषस्तथा' हरयुक्त चतुर्विधाभिनयारमके दृश्यकाव्ये तैरेव प्रमदादिमिरेव कारणत्वादिपरिहारेण लौकिककारणत्वकार्यरवसहकारित्वव्यपदेशपरित्यागेन विमावनादिव्यापारवस्वात् मादिपदादमुभावसञ्चारिणी। ननु तथापि कथमन्यनिष्ठैविभावादिभिरन्यनिष्ठस्य स्थायिनोऽभिव्यक्तिरित्यत्त आह-ममैवैते इयादिस्वगतत्यपरगतत्वाशयोर्मोपात् साधारण्येन प्रतीतैस्तै स्याय्यभिव्यक्ती वाधकाभावादिति भावः । अत एवं च बीमासादिभ्यः सुखमेव सायत इयत्र न विरोध । असाधारणीवृत्तस्तै. चरवात् । तत्कालविगलितेति-तत्काले रसास्वादकाले विगलितो. य परिमितममातृभावः ममैवैते अहमेव रसास्वादयिता इत्येवरूपेणानु- भूयमानो यो व्यक्तिविशेषसम्बन्ध तद्वशेनोन्मिपितो वेद्यान्तरसम्पशून्योऽपरि- मितभावो यस्य तेन प्रमात्रा सामारिकेन सकलसहृदयसवादभाजा प्रमाविशेष सम्बन्धित्वतत्समवेतत्वामहरूपेण साधारण्येन (साधारणीकरणव्यापारेम) स्थायी चच्यते "विमावदिजीपिताधीपरि त्योम चणाया भीनस्यत्वमुमपुर इव प्रविशन इत्यादि रसस्तच शेपं स्पष्टम् ।

चतुर्थोल्लास. म०४-काव्यप्रकाशकूदुक्तरसप्रपञ्चनिष्फर्यतो रसस्वरूपं कथं निर्धारितं भवतीति सामान्यरूपेण सविस्तरं प्रतिपादयत । उ०४-अथ रसस्वरूपमाह 'कारणन्यथ कार्याणी ति कारिकादयेन । स्था. यिन स्थितिशीलस्य रत्यादिसस्कारस्यति यावत् । रत्यादाना हि ज्ञानरूपत्वात् नृतीयवग एव नाशात् स्थितिशीलव न सम्भवति इति रस्यानुभवजनित सस्कार एव स्थायिपदेनोच्यते इति स्वशास्त्रसङ्केत । यद्यपि सस्कारे कारणमनु भव एव तथाप्यत्र सस्कारोवोधे कारणनिति इयम् । विशेषेण भावयन्ति सस्काररूपेण स्थित रत्यादिक रतित्वादिनाउनुभवगोचरतामापादयन्ति इति विभावा नायिकादर्शनात्पूर्व न्याघ्रदर्शनात् पूर्व वा जनादौ ससारे अनादीना जीवाना पूर्वपूर्वजन्मसु कदाचित्कदाचिन्नायिकाव्याघ्रादिदर्शनजनितरतिभीत्या दिसंस्काराणा वर्तमानत्वेऽपि इदानी नायिकादर्शन मिनाऽह रतिमान् इति याप्रदर्शन विनाऽह भीतिमानिति न कश्चिदनुभवति । भत विशेपाकारेण सस्कारमुत्पादयन्तो विभावा उच्यन्ते। तत्र समवायसम्बन्धेन रत्याधुबोध प्रति यद्विषयक ज्ञान कारण स मालम्बनविभाव इत्युच्यते । समूहालम्बन ज्ञानमित्यादी विषयस्यालम्बनपदेन प्रसिद्धे । उखुद्भस्य रस्यादेश्विरकार वृत्तित्व सम्पादक उद्दीपनविभाव इत्युच्यते । न हि नायिकादर्शनमात्रेणोदबुद्धाऽपि रति पुण्यक्षेत्रे पर्वकाले वा चिर तिष्ठति अपि तु उपवनवसन्तादिप्वेन । अतस्त उद्दी पनविभावा उच्यन्ते । यद्यपि नायिकादर्शनेन सस्कारोद्वोधात् तजनिताऽपि रति- नित्वादेव तृतीयतणे नश्यति तथापि तादृशरत्यादिपूर्वजनितज्ञानबाधविजा तीयज्ञानानन्तरितपूर्वज्ञानसनातीयज्ञानपरम्पराधारोत्पादनमेवान चिरकाल- वृत्तिरवपदेन बोध्यम् । अनुमावास्तु अनु पश्चाद् ममन्तीति एवं व्युत्परमा कार्य रूपा अनुभावयन्तीति व्युत्पत्या 'कार्याकारण गम्यत' इति न्यायेन ते एव परा• रमसमवेता रति पर प्रत्यक्षीकतुंमयोग्यामनुमापयन्तीति अनुभावा । व्यभिचा- रिगस्त अनियतत्वादती सत्यामालम्पनविभावस्य नायिकादरचोन्मादादेरनियत स्वादश्यापका व्यभिचारिण इयुच्यन्ते । अथवा रत्यादीना विशपादाधिक्या दाभिमुत्येन चरन्ति रत्यानुकूल्यनैवोत्पद्यन्ते इति ध्यु पत्तिद्वयेन तथो- प्यन्ते । नहि सर्वदा रतौ सत्यामुन्मादो भवत्येवेति नियम । आधिक्ये नु कदाचित् भवत्यपि ते जायमाना भपि न रतिं विनाशयन्ति । अपि तु परि- पुणन्त्येवेति लोकसिद्धम् । तदेवाह-'सकसूत्रवृत्त्या मावानामिति तै विभावा- પર काव्यप्रकाश-रहस्यम् यतः व्यञ्जनाच्यापारेण प्रत्यायितः रस्यादिः रसपदवाच्यः । असंहाच्या क्रमच्यङ्गय क्रमस्य सत्तायां भरतसूत्रसम्मतिमाह-विभावानुभावेत्यादि । अन संयोगादिति हेतौ पञ्चम्या तस्य प्राग्वृत्तित्वं बोधितम् । तेन प्रमोऽस्ति । ध्यातु न प्रतीयते इति भावः। अत्र सूत्रस्य ज्यास्यानचतुष्टयम् । हेतौ पञ्चमी संयोगस्य कारकहेतुत्वमाह । तेन रसनिप्पत्तिरित्यस्य रसोत्पत्तिरित्यर्थः । अयं छ कार्यत्ववादः भट्टलोलटादीनाम् । एतेषां मते अनुकार्य रामादावेव रसः सीतो. पवनौसुक्यादिसंयोगस्य राम एरसम्भवात् । सामाजिकानान्तु तदनुकारिनटदर्शनेन रसप्रतीतिः भ्रमात्मिकैव। एतन्मते रामसमवेताया रतेः सुसारमकत्वमित्र भीत्यादेवुःखात्मकत्वमपीति सर्वेषां रसानामानन्दात्मकत्वं न सिक्ष्यति । किश विभावादीनां कारणत्वं हि न समवायिकारणरवं ज्ञानारिमको रति प्रति रामस्यैव समवायिस्वात् । नापि असमवायिकारणत्वं गुणक्रिययोरेवासमरायित्वाहीकारात् । आत्मविशेषगुणभूतायां रती असमयायिकारणासम्भवाच । अतः निमित्तकारण- त्वमेव वाच्यम् । तथा च तनाशेऽपि रसः स्थिति प्राप्नोति । न हि निमित्तकारगे दण्डादौ विनष्टे घटस्यापि नाशः । अत्र तु विभावादिनीवितावविरवं वदरते । किस रामात्मनि समवेताया रतेरेव रसरये सामाजिकानां तरमत्यासम्भवात् तदास्वादनाथं तेषां प्रवृत्तिरपि अनुपपन्ना स्यात् । नसारोपितररयादिप्रायसाय कोऽपि प्रयतते इति दृष्टम् । तस्मादसकार्यत्ववादो न युक्त । अपि संयोगा- दिति झाप्यत्वहेतौ पञ्चमी । तत्र ज्ञानस्वं तमन्यज्ञानविषयत्वम् समन्यज्ञानमनुः मितिरिति श्रीशाकः । प्रत्यक्षारमकमिति भट्टनायकः । आचमते नर्तकंगतो रसः अन्त्ये सामाजिकगतः। निम्पतिरित्यस्यानुमितिरिति आद्यमते । भुतिरिति चान्येऽर्थः । साक्षात्कार ए च भोगपदेनोच्यते मुग्पभोग इत्यादी तथा दर्शनात् । साधारकारत्वेऽपि दशमस्त्वमसीत्यादी प्रत्यसरवशाब्दत्ययोदर्शनात् । इन्द्रिय- . निरी एकस्मिन्नपि शाने शब्दयप्रत्यार दोपानाधायकत्याच्छाब्दत्यप्रत्यक्षरवयोगातिरयानी- काराद्वा एक्म ज्ञाने द्वयोः सत्त्वेऽपि न दोपः । अत्र हि सामाभिमानामा- रमनः संयोगादिसामप्रयो सत्यामेव यथा रमप्रत्यक्षमे 'शून्यं यासगृहमित्या. दिलोकार्थज्ञाने सत्येव नान्यथा । अतः प्रत्यसमारणस्येर शान्दयोधकारण. स्यापि अन्वयव्यतिरेको स्त एर। तत्र शब्देन रसमाती जननीयायां न दाब्दगतः अभिधान्यापारः । तस्या पाच्यार्थयोधनमार्णवं विस्तायाम् ।

चतुर्थोल्लासः विरम्य व्यापाराभावात् । नापि रक्षण मुरयावाधावभावात् । मीमास- काभिमततारपर्याख्यवृत्तिस्तु पदार्थयो समामात्रबोधनेनोपनीणा न बोधोपयोगिनी । अत व्यत्तिर्नाम व्यञ्जनाच्यापारोऽभिनवगुप्तपादादिभिराश्रित । एवञ्च उत्पत्ति , अनुमिति , भुक्ति, व्यक्तिरिति क्रमेण चत्वारो वादा । तनानु- मितिपते पक्षतावच्छेदकल्पेण पदप्रत्यक्ष सत्येद तस्मिन्हेतुनिश्चरेन साध्यानु- मितिर्भवति । अत पक्षप्रयक्षमुपपादयति--राम एवायमित्यादिना । अत- (काटीने नटे त्रेताकालोत्पन्नरामभेदस्य निश्चितत्वादय नट रामान्यो नेति ज्ञान न सम्भवति । नापि रामो नटान्यो नेति ज्ञान, नाप्यय रामो न वेति सशया- स्मक तथा सति पक्षतावच्छेदकरूपेग पक्षप्रत्यक्षाभावादनुमित्यभावप्रसङ्गात् । नापि न रामोऽयमिति सय भेदज्ञान पूर्वोक्तदोपादेव । अत एव न रामसहशोऽ यमिति ज्ञानम् । नहि पक्षसादृश्यमात्रज्ञानेन अनुमितिदृष्टा । अपि तु राम व वाधमहे सति रामगवावयवसस्थानदर्शनेनातिमकारक रामोऽयमिति ज्ञान यथा चित्रतुरगे जातेधे आकृतिमानप्रकारिका प्रतीति । अत एवाहु –'जात्याकृति व्यत्य पदार्था' इति । एतेन पक्षप्रत्यक्षमुपपादितम् । 'सेय ममाङ्गेल्यादिना । तन हेतुप्रयक्षमुपपादयति । यद्यपि नट रत्यादिशून्योऽप्यन्यासमात्रेण तथा तथा प्रदर्शयति एव केवलम् । तथापि सामाजिकास्तहतान् हेतून् कृत्रिमत्वेन न जानन्ति । एवञ्च कृत्रिमत्वेनाज्ञात रत्यादिकार्यभूत विलापहर्पवादादिभि मटा मनि रतिरनुमीयते। अनुमीयमाना रतिरेव रस ।यद्यपि नटे रतिमनुमिनोमि इति सामाजिकानामनुव्यवसायो युक्त, तथापि तस्या अनुमिते सुखविशेष जनकत्वादन्यानुमितिवरक्षण्येन रतिं साक्षारक्रोमीत्येवानुव्यवसाय इति श्रीशङ्कुकमतम् । . रसस्यानुमेयत्वपक्ष-'नट सीताविषयकरतिमान्' इत्यादि वाधज्ञाने सति न सम्भवति, मर्वे हि सामाजिश नद शिक्षाभ्यासादिमात्रेण तथा तथाऽनुकुर्वन्त- मेव जानन्ति न रतिमत्वादिना । किञ्च अन्यायमगतरत्यनुमानेन सामाजिकाना क्थमानन्द । नहि प्रत्यक्षेग जायमान पल्मनुमानमानेग भवति । तथा सति मोदकभोजनायनुमानेनापि तृप्त्यादिप्रसङ्गात् । बत रसस्य प्रत्यक्षवनेव वाच्यम् । तोय, काव्यस्य निरन्तरालोचनेन नाट्यस्य सन्ततदर्शनेन सामाजिकाना प्रथम 'राम सीताविषयकरतिमान्' इत्यादि विशिष्टवैशिष्टयावगाहि ज्ञानमेव जायते ।

५४ काव्यप्रकाश-रहस्यम् तस्यैव च निरन्तराभ्यासदशायां सीताविषयवरामसमवेतत्वांशप्रमोपो भवति । ज्ञानाभ्यासे हि द्विविधमपि सामर्थ्यमस्ति । पूर्वपूर्वज्ञानविपयेण सहोत्तरशाने अधिकविषयत्वं यथा व्युपित्सुदशायां पूर्वमेकैकं पदार्थ मनसिकृत्य पश्चाद्वितीयादि. पदार्थैः सह तान् चिन्तयन् व्युरिपत्सुः क्रमेण महावाक्यार्थमपि एकक्षणे एव जानाति। पूर्व विशिष्टवैशिष्टयावगाहिज्ञाने सत्यपि तदीयैकांशप्रमोपेण घरमज्ञान- दशायामेकपदार्थमात्रम्। भूविक्षेपकटाक्षकारियादित्यनुमानाकारो वाच्यः । सच नटो न रतिमान् जानाति । यथा कीटभ्रमरस्थले ब्रह्मसाक्षात्कारे वा प्रथम कीटो भ्रमरो मामागत्य दक्ष्यतीति जानपि क्रमेणैकैकांशप्रमोपे भ्रमर- मात्रविषयीकुर्वन् स्वयं श्रमररूपो भवति तथैव ब्रह्मज्ञोऽपि । इत्थश्च सीता. विषयकत्वांशप्रमोपे सति रतित्वेन ज्ञायमाना रतिः स्वात्मनि संस्काररूपेण रति विषयीकरोत्येव । अयमेव साधारणीकरणामा व्यापारः इत्युच्यते । 'अहं सीता. विषयकरतिमानित्याकारकज्ञाने उच्यमाने सामाजिकानां प्रीडाऽऽतक्षादि प्रानोति । 'रामः सीताविषयकरतिमान्' इति ज्ञाने तु परास्मसमवेतरत्यादीनाम- प्रत्यक्षतापातः । अत एवमुच्यते । एतादृशज्ञानोत्पत्तौ च सरवोदेको निमित्रम् । ततश्च व्यक्तिविशेषवृत्तित्वव्यक्तिविशेषसमवेतत्वांशप्रमोपवती रतित्वेन ज्ञाय- माना सत्वोद्रेकजनिता रति तिवेत्येवंरूपा वृत्तिः सत्वाधिक्यस्वभावात् सुखमेव जनयति न भयादिकम् । पुत्रमरणादीनां राज्यलाभादीनां वा स्वारमगतत्वेन प्रतिसन्धीयमानानामेव दुःखादिहेतुरवं लोके प्रसिद्धम् अत आत्मसम्बन्धित्वेन ज्ञायमानानामेव तेषां शोकादिहेतुत्वं वाच्यम् । तचात्र नास्तीति न कोऽपि दोपः, अयमेव भुक्तिवादः। प्र. ५-व्याख्यायतां निनोद्धृतपदपङ्किः सोदाहरणं स्पष्टीकृत्य- 'यद्यपि विभावानामनुभावानामौत्सुक्यवीडाहर्पकोपासूयाप्रसादानां च व्यभिचारिणां केवलानामत्र स्थितिस्तथाप्येतेषामसाधारणत्वमित्यन्य- तमद्वयाक्षेपकत्ये सति नानैकान्तिकत्वम् ।' उ०५-अत्र ग्रन्यकृता श्रीणि पद्यान्युदाहृत्य केवलविभावात्मिका, केवला. नुभावात्मिका तथा केवलकतिपयव्यभिचारिमावास्मिका स्थितिः सम्प्रदर्शिता । केवलविभावारिमका स्थितिरत्र 'वियदलिमलिन' पधे, केवलानुभावानामस्तित्व चतुर्थोल्लासः 'परिभूदितमृणाली' इति पये, तोसुक्यनीडाहर्पकोपासूयाप्रसादानां व्यभिचारि- मात्रागां वर्तित्वं 'दूरादुत्सुमिति पये प्रदर्शितमस्ति । तत्र आये पये 'प्रणतिपरे प्रेयसीति कामिनीगताया रतेरालम्वनविभावस्य 'वियदम्बुगर्भमेधम्' इति। मधुकर "दिशां श्रीः, धरगि..."टङ्क, इति उद्दीपन विभावानामेव केवलानां स्थिविः साक्षादुनिखिता वर्तते । तथा द्वितीये पद्येऽङ्गानां ग्लानत्य, हियासु प्रवृत्तिजाड्यं तथा कपोलस्य पाण्डुतादिकेवलानुभवानामेवोल्लेखः, तया च तृतीये पद्ये 'दूरादुत्तु- के'त्यादिविशेषणैःक्रमेण व्यजितानानौत्सुक्यलजाहर्पकोपासूयाप्रसादानां व्यभिचा- रिमात्राणामुलेखः । यद्यपि प्रसादस्य व्यभिचारिभाषेषु गणना न दृश्यते तथापि मनःप्रसादस्य हर्षापरपर्यायतया व्यभिचारिपु योज्यः । तृतीयोदाहरणे यद्यपि प्रेयसीति आलम्बनविभावस्य निर्देशसवात् तथापि तस्य रतिधर्मानुकूलत्वेन निर्देशासत्वादनस्तिमायो ज्ञेयम् । विभावानुभावव्याभिचारिमिर्मिलितैरेव तैः स्थायिभावो रसः स्मृतः इत्युक्तं प्राक् तर्हि क्थमत्र रसस्योपनिरिति चेन्नैवम् । पूर्वोक्तेषु विष्वपि पयेषु विभावानामेव केवलानाम् प्रथमे, अनुभावमात्राणां द्वितीये, व्यभिचारिमात्राणां च तृतीये असाधारणत्वसत्वेऽपि द्वयमन्यदपि तथाऽऽ- निप्यते एव । असाधारणत्वं नाम मुख्यत्वं, सटित्यास्यापकत्वम् अय प्राकरणिक- नियतावस्थितिकरवं चा शेयम् । अनैकान्तिकरवं, व्यभिचारित्वम् । तद्रसनिष्पा तिहेतुत्वे अनेकान्तिकत्वं नेति नानकान्तिकत्वम् । अत्राय भावः । रसस्य समूहा. लम्बनरूपत्वादेकैकस्मादसाधारणादपि रसव्यक्त्यभावात् मिलितानामेव ब्रयाणां व्याकरवम् । अतोऽसाधारणेनापीतरद्वयमामिप्यत इति मिलितैस्तदभिन्यक्ति- रिति मानेकान्तिकत्वम् । । प्र.---'ङ्गारहास्यकरुणरौद्रवीरभयानकाः। बीभत्साद्भुतसंझौ चेत्यष्टौ नारथे रसाः स्मृताः' इति कारिकोकरीत्या प्रतिरसं स्थायि- भावस्य विभावादीनाञ्च स्पष्टतया निर्देशः कार्यः। 'शान्तोऽपि नवमो रसः' इत्यस्याप्यत्र समावेशः कार्यः। उ०६-अत्र 'स्थायिभावो रसः स्मृतः इति निर्देशात् कारस्य रतिरेव स्थायी। कान्ताधालम्बनविमाः । सरचन्दनाधुद्दीपनविभावः। कटादाधनु- भावः । नीडादिसचारितः शृङ्गारः इत्यं कोष्टकरूपेणान प्रदर्श्यते- काव्यप्रकाश रहस्यम् रस | स्थायिभाव आलम्बन वि० दीपन वि. अनुभावा सश्चारिभावा हास द्विषद् भृङ्गार रति कातादि स्रक्चन्दनादि कटाक्षादय बीडातात्य हास्य विकृतिकृत वैकृतादि गलफुहनादि श्रमादि करुण शोक मृतादि मृतगुणादि रोदनादि दैन्यादय क्रोध द्विषदपकार दिकथनादि गर्वादय वीर उत्साह द्विषद्विद्वजन अपकारादि प्रतिकारादय हर्षावेगचित्रादय भयानक भयम् विकटादि विकटकर्मादि । पलायनादि जडतादव. बीभत्स जुगुप्सा विण्मूत्रादि दुगधादि निष्ठीवनादि ग्लान्यादय विस्मय विस्मयजनक विस्मयकम चकिततादि हर्षादय कमा शात निर्वेद शमोवा मिथ्यात्वेन तपोवनादि अहिहारायो मतिधृति परिमायमान समदर्शनम् हर्षादय जगत् प्र० ७-पूर्वोक्तनवरसानां लक्षणोदाहरणानि विलिख्योदाहरणेपु तेपु विभावादीनां स्थायिभावपूर्वकं सुविशदनिर्देश कार्य । उ०७-शृङ्गारादीना रक्षण च रत्यादिप्रकृतिकस्वम् । तत्र 'मनोऽनुकूले प्वर्थेषु सुखसवेदन रति ।' तत्प्रकृतिको रस शृङ्गार । तत्र शृङ्गारस्य द्वौ भेदी सम्भोगो विप्रलम्भश्च । तत्र 'अनुकूरी निषेवेते यनान्योन्यौ विलासिनी । दर्शन स्पर्शनादीनि स सम्भोगो मुदान्वित ।' शृङ्गारशब्दस्य व्यु पत्तिस्तावत्- 'शृङ्ग हि मन्मथो दस्तदागमनहेतुक । पुरषप्रमदाभूमि शृङ्गार इति गीयते' इत्युक्तदिशा स्मरकरम्बितान्त करणयो स्वीपुसयो परस्पर रिरसा रति तप्रकृतिकरव शृङ्गारस्येति योध्यम् । सम्भोग रजायेनिषिद्धान्यपीष्टदर्शनादीनि यत्र कामिनौ सम्भुमाते स सम्भोग । 'भावो यदा रतिर्नाम प्रकर्पमधिगच्छति । गच्छति चाभीष्ट विप्रलम्भस्तदोच्यते ।' विप्रलम्भ सम्भोगसुखास्वादलोभेन प्ररभ्यते आरमा यत्र स विप्रलम्भ । अपरिच्छेद्य परिच्छेत्तुमेतावदेवे कर्तुमशक्य । तत्राद्य सम्भोग परस्परावलोकनालिङ्गनाधरपानपरि चुम्बमाद्यनन्तत्वादपरिच्छेद्य एक एव गम्यते । एक एवेति-विप्ररम्भभिन्नरचे सति सयोगरवसामान्यरूपरवे सति रतिमतिकत्व सम्भोगस्वमित्येक एव ।

चतुर्थील्लासः नायिकारब्धत्वेन नायकारब्धचेन च सम्भोगस्य द्वैविध्यम् । तत्राद्यमाह- 'शून्यं वासगृहः' इति पयेन । बत्र च नायक नालम्बनम् । शून्यगृहनायक- निद्रादि उद्दीपनम् । मुसनिर्वगनचुम्बनादि अनुनाव । रजा हास यङ्ग्यहर्षादि व्यभिचारिभाव । रति स्थायिभाव । तन्ने सामानिक नायकनिष्टस्यैव रसस्य निपत्ति । नालोक्येति रजया समानकर्तृकम् । द्वितीय सम्भोगमुदाहरति-व मुग्धानि०' इति पद्यम् । नत्र मुग्धाक्षी मालपनम् । नयनसौन्दर्याद्गशोभादि उद्दीपनम् । जाभापाबीटिकास्पबनु- मावा उत्कण्गदयो व्यभिचारिण । रति स्थायिभाव । तज्ज्ञ सामानिक नायिका निष्टरतिविषयकरसनिप्पत्ति । अपरो विपरम्भ । अभिलाप-विरह-या-प्रवास-शापहेतुफ इति पद्ध विध । अभिलापाऽप्राप्तसमागमये परस्परमाप्ताच्छा, विरहोऽननुरागाईवप्रनि- वन्धानजादिवशाचासयोग , मानकारग्मा, प्रवासो विनिवदेशस्थिति , शाप पुताव कालपर्यन्तं तव सयोगो मारिवनि सिद्धपुरपवागविशेष । एतान्हेतूना- श्रिय जायमान । तत्राभिलापाहतुकमाह-'प्रेमात्रा प्रणयस्पृश ०' इति पद्यम् । नत्र मारती बालम्बनम् ।तद्विलासानुस्मर"मुद्दीपनम् आरासाऽनुभाव तिब्धयो कष्टा व्यभिचारिभार । रति स्थायिभाव । रिहहेतुकमाह-'अन्यत्र प्रत तीति का०' इनि पद्यम् । कृतसङ्केतनायात्य राजावनागमने विरहोत्कण्ठिताया वितर्कवर्णनमिदम् । नानागतपतिरारम्बनम् । अनागमनादिरीपनम् । विगत नादिरनुभाव । हहहेति चितो विस्मयो व्यभिचारिभाव । रति स्थायिभार । ईव्हेतुकमाह-सा पत्यु प्रघमापराध०' इति पद्यम् । स्वप्रेयस्या नव' ढाया दु खमसहमाना काचिन् काञ्चित्याह-पत्र पतिर लम्चनम् अपराध उद्दीपनम् । रोदनाद्यनुभाव । तद्यङ्ग गाऽसूया व्यभिचारिभाव । रति स्थायि भाव । प्रवासहेतुकमाह-'प्रस्थान क्रय कृत०' इति पद्यन् । पन प्रियतम आलम्बनम् । तम्प्रयापमुढीपनम् । कार्यादयेऽनुभावा । चिन्ता व्यभिचारि- भाव । रति स्थायिभाव । शापहेतुझमाह-वामालिस्य प्रणयपिता.' इनि पघम् । मेवहूते प्रियामुदिश्य मेघ प्रति यहस्योति । नत्र नायिका बालग्न नम् । तत्प्रणयकोप उद्दीपनम् । चर पातेच्छादिरनुमाव । कृतान्तेश्या च्यभिचारिणी । रति स्थायिमाव ।

। काव्यप्रकाश-रहस्यम् न्याभीलादिभिश्चतोरिकासो हास उच्यते । न्य वैकृतम् । तेन हासप्रकृ. तिको हास्यः । यथा-माकुम्च्य पाशिमशुचिः' इति पयम् । अत्र तायमानो विष्णुशर्मा पाटम्यनम् । तमन्दनमुदीपनम् । रसाश्रयस्यैतद्वाक्यमनुमावः । चापरादिन्यभिचारीति । दास. स्थाथिभाषः । 'इष्टनाशादिभिश्वेतोवैजयं पोस्दादमा' । आदिग्रहणादनिष्टाः । शोकप्रतिकः परण.। यथा-'हा मातस्यरितालि०' इति पधम् । राम- पीमरने तरपरिजनविसापोधिरियम् । अन नायिका मालम्यनम् । विपना काचिदीपरी सम्योप्या। तदाहायुद्दीपनम् । रोदनमनुभावः । मूरोदमो प्यभिचारिण । शोकः स्यायिभावः । शोकप्रकृतिका करणो रसः सामाजिक म्पश्यते। प्रतिकूलेषु तैपण्यस्य प्रयोधः प्रोध उच्यते । तत्प्रकृतिको रौदः । यथा- 'तमनुमतं (८०' इति पदम् । द्रोणवधनुभस्याश्वरयानोऽर्जुनादीप्रत्युक्तिः । अधापकारिणोऽर्जुनादय. आलम्पनम् । असाधुधमनमुदीपनम् । प्रतिज्ञाऽनु- भायः । अन्यनरपेक्ष्यगम्यो गर्यो व्यभिचारी | सोधः स्थायिभावः । मध. प्रतिको रोदो रसः सामाजिक व्यज्यते । घीररसमुदाहरति यथा--'उदाः सन्नासमेते.' इति पद्यम् । कार्यारम्भेषु संरम्भ' स्येयानुत्साह उच्यते । उत्साहप्रकृतिको वीरः । स च निधा-युद्धवीरो, दानवीरो, दयावीरश्च । क्षेत्र पूर्वोचोदाहरणं युवीरस्य । हनुमघाटके मेघनाद- स्पोनिरियम् । अत्र राम आरम्यनम् । तत्समुद्रवन्धनमुद्दीपनम् । उदेपेक्षा पराक्रमशालिनि रामे स्पर्धा धानुमायौ । ऐरावतकुम्भचूर्णनस्मृतिः रज्जा दधतीति गम्यगच व्यभिचारिणी। उत्साहः स्थायिभाव तज्ञे सामाजिके उत्साह- प्रकृतिको वीररसो व्यज्यते । अपराहनीयो । 'शैदशक्रया तु जनितं चित्तवेतन्यदं भयम्', तव्यकृतिको भयानकः । यथा- म. ' इति पद्यम् । मृगानुसारिणो दुप्यन्तस्योतिरियम् पत्र पश्चा- स्पन्दनी राना वाऽऽलम्बनम् । सरपतनं चोद्दीपनम् । प्रीवाभङ्गादयोऽनु- । श्रमादयो च्यभिचारिण । भय च स्थायिभावः। तच्छे सामाजिक तिरा भयानको रसो व्यग्यते । जुगुप्सा गहणार्यानो दोपमाहारयदर्शनात् । तत्प्रकृतिको यीभत्सः। समु- + चतुर्थोल्लासा दाहरति-'उत्कृत्योत्कृत्य कृत्तिः' इति पद्येन । स्थट निमविषमम् । स्फिचि अरमूले, पृष्ठपिण्डीम् बसोचभागम् । जग्या मनयि चा । कर प्रेवशरीरम प्रेतमस्तक था। कन्यमकमासम् । अत्र शव मालम्बनम् । मासाशनमुद्दी- पनम् । नासाकुचनादयोऽनुमावा'। उद्वेगादयो व्यभिचारिभावा । जुगुप्सा स्थायिभाव । जुगुप्साजनितो वीभत्सो रसस्तम्झे सामाजिके व्ययते । 'विस्मयश्चित्तविस्तारो वस्तुमाहा ग्यदर्शनात् ।' तप्रतिकोऽद्भुत । यथा- 'चित्र महानेर बतावतार ' इति पद्यम् । वामन प्रति बलेरुक्तिरियम् । मन वामन आलम्यनम् । कान्त्यतिशयाद्युद्दीपनम् । स्तवादयोऽनुभावा । पति- हर्षादयो व्यभिचारिण । विस्मय स्थायिभाव । विस्मयजनितोऽद्भुतो रसोऽभिज्ञे सामाजिक व्यज्यते। 'निर्वेदस्थायिभावोऽस्ति शान्तोऽपि नवमो रस ।' तव्यकृतिकस्यात् । यथा- 'अहो वा हारे वा' इति पद्यम् । करमोरदेशस्थस्य श्रीमदुत्पलराजस्य पयमिदम् । भव मिथ्यात्वेन परिभूयमान जगदालम्बनम् । तपोदनााद्दीपनम् । अहिहाराद्यो समदर्शनमनुभाव । मतिपतिहर्षा व्यभिचारिभावा । निर्वेद स्थायिभावः । तर सामाजिक शान्तरसनिप्पत्तिज्यते । भत्र पदन्ति-शान्तो नाम रसस्तावदनुभवसिद्धतया दुरपर्व । न चास्य स्थायी निर्वेदो युज्यते । तस्य विषयेवल्पययरूपत्वादात्मावमाननरूपत्वाद्वा । शान्तेश्च निखिलविश्यपरिहारजनिता मविभ्रमानन्दप्रादुर्भावमयत्वानुभावात् । तदुक्त 'यञ्च कामसुख लोके यच दिव्य महसुसम् । तृष्णाक्षयसुखस्यैते नाहंत पोडशी कलाम्' इति । अत एव सर्ववृत्तिविरामोऽस्य स्थायीति निरस्तम् । तस्माच्छमोऽस्य स्यायो । निर्वेदादयस्तु व्यभिचारिण । स च 'शमो निरीहाव. स्थायामानन्द स्वात्मविश्रमाद्' इति । एवं स्थायिभावानाह-रतिहासश्च शोकश्च क्रोधोत्साही मयन्तथा । जुगुप्सा विस्मयश्वेति स्थायिभावा प्रकीर्तिता' इति । स्थादिलक्षणमाह-'विरुद्धा अविरुद्धा वा य तिरोधातुमक्षमा । भानन्दाङ्करकन्दोऽसौ भावः स्थायीति सहित' इति सामान्यलक्षणम् । अवस्थितिश्चैषा सम्वन्यायेन, फेनबुबुद- न्यायेन तु न्यभिचारिणामित्यनयोर्भेद । विशेषलवणान्युक्तानि ।

- ६० काव्यप्रकाश-रहस्यम् प्र०८--व्यभिचारिभावान् नामतो विलिख्य पां लक्षणान्यपि प्रदर्शयत। उ०८-निवेद ग्लानि शङ्काख्या स्तथाऽसूया-मद-र्धमाः । बालस्यं चैव दैन्यं च चिन्ती-मोह: स्मृति"तिः ॥ बीडी चलता हप-आवेगो-जेंडता तथा । गर्यो -विषाद-औK क्य-निद्रा-ऽपस्मोर एव च ॥ स्व मो-विवोधोऽ. मर्पश्चाप्यवहित्य अयोग्रता। मतियाधिस्तथोन्माद-स्तथा मरणमेव च ॥ श्रीसश्चैव-वितैश्च-विज्ञेया व्यभिचारिणः । यस्त्रिंशदमी भावाः समाख्यातास्तु नामतः ॥ नामत एव समारयाता न तु लक्षणतः । तल्लक्षणानि यथा- तत्वज्ञानापदीयादेनिर्वेदः स्वावमाननम् । (तत्त्वज्ञानं नित्यानित्यवस्तुविवेक') तत्र चिन्ताधुनिःश्वासवैवोच्चासदीनताः।(स्वावमाननम्-आरमनि तुच्छत्वबुद्धि.) 'चित्तस्य खेदो निर्वेदस्तत्त्वज्ञानोदयादिभिरिति केचित् ॥ ६ ॥ रत्यायासमनस्तापतुत्पिपासादिसम्भवा ग्लानिनिष्प्राणता कम्पकार्यानुत्साहितादिकृत् ॥ २॥ अनर्थप्रतिमा शङ्का परक्रौर्यात्स्वदुर्नयात् । वैवर्ण्यम्पवैमुख्यपा लोकास्यशोपकृत परोकोऽक्षमाऽसूया गर्वदौर्जन्यमन्युजा । दोपोद्घोषभूविभेदावज्ञाक्रोधेलितादयः॥ सम्मोहानन्दसम्भेदःस्सलदङ्गवचोगतिः। मधुपानादिजोशेयो मदी विविधभावकृत्॥ उत्तमसत्वः प्रहसति गायति तद्वच्च मध्यमप्रकृतिः । परपवचनाभिधायी शेते रोदित्यधमसावः ॥५॥ खेदो रत्यध्वगत्यादेःश्वासनिद्रादिकृच्छ्रमाश्रमग्लान्योविभेदंतु चक्रेकारणकार्यता॥ श्रमस्यातिशयावस्थामथवा ग्लानिमूचिरे बलस्यापचयो ग्लानिराधिच्याधिप्रकर्षभूः॥ इत्येके ॥ ६ ॥ आलस्यं प्रमग देहायं जुम्मक्रियादिकृत् ॥ ७ ॥ दौर्गत्यादेरनोजः स्यादैन्यं काामृजादिमत् ॥ ८॥ ध्यानं चिन्ता हितानाप्तः शून्यताश्वासतापकृत् । प्रयतपूर्विकान्वेप्यस्मृतिश्चिन्तति केचन मोहो विचित्तता भीतिदुःखावेगानुचिन्तनैः। (विचित्तता चित्तेन ज्ञानाजननम्) घूर्णनाज्ञानपतनभ्रमणादर्शनादिकृत् ॥ १०॥ - । ॥१४॥ (यहा चतुर्थील्लास. सहशज्ञानचिन्ताधूसमुन्नमनादिकृत् ।स्मृति पूर्वानुभूतार्थविषय ज्ञानमुच्यते॥१॥ अभीष्टार्थस्य सम्प्राप्ती स्पृहापर्याप्तता धृतिः। (स्पृहापर्याहता इच्छानिवृत्ति) सौहित्यवदनोल्लाससहासवचना (प्रतिभा) विकृत् ॥ १२ ॥ सङ्कोचश्वेतसो जोडा वैवाधोमुख वकृत् । यदा दुराचारादिभिर्जीडाधाष्टर्याभावोऽभिधीयने ।वनाङ्गुलीयस्पर्शभूरेखाधोमुखादिकृत्'। (धार्याभाव चेतस सङ्कोच ) चेतोनिमीलन बीडान्यगरागस्तवादिभि । (इतिकेचित्।१३।न्यग वैकृत विकार) मात्सर्यद्वेपरागादश्चापलं वनवस्थिति । (अनवस्थिति, अविमुश्यकारिता) 'आमप्रकाशनपरा चेष्टा चपलतोच्यते' इति केचित् । भर्सनपारु यस्वच्छन्दाचरणादय मन प्रसादो हर्ष स्यादिष्टावाप्तिस्तवादिभि । यद्वा मन प्रसादो लाभादेह पोऽश्रुस्वेदगद्गदा ॥१५॥ 'अनर्थातिशयाञ्चेतस्यावेग सम्नमो मत' आवेगो रागविगावरसादे सम्भ्रमो मत । तर विस्मरण स्तम्भ स्पेद कम्प स्खलदति ॥१६॥ क्रियास्वपादब जाडयं चिन्तोत्कण्ठाभयादिभि । आलस्य तु क्रियाद्वेपो न त्वत्रेति भिदा तत ॥ यद्वा 'अप्रतिपत्तिर्जडता स्यादिष्टानिष्टदर्शनश्रुतिभि । अनिमिषनयननिरीक्षणतूष्णीभावादयस्तर' गर्योऽभिजनलावण्यधनैश्वर्यादिभिर्मद सविलासाङ्गवीक्षाऽविनयावज्ञादिकृत्तु स ॥ यद्वा गर्यो मदप्रभावभीविद्यासकुर नन्मभि । अवज्ञा सवितासाङ्गदर्शनाविनयादिकृत् ॥ प्रारब्धकार्यासियादेविपाद सत्वसत्य । (सत्त्वसमय उसाहनाश) नि श्वासोच्छासहृत्तापसहायान्येषगादय ॥ १९ ॥ औत्सुक्यं वाञ्छितप्राप्तौ कालज्ञेपासहिष्णुना। चित्ततापरवरास्वेददीनि श्वसितादिकृत । यदा कालाक्षमस्वमौत्सुम्यं रम्यच्चारतिसम्भ्रमै । तत्रोच्दास वराश्वासहृत्तापस्वेदविभ्रमा ॥ २०॥ - काव्यप्रकाश रहस्यम् निद्रा व्यापारवैमुरयमिन्द्रियाणा श्रमादिभि । तत्र जृम्भागभलादिमीलनोसितादय ॥२१॥ (इन्द्रियाणामित्युपलक्षणम्, वेन मनसोऽपि । तेन स्वमाझेद।) माधेश्चात्यन्तदु खादेरपस्मारस्तथाविध । 'मन क्षेपरत्वपस्मारो ग्रहायशादिसम्भव' इति केचित् ।। (वीभसभयानकयोरेव) कचित्तु 'अपरमार'स्थाने विस्मृति. पठिता तथा- विरोधिभावापूर्वस्य तस्मृतिविरमृतिर्भवेत् । ध्यानजाध्यप्रमोहाऽऽधिपरितापादिकृत सा॥ (प्रगतास्मृति प्रस्मृति) स्वप्नो निद्रामुपेतस्य विषयानुभवस्तुय । (विषयानुभव -स्वामज्ञानम) कोपावेगभयग्लानिसुखदु खादिकारक ॥ २३ ॥ निदापगमहेतुभ्य प्रबोधश्चेतनागम । जृम्भाङ्गमङ्गनयनमीलनाडावलोककृत् ।। 'कोप एव स्थिरतरो हामर्प इति कथ्यते । यदा अधिक्षेपापमानादेरमर्षोऽभिनिविष्टता । (अभिनिविष्टता स्थिरकोभः) तत्र स्वेदशिर कम्पनेत्ररागाङ्गविक्रिया ॥ २५ ॥ लजायेविक्रियागोपोऽवहित्थामन्यविक्रिया । ध्यापारान्तरसगि ववदनानममादय ॥२६॥ (अवहित्थाऽऽकारगुप्ति) अधिक्षेपापमानादेश्चित्तचण्डरवमुग्रता। यद्वा विटेऽपराधदौमुख्यचौर्यैश्चण्डवमुग्रता ।। (चण्डस्व साहकारतदसहिष्णुत्वम्) क्षत्र स्वेदशिर कम्पताडनातर्जनादय शास्त्रोपदेशमन्त्राद्यैरय निर्धारण मति । यद्वा भ्रान्तिच्छेदोपदेशाम्या शास्त्रादेस्तत्वधीमति ॥ स्मेरता एतिसन्तोषौ बहुमानस्तथास्मनि ॥ २८ ॥ विरहोर्मनस्तापो व्याधिदुस्थाङ्गतादिकृत् । यद्दा व्याधयों सत्रिपाताद्यास्तेषामन्यत्र विस्तर । प्रस्वेदकम्पतापाद्या अनुभावतयोदिता ॥ २९॥ सन्निपातग्रहादिभ्य उन्मादश्चित्तविभ्रम । यद्वा उत्कण्ठाहपंशोकादेरुन्मादश्चित्तविप्लव । (चित्तविप्लव चित्तविभ्रम । आसितमयस्थानम्) ३३ - चतुर्थोल्लासः तस्मिस्थानरदितगीतहासाअपितादय ॥ ३० ॥ जीवस्योदमनारम्भो मरणं परिकीर्तितम् । सम्मोहेन्द्रियसलानिगानविक्षेपणादिकृत् ॥ यद्वा रोगाचे प्रागवस्था तु मरणस्य मृतिर्मता ॥३॥ (मुख्यमरणस्यालम्बनोच्छेदेन माव वायागाद् । मूनि मरमियन्ये न धान्य सदारित्वादन फलवदिति वाचम् । स्थास्यन्तरसाधरावाद । तेऽपि हि छचन सञ्चारिण तदुधम्- शृङ्गारवी योहाँसो वीरे क्रोधस्तथा मत'। शान्ते उगुप्या कथिता व्यभिचारितया पुन । इत्याद्यन्यत् समुशेय स्वय भावितवुदिभि । इति ॥) गजितादेर्मन शोमत्रासोनोकपितादप । यद्वा भोपातिकमन होमस्त्रास. कम्पादिकारक । (तोत्पातिकर पातनन्यै गर्जितादिभि) पूर्वापरविचारोत्य भय पासात् पृथग्भवेत् ।। ३२ ॥ ऊहो वितर्क सन्दहे भ्रूशिरोऽहुलिनर्तक । (तर्को 'विचार सन्देहे' इतिपाठे विचारो विमर्श । तथा च माहू रसगङ्गाधरकारा' सन्देहायनन्तर जायमान उहो वितर्फ' इति । स च निश्चयानुकूल) प्र०९-अय 'भावस्य' किं लक्षणम् । सोदाहरणं सप्रपञ्चः स प्रतिपाद्यताम् । उ०९-रसभावतदामासः' इति सूत्रे भावोऽप्यपदयरमेषु परित । स किंरूप , इति चेत् 'रतिर्देवादिविषया व्यभिचारी तथाऽक्षित । भाव मेकर' इति । आदिशब्दान्मुनिगुरनूरपुत्रादिविषया । कान्ताविश्या तु व्यता शनार । रत्यादीनां रसरूपत्वात्, व्यभिचारिणा रसास्तानियमेन प्राधान्यामावात, साविकानामव्यङ्गय वादित्यत' क्रमप्राप्त भाव स्पयति-रितिरिनि । निरिति सकलस्थायिभावोपलक्षणम्। देवादिविषयेत्यपि भप्राप्तरसावस्य पलम् । तथा शब्दश्वार्थे । तेन देवादिविषया सर्वप्रकारा तथा कान्तादिविण्यापि अपुष्टा रति हासादययनमासरसावस्या दिमावादिभि प्राधान्येनाक्षितो व्यक्षितो काव्यप्रकाश रहस्यम् व्यमिचारी च भाव प्रोक्त भावपदाभिधेय कथित, इति सूत्रार्थ । यदुक्तम्- 'रत्यादिश्चेन्निरङ्ग स्याहेवादिविषयोऽथवा । अन्याङ्गभावभाग्वा स्यान तदा स्थाथि शब्दभाक्' इति । तदेतदाह वृत्तिकार -~'कान्तादिविषयातुध्यक्ता शृङ्गार । तत्र देवविपया रतियथा-'कण्ठकोणगिनिविष्ट०' इति पद्यम् । श्रीमदुपराचार्यप्रणीत परमेश्वरस्तोतावलौ पद्यमिदम् । अत्र महादेव आलम्बनम् । ईशपदप्रतिपाद्या व्याहतैश्वर्यमुद्दीपनम् । स्तवोऽनुभाव । तिमाहात्म्यस्मरणादयो व्यभिचारिण । अनैतैरनुमितस्तावकरतीना सामाजिकाना तैरेव विभावादिभिर्व्यञ्जिता रतिर्भाव एवेति बोध्यम् । मुनिविषया यया-'हरत्यघ सम्प्रति हेतुरेष्यत .' इति पद्यम् । अन्न श्रीकृष्णस्य मुनिविषयाया रतेर्मुनिरालम्बनम् । दर्शनयोग्यतान्यानमुद्दीप नम् । श्रीकृष्णस्येयमुक्तिरेवानुभाव । तद्व्यशयहर्षश्च व्यभिचारी। मुनिविषयक- श्रीकृष्णरतिज्ञे सामाजिके भावनिप्पत्ति । एवमेव गुरुविषया, नृपविषया, पुत्र विपया च रतिरुदाहरणेषु टीकाया दत्तेप्ववलोकनीयानि । कान्ताविपयाऽपुष्टा रतियथा-कुमारसम्भवे 'हरस्तु किञ्चिरपरिलुप्तधैर्यश्चन्द्रो. दयारम्भ इवाम्बुराशि । उमामुखे बिम्वफलाधरोष्ठे व्यापारयामास विलोचनानि' प्रधानतया वर्णित व्यभिचारिणमुदाहरति--'जाने कोपराड्युखी.' इति पद्यम् । वियुक्तस्य कस्यचित् स्वमित्र प्रत्युक्तिरियम् । अत्र विधि प्रति असूया प्राधान्येन प्रतीयते । जाने शठेत्यनेन निर्णीतापकारि वेनासूयाप्रकर्ष । विधिरवालम्बनम् । विधिदौर्जन्यमुद्दीपनम् । शठत्वोतिरनुभाव । प्राधान्येन व्यजितोऽसूयारूपो व्य. भिचारी भावपदाभिधेय । मनु नायिकालम्बनस्य त कोपोद्दीपितस्य स्वशादिदृष्टयनुभावितस्य विन लम्भस्य सत्वात्तवनित्वमेव स्यादत आह–'असूयेति' शठपदगम्या प्राधान्येन प्रतीयते इति । पर्यन्ते तु रसस्यैव प्राधान्यम् । मध्यमव्ययमादायैव ध्वनि- स्वादिव्यवस्थितेरिति बोध्यम् । नन्वत्र शठेन विधिनेतिवत् 'त्वामालिरय प्रणय कुपिता०' इति पद्ये क्रूरपदेनासूया प्राधान्येन व्यज्यते इति तत्रापि भावध्यनित्य मेव । तत्कथ विप्रलम्भोदाहरणमिति चेस । तत्र 'दृष्टिरालुप्यते मे इत्यन्तेन विप्रलम्भावगमेऽनन्तर प्रतीयमानाया असूयाया विप्रलम्भाङ्ग वस्यैवौचित्यात् । प्र. १०-रसाभासभावाभासयोरपिस्वरूपं सोदाहरणं विलिखत ।

। . चतुर्थोल्लासः उ०१०-'तदाभामा अनौचित्यप्रवर्तिताः' इति सूत्रांशेनानौचियेन प्रव. तिताः तदाभासा रसाभासा भावाभासाश्चेति तान् लक्ष्यति । तसदेन रसमावयोः परामर्श न तु संनिहितत्वेन भावस्यैवेन्याह-रसामासा भावाभामाश्चेनि । अनौचिन्यं हि शास्त्रलोकातिकमात् प्रतिषिद्धविषयकत्वादिरूपं सामाजिक- सवेद्यम् । तञ्च सहृदयव्यवहारतो ज्ञेयम् यत्र तेषामनुचितमिति घीः। तच मृङ्गारे बहुविषय वेन उपनायकादिगनचेन नायकनायिकान्यतरनानविषयत्वेन, गुरु- जनगतत्वेन, नानैव । तदुनम् –'उपनायकसत्यानां मुनिगुरपत्नं गतायां । वहुनायकविषयायां रतौ तथानुभयनिष्टाचार॥ आभासवं कथितं तथैव च नियंगा- दिविषयतायान्' इति । तथा दि गु द्याल बनतया हासस्य, वीतरागाद्यश्रयतया करणस्य, पित्राद्यालम्बनतया रौद्रवीरयोः, बरगतत्वेन मयानकस्य, यज्ञीयपशु- वसाधालम्बनतया बीम पस्य, ऐन्दजारिकाद्यालम्बनतया तस्य, चन्डाला- दिगतत्वेन शान्तस्य चामासम्वं ज्ञेयम् । अत्र रमाभासो यथा-स्तुमः कं वा- माति०' इति पद्यम् । भन्न बहुषु व्यापारोपादानेन बहुविषमा रनिचते । न चार व्यापारस्य बहुविषयत्वमसिद्धम् । एक्कापि नाश याारसम्मवात् । यत्तु' अनेककर्मपदोपादानमनेकवियत्वं क्रियानां प्रस्टयति । एकविश्य वामि- प्राये रवेकमेव कमरदमुपाददातेनि तत्तुच्छम् । स्तुमो विरेभ इत्यादीनां भिन्न वाग्यानामेकविभरत्यन्तपदोपस्यापितेनानन्वये तदन्वयिनोऽभिवास्यापि कं + इत्यादिपदैरसस्यापने मिनर्मपदैरेवोपस्थापनागात् । अत्र नः-'तु' शब्देन व्यवच्छेदायन व्यापारस्याने कवियत्व सभ्यते । एवमेत भेदाभिप्रदेवगड. न्यत्रापि तथैवावगम्यते, बहुपदमनेकपर वा। भावाभासो यया-रामसुधाकरमुनी०' इनि पान । सीतामुदिश्य रार- पोक्तिरियम् । अत्र रतेयमिधारिभूटा चिन्ताऽनौचिचप्रवर्तिता। नायिकामा अननुरक्तवया रटेरनुत्कृष्टरेन तमिचारियोऽपि तय वान् । पवनन्यैड- प्युदाहार्या। प्र० 11-व्याप्यायतां 'भावस्य शानिरदयः सन्धि शबलता तया' इति । उ०१२-भावशान्त्यादिरकन' इत्यत्र भावशान्त्यादिपदानिपाद्यमाह- ५का-प्र० ६६ काव्यप्रशाश-रहस्यम् 'मावस्य शान्ति रित्यादिना । सन्धिोककालमेव तुपक्षपोरास्वाद दिल तु कामभेदेन निरन्तरतया पूर्वपूर्वोपर्टिनाम् । न च मावस्य सबटन शान्त्युदयाम्यामविशेषः । शान्तरुदयस्य वा एकस्यास्दादे न वयप न । एव शान्त्युदयावु-पत्तिकालावच्छिनावेव चमकारिगाविति दोध्यम् । स्थानिक त्वते न सन्मदन्ति तेपा सन्ततममिच्दशात् । तत्र भावस्य शान्तिर्यथा 'दस सान्द्रविलेपन' इनि पद्यम् । अमरशारक सग्डिताया स्वनापिकाया कोर तान्तिवृत्तान्त वयस्य प्रति कथयतो एएनायकस्मोनिटरियम् । कत्र के पर मावस्य शान्तादेव चमकारविग्राम । न तु विद्यमानेपरि प्रसादेरे बदनु भावाद्यनुल्लेग्वादिति वाध्यम् । तदेवाहार-झोपस्यवि शान्तिरिति रेप । मावस्योदयो यथा -“एकस्मिन् दापने दिपक्षः' इति पयम् । अमरसन के पद्यमिदम् । अत्र सुरतविपरस्यौरसुन्यस्योदयश्चम करोति न नु सन्यार कर शान्ति तदनुभावानुपादानात् । तदेवाह-'अत्रीमुक्यस्यै ति उदय इति शेष । भावस्य सन्धिर्यथा 'उसिनस्य तप पराक्रमः' इति पद्यन् महावार चरितनार के द्वितीयेऽङ्के सीतामानिङ्गन श्रीरामस्य परशुरामागमने उनिरियन् । अन्न मुगधि यादरगीयत्वज्ञानजन्यत्वराविर पूर्वार्धगम्य । हर्पस्तूत्तराधाम्य । अनयोस्तुल्यकालमेवास्वाद इति तयो (आवेगहर्पयो ) मिनरूप" सन्धि। अत्र परिरम्मतहग समाप्रियतोत्माहोमपतत्वादावेगस्तुल्य इति बोध्यम्। तदेवाह-वावेगहर्पयोरिति । मन्धिरिति शेष । आवेगस्वराविष । मार शलता यथा-वाकार्य सराटनग' इति पद्यम् । विश्नावरिये धनु उर्वशीं दृष्ट्वा पुररथम उचिरियम् । अत्र 'कामार्य' मियादी विनर्क, भूयोऽधी त्यो सुक्यन, दोषागामिति मतिः, कोपेनीति स्मृति, किं पन्नीति शश, स्वप्नेऽपानिदैन्य, चेतस स्वास्थ्यमिति एति, २. सस्विति चिन्ता, सुट पूर्वपू, पमईन प्रतायमाना शदलता चम कारमूनि । ननु भावस्य शान्यादिवरिपति रपि प्रकार' मम्भवत्येव, तस्कय नोक्त दनि चेन । माक्त्यैव तदुन्। भावरिय वानिनवाद । ननु च्यभिपरिस्थले नियमतो मुरयस्य रसस्याद रधान तस्य भावोदाहरणमैतत् , कथ वा भाववनिव, रमान तैया गुर्ग भावादियत बाह--'मुख्य रसेऽपि तेऽद्वित्व प्राप्नुवन्ति कदाचन' इति । ते मासान्त्याइय कदाचन यदा त एवानिदेन विवचन्त, रमानुगविह - चतुर्थोल्लासः ६७ प्रवृत्तमृत्यवत् । मावशान्त्यादय भावाश्च शान्त्यादयश्चेति द्वन्द्व । भावस्थिति शान्यादयश्चेति पाठ सुगम । १० १२–'अनुस्वानाभसंलक्ष्यनामध्यद्यस्थितिस्तु य शब्दार्थोमपशम्त्युत्थस्त्रिधा स कथितो धनि ।' कारिकामिमां सम्यग्यारयाय तननिर्दिष्टसंलक्ष्यक्रमन्यदयस्य त्रैविध्यं तत्स्वरूपप्रपञ्चोदाहरणपुर सरं प्रतिपादयत । उ०१२-अनुस्वानेति । घटाया हन्यमानाया मुख्यशदानन्तर क्षोदीया नपरोऽनुरणनरूप शब्द प्रतीयते तद्वत्सलच्यक्रमा व्यङ्गयस्थितियन म शब्दश्चा यश्चेति शब्दायों च उमय चेति तेपा शक्तिश्च शब्दार्थोभयशक्ति , तस्या उत्थ तत उत्तिष्ठतीति शब्दार्थाभयशक्त्युद्भव त्रिधा त्रिप्रकारको ध्वनिरित्यर्थ । तथा च शब्दशक्तिमूलव्यङ्गय अर्थशकिनूलव्यङ्गय उभयशक्तिमूलव्यङ्गयश्चे यर्थ । शब्दशक्तिमूल व चैतदेव यत्तेनैव शब्देन तदर्थप्रतीति न तु पर्यायान्तरे णापि । एतद्वैपरीत्य चार्थशक्तिमूलत्व न त्वभिघया तत्प्रतीतिरिति । एतेन 'अभिधाया यत्र न नियमन तत्रैप भेदो दधन्य । तनियमने तु नाभिधामूर व किन्तु व्यञ्जनामूलत्वमेव 'भद्रात्मनः' इतिवद्वेदिति यस्कनचिदुक्त तन्नादेयम् । 'भद्रात्मन' इत्यादेरपि एतद्भेदत्वेनेष्टत्वात् । अन्यथा तस्य सर्वभेदवहिर्भावापत्ते । किञ्च शब्दशक्तिमूलव्यङ्गयोदाहरणेषु । उल्लास्यति, तिग्मरचिरिति, अमिन इति त्रिवप्युदाहरणेषु क्रमेण प्राकरगिकाप्रारगिकयोरिति व्यारयानेन, भवानि त्यनेन तथा च अपीत्यनेन प्रकरणस्याभिधानियामकस्य स्पष्ट वात्तेपामुदाहरणत्व विरुदधेत तस्माद्यथोक्तमेव न्याय्यम् । तेषु मध्ये शब्दशक्तिमूलानुरणनरूपव्यङ्गयो द्विधा । यथा--'अलङ्कारोऽय वस्त्वेव शब्दाद्यत्रावभासते । प्रधानत्वेन स क्षेय शदशक्त्युबो द्विधा' इति । अलङ्कारध्वनिर्वस्तुवनिश्चेति द्विप्रकारक । अश्छ्नस्यानरतवस्तुमात्रस्य दा प्राधान्येन प्रकाशान् । प्राधान्येनेत्यनेन सदस्य यत्र प्राधान्यमर्थस्यापि चिव्यमथवा प्राधान्येनेत्यनेन गुणीभूत अङ्ग्यनिरास ध्वनिरित्यर्थ । तत्र शब्दशक्तिमूलालङ्कारध्वनिमुदाहरति-उल्लास्येत्यनेन । कालकरवार- महाम्वुवाहम्-कालो वैरिमहा य करवाल स एव महदम्बु धाराजल कहतीति महाम्बुवाह नम् । यद्धा मह उसर स एकाम्नु तद्वाह , उस्टोनितपकिन- काव्यप्रकाश-रहस्यम् जरलं कटोरम् उर्जितं बलवत् । गर्जितं सिंहनादो यस्य तथाविधन । अप्राकरणिक- (व्यङ्गय) पक्षे येन देवेन मेघाधिपतिना (प्रारणिके देवो राजा) इन्द्रेण जरठं गम्भीरम सर्जितं यद् गर्जितं गर्जनं तेनोपलक्षितम् ।कालकर कृष्णरश्मि वर्ष काल- सूचकं वालं (पालं) नवीनम् (ववयोरभेदात् ) महाम्वुवाहं मेघमुल्लास्य प्रशश्य रणे अङ्गारादिषु जले पात्यमाने जायमानः शब्दो रणः (प्राकरणिके युद्धभूमौ) वस्मिन् सति धाराजलेः धाराकृतिभिर्जलैः त्रिभुवने रिपूणामर्थात् जलशत्रूणां तेजसा सम्लः प्रकृष्टः तापः औष्ण्यं निर्वापितः शमितः इत्यर्थः । अत्र प्रकरणेन प्रथमार्थे (राजार्थे) अभिधाया नियन्त्रणात् तया बोधयितुमशक्यो वस्तुरूपो द्वितीयार्थो (इन्द्रविषयकः) व्यङ्गय एव । अत्र 'करवालमुल्लास्यै' ताव. न्मात्रे वक्तव्ये यदेतादृशशब्दप्रयोगस्तस्यासम्बद्धार्थकता मा प्रसज्यतामित्यप्राकर. मिरिन्द्रवारिवाहादिभिः प्रारगिकानां राजकरवालादीनामुपमानोपमेयभावे कवितात्पर्यमित्युपमाऽलङ्कारो व्यङ्गयः। स च शब्दशक्तिमूलः । पर्यायान्तरेण भूपादिना तदर्थोपस्थितौ तदप्रतीते. । एवमग्रेऽप्यूह्यम् । यथा 'तिग्मरचिरप्र. ताप०' इत्यत्र तिग्मः रचिरश्च प्रतापो यस्येति प्राकरणिकार्थः । तिग्मरचिः । अप्रतापः इति एवं क्रमेण विधु अनिशात् , मधुः भलील', मतिमान् अतत्व- वृत्तिरिति एकैपदस्य द्विपदत्वे विरोधाभामो व्यङ्गयः। अनोदाहरणे पदभेदेन विरोधाभासो द्योतितः। पदाभेदेऽपि विरोधाभासो यथा-'अमितः समितः' इत्यत्र । अत्र विचार्यते किं विरोधस्य सर्वत्र व्यगायत्दमेव, नेत्युच्यते । अपि- शब्दादेविरोधव्यजकस्य भावे सति वाच्यत्वम्, तदभावे व्यङ्मयत्वम् इति । अधुना व्यतिरेकालङ्कारध्वनिरदाहियते यथा 'निरपादानसम्भारे'ति । अत्र चित्रं नाना- कारमालेल्यं च यला चन्द्रस्य षोडशो भागः । अन्यत्र कौशलञ्च भत्रोपादानः. तूलिकाद्युपश्रणैः मित्तावेव चित्रपदादिप्वेवारे ख्यकारिभ्यः क्लावद्भयो जगचित्रं नानारम भभित्तावेव शून्ये एव तन्वतः शूलिनो व्यतिरेको व्यङ्गयः । अन्न चित्रकलाशब्दयोः परिवृत्यसहवेन शब्दशक्तिमूलता। अथ 'वृत्तिगतवाक्यमर कार्यस्यापि बाह्मणश्रमणन्यायेनालकारता' इति च्या- ख्याति । ननूदाहृतेषूपमादीनां प्राधान्य न वा प्राधान्यं चेत् कुतस्तेपामलद्वार- स्वम् । अन्यानलकरणात् । अप्राधान्ये नोऽस्य काव्यस्य धनित्वम् । व्यङ्गयस्या- पायल्पा । इति चेन्मैवम् । भयमलङ्कार आदित्येतारताऽलहारन्यप- चतुल्लासः देशात् । यथैदानी श्रमणः वौद्धसंन्यासी पूर्व ब्राह्मण आसीत् इति स ब्राह्मण इति क्यते तथा । न चे व्यपदेशसमर्थनेऽप्यलङ्कारध्वनियन समर्थितमिति चेन्न । अलङ्कारपदेन तद्योग्यताया विवक्षितत्वात् । नचैवं रसादिध्वनावपि अलङ्कार वनि- स्वप्रसंगः संलक्ष्यक्रमस्यैव तादृशस्य तथाभिप्रेतत्वात् । वस्तुतस्तु प्राधान्यामाधान्ये व्यङ्गयस्य वाच्यापेक्षयैव, न तु रसापेक्षयापि । तदपेक्ष्या सर्वत्र गुणीभावात् । तथा चोपमादीनां रसाङ्गतयाऽर द्वारत्वम्, वाच्यापेक्षया प्राधान्यं चेति न दोप- लेशावकाशः। एवं शब्दशक्तिमूलालद्वारम्वनिमुदाहृत्याधुना शब्दशक्तिमूलवस्तुरूपध्वनि. मुदाहरति, यथा-'पंथिअ' इति । पधिक मात्र सस्तरमस्ति मनाक् प्रस्तरस्थले ग्रामे ॥ उन्नतपयोधरं प्रेक्ष्य यदि वससि तदा वस-इति छाया। स्रस्तरम्-(१) क्टाधास्तरणम् () शास्त्रम् कामशास्त्रमिति वा । प्रस्तरस्थले-(१) पापाणप्रचुरे स्थले, (२) पाषाणाना तस्वेनाध्यवसितानां मूर्खाणां स्थले तन्मये ग्रामे । अत्र शास्त्राभावादाकारेगितज्ञानाधिकरणे ग्रामे, सति चैवविधे उद्दीपने मेधे श्लेपमर्यादया उततस्तनदर्शने च को नाम उपभोगतमोऽन्यत्र गन्तुमर्हतीति वन्यभिप्रायो व्यञ्जनया प्रकाशते इत्यर्थः। तच्च पयोधरेति शब्दशक्तिमूलमेव । तथा-'शनिरशनिरिति । अशनिवन्न.। न शनि. । अनुदार-अनुगता दाराः यस्य । म उदारः इति । अत्र प्रथमा शनिरशनिश्चेत्यनेन विरुद्धावपि रवदनु- वर्तनार्थ मेककार्य कुरुतः' इति वस्तु ध्वन्यते । न तु विरोधालङ्कार । शनिरशनि- रित्यनयो. सामान्याधिकरण्याभावात् । विरोधस्य तत्रैव विश्रान्तेः । द्वितीया| तु मोदाहरणम् । तत्र 'च' शब्दस्य अप्यर्थत्वे विरोधस्य वाच्यत्वात् । समुच्चय- मानार्थत्वे विरोधस्यैव व्यङ्गयत्वादिति । इत्थं शब्दशक्तिमूलं द्विविधं ध्वनि निरूप्येदानीमतिमूलानुरणनरूप.. च्यङ्गय द्वादश विधत्वेन विभजते । तथाच कारिकाद्वयम्- अर्थशवरयुद्भवोऽप्ययों व्यञ्जकः सम्भवी स्वतः ।। प्रौढोक्तिमात्रासिद्धो वा कवेस्तेनोम्भितस्य वा।

७० काव्यप्रकाश रहस्यम् तनाव वस्तु वा लड्नति पभेदोऽमौ व्यक्ति यत् ॥ वस्वरकारमया द्वादशामा । वस्तु वा कृतिनि। () स्वत सम्भवी, न वेदर भनितिनिप्पलवारीरोऽपि नु वहिरपि औचित्येन प्रतीयमान सम्भाग्यमान । (२) प्रौढानिमात्र सिर बहिरमनपि वक्तृप्रतिमामाने तथा निर्मित, (३) कविनिवदेन दा तथ! निमित्त इति विधा । अयमर्थ यक्षको निधा() स्वत सम्भवी (२) कविप्रोटोक्तिमात्रसिद्ध, (३) कविनिवदनायकादिवत्तृप्रौढोचिमात्र मिश्चेति । अत्र प्रौढोक्तिः चमत्कारानुगुणोक्तिया । एव विविधोऽपि प्रत्येक वस्तुमानमल कृतिति पविधो व्यक्षिक । एतेषां पण न्यायमपि प्रत्येक वस्तु वाऽतिर्वति द्वादशभेदा भवन्ति । तत्र स्वत सम्भविन्यर्थे भेदचनुष्टये । (१) वस्तुना वस्तु मो व्यक्तिर्यथा- अलसशिरोमणीत्यन । इद पद प्राकृत, तस्य च्छाया-'असशिरोमगिधूर्तानाम ग्रिम पुत्रि धनसमृद्धिमय । इति भगितेन नताली प्रफुलविरोचना जाता ।' बवा टसत्वेन प्रबासे नायिकान्तरगृह च गन्नुमनिच्छु, धूर्तत्वेन रतेप्दनादृतगुणो, धनसमृद्धिमयतया कृपण सुखी चेति निर्धार्य यधपुलनयन व हर्षव्यञ्जक वस्तु तेनान्यामामनाकर्षणीय इति, ममैवोपभोग्य इति वस्तु व्यज्यते (२) वस्तु नाऽर कारस्य व्यक्तियथा-'धन्यासि या कथयसीति उदाहरणम् । रतिकालीन स्वप्रियालाप कथितवती काजिदुपहसन्त्या त्रमिदानी स्वरतिवात कथयति सखीग्रेरिताया उचिरियम् । अत्र वाच्येन सखी प्रति धन्यवेतिरूपे वस्तुना स्वस्य महानन्दाप्तिसूचनद्वारा धमधन्ये ति व्यतिरेकालङ्कारो व्यग्यत । (३) अलक्षरेण वस्तुना व्यचियथा-~'दन्धिगन्धग' त्युदाहरणम् । अत्र 'दन्धिगन्धगनकुम्भपाटयूट सक्रान्ति निनधनशोगितशोशिशोधि' इति पदस्यैव विग्रह -दर्पण मदेनान्ध मदोदित यो गन्धगन, तस्य कुम्भयो गण्डस्थल्यो पार विशालतया दुर्भद्यत्वाकपारमिव मध्यभाग तस्य यूटमप्रभाग तदेव कटिनस्वात् कूट लोहमुद्गर इस तत्र समान्त्या सम्बन्धेन (पतनेन)सम्यक् प्रवि शनेन चा निप्न दृढसम्वद्धन निविड यत् शोणित रधिर तेन शोण रक्त शोचि कान्तिर्यस्य यत्र वा तादृश इत्यर्थ । अत्र 'कालीकटाक्ष इव कृपाणो व्यकि' इत्युपमा, न पुनरस्प्रेक्षा सम्भावनाविरहाद । शोणशोचि -कपायकान्त्योर्विम्वप्रति चतुर्थोल्लासः विम्वभावेन समानधर्मस्वात् सा च स्वत सम्भदिनी, सादृश्यस्य लोकेऽरि सत्वात् तया चोपमया 'सकलरिपुक्षयः तणाकरिष्यते' इति वस्तु व्यज्यते । ( ४ ) अल . तारेणालङ्कारस्य व्यत्तियथा-'गाढकान्तदशने'त्युदाहरणे । अत्र ओष्टविषयकयो- दशनमोचनयोविरोधः । यो हि निजमप्यधरं ददाति स क्यं परेपामधराम्मो. चयतीति स्वतःसम्भविना विरोधामासाद्वारेण प्रकृतयोः स्वाधरदशनशनु- व्यापादनयोरेककालरूपैकधर्मसम्बन्धेन तुल्ययोगितारवारो व्यज्यते । एवं मम राज्ञो दन्तहत्या अन्यस्यापि नृपधजनस्यापि हतिनिवर्ततामिति नृपबुद्धि- स्प्रेचरते इत्युत्प्रेक्षालद्वारोऽपि व्यज्यते । एषु चतुपदाहरणेषु व्यञ्जकोऽयं, स्वतः सम्भवी इति । कविप्रौढोक्तिसिद्ध व्यञ्जऽर्थे भेदचतुष्टये १ वस्तुना वस्तुनो व्यक्तियथा 'कैलासस्य प्रथमशिखरे' त्युदाहरणम् । व्यङ्ग्य दर्शया-पत्र कविप्रतिभामात्र. निप्पनाद् यशस प्रवर्गप्रवेशाद् चिनिनोसम्भावनया करें हस्ताबर्तनरूपेन कविप्रतिभामात्रनिष्पन्नेन वस्तुना येषां जडानामपि दिग्गजानामर्थाधिगम गीतार्थज्ञानं नास्ति तेपामप्येव वै यमूर्तस्वादिबुद्धिजननेन स्वस्कीतिश्चमकरोतीति वस्तुमात्रं व्यज्यते । अत्र च कीर्तिश्रवगानन्तर को हस्तावर्तन हस्तिनो न स्वतः- सम्भवि फिन्तु कविसम्प्रदायात् कविना गितमिति कविप्रोडोक्तिसिदत्वम् । २ कविघौढोक्तिमानमिद्धेन वस्तुनाऽलङ्कारस्य यथा-'केमेसु बलामोडिये' त्यादि प्राकृतश्लोकः। तस्य छाया-केगेषु बलात्कारेण तेन च समरे जयश्रीहीता । यथा कन्दराभिर्विधुरास्तस्य दृढं कपदेसस्थापिता इति । तेन पराजिताः शनको गुहास्वेद तिष्ठन्तीति भावः । अत्र कन्दराभि कण्ठे स्थापिता इत्यरूपेश कविप्रतिभामात्र- पिढेन वस्तुना देशग्रहणावलोकनो हीपितमदना इव कन्दरास्तद्विरान् कण्टे गृहन्ति इल्युत्प्रेक्षा । एकत्रैव समामे विजयदर्शनात्तस्यारयः पलाय्य गुहासु तिष्ठन्ति इति का यलिङ्गम्, न पराय्य गतास्तवैरिणोऽपि तु ततः पराभव • सम्माव्य ता कन्दरा एवं न तास्त्यजन्ति इति अपद्धतिश्च अर कारा व्यज्यन्ते । ३ कविप्रौढोक्तिमा सिद्धेनालङ्कारेण वस्तुनो व्यक्तिमुदाहरति यथा---गादालिङ्गणम्' इत्यादि । छाया 'गाढालिङ्गनरमसोद्यते दयिते लघु समपसरति । मनस्विन्या मान' पीडनमीत इव हृदयात्' इति । अत्र पीडनभीररिवेत्युक्षयाश्लङ्कारेग प्रन्यालिङ्गनादि जृम्भते इति वस्तु व्यज्यते । ४ अत्रैवालङ्कारेगालङ्कारस्य यथा- "जा ठरं वहसन्ती' इति प्राकृतपद्यम् । अस्य छाया- હર काव्यप्रकाश-रहस्यम् या स्थविरमिव हसन्ती कविवदनाम्बुरहबद्धविनिवेशा । दर्शयति भुवनमण्डलमन्यदिव जयति सा वाणी ॥ अत्र 'जा ठे व हसन्ती' युप्रेतारकारेण चमत्कारककारण नव भव जगत् सम्वुजासना (जडजरामिति डलयोरभेदात्) कविवदनस्था (अजडासना) निमि मोते इति वाण्या ब्रह्मणो व्यतिरेक प्रकाश्यते । यद्य युप्रेक्षा विनापि व्यतिरे कोऽय प्रकाशते नियतिकृतनियमेत्यादिवत् तथापि न स्फुटो भवतीति । यदा तावन्मात्रस्य व्यञ्जकत्वेऽपि उत्प्रेक्षाव्यञ्जकत्व न विहन्यते इति । यद्वृत्तौ चम कारैककारण नन नव जगत् अजडासनस्था इत्युक्त तत्र स्थविरमिव हसन्ती त्यनेन चमत्कारैककारणत्वाशलाभ । अन्यदिवेत्युत्प्रेक्षया नवनवत्वलाभ । कविवदनेत्यादिना अजडापनस्थेत्यशलाभ । एषु पूर्वाक्तचतुर्वृदाहरणेषु कवि प्रौढोक्तिमात्रनिप्पन्नो व्यञ्जक । एव कविप्रौढोक्तिमात्रनिप्पन्नभेदचतुष्टयमुदाहृत्य कविनिवद्भवत्प्रौढोक्तिमा सिद्धच्याकार्थस्य ध्वनेश्चतुर्प भेदेषु मध्येऽधुना वस्तुमा वस्तु व्यज्यते-यथा 'जे लकागिरिमेहलासु' इति प्राकृतपद्यमुदाहृतम् । तस्य छाया-प्रे लागिरिमेस- लासु स्खरिता सम्भोगखिन्नोरगी स्फारो फुल्लफणावरीकवल्ने प्राप्ता दरिद्रत्वम् । त इदानी मलयानिला विरहिणोनि श्वाससम्पणिो जाता झटिति शिशुस्वेऽपि पहलास्तारुण्यपूण्णा इव ॥ इति ॥ ये बाता रागिरेहेमकूटस्य नितम्बेषु सर्प नासा स्खलिता सम्भोगेन श्रान्ताना सर्पिणीना वितता ऊर्वप्रसता या फगापति तया कदल्ने भक्षणे सति तोण व प्राप्ता (स्वल्पारशिष्टा ) इदानीं विरहिणी निश्वासरीपत्सम्बद्धा एव प्राप्तैश्वर्या शीघ्रमेव शिशु वेऽपि तारुण्येन पुष्टावयवा इव जाता इत्यर्थं । अत्र वस्तुना वाच्यार्थरूपेण 'नि श्वास प्राप्तैश्वर्या वायव कि किं न कुर्वन्ति' इति वस्तु व्यज्यते । २ वस्तुनाऽलङ्कारस्य व्यक्तियथा-'सहि विरइऊण' इति प्राकृतपद्यमुदाहरणम् । छाया-सखि विरचय्य मानस्य मम धीरत्वेनाश्वासम् । प्रियदर्शनविश्वलक्षणे सहसेति तेनापसृतम् इति । सिमिति मान व्यक्तवतीति वदन्ती सखी प्रति नायिकाया उक्तिरियम् । धैर्येण मम मान स्याश्वासन कृत्वा प्रियदर्शनक्षणे सहसाऽपस्तम् इति वाच्येन वस्तुनाऽकृतेऽपि प्रियप्रार्थने सा प्रसन्ना इति कारणामावेऽपि कार्योत्पत्तिरूपविभावनाऽलङ्कार । ननुप्रियदर्शनसामाग्यबल धैर्येण सादु न शक्यते इति चायवालङ्कारश्च व्यज्येत !

। चतुर्थोल्लासः ३ अत्रैवालङ्कारेण वस्तु व्यज्यते यथा 'ओल्लोलकर' इति प्राकृत पद्यमुदाह- रणम् । छाया-आर्दकरजरदनक्षतं तव रोचनयोर्मम् दत्तम् । रक्ताशुरु प्रसाद कोपेन पुनरिमे नाकान्ते इति । भर्तरि सपरन्या कृत नखक्षतादि दृष्ट्वा कोपारक्तनयना भर्तु प्रश्नमुत्तरयति तत्र । भत्र किमिति कुपिते रोचने वहसीति प्रश्न नयनादुत्तरालङ्कारेण न केवर- माक्षतानि गोपायसि तेषामह प्रसादपानमपि जाता इति वस्तु व्यज्यते, कोपेन पुनरिमे नाक्रान्ते इति अपहृतिसहितेन वस्तुव्यक्ति । ४ अप्रैवालङ्कारेणालङ्का रस्य यथा-'महिलासहस्सभरिए' इति प्राकृतपद्यमुदाहरणम् । छाया-महिलासह सभरिते तव हृदये सुभग सा अमान्ती । अनुदिनमनन्यकर्मा अङ्ग तन्वपि तनयति अत्र विरहकृशा नायिका नायकायावेदयन्त्या सरया उक्तिरियम्। अनामान्तीत्यत्र महिलासहस्रभरितत्व हेतु । तनूकरणे च अमान्तीत्य हेतु । अलो महिलासहस्र भरितत्वात्तव हृदि स्थान न लभ्यते, ततो तन्वपि तनयतीति हे वलकाराभ्या तनोस्तनूकरणेऽपि तव हृदये न वर्तते इति कारणसत्त्वेपि कार्यानुत्पत्तिरूपो विशेषोक्तिरलङ्कारो ध्वन्यते । एषु चतु'दाहरणेषु कविनिबद्धवक्तृप्रौढोक्तिमान सिद्धव्यञ्जकार्थ । एवम् अर्थशव युद्भवध्वनेादश भेदा । एव द्विविध ताब्दशक्तिमूल द्वादशविधमर्थशक्तिमूल च सलक्ष्यक्रमव्यङ्ग्य निरूप्येदानीमेकविधमुभयशक्तिमूल निरूपयति अनन्दचन्द्राभरणे'ति उदाहरणेन । शब्दश्चार्थश्च शब्दार्थों तद्रूप यदुभय तद्भू तच्छत्युभव एको वस्तुनाऽलङ्काररूप इति कारिकार्य । ननु शब्दशक्तिमूलेऽप्यर्थस्य, अर्धशक्तिमूरऽपि शब्दस्य व्यञ्ज. कत्वमस्तीति उभयशक्तिमूलकत्व सर्वथैवास्तीति चेन्न । तत्र तयोर्गुणप्रधान भावेन व्यञ्जकत्व प्रतिपादितम् । अत्र तु द्वयोरेव प्राधान्येन व्यञ्जकत्वमि त्युभयशक्तिमूलत्वम् । तथा हि शब्दस्य परिवृत्तिसहरवासहत्वाभ्या शब्दार्थो- भयशक्तिगूलत्वमिति ज्ञेयम् । अत्रोदाहरणे अतन्द्र स्फुरदूप चन्द्र एवाभरण भूषण यस्था सा अत एव सम्यगुद्दीपित प्रपलीकृतो मन्मथो यया सा, तारका नक्षत्राणि तरला स्वल्पा यस्या सा, श्यामा रात्रि क जन सानन्द न करोति अपि तु सर्वमेवानन्दयति रात्रिपथ । अतन्द्रा सुरतादावालस्यरहिता सा चासौ चन्द्र कपूर सुवर्णनिर्मितशिरोभूषणविशेषो वा भाभरण यस्या सा। मुदा हर्षेण सहिता समुद्दीपितो दीप्तिं प्रापितो मन्मयो यया सा दीपितमन्मधा काव्यप्रकाश रहस्यम् तारका अतिगतकृष्णकनीनिका तरला चञ्चला यस्या सा। यद्वा तारकावत् नक्षनवदीप्त तरलो हारमध्यमणियस्या मा । एवम्भूता श्यामा पोडशवापिकी नायिका क पुरुष सानन्द न करोतीति नायिकापोऽर्थ । अत्रैवरीत्याऽर्थद्वयप्रतीतो स्त्रीविशेप इव रानिरिति, ज्योत्स्नी रागिरिव नायिकेति वा उभयत्रोपमालङ्कार प्रतीयते व्यज्यते, तदाह-'अनोपमा व्यङ्गयेति । अन्न च चन्दतारकातरलश्यामाशब्दा परिवृत्यसहा । पर्यायान्तरोपादानेऽपरार्थ बोधासम्भवात् । अतन्द्राभरणसमुद्दीपितमन्मथशब्दाश्च परिवृत्तिसहा अनिद्रा भूषणसमुत्तेजितकामादिपर्यायान्तरैरपि तदर्थप्रतीतेरिति उभयशक्तिमूरत्वमिति । प्र०१३-निनोद्धृतपद्यानां ध्वनिभेदं प्रदर्य पद्यव्याप्यानप्रसङ्गेन भवन्मतं सोपपत्तिकं समर्थ्यताम् । चतुर्थोल्लासे पद्यसंख्या ७४, ७६, ८० ८१, ८४, ८७, ९१, ९९, १००, १०९, ११०॥ उ०१३-अनपद्य ७४ यथा- खलववहारा दीसन्ति दारुणा जहवि तहवि धीराणम् । हिअअवअस्सबहुमआ ण हु ववसाआ विमुज्झन्ति । अस्य छायैवम् -'खलन्यवहारा दृश्यन्ने दारुणा यद्यपि तथापि धीराणाम् । हृदयवयस्यवहुमता न खलु व्यवसाया विमुह्यन्ति' इति । इद पद्य पदप्रकाश्यत्वे अविवक्षितवाच्यध्वनिभेदमत्यन्तविरस्कृतवाच्यमुदा- हरति । पद्यव्यारयाननन्वेवम्- यद्यपि सलानां धूर्ता। शठानां व्यवहारा चरितानि दारणा दुखदा अन्येष्टप्रतिरन्धका दृश्यन्ते तथापि सदर्थमाहितया हृदयमेव वयस्य मित्र तेन बहुमता अनुमोदिना धीरागा महतां व्यवसाया उद्योगा न खलु विमुह्यन्ति न प्रतिवद्वा भवन्तीत्यर्थ, यद्वा न विराम प्राप्नुवन्तीत्यर्थ । अत्र अचेतने व्यवसाये मुरयो विमोह बाधित सन् कार्यकारणभावसम्ब न्धात् प्रतिवन्धरूप विरामरूप वार्थ लक्ष्यति । तेन च सर्वथा इष्टकार्यकारिश्व ध्यङ्गयम् लक्षण क्षणाफलम् । तथा च विमुह्यतीति पदमत्यन्ततिरस्कृतवाच्यं सद् अक्षरम् । अत्र विमुयन्तीति पदस्यैक्स्यैव व्याक्तेति पदप्रकाश्यत्वम् । .

, चतुर्थोल्लास. 'उपकृत बहु तत्र' इति पद्ये तु सर्वेपा पदाना व्यञ्जकत्वमिति तत्र वाक्यप्रका- श्यत्वमिति भेद । ७६ तमपद्य यथा- मुग्धे मुग्धतयैव नेतुमखिल काल विमारभ्यते , मान धस्व धृति वधान ऋजुता दूरीकुरु प्रेयसि ॥ सरयैव प्रतिबोधिता प्रतिवचस्तामाह भीतानना नीचे शस हृदि स्थितो हि ननु मे प्रागेश्वर भोप्यति ॥ न केवल सर्वनामपदानामेन रसादिव्यञ्जकता किं त्वन्येपामपीति ध्वनयन् अनेन पद्येनात्र सभोगेऽसर च्यक्रमध्वनिमुदाहरति-विदितरहस्या मानोपदेश कुर्वाणा सखीमगणयन्त्या भर्तरि प्रणयविनयव या नायिकाया भगवन्तरेण ता प्रत्युक्तिरियम् । हे मुग्धे उपदेशाग्राहिणि स्वयाऽपिर समय कार मुग्ध तयैव यथोचितानाचरणेनैव मानचातुरीशून्यतयेव का नतु यापयितु किं किमिति आरभ्यते किंतु मान धत्स्व धारय धैर्य वधान प्रेयसि प्रियतमविषये ऋजुता सरलता त्यज दूरीकुरु । इत्येव सरया प्रतियोधिता मुहुर्मुहुरपदिष्टा अकृत्रिमा नुरागा नायिका भीतानना भयपनितवरब्यवदना सती ता प्रतिबोधयन्ती सखी प्रतिवच उत्तरमाह । उत्तर दर्शयति-हे ससि व नीचैर्मन्द शस कथय । हि यस्मात् प्राणेश्वर प्राणाना तदायत्त बाजीवितसर्वस्वायमान अत एव मे मम हृदि हृदये स्थितो विद्यमान श्रोप्यति आर्णयिष्यति । ननु शङ्कायाम् । अत्र सख्या अपरिहार्यवाक्यतया नीचै शसनस्य विधान कृतम्, मैव शसेति च नोक्तम् । अत्र भीताननेति पद नीचै शसनविधानस्य युक्तता प्रकाशयन् प्राधान्येन भयप्रतिपाद्याकृत्रिमानुरागेण रागातिशय सम्भोगातिशय वा (शृङ्गाररस) व्यञ्जयतीत्यर्थ । पद्य८.८१ यथा- वदप्राप्तिमहादु पविलीनाशेषपातशा । तचिन्तारिपुलाहादतीणपुण्यचया तथा । चिन्तयन्ती जगसूति परब्रह्मस्वरूपिणमानिरुच्चासतया मुक्ति गताऽन्या गोषकन्यका।। भत्र युग्मके स्वत सम्भावना वस्तुना अलङ्कारस्य व्यक्तिमुदाहरति-इद सलक्ष्यकमध्ययमर्थमूलकम् । अधुना पद्यस्य न्यारयानम् उताभ्यो भिता काचित् गोपन्या निरुवासतया निरद्वप्राणवायुतया परब्रह्म यथा-न्या ७६ काव्यप्रकाश-रहस्यम् स्वरूपिणं सच्चिदानन्दरूपं जगतः संसारस्य सूतिरुत्पत्तिः यस्मातादृशं श्रीकृष्णं चिन्तयन्ती भावयन्ती सती मुक्ति मोक्षं गता । कीदृशी, तस्य कृष्णस्याप्राप्त्या वियोगेन यन्महादु सं तेन विलीनानि नष्टानि अशेषाणि पातकानि यस्याः सा पुनः तस्य श्रीकृष्णस्य चिन्तया भावनया ध्यानेन यो विपुलो महान् आह्लाद आनन्दस्तेन क्षीणो नष्टः पुण्यस्य चयः समूहो यस्याः सा इति वाच्यार्थः। अब जन्मसहरपभोग्यानि दुष्कृतसुकृतयोः फलानि वियोगदुःखचिन्तनाहादाभ्यां कयाऽप्यनुभूतानीत्युक्तम् । एवञ्च दुष्कृतसुकृतफलराशितादात्म्येनाध्यवसितो भगवद्वियोगदुःखचिन्ताहादौ प्रतीयेते इति निगीर्याध्यवसानरूपातिशयोक्ति द्वयमशेपचयपदाभ्यां द्योत्यते । पद्यं ८४ यथा- राईसु चन्दधवलासु रलिअमफालिऊण जो चावम् । एकच्छत्तं विन कुणइ भुअणरजं विभंतो॥ अस्य छाया-रात्रीषु चन्द्रधवलासु ललितमास्फाल्य यश्चापम् । एकच्छत्रमिव करोति भुवनराज्यं विजृम्ममाणः ॥ अत्रार्थमूलसंलक्ष्यक्रमव्यङ्गये कविप्रौढोक्तिमात्रनिप्पन्नशरीरे व्याऽर्थे वस्तुना वस्तु व्यज्यते । मानिनी प्रति माननिर्वाहः कठिनः इत्येतद्वोधिका सख्युक्तिरियम् । व्याख्या-यः प्रकृतः स्मरः चन्द्रेण धवलासु उज्ज्वलासु रात्रीपु ज्यौरनी. विति यावत् । ललितं सुकुमारमेव कुसुममयमेव (न तु कमठपृष्ठकठोरम्) चापं धनुः आस्फाल्यैव, नतु बागादि संधाय भुवनानां राज्यम् एकमेव छत्रं यत्र तथा- भूतमिव अद्वितीयमिवेति यावत् करोति । अत एव विजृम्भमाणः विस्फुरमाणः अतिसाहंकारतया वर्तमान इयर्थः। अत्र चापास्फालनेन एकच्छन्नमिव भुवनराज्यं करोतीति कविप्रौढोक्तिसिद्धेन वस्तुना स्वशासकानगपारवश्येन कुशलः कामिभि. मिद्भिः उपभोगपरैरेव निशाऽतिबाह्यते इति वस्तु भुवनराज्यपदेन प्राधान्येन ज्यते । कामिनाम् इत्यत्र कामिन्यश्च कामिनश्चेति कामिनः । पुमान् स्त्रियेपेक- शेषः । न कोऽपि तदादेशपराङ्मुखः कामाज्ञाभक्षकः आसीदिति हेतोः उपमोग. परैरुपभोगासक्तैरेव निशा नीयते इत्यर्थः। अखण्डाज्ञाविषयो हि साम्राज्यम् । अत्र भुवनराज्यपदस्य प्राधान्यात् पदप्रकाश्यता । कैलासस्य प्रथमशियरे इत्यादी तु नेदृशं किमपि पदमिति वाक्यप्रकाश्यतैवेति भेदः । अत्र 'एकच्छत्रमिव' चतुर्थोल्लास इदार्थ उत्प्रेहा सा च न व्यञ्जनोपयोगी प्रत्युत तत्परित्यागेऽतिशयो गम्यत निर्धारितार्थप्रतीते । अन्न वृत्तेाग्यानम् यथा- असौ प्रजापालनपरो राजा स्मर तेभ्य तदर्थम कन्दर्पप्रजारूपकामुकभी यर्थमिति यावत् । तादये चतुर्की । 'तेषु मध्य' इति व्यारयान नातीव समीचीनम् । यत कश्चिदपि स्वीपुरुषारमको ला विरक्तोऽपि तदादेशपराङ्मुख कामाज्ञामञ्जक सुरतरिमुख नासीत् अत एव जाग्रदिप- भोगपरैरेव तैनिशाऽतिवायते इति । पद्य ८७ यथा-- सो मुद्धसामलगो धम्मिल्लो कलिअलिअणिअदेहो। तीए खधाहि बल पहिम सरो सुरअसगरे जअइ ॥ छाया-स मुग्धश्यामलाङ्गो धम्मिल्हो कलितर स्तिनिनदेह । तस्या रसन्धादल गृहीचा स्मर सुरतसगरे जयति । इत्य कविप्रोढोक्तिमानसिद्धेनालङ्कारेणार कारस्य व्यक्तिमुदाहरति । पद्यस्य च्यारयानम्-सम्मिल केशपाश एव स्मर वामस्तस्या नायिकाया स्कन्धोंड सभाग एवं स्वन्ध सेनानिवशस्तस्माद्वल सामर्थ्यमेव वल सैन्य गृहीना सुरतसगरे सुरतरूपे सड्ग्रामे जयति सर्यो वर्षेण वर्तते । कीदृश मुग्ध सुन्दर श्यामलम (श्यामलम् ) अङ्ग यस्य स । तथा चरित पुनरापादितो ललितो मनोहरो निनदेह स्वशरार धम्मिल्लरूप यन स । इति वाच्यार्थ । तादृशस्य हि महापुरुषबुद्ध्या स्वकीयबरदानन साहाय्यकमाचरन्ति रोका इति बोध्यम् । धम्मिल स्मर इति रूपकम् ।सन्धादिति वरमिति च श्लिष्टरूपके सुरतसगरे इति स्पकम् । यथा युद्धानिवर्तमानमपि कञ्चित् कश्चिन्मित्रभू तोऽन्यत स्कन्धावारात् बल लब्ध्वा त प्रोसाहयति तथा अस्या नायिकाया पूर्वसुरतवेलाया मुहुर्मुहु कपणेन स्कन्धपतितकेशपाश साक्षारमर एव सन्धान बल गृहीत्वा (लब्ध्वा ) सुरतभोगनिवृत्तमपि मा मन प्रो साहनेन सुरते प्रवर्त यतीति भाव । अत्र रूपकेणेति एकवचनम् जायभिप्रायेणानेकेपा रूपकाणा साचात् । सुरतसगरे इति धम्मिल स्मर इति रूपकार द्वाराभ्यामियर्थ । धम्मिलस्य स्वन्धसम्बन्धन शोभातिशयलाभात् सन्धपदस्य प्राधान्यम् । तथोपर्युक्तरूपकाभ्या रयनिष्पत्तित्पाभिलापहे वभावेऽपि क्षभिरापोदयात् ७८ काव्यप्रकाशरहस्यम् विभावनालद्वारो व्यज्यते । रविनिप्पत्तिश्च सधपदेनैव घोतिता। आपंगेन हि धम्मिहस्य स्कन्धप्राप्ते प्रायशो रतिनिम्पत्ति विनाऽसम्मरात् । अय रूपक स्वतोऽसम्मरीति कविप्रौढोतिमानसिदम् । पच ९१ यया- विहलसर तुम सहि दट्टण कुटग तरलतरदिहिम् । चारप्फसमिसेण अनश गुर ओत्तिपादिअ विहिपणो ॥ जस्य छाया-विरासला वा ससि दृष्ट्वा बुटेन तरलतरदृष्टिम् । द्वारस्पमिपेग घामा गुरक इति पातयित्वा विभिन्न ॥ अत्र पो कविनियवस्तृप्रौदोक्तिमायमिनारधारेण वस्तुनो व्यक्ति मुदा हरति । प्यारयान पद्यस्य यथा-नदीले हतागहने कृनसहेतमप्राप्त गृह प्रवेशसमये पश्चादागच्छत कामुर दृष्ट्वा पुनर्नदीगमनाय युदिपूर्व द्वार ध्यान घट स्पोरितवती नायिवा प्रति सरया पदभिप्रायोजगतो मया नरमा समाश्वाम विधाय समाहितसिइये बज । अह प्यावादिनिकटे सर्व समाधारये इत्यभिप्रायगर्भा अविदग्धजनप्रतारणायोनियिम् । हे सपि विशालमिति भार वशात् विकला व्याकुला वा अत एव सरलतरदृष्टिम् अतिशयितबाटिम् रखा दृष्ट्वा कुटेन घरेन (का) क्षामा स्वस्परपम घरम्यपदश्य करनुप्रीया दिमान् मृन्मयो देद इति यावत् गुररु गरीयान् इति स्वारया अपि कष्टदायक इति दु मेनेति माय । द्वारसस्य मिपंग या पातपिरमा विभिन्न स्फोटिस इत्यर्थ । अन्तर्भावितण्योऽयम् । नाय द्वारस्पति घग्नापारमया कृत किन्तु गरनया परपीडक यात् घग्नय स्वारमा विभदित इग्यपदुरयर कार । विगा कामपरवशामिति हदि स्थितोऽयं । वृत्तरियान शु गृह प्रवेशापसरे गृहप्रवेश समपे आगत कामुक दृष्ट्वा पुन दागमनाय द्वारोग्यातम्याजेन पुदि म्याकुल या स्वया घर स्पोरित अप्रैर पुदिपूर्व रिभेदित इति मया चिन्तितमयग तम् । सत् तस्माद् पज गरम जो परिप्रदर्शितापदायर गरेण यदभिप्रायोऽयगती मया, तरसमाधास विधाप समाहितपिश्य मज अहस्यपृथूनिटे स समपं दिये, इनि पस्तुन यारपसमिमेनेति पदपाधान्यात् पदमारयना । अयागने घरे रामविभेदनरूपचेतनधर्मारोप इनि सन्मूनायागने प्रोडोनिसिपम् । यि एकधारामाguri दिशि दिशि पयमानो यौri Prमा । पच ९९ यथा- चतुर्थोल्लासः नरि नरि फिरति द्राक् सायकान् पु पधन्वा पुरिपुरि विनिवृत्ता मानिनीमानचर्चा अन्न प्रत्ययरूपपदेकदेशयो तिड्सुपो सम्भोगशृङ्गारस्य व्यक्तिमुदाहरति पद्यन्याख्यान यथा-चपन्तवर्णनमिदम् । पपि पथि प्रतिमार्गम् अडराणा नूतनप्ररो हाणाम् आमा कान्ति शुकचञ्चूनामिय चारमनोहरा (अस्ति) । एवम् दिशि दिशि प्रतिदिश वीरुधा रताना लासको नर्तक पवमानो वायुश्चास्ति । आभ्या च वा- क्याम्या नूतनाङ्गुरशोभाशालिवसन्तत॒सर्वदिवसञ्चारिमन्दमारुतयोरद्दीपकयो सम्प त्तिरुता । तस्कार्यमाह-गरि नरीति । नरि नरि प्रतिपूरुष पुष्प धतुर्यस्य स पुष्पधन्वा काम दाग झटिति सायकान् पञ्चापि बाणान् पिरति क्षिपतीत्यर्थ । (एर कामा द्दीपने सति) पुरि पुरि प्रतिनगर मानिनीना मानयतीना स्त्रीगा मानस्य चर्चा वार्ता प्रसङ्गो या विनिवृत्ता विशेपेण निवृत्ता गतेत्यर्थ । अत्र नरि नरि पुरि पुरि इत्येतयो स्थानारयप्रमाणेन एकैकस्या पुरि एकै कस्मिन् नरि सायकपातेन सम्पूर्गनगरे त्रासात् सर्वासा मानभङ्ग तथा पुरुषे जा पातेन मानधनाभि स्त्रीभिरपि मानरत्यक्त इति अतीवाखण्डानाशालित्य मन्मथस्य द्योत्यते । अत्र रितीति निड् । किरणस्य साध्यत्वम् तिड्योगे व्यञ्जनया साध्य- तयैव धात्वर्थोपस्थिते निवृत्तेति सुप्प्रत्ययेन निवृत्ते सिद्धत्वम् सुयोगे व्यजनया तथैव प्रकृत्यर्थप्रतीते । तत्र सिद्धत्वेऽपि 'क्त' प्रययेन अतीतत्व व्यज्यते इति । किरणनिवृत्त्यो पौर्वापर्यविपर्ययरूपातिशयोक्त्यल कारप्रकाशो रसोत्कर्षे पर्यवस्यति क्या च फिरतीति वृत्तेति तिड्सुपो प्रत्ययात्मकपदैक्देशयो क्रमेण प्रययार्थगन- साध्यत्यसिद्धत्वाभिव्यक्तिद्वारा रत्युद्दीपनातिशयपर्यबसानात् प्राधान्यम् । मान निवृत्तौ शरकिरणम् तस्य सिद्धत्वे वक्त ये किरतीति तिड्प्रययेन साध्यत्व'क्ति । मानानिवृत्तौ च कार्यभूताया साध्यत्वे वक्तव्ये सिद्धत्वोक्तिस्तथा च किरणनि- वृत्यो कारणकार्यभूतयो पौर्वापर्यविपर्ययात् कार्यकारणयो पौर्वापर्यविपर्यय रूपातिशयोक्त्यलङ्कार रकाश । स च निवृत्ते शीघ्रवबोधनद्वारा वतन्तस्यो। द्दीपकातिशयाभिव्यक्ते रसोक पर्यवस्यति इति 'क्त' प्रत्ययेनातीतत्व शरत्या बोध्यते तेनोस्पन्नस्वरूप सिदत्व व्यगयम् । तथा च प्रकृत्या प्रत्यायितस्याऽप्य तीतत्वस्य पुनः कृमययेन प्रत्यायनमनिशयाचगमाय । पयं १०० यथा-- लिखनास्ते भूमि पहिरवनत प्राणदयितो निराहारा सख्य सतरारितोच्ननयना ॥

८० काव्यप्रकाश रहस्यम् परित्यक्तं सर्व हसितपठितं पारशुकै स्तवावस्था चेयं विस्ज कठिने मानमधुना ॥ अत्र प्रत्ययरूपपदैकदेशेषु सुप्तिविशेषेषु विप्रलम्भशृङ्गारस्य व्यक्तिमुदाहरति । अत्र पद्येऽमरुशतके बहुदिनव्यापिमानवती प्रति सख्या उक्तिरियम् । व्याख्यानम्- हे कठिने निर्दये तव प्राणानां दयितः प्रियः । तेन दयितदुःखेन त्वत्प्राणा अपि दुःखिता भविप्यन्तीति ध्वन्यते । यद्वा तव प्राणा इव सोऽस्माकं दयितः तथा च त्वत्प्राणा इव सोऽप्यस्माक रक्षणीय इति भावः । ईदृशोऽपि अवनतः नन भूमिं न तु भूमौ । तेनाकासितस्य कर्मणः अनुद्देशत्वं ध्वन्यते । लिखन् शून्य- हृदयतया । विलिखन् न तु लिखतीति । तेन लिखनस्याबुद्धिपूर्वकत्वरूपाप्रा. धान्यं ध्वन्यते । बहिः बाह्यदेशे न तु गृहमध्ये । तेन नायकस्यात्यद्वेगो ध्वन्यते । आस्ते उपविष्टोऽस्ति न त्वासीत् । तेनैवमवस्थानस्य प्रसादपर्यन्तता ध्वन्यते । तथा सख्यः सर्वाः वयस्या मिर्गतः आहारो यासां तथाभूताः सत्यः सततं निरन्तरं यद् रुदितं तेनोच्छूने जातशोफे नयने चतुपी यासां तथाभूताः । सन्तीति शेषः। तथा पञ्जरस्थैः शुकैः कीरैः हमितं हसनं पठितं पठनम् अन्यत्र सर्व शरीरधारणोपयोगि भोजनादिकमपि परित्यक्तम्, उज्झितम् अज्ञानामपीदृश्यवस्था किं पुनरस्माकमिति भावः । पञ्जरेत्यनेनान्यनगमनासामर्थ्य व्यज्यते । शुकत्येक- वचनं न कृतम् । एक्स्य शिक्षादिनापि तथा ज्ञानसम्भवात् । तव चेयमुत्तरोत्तर- वर्धमानासह्यपीडाजनिका अवस्था दशा । जातेति शेषः । अतः अधुना वसन्त- चन्द्रिकादिभिरद्रामे मन्मथविलसिते सतीत्यर्थः । मानं विसृज विशेषेण स्यजेत्यर्थः । अत्र लिखन्नित्युक्तं भतु लिखतीति तेन शतृप्रत्ययेन लिखनस्या प्राधान्यमबुद्धिपूर्वक्रवरूपम् । आस्ते इत्युक्तं न स्वासीदिति । तेन तथावस्थानस्य प्रसादपर्यन्तता तिड्विभक्त्या व्यज्यते । भूमिमित्युक्तम् नतु भूमाविति । तेन बुद्धिपूर्वकं भूमौ किञ्चिन्न लिख्यते इति सुविभक्त्या व्यज्यते । तेन च व्यङ्गयेन नायकस्य मोहातिशयो व्यज्यते तेन च विप्रलम्भोत्कर्षो व्यङ्गय इति भावः । पद्यं १०९ यथा- रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुणैः प्राप्त प्रसिद्धिं परा- मस्मद्भाग्यविपर्ययाद्यदि परं देवो न जानाति तम् । वन्दीवैष यशांसि गायति मरद्यस्यैक्वाणाहति. अंगीभूतीवेशालतालविवरोद्गीणे. स्वरैः सप्तभिः ॥

राम 1 चतुर्थोल्लास. पदैकदेशरचनावणेप्वपि रसादय इति यदुक्त तत्र तेषा बहूना रसव्यञ्जकत्वम् । भत्र पद्ये बहूना वीररसन्यञ्जकत्वमुदाहरति । तस्य व्यास्यानम् राघवानन्दनाटके रावणमुद्दिश्य विभीषणोक्तिरियम् । सकलभुवनमनोरमण एतेन सर्वे तद्वितकारिण इति व्यज्यते । असौ खरदूपणादिनिहन्तृत्वेनातिप्रसिद्धः विलक्षणधेर्यगाम्भीर्यादिशाली च भावनया प्रत्यक्षायमाणश्च । विक्रमगुणैरिति । केवल प्रसिद्धि प्राप्त इत्युक्तौ सदोपगुणैरपि प्रसिद्धिसम्भव यथा सम्बोध्यराव- णस्य । तन्निवृत्यर्थ गुणैरिति । न केवल गुण अपि तु विक्रमजै । एतेन सीता. दानस्यावश्यकस्व व्यज्यते । सापि (प्रमिद्विरपि) न प्रामे न नगरे नापि भुग्ने किंतु भुवनेषु, तेष्वपि न कृशा कि तु पराम् । तेनाज्ञातत्वनिरास । यद्वा विक्रम. गुणै प्रकृष्टा सिद्धि जररक्षणा भुवनेषु प्राप्त इत्यर्थः । एतेन सर्वथाऽपि युद्धेड- जेयत्व ध्वन्यते। तमपि यत् देवो दिव्यज्ञानवानपि भवान् न जानाति तद् अस्माक भाग्यस्य विपर्ययादेव अन्यथाविपरिगामादेर न तु वद्भाग्यविपर्ययात् त्रैलोक्य- नाथतादृशमहापुरुषहरतेन मरणेऽपि मोक्षलक्ष्मीविलासराभेन तस्यापि भाग्य- फल बाद् अस्माक पुन चिरकाल नीविताना त्यादृशम्भुविपदर्शनात् त्वद्वियोगाच निरन्तरदुखदावानलपच्यम नाना पर भाग्यविपर्यय । यदि परमिति निपात समुदायोऽवधारणार्थ । अत्र भाग्यविपर्ययादित्युक्त न तु अभाग्यादिति । तेन स्वादशप्रभुलाभात् सार्वदिकातिशयसुखलाभेनाभाग्यविरहेऽनुमितेऽपि भाग्या- न्येव विपरीतफलत्वेन परिणतानीति पनि । अस्मदित्यनेन समस्तरक्ष कुलस्यैव तथास्व मनीयते । प्रसिदिहेतुभूत विक्रमगुणोदाहरणमाह-वन्दीति । एष मरुत् वायु बन्दीव वैतालिक इव सप्तभि स्वरै पड्जादिभि यस्य रामस्य यशासि गायतीवेत्यु प्रेक्षागर्भम् । सप्तस्वराश्वेता 'निषादर्षभगान्धारपढ्जमध्यमधैवताः । पञ्चमश्चेत्यमी सप्त तन्त्रीकण्ठोत्थिता स्वरा ॥ इति। कीदृशै स्वरै । एकबाणहत्या जातानि यानि श्रेणीभूतविशालतालाना विवराणि रन्ध्राणि ते उद्गीर्णा प्रकाशिता- स्तैस्तथाभूतरित्यर्थ । अत्रासाविति सर्वनाम्ना भुवनेश्वति गुणैरिति उभयत्रैत्र प्रातिपदिकबहु- वचनयो , अस्मादिति सर्वापिगो, भाग्यविपर्ययादिति अन्यथाविपरिणाममुखे. नाभिधानस्य च वीररसयलकत्व सहृदयवेद्यम् । अन्यथासम्पत्ति दुर्भाग्यरूपेण ६का०प्र० फाव्यप्रकाश-रहस्यम् परिणमनम् । नयभाग्यादिति अमारमुग्न । अतम्नाविधनाभापनिती भाग्यान्देर सायन परिणतानीनि ध्यायते । पच 1. यथा- तरगिमनि रलपति रामनुमदनधनुयोः पटायने । अधियमति सरसएसनामीसिमिप पस्तिहरिणपरनयना ॥ यहना हाररसग्यायमुदाहरति । इयमेश परितस्य भीतरय परिस्य मृगस्य घले घरले नपने इय नपने यस्याः सा पदा चरितरप इरिगर घले नयने पस्या इनि अपि विग्रहः । तपाभूना नापिका सलए लनामा मौरि- मधियति । 'उपान्यध्यानमः' सूर्यगाधारस्य पर्मा समुन्द लिपि तिष्टतात्यर्थः । चीमाप्रदामगिर प्रामोतीति याया । पस्मिन्सनि । रमिति सारण्ये कला फटाश विपादिस्पो फलपति शिषपति मति अर्थात विशाय । यदा सरणिमनि करामुपययं (पृद्धि) पल्यनि प्राप्तयति सतापः। पुनः कस्मिन् सनि भूयोरने धूलताप्रे अनुमदनपनुः मदनपनुपः पामय पाप समीपे पटति सति भारकायाः । अत्र चरित्यनेन पापोभायपानियो प्यश्यते । पृर्याण्यानं यथा-- भय इमनिप्परययाप्ययीभावसमामरमभूमापाराणा गारपार - पति अग्रेमनिजिरयादिना करगिमनि इति (मनि' प्रत्ययः । अनुमदनधनुरिया प्ययीभायः । महिमिनि यमभूनाधाररनेपामियः । स्वरूपाती। मारपx. कायमिनि दोषामदेवाद सरगये इशिता इमनिशादीना पापमय गरिभिार. प्परयपादिभिम्नुस्येऽपि अस्ति कधिरयरूपस्य शिरोपः इति । भुरिग्पादिलानो माधुर्यादियुनोयएनागोचरः मददपमाप: पामगरकारी गएर प. सायं प्राप्नोतीति । अयं भार इममिण मम्मिन मामाराव गारमेष भयं पर प्रसायने । सरगम्ये पनी गुपयाय प्रॉपरतपा पपगी:विri अनुमदनधनुरिति पूर्वपदार्थपानापपीभाग उरपदालानुमाया प्रझरपणा गरिपंचपनीकरणपाम-पं भूरप पप्पा । गया affai पर्मायन पीभूनमामोशिमातिना गोराम्पिो पश्यने । भोली ए आधारशिलापा भी गामगमतिनं. मदिन। एपगामनिगाहानामेनपापजनदारा मिनि। ।

चतुर्योल्लासः " " " " अस्योल्लासस्य सर्वोऽय विषय कोष्टरूपेण निम्न प्रदर रसाना सन्ति नवैव च तेया स्थायिभावा । तद्यथा- रसनाम स्थायिमाव उदाहरणम् १ मार (क) सम्भोग शूय वामगृह ॥३०॥ (ब)विपलम्म १ अभिल धातुक प्रमाा प्रय ३२॥ २ विरहहतुन अन्यत्र नजनीति । ३३ ।। ३ याहतुक मा पत्य प्रथमा ॥३४॥ ४ प्रवासहेतुक प्रस्थान वलय 11३१॥ ५ शापहतुक वामादित्य २ हास्यम् हाम आकु य पानि ॥३७॥ ३ करुण शक हा मातस्परिता ॥३८॥ काध ऊनमनुमत्त दृष्ट ॥३९॥ ५ वीर साइ शुदा सत्रासमेते ॥४॥ ६ मयानक भयम् ग्रीवायड़ामिराम ॥४१॥ ७ बीमत्स जुगुप्सा उकूगोत्कृय कृत्ति ।। ४२ १५ ८ अद्भुत विस्मय चिनमहानेत्र बताद।। ४३॥ 'नि. शमी का अहौसहारे का ४४। भाषादीनां लक्षणमुदाहरणं च । निम्नलिखितकोटे द्रष्ट यम्- भावनाम लक्षणम् उदाहरणम् माव रतिर्देवादिविषया। कण्ठकोगविनिरिटमीश।॥४५॥ (क) देवविषया रति (ख) अभिव्यभिचारा गने कोपपराकमुनी ॥४७॥ नदामासा अनौचियप्रवरिता स्तुम क वामाक्षि ॥४८॥ ३ भावामान " कासुगकरमुखी ॥४९ । ४ मावशान्ति मावस्यानि प्रशम नस्या साधिनपन । ५०। १ भावोदय मावस्योदय स्मिन अपने ६ मावशलता मावाना शहलना पूर्वपूर्वी कार्यसनमण कच॥ पमन परसरोदय १७ मात्रसधि भाश्योरेककानमेव तुश्यक उत्सितस्य तप पराक्रमनिध भयोरास्व द समकार रम्यापमादेन ।१२॥ मेव विरुद्धयोरपि दुस्य कायोगबाटो वा " २ रसामाम काव्यप्रकाश-रहस्यम् " " " " ९ " " " " " ध्वनेअंदा उदाहरणानि च यथा- चने दाः उदाहरणानि १. अर्थान्तरसमितवाच्यो ध्वनिः स्वामरिम वच्मि विदुषाम् ॥ २३ ॥ २. अत्यन्ततिरस्कृतवाच्यः उपकृत बहु तत्र किमुच्यते ॥ २४ ॥ ३. भलक्ष्यक्रमव्यय शून्य वासगृह विलोक्य ।। ३०॥ ४. शब्दशक्तिमूलबालङ्कारस्य " उल्लास्य कालकरवाल ॥५४॥ ५. शब्दशक्तिमूलकवस्तुनः पथिक नान सस्तरमस्ति ॥ ५॥ ६ स्वतः सम्मविना वस्तुना वस्तुनो व्यक्तिः । अलसशिरोमगिधूर्तानाम् ॥६० ॥ " अलङ्कारस्य " धन्याऽसि या क्थयसि ॥६१॥ ८. " अलङ्कारेण वस्तुन' " दन्धिगन्धगजकुम्भकपाट ॥३२॥ " असारस्य गाढकान्तदशनशनथ्यथा १. कविप्रौढोक्तिसिद्धेन वस्तुना वस्तुनः" कैलासस्य प्रथमशिखरे ॥६४॥ ११. " अल कारस्य" केशेषु बलात्क रेण तेन च ॥६५॥ १२. कविप्रौदो० अलङ्कारेण वस्तुनः व्यक्तिः गाढालिगनरमसोधते ॥६६॥ १३. अलङ्कारस्य " या स्थविरमिव इसन्नी ॥६७ ॥ १४.कविनिबद्धवक्तप्रौढो० वस्तुना वस्तुन " ये लदागिरिमेसासु ॥६८॥ अलङ्कारस्य " सखि ! विरचयमानस्य ॥ ६९ ॥ १६. " अलङ्कारेण वस्तुनः भाद्राकरजरदनक्षतैस्तव ॥७॥ १७. अलङ्कारस्य " महिलासहस्रमरिते व ॥७१॥ १८. शब्दार्थोमयशक्तिमूलो ध्वनिः श्रत-द्रचन्द्रामरणा ॥७२॥ २९. पदप्रकाश्योऽर्थान्तरसङ्गमित वाच्य " यस्य मित्राणि मित्राणि ॥७३॥ २०. " अत्यन्नतिरस्कृतवाच्यः खलव्यवहारा दृश्यते ॥ ४॥ " भरपक्रमव्यथा लावण्य तदसौ कान्तिः ॥ ७५ ॥ २२. " वस्तुनाऽर द्वारस्य व्यक्तिः रविरविसरप्रसाधित ॥७७॥ वस्तुनः मुक्तिमुक्तिकृदेवान्त ॥ ७८॥ २४. " स्वाम्माविना व० ०" साय खानमुपासितम् २५. ॥ अवारस्य" तदाप्तिमहाखविलीना ॥८॥ २६. " अलङ्कारेण वस्तुनः" क्षगदाऽसावक्षमादा ॥२॥ २७. " अरद्वारस्य " तव समस्य प्रमाने ॥८३॥ २८. विप्रौदोत्तिसिद्धनव०व०॥ रात्री चन्द्रपवलाम |॥4॥ २५. "श्रद्वारस्य निशितरपियाऽपयत्यनङ्गो। ८५॥ अबकारेण वस्तुनः" दार्यमागोऽपि पुनः सन्ताप ॥८६॥ " " " " " " " M चतुर्थोल्लासः ध्वनेर्भदाः " " " " "अलङ्कारस्य" ३२. कविनिपद्धवक्तृप्रौढो०३०३०॥ " अलङ्करस्य" अलङ्कारेण वस्तुन." " अलङ्कारस्य" ३६ प्रबन्धेःशक्तिमूलो घनिः ३७ धातुरूपपदै कदेशे रसस्य ३८. नामरूपपदैकदेशे ३९. प्रत्ययरूपपदैक्देने ४०. सशयास्पद वनिद्यसङ्करः ४१. अनुमाशानुग्राइकैकव्यानुप्रवेश- रूमौ सगे सष्टिश्च उदाहरणा म मुग्धश्यामलाङ्गा धम्मित। नवपूर्णिमामृगाइस्य 1८८ मखि। तव निधुवनसमरे ॥ ८९॥ प्रविशन्नी गृहद्वारम् ॥९० ॥ ज्योत्स्नया मधुरसेन च ॥ ९ ॥ अल स्थित्वा श्मशानेऽस्मिन् ॥ ९३ ॥ रतिकेलिहृन निवसनकर. प्रयान् सोऽयमपाकृतः ॥९८॥ पथि पथि शुकचञ्चार ॥ ९९ ॥ क्षाप्राघुणिका देवर जायया ।। १११ ।। स्निग्धश्यामकान्तिलिप्त ॥ ११२।। " " " "" " ध्यनेः परिगणनम् १रक्षणामूलकः भविवक्षित २ अभिधा विवक्षितर ૨ १ अत्यन्त. क्षसं. अर्था. पर्द वाक्य पदं वाक्य वाक्य २ प्रबन्ध पदैक्देश ४ रचना ५ वर्ग संलक्ष्य २ अर्थः ३ १ उभय० शब्द वाक्य ८२ वस्तु अलं.३ काव्यप्रकाश-रहस्यम् स्वतः० कविप्रो० कविनि. वस्तुना वस्तु व. व. वस्तुनालङ्कारः २३. अलं.२५. अलं, अलङ्कारेण वस्तु. ३ अलं. व. ३ अलं. वस्तु ३ भलक्षारणालड्वारः ४ अलं. अलं . अलं भलं . वाक्य ४ ४ ४ ४ पदवाक्यप्रवन्ध ३ ३ १३ स्वतः कविप्रो. कविनि. १२ १२ N ६ अविवक्षित असं० शब्द. उभय. - १ ज अन्योन्ययोजने २६०१ त्रिरूपेण ससङ्कोण गुणने ३ ७८०३ एकरूपया संसृष्टया १०४०४ शुद्धभेदयोजने सकलभेदाः १०४५५ इति चतुर्थोल्लासः।

. अथ पञ्चमोल्लासः प्र०१-सोदाहरणा गुणीभूतव्यगयभेदा लेरयाः। उ०१--अगुणं गुणंभूतमिति गुणीभूतं गुणीभूतञ्च तद् व्यङ्गयञ्चेति गुणीभूत- म्यगाथम् । गुणपदेनात्र गौणं बोध्यम् । यत्र चाच्यार्थादधिकचमत्कारि व्यङ्गय न भवेत्तत्र गुणीभूतभ्यगाथमिति व्यवहार । तस्य निनाष्टौ भेदाः सन्ति । व्यङ्गयभेदाः उदाहरणानि ध्यङ्गयभेदा उदाहरणानि १. अगूह यहचम् (क) अर्थान्तरम. यस्यारहृत्कृत ४ अस्फुरम् अदर्शने दर्शकण्ठा (a) अत्यातनिर | उन्निद्रोक्नद + सन्दिग्धप्राधान्यम् हरस्तु विशित् परिलुप्त (ग अर्थशक्तिमू अत्रासीत्फणिपाश ६ तुल्यप्राधान्यम् ब्राझगानिक्रमत्यागः २ अपरस्यागम् अय म रशनोत्क्षों ७ काकाक्षिप्तम् मथ्नामि कौरवशतम् ३ वासिद्धयाम् भ्रमिमरनिमल ८ असुन्दरम् वानीरकुजोडोन प्र०२-गुणीभूतव्यङ्गयस्याटसु भेदेपु द्वितीयस्य 'अपरस्यागम्' इत्यारयस्य भेदस्य स्वरूपं, लक्षणं सप्रपञ्चं सोदाहरणं निपुणं निरुप्यताम् । उ०२- अपरस्याङ्गमिति द्वितीयभेदं विवृणुमः । अपरस्य रसादेः इत्यादि. वृत्तिगतस्य व्याख्यानमेवम्-अपरशब्दार्थमाह-रसादेर्वाच्यस्य वा (वाक्यार्थीभूत- स्येति)। रसादेरित्यत्रादिपदेन भाव रसाभास भावाभास-भावशान्ति-भावोदय. भावसन्धि-भावशबलतारूपस्यासंलक्ष्यक्रमस्य च ग्रहणम् । वाच्यस्य वाच्यार्थस्य कीदृशस्य रसादेर्वाच्यस्य वेत्याकाङ्क्षायामाह-वाक्यार्थीभूतस्येति। वाक्यता- स्पर्य विषयतया प्रधानस्येत्यर्थः। एवं चासंलक्ष्यक्रमम, संलक्ष्यक्रमं वाव्यवस्तु चैति त्रिविधोऽत्रापरशब्दार्थः । अन एव अपरस्याङ्गम अपरस्य रसादेः स्वनरपे- दपेण लब्धसिद्धरुपकारकम् । तत्र रसपदम् असंलक्ष्यक्रमोपलक्षणम् । आदिना लक्ष्यक्रमस्य वाच्यवस्तुनश्च सङ्ग्रहः । एतेषां प्रधानानां मध्ये रसभाववाच्य. रूपस्य त्रिविधस्यैव प्रधानस्योदाहरणानि मूलकृताऽग्रे प्रदर्शितानि । रसाभासाद्य- लक्ष्यक्रमरूपस्य, संलक्ष्यकमरूपस्य वप्रधानस्योदाहरणानि सुधीभि स्वयमूशानि। अगम उपकारकम् उस्कपकमिति यावत् । रसादीति । असंलक्ष्यक्रमरूपमित्यर्थः।

पञ्चमोल्लास. स्पर्धाकधसमृद्धयेव सुदृढ रूढा यया नेत्रयो कान्ति कोकनदानुकारसरसा सद्य समुत्सार्यते ॥ प्रणतिपरे भगवति भवे भवान्या मानभङ्गेन नेवारण्यनाशवर्णनमिदम् । गिरिभुव पार्वत्या सा पादनखाना द्युति कान्ति व युप्मान् सदा नायताम रात्वित्यन्वय । कीदृशी । कैलास आलय स्थान यस्य तथाभूतस्य (शम्भो ) भालसम्बन्धिनो लोचनस्य वह्निरूपस्य रुचा अरुगकात्या निर्वतिता निष्पादिता सम्पादिता भरतकस्य लाहारसस्य व्यक्ति प्रकटता यस्या तथाभूता, मानिन्या पादपतने सानिध्येन लाक्षारुणललाटने प्रभासम्पर्कादिति भाव । तेन शिवस्य गिरिजापादपतन ध्वन्यते । सा का । यया नवद्युत्या सुदृढ यथा स्यात् तथा रूदा प्रवृद्धा कोकनदस्य रत्तोत्पलस्य अनुकार सादृश्य यस्या कोकनदसदृशी स्यर्थ । अत एव सरसातिशयिता नेत्रयो कान्ति कोपजनिता शोणाति सद्य तत्क्षण समुत्सार्यते नि शेष दूरीक्रियते । अत्र गिरिभुव कोपान्नेत्रयो शोणा कान्तिरासीत् सा पादप्रगते शिवेऽपगतेति तत्वम् । तन्नेदमु प्रेक्ष्यते । स्पर्धाया विजिगीपाया बन्धेन सातत्येन समृद्धयातिदीप्तयेव । अन किं कस्याङ्गम् इति चेत् त्रायतामि यत प्रतीतस्य कविनिष्ठस्य पार्वती. विषयकरत्यारयभावस्य महादेवनिष्ट पार्यतीविषयक सम्भोगरूप झार अङ्गम् । तस्य शृङ्गारस्य भावप्रकर्षार्थमेवोपादानात् पुष्टविभावाद्यप्राप्याड पुष्टत्वाच रसत्य भावाङ्गता । अत्रापि रसबदलङ्कार एव । भावस्य भावाङ्गता यथा-- अत्युच्चा परित स्फुरन्ति गिरय स्फारास्तथाम्भोधय स्तानेतानपि बिभ्रती विमपि न लान्तासि तुभ्य नम । आश्चर्येण मुहुर्मुहु स्तुतिमिति प्रस्तौमि यावद्भुव स्तावद्विभ्रदिमा स्मृतस्तव भुजो वाचस्ततो मुद्रिता ॥ पञ्चाक्षरीनामा कवि अनेन श्लोफेन भोजराज स्तुतवान् । हे पृथ्वि, अत्युच्चा भत्युनता गिरय पर्वता परित सर्वत स्फुरन्ति समन्ताद् व्याप्य तिष्ठन्ति । एवम् स्फारा अतिविस्तृता अम्भोधय समुद्रा तथा स्फुरन्ति । हे पृथ्वि तानेतान् निरिसमुद्रात विभ्रत्यपि धारयन्त्यपि त्व किमपि किञ्चिदपि न क्लान्ता श्रान्तासि अत तुभ्य नम इति भुव पृथिव्या स्तुतिम् आश्चर्येण यावत् मुहुर्मुहु अस्माक काव्यप्रकाश रहस्यम् वारवार प्रस्तौमि तापत् । हे राजन् इमाम् एतद्विशिष्टा भुव रिभ्रत् पालयनत्र विभ्रत् धारयनेव तव भुज स्मृन (न तु भुनी) तत भुजस्मरणात् वाच पृथ्वीस्तुतिरूपा मुद्रिता सङ्कुचिता इति वाच्यार्थ । भन भूविषयक विनिष्ठो रतिभावो राजविषयस्य कविनिष्टस्य रति भावस्याङ्गम् । रमाभासभावाभापयो भावाङ्गता यथा- वदीय नृप द्विपां मृगदास्ता पश्यता प्रेयसा श्लिष्यन्ति प्रसमन्ति लाति परितश्चुग्रन्ति ले सैनिकर । सुकृतशोर्निपतितोऽस्यौचियवारांनिधे विवस्ता निपदोऽखिलास्तदिति तै प्रयर्थिभि स्तूयसे । कश्चित् कवि राजान स्तौति । हे नृप ते तव सैनिका भटा येषां द्विषा शत्रूगा मृगदृश कातरतया मृगसशदृष्टय स्त्रिय वदीकृत्य हटादाहृत्य पश्यत तमियतमाननाय ता भृगदृश शिलप्यति आलिङ्गति प्रणमन्ति नमस्कुर्चति राति गृक्षति चुम्वति च। इधमनुचितप्रवर्तयितापि त्व ते प्रयर्थिभि स्तूयसे हे औचियधारांनिधे औचित्यसमुद्र त्वम् अस्माक सर्वेषा सुक्त पुण्यै दशो निपतितोऽसि । तत् तस्मात् स्वदर्शनात् अखिला विपद अस्माक ध्वस्ता नष्टा इति वाच्यार्य । अत्र प्रथमा सैनिकनिष्ट शृङ्गारोऽननुरक्तस्त्रीविषयक्त्तया परस्त्रीविषयक तया च प्रवृत्त द्वितीयार्थे तु प्रत्यर्थिनिष्टो रतिरूपो भाव प्रकृतराजरूपशनु विषयक्नयाहार्यरवेन प्रवृत्त । एवमनौधियप्रवर्तित वादुभावपि रसाभासभावा भासौ रानविपयास्य कविनिष्ठस्य रत्यारयभावस्याङ्गभूतौ । भावशा तेर्भावाङ्गता यथा- अविरलकरवालकम्पनर्भुकटीतर्जनगर्जनैर्मुहु । दहशे तव वैरिणा मद स गत कापि तवेक्षणे क्षणात् ।। हे राजन् अविरत निरन्तर करवालस्य खडगस्य कम्पनै भृकुटीकरणकै तर्जन विधि भिधीत्यादिवाक्यरूपै हुङ्कारसिंहलादरूपै गर्ननै तव वैरिणा यो मद अस्माभिर्मुहुर्मुहु वारवार ददृशे दृष्ट । स तवेक्षणे तव दर्शने सति क्षणात शापि गत इति वाच्यार्थ ।

पञ्चमोल्लासः अत्र वैरिणे मदारयो गर्वरूपो भावस्तस्य प्रशम शान्ति कविनिों विषयकरतिभावेऽङ्गम् । मात्रोदयस्य भावाङ्गता यथा- साक कुरङ्गम्शा मपानलीला कर्तुं सुहद्भिरपि वैरिशि ते प्रवृत्ते । अन्याभिधायि तव नाम विभो गृहीत केनापि तत्र विषमामकरोदवस्थाम् ॥ हे विभो प्रभो रामन् ते तब वैरिशि रात्रौ कुरगरदृशा बालमृगनेत्रया ( कान्तया) सुहृदि स्निग्धैरपि साफ साधं मधुपानलीला मद्यपानरूपा क्रीडा कर्तुं प्रवृत्ते सति अन्याभिधायि अनेकार्यकतया त्वहिन्नस्यापि बोधक तव नाम केनापि जनेन गृहीतम् उच्चारित सत् तत्र वैरिगि मोडामन्दिरे विपमा कम्पादिछीम अवस्था दशामकरोत् इति वाच्यार्थ । अत्र विषमावस्याव्यङ्गयस्य वासरूपभावस्योदय कविनिष्टस्य रानविषयकस्य रयास्यभावस्याङ्गम्। मावसन्धर्भावागता यथा- असोदा तत्कालोल्लसदसहभावस्य तपस क्यानां विधम्भेष्वय च रसिक शैरदुहितु । प्रमोद वो दिश्यात् कपटबटुक्षेपापनयने स्वराशैथिल्याभ्या युगपदभियुक्त स्मरहर । तप कुर्वी पार्वती बटुवषेण छल्यतो महादेवस्य वर्णनमिदम् । कपटेन छलेन यो वटोर्ब्रह्मचारिण वप आकारविशेष तस्य अपनयने त्यागे युगपत् समकारमेव स्वराशैथिल्यास्यामभियुक्त आक्रान्त' स्मरहर शिव व युप्मन्य प्रमोदम् आनन्द दिश्यात् दद्यात् इति वाच्यार्थ । वराशेथित्ययोर्हेतुगर्भ विशे- पगे अमोदेति चरणद्वयेनाह-तत्काले पार्व या बालत्वकाले उल्लमन् प्रादुर्भवन् असहभावो दु सहस्वम् यस्य तादृशस्य तपस अमोढा सोदुमसमर्थो य फल दाने बिलम्वयितुमसम इत्यर्थ 'अय' च समुच्चये सैल्दुहितु पावस्या कथाविध म्भेषु (विश्वस्ततया) प्रगयेषु वा रसिक प्रीतिमान् स्मरजेतापि या दृष्ट्वा यक- ययाऽऽकृष्धचित्त कृत इति वाच्या । भन्न स्मरहरगतयो त्वरापदशैथिल्यपदगम्ययोरावेगधैर्यास्ययो भावयो सन्धि कविनिष्ठस्य शिवविषयकरतिभावस्यागम् ।

काव्यप्रकाश रहस्यम् भावशवल्ताया भावागता यथा- पश्य कश्विञ्चर चपल रे का त्वराऽह कुमारी हस्तालम्र वितर हहहा व्युत्क्रम कासि यासि । पृथ्वीपरिवृढ भवद्विद्विषोऽरण्यवृत्ते कन्या कचित् पर क्सिलयान्याददानाऽभिधत्ते । किञ्चिदुनिन्नयौवनाया प्रकृतनृपविरोधिवननिवासिनृपकन्याया फलाद्याहरण समय कस्मिचि कामुके जातानुरागाया उत्तिर्ण नमिदम् ।हे पृथ्वीपरिवृढ भूस्वा मिन् राजन् अरण्ये वृत्तिर्वर्तन यस्य तस्यारण्यवृत्ते भवद्विद्विप त्वच्छत्रो कन्या कुमारी फलानि सिल्यानि कोमलपल्लवाच आददाना गृहन्नी सती कचित् कामुकम् इ थमभिधत्ते। कश्विज जन पश्येदिति शङ्का, रे चपर स्वच्छदा चरणशीर चल भपसर इति असूया । का त्वरेति सवर निगमिपावारणायद इति । अह कुमारी इति मम नैवविध स्वातन्यमुचितम् इति स्मरणम् । हस्त रूपमालम्बन वितर देहीति श्रम । हहहेति दैन्यम् । व्यु क्रम कन्यागमनरूप विपरीताचरणम् । अय विरोध । असि इति स्वमर्थे विभक्तिप्रतिरूपक्मव्ययम् । त्व छ कुन यासि इति औत्सुक्यम् । अत्र शङ्काऽसूयाधतिस्मृतिश्रमदैन्यविबो धौ सुक्याना शवलता नृपविषयके रतिभावेऽङ्गम् । एते एव गुणीभूता रसादय रसवदायलवारव्यपदेश लभन्ते । रसव प्रेयऊ स्विसमाहितभावोदयभावसन्धि भावशवरताश्चेति रसवदादयो येऽलङ्कारा पूर्वमुक्तास्तेऽत्रोदाहृता । ननु 'गुणीभूतो रसो रसवत् भावस्तु प्रेय रसाभासभावाभासी ऊस्वि, भावशान्ति समाहित ' इयस्यैव पूर्वेपामलकारच्यवहार । अतो रसादिचतुष्ट यस्य रसवदाद्यलङ्कार व युक्तम् न तु भावोदयादीनाम् इयाशयानुवदति । यद्यपि भावोदयभावसधिभावशवल वानि नालङ्कारतयोवानि तथापि कश्चिद् यादित्येवमुक्तम् । नालङ्कारतयोक्तानि व्यक्तिविवेकृझिमहिमभट्टै स्वे विवरणे । श्रीम मम्मरमते रसवदादीनामपि नालद्वारस्वम् । परमतमेतदवानूदितम् इति । अथ शब्दशक्तिमूलानुरगनरूपोपमालङ्कारस्य ( लक्ष्यक्रमस्य) चाच्याङ्गता यामपरागव्यङ्गय मध्यमकाव्यमुदाहरति-जनस्थाने इति । जनस्थाने भ्रान्त कनक्मृगतृप्यान्धितधिया वचो वैदेहीति प्रतिपदमुदश्रु प्रलपितम् ।

घटना पञ्चमोल्लासः कृता रड्याभर्तुर्वदनुपरिपाटीपु मयाप्त रामत्व कुशलवसुता न त्वधिगता ॥ राजसेवानिविग्णस्य कवेरुत्तिरियम् । पद्यस्य व्यारयानमेवम् । मया रामत्व रामधर्म आतं प्राप्त परन्तु कुशल परिणामसुरसम् उद्वेगनिरासनिपुण वा आयति शुद्ध वा वसु धन यस्य तद्भाव कुशलवसुता सैव कुशरबौ सुतौ यस्या इति न्यु पत्त्या सीता सा तु नाधिगता न प्राप्ता रामत्व क्थ प्राप्त तदाह-कनकस्य सुवर्णस्य मृगो मार्गणम् (अन्वेषगम्) प्रार्थना वा यत्र या तृप्णा । अथवा कनके वा या मृगतृष्णा निष्फटाशा सैर कनकमृगे मारीचे तृष्णा तया अन्धिता विवेकरहिता धीर्यस्य तादृशेन मया। यद्वा अन्धितया धिया जनाना स्थाने ग्रामनगरादौ भ्रान्त भ्रमणमेव जनस्थाने दण्डकारण्ये भ्रमण तत् कृतम् । वै निश्चयेन देहि प्रयच्छ इति वच वचनमेव वेदेहीति सीतासम्बोधनवचनम्, तत् प्रतिपद प्रतिस्थानम् उद्गतम् उस्थितम् अश्रु अश्रुपल यत्र तद्यथा भवति तथा प्ररपित वृथैवोक्तम्, भर्तु भरणतुं धनिकस्य परिपाटीपु सेवारचनासु अलम् अयर्थ का घटना न कृता वद । अथवा काभतु कुसितभर्तु वदनपरिपाटीपु मिथ्याभाषणप्रकारेषु घटना उपपत्ति सा एक हवामर्नु रावणस्य वदनपरि पाट्या मुखपली इपुघटना शरसयोजन सा अलम् अत्यर्थ कृता इति श्लपोपस्थित. पदार्थानामभेदारोपादाम वोपपत्ति इति वाच्यार्य । अन शब्दशक्तिमहिम्ना पादयद्योत्या प्रकृताप्रकृतयो कवयितृरामयो उपमा मयाप्त रामवम् इति वाच्याया रामवाप्रपकारकनयैव क्वेरभिप्रेतेनि उपमाया वाच्याङ्गम् । उपमानोपमेयभाव सादृश्यम् । जनस्थामादाना परिवृत्त्यसहस्वात् शब्दशक्तिमूलता । 'रामत्वमाप्तम्' इत्यनेन व वाच्यार्थसिद्धि- रिति नोपमाया वाच्यसिद्धरणवम् । इवाद्यभावेनोपमाया वाच्यत्वाभावान्नानोप माल शर किन्तु मध्यमकाव्यमेव । अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपस्य (लघयक्रमस्य) वस्तुनो दाच्याङ्गतायामपराग- व्यद्य मध्यमकाव्यमुदाहरति । आगत्येति- आगत्य सम्प्रति वियोगविसष्टुलागीमम्भोजिनी कचिदपि हपितत्रियाम । एता प्रसादयति पश्य शनै प्रभाते तन्वह्नि पादपतनेन सहसरश्मि ॥ मौष्यादिनैवानुनयं त्यक्तमान प्रति सरया उक्तिरियम् । हे तन्वनि कचि.

काव्यप्रकाश रहस्यम् दपि चिदेव (द्वीपान्तरे एव नायिकान्तरगृहे ) पिता अतिवाहिता त्रियामा रात्रिर्यन तथाभूत सहस्ररश्मि सूर्य सम्प्रति अधुना प्रभाते जाते सति शनै अतिभीत इवातिर जित इव मन्द मन्दम् आगत्य एनाम् अम्भोजिनीम् कमहिनी मेव नायिका पादपतनेन किरणसयोगेनैव चरणपतनेन (प्रणामेन) प्रसादयति विकासयति एवानुनयति । एतत् पश्येत्यन्वय । कीदृशीम वियोगे द्वीपा-तरे सूर्यस्य सञ्चारणे यस्तेन सम्पन्धाभाव स एव वियोगो विरह तेन विसष्ठुरानी सकुचिताङ्गीमेव सन्तापकार्यादिना विषमाङ्गीमित्यर्थ । अन विनवानुनयमपगतमाना नायिका सरया उपालभ्यते । तथाहि सहस्त्र रश्मिरिस्यनेन बहुनायिकावत्व ध्वन्यते । अम्भोजिनीमि यनेन वाया पमिनी त्वम् । कचिदपि कचिदेवेत्यनेन उपनायिकागृहे एवति निश्चयाभाव । तत्रापि सामनयमेव न त्वधिकम् एव चेदृशोऽपि ईदृशी स्वयमेवागत्य पादपतनेनानुनयति ईदृशो हि कामिनोव्र्यवहार । स्व पुनर्वहुतरकाल परनायिकासक्ते धर्ते विनवा नुनय गान त्यक्त्वा प्रसन्नाऽसीत्युपालम्भ । एवञ्च नायकमाथिकावृत्तान्त कथनमेवाभिप्रेतम् स च वृत्तान्तो व्यज्यमान, बाच्ये रविकमलिनीवृत्तान्तेऽ भितया च आरोग्यमाणस्तस्य प्रकृतार्थता सम्पादयन् तदुत्कर्षमाधत्ते इयङ्ग सयैवास्ते । अयमेव समासोक्त्यलङ्कार । एतत्सर्वमभिप्रेत्याह वृत्तौ। नायकवृत्तान्त नायिकेत्येकशेष । नायकनायिके इत्यर्थ । वृत्तान्तो व्यवहार वस्तुरूप । यत्र स्वातन्येण धर्मिद्वयमवगम्यते तकधर्मान्वये सति उपमाङ्गीकारात् एव धमिया वगताव तादा म्यारोपे रूपकाङ्गीकारान्न रूपकमपि व्यङ्गय किन्तु वस्तुरूप एवेति भाव । यद्यपि पादशब्दस्य श्लिष्टत्वात् परिवृत्यसहत्वात् शब्दशक्तिमूलस्व सम्भवति तथापि अर्थशक्तिमूलत्वेन व्यपदेश । परिवृत्तिसहशब्दाना बाहुल्यात् तेषां प्राधान्याञ्च । प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्तीति न्यायात् । रविकमलिनीवृत्ता न्तस्य नायकनायिकावृत्तान्तनिरपेक्ष वात् अप्रकृतनायकनायिकावृत्तान्तोपस्थिति विनापि वावयार्थस्य पर्यवसानात् न वाध्यसिद्ध्यङ्गस्वम् अपि तु प्रतीतस्य वाच्यस्य ज्यन्येन शोभामात्रमाधीयते इत्यपरागत्वमेव । यन्त्र पुनर्व्यङ्गयेन विना वाच्य मेवात्मान न लभते तत्र वाच्यसिद्धयङ्गरवमिति व्यङ्गयसापेक्षनिरपेक्षसिद्धि भ्यामनयोभेद अध्यारोपेणैव उत्कर्षकतयवे यर्थ । एव च वाच्यरविकमलिनी- स्थित न तु प्रधानतया इति । A पञ्चमोल्लास' प्र० ३-व्याख्यायतां निम्नोद्धृता पदपशिस्तत्प्रयोजनपुर सरम्- 'यद्यपि स नास्ति कश्चिद्विपय यत्र ध्वनिगुणीभूतव्यगययो. स्वप्रभे. दादिभिः सह सङ्कर ससृष्टिा नास्ति तथापि प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्तीति क्वचिकेनचिद् व्यवहार उ०३-ननु 'अय स रशनो' इत्यन्न प्रकरणगम्यस्य करुणस्य प्राधा न्येन सम्भवति धनित्वे क्य गुणीभूतव्यगवतन्याशङ्कते-'यद्यपि स' इत्यादि । यद्वा ननु रसध्वनी भाववानिरवश्य वाच्य । तथा च कञ्चन प्रधानव्यगयमादाय पनित्व कञ्चनागभूतमादाय गुणीभूत यद्यत्वमिति निमित्तद्वयसमावेशाद्विनि- गमनाविरहे कथ व्यपदेशनियम इत्याशङ्कते-यद्यपि स इत्यादि । कचिद्विषय कश्चिदाश्रय ध्वनिगुणीभूतव्यङ्गययो उत्तममध्यमकाव्ययो स्वप्रभेदादिभिरिति । स्वशब्देन ध्वनिगुणीभूतव्यगययोर्ग्रहणम् । प्रभेदोऽवान्तरभेद । आदिपदेन विजातीयप्रभेदपरिग्रह । सङ्कर अगानिस्वात् । द्वयो प्राधान्ये ससृष्टि । सर्वत्र रसम्वनी भावध्वने सवेन तयोरुपकार्योपकारक्तया सकरापत्ति । अवान्तर- घनीना प्रधानध्वनिरूपेतरागतया गुणीभूतव्यङ्गयस्य चापत्तिरिति यद्यपि साङ्कर्यादिकमस्ति तथापि 'प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्तीति न्यायेन यन यन्मुखेन चमत्कारस्तत्र तेनैव व्यवहार । प्राधान्य च चमस्कारप्रयोजकत्वम् । तथा चाङ्गीभूतरसादीना चमत्कृत्यातिशय्ये गुणीभूत यङ्गय वमगिनस्तथावे ध्वनि त्वमिति भाव । एवञ्च 'अय स रशनोत्कर्षी त्यादौ करुणध्वनावपि गुणीभूत. व्यङ्गपारेणैव चमत्कार इति तेनैव व्यवहारो न ध्वनित्वेन सहृदयहृदय साक्षिक । एतेनोक्तोदाहरणे मुख्यत्वेन करुणस्यैव प्राधान्यमिति निरस्तम् । भृङ्गारवर्णने कवे सरम्भात् । प्र०५---'एयां भेदा यथायोगं वेदितन्याश्च पूर्वनद्' व्याख्यायता मिदं सूत्रार्धे वृत्युक्त कथनविशेष लक्ष्यीकृत्य 'वस्तुमात्रेण यत्रालङ्कारो व्यज्यते न तत्र गुणीभूतव्यङ्गयत्वम्' इति । उ०४-अनेनोक्तानामष्टानामेव गुणीभूतव्यगयानामवान्तरभेदानाह-एपा मिति । शुद्धभेदानाह-एपामिति । एपामुक्तप्रकाराणा गुणीभूतव्यगयाना भेदा पूर्वचच घनिभेदवत् यथायोग यथासम्भव वेदितव्या चोद्धच्या । अय भाव । न केवलमेते अष्टावेव गुणीभूतव्यङ्गयस्य भेदा । किन्तु अर्थान्तरसमितवाच्य- काव्यप्रकाश रहस्यम् स्वादिभिरपाधिभिः यथा वने दास्तथाऽसम्भविनो विहायास्यापि तेरपाधिभिः शुभेदाः सङ्करमंसृष्टिभ्या योजने च तेपामिवैषां च सदाभेदा अपि बोदव्याः । असम्भविनश्च वस्तुमानेणालझारनियन्धनाः । एवम या वस्तुना:- लकारव्यक्तिस्तत्र गुणीभूतव्यागपत्वं मा प्रसासीदिति यथायोगमिरयुक्तं योग्यम् । तत घनिकारसम्मतिमाह-न्यज्यन्ते' इति । यथा 'ग्यश्यन्ते परतुमाग यदालंकृतयस्तदा । ध्रुवं ध्वन्यङ्गता तासां कान्यवृत्तेस्तदाश्रयाद्'' इति । भरप व्यारयानम् । यदा यस्तुमानेण वाच्यालझाररहितेनालंकृतयोऽरकाराः प्यज्यन्ते तदा तासामलनीनां ध्रुव निश्चयेन धन्यगता वनिष्यवहारप्रयोजकता । पाग्य. वस्त्वपेक्षयाऽलकारवन रातिशायितया ध्वनिष्पनिर्वाहक्तति यावत् । पुतः काम्यवृत्तः काव्यन्यवहारस्य तदाश्रयात् भरक्षारसापेक्षरयादिरयर्थः इति ध्वनि- कारोस दिशा न तत्र गुगीभूतव्ययस्यमिति । भयं भावः। याच्यावस्तुनोलारस्य पारत्वनियमेन अगृढररादिना व्ययस्वाधीनचाएवापनयेऽपि भर कारस्वरता चारता अव्याहतैवेति सर्वत्र वस्तुय्यङ्गपालकारस्थले घनित्यमेव न गुणीभूतम्य. अपरमम् । वस्तुमाग्रेण इत्यनेन वाच्यार शाररहितेनेत्यर्थः। तरसहितपस्तुनाऽ. लकारयाने यत्र तु याच्यार शारापेच्या न्यायस्य तस्य चारवं तत्र पनिरर. मेव । यग्रालङ्कारप्यपालधारस्य चारवं तम गुणीभूतम्यागावमेय सभा प वस्तुम्यायालंकृतिभेदहीनः द्विघरवारिंशरप्रकारः शुशे गुणीभूतप्यायभेद । स्वतः सम्भाविरविप्रोटोक्तिसिस्कपिनियस्वस्तृप्रोटोतिसिश्यस्तु- व्यापार हाराणा पदवाक्यमयन्धगतस्येन निस्पतपा वम्मुव्यापार शरस्य नय. विधस्वमिति घनिभेकपञ्चाशतो (५१) नयन्यूनेन (५१-९) अष्टाना भेदानां प्रत्येकं विचरयारिंशद्विधस्य (५२) मिनि मिलिश्या गुणीभूतम्या वरय पनिशदधिमनियन (३३६) भेदाः (४२४८ = ३३६) शुमाः । एपमस्य संपाटिमकराभ्यां (३३६ ४४ x ३३६ = ४५१५८४) पारशीरपधिपाता. धिपसहयोत्तरतुएं भेदा. संत्रीःशुभेदैः सह (४५१५८४+३३) विशयधिकनवशतोतरेपशाशसहस्राधिकचनुर एभेदाः (१५१९२०)। गुगन- मकारस्तु पनिस्थलीयोक्तदिशाऽयमेयः इनि।' एवञ्च १. पारिवाविवरणधरमेडम प्रयो विस्तरोबगेकनीयः।

चतुर्थोल्लासः प्र० ५-'सालङ्कारै नेस्तैश्च ति सूत्रस्य व्यारयाने वृत्तौ मूल- अन्थे कथितं तावत् 'शृङ्गारस्यैव भेदप्रभेदगणनायामानन्त्यम् । का गणना तु सर्वेषाम् ? सङ्कलनेन पुनरस्य ध्वनेत्रयो भेदाः। व्ययस्य विरूपत्वात्' इत्युक्त्वा कथं तत्वैविध्य प्रदर्शितम् ? तथा च यैः प्रति- पक्षिमिः 'ननु व्यञ्जनायाः शशविषाणायमानत्वात् कुतो व्यङ्ग्यत्रैरूप्य. कृतो भेदः' इत्युक्त्वा व्यङ्गयं व्यञ्जनाव्यापार एव वा शन्दस्य न स्वी- कियते तेषां मते का विप्रतिपत्तयस्तथा च तासां विप्रतिपत्तीनां निरास- श्व अन्थे कथमुपदर्शितः. इत्येतत् सर्व समासेनानूद्यताम् । उ०५-सालङ्कारैरिति । 'आगत्य सम्प्रती'त्यादिगुणीभूतव्यगयोदाहरणे स्थितैः समासोक्त्यादिभिः अलङ्कारयुक्तैर्गुणीभूतव्यद्गथैर्वा गुणेन तेषां चैकरूपया ससृष्टया त्रिविधेन सङ्करेण गुणने पुन परस्परं योगे निष्पन्नसंख्याया अतिवाहु- ल्येन संख्यातुमशक्यत्वात् संक्षेपविस्तराभ्यां शास्त्रप्रवृत्तिरित्युक्त्तदिशा संक्षेपेण गणनाप्रकार उच्यते । सङ्कलनेन पुनरिति । वस्त्वलकाररसरूपत्वेन ध्वनेस्तावत् वैविध्यम् । तत्रापि किञ्चिदभिधया वक्तु शक्यम् । किञ्चिदन्यथैति द्वैविध्य मेव । तत्र वस्खलङ्कारयोः शक्तिप्रतिपाद्यत्वमस्ति । रसस्य व्यङ्गयत्वान्न शक्तिप्रतिपा- द्यत्वम् । तस्य रसशब्देन हारादिशब्देनाऽनभिधानादभिधाने च प्रत्युत दोपस्यैव वक्ष्यमाणत्वात् । 'शून्य वासगृहम्' इत्यादी रसादिपदानामप्रयोगेऽपि विभावादिधदितसामग्रथा. सत्वेन रसोत्पत्तेर्दर्शनाद् अन्वयव्यतिरेकाभ्यां विभा. वादिसामग्रीसत्त्वे रसचमत्कारविषयत्वमिति निर्णीयते । लक्षणाहेतूनां मुख्यार्थ- वाधादीनामभावात् रसस्य लक्षगीयत्वं वक्तुमशक्यम् प्रतीतेश्च सकलजनसं- चेद्यत्वात् वृत्ति विना बोधादर्शनाद् व्यअनानामिका वृत्तिः रसप्रत्यायनायावश्य कल्पनीयेति रसस्य व्यगायत्वम् । लक्षणामूलगूढव्यङ्गयप्राधान्ये 'स्वामस्मि'-'उपकृतमित्यादौ रून्यभावा- प्रयोजनवरयां प्रयोजनस्य व्यञ्जनाव्यापारगम्यत्वमेवेत्युक्तं प्रागिति वस्तुमात्ररूपं व्यङ्गयमवश्यमपेक्षितमिति तन्मूलवलादेव वस्तुध्वनिरिति व्यवहारः । शब्दशक्ति- मूले तु अभिधाया नियन्त्रणेनामभिधेयस्यार्थान्तरस्य तेन सहोपमादेरलङ्कारस्य च निर्विवादं व्यङ्गयत्वम् । अर्थशक्तिमूलानुरणनरूपव्ययस्थलेऽपि अभिहिता. न्वयबादिमते घटादिपदानां घटव्यक्तिमानबोधनेनोपक्षीणानां समीपस्याच्छिद्रा- काव्यप्रकाश रहस्यम् दिप्रत्तीतौ च आकाढायोग्यतादीना कारणाव वाच्यमिति वाफ्यार्थोऽप्यपदार्थस्तन तृतीयकक्षाया प्रतीतस्य व्यङ्गयार्थस्य कथमभिधाजन्यप्रतीतिविषयत्व वस्तु शक्यते । अन्विताभिधानवादिन 'विषयतासम्बधेन शाब्दबुद्धिवावच्छिन्न प्रति विषयतासम्बन्धेन वृत्तिज्ञानाधीनोपस्थिति कारणम्' इति सामान्यत कार्य कारणभावमाहु । ततश्च ससग शक्तिविषयताया अभावे शन्दविपयताया असम्भवात् । तत्रापि पदाना शक्तिमेर स्वीचक्रु । उपपत्तिं चान वदन्ति । दाक्तिग्राहक मुख्यो व्यवहार एव कोशाप्तवास्यादिभिरपि शक्तिग्रहो बहुप्वन्यपु पदेषु शक्ति जानतामेव सम्भवति । यो हि नारायणपदार्थ न जानाति इद पदार्थ वाच्यत्वपदार्थ वा स 'विष्णुारायण कृष्ण' इति कोशादा 'अय घरपद वाग्य' इति आप्तोपदेशाद्वा विष्णुपदस्य घरपदस्य वा शक्ति ज्ञातु न समोति । व्यवहारेण तु सर्वथा शक्तिज्ञानशून्योऽपि ज्ञातु शक्नोति। तद्यथा-स्वामिना भृश्य प्रति 'घदमानय'त्युक्त तटस्थोऽन्योऽध्युपनस्तदीय शब्द शृणोति । वक्तार भृत्य घट चावलोकयति । मृत्यस्य च प्रवृत्ति पश्यति । तया प्रवृत्या तदा मनि कृति मनुमिनोति । वृत्या चिकीपा,चिकीर्पया इष्टसाधन वज्ञानम् । स्वशरीरप्रवृत्ती तेपा नियमदर्शनादनन्तर घ तस्मिन् इष्टपाधनावाने एतद्वारपजन्यायमेतद्वाश्या त्पूर्वमविद्यमानत्वे सति एतद्वास्योत्तरत्वादिति हेतुनाऽनुमिनोति । घटानयन मदिष्टसाधनमिति मृत्यसमवेत ज्ञाने एतद्वाक्यानन्यस्वज्ञानमेवाखण्डवा क्यायो प्राथमिक शत्तिग्रह । भगानयोर्वाक्यवाश्यायो सम्बन्धाभाव एतद्वाश्याधीना एतद्वाक्यप्रवृत्तिनं स्यादियांपत्तेरासर । स च सम्बन्ध 'इद वाक्य वाचकम् भयमा वाच्य ' इत्येत मानाकारक एकत्र वाच्यमयन वाचक चेयन्तर्भाग्य ज्ञायते चत् पुनर्योधनियमो न प्रामाति । अत वाग्यवाचम्भावरूप सम्बन्ध एवानयो इत्यमो द्वयात्मर । अनन्तर पदान्तरापापोद्वापाभ्यामान यमाद्यशयागेऽपि घादिज्ञानेन साक यथानियमरतया माय धज्ञानेनापि । नाहि केनापि अमम्मदो भृयप्रवृत्तिविषय 'गौरव पुरको हस्नी'त्यादि प्रतिपादरुमा पु स्वामिनोरुपु भृयप्रवृत्यदर्शनात् । ततश्चानयनादवि वर्म स्वादरपि ससर्गस्य 'धग्मानय, घरेनानय, घो भानयत्यादी व्यभिचारदान.गि सम्वन्धसामान्यस्याव्यभिचारात् पदार्थान्तरसम्बन्धा 'घो घटपदगम्य 'एय साचिप्रहाकार पर्यवस्यति । अत एव न रयाननय तथा ने पदान्तर वैयर्यमपि । एव स्थिते एाघवेन थाधादिना शान्दयोधीयापा घगवावडिया या ततश्च 1 घर पञ्चमोल्लासः विषयताया वस्तुत भच्छिद्रसमीपस्थरावृत्ति वेऽपि यथा घनिष्टविषयताया अभिधाप्रयोज्य वे नानुपपत्ति , तथा समर्गवावच्छिन्नाया विषयताया वस्तुन कर्म वादिमसर्गविशेषनिष्ट वऽपि नाभिधाप्रयोऽयतावाध । एतमते अवच्छेदका सामा यमवच्या विशेष शक्तिविषय इति फरितम् । अच्चिद्र बादौ सङ्केताभावऽपि घग्वसामान्ये वस्तुत अच्छिद्रधरविशेष च सङ्केतप्रहात् एव ससगऽपि । एतारता प्रबधेन सम्बधाश पदशक्तिसाधनेन पदन पदार्थविगपेण सह सम्बधविरापागान्वितघविशेषस्य शया बोधनोत्तर व पश्चादन्योऽयं प्रतायते तत्र शक्तिविश्यता न सम्भवनि पदयापारस्योपक्षा। स्वात् । कार्यात्कारण गम्यत इति घपदानन्तर घट्योधदर्शनन यथा घरपद तदोषजनकतारूपा शतिरनुमीयते तथा नि गरे त्यादौ तदन्तिकमेव गतासाति प्रताया सजनकद तस्मिन्वाक्य कल्पनीयमेव बोधननकतैव शकिरियर व्यथनपनि श्रीशङफस्याशय । समाधाता तु शक्तेद विध्यमुपपादयन् पदनिटाले स्वरूपसच्या अकारण बाच्छक्तिग्रहत्यापक्षित वात् शक्ग्रिहस्य च पूर्वमभाव कथमभिनवकविविरचितवाक्यैस्तावार्थप्रतानिरिति त प्रतीतये शन्दगत अभि धाभिन्न व्यथनारयो व्यापार आवश्यक इयाह । कवन मामासका -तापर्यवोधनकवरूपाया अभिधाया एवं व्यापार विशष मन्यमाना अर्थवादवाश्याना प्रागस्त्य निन्दाया वाऽशक्यायामपि वोधो पयागि वमालोचय तस्तदेव ता पर्येणैव व्यङ्गयार्थप्रतीतिसिझे मल व्यञ्जनय त्याक्षिपत्ति। तेपामयमाशय -बदवावच्छेदे नहि प्रामाण्यमियते । न च 'भृगोत मावाण' 'प्रनापतिरामनो वपामुदस्य दियादिबाधितार्थकाना प्रामाण्य सम्भवति । 'अग्निहिमस्य भएन मियादीनामवाधितार्थकानामपि तदर्थस्य लोका वगन वात् अनधिगतार्थविषयकबोधनकररूप प्रामाण्यस्यासम्भव एव । अत स्नेग प्रवर्तनीयरियाया निवर्तनीय वा विषये प्रासानिन्दान्यतरबोधने एव तापर्यम् । एव व्यङ्गय रसादावपि भवियति । तद वक्तव्यम्-~पातिगुगद्र व्यागा टोकावगन वाद्विधिवाक्य वति तदोधाना पदानामनधिगतार्थविषयक प्रतातिना पाभावेऽपि प्रवर्ननायक्रियान्वयन क्रियाविशेषबोधनादनधिगतार्य या दि वक्त यम् । नहि माहिभिर्यत इयुने बाहिस्वरूप प्रागनवगत किन्तु याग एव । अत स एव अपूर्वबोध्यत्वेन विधेय । तदाह सूत्रकार मावार्था कर्म १०० काव्यप्रकाश-रहस्यम् शन्दा तेभ्यः क्रिया प्रतीयते एष पर्थो विधीयत' इति । क्रियैव कर्तुमर्तुमन्य. थार्नु वा शक्यत्वाद् विधातुं योग्या । जात्यादयरतु न तथा । परन्तु काररवि- मेपितस्य तस्य यागमात्रस्य विधिसितत्वात् यागविशेषस्वरूपज्ञापनाय जात्यादय उपयुज्यन्ते । तदाह-'भूतभव्यसमुच्चारणे भूतं भव्यायोपदिश्यते' इति भूतं मिदं जात्यादि । भन्या जन्यत्वेनैव प्रनीयमानानां क्रिया । तन्त्र यद्यपि क्रियाया इव तक्रियानिरूपितबीह्यादिनिष्टकारणत्वादेरपि अनवगतत्वात् करण- त्वादिपुरस्कारेण ब्रीहिरपि प्रागनवगत इति विधातुं शक्यः, तथापि क्रियायां विधेयत्वे विशेषस्यैवानवगमात् अनधिगतार्थविषयकज्ञानजनकरवं सुलभम् । ब्राह्मादिपदानान्तु विशेषणानवगतप्रयुक्तमिति परम्परया तद्वक्तव्यम् तत्र माहात्मामाण्यासम्भवे परम्परया तस्विमिति वक्तव्यमिति । क्रियैव सर्वत्र विधीयते इति सूत्रकृदाशयः । परं तु यत्र 'बीहिभिर्यजेते'त्यादिना रियाविशेषोs- वगमितः तत्र पश्चात् पठितेन 'समे यजेते त्यादिमा यागस्य विधातुमशक्यत्वाद- गत्या समे देशे तदधिकरणवमात्र विधीयते तदाह 'अदग्धदहन' न्यायेन यावद- प्राप्तं तावद्विधीयते इति । आद्यवाक्ये तु करणत्वाकारेण मोहयोऽपि यागोऽपि चेति द्वयमनधिगतमेव विधीयते । समे यजेतेत्यनेन तु समदेश एवेति । एवं- जातीयको गुणविधिरित्युच्यते । आधस्तु विशिष्ट इति एवं विशेषणान्तरयोगेऽ- प्यूह्यम् । यथा---'लोहितोष्णीपा ऋत्विजः प्रचरन्ति' इत्यत्र लोहितोष्णीपत्वमानं विधेयम् । यथा वा 'रक्तं पटं वये'त्यादी । यत्र तु लौकिक्वाक्येप्यपि 'मास्य गृहे भुड्क्या.' इति एकवाक्यसमीपे आप्तेन 'वरं विषं भक्षयेत्युच्यते तत्राप्तस्यास्य विपभक्षणे प्रवर्तनासम्भवात् वाक्यैकवाक्यं तया तात्पर्यानुपपत्त्या तद्गृहभोजने निन्दायां लक्षणाऽऽश्रीयते तेन विपभक्षणादधिकानिष्टजनकं तद्गृहभोजन मिति : वाक्यैक्वाक्यता सम्पद्यते । तदाह-'विधिना त्वेकवाक्यत्वात् स्तुत्यर्थेन विधीनां स्युरिति तेन पूर्वप्रदर्शितद्विविधार्थवाक्यानां स्तुतौ निन्दायां वा लक्षणेति पर्य- वस्यति । एतावता सर्ववैदिकवाक्यानामनधिगतार्थविषयक्शानजनकत्वं परि- रक्षितं भवति । यत्र तु 'शून्यं वासगृहमित्यादौ स्वार्थे तात्पर्यानुपपत्तिरेव नास्ति तादृशेऽभिधामूलव्यङ्गय कारणाभावेन लक्षणाया असाभपात् । अभिधा- याश्च सङ्केतितार्थमानबोधनेनोपक्षणीत्वात् पश्चाजायमाना व्यङ्गवार्थप्रतीतिवृत्य- न्तराश्रयणं विना न सम्भवतीति आवश्यकी व्यञ्जना ।

पञ्चमोल्लासः २०६ इदानीं 'यदि च शब्दाते. रियादिप्रन्येन व्यवनानगीकारे दोषदृष्टिमाह- सदश्रवणप्रत्यक्षा यवहितोत्तर यदर्थविषयकप्रतीति सा शक्तिजन्यव उक्त "ब्राह्मण पुत्रस्ते जात , कन्या ते गभिगी'त्यादि स्थले मुखप्रसादमुम्बमालिन्या दिनाऽनुमितहपंशोकबुद्धीनामभिधानन्य व स्यात् । किञ्च 'गगाया घेष' इया दावपि दीर्घदीर्घतराभिधा यापारेणैव तीररपार्थप्रतीतिपिझौलागाया अनुपयुक्त व स्यात् । किञ्च 'श्रुनिलिङ्गवास्यप्रवरस्थानसमाख्याना पारदौदल्यमविप्रपा दिति जैमिनीयसूत्रेण रिहादीनामुत्तरोत्तर विनम्वनाथापस्यापरतया श्रुतेश्च सर्चा पेक्षया आद्योपस्थित रेन वरीयस्त्वमियुनम् । तत्र लिङ्गापेक्षया श्रुतेर दत्त्वे उदाहरणम् 'ऐन्द्रया गार्हप यमुपतिएते, इति । बत्र इन्दो देवता नस्वरयैन्द्राति व्युत्पत्या तस्या प्राच इन्दोपस्थानागरे प्रहेऽपि गार्हपत्यमिति श्रुनर्वटयत्वन लिगोपस्थापितेन्द्रोपस्थानरूपार्थस्य वाधे इन्द्रदेवताकचाऽपि गार्हपय स्तूरत । तत्र यदि शब्दश्रुत्यनन्तरोपस्थितसरलार्थवोधनेऽभिधा यापार स्यात्तदा शुजुर स्थापितार्थस्येव रिहायुपस्थापितार्थस्यापभिधेयतया सर्वपी समकालनेबाधे- पस्थापक्रवेन मुनिनोक्तमर्थविमकर्षवमनुएरन स्यात् । एवज इषुस्थले स्वरूपपन कारणस्न तया वतु शक्यत्वेऽपि पदेऽर्थबोधानुकूलशक्ते इनाया एवं कारण स्वान्नि शेपच्युने यादौ तदन्तिकमेव रन्तु गनासीयादिविधे अभिधापतिपाद्य वा भावेन व्यायव सिमेव । किवान्विताभिधानवादिमते व्यश्चनानङ्ग कारे क्टवादीना नियदोपवन साधुवादीनामनित्यदोश्त्वमिति विभागकरणमनुएपन स्यात् । तदङ्गीकारे च श्रद्वाररसे व्यगये परश्वर्णस्य प्रतिकूलत्वेन दोषत्र, वीरादिरस व्यन्येऽनुकूल स्वन गुगत्वमिति भवति नित्यानियदोषव्यवस्था । 'द्वय गत सम्पति गोचर मयता समागमप्रार्थनया कपारिन' इत्यादौ च कपालपिनाश्यादिपदयो शिवबाचा वऽपि कपालिन इत्युक्या दरिद्वरूपार्थप्रती या शोचनीयस्य युक्तता समदते । वाच्यज्यद्यभेदमूरक एव वाचकव्यञ्जकशन्दयोमद इति दर्शयनि । पच कशदस्य घटायर्यापहा सङ्केतितार्थ एव । अभिवाया उत्सवाद, व्यवस्नु न तथा । किञ्चासुन्दरारये गुणीभूतव्यङ्गयोदाहरणे ' वारकुग्वि'त्यादौ प्रता यमान व्यङ्ग्यमनपेक्ष्य सीदत्यङ्गानीति वाच्यमेव सबमकार मुहार परिपोष , १०२ काव्यप्रकाश-रहस्यम् यति । तत्र तात्पर्योऽविषय । दत्तसङ्केत कश्चिलतागहन प्रविष्ट इति व्यङ्गयरूपो वाचकशब्देनाप्रतिपाद्यमानोऽपि प्रतीतिगोचरीभूत ध्यानाव्यापार पिना केन बोधयितु शक्य । न च 'गतोऽस्तम' इत्यादिस्थले व्यङ्गयार्थस्य नानाविधस्य प्रतीतिवत् लक्ष्यार्थेऽपि 'रामोऽसो भुवनेषु', 'रामेण प्रियजीवितेन', रामोऽस्मि स सहे' इत्यादी क्रमेण एफ एव रामशब्द सरदूपणादिनिहन्तृत्वेन अत्यन्त निष्करणस्वेन सर्वदु खसहिष्णुत्वेन प्रतीयत इति नानार्थबोधक , किञ्च व्यङ्ग्य स्थले वामस्मि' इति श्लोके त्वामित्यस्य प्रीतिपात्रत्वाद्यर्थान्तरसक्रमेणन यथा विशेपव्यवहारकारणत्वम् तथैवानापि निष्करुणत्वादियोधनेन विशेषव्यवहारहेतु रपि । किञ्च व्यञ्जनाऽभिधामूला लक्षणामूला चेति शब्दार्थायत्ता लक्षणाऽपि शब्दे आरोप्यत इति शब्दायत्ता । मुरयार्थवाधज्ञाने मुख्यार्थज्ञानस्यावश्यक स्वात् अर्थायत्ता च प्रकरगादिसापेक्षस्वमुभयत्रापि तुल्यमेवेति न लक्षणाव्यञ्जन योर्भेद इति चेदुच्यते । रामशब्देन निष्करणत्वादीना नानार्थाना प्रतीतापि न तथा वक्तु शक्यम् । एककाले उच्चारितरामशब्दस्य तादृशनानार्थबोधाजनक त्वात् । 'रामोऽस्मी'त्यत्रोच्चारितरामशब्देन सर्वदु खसहिष्णुत्वविशिष्टरामस्यैव बोधात् । 'गतोऽस्तमक'इत्यादौ तु एककाल एव नानाप्रतीतिरिति तदपेक्षया लक्षणाया वैलक्षण्यम किञ्च 'गङ्गाया घोष' इत्यादौ तीरेण साक सामीप्यादि सम्बन्धस्य सवालक्षणेति सा नियतसम्बन्धे एव भवति । याना तु 'अत्या एस्थे' त्यादौ नियतसम्बन्धे, 'क्रस वा ग होइ रोसो' इत्यादौ वञ्चनीय वाद्यनियत सम्बन्धे, सम्बद्धसम्बन्धे विपरीअरए' इत्याद्यनुरणनरूपव्यङ्गयस्थलेऽपीति व्यञ्जना लक्षणयोर्भेदोऽवश्य वाच्य एव । अन्यथा 'अत्था एत्थे' स्यादौ रक्षणाहतूना मुख्यार्थवाधादीनामभावात् 'यथेष्ट मम शय्यायामेवस्वपिही'त्यर्थ कथ प्रतीयेत? किञ्च न लक्षणास्वरूपमेव ध्वननम् । लक्षणामुपजीच्य ध्वनेर्दर्शनात् । कार्य- कारणयोस्तादात्म्यस्याभावात् । रक्षणानुगतमेव धननमित्यपि न वाच्यम् । 'भद्रात्मनः' इत्यादिश्लोके अभिधामूलव्यञ्जनाया सत्वात् । अवाचकाना टका सकारादीना रौद्रादिव्यञ्जक्त्वादभिधाल क्षणोभयानुसायवेत्यपि न वक्तु शक्यम् । नेत्रतिभागावलोकनादीनामपि व्यङ्ग्यत्वेन शब्दानुसारीत्यपि न शक्यते वक्तुमिति अभिधातात्पर्यलक्षणातिरिक्त ध्वननद्योतनादिपर्याय व्यञ्जनाच्यापारोऽवश्य- मानयणीय एव । अत्र वैयारणा अखण्डबुद्धया पदे न वर्णा विद्यन्ते वर्णप्ववयवा । पञ्चमोल्लास. १०३ न चेत्युक्त्या 'वाक्यस्फोटोऽतिनिक सिध्यतीति मतस्थितिरिति वाक्य स्फोटस्यैव सिद्धान्तितत्वात् अखण्डवाश्यस्य वाच्यार्थ शक्ते सत्वात् वाश्यगम्ये व्यङ्गयार्थे शक्तिरेवेत्याहु । पर तेषामपि मते 'शास्त्रेषु प्रक्रियाभेदैरभिधैवोप वर्यते । इति 'असत्ये वर्मनि स्थित्वा तत सत्य समीहते' इति स्वीकारात् पदपदार्थेऽन्वयव्यतिरेकाम्या सूक्ष्मतया निरीच्यते । 'नि शेपे'त्यादिश्लोके तदन्ति- क्मेव गतासीति विधे शक्त्यानुपस्थितत्वाल्लक्षणायाश्चानमरात विध्यर्थप्रत्याय- माय व्यञ्जनानामिका वृत्तिरवश्य स्वीकार्यव । अन कैरित्- 'याऽर्थान्तराभिव्यक्तौ च सामग्रीसनिबन्धनम् सैवानुमितिपक्षे नो गम कत्वेन सम्मते' त्यादिना व्यगाथार्थस्यानुमानेनैव गतार्थत्वान्न व्यञ्जनास्वीका रस्य प्रयोजनमित्याहु । तथाहि न खलु प्रतीतिविपयीभूतोऽर्थो वाच्यादसम्बद्धो भवनि तथात्वे सर्वस्माच्छब्दात्सर्वार्थोऽपलधिप्रसङ्गात् । एवञ्च सम्बन्धाध्याय व्यचकभावो व्यभिचारे नियमनेन भवतीति सपक्षसत्त्वेन पक्षसवेन विपहव्या वृत्तचेन च लिगा तो लिगिन ज्ञान साध्यविषयकज्ञान यत्तद्रूप एव व्यगाय- व्यञ्चकभाव पर्यवस्यति । तत्रोदाहरति । 'भम धम्मिएति' अत्र यद्यद्धीरुभ्रमण तत्तद्यकारणनिवृत्युपलब्धिपूर्वकम् गोदावरीतीरञ्च सिंहवत् अत भीरुभ्रम णायोग्यमिति भ्रमणाभावोऽनुमितादेव पर्यवस्यताति किमर्थं न्याना पृथक स्वीक्रियते । तत्रोच्यते नात्रानुमानावसर । पक्षतावच्छेदकावच्छेदेन साध्यानु- मिति प्रति परतावच्छेदकावच्छेदेन हेतुनिश्चयस्य कारणत्वेन प्रकृते हेतुनि श्चयाभावात् । न खलु 'यद्यगीरुभ्रमण तत्तद्वयकारणनिवृत्युपलब्धिपूर्वकम्' इति नियम । गुरो स्वामिन आज्ञया, कान्तानुरागेग, द्रव्यादिलाभाशया वा भीरोरपि गमनसम्भवात् । किन शूरत्वेन लोकनिन्दाभयात् श्वान हन्तुमनिच्छन्नपि सिंहमारणार्थ मयाऽवश्य गन्तव्यमिति गमने प्रबनते इति विरुद्ध । किञ्च गोदावरीतीरे सिंहसत्ता न प्रत्यक्षणानुमानाद्वा निर्णीता किन्तु पुश्चलीवचनात् । तस्य च अर्थेन सम नियतसम्बन्धे 'नद्यास्तीरे फ्लानि सन्ति' इत्यादि वाश्यानां प्रामाण्यमित्र प्रकृते अर्थेन सम नियतसम्बन्धाभावात् प्रामाण्यस्य वक्तुमशक्यतया हेतो असिद्धत्वमपि । एवञ्च हेतोर्दुष्टत्वात् कथ तेन भ्रमणामा- वस्य साध्यास्यानुमितिर्वक्तु शक्या। एव 'नि शेपे'त्यादौ उपभोगव्यञ्जकतयोक्ताना चन्दनच्यवनादीना तत्रैवोक्तस्नानादिकारणान्तरेणापि सझावायभिचारित्वेन १०४ काव्यप्रकाश रहस्यम् नानुमितिसाधकत्व वाच्यम् । अत एव व्यक्तिवादिना दूतीप्रेषणात्पूर्व नायक स्याधम वे प्रेपणस्यानुपपन्नत्वात् । तदुत्तर कारणान्तरस्याभावेऽपि अधम इत्युक्त्याऽधमपदसहायाना चन्दनच्यवनादीना व्यजकत्वमुक्तम् । व्यञ्जनावादिमते च्याप्त्यभावेऽपि व्यङ्गयार्थप्रतीते सर्वसम्मतत्वान्नोपपत्तिप्रदर्शनावश्यक्तेति सर्वमवदातम् । प्र० ६-व्याख्यायतामियमुद्धृता पनिस्तत्रत्याशयं सुविशदीकुर्व --'अर्थशक्तिमूलेऽपि विशेपे सङ्केत कर्तु न युज्यते' इति सामान्य रूपाणां पदार्थानामाकासासन्निधियोग्यतावशात् परस्परसंसर्गो यत्रा पदार्थोऽपि विशेषरूपो वाक्यार्थस्तत्राभिहितान्वयवादे कर वार्ता व्यगन्यस्याभिधेयतायाम्' इति । उ०६-अथार्थशक्तिमूलयोर्वर वरङ्कारयोर्वाक्यार्थावगमोत्तरगम्यतयाऽभि हितान्वयवादिमते वृत्यन्तरेणैवावगम इ धमभिधत् अभिहितान्वयवादे व्यङ्ग्यस्या भिधेयता निराकरोति 'अर्थशक्तिमूलेत्यादिना' 'अभिधेयतायाम्' इत्यन्तेन। विशेपे तत्तद्वयक्तिविशेष, सन्निहितगवादिव्यताविति यावत् । सङ्केत सकेतग्रह । न युज्यते न पार्यते शक्यते वा। आनन्त्यायभिचाराच व्यक्तीनाम् । यद्वा विशेषे पदार्थससर्गे। न युज्यते । वाक्यार्थस्यापूर्वत्वेन प्रागनुपस्थिते सामान्यरू- पाणा जातिरूपाणाम्, जातिरेव पदार्थ इति मीमासकसिद्धान्तात् । पदार्थाना- माकासासन्निधियोग्यतावशात् । प्रतीयपर्यवसानमाकाला। अव्यवधानेनोप स्थिति सन्निधि । राधाविरहो योग्यता । एतद्धशात् परस्परसम्बन्ध इत्यादि सहकारिकारणताज्ञानेन वक्ष्यमाणजातिगुणक्रियासज्ञारूपाणामन्योन्यसम्बन्धे जनयितव्ये अपदार्थोऽपि शक्याऽप्रतिपद्यमानोऽपि तात्पर्यारयवृत्तिरूपो वाच्याद्य पेक्षया विलक्षणशरीर विशेषरूप समुल्लसति, तत्र व्यङ्गयस्य वाच्यार्थादपि दूर भावि वादभिधेयताया क प्रसङ्ग इत्यर्थ । अय भाव ---अर्थशक्तिमूरेऽपि यत पदेभ्य प्रथम पदार्थस्मृति अथ पदार्थविशपाणामन्वयरिशेषरूपस्य वाक्यार्थस्य प्रत्यय ततो व्यङ्गयप्रतीतिरिति तृतीयक्क्षाया कुतोऽभिधाया प्रसारणम् । द्वितीयकक्षायामेर तदनपेक्षणात् । यतोऽभिहितान्वयवादेऽशक्य एवान्वय भास. सादिवशेन प्रतीयते । शब्दबुद्धिकर्मणा विरम्य व्यपाराभाव इति च सर्व सिद्धम्' इति ।

पञ्चमोल्लासः प्रश्न --अन्विताभिधानमतं परामृशता व्याप्यायेतामिमे कारि- के अन्यत्प्रतिपादितदिशा- 'शन्दवृद्धाभिधेयांश्च प्रत्यक्षेणात्र पश्यति श्रोतुश्च प्रतिपन्नत्यमनुमानेन चेप्टया। अन्यथाऽनुपपत्त्या तु वोधेच्छक्ति द्वयात्मिकाम् अर्थापत्त्याऽवोधेत सम्बन्धं त्रिप्रमाणकम् ॥ उ०७-येऽप्यन्त्रिताभिधानवादिन -'देवदत्त गामानयेत्यादि प्रयोजस्वृद्ध- वाक्यं श्रुत्वा चार तदनन्तर प्रयोज्यवृद्धेन सास्नादिमन्तमर्थ देशान्तर नीयमानमा- होक्यायमेतद्विपयतक्रियागोचरकार्यताज्ञानवान् , तद्विपररचेष्टावरत्वात् तद्विष- यकप्रवृत्तिमत्वाद्वा, मद्वदिनि प्रयोज्यवृद्धस्य ज्ञानमनुमिमीते । तत कारण बिना कार्यानुपपत्याऽखण्डवाक्यस्यान्वयव्यतिरेरिणस्त ज्ञानेन कार्यत्वकारणस्वरूपा शक्तिमधारयति । अथ शेयसंबन्ध विना वाक्यस्य सा शक्तिरनुपपन्नेत्यर्थापत्त्या खण्डवाक्यार्थेनाखण्डस्य वाक्यस्य वाच्यवाचकभावरूपं सम्बन्धमवधारयति । यदुक्तं प्रभगनकारिकयो 'शब्दवृद्धेस्यादिना । तिप्रमाणमिनि । जात्यपेक्षया- त्रिवम् न तु व्यक्त्यपेक्षया । एवमखण्डयो सम्बन्धमवधार्य विशेषतो व्युत्पद्यते इत्थम्-अनन्तर तेनैव प्रयोजन 'चैत्र, अश्वमानय, देवदत्त, गा नय' इत्यादि घाश्येपु कस्यचिदन्यपदस्य चापे कस्यचिदुद्धारे सति यस्य भागस्यान्वयम्मतिरे- काभ्यां यस्य वाक्यार्थभागस्यान्वय यतिरेकाउपरभते, तत्र तस्य शक्तिमवधार- यति तच शक्यवधारणमन्वित एव पदार्थ, प्रथममन्वय एव वाक्यस्य शक्तिप्रहात, पदार्थमाने दाताबुपजीव्यविरोधाद्, व्यवहारणन्वितज्ञानस्यैवोपस्थापनास, न च वाक्य बिना काचिदाद्यव्युत्पत्ति व्यवहारेणैवाद्य युत्पत्ते, व्यवहारस्य च प्रवृत्ति निवृत्तिरूपस्य पदमात्रेण कर्तुमशक्यत्वात् , अतो वाक्यस्थितानामेव पदानाम वितेप्येव पदार्थेषु सङ्केतग्रहादन्धिता एव पदशश्या , त एव च वाक्यार्थ इति न वाक्यार्थबोधे शनर्विराम नत्वभिहिताना पदार्थानामम्वयोऽशक्य एवं प्रतीयते, योग्यतादिवशादिति युक्तम् । मनु तथापि सपर्गविशेषोऽशक्य एक, पदार्थसामा न्यान्वित एवं शक्तिग्रहादन्यथा गाम्गनये'तिपद श्रुत्वाऽश्वमानयेत्यादिवाक्ये तदेवेद मानयपदमित्यादिप्रत्यभिज्ञा न स्यात्, पूर्वस्य गवान्वितानमनपरस्याश्वान्विता- नयनेऽशयत्वेनार्थभेदेन भेदादिति चेन्न, पदार्थत्वेन सामान्यन विशेषाणामेरान्वये शक्तिमहात्, अन्विताना च विशेषरूपत्वादित्याहु तेषामपि मते सामान्येनैव - १०६ काव्यप्रकाश-रहस्यम् । रूपेण विशेषः शक्यो न तु विशेषरूपेण, तथा च पदार्थान्तरसामान्यान्वितपदानां शक्तिः, गवादिविशेपान्वितस्तु विशेपो वाच्य एव । तस्मादभिहितान्वयवादेऽन- न्वित एवान्विताभिधानवादे तु पदार्थसामान्यांन्वितः स्वार्थः सङ्केतविषयो, गवादिविशेषान्वितानयनादिरूपस्त्वसङ्केतित एवेत्यवाच्य एव वाक्यार्थः इति । प्रश्न -'नैमित्तिकानुसारेण निमित्तानि कल्प्यन्ते' इत्यत्य क आशयः ? कथं च तन्निराक्रियते ? उ०८-यदपि कैश्चिदुच्यते 'शब्दश्रवणानन्तरं यावानर्थः प्रतीयते, तत्र सर्वत्रापि शब्द एव निमित्तम् । यतो नैमित्तिकानुरोधेन निमित्तानि क्रुप्यन्ते' इति तदप्ययुक्तम् । शब्दस्य ह्यर्थे निमित्तत्वं कारकत्वं ज्ञापकत्वं वा । न प्रथम शब्दस्यार्थानुत्पादकत्वात् । चरमं पुनरनुमन्यते, परंतु सङ्केत वेन ज्ञातस्य, भज्ञा- तस्य, स्वरूपमात्रेण ज्ञातस्य वा ज्ञापकत्वेऽतिप्रसङ्गात् । न चान्वयविशेपे सङ्केत- ग्रहः, अस्तु विशेष एव सङ्केतग्रह इनि चेद्, लोप्टाद्यन्विता नयनादेविशेपस्योपस्थाप काम्तराभावेन शब्दादेवोपस्थितिर्वाच्या। तथा च तत्र सङ्केतग्रहे शब्दात्तदुप- स्थितिः, शब्दाच तदुपस्थिती सहेतग्रहः इत्यन्योन्याश्रयात् तस्मान्नैमित्तिकानु- रोधेन निमित्तानि कल्प्यन्ते इत्यविचारित भिधानम् । प्र०९-परामृश्यतामियमुक्तिः 'सोऽयमिपोरिव दीर्घदीर्घतरो व्या. पारः' इति, यत्परः शब्दःस शब्दार्थः' इति च 'विधिरेवात्र वाच्यः' इति। उ०९--अथ 'सोऽयमिपोरिवेत्यादि', 'यत्परः शब्दः सशब्दार्थ.' इति च 'निःशेषे स्यादौ विधिरेव वाच्य इति भट्टमतोपजीविनो भट्टलोहटादयः । अस्या- थ-यथा बलवता प्रेरितः इषुएंकेनैव वेगाख्येन व्यापारेण वर्मच्छेदमुरोभेदं प्राणहरणञ्च रिपोर्विधत्ते तथा एक एव शब्दः एकेनैवाभिधाव्यापारेण पदार्थस्मृति- वाक्यार्थानुभवं व्यङ्गयप्रतीति च विधत्ते । अतो व्यङ्गयत्वाभिमतस्यार्थस्य वाच्यत्व- मेव। विश यत्र शब्दस्य तात्पर्य स शब्दार्थ इति नि शेषे'त्यादौ तात्पर्याविषय- तया विधिर्वाच्य एवेति । ते तात्पर्यवाचोयुक्तस्तात्पर्यमजानन्तः पशवः वाना प्रियाः)। तद्वाक्यवर्तिपदोपस्थापित एव हि तात्पर्यमुच्यते, न प्रतीतिमाने। तथाहि 'भूतभव्यसमुच्चारणे भूतं भव्यायोपदिश्यते' इति सिदान्तः । अस्यार्थ:- भूतं सिद्ध, भन्यं साध्यम तयोः समभिव्याहारे भूतं सिद्ध भध्याय साध्यायोप- दिश्यते इति कारपदार्थाः क्रियापदार्थेनान्वीयमानाः सिद्धा अपि प्रधान क्रिया- पञ्चमोल्लासः १०२ विधरवाद्रौदादौ व्यङ्ग्येऽनुकूलत्व, भगारादौ तु दुष्टस्वमिति युज्यते विभाग व्यवस्था। एव पर्यायेपु मध्ये कस्यचिदेव कुत्रचिवाव्येऽनुगुणत्वमित्यपि व्यवस्मा न स्यात् , वाच्यार्थस्याविशेषात् । दृश्यते चामो यथा-'द्वय गत सम्पनि शोचनीयता समागमप्रार्थनया कपालिन' इत्यत्र न पिनाक्यादिपदमनुकूरम् , किन्तु जुगुप्साव्यञ्जकतया 'कपालि' पदमेव । ननु द्वयमप्येतदयुक्त, व्यङ्गय वे. नाभिमनस्य वाच्यत्वस्वीकार एवानुकूरवप्रतिकूलत्वयोर्यवस्थोपपत्तेरिति चत् न, अभिधास्वीकारे सङ्केतग्रह विना तदनुपस्थितिप्रसङ्गस्योक्त वात् । किञ्च काव्ये शास्त्रे वा वाच्यव्यङ्गययो प्रतिपत्तिहतुव्यापारभेदनिबन्धनो भेदोऽवश्य स्वोर्तव्य वैधय॑दर्शनात् । वाच्यो ह्यर्थ सबै रेक एव प्रतीयते इति नियत , व्यङ्गयस्तु वक्तृप्रकरणादिवशादनियत । तथाहि 'गतोऽतमर्क' इति वाक्ये राज्ञ सेनापतीन्प्रति 'शगामाहवेनावमनाचमर' इति, दूतीनामभिसारिका प्रत्यभिसरणमुपकग्यतामिति, सरया वासकसना प्रति प्राप्तप्रायस्ते प्रेयान्' इति कर्मकरस्य सहकर्म कुर्वत प्रनि 'कर्मकरणान्निवर्तामहे' इति, भृत्यस्य धामिक प्रति 'सान्ध्यो विधिरपक्रम्यताम्' इति, आप्तस्य कार्यवशेन बहिर्गच्छत प्रति 'दूर मा गा' इति, गृहिणो गोपालक भति 'सुरभयो गृह प्रवेश्यन्ताम्' इति दिवसेऽतिसन्तप्तस्य बन्धून प्रति 'सन्तापोऽधुना न भवतीति, आपणिकाना भृत्यान्प्रति वियवस्तूनि सद्वियन्ताम्' इति, नायाऽऽगमनमस्ताये प्रोपित भर्तृकायास्त कथक प्रति 'नागतोऽद्य प्रेयान्' इति एकस्यैव वक्तुहून् प्रति तत्त प्रकरणवशादेवमादिरनवधिय॑गयोऽर्थ प्रकाशते, वाच्यस्तु सर्वान्प्रति अविशिष्ट एव । ननु नैतद्वाच्यवैधय॑म् नानार्थसैन्धवादिपदे नानार्थावगतिदर्शनादिति चेस । एकवाक्यवर्तिनस्तस्याप्यर्थक्यनियमात् , यदने वक्ष्यति । 'लम्णीयार्थस्य नानास्वेऽपि अनेकार्थपदाभिधेयवानियत बमेति। तथापि यत्र लवणाद्य- धिकारिण प्रति सकर स्वामिन सैन्धवमानयेति पदप्रयोगस्तत्रानियतत्व दुर्वा रमेवेति चेन्न । ता पर्याज्ञानात् । न ह्यत्र सर्वाच्यै सम सर्वव्याथाना भेद प्रतिपाद्यते, किन्तु 'गतोऽस्तमर्क' इस्यस्य वाच्यव्यङ्ग्ययो । तथा च तद्वाच्यस्य- नियतत्व, तदर्थपुरस्कारेणैव सर्वेषा व्यङ्गयस्यापि प्रतीते । तदय नियतत्वानि- यतत्वरूपविरद्वधर्मससर्गोऽभिहित । एवं विरणस्वरपकालादिभेदोऽपि भेदको द्रष्टव्य । वैधर्म्यसत्वेऽपि यद्यभेद स्यात्तदा नीरपीनादेरपि न कचिद्भेद स्यात् वैधय॑स्याविशेषात् । यदुक्तम्-अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा, यद्विरुद्ध- ।

. - पञ्चमोल्लास. विघत्वाद्रौदादौ व्यङ्गयेऽनुकूलत्व, शृगारादौ तु दुष्टत्वमिनि युज्यते विभाग व्यवस्था। एवं पर्यायेषु मध्ये कस्यचिदेव कुचिकाव्येऽनुगुणत्वमित्यपि व्यवस्था न स्यात् , वाच्यार्थस्याविशेषात् । दृश्यते चामौ यथा-'द्वय गत सम्पत्ति शोचनीयता समागमप्रार्थनया कपालिन' इत्यत्र न पिनाश्यादिपदमनुकूलम् , किन्तु जुगुप्साध्यञ्जकतया 'कपारि' पदमेव । ननु द्वयमप्येतदयुक्त, न्यायदे- नाभिमतस्य वाच्यत्वस्वीकार एमानुकूलत्वप्रतिकूल वयोर्व्यवस्थोपपत्तेरिति चेत् न, अभिधास्वीकारे सङ्केतग्रह विना तदनुपस्थितिप्रसङ्गस्योक्तस्वात् । किञ्च काव्ये शास्त्रे वा वायव्यङ्गययो प्रतिपत्तिहतु यापारभेदनिबन्धनो भेदोऽवश्य स्वीकर्तव्य वैधय॑दर्शनात् । वाच्यो यर्थ सबै रेक एव प्रतीयते इति नियत , व्यङ्गयस्तु वश्तृप्रकरणादिवशादनियत । तथाहि 'गतोऽतमर्क' इति वाक्ये राज्ञ सेनापतीन्प्रति 'शगामाहवेनावमर्दनारसर' इति, दूतीनामभिसारिका प्रत्यभिसरणमुपगम्यतामिति, सरया वासकसजा प्रति प्राप्तप्रायस्ते प्रेयान्' इति कर्मकरस्य सहकर्म कुर्वत प्रति कर्मकरणानिवर्तामहे' इति, भृत्यस्य धामिक प्रति 'सान्ध्यो विधिरुपकग्यताम्' इति, भाप्तस्य कार्यवशेन वहिर्गत प्रति 'दूर मा गा' इति, गृहिणो गोपालक प्रति 'सुरभयो गृह प्रवेश्यन्ताम्' इति दिवसेऽतिसन्तप्तस्य वन्धून् । प्रति 'सन्तापोऽधुना न भरतीति, आपगिकाना भृत्याम्प्रति 'विज्यवस्तूनि सहियन्ताम्' इति, नायकाऽऽमनप्रस्ताव प्रोपित भर्तृकायास्तस्कथक प्रति 'नागतोऽद्य प्रेयान्' इति एकस्यैव चक्नुहून् प्रति तत्त प्रकरणवशादेवमादिरनवधिय॑गयोऽर्थ प्रकाशते, याच्यस्तु सर्वान्प्रति भविशिष्ट एव । ननु नैतवाच्यवैधय॑म् नानार्थसैन्धवादिपदे नानार्थावगतिदर्शनादिति चेत । एकवाक्यवर्तिनस्तस्याप्यर्थेक्यनियमात् , यदने वक्ष्यति । 'लक्षणीयार्थस्य नानात्वेऽपि अनेकार्थपदाभिधेयवन्नियतवमेवे ति । तथापि यत्र खाद्य- धिकारिण प्रति सकलस्वामिन सैन्धवमानयति पदप्रयोगस्तबानियतत्व दुर्वा रमेवेति चेन्न । तापर्याज्ञानात् । न ह्या सर्वाच्यै सम सर्वव्यङ्गयाना भेद प्रतिपाद्यते, किन्तु 'गतोऽस्तम' इत्यस्य वाच्यव्यङ्ग्ययो । तथा च तद्वाच्यस्य. नियतव, तदर्थपुरस्कारेणैव सर्वेपा व्यङ्गयस्यापि प्रतीते । तदय नियतत्वानि- यत वरूपपिरधर्मससर्गोऽभिहित । एव विलक्षणस्वरपकालादिभेदोऽपि भेदको द्रष्टव्य । वैधर्म्यसत्त्वेऽपि यद्यभेद स्यात्तदा नीलपीतादेरपि न चिनेद स्यात् वैधय॑स्याविशेषात् । यदुक्तम्-'अयमेव हि भेदो भेदहेतुर्वा, यद्विरुद्ध- - . काव्यप्रकाश-रहस्यम् धर्माध्यास कारणभेदश्वेति । सुप्रसिद्धश्च तत्र तत्र स्वरूपभेऽर्थभेद । तत्र “नि शेपे'त्यादौ । 'मात्सर्ययुत्सार्य विचार्य कार्यमार्या समर्यादमिद वदतु । सेव्या नितम्ना किमु भूधराणामुत स्मरस्मेरविलासिनीनाम्' इत्यादौ । 'कथ मवनिप दो यन्निशातासिधारादलनगलितमूनां विद्विषा स्वीकृता श्री । ननु तव निहतारेरप्यसौ किं न नीता त्रिदिवमपगताझैवल्लभा कीर्तिरेभि ।' इत्यादी च स्वरूपभेद । प्रथमे हि वाच्यो निषेधरूपो व्यङ्गयस्तु विधिरूप , द्वितीय वाच्य सशयरूप प्रतीयमानस्तु शान्ते शृङ्गारिणि वा वक्तरि तदुचितककोटि निश्चय , तृतीयो वाच्यो नि दारूप प्रतीयमानस्तु स्तुतिरूप , कालभेदस्तु सर्वत्र पूर्व हि वाच्य प्रतीयते पश्चात्तु व्यङ्गय इति । वाच्यस्य तु शब्दमानमाश्रय , प्रतीयमानस्य तु पदशब्दैक्देशीभूतकाकादितदर्थवर्णसङ्घटना इयाश्रयभेद । याच्यस्य व्याकरणकोशादिमात्रेणावगम , प्रतीयमानस्य तु प्रतिभानमल्येना प्यधिकेनेति ज्ञापकभेद । वाच्येन व्यु पन्नमात्रस्य प्रतीतिमात्रम् अन्येन तु विदग्धपदवाच्यस्य सहृदयस्य चमकृतिरिति कार्यभेद 'गतोऽस्तमर्क' इत्यादी दर्शितनयेन वाच्य एक प्रतीयमानस्तु नानेति सरयाभेद , 'कस्स वा ण होई' इति प्राकृत पदम् । तस्य छाया-कस्य वा न भवति रोपो दृष्ट्वा प्रियाया सत्रण मधरम् । सभ्रमरपद्माघ्रायिगि वारितवामे सहस्वेदानीम, इत्यादी वाच्यार्थस्य. सम्बोध्या सखी विषय , तत्र हि वाच्योऽर्थ श्रोतुर्व्यवतिष्ठते । प्रतीयमानस्य तु 'भ्रमरेणास्या अघर खण्डित , न तूपपतिनेति त का त , 'ममैव वैदग्भ्यम्' इत्यस्य प्रतिवेशिनी, इदानीं मया समाहित पुनरेव स्वया न विधेयम्' इत्यस्यो पपति एव सपन्यादिविषयोऽपीति विषयस्य भेद । एव स्वरूपादिभेदादव श्यमङ्गीकर्तव्यो वायव्यङ्गययोर्भेद । किच वाचकव्यञ्जकयोरपि वैधाद् भेदो वक्तव्य । यतो वाचकस्य सकेतितार्थापेक्षा, सङ्केतिते सेवार्थेऽभिधा प्रवर्तते, न वेव व्याक अन्यत्रापि व्यञ्जनया प्रत्ययजननात् । यच्चोक्त-तापर्यविपये शब्द प्रमाणम्' इति तदितोऽप्यनुपपन्नम् । यतो व्यङ्गयस्य वाच्यताभ्युपगमेऽपि नानार्थन्यायेन तारपर्यादेव नियमो वाच्य , अयथा सर्वत्र सर्वव्याय प्रतीतिप्रसङ्गात् । तथा च यत्र 'वाणीरकुडगः' इत्यादी व्यायप्रतीतायपि वाच्य एव चार वविश्रामस्त ता पर्याविपयो व्यङ्गयोऽर्थ क्य प्रतीयते । 'यरपर शब्द' इयुक्तमते तु सुतराम् । एतेन ता पर्यमेव व्यगयप्रतीतो व्यापार इयपि निरस्तम् । तस्मात्तात्पर्यमभिधा वा न प्रतीयमानेऽयं व्यापार ।

पञ्चमोल्लासः प्रश्न १२-ननु लक्षणानुगतत्वं व्यञ्जनाया कुतो न? उ०१२-- नन्वस्तु लक्षणा । नहि वायवल्लक्ष्योऽपि व्यवस्थितो विशेषध्यप- देशाहेतु । यतो रामोऽस्मि सर्व 'सहे' इत्यन्न 'राम' पदेन सर्वदुः खभाजनत्व, 'प्रत्यारयानरचे वृत समुचित ऋरेण ते रक्षसा । सोढ तच तथा त्वया कुल्- जनो धत्ते यथोच्चै शिर । व्यर्थ सम्प्रति विभ्रता धनुरिद रब्धापदा साक्षिणा । रामेण प्रियजीवितेन तु कृत प्रेम्ण प्रियेनोचितम् ।' इत्यत्र कातर वम्, 'रामोऽसौ भुवनेषु विक्रमगुगै रित्यत्र खरदूपणादिहन्तृ व च रयते । अतो रामपदरचय- एवानेको भवति, अर्धान्तरसमिसवाच्यादिविशेष यपदेशहेतुश्च भवति । एवं मन्यनापि स्यात् । तदुन-'भाक्तमार्गस्तदन्य' इति क्षणीयविशेषावगमश्च प्रकरणादिसापेक्षेण शक्यार्थेन स्यादतो नास्यतिरिक्त प्रतीयमानो नाम । मैवम् । लक्षणीयस्य नानात्वेऽपि हि नानार्थसैन्धवादिपदाभिधेयस्येव नियतत्वमेव । न खल्वनियतसम्बन्धो मुरयेनार्थेन रक्षयितु शक्यते । प्रतीयमानस्तु प्रकरणादिवशेन नियतसम्बन्धोऽनियतसम्बन्ध सम्बद्धसम्बन्धश्चेति तस्वरूप सोदाहरणमने प्रदर्शयि यते। किञ्च 'अत्ता एस्थ गिमञई यादौ विवक्षितान्यपरवाच्ये क्थ लक्षणा, मुख्यार्थबाधाभावात् । ननु तनापि तात्पर्याधीनान्वयानुपपत्तिश्छत्रिणो यान्तीत्यवेति चेन्न । लक्षणाया प्रयोजन नियमात् । तस्य च व्यापारान्तरा- गम्यत्वात् तदर्थ व्यञ्जनास्वीकारे किं प्रथमयापि र क्षणया। अथ निरूढलक्षणा यामिवान्यत्राप्यस्तु प्रयोजनानपेक्षेति चेन्न । यथाहि सङ्केतग्रहसापेक्षाऽभिधा, तथा मुरयार्थबाधतद्योगदिप्रयोजनान्यतरस्य मुख्यार्थसङ्केतग्रहस्य च सापक्षा लक्षणा । तत्कथ रूदे प्रयोजनस्य वाऽभावे भवेत् । यत' सङ्केतग्रहणापेक्षा सा । अत एवाभिधापुच्छभूता से'त्याहु । विन रक्षणाव्यञ्जनयोरभेद , रक्षणामुप- जीव्य तदर्शनात् । नापि लक्षणानुगतमेव ध्वननमिति ध्वनेस्तल्लक्षणमिति वाच्यम् । अभिधोपजीवनेनापि भावात् । न च र क्षणाभिधोभयानुसार्येव । वर्गमानानुसा रेणापि हि दृश्यते रसादिभ्यञ्जन।। न च वर्णमात्रे रक्षणाऽभिधा वा सापि शब्दानुसार्येव । विकसन्नर्तकीनेत्रनिभावलोकनादिगतत्वेनापि प्रसिद्धे । तस्मा दभिधा-लक्षणा तात्पर्यविलक्षणस्तुरीयो घनन यचनद्योतनप्रकाशनादिपर्यायो व्यापारोऽनपहवनीय एव । तत्र 'अत्ता एपथ गिमजई भादौ व्यङ्गयाऽर्थो नियत सम्बन्ध , 'कस्स ण वा होइ रोसो' इत्यादावनियत्तसम्बन्ध , नियतसम्बद्वत्व च व्यङ्ग्यप्रतीत्योरेकविषयता मकत्वम, प्रथमे तस्य भाव पथिकरूपकविषयकत्वात् ।

काव्यप्रकाश-रहस्यम् द्वितीय तु तदभाव , सखीतरकान्तादिविषयभेदादिति केचित् । तन्त्र सम्यगाभाति, रक्ष्यस्य नियतसम्बद्धत्वमेव, व्यङ्गयस्य तु तथावान्यथार चेति पूर्वप्रतिपादि तस्य हीदमुदाहरणमिति लक्ष्यसाधारण नियतसम्वद्वत्व वाच्यम् । न चोच तथा भवति । अन्य तु प्रथमे सर्वेषामेव सत्यताप्रतीति , द्वितीये तु कान्तस्यैव सत्यतया, अन्येषा स्वसत्यतयेति नियताऽनियतसम्महत्वमित्याहु । तदपि न मनोरमम् । यत एव वाध्यप्रतीतेरेव सत्यताऽसत्यताप्रतीतिविषयत्वरूप वैता प्यमुच्यते, न तु व्यायप्रतीते । तस्मानियतसम्बन्धत्व तेन वाक्येन सह ज्ञाप्यत्व- रूपसम्बन्धनियम (शय्याप्रवेशरूपे व्यगये तदप्रवशरूपस्य वाच्यस्य विरोध. सम्बन्धोऽस्ति। स च प्रसिद्भतया क्लुप्त इति नियतत्पम् । द्वितीये नायकनावगते भ्रमरणास्या आस्य दष्ट नतूपपतिना इति व्यगयार्थे । विनीतत्वरूपवाच्यार्थस्य न कोऽपि प्रसिद्धसम्बन्धोऽस्ति इति कोऽपि कल्पनीय इत्यनियतत्वम् ।) इति युक्तमुत्पश्याम । सम्बद्धसम्बन्धो यथा 'विवरीअरए.' इति प्राकृत पद्यम् । अस्य छाया-'विपरीतरने लक्ष्मीब्रह्माण दृष्ट्वा नाभिकमलस्थम् । हरेर्दक्षिणनयन रसा. कुला झटिति स्थगयति' इति । अत्र हरिपदेन दक्षिणनयनस्य सूर्यात्मक तनि मरनेन सूर्यास्तमयस्तेन पद्मसङ्कोचस्ततो ब्रह्मणस्स्थगन तस्मिन्सति गोपनीया. ङ्गस्यादर्शनेनानियन्त्रण निधुवनविलमितमिति सम्बदसम्बन्धानि द्योत्यन्ते । प्रश्न १३-व्यञ्जनाविषये वेदान्तियेयाकरणानां मतमनूद्य खण्डयत। उ०१३-वेदान्तिनस्तु-क्रियाकारकादिपुरस्कारेण शन्दाना प्रवृत्तिधर्ममि- भावमपुरस्कृत्य न सम्भवति, धर्मधर्मिभावश्च प्रपञ्चगोचरो वा स्याद्, ब्रह्मगोचरो प्रपञ्चस्य वाध्यत्वात् (सप्तारस्य मिथ्यात्वेन धर्मधर्मिभावश्च न सम्भवति ), नान्त्य ब्रह्मणो धर्मशून्यत्वात् । अत पदपदार्थविभागमन्तरेणैर 'सत्यं विशन'मि यादि वाक्यमखण्डमेवाऽखण्डग्रह्मवाचकमित्यातिष्टन्ते । अतस्त न्मत्तानुसारेण प्रतीयमानेऽपि वाच्यस्य शक्तिरेच (पदपदार्थविभागमन्तरेणैव सय ज्ञानमनन्त ब्रह्मे'त्यादि महावाक्यमसण्डमेव अखण्ड ब्रह्म बोधयति इति वेदान्त- मतानुसारेण व्यङ्गयेऽपि वाक्यगम्ये वाश्यस्य वाच्यस्य वा शक्तिरेवेति पूर्वपन ) * इयपि न वाच्यम्। यतो व्यवहारमार्ग तैरपि पदपदार्थकल्पनाऽवश्यमगीकर्तगया। च्यवहारे तेपा भहनयस्वीकारात् । यदि च पदार्थकल्पना अविद्यादक्षायामपि नागीक्रियते, कुतस्तहि व्युत्पताऽन्युत्पनविभागव्यवहार 1 वाश्यार्थ एवं वा। नाद्य पञ्चमोल्लासः वाक्यस्य सङ्केतग्रहमाश्रित्येति चैन्न । वाक्यार्थस्यापूर्वत्वेनाऽनन्त्यात्तत्र सङ्केतग्रह- स्याशस्यत्वात् । अविद्यामार्गतिरस्कारे च कथमखण्डयोरपि वाच्यवाचकभाव । पारमार्थिकभेदाभावात् । तस्मात् तन्मतेऽपि विध्यादिर्यगय एव । प्रश्न १४-व्यअनाविषये महिमभट्टमतमनूद्य खण्डयत । उ०१४-महिमभद्दास्तु-नतावदसम्बद एव वाक्यात्प्रतीयते, सर्वस्मात्सों- पलब्धिप्रसङ्गात् । सम्बन्धाच व्यगायव्यञ्जकभावो भवन्नानियताद्भवतीति प्रति- वरूपादेव भवतीत्यारयेयम् । सम्बद्रोऽप्यों न स्वाधिकरणत्वेनाऽज्ञाते व्याय प्रतिपादयति, सर्वत्र तत्प्रतीतिप्रसङ्गात् एवञ्च व्यगायच्याकभावोऽनुमेयानुमापक. भाव एव पर्यवसन्न । यतो व्याप्तत्वेन सकलपक्षनिष्ठत्वेन च सपनसत्वविपक्षा सत्वपक्षसावलक्षणरूपत्रयवतो लिङ्गाल्लिङ्गिज्ञानमेवानुमानम् । तदेतदुक्तम्-'अनुमान यत्तद्रूप ' इति (अनुमित्यात्मको व्यगायव्यअकभाव पर्यवस्यति) तेनानुमानेन रूप्यते न त्वतिरिक्तया व्यक्त्येति तस्यार्थ । एवमनुमानादेव व्यङ्गन्यप्रतीति । तथाहि-'भम धम्मिनः' इति प्राकृत पद्यम् । छाया तु 'भ्रम धार्मिक विश्रब्ध स शुनकोऽध मारितस्तेन । गोदानदीकच्छवासिना इतसिहेन' इति । सङ्केतनि रेतनीभूत गोदावरी निकुञ्ज पुष्पावचयादिहतो कदाचि सशरतो धाम्मिकस्य निवारणायाऽविनयवत्या इयमुक्ति । तदन निकुञ्जवासिसिहतया श्वनिवृत्या गृहे भ्रमणविधिर्वाच्य स एव निकुञ्जनमणायोग्यतानुमित्यै प्रभवति (अत्र गृहे श्वनि वृत्या भ्रमण विहित गोदावरीतीरे सिंहोपलब्धेरभ्रमणमनुमापयति) यद्यद्रीरू- भ्रमण तत्तद्भयकारणनिवृत्युपलब्धिपूर्वकम्, निकुजे च सिंहोपर ब्धिरितिच्यापर विरुद्धोपलब्धौ पर्यवसानात् । भर भीरुभ्रमणस्य व्यापिका भयकारणाभावोपलब्धि , तद्विरद्ध भयकारणम् तदुपलधि (अनेन व्यतिरेकव्यातिईशिता भवति, तथा च गोदावरीतीर भीरभ्रमणाऽयोग्य सिंहरवाद् यन्नैव तन्नैव यथागृहम्') अनुमान चैव 'गोदावरीनिकुझं श्वभीनमणायोग्य सिंहवत्वाद् । अन्रोच्यते-श्वभीरोर वीरस्वभावस्य भ्रमणायोग्यत्वमत्र साध्यम, वीरस्वभावस्य वा, विशेषौदासीन्येन तसामान्यस्यैव वा । आद्ये व्यभिवार , तादृशस्यापि प्रमोर्गुरोर्वा निदेशेन, प्रियानुरागेग, निधिलाभादिशङ्कया वा तत्र भ्रमणदर्शनात् । अत एव नान्त्योऽपि । मध्यमे तु विरोध , स्पर्शादिशष्टयाऽपौरुषेयतया वा श्वतो बिभ्यतोऽपि मृगयादि कुतूहलेन सिंहवद्देशे वीरस्य भ्रमगदर्शनात् । किञ्चान पत्रे सिंहसद्भावो न मानान्त. ८का०प्र० है काव्यप्रकाश-रहस्यम् रेणारधारितः किन्तु पुंपलीवाश्यादवगतः । न च सदनं निझापाम, भम सौ सम्बन्धानियमादिस्यनिश्चयरूपाऽसिदिः । एवं निःशेषग्युसपन्दने रयादी पन्दन. प्यवनादीनि उपभोगण्यङ्गकतयोपात्तानि । न तानि समाप्यानि चारनम्न- रतोऽपि सग्मात् । अत एवान स्नानकायस्वनोपात्तानि । अतोनमन्तिम फयमनुमितिः स्यात् । ननु व्यक्तिरपि क्ध तरिति चेत् अधमपदमादिस्पारिति ममः । अस्माकमपि तरसाहित्येनान कान्तिकताप्यतिरेक पनि पेश, भपेप यद्यधमा प्रमाणारधारितं भवेत्, म स्येवमस्ति । निरपि कथं सामान दिति घेद, घिमूर्ग, ग्यानायां न प्यासेनापि परधर्मनाया निरिजम रिगु सम्मावितादप्पेयंरिधादेरियोऽर्थः प्रतीयत इति मूकीभर । इति परमोशामः । Gondon- अथ पष्ठ उल्लास: प्र० -ग्रन्थसन्दर्भपुर सरं न्याख्यायन्तां निनोद्धृतपद्यानि- रुपकादिरलङ्कारस्तस्यान्यैर्वहुधोदित । न कान्तमपि निर्भूपं विभाति वनिताननम् ।। रूपकादिमलङ्कारं वाह्यमाचक्षने परे। सुपां तिडांच व्युत्पत्ति वाचां वान्छन्त्यलड्कृतिम् ॥ तदेतदाहु सौशभ्यं नार्थव्युत्पत्तिरीदृशी । शब्दाभिधेयालङ्कारभेदादिष्टं द्वयं तु नः । उ०१-यद्यपि शब्दचित्रार्थचित्ररूपभेदद्वय प्रथमोल्लासे एवं दर्शितम्, तत्प्रभेदाश्चालङ्कारप्रभेदप्रदर्शनेनैव दर्शिता भवियन्ति' इति न कश्चिदस्ति तनप्र दर्शनीयम्, तथापि प्रदर्शितभेदद्वयमेव तावदनुपपन्न शब्दार्थालङ्कारयोरन्योन्यनैर पेदयेणानुपलम्मात् । तत्राहु-शब्दार्थालङ्कारयोरेकैकमात्रावस्थानपुरस्कारेण नाय विभाग किन्तु प्राधान्यपुरस्कारेण । तथा च प्रथमोल्लासे 'स्वच्छन्दोच्छरित' इति पधे नद्यन्तराधिक्यरूपेण व्यतिरेकालकारेणार्थस्य चित्रवम् विनिर्गतमि'त्यादी च मानमारममन्दिरात् इति मकारस्यासकृदावृत्या वृत्यनुप्रासेन शब्दस्य चितव मस्ति तथापि सत्र कान्ये चित्रार्थशब्दयो चित्रौ च तावर्थशब्दौ च तयो गुणत्वेन प्राधान्येन चावस्थानम्-तदुक्त नतु शब्दचित्रेयस्याचित्रत्वम् अर्थचिनेच शब्दस्य' इति । अत पूर्वोक्तोदाहरणद्वये 'प्राधान्येन ध्यपदेशा भवन्तीति न्याय नान शब्दचित्रमर्थचित्र क्रमेगावगम्तव्यम् । तत्र प्रामाणिकाना वैमत्य प्रदर्श यति-रूपकादिरित्यादिना । शब्दालङ्काराणामालङ्काराणा च चमत्कार प्रयोन- कत्वे प्रामाणिकसम्मतिमाह-तस्य काव्यस्य रूपकादि रूपकोपमादिरेव (अर्थालङ्कार एव) अलङ्कार अन्यै कैश्विदारारिक बहुधा बहुप्रकार उदित उक्त । अर्थस्य विभावादिरूपस्य रसव्याक्त्वेनार्थनिष्टो रूपकादिरेवालङ्कार मुख्यस्य रसादेरुत्कर्षकत्वात् । सदालङ्काराणा तु विभावाद्युपनयनमानप्रयोजक- श दधर्मतया न मुख्यालवारत्वम्, तत्र व्यतिरेकदृष्टान्तमाह-'न कान्तम्' इत्यादि । यया वनिताया आनन मुख कान्तमपि सलावण्यमपि निभूप निर- काव्यप्रकाश-रहस्यम् लङ्कारं सत् न विभाति नाहादाय पर्याप्तं तथा शब्दार्थशरीरं (काव्यस्य) सगुणमपि निरलङ्कारं न विभाति । विभावादित्वेन प्राप्तानामर्थानामेव रसत्व- मिति तेषां परिष्करणमुचितम् । अर्थ प्रत्याय्योपक्षीणानां शब्दानामलङ्कारस्या- नादरणीयत्वात् । द्वितीये पद्ये 'रूपकादिमित्यादिना सार्धपद्येन 'शब्दालकार एवादरणीयो न स्वर्थालङ्कारः' इति केषाञ्चिदालवारिकाणां मतमाह । परेऽन्ये (केचिदालङ्कारिकाः) रूपकादिमर्थालझारं याचं काव्यार्थप्रतीत्युत्तरवर्तिनीम् आचरते कथयन्ति । शब्दश्रवणानन्तरं शब्दालङ्कारेण चित्ते आकृष्ट अर्थतीत्य. नन्तरं हि रूपकाद्यनुसन्धानमिति तेषां वाह्यत्वम् । यतस्ते सुपां तिडा सुव- न्तानां तिङन्तानां च पदानां व्युत्पत्तिं विशेपेणानुभासादिरूपेणोत्पत्ति (विशेषण उत्पत्तिः व्युत्पत्तिः) संनिवेशं वाचामलङ्कृति शब्दालङ्कारं वाञ्छन्ति अत्यन्तो- पादेयत्वेनाभिलपन्तीत्यर्थः। तस्या एवालकृतित्वे हेतुमाह-तदेतदाहुरिति । सौशब्धं शोभनशब्दस्य काव्यस्य शोभनत्वं स्वत एव शब्दालङ्काराणां चमत्का. रित्वमेव । अर्थव्युत्पत्तिः अर्थालङ्कारः नेदृशी न शब्दवत् स्वतश्चमत्कारिका अपि तु विभावाद्युत्कर्षमुखेनैवेत्यर्थः । शब्दैरभिव्यज्यमानानामारवादानां विभावादिभि- स्थैरपचायनम ते च (शब्दाश्च) माधुर्यादिव्यञ्जकवर्णघटितानुप्रासादिमत्तया रचिता एव तड्याने प्रभवन्ति तेन शब्दालङ्काराणामावश्यक्ता पश्चाद्भवानामा लङ्काराणामकिञ्चित्करता तैविनापि शब्दालङ्कारैरास्वादानामभिव्यक्तः । तदेवाह वाह्यमिति । 'आस्वोदोत्पत्तिदशायां तदनुपलम्भात्' । इति । अधुना 'शब्दाभि- धेये त्यादिना स्वसिद्धान्तमाह अन्यकृत् । अभिधेयः अर्थः । यद्वा अभिधेयः प्रतिपाद्यः तेन लक्ष्यव्यङ्गययोरपि सङ्ग्रहः । 'तु' शब्दः पुनरर्थे । तथा च नः भस्माकं तु शब्दाभिधेयालङ्कारभेदात् शब्दार्थालङ्कारयोर्भेदात् द्वयं शब्दार्थालवार- युगलम् इष्टम् अभिमतमित्यर्थः । इदमन्नाडूतम् । नहि शब्दे स्वरूपेणालङ्कार, निरर्थकेऽपि तदापत्तेः । नाप्यर्थे सर्वदार्थसत्वेन तदापत्तेः। किन्तु शन्दवोधितेऽ. थेऽर्थबोधके शब्दे च चित्रता । अत एव द्वे काव्ये तेन द्वयोरप्यारवादोपकारक. स्वस्य सहृदयकवेधत्वात् कविसंरम्मगोचरत्वाञ्च द्वावायलकारी । इति । इति पष्टोक्षासः।

अथ सप्तमोल्लासः प्रश्न १-दोषसामान्यस्य लक्षणं प्रतिपाद्य सोदाहरणान् सोपपत्ति- कान् पदगतान् दोषान् प्रतिपादयत । उत्तरं १-'उद्देश्यमतीतिविघातको दोप' इति दोषसामान्यस्य लक्षणम् । पोडश पददोषा सन्ति । श्रुतिकटु १ श्रुतौ कटु यद् भवति तत् श्रुतिक्टूच्यते । यथा-'अनङ्गमगले त्यादिपये 'कार्यिम्' इति पदश्रवगै कटु विद्यते। च्युतसस्कृति २ व्याकरणलक्षगहीन यद् भवति तत् पद च्युतसस्कृतीयुच्यते । यथा-'एत- मन्दविपके या दिपद्ये 'अनुनाथते' इति पद 'आशिपि नाथ' इति वार्तिकविरत्वा- च्युतसस्कृति । अप्रयुक्तम् ३ तथा पठितमपि कविभिर्नादृतम् । यथा-'यथाय दारणाचार' इत्यादिपद्ये 'दैवत शब्द पुसि पठितोऽपियथा 'दैवतानि पुसिया' इत्यत्र पुसि कविभिर्न प्रयुज्यते । असमर्थन ५ शक्तिरहित, यस्मिन्नधैं पठितस्त प्रतिपा दयितुमशक्तम् । यथा-'तीर्थान्तरेषु मानेन' इत्यत्र 'हन्ति'पदम् । हन्धातुर्गम नार्थे पठितोऽपि तदर्थप्रतिपादनेऽशक्त । निहतार्थम् ५ उभयार्थमप्रसिद्धय प्रयु- तम् । 'यावकरसाई इस्यत्र 'शोणित'शब्द उज्वलीकृतरूपेऽर्थे निहतार्थ । अनु- चितार्थम् ६ तपस्विभिर्या' इत्यत्र पशुपद कातरताभिव्यञ्जक वादनुचितार्थम् । निरर्थकम् ७ पादपूरणमात्र प्रयोजनम् । यथा-'उत्पुलकमलकेसर' इत्यत्र 'हि' पदम् । अवाचकम् ८ यथा-'अवन्थ्यकोपस्ये या दिपद्ये 'जन्तु'पदमदातर्यर्थ प्रयुक्त परन्तु तदर्थे जन्तुपदस्य शक्तिरेव नास्ति । अश्लीलम् ९ श्रीरस्यास्तीति श्रील सिध्मादित्वान्मस्वर्थीयो लचप्रयय । रलयोरभेदात् श्लील, न श्लीरम् अश्लीलम्। अथवा श्रिय लातीति श्रीरम् । स त्रिविधो ब्रीडाजुगुप्साऽमङ्गल अथकत्वात् । 'साधन सुमहद् यस्य', 'लीलातामरसाहत 'मृदुपवनविभिन्न ' इत्यादीनि क्रमेणो दाहरणानि बोध्यानि । उक्तेषु त्रिपूदाहरणेषु साधनवायुविनाशशब्दा ब्रीडादि व्यञ्जका । सदिग्धम् १०-यथा-'आलिङ्गितस्तत्र भवान्' इत्यत्र वन्द्यामिति पदे पन्दीभूतायामुत वन्दनीयामिति सशय । अप्रतीतम् ११-यश्वले शास्त्रे प्रसि दम् । यथा-सम्यग्ज्ञानेत्यादिपद्ये आशयशदो चासनार्थो योगशास्त्रादावेव प्रयुक्त । ग्राम्यम् १२ लोके एव प्रसिद्धम् । यथा-राकाविभावरीत्यादिपद्ये करि- काव्यप्रकाश रहस्यम् पदम् । नेयार्थम् १३ रूढिं प्रयोजन विना शक्यसम्बन्धमात्रेणाशक्यार्थोपस्थापनम्। यथा-'शरत्काल्समुल्लासि' इत्यत्र चपेटापातनेन निजतत्वं लक्ष्यते । क्लिष्टम् १४ यतोऽर्थप्रतीतिर्व्यवहिता । यथा-अनिलोचनसभूतेत्यादिपधेऽत्रिलोचनसभू तस्य चन्द्रस्य ज्योतिरगमनेन भासिभि कुमुदरित्यर्थो व्यवहितत्वात् क्लिष्ट ।। अविमृष्टविधेयाशम् १५-अविमृष्ट प्राधान्येनानिर्दिष्टो विधेयाशो यत्र तत् । यथा- मूर्नामुत्तकृत्तेत्यादिपद्ये मिथ्यामहिमत्व नानुवाद्यमपि तु विधेयम् । विरदम तिकृत् १६ विरुद्धा चासौ मतिश्च, ता करोतीति विरुद्धमतिकृत् । यथा-न त्रस्त यदि नाम भूतकरणे यादिपद्ये भवानीपतिशब्दो भवान्या पत्यन्तरे प्रतीति करोति। भवस्य स्त्री भवानी तस्या पतिरिति रीत्या भवानीपतिशब्द यज्ञदत्तपन्या पतिरितिवत् पत्यन्तरप्रतीतिं करोति । एषु प्रारम्भिकास्त्रयोदश दोषा केवल पदगता समासगताश्च अन्ये क्लिष्टादयस्त्रयस्तु समासगता एव । प्र०२-पदांशदोषान् सोदाहरणान् प्रतिपादयत । उ०२-श्रुतिकटु-'तद् गच्छ सिधै' अत्र ध्य,ध्य इति कटु । 'यश्चाप्सरो- विभ्रम इत्यादिपद्ये' मत्ताशब्द क्षीवार्थे निहतार्थ । आदावानपुञ्जेत्यादिपये दृशा- मिति बहुवचन निरर्थकम् । चापाचार्यस्चिपुरविजयीत्यादिपये विजेय इति कृय प्रत्यय तप ययेऽवाचक । 'अतिपेलवमतिपरिमितवर्णम्' 'य पूयते' 'विनयप्रण यैककेतनम्' एषु पेल्वपूयमेतशब्दा क्रमेण ब्रीडादिध्यक्षका । 'कस्मिन् कर्मणि' इत्यादिपद्ये किं पूर्व साधु उत साधुषु चरतीति सन्देह । किमुच्यतेऽस्येत्यादिपये वच शब्देन गी शब्दो रक्ष्यते। प्र० ३-साधारणान् वाक्यगतान् दोपान् सोदाहरणान् प्रतिपाद्या. साधारणान् वाक्यगतान सोदाहरणान् दोषान् प्रतिपादयत । उ०३–च्युतसस्कारमसमर्थ निरर्थकञ्चेति श्रीन् दोपान् विहाय प्रयोदश दोपा पूर्वमुचा वाक्येऽपि भवन्ति । 'सोऽध्यैष्ट', 'स रातु' 'सायकसहायराहो' 'कुविन्द- स्त्वम्' 'प्राभ्रधा' 'भूपतेरुपसर्पन्ती' 'तेऽन्यैर्वान्तम' 'पितृवसतिमह प्रजामि' 'सुरालयोल्लासपर ''तस्याधिमानोपायस्य 'ताम्बूलमृतगल्लोऽयम्"वस्त्रवैदूर्यचरण' 'धमिल्लस्य न कस्य' 'अपाङ्गसंसर्गितरङ्गितम्' "श्रितक्षमा रभुव' इत्यादिषु नयुक्त-निहतार्थ-अनुचितार्थ-अवाचा मीडा-जगप्सा अमगलाश्लील- , सप्तमोलासा सन्दिग्ध-अप्रतीत-ग्राम्य-नेयार्थ-स्टिट-अविमृष्टविधेयाश-विरुद्धमतिकृद्दोपा प्रमेण बोध्या। प्रतिकूलवर्णम् १ रसप्रतिकूला यत्र वाक्ये वर्गा भवेयुस्तत् , यथा-'अकुण्ठो. कण्ठया' इत्यत्र । उपहतलुप्तविसर्गम् २ ३ उपहत उत्व प्राप्तो लुप्तो वा विसगों यत्र तत् , यथा 'धीरो विनीत' इत्यादौ । विसन्धि ४ विश्लेप , सन्धौ अश्ली र व, सन्धौ कष्टता वा 'तत उदित उदारहारहारि' 'वेगादुड्डीय गगने' 'उर्व्यसा वन ताली' इत्यादीनि क्रमेण विसन्ध्युदाहरणानि हतवृत्तम ५ हत वृत्त यत्र तत्-रक्षणानुसरणेऽप्यश्रव्यम्, न प्राप्तो गुरुभावोऽन्ते लघुना यत्र तत्, रसान नुगुण वेति त्रिविध हतवृत्तम् । यथा-'अमृतममृतम्' इत्यादिपद्ये हरिणीछन्द तस्मिंश्च प्रतिपाद पटाक्षरे यतिरुचिता। परन्त्वत्र चतुर्थपादे 'हा' इति पठारे परपदानुसन्धानापेक्षत्वेन यतिभङ्गाश्रयत्वम् । 'विकसितसहकारतारहारि' अत्र हारिशब्दोऽप्राप्तगुरुभावान्तलघुरस्ति। 'हा नृप हा बुध' इत्यादौ हास्यानुकूल दोधकवृत्त विपरीतम् । न्यूनपदम् ६ तथाभूता दृष्ट्वा' इत्यत्रास्माभि "खिन्ने' इत्यस्मात् पूर्वमित्यमिति च न्यूनम् । अधिकपदम् ७ यथा-'स्फटिकाकृतिनि मल' इत्यत्राकृतिशब्द । कथितपदम् ८ 'अधिकरतलतल्पम्' इत्यादौ तीला. शन्द । पत प्रकर्षम् ९ पतन् हसन् प्रकर्ष उत्कर्षो यन्त्र वाक्ये तत् । अलङ्कारक तस्य बन्धकृतस्य वा प्रकर्षस्य यत्रोत्तरोत्तर पात । क क कुत्र न' इत्यादिपधे यथा । समाप्तपुनरात्तम् १० समाप्तमय च पुनरात्तम् । यथा--बेकार स्मरका मुकस्य, इत्यत्र तनोतु व' इति समाप्तमेव वाक्य नवेत्यादिविशेपणेन पुनस्या. दीयतेऽत समाप्तपुनरात्तम् । द्वितीयाधगतंकवाचक्शेपप्रयमाधम ११ द्वितीया गतमेक वाचक शेषम् अवशिष्ट यस्य तादृश प्रथमा, यत्र वाक्थे । यथा-'मस चरणपातम्' 'भू सदर्भा' तत् तस्मात् मसृणचरणपात गम्यताम्' इति वाक्य द्वितीयाधंगतेन तदित्यनेन पूर्यते । अभवन्मतयोगम् १२ अभवन् मत (इष्ट ) योग (सम्बन्ध ) यत्र । यया-स्वमेवसौन्दर्या' इत्यादौ यदित्यन तदिति तदानीमित्यत्र च यदति वचन नास्ति । अनभिहितवाच्यम् १३ अवश्यवक्तव्य मनुक्त यत्र । यथा-'त्वयि निचररतेरित्यादौ अपराधस्य लवमपीति वाच्यम् । अस्थानस्थपदम् १४ अस्थानेऽयोग्यस्थाने तिष्टतीति भस्थानस्थम् । अस्थानस्थ पद यत्र । यथा-'प्रियेण सपथ्य' इत्यादिपद्ये 'काचिन विजहौ' इति वाच्यम् ।

१२० काव्यप्रकाश-हस्यम् अस्थानस्यसमासम् १५ यथा-'अद्यापि स्वनशैलदुर्गविपने इचादिश्ये कुदस्य चन्द्रमस उत्तौ समासो न कृतः कवरक्तौ तु कृतः। संकीम् १६ यत्र वाश्या. न्तरस्य पदानि वाश्यान्तरमनुप्रविशन्ति । यथा-'किमिति न पश्यनि कोप इत्यादौ पादगतं बहुगुणं हृदयनार्य किमिति न पश्यसि इमं कष्ठे गृहानत्यादि बोध्यम् । गर्मिवम् १७ यत्र वाक्यस्य मध्ये वाक्यान्तरमनुमविशति । यथा- 'लभं रागावृताङ्गया' इत्यादी विदितं तेऽस्तु एतत् प्रयोजनं विनैव गर्मितं कृतम्। प्रमिडिहवम १८ प्रमिदिमतिकाप्तम्। 'मीरादिपु रगितमायं पदिषु च पूजित. प्रमृति । स्तनितमणितादि सुरते मेघादिषु च गर्जितममुखम्' । इस प्रसिदिवापा। यथा-महाप्रलयमास्तेत्यादौ सिंहनादे रव। मनप्रक्रमता १९ ममः प्रकम प्रस्तावो यत्र तस्य भावः । यथा-'गाहन्तां महिपा' इन्पादिघे गाइन्ठानिनि कर्तृतिडः मक्रमात् नियन्तामित्वत्र तनः। अक्रमः २० अविधनानः मनोपत्र यथा-लग्नं रागावृताङ्गया' इत्यादौ इति प्रोनियोगाद', इति वाच्यम् । श्रमत- परार्धम् २१ भमतः प्रकृतविरुदः परायों यत्र । यथा-'राममन्मयशरेग, इया. विपद्ये ताटकामरगप्रकरणे बीभत्सरसे विदस्य झारस्य व्यक्षकोऽपरोऽर्थः । प्र० ४-अर्थदोपान् प्रतिपाद्योदाहरणेपु सङ्गमयत । उ०४-त्रयोविंशनिरर्यदोपाः सन्ति । अपुष्टः । मुरयायर्यानुपकारी यथा- अलिविततगगनसरणीत्यादिपद्ये अतिविततत्वादयो मुस्यायं नोपर्वन्ति । कष्टः २ दुरूहः । यथा-सदा मध्ये यासामित्यादौ यामां कविरुचीनां मध्ये सुकुमारवि- चित्रमयमात्मकत्रिमार्गा भारती चमत्कारं वहति ताः गम्भीरकान्यपरिचिताः कयमितरकाव्यवत् प्रसन्ना भवनिवस्यादिरयों दुरूहः। व्याहतः ३ पूर्व कस्यनि- दपकर्षमुकर्ष वा प्रतिपाद्य पुनस्तदन्यथाम्रणम् । यया-'जगति यिनले ने मन यं माधवम्प्रतीन्दुक्लादयस्तुच्छमापाःसमाधर एव मालत्यामुत्काय चन्द्रि- कावमारोपयति । पुनरतः ४ वाग्देन शातः पुनस्तेनैव प्रतिपादिनः । दया- असज्वालावलीदेत्यादौ चतुर्यपादवाक्यार्थः पुनरतः। दुकम ५ दुष्ट अनुचितः क्रमो यत्र । यथा-भूपालरनेत्यादौ मातस्य प्रानिर्देशो युधः। माम्यः ६ प्रामे भव। यया-वपिति यावदयं निकटे जन' इत्यत्र रिसंसायाः पटकथनम् । सन्दिग्धः ७ यथा-मा पर्येमु सार्येत्यादिपर्धे प्रकरणाचनावात् सन्देहः । निहतः निफान्तो हेनुयन हेतुरहित इत्यर्थः। यथा-'गृहीतं येनामी 'इत्यादि सप्तमोल्लासः पद्ये शस्त्रत्यागे हेतुर्न गृहीत । प्रसिद्धिविरद्ध ९ यथा-'इद ते केनोक्तम्' । इत्यत्र कामस्य चक्र लोकेऽप्रसिद्धम् । विद्याविरुद्ध १० यथा-सदा स्मारवा निशी थिन्यामित्यादौ ग्रहोपरागादिक विना रानौ स्नान धर्मशास्त्रे निपिद्धम् । अनवी ११ एकप्रकारेणैव निर्दिष्ट । यथा-'प्राप्ता श्रिय सक्लकामदुधास्तत किम्' इत्यादौ तत किमिति न नवीकृतम् । सनियमपरिवृत्त १२ सनियम न यत्तुमुचित अनियमत्वेनोक्त । यथा-यत्रानुनिखितार्थमेवेत्यादौ 'छायामात्रम णीकृताश्मसु मणेस्तस्याश्मतैवोचिता' इति वाच्यम् । अनियमपरिवृत्त १३ अ नियमत्वेन वकुमुचितो नियमावेनोक्त । यथा-वस्त्राम्भोनमित्यादौ 'शोण एव' इति नियमो न वाक्य । विशेषपरिवृत्त ११ विशषेण वक्तुमुचितोऽपि सामान्येनोक्त । यथा-श्यामा श्यामलिमानमानयते यादौ 'ज्योत्स्नाम्' इति श्यामाविशेषो वाच्य । अविशेषपरिवृत्त १५ सामान्येन वक्तुमुचितोऽपि विशे पेणोक्त । यथा-कल्लोलवेल्लितहपदित्यादौ 'एकेन किं न विहितो भवत स नाम' इति सामान्य वाच्यम् । साकास १६ अर्थित्वे प्रकटीकृतेऽपीत्यादी स्त्रीरत्रम् 'उपेक्षितुम्' इत्याकासति । अपदयुक्त १७ अपदे अस्थाने युक्त सबद्ध । यथा - आज्ञा शशिखामणिमणयिनीत्यादौ 'स्याञ्चेदेष न रावण, इत्यत एव समाप्यमा सहचरभिन्न १८ सहचरेभ्य सहोच्चरितेभ्यो भिन्न विनातीय । यथा-श्रुतेन धुद्धिरित्यादौ श्रुतादय उत्कृष्टा व्यसनमूर्खते च निकृष्टे । प्रकाशितविरुद्ध ५९ प्रकाशित विवक्षितार्थाद विरद्धोऽर्थो येन । यथा-हन रागावृतागधे यादो विदित तेऽस्वित्यनेन श्रीस्तस्मादपसरतीति विरुद्ध प्रकाश्यते । विध्ययुक्त २० यन विधान युक्त न भवेत् । यथा-'प्रयत्नपरियोधित ' इयादौ शयित प्रयत्न बोज्यसे इति विधेयम् । अनुवादायुक्त २१ यावानुवादो युक्तो न भवेत् । यथा- 'अरे रामाहस्ताभरण' इत्यादौ 'विरहिप्राणदमन' इति नानुवाद्यम् । त्यक्तपुन स्वीकृत २२ 'लग्न रागावृताङ्गश' इत्यादो विदित तेऽस्वियुपसहृतोऽपि तने स्यादिना पुनरपात । अश्लील २३ यथा हन्तुमेव प्रवृत्तस्यत्यादौ पुरुषलिग स्यापि प्रतीति । प्रश्न ५-सोदाहरणा रसदोषा लेण्या । उ०५-रसदोषास्त्रयोदश सन्ति। व्यभिचारिणो, रसस्य, स्थायिभावस्य च स्वशब्देनोक्तो क्रमेण यो दोषा । 'सबीडा दयितानने 'तामनङ्गजयमङ्गल- १२२ काव्यप्रकाश-रहस्यम् श्रियम्' 'संप्रहारे प्रहरणैः' इत्यादीनि क्रमेणोदाहरणानि ज्ञेयानि । अनुमावस्य कष्टकल्पनया व्यक्तिः ४। यथा-कपुरधूलिधवलेस्यादी उद्दीपनालग्यनस्पः शृङ्गारयोग्या विभावा अनुभावपर्यवसायिनः स्थिता इति क्टरल्पना । विभावस्य कष्टकल्पनया व्यक्तिः ५ यथा परिहरति रतिमित्यादौ रतिपरिहारादीनामनुः भावानां करुणादावपि संभवात् कामिनीरूपो विभारो यवतः प्रतिपाद्यः। प्रति. कूलविभावादिग्रहः ६ प्रसादे वर्तस्वेत्यादौ शृङ्गारे प्रतिकूलस्य शान्तस्यानित्या ताप्रकाशनरूपो विभावस्त प्रकाशितो निर्वेदश्च व्यभिचारी उपाप्तः । दीप्तिः पुनः पुन' ७ यथा कुमारसम्भवे रतिविलापे। अकाण्डे प्रयनम् ८ भकासे भनवसरे रसस्य प्रथनं विस्तारः । यथा-वेणीसंहारे द्वितीयेऽवेऽनेकवीरपये प्रवृत्ते भानु- मत्या सह दुर्योधनस्य शृङ्गारवर्णनम् । अकाण्डे छेदः ९ यथा-धीरचरिते द्वितीयेऽके राघवभार्गवयोर्धाराधिरूढे वीररसे, 'कङ्कणमोचनाय गरहामि' इति राघवस्योक्ती । भङ्गस्याप्यतिविस्तृतिः १० यथा हयग्रीवन्धे हयग्रीवस्य । भनिनोऽ. ननुसंधानम् ११ यथा रत्नावल्यां चतुर्थेऽके याभण्यागमने सागरिकाया विरमृतिः । प्रकृतिविपर्ययः १२ दिव्यादिव्यदिव्यादिव्यभेदात् प्रकृतयस्त्रिविधाः सन्ति । तद्विपरीतवर्णनम् । यथा कुमारसंभवे शम्भोः शङ्गारवर्णनम् । अनहस्य रसानु पकारकस्य वर्णनम् १३ यथा करिमाया नायिक्या स्वारमना घ कृतं घसन्त. वर्णनमनाट्य यन्दिवर्णितस्य राज्ञा प्रशंसनम् । प्रश्नः ६-के दोपाः कुत्रादोपाः कुत्र गुणाः कुत्र च दोपगुणर- हिताः ? इति सोदाहरणं लिसत । उ०६-प्रसिदेऽर्थे निहतरदुष्टः । यथा-चन्द्रं गतेत्यादी । अनुसरणे सर्वे टोपा भदोपाः । यथा-मृगचपमित्यादी । अप्रयुक्त निहताची रलेपादारदुष्टी। यथा-येन ध्वस्तमनोभवेनेत्यादौ । वनाचौचित्यात् फचिद् दोषोऽपि गुणा भवति पचिन दोपो भापि गुणः। यथा-वैयाररणादौ यत्तरि प्रतिपाय च रोदादी रसे न्याय कटरवं गुणः । 'दीधीड्मेवीइमम' इत्यायुदाहरणम् । नीरसे न गुणो नापि दोपः । यथा-दीर्णमाणाइनिपाणीन्' इत्यादी । असावं मुरता. रम्भगोष्टयां शमस्थासु गुणः । यथा-परिदरतेनेत्यादि, उसानोरनमपदके- त्यादि घ । सन्दिग्धमपि वाग्यमहिमा फचिनियतार्यप्रतीनिहायेन प्याजस्तुनिपर्य- घमायिये गुणः । यथा-गृधुपातस्वरपायमिरयादी । प्रतिपाचप्रतिपादश्योन्ये सप्तमोल्लासः १२३ स्वय परामर्श वापतीत गुण । यथा-'आत्मारामा' 'पडधिकाने त्यादि । अधमप्रकृत्युदिपु ग्राम्यो गुण । यथा-पुप्पोरकर कलमभक्तनिभमित्यादि। न्यूनपदं कचिद्गुण क्षचिन्न गुणो नापि दोष । गाढालिग नेत्यादि, तिष्ठेत् कोप- वशादित्यादि च क्रमेणोदाहरणम् । अधिक्पद वचिद् गुण । यथा-'वद वद जित' इत्यादौ कथितपद लागनुमासे अर्थान्तरसडक्रमितवाच्ये विहितस्यानुत्रा यवे च । सितकरकररुचिरविमा 'तदा जायन्ते गुणा 'जितेन्द्रियाव विभयस्य कारणम्' इत्यादीनि क्रमेणोदाहरणानि । पत प्रकर्ष कविद् गुण , यथा--प्राग प्राप्ते यादौ । समाहपुनरात न कचिद्दोष नापि गुण । यत्र न विशेषणमात्रदाना, पुनर्ग्रहणमपि तु वाक्यान्तरमेव क्रियते । यथा-'प्रागप्राप्ते त्यादौ । अपदस्थ समास कचिद् गुण यथा--रक्ताशोके यादौ । गभितमपि कचिद् गुण । यथा-'भवाम्यपहस्तितरेख' इत्यादि। धचित् सचारिण स्वपदोक्तावपि न दोप । यथा -'औत्सुक्येन कृत वरा' इत्यादि। प्रकृतरसपरिपोपकृतो विरुद्धस्य सचार्यादेर्वाध्यत्वेनोक्तिर्गुणावहा भवति । यथा-'काकायं शशलचमग ' इत्यादी। प्रश्न ७-रसयोर्विरोधपरिहार कथं भवति ? उ०७-रसयोविरोधो द्विविधोऽस्ति दैशिक कालिकश्च । ययोदेशिको विरो धोऽस्ति तयोरेको मिनसश्रय कार्य , ययो कालिको विरोधोऽस्ति तयोमध्ये भिन्नो रसो निवेशनीय । यथा वीरभयानकयोदेशिकविरोधोऽस्ति तस्माद् भयानक शनुगत वेन वर्णनीय' । शान्तझारयो कालिकविरोधोऽस्ति तत्रान्यो रसो मध्ये निवेश्य । यथा नागानन्दनाटके शान्तस्य जीमूतवाहनस्य 'अहो गीतम्' 'अहो वादिनम्' इत्यद्भुतमन्तर्निवेश्य मल्यवती प्रनि गारो निवद्र । किञ्च-विरुद्धोऽपि कश्चित् रस प्रधानरसेन सह स्मर्यमाणश्चेत् न दुष्ट । साम्येन विवक्षितोऽथवा प्रधानरसोपकारको विरुद्धो न दुष्ट । 'अब स रसनो- स्क -'दन्तक्षतानि करजैश्च'--'कामन्त्य इतकोमाहुलिगलगत्तै' इया दीनि क्रमेणोदाहरणानि। प्रश्न --'यत्तदोर्नित्य सम्बन्ध स्पष्टीक्रियताम् । अथवा 'अपाङ्ग- संसर्गि' इत्यादिपद्येयोऽसाविति पदद्वयमनुवाद्यमानप्रतीतिरुत् कथम्? उ०८-प्रकान्तप्रसिद्धानुभूतार्थविषयस्तच्छन्दो यच्छन्दोपादान नायेचते । 'कातयं केवला नीति'-'द्वय गत सपति'-'उत्कम्पिनी' इत्यादीन्युदाहरणानि ।

१२४ काव्यप्रकाशरहस्यम् एवमुत्तरवाक्ये गृहीतो यच्छन्दः पूर्ववाश्यानुगतस्य तच्छब्दस्योपादानं नापेक्षते। यथा-'साधु चन्द्रमसि पुष्करैः' इत्यादौ पूर्व पठितस्तु यच्छन्दस्तच्छब्दोपादानं नूनमपेक्षते । कचिदनुपादानेऽपि सामर्थ्याद् द्वयमपि प्रतीयते । यथा-'ये नाम केचिदिह' इत्यत्र य उत्पस्यते तम्प्रतीति गम्यते । एवञ्च 'अपाङ्गसंसर्गि' इत्यादि. पद्ये यस्छब्दस्तच्छब्दानुपादानात् साकाङ्क्षः। न चादश्शब्दोऽपि तच्छन्दा प्रतिपादयतीति वाच्यम् 'असौ मरुधुग्वित' इत्यादौ तच्छब्दार्थप्रतीत्यभावात् । इतरथा 'करवालकरालेत्यादौ 'स' इत्यस्यानर्थवयं स्यात् । ननु 'योऽविकल्पमिद- मर्थमण्डलम्' इत्यत्र यथा इदं शब्दस्तच्छब्दार्थमाह तथाऽदरशब्दोऽपि क्यायि- तुमर्हतीति चेन्नात्रैव वाक्यान्तरेऽदसो ग्रहणं कार्य न तु तव । यरछब्दस्य समीपे स्थितस्तु प्रसिद्धिं परामृशति । यथा-'यत्तदूर्जितमत्युग्रमित्यादिपये । न च 'कल्याणानां त्वमसी'त्यादिपधेऽविमृष्टविधेयांशोऽपरिहार्यो यच्छब्दस्यैक्रय निराकासत्वेऽपि द्वितीयस्य साकासवादिति वाच्यम्, यद्यदिति येन केनचिद्रूपेण स्थितं सर्वात्मकं वस्त्वाक्षिप्तं तथाभूतमेव तच्छब्देन परामृश्यते । प्रश्नः ९---अत्राकर्णनक्रियाकर्मत्वे कोदण्डं शरानित्यादिवाक्यार्थस्य कर्मत्वे कोदण्डः शरा इति प्राप्तम् । न च यच्छन्दार्थस्तद्विशेषणं चा कोदण्डादि । न च केन केनेत्यादिप्रश्नः । उपरितनं सन्दर्भ स्पष्टयत । उ०९-अनाभवन्मतयोगोदाहरणे 'सड्मामाङ्गणमागतेने स्यादिपये यदि कोदण्डादय आकर्णन कियाया कर्माणि तदा कोदण्डं शरानिति द्वितीया प्राप्नोति 'कर्मणि द्वितीया' इत्यनुशासनात् । यदि कोदण्डादीनां वाक्यार्थविधयाऽन्वय- स्तहि 'यो यो वीरः समायातः' इत्यादिवत् 'कोदण्डः शरा' इति प्रथमा स्यान कर्मवाधभावात् प्रातिपदिकार्थभावे प्रथमाविधानाच । ननु यरछब्देन कोदण्डा- दिरेय प्रतीयते ततश्च यथा यच्छन्दात् तृतीया तथैव कोदण्डादितस्तृतीया युक्तैवेति चेग्न तथा सति कोदण्डादीनां पुनरपादानं घटो घद इतिवत् व्यर्थ स्यात् । न च कोदण्डादेर्यच्छदार्थो विशेषणमथवा यच्छन्दार्धस्य कोदण्डादिवि. शेपणमिति वाच्यम्, आये येन कोदण्डेन यत् शराः समासादितं तत् आकर्णयति वाक्यापर्यवसानेन 'केन कोदण्डेन के शराः' इति विशेपागलाया अनिवृत्ति प्रसङ्गः । कोदण्डेन येन यत् शराः समासादितं तदाकर्णयेति द्वितीयकरपेऽपि सप्तमोल्लासः १२५ पूर्वोक्त एव दोषः । ननु येन यदिति सामान्यतो वोधे केन केन किमिति विशेष- प्रक्षेसति तच्छान्त्यर्थकोदण्देन शरा इत्याद्युक्तमिति चेन केन केनेति प्रश्नाभावात्। प्रश्नः १०-'नेपदं द्विः प्रयोज्यं प्रायेण' इत्यस्य क आशयः । उ०१०-ननु भग्नप्रक्रमे तस्यैव शब्दस्य प्रयोगः कर्तव्य इति यदुक्त तद् वदतो व्याघातं नातिशेते तादृशस्थले कथितपदाङ्गीकारात्, इति चेन्नोद्देश्यप्रति- निर्देश्यभिन्नस्थल एवैकपदप्रयोगनिषेधस्याङ्गीकारात् । तद्विपये तस्यैव शब्दस्य, सर्वनाम्नो वा प्रयोगं विना दोपाङ्गीकारात् । यथा-'उदेति सविते'त्यादिपये उद्देश्यप्रतिनिर्देश्यभावसत्वात् तच्छब्दस्यैव पुनरुपादानम् । रक्तादिपदग्रहणे तु अर्धान्तरतयेव प्रतिभासमानः प्रतीति स्थगयेदिति । इति सप्तमोहासः।

1 अथ अष्टमोल्लासः प्र० --गुणालङ्कारयोरन्यमतनिराकरणसहितं सलक्षणमन्तरं प्रतिपादयत। उ०१-ये प्रधानस्य रसस्य धर्मा सन्ति । यथाऽमन शौर्यादयो धर्मा सन्ति । ये च रसोत्कर्षस्य हेतुभूता । ये च रस विना नावतिट ते ते गुणा इत्यु ध्यन्ते । शौर्यादयो धर्मा आ मन एव नतु शरीरस्यैवमेव माधुर्यादयो रसस्यैव धर्मा न तु वर्णानाम् । ये शदार्यद्वारेण समविन रस कदाचिदुपकुर्वन्ति न तु सर्वदा । यथा हारादय कण्टाद्यानामतिशयाधानद्वारेण आमनोऽप्युपकारका स्तथैव शदार्थद्वारेण ये कदाचित् समविन रसमुपकुर्वति तेऽनुप्रासोपमादयोs लङ्कार इति नाम्ना व्यवहियन्ते । गुणा रस विना नावतिष्ट तेऽटकरा अवतिष्टन्ते। गुणा सर्वदा रसोपकारका अलङ्कारा कदाचिदेवेति गुणाल कारभेद । ननु गुणा सङ्कारयोर्गहुलिकाप्रवाहणव भेद । समकायवृत्या अपकस्थियात्मकसम्यन्धन शौर्यादय , सयोगेन हारादय इति गुणालङ्कारभेदस्य ओज प्रमृतीनामनुप्रासोपमा दीनायोभयेपामपि समवायवृत्तिदर्शनेन व्यभिचारादिति चेन्न, गुणालङ्कारयोरक्त रीयाकाव्यभेदसत्त्वात् । न च 'काव्यशोभाया कर्तारो धर्मा गुणास्तदतिशय हतवर वरङ्कारा इति गुणाल क्षारयोरंक्षण स्यादिति वाच्यम्, समस्तैर्गुणै काग्य व्यवहार आहोस्वित् कतिपय ? आयेऽसमस्तगुणा गौढी पाचारी व रीति फय काव्यस्यामा, वामनमते-'शतिरामा काव्यस्य' इनि काग्यलक्षगात् । 'अन्या मद्रावो रयादिपद्येऽलङ्काराभावेऽपि ओप ममृतिगुणानां सस्वात् काम्यग्यवहार: प्राप्ति । अलकाररक्षणमपि वामनोक्त न युक्त 'स्वर्गप्राप्तिरनेनैव' इत्यत्र गुणाभा वाद् गुणतशोमातिशयहेतुरवामावादारस्य । गुणनिरपेक्षी विशेषोक्तिव्यतिरे कावेव 'स्वर्गप्राप्ति रित्यादिपये काव्य यवहारस्य प्रवर्तको । प्र०२--गुणा कति सन्ति ? कस्मिन् २ रसे तेषां स्थिति ? किञ्च तेपां लक्षणम् ? उ०२--गुणात्रय सन्ति माधुयोज प्रसादारया । 'माहादकस्य माधुर्य प्रकारे दुतिकारणम्' अर्थात् दुतिकारणम् आहादकरय नाम भान दरवरूपरव माधुर्य अष्टमोल्लास. मुच्यते । अयं गुण सम्भोगङ्गारे, करगे, विमरम्भ, शान्ते च क्रमेणातिशयाधा यको भवति । 'दीप्त्यात्मविस्तृतेहेंतुरोजो वीररसस्थिति' दीतिरूपा या भात्मन श्चित्तस्य विस्तृतिस्तस्य हेतु । अयमपि चीरे, वीभत्से, रौद्रे क्रमेणाधिक । 'शुष्क न्धनामिवत् स्वच्छजलवत् सहसैव य व्यामोत्यन्यत् प्रसादोऽसौ सर्वत्र विहित. स्थिति ॥' इति प्रसादलक्षणम् । प्र० ३-प्राचीनोक्तानां दशशब्दगुणानां दशार्थगुणानाञ्च कथं त्रिपु गुणेष्वन्तर्भाव? उ०३-बहूना पदानामेकपदवद्भासनरूपो य श्रेप , यश्च गाढताशिथिर ताक्रमरूप समाधि , या च बिकट वलक्षणा उदारता, यश्चौनोमिश्रितशैथिल्यरूप प्रसाद, तेषामोजस्यन्तर्भावः । पृथक्पदत्वरूप माधुर्य प्रकारान्तरण सादाटपा त्तम् । प्रसादेनार्थव्यक्तिश्चरितार्था । यया रीत्यारब्ध तयैव समापनमिति मार्गा भेदरूपा समता कचिदोष । यथा-'मातङ्गा किमु वलिगतै ' इत्यादौ सिंहाभि धाने मणमार्गत्यागो गुण कटत्वग्राम्यत्वयोर्दोषेषु गणनादपारुष्यरूप सौकुमार्य मौज्ज्वल्यरूपा कान्तिश्च स्वीकृता । इत्य दशशब्दगुणानामन्तभावो भवति । पञ्च विधा पौडिरस्ति । -यथा पदार्थे वाक्यरचनम् चन्द्र इति वक्तव्ये 'अत्रिलोचन सभूत ज्योति'। वाक्यार्थे पदस्याभिधानम् । २ पूर्वस्य वैपरीत्यमुदाहरणम् ।३- एकवाक्यार्थस्यानेकवाक्येन प्रतिपादनम् । ४-अनेकवाक्यार्थस्यैकवाक्येन प्रतिपाद नम् । ५ विशेषणस्य सार्थकत्वम् । इय प्रौढिर्यदोज इत्युक्त तद् वैचित्र्यमान न तु गुण । तदभावेऽपि काव्यव्यवहारप्रवृत्ते । अपुष्टार्थनिराकरणेन साभिप्राय वरूप मोन, अधिकपदत्वनिराकरणेनार्थवैमल्यामा प्रसाद, अनवीकृतनिराकरगेन उक्वैिचिभ्यरूप माधुर्यम्, अमङ्गलरूपाश्लीलनिराकरणेन अपारप्यरूप सौरमा संम्, अमाम्यरूपोदारता च प्राम्यनिराकरगेन स्वीकृता। स्वभावोक्त्यर कारण अर्थव्यक्ति , रसध्वनिना रसवदलङ्काररूपगुणीभूतव्यङ्गथैन च दीप्तरसरूपा कान्ति , प्रमस्य योऽतिक्रमस्तस्य याऽस्फुटता तत्र या युक्तिस्तत्सम्वन्धरच नारूप श्लेपोऽपि विचिवमात्रम् । अवैषम्यरूपा समता दोपाभावो न तु गुण । अर्थदर्शनरूपो य समाधि स न गुणो यतो यन्येनावणितस्य वर्गितस्य वाऽर्थ स्यानुसन्धान विना काव्यनिर्माण न भवितुमर्हति । काव्यशरीरकारण गुणो न मवितुमर्हति तस्मादर्यगुणा अपि पृथड् न वक्तव्या । .

१२८ काव्यप्रकाश-रहस्यम् ५० ४–कस्य गुणस्य के वर्णाव्यञ्जका इतिसोदाहरणप्रतिपादयता उ०४-टठडढवर्जिता: कादयो मन्तिा निजवर्गान्ययुक्ताः शिरसि, तथा हस्वस्वरयुतौ रेफगकारौ अल्पसमासो मध्यमसमासो वा तथा च माधुर्यवती रचना माधुर्यस्य व्यक्षिका भवति । यथा-अनगरङ्गप्रतिममित्यादि । भावनृती. याभ्यां सह द्वितीयचतुर्थयोः सम्वन्धः। तथा रेफरयाध उपरि उभयत्र वा सम्बन्ध ! समानाकारयोः कयोश्चित् संयोगः । ठडढाः शकारः पकारो दीर्घसमासो विकट. रचना च अजोनामकस्य गुणस्य व्यक्षिका भवति, यथा-मू मुवृत्तकृत्तेत्यादि । येन शब्देन समासेन रचनया वा श्रवणमात्रेणार्थज्ञानं भवेत् स प्रसादय्यअकः। यथा-परिम्लानं पीनस्तनजधनेत्यादि । प्र०५-रचनावृत्तिवर्णानामन्यथात्वं कथं भवतीति सोदाहरणं प्रतिपादयत । उ०५-यद्यपि रचनादयो गुणाधीनास्तथापि वक्यौचित्यात् पाग्यौचिरयात् प्रबन्धौचित्याच कचिद् रचनादीनामन्यथास्वमपि भवति । यथा-'मन्यायस्ता. पर्णवाम्भः' इत्यादि 'प्रौढच्छेदानुरूपोछलन' इत्यादि च । भाये भीमसेनो वकर द्वितीये तु वाच्यं कुम्भकर्णोत्तमाझं-तदपेक्षया रचना । एवं प्रबन्धापेक्षयाऽऽख्यायि. कार्या शृङ्गारेऽपि न मसृणवर्णादयः । कथायां रौद्देऽपि नारयन्तमुक्ताः । नाटकादी रौडेऽपि न दीर्घसमासादयः। इत्यएमोल्लासः।

अथ नवमोल्लासः ०१-वृत्तयः कति भवन्ति, किञ्च तासांलक्षणं, किञ्चोदाहरणम्? उ०१-रसविषयव्यापारवती वर्णरचना वृत्तिः । तिस्रो वृत्तयः सन्ति । उप- नागरिका परुपा कोमला च । 'माधुर्यव्यञ्जवणैरपनागरिकोच्यते', 'ओज.प्रका- गवस्तु परपा' 'कोमला परैः' इति क्रमेण लक्षगानि । माधुर्याजोगुणयोयें उदाह- रणे ते आद्ययोरुदाहरणे । कोमलायास्तु-'अपसारय धनसारमि'त्यादिकम् । एता एव वैदर्भी-गौढी-पाञ्चालीति नाम्ना क्रमेण व्यपदिश्यन्ते । कोमला तु ग्राम्येष्यपि मण्यते वृत्तिरेव रीतिरिति कथ्यते । ४०२-सलक्षणान् सभेदान् सोदाहरणान् शब्दालङ्कारान् प्रति- पादयत। उ०२-अस्योत्तरं निम्नप्रकोष्ठे द्रष्टव्यम् । भलारा लक्षणानि भेदाः उदाहरणानि वक्रोक्तिः यदुक्तमन्यथे १ श्लेषेण नारीणामनुकूलमाचरसि गुरुजनेत्यादि নুনঃ वर्णसाम्यम छेकानुप्रास: नुप्रातः वृत्त्यनुप्रासः लाटानुप्रास्ः हेकानुप्रासः सोऽनेकस्य ततोऽरुणपरिस्पन्देति सकृत् पूर्व वृत्त्यनुप्रास: २ काक्वा एकस्याप्यस कृत् पर: शाम्दस्तु लाटानुप्रासः १ पदानाम् यस्यन सविधे० ९का०प्र० काव्यप्रकाश-रहस्यम् अलङ्काराः | लक्षणानि भेदाः उदाहरणानि (पदानुप्रासः) | लाटानुपासः २ पदस्य वदन वरवणिन्याः ३ एकममासे सितकरकरेति- ४ भिन्नसमासे ५ समासासमासयोः (प्रातिपदिकस्य) यमकम् अर्धे सत्यर्थ इद पादजं नवभेदम् , द्विधा मिन्नानामि विमक्ते पादे विंशतिभेदम् , त्यादि त्रिखण्डे विंशत् , चतुःखण्डे चत्वारिंशत, प्रथमपादस्य तृतीयपादयमने- सन्नारीभरणोमायम् प्रथमस्य द्वितीये तृतीयस्य विना यमेनोनयता चतुर्थे- सुखादिना- शोकाभ्यासे सत्त्वारम्भरतो- द्वितीयपादान्तभागस्य चतु. अनन्तमहिमव्याप्त- र्थपादान्तमागयमने- आदिमागस्यान्तभागयमने- बदानतोऽयदानतः। आद्यन्निक पूर्वार्ध-उत्तरार्धे सरस्वती प्रसाद मे- आवन्तिकमन्तादिकं चेति द्वयोरप्यधयोराधन्तिकान्ता- ससारसाकमित्यादि- दिकेच. मधुपराजीत्यादि शेषः अनियतस्थानावृत्ति वाच्यभेदेन / वर्ण पद लिङ्ग माषा प्रकृति प्रत्यय विमक्ति वचनभेदात् प्रकृत्याचष्टभेदामावाच्च नवविधः। मित्रा यत् १ वर्णे- ३ लिङ्गे- ४ भाषायाम्- ५ प्रकृतौ- ६ प्रत्यये- अलङ्कारः शङ्काकरेति पृथुपालस्वरपात्रम् भक्तिप्रहृतिक मड्दे सुरसंघम्मे० अय सर्वाधिक रजनिरमणमौले:

नवमाल्लासः अलङ्काराः लक्षणानि भेदा: उदाहरणानि ७विमती- सर्वस्व हरेति- ८ वचने- मतिमहनि- ९ प्रकृत्यादिभेदाभावे यो मन परगोनाहान- चित्रम् तच्चित्र यत्र बड्गे- मारारिशनि- वर्गानामिति मुरजे- सरता बहुलारम्भति- पढ़े- भासते प्रतिभासारेनि- सर्वतोभद्रे- रसासाररसेनि- पुनरवदा पुनरुक्त वदा समङ्गशब्दनिष्ठ - । अरिवध देह शरीर मासः म सो विभि नाकारशब्द गा। एक अमङ्गशब्दनिष्ठ - न चकारत्यङ्गनारामा- तेव शब्दावनिष्ठ तन्वपरजधन्योऽसौ- प्र०३---'अर्थमेदेन शब्दभेदः'-'काव्यमार्ग स्वरो नगण्यते' अनयोः कआशयः। उ०३-अयं भाव--'सकृदुचरित. शब्द. सकृदेवार्थ गमयति' इति नये एक- शब्देनैक्स्यैवार्थस्य प्रतीतिरथद्वयमतीत्यर्थ श्लेषस्थले एकाकारों द्वौ शन्दी रन इत्यवश्यमङ्गीकार्यम् । ती चैकेन प्रयत्नेनैकदोचार्यतया पृथक्त्या नानुभूयते । ननु भिन्नसमासानामिन्द्रशत्रुप्रभृतीनां श्लेपे उदात्तानुदात्तादिस्वरभेदादेकरूपतया भासनमनुपपन्नमिति चेन्न, 'काव्यामार्ग स्वरो न गग्यते' इत्यङ्गीकारात् । अत । एव विभाषा इन्दसि', (१२॥३६) इति पाणिनीयसूत्रे तन्त्रेग सावृत्या 'वाऽच्छन्दसीति' ननं प्रश्लिप्य भाषायामपि वैकल्पिकी एक्श्रुतिरङ्गीक्रियते । प्र० ४-अभङ्गलेपः शब्दालङ्कारोऽर्थालङ्कारो वा ? श्लेष उपमाद्य- लङ्कारवाधको न था ? शब्दरूपोऽर्थरुपश्च श्लेयोऽर्थालङ्कारोऽस्ति न चा? उ०४-ननु अभङ्गश्लेष. स्वरितादिगुणभेदाभावादेकप्रयत्रोचार्यत्वादर्थचन स्कृतिमत्त्वाचार्यश्लेषः कथं नाभ्युपगम्यते इति चेन्न, दोपगुगाल कारविमागस्या- न्वयव्यतिरेकानुविधायित्वात् । शब्दपरिवृत्तिसहे 'स्तोनोग्रतिमायाति' इत्यादा- वेवार्थश्लेषस्य सत्वात् । न चोपमादीनां श्लेपामंझीर्णतया श्लेषस्य चालङ्कारान्त- F - १३२ काव्यप्रकाश-रहस्यम् रसंकीर्णतयोपमाद्यलकारवाधकः श्लेप इति वाच्यम्, गुणक्रियासाम्यवच्छन्दसाग्य स्याप्युपमाप्रयोजकत्वात्, 'स्फुटमर्थालङ्कारावेतौ' इति रुद्रटोक्तस्वाच । ननु 'क्म- लमिव मुखम्' इत्यादिः साधारणधर्मप्रयोगशून्य उपमाविपय इति चेन्न, पूर्णोपमाया निर्विषयत्वात् । 'देव त्वमेव पातालम्' इत्यादिः श्लेषस्य चोपमाद्यलङ्कारभित्रो विपयोऽस्ति । द्वयोर्योगे संकरः । वस्तुत उपमान्यपदेश एव यलीयान् प्राधान्येन व्यपदेशा भवन्तीति नियमात् । श्लेपं विना साधारणधर्मसम्भवो नास्ति । माधारणधर्म विनाच नोपमा भवितुमर्हति 'साधम्र्यमुपमा भेदे, इति तल्लक्षणात् । 'अधिन्दुसुन्दरी नित्यं गललावण्यबिन्दुका' इत्यादौ विरोधज्ञानोत्पत्तिहेतुका श्लेपो नास्ति प्रत्युत श्लेपज्ञानोत्पत्तिहेतुको विरोधोऽस्ति । न पत्राद्वयप्रति- पादकः श्लेपो द्वितीयार्थस्य प्रतिभातमात्रस्य शाब्दवोधाविपयस्वात् । ननूभयवि. धरलेपस्यार्थालङ्कारस्वं स्यादिति चेन्न वदतो व्याघातात् । शब्दरलेपः कथ्यतेऽर्था- लक्षारमध्ये गण्यते । किञ्च चमत्कारजनकता यत्र भवेत्तस्यैवालदारता युक्त, शब्दस्य चमत्कारित्वे शब्दालङ्कारतवोचिता । अर्थसापेक्ष स्वादन शब्दानामर्थश्लेष इति चेदनुमासादीनामप्यालक्षारतापत्तेः। रसाधनुगतः प्रकृष्टो न्यास इति म्युरप- त्यनुसारमनुप्रासो रसव्या स्वरूपमपेतते रसश्चार्य विना न भवतीति तात्पर्यम्। शब्दगुणदोपालङ्काराणामापेक्षयाऽर्थगुणदोपालद्धाराणा शब्दापेक्षया प्यवस्थिति- रिति तेऽपि क्रमेणार्थगतस्वेन च भण्येरन् । अन्यच्च-विधौ वळे मूर्मि' इत्यादी वर्णादिश्लेपे एकप्रयतोचार्यत्वाच्छब्दभेदेऽप्यर्थश्लेपत्वं प्रसज्येत तस्मादमाश्लेयोऽ. लकार एवालङ्कारान्तरस्य चाबाधक एवेति स्थितम् । इति नवमोझासः।

१. उपमा अथ दशम उल्लासः। प्र० १-सलक्षणान् सभेदान् सोदाहरणान् अर्थालङ्कारान् प्रतिपादयत । उ०-१ अस्योत्तरं निम्नप्रकोष्ठे इष्टव्यम् । भलधारनाम) लषशानि भेदाः उदाहरणानि माधयमुश्मा | वाक्यमतीता | स्वप्नेऽपि समरेषु० भेदे वाक्यगतार्थी- चकितहरिणलोट समागतोटी | अत्यायनियमकारिमि समासगनार्थी- पबितयमनोरथपथ० तद्धितगीतो- गन्मीर्यगरिमा । तद्धितगता - दुरालोकः स समरे वाक्यगतधर्मनुप्ता यौती- धन्यस्यानन्यमामान्य वाक्यगतार्थी धर्म- आकृष्टकरवालोऽमौ० समासगनौती धर्म करवाढवाचार.. समासगतार्थी धर्म नत्य दामृतोरमा. तद्धितगनार्थी धर्म विषपन् दास्यगतोपमानतुप्ता(प्रा)- मलकरणारविश्रामेति. कब्बममनिनिपाठे सरि समिन्यत्र गमिनि पाठे चसमामगा उपमाप्रतिरादकटपे ननः कुमुदनायेन. (द्विपदसमासमा बहुपदसमासमा उग्मा- असितनुजग. कर्माधिकरणयोक्यचियहि-पौर सुतीपति- चौपमापतिपादकलोरे बन समरान्तरे कमति कतरि च- मृधे निदाघधर्मा- नमुत्युपमाप्रतिपादकचोपे- धर्मवाधोठोंप किय-गता सविता विश्वनि समागताच परिसन्धिमनो. घोपमानयोपि-ममामगा| उग्टुशायमानः १३४ काव्यप्रकाश-रहस्यम् ४ उत्प्रेक्षा अलकारनाम रक्षणानि भेदाः उदाहरणानि वाक्यगाच- कुसमेग सममिति पाई वाक्यगा० वायुपमेयटोपे क्यचि- अरातिविक्रम उपमेयातिरिक्तत्रितयलोपे तमगिमनि कृतावसेना २. अनन्वय उपमानोपमे न केवल भातिक यत्वे एक्स्य न केवल भाति नितान्न वैकवाक्यगे कान्ति: ३ उपमेयोमा/ विपर्यास उप कमलेश मनिमनिक मेयोपमा रिव कमला तयो। सम्मावनमा उन्मेष यो ममम महते थोत्प्रेक्षा ५ सन्देह. ससन्देहस्तु १भेदोत्तौ निश्चयगर्भ अयमातंण्ट: किस खत भेदोतो २ भेदोकी निश्चयान-- इ.दु किक कल ३ भेदानुक्तो- अस्याः समविधी प्रग पतिरभूत ६.रूपकम् तद्रूपकमभेदो | १ समस्तवस्तुविषयहरकम - | ज्योत्स्ना भस्म छु। य उरमानो धवा पमेययोः एकदेशविवनि श्रीता आर्या २ एकदेशविवर्तिरूपकम् - यस्य रणान्तःपुरे करे. श्चते ३ निरक्षरूपकम् कुरहीवाहानि. ४ निरनमामारूपकम्- सौन्दर्यस्प महियो. परम्परित नियतारोपणो- ५ शिष्टमालापरम्परित विदन्मानसमा रूपकम् पाय- रूपकम्- ६ अशिष्टमारापरम्परित मालान प्रयकुअरस्य रूपकम्- ७ शिष्टकेवलपरम्परित रूपकम्- ८ भरिकेवलरूकम् निरवधिच निरामयं च. ९रनारूपकम् विमलयकरैलेगानाम् ७ भपतिः | मयनिषि- भवाप्स' प्रागस्भ्यम् ध्यान्यव० भलौक्किमहारोक.

दशमोल्लासः अरदारनाम लक्षणानि भेदाः उदाहरणानि ८ इलेषः इलेषःस वाक्ये उदयमयते दिङ्मालिन्यम् एकस्मिन्- ९. समामोति परोक्तिभेदकैः रब्ध्या तव बाहुस्पर्शम्. दिलष्टै.. १०.निदर्शना अभवन् वस्तु क सूर्यप्रभवो वश.. सम्बन्धः- मालाख्या निदर्शना दोभ्यो नितीति निदर्शना स्वस्वदेवन्द उन्नत पदमयाप्य यो लघु . (अपरा) यस्योक्तिः- ११ भमस्तुत अरस्तुनप्रशसा कार्य प्रस्तुते कारणस्प याता-किन मिलन्ति प्रशसा या सा वर्णनम्- २ कारणे पस्तुने कार्यस्य राजन् राजमुनान पाठयति वर्णनम्- ३ सामान्ये प्रस्तुते विशेषस्य व एतत्तस्य मुखात कियत् । ४ विशेष प्रस्तुते सामान्यस्य व सुहृद्वधूबाष्पजलप्रमार्जन ५ श्लेषहेतुकाप्रस्तुतप्रशसा- पुरुत्वादपि प्रविचले० समासोक्तिहेतुकापस्तुत येनास्यम्युदितेन. प्रशसा- सादृश्यमानहेतुकाप्रस्तुत आदाय वारि परितः प्रामा- वाच्ये प्रतीयमानार्थानच्या अन्धेरम्मः० वस्त्वं मो. कथयामि- मोऽपूर्वोरसनाविपर्ययविधिः कमलमनम्मसि १२. अतिश अध्यारोपेण- अशेश्वध्यारोपेण- निगीर्याध्यव | उपमानेन निगोर्णस्योपमेय सानतु प्रकृत्यस्य स्याध्यवसानम्- प्रस्तुतस्थान्यत्वम्- यद्योंकौ कल्पनम्- कारणकार्ययोः पौर्वापर्य विपर्ययः- अन्यत् सौकुमार्यम्. राकायामकलङ्कम् हृदयमधिष्ठितमादौ काव्यप्रकाश-रहस्यम् अलदारनाम| लक्षणानि भेदा उदाहरणानि १३ प्रति प्रतिवस्तूपमा | प्रमाला प्रतिवस्तूपमा देवीमाव गमिता. वरतूपमा सा, सामा न्यस्य दिरे कस्य माला प्रति वस्तूपमा यदि दात्यनलोऽत्र. १४ दृष्टान्त दृष्टान्त पुन साधयेण- स्वयि दृष्ट एवं तस्या. रेतेषां सर्वेषां प्रतिवि०- वैधयेण तवाइवे साहसकर्मशमण. १५ दीपकम् | सकृवृत्तिस्तु क्रियादीपकम् कृपणानां धन नागाना धर्मस्य फणमणि. स्विधति कूगति. कारकदीपकम् मालादीपकम् मालादोपक मालादीपकम् सख्यामाङ्गणमागवेन. माथ चेद्- १६ तुल्ययो नयताना सक, प्राकरणिकाना सकृद् धर्म पाण्डधाम वदनम् गिता धर्म सा- अप्राकरणिकाना सकृद् धर्म कुमुदकमलनील- १७ व्यतिरेक उपमानाद् अश्ष्टेि हेरवोरक्ती अतिमात्रसहायस्थ । भत्र यदन्यस्य- शाद साम्यम्- तुच्छेति महाकृतेरनयो पाउनुपादाने भेदत्रयम्। आर्य साम्यम् मसिमात्रसहायोऽपि अ०० पाक्षिक्ष साम्यम् यदुनयना० शिष्ट हेत्वोरुको शाम्द जितेन्द्रियतया सम्यक. साम्यम् शि...मार्थ साम्यम्- अखण्डमण्डल श्रीमान् डि. मासाम्ये मालाम्यति हरवन विषमाट. शि०६०३० आक्षिप्त साम्यम् । नित्योदितप्रतापेन. वश्यमाणविषय एहि किमपि कस्या. मिष्टस्य- उक्तविषय ज्योत्स्ना मौक्तिकदाम पर्यायश युगपद- १८ भाक्षेप निषेधो व दशमोल्लासः १३७ भेदा अलारनाम लक्षणानि १९ विमावना क्रियाया प्रति धेऽपि फल व्यक्ति उदाहरणानि कुसमितलतामिरहता प्यषच. अनुक्तनिमित्ता निद्रानिवृत्ताधुदिने २०विशेषोत्ति विशेषोतिर खण्डेषु का रणषु कलावन उक्तनि मिटा अचित्यनिमित्ता कर्पूर हव दग्धोऽपि स एक्स्त्रीणि ज्यतिः एकत्रिधा वमसि चेनसि. २१ यथासख्यम् यथासरयक मेणैव क्रमि कागा सम न्वय २२ अर्थान्तर सामाय वा "यास विशेषोवा- विशेषेण सामान्यस्य साध निदोषावृनमनसाम्. म्यग समर्थनम् मा०वि०साधम्र्येण समर्थनम् | मुसितवसनार कारायाम्। विशे सा वैधम्र्येण समर्थनम् गुणानामेव दौराल्यात. मा०वि० वैधाण समर्थनम्-भहोहि मे बहूपराद्धमायुषा १ जाते त्या भमिनवनलिनी २३ विरोधा विरोध सोड मास विरोधेऽपि २ जातेप्शन ३ जाते क्रियया ४ जातेद्रव्येण ५ गुणस्य गुणेन ६ गुणस्य क्रियया ७ गुणस्य द्रव्येग ८ क्रियाया क्रियया ९ कियाया द्रव्येश १० व्यस्य द्रव्येम २४ स्वभावोक्ति स्वभावोकिस्तु गिरयोऽप्यनुननियु. येषावण्ठपरिग्रहप्रगयिताम् सुजति च अगदिदमवति सतत मुमटासका पेशवमपि खरवचनम्। क्रौञ्चाद्रिदामा परिच्छदातीत. भय दारामेचे निलय. समदमतहजमद० पश्चादब्धी प्रसार्य १३८ काव्यप्रकाश-रहस्यम् उदाहरणानि हित्वा त्वामुररोवध्य मनसाम्० है हेलाजितबोधिसत्व सहदिवसनिशाभिर्दीर्घा. अरचिनिशया विना भलारनाम लपणानि भेदा २५ च्यानस्तुनि व्यानस्तुनिर्मु- स्तुतिपर्यवमायिनी निन्दा खे निन्दा- निन्दापर्यवसायिनी स्तुनि २६ सहोक्ति मा सहोक्ति महार्थस्य- २७ विनोक्ति विनोति सा अशोमन विनाऽन्येन- शोमन २८ परिवृत्ति परिवृत्तिर्वि निमय उत्तमेन न्यूनस्य च- न्यूने। उत्तमस्य १९ माविकम् प्रत्यक्षा इव यद्रावा कियते- ३० काव्यनि काव्यलिङ्ग वाक्यार्थता कम् देतोर्वाक्य- पदार्थता अनेक पदार्थता एक पदार्थना समेन समस्या मृगरोचनया बिना लनानामेतामामुदितकुम मानाम् नानाविधप्रहरणैप० पासीदअनमोनि पश्यामि० वषु प्रादुर्भावादनुमित मिद जन्मनि प्रणयिससोसलील- भस्मोद्धूलनमद्रमस्तु भवते. य प्रेघ चिररूढाऽपि ३१ पर्यायोत्तम पर्यायोक्त विनावाच्य वाचकत्वेन- ३२ सदाचम् उदात्त वस्तुन सम्पद महतां चोप लक्षणम् ३३ समुच्चय तत्सिद्धिहेता असद्योग वेकरिमन् सद्योग सदसद्योग मुक्ता केलिविसूत्रहार गलिता. तदिदमरण्य यस्मिन् दुर्वारा स्मरमार्गणा. कुलममलिनम्। शशी दिवसधूसर .

दशमोल्लासः उदाहरणानि विदलिदसकलारिकुलम् अलकारनामा मटकारनाम मेदाः स वन्यो यु गुडदौगाधन गपद्दा गुणक्रियाः क्रियायोगधन् गुमक्रियायोगादम्- । अवकपदे तया० कलुष च तवाहिदेखक स्मात् नन्वाश्रयत्पितिरियं दवा ३४. पर्यायः पक्रनेगाने- कमनेकत्र मवति कस्मिन् । पर्यायः एकमनेकत्र किरते उत्तेषां श्रोतहोदरता मरणे मधुरिम्सचिरं बच:० तोहं नमित्ति यदा लहरीचाचा %3D मौसो मानधना । अनेकमेकन मवनि अनेकमेकत्र क्रियते ३५.अनुमानम् । अनुमानं तदुक्त यद्- ३६ परिकरः । विशेषपैयद सातै क्ति:-' ३७.व्यामोक्तिः व्याजोक्ति- इमनो- दिन. ३८. परिसंख्या किश्चित् पृष्ट प्रश्नपूर्वकपदीय- माट वा० मानन्दवच्छेद्या प्रश्नपूर्वकवाच्य यवच्छेदा शैलेन्द्रप्रतिपादमान- गिरिजा किमासे यं घुमान. कि मन सुद्धमत्र यो नरसन् कौटियं कचनिये. अप्रश्नपूर्वकमतीय- मानम्यवच्छेया. भप्रश्नपूर्वकवाय- न्यवन्द्या- मटिमबे न विमवे. ३९.कारणमाला ययोत्तरं चेद पूर्वस्व० जिनेन्द्रयत्वं विनयस्य कारणम् १४० काव्यप्रकाश-रहस्यम् उदाहरणानि इंसाना सरोमियोमा वामित्रक इस्तिदन्न:- कुतः० का विषमा देवगतिः- अलवारनाम। लगानि भेदाः ४०.भन्यो यम् क्रियया तु परस्परम्० ४१. उचरम् उत्तरशतिमा श्रुतिमात्रतः प्रश्नस्योत्र- प्रतः प्रश्न यनम्- स्योन्नयनम् 1 असकृत पदने सति असम्माध्यमुत्तरम्- ४२. सूक्ष्मम् नोऽपिलपिनः मदमोऽप्यर्थः ४३ सारस उच्चरोचरमु त्कर्षों मवेद सार:- ४४. भतहतिः भिन्नदेशन याऽत्यन्नम्- ४१. समाधिः ममाधिःसरं वत्रस्पन्दिस्वेदविन्दु प्रबन्धैः० राज्ये सारं बसपा यत्येवमगस्तस्यैव वेदना. मानमस्या निराकर्तुम्. काय कार. ४६ समः ४७ विषमः णान्तर सम योग्यत | सद्योगः धातुः शिवाविशय. या योग:- সমযীশ चित्र चित्रंत बत- कचिद यद भतिवैधाव शिरीरादपि ममी. निवैषम्याद सम्बन्धापटनम् क्रियाफलाप्राप्तिरनशक:- सिंहिकासनसंत्रस्तः कार्यस्य गुणेन कारणस्य सपः करमर्शमवाय. गुगो विक. कार्यक्रियया कारणक्रिया भानन्दममन्दमिमम् विस्टा महतोयन्मही मागराविश्यम् योमावाषिता प्राधेवाविश्यम् TIP. 1८ अधिकम् महो विशाल भूपात.

दशमोल्लासः उदाहरणानि वि विनिर्जितमनोभ अलटारनाम लषणानि भेदा: ४९. प्रत्यनीकम् प्रतिपक्षमश केन प्रति- क्तुम्० ५० मीलितम् | समेन लक्ष्म स्वामाविकन लक्ष्मणा- णा वस्तु आगन्तुकेन रक्ष्मणा ५१ एकावली स्थाप्यतेऽपो । पूर्व पूर्व प्रति परस्य परस्य ह्यने चाऽपि- विशेषगतया स्था. अपाङ्गतरले दृशौ- वन्दरासु निवसन्ति पुराणि यस्यां सवराङ्ग नानि- पूर्व २ प्रति परस्य २ विशे धगतया निषे० न तज्जल यन सुचारु पङ्कजम्० ५२. स्मरणम् योनुभवम- निम्ननामिकुहरेषु र्थस्य दृष्टे यदम्भ' ५३ भ्रान्तिमान भ्राम्तिमान कपाले मारिः पव इनि० न्यसविरत तुस्य ० ५४ प्रतीपम् अपक्षेप उप उपमानस्याक्षेस: लादण्याकमि० मानस्प प्रतीपमुप मैयता- उपमानस्योरमेयता भयि एहि ताव मुन्दरि असाधारणगुणयोगाद्यस्यो इमेव गुरु सुदारुणा पमानत्व पूर्व नानुभूतम् नाम् मलयजरसविलिप्तनव ५५ सामान्यम् प्रस्तुतस्य यदन्येन- ५६. विशेषः विना प्रसिद्ध प्रसिद्धाधार विना आधेय | दिवमप्युपयातानाम् । मापारमाधे स्यावस्थानम् | यस्य २४२ काव्यप्रकाश रहस्यम् अलङ्कारनाम लणानि भेदा उदाहरणानि एकस्य वस्तुन एकस्वभाव सा वसति तव ददये. नानेकर वर्तनम्- अन्यत् प्रकुर्वत कार्यमशक्या | गृहिणी सचिव ससो. न्य वस्तुन करम्- ५७ नद्गुण विभिन्नवर्णागरडायजेन- स्त्रमुत्मज्य गुणम् ५८ अतद्गुण तद्रूपस्यान नुहार- अमरतुतेन प्रस्तुतरूपाननु घवलोऽसि यपि मुदर. हार प्रस्तुतेनाप्रस्तुतरूपाननुहार | गाङ्गमम्यु. ५९ व्याघात यथा साथि तम्. इशा दग्ध मनसिजम्. ६. ससृष्टि बदनसौरमलोम- सेप्टा ससृष्टि शब्दालारसस्त रेतेषाभेदेन- गारकारसमष्टि उमयालद्वारसमष्टि अविभाति-जु| १ भगुमामानुपाहकरूप पामात्मय हात्विम्- लिम्पनीय तमोगानि. सानास्यत्र पामे भातमीमतरत्ने ६१ सहर यथा गभीरोयषा रत्न (मरेदमकर) | वस्य च प्रहे२ सदेहरूप न्यायदोषा माव- ३पदप्रनिरापरूप स्टोरमतररणरेमर- (एकपदपनि पुटमेस्त्र पापकर) विषये शम्दा ल- दशमोल्लासः १४३ प्रश्नः २-अलङ्कारदोषाणामुक्तेपु दोपेघु कथमन्तर्भावः ? उ०२-अस्योत्तरं निम्नप्रकोष्ठे द्रष्टव्यम् । भलवारदोष यस्मिन्नन्त उदाहरणानि विवरणम् नाम र्भाव अनुपासे प्रसिद्धिविरु चनी चकारपट्टि अत्रत्या स्तुतिः पुरागे- प्रसिद्धयमाव. तिहासादौन प्रसिद्धा. अनुवैफल्यम् अपुष्टार्थत्वम् भण तरुगि रमश. वाच्यस्य विचिन्त्यमान | अनणुरणन्० किश्चिदपि चारुत्व न। प्रतिकूलवर्ण- अत्र शृङ्गारे परुषा वर्णाः विरोध. प्रतिकूला। यमकस्य पाद। अपयुक्तत्वम् मुजङ्गमस्येव मनि.. द्धना. अनु वृति त्वम् प्रये यमनम् । अनुचितार्थ चाण्डालैरिव (जातिगता) चाण्डालादिभिरुपनानः वहिस्पुलिग इव० (प्रगता) प्रस्तुनोऽर्थेऽत्य-न कद- बित । उपमायामुप मानस्य जानिप्रमा न्यूनना " अय पद्मासनासीन.. पातालमित्र ते नाभि उपमायामुप मानस्प जा कमेण निप्रमाणा चिकता उप०धर्मन्यूनता होनपदत्वम् स मुनिलादितो मौज्या. उपमानस्य मौजीस्था- नौयस्ताडिलगोधर्मः केनापि न प्रतिरादितः। उपमेयशवदेरनिर्देशे श. शिनो ग्रहणमविकम्- उपधर्माविकता अधिकपदत्वम् स पौवासाःप्रगृहीतशाई -- उपमायामुप मग्नसक्रमावन् । चिन्नारनमिव च्युनोऽमि मानोपमेय योमिन्न- रिङ्गत्व भिन्न वचनत्वम् " १४४ काव्यप्रकाश-रहस्यम् बलकारदोष यस्मिन्नन्त- र्भाव उदाहरणानि नाम विवरणम् उपमा मनप्रक्रमत्वम् | अतिथि नाम काकुत्स्थात् अत्र चेतना प्रसादमा कालभेदः नोति न वाप उप० पुरुषभेद प्रत्यग्रमज्जनविशेष लता विभाजते न तु विधाजसे उप०विध्यादि गाहेवप्रवइतु ते सदैव कीलिंगाा प्रवहति न तु प्रबहतु भेदः उप०असादृश्यम् अनुचितार्थत्वम् अनामि काव्यशशिनम्-- काव्यरूपशशिनाऽर्थाना च रश्मिभिर्ने सादृश्यम् उपभसम्मव: निपेतुरास्यादिव- ज्वलन्त्योऽम्बुधारा सूर्य मण्डलान्निध्पतन्त्यो उत्प्रेक्षायो भवाचकत्वम् उपयौ दीधिकागर्मात- यथा-शुन्द स्य संमारना वाचकता- निविषय उत्प्रे अनुचितार्थ- दिवाकराद्रक्षति यो गुहाम- अचेतन तमसो दिवाकरात क्षितार्थसम स्वम् त्रास एव न सम्भवति कार्यान्तर न्यास: सामान्यविशे | अपुष्टार्थत्वम् | स्पृशति तिग्मरुचौ ककुमः- | कुतोऽद्रिणा तत् प्राणम् । पुनरुक्तं वा " पणेन समा सोक्तो उप मानपतीती तदुपादानम् अप्रस्तुतप्रशं| अपुष्टार्थत्वम् भाहूतेषु विइनमेषु मशकः सायामुप मैयप्रतीतो नत्कथनम् अचेतनस्य प्रमोरप्रस्तुत विशिष्टसामान्यद्वारेणा- मिव्यक्ती पुनः कथनमा युक्तम् । इति दशमोबासः ।

अथ सङ्कीर्णाः केचित् प्रश्नाः प्र० १-'अत्र ऐरावणशनौ मदमानमुक्तौ जातो' इत्यादि सन्दर्भस्य क आशयः। उ०१-'यम्प्रेक्ष्य चिररुद्वाऽपि' इत्यादिपद्ये मनैरावणमुखे मानेन च शकस्य हृदये निवासप्रीति उज्झिता त्यतैति वाच्यार्थोऽस्ति । व्यङ्गयार्थस्तु ऐरावणशनौ मदमानमुक्तौ जातौ इत्यस्ति । अतो व्यङ्गयार्थत्य प्रकारान्तरेण कथनात् पर्यायो- तालङ्कार । अन हि यदेवोच्यते तदेव व्यायमस्ति, परन्तु यथा व्यङ्गय न तथो- च्यते । अर्थात् विपयेण वाच्यार्थव्यङ्गयार्थयो कश्चनापि भेदो नास्ति । केवर प्रकारेणैव भेद । तत्र दृष्टान्त -यथा गवि शुक्ले चलति दृष्टे 'गौ शुक्लश्चल ति' इति विकल्प । यदेव दृष्ट तदेव विक्ल्पयति न तु यथा दृष्ट तथा। अय भाव- प्रत्यक्ष द्विविधमस्ति सविकल्पक निर्विकल्पकञ्च-नामजात्यादिमकारयुक्त ज्ञान सविकल्पक भवति । त्रिविधविषयताशून्य तुरीयविषयताशालि झानमर्थात् नाम- जात्यादिप्रकाररहित ज्ञान निविकल्पक भवति । निर्विकल्पकसविकल्पक्रयोनास्ति विपयस्य भेद केवल प्रकारस्यैव । यतो हि भिन्न वेनाससृष्टत्वेन वा दृष्ट भिनवेन (बौद्धमते ) ससृपत्वेन (वैयाकरणादिमते ) विशिष्टीक्रियते । अर्थात् निर्विक- रूपके गोत्वप्रकारक गोज्ञान नास्ति प्रत्युत गोज्ञानमारम् । सविकल्पके तु गोत्व. प्रकारक गोज्ञानमस्ति । इत्यञ्च दृष्टान्तदान्तिकयो विषयभेदो नास्ति अपितु प्रकारस्यैव । प्र० २--स्वाधीनपतिकेत्यादि-स्कुटीक्रियताम् । उ०२-ननु 'गुणालङ्कारयुक्तमव्यङ्गय चित्रम्' इति प्रथमोल्लासे गदित विरु ध्यतेऽलकारस्थले व्यङ्गयस्यानुभवसिद्धतया त प्राधान्ये ध्वनि स्वमप्राधान्ये गुणीभू. तन्यमय वरूपचित्रस्य दुरपपाद वादिति चेन्न, स्वाधीनपतिक्त्यादौ व्यङ्गयसम्ब न्धान चारताप्रतीतिरपितु इवादिवाच्योपमावैचियात् । न च ते चालङ्कारनिर्णये निर्णेच्यन्ते' यान्यलङ्कारोदाहरणतयोपन्यस्तानि तानि चित्रकाय्यस्योदाहरणानीति पष्ट उक्तमत्र तु 'स्वप्नेऽपि' इयादीनि यानि उपमोदाहरणतया कथितानि तानि चित्रकाव्यस्य नोदाहरणानि राजविषयकभावादिरूपस्य व्यङ्गयस्य सखेनाव्यङ्ग-य- १०का०प्र० ।

१४६ काव्यप्रकाश-रहस्यम् स्वलक्षणचित्रकाव्यासम्भवादिति पूर्वापरविरुदाभिधानमिति वाच्यम्, रसभावादि रूपव्यङ्गयस्य सर्वनाच्यभिचारित्वात्तत्रौदासीन्यमवरम्ब्य काव्यालङ्काराणामुदाहर णात् । तद्रहितानां विरसतापादनाच्च । ननु 'स्वप्नेऽपि' इत्यादौ उपमालङ्कारो दाहृते पद्ये 'प्रभावप्रभव' इत्यनुप्रासोऽप्यस्ति तस्मात् ससृष्टि सकरो घा वत्तुमु चितो न तूपमेति चेन्न उपमानुप्रासयो ससृष्टौ सकरे वोपमाया अपि सस्वात् । प्र० ३–केरसवदाद्यलङ्कारा ? उ०३-रसवदाद्यलङ्कारा सप्त सन्ति । गुणीभूतो रसो रसवत् , गुणीभूतो भाव प्रेय , गुणीभूती रसाभासभावाभासी उर्जस्वि, गुणीभूता भावशान्ति समाहित , एव गुणीभूता भावोदय-भावसन्धि-भावशवलताश्च तन्नामान एवा लकारा ज्ञेया । प्र० ४-अथ केपाञ्चिदलकाराणा भेदा । उ०४-१-उपमारूपकयो, उपमायामिवादिप्रयोगात् सादृश्य वाच्य भवति, रूपके तु तदभावाद् व्यङ्गयम् । २-तुल्ययोगितादीपकयो , तुल्ययोगिताया प्रकृतानामप्रताना वैकधर्मेण सम्बन्ध , दीपके नु प्रकृताप्रकृतयोरेकधर्मेण सम्बन्ध । ३-लाटानुप्रासपुनरुक्तवदाभासयो, लाटानुप्रासे समानाकारी तापर्यण भिन्नौ शब्दौ भवत पुनरुक्तवदाभासे भिन्नाकारौ । ४-उत्प्रेक्षाभ्रातिमतो, उप्रेक्षाया सम्भावनाकर्तुर्विपयस्य ज्ञान भवति भ्रान्तिमति विषयस्य ज्ञान न भवति । ५-सन्देहभ्रान्तिमतो , सन्देहे उभयकोटिक ज्ञान भ्रान्तिमत्येक्कोदिकम् । ६-सन्देहो प्रेक्षयो, सन्देहे द्वयोरपि कोट्यो समयेन प्रतीतिरुत्प्रेक्षाया मेककोटे प्रधानखेन। ७--उपमाऽनन्वययो, उपमाया द्वयो साम्योक्तिरमन्वये एकस्यैव । ८-वक्रोक्तिद्वितीयापहृत्यो, वक्रोक्तो परोत्तरन्यथाकार, द्वितीयापहती स्वोत्तरेव । ९-द्वितीयाप तिव्यानोक्त्यो , द्वितीयापहृतौ गोपनकृतो गोपनीयार्थ प्रथममुच्यते व्याजोत्तौ तु नोच्यते ।

सङ्कीर्णा प्रश्ना 10-निदर्शनादृष्टान्तयो , निदर्शनाया द्वयोर्वाक्यार्थयो सापेक्षत्वम्, दृष्टान्ते तु निरपेक्षत्वम् । ११-अप्रस्तुतप्रशसाममासो यो, अप्रस्तुतप्रशसाया प्रस्तुतस्य गम्यत्व समामोक्तौ त्वप्रस्तुतस्य। १२-अर्थापत्तिनिदर्शनयो , अर्थापत्तौ 'दण्डापूप'न्यायादर्थान्तरप्रतीतिमा- त्रम निदर्शनाया वाक्यार्थस्य सादृश्ये पर्यवसानम् । १३-अप्रस्तुतप्रशसादृष्टान्तयो, अप्रस्तुतप्रशसाया कचिदप्रसिद्धस्यापि वस्तुन प्रतिविम्ब वेनोपादान दृष्टान्ते तु प्रपितस्यैन । १४---उत्प्रेक्षानुमानयो , उप्रेक्षाया विषयिण (उपमानस्य) अनिश्चित तया प्रतीतिरनुमाने तु निश्चिततया। १५-अनुमानोत्तरयो, एकपक्षगतत्वेन साध्यसाधनयोनिर्देशोऽनुमाने मवति । उत्तरे तु न भवति । - . . प्र० ५-के व्यभिवारिण ? व्यभिचारिस्थायिनो को भेद ? उ०५--निर्वेद , ग्लानि , शङ्का, असूया, मद , श्रम , आलस्यम्, दैन्यम्, चिन्ता, मोह , स्मृति , घृति , व्रीडा, चपलता, हर्प, आवेग , जडता, गर्व, विपाद , औ सुक्यम्, निद्रा, अपस्मार , सुप्तम, प्रबोध , अमर्प, अवहित्यम्, उग्रता, मति , व्याधि, उन्माद , मरणम्, वास , वितर्क, एते त्रयस्त्रिंशद् म्यभिचारिभावा कथ्यन्ते । सजि सूमिव स्थायिनो नियतावस्थानम् । व्यभि. चारी तु फेनत्रुवुदवदनियतावस्थितिको भवति । प्र०६-सोदाहरणं लक्षणाया पडू भेदा लेरया । उ०६-लक्षणा पूर्व द्विविधा। शुद्धा गौणी च । शुद्धा चतुर्विधा गौशी च द्विविधा। १ सारोपा उपादानरक्षगा, यथा-कुन्ता पुरथा प्रविशति । २ साध्यरसाना उपा० ल०, यथा-कुन्ता प्रविशन्ति । ३ सारोपा सत्तलक्षणा, यथा-आयुश्रुतम् । ४ साध्यवसाना रहणलक्षगा, यथा-आयुरेवेदम् । ५ सारोपा गौणी, यथा गौर्वाहीक । ६ साध्यनसाना गौणी, यथा-गौरयम् ।

4. कान्यप्राशरहन्यन् गोपीशुद्धोई प्रतिराद्य लक्षणापविरन्यं किमर्थमुत- मिनि प्रतिपादयत। उ०७-या माश्यमन्बन्यो भनि गगी, परतु मायाद् निरः करित् तादग्रंार्यकारगमावावयवावपविनावादि मान्यों मति नत्र गुन। मादानलमा-मयान्तरपनिनवाच्यम्मन्युपयोगिनी । टनगरमा-अन्यन्नतिरन्तवाच्यम्वन्दरयोगिनी। गौरी मारोपा-रूपकारवारोपयोगिनी । गेगी माध्यमाना-प्रयनानिशयोनिरहित । शुद्धमारोपा-चतुर्थाविशयोकिडिका। शुद्धमान्यवमाना-सहारिनिरामेन कार्यकारिन्वरूपमामप्यांविशयमय- इन्य पदर्शिका ०८-हेन्यलद्वारा पृथगलद्वारोऽग्नि न चा? ८०-ननु हनुमता मह हेटौरमंदनानिधानं हेतु ' इति प्राचीन हमारः पृथग टादिनम्नम्नानापि वटा टमीय इनि ग, भायुतमियादिम्पो- नगर कारतामहति चमकारानावात् । न ध 'अरिटकमाविकाम.' इयत्र हत्वलशरमदुनं का मादीनग्मं हे वटारानीकारे क्यं नाम मगरगनानिनि वाच्यन, दर कामवं लानुमासनहिन्नर कायलिनेर चारो न नु मित्र, ०९-व्यतिरेकालद्वारभेदाः । ३०९-पतिरकटकारस्य अनुप्रिनिदा मान्न । उसनेपग गरशारण मुन्न नगदरकार द्वयोगदिः। ()पगारसरगनुनि । (.) समानताकर मुनिः । (३) उनपोरनुनिः। (१) एन टपमानयनादर न कपिन । भरी नहा मा चादर एव पझिते । परमादरा नवादा। मिरा पनि । २०१०-मल्ने सानुमायपरलिएसपनाम:

सङ्कीर्णाः प्रश्ना उ०१०-यावस्तुमा नेपदाच्याद्वाररहितेन अलकृनय नरङ्कारा व्यज्यन्ते तदा तासामरकृतीना ध्रुव निश्चयेन ध्वन्यगता ध्वनि यवहारमयोतकता । काय वृत्ते काव्यन्यवहारस्य तदाश्रयात् अलङ्कारसापेक्ष वात् । वस्तुमात्रा यत्रालङ्कारो गज्यते न तन गुणीभून पड्म्यत्वमिति तत्त्वम् । ११ रूपकादिरलद्वार -केचिदारवारिका रूपकादानामेवा शरव मन्वन्न। यतो हि विभावादिरूपापस्कारकतया मुरयस्य रन्यादर करको रूपकादिर वस्तुतोऽटङ्कार । सुन्दर सदपि वनिताननमलङ्काररहित न दोनने । केचित्तु- मनुप्रासादीनामेवार ङ्कारस्व वाञ्छन्ति । यतो हि रूपकाद्यपदारस्य कान्यमीर- मन्तर प्रतीतिर्भवति । यत्र सुपा तिडा चानुप्रासादिरूपेगेपत्तिर्भवनि तनवार कारता। शब्दालङ्कारागा स्वतश्चम कारितार्थालङ्काराणान्तु विभावाद्युत्कर्षमुखमव । कविकर्म च शदविषयकमब न वर्थविषयक तेनानुमासादीनामबालकारना रूप कादिषु स्वरका व्यवहारो गौण । श्रीमन्नटमते तु द्वयोरप्यपदारता । यतो हि शदे स्वरूपेगालवारता नास्ति निरर्थकेऽपि तदापत्ते । नापि केवलऽर्थेऽर्थबंधक च शब्देऽलङ्कारतेति द्वयोरपि शदार्थयोरास्वादोपकार कतयोभयत्राप्यलङ्कारता। १२ गुण कृतात्मसंसार-गुणोऽप्रधान कृत आमन स्वस्य सस्कार अन्येन परिपुष्टिर्यस्य तादृश प्रधान प्राप्नोति। ला नसरकारे च प्रधानस्य महत्ति उपकारे वर्तते । अय भार-गौणरसोन्यन परिपुष्ट सन् प्रधान रसमुप कोति । जनन रसविरोध परिहृतो भवति । कर्णादिशब्दानां सार्यकानर्थव्यवस्थायद्यपि अवतसादानि कर्णाभ रणन्यव भवन्ति तथापि कादिशदा कर्णादिस्थितिज्ञानाय । यथा-पस्या वणावनसेन' 'अपूर्वमधुरामोद अनयो पदयो कश्रवशिर इदा समीप्य शाना । 'विदीणाभिमुबाराति' इत्याद वज्ञानाय धनुदद । तदविवदाया तु यावन्धनि पन्दमुन' इत्यादौ केवस्य ज्याम्दस्य प्रयोग । 'वर' इयादौ अन्यरत्नामिप्रितवबोधनाय मुनारद । 'सौन्दर्यसपद्' इत्याद दुष्ट पुप्पविषये पुपाद । उपपदाहित मारापद पुपयनमेवाभिधत्ते । 'गाद मधुरा वाचम्' इयादौ कियाविर पगवेऽपि विवहितार्थसिद्धिर्भवति। नत 'गता र्थस्यापि वियो यस्य विपणदानार्थ चित् प्रयोग' इति न युक्त, युनच वा 'धरणत्रपरित्राण त्याद्युदाहार्यम् । अर्थात् 'कागद मधुरा वात्रमित्या जगादनि १५० काव्यप्रकाश रहस्यम् क्रिययैव वाचो लाभे विशेषणदानार्थ वाचमित्यस्य ग्रहणमिति केचित् तन्न, क्रिया विशेषणत्वेनैव निर्वाहे वाचमित्यस्य विशेपणदानार्थ ग्रहण न युक्तम् । १३ सर्वत्र एवंविधविषये-ननु आधार विना आधेयस्यावस्थानम्, एक स्या कत्रावस्थानम्, एकेन यत्नेन कार्यद्वयकरण वस्तुतो नोपपन्नमिति चेन्न, एवं विधविपयेऽतिशयोक्तिरेव जीवनम् । भतिशयेन लोकसीमातिनमेण उक्ति क्य नम् । उक्त--'सैषा सर्वत्र वक्रोक्तिरित्यादि । अत्रापि वक्रोक्तिरतिशयोक्ति बोध्या । सर्वत्र एपा अतिशयोक्तिलॊकसीमातिक्रमेणोक्तिरेवालङ्कारकारणमस्ति । एतदर्थ कविना यत्न कार्य । एनामन्तरेण प्रायेण कोऽप्यलङ्कारो नास्ति । १४ एपाचविरोधवाधिनी-असगतिविरोधाभासबाधिकाऽस्ति । असगती एक्देशकयोनिदेशकस्वरूपानुपपतिरिस्ति । अतो विरोधाभासे भिन्न देशस्योरेक- देशक वरूपानुपपत्ति क्थन विनापि सिद्धयति । 'प्रकल्प्य चापवादविषय तत उत्सर्गोऽभिनिविशते' इति न्यायात् । अपवादविपय परित्यज्य सामान्यशास्त्र प्रवर्तते । असगतिरपवादोऽस्ति विरोधाभास सामान्यमस्ति । तस्मादसगति विषय परित्यज्य विरोधाभास प्रवर्तते । १५ ननु समानमुश्चरितम्-ननु कालभेदेऽप्युपमाया भग्नप्रक्रमता न भवितुमर्हति । उच्चारित गम्य वा कालाद्यनुपहितधर्मान्तरमादाय कालभेदाभावात् । यत्रोच्चारितेनैव सामान्यधर्मेणोपमा प्रतीयते तत्रापि 'युधिष्ठिर इवाय सत्य वदति' इत्यादौ युधिष्टिर इव सत्यवाघय सय वदतीति बोधयिष्याम । सयवादो सय वदति' इयादौ युधिष्ठिर इव सयवाद्यय सय वदतीति योधयिष्याम । स यवादी सय वदत्तीयन पुनरुक्तिस्तु न शमीया । युधिष्टिर इव सयवदनेन स यवाद्यय मि यर्थावगमादिति चेन, साधु वार्थ नियमितेष्वेतत्समर्थन न तु सर्वथा निर्दुष्ट' प्रकृतवस्तुप्रतीतिविनाशात् । १६ सालङ्कारैनेस्तैश्च- सालकारैरियरैकशेष । सालद्वाराश्च सालङ्काराश्च सालदारास्तै सरूपाणा मेक्शेष एकविभक्तौ' इयेकशेप । पूर्वमलङ्कारशब्दो भावधनन्तोऽलङ्करणमलङ्कार शोभा तया सह वर्तते इति सालकारा । अपरनालङ्कारशब्द करणघनन्त । अलडिक्रयतेऽनेने यरकार उपमादिस्तेन सहिता सालकारा । ततश्चायमर्थ- अलङ्कारा मता प्राप्त समासोक्तिरसबदादिपदाभिधेय याच्यालङ्कारयुक्तैश्च गुणीभू A प्र०१८- सङ्कीर्णा प्रश्ना' सध्ययभेदै शु? सह एकपञ्चाशद्भेदस्य ध्वनेरेकरूपया ससृष्टया निमि सकरैश्च योगो भवतीति। २० १७--आय शूलिक इत्यत्र लुप्तोपमाऽस्ति न वा ? उ०१७--ननु अय शूल मिव क्रूराचारस्तेनान्विच्छति व्यवहरतीति आय - शूलिक । अत्र हि भूराचार उपमेय , तीचणस्वादिरूप साधारणो धर्म , साधारण धर्मवाचक इवादिश्च नोपात्त केवलमुपमानमुतमय शूल मेवोपात्तम् । अतस्त्रिलो पेयमुपमेति चेन्न, ङ्कराचारस्य निगीर्णस्वरूपस्याय शूलतादाम्येनारोपादनानि शयोक्ति । अन्यथा निगीर्याध्यवसाममूलातिशयोक्तेनिर्विषयत्वापत्ति । --'निरूढा लक्षणा काश्चित्' व्याप्यायताम् । उ०१८--अभिधानवत् शक्तिवत् सामर्थ्यात् प्रसिद्धे शन्दस्वभावाद्वा निरढा अनादिप्रसिद्धा काश्चिल्लक्षणा भवन्ति । यथा 'कर्मणि कुशल ' इत्यादौ । साम्प्रतम् अधुना काश्चित् प्रयोजनवशात् क्रियन्ते । यथा 'गङ्गायां घोप ' इत्यादौ । भत्र शीतपावन वादिप्रतीत्यर्थ गङ्गादिपदस्य गगातटादौ रक्षणा स्वीक्रियते । काश्चित रक्षणा रूढिप्रयोजनान्यतराभावात् अशक्तित प्रत्यायनसामर्थ्याभावात् नैव नियन्ते । यया 'रूपो घर' इत्यादौ । पददोपेषु नेयार्थदोष उक्तस्तत्र नेयरव प्रति पादयितु 'निरूडा लक्षणा' इत्याधुक्तम् । निपिद्धलसणाया विषयो नेय । नेयोऽर्थो यस्य तत् पद नेयार्थम् । १९ गुणनाञ्च परार्थत्वात्-गुणाना विशेषणाना परार्थ वात् प्रधानान्वया पेक्षि वात् असम्बन्ध परस्परमनन्वय स्यात् समचात् । गुणप्रधानभावेनैव पदा. नामन्वयो न तु गुणाना गुणै सह, नापि प्रधानाना प्रधान सहाम्बय इति तवम् । इयुक्तनयेन ‘यासा त्रिदशेभ' इयादिपद्ये यच्छ दनिर्देश्यानामधाना गुग वात् । परस्परमन्वयाभावेन यैरित्यत्र विशेभ्यस्य प्रतीतिनास्ति । यैरिति यदर्थस्यविशेष्यतया क्षपाचारिसम्बन्धी विवक्षित । स च न घरते क्षपाचारि णामिति भिन्नविभक् यन्तनपाचारिशब्दस्य ग्रहणात् । तेनाभवन्मतयोगच स्पष्ट मेव । सपाचारिमिरिति पाठे वन्बय सुसिद्धो भवति । इति पराशरवशावतसपण्डितश्रीमदमोलक्रामा मनमण्डित श्रीब्रह्मानन्दतनुननुपा सुरजीगर्भसमुद्भवनीपण्डिनदेवदत्तशास्त्रिणा निमित खप्तमोलासादार दशमोल्लासपर्यन्त काव्यप्रकाशरहस्य समातम ' . oraon व्यारयाकार, टॉ० भोलाशंकर व्यास । इसकी व्यारा में शास्त्रार्थस्थलों को सुबोध बनाने की अथक चेष्टा की गई है। कुवलयानन्दकार की परिभाषाओं, भेदी तथा उदाहरणों की जहाँ जहाँ पण्डितराने रसगगाधर में बालोचना की है, उन-उन स्थलों पर पण्डितरातके आक्षेपों को उपन्यस्त कर अन्य को अधिक उपयोगा बनाया गया है। ग्रन्थ के प्रारम्भ में एक विस्तृत भूमिका है जिसमें प्राय सभा प्राचान अलकारशास्त्रियों के मतों का समन्वय एव समीक्षा आदि है। यह अन्य अलकारों के अध्ययन के लिए एक महत्त्वपूर्ण सामग्रा उपस्थित करता है । अलकार शास्त्र क जिज्ञासुओं के लिए यह ग्रन्थ अत्यधिक उपयोगा सिद्ध होगा। ६॥) - हिन्दी काव्यादर्शः 'प्रकाश' सस्कृत-हिन्दीव्याख्योपेत । व्याख्याकार-आचार्य रामचन्द्र मिश्च । सरस शैला में अलकार शास्त्र का तात्विक विवेचन प्रस्तुत प्रथ का विषय है । व्यारयाफार ने वर्तमान शिक्षास्तर के सर्वथा अनुकूल सारगर्भि मरल विस्तृत हिन्दी भाष्य करके इसे मुबोध बना दिया है। इस अभिना, सस्करण का प्रस्तावना में लगभग ७० अलकारशास्त्रियों का सा रचनाए तथा उनकी विशेषताओं का वर्णन किया गया है। स। अलकारशास्त्र, अल्फारशब्दार्थ एव अल्कारशास्त्र का प्रमविकास ना प्रसग भा प्रस्तावना में अपना विशिष्ट स्थान रसता है। छानों, अध्यापन एव साहित्यानुरागियों के लिये यही उपयोगा सस्करण है। प्राप्तिस्यानम्-चौखम्बा सस्कृत सीरीज आफिस, वाराणसी-भू

Kavyaprakash Rahasyam

Author
Joshi, Sri Pt. Sitaram Jayram
Title
Kavyaprakash Rahasyam
File name
Kavyaprakash Rahasyam
Text
OCR done
Citation
1959
Published
2012/04
Publisher
Benares, Chowkhamba Sanskrit Series Office
Language
Sanskrit
Pages
161
Library
Government College, Kota
Classification
Literature
DLI number
407613
Barcode
99999990303539.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
WjzXGU1tVv6
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