Shri Abhaya Jain Granthalaya, Bikaner
Tatvamala Jinendramat Darpan Bhag 2
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तत्वमाला
: अर्थात्
जिनेन्द्रमतदर्पण द्वितीय भाग।
'जैनधर्मभूपण व शीतलप्रसादजी,
मा सम्पादक "जैनमित्र" व "योर"-मूरत ।
प्रकाशक--
ARRORAN15
मूलचन्द किसनदास कापडिया,
मालिक, दि० बैन पुस्तकालय-सूरत
द्वतीय भावृत्ति]
वीर सं. २४५० . प्रति १०..
मूल्य ।।) छह आने ।
मुदक- मूलचंद किसनदास कापड़िया, "अनविजय" प्रिटिंग प्रेस, सूरत। 1 1 مه प्रकाशक- मूलचन्द किसनशव कापडिया, मालिक, दि. जैनपुस्तकालय चंदावाड़ी-सूरत। Mood Hel
प्रस्तावना।
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A
.
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तत्वमाला
नामक - एक लेखमाला जेनगनट के
१९०४-५ के अंकोंमें पुज्य ३० शीतलप्रसादनी द्वारा प्रकट हुई
थी, उसकी मांग होनेपर यह १९०५ में ही पुस्तकाकार छपाया
गया था यह चिक जानेपर १९११ में इसकी दुसरी आवृत्ति
भारत जैन महामंडल "ने प्रकाशित की थी वह भी बिक जानेपर
कई वर्षोंसे यह पुस्तक नहीं मिलती थी और मांग आती रहती थी
...इसलिये ब्रह्मचारीनीकी आज्ञानुमार हमने इसकी यह तीसरी आवृत्ति
प्रकट की है।
इस पुस्तकमें ब्रह्मचारीनीने जैनधर्मके मूल तत्वोंका वर्णन
श्री तत्त्वार्थसूत्रकी अर्थ बोध टीकाके अनुसार इस रीतिसे दिखलाया
है कि हमारे अल्पज्ञानी नवयुवकोंको वह भले प्रकार समझमें आ
सके । जिनेन्द्रमतदर्पण प्रथम भाग-भी ब्रह्मचारीनीने प्रकट किया
है उमका ही यह द्वितीय भाग है नो खाध्याय प्रेमियोंकि अतिरिक्त
'पाठशालाके विद्यार्थियोंको पढ़ाने योग्य तथा जैन व अजेनोंमें मुफ्त
वितरण करने योग्य है । आशा है इस तीसरी आवृत्तिका भी
मीघ्र ही प्रचार हो जायगा।
जाति सेवक...
सूरत,
मूलचन्द किसनदास कापड़िया,
विपयसूची। विषय विषय पृष्ठ . ७०। ७१ .r ५।१७ ध्यान १८ धर्म ध्यान १४. १६ ध्यानका स्थान २० २०.ध्यानका यासन २४ | २१ प्राणायाम २७ २२ प्रत्याहार धारणा ३२.२३ ध्येय ३८२४ ध्यान और फल ; ४२ / २५ निराकारफा ध्यान साफार ५० ७७ ८ आयु ७६ १सप्ततत्व २ जीवतत्व ३ अजीवतत्व ४ ज्ञानावरणी कर्म ५ दर्शनावरणी कर्म ६ येदनी कर्म ७ मोहनी फर्म कर्म ६ नाम कर्म १० गोत्र कर्म ११ अन्तराय कर्मः 1. १२ अन्य ४द्रव्य १३ थाश्रय तत्व १४ यंघ तत्व १५ संवर तत्व '१६ निर्जरा सत्य के द्वारा हो सकता है ८५ ५२/२६ पिंडस्थ ध्यान मार्ग ८२ ५४/२७ पदस्थ ध्यान ५६।२८ रूपस्थ ध्यान ५७ | २६ रूपातीत ध्यान २ ५६३० मोक्ष तत्व है "- .
जिनेन्द्रमत दर्पण * दूसरा भाग.* (तत्यमाला) भाई साहबान-क्या यह 'वात सत्य है ! कि "श्रो श्रुतेनैव न कुंडलेन, दानेन पाणिर्न तु कै कणेन । विभाति कांया खलु सज्जनानाम् परोपकारेण न चंदनेन ॥" अर्थात् कानोंकी शोभा कुंडल पहननेसे नहीं परन्तु शास्त्र सुननेसे है, हाथकी शोभा कंकणसे नहीं परन्तु दान देनेसे है, . इसी तरह सबनोंके शरीरकी शोभा चंदन लगानेसे नहीं परन्तु परोपकारसे है। इप्त प्रश्नका उत्तर कुछ शीघ्रतामे देनेकी आवश्यकता नहीं। थोड़ी देर एकांत वेठ चितकी वृत्तिको सर्व आकर्पोंसे रोक अपने "अंतरंगमें यादानुवाद करके निर्णय कीजिये और तब, भलेप्रकार साहसकी कमर यांध निर्भय हो खुले स्थानमें आकर बड़ी ध्वनिसे इस प्रश्नको उत्तर कह दीजिये। पाठकगण-है कि नहीं, क्योंकि बिना विचारे कहना केवल कहना ही फहना है। यदि पिचार पूर्वक कहना होगा तो क्या सच्ची श्रद्धापूर्वक कहना न होगा! या महाशयों में तो यही विश्वास करता हूं कि आप अपने मुक्त कंठसे यही कह उठेंगे कि निःसन्देह इस श्लोकका वचन बहुत ठीक है "। , * . , मिनदमनदपंग यदि यही उतर आएका होगा तो हम भी सहमत हैं। पर हमें शब्द " क्यों " के उत्तहोंका प्रकाश करना भी आवश्यक है। क्या यह कान कुंडल पहनने के लिये नहीं ? तप फिर कुंड- लोंका होना निरर्थक है। नहीं नहीं कुंडल पहनाना इस फर्णकी बाह्य शोभाको दिखलाना है । पर जब यह कर्ण कुंडल तो पहन लें पर हमारे हितकारी कार्यकी ओर अपने विषयको न लगाकर अहि- समें प्रवते तो क्या वह कर्ण उस सोनेके घड़े के तुल्य नहीं हैं कि मलसे पुरित हो अथवा उस कर्णकी प्रभा उस स्त्रीके तुल्य नहीं है जो कि श्रृंगार रसमें भीनी होनेपर फुशीलके कीचड़से लिप्त हो ? पर महाशयो ! ऐसे कर्णको दोषी ठहराने के समय कुछ हमें और भी वर्गनकर देना पड़ेगा कि हमारा कीन कार्य हितकारी और कौन अहितकारी है । पाठमगण ! कृपया इन दो बातों का भी ध्यान वर-हमारी सम्नति इस विषयमें यह है कि नो कार्य हमें वास्त. वर्मे सुख पहुंचानेयाला य सुखके मार्ग में ले जानेवाला है, वही हितकारी और इससे विरुद्ध अहितकारी है। अय यह मी निर्णय कीनिये कि सुख क्या है ? नहां तक बुद्धिमानोंने विचार किया है सुख उस अवस्थाको कहते हैं कि निस समय आकुलताका अभाव हो, क्योंकि जहां आकुलता, घबड़ाहट, चिन्ता, शोक, क्रोध, लोम, माया इत्यादि उपस्थित होंगे वहां सुख कहांसे हो सका है। इंद्रियों के विषयोंसे माना हुआ सुख कुछ आकुलताके अमावसे जबतक उस विषयकी स्थिरता है और अपना चित्त केवल उसी विषयमें लौलीन है तब तक है। पश्चात् फिर अन्य विषय ग्रहण करनेकी थाकुलता बाधित 1 द्वितीय भाग करती है। नसे किसीको सेव ,खानेकी इच्छा हुई अब जबतक सेवका स्वाद नवानको न मालूम होगा तबतक आकुलता रूप दुःख है । यदि पुन्य योगसे हमारी इच्छाके अनुमार सेव आ भी गया (क्योंकि नंगतके प्राणी बहुत प्रकारके विषयोंकि पानेकी कामनाएं • किया करते हैं. पर उनकी एक भी इच्छा फलीभूत नहीं होती) और उसने भक्षण भी किया परन्तु उसके भक्षण करते ही दूसरी : किसी वस्तुकी इच्छा हुई कि तुरंत दुःस पैदा हो गया। अब जबतक यह इच्छा पूर्ण न होय तपतक यह दुखी है । इस प्रकार इन्द्रियोंके विषयों द्वारा सुखको मानना ऐसा है कि जैसे कोई , भनेक रोंगोसे. पीड़ित टोय और उसका एक रोग शांत हुआ हो इतने ही में यह रोगी उसके शांत होनेसे अपनेको सुखी • मान लेबे, लेकिन यदि ठीक २ विचारियेगा तो यही कहना होगा कि जबतक यह रोगी सर्व रोगोंसे मुक्त न हो नाय कदापि सुखी नहीं है। इसी तरह 'संसारी प्राणियोंको अनेक असंख्य इच्छाओंके रोग लगे हुए हैं। जब एक इच्छा रूपी रोग किसी.. शुम कर्म यशसे शांत होता है तो यह प्राणी अपनेको सुखी मान लेता है, पर वास्तवमें सुखी वही होगा निसकी सर्व इच्छाओं रोगोंकी शांति हो जायगी। इसी लिये हमको वह यत्न करना योग्य है कि निसमें हमें विषयोंकी इच्छाएं. बाधित न करें। बस यही सुख-गार्ग पानेका सीधा उपाय है । पाठकोंने भले प्रकार जन शास्त्रोंसे निर्णय किया होगा कि बड़े बड़े महान पुरुष जैसे तीर्थदर चक्रवर्ती आदिक पूर्ण पुन्य योगसे इच्छित विषय प्राप्त करनेका चल रखते थे तथापि इच्छाओंके रोगोंसे उनकी मुक्ति उसे बलसें नहीं:
.. - जिनेन्द्रमतदर्पण हुई-उनको इन रोगोंसे छूटने के वास्ते परिग्रहका भार छोड़ बनमें ना नग्न दिगम्बर हो ता करना पड़ा, अपने चित्तको अपने आपमें बिठाना पड़ा। ता उनके पूर्ण यत्नसे वे इच्छाओंके रोगोंसे मुक्त हुए और तर तीन लोककी वस्तुओंका पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर सर्व प्रकारसे सुखी होते भए । यस यास्तवमें हम प्राणियोंको भी वही मार्ग धारण करना उचित है अर्थात जितेन्द्रिय हो अपने आत्मद्रव्यको जानना उचित है। अपने आत्मद्रव्यरूपी फटिक- मणिमें तीन लोककी वस्तुओंके सर्वगुण पर्याय झलकेंगी और किसी चीनके विषय नाननेकी.इच्छा पैदा न होगी। पूर्ण यत्न सुखी होने का तो मुनिपद ग्रहणसे है पर जबतक । ऐमा न हो सके तबतक गृहस्थीमें यथाशक्ति यत्न करता रहे-बस अपने कानोंको ऐसी ध्वनि सुनाना कि नो चितको प्रमादसे छुटा- कर उद्यममें, जुआ आदि सात व्यसनोंसे छुटाकर धर्म, अर्थ, काम- मोक्षरूप चारों पुरुषार्थोके साधनमें, क्रोप मान माया लोभकी तीव्र-।, तासे बचाकर विवेकके मार्गमें, स्वार्थीपनेकी आदतसे बचाकर कुटुम्ब रक्षण, जाति.वा धर्म रक्षण, देश हितरक्षण व जगत सुख, दायक कार्योकी ओर फेर देवे यही हमारा हित है । सो इसीलिये न्यायकार कहते हैं कि हे भाइयों ! कर्णोकी शोभा कुंडल पहनने से नहीं किन्तु हितकारी वार्ताके सुननेसे है। इसी तरह वह हाथ जो कि निर्ममत्य हो सर्व त्याग कर दे अथवा जो परोपकार में अपने हायसे धनको दान करे वही हाथ गोभनीक है । इमी तरह समन और साधु पुरुषोंके शरीर निश्चयसे चन्दन लगानेसे शोभनीक नहीं होते किन्तु यदि वह अपने शरीरसे परोपकार करें तभी शोमनीक हैं।
'द्वितीयामागः भाइयों ! जो आप मि० गोखले, दादा माई नौरोमी, मि० ताता, मि० सुरेन्द्रनाथ वननी, मि० मदनमोहन मालवीय, मि० सय्यद अहमद इत्यादि परोपकारियोंकी प्रशंसा करते हैं वह उनके परोपकारतामें अपने तनको लगाने हीके कारण करते हैं । कुछ मुन्दर पगड़ी और कपड़े पहनने से नहीं। इसी तरह हमारी जन जातिके भद्र पुरुषों (जेन्टिलमैनों) की शोभा उसी समय है ना वे अपने आपको जानि व धर्मकी उन्नतिमें लगा देवै । कुछ मुन्दर कपड़े पहनने पगड़ी बांधनेसे नहीं, कुछ पतल्टन कोट पहननेसे नहीं, कुछ वृथा प्रलाप करनेसे नहीं। अध्याय दूसरा। सप्तनत्र। भाइयो ! श्रीमान् उमास्वामी आचार्य ने मोक्षमार्गका स्वरूप अपने रचिन श्री तत्वार्थमूत्रनीमें जैसा वर्णन किया है वही मार्ग अनादिकालसे चला आया है। मोक्षमार्ग वही मार्ग है जो कि जीयको दुःखोंसे बचाकर ऐसी दशामें करदे कि निस दशामें रहकर यह पूर्ण आनन्द अनंत काल तक भोगता रहे । पूर्ण 'आनन्द क्या वस्तु है ? और क्यों इसके प्राप्त करनेकी यावश्यक्ता है ? यह. वर्णन पहले किया नाचुका है, तथापि यहांपर भी उसकी किचित परिभाषा दीनाती है। * यह आचार्य संवत् १०१ में हुए है।
(६), .. जिनेन्द्रमतंदर्पण
पूर्ण आनन्द वह स्वाधीन निराकुल आनन्द है जो कि
अपने जीवका निन स्वभाव है और उसके पानेकी आवश्यकता
इस प्रयोजनसे है कि यह जीव उस दशामें पूर्ण ज्ञानी अर्थात
सर्वज्ञ हो जाता है और यह नियम है कि सुख ज्ञानपूर्वक है।
निस व्यक्तिको एक वस्तुका हाल जबतक नहीं मालूम था वह
दुःखी था उसको वह हाल मालूम हो गया वह सुखी हो गया।
इसी तरह पूर्ण ज्ञानी पूर्ण सुखी है, क्योंकि ऐसे जीवके लिये
कोई पदार्थ शेष नहीं रहा कि जिसके जाननेकी आकुलता हो । '
आकुलताके अभावसे वह पूर्ण ज्ञानी सदा सुखी है- बस इसी पूर्ण
ज्ञानी होनेका जो उपाय है वही मोक्षमार्ग है।
यह मार्ग तीन भेद रूपसे है अर्थात् सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान
और सम्यक्चारित्र अर्थात् अच्छी तरह विश्वाप्त करना अच्छी
तरह जानना और अच्छी तरह आचरण करना-किनको ? तत्वोंको।
तत्व क्या वस्तु हैं ? इस शब्दका अर्थ सत्यता है और यहां पर
भी तत्व उसीको कहते हैं जो सत्य सत्य वस्तु मोक्षमार्गमें प्रयोजन
भूत हैं अर्थान् वह वस्तु जिनके कि जाने बिना मोक्षमार्ग नही.
प्रण किया जा सकता।
तत्व सात-७ हैं:-
जीव, अनीय, आश्रव, बंध, संवर, निरा और मोक्ष ।
HEAGDEK
द्वितीय भाग (७) अध्याय तीसरा। जीव तत्व। महाशयो! जीवसे निश्चय करके मतलब उस चीनसे है जो कि नीती थी अर्थात् चैतन्य रूपमें थी; जीव है याने इस वर्तमान समयमें भी जी रही है और जीवंगी याने आगामी जीती रहेगी। प्रयोजन यह है कि ज्ञान जो एक गुण है यह जीव हीके पाप्त है और कहीं नहीं। जिस चीनमें जीव नहीं होता उसको जड़ कहते हैं। जड़में समझने व पहचाननेकी ताकत नहीं। यह ताकत एक जीव ही के पास है। यह बात निर्विवाद सिद्ध है व हरएक मत व हरएक बुद्धिमान अच्छी तरह समझता है कि जीव निसको रुह कहते हैं उसका काम "जानने" का है। जिस वक्त यह शरीरमें रहता है यह अपने शरीरके द्वारा किसी चीनको छूकर, किसीका सवाद लेकर, किसीको सूंघकर. किसीको देखकर और किसीको सुनकर उनका हाल मालूम करता है । जिस वक्त यह शरीरमें नहीं रहता, शरीर अकेला किसी चीनका हाल जाननेको असमर्थ होनाता गाने नहीं जान सकता है। अब यहांपर कोई कोई मतवाले यह शंका करते हैं कि जीव कोई जुदी चीन नहीं हैं और वे कहते हैं जैसा कि इस छंदमें वर्णित है। चौपाई। भूनल अगनि पन नम मेल | पांचो भए चेतना खेल || त्यों गुड़ आदिक ते मद होय । मद ज्यों चेतन थिर न कोय।।
१ - सिनेन्द्रमतदर्पण याने जमीन, पानी, आग, हवा और आकाशके मिलनेसे चेतना याने जीव पैदा होमाता है जैसे गुड़ वगेरह चीनकि मिल- नेसे मदिरा याने शराब बन जाती है जिसका काम नशा है। इसके जवाबमें जीव माननेवाले यह दोहा कहते हैं- दोहा। पांचों जड़ ये आप हैं जड़ ते जड़ ही होय । गुड़ आदिक ते मद भयो, चेतन नाही सोय ।। भूनल पावक पौन नभ, जहां रसोई जान । क्यों नहिं चेतन उपने, यह मिथ्या सरधान ॥ याने जमीन वगैरह जिन पांचोंके मिलनेसे कहते हो कि जीव पैदा होता है सो ये पांचों ही जड़ हैं, जड़ चीनसे जड़ पैदा होगी चेतन नहीं, गुड़ वगैरहके मिलनेसे मदिरारूपी एक नड़, चीनकी पैदाइश हुई। इस मदिरामें अपने आप नशा कुछ नहीं है। भव यह पी (पिई) नाती है तो पीनेवालेको नशा मालूम भी होता है और नहीं भी मालूम होता है सो इस तरहसे तो जगतमें यह कायदा ही है कि कई जड़ चीनोंके मिलनेसे एक दूसरे प्रकारकी जड़ चीन पैदा हो जाती है निसका असर कुछ न कुछ होता ही है जैसे पानी, मीठा, रवा और अग्निके नरियेसे मिलकर हलवा होनाता है जो कि अपना एक खास असर रखता है । और देखिये रसोईमें मिट्टी, पानी. आग, हवा और आकाश पांचों चीजें होती हैं पर उनसे सिवाय जड़ चीनौके कोई चेतन चीन पैदा नहीं । हो सकती है- ५ 7
द्वितीय भाग (९)
यह बात तो सायन्स (विज्ञान) के जरियेसे भी प्रमाणित है
कि मिन चीनोंमें पुदगल (Matter) है उनके मिलने व अलग
करनेसे पुद्गल (Matter) ही होनायगा । पुद्गलमें तरह तरहकी
ताकतें मौजूद हैं। एलेक्ट्रिसिटी.( विजुली) आदिक सब पुद्गल
ही की पर्याय हैं । इनमें कुछ भी चेतना नहीं । जीवकी कोई
मूरत नहीं बना सकता है। पुद्गलका छोटामे छोटा टुकड़ा (निसका
और टुकड़ा नहीं हो सकता) भी मूर्तिक होगा । यदि हम यह मानें
कि मिट्टी, पानी, आग, हवाके मिलनेसे नीव होता है और एक
एकका इनमैसे एक एफ ही छोटेसे छोटा टुकड़ा आपसमें मिलकर
जीव होनाता हो, तब भी इन पांच टुकड़ोंसे बनी चीन मूर्तिक ही
होनी चाहिये, अमूर्तिक नहीं । मूर्तिककी तौल भी होती है किन्तु
इस अमृर्तिक यस्तु जीवमें कोई तौल नहीं। अगर एक जीवधारीका
शरीर उसके मरते समय तौला जाय और फिर नीव न रहे तब
उसी शरीरको तौलो वशर्ते कि उसके शरीरसे सम्बन्ध रखनेवाला
एक भी परमाणु जरी ( Matter ) पुदलका अलग न हो । तौ
'दोनोंकी तौल बराबर होगी।
यह जीव अनादिकालका है कभी इसका नाश नहीं होता।
चौपाई॥
बालक मुख मेथुनको लेय।
दावे अंचे दूध पिवेय ॥
जो अनादिको जीव न होय ।
सीख विना क्यों जाने सोय ।।
मरके भूत होत जे जीव ।
जिनेन्द्रमतदर्पण h ३ पिछली बात कहें सदीव ॥ सिरचढ़ि बोर्ले निज घर आय । ताते हंस अमर ठहराय ॥ भावार्थ-छोटा लड़का जन्मते ही अपनी माताको पहचान कर दूध पीने लगता है। शरीरमें दुःख मालूम होते ही रो देता है, दूसरे जो जीव मरकर भूत आदिक नीच देव होते हैं वे कभी किसीके सिर चढ़के पिछली बातें कहते हैं इत्यादि दृष्टान्त "इस यातके प्रमाण हैं कि, नीव अनादि, अनन्त, अविनाशी, पुद्गलसे भिन्न कोई अमूर्तिक वस्तु है । मूर्तिक पुदगलसे इसका निश्चयसे सम्यन्ध नहीं है-इस जीवका लक्षण 'जानना' 'देखना है। लेकिन संसारी जीवोंके ज्ञान दर्शन स्वभावका प्रगटपना बहुत कम है इससे संसारी जीवोंका जानपना इन पाँच इंद्रिय तथा मनके द्वारा होता है। जैसे कि दृष्टि ठीक न हो तो उसको देखनेके लिये चदमा लगानेकी आवश्यकता होती है उसी प्रकार हमारे जानपनेका स्वभाव जबतक निर्मल नहीं तबतक मानपने के लिये सहायताकी आवश्य- कता होती है । यहां पर यह शंका होगी कि जब जीव वस्तुका स्वभाव जाननेका है तब और सहायताओंकी क्या आवश्यकता है ? इसका समाधान इस प्रकार है कि संसारी जीवोंके स्वभाव अनादि कालसे किसी प्रकारके मलसे पूरित हैं जो कि इनको अपने स्वाभाविक कार्यके होने में बाधा करते हैं। मल क्या है इसका वर्णन अजीच और आश्रय तत्यमें किया जायगा । यहांपर केवल नीय तत्व ही वर्णन है । इसी जीव तत्वके विषयमें एक कविस्त यह कवित्त है ।
द्वितीय भाग (११) सचेया। जीव सदा उपयोग मई, मिरमरति भावनिको करता है। देह प्रयान को भुगता भव वास यसै शिवको भरता है ॥ करध चाल मुभाव विरानत नौ अधिकारनिको धरता है। सो सब भेद बखान करूँ शरधान करो भ्रमको हरता है ॥१॥ सवेश ३१ 'इन्द्री पांच बल तीन श्वास आव दस प्राणं मूल चार इन्द्री वल स्वास आव मानिये । पुरय जीवै था अब नीयं आगे जीय होगा एई प्राण सेती विवहार जीव जानिये । मुख सत्ता योष और चेतन निचे प्राण, शाश्वतो सुभाव तीन कालमें बवानिये । विव- हार निहचे स्वरूप जान सरधान ऐसे नीव वस्तु लेख सो मुखी पिछानिये ॥ भावार्थ-जीवके मुख्य करके ६ विशेषण हैं ( १) सदा नीय है अर्थात तीनों कालमें जीता है (२) उपयोगमई गाने ज्ञान दर्शनका धारी है (३) अमूरत है पुद्गलकी ऐसी कोई मूरत ( Material figure ) नहीं है ( ४ ) कर्ता है याने व्यौहा- रसे फर्मोका कर्ता है निश्चयसे अपने ही भावोंका फर्ता है (५) देह प्रमाण याने जिप्त देहमें जाता है उसी देहके प्रमाण सिकुड़ता व फैल जाता है (६) भोक्ता है याने व्यवहारमे अपने ही किये हुए कर्मीका फल आप भोगता है। निश्चयसे अपने स्वभावको भोगता है (७) संसारी है अर्थात् संसारमें धूमने वाला है (1) सिद्ध है अर्थात् संसारसे रहित शिवरूप है (९) ऊर्च स्वभाव धारी है याने अग्निकी लौ के समान ऊंचा चलनेका है स्वभाव
जिनेन्द्रमवदर्पण
१.
जिसका । व्यवहारमें जीव वह है जिसके कमसे कम ४ प्राण और
ज्यादामे ज्यादा १० प्राण होते हैं।
एक इन्द्रीवाले जीवोंके ४ प्राण याने स्पर्श इन्द्री, शरीरका
चल; आयु और श्वासोझ्यास होते हैं।
दो इन्द्रीवाले जीयोंके ६ प्राण याने पहले कहे हुओंसे रसना
इन्द्री और बचन बल ज्यादा होता है।
तीन इन्द्रीयाले जीवोंके ७ प्राण याने एक प्राण (नाक)
इन्द्री ज्यादा होती है।
चार इन्द्रीयाले जीवोंके ८ प्राण याने एक चक्षु (आंख)
इन्द्री ज्यादा होती है।
पांच इन्द्रीवाले नीव दो तरहके होते हैं एफ मनवाले दूसरे
मन विना-
मन रहित पंचेन्द्री जीवोंक ९ प्राण याने एक कर्ण इन्द्री
ज्यादा होती है । मन सहित पंचेन्द्री जीवोंके १० प्राण याने एक
मन वल ज्यादा होता है।
और निश्चय कर जीव यह है जिसके सदा ज्ञान दर्शन सुख
'पाया जाय।
यहां पर व्यवहार और निश्चय दो शब्द कहे इनका प्रयो-
मन यह है कि निश्चय उसे कहते हैं जो कि एक चीनके असली
हालको कहे । व्यवहार उसे कहते हैं जो कि असली हालको न
कहकर किसी और चीनोंके सब्यसे जो तरह २ की हालतें हों
पनको कहे।
. द्वितीय 'भाग '(१३) जीवका जो जानना स्वभाव है उस ज्ञान स्वभावके पांच भेद हैं अर्थात मंतिज्ञान, श्रुतिज्ञानं, क्यधिज्ञान, मन पर्ययज्ञान और केवलज्ञान | इनमें से केवलज्ञान जिस समय जीवके स्वमाव होता है उस समय यह नीव स्वयं विना किमी और वास्तुकी मदेदके तीन लोककी सब चीनोंको जान लेता है। अवधिज्ञान और मन पर्ययज्ञानके होनेपर इस जीवके जाननेकी शक्ति और चीनोंकी थोड़ी मददकी आवश्यकता होती है इसीलिये इन दो ज्ञानोंको कुछ प्रत्यक्ष भी कहते हैं। किन्तु मति ज्ञान और श्रुति ज्ञान यह दो ज्ञान बिना और चीजोंकी मंददके बिलकुल नहीं होते। यह दो ज्ञान एकेन्द्री नीवसे लेकर मन सहित पंचेन्द्री जीव तक सब जीवोंके कमती बढ़ती पाये जाते हैं। अवधि ज्ञान जन्मते ही देवनारकी और तीर्थदरोंक पाया नाता है लेकिन औरों को इसके पाने के लिये आत्मध्यान करना , होता है । मन पर्य्यय ज्ञान और केवल ज्ञान यह दो ज्ञान बिलकुल मात्मध्यान करने ही से मनुष्य जन्मधारी जीव हीको होते हैं। एक जीवके एक वक्तमें कमतीसे कमती एक और ज्यादासे ज्यादा ४ ज्ञान होते हैं । यदि एक ज्ञान होगा तो केवलज्ञान ही होगा, क्योंकि जिस समय केवलज्ञान होता है उस समय पूर्ण ज्ञान हासिल होनाता है फिर और ४ प्रकारके ज्ञानकी यावश्यकता नहीं होती है। दो होंगे तो मति और श्रुति होंगे | तीन हांग, तो मति, श्रुति और अवधि या मनपर्य्यय और चार होंगे तो मति, श्रुति, अवधि, और मनपर्य्यय होंगे।
A . जिनेन्द्रमादपण हमारेमें मति और श्रुति यइ दो ज्ञान ही मौजूद हैं . और : यह दोनों ज्ञान पांच इन्द्रिय और०मनके आधीन हैं, क्योंकि हमारे । आत्माका ज्ञान इतना मन्द है कि यह बिना इनकी सहायताके नहीं देख सकता है जैसे कि कमती देखनेवालेको चश्मेकी सहायताके बिना ठीक नहीं मालूम पड़ता और जैसे चश्मेमें यदि कुछ दोप हो जाय तो देख न सके व कम देख मके व और का और देखे। इसी तरह यदि पांच इन्द्रिय च मन जो बिगड़े हों व किसीमें दोष होय तो उनके द्वारा भी जो जानना होगा वह कमती बढ़ती औरका और व नहीं जानना होगा। यही कारण है कि वृद्ध अवस्था में इन्द्रियोंको शिथिलता होनेपर जाननेमें भी कमी हो जाती है और इन्द्रिय और मनके ठीक रहनेसे जानपना भी ठीक होता है। जैसे जितना तेन चश्मा होगा उतना तेन दिखलाई देगा और जितना मन्द • होगा उतना ही मन्द प्रगट होगा । अब प्रश्न केवल इतना ही है कि ऐसे जीवों का ज्ञान इतना मन्द क्यों होरहा है ? उसके लिये . ऊपर लिखे अनुसार फिर भी कहना होता है कि एक प्रकारका मल है मो अनादिकालसे हमारी आत्मज्योतिको प्रगट नहीं होने देता। चौथा अध्याय। अजीवतत्य। 'अनीय' उसे कहते हैं जो जीव नहीं अर्थात् जिस वस्तुमें अपने आप चेतनता याने देखने जाननेकी शक्ति नहीं। अनीव पांच प्रकारके जैनमतमें कहे हैं । पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश '. और काल।
-द्वितीय मांग , यह लोक सब जगह छद्रव्योंसे भरा हुआ है । वह छः द्रव्य ऊपर कहे हुए पांच तरहके अनीव और एक जीव द्रव्य है। इन पांच अनीवोंमें धर्म, अधर्म, आकाश और फाल तो बिलकुल अमूर्तिक हैं । सिर्फ पुद्गलं ही मूर्तिक है ! :,... इस जगतमें जितनी वस्तुएं इन्द्री गोचर हो रही हैं सर हैं हमारा बहुत बड़ा सम्बन्ध युद्गलसे रहता है इस कारण पहले पुट्ठल नामा अनीव ही के भेदोंका वर्णन प्रगट किया जाता है। 'पुदगल छः प्रकारके होते हैं-(१) सूक्ष्म सूक्ष्म (२) सूक्ष्म (३) सूरम स्थूल (४) स्थूल सूक्ष्म (१) स्थूल (६) स्थूल स्थूल । 'सूम सुक्ष्म पुद्गलका एक परमाणु होता है याने इतना छोटा हिस्सा कि निसका फिर भाग न हो सके। सूक्ष्म-फर्म-वर्गणाके पुद्गल हैं जिनसे बंधा हुआ यह आत्मा संसार-चक्रमें घूमा करता है और निनके छूट जानेसे यह . जीव मुक्त कहलाता है। मूक्ष्म-स्थूल यह चीन है जो कि देखनेमें सूक्ष्म है याने चर्म नेत्रोंसे नहीं दिखलाई पड़ती, परन्तु अपने कार्य में बहुत स्थूल है याने काम उसका बहुत बड़ा मालूम होता है । जैसे शब्द (आवान) खुशबू जो कि देखनेमें नहीं आते परंतु काम इनका साक्षात् प्रगट है। स्थूल-सूक्ष्म वह पुद्गल है नो देखनेमें बहुत मालूम हो पर सूक्ष्म ,इतना कि आप उसे हायसे पकड़ नहीं सकते जैसे चांदनी, धूप, छाया आदिक। 8
हिनदमादक
पूल पाड़ाएगा, दुनो होगा सौ सय
भावोंने तीवजा व मंदताके अनुपार टमी मानिक पाणुगोल
मेपन होगा नो कि आगामी फिर कभी फल देने के संमुस दोगे।
यह कोह। पर इस मुर बतार बारके समान है मो कि
एक तरफमे सुरवा माय और दूसरी तरफ ना माय । कर्न
घरका खोलने वाला यांरनेवाला एक मोबदरीदे। यदि या
प्रयत्न करे तो रंधे कर्म विना रस दिये
होय और नए
कर्म बंधे ही नहीं।
यहाँ पर इतना कह देना भी अनुचित न होगा किया
संसारी भीव विजकुछ कामों व नहीं है। यदि यह प्रयास करे,
तो पहिलेके मौकी माने फा देने के पहले ही दूर कर ससा
है वमा उनके मोर पक्ष सता है और वनका र बदामी
सकता है । इसका वर्णन "निरा" ताप का भाया...
हम यहाँपर अपने उन भाइयोका स्थान इस विषय पर.
माकपंग करते हैं मित्रो कोक माधीन भरनेको मानकर निरु:
समी रहते हैं। नैन मतका कभी यह सित नही सिम
कमौके ही आधीन हैं। मैन मन के सिद्धांतो सा अपर मर्णन
किया गया है जाननेवाले सदा उपमके घोड़ेपर सवार रह कर
कोको अपने ही वशमें समझ कर पानी मात्म-उमविकी ओर..
दत्तचित्त रहते हैं। जनमत कहता है कि महां मालम्य है वहाँ
पाप है। श्री उमास्वामी रुत तत्वाधसूत्र में हिंसाका मेरहम पहार
लिखा है कि प्रमादके योगसे भो प्रागों का नाश करना है वह हिंसा
है। मालसी पुरुष न खानेमें, न पीने में, न उठाने में, न भरनेमें, ने
में
द्वितीय भाग (१९) बाव करनेमें किभी ही काममें उचित यन न रखने के कारण नीद हिंसाके पाप भागी होते हैं। नो भाई निनेन्द्र दर्शन करने का उधम किंचित भी न करने पर और पूछने पर यह नाच दे देते हैं कि भाई क्या करें हमारे भागहीमें नहीं मो थोड़ी सी भी फुरसत मंदिर भाने को मिले वे लोग और भी ज्यादा पापके भागी होते हैं। इस विषयका विशेष वर्णन मानना हो तो श्री पुरुषार्थ- सिद्ध गाय अन्य की स्वाध्याय करके जान सकते हैं। महापर यदि कोई प्रश्न करे कि कर्म वर्गणारे पुदगल मूर्ति हैं और आत्मा समूर्तिक है अतः किस पकार ममूर्विकको मूर्विक घेर सकता है ! इसका समाधान इस प्रकार है कि यह संसारी भी भनी वर्तमान दशा ममूर्तिक नहीं चि मूर्तिक है, क्योंकि भनादिसे कर्मों करके घिरा हुमा है, उसी कर्म साप और कर्म • भाकर मिकमाये हैं, शुद्ध जीन को संपिकित नहीं हो सका। मित समय भी भाव भरने स्वभावसे मिन्न होते हैं उस समय कर्म वर्गणाके परमाणु भोंको जो कि तीनों लोहमें मो. हैं यह संसारी. भीव भास्ति कर लेता है । इस लिपे कर्मके फंदोंमें छूटना ही, इस नीयका परमहित है। यह कर्म आठ प्रकार के होते हैं- ११) ज्ञानावरणी (१) दर्शनावरणी (३) संतराय (१) मोदनी (१) मायु () नाम (७) गोत्र () चेदनी। इनमें से पहले के १ कर्म घातिया इह पते हैं क्योंकि यह श्रीवके समावको आवरण करनेवाले हैं और अन्त अपातिया; 'क्योंकि यह जीवके स्वभावको न दकार केवल ऐसे कारण मिला हैं जो कि मौवको स्वभाव मूख्नेके कारण' होनाते हैं।
(२०)
मिनेन्द्रमतदर्पण
अध्याय पाचवा।
[आठ कर्म]
(१) ज्ञानादरणी कर्म
इस फर्मका यह स्वभाव है कि इतके सम्बन्धसे भात्माका
ज्ञान प्रगट नहीं होता है तथा कम प्रगट होता है। यह पांच प्रका-
रका होता है।
(१) मतिज्ञानावरणी-जो मति ज्ञानको न होने दे। मलि
ज्ञान वह ज्ञान है जो कि पांच इन्द्री और मनके द्वारा किसी
पदार्थको जाने । जसे हम पीली वस्तुको आंख इन्द्रोसे देखकर
उसके और लक्षण जानकर यह निश्चय करते हैं कि यह सोना
पीतल नहीं। यह हर ज्ञान - मतिज्ञान ' है। मतिज्ञानावरणी
फर्मके कमती बढ़ती होने के कारण जीवोंकी साधारण बुद्धि
(Common Sonse) कमती बढ़ती होती है । इसके १८८ भेद
हैं निप्सका वर्णन श्री सर्वार्थसिन्दिनी ग्रन्थसे गानना योग्य है।
(१) श्रुति ज्ञानावरणी-जो श्रुति शानो न होने दे। श्रुति
ज्ञान मतिज्ञान पूर्वक होता है अर्थात पदार्थो का विशेष हाल घ भेद
मालम करना यह श्रुति ज्ञानका विषय है। ११ अङ्ग १४ पूर्वक
शान सब श्रुति ज्ञान है।
(३) अवधि ज्ञानादरणी वह शान है जो अवधि ज्ञानक
न होने दे । अवधि ज्ञान वह ज्ञान है, जिसके द्वारा तपस्वी मुनि
अपने व और जीवों के पूर्व जन्मके चरित्रोंको व भागामी चरित्रों
विचार करनेसे मालूम करते हैं-यह ज्ञान रूपी पदार्थो ही कोम
द्वितीय भाग (२१) 'सकता है। यह ज्ञान देव और नारक्यिोंक भी होता है निससे वे अपने पूर्व मवका वृत्तांत विचार करने से मान लेते हैं। (१) मनपर्यय ज्ञानावरणी-मनपर्यय ज्ञानको नहीं होने देवी । मनपर्यय ज्ञान वह ज्ञान है जो कि दृप्तरोंकी मन सम्बन्धी सूक्ष्म वार्ताओंको व मूक्ष्म पद्गल द्रव्यों के चरित्रको मान लेता है। केवल ज्ञानावरणी-केवल ज्ञानको नहीं होने देता। केवल ज्ञान वह ज्ञान है जो कि सर्व पदार्श की कुल पराँगों को एक ही समसमें मालूम करता है। इस प्रकार शोनावरणी धर्म पांच भेद हैं। इस फर्मके साभव होकर यंधने (पर्थात् फोका भाकर मात्मासे सम्बंध करने) में नीचे लिखे कारण होते हैं। जब मन बचन और काय चलाय- मान होते हैं उसी समय कोका मागमन होता है। जैसे चुम्बक पत्थर लोहे को घसीट लेता है इसी प्रकार मरागी मन वचन काय "कोको,घसीर लेते हैं। ज्ञानावाणी कर्मके माने (भाव) कारण १-प्रदोप-तत्वज्ञानकी कथनी करनेवासे व उत्तम ज्ञानके 1. देनेवासे ईपोमाव रखना प्रशंसा न करके चुप रहना । १.-चिन्हम-आप पदार्थीका हाल भानता हुषा भी अगर १८ कोई पूछे तो यह कहना कि हम नहीं जानते । मावार्थ अपने ज्ञानको दुसरेसे छिपाना। -मर्य-अपने को शास्त्र ज्ञान व पदार्थों का ज्ञान होते सते मोर मार सिसावने योग्य होते संत मी दप्तरेको न सिखलाना; रह भाव रखके कि यदि दूसरा सीख नावेगा वो मेरी बराबरी करेगा। .
जिनेन्द्र मतदर्पण -अन्तराय-ज्ञानके सम्यासमें विद्याकी उन्नतिमें बिन करना, विद्योन्नतिक कारणोंको म होने देना। ५-असादना-दुसरेके प्रकाश किये हुए ज्ञानको वर्नना याने मना करना। ६-उपघात-ठीक ठीक ज्ञानमें भी दोप लगाना । यह छः तो मुख्य कारण ज्ञानावरणी धमके मायके हैं। इनके सिवाय विद्या पाने में बालय, शास्त्र व पुस्तक पढ़ने में बनादर, माप बहुज्ञानी होकर ग घरमा, मूठा उपदेश देना, ज्ञानवानों का गप- मान करना, खंटे शास्त्रका लिखना, छपाना व वेचना इत्यादि गो को बातें किसी प्रकार से भी अपने व दुसरेके ज्ञानाम्य में रोने बाली है ये सब ज्ञानारणी कर्मके आश्रदके कारण है। हे हमारे प्यारे अनी भाइयों ! देखो धापा मालीन शास्त्र क्या कहता है ? क्या आप लोगोंको ज्ञानाभ्यास के कारणों को गारोन करने के कारण तथा विद्योगतिमें जालस्य करने के कारण ज्ञानावरणी कर्मका आश्रय न होगा ? क्या यह विद्वान् पंडित-मोकि भार ज्ञान परिपूर्ण होकर और अपने ज्ञानरूपी ज्योतिमे हगरे अज्ञानरूप अंधेरेवों मेटने की योग्यता रखनेपर भी आलस्य करते हैं तथा दूसरोक वस्तुका स्वरूप मले प्रकार यह समझ कर नहीं सिखलाते हैं कि या मान कर हमारी बराबरी करेंगे व हमसे ज्ञान में उच्च हो कर हमा भानमें भिन्न करेंगे-ज्ञानावरणी फर्मके पाश्रवके भागी नहीं हैं। ज्या वह हमारे मुखदेवी (पिन्शंनयाफ्ता ) भाई मिनको सरका पेन्शन इसी गरजसे देती है कि वे अपने अन्तके दिन मुर गन्तवा पूर्वक विताते हुवे अपने अनुभव से हासिल किये ज्ञान द्वितीय माग दुसरों को प्रमान करें, यदि ऐसा न करके अपने ज्ञानको छिपा कर रखें तो ज्ञानावरमी धर्मके अनबके मागी नहीं है ? हे हमारे जैनी,माइयो ! आप अपने प्राचीन शस्त्रों को पढ़ार यस पर चलने की कोशिदा दीजिये । आपके शास्त्र जब पुश्कर पुकार कर पहते हैं.कि "ज्ञान विना घरनी दुखदाई, अज्ञानी कोटि वर्ष तप तपे तो नितने दोका क्षय हो उतने कमोको झागी एक क्षण भर तप करके नाश कर सकते हैं" तो क्यों माप ज्ञानशून्य अवस्था थानी करते जाते हैं। आपने भनेको अज्ञानी बनाकर अपना धर्म में राज्य पाट सब गवां दिया। थापा रहा सहा व्यापार भी चला मारहा है। आप सरासर देखते हैं, पर चुछ उपाय नहीं करते। यह भार स्यका गमाना नहीं, चेष्टाका है। यदि उद्योगी पुरुष हो तो बहुत कुछयार सता ! आपकी खेती भी मापसे निकल र मापसे ज्यादा जानकारों (अग्रेही व्यापारी के हाथ में चली नारही है। आपकी ईश्री खेती कुछ दिनों युरुपियन उद्योगी व्यापारियोंके हाथमे चली जायगी। आप यह देखते हुए भी कि मापके भाई नाशन निवासी पुरुषोंने कितनी उमति अपनी की है, थाप बिलकुळ खबर हैं । जापान के लोग बौद्धमती हैं। वे भी जैन धर्म के माफिक ज्ञानको सर्वोत्तम समझते हैं। उन्होंने शास्त्रानुसार भाज्ञाको मान ज्ञानको इतना बढ़ाया कि ५० वर्षके भीतर गीतर कुछ सौदाग. रीकी, चीन (दियासलाई, बटन, सुई, ऊंची, कपड़ा इत्यादि रोमकी कामकी चीमें ) मो पहले दिलायतसे मंगाते थे अपने घरमें प्रस्तुत करने लगे। माइयो ! जापानकी तरक्कीका केवल कारण:- विद्याका प्रचार -यू धर्मपा वा ५८ अप्रैल १९९ .
4.
(२४) जिनेन्द्रमतदर्पण
"ऐडवोकेट में लिखते हैं कि जापानकी तरक्कीका असली
कारण विद्याका प्रचार है । नापानमें कोई भी अनपढ़ बचा नहीं है।
"Thore are no illiterate children in the land
of the Rising Sun" यहां मनाथ बालकों की यहांकी म्यु-
निसिपेलिटी और सार दोनों बड़ी खबरगीरी रखते हैं। छोटे,
छोटे बालकों को कारीगरी सिखलाई जाती है । मि० धर्मपाल
कहते हैं कि सन् १८९९ में जापानके लोग मुश्किलसे १ ग्लास :
हेम्पकी चिमनी बना सकते थे । नत्र कि ३ वर्ष नार सन १९.२
में देखा गया तो वे ६००० टनवाले नहाम माने डौक घरोंमें
तयार कर रहे हैं । वस भाइयो ! प्रसादको छोडकर अपना सर्वस्व
ज्ञानकी उन्नतिमें खर्च कौनिए, तभी थाप ज्ञानावरणी कर्मके
संयोगसे दूर रहेंगे । जन्मथा यह कर्म बंधकर मापकी गात्माको
निगोद मादि एरेन्द्री पर्यायमें ले जाकर अज्ञानी की मांति ही
भसमर्थ कर देंगे।
अध्याय छठा।
२-दर्शनावरणी कर्म।
यह वह कर्म है कि निसके सम्बन्वसे मात्माकी दर्शन
शक्ति प्रस्ट नहीं होती तथा कम प्रकट होती है । यह नव प्रका.
रका होता है-
(१) चक्षु दर्शनावरणी-वह कर्म है निसके उदयसे यह
प्राणी अंघा होता व कम दृष्टिवाला होता है।
(१) अचक्षु दर्शनावरणी-वह है जिसके द्वारा मांखको
. द्वितीय भाग छोड़कर और चार इंद्री भैसे नाक, कान, मुंह, स्पर्श इनके द्वारा मालूम करना न हो।" (३) अवधि दर्शनावरणी-अवधि दर्शनको न होने दे। अवधि, वर्शन वह दृष्टि है कि निसके द्वारा यह नीव अपने द्रव्य क्षेत्र काल भावकी मर्यादा लिये रूपी पदार्थो को देखे । भने कुछ भव पहिलेकी वाहें अपनी तथा भौरों को देखकर कहना । (१) केयो दर्शनावरणी-मात्माको वीन लोक देखने की शक्ति अर्थात् केवल दर्शनको न होने दे । (१) निद्रा-मिसके द्वारा नींद भावे । (६) निद्रा-निद्रा-वह है किसके द्वारा निन्द्रा बार बार आयो , (७) प्रचला-वह है निसके द्वारा बैठे बैठे मोवाई भावें । (८) प्रचला-प्रचला-सोही औपाई पार वार माये । (९) स्त्यानगृन्द्रि--वह है जिसके द्वारा सोता सोता रठ कुछ काम करे, फिर सो रहे और न जाने गो मैंने कुछ किया था। .इस दर्शनादरणी कर्मका माश्रय होकर भारमाके साथ पंधने में यही छ कारण हैं जो कि ज्ञानावरणी कर्मकै माश्रवके कारण हैं- १ । प्रदोष-अच्छी दृष्टिं व इन्द्री विपय अवधि च केवल दर्शनादि-इनको दुसरोम उत्तम देखकर ईपो करना । २ | निन्हव-मापं जिस पदार्थको देना होय उसको दूम- रोंसे छिपाना । मासर्य-दूमा शास्त्रादिकप और वस्तु देखना चाहे ससको न दिखाना न बतलाना-ऐसा भाव रखा कि देखकर मेरी हानि करेगा। r .
(२६) जिनेन्द्रमनदर्पण ४ । अन्तराय-दूसरेके पदार्थ देखने में मिल करना । ५१ मासादना-दृमरे की देसी हुई चीनको मना करना। ६। उपयात-ठीक ठीक देखी हुई चीनमें व देखनेकी शक्ति दोष माना | इसके सिवाय द्वारेले नेत्र उपादना, परकी इन्द्रियों को बिगाड़ना चाइना । पानी दृष्टिका गर्व घरना, दिनमें सोयना तथा आलस्य रूप रहना, सम्यक प्टिको टुपम लगापना, कुत थकी प्रशंसा करनी, प्राणीनका पान करना तथा यतीदेवरों: को देख शनि करनी इत्यादि दर्शनायरणी कर्म के आश्रयके कारण हैं। इन कारणों को बचाने के लिये हमें अपने मन नचन काय पर काबू रखना चाहिये, क्योंकि निग सगर इनमें से कोई चलता है. फार्माण पुद्गल उसी समय उसके भाव (Thought) के प्रेरे उप्तके.. पाप्त माते हैं और पुराने कर्मरूपी रन पर आकर नम नाते हैं। पारे भाइयो ! ऐसा मानकर कि मालस्य और प्रमाद हमारे दर्शनावरणी क्रर्मके भावरे कारण हैं, हमें इसे दूर कर अपने धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष रूप चारों पुहार्थोकी परिपूर्णतामें कटिबद्ध होना चाहिये। यदि हमारे वर्तमान जैन गातिक शास्त्र के मर्मी इस दर्शनारणी कर्मके गानबके कारणों को छोड़कर निरालसी हो पदार्थों का भेद मालूम करें और पुरुषार्थकी ओर ध्यान करें तो थोडे ही दिनों में हमारी इस गैर नातिका सुधार हो भय ! खेद इस बातका है कि हमारे भाई अपने महान् आचार्योंके सदुपदेशों । पर गौर ही नहीं करते। .1 T प
द्वितीय भाग
(२७)
-
अध्याय सातवा.
पंदना कर्म।
- यह वह कर्म. मिलके उदय होनेसे प्राणियों को ऐसी नीगों
का रिलाप होता कि जिनके सबसे संसार मोड कानेवाला
प्राणी मुख व दुम्स मालम करता है, परन्तु-मिजो मोह गल जाता
है उसको वेदनी कर्मका उदय मुख व दुस अनुभव व विचार नहीं
करा सकता है । यह वेदनी कर्म दो ताइका होता है-
१-साना बदनी।
२-असाता वेदनी।
साठा वेदनी - फर्मका गा उदय होता है तन देव गति में
सुन्दर शरीर, सुन्दर देवांगना, अनेक ऋदयां व अनेक देव नाभर
बाद चीनोंगा मिलाप होनेसे मुख होता है और मनुष्य गति
राज्यादि विभव (दौसा) निरोग शरीर, अनेक चाफ्न, सुन्दर
- स्त्री, पनेक मन मोहने गहल आदि चीनों का प्रयोग होदर सुरक
होता. । निर्गच (पशु) गतिमें यदि घोड़े, गो, कुने मादिकी
योनिमें गए तो राजा महाराजा व धनव नोंके रहना हुया कि
नहां कई नौकर उनकी हर वक्त सेवा किया करें व मालिक भी
'खुश होकर प्यार किया करें । इमी ताद रामझ लेना चाहिये कि
नो ची में ऐसी हों कि जिनके मिलनेसे मोही नीव मुख मालूम
करते हैं, वे सब चीमें सात वेदनी कर्मके उदयसे सुख देती
मालम होती हैं।
असाता वेदनी कर्मके उदपसे यह प्राणी नरकों में नाकर
भनेक प्रकारके दुखको नी नौका मिलाय. पाता है । जमीन बदबू-
मिनेन्द्रमतदर्पण ये छः बातें आप करे व दुसरेको करे य किसी की ऐसी •दशा देखार खुश होय व इन्हींको मन पचन और कार्य करे यह सब भाव व क्रियाएं अमाता वेदनी कर्मके मानवके कारग होती हैं । इसके सिवाय दुमरे की बदनामी काना, चुगली खाना, कठोर परिणाम होना दुसरेके काय भावसे अङ्ग उपंग छेडालना, डर दिखलाना, कपायभावसे मपनी तारीफ करना, दूपरेकी मुराई करना, दूसरों के परिणाम दुखा देना, भारम्भ व परिमहमें बड़ा ममत्व रखना, विश्वासघात ( फरेस) करना, स्वभाव टेढ़ा रखना, जीवोंको बेमतलय दण्ड देना, विष पीना या दूपरेको भदर पिलाना इत्यादिक नो नो पापसे मिले भाव में वह मसात मेर- नीके भावके कारण हैं। मैंसे जैसे भावमें विकार होते हैं वैसे. ही कार्माण नातिके पुद्गल माकर आत्माके पुराने को साबमें मिल जाते हैं और कालान्तरमें फर देते हैं। इसी प्रकार साता चेदनीयके भावके कारण यह हैं: (1) भूत और ब्रहीपर मनुकम्पा-याने मूत कहिये. सामान्य पाणी [Coomon husn begins ] और ब्रजी कहिये वृतके धारी श्राविकादि पर पीड़ा देखकर ऐसे परिणाम होना मानों यह दुख हम हीको हो रहे हैं और अपनी शक्किमर देख दूर करनेका यत्न करना। (२)दान-दुसरे जीवोंकि भले के लिये अपना धन मारिक देना सो दान है। सो यह दान १ प्रकारका है, औषध दान- दवाईका दान, माहार दान-भोगनका दान, अभय दान-जिसका कोई रक्षक गहोय उतको रक्षाका दान, विद्या दान-याने इत्म हुनरका दान।
प्यारे नैनी माइयों ! यह देवा दूर न
द्वितीय भाग (३१)
(३) रागसंयम-धर्म की प्रीतिडे सर सपन रखना याने ...
अपने इंद्रिय और मनको रोकना और इसी लिये कुछ दिन
छोड़नेवाली चीजोंको छोड़ना व कुछका प्रमाग या गिन्नी को
रखना-या श्रावक ११ व्रत पालना व मशान माना
भकाम निराके भाव होना । महाम निरा इसे कहते हैं
कोका उदय होकर 'झड़ना,, उस समय किसी पाइने कामना
याने इच्छाका न होना।
(१) योग-मन.वचन काय योगों शुमाहना याने पर
मच्छे भाव, बचन हित मित व. कायको अच्छे कामोन रहा।
(५) शांति-क्षमामायका होना, याने क्रोष पद
न होने देना।
(६) शौच-लोम मार्वोका चित्तमें न हो।
यह. मुख्य काके छ: नाते साता देने की मार
कारणमूठ हैं । इनके सिवाय पाहतकी में चार,
वृद्ध (बुढे ), तपस्वी, व मनाय, विषारी की
मुस्तैद] रहना, सरल परिणाम याने संधे पल शर, विनर
रूप रहना, मान याने घमंडधान ना दर माव
व मच्छे बचन व भच्छी (शुमाइंट सब सादा
वेदनीय कर्मके बावके कारण हैं।
तक कभी दुख कमी मुखजीत होती
निमें कि मोही मन लीन होश
पहचानता।
जिनद्रमसदर्पण परन्तु निन भात्मस्वरूपमा पहिचाननी दूर रहे, 'हम कभी इस भातंका विचार तक नहीं करते हैं कि साता घेदनीव भासाता वेदनीका आश्नव किन किन बातोंसे होता है। इसी हमारे विधा रफे न होने हीके कारण हग बाल्य विवाह करते शंशा नहीं करते। इम वृद्ध विवाह करते डरते नहीं, हम बालकों को विद्वान् करनेकी.' परमाह नहीं करते, हम अपनी नातिके भाइयों को दिन पर दिन अवनत दशा में प्राप्त होते हुए भी उन फिजूल खर्ची मादिक कारणोंको नहीं रोकते । क्या कहें, यदि कोई विद्वान मंडली इन : जेन धर्मके सम्यक उपदेशोंको चितमें धारण करे तो उस मंडलीको कैसे सुख और शांतताकी प्राप्ति हो सो कुछ शुमारमें नहीं मा सकता। - -MSONAMK- . अध्याय आठवा । मोहनी कर्म। यह धइ कर्म है जिसके कारण यह नीव अपनेसे जुदी भीनों में ऐसा लुमा नावा है कि अपने आपको मूल जाता है। जैसे मदिरा (शराब) का नशा चढ़ता है, वैसे ही मोहका नया होता है । इस कर्मके खास खास भेद दो हैं-(१) दर्शन मोहनी, (२) चारित्र मोहनी। दर्शन मोहनी हमारे विश्वास ( अकीदे लो मदकी दशाम. रखती, याने निसके कारण हमारा विश्वास ठीक नहीं होता। चारित्र मोहनी के कारण हमारा माचरण मतवारेका ऐसा होता है, याने उचित व्यवहार अपने मन वचन शायका नहीं होता। ५ द्वितीय भाग (३३). दन मोहनी प्रकार है- (१) मिथ्यात्व, (२) सम्यकू मिथ्यात्व (३) सम्यक प्रकृति 'मिथ्यात्व () मिथ्यात्व-निसके उदयसे तत्वार्थका प्रधान न हो, याने भी मनीव वगैरह तत्वोंकि नौ असली मतलब हैं उसपर यकीन न हो । इसी तरह इन तत्वों के स्वरूपको बतलानेवाले देव, गुरु, शास्त्रका भी ठीक विश्वास न हो, रोगी द्वेषी देवोंको देद माने रागी द्वपी परिग्रहधारी गुरुओंको गुरु माने, हिंसाके पुष्ट करनेवाले व संसारसे प्रोति बढ़ानेवाले शास्त्रों को शास्त्र माने, मादि मिथ्यात्व है। १.२) सम्यक् मिथ्यात्व-जीव भजीव मादि तत्वोका व देव गुरु शास्त्रका कुछ सो अशान होय और कुछ न होय, याने सम्यक और मिथ्यात्व मिले हुए होय । जैसे दही और गुड़ का मिला -हुमा स्वाद होता है। ... (३) 8. प्रकृति मिथ्यात्व-जिसके उदयसे सम्यक बिगड़े तो नहीं परन्तु श्रद्धानमें मैलापन रहे । जैसे जीवादि तपोंका; अडान तो है परन्तु कभी कभी निश्चयनयोंसे सर्व जीव एक ही स्वरूप है । इस बात को भूल नाना, भेद समझने लगाना, अथवा सथे देवादिका स्वरूप तो मादम है परन्तु कभी२ ऐसा भ्रम करना कि शांतिनाथमी शांति की है, पवनारजी ही हमारे सुप्त । दाता, याने कभी कभी सही अरईत देवोको एकमा न समझना। चारित्र मोहनीके २५ भेद हैं । इनमें नौ नोकपाय कहलाते दें और १६ कपाय हैं।
जिनन्द्रमतदएका नौ भेद नोकपायके यह हैं- .(हास्य-निसके उदयसे हास्य 10 ममा प्रकट हो। (२) रति-जिसके उदयसे संसारी चीनों में विषत लीन होमाया (1) अरति-निसकें उदयसे कुछ मुहावे नहीं। (शोक- निके उदयसे किसी इष्टके वियोग होनेसे रंग करे। (७. भय- निसके उदयसे दुःखकारी' चोसे डरे । ६ जुगुप्सा-निसके उदयमे अपना दोष ऐनो छिपाये और इसरेके दोष देख परिणाम भैले रे याने नफरत परेः। (७) स्त्री वेद-मिसके उदयसे स्त्री सम्बंधी भाव होय । (2) पुरुष वेद:मिप्तके उदयमे पुरुष संबंधी माव होय (९) नपुंसक वेद-जिसके उदयसे नपुप समन्धी माव होग। १६ षाय यह हैं-क्रोध (गुस्सा), मान ( ग़रूर), माया (कएर दगावा); लोम (लालंच) यह चार काया है। इन चारों चार चार भेद है याने अनंत नुबन्धी क्रोध व मान व माया व लोभ, अपायाख्यानावरणी क्रोध व.मान ६, माया वालोमा पत्या- ख्यानाताणी क्रोध व मान व माया व लोम, संज्वलन क्रोध व मान, व माया व लोभ । इस प्रकार :१६ भेद हैं.। अनन्तानुबन्धी-वह हैं जिनके उदयसे अनन्त संसारका पंध हो, यांने ऐमा गुप्ता व गार - वगैरह , होना कि जो तरियतसे. . दूर न हो। .. अप्रत्याख्यानावरणी-वह है: जिनके ..दयसे ऐसा गुप्ता, गरुर; लाच व मायाचार होना कि निससे गृहायोके करने के लायक श्रावकके १२ प्रत पालनेके भाव नहीं हों। ।
. प्रत्याख्यानाकरणा-वई हैं मिनुके उदय से ऍमा बोषादि होना मुनिया को नहीं पा सके। सन्चकन-वह है जिनके उदयसे ऐसा क्रोधादि दोनों कि अपने पूर्ण शुद्ध स्वभावम बायर लीन न रह सके। गद २१ मेद चारित्र मोहनीके और ई भेदं दर्शन मोह- नी मिलाकर कुले २८ भेद मोहनी कके हैं। अब यह मोहनी कम नि किन बातों में आभव रूप होता "सका विचार करना चाहिये। भाइयों ? दर्शनमोहनी फर्म के कारण यह हैं- चली (ो पतिया को को नाशकार केवलज्ञ न हामिल करके तीन- लोक व अलोकको नानकर निराकुल हो गर) को निन्दा करनी' .. या झूठो दोष राना (6) नन शस्त्र (नो कि दयामयी उप- देशसे भरा है) की निन्दा करना यान' झूला दोष गाना। संघ मुनियों के संय की निन्दा करना व झूठो दोष लगानां ।' (४) देव र भवनवासी, व्यन्ता, ज्योतिषो पायांसा') की निन्दा काना व झूश दोष लंगाना याने कहा कि मां भी हैं। (७) धर्म (दयामयी धम) की निन्दा करना व झुठा दोष लगानी । इन ६ बातों की तरफ मन बच काय च नेसे तथा अन्य पदायों के स स्वरूपको मिथ्या कहने और माननेसे दर्शन मोहनी कर्मकी आश्रव होता है। कषाय । क्रोध, मान, माया, 'लोभ । के होने में नो परि- जनमें तना होना और इसी कारण वचन में नैन निहालना व घरीरसे भी खोरे भावरण करना, इनमेंन मोनों के पास द प. KER Pur V जिनेन्द्रमसदन 11 मेदनी कर्मका भाव होता है। इसी तरह नौपाय वेदनीका भाव इस मांति है कि दीन दुःसीकी हसी हरने व देमतरर बहने से हास्यच (१), योग्य कामको मना नहीं करने व सरकी पीडाको दूर करने इत्यादिसे रविका (१), सोटी क्रिया माह, दुसरेको पीड़ा देने व पापीही संगति करनेसे भरतिका (३), माप रुममें रहने तथा दूसरों को रुन देने तया दुसरे का रंम देख- कर खुश होनेसे शोकका (४), मार भयमें रहना व दुसरेको दर दिसलाना व निर्देई होकर दुःख देनेसे मयका (५), दुमरेकी बुराई करने व भच्छे भाचरणवालेसे घृणा (नफरत करने से नुगुप्साका (६), अतिकाम-तीव्रतासे परस्त्रीका आवर तथा राग भाव करने व सेवने तथा स्त्रीवसे भाव मालिंगनादिके करने से , स्त्री (वेदका) (०), थोड़ा कोष तथा कम लोभ, स्त्री समन्ध मल्पराग, अपनी स्त्रीमें सन्न.प करने, ईपीका समाव तथा स्नान, गन्ध, पुष्पमाला, पामरणसे अनादर इत्यादि होने पुरुष घेदक (८), चार पायकी तेजीसे तथा मुह्य दन्द्रोके छेदनेसे, स्त्री पुरुषके कामके अंग छोड़ अन्य अंगोमें व्यसनीपने से, शीलवंत व व्रतीको उपसर्ग देनेसे, परस्त्रीके संगके निमित्त तीय राग करनेसे :- नपुंसक वेद (९) का भाव होता है। भाइयो ! इस प्रकार मोहनी कर्मके भेद नानकर यह उध करना चाहिये कि मिसमें हमारा मोह सांसारिक पदार्थोंमें विशे न लगकर अपने भीव रहारकी ओर कगे और हमको बहुतसे • मतलब कामों में अपना धन व मिहनत व समय बरबाद करना । हो । हम देखते हैं कि हमारे मैनी माई भी बिलकुल जनमत 'द्वितीय भाग उपदेशके विरुद चलकर सांसारिक इच्छाओं की पूर्तिके लिये कुदेव जैसे शीतला, देवी, भवानी, मेरों; यक्षपाल आदिको मानते तया संसारमें नाशक्त विषयों में प्रीतिधारक मिक्षकोंको भोजन देते व ब्रह्मकी ओरसे विमुख केवल ब्राह्मण नाति धारी विषयलीन ब्राह्म- गोको दान देने से अपना भला होना मानते हैं। :: माइयो ! क्या कहा नाय ! हमारे अनी माई इसी मोहनी कर्मके फन्दोंमें ऐसे उलझे हुए हैं, मतः झूठ बोलनेसे डरते नहीं, दुसरेका माल हनम करनेमें शंका करने नहीं, देव द्रव्यके गटक 'जाने में कुछ पाप समझते नहीं, बालकों का छोटी उमरमें विवाह कर उनको मिट्टोके खिलौने समझर तमाशा देखने में आनंद मानते, तथा उनको विद्यारत्नसे विभूषित करने की परवा रखने नहीं, अपने समयको बेमतलब चौमर सतरंम आदिमें खोनेसे कुछ दोष मानते नहीं, अपने भाइयों को दिनपर दिन हीन दीन देखकर उनके सुधार व सुखके लिये प्रयत्न करते नहीं, नैन मातिको उद्धार करनेवाली भारत मैन महामंडलसे बेपरवाह रहकर '. उसको सहायता देते नहीं, व्यापारको वृद्धि न्याय. और सत्यसे होती है उसपर ध्यान रखने नहीं। विशेष धया कहिये ? उत्तम मनुष्य कुली कहना करके भी साधारण मनुष्य होनेकी इच्छा रखते नहीं । भाइयो ! मोह छोड़ो। यह महा दुःखदाई है। इसकी संगतिसे जीवाने त्रास पाई है। जिन्होंने इस मोहके सायं । • बुराई की है उन्होंने व्यापार, घन, मान्यता, देशोपकार मोव विचार । मादिमें उन्नति पाई है।
wi- . . . । अध्याय नवमां '.. ५-आयुकर्म । आयुकर्म-वह कर्म हैं जिसके कारण यह जीव इस समा- रमें नाना प्रकारको योनियोंमें ना शरीरमें निवास कर भ्रमण करता हुमा कालक्षेप करता है। इसके मुख्य ४ भेद हैं-नरक, तिच, मनुष्य और देव । (निसके कारण नरकमें पैदा होकर नारकीके शरीरको मारण करे सो नरक श्रायु है । (२) एकेंद्री वृक्षादि जीवसे लेकर गंचेंद्री पशु.पक्षी पर्यंत जलचर, थलचर, नभचर मादि योनियों में रहनेका कारण सो तिर्यच मायु है । (३) मनुष्य भवमें रहने को कारण सो मनुष्य आयु है ! (१) देवकी योनिमें रहने का कारण सो देव आयु है। यह जीव अपने ही रागादि भावों के द्वारा अपने ही भात्मा- पर पड़े हुए कर्मरूपी मुश्म पुद्गल परमाणुओंक द्वारा अन्य मुम परमाणुओं के आकर्षित किये जानेपर इन्हींकी, शक्तिसे प्रेरा हुआ स्वयं कभी नारकी, कभी नियंच, कभी मनुष्य, कमी देव होमाता है, अर्थात् संसारकी चार विशेष गतियों में भ्रमण किया करता है। • इस मायुकर्मके भीवके साथ संबधित होने के कौन कौनसे कारण हैं इनका भी मानना आवश्यक है, अतः प्रथम नरक भायु. रूपी कमौके पानवका कारण कहते हैं । बहुत भारम्भ करना और परिग्रहमें बहुत ममत्व करना, सो नरक आयुके आश्रवके, कारण हैं । प्रयोजन यह कि जिन जीवोंके ऐसे परिणाम रहते है R . द्वितीय भागी कि हम अपने आत घन, घरती आदि पदार्थों को खूब बढावे, *चाहे वहां धन घाली. आदि पदार्थ अन्याय, चोरी, मापाचारी, 'झूठ आदि लंपायों से प्राप्त हों, अस्यका चाह संवस्थ माता रहे 'हमें तो काम हो जाय, रगंडेश्याके रंगके भाव मिनके होते हैं उनको अवश्य नरकगति प्राप्त होती है। जो जीवोंके पास, 'झूठ चोरी यौर परिग्रहने बहुत खुश होते हैं, ऐसे शेरशानी जीव नरक ही के पात्र हैं। नरकगतिमें पड़े हुए नोवोंको विना किस प्रकारका दुख होता है, इसका वर्णन यहांपर कर केवल इतना कह देना.ही बस होगा कि असहाय और छोटे छोटे पंशु ६ पक्षियों को जो कुछ दुख भाप अपनी माखके सामने देखते हैं, इससे करोड़ गुना दुस्ख नारकियोंका यहा नाय तो अत्युक्ति नहीं होगी। : कमेक-परमाणुमौके बनसे यह आत्मा मिठका कि अपना स्वभाव "ऊंचे जानेछा है, नीचे की ओर भाकर जन्म लेता है। जैसे भागको ली, निमका स्वभाव ऊंचे नानेका है, पवन के परके कारण हघर घरको गमन करती है । . तिथंच आयु आश्चवका कारण मायाचार करना है, अर्थात को जीव धर्मके उपदेशक अपने को प्रकट करके अपने नाति मत. लवको लिये हुए उपदेश का दमरों को झूठे मार्गपर लगाकर अनर्थ कराते हैं, ऐसे जीव पशु-पर्याय पाते हैं । भो 'दुपरेको झूठा दोष लगाकर उसका अपमान करके अपने में नहीं होते गुणों को प्रकट (कर अपना माना चाहते हैं, ऐसे कपोतलेश्या रंगके परिणामबाले भीव पशुगतिके पात्र हैं। जो अपनी किती अच्छी चेतनाव अचेतन नीवके बिछुड़ने पर शोक करते हैं, बुरी तना 1 17 (४०) जिनेन्द्रमतदर्पण अचेतन चीनके पास रहते हुए रंज किया करते हैं, व माप रोगी होकर उस रोगके कारण उपाय तो नहीं बल्कि सोच किया करते हैं, व जिन जीवोंकी इच्छाए यह रहती हैं कि हमें मानेके ब.द खुब धन सम्पदावाली पर्याय प्राप्त हो, हम राजा महाराना होकर खूब चन उड़ावें, ऐसे मात्तध्यानी नीव पशुगतिमें भाकर भूख, प्यात, गरमी, सरदी, घात मादिकी ऐसी ऐसी वेदनाएं सहते हैं कि हम उनका यदि विचार करें तो शरीरका रोयाँ रोयां कांप उठे। काकी प्रेरणासे यह नोव स्वयं कभी वृक्ष होता है, कभी भौग, कभी चीटी, कभी हाथी, कमी सिंह, कभी चकरी, गाय. म दि होता है । निश्चयसे अपने परिणाम ही अपनेको दुखदाई हैं। मनुष्य आयुमें जाने के कारण यह है- मो जीव थोड़ा आरम्म मतलब भर करने ही से व थोड़ा मतलब भर परिग्रह ( सामान) के धरने हीसे संतोषी रहते हैं जिनके मित्त दया मावसे भीजे हुए अन्यायसे डरते हैं, तथा जो दुसरेका बुरा नहीं चाहते हैं, संसारमे भी जिनके बहुत प्रीति नहीं होती, दान पूना बादिकमें जिनके भाव विशेष लवलीन होते हैं, ऐसे धर्मध्यानी जीव मनुष्य आयुको प्राप्त करते हैं और मिनके चित्त कोमल होते हैं, दिलमें नरासा भो मान मिनके नहीं होता, ऐसे विचारवान प्राणो मनुष्य आयुका आश्रव करते हैं। देव आयुके आश्वके कारण इस मांति हैं जो महावृती योगीकी दशाको धारण कर आत्मध्यान करने हैं व मो गृहस्थ श्रावक बतशीलको पालते हैं और मन्तमें संन्यास लेते हैं, ऐसे नीव अवश्य देवगति पाते हैं । अथवा जो किसी दूसरेके भयसे .
. मितीय भाग: व लाचार हो मूख, प्यास, खोटे वचन व गर्मी सदीकी बापा सहते हैं और परिणाम निन कोमल होते हैं, ऐसे अकाम .निनरावाले जीव भी छोटी जातिके देव होते हैं । जो भज्ञान तप करते हैं अर्थात् भात्माको नहीं मान . कर व भावोंकी शुद्धताको न पहि- चानकर शरीरको ताह तरह ष्ठ देने हैं इस निश्चयसे कि इसके 'बाद अच्छी गति होगी, ऐसे भीव भी मरकर नीच जातिके देव होते हैं। जो नीव सम्यग्दृष्टी होते अर्थात निनके मापा परका -अच्छी तरह 'ज्ञान और निश्चय होता है. ऐसे जीव स्वर्गवासी देव ही होते हैं । भोगभूमिके पैदा होनेवाले मनुष्य जो शील और व्रत नहीं पालते हैं अपने सरल स्वभावके कारण देवगतिमें गमन करते हैं । देवगतिमें इद्रियाधीन सुखकी बाहुल्यता है तो भी उप्त स्थानमें मन सम्बन्धी अनेक दुःख हैं, जैसे ईपा, हेप, अपमानादिक। 'भाइयो ! यही मंक्षेपमें चारों आयुमें जीवोंको रखने. वाले काँक माधवका वर्णन किया है। विशेष मानने की इच्छा करनेवालोंको श्री सर्वार्थसिद्धिनीको मले प्रकार पड़ना चाहिये । प्रयोजन कहने का यह है कि मनुष्यमव पाकर हमको वह कर्तव्य करने योग्य है जिनसे हमारी अवस्था दिन पर दिन उच्च होती चली जाय, क्योंकि जीवन संसारमें थोड़ा है। यह थोड़ीसी आयु पाकर यदि हमने अपने आस्माको निर्मल करनेके यत्न नहीं किये अर्थात् संसारसे. मुक्ति पाने की चेष्टा नहीं की तो फिर हमारा सुधार कैसे होगा। यह, मनन कदाचित जीवोंकी अज्ञानतामें दब भाय और हम पावलेकी तरह - कर्मरूपी नशेसे 1 18 . जिनेन्द्रमतंदर्पण वह चित्तमें जिनसे कोष हुआ उनका नाच विचारते हैं, ता याय कंधेसे एक तेनका पुंम निकलता है और यह उनको भाम कर मुनिको मी भस्म कर देता है इस मा शरीरको विद्युत शरीरके समान कहा भा सकता है। (च) कार्माण--एक प्रकारके बहुत ही महीन पुरसके परमाणु जो कि आत्माके साथ एक सुक्ष्म शरीर बनाये हुये संसार अश्या- में सदा साथ रहते हैं ! इन परमाणुओं को कर्म संज्ञा है। मायो । 'कारण इनका मे होता है और यह जीवात्माके साथ रहने हुये समय समय पर अपना अत्तर दिखलाया करते हैं निमसे मोहवान जीव सुख तथा दुख अनुमत्र करते हैं । ३ अंगोपांग-मिनके उदयसे अंग व टमसे भाग बने, असे शरीरके ओख, नाक भादि । औदारिक-बैक्रयक, माहारक इन तीन प्रकारके शरीर ही के अंगोपांग होने हैं। २ निर्माण-निसके उदयसे मांस्त्र, नाक, कान आदि यथा स्थान होवें सो स्थान निर्माण तथा निप्तके उदयसे किसी प्रमाण रूप हो सो प्रमाण निर्माण । ५बन्धन-मिन के उदयसे पांच प्रकार के पुद्गल परमाणुओंका परस्पर अपने अपने शरीर रूप बंधना होय । ५ संघात-जिनके उदय से पांच आकारके शरीर रूप पह- लके परमाणु आपसमें अपने अपने शरीर रूप एकसार मिट माय। ६ संस्थान-मिनके उदयसे शरीरका भाकार [ डीलडौल ] ।
द्वितीयं भाग (४५) (क) समचतुर संस्थान आंख, नाक, कान, मुंह, हाय, पैर- का साकार मुनासिब सुन्दर बनना। (ख) न्यग्रोध परिमंडल संस्थान-शरीरका माकार उपर गड़ा और नीचे छोटी हो । बसे बड़ वृक्ष । (ग) स्वाति संस्थान-शरीरका आकार नीचे चौड़ा ऊपर सकुन्नका (घ) कुमक संस्थान पीठ-बीचमें बड़ी ऊपर नीचे हलकी हो । इसको कुपडापन भी कहते हैं। (च) बामन संस्थान-हाथ पैर छोटे हों उदर मस्तक बड़ा हो भर्मात वौनापन हो। (छ) हुंडक संस्थान-शरीरके सब अंग उपंग नीचे ऊंचे बेदेंगे. हों। ६ संहनन-जिनके उदासे हाड़ोंका विशेष बंधन हो। यह भी ६ प्रकारका है-- (क) बऋषमनाराच संहनद-मिस शरीरमें मंहनन कहिये हाइ, ऋषभ कहिये नशके वेठन, नाराच कहिये 'कोले, यह तीनों बनमय कठोर हों। (ख) बनू नाराच संहनन-मिसमें हाइ और कीले वजूमय हो पर नाके बन्धन दमय न हों। (ग) नाराच संहनन-जिसमें हाड़की सन्धि कीलोंसे कीलित हो। (घ) अर्धनाराच संहनन-जिसमें हाड़की सन्धिमें कीले - मावे हों एक तर्फ हों पर दूसरी ओर न हो।
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(४६ जिनेन्द्रमतदपण'
(च) कीलक संहनन-निसमें-हाड़की सन्धि छोटे कीलोंसे
मिली हो।
-, (छो मसंभाप्ताष्टपाटिका सहनन-निसमें 'हाइको सन्धि
मन्तर (फरक ) हो। चौगिाद बड़ी छोटी नर्स किपटी हो;
मांमादिसें छाई। हो । यह सर्वसिंहनन मनुष्य और तिथचके
होते हैं, देवनारकियों के नहीं. क्योंकि उनके हाड़ नहीं होते हैं।
८ स्पर्श-मिनके उदयसे शरीरके स्पर्श (छुने )के गुण पैदा
हो। यह ८ प्रकारका है-कर्कश, कोमले, 'भारी, हलका, चिकना,
.
।
रूखा, ठंडा, गरम
५ रस-मिनके उदयसे शरीर में रस पेदा हो। ये पांच
प्रकार के हैं तेन कडुयाँ, मीठा, सट्टा, कप यका।
२ गंध-मिनके उदयसे शरीरमें गंध हो। यह दो पचारका
है-एक सुगंध) एक दुर्गन्ध ।
५ वर्ण-निनके उदयसे शरीरमें रंग पैदा हो। यह पां'
प्रकारका होता है-काला, नीला, सफेद. लाल, हंग।
१ भानुप:-जिनके उदयसे भानुपूर्वी हो। आनुपूर्वीका'
प्रयोजन यह है कि मरण होने के पीछे जब तक यह शरीर धारण
करने के लायक पुद्गल नहीं लेवे तब तक मारमाका पहिले शरीरका
सा साकार बना रहता है। यह भानुपूर्वी अवस्था अधिकसे अधिक
३ समय तक रहती है। यह गतिकी अपेक्षा ४ प्रकार की होती
है। जैसे कोई मनुष्य मा कर देव गतिको पाता हो तब न त
देवमई पुद्गल नहीं लेवे तब तक कर्म सहित आत्माको आकार
मनुष्य शरीरके सदृश रहना सो देव त्यानुपूर्वी है ।
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जान
१
(1)
= . यहदि पिंडो पहिति इलाती है। अब मागे २६ अपिड
प्रकृति कही जाती हैं।
१ गुरुलघुमिसके रदयसे देहे न लोहे पिडीताह
मारी हो और न पत्रिकी फस्दीकी तरह हलकी हो।
यहाँ अगुरुंधु मो दिव्या स्वभाव है उससे प्रयो मन नहीं।]
१ स्वपत-जिसके उदयसे अपने शरीरसे भपिका पति
करे: जसे.घड़ा सौगलम्बा रतन पड़ों पेट-।-
पाच त-निसके उदयसे ऐसा अंग हो निमसे दूपरेका
पात हो से तीण सागवनसबिच्छूका डक आदि।
आताप-निसके उदयसे मातापमय शरीर पावै । मैसे
सूर्यके विमानमें पृथ्वी कायिक जीव । इन जीवोंको स्वयं धूपकी:
गरमी नहीं मालमाहोतो अब कि.मरों को बहुत माताप होता है।
१ उद्योत : जिनके उदयमे द्योत रूपः शगेर पावे । जैसे
• चन्द्र के विमानमें पृथ्वीका यह.जी -
उवा-निमके उदयसे शासोश्वास आये।
१.विदायो गति जितके उदय आकाशम गमन हो,
१ प्रत्येक शरीर-जिमके उदय होनेसे एक आरमार एकर
शरीरको मोगे
१ साधारण-जिपके रदयसे बहुत नीव भोगने योग्य एक
शरीर पवे |
१३-निपके उत्यमे दो इन्द्र से पंचेन्द्री तकमें उपजे ।
१ थवा-मा उदयसे । इन्द्री पैदा होती हो।
१ सुमग-नाके उदय से परेशो अच्छा मालम हो।
६
K
4
(४८) मिनेन्दमतदर्पण
१ दुर्भग-निसके उदयसे रूपादि सुंदर :गुणं होने पर भी
दुसरेको बुरा मालम पड़े
१ मुस्वर-निसके उदपसे शब्द मुहावना निकले ।
१ दुस्वर-मिसके उदयसे बुरा कसुहावना शब्द निकले।
शुभ-निसके उदयसे मुंह, हाथ, पैर आदि शरीरके
अंग सुंदर हों।
१ मशुम-निसके उदयसे मस्तक मुख आदि मान्दर
(बदसुरत ) हों।
१ सूक्ष्म-मितके उदयसे ऐसा महीन शरीर पाये जो
ममीन, पहाड़, माग, नल, कपड़ा मादिसे होकर निकल
बाय-रुके नहीं।
१ बादर-निप्तके उदयसे रुकने व रोकनेवाला शरीर पाये।
१ पर्याप्त-जिसके उदयसे निप्त पर्याय नाय उसके
अनुप्तार शरीरके भाग पूर्ण करानेकी शक्ति पारे ।
१ अपर्याप्त-निसके उदयसे पर्याय सम्बन्धो शरीरके
भागोंको पूरा करनेकी शक्ति न पाकर पौने दो घड़ीके भीतर
मरण कर जाय।
। स्थिर-जिसके उदयसे रस धातु उपधातु अपने अपने
स्थानमें हद हों।
१ अस्थिर-जिपके उदयसे रसादि दृढ़ न हो।
१ पादेय-जिसके उदयसे प्रमावान (चमझदार) शरीर हो।
१ जनादेय-जितके उदसे प्रभारहित शरीर हो।
यशस्कीति-निसके उदयसे गुण प्रकट हो ।
यह . . . द्वितीय भाग (४९): १. अयशस्कीति-निसके उदयसे अवगुण प्रकट हो। , १.तीर्थहर-निसके उदयसे तीर्थकर पदको शरीर हो। 'यह २८ अपिंड प्रकृति हैं। सब मिलकर ९३ प्रकृति नाम कमकी हैं। अब यह देखना चाहिये कि यह नाम कर्म क्योंकर संसारी जीयक बंधते हैं कि जिनके उदयसे ऊपर कही अवस्थायें भोगनी पड़ती हैं, क्योंकि “कर्म" का नियम कारण और कार्यके आधीन है। इसीको Cause and effee t कहते हैं और इन कर्मोका बन्धन राग और द्वेपसे होता है जैसा कि "Mr. C. W. Leadyster" का कथन है। * If a man has within him only pure, high, and unselfish desires and emotions, lie will chiefly set isto vibration the more refined matter of that getral lody; it on the contrary his desires. on otions and passions are coareer and selfsb, almost the whole of thou will express themselves in the lower, denser, grosor parts of that ustrul veliicle. भावार्थ-अच्छे विचारोंसे शुभ और बुरे विचारों से अशुम कर्म बँधते हैं। पस यह कर्म समय समयपर उदय आकर अपना रस देते रहते हैं इसीको कर्मफल कहते हैं। यही कर्म- फल यदि रागद्वेष सहित भोगा जाता है तो आगामी कर्म बंधनका कारण हो जाता है । इस प्रकार संसारकै मोही जीव एक ओरसे , कर्मका उदय फल पाते हैं, दूसरी ओर कर्म बांधले जाते हैं जो + .
जिनन्द्र मतदर्पण
.
रस देते हैं । यही "कारण और कार्य" का नियम संसारी प्राणि-
योंको सुख दुखका हेतु है।
नाम कर्मके आश्रव तथा बन्धके कारण यह हैं। मन, वचन,
और कायके कुटिल अर्थात् टेढ़े रखनेसे अशुभ नाम कर्मका आना
होता है। जैसे मिथ्यात धरना, चुगली खाना, खोटी वस्तु अच्छीमें
मिलाकर वेचना, खोटी कसम खाना, मद करना, नकल चिढ़ाना,
दूसरेके बुरे अंग देख खुश होना आदि । इसी प्रकार मन वचन
कायको सरल रखनेसे शुभ नामकर्मका आश्रव होता है। जैसे
धर्मात्माको देख खुश होना, प्रमाद न करना आदि ।
पाठक ! अपने परिणामों हीके आधीन हमारा भाग्य
(Deetiny) वनता है निसको कर्म कहते हैं | इस लिये हमको
अपने परिणाम निर्मल रखने चाहिये । तथा अन्धे, लूले, कुबड़े;
काने आदि होनेसे बचनेके लिये हमको अपने वचन और कार्यकी ।
चेटा भी ठीक ठीक रखनी चाहिये ।
तीर्थकर नाम कर्मका बंध उस समय होता है जब सोलह कारण
भावनाका विचार किया जाता है । इन भावनाओंका वर्णन जैन
शास्त्रोंसे देखकर मालूम कीजियेगा।
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Th
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अध्याय ग्यारहवां।
७-गोत्रकर्म ।
यह यह कर्म है निसके उदयसे यह जीवात्मा ऐसे कुलका'
संयोग पावे निससे इसको दुःखकी प्राप्ति हो। यह दो तरहकाः'
होता है।
-
दिनीय भाग (५१) १ उच गोत्र-अच्छे चारित्रवाळे लोकमान्य कुलमें निसके उदयसे जन्मे । १.नीच गोत्र-खोटे आचरणवाले लोकनिय कुलमें 'निसके उदयसे पैदा हो । जहां आपको भी हिंसा, चोरी आदि दुष्ट कर्म करनेका समागम सहममें मिल जाय । इस कर्मक आश्रय होकर आत्माके साथ मिलनेमें नीचे लिखे कारण हैं। १ परनिन्दा, आत्मप्रशंसा-दूसरेमें अवगुण हों या न हों, परन्तु किसी अपने विषयके मतलबसे दश आदमियोंमें उनकी बुराई करनी और अपने में गुण हों वा न हों, किसी अपने विषय कमायके मतलब (पनादिका लोभ) से दश आदमियों के सामने अपनी तारीफ करनी। २ पर-सत-गुणाच्छादन आत्म असत्गुणाच्छादन-दूसरेमें गुण होते हुए भी जाहिर न हों ऐसी चाह व कोशिश करना, अपनेमें अवगुण होते हुए अवगुणोंके दकने और न होते गुणोंको प्रकट करनेकी चाह व कोशिश करना । ::. इसके सिवाय अपनी नाति, कुल, रूप, बल, विद्याका घमंड करना, दूसरेकी हंसी करना, व देव गुरू धर्म व अपनेसे बड़ोंकी विनय, सत्कार नहीं करनी, यह सब नीच गोत्रके आश्रवके कारण हैं। ::..' इसके विरुद्ध कारणोंके होनेसे उच्च गोत्र रूपी कर्मोका आश्रव होता है। जैसे दूसरेके गुणोंकी विनय व प्रशंसा, अपनेमें गुण होते हुए भी. विनय व प्रशंप्ता नहीं चाहना, जैसे मत्मके नीचे देवी अग्नि रहती है। इस तरह रहकर अपने बड़प्पनको अपनेसे प्रगट न करना।
(५२) जिने मतदपंप
अध्याय वारहवाँ।
८---अन्तराय कर्म।
यह वह कर्म है निसके उदय आनानेसे बनते .य सोचे हुए
काममें विघ्न व विगाड़ पड़ जाता है । इसके ५ भेद हैं--
१ दानांतराय-निसके उदयसे देनेकी चाहना करे व कोशिश
मरे, परन्तु दे न सके।
२ लाभांतराय-जिसके उदयसे लाभ होना चाहे य कोशिश
करे, पर लाम न हो सके।
३ भोगांतराय-निसके उदयसे संसारकी वस्तुओंको भोगनेकी
नाहना करे व कोशिश करे, पर वह भोगनेमें न आवे ।
४ उपभोगान्तराय-निसके उदयसे संसारकी उपभोग करने
योग्य वस्तुओंको काममें लानेकी चाहना व कोशिश करे, पर काममें
न ला सके।
भोग-उन वस्तुओंको कहते हैं जो एक बार काममें आये
फिर किसी कामकी न रहें । जैसे भोजन, सुगन्ध आदि। उपभोग
उन वस्तुओंको कहते हैं जो वारवार काममें आवे जैसे मकान,
कपड़े आदि]
५ वीयांतराय-निसके उदयसे किसी काम करनेका
उत्साह करे पर वह उत्साह काम न कर सके।
इस अंतराय कर्मके आने और आत्माके साथ वन्धने में कारण
विघ्नका डालना है। कोई दान देता हो व देनेकी इच्छा करता,
हो उसको किसी न किसी प्रकार दान देनेसे रोकनेकी चाह य
.
"द्वितीय भाग कोशिश करना, कोईको लाम होता हो उसको लाभ न होने देनेकी चाह व कोशिश करना, दूसरेके . भोगने व उपभोगने योग्य वस्तु- ओंको विगाइनेकी चाह व कोशिश करना दूसरेकी शक्ति व उत्साहको बिगाड़नेकी चाह व कोशिश करना यह सब अन्तराय कमके आश्र- के कारण हैं। इसके सिवाय और जितने ऐसे ऐसे काम है जिनके करनेसे हमारा व हमारे आधीन स्त्री व बालकोंका विगाड़ होता है, वें सत्र अंतराय कर्मके आश्रयके कारण हैं। जैसे लड़के व लड़कियोंको विद्या न पढ़ानेसे उनके ज्ञान प्रगट होनेमें वित्र पड़नेसे, तथा चालकोंकी शादी छोटी उम्र कर देनेसे जिससे उनका मन विद्या- लाभ करते करते रूक जाय, व अपने आधीन नौकर चाकर व प्रनाको धर्म सेवनमें विघ्न डालनेसे अंतराय फर्मका आश्रय होता है। इसी प्रकार विद्यालय, औषयालय, भोजनालय आदि धर्मका- योमें उन्नति न चाहनेसे तथा बिगाड़के भाव रखनेसे तीव्र अंतराय कर्मका आश्रय होता है | जो धन यात्री लोग तीर्थयात्रामें तीयों- पर तीर्थके सुप्रबन्ध व उचित धर्मकार्यके लिये-देते हैं उस धनसे 'सुप्रबन्ध न कर व उचित धर्मकार्यको न कर व्यर्थ डाले रखना व अपने फाममें ले आना तीव्र अंतराय कर्मका आश्श्रव करनेवाला है। इस तरह यह आठ प्रकारका कर्म हम संसारी नीव अपने ही भावोंक द्वारा बांधते हैं और आप ही उनके उदय आनेपर उनका फल भोगते हैं नैने मदिरा हम आप ही पीते हैं और आप पही दुःख भुगतते हैं तथा वदहनमी करनेवाला भोजन हम आप ही (सखाते हैं और आप ही अनेक रोगोंको अपनेमें पैदा कर लेते हैं। इस तरह ५२९+२+२+४+९१+१+११४८ प्रति M (५४) जिनेन्द्रमतदर्पण मुख्य करके ८ कर्मोकी हैं। पर इनके भेद यदि मूक्ष्म दृष्टिसे किये जायें तो और वेगिनती हो सकते हैं। इस प्रकार यह कर्म सर्व पौलिक हैं, जड़ हैं, हमारे ही किये हुये हैं, अनीव हैं। - अध्याय तेरहवा । अन्य ४ द्रब्प। धर्म द्रव्य वह है-जो जोव पुद्गलको चलने में इस तरह मदत करै जैसे मछलीको चलनेके लिये पानीकी जरूरत है, पानी मछ लीको प्रेरणा नहीं करता है कि चलो किन्तु विना पानीके नह चल सक्ती। इसी प्रकार धर्म द्रव्य प्रेरणा करके जीव और पुद्गलक नहीं चलाता है किन्तु उदासीन सहायक होता है। अधर्मद्रव्य-धर्मद्रव्यसे उल्टा काम करता है अर्थात् जी- पुद्गलको ठहरनेमें सहायक होता है; जैसे रास्ते जाते हुये मुसी फिरको वृक्षकी छाया सहायक होती है । आकाशद्रव्य-जो कि जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, काल इ पांच द्रव्योंको स्थान दे। कालद्रव्य-वह द्रव्य है जो अन्य द्रव्योंकी पर्याय व द= पलटनेमें कारण रूप हो । यह दो प्रकारका है-व्यवहारकाल- समय घड़ी घंटा आदि । निश्चयकाल-आकाशके एक एक प्रदेश कालका एक एक अणु जैसे रत्नोंकी रागि । इस द्रव्यका ए अणु दूसरे अणुमें एकमें एक होकर नहीं मिलता । इसीसे, द्रव्यको अकाय कहते हैं।
द्वितीय भाग प्रदेश उतने स्थानको कहते हैं जितनी जगहको पुद्गलका छोटासे छोटा अविभागी (निसको फिर भाग न हो सके) परमाणु रोकता है । इस १ प्रदेशयाले आकाशमें धर्मद्रव्य और अधर्मद्रव्यका एक प्रदेश और कालकी एक अणु और पुद्गलके यहुनसे परमाणु आसक्त हैं, इसी प्रकार जीवके शरीरमें छोटे छोटेमें बहुतसे अन्य शरीर धारी जीव आसक्त हैं। इसीसे नीव व पुट्ठल अनन्त हैं किंतु धर्म, अधर्म, आकाश, काल, एक एक द्रव्य है-जैसे १ दीपक एक कमरेमें नलानेसे रोशनी के परमाणु कमरे भरमें फैल जाते हैं किन्तु यदि दश दीपक उतने ही स्थानमें जलाये जाय तो उतने ही स्थानमें आ सकते हैं। यह परमाणु पुद्गलके स्थूल सूक्ष्म हैं नब इनके अणुओंमें यह शक्ति है तो सूक्ष्म व मूक्ष्म मूल्म परमा- गुओंमें व नीव द्रव्यमें यह शक्ति क्यों नहीं हो सकती है* इसी लिये एक जीवके एक प्रदेश भर स्थानमें अनन्ते कार्माण पुद्गलके परमाणु आ सकते हैं तथा एक निगोदिएके सबसे छोटे शरीरमें अनन्ते शरीरी जीव समा सकते हैं। इन द्रव्योंको नहीं पाया जाय देखिए श्री पादपुराणीको। शिष्यत्रभ-धर्म अधर्म काल अर चेतन चारों दरव अस्पी गाए, ताते एक आकाश देशमें प्रभु सर प्रदेश समार । भूरतवंत यनंदे पुल ने उस नममें क्योंकर माए, यह संशय समसार कहो गुरुदास होय अब पूठन आये गुरु उत्तर--सोरटा-बहु प्रदीप परकाश, यथा एक मंदिर 'विष । लह सहज अवकाश, याचा कच्च उपजे.नहीं । लोही नम प्रदेश पुद्गल मेघ अनेक, निगाध निवसे सही, न्यों अनन्त त्यों एक . r . . न + - . To- (५६) मिनेन्द्रमतर्पण उनको ही लोक (दुनियां) कहते हैं। यह सर्व लोकमें हैं तथा इन द्रव्यों ही की पर्याय पल्टनसे नानाप्रकारके मनुष्य, जन्तु, वृक्ष, पहाड़, धातु, औषधि आदि पाई जाती हैं इन छहोंमें सबसे ज्यादा काम पुद्गल और जीवका है याकी ४ द्रव्य फेवल सहायता मात्र है। इस प्रकार अगीय पांच प्रकार होते हैं जिनमें चेतना न होनेपर भी अपने अपने सभाषरूप कार्य करनेकी शक्ति होती है (इनका विशेष वर्णन जानने के लिये हमें जैन शास्त्रोंके तो द्रव्या- नुयोगके ग्रन्थ और यूरपके विद्वानों द्वारा प्रकाशित पदार्थ विद्याके अन्य पदने चाहिये। अध्याय चौदहवां। आश्रच तत्व। पुद्गलके कार्माण परमाणुओंका हमारी आत्माके प्रदेशोंके पास पास आनेको आश्रय कहते हैं । कर्मोक आनेके ३ मार्ग हैं। मन, धचन, काय, इनको योग रहते हैं । नव यह हिलते हैं कार्माण परमाणुओंका आना होता है। यह दो प्रकारका होता है-- एक भाव आश्रय । दृसरा द्रव्य आश्रय । मिथ्यात, अविरत (पांच इन्द्रिय, मनके न रोकने अदया भाव) प्रमाद (आलस्य) कपाय (क्रोध मान माया लोभ) आदिके भाव अथवा दानादि शुभ कर्म करनेके भाव इत्यादि भाव जिनसे कि अशुभ व शुभ कर्म आते हैं उनको भाव आश्रव कहते हैं। जो कर्मरूपी पुद्गल आते हैं उनको द्रव्याश्रव कहते हैं। कर्म आठ प्रकारके हैं और उनके आनेके कौन कौनसे भाव हैं इनका वर्णन "अनीव तत्व' में हो चुका है। ,
2
द्वितीय भाग
(५७)
कर्म जो आकर आत्माके प्रदेशोंमें बन्ध जाते हैं उनको
सांपरायिक आश्रव कहते हैं और जो आवे तो सही पर बंधे
नहीं उनको ईर्यापथ आश्रय कहते हैं। नत्र अपने परिणाममें
रागद्वेप, कयाय आदि होंगे तब अवश्य सांपरायिक आश्रव होगा
किन्तु जब यह न होंगे और वचन व काय हिलनेसे फर्म आयेंगे
जसे कि केवल ज्ञानियोंके आते है तो उनके आगमनको ईर्यापथ
कहते हैं । कर्म किन किन भावोंसे आता है इसका विशेष वर्णन
गोमट्टसारके जीवकांड तथा कर्मकांडसे विशेष मालूम हो सकता है।
९
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अध्याय १५ वा।
यंघनत्व।
कर्मोका चांधना ही वास्तवमें हमारे लिये संसारकी अवस्थामें
रहनेका कारण है।
इनमें मुख्य कारण राग और द्वेष हैं।
निस समय हम अपने पहलेफे बांधे हुए कर्मीका फल पाते
हैं उस समय यदि हमारी आत्मा अपने परिणाम चलाकर उस
फलको अच्छा व बुरा समझेगा तो उमी समय वह आत्मा कार्माण
परमाणुओंको खींच लेगा नो अगाड़ी फिर कभी उदयमें आवेंगे-
किन्तु यदि आत्मा उस फलमें अपना परिणाम राग व वेपरूप न
करके समता रखे, तब वह कर्म अपना फल देकर चले जायगे
और वह आत्मा काँका बंधन न करेगा-जसे किमी मनुष्यका पुत्र
मर गया तब यदि उसका आत्मा शोक्ति होगा तब नितने तीव्र
व मंद भाव होंगे उसी प्रतिके कामर्माण परमाणुओंसे बंधन होगा।
-
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प (५८) जिनेन्द्रमतदपण किन्तु यदि शोक्ति न होकरके संसारकी क्षणभंगुरता देखता हुआ वह आत्मा समपरिणाम रक्खेगा अर्थात किसी प्रकारकी हलनचलन, इस वार्ताक होनेसे उसके परिणामों में न होगी तो वह आत्मा कर्मोका बंधन नहीं करेगा। १४८ प्रकारके जो मुख्य भेद आठ कर्माक दिखलाए गए. हैं इसी बंधके द्वारा होते हैं-जिस जिस प्रकारका कम यह यांधता है उस उस प्रकारका रस उदय होनेपर पाता है । इस यातके अनेक दृष्टान्त जैन शास्त्रोंमें मिलेंगे। श्री रामचंद्रके भाई भरत- जीके पूर्वमवके चरित्रमें एक मुनिका वर्णन है कि उसने एक ऐसे उद्यानमें विहार किया जहां कि चारण रिद्धिवारी आचार्य्यने चौमासा किया था और जिस समय यह मुनि वहां पहुंचा वह विहार कर गए थे । उस उद्यान के निकटवर्ती नगरके लोग उसी दिन आचा- यके दर्शन करनेके लिये आए और इन्हींको आचार्य मान नमस्कार किया व धर्म सुना। तब इस मुनिने उन लोगोंको यह न बतलाया कि मैं वह आचार्य नहीं है जिसका नाम आप लेते हो । इतनी माया रखनेके कारण उसी मुनिको तियश्च गतिमें तिलोकमंडन हाथीकी पर्यायमें आना पड़ा। जगतके नीवोंके तरह तरहके चरित्र दिखलाई पड़ते हैं कारण यही कि उनके पहले के बांधे हुए कर्मोका उदय है ।
द्वितीय माग (६९ 'अध्याय १६ वा। मंवर । 1 जिन हारोसे कार्माण परमाणुओंका आगमन आत्माके प्रदे- शोके पास होता है उन द्वारोंका रोकना सो संबर है । यह भी दो प्रकारका होता है- १-भाव संबर-मिन भावोंके फरनेसे आत्मा कर्मोको खींचे उन भावोंको रोकना सो भाव मंबर है। मिथ्यात रूपी भावोंक रोकनेके लिये सम्यग्दर्शन होनेकी, '. अविरत रूप भायोंको बन्द करनेके लिये देशवतकी तथा महाव्रतकी, प्रमादके नाश करनेको निरालमी ध्यानी मुनि होनेकी, कोध, मान, माया, लोभके बन्द करनेके लिये वीतराग भावोंकी, मन वचन काय योगोंको रोकने के लिये निश्चल निज रुपमें थिरता होनेकी आव- श्यकता है। इसी संवरके पानेके लिये बुद्धिमानोंने यह हेतु क्तलाये हैं। (१) गुप्ति-~मन, वचन, कायको वशमें रखना। (२) समिति-यह पांच तरहकी है। (क) देखकर चलना। (ख) समझकर हित मित वचन बोलना । (ग) शुद्ध निर्दोष भोजन लेना। (घ) देखकर वस्नुओंको रखना व उठाना । (6) देखफर मलमूत्र आदि डालना । धर्म-निम्न लिखित दश लक्षणवाले धर्मपरं चलना- १ (६०) जिनेन्द्रमतर्पण (क) उत्तम क्षमा-क्रोधको वशमें करके निर्बलका भी अपराध विचार पूर्वक क्षमा करना। (ख) मार्दव-घमंड किसी बातका न करके अपने भाव यह ममझकर कोमल रखने कि आत्मा तो सब हीकी निश्च- यसे एकरूप है छोटा बड़ापन केवल शरीर सम्बन्धी । सो इसके छूटनेका कोई ममय नियत नहीं, यह शरीर नाश होने ही वाला है। इससे संसारकी चीजों- को लेकर मेरा मन करना व्यर्थ तथा हानिकारक है। (ग) आनंब-किसी प्रकारकी मायाचारी न करके परिणाम सरल रखना। (घ) मत्य- स्वपरहितकारी सच वचन कहना । () शौच-मन बचन कार्यकी पवित्रता (सफाई) (च) मंयम-इन्द्रियोंको वशमें रखना-जीव दया पालनी। (छ) तप- मनको एक टिकाने करके आत्माकी शक्ति प्रगट करनेमें यत्न करना। (ज) त्याग-दान देना व परिग्रह न रखना । (झ) आकिंचन-परिग्रहकी ममता विलकुल न होना । (अ) ब्रह्मचर्य-खी मात्रसे चित्त हटाकर अपना ब्रह्म गो आत्मा उमके वीचमें उमको स्थिर करना। (४) नीचे लिखे अनुसार १२ भावनाओंको पार वार भावना अर्थात याद करना ।। (१) अनित्य-इम जगतमें सब चीजोंकी दशाएं बदलने. वाली हैं कोई एफ दशामें स्थिर नहीं रहता इससे मोह करना निरर्थक है। t
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द्वितीय भाग (६१)
(१२) अशरण-जगतमें जीवको अपने किये हुए काँका
फल भोगनेसे रोकने के लिए किसीकी भी ताकत नहीं
है इसलिए झूठी शरणका-स्थान छोड़ अपने ही
आत्माको अपना शरण माननालाहिये अथवा पंच
परमेष्टीका शरण अनुमव करना चाहिये ।
(३) संसार-निन चार गति रूपी संसारकी अनेक योनि-
:: योंमें जीवका भ्रमण उसीके यांचे कर्मोके द्वारा हुआ
करता है उनमें कहीं रंचमात्र भी आनन्द नहीं है।
देव, पशु, मनुष्य सब ही मानसिक तथा शारीरिक
दुःखसे दुखी हैं ऐसे संसारमें प्रीति करना उचित नहीं।
(४) एकत्व-अपने बांये हुए कर्मोका फल इस जीवको
अकेला ही भुगतना पड़ता है।
(५) अन्यत्व-अपनेसे नितने दूसरे हैं सब पर है-
जगतमें सम्बन्ध मनलपका है।
(६) अशुचि-यह शरीर किसी दशामें भी पवित्र नहीं
है और न स्नान चन्दनादिसे किसी प्रकार शुद्ध हो
सकता है इसलिये शरीरको अपना दास बनाकर
रखना । आप दास न हो जाना।
(७) आश्रय
आश्रव-कौक आनेके कारणोंका विचार करना।
(८) संवर-कोको आनेसे रोकनेके लिये उपाय विचारना।
९) निर्गरा--कर्मोको नाश करनेका यत्न विचारना।
(१०) लोक--छः द्रव्योंमे भरे लोकका स्वरूप विचार करना।
(११) बोधदुर्लभ.जगतमें आत्मज्ञानका पाना बड़ा कठिन है ।
यदि ऐसा ज्ञान होनाय फिर अपना समय व्यर्थ नखोना)
(६२) जिनेन्द्रमतदर्पण (१२) धर्म-~~-जीवदया जिसमें प्रधान है वही धर्म है-यह धर्म आत्मा ही का स्वभाव है मो किसी प्रकार भी त्यागने योग्य नहीं है। (५) परीपहीको सम परिणामोंसे सहना- ये परीसह २२ है-~-१ क्षुधा ( भूख ) २ नृपा (प्यास । शीत (नाड़ा) ४ उष्ण (गरमी) ५ देशमशक (इंस मच्छ- की) ६ नग्न (नंगे रहनेकी ) ७ अरति (न सुहावने लायक तीनोंके सम्बंधकी) ८ स्त्री (स्त्रीकी ओर परिणाम हो जानेकी) ७ चर्या (चलनेकी) १० निषद्या (बटनेकी) ११ शेया :सोनेकी ) १२ आक्रोश--(गाली सुननेकी) १३ वध (मारनेकी) १४ याचना ( मांगनेकी) १५ अलाभ (भोजनादि न मिलनेकी) १६ रोग १७ तृणस्पर्श ( कटीले तिनके आदिके छूनेकी) १८ नल ( शरीरके मलादिककी ) १९ मत्कार पुरस्कार ( आदर न होनेकी ) २० अप्रज्ञा (बुद्धि न होनेकी) २१ अज्ञान (ज्ञानकी कमीकी) २२ अदर्शन ( श्रद्धान बिगड़नेके कारण मिलनेकी)। (६) चारित्र सामायिक आदि करके व महाग्रत आदि पालके अपने परिणामोंको अपने रूपमें चलाना। इस तरह संवर करनेके लिये मुख्य करके ६ कारण हैं। हमारे लिये हर समय उचित है कि हम इन कारणों को अपने नेत्रके सन्मुख रखें-ऐमा करनेसे न तो हमारे कर्मोका आश्रय होगा और न हम इस जगतमें कोई प्रकार किसीको हानिकारक होंगे-सम्यता (Gentlemanliness ) के प्राप्त करने के लिये हमें संवर धारण करना चाहिये।
द्वितीय भाग (६३)
अध्याय १७ वां ।
निर्जरा।
बघे कर्मोका दूर होना सो निनरा है। यह निनरा दो प्रका-
रसे होती है-१ सविपाक निर्नरा-जो कि अपने आप हर समय
हुआ करती है-नव कर्म अपना रस दे चुकते हैं तब झड़ जाते हैं।
२ अविपाक निर्मरा-जो कि यत्न करके करनी होती है ।
यह निरा तप द्वारा होती है । तपके अर्थ-तपानेके हैं।
जैसे मेलसे मिला सोना अग्निमें डालनेसे शुद्ध हो जाता है. वैसे
काँसे मिली आत्माको तपानेसे इसके कर्ममल अलग होनाते हैं ।
यह तप १२ प्रकारका होता है-६ बाह्य, ६ अंतरङ्ग ।
चाहरी तप उसको कहते हैं जिसके ग्रहण करनेसे अन्दरका
तप सिद्ध होमक्ता है । यह छः प्रकार होता है ।
१ अनशन-चार प्रकारका आहार छोड़कर निर्मलग्रतको
एकादि दिनका प्रमाण लेकर करना--इसीको उपवास कहते हैं।
ममय समय पर इस तपके करनेसे इन्द्रियोंका स्वेच्छाचारीपना
मिटता है तथा संसार देह भोगोंसे राग कम होता नाता है।
२ अवमोदर्य--जितनी भूख हो उससे इतना कम खाना कि
निससे नींद आलस्य न आनाये तथा रोगन पैदा हो जावे। इसके
. धारण करनेसे हम अपनेसे आलस्यको दूर रखेंगे।
३ वृतपरिसंख्यान-~-आशा तृष्णा मिटानेके वास्ते यह ,
नियम करना कि आज हम एक व दो व पांच घर तक जायगे,
भिक्षा मिलेगी तो लेंगे ज्यादा न जायगे । तथा मिट्टीके व चांदीके
of
.
.
।
(६४) जिनेन्द्रमतर्पण
व पीतलके वर्तनोंमें भोजन मिला तो व्यगे अन्यथा नहीं। अथवा
रानाके यहां चनेका भोजन मिलेगा तो लेंगे नहीं तो नहीं-इस प्रकार
दिलकी कमजोरीको टालनेके मतलबसे अटपटी आखरीका लेना
परन्तु किसीको प्रकाश न करना सो घृतपरिसंख्यान तप है।
४ रस परित्याग-जिह्वाइन्द्रीकी लंपटताके मिटानेको मतलबसे
तथा नींदको जीतनेकी गरमसे, तथा स्वाध्यायमें चित्त रखनेके
प्रयोननसे इन छः रसोंको समय समय पर छोड़ते रहना सो रस'
परित्याग नामा तप है----घी, दूध, दही, मीठा, नोन, तेल, यह
T
१
५ विविक्त शय्याशन----जीवोंकी बाधागे रहित एकांत
स्थान से सुना घर, मठ, गुफा, नदी तट आदि स्थानोंमें शयन
आसन करना जिसमे ब्रह्मचर्य स्वाध्याय तथा ध्यान भले प्रकार
पालन कर सके।
६ कायकेश-देहके सुखिया स्वभावको मिटानेके लिये तथा
दुःख आनेपर कायरता होनेके बचावके लिये शरीरको यथाशक्ति कष्ट
भी देते रहना म गरमी में पहाड़के ऊपर खड़े हो, वर्षामें वृक्षके
तले, तथा शरदीम नदी के किनारे व चौराहे पर खड़े हो, अंतरङ्ग
तप करना।
इन उपर्युक्त ६ बाहरी तपोंका अभ्यास करनेवाला अंतरके
तपको भले प्रकार पालन करसकता है। अंतरके छः तप यह हैं-
१ प्रायति-प्रमाद (आलस्य) के कारण जो कोई दोपं वन
जावे उसके दूर करनेका यत्न करना, गुरुसे कहकर दंडादि लेना।
२ विनय-आदरसत्कार करना-यह ४ प्रकारका होता है।
-
द्वितीय भाग. (क) दर्शन विनय-सम्यकदर्शनको भले प्रकार धारण करना । तथा सम्यक्हृष्टि धर्मात्मा पुरुषोंकी उचित विनय करना। (ख) ज्ञान विनय-ज्ञानको भले प्रकार हासिल करना, सम्य- १. कज्ञानियोंका यथायोग्य आदर करना, तथा ज्ञानके देनेवाले शास्त्रादिकोंको अच्छी तरह रखना तथा पढ़ना पढ़ाना। (ग) चारित्र विनय-श्रावक व मुनिके करने योग्य आचरण बड़ी प्रीतिसे करना तथा सम्यग्चारित्रके पालनेवालोंका यथायोन्य आदर करना। (ब) उपचार विनय---शास्त्रको आते देखकर खड़ा होनाना, दण्डवत करना, आचार्यादिकके पीछे चलना, कायदेसे मैठना, हाथ जोड़ना आदि व्यवहार-विनयको उपचार विनय कहते हैं। ३ वैयावृत्य--अपने शरीरसे तथा भोजनादि व पुस्तकादि दानकर व उपदेश देकर धर्मात्मा मुनि तथा श्रावकोंकी सेवा करनी सो वैयावृत्य नामा तप है। ४ स्वाध्याय-आलस्यको छोड़कर ज्ञानकी भावना करना सो स्वाध्याय है, यह पांच प्रकारका होता है- क-बांचना-स्वयं शास्त्रको पढ़ना । स-प्रेछना-पढ़ते हुए नहां न समझे उसको अपनेसे १.विशेष जानकारसे पूछना। । ग-अनुप्रेक्षा-गो कुछ पदा व पूछा उसको बार बार विचार : करना। A- । .
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(६६) जिनेन्द्रमठदर्पण
घ-आमाय-नो विचार करके निर्णय किया होय उसको
प्राचीन आचार्य तथा विद्वानोंके कयनसे मिलान करना}..
शु-धर्मोपदेश अन्य जीवोंको जो तत्वोंकि मतलब आप
समझ रखे हैं सो समझाना।
५-व्युत्सर्ग-देह तथा देहके सम्बन्धको अपना न मानना।
इसी लिये बाहरी धनादि परिग्रह तथा अंतरंग क्रोधादिक तथा
कायकी ममताको छोड़ना मो.व्युत्सर्ग नामा तप है !
६-ध्यान-यही यह तप है जो कि कर्मोंकी निर्नरा बहुत
शीय कर सकता है तथा ऊपर यहे हुये ६ प्रकारके बाहरी तप
और पांच प्रकारके अन्तरंग तप इसी तपकी सहायता करनेके लिये
किये जाते हैं!
अध्याय १८वां।
ध्यान।
ध्यान ही एक वह प्रधान मार्ग है जिसके द्वारा हमारे
कौके बन्धन एकाएक हट पड़ सकते हैं । यह यह रसायन है
निसको खाकर एक महा रोगी पुरुष वीतरागी होकर उसी दगासे
शियरमणीको दर सकता है। यह वह राग है जिसमें मोहित होकर
मुकुमालगीतो यह न मादम पड़ा कि उनकी देहको कोई नाहरी
सारही है। यह वह इश्क है जिसमें मोह हो जानेसे तीन पांडवोंने
अपने शरीरको मलते हुए लोहेके गहनोंसे विभूषित होता हुआ
भी कोई दुःम्प न मालूम किया । यह वह चटनी है जिसका स्वाद
। द्वितीय भाग (६७) लेनेसे रामचंद्रनी अपनी स्त्री सीतानीका प्रत्येन्द्रकी पर्यायमें रहकर तरह तरहके पांचों इंद्रियोंकि स्वादोंका नाटक दिखलाये जानेपर भी.रंचमात्र मोहित न हुए। हा! यह क्या ही भली भंग है कि निसके रंगकी तरंगमें लहराते हुए एक महात्माके गलेमें हमारों चीटियोंसे लिपटा हुआ मरा सांप कई दिन तक सड़ा रहा 'पर उनके मनका बाल भी बांका न हुआ। जो इस आनन्ददायिनी विद्याको वशमें कर लेने हैं उनको न भूख है,न प्यास है, न रोग है और न किसी वस्तुकी आशा है । वे सदा ही मस्त रहकर सुस्त उड़ाते हैं। संसारकी जलती हुई तृष्णाकी लपकोंसे उनके आंचल बिलकुल दूर रह जाते हैं । यह वह रत्न है निसका घनी ईश्वर- वक्री पदवीस किसी प्रकार कम नहीं, यह वह मन्त्र है जिसका की जगन्मोहनीके जेतामे तुल्यता करने में असमर्थ नहीं, यह वह अग्नि है जिसकी शीघ्र लपक कर्म कष्टोकि भस्म करनेमें अपनी अनुपमतामे किंचित् भी दूर नहीं । पाठको ! इस निरुपम ध्यानके विषयका मनन करना परमावश्यक है क्योंकि जैन मतका दारमदार इसी हीकी थिरतापर स्थिर है । नो नो सुगम ग्रन्थ मेरे देखनेमें आए हैं उनमें श्री ज्ञानार्णवनीकी महिमा अगाध ही विदित हुई है। श्रीमान परमोपयोगी श्री शुभचन्द्राचार्य विरचित यह ग्रन्य • है। श्री शुभचन्द्राचार्य ने यह ग्रन्थ अपने लघुभ्राता भरथरीके समझानेके हेतु रचा था राजा भोन जिनके समयमें कालिदास व प्रसिद्ध आचार्य श्रीमान्तुंग व धनंजयजी हुए हैं इन्हींक छोटे भाई थे इनका नीवनचरित श्री भक्तामरचरित्र में मले प्रकार दिया हुआ है।
जिनेन्द्रमतंदर्पण इस ग्रन्थमें ध्यानका विषय जैसा उत्तम वर्णन किया गया है, मुझे विश्वास है मेरे ऐसे अल्प ज्ञानियोंके देखने में कम आया होगा । मैं यहां सीकी कुछ छाया लेकर अपने विचारवान पाठ-.. कोंके हेतु किंचित् वर्णन करूंगा। चित्तको एक हेयकी तरफ लगानेका नाम ध्यान है। ज्ञेय वह वस्तु है जो जाननेमें आ सकती है । यह ध्यान ४ प्रकारका होता है निनमें दो भेद तो अशुभ अर्थात् खोटे ध्यान हैं और दो 'शुम अर्थात् अच्छे ध्यान हैं। दो खोटे ध्यान आत और रौद्र हैं। आर्त ध्यानका यह लक्षण है- - - " दुखके कारण आवते, दुःखरूप परिणाम | भोग चाहि यह ध्यान दुर, आर्त तनो अघाम ॥ (ज्ञा० अ० २५) भावार्थ-आर्त नाम दुःखी होनेका है-वह विचार निससे परिणाम (भाव) दुःखी हो गर्तध्यान कहलाता है। परिणाम दुःखी होनेके ४ कारण हैं-१ इष्ट वियोग-निस चेतन व अचेतन वस्तुसे हम प्रीति (राग) करते थे ऐसी चीन, मनुष्य व पशुका हमसे जुदा हो जाना और हमारा इसी लिये रंज करना । (२) अनिष्ट संयोग-जो चेतन व अचेतन चीन हमको बुरी मालूम होती है उसीका साथ होनेसे हमारा रंन करना । (३) पीड़ा चिंत- बन-रोगादि दुःख होनेपर रंज करना।(४) निदान-दुसरेकी विस्मृत: धनदौलत देखकर अपने दिलमें रंग मानना तथा अपने पास . होनेकी चाहना करना। .
(६९)
कर्मोके संवर व निर्जरा करनेवाले ध्यान दना चाहते हैं उनको
ध्यानोंको विचार करना चाहिये ध्यान, शुल ध्यान!
द्वितीय.मांग,
दूसरा रौद्र ध्यान है, इसका लक्षण
दोहा
पंच पापमें हपं जो रौदध्यान अपनी
आर्त कह्यो दुःख मगनता, दोऊ का निन माने।
भावार्थ-पापोंमें खुशी माननेके भाव होना नौ दिप्यान
इस विचारके होनेके मुख्य ४. कारण है । 1. ऊनन्द आउने
मनसे, बचनसे व कायसे दूसरोंको स्वयं प्राम, पीडा रनाव:
प्राण पीड़ा कराना व प्राण पीड़ा व कोई हानि शिक्षक
हर्ष मानना, [ २ ] भूपानन्द-झूठ बोलके बुलावे व पोला हुआ
सुनके दुशी मानना, [.३] चौर्यानन्द-चोरी करके केव
करी हुई सुनके खुशी मानना, [४परिम्हनन्द्र-सांसारिक,
सामग्री बढ़ाके, बदवाके व बढ़ी हुई देख सुनके आनंद मानना ।
इन आर्त रौद्र ध्यानों के करनेमे डिसी जीवन कुछ भी भला
नहीं होता बल्कि दुहरी हानि होती है । पद को इस भवने दुःख
होता है दूसरे यह प्राणी ऐसे अशुभ समीय परमाणुओंको खींच
लेता है जिनका फल अन्यमयमुगतना होता है । इसलिये जो
यह दोनों ध्यान त्यागने योग्य है । ध्यान देनेवालेको दो अच्छे.
शुद्धध्यानके होने लायक माद इस इससे हमारे नहीं हो सक
। इस कारण इसका वर्णन यहाँ किन केवल
- नफा हम वर्णन करेंगे।
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A
(७०) मिनेन्द्रमतर्पण अध्याय १९वा ।। मध्यान ध्यानमें चार मुख्य बातोंको जानना चाहिये १ ध्याता ध्यान करनेवाला २ ध्यान क्या है, य क्योंकर हो सकता है, ३ ध्येय ध्यान किमका करे ४ च्यानका पल क्या है। ध्याता। ध्यान करनेवालेका यह लक्षण है। सोरठा। जो गृहत्यागी होय सम्यक रत्नत्रय चिना । ध्यान योग नहिं सोय, ग्रह्मासीकी का कथा । (ज्ञा० अ०४) दोहा। रत्नत्रयको धारि ने, शम दम यम चित देय । ध्यान करें मन गेकि के, धगि ने मुनि शिव लय ।। (ज्ञा० अ०५) भावार्थ-जो तीन रतनको अर्थात सम्यग्दर्शन (भले प्रकार सात तत्योंका अडान) सम्यग्ज्ञान (भले प्रकार सात तत्वोंका जान- पना ) सम्यक चारित्र (भले प्रकार सात तत्वामें आचरण)के धारी हैं और समता अर्थात वीतरागताके धारक पांच इंद्रियोके विषयों के जन्म पर्यत छोड़नेवाले रोमे नो मुनि मनको रोकके ध्यान करते है ये कौकी निर्जरा करके शिवपदको लेते हैं। और जिन्होंने घर त छोड़ दिया पर तीन रतन नहीं धारे वे कभी ध्यान नहीं क द्वितीय.मागर (७२) सकते हैं। उनसे तो वे गृहस्थी ही भली प्रकार ध्यान कर सकते है जो सम्यग्दर्शन सहित व्रती हैं जो श्री सुदर्शन सेठने अष्टमी के दिन नगर बाहर बनमें ध्यान लगाया याना! क्या स्थिर 'ध्यान था कि राजाकी. अद्धौगिनी द्वारा अनेक कष्ट दिये जाने तथा आपत्तियोंके भीतर पटके जानेपर भी उन्होंने अपना सथा ध्यान नहीं छोड़ा। जो मुनि मारण, उच्चाटन, वशीकरण, इन्द्रनाल, वैद्यक, ज्योतिष आदि क्रियाओं के फरनेमें परिणाम रखते हैं वे कमी धर्म- ध्यान नहीं कर सकते हैं। ध्यान तो १२ भावनाओके रसमें मगन . हो नानेवाले मनुष्यों हीके पड़े पड़ सकता है, अन्योंके नहीं । ऐसे ध्यानके चाहनेवालेको किस स्थान पर बैठकर ध्यान करना चाहिये। त अध्याय २०वाँ। पानका स्थान। दोहा। जहां क्षोभ मन उ.पने, तहां ध्यान नहिं होय । ऐसे थान विरुद्ध है, ध्यानी त्याग सोयं ॥ भावार्थ-निस जगह पर बैठनेसे मनमें कुछ भी घबड़ाहट "पैदा हो वह जगह ध्यान करनेके लायक नहीं है, क्योंकि स्थान सबबसे भी मन बिगड़ जाता है व निश्रल हो जाता है । इस लिये ऐसी जगह बैठकर ध्यान नहीं हो सकता है-जहाँ मनुष्य सी नपुंसफोका आना जाना हो, जिस स्थानपर किसी खास मनु. F-
हिनेन्द्रमतदर्पण
1
प्यका अधिकार हो, जहाँ भेषधारी साधुओंका 'रहना हो, जहां
राना दुष्ट हो तथा जहां जुझारी आदि व्यसनी जीव आ
भाते हों।
ध्यान करनेके स्थान तो यह हैं-सिद्धक्षेत्र जहांसे मह
पुरुषोंने मुक्ति पाई, तीर्थक्षेत्र-जहां, तीर्थंकरोंके जन्म, तप व ज्ञ
कल्याणक हुए हों, समुद्र व नदीके किनारे, बनके बीच, पहाड़
चोटी, शालमली वृक्षोंकि झुंड, जलके बीच टापू, वृक्षकी खो
उजड़ा बगीचा, मशानभूमि, पहाडकी गुफा आदि ।
विना एकान्त स्थानके मन एक ओर नहीं जम सकता
जो जो विद्वान् हुए सयने एकान्त हीमें मनन कर विद्याको प्र
किया है। विद्याधर लोग विद्या साधनेके लिये जंगलोंमें अय
रहते थे तब विद्याको सिद्ध कर पाते थे । यूरुपमें जो जो प्रार्च
विद्याके उद्वारक व प्रचारक हुए हैं सबने एकांत स्थान हीमें अ
मनको रखकर काम किया है | Newton (न्यूटन ) Buff
(वफन) Wiclifls (वीक्लिफ) Luther (लूथर) knox (नाम
Oliever Cromwell ( ओलाइवेर कामवेल ) Wordsror
(वर्डस्वर्थ) Carlyle (कारलाइल) Goldsmith (गोल्डस्मि
Scott (स्काट) Lord Byron (लाई वैरन) Shakespea
(शेक्सपीयर) आदि प्रसिद्ध यरूपीय विद्वान् एकांत स्थानमें वि
करनेके कारण अपने अपने कर्तव्यमें उन्नति कर सके।
Jean Paul Bichter [जीनपाल रिकर] का कथन
* All worthy things are done in solitude • अः
जितने योग्य काम हैं सब एकांत स्थानमें ही किये जाते हैं।
।
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रै * (७४) जिनेन्द्रमतदपण- बिलकुल वशमें होगया है उनके लिये आसनका कोई विशेष नियम नहीं है किन्तु ध्यान सम्पनेवालेके लिये आसनकी मनबूती, जरूर होनी चाटिसाध्यान करनेके आसन बहुतसे हैं जिनमें दो आसन बहुत सुगम और प्रचलित हैं । १ पर्यकासन २ कायो- त्सर्ग । पर्यकासनमें दोनों पैरके तलवे अपनी जाघोंपर खुले मुंह ऊपरको किये जमावे और दोनों हाथोंकी हथेली खुली हुई अपनी गोदमें वापके ऊपर दाहनी सखे । दोनों आंखोंको नाकके आगे नोकपर जमादेवे, भौहें चले नहीं होठ न बहुत खुले न बहुत मिले हों और मुंह रूपी कमल शांतरसका टपकानेवाला होय, मनमें दया और वैराग भरा हो, शरीर सूधा रहे । इस आसनमें ऐसा निश्चल रहे कि देखनेवालेको पत्थरकी मूर्ति ही मालूम हो । बैठे आमन भगवानकी प्रतिबिम्ब जो हमारे मंदिरोमें विराजमान- रहती है इम पर्यकासनको भले प्रकार दर्शाती है। कायोत्सर्ग आस- नमें खड़े हो ४ अंगुलके अन्तरसे दोनों पैर बराबर रखकर दोनों हथेली लटकती हुई मुख नेत्रकी चेष्टा पर्यकासनकीप्ती हो। इन दोनों आसनोंमें एक आसनके जीतनेका यत्न अवश्य करना योग्य है दोहा आसन दृढ़ते ध्यानमें, मन लागे इक्तान । ताते आसन योग्यवं, मुनि करि धीरे ध्यान ।। (ज्ञा० अ० २८) भावार्थ- जिम आमनके रखनेसे मुनिका मन निज स्वरूप लगे उसी आमनको रखकर मुनि आत्मव्यान करते हैं।
द्वितीय मार्ग (७५) अध्याय २२वा प्राणायो । मान करवाले के लिये यह बहुत जरूरीत है कि उसका मन थिर हो, क्योंकि बिना मनके स्थिर किए हम कदापि आत्म- ध्यान नहीं कर सकते हैं। यदि ध्याताने अपने ज्ञान वैराग्य तथा इंद्रियोंके रोकनेमे मनको सहन हीमें वशकर लिया है तो उमके लिये प्राणायामकी जरूरत नहीं है । किन्तु निम ध्याताका मन चंचल है अर्थात व्यान करते वक्त यश; भले प्रकार न रहकर विषय काय सम्बन्धी तरह तरह के विकल्प भावोंके अन्दर नाता है उसके लिये ध्यान शुरू करनेके पहिले प्राणायामका माधन बहुत नरूरी है। इम प्राणायामक साधनमे लौकिक प्रयोजन भी सिद्ध होते हैं, किन्तु मोश मार्गपर चलनेवालेको लौकिक मतन्यमे कभी प्राणा. यान करना उचित नहीं है क्योंकि लौकिक प्रयोजन सांसारिक राग- द्वपके करनेवाले है-दूमरेके हानि लाभको बतलाना, वशीकरण, . मारण, उच्चाटन आदि करना तथा पशुपक्षी आदिके शरीरके अंदर फिरना आदि काम इस प्राणायामके द्वारा किए जासकते हैं। इस प्राणायामका वर्णन श्री.ज्ञानावर्णव ग्रन्थके २८ अध्यायमें किया है । इस अध्यायके श्लोक ९८, ९९ व १०० का यह मतलब है कि प्राणायामका मले प्रकार साधनेवाला योगी एक चित्त होकर भौरा, पतंग व अंदन पक्षी तथा हिरन आदि. पशुओंके शरीरोंमें चला जा सकता है तथा मनुष्य, घोड़े, हाथी आदिके शरीरोंमें अपनी इच्छा के अनुसार ना सकता है तथा निकल आ सकता है। HAR
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जिनेद्रमतर्पण
इसी तरह पत्थरों के अन्दर भी जा सकता है। यहांतक कि ऐसा
योगी अभ्यासके बलसे शरीरहित आत्माकी तरह चाहे जहां
अपनी इच्छासे घाना सकता है।
प्रणायाम-पवन (हवा) के माधनेको कहते हैं-शरीरमें
हर जगह हवा घूमती है । मुंह व नाकके द्वारा जाती आती प्रत्यक्ष :
विदित होती है इसी हवाके कारण मन भी चंचल रहता है-इस
हवाके रोकनेकी तरकीय प्राणायाम है ।
यह प्राणायाम तीन तरहका होता है-
१ पूरक----हवाको तालूके छेदसे खींचकर देहमें भर लेना ।
५ कुंभक-इस खींची हुई हवाको नाभिके स्थान पर इस
तरह रोक देना जो यह नाभिको छोड़कर दूमरी जगह न जाने पावे ।
३ रेचक-इस हवाको अपने कोठेसे धीरे धीरे निकालकर
बाहर कर देना । जो या नाभिसे हटाकर हृदय कमलमें होती हुई
तारके छेदके स्थान पर टहराई जाती है उसको पवनका परमेश्वर
कहने हैं।
पूरक, कुंभक, रेचकका जब वरावर अभ्यास होजाय तब
योगी हृदयके कमलमें हवाके साथ अपने मनको जोड़बार थांम देते।
हैं-इस तरह मनको थामनेसे जबतक मन रुकेगा कोई और भाव ,
पैदा न होकर विषयोंकी आशा मिट जायगी और भीतर ज्ञान
घदता हुवा चला जायगा ।
मनके वश करनेके लिये सिर्फ इतना अभ्यास प्राणायामका
जरूरी है । प्राणायामके द्वारा लौकिक प्रयोजन साधने के लिये इस
२८ अध्यायमें बहुतसी युक्तियां पवनके वश करनेकी कही हैं
।
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द्वितीय भाग (७७)
रनका वर्णन में प्राणायाम शीर्षक लेखमें किसी समय पर दिखा-
ऊंगा। यहां "ध्यान" विषयमें कैद सनके वश करनेका प्रयोजन
1:२८ वें अध्यायका सार टीकाकार श्रीमान पंडित जयचंदनीने
इस एक कवित्तमें दिखलाया है-
कवित्त।
आसन थान सवारि करै मुनि प्राणायाम समीर संभार ।
पूकर कुंभक रेचक साधन निज आधीन सुतत्व विचार ॥
जगत रीति सम लखें शुभाशुभ अपने हानि वृद्ध निरधार ।
मन रोके परमातम ध्यावे तब यह सफल न आन प्रकार ॥
भावार्थ यही-कि आसन और स्थान ठीककर प्राणायाम
फेवलं मनके बस करनेके लिए ही करना उचित है जिसमें हम
शुहारमाकर विचार कर सके।
अब ध्याताके लिये प्रत्याहार धारणाको भी आवश्यकता है।
.
अध्याय २३ वां।
प्रत्याहार घारणा।
मनको एफ ठिकाने रोककर रखकर रखना और उसमें ध्येय
ध्यान करने योग्य पदार्थ ] का ठहराना सो प्रत्याहार धारणा है।
दोहा।
भाल आदि दश यानमें, ध्येय थापि मनलार ।
प्रत्याहार जु-धारणा, यह ध्यान विधिसार ।।
(ज्ञा० अ० २९)
देहके भीतर मनको ठहराने के लिये दस जगह है- साहा
F (७८) जिनेन्द्रगतदर्पण मंदाक्रांता छंद। नेत्रद्वंदे श्रवणयुगले नानिकाने ललाटे, वक्ते ना शिरसि हदये तालुनेत्रेयुगांते । ध्यानस्थानान्यमलमतिभिः कीर्तितान्यत्र देहे, तवैकस्मिन् विगतविपर्य चित्तमालवनीयम् ॥१६॥ [ ज्ञा० अ० २९] भावार्थ-~~-मन टहरानेके १० स्थान यह हैं १-दोनों आखें २ दोनों कान ३ नाककी नोक ४ माथा ५ गुंह ६ नाभी ७ सिर ८ हृदय [ दिल ] ६ तालू १० दोनों भौहोंके बीचका माग ।। इनमें से किसी जगह मनको रोककर ध्येय (परमात्मा) का विचार करना है सो प्रत्याहार धारणा है। ध्याता आसन, स्थान, प्रत्याहारधारणाको ठीक करने के पीछे इस बातकी प्रतिज्ञा अपने चित्तमें करता है कि मैं अनादि कालसे कर्मरूपी जालसे बँधा हूं, इसीसे संसारमें नाना प्रकार के दुःख अविद्याके कारण पाए । मेरा सभाव परमात्माके समान ज्ञाता दृष्टा है किन्तु कर्मकी रजसे मैला होरहा है। अब में ध्यानके वलसे कर्मोको नाशकर अपने स्वरूपको ध्याय लेऊं। इस तरह मनमें कहकर वह ध्यानी रागद्वेप अपने चित्तमे हटा धर्म ध्यान करना प्रारम्भ करता है। 24 AL -- . ::-:: अध्याय २४ वाँ। ध्येय। जिसका ध्यान किया जाय-उसको ध्येय कहते हैं। यह लोक छः द्रव्योंका देर है-जितनी दशाएं इस जगतमें दिखलाई पड़ती
मिनाय-भाग
१
ह
(७१)
है सब के द्रव्योंके ही सम्बन्धसे पैदा हुई हैं। जिनमें १ जीव तो
चेतन ज्ञान दर्शनमई द्रव्य है मोती पांच पुद्गल, धर्म, अधर्म,
आकाश और काल अचेतन याने जड़ पध्यानीको इन छहों
द्रयों से अलगकर चेतन द्रव्यको मले प्रकार विचारना चाहिये ।
": चेतन द्रव्य दो तरहका है-१ सांसारिक, २ सिद्ध । जो जीव
कोसे लिपटे हुये जनम मरण करते रहते हैं वे संसारी हैं । जिनके
कर्मका मेल नहीं वह सिद्ध परमात्मा हैं !
ध्यान करनेवाला अपनी आत्माको संसारकी अवस्थामें कर्मोसे
लिपा देखता है और जब अपनी आत्माके असली स्वभाव पर
जाता है तो अपनी आत्मा और सिद्धात्मामें कोई भेद नहीं पाता
है। सिद्ध परमात्मा शुद्ध आत्मा है निसके कोई कर्मका मेल तथा
किसी प्रकारका राग द्वेष नहीं है।
अन्याय २५ वाँ।
पान और उमका अन्तिम फल ।
जिसके ज्ञानमें तीन लोककी सब चीने इसी तरह झलकती.
हैं जैसे निर्मल दर्पणमें सामनेकी सब चीने झलक जाती है, और
इन्द्रियोंके द्वारा नहीं ग्रह्णमें आता तथा जो जानकी के
साकार तथा पुद्गल शरीरकी अपेक्षा निराकार है. इस
जो जो अन्तरङ्ग गुण हैं ये सब आत्मननित मुख्य सुटरल
शरीर सहित अर्हन्तमें भी है-अर्हन्त व सिद्धकी अवह
गुण धारनेवाला अपनी आत्माको विचारना । मन्ट मत करो
ध्याताकी आत्मा परमात्मा स्वरूपमें हो सस्ती है कन्द्रा
(८०) जिनेन्द्रमनदपंग
करते करते कुछ दिनोंमें ध्यान करनेवालेका तभाव ( में मारमा
किसी परमात्माका ध्यान ममा) नाश होनाता है। उसके
फिर ध्याता, ध्यान और ध्येयमें कुछ भेद नहीं रहता अर्थात्
अद्वैतभाव (एकीभाव) में प्राप्त हो काका नाश कर डालता है।
दोहा।
पौरुष कर ध्यावे मुनी, शुद्ध आत्मा नोय ।
कर्म रहित वर गुन सहित, तर तसा ही होय ॥
(ज्ञा० अ०३०)
भावार्थ-मुनि यतन करके अपनी आत्मा होके खभावमें लीन
होते हैं । अपनी ही आत्माको शक्ति अपेक्षा शुद्ध कर्मोसे दूर
'विचारते हैं तर तसे ही याने शुद्ध आत्मा होनाते हैं, इसलिये
ध्येय अर्थान् ध्यान करने योग्य सिवाय शुद्ध आत्माके और कोई
वस्तु नहीं है-इस शुद्ध आत्माका ध्यान इस प्रकार विचार करना
जैसे इस छप्पैमें कहा है---
जड़ चेतन मिलि है अनादिके एक रूप मिम ।
मूढ़ भेद नहिं ये प्रति मिथ्यात्व उद इम ॥
गिन आगम मिन्ह भेद जाने लहि अवसर।
अनुभव करि विद्रुप आप अर अन्य सकल पर ॥
जब अंतर आतम होय करि करे शुद्ध उपयोग मुनि ।
तब शुद्ध आत्मा ध्यान करि लहै मोक्ष सुख मय अवनि ।।
(ज्ञा० २०३१)
भावार्थ-चेतन और कर्म आदि जड़ यस्तुका मेल अनादि
काल याने हमेशासे ऐसा होरहा है कि दोनों एकमें एक होरहे हैं-
रमितीय भाग .(८१) नोकिं शरीरको ही आत्मा जानते हैं ऐसे नीव इसके भेदको नहीं पाने हैं। जैन शास्त्रोंके उपदेशो आत्माकी और नड़की अलग अलग पहचानको जानकर जो और सर चीनोंसे मन हटा मात्माका विचार करते हैं वे अतरात्मा होनाते हैं। इस तरह अपने उपयोग (भाव) को शुद्ध आत्मामें अच्छी तरह लीन होते होते मोक्ष सुखकी भरी अवस्थाको प्राप्त करते हैं अर्थात् संसा के दुःखके प्रसारसे छुटकारा पा जाने हैं। - न अध्याय २६ वाँ। निराकारमा ध्यान साकार के द्वारा ही हो सकता है। .यहांपर एक बात विचार करनेकी यह है कि आत्मा और परमात्मा दोनों का स्वरूप निराकार है याने सामने दिखलाई नहीं पड़ता इससे एकाएक मनका आत्मा तथा परमात्माके स्वरूपमें बराबर लगे रहना कठिन है। इस लिये साधनेशनकि लिये निरा- कारका ध्यान विना किसी साकार वस्तुपर मन लगाये नहीं हो सकता है भैसा कहा है-- आलश्पलक्ष्य सम्बन्धात, स्थूलात्सूक्ष्म विचिंतयेत् । सालंपाच निरालम्ब, तत्व वित्तवनमा ॥४॥ . (ज्ञा अ०३२) भावार्थ जो अपने सदने याने जानने में आये उसके द्वारा जो कि प्रत्यक्ष रखने में नहीं आ सकता उसो विचारे, (शाली -
(८२) जिनेन्द्रमतदर्पण
इंद्रियोंके मालूम करनेमें जो आवे उसके द्वारा सूक्ष्म- (मो इंद्रियोंकि
जाननेमें न आवे) को विचारे । इसी तरह सालंब (किसी सहारा
लेनेवाली चीन) के हागरालम्ब (मो किसीके सहारे नहीं है)
गेमे परमात्माको नाने-तत्वपर पहुंचनेका यह मार्ग है दमी लिये
किसी माकार चिकी आवश्यकता है जिसके द्वारा हम निज
आत्मा व परमात्माका ध्यान कर सकें।
धर्मध्यान साधनेके मुख्य नियम ।
पाठकों ! शुद्ध परमात्मामें लय हो जाने के लिये ४ प्रकारका
आलम्बम्वरूप मार्ग है जिसके द्वारा हमारा अम्यास ऋमकमसे.
निराकार आत्मापर जम जाता है।
वे यह है-१ पिंडस्थ, २ पदस्थ, ३ रूपस्य, ४ ल्पातीत ।
अध्याय २७ वाँ।
पिंडस्थ ध्यान मार्ग ।
इस पिडस्थ ध्यानमें ५ प्रकारको धारणा है।
१ पार्थिवी, २ आग्नेयी, ३ आश्वासनी, ४ वारुणी, ५
सत्वरूपवती।
पाधियी धारणा स्वरूप ।
इस मध्यलोकके समान बड़ा एक समुद्र विचारकर : मो.
कि क्षीर समुद्रके समान सफेद रंगका. टहरा हुआ, विना
किसी लहर उठे व किसी गर्जनाके हो | इस समुद्रके बीचमें
एक कमल हमार पत्तोंका विचार करे जो कि सुवर्णके रंग समान
चमकता हो, तथा जम्बूद्वीपके समान एक लाख योजनके व्यास
।।
१
.
हितोय मंग Disliveter) सहित हो, इस कमलके वीचमें एक बहुत पीले की पर्णिका विचार करे जो कि सुमसात के समान हो-इस पिकाके ऊपर सखा हुआ, १ सफेद रंगका चन्द्रमाके माफिर मकता हुआ सिंहासन विचार करें-इस सिंहासन के ऊपर अपनेको आहुआ इस हालतमें देखें कि मैं शांतरूप विना किसी घबड़ाहटके तथा मैं अग्नी आत्मा पर लगी हुई कर्मरूपी कालिमाके नादा रने लिये यतन कर रहा है। इतना विचार वारम्वार करनेसे थिवी धारणाका जमाव चित्तमें होमाता है। जब इसका अभ्यास रूपसे होनाता है तब आग्नेयी धारणाका विचार किया जाता है। आग्नेयी धारणा। उसी ऊपर कहे हुए सिंहासनके उपर बैठा हुआ योगो अपने नाभिमंडलके अन्दर र कमल १६ पाँखड़ीका बहुत मनोहर हकी ओर मुंह किया हुआ 'विचार फरे, इस कमलके हमक जिपर एक स्वर लिखा हुआ विचारे, याने सोलह पोंपर यह १६ स्वर देखें । अ, आ, इ, ई, उ, उ, ऋ, ऋ, ल. लू, म, , ओ, औं, अं, अः । और इसी कमलकी कर्णिकाके बीचमें (है) चन्द्रबिन्दु और रेफ करके सहित . ह-का विचार करे । यह है अक्षर यहुत चमकता हुआ देग्ये । इस ह की रेफसे धीरे धीरे निकलती हुई धूकी लौंको विचारे और फिर यह धृऔं आगके फुलिंगोंकी सूरतमे होता हुआ लौकी दशामें बढ़ता नाय और योगी अपने हृदयके बीचमें नीचा मुंह किये एक आठ पाखडीका कमल विचारे, यह आठ पाँखड़ी आठ फर्मको दिखलानेवाली जाने-और यह देखे कि यह रेफसे पैदा हुई आग इस आठ कर्मरूपी गाठ पनों
(८४) जिनेन्द्र मतदर्पण
कमलको जला रही है । फिर यह देखे कि यह आग इस कमलको
जलाते जलाते बाहर देहळे आकार त्रिकोण ( Triangle) रूप
हो गई । निसन अग्निका बीजाक्षर रेफ फैला हुआ तथा साथि-
येका चिद्र बना हुआ है और जो ऊपरकी ओर सोनेकी चमकर
माफिक चमकदार लौको निकाले हुए बिना किसी धुएंके नल रही
है इस तरह यह विचारे कि यह रेफमे निकली हुई आग अन्दर
मेरे कर्मोक कमलको बाहर इस शरीरको जला रही है और जलाते
जलाते दोनोंको भस्मकी दशामें कर दिया है और तब यह आग
अपने आप धीरे धीरे ठंढी हो बुझ गई है-इतना विचार वारवार
करना सो आग्नेयी धारणा है ।
आश्चामनी धारणा।
जब उपर कही हुई धारणाका अच्छी तरह अभ्यास होनाय
तब वह योगी यह विचार करे कि बहुत तेज हवा चल रही है
जिसने बादलोंको फोड़कर समुद्रके पानीको चलायमान कर, पर्वतों-
को कम्पाकर तमाम जगतमें फैलकर खलबली पैदा कर दी है और
उसी पवनने इस योगीके जले हुए आट कर्मरूपी कमल और शरी-
रकी भस्मको एक झोकेमें उड़ा दिया है और फिर यह हवा
धीरे
धीरे शांत होगई है-इतने विचारको आश्वासनी व मारत धारणा
कहते हैं।
वारुणी धारणा
जब आश्वासनी धारणाका अच्छी तरह अभ्यास हो जाय
तब वही योगी यह विचार करे कि आकाशमें मेघ छा गए.
गर्नना होने लगी तथा बिनली चमकने लगी और फिर मोती
.
दिसा माग (८५)
भनीन् मोटी मोटी साफ पानीकी बूंदें वरावर पाने लगी ऐसी कि
निम वर्षाने विस्कुल छोलिया त निसमें अई चंद्रमाका मा
प्रथम बन गया फिर यह देखे कि यह वासी) जल मेरी
आमापर लगा हुआ भस्म रनको धो रहा है और आत्माको साफ
कर रहा है-इस प्रकार विचारना सो वाल्गी धारणा है ।
सत्वरूपवती धारणा।
जब योगीको ऊपर कही हुई वारुगी धारणाका अभ्यास हो
नारे तब यह योगी विचार करे कि मेरी आत्मा सर्व कामे रदित
व मान धातुमयी शरीरसे रहित शुद्ध होकर उसी सिंहासन पर
-यहुन साफ गौरवणे पुरुषके आकार गोमा संयुक्त विरानमान है ।
तथा देवादि मेरी आत्माकी पूना कर रहे हैं और मैं अपनी निर्मला
चंद्रमाती किरण समान आत्मा हीमें लीन है-इतना विचार सो
तत्यरूपवती धारणा है।
इस प्रकार पिंडस्थ ध्यानके अभ्यास किये जानेमे यह आत्मा
निनानंदको पाता हुआ थोड़े ही समयमें मोक्षके अविनागी मुखको
पाता है। इस विडम्य स्थानकी महिमा अगाध है-इसके यन्यास
करनेवालेको मंत्र, यंत्र, सिंह, सूर्य व और कोई उरव अपना कुछ
अमर नहीं कर सकते हैं।
इस पिंटस्थ ध्यानकी महिमा इन लोसे जाननी चाहिये।
आर्याछन्द ।
इत्यविरतं सयोगी
पिरस्य नातनिश्चलाया।
मियसुसमनन्यमाच्यं
मामोत्यचिरेण कालेन ।
+
(८६) जिनेन्द्रमा
शार्दूलविक्रीडित
विद्यामंडलंयंत्रकुहुक
मताभचाराः क्रियाः।
सिंहासी विषदत्य दंति सरमा
यांत्येव निःसारतां ।।
शाकिन्यो गृहराक्षसप्रभृतयो
मुंचंत्यसदवासनां।
एतद्ध्यानधनस्थ सन्निधिवशा-
द्भानोर्यथा कौशिकाः ॥
दाहा।
या पिंडस्थ ध्यानके मांहि,
देह वि चित आतम चाहि ।
चितवे पंच धारणा धारि,
निन आधीन चित्तको पारि ।
अध्याय २८वाँ ।
पदस्थ ध्यान।
पदोंको आश्रय लेकर जो ध्यान किया जाय उसको पदस्थ
व्यान कहते हैं-व्यान करनेवाला अपने योग्य स्थान तथा आसन
ठीक करके यह विचार करता है कि मेरे नाभि मंडलमें सोलह
(१६) पत्रोंका १ कमल है। इन १६ पत्रों पर १६ स्वर (अ.
आ इ ई उ ऊ ऋ ऋ ल ल ए ऐ ओ औ अं अः) लिखे हुए
हैं और यह स्वर दन पत्रोके उपर घूम रहे हैं और हृदयके बीचमें,
भावार्थ-इस वर्णमानच हवी अग्निकी मंदता, कुष्टदर
कासश्वास, आदि रोग जाने हैं अच्छी वचन शक्ति माम
(८७)
इसी तरह एक दूसरी कमल २१ पत्रोंका है। इस कमलके बीच में
र कार्गका है । यह २४ पत्रे और का इनं. २६ जगहों पर
कवर्गसे पवर्ग तक २५ अक्षर लिखे हुए हैं अर्थात् (क, ख, ग,
ब, ड, च, छ, न, झ, ञ, द, ठ, ड, द, ण, त, थ, द, घ, न,
फ, य, भ, म, ) फिर वह ध्याता अपने मुखमें , औठ पत्रान
कमल देखें इन पत्रोंपर यह देखें कि य, र, ल, व, श, ५, , है,
यह आठ अक्षर लिखे हुए हैं और घूम रहे हैं । इस तरह सर्व
( १६३३) ४९ अक्षरोंके मंत्रका विचार करना सा पदस्य
ध्यानमें वर्णमातृका ध्यान है---
सर्व श्रुतज्ञानकी उत्पत्ति इंन १९ अमरोंसे होती है इंस
लिये
इस
ध्यानके
बहुत
लगती है यहांतक कि संयमी मुने श्रुतनिके पार पहुंच जाते हैं-
अतिरिक्त इस ज्ञान वृद्धि होनेके इस व्यानकै जम्यास शरीरके
रोगोंकी भी शांति होती है ।
स्वामी शुभचंद्राचार्यका वाक्य है।
है तथा उत्तम गतिको पर्ने
दिनोंके अभ्याससे जानकी बढवारी होने
जापानयेत् अयमोनानिमाय ।
कुष्टोदरात्मकसनादान दि गंगान ॥
प्राप्नोति वा प्रति माम्हनी म्हदयः ।
पूनां परत्र च गनि पुरयत्माप्त
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. ५ (८८) जिनोद्रमतदर्पण इस पदस्थ ध्यानमें बहुत प्रकारके पद ध्यान करने योग्य.. कहे गये हैं-यहां उनमें से कुछ और वर्णन किये जाते हैं..- पद-है-मिसस प्रयोजन अर्हन्तका है। इस मन्त्र . पदको अपने हृदयके बीच एक सुवर्ण मई कमलके बीचकी कर्णिकामें उहरा हुआ सफेद रंगका विचार करे फिर इसीको धीरे धीरे ऊपरको उठता हुआ देवे और यह उठकर दोनों भौंहोके वीचमें आकर चयके, फिर मुंहरूपी कमलमें जाता हुया तालूके छेदसे अमृतमई, जलको वर्षाता हुआ निकले फिर आंखोंकी पलकोंपर चमकता हुआ सिरके बालोंमें आकर ठहरे, वहांसे उठकर ज्योतिषी लोकमें घूमता हुआ तथा चंद्रमाकी वरावरीसे निकलकर सब दिशाओंमें घूमता, आकाशमें उछलता तथा कलंकोंको दूर करता हुआ मोक्ष- स्थान जो सिद्ध शिला उसमें प्राप्त होता हुआ विचार करे । इतना विचार ध्यान करनेवालेको कुम्भक पवन साधन करके करना चाहिये, जब इसका अभ्यास पूरे तोरसे हो जाये तब इस मंत्र पदको सदा अपने नाकके अग्रभागमें द भौहोंक धीचमें धारण कर ध्यान करें। पद-उरों-जिसको प्रणव कहते हैं। यह पांच परमेष्टीको प्रकाश फरनेवाला है क्योंकि यह पद पांच परमेष्टियोके प्रथम पांच': अक्षरों हीसे बना है जैसे (अ+अ+आ+उ+म्)-(अरहंत अतन (सिड) आचार्य+उपाध्याय-मुनि) यह अक्षर परमेटीका सूचक है ऐसा स्वामीके इस श्लोकसे भले प्रकार विदित है। १ te द्वितीय भाग (८९). श्लोक-यस्माच्छब्दात्मकं ज्योतिः प्रमूतिमति निर्मलं । वाच्य वाचक्रसम्बंधाते तव परमेटिनः ॥ इस 'गे' अक्षरको हृदयकमलकी कोणका स्वर और व्यंन- नोंमे वेदा हुआ चंद्रमाके रंग समान सफेद रंगका देखकर कुंभक संवनके द्वारा विचार करे। इसी डों अक्षरको यदि. मंगेके समान लाल रंगका विचारे तो जगतमें घबड़ाहट पैदा हो जाय य वशीकरणका कार्य दे। यदि सुवर्ण रंगका विचार करे तो स्तम्भनका काम दे, यदि काले रंगका विचारे तो उप पैदा हो जाय किन्तु मोक्ष मार्गपर चलनेवाले व्य- क्ति के लिये सदा यह अक्षर सफेद रंग हीका देखना योग्य है। ‘पंच परमेष्टी नमस्कार लक्षण मंत्रका विचार अपने हृदयमें एक सफेद चमकता हुआ आठ पत्रका कमल विचार करें उसकी चीचकी फर्णिकामें सात अक्षरका मंत्र अर्थात् ' णमो अरहंताणं ' विचारे, और इस कमलकी चार दिशा सम्बन्धी पत्रोंपर क्रमसे यह ४ मंत्रोंको विचारेः- १-णमोसिद्धाणं-५ अक्षर । २.---णमो आयरियाण---७ अ. ३----णमो उवझायाणं----७ अ० '४--णमोलोये सश्य साहणं-~९ अ० 'और इस कमलके चार विदिशा याने कोनोंके पत्रोंपर यह ४ मंत्र विचारे--- सम्यग्दर्शनाय नमः १ सम्यग्ज्ञानाय नमः २ सम्यग्चारित्राय . नमः ३ सम्यगतपसे नमः ४ -- 1 जिनेन्द्रमसदर्पण: इस तरह ९ पदोंको कमलपर स्थापकर ध्यान करनेसे चित्तमें बहुत पवित्रता प्राप्त होती है। इसी तरह पच परमेष्ठीके नमस्कार रूप नीचे लिये यह भी मन्त्र हैं । १६ अक्षरका मंत्र-अईसिदाचार्योपाध्यायसर्वसाधुभ्यो नमः-- ६ अक्षर मंत्र--अरहंत सिद्ध । ४ अक्षर मंत्र --अरहंत- २ अक्षर मंत्र.-मिद्ध---- १ अक्षर मंत्र--- पहला पंच परमेष्ठी नमस्कार रूप मंत्र १०८ बार जपना बराबर है । १६ अक्षरका मंत्र २०० वार जपनेके, यह बराबर है। ६ अक्षरका मंत्र ३०० वार नपनेकै, यह यराबर है, ४ अक्षरका मंत्र ४०० वार नपनेके. यह बराबर है १ अक्षरका मंत्र ५०० बार जपनेके*। इत्यादिक अनेक मंत्र पद हैं । इनके ध्यान करनेसे मने एकान्त होकर निजस्वरूपकी ओर दौड़ता है। इनका विशेष वर्णन शास्त्रके देखनेसे मालूम हो सकता है। यहाँपर लिखनेसे यह लेम्व बहुत बढ़ जायगा । प्रयोजन यह ध्यान में रखना योग्य है कि विना, संसार सम्बन्धी राग द्वेष छोड़े यह मंत्र पद भी, ध्यान किये हुए लाभ और वैराग्यको नहीं बढ़ाते हैं। अपने सूक्ष्म आत्माकी ओर अपने मनका लगा देना ही हमारा यमली मतलब है । इसीलिये ही पदस्थ ध्यानका अभ्यास है । जैसा कि श्रीमान जयचन्द्रनीने: * १ अक्षर मंत्री चापका नियम लोकमें नहीं पाया गया।
द्वितीय भागः
इस अडिल्लमें कहा है-
'अक्षर पद • अक्षरूपले ध्यान में ।
जे ध्याई इस मंत्ररूप अनमें ॥
- ध्यान पदस्थ जु नाम कहो मुनिरानने ।
जे यामें व्है लीन लहे निन कानमें ॥
अध्याय २९वाँ ।
रूपस्थ ध्यान।
सोरठा।
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सर्व विभुव जुत जानिये, ध्याचे अर्हन्त डूं।
मन यस करि मतिमान, ते पावै तिम भावकू ।।
अर्थात्-~-अपने मनमें अर्हन्तका स्वरूप विचारना सो रूपस्था
व्यान है अर्थात् अर्हन्त भगवानकै स्वरूपमें अपने मनको लगाकर
यह विचारना कि इन अर्हन्त भगवानने ज्ञानावरणी, दर्शनावरणी,
अंतराय, मोहनी ऐसे चार घातिया कर्माका नाशकर अनंत ज्ञान,
अनंत दर्शन, अनंत सुख और अनंत वीर्य प्रकट किया । केवल.
ज्ञानके होते ही समवशरणको रचना हुई । श्री जिनेन्द्र भगवान
सिंहासन पर अंतरीक्षमें विराजमान हैं । देवादिक नाना प्रकारको
भक्ति कररहे हैं । भगगनके रागडेग, भूख प्यास, रोग आदि में
भी दोष अठारह दोषोंमें नहीं है । भगवान शांत सरूप देने हो
भव्य जीवोंका चित्त कमलकी भांति प्रफुल्लित होनाता जिनकी
निरक्षरी वाणी सब सभा : उपस्थित ननोंके मन्द
निसको सुनकर ही जीव धर्मकी ओर गमन को है।
--
(९२)
उनकी मूर्तिका ध्यान करते करते यह ध्यानी उन्हीं में तन्मय
गाता है अर्थात एकमेक होनाटा है । तर मनकी गृत्ति
होनाती है कि किस समय मन और यस्तुओंसे हटाकर
किया उसी समय मनमें श्री अरइतकी वीतराग मूर्ति
झलकने लगती है । इसी तरह अभ्यास हो नानेसे ऐमी,
ध्यानीकी हो जाती है कि स्वन्नेमें भी अरहंतकी ..
दीखने लगती है। फिर यह विचार होता है कि सवा
भगवानकी आत्मामें और मुझमें कुछ भी भेद नहीं है । जो दे
हैं सो में है, क्योंकि इस आत्मामें यह शक्ति है कि निस विषय
ओर इसको जोड़कर ध्यान किया नाय उसी विषयकी सिद्धि प्राप्त
कर सकता है। यदि राग तथा क्रोधरूपके ध्यानका अभ्यास करे
तो जगतमरमें क्षोम पेदा कर दे, और जो वीतराग होकर शुद्ध
खरूपका ध्यान करे तो शुद्ध स्वरूप हो नाय । नेसे फटिकमणि
निर्मल होती है, उसके नीचे निस रंगकी चीन रखदे उसी दीका
रूप लिखलाई दे सकता है।
अध्याय ३० वाँ।
रूपातीन ध्यान।
दोहा।
सिद्ध निरंजन कर्मविन, मूरति रहित अनंत ।
जे व्या परमात्मा, ते पर्वि शिव संत ॥
भावार्थ-सब कर्मोसे दूर पुद्गलकी - मूरतको नहीं रखनेवाला
अनंत गुणोंके भंडार ऐसे सिद्ध परमात्माका नो ध्यान है यह
..
-
L
तीय माग. N रूपातीत ध्यान है। ध्यानका विचारनेवाला यह विचारता है कि लोई, अर्थात् सः अहं अर्थात् नी बह है सो मैं हूँ । अर्थात् भेरी, शक्ति और सिद्ध भगवानकी शक्ति एक ही साथ है । जैसे वह सर्व संसारके प्रपंचरूप विकल्प नालोंसे रहित राग और द्वेपसे अत्यन्त दूर आनन्द रूप है, वैसे मैं हूं। जैसे वह तीन लोक अनेकका ज्ञान धारनेवाले हैं वैसा मैं हूं। उनमें मुझमें जाति अपेक्षा कोई भेद नहीं है। किन्तु भेद केवल यही है कि उनके गुण शानपर घिमे व पालिस किये हुये नगीनेकी भांति झलक रहे हैं। और हमारी आत्माके गुण खानसे निकले हुये पत्थरकी भांति दबे हुए हैं। यदि हम तप द्वारा इसकी पालिस करेंगे तो यह भी सिद्धभगवानके सदृश हो जायगी। यह सिद्ध भगवान ज्ञानानंद स्वभाव है सो मैं हूं। मैं अप- .'नेको सिद्ध भगवान ही मानता है। वह मेरे नातिक सम्बन्धी हैं। उनसे मित्रता करूंगा अर्थात् उनह कि गुणोंमें यदि मैं लीन हो. जाऊंगा तो उनके गुण भले मित्रकी तरह अपनेमें मुझे मिला लेंगे, : इसमें कोई भी सन्देह नहीं है । 'इन प्रकार सर्व संसारसे मन हटाकर जो निन आत्माको सिद्ध मान कर ध्यान करते हैं वे अभ्यासके क्लमे कर्मोंको नाश कर उस रूप ही हो जाते हैं। :: यह ४ प्रकारका धर्म ध्यान परमानंदका करनेवाला' तथा , शुक्ल ध्यानका पैदा करनेवाला है। आगममें साधारण रूपसे धर्म ध्यान के ४ भेद यह भी कहें है-भाज्ञा विचय-अरहंतकी आमाको शास्त्रद्वारा जानकर विचारना जिनदमनदांव इससे परिणाम शुम होने हैं। अपाय विचय-कफि दूर करने के उपाय विचारते रहना । विप्रवचय-फकि पलमा विनाग्ना कि संसारमें जीव अपने पुण्य तया पारक यशमें होकर तरह ताके, दुःख सुम्ब पाने हैं। मन्थान विचय-तीन लोकका स्वरूप तथा पर्य नरकादिका वर्णन विचारना। यह धर्म ध्यान वीतराग परिणामोंका कारण है। ऊपर कहा हुआ पिंडस्य पदास्यादि ध्यानका अभ्यास पीत. -राग रूप होकर किये जानेमे हमारेमें शुद्धता होती नायगी। ज्यों ज्यों शुद्धता होगी त्यों त्यों फर्मोको निरा होगी। यही शुद्धता जब अधिक हो जाती है, तब शुष्म ध्यान पैदा हो जाता है। यह गुरु ध्यान बद्ने पढ़ने केवलज्ञानको पैदा कर देता है । इस ध्यानके फलसे यह जीव फोक कोडोमे हलका होता हुआ स्वर्ग, ग्रीवक आदि गतियोंमें पहुंच जाता है । पिर धीरे धीरे तो मोक्षके फलयो प्राप्त फ ता है, नेमा कहा है- म. ज्ञान समुद्र रहां मुग्व नार पदारध पंकति ग्न विचारो। राग विरोध विमोह कुन्तु मलीन करे तिनि दूर बिडारी ।। शक्ति सम्भारि करो अवगाहन निर्मल होय सुनत्व उपारो। ठानि क्रिया मम गुन भोमन भोगत मोक्ष पयारो॥२५॥ इसायममारी जीवों को अपने लगे हुए. फर्माको दूर कर. नेके लिये १२ प्रकार तपके द्वारा कर्मकी निरा करनी चाहिये । जो इम टत्तम उपायको पहचानकर फिर भी दील करते हैं उनके ‘लिये फिर सुधारका मौका आना एक कठिन पदार्थ है, क्योंकि - .
द्वितीय भाग वह तीन मानसिक शक्ति जोकि मनुष्य गतिमें प्राप्त होती है, और किसी भी मनुष्य गतिसे.हीन तिय गदि गतियों में नहीं प्राप्त होती है। देवगतिमें इन्द्रियोंको लुभानेवाले कार के विशेष होनेसे यह जीव उन्हीमें मुग्ध हो जाता है । और नंकि मनुष्य जन्म उत्तम समागम अनन्त जन्मोंके भीतर घूमते रहने हुए किसी कारण- विशेषसे प्राप्त हो जाय तो हो जाता है। ऐसे जन्म पाने पर फिर भी जो उन काँके नाराका उपाय नहीं करते हैं कि जिन फकि कारण यह जीव सदा काल दुःख पाता रहा तथा यहां भी दुःख पा रहा है, तो हम तो उस व्यक्तिको विचारशून्यके सिवाय कुछ भी नहीं कह सकते हैं। 'इसलिये जो इस नर देहीको सफल करना चाहें उन्हें आन- फलफा मुंह नहीं ताकना चाहिये, किन्तु मच्चे हृदयमे अपनी इस आनकल करने में नाश हो जानेवाली पर्यायसे अपनी आत्माको भला लेना चाहिये । कलको यह न रही तो पछताना होगा कि हाय, हम चाहते थे कि इस नर देहीमें अपने पूर्व बांधे कर्मोंकी निर्जरा करे । हाय अब क्या करें, अब तो यमरानके मुखमें चले जा रहे हैं। ग " 4 अध्याय ३१. वाँ मोक्षतत्व । सातवां तत्य मोक्ष है। जब इस जीवसे चार धातिया कमकि . पुद्गल भिन्न हो जाते हैं, तब यह जीव जीवन्मुक्त हो जाता है.. अर्थात् अरहंत होकर आत्मीक सुख भौगता है। इस दशा में जिनेन्द्रमंतदर्पण ४ अघातिया कर्म जली हुई रस्सीकी भांति बाकी रहते हैं, निनका फल उप्त अरहंत आत्माके अन्दमें किसी प्रकार बाधक नहीं होता।" यह आयु नाम, गोत्र, वेदनी रूप चार कर्भ भी जब: बिलकुल छूट जाते हैं तब यह आत्मा शरीरसे निकलते ही एक समयमें सीधा सिद्ध लोकको पहुंच जाता है । जैसे एरंडका चीन फली के फूटते ही ऊपरको जाता है व अग्निकी लव सीधी उपरको उठ जाती है और यह सिद्धामा लोकके ऊपर उसी स्थान तक जाता है जहां तक धर्म द्रव्य है । उस सिद्ध लोकमें: अपने अर्हन्तके शरीरसे कुछ कम चैतन्य रूप शरीरको धारता' : हुआ अपने ज्ञानमें अनंतकाल तक मगन रहता है। फिर उस सिद्धात्माको संसारमै आकर जन्म मरण करनेकी आवश्यकता नहीं रहती । यह मोक्ष तत्त्व है। इस प्रकार इन सात तत्वोंका स्वरूप मानकर जो अपना विश्वास निर्मल करते हैं ये सम्यक दर्शन पाते हैं और उसी समय उनका ज्ञान सम्यक् ज्ञानरूप और आचरण सम्यक् चारित्र रूप हो जाता है। निसके जीवात्मा व उसके साथ संबंध रखनेवाले पुद्गल बादिका श्रद्धान भले प्रकार हो गया है, वह वाणी नियम न होने पर भी जुआ खेलना आदि सात व्यसन जो कि प्रत्यक्ष हीमें दुःखके कारण हैं कदापि नहीं करेगा । सत्य वचन बोलनेका नियम न होने पर मी मुखसे कभी परको दुःखदाई ऐसे मृढ़ बचन न निकालेगा, क्योंकि उसके पहले ही आश्रय तत्त्व और उसके । कारणोंका श्रद्धान हो गया है। यह जानता है परको असाता यहुंचानेसे असाता वेदनी कर्म बांधना पड़ेगा निसका फल मुझ ही १ . । .
इसीके अंतर्गत और भी कई न्यूटना विषयमें हैं। इनका विशेष वन्न दाना द्वितीय भाग (९७) को कडुवा मिलेगा। इसीलिये सम्यकदृष्टि होना धर्मिष्ट होने मंड पक्की करना है । विना सम्यक् हुए हिंसा न करने, झूठ बोले आदिके नियम समय पाकर टूट जा सकते हैं।' इन सात तत्वोंका ज्ञान बढ़ाने के लिये हमें नित्य :शा स्वाध्याय करना चाहिये, ताकि हमें इनका ज्ञान और नीट का और उसीके साथ अपने आचरणको भी धारणा हमाग - आवरणके नियम मुनि और श्रावकके लिये हैं-अहिंसा, सत्य, असत्य, ब्रह्मर्य और परिग्रह कर व्रतोंको पुर तौरसे पालना महाव्रतके धारकं निक और इन्ही ५ व्रतों को थोडा पालना श्रावक श्रावक स्थूल (स) हिंसा न करके सूदन-इ- जीवोंकी वाधा नहीं बचा सकता है । सत्य के जलने दोष नहीं समझता जिससे किसी दूसरे र करनेमें सर्व स्थानों में रहनेवाले जल व = है। मुनि बिना दिया जल भी नहीं लेने का अवलोक स्वस्त्री संतोष नाम व्रत होता है | ली है। परिग्रहमें श्रावक अपने वर्तने यो कन्ट्रीय है जब कि मुनिके गिनती न होग कई निल्दमें समय पाकर किया जा g ग A 4 ।
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