Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Pal Pratipal

Desh Nirmohi · 2011/03

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पल प्रतिपल कहानी-सकलन

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पल प्रतिपल सम्पादक : देश निर्मोही

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भूमिका नही आज साहित्य की सभी विधाओ मे कहानी अधिक लोकप्रिय है। स्वतत्रता प्राप्ति के बाद हि दी कहानी ने कई उतार- चढाव देखे हैं। अनेक आदोलनो के बीच से होकर गुजरी है। अभी नयी कहानी के रूप मे अपनी पहचान बनायी तो कभी 'अकहानी आदोलन' के रूप म 'नयी कहानी के अस्तित्व को नकारा । 'सचेतन कहानी', सहज कहानी', 'समान्तर कहानी' और फिर 'सक्रिय कहानी' के तेवर लिए हिदी कहानी की विकास यात्रा जारी रही। आज जब हिदी कहानी की इस विकास यात्रा का नोवा दशक समाप्ति की ओर है तो कई स्वर एक साथ उभरकर सामने आये हैं। एक ओर अधिनायकवादी प्रवृत्तियाँ सक्रिय हैं तो दूसरी ओर जनवादी सघप भी तीव्र गति स बढ रहा है। कोई कहानी के हमशक्ल होने की बात कर रहा है तो कोई 'सायक कहानी' का नारा लगाने का प्रयास कर रहा है । अनेक वादो के नाम पर कहानीकार छोटे छोटे खेमो म बटकर लोगो का ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की कोशिश कर पल प्रतिपल मे सकलित कहानियां बिना किसी नारे- बाजी के सामाजिक चेतना की कहानियां हैं । इन कहानियो मे मानव मन की विविध स्थितियो का चित्रण हुआ है। इन कहानियो की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये अपन परिवेश से बहुत गहरे और गम्भीर रूप म जुही हैं। आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक सभी क्षेत्रो में व्याप्त भ्रष्टाचार को नये से नये कोण से उठाया गया है। चाहते हुए भी स्थानाभाव के कारण कुछ लेखको की रचनाएं न दी जा सकी। इसके प्रति मैं क्षमाप्रार्थी हूँ। स्नेह-सह्योग के लिए समलित कथावारों के अतिरिक्त आदरणीय भाई ज्ञानप्रकाश विवेक, तारा पांचाल व श्रीनिवास वत्स या विशेष आभारी हूँ। -देश निर्मोही

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कथा-क्रम
हिदी कहानी का विकास और समकालीन आलोचना
अखिल अनूप
9
अशोक गुप्ता/एक जिदा चेहरा
रमेश बतरा/शुद्ध समाचार
महेश दपण/दुपहरी
मानप्रकाश पिवेक/किरचें
सुनील कौशिश/माती
पुष्पपाल सिंह/पताल की छब्बीसवीं कहानी
ब्रजमोहन/कमरा खाली है
कमला चमोला/विस्फोट के बाद
प्रेमसिंह वरनालवी/काला सूरज
तारा पाचाल/बिल्ली
रमेश उपाध्याय/शीशा
हरिसुमन बिष्ट/चिशाव
17
27
35
40
51
59
71
78
88
94
98
102

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हिन्दी कहानी का विकास और समकालीन आलोचना D अखिल अनूप हिदी कहानी आज वहीं नहा है, जहाँ आज से दो-ढाई दशक पहले थी। उसकी प्रकृति सरचना और सप्रेषण मे मूलभूत परिवतन आया है। कहानी की सवेदना बदली है और कहानीकार का दृष्टिकोण बदला है। आज का पहानीकार जहाँ कथाक वी दृष्टि से अपने समय की सच्चाइयो टकरा रहा है, वहीं शिल्प की दृष्टि से वह प्रचलित मानदण्डो से परे जाकर नयी-नयी सभावनाएं तलाश कर रहा है। यह सही है कि हिंदी कहानी की चर्चा के नाम पर हि दी मालोचना आज भी 'नई कहानी के ही युग में जी रही है। आलोचना के मादण्ड उस अनुपात मेक्तई नहीं बदले हैं जिस अनुपात मे रचना मे बदलाव आया है। चूकि हमारे यहाँ आलोचना के जरिये ही रचना वो जानने और समझने की परिपाटी विकसित की गयी है, इसलिए यह भ्रम खूब फैल गया~या फैला दिया गया है कि जब आलोचना ही समकालीन पथा रचनाशीलता वा निषेध कर रही है तो मच्छी कहानियो 7 तो लिखी जा रही है और न ही 'नई कहानी' के हस्ताक्षरों के वजन के रचनाकार रह गये हैं। कुल मिलाकर हिंदी कहानी की दशा और दिशा निहायत चिन्ताजनक है और यदि समय रहते पाकारो ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो बहानी निकट भविष्य में उसी धीरगति को प्राप्त होने वाली है, जो हल अच्छी कविता का हो रहा है। यानी हिंदी कहानी को लेकर अक्सर चिन्तित हो जाने वाले 'महाप्रभुओ पा नजरिया कुछ कुछ उस बुड्ढे व्यक्ति जैसा हो गया है, जो अपनी तमाम उम्र गुजार चुक्न के बाद अतीत पर गौरवान्वित होता है, वतमान से असतुष्ट रहता है और भविष्य को लेकर दो-टूक कह सकता है कि सवनाश निश्चित है। पहना न होगा कि यह एक असगत, बेबुनियाद और पूर्वाग्रहयुक्त दष्टिकोण

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हिन्दी कहानी का विकास और समकालीन आलोचना अखिल अनूप हिदी कहानी आज यही नहीं है, जहाँ आज से दा-ढाई दशक पहले थी। उसकी प्रकृति सरचना और सप्रेषण मे मूलभूत परिवतन आया है। कहानी की सवेदना बदली है और कहानीकार का दृष्टिकोण बदला है। आज का पहानीकार जहाँ कथानक की दृष्टि से अपने समय की सच्चाइयो से टकरा रहा है, वही शिल्प की दष्टि से यह प्रचलित मानदण्डो से परे जाकर नयी नयी सभावनाएं तलाश कर रहा है। यह सही है कि हिदी कहानी की चर्चा के नाम पर हिदी मालोचना आज भी 'नई कहानी के ही युग में जी रही है। आलोचना के मापदण्ड उस अनुपात में कतई नहीं बदले हैं, जिस अनुपात मे रचना में बदलाव आया है। चूकि हमारे यहाँ आलोचना के जरिये ही रचना को जानने और समझने की परिपाटी विकसित की गयी है, इसलिए यह भ्रम खूब फैल गया-या फैला दिया गया है कि जब आलोचना ही समकालीन क्था रचनाशीलता का निषेध कर रही है, तो अच्छी कहानियाँ 7 तो लिखी जा रही हैं और न ही 'नई कहानी' के हस्ताक्षरों के वजन के रचनाकार रह गये हैं। कुल मिलावर हि दी वहानी की दशा और दिशा निहायत चि ताजनक है और यदि समय रहते, कथाकारो ने इस ओर ध्यान नहीं दिया तो कहानी निकट भविष्य में उसी वीरगति को प्राप्त होने वाली है, जो हथ अच्छी कविता का हो रहा है। यानी हिदी कहानी को लेकर अक्सर चितित हो जाने वाले 'महाप्रभुओ' वा जरिया चुछ कुछ उस बुड्ढे व्यक्ति जमा हो गया है, जो अपनी तमाम उम्र गुजार चुकने के बाद अतीत पर गौरवान्वित हाता है, वतमान से असतुष्ट रहता है और भविष्य को लेकर दो टूक कह सकता है कि सवनाश निश्चित है। कहना न होगा कि यह एक असगत, वेबुनियाद और पूर्वाग्रहयुक्त दृष्टिकोण 1 बाल रिजवट की जा सकती है कि उसमे 'नई कहानी जसी अनुभववादिता- 10 है। हिदी कहानी आज अपनी विरास या माणिम दौर स गुजर रही है। जो यह कहते हैं कि नई कहाणी' थे वाद महानी ही नहीं लिखी गयी, या लिपी गयी तो बेहद पृत्रिम, अस्वाभाविक और अतिरजनाओ से परिपूर्ण, उहें जानना चाहिए कि रचना पभी भी एक पड़ाव पर नहीं करती। रचनाका सतत् विकास उमकी जीवतता को अनिवार्य शर्त है। जब नई बहानी' के पहानीकारो का इसके बावजूद स्वीपार दिया गया कि प्रेमवाद की यथाववादी परपरा से स्थूल रूप मे उनका कोई लेना-देना नहीं था, तो समकालीन महानी को सिफ इस विना पर कस पारिज किया जा सकता है कि वह 'नई महानी' जैसी नही बन पा रही है। आज कहानी 'नई कहानी' जैसी नही पन पा रही है यह तो उसकी निजी पहचान और अपनी विशेषता है। यह भी उसकी अपनी ही विशेपता है कि कई मायनों में वह पूर्ववर्ती कहानियों की तुलना म यही समृद्ध साथ और युगीन है। प्रख्यात कथाकार रमेश उपाध्याय के मुताबिक, 'महानी मो परषा के कोई शाश्वत प्रतिमान नहीं होते मावि कहानी लगातार बदलती हुई सामाजिक परिस्थितियो के साथ कदम मिलाकर चलती है और बदलती रहती है।" तो क्या आज की बहानी के निमम आलोचका को यह मानने से भी गुरेज है कि पिछले कुछ दशको की सामाजिय परिस्थितियां वही फी वही है ? यों तो कुछ समस्याएँ शाश्वत होती है लेकिन क्या उन समस्याओ सलहन के हथियार अपने समय की जरूरत के मुताविक नये-नये रूप में सामो नहीं आत? 1857 के प्रथम स्वाधीनता संग्राम म अग्रेजा के खिलाफ जो विगुल बजाया गया था क्या गाधीजी का नेतत्व भी वही स्वर दे रहा था? प्रथम स्वाधीनता संग्राम से लेकर भारतीय राजनीति मे गाधीजी के उदय में प्राय छह दशकों के समय में शाश्वत समस्या एक ही थी-अप्रेजो से मुक्ति। तो फिर गाधीजी ने 1857 मा ही रक्तरजित रास्ता क्या ही अपनाया ? वस्तुत इस तरह के प्रश्नों का पोई अत नहीं है। 1857 के सिपाही भी अपने समय और परिस्थितियों के हिसाब से प्रासगिक थे और गाधीजी भी अपने युग की अतविरोधपूण बारीकियो पर नजर रख रहे थे। इसी तरह से 'नई कहानी' ने जब अपनी पहचान बनायी तो यह इसलिए अप्रासगिक नही हो जाती कि उसम प्रेमचन्द का सा ग्रामीण यथार्थ और इस ययार मा मनोजगत नहीं था। लेकिन तब आज की कहानी इस आधार पर कैसे बन या कह कि क्षण प्रतिक्षण को बारीक चीर फाह ही है और वह प्रचलित धाराओ से अलग जाकर नयी-नयो धाराओं पोज दे रही है ? हम किसी लेखक के लिखे पर तो मनचाही टिप्पणी के लिए वैशक स्वतंत्र हैं, लेकिन इतने स्वच्छ क्व से हो गये कि लेखक को यह बताने लगे कि उसे वैसा ही लिखना है, जसा 11 हमो लिया है या जसा हम चाहते हैं ? यदि कोई ऐसी स्वयभू टिप्पणी करता है तो लेखक को पूरा अधिकार है कि वह उस टिप्पणीकार को ही रिजेक्ट कर दे और साफ साफ कहे कि हमें तुम्हारो टिप्पणियों की जरूरत नहीं है क्योकि उससे हमारी रचना बाधित होती है। आलोचना का आधार रचना है, रचना का आधार आलोचना नहीं है और एसा प्राय हुआ है कि आलोचना मे स्थान न पाने वाली रचना दीधजीवी भी हुई है और सायक भी। हिदी आलोचना मे एव और परम्परा भी पनपी है। आलोचना लिखते समय 'भूतपूर' हो चुक लेसको की तो चांसद की जाती है, लेकिन उन लोगो को जान बूझकर 'इग्नोर किया जाता है जो न केवल लगातार लिख रहे है, बल्कि अच्छा लिख रहे हैं। इसके अपने फायदे हैं। 'भूतपूर्वो' पर चर्चा करके आलोचक अपनी जवावदही से मुक्त हो जाते हैं, जबकि कोई भी समकालीन लेखक उनसे पूछ सकता है कि इस आलोचना का मतलब क्या है? हमारे यहाँ आलोधक-और प्राय लेखक भी~यह माने वठे हैं कि उनका लिखा अतिम है--उसे ब्रह्मवाक्य मानकर स्वीकार करो। जवधि न तो लेपर और न ही आलोचक अपने लिखे की जवाबदेही के लिए स्वतत्र होो चाहिए। लेखक के साथ यह छूट अवश्य है कि यदि उमकी रचना पर सवाल उठाये गये हैं तो वह अनुत्तरित करके 'मौन स्वीकाय लक्षणम्' की तज पर उसे लेखकीय स्वीकृति माना जा सकता है, जो कि एक तरह से उसकी निजी स्वीकृति होती है। लेकिन आलोचक सर्जक नही है। वह दूसरे के सृजन पर अपनी धारणा बनाता और बताता है और इसमे भी सदेह नही कि उसकी धारणा से तमाम दूसरे लोग भी अपनी धारणाएँ बनाते हैं। तो फिर हमे उससे यह जवाब पान का हक क्यो नही है कि अमुव रचना पर उसने यह धारणा किस आधार पर बनायी? या समकालीन रचनाशीलता को छोडकर उसने 'भूतपूर्वो पर ही काम क्या किया? बेशक यह तय करनाआलाच का अधिकारक्षेत्र है कि उसे दिन पर काम करना है? लेकिन इतना तो पूछा ही जा सकता है कि वह समकाली। रचनाशीलता पर शाम क्यो नही कर रहा है। यदि सचमुच समकालीन रचनाशीलता इतनी रही और अप्रासगिव है, तो उसके क्या कारण हैं ? हम मानते हैं कि स्वस्थ मालोचना समकालीन रचनाशीलता के विकास में भी मदद करती है, लेकिन विकास से होगा-यदि यही न पता हो कि विकास बाधित हाने के पारण क्या हैं और वह कारण तिने जेनुइन हैं? नि सदेह यह पडताल तभी सभव है, जब लेखक और आलोचर के बीच सवाद की गुजाइशें हो, सवालो की उठा-पटक हो और मालोचक इस प्रकार यो दमपूण उद्घोषणाएं न करे कि मैं तो नये लेखका को पढ़ता ही नहीं। मुझे याद है कि गुहगांव की एक गोष्ठी मे कहानी की आलोचना करने म घण्टे भर से लगे विश्वविद्यालय के एक विद्वान प्रोफेसर ने भात्मविश्वासपूण मुद्रा ?

12 . मे यह निष्कप दिया कि मैंने प्रेमचद के बाद से आज तक न तो किसी कहानीवार को पढ़ा है और न ही किसी रचना को। फिर भी आयोजको की तरफ से उहे समारोह की अध्यक्षता करने के लिए वाकायदे यौता गया था और वह भी एक युवा कहानीकार के कहानी सग्रह पर अपनी अमूल्य राय जाहिर करने के लिए। इस प्रकार की आनाचना रचना को कैसे बाधित वरती है इसका नतीजा भी जल्दी ही सामने आ गया। जिम कहानीकार ने उक्त प्रोफमर महोदय को सादर आमनित क्यिा था उसको एक भी रचना उस गोष्ठी के बाद सामन नहीं आयी, जबकि उससे पहले उसके तीन तीन कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके थे। अच्छे या बुर, यह अभी दीगर प्रश्न है । असल मे मूल समस्या यही है कि लेखक लिखे नियमित लिखे और लिखना उसकी प्राथमिक्ता हो। लिखे पर चर्चा या उसे श्रेष्ठ अश्रेष्ठ साबित करने की चेष्टा तो बाद का प्रश्न है । मैं जोर देकर कहना चाहूँगा कि आज कहानियां न वैवल भारी मख्या मे लिखी जा रही हैं बल्कि बहुत अच्छी कहानिया भी लिखी जा रही हैं। विगत चार पाच वर्षों में पन पनिकाओ और सग्रहा के माध्यम से सामने आयी कहानिया आश्वस्त करती हैं कि हि दी कहानी की मुख्यधारा एक बार फिर से यथाथवादी धारा होने जा रही है। हिदी कहानी का समकालीन यथाथवाद इस मायने म और भी सशक्त है कि वह समाज में घट रहे का हू व है चित्रण करना ही यथाथवाद नहीं मानता, बल्कि यथाथवादी प्रवत्ति यह पनपी है कि रचना में जीवन को पूरी आस्था और पूरे अतविरोध के साथ उतारा जाय । समकालीन यहानी, यदि एक ओर, समाज में नासूर फैलाने के लिए जिम्मेदार पाखण्डी दिमागो को बेनकाब करती है और वग शत्रुओ तथा समाज द्रोहियो की पहचान कराती है, तो दूसरी ओर उन अतविरोधो और कमजोरिया पर भी उगली रखती है, जो आम जनता द्वारा मनुष्य की बेहतरी के लिए चल रहे संघर्षों की बुनियाद में निहित हैं। इस प्रकार से आज की कहानी मनुष्य और उसके सपो स सीधे सीधे जुडती है और मानवीय ऊर्जा और आस्था के उन विदुओ को पकड़ने का प्रयास करती है, जो साहित्य और समाज को बेहतर बनाने की अनिवाय आस्था साहित्य की ही नहीं सघष की भी बुनियादी जरूरत है । जिस जीवन को उात और मनुष्य को बेहतर बनाने की लडाई व्यापक पमान पर विधार और व्यवहार के धरातल पर, लही जा रही है, वह लहाई बिना आस्था के अधूरी है। इसलिए आवश्यक है वि कथाकार सघप के लिए जमीन तयार परत के साथ साप जीवन र प्रति आस्या भी पंदा परे। यह निश्चय ही हम सबके लिए सुखद स्पिति है कि एस कहानीरारों को एक लम्बी कतार मौजूद है जो जीवन, सथप और साहित्य की एर यस्तुपरक समझ के साथ अपनी रचनात्मकता को भी रहे पाते हैं।

13 हैं। हालांकि बहुत ामो के उल्लेख या बहानियो के विस्तृत विवरण की यहाँ गुजाय नहीं है लेकिन जिन लेपनो ने इधर लगातार आस्था की शतों को पूरा किया है, उनमे शैलेश मटियानी रमेश उपाध्याय, सत्येन कुमार, विजय भोर सजीव प्रमुख हैं। सत्येन कुमार की कहानी 'पनाह' हो या रमेश उपाध्याय की 'हसो, हिमा हेमो' ये अपने अपने स्तर पर उन सधि बिदुओं की तलाश करती हैं, जो मनुष्य को मनुष्य में जोड़े हुए हैं। एक ही भावभूमि पर दो भिन्न दृष्टिकोणो से लिखी गयी ये कहानियां उन हालाता की पहताल करती हैं, जिहोने देश मे कौम, मजहब भाषा, धम और जाति-पांति के नाम पर सामा य इसानी रिपता तक वो नेस्तनाबूद कर दिया है। और इसी नेस्तनाबूद पराकी कोशिश के खिलाफ एक हस्तक्षेप है, नये लेखक भगवानदास मोरवाली कहानी 'पहली हत्या'। सत्येन कुमार की कहानियो के बारे में मेरी आम धारणा यह रही है कि उनकी कहानियां मम को छूती तो हैं, लेकिन झाझारती नहीं। किन्तु प्राय दा धप पूर्व प्रकाशित उनकी कहानी 'पनाह' को पढने के बाद लगा कि इस कहानी के लेखक मे मम वो झकझोरने की ही नहीं, कंपा देने की भी जसी क्षमता है शायद उस क्षमता का सजनात्मक दस्तेमाल अभी तक हो नहीं पाया । इसानी रिश्ता और मानवीय सम्बधो के खोखले होते चले जाने के बावजूद, यह बहानी मनुष्यन्मनुष्य के बीच रिहीं ऐसे अतसूत्रो की खोज करती है जो इस बात की गारण्टी देते हैं कि मनुष्य का मनुष्य से इसानी नाता तमाम झपावाता के बावजूद कभी खत्म नहीं हो सकता। मुझे यह कहने मे कोई सको नहीं कि 'पनाह' अपने दौर के यथाय को पकड़ने वाली सर्वाधिक सक्षम और सशक्न कहानियो म से एक है। इसी तरह रमेश उपाध्याय की कहानी हमो हिमा हसो' भी उन्हीं सूत्रो और सिरो की तलाश करती है जिहे पत्म करने के लिए बच्चो तक के मस्तिष्क को धोया जा रहा है। यह कहानी आगाह करती है कि समय रहते यदि मामाजिक जीवन के तौर-तरीके नहीं बदले गये तो अगली नस्लें अभिशप्त मानसिकता लेकर जीने पर मजबूर होगी । इसानी प्रेम और सद्भाव 'मनुष्य' मात्र के अस्तित्व के लिए आज अनियायता बन चुका है। लेविन पनाह' और हँसा हिमा हैसो की सबसे बड़ी खूबी है उनका नायाब शिल्प । एकदम अनूठा, सभागाशी 7 और सवग्राह्य । भतर यह है कि जहां 'पनाह' मम को कंपाती है, वही 'हेसो, हिमा हँसो' बेचैन और सावधान हो जाने के लिए विवश करती है। सजीव की कहानी 'वापसी को 'अपराध' के बाद की उनकी कथा यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण पडाव माना जा सकता है । यह कहानी दो मुल्को के बीच युद्ध, युद्ध की असगतियो और नतीजो से मानव सवेदा के आहत हो जाने को प्रस्तुत करती है । यह निष्कप देती है कि युद्ध हमेशा शासक वर्गों की महत्वाकांक्षामो की पूर्ति के लिए होता है। लडाइयो का जिसको सबस ज्यादा खामियाजा भुगता ।

14 पहता है, वह आम जनता ही होती है और इसलिए जरूरी है पि अवाम का रौंदन वाली लडाइयां न हों। अहिदी भापी प्रदेशो यो पृष्ठभूमि पर हिनी म नियमित और विविध कहानियां लिपने वाले व्यापार विजय की 'यो सुरौली' भी एम ऐसी पहानी है जिसे इस दौर की श्रेष्ठ रचनाओ म रखा जा सकता है। पहाड यो पृष्ठभूमि पर लिखी गयी 'बी सुरीली' पहाड की पूरी सस्कृति, वहाँ से सामाजिर जीवन, माचार विचार, मानवीय-पारिवारिक रिश्ते और पहाड बनाम मैदान की अपरिभापित द्वद्वात्मक विचारधारा को हमारे सामने रखती है। यह पहानी अपन परिवेश से पूरी आत्मीयता और अपनापा कायम परती है और पवतीय अचल फे उन विविध रूपों से हमारा साक्षावार पगती है जो घाटियों वादियो म गूंजते पटा घडियालों से लेकर सिंह-गजनायो तक के सोष सवेदनात्मक सराकारो म व्याप्त हैं। शैलेश मटियानी ने इधर फहानियां बहुत कम लिखी हैं लेकिन जो कहानियाँ पिछले कुछ वर्षों म प्रकाश में आयी हैं उनम कम से कम दो कहानियां ऐसी जरूर हैं, जो यह आभास दिलाती हैं कि हिन्दी कहानी की स्थिति बहुत अच्छी है और निश्चय ही उसका भविष्य उज्ज्वल है। ये कहानियां हैं 'अघागिनी और 'मेरा एकलध्य' । जहाँ 'मेरा एकलव्य' हरिजन शिष्य और ब्राह्मण गुरु के बीच पनपते रिनो के बीच यह भरोसा देती है कि विद्या विसी जाति विशेष की बपौती नहीं होती, कोई भी शिक्षा प्राप्त कर सकता है, वही 'अर्धागिनी' पति-पत्नी के बीच व्यक्त न हो सको वाले पवित्र निश्छल और तरगित भावनामयी प्रेम की ऊष्मा और ऊर्जा को व्यक्त करती है । हालांकि इस कहानी मे कथा का कोई बंधा बधाया फाम नहीं है, इसलिए ऐसी खोज परने वाले सवाल उठा सकते हैं कि इसमे बहानी ही नहीं है, लेकिन यदि एक क्षण को भी पूरे आवेग के साथ जीना और रचना ही सजन हो तो अर्धागिनी' को एक कालजयी सृजन मानने में तक्लीफ नही होनी चाहिए। प्रेम के विविध रूप होते हैं। वह केवल पवित्र निश्छल और तरगित भावनामो का गुच्छा ही नहीं होता। उसम घुटन भी होती है का भी होती है अपनी असमथता का एहसास होता है और वासना के सागर में डूबने की इच्छा होती है। याी सामाय जीवन के सफेद स्याह जितने भी पक्ष होते हैं प्रम में उन सभी पक्षों या अनुपात मिल जाता है। यह एक अलग बात है कि किसके हिस्स मे प्रेम का पौन सा पक्ष आता है ? सिफ इसी एक दशक मे प्रेम के विविध पक्षों पर केन्द्रित दो अच्छी, बहुत अच्छी रचाए सामन मामी हैं-(1) उदय प्रकाश की 'रामसजीवन को प्रेमक्या और (2) धीरेन्द्र अस्थाना की खुल जा सिमसिम'। मजे की बात यह है कि दानो ही रचनाएं खासी विवादास्पद रही है लेकिन इन दानों ही कहानियों में प्रेम का जो स्वरूप है. वह बेहद सासारिफ किस्म का है।

15 . ऐसा नहीं है कि इस सामारिकता मे भावुकता नहीं है, लेकिन यह भावुकता. आत्मविश्वास की ही नही आत्महीनता के आत्मबोध की भी है। इसी तरह, भावुक्ता का स्वरूप किशोरज य मन स्थितियो मे नही पनपा है, बल्कि प्रेम का स्तर यह है कि उसकी कोई सीमा नहीं है। न उम्र न स्थान, न सामाजिक बधन और न ही दैहिक नैतिकता। जो है, जैसा है या जैसा हो सकता है, उदय प्रकाश और धीरेद्र मस्थानान प्रेम के सदभ में इस समग्न मनोजगत को उभारा है, जहाँ पाठक लेखक के साथ साथ सफर करता है। उदय प्रकाश की ही एक अन्य कहानी 'तिरिछ' पर पिछल दिनो काफी चर्चा हुई है। लोकमा यताओ से निकली यह कहानी निश्चय ही अनूठी है। तिरिछ यानी एक ऐसी लोकमा यता, जिसकी जडें सस्वारी मन के भीतर इतने गहरे तक पैठी हुई हैं कि व्यक्ति स्वय ही अपना आवेट कर डालता है। मामाजिक सस्कार- शीलता के इस हद तक प्रतिगामी होन का यह कहानी मौवे सीधे निषेध करती है और इसी नाते एक उत्कृष्ट रचना है। इस दौर की जो अ य कहानिया रखाकित क्यि जाने लायक हैं, उनमे हैं ज्ञान- प्रकाश विवेक को 'पिताजी चुप रहते है', रमेश बतरा की 'थप्पड , चित्रा मुद्गल की जगदवा बाबू गांव आ रहे हैं', महेश दपण की दीनानाथ', प्रदीप पत की राजपथ का मेनहोल , स जय की 'कामरेड का कोट , अखिलेश की बड़ी अम्मा, मुशरफ आलम जौकी की फिलहाल ,गिरिराज क्शिार की वल्द रोजी और गोविन्द मिश्र वी 'अथ आझल जहाँ रमेश बतरा को 'थप्पड आम आदमी के अह और स्वाभिमान की कसोटी है, जो अब यह जानना चाहता है कि उससे जिदा रहने का हक क्या छीना जा रहा है, वही प्रदीप पत की कहानी राजपथ का मेनहोल' दिखावे की सरकारी बायपद्धति पर सीधा व्यग्य करती हुई उसकी जटिलता की परतें खालती है । ज्ञान- प्रकाश विवेक की कहानी पिताजी चुप रहते हैं किसी भी निम्न मध्यवर्गीय भारतीय परिवार की ऐसी व्यथा-कथा है जो उसके अभावों म स निकलकर उसकी नियति बन चुकी है। हर पर सर पर एक अदद छत होने का सपना देखा करता है और उस सपने में ही उसकी सारी खुशियां दफन हो जाती हैं। शानप्रकाश विवेक ने अपनी निजी विस्म की भाषा शला मे इस यथार्थ को बहुत नजदीकी और बारीकी से पहचाना है और यही उनकी सजनात्मकता को अपनी विशेषता है। इसी तरह महश दपण की कहानी दीनानाथ भी निम्न मध्यवर्ग प्रासद जीयन मा जीवत चित्र है । दोनानाय माध्यम स जिन्दगी को जीते, भोगत वचन होते, उसस लडते, टूट जाते और टूटकर फिर एक बार वह होते आदमी के सएप और सघर्ष की परिणति को बयान करने वाली इस कहानी मे महेश दपण ने आदमी के मदरूनी ततुओ को घोलने का काम किया है। सुजय को बहानी कामरड का 16 वाट' पर यह आरोप लगाया जाना गलत है कि यह वामपयो सपष पो बमबार करने के उद्दश्य से लिपी गयी है। इस तरह से तो हर अराहमत रचना यो विना विचार थे रद्द पिया जा सकता है । वस्तुत 'कामरेड मा पाट' सपपशील शक्तियों यो आगाह परती है कि उापी एवजुटता जारी है-अपनी सीमाओं को तोडकर, ग्रामियो और अविरोधो को दूर करये । अब समय आ गया है कि लपक ही राजनीति के मार्गदर्शन मे हीं, राजनीति भी लेपकों से सीखकर अपनी दिशा निर्धारित करे। तब वह सथप सचमुच जनता पा होगा। महिला क्याकारा में मन्नू भण्डारी के बाद जिस एफ मथाकार ने अपनी निरतर सक्रियता परिचय दिया है, यह हैं चित्रा मुद्गल । चित्रा मुद्गल को कहानियां परिवंश से ऊर्जा प्राप्त करती हैं और मया ही नहीं भाषा और शिल्प के स्तर पर भी अपनी जनपक्षधरता घोपित करती हैं। उनकी पहानियो के पात्र हमारी अपनी दुनिया में रहते, जीते और बात करते हैं। उनकी मानसिकता और सोच आस पड़ोस म पही भी नजर डालन पर मिल जायेगी। सबसे बड़ी बात सो यह है कि चित्रा मुदगल रूढ अयों में महिला कथाकार' नहीं हैं, जिनके कुछ निश्वित सब्जेक्ट है, और न ही अतिरजित रूप से इतनी बोल्ड हैं कि हास्यास्पद लगने लगें। उलटे 'जगदया बाबू गांव आ रहे हैं जैसी कहानियो मे वह जिस तरह स सामती प्रवृत्ति और राजनैतिक अवसरवाद की खबर लेती हैं, उसका कायल होना पडगा। यह मान लेने मे कोई सकोच नहीं होना चाहिए कि आज का दौर कहानियों के इतिहास का स्वनिम दौर है। इतनी बड़ी संख्या में इतनी अच्छी कहानियाँ पहले कभी नही लिखी गयी। इसलिए जा लोग यह कहते हैं कि 'नई कहानी के बाद से अच्छी कहानी लिपी ही नहीं गयो, उहें चाहिए कि इस तरह का वक्तव्य देने से पहले यह अगल-बगल म झारकर देख लें कि कही उन्हे 'नॉन सीरियसली' तो नहीं लिया जा रहा। वैसे भी सरदार भगतसिंह ने एक बेहद जरूरी बात कही थी कि, 'पढ़ा, पढ़ो, विरोधियों के तकों का सामना करने के लिए उह पढो।" तो क्या हमार चर्चावार उहें मैं मालोचक नही कहेंगा, अब भी अपने सम बालीनो को पढने के लिए तयार नहीं - १ (यह विध 'क्या भाषा मच', हरियाणा द्वारा फरीदाबाद में आयोजित 'क्या समारोह मे गत 14 मई 1989 को पका गया था।)

एक जिन्दा चेहरा 7 अशोक गुप्ता गोली की एक तेज आवाज के साथ सब खत्म हो गया। सतोखी ने अपनी बदूक कधे पर रखी और पीछे की ओर लौट पहा निहायत बेपरवाह । बिना कही रुके उसन पास खडा एक घना नीम का पेड खोज निकाला और पैड की बेतरतीय फैली एक ऊची सी जड पर बैठ गया, उसी तरफ मुह करके जिधर से वह आया था, ताकि तारी का आना मासानी से देखा जा सके और वह मातादीन वो इशारा करके गदगी साफ करा दे। अपने इस काम में काफी पुराना हो गया है सतोख सिंह। तभी तो नये भरती वालों की तरह लाल अडियो लाद कर नहीं चलता वह बदूक के साथ । बस, एरिया मे जितने फायर का मौका भिड जाय, तमाम करके बैठ जाता है कहीं छाया म, और लारी देखकर वहीं से चिल्लाकर कहता है, 'अवे ओ 'मातादीन अपनी जवान फैटता हुआ आता और एक एक को पूछ से पकड़कर लारी में फेंक देता, बिना नाम पर रुमाल लगाये, यू ही खी-खो हंसता हुआ सा 'ये ल्यो, मारी भी, तो साली कुतिया पेड की जड पर बैठकर सतोखी ने कान से उतारकर बीबी दांतों के बीच दबा ली और जेब मे माचिस तलाशने लगा। 'हाय रज्यू तू ये क्या कर रहा है सतोषी ? और दांतों के बीच से बीडी छूटकर गिर पड़ी, और वह घबराहट मे इधर-उधर देखने लगा। आसपास कोई भी नहीं था। उसने जमीन से उठाकर बीडी फिर अपन दांतो मे पैसा ली, लेकिन उसकी सांस तब भी काफी तेज चल रही थी और चारों तरफ सारा कुछ सुन्न हो गया था। बालो को हवा मे बेतरतीब उड़ने से बचाने के लिए उसने सिर पर एक रुमाल बांध रखा था उसे खोना, फिर बिना वजह अपने चेहरे, हापो, और गदन पर रगडता हुआ-सा पेड से पीठ टिकाकर निदाल बैठ गया, पलमें भूदे हुए, और उसकी जिन्दगी पोछे लौटने लगी। पता नहीं क्या बात है रि उसरी जिन्दगी आसानी से पीछे नहीं लोटती, , 18 / पल प्रतिपल लेकिन जब लौटती है तो ऐसे जमे क्मिी पहाडी के उघड हावड ढलान वाले रास्ते पर कोई व्हील चेयर नीचे ढकेल दी जाये । व्हील चेयर का तेजी से लुढ़पते जाना वह देखता रहता और उसे लगता कि उस पहिये वाली कुर्सी के हत्यों पर बाहें टिकाय व्यक्ति का चेहरा कभी उसका हो जाता, कमी ताई था। उसके भीतर सिफ ताई का चेहरा ही एक ऐसी रस्सी है जो उसे खींचकर चाहे जितना पोछे ले जा सकती है। दस वरस वीस बरम पच्चीस वरस और बस । उसके पहले ये आठ वरम तो वे आवाज हैं शायद-~-उलझे हुए और गुम, बस उनसे जुग हुआ अशेष, और पहचान की सजा का धुंधला सा विय है उसका नाम, जिसे उसने अपनी मुटिठयो म भाचार अपो सीने में बहुत गहरे छुपो रहा है। सतोखी पानी सरदार सतोष सिंह विरदी। आठ बरस का ही तो था वह जव ताई के यहां नौकरी पर माया था। उस समय सतोख सिंह के सिफ नाम में ही सरदार विशपण था और ताई भी तब ताई नहीं थी, सिफ वही बहू थी 'नारायण विता' म 1 केवल नाम से ही नहीं बल्कि देखने भालने और सोचने, चाह लेने से भी। एक-एक का मुख दुख एक एक मी भूल चूक सब उनके बडप्पन मे जुड़ते-सुधरते रहते थे। एम मे फोन राजा, कौन प्रजा कोठी खेत और मिल के मारे पदह वीस नौकर मजर थे मातहतो मे उनमें जैसे रामसिंह शर्मा वैसे सतोख सिंह बिरदी। सब एक जैसे प्राणी एक-दूसरे से धुले मिले। केवल एक समय का पहिया एसा होता है जो लगातार चलते रहने पर भी नहीं घिसता-टूटता लेकिन उसक माय माप दौडता इसान बदरंग होता हाता एक दिन रेत का जर्रा बनकर मिट्टी में मिल जाता है, इतना धीरे धीरे कि सारा पुछ विना पटे हो घटता रहता है स्वत । शिव मात्रिक की शादी हुई तो सारी की सारी षोठी रोशनी के सैलाब में डूब गयी एक वार । फिर उनक लटका हुआ, तो हवेली सो क्या हवेली की एक-एक इट एक एक प्राणी के घर मतयुग आ गया । नारायण पाबू मारे खुशी थे कमी शिबू को कभी प्रभु को सहसा बाहो मे भर लेते और नाच जाते। और बढी मालकिन वह तो जगत ताई हो गयौं। जितनी पुश उतनी विभोर उधर सतोसी भी कोठी के भीतर कुछ और ही होता जा रहा था धीरे धीरे । रामसिंह के साथ खनो पानी सीधी तो नरोत्तम ने उसके हाय बीडीपमा दी। चौदह वरम का सतोष मिह कभी मिल पर काम परता, कभी कोठी पर, लेशित मेहनत भरपूर पूरे मद जैसी और घुराक भी भरपूर पूर मद जैसी। वेब म बोरी या बडन । मौवा मग जाय तो भूप, तिरपत के साथ तीन पत्ती, और जिस दिन बड़ी बहू साई पर्नी सनोधी थे मुह दारू भी लग गयो । 'नारायण शिला ठासुरों की मोठी पो जिममे उस मौके पर पर मानिक से लेकर एक भदना मा मजूर सर युग या मेपिन बर मतोसी के बारे में साई को पता पता तो - एक जिन्दा चेहरा / 19 अहोने उसे बुलाकर बिना पूछे पहले दो हाय रसीद पर दिये । 'कल का छोकरा, दारू पीता है ।' और अगले ही दिन से उसको डयूटी पनकी हो गयी सिफ वोठी परनिह ठाकुर की खास खिदमत मे, ताई की आँख के ठीक नीचे। उसी दिन से एक विशेष और विलक्षण युद्ध शुरू हुआ। सतोखी को ताई का चेहरा देखकर एकदम से बदले, और तमतमाहट की गर्मी चढ़ जाती। शायद यह सोचकर कि इतने कुचले जाने पर भी क्यो उसे उसके भीतर झांस्ता बचपन नजर आता है। और इधर, ताई का मन भर भर आता दया और ममता से, सतोखी के लिए बदनसीब, बेचारा! युद्ध चलता रहा अनवरत । दानो के वार एक दूसरे के लिए निरथर सिद्ध होते रहे । सतोखी की हरकता से ताई थोडा सतक हो गयी थी। शायद वह रह- रहकर टप्प मार देता है न हे को या कान खीच लेता है। सतोखी भी कुछ और काइयां हो गया ताई के साथ। चुपके से बीडी पी आता भागकर बाग मे, बिना इच्छा के भी। सुबह काम पर आता तो कभी अलसाये और नशे मे टूटे होने का सा स्वांग करता। फिर कभी सीधे कभी किसी सहारे पूछताछ होती, मुह सूपा जाता और यरायक सब पराजित हो जाते । वह इठलाता घूमता । नन्हें के साथ कुछ और क्रूर होकर पेश आता और दोपहर बाद जब वह खाना खाकर लौटता तो उसने लगायी होती। बस थोडी सी, बतौर एक बदले की शत के । नहाँ तीन बरस का हो चुका था। सतोखी सत्रह का, और नन्हें के प्रति उसकी निममता उससे भी अधिक कुछ और गबरू । नहें को देखकर सतोखी सोचता, 'क्या सरदार सतोख सिंह बिरदी के नीचे भी ऐसा ही बचपन दबा होगा कही ?" 'लेकिन उसके मा कहाँ थी?' कोन कहता है कि बचपन के गिलकने के लिए मां जरूरी है नहें के भी माँ . . "है तो।' 'अरे होना, न होना बराबर है उसका । सारा दिन कोठी म पडी सोती है टांग पसारकर या इधर उधर बन-सेवर के डोलती है, बस । नहीं तो ताई का है अपने पूरे बचपन के साथ ताई सतोषी की दुश्मन और सतोषी इधर उधर देखकर झट न हे के दूध का गिलाम एक सौस म आधा कर देना । सचमुच सरदारो जैसा सरदार होता वह तो उसकी मूछे शायद गवाही भी देतीं, लेकिन अब तो सतोषी था वह, सिफ सनोखी, जैस रामसिंह शर्मा वैसे सतोख सिंह विरदी। वसे भी इस कोठी में यह पता ही किसे था कि यह अपना सतोषी सरदार का पुत्तर है । लेकिन जो भी है, है भरपूर ।

20/ पल प्रतिपस अतिभीषण भूरम्प से भी कभी धरती इतनी नहीं की होगी, जितना 'नारायण विला' परथरा गया था उस दिन अच्छी खासी ताई रात नहें को खिला सुलापर, और ठायुरखारे म जोत जलायर सोई, और जब भोर भई, तो वह अपाहिज थी। इतना गहरा पक्षाघात । वाई ओर का हर अग वेकार हो गया। जुबान ने शब्द को दिय और आयो । स्पष्ट दृष्टि । पेहरा तो इतना विकृत हो गया कि बस है भगवान ) जिसने भी देया, बम राम राम भरता ही बाहर आया । लेकिन देषा भी रिसन ? दयो बुदृष्टि मला दपने पो होती है ? अगल ही सप्ताह ताई अपनी व्हील चेयर पर आ गयी। फिर स नह ये आसपास और सतीधी भो निगरानी पर। सतोखी भी रोया था उस दिन, लेकिन भरपूर रोने के बाद उसने दारू भी पी पी और आधी रात को उठा र टहलता रहा था, अपनी कोठरी के बरामदे में, अब तो नह को एव चौयाई मा रह गयी आधी से। सेमिन इतनी भी बहुत है मुझ जैसे में सामने' और वह मुट्ठियां गीयते भीचते सो गया था, भीतर ही भीतर लढाई तेज करता हुना। हाँ तब पांच का हो चला था। - एक भरपूर तमाला पहने के बाद जैम आंख के आगछाये घटाटोप अंधेरे के बीच चिंगारियां छूटती हैं, वैसी ही चि गारियां समेटे सतोषी नारायण विला' से भागा था यकायक । जो कुछ घटा था उम याद पर सरदार सोख सिंह का कलेजा इतना जबर नहीं था जो हिन न जाता ताई के अपाहिज होने के बाद सतोखी के मन मे उनका हर, उनका निहाज उतरकर घुटनो पर भी नहीं रह गया था और ताई के पास सारी ममता थी केवल दाहिने अग में, जिससे वह घसीटकर अपनी व्हील चेयर किसी के पास ला पाती थी और अपने पत्थर चेहरे मोर जुबान से कुछ कुछ महती थी, दर सारा आकृतिहीन और उपक्षणीय। उस शाम कोठी पर कोई भी नहीं था। केवल नहीं, नन्हे का खिदमतगार, और ताई। ताई का होना, न होना बराबर था, फिर उस समय तो बहन है के पमरे म भी नहीं भो। सताक्षी के हाथ में बीही थी बेपरवाह । सतीखो का नाई के मामने भी बोडी के सुट्टै खीचकर धुआं निकालते रहना अब नया नहीं था, फिर उस दिन तो ताई के पीछ की बात थी। अचानक सतोखोकीबोही धमकी और न हे की गदन को छू गयो होले से । न हाँ छटपटाकर रोया तो सतोयी उठकर रहल लिया दूसरी ओर। फिर थोड़ी देर में सताखी को बीडी न हे की उगलियों पर, महे की पीठ पर नहें के घुटनो पर। नहाँ बिनविलाकर चीखता रहा बेजार और सतासी को गिरफ्त से अपना हाथ छुडाता रहा। सतोखी हंसता रहा और कि सारा पुछ अरस्मात एक्दम थम गया। अचानक एक्दम पीज' पता नहीं पर ताई अपनी अपाहिज व्हील चेयर लुढ़काते-सुकाते उमक एकदम बेलता रहा, एक जिन्दा चेहरा/21 . - पास थी। एकदम करीव । एक चीख एक आक्रोश की लहर उनके चेहरे पर थी आधारहीन । केवल कुछ रिरिया। गिडगिडाने जैसे स्वर उनके विकृत आठो से बाहर आ रहे थे, पता नही कैसी सतोखी न धूमकर ताई को देखा। कुछ पल, नुछ गिने हुए पत दोनो एक दूसरे को भर आंद देखते रहे कि एकाएक ताई ने अपना दाहिना हाथ बढाकर मेज पर रखा पीतल का फूलदान उठा लिया। इसके पहले कि सतोखी पैतरा बदलकर सम्हल पाता ताई ने उससे अपने चेहरे, अपने मिर पर, मारना शुरू कर दिया अधाधुध । फूलदान की चोटो से उनका सिर लहूलुहान हो गया। चश्मे के शीशे टूटकर यहाँ-वहाँ चेहरे मे फँस गये शायद और चेहरे को खून स सराबोर कर गये, मगर ताई की नहीं, सतोखी ने यह देखा तो हावाकर रह गया। न हे की चीख पहले तो ताई के आ जान से थम गयी थी पल भर, फिर दुगुनी हो गयी। सतोखी न पहले व्यथ दायें बायें देखा, फिर पलटपर चल दिया, निहायत वेपरवाह । लेविन भीतर से बाहर आते आते तक उसका बदन तेज बुखार जैमा तप आया था। वह बिस्तर पर पड़ा रहा रात भर । फिर उठकर उसने अपना सामान समेटा । बक्स की तह मे सलोतर लगे नोटो को फिर से गिना और इत्मिनान पाया। अपनी तनख्वाह स उसन खच ही क्या किया था? थोडा भीतर बाहर बेचैनी से टहलने के बाद वह फिर बिस्तर पर गिर रहा । खाने भी नहीं गया भीतर, वस सोया पडा रहा बूट पर समेत। पता नहीं कितने पहर रात गये वह उठा और विस्तर समेटने लगा। फिर पता ही क्या सोचकर विस्तर उसने वही छोड दिया बस पैताने से कबल खीचकर उसने बक्स मे लगाया और उसे उठाकर बाहर हो लिया। आते आते वह बिस्तर पर से तक्येि के नीचे पड़ा अद्धा साथ समेट लाया था। उसने उसे वही खडे खडे खाली किया और अपनी कोठरी के दरवाजे पर पटक चकनाचूर करके बाहर हो गया निहायत बेपरवाह बिना पीछे देखे जैसे उसके सामन भरपूर तमाचा पहन के बाद का घटाटोप अंधेरा और चमकदार चितारियां उसे आगे खीच रही हो। कैमा था तेजा। बिल्कुल अपन नाम की तरह तेज, चमकदार और खरा, और वह सतोखी को मिल भी गया नारायण विला छोहने क तीन घटे बाद ही, सुनसान रास्ते पर धूल में पड़े चमकदार सिक्के की तरह । नींद मे पक्ती पलको मे सतोखी को पता ही तब चला जब अपने ट्रक स गदन निकालकर तेजाने उसे आवाज भारी, वे आए पगले पर का फालतू है क्या?' और आनन-फानन में दरवाजा खोलवर उसके सामन कूद पडा।

22 / पल प्रतिपल - 'शहर जाना है और सतोखी ने बोदेपन से मिर हिला दिया था। उसका वक्स खुद उठाकर तेजा ने ट्रक मे रखा था और बाजू से उठाकर सतोखी का भी ऊपर खीच लिया था। ट्रक कब तक विधर और क्तिना चला सतोखी को कुछ खवर ही। वह तो मिनट भर मे ही दरवाजे से टिकार लुढक लिया था, अद्ध की तरग कही छुपती है भता? कुछ घडी दिन चढे जव धूप थोडी फलने लगी थी तेजा ने एक ठिकाने ट्रक रोककर उम उसके सामान सहित नीचे उतारा और अपनी कोठरी खोलकर उसम लुढका दिया, फिर बिना कुछ कहे बाहर से कुडी मारकर चल दिया अपना ट्रक लेकर। मतोखी जागा तय, जब पीछे की खिडकी से सूरज ने आकर उसकी आँखो म अपनी उगलियां घुसेड दी। जागकर उसने कोठरी के भीतर पानी तलाशा और भरपूर छोटा से अपना चेहरा तर कर लिया। नाली गर बैठकर उसने कुल्ला क्यिा। आले मे रखे शीशे के टुकडे म अपना चेहरा देखकर वालो पर कधी फरी और बक्स खोलकर कपडे निकालने लगा। बक्स बद करके वह उसम ताला मारन ही वाला था कि चरमराकर मोठरी का दरवाजा खुला और आठ नौ बरस का एक छोक्रा, एक प्याला चाय और दा टोस लेकर भीतर दाखिल हुआ। 'लो चाय पियो । तेजा दोपहर तक आयेगा। सामन दुकान है, कुछ जरूरत हो तो माग लेना।' और एक सास मे सारा कुछ कहकर वह तेजी से वापस भाग गया। सतोषी ने चाय पी। दुकान के पास नल पर जाकर भरपूर नहाया, कपर बदले और तेजा की इतजार म बाहर पेड के नीचे आकर बठ गया, बिना कुछ सोचे। तेजा आया और आते ही सवालो की झडी लगा दी सतोखी के सामने। चाय पी? दारू पीकर जगल म क्यो बैठा था? घर स भागकर आय हा? कोई जुम कर बैठे हो क्या? कोई सदमा लगा है छाती में कोई मौत? जलालत हार ? कोई इश्क-प्यार का चक्कर ? और सतोखी वुत बना साबठा रहा था। वसा ही सपाट और वेपरवाह। फिर ता ने कुछ नहीं पूछा। बस अगले दिन स दोनो ने साथ-साथ काम पर जाना शुरू कर दिया। ट्रक पर माल के साथ आने-जाने का काम कीरत ट्रासपोट कम्पनी' म । हर तरह का माम, काला भी सफेद भी। दिन से चलने का और रात भर का भी। मीठी जुबान और लात जूते का भी और कुछ ही समय म सतोषी रम गया इस काम म। फिर घोड और दिनो मे कम्पनी का दादा हो गया। पता नही क्व और क्स उसकी आंखो के आगे व्हील चेयर घूम जाती और सामने वाला बदा नहीं हो जाता उसकी निगाह में। तजा सरणार तो नहीं पा पजाव का भी नहीं या वह, लेकिन जिस दिन अदा उतार लेन र वाद उस दुघ-सुख की बातो क वीच पता चला कि सतोख सिंह मरदार है सोएर दुहत्या दिया उसने सनापी के जवहे पर। सरदार होरर मुह को बोडी मगाता है समीन। और हरकार सताधीन मुह भीच लिया जा 7 तेजा।

एक जिदा चेहरा /23 का।'मार ले साले चाहे जितना, लेकिन इतनी जोर से मत चिल्ला। मेरे भीतर था मरदार अगर जाग गया तो उसका भाई-वाप क्या कीरत सिंह,बनगा मेरों बाप क्या था मुझे पता नहीं, लेकिन वह हड्डीखोर नही था समपा।' ओसोती फफर कर रो पडा था। उसे लगा कि आज वह रो ले जी भरदे । जरा भी उसके भीतर खारे पानी का दरिया कुछ थमा नगता, वह नजरो के आगे घूमती व्हील- चेपर के नीचे हाथ दे देता और नये सिरे से फूट पडता। तेजा भी रोया था उस दिन सताखी के साथ, और रोते-रोते दोनो साथ साथ सो गये थे। सवेरे नाम पर जात-जाते तेजा ने बस इतना बहा था, यार तू पुरबियो की तरह खंनी खाकर यूकता चलता है गदा लगता है। इसे छोहर की सोच ।' और धीर धीरे मतोखी अपने इस पुरबियापन से उबर गया था। वोडी वह अब भी पीता था तेजा से छुप- छुपकर और तेजा जब भी परड लेता एक बेबस खीझ भरी आवाज मार देता उसे, 'हाय रब्ध, ये तू क्या कर रहा है सलोखो ?' और मतोखो ये दांतो के बीच दवी वीडी छूटकर गिर पडती हर बार। तेजा के माथ रहते-रहते सरदार जागा, न जागा एक ईमान जरूर जाग आया था सतोखी के भीतर । सही और गलत को चीरकर अलग कर देने जैसा ईमान, जिसने उसके अतस मे धूमती व्हील चेयर को कुछ और निधि बना दिया था। दिनोदिन बदलता गा पा सतोखी सिवाय इसके कि दांतो के बीच से बार बार छूटकर गिर पडने के बावजूद बोडी पीता था वह और न है को या करके एव झनाटेदार तमाचे के वाद के घटागर अपरे और छूटती हुई चमकदार चि गारियो मे खो जाता था थोडी दर के लिए। ऐसे ही बहुत जरा-सी बात थी उस दिन, जब किसी मिल के अदने से मुशी ने अनजाने मे तू-तडाक की थी तना से, नौकरी से निकलवा देन की धमकी के साप, और सतोखी न झपटकर उसका पालर पकड लिया था वहीं, 'अवे ओ काणे को मौलाद नौकरी स निकलवायेगा तेजा को? रखवा भी मक्ता है किसी को रोजी पर, है इतनी भोकात" और उसके आग ताई का लहूलुहान चेहरा घूम गया था। 'मैंन सैकहा के जबडे ताडकर उन हाय में दे दिय हैं मालूम है ? लेकिन पाइयो को जनखा समझकर बिना हाथ लगाये छोड भी देता हूँ मैं, जंग तुझे छोड रहा है. पू' और सचमुच सतोषी उस विद्रूप से परे धवलकर हाथ माता हुआ चल दिया था। सतोखी न पू कर छोड़ दिया था लेकिन वह जनखा नहीं छोड पाया सतोत्री को, और सतोखी की नौकरी खत्म हो गयी। नौकरी नहीं थी लेकिन तेजा तो या सतोखी के साथ। 'देख लिया हडडी खोर सरदार कीरत सिंह को, ऐसा ही सरदार तू बनाना चाहता था मुझे' और ठहाके ये साप सतोखी ने तेजा की पीठ पर एक धौम जमा दिया था। तेजा दिन- भर काम पर रहता और सतोषी व्हील चेयर के पीछे दौड़ता रहता सारा दिन 24 / पस प्रतिपल और पाकर सो जाता-जय तर शाम को गोसाय सापडाचे पर जाकर रोटी पात रगीत हार या कभी-भी सार ही, और दुरा मुख वो यह सुनकर सो जात एपदित जय सजा रात को यापग आया तो उसपे चेहरे पर एक उधाबुन थी। जो उसने आन ही सतायो । पटपर परहती थी। 'कोई काम लाया है यया मेरे सिए' और तेजा ने न ना पहा म हां, बस दी करके गदा हिना दी। 'यहाँ ? 'यही हावी मा 'तव तो सरवारी होगी। हाँ, है तो सरकारी हो। और मतोयी उछलकर वठ गया पा चेतन हापर। 'क्या काम है ? जल्दी यता? और अधीर हान लगा था। लेपित तजामा मह वैसे ही सूजा रहा पिर भी। कुछ कह न यार' सतोषी बिलखन लगा। "रहने दे सतोख, बडा गदा काम है, छोड ।' 'नहीं-नही, तू बता तो सही। 'ता सुस, बदूक चलायगा?' 'क्यो नहीं ? क्या फोज म लेंगे मुझे" छोड सोखी, यह काम तरे लायक नहीं।' 'साले झापड मार दूंगा।' 'कुत्ते मारेगा" 'हा मारूंगा क्या कुत्ते मारने का काम है।" तेजा ने कोई उत्तर नही दिया, बम अगले दिन छावनी म हवलदार के सामने खडा कर दिया सतोखी को। हबलदार ने सतोषी से दो चार बातें पूछी। हवलदार ने सतोसी के पागज भरे और उस पर सतीखी के दस्तखत कराये और उसे मैदान में ले जाकर उसरावाम समझाया और बदूक की एक तज आवाज के साथ सब ठडा हो गया। मातादीन सलाम मारकर उस ठही दिशा की ओर दौड पहा, आनन फानन मे सफाई कर देन एसए! के लिए। और वह बदूर सतोख सिंह के हाथ मे या गयी। सलोखी के हाथ बदन पर मलेशिया की वर्दी। अतीत और वर्तमान को कुचलकर गुजरती हुई बदहवास व्हील चेयर और एक जिदा चेहरा 25 . भविष्य, एक एक मारफे म हे मे बदलते हुए कुत्ते और सतोसी की व दूक। कुत्तै मारने की नौकरी मे बही बरक्त थी सतोषी के लिए। छावनी मे क्वाटर, तेजा की सतोषी को सौगात, एक खूबसूरत प्यारी सी बीवी और सतोसी पी खुशनुमा कारगुजारी, उछलता-कूदता प्यारा सा तोशी। तोशी, सतोख सिंह की इकलौती औलाद, जिसकी याखें अपनी मां की आंखो की तरह पनीली थी, और नाक बाप की तरह सुडौल और ऊंची। तोशी हर रोज अपने पप्पा की लायी हुई रग विरगी नयी वीजें पहने डोलता रहता छावनी मे, लॉलीपॉप चूसता हुआ। कैसा था तेजा? एकदम अजीब। जब-तब रास्ता रोककर खड़ा हो जाता सतोखी का, 'तू घर म भी कुत्तेमार की तरह तनकर खडा रहता है क्या ? तेरे आने से तोशी किलक्कर तेरी ओर भागता क्यो नही ? बोल न, तेरे घर मे घुसते ही भाभी के ओठ कपकपा- कर खिल क्यों नहीं जाते " और सतोख सिंह बीडम सा सिर झटकर बिना जनाब यि आगे चल देता, एक्दम वपरवाह सा। चल तो दता नेविन मोचता, कहाँ से उलीचू अपना प्यार बाहर को सारा कुछ तो व्हील चेयर के नीचे कुचल गया है जैसे । सब ठिठककर पत्थर हो गया है ताई का लहूलुहान चेहरा देखते देखते । तभी तो अपनी तरफ से लाख मुलायमियत से वह आवाज देता अपने पास बुलाता, तो भी तोशी सहमकर ठहर जाता वही का वही, नह सा, और वह भीतर से बेतरह छटपटाकर तल्ख हो जाता, आज भी उतना ही जितना तीन बरस पहले हो जाता था, जब डोरी व्याह के आयी थी। आज - एक पथरीली चट्टान से व्हील चेयर टकरायी, और सतोखी की बेआवाज चीख म साथ ताई वा लहूलुहान चेहरा फीज हो गया। जिदगी इससे पीछे और. जा भी क्तिना सकती थी आपिर, कही न कही तो उसे विसी पथरीली चट्टान से टकराकर रखना ही था। सतोखी भी रुका। कपर उसन अपने आसपास फली धूप को अपनी परछाई से नापा और उठ खड़ा हुआ। मातादीन अभी नहीं आया था शायद । वे इरादा उठकर वह योझिल- सा उस मरे हुए कुत्ते तक आया और उस एक्टक देखने लगा। चकनाचूर खोपडी, और लटकी जुबान बाला चेहरा। कभी नहीं, कभी कीरत सिंह और भी वह खुद । नही, नही ताई का नहीं । भीतर ही भीतर झपटकर उसने अपने भीतर कही उठ रही एष वान को फुर्ती से काट दिया। 'उनका तो हमेशा हमेशा स एव जिदा चेहरा है एक भरपूर जिदा चेहरा। उगस देखा नहीं गया और अधिक । उसने सिर पर बांधा हुआ वहा सा रुमाल, जो 26/ पल प्रतिपल अब उसके हाथ म या तह योलकर युत्त के मुंह पर डाला और चुपचाप पीछे चस दिया। बन्दूक जमा करने वह योत तक नही गया, रास्ते में ही दापाराम पो थमा गया, याचना के साथ । हाजिरी वरवान के लिए बडे फाटक तक भी नहीं आया, वहीं मे हाथ हिलाता हुआ निकल गया अपने क्वाटर की आर, शार्टक्ट मारकर, तजी से कदम बढ़ाते हुए। जब वह घर पहुंचा तो डोरी शायद रसोई म पो और तोशी फश पर ही खेलता खेलता सो गया था। रोज की तरह सतोगी बाहर से आवाजें मारता हुआ नहीं घुसा बरिक खामोशी से आकर पमरे के बीचोबीच खड़ा हो गया। उसने चारो ओर देषकर, जमीन से तोशी को उठाया और पास पही चारपाई पर लिटा दिया। और अपलक उसे देखता रहा। फिर उसे कुछ हुआ कि वह हौल स तोशी के पास बैठ गया और उसके बालो पर प्यार से हाथ फेरन लगा। उसने झुककर तोशी का एक चुम्मा लिया, और अपानर पता ही क्या हुआ कि वह एकदम बोरा गया। उसने तोशी को भरपूर वोहा म उठा लिया और सीने मे भीच कर उसे चूमता गया, चूमता गया। एक, दो, दस, पच्चीस, पचास और न जाने कितनी बार, और कब तक, जब तब वह पद भी पर निढाल नहीं हो गया। तोशी का चेहरा गर्मी और पसीने से भीग आया था। उसन उस अपनी कमीज से पोछा और धीरे से उठ खडा हुआ। थोडी हलचल सुनकर डोरी कमरे में आयी और सतोखी को देखकर सिर पर पल्ला करती हुई वापस लौट गयी सतोखी के लिए शवत पानी लाने के लिए। सताखी वही पास खड़ी एक कुर्सी पर टिक गया और ताशी का चेहरा देखत देखते मुस्कराहट फैलाने लगा। अभी क्या हा गया था उसे? लेक्नि जा भी हुआ था उसे बहुत अच्छा लगा था। अदर डोरी शबत बना रही थी और सतोखी यह साचकर मुस्करा रहा था, कि चलो सबसे अच्छा यह हुआ कि डोरी ने उसे ऐसी चौडमपन की हरकत करत नहीं देखा । नहीं तो क्या होता 7 शुद्ध समाचार र रमेश बतरा नई दिल्ली, तीस जनवरी आज सुबह करीब दस बजे 'दैनिक बगावत' का सवादाता दिल्ली परिवहन निगम उफ डी० टी० सी० की मुद्रिका सेवा का लाभ उठाकर राजघाट पर उतारकर आगे बढ जाने वाली भीडमभीही बस मे विसी खबर का जुगाड करने के लिए जा रहा था। वह बाकायदा सीट पर बैठा हुआ था मगर भीड इस कदर बेकायदा थी कि उसे लग रहा था वह ना ही बैठा होता तो अच्छा रहता। फिर भी वह बैठा ही रहा और सोचने लगा कि अगर उसे इस स्थिति का वणन करना पडे तो वह कुछ इस तरह से लिखेंगा कि बस की भीड म बच्चे, बच्चे नहीं रह गये थे ! बूई बूढे नही रह गय थे। मद,मद नहीं रह गये थे। लडवियां, लड़की नही रह गयी थी। औरतें, औरत नही रह गयी थी। यहां तक कि यादमी, आदमी नहीं रह गया था। सबके सब सवारियां बन चुके थे और किसी तरह उस सवारो म अटे हुए थे। सवारी हालांकि हर पडाव पर रुक रही थी लेकिन चलती जा रही थी और और सवारियो के सतोप के लिए बस इतना ही काफी था। मगर सहसा रिंग रोड पर प्रगति मैदान वाले मोड से पहले बस रुक गयी। सवारियो ने साचा, आगे तिराहे पर लाल बत्ती होगी, इसलिए दम साधे हरी बत्ती होने का इतजार करने लगी। दो मिनट चार मिनट छह मिनट क्या गुजर गये मानो युग बीत गये सवारियां बेचन होने लगी। सबने कयास लगाया कि तिराहे पर सबसे आगे खडा वाहन खराब हो जाने कारण यातायात जाम हो गया है । उन्होने डाइवर को सुझाव दिया, 'भई, जैसे तैसे बगल वाली जगह से बस को निकाल ले चलो।' मगर बात बनी नही क्योकि तभी तिराहे की तरफ से भाते हुए एक मजदूर विस्म दे आदमी ने किसी सवारी के पूछने पर बताया, नेता लोग राजघाट गये हुए हैं। जब तक वे वहाँ से वापस नहीं लौटते, यह रास्ता बद रहेगा।

28 / पल प्रतिपल यह सूचना मिलने पर एक प्रौढ सवारी दौखला गयी, 'मगर गये क्यो हैं वे राजघाट पर एक युवा सवारी ने उस पर हंसते हुए उमे मूख जतलावर जवाब दिया, 'इतना भी नहीं मालूम आज तीस जनवरी के दिन महात्माजी शहीद हुए थे।' प्रौढ सवारी कुछ और बौखला गयो, 'कोन महात्माजी" 'राष्ट्रपिता मोहनदास कमचद गाधी।" 'तो ऐसे बोलो ना, घुमा फिराकर बात क्यो करते हो? यह तो मुझे भी मालूम है।' । 7 'मालूम था तो पूछ क्यो रहा था? 'तुम्हारी जनरल नॉलेज जाच रहा था पर तुम फेल हो गये। सवारिया एकबारगी तो ठठाकर हंसी, लेकिन फिर जैसे स्वयं भी लजावर आश्चयक्ति रह गयी। दैनिक वगावत' के सवाददाता के भी आश्चय का ठिकाना न रहा । वह अब तक अपनी सीट पर किसी के यहां जाकर शोक प्रगट करने वाली मुद्रा म बैठा हुआ था। प्रौढ की बात सुनकर वह चौकस हा गया और बाला, 'मगर महोदय, इस नौजवान ने तो विल्कुल सही जवाब दिया है, फिर यह फेल कैसे हो गया प्रोट का चेहरा खिल उठा और वह 'प्रेम मे मिलिए' वाले आयोजन की भाति गाना खेसारकर कुछ इस तरह से बोला मानो उसे पहले से ही मालूम हो कि अब उसस क्या पूछा जाने वाला है। उसने कहा 'बहुत अच्छा सवाल पूछा है आपने दरअमल इस नौजवान को रगो मे नया खून ठाठे मार रहा है। यह अभी नहीं जानता कि सही क्या होता है और गलत क्या होता है। इसका जवाब हाना चाहिए या नेता लोग महात्मा गाधी के नाम पर टसुए बहाने गये हुए हैं कि हम तुझें याद नही परना चाहते, लेकिन तुम्हारी मूरत साये की तरह हमारे पीछे पड़ी हुई है। इसलिए, ऐ महात्मा । कोई ऐसा उपाय कर कि तुझसे हमारा पिंड भी छूट जाये और हमारी नाक भी न पटे' सवारियां न हँसी, न मुस्करायीं न रोयी। प्रौढ सवारी अपनी जीत के आलम में अलमस्त होकर गुनगुनान लगी 'प्रभुजी मेरी इतनी अरज सुनो, दास को गाधी मुक्त करो।" सवाददाता पी सवेदनाओ वा ससार सब्ज हो उठा कि आज का दिन कितना बढ़िया दिन है सुबह सुवह सरेराह एक धांसू बाक्स आइटम मिल गया है तो जिस खोजी खबर का जुगाह करने वे दराद से वह जा रहा है, वो भी जरूर मिल जायगी। मगर इस लिए तो उस जल्द-अज जल्द पहुँच जाना चाहिए वरना वह साला आलोक तोमर मुझस पहले पहुच गया तो सब गुड गोबर हो उसने सोचा और सोवन लगा जिस जगह मुझ पहुचना है वह का जायगा।

शुद्ध समाचार | 29 रास्ता दस-बारह मिनट का है । मैं पैदल ही चल दू तो ज्यादा से ज्यादा आधेक घट मे वहाँ पहुँच जाऊँगा। इतनी सी बात के लिए देर क्यो की जाये। मुझे पैदल ही चल देना चाहिए। इसी ऊहापोह में वह अपनी सीट से उठने के लिए बस यूहो उठगा ही हुआ था कि एक सवारी न सरपट रपटकर अपनी पुटठी सीट पर जमा दो कुछ इस तरह कि उस सवारी का मुह सामन नहीं बल्कि दाहिनी तरफ था। कुछ इस तरह कि जैसे वह सवाददाता अब तक उसकी गोद में बैठा हुआ पा! सवाददाता के मन मे सीट पर बैठे रहने की बची खुची हसरत भी मर गयी और वह लूडो वाली गाट की तरह नहीं सोढी चढता तो कही साप के काटन पर वापस लुढ़कता हुआ डी० टी० सी० को वस के उस न्यूह से बाहर आ गया सडक पर पांव रखते ही उसने बेचन सी राहत भरी सास ती। अपने आप को परखा और यह पारर कि वह सही सलामत है, यह तिराहे की तरफ बढ़ गया। तिराहे पर यातायात रोकने के लिए केंद्रीय 'आरक्षी पुलिस की एक बम सह पर सहक यो चौडाई म खडी हुई थी। उसके बाद तिराहे के तीनो तरफ तीन सितारो वाले सतरी से लेकर फोतेदार और बिना फीती वाले संतरी आडी- तिरछी मुद्राओ में तैनात थे। उन सबके चेहरे महात्मा गाधी की तस्वीर वाले विज्ञापा कि 'शराव मौत का घर है !' की भांति विज्ञापित कर रह थे कि 'यहाँ से आगे जाना आफत मा बुलाना है उग तिराहे पर तरह-तरह की बसों से उतरे हुए देश के वइ सो बाशिदे वह! से पैदल जाने को आतुर थे। यह उनका मौलिक अधिकार था मगर बिना फीती थाले एक सतरी की कहानी आवाजो सविधान की नार में नल द दी थी और धै लाय चाहने'वे यावजूद उस नवेल की लगाम स मुक्त नहीं हो पा रहे थे। इस बारे में यह कहना सचमुच सच्चा होगा कि उनकी बोलती ही बद हो चुकी थी। मगर ऐसे खतरााक माहोल में एर पतला पता माइदिन मबार पतिराहे में पहुचती सहक की सीमा पर एक तीन फीती वाले सतरी से उलझा हुआ था। मह कह रहा था, 'भजी, मैं तो खुद ही मरा हुआ हूँ मैं भला किस मारूंगा? तुम भेरी तलाशी ले लो और मुझे जान दो, वरना मेरी दिहाड़ी मारी जायगी।' पर सतरी। उमे यापस धकेल दिया, 'एक बार वह निया, समझ ले लाप मार कह दिया तू मागे नहीं जा मरता।' 'मैं तो आगा।' पतला-पतगा साइरिल सहित आग बढने को हुना तो सतरीन उसी साइपिल को पीछे खींच लिया, 'साले, चुपचाप जावे उधर पटरी पर खड़ा हो जो नही तो तरी भी साइकिल बना के दो साइरिल पार्सल कर दूंगा 30/ पल प्रतिपल " तेरी बीवी के नाम पर !' 'कर ले, यह करके भी देख ले " कहता हुआ यह फिर से आगे बढ़न को हुआ पर इस बार सतरी ने साइकिल यारियर पहले से ही कसार पामा हुआ था। उसका चेहरा तमतमा गया और यह सोचकर कि 'यह हरामी ऐसे ही मानगा', उसने तनिक नीचे झुक्कर साइकिल के पिछले पहिए यावाल्य बोलकरट्यूब की हवा को हया में सुरसुरा दिया। टयूब की हवा सनसनाती हुई बाहर निक्ली और पतला पतगा किसी तेज पदबूदार भभके या शिकार हो जाने वाले मजलूप की तरह साइकिल का हैंडिल थामे थामे भाग पडा हुगा पर सतरी ने उसे तीन पार कदम पर हो नाप लिया और बोला, 'मां के दीने, तेरा भेजा धूम गया है क्या?' पतला पतगा गिडगिडाया, 'मेरे बाप, मुझे जाने दे। मेरी नौकरी का सवाल है। सतरी खीझ गया और उसने उसके गाल पर रैपटा दे मारा, 'अपनी एक नौकरी के वास्ते हम सबको नौकरी लेगा क्या पतले-पतगे के जिस्म का जुस्सा इतना नहीं था कि वह किसी हाजमेदार हाथ की हुज्जत सह पाता । वह चुपचाप अपने साइकिल को घसीटता हुआ पटरी पर जा पहुचा और साइकिल को स्टैंड पर लगाकर खुद जहाँ पहा था वहीं बैठ गया। कुछ देर बाद जब शायद पप्पड के जोर पर उसके सिर से पांव तक सापकाती हुई चीटियां शात हुई तो वह साइकिल के हवा निहले पहिए को तारता हुआ बुदबुदाने लगा और देखते ही देखते उसी सतरी की तरफ चल दिया। सतरी उस अपनी तरफ आता पार वही से चिल्लाया, 'उडे ही डटा रह उडे मगर उस पर कोई असर नहीं हुआ। उसी वेग से उसके पास आकर बोला, 'साइकिल के पहिए का वाल्व तो दे दे।' वाल्व अभी तक सतरी के हाथ में था और वह उससे बलता हुआ वक्तकटी पर रहा था। उसने वाल्व को ऐसे देखा जैसे कोई अनमोल रन हो और फिर कुछ इस भाव से कि 'जा तुझे दिया दान' उसने उसे पतले पतगे की फली हुई हथेली पर धर दिया। पतला पतगा सतुष्ट हो गया। सतुष्ट होकर वह मुस्कराया और क्सिी हमदद की तरह बड़े प्यार मे बोला, 'हवलदार, तुम्हे अपने नेताओ की जान बहुत प्यारी है ? मतरी ने उसे डाट दिया जा के वहीं खडा हो जा अपन खटारे के घोरे।' वह किसी मागिनी की तरह मचलकर बाला 'न न फिर भी 'तू जाता है या नहीं? सिपाही ने दाक दिया, तो वह भी तनिक ताव खा गया "मगर तुम मेरे सवाल का जवाब क्यो नहीं देते?' सतरी हल्ला गया, मैं तेरे बाप का नौकर सू के? पतला-पतगा सरपरे की तरह तनकर अभिनय मारता हुआ बोला 'यह भी - हाथो से वापस घुमाकर ड 1. मुझे अपनी जान । । " - मेरे प्रश्न का उत्तर नहीं है महोदय।' अपमानजनक स्थिति के - संतरी का सब कुट्टी बोलनया। वह उसे दोनों प्रारलिख लो अगर ठेमता हुमा बोला, 'बा बावा पार'मेरी जान छ, क यह मेरी नौकरी का भारी है।" माडी दलिया हुई जा रही 'फिरतो तुम मेरे सानो हो पतला-पतगा उस बावजूद चहक उठा, बोर साषी, एकमात 'एफ० बाई० महात्गा के मूत, बक- महात्मा गांधी विधा होते तो पहले मुझे जाने देते, क्यो, समान है। इसलिए भी मुले बाने है। मेरी आधी दिक्षी के हाथो से छिटक्कर है। दुई महात्माजी का वास्ता !' बुलाआ प्रधानमत्री को 'कसकसकसक ! सिपाही ने दांत भीच लिए। इन सतरियो ने राक बात देर करे । यो महात्मा गांधी नहीं राजीव गांधी है झिस छोटा है। मै उस । भवर पतले-पतने पर उनटा असर हुवा। वह सता उससे पूछूगा कि अपनी भामा और माबें काम पर ही रुककर चिल्लाने मया, मल लेन का हक तुम्ह "ताई उसले कि यह रास्ता उतने गाया है। गा बड़ी अदालत से कोई लिया है। वह पर में तो क्या हुवा समर में हाशाही करते हो। मैं मनामा समसार होगा से जर समजायेगा । वह यही तक पहुचा राहगाते हुए मौसमया की साइकिल का वाव निकन पर मां की गाली का किसने दिया।मलानी ना कि वह इस बारे र उसे लगभग घसीटता कान बनवाये। एम मोर पुलिस की परी पहनकर तासने उस ऊपर खीचकर स्वदूर, मजनूम पर इसका मतलब यह वो महीं। पाकिसतरी ने उसके गाल पर छापा पमा दिया और चला गया और जब म परमारोनों सालों से उसका एक हासो हाथ-पांवों से चल मारतीवरीको पता पटरी परमार मायाबार गोरासर रोग विनास ही खडा हुआ हो। पवना-पतवा बरबोर से पांच-सात बमी उधर गदन विरोगनेकी विश में समापन को ताक्ने लगा मानो पर बोलायेसरम होगा। जमिनट तकाजामातक या मानो हमेशा से मे घेरते हुए मजमा मोहनी हरतरी की तरफ गदन निरोपवावा किसी में बड़ी भी मेरा शाप तुझे पा बार 32/ पल प्रतिपल जायेगा । र एशलात रसाद गालियां सुनत ही सतरी दौडता हुआ माया और उस.प परता हुआ बोला 'गाली देता है मच्छर।' मापनमा पतझह 'गाली दे सकता हूं, इसलिए गाली ही दे रहा हूँ!' 'तु मारता बहुत के आखिरी पत्ते की तरह कापा, 'तू मेरे बूते का होता तो मैं, - मारता " । हड और गारियाँ । यह मन स्थिति बही सतरी ने आव देखा न ताव, सापडतोड उस पर लात घूसे कोई प्रतिरोध नहीं वरसा लगा। पतला पतगा न चीपा, न चिल्लाया । उसाथ यही सुलूक होना किया । बड़े धेय से पिटता रहा मानो जानता हो कि उसने सं है और उसने उप तक नही करना है। मबके साथ साथ सवाददाता को भी पतले पतग को बोला हो रहा था और विचित्र लगी कि अभी तक तो वह सनक की हद तक हठ अव पिसी नितात निढाल गूगे की तरह पिटता जा रहा है नाम राय के अनुमार सवाददाता पातिमना युवक था। तथाकथित लोगो की आना चाहिए, किंतु जातिकारी को चरित्र के इस विरोधाभास पर क्रोध ही मागे बढ़कर सतरी को सवाददाता के मन मे सहानुभूति उमड आयो और उसने घर जायेगा। रोक्ने पे इरादे से कहा, मत गारिए भाई साहब, बेचारा मराटी की तरह पाये 'मरता है तो मर जाये । कमीना मेर भेजे पो लगर की म ही पतला पतगा जा रहा है ।" रहते कहते सतरी का हाथ रुक गया और इतरी का ताजी हवा एक्दम उठ खडा हुआ और चिल्लाया, 'और तू जो मेरी न पी तरह फांक रहा है वो कुछ नही ?' काफी देर स इधर तिराहे थे उस पार सहा एक तीन मितारो वाला सताले पतगे के चिल्लान ही देखता हुआ जाने क्या सोच रहा था। मगर ज्योही परा आया और दहाड को चमर उसके पानी में पड़ी वह चीते की तरह दौडता 1 उठा 'क्या माजरा है हरिसिंह' रन होरा बोला 'यह सतरी ने गदन घुमार पोछे देखा और फौरन सावध) इसी वक्त पाऊगा बवकूफ पालतू मे नही पर रहा है जनाब वहता है अभी साक्सि पे चढ़ ।' तीन सितारों ने पतले पतग पर उहती-सी निगाह दाए इसकी साइकिल उठाकर चारो मे दापिल पर दो।' सहज भाय से सलाह पाने में श्यों दापिन परवाता है पतसा पतगा या वच्च र वाम था दने वाले मनन म याला, 'मान पर भिजवा द त जायगी। परे और उसी तीन सिताराका पून बोस उठा। ये येत सहराते है - पर हुक्म दाग दिया 34 / पल प्रतिपल है! तभी वहां लगातार बजते हार्न की हूटरनुमा आवाज सुनाई देने लगी और फिर दिखायी दिया कि एक सफेद जीप ह्या से बातें करती हुई पली बा रही है। उस देखकर तिराहे पर खडे तमाम सतरी चौकस खडे हो गय। भीड से कुछ कम दूरी पर पड़े एक सतरी न भीड को दवाया, 'सब लोग अपनी-अपनी गाडियों म चले जाबा। लोग वापस लौटन लगे मगर साइकिल ले जाता सतरी सहसा ठिठक गया। देखते ही देखते उसने साइकिल को दोनो हाथो से सिर के ऊपर तक उठा लिया और पूरा दम लगाकर उस पटरी स दूर उछालता हुआ भागकर अपनी जगह पर तैनात हो गया। पतला पतगा राजपाट को जाने वाली सड़क की तरफ पीठ करके पटरी पर वहीं का वही वठ गया और पौधे मुह दूर जा गिरी अपनी साइकिल को ऐसे पूरने लगा जसे किसी शहीद को श्रद्धाजलि अर्पित करना चाह रहा हो रितु यह न जानता हो कि किसी शाहीद को अपन श्रद्धा सुमन पिस प्रकार अर्पित किय जात हैं।

दुपहरी महेश दर्पण हि देखा, कितना सुन्दर लग रहा है न ।' उगली के इशारे से प्रीता ने मुझे दिखाया। कीचड के किनारे खिला पा~- हाल फूल-दुपहरी। में देख रहा था। फूल को देखते वक्त एक फूल उसके चेहरे पर खिल उठा था जिसकी आभा कानों के निचले हिस्से तक खिंची थी, "इसे उखाडकर डिम्चे में लगा लें । रा के साथ साथ फूल की उमग भी उसके चेहरे पर उतर आयी थी। मैं अनायास अपने भीतर टहल रहा था। घर के नाम पर इन दो कमरो को बने दो साल होने को हैं । आज तक फूल का एक भी पौधा हमने क्यो नही लगाया होगा। 'यह लो, जड समेत उखाड़कर लाना।' पडोस से लाकर खुसी उसने मेरे हाथ मपमा दी। सच, फूल अब इस घर की जरूरत है। बुरपो लिए में कीचड़ तक जा पहुंचा हूँ। इस दौरान प्रीता की आँखें मेरी पीठ पर लगी होगी। जब भी मैं आस-पास होता हूँ वह मुझे आँखो म भर लेना चाहती है~~भरपूर । पास के बीच मे लगे यह पौधे अब तक इसीलिए नजर नहीं आये ये कि इनमे फूल नहीं खिले थे। फूला न ही इ हैं पहचान दी है। हमारे फूल सूख गये हैं शायद इसीलिए हम अपनी पहनान घो वठे हों। पास का अरग करते हुए मैं पौधो को सुरक्षित उखाड लेना चाहता हूँ। यह खास किस्म की पास है इसकी जरूरत बक्सर पूजा के ही वक्त पड़ती है। कभी- कभार मैं इसके तिनके से दांतो के बीच सफाई भी कर लेता है। पहली बार इस 36 / पल प्रतिपल पास का नाम मैंने सुमेधा दी स जाना था, 'इसे दूध कहत है पगले ।' वरसो पुरानो बात है पर आज तक खिले फूल की सुगध की तरह मुझमे बसी है। यह वही दिन थे जब फूल हमारे भीतर बाहर स महकते थे अपने रगो की चमक के साथ। कसा था वह दिन। जब उसने हरे गुनार की खोज की थी। 'रोज कपटीशन' मे उसका 'ग्रीन रोज' पुरस्कृत हुया था। ग्रीन राज जिसे अब तक लोग कैक्टस कहा करते थे मुझे फूल का पौधा उपाडना है। प्रीता ने अब तक रसोई मे से कोई हिच्या खाली कर चमका लिया होगा। डिभानुमा गमला या गमलानुमा डिव्या। अतीत और वतमान म आदमी साथ साथ क्यो नही चलता? द्रव की जडे सामा य नही हैं कि खोचा और उखड गयी। कितनी गहरी और मजबूत पकड है। मुझे अपनी जडें कमजोर क्यो लग रही हैं । क्या मैं अपनी जमीन कही पीछ छाब आया हू। गीली मिट्टी में घुसा आदमी कैसा महसूस करता होगा । पडोस के घरो से कुछ सिर बाहर झांक रहे हैं। जाने शर्माजी गदगी मे से क्या उठाय ले जा रहे हैं। 'दुपहरी' भी है खूब । जरा भी जोर से पकड़ा और कोमल टहनी अलग। सबधा की तरह नाजुक । प्रीता भी तो कहती है सबध बहुत नाजुक होत हैं छह बनाये रखने से ज्यादा जरूरी होता है निभाना । ठीक हो तो कहती है प्रीता। सबध दुपहरी सरीखें नहीं होते। टही टूट जाने भर से खत्म नहीं हो जाती दुपही। मिट्टी म सपने भर की देर है चार छ दिन मे जडें पकड़ लगी। टूट टूटकर भी जडो से जुड़ जाना ही शायन इस सबका मनपसद बना गया है। हमारी कमजोरी ही कसे हमारी पसद बन जाती है । क्या हम सब भी टूट टूटकर फिर से जुड़ जाना नही चाहत ! फूल वाली दुपहरी वाटर बाटल' में लगी इठला रही है। नही, खुद वाटर बॉटल भी। कल तक यह निरथक इधर से उधर लुढकती रहती थी। अधूरी रह जान पर चीजें कैस अर्थ यो बदती हैं । ढक्कन यो जान से पहले प्रीता इसे कस सहेजकर रखती थी। फिलहाल, यह एक गमले मे तब्दील हुई दुपहरी के साथ इठला रही है। जान क्यो, गमला म लगाये गय फूलो के पौधे मुझे विचित्र से लगते हैं । तुलसी लिए ही गमला लाने की बात महीनो स चली आ रही है, अब तार पर हार- कर प्रोता ने गलता क दो किला कडिच म ही नगा दिया है तुलसी का पौधा । 'तुमन देया, अब तो हमारी तुमसी म मजरी भी सग आयी है। प्रीता चहक 11 उपेक्षित सीपही दुपहरी / 37 . . 1 रही है। पीछे से आकर, अग्नी दोनो हथेलियां उसने मेरे दायें कधे पर दिका दी हैं छेडखानी का अशज, उसकी सांस सांस म बज रहा है। मजरी हमारे भीतर खुशी बनकर फेल रही है। 'तुम एक वडा सा गमता ले आओ न यार । अपन उसम चम्पा लगायेगे। मुझ चम्मा बहुत पस द है। उसकी आँखो म चम्पा महक रही है। पहले पहल ऐमा नहीं था। तब शायद वडा ससार रहा होगा उसवे सपनो का। अक्सर वह अदेखी जगहो पर जारी की योजना बनाती 'अबकी वार, सुनो, जब तुम छुटटी लोगे न तो अपन मथुरा-वृदावन घूमकर जायेगे हैं "उसके लिए विधिवत छुटटी लेन और प्रोग्राम बनान की क्या जरूरत है जब कहोगी चल निकलेंगे।' वरस बीत रहे हैं। यह च न निकलना हुआ ही वहाँ । महज घूमन के नाम पर कहाँ जा सके हम 'भरे जाओ, तुमस तो कही चलने लिए कह्ना बेकार है उसकी जांखो में एक अलग ही भाव तर रहा था। उदामी भरी उलाहना म डूबी यह आवाज इतनी गहराई से आ रही थी कि मुये घबराहट होने लगी। राचमुच, कितने वर्ष गुजर गये। एसी बातो का कोई जवाब नहीं होता। अपराधी की तरह जाने कितनी देर मैं गुमसुम पड़ा रह जाता अगर प्रीता न आ खडी होती लो चाय पी लो | घर में हो, तो पूरी तरह घर में रहा करो।' जक्सर यही होता है । मैं उसे लेकर कुछ न कुछ सोच रहा होता हूँ और वह मुझे कही और पहुंचा समझती है। चीजें क्या कह दिय जाने पर ही अपना अथ रखती हैं ? चाय मेरे सामने स्टून पर रखी है । रखी ही है । प्रीता जमीन पर पर फलाये भालू छील रही है। उसका इस तरह बैठना बहुत सहज होता है पर मैं भीतर तक सहमा रहता हूँ। 'तुम कुछ बताते बताते एक गये थे न कल "सीधी सरल भाषा मे उसका सवाल वगैर किसी भूमिका के ही शुरू हो जाता है। शायद यह निरतर नि शब्द सवाद बनाये रखती है। 'रुक गया था ?' मैं सोच में पड़ गया हूँ। 'कही बाहर जाने की बात कर रहे थे न तुम ?' घुटने के सहारे दायां पैर मोडकर उसने इस तरह से आधी पालथी मार ली है कि बठे हुए बाए पैर के माथ करीब-करीब समकोण बन रहा है । ओह हो। परसो अहमदाबाद जाना है यार चला जाऊँ ?' 'पूछ रहे हो या बता रहे हो ? + - 1 38 / पल प्रतिपल 1 । में 'फिलहाल तो पूछ ही रहा हूँ। 'मुझे तो लगता है तुम कुछ अलग ढग से अपने जाने की खबर भर दे रहे हो। आलू छोलत हाथो की गति ठहर गयी है। वह मेरी आँखो म कुछ पढ़ लेना चाहती है शायद। 'जरा सी बात को तुम मैं उस समझान के लहजे में कहना चाहता हूँ पर वह समझने के नहीं निणय के मूड म है 'यह जरा जरा सी बातें हैं ? आज तक तुम जो कुछ करते रहे हो मुझसे पूछा है कभी तुमने । घर का भी आपिर कोई मतलब होता है एक दिन बाद ही इतनी दूर जाना है और तुम पूछ रहे हो 'समझने की कोशिश तो करो। बगैर टिकट आये कसे मान लता कि मुझे जाना ही है। अब टिक्ट आया तो । विल्कुल ठीक यही तो वह रही हूँ मैं भी। जब तुम जाने का मन बना रहे थे तभी मुझे बता देना चाहिए था। मैं अब ले रहने का मन बना लती। पूछने तो खर तुम्हारी तौहीन होती बता देना चाहिए था मैं औरत जो हूँ न | तुम ठहरे ।' बोलते बोलते साँस जब भीतर तप खीच ले जाती है प्रीता, तो चेहरा लाल हान के साथ साथ वाक्य भी अधूरा छूट जाता है। पर ऐमा होता तभी है जब वह भीतर की झुझलाहट को बाहर जाने स राक लेना चाहती है। मैं अखबार पढने का अभिनय कर रहा हूँ। हाँ, इस अभिनय ही कहना चाहिए। एक खबर भी पूरी नहीं पढ़ पा रहा हूँ। प्रीता का अधूरा वाक्य अलग अलग तरह से पूरा होकर मेरे सामने आ खडा होता है कभी वह मेरे पुरुष होने को आहत करता है तो कभी दवती चली आ रही औरत के एकाएक फट पडने के ताप को प्रस्तुत करता हुआ मुझे हिला जाता है। अधूरी छूट गयी बातें पूरी हो गयी बातो से ज्यादा भयावह होती हैं। निद्वद भाव से आलू छोले जा रही यह औरत बोलती क्यों नहीं ? मैं ही कुछ 1 कह पाता। हथेलियो से बालू के बिखरे छिलके समेटते हुए वह भरी भरी आंखो से मरी आर दखती बहुत कुछ कह रही है। शायद मेरी दुविधा उस तक एक पल मे बहुत कुछ विजली की गति से मुझ तक आ पहुंचा है। प्रीता 'कुछ भी वह सकने की स्थिति मे नही पा रहा हूँ खुद को। समेटे हुए छिलके जमीन पर छोड उठकर वह मेरे बहुत पास आ गयी है । मरी दायीं हथेली उसकी दोनों हथेलियो के बीच दबी है। अहमदाबाद स लौटपर तुम एक दिन सिफ हमार साप घूमने चलोगे न ! मैं और तुम बस और काई भी नहीं। बोलो मजूर 7 'मजूर।

दुपहरी / 39
'तो अव उठो, और तैयार हो जाओ। आज दफ्तर भी जाओगे कि नहीं'
आलू के छिलको के साथ कितना कुछ बिखरा हुआ पल भर म समेट लिया है
प्रीता ने
मैं दुपहरी' के सामने आ खडा हुआ हूँ। कलियाँ फूटने को हैं उनके भीतर
का लाल रण बाहर झांक रहा है।
बगल म आकर खड़ी हो गयी है प्रीता।
'क्या देख रहे हो"
'देखो न, दूसरा फूल भी खिलने ही वाला है।'
'सो तो ठीक है, पर इसे लगाकर भूल मत जाना। ध्यान न दिया जाये ता
पौधे का भी सूखते ज्यादा देर नहीं लगती ।'
उसकी यह बात क्या महज पौधे के सबध मे है ?
रसाई से प्रीता के गुनगुनान की धीमी स्वर लहरी आ रही है। मन होता है,
कभी वह खुलकर गाय और मैं सुनता रहू । सुनता ही रहूँ।
कई रगा का एक फूत मेरी आँखो मे आकर ठहर गया है मैं इस पौधे को
सूखने नही दूगा।
'सुनो, आज मैं खाना नहीं बनान वाली। सारा समय तो बातो मे निकल
गया ।' उसकी आवाज मे हरियाली गध लहरा रही थी।
अधिकार और खुशी से सराबोर उसका यह कहना मुझे भर गया है
हल्की बरखा के बाद मिटटी से उठी सोंधी गध की तरह।
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किरचें O ज्ञानप्रकाश विवेक - गर्मी के दिन और दस ग्यारह पा ववत । ऐसा लगता था आग बरसने लगी है। मैं भीतर कमरे म था, किनाव पउन म व्यस्त । गली से कोई गुजरा था एक हाँक-सी लगाते हुर-चारपाई बुनवा लो चारपाई खाट म बान बुनवा लो हमारी कालानी मध्यम वर्गीय लागो की है और एसे चलते फिरते दुकाननुमा लोग दिन म कई गुजर जात हैं। मैं फिर किताब पढन लगा था। एक सोश सी भी उठी थी जेहन मे~-साले दिन भर स्टिव करत रहते हैं। कभी पुराने जूत और पुरान कपडा के बदले वतन या भाकरी वाले, कभी सूखा जोरा-धनिया वाले, कभी दरियो चादरो वाले और या चारपाई बुनने वाले भी निकल पड़े गलियामा मरी सीश पूरी तरह रास्ता बनार वाहर नहीं निकली थी। पिताजी ने दरवाजा बालकर उसे दूर म बुलाया था। वह गलरी तक चला आया था, भी भीतर कमरे म था और पिनाजी पर गुस्सा रहा था जिस तिस यो हैं। जब से रिटायर हुए हैं एस लोगो को घर बुलाना और सौदेबाजी करना कुछ ज्यादा हो गया है। पिताजी पूछ रहे थे, 'हमने चारपाई बुनवानी है कितने लोगे? जी पहल चारपाई दिखाओ और बान भी।' क्यं पारपाई और वन में क्या मतलब?' मतलब है सार। छाी-बड़ी पारसाई धनी है और वान कैसा है यह मालूम हो जायगा। पिसाबीन उ चारपाई सागर दिखायी था और वान का एक गोसा भी। और योनप मा मुसायम वान सभी तून दपा भी नहीं होगा। फिर कुछ करवान बता पितन सगा? बीबीम पाय। उसन सषित हुए कहा। मैं अब लेत बुना किरचें/41 'बीस रुपये बहुत हैं भई।' पिताजी चौके । मैं मन ही मन बोला-और बुलाओ एसे लोगो को। कुछ पल चुप रहने के बाद उसने कहा, 'बडी खाट है साब, साढ़े तीन किलो बान तो लग ही जायेगा। छ रुपये किलो के लेते हैं, इक्कीस हुए आप बीस दे दना।' 'बारह रुपये दूगा।' पिताजी ने पत्थर लुढका दिया शब्दो का । 'नइ साव बोत कम हैं।' 'तो शायद पिताजी को लगा था कि कम दे रहे हैं। अन्तत सौदा सोलह रुपये पर हुआ था। और वह उलझे हुए बान को सीधा करने में जुट गया। फिर सहमते हुए बोला, 'साब, दिक्कत न हो तो इसी गैलरी म चारपाई बुन दू। बाहर बहुत धूप है ।' अन्तिम वाक्य मे उसने सफाई सी दे दी थी। 'सामने उस दीवार की छांव मे बैठ जा। पिताजी ने बेरुखी से कहा । 'साब वो छाँव तो अभी चली जायेगी।' वह कुछ निराश होकर बोला। 'ठीक है यही बुन ले।' इतवार था, वच्चो की छुट्टी थी। उनके लिए यह चारपाई बुनना मनोरजन था और चारपाई बुनन वाला एक तमाशा। बच्चे उसके गिद जमा हो गये थे। उसने किसी बच्चे से पानी मगाया था। मारे बच्चे हम पडे थे। एक शतान सा बच्चा बोला, 'भाई, तुझे प्यास भी लगती उसने कहा, 'हो।' वच्चे फिर हंस। फिर दूसरे बच्चे ने पूछा, 'तुझे भूख भी लगती है ?' उसने कहा, 'हो।' बच्चे फिर से। तीसरे ने कहा, 'तुझे भूख लगे तो यह वान वा लिया कर। सब बच्चे ठठाकर हंस पडे। मैंन किताव बद कर दी। मुझे बच्चा पर गुस्सा आने लगा था। गरीव का मजाक उडाना अच्छी बात तो नहीं। उसन पर के किसी और सदस्य को पानी के लिए कहा था। पिताजी ने उसे पानी पिसाया। फिर वही खड़े होकर पूछने लग, 'श्व से कर रहा है ये काम" 'सात-आठ साल से वाबूजी। इसस पैले फैक्टरी में था। वो बन्द हो गपी तो ये काम शुरू कर दिया। 'महोने का कितना बन जाता है तरा?" पिताजी उस पुरेदने लगे थे। पिताजी की ऐसी सबदनाएँ मुझे अच्छी नहीं लगता। क्या पता वह पताना चाहता है या नही।

'कभीषम, 42 / पल प्रतिपल भी ज्यादा। कोई बंधी हुई कमाई ता है नइ दाबूजी। कई-कई बार तो तोन-तीन दिन तक कोई चारपाई वनने यो नइ मित्रती। कभी दिन में दो दो चारपात्यो युनने को मिल जाती हैं। वन गुजर-बसर हो जाती है। कभी कभी तो ऐसा भी होता है ।' इतना कहकर वह चुप हो गया। उसे चुप देवर पिताजी ने पूछा, 'क्या होता है।" 'यही कि थाटे का कनस्तर भी खाली होता है और जेव भी। एक दोघश्वास छोला था उसने ! मैंन कमर मे बैठकर महसूम किया था उसके दद का। किसी के दद का कमरे में बैठार महसूस करना, जहाँ पखा चल रहा हो, महानगरीय सिंथेटिक अदा भी हो सकती है। यह बाहर गर्मी म था, वान को सुलझा रहा था और मैं दीवार के इस पोर उसके दद को महसूस कर रहा था मुझ लगा मेरे भीतर उपजा यह दद भी एक प्रकार का छद्म है। पिताजी ने उसस पूछा था, 'क्या नाम है तरा" 'सूरज सूरजप्रकाश " उसने अपना नाम बताया। नाम मैंने भी सुना । चौंक-मा गया। सूरजप्रकाश यह नाम मेरी स्मति की खिडकी खोलार भीतर चला आया। एक सूरजप्रकाश हमारे साथ भी पढता था, उस हम सरजू पहते थे लेकिन चिढाने वाले लहजे मे सनलाइट भी कहा करते थे। वही यह वहीं तो नहीं ? मैंन सोचा। लेकिन दिमाग ने मेरे विचार को झटक दिया-संसार में सूरजप्रकाश नाम के और लोग भी तो हो सकते हैं। सूरजप्रकाश अवेला वही तो नही था जो मरे साथ पढता था। मैं इमी उघडवुन म लग गया था। पिताजा की आवाज आयो, अच्छा नाम है सूरजप्रकाश, अच्छा नाम है। 'हा साव नाम तो अच्छा है पर लो। मुझे सूरजप्रकाश नही रहते।' 'तो' सरजू कहते हैं।' मैं फिर चौक पहा। पिताव एक ओर पटककर उठ खडा हुआ। मुझे उसका नाम ही नही आवाज भी कुछ कुछ पहचानी सी लगी। तब भी एस ही हाता था वाक्य के अन्त तक आते आते उसकी बावाज मरने लगती थी। वह हडबडाकर वाक्य पूरा कर देता। कभी कभी ता उसके शब्द भी लइखा जाते प-इसी बौखलाहट में । इस सरजू क वाक्यो को मैन सुना था और महमूस किया था। वह शुरू मे बात करत वक्त सामान्य-सा होता है किन्तु अत तक पहुँचत-पहुंचते शब्दों को एक साथ जुदका देता है असे शब्द न हो पत्थरो का ढेर हो। में दोपरि गमरी तक आया था। एक उत्सुक्ता भी यो, एक आश्वस्ति भी थी, एक शका भी थी। मैं लगभग तय पर चुना था कि वही सरजू है यह। वही साजूजा हमारे साथ पढ़ता था।

किरचें 1.43 गैलरी से पहले, स्तभ की आड लेकर मैन उसे देखा था। वह उलझे बान को सुलझाने में उलझा हुआ था। मैं उसे देर तक देखता रहा, वही धेसी आखें लम्बा नाक बाहर को निकला माथा, संवलाया चेहरा-कुछ वक्त की धूप में कुछ भूष के सहरा म । माये के पास वही चोट का निशान ! मैं स्मति म डूब गया उसकी चोट का निशान दखकर-वही सरजू भुखमरी से जूझते घर का एक बालक । और अब भी उसी भूख की जग मे मसरूफ । मैंने उसवे हाय दखे। जसे हाथ न हो, मशीन हो। बड़ी तेजी से वान को मुलया रहे थे और गोला बना रहे थे। दो माटे माट गोले बनाकर उसने चारपाई को बनना शुरू कर दिया था। एक वार को वह खडा हुआ, चारपाई के गिद एक परिक्रमा सी पूरी की। खड होने, चारपाई का देखन परखने और अपना नाक सुडकने की क्लाबाजियो क बीच एक बार उसने मुझे देखा और फिर चारपाई म बान के गिरह डालने लगा। जिन्दगी की मुठभेड ने उस शायद फुर्सत ही नहीं दी थी कि वह भरपूर नजरो से मुझे देखें। या यह भी हो सपता था कि वक्त की मार ने उसते एकटक देखते रहने की बुन्वत छीन ली हो। लेकिन मैं उस देखता रहा था। सिफ उसे नही, उसके समूचे शरीर को । शरीर शरीर वहाँ था? जिन्दगी के अकुशल मिस्त्री ने शरीर को घड दिया था जमे। उसन एक बार फिर मुझे देखा था-~कुछ इस भाव से कि मैं वहाँ क्यो खडा हूँ, कि मैं उसे क्यो देख रहा हूं, कि मैं उसके काम मे बेवजह दखलदाजी क्यो कर रहा हूँ? वह तीसरी वार मुझे देखने लगा था कि पलके उठा नहीं पाया था। जसे वक्त के शानिर हाथा ने उसकी पलका पर पत्थर बांध दिये हों और पलकें उठन स पहले झुक गयी हो या जैसे किसी ने खीचकर नीचे गिरा दी हों। तब भी, हो तब भी वह जरें उठाकर किसी को देर तक देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था, जब वह हमारे साथ पढ़ता था । वह सदैव हान भावना से प्रस्त रहता था। उसका शरीर बेडौल था। उसके शरीर का प्रत्येक अग बदसूरत पा। बस एक चीज उसकी हम अच्छी लगती थी उसके लम्बे पतले हाय और उन पर उगी हुई पतली पतली सम्धी उगलियों! अब उसके हाप क्तिने परदर, कितने भद्दे नजर आ रहे हैं। मेरा मन हुआ उम बुता पहचान कराई। लेकिन मैं सोच में डूब गया था पही में तो नहीं जायेगा नही मिदगी तो महसूस नहीं करने लगेगा यह सोचकर कि मैं अपने भूतपूर्व सहपाठी के घर पारपाई सुनने आया है। यही वह मेरी सम्पन्नता न सहम तो नहीं जायगा? नही उमे यथावत् काम करने दूं। उसे अतीत की याद दिनाकर उसके तन्तुओ को शितोडना ठीक नहीं होगा। उसका 44/ पल प्रतिपल स्वाभाविक स्वरूप विगड जायेगा। उसके वर्तमान की चटटान दरक जायगी । वह था चारपाई थी, बान था इधर मैं घा, स्कूली यादें थी, तब का सरजू था सरजू-सहमा हुआ मुफलिसी के बीजगणित को समझता हुआ आंखो मे उदास सी गद लिय और चहरे पर किसी निजन टापू का खोयापन लिये हुए । समक्षन मा वह हमारे साथ पढता था। हमारे मोहल्ले में रहता था। हम सगी साथी हसते खेलते, चुटकुले सुनात, ठठाकर हंस पडते, वह चुप रहता या फिर उदासी के चीथडो मे लिपटी हुई मुस्कान मुस्करा देता। हम उसे चिढ़ाते, सडियल सरजू, कभो हस भी पडा कर। तब वह हम अपनी निधनता के हिज्जे समझा पाने में असमथ था और हम क्लास म भी वह आखिर म बैठता और अक्सर उस सजा मिलती। कभी कापी नहीं होती थी कभी पिताब । एक ही बहाना~कल ले लूगा मस्साब आज माफ कर दो। लेकिन सारे मस्साव उसकी मजबूरी स अपरिचित थे। बेचारा सरजू पर की जजर अवस्था को ढोता छिपाता, स्कूल म कापी कितावो के लिए वहान बनाता और सजा पाता। कभी डडे पडते, कभी बैंच पर खड़ा होता तो कभी बाहर धूप में। एक दिन स्कूल स वापिस आते हुए हमम से किसी न कहा था 'सरजू तरे हाप तरसते रहते हैं मार खान के लिए साले तू सारी कापियां किताबें खरीद क्यो नही लेता?" ऐसा लगा था जस किसी डरावने खण्डहर म कोई चमगादड उडा हो, पछ फडफडाये हो, एस शब्द फूटे थे सरजू के । उसको ही नही उसके शब्दो री आप भी बडवाई हुई पो-तुम तो तुम तो ऐसे कहत हा जम कि मुझ पिटन का मोक हो कौन पाहता है हर रोज कक्षा में बेइज्जती हा पनिशमट मिल तुम तुम्ह तुम्हें क्या बताऊँ ।'बाग के शब्द वह बोल नहीं पाया था ! गला २६ गगापा उसका उसके पिता किसी प्राइवेट कम्पनी म चपरासी थे। पर म अभावो के बबूल पे पाच वष चार भाइ एक बहन । सरजू का दूसरा नम्बर पा। वडा भाई निसी फैटरी नौकरी परता पाइप जब भी उस दरात वह कुछ बुनता उधता नगर माता। हमणा दीवार में माप पीठ टिकाय मूय म मगानों को हल करत हुए। मरजू के दाछाट भाई ५-इममा म सगास, रोत-पीटत । पिता, fuोपरशुराम को भाति सदव गुस्सार हुए यही हाल मा का था। जब उस प्रभार पहाव यह बच्चों का पीरवी, व बाहर गती गरोस म कोई गड़ा होताना किरचें / 45 वह बच्चो को पीटती। यानी अपनी तमाम कुरा बच्चा को पीटकर उतारती। पूरे का पूरा घर हम भयावह लगता लेकिन उस घर मे सरजू की बहन हमे तपे- झुलसे माहोल मे शीतल छांव जैसी महसूस होती। हम उसे दीदी कहते थे। सरजू हम चिढे से रहते थे, लेकिन उसकी बहन यानी हमारी दीदी, उसके लिए हम सरजू के घर जाते । वह उम्र मे हमस दो तीन साल बडी थी। एक तरह स जवान थी। मामा य रग रूप लम्बी दुबली पतली। लेकिन व्यवहार गजब का था। कई बार ऐसा होता कि मां से उसका झगडा हो चुका होता, वह मां स पिट चुकी होती, हम पहुँचते तो वह ऐस खिलखिलाती जैसे दिन भर ठहाक लगाती रही हो। हमारे लिए चटाई विछाती, हम विठाती, पानी पिलाती। हमसे चुटबुल सुनती तो खूब हसती। ऐसी ही एक शाम को हमारी चुटकुला गोष्ठी खत्म हुई थी, हम उठकर चले आय थे सरजू भी साथ था। हमन उस कहा, दीदी बहुत अच्छी है । पूव हँसती- हेसाती है।' सरजू ने बड़ी गम्भीरता से कहा, 'जो दीदी तुम्हारे साथ खुलकर हंस हंसा रही थी न, उसे कल रात स रोटी नहीं मिली।' क्याsss?' हम एक साथ चौक पडे थे। 'हाँ मा से झगडा हुआ था उसका और मां ने रोटी नहीं दी। सरज की बात सुनकर हम सब सन्नाटे से घिर गये थे। दीदी की हमी के पीछे छुपे दद को हम जरा भी महसूस नहीं कर पाये थे। हम हैरान थे। भूखा रहकर मोई कस हंस सकता है? स्कूल म, वाहर, आधी छुट्टी या पूरी छुट्टी मे सरजू हमारे साथ रहता, एक तरह से तो चिपका रहता था हमसे । हम जो खरीदते, उसे भी देते। वह इकार में सिर हिलाता लेकिन आँखो मे छुपी भूख हाथ फैला दती। हमने तय कर लिया था इसे एक दिन सीधा करेंगे। बस एक बार हमारी अटी पर चढ़ गया तो बच्चू उम्र भर याद करेगा । और वह मौका हमारे हाथ बहुत जल्दी लग गया था। एक दिन वह बाजार की तरफ हमे मिल गया था। हमने उसे रोककर पूछा था, 'कहाँ जा रहा है उसने कटोरी दिखाते हुए कहा, 'मां ने घी मंगाया है, तीन रुपये का।' 'अवे साले बकवास करता है तीन रुपय का क्या थी आता है ? गोलगप्पे खाने जा रहा होगा अकले अकेले।' हममे ओमी सबसे ज्यादा उद्दड था, बलिष्ठ भी था और मुहफ्ट भी, उसी ने सरजू को हडकाया। भोमी के सामने सरजू की बोलती ब द हो जाती थी। वह कंपकंपाते हुए बोला, 'नई सच्ची, घी ले जाना है।' एक अप्रत्याशित खौफ उसके चेहरे पर फलने 46/ पल प्रतिपल लगा था। - ?' वेद, लिल्ली, शर्मा, जग्गी, सुभाष, मैंने और ओमी न उस पर सा लिया था। वह चुप था और हम फिकरे कस रहे थे। ओमी ने देया कि हम भी उसका समयन कर रह हैं तो यह पागल भैग की तरह सरजू पर झपटा और तीन रुपय अपने कब्जे म लिए । फिर उसने एलान किया पला माज सरजू की तरफ स गालगप्पे खाते हैं । हम गोलगप्पे की रेड्डी की ओर चल पड़ थे। बेचारा सरजू भौंचक्क सा देयता रहा था हम । किकत्तव्यविमूढ़ सा बहा रहा कुछ पल फिर चल पड़ा हमारे पीछे पीछे वाली क्टोरा लिए। जम चल न रहा हो पिसट रहा हो। 'ले तू भी या!' सुभाप ने गोलगप्पा उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा था। और सरजू की छलाई फूट पड़ी थी। हमन उसे हरकाया था, इतना बड़ा हो क रोता है। साले मूड विगाड रहा है हमारा!' लेकिन हमारा ठट्ठा मखौल बड़ा महंगा था उस। वह खाली कटोरी लेकर पर पहुंचा था। मां न देखा तो दहाही, घी कहाँ है ?' 'नई लाया।' सहमा सा जवाब था सरजू का। 'क्यो नई लाया 'पैसे लड़को ने छीन लिए। "और लाटसाब ने पंस दे दिये । यहाँ मैं दाल को छौंक लगाने क लिए बठी हूँ। बेटा दोस्ता के साथ अय्याशी कर रहा है। उसके बाद मां का गुस्सा उबलत हुए पानी की तरह खोलने लगा था । अगीठी के पास पडे चिमटे को उठाकर सरजू पर दे मारा था उसने । चिमटा सीधा सरजू के माथे पर लगा था। जरा सा इधर उधर होता तो जाँख नही वचनी थी। माथे से खून की मोटी धार बह निकली थी, सरजू तो वही का वहीं बैठ गया था। अब तक का दृश्य हम सब बाहर दरवाजे के रोजन से देख रहे थे। सरजू के माथे से खून बहता देखकर हम सब सहम गये थे। कोई नहीं बोला था किसी से । सब अपने अपने घरा का लौट गये थे। सरजू के माथे पर चोट का निशान देखकर अनायास सारी घटना जेहन में रेखाक्ति हो गयी पुरा । उमने एक बार फिर मुझे देखा है और मैंने उसे। उसकी बाखा का बुज्ञापन एक बार फिर मुझे कही अतीत की तलहटियो म उतार ले गया है। हमारे कस्बे के जनपद में विनान प्रदशनी थी। वह प्रदशनी हमे दिखाने के लिए हमारी रक्षा का टूर प्रोग्राम बना। हम तो चहक उठे थे। बाहर जान का, घूमने फिरने या अच्छा मौका हाथ लगा था। कक्षा के इक्यावन विद्यार्थी प्रसन्न थे उदास था तो केवल सरजू । तब हम उसकी उदासी का सबब नहीं समझ पाये थे, जरूरत ही नहीं थी। हम उमग में थे तरग म थे। सरजू उदास है हम इसकी खबर ही नहीं हुई थी।

-11 [करच /47 दस दस रुपये लिए गये थे । सबने दिये थे। बस एक सरजू ही था जिसने पैस जमा नहीं कराये थे। मस्साव ने पूछा था सरजू से, 'क्यू रे तू नहीं चलेगा हमारे साथ 'नइ जी।' 'बस एसे हो।' सरजू के मुख स शब्द टूट थे और विवशता की किरचा की तरह बिखर गये थे। हम बस मे बैठ गये थे और वह हम यस की खिडकियो स दखता रहा था- अवसादपूण नजरो से। उसकी आँखो के पीछे दद के चीखत काले समदर थे और उस चेहरे पर पसरे हुए थे सन्नाटे, महज स नाटे । बस चल पडी थी और वह वस के पहियो के निशान पर चलता रहा था दूर तक, जहाँ तक कि उस बस नजर जाती थी, जहाँ तक कि हमारे हाथ हिलते हुए नजर नात थे, जहाँ तक कि वह बस की रफ्तार का पीछा कर सकता था। अन्नत एक अकेला हाथ हिलता रहा था शू य म । वह हाथ सरजू का था। हमारे हाथा म उत्साह के सूरज उग थे, धप की लकीरें थी और उसके हाथ म मुह चिढ़ाता बंधरा था। अधरा अब भी उसके हाथा म है । लेकिन किसी महनतकश की तरह वह उस अधेरे स लड़ रहा है । तोड रहा है अंधेरे के तिलिस्म को । मैं उस दख रहा हूँ। वह मसरूफ है चारपाई बुनने मे । चारपाई के चारो तरफ घूम रहा है, बठता है, उठता है और पूरी शिद्दत के साथ लड रहा है अपने साथ जिन्दगी के साथ। यही लडाई उसकी बहन यानी हमारी दीदी भी लडती रही थी और जन्तत । जब से सरजू स घी के पैसे छीनकर गोलगप्प खाये थे, हमारी हिम्मत नहीं हुई थी कि हम उसके घर जात । सरजू भी कई दिन तक हम नहीं मिला था। गर्मी की छुटिटया था। स्कूल बन्द थे । वाकी मित्र शाम को मिलते लक्नि सरजू से मिलना नहीं हुआ था। एक दिन वह हडबडात हुए आया था। उसकी आवाज म पआिया- पन था और आंखो मे भी। हम जोमी के घर बैठकर ताश खल रहे थे। 'क्या हुआ?" मोमीन यता फेरते हुए पूछा। 'वहन बीमार है बहुत ज्यादा खून की उल्टियां हुई हैं।' 'क्या? हमने चौंककर पूछा था। हम जिस दीदी कहते थे वह वीमार थी और हम मालूम ही नहीं था। यी उल्टियां हुई हैं। डॉक्टर के पास ले गये थे पिताजी। उसने पद्रह वाय फीस के लिए और बहुत सारी दवायें लिख दी हैं।' 'ता दवायें ली हैं या नहीं?' ओमी ने पूछ। उसन ताश के सारे पत्ते पटक 48 / पल प्रतिपल दिय थे। दो क्लिो । सरजू ने। 'क्यो" तल्खी से पूछा था सुभाष ने । 'पिताजी डॉक्टर को जो पद्रह रुपये फीस दे आय हैं, उसका गुस्सा नहीं उतर पा रहा ऊपर से ये दवायें " 'तो दवायें नही लेंगे।' दीघश्वास लेकर सरजू बोला, 'तुलसी के पत्ते डालकर चाय पिला दी है।' 'लेकिन दवायें। 'डॉक्टर कहता था डेढ़ सौ रुपये के करीब लगेंगे दवाओ पर।' 'तो' पिताजी मा से कह रहे थे डेढ़ सौ रुपये मे तो दस किलो बाटा, चीनी, दो किलो घी और हफ्ते भर का फुटकर सामान खरीदा जा सकता है।' 'लेकिन दीदी को कुछ हो गया तो? वेद विचलित होकर बोला। 'पिताजी को छुटकारा मिल जायेगा।' एक ठण्डा सा जवाब दिया था ओमी उठा था। बिना कुछ बताये कमरे में घुसा था। रंक मे पड़ी किताबें उलट पलटकर एक किताब निकाली थी। उसमे नोट थे-साठ रुपये। 'सरजू', अकुलाकर वोला ओमी, 'जा जल्दी से तू दवाइयो वाली पर्ची ले भागकर जा कुछ तो दवाइयाँ आ ही जायेंगी।' जब तक सरजू आता हम अपने-अपन जेब खच उठा लाये थे। एक सो पसठ रुपय थे हमार पास । ओमी ने कहा, 'तुम सब लोग दीदी के पास जाओ मैं दवाइयाँ लकर आता हूँ।' दीदी चारपाई पर पड़ी थी। हम उसकी चारपाई के पास बैठ गये थे-चुप चाप वह निनिमेष हम देखती रही थी। दीदी की दो आंखें ऐसे लग रही थी बस जिन्दगी के मरुस्थल में पढी हो-प्रतीक्षारत। इस बार हमारी गोष्ठी में कोई चुटकुला नही था, कोई ठहाका नहीं था। बस था तो कवल चुप्पी, सिर्फ उदासी, पीड़ा । हमारी आत्मीयता, हमारा स्नेह, हमारा प्यार, दीदी के प्रति घना, सारे भाव हमारी बापो के कोर के पास ठिठक गये थे। हमारे शब्दो म सच्ची भावना थी, दुलार पा, कमजोर परता आत्मविश्वास था-दीदी, तुम ठीक हो जामोगी हाँ दीदी हमारा मन कहता है, तुम जरूर ठीक हो जाओगी ।' सेक्नि चारपाई पर पड़ी दीदी ने एक बार करवट बदली पी, पाड़ा उछली पो, गरीर म ऐंठन-सी हुई पो और गले से हिचकी की आवाज वही हिचकी विदगी सबंधो गर का तोड़ पयो यो। सुढ़क गयो पी दीदी एक भोर और हम आ 4 किरचे/ 49 । सब सन्नाटे को पीते लगे थे। ओमी आया था, बडा सा लिफाफा था उसके हाथ में दवाओ और टीका का। दूर खड़ा हुआ था, जैस समझ गया हो सारी वास्तविकता। वही जमकर खड़ा रहा था--शिलालेख सा! दीदा नहीं रही थी जो उसके लिए चटाई बिछाती, उसे विठाती दीदी तो मर चुकी थी। दीदी की दवायें ओमी के हाथ मे थी आमी घर से बाहर चला गया था। कुछ देर बाद हम भी बाहर आये थे। बाहर का दृश्य देखकर हम ठग-से खडे रहे थे। आमी पत्थर उठाकर कपसूल और टीको को चूर-चूर कर रहा था, उसकी आँखो में औसू थे, हाया म पत्थर और जमीन पर बिखरे हुए कंपसूल, टीको की शीशियां, उनकी किरचें हम सबब किर देख रहे थे। लग रहा था जैसे वे किरचे जमीन पर नहीं पड़ी, हमारे भीतर उग खड़ी हुई हैं। वही किरचें मुझे सरजू की आँखो मे नजर आयी हैं । सम्पन्न लोगों के सपने भाकार पाते हैं कि तु गिधन के सपने किरच बनकर चुभते रहते हैं आँखो में उमरकर। वह चारपाई वुन चुका था। तीन साढ़े तीन घण्टे लग गये थे चारपाई बुनने म। चारपाई बुनकर वह खडा हुआ था। माथे पर धुचुनाय पसीन को अपनी कमीज की आस्तीन से पाछकर तनिक आश्वस्त हुआ। गर्मी, तपिश और थकान के बावजूद उसके चेहरे पर तसल्ली की लकीरें थों, जैस मेहनतकश के चेहर पर होती हैं --काम निपटा चुकने के बाद । चारपाई के चारो कोनो से खडे होकर उसने चारपाई का मुआयना किया था, किसी आलोचक के नजरिय स । आश्वस्त हा चुकने के बाद उसने आवाज लगाई, बाबूजी चारपाई तयार है।' पिताजी ने चारपाई देखी तो उसने पूछ लिया, 'बाबूजी कैसी बुनी है।' 'अच्छी है वहुत अच्छी है। ठहर मैं पैसे ले आता हूँ।' पिताजी पसे उठा लाये थे। पैस देते हुए उहोने पूछा, तूने दोपहर को रोटी भी नहीं खायी, यहाँ खायेगा रोटी?' 'नई साव।' 'अरे खा ले भूखा होगा तू भूख तो लगी होगी तुझे । हम सब भी खा रहे हैं तुझे यही भिजवा देता हूं।' वह फीकी-सी मुस्कान के साथ वोला भूख तो लगी थी साव लेकिन पस नई थे । अब पसे मिल गये हैं। बाजार से खा लूगा।' 'अरे यही खा ले।

50 / पल प्रतिपल 'नई साब, अपना असूल है। 'क्या? 'मैं मजदूरी लेता हूँ अनुदान नही।' मैंने उस चौंककर देखा। उसकी आखो मे चमक देखी थी मैंने पहली बार चमक और चेहरे पर आत्मविश्वास ! पहली बार वह तनकर खड़ा हुआ था। उसका आत्मविश्वास और तनकर खडा होना मेरे लिए अद्भुत था। वह जाने लगा था, उसने मुझे आखिरी बार देखा जैसे आंखो से प्रश्न पूछ रहा हो-बहुत बडे आदमी बन गये हो, क्या इसीलिए नही पहचान रहे मुझे।

माती 0 सुनील कोशिश माती बरामद मे घूम घूमकर चिल्ला रही है। बीच बीच मे वह हाथो को नचा लेती है और हिलने डुलने से बार-चार नीचे को खिसक आये धोती के पल्ले को सिर पर रख लेती है। माती के बक बक करने और जोर-जोर से चिल्लाने की आदत से सभी वाकिफ हैं । घरवाले भी, मुहल्ले वाले भी। माती की ककश आवाज जब घर की दीवारो को पार करती हुई मुहल्ले वालो के कानो म पहुँचती है तो वे लोग अजीब सा मुह बनाकर बुदबुदाया करते हैं-'क्या रोज-रोज का तमाशा है ?' घर के लोग भी इस आवाज को सुनकर अनसुन और बेसुध से अपने-लपन कामो म लगे रहते हैं बदस्तूर । माती जब तक कान पर आकर नही चीखती, कोई उस तरफ खास तवज्जो नहीं देता। उस ऐसा करन म खासतौर पर बड़ा सुकून मिलता है। वह अभी बिस्तर मे पड़ा है। सुबह के साढ़े आठ बज गये हैं। दोपहर की पाली की ड्यूटी खत्म करके वह रात के बारह बजे के लगभग घर लौटा था। मोती को आवाज स उसको नीद उपट जाती है । उस माती पर बेहद गुस्सा आता है। रोज चख चख मचाय रहती है। सुबह ही सुवह महाभारत शुरू कर दिया। घरन हुआ साला, नौटकी हो गयी। दो घडी भी चंन नहीं लती। आखिर कब वह वक्त आयेगा जब माती चन से बठेगी। उसका मन होता कि माती स कहे अब तुम्हारी उम्र पीढ़े पर बठकर रामायण की चौपाइयां पढ़ने की हो गयी है। सुबह ही सुबह गगा नहा बाया करो और थोडा राम का नाम जपा करो। दुनिया- दारी के ये सबसमट छोडो अब। माती का चेहरा आँखो में आते ही उसकी रूह कांप जाती है। वह भला क्या कहेगा माती से। पिताजी को ही हिम्मत नहीं हुई भाष तक जो कुछ बोलें। पिताजी बरामदे म मूड़े पर से परे हैं। मह लटकाय, मां नीची किय व भमादार वपन दाहिन हाप के अंगूठे को वजनी के चारो बोर घुमाव जा रहे हैं।

52 / पल प्रतिपल पिताजी कल रात ही गांव से लौटे हैं। गांव को वची पुची को जमीन रह गयी है, वह टेसू वाला बाग ही है। बाग भी कहाँ रह गया है यद । मुश्किल स वारह चौदह पढ हाग। कुछ पद आधी, तूफान में गिर गये, कुछ गांव वालो ने काट हाल । इसी जमीन का मौदा तय करके पिताजी लोटे हैं। जमीन बेचन का अपना इरादा उहोने माती का नही बताया था। इसी बात को लेकर माती सुबह से उवात पा रही है और तमाम पर सिर पर उठाय हुए है। माती को तज आवाज उसरे काना से टकराती है । 'मैं पूछती हूँ जमीन बेचने की बात तुम्हारे दिमाग में आयो पिसलिए ? मुपसे पूछे बगर सौदा भी कर नाय । मुनिया की शादी करंगा । इसी बरस जाडोमा यस जमीन विक लेवे।' 'मुनिया को शादी की चिन्ता करन की जरूरत नहीं है तुम्ह । उनके लिए मैं बैठी हूँ अभी। जमीन नही बिकेगी। सुन लिया न।' 'चौबीस साल की हो गयी लहकी। कव तक घर मे बैठी रहेगी। तुम क्या करोगी मुझे मालूम है । गुड्डी के लिए क्या किया तुमन? ये जो इतना पैसा अपने नाम से दवाय बैठी हो, साथ लेबर नही जा पाओगी ऊपर । अब एक य ही जिम्मेदारी रह गयी है मेरे सर पर । इस पूरी करके ही चन स बैलूंगा।' 'कह देती हूँ जमीन क्तई ही बिकेगी । गुड्डी की बात मुझस न किया करो। यह थी बदजात । नाक कटानी थी खानदान की सा स्टा गयी। 'जमीन भी छाती पर लकर जाओगी ऊपर । ये ही तो रह गयी है मेरे पास । इसे वेचूगा अब में।। देखती हूँ, क्स बेचते हो।' पिताजी चुर हो गये। माती बडबडाती हुई रसाईघर मे चली गयी। वह उठकर आंगन मे निकल आया। चार निगाहो स पिताजी की ओर देखा। वे बुत बने वठे थे। माती के बडबडा की आवाजें अभी भी उसके कानाम आ रही थी। वह बाथरूम में घुस गया। +- उस याद है बचपन म बहुत शतानियां करता था वह । राधेलाल मिडिल स्कूल म पढता था तब वह। स्कूल में रोज कोई न कोई हगामा जरूर करता। कभी किसी की किताव फाह डालता और कभी किसी की दवात उड़न देता। स्कूल को छुटटी होत ही सीधा मैदान म भाग जाता। थोड़ी दर वहाँ कचे खलता, मगहा-फमाद करता। फिर जब जोरो की भूख लगती तो घर लौटने का होश थाari घर पर उसकी शिकायतें याती थी। माती व मारता थी । यह माती की मार से बहुत डरता या लेकिन फिर भी अपनी हरकतें छोड़ता नही था। परम माती / 53 उसका मन नहीं लगता। माती वेगार के काम बहुत कराती थी। दोपहर मे खुद तो सो जाती, उसे और गुड्डी को हुक्म मिलता कि दोनो बारी बारी स पखा खीचें । छत मे एक लकडी का तजा लटका होता था जिस पर कपडा बंधा होता था। उसी के बीच से एक रस्सी बंधी होती थी जिसे खीचना होता था। थोडी देर खीचने पर हाथ दुखने लग जाते थे। वह भरी दुपहरी मे विवाड खोलकर बाहर भाग जाता और मुहल्ले के लडको के संग नदी पर नहाने पहुंच जाता। नदी पार कर खेतो स ककडी, खरबूजे, तरबूजे तोडे जाते और खाय जात । कभी जामुन तोडे जात ता कभी शहतूत। उसके पाजाम की जेब में गुरोल और छाट छाट पत्थर भर होते। पर लौटकर आन पर माती उसकी डण्डे से खबर लेती । वह भी ढीठ होता गया। मार की परवाह नहीं करता। पिताजी के पास शिकायत पहुंचती तो वे बस इतना ही कहते माती से-'शैतानियां करने की उम्र है । अब नहीं करेगा तो क्या बुढाप मे करेगा । छोटी छोटी बातो पर क्यो खामख्वाह मारती हो।' पिताजी बहुत सीधे और सरल स्वभाव के शख्स रहे। धम कम म उनकी खास रुचि रही। घर के मामलो म उनका दखल जरा भी नही रहा । कानूनगो की अपनी नौकरी के सिलसिले म अक्सर ही उह दोरो पर जाना पड़ता था। पिता बहुत प्यार करत थे दोनो को। मुनिया तब बहुत छोटी थी, शायद पैरो परो चलना सीख रही थी। हर साल दशहरे के मले पर पिताजी दोनो का मले म घुमा लात थे। 7 बावा तब यहीं रहा करते थे। सारा दिन अपने कमरे में बने रहते । सुवह और शाम छडी लेकर कम्पनी वाग तक घूम आत या अपने वक्त के दोस्तो के साथ शनरज खेलन बठ जात । रिटायड जिन्दगी के क्षण, एकदम खाली खाली, बुझे बुझ से। बाबा उसे बहुत लाड करते थे। अपने साथ धुमाने भी ले जात थे कभी कभी। रास्ते भर उस बताया करते कि सुबह ही सुबह घूमने के क्या क्या फायदे हैं। रात मे । अक्सर ही उसे अपने पास बुना लेते और कहते, वेटा, जरा मेरी कमर तो खुजला। वह कमर खुजाता जाता और बावा उसे परियो और राजा- रानियो की कहानियां सुनाया करते। वावा उस बहुत अच्छे लगत। वावा के छोटे मोटे काम वह ही किया करता ! माती को यह सब अच्छा नहीं लगता था। उन दिनो भी माती के चीखने-चिल्लान की आदत बदस्तूर थी । वह उसे बाबा के पास जाने के लिए मना करती थी। वह मौका मिलने पर बाबा के कमरे का चक्कर लगा आया करता। माती सारा दिन नौकरा पर चीखती चिल्लाती रहती थी। बावा का शोर- शरावे से वेसाब्ता नफरत थी। पिताजी दूदकर नौकर लाते थे लकिन वह बीस- पञ्चीस दिनोस ज्यादा घर म ठहर नहीं पाता । एक बार कालीचरन नाम के नौकर को माती ने कोठरी म बद कर दिया था। उस गरीब का कसूर इतना ही था ।

54 / पल प्रतिपल - कि धूप मे रथा के लिए अचार का वा मतवान उठात वक्त उसके हाथ से छूट गया था और उसके कइ टुकड हो गये थे। पदह सोलह वरस का लड़का था वह । सारा दिन काठरी म पद रहा। शाम को उसे बाहर निकाला गया। मतदान के पैमे उसकी तनख्वाह से काट डालने की धमकी दी माती ने । रात भर वह घर पर ही रहा । सुबह होते ही वह भाग गया। ऐस ही एक नौकर को माती न तहा तड चौटे मार दिय थे। विस्तर लगाते वक्त बडशीट म कुछ सलवटें रह गयी थी। दो दिनो बाद वह भी निकल भागा। इस तरह कितने ही नौकर और चले गये। पिताजी परेशान थे। फिर बाद में यह घर इस बात के लिए बदनाम हो गया कि इस घर की मालकिन एक जालिम और क्रूर औरत है। नौकर तो यूं ही नहीं मिलते थे। पिताजी दूढ-ढांढकर कोई ले भी आत तो उसे भडकाने का काम मुहल्ले वाल एक दो दिन म हो पूरा कर देते। इसस पहले कि माती उमे अपना क्रूरपन दिखाय, यह रफूचक्कर हो जाता। नौकरा का काम उसके और गुड्डी के सिर आ पडता। उसने मशा महसूस किया कि माती का व्यवहार अपने बच्चा और नौकरा के साथ एक जसा ही है । हैंडपम्प के नीचे माती एक बडा हडा रख देती और उम आडर मिलता कि वह उस पूरा भर दे। उस पीतल के हड मे बारह वाल्टी पानी आता था। उसे मालूम था घट भर नल चनायगा तब कही जाकर वह भरेगा पूरा। वह उचक- उचकर हैडपम्प चनाता और थोडा ही दर मे हाफ जाता। माती चिल्ला पडती, 'खाता है ठूस मकर । काम करते तरी दादी भरती है।' दादी को मरे कई वरस हो चुके थे। दादी के मरने वाली बात उसे अच्छी नहीं लगती। गुड्डी उससे घारा बडी थी। स्कूल जानी थी और सारा दिन घर के कामो में जुटी रहती थी। कभी उसस परांठा या सब्जी वगैरा जल जाती तो माती उस बाल पकडकर खीच लेती और उसका सिर रसोईघर की दीवार मे टकरा देती और बकने लगती, कहाँ ध्यान लगा रहता है बरा। जिस पर म जायेगी, वहां भी ये ही सब करेगी। थोवगताड दूगी तरा।' और कभी-कभी वह उसकी कमर मे बेलन या विमटा जड दती। गुड्डी बिलबिला पडती। वाया शोर सुनकर अपन कमरे से निकल आते और माती म कुछ कहते तो उन पर भी वरम पडती। बावा चुपचाप वापस लोट जात । एम ही छोटे छोटे कामो म गलती हो जाने पर उम भी मार पडती थी। माती वावा म बहुत चिढ़ती थी। एक मतवा वाग ने अपन किसी दोस्त से कहा पा पिताजी के लिए-मरे तीन लहको म यम एस य ही जनखा किस्म का पंदा हुआ है। चुप यहा जोरू रसर देखता रहता है। दो सात जमादे फसकर। सब तेवर दीले हो जाएं। नहीं होता ये सब तो साले यामो जोहको गाजिया और गत रहो दिदगी भर। यह बात घूम फिरकर पाती के कानों तक पहुंष गपी पा। अब तो माती और भी ज्यादा पिढ़ने लगी पी पाना स । एक दिन माती/55 न जाने क्या बात हो गयी थी, माती ने आगन म खडे होकर बाबा का बहुत खरी- खोटी सुनायी थी चीख चीखकर। दो दिन बाद पिताजी दौरे से लौटकर आय। बाबा ने अपना सामान बौध लिया और घर के अदर आकर पिताजी से बोले, 'बेटा बस बहुत हो गया। अब मैं यहाँ नही रहूँगा। और बाबा चल गये ताऊजी के पास । पिताजी कुछ भी तो नहीं वाले, उनके जाते वक्त । माती के रवये स व मन ही मन बहुत दुखी रहत थे। माती स छुपाकर वे बाबा का लगातार रुपय भेजते थे। माती उन दिनो बडे लटके से रहती थी। बढिया स बढ़िया कीमती साडियां पहनती थी। सिंगार भी खूब गजब का करती थी। चेहरे पर पाउडर की मोटी पत जमाती थी, शायद अपन सांवलेपन को दांपने के लिए। गहरे लाल रंग की लिपिस्टिक माथे पर चोडी विंदी लगाकर वह पूरे मुहल्ले का चक्कर लगा आती थी। इसो साज सिंगरम वह मुहल्ले की औरतो के सग हर हर महादेव फिल्म देख भाती थी। पान खान का उस शुरू से ही शौक रहा । साधु सतो की बातो पर उमे ज्यादा विश्वास रहता है । उहे वह सवार ही मौके वेमौक खिलाती रहती । उस याद है माती उसकी और गुड्डी की दाल में एक एक चम्मच घी डालती और साधुओ को खिलाते वक्त उनकी दाल में एक-एक बड़ा चम्मच घी डालती थी। साधुओ के कहने पर ही यह अवसर पूजा, हवन व सत्यनारायण की कथा आदि कराती रहती। गुड्डी ने इण्टर पास कर लिया था। माग पढ़ने के नाम पर मातीने फुलस्टाप लगा दिया। उसका कहना था, नोकरी करानी नहीं है। जब चूल्हा चौका हो कना है तो पसे जाया किसलिए करें? पढने लिखने मे उसका कतई मन नही लगता। बुद्धि भी उसकी ज्यादा तेज नही थी। हाईस्कूल म फेल होत जान का उसका यह तीसरा मौका था। पहले बरस जब इम्महान दिया था तो तीन विषयो मरल जोरो मिला था। दूसरे साल हाजरी कम होन की वजह से इम्तहान में नहीं बढ़ पाया था। महीनो स्कूल नहीं जाता था। अलबत्ता घर से किताबें लेकर रोज निकलता पा। सारा दिन इधर-उधर घूमता रहता। उन दिनो फिल्म खूब देखता था। 'नदिया क पार, नकाब', मिर्जा गालिब , बमन बहार तो उसे खूब याद हैं अभी भी। गाने की किताबें भी उसके पास पूरी पचास यो। तलवारो को मलाई पान सोन उस बहुत अच्छे लगत पे। उन दिनों तलत महमूद का सितारा सन्दो पर या। बहुत गान याद ५ उस। उसकी आवाज भी बहुत अच्छी थी उस । रामलीला की सकियो म यह यूब जमकर गाता था। रावण के रोल में उसको बहुत धाक पी। नई मरो वाल उस हर साल बुलावा भजत थे। पर वह संवाद बोलता पा तो जनता बाह-वाह कर उठनो पो। मास्टर राधना तो उस रापण हा कहकर पुकारत पे मास मअक्सर कह पे गवण ता बहव विज्ञान - 58 / पल प्रतिपल कि अब वह गुड्डी को घर म नही आन देगी। लडका स्टेट बैंक म क्लक था। बाद मे वह गुड्डी को लेकर अपने घर आया था। पिताजी कई मतवा उससे मिलकर आय थे। वह भी दो मर्तबा उस मिल आया था। वह बाथरूम से बाहर निकल आया। आगन म तार पर लटके तौलिये को खीचकर मुह पाछने लगा। तभी माती के चिल्लाने की आवाज उसके कानोस टकरायी, 'आंखें फूट गयी हैं तरी । दूध अंगीठी पर रखकर न जाने कहां खा जाती है चुडैल । तेरा भी किसी से चक्कर चल रहा है क्या?' मुनिया चुप पटरे पर वठी थी रसोई- घर में । उसका ध्यान चूक गया था शायद । अंगीठी पर रखा दूध उफनकर फल गया था थोडा-सा। उम माती पर गुस्सा आया फिर अपन पर भी गुस्सा आया। वह भी तमाम परिस्थितिया स सामना करने का साहस कहाँ जुटा पाया है आज तक। पिताजी ज्यो के त्यो मूढे पर बैठे थे। वह कमरे मे जान लगा तो पिताजी ने धीरे स कहा 'मुनीश बेटे, जल्दी तयार हो जाओ । कचहरी चलना है। रजिस्ट्री आज ही हा जाय तो अच्छा है।' जी, अच्छा'-कहकर वह कमरे म घुस गया। उसे पिताजी के कहे शब्दो पर बेहद आश्चय हुआ, साथ ही खुशी भी। उसी खुशी के तहत वह जल्दी जल्दी कपडे पहनने लगा।

बैताल की छब्बीसवीं कहानी 0 पुष्पपाल सिंह वैताल का शव धो पर ढाते-ढोते वीर विक्रमादित्य बहुत थक गया। वह बोझ उठा और बोला हे बताल | तुम्हे ढात-ढोते मैं बुरी तरह थक गया । जम्बू द्वीप में अव वकीमवी सदी भी आने को हुई और तुम हो कि मेरा पीछा ही नहीं छोडते । हमेशा मुझे प्रश्नाकुल स्थिति में रखे रहत हा, अब सा मेरा पीछा छाडो।' विक्रम की ऐसी वेमुरव्वत वात सुन वैताल बोला, 'राजन्, बस अभी स घबडा गया? मैं तुझे प्रश्नाकुल बना चिंता म इसलिए रखता हूँ कि प्रश्नाकुलता और चिंता आधुनिक युग और आधुनिकता दोनो के लक्षण हैं । मेरा शव अपने कधा पर ढोते ढोते तू इक्कीसवी सदी की आर आ चुका है इक्कीसवी सदी में तो और भी अधिक प्रश्नाकुलता रहेगी। अच्छा चल, जो तू मेरी इस छब्बीसवी कहानी के प्रश्न का उत्तर दे दे तो मैं तुझे मुक्त कर चला जाऊगा | ता सुन 11 दिल्ली नगर से पच्चीसेक कोस दूर एक नगरी है, छोटी नगरी। उसका नाम आज कुछ है तो और पर हमारी पिछली कथानो के अनुरूप धमपुर नाम ही ठीक रहेगा। बडी सभ्रात नगरी है यह धमपुर ।। खूब समृद्ध लोग हैं यहां के । यहाँ फूलवती नाम की एक विधवा रहती है। एक बड़ी अजीब बात है इस नगरी भी एक गली की। इसमे फूलवती ही नहीं ग्यारह घरा म सात विधवाएं रहती हैं । यू यह नगरी खाती पीती और सभी तरह के ऐशो आराम से भरपूर है। बिजली सडक ट्रैक्टर, टी०वी० और कुछ घरो मे कूलर तथा फ्लश भी लग गये हैं। इतना सब होते हुए भी इस नगरी को लोग नगर कम, गाँव ज्यादा मानते हैं या निखालिस गांव ही मानते हैं क्याकि यहां सभी परिवार प्राय खेतिहर हैं। इस नगरी म प्राय सब मेहनत कर पसा बनाते हैं और मजे का जीवन जीते हैं। वम, ये विधवाएं ऐमा जीवन जी रही हैं 7 । 60 / पल प्रतिपल जिसस नरक या मौत ज्यादा अच्छी है। विक्रम तू सोचता होगा कि ये सातो की सातो विधवाएं क्यो हुइ ? तो मुझे तो एक ही सवव पासतौर स दीखता है। पहले लोग जो शादी ब्याह करते थे, उसम लड़के-पुरुषो की उम्र ज्यादा होती थी और लडको की कम, या बहुत ही कम । इसी का परिणाम था कि पति पहले चल बसता और पीछ जिंदगी के पापड बेलने और रहे सहे दिन पूरे वरन उनकी राड रह जाती। रडापा और बुढ़ापा दो दो अभिशाप मिलकर एक पूरा नरक बन जाते। पर विक्रम, इस समय तू और बुढियात्रा की वात छोड फूलवती की ही बात पर ना। और फूलवती क्या इस मुहल्ले की सारी बुढियाएँ हो उतनी ही दुखी हैं । जिसके एक बेटा है वह भी, जिसके दो तीन वेटे बहुएं हैं वह भी और जिसके पाच- छह बेटे बहुएँ हैं वह भी। जिसके सारी लडकियां हैं बेटे नहीं वह भी, जिसके कोई नही है वह भी। जिसके सब कोई है वह भी ।। मगर विक्रम, बात तो फूलवतो की चल रही है। फूलवती के चार बेटे हैं। एक खेती म घर पर ही, तीन वाहर, दूर दूर की जगहो पर ऊचे ऊचे ओहदा पर ।। एक ऊँचा अफसर, एक इजीनियर और एक डॉक्टर। गांव में रहने वाले बेटे का भी अच्छा कारोवार और पसे की तरफ से भगवान को मोज ।। धमपुर के सब लोग बुढ़िया फूलो (फूलवती) के भाग को सराहते, अरी तेरे क्या कमी है। चार-चार कमाऊ पूत । तुझे फिकर काहे की ।।" बुढिया भीतर ही भीतर दुखी है। पहले तो चुपचाप रहती खून का घूट भीतर ही भीतर पीती थी। टुसर टुसर रोती कापत हाथो, अलग चूल्हे पर अपनी रोटी सक्ती। कुछ दिन तो उसने घर की लाज को छिपाकर रखा। यही डर और शम कि कोई क्या कहेगा । पर धमपुर जैसे गाव मे कितने दिन बात चुपचाप चल सकती थी। जितने मुंह उतनी बातें । कोई कहता, बुढिया के तीन तीन बेटे नौकरियो पर हैं चौथा गाँव मे मौज म है फिर भी सबको इसके दो टूकड भारी । जाडे गर्मी, बरसात में खुद रोटी सेकती है।' क्या इसके लिए दो रोटी शहर वाले बेटे नही दे सक्त ।' 'नहीं दे सकते तो आग लगे उत्ता की ऐसी कमाई में।' तो राजा विक्रम, एक दिन मैं भी सच्चाई जानने के लिए गाव के ही एक बाशिंदे के चोल मे धमपुर म उतर पड़ा। पहले वित्रम, तू बुढिया की बात सुन ! साझ के झुटपुटे म मैं बुढ़िया के घर पहुँचा वो थोड़ी देर उसकी मुडेर पर वठ चुपचाप, अदश्य होकर, वहां का नजारा देखने लगा। तो क्या देखता हूं कि बुढिया गिलास में बाहर स पाव भर दूध माल लेकर आ रही थी। उस आगन म एक ओर गांव मे रहने वाली बहू का चूल्हा जल रहा था तो दूसरी बार बुढ़िया का । शायद कोइ दाल चूल्ह पर चढ़ाकर दूध - ।

बताल की छब्बीसवी कहानी /61 लेने गयी थी। बुढ़िया दूध लेने बाहर क्या गयी ? बडा अचभा हुआ। इसके घर के आंगन में तो दो दो भैस बंधी हैं और बहू इस समय दूध दुह रही है। फिर बुढ़िया ने वही पाव भर दूध दो गिलासो में अलग-अलग किया। आधा रात की चाय का, आधा सुवह की। रोटी पानी खा-पी, बुढ़िया अपने कमरे के बरामदे में झगोल सी खाट पर कुछ गूदडनुमा कपडे बिस्तर के नाम पर विछाफर पड रही। मकान के दूसरे हिस्स में वेटा-बहू व बच्चे हैं वे अपनी दुनिया म मगन सो जाते हैं । सबके सो जान पर मैं बुढ़िया के पास आ जाता हूँ और उससे बात करन क लिए उसकी खाट की पाटी पर ही बठ जाता हूँ। बुढ़िया मुझे देखकर (अपन गांव का ही वाशिदा समझ) बहुत बहुत खुश होती है। 'भली करी बीरन, जो तू आया। मैं तुमसे दो बातें कर लूगी। पूरी पूरी रात ५ ही चली जार्य है । न कोई बतलाने कू, न बोलने कू । पडी-पड़ी कभी रो लू, कभी थोडी-बहुत सो लू ॥ नासपीटी रात काटै न कट। 'अच्छा दादी, पहले यह वता तू अलग दूध क्यूँ लादै ? तरे घर तो दो-दो भैस बंधी हैं।' 'भइया । भैस मरे किस मतलब की पहले लौंडा कभी कभार दूध बहू से चोरी चोरी दे दवै हा, बहूँ कहव है जो तू मेरी भस का दूध पाव तो मूत पीव। भइया, अब तूई बता के फर भी मैं इनका दूध लेती।' 'लोंडा कहन लगा मां तू बाहर स दूध मत ला, हमी से मोल ले लिया कर, घर की बात घर म ही रह जाती। मैंन कही चल भइया ठीक है, पर बह तो उसमे पानी मिलान लगी। मैंन एक दिन पानी डालती पकड ली तो बोली, 'भस के थन फट जोग, जो तन सा पानी न मिलाया। लेना हो तो ले, नही तो मत ले । कुछ एहसान नइ ।' हारकर मैंने दूध और से बांध लिया। विक्रम अभी मैं अलग रोटी की बात भी पूछना चाह रहा था, पर बुढ़िया को चंन कहाँ । वह अपने आप ही बताने लगी। उसे तो उतावली थी मन की सारी भड़ास निकालने की। कदाचित इतना धयवान थोता धमपुर म बहुत समय से उपलब्ध नहीं हो पाया था। या तो जव उमकी लडकी ससुराल से आ जायें या फिर गली-मुहल्ले की अय बुढियाओ म स किसी से बात हो जाये तभी मन की कह- सुन पाती थी। जिस समय मुहल्ले की दो चार बुढ़िया विधवाएँ कही मिल जाती तो लगता कि इन सासा की कोई यूनियन है जिसकी समस्याएं साझी ही हैं। हर घर की वही कहानी जिस वे यू कहकर व्यक्त करती, 'बीबी घर घर मिट्टी के चूल्हे हैं। किसकी कहे, किसकी ना।' इन गुप्त मत्रणामओपी खबर सभी घरा की बहुओ को भी कहीं न कही से लग ही जाती किंतु उनके पास यूनियनबाजी करन के लिए इतना खला समय नही - 62/ पल प्रतिपल होता। फिर भी पर गृहस्थी के टटो और भंसो बादि के सानी पानी से फुसत मिलते ही बहुएं भी अपना मोर्चा सभाल ही लेती। फिर तो वे गली की इन मारी विधवा बुढ़ियाओ की यबर पूरी तरह स लेती जो पता नही कैस काल कौए खाकर उतरी थी पि नासपीटी मरन का नाम ही नहीं लेती। उनका पिंड ही नहीं छोडती। बुढ़िया बतान लगी, 'भइया अलग राटी न करूं तो क्या करूं ।। इसके (बहू क) तो लच्छन ही राटी देन के नइ हैं। ऐसी ऐसी हुई-अनहुई कहव है अक कोई सुने तो क्या है।" फिर तो फूलवती शुरू हो गयी ।। उसन बताया कि 'बहू उसके लिए अलग खराब अनाज के आटे की रोटी बााती। घर मे कितना ही घी-दूध होता हा, कभी दाल दपाल म घी वी डालने का कोई काम ही नहीं। अपने मद और बच्चो के लिए चम्मच भर भर घी डालती है। मेरे नाम को ही नहीं है। दाल सब्जी भी ऐसी बनाकर धर दे है कि मुह में वो चलती ही नइ। पता नही भइया, मेरी ही ऐसी बनाव है या सब कुनवे की।' बुढिया की यह दद भरी दास्तान सुन मैं बोल उठा, 'दादी तू यहाँ पडी-पड़ी पy सडे है, शहर मे बडे के पास क्यो नही जाती। वहां सुख से रह । उसके क्या कमी है।" 'अरे मेर नसीब म सुख वहाँ " एक लम्बी उसांस भरकर बुठिया ने कहा, उइ उत्ता क्या मुझे जीने दे। फिर तो बुढिया बड़े बेटे के बारे में शुरू हो गयो । कितनी बातें कही उसने, जिन सवका साराश यही है कि उस इतनी इतनी कुर्बानी कर पढाया-लिखाया, आदमी बनाया। उम्मीद थी कि वही नैया पार लगायेगा! ठीक है उसने बहन- भाइयो को पढाया लिखाया, सबके ब्याह कारज किये, घर पर पक्की जगह भी बनवायी। पर क्या कर दिया, जिनका बाप मर जाता है भाई क्या उनके शादी च्याह नहीं करते ।। अब जब मैं वहाँ चली जाती है तो उसके यहाँ तो बदिश बडी भारी हैं। इसके सामने मत था, उसके सामने मत जा । वसे मत उठ। यह कमीज मत पहन, वह धोती न बांध ।। यहां पेशाब न कर, वहाँ कर। कुर्सी साफे पर पांव धर के मत बैठ ।। यही सब || अब हमारे बस (वश) की है नही हर समय सजे धजे रहना । किसी के घर जा बठो तो बिा पूछ इनके मही क्यो गयी ये पता है कितने छाटे तबके के लोग हैं ।। भला पूछो कस छोटे हैं वे ? उनके भी रडियो है टीवी है, सोफा है--सब कुछ है जो कुछ तुम्हारे पास है । पर नही वे इनकी शान से छोटे हैं। हुई भला कुछ बात' बच्चे हैं स्कूल कालिज से आते ही जी होवे है कि बेटी-पोतो से घडी दो घडी बात करूं पर व कहत हैं दादी हम सोने दो।' सोकर उठते हैं कि पड़ना। चलो दिन म पढ़ना है तो रात को ही दा बात कर लो। उत्ती ।

बेताल की छब्बीसवी कहानी 76a यहां तो नीद आती ही नहीं, वहां भी नहीं आती। एसे में दो चार वात कर ली था. रात को दा चार बार पूछ लिया कि क्या वजा है', 'क्या टम है तो सुबह ही अपन मम्मी-पापा से जड देंगे, 'दादी हमे रात भर सोने नहीं देती। अबू बेटा वह के कमरे मे सोऊँ कैसे ।। उत्ते स्टोर में अकेले नीद मुझे ना आवे ।। दिन भर पाली पड़ी कभी यह, कभी वह खाये जाओ, न कुछ काम करने को, न धरने को। ठाली बठेजी लगे भी तो कैसे।। एक दिन जबै तोडवर मैंने दो चारपाइयो पर सुखा दिय तो बेटा कहता है, 'क्या सब जगह मक्खी ही मक्खी भिनभिना दी, गन्दगी फैला दती हो मो" खायेंगे खूब स्वाद से पर बनाने नहीं देंगे। अरे । ऐसा भी क्या पैसे का घमण्ड कि जवे मत तोडो, बाजार से ले आयेंगे । जो चीज देखो, बाजार से ले आयेगे। एक दिन मैंने उसके कमरे की सफाई कर दी। काम वाली नही आमी थी, बहू को टम नहीं मिला तो यह कमबखत मुझसे लड पडा, 'मां तुमन ड्राइगरूम म पायदान मेज पर क्यो रख दिया "भला पोचा करती तो पांव पूछने के वो वहाँ से नहीं हटाती। उस मेज पर रखी पीतल की टोक्नी की इब की वालिया कों हटा दी?" भता यह भी कोई शोभा की चीज हुई कि उठाकर हाटी तिपाई पर नवा दी। मैंन टोकनी पानी भरने के लिए उठाकर रख दी और इसकी पुलिया करे में फेंक दी। बस इसी बात पर खूब बोला, कुछ समझता हानही किसी का बुढ़िया की विपदाओ की रामकहानी एक्न का ही नहीं वारदा यो मी बातें पूणत निरथक भी नही थी। उसकी दुखती रण यही भीमानीवन सतान के लिए मर-खपकर पैसा कमात हैं, जान हूँ। नाविक लिए 4 क्या नहीं सहत । अपना आज उन कनक बनकर अब तक वह कल आता है मां-बाप पूरी तरह एक दिनमा विक्रम क्या कभी इस सनातन कालगति का नाम मैंने बुढ़िया स कहा यदि ऐसा ही है नोनसन र पारबाट चली जाती? वह बोली -दामनेटनगरकी AI, वही गर्ने जाऊँ ना छोट के पास कमी लागी नगर उमा यादहमा है, उसकी भी आंख बदली हुई है। मान्य नहीं दर दी कहती थी, 'हम मा में तीन सायद मार जब तक माह नहीं इमाया अद्यतालिया बछडा हो। कहना था, शिवम हमशा मर साथ ही रहा।

64 / पल प्रतिपल - बुढ़िया भव रआँसो हो भायी थी। वह यह अनुभव कर रही थी कि उसका इस दोन दुनिया में कोई नहीं है, वेटा न पोता!! वैताल बोला, राजा विक्रम । मुझे ला कि बुढ़िया की तो बहुत मुन ली, एसी क्या बात है कि इसकी अपन किसी भी वेट यहूस नहीं निभ पा रही है ? कही बुढ़िया के व्यवहार म तो काई खोट नहीं ? क्या न इसक बेटे वहुआ स मुलाकात कर उनके जो की भी जानूं । सा में गांव के उसी वाशिंदे के चोले म उडता उडता उस शहर जा पहुँचा जहां उसका बडा बटा एक दफ्तर मऊँचे ओहदे पर अफसर था। उ होन मरी खूब आवभगत की। अपने गांव के जादमी के रूप में मुझे पाकर बहुत खुश हुए उनके यहां शाम वक्त राज कोई न कोई महफिल सी जमती। कभी कोई आता, कभी काई जाता। कभी चाय कॉफी तो कभी शबत ! मैंने सोचा जब ये मुझ जस आदमियो की इतनी आवभगत करते है जो इनका कुछ नहीं लगता और पस की भी काई असुविधा या अभाव यहां नहीं दीयता, तो क्या य अपनी मां को दो जून की रोटी ही दे सकते ? रात को पाने के बाद लौटने पर मैंन उनसे यही समस्या रखी कि तुम्हारी मां धमपुर में इतनी दुखी है और तुम यहा ऐस रहते हो ! तुम उसे यही क्यो नही बुला लेते ? उसकी पत्नी भी वही उपस्थित थी। दोनो को माँ की हालत सुनकर बहुत अफसोस हुआ। उनके दिल की बात से लगा कि दिखाने के लिए नही अपितु आतरिक रूप स अपनी बात कह रहे हैं। बेटा बोला-आज भगवान की दया से हम सभी भाई इस हालत मे हैं कि किसी गैर को भी हमेशा बिठाकर खिला सक्त हैं भगवान का दिया सब कुछ हमारे पास है । जितना मा बेचारी खायेगी उसस ज्यादा तो महरी के ही चला जाता होगा। लेकिन हमारी मां के भाग्य म सुप बदा ही नहीं है, चन स बठकर दो राटी खाना लिखा ही नहीं है । अब हम क्या कर, क्या वश है हमारा भाग्य पर और मां की जादतो पर । जब यहा आ जाती है तो घर की शान्ति हमेशा भग रहती है। लगता है पूरा घर एक तनाव मे जो रहा है। मा तनाव और अशाति के लिए कोइ न काई कारण हमेशा खडा रखती है। बडी लडकी का बी० एस सी० का अतिम वप था । वह मय्स के लिए ट्यूशन पढ़ने नवम्बर दिसम्बर मे अधेरे मे ही प्राय छ बजे जाती थी तो हर वक्त उस बच्चे से टोका-टाकी रखना। ऐंतू अकेली ही मास्टर के पास पढ़ने जाव है या और कोई भी वहाँ होव है ? तरा वाप तुझ जाकर भी देख है या तू वाहियो फिरे जावै। कभी कहती, तू चुन्नी गल में लटका के चल दव, सिर पर ओढ़ा कर।' सड़की राती मेरे पास आती, 'पापाजी, हम इतने बड़े हो गय बापन तो कभी हम कुछ कहा नही । दादी कभी हमारे चरित्र के विगड़ जाने की बात करती हैं तो कभी बैताल की छब्बीसवी कहानी / 65 ?" कुछ।। कहती हैं अंधेरे-उजाले म तुम कहाँ जाती रहती हो ऐसी शिकायत लडकी को ही नहीं, लडके को भी थी। वह भी अपनी मेडिक्ल की तैयारी म तीन तीन जगह टयूशन पढ़ने जाता था। उसको लेकर मां को यही चिंता थी कि यह दिन भर पता नही कहाँ कहाँ मारा मारा फिरता है। क्या पता कहकर तो जाता है पढन को कही और ही मूड जा मारता हो। बच्चे और सब कुछ बर्दाश्त कर सकते हैं किन्तु अपने चरित्र के विषय में एक शब्द भी नहीं। फलत' मैंन देखा, बच्चे जब भी अपनी दादी स बोलते तो झल्लाकर। मुझे और सगीता को लगता कि मो के साथ रहकर तो बच्चे बोलने मे भी अशिष्ट होते जा रहे हैं । इसलिए हम उहे बहुत समझाते. बेटे ! बडे बूढ़े तो यू ही कहा करते हैं । उनकी सोच ही ऐसी हो जाती है। फिर उन्होने गांव मे जैसा देखा है वसा ही तो सोचेंगी।' इस उपदेश के पीछे मेरे मन मे वे सब बातें घुमडती रहती जो मां जब-तब खबरो के टुकडो के रूप मे बताती रहती-भइया ! गाँव में तो बस नाग लग रही है। फलाने की बहू सेतो पर जाती, अपने अमुक यार से मिलती है, लडकियां गोवर सानी या लकडी लाने के बहाने किस किस से कसे कसे मिलती हैं । अमुक- अमुक की लडकी के कुआरी के ही हमल था -पहले तो हसो भगन सौ पचास लेकर केस रफा दफा कर देती थी। अव गांव की मिडवाइफ भी ऐम केसो का निपटान करने लगी हैं। कोई चार पांच महीन के लिए अपनी लड़की को कही बाहर रिश्तेदारी आदि म भेजकर उसका निपटान करवा लेता है आदि। तब मुझे लगता कि गांव से शहर मे ज्यादा दर भर है। कहाँ गये गांव के वे आदश जहाँ मर्यादाओ के बधन, दूसरे की बहू बेटी को अपनी बहू-बेटी मानने वाली लीके ज्यादा थी-ये भ्रष्टताएं नहीं। दादी को लेकर बच्चा को समझाने का असर थोड़ी बहुत देर रहता फिर वही चाल !! किसी न किसी बात को लेकर बच्चो की दादी से झटक हो जाती। छोटी लडकी से भी जो अभी पांचवी म पढ़ रही थी, मां को शिकायत रहती। भारी बस्ता स्कूल स लिए वह प्राय चार बजे स्कूल स लौटती तो थोडा खा पीकर अपना हाम वक लेकर बैठ जाती जो टी० वी० कायक्रम आने तक बडी मुश्किल स समाप्त हो पाता। मां को शिकायत यह कि यह छुटकी भी उससे ठीक तरह नहीं बोलती। जब वह होम वक करती तो बीच बीच में मां कभी कुछ, कभी कुछ उसस बात करना चाहती। वह झल्लाकर जवाब देती। उधर दोपहर मे जब पत्नी खाली होती तो मां पता नही उससे कहाँ कहाँ का पारिवारिक इतिहास पुराण लेकर बैठ जाती। किसी बच्चे का नाम लेकर, 'इसके बाप ने मेरी एक भी चीज (सोने चांदी की) न छोडी,। छोटी पूनम के ब्याह पर पूरी पांच किलो चांदी घी, डडी की तुली हुई जो इसने बेच दी। मेरी सोने की चीजें 66 / पल प्रतिपल भी न छोडी' आदि। पत्नी एक आक्रोश व गुवार से भरी ऐसी रहती जैसे कोई बहुत ज्यादा फुलाया गया गुब्बारा, जो कभी अपने आप ही या कभी जरा-सी बात की पिन चुभते ही फट पडेगा। यह फटना कभी फूटने रोन के रूप में होता तो कभी मुझे आक्रोशपूर्वक झिडकने जैसा। वह भी अपनी जगह सही थी, यो उसका वर्दाश्त का माहा मुझसे कही ज्यादा था। सगीता ने इस घर के लिए, अपनी ननदो एवं देवरो के लिए जितनी कुर्बानी की थी, आज के जमाने मे जहां स्वाथ अधिक प्रवल है जहां हर वहू अपन पीहर स “यारे साहो के प्रश्नों के बहुत चौकस उत्तर सीखकर आती है, उसका त्याग और घर को बनाने मे भूमिका बहुत महत्वपूण थो। पीहर में लडकियो को कोई न्यारे साये की शिक्षा देता नही कि तु आज स्वाथ और भौतिकतावादी दष्टि इतनी प्रबल है कि अपने भले बुरे का ज्ञान सबका सहज रूप में ही है। ऐसे समय के बीच सगीता न अपनी अपने पिता के नाम व पति की इज्जत रखने के लिए, क्या नहीं सहा इस घर के लिए, जो उसका कम मां का ज्यादा था। जब भी परिवार म च्याह शादी आयी, उसने अपना बक्स खोल दिया। जो चाहे कपडे ननदो की शादो म दे दो । कही कोई कमी न रह जाये वही हमारी बात नीची न रह जाय। बतन से लेकर कपड़े हाथ का जेवर क्या नही छाडा उसने अपनी ननद व देवरो के लिए। ननद ससुराल जा रही है पति के पास पैसे नहीं हैं साडी लाने के लिए तो घट अपने बक्स मे साडो निकाल चिंतामुक्त किया है मुझ । किन्तु उसने कभी इस त्याग का कोई प्रतिदान या मोल नहीं मांगा था। मांगा था केवल बादर और प्यार कि तु उसका दुर्भाग्य कि वह भी न मिला । आज कोई उसे कुछ नहीं समझता। वह सोचती है आज हमारे पास भी अपना मकान कोठी होती, वैक म चार पस होते, पर हम तो पूरी उम्र दूसरो का करत रहे और पर का अध-कूप फिर भी नहीं घट सका । अब अपन बच्चो का कुछ करने का नम्बर पाया है तो हम सुवधालनाथ हैं। ऐसा लगता है जीवन की दौड़ में हम बुरी तरह हारे हैं अपनी तपस्या की विफलता पर एक पश्चाताप-सा होता है कि यो व्यय दूसरो के लिए जिंदगी होम वी।' इस सबसे परेशान संगीता मुझसे वहतो, 'क्यों बेची है आपन मा की चीजें ? नाप खुद ही अपन वहन भाइया क ब्याह-वारज करते? क्या पडी रहती है माजी हममा मरे पीछ! बाप रयों नही परी दत इन जेवर फिर सइह दफ्तर से पका-मांदा माता, क्तिन ही दफ्तरा तनायो शमत्त हुए इन बातो को मुन मरे तन-बदन म भाग लग जाती। मरा फ्यूज एक्दम जाता मासा किसी वपन रन्च की तो का नहीं। यदि वे मरे बहन भार पवा तुम्हारे भी मा! मैंन व्याह बैताल की छब्बीसवी कहानी /67 जाता, । तो कुछ थे। सब तुम्हारी लडकियो और लडको की शादी मे ही तो खच हुआ। मा से बोलने की यह मेरी स्वाभाविक टोन और माद्दा न था किन्तु वे क्रोध ही इतना दिला देती। 'जब तो तुम्हारी इच्छा होती कि शादी मे यह भी होगा, वह भी होगा, यह भी चाहिए, वह भी चाहिए। यदि यह न किया तो हमारी नाक कट जायेगी, यदि वह नहीं किया तो लोग क्या कहगे।' मैं एक योग्य पुत्र सा दिवगत पिता क नाम की रक्षा के लिए, यह सोचता हुआ कि मां को यह अहसास न हो कि पिता होते तो इस ब्याह में यह और हो मां की इच्छाआ का दास बना नाचता। 'तुम्हारी इच्छाओ की पूर्ति के लिए ही मां तुम्हारा जेवर बिका और जिसम से आधा तो लॉकिट जजीर, तगडी पाजेब आदि के रूप में लडकियो को चला भी गया है । मां । तुम आज मुझस सोना- चांदी मांगती हो ? मा, तुम्ह हो क्या गया है ?' सवाद के अन्त तक पहुंचते पहुचते मेरे क्रोध वाली करारी आवाज भर्रा-सी जाती, भीग जाती। मैं इस युद्ध-स्थल से हट जाता। कोई पार बसाती न देखकर, सभी तकों के वेमानी हो जाने पर मा अन्तिम अस्त्र, अपना ब्रह्मास्त्र चलाती, 'तुम्हारा बाप होता तो मुझे यह दिन मयू देखना पडता।' इस शस्त्र के आगे मेरा भी धैय और सहनशक्ति चुक जाती। मैं अपने कमरे में पांच पटकता, चला जाता। दो चार दिन घर में एक अबोलेपन का भूत अपनी छाया फैलाय रखता। मां तक सवाद के पुल सिफ बच्चे रह जाते किन्तु उनकी बातचीत भी पूर्ववत् सहजता से नहीं हो पाती। तो बताओ, यदि एस म मां गांव जाना चाहे और आग्रह कर कि मुझे बस म विठा दो, फला से मिले मुझे बहुत दिन हो गय, मुझे उसका सिंदारा भेजना है, उसका यह करता है या वह, तो हम उसे कस रो? मजबूर होकर हम उस वस में विठा माते, ऐसा न जाने कितनी बार हुआ है। " राजा विक्रम ! यह सब किस्सा सुन मैंने बुढ़िया के बड़ बेटे से कुछ भी कहना ठीक नहीं समझा। मन हुआ कि इसी रूप में क्यो न दूसरे शहर में रहते बुढ़िया फूलवती के छोटे बेटे-बहू के पास जाया जाय और उनकी भी सुनी जाय । सो मैं उसी चोले म फिर उड चला और चलते चलते उस शहर पहुंचा जहाँ फूलवती के छोटे बेटे बहू अपनी बोसी दुनिग म राज करते ५। न काई फ्रुि, न फाका !! सबस छोटा होन के कारण इस बेटे की जिम्मेदारियां परिवार के प्रति कभी नहीं रहीं। जब तक कुछ कमाने घमान लायक हुया, तब तक परिवार के संघर्ष का वक्त गुजर गया था। इसलिए वह ज्यादा बलमस्त था।

68 / पल प्रतिपल सध्या समय छोटा बेटा अस्पताल म अपनी डयूटी का राउण्ड लेकर आया था। राजा विश्रम, तभी मैं वहां जा पहुचा। उस लड़के ने भी अपने गांव स आया जान मेरा भरपूर आतिथ्य किया। इस लड़के के यहाँ पहुँचकर भी यही अनुभूति हुई कि बुढ़िया के सभी बेटे बहुत अच्छ हैं । दा से तो मुलाकात नहीं हुई, वे भी इन जसे ही होगे। रात को जब खाना पीना विट गया तो हम गांव जहान की बात करने लगे। हात-करत बात इसी विदु पर आ पहुंची कि तुमने अपनी मां को गांव में फटेहाल क्यो रप छोडा है ? उस यही बुला क्यो नही लेते ?" वह लडका भी बडे भाई की तरह ही रहने लगा-क्या बतायें भाई साहब, हम तो खुद शम आती है। हमारी मां से न तो खुद रहा जाता है न चन स रहने देती हैं । न खुद रहना जाता है न बहुआ को रखना जाता है। वे कभी नही सोच पाती कि जमाना कहाँ का कहां पहुंच गया है पर उहे इससे यही शिकायत है कि तू इस काम को यू क्यो नहीं करती, वू क्यो नहीं करती। इस समय सिर ढका रखा कर, इस समय उघाडा। कभी कहेगी, हमने तो कभी बडो के सामन घूघट खोला ही नहीं। आजकल की बहुओ को कहा सुहाता है यह सब । सब्जी बनी तो वह वैसे क्यो, ऐसे क्यो नही बनायी। इस सब्जी में हीग डालनी थी, उसम नही । इसमे मेथी का छौंक लगना था, उसमे !' सुनीता तो स्कूल में पढाती है, इसे तो उल्टी सीधी रोटी बनाकर अपने समय को नौकरी के हिसाब स एडजस्ट करना है। मां तो अब खाने के लिए जीती हैं और हम जीन के लिए खाना खाते हैं। अब हम यह सोचना है कि बच्चे कब होने चाहिएं। हमे अपने करियर के हिसाब से प्लानिंग करनी है कि तु इसी सवाल को लेकर सुनीता स झेझें बाजी करती रहेगी। अरी, हप हो गयी, तुम्हारे ब्याह को ढाइ सान होने को आय और अभी चूही तक घर मे नही चल तुझे मैं दिखाकर लाऊँगी बडी डॉक्टरनी वो। आजकल तो ब्याह के पूरे नौ महीने बाद भी बच्चे होव हैं पर एक तू है ।' पहली बात तो एसा है नहीं कि हम दोनो में शारीरिक रूप स कोई विकार हो। हम तो शादी के तीन साल बाद तक कोई बच्चा चाहते ही नहीं हैं। अभी मुझ आगे अपनी स्टडी करनी है, पत्नी को भी अपना बीच प छूटा एम० ए० पूरा करना है। फिर किसी शारीरिक विकार के कारण ही सतान न हो पा रही है तो ह सिफ यही पता है कि बहू म ही कमी होगी इनके वेटे मे नही । अब शादी को थोडा बहुत समय ही हुआ है तो घूमने फिरने या कभी कभार पिक्चर विक्चर तो जायेगे ही कि तु मा हैं कि उ हे यह सव फूी आँख नही सुहाता । जव व भी कही बाहर जाने के लिए तयार होन की सोचते कि आज मां से इजाजत लेकर ही जायेगे। जाते हुए थोडा पूछकर चल ही जालो तो क्या विगडता है, बडे-बूढो को बात्मा सतुष्ट होती है। लगता है वेटा बहू बहुत लायक है। किंतु अभी हम पूछ पात भी नहीं कि मां पहले स ही सवाल दाग दती, अब - - 1 वैताल की छब्बीसवी कहानी /69 . हम मां कहाँ कू चले सज धजकर ।' बस पली के मूड का फ्यूज पडाक स उड जाता। वाहर निकलकर मूड को पुन सम पर लाने मे, चहकान म, उतना ही समय लग जाता जितना खभे स उडी बिजली का फ्यूज पुन जोडने आने वाले विजली कमचारियो लाइनमैन आदि का रगता। जव कभी कही से हम आत तो हमारा स्वागत मा इन शब्दो से करती कहा क्या उडा आय क्या माल खाय के खान पीने के लिए कोई फल या मिठाई जरूर लात पर इस वाक्य की गोली-सी वात सुनीता को लग जाती। कभी उसके कपडो के रग को लेकर जो उसने बहुत मन से खरीदा और पहना होता कहती क्या रग लिया है, एकदम नही भाता। बिलकुल गंवारू डिजन है।' गज यह है कि किसी न किसी बात पर मां वा झण्डा यहाँ अलग ही धज स फहराता। इसलिए जब अबकी बार उहोन गांव जाने का आग्रह किया तो हमने उन्हें रोका नहीं। उनमें कहते ही एक छुटटी के दिन गाँव छोड आया। बस, इसी के गुस्स म उहोने वहाँ से चिट्ठी लिख दी है कि अब मैं तेरे यहाँ कभी नहीं आऊँगी। यो उनकी बडी इच्छा रहती थी कि वे जब मरे तो मेरा हाथ ही उनमे लग, मैं ही उनकी अर्थी को कधा दू । कितु अव अब आप ही बताइय मां को न रखन मे हमारा क्या कसूर है। हम तो खुद उनके लिए बहुत चिन्तित रहत हैं। मैं तो सोच जाता हूँ, चलो बड बूढे कुछ भी कहे, सब सुन ला, किन्तु पत्नी तो पराई जायी है, इसे तो प्यार दन से ही वे प्यार पा सकती हैं। राजा विक्रम ! अब छोटे की बात सुन, मुये दूसरे शहर रहते इससे बड़े बेटे के पास जागा व्यथ सा लगा। सोचा, शहर मे रहते सभी बेटो के लिए दुनिया इसी तरह की समस्याएँ पदा करती होगी या शहर मे रहत तीनो बेटे बुढिया को एक से ही लगते हागे। फूलवती के जो वेटे बहू गांव म ही रहत हैं, क्यो न उनकी सुनी जाये ? चलो उनके भी मन की ले ही ले। चुनाचे मैं उडता उटता पुन धमपुर गांव में आ पहुचा और रात होते होत बुढिया फूलवती के घर पर था। अबकी बार बुढ़िया की तरफ नही उसके वेटे हरीसिंह की ओर जा निकला। अभी मैं गांव वाले के उमी भेप मे था। रोटी पानी कर जब वे लोग आराम से बतिया रहे थे तो मैं जा पहुंचा। उसने मुझे अपनी बैठक मे बिठाया । रोटी पानी की पूछी पर तु मैं तो खाये पिये था। उमस यही कहा, क्यो भई, तुम्हारे घर में सब कुछ है फिर भी तुम्हारी मां इस उमर मे भी अपनी दो चदूकडी अलग सेंके ? इस घर मे दो दो भसे दूध देती हो और बुढिया बाहर से मोल दूध लाये? यह कहाँ की इसानियत है ? सारे गांव म थू थू हो रही है तुम्हारी।।' पहले तो हरीसिंह क्रोध मे भिना सा गया कि तु मैं (मेरा गांव वाले का रू, गांव रिश्ते मे बड़ा था तो वह कुछ अबे-तबे नही बोला। थोड़ी देर म वह सम 10/पत प्रतिपन मावर बोला-हम पया परें! हमारी मा यसग कर पी बुढ़िया है। रोटीमा एर जगह बनती है तो उसम हममा नपस होकासती रहती है कभी पुछ, कभी मुछ भी दाल दोनोरी की नहीं बनती कभी सन्नी बिलुम नाम मी नहीं। सभी गटी पच्चीसो भी ज्यादा परी। उहस्तिना ही मममा 'और सर भी यही बात है कि तु उहें शक रहता है कि उह अग म वनापर दी गयी है। कभी जब ये सब बातें ही पल पाती तो 'रोटी को बहुतार कर य पोई रोटियो पा टम है'. इत्यादि। कभी कोई महमान, विशेषत सहरिया क आ जाने पर स्तिना ही अच्छे स अच्छा करन पर मावी यही शिकायत रहती कि यह नहीं हुआ, वह और होना चाहिए था। यह नही दिया गया वह और देना चाहिए था। बाहर म में पका-हारा आऊँ तो आत ही रोज यहाँ भारत !! कभी किसी बात पर ता कभी किसी पर!' भी तरे इस बच्चन यह पर दिया, फलो बच्चे न मुझ यह पह दिपा । पभी तेरी बह यह रहा, वह दिया। मैं बहुत समझाता मा। तुम क्यो रह मेरा बच्चा और यहू ही यही हा? क्या ये तुम्हारे लिए कुछ भी नहीं हैं तुम्हारे कुछ भी नही लगत । य तुमन क्या लगा रखी है तरे बच्चे तरी बहू', तुम इन बच्चो को अपना समनो, बहू को अपना समझो और कहो, जिसस मे भी तुम्ह कुछ समझें अपना समझें। यस माँ को एक ही रट रहती 'मुझे तू दो रोटी के लिए अलग कर दे।' यह रोज मी चय च ।। चूल्हो को आग बुझ जाती पर दम घर की लहाई न बुझती। मैं क्या करता !! हारकर मां को हर फसल पर अलग गेहूँ आदि देने का फैमना कर लग परना पडा। मां को अलग रोटी बना- कर देखत अभी भी मरा हस रोना है पर क्या परू। - राजा विक्रम, इन सबकी अलग अलग बातें सुनकर मैं सोचता है कि इन सबधो का समीकरण कहाँ गलत हो गया है। अव किमये पास जाकर असलियत का पता चल पायेगा कि तु वित्रम तू तो ज्ञानवान है तू ही बता कसूर विसका है, मा का या ब बेटे का, छोटे बेटे का या गांव मे रहत इस बेटे का? राजा विक्रम चक्कर म आ गया उससे कोई उत्तर न बन पडा। बताल का शव उसके कधो पर ही टंगा रहा क्योकि अबकी बार तो छन् सवी कहानी की शत यह थी कि यदि वह उत्तर दे देगा तो वैताल का प्रेत उसे मुक्त कर देगा। निरुत्तर स्थिति म बताल का शव अभी भी विक्रम के कधो पर है और वह उसे ढोता फिर रहा है।

कमरा खाली है O ब्रजमोहन . लोग कहते हैं पहले पेड जर बूढे हाते में लोग उनकी पूजा करते थे। परन्तु अव बात ऐसी नहीं है । अधे का रास्ता और इ सान का बुढ़ापा समान है। हाथ-पांव सलामत हो तब भी जिंदगी की आस बनी रहती है, हाथ पांव काम करना बद कर दें ताजीते जी नरक हो जाता है। 'अपने किये का इसी ज म म भुगतान होता है वेट हम जितना भी बुरा करत हैं सब दुख के रूप म सामन आता है, मद कुछ एक एक करके घर के सबसे छोटे सदस्य अटू के साथ बैठकर बाबा एसे यतियाते मानो वच्चा सब कुछ गनझता है । न हाँ अटू भी ज्ञानियो की मुद्रा बनाकर जिज्ञासावश बाबा से पूछता, 'आपने किसका बुरा क्यिा है वाबा जो मां और बापू तुमस कभी सीधे मुह बात नहीं करते।" भरी हुई आंखो से बाबा न ह अट का अपनी छाती से चिपका लते । आँखा मे सारा जीवन विसी दवता की तरह जीवित हो उठता। बाबा को लगता अटू उनका बचपन है, जहाँ से याना आरम्भ होती है। बचपन के किसी रास्त पर उहती धूल में बाबा कही खो जाते । 'मा मुझे पढ़ा नही सक्ती तो कूर्वे मे फेक दें 'न न बेटे न ऐसी बातें मत निकाल मुह स तेरे पिता नहीं हैं तो क्या ताना मारता है मुझ पढाई की शुरुभात हुई, पर नहीं । जीवन ने कभी ज्यादा पढ़न पी आमा नहीं दी। किरयाने की दुकान से शुरू हुआ जीवन चपरासी खाता मास्टर और कमी. शन ठेकेदार के यहाँ मुनीमो तक पहुंचा । उसके बाद मा के दहात से लेकर पली के दहात तक की कथा मे प्रापना की तरह इकलौत पुत्र शिवचरण का योग लिखा पा। और लिखा या अवहेलनात्री के बीच दम तोडता बुढ़ापा । पूरेछ महीने की मशक्कत म बन तीस साल पुराने इस मकान के एक कमरे में . .

72 / पल प्रतिपल इतना अंधेरा मिलेगा-यह वावा ने कभी सोचा भी न पा। यह पर आज भी पूरी मुस्तदी और मजबूती के साथ पडा है । वावा से अधिा स्थायी बाधा से अधिक टिकाऊ और वावा से अधिक उपयोगी। समय समय पर इसकी सफदी और मरम्मत हुई है। तभी इसकी शान अभी बाकी है । गली पक्की है एकदय मजबूत और दोनो तरफ ढलवां नालियां हैं, जो सारे घर की गदगी को वहा ले जाती हैं । घर के तीर दरवाजे बाहर गली मे खुलते हैं। पहला दायी तरफ के कमरे का है दूसरा मेन गेट का और तीसरा वायी तरफ के कमरे का है। दाएं और बाएं कमरे के दरवाजे दर चौक मे भी खुलत हैं। अदर दो कमरे और हैं जिनमे घर के मालिक रहते हैं। उनके पांच बच्चे हैं-~-बाबा के पोते। मां और बाप की तमतमाती लाल आँखो के अलावा किसी से नहीं डरते । मा और बाप के अन्तरमुखी जीवन के अलगाव न बच्चो की तरफ से अपना ध्यान हटा लिया है। सबसे बडा राधे नवी म है। पढाई को ऊँ को तरह खीचता फिल्मो का शौकीन राघे सप्ताह में एक दिन जरूर स्कूल से फूटकर पिल्म देखता है और उस दिन एस घर लौटता है मानो सारी किताबे जवानी याद करके लौटा है। उसस छोटा पूरन दावतो का शौकीन है । वह सदा इस ताक में रहता है कब अहोस पडोस म कोई बारात आये कोई पार्टी हो और वह साफ सुथरे कपडे पहनकर मिठाइयो पर हाथ साफ करे। सबसे स्वादिष्ट सब्जी का डोगा उठाकर घर लाये जोर सबकी उगलियां चटवा दे । उसको शरारतो पर मुग्ध मा बाप उस चाहते । उसस छोटी लडकी रीना घर के काम करके स्कूल जाने तक बराबर डॉट और शिडकियाँ खाती बड़ी हो रही है। उससे छोटी सपना तीसरी जमात में है। स्कूल के बाद भी घर में हर समय स्लेट पर झुके रहने से उसकी आँखें कमजोर हो चली हैं। सबस छोटा अटू देखने मे देवता और हरक्तो म शैतान का ताऊ । सबकी किताब कापियो के पने फाडकर हवाई जहाज बनाकर उडाता। वही कभा कभी बाबा के कमरे में जाता है और उनसे बातें करता है । वायी तरफ का कमरा बच्चो के पिता शिवचरण का है जिसम रखी पुरानी किताबो को दीमक ने चाट लिया है। साल- छ महीने मे कभी कभार उनम से कोई किताव निकालकर शिवचरण कोई कविता लिखता है । वसे वह जीवन को पटरी पर लान के जुगाड म पुराने टायर बेचने का धधा कर रहा है। जीवन और घर से असतुष्ट शिवचरण पहले बाबा के पास घटो वठना । अब बाबा का मुह देखें भी उसे हफ्तो गुजर जाते हैं। रात भर बाबा के कमरे से खासने की आवाजें आती हैं । नीद मे भी जागती आँखा में कोई सपना नहीं है। फलता हुआ एक अधेरा रात दिन उस कमरे म महसूस हाता है। बावा वे बुढ़ापे में तग आवर सब उनकी मौत का इतजार करने लग हैं। उनकी सूरत पर माहूसता का ठप्पा लग गया है। वेटा और छाती - - कमरा खाली है / 73 पर रखे पहाड़ की तरह उनको देखने लगे हैं । बच्चो के लिए बाबा का उठना, बठना, बालना सब खेल हो गया है। वावा की लाठी और चश्मा उठावर वच्चे कही भी छिपा देते हैं। वावा चिल्लाते हैं, पर उनकी आवाज सबके कानो के बगल से होकर गुजर जाती है। बुढापे ने सब कुछ अजनवी और बगाना कर दिया है। यह मकान जिसकी एक एक इट जुटाने म रीढ़ धनुष की तरह घूम गयी अचा नक ही अपरिचित और पराया लगने लगा है । घर की दिनचर्या इस प्रकार जारम्भ होती है-दिन निकलते ही बच्चो को गूदडो से खीच खीचकर उठाने की हाय तौवा मचती है। बडे होने के बाद भी वच्चे रात म दा दो बार मूते हुए गूदडो की सीलन से न निकलने के लिए चिल्लात हैं । पर तु भारी भरकम शरीर वाली उनकी मां गुस्से से बिफरती अपने पांव पलग से नीचे उतारती है तो दोनो बच्चियां घडाम से उठ पड़ी होती हैं। लडकियो जगर मालस दिखाती हैं तो मा चुटिया पकडकर खीचती उनका मुह सीधे नल के नीचे झुका देती है और ठडा पानी लडकियो की आँखे सुख कर देता है। उसके बाद वह लडको पर झपटती है । उनके कान मरोडकर उहे खडा करती है । तब रसोई मे धमकती है और स्टोव की गुददी पकड़कर उसम पम्प मारती, उसके मुह म पिन घुसडती फिर आग दिखाती और स्टाव के जलते ही पानी का भगौना नाय के लिए उस पर पटक देती है । इस बीच कई बार वह अपने नसीब को कोसती है । अपने बचपन में वह ऐसी नहीं थी। दुबली पतली और हर पल उछलने वाली चचल और उ मुक्त । सूरज को धूप की तरह अपने आगन मे वह जवान हुई थी। आठ जमात पढी लिखी थी वेशक पहाडे याद करने के नाम पर उसका सर दुखता था। रस्सा कूदने मे उसे कभी थकान न होती। बड़ी होने पर जब वह अपने दूल्हे की कल्पना करती तव सोचती उसका दूल्हा उसे कभी स्कूल नहीं भेजेगा, कभी कटवा पहाडे ही पूछेगा और जीवन एक, दो, तीन, चार की सीधी गिनती की तरह पूरे सक्डे तक सुख चन से कटेगा। शादी हुई तब उसके मन म जीवन की उमग पूरे योवन पर थी। पति शुरू से ही थोडा मुटियाया हुआ था। उसे पहली रात मालूम हुआ उसका पति कविता भी करता है। उसका पति उसे छू छूकर देखता वह उस जगली भालू की तरह दबोच लेता । नतीजा यह हुआ पहले ही साल वह एक बच्चे की मां बनी। वस फिर तो झडी लग गयी। जीवन की गिनती उलट पुलट हो गयो। हर साल एक बच्चा पैदा करत करते उसका चेहरा मुरझा गया, पट लटक गया और चौबीस घटो की झल्लाहट उसके चेहरे का स्थायी भाव बन गयी। भेडिये की तरह पिसियाता पति, बदरो की तरह उछलते बच्चे और बूढ वनमानुप की तरह जिंदा बारा, सबसे उसे चिढ होने लगी। खिसियानी बिल्ली की तरह वह जीवन का खम्भा नोचन लगी। आटा गूदते हुए वह बराबर बच्चा पर चीखती । भूखे अधभूखे वच्च जल्दी जल्दी सुडक सुडक चाय पीते । दो- 74/ पल प्रतिपल " दो फुलके असार म लपेटकर अपने स भी वजनी वस्तो म रखते और स्कूल के लिए निकल जाते। इसके बाद शिवचरण अपना रिस्तर छोहता । इच्छा होती तो नहाता, नहीं तो हाथ मुह धोकर रसोई में जा बैठता। उधर बाबा के कमरे से आवाजें आती "वहू । एक गिलास चाय ता दे वह अपने पति को गस के लिए लताडती । जिस दिन पति तनख्वाह के पंस अपनी पत्नी के हाथ पर रयता उस दिन वह पैसे बहुत सभालकर अपने सी7 स लगा लेती। उस दिन घर म परांठ बनते । और रात को योजनाएँधेरे भविष्य की। अधर म नटकी हुई जिंदगी की बच्चो की लिखाई-पढाई की। पति का पेट अक्सर खराव रहता, फिर भी वह ठूस ठूसकर खाता और ग्यारह बारह बजे वह घर से निकलता अपने काम के लिए। शिवचरण सदा जीवन को स्थायित्व दने को जोड तोड में लगा रहता। दिन- भर लोगो से मिलता, पुराने टायर खरीता विना पैसो क नये काम के बारे में सोचता साल छ महीने मे एकाध कविता लिखता । लक्ष्यहीन जीवन को किसी भी किनारे लगा देन की आस मे वह भीतर हो भीतर खत्म होने लगा। उसके जान के बाद बाबा के कमरे स फिर आवाजें बाती, बहू । एक गिलास चाय तो देजा" हाथ पाव पटकते हुए बहू रसोई से ही चिल्लाती हो हाँ एक गिलास क्यू पूरी बारटी बनाकर ला रही हूँ रोज पहाड खोदते हो न एक बिना हैडिल का अछूत कप वह बाबा के सिरहाने रखे स्टूल पर रखती और बडबडाती घर म धोने के कपडे समेटने लगती। धीरे धीरे बाबा चाय को घूट लेत और वीत दिनो को याद मे खो जाते । दो बूढी आखें जब अतीत के गम मे झाकनी, दुख और विद्रोह में कुलबुलाता बचपन घुटनो के बल रेगता सजीव हो उठता। चारपाइ पर पडे असहाय से वे मां की गोद का अनुभव करते । माथे पर एक साथ कई दरारें उभरती। लम्बी और सघषपूर्ण जिंदगी की जद्दोजहद के बदले पूरी पीठ दद मे कराह उठती। एक समय था जब बाबा का घर मे पूरा सत्कार था। काम से वापस आते ही बच्चे वावा से लिपट जाते । शिवचरण पानी का गिलाम लाकर देता और बहू गरमा गरम रोटियां परोसती । तब बाग के कमरे में छुट्टी के दिन बैठक जमती थी। गली के सब बुजुा आत । हुक्का गरम होता और सब अपने दुख-सुख की चर्चा करते । सत्ते के बापू कहते इस देश का तो बस भगवान ही मालिक है जहा जाओ वही घूम और महंगाई कुछ दिन बाद लोग खाना ही छोड़ देंगे तब बम्बो और बारूद की खेती होगी शिब्बू के बापू खाने की बात पर बावा को ध्यान आता और वे आवाज लगाते, राधे ।

कमरा वाली है। mumod राधे वेटे जरा सुनना राध आता और बाबा अपनी जेब से कडक्ता एक दस का नोट उसे दो और कहते 'जा भेली की दुकान से गरमा गरम जलेबी ले आ ।' जलेबिया जागी सब खाते बच्चे भी, और बाबा के आनन्द की सीमा न रहती। फिर बाते होती! मास्टरजी बोलते, "विस पे विश्वास करें आजकल, हर पारटी मे चोर भरे हैं, और ये हमारे नौजवान पिचका हुआ मुह लिए बस धुना उडाते मिलेंगे गतियो मे छिप छिप के मेरा लडका छ साल से धक्के खा रहा कोई कहता, 'शिब्बू के बापू कल रात गुप्ता के लडके की बहू जल मरी, कितना रुपया दिया था बेचारी वापने ।' बीते दिनो की याद वागा के शरीर में प्राण फूक देती। क्तिनी हिम्मत से उहोने यह मकान खडा किया था। पर धीरे-धीरे जिंदगी का अक निचुड गया । हाथ-पांव ढीले पडे तो शिवचरण को बाबा के दास्त खटकने लगे। सारा जीवन धीरे धीरे इस कमरे मे सिमटता चला गया। कुछ ही दिन पहले घर मे नया टी०वी०आया था। बच्चो ने पूरी गली मे हल्ला मचा दिया । बहू फूली न समायी। शिवचरण ने खुद दीवार पर चढ़कर एन्टीना लगाया। कई बार बाबा को आवाज उस कमरे तक आयी, 'बहू | शिवचरण राधे कौन आया है । उधर किसी का ध्यान नही गया। बावा ने बहुत चाहा जब नही रुका गया तब धीमे धीमे लाठी टेकते वे उस कमरे मे आये । अबोध बच्चे की तरह टी० वी० पर तस्वीर देखकर मुस्कुरा उठे। एक अजीव-सी गुदगुदाहट उनके भीतर मचल रही थी। चश्मे के भीतर से चमकती बूढी आंखें बच्चे बाबा स लिपट गये। वे गिरते गिरते बचे । कनखियो से ही उहोने बेटे और बहू को देखा । ये उहे ही घूर रहे थे। कौन-सा टेलीविजन है शिवचरण बहू हैं ? "बेटे राधे मेरे लिए एक कुर्सी तो ला दे हैं 'बहू गुस्से मे उठी। दूसरे कमरे से कुर्सी लाकर बाबा के पीछे पटक दी, 'लो ! तुम जरूर देखो। बुढापे में भी चैन नहीं है एक पल का बावाचकचाकर रह गये। अव बैठोगे भी या सरप खडे रहोगे 'यह शिवचरण की आवाज थी। उनके इकलौत बेटे की। जिसकी मां बचपन म ही मर गयी थी और जिसे बाबा ने सब कुछ खोकर पाला था। उनकी आँखो के सामने अंधरा छा गया। वहां से अपने कमरे तक पहुंचने मे उहे लगा सारी जिंदगी लग जायेगी। व्यथ की किसी चीज की तरह आकर वे अपनी चारपाई पर ढह गये। उन्हें सगा, बुढ़ापे के दांत सीधे .

76 / पल प्रतिपल छाती म गडे हैं। बाबा का पाना शुरू से हो कमरे म भिजवाया जाता था। भूख उनकी बर्दाश्त के बाहर थी। खाना न मिलता तो वे छटपटा उठत । उस दिन शिवचरण कमरे म वठा खाना खा रहा था ग्यारह बज चुके थे और बाबा के पास एक रोटी पहुंची थी, काफी देर तक जब रोटी नही आपी तो बाबा चिल्ला उठे, 'बहू । राटी तो 1 'सबर करो। पहाड खोदकर नहीं आये हो सारे दिन यही पडे रहत हो पहले इहे दे दू ।' अदर ही अदर बाबा की भूख मर गयी। सूटयां सी उनके दिल को वैधती चली गयी। उठे धीमे धीमे रसोई तक जाये और थाली आगन में फेंक दी। बच्चो की तरह रोते हुए वापस अपने कमरे तक आये और दरवाजा भीतर से बद कर लिया, 'हे भगवान उठा उठा मुझ अपनी शरण म बुला । प्राथना जैस कलेजे का चीरकर निकल रही थी। बाबा की इस हरक्त पर बहू तिलमिला उठी और जार मे चिल्लायो, 'बर नही खाना है तो मत पाआ' पूरे मुहल्ले मे ढोल पिटवा दो। हम तुम्हे भूखा रखते हैं । अरे वुढापे म हमारा मुह काला करोगे और क्या करोगे तुम ।' कुल्ला करता शिवचरण आंगन में आया और पत्नी पर झल्लाया, क्या हुआ | क्या आफत टूट गयी। पत्नी ने आगन मे पडी बाबा की थाली की तरफ उँगली उठाते हुए कहा, 'थाली फेंक गये हैं दरवाजे भर स बद कर लिए हैं । शिवचरण ने खूब जोर से बाबा का दरवाजा खटखटाया । अदर से कोई आवाज नही आयी। झल्लाकर शिवचरण ने अपनी पत्नी स कहा 'मरने दे जब भूख लगगी अपने आप दरवाजा खोलेंगे ।' बाबा के शरीर मे जितना भी खून था, पानी हो गया। जीवन की इस अंधेरी राह पर पुत्र के उदगार ने एक सनाटे की तरह बाबा का घेर लिया। अपना झोला उठाकर शिवचरण अपने काम पर चला गया। रात आयी फिर दिन निक्ला । रात आयी फिर दिन निकला। फिर रात आयी फिर दिन निकला । लेकिन बाबा के कमरे का दरवाजा न खुला । इस बीच नहीं अटू कई बार बाबा के कमरे के बाहर स चिल्लाता रहा बाबा दरवाजा पोल दो बाचा दरवाजा पोलो कमर के भीतर जस अधेरे व बलावा कुछ नहीं पापौध दिन शिवचरण की पत्नी के चिल्लाने पर शिवचरण पिर जोर सदर- वाला हिलाया। सन्नाटा। शिवचरण ने पिर हयोहा निकाला और दरवाजे पर बजा दिया | मटने से विवाड एले। बरसा म ठहरी हवा का भभवारा निकता। सामन धारपाई पर विधी दरो पर बाबा का मृत शरीर पापा। बहुत देर रोन कमरा खाली है /17 के बाद उनकी पलकें आंख के निचले हिस्से से चिपक गयी थी। उनके चेहरे पर हल्की सी सूजन थी। शिवचरण ने बहू की तरफ देखा बहू ने शिवचरण की तरफ । बच्चे सहमे हुए कमरे म एक तरफ खड़े यह मजर देख रहे थे । सबसे छोटा अटू बाबा के सिरहाने खडा उहे गौर स देख रहा था। अंधेरा कमरे मे मुक्ति का एह- सास करा रहा था। घर की दिनचर्या फिर पहले की भांति चलने लगी। बस कुछ दिन बाबा के कमरे के बाहर गली म एक गत्त का टुकडा लटका था, जिस पर लिखा था-- 'मकान विराय के लिए खाली है।'

विस्फोट के बाद कमला चमोला पटी को ट्रिा ट्रिन सुन देवधर लपका। आंगन म एक खाकी लिफाफा मूखे पत्ते- सा हवा म फडफडा रहा था। देखते ही वह समझ गया कि कही स इटरव्यू कापन आया है । खोलकर दपा-शक सही निकला। पहले पहल जब एस लिफाफे उसके पास आते थे तब वह एकदम से उल्लसित हा उठता था, लगता था आधा मैदान तो फतह हो ही गया है। वार बार उसकी निगाह लिफाफे को सहलाती-सी रहती- लगता य नौकरी उसो के लिए है, खाम उसी की योग्यताओ को ध्यान मे रखकर यह पोस्ट रची गयी है। पर अब न जाने क्या पसा कुछ अहसास नहीं हो पाता। इटरव्यू दर इटरव्यू दते देते अब वह समझ गया है कि ऐस लिफाफ उस यानिक प्रक्रिया के एक अग हैं जिसमें अपनी तमाम कोशिशो के बावजूद उसका फिट होना बहुत मुश्किल है। व्यक्ति का चयन तो पूनियाजित होता है बाद म उसी के लिए पोस्ट बनायी जाती है उस जैम प्रत्याशी यू हा कुछ दिन रेत के परौद बनात वनात भविष्य के सुनहरे सपन रेसने तगत | जब ता लगता है य खाकी लिफाफे उसे नौकरी दिलवान नही महज उसे मुह चिढ़ाने आत हैं। अपनी तीन वष की बेरोजगारी के अनुमान स वह इस फैसले पर पहुंचा था कि नौकरी तो ऊँची डाल पर लगा फल है जिस देखकर लार बेशक टपका लो पर हाथ वो नही आयेगा। दवधर रसोई म आया तो वहा रखे हुए पारदर्शी लिफाफो से बरपी और नमकीन काजू झाकत देख समझ गया कि शायद आज भी विटटी को देखने वालो न आना है । लडकी के लिए ब्याह और लड़के के लिए नौररो~य दो ही सनातन बिंदु पूर्णता को मीमा रेखा हैं । बदकिस्मती से इन दोनाम जग दर हो जाय तो सभी के सब का प्याला छलछला उठना है। दुर्भाग्य से उसक घर तो य दोनो समस्यायें मौजूद हैं। बल्कि यू कहे कि सुरसा सी मुह फलाय खडी हैं। बिट्टी वो बी० ए० पास क्यि चार वष होने को जाय पर कही व्याह का जुगाड विस्फोट के बाद / 79 नही बैठ पाया। उसे भी तो एम० ए० करके चप्पलें फटकारते तीन बरस होने को आये हैं पर एक अदद नौकरी नहीं जुटा सका वो अपने लिए। अदर गया तो देखा विट्टी अपना फिरोजी सिल्म का सूट प्रैस कर रही है । जब पहली बार बिटटी को देखने वाल आने थे तब मिलवाया था मां ने यह सूट । बाबूगी तो इतना महंगा सूट खरीदने के पक्ष मे नही थ पर मां ने अपने स्त्रीजनित अनुभवो के आधार पर तक दिया था, 'अच्छे कपडा का वडा असर पड़ता है। चेहरे- मोहरे की छोटी-मोटी कमियां भी ढक जाती हैं। फिर लडकी की किस्मत का फैसला होना है। सौ पचास लग जाने से कोई फर नहीं पड़ता।' पर लड़के वालों की नजर म शायद इस 50 रुपय मीटर वाले सूट की कोई अहमियत नहीं थी। उनकी घाघ नजरें बिटटी की रगत को ही तोलती परखती रही और नकारात्मक जवाबा का जो मिलसिला चला वो अब तक वदस्तूर जारी है। ध्यान से विटटी का चेहरा देखता-जरा दबी हुई मी मावली रगत है विटटी की पर इससे क्या, उसकी बडी-वडी भावप्रवण जाँखे हैं, क्या ब्याह के वागार म लडकी को सिफ उजले रंग की ही क्सौटी पर तोला जाता है ? और फिर रिश्तो को ठुकराने वाले खुद कौन स दूध के धोय थे | अलीगढ़ वाला खुद तो उलटा तवा था। पर चाहिए थी नाटे की लोई-सी गोरी क या । हुँह-ऐसे लोग भला क्या कदर कर पायेंगे बिट्टी की। वी० ए० प्रथम श्रेणी से पास विटटी म जा कुछ है वह क्या हर लडकी म सुगमता में मिल सकता है। वो तो घर को पारिवारिक स्थिति से मजबूर होकर बिटटी की पढाई बीच मे ही छुडवानी पड़ी और इसका जिम्मेदार शायद घर का हर शख्स है। पिताजी की रिटायरमट, उसकी बरोजगारी मां का सदा से चला आ रहा रोगी शरीर-य सब कारण पयाप्त थे विट्टी की पढ़ाई छुडवान के लिए । प्रथम श्रणी मे वी० ए० पास बिटटी को जव वा वतन रगडते देखता तो अपराध बोध से भर उठता। उसकी नी तो नौकरी नही, किस मुह से सिफारिश करता विट्टी की । एक वार दवे मुह से बाबूजी से कहा, बाबूजी, बिट्टी को एम० ए० तो वरने दीजिय, इतकी होशियार है।' 'एम० ए० करके तुमने ही कौन-सा क्लिा फतह कर लिया है-दो साल से निठल्ले घूम रहे हो । जब ठिल्ले ही घूमना है तो एम० ए० क्या और बी० ए० क्या।' उसका मुह अपमान से स्याह हो आया था। बाबूजी उस पर यू ताने कसते हैं मानो वह अपनी मर्जी से बेरोजगार है। क्या वह नहीं चाहता कि जल्दी से जल्दी उसकी नौकरी ला बाय और इस जलालत भरी जिंदगी से उसे छुटकारा मिल जाये। किन किन महकमो को खाक नही छानी है उसने कहाँ कहाँ आप्लाई नहीं किया पर एक अदद नौकरी नही पा सका। छोटी से छोटी नौकरी के लिए भी ये सोचकर आवेदन पत्र भरे कि एक बार उसका पांव भर टिक जाये और उसके 80/ पल प्रतिपल मत्थे से वेरोजगारी का ठप्पा हट जाये फिर वह वेफिक्री से वेहतर जगह तलाशने का प्रयास जारी रखेगा-पर ऐसी नौकरी भी वहां जुटा सका अपन लिए। वहाँ उसकी योग्यता और उच्च शिक्षा आडे आ जाती। वोला जाता, 'आप अपनी लियाक्त इस अदनी सी पोस्ट पर क्यो जाया कर रहे हैं। आपका तो इससे बेहतर बीसिया जगह मिल जायेगी। कम पढे लिखे लोगो का हक तो न छीनिये।' 'अजीब मुसीवत है वह झल्ला पडता । छाटी नौकरी उमके योग्य नहीं बडी नौकरी के योग्य वह स्वय नहीं है फिर वह जाये कहाँ ? कौन सा वो सतुलित बिंदु हागा जहा वह थिर हो सकेगा। अच्छी नौकरियां तो भाई भतीजावाद और रिश्वतखोरी के जोर से यू भर जाती हैं जसे शतरज की गोट । 'वहाँ खडा खडा क्या कर रहा है देव जा राशन की चीनी ले आ। मां के हाथ से राशन काड, थला और पसे लेकर वह चल पडा । उसे कालेज के जलमस्त दिन बाद आ गये, तव कभी अगर मा उसे राशन की चीनी लेने को बोलती थी तो वह भडक उठता था थैला लटकाये राशन की क्यू में खड़े होना उसे अपनी तौहीन लगता था। पर अब एस कई काम वह बिना ना नुकर किये खामोशी से कर देता है। अपनी बेरोजगारी की भरपाई का कोई रास्ता वह नही छोडता। विटटी भी तो खामोशी से घर के कामो मे जुटी रहती है। पहले वो भी मा द्वारा काम बताये जाने पर ठुनकने लगती थी पर चार पांच जगह से रिश्ते का नकारात्मक जवाव आन के बाद वह भी जस अपराध बोध से भर उठी है। स्वय को घरवालो पर बोझ सा समझने लगी है। मां वावूजी चाहे उसे न समझ पाय हो पर वह तो जैसे विटटी के अ तमन तक झाँक आया है। जानता है जितनी अहमियत उसके लिए नौकरी की है उतनी ही विट्टी के लिए ब्याह की है। डिया पर लम्बी कतार लगी थी। बामुश्किल उसका नम्बर आ सका। इसके वाद वह एक सावजनिक पुस्तकालय में बठकर अखबार के पने पलटने लगा। नौकरी की तलाश अक्सर यही करता है वो। उसकी पाली खाली दिनचर्या का य एक सरस टुकडा होता है। कही अपो योग्य रिक्त स्थान पा जाता है तो उसकी आँखो मे एक चमक सी आ जाती है। मन मे आशा का सवार हो उठता है । पर साप ही कई समस्यायें भी सिर उठाने लगती हैं। आवेदन-पन मंगाने के लिए पैसे दरकार हैं और यह काम बहुत मुश्किल और तनावपूण लगता है, बाबूजी से पस मांगन की ताब नही है उसम । व पमो के साथ साथ कुछ जलीचटी चुभने वाली बात कहने से बाज नही आते । मां बालती तो कुछ नही है पर पस थमाते समय एसा ठडा नि श्वास भरती है कि वह अपराध बोध से भर उठता है। मां के निश्वास उसके सीने में फफोले बनकर उभर आत हैं। अपन आपको कोमत हुए वह सोचता है एम समय जबपि उसे श्रवण पूत की तरह मां के हाथ म सो सो विस्फाट के बाद / 81 के नोट रखने थे वह स्वय ही हाथ पसारे खडा रहता है। घर की मजबूरियां वो समझता है। सिर्फ पैशन के बूते पर गृहस्थी को चलाना आसान काम नहीं है। अपनी जान में बाबूजी सदा नियाजित ढग से चले। उस जमाने म भी हम दो हमारे दो' वाले सिद्धात पर चलते हुए दो अदद वच्चो पर ही पूर्णविराम लगा लिया। सदियो की गुनगुनी धूप मे खाट में अधलेट बाबूजी कहते, 'अपना तो सब कुछ रामजी की दया से ठीक चल रहा है। इधर मेरी रिटायरमट हुई उधर देबू पढ़ाई पत्म करके नौकरी स लगा। बिट्टी का ब्याह फड के पसो से हा ही जायगा।' पर वाबूजी की 50 प्रतिशत बात ही सच निकल पायी। रिटायर तो वे हो गय पर देवघर की नौकरी न लगी। अब तो उसकी बेरोजगारी के लम्बे तीन वपन उनके अन्दर निराशा के साथ-साथ झुझलाहट भी पैदा कर दी है। सारा दिन घर में उनकी उपस्थिति देवधर को और देवधर की उपस्थिति उह असहज बनाये रहती है। इसलिए वह अक्सर बाहर के कामो मे ही स्वय को व्यस्त रखकर बाबूजी की जलती सलाख सी आँखो से दूर रहने का प्रयास करता है । वाबूजी तो बिटटी के सांवलेपन को लेकर नकारे गये रिश्तो का गुनहगार भी उस ही मानते हैं । अक्सर बोल देते 'अरे जि हे पता हो कि लडकी का वार रिटायर हो चुका है, बड़ा भाई तीन साल से वेरोजगार है वहाँ कोई किस आशा से रिश्ता जोडेगा। भाई, अच्छी नौकरी पर ही तो रिश्ते खुद चलकर आत हैं।' उसका मन हाता है चीख पडे-- 'भाई की नौकरी बहन का रग तो उजला नहीं कर सकती' पर आदतन वह चुप रहता है, जानता है घर की हर अवाछित घटना का बाबूजी घुमा फिराकर अक्सर उसी पर आरोपित कर देते हैं । क्या उसे कम चिंता है विट्टी की, चौबीस पार कर चुकी है उसमे बस एक ही वरस तो छोटी है। एक-दो रस और अगर इसी तरह गुजर गय तो ब्याह के बाजार में विटटी की कुछ भी कीमत न रह जायेगी। वो अभी से निराश हो गयी है। पहले जब उसे देखने वाले माने होते थे तब बिटटी के चेहरे पर सज्ज मुस्कान छा जाती थी। गालो पर सावलेपन के वावजूद सुख गुलाब खिल जाते थे, गुनगुनाते हुए तैयारियो मे लगी रहती थी। पर अब लगातार नकारात्मक जवाब सुन सुनकर उसका मन भी जैसे भर गया है। सुबह किस मशीनी ढग से सूट प्रैस कर रही थी-जैस महज एक और- चारिकता निबाह रही हो। वापिसी म वह नरेश से इस शर्त पर पचास रुपये ले आया कि राज्य सरकार से मिलने वाली बेरोजगारी भत्ते की पहली किश्त वह उस दे देगा। नरेश भी उसका ही सहपाठी था पर वह अपेक्षाकृत खुशकिस्मत रहा । कुल डेढ़ बरस की बेरोजगारी ही देखी उसने, अब छोटी सही पर एक अदद नौकरी तो जुटा ही ली उसने अपन लिए। इन पचास को मिलाकर दो सौ रुपय कज हो गया है उस पर 82 / पल प्रतिपल नरेश का 1 नरेश के ही जोरदन पर बेरोजगारी भत्त के लिए आवेदन-पत्र दिया था। उसने सोचा-यम स कम दस-बीस रुपया के लिए तो मां-बापूजी क आग हाप नही पसारन पड़ेंगे। घर म जब वह फार्म भर रहा था तो अचानक बाबूजी आ गये और जेलरो की तरह तहकीकात करने लगे, 'क्या कर रहे हो?' 'नौकरी के लिए आवेदन-पत्र भर रहा हूं।' 'पसे नही मांगे तुमन' बाबूजी ने टेढ़ी नजरो स उस पूरा। 'हैं मेरे राम" 'कौन सा कारू का पजाना हाथ लग गया?" वावूजी का व्यग्य भरा स्वर उस अदर नकवीच गया। स्वर की तल्धी पर बामुश्किल काबू पाकर वह गोला, बेरोजगारी भत्त के लिए भावेदन पत्र भरा था मैंने।' 'अपना अपना नसीब है' पलग म लेटी मान गहरी उसांस भरी, "किसी को तनख्वा मिलती है ता किसी के हिास ये खरात का पसा आता है। उसका मन हुआ बोले-~ये बरात का पसा नहीं है। उस नोपरी देना सरकार की जिम्मदारी है जिस पूर्ण न कर पाने के एवज में ही उस य पैसा दिया गया है। दोपहर वाले साक्षात्कार के लिए जब वह डिग्रो फाइल में रखने लगा तो उस होठो पर एक फोको मुस्कान सी आ गयी। विटटी का फिरोजी सूट और उसकी डिग्री विवाह और नौकरी के लिए महत्वपूण हथियार होते हुए भी क्रमश अपना पनापन खोते जा रहे हैं। न बिटटी का महंगा सिल्क का फिरोजी सूट उस एक पति दिलवा सका और प्रथम श्रेणी की उसकी डिग्रो उस एक अदद नौकरी दिलवा सकी। बिट्टी अपना सूट हैंगर म टांग रही थी। हर बार क किस्स की वही घिसी पिटी पुनरावनि हागी। हर वार वही पर औपचारिकताये तो निवाही जाती हैं। लडके वाले आत हैं, फिराजी सूट म सकुचाती बिटटी चाय की दलकर आती है बिट्टी को देखत ही लड़के वालो के चेहरे पर जो ऊब और बेजारी के भाव छा जात हैं देवधर स छिपत नही पर मो ये सब न भापकर विटटी की विरुदावलि गाने में लग जाती है- हमारी विदुला तो बडी हाशियार है बी०ए० फस्ट आयी थी। वो तो हमने ये सोचकर पढ़ाई छुड़वा दो पि लइक्या को आखिर घर का वामकाज भी आना चाहिए । बब चाहे तो ये नौकरी कर ने-चाहे पर बठकर गृहस्थी ममाले- हमन तो हर नायक बना दी है अपणो विदुला-जिस पर जायेगी-~~घर जगर- । हैदराबाद का एक इजीनियर तो जी विना दहे। इससे माह करने को कहता है--पर हम ही इतनी दूर नहीं मजना चाहत-हमारी भी तो इकलौती बेटी है । मो के Rठ पर उस हंसा आन को होनी है जिस बामुश्किल वह बन कर जाता है। उसो को मी किस्मत तो है बिटटी की, वह भी मगर कर उठगा विस्फोट के शद / 83 तो डिग्रियां समेट पूरी सजधज के साथ जाता है इटरव्यू देने पर नतीजा सदा सिफर ही रहता है। दोपहर उसका एक साक्षात्कार था। अपनी डिग्री और आवश्यक कागज समेट रहा था कि मां बोली, 'शाम को इलाहाबाद वाले आने वाले हैं, समय से घर पहुँच जाना। उसके होठा पर एक क्षीण मुस्कान सी आ गयी। तो उसका और बिट्टी के भविष्य का फैसला जान साथ साथ ही होना है। घर से निकलने लगा तो आदतन मां को सूचना दी, मा मैं जा रहा हूँ।' 'अच्छा ।' रसोईघर में मां का लापरवाही से भरा सपाट स्वर आया। पहले पहल जव वह इटरव्यू देने जाता था मां उसके माथे पर रोली लगाकर दही- गुड खिलाती थी। फिर शायद बार बार उस निरथक शगुन की पुनरावृत्ति करना उ हे गैरजरूरी लगने लगा। खुद उसको मन स्थिति भी अब पहल सी कहां है। पहले उसका मन अवूझी घबराहट से उद्वेलित रहता था पर अब इटरव्यू देते देते उसका मन भी पत्थर सा सवेदनहीन हो गया है । अब इटरव्यू देन और राशन को चीनी लाने में उसके लिए खास फक नही रह गया है। जानता है ये साक्षात्कार महज औपचारिकतायें हैं फिर भी आशा का न जाने कौन सा अदश्य सूत्र उस हर बार अपनी ओर खीचता है और वह भी सहज भाव से चल देता है । जूते की एक कील उसे बार बार चुभ रही थी। ऐसे में तो बम स्टाप तक पहुचना ही मुश्किल हो जायेगा। उसने जेब रटोली, किराये के अलावा चार रुपये और थे उसके पाम। चाय के लिए दो रुपय बचा लोभी बकाया दो रुपये मे बूट पालिश कराकर कील कवाई जा सकती है। मोची के सामन जूना सरकार उसन टायरमोल की बेडोल मी चप्पल म पौव फंसा लिया। 'सोल बिल्कुल घिस गया है साब-कहो तो नया लगा हूँ-दस रुपये में एकदम नय-नकोर कर दूगा जूते ।' 'अभी नहीं अभी मुझ दर हो रही है ।' मन ही मन मोची की नादानी और अपनी मजबूरी पर उस हमी आने को हुई । सोल लगवान के लिए ही पस हाते उसके पास ना बस की धक्कम धक्का की जगह वह टक्सी सन चला जाता, कम से कम पैट की कीज तो सलामत रहती। बूट पहनकर वह बस स्टाप की बार बढ़ गया। अब यह आरामदायक ढग से चलता मोच रहा था, कष्ट के बाद का आराम कितना सुखद होता है। बस स्टॉप पर लम्बी क्यू देय मायूसी म वह क्यू के अतिम छोर म जाकर खड़ा हो गया। तभी घरघरावर बस रुखी तो क्यू की नौपचारिक्ता छोड सर वाडे से छूटी भहो के रेवड की तरह बस के दरवाजे की ओर लपक । उमन दा बार आगे बढ़न का प्रयास रिया पर दानो पर भीड ने उस पीछ धरेल दिया। स्टाप पर अब आठ-स आदमी ही रह गये थे। हर जगह 84/ पल प्रतिपल समथ ही आगे निकल जाते हैं उसने सोचा । अब तक तीन चार और नय व्यक्ति आकर क्यू म लग गय थे। उस हसी आने का हुई इस समय कसी मराफ्त और शालीनता से पडे हैं-अभी बस बायगी तो सारी शराफ्त ताक पर रखकर उग्रता से एक दूसरे को धकेलत हुए वस की जोर लपकेंगे । तभी बस आकर एकी तो एक बार फिर पहले वाले दृश्य को पुनरावत्ति हुई पर इस बार धरमपल के बीच वह किसी तरह वस म प्रविष्ट हो ही गया । एक कोने म सिकुडकर वह भीड से अपने कपडे बजाने वा व्यथ प्रयास करने लगा। अपने गन्तव्य पर जब वह उतरा तो पैट की हालत देखकर उसका सिर धुना वा मन हुआ। कमीज जगह-जगह से मुघड गयी थी जतो पर धूल लिपटी थी -पट की फ्रीज में वई पम आ गय थे। उमने जेब स रुमाल निकालकर अपने बूट पोछे, हाथ स पैट की श्रीज सीधी करी और चल पडा। पक्ष के बाहर कइ प्रत्याशी वैच पर बड़े थे। वह भी बैठ गया। उसने सबके चेहरो पर सरसरी नजरें फिरायी। सभी चेहरे गमगीन और गभीर थे। बेरोज- गारी के सबके अपने अपने पडवे तीखे अनुभव होग । नौकरी की अनिवायता सभी के लिए होगी । न जान क्यो इस समय उसके मन की उद्वेलना को कुछ शाति-सी मिल गयी थी लग रहा था वह एक अकेला ही बेरोजगार नहीं है, उस जसे वीसियो और भी हैं। चपरासी अब एक एक करके नाम पुकारने लगा था। उसने अपने कागजो पर सरसरी सी नजर फिगई। उसका नाम पुकारा गया तो सभल- दर वह अदर गया। बोड के सदस्यो का अभिवादन करके बैठ गया । ये चार भाग्य विधाता हैं उसके- 'कहाँ के रहने वाल हो " 'कितने भाई-बहन हैं ?' एम० ए० किये कितन वप हो गये।' 'कौन से कालेज से ऊलजलूल से असबद्ध प्रश्नोस उकताकर वह सोच रहा था सीधे से साक्षासार क्या नहीं ले रहे थे लोग । बाखिर प्रमुख लिपिक का पद है, कुछ विपय से सवचित प्रश भी तो पूछ अब आप जा सकते हैं पत्र द्वारा आपको निणय से अवगत करा दिया जायगा। निदाल कदमो से वह बाहर आ गया। इस तरह के टरकाऊ साक्षात्कार वह पहल भी कई दे चुका था और उनका नतीजा भी उसे पता था। दोबारा वह जपन स्थान पर बठ गया। उसके बाद एक युवक का नम्बर था। युवक को अदर प्रविष्ट हुए अभी दो मिनट ही हुए थे कि उसका आक्रोश से भरा उच्च कठ स्वर तिरता हुआ बाहर तक आया ये कसा इटरव्यू है- ऊनजलूल प्रश्न पूछने के बजाय कुछ सीची ठोस विषय की बातें क्यो नही पूछते । मजाक बना " रामजससे - विस्फोट के बाद / 85 रामधन रखा है ।' 'देखिये ।' एक समझाता-सा स्वर आया। 'क्या दखिये हम अधे हैं क्या, नजर नहीं आता तब से आप ऊटपटाग प्रश्न पूछ रहे हैं कहाँ पैदा हुए कहाँ पढे किस शहर के हैं-विषय से सवधित एक भी बात नहीं पूछी ।' 'तो अब पूछ लेते हैं आप शात तो होइये ।' 'य औपचारिकतायें रहने दीजिये ।' युवक का स्वर उच्च से उच्चतर होता जा रहा था, हमे क्या पता नही कि इस पद पर यड डिवीजन पास विधायक के भतीजे का चुना जाना पहले ही नियत हो चुका है-आप लोगो का राज है लियाकत ताक मे रखकर जिसे मर्जी चुनिये मगर फिर हम लोगो को क्यो बुलाया गया है हमारे ममय और धन की क्या कोई कीमत नही । दस रुपये टैक्सी भाडा देकर हम यहा पहुँचे हैं इतना ही वापिसी मे लगेगा फाम भरने में भी दस-पन्द्रह रुपये लग जायेंगे-वो पैसा क्या आप देंगे? बेरोजगारो से ये कसा चदा उगाह रहे हैं आप? एक कठोर आवाज गूजी, 'वाहर ले जाओ इन साहब को, इनका तो दिमाग खराब हो गया है ।' "दिमाग खराब है आप लोगो का युवक का स्वर अव चीखने की पराकाष्ठा पर जा पहुंचा था। 'वाहर एक से एक योग्य प्रत्याशी उम्मीद लगाये बैठ हैं पर चयन होगा विधायक के थड डिवीजन पास भतीजे का धिक्कार है आप लोगो की चापलूसी और स्त्रंणता पर इस देश को रसातल में ले जा रहे हैं। नेताओ अफसरो के साथ आप लोग भी शामिल हैं इस षड्यय में ।' युवक तेश मे भरा बाहर आ गया। उत्तेजना के अतिरेक से उसका चेहरा लाल हो रहा था । माथे पर झूल आयी बाला की लट को झटके से पीछे फेंक तेज चाल चलता वह कक्ष से बाहर हो गया। सभी प्रत्याशी सनाका खाये किंकतव्यविमूढ से वठे थे। उलझन की सी स्थिति बरकरार थी। सब एक दूसरे का चेहरा देख रहे थे। इस विषय में फुसफुसाहट हो रही थी कि इटरव्यू दिया जाये या नही । युवर की वातो म पातप्रतिशत सच्चाई है ये सबको पता था। बकाया प्रत्याशी भी अब साक्षात्कार देने के मूड में नही थे और फिर एक फमले पर पहुंचकर वॉकआउट मुद्रा में सब युवक के पीछे पीछे बाहर निकल आये। वह अपनी ही सोच मे उवा चल रहा था। उस अनजान युवक के प्रति उसके मन में प्रशसा और श्रद्धा के से भाव पैदा हो गय थे। कितना निडर साहसी और स्पष्टवक्ता है मन मे खोल रही बातो को किस तरह वेखौफ उगलकर रख दिया। इस युवक जसे मो- पचाम भी हो जायें तो साक्षात्कारो मे चली जा रही धांधलियां काफी हद तक बम हो जायें। सिफारिसा, भाई भतीजावाद और रिश्वतखोरी के निद्वद प्रवाह

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विस्फोट के बाद / 87 निनिमेष देखता रहा फिर शिथिल कदमो से अपने कमरे की जोर वढ़ गया। कमरे मे आकर वह निढाल सा विस्तर मे जा पड़ा। उसकी कल्पना मे अब काजू बर्फी टूगते मेहमान, फिरोजी सूट मे चाय दती बिटटी बिटटी के गुणो के बखान म लगी मां और मेहमानो के चेहरो पर छाये ऊब और नकार के से भाव - सब एकमुश्त ही छा गये। अचानक उसकी आख की कोर से एक अवश सा आँसू बहता हुआ टप से तकिये पर जा गिरा।

86/ पल प्रतिपल म कुछ तो रुकावट आये। पर यही है उम जैस लोग उस जसा दुलभ व्यक्तित्व है पितनो बा। पद वा भी तो पितना दत है। इस तरह गुल्मखुल्ला मात करने का साहस नही है उसम। पिछले माभारवार म उस भी तो पता था कि उस पोस्ट पर घोड के सदस्य के ही किमी रिश्तेदार का चयन होना है फिर भी उसन किम सुघडता और शालीनता से साक्षात्कार दिया था। माश उमम भी उस युवक जसी मुखरता होती। उसकी अवचेतना में भव भी युवक का लाल तम तमाया चेहरा छाया था। अपनी ही सो मे गुम वह जान पर बस स्टॉर पर जा पहुंचा। धक्कमपल के बीच उसन भी स्वय को यम के अदर ठेल दिया। अब न क्रीज विगडन की चिंता थी और न जूत पराव होने की। इसी तरह सम्मोहित- मा वह न जान पर अपने घर भी पहुंच गया। कमोवेश उसी समय घर के सामने एक टैक्सी रुकी और उसम स सभ्रात स नजर आने वाले एक अधेड पति और एक सुदर्शन सा युवक उतरा। देखते ही वह ममक्ष गया कि ये लोग बिटटी को देखने आये हैं। इतनी देर म वावूजो उनकी जगवानी करके अपर मांगन तक ले गय। एकाएक उस लगा उसके अदर कुछ उवल खोल रहा है वाहर आने को बेताब है अगर शीघ्र ही ये सब कुछ बाहर न आया तो उसके अदर एक विस्फोट हो जायगा । वह तेज कदम धरता आंगन मे आया और बोला आगतुक दम्पति के साथ बाबूजी भी ठिठक गये और प्रश्नवाचक दष्टि स उस पूरने लगे। बाबूजी कुछ बोलते इससे पहले ही वह बिना किसी भूमिका के बोला देखिय--आप लोगो को पहले ही बता दू कि हमारी विदुला सांवली है। वैस मवगुण संपन्न है-क्सिी नसीब वाले के ही घर जायेगी। पर उसका रग वसा उजला नहीं है जमा विवाह के बाजार मे अपेक्षित है।' 'देवू ।' बाबूजी ने श्रोध और अविश्वास भरी नजरोस उसे देखते हुए बरजना चाहा। पर उमन जम कुछ सुना ही नही। अपनी ही रो मे बोलता गया, 'अगर सांवलापन विवाह के लिए आपकी क्सौटी मे कोई जयोग्यता नहीं है तभी देखने-दिखाने की औपचारिक्ताये निवाहिय वरना झूठमूठ का नाटक खलने से कोई लाभ नही ।' भागतुको का चेहरा अपमान से लाल सा हो आया। अधेड व्यक्ति बाबूजी की ओर उमुख होकर बोला, ये सव क्या है ? कौन है ये असभ्य लडका जी-मेरा ही बेटा है' बाबूजी घिधियाये 'जवान खून है यू ही बेमतलन उफान खाता रहता है-आप लोग इसी बातो पर ध्यान न दे। इसकी ओर स मैं जाप लोगो से माफी मांगता हूँ-आइये-आइये । बाबूजी को घिधिया- हट निरीहता की सीमा पर थी। नफरत से देवधर का सर्वांग थरथरा आया। बाबूजी तब तक अधेड व्यक्ति और युवक का हाथ थाम लगभग खीचते से अदर ले गये थे। वह जड बना जहा का तहाँ खडा था। कुछ दर वह हिलते हुए पर्दे को 'सुनिये । ?"

विस्फोट के बाद / 87 निनिमेष देखता रहा फिर शिथिल कदमो से अपने कमरे की ओर बढ़ गया। कमरे मे आकर वह निढाल सा विस्तर मे जा पड़ा। उसकी कल्पना मे अब काजू बर्फी टूगते मेहमान फिरोजी सूट मे चाय देती बिट्टी, बिटटी के गुणो के वखान म लगी मा और मेहमानो के चेहरो पर छाये अब और नकार के से भाव -सव एकमुश्त ही छा गये। अचानक उसकी आँख की कोर से एक अवश-सा आँसू बहता हुआ टप से तकिय पर जा गिरा।

काला सूरज 0 प्रेमसिंह बरनालवी वह रेलिंग पर कोहनिया टिकाय नीचे कलकल बहती जलधारा को निहारता जल और जीवन के सबंध मे तरह तरह की बाते सोच जा रहा था। सहसा उसने गदन ऊपर उठायी। एक जनती बुझती रोशनी पर उसकी आखे स्थिर हो गयी । 'दव- घाम' वह मन ही मन रोशनी के शब्द को दोहरान लगा। चल मन आज वही चल और कलम उधर बढ़ा दिये। नाम अनुरूप ही वह जगह थी। नदी का एक हिस्सा पानी नेवधाम के जागे स बह रहा था। किनारे पर मखमली घास लगी थी जिसके बीच में बेगनवेलिया के फूलो की शोभा मरक्युरी लाइट मे देखते ही बनती थी। क्रिसमस पेडा के बीच नीली रोशनी और इद्रधनुषी वत्तियो वाले फुहारे क महीन जल वण उसके हृदय मे ठण्डक भरने लगे। लॉन मे देवधाम नाम को साथक करती ध्यानमग्न महात्मा की मूर्ति थी। मूर्ति के चेहरे के भाव इतने सजीव थे कि वह मूर्ति और मूर्तिकार पर मुग्ध हो गया। काउटर पर इकहर बदन की खूबसूरत लडकी जो खुद किसी तलवार से कम न थी हाथ में मुल्लमा चढे कागज की तलवार लिए बैठी थी। उसन सडक किनारे कलात्मक रम्भे से कान लगा लिए। संगीत की धुनो के साथ कुछ अजीब किस्म की आवाजें उसके कान में प्रतिध्वनित होने लगी। जस ही उसन खम्भे स कान हटाय उसकी नजर काउटर पर बैठी लडकी के चेहरे ने टकरायी। लडकी मुस्करा रही थी। वह भी मुस्करा दिया। लड़की ने पास जान का सकत किया। उसने यवत सकेत का पालन किया। तुम दूर क्यो खडे थे" लडको ने उसकी आँखो म आँखें डालत उलाहन भरे स्वर म कहा । फिर हाथ की तलवार को आठो से लगा लिया। उस लगा तलवार उसके जिगर के आर पार हो गयी है। फिर भी साहस बटोरकर कहा, दरअसल यह काला सूरज / 89 मेरी राह नहीं है। मैं एक पुजारी का वेटा हूं और अक्सर एका त म अपने पिता की तरह उस चिरतन शाश्वत सत्य की खोज किया करता हूँ।' लडकी ने 'हूँ वह अपनी नाजुक क्लाई हिलाई। हीरे रत्नजडित चूडियो पीक्षाकार से उसका रोम रोम झनझना उठा। लड़की ने तनिक व्यग्य भरी मुस्कराहट विखेरते हुए वहना शुरू किया, 'मिन उस सत्य की खोज कहाँ करागे? क्या इस दुनिया, इस धरती से परे जा वर्तमान है उमसे टूटकर? ध्यान से सुन । कोई मत्य शाश्वत नहीं होता। यह शब्द मूखों का झूठा अवलम्ब है जिस लिये अतीत को गली सही व्यवस्था व मा यताआ से चिपके रहत हैं। आज का सच कल पा झूठ हा सकता है और क्ल का झूठ आज का सबसे बडा सच । अतीत मुर्दा है और भविष्य अजाना। बस तमान की धारा मे बहे रहो। यही जीवन है। यही है चिरतन शाश्वत सत्य का सार और नयी सदी का सदश भी।' उससे इसका कोई तक्सगत उत्तर देते न बना। लड़की ने अन्तिम चोट की, 'दुविधा तज !' और उसके ओठ हौले होले तलवार की धार पर फिरने लगे। उसे लगा जसे उसके भीतर में कुछ कट रहा है जो उसे आहत किये जा रहा है। उस पहली बार महसूम हुआ कि उसके दिमाग म कुछ फालतू चीजें जमा हो गयी हैं जिह उसे फेंक देना चाहिए। उसके रूप लावण्य म खोये उमे अपना आप भोर मे पिले कमल-सा लगा। फिर उसे महसूस हुआ कि उसका मन उलझन रहित हो गया है । वह लडकी के चाहे जनुरूप बन गया है। वह अपो स्वभाव के विपरीत लडकी के अंग प्रत्यग को निहारता बहुत कुछ मोचे जा रहा था। फिर उसे लगा जस उसको मोच जड हो गयी है। उसने आँखें मूंद ली। उस लगा जैस उसने सुन्दर आकृति पो आंखो म कैद कर पुतलियो का दरवाजा ठल दिया हो। तभी लड़की ने धोमे स न नयार उसकी गदन पर रख दी और उस धीरे से समान लगी। अभी वह मुशिलोदो इच ही सरका पायो यो नि उसन जाय खोल दी और दिन तान ली, 'तुम एस ही आँखें मूद बठे रहा लडकी ने वादामी भाना राजादू विपरत हुए यहा। 'नही अब और नहीं।' 'यह देवधाम के नियमों के विरुद्ध है।' 'देवधाम कमियम क्या रहत है देवधाम परम सुन्दरी व काग में काई वाधा न दे। 'अगर कोई एसा करे तो।' 'उमा हय बुरा होता है।' मैं यह होगना पाहना हूँ।' "मुस तुम पर दया भानी है।'

90/ पल प्रतिपल कहा, तो दया कीजिये।' लडकी ने कुछ क्षण सोच लडके के भोले मासूम चेहरे की ओर देखकर कहा, 'देवधाम के नशे म भी तुम्हारी ज्ञानद्रियां शिथिल नहीं होगी।' 'यह तो बहुत अच्छी बात हुई।' 'बहुत अच्छी बात नहीं। वहोशी मे कष्ट झेलना कही सुखकर होता है अव भीतर जाओ। उसने एक झलक भीतर की देखी और फिर लौट आया। यह देवधाम नही है। शायद मैं गलत जगह आ गया हूँ।' वह हंसी सूरज को चिराग कहने से वह चिराग नही बन जाता।' 'यहाँ अनाचार की वू आती है।' लडकी ने अपनी माम सी अंगुली उसकी नाक पर रख दी और मुस्कराते हुए 'अव कहिये उसने कहा कुछ नहीं। कुछ क्षण पहले लड़की के मुस्काने स गाल म वन गड्ढे की मुद्रा मे उलझा रहा। फिर जैस भीतर के वोनपन से उभरने की गज स कहा, मरे मन में एक बेहतर समाज की कल्पना है।' 'रो आदमियो के दिमाग मे ऐसी कल्पनाएँ कुकुरमुत्तों की तरह उगती हैं और मिट जाती हैं। कल्पना के पीछे वल चाहिए। और जो बलवान होते हैं वे ऐसी बेहूदा कल्पनायें कभी नहीं करते।' लेकिन मरी कल्पनायें मरी जान रहत खत्म न होगी। मैं इस जनाचार का पर्दाफाश कर दूगा' वह आवेग मे कहता जा रहा था, मरी बडे बडे समाजसवियो से मित्रता है। धम स्तम्भ माने जाने वाले लोग अक्सर हमारे घर आते हैं । जन रक्षक पुलिस अधिकारीगण मेरे पिता का बहुत सम्मान करते हैं। आज की सबस बडी ताकत अखबारो तक मेरी पहुंच है । इन सबके जरिये मैं ।' लडकी ने मुस्कराते हुए बात काटी, 'निश्चय ही तुम बहुत ताकतवर हो और साथ ही काम के आदमी भी। पर मित्र, देवधाम का तुम बाल भी बांका नहीं कर सकत।' 'क्यो?" वह तनिक आवेश मे वोला। 'जिन लोगो की पहुंच के बल पर तुम इतने आशावान हो वे सब तुम्हें यही पहुंचे मिलेंगे। जिहे तुम अपना हथियार मानते हो बही तो हमारी ढाल हैं। विश्वास न आये तो देख लो। हमारे स्वामी के हाथ सत्ता के कागजी कानूनी हाथो स कही मजबूत हैं।' प्रत्युत्तर म उससे कुछ कहते न वना। उस ख्याल आया पुलिस चौकी नम्बर 4 यहाँ से लगभग सो गज दूर होगी। उससे कुछ फामले पर नवजीवन दर्शन' नामक एक सामाजिक सस्था है बोर सहक के सिरे पर सनातन जीवन धम का काला सूरज 191 बीड लगा है। उसके थोडा आगे दो पीर चौक के पास 'घर बाहर' नामक प्रसिद्ध दैनिक पत्र की इमारत है। उसन कुछ दवी-सी आवाज मे पूछा, 'तुम्हारा स्वामी कौन है। लड़की ने एक शीशे से पर्दा हटाया। वह एकटक उस तस्वीर को पूरने लगा। उस इस तस्वीर और लॉन की मूर्ति के चेहरे म माम्यता लगी। बड़े सख्त लहजे में कहा, 'मैंने इसे देखा है।' 'जरूर देखा होगा कहकर वह अग्रेजी धुन म गुनगुनाने लगी। उसकी आँखों के नागे चलचित्र की तरह घूम रहा था, एक सती की समाधि पर पुष्पमाल्यापण का दृश्य, दहेज विरोधी अभियान के दिलकश पर खोखले नारो की गूज, झुग्गियो पर चलते दत्य से बुलडोजर, असहाय लोगो की चीखें, भडके दगाइयो द्वारा मौत का नगानाच और वह दांत पीसता चीखा, 'मुझे इससे सख्त से सख्त नफरत है।' वह अपनी नाजुक उगली चटवाती बोली, 'ये नफरत प्यार, मान-अपमान से आर हैं । ये शान्ति के वट वृक्ष हैं और आधी के पास, इसलिए वक्त के थपेडे मात्र इनकी पीठ थपथपाते गुजर जात है।' कह उसने प्यार से हाथ उसके माथे पर रख दिया। उमने ठडी आह भरी और लडकी को ओर ललचायो आँखो से देखने लगा। तभी एक खद्दरधारी नेता का आगमन हुआ। लड़की उसे देख हौले से मुस्कराई और नहफे को भीतर जाने का सकेत किया । वह भला बालक सा भीतर चला गया। भव्य हॉल । छत दीवारें, फस सब कांच के। उसने पहली बार रोशनी के फुहारे देखें। जिहे वह पानी की बूदें समझ उनकी ठडक महसूसना चाहता वे रोशनी की किरणें होती। उसने पहली बार पिघली रोशनी देखी जो पल भर के लिए कौंप्रती, जिस्म म झुरझुरी सी भर देती और शूय में विलीन होकर अगले पल फिर कौंध उठती। उसके साथ वातावरण म ऐसा सगीत था कि उसका रोम- रोम उत्तजित हो उठा। शुरू मे उसे लगा यह संगीत उसकी बुद्धि की पकड से परे है पर जल्दी ही उस अहसास हो गया यह सगीत वतमान को, जो लडकी के शन्दा म सही जीवन पा, भोग लेने का मधुर संदेश था। एकाएक सगीत थम गया और उसके साथ ही रंगीन रोपनियां गुल हो गयी। क्षण भर क लिए यहाँ गहन अधकार पसर गया । देवधाम सद अमावस की रात में पण्डहर को कामासार-साय करने लगा। तभी दूधिया राशी जमी। उस अपने गुलावी हाथ पीले रक्तहीन से लगे। लगा सविसी नाटक का पट-परिवतन हुआ हो। हर चीज उसे बदली-बदली-सी सयो । उस हॉल मइरो चहरे देवकर पाश्चय हुजा जो शो-केसो मे सजे थे। उस जनता का चेहरा भी दियायी दिया जा पाड़ी देर पहले आया था। हर चेहरा कभी पिलपिलाता ता कभी मर्द नाह भरता उदास हो जाता। उसे यह बर वडा 92/ पल प्रतिपल अजीब लगा और इमसे भी अजीव यह कि वहाँ केवल वही एकमात्र दशक था। शेष जितने भी लोग उसकी उपस्थिति में आये ये उन सबका अस्तित्व किसी न क्सिी शो केस के चहरे म विलीन हा गया था। तभी उसकी निगाह एक चेहरे पर पडी, उसने गदन झटकी। तीन चार बार आंखें झपकी। ह यह कैस हो सकता है। नहीं-नहीं। और वह बेतहाशा घर की और भागा। 'मा मा पिताजी कहाँ हैं ?' उसके स्वर म तल्खी थी, वौखलाहट थी। 'यह तुम्हे क्या हो गया है तुम कैसी वहकी बहकी ।' 'मैं बिल्कुल ठीक ठाक हूँ । वस मुप अपनी बात का जवाव चाहिए।' 'मन्दिर में हैं। बैंस उनके आने का वक्त भी हुआ चाहता है।' वह मदिर की ओर भागा। राह म लाग उस पिता की श्रद्धा भपित यमनिष्ठा व केत्तव्य परायणता की बातें कर रह थे। लोगा की आमद से उसन जान लिया कि देवता अब सुखासन (विधाम) की स्थिति म है। लगभग मील भर का राह था। उसका अनुमान सही था। मदिर के मुख्य दार पर बडा सा ताला झूल रहा था। पर उस पिता रही दियायी नहीं दिए । जरूर यही कही होन चाहिए। इसी उधेड्युन म उस मदिर के पुजारी के लिए बनाये निजी कमरे के दरवाजे का ख्याल आया। यह उधर हा लिया। न जान क्या सोच वेआवाज दरवाज स सटकर राड़ा हो गया। इसी म उम पात हो गया दरवाजा भीतर सरद है। तभी उसन एक दरार महा। गुलाची रोशनी । उस यह रचकर आश्चर्य हुआ कि उसके पिता भावविह्वल स एक मूर्ति स आलिंगनयर हैं। उस यह वग बेहूदा सा। पर अगल पर उसने बी घटिया साप रे लिए युद को धिरारा। अपतन न रहा मदिर म सोगो की उपस्थित मदरसा की पूजा महान राम औप चारिता है। असल पूजा तो बादमा पनिज पल हात है जब नामी हर रिस्म पवधन स मुबा अपन समाव व्ययसरिया करता है। तभी उमक far मूर्ति रामापा पूमा और स्टूल पर रपो राजपूता की माला मूगन मगरदा। उम अनारास मजर उसराना मूर्ति पर पी सावह nिa गिराधा। यह स्मधामकाउटर वाला परम गुदरी का प्रतिमा पी।सात् उमन मन ही मन महागुरी अब करा रह इय मैं हारा मनहा भाग सरसा। पर EिR का हत्या करना शुमार कहती पाहाणी मरष्ट समारही मुपार हाया है। उगा मसरामा और मसीकोपार का स्मरणकरनसपर उनीफरनममा उस एक मनोरमा Elentenहनिरोहमा पाबोर सार काला सूरज / 93 का स्वामी अपनी लोहे की मुठ्ठियो मे उसकी फूल सी रूह लिए खिलखिलाकर हंस रहा है । फिर उसको धड गायब हो जाती है और मदन एक खाली शो रेस म फिट हो जाती है। उसका चेहरा भी और चेहरो की तरह हमा-रान लगता है। उस खडे खडे लगा जम वह किसी और ही धातु का जादमी बनता जा रहा है। उसकी आंखो मे चि गारियां निकलने लगी। वह दो कदम पीछे हटा और फिर पूरी ताकत स दरवाजे का बका दिया। दरवाजा कमजोर था उखड गया और दसस पहल कि पुजारी कुछ समय पाते लडके ने बिजली की तजी से उसे वा दिया और खुद मूर्ति म चिपक गया। गुलाबी राशनी को अंधेरा लील चुका था।

92 | पल प्रतिपल अजीब लगा और इससे भी अजीव यह कि वहाँ केवल वही एकमात्र दशक था। शेष जितने भी लोग उसकी उपस्थिति म आये ये उन सवया अस्तित्व किसीन विसी शो-कस के चेहरे म विलीन हा गया था। तभी उसकी निगाह एक चेहरे पर पही, उसन गदन झटकी। तीन चार बार आंखें झपी। हें यह कैस हा सक्ता है। नहीं-नहीं। और वह वतहाशा घर को बार भागात 'मा मां पिताजी कहां हैं ?' उसके स्वर म तल्खी थी, वौखलाह थी। 'यह तुम्ह क्या हो गया है तुम कैसी बहकी बहकी ।' 'मैं विल्कुल ठीक ठाक हूँ। बस मुझे अपनी वाल का जवाव चाहिए।' 'मदिर म हैं । वस उनके आने का वक्त भी हुआ चाहता है।' वह मदिर की ओर भागा। राह में लोग उसक पिता की श्रद्धा, भक्ति कमनिष्ठा व कत्तव्य परायणता की बातें कर रहे थे। लोगा की आमद से उसने जान लिया कि देवता अब सुसासन (विश्राम) की स्थिति म है। लगभग मील भर का राह था। उसका अनुमान सही था। मदिर के मुख्य द्वार पर बडा सा ताला झूल रहा था। पर उस पिता कही दिखायी नहीं दिये। जरूर यही कही होने चाहिए। इसी उधेडगुन मे उसे मन्दिर क पुजारी के लिए बनाये निजी कमरे के दरवाजे का ख्याल आया। वह उधर हो लिया। न जाने क्या सोच वेआवाज दरवाजे से सटवर खडा हा गया। इसी स उसे ज्ञात हो गया दरवाजा भीतर से ब द है। तभी उसने एक दरार से शाका। गुलाबी रोशनी । उस यह देखकर आश्चय हुआ कि उसके पिता भावविह्वल स एक मूर्ति से आलिगनबद्ध हैं। उस यह वडा बेहूदा लगा। पर अगल पल उसन अपनी घटिया सोच के लिए खुद को धिक्कारा । अचेतन ने कहा मदिर म लोगो की उपस्थिति म देवता की पूजा महज एक औप- चारिता है। असल पूजा तो आदमी के वे निज पल होते हैं जब आदमी हर किस्म के बधा से मुक्त अपने ढग समाव व्यक्त किया करता है। तभी उसके पिता न मूर्ति का माथा चूमा और स्टूल पर रखी ताजे फूला की माला मूर्ति के गले में डाल दी। उस अन्तराल म जब उसकी आँखें मूर्ति पर पड़ी ता वह गिरते गिरते बचा। यह देवधाम के काउटर वाली परम सुदरी की प्रतिमा थी। हठात उसने मन-हो मन कहा---सुदरी अब बस करो। वह हथ मैं होश में नहीं भोग सकता। मेरे विवेक की हत्या कर दी। तुम ठीक कहती थी बहोशी मे कष्ट झेलना कही सुखकर होता है। उसन गदन झुका ली और लडकी की तलवार का स्मरण कर अपनी गदन पर उगली फेरने लगा। उस एक अजीब-सी झलक दिखाई दी। वह निरोह-सा खडा है और देवधाम काला सूरज / 93 का स्वामी अपनी लोहे की मुट्ठियो मे उसकी फूल सी रूह लिए खिलखिलाकर हंस रहा है । फिर उसको धड गायब हो जाती है और गदन एक खाली शो केस मे फिट हो जाती है। उसका चेहरा भी और चेहरो की तरह हमा-रोन लगता है। उम खडे खडे लगा जैम वह किसी और ही धातु का आदमी बनता जा रहा है। उसकी आखो म चि गारियां निकलने लगी। वह दो कदम पीछे हटा और फिर पूरी ताकत से दरवाजे का धसा दिया। दरवाजा कमजोर था, उखड गया और इससे पहले कि पुजारी कुछ समय पाते लडके ने बिजली की तेजी से उसे धक्का दिया और खुद मूर्ति म चिपक गया। गुलाबा रोशनी को अधेरा लील चुका था।

बिल्ली 1 तारा पाचाल बडे लडके और लडकी को साइक्लि पर विठार हजूरसिंह जब स्कूल रवाना हो गया तो लखी सुबक पडी। सुबकते सुरकते ही उसने गुस्से म भरकर निणय लिया कि आज या तो बिल्ली नहीं या वो नही । वह सारे काम छाड दरवाजे पर टकटकी लगाकर बैठ गयी। उसके हाथ मे नूण मिच रगडने वाला सोटा था। छोटा काका ठुनककर उसकी गोद में आ लटा। वह उस दूध पिलाने लगी। 'पोटता भी ऐने है जैसे दूध में उसे गोद में लिटाकर पुचकार-पुचकारकर पिलाती होऊँ। घुस गयी चुपके स और पी गयी तो इसम मेरा क्या कसूर? और फिर कोन सा यहा वडाहे के कडाहे दूध उबलता है। गिलास भर दूध मुश्किल से आता है --उसमें से दो बार की चा और बचा हुआ काके का। अब काका भी भूखा और मैं भी पिटी। आ जा, तुझे मैं पिलाऊगी रवडी आज। कहा मर गयी आज मरजाणी। रब्ब सोन की विल्ली मागेगा तो कहां से दूगी? ना भी मांग, पाप तो लगेगा ही और पाप स नरक मिलेगा।' लखी सुबकते हुए सोचने लगी, लेकिन रोज रोज की इस खिच खिच और मार खाने से तो रब्ब का नरक चगा।' जिस तरह अधिक दुप मे आदमी का कम दु खो वाले दिनो की याद मे राहत और सुख मिलता है---उसी प्रकार लखी का मन भी मार खाने के कारण वार बार भटक रहा था, यहाँ स तो पिण्ड में ही चगाया। वहां बथुआ कुदरा, चोलाई तो खेतो से मिल जाता था। ना भी मिलता तो बडे सरदारोके घर से लस्सीले आती थी जिसके साथ लूणी रोटी भी परसादा हो जाती थी। पर यहां तो गुड हादा तो पूडे पो दी ले आदी तेल उधारा पर को कर आट्टा ही नही वाला हाल है।' लखी का सुबकना धीरे धीरे खीझ म बदलने लगा 'रोज रोज का झगडा । इतनी चीनी कैस लग गयी घडी पक्का आटटा इतनी जल्दी कस खत्म हो गया?

बिल्ली/95 तू इतना घी क्यो खच करती है " 'हूँ। जसे मैं रात को उठकर खाती होऊँ। इतना सडाधला घी। गेटी भी चुपडन को मन नही करता । सूखी खाती हूँ फिर भी झगडा।' 'यहाँ बडे सरदारा के पशुओ का सानी पानी ही तो करना पड़ता था। देर- सवेर सब कुछ खाने पीने को मिल तो जाता था। पर नही-शहर मे नौकरी करनी है। शहर मे बच्चो को पढाऊँगा अफसर बनाऊगा । पिण्ड मे अब वैसे भी गरीब का गुजारा नही। ले अब मजे और मार रोज रोज लखी को। बहाना बिल्ली का। यहां स्कूल मे चपरासी ही तो लगा है-~-वह भी सरकारी में नहीं। हुमला पटका यहां ग दे नाले की सड़ांध में । सडौघ तो सडाध, कोई-सा बच्चा कभी लुढ़क गया तो मकान भी लिया तो यहाँ नाले पे। जैसे शहर मे और कही मकान ही नहीं है। आज वहां मर गयी यह विल्ली की बच्ची | अच्छा है आज ना ही आये तो मेरे हाथो पाप तो नहीं होगा।' सोचते सोचते ही उसने 'सी' किया और गोल में लेटे काके को झियोड दिया । दूध ना आने के कारण उसने दांत गडा दिय थे। 'मुझे चाहे नरक ही मिले पर तुझे आज सुरग में जरूर पहुँचाऊंगी नासपिट्टी, तुझ जाज मैं नहीं बरमने की काले मुह वाली। शुरू शुरू म ता गाली खाकर ही बात टल जाती थी पर ब तो एकदम मारने को दौडता है। जब तब ताने मारता है तेरे हाथा में बरकत नहीं है.--वडा आया बरकत वाला । जैस कि हर महीने पीपे के पीप, बारे के बारे लाकर धरता हो। एक चिट्ठी लिखवा दू भाई को तो छुटी लेकर अभी दोडा आयेगा फौज से मुझे लेन । जसे लखी को बिल्कुल बेवारसी समझ लिया है। पर क्या करू, भाई तो बहुत अच्छा है--भाभी भी हो किसी कार को मादी नीत वाली दो धले सस्ती। और फिर ये भी कौन सा भेजता है।' तखी को आँखों म आँसू आने हो वाले थे कि उसे जज्ब परन पड़े। पडोसन बाहर ही से बातें करो लगी थी-हे लखी भैग क्या कर रही हो। देख भैण देख-भव शहर म गरीव का गुजारा नी । देख भण दा रपथ्य की चीनो । देव तो भण बाज भी एक टेम की चा धणगी, बस। लखी अनमनो ही रही। यह देवल हा हूँ और पुचर पुचर करती रही। वैसु भी इस पडोसन की बादत स बह वाकिफ हो चुकी है-अपनी-अपनी कहगी-सुनगी क्सिी पी नहीं। सवेरे उम चीनी र लिए महूंगी तो खूप वालगा--कहेगा क्ल ही तो लायी थी। यता भण? अच्छा भंग मर ता बरतन माण्ड भी झूटे पड़े हैं। दूध भी ऐस ही पड़ा है। चिल्लो पो गयो तो बुडो भूणी रहेगी। सब कुछ यूं ही विखरा छाडनर पीना सन पलो गयो भी पहल । साया सा भाजी म घले जात तो चोनी रह जातीबा भग।' वह पली गयी तो लमी को बिल्ली पर और भी दी mmm ia- 96/ पल प्रतिपल सब जगह घूमती है। फिर तो आज तुझे मेरे हाथा रब भी नही बचा सकता। मैं पिलाऊंगी तुझे आज बच्चा के हिस्स का दूध।' लेकिन सोचत सोचत ही उसे लगा जैस पडोमा के आगे से उसका गुस्सा और दुख कुछ बम हुए हैं। वह यहाँ अकेली नहीं है । विल्कुल उसी जसी और भी औरतें हैं । ठीक है तुझे मारूंगी नहीं तो टांगें तरी जरूर तोड दूगी। फिर तो इधर तू क्या परेट करती आयगी।' वह सोच ही रही थी नि उसया सोट याला हाथ एक्दम उठा और घर न घुम रही विल्ली थोडा उछली । लेकिन वह अधिक उछल-कद और बचाव नहीं कर सकी-वही दरवाजे मे ही पसर गयी। लपी ने पाक को यटके स नीचे बिठाया और जाकर बिल्ली पर झुक गयी। सोटे से उसे उथल-पुथलकर देखा। वह पछतान लगी---इतना जार से सोटा क्यू मारा? उसने पानी भी उसके मुह मे डाला पर बिल्ली तो ठण्डी हो चुषा थी। 'माया ये पाप भी मेरे हाथा होता था।' ज्या ज्यो उसके मर जाने का विश्वास पफरा हो रहा था--उसका पछतावा भी बढ़ रहा था। आखिर उसने तसल्ली हो जाने के बाद एक लम्बी सांस भरी, वाहे गुरु की मर्जी और बिल्ली को घसीटकर नाले मे धिका दिया। लखी घर के झाड, पोचे और बरतन भाण्डो मे मन लगाने की कोशिश करने लगी। पानी से अच्छी तरह धोकर सोटा काके के आगे डाल दिया। वह उस लुका- लुढ़काकर खेलने लगा। पर लखी का मन भारी होने लगा। उसे बार बार यह अ देशा भी हो रहा था वही यह वो विल्ली ना हो जो मरे काके का दूध पीती थी और मुझे पिटवाती थी?" - हजूरसिंह और दोनो बच्चे आ गये। हजूरसिंह ने आते ही पग्ग और कमीज उतार दी। लखी ने लडके का पटका खोला और हजरसिंह को पखा झलने लगी। वह चाहती थी कि हजूरसिंह को खुश होकर बताये कि अब हमारा काका कभी भूखा नहीं रहेगा । उसके हिस्स का दूध पीने वाली राम नाम सत्त हो गयी है । पर उस मौका ही नहीं मिला। उसने ट्राजिस्टर उठा लिया और उसे कान से लगाकर स्टेशन पुमाने लगा। फिर जल्दी ही उसने पटकने की तरह ट्राजिस्टर एक ओर रखा और उबल पड़ा-सारा दिन तुझे और कोई काम नहीं कि पडी पडी गाने ही सुनती रहती है ? मै पूछता हू अभी दस दिन भी नही हुए सैल डलवाय और आज ये मी सी भी नहीं कर रहे?" वह गालिया बाने लगा। लखी ने एक दिन यही बात हजूरसिंह से पूछी थी-इस रेडियो मे सल वहुत लगते हैं ? तो हजूरसिंह 1 कहा था, 'ओछो पूजी खसम का खाय-दसी सट है सल तो खायगा ही।' पर बब लखी कुछ नहीं बोली। वह जानती है कि बात मारपिटाई तक आ जायेगी। हजूरसिंह वोराता रहा और वह उठकर चुपचाप उस कोन म जा बठी जहाँ रसोई विल्ली./94 का जुगाड था। वह स्टोव जलान लगी तो बनर राम करने के लिए तल अधिर्व निक्ल गया जिससे स्टोव की ढीवरी पर बाग जले जा रही थी। इनलिन शतने महंगे तेल को यू जलता देख और भी नल गया तथा और भी अधिक गालियां बक्ने लगा। हजूरसिंह की गालियां लपी को यही गहरे तक चुभ रही थी। वह एक काो की ओर मुह किय चुपचाप बैठी पछता रही थी, 'उस वेचारी बेकसूर का तायामो मारा। अमली बिल्ली तो जिदा है और विना किसी भय के पूर घर म धमाचौकड़ी मचा रही है।'

शीशा - रमेश उपाध्याय । एक दिन ऐसा हुआ कि मेरे कमरे की खिडकी का एक शीशा टूट गया। उस दिन छुट्टी थी। बाहर मई की तेज धूप और लू। दोपहर को मने अपने हाथो बनाया हुआ भोजन किया माता पिता और अपनी प्रेमिका को पत्र लिखे और बिस्तर पर लेटकर एक पुस्तक पढ़ने लगा। खिडकी व द थी और उस पर नीला परदा पडा हुआ था। ऊपर पखा चल रहा था। अपनी फुरसत और कमरे की नीली ठडक बडा सुख दे रही थी। पता नही कव नीद आ गयी। मगर आख खुली तो देखा पखा बद है । मैं पसीने म भीगा पड़ा था और कमर म उमस भरी हुइ थी। बिजली पता नहीं कब चली गयी थी। समय देखा शाम होने वाली थी। सोचा ह्वा की गरमी और तेजी कम हो गयी होगी खिडकी खोल दू। मुझे क्या पता था कि हवा इतनी तज होगा। मन्द मद आने के बजाय वह झपाट से आयी और जब तक उसके थपेडे से बचने के लिए मैं खिडकी पुन बाद करूँ उसने एक परला मेरे हाथ से छुडाकर खोला और ऐसे भडाक से बद किया कि उस पल्ले का शीशा टूटकर कमरे के फश पर आ गिरा। खिडकी तो मैंने इस खगल मे व द कर दी कि कही दूसरे पल्ले का शीशा भी न जाता रहे पर वह बद कहाँ हुई ? एक पलना तो खाली चौखटा रह गया था और क्षण भर पहले जो हवा बाहर ही मिर पटक रही थी अब मजे म मेरे कमरे म सपाटे भर रही थी। उसन मेज पर रखे हुए मेरे लिखे पत्र उडा दिय । दोवार पर टंगे कलेंडर उलट दिया। छत में लटक पखे को हिलाने डुलाने लगी। मैंने खिडकी के परदे स उम रोकने की कोशिश की लेकिन उसन परदे का मेरे हाथ से खीच लिया और उम मेरे सिर के ऊपर विजय पताका की तरह फहराने लगी। लाचार मैंने अपने पत्रो के पन्ने बटोरे और उह दबाकर रख दिया। दीवार पर फडफडात उलटे हुए कैलेंडर को उतारकर बमारी म ब द कर दिया। पर इसस क्या हवा बाजादी से अपना काम कर रही थी। वह कमरे की तमाम चीजो ।

शीशा / 99 पर तो धूल डाल हो रही थी, मेरी आँखो में भी धूल झोक रही थी। जरा सी देर म उसने मेरा सांस लेना दूभर कर दिया और मैंने मुह खाला तो मेरे दांतो म किरकिरी भर दी। आँखें पोछते हुए मैंने फर्श पर पडे शीशे के टुकडो को देखा तो वे बोले, 'हम क्या कर सकते हैं ? चाहो तो हम अभी उठाकर फेंक दो, नही, कल फेक देना।' खिड़की के दूसरे पल्ले में लगे शीशे ने कहा, 'मरा जोडीदार नही रहा, नहीं तो मैं इस हवा की बच्ची को देख लेता। तुम जानते हो हम दोनो ने मिलकर इससे भी तेज-यहाँ तक कि तूफानी अघडो और घनघोर बारिशो का भी- सफलतापूर्वक सामना दिया है। तुम्हारी इच्छा के बिना हमने गांधी पानी को कभी तुम्हारे कमरे में कदम नही रखन दिया। लकिन अकेला में क्या कर सकता - M ? । 'लेकिन वह तो तुम्हारा इतना पुराना, मजबूत और भरोसम द साथी था। टूट कैसे गया?' 'शीशा नाखिर शीशा ही होता है, जरा सी ठस लगने से टूट सकता है। उस वेधारे को तो इतना जोरदार धक्का लगा था।' 'खुद टूटा सो टूटा, कमबख्न मुझ भी मुसीबत में डाल गया।' 'उसे गाली क्यो देत हो? तुम दूसरा शीशा लगवा लो।' 'इतना आसान है ? तुम मकान मालिक को नही जानते मकान-मालिक की याद जाते ही मुझ डर लगने लगा । वह बड़ा बदमाश था। नल की टोटी तभी से खराब थी जब मैंन कमरा किराय पर लिया था। कई बार उसस कहा कि वह टोटी बदलवा द, लेकिन उसने सुनी-अनसुनी कर दी। आखिर मैंन खुद ही बदलवा ली। अगले महीन किराया दत समय मैंने टोटी पर हुए खच की बात की तो वह चिल्लान लगा, टोटी तुमन अपनी मर्जी से कस बदलवा ली? बदलवान की जरूरत ही नहीं थी। पुरानी टोटी विल्कुल ठीक थी। उसमे सिर्फ एक वाशर लगता और वह ठीक हो जाती। न ठीक होती बदलवानी ही पड़ती, तो भी वह तुम्हारा नही मेरा काम था। मकान-मालिक मैं हूँ या तुम ? तुम कौन होते हो मरे मकान की चीजो से छेडखानी करने वाले ? मैंने तुम्हे कमरा किराये पर देते समय ही कह दिया था कि अपनी इच्छा से तुम दीवार में एक कील भी नही ठोक सकते। जो चीज नहीं है, जसी है, वसी ही रहनी चाहिए। कोई भी टूट- फूट या फेर-बदल हुई तो उसका हर्जा खर्चा तुमको देना होगा। लाओ टोटी बदलवाने के दस रुपये और निकालो।' मैंने मकान मालिक से तक करने की कोशिश की बरतने से चीजें घिसेगी- टूटेंगी नही पुरानी होकर खराव और देकार नही होगी? एसी चीजो की मरम्मत कराना या बदलवाना आपका काम है। टोंटी पर मेरा जो खच हुआ है, ।

100 / पल प्रतिपल । उमे किराये मे से काट लेने का मुझे कानूनो अधिकार है। जाप उस अधिकार को तो छीन ही रहे हैं उल्टे दस रुपय मुझस और मांग रहे हैं।' 'मी कानून की दुम । एक शब्द भी जोर बोला तो तेरा थोबडा तोड दूगा। कितने दिा हो गये मेरे मकान में रहते ? अभी पता ही चला कि मैं कौन हू' मीधी तरह दस रुपये और निकाल, नही तो तेरा सामान सडक पर और तू अस्पताल में नजर आयेगा।' गनीमत हुई कि मकान के दूसरे किरायेदारो ने मकान मालिक को दहाड सुन ली और वे मेरी सहायता के लिए आ गये। लेकिन कैसी सहायता? उन्होने मकान मालिक से कहा, छोडिय मालिक लडका है, विद्यार्थी है । अभी दुनियादारी नहीं जानता न पहला मौका है, माफ कर दीजिय, आगे स कभी आपकी शान में ऐसी गुस्ताखी नही करेगा। फिर उ होने आँखा ही आखो मे मुझस कहा कि झटपट दस रुपये और देकर अपनी जान बचा लो। मकान मालिक दस रुपये अतिरिक्त लकर टल गया तो उहोने मुझ धीमी फुसफुसाहटो मे समझाया, तुम इसे जानते नहीं ? वडा बदमाश है। हक इसाफ की बात करने वाल किरायदारो के साथ वडा बुरा सलूक करता है । मारपीट करता है । किराया बढ़ा देता है। मकान स निकाल देता है। कोई पुलिस कचहरी मे जाता है तो उसके पोछे गुडे लगा देता है। कइयो का खून करा चुका है। इसीलिए कोई किरायदार उसके खिलाफ नहीं बोलता । तुम भी, जब यहा रहा है भागी विरली बनकर रहा।' ये सारी बातें मरे कमरे में हुई थी और खिडकी का साबुत शीशा साक्षी था, इसलिए मकान-मालिक का नाम सुाकर वह भी भयभीत हा गया। वाला, तो फिर क्या करन की सोच रहे हो ? देखो बादल आ रहे हैं । वषा हुई तो बौछारें तुम्हारी मेज और विस्तर सब भिगो देगी । पढा लिखना तो दूर, तुम सो भी नहीं पाओगे।' क्या करूँ, मकान मालिक की शरण में ही जाऊगा । कहूंगा शीशा हवा से टूट गया है दूसरा लगवा दीजिय।' 'मान लो वह न लगवाय?' 'तो क्या उससे लडाई झगडा करूं?' 'क्या नहो ? मकान मालिक और किरायेदार मे ता झगड़ा होता ही आया है। तुम भी करो।' 'नही तो" 'मरो।' 'तुम शीश हो न समझ नहीं सक्त। मकान मालिक बडा हरामी है । शीशा टन की बात कहूँगा तो कहेगा--तुमन ताडा है, तुम ही लगवायो, ऊपर स दस- वीस रुपये और दंते जाओ।'

शीशा / 101 'तुम कहना-शीशा मैंने नही, हवा ने तोडा है।' वह मानेगा? उरटा कहेगा- हवाएँ तो तब स चल रही है जव स मकान बना है। हवा स वाई शीशा नही टूटता।' 'मैं गवाही दूगा । कहूगा-मेर जोडीदार को होन नही, हवा ने ही तोडा था।' 'तुम्हारी गवाही । हह । वह पूछेगा तुमसे-हवा तो तुमको भी लगी होगी तुम क्यो नही टूट" शीशा सोच में पड़ गया। थोड़ी देर बाद भेद भरे स्वर म बोला 'एक काम करो। मेरे जाडीदार के टुकडो मे स कोई वडा सा नुकीला टुकड़ा उठाकर रख लो। चाकू से भी तेज मार करेगा।' यानी मैं मकान मालिक को मार डालू?' मैंने घबराकर कहा, 'नहीं, नही, मैंने उस पर हमला किया तो वह चिल्लाकर पुलिस का बुला लेगा। फिर मुकदमा, जेल, फांसी-न जाने क्या हो ।' शीशा चुपचाप हिकारत से मुझे घूरता रहा, जैसे कह रहा हो-तुम कायर हो। मैन उसमे कहा, 'कायर नही, मैं अकेला हूँ। जैसे तुम । अकेले होकर तुम बेकार नही हो गय हो ? अपनी जगह पर मजबूती से जम हुए हो, लेकिन क्या हवा को अ दर आने से राक पा रहे हो।" शीशा कुछ बोला नही, पर उसका चेहरा स्याह हो गया। मैंने देखा आकाश म घटाए घिर आयी हैं और बाहर पानी बरसने लगा है । अचानक कमरे म अंधेरा हा गया था, लेकिन गनीमत कि उसी समय बिजली आ गयी। मैंन बत्ती जला दी। पलटकर देखा त। खिडकी के खाली, विना शीशे क पल्ल में से बौछारे अदर आ रही थी। दूसरे पल्ले मे लगा शीशा अपनी तरफ की बौछार को रोके हुए था, उस पर बरसती फिसलती बूदें देख मुझे एसा लगा, जस वह रो रहा हो। थोडी देर मे बाहर अंधरा घना हो गया और खिडकी का शीशा दपण की तरह मरे कमरे को चीजो को प्रतिबिंबित करने लगा। मैंने उसम अपनी शक्ल भी देखी। पानी की बूदे मेरे चेहरे पर आँसुओ की तरह फिसल रही थी।

चिशाव हरिसुमन बिष्ट लाल कुतिया बाजार से ठीक नाक की सीध मे दखे तो दूर, रानीखेत के दक्षिण मे पडता है यह गाँव जहा 'ह्य न' (उड) की दोपहरी ढलन को आ गयी है। लोग अपने अपने घरों में जा पहुंचे हैं। एक मय उहे कई दिनो से खाय जा रहा है । जबान पर एक ही वाक्य है-~भूमिया देवता को केर' (पूजा) बिगड गयी है या फिर देवी के थान म लस्ट पस्ट हो गयी है। दन सयाण लोगा का कहना है-अपनी उम्र म उहोने एसी आधी-अधड कभी नहीं देखी। ऐसा अनथ कभी नहीं हुआ-- अब तो उलटी गगा बहने लगी है। 'खसिया' ने (कुमाऊँ म क्षत्रियो की एक विशेष जाति) भूमिया देवता पूजन का आयोजन किया था-सच्चे मन से। पणज्यू' (पुजारी) के मन मे कोई अमतोप या फिर खोट आये तो उसके लिए दोपी कौन ? दोषी तो पणज्यू हुए। भूमिया देवता को भी जरा सोच विचार करना चाहिए। वह निर्दोपो को भय क्यो दिखाता है ? किसी को क्या मालूम किस थान मे हलुवा' (परसाद) चढता है-~- किस थान में 'खुटि' (बकरे की टाग) चढती है तो किस थान म सिरि (बकरे का कटा हुआ सिर)। वे तो सब पणज्यू पर छोड देते हैं। हा पणज्यू से भी भूल हो ही जाती है वह भी तो इ सान हैं-~इ सानो से ही तो गलती होती है। दरअसल पणज्यू ने भी 'जतरा' (पूजा गाथा) के समय भी कहा था देवी हम तो नर वानर हैं। कोई भूल चूक हो भी गयी तो दरग्या में लगा देना ।' बस ती काकी पर देवी अवतरित होती है। वह धूनी मे लावा उगल रहे अगारो के नीचे म राख अजलि भर भरकर निकालकर दसों दिशाओ म फूक मार कर उडा देती है। वाकी देवताओ के डरिय अलख जगाते हुए उछल पडते हैं नाचते हैं। और बस ती काकी का बदन सबसे अधिक पूरी शक्ति से तरगायित हो उठता है । ढोल दमऊ बजते रहत हैं। लोग वारो वारा से देवी के समक्ष माते हैं । बोल चिशाव / 103 वचन होते हैं कोई कहता है-भगवान यह तो ठीक नहीं रहती। कोई कहता, भगवान इतने साल हो गय विवाह किय मगर अभी तक सकी गोद हरी नहीं हुई। यह कम का दण्ड है या फिर तेरी नजर मे तेरी कोई चिशाव तो नहीं है? है तो बता दे। देवी बारी बारी से सबके सवालो का जवाव दती है। दुख के निवारण का रास्ता सुवाती है और आखिर म भभूति के साथ पीठ ठोककर याशीर्वाद देती हुई कहती है 'नगरी म सव राजी रा खुशी रा स्यौनाई ।' रमा को गांव में अभी महीना भर भी नहीं हुआ था। गांव मे जतरा की तैयारी पूरी हो चुकी थी। गाव के छोटे बडे थान म जा रहे थे। रमा की भी वहां जाने की इच्छा हुई। उसने जतरा कभी नहीं देखी थी। सहेलियो के साथ वह भी भूमिया के थान मे चली गयी। दिल्ली महानगर में उसने साक्षात देवी का अवतरित होना नही देखा था-अपने ईजा-योज्यू (माता पिता) से सुना अवश्य था। मगर उसे विश्वास कभी नहीं हुआ। वह कहती, 'ऐसा भी सम्भव है क्या? लोग ग्रहा मे जाने की तयारी कर रहे हैं -जा भी रहे हैं। मगर वे । ईजा वीज्यू उस फटकारते-एसा नहीं कहते रमा । देवता होते हैं अवश्य-- यहाँ भी जोर वहाँ भी। तुझे नहीं मालूम देवी म क्तिनी बड़ी शक्ति होती है गाव मे फला व्यक्ति की शानी हो रही थी। तीन सौ से चार सौ के बीच बरातिये थे। ढोल दमऊ नगाडे के साज-बाज--'सरकार' (छोलिया नत्य) थ, 'निशाण' (धार्मिक ध्वजाएं) थी और वरकिंडा की 'हुडक्याणी' (नतकी) थी। बारात चल पड़ी घर से। लाल निशाण को उठाये एक आदमी पहुँच गया ओडम ढ' मे जोर सवस आखिर म सफेत निशाण वाला आदमी खडा ही था घर के आंगन मे । इतनी बडी बारात का उदाहरण आज भी लोगो की जबान पर है, कैसी दल फल की थी उस दिन। हाँ जब सबसे पीछे वाला आदमी सफेद निशाण लिए 'ओडम ढे' म पहुंचा तो लाल निशाण कहा पहुंची होगी? एकाएक ढोल दमक नगाडो की आवाज बन्द हो गयी। सबको बडा आश्चय हुआ। 'दास' (एक जाति विशेष जो पवतीय क्षेत्र में शुभ वाय पर बाजा बजाते हैं ) कितन ही 'आटू (बजाने की हडी) मारते । क्या मजाल कि ढोल दमऊ नगाहो के बोल निक्लें। बारात ने अभी एक चौथाई पहाडी रास्ता तय नहीं किया था। मभी निराश हो गये। बारात की रौनक एकाएक फीकी पड़ने लगी। गुसेंदास को बड़ा गुस्सा आया। दासो मे दास गुसें दास। चारो तरफ नाम था उसका। ऐसी अनहोनी उसके साथ कभी नही घटी थी। वह बहुत शमि दा हुआ। लाल निशाण रुक गयी। क्या हुआ गुसें दा? क्या हुआ मुसे का" के स्वर गूज उठे। दन सयाण व्यक्ति कहन लगे, 'अरे गुसेंदास, यह बेइज्जती का सवाल है । तेरे हाथ मे हुनर होते हुए भी गुसेंदास क्या जवाब देता। वह मन ही मन जलने भुनने लगा। भिडी (सीढ़ीदार खेत की मेड) पर से 'बुकिल' (जगली घास) चुनी, किसी से माचिस मांगी 104 / पस प्रतिपल और आग जलाकर अपन गाज-यात कोतपान लगा। मगर उन पर जणकन पणक' (जस-तस)। सबका ख्याल या फि गरम करन पर आवाज लौट आयगी। लाल निशाण चल पडी। गुसेंदाम के आटू जोर जोर से नगाडे पर पड़ा लग । सारा प्रयाम व्यथ गया। गुसेदास झुझला उठा ! माज उसके ठाकुरो का यह पहला शुभ माय था। कई दिन पहल ग ही उसे सावधान कर दिया था-माज पाज ठोर होने चाहिए। बारात को पटटी नया स पटटी सल्ट म जाना है। परसा सल्लिया र बीच बेइज्जती हा जायगी। उह तो नया पटटी र लोगो को वहन सुनि का मौका चाहिए। हम ता वनया के क्तिमार' (मछली के बच्च पक्डन वाले) रहत हैं। दपा जाय तो सल्टियो को कित पक्डने भी नहीं आत हैं। स्वग गग वैचारा मोतीराम उपाध्याय, जिसने जग्रजा के साथ कई दिन तक टक्कर ली। जिसने जग्रजा को टटै गोली से उड़ा दिया। नाम तो उम निमा गया जिस दिन उसने मौका मिलत ही खुमाड गाव की वीच सभा में ग्रिजो को गोली में छलनी कर दिया था। आखिर म मोतीराम उपाध्याय पक्डा गया था। उसी के बलबूत पर ख्याति अजित की सल्ट ने। बाकी ता घुरूचुपु हैं। उसी के नाम स सल्टियो के जाज तक नाक भौं चढ़ रहते । अरड ऐमो जम मोतीराम उपाध्याय मरत मरत अपनी सारी शक्ति इन सस्टिया का बांट गया हो-अपनी राय की खरात बाँट गया हो वारात आगरी घर पर पहुँच गयी। गुसेदास को जपन ठाकुर के शक कचाटन लग थ। उस दिन नाक ऊपी करके उसने कहा था चिना न कोजिये ठाकुर साव, सात वाज या मढवा रहा हूँ मुहम्मद म ।' और हंसी का ठहाका लगात हुए यह भी कहा था 'नगाडो की मढाइ का खच भी तो उसी रिन वसूल पाना है ।' गुसेंदास को एक एक बात याद आती रही। गुस्सा भी पूरी तरह पड़ गया दिमाग मे। आगरी घर व जोहड में डाल दिय नगाड और फिर चश्मे के स्वच्छ पानी से धोने लगा। सवको वडालाश्चय हुआ। पानी की सज धारा ने नगाड को भली भाति सल्ल कर दिया। गुसेंदास न नगाडे पर आट दे मार, फिर भी जस तस। वारातियो को निराशा डस गयी। पहरे उतर गयकाले और फीके पड गय। उम्मदसिंह बूब सबसे दन सयाण आदमी थे। बहे भी आश्चय हुआ और बाले अरे गुसेंदास | सारे प्रयास विफल हो गय । अस्सी के आसपास मेरी भी उम्र हो चुको, एसा आथ तो कभी नही हुआ एक बात की शका उत्पन्न हो रही है। भूल से कोई लस्ट पस्ट ता नहीं हो गयो-यह नगाडा भी तो देवी के थान में चढावा आया था।' 'मुझे भी एसी ही शका हो रही है ।' अपने मन मे गहरा विश्वास मात हुए । गुसदास ने कहा, 'सवा रुपया दड का निकाल दीजिये ठाकुर कोई भूल चूक और लस्ट पस्ट हो सकती है।' 'अच्छा तेरा भी यही सोचना है भूमिया देवता के नाम पर यह सवा रुपया' उम्मदसिंह बूबू ने एक तीसर व्यक्ति को भूल चूक, लस्ट-पस्ट के लिए दह स्वरूप सवा रुपया धमा दिया। गुसेंदास ने भी क्षमा याचना की और नगाडे पर माटू दे मारा । आवाज लोट आयो। सबके चेहरे पिलपिला उठे। तुम कहती हो देवता जसी कोइ शक्ति नहीं है । सभी अपने अपने स्थानो म हैं-~-उनकी अपनी मा यता है। रमा को अपने ईजा बोज्यू का महा एक एक शब्द याद आने लगा, देवी के प्रति उसकी एक पल को श्रद्धा उमडती तो उसी क्षण यकीन चटक भी जाता। बोल वचन करती देवी क समक्ष दो महिलाएं और तीन बच्चे उससे पहले खड़े थे। वारी बारी स उ होने भभूति लगायी। वे चलते बने। अब वारी थी रमा की हाथ जोडे मन म कुछ सवाल लिए। दनी उसके सवालो का क्या जवाब देगी? जवाब देगी भी या नहीं? पहला सवाल उस कौन- सा पूछना होगा । वह अपन ही मवाला की उघडवुन मे फस गयी। उसके सवाल माधारण नहीं बल्कि अब तक महिला पुरुषो, युवक युवतियों द्वारा पूछे गये प्रश्ना से भिन थे। उसे घवगहट सी होन लगी। महानगर की जि दगी से हारकर वह गांव लौट आयी थी। सुबह शाम की भाग दौड, वसो कारो एव स्कूटरो की भीड भाड खोचातानी से ऊब चुकी थी। वजह यही नहीं थी बल्कि आज तक यह किसी की बन नही मकी और न वह किसी का अपना कह सकती थी। एक तरफ ईजा बोज्यू की पावदिया लोकाचार और दूसरी तरफ महानगर म सास बहू, देवर देवरानियो की काली सुर्षी खबरो से भरे अखबारो ने उसे बुरी तरह कचोट डाला था। उसके ईजा-वीज्यू भी हारकर वइ बार कह चुके थे 'इस महानगर में सुयोग्य लडका ढूंढ़ पाना मुश्किल है-वैस कुडली मांगने वाले, नाम की बाल हिलाने वालो की कमी नहीं होती।' रोज घर मे हडबडी मची रहती थी। बोज्यू आगन्तुको के साथ गप्पें लगाते तो ईजा बढ़ बैठे ऑडर फरमाती 'रमा । देख तो कौन आये हैं ? पानी तो पिला।' वह झट समा जाती कि अब उस किसी होटल के वेटर की तरह बाहर के कमरे में लगी सट्रल टेबल पर पानी पहुंचाना होगा। फिर इजा जनस पूछपर बतायेंगी t~क्या पीना है-ठण्डा चाय या काफी। रमा पानी लेकर जाती तो ईजा का स्वर गूज उठता, 'अब आधा आधा प्याला चाय बनाना बेटी।' 'अच्छा ईजा' कहकर रमा ज्यो ही इजा की तरफ देखती, आगन्तुळ को सवालिया नजरें, सदह भरी नजरें टूट पडती। उसकी आवाज पर गौर होने लगता 106/ पल प्रतिपल -स्वर मीठा है न? नयन नवश तो ठीक हैं न? कद और गात में भी ठीक ही रहेगी और रग, विलकुल साफ है रमा किचन म लौट आती। ईजा बोज्यू और आगन्तुको के बीच बातो का सिलसिला चल पडता। 'ग्रेजुएशन तो कर ली है न विटिया ने? अब आग क्या कराने का इरादा है- नौकरी या फिर ।' नौकरी के लिए कोशिश कर रही है । ग्रेजुएशन म नम्बर तो अच्छे हैं-बक- बैंक का फाम भी भरा है।' रमा की ईजा जवाब देती। क्व भरा है फाम " यह आग तुक का अगला प्रश्न होता। 'कुछ रोज पहले ही निकले थे फाम 'महनत करने पर ही होता है सब कुछ ।' आग तुक को बातचीत का विषय बदलने में देर नहीं लगती। एक बात पूरी तरह परिणाम पर नहीं पहुंचती कि उससे पहले दूसरी बात का सिलसिला प्रारम्भ हो जाता। रमा चाय बसाकर ले आती। चाय की चुस्कियाँ लते लेते जाग तुक की सवालिया नजरें जरा देर थम जाती और फिर उसे पूछा जाता, 'क्या नाम है " रेमा।' 'इसी साल ग्रेजुएशन की है क्या?" 'हाँ' रमा का एक टूक जवाब होता । किस कालज से रमा चट से शरमाती हुई कॉलेज का नाम बता देती। इधर उधर के बीसियो सवाल पूछे जात और उमे कुछ न कुछ जवाब देना ही होता था। रमा दुखी हो चुकी थी- माडल बनकर पेश होने से किसी होटल की वेटर की जिन्दगी से । अन्त मे रमा किचन मे लौट आती स्वय स सवाल करती, कैसी हूँ मैं ? कसा है मेरा रग? कैस हैं मेरे नयन-नक्श और कद कद्दावर?" उस समय रमा को कोई जवाब नहीं मिलता और न ईजा वोज्यू को। दिनो तक उत्तर की प्रतीक्षा रहती। जवाब आने में हप्ता, दस दिन भी लग जाते, 'लडको सुदर है लडके को भी पसद है लेकिन लेकिन लडके का कहना है लडकी कही काम वाम नही करती।' और कही पर नौकरी का सवाल नही उठना तो, माती पर खच और लेन- देन की बातें आड़े आ जाती। रमा ने कई बार तय कर लिया था कि अब उसे किसी चलते फिरते लडके का हाथ थाम लेना चाहिए। लेकिन उसी समय वह घबरा जाती-जब वह कालज मे पढ़ती थी तभी उसने एक अनुभव प्राप्त किया था। कालेज आत जात समय उस एक हृष्ट-पुष्ट युवक मिलता था। राकेश नाम विशाव / 107 । बताया था उसने। एक दिन उसन रमा से भी नाम व घर का पता पूछा, जबकि नाम वह किसी से मालूम कर चुका था। फिर भी वह रमा की जवान से नाम की पुष्टि करवाना चाहता था। रमा से बातें करने को उसको हरदम कोशिश रहती। हां, दो-तीन दिन तक वह रास्ते मे या कालेज के बाहर नहीं दीख पडता, तो रमा को भी उसकी गैर मौजूदगी खलने लगती। यह सिलसिला अधिक दिनो तक नहीं चला। एक बार हफ्ते भर तक राकेश नही दीखा तो रमा उसे भूल सी गयी। आठवें दिन रमा ने एक दैनिक अखबार में पढ़ा सूरज कुमार उर्फ राश, दो नेपाली लडकियो का सौदा करते रगे हाथ पकड़ा गया। सूरज कुमार उर्फ राकेश की फोटो भी छपी थी। रमा को पहचानने मे देर नहीं लगी। वह कंपकपा उठी थी। उसे अपन जीवन के बारे में सबसे पहली बार सोचने का मौका मिला था। लेकिन आज वह दूसरी बार अपने विषय में सोच रही थी-क्या आज देवी उसका भविष्य बतायगी ! उसके दुख का निवारण करेगी। देवी के चरणो मे वह झुकी। भूमिया देवता के डारिया ने धूनी की आग में फाडि घुमाते हुए अलख जगायी। आग की लपटे तेज हो गयी। डडरिये ने बडी बडी सुख आँखा से उसकी ओर देखकर पुन अलख जगायी और धूनी के चक्कर काटने लगा। 'अनय हो जायेगा। भूमिया देवता का डडरिया बोला। कसा अनथ भगवान ? पणज्यू ने सवाल किया। 'इस सवाल का जवाब मुझस नही, देवी से पूछो।' । पणज्यू नतमस्तक हाकर बोले, 'इस गांव से देवी देवता चल गय है जो कि अनथ होगा। देवी से अभी पूछत हैं। 'अनर्थ हो जायेगा इस नगरी म । स्योनाई को हर कदम सोच समझकर रखना होगा-यह मेरी नगरी है 'छलछलाट वलबलाट' (चचलता) नही करना होगा यहाँ। देवी ने कहा। 'समाग पर चलने की बुद्धि भी तो तुम ही दागी, देवी मौ" पणज्यू 'मेरी तरफ से राजी रहा, खुश रहो~सारी नगरी वाले।' 'हमे तो यही बोल-वचन चाहिए देवो " सभी ने बैठे हुए ही अपने-अपने स्थानो स देवी को हाथ जोडे और रमा, वह तो हाथ जोडे हुए बठी थी। देवी भभूति लगाती हुई बाली, 'अपोर में नहीं डालना, नहीं तो नही तो स्यौनाई एक का देखना दस का सुनता ठीक नहीं होता, स्योनाई वदनाम हो जायेगी, मेरी 108 / पल प्रतिपल नगरी बदनाम हो जायेगी। अच्छा राजी रा, पुशीरा ।' रमा उठकर चली आयी। दवी की बातो को उसन गहरायी से सोचा। लकिन वह यह तय नहीं कर सको कि य शब्द वस ती काली के थे या फिर देवी के । फिर एसा कहने का क्या तुक ! यह कोई देवी नही, बस ती काकी पा अपना ताना-बाना बुना हुआ है। मैं इसम फंसने वाली नहीं, मैं जो सवाल पूछना चाहती थी वह तो उमन पूछने का मौका ही नहीं दिया। उसकी शक्ति का पता तो तब चलता जब वह मर सवाल का जवाब देती। यह तो एक जाल है--स्टट है । ईजा-चीज्यू की बातों से उसके मन म जो एक विश्वास सा बन रहा था वह चरमराने लगा। भूमिया थान स घर वापस आयी। ईजा-बोज्यू को भी बताया। इन पवतिया को अक्कल नही हाती। अपनी वाल पर पानी फिराकर उस वसन्ती काको के कहे पर चलते हैं। सिर दद, कमर दद या फिर मौसम के बदलने पर छोक भी आती है तो उसी के पीछ-पीछे मारे फिरते हैं। जैस भूत पिशाच, छल-चल से लेकर टी० बी० और कैसर जैसी बीमारिया की दवा वह चुटकी भर राख हो।' 'भभूति तो शीघ्र स्वस्थ होने की कामना के लिए होती है। उसके बाद ही तो दवाइया दी जाती हैं बेटी " रमा को समझाया ईजा-वीज्यू ने । लेकिन रमा के लिए सव पाखण्ड था। वह चिढ़कर बाली, बसन्ती काकी के पदव पेच उसके कदमो म झुकने के लिए मजबूर कर देते हैं और वे इडरिय थान म 'वोक्यिा' चढता है एक । उसके लिए एक कहता है, 'सिरि' मेरे हिस्से आती है क्योकि मै भूमिया का डरिया है और दूसरा कहता है खुटि मेरे हिस्से आती है क्याकि वह भरव का डडरिया है और उनम पणज्यू सबसे आगे रहत हैं--कहते हैं, 'पिछली एक 'खुटि मेरे हिस्स आती है-जरा अच्छी तरह काटना उसे ।' रमा बौखला उठी। दिल्ली म जब भी अपने ईजा बोज्यू से गाय के देवी देवताजा की बाते सुनती तो उसके मन में उनकी परीक्षा लेने की प्रबल इच्छा होती थी। लेकिन इजा बोज्यू के कई तरह क भय दिखाने पर वह चुप हो जाती थी। जाज उसने परीक्षा लेने का मन बना लिया। दिन भर रमा बसती काकी की राह देखती है। उसका इस घर में आना जाना काफी था। मौका मिलते ही वह किसी भी समय वा धमकती थी। रमा विस्तर मे पसरन तक उस पर भी आँखों म नीद आन तक बस ती काकी की प्रतीक्षा करती रही । वह नही आयी। सुबह हुई। चौथर म धाम घुटनो के बल चलकर बढ़ रहा था। वसती काफी भा पहुंची।

विशाव / 109 'कल शाम क्यो नही आयी काकी' रमा न पूछा। 'अरीतू अभी उठी नही, दिल्लीवाज है न । दिल्ली वाले कहाँ जल्दी उठते हैं। उहें तो 'टी' चाहिए विस्तर म।' कहती वसती काली रमा के नजदीक बठ गयी। रमा ने बिस्तर छोडा, उठी हाथ मुह धोए, चूल्हे पर गयी, चाय का पानी रखा और झट से चाय बनाकर ले आयी। बसन्ती काकी ने चाय का घूट भरा। रमा खिलखिलाकर हंस पड़ी। 'क्या हुआ, हम क्या रही है ?' बसन्ती काकी ने पूछा। 'कुछ नहीं, यो हो एक बात याद आ गयी।' कहकर रमा ने वात को तिलाजलि दे दी और स्वय भी चाय पीने लगी। 'मुझसे कब तक छुपाओगी।' गम्भीर होकर बसन्ती काकी न कहा और चाय सुडक डाली। 'अब जाती हूँ, शाम को आऊँगी।' कहकर वसन्ती कार्की उठी और वापस भी चली गयी। 'कसा उल्लू बनाया है बसन्ती काकी ने सबको। ढोगी। और ये लोग भी क्तिने अधविश्वासी हैं। यदि उस पर देवी अवतरित होती तो उसे अभी पता चल जाना चाहिए था । मैंने उसे अपने हाथो बनायी चाय पिला दी। उस पता नही चला। मैं तो आज रजस्वला हूँ। यदि उस बता देती तो पूरा घर सिर पर उठा लेती। अब मैं समझ गयी हू वह वकरे के लिए ही नाटक खेला जाता है । मैं सभी से कहूगी, 'क्यो व्यथ पसा और समय बरबाद करते हो- छोड दो यह सब ढको- सला -देवी गढदेवी कोई भी अवतरित नहीं होती, मैंने आज परीक्षा ले ली है।' रमा ने स्वय से कहा और जोर से हमी । एकाएक उसका चेहरा उतर गया। वे लोग पूछेगे कि क्या परीक्षा ली, तो? उनसे कैसे कहूंगी कि इस मैंने अपने हाथो बनायी चाय पिलायी है। वे मुझे पापी कहगे। वे मुझे माफ नही करेंगे ? वह घवरा उठी । गाँव की अनब्याही लडकी मैं बदनाम हो जाऊँगी। वदनामी का दोप मरे माथे मढ़ दिया जायगा। ईजा-बौन्यू को इस पर ताने कसे जायेगे । मैं उह समझाऊँगी भी तो मेरी एक न सुनेंगे । ईजा बोज्यू की नही सुनेंगे कि रजस्वला होने का शादी से कोई मतलब नहीं है । यह तो उम्र के बढ़ने के साथ होता है। गौव का छोटा बडा इस बात को नहीं मानेगा। रमा के मन मे कई मदेह उठने लगे। वह दहल सी गयी। ईजा बोज्यू ने इस बीच बाहर से आवाज दी तो वह चुपचाप बठी रही। ईजा अदर चली आयी। रमा को आवात दी। वह फिर भी गुमसुम बैठी रही। ईजा ने देखा, ठण्ड की सुबह होने पर भी वह पसीन म नहा रही है। हाथ-पांव मे तपिश भी नही है। - 110/पल प्रतिपल वह घबरा गयी । आंगन मे हल का फाल ठीक कर रहे अमरी को आवाज देकर बुलाया। वह इस गाव के भूमिया देवता का उडरिया था। उसन रमा को देखा और बोला छल की पिशाव हो सकती है-~-मैं भभूति लगा देता हूँ।' कहते उसन भभूति टिकाने को हाथ बढाया तो रमा ने उसे ऐसा करने से राका । एकाएक अमरी अलख जगाते हुए बोला देवी की डडरिया को बुलाओ, वही स्योनाई की करतूतो का दूध का दूध पानी का पानी करेगी।' रमा और ज्यादा घबरा गयी। देवी की डरिया तो बस ती काकी ही थी-वह तो अभी अभी थोडी देर पहले यहा से गयी थी। उसके ईजा बोज्यू घबरा गये। अब उस बुलाने जाय कौन ? उहे एक भय खाने लगा। अकेले जान की हिम्मत न हुई। पूरा घर घूमता प्रतीत होने लगा। उसके ईजा वौज्यू क्षमा याचना करते हुए बोले 'भगवान, यह सब कैसा अनथ हो रहा है ? दवी के डडरिय को बुलाने जायगा कौन? वह भी घर पर मिलेगी या नहीं।' इस पर अमरी उछल पडा, "तो सौकार (श्रेष्ठ पुरुष) तू भी मेरी परीक्षा लेगा- ठीक है मैं अभी उस बुला लाऊँगा।' अमरी ने एक बार फिर पूरी शक्ति से अलख जगायी। भभूति चारा दिशाओ मे फूकी। रमा के ईजा बोज्यू लाचारी म सिर झुकाय गिडगिडाने लगे आप क्रोधित न हाएँ भगवान, मैं देवी के डडरिय को बुलाकर ल आती हूँ।' रमा की इजा ने कहा। 'अरी तू कहा जायगी औरत जात होकर, मैं बुलाकर ले आता ।' रमा के बोज्यू न कहा। नहीं वौज्यू नहीं । उसे बुलाकर न लाजो । मुझे कुछ नही होगा।' रमा ने कहा । लेपिन उसके वौज्यू ने उसकी वात न मानी और सहमे कदमो से बाहर निकल गये। रमा ने अपनी ठौर पर उठन का प्रयास किया तो अमरी ने ढेर सारी राख उसके चेहरे पर फूंक दी । वह चीख पड़ी। उसक पीसने के साथ अमरी ने अलय जगायी। पाम पडोस के लोग टक्टठे होने लगे। पूरे गांव में बात बिजली की भांति फल गयी। रमा के बोज्यू बसती काकी का वाकर ले आये । घर में प्रवेश करते वह चीखी। अमरी भी जोर से लस जगाता उछल पडा। जवान लडकी की दशा दबकर ईजा बोज्यू के मुघ म सावन भूम गया । हम क्षमा करो दयी। अभी बच्ची है-इन सब बाता का नहीं समझती।' रमा की जान विनती की। - पिशाव / 'स्यौनाई, मैंने इस अपन दरबार म भी सावधान किया था कि बलवलाट करना ठीक नही-मगर यह मानती नहीं मिल प्रया, कहती बसती काकी रमा पर टूट पड़ी। 'नही, नही । के प्रतिरोध मे रमा चीखकर लुढ़क गयी बेहोश । 'इसे जल्दी ठीक कर दीजिये देवी। रमा के ईजा बोज्यू न कहा। 'मैं तो इस ठीक कर दूगी लेकिन मेर साण वाण कैसे चुप होगे। उनका खाना पीना दे दे सौकार महीने भर में । नहीं तो वे अपना छल बल दिखायेंगे।' मैं अपन ही घर पर जतरा दूगा देवी तुम सभी को शात कर दीजिये।' 'अच्छा " कहता देवी ने भभूति भूमिया के डडरिया की तरफ फूकी। वह शात हा गया यानि अमरी। फिर देवी ने बेहोश पडी रमा की तरफ मभूति फूकी। जब राजी रहो खुशी रहो सौवार ।" कहकर वसती काकी वाहर चली गयी। उसके पीछे-पीछे अमरी घर पर इकटठी भीड छंटने लगी। पर मे एकात पसर गया । बेहोश पडी रमा को एकात म छोड दिया गया । सिफ उसकी ईजा हवा झलती रही । अब उसके हाथ भी दुखने लगे थे। धीरे धीरे रमा के चेहरे का तेज लौटने लगा-पलकें हिलने लगी। सूखे कण्ठ में थूक निगलने का स्वर भी निकता। उसकी स्थिति में बरकत दबकर ईजा का कलेजा अपनी और पर लौट आया-~~वह धीरे से बोली रमा बत्र जी तो ठीक है न 'हो' रमा न सिर हिलाया। ईजा ने पानी की चूदें उसके मुह मे डालते हुए कुछ कहना चाहा लेकिन एकाएक आसू छलछला आये। वह अस्पष्ट सी बुदबुदायी। 'क्या हुआ मा 'तुम वक्त बेवक्त रोती रहती हो । यही भी और शहर मे भी।' रमा ने भारी स्वर म कहा मैं तो चाय पीकर कुछ सोचने लगी थी कि देवी के थान में बसती काकी न मुझे वही कहा जैसा कि मैं उसस हँसी मजाक म सहती थी। उस यकीन आ गया मेरी वात का। तब मुझे लगा वह मुझे डरा रही है। भला एसा देवी पर म क्यो विश्वास रहें।' ऐसा अपशब्द देवी के लिए नहीं कहत बेदी | देवी नहीं होती तो तू अभी यो नही बोलती। ईजाने सिसकत हुए कहा, तू ऐसा क्यों बोलती है। मेरे दिल ने ताठौर छोड दी थी। मैं ठीक रह रही हूं मां वह देवी नहीं है । मैं तो कल को वात सुनकर अफ सोत कर रही थी और आज वह दवी मेर मन की बात नही पढ़ पायी। मगर कैसे मैंने कुछ उसे बताया होता ववनफिर वह किस बात की वैतावनी दती मुझे, और वह घर पर आयो भी तब जब उस बुलाने गय।'

112/ पल प्रतिपल 1 'तभी तो वह समय पर यही या गयी। देवी की शक्ति न होती तो मैं कही की न रहती।' 'ऐसी क्या बात हुई । तुम क्या सोचती हो कि मुझे कुछ नही मालूम । वसती काकी यहाँ आयी। उसने मेरे बालो की गूथ पकडी। मेरे ना-ना करन पर भी मेरी गूथ नोच ली। मेरी एक नहीं सुनी । मैं घबरा गयी। फिर मुझे याद नहीं कि क्या हुआ? सव भले के लिए ही होता है -वह मुझे जीवित नहीं छोडती।' 'देवी तो सभी की मां है-एक मां अपनी बेटी की जान क्यो लेगी ऐसा जविश्वास नहीं करते।' ईजा ने समझाया। 'यह सब झूठ है-धोखा है मां । वह देवी नही है। मेरी बात पर यकीन करो मा । वह अमरी भी दोगी है। उसने चीखकर मेरे गाल पर तमाचा मारने से पहले राख आखो में न फूकी होती तो मैं उसका हाथ मरोडकर रख देती-मैं तो आंखें मलती रही। मैं पूरे गांव के लोगो को चीख चीखकर बताऊँगी यह सब धोखा है फरेब है। वसती काकी पर देवी जवतरित नहीं होती। वह ढोग करती है। अमरी ढोगी है-बकरा खाने के लिए उनका यह जाल है। कोई भी देवी देवता बकरा नही खात । उनके लिए जीव ज तु सब बराबर हैं। फिर वह देवी बकरे की बनि क्या लेगी भला ? यह अपराध है। ऐसे लोगो को दण्ड मिलना चाहिए।' रमा क्रोधित हो उठ बैठी थी। मां के समझान पर भी उसका चित्त शात न हुआ। उसके खिलाफ आवाज उठाती भी लेविन गाव के लिखित सविधान मन तो कोई अदालत थी और ने विराध करने की आवाज ही बल्कि गांव क हर व्यक्ति की कोशिश थी कि रमा का सवाल हो अनुत्तरित क्या सवाल करने का हक ही न रहे।

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देश निर्मोही
4 अप्रैल, 1959 (पाई, कुरुक्षेत्र)
शिक्षा एम० काम, डी० पी० एम० एण्ड आई.
आर०, एम० ए० (हिंदी)
अनुवाद पजाबी के चर्चित व्यग्यकार गुरदेव चौहान
के व्यग्यो का हिन्दी में अनुवाद पुस्तक
'टेढ़ी लकीर'
विभिन पत्र पत्रिकाओ मे अनेक रचनाएँ
प्रकाशित एव चचित।
कविता सग्रह 'अंधेरे को बुनता हुआ' प्रकाशन
की तैयारी मे।
विशेष जन साहित्य की त्रैमासिक पत्रिका
'पल प्रतिपल' का सम्पादन ।
सम्प्रति रक्षा लेखा नियन्त्रक (पश्चिमी कमान)
चण्डीगढ़ मे लेखा परीक्षक।
372/सेक्टर 17, पचकूला-134 109
(हरियाणा)
सम्पक

Pal Pratipal

Author
Desh Nirmohi
Title
Pal Pratipal
File name
Pal Pratipal
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Aadhar Prakashan Panchkula Hariyana
Language
Sanskrit
Pages
119
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551233
Barcode
4990010031994.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
Wn9RGmXFsjK
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