Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Jain Lak Sanghar-1
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SAIEN INS GRISEHONS. जैन लेख संग्रह। भारतके प्राचीन इतिहासके प्रमाणोंके प्रधान साधन लेख ही है। विशेषतः जैनियोके सिलसिले वार इतिहासके अभाव में इन्हो के लेखों का संग्रह बहुत ही आवश्यक है। इतिहास का बहुतसा भाग शिलालेख पर निर्भर है। जो वात शिलालेखले जानी जा सकती है वह इतिहाससे नहीं, क्योंकि इतिहास में समय परिवर्तनसे फेरफार पड़ जाता है शिन्तु पत्थर पर जो कुछ लिखा गया वह पत्थर के अन्त तक यना रहता है। अतएव लेखो से इतिहास को पात सी सहायता मिल जातो है । यह भानन्दकी बात है कि आज कल यातसे सज्जनोंकी इस पर दृष्टी भी आकर्षित है। मैं इस विषय पर अधिक लिखकर पाटकोका समय नए फरना नहीं चाहता. किन्तु संक्षेपमे कुछ सूचना देता है ताकि इस ओर और भी लोग ध्यान देकर ऐसे संग्रहसे लाभ उठायें वीर मेरा परिश्रम सफल करें। मुझे लेगों का पाहुन दिनों से प्रेम था, खास करके हमारे जैन लेख देखते ही मेरा जी हराभरा हो जाना था, परन्तु भाजी जर्नल, पत्रि. रिपोर्ट और स्वदेशी भाषाके पत्र या पुस्तको मे लेप देखने के सिवाय स्वयं कोई लेग देगने का अवसर न मिला था। कुछ दिनोंसे यह जैन लेखों को उपयोगिता मेरे मस्तिष्क मे ऐसी घुम पड़ी कि जहा पाहीं मिमी पाग लेखका राल सुना या किसी मन्दिरादि स्थानो मे गया तो वहां के लेख देरो बिना चित्त को गांनि नही होती थी। इन कारण मैंने स्वयं जो लेख पढे है इतने इकडे हो गये कि उनका एक संग्रह हो सकता है।मी मिनारमे या पार्यों में प्रत्त हुभाइ मेरा संस्कृत आदि भागवोंमे अधिक प्रवेश नहीं है या में कोई वटा विद्वान नही, विशेष कर जैन शास्त्र मे मेरा सत्य प्रवेश है. इस कारण पटुन से लेप पटनेने नम हो गया होगा मो, धागा, शुपमा सुधो जन सुधार कार पटेगे। लेख पास दरको पत्थर और धातु पर ही होते है। पन्धर पका ले पातु से गीली जाना । म पारस प्रार पत्थर पर याद छातने असर हो जाता है। असार मविर पातु पदमा पधिप पाने प्रशासदिया।गो परम मित्र ने दावी रहती है- -- [] -- , . १। वर्ष, मास, तिथि, वार आदि।२ । वंश, गोत्र, कुलों के नाम । ३ । कुर्शिनामा। ४ । गच्छ, शाखा, गण आदिके नाम । ५। आचार्योके नाम, शिष्यों के नाम, पहावली । ६ । देश, नगर, ग्रामों के नाम । ७ । कारिगरों के,खोदनेवालों के नाम । ८। राजाओके, मंत्रियों के नाम। ६ । समसामयिक वृत्तान्त इत्यादि। ऊपरोक्त विवरणो मे जैन श्रावकोंकी ज्ञाति, वंश, गोत्रादि और जैन आचार्योके गच्छ शायादिको दो सूनी पाठकोंकी सेवामें उपस्थित की जायगी, जिसमे सुगमता के लिये (१) जाति, वंश, गोत्र (२) संवत्, आचार्योंके नाम और गच्छ रहेगा। सुज्ञ पाठकगणको ज्ञात होगा कि बहुतसे लेगोमे वंश, गोत्रादिका उल्लेख पूर्णरीतिले पाया नहीं जाता है:-जैसे कि कोई २ लेख में केवल गोत्र ही लिखा है, जाति, वशमा नाम या पता नही है। ज्ञाति वंशादिके नाम भी कई प्रकारसे लिखे हुप मिलते हैं, जैसे कि "ओसवाल" ज्ञातिके नाम लेखोमें आठ प्रकार से लिखे हुए मिलते हैं [१] उपकेश [२] उकेश [३] उवएश { ४] ऊरश [५] उयसवाल [६ ] ओसलवाल [9] ओश [ ८ ] ओसवाल। लिखना निष्प्रयोजन हे कि यहां मूनीमें ऐसे आठ प्रकारके नामोंको एक 'ओसवाल' हेडिङ्ग में दिया गया है। इसी प्रकार कोई २ लेखोंमे आचार्यों के नाम, उनके शिष्योंके नाम, गच्छादि का विवरण पूर्णतया नही है। प्रतिष्ठास्थानोंके नाम भी बहुतसे लेखोंभे बिलकुल नहीं है। पुरातत्त्वप्रेमी सजनगण अच्छी तरह जानते हैं कि प्राचीन चिपय में ऐसो बहुतसी कठिनाइयां मिलती है, स्थान २ मे प्राचीन लेख घिस गये हैं, इस कारण बहुत सी जगह प्रयत्न करने पर भी खुलासा पढ़ा नहीं गया है। यह "लेख संग्रह" संग्रह करनेमे हमें कहां तक परिश्रम और व्यय उठाना पड़ा है सो सुज्ञ पाठक समझ सक्त हैं ; "नहि वन्ध्या विजानाति गर्भप्रसववेदनाम् ।” अधिक लिखना व्यर्थ है। यह संग्रह किसी भी विषयमे उपयोगी हुआ तो मैं अपना समस्त परिश्रम सफल समझंगा। आशा है कि और २ आचार्य, मुनि, विद्वान् और सज्जन लोग भी जैन लेख संग्रह करनेमें सहायता पहुंचा। और उनके पास के, या जिस स्थानमें वे विराजते हों वहांके जैन लेखों को प्रकाशित करें तो वहुत लाभ होगा और शीघ्र ही एक अत्युत्तम संग्रह बन जायगा। किं बहुना । इ. स. १९१५६ निवेदक- पूरणचन्द नाहर।
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[स] पत्रांक ... २२० ... २२९ ... + , ... ... २३१ ... पत्रांक चिन्तामणिपार्श्वनाथका , १८० होकिंद। कड़लाजीका १८६ বানী মনি महावीरजीका सेवाती। तपगच्छका उपाधय १८१ मदायोरजीका मन्दिर ओसिया। सांडेराव । महावीर स्वामीका मन्दिर १६२ शान्तिनाथजीका मन्दिर सचियाय माताका १६८ नाना। डुंगरीके चरण पर १६६ पालो। जैन मन्दिर लालराई। नौलखा मन्दिर गोडीपाश्वनाथका मन्दिर २०४ / जैन मन्दिर लोढारो वासका ... २०५ हटुंदी शान्तिनाथजीका महावीरजीका मन्दिर सोमनाथजीका माताजीका नाडोल। खएडर में मिला हुआ पत्थर पर आदिनाथजीका मन्दिर २०६ जालोर। ताम्र शासनमें २०६ महावीरजीका मन्दिर नाडलाई। चोमुखजीका अदिनाथजीका मन्दिर २१२ । तोपखानामें नेसिनाथजीका .. २१७ हरजी। कोट सोलंकी। जैन मन्दिर जैन मन्दिर घाणेराव। जैन मन्दिर जैन मन्दिर घेलार। जना मादिनाथाजीका मन्दिर फलोदी। नगर गांव। २२१ जैन मन्दिर .. ३३३ " २३४ '. २४९ २४३ २३८ २४३ जना। २४४ . बेडा। जैन मन्दिर २४५ बड़ा जैन मन्दिर ... ... :1 २४७ - [ 7 ] এস वघीणा .. लोज-तोतोडा नोदिया ... कोटरा ... पत्रांक सांचोर जैन मंदिर २४८ जैन मन्दिर रत्नपुर जैन मंदिर २४८ जैन मन्दिर बिलाडा जैन मंदिर २५० जैन मदिर योहिया (मारवाड़) जैन मदिर २२ जैन मंदिर मोटार गोड़वाड़ जैन मन्दिर विराडू एमापानका जीर्ण मन्दिर सुंधा पहाडी जन मन्दिर घटियाला नमन्दिर ਵਟ। नमन्दिर वीरवाहा वरमाण ... २६ ठोटाना ... .. मायरोरा ... ... प्रमाली ... नीश সে এখন ... बसंतगट अजारा पारवनाथ पालही शापडापाग्याय बालाजर ... पटना न्यायम [2] लेखांक १५६ १७३ ४८२ ४७१ ... ... ... ... ... ... M लेखांक प्रतिष्ठा स्थान । कलागर (कालाजर).. काकंदी अजमेर ५६६ । काकर अजिमगञ्ज (मुर्शिदाबाद) ८५।७६।१४२ | कायपा अतरी ४० कालघरी अलवर १००० कालपुर अष्टार कास्माबजार (मुर्शिदाबाद ) अहमदाबाद ६६१७११११२६३५६०३६०३३७२।३८२, कीराट कूप ४४४५२६ । कोठारा अहिलाणी ४४८ कोरडा आगरा २०५।३०७१३०६५३१००३११ खहेडा '३२२१४३३१५०६ । खुदीमपुर आमेण ... १२५ | गणवाड़ा आरामपुर ३२७ गंधार आवरणी ७६८ गुनशिला भासलपुर ८५६ गुव्वर ग्राम (वड़गांव) ६२७ ग्रेहडी ५२६ । गोरईया उदयगिरि ( राजगृह)' २५३।२५४।२५५ गोलकुंडा उदयपुर ६४५/७४४ गोलीपा उन्नतनगर ६८७ चंपकदुर्ग उपकेश ( ओसिया) १३४ चंपकनर उमापुर ४८ चंपानगर जुवालुका कढ़ी ३५ चिमणीया- कमलमेरु ४८३ | चुंपरा ग्राम कर्पटहेटक ६८१ जयनगर ... ८१६८४ ६४२ ६५२ १०६ ८९६ २२१ ६४७ ३९६६०८०६५३१७६६ १७७।१८।१७६/१८० २७१ ... ... ... ... ... ३ इन्द्रप्रस्थ (दिल्ली) 99२ ... ४७६ ८५० ... ... ३३६ / चंपापुरी १४३११६५ १३७५१४६।१५८ ५१० . ६२४ १६३ ... २९ जलवाह जधाच ६७४/७५/७६ ... १६ लेखांक ... আমার जालोर ... लेखांक २८३ / नन्दियाक ( नोदिया) ८३७१६०५ ल ७१५ नलीतपुर ८९६18 नागपुर ६७३६७६ नाणा ६०७ : नापलीया ... ६५४६५५ ५८१६१३ ... C६० ... ... पत्तन ... २१॥२१॥५४.२१६९५५ ५०४।५४१३५६५६८१८५१ ६१२८२८८३८ १२१ पाटन पलिका ५६८ पालिका ४२१ .. जावरनगर ताबालीपुर जीरावला पार्श्वनाथ जीर्णदुर्ग जैनगर जोधपुर नमय हिंडिला प्राम देढया तिजारा दंतराई धालीया दिति दिवसा हिपरन्दर देवर पसन धधरा धमरा (एच्छ । ८०६१८१३३८१४।८१५.८३२ ... ८२५८२६८७ ... ४६६ पानि ५-६ पाटलिपुर ६८ ... :: ... १३. ... पाटलपुर पटल पुन .. ... ... ... ... ... इया दुल पाटन पालई १२१ पटत पनीर ८३६८11८.८६. पवर्ग ६४२ टिकट ८३11४९ टकट १८... पर गिर ... . + ... : ... ... CES -- ...
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जैन लेख संग्रह।
पूर्व ।
जिला मुर्शिदाबाद । स्थान अजिमगञ्ज ।
श्री सुमतिनायजी का मन्दिर ।
धातुपों पं. मान पर ।
I
हैं। श्री सवाल हे अत्तानृकेन कारित ॥ संतु १.११.० ४ ।
नाहान पर्वमा निहित जिनालयों में यह मन्दिर मामा मात्र भाग विद्यमान 7
प्रनिनि नयामा नबीच सह गुजराती नमुः दयनीर परम पिना गर मेगा
कार महान है। दुई मन्दिर 7. 7 जानेमे आर पर नन ने मंचन "...
नि:::-
दि
5 :
मनमः
.
.
(
म पनि विवाद
पन नं 17177
जिप रा मन..
रामनवीर र समान
--
[12]
मंचन रए०० मिति आषाढ़ सित ए गुरौ श्री आदिनाथ विंचं प्रतिष्टितं । बृहत खरतर
नधारक गठेश नम्। श्री जिन दर्प पट्टे दिनकर जा श्री जिन सौलाग्य सूरिनिः कारितंच
श्रीमान बंशे टाक गोत्रे मोठ्या दास पुत्र हनुतसिंहस्य नार्या फूलकुमार्या स्यश्रेयो) ।
॥ श्री नेमिनाथजी का पंचायति मन्दिर ।
[13]
in ??? य८ माघ सु० ५ सोमे उसवाल ज्ञाती लिगा गोत्रे समदडीया उडकेण
मा० सदागद पु० कम्माकेन ना कस्मीरदे पु० हेमा संसारचंद देवराज युतेन
- श्री नमिनार वियं कारितं श्री उपकेश गछे श्री कुकुदाचार्य संताने प्र० श्री कर
[14]
+
T.: 1 याय यदि ४ गुरो उसवाक्ष झातो कटारीया गोत्रे सा सरवण
१, सिंघा ना माममिरि मुसा यापु नाम्ना नार्या विरणि सुत सारा
मपनि प्रमुग्य कुटुंब युनेन स्वश्रेयसे श्री पार्श्वनाथ विंबं कारित
च - श्री मामा मुरिनिः ॥ श्री ।।
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157
}
६ वय , दि . माघाट डा व्यत्र पना नार्या मदी
नमः' मना देवा मतेन वपुर्विज्ञ श्रेयाय श्री शांनिनाथ ।
देवावर कमल कप्तम मृरिनिः सिम्त्रा बास्तव्य ।
सुन
*.
६.
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. . ट , तो जवाट बाम्नव्य छुवट झानीय मंत्रीश्या गो
दो साक्षेमाकेन ना० राणी स० श्री पार्श्वनाथ विवं का० प्र० श्री तेजरत्न सूरिनिः ॥ ॥ श्री चिंतामणि पार्श्वनाथजी का मंदिर ॥ [17] संवत १५०५ वर्षे माघ वदि ५ रवी उशवास ज्ञातीय जएकारी गोत्रे साप गेल्हा पुरु सोपी ना पोलश्री पुण् हराकन आत्म पुण्यार्थ श्री अनिनंदन विवं कारापितं प्रतिष्टितं श्री धर्मघोष गहे न श्री विजयचंड सूरि पट्टे श्री साधुरत्न सुरिनिः। [18] संबत १५२५ वर्षे वै० व ११ बुधे लांबडी वास्तव्य उकेश ज्ञातीय व्य० षीमसी नाप वान पुत्र व्य गणमा नावाबू पुत्र व्यण केव्हाकेन नाण मानू वृद्ध नाग घूघा पुत्र मेघादि सुटुंब युतेन श्री मुनिसुव्रत स्वामी चतुर्विशति पट्ट कारितः प्रतिष्टितः ॥ वम्रगत चांसगीया श्री मर्त सूरि श्री उकेश विदणीक गले प्रतिष्ठा कारिता । * (अक्षर अस्पष्ट है)। [ 107 संवत १५२७ वर्षे माघ वदि ५ शुक्रे मंत्रि दलील वंश उवह गोत्रे उ० पाहणमीकेन पुण् वा कर्णसी व उन्नयचंद व हेमा पुत्री अजाक्ष सहितेन परिवार युतेन श्री शीला नाथ विवं कारितं श्री खरतर गहे श्री जिनसागर सूरि पट्टे श्री जिनसुंदर सूरयन्तन्य श्री जिनदप सूरिभिः प्रतिष्टिनं । :20 संवत १५६३ वर्षे माह सुदि५ गुगे प्रेष्टि गोत्रे नायना जाय बासदे मुझदा ना पव्द सुलिस हिरा सांवा सपा युनेन श्री पद्मप्र वि कान्निं उपकंग गई ककुदा. चार्य संताने जय श्री देवगुप्त मुरितिः प्रतिष्टितं ।।
[12] संवत १०० मिति भाषाढ़ सित ए गुरो श्री आदिनाथ विं प्रतिष्ठित वृहत खातर नहारक गधेश जा। श्री जिन वर्ष पढे दिनकर जा श्री जिन सोनाग्य मुनिः कारितंच श्रीमाल वंशे टाक गोत्रे मोहया दास पुत्र हनुतसिंहस्य नार्या फुसकुमार्या स्वश्रेयोर्थ । ॥श्री नेमिनाथजी का पंचायति मन्दिर ॥ (133 संवत १५११ व० माघ सु० ५ सोमे उसवास ज्ञाती लिगा गोत्रे समदडीया उडकेण सुड्डा ला सुहागदे पु० कम्माकेन जा कस्मीरदे पु० हेमा संसारचंद देवराज युतेन स्वश्रेयसे श्री नमिनाथ विवं कारितं श्री उपकेश गछे श्री कुकुदाचार्य संताने प्र० श्री कक सूरिनिः। [14] संवत १५२३ वर्षे वैशाख चदि ४ गुरौ सवाल ज्ञातो कटारीया गोत्रे सा सरवण ना राणी सुत सारा सिंघा ना० सोम सिरि सु० सा आफु नाम्ना नार्या विरणि सुत सा पुनपाल सा० सोनपास सुरपति प्रमुख कुटुंब युतेन स्वश्रेयसे श्री पार्श्वनाथ विंबं कारित प्रतिष्ठितं च । श्री लक्ष्मीसागर सूरिनिः ॥ श्री॥ [15] संवत १५५३ वर्षे बैशाख सुदि छ प्रान्बाट झाप व्यव० पेता जार्या मदी सुत व्य नोजाकेन ना राजू जात राजा रत्ना देवा सहितेन वपुर्विज श्रेयोर्थ श्री शांतिनाथ विध का प्र० तपागच्छे श्री हेमविमल सूरि श्री कमल कलस सूरिनिः सिरुत्रा वास्तव्य । [16] संवत १६१५ वर्षे वैशाख वदि १० जौमे जवाब वास्तव्य हुक्ड ज्ञातीय मंत्री श्वर गोत्रे दोसक्षमाकेन जाग राणी स० श्री पार्श्वनाथ विवं का प्र० श्री तेजरत्न सूरिनिः ॥ ॥ श्री चिंतामणि पार्श्वनाथजी का मंदिर ॥ 1177 संचन १५०५ वर्षे माघ वदि २ रबो उशवाश झातीय जएकारी गोत्रे साप गेल्दा पुण् नोपी ना० पोलश्री पुण् इराकन आत्म पुण्यार्य श्री अनिनंदन विवं कारापितं प्रतिष्ठिनं श्री धर्मघोष गठन श्री विजयचंड सरि पट्टे श्री साधुरत्न सूरिनिः । 1187 संवत १५२५ वर्षे 40 व० ११ बुधे खांबडी चान्नध्य उकेश कानीय व्य० पीमनी जान वान पुत्र व्य गणमा नादात्र पुत्र व्या कलाकेन ना मान वर जाप घया पुत्र मेघागि इटुंब युनेन श्री मुनिसुव्रत खानी चतुर्दिशनि पहफामिः प्रनिहितः ॥ ९ बन गत चांउ सगीया श्री मर्न मृरि श्री उकेश विदणीक गई। प्रनिता कान्तिा। * ( अक्षर पट। संवत १५२७ ८ माघ वदि ५ हात्रे मंत्रि दही वंटा पुनद गोत्र व पादामकिन पुट न० कासी ०८ उनादक मा पुत्री हा महिनेन परियार युतन श्री मात्र दियं वारि श्री बग्नर नोश्री जिनसागर सहि श्री जिनमुंदर मृग्यम्नान धी जिनप्रिनिEि : ० मंकन :ए पंदन::": दददः इदान पहिला दिनमा भाई ने मान : .
-
सुत सं० समरसी नार्या धनाश् सुण रा० अर्जन केन नार्या अदिवदे पु० सं० राणा शाणा
प्र० कुटुंब युतेन स्वश्रेयसे श्री वासुपूज्य विंबं कारि० प्रति श्री बृहत्तपा श्री ज्ञानसागर
[21]
संवत १६३० वर्षे माघ सुदि १३ दिने पत्तन वास्तव्य सा० सांडा नार्या खपमा मुन
बीर पालेन जार्या रंगार प्रमुख कुटुंब युतेन श्री संजवनाथ विवं कारित प्रतिष्ठितं नया
गछाधिराज श्री हीरविजय सूरिनिश्चिरं नंदतात् ।
[22]
॥ रौप्य के मूर्ति पर ॥
संवत १९३३ का जैष्ठ शुके १३ शनिवासरे श्री शांतिजिन पंचतिथीका उप्स अंश
ड़िया गोत्रे बाबु हर्षचंद तत्पुत्र घाबु विसनचंडेन कारितं पुनमिया विजय गठे श्री शांति
सागर सूरिनिः प्रतिष्ठित
॥ श्री संनवनाथजी का मंदिर ॥
संवत १५११ बर्षे ज्येसु ३ गुरौ दिने ऊ ज्ञातीय श्री वरसद्ध गोत्रे नाथु
राजा ज्ञार्या राजलदे सुत सह सावलू राणा हुदा श्री मल्लयुतो पितृ मातृ श्रेयसे श्री चंद्र
प्रन स्वामी विवं कारित प्रतिष्ठितं श्री बृहम श्री मुनिशेखर सरि संताने श्री महेंद्र सूरि
पट्टे श्री श्री श्री रत्नाकर सूरिनिः शुनं ॥
संवत १५४६ बर्षे माघ सु० १० रवी श्री श्रीमाल झा सं० जूनच चार्या सं० ज्ञरमादे
सुरि पट्टे श्री उदय सागर सूरिभिः । वुगुज ग्राम ॥
[23]
संताने
[24]
[25]
संवत १५६३ वर्षे माह यदि ११ दिने रखो श्री श्रीमाल ज्ञातीय सघु शापायां । व्या
केसव ना जरमी सुत व्य० वीका नाप संपू । नाण व्यश्रासाकेन नार्या अमरादे जात
पण साडण प्रमुख झुटुंच युतेन श्री वासुपूज्य चतुर्विंशति पद कारितः प्र० श्री सूरिनिः श्री
स्तम्न तीर्थे । कृतवपुर वास्तव्यः ॥ शुलं लवतु।
126]
संवत १५७५ वर्षे वैशाख सुदिप सोमे उस्वास ज्ञातीय सूराणा गोत्रे साइ शिवदास
जिनदासकेन रहे नार्या नाई नारिंग सुत नात राजपाल सहितेन मातृ नारिंग श्रेयोथं श्री
कुंथुनाथ विदं श्री चतुर्विशति जिन सहित काराचित प्रतिठितं श्री धर्मघोप गछे नंदिवलन
सुरि पदे नयचंद सुरितिः ॥
[27
संवत ११०० वर्ष फागुण सु०१२ -
ग जटवारक गुनकीर्ति उपदे-
सात् अत्ताल हाती गोपख गोत्रे लं । दोर राज ना सदस पुत्र सं० चन्द गगनायी जी।
पुत्र लालूमणी नित्यं प्रणमंति ॥
15
॥श्रीशांतिनामजी दादि ।
संपत १५१९ प पोहु. १५ शुरे. उदा हातीय प. निवा नाप्रीमद नुन का
रामादेन जा बार प्रमुख इंदर पुन निज पर श्री हनदिनाम दियं का प्रः श्रीना
दश नापीसीबीरलार हनिमः !
मारना
स
+
संचन १६९ र
.
(८) घिरी सुलूणी पुण् थावरसिंह । जटादि युतेनं खश्रेयोर्थ श्री पार्श्वनाथ विवं का प्रण श्री खर सर गछे श्री जिनन सुरि पदे श्री जिनचं सुरिनिः। . ॥श्री सांवलियाजी का मंदिर - रामबाग ॥ [30] लाडो संवत १५४६ माघ बदि ४ सुचिंतित गोत्रे साप सोनपाल सुण सा दासू ना नाम्न्या पु० सिवराज नार्या सिंगारदे पु० चूहड़धन्ना आसकरणादि सहितया स्वपुण्यार्थ श्री अजितनाथ विवं का प्रण उपकेश गछे कुकुदाचार्य सं० श्री देवगुप्त सुरिनिः॥ जिला - मुर्शिदावाद । स्थान - बालूचर । ॥ श्री थादिनाथजी का मंदिर ॥ [31] बास्तव्य पत्थरों परका लेख। ॥ शी जिनाय नमः ॥ शी मविक्रमादित्य राज्यात् संवत 2.४५ मिते। श्री शालिवाहन शकाव्दाष्ठके १५१० प्रवत्तमान । मासोत्तम माघ मासे शुक्ल पक्ष ३ तृतीयायां तिथौ गुरुवासरे श्री तपगहाधिगज जट्टारक श्री विजय जैनेंद्र सुरीश्वर विजय राज्ये । महिमापुर जानी गोत्र। साइजी श्री जीरणदासजी तत्पुत्र धर्मजार धुरंधर माइजी श्री केशरी मंदजी नन्यसायी धर्म कर्मणि रता वीवी सरूपाजी पं। श्री चावबिजय गणरुपदशात् । जिन वियं स्थापनार्थ ॥ बालोचर नगरे श्री जिन प्रासाद कारितं । प्रतिष्टितं पं नाव विजय पं गंजीर विजय गणिनिः। यावत्वरातुमेरोति। यावलोक्य जाखरं । तावत्तिष्टतु प्रासादं निकिन्तु मुनिश्चलं ॥ १॥ विधिकृतं पं० नूप विजयेन ।
(९) [32] श्री जिन शासनो जयति ॥ श्री मत्तपागण शुनांबर धर्मरश्मिः । श्री सूरि हीर विज- योति ज्ञान लक्ष्मी ॥ यस्योपदेश बचनाय्यवनेश मुख्यो । हिंसानिराकृत परो प्रगुणो वन्नूब १॥ तत्पट्टे क्रमतारबीच विजय जैनें सूरीश्वर । स्तमाज्ये प्रगुणो जिनालय वरो वालोचरे इंगके ॥ श्री संघेश सहायता शुनरुचिः श्री केशरी सिंहक । स्तत्पल्या जिन राज नति वशतः कारापिनायं मुदा ॥ २ ॥ श्री वीर हीर सूरीश संघाटक गुणाकरः। वाचकोत्तम :: नूमान्यः श्री शद्धि विजयाजवत् ॥३॥ तछिन्य नाव विजयोपदेश वाक्येन कारित रन्य प्रतिष्ठितं च सदनं जिन देव निवेशनं । शुजतः ॥४॥ नइंजवतु संघन्य नइंप्रासाद कारके तया न तपा गह नई नवतु धर्मिणां ॥ [33] ॥ धातुयोपरका लेख ॥ सवत १४ए वैशाख सुदि ५ जार जडिया गोत्रे । साप नोंदा सुत । सा पदाकेन पुन फासु रजनादि सहितेन खन्नार्या पदम श्री पुण्यार्य श्री विमलनाथ विवं श्रीदेसइंस सुरिनिः [34] संवत १५१३ वै सुदि ५ गुरौ श्री कुंबड ज्ञ.तीय फडी शिवराज सुत महीया श्रेयमे बात हीराकेन भ्रातृज इस्या सुतेन श्री शांतिनाथ विवं कारितं प्रति वृद्ध तपा पक्षे श्री रत्नसिंह सूरिनिः॥ 135 संवत १५२७ वर्षे माघ दि ५ जुरो जपकेश ज्ञातीय श्रेण तेजा ना तेजलद पुत्र जुवा ना पतलमादे पुत्र देवदास गणपनि पेपट जेसिंग पोचा युनेन करणा श्रेयोर्थ संजवनाय विवं का श्री साधु पुर्तिमा पक्षे श्री पुखचं सूरीणामुपदेशेन प्र० श्री विजय ना सुनिता कडी वान्तश्यः ।
(१०) [38] संवत १५३४ वर्षे शु३ दिने साथरसी नाया रानूं पुत्र सा लूणाकेन नार्या टीस प्रमुख कुटुंब युतेन स्वश्रेयसे श्री धर्मनाथ विषं कारापितं प्रतिष्ठितं तपा गछे श्री सभी सागर सुरिनिः पान बिहार नगरे ॥ [37] संवत १५५३ वर्षे माह सुदि ६ दिने वारडेचा गोत्रे सा कोहा ना० सोनी पुरा साह सीहा सहजासीहा ना होरूं श्रेयोर्थ श्री कुंथुनाथ विंबं कारित प्रश्री कारंट गले श्री--सूरिनिः। [38] श्रीचं संपत १५७० वर्षे थाषाढ़ सुदि २ रयो श्री श्रीमालान्वये डउडा गोत्रे साह पुत्र चौताव्दण अजय राजा रायमल थासधीर बाजा नार्या केली पुत्र सा योगा इव्हा शकतन पासा नरपाल साह सहसमल पुत्र चिः कीर्तिसिंह साह रायमर पुत्र हेमा गजपति उकुरसी । सा योगा पुत्र महिपाल ग० श्व्हा नार्या दणदे पुत्र सहसमझ सीमल साह थासधर नायर्या दासी सिंगारदे पुत्र राया शकतन जा० शकतादे पुत्र घेता जश्तमल । पेता पुत्र नैरोदास जश्तमलेन राया शकतन पुण्यार्थ: श्री शांतिनाथ चवीस पट्ट कारित श्री धर्मघोष गछे श्री साधुरत्न सूरि पट्टे श्री कमसप्रन सूरि तत्पट्टे श्री उदयप्रन सुरिजिः। श्री विमलनाथजी का मंदिर ॥ [39] संवत १४७५ पर्षे ज्येष्ट बदि ५ शनिः उगड़ गोत्रे सा धीटा पु० डाड़ा पुत्र साटा दारा रंग मुकनाच्या डाहा पितृव्य सा रूल्हा पुरा रेडा श्रेयसे श्री श्रादिनाथ विघं कारित प्रदतीय श्री थमन्प्रन सुरिनिः ॥ शुनं नवतुः । [40] संदत १५१५ २ः वः ५ अतरी ग्रामे प्राग्वाट साण्यासा ना संसारी पुत्र सा:
रोजर कर्म सीन ना सारू सुत गोइंद गोपा हापादि कुटुंब युनेन नातृज माइराज श्रेयस श्री मुनि तुव्रत बिंब का प्र० तपा श्री लोन सुंदर सूरि शिष्य श्री रत्नशखर सुरिनिः॥ [41] सं० १५५१ वर्षे वैशाख सुदि १३ दिने श्री उकेश वंशे सखवाल गोत्र सा लाला जाण लसनादे पुत्र साप जावडेन ना जवणादे पुन रायपाल तेजा बेला खीला रामपाल जायी आंबू पुत्र लोइंट प्रमुख सपरिवार युतेन श्री मुनि सुत्रत विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री खरतर गठे श्री३ जिनसमुज सूरित्तिः ॥ [42] डे संवत १५७६ वर्षे श्री खरतर गठ नाड़ीया गोत्रे साप नाथू पुत्र ताप पाव्ह सा टाकू ना नीमा रा-तटल्या मपली प्रमुख कुटुंबिल्या श्री आदिनाघ वि० का जप श्री जिनइंस सुरितिः प्रतिष्ठितं ॥ श्री॥ [43] सं १६५७ वर्षे ० श्रुप ए नौमे श्रीमाल ज्ञातीय ढोर गोत्रे ता धरमगज नायर्या धीर सुत ला लतीदात नार्या वाईआणी तान्यां पुण्यार्य श्री शांतिनाथ विवं कारितं प्र० न्नर- तर गछे की जिनचंड सुरित्तिः। श्री जिनतानु सूरीमानुपदेशेन । यताईः ४२ वर्षे श्री अकवर राज्ये। [44] ॥ रायके मुर्निर ॥ ॥ सं १९२८ मि। धातोज दिए नियो बुपयारेन। वाय श्री प्रतार निवजी नपुत्र सनीपत विपनाल नसिंच श्री दिजिन विज्ञानदिनं या पदासान प्रतिक्षितं ।। शांनि जि. नेम जिनं. पा जिनं. धीर जिनं परनिधी ! नि:मिनमर हद ॥ श्रीः !
-
संपत १४७२ वर्षे ज्येष्ट वदि ५ शनि उगड़ गोत्र सा० धीमा पुन डाड़ा पुत्र साटा
(१०)
[36]
संघत १५३४ वर्षे शु३ दिने सा० अरसी नाया रानूं पुत्र सा खूणाकन नार्या टीम
प्रमुख कुटुंब युतेन स्वश्रेयसे श्री धर्मनाथ विध कारापितं प्रतिष्टितं तपा गछे श्री सदमी
सागर सुरिजिः पान बिहार नगरे ।
[37]
संवत १५५३ वर्षे माह सुदि६ दिने वारडेचा गोत्रे साकोहा जा सोनी पु० साह सीहा
सहजासीहा ना होरं श्रेयोर्थ श्री कुंथुनाथ विवं कारित प्रश्री कारंट गछे श्री--सूरिभिः।
[38]
संपत १५७० वर्षे थाषाढ़ सुदि र रवी श्री श्रीमालान्वये डउडा गोत्रे साह श्री चं
पुत्र चौताब्दण अजय राजा रायमल थासधीर थाजा नार्या केली पुत्र सा योगा हा
शकतन पासा नरपाल साह सहसमल्ल पुत्र चिः कीर्तिसिंह साह रायमद पुत्र हेमा गजपति
उकुरसी । सा योगा पुत्र महिपाल गण इटहा नार्या श्हणदे पुत्र सहसमस सीहमद साह
यासधर जार्या दासी सिंगारदे पुत्र राया शकतन जाण् शकतादे
पुत्र
षेता
जश्तमल।
पुत्र नेरोदास जश्तमलेन राया शकतन पुण्यार्थ: श्री शांतिनाथ चवीस पट्ट कारित
श्री धर्मघोष गछे श्री साधुरत्न सूरि पट्टे श्री कमलप्रन सूरि तत्पट्टे श्री उदयप्रन सुरिभिः।
श्री विमलनाथजी का मंदिर ॥
दारा रंग मुकनाच्या हाडा पितृव्य सा रूल्हा पुरा रेडा श्रेयसे श्री श्रादिनाथ विधं कारित
प्राइजटीय श्री अमरप्रन सुरिनिः ॥ शुत्तं नवतुः ।
पेता
[39]
[40]
संइत १५१५ व ५ अतरी ग्रामे प्राग्वाट सा भासा नाय संसारी पुत्र सात
(1) --- । कर्म सीन नाण् सारु सुत गोद गोपा हापादि कुटुंब युनेन नातृज माहराज श्रेयसे श्री मुनि सुत्रत वि का प्र० तपा श्री सोम सुंदर सूरि शिष्य श्री रत्नशेखर सुरिनिः॥ [41] नं० १५५१ वर्षे वैशाख सुदि १३ दिने श्री उकेश वंशे सखवाल गोत्र सा लाला ना ललनादे पुत्र साप जावडेन ना जवणादे पुत्र रायपाल तेजा चेला लीला रामपाल नायी श्रांतू पुत्र लोइंट प्रमुख सपरिवार युतेन श्री सुनि सुत्रत विं कारितं प्रतिष्ठितं श्री खरतर गई श्री३ जिनसमुड सूरिभिः । [42] ई संबत १५७६ वर्षे श्री खरतर गव नाड़ीया गोत्रे सा नायू पुत्र ला पाव्द साप सकू नाप नीया रा-तटकथा मपली प्रमुख उदंविच्या श्री आदिनाथ वि का जप श्री जिनहंस सुरितिः प्रतिष्ठितं ॥ श्री॥ [43) सं १६५७ वर्षे वै ध्रुप ए नौमे श्रीमाल ज्ञानीय ढोर गोत्रे सा० धरमगज नार्या धीर तुत ला सतीदात जार्या वा झिापी तान्यां पुण्यार्य श्री शांतिनाथ विवं कारितं प्रसन्नर- तर गलेश्री जिनचंड हरिनिः । श्री जिनजानु सूरीपानुपदेशेन । थनाईः ४२ वर्षे श्री थकवर राज्ये। [ । रोचके नुर्निर ॥ - । सं १९२० मि। आज दिए नियो बुधबार । बाबु श्री प्रकार नियनी नत्पुत्र सनीपन दि । पनपन हिंद श्री दिजिन विकागतिं ना मदासात प्रतिष्ठितं ॥ शनि जिनं ने जिनं. पाजिनं. पीः जिनं पशनि ! नि:निगमा हद २॥ श्रीः ॥
(१६) ॥ श्री सम्नव नाथजी का मन्दिर । ॥ परोपरका खेख ॥ [45] :- संपत २४ मिते बेशाख सुदि ५ रखो । श्री याखूचर पुरे । जए श्री जिनचंड सूरि जी विजय राज्ये वाचनाचार्य श्री अमृतधर्म गणिनां पं० क्षमाकट्याण गणिः। तच्च कुमारादि युतानामुपदेशतः श्री मक्सूदायाद वास्तव्य समस्त श्री सङ्घन श्री सम्जय जिन प्रासादः कारितः प्रतिष्ठापितश्च विधिना । सतां कल्याण वृध्यर्थम् ॥ [46] अब चैत्य वर्णनं । निधान कौनवनिर्मनोरमै । विशुद्ध हैनः काल विराजितं । मजारु घंटावलि कारणाकृति । ध्वनि प्रसन्नी कृत शिष्टमानसम् ॥ १॥ चलत्पताका प्रको प्रकास । माकारयन्नूनमंनिन्धसत्वान् ॥ निषेधय निश्चित्त पुष्टबुद्धीन् । पापात्मनश्चापतत कथंचित् ॥ २॥ संसेव्यमानं सुतरां सुधीनि । जव्यात्मनिर्जुस्तिर प्रमोदात् ॥ घालूच राख्ये प्रवरे पुरेदो । जीयाचिरं सन्नवनाथ चैत्यम् ॥ ३ ॥ धातुयोंके मूर्तिपर। . A [47] हर्षु पुण् उ संवत १५१५ वर्षे आपाढ़ चदि १ जकेश बंशे दीक गोत्रे म० लिवा ना म० हीराकेण ना० रङ्गादे पुत्री सेना प्रमुख परिवार युनेन श्री चंपन्न विवं कारितं श्री खरतर गठे श्री जिनन सूरि पट्टे श्री जिनचं सूरिजिः प्रतिष्ठित श्रीः ।। [48] नं १५१५ वर्ष थापा, वदि १ श्री मंत्रिदलीय वा बाबू नायर्या धर्मिणि पुत्र सब अचा सरोग पुन उग्रसेन सदनासन सूर्यसेन बुझिसन देवपाल पोरसन पहिराजादि जुनेन सञः (५३) यसे श्री आदिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री स्वरतर मधे श्री जिनसागर सूरि पट्टे श्री जिन सुन्दर सूरि पहालङ्कार श्री जिनहर्षे सरिवरैः ॥ श्री। [40] सं० १५२३ वर्षे वैशाख पदि गुगे श्री उपकेश वंश स देव्हा जार्या व्दादे पुत्र वझर, सुभावकेण नार्या मेघू पुत्र जयजस्ता पौत्र पूना सहितेन खश्रयले श्री अञ्चल गठेश्वर श्री जप केसरि सूरीणामुपदेशेन श्री सम्जवनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री संघेन । 150] सं १५५४ वर्षे मार्गशीर्ष सुदि १० शुक्रे उपकेश ज्ञातौ । श्रादित्यनाग गोत्रे सं० गुणधर पुत्र समालण त्ता कपूरी पुत्र स० क्षेपाल नाम जिणदेवाश् पुत्र साप सोहिलेन जात पार दल देवदत्त नार्या नानू युनेन पिनोः पुण्यार्थ श्री इंद्रप्रन्न चतुर्विंशति पट्टः कारितः प्रतिष्ठित श्री उपकेश गले ककुवाचार्य सन्नाने श्री कक्क सुनिनिः श्री जहनगरे । [5] सं १५२५ वर्षे ज्येष्ठ व० र शुक्रे उपका पत्तन वास्तव्य सा० देवा ना कपूर पुण् सा याला नए नाऊं पुण् हर्पा ला मनी नाप साश्या रत्नसी साप आसकेन रत्नसी नमिः श्री दासुपूज्य विवं उपश० श्री सिदाचार्य सन्तान प्रान श्री सिद्ध सुनिः॥ [52] ई संवत २५२७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि सोमे प्रान्बाट ज्ञातीय दु गांगा तु० मुजा पुत्र बुर महिाज ना रमाइ आविरुवा श्री बानुपज्य विवं कारितं श्री खरतर गर्छ श्री जिनसागर सूरीश्री जिनसुन्दर चरि पराज श्री३जिनप सरितिः प्रतिष्टिनं श्रीरत्तु ख्यायं स्यात् । 333 से १५३४ वर्षे चार ज्ञानी चांगले. सवयी जाटानाः जयतला ច নাৰি (१५) - नगिन्या वीरिणी नाम्न्या श्री धर्मनाथ विवं कारितं प्रतिष्टितं तपा गछे श्री रत्नशखर सुरि पदे श्री सदमीसागर सूरिनिः॥ [64] सं १एए१ वर्षे बैशाख बदि ६ शुक्रे प्राग्वाट झातीय म पाल्हा पुत्र म पांचा जार्या 'वाश् देऊ पुत्र म नाथा नार्या श्रा० नाथी पुत्र म० विद्याधरेण पु० म० हंसराज हेमराज जीमा पुत्री इंशाणी इत्यादि कुटुंब युतेन श्रेयोर्थ श्री थादिनाथ विवं कारित प्रतिष्ठित कुतव पुरा गछे श्री अनन्दि सूरिपट्टे श्री सौलाग्य नन्दि सूरिनिः श्री पत्तन वास्तव्यः । [55] सं० १६०० वर्षे ज्येष्ठ सुदि ३ शनी श्री श्रीमाल ज्ञातीय सा जेठा जा० मन्हाई पुत्र सोनाकर ना वाइ कमलादे पु० सोना वीराकेन श्री पूमिमा पक्षे श्री मुनि रत्न सूरिणा- मुपदेशेन श्री श्रेयांसनाथ बिवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री संघेन ॥ शुनं नवतु कल्याणमस्तु ॥ रौप्यके मूर्तिपर ॥ [56] संवत १९०३ शाके १७६७ प्र । माघ मासे कृष्ण पञ्चम्यां भृगौ वालरे श्री मनुदावाद वास्तव्य जैसवाल ज्ञाती वृद्धशाखायां साह निहालचन्द इंसिंघ खश्रेयोर्थ श्री शांतिनाथ जिन विवं कारापितं । खरतर गछे श्री शांतिसागर सुरिनिः प्रतिष्ठितं । तप्पा सागर गर्छ । राय धनपत सिंदजी का घरदेरासर । . [57] सं० १९२० फा कृ०१ वुधे प्रताप सिंहजी उगड़ नार्या महताब कुंवर चंचप्रज पञ्च: तीर्थीका । उ । सदा लानेन प्र० श्री अमृत चं सूरि राज्ये सं रएs आषाड़ शुक्ल १७ यात्मनः कल्याणार्थ।
किलपन्यजीतेज्यिा जनादेरासर-चावलगोका।
[53]
संच १५३३ वैशाख वदि ५ प्राबाट व्यः अथा का आली कुत्र कर भरलीइन ना
पहनु-पालकाविल्टु सुनेन इसे श्री वासुदज्य दिवं का प्र० तपा रत्नशखर सूरि
श्री लक्ष्मीलागर सूरिभिः ।
श्री सांवलियाजी का मन्दिर-कीरतवाग।
[50]
पापाण के लूर्तिवोंपर।
॥ श्री सं० १३० माघ शुक्ल ५ चंडे श्री पाश्चंन गो उ० श्री हर्षचंदजी नित्यचं.
जीकानाजुपदेशेन । उस वंश गांधी गोत्रे साइजी श्री कास नयनजी तत्पुत्र सा उदय
चंञजी तत्वर्गपत्नी तथा त गलता गोने जगजी श्री फत्तेचंजजी तत्पुत्र सेठ
प्रारद जजी तत्पुत्री दाइजमोजी श्री सत्यनाय विकारापितं । प्रतिष्ठित विप
सुरिनिः श्री लालुवति याचिरं कन्दतलब स्यादश्रियं ।
[00
॥ श्री सं० २०३० माघ शुरु ५ पंजश्री पाश्चेवं गजेनी नित्य वंज
जीकानासुदेशेन स ० गांधी गो. सा० श्री का नाम की
तत्धर्मपत्नी तथा उस देश गइवता पाने जगले० - जीना मेला
चंड तत्पुत्री वा अजयोजी श्री दाना विवं कागरिक भी नुवाति जत्र
नूयाहि तदा ॥
::
पापा।
सं १८३० वर्षे माघ शुद्ध जवान र गांधी गोवा :
जी तत्पुत्र सा उदयचन्द जी तम्नार्या बाइ थजबोजीकेन श्री पाश्व प्रथम वारिन गा घर पाडका कारापितं। [62] सं० १७३० वर्षे माघ शुक्ल ५ सोमे गांधी गोत्रे साप श्री कमल नयन जी नत्पुत्र मात्र श्री उदयचंड जी तत्धर्मपत्नी बाइ अजयोजीकन श्री वासुथुज्य प्रथम मुरुम गाधर पाएका कारापितं। [83] संघ र७६१ चैत्र शुक्ल पञ्चम्यां शनिवासरे चंद्र कुलाधिप श्री जिनदच सूरीयां चरा ग्यापनं श्री सङ्घाग्रहण श्री जिनहर्ष सूरीणामुपदेशात्प्रतिष्ठितं ॥ [64] धातुके मूर्तियोंपर। सं० १५१५ वर्षे बै० वा ४ उके व्या गोइन्द नाग राजू पुत्र नाधू जार्या रूपिदि मातृ-नाव्हा केन जार्या लीलू प्रमुख कुटुंव युतेन श्री श्रेयांसनाय विवं कारित प्रतिष्टितं श्री सोमसुन्दर सूरिपद श्री रत्नशेखर सूरि राज्यः ॥ कासधरी। [65] दं १५३० वर्षे चैत्र बदि. ५ गुरू रजीयाण गोत्रे हवड़ ज्ञातीच दोसी गकुर सीमा नाउ सो नुन दोसी वादन हरपाल दासा पागा युतेन मातृ श्रेयसे श्री कुंथुनाथ दुवड़ नहे भी सिंघदत्त मृरि प्रतिष्टितं । उपाध्याय श्री शीलकुञ्जर मणि । विव [66] मं० १५३१ वर्षे वेगाव बदि ११ सोम श्री श्रीमाल झा० ना ना नाराज F. माजन का मदापि मु० साए लटकल ना राइ लुः सा लोड 10 पास सहसाख्यैः पितृ मातृ श्रेयसे श्री अजितनाथादि चतुर्विंशति पट्टः पूर्णिमा पदो श्री पुखरल सूरीणामुपदेशेम कारितः प्रतिष्ठितश्च विधिना श्री अहमदावाद नगरे । श्री दादास्थान का मन्दिर । पाषाण के चरणोपर। [67] ॥श्री ने नमः ।। संवत १७२१ मिति माघ सुदि १५ दिने महोपाध्याय जी समरसुन्दर जी गणि गजेंसाणां शिष्य मुख्योत्तम श्री १०५ श्री हर्षनन्दन : २, सायां नितोत्तस प्रवर श्री श्री जीमजी श्री सारङ्गजी तत्शिष्य पंवोधाजी तत्शिज्य पंण् इनारी नन्दत्य उपदेशेन सुनावक पुण्य प्रन्नावक कातेल गोत्रे साइजी श्री सोनाचन्द जी तत् नात मोतीचन्द जी श्री मत् वृहत स्वरतर गठे जगम युगप्रधान चारित्र चूड़ामणि जहारक पर श्री २७ श्री दादाजी श्री जिनदत्त सूरिजी दादाजी श्री १०७ श्री जिनकुशल सुरि नूरी- राणां पापुका कारापिता मसूदाबाद मध्ये प्रतिष्ठितं महेंज सागर सूरितिः ॥ शुजमस्तु । 163] संघ १७७६ रा वर्षे मार्गशोई मासे शुक्रपदे १० तियो शुक्रवारे बृइत श्री खरतर गई जंगचुछ । ला श्री १०७ श्री जिन सूरि सन्तानीय सकल शास्त्राशार्थ पाठन प्रधान बुद्धि निधान ! श्रीमपाध्याय जी श्री १७ श्री रत्नसुन्दर गणिजिराणां चा स्थापन H जीगड़ गोत्रीय श्री बाबु श्री सुधसिंह जी तहसुन वायु श्री प्रतापसिंह जी वामदे की तुः कमाएनन्दुः । श्री आदिनाथजी का मन्दिर - गोला। [60 भर टाका व दिगे श्री नीना शातीर नानार्या नाव:
सुतेन सह सायरेण खोरसे श्री जीववामि भी सुपा श्वनाय पियं कारापित प्रनिनि श्री वृहत्तपा पक्षे श्री रत्नसिंह सूरिनिः शुचवतु। [70] सं० १५३० बर्षे माघ सुदि शुक्र सांबोलण वासि भाबाट ज्ञाव्य सोना ना माज पुत् व्या नारद बंधु व्या दिल्याकेन चा वीक्षण पु० देघर मा साश्यादि कुटुंब युनेन निज श्रेयसे श्री लल्लवनाथ विवं का प्र० श्री तपा ग श्री सनीसागर सूरिभिः । ['71] संग १५०३ शाके १७६७ प्रवर्तमाने माघ कृष्ण ५ भृगु अहमदाशद वास्तव्य जैसवाल ज्ञाती बृद्ध शाखायां सा केसरीसिंह तत्पुत्र साह विसंघजि तार्या रुपमणी स्वयर्थे श्री आदिश्वर जिन बिवं चरापितं श्री शांतिसागर सुरिचिः प्र० ॥ । श्री जगत्लेजी का मन्दिर - महिमापूर । [72] . सं० १५२ वर्षे माघ बदि १ गुरो प्राण ज्ञाए म जेला जा सूरी पुत्र सर्वखेन जाए रूपाइ मातृ पितृ श्रेयसे स्वश्रेयसे श्री कुंयुनाथ विवं कास प्र० श्री साधु पूर्णिमा परे श्री पुण्यचंड सुरीणामुपदेशेन विधिना श्री निजयचंद सूरिभिः ॥ श्री रस्तु । [73] गीमति पु० सं० १५३६ व फा० सुख १२ प्राग्वाट व्य होरा ना रूपादे पुत्र व्य० देपा जाए गांगाफेन ना नाथी पुत्र मेरा जात गोगादि कुटुंब युतेन श्री नमिनाथ बिंध का प्र० तपा ग श्री लक्ष्मीसागर सूरिनिः । पीकरवाडा ग्रामे मुंगलिया बंशे श्रीः ।
( १९)
[74]
सं १५७ए वैशाख सुदि ६ सोमे उपकेश ज्ञातो बल हि गोत्रे राका शाखायां साप
पासड जाप हापू पुरा पेयाकेन ना जीका पुण् देपा दादि परिवार युतेन स्वपुण्यार्थ
श्रो पक्षप्रज बिवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री उपकेश गछे कदाचार्य सन्ताने न० श्री सिद्ध
जूरिनिः दन्तराइ वास्तव्यः ।
[75]
स्फटिक के विंव पर।
सं १७१० व ज्येसु र श्री स्तम्म तीर्थ वा उकेश झा गांधि गोत्रे प-सीसीपति
साप शिवा श्री कुन्युनाथ विवं प्र श्री विजयानन्द सूरिनिः । तप (नय ) करण ।
{76]
रोप्यके मूर्ति पर।
संच १७३६ बर्षे वैशाख शुक्ल ५ लियो । उसवाल वंशीय श्रेष्ट श्री माणिक चन्दजी खधर्म
पस्नी माणिक देवी प्रतिष्टितं श्रीमत् चतुर्विशति जिन विचं चिरं जयतात् ॥धेपोरक्तः ॥
नछ नवतुः ॥ १४
॥श्री नमिनाथजी का मन्दिर
कासिमबजार ॥
[77
धातुयोंके मूर्तिपर।
सं० १४७० वर्षे ज्येष्ट बदि ५ उपकेश झानीय थायणाग गोत्र का यामा प्नात
वाछि पु० माजू नाहू नाप रूपी पुरा खेमा ताल्दा ताबड़ श्री नीनाय पिवं काट पूर्वतक्षिण
पुरा धात्मा श्रेण उरकेश ढुक० प्र० श्री निद सुरिन्तिः ।
[78]
सं० १५५ बर्षे फागुण बदि १ दिने शुक्ने श्रीमाल बंशे साढू गोत्र श्री सा० पदा पुत्र
सा पासा ना० पूनादे पुत्र साना पाश्नादि परिवार परिवृतेन श्री श्रेयांसनाथ विवं स्वपु
ण्यार्थ कारितं प्रतिष्टितं श्री खरतर गछे श्री जिनाना सुरि पट्टे श्री जिनचंड सूरिभिः ॥
[ 70]
पाषाणोंके मूर्ति और चरणपर ।
सम्बत १५४ बर्षे बैशाख सुदि ७ श्री मुखसद्ध नद्यारक जी श्री जिनचं देव साह
जीवराज पापड़ीवाल
--
[eo]
॥ सं० ११५ए बर्षे मिती फागुण सुदि ५ गुरौ श्री गौतम स्वामि पादुका कारापित
काकरेचा गोत्रे सा बीरदास पुत्र लषमीपतिकेन ।
[81]
सम्बत् १७७७ बर्षे मिती माह बाद ३ वार गुरु दिने कारितमिदं पंमित मुनिजन गणि
बरेण प्रतिष्ठितञ्च विधिना उ० श्री कर्पूरप्रिय गणिनिः कास्माबाजार--
[82]
सं० १७७१ मिति थापाढ़ शुक्ल १० तिथौ शनिवारे पूज्य श्री हीरागरिजीना पादुका
कारापिता सेठिया गुप्तानचन्द ॥
[831
सं० १७२१ माघ शुक्ल १३ रवौ महोपाध्याय श्री नित्यचंद्रजी स्वर्गगतः। श्री पाश्वचंद्र
सरि गछे।
{84]
॥ सम्बत १०६७ व मिति थापाढ़ सुदि ए शुनदिन बुधवारे श्री (जनकुशल सुरिजी
सद्गुरूणा चरणन्यासः कारितः श्री सडेन । कास्माबाजार वास्तव्य धावकैः सुगुणोवलेः।
पूजनीयाः प्रतिदिनं गुरुपादाः
जिः ॥
॥ श्री सम्नवनाथजी का मन्दिर
अजिमगा॥
-
85
पापाणको विशाल मूल विंव पर ।
॥ श्री वीर गताब्दा २४०३ विक्रमादित्य सम्बन १९३३ मालिवाहन १७ माघ शुर.
एकादश्यां गुम्बासरे रोहिणी नक्षत्र मीन र यहादेगे मदाबादांनर्गनाजिमगा नापी
दृट्न प्रोस बंशे झुपक गहे बुधसिंद पुत्र प्रतापनिद नालायर्या मनाये समय तन गहन पर
रार लक्ष्मीपतिसिंट पदाउर तत् लघु ब्राना गद धनपमिद यदापुर मयं एवं गनपानिय
नरपतसिंद सपरिवारेन श्री सम्वजिन विंशतिनाय जी नमनाय जी पानाय जी महा
वीर जी परिकर सहित कारादितं निफ्टुरिया साट विद्यामाने प्रतिष्ठितं सर्व गतिः ।।
जो मन्दिर
।
.
नगद नमः ॥ सात हद
r" हादर
मबाज इस गोत्रमावर ही
धर्म!
मायाद पत किया
सर मुरकर मार ! निन्द:::::
[78]
सं० १५२ए वर्षे फागुण बदि १ दिने शुक्ने श्रीमाल वंश
साहू
गोत्र श्री सा० पदा पुत्र
सा० पासा जाम् पूनादे पुत्र साना पाश्नादि परिवार परिवृतेन श्री श्रेयांसनाथ विवं वपु
ण्याथ कारितं प्रतिष्ठितं श्री खरतर गठे श्री जिनना सुरि पट्टे श्री जिनचं सूरिभिः ॥
[ 79]
पाषाणोंके मूर्ति और चरणपर ।
सम्बत १५४ए वर्षे वैशाख सुदि । श्री मुखसङ्घ जहारक जी श्री जिनचंड देव साह
जीवराज पापड़ीवाल
[20]
॥ सं० १७५ए वर्षे मिती फागुण सुदि ५ गुरौ श्री गौतम स्वामि पाडका कारापित
काकरेचा गोत्रे सा वीरदास पुत्र सषमीपतिकेन ।
[81]
सम्बत् १७७० वर्षे मिती माह बाद ३ वार गुरु दिने कारितमिदं पंमित मुनिन्जा गणि
बरेण प्रतिष्ठितञ्च विधिना उ० श्री कर्पूरप्रिय गणिनिः
कास्माबाजार
[82]
सं० १७७१ मिति थापाढ़ शुक्ल १० तिश्री शनिवारे पूज्य श्री हीरागरिजीना पादुका
कारापिता सठिया गुलाबचन्द ।
[833
म. १०२१ माघ शुकः १३ रबा महोपाध्याय श्री नित्यचं जी स्वर्गगतः। श्री पाश्वबंध
मुरि गर्छ।
॥ सम्बत १०६७ वर्षे मिति आषाढ़ सुदि ए शुजदिन बुधवारे श्री जनकुशल सुरिजी सद्गुरूपा चरणन्यासः कारितः श्री सकेन । कास्मावाजार वास्तव्य श्रावकैः सुगुणोज्वलैः। पूजनीयाः प्रतिदिनं गुरुपादाः जिः १॥ ॥ श्री सम्नवनाथजी का मन्दिर -अजिमगञ्ज ॥ {85] पाषाणको विशाल मूल विंव पर । ॥ श्री वीर गताब्दा २४०३ विक्रमादित्य सम्बत १९३३ शालिवाहन १७ए माघ शुक्ष एकादश्यां गुरुवासरे रोहिणी नक्षत्रे मीन सग्ने बङ्गादेशे मञ्जदावादांतर्गनाजिमगञ्ज बासी दृद्दत थोस वंशे बुंपक गठे बुधसिंह पुत्र प्रतापसिंह नझार्या महतावं कुमर्य तत् वृहत पुत्र राय लक्ष्मीपतिसिंह वहापुर तत् लघु नाता राय धनपतसिंह यहाहर स्वयं एवं गनपतसिंद नरपतसिंह सपरिवारेन श्री सम्जवजिन वि शांतिनाथ जी नेमनाथ जी पार्श्वनाथ जी महा- वीर जी परिकर सहित कारापितं निरिया सम्राट विद्यामाने प्रतिष्टितं सर्व सृरिनिः ।। 186j जो मन्दिर दस्तुन्हाट। उजगवते नमः ॥ सम्बत चारह से ग्यारह ( १७११) कृपा हादमी मृग यशान । उसवाल कुस गोत्र गोखरु श्री मजैन धर्मकी साम्ब ॥ सनाचन्द के मरनन्द मुन निक सुन मुदकमसिंद सुनाम । तिनके धाम राय मन्दिर यह नागीबी नीर विश्राम ॥
[78]
सं० १५२ए वर्षे फागुण बदि १ दिने शुक्ने श्रीमाल वंश साहू गोत्र श्री सा० पदा पुत्र
सा० पासा ना० पूनादे पुत्र साना पाश्नादि परिवार परिवृतेन श्री श्रेयांसनाथ विवं स्वपु
एवार्थ कारितं प्रतिष्टितं श्री खरतर गछे श्री जिनना सुरि पट्टे श्री जिनचं सूरिभिः ।
[ 79]
पाषाणोंके मूर्ति और चरणपर ।
सम्बत १५४ए वर्षे वेशाख सुदि ७ श्री मुखसई नहारक जी श्री जिनचंड देव साह
जीवराज पापड़ीवाल
।
[20]
॥ सं० ११७ए वर्षे मिती फागुण सुदि ५ गुरौ श्री गौतम स्वामि पाजुका कारापित
काकरेचा गोत्रे सा वीरदास पुत्र लषमीपतिकेन ।
[81]
सम्बत् ११७० वर्षे मिती माद वदि ३ वार गुरु दिने का रितमिदं पंमित मुनिजम गणि
बरेण प्रतिष्ठित विधिना उ० श्री कर्पूरप्रिय गणिनिः
कास्माबाजार
-1
[2]
मं० १३७१ मिनि थापाढ़ शुक्ल १० तियो शनिवारे पूज्य श्री हीरागरिजीना पाका
कागपिता सठिया गुजावचन्द ।।
[3]
मं १७२१ माघ शुक्र १३ ग्बो महोपाध्याय श्री नित्याचं जी स्वगंगनः। श्री पाश्चचंद्र
मुहि गई।
. - ॥ सम्बत १०६५ वर्षे मिति थाषाढ़ सुदि ए शुनदिन बुधवारे श्री जिनकुशल सुरिजी सद्गुरूपा चरणन्यासः कारितः श्री सद्देन । कास्मावाजार वास्तव्य श्रावकैः सुगुणोज्वलैः । : पूजनीयाः प्रतिदिनं गुरुपादाः जिः १॥ ॥ श्री सम्नवनाथजी का मन्दिर - यजिमगञ्ज ॥ 185] पाषाणको विशाल मूल विंव पर । ॥ श्री वीर गताव्दा २४०३ विक्रमादित्य सम्बत १९३३ शालिवाहन १७एमाघ शुक्ल एकादश्यां गुरुवासरे रोहिणी नक्षत्रे मीन सम्न वङ्गादेशे मञ्जदावादांनर्गताजिमगञ्ज बासी वृद्दत श्रोस वंशे बुंपक गछे बुधसिंह पुत्र प्रतापसिंह तनार्या महताव कुमर्य तत् वृहत पुत्र राय लक्ष्मीपतिसिंह बहापुर तत् लघु जाता राय धनपतसिंह यहापुर स्वयं एवं गनपतसिंह नरपतसिंह सपरिवारेन श्री सम्जवजिन विवं शांतिनाथ जी नेमनाथ जी पार्श्वनाथ जी महा- वीर जी परिकर सहित कारापितं जिक्टुरिया सम्राट विद्यामाने प्रतिष्टितं सर्व सरित्तिः ॥ 186] जो मन्दिर-दस्तुरहाट । उगवते नमः ॥ सम्बत अद्यारह से ग्यारह ( १७११) कृष्ण हादसी मृग यशाग्न । उसवास कुस गोत्र गोखरु श्री मन धर्मकी साम्य ॥ सत्तावन्द के शामरचन्द मुन निन सुन मुहकमसिंह सुनाम । निनके धाम राय मन्दिर यह नागीन्धी नीर विश्राम ॥
कलकत्ता बड़ावजार।
॥श्री धर्मनाथ स्वामी का पञ्चायति मन्दिर ॥
पत्थर परका लेख।
[87]
श्रो॥ सम्बत चंऽमुनि सिद्धि मेदिनी । १७७१ । प्रतिष्ठितं शाके रसबहि मुनि शश
१७३ए। संख्ये प्रवर्त्तमाने माघ मासे धवक्षषष्टि तिथौ बुधवासरे श्री शांतिनाथ जिनेपाली
प्रासादोयम् । श्री कलकत्ता नगर वास्तव्यः श्री समस्त सङ्केन कारितः प्रतिष्ठितः श्री खरतर
गछेश नहारक श्री जिनहर्ष सूरिभिः । श्रीरस्तु ॥
[88]
धातूयों के मूर्तिपर।
सम्बत ११९४ माघ सु० १४ पद्मप्रन सुत स्थिरदेव पत्नी रैवसिया श्रेयो
[80]
सं० १२५ए वैशाख सु० ३ बुधे सो जेहड़ सुत सा बहुद्देव हीर नमान्यां मातृ राज
श्री श्रेधार्य श्री पाश्वनाथ प्रतिमा कारिता प्रतिष्ठिता मलधारी श्री देवानन्द सूरिनिः ।
[80]
मम्बत १३४ए वर्षे ज्येष्ट सुदि १४ वर्षे प्राग्वाट जाति महं० सादा सुत महा राजा
प्रेयमे समुन म६० मालदिवि श्री आदिनाय विवं कारितं प्रतिष्ठापितं ।
[21]
- १३४५ प्रान्बाट छानीय श्रेः श्रामचंद्र नायर्या रत्नादेवी पुत्र सहजा श्री शान्ति
मारा श्री देम मरितिः प्रण महाददाय ।
सं० १४३४ वर्षे ज्येष्ठ वदि गुरो बरदुडिया गोत्रे साठ जोजदेव पुत्र मुण् सरसति श्रेयस श्री शान्तिनाथ विवं कारितं प्रण देवाचार्य सं० -- सुरिनिः । [93] सम्बत १४४ए श्राषाढ़ सुदि गुरो श्री अञ्चल गठ उकेश वंशे गोखरु गोत्र साए नाग नायो तिहुपसिरि पुत्र साप नाग राजन खपितुः श्रेयस श्री शान्तिनाथ विवं कारित प्रति- ष्टितञ्च श्री सूरिन्तिः। [4] सं० १४५० वर्षे ज्येष्ठ पनि १३ शनो प्रान्बाट ज्ञातीय श्रेण रवना नाया लष्टसाद पुत्र सोगारून पित्री श्रेयसे श्री आदिनाथ शिव का श्री [35] सं० १४एए नपे माति चेत वदि १ उवएस ज्ञातीय व्यण देवराज नायी जस्मादे पुत्र वूया ना खूणादे सहितेन पित्रो जात रामसी श्रेयले श्री पन्नप्रज विवं कारित प्रण ब्रह्मा- पीय गठे श्री उदयानन्द सुरित्तिः । [86 स्वस्ति । सम्वत १४७१ वर्षे फागुण सुप ११ दुधे श्रीमाख महरोल गाने सादा सुत सा खेमराजे त महादेवेन श्री आदिनाथ विवं प्र० श्री विजयप्रत सुरिन्तिः ॥ 1872 सं० १५८३ वर्षे माघ सुदि ५ श्रोत बंशे काकरिया गोत्रे साप साजण पुत्र सा० सालिग नार्या पाईना शान्तिनाथ विं का प्रतिष्टितं कृर्पपीय श्री नयचंड सरितिः ।
[98]
.
सं० १५०६ वर्षे पोष सुदि ५ जैस वंशे चत्तकरीया गोत्रे सापादेव जाप करण पुत्र
सामल नार्या नयणादे पु० श्रीवठ सहिता आत्म पुण्यार्थ श्री श्रेयांस विंय का० प्र० --
गछे भी नयचंड सूरिनिः।
[20]
सं० १५०६ वर्षे पोष सुदि १५ सोमे उपकेश वंशे श्री काकरिया गोत्रे संप सुरजन भार
चंनी पुत्र श्रीरङ्गेन श्रात्म श्रेयसे निज मातृ पितृ श्रेयसे श्री चंडअन विवं का० प्र० श्री.
गठे श्री नयचंड सूरिभिः॥
[100]
सं० १५१० वर्षे फागुण वदि ३ शुक्रे श्री श्रीमाल झातीय उकुर धरणी नार्या वाई गाड़ी
सुत उकुर मांगण जार्या पाई अरघू तेन खकुटुम्ब श्रेयसे श्री आदिनाथ विवं कारितं प्रति
टितं आगम गछे श्री जिन रत्न सुरिनासुपदेशेन ॥ श्रीरस्तु कल्याण ॥
[101]
सम्बत १५१३ वर्षे मामु०६ रवौ सवाल ज्ञातीय बहुरा गोत्रे सा स्वीमा पुत्र
घरपा ना बालहदे ला लातृ रहा श्री विमलनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री चित्रवास
गछे श्री दाणाकर सूरिलिः।
[102]
सं० १५१४ वर्षे थापा यदि १३ दिने बपुड़ागा गोत्रे तुंल्लिा गोत्रे सुत देवराजेन पुरु
पहाज जुने विवं का० प्र० श्री सर्वानन्द सूतिः।
[103]
सं० १५१वर्षे छापद मुदि १० मंत्रिदलीय श्री काणा गोने ७ लावू जा
धर्मिषि
पुण् अचल दासेन पुण् उमसेन लदीसेन सुर्षसेन बुद्धिसेन देवपाल वीरसेन महिराजादि युतेन श्री शान्तिनाथ का श्री जिननस सरि पट्टे श्री जिनचंड सूरितिः प्रतिष्टितं ॥ 1104 सन्दत १५१ए वर्षे कार्तिक यदि ४ गुरू श्रीमाली झातीय मंत्रि देपा नार्या सहित जुन परजांगरून जात जेता नरखद हापा सहितन पितृ मातृ श्रेयोघं श्री अजितनाथादि चतु- विशति पकारित प्रतिष्ठित श्री ब्रह्माए नहे श्री नुनिचंड सूरि पहें श्री वीर सूरिनिः ॥ नेया वास्तव्यः श्री शुन्नं जवतु ॥ श्रीः ॥ | 105 सं० २५३४ वै शु १० उकेश घेदर वासि सण महिराज जार्या चपाई सुत पनसिंहेन जगिनी पसाई प्रमुख टुल्ब युतेन श्री शीतलनाथ वि का प्रण तपा श्री सोमसुन्दर सुरि सन्ताने श्री सक्ष्मीसागर सूरितिः ॥ श्रीरस्तु ॥ ! 106 सं० १५१४ दैव शुरु प्राय श्रेण पाता जाए यातू पुत्र जोगाकेन नाप जावनि पु रामदास जात घर्जुन ना सोनाइ प्र० कु० युतेन श्री शीतक्षनाथ विवं का० प्रश्री सोमसुन्दर ' सूरि सन्ताने श्री लक्ष्मीसागर सूरिभिः ॥ :07 संच १५३२ वर्षे ३६६ सोमे श्री नरेशशे श्राद्ध मन्नाने न जोजा पुत्र नबाना इना जा जोडा नारदात्यां चनिनन्दन जिन विवं कारित प्रश्रो खम्तर गर्ने श्री जिनमः॥ : सं. :३२ साल : श्री एन बंटी बोर नत्र मा नन्दर
[117]
सं० १५११ वर्षे पोष बदि ५ बुधे श्री ब्रह्माण गछे श्री श्रीमाल ज्ञातीयः श्रेण मांश्या
नाप राणा सुबस्ता प्रा0 अलवेसरि नाम्न्या खजर्तृ श्रेण श्री कुन्थुनाथ विप्र० श्री
विमल सूरिभिः । बगुला वास्तव्यः ॥
[118]
सं० १५३५ बर्षे बैशाख बदि ५ रबौ श्री जावमार गचे उपकैश ज्ञातीय वांजीया गोत्र
व्य मीमण लाए हलू पु सादा ना सूहगदे पु० नेमीचन्द
समस्त कुटुम्ब श्रेयसे श्री सुविधिनाथ प्रमुख चतुर्विंशति पट्ट का प्रण श्री कालकाचाय
सन्तान जम् श्री जावदेव सूरिभिः ॥ सीरोही बास्तव्यः शुनम्नवतु ॥
नातृ नेमा पुण्यार्थ
[119]
सम्बत १५५१ वर्षे पोप सुदि १३ शुक्र श्री श्रीबंशे सा अदा नाप धर्मिणि पुत्र सा
वस्ता सा तेजा सा पीमा सा तेजा जार्या लीलादे सुश्राधिकया स्वपुण्यार्थं श्री शान्ति
नाथ विवं श्री अंचल गछेश श्रीमत् श्री सिद्धान्त सागर सूरीणामुपदेशेन कारित प्रतिष्ठित
श्री पत्तन नगरे श्री सद्धेन ॥ श्रीः॥
[1201
सं० १६६७ वा ज० ज्ञाण जड़िया गो० स० होला पुत्र स० पूरणमल पुत्र सं० भूपतिना
श्री विमलनाथ विवं महोपाध्याय श्री विवेकहर्प गएयुपदेशात्का० प्र० तपा गज०
विजयसन सूरिभिः॥
॥ श्री चंप्रनु स्वामीका मन्दिर-माणिकतला ॥
[121 ]
संc 2५११ वर्षे यापाद बदिए मागा उकेश ज्ञातीय साग जोसिंग ना चंनी पुत्रेण
साप वीदाकन ना नपी सहितेन स्वश्रेयसे श्री पार्श्वनाथ विवं का रितं प्रतिष्ठितं श्री खर
तर गहे श्री जिनना सूरिजिः ॥ श्री पूंजणू वास्तव्य ।
---
[122]
सं० १५१६ कार्तिक बदिश रवी श्री नएस वंशे लोढ़ा गोने साप बाजू ना पीमिणि
पुरा सा गजसी ना नूरा पु० सा धना ना धर्मादे पुण् साप समधरेण ना सूढयदे
सहितेन पृष्ट नातृ नरपति संसारचं पुण्यार्य श्री श्रादिनाय विवं कारितं प्रतिष्टितं रुक
पक्षीय गठ श्री सामसुन्दर सूरिभिः ॥
,
1123
सम्बत १५५२ वर्षे कार्तिक यदि ५ गरी श्री नएस वंशे । स घड़ीया नायर्या कपूरी
पुत्र सण गोवल ना लखमाद
पुत्र
बनाकन नातृ पितृ पितृव्य मातृ श्रेयसे श्री अंचलगना-
धिराज श्री श्री जयकेशरि सूरीणामुपदेशेन श्री चंयन स्वामी विवं कारितं प्रतिष्ठित श्री
सन ॥ कठदेशे धसड़का प्रामे ॥ श्री ॥
1241
सं० १६६५ वर्षे फाण् श्रुप -- शः पत्तने संनाइएना मनन्त कुटुम्ब युतन श्री श्रेयांस
नाथ विकास प्राधी पत्ता गमाधिराज श्रीदी-विजय समितिः ॥
॥श्रीपीनानाय सानीमा मन्दिर-मासिवना !
3
सं. १५.६ रेंगार भी
गापित की।
" नारद पवाद नमानी
पनीर
श्रीगर की कामना
-
[143]
[144]
संवत १० वर्षे मिः फागुण सुदि ३ दिने । श्री शान्तिनाथ विवं कारितं मकसुदाबाद
श्री जिनचंड सूरिभिः वृहत् खरतर गछे थजिमगा पास्तव्य कारितं गोलेष्टा गोत्रे --
-- श्राविकया कारि॥
(२। शान्तिनाथ ३। चंप्रनु । विमलनाथ ---अजयराजेन श्रेयोर्थ ।
। सं। २०५६ फाल्गुण कृष्ण प्रतिपत्तथो श्री वासुपूज्य जिन चरण न्यासः प्र । सर
सूरिनिः । कारितं । सर्ब संघेन । चंपानगर मध्ये ॥
॥ संवत । १७५६ बैशाख शुक्ल पदे तृतीयायां तियो श्री जिनकुशल सूरि पाक
प्रतिष्ठितं नः श्री जिनचंड सूरिनिः बृहत् खरतर गछे कारितं । समस्त श्री संघेन श्रेयार्थी
संवत १७७१ मिति माग शुक्ल षष्ठ्यां शुक्रवार काष्ठासंघ माथुर गछे पुस्कर गणे लोहा
चार्यानाय जहारक श्री जगत्कीर्ति सदानाय अग्रोत कान्वये पिपल गोत्रे प्रयाग नगर
वास्तव्य सापक श्री हीरालाल पुत्र झपनदास पुत्र सन्नूलाल
- श्री पद्मप्रन प्रतिष्ठा कारिता।
सं १ए० आषाढ शित ए गुरौ श्री संजवनाथ विवं प्रतिष्ठितं वृहत
कारितं च दूगड़ सरूपचंद वात करमचंद दुलासचंद जननी प्राण बीबी श्रेयोथं ।
वास्तव्य श्री संघेन श्रेयसे प्रतिष्ठितं च न । श्री जिनहर्ष सूरि पट्टालङ्कार न । श्री जिन
सोचान्य सूरिनिः वृहत् खरतर गठे।
[145]
अगरवाल प्रजासा
-
2
[146]
सूरिभिः
.
[1477
सर्वसूरिजाकारितासरसंघनापान
-
T
गरमध्ये॥
-
वासुपूज्पजिनदरणन्यासः
Kra
.
॥सार८५६फागुएललपतिपत्तियोश्री
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[143]
संरए० मि । फा कृष्ण २ तुध
-गड़ प्रताप
[14]
१ ११२ लिनि जेड शुक्रकीनीया नियो रवाशारे गड़ गोधो प्रारमिडजी
तजा - कुंवर तत्पुन र लपीतसिंघ याहार तत् लघुकाना राय भावसिंत्र
पापुर बाल्दो प्राणकुंबर जन्म सफली करणार्थ । जं । शुरुच शी जिनहंस सरिजा
बिजेगा । उ श्री आनन्दवन गणि तद् शिष्य श्री सदालान मलि प्रतिष्ठिका ॥
पूज्याचार्य श्री रतनचन्द सूरि लुपक गजे॥ श्रोः ॥ कल्याणमस्तु ॥ श्री नवपदजी श्री चरा
पूरीजी स्वास्तिः ॥ श्रीः॥
[150]
श्री बायजी जन्म कल्याणक । सं० १३५ मिः फाल्गुन कृष्ण ५ तिश्री। गड़ श्री
प्रतापसिंघजी तत्पुत्र राय लखमीपत्तसिंघ वहाउर तत्दात्र श्री धनपत्तसिंघ बहापुर काराविनं
जं? सुप्रीम श्री जिनहंस सूरिजो विजैराज्ये ॥ ज श्री सागरचन्द गति प्रति-
छितं ॥ गुञ्जनूयात् ।
[151]
धातुयोंके सूर्तिपर।
सं १५० वर्षे ज्ये सुध - रबौ रंग जाण रमाई -- हेमा हापा बारा पुरा साहस चाय
सनी विधि एवार्थ श्री चतुर्विशति जिन प्रतिमा श्री ननिनाथ विवं का प्रा श्री संकर
गडे श्री शांति सूरिभिः ।।श्री
[152]
-
संत १५२५ वर्षे नाम ब० १ सो कार संघ धारा जा सलोन सा बेत वयुना
स बनाकेन ला सीनू प्रमुख कुटुम्ब युतेन निज श्रेयसे श्री सम्जवनाथ वित्रं कारित
प्रतिष्ठितं श्री सूरिभिः ॥ माल्यबन ग्रामे ॥
[158]
से १५३७ श्री मूलसंघे श्री मानिकचन्द देवराज प्रतिष्ठापितं ---
[154]
सं० १५५१ वर्षे माग सु० १३ गुरू उकेश वंशे सिंघाडिया गोत्रे सा चांपा जाण राऊ
पु० सा जोला ना लहिकू पुण् सा पूजा सा काजा सा राजा पुण् धना सा काबू सा
काजा चा कुनिगदे इत्यादि परिवृतेन सा काजाकेन श्री आदिनाथ चतुर्विंशति पट्टे का
प्र श्री खरतर गछे श्री जिनसागर सूरि पढे श्री जिनसुन्दर सूरि पढे श्री पूज्य श्री जिन
हर्ष सूरिभिः॥
[ 155]
साहिता
संवत १५७१ वर्षे माघ वदि १० शुक्र श्री प्राग्वाट झा वृद्धशाखायां व्य
सु० वरण समधर जा बड़धू सुत व्य हेमा नार्या हिमाई सुत व्य तेजा जीवा बर्द्धमान
एते प्रतिष्ठापितं श्री निगम मनावक श्री आणंदसागर सूरिभिः ॥ श्री शान्तिनाथ विवं श्री
रस्तु श्री पतन नगरे ।
[156]
संवत १५७५ बर्षे आपाड़ सुदि ५ सोमे श्री उसवाल ज्ञातीय छाइचणी गोत्रे चोर
वेडीया शाखायं सं० जस्ता नार्या जश्तलदे पु० सं० चूहड़ा नार्या शूरी सुत ऊधरण चंद्र
पाल श्रात्म श्रेयोर्थ श्री आदिनाथ बिवं कारितं श्री उपकेश गरे कदाचार्य सन्ताने प्रति
टतं श्री श्री श्री सिद्धि सूरिनिः ।
[157]
संवत १६०३ वर्षे मायशिर सुद ३ झुके प्राण ज्ञा
बास्तव्य
ទី២
रङ्गादे सावं
साजालाजालाही
Choubisi (Metal) Champêpur Temple, dated S 1551 (1494 A D.)
रा
IGIERLEI EINEZLETIRILLE
ELEINDIATE
साज
GRETERIA
चान्निाव
शतकापरवस
RE उ
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संग जाप सूरमारे सा श्री रङ्ग सदारङ्ग थमीपलादि कुटुम्ब युतेन साइ स चवीरेण श्री सुमतिनाथ विवं कारित प्रतिष्ठितं श्री तपा गठे श्री विशालसोम सूरि शिष्य श्री श्रीय सूरिजः। [158] झीकार यंत्रपर। सम्बत १६६ए वर्षे शुक्षेपक्षे त्रयोदशी दिने शुक्रवारे श्री मूलसंघे सरखति गछे बस कार गणे चंपापूरी नगर शुनस्थाने 1159] तम्बत १६७३ वर्षे सूलसंघे ना श्री रत्नचंड उपदेशेन उपाळ श्री जयकीर्ति प्रतिष्ठित पाले समस्त श्री संघेन कारापितं । - A- - नाथनगर बाबु सुखराज रायजी का घरदेरासर पापापक सूर्तिपर । [ 160] सं० १७ बाघ सुदि १३ बुधे योस वंशे कगारा गोत्रीय लाला जमनादास नकार्या यातबर तपा श्री वासुपूज्य जिन पिंवं कारितं मुनि हेमचंयोपदेशात्प्रतिष्टिनं श्री युद्धन खरतर गछीय श्री जिन - - पञ्चताधीयों पर। [1612 सं० १५० त्रिवसीय श्री दाग.त्र हा नामिनि दु नः .
सफल करणार्थ श्ठा कृतासिंच कालवशात् सं० २ए३२ श्रावण १०६ दिने कालधर्म प्राप्तस्य (३८) अचव दासेन पु० उग्रसेन लक्ष्मीसेन सूर्यलेन बुद्धिसेनादि युतेन श्री शान्तिनाथ विव का प्रति श्री जिनसुन्दर सूरि पट्टे श्री जिनहर्ष सूरिभिः । [162] सम्बत १५७१ वर्षे वैशाख सुदि ३ तोमे श्रीमत्वरा ॥ ते ॥ मिपूजनोत्र । साइन ---- सुश्नावकेण चा जीवादे पु० श्रानन्द ला सोहिल प्रमुग्न सहित भोयादिनाथ बिंब कारितं प्रतिष्टितं श्री खरतर गई ॥ श्री जिनरल सूरिभिः ॥ छीकारके यंत्रपर। [163] सम्बत १७५६ वर्षे वैशाख मासे शुक्लपक्ष तियो ३ बुधे श्री सिद्धचक्र मंत्र प्रतिष्ठि श्री जिन अक्षय सूरि पहालकार श्री जिनचं सूरिभिः जयनगर वास्तव्य श्री मालान्वये सरगड़ गोत्रीय सुश्रावक खुबचन्द तत्पुत्र रोसनराय वृद्धिचन्द खुल्यालचन्द सरूपचन्द मोतीचन्द रूपचन्द सपरिकरण कारित स्वश्रेयोर्थ ॥ जागलपुर। श्री वासुप्नज्यजी का मन्दिर (धर्मशालामे) पाषाएपर। [164] ॥ शुज संग बीर गताब्दा २४०५ विक्रम नृपात् १५३६ रा जेष्टमासे वरे शुरूपक्षे त्रयो दश्यां तियो - चम्पा नगर्या श्री वासुपूज्यजी पञ्चकल्याणक म्युपरि ओश वंशे झूगड़ गोत्र वृ। शा । वा। श्री बुधसिंघजी तत्पुत्र श्री प्रतापसिंघस्य चतुर्थ वधूः महताबकुमरी खजव स्थान मनोरयाय तत्पुत्र राय श्री लक्ष्मीपत सिंघजी वहाउर राय श्री धनपत सिंघजी बहाउर
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epika11 9-1-1141-42 : -
legਸਰੋਂ5
ਵੇਸ਼
gਸਿਬੂਰੇਰਦੇ ਜਿਵੇਂਗੂੰ ਜਾਰਪ੍ਰੀ੨E,Gਸੌਰ
ਮੰਗੇਤਰਸ਼ੇੜੀ ਵਿਨਾਂਵਛੁਵ2ਝਾਸ੩॥
(३९)
तेन अव्येण धर्मशाजा जिनालय कारापितं प्रतिष्ठितं सर्व सुरिनिः श्रीसंघ च संजालसी श्री
संघ माक्षिक श्री रस्तु श्री माण नस्तु श्री नोकटरीया सप्रेश राज्ये षष्टाब्द १जाए।
पापाणके चरणों पर।
{165]
श्रीवासु
-
-
(1) यवन (२)जल (३) दीक्षा (४) केवल (५) निर्माण कल्याणक पाउका ॥
साधु १२००० । सानो १२५ भाव १५०० । श्राविक्षा ४३६७ ॥
पूजय पञ्चाणक चरण कारादितं चंग नमेरे ओशवाल । शा। दूगड़ गोत्रे बा । श्री
बुधातिवनी तत्पुत्र श्रीप्रसासिंघलो तनार्या सइताबकुमर बीवी तत्पुत्र राय श्री लक्ष्मी
पतसिंघ श्री धनपतसिंघ वदाउर कारारितं प्रतिष्ठितं सर्वरिति श्री संघस्य शुजवतु ॥
1165]
॥ ए ए ॥ सम्बधाणर्षि नागेन्दो राध शुझादशी सुगौ महिनम्योः पदं जीर्णमुद्धृत
खरतरेण श्री जिनहर्प निदेशी वा जाग्यधीर गधि किन माहू गोल्य प्रणेन्दोविरामुहिन्य
काव्यकृत् र युग्मम् ॥ लव १५ मिती वेशास सुदि १० शुक्रे मिशिक्षा नगा श्रीमान
जिन चरणन्यालः॥
1673
सं० १९३१ माघ गुको १५ दुवे श्री वासुपूज्य (धजिननाय, सन्जयनाय ) जिन
* यह वरण दरममा लैन में सीतामहोपन पाम मिपिता नगरी में वाया भया । वटादार
समय कोई जैन मन्दिर नहीं है । १९गतीपाश्री निनाद मानाचा मानानां श्री नाम
नाप तामीक चार सल्यान नहीं भरे श्री मलिनार मिपिता नगा और मापन: गीनीक
थी। जन्म. दहा जनमत दिन याद। इन ननाद किया गया कि
रानो एवम नामिनाय अन्न : यी ८. द
.....?
दै. दिन भपापा मिनी अन्य "लिपिन्, “म नगद कार
सत्य सनगन्य है। नाम नैनन ।
पुत्र राय धनपतसिंहेन काराप्तिं प्रतिष्ठितं चाचार्येण अमृतचंड सूरिणा ढुंकागठीयन
(१॥
विवं ओस वंशे गढ़ गोत्रे वायु पनारसिंह पुत्र नाम नाम नदिन कागति
मखधार पूर्णिमा श्री मद्विजय ग नहारक श्री जिन शांनिसागर ॥
1133]
॥ सं० १९३३ मा। शु। ११ श्री मनजिन त्रिमिदं मकसुदामाद बास्तब्य थ
बंशीय ढुंपक गणोपाशक झूगड़ गोत्रीय घानु प्रतापसिंहस्य जार्गा महनाव कुंवरिकस्य
पुत्र राय धनपतसिंहेन कारापितं प्रतिहिनाचायण अमृतचंद सूरिणानुकागठीये
श्री मिथिलापुरवरे।
सं० १९३३ मि । मा। सु। १५ श्री नमिजिन विवमिदं मकसुदाबाद बास्तव्य
वंशीय चुपकगणोपाशक झूगड़ गोत्रीय वावु प्रतापसिंहस्य जार्या महताब कुंवरिकस्य या
[100]
नाहा
सीतामढ़ी मिथिलायां।
पंचतीर्थी पर।
[170]
॥ सं० १५ आषाढादि ए६ वर्षे श्रापाड़ शु० ११ दिनः रानकारी गोत्रे अंग सिवा
ना रत्नादे पुराना हेमराज वेला ना0 वालहदे पु० पता
संमेर गछे ना श्री लाल सूरिनिः प्रतिष्ठितं ॥ सू तानाकेन कृतं ।
--
विवं कारापितं पुण्यार्थ श्री
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dauसुबत० वर्षे वैज्ञावमा से शतक
पतिथीमान विनाशवचरणक
दीका
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कल्य
स्थाने
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तारक
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काकदीनामकोवर
Leatre
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(४१) ६ तीर्थ कार्कदी और क्षनियकुण्ड । लस्सीलराय स्टेशन से ६ कोस पर काकंदी हे। नम्मा तीर्थकर श्री सुविधिनाथ जी का चयन-जन्म-दीक्षा और केवल ज्ञान यह चार कल्याणक यहां गये हैं। सुग्रीव राजा रामा रानी के पुत्र थे। मृगशीर वदि ५ जन्म, मृगशीर वदि ६ दीक्षा और कार्तिक सुदी ३ के दिन केवल ज्ञान नया । जैन मुनि धन्ना कामन्दी जी यहीं नये हैं। यहां से नव कोस पर खत्रिय कुए आज कल लबाड़ गांव के नाससे प्रसिद्ध है। चौविशमा तीर्घकर श्री महावीर खामी का कन, जन्म और दीदा यह ३ कल्याणक यहां नये हैं। मूर्तियों पर। [171] संवत १५७४ वर्ष फागुण सुदि ए नहतियाण वंशे मुंमतोड़ गोने । सं महणसी पुत्र सप देपाल नार्या मूळ महिणि स्वकुटुंवेन भ्राता व मित्र लखमी पुत्र व्य० हंसराज पुत्र श्री महावीर विवं कारितं प्रतिष्टितं श्री खरतर वा शुनशील गणितिः [172] राजपुत्र संवत १५०४ फागुण सुदि ए दिने महतियाण वंशे नुसतोड़ गोत्र । संव में महादेपाव जण माहिपि पुत्र मं० सिवाई। चरण पर। 1173 थों नमः । संवत १७२५ वर्षे वैशाख नाले शुक पोपटी निधी श्री विधिनाय जिन- पर चरण कमले शुने त्यारित ॥ श्रीकाकंदी नगरी जन्म कयापक म्याने श्रीलंघन जीर्णोद्धार काराप्तिं ॥ चिरं नन्तु तीनो काकंदी नानलो वरः।
तार एश्व विघामा चक्कर
हवामानावरचरणक
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বীজ হজ্জ্ব জহি থাকি। लखीसराय स्टेशन से ६ कोस पर काकंदी है। नवमा तीर्घकर श्री सुविधिनाथ जी का चवन-जन्म-दीक्षा और केवल ज्ञान यह चार कल्याणक यहां गये हैं। सुग्रीव राजा रामा रानी के पुत्र थे। मृगशीर चदि ए जन्म, मृगशीर वदि ६ दीक्षा और कार्तिक सुदी ३ के दिन केवल ज्ञान नया । जैन मुनि धना काकन्दी भी यहीं गये हैं। यहां से नव कोस पर खत्रिय कुएक आ कल लबाड़ गांव के नाससे प्रसिद्ध है चौविशमा तीर्थकर श्री महावीर खानी का चन, जन्म और दीदा यह ३ कल्याणक यहां जये हैं। मूर्तियों पर। [171] संवत १५७४ वर्ष फागुण सुदि ए लहतियाण वंशे मुंगतोड़ गोने । सं महणसी पुत्र स देपाल नार्या सू महिणि खकुटुंबेन भ्राता वा मित्र लखमी पुत्र व्या हंसराज पुत्र - -- श्री महावीर विवं कारितं प्रतिष्टितं श्री खरतर वा शुलशील गणिनिः - [172] राजपुत्र संवत १५७४ फागुण सुदि ए दिने महतियाण वंशे मुंहतोड़ गोत्र । सं० संग महादेपाल जण साहिणि पुत्र मं० सिवाई। चरण पर। 11781 वों नमः । संवत १७२५ वर्षे वैशाख मासे शुद्ध पक्षे पटी लियो श्री मुदिधिनाय जिन- पर चरण लमले शुने स्थापिते ॥ श्री काकंदी नगरी जन्म घ्यापक म्यान श्रीसंघन "दारं कारापितं ॥ १ रिं नन्दतु तीघोयं कावंदी नानको बरः।
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१८.२५ वशमा से शुरू
वियोपासनाpaaचरण को
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ងយប់ संबत १६७७ वर्षे बैशाख सुदि १५ तिथौ मंत्रीदल बंसे चोपरा गोत्रे पाप विमलदास पापाण पर। [17] मकशूदावार शजीमगच वास्तव्य इगड़ गोने बाबु प्रतापसिंदजी वजनी गदना' तत्पुत्र राय लक्ष्मीपत तलघु सहोदर राव धनपतसिंह बढ़ापुरेण न्याग अगाकर प्रन्नू का जिनालय करापितः लम्बाइ मध्ये उप श्री सागरगंज गणिप्रतिक्षित। सं० मिती वैशाख वदी चन्छे भी चुनायाजी। नवादा ( गया लाईन) टेसनसे ॥ माईत पर यह स्थान है। इसका नाम “गुणशील चैत्य” से प्रसिद्ध है। यहां २४ मां तीकर श्री महावीर तानीका १५२ अयाथा । स्थान मनोहर और श्री पावापूरी तीर्थके जवमन्दिर की तरह तालाब बा मन्दिर है। धातुके मूर्तिपर। [175] संबत् १५१७ बर्षे फागुण बदि १५ उसवालान्वये सूधाला गोने स० मीला जा पुत्र साप तोव्हा ना पई नाम्न्या खपुण्यार्थ पद्मपन्न विवं कारित प्रा श्री पद्मानंद सू पापापके चरणोपर। [176] तत्पुत्र ना तुलसीदास तत्पुत्र श्री गण संग्राम गोबर्द्धनदास तस्य माता उकुरी श्री निहालो तत्पु ज्ञार्या उकुरेटी चु० ज० श्री जिनकुसब सूरिका कारापिता पूज्य श्रीश्री ५ श्री श्रीराज सुरि विद्यमाने उपाध्याय अजय धर्मेन प्रतिष्ठा कृता स्थिर लग्ने खरतर गछे ।
कातिवता पूऽ
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(1631 AD)
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(१३)
पकानेर (राजपुताना
[177]
संवत १ए५४ मिति माव कृष्ण ५ नोमे श्री गुण शिलाल्ये नेत्ये भी जड़ प्रतापसिंह
लोकानां जाया महताद ढुंबर तक्षितान कनिष्ठ पुत्र श्री राम धनपतसिंह बहार
नाम्ना खपली प्राणकुंडर जन्न सफली कराई श्री उण्टापड तीये श्री शर्बुजग निर्माण
चालतया शीथादिग्नि बगल पापुजा गपिता श्री जिनकि खुरि शबाशं ला सदा
पाल शिना तिष्ठितं गुल
1473]
TZला सारित माप्तिं श्री शुदा
सं० १९३० माघ शुरु ५ सय संघन श्री
मीच ये धात्महिताय ॥
पापा ।
[179]
सं० रए४ मिती माघ शाप ए नौने गुस्सीसे चेरो शूगड़ गोने श्री प्रतापसिंदजी
सत्ता महताब कुंर लत्पुर चिरूर दहापुर तत् प्रथम पली प्राणकुंतर जन्म माल्य
कराप्तिा जीसारं । लोएंद पहन गघि ततशिप्य श्री सागरचंद गदि उप;
देशात् ॥ श्रीः ।। शुभयात् ।
पापाय पर।
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--श्री जिने उपती। रूस्ती भोमद हारजिनें:क्षरहि arur
पर्षे २८ वर०० दुपदारे भी तापमाननाय भाग्य. प्रारक दम्म श्रीमा शानदार
परन्द रंगीधदात देवचन्द पाटनमा दास नुवान पेदा मुंबई दे बनना म्पनी नन
रन्धु रतुर रन्दमन देश पन्दा रन्दमाग रन्द उर। भीती
.
है पंछ । खस्ति श्रीजयोमंगवान्युदयश्च ॥ श्री गौतमस्वामिनोसब्धिः ॥ संबत १६०
शाख मुदि ५ सोमवासरे ॥ श्री विहार नगर बास्तव्य श्रीषन जिनेश्वर प्रथम पुत्र श्री
संवनायक मं० संग्राम । राइ दिया गोन्द्रीय संघ० परमाणन्द प्रमुख श्री वृहत खरतर गही
धीर जिन निर्वाप भुमि श्री पापापूरी समीपनि परविमानानुकार श्री वीर जिन प्रामा
मा करगिजि पुत्रेण स शुजकरण चाय पद्मिन्याः पु० सदमीसेन हाबू जनन्याः भयो
श्री संनदनाथ विज्ञ का श्री खरतर शी जितना सूरि पट्टे श्री जिना सरिभिः
ठितं श्रेयोस्तुः ।।
[187]
सं० १५६५ वर्षे बैशाख सुण १० दिने श्रीमाल जातीय गाने मोतिप्पा सा रणम
सा दीपचंद नार्या जीवादे कारितं । श्री खरतर गम जहारिक शी जिनहंस सूरि
नमः॥प्रतिमा श्री शांतिनाथ विवं कारितं ॥
पाषाणके चरण पर।
[138]
सं १९४५ बर्षे बैशाख सुदि ३ गुरो
उपचंद पुत्र जसराज अव्यय जाय
भी चईमान जिनस्वयं पापुका कारा
॥ संवत १७७२ वर्षे माह सुदि २३ दिने सोमवार श्री पुएफरक चरण कमल
[180]
चरत चक्रवर्चि राजान मुख्य मंत्रिदल संतानीय महतीयाध ज्ञाती मुख्य चोपड़ा गोत्रा
नरमणि मलित नावस्थत श्री जिनकसरि प्रतियोधित महतीयाण श्री संघ कारित
[109]
मध्यके चरणपर।
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तिघणय शा स्वसु दिएसोवास पा(जसाद को सादिजा सक
पर विराजमारलतमनिनाविरामवीर मानवाम
विधिनपालाराम शवासन मितिEिRAT
Pralhar मा विश्रावतमहाराज सकलमलमल धमधिरी यमसनलायम
दास घराक संतामदो म नामनिहाला सा मयाम
गजलका मदिनानायम परमाल देसपरिवार मतदाता धावत
Enaमामीदास मनोहर सलाउदरदास
मप्रसादावा गरम वनमानामा
मानाचाod का मामन मन्त
किनका सातबावरान काम नाम सतत काम
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(१७) चूनौ धाम प्रतिहिन श्री महावीर बर्द्धमान जिनराज पाफुके महतियाण श्री संघेन कारिते। प्रतिष्ठिते । श्री वृइत्खरतर गवाधीश्वर श्री शत्रुजयाप्टमोद्वार प्रतिष्ठाकर युगप्रधान भी जिनसिंह सुरि पहोदयगिर दिनकर युगप्रधान श्री जिनगज सूरिजिः ॥ श्रीवतु । श्री कमल लाजोपाध्यायाः पं० खब्धकीर्ति राजहंसादि शिष्य सहिताः प्रणमंति । ११ गणधरोंके चरणों पर। [101] १। संबति १६एउ प्रनित । वैशाख सुदि ५ सोनकरे। श्री विकार नगर वास्तव्य श्री तरत पनवर्ति महाराजान सकन मंत्रि मुख्य मंत्रिश्वर दलान्चोय नरमणि मलित श्री जिन चंड खूरि प्रबोषित महतिपाल ज्ञाति मलन चोपड़ा गोत्रीय संबवी संग्राम सररिव.रेण । श्री गौतम स्वामि ॥ १ श्री अमिनुनि ॥२ श्री वायुनूति ॥ ३ को व्यकनानि ॥४ श्री सुधा स्वानि ॥५भी मंपिकासति॥६ श्री मौर्यपुत्र स्यामि ॥ श्री अकंपिक स्वामि ।। जो अचमन्त्राता स्वनि॥ ए श्री मेतार्य स्वामि ॥ १० श्री प्रनास स्वानि ॥ ११ मंदिर प्रशस्ति । [192] । एं॥ वस्ति श्री संजति १६एवैशाख सुदि ५ सोमवासरे। पानिमाद श्री सानि जां इलाख नूर मोमवाधीश्वर विजविराज्ये ॥ श्री चतुर्विशतितम जिनाधिगन श्री वीर बर्द्धमान स्वामि निर्वाण कव्यापक पविनित पावापूरी परिमरे श्री बीर जिन चत्य निवाः ।। भी पद जिनराज प्रथम पुत्र चक्रवर्ति श्री भरत महाराज सकल मंत्रि मएनव श्रेष्ट मंत्रि श्री दक्ष संतानीय मदतियाण शातिश्रृंगार चोपड़ा गोत्रीय संघनायक संघर्व। नुसनी नायी निदालो पुत्र संभ संग्राम धुनाद गोवद्धन तेजपाल नोजगज । रोइदिय गोत्रीय न० पर. * यह वेदोंके जन्दर दया भया है इनकारनपदा नदीनपा ।
दाहिने भी स्थान कोनी के नगणों पर।
[2001
भी॥ नगनिधि गज गोत्रा सम्मितायां समाया (17) नमन रस मतान
युकेषु शाके ( १७६५)॥ सित पटधर पाटो फाल्गुने शुक पर जुजगपति तियो (१
मम्मर्गवे वासरह ॥ १॥ श्री मब्रह्मचर्य धर्म नदी श्री गुरु नागार्ग पार पद्म प्रति
बहत खरतर गणेश श्री जिनदर्प सूरि पट प्रनाकर श्री जिन जिला
श्री हीरधर्म गधि विनय मित्कृष्पकज प्रनाकर श्री मान गएका
श्री संवैः ॥ यदखिया गोत्रीयोत्तम चंडात्मज मुनिलाजानिन ।
[201]
(१) ॥ स० श्री ५ श्री जिन विमल चूरि पाता । (२) ॥ श्री जिन सक्षित र
पाकुका।
[202]
-
सं० १७ए वर्षे कार्तिक मासि शुक पक्ष पूर्णिमा तियो १५ गुरुवासरे युदर -
पछे यु ना श्री जिनरंग
[203]
सं० १७धर्षे कार्तिक शुक्ल पक्षे राका तियो १५ गुरु वासरे वृहत् खरतर गर्छ
अण् श्री जिनरंग सुरि शाखायां प्राचार्य श्री जिनचंड सुरिणां शिष्य वा श्री सुमतिन
माणिनां पादपझे स्थाप्यते वा जुवनचंडेण । वा सुमतनन्दन गणिनां चरण कमले भी
बाप भी जिन चन्द सूरीषां चरण कमवे श्मे नवतः ।
श्री चंदनवासा कोठरी के चरणों पर ।
है
.
[204]
-
-
प्रश्नी सुजाण विजयाजी पाडका!
(५१) 1205] सं १७ मा वर्षे लिते १५ ॥ वृहत् खरतर गछे युग न० श्री जिनरङ्ग सुरि शाखायो। शिण चरण रेणुना दीप विजयायाः स्थापित । श्री कीर्ति विजयायां चरण सरसी रुहे प्रतिष्टितं ॥ साध्वीश्री सोजान्य विजयाया। पादप प्रतिष्ठितं । [20] - सम्वत १४ शाके १७१३ वर्षे मिति वैशाख शुझ३ तियो भृगु वासरे श्री मत् खरतर गछे नहारक श्री जिनरश सूरि चाखायां साध्वीमदत्तरा मति विजयाकस्य पापुका शिष्यनी रूपविजिया पाहाप्रीशनिशापितः [20] ..- ॥ श्री संवत १९३१ का पिति नाव शुझ दशमी तियो चन्ड धारे श्री मद्बदाका गुजराधिपति ॥ श्री पूज्याचार्य जी श्रीश्री १०० श्रीश्री अक्षयराज सुरिजी चरण कमलो स्थापितो श्री अजयराज सुरिनिः प्रतिष्ठितं च श्री शुनंनवतु = [28] ॥ नमः ॥ संवत १७१ए वर्षे माव नासे मुकरदे पटो तिथो गुरुवासरे श्री महावीर जिनवर चरण कमले शुत्ते स्थापिते। हुगलो वातार उत वंशे गांधि गोत्रं बुलाकी दास स्त्पुत्र साह मालिक चंदेन भी पत्नीयछन नगर जन्नत्याने जन्मकल्याणक तीधे जीर्णोद्धार करापितं ॥ स्वपरयोः शुजाय ॥ १ पारसमल चंजना स्थितो रो तारनंदतु तीर्थावं स [20] ॥ नमः ॥ संयत रपए वर्षे नो महावीर जिन चरप कमजे स्थापित श्री मात्रीने संघाटे ताह मापिकचंदेन जीदार करापितं ॥ श्री रस्तु ।
1227]
:
संवत १६४ वर्षे माघ सुदि ए दिने नोम वासरे श्रवण नक्षत्र
ठाकुर ---- ठाकुर काडेन तत्पुत्र गकुर मुखीचंद श्री जिन कुशल सूरीणं पाके कारित।
[228]
-
सं० १६एशाके १५५ए ईश्वर बर्षे सम्बतसरं चेत्र वदि १३ शुक्र शुने मुहुर्ते द ५'
देशे न श्री कुमुदचं दिनंद पट्टे न श्री मूल श्रृंगार हा
बघेरवाल झातो.
श्री तोला ना० सं पुत्र स० श्री कृष्ण ॥ देव नार्या सोहि
श्री महावीर पाका स्थापित
या
PM
an
[220]
सं० १७३० माघ शुदि ५ - श्री सकल संघे श्री पार्थ ना पा कारापि -
[230]
संभ १०३० माघ शु० ५ सकल संघेन शांतिनाथ पाऽ० कारापिता
[231]
प्रमदिये ग्राबीम सय वरम वसाह - मुद्ध
मा निदा वा कारिया सिरिमाल बंसे वदलीया गुत्ते साह कमला वश्णा
मुरडियमय महि ॥ श्री॥
वह पियामह सिरि
विमा
[2321
श्री दादाजी श्री कुगत मुरजी सहाय
:::नीमा सुदी १३ - - -
}
[233] सं। १७३ए फागुन कृष्ण ७ गुरौ श्री जिन कुशल सुरी पादन्यास । जं । यु । प्र न । श्री जिन मुक्ति सूरिश्वराणामादेशात् श्री दालचंद गणिनिः प्रतिष्ठितं ॥ सेठ गोत्रीय बाराचंदात्मज रामचंण कारितः स्वश्रेयोर्थ मिरजापुर वरो ॥ [234] ॥ ॐ नमः सिद्धम् । संवत् १एए। सिप फागुण सुदि ३ श्री मूलसंधे सरस्वति गठे वला त्कार गण कुंद कुंदाचार्य श्रान्नाय सकल कीर्ति नहारक तत्पट्टे । नहारक कनक कीर्चि उपदेशात् शा कुबेरचंद हरीचंद तन्नार्या केशरवाई खुरदेवाले प्रति 1235] संवत् १एएए पोत सुद १५ गुरु ॥ श्री बुंपक गठे श्री पूज्य अजयराज सूरिः प्रतिष्ठि- तम् ॥ वावू लठमीपत गोविंदचंद की माजी करा पितं श्री दादाजी चतुः चरण पाकेन्योः ॥ श्री स्यूतनम सूरिः॥ श्री जिनदत्त सूरिः॥ श्री जिनकुशल सूरिः ॥ श्री जिन वंस सूरिः ।। राज गृह । मगध देशकी राजधानी यह राजरइ ( राजगिरि ) वहुत प्राचीन नगर है । २८ मां तीर्थकर श्री मुनि सुव्रत स्वामीक्षा ३ कल्याणक ज्येष्ट वदि-जन्म फाल्गुन सुदि-१२ दीदा फाल्गुन वदि-१५ केवल ज्ञान यहां होनेके कारण यह स्थान पवित्र है । २२ मां तीर्थकर श्री नेमिनाथ के समर में जातंधकी जी रही राजधानी थी। २५मां नीर्थकर श्री महावीर स्वामी के तमयमें प्रसिद्ध नगर था । गौतम युद्ध की भी यही लीया नूमि थी। प्रलेन जिन उनके पुत्र श्रेणिक. उनके पुत्र कोणिक यहांक राजा थे। श्री महावीर स्वामी नी १४ चामाने यहां किये । जंबुस्वामी. धन्ना, शाशिजी झादि बड़े लोग यहां के रहने वाले थे। यहां । संवत तिथि वगेरा की जगह टुटी हुई है पंक्ति (१६) ६ पर पहाड़के निचे ब्रह्मकुएम, सूर्यकुएफ आदि उष्ण कुएक बहुतसे है और स्थान देखने है। पांच पाहाड़ नो सामने दिखाई देते हैं (१) विपुल गिरि (२) रत्नगिरि (३) गिरि (४) स्वर्णगिरि (५) वैनारगिरि । पहाड़ पर बहुतसे जैन मंदिर बने हुये हैं। से चरण वा मूर्ति श्धरसे उधर विराजमान है इस कारण यहां के सव लेख एक साथ दिया गया है। पार्श्वनाथ मंदिर प्रशस्ति । [2861 (१) प० ॥ ॐ नमः श्री पार्श्वनाथाय ॥ श्रेयः श्री विपुखाचलामरगिरि स्थयः स्थि खीकृतिः पत्र श्रेणि रमानिराम नुजगाधीशस्फटासंस्थितिः। पादासीन दिवस्पतिः । फल श्री कीर्ति पुष्पोजमः श्री संघाय ददातु वांछित फ (२) लं श्री पार्श्वकल्पद्रुमः॥ १ यत्र श्री मुनि सुव्रतस्य सुविनोर्जन्म व्रतं साम्राजां जय राम लक्षण जरासंधादि चूमीजुजां । जज्ञे चकि बलाच्युत प्रतिहार शालिनां संजवः प्रापुः श्रेणिक जुधवादि se" जैन तीर्थ गाईड" के तवारिख सुवे विहार में उस्कै ग्रंथकर्ता लिखते है कि मयीयान महल्लाके " में एक शिला लेख जो अलग रखा हुवा है उमदा मगर घीस जानेकी वजह से कम पड़ने में आता है अखीर की पक्तिमें जहां गच्छ का नाम है वहां किसी तोड़ दिया है बत्र शाखा बगेरह नाम वेशक मौजूद है " यह पढ़ कर मुझे देखने की बहुत आभिलाषा हुई। लगाने पर १७ पंक्तिका एक लेख दिवार पर लगा भया पाया । किसी र जगह टूट गया है संवत वगेरह साफ और दुसरा टुकड़ा मालू न भया । पहिले टुकड़ेके लिये बहुत परिश्रम करने पर पता लगा और अब वहाँ रईस बानु धन्नुलालजी सुचंति के यहां रखा गया है । यह प्रशस्ति पूर्व देशकी अपूर्व वस्तु है आज तक अ .. शित था। इसमें श्री खरता गच्छको पट्टावली है जिसे बहुत पक्षपातीयों का भ्रम दूर हो जावेगा। यह सो माठ वर्ष प्राचीन है आर टस समयके मुसलमान समाद और प्रादेशिक शासन का भी नाम विद्यमान पांडित्य और पद लालित्य भा पुरा है। पा (५९) 1 . (३) नविनो बीराच्च जैनी रमां ॥ १ यत्राजय कुमार श्री शालिधन्यादि माधनाः । सर्वार्थ सिद्धि संजोग जुजो जाता द्विधापिहि ॥ ३ यत्र श्री विपुलानिधोवनि धरो वैनार नामापिच श्री जैनें विहार भूषण धरौ पूर्वाप (४) राशा स्थिती। श्रेयो लोक युगेपि निश्चित मितो लज्यं बुवाते नृणां तीर्थ राज- गृहानिधान मिह तत्कैः कैर्न संस्तुयते ॥ ४ तत्रच संसारापार पारावार परपार प्रापण प्रवण महत्तम तीर्थे । श्री राजगृहम (५) हातीर्थे । गजेंडाकार महापोत प्रकार श्री विपुलगिरि विपुल चूला पी सकल महोपाल चक्रचूला माणिक्य मरीचि मंजरी पिंजरित चरण संरोने । सुरत्राण श्री साहि जे महीमनुशासति । तदीय (६) नियोगान्मगधेषु मलिक वयोनाम मएमलेश्वर समये । तदीय सेवक सह पास रदीन साहाय्येन । यादाय निर्गुण खनिर्गुणि रंग नाजं॥ पुंमौकिकाववि रत्नं कुरुते सुराज्यं कः श्रुती अपि शिरः (७) सुतरां सुनारा लोयं विनाति जुवि मंत्रि दलीय वंशः ॥ ५ वंशेमुत्र पवित्र धीः इज पाखाख्यः सुमुख्यः सतां जज्ञे नन्यसमान सद्गुणमणी शृंगारितांगः पुरा । तत्सूलुस्तु नस्तुत स्तिहुण पालेति प्रतीतो नव (७) जातस्तस्य कुले सुधांशु धवले राहानिधानो धनी ॥ ६ तस्यात्मजोजनिच उकुर मनाख्यः सद्धर्म कर्म विधि शिष्ट जनेषु मुख्यः। निःसीम शील कमलादि गुणाखिधाम जझे इस्य गृहिणी घिर देवि नाम (ए) ॥ ७ पुत्रास्तयोः समनवन् जुवने विचित्राः पंचात्र संतति भृतः मुगुणेः पवित्राः । त्रादिमात्रय इमे सइदेव कामदेवानिधान महराज इति प्रतीताः ॥ तुर्यः पुनर्जचति संप्रति पहराजः श्रीमा (१०) न् सुवुद्धि सघु वांधव देवराजः । पान्यां जमाधिकतया घनपंक पूर्व देशपि धर्म- एय धुर्य पदं प्रपेदे ॥ ए प्रथम मनव माया वष्ठराजन्य जाया समजनि रत नीति तीति अनीति रीतिः। प्रनवति पहाजः तमु (२७) वशत: प्रनु पार्श्वनाथ प्रासाद मुत्तम मची करत - श्रीमविहार वस्थिति वष्ठराज श्रीसिद्धये सुमति सोदर देवराजः॥ ३१ मद्देन गुरुणा चात्र वडराजः .. न्धवः । प्रतिष्ठां कारयामास मंगनान्वय (२७) मंगनः ॥ ३५ श्रीजिनचंड सूरीन्ला येषां संयम दायकाः । शास्त्रेष्व । । श्रीजिनसब्धि यतीश्वराः ॥ ३३ कारोश्च प्रतिष्ठाया स्ते उपाध्याय पुङ्गवाः । श्री मंतो हितानिधाना गुरु शासनात् ॥ ३४ न (२५) यनचं पयोनिधि नूमिते ब्रजति विक्रम नूभुदनेहसि । वहुल षष्ठि दिने श्रु मागगे मदी मचीकर देव मयं सुधीः ॥ ३५ श्रीपार्श्वनाथ जिन नाथ सनाथ मध्यः । एप कससध्यज ममिनो (३०) हैः । निर्माप कोस्य गुरवोत्र कृत प्रतिष्ठा नंदतु संघ सहिता नुवि सुप्री २६ धीमविन हिता निषेक वर्य प्रशस्ति रेपाच । कृत्वा विचित्र वृत्ता लिखिता श्रीनि शिमगा ॥ ३० उत्कीच सुवर्णा उकुर मा (१) ब्दांगजेन पुण्याय । वैज्ञानिक सुश्रावक वरेण वीधानिधानेन ॥ ३० ॥ विका गत १४१२. थापाद यदि ६ दिने।श्रीखरतर गद्य शृङ्गार सुगुरु श्रीजिनसब्धि म प्रीजिने मृरिणामुपद (:) मन । श्रीमंत्रि बंश मंमन ० मंमन नंदनान्यां । श्रीजुवन हि हरिणत पनि।मोद मुनि गणि । दर्ष मृर्ति गणि । पुण्य प्रधान गणि सहितानां दिदार श्रीमहातीर्थ यात्रा संमृत्र 12 दमदा प्रदावनया सकल श्री विधि संघ समान नंदनान्यां । छ वटारा देशाच्या काम म्य । श्रीपार्श्वनाथ प्रसादस्य प्रशस्तिः ॥ शुन पन्न ! 1.3॥ ॥ । पान - - ॥ --
(६३)
गांव मन्दिर-धातुओंके मूर्ति पर ।
( 237 )
सम्बत १११० चैत मास सुदि १३ संसनाथ प्रतिमा कारित--।
( 238 )
सं० १४९७ वर्षे आषाढ़ वदि ८ रवी ज० ज्ञा० सा० सपुरा भा० सीसादे पु० कर्मसिंहेन
। नमिनाथ विवपितृ मातृ श्रेयसे कारितं उकेश गच्छे श्रीसिद्धाचार्य संताने प्र० श्रीदेव
प्लसरिभिः।
पाषाण पर।
(239 )
सम्बत् १५०४ वर्ष फागुण सुदि दिने महतिआण वंशे जाटड़गोत्रेसा. देवराज पुत्र
• पोमराज पुत्र सं० सिवराज तेन पुत्र सं० रणमल धर्मदास। श्रीशांतिनाथ विवं
रितं प्रतिष्टिते खरतर गच्छे श्री जिनबर्द्धन सूरिप श्रीजिन चन्द सूरिपह श्री जिन
गागर सूरीणां निदेसेन वाचनाचार्य शुलशील गणिभिः ।
( 240 )
ॐ नमः सिद्धं ॥ सम्वत १८१६ वर्षे माघ मासे शुक्ल पक्ष ६ तिथौ गुरुवासरे श्री मुनि
जुव्रत स्वामि जन्म कल्याणक चरण कमले स्थापिते हुगली वास्तव्य ओसवंशे गंधीगोत्रे
हुलाकीदास पुत्र साह माणिक चंदेन राजगृहे जीर्णोद्वारं करापितं ।
( 41 )
सं० १८२५ लाए सु० ३गुरुपतासाह पुम्या उमरवाई केनशांतनाथ विवं कारापिता।
( 242 ) ( 243 ) संवत १७०७ शाके १५७२ प्रवर्त्तमाने आश्विन शुक्ल पक्षे त्रयोदश्यां शुक्र वासरे। लिपतं रतनसी खंडेलवाल गोत्रे पाटनी गुमानासिंही रासिंग ग्राम मुकाम राजग्रिही। श्री शुभ सम्बत १९०० वर्षे मार्गशीर्षमासे शुक्ल पक्ष दशम्यां तिथी शुभवासरे वर्द्धमान तीर्थंकरस्य चरण पादुका प्र० श्री वृहत्खरतर गच्छे जंगम युग प्रधान श्री जिनरंग सूरीश्वर शाषायां य० यु० भहारक श्रीजिन नंदीवर्द्धन सूरी राज्ये श्री नाचार्य श्री मुनि विनय विजयजी सत् शिष्य पं० कीर्योदयोपदेशात् ओसवाउ द्भव बाबू खुस्यालचन्दस्य पत्नी वीवी पराण कवरी तेन प्र० का श्री संघस्य कारिणो अवतु शुभमस्तु । शु० स० १९०० २० मार्गशीर्षमासे शु० था० श्रीचन्द्रप्रमकस्य च० क० प्र० भी । ग० श्री जिन नन्दी बर्द्धन सू० व० मुनिकायुदयोपदेशात् महतावचन्द संचीतीकस्प चीरोंजी बीबी प्र० का० शुभमस्तु । सं० १९११ व । शा० १७७६ प्रा शुचि शु। १० ति। श्रीचन्द्र प्रश्न विवं प्र० । । । जिन महेंद्र सूरिभिः का । सा श्री हकु- खरतर गच्छे। विपुलगिरि। बिहार वास्तव्येन महतीयाण ज्ञातीय चोपड़ा गोत्रेण म० तुलसीदास तत्भार्या निहालो सत्तनयेन मं० संग्रामेण यवीसात्पुत्र गोवर्द्धनेन सह श्रीराजगृह विपुलगिरी ममै जीर्णा उद्धरिता संघवी संग्रामेण प्र० कल्याण कीत्युपदेशात् श्रीखरतर गच्छे ( 244 ) - ( 245 )
(६५)
( 246 )
सं०
• १८४८ मिती कातिक सुदि ७ सिधौ । श्रीसंघेन । श्रीविपुलाचले मुक्तिंगतस्याति
तकमुने मतिः कारिता । प्रतिष्टिताच श्रीअमृतधर्म वाचकः ।
( 247 )
उम्बत १९३८ ज्येष्ठमासे शुक्ल पक्ष द्वादशी गुरु वासरे श्रीचन्द्रमा जिन घरण न्यासः
तिष्ठितं वृद्ध विजय गणि प्रथम जीणोद्वार माणिकचन्द गंधी करापितं विपुलाचल
तिय जीर्णोद्धार राय लछमीपति सिंह धनपति सिंह करापितं । श्रोरस्तु ॥
(248 )
संवत १९३८ ज्येष्ठ मासे शुक्ल पक्ष द्वादश्यां श्री मुनि सुव्रत जिन घरण न्यासः वृद्ध
जय प्रतिष्ठितं राय लछमीपति सिंह धनपति सिंह जीर्णोद्धार करापितं श्रीरस्तुशुनं
यात् विपुलाचल।
रत्नगिरि।
( 249 )
६
॥ मनमः ॥सम्बत १८१९ वर्षे माघ मासे शुक्ल पक्ष तिथौ श्रीनेमिनाथ जिम चरणकमले
स्थापिते हुगली वास्तव्य ओश वंशेगांधी गोत्रे बुलाकीदास सरपुत्र साह माणिक चन्देन
पीराजगृहे रतनगिरी जीर्णोद्धार फरापिते ॥ प्रियोस्तु ।
--
(250)
॥ ॐनमः ॥ सम्बत १८१८ वर्षे माघमासे शुक्ल पक्ष हतियौ पोशांतिनायजिन घरण
कमले स्थापिते हुगली वास्तव्य जोशवंशे गांधी गोत्रे घुलाकोदास तत्पुत्र साह माणिक
चन्देन धीराजगृहे रतनगिरी जीर्णोद्धारं क० ।
. नमः ॥ संवत १८२३ वर्षे वैशाप मासे शुक्ल पक्ष पष्टी तिथी श्री पार्श्वनाथ ( 251 ) ॥ ॐनमः ॥ संवत १८१६ वर्षे माघमासे शुक्ल पक्ष । तिथौ श्री पार्श्वनाथ चरण कमले स्थापिते हुगली वास्तव्य ओशवंशे गांधी गोत्रे बुलाकीदास तरपुत्र माणिक चन्देन श्रीराजगृहे रतनगिरौ जीर्णोद्धार करापितं ॥ श्रीः ॥ १॥ ( 2522 ) नमः ॥ संवत १८१८ वर्षे माघमासे ६ तिथौ श्री वासु पुज्य जिन चरण स्थापिते हुगली वास्तव्य ओश वंशे गांधी गोत्रे बुलाकीदास तत्पुत्र माणिकचंदैन राजगृहे रतनगिरि पर्वते जीर्णोद्धार करापितं । स्वपरयोः शुभम् ॥ श्रीः ॥ उदयगिरि। ॥ ॐ नमः ॥ संवत १८२३ वर्षे वैशाष शुक्ल पक्ष ६ तिथौ श्री अभिनन्दन जिन कमले स्थापिते हुगली वास्तव्य ओश वंशे गांधी गोत्रे बुलाकीदास तत्पुत्र साह चन्देन उदयगिरी जीर्णोद्धार करापितं ॥ ॥ ॐनमः ॥ संवत १८२३ वर्षे वैशाष शुक्ल पक्ष ६तिथौ श्री सुमति जिन चरण स्थापिते हुगली वास्तव्य ओश वंशे गांधी गोत्रे बुलाकीदास सत्पुत्र गिरी जीणोद्धारं करापितं ॥ ( 255 ) ( 253 ) ६ -- ( 254 ) माणिकचन्दन चरण कमल स्थापिते ॥ हुगली वास्तव्य जोश वंशे गांधीगोत्रे बुलाकीदास तत्पुत्र नापिकचन्देन श्री राजगृहे उदयगिरि राजे जीर्णोद्धार करापितं ॥ स्वपरयो देतवे । श्रीः॥
(६७) स्वर्ण गिरि। New (256 ) सं० १५०४ फागुण सुदि दिने महतियाण वंशेजाटड गोत्रे सं० देवराज सं० पीमराज [सं० सिवराजेन । नार्या सं० माणिकदे पुत्र सं० रणमल धर्मदास सकुदुम्वेन श्री दिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्रीजिन वर्द्धन सूरि प श्रीजिन चन्द्र सूरि पह श्रीजिन गर सूरीणां निदेखेन वाचकाचार्य शुक्ल शील गणितिः श्रीखरतर गच्छे । वैभार गिरि। ( 257 ) सं० १५२४ आषाढ़ सुदि १३ खरतर गणेश श्रीजिन चन्द्रसूरि विजय राज्ये तदादेशे (वैतार गिरौ मुनि मेरुणानि ॥ श्री कमल संयमोपाध्यायैः स्वगुरु श्री जिन भद्र रि पादुके प्र० का० श्री माल वं० नीषू पुत्र ठ० छीतमल श्रावकेण । ( 25 ) सं० १५२७ आपाड सुदि १३ श्रीजिन चंद सूरिणामादेशेन श्री कमल संयमोपाध्यायः नाशालि नद्र मूर्ति-- का० प्र० पीमसिंह (?) श्रावकेण । (259 ) नमः ॥ सम्बत १८२६ वर्षे माघ माते शुक्ल पक्ष १३ तिघौ श्री आदिनाथ जिन चरण मले स्थापितं हुगली वास्तव्य जोतवंशे गांधि गोत्रे बुलाकीदास तत्पुत्र साह माणिक देन राजगृहे वैज्ञार गिरे जीर्णोद्धार करापितं ॥ स्वपरयोः शुताय ॥ श्री ।।
- १० सं० १९०० वर्ष मार्गशीर्ष मासे शु० पक्षे १०८० श्री पद्मप्रभुकस्य (260 ) ॥ श्री सम्वत १८३० माघ शुक्ल ५ चन्द्रे ओसवंशे गहलडा गोत्रे जगत्सेठजी श्री चन्दजी सत्पुत्र सेठ आणंदचन्दजी तत्पुत्र जगत्सेठजी श्री महताव रायजी तदुर्म जगस्सेठाणीजी श्रीशंगारदेजी श्रीमदेकादश गणधर पादुका कारापितं। स्था० । नगरोपरि वैमार गिरी॥ ( 261 ) सम्बत १८७४ वर्षे शाके १७३६ मिति जेष्ठ वदि ५ सोमदिने श्री व्यवहार गिरि श्री पार्श्वनाथ धरणन्यासः प्रतिष्ठितं भ० श्रीजिन हर्ष सूरिभिः । सम्वत १८७४ वर्षे शाके १७३९ मिति ज्येष्ठ वदि ५ सोम दिने । श्री व्यवहार शिपरे । श्रीयुगादि देव चरण न्यासः प्रतिष्ठितं । महारक श्री जिन हर्ष सूरिभिः । ( 26 ) सुन्न स० १६०० वर्षे मार्गशीर्ष मासे शुक्लपक्ष १० दशम्यां तिथौ शुभवासरे शांतिनाथ चरण कमल प्र० श्रीमत् बृहत्खरतर ग० श्री जिन रंगसूरीश्वर साखाया , यं० यु श्री जिन नन्दी वर्द्धन सूरि राज्ये वा० श्री मुनि विनय विजयजि तत् शिष्य पं. कीयुट्योपदेशात् ओसवाल पं० वायू मोहन लाल कस्यात्मज बाबू हकुमत का शुभमस्तु । ( 264 ) ( 262 ) A रायेन नम: सु. २० प्र. की वृः प० ० श्रीजिन नन्दी बद्धन सूरीवा श्री मुनि यिनय विजयाज विमुकीन्युट्योपदेशान् यायू पुस्याल चन्द पीपाडागोत्रीयास्य पत्नी पराण , ही बेभार गिरे सुन्नमस्तु ।
(६६) ( 265 ) । सु० स० १८०० वर्षे मार्गशीर्ष मासे शुक्ल पक्ष १० दशम्यांशुन्नवासरे श्रीमस्पार्श्व- रस्य चरण कमल प्र० श्रीमत् वहत परतर ग० श्रीजिन रंग सूरीश्वर सापायां श्री जिन वर्द्धन सूरि राज्ये वा० श्री मुनि विनय विजयजि तत् মি ० मु० कोय॒दयोपदेशात् ० ० पुस्याल चन्द पीपाडा गोत्रस्य पनी पराण कुंवर माविका प्र० का वैज्ञार गिरे। ( 966 ) ॥ ॐनमः सिद्धं सं० १९०० वर्षे मार्गशीर्ष माते शुक्ल पक्ष १० दशम्यां तिथौ शुन वा० कुंघनाघस्य चरण क० प्र० श्री मत्र० स० ग० श्री जिन रंग सूरीश्वर तापा० श्री जिन दी वर्द्धन सूरि घ० वा. श्री मुनि विनय विजयजि तत् शिष्य मुनि कीर्युदयोपदेशात सवाल वंसोद्भव वावु मोहनलालजीद फस्यात्मज वावु हकुमत राय--कस्य गोत्रीय • कारापित शुभमस्तु । वैज्ञार गिरी। (SC ॐ नमःसिद्ध । शु० सं १८०० वर्षे मार्गशीर्ष माने गुरु पले १० दशम्यां तियो शुभ धोचिंतामणि पावनाघस्य ६०प्र० घी मत्रसरतर ग. श्री जिन रंग गरियर सा० १० २० यु०प्र० श्रीजिन नंदी पईन सूरि वर्तमान वा श्री विनय विनयजितन I० मुनि कीर्युदयोपदेशात् दायु महताय बन्दस्य सचिती गोत्रीयो तत्पनी चिराजी दी प्र० पा० सुन्न मस्तु वैज्ञार गिरे। । सं०६८९६ मा १६६F मुधिः मुदि। तिकी कामना पायामाग Re छोजिन महेन्द्र परिहालेश्री कर ne- दो परत
--
itter
( 269 )
सं. १६८६ वर्षे वैशाप सुदि १५ दिने मंत्रिदल वंशे चोपरागोनेठा०विमलदासस
कुण्डलपुर।
आज कल यह स्थान वडगांव नामसे प्रसिद्ध है परन्तु शास्त्र में इस्का गुटयर
नाम है । यहां श्री महावीर स्वामीजीके प्रथमगणधर श्रीगोतमस्वामी ( इन्द्रभूति
का जन्म स्थान है। बौद्धोंके समयमें निकट में नालंदा नामका प्रसिद्ध
और छात्रावास था। चारों तर्फ प्राचीन कीर्तियोंके चिन्ह विद्यमान
के तर्फसे इस वर्ष यहां खुदाई आरम्न भई है आशा है कि प्राचीन इतिहासके.
यहुतसे साधने यहां मिलेगी।
पाषाणपर ।
॥ ५॥ संवत १४७७ वर्षे ज्येष्ट वदि ६ शुक्रे श्री आदिनाथ ऋषम विवं का० ।
॥ सं० १५०४ वर्षे
फागुण सुदि ६ दिने महतियाण वंशे काणा गोत्रे स.
म० भीषण कारित श्री महावीर विवं प्रतिष्ठितं श्री खरतर गच्छे श्री जिनसागर ।
निदेशेन वाचकाचार्य सुन शील गणिभिः ।
ठा० तुलसीदास सत्पुत्र ठा० संग्रामगोवर्द्धनदास तस्य माता ठ० नीहालो तरपुत्र मौर्या
यो देहरामोसमस्बानीका चरण गुन्बर ग्राम कारा पिता वृहत्खरतर
गरले
श्री श्री जिनराज नृरि विद्यमाने उ० अन्नय धर्मन प्रतिष्ठा कृता ।
( 270 )
कउरसी
( 271 )
(७१) (272) सम्बत १६८६ वर्षे शाके १५५१ प्रवर्तमाने---- मासि शुक्ल पक्ष सप्तमी गुरु वासरे त श्रीपरतरगच्छे युग प्रधान श्रोजिन चन्द्र सूरि पादुका ठाकुर देवा तस्यात्मजमांडन य भार्यान्हालो प्राविका पुण्य प्रमाविका तस्य पुत्र दुलि चन्द्रेण प्रतिमा कारापिता माहतीयाल (महतियाण) श्रावकेन गुरु भक्ति दुलिचन्द्र प्रतिष्टा क० श्री उपाध्याय श्री तिलक गणि पादुके प्रतिष्ठितं वा० लब्धिसेन गणि प्रतिष्ठा । पटना (पाटलिपुत्र) मगधके राजाओंकी राजधानी राजगहीसे राजा श्रेणिकके पुत्र कोणिक चंपा नगरी राजधानी बनाया। उनके पुत्र उदाई राजा वहांसे यह पाटलिपुत्र नवीन नगर वसा । राजधानी कायम किया। पश्चात् यहां पर नव नन्द मौर्य वंशो चन्द्रगुप्त अशोक दि बड़े २ राजा राज्य कर गये। पं० चाणक्य, आचार्य उमास्वाति, भद्रबाहू-आर्य हागिरि, तुहस्थि, वज स्वामि महान् लोग यहां रह गये हैं। आचार्य श्री स्यूल भद्रजी र सेठ सुदर्शन जी का भी यहीं स्थान है। दादा जी की छत्री भी यहां प्राचीन है हरका मंदिर जीर्ण होगया है-आज कल विहार उडोसाचे शासन कर्ता यहां रहने के रण और प्रधान विचारालय स्थापित होनेते यह स्थान उन्नति पर है। सहर मन्दिर-पाषाण पर । (273) संवत १८५२ वर्षे पोप शुक्ल ५ मृगवासरे श्री पडलीपुर वास्तव्य । श्री उरुठ संघ सम- येन भो विशाउ स्वामी। प्रो पार्श्वनाथ स्वामी प्रासादस्य जीणोद्वारं कारापिर्त । पर्यस्याग्रेश्वरो तपागच्छोय प्राईः । कुहाड श्री ज्ञानचन्दजो प्रतिष्ठितं च श्री सकल रिजिः शुयात् ।
.
सूरिभिः
( 275 )
अमाद पु० राणा धिरदे कुंपा पांचा स० ऊदाकन पीकातमि०(?) श्रीवासुपुज्याय
धातुओं के मूर्तिपर।
( 274)
सं० १४८६ वर्षे वैशाख सुदि ७ सोमे श्री श्रीदूगड गोत्रे सा० अर्जुन पुत्रेण सा.
सिंहेन आर्या जयताही पु० सा० मूला सा० नगराज सा० श्री पालादि युतेन
श्रीचंद प्रभ कारितं प्रतिष्ठितं वृहद्गच्छीय प्रो मुनीश्वर सूरि पह प्रन्न
सं० १४९२ वर्षे श्री आदिनाथ विवं प्रति० श्री खरतर गच्छे श्री जिनगद ला
कारितं कांकरिया सा० सोहड़ भार्या हीरादेवो भो--कया ।
( 276 )
सं० १५०३ वर्षे माघ सुदि बुधौ वासरे घौरपट श्री देवां कीर्ति अटकी घौरेय
सहिजै पतिसर्जर्षिः भ्यमिरि पुत्र उदत्य-षिम्बराजामन । शुभं ॥
सं० १५०८ वर्षे वैशाप सु०५ चन्द्रे उप० सा० घेता भा० तलदे
पुत्र
देपा पेताकेन डूंगर निमित श्री धर्मनाथ यि का गच्छ म श्री मुनि कि.
सूरिभिः ॥
सं० १५०६ माह सुदि १० के० सा० ला गो० दो० साल्हा मा० माल्ही पु० जदा,
(277 )
चाचा
(278 )
का०प्र० श्री संडेर गच्छे श्री शांति सूरिभिः।
( ०३) (279 ) सं० १५१४ जलवाह ग्राम वासि ओसवाल सा० लीला मा० अमरी पुत्र सा० नाथू ना ना० चनू पुत्र डूगशादि युतेन भात उगम शेयसे श्री मुनि सुव्रत विवं का० प्र० तपा गच्छेश श्री रत्नशेषर सूरि पुरंदरैः । (280) सं० १५१७ वर्षे फा० शु० ११ लीणुरा बासि प्रा० वा० माई (?) आज बाकुंसुत सम- ण ना० राजू पुत्र वानर पर्वतादि युतेन स्व श्रेषसे श्री कुंयु विवं का० प्र० तपागच्छे रत्नशेपर सूरिपदे श्री लक्ष्मीसागर सूरिलिः आचंद्रा जपतत् ॥ श्री॥ ( 21 ) सं० १५१९ वर्षे आपाड़ वदि१ श्री मंत्रि द० श्री काणा गोरे ता० लाधू मार्या धर्मिणि व सं० अचल दासेन पुत्र उग्रसेन लक्ष्मीसेन सूर्यसेन बुद्धिसेन देवपाल महिराजादि युतेन श्रेयो) श्री पार्श्वनाथ विंवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री खरतरगच्छे श्री जिन सुन्दर सूरिपदे जिन हर्प सूरिभिः। ( 22 ) सं० १५२३ वर्षे फा० २०८ छाव गोत्रे उकेश स० सान्हा ना० कलह पुत्र सं-नरसिंह T० नामलदे पुत्र सं० साधून श्री यमना मात ताहत्तमधर प्रमुख कुटुम्ब युवेन स्व यते श्री धर्मनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री-रिभिः:॥ देप। तप--श्री ॥ ( 23 ) सं० १५२४ वै० अ० १३ प्राग्वाट सं० जास० मा० रात सुन सा वाटा : सोनी त्र हासादि कुटुम्ब युतेन स्वप्रेयते श्री वासु पृज्य विवं सारितं प्रतिष्टिनायी सक सर सूरिभिः ॥ जाणांधारा (?) वास्तव्य वासियाः ।
( 284
सं०१५३१ वर्षे ज्येष्ठ वदि ११ सोमे श्रीमाल ज्ञातीय घेवरीया गोत्रे सा. केव्हर
गणी पुत्र साहसू जगपतिकेन प्रा० साल पुत्र सहसू युतेन श्री विमल नाथ विवक
प्र० श्री खरतर गच्छे श्री जिन हर्ष सूरिभिः ॥
( 285 )
सं० १५३४ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १० सोमे लोवडी वास्तव्य सं० खेमा भा० गोरी
पुत्र घेडसीम हितया निज श्रेपसे श्री अंचल गच्छे श्री कुंथ केसरि सूरीणामुपदेशेन
कुंपनाथ विवं का० प्रतिष्ठितं श्री संघेन ॥
( 286 )
सं० १५३५ श्री मूलसंघ श्री विद्यानंदि गुरु रोहिणी व्रतोद्यापन वासु पूज्य
प्रतिष्ठितं सदा प्रणमंति गुरवः ।
स्व
( 287 )
सं० १५३६ फा० सु० ८ ओसवाल ज्ञा० सा० देल्हाणधासुःसरठवणेन (?) सु०
श्री शांतिनाथ विवं का० ॥प्र०॥ उके
सरसा
कव।
( 288 )
सं० १५३८ वर्षे आपाढ़ वदि ५ स--र मूलसंघ श्री मानिक चंद ल --- श्री।
(289 )
सं० १५१३ वर्षे वैशाख सुदि ३ दिने श्रीमाल ज्ञातीय नांडिया गोत्रीय सा.
पुत्री वाटाया मार्या साठी सुप्राविकया श्री चन्द्र प्रभावकारितस्य पुण्यार्थ प्रा
अनि
(५) खरतर गच्छे श्री जिन समुद्र सूरि पहालंकार श्री जिन हंस सूरिभिः कल्याणं भूयात ह सुदि १॥ दिने (290) सं० १५६६ वर्षे ज्येष्ठ शुक्ल नवम्यां श्रीमाल वंशे महता गोत्रे सा० हाल्हा तस्य पुत्र ० तकतनेनेदं पार्श्वनाथ विवं कारितं खरतर गच्छे श्री जिनदत्त (2) सूरि अनुक्रमे श्री नराज सूरिप श्री जिन चन्द्र सूरिभिः प्रतिष्ठितं । (291) सं० १५६६ वर्षे माघ २०५ गुरौ लघु शाखायां सा० वीरम मा० कलापुत्र सा० आसा To कुंअरि नाम्न्या मुनि सुव्रत विवं का० स्वयसे प्र० तपागच्छेलो हेम विमठ सूरिभिः नलकछे। (?)॥ (292) सं० १५७६ वर्षे वैशाप सु० ३ शुक्रे श्री श्री (?) वंशे। सा० माला मा० खातू नाम्ना ण्यो (?) जावड़ शी० अदा समस्त कुटुम्ब युतयाधी अंचलगच्छे श्रीभावसागर सूरीणा- पदेशेन श्री आदिनाथ विंध कारितं श्री संघेन ॥ अंयोऽयं ॥ (293) सं० १५७६ वर्षे वैशाख तु० ६ सोमे पं० ननयसार गणि पुण्याय शिष्याः पं० अभय दिर गणि अन्नय रत्न मुनि युताभ्यां श्री शांतिनाथ विवं कारितं प्रतिष्टितं विय तपा हे घोसौताग्य सागर सूरिभिः । सं० १५७६ वर्षे माह सुदि ५ दिने उसबोट ज्ञातीय नवटपा गोत्रे माहयान मा०- सिरि पुः पदमा-पापदमा-पांचा हेमादि युवेन साः पहमारेन पृथंज पृण्याचं घी वर्षे ओसवाल ज्ञासीय लोढा गोत्रे गाणी वंसे साह Qर पाल सं० सोनपा लोढा गोत्रे गावंसे संघपति ऋषभ दास भा० रेष श्री पुत्र सं० क्रुरपाल सं० सोनपार श्री मत्संवत १६७१ वर्षे वैशाष सुदि ३ शनी श्री आगरा वास्तव्य उपके (७८) -( 306 ) सं० १९०० मिः आषाढ़ सिः गुरौ श्री महावीर जिन विवं प्रति. खरतर गच्छे महारक श्री जिन हर्ष सूरिप दिनकर ० श्री जिन सौभाग्य सूरिमिः तेन ओसवंशे दूगड़ गोत्रे मोलानाथ पुत्र दोलतरामेन स्वश्रेय सोर्थम् । पाषाण के मूर्तियों और चरणों पर । ( 307 ) ( चंन्द्रमा विवपर) सम्बत १६७१ श्री आगरा वास्तव्य ओसवाल ज्ञातीय लोढ़ा गोत्रेगाणी से ऋषभदास भार्या सुः रेष श्री तत्पुत्र संघराज सं० रूपचन्द चतुर्भुज सं० घ युते श्रीमदंचल गच्छे पूज्य श्री ५ धर्ममूर्ति सूरि तत् पर्ट पूज्य श्रीकल्याण सागर मुपदेशेन विद्यमान श्री विसाल जिन विंध प्रति प्रति० अंचल गच्छे श्री कल्याण सागर सूरीणामुपदेशेन वासु पूज्य विबं प्रतिष्ठापित। भी मत्संवत १६७१वर्षे वैशाष सुदि ३ शनी आगरा वास्तव्योसवाल प्रवरौ स्वपितृ ऋष दास पुन्यार्थं श्रीमदंचल गच्छे पूज्य श्री ५ कल्याण सागर मुपदेशेन श्री पदम प्रनु जिन बिंयं प्रतिष्ठापितं स० चागाकृतं। ( 310) ( 308 ) संवत १६७१ (309 ) ३ सूरीमा ज्ञातीय लोढा गोत्रे सा. प्रेमन भार्या शक्तादे पुत्र सा० पेतसी लघुभ्राता सा मेवमा
(७९)
सेन श्री मदंचल गल्छे पूज्य श्री ५ कल्याण सागर सूरीणामुपदेशेन श्री वास पूज्य
व प्रतिष्ठापितं सं० Qरपाल सं० सोनपाल प्रतिष्ठितं ।
.
( 311 )
श्री मत्संवत् १६७१ वर्षे वैशाष सुदि ३ शनी श्री आगरा नगरे ओसवाल ज्ञाती
मोढा गोत्रे गा वसे सा० पेमन मार्या श्री सतादे पुत्र सा० पेतसी मा० अकादे
पुत्र सा०- सांग
श्री अंचल गच्छे पूज्य श्री ५ कल्याण सागर सूरीणामुपदेशेन
गोविमलनाथ विवं प्रतिष्ठितं सा० Qरपाल--।
--
( 312)
-
..
(सं० १६७१ ) संघपति श्री Qरपाल स० सोनपाले : स्वमातृ पुण्यार्य श्री अंचलगच्छे
ज्य श्री ५ श्रीधर्ममूर्ति सूरि पहाम्बुजहंस श्री ५ श्री कल्याण सागर सूरीणामुपदेशेन
गोपार्श्वनाथ विवं प्रतिष्ठापित पुज्यमानं चिरं नंदतु ।
(313 )
V
॥ सं० १७६२ वर्षे कार्तिक शु०६ सा वेणीदास पुत्र नीमसेन पुत्र मयाधन्द प्रतिष्ठा
रापितं बीराणी गोत्रे पाडली पुरे।
(314)
। सं० १७६२ वर्षे कार्तिक शुक्ल : सा. वेणीदास पुत्र जीमसेन पुत्र मयाघन्द वीराणी
सोने प्रतिष्ठा करापितं पाटली पुरवरे।
( 315 )
॥ सं० १७६२ व० का० सु० ६ सौ. वेणीदास पुत्र बीमसेन पुत्र मयाचन्द प्र.
पौराणी गोत्र पटना नगर प्री नेमनाथ ॥ श्री गांतिनाथ ।।
--
।
५
( 316 )
॥ सं० १७८६ वर्षे आसोज सुदि ८ श्रीपासचन्द गच्छे ॥ श्री उपाध्याय
जीना
पादुका ॥
( 317 )
॥ संवत १८१८ वर्षे श्री संभवनाथ जिनचरण कमल स्थापिते साह माणिक
जीर्णोद्धार करापितं ॥
-
( 318 )
सं० १८२५ वर्षे माघ शु० ३ गुरौ गोवर्द्धन सुत सरुपचंदेन प्रति महि
कारापितं ।
नाय,
।
( 319 )
॥ संयन् १८२६ श्री ५ पं० लोलचन्दजी पादुकं ॥ मनसारामेन स्थापितं ॥ सर्वत् ।'
थी। पं० रपचन्दजी पादुका ॥ संवत् १८२६ श्री ५ श्री वा० भारमल्लजी ॥
५
( 320 )
। मुह संधत् १८७७ वर्षे ॥ वैसाख शुक्ल पंचम्यां चंद्रवासरे श्री जिन कुशल
रहरमा बरण पादुका प्रतिष्ठिता श्री महत्खरतर गच्छे भहारक श्री जिन
गरि पाउं कृत श्री जिनचन्द्र मूरिभिः श्री मत्पाटलिपुर वास्तव्य । समस्त श्री
मनिटासारापिता। पं । गणि श्री कीर्युदयोपदेशात् ॥ श्री रस्तु ।
--
( 321 )
.
६. सन्नद १८६५ वर्ष वैगाप शुक्र पंचम्यां चन्द्रवासरे श्री जिन कुशल
स्मरमा चरप्ट पादुका प्रतिष्टिता महारक थी जिन अजय सूरि पहालंकृत श्री ।
Fectrrs Poelp... Prima TeededS 1577 . 1820A D)
शतक्ता अवधीचिमार
जिन रावरीचवमन
नरात्रि
मावा बास
बासरे
को कातिमि
हदरवरता
द्वारक
अदायत
होतीनि
तिल
खास्त
नवज्ञाना
पालि
समाधी
छा
वाकी
मितामा
दियों
।
No text on this page.
(१)
न्द्र सूरिभिः मनेर वास्तव्य श्रीमालान्वये--वदलिया गोत्रे सुश्रावक श्री कल्याणचन्द
पुत्र श्री भरगुलाल कीर्तचन्द्र तत्पौत्र किसनप्रसाद अभय चंद्रादि सपरिवारेण स्वश्रे-
ज्य प्रतिष्ठा कारापिता पं । ग । कीर्युदयोपदेशात् ।
( 322 )
भी आगरा नगर वास्तव्य सं० पति श्री श्री चन्दपालेन प्रतिष्ठा कारिता।
( 323 )
॥ संवत २४६ वर्षे वेशाप सुदि ३ श्री मुलसंघे महारक जी श्री जिन चन्द्रदेव साह
विराज पापडीवाल लित्य प्रणमति सर मम श्री राजाजी स संघ---
( 324 )
संरत १५४८ वर्षे वैताप लुदि ३ मुलसंघे भहारक श्री जिन चन्द्र सा० जिवराज
पडिवाल सहरन-सा श्री राजसी संघ रावल ॥
( 325 )
॥ संवत १६०४ ज्येष्ठ वदि ३ सोमवारे क्रुरवंशे महाराजधिराजजी श्री मत स्याहजा
ज्य २० ॥ चंद्रकीर्तिजी तत्पदे न० श्री देवेन्द्र कीर्तिजी सदाम्नाये सरस्वती गच्छे
लात्कारगण कुंदाचार्यान्वये शुभां।
( 326 )
-
संवत १७३२ वर्षे मार्गशिर्ष वदि पंचमी गुरौ ढाकामध्ये काष्ठा संघ माथुर
च्छे पुष्कल गण लोहाचार्या न्वये दिगम्वर धर्म नहारक रूपचन्द्र प्रतिष्ठितं अग्रवाल
गलु गोत्रे सा० गुलाल दास ना० मुलादे पुत्र० । सायलसिंघवी अमरसिंघवी केसर
ह वि---प्रतिष्ठा कारापितानि सेरपुरेन्तिके ढाकायां
प्रतिष्ठा ।
दुकानां ॥ योस्तुः ॥ पादुका आदिनाधकी। गुरुपादुका ॥
(८४) श्री समेत शिखर तीर्थ। हैं यह प्रसिद्ध जैन तीर्थ पूर्व देश जिला हजारिवागमें है। १ । १२ । २३ । २१ सीर्थंकरोंके सिवाय और २० तीर्थंकरोंका निर्वाण कल्याणक यहां हुवे हैं। यह पहाड़के २० टोंकमेंसे १८ टोंक पर छत्रिमें धरण पादुका विराजमान हैं और श्री नाथ स्वामीके टोंक पर मंदिर है। तलहटी मधुवनमें मंदिर और धर्मशालाबने हुए यहांसे ४ कोस पर ऋजुवालुका नदी बहती है जिसके समीपमें श्री वीर भगवानका ज्ञान भया था। यहां पर चरण पादुका है। यहांका और मधुवनका लेख जैन तीर्थ डसे लिया गया है। ऋजुवालुका नदी किनारे छत्रिमें चरण पर । ( 336 ) ऋजुवालुका नदी तटे श्यामाक कुटुम्बी क्षेत्रे वैशाख शुक्ल १० तृतीय प्रहरे ज्ञान कल्याणिक समवसरणमभूत् मुर्शिदावाद वास्तव्य प्रतापसिंह तद्भार्या . कुवर सत्पुत्र लक्ष्मीपतसिंह बहादुर तत्कनिष्ट भ्राता धनपतसिंह वहादुरेण सं० १९३" जीणोधारं कारापितं । मधुवनके मन्दिरके मूर्तियों पर । ( 337 ) संवत् १८५४ माघ कृष्ण पंचम्यां चंद्रवासरे श्रीपार्श्व जिन विवं प्रतिष्ठितं -- ( 338 ) संवत १८५५ फाल्गुण शुक्ल तृतीयायां रवी श्रीपार्श्वनाथस्य शून स्वामी गणधर . प्रतिष्टितं जिन हर्ष सूरिनिः कारितं च वालुचर वास्तव्य श्रीसंघेन ।
(८५)
( 389 )
इत १८७७
भोपार्श्व विंवं प्रतिष्ठितं श्री जिन हर्ष सूरिणा कारितं - - सांवत
हज पदार्य मल्लेन
( 340 )
संवत् १८७७ वैशाख शुक्ल १५ श्रीपार्श्वविवं प्रतिष्ठितं श्रीजिनहर्ष सूरिणा गोलेछा
इतावो - - मूलचन्द्र धर्मचन्द्रेण कारितं ।
( 341 )
संवत १८८७
वर्षे
फाल्गुन शुक्ल १३ श्रीपार्श्वनाथ जिन विवं दुगड़ ज्येष्ठमल्ल मार्या
ती नाल्ल्या वाचक चारित्रनंदि गणि उपदेशात् कारितं प्रतिष्ठितं च ।
( 342 )
संवत १८८८ माघ शुक्ल पंचम्यां सोमवासरे श्री शितलनाथ विंवं कारितं ओशवंश
गड़ गोत्र प्रतापसिंहेन प्रतिष्ठितं च भी जिन चंद्र सूरितिः ।
( 348 )
संवत १८८८ माघ शुक्ल पंचम्यां चंद्रवातरे श्रीचंद्रप्रन जिनवि कारितं ओशवंशे
विलखा गोने मेटामल पुत्र जसरूपेन प्रतिष्ठितं च वृहद सहारक खरतर गच्छ श्री जिना-
यसूरी चंचरीक धीजिनचंद्र सूरितिः ।
सं० १८६७ वर्षे ---श्री ऋपन्न जिनविवं कारितं प्रतिष्ठितं
---
॥ संयत् १९३१ । माघे। शु। १० चंद्रे। श्री अजितनाथ जिनेन्द्रस्य चरण ५.
खुसालचंदेन श्री
(८६)
सागरांकयसुचंद्र वर्षे (१८८७) नेत्रषण गणधरायुते शके (१७६२) ।
सुनागके (५) भार्गवे सिसपटौघपालके वाणारस्यां श्रीमदत। ।
पार्श्वनाथ जिनमूर्तिः कारापितं श्रे० उदय चंन्द्र धर्म पत्नी महाकुवराज्यया
युतया यहत्खरतर गणेश श्री जिन हर्ष गणि पदालंकृत श्री जिन महेंद्र
( 345 )
सं० १९०० वर्षे-- श्री गोडी पार्श्वनाथ विवं का०
.
( 346 )
४
सं०१९१० शाके १७७५माघ शुक्ल द्वितीयायां श्री पार्श्वविवं प्रतिष्ठितं ९
टोकपरके चरणों पर।
( 347 )
॥ संवत् १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय सा० खुसाल
अजितनाथ पादुका कारापिता श्री मत्तपा गच्छे
( 348 )
जीर्णोद्धार रूपा श्री संघेन कारापिता । मलघार पूर्णिमा श्री मद्विजय गच्छे । "
श्री जिन शांतिसागर सूरिलि प्रतिष्ठित च ॥
ही
( 349
॥ संवत् १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय सा०
पादुका कारापिता श्री मचपा गच्छे ।
( 350 )
(20)
(351)
T
" संवत् १९३० । माघे ।। शु० १० । चंद्रे । श्री संजय जिनेंद्रस्य चरण पादुका श्री संघेन
रापितां । मलधार पूर्णिमा ॥ विजय गच्छे । श्री महारकोत्तम श्री पूज्य श्री जिन
गंति सागर सूरितिः प्रतिष्ठितं ॥
( 352 )
॥ सं० १९३३ का जेष्ठ शुक्ल द्वादश्यां शनिवासरे श्री अभिनन्दन जिनेंद्रस्य चरण
दुका जीर्णोद्धार रूपा श्री संघेन कारिता मलधार पूनमीया विजय गच्छे श्री जिन
६ सागर सूरि पहोदय प्रत्नाकर महारक श्री जिन शांति सागर सूरिभिः प्रतिष्ठितां।
पितांच । शुभं भेंयसे
भवतु।
4
( 353 )
॥ सं० । १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय सा० खुसाल चंद्रेण श्री सुमति
'थ पादुका कारापिता घ । सर्व सूरिभिः श्री तपा गच्छे ।
( 354 )
। सं। १९३९ । माघे । शु। १० श्री सुमसिनाथ जिनेंद्रस्य चरण। पादुका । जीर्णो-
र रूपा । गुर्जर देसे श्री संघेन स्थापिता। कारापिता। विजय गच्छे ।।। श्री जिन
िित सागर सूरिनिः। प्रतिष्ठितं ॥
1
(355)
॥ सं १९४९ माघ सु० १० सुक्रवा । श्री समेत शैल पर्वते श्री पद्म प्रभु जिन चरण
थापितं प्रति।म। श्री विजय राज सूरि तपा गच्छे ।
(८८)
( 356 )
॥ संवत् १८२५ मह सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय साह खुसाल चंदेन श्री सुपार
पादुका कारापिता ब्र।
( 357 )
संवत् १९३१ । माघे । शु। १० । सुपार्श्वनाथ जिनेंद्रस्य । चरण पादुका
रूपा। सेठ उमा भाई हठी सिंहेन तया स्थापना कारापित पूर्णिमा विजय गाः
भहारक । श्री जिन शांति सुरिभि । प्रतिष्ठितं च ।
( 358 )
॥ संवत् १८४९ माघ मासे शुक्ल पक्ष पंचमी तिथी बुद्धवारे । श्री चंद्र प्रभु
चरण न्यासः श्री संघाग्रहेण । श्री बृहत् खरतर गच्छीय । जंगम । युग प्रधान मट्टार
श्री जिन चंद्र सूरिभिः। प्रतिष्ठितः ॥ श्री॥
( 359 )
॥ संवत् १९३१ वा वर्षे। माघ सुदि १० तिथौ श्री सुविधि जिनेंद्रस्य चरण पादुर
अहमदावाद वास्तव्य सेठ उमा भाई हठी सिंहेन कागपिता । मलधार पूर्णिमा
गच्छे । भहारक । श्री जिन शांति सागर सूरिभिः । प्रतिष्ठितं ॥
( 360 )
.
म संवत १९३१ । माघे । शु। १० तिथौ । चंद्रे । श्री सुवधि जिनेंद्रस्य चरण
जीर्णोद्धार रूपा । अहमदावाद वास्तव्य ।सेठ उमा भाई हठी सिंहेन स्थापिता
। मलघार पूर्णिमा । श्री मद्विजय गच्छे । श्री महारकोत्तम । श्री श्री जिन
सूरिमिः ॥ प्रतिष्ठितं । स्थापितं च शुभ श्रेय ।
गरनार
(EE)
पीजानेर. राजकतामा
-
( 361 )
॥ सं० । १८२५ वर्षे माव सुदि ३ गुरे विरानी गोत्रीय सा० श्री खुसाल चंद्रेण । श्री
तल जिन
पादुका
कारापिता श्री तपा गच्छे ।
( 362 )
॥ संवत् १९३१ वर्षे साघे । शु। १० । चंद्रे श्री सीतल नाथ जिनेद्रस्य चरण पादुका
र्णोधार रूपा गुजरातो श्री संघे कारापिता ॥ मलधार पूर्णिमा विजय गच्छे । महा-
। श्री जिन शांसि सागर सूरिभिः । प्रतिष्ठितं । स्थापितं च ।
( 363 )
॥ संवत १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय साह खुसाल चंदेन श्री श्रेयांस
मुपादुका काराापता प्रतिष्ठिता च श्रीमत्तपा गच्छे ।
--
(364)
॥ संवत् १९३१ माघे शु। १० तिथौ । श्री घेयांत नाथ जिनेंद्ररय चरण पादुका
र्णोद्धार रूपा । गुजरातका श्री संघेन तया स्थापना कारापितं पूर्णिमा श्रीमद्विजय
स्छे । त। श्री पूज्य । श्री जिन शांति सागर सूरिभिः । प्र ।
--
(663)
॥ संवत् १८२५ वर्षे माघ तुदि ३ गुरो विरानी गोत्रीय साह सुसालचंदेन श्री विमल
घि पादुका कारापिता प्रतिष्ठिता च धीमत्तपा गच्छे ॥ भी ।
॥ संघत् १९३१ माघ शुक्ले १० चंद्रो घी थिमटनापजिनेंद्रस्य पादुका घीर्णोद्वार रपि।
जरात का श्री संघेन । तया स्थापना कारापिता । मलधार श्री विजय गच्छे । जं । यु
। महारक । यो पूज्य । यो जिन शांनि सागर सूरि प्रतिष्ठितं च ।
(60) ( 367 ) ॥ संवत् १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय साह खुसाल चंदन श्री प्रभु पादुका कारापिता प्रतिष्ठिताच सर्व सूरिभिः श्रीमत्तपा गच्छे ॥ श्री रस्तुः । ( 368 ) ॥ संवत् १९३१ वर्षे माघ शु०१० चंद्रे श्री अनंस नाथ जिनेन्द्रस्य चरण जीर्णोद्धार रूपा। श्री संघेन स्थापना कारापिसा । मलधार पूर्णिमा श्री मद्विजय महारक । श्री शांति सागर सूरिभिः प्रतिष्ठितं । स्थापितं । ( 369 ) ॥ सं १९१२ वर्षे शाके १७७७ मिते माषोत्तम मापे मार्गशीर्ष कृष्ण पक्षी सोमवासरे विजय योगे कुंभ लग्ने श्री सम्मेत शैले श्री धर्मनाथ चरण पादुका वृहत् खरतर महारकोत्तम मट्टारक श्रो जिन हर्ष सूरीणां । पद प्रभाकर श्री जिन सूरिभिः स साधुभिः कारिताश्च वाराणसीस्य श्री संघेन कालिपुरस्य संघेनया। ( 370 ) ॥ संवत् १९३१ माघे । शु । १० तिथी श्री धर्मनाथ जिनेंद्रस्य चरण पादुका रूपा । मम्बई वास्तव्य। सेठ नरसिंह भाई । केसवजी केन स्थापना पूर्णिमा विजय गच्छे । जं। यु।प्र। महारक जिन शांति सागर सूरिभिः । स्थापितं च । शु भवतु ॥ ( 371) । संवत् १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय साह खुसाल चंदेन श्री नाथ पादुका कारापिता प्रतिष्ठितं च सर्व सूरिभिः श्रीमत्तपा गच्छे ।
(६१) (2) n संबन् १९३९ । माघे । शु। १०। चंद्र। नी शांतिनाथ जिनेंद्रस्य । चरण पादुका गोटार रूपा । अहमदाबाद वास्तव्य । हे गु भाइ पेस देत त्यापना कारा- । पूर्णिमा विजय गच्छे । । युग प्रधान ।। ओ पूज्य ओजिन शांति सागर शिः प्रतिष्ठिन स्थापितं च ॥ - ॥ नंबत २५ मा दिनी मिगी गोलनदेन भी गाना दुका कारापिता प्रनी की। 44 TA ॥धा इ८::मा." བtirས་• - : ཟའ ཡ ར ལ:: . ।श्री जि." शिरः । प्रतिसाद । - :::::: :.1..." AT :- । १६ FEAn Tier- 7 .
(६२)
( 377 )
॥ संवत् १८२५ वर्षे माघ मासे शुक्ल पक्ष ३ गुरी विरानि गोत्रीय साह खुसाल
भी मल्ली नाथ पादुका कारापिता प्र • श्री तपा गच्छे ।
( 378 )
..
॥ संवत् १९३१ माघे । शु। १० चंद्र। श्री मल्लि नाथ जिनेंद्रस्य । चरण
जीर्णोद्धार रूपा अहमदावाद वास्तव्य । सेठ जगु भाई पेम चंद स्थापना
मलधार पूर्णिमा। श्री मद्विजय गच्छे । भहारक । श्री पूज्य। श्री जिन शांति सागर
प्रतिष्ठितं । स्थापितं च ॥
( 379 )
॥ सं० । १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरौ विरानी गोत्रीय साह खुसाल चंद्रेण श्री .
जिन
पादुका
कारिता श्रीमत्तपा गच्छे ।
( 380 )
॥ संवत् १९३१ माघे। शु।१०। श्री मुनि सुब्रत जिनेंद्रस्य । चरण पादुका।
रूपा। गुजरासका। श्री संघेन स्थापना कारापिसा । मल । पूर्णिमा । श्री
गच्छे श्री जिन शांति सागर सूरिभिः । प्रतिष्ठितं ॥ स्थापितं च ॥
( 381 )
॥ संवत १८२५ वर्षे माघ सुदि ३ गुरी विरानी गोत्रीय साह खुसाल चंदेन श्री न
नाय पादुका कारोपिता प्रतिष्ठिता सर्व सूरिभिः श्री तपा गच्छे।
(६३)
( 35 )
॥ संवत १९३१ माघ शुक्ल दशम्यां चंद्रवासरे श्री नमिनाथ जिनेंद्रस्य चरण पादुका।
र्णोद्धार रूपा। महमंदावाद वास्तव्य । सेठ उमा भाई हठी सिंहेन स्थापना कारा-
। पूर्णिमा विजय गच्छे नहारक। श्री जिन शांति सागर सूरिभिः । प्रतिष्ठितं ।
तेजपूर (आसाम)
राय मेघराजजीका मंदिर ।
( 383 )
संवत १५१३ वर्षे वैशाष शुदि ७ शनौ श्रीश्रीमाल ज्ञातीय श्रे० सानंद भार्या हीसू
पूनसीकेन मातृपितृ श्रेयोर्थं श्रीशीतलनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री सूरिभिः ।
( 384 )
सं० १९४३ का मिति वैशाप शुक्ल सप्तम्यां
-
( 365 )
सं० १९५७ वर्षे ज्ये० शु० १२ तिथौ शुक्रवासरे ॥ श्री जिन कीर्ति सूरि प्रतिष्ठितं श्री
नदत्त सूरि नाम पादुका का० ।
कलकत्ता
श्री कुमरसिंह हल - नं० १६ इंडियन मिरर स्ट्रीट ।
घातुयोंके मूर्ति पर।
(5)
श्रीपार्श्वनाथ विंद।
ब्रह्माण सत्व संयकः घियावे तुनः सुपुण्यक भी द्वः (?) सीटगप नृरि सत्तर (:)
हुले कारयामास संवत १०३२
( 387 )
श्री मूलसंघ गुणभद्र सूरेः संडिल्ल (खडिल्ल - खंडेल ?) वालान्यय सारमतः:
(६४)
सं० ११५० ज्येष्ठ सुदि १० श्री महेशराचार्य श्रावक पूना सुताभ्यां पाल्हण . ५५ "
स्वमातृ सोमा श्रेयसे चतुर्विंशतिः कारिता ॥
यो बिस्नु (शु) तोसौ सिवदेवि पुत्रः सच्छावकोऽभून्मुनिचंद्र नामा ॥ १
सरमाच्छीतेति विरव्याता आर्या शील विभूपणा।
कारिता कर्मनाशाय चतुर्विंशसिका शुना ॥ २ संवतु १२३९ फा सु० २ गुरौ ।
( 388 )
( 389 )
संवत १४८५ वर्षे जेठ सुदि १३ चंद्रवारे उपकेश गच्छे कक्क उकेश ज्ञातीय
सा० छाहउ ब्रजीदा (?) भा० जईतलदे पु० साचा माय
श्रेयसे श्री शांतिनाथ विवं कारा० प्रतिष्ठितं श्री सिद्ध सूरिभिः ।
सिवराजकेन
बडाबजार-पंचायति मंदिर।
( 390 )
रीषनाथ वीतनाग पत्नीलं मुलसत्क ॥ सं० १०८३ वै० सु० १५
[पृ० २२ के लेख नं० (८८ ) का संशोधित पाठ]
संवतु ११५४ माघ सुदि १४ पद्मप्रभ सुत स्थिरदेव पत्न्या देवसिया श्रेयो दूई
करिता ।
(६५) यति पन्नालालजी मोहनलालजीका घर देरासर । ( 391 ) ॥ संवत १५०६ वर्षे श्री श्रीमाल ज्ञातीय दोसी डूगर भार्या म्यापुरि सुत पूजाकेन र्या सोही सुत बीका युतेन आस्मश्रेयसे श्री सुविधिनाथादि चतुर्विंशति पह कारितः । गम गच्छे श्री अमरसिंह सूरि पह श्री हेमरत्न सूरि गुरुपदेशेन प्रतिष्ठितः ॥ गंधार हास्तव्य ॥ शुभं भवतु ॥ श्रीः॥ ( 392) सं० १५१६ वर्षे फा० शु० ८ प्राग्वाट सा० जोगा प्रा० मरगदे सुत सा० हदाकेन भा. 'रमी पु० पाल्हादे कुटुम्ब युतेन स्वश्रेयसे श्री विमलनाथ विवं का प्रतिष्ठितं तपागच्छे । सोमसुंदर सूरि पह श्री रत्नशेपर सूरिभिः । ( 393 ) सं० १७७१ वै० वदि ५ गुरी प्राग्वाट ज्ञातीय वृद्धशापायां सा. प्रेमचंद ग्रामीदास वयसे श्रीशांतिनाथ प्रतिष्ठितं श्री विजय ऋद्धि सूरिप्तिः । कलकत्ता अजायव घर ( म्युजियम ) के पाषाणके मूर्तियों पर । सार्या श्री गांगी नुत- -संवत १-८१ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १५ गुरौ भीनोमाली ज्ञातीय जंबहरा स० केशव त सं० मंडिलक तुत० सं० चांपा सार्या चापटदेतुत तं० घाकेन भार्या राजु पुत्र सा० नाकर सा० मागादि तथा (?) पुत्री जीवणि प्रसम्म मसु (?) कुदुम्ध युतेन निज धेयोऽवाप्ताय धी प्रेयांसनाय विवं कारितं ।। ऋ तपागा गायक ० भो रत्नसिंह सूरि पहालं करण ० श्री उदय वल्ड नृरिति श्री ज्ञान मागर रियुतो प्रतिष्ठितं। . 1 (६८) ०० आपाढ़ सुदि ८ दिने चंपकनर वासि श्रे० जावड़ भार्या पूरी सुत पाकेन मार्या हाई सुत नाकर प्रमुख कुटुम्ब युतेन श्रीशांतिनाथ विंवं श्री निगमागन 3 वनारस काशीदेशका यह वाराणसी वा वनारस सहर जैनियोंका बहुत पवित्र स्थान हिन्दुओंका भी प्रसिद्ध तीर्थ है। यहां प्रतिष्ठ राजा और पृथ्वी राणीके पुत्र: तीर्थंकर श्री सुपार्श्वनाथजी का च्यवन और जेठ सुदि १२ जन्म,जेठ सुदि १३, फागुन वदि ६ केवल ज्ञान और अश्वसेन राजा वामा राणी के पुत्र २३ मां । श्री पार्श्वनाथजी का भी च्यवन, पोष यदि १० जन्म, पौष वदि ११ दीक्षा और वदि १ केवल ज्ञान यह ८ कल्याणक भये हैं। महल्ले अलुपुरा और अदेनीमें बने हुए हैं सहरमें कई एक मंदिर हैं। यहां से ४ कोस पर सिंहपूरी है यहां ११मां श्री श्रेयांसनाथजी का च्यवन, फागुन वदि १२ जन्म, फागुन वदि १३ दीक्षा और ' वदि ३ केवल ज्ञान प्रया है। निकट में वौद्धोंका सारनाथ नामक प्राचीन स्थान है। सुत टोलका मंदिर। पंच तीर्थी पर। सं० १५१५ वर्षे माह शुक्ल १३ दिने श्री ओसवाल ज्ञातीय श्री मूंधा भार्या : सु० धनदत्त न पितृ श्रेयो) श्री शितलनाथ विवं पूर्णिमा पक्ष भ० श्री सागर तिलक ! पह श्री नहितिलक सूरि कारितं प्रतिष्ठितं श्री सूरिभिः । वर्प ३ ( 40 ) ( 404 ) 4 सं० १५५६ भार्या कारितं प्रतिष्ठितं श्री निगमा विनावक श्री इन्द्रनंदि सूरिभिः ॥ श्रीः॥ ॥ श्रीः॥
( 66 )
बट्टीका मंदिर।
( 405 )
सं० १५१९ वैशाष शु० ५ प्राग्वाट सा० सिघा भा० लादां सु० साह हीराकेन ना.
जत्री प्रमुख सुरत श्री-जिनावति का० प्र० तपा रत्न शेखर सूरिभिः ॥
पटनी टोलेका मन्दिर ।
( 406 )
सं० १४८५ वर्षे आ० सुदि १० रवौ माल्हू --जज्ञा० साह वीजड पु० साह हरपाल
० हेमादे पुत्र ताह साडान श्रीपार्श्वनाथ विवं राजावर्तक रत्न मयं सपरिकरं का.
तिष्ठितं भीमल धारि गच्छे प्रोविद्यासागर सूरिनिः ।
( 407 )
सं १५८६ वर्षे वैशाप सुदि ३ मोमे श्री श्रीमाल ज्ञातीय परी. नरसिंघ भ्रातपरी
मनपा भार्या हीरूपुत्र कुरपालेन श्री श्री आदिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री तुविहित
सूरिभिः ॥
चुनिजी यतिका मन्दिर गणेशघाट ।
(408)
संवत १२५७ ज्येष्ठ तु० १० महेष्ठीराबार्य ---रखमातृ सोमा श्रेयचे धनुर्यि गतिः
कारिताः॥
।
रामचन्द्रजी का मंदिर।
(409)
सं० १४०६ वर्षे फागुन सु० ११ गुरी सूराणा गोत्रे सा० जतरा शु० सा० जगद
जयत श्री पु० नरपाल रणमीरभ्यां मात अ० महावीर वि० का० प्र० श्रीधर्म घोष
श्री ज्ञान चंद्र सूरि शिष्य श्री सागरचंद्र सूरिभिः ॥
( 410 )
सं० १४५६ ज्येष्ठ वदि १२ शनी सूराणा गो० सा० अमर मा. अइहव दे सुतसा
साल्हा श्रेयसे श्री पार्श्वनाथ वि० का० प्र० श्रीधर्म घोष ग०० श्रीमलय चन्द्र सूरी
(411)
सं० १४८१ वर्षे वैशाष वदि ८ शुक्रे श्री उकेश वंशे मणी सा० पासड मार्या
देवी सुत सा० सिवाकेन सा सिघा मुख्य ? जिनोनुजैः सहितेन स्वयसे श्री
विवं श्री अंचल गच्छेश श्रीजय कीर्ति सूरीन्द्राणामुपदेशेन कारितं प्रतिष्ठतं श्री संत
शुभं भवतु सर्वदा सर्वकुटुम्ब ॥ श्रीः ॥
( 412 )
सं० १५०७ वर्षे मार्गशिर सुदि २ शुक्रे श्रीमाल ज्ञातीयगोवलिया गोत्रे सा० हेमा
पु० --वाल्हा उपा
• उपदेशेन विमलनाथ विवं का प्रतिः पवीर्य गच्छे श्री यशो
सूरिभिः॥
( 41 )
सं० १५४६ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १३ घेवरिया गोत्रे श्री बाल बीलीजदेवी गोवेद पु०
पु० सा. सिंघण सुमेरू आत्म पुण्यार्थं कुंथुनाथ विवं श्रीमल धार गच्छे अ० गुण
सूरि प्रतिष्ठितं का० हर्ष सुन्दर शिष्य उपदेशेन ।
पीमा
की
(१०१) (414) सं १५६२ वर्षे वैशाष सु० १० रवौ श्रीमाल मउवीया गोत्रे सा० परसंताने सा० राज पुत्र सा० ईसरेण मा० तिलकू पु० त्रिपुर दास युतेन पारर्वनाथ विवं स्वपुण्यार्थं रितं । प्र.श्री खरतर गच्छे श्री जिन तिलक सूरिप० श्री जिनराज सूरि पह श्रीतिः ॥ श्रीकुशलाजी का मन्दिर-रामघाट । (415) सं० १३७६ ज्येष्ठ वदि ७ शुभ दिने श्रीपंडेरकीय गच्छे श्रीवाहड़ जार्य धीरु पु० धरा मयणल्ल -णिग मार्या केल्हण सहितेन विवं कारितं प्र० श्री सुमति सूरिभिः । . ( 416 ) सं० १५०३ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १० गुरी उ० २० सा० रेता भार्या रण श्री पुत्र पद सादा केन भी अंचल गच्छेश भी जय क्षेसरि सूरीणामुपदेशेन श्री संजयनाथ विवं का० प्ठितं च ॥ श्री॥ सं० १५०६ ३० वदि० ११ शुक्र धो कोरंट गच्छे श्री नवाचार्य संताने उयएग बंगे लिक गोत्रे साह एता पु० स० पाउवीरनार्या संपूरदेनाम्न्या निज गोयं बीयनाथ | कारापितं प्र० शीदक तूरिप सद गुरु पयर्ति हारक. ही सानदेव मरिभिः । सं० १५१९ लापार यदि मंत्रिदलीय सामाः टनाग राजपट्ट भायां पि सुरसं० को वर दास का वीर लिंचिपु हा मन मा श्री कंधनाय फारित ही रूरतर पर दी जिन सागर रिपोजिन मुन्दर गरि पर्ट की न हर्ष सूरिभिः ।
( १०२)
( 419 )
सं० १५१९ आषाढ़ वदि-मंत्रिदलीय श्री काणा गोत्रे ठा० लाघू मा० धर्मिणि,
अचल दासेन पु० उग्रसेन लक्ष्मीसेन सूर्यलेन बुद्धिसेनादि युतेन श्री आदि विवं का
श्रीजिन भद्र सूरि पह श्रीजिन चंद्र सूरिभिः श्री खरतर गच्छे ॥ श्रीः।
( 420 )
सं० १५३६ वर्षे वै० वदि ११ ओसवंशे साह शिवराजमा० माणिकि सुत देवदत्त
रूपाई सुत साह कर्म सिहन मार्या हंसाई स्वकुटुम्ब युतेन स्वश्रेयसे श्री संभवनाची
का०प्र० वृद्वतपापक्षे श्रीउदय सागर सूरिभिः श्री मंहुपे।
( 421 )
सं०
१५७०
वर्षे
माह सुदि ११ रवी उपकेश वंशे छजलाणी गोत्रे साह श्री पाल
सुहवदे पु० सा० ऊधा सा जोधा ऊधा भार्या उमादे प्रमुख कुटुम्ब सहितेन श्री
स्वामि विवं कारितं नागुहरी तपागच्छे श्री सोम रतन सूरि प्रतिष्टितं तिजारा नगरे।
प्रतापसिंहजी का मंदिर ।
( 422 )
सं०
o
• १५२० वर्षे पोप सुाद १३ शुक्र श्री ब्रह्माण गच्छे श्री श्रीमाल ज्ञातीय ०
सुत कामा नार्या कामीदे सुत माण नगराज रत्ना सहितेन आत्म श्रेपोयं श्री
विवं का० प्र० श्रीशील गुण सूरिभिः पाटरी वास्तव्यः।
( 423 )
वेला
सं. १५१८ वर्ष वैशाप शुदि ३ गुरी श्री श्रीमाल ज्ञातीय श्रे० वीरम सु०
भार्या सोही सु० महिराज जिणदास महिपति हूआ कुटुम्ब युतेन आरम आयो
श्रेयांस विवं बागम गच्छे श्रीसोम रत्न सूरि गुरुपदेशन कारित प्रतिष्ठितं च
धांदू वास्तव्यः॥
(१०१ )
सिंह पूर्ग।
मं० १५:१६ मार्ग मुद्रि गनी प्राग्वाट जातीय ता. राज नायर्या वारू पु. सा.
'म पनि भा० आगल नेत्री मा नुन गुणराज नगदि जुटुम्ब युतेन श्री मुनि सुव्रत विवं
रिनं प्रनिष्ट भी यानपाच्छ प्री उदयसागर नृरिभिः ।
( 42 )
.
चरण पर।
सं० १८५७ मिति पत्रक मासे कृष्ण पक्ष पठ्या कर्मचा-पूज्य महारक श्रीजिन हर्प
रविजयराज्ये श्रीसिहपूर ग्रामे तेषां केयलोत्पत्ति स्थाने गांधि गोत्रीय मयाचंद प्रमुख
मस्त श्रीसंघेन धी श्रेयांसाख्या नामेकादशानां लोक नाथानां पादन्यासः कारितः प्र.
जिन लान सृरिणां शिप्यः उपाध्याय श्रीहोरधर्म गणिभिः खरतर गच्छे ।
मिर्जापुर ।
पञ्चायती मन्दिर ।
( 126
)
श्रीपार्श्वनाथ विंव पर ।
सं० १३७६ वर्षे उएसज्ञातीय वावेलागोत्रे देवात्मज सा० घीका पुत्र संघपसि झाला
त सा०- जूफेन पितृ श्रेयसे का० प्रति० श्री कृष्णर्पिगच्छे श्री प्रसन्न चंद्र सूरिभिः ॥
( 427 )
सं० १४२० वर्षे वैशाप शुदि १० शुक्र श्री श्री माठातीय ठ० वीजा भार्या मोहनदेवि
यसे
सुत
जोलाकेन श्री पार्श्वनाथ विंवं कारितं प्रतिष्ठितं त्रिभवीया श्रीधर्मदेवसूरि
ताने श्रीधर्मरत्न सूरिभिः ॥
१
मा.
( 429 )
५
सदि २ सोमे श्री श्रीमाल ज्ञा० अ० देवस सुतवाछा मा०
पु. कालहा HT० मालूरूपी सहितेन ॥ पित्रो श्रेयसे श्री नेमिनाथ विंवं कारितं प्रति
(१०४ )
( 428 )
सं० १४८२ व० बैशाष वदि १ प्र. क्लर गोत्र सा० लाहड भा०वाहिणदे पु० मा
जिनपितृव्य सोमसिंह आत्म मे० श्री वासुपूज्य विवं कारितं प्र० श्री धर्मघोष गच्छे ।
मलयचद्र सूरिप भोपद्मशेखर सूरिभिः ॥ छः। श्री ॥
सं० १४९० व० वैशाप वदि कंठउतिया गोत्रेसा० कमसिंह पुत्र डालण तत्सु
स्त्रपूर्वज पूण्यार्थं श्रोकुंधु विवं कारितं प्रति० श्रीहेम हस सूरिभिः ॥
वर्षे
फागुण
मादे सुत रागा जीमा पीमाभिः नातषेता तथा पित्रोः श्रेयसे श्रीवासुपूज्य
श्री पोपलगच्छे श्री सोमचन्द्र सूरिपह श्री उदयदेव सूरिभिः ।
० १५१८ वर्षे नाब तु० ४ रवी उपकेश ज्ञा० व्यव० गोष्ट सा० माडण मा० मोह
पूर्णिमापक्ष जयवंन्द्र सूरिप श्रीजयन्द्र सृरिभिः॥:॥
( 430 )
सं० १४९१
विवं का
( 431 )
( 432)
तं. १५२६
व
माह व० ६ रखी उप० ज्ञातीय कठउड़ गोत्रे सा० बरसा भा० ।
पु० रामा माहा राजा चांटा मा० मरधू पु० जीवा समस्त कुटु वेन पितृ श्रेयर्थं श्रीच
मरामि विकास प्रतिमा त्रीवाल सोमा सूरिभिः न
पिया नगरे।
( १०५ )
( 433 )
श्री मत्संवत १६७१ वर्षे वैशाप सुदि ३ शनी श्री आगरा वास्तव्योसवाल ज्ञातीय
डा गोने गावं-ज्जा स. पालदास सार्या रेपनी तत्पुत्र श्री नुरपाल सोनपाल संघाधिपे
वानुवर दुनोचंदस्य पुण्यार्थ उपकाराय श्री अंचलगच्छे पूज्य श्री ५ कल्याण जागर
रिणामुपदेशेन श्री आदिनाथ विवं प्रतिष्ठापितं ॥
( 3 )
सं. १८७७ मि. फा० २० १३ श्रो बुथुताय जिन विवंदू विसादेन जारितं प्रति-
उतश्रो जिनहर्प सृरित्तिः ।।
(५
सं० १८९७ पा० शु०५ श्रोपावनाच
विसो पारगाव विप्र श्रीजिनमोल
दूरिनुपदेशेन कारिता। सेठ उदयचन्द संपनी का मारिधिया। भावनामागी
दारित्र नन्दन गणिनिर्देश---
सं. १८८९ पता मुधी आदिनाथ त्रिको किन नरेन्द्र मियाको।
नाथूराः पत्नो सारदा नादान बिहे काय चारित्र कलाकार।
सेव्यननुदान का मंदिर।
mar
FEE
सं १ का दिन
सुक्त देवान श्रीमरित
--
वि
-
( 440 )
सं० १८७७ वै० सु. १५ श्रीपाश्र्वविंबं प्र. जिन हर्ष सूरिना कारित। छजलानी
घानी रही। कुछ दिनसे अपने सरकार बहादुरने भी दिल्ली में भारतकी राजधानी
स्थापनकी है और आज कल उन्नतिपर है, यहां से ४ कोस पर आचार्य महाराज
(१०६)
( 438 )
सं० १५३३ वर्षे माह सुदि १३ सोमदिने वघेरवाल ज्ञाती राय अंडारी गोत्रे ।
सीहा मा० पूरी पुत्र ठाकुरसी भा० महू पुत्र आका आत्मपूजार्थं श्री आदिनाथ
करापितं श्रीसर्व सूरिभिः शुभं भवतु ॥
( 439)
चतुर्भुज पुत्र्या दोपो नाम्न्या चोरडिया मनुलाल वधू-
सं० १८९७ का० भु० ५ श्रीपार्श्वविवं प्र० श्रीजिन महेन्द्र मूरिणा का० । सकल श्रीसंथे।
देहलि बा दिल्ली सहर ।
यह भारतवर्षका एक प्राचीन स्थान है। कुरु पांडवके समयमें यही 'इंद्रप्रस्थ' था।
हिन्दुराजा पृथ्वीराजकी राजधानी थी। मुसल्मानोंके समयमें बहुत काल तक यह राज
शोजिन कुशल सूरिजीका स्थान है जिस्को छोटे दादाजी कहते हैं और ७ कोसपर
प्रसिद्ध कुतुब मिनारके पास बड़े दादाजीका स्थान है वहां कोई लेख नहीं है।
चेलपुरी का मंदिर।
धातुयोंके मूर्तिपर
( 41 )
सं. १९६३ मार्गशिर सुदि १ ओ गागसादेव धम्मीयम्--(आगे अक्षर अस्पष्ठ पदा
नहीं जाता)
(१०७)
( 44 )
।
सं० १५१६ वर्षे जे०व० ११ शुक्र सोमसर यासि उकेश सा० मेहा ना०माल्हणदे पुत्र
धाकेन मा० सल्ही प्रमुख कुटुम्बयुत्तेन भी कुंथुनाथ विवारितं प्रतिष्ठितं-- श्री पव
रितिः॥ सचितीगोत्रे॥
॥
(443)
सं.
• १५२१ वर्षे माघ तुदि १२ युधे लोढ़ा गोने ता. हरिचन्द गोगा गोरा संताने
घु बारपाल पुत्रेण सं० तेजपाले पुन परस्त सहादि युतेन रातू पूनपात पुण्यार्य
पार्श्वनाथ विवं कारित प्रतिष्टित तपागच्छेधी नहर तृरिश । प्लीहेर समुन्न
रितिः ॥
संवत १५२१ ५० माघ तु० १६ गालामा गं गुमनाम:
बुत पापाना० पर्मिणि नामापियादिनाय नेमिनाय जि पारित
रति तपागडे श्री लक्ष्मी सागर सूरी परिगतिः बामदाबाद।
२० १५३४ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १८ दिने कामालायांका पाया :-
पदे तोलही सादेपा मा उपती पुरा गाजलेली पुत्रा रा
चांपा परमा युतेक जा पोपा पुताई मुनि गुरम
i:
चंद्र सूरिभिः ।
--
• १५६६ माप शुदि 'दिमा:::::::::
ཙེ Sit ཏཱ ཙ༌ པ༌ ག
gོ༌ ༤
ཎ༌པས་སྣཔ* པདྨifi; |
(118)
सं० १५६६
( 449 )
सं० १६६० वर्ष फागुण वदि ५ गुरुवासरे महाराजाधिराज महाराजा मानसिं
संघत १५६० वर्षे ज्येष्ठ यदि ४ दि धीमाल से
सिंगोत्रे व अभय राज.
आमलदे पुन चउ० ठकुरसीहन मा० मुरादे पुत्र व मारमा प्रमुगा परिणतेन
आदि जिन विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्रीसरार गरले श्री पूज्य श्री जिनान सूरिभिः ।
वर्ष
फागुण सुदि २ सोमे ब्रह्माप्पीया गन्छे बहुरा हीरा भा० होराडे
जीदा सोमा रूपा पुण्यार्य श्री शांतिनाथ विवं का० प्रतिष्ठितं श्री गुणसुन्दर
अहिलाणी।
॥ श्री पार्श्वनाथ स. १६०५ फागुन सुदी दसमी घरवडिया गोत्रे गागपत्नी
मिनी पुत्र पेतु लघु प्रनमल गुरु श्री जिन भद्र सूरि रुद्रपला गच्छे भ० श्री H .
सूरिभिः प्रतिष्ठितं श्री समेत सिपर ।
सं० १६१२ वर्षे ज्येष्ठ सु० ११ शनी उकेशवसे----।
( 451 )
जी राजे श्री मूलसंघे आम्नाये बलात्कार गणे सरस्वती गच्छे कुंदकुंदाचार्यन्वये ४०
बिई कीर्त्ति स्तदाम्नाय पंडेलवालान्वये पोस । सं श्री होला मा कोसिगदे पुः
कचराज मा० उमदे कोउमदे गुजरि पु० २ थातु दानु स श्रीरायत मा रयणदे-.-७
मा० महिमादे लाड़मदे--।
.
( 450 )
श्री
श्री
970
हरदास
( १०६) ( 452 ) सं० १६७७ मार्ग शु०- रवी श्रीमाल ज्ञातीय सा० तेजसी नाम्ना श्रीपार्श्व विवं का० । तपा गच्छे श्री विजयदेव सूरिभिः । ( 453 ) सं० १६८१ ३० फा० शु० १० ० चंद्रकीर्ति प्र० अग्रवाल ज्ञाती गोयल गोने सा० मा भा. सरूपादे। (454 ) नवपदजी पर। सं० १८५१ वर्षे कार्तिक मासे कृणपक्ष प्रतिपदा तिथी गुरुयासरे- - सुधायक 'य प्रज्ञावक देव गुरुमक्ति कारक फतेचन्द मार्या विदामो तत्पुन वस्तिरामजी ॥ माल ज्ञाती। नवघरेका मन्दिर । मूलनायक भीमतिनाघजीके विंव पर। (155) संवत १६८७ वर्षे ज्येष्ठ शुक्ला १३ गुरौ मेरुना नगर वास्तव दुहाड गाने . जय- पवमा सोनागदे पु० सं० लोहपकेन श्रीनुमतिनाय बिंब का. प्र. तपागच्छे श्री वजयदेव सूरिलिः लाचार्य घी विजयन्हि भूरि परिवृत्तिः ।
सं० ११५१ वर्ष लोढा गोत्रे उ० ज्ञा० सा० पोपा मा० पापी पत्र लापाकेन रखपुर
सं० १९१५ पोप शुदि १२ वुधे ज० अ० जोला मा०होरीपुत्र लालान श्रीशांतिनार
( ११०)
सर्व धातुयोंके मूर्तियों पर।
( 456 )
ओं। संवत ११ ९७ वैशाष सुदि ५ श्री चंद्रप्रभाधार्य गच्छे सतु श्री वि---
(457 )
संवत १२८० वर्षे -----लांडा प्रणमंति ।
( 458)
सं० १३३१ १०व०२ दल
459)
सं० १४३३ आपाड शु०-- प्रा० लघु व्य० आसा भा० ललतदे--श्री पार्श्वनाथ
का० श्री गुणभद्र सूरीणामुपदेशेन।
(460)
विवं कारापितं प्र० ० गच्छे श्री सिद्ध सूरिभिः ।
(461)
बीसर श्रेयसे श्री पार्श्वनाथ दिन का० श्रीरुद्रपल्लीय गच्छ सृसिंजः प्रतिष्ठितं श्रीदन
मुन्दर नृरितिः।
(462)
सं० १९६३
वै
शु० १०-सा--
( 465 )
सं० १४७१ माघ शुदि १० रवी शारवाट ज्ञातीय साः रामा मा० - ठाकुर पित
योर्थ श्री आदिनाथ लक्ष्मी
(464 )
सं० ११७२ वर्षे फागुण सु० ८ शुक्रे ऊ० ज्ञा० सा०तिहुणा मा. तिहुणालारपु० चाहड़
रा० केल्हु पु० हापा मा० तेजू पु० करमोकेन पितृ--श्री पद्ममा वि० का० प्र० भी
संडेर गच्छे श्री श्री यशोजन सूरि सं० श्री शांति सूरिभिः॥
( 465 )
.
सं० १४७६ वर्षे माघ सु० ४ दिने सा० धरणा पुत्र संग्राम जमरासिंघ मादकः श्री
महावीर विवं पुण्यार्थ झारित प्रतिष्ठितं श्री खरतर गच्छे श्री जिनाद्र सूरिभिः ॥
(466 )
सं० १९८२ वर्षे माह तुदि ५ लोमे नाहर गोत्रे ता० छाडा पु० जयता सार्या साल्ही
पुत्र चोपान पित्रो अयोधू श्री पार्श्वनाथ वि० का०प्र० श्री धर्म पोपन भी धर्म घोप
ठा० धीरउयचन्द्र सूरि प श्री--देव सूरिभिः ।
(८)
--
सं. १९८२
--
वर्षे सोमेज. ज्ञाः पाल्देवा गोत्रे साकार मा० तेजलने
पु० जाने मा० सहितेन पित्रो स्वय० प्रो वासुदृज्य बिना श्री नयिमन
सूरिभिः की वोसान सूरि सहितेन ।
(११२)
(468 )
सं० १४८३ फा० ५० ११ ज. ज्ञा० टपगोत्रे व्यव० रुपा आ० सपाई पु.
पाचाभ्यां भ्रा० अदा भा० आल्हणदेविः श्री पद्मप्रसाव का० प्र० श्री संडेर ।
शोति सूरिभिः ॥
(469 )
सं०
-
.
• १४८६ वै० शु०-प्राग्वाट सा० साजण भा० छापू पुत्र केल्हाकेन भा० ।
भ्रात भीम पदमदि कु. यु० श्री धर्मनाथ विवं कारितं प्रति तपा श्री।
सूरिभिः श्री-५॥
( 470 )
सं० १४८६ वर्षे जेष्ठ सु० १३ सोमे श्री दूगड़ गोत्रे सं० सिवराजमार्या सीघरही,
सा० मोहिल धण राजाभ्यां पितुः श्रेयसे श्रीअजितनाथ वि० का० प्र० वृहडा० ।
श्वर सूरि पह श्रीरत्नप्रभसूरिभिः ।
( 471 )
सं० १४९९ ३० फा० ३०२ उपकेश ज्ञातौ आदित्य नाग गोत्रे सा० देसल मा० देसडर
पु० धमी सा० सुहमदे युतेन स्व श्रे० श्री आदिनाथ विवं का० उपकेश ग०
सं० प्रति० श्री कक्क सूरिभिः।
सदाचार
( 472 )
सं० ५०४ वर्ष आ. सु० ६ श्री मूलसंघे भ० श्री जिनचंद्र देवाः जैसवालाबसे भा०
भाया* सिरि लत्पुन सोनिग भार्या षेमा प्रणमति ।
(११३)
( 473 )
" सं० १५०७ वर्षे ज्येष्ठ सु० २ दिने उकेश वंशे नाहटागोत्रे सा० जयतामार्या जयसलदे
पुत्र सा० संगरेण पुत्र सलपा अजादि परिवार युतेन श्री सुमतिनाथ विं० का० प्र०
। जिन भद्र सूरिभिः खरतर गच्छे ।
(474)
सं० १५०७ वर्षे माघ सु० १३ शुक्र प्रवाणागोत्रे उदा सार्या लावि पु० देवराजेन स्त्र
पयार्थं श्री वासुपूज्य विज्ञा० प्र० श्री धर्मघोप गच्छे प्रो पदमसिंह सूरिभिः ।
(173)
सं० १५०७
वर्षे ३००० ५ दिने ऊशेश ज्ञातीय साः नापा RI० पापलदे मुत नूगर
न पा० वापू तु० घाईयादि कुटुम्ब युतेन धी पार्श्वनाथ विका० प्र० तपगग श्री
जय चन्द्र सूरि शिष्य श्री उदयनंदि सूरिभिः । कायपा नाम ।
सं० १५०७ वप वैशाप वदि ६ गुरी धी घीनाल ज्ञातीय पं. बोटा सा युनिक
योः सुताः २० मार्या समरानायक पांचा एतेषां मध्ये माना FIR
'योधं श्री मुनितुन्नत स्वामि विवं कारितं प्रतिष्टितं श्री नागनगर श्री भारत
सूरिभिः गोलोपा वास्तव्यः ।
तं० १५ वर्षे फार :- सं: हमा परपुन साः नाम
शाहादि सब चुतेन घी नुदाई का तपाही को मुन्टा :
सूरितः।
me
र
( 480 )
रूप म:मरन्या मा. चाचिंग भार्या नारंगदेव्या श्री अजित चिंकार
(११४.)
( 478 )
संवत १५१२ वर्षे फा० शु० १२ दिने लोढा गोत्रे स० पासदत्त भार्या अपूर्द कर
सा० कमलाकेन पुत्र जावा गोरादि परियुतेन श्रेयसे पुण्यार्थं श्री अभिनन्दन कार
पोखरतर गच्छे श्री जिनराज सूरि पह श्री जिनभद्र सूरिभिः ॥ श्री ॥
( 479 )
सं० १५१३ वर्षे फा० वदि १२ अ० ज्ञा० सोधिल गो. रणसीपु० गहणा पु० वोल्हा
जसनी पु० सादान ला० चांदासहितेन पितृ पुण्यार्थं श्री कुंथुनाथ वि० का०प्र० श्री ती
गच्छे श्री यशोभद्र मूरि संसाने श्री श्री ५ शांति सूरीणां पह श्री ईश्वर सूरिभिः शुभ मूब
ग: १५१५ वर्प माघ सु० ११ दिने ऊ० ० जांगड़ा गोत्रे सा० काल्हा आर्या
नगमा गापाकन सपरिवारेण श्री सम्भवनाथ विंवं कारितं प्रतिष्टितं श्री प. ग.
iam नृरि प? श्री जिन सुन्दर सूरिभिः॥
१५. ना. मा. सु. १ शुक्रे श्री श्रीमाल ज्ञा० ऋ० गूगा भार्या लालू पुत्र
केन विना निमित्तं आत्मध्ये) श्री धर्मनाथ वि० प्र० श्री नागेंद्र गच्छे श्री वि
प्रारावास्तव्य ।
.: ५५ बजे बैगा. मु. १३ हालाई दिने महतिआण सा. गुरपसि
मागाजिन भागरिपद श्री जिनमुन्दर मृरिभिः ॥ श्री ।
( 481 )
me
( 422 )
गुरपति ना० निती
द
(११५) ( 483 ) सं० १५१७ वै० शु०८ प्रा० सा० देपाल सु० हउसी करणा भा० चन्हडा धर्मा कर्मा सा काला भ्रातृ हीराकेन मा० हीरादे सुत अदा बरा लाजादि कुटुंवयुतेन श्री शांति- थ विवं का०प्र० तपा श्रीसोमदेव सूरि शिष्य श्री रत्न शेषर सूरि शिष्य श्री लक्ष्मी गर सूरिभिः ।। कमल मेरू। ( 484 ) सं० १५२५ वर्षे मा० शु० ६ सीणुरा वासि प्रा० सा० राजा मा० स्या पूरि पु० तीपा- न मा० रानू पुत्र सधारण हीरायुतेन श्री पद्मप्रति विवं स्वश्रेयसे का० प्र० तपा श्री सोम दर सूरि शिष्य श्री लक्ष्मीसागर सूरिभिः ॥ ( 465 ) सं० १५३० फा० शु०२ गोखरू गोत्रे सा० पासवीर भा० कुढी नाम्न्या पुत्र साधारण व देवा सब-युत श्री मुनि सुन्नत स्वामि विवं का० प्र० तपा गच्छ्रनायक श्री लक्ष्मी गर सूरिभिः ॥ वहादुर पुरे ॥ (456 ) सं० १५३४ वैशाप सुदि ५ गुरौ ---सिवो पुत्र काला सिरिपुत्र- (457) सं० १५३५ श्री मूलसंघे सधी हुवन कीर्ति स०१० श्रीज्ञान नूपण गुरुपदेगात् । ० पेतसी मा० मः। * ( 489 ) संवत १५५१ वर्षे वै० सुदि६ रवौ उपकेश ज्ञातीय नाहर गोत्रे सा० लापा । सोहिणी-पु. चांपा आय.पौत्र पुत्र.पौसादि सहितेन आत्मपुण्यार्थं श्रीधर्मनाथ । ( ११६ ) ( 488 ) सं० १५३६ वर्षे फा० सुदि ३ दिने उकेश वंशे श्रेष्टि गोत्र श्री कीट आर्या देवण मांडण धर्मा श्रावकैः वे देवण मार्या ६डिमदे सुत समरादि परिवार यु धर्मनाथ विवं प्र० श्री खरतर गच्छे श्री जिन भद्रसूरि पहालंकार श्री जिन चंद्र सं० १५३७ वर्षे वै० शु० १० सोमे उमापुरवासि उ० व्य० महिराज भा० श्रीपाल सहिजाभ्यां भा० सुहवदे। अदादि कुटुं वयुत्ताभ्यां श्री वासुपूज्य विं. " श्री लक्ष्मी सागर सूरिभिः। सं० १५४५ वर्षे वैशाष वदि र जडिया गोत्रे स० नासण पु० स० पिमधर पागा पहिराज आढू लाल्ला लेपली पिलरनिमित्त श्री शांतिनाथ विवं कारापित ष्ठितं तपागच्छे महारक श्री सोमरसन सूरिभिः॥ सं० १५४८ ज्ये० वदि ६ बुधे म० श्री हेमचन्द्राम्नाये स० नगराज पु० दामू हंसराज हापु-- ( 490 ) ( 491 ) ( 492) का० श्री धर्मनाथ विवं का० श्री धर्मघोष गच्छे प्र० श्री पुण्यवर्द्धन सूरिभिः।
( ११६ )
(503)
सं० १६१८ सिंघुड़ सा० गोपी भार्या विमला सुत घणराजेन कारितं ।
( 504 )
सं० १६४३ वर्षे फाल्गुन सु० ११ गुरु प्रा० ज्ञा० से विधोगा भार्या वाई पूराई सुत
वचन्द भार्या वाई हासी सुत रायचन्द भीमा श्री शीतलनाथ विंवं कारितं प्रतिष्ठितं
हत्तपा गच्छे श्री विजयदान सूरितत्पह श्री हीर विजय सूरि आचार्य श्री विजयसेन सूरि
मो पत्तन वास्तव्यः।
( 505 )
सं० १७०० फा० सु० १२ श्री मूल स० स्वर० गच्छे ५० ग० श्री कुंदकुंदाचार्यान्वये सं०
सांवल । साकार-साहमल अ-जा। गा---।
( 506 )
सं० १७०१ व० मार्ग व० ११ दिने श्रीमाल ज्ञाती वाई गूजरदे सुत स० हीराणंद प्रा.
सबरंगदे श्री पद्मप्रभ विः का० प्रतिः तपागच्छे श्री विजयसिंह सूरिभिः आगरा वा०
चीरेखानेका मन्दिर ।
(507)
सं० १४८६ वर्षे पौस वदि १० गुरौ श्री हुंवड़ जातीय श्रे० उदयसीह भार्या वईराज तयोः
पुत्र तथा दोहीदासुत दोगा--पत्नी वई चमक नाम्न्या आत्म श्रेयसे अजितनाथ
विवं कारापितं श्रीवहत्तपा पक्ष श्रीरत्न सिंह--।
सं० १५८६ वर्ष वै० सु०५ गुरी श्री रुद्र पल्लीय गच्छे अ० श्री गुण सुन्दर सूरि शिम
सं० १६०० वर्षे वैशाख सु०३ सोम श्री मूलसंघे सरस्वती गच्छे भ० श्री ज्ञान
देवा स्तत्पदे म० श्री विजय कीर्ति देवास्तत्पर महारक श्री शुभचंद्रोपदेशात् ह्वा
( १९८)
( 498 )
सं० १५६२ वर्षे वैशाष शु. १३ युधे श्री श्री मालीज्ञातीय सा० पूजा मात्र मूजा,
विमलाई श्री मुनि सुब्रत स्वामि विवं कारापित-श्री साधुसुन्दर सूरि प्रतिष्ठितं ।
लषराज श्री अभयराज ॥
( 499 )
सं० १५६८ वर्षे माह सुदि दिने उकेशवंशे नाहटा गोत्रे सा० राजा मा० अपू
सा० भीम भार्या रत्तू पु० श्रोपाल नाथूभ्यां मातृ पुण्यार्य श्री चंद्रप्रभ विवं का.
खरतर गच्छे श्री जिन हंस सूरिभिः ॥
सं० १५७४ वर्षे माह सु० १३ शनौ उ४ वं० पमार गोत्रे स० वक्राना० वुलदे पु०
पतोला श्री अंचल गच्छेश भाव सागर सूरीणामुपदेशेन ।
श्री आदि नाथ विवं का. प्रतिष्ठितं ।
( 500 )
( 501 )
उ. श्री गुणप्रभ
( 502 )
ना
सुतसा• श्री पाल श्री शौतिनाथ विवं कारापितं नित्यं प्रणमंति ॥
( ११६ )
( 503 )
सं० १६१९ सिंघुड़ सा० गोपी भार्या विमला सुत घणराजेन कारितं
F
-..
( 504 )
सं० १६४३
वर्षे
फाल्गुन सु० ११ गुरु प्रा० ज्ञा० से विधोगा मार्या वाई पूराई सुत
देवचन्द भार्या वाई हासी सुत रायचन्द भीमा श्री शीतलनाथ विंवं कारितं प्रतिष्ठितं
वृहत्तपा गच्छे श्री विजयदान सूरितत्प? श्री हीर विजय सूरिआचार्य श्री विजयसेन सूरि
श्रो पत्तन वास्तव्यः ।
.
( 505 )
सं० १७०० फा० सु० १२ श्री मूल स० स्वर० गच्छे ब० ग० श्री कुंदकुंदाचार्यान्वये सं०
सांवल । साकार-साहमल अ-जा। गा--
( 506 )
सं० १७०१ व० मार्ग व० ११ दिने श्रीमाल ज्ञाती वाई गूजरदे सुत स० हीराणंद भा.
सबरंगदे श्री पद्मप्रन्न विः का० प्रतिः तपागच्छे श्री विजयसिंह सूरिभिः आगरा वा०
चीरेखानेका मन्दिर ।
(307)
सं० ११६ वर्षे पौस वदि १० गुरौत्री हुंबड़ जातीय प्रे० उदवसीह तार्या वर्हराऊ तयोः
पुत्र तथा दोहीदासुत दोगा--पत्नी वई चमक नाम्न्या आत्म श्रेयसे अजितनाथ
३वं कारापितं श्रीवृहत्तपा पक्ष श्रीरत्न सिंह--।
---
( 509 )
सं०
( 510 )
।
। सुरजन प्र० परिवारेण स्वयोर्थं श्री विमल विका
नं. १६०५ कागुण मुदि दशमि समेत सिखरे प्रतिष्ठितं मागपत्नी त्वरमिनी पुत्र
( १२० )
(508 )
सं० १४९२ वैशाख सुदि २-- ओसवाल ज्ञातिय भूरि गोत्रे -- श्रीश्रेयांस विंव के।
प्र. श्री धर्मघोष गच्छे श्री श्री महेन्द्र सूरि प्र० -- !
० १५०६ माघ सुदि ५ श्री केश वंशे चोपड़ा गोत्रे सा० ठाकुरसी सुत सा०
केन
पुत्र
मेघा माला नाल्हा
पौत्र
श्री खरतर गच्छे श्री जिनभद्र सूरिभिः प्रतिष्ठितं ।
सम्बत् १५१७ वर्षे फाल्गुण सुदि ६ गुरौ श्री श्री माल ज्ञातीय मंत्रि पोपा
पाल्हणटे सुन मण्याकेन भार्या सोहासिणि सुत उधरण प्रमुख कुटुंव सहितेन :
पित श्रेयो) आत्म श्रेयोर्थं च श्री संभव नाथ चविंशति पह जीवत स्वामी
गच्छे श्री गुण समुद्र सूररुपदेशेन आचार्य श्री गुणदेव सूरिभिः प्रतिष्ठितं च
वास्तव्यः। श्री।
सं० १५-५ फा० वदि ६ सोमे प्रा० ज्ञा०
सा० घेरा भा० पूजी पुत्र पूना मा००
पुत्र
तोला
पु. कर्मसिंह श्री संभव नाय विंवं कारितं प्र० श्रीसर्व सूरिभिः ॥
पयुभनमय गुरु श्रीजिन भट मूरि -
।
( 511 )
( 512 )
( १२१ )
(513)
सं० १६६३ वर्षे ज्ये. व०८ श्री-धर्मनाथ विंवं प्रति०-1
( 514 )
सं० १७०३
वर्षे ज्ये० ३० ७ शुक्रे श्री आसवाई नाम्न्या श्री पार्श्व वि० का० प्र० तप०
१० श्रीविजय देव सूरिभिः ।
( 15 )
सं० १७२५ वर्षे मार्गसिर सुदि ५ रवौ प्रो मालदास नार्या --पार्श्व वि० कारापित्त ।
( 16 )
सं० १८५२ पोस सु० १ दिने वृहस्पति वासरे श्री सि० च० यं० मिदं प्र० लाल चन्द
गणिना कारितं जैनगर वास्तव्य भी माल रत्नचंद टोडरमल्लेन श्रेयोर्थ ।
लाला हजारीमलजी का घर देरासर ।
( 17 )
सं० १२११ आपाढ़ तुदि२ श्री देवतेन संघे स० रामचन्द्र नार्या मना-।
सं० १६०७ वर्षे ज्येष्ट वदि १: गुरी
नहव ता
३
वर्षे माघ वदि ११ बुध श्री देवीसिंग संघवों श्रे० कावा भार्या विजी
सं १६६१ व० चै० वदि ११ शु० सा० वदी या कारितं श्रीपाश्र्व विंवं प्रतिष्ठित
( १२२)
(519 )
ॐ संवत १३५० वर्षे ज्येष्ठ वदि ५ श्रीषंडेर गच्छे श्री यशोद्रसूरि संताने । अ० जगन
भार्या जमति पुत्र कांकण अरि सिंह लघुभ्राता अरिसिंहेन ज्येष्ठ भ्रात कांकण प्रेम
श्री अजितनाथ विंवं कारितं । प्र० श्री सुमति सारिभिः ।।
( 520 )
सं० १४६६ माघ सु०६ सागरदास
आर्या
नालू -- ।
( 521 )
संवत १४८३ वर्षे श्री श्रोमाल ज्ञातीय वहरा धड़ला मार्या ललता देवि साविलीदा
हीराकेन भार्या हीरा देवि स. संघ श्रेयसे श्री शांतिनाथ विवकारित प्रतिष्ठितं । ना
गच्छे श्री रत्नप्रभ सूरि पह श्री सह दत सूरिभिः शुभं भवतु ।
( 522 )
परनागड प्रणात।
खरतर गच्छे। श्री जिनचंद्र सूरिभिः ॥
सं०.१४८९
( 523 )
श्री
( 524 )
सा.
संवत १५६६ वर्षे ज्येष्ठ सुदि ७ श्री माल ज्ञातीय सिंधुड गोत्रे सा० घोल्हरण पु०
छेयतन श्री श्रेयांसनाथ विंवं कारितं प्र० श्रीजिनचंद्र सूरिभिः ।
4
( १२३ ) (626 ) सं. १९३५ वर्षे माघ कृष्ण पंचमी भृगी अहमदाबाद वास्तव्य ओसवाल ज्ञातीय द्ध शापायां सा० हठी संघ केशरी संघ सार्या वाई रुकमिणि स्वश्रेयो) श्री शांतिनाथ वेव कारारितं हारक श्रीशांति सागर सूरिभिः प्रतिष्ठितं सागर गच्छे तपावोरुटे । छोटे दादाजी का मन्दिर । ( 527 ) । संवत १८७१ वर्षे वैशाप शुक्ल पक्ष तिथी ८ बुधे सट्टारक श्रोजिन कुशल सूरि पादुका पारिता श्री स्याहजानावाद नगर वास्तव्य श्री संघेन प्रतिष्टितं च बदहारक सरतर गच्छीय श्रीजिनचंद्र सूरिरिः सम्योथं धो मद्वादस्याह अकयर स्याह विजय राज्ये शुभ भूयात् ॥ संवत् १९०८ मिती चैत्र शुदि १२ सूर्यधारे प्रोजिन नंदि घटुन मृतिः विजय . सधर्म राज्ये श्री दिल्लि नगर वास्तव्य तरल धीसंघेन जीणोधार पृबंक कागपितं पृज्या राधाना महलमाला वृद्धितरां यायात् ॥ धोमान्माणिय मृरि शासायां पाठक. मनि बुमार तच्छिय पटोप्देशात् ।। !! सका हर व गप मार गुरु एबीमारनानीय धीबाट गोत्र वासनावर सिंघा रथ गामान की मांजिनाच किम कारादिन निष्टिन यान् परनर गरीजिन माम! r និ? संवत् १४९५ वर्षे ज्येष्ठ सु० १३ उप. ज्ञातीय तातहड़ गोत्रे सा० वीकम भा. देवस ( १२४ ) (599 ) श्री सं० १९७२ मिः माघ शुक्ल ६ शनिवासरे रंग विजय खरतर गच्छीय जं. म० श्रोजिन कल्याण सूरि चरण पादुका कारापितं । इंद्रप्रस्थ नगर वास्तव्य समस्त संघेन प्रतिष्ठितं जं यु० प्र० ३० म. रंग विजय स्वरतर गच्छीय श्री जिनचंद्र सूरि पर श्रिते ० श्रोजिनरत्न सूरिभिः पूज्याराधकानां मंगल मासा वृद्धितरां यायात् श्री संघम शुभं भूयात् ॥ श्री॥ अजमेर। यह भी प्राचीन नगर है। मुसल्मानोंके पूर्व में यहां श्री खरतर गच्छनायक प्रभाविक श्री जिनदत्त सूरि संवत् १२११ आषाड ११ देवलोक हुऐ। श्री गाडी पार्श्वनाथका मंदिर। पंचतीर्थीयों पर। संवत् १२४२ आषाढ़ पदि-गुरौ श्री यश सूरि गच्छे श्रे० नागड सुत आसिगत राल्हण थिरदेव मातृ सूहपादि पुत्रैः आसग श्रेयोर्थं पार्श्वनाथ विवं कारापिता। दे पुत्र रेडा भा० हीमादे पुत्र सुहड़ा भा० सुहडादे पु० ससारचंद। सामंत सोभा स' सुमतिनाथ वि० श्री उपकेश गच्छे ककुदाचार्य स० श्री सिंह सूरिभिः । ( 530 ) ( 531 ) श्री (१२५) (532) सं० १५०७ वर्ष वैशाप वदि ३ गुरी श्री श्री माल ज्ञातीय श्रे० चांपामा० चापलदे तयो सुता श्रे० व्यघा वीघा विरा सार्या पीमा पूना भगिनी हरप एतेषां मध्ये पूनाकेन स्वमातृ पितृ श्रेयसे श्री संभवनाथ विंवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री मूरिभिः अप्टार वास्तव्यः । ( 333 ) सं० १५१३ वै० सु० २ सोमे उसवाल ज्ञातीय छाजहड गोत्रे माघाहरू पु० रानपाल मा० कपूरी पुत्र - हारलण मा० सारतादे माता डासाहा सहितेन श्री शीतलनाथ विं० प्र० श्री पल्लि गच्छे श्री यश सूरि। ( 534 ) सं० १५१५ वर्षे फागुन सु. ६ रवी ऊ. आईचणा गोत्रेसा० समदा भा० सवाही पुत्र दसूरकेन आत्मश्रेयसे सितलनाथ वि० का०-प्रति० श्री कक्क सूरिभिः ॥ ( 535) सं० १५२१ वर्षे ज्ये० शु. १ प्राग्वाट सा० जयपाल ना. वासू पुत्र्या सा० होरा भा. हीरादे पुत्र सा० माउण भार्या रंगू नामा श्रेयसे श्री सुमतिनाथ विवं का० प्र० तपापक्ष श्री रत्न शेषर पह श्री लक्ष्मी सागर सूरिभिः। (536 ) सं० १५२१ वर्षे ज्येष्ठ सु० १३ गुरौ श्री राजपुर वास्तव्य श्री श्री मालज्ञातीय श्रे० सारंग भार्या मवकू सुत लाईयाकेन भा० हीरू सुन गाईयागुदा प्रमुख कुटुम्वयुतेन भार्या श्रेयसे श्री संभवनाथ विंवं कारितं प्रतिष्ठितं बृहत्तपा श्री उदय बल्लभ सूरिभिः ॥
-
--
वी
सं० १५२७ वर्ष पोप यदि १ ओ० मावादमा. म. मा गरजा प्रसार
(मानसिंघ मा० षेतसी युतन स्वयसे श्री वासुपूज्य वि. का. प्र. तपगच्छे १०
(१०।
संवत १५२५ वष नेत्रदिर गयो पा. : TA मा
सिधा सार्या सोमानिणि सुन पनामा पानी भी मुनि का रस
देशेन विधिना प्र.नि.-----.॥
नाम्न्या श्री नेमिनाथ विंध कारित
प्रताप का भी जिना यूरिभिः ।
सं० १५२८ माह व० ५ बुधे श्री ओस बंश घनेरीया गोत्रं शा: का पुत्र
सार्या वील्हणदे पुत्रः साह फोहा केल्दा मौकालाग्य: स्य श्रीधर्मनाथ विवं का
श्री पल्लिवाल गच्छे श्री नन्न सूरिभिः प्र० ।
सं० १५७० वर्षे माघ यदि १३ बुधे श्री पत्तन वास्तव्य मोढ़ ज्ञातीय ठ० मोजा माय
वाली
सुत
• ठ० रत्नाकेन भार्या रूपाई सुत ठ० जसायुतेन श्री आदिनाथ विंबं कारितंत्र
श्रेयोर्थ श्रीवृद्धतपा पक्ष श्री रत्न सूरि संताने श्री उदय सूरिः ॥ श्रीलक्ष्मी सागर
पही प्रतिष्ठितं श्री धन रत्न सूरिभिः श्री रस्तु ।
सं० १६०३ वष आपाड वदि ४ गुरौ भिन्नमाल वास्तव्य म० देवसी भा० दाडिमई
श्री ५ श्री विजयदेव सूरिभिः ।
( 510 )
सूरीणा
(5.11 )
पुत्र
( १२७ )
( 542 )
सं० १६८३ वर्षे आषाड़ वदि १ गु० उसवाल ज्ञातीय वेद महता गोत्रे म० अयरव
मा० अरमादे पुत्र मे० सुरसाणाख्येन श्री सुविधिनाथ विंवं का० प्र० तपा गच्छे भ०
भी विजयदेव सूरिभिः॥
(543 )
संवत १६८७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १३ गुरौ मेडता नागर वास्तव्य उसज गोत्र को० जयता
भार्या जसदे पुत्र की० दीपा धनाकेन श्रीपार्श्व वि० का० प्र० तपा गच्छे १० श्री विजय
देव सूरितिः स्वपद स्थापित श्री विजयधर्म-सू--।
श्री संभवनाथजी का मन्दिर ।
( 541 )
सं० १२९० माह सुदि १० ० धवल सुत जैमल पोर्घ--कारितः ॥
(545)
सं० १३७६ वर्षे वै० वदि ५ गुरो प्रारबाट ज्ञातीय महं कंधा जार्या--- पुत्र माल्ह
मो शांतिनाथ वि० का प्र० घी महेंद्र सूरिभिः ।
स्वधेयने पद्ममात किंवं का भी तोम
सं० १९८१ माघ शु. १० प्रावास
सुंदर सूरितिः ।
--- मा० अणुपदे पु० सचवीर मा० सेत्त पु. देवा श्री वंताभ्यां पित्रो श्रेयसे श्री विमलनाथ (१२८ ) (57) सं. १४८१ वर्षे वेशाप सु० ३ रयो रहूगली (?) गोत्रे सा० वीजल मार्या विजय श्री पु० रावा----श्रेयोर्थ श्री अजितनाथ वि० प्र० श्री धम श्रीपा शेषर सूरिभिः (548 ) सं० ११८५ वर्षे माघ सुदि १४ बुधे लिगा गोत्रे सा० माला सागू युतेन सा० जीला केन निज पित्रोः श्रेयोर्थं श्री सुमतिनाथ वियं कारितं प्रतिष्ठितं तपा गस्छे श्री हे हंस सूरिभिः। ॥3॥ सं० ११८६ वर्षे माघ सु. ११ शनी श्री पंडेरकीय गच्छे उपकेश ज्ञा० गूगलीया गोत्रे सा० महूण पु० षोना ए. नेमा पु. नूनाकेन भा० लपी पु० करमा नाल्हा सहितेन स्वयसे श्रीमुनि सुव्रत विध का० प्रतिष्ठितं श्री शांति सृरिभिः शुभं भूयात् ॥श्री॥ सं० १४८८ वर्षे पोष सु० ३ शनी उकेश ज्ञाती तीवट गोत्रे वेसटान्वये सा• दा विवं का०प्र० श्री उकेश गच्छे ककुदाचार्य संताने श्री सिद्ध सूरिभिः । (842) (550) (551) सं० १४९० वै० सु० शनी श्री मूलसंघे नंदिसंघे वलात्कार गणे सरस्वती गच्छे श्री कुंद कुंदाचार्यान्वये भहारक श्री पद्मनंदि देवाः सत्पह भी सकल कीर्ति देवाः । उत्तरे ( १२६ ) श्रख्योति (?) हं० ज्ञातीय व आसपाल भा० जाणी सु० आजाकेन भा० मघूसुत विरुआ मातृ वीजा भा० वान सुत समधरादि कुटुंव युतेन श्रीपद्म प्रान चतुर्विशति पहः कारितः तंच सदा प्रणमति सुकुटुंवः । ( 552 ) सं० ११ १२ वर्षे मार्गशिर वदी १ गुरुवारे श्री उपकेश वंशे लूसड गोत्रे सा० देव राज नार्या हेमश्रिया पुत्र सा० वाहडेन आत्मा कुटुंव श्रेयो) श्री विमलनाथ विवं कारापि प्रतिष्ठितं श्रीधर्म घोप गच्छे १० श्रीपनशेखर सूरिनिः। (5) ) सं० ११९६ माघ सु० ५ प्रारवाट व्य० धीरा धीरलदे पुध्या व्य० भीपा आयल दे सुतव्य० वेला पत्नया वीरणि नाम्न्या श्रोसंभव विंचं का• प्र० तपा श्री सोम सुंदर सूरिरिः ॥धी। सं० ६५१६ वर्षे वैशाप वदि १२ शुक्र श्री धीमाल जातीय पितृ मं० रामा मान शाणी घेयो) सुत सागान धोनी अभिनंदन नाघ विवं कारितं श्री पूर्णिमा पर श्री साधुरत्न सूरिणामुपदेशेन प्रतिष्टितं विधिना प्री संपेन गोरईया यान्तव्य ॥ ॥ १५९६ जापाड़ सु. ५ लोहे गोने नीठा मार्ग सपा पुमा नेजा पनापति मनांत ।
माघ सु० ५शुक्र प्राग्वाट ज्ञा० श्री. डउढा आ० हरप सु० श्रे• नागामा
सं १५२० वर्ष वै. शुदि ५भौमे श्री ज्ञातीय श्री पल्हयउ गोत्रै सा० भीषात्मज सा
घेल्हा तत्पुत्र सा० सांगा---प्रभूतिभिः स्वपितृ पुण्यार्थं श्री आदिनाथ विंवं कारित।
( १३० )
(536)
सा० सोढा मा० शाणी
सं० १५१७ वर्षे फागुन सुदि २ उकेश वंशे
बहरा गोत्रे
नगोकेन भा० नायक दे पुत्र नापा गोपा प्र० परिवार सहितेन स्वपित मा
पुण्यार्थं श्री श्रेयांस वि का श्री खरतर गोश्री जिन भद्र सूरि पट्टे श्री
सूरिभिः प्रतिष्ठितं।
६.-
( 57 )
सं० १५१७ वर्षे
आजी सुत श्रेजिनदासेन स्वश्रेयसे श्रीधर्मनाथ विवं आगम मच्छे श्रीदेवरत्न !
गुरूपदेशेन कारितं प्रतिष्टित ।
( 558 )
सं० १५१९ वर्षे ज्येष्ठ वदि ११ शुक्रे उपकेश ज्ञातीय चोरवेडिया गोत्रे उएस
सा० सोमा भा० धनाई पु० साधू सुहागढे सुत ईसा सहितेन स्वश्रेयसे श्री सुमा
नाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्रीकक्क सूरिभिः ॥ सीणोरा वास्तव्यः ॥
( 559 )
वृहद्गच्छे श्रीरत्नप्रभ सूरि पह प्रतिष्ठितं श्री महेंद्र मूरिभिः।
--
(१३१ ) ( 560 ) सं० १५२४ आषाड़ शु० १० शुक्र उकेश वंशे-- भा० सपूरा पु० जेसाकेन भा० धर्मि- णि पु० माईजा पौत्र इसा वीसालादि कुटुंव युतेन पु० माझ्या श्रेयसे श्री नमि विव का० प्र० सपा श्रीसोमसुंदर सूरि संतान श्रीलक्ष्मी सागर सूरिभिः । ( 561 ) सं० १५३२ वर्षे चैत्र दि २ गुरौ श्रो श्रीमाल ज्ञा० सं० जोगा प्रा० जीवाणि त० गो- लाना० कर्मी पु० नरवदेन प्रो श्रेयांसनाथ विवं कारितं श्री पूर्णिमा पक्षीय श्री साधु सुंदर सूरीणामुपदेशेन प्रतिष्ठितं विधिना वलहरा । (162) स० १५३५ वर्षे फागुण सुदि ३ दिने श्री उकेशवंश २० गोत्रे ता. नीवा जार्या पजी सा० पूना श्रावकेण भातृ सजेहण मा० अंवा परिवार युतेन श्रो संभवनाथ बिंब कारिनं प्रतिष्ठित श्री खरतर गच्छे श्रीजिन भद्र सूरि पर श्री जिनचंद्र सूरितिः ॥ ( 35 ) संवत १५१७ वर्ष मा० यदि ८ दिने प्राग्वाट ज्ञातीय व्यः रूपा ना. देपू पुः मेग मा० हीरू योर्च प्रो वासुपूज्य विंध प्रतिष्ठितं श्री सूरिभिः।
( १३२ ) ( 56 ) ॥ संवत १५५७ वर्षे वैशाप सुदि ३ दिने मंगलवासरे उ. ज्ञातीय वेछाच गोत्र मा. पीमा पु० जालू नारिगदे अगस---श्रेयो) श्रीशांतिनाथ विंवं का० प्र० श्रीसंडे गच्छे श्रोशांति सूरिभिः तत्प- श्रीर-सूरिभिः । (565 सं० १५५६ (?) वर्षे आपाड सु० १० सूराणा गोत्रे स० शिवराज भा० सीतादे पुत्र स हेमराज आर्या हेमसिरी पु० पूजा काजा नरदेव श्री पार्श्वनाथ विंव कारितं प्र. घोष गच्छे १० श्रीपद्मानंद सूरि पह नंदिवर्द्धन सूरिमिः। श्रीधर्म ( 566 ) सं० १५५६ वर्षे आपाढ सुदि १० आईचणाग गोत्रे तेजाणी शाषायां सा० सुरजन मा० सूहवदे पु० सहस मल्लेन भा० शीतादे पु० पाडा ठाकुर भा० द्रोपदी पौ० कसा पीधा श्रोवंत युतेनात्मपुण्यार्थं श्रीसुमतिनाथ विवं कारितं प्र श्रीउपकेशगच्छे १० श्रीदेव. गुप्त सूरिभिः ॥ श्रीः ॥ ( 567 ) - राठा- सं० १५६७ वर्षे श्री माह सुदि ५ बुधे गोठि गोत्रे सा. त्यादि परिवार युतेन सुविधि नाथ विवं का० प्र० खरतरगच्छे श्रीजिन- चन्द्र सूरिभिः। तत्पु. पहराज तत्पुत्र -~- ( १३३ ) ( 568 ) संवत १५७६ वर्षे आषाढ़ सुदि १३ दिने रविवारे श्री फसला गोत्रे मं० सधारण पुत्र त्न मं० माणिक मार्या माणिकदे पुत्र मूलाकेन पुत्रपौत्रादि परिवृतेन श्री.पार्श्वनाथ ३वं कारितं प्र० श्रीखरतरगच्छे श्रोजिनहंस सूरिभिः श्रीपत्तन महानगरे। ( 569 ) सं० १९०४ वर्षे पोप मासे शुक्ल पक्षे पूर्णिमायां तिथौ श्रोअजमेर पूर्वी श्री चतुविंशति जनमातृका पह लुनिया गोत्रेन सा. पृधिराजेन का० प्र० श्रीवृहत् खरतरगच्छाधीश्वर गमयुगप्रधान न० श्रोजिन सौभाग्य सूरिभिः विजयराज्ये । श्रीदादाजीके छतरिके पास मन्दिरमें। ( 670 ) सं० १५३५ वर्षे आपाढ़ सुदि६ शुक्रे बड़नगर वास्तव्य उकेराझातीय सा० साजण सार्या तारू पुत्र ता० लपान जार्या लीलादे प्रमुख कुटुम्बयुतेन स्वनेचसे श्रीशांतिनाय वेवं ज्ञारितं प्रतिष्ठितं श्री तपागच्छनायक श्री लक्ष्मीसागर सूरितिः ॥ पं० पुण्यनन्दन गणीनामुपदेशेन ।
( 571 )
( 572 )
(मोजाकेन भा० भली प्रमुख कुटुम्ब युतेन स्वश्रेयसे श्रीशांतिनाथ चतुर्विंशति
( १३४ )
जयपूर।
यति श्यामलालजी के पासकी मूत्तियों पर
सं० १३ -- वर्षे माघ सुदि १३ सोमे श्रीकाष्ठासंघ श्रीलाड वागड (2) गण श्रीमन्-
मुरूपदेसेन हुंवउ ज्ञातीय व्य० पाहड भार्या लाछि सुत पीमा सार्या राजलदेवि ने योष
सुत दिवा मार्या संभव देवि नित्यं प्रणमति।
सं० ११३८ वर्षे पौष ६ सोमे श्रीब्रह्माणगच्छे श्रीश्रीमा० माथलदे पु०
श्रोशांतिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्रीबुद्धिसागर सूरिभिः ॥ श्री।
सं० १५१५ वर्षे फागुण शुदि १ शुक्रवारे। ओसवाल ज्ञातीय बच्छस गोत्रे सा
धीना भार्या फाई पु० देवा पद्मा मना वाला हरपाल धर्मसी आत्मपुण्यार्थ श्रीधर्मनाथ
विवं कारितं श्रीम. तपागच्छे
सं० १५२१ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १३ गुरी रपसण वासि श्रीश्रीमाल ज्ञासीय श्री. धर्मा भाः
धर्मादे
सुत
पहः कारितः प्रतिष्ठितः श्री सुविहत सूरिभिः ॥ श्रीरस्तु ।
सामने
( 573 )
-
( 574 )
( १३५)
यति किसनचन्दजी के पासकी मूर्तियों पर ।
( 55 )
सं० १३१८ फागुन--- गेहलडा गोत्रे वटदेव पुत्र विसल पुत्र लषमणेन मातृ वीरी
अयोर्थं श्री पार्श्वनाथ विवं कारितं प्र० श्री भावदेव सूरिभिः ।
(576 )
सं० १५०५
वर्षे
माह वदिशनौ श्री--- गच्छे... जलहर गोत्रेसा० लुणाना० लुणादे
पुत्र पविन पाल्हा सानानि पितृमातृ अयोर्थं श्री संभवनाथ विवं कारि० प्र० ...।
(577)
सं० १५०८ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १० श्रीमाल ज्ञाती झांडावत गोत्रे सा० मोजा नार्या
सासु
पुत्र नेता नार्या फुला श्री धर्मनाथ विवं कारितं श्री पल्लि गच्छे
----
( 378 )
संवत १५०६
व
जएत वंसे ता० हजदा भार्या आलणादे पुत्र केन्हाकेन श्री अंचल
गच्छेश श्री जय केशरि सूरिणां उपदेशेन पितृ अयो) श्री आदिनाथ विवं कारितं।
(579)
सं० १५३२ व ज्ये० ३०३ रवौ वणागीला गोत्रे सा० वादी न० पोमाइ सु. तिउण
अयोर्थ सा० सावउन श्रोवंत साजण प्र० कुटुंब युतेन श्री पद्मप्रन्न विवं कारितं रोगपल्लिय
गच्छे श्रीदेव सुंदर सूरि पट्टे प्रतिष्टितं श्री गुण सुंदर सूरिन्निः ।
( 580 )
संवत १५५९ वर्षे माघ सुदि १५ गुरौ ओसवाल ज्ञातीय सा० हासा पत्र हरिच्दैन
मा० हीरादे पुत्र पुना धूनादि कुटुंव युतेन गहिलडा गोत्रे श्री सुविधिनाथ विवं का० ।
तपागच्छे श्री हेम विमल सूरिभिः नागपुरे।
( 581 )
संवत १६७४ वर्षे माघ वदि २ दिने गुरु पुष्ययोगे ओसवाल ज्ञातीय चोरडिया गोने
स० सिघा भार्या नवलादे तत्पुत्र स० भैरवदास मार्या अर्मादे नाम्न्या श्री नमिनाथ विं
कारितं प्रतिष्ठितं तपा गच्छे अहारक श्री विजयदेव सूरिभिः ।
( 582 )
सुविधिनाय
सं० १६८८ व० माघ व० १ गुरौ
--हस गोत्रिय सावंजाकेन
विं. गृहीत घ० ८० श्रोतपा गच्छे श्री विजयदेव आचार्य श्री विजयसिह सूरि प्रतिः ।
जोधपुर।
यह मारवाड़ की राजधानी एक प्रसिद्ध स्थान है।
श्रीमहावीर स्वामीका मन्दिर (जुनी मंडि)
धातुओंके मूर्ति पर।
( 583 )
युतेन
सं० ११५६ वर्षे माह सुदि ११ स० हाप-सीह पुत्री सपदे-केन पुत्र पूजा काजा
पित भयोधं श्री जादिनाथ वि कारिस प्रतिष्ठितं श्री जिनराज सूरिभिः ।
(३३७ ) ( 5 ) सं. १४८० वर्षे वैशाप सु०३ धांधगोन्ने सा० मोल्हा पुत्रेण सा० सांचडेन स्वपुत्रेण भार्या सिरिधादे श्रेयसे श्रीआदिनाथ विवं कारितं प्र० श्रोविद्यासागर सूरिभिः ॥ श्री॥ ( 555 ) सं० १५०१ प्रा० ज्ञा० डोडा RI० राणी सुत सुपाकेन ना• सरसू पुत्र साजणादि युतेन श्रो अजितनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री सूरिभिः । ( 585) सं० १५०३ आपा० सु० ६ शु० राउ खावरही गोत्रे ता० महिराज ना० सीता पु० पीद सा० लोली पु० कीडा देताभ्यां युतेन श्री धर्मनाय विकारापित श्री • - पिं गच्छे को जयसिंह सूरि प श्रीजय शेपर सूरितिः तपा पक्ष । (157) २० १५०३ वर्षे मार्ग वदि २ खुचंती संहारी गोत्रे सा० सोमाभा० सोम श्री पुत्र हीरा केन आत्म० श्री श्रेयोत विवं क्षा० ए० श्री धर्म वोप गच्छे पो पन पर सूरि प? यी विजय नरेन्द्र सूरिभिः । सं० १५१७ वर्षे क्षेत्र तुः १३ गुरौ उप. ज्ञा० म० नूपा सामाजिक पु. नांढा ना. वाल्हणदे पुत्र पेतति दात प्रा नाम ही तुमतिनाथ विकास मानीया गः श्री उदय प्रत तरितिः।
(589 ) बारी सं० १५२२ वर्षे वैशाष सु० ३ नना ज्ञा०० जइता मा० परि पुत्र गेला भा. नाम्न्या पुत्र अमरसी भा० तिलू सजन कवेला मातृ दूसी ज्येष्ठमाला प्रमुख कुटुंब युक्ता स्व अयोर्थं श्री विमलनाथ विवं का० प्र० तपा श्री लक्ष्मीसागर सूरिभिः ॥ श्री ॥ ( 590 ) पानीद सं० १५२४ वै० शु० ३ श्री मूलसंघे सरस्वती गच्छे श्रीकुंदकुंदाचार्य म० सत्प० भ० श्रीसकल कीर्ति सत्प० भ० श्री विमल कीर्त्या श्री शांतिनाथ विवं प्रतिष्ठित । ओ जे संग भा. मरगादे सु० तेजा टमकू सु० सिवदाय । ( 591 ) सं० १५२७ वर्षे माह सु० ६ बुधे श्री गोत्रे सा० भादा भा० सावलदे पु० मा० मालूणदे पुत्र वींझा कान्हा रूपादि युतेन स्व श्रेयसे श्री आदिनाथ विवं कारित प्रतिष्ठितं जिनदेव सरि पह श्रीमत् श्री भावदेव सूरिः । ( 592 ) ५ सं० १५३२ वर्षे वैशाष वदि ५ रवौ उप० ज्ञा. गो. उरजण भा० राउं सु० मीदा म भावलदे सु० गारगा वरजा युतेन आत्म० श्री सुमतिनाथ विवं का० प्र० श्री जीरापलीग गच्छे श्री उदयचन्द्र सूरि पट्टे श्रीसागर नाद सूरिभिः शुभं भवतु ( 593 ) सं० १५३५ श्री मूलसंघे म० श्री भुवन कीर्ति स्त्र. १० श्री ज्ञान भूषण गुरूपदेशे --
(१३६)
( 594 )
सं० १५५४ वर्षे फागुण मासे शुक्ल पक्षे ३ वुध वासरे साइ चांपा मार्या मेयू डुंगर
भार्या चांदू पु० डाहा भा० मालू श्री नमिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं पूर्णिमा पक्षिक
छोली वाल गच्छे अहारिक श्री विजय राज सूरिभिः ॥ श्री ॥
( 595 )
सं०
० १५६३ वर्षे माह सुदि १५ गुरौ प्रग्वाट ज्ञा० सा० कला मा० जमणादे पु० सदो
सहितेन आत्म पुण्यार्थे श्रीसुमति विवं का०प्र० पूणिमाक गच्छे
--सागर सूरि---
पु० घना
( 596 )
२० १५६५ वर्षे चैत्र सु० १५ गुरौ उप० अंडारी गोत्रे सा० नरा भा० नारिंगदे पु.
सोली भा० लाछलदे पु० चिजा रूपा कूणा विजा मा० वीजलदे पु० नाम्ना डामर
वि० भा. वालादे पु० खेतसी जीवा स्वकुटुंवेन पितृ निमित्तं श्री सुमतिनाय विवं कारितं
प्र० श्री संडेर गच्छे १० श्री शांति सूरिभिः ।
( 597 )
सं० १५६५
वर्षे माह सुदि ८ रवी श्री उपकेश वंशे वि० सांडा नार्या धम्माई सुत वीसा
सूरा नार्या लाठी द्वि. नार्या अरघाई धर्म अयसे श्री शीतलनाथ विवं प्रति० सिद्धांती
गच्छे श्रीदेव सुदर सूरिभिः प्र० ।
(598 )
॥ॐ संवत १५६५ वर्षे वैशाप वदि १३ रवी ठेढीया ग्रामे श्री उएसयंशे सं• पीदा
भार्या घरणू पुत्र सं० तोला सुश्रावकेण मा० नीनू पुत्र सा० राणा सा. उपमण भ्रात
( ११.) सा० आसा प्रमुख कुटुंध सहितेन स्वश्रेयो) श्री अंचल गच्छेश श्री भाव सागर सूरीगा मुपदेशेन श्री अजितनाथ मूलनायके चतुर्विंशति जिन पह कारितः प्रतिष्टितः श्रीसंघेन। ( 669 ) • १५७० वर्षे आ० सु० ३ सोमे ओसवाल ज्ञातीय चंडलिआ गोत्रे सा० सारिन पुत्र कालू भा० हामी पु. हासा देवा गणाया भार्या दमाई १० साह विमलदास सा. हरवलदास सा० विमलदास भा० सोनाई पु० सुन्दर वच्छ रिषदास मार्या अमरादे सुत अमरदत्त पूर्वत भु० श्री सुविधिनाथ विंवं कारितं प्र० श्रीमलधार गच्छे १० श्री गुण सागर रिपह श्री लक्ष्मीसागर सूरि प्रतिष्ठितः । ( 600 ) सं० १८२१ मि. वै० सुदी ३ श्री पार्वजिन-२० श्री जिन लाभ सू० यति हीरानंद कपितं देविजीके मूर्तिपर। (४ भूजा+सर्प छत्र) ( 601 ) सं० १४७२ वर्षे ज्येष्ठ वदि १२ सोमे वीजापूर वास्तव्य नागर ज्ञातीय ठा० भवासुत घरणाकेन कुटुंव सम-- अयोर्थ देवी वेइरुठा० रूपं प्रतिष्ठापितं। ( 602 ) सं० १५५४ माह सुदि५ दिने उ० ज्ञातीय मंडोवरा गोत्रे सा० पासवोर पु.सा० सूरा भा• सूहवदे पु० सा० श्रीकरण सा०शिवकरण सा विजपाल श्रा० सूहवदे आरमपुण्या श्री शांतिनाथ विवं का० प्र० श्रीधर्म घोष गच्छे भ० श्रीपुण्यवर्द्धन सूरिभिः ।
(१११) ( 603 ) संवत १५७६ वर्षे वैशाख सुदि ७ वुधे उशवाल ज्ञातीय पद्धशाषीय पोसालेवा गोत्र सा० पीमा भा० अधी-पु० सा० श्रीवंस भा• सोनाई पु० सकल युतेन स्वश्रेयसे श्रीपा- वनाथ विवं का० श्री कीरट गच्छे श्री कक्क सूरिभिः ॥ श्री ॥ ( 604 ) स्वस्ति श्रीः ॥ सं० १५९८ वर्षात्पौष वदि ११ सोमे उकेश वंशे व्य० परवत भा० फदकु तत्पुत्र व्य० जयता प्रा० अहिवदे पु० व्य० श्री ५ सपरिवारेण सोक्त विहान कर्मा निज परिवार अयोधं आदिनाथ विंवं कारितं प्र० श्री पूर्णिमा पक्ष भीमपल्लीय He श्री मुनि चन्द्र सूरिप श्री विनयचंद्र सूरिणामुपदेशेनेति भद्र। ( 605 ) ॐ संवत १६३८ वर्षे माघ सुदि १३ सोमे श्री स्तंज तीर्थ वास्तव्य सोनो मनजोतार्या मोहणदे सुत सोनी मंगलदास नाम्ना श्रीश्री माल ज्ञातीय श्री अजितनाथ विवं कारा- पितं तपागच्छे श्री हीर विजय सूरीश्वरै प्रतिष्ठितं । श्री केसरियानाथजी का मदिर-मोती चौक । ( 65 ) * संवत १२३६ द्विः वैशाख सुदि६ शुक्रे पल्यपद्र वास्तव्य श्री ति-नि गच्छ . भी देवाचार्य सरक श्री नवत्सार सुत-टे-गुण स्वरत्नी सुखणायाः यो श्री पाश्यनाथ प्रतिमा कारिता प्रतिष्टिता भी बुद्धि सागराचा
(१४२)
( 607 )
सं० १४५८ वर्षे माह सुदि ५ लोढा गोत्रे सा० देवसीह भार्या देलूणदे पुत्र रेडा भाग
रूपादे पुत्र सा० सालू सायराभ्यां पितृ मातृ पुण्यार्य श्री आदिनाथ विवं का० प्रति।
भी धर्मघोष गच्छे श्री मलयचन्द्र सूरिभिः ।
( 608 )
सं० १५१३ वर्षे पोष वदि १ शुक्रे श्रीमाल ज्ञा० ऋ० संग मा० श्रेयादे सु० महिराजे
पितृ मातृ भ्रातृ समधर सारंगा भी मान मित्रं स्वात्म श्रेयसे श्रीश्री सुमतिनाथ वि
पंचतीर्थी कारापिता प्रतिष्ठितं पिप्पल गच्छे अ. श्री गुण रत्न सूरिभिः गंधारवास्तव्य।
( 609 )
सं० १५२४ चैत्रवदि ५ -- ड माणिक मा० वारूदे-श्री विमल कीर्ति-धर्मनाथ विव
प्र. वाई सपदे जा० काल्हा
( 610 )
सं०
• १५२८ वर्षे वैशाख वदि ६ दिने सोमे उकेश वंश कुर्कट शाखायांव्य० तोलामा
घेतलदे पुत्र सदस मल्लेन तील्हादि पुत्र पौत्रादि युतेन स्व भयो) श्री सुमतिनाथ विंध
कारितं प्रतिष्ठितं श्री खरतर गच्छे श्री जिनचंद्र सूरिभिः ।
( 611 )
सं. १५७२
विध
वर्ष
फागुण सु० ६ मं० भंडारी गोत्रे सा० तोला भा० पलाछदे पुत्र
विद्रा सा० परूपा सा० कूपा भा० करमादे पु० माता - पुण्यार्य श्री सुमतिनाथ
कारितं प्रतिष्ठितं श्री संडेर गच्छे भ० श्री शांति सूरिभिः ।
( १९३) ( 612 ) सं० १८९३ ना मा । सु० १० वुः । श्री जोधपूर वास्तव्य श्रीओसवाल ज्ञातीय युद्ध शाखायां संघ माणक चंद तेउ स्वयार्थ श्री चतुर्विंशति जिन विवस्य भरापोतं। ( 613 ) सिद्ध चक्रके पट्ट पर। श्री सिद्धचको लिखतो मया वै। महारकीयेन सुयंत्रराजः ॥ श्री सुन्दराणां किल शिष्यकेन । स्वरूपचंद्रेण सदर्य सिद्धयः॥ १॥ श्री मनागपुरे रम्ये चंद्रवेदाऽष्ट भूमिते । अब्दे वैशाखमासस्य तृतियायां सिते दले ॥२॥ श्री मुनिसुव्रतस्वामीजी का मन्दिर । (614) सं० ११२३ वर्ष फागुन शु० १ श्री श्री ज्ञा० व्य० काठा ला• काल्हणदे सु०- - पद्म प्रभु वि० भी पू० श्री उदयाणंद सू० प्र० । (615) सं० १४११ वर्षे वैशाख वदि १२दिने नाहर बंगालंकारेप सा० घनिह पुत्रेण भ्रातृ सा० सप्टकेन सरवणादि युतेन भी पार्श्वनाथ विवं कारितं प्रतिष्टिनं बाजिनराज मृरिन्ति: सो खरतर गच्छेशः॥
( 66 )
सं० १४९६
( 617 )
--
३
पुत्र सा
सं० १५०३ वर्षे डोसी-धर्माकस्य पुण्यार्थं दो० वूछा पुत्र संग्राम श्रावकेण कारितः
( १४४ )
वर्ष
फागुण बदि २ गुरी श्री तावडार गच्छे पांढरा गोत्रे जेसा भा० जस
मादे पु० तोजा भा० बापू पुठीयलमेदा सह प्रो शांतिनाथ वि० प्र० का० श्री कीर्ति का
चार्य स० श्री वीर सूरिभिः ।
सं० १५३६ वर्षे फा० सुदि ३ रवी उके० पदे दोसो गोत्रे सा० सीरंग
डूडकेन भा० दाडिमदे पुत्र कीता तेजादि परिवारयुत श्री धर्मनाथ बित्रं कारितं श्रेयस
प्रतिष्ठितं श्री खरतर गच्छे श्रोजिनद्र सूरि प? श्री जिनचंन्द्र सूरि श्री जिन समुद्र सूरिति
श्री पन प्रश्न विवं।
सं० १५८२ वर्षे जे० सुदि १० शुक्र बस्तप श्री वन रतन सूरि
श्रीधर्मनाथजी का मन्दिर ।
सं० १४९३ जेठ यदि ३ मंगले उप० ज्ञा० पावेचा गोत्रेसा वीरा मा० वील्हणदे पुत्र
कुंभाकेन भा० कामलदे युतेन स्वश्रे० विमल विवं का० प्र० वृहत गच्छे देवाचार्यान्वये
श्री हेमचन्द्र सूरिभिः ॥ छ ।
श्री श्रेयांस विवं प्रतिष्टितं श्री जिनभद्र सूरिभिः श्री खरतर गच्छे ।
( 618 )
( 619 )
३
( 620 )
(११५) (621) सं० १५०४ वर्षे वै० शु० ३ प्राग्वाट ज्ञा० अ० अंडारी शाणी सुत श्री० पीमसी सा- पाभ्यां प्रा. मदीखसजता मालादि कुटुंवयुताभ्यां स्वयसे श्री मुनि सुव्रत स्वामि विवं का०प्र० तपा श्री सोम सुन्दर सूरि शिष्य श्री जयचंद्र सूरिभिः धार वास्तव्यः शुभं भवतु ॥ (622 ) सं० १५०७ वर्षे मार्गसिर वदि २ गुरौ उपकेश वंशे जारंउडा गोत्रे सा० पिमपालात्मज सा० गिरराज पुत्र सहदेवो न० लोला समदा तहितेन मातृ गवरदे पूजार्य श्री नमि वि० का०२० तपा रहारक श्री हेमहंस सूरितिः॥ ( 623 ) ? स० १५१२ वर्षे फागुन सु० १२ आहतणा ( आईपणा ? ) गोत्रे मा० धना मा. रसपी पु० मोकल प्रा० माहणदे पु० हालादि चुतेन स्वमाकट अयसे श्री संजयनाय विंबं का. उकेश गच्छे धो सिद्धाचार्य संताने प्र० स० घी व नृरिभिः । स. १५२५ वर्षे दिवत्ता वाले सोमाल ज्ञातोय सा० दशरय ना• मामिनी मुत्र माना केन मा० राना मातृसालू ज्ञासोटो मुटुंदयुतेन स्यने योर्य श्री गांतिनाथ वियं या प्रतिष्ठितं तपागच्डे घी लक्ष्मी सागर सूरिभिः नपुरीचा गोत्रः । -- स० १५२८ वर्षे देशास पदिइने उपशहाली साधियना मात्र माना पु० जासी-हा. जयतिरि पु लापर हा हिलि नया गाना,मदानमा ( १४८) श्री केसरियानाथजी (मेवाड़.) यह स्थान जो मेवाड़की राजधानी उदयपूरसे २० कोस पर है रखदेओ नामसे भी प्रसिद्ध है। मूलनायक श्री ऋषभदेवकी मर्ति स्थामवर्ण बहुत प्राचीन और इनका अतिराय यहुत विलक्षण हैं। मन्दिरके वाहर महाराणा साहयोंके अघाट बहुतसे हैं। पंचतीर्थी पर। (635) सु० जावल मं० १५१८ बर्ष माघ सु० १३ दिने उप० ज्ञा०, श्री. पोमा भा० पोमी भा० गोटादे सु. जसा धना वना मना ठाकुर परवतादि कुटुंवयुतेम स्वपितृ श्रेयसे श्री धमनाय विवं का० प्र० तपा गच्छे श्री सोम सुंदर सूरि संसाने श्रीलक्ष्मी सागर सूरिति पापाण पर। ( 636 ) श्री कायाम्बाम वामीता केयलापदाग नमो क्षमाग्रत (?) आदिनाथ प्रणमामि- विक्रमादित्य म्बत ११३१ वर्षे वैशाख मुदि अलय तिथो बुध दिने चादी नाधुराल.." ( 637 ) ५वार नामा श्री आदिनाथ प्रामामि निन्यं विक्रमादित्य संवत १५७२ वैशाप मुदि पर श्री राज या कला सार्या मोबनवाई चोजीराज यहां धुलेवा ग्राम श्री नाव प्रयाय नदीमामाईमा नार्या भग्मी तम्या पत्र मा० मायाँ हासलदे नस्य पा देव गमाय म्रात वीवाम माया लादी बाबा मार्यालीमा सकलनाय नाप' -श्री ऋषमाथजी श्री नामिगज कुष श्री तां-री कुल
(१४६)
( 638 )
संवत १४४३ वै० शु० १५ पूर्णिमा तिथौ रविवासरे हत्खरतर गच्छै श्रीजिन अक्ति
सूरि पहालंकार अहारक श्रो १०५ श्री जिनलाभ सूरिभिः श्री राम विजयादी प्रमुख
सहूक -- आदेशात् सनीपुर - श्री ऋषनदेवजी
सरस्वतीजी महादेवजी के चरण चौकी पर ।
-
( 659 )
संवत १६७६ वर्षे मा० सुद० १३
मरुदेवी माताजीके हस्ति पर ।
( 640 )
संवत १७११ वर्षे वैशाष सुदि.३ सोमे श्री मूलसंचे सरस्वति गच्छे वलात्कारगणे
श्री कुं--
( 641 )
संवत १७३४ व० माघ मासे शुक्ल पक्षे - तिथौ भृगुवासरे श्रीमलसंघ काष्ठासंघ महा-
रक श्री रामसेनीन्वये तदास्नाये १० श्री विश्व भूपण ज० यशः कीर्ति १० श्रो चिनुबन
कीर्ति-
--
(62)
संवत १७४६
वर्प
फागुण तु० ५ सोमे श्री मूउसंच सरस्वति गच्छे बलात्कार गणे श्री
श्री कुंदकुदाचार्यन्वये महारक भी सकल कीर्ति स्तदन्तर महारक श्री दामकीर्ति -- ।
(643 ) ( 644 ) धोया उरगुणहरः ॥ सकल संघ सानिधकः समतिचंद महासाधः। पास सदन कियो प्रगट ( १५० ) संवत १७६५ वर्षे माघ मासे कृष्णपक्ष पंचमी तिथी सोमवासरे महारक श्री विजय रत्न केश्वर तपागच्छे काष्ठासंघे श्रा० पु० दे० वृ० शा• मुहता गोत्रे मुहताजी श्रीरामच्छ जी तस्वनार्या वाई सूर्यदेवि तस्यात्मज मुहताजी श्री सोसाग चंद्रजी मुहताजी श्री सातु जी आई मुहताजी श्री हरजीजी श्रीपार्श्वनाथ जिन विवं स्थापितं । श्री जगवल्लभ पार्श्वनाथ प्रशस्ति । ॥ ॐ ॥ प्रणग्य परया भक्तया पद्मावत्याः पदाम्बुजं । प्रशस्तिल्लिख्यते पुण्या कवि केशर कीर्त्तिना ॥ १॥ श्री अश्वसेन कुल पुष्पक रथजभानुः । वामांग मानस विकासन राजहसः ॥ श्रीपर्श्वनाथ पुरुषोत्तम एष भाति । घुलेव मंडनकरा करूणा समुद्रः ॥२॥ श्री मज्जगत्सिंह महीश राज्ये । प्राज्यो गुण र्जात ईहालथोयं ॥ आपुष्पदत्त तामुपैतु । संपश्यतां सर्व सुख प्रदाता ॥३॥ दोहा । सुर मन्दिर कारक सुखद सुमतिचंद महा साधः । तपे गच्छमें सप जप उयत उदधी अगाधः॥ ४॥ पुन्यथाने श्रीपार्श्वनो पुहवो परगट कीधः। खेमतणो मन था तिसु लाही अवनो लीध ॥ ५॥ राजमान मुहता रसन चातुर लषमी चंद । उच्छ व विधा अति घणा आणिमन आनन्द ॥६॥ दिल सुध गोकल दासरे की प्रतिष्ठा पास । सारे ही प्रगटयो सही जगतिमें जसवास ॥ ७ ॥ सकल संघ हरषित हूओ निरमल रविजिन नाम राषो मुनि महंत सरस करता पुण्य सकाम ॥८॥ कवित्त । सांतिदास सचितसंत दावडा लषमी चंदहः । संघ मनुष्य सिरदार सहन किरण सुषके कंदहः ॥ वल्लभ दोसी वीर धीर जिन धर्म धुरंधरः । मुलचंद गुण मूलही स्थिर- तको ( १५१ ) निश्चल रहो निरवाघः ॥ ६॥ श्लोक ॥ तद्वारेक पूज्यकृद कृपाख्यो देवेरप्रविलग्न विचित्रः पूजायतेस्मै प्रविलं लितावै संघेन तत्सौम्य गुणान्वितेन ॥ १० ॥ गजधर सकल सुज्ञान धराहरी कीघो गुणहेर। रच्योविवजिनराजको करुणा बंत कुवेरः ॥ ११॥ आर्या । शशीव सुख राज वर्षे । माधव मासे वलक्ष पक्षच । पंचम्यां भृगुवारे हि कृता प्रतिष्ठा जिनेशस्य ॥ १२ ॥ महा- गिरि महा सूर्य शशिशेष शिवादयः । जगवल्लन पार्श्वस्य तावतिच्छतु विवकं ॥ १३ ॥ श्री संवत १८०१ शाके १६६६ प्रमिति वैशाख सुदि ५ शुक्र वासरे श्री जगवल्लन पार्श्वनाथ विवं प्रतिष्टितं ब्रहत्तपा गच्छीय सुमतिचन्द्रगणिना कारापितं ॥ श्रीरस्तु ॥ शुक्षं सवतु ॥ पगलीयाजी पर। ( 645 ) स्वस्ति श्री संवत १८७३ वर्षे शाके १७३९ वर्त्तमाने मासोत्तम मासे शुभकारी ज्येष्ठ- मासे शुभे शुक्ल पक्ष चतुर्दशि तिघी गुरुवासरे उपकेश ज्ञातीय वृद्धिशाखायां कोष्ठागार गोत्रे सुश्रावक पुण्य प्रस्तावक श्री देव गुरु भक्तिकारक श्री जिनाज्ञा प्रतिपालक साह : श्री शंजुदास तत्पुत्र कुलोद्धारक कुल दीपक सिवलाल अंवाविदास तत्पुत्र दोलतराम । ऋपनदास श्री उदेपूर वास्तव्य श्री तपागच्छे सकल सह रक शिरोमणि महारक श्री श्री विजय जिनेंद्र सूरिति उपदेशात् पं० मोहन विजयेन श्री धुलेवानगरे ॥ भंडारी दुलिचंद ' आगुंछई॥ दादाजी के चरण पर। ( 616 ) संवत १९१२ का मिति फागुन वदि ७ तिघौ गुरु वानरे श्री घुलेवानगरे श्री लेम । कीर्तिशाख्योद्भव महोपाध्याय श्री राम विजयजी गणि शिप्य महोपाध्याय शिवचंद्र
चहिता भा• लाली पु. व्य. नारद भार्या नारिंग पु. जयवंतकेन भार्या हर्षमदे प्रमुख
( १५२)
गणि शिष्य----चंद्र मुनिना शिष्य मोहनचन्द्र युतेन श्री सत्गुरुचरण कमलानि कारि
सानि महोत्सवं कृत्वा प्रतिष्ठापितानि स्थापितानिच वर्तमान श्री वृहत्खरतर गल्छ मा
रकाज्ञयाच श्री अभयदेव सूरि जिनदत्त सूरिजिनचंद्र सूरिजिन कुशल सूरिणां चरणन्या।'
पालिताना।
श्वेताम्बरियोंका विख्यात तीर्थ श्री शत्रुजय (सिद्धाचल) पहाड़के नीचे यह काटिस
वाड़का एक प्रसिद्ध स्थान अवस्थित है।
मोती मुखियाजीका मन्दिर ।
संवत १५०३ वर्षे ज्येष्ठ शु० १० प्राग्वाट ज्ञातीय श्रेआमा मा० सेगू सुत
भा० माई कुटुंवयुतेन स्वन योर्थं श्री श्रेयांस नाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं तपा श्री जर
चंद्र सूरिभिः ।। गणवाडा वास्तव्यः।
संवत १५५८
वर्षे
फागुण शुदि १२ शुक्र श्री उकेश वंशे गांधी गोत्र अविका प्रत
सा० छाजू सुत सेंघा पुत्र सूरा मा० मेघाई सु० साऊंया मा० मकू नान्या स्व श्रेयोप
श्री सुमतिनाथ विवं कारितं प्रतिष्टितं मलधार गच्छे श्री लक्ष्मीसागर सूरिभिः ।
संवत १५७१ वर्षे माघ वदि १ सोमे वीसल नगर वास्तव्य प्रारबाट जतीय ट्या
( 647 )
परवते
( 648 )
(649)
१
( १५३ ) परिवार युतेन स्वश्री योधं । श्री नमिनाथ चतुर्विंशति पहः कारित: प्रतिष्ठित तपागच्छे श्री सुमतिसाधु सूरि पट्टे परम गुरुगच्छ नायक श्री हेम विमल सूरिभिः ॥ श्री ॥ सिद्धचक्र पट्ट पर। ( 650 ) संवत १५५६ वर्षे आश्विन सुदि ८ वुधे श्री स्तंभ तीर्थ वास्तव्य प्राग्वाट ज्ञातीय म० वछाकेन श्री सिद्ध धन यंत्र कारितः । सेठ नरसी केशवजकिा मन्दिर । ( 651 ) संवत १६१४ वर्षे वैशाष सुदि २ बुधे प्राग्वाट ज्ञातीय दोसी देवा मार्या देमति सुत दो० वना भार्या वनादे सु० दो० कुधजी नाम्न्या पितु श्रेयसे श्री पार्श्वनाथ विवं कारा- पितं तपागच्छाधिराज महारक श्री विजयसेन सूरि शिष्य पं० धर्मविजय गणिना प्रति- ष्ठितमिदं मंगलं भूयात् ॥ ( 652 ) संवत १९२१ वर्षे शाके १७८६ प्रवर्त्तमाने माघ शुदि ७तिथी गुरुवासरे श्रीमदंघल गच्छे पूज महारक श्री रतन सागर सूरिश्वराणामुपदेशात् थी कच्छदेते कोठारा नगरे मोशवंशे लघुशापायां गांधिमोती गोत्रे सा० नायकमणजी सा० नाक नणसी तस नार्या हीरवाई तस्सुत सेठ केशवजी तस नार्या पावो वाई (तत्पुत्र नरसी नाई नाना मना) पंचतीर्थी जिनवि मरापितं (अंजन शलाका करापितं) जठास गण ।
( १५४ )
सेठ नरसीनाथाका मन्दिर ।
( 653 )
सं० १५३० वर्षे वैशाख शुदि १० सोमे श्री गंधारवास्तव्य श्री श्री माल ज्ञातीय व्यः
साहसा भा. वाल्ही ठ० सालिग आ० आसी ठ० श्रीराज भा० हंसाई। व्य. सहिसा सुत
धनदत्त मा० हर्षाई पतै सात्म श्रेयो) आदिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री वृहत्तपा
पक्ष श्री विजयरत्न सूरिभिः ॥ श्री ॥
( 654 )
सं० १९२१ वर्षे माघ सुदि ७ गुरौ श्रीमदंचलगच्छे पूज महारक श्री रत्न सागर सूरी
श्वराणां सदुपदेशात् श्री कच्छदेशै भो नलिसपुर वास्तव्य । मोश वंशे लघुशाखाया
नागडा गोत्रे सेठ होरजी नरसी तद्भार्या पूरवाईंना पुण्यार्थे श्री पार्श्वनाथ विवं कारित
सकल संघेन प्रतिष्ठितं ।
( 655 )
सूरीणां
सं० १९२१ वर्षेमाघ सुदिगुरौ श्री मदंचल गच्छे पूज महारक श्री रत्न सागर
सदुपदेशात् श्री कच्छदेशे श्री नलित
पुर वास्तव्य। ओशवंशे
सा० श्री राघव लषमण सद्धार्या देमतवाई तत्पुत्र सा० अनयचंदेन पुन्या शांतिनाथ
विवं कारितं सकल सघन प्रतिष्ठितं ॥
लघुशाखायां नागडा गोत्र
सेठ कस्तुरचन्दजी का मन्दिर
( 656 )
संवत १६९३ वर्षे वईशाष सुदि ६ गिरौ वास्तव्य श्रीपत्तन नगरे ओसवाल ज्ञातीय
यह शापायां सोनी तेजपाल
सुत
सोनी विद्याधर
सुत
सोनी रामजी भार्या वाई अजाई
।
की+
(१५५) सुत सोनी वमलदास सोनी धर्मदास सोनी रूपचन्द पुत्री वाई शीत्ति एतेन श्री विजयनाथस्य विवं कारापितं श्रीतपगच्छाधिराज श्री विजयदेव सूरि राज्ये प्रतिष्ठितं आचार्य श्री विजयसिंह सूरिभिः। श्रीगौडी पार्श्वनाथजी का मन्दिर । ( 657 ) सं० १३८३ वैसाख वदि ७ सोमे पल्लिवाल पदम मा० कील्हण देवि श्रेयसे सुत कोकमेन श्री महावीर विंवं कारित प्रति. ( 658 ) सं० १४८६ वर्षे ज्येष्ठ सुदि १३ नाहर गोत्रे सं । आसो सुतेन देवाकेन स्वबांधव हजा हरिचन्द पनि घेता-श्रेयो निमित्त श्री विमलनाथ विवं कारापितं प्र० ओ हेम स सूरिभिः । ( 659 ) सं० १५०५ वर्षे माघ सुदि १० रवी उकेश वंशे मीठडीआ सा० साईमा सार्या सिरी- आदे पुत्र सा० मोला सा सुश्रावकेण मार्या कन्हाई लघु भ्रातृ सा० महिराज हरराज पच राज भ्रातृष्य सा• सिरिपति प्रमुख समस्त कुटुंब सहितेन प्रा विधिपक्ष गच्छपति श्री जयकेशर सूरिणापमुदेशेन स्व श्रेयोर्थं प्रो सुविधिनाय विवं प्रतिष्टिनं श्री संघेन ॥ आ- वन्द्रार्क विजयतां ॥ (650) सं० १५१५ वर्षे माह शुदि ५ शनी प्रारवाट ज्ञा० म० राउट RT० राउटदे द्वितीया हांसहदे सु• मूलू हा० बरपू तुःप्तीजा हासा राजा मा. कृ.मु. हीरामाणिकग्दाम १
( 661 )
'. १ , मरिन श्री मुधिधिनाय यिंत्र कारापितं प्रतिष्ठितं श्री त्रिता
गुटेन सपयिंज पितृ श्रेयोर्थ श्री शांतिनाथ विवं कारितं प्रतिष्टितं आगमगर
श्री पद प्रन मूरिलिः सहयाला वास्तव्यः ।
वर्ष उमेष्ट दि : शनी प्रा० सा० काला मा० माल्हणदे पुत्र स. असे
#. मात्र मं० सीम मा० देमति सुति हरपाल भा० टमकू युतेन स्व श्रेयसे श्री
::HE श्री सिंह रिपार श्री उदय वल्लम सूरिभिः ।
* १५::: गर पंगाप पदि ११ ग्यो यो उकेश वंशे सा० घाचा भा० मायरि
का
(662)
-
mar
2
, बद : माम म. याछा मा. रान मु० महीपान भा• अ६१
याय श्री मुनि मुव्रतनाथ विवं कारित प्रा
-मी ॥
।
.
यी यात्रामा पाप'
7- माथा मन्त्रि पिन अंग में श्री र
मदिनाविध
अधकारी
( १५७ ) ( 665 ) ३ सं० १५३१ वर्षे माघ सुदि ३ सोमे श्री अंचल गच्छेश श्रीजय केशर सूरिणामुपदेशेन उएशवंशे स. जहता भार्या जहतादे पुत्र माईया सुश्रावकेण रजाई जार्या युतेन स्वश्रेय से श्री अजितनाथ विंवं कारितं प्रतिष्टितं सु---। ( 666 ) संवत १५३८ वर्षे वैशाख सुदि १० गुरौ श्री श्री वंशे ॥ श्री गुणोया सार्या तेजू पुत्र अमरा सुश्रावकेन भार्या अमरादे जात रत्ना सहितेन पितुः पुण्यार्थं श्री अंचल गच्छेग श्रीजय केसरि सृरिणामुपदेशेन वासु पूज्य विवं का प्रतिष्ठितं ॥ श्री ॥ ( 667 ) सं० १५६६ वर्षे माह वदि ६ दिने प्राग्वाट ६ ज्ञातीय पार विलाईआ मा० हेमाई सुत देवदास ना. देवलदे सहितेन श्री चंद्रप्रत स्वामि विवं कारितं प्रतिष्ठितं द्विवंदनोक गच्छे १० श्री सिद्धि सूरीणां पहुं श्री श्री कक्कसूरिभिः कालू -र ग्रामे ॥ ( 66 ) सं० १५८३ वर्षे वैशाप सुदि ३ दिने उसवाल ज्ञाति मं० वानर ना० रहो पु० म० नाकर मं० साजो म० ना० प्रा० हदे पु० पघु वनु भोजा भार्या अवलादे एवं कुटुंव सहित स्वधेयो) सुविधिनाथ विं० कारितं प्रति. विवदणीक ग० स० श्रा देव गुप्त सूरिभिः । भारठा ग्रामे। ( 669 ) सं० १६९४ ३० माघ सुदि६ गुरौ देवक पत्तन वास्तव्य उ० ज्ञा० वृद्ध सा० जसमाल सुत सा० राजपालेन ना० वाह पूराई प्रमुख कुटुंब युतेन श्री सुमतिनाथ विवं का प्र. तप गच्छे न० श्री विजयदेव सूरितिः ।
श्री मुनि सुव्रत वि. का. प्र. श्री उपकेश-श्रीकक्क सूरिभिः॥ श्री कुक्कुदाचार्य सताने।
( १५८ )
(670)
सं० १६९४ व० माघ सुदि । गुरो देयक पत्तन वास्तव्य उकेरा ज्ञातीय बद शाषा
सा० राजपाल तद्धार्या वा० पूराई सुत सा० वीरपाल नाम्न्या श्री संभव विवं प्रा तथा
गच्छे श्री विजयदेव सूरिभिः ।
यति कर्मचन्द हेमचन्दजी का मन्दिर ।
(671)
संवत १५५८ वर्षे चैत्र यदि १३ सोमे उपकेश ज्ञा० बर्द्धन गोत्रे बना भार्या वनारे
सुत रे जिणदास केन भार्या आलणदे पुत्र राजा सांडादि कुटुंध युतेन श्री शितलनाथ
विवं का. प्र. पल्लीवाल गच्छे श्रीनन्न सूरिप४ श्री उजोयण सूरिमिः ।
संवत १५५६ वर्षे वैशाष वदि ११ शुक्र उपकेश ज्ञाती पीहरेचा गोत्रे सा-गोवर पु
सा--- मा० धारू पु० साह नर्वदेन भा० सो मादे पु. जावड । भा० घड
( 672 )
-पितुः श्रो
गांव मन्दिर बड़ा ।
( 673 )
सं० १५०७ वर्षे माघ सुदि १३ शुक्र श्री श्रीमाल वंशे व्य० जीदा १ पुत्र व्य० जेता
णंद २ पु० व्य० आसपाल ३ पु. व्य. अभयपालपु. व्य. वांका ५ पु० व्यः श्रीवाउनि
पु० व्य० अणंतऽपु० व्य० सरजा पु० व्य० धीधा पु० व्या राजा १० पु. व्य.
देपाल
"
--
(१५६ ) पु० वसनाना १२ पु० व्य० राम १३ पुत्र व्य० नीना भार्या मांकू पुत्र वसाहर रयणायर सुश्रावकेण प्रा० गउरी पु० भूभव पौत्र लाडण वरदे भातृ समधरीसायर भ्रातृ व्यसगरा करणसी- सारंग वोका प्रमुख सर्व कुटुंव सहितेन श्री अंचल गच्छे श्रो गच्छेश श्री जय केसरि सूरिणामुपदेशात् स्व श्रेयसे श्री शांतिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री संघन श्री भवंतु ॥ ( 674 ) सं० १५३१ वर्षे श्री अंचल गच्छेश भोजय केसरि सूरीणामुपदेशेन श्री श्री माल ज्ञा- तीय दो० नोटा भा• रत्तु पु० वीरा मा० वानू पु० लपा सुश्रावकेन भगिनी चमकू सहितेन श्रीशांतिनाथ विवं स्वयोर्य कारितं श्रीसघ प्रतिष्ठितं ॥ ( 675 ) सं० १५४८ वर्षे कातिक सुदि ११ गुरौ श्री श्रीमाल ज्ञातीय धामी गोवल मा० आपू सु० वावा ना० पोमी सु० गणपसि स्वयसे श्रीचन्द्रप्रन्न स्वामि वि० का० प्र० चैत्रगच्छे श्री सोमदेव सूरि प्रतिष्ठितं । ( 676 ) सं० १५४६ वर्षे वै० सु० १० शु. श्री उ० ज्ञा० पीहरेवा गोत्र साह नावड मा परमादे नात्मयोर्थं श्री जीवित स्वामी श्री सुविधिनाथ विवं कारापितं प्रतिष्टितं श्री उसवाल गच्छे श्री कङ्क सूरि प त्री देव गुप्त सूरिभिः । (677) संवत १५७२ वर्षे वैशाप सुदि १३ सोमे श्री श्री प्राग्वाट ज्ञातीय दोसी महिजा मुत दो प्ररणा नार्या यदि तुत दोसी बहु नार्या वल्हादे तेन लारम पितृमातृणां श्रेयने श्री ..
(१६२)
( 636 )
सं० १३१४ वै० सु०३ ---विवं का० श्री चन्द्र सूरिभिः ।
( 687 )
सं० १३७३ ज्ये. सु० १२ ० राणिग भा० लारी पु० महण सीहेनपितामाता प्रयोग
श्रीमहावीर विंवं का० प्र० श्रीसालिनद्र (?) सूरि श्री मणिभद्र सूरिभिः ।
( 638 )
सं० १३८७ --- श्री आदिनाथ विं० का० प्र० श्री महातिलक सूरिभिः।
(689 )
सं० १४४६ वर्षे वै० व० ३ सोमे प्रा० ज्ञा० पितृ धणसोह मातृ हांसलदे अयसे सुन
सादाकेन श्री अजितनाथ विवं पंचतीर्थी का० प्र० श्री नागेन्द्र गच्छे श्रीरत्नप्राम
सूरिभिः॥छ॥
॥
(690)
सं० १४६३ फा० सु. ६-- श्रीमाल -श्री तेजपाल भा० ..
आदिनाथ वि० प्र० श्री जयप्रश्न सूरीणामुपदेशेन ।
श्रेयसे
सुत भादाकेन भी
( 691 )
सं० १४८६ वर्षे -- श्रीमाल - - आदिनाथ विवं प्र० श्री नरसिंह सूरीणामुपदेशेन ।
...
( १६३ )
( 692)
सं० १५११ व ज्येष्ठ व० ६ रवौ उसवाल ज्ञा० म० पूना ना• मेलादे सु० वीजल मा.
डाही तयो श्रेयसे मातृ आतुदत्त हीराभ्यां श्री विमलनाथ विवं का० पूर्णिमापने भीम
पल्लीय सहा० श्री जयचंद्र सूरीणामुपदेतेन प्रतिष्ठितं ॥
( 653 )
सं १५१९ २० फा० बा० ४ गुरु श्रीमाली ज्ञा० म० गोवा मा० नाऊ सुत जूठाकेन
पितृमातृ अयो) श्रीधर्मनाथ विवं का० प्र० श्रीब्रह्माणगच्छे श्री मुनि चंद्र सूरि पर
श्री वीर सूरिभिः ॥ वलहारि वास्तव्यः ॥ प्रो।
( 6 )
-- श्री नमिनाय विं श्री
सं० १६८५ व वै० तु. १५ दिने क्षत्रि रा• पुजा का
विजयदेव सूरिभिः प्रतिष्ठितं ॥
सं० १७७८६०
पिप्पलगा।
प्रीतुमहिमाघ वि. का. प्र. वि. श्रीधर्ममा मृर्गिक
सेठ वाल्हा भाई टोर।
संवत २५
पाल्गुन मुदिप नाम्ची ग अाकार
घी मुदमुगाचार्यान्वये 5. रविवार को मनि टेवा प्रायो
हरी पिंटर वाटक सालेरादि बहुस्थान नवीन जैन विहार जीर्णोद्धार पद स्थापना टे पुत्र राजा लावहानि प्रबर्द्धमान संतान युतेन राणपुर नगरे राणा श्री कर चनुमख युगादीवर विहार काग्निः प्रतिष्ठितः श्रीरहत्तपा गच्छे श्रीजगचंद्र मार कोटद्रमरि मनाने श्रीमन् श्रादेशदुन्दर मूरि पह प्रमाकर परम गुरु सुविहिन पुरंदर ( १६६ ) नस्य । विषम तमाग सारंगपुर नागपुर गागरण नराणका अजयमेरु मंडोर मंडसम बुंदी खाटू चाट सुजानादि नानादुर्ग लीलामात्र ग्रहण प्रमाणित जित काशिस्वाभि मानस्य। निज भुजोर्जित समुपार्जितानेक अद्र गजेन्द्रस्य। म्लेच्छ महीपाल व्यान चक्रवाल दिलल विहंगमेंद्रस्य। प्रचंड दोर्दैड खंडिताभिनिवेश नाना देश नरेश भाल माला लालित पादारावंदस्य। अस्खलित ललित लक्ष्मी विलास गोविंदस्य। कुनय गहन दहन दवानलायमान प्रताप व्याप पलायमान सकल बलूस प्रतिङ्कन हमाप श्वापद वृदस्य। प्रवल पराक्रमाकांत ढिल्लिमंडल गूर्जरत्रा सुरत्राण दत्तातपाः प्रषित हिन्दु सुरत्राण विरुदस्य सुवर्ण सत्रागारस्य षड्दर्शन धर्माधारस्य चतुरंगवाहिनी वाहिनी पारावारस्य कीर्त्तिधर्म प्रजापालन सत्रादि गुण नियमान श्रीराम युधिष्ठिराति नरेश्वरानुकारस्य राणा श्री कुभकर्ण सावीपतिसार्वभौमस्य ११ विजयमान राजे तस्य प्रासद पात्रेण यिनय विवेक धैर्योदार्य शुभ कर्म निर्मल शीलाद्यद्भुत गुणमणिमया भरणासुर गात्रेण श्री मदहम्मद सुरत्राण दत्त फुरमाण साधु श्रीगुणराज संघ पनि माहवयं कृताश्चर्ययारि देवालयाडंबर पुरःसर श्री शत्रुजयादि तीर्थ यात्रेण । आ विषम समय सत्रागार नाना प्रकार परोपकार श्री संघ सत्काराद्य गण्य पुण्य ऋयाणक पृर्यमा याक तारण क्षय मनुष्य जन्म यान पात्रेण प्राग्वाट वंशावत स भागर ( मांगण ) सुत रा० कुरपाल मा० कामलदे पुत्र परमाहत घरणाकेन उगेन जाद मंः रत्ना भा. रत्नादे पुत्र सं० लापा म(स)जा सोना सालिग स्व मा० स० घार नरेन्द्र ग्मनाम्ना निर्देशिने तदीय सुप्रसादादेशसस्त्रैलोक्यदीपकाभिधानः मारा श्री मोममन्टर मूर्गिः ॥ कृतमिदंच सूत्रधार देपाकस्य अयं च श्रीचतुम्' जिराद्राशनाद शुजयतु ॥ महा श्री
(१६७)
पाषाण और धातुओंके मूर्ति पर।
(101 )
सं० ११८५ चैत्र सुदि १३ श्री ब्रह्माण गच्छे श्री यशोभद्र सूरिलिः --- स्थाने देव
सरण सुत यीशके ----श्री गुह
कारिता।
(702 )
संवत १२९० वर्षे माघ सुदि ५ सुन भ० वढपाल अ. जगदेवाभ्यां श्रेयोर्थ पुत्र
सामदेवेन भातृ पून सिंह समेतेन चतुर्विंशति पट्ट कारितः प्रतिाप्ठतं वृहदगच्छीयः
श्रो शांति प्रत सूरितिः।
(703)
संवत ११९६ वर्षे सा० साजण मार्या सिरिआदे पुत्र चांपाकेन भार्या चापल
देव्यादि कुटुम्य युतेन अनागत चतुविंशत्यां श्री समाधि विंबं का० प्र० तपा श्री सोम
सुन्दर सूरिभिः।
संवत १५०१ ज्ये० सुदि १० प्रारबाट व्यः करणा सुत रामाकन नार्या तीचणि युद्धन
मो क सुमतिनाथ विवं कारित प्र. तपाशी सोमसुंदर शिष्य धी मुनि सुंदर मृरितिः ।
( १६८)
-
(705)
शत्रुजयके नक्सेके निचे।
सं० धर्मा
॥ ॥ सं० १५०७ वर्षे माघ सु० १० जकेश वंशे स० भीला मा० देवल सुत
सं० केल्हा मा० हेमादे पुत्र स० सोल्हा षांगां मोल्हा कोल्हा आल्हा साल्हादिति
सकुदुवैः स्वश्रेयसे श्री राणपुर महानगर त्रैलोक्य दीपकाभिधान श्री युगादि देव
प्रासादे ... धन्त -- महातीर्थ शत्रु जय श्री गिरनार तीर्थ द्वय पहिका कारिता प्रति
प्ठिता श्री सूरि पुरंदरैः ॥ तीर्थनामुत्तमंतीर्थं नागानामुत्तमा नगः। क्षेत्राणामुत्तन
क्षेत्र सिद्धादिः श्री जिं -मं ॥ १ श्री रुसुपूजकस्य --
--
( J06 )
संवत १५३५
वर्षे
फाल्गुन सुदि-- दिने श्री उसवंशे मंहोरा गोत्रे सा० लाघा पुत्र
सा० वीरपाल मा० नेमलादे पुत्र सा• गयणाकेन मा० मोतादे प्रमुख युतेन
विमलादे पुण्यार्थं श्रीचतुर्मुख देव कुलिका कारिता ॥
माता
( 707)
शंगार सा.
॥ ॐ ॥ सं० १५५१ वर्षे माघ यदि २ सोमे श्री मंडपाचल वास्तव्य श्री उश वंश
धर्मसुत सा० नरसिंग भा० मनकू कुक्षि संभूत सा० नरदेव भार्या सोनाई
पुत्ररत्न सा० संग्रामैन कायोत्सर्गस्थ श्री आदिना विवं कारितं । प्र० वृ० तथा श्री
उदयसागर मृरिनिः स्थापित श्री चतुर्मुख मासादे घरण विहारे ॥ श्री ॥
.
.
(१६६ ) सहस्रकूट पर। ( 70 ) सं० १५५१ व० वैशाख वदि ११ सोमे से० जावि भा० जिसमादे पु० गुणराज मा. सुगणादे पु०जगमाल प्रा० श्री बच्छ करावित ( उत्तर तर्फ) या. गांगांदे नागरदात वा० साडापति प्रो सूजा कारापिता मा० नीतवि० रामा० झा० कल (709) संवत १५५२ ३० मिगशर सुदि गुरु दिने श्री पाटण वास्तव्य ओस बस ज्ञातीय म० धणपति प्रा० चांपाई भाई मं० हरपा ना० कीकी पु० मं गुणराज म० मिहपाल ॥ करावत ॥ (710) सं० १५५६ वर्षे वै० सुदि६ शनी श्री स्तम्जतीर्थ वास्तव्य श्री उस वश सा० गणपति मा० गंगादे सु० सा० हराज मा० घरमादे तु० सा० रत्नतीक्षेन जा० कपूरा प्रमु० बुदुन युतेन राणपुर मंडन श्री चतुर्मुख प्रासादे देव कुलिका का श्री उसयाल गच्छेत्री देव नाथ सूरिभिः । (711) सं० १५५६ वर्षे दै० तुदि६ शनी भी स्तनतीर्घ वास्तव्य श्री उसबंश मा० आन भार्या सपांह तुत सा० साजा सार्या राजी सुन सा. श्री जोग राजेन नात मलागा स्वमार्या प्रधः सोवती देती० सं० सखा - सहजो सालासर प्रमुख कुटुंए अनन *॥ संवत १६४७ वर्ष फाल्गुन मासे शुक्लपक्षा पंचम्यां तिथौ गुरुवासरे श्रीक्षण हीर विजद नूरीणामुपदेशेन चतुर्मुख श्री धरण विहारे प्राग्वाट ज्ञातीय सुश्रावक ( १७०) स्वयसे श्री राणपुर मंडन श्री चतुर्मुख प्रासाद देव कुलिका कारिता श्री चतुर्मुस प्रासादे श्री उदय सागर सूरि श्री-ष्टि सागर सूरिणामुपदेशेन । (712) संवत १५८-- वर्षे माघ सुदि १० उकेश वंशे छाजहड़ गोत्र सा. साध पुत्र सा' उमला मातृ पुण्या श्री धर्मनाथ का० प्र० श्री जिन सा पूर्व सभामण्डपके खंभे पर। सूरिमिः। (713 ) ६ श्री ॥ॐ॥सं १६११ वर्षे वैशाख शुदि १३ दिने पात साह श्री अकबर प्रदत्त जगद्ग विरुद धारक परम गुरु तपा गच्छाधिराज भद्यरक श्री हीर विजय सूरीणामुपदेशेन राणपुर नगरे चतुर्मुख श्री धरण विहार श्री महम्मदाबाद नगर निकट वयु समापुर वास्तव्य प्राग्वाट ज्ञासीय सा० रायमल भार्या वरजू भार्या सुरूपदे सत्पुत्र खेतास नायकाभ्यां भावरधादि कुटुंब युसाभ्यां पूर्व दिग् प्रतोल्या मेघनादाभिधो मंदर कारितः स्व श्रेयोर्थे ॥ सूत्रधार समल मंडप रिबनाद विरचितः । दूसरे आंगन में। ( 714 )
.
( १७१)
खेता नायकेन बर्दा पुत्र यशवंतादि कुटुम्बयुतेन अष्टचत्वारिंशत् (४८) प्रमाणानि
सुवर्ण नाणकानि मुक्तानि पूर्व दिकृसत्क प्रतोली निमित्तमिति श्री अहमदाबाद पावै
उसमा पुरतः । श्रीरस्तु ।
(715)
नमः सिद्ध श्री गणेशाय प्रसादात् । संवत १७२८ वर्षे शाके १५९४ वर्तमाने जेठ
सुदि ११ सोम जावर नगरे काठुड गोत्र दोसी श्री सूजा सार्या कथनादे सुत गोकलदास
भार्या गम्भीरदे अमोलिकादे सुत रणछोड़ हरीदास प्रतिष्ठित श्री संडेरगच्छे महारक
श्री देवसुंदर सूरि प्रतिष्ठित उपाध्याय श्रीन सुंदरजी चेला रतनसी
( 716j
सं० १७२८ मा० संडेरगच्छे उ० श्री जनसुंदर सूरि चेला रतन राणकपूर महानगर
त्रैलोक्य दीपकानिधाने
(717)
संवत् १६०३ वर्षे वैशाख सुदि ११ गुरौ दिने पूज्य परमपूज्य महारक श्री श्री कक्क
सूरिजिः गण २१ सहिता यात्रा सफली कृता श्री कवल गच्छे लि० पं० शिवसुंदर
मुनिना ॥ श्रीरस्तु॥
(715)
संवत् १९०३ वर्षे वैशाख सुदि ११ श्री जिनेश्वराणां चरणेपु। पं० शियसुंदरः
समागतः।
(१७२)
सादडि।
यह ग्राम रैनपुरसे ३ कोस पर है।
( 19 )
स्वस्ति श्री ऋद्धि वृद्धि जया मंगलाभ्युदय श्री- अथ श्रीत--विक्रमादित्य समयात् ।
१६४८ वर्षे वैशाख मासे कृष्णपक्ष अष्टम्यां सियो लामदासार गंगाजल निर्मलायां श्री
उसवाल ज्ञातौ कावेडिया गोत्र साह श्री भारमल गृहे भार्या यहू
श्री मेवाडी-
साह श्री तारा चंदजी स्वर्गारूढो जातः तत्र बहू श्री तारादे १ बह पो त्रिभवणदे २५
श्री असडवदे ३ बहू श्री सोभागदे ४ सहगत
तत्पुत्र
..
नाकोडा।
मारवाड़ के मालानी-परगने के नगरके पास पहाड़ों के बीच यह एक प्राचीन स्थान है।
( 70 )
संवत १९२१ --- पार्श्वनाथ जिन चैत्ये चतुष्किका कारापित श्रावक संघेन ।
( 721 )
-
संवत १६३८ आशाढ़ सुदि २ गुरुवार :
-
( 722 )
संवत १६४२ भाद्रपद सुदि१२ सोमवार
-राउल श्री मेघराजजी विजय राज्ये..।
( १७३ ) (723) संवत १६६६ भाद्रपद शुक्ल पक्ष तिथि द्वितीया दिने शुक्रवासरे वीरमपुर श्री शांति- नार्थ प्रासाद भूमि गृहे श्री खरतरगच्छे श्री जिन चंद्र सूरि विजयाधिराज आचार्य श्री सिंह सुरि राज्ये श्री संघेन लिखितं । (724) उपाध्याय श्री ५ देवशेखर विजय राज्ये ॥ ॥ * ॥ सं० १६ असाढ़ आदि ६७ वर्षे भाद्रपद शुक्ल पक्ष श्री नवमि दिने शुक्रवासरे श्री वीरमपुरवरे श्री पार्श्वनाथ श्री महावीर स्वामी श्री पल्लीवाल गच्छे नहारिक श्री यशोदेव सूरि विजय राज्ये राउल श्री तेजतोजी विजय राज्ये कारित श्री संघेन पंडित श्री सुमति शेखरेण लिपीकृतं सुत्रधार दामा तत्पुत्र मना धना वरजांगेन कृतं ॥ भ्रात्रोज सामा मेया कला पुन कल्याण ॥ पानेज नासण श्री पार्श्वनाय थो महाबोरजी रक्षा शुभ सवतु (125) संवत् १६६८ वर्षे द्वितीय आसाढ़ शुक्न ६ शुक्रवासरे उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्रे श्री तेजसिंहजी द्राज्ये भीतपागच्छे नहारक श्री विजय तेन सूरि विजय राज्ये नाचार्य श्री विजयदेव सूरि विजय राज्ये । स्वस्ति श्री तथा नंगमभ्युदयरन । संवत १९६८ वर्ष शाके १५१ प्रयत्मान द्वितीय जासह तुदिरदिने रविवारे राबल प्री जगनालजी विजय राज्ये भी पलिकीच
छत्रीमें।
(727)
-
॥
सं. १२३१ ज्येष्ठ सुदि ११ सा० जणदेव आर्या जेउत पुत्र वीरा देवेन भात वाइट
(१७४ )
गच्छे अहारक श्री यशोदेव सूरिजी विजय माने श्री महावीर चैत्ये श्री संघेन चतुष्किका
कारिता श्रो नाकोड़ा पार्श्वनाथ प्रसादाद् शुभं भवतु । उपाध्याय श्री कनक शेखर
शिष्य पं० सुमति शेखरेण लिखित श्री छाजड़ दीव सेखाजी संघेन कारापिता सूत्र
धारः ऊजल आत झाको घडिसा अपन कंचरा--
॥ ॐ ॥ श्रीमत् श्री जिन भद्र सूरि भत्याणां बुजाप्लोदया। धन्याचार्यपदावदास
वदिताः श्री कीर्तिरत्नाह्वया ॥ नम्रा नम्र सरोज स्मणि विना प्रोच्छासितां हि द्वया।
राजा नन्द करा जयंतु विलसत् श्री शंखवालान्वया ॥
वालोतरा।
श्री शीतलनाथजी का मंदिर
धातु मूर्तियों पर।
वोरदे श्रेयार्थमकारि प्र. देव सूरिग्निः !
(728 )
عرلر ها
( १७५)
(729 )
सं० १४०१ वैशाष ४ श्री आदित्य नाग गोत्रे सघ० कुलियात्मजा सा० शाम पुत्रेण
पुत्र सेयसे श्री शांति विवं कारितं प्रति० श्री कक्क सूरिभिः ।
(730 )
सं० १५०१ वर्षे माघ यदि ६ बुधे उपकेश ज्ञाती आविणाग गोत्रे सा० कालू पु०
वील्ला भार्या देवा आत्म श्रेयसे श्री श्रेयांस विंवं कारितं श्री उकेश गच्छे ककुदाचार्य
संसाने प्रतिष्ठितं श्री कुकुम सूरिभिः ।
(731)
सं० १५०४ वैशाख सु०७ दिने श्री उकेश वंशे सा० डोडा पुत्र सा० नाय
सहितेन स्वपुण्यार्थं श्री पार्श्व जिन विवं का प्र० श्री खरतर गच्छे भोजिन भद्र सूरिभिः ।
(732 )
--
सं० १५०६ वर्षे कार्तिक सु० १३ गुरौ उपकेश वशे वहरा गोत्र सा० पुत्र
हरिपाल मार्या राजलदे पुत्र सा० धरमा भार्या धनाई पुत्र सा० सहजाकेन स्वपितृ
पुण्यार्थं श्री वासुपूज्य विवं कारितं । श्री खरतर गच्छे श्री जिनराज सूरि पह श्री जिन
भद्र सूरि युगे प्रधान गुरुभिः प्रतिष्ठितः ।
(33)
उपकेश वंशे बहरा गोत्र सा० श्री सुमतिनाथ विवं
कारिता भी खरतर गच्छे श्री जिनराज तूरि पट्टे श्री जिन भद्र सूरिभिः प्रतिष्ठितं ।
सं. १५०० वर्षे -
(१७६)
.
(.734 )
सं० १५२५ वर्षे मार्ग शीर्ष बदि ६ शुक्र श्री उपकेश ज्ञातीय त्री दूगड़ गोत्र में
पनरपास पु० बछराज भा० कम्मी पुत्र सारंग सुदय वच्छाभ्यां पितु पुण्यार्थं श्री कुं-
नाथ विवं कारिता प्र० श्री रुद्र पल्लीय गच्छे श्री देवसुंदर सूरि पट्टे H० श्री सोन
सुंदर सूरिभिः।
(735 )
सं० १५३७ वर्षे वैषाख सुदि ७ दिने श्रोउपकेश वंशे व - रा गोत्र अभयसिंह संताने
सा. कुता भार्या लषमादे सा० डाहत्थ श्रावण मा० पूराई पुत्र मरा जीवा देवादियुतेन
श्री धर्मनाथ विवं का० श्री खरतर गच्छे श्री जिनभद्र सूरि पट्टे श्री जिनचंद्र सूरि प?
त्री जिन समुद्र सूरिभिः प्रतिष्ठितः ।।
भावहर्ष गच्छके उपासरेमें केशरियानाथजी का देरासर ।
( 36 )
॥ ॐ ॥ सं० १०६-वैशाख यदि ५
-
प्रतिमा कारितेति।
( 737 )
प्रा०
सं० १५३३ श्री माल फोफलिया गोत्रे सा० चूहड़ भा० नापाई पुत्र बुढाकेन
कुबेन युतेन श्रीविमलनाथ विवं का० प्र० श्रीधर्म घोप गच्छे श्री पद्मानन्द सूरि श्रीन
(738 )
सं. १९१८ सा. रामजा सुत तेजसी श्री आदिनाथ विवं का. प्र. श्री विजय गो
वापणा सुमति मागर सूरिभिः आचार्य श्री
-
(१७७) वाड़मेड़। गोपोंका उपासरा। धातुके मूर्तियों पर। ( 739 ) स० १५२७ व० माह शु० १३ उ० सा० साल्हा भा० ह्वीसलदे पुत्र सा० गुण दत्तन प्रा. गेलमदे पु० तिहणा गोपादि कु० युतेन श्रीसुमतिनाथ विंव का०प्र० तपागच्छे श्री सोम सुन्दर सूरि संताने श्री लक्ष्मीसागर सूरिभिः॥ श्री ॥ (740) • सं० सं० १५८० वर्षे वैशाप सुदि १३ शुक्र श्री श्री माल ज्ञा० म० डोरा भा० सपो सु. हेमा मा० हमीरदे मं० चाकेन भा० वमी तु० अमरा युतेन स्वयसे श्री सुविधिनाय विवे श्री पू० श्री पुण्य रत्न सूरि पदे श्री सुमति रत्न सूरिणामुपदेशेन कारितं प्रतिष्ठितंच विधिना ॥ श्रो॥ यति इंद्रचन्दजीका उपासरा । (41) सं. १५१२ वर्षे वैशाप सुदि५ श्री श्रीमाल ज्ञा० ० सहसा ना जोली पुत्र जिन- दास महाजल युतेन स्वयसे भी कुंथुनाथ विंवं का० नागम गच्छे श्री हेम रत्न नृरिणा मुपदेशेन प्रतिष्ठितः। (42) सं० १५१४ मा-शु० - प्रारवाद ज्ञाः रूल्हाकेन ना बर्चनुत ना० बोरा माणिक +
(743 )
नाथजीकी धरिसातांता संघ समस्त मीणक बाई श्री शांतिनाथ पन तीर्थ कारापित
(१७८)
यछादि कुटुंब युतेन पितृव्य सा० चांपा अयोर्थं सुमति नाय विवं कारित प्र० तपा श्री
सोम सुन्दर सूरि श्री मुनि सुन्दर सूरि पह श्री रत्न शेखर सूरिमिः ।
बडा मन्दिर श्रीपार्श्वनाथजीका।
सभामण्डप।
ॐ नमो भगवते श्री पार्श्वनाथाय नमः ॥ संवत १८५६ वर्षे माह सुदि ५ शुक्ल पर
प्रतिपदा तिथौ सोम वासरे राठउड़ वंशे राउत श्री उदयसिंह श्री वाक् पत्राका
राज्ये
कुपा
श्री त्रां-कीय सहिमिः ॥ श्री विधि पक्ष मुख्यानिधान युग
प्रधान श्री पता श्री धर्म मूर्ति सूरि अंचल गच्छीय समस्त श्री संघमें शांति श्रेयो
श्री पार्श्वनाथ प्रासाद कारितः।
पञ्च तीर्थियों पर।
सं० १९०३ माह यदि ५ शुक्रे श्री उदयपुर नगर वास्तव्य श्री सहस्र फणा पार्थ
सपा गच्छे पं० रूप विजय गणिभिः प्रतिष्टितं च ।
दुसरा मंदिर।
॥
:
(744)
(775)
संवत १५४० वर्षे जेष्ठ सुदि १० सोमे श्री श्री माल ज्ञातीय पितामह रा० अस्ता
पितामही कोल्हणदे सुत पितृ स. पवा मात राजू योर्थ सुत सं० सहसा सागा सहन
(१७६ ) धरणा एसे श्री आदिनाथ मुख्यरचतुर्विंशति पहः कारितः पुनिम पक्ष साघु रत्न सूरिणामुपदेशेन प्रतिष्ठित शंडलि वास्तव्यः । (746) सं० १५२० श्री मूल संघेन अहारक श्री विजय कीर्ति श्री सभा मंडप । (747 ) ॥ॐ॥ संवत् १६७६ वर्षे माघ सुदि १५ रवि वासरे खरतर गच्छ महारक श्री जिन पुष्य नक्षत्र राजत प्रो उदयसिंहजी वितरि विजय राज्ये जयराज्ये ॥ श्री सुमतिनाथ रउ नत्रु कीउ श्री संघ करायउ सूत्रधार पीसा पुत्र नसा नवयु कीउ । सूत्रधार नारयण नट सेघ धन । ( 45 ) सं० १९२८ वर्षे रद्रपद कृष्णपक्ष ७ बुध वृहरखरयर गच्छे सहारफ श्रीमगल सुर रावतजी भा वाफीदासजी । जुहारसिंग विजय राजे प्रो मुमतानाथजी- शिणगार पीधी - ॥ ॥ स्बत १६५२ देशास सुदि श्री बाडमेरी महाराज मुष्ट यो नाम मिंट देव कल्याण दिजय राज तन्नियुक्त को कारण दीरामेट सेवा FT: मिगन प्रकार योघं अक्षराणिमयपति रजा ही जादिनार मध्ये विटनान श्री (१८०) क्षेत्रपाल श्रीचउंड राज देयो उनय मार्गीय समायात सार्थ उष्ट्र १० वृप २० उभया- दपि उर्दू सार्थं प्रति द्वयो देवयोः पाइला पदे प्रियदश विशोप का० अौं?न ग्रहीत. व्याः। असौ लागो महाजनेन सामतः॥ यथोक्तं यहुभिर्वसुधा भुक्ता राजनिः सगरा- दिभिः । यस्य यस्य यदा भूमी तस्य तस्य सदाफलं ॥१॥छ । मेडता यह भी मारबाडका एक प्राचीन नगर है। श्री आदिनाथजी का मंदिर-डानियोंका मुहल्ला । है (750) संवत १६७७ वसे ॥ वैशाख मासे शुक्ल पक्ष तृतीयाया तिथौ शनि रोहिणी योगे श्री मेडता नगर वास्तव्य श्री माल ज्ञातीय पाताणी गोत्रीय सं भोजा भार्या मोजलदे पुत्रेण संघपति पेततोकेन स्व० मा० चतुरंगदे पुत्र डुंगसी प्रमुख कुटुंब युतेन स्त्र श्रेय से स्वकारित रंगदुत्त ग शिखर वटु श्री ऋषभदेव विहार मंडन सपरिकरं श्री आदिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठापितंच प्रतिष्टायां प्रतिष्ठितंच सपागच्छे श्रीमदकव्वर सुरत्राण क श्रो शत्रुजयादि कर मोचक महारक श्रो हीर विजय सूरि राज पट्टोदय पर्वत सहस्र किरण यमान युग प्रधान महारक श्री विजयसेन सूरिश्वर पह प्रभावक श्री मद जाहगीर साहि प्रदत्त श्री महातपा विरुधारक श्री महावीर तीर्थंकर प्रतिष्ठित श्री भुधन्न न्यामि मयर - - नुविहित सूरि सन्ना शृगार महारक श्री विजय देव मुरिभिः। प्रदत्त - श्री
( १८१)
सर्व धातुकी मूर्तियों पर।
(751 )
सं० १५३४ वर्षे आपाड़ सुदि २ गुरौ झंडारी गोत्रे सा० वील्हा संताने मं० मायर
मार्या सुहदे पुन स० अस्का नार्या लपमादे मात सांपायने ओ कुंथु नाथ विवं कारितं
प्रेयसे प्रति संडेरग गच्छे श्रोईसर सूरि पह श्री शांति सूरितिः ।
तपगच्छका उपासरा ।
(152 )
सवीरदे पुत्र साटूल
प्रतिष्ठितं।
सं० १६५३ वर्षे ० शु०१ श्री कुंथनाथ विवं गांदि गोत्रे श्री-स० सुरताण ना.
श्रो तपागच्छे श्री विजयतेन सूरि • - पं० यिनय सुंदर गणि
श्री पार्श्वनाथजी का मंदिर ।
( 13 )
नं. मद
तं० १५२८ वर्षे फावदि १३ सोमाली समरामा धर्मिणि
प० काका प्रा० का पुत्रो लापू नान्या पु० सांगा ना. याधी २० मुदम्ब युदया श्री
शांति विवं का० तपाभी क्षम सुन्दर सूरि --
सं० १६७७ वर्षे लक्षर तृतीपा दिने शनि रोहिनी भेटना नगर भ्रान्ताय ना
(१८२) लाषा मा० सरूपदे नाम्न्या श्री मुनि सुव्रत विवं कारितं प्रतिष्ठितं अहारक श्री विजय- सेन सूरीश्वर पह प्रभाकर जिहांगीर महातपा विरुद विख्यात युग प्रधान समान सकल सुविहित सूरि सभा शृंगार भहारक श्री ५ श्री विजय देव सूरि राजेंद्रेः। श्री वासुपूज्यजी का मंदिर। ५ ( 55 ) सं० १५३२ वर्षे ज्येष्ठ बदिा १३ बुध प्राग्वाट ज्ञा० श्री. आसपर मार्या गागी सुत मदन दमा जिनदास गीवा पुत्र पौत्रादि सहितेन आरम श्रेयार्थं श्री श्री शांतिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री वृहत्तपा गच्छै श्री जिनरत्न सूरिभिः । -- (755 ) सं० १६८७ व. ज्येष्ठ सुदि १३ गुरौ स० जसवंत मा० जसवंत दे पु० अचलदास केन ओ विजय चिन्तामणि पार्श्वनाथ विवं का० प्र० सपा श्री विजयदेव सूरिभिः । श्री धर्मनाथजी का मंदिर । ( 757 ) सं० ११५० ब फाल्गुन सुदि १० बुध ऊ० गुगलिया गोत्र सा० चीरा प० सोहाकेन श्री जादिनाय वियं स्व श्रेयसार्थे संहर गच्छे प्रतिष्ठा श्री शांति सूरिभिः । (758) ६ स. १४६६ वर्षे माघ सुदि ६ रवी अकेश ज्ञा० टप गोत्रे सा० ललना भा० ललनाते पुत्र रूपमा मायां लाखम दे पुत्र दील्हा नार्या चोल्दणदे पुत्र घडनी सकुटुम्वेन श्री ( १८३ ) वासपूज्य विवं कारापितं श्री संडेर गच्छे श्री यशोभद्र सूरि संसाने प्र. श्री सुमति सूरिभिः। (159) सं० १५१५ वर्षे आषाढ़ यदि १ दिने श्री उमेश वंशे धुल्ल गोत्र सा० सार्दूल जाया सुहवादे पुत्र स० पासा प्रावकेण भार्या रूपादे पुत्र पूजा प्रमुख परिवार युतेन श्रीशांतिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री खरतर गच्छे श्री जिन भद्र सूरिमिः । ( 760 ) सं० १५१७ वर्षे माह सुदि १० सोसे सोनी गोत्र सा० धन्ना पुत्र सा० हिमपाल पुत्राभ्यां सा० देवराज खिमराजाभ्यां स्वपितृ पुण्यार्य श्री श्रेयांस विंवं कारित प्रति- ष्ठित तपागच्छ महारक श्री हेम हंस पदे श्री हेम समुद्र सूरिभिः । (761 ) सं० १५४७ वर्षे माघ सु. १३ रवी श्रीमाल दो शिवा नार्या हेली सुत दो० घाईया केन भा० सलपू सु० दो० दासा संना कणेसी गांगा पौत्र कमल सीक भार्या चाढा दाया म. कुटुंबयुतेन श्री शितल विवं कारितं श्री मधूकरा स्वरतर -- (762) - सं० १५५६ वर्षे क्षेत्र सु०७ सोम प्रारबाठ ज्ञातीय सा० चां (?) दरा नार्या संठपणदे पुत्र लोला सा० पीमा मा. पंतलदे सकुटुम्ययुतेन आत्म पु. श्री चंद्रप्रन्न स्वामि विवं का० अंचल गच्छे भी सिवांश सागर सूरि विद्यमाने रा० नाव वर्द्धन मणीना- मुपदेशेन प्रतिष्ठित श्रीसंघेन -..।
(१४)
( 763 )
सं०
• १५६८ वर्षे माघ सुदि ५ दिन श्री माल वंशे मांडिया गोत्रै सा० साहा पुत्र सा०
भरहा सुत सा० नरपाल भा० नामल ६ स्वपुण्यार्थं श्री श्री श्री श्रेयांस विवं कारित
प्रतिष्ठितं श्री जिन हंस सूरिभिः खरतर गच्छे ।
( 764 )
স্বয়ং
-
सं० १५७२ वर्षे वैशाप सु०२ सोमवारे पट बड गोत्रे सा० सा- र
श्री आदिनाथ विंवं कारापिसं श्री प्रभाकर गच्छे भट. पुण्यकीर्ति सूरि पट्टे महा०
लक्ष्मीसागर सूरि प्रतिष्ठितं ।
श्री
( 766 )
सं० १५८१ व श्री विक्रम नगरे जकेश वंशे वादि-रा गोत्र सामंजउ सा. जीवास
धावकेण भार्या नीयदे पुत्र जेवा काजी ताल्हण पंचायण भारमल सांदा नरसिंह सहितन
श्री यांस विवं कारित
( 760 )
सं० १८८३ माघ व सु० ५ . - पार्श्वनाथ विवं श्री विजय जिनेन्द्र सूरि - -
श्री आदिश्वरजी का नवा मंदिर ।
२० १.५.६ वर्षे फा. म. ३ बुधे । ओग बंगे बहरा हीरा मा हीरादे पु० य. येता
(१५) भा० पेतलदे पु० ३० हियति पितु श्रेयसे श्री शांतिनाथ विवं कारितं श्री खरतर गच्छे श्री जिनभद्र सूरि भी जिन सागर सूरिभिः प्रतिष्ठिता ॥ ( 768 ) सं० १५२७ वर्षे वैशाख बदि६ शुक्र श्री माल ज्ञातीय पितामह वीरा पितामही वीरादे सुत पितृ डाहा मातृ जासू योर्थं सुस राजा भोज ठाकुर सी एस श्री विमलनाथ मुख्य चतुर्विशति पहः कारितः श्री पूणिमा पक्ष श्री साघु रत्न सूरि पहे श्री साधु सुंदर सूरीणामुपदेशेन प्रतिः विधिना श्री संघेन आवरणि वास्तव्यः । (769) संवत १५७६ वर्ष माघ सुदि १३ दिने बुध वासरे स्तम्न तीर्थ धासी जकेश ज्ञातीय सा० पातल भा० पातलदे पुत्र सा जइताभार्या फते पुत्र सा० सीहा सहिजा भा• गुरी (?) पुत्र सा० पडलिक ना० कमला पुत्र साजीराकेन मा० पुनी पितृव्य सा० सीमा पापा विजा कुटुंब युतेन पितृ वचनात् स्वसंतान अयोर्थे श्री सुमतिनाथ विवं कारितं प्रतिः तपागच्ढ़े भी सोम सुन्दर सूरि संताने श्री सुमति साधु सू० पट्टे श्री हेम पिमठ सूरिभिः महोपाध्याय श्री अनंस हंस गणि प्र० परिवार परिवृत्तौ। (70) संवत १६११ वर्षे वृहत खरतर गच्छे श्री जिन माणिक्यसूरि विजय राज्ये श्री माल ज्ञातीय पापड़ गोत्र ठाकुर रावण तत्पुत्र उणगढमल तद्वार्या नपणी तत्पुत्र जीयराजेन श्री पार्श्वनाथ परिगृह कारापितं धर्म सुंदर गपिना प्रतिष्ठितं शुभं भवतु ।
(१८६) (771) सं० १९७७ ज्येष्ठ वदि ५ गुरौ ओसवाल ज्ञासीय गणधर चोपड़ा गोत्रीय स० नामा भार्या नयणादे पुत्र संग्राम भार्या तोली पु० माला भार्या माल्हणदे पु० देका भा. देवलदे पु० कचरा भार्या कउडमदे चतुरंगदे पुत्र अमरसी भार्या अमरादे पुत्र रत्नसेन श्री अर्बुदाचल श्री विमलाचलादि प्रधान तीर्थ यात्रादि सद्धर्म कर्म करण सम्प्राप्त संघपति तिलकेन श्री मास करणेन पितृव्य चांपसी भातृ अमीपाल कपूरचंद स्वपुत्र ऋपनदास सूरदास प्रोतृव्य गरीवदास प्रमुख सस्त्रीक परिवारेण संपरूप जी कारित शत्रुजयाप्टमोद्धारमध्य स्वयं कारित भयर बिहार शृगार हार श्री आदिश्वर विवं कारितं पितामह पचनेन प्रपितामह पुत्र मेधा कोशा रसाना समुख पूर्वज नाम्मा प्रतिष्ठितं श्री वृहत्खरतर गच्छाधीश्वर साधपद्रववारक प्रतिवोधित साहि श्रीमदक- घर प्रत युगप्रधान पद धारक श्रीजिन चन्द्र सूरि जहांगीर साहि प्रदत्त युगप्रधान पदधारक श्री जिन सिद्ध सूरि पह पूर्वाचल सहस करावसार प्रतिष्ठित श्री प्टमोदार श्री प्राणवट नगर श्री शांतिनाथादि विवं प्रतिष्ठा समयनि-रत्सुघार पार्श्व प्रतिहार सकल महारक चक्रवर्ति श्री जिनराज सूरि शिरः शृंगार सार मुकुटो- शत्रुजया- श्री पमान प्रधानः। (772) सं० १६०० य. दि.० सित गुरी गोलकुंडा या० सा० मेघा मा. मीहणदे सुत हा नानजी नाम्ना श्री मुनि नुवर बिंब कर० प्रतिष्ठितं तपाधिपति परम गुरु महारक श्री विजय मेन गरि पहालवार पसिस्यादि श्री जहांगीर प्रदत्त महातपयिरुष धारि श्री वि देव गरिधिः।
(१८७)
चिंतामणि पार्श्वनाथजीका मंदिर ।
(173)
सं० १६६६ वर्ष माघ सुदि ५ शुक्रवारे म्हाराजाधिराज महाराज श्री सूर्य सिंहायजय
राज्ये श्री उपकेशि ज्ञातीय लोढा गोत्रे स० दाहा तत्पुत्र स० राय मल्ल मार्या रंगादे
तत्पुत्र स० लापाकेन मार्या लाडिमदे पुत्र ॥ वस्तपाल सहितेन श्री पार्श्वनाथ विवं कारित
प्रतिष्ठित श्रीमत श्रीवहत्खरतर गच्छे श्री आद्यपक्षीय श्रीजिन सिंह सूरि तत्पहोदयादि
मातही जिन चंद्र सूरिभिः ॥ शुजवतु ॥
पंचतीर्थयों पर।
(7)
१९७१
वर्ष
माघ तु० १३ बुध दिने उमेश वंशे वापणा गीत्रं गा० सोहर ग.
दाद झा.. पपितु -- निमित्त श्री शांतिनाध पिवं का० प्र. उपगच्छे श्री देर
गुप्त सूरशिः।
(
)
सं० १५१० प्ठ सु०३ दिने प्राबाद पोपलिया पानिया लीग . धीग पत्र मा.
डुंगर सात ता. खेतसि सहसा सुमारदे धारसमी मायां गरिए इन काटि
सुदुन्य दुतेन धी मुनि तुमस: विकासानन्द करि नगाला
रुरि रहेधीर शेरूर सूरितिः ।
(१८८ )
(776)
सं० १५२६ बर्षे माघ बदि ५ रवी जकेश ज्ञातीय श्री दणवट गोत्र सा० भीम मा
दि कुटुंघ युतेन श्री कुघुनाथ विवं का० प्र० श्री धर्मघोष गच्छे श्री
प्रज्ञ शेखर सूरि पह श्री पद्मानन्द सूरिभिः ।
भरमादे पु०-
(777 )
.
सं० १५३२ जेष्ठ सुदि १३ बुधे प्राग्वाट ज्ञातीय सा० मही श्री मा० राणी सुत
होर
भा० भरमी नाम्न्या स्व श्रेयार्थं श्री सुविधिनाथ विवं का० प्र० सपा श्री रत्न शेखर
सूरि पहाल'करण श्री लक्ष्मी सागर सूरिभिः ॥ श्री ॥
( 778 )
सं० १५४७ वर्षे वैशाख सुदि २ सोमे श्री काष्टा
भ. श्री सोख कीर्ति आ०
श्री बिमलसेन नारसिंह ज्ञातीय बोरठेच गोत्रे सा० पेईथा मा० खेइ पुत्र खा० भीमा
जा. प्रटी श्री आदि -- कारापितं नित्यं प्रणमसि ।
(779 )
सं० १५५२ वर्षे माध सु० ५ प्रा० ज्ञा० सा. पुंजा भार्या रमक पुत्र - सोमकेन मा
गौरी पुत्र सा० हर्षादि कुटुम्ब युतेन श्री आदिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं तपा गम्छे
श्री सोमसुन्दर सूरिभिः श्री इन्द्रनन्दि सृरि श्री कमल कलस सूरिभिः ।
(780 )
सं० १६५६ वर्षे वैशाप मासे सित ३ दिने रविवारे जकेश वंशे लोढा गोत्र संघवी
टाहा भार्या तेजलदे पुत्र रा० रायमल्ल भार्या रंगदे पुत्र सं० जयवन्त भीमराज तमो
( 781 )
॥ॐ॥ संवत १६८६ वर्षे वैशाख सु०८ महाराज
( १८६)
भंगिनी सुश्राविका वोरा नाम्न्या स्वयसे श्री अजित नाथ विवं कारित प्रतिष्ठित
श्रो चतुर्विंशति जिन बिंबं प्रतिष्ठित श्री वृहत्खरतर गच्छे श्री जिन देव सूरि तरी
श्रो जिनहंस सूरि तत्पहालङ्कार विजयमान श्रीजिनचंद्र सूरिभि सकल संघेन पृश्यमान
माचन्द्रार्क नन्दतात् शुभं भवतु ॥
कडलाजी का मंदिर।
संवत १९८१ वर्षे माघ शुदि १० सोमे सघ हरषा ना० मीरा दे तत् पुः -
वंत मा. जसवंत दे तत्पुत्र सं० अचलदाससं० शामकरण कारितं प्रविधि
महारिक श्री विजय चंद्ग सूरिभिः।
महावीरजी का मंदिर।
सं० १६५३ वर्षे वै० शु० ४ बुधे श्री शांतिनाथ विवं गाईक
भा. हर्पमदे पु० स० हांसा भा० लाडमदे पु० पदलती कारिन गट -
श्री हीर विजय सूरि प श्री विजयलेन सूरिभिः ॥ पं० विनय
श्री
श्री मेहता नगर वास्तव्य बोतवाल ज्ञातीय तुराणा
(783)
रस्तु।
(783 )
६
17 (१६०) मणादि सपरिवार - श्री सुमतिनाथ विंवं कारित प्रतिष्ठित तपागच्छाधिराज महारक श्री विजय देव सूरिभिः स्वपद प्रतिष्टिताचार्य श्री श्री श्री श्री विजय सिंह सूरि प्रमुख परिकर परिवृतः॥ (784) संवत १६७७ वर्षे वैशाख मासे अक्षय तृतीया दिवसे श्री मेहता वास्तव्य अज्ञा. समदडिआ गोत्रीय सा० माना मा० महिमादे पुत्र सा० रामाकेन भ्रातृ राय संगच्छात मा० केसरदे पुत्र जईससी उपमीदास प्रमुख कुटुय युतेन श्री मुनि सुव्रत विवं का? प्र० सपा गच्छे महारक श्री पं श्री विजय सेन सूरि पहालङ्कार २० श्री विजय देव सूरि सिंहै। (715 ) सं० १६७७ ज्येष्ट बदि गुरौ श्री ओसलबाल ज्ञातीय गणधर चोपड़ा गोत्रीय स. कचरा भार्या कउडिमदे चतुरगदे पुत्र स० अमरसी भा० अमरादे पुत्ररत्न स. अमी- पालेन पितृव्य चांपसी वृद्ध भातृ स० आसकरण लघु भातृ कपूरचन्द स्वभार्या अपूर व पु० गरीबदासादि परिवारेण श्री अजितनाथ वि० का० प्र०व० खरतर गच्छा- धीश्वर श्री जिनराज सूरि सूरिचक्रवर्ति ॥ (286) पह प्रमाकर श्री अकयर साहि प्रदत्त युग प्रधान पद प्रवरैः प्रति वर्षाषाढीया प्टाहिकादि पामोसिका अमारि प्रवत्त कैः श्री-तं तीर्थोदधि मीनादि जीव रक्षक श्री शत्रुजयादि तीर्थकर मोचकैः । सर्वत्र गोरक्षा कारकैः पंचनदी पीर साधकः युग प्रधान श्री जिन चन्द्र सूरिन्तिः आचार्य श्री जिन सिंह सूरि श्री समय राजोपाध्याय ॥वा. हंस प्रमोद वा० समय सुन्दर वा० पुण्य प्रधानादि साधु युतैः।
(१९१) (787 ) संवत १६७७ ज्येष्ठ बदि ५ गुरुधारे पातसाहि श्री जिहांगीर विजय राज्ये साहियादा साहिजहां राज्ये ओसवाल ज्ञातीय गणघरचोपड़ा गोत्रीय स० नामा आर्या नयणादे पुत्र संग्राम मा० तोलो पु० माला ना० माल्हणदे पु० देका भा० देवलदे पु० कचरा ना. कउहिमदे पु० अमरसी-मा. अमरादे पुत्ररत्न संप्राप्त श्रा अर्बुदाचल विमलाचल संघपति तिलक कारित युग प्रधान श्री जिन सिंह सूरि पह नंदि महोत्सव विविध धर्म कर्तव्य विधायक स. आस करणेन पितृव्य चांपती भातृ अमीपाल कपूरचन्द स्वमार्या सजाइयदे पु० ऋपालदास सूर दास भ्रातृव्य गरीबदासादि सार परिवारेण अयोर्थ स्वयं कारित नआणीमय विहार शृगारक श्री शांतिनाथ विवं कारित प्रति- पर परायत श्री बृहत्खरतर गच्छाधिप श्रीजिन रद्र सूरि संतानीय प्रतियोधित साहि श्री मदकमर प्रदत्त युग प्रधान पदवीधर श्री जिन चंद्र सूरि विहित कषित काश्मीर विहार वार सिंटूर गर्जणा विविध देशामारि प्रवरया जहांगीर साहि प्रदत्त युग प्रधान पद साधक श्रीजिनसिंह सृरि पहोत्तस उन्ध शो अम्धिका वर प्रतिष्ठित श्री शत्रुजयाप्ठमोद्धार प्रदर्शित माण वहमध्य प्रतिष्ठिस मो पार्श्व प्रतिमा पीयूप वर्पण प्रभाव योहित्य वंशमण्ढन धर्मसी धारटदे नन्दन भारत चक्रवर्तित्री जनराज सूरि दिन करैः ॥ लाचार्य श्री जिन गागर नृरि प्रमुनि यति । सुत्रधार तुजा। प्रतिष्ठित महारक प्रनु की जिन राज गरि पुरटर. या मेरमा नगर मध्ये। प्ठितं श्री महावीरदेव राजः ( १९२) है प्रोसियां। ओसियां एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थान है, विशेषकर ओसवालों के लिये यह तीर्थ रूप है। यहां पर बहुतसे प्राचीन कीर्त्ति चिन्ह विद्यमान है। शासन नायक श्री महा- वीर स्वामीके मन्दिरका कुछ दिनसे जीर्णोद्धार का कार्य चल रहा है। सचियाय देवी का मन्दिर भी बहुत जीर्ण हो गया है और भी बहुतसे प्राचीन मंदिर इधर उधर टूटे फूटे पड़े हैं और समिपमें एक छोटी डूगरी पर मुनियों के अनशनके स्थान पर चरण प्रतिष्ठित है। मंदिर प्रशस्ति । ( 788 ) - ॥ ॐ ॥ जयति जनन मृत्यु व्याधि सम्बन्ध शून्यः परम पुरुष संज्ञः सर्ववित्स दी। ससुर मनुज राजामीश्वरोनीश्वरोपि, प्रणिहित मतिभिर्यः स्मय॑ते योगिवय्यः ॥ १॥ मिथ्या ज्ञान घनान्धकार निकरावष्टब्ध सबोध दृग्दृष्ट्वा विष्टप. मुद्भवद् घनघृणः प्राणानां सर्वदा कृत्वा नीति मरीचिभिः कृत युगस्यादी सहस्रां गुवत्प्रातः प्रास्तसमास्तनोतु भवतां भद्रस नालेः सुतः ॥२॥ यो गाणि सर्व-निद लिहितां शक्ति मअधा नः ऋगः क्रोड़ा चिकीर्या कृत वृद्ध यस्याहसी मौ मति मित इयता नामरत्वं यती मूत्पुण्यैः सत्पुण्य वृद्धि बितरतु भगवा- यस निहार्य नूनः ॥ ३ ॥ स्वामिनिकं स्वनियासालय अन समयोरमाक माह नरपात्रमाने उत महती काचिदन्याय देपा इत्युदनान्तगत्मा हरि मति अग्रता मम्ब सेशन नीदर्यपादांगुष्टकोद्याकनक नगपनी प्रेरिते ट्यांत्सवीरः ॥ १ ॥ श्री मालाई प्रविष्ट भुवि बैंकबीर स्त्रैलोक्येयं प्रकट महिमा राम नागासुन म - मुष्टया सूत रति या ॥ ११ ॥ ( १९३) शाक दृढतरमुरो नियालिङ्गनेषु स्वप्रेयस्या दशमुख वधोत्पादित स्वास्थ्य वृत्तिः ॥५॥ तस्या कापत्किल प्रेम्णालक्ष्मणः प्रतिहारताम् ततोऽनवत् प्रतोहार वंशो- राम समुद्भवः ॥ ६ ॥ तद्वशे सवशी वशी कृत रिपुः श्री वत्त राजोऽनवत्कीर्तिर्यस्य तुषार हार विमला ज्योत्स्नास्तिरस्कारिणी नरिमन्मामि सुखेन विश्व विवरे नत्वेष तस्माद्दवहिन्निर्गन्तु दिगिजेन्द्र दन्त मुसष्ठ व्याजाद कायींन्मनुः ॥ ७॥ समुदा समुदायेन महता चमूः पुरा पराजिता येन... समदा॥८॥ - समदारण तेनावनोशेन कृता भिरक्षः सवालण क्षत्रिय वेश्य शूद्रः। तमेतमेतत्प्रथितं पृथिव्या मूकेशनामास्ति पुरं गरीयः॥॥ सकान्तं परैः -मिव श्री मत्पालितं यन्महोभुजा। तस्यान्तस्तपनेश्वर स्य सघन बिद शं शुद्धतामस्पृमदृगराज कुजर युतं सट्वैजयन्ती उतम् किं कूट हिम ॥ १०॥ तद काय्यं तार्य घचसा संसार रबुद्धयोधिकस धोयते साधवः क्वचित्पट पटीयों प्रकटयन्ति धर्म स्थितिम् । क्वचिन्तु भगवत्स्तुतिं परिपठयन्ति यस्या जिरे - ध्वनिपदेव गाम्लोयंत ॥ १२॥ वीक्षणे क्षणदां स्वस्य वर्णलक्ष्मी विपश्चिताम् । बुद्धि- भवत्यवशास्ते यत्र पश्यन्त्यदः सदा ॥ १३ ॥ साचार्यादेचन यन न्ति- मुच्दैः सवर्शव पयार्यः प्रतिध्वान दण्डम् सत्यं मन्ये यदु दित मितीवा वान्नीत्म- मन्तात्सोये भूयः प्रक्षट महिमा मण्डपः पारितोत्र ॥ १४ ॥ - किं चान्ह उधः । ताराप्तिं येन सुबंश ताजा सट्टानस माणिया ॥ १५ ॥ पुत्रस्तस्या भवत्तोम्यो वणिजिन्दक सज्ञिनः । इन्दुयत्मानित - .. चदुह्वरा - - हया प्रसाद युक्तात्रयशोतिराना। सदानुसो स्थपनिनदीन तरगा ॥en तस्मात्तस्यामदुर्ग त्रिवर्ग ॥१८॥ यन्नाकारि तितेतरच्छवि . . नया दिन यानि यो नायिं जनरपि प्रतिगतं यद्नेहमभ्यत्यितं । कि बान्दयने दुर्गम कर प . . नीर नोर दलित ॥ १६॥ जिनेन्द्र क्वचित् - - यिकार त्रैव मार्गणेन लयः ॥१६॥ मार्गणावास - ... अनि गुम २ (१९४) ......." Jary 'व्य ..."ताये ...""कुमतेर्मनागपि। मि...। वंसतोपिहि मण्डठेथवान सन्मणीनां अवतीहकाचता ॥२०॥ यदि वादि संज्ञिता' जाकलावपि ॥ २१ ॥ तत्र ब्रह्म वौ स्वा सम्प्राप्त तन्महिलया। दुर्गया प्रतिमा कारिस धामनि ॥ २२ ॥ आम्रकात्सर्वदेव्यातु 'यत" 'देवदत्त मिवागमे ॥ "प्रति दिनमिति या कार्य प्रति विद्यते यदधिकं ॥ ध्येयवन्तो पिये त्यन्तं भीरबः परलोकतः। मोगि हिको च दूरगाः॥ ति निः पुन्यं भूमण्डनो मण्डपः । पूर्वस्यां ककुभि त्रिभारा यिकालः सुनगोष्ठिकानु "जिन्दक मतदु हनीय नेन जिनदेव धाम तत्कारित पुनरमुष्य भूषणं । मत्स दृग्दृश्यते देजयत्री जयन्त ..." ॥ संवत्सर दशशत्यामधिकायां यत्सर स्त्रयो दशभिः फागुन शुक्र तृतीया हा पदाजा राम ॥ पानापन्यं दधदापि मना गक्षमालो पयोमी शंखं चक्रं स्फुटमपिव करायः पाया भुवन गुरुन्नति भर घिन मामइमिडावते घोचायन्मेमामम्मिन्नि समुखरछेद 'दशा पूच नित्यमरतु ॥ जया Eripa ििन गति वषु : सदा ॥ यस्मादस्मिन्निजम्मन्यपि पनि प्रकट गुताग्नी সুস্থ ......... ....... 'सं. १०१३ ....... .. ॥ भावदगीग्गूढ यन्हिग्गुरु ..ति युते" ..... "मो मद्र MANT .. uaryay " - है * ar 4
(१९५)
तोरण पर।
( 789 )
सं० १०३५ आषाढ़ सुदि १० आदित्य वारे स्वाति नक्षत्र श्री तोरणं प्रतिष्ठापिमिति
स्तम्भ पर।
( 790 )
॥
संह १२३१ मार्ग सुदि ५ वांधल पुत्र यशोधर वोहित्य मूला देवि
२४ माताके पट्ट पर।
( 791 )
सं० १२५६ कार्तिक सु० १२ सुचेत गुत्री उहदिग पूनः शशु दरदी सुखदी सल्ल चर्य
प्रसाद चतुर्विशति जिनः मातृ पहिका निज मातृ जन्हव अयोर्थ कारिता श्री कक्क
सूरिनिःप्रतिष्ठिता।
मूर्तियों पर।
(72)
१
सं० १०८८ फाल्गुन यदि १ श्री नागेन्द्र गच्छे प्रो यासदेव नृरि मंच नानतिहट
घयार्थ राखदोव कारिता।
(73)
--
सं० १२३४ वैसाख सुदि १४ मंगल । नागदेव वर्मा शामपद बनाय गांध। जायर्या
यशोदेच्या नाम पोचं पदे।
( १९६ )
( 794 )
सं० १२३४ वैशाख शुक्ल १४ मंगलवार सार्वदेव सुत नागदेव तरसुतेन पारो पारेन
जिन तुत्रित सादेव मणि कुतेन ।
( 795 )
सं० १४३८ वर्षे आषाढ सुदि शुक्र मोढ़ वास्तव्य सा० डा-मार्या यससारदे मार्या
सूमलदे सुत साहूण सामल पितृ मातृ अयार्थं ठ० महिपालेन श्री पार्श्वनाथ विवं कारितं
आगम गच्छे. श्री जय तिलक सूरि उपदेशेन ।
(796 )
.
सं० १४९२ वर्षे वैशाख वदि ५ श्री कोरंटकीय गच्छे सा. ३० शंष बालेचा गोत्रे सा०
वास माल भार्या लक्ष्मीदे पुत्र ३ प्रता मिहा सूरांयानी पितृ श्रेयसे श्री संभवनाथ विव
कारितं पुताकेन का० प्र० श्री सावदेव सूरिभिः ।
( 797 )
सं० १५१२
वर्षे
फाल्गुन सुदि ८ शनि श्री उसम से. मार्या माणिकदै सुत रणाय
आर्यायां १० पिधा भार्या चां सुतयो याते जूखाण श्री कुंथुनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठित
श्री वृहद तपापंकज श्री विजय तिलक सूरि पह श्री विजय धर्म सारे श्री भूयात् ॥
( 798 )
सं० १५३४ वर्षे माघ सुदि ५ दिने सीढ ज्ञातीय मंत्रि देव वकु सुत मंत्रि सह साइ
ताभ्यां श्री धर्मनाथ विवं पित्रो श्रेयसे प्रतिष्ठित श्री विद्याधर गच्छे श्री हेम प्रभु
सूरि मंडलिराभ्यां कृतः।
( १९७)
( 799 )
सं० १५४६ वर्षे माघ सुं० ५ गुरौ गंधार वास्तव्य श्री श्री माल ज्ञातीय सा० शिवा-
भार्या माणिक्यदे नाम्नी तयो सुत सा० लोजकेन HI० सम्मादे धर्मादे नाम्नी युतेन
स्वमात्री श्रेयसे श्रो विमल नाथ विवं कारितं प्रतिष्ठा श्री वृहत् तपा पक्षे श्री उदय
सागर सूरितिः।
(800)
सं० १६१२ वैशाख सुदि ५ दिने भो लालूण करापितं ।
( 601 )
से० १६८३ ज्येष्ठ सु० ३ झडया मति गच्छे आदेवा पुत्री राजवाई केन श्री सम्भव
विर सा तेजपालेन प्र० ।
(502 )
संवत् १७५८ वर्षे आषाढ़ सुदि १३ । रविवार शुभ दिने श्री वृहत् खरतर गच्छ
महारक श्री जिन राज सूरि । गणे शिष्य
नींवमें प्राप्त मूर्तिके टूटे चरण चौकि पर ।
(803)
सालीद्र
-
देव कल
ॐ संवत् ११०० मार्गशिर सुदि६
अयोर्थ कारित जिनेत्रिकम् -
।
( १६८ ) श्री सचियाय माताका मंदिर । (804) १ सं० १२३६ कार्तिक सुदि १ बुधवारे अद्यह श्री केल्हण देव महाराज राज्ये तत्पु! श्री कुमर सिंह सिंह बिक्रमे श्री माडव्य पराधिपती-- -- दलिकान्वीय कीर्ति पार राज्य वाहके सद्भुक्तौ श्री उपकेशीय श्री सञ्चिका देवि देव गृहे श्री राजसेवक गुहिल गो क्रय विषयी धारा वर्षेण श्रीक संचिका देवि भक्ति परेण श्री संच्चिका देवि गोष्ठि- कान् भणित्वा सत्समक्ष तइयं व्यवस्था लिखापिता। यथा। श्री सच्चिका देवि द्वार भोजकः प्रहरमेकं यावदुद्धाट्य द्वार स्थितम् स्थातव्यं । झोजक पुरुप प्रमाणं द्वादश वर्षीयोत्परः । तथा गोष्ठिकः श्री सच्चिका देवि कोष्ठागारात् मुग मा।॥ घृत कर्ष ? मोजकेम्यो दिन प्रति दातव्यः । ( 805 ) संवत् १२३४ चैत्र सुदि १० गुरौ घोर बड़ांशु गोत्र साधु बहुदा सुत साघु जाल्हण तस्य भार्या सूहवं तयोः सुतेन साधु मारहा दोहित्र न साधु गयपालन- सच्चिको देवि प्रासाद कर्मणि चंडेका शीतला श्री सच्चिका देवि क्षेमं करी श्री क्षेत्र पोल प्रतिमाभिः सहितं जंघा धरं आत्म श्रेयार्थं कारित। (806) संवत् १२४५ फाल्गुन सुदि ५ अोह श्री महावीर स्यशाला निमित्तं पाल्हिया धीय देव चन्द्र बधू यशोधर भार्या सम्पूर्ण श्राविकया आत्म श्रेयार्थं आत्मीय स्वजन समन्तेन स्वगृह दत्त । वर्गा
(१९९)
( 807 )
सं० १२४५ फाल्गुन सुदि ५ अचेह श्री महावीर रथशाला निमित्तं
पाल्हिया धीत देव चंड वधू यशधर नार्या सम्पूर्ण श्राविकया आत्म अयार्थं समस्त
गोष्ठि प्रत्यक्षच आत्मीया स्वजन वर्ग समतेन आत्मीय गृहं दत्त।
इंगरीके चरण पर।
( 808 )
सं० १२४६ माघ बदि १५ शनिवार दिने श्री मज्जिनजद्रोपाध्याय शिष्यैः श्री कनक
मा महत्तर मिश्र कायोत्सर्गः कृतः ।
पाली।
यह
भी मारवाड़का एक प्राचीन स्थान है। यहांके लेख पण्डित रामानन्दजीने
संग्रह किया है।
नौलखा मंदिर।
संवत् ११४१ वैशाख ८दि पण्डिजले कीर।
संवत् १९११ ज्येष्ठ वदिशीघरल
5
है
.
(812 ) (813 ) ॐ। संवत १२०१ ज्येष्ट बदि ६ रवौ श्री पल्लिकायां श्री महावीर चैत्ये महामान्य ( २०० ) (811 ) संवत् ११४४ माघ सु० ११ वीर उल्लदेव कुलिकायां पुल आजिताभ्यां सांस्याप्त कृतः श्री ब्राह्मी गच्छां प्रदेवाचार्येन प्रतिष्ठितः । संवत् ११५१ आसाढ सुदि गुरी. ॥ ॐ ॥ संवत् ११७८ फाल्गुन सुदि ११ शनी श्री पल्लिका श्री बीरनाथ महा चेस्ये श्री मदुद्योतनाचार्य महेश्वराचार्यामनाय देवाचार्य गच्छे साहार सुत धार सघण देवी सयोर्मस्य धनदेव सुत देवचन्द्र पारस सुत हरिचन्द्राभ्यां देव चन्द्र भार्या वसुन्धरिस्तस्या निमित्तं श्री ऋषा नाथ प्रथम तीर्थंकर विवं कारितं गोत्रार्थच मंगलं महावीरः । ॐ। संयत् १२०१ ज्येष्ठ यदि ६ रवी श्री पल्लिकायां श्री महावीर चैत्ये महामात्य श्री आनन्द सुत महामान्य श्री पृथ्वीपालेनात्मयो) जिन युगलं प्रदत्तम् श्री अनन्त नाथ देवस्य । ( 815 ) श्री आनन्द सुत महामान्य श्री पृथ्वी पालनात्म श्रेयोथें जिन युगलं प्रदत्तम् श्री विमल नाथ देवस्य । ( 814 )
(२०१)
( 516 )
स्व श्रेयसे श्री कुंथनाथ
-
-
का० सा. मया
सं. १५ - - • सुदि ३ सा
विव का प्र.श्री मिन्नमाल गच्छे।
(817)
संवत् १५२६ वर्षे भाद्र सुदि ५ रवौ -
(S18 )
सं० १५१३ माघ तुदि ३ दिने उमेत ला० सदा मा० बालहदे पुत्र सा० झेमाकेन आ.
सेलखू मातृ हेमा कान्हर मल प्रमुख कुटुंब युतेन श्री अजित नाथ विवं का० प्र० तपा
श्री रत्न शेखर सूरिभिः।
( 819 )
सं० १५२६ वर्षे माह सु० ५ रवौ ज० मोगर गो० सा० राणा मा० रत्नादे पु० चाहड़
मा० रइणे पु० खरहथ खादा खात खना धितु श्री नेमिनाथ विवं कारि० श्रो नागेन्द्र
गच्छे प्रतिष्ठित श्री सोम रत्न सूरिभिः ।
(80)
संवत् १५३२ वर्षे चैत्र सुदि ३ गुरु ज० गुगलिया गोत्र सा० खोमा पुत्र काजा ना.
रतमादे पु० वरता नरसा घादा नार्या पुत्र सहितेन स्व श्रेयसे श्री संडेर गच्छे श्री
जिशो भद्र सूरि संताने प्रो चंद्रप्रभ स्वामि विवं ज्ञारितं प्रतिष्ठितं श्री सालि
नृ-
(521)
स० १५३४ वर्ष ज्येष्ठ सुदि १० श्री जोश बंशे गणधर गोत्रे माथु पायुद्ध आर्या
खनादे पुत्र ता.जोजा सुनावशेष धातृ डा० पदा तत्पुत्र सा० कोना प्रमुम्ब परिवार
#
१
- (२०२) सहितेन स पुण्यार्थं श्री संभवनाथ विवं कारित प्रतिष्ठितं श्री खरतर गच्छे पो जिन भद्र सूरि पहश्रो जिन चन्द्र सूरिभिः । ( 822 ) सं० १५३४ वर्षे फागुन शु०२ गुरौ ऊ० चूदालिया गोत्रच ज. सा. सिवा मा. सहागदे पुत्र सा० देवाकेन भार्या दाडिमदे पुत्र आसा भार्या ऊमादे इत्यादि कुटु युतेन स्व श्रेयसे श्री संभवनाथ विंवं का० प्रति० श्री सूरिभिः श्री वीरमपुरे। ( 823 ) ३ संवत् १५३६ वर्षे फाल्गुन सुदि ३ रवौ फीफलिया गोत्र सा० मूला पुत्र देवदत्त भार्या साह पुत्र सा० बरु श्रावकेण भार्या नामल दे परिवार युतेन श्री आदिनाथ विध श्रेयसे कारित श्री खरतर गच्छे श्री जिन भर सूरि पह श्री जिनचन्द्र सूरि श्री जिन समुद्र सूरि प्रतिष्ठितं। ( 824 ) संवत् १५५५ वर्षे जेष्ठ दि १ शुक्र उकेस न्यातीय काकरेचा गोत्रे साह जारमर पुः जदा चांपा जदा भा० रूपी पु . वाला खेतावाला मा. बहरङ्गदे सकुटुव अ० उद पूर्व पु. श्री चंद्र प्रभ मूलनायक चतुर्विशति जिनानां विवं कारितं प्रतिष्ठित श्री संडेर गच्छे श्री जसो भद्र सूरि सन्ताने श्री शांति सूरिभिः । (825 ) सम्वत् १६८६ वर्षे वैशाख सुदि ८ शनी महाराजाधिराज महाराज श्री गज सिंह विजय मान राज्ये युवराज कुमार श्री अमर सिंह राजिते सत्प्रसाद पात्र चाहमान वशायसन्स श्री जसवन्त सुत श्री जगन्नाथ शासने श्री पाली नगर बास्तव्य श्री श्री श्री माल ज्ञातीय सा० मोटिल मा० सोजाग्यदे पुत्र रत्न सा० डुगर भाखर नाम भ्रातृ येन सा० डुंगर ना. नाथदे पुत्र सा० रूपा रायसिंह रतन सा० पीत्र सा० टीला सा. भाखर मा० नायलदे पुत्र ईसर अरोल प्रमुख कुटुव युतेन स्व द्रव्य कारित नबलखास्य प्रसादोरि श्री पार्श्वनाथ विवं सपरिकरा स्व श्रेयले कारितं प्रतिष्ठापितंत्र स्त्र प्रति-- छायां प्रतिष्टितंच श्रीमदकवर सुरत्राण प्रदत्त जगद्गुरु विरुद धारक तपा गच्छाधि- राज बहारक भी हीर विजय सूरि पह मनाकर महारक श्री विजयतेन सूरि पहालंकार हारक श्री विजय देव तृरिभिः स्वपद प्रतिष्टिनाचार्य श्री विजय सिंह प्रमुख परिकार परिकरितेः ओं श्री पल्लीकीये घोत्तनाचार्य गच्छे ब्रवी मादा मादा की तगोः गाई लखमण सुत देशलेन रिवनाथ प्रतिमा श्री वीरनाच महानरचे देवकुलिकायां कारित ॥ ( 6 ) धोखा xixin या संवत् १९८६ वर्षे वैशाख माले मुह पर्व अति का योगे ममी दिली मेहता नगर वास्तव्य सूत्र धार धरण पुग्न नृतगरमा गाभागनि पर सुरताण ददा पुत्र नारायण हंसा पुरयामादि पगिर पनि महागेर विवं झारित प्रसिटापितं की पाली का गाना DIET Aft: प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितं च महारह ही विजय सेना ; रिजय देव सूरिभिः सपद प्रतिष्ठाचारी विपि । . . । - • - -27 a T १९८९ सालमा गुहपुर महाराज श्री गजसिंह विजयारा ER: सत्रसाद पानं बाहर नगर वास्तवमा म: पासर नाम्ना हार * क । अ- न (२०४) सुपार्श्व विंब कारित प्रतिष्ठापितं स्व प्रतिष्ठिायां प्रतिष्ठितं पातशाह श्री मदकवर शाह प्रदत्त जगद्गुरु विरुद धारक तप गच्छाधिपति प्रतिष्ठिताचार्य श्री विजय सेन सूरि। ( 828 ) । सं० १७०० वर्षे माघ सित द्वादश्यां बुधे श्री श्री योधपुर वास्तव्य उसवाल ज्ञातीय मुहंणोत्र गोत्र जयराज भार्या मनोरथ दे पुत्र सुभा पु० ताराचन्द भाज राजादि युतेन श्री शीतल पार्श्व वीर नेमी मूर्ति स्फूर्ति मरकोशं विंशन्ति जिन विव विराजित दल दशकं चतुर्विशति जिन कमल कारितं प्रतिष्ठितं तपा गच्छे अहारक श्री विजय देव सूरि आचार्य श्री विजय सिंह निदेशात् उ० सप्तमे चंद्र गणिमिः । श्री गौड़ी पार्श्वनाथजीका मंदिर । मूलनायकजी पर। (829 ) संवत् १६८६ वर्षे वैशाख सुदि राजाधिराज महाराज श्री गजसिह विजय मान रोज्ये मेड़ता नगर वास्तव्य हा वंशे कुहाड़ गोत्रे सा० हरषा भार्या मिरादे पुत्र सा० चसवंत केन स्व श्रेयसे श्री पार्श्वनाथ विवं कारितं स्थापितं च। महाराणा श्रीजगतसिंह बिजय राज्ये श्री गोड़वाड़ देशे श्री विजयदेव सूरीश्वरोपदेशतः वीघरला। वास्तव्य समस्त संघेन। शिशरिराया उपरि निर्मापितेन विवेन प्री० श्रा प्रतिष्टितंभ तप गच्छाधिराज अहारक श्रो मदकवर सुरत्राण प्रदत्त जगद्गुरु विरुद धारक H० हीर विजय सूरीश्वर पह प्रभाकर महारक श्री विजय सेन सूरीश्वर पहालंकार महारक श्री विजय देव सूरिन्तिः स्वपद प्रतिष्ठाचार्य श्री विजय सिंह सूरि प्रमुख परिकर परिकरितः।
(२०५)
।
लोदारो बासका मंदिर।
(830 )
ॐ हौ श्री नमः ॥ श्री पातिताह पुण साहजी विजय राज्ये । संवत् १६८६ वर्षे
वैशाख सिताष्टमी शनिवासरे महाराजाधिराज महाराजा श्री गजसिंह जी विजय
राज्ये श्री पालिका नगरे सोनिगरा श्री जगनाथ जी राज्ये ऊपझेस ज्ञातीय श्री श्री
माल चंडालेचा गोत्रे सा० गोटिल आर्या सोनागदे पुत्र सा० हुगर भातृ सा-नापर
नामभ्यां - डुगर प्रार्या नाथलदे पुत्र रूपसी राई त्यघर भना आषर भार्या चाचलदे
पु० ईसर मारेल रूपा - पु० टीला युतेनं स्व श्रेयसे श्रो शांतिनाथ विवं कारापितं
प्रतिष्ठित ॥ श्री चैत्र गच्छे शार्दूल शाखायां राज गच्छान्वये १० श्री मानचन्द्र सूरी
तत्पह श्री रत्नचन्द्र सूरि वा तिलक चंद्र मु. पति रूपचंद्र युतेन प्रतिष्ठा कृता स्य
योर्थे श्री पालिका नगरे श्री नवलपा. पासादे जोर्णोद्धार कारापित मूल नायक श्री
प्रमुख चतुर्विशति जिनानां बिंब० प्रतिष्ठापितानि सुवर्णमय कलश इंडे रुप्य
सहस्र ५ द्रव्य व्यय कृते नाद बहु पुन्य उपार्जितं अन्य प्रतिष्ठा गुरजर देशे कृता श्री
पर्व गुरु गोत्र देवी श्री अम्बिका प्रसादात् सर्व कुटुम्ब वृद्धि भूयात् ॥
श्री शांतिनाथजी का मंदिर ।
पाश्वनाथ
।
( 881 )
--
-
संवत् ११४५ आपाढ सुदी ६
श्री सोमनाथका मंदिर ।
(82)
संवत् १२०६ द्वि० ज्येष्ठ यदि १ नद्यह भी परुिटकायां ग्रामे अपाहिट पाटकाधिष्ठित
rx
ॐ संवत् १२१५ वैशाख सुदि १० भौमे वीसाडा स्थाने श्री महावीर चैत्ये समुदाय ( २०६ ) समस्त राजावलो विराजित परम महारक महाराजाधिराज परमेश्वर उमापति वर लब्ध निज विक्रमे रणांगन विनिर्जित शाकं भरी मुशल श्री मत्कुमार पाल देव कल्याण विजय राज्ये नाडोल। मारवाड़के देसूरी जिलेके समीप यह स्थान भी बहुत प्राचीन है। श्री आदिनाथजी का मंदिर । सहितैः देवणाग नागढ जोगड सुतैः देम्हाजधरण जसचन्द्र जसदेव जसधवले जसपाल श्री नेमिनाथ विवं कारितं ॥ वृहद्गच्छीय श्री मद्देव सूरि शिष्येन पं० पद्मचन्द्र गणिना प्रतिष्टितं ॥ 1 ( 833 ) ( 834 ) अ। संवत् १२१५ वैशाख सुदि १० भौमे वीसाडा स्थाने श्री महावीर चैत्ये समुदाय सहितैः देवणाग नागड जोगड सुतैः देम्हाजधरण जसचन्द्र जसदेव जसधवल जसपाले श्री शांतिनाथ विवं कारितं ॥ प्रतिष्टितं वृहद्गछीय श्री मन्मुनिचन्द्र सूरि शिष्य श्री मव सूरि विनेवेन पाणिनीय पं० पद्मचन्द्र गणिना। यादिषि चन्द्र खीस्याता घमौजिन प्रणीतोस्ति। सावज्जाया देत जिन युगलं वीर जिन भुवने ।
- ( २०७) ( 835 ) संवत् १४३२ वर्षे पोह सुदि-यवत जैता नार्या० कह पुत्र नामसी मार्या कमालदे पितव्य निमित्तं श्री शांति नाथ विंव कारापित्त प्रतिष्टितं श्री नांवदेव सूरिभिः ॥ (836 ) सं० १४८५ वै० शु० ३ बुधे प्राग्वाट श्री समरसी सुत दो० धारा मा० सूहदे सुत दो महिपाल ना० माल्हणदे सुत दो० मूलाकेन पितृष्य दो० धर्मा भ्रातृ दो० माईआभ्यां च दो० महिपा श्रेयसे श्री सुविधिविर्व कारितं प्रतिष्टितं श्री तपागच्छेश श्री सोम सुदर सूरिभिः । ( 837 ) श्री चन्दा प्रभु विवं। सं० १६८६ प्रथमापाढ़ वदि ५ शुक्र राजाधिराज श्री गज सिंह प्रदत्त सकल राज्य व्यापाराधिकारेण मं० जेसा सुत जयमल्ल जी नाम्ना श्री चन्द्र प्रभु विवं कारितं प्रतिष्ठापितं स्वप्रतिष्ठायां श्री जालोर नगरे प्रतिष्ठितं च नपागला. धिराज स० । श्री हरि विजय सेन सूरि पहाडंकार न । श्री विजय मेन मृरि पहाटंकार पातशाहि जहांगीर प्रदत्त महातपा विरुद धारक १० श्री ५ श्री विजयदेय गृभिः ग्य पद प्रतिष्ठिताचार्य श्री विजय सिंह सूरि प्रमुख परिवार परिकरितः राणा श्री जगत सिंह राज्ये नाहुल नगर राय विहारे श्री पद्म प्रज विवं पापित ५ (55) संवत् १६८६ वर्ष प्रघमापाट व ५ शुक्र. राजाधिराउ गमि जी गये यधपा नगर वास्तव्य मणोत्र जेसा सुतेन । जएमट ही नसी शांतिनाथ विवाग्मि ( २००) प्रतिष्टापित स्व प्रसिष्टाया प्रतिष्ठितं च श्री सपा गच्छेश श्री ५ श्री विजय देव सूरिति- स्व पहालंकार आचार्य ओ५ श्री विजय सिंह सूरि प्रमुखः स परिवारः ॥ ५ . ताम्रशासन ।* ( 839 ) ओं।ओं नमः सर्वज्ञाय । दिसतु जिन कनिष्ठः कर्म बंध क्षयिष्ठः परिहत मद मार क्रोघ लोनादि वारः । दुरित शिखरि सम्बः स्वो वशीयं च सम्म स्त्रिभुवन कृतसेवा ओ महाबीर देवः ॥१॥ अस्ति परम आजल निधि जगसि तले चाहुमाण वंशोहि तत्रासोन नडूले भूपः श्री लक्ष्मणादौ ॥२॥ तस्मात् वभूव पुत्रो राजा श्री सोहिया स्तदनु सूनुः । श्रो बलि राजो राजा विग्रह पालोनू चपितव्यं ॥३॥ तस्यात्तनुजो भूपालः श्री महेन्द्र देवाख्यः। तज्जः श्री अणहिल्लो नृपति वरो भूत पृथुल तेजः ॥४॥ तत्सूनुः श्री वाल प्रसाद इत्यजनो पार्थिव श्रेष्ठः । सद्भाताऽभूत क्षितिपः सुभटः श्री जैद्र राजाख्यः ॥५॥ श्री पृथिवी पालोऽभूत् तत्पुत्राः सौर्यवृत्ति शोमाढयः। तस्मादसवत्माता श्री जोजल्लोरणरसारमा॥६॥ तदेवराजो भूच्छीमान् आशाराजः प्रसाप वर निलयः। सत्पुत्राः क्षोणिपः श्री अल्हण देव नामाभूत् ॥२॥ यस्य प्रताप प्साले सकुल दिक् चक्र पृथुल विस्तारं । सिंचंति सुदिताहित गण ललना नयन सलिलौघैः ॥८५ सोय महा क्षितिशः सारमिदं बुद्धिमान चिन्तयत। इह संसार असार सर्व जन्मादि जन्तूनां ॥ी यतः। गर्भ स्त्रि कुक्षिः मध्ये पल रुधिर यसा मेदसा बद्ध पिण्डो मातु प्राणांतकारी प्रसवन समये प्राणिनां स्थान्नु जन्मा धर्मादीनामवेत्ता भवतिहि नियतम् बाल भाव स्ततः स्यात् तारुण्यम् स्वल्प मात्र स्वजन परिभव स्थानता वृद्ध भावः ॥१०॥ खद्योतोद्योत तुल्यः क्षणः मिह सुखदाः सम्पदा दृष्ट नष्टः प्राणिस्वं चंचलं स्थाइलमुपरि यया तोर बिन्दुन्न लिन्याः ज्ञास्वमं व * यह तामापत्र प्रसिद्ध कर्नेल टड साहब यहांसे लेकर विलायतके रयल एशियाटिक सुसाइटीमें दान किया है।
- ( २०६ ) पित्रो स्पृहयनमरताम् चैहिकम् धर्म कोर्ति देशान्तो राज पुत्रान जन पद गणान बोधयत्येव वोस्तु ॥११॥ सं० १२१८ वर्षे प्रावण सुदि १४ रवौ अस्मिन्नेव महा चतुर्दशी पर्वणी। स्नात्वा घौत पटे निबेश्य दहने दत्वाहुनीन पुण्य कृन मार्चण्डस्य तमः प्रपाटन पटोः सम्पर्य चाचंज्जलिं । त्रैलोकस्य प्रभु चराचर गुरु संस्नप्य पंचामुतैः ईशान कनकान्न वस्त्र नदनः सम्पूज्य विप्रां गुरु ॥१२॥ अनुतिल कुशाक्ष- तोदकः प्रगुणी भूता पसन्यकः पाणिः शासनमेनमयच्छत यावत् चंद्राकं भूपालं ॥१३॥ भी नडु ल महास्थाने श्री संडेरक गच्छे श्री महावीर देवाय श्री नड्डूल तल पद शुल्क मंडपिकायां मासानुमासं धूप वेलार्थं शासनेन ट्र०५ पंच प्रादात् अस्य देवरस्यन मुंजानस्य अस्मदृशे जयिविलोक्तिभिरपरैश्च परिपंधाना न कार्या। यतः सामा- न्योयं धर्म सेतु न पाणां काले काले पालनीयो प्रवद् भिः सर्बान एवं नायीनः पार्थिवेन्द भूयो भूयो याचते रामचन्द्रः ॥१४॥ सस्मात् । अस्मदन्वयजा भूपा प्रावी भूपतयश्च ये। तेषामहं करे लग्नः पालनोयं इद सदा ॥१॥ अस्मद्वंशे परीक्षीणे यः कश्चिन नृपति भवेत् तस्याहं करे लग्नोस्मि शासन न व्यतिक्रमेत् ॥१६॥ यहुभिर्व- सुघा भुक्ता राजकै सगरादिभिः यस्य यस्य यदा भूमि तस्य तस्य सदा फल ॥१७॥ पष्टि वर्ष सहस्राणि स्वर्गे तिष्ठति दानदः आच्छेत्ता चानुमंत्ता घ तान्येव नरकम् वशेत् ॥१८॥ स्व दत्तं पर दत्त वा देव दायं हरेत यः स विष्टायां कृमि वा पितृभि. सह मज्जति ॥१९॥ शून्याटवो व्यतोयासु शुष्क कोटर वासिनः । कृष्णा हयाभि जायते देव दायम् हरंति ये ॥२०॥ मङ्गल महा श्रोः । प्राग्वाट बंशे धरणिग्ग नाम्नः मुनी महा मात्यवरः सुकर्मा वनूष दूताः पतिजा निवासो एक्ष्मीधरः श्री करणे नियोगी ॥२॥ मासीत् स्वच्छ मला मनोरथ इति पार नंगमानां कुले शास्त्र ज्ञान नुधार पवित्र घिष्टज्जो नवत वासलः । पुत्रस्तस्य वभूव लोक यसनिः ओ श्री धरः श्री सूपास्ति रचयांचकार लिलिखे चेदं महा शासन ॥२॥ व हन्ताय महागज भी बरहण देवस्य।
तामापत्र (महाजनों के पास ) ( 810 ) ॐ स्वस्ति ॥ श्रियै भवंतु वो देवा ब्रह्म श्रीधर शंकराः । सदा विरागवंतो ये जिना जगति विश्रु नाः ॥१॥ शाकंभरो नाम पुरे पुरासी च्छी चाहमानान्वय लब्ध जन्मा। राजा महाराज नतांहि युग्मः ख्यातो वनौ वाक्पत्ति राज नामा ॥२॥ नहूले समाभूत्तदोय तनयः श्री लक्ष्मणो अपसि स्तस्मात्सर्व गुणान्वितोः न पबरः श्री गोलि- ताख्यः सुतः । तस्मा च्छी बलिराज नाम नृपतिः पश्चात् तदीयो मही ख्यातो विग्रह पाल इत्यभिधया राज्ये पितृव्योऽ भवत् ॥३॥ तस्मित्तीव्र महा प्रताप तरणिः पुत्रो महेंद्री भवत्तज्जा च्छी अहिल्ल देव न पतेः श्री जेंद्रराजः सुतः। तस्माद्दुर बैरि कुंजर वध प्रोत्साल सिंहोपमः सत्कीर्त्या धवलाली कृताखिलजग च्छी आशराजो न पः ॥४॥ सरपुत्रो निज विक्रमार्जित महाराज्य प्रतापोदयो यो जग्राह जयश्रिय रण भरे व्यापाय सौराष्ट्रकान् । शौचाचार विचार दानव सति नड्डूल नाथो महा संख्योत्पादित वीर वृत्तिरमलः श्री अल्हणो भूपतिः ॥५॥ अनेन राज्ञा जन विश्रुतेन। राष्ट्रोड वंश जव रा सहुलस्य पुत्री अन्नल्ल देवीरिति शील विवेक युक्ता। रामेण बै जनकजेव विषा- हिता सौ ॥६॥ आभ्यां जाताः सुपुत्रा जग धियो रूप सौंदर्य युक्ताः। शस्त्र शास्त्र प्रगल्भाः प्रधर गुणः गणास्त्यागवन्तः सुशीला: ज्येष्ठ श्री केल्हणाख्य स्तदनु च गज सिंह स्तथा कीर्ति पालो। यद्वन्नेत्राणि शंभो खि पुरुष वदथामीजने बंदनीयाः ॥३॥ मध्यादमोसा परिवारानथो ज्येष्ठोगंजः क्षोणि तले प्रसिद्धः । कृतः कुमारो निज ज्य धारी श्री केल्हणः सर्व गुणोरुपेतः ॥८॥ आभ्यां राज कुल श्री आल्हण देव र श्री केल्हण देवाभ्यां राजपुत्र श्री कोर्तिपालस्य प्रसादे दत्त नडूलाई प्रतिवद्ध दश ग्राम ततोराज पुत्र श्री कौर्तिपालः । संवत् १२१८ श्रावण वदि ५ सोमे ॥ अोह नडुले स्नास्वा धौतवाससी परिधाय तिलाक्षत कुश प्रणयिन दक्षिण करं कृत्या ५ - ( २११ ) देवानुदकेन संतl । वहलतम तिमिर पटल पाटन पटीयसो निःशेष पातक पंक प्रक्षा- लनस्य दिवाकरस्य पूजां विधाय। चराचर गुरु महेश्वरं नमस्कृत्य । हुत भुजि होम द्रव्याहुती इत्या नलिनी दल गत जल लव तरलं जीवितव्यमाकलय्य । ऐहिकं पारत्रिक च फलमंगीकृत्य स्व पुण्य यशोनि वृद्धये शासनं प्रयच्छति यथा ॥ श्री नडूलाई ग्रामे श्री महावीर जिनाय नड्लाई द्वादश ग्रामेषु ग्राम प्रति वो ट्रम्मौ स्नपन विलेपन दीप धूपोपजोगार्थ । शासने वर्ष प्रतिपाद्रपद मासे चंद्राक्क क्षिति कालं यावत् प्रदत्तौ। नद्द लाई ग्राम । सूजेर । हरिजो कविलाडं । सोनाणं। मोरकरा। हरवंदं माहाड। काण सुर्व। देवसूरो । नाडाड मउवड़ो। एवं ग्रामाः एतेषु द्वादश ग्रामेषु सर्वदाप्यस्मामिः शासने दचौ । एक्षिामैरधुना संवत्सरं लगित्वा सर्बदापि वर्षे प्रति माद्र पदे दातव्यो। अत उर्दु केनापि परिपंथना न कर्त्तव्या। अस्मद्वंशे व्यतिक्रांते योऽन्य कोपि भविष्यति तस्याहं करे लग्नो न लोप्यं मम शासनं । पष्ठि वर्ष सहस्राणि स्वर्गो तिष्ठति दायकः । आच्छेत्ता चानुमंता च तान्येव नरके वसेत् ॥ बहुभिर्वसुधा भुक्ता राजभिः सगरादिभिः । यस्य यस्य यदा भूमि तस्य तस्य तदा फलं ॥ स्व हस्तोयं महाराज पुत्र श्री कीर्ति पालस्य ॥ नैगमान्वय कायस्थ साढनप्ता शुभं करः दामोदर सुतो टेखि शासनं धर्म शासनं ॥ मंगल महा धीः ।। (81) संवत् १२१३ वर्षे मार्गा वदि १० शुक्र ॥ श्रीमदपहिल्ट पाटके समस्त राजा यली समलं कृत परम महारक महाराजाधिराज परमेश्वर उमापति यर लक्ष्य प्रमाट प्रोट प्रताप निज भुज विक्रम रणं गण विनिर्जित शाकंभरी भूपाल श्री कुमार पाल देव कल्याण विजय राज्ये। तत्पाद पद्मोपजीविनि महामात्य धी यह देय श्री श्री करपादौ सलल मुद्रा व्यापारान्परि पंधरति यथा । लस्मिन् काले प्रयत्तमाने रिव्य बोहाणान्वये महाराज श्री योगराज स्तदे तदीय नुन संज्ञान महामंदीकः श्री वन १ संधत् ११८७ फाल्गुन सुदि १४ गुरुवार श्री षंडेरकान्वय देशी चैत्य देव श्री महावीर (२१२) राजस्तदस्य सुत संजात ऽनेक गुण गणालंकृत महा मंडलीक० श्री मता प्रताप सिंह शासन प्रयच्छति यथा। अत्र नदूल डागिकायां देव श्री महाबोर चैत्ये । तथारष्ट नेमि चैत्ये शील बंदडो ग्रामे श्री अजित स्वामि देव चैत्ये एवं देव त्रयाणां स्वीय धर्मा- थै वदर्य मंडपिका मध्यात् समस्त महाजन महारक ब्राह्मणादय प्रमुख प्रदत्त त्रिहाइको रूपक १ एक दिन प्रति प्रदातव्यामदं । यः कोपि लोपियति सो ब्रह्महत्या गो हत्या सहस्त्रेण लिप्पते । यस्य यस्य यदा भूमि तस्य तस्य तदा फलं । बहुभिर्वसुधा भुक्ता राजभिः। यः कोपि बालयति तस्याहं पाद लग्न स्तिष्टामीति। गौडान्वये कायस्य पण्डित. महीपालेन शासनमिदं लिखितं । नाडलाई। वर्तमानमें मारवाड़ के देसूरी जिलेके नाडोलके पास एक छोटासा गांव है परन्तु प्राचीन कालमें यह एक बड़ा आबादी नगर था और वही स्थान है कि- संवत दश दाहोतरे बदिया चोरासी बाद। खेड नगर थी लाबिया, नारलाई प्रासाद ॥१॥ यहां पर बहुतसे प्राचीन जैन मंदिर वर्तमान है। श्री आदिनाथजी का मंदिर । दत्तः। मोरकरा ग्रामे घाणक तैल बल मध्यात् चतुर्थ भाग चाहुमाण पत्तरा सुत विसराकेन कलसो दत्तः ॥ रा. वाच्छल्य समेत। साखिय भण्डौ नाग सिउ । अतिवरा ( 842 ) (२१३ ) बीद्धरा पोसरि । लष्मणु। बहुभिर्वसुधा भुक्ता राजिलिः सागरादिभिः। जस्य जस्य यदा मि । तस्य तस्य तदा फलं ॥१॥ (843 ) ॐ ॥ संवत् ११८६ माघ सुदि पंचम्यां श्रो चाहमानान्वय श्री महाराजाधिराज रायपाल । देव तस्य पुत्री रुद्रपाल अमृत पालौ। ताभ्यां माता श्री राज्ञो मानल देवी तया नद ल डागिकायां ॥ सतां परजतीनां राजकुल पल मध्यात् पलिका द्वयं । घाणकं प्रति धर्माय प्रदत्त श० नागसिव प्रमुख समस्त ग्रामीणक। रातिमटा वि० सिरिया वणिक पोसरि। लक्ष्मण एते साखिं कृत्वा दत्तं । लोपकस्य यदु पापं गो हत्या सह- । ब्रह्म हत्या सतेन च। तेन पापेन लिप्यते सः॥ श्री॥ नेण (84% ) हास सर्व साउत पुत्र * ॥ संवत् १२०० जेष्ठ सुदि ५ गुरौ श्री महाराजाधिराज श्री राय पाल देव राज्ये समाए रथयात्रायां लागतेन । रा० राजदेवेन । जात्म। पाइला मध्यात् विंसोपको दत्तः ॥ मात्मीय घाणक तेल बल मध्यात् । माना निमित्त पलिका द्वयं । प्ली २ दत्तः ॥ महाजन ग्रमीण। जन पद समलाय । धर्माय .निमित्त विसोपको पलिका द्वयं दत्त ॥ गो हत्याना सहवेग ब्रह्म हत्या सुतेन च । सी हत्या भ्रूण हत्या च जतु पापं तेन पापेन लिप्यते तः ॥१॥ (85) १ संवत् १२०० कार्तिक यदि १ रवी महाराजाधिराज श्री राय पाल देय गज्ये। श्री नटूल रागिकायां रा. राजदेव ठकुरायां। श्री नद्रला इय महाजनेन मयं मिलिया श्री महावीर चैत्ये। दान दत्त । पृत तैट घोपर नामिपिट पाहर प्रतिक - (२१४ ) नमपि तद्रोणं प्रति मा० कपास लोह गुढर षाड होगु माजीठा तौल्ये घडीपति । पु. पूगहरी तकि पमुख गणितैः। सहस्रं प्रति । पुगु १ एततु महाजनेन चेतरेण धर्माय प्रदत्तं लोपकस्य जतु पापं। गो हत्या सहस्त्रेण ब्रह्महत्या शतेन च तेन पापेन लिप्यते सः । ( 846 ) ॐ ॥ संवत् १२०२ आसोज यदि ५ शुक्र । श्री महाराजाधिरान श्री रायपाल देव राज्ये पुवर्ण माने । श्रो नदूल डागि कायां । रा० राजदेव ठकुरेण प्रवर्गमानेन । श्री महा- वीर चैत्ये साधुसपोधन निष्ठार्थे । श्री अभिनव पुरीय वदार्या । अत्रेषु समस्त वणजार केषु। देसी मिलित्वा वृषा भरित । जतु पाइलाल गमाने। ततु बीसं प्रति । रुआ २ किराड उआ। गाडं प्रति रु. १ वणजारकै धर्माय पुदत्तं ॥ लोपकस्य जतु पापं गो हत्या सहस्रेण ॥ ब्रह्म हत्या सतेन। पापेन । लिप्यते सः । ( 847 ) संवत् १४८६ वर्षे अषाढ़ बदि नाडलाई रीमाउहीत को-विसति को तेल सेर० ॥ दीधे छूटि सुपासना श्री संघ मतं दिना १ प्रत देस । (848 ) १५६८ वीरम ग्राम वास्तव्य श्री संघेन पक्ष ( 849 ) सं० १५६८ वर्षे । कुतयपुरा पक्ष तपागच्छाधिराज श्री इन्द्र नन्दि सूरि गुरुपदेशात मुजिगपुर श्री संघेन कारिता देव कुलिका चिरनन्दतात् ॥ ( 850 ) सं० १५७१ यप कुतवपुरा तपागच्छाधिाज श्री इन्द्र नन्दि सूरि शिष्य श्री प्रमोद दर सूारराज गुरुपदेशात् चम्पकं दुर्ग श्री संघेन करापिता देव कुलिका चिरं नन्दतात ( 851 ) ( 852 ) विजय राज्ये॥ अथेह श्री मदेपाट देशे। (२१५) सं० १५७१ वर्षे कुतयपुरा पक्ष तपागच्छाधिराज श्री इन्द्र नंदि सूरि शिष्य प्रमोद सुन्दर सूरि गुरुणामुपदेशात् पत्तनोय श्री संघेन कारिता देव कुलिका चिरं जीयात् ॥ श्री यशोभद्र सूरि गुरुपादुकाभ्यां नमः । संवत् १५८७ वर्षे वैशाख मासे शुक्ल पक्ष पक्ष्यां तिथौ शुक्र वासरे पुनवसु ऋक्ष प्राप्त चंद्र योगे श्री संदुर गच्छे कलिकाल गौतमावतारः समस्त भविक जन मनोबुज विवोधनक दिन करः सकल लन्धि विनामः युग प्रधानः जितानेक वादीश्वर वृदः प्रणतानेक नर नायक मुकुट कोटि पृष्ट पादारविंदः श्री सूर्य इव महाप्रसादः चतुः पष्टि सुरेन्द्र संगीयमान साधुवादः । श्री पंडेरकीय गण बुधावतंसः सुभद्रा कुक्षि सरोवर राजहंसः यशोवीर साधु कुलांबर नन्नो मणिः सकल चारित्रि चक्रवर्ति वक्त, चूड़ामणिः १० प्रभु श्री यशोभद्र सूरयः तस्पह भी चाहुमान वंश श्रृङ्गारः लब्ध समस्त निरवद्य विद्या जलधि पारः श्री बदरा देवी दत्त गुरु पद प्रसाद कुल प्रयोघनेक प्राप्त परम यशो यादः १० श्री शालि सूरि स्त० नो सुमति सूरिः त० श्री शांति सूरिः त० श्री ईश्वर सृरिः । एवं यथा क्रममनेक गुण मणि गण रोहण गिरीणां महा सूरोणां बंशे पुनः श्रा शालि सूरिः त० प्रो सुमति सृरिः तत्पहालंकार हार H० श्री शांति सूरि बराणां सपरिकराणां दिस्य वंशे श्री गुहिदत्त राउल श्री वप्पाक प्रो खुमाणादि महाराजान्वये राणा हमीर श्री पेत सिंह श्री लखम सिंह पुत्र श्री मोकल मृगांक यशोद्योतकार प्रताप मातंरा वतारः आ समुद्र मही मंडला खंडलः अतुल महायट राणा श्री कुम्भकर्ण पुत्र गणा श्री राय मल्ल विजय मान प्राज्य राज्ये तत्पुत्र महाकुमार श्री पृथ्वी राजानुगामनान । मी उकेश वंश राय जहारो गोत्रे राउट भी लारुण पुत्र मं दृदबंगे मम्र मत मं. सादूल स्तत्पुत्राभ्यां मं• तोहा समदाभ्यां सवांधव में कर्ममाघश गलामाटि मदम्य स्व विमल ( २१६) युताभ्यां श्री नंदकुलवत्यांपुर्या सं० ८६४ श्री यशोभद्र सूरि मंत्र शक्ति समानीतायो त. सायर कारित देव कुलिकायुद्धारितः सायर नाम श्री जिन वत्यां श्री आदीश्वरस्य स्थापना कारिता कृता श्री शांति सूरि पह देव सुदर इत्यपर शिष्य नामभिः आः श्री ईश्वर सूरिभिः। इति लघु प्रशस्तिरिय लि. आवाव्य श्री ईश्वर सूरिणा उत्कीर्ण सूत्रधार सोमाकेन शुभं । (858) १ संयत् १९७४ वर्षे माघ दि १ दिने गुरु पुष्य योगे उसयाल ज्ञाती भण्डारी गोत्र। सायर तुत्र साहल तत पु० समदा लषा धर्मा कर्मा सोहा लखमदा पु० पहराज प्रद मान गम भार्या तत् पु० । भीमा में पहराज पुत्र कला मं० नगा पुत्र काजा मं० पदमा पुत्र जईचन्द्र में भीमा पुत्र राजसी मं वाला पुत्र संकर उसबालः जैचन्द्र पुत्र जस चंद जादव । मं० सिवा पुत्र पूजा जेठा संयुतेन श्री अदिनाधविवं कारितं प्रतिष्ठितं तपा गच्छाधिराज भटा० श्री हीर विजय सृरि तत्पटालंकार श्री विजयसेन सृरि ततपटा- लंकार भटारक श्री विजय देव सूरिभिः । (854 ) ३ महाराजाधिराज श्री अभय राज राज्ये संवत् १९२१ वर्षे ज्येष्ट सुदि ३ रवी श्री नलाई नगर वास्तव्य प्राग्वाट ज्ञातोय वृ० सा। जीवा आर्या जसमादे सुत सा। नाथाकेन श्री मुनि सुव्रत विवं कारापितं प्रतिष्टितं च । भहारक श्री हीर विजय सूरिनिः। (865) संवत् १७६६ वर्षे वैशाख सुदि २ दिने उकेश ज्ञात १ बोहरा काग गोत्र साह ठाकुर की पुत्र लाटा हेत सुवर्णमये कलस करापितं श्री आदिनाथजी सेतरभेद पूजा गुहिलेन संप्रति प्राप (प्रतिष्ठिन) माणिक्य विज शि जित विजय शिष्य ॥ कुश विजय उपदेशात कुो भूयात् ।
(२१७) (806) संवत् १६८६ वर्षे वैशाख मासे शुक्ल पक्ष शनि पुष्य योगे अष्टमी दिवसे महाराणा श्री जगत सिंह जी विजय राज्ये जहांगोरी महा तपा विरुद धारक भहारक श्री विजय देव सूरीश्वरोपदेश कारित प्राक प्रशस्ति पहिका ज्ञात राज श्री संप्रति निर्मापित श्री पठ पर्वतस्य जोर्ण प्रासादोधारेण श्री नड्डु लाई वास्तव्य समस्त संघेन स्वंयसे श्री श्री आदिनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं च पातशाह श्री मंदकन्दर शाह प्रदत्त जग- दगुरु विरुदधारक तपागच्छाधिराज महारक श्री श्री श्री श्री श्री हीर विजय सूरीश्वर पह प्रनाकर म० श्री विजय सेन सूरीश्वर पहालंकार प्रभु श्री विजयदेव सूरिभिः स्व पद प्रतिष्ठिताचार्य श्री विजय सिंह सूरि प्रमुख परिवार परिवृत्तः श्री नडुलाई मंडन श्री ज़खल पर्वतस्य प्रासाद मूलनायक श्री आदिनाथ विवं ॥ श्री ॥ ॥ श्री नेमिनाथजी का मंदिर । (857) जो नमः सर्वज्ञाय ॥ संवत् ११९५ आसउज वदि १५ कुजे ॥ जय ह श्री नडूंडागि- कायां महाराजाधिराज श्री रायपाल देवे। विजयीराज्यं कुर्वतत्ये तस्मिन काले श्री मदुर्जित तीरः श्री नेमिनाथ देवस्य दीप धूप नैवेद्य पुप्प पूजाद्यर्थ गुहिलान्वयः। राउत उधरण सूनुना सोक्तारि १ ठ० राजदेवेवन स्व पुण्याचं स्वीयादान मध्यात् माग्गे गच्छता नामा गतानों वृषनानां शेकेषु यदा पाव्यं भवति तन्मध्यात् विंशतिमो नागः चंद्रार्क यावत् देशस्य प्रदत्तः ॥ अस्मद्वंशीयेनान्येन वा केनापि परिपंचना न करणाया। मस्मदत्त न केनापि लोपनीयं ॥ स्वहस्ते पर हस्ते वा यः कोपि लोपयिष्यति । तस्याह करे लग्नो न लोप्य मम शासनमिदं ॥ लि. पांसिलेन । स्व हस्सोयं साविज्ञान पृव्यं राउः राज देवेन मतु दत्त । अत्राहं साक्षिण ज्योतिपिक टू पानृनुमा गूगिना ॥ तथा पला. पाला पृथिवा १ मांगुला ॥ देवता । रापसा ॥ मंगलं महा श्रीः ।।
( २१८) (858) ओं ॥ स्वस्ति श्री नप विक्रम समयातीत सं० १४४३ वर्षे कार्तिक वदि १४ शुक्रे श्री नडुलाई नगरे चाहुमानान्वय महाराजाधिराज श्री वणवीर देव सुत राज श्री रणवीर देव विजय राज्ये मत्रस्थ स्वच्छ श्री मदवहद्गच्छ नभस्तल दिनकरोपम श्री मानतुग सूरिवंशोद्भव श्री धर्मचन्द्र सूरि पह लक्ष्मी श्रवणो उत्पलाय मानः श्री विनय चंद्र सूरि भिररूप गुण माणिक्य रत्नाकारस्य यदुवंश शृगार हारस्य श्री नेमीश्वरस्य निरा- कृत जगद विषादः प्रसाद समुद्दधे आचंद्राक नन्दतात् ॥ श्रो॥ कोट सोलंकी। ( 859 ) ॐ ॥ स्वस्ति श्री न प धिक्रम कालातीत संवत् १३९४ वर्षे चैत्र सुदि १३ शुक्र श्री आसल पुरे महाराजाधिराज श्री वणवीर देव राज्ये राउत माल्हणान्वये राउत सोम पुत्र राउत वांवी भार्या जाखल देवि पुत्रेण राउत मूल राजेन श्री पार्श्वनाथ देवस्य ध्वजारोपण समये राउत बाला राउत हाथा कुमर लुभा नीवा समक्ष मातृ पुण्यार्थं ढिकुय उबाडी सहितः प्रदत्तः आचंद्रार्क यावदियं व्यवस्था प्रमाण ॥ बहु। सुधा भुक्ता राजभिः सगरादिभिः । यस्य यस्य यदा भूमी सस्य सस्य तदा फलं ॥ शुभ पित्रोः बहुभिर्व भवतु ॥ श्री॥ धानेराव । ( 860 ) संवत् १२१३ भाद्रपद सुदि १ मंगल दिने श्री दंडनायक बैजल्ल देन राज्ये श्री वंस -
(२१६)
गतीय राउत महण सिंह भुक्ति बंतंह उवाट मध्यात श्री महावीर देव वर्ष प्रति ट्राम
र खाज तूणो दत्ताः जस्य भूमिः तस्य तदातत्य। तेठ रायपाल सुत राब राजमल्ठ
महाजन रक्ष पाल विनाणि यस्त दिवहिं ।
वेलार ।
मारवाड़ के देसूरी जिले धानेराव नामक स्थानके समीप यह ग्राम
-
श्री आदिनाथ जी का मंदिर ।
(S)
जाधवीर
को संवत १२३५ वर्षे ताधिग झार्या माल्ही तत्पुत्रा जावधीर घदाक जायधराः
पुत्र साल्हण गुण देवादि समन्त्रित जात्न प्रेयते लगिझां कारितवान ।
संवत १२३५
व
पताल्गुन
बदि गुरी नौट प्रताप की न्हांध देव कल्याण
विजय राज्ये याचलदे चैत्येशी नागीय गन्छे श्री शांटि नृरि पन्छापिने शान।
भासोट धर्कः वंश मुख्य उतनः धाइः पुरा गुदृधीनगानन्य मि मनि
अष्टि सपारवानिवः । पुत्रौ दत्य बबः क्षितिटडे विस्मात के
नियम यो
अब सगुणी रामाविश्वापर पान्यः : को नई पदाची कृट मतियाने यार
रागादेव इति हितो समजावट पुत्रीन्द चाहियः । टन पति
देन गोसाक नामा दुर्शः शिष्टाचार विशारदा जिन महोहान्दः योनि
- (२२० ) कदाचिदन्यदा चित्ते विचित्य चपलं धनं । गोष्ट्याच राम गोसाभ्यां कारितो रंग मंडपः ॥३॥ अद्रं भवतु। ( 863 ) संवत १२३८ पौष वदि १० वला नागू पुत्र थे. उद्धरण मार्यया श्री देवणाग पुत्रिया उत्तम परम प्राधिकया स्व श्रेयोर्थ नो पार्श्वनाथ देव चैत्य मडपे स्तंभोयं कारितः। . ( 864 ) अ॥ संवत १२३८ पौष वदि १० श्री० आय कुमार पुत्र श्री धवल भार्यया वला. नागू पुत्रिकया संतोस परम धाविकया स्व श्रेयार्थ श्री पा। ( 865 ) ॐ सं० १२६५ वर्षे थांथां भार्या तिण देवि तत्पुत्रिका पउसिणि पुत्र गोसा मार्या लक्षा श्री पाल्हाया माल्हा भार्या श्री ति सार्या पूरां श्री गोसाकेन सकल बंधु सहितेन सोहि । न भार्या (866 ) ॐ गस्छे श्री नाणकाभिख्ये सुधर्म सुत वल्हणः। अभुच्चारित्र संयुक्तो वाल भद्रो मुनिः पुरा ॥१॥ तच्छिप्यो हरिचंद्राह्वो मुनिचन्द्र घोस सोमको ॥ २ ॥ पार्श्व देवः स्वशिष्येन वीर चंद्रण संयुतः। लगिकां कारयामाग गुरु कंद विवर्द्धये ॥३॥ परः । तदन्वये धनदे. - पाव दे। ( 867 ) ओं संवत १२६५ वर्षे धर्कट वंशे भार्या जिन देवि तत्पुत्रा पंचगोसा० सदेव भार्या मति तत्नुत धांयां काल्हा राल्ह घोर सीह पाल्हण प्रमुख गोसा पुत आम
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( २२१)
धीर आम जालं काहा पुत्र लक्ष्मीधर महीधर राल्हण पुत्रं आखे शूर घोरहसी पुत्र
देव जस पाल्हण पुत्र घण चंडा रथ चंडादि स्वकलन समन्विताः स्व अवोर्थ स्तंभ
लगामिमं कारापयामासूः ।
( 868 )
ओं संवत १२६५ वर्षे उसम गोने नोष्ठि पाय मायां दूल्हेवि तत्पुत्रं मगाकेन
भार्या राजमति राल्हू तस्याः पुत्राश्चत्वारी लक्ष्मीधर अभय कुमार मेघ कुमार शक्ति
कुमार लक्ष्मीधर पुत्र वीर देव अभय दे पुत्र सर्वदेवादिषु कुल कुटुष सहितेन स्तंभन
माकारितेदमिति ...।
( 869 )
ॐ संवत १२६५ वर्षे श्रों नाणकीय गच्छे धर्वट गोत्र आसदेव सत्सुत जागू भार्या-
घिर मति सत्सुत गाहस्तस्य भार्या सातु तत्पुत्र आजमटादेः समुत्ति का सूरि काम
कारयदात्म झयसे ॥छ॥
फलोदी।
यह स्थान मारवाड़के मेड़ता नगरके पास है।
बड़े जैन मंदिरके देहलीके पत्थरों पर।
(870)
संवत् १२२१ मार्गसिर सुदि ६ श्रो फलबर्द्धिकायां देवाधिदेव प्रो पार्श्वनाथ प्रत्ये
श्रो पारबाट वतीय रोपि मुणि मं० दसादाभ्यो जात्म श्रेगर्य श्री चित्रकूटीय सिलफट
सहितं चन्द्रको प्रदत्तः शुतं भवत् ।।
.
A
( २२२) 1 1871 ) । चैत्यो नरवरे येन श्री सल्लक्ष्मट कारिते। पंडपो मेडनं लक्ष्या कारितः संघ भास्वता ॥१॥ अजयमेरु श्री वीर चैत्ये येन विधापिता श्री देवा बालकाः ख्याताय तुर्विंशति शिखराणि ॥२॥ श्रेष्ठी श्री मुनि चंद्राख्यः श्री फलवर्द्धिका पुरे उत्तान पर श्री पार्श्व चैत्येऽचीकरदद भूतं ॥३॥ . ककिन्द । यह प्राचीन स्धान भी मारवाड़के मेड़सा जिले में है श्री पार्श्वनाथजी का मंदिर । - ( 872) ॐ ॥ संवत् १२३० आषाढ़ सुदि ६ श्री किष्कंधर दिवा प्रमुख वाला मलण यास ददिवा रावधी विधि चैत्ये मूल नायकः श्री आनन्द सूरि देशनया श्रे॥१॥ ( 873 ) - ५ ॐ ॥ संवत १२३० आषाढ़ सुदि किष्कंध विधि चैत्य मूल नायकः श्री आनंद सूरि देशनया श्री. धाधल श्रे० वाला लण दास ददिवा पीवर दिवा प्रमुख नाक -- । (874) ॐ ॥ नमो बीतरागाय ॥ श्री सिद्धिर्भवतु ॥ स्वति श्रियामास्पदमापसिद्धिज- यस्य भवत् प्रसिद्धि। सोऽस्तु श्रिये स्फूर्जदनंब रिद्धिरादीश्वरः शारद भास्य ॥१॥ यमाहता शैव मताऽवलंया। हिन्दु प्रकाराय वन प्रकाराः। सर्वेऽप्यमी (२२३ ) मार्गः मोद मृतो सजते । युगादि देवो दुरितं सहंतु ॥२॥ दूर्वा प्रसारः सवट प्रसारः । कष्छ प्रसारो व्रतति प्रसारः। इमे समे कोटितमेऽपिलागेऽपत्य प्रसारस्य न यांति यस्य ॥३॥ गीर्वाण सालो नहि काष्ठ आयात् । तथा पशुस्वान्नहि कामधेनुः। मृदा विकारा- न्नहि काम कुंजश्चिंतामणिन्नैव च करत्वात् ॥४॥ सृया न सापाकुलता करत्वात् । सुधाकरोनैक कलंकवत् त्वात् ॥ सुवर्ण शैलो न कठोर भावात् । नाभ्यंगजातेन तुला- मुपैनि ॥॥ दुग्धो दधौ संस्थित लोय बिंदून। पुष्पोच्चयान्नंदन कानन स्थान् । करोत्करान् शारदःचन्द्र सत्कान् । कश्चिन्मिमीतेन गुणान् युगादेः ॥६॥ यस्लाट् जगत्यां प्रभवति विद्याः। सुर्पव्वलोकादिव काम गव्यः । द्वय्योऽपि वांच्छाधिक दान दक्षाः । पुष्णातु पुण्यानि स नानि सूनुः ॥७॥ यतोसराया स्त्वरितं प्रणेशु। मृगाधिराजा दिव पूगाः । यद्वा मयूरादि वले लिहानाः । स मारु देवो भवताइ विभूत्यै ॥८॥ राठोड वंश व्रतति प्रताना नीकोपमो नीक निकाय नेता। राजाधिराजो जनि मल्ल देव । स्तिरस्कृतारि प्रति मल्ल देवः ॥ ६ ॥ तस्मौरसस्सम जनिष्ट यलिष्ठ बाहुः प्रत्यर्थिता पनकदर्यल पर्व राहुः। श्री मल्लदेव नृप पह सहन रश्मिः। श्री मानभूदुदय सिंह नृपः सरश्मिः ॥१०॥ कम धज कुल दीपः कांसि कुल्या नदीप। स्तनु जित मधु दीपः सौम्यता कौमुदीपः। नृपतिरुदय सिंहा स्व प्रतापास्त सिंह सितरद मुचुकुंदः सर्व मुकुन्दः ॥११॥ राज्ञां समेषामय मेव वृद्धो। वाच्यस्तद न्यरथ वृद्ध राजः। यस्येति शाहिर्विरुदं स्मदया। दकधरो वर्वर वंश हंसः ॥१२॥ सरपह हेग्नः कप यह शोमा । मबीरसंप्रति सूर सिंहः । यो माप पेपं विपतः पिपेप। निर्मूल का कषितार्त्तितांतिः ॥१३॥ राज्य श्रियां साजन मिट्ट धामा। प्रताप मंदी कृत चढ धामा। संपन्न नागावलि नाव सिंहः पृथ्विी पसी राजति सूर सिंहः ॥११॥ प्रतापतो विक्रम श्व सूर्य। सिंहौ गतौ व्योम वनं च जीती। जन्वयतो नाम जगाम स्यं । सिहे तियः सर्व जन प्रसिद्धं ॥१॥ यदीय सेनोच्छलित रजोभि । मलीमनांगो दिनसाधि नायः । परो दया वस्त गिषेण मन्ये । स्नातु प्रवेशं कुरुते विनन्त्रः ॥१६॥ अप्येक मीहेतन नित्या (२२४) शुद्ध वंशो। धार चकं तृप्ति युतो विशेषात् । स्वयं हताराति वसुन्धरा वो परिग्रहात्त बहुता करस्सः ॥१७॥ तथापि राज्ञः परितोष भाजः। स्तुति विज्ञा विविधैः कवित्वः । वहंति भक्तिं स्व कुटुबलोका। अहो यशो लाग्य क्शोपलभ्यं ॥१८॥ द्वाभ्यां युग्मं । सुरेष यदन्मधवा विभाति । यथेष तेजस्त्रिषु चंड रोचिः । न्यायानुयायि ब्धिव राम- चंन्द्र। स्तथाकुना हिन्दुषु भूधबोयं ॥१९॥ द्रव्य जिनाचौंचित कुकमादि दीपार्थ मा जाद्यममारि छोषं । आचामतोम्लादि तपो विशेषं विशेषतः कारयते स्वदेशे ॥२०॥ ना पुत्र वित्ताहरणं न चौरी नन्या समोषो न च मद्य पानं । नाखेटको नान्य क्शा निषेवे। स्यादि स्थितिः शासति राज्यमस्मिन् ॥२१॥ अभूधानो युवराज मुद्रां तस्मात्कुमारो गजसिंह नामा । गत्या गजोऽतीव बलेन सिंहस्ते नैव लेने गजसिंह नाम ॥२२॥ श्रो ओसबालान्वय वाढेि चन्द्रः। प्रशस्त कार्येषु विमुक्त तंद्रः। विज्ञ प्रगेयो चितवाल गोत्रः पणेष्वपिस्वेष्व चलत्व गोत्रः ॥२२॥ आसीलिवासो नगरांतरेच। प्रायः प्रभूतैः- विणरुपेतः जगाभिधानो जगदीश सेवा। हेवाभिरामो व्यवहारि मुख्यः ॥२४॥ द्वाभ्यां युग्मं । विद्यापुरः सूरि सुवाचकानां। करे पुरे योधपुरामिधाने। दंतं प्रमाणावया जगारूपः सएष तुर्य व्रतमुच्चचार ॥२॥ सदंगजन्मा जनित प्रमोदः पुण्यात्मनां पुण्य सहाय भावात्। विशिष्ट दानादि गुणैः सनायो। नाथा सियो नाथ समाप्त मानः ॥२६॥ तस्योज्वलस्फार विशाल शाला । भार्या भवद् गूजर दे सुनामा। रूपेय वर्या गृह भार धुर्या। श्री देव गुर्वाः परिचर्य यार्या ॥२७॥ असूत सा पूर्व दिगेत्र स्य। मुक्ता मणिं वंश विशेष यष्टिः । वजांकुरं रोहण भूमि केव। नापाभिधानं सुत राज रत्न ॥२८॥ गुणैरनेकैः सुकृतै रनेकै । ले* प्रसिद्धि भुवि तेन विष्वक। तदचिनोन्यपि समर्जयतु । गुणान्सपुण्यान्विधुवद्विशुद्वान ॥२९॥ तस्यासीन्नवलादे। बनिता वनितार सार रूप गुणा । शीलालंकृत रम्या गम्या नापाहये नैव ॥३०॥ आसानिधानोझमृता- भिश्व । सुधर्म सिंहोप्युदयाभिधोपि । सादल नामेति च संति पंच। तयोस्तनूजा इन पांडु कुयाः ॥३१॥ आसा रिधानस्य बभूव भार्या सरूप देवोति तयोः सुतौ द्वौ । - -- म - गते ( २२५ ) सोर दादिम वीर दासों। लघुश्चिरंजीवित जीव राजः ॥३२॥ ? तरस्याऽमृत सज्ञितस्य । मृगे चणाऽमशेलक्ष देनिधाना। सुता बनूसामनयोस्तथा वी मनोहरायो पर बर्द्धमानः ॥३३॥ सदा मुदे धारल दे निधाना। सुधर्म सिंहस्य समिणीति। कुटु यिनी साउछ रंगदेवी। प्रिया वभूवोदय संज्ञितस्य ॥३४॥ इति परिवार युत चोजयंत शत्रुजये प्वकृत यात्रां । निधि शर नरपति १६५८ संख्ये। वर्ष हर्पण ना पाख्यः ॥३॥ अर्बुद गिरि राण पुरे नारदपुर्या च शिवपुरी देशे ' योत्री युग पट् पद पद । कला १६६४ मितेव्दे चकार पुनः ॥३६॥ श्रोविक्रमाकाहतु तक्कं पड । वर्ष १६६६ फाल्गुन शुक्ल पक्ष । तौ दंपती स्पो कुरुतः स्मतुर्य । व्रत तृतीया हनि रुप्य दानैः॥३॥ दानं च शीलं च तथोपकार । स्त्रयात्मकोयं शुक्ल योग आस्ते । नापाभिधान व्यवहारि मुख्ये । यथाहिलोके गुरु पुष्य पूर्णा ॥३८॥ भुजार्जिताया निज चारु सपो । न्याय- र्जितायाः फलमिष्टमिता। वांणागफ्ट शीतगु १६६५ रस्य हायने । विधापित रसेनति नल मंडरः ॥३९॥ चतुष्किले देअपि पारयो वयो। र्मापा निशानेन विद्यापित हमे। पित्रोर्यशः कीर्ति रुने इव स्वयोः। फत्ता द्वयं तोडर मृत्र धारकः ॥२०॥ यिविध वादि मतं गज लेसरी। कपट पंजर संग कृते करी । तब पयोघि समुत्तरणे तरी। प्रयल धैर्य हरैर्वसनेदरी ॥४१॥ असम भाग्य पधरपसागरः । रय गुण गंजित नायक नागरः । विजय सेन गुरु स्तप गच्छ राड्। विजयते जय तेज उदाह गः ॥२॥ द्वाभ्यां युग्मं । नाम्प होदयि रक्यो विजयते विजय सूरोशः । सो उचिसयाल मानायनम नात्या जनूचानाः ॥४३॥ तेषां निदेशेन सो विना करें: गगा नगासिल गद गोरे जिनालयोय प्रशिक्षा बधूबरें । प्रविष्टियो दादा लम्धि नागरः ॥१४. पहिन पनि प्रभावः प्रो विजय कुशल विवय वरारोपा शिन्दर चित्र प्रस्तरेण प्रिनि- रमायि ॥१५॥ श्री सहज सागर तुधो दिप य सागर. प्रास्तम! मी सिद्कोर्णा वर तोहर सूत्रधारेण ॥२६॥ । । ।
(२२६ )
सेवाड़ी।
मारवादके गोड़वाड़ इलाकेके वालो जिलेके समीप यह प्राचीन स्थान है।
श्री महावीर जी का मंदिर ।
( 835)
17
प
#. ११६० क्षेत्र मु०६ महाराजाधिराज श्री अश्यराज राज्ये। श्रो कदर
। गर्मी पाठाय पत्ये जगती श्री धर्मनाथ देवसां नित्य पज्जाय। गा
wiringin पीनेण असिम नाज पुत्रेण उप्पल राकेन। मां गढ़ आंचल
iv. गदि कुटुप समं । पदांडा ग्रामे तथा मेद्र'चा ग्रामे तथा कि
र कार पनि दशः जन्म हारकः ॥ एक यः कोपि लापयिष्यति ।
::' कायाः सदा मटियक्ष्यति। इति मत्या प्रतिपालनीयं। यस्य या
नए सदाकाष्ट । यभित्र गुफा भुक्ता राजभिः सगरादिभिः ११॥
प
(829)
• याद ,
- उन मामा मामा परनाकारिणी शांतिः। विधुध पति विनुन
4 7 नामोदन प्रतापायः श्री मटण हिप भूमि ।
२१ गठन किया नही ॥२॥ नपुत्रः चाहमाना नामन्यये नीतिमा
र भन्या मात्र समाप्रयः ॥३॥ नन्न नृजाना जातः प्रभाषा
र सवार मनिकना बर: net कटकानि नपाध
* 25 विधान बन्य विस्मिनः॥७तटुकी पन नं रदय शमी पर
xxz स्याम मोपचामाद त्रिम
.
११
( २२७)
यशोदेको बलाधिपः। राज्ञां महाजनस्यापि सनायामग्रणी स्थितः ॥७॥ श्री पंडेरक
सग्दच्छे बंधूनां सुहृदां सतां । नित्योपकुर्वता येन न प्रांतं समचेतसा ॥८॥ तत्सुतो
बाहहो जातो नराधिप जन प्रियः। विश्व कर्मेव सर्वत्र प्रसिद्धो विदुषां मसः
॥ तत्पुत्रः प्रथितो लोके जैन धर्म परायणः । उत्पन्नः थल्लको राज्ञः प्रसाद गुण
मंदिर ॥ १० ॥ दया दाक्षिण्य गांलार्य बुद्धिचिध्यान संयुक्तः। श्री मस्कटुक राजेन यस्य
दानं कृतं शुभं ॥ ११॥ मात्र्यंवक संप्राप्तौ वितीर्णं प्रति वर्षकं । ट्रम्माष्टकं प्रमाणेन
पल्लकाय प्रमोदतः ॥१२॥ पूजाऱ्या शांसि नाथस्य यशोदेवस्य खत्तके। प्रवर्द्धयतु चंद्राई
यावदादनमुज्यलं ॥ १३ ॥ पितामहेन तस्येदं समीपाट्यां जिनालये। कारितं शांति
नाथस्य वियं जन मनोहरं ॥११॥ धर्मेण लिप्यते राजा पृथिवीं सुनक्ति यो यदा।
ब्रह्महत्या सहखेण पातन विलोपयन् ॥१॥ संवत् ११७२ ॥
(87)
।
॥ संवत् ११८८ असोज पदि १३ रयो अरिष्ट नेमि पर्व दिवायां अ परिक्षा
भने भित्ति द्वार पत्रे पर्तुलनाते कत्तु मम च गोप्ट्या मिरित्या निषेधः कृतः ॥ टिरियन
पं० अश्वदेवेन।
(SS)
पघर
सं० १२४१ लासाट घदि रवी लो संभव दे पा दिया . . . . .
-तुदि ११ जंसो- - - हेदर जिन देव । - - . गदि विमा
हेतु श्री बहेव ।
शादि पदिमा
दे पार देव
५रवो
पप शांवव।
-
ॐ॥ सं१२५६ कार्तिक मदिर र बामका मावि मी
है
. ( २२८ ) निज गुरु श्री शालि भद्र सूरि मूर्ति पूजा हेतो श्री सुमति सूरिभिः । प्रदतात् बलाः ५ मास पाटकेने चके बययनीयाः॥छ। (880) R॥ संवत् १२८७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि २ गुरौ यासहड़ वास्तव्य अजाजल गोत्र श्रेष्ठि चांदा सुत नाना देव सधोरण सुत आस पाल गुण पाल सेहड़ सुत पूस देव साधूदेव पूसदेव सुत धण देव सहड़ भायां शीत पुत्रिका साजणि जाल्ह सती रण आर्या राहीअई- सेहड़ मार्या अइहव सूमदेव भार्या मदावसि सावदेव भार्या प्रहल सिरि कुटुब समुदायेन सेहड़ेन मार्या समन्वितेन देव कुलिका कारापिता ॥ मेद पुत्रिका दैह साहुसा उसनदासेन सुभं भवत् ॥ सांडेराव। ॥ यह भी मारवाड़के बाली जिले में है। श्री शांतिनाथजी का मंदिर । ( 881 ) भी पंडेरक चैत्ये पंडित। जिन चन्द्रेण गोष्ठियुतेन धीमता देव नाश गुरो मूर्ति कारिता घिरपाल मुक्ति बांछसां सं० ११४९ वैशाख वदि-। (882) ६ . सं० १२ - - वर्षे फागुण सुदि ११ गुरौ अद्यह श्री पंडेरक निवासी श्रष्टि गुणपाल गो-.- ला - - सुखमिणि नामिकाया। श्री महावीर देव चेत्ये चतुष्किका ( २२६) ( 883 ) ॐ ॥ संवत १२२१ माघ बदि २ शुक्र अद्येह श्री केल्हण देव विजय राज्ये। तस्य मातृ राज्ञी श्री आनन देव्या ओ पंडेरकीय भूलनायक श्री महावीर देवाय चैत्र वदि १३ कल्याणिक निमित्तं राजकीय लोग मध्यात्। युगंधर्याः हाएल एकः प्रदत्तः। तथा राष्ट्रकूट पातू केल्हण तद्भातृज जत्तमसीह सूद्रग काल्हण आहड आसल अणतिगा- दिक्षिः तला रानाव्यथस गटसत्कात् । अस्मिन्नेव कल्याण केद्र १ प्रदत्तः ॥१॥ तथा श्री पंढेरक वास्तव्य रथकार धणपाल सूरपाल जोपाल सिगडा अमियपाल जिसहड- देल्हणादिभिः चैत्र सुदि १३ कल्याणके युगंधर्याः हाएल एफ १ प्र (884) सम्बत् १२३६ कार्तिक यदि२ बुधे अद्यह श्री नड्ले महाराजाधिराज श्री केद्रण देव कल्याण विजय राज्ये प्रवर्तमाने राज्ञी श्री जाल्हण देवि भुको यो पंडेरक देव श्री पार्श्वनाथ प्रतापतः थांथा सुत राल्हाकेन ना भ्रातु पाल्हा पुत्र सोढा सुनकर रामदेव घरणि यवोहीप बर्द्धमान लक्ष्मीधर सहजिग सहदेव सहियगछा ? रासां धोरण हरिचन्द्र परम श्रेयोर्थ विदित निज गृहं पदत्तः ॥ राल्हाश सत्क मानुषै यसद्भिः वर्ष प्रति ट्रा० एला ४ प्रदेया। शेष जनानां यसतां साधुभिः गोप्टिक सारा कार्या ॥ संवत १२६६ वर्षे ज्येष्ट सुदि १३ शनी सोय उधृत । थांथा सुत राल्हा पाल्हाभ्यां मातृ पद श्री निमित्त स्तंन्तको प्रदत्तः घर देवादिभिः युतेन म मातृ धारमति पुनः स्तंनको नाना मारवाड़के वाली जिले में यह ग्राम है। (85) संवत १२०३ वैशाख सुदि १२ सोम दिने को नहेत नरितिः प्रनिष्ठिनः मनम्नः ।
(२३०)
( 886 )
संवत १४२९ माह यदि ७ चंद्र श्री विद्याधर गच्छे मोढ ज्ञा० ठ० रत्न ठ० अ
ठं तिहणा पुत्र नोन्द देव श्रेयसे सात टाहाकेन श्री पार्श्व पंचतीर्थी का० प्र० श्री उ
देव सूरिभिः ।
( 887 )
सं० १५०५ वर्षे माह यदि शनौ श्री ज्ञावकीय गच्छे महाबीर विवं प्र० श्री शां
सूरिभिः षा ण जिन
अवतं
( 888 )
सं० १५०६
वर्ष
माघ वदि ११ सा० दूदा वीर मं महिया
लहराज
-
( 889 )
सं १५०६ वर्षे माघ यदि १० गुरी गोत्र वेलहस ज० ज्ञातीय सा० रतन भार्या रतना
दे पुत्र दूदा वीरम माह पादे पलू णा देव राजादि कुटुम्ब युतेन श्रीवीर परिकरः कारित
प्रतिष्ठितः श्री शांति सूरिभिः ।
(890)
॥ ॥ अथ संवत्सरे नप विक्रमादित समयास संवत १६५६ भाद्रपद मासा शुक्ल
पक्ष७ सातमी तिथौ शनिवारे। श्री बैद्य गोत्रे। श्री सविया किण्णोत्रजा। मंत्रीश्वर
त्रिभुवन सत्पुत्र पूना० तत्पुत्र मुहता चांदा तत्पुत्र मु० षेतसी तत्पुत्र मुहता नीसल ?
चाइमल २ वीसन पुत्र मुहता श्री उरजन तत्पुत्र मुहता पतागढ़ सिवाणे साको करी
। पिता पुत्र मुहता श्री नाराइण
साटूल २ सूजा ३ सिंघा १ सहसा ५ मुहता
नारायण नुराणा श्री अमर सिंघ जी मया फरेने गांव नाणो दीयो मुहतो नाराइण
रहट १ लाईमल देव श्री महावीर नु सतर भेद पूजा सारु केसर दीबेल सारु दीधी
वले जणयल - होटूनां बरोस। उत्थापे तियेनु गाईरो--सुस। तुरक उत्यापे तियेनं सुयररी संस को उथाप जो गांव नाणारे चढ़ियो गांव वीपलाणे -- वो-सि-ए। इजाएन - गांव - दम १ चेटियो तको उथाप जरे । वीजोको उथापसी तिमनु गदहउ गाव मुहत्ता श्री नारायण रार्या नवरंगदे तत्पत्र सु० श्री राज -- दा पुत्री जपनी नारायण विजी भार्या नवलदे पुत्र जसवंत १ सहितं श्री गच्छै बहारक श्री सिद्ध सूरि विद्यमाने -चंद शिष्य चांपा लिषितं । ए जलो तिणु - - लालराई। १ । श्री -1 मारवाड़के वाली जिलेके समीप इस ग्रामके एक प्राचीन संडर जैन मंदिरमें यह लेख है। ( 891 ) ३ संवत् १२३३ वैशाख सुदि ३ संनाणक झोक्ता राज पुत्र लाखण पाल राज पुत्र अनय पाल तस्मिन राज्ये वर्तमाने चा० नीवड़ा पड़ि देह पसी सू. आसघर समस्त सीर सहित खाडि सीर जव मध्यात् जवा ते ४ गूजरी जात्रा निमित्त श्री शांति नाथ देवस्य दत्ता पूण्याय यः कोपि लुप्यते स पापो न छिद्यतेमंगल भवतू ॥ तथा अड़िया उल्ल जरहह आसधर सीरोइय तमत्त तीरण जवा हरोथु १ गूजर हयात्रहि वील्हस्य युण्याचं ॥ १॥ (E) *॥ संवत् १२३३ ज्येष्ठ यदि १३ गुरो लदह भी नहूले महाराजाधिराज श्री केहहण देव राज्ये वर्तमानः प्रो कीर्तिपाल देव पुत्रै मिना जाता राज पुत्र छाप ( २३२ ) पारह राज पुत्र अभय पाल राज्ञी श्री महिबल देवि सहितः श्री शांतिनाथ देव यात्रा निमित्त भडिया उव अरघट उरहारि मध्यात् गूजर तुहार १ जवा ग्राम पंच कुल दानं कृतं पुण्याय साक्षि अत्र वास्त -गण -सी० देवलये समीपाटीय पाजून आप्र- समक्ष आदानं -मितस्य २त हत्या पातकेन लि-.- ११॥ समक्षि एतत् - . हटुंदी। मारवाड़ के गोड़वाड़ इलाके के बीजापुर के पास यह प्राचीन स्थान है। श्री महावीरजी का मंदिर । ( 893 ) ॐ ॥ सं० १२९६ वर्षे चैत्र सुदि ११ शुक्र श्री रत्न प्रमोपाध्याय शिष्यः श्री पूर्ण चन्द्रोपाध्याय रालक द्वय शिखराणि च कारितानि सर्वानि । ( 894 ) ॐ सं० १३३५ वर्षे धाम्वण यदि १ सोमे उद्यह समीपाही। मंडपिकायां भी पाहट उन्नां वां । पथरा महं सजन उ महं. धीणा उधण सीह उ० १० देव सिंह प्रमृति पंच कुलेन भो रातानिधान श्री महावीर देवस्य नेचाप्रचयं ? वर्ष स्थितिके कृत द्र० २१ चत्व विंशति। दमाः वर्ष वर्ष प्रति समी मंडपिका पंच कुलेन दातव्याः पाठनीयात्र बहुभिर्वसुधा मुक्ता राजभिः सगरादिभिः यस्य यस्य तदा फलं. शुभं भवतु॥ यदा भूमि तस्य तस्य
(२३३)
( 895 )
सं० १३३६ वर्षे प्रौष्टिको नाग श्र। श्रे अर सोहेन सय पक्ष दत्त द्र० उमयं द्र ३६
समीपाटी मंडपिकायां व्याष्टपय माण पंच कुलेन वर्ष वर्ष प्रति आचंद्रार्क . - यावत्
दातव्याः। शुलमस्तु
(896 )
ओं नमो वीतरागाय सेवट १३४६ वर्षे श्रावण वदि ३ शुक्र दिने सहेड़ा ग्रामे
महादपाल लतारावा कर्म सीहपा
माताज'के मंदिरके स्तम्भ पर ।
(SOP)
॥ ॥ नमो बोत रागाय ॥ संवत् १३१५ वर्षे प्रथम माया यदि र गुम दिने यो
श्री
नहूल मंडले महाराज कुल श्री सम्पंत सिह देव राउनेत्र तन्नियक पा॥ श्री जरा
महं ललनादि पंच कुल प्रच्छति भुमि सनराणि पपा गमो गय पदिशा मनपामा
साधु ० हेमाकेन मावि हाधीउड़ी ग्रामें श्री महायोर देय नेवायंग प्रति ari -
२१ चस्वविसि द्रमा प्रदत्ता शुन्न वतु ॥ शिशुधा मला मा गगगदिपि।
जस्य जस्य जदा सूमो तस्य तस्य रदा फल ।। बहर विजय दिपना
खण्डहर में मिला हुआ पापाय पर |
..mhrat
॥ विरके - पजे रक्षा सरमा मा.
जिनाः ॥१॥ ते व तु जिला दिनमा
+
.
(२३४१ 1 - रोखर नख श्रेणीषु विम्योदयात् । प्रायै कादशभिग्गुणं दराशसो शक्रस्य शुम्मट्टशां कस्प स्योद्गुण' कारको न यदि वा स्वच्छात्मनां सङ्गमः ॥२॥ नासत्करीलोय शोभितः। सुशेखर - - लौ मूईि रूढों महीभूतां ॥३॥ अनि बिभ्रद्रुचिं काता सावित्री चतुराननः हरिव िवभूवात्र भूविभुवनाधिकः ॥४॥ सकल लोक विलोचन पंकज स्फुरदनं बुद बाल दिवाकरः। रिपु बध्वदनेन्दु हृन द्यनिः समुदपोदि विदग्ध नप- स्ततः ॥५॥ स्वाचाय या रुचिर बचनर्वासुदेवाभिधाने बाघ नीतो दिनकर करैन्नीर जन्मा करो व। पूर्व जैनं निजमिव यशो कारयद्धस्तिकुण्या रम्यं हर्म्य गुरु हिम गिरेः शृङ्ग शृङ्गार हारि ॥६॥ दानेन तुलित बलिना तुलादि दानस्य येन देवाय । भागद्वयं व्यतीर्यत मागश्चाचार्य वर्याय ॥७॥ तस्मादनूच्छुद्ध सत्त्वो मंमटाख्यो महीपतिः । समुद्र बिजयी श्लाघ्य तरवारिः सदूर्मिकः ॥८॥ तस्माद समः समजनि समस्त जन जनित लोचनानंदः। धवलो बसुधा ब्यापी चंद्रादिव चन्द्रिका निकरः ॥६॥ क्तवाधार्ट घटाभिः प्रकटामिव मदं भेदपाठे अटानां जन्य राजन्य जन्ये जनयति जनता रण मुज राजे । श्रीमाणे प्रणष्ट हरिण इव भिया गूजरेशे विनष्ट तत्सैन्यानां शरण्यो हरिरिव शरणेयः सुरणा बभूव ॥१०॥ श्री महलम राज भूभुजि भजै जत्य भंगां भुवं दंडै भैण्डन शौंड चंड सु भटै स्तस्याभिभून विभुः। यो दैत्यरिव तारक प्रभूतिभिः श्री मान्महेद्रं पुरा सेनानीरिव नीति पौरुष परो नैषीत्परां नितिं ॥११॥ यं मूलादुद मूलयद्गुरु बलः श्री मूल राजो नृपो दाधो धरणो बराह नृपतिं यद्वद्द पिः पादपं । आयात भुविकां दिशी कमभिको यस्तं शरण्यो दधौ दंष्ट्रायानिव रूढ मूढ महिमा कोलो मही मण्डलं ॥१२॥ इत्यं पृथ्वी भर्तृभिर्नाथ मानः सा नायो वा विपक्षात्स्व पक्षा रक्षा कांक्ष रक्षणे बटु कक्षाः ॥१३॥ दिवाकरस्वेव करैः कठोरैः फरालिता भुर कदम्बकस्य। अशि श्रियं ताप हृतोरुताप यमुन्नतं पादप वज नौवा ॥ १४ ॥ धनुर्द्धन शिरोमणे रमल धर्ममभ्यस्यतो जगाम जलधेग्गुणो गुहरमुप्य पारंपरं। समोयुरपि सन्मुखाः सुमुख मार्गणानां गणाः ससां चरितमद्भुतं सकलमेव सुस्थितैरास्थितोयः । पायो
( २३५ )
डोहोत्तरं ४१५॥ यात्रासु यस्य वयदौर्ण विपुर्बिशेषात् वल्गत्तु रंग खुरसात मही
रजांसि। तेजोनिजिर्जत मनेन विनिर्जित त्वाद्धास्वान्विलज्जि त इवातितरां तिरो.
सूत् ॥१६॥ न कामना मनो धीमान् घ - लनां दधौ । अनन्योद्धार्य सस्कार्य भार धुर्योर्थ-
तोपि यः ॥१७॥ यस्तेजोझिरहस्करः करुणया शौद्धोदनिः शुद्धया। भीष्मो वंचन वंचितेन
बरसा धर्मेण धर्मात्मजः। प्राणेन प्रलाय निलो बलमिदो मंत्रेण मंत्री परो रूपेण
ममदा प्रियेण मदनो दानेन कोभवत् ॥१८॥ सुनय तनयं राज्ये याल प्रसाद मतिष्ठिप
त्परिणतवया निःसंगो यो यचूत सुधीः स्वयं । कृत युग कृतं कृत्वा कृत्यं कृतारम चमकृ.
ती रकृत सुकृतीनो कालुप्यं करोति कलिः सतां ॥१॥ काले कलावपि किलामलमेतदीयं
लोका विलोक्य कलनातिगतं गुणौघं । पार्थादि पार्थिव गुणान् गणयन्तु सत्यानेकं व्यघा-
हगुणनिधि यमितीव वेधाः ॥२०॥ गोचरयति न वाचो यच्चरितं चंद्र चंद्रिका रुचिरं ।
वाचस्पते वचस्वी को वान्योवर्णयेत्पूर्ण ॥२१॥ राजधानी भुत्रो मर्तु स्तस्यास्ते हरित
पुण्डिका अलका धनदस्येव धनाट्य जन सेविता॥२२॥ नीहार हार हर हास हिमांशु हारि
तारकार वारि भुवि राज विनिर्जराणां। वास्तव्य भव्य जन चित्त समं समंतात्संताप
संपद पहार परं परेषां ॥२३॥ धौत कल धौत कलशामिराम रामास्तना इव न यस्यां । सत्य
परेप्य पहारा: सदा सदाचार जनतायां ॥२४॥सनद मदनालीलालापाः प - ना कुलाः कुवलय
इशां संदृश्यते दृशस्तरलाः परं। मलिनिस मुखा यत्रोवृत्ताः परं कठिनाः कुधा निविड
रचना नीवी बंधाः परं कुटिलाः कचाः ॥२५॥ गाढ़ोत्तुंगानि साटुं शुचि कुच कलरी:
भामिनीनां मनोज्ञौविस्तीर्णानि प्रकामं सहं धन जघनैर्देवता मंदिराणि । भाजते दभ्र
शुभ्राण्यतिशय सुनगं नेत्र पानः पवित्रः सत्रं चित्राणि धात्रो जन हुन हृदयविनमयंत्र
सत्रं ॥२६॥ मधुरा धन पाणो हृद्यरूपा रसाधिकाः। यत्रे, वाटा लोकेभ्यो नालि-
इत्यादिदेलिमा: १२७ अस्यां सूरिः सुराणां गुरु रिव गुरुनि गौरवार्थी गुणोघे न पाटानां
त्रिलोकी ब्लय विलसिता नंतरानंत कीर्तिः। नान्ना श्री शांति भद्रो भवन्ति भवितुं
भासमाना तमानोकामं कामं समर्धा जनित जनमनः संनदा यस्य मूर्तिः ॥२८॥ मन्येमुना
मुनीन्द्रेण मनोनू रूप निर्जितः । स्वप्नेपि न त्वरूपेण समगन्स्ताति एज्जतः ॥२८॥
। ( २३६ ) प्रोद्यत्पद्माकरस्य प्रकटित विकटा शेष भावस्य सूरेः सूर्यस्येवामृताशुं स्फुरित शुभ रुचि वासुदेवानिधस्य। अध्यासीनं पदव्यां यम मल विलसज्ज्ञान मालोक्य लोको लोका लोकावलोकं सकलमचकलत्केवल संभवीति ॥३०॥ धर्माभ्यास रतस्यास्य संगतो गुण संग्रहः। अन्नग्न मार्गणेच्छस्य चित्रं निर्धाण वांछना ॥ ३१ ॥ कमपि सर्वगुणानुगत जनं विधिरयं विदधाति न दुर्विधः । इति कलंक निराकृतये कृती यमकृतेव कृताखिल सद्गुणं "३२॥ तदीय वचनान्निजं धन कलन पुत्रादिकं विलोक्य सकलं चलं दल मिया- निलांदोलितं । गरिष्ठ गुण गोष्ठ्यदः समुददी धरवीर धीरुददार मति सु कृन्मंदिरं ॥३३॥ रक्तं वा रम्य रामाणां मणि ताराव राजितं । इदं मुख मिया भाति प्रास मान वरालकं ॥३४॥ चतुरस्न पट उजन घाड्डनिक शुभ शुक्ति करोटक युक्त मिदम् । बहु भाजन राजि जिनायतन प्रविराजति भोजन धाम समं ॥३॥ विदग्ध नप कारिते जिन गृहेति जीपणे पुनः समं कृत समुद्धताविह भवांबुधिरात्मनः । अतिष्टिपत सोप्यथ प्रथम तीर्थ नाथा कृतिं स्वकीर्तिमिव मर्ततामुपगता सितांशु युति ॥३६॥ शांत्याचार्य खि- पंचाशे सहस्र शरदा मियं । माघ शुक्ल त्रयोदश्यां सुप्रतिष्ठः प्रतिष्ठिता ॥३७॥ विदग्ध नृपतिः पुरा यद तुलं तुलादेर्ददौ सुदान मवदान धारिदम पोपलन्नाद्भुतं । यतो धवल भूपतिर्जिनपतेः स्वयं सात्मजोरघहमथ पिप्पलोप पद कूपकं प्रादिशत् ॥३८॥ यावच्छेष शिरस्थ मेक रजतस्थ्णा स्थिताभ्युल्ल सत्पातालातुल मंडपा मल तुलामा लंबते भूतलं । तावत्तार रवाभिराम रमणी गंधर्व थीर ध्वनिर्धामन्यत्र धिनातु धार्मिक धियः सदुप वेला विधौ ॥३६॥ सालंकारा समधि करसा साधु संधान बंधा श्लाघ्यश्लेषा ललित विल- सत्तद्धिता ख्यात नामा। सत्ताट्यारुचिर विरतिद्धर्यमार्यवर्या सूर्याचाथै यरचिरमणी वाति रम्या प्रशस्तिः ॥४०॥ सम्बत १०५३ माघ शुक्ल १३ रवि दिने पुष्य नक्षत्रे श्री ऋषा नाथ देवस्य प्रतिष्ठा कृता महा ध्वज श्चारोपितः ॥ मूलनायकः ॥ नाहरू जिन्दज सशम्प पूरभद्ः नागपोचिस्थ श्रावक गोष्ठिकर शेष कर्म क्षया) संतान भवाब्धि तरणार्थं च न्यायोपार्जित वित्तन कारितः ॥३॥ परवादि दर्प हेतु नय सहस्र मंगकाकीपण । भव्य. जन दुरित शमनं जिनेंद्र वर शासन ॥१॥ आसीद्धी धन संमतः शुभगुणो भास्वत्प्रतापोज्ज्वलो विस्पष्ट प्रतिमा .. ( २३७ ) प्रभाव कलितो भूपत्तिमांगार्चितः। योषित्पीन पयोधरांतर सुखाभिष्वङ्ग सन्लालितो यः श्रो मान्हरि धर्म उत्तम मणिः सदंश हारे गुरी ॥२॥ तस्माद्वभूव भुवि भूरि गुणोपपेतो भूप मभूत मुकुटार्चित पाद पीठः। धी राष्ट्रकूट कुल कानन कल्प वृक्षः श्री मान्विदग्ध नपतिः प्रकट प्रतोपः ॥३॥ तस्माद प गुणान्वित तमा कीतः परं माजनं संभूतः सुतनुः मुताति मतिमान् श्री ममटी विश्रुतः । येनास्मिनिज राज वंश गगने चंद्रायितं चारुणा सेनेदं पितु शासनं समधिकं कृत्वा पुनः पाल्यते ॥४॥ वलन्नद्राचार्य विदग्ध नूपपूजितं अमभ्यर्य । आचंद्रा यावदत्त भवते मया प्रपाल्यते सर्वम् ॥॥ श्री हस्ति कुडिकायां त्य गृहं जन मनोहरं जक्त्या। श्री मट्टलभद्र गुरोर्याद्वहितं श्री विदग्धेन ॥६॥ तस्मि- ल्लोकान्समाहूय नाना देश समागतान । आचंद्रार्क स्थितिं यावच्छासनं दत्त मक्षयं ॥on रूपक एको देयो बहतामिह विंशतेः प्रवहणानां । धर्म क्रय विक्रयेच तथा ॥८॥ संत गंध्या देयस्तथा वहत्याइच रूपकः श्रेष्ठः। घाणे घटे च को देयः सर्वेण परिपा- या ॥६॥ श्री महलोक दत्ता पत्राणां चोल्लिका त्रयोदशिका। पेललक पेल्लक मेतद्ध यूत करैः शासने देयं ॥१०॥ देयं पलाश पाटक मर्यादावर्तिक प्रत्यर घट्ट धान्या- ढकं तु गोधूम यव पूर्णं ॥११॥ पेड्डा च पंच पलिका धर्मस्य विशोपक स्तया मारे। शासन मेतत्पूर्व विदग्धेन राजेन दत्तं ॥१२॥ कर्पासकांस्य फुकुम पुर मांजिष्ठादि सर्व भांडस्य । दश दश पलानि नारे देयानि विक - ॥१३॥ आदानादे तरमाद्धाग द्वय मर्हतः कृतं गुरुणा । शेषस्तृतीय भागो विद्या धनमात्मनो विहिन॥१४॥ राज्ञा तत्पुत्र पोत्रैश्च गोष्ठ्या पुरजनेन च । गुरुदेव धनं रक्ष्यं नापेक्ष्यं हितमीप्नुतिः ॥१५॥ दन्ने दाने फलं दानोत्पीलिते पालनात्फलं । अक्षिता पेक्षिते पापं गुरुदेव धनेधि ॥१६॥ गोधम मुदग यव लवण रालकादेस्तु मेयजा तस्य । द्रोणम प्रति माणकमेक मन्त्र मध्यण दाम यमय रुप पदा सुमिरतन्य नाय ॥१७॥ बहुभिर्वसुधा भुक्ता राजतिः सगरादितिः । तदा फलं ॥१८॥ राम गिरि नंद कलिते विक्रम काले गने नु गुचिनाने। श्री मायामा गुरोविदग्ध राजेन दत्त निदं ॥१॥ नबनु शतेषु गतेषु तु पाणवनी ममधि केषु मात्रय कृष्ण कादश्यामिह समर्पितं मम पेण यादवर भूमि FIनु र सागधी । (२३८ ) भारती भास्वझानि भुजङ्ग राज भवन भाजद् भवांभोदयः। तिष्ठन्त्यत्र सुरासुरेंद्र महित जैनं च सच्छासनं श्री मस्केशव सूरि सन्तति कृते तावत्प्रभूयादिदम् ॥२१॥ इदम् चाक्षय धर्म साधनम् शासनम् श्री विदग्ध राजेन दत्तं ॥ सम्बत २७३ श्री मंमट राजेन समर्थितम् सम्बत् ६६६ ॥ सूत्रधारोद व शत योगेश्वरेण उत्कीर्णे यम् प्रशस्तिरिति । जालोर। मारवाड़का यह भी बहुत प्राचीन स्थान है। इसका प्राचीन नाम जावालीपूर था। तोपखाना। ६ ( 899 ) लक्य लक्ष्मी विपुल कुलगृहं धर्मवृक्षालवालं। श्री मन्ना भेय नाथ क्रम कमल युगं मंगलं व स्तनोतु। मन्ये मंगल्य माला प्रणत अव भूतां सिद्धि सोध प्रवेशे यस्य स्कंध प्रदेशे विलसति गल श्यामला कुसलाली ॥१n श्री चाहुमान कुलांवर मृगांक श्री महाराज अणहिला न्वयोवद्गनव श्री महाराज आल्हण सुत यावली दुर्ललित दलित रिपुवठ श्री महाराजकीर्तिपाल हेत्र हृदयान दिनंदन महाराज श्री समर सिंह देवकल्याण विजय राज्ये सह पाद पद्मोपजीविनि निज प्राढि मातिरेक- तिरस्कृत सकल पील्वाहिका मंडल सस्कर व्यतिकरे। राज्यचिंतके जोजल राजपुत्रे इस्येवं काले प्रवर्त्तमाने। रिएकुलकमलेंदुःपुण्यलावण्यपात्रं नय विनय निधान धाम सौंदर्य लक्ष्म्याः। धरणि तरुण नारी लोचनान'दकारी जयति-समर सिह क्ष्मा पतिः सिंह वृत्तिः ॥२ तथा ॥ औत्पत्तिकी प्रमुख युद्धि चतुष्टयेन निर्णीत भुप अवनोचित कार्य वृत्तिः। यन्नातुलः समभवत् किल जो जलाहो खंडित दुरत विपक्ष लक्षः ॥३ श्री चंद्रगच्छ मुख मंडन सुविहित यतितिलक सुगुरु श्री श्री चन्द्रसूरि धरण नलिन युगल दुर्ललित राजहंस श्री पूर्ण अद्र सृरि चरण कमल परि चरण चतुर मधु- करेण समस्त गोष्टिक समुदाय समन्वितेन श्री श्रीमाल वंश विभूषण श्रेष्टि यशोदेव सुतेन सदाज्ञाकारि निज-तृययोराज जगधर विधीयमान निखिल मनोरथेन श्रेष्टि यशोवीर ( २३६ ) परम पावकेण संवत् १२३६ वैशाख सुदि ५ शुरी सकल त्रिलोकी तलानोग भ्रमेण परिश्रांत कमला विलासिनी विश्राम विलास मंदिरं अयं मंडपो निर्मापितः ॥ तथा हि ॥ नाना देश समागतैर्नवनवैः स्त्री पुंसवर्गे मुंहु यस्य -- -- पाव लोकन परेनों तृप्तिरासाद्यते। स्मारं स्मारमघो यदीय रचना वैचित्र्य विस्फूर्जितं तैः स्वस्थान गतैरपि प्रतिदिनं सोत्कं- उमावर्ण्यते ॥ १॥विश्वंतरावर वधू तिलई किमेतल्लीलारविंदमथ किं दुहितुः पयोधेः । दत्त सुरै रमृत कुंड मिदं किमत्र यस्यावलोकनविधी विविधा विकल्पाः ॥५॥ ग पूरेण पातालं. प महीतलं । तुंगत्वेन ननो येन ध्यानशे भुवन त्रयं ॥ ६॥ किं च ॥ स्फूर्ज- पोमसर: समीनमकरं कन्यालिकुनाकुलं मेपाढय सकुलीरसिंह मिथुनं प्रोद्यवृपालं. कृते । ताराकैरवमिंदुधाम सलिलं सद्राजहंसास्पदं यावत्तावदिहादिनाय अपने नंद्यादसी मंडपः ॥ ७॥ कृतिरियं श्री पूर्ण भद्र सूरीणां ॥ भद्मस्तु श्री संघाय ।। - ( 899 ) ओं ॥ संवत् १२२१ श्री जावाठिपुरीय कांचनगिरि गढ़स्योपरि प्रभु श्री हेम सूरि प्रयो. घित गूर्जर घराधीश्वर परमाईत चौल्लक्य ॥ महाराजाधिराज श्री कुमार पाल देव कारिते श्री पार्श्वनाथ सत्कमूल विंध सहित श्री कुवर विहारान्निधाने जैन चैत्ये । सद्विधि प्रय. नाय वृहद्गछीय यादींद्र देवाचार्यामां पक्ष लाचंद्रा समर्पिते ॥ सं० १२१२ वर्षे एतद्देशाधिप चाहमान कुल तिलक महाराज श्री समर सिंह देवादेशेन मां पागू पुत्र प्रा. समुह से । श्री मद्राजकुलादेशेन प्री देवा चायं गिप्यः प्रो पर्ण देवाचार्यः । सं० १२५१ वर्षे ज्येष्ठ सु० ११ श्री पार्श्वनाथ देवे तोरणादीनां प्रतिष्ठा कार्य कृते । माट शिखरे च कनकमय ध्वजा दंहस्य जा रोपए प्रतिष्ठायां वायां ॥ मं० १६८ वर्षे दीपोत्सव दिने अभिनव निप्पंसप्रेक्षा मध्य नरपे श्री कृष्णदेव मृरि शिष्य श्री रामनं. दाचार्य सुवर्णमय कटसारोपण प्रतिष्ठा ता । मुहं मनु छ । यशोवीरेण - ६ ( २१०) ( 900 ) संधत् १२६४ वर्षे श्री मालीय श्रे० वीसल सुत नाग देवस्तत्पुत्रो देल्हा सलक्षण शोपाख्याः सांवा पुत्रो वीजाकस्तेन देवड़ सहितेन पितृका श्रेयोथै श्री जावालिपुरीय श्री महावीर जिन चैत्ये करोदि कारिताः ॥ शुभ भवतु ॥ (801 ) १ संवत् १३२० वर्षे माघ सुदि १ सोमे भो नाणकीय गच्छ प्रतिबद्ध जिनालये महाराज श्री चंदन विहारे श्री क्षी व रामेश्वर स्थान पतिना महारक रावल लक्ष्मीधरेण देव श्री महावीरस्य आसोज मासे अष्टाहिका पदे द्रम्माणां १०० शतमेकं प्रदत्त ॥तयाज मध्याद मठ पसिना गोष्ठिकैश्च द्रम्म १० दशकं वेधनीयं पूजाविधाने देव श्री महावीरस्य । ( 90% ) औ संवत् १३२३ वर्षे माग सुदि ५ बुधे महाराज श्री चाचिग देव कल्याण विजय राज्ये सन्मुद्रालंकारिणि महामात्यः श्री जक्षदेवे ॥ श्री नाणकीय गच्छ प्रतिबद्ध महा- राज श्री चंदन विहारे विजयिनि श्री मद्धनेश्वर सूरौ तैलं गृह गोत्रोद् अवेन मह नर- पसिना स्वयं कारित जिन युगल पूजा निमित्तं मठ पति गोष्ठिक समक्ष श्री महावीर देव भांडागारे द्रम्माणां शनाई प्रदत्त ॥ तव्याजोद्वेन द्रम्मा?न नेचकं मासं प्रति करणीयं ॥ शुभं भवतु ॥ ( 903 ) ऑ॥ संवत् १३५३ वर्ष वैशाख वदि ५ सोमे श्री सुवर्ण गिरौ अद्येह महाराज कुछ श्री सामंतसिंह कल्याण विजय राज्ये तत्पादपद्मोपजीविनि ॥ राज श्री कान्हदेव राज्य धुरामुग्रहमाने इहैव वास्तव्य संघपति गुणधर ठकुर आंबड पुत्र ठकुर जस पुत्र सोनी महणसीह भार्या माल्हणि पुत्र सोनी रतनसिंह णाखी माल्हण गजसीह तिहुणा पुत्र सोनी नरपति अयता विजयपाल नरपति भार्या नायकदेवि पुत्र लखमीधर भुवण ( २११) पाल सुहहपाल द्वितीय आर्या जाल्हण देवि इत्यादि कुटंब सहितेन भार्या नायक देवि मेयो देव प्रो पार्श्वनाथ चैत्ये पंचमी बलि निमित्त निमा निक्षेप हहमेकं नरपतिना दसं सत् माटकेन देव श्री पार्श्वनाथ गोष्ठिकैः प्रति वर्षः आचंद्रार्क पंचमी वलिः कार्या ॥ शुश तवतु ॥ छ॥ ॥ महावीरजी का मन्दिर । ( 804 ) -- संवत् १६८१ वर्षे प्रथम क्षेत्र वाद ५ गुरो अोह श्री राठोड़ वंशे श्री सूरि सिंह पह श्री महाराजे श्री गजसिंह जी विजयि राज्ये....."मुहणोन गोत्रे वृद्ध उसवाल ज्ञातीय सा० जेसा तार्या जयवंत दे पुत्र सा० जयराज नार्या मनोरथदे पुत्र सा० सादा सुमा साम तुरताण प्रमुख परिवार पुण्यार्य श्री स्वर्ण गिरि गढ़ादुर्गी परिस्थित श्री मत कुमार विहारे श्री मती महावीर चैत्ये सा० जैसा भार्या जयवंतदे पुत्र सा० जयमल जी वृद्ध मार्या सरूपदे पुत्र सा० नइणसी सुन्दरदास आस करण लघुजार्या सोहागदे पुत्र सा० जगमालदि पुत्र पौत्रादि श्रेयसे सा० जयमल जी नाम्ना श्री महाघोर बिंध प्रतिछा महोत्सव पूर्वकं कारितं प्रतिष्ठितं च भो तपा गच्छ पो सुविहिताचारकारक्षशिपिला- घार वारक साधु नियोद्धार कारक श्री ६ जाणंद विमल सूरि पढ़ प्रभाकर श्री विजय दान सूरि पह शृङ्गार हार महा म्लेच्छाधिपति पासशाह श्री अकबर प्रतियोधक तद्दत्त जगद्गुरू विरुद धारक श्रो शत्रुजयादि तीर्घ जीजीयादि कर नौचल पम्मान जमारि प्रवर्तक महारक श्री ६ हीर विजय सूरि पह मुझटायमान १० श्री ६ विजय सेन सूरि पह संप्रति विजयमान राज्य नुविहित जिरः यायमा मा. रक श्री विजय देव सूरीश्वराणामादेशेन महोपाध्याय धी विद्यासागर शिष्य पण्डित भी सहज सागर गणि शिप्य पं. जय नागर गमिना श्रेषले कारक-य॥ , (२४२) (905 ) संवत् १६८३ आषाढ़ वदि गुरौ श्रवण नक्षत्रे श्री जालोर नगरे स्वर्ण गिरि दुगे महाराजाधिराज महाराजा भो गजसिंह जी विजय राज्ये महुणोत गोत्र दीपक में अचला पुत्र मं जेसा भार्या जेवंत दे पु० मं श्री जयल्ला नाम्ना मा० सरूपदे द्वितीय सुहागदे पुत्र नयणसी सुंदरदास आसकरण नरसिंहदास प्रमुख कुटु व युतेल स्व श्रेयसे श्री धर्मनाथ विवं कारितं प्रतिष्ठितं श्री सपा गच्छ नायक भट्टारक श्री हीर विजय सूरि पहालंकार महारक श्री विजय सेन ( 906 ) संवत् १६८३ वर्षे अपाढ़ वदि १ गुरौ सूत्रधार ऊद्धारण सत्पुत्र तोडरा इसर दाहा। दूहा हांराकेन कारापितं प्रतिष्ठितं तपा गच्छ भ० श्री विजय देव सृरिभिः । (907) संवत् १६८३ वर्षे अपाढ़ वदि ४ गुरौ । महणोत्र गोत्र । प्र. जमल भार्या सरूपदे समर्पित । श्री सुपार्श्व विवं । प्रतिष्ठितं तपागच्छे १० -- (908) संवत् १६८३ वर्षे श्री अजित बिंब प्र० त० म० श्री विजय देव सूरिभिः ।। (909) संवत् १६८१ वर्षे माघ सुदि १० सोमे श्री मेड़ता नगर वास्तव्य उकेश ज्ञातीय प्रामेचा गोत्र सिलक सं हर्ष लघु भार्या मनरंगदे सुत संघपति सामीदासकेन भी मुधु नाय विध कारितं प्रतिष्ठितं श्री तपा गच्छे श्री तथा गच्छाधिराज महारक श्री विजय देव सूरिभिः । आचार्य श्री विजयसिंह सूरि प्रमुख परिवार परिकरितैः । श्रीरस्तुः॥
(२४३ )
( 910 )
संवत् १६८३ वर्षे आ० ३० गुरौ भ० लठांक श्री माण विप्र आ. विजयदेव सूरिभिः ।
( 911 )
६
चौमुखजी का भन्दिर।
संवत् १६८१ वर्षे प्रथमा चैत्र वदि ५ गुरौ श्री श्री मुहणोत्र। गोत्र सा० जेसा भार्या
जसमादे पुत्र सा० जयमाल मार्था सोहागदेवी श्री आदिनाथ विवं कारित प्रतिष्ठा
महोत्सव पूर्वकं प्रतिष्ठितं च भो तपा गच्छे श्री ६ विजय देव सूरीणा मादेशेन जय
सागर गणिना।
हरजी
यह मारवाड़के जालोर के पास गांव है।
( 912)
संवत् १२३१ मार्गा सुदि ८० शांति शिष्येण नेमिचंद्रण आत्म अयार्थ प्रदरः ।
( 913 )
संवत् १५१७ वर्षे ज्येष्ठ सुदि ३-वा० श्री मुनिशेपर शिष्य दया र श्री बोरस्य
कया केत॥
(914 )
--
संवत् १५१०
व
फागुण तुदि ११ दिने रा० श्री विष्टास मा मोम रात्र श्राः
॥
५
(२४४ ) ( 915 ) श्री शीले सार्थों मतिर्यस्यातः स्पडा बीर देशिते । महिमा कीर्ति लेखा स्या। तस्य देवेषु दुर्लभा॥ ( 916 ) श्री पज्जु वधू असोचय वहुया भज्जा सुहकर धणिस्स । सो भन सरावि- याए धम्मस्थम कारि लग एसा ॥१॥ ( 917 ) चंदण वाल नासा षा मति सिरी सा-. पी.- लगाकारिता जूना। यह मारवाड़का वाडमेर इलाके में गांव है। (918 ) ओं ॥ संवत् १३५२ वैशाख सुदि १ श्री बाहड मेरौ महाराज कुल श्री सामंत सिंह देव कल्याण विजय राज्ये तनियुक्त श्री २ करणे मं० चीरासेल वेलाउल मां० मिगल प्रभूसयो धर्माक्षराणि प्रयच्छन्ति यथा। श्री आदिनाथ मध्ये संतिष्ठमान श्री विघ्न मर्दन क्षेत्रपाल श्री चउंडराज देवयोः उभय मार्गीय समायास सार्थ उष्ट्र १० वृप २० उमयादीप अई सार्थ प्रति द्वयोर्दवयोः पाइला । पक्ष भीम प्रिय दविशापक अहोर्द्धन ग्रहीतव्याः। ओसो लागो महाजनेन मानितः ॥ यथोक्तं बहुभिर्वसुधा भुक्ता राजभिः सगरादिभिः । यस्य यस्य यदा भूमिस्तस्य तस्य तदा फलं ॥१॥छ ।
( २४५) जूना वेडा (भारवाड) ( 919 ) ॐ ॥ संवत् ११४४ माघ सु० ११७ पतेरं प्रदेव्यास्तु सूनुना जेज्जकेन स्वयं प्रपूर्ण बन मानावं मिलित्वा सर्व बांधवः ॥ १॥ खनके पूर्ण भद्रस्य वीरनाथस्य मंदिरे कारिता वीर नाथस्य श्रेयसे प्रतिमानघा ॥ २ ॥ सूरे प्रयोजनार्यस्य ऐन्द्र देवेन सूरिणा भूपिते सांप्रतं गच्छे निःशेप लय संजुते ॥ ३ ॥ ( 920 ) संदत् १६१४ वर्षे फागुण दि १३ उकेस ज्ञातोय यापणे गोने सेंधधी नीलु जागा दीडम दे पुत्र सं० गोरा भार्या गेलमदे पुत्र रूपा चंदा श्री रावुलिया भागां मन गोरे पर या पार्श्वनाथ विंद सारित सना गर हारको साकार . मोजा ना. ना विज - . संवत् १३४७ वर्ष वैशाख नुदि १५ रबी सी हरे गोने की गिटा याना वेरुहू ला० देम उत्तात्र ० जन सोहेन राज जाननाnif.. २० श्री देव गुप्त सूरिधिः॥ -- m संयत् १५०० 12 4 माहि नदिच. पुजगर सहितेन व पुष्पा को विकसित त्ति सृरि निमार मार कर ।
( २४६ ) ( 923 ) सं० १६३० वाषि वैशाख वदि ८ दिने श्री वहड़ा ग्रामे उसबाल सुते गोत्र सोलाकी बाधणे सागासाहा भी दामा० खेमलदे पुत्र राजा भार्या सेवादे पुन माना कमरसी श्री कुंथुनाथ विवं श्री हीर ( 924 ) सं० १५३० वर्षे सा० ० ६ प्राग्वाट ज्ञासि व्य० चाहड भार्या राणी पु० व्य० वेला प्रमुख कुटुम्ब युतेन स्व श्रेयसे श्री संभवनाथ विंवं का० प्र० तपा श्री लक्ष्मी सागर सूरिभिः चुंपरा ग्रामे ( 925 ) सं० १६३० वर्षे वैशाख वदि दिने श्री वहड़ा ग्राम उसवाल ज्ञातीय गोत्र तिलहरा सा० भूदा मार्या सीहलादे पुत्र नासण वीदा नासण भार्या न काग देवीदा भार्या कनकादे सुत वला श्री आदिनाथ विवं कारापित श्री हीर विजय सूरिभिः प्रतिष्ठितः ॥ (926 ) सं० १५१५ वर्षे माघ श्रु० १५ उकेश लोढ़ा गोत्र सा० का श्रा० कपूरी सुत सा. वीरपालेन मा० गांगी पुन पनल कर्मसी भातृ दिल्हादि युतेन श्री संभवनाथ विंध कारित प्रतिष्ठितं तपा श्री रत्न शेखर सूरिभिः । ( 927 में १६२३ बर्षे वैशाख मासे शुक्रवारे १० तिघी इहर नगर वास्तव्य उसयाल ज्ञातीय। में श्री राजा मुक्त मं० लसा मं यो रामा महा श्राधेन भार्या रखा। दम. कडूमा
२
( २४७)
म. सिंघराज
प्रमुख सकल कुटुंब युतेन श्री शांतिनाथ विवं कारित। श्री श्रीतपागच्छ
मुगप्रधान विजय दान सूरि पह श्री हीर विजय सूरिनि प्रतिष्ठितं । वैशाख सुदि
दशमी दिन॥
( 928 )
संवत् १६३४ वर्षे माघ सु० ६ उप० ज्ञाती गादहीया गोत्रे सा० कोहा मा० रतनादे
पु० जाका मा० यस्मीदे पु० हराजावड़ मेरादि साहि तिथी सति मतं श्री वास पूज्य
विध कारि० श्री वपु श्री कुकुदाचार्य संताने म० देव गुप्त सूरिभिः ॥ श्री ॥
( 929 )
सं० ११२२ श्री सर प्रभु सूरि उपदेशेन प्रतिष्ठितं ।
( 950 )
संवत् १६४४
संन्नवनाथ
वर्षे
फागुण वदि १५ उपकेश ज्ञातीय वाहड़ा गोत्रे.
उघ गछ लघ श्री श्री हीर विजर सूरि ।
नगर गांव (मारवाड)
(91)
संवत् १५१६ वर्षे पौसष वदि११ दिने गुरुवारे श्री राउद राज्ये श्री सोभ्र यंम पुत्र
श्री श्री वयं रसाल नरेस्वरेप यांधध सामंत सल्हा पुत्र हरुव मुख सपरिवारेण वेज याई
भरतार घाटी महिप पुण्यार्य गोविंदराजेन भो भी महावीर चैत्ये वाः मोदराज गणि
उपदेशेन पटही बांधव मं० धारा पुत्र धाघल मंदाही पुत्र नागदा मं० जाणा मं. दे.
ब्रट प्रमुख श्री संघ समु मसं पटहो वारमानो चिरं जयातः गुनं नवदु नारदेन टपट ।
The
-
( 932 )
रत्नपुर।
कुल प्रतिपत्तो रत्न पुरे देव.श्री पार्श्वनाथाय पोष, कल्याणिक यात्रा निमित्तं मह माधक
(२१८)
सांचोर (मारवाड)
स्वस्ति श्री संवत् १२२५ वर्षे वैशाख वदि १३ दिने श्री सत्य पुर महा स्थाने राज
श्री भीमदेव कल्याण विजय राज्ये उपकेश ज्ञातीय भंडारी मंजग सिंह पुत्र अंडारी
पाल्हा सुत छोघाकेन वृद्ध भातृ R० साम वधू. घासकितेन. श्री महावीर चेत्ये आरम
श्रेयसे चतुष्किका उद्धारः काारतः ॥
मारवाड़के जसवंत पुरा इलाके में यह स्थान भी बहुत प्राचीन है।
( 933 )
ॐ संवत् १२३८ पोष यदि १० वला० नागू पुत्र श्रे० उद्धरण भार्यया श्रे० देवणाग पुनि-
कया. उत्तम परम भाविकया स्व श्रेयो) श्री पार्श्वनाथ देव चैत्य मंडपे स्तंभोयंकारितः ।
* ॥ संवत्.१२३८ पोष वदि.१० अ० आंय कुमार पुत्र श्रे० धवल भार्ययावला नाग
पुत्रिकया संतोस परम प्राधिकया स्व श्रेयोर्थ श्री पार्श्वनाथ देव चैत्य मंडपे स्तंभोयं
कारितः ।।
( 935 )
ॐ ॥ संवत् १३३३ वर्षे माघ सुदि १ प्रतिपदायां महामण्डलेश्वर राज
चाधिग देव कल्याण विजय राज्ये तन्नियुक्त महामात्य श्री जारवा प्रभूतिया
1
( 93 )
.
श्री
{ २१६ ) (936 ) कल्याणक दिने देव कुलिकाया किंवोग करणोय । उरितं द्रव्यं श्री पार्श्वनाथ सत्य बालिकायां थवं । न्यां खेपनीयं निक्षेप उचार गाष्टिके करणीय। अत्र मताल महा सुत महे मदन सुंग महं धीणां । श्री लरसिंह सुत महं जदल प्रगति पंच बुलेन श्रो पार्श्वनाथः देव प्रतिबद्ध श्री चैत्र गच्छीय श्रीदेवचंद्र सूरि संसाने प्रा अमरचंद्र सूरि शिष्य श्री अजित देव सूरीणा मुपदेशेन हह ह्रय भूमिः प्रदत्ता आ चंद्रार्क नंदतु ॥ बहुभिर्वसुधा भुक्ता राजतिः गरादिभिः। यस्य यस्य यदा भूमि स्तस्य तस्य तदा फलं। संवत् १३४६ वर्षे चैत्र सुदि १५ गुरावयेह रत्न पुरे महाराज कुंड श्री खांदत सिंह। कल्याण विजइ राज्ये तनियुक्त महं० कदुआ प्रति पंच कुल प्रतिपत्ती श्री पार्श्वनाथ प्रतिबद्ध महा महणा श्री सांता मह विजय पाल गो० लपण प्रवृति समस्त गोष्ठिकानां विदितं अध्यराणि प्रयच्छति यया रत्नपुर वास्तव्य गूर्जर न्यातीय • राजा सुत बादा गांगा सुत मंडलिक मदन प्रति कानां देव श्री पार्श्वनाथ प्रति वर्द्ध तोडक प्रवेश द्वार दक्षिण हस्त प्रथम हहात् द्वित्तीय हह . गांगा अयोर्य वादा तत्क देव कुलिका पूजापनार्थं श्री पार्श्वनाथ देवेन गोष्ठिकैं। विदितं हह समर्पितं। अस्य हह निवड प्रशिदेव श्री पार्श्वनाथस्य श्री वाधकेन वीसल प्रीययाय एक विशसत्याधिक रात मेकं प्रदत्तं । हह मिदं चतुर्ति गोष्टिकैः संमिलते भूत्वा नाहक संस्था करणीया शरमीय परिणां अष्ठि बांदा भुतक सांय विनैः नाइके हह कस्यापि नार्पणीयं । तया सरक उतपत्ति व्यय कर्ण वागोष्ठिज्ञानु विना एकाकिनः न कर्तव्या । उतपत्ति मध्यातु देव कुलिकाया शिबाना नेचकर देवी० २। ३ वर्षे प्रसिदाराच्या उतपत्ति मध्यान हहे पतित दुसित पदे कमठाय कारापनीया। यच्च प्राहक स्वक द्रव्यं वदंति नत् पोप पण मतं अष्टि सोता मतं घराणे गती वा हस्तेन महं विजय पाउ मस । गोष्टिक विंध उश्या मतं ॥स (२२० । बिलाड़ा (मारवाड) ( 937 ) सं० १८०३ वर्षे शाके १६६८ प्रवर्तमाने मगशिर सुदि २ दिने सोम वारे महाराज राज राजेश्वर महाराजा जी श्री अभयसिंह जी कंवर श्री रामसिंह जो विजय राज्ये यहत म्यरतर श्री आचार्य गच्छे । महारक प्रो जिन कीर्ति सूरि जी वर्तमाने सति । श्री विताना नगरे कटारीया कलावत साह श्री तुता जी पुत्र गिरधरदासजीकेन जिनाच करापितः स्थानको धमः उपाध्यायजी श्री करम चंद हरष चन्दाभ्यां कृतः कलायत पावकाणामपि विशेषोपदेशो दत्तस्ते नार्य श्री सुमतिनाथ जी देव को द्रपर भीपन कमाभ्यां कृतः उपाध्याय श्री करमचंद गणि पं० हरषचंद गणि. मापसी गणि प्रमुख सपरिकरेन विव-श्री भवतु । RAN बोईया (मारवाड) ( 38 ) रूपन १२५ मापार दि ११ रया झुडपट वास्तव्य पायक सामण मार्या जिस मुम अगर रामदेव मायदेव चुटुंध महिनन राम्यदेवेन स्तंम लता प्रदत्ता दा२० ॥ (9.) बन् १०५. मामाद यदि ? यो बहुविध वास्तव्य र रोहिल जुत चांपा * मन भर सायनान्या मात्र विम्मति यार्य सना ट्रां. २०
( २५१)
कोटार (गोड़वाड़)
( 940 )
सउ
संवत् १३३५ वर्षे प्रावण वदि १ सोमेऽद्य ह समाण
पयरा महं सज्जन ठ. महमा
'ठ घणसीह ठ देवसीह प्राति पड़
फुलेन श्रीधात निधान श्रीमहावीर देवस्य ने च के -
वर्ष स्थितके कृत द्र २४ गतु.
विशति द्रम्माः वर्ष वर्ष प्रति - मी मंडपिका पंच कुलेन दातव्याः ॥ पठनीया ॥
बहुभिवंसुधा भुक्ता राजभिः सगरादितिः यस्य यस्य यदा भूमी तस्य तस्य रादा फल ।
पुतं भवतु ।
वर्षे भोष्ठि को सीहन पचपने दन्छ ।३ - य, ३६ ग • • १ मा .
मामा.
या स्वस्ति यमाण पञ्च कुलेन वर्ष वर्ष प्रति
..
किगह।
मारवाड़ के मालानी परगने में माना:
पान का नाम किराट कूप धा और नियो।
स्यान में जैन धर्ममे दीक्षित होने पर सदर मि... 4 . :
या काट के पक से इस समय र
प्रो नष्ट हो गये हैं।
4
* नमः सातारा
पदेश देवार ।
घिराजो महाराज - - १ - ( २५२) विधु (अस्म ) विभूषणस्य । गर्वः स कोपि हृदि यस्य पदं करोति गौरी जितं च चिर- वल्कल वर्ष दर्शात् ॥२॥ वशिष्ठ भूषिते बूंद भूधरे। सुरभ्याः परमाराणां वंशो नलं कुंडतः ॥३॥ तत्रानेक मही पाल सिंधु रणे समभून्मरु मंडले ॥४॥ निरर्गाल मिलवरि प्रतापो ज्वल दूसलः ॥५॥ शंभुवद् भूरि मीशाभ्यर्चनीयो भ सूः ॥६॥ खग रणरकार रावणो ल्वण वैरिहं भवः ।। - ॥७॥ ॥७॥ सिधु राज घरा धार घरणी घर धाम वान ॥ मा H८॥ जो भवत्त स्मात् सुर राजो हराज्ञया देव राजेश्वर- मपहाय मही मिमां । मन्ये कस्प द्रुमः प्रायाद दृश्यक ॥१०॥ दारणात् । श्री मदुर्लभ राओपि राजेंद्रो रंजितो ॥११॥ धंधुक - तः। येन दुर्वार वीर्यण भूपितं मरु मंडलं ॥ १२॥ धर्म करो व कृष्ण राजो महा शब्द विभूषितः ॥ १३ ॥ तत्पुत्रः सोछद्द राजाख्यः च्य -कल्पद्रमो भवत् ॥ १४ ॥ तस्मा दुदय राजाख्यो महाराज मंडलीक पदाधिकः ॥ १५ ॥ प्राचोड़ गौड़ कर्णाट माटवोत्तर पश्चिम। ह-शजं ॥ १६ ॥ प्राश्च सिंधु राज भूपालारिपतृ पुत्र क्रमा पुनः । तस्मादुदय राजश्च पुत्रः सोमेश्वरः सुतः ॥ १७ ॥ उत्कीर्ण मपि यो राज्य मुद्द भुज वीर्यतः । जयसिंह महिपालात् - यद्वं - ॥१८॥ अतश्य नव गत वर्षे ११६ १२०० विक्रम भूपतेः प्रसादा जयसिंहस्य सिद्धराजस्य भू भुजः ॥ १८ ॥ श्री सोमेश्वर राजेन सिंधु राजपुरोद्भवं । भूपो निर्याज शौर्येण राज्य मेतत्समुद्धतं ॥ २० ॥ पुनवादा संस्येषु पंचाधिक शते १२०५ प्वलं । कुमार पाल भूपालात् सप्रतिष्ठ मिदं कृतं ॥ २१ ॥ । कूप मात्मीयं शिव कूप समन्वितं । निजेन क्षत्र धर्मेण पालयामास यश्चिरं॥२२॥ का दशाधिके चास्मिन शत द्वादशकेऽश्विने । प्रतिपद्गुरु संयोगे सार्धयामे गते नान् ॥ २३ ॥ दंडं सप्तदश शता न्यश्वानां नृप जज्जकात् । सह पंच नखांश्चैवमय. निरष्टभिः ॥ २४ ॥ तणु कोद नवसरी दुग्! सोमेश्वरो ग्रहीत् । उच्चांगवरहा टयां चने चैवात्म चादमी ॥ २५ ॥ बहुशः सेवक्री कृत्य चौलुक्य जगती पतः । पुन - .
( २५३ ) स्यापयामास तेषु देशेषु जज्जकं ॥ २६ ॥ प्रशस्ति मकरो देतां नरसिंहो नृपाज्ञया। वको प्रय (णे ] देवः सूत्र घारोस्तु जशोधरः ॥ २७ ॥ विक्रम संवत् १२१८ अश्विन दि १ गुरो ॥ मंगलं महा भोः । सूंघा पहाड़ी। मारवाडके जसवंतपुरा के पास उत्तरकी तर्फ पहाड़ीके ढसाबमें सुंधा माता नामम गमुंहाके मदिरमें उगे हुए दो पत्थरों पर यह लेख खुदे हुए हैं। ( 4 ) 7 है 4. भो ॥ घेतांनोजातपत्रं किमु गिरि दुहिनुः रघरलदिन्या गाः पिता गोमाग महिम मुख महासिद्ध देशी गणरय । बेलाराम पो. निगम क्षत्र मुरचे शंजोडिस्थलेंदुः सुकृति ननुगिः पा ॥ १ ॥273111 निरनुपमानंद संदोह मूला वासोंग मा प्रोगा। " अण्योदय मुफलिनी पार्टी प्रेम की पति , 11.5 जनानां ॥२॥ विकट मुइट माघर जला: RAI कनेन । उनणुरणित लीला हसदरमा :... : ॥ श्री मद्वत्समहर्षि हर्ष मनो पत्रकार सिरमयतिः । एक सोदर रशी राशि प्रमाण गर परिधान प्रार मणो नाम साहो' : PREर जति मा ८५ र བྷཡཱ་ཡ: སྶ ཝཱ༔ ཨཱ ཨམྨཊ་༣ དང་ - + ग त "
{ २५४ )
॥ ६ ॥ तस्माद्धि माद्रि भवनाथ यशो पहारी श्रीशोमितो जनि नृपो स्य तनूद्योध। गां.
भीर्यधैर्य सदन बलि राज़ देवो यो मञ्जराज बल अंगमचीकरतं ॥७॥ साम्राज्याशा क रेणु
रिपु नपति गज स्तोम माक्रम्य जहु यत्खनो गंध हस्ती समर रस भरे विंध्य शैलाय
माने । मुक्ता शुक्तींदु कांतोज्जाल रुचिषु सत्कीर्तिरेवातटेषु प्रौढ़ाने दोपचारो स्वष
पुलकततिः पुष्कराणां छलेन ॥ ८॥ सस्पितव्य जसयाथ बांधवः श्री महादुर जनिष्ट
भूपतिः । यस्कृपाण लतिकामुपेयुषां छायथा विरहितं मुखं द्विषां ॥६॥ जज्ञ कांतस्तदनु
घभुवस्तत्तनुजो श्वपालः कालः रे द्विषि सुचरिते पूर्ण चंद्रायमानः। यः संलग्नो न खलु
समसा नैव दोपाकरात्मा तेजो भक्तः कचिदपि न यः किंच मित्रोदयेषु ॥१०॥ केयूराग्र
निविष्ट रत्न निकर प्रोद्यत्प्रमाई घर व्यक्तं संगर रंग मंडपतले यं वैरिलक्ष्मीः श्रिता।
धीरेषु प्रसृतेषु तेषु रजसा नीतेषु दुर्लक्ष्यतां लब्धो पायबलापि निर्मल गुणैर्वश्या
प्रशस्या कृतिः ॥ ११॥ पुत्रस्तस्याहिल इति नपस्तन्मयूख च्छलेन स्रष्टा यस्य व्यघित
यशसां तेजसा तोलना नु । गंगा तोले शशि सपनयो दंतश्चारु चेले मध्यस्थायि
ध्रुवमिष लसत् कंटके कौतुकेन ॥ १२॥ गुर्जराधिपति भीम भूभुजः सैन्य पूर मजय-
द्रणेषु यः । शंवत् त्रिपुर संभवं बलं वाडवानल इवांबुधे र्जलं ॥ १३ ॥ सैन्या क्रांता खिल
वसुमती संडठस्तत्पितृव्यः श्रीमान् गजा प्रवदथ जिताराति मल्लो पहिल्लः । भीम
क्षोणी पति गज घटा येन भग्ना रणाय हृद्यार्था' भोनिधि रघु कृते वहे पंक्तिः खलानां
॥ १४ ॥ अंभोजानि मुखान्यहो मृग दृशां चंद्रो दयानां मुदो लक्ष्मीर्यत्र नरोत्तमानुसरण
पापार पारंगमा। पानानि प्रसनं शुलानि शिखरि श्रेणीव गुप्यद्गुरुस्तोमो यस्य
नरेश्वरस्य तलनां सेनांत्रु राशेर्दधौ ॥ १५॥ उव्वीरुद्द विटपावलंब सुगृही हम्येषु दरवा
दृशं ध्यातास्यंत मनोहराकृति निज प्रासाद वातायनः। भूस्फोटानि वनांतरेषु वित-
तान्या लोक्य हाहेति वाक् सस्मारा तपवारणानि शतशो यवौरि राज ब्रज
दृष्टः के नं चतुजः स समरे शाकंभरी यो यलाज्जग्राहानुजघान मालव पतेोजस्य
साढाह्वयं । दंडात्रीशम पार सैन्य विनवं सीव्र तुरुष्कं च यः साक्षाद्विष्णुर साधनीय य-
गसा शृंगारिता येन भूः ॥ १७ ॥ जज्ञ भूमृत्तदनु तनयस्तस्य पाल प्रसादो मीममा
॥ १६॥
२५५ ) रूचि शरोरः शैलसाराभिराम पति भूचरण युगली मद्देन व्याजतो यः। कुर्वन्पीडा मति बलतया मोचयामास कारागा- राग भूमी पति मपि तथाकृष्णदेवाभिधानं ॥१८॥श्रीकयों जलदभ्रमं दधुरहो सैन्येस्य से- वारसा यात प्रतिमे समुज्ज्वल पटा वासा मराल श्रियं । कंपं वायु वशेन केतु निबहाः शस्यानुकारं च ते सङ्गीतानि च कोकिलारव तुलां चित तु तापं द्विपः ॥ १६ ॥ श्रीमा- स्तस्याजनि नर पति धवो जिंदुराजो यः संडेरेऽर्क इव तिमिर वैरि द विभेद । यस्य ज्योतिः प्रकरमनितो विद्विषः क्षौशिकामा द्रष्टुं शक्ता न हि गिरि गुहा मध्य- मध्या प्रितास्तत् ॥ २०॥ गच्छत्तीनां रिपु मृगदृशां भूपणानां प्रपाते बाप्पासाय. नितति तुलां बिभ्रतीनामरण्ये । दूर्वा भ्रांति मरकत मणि भणयो यत्प्रयाणे सांयूलीय धममिव चिरं चक्रिरे पर रागाः ॥ २१ ॥ पृथ्वी पालयितु पवित्र मतिमान् यः कषुका- यां कर मुंचन माप यशांसि कुंद घघला न्यानंद हयाननः । पृथ्वी पाल इति ध्रु पक्षिति पति स्तस्यांग जन्मावत्प्रत्यक्षोरु निधिः स गूर्जर पतेः कर्णस्य सैन्या परः ॥ २२ ॥ सरसेना किल कामधेनु सदृशी कीर्ति सवंती पयः स्पछदं रागरागरेपि गाने शा- स्तषी कुर्वती। धर्म वत्समिव स्वकीय मनघं वृष्टिं नयंती मुदा कारयानंद वर्ग मानती भीष्टं समातन्श्ती ॥ २३ ॥ श्री योजको भूपतिररप यधु विद्यक मोध प्रबाट प्रतापः । रवेतात पत्रण विराजमानः शरत्याहिल्लारय पगेपि में ॥ २१ ॥ रपया मोघमदार केसि विपिन कोडाचले दीर्घिकां परुयंका धयां घरेषु मदां पान मसाप गया याल ललना: शैले बने निसरे रघून ग्रागिनि मग पप, ॥ २५ ॥ श्री आशा राज नामा समनि मा नायक मन्द पंप मामा. स्वाना मुवि पदसि कृतं वीक्ष्य सिदाधिराः । नाम : मर यस्य गुप्यद्गुरु स्व तहतु नैव शक्त बपिन दर कायम गिरि शिरः स्थ किं सहरमांशु दिदं विटन दिन, सुभग ताया उद्गता गरी शिकता सुतारा मंदिरे देश र द :- रिक्षितिपाल त्रियां 74 - T, + *ara 17 (२५६ ) तड़ाग-कानन-हरप्रासाद-धापी-प्रपा-कूपादीनि विनिर्ममे द्विज जनानंदी क्षमा मण्डले धर्मस्थान शतानि यः किल बुध श्रेणीषु कल्पद्रुमः कस्तेस्यंदु तुषार शैल धवलं स्तोर यशः कोविदः ॥ २६ ॥ श्वेतान्येव यशांसि तुंगतुरग स्तोमः सितः सुभ्रवां चंचन्मौक्तिक भूषणानि धवलान्युच्चैः समग्राण्यपि। प्रेमालाप भवं स्मितं च विशदं शुभ्राणि वस्त्रोकतां दानीति नृपस्य यस्य पृतना फैलास-लक्ष्मी निता ॥ ३० ॥ प्रशस्ति रिय बृहद्गच्छीय-श्री जयमंगला चार्य-कृतिः॥ धिपग्विजयपाल-पुत्र-नाम्वसिंहेन लिखिता सूत्र जिसपाल-पुत्र-जिसरविणोत्कीर्णा ॥ ॥ ( 944 ) ॐ ॥ जटा मूले गंगा प्रघल लहरी पूरकुहना समुन्मील छत्र प्रकर इव नभेष नपतां । प्रदातुं श्री शंभुः सकल भुवनाधीश्वर तया सया वा देयादः शुभ मिह सुगंधादि मुकुटः ॥ ३१ ॥ आशा राज क्षिसिप सनयः श्री मदाल्हादनाह्वो जज्ञे भूभृद्भुवन विदित रचाहमानस्य वंशे । श्रीनदले शिव भवन कृद्धर्म सर्वस्व वेत्ता यत्साहाय्यं प्रति पद महो गूजरेश श्चकांक्ष ॥ ३२ ॥ चंचत्केतक चम्पक प्रविलसत्ताली तमाला गुरु स्फूजर्ज चन्दन नालिकेर कदली द्राक्षान्न कम्र गिरौ। सौराष्ट्र कुटिलोग्र कण्टक मिदात्युद्दाम कीर्तस्तदा यस्या भूदभिमान भासुर तथा सेनाचराणां रवः ॥ ३३ ॥ श्री मांस्तस्यांगज़ इह नृपः केल्हणो दक्षिणा शाधीशोदद्भिलिम नपते मान हुसैन्य सिंधुः । निर्मि- द्योच्चैः प्रबल कलितं य स्तुरुष्कं व्यधत्व श्री सोमेशास्पद मुकट वत्तोरणं कांचनस्य ॥३४॥ मातास्य प्रबल प्रताप निलयः श्री कीर्तिपालो भवद् भूनाथः प्रति पक्ष पार्थिव चमूदा वाहो पमः । यस्खयां बुनिधौ हतारि करिणां कुस्थलीभ्यः क्षरन्मुक्तानां निकरो ललितं धत्ते स्म धारा श्रयः ॥३५॥ यो दुर्दा त किरात कूट नृपति निश्वाशरैरासस तस्मि कांसहदे तुरुक निकरंजित्वारण प्रांगणे । श्री जावालि पुरे स्थिति व्यरचया- राज्येश्वर श्चिता रत्न निमः समग्र विदुपां निःसीम सैन्याधिपः ॥ ३६॥ श्री स्मानं सोमपर्वणि । - . T विश्व भी हदयस्य हारपरिकां यानि मिल दात्तरतुरुपकाधिपमददलतो नूरकर गजातको यः । मोट्टामन्यारा. परि शिव सदन हुदत* विदा निप्सात मनीर : པའོ g༎ ཡ༌ཙེ ས ས བག་ སྨ བཟའ་ ( २५७ ) अमर सिंह देवस्तत्तनयः क्षोणि मण्डलाधिपतिः । इन्द्र इव विबुध दयानन्दी पुरु. पात्तमो हरिवत् ॥ ३७॥ नाकारः कनका चले विरचितो येनेह पुण्यात्मना नामा मंत्र मनीज्ञ कोष्टा ततिर्विद्याधरी शीर्षवान्। शेपः फण वृटमेटुर तनु स्वाभुगो हारः किं घमण श्रमादुडुगणः किं वैप मे यिति ॥ ३८ ॥ मत नमिददं प्रशीची लि दंशानिखिल विपुल देश श्री सम्म कर्षणाय । लिखित विशद जिंदु पोणिजन्मा रि क्षिप्तिपति मिला जिल्लोमस्या निमित्त ।। ३६ ॥ तोलयामात ग. ग. आराम रम्य उमरपुरं यः हरान।" ॥ोकोकि - भूपति पुत्रो जावाति पुरवरे चक्के । यो रूइल देवी शिव मदिरा पित माहि. १५२१ ।। पा समरसिह देवस्य नंदनः बाल शौर्य रमजोया दुपमानः ॥ १२ ॥ श्री नझूल-ची जागा -2...: गरहद-खेद-रामसैन्य श्री मार-रत्नपुर-17 "१६॥ शेषः स्तोतुमिक रूढ रसना र हालोल माला सिशत् । द्रष्टुं मालिक यस्यां गजं प्रसूते स्म । मी मावि सइय: साक्षादिवेंद्र र FT. 1 . + , 4 . you -- m *- w " 1 -- 5 - . that + - 7 -- ma ar ब है । । . H और म . . . 4 ३ रोहरमर :
( २५८ ) रत्र प्रणयिनि जने देव एवैप तस्मात् ॥ १६ ॥ स्फूर्जद्वोरम गूर्जरेश दलनो यः शत्रु शम्म द्विपंरपातुक पातनकरसिकः संगस्य रंगा पहः। उन्माद्यनहरा चल स्य कुलित कार स्त्रियोकी तल धाम्यत्कीर्शिर शेष वेरि दहनोदय प्रतापोल्वणः ॥ ५० ॥ श्री मात द्विज जानुवादिक कर त्यागो तथा विग्रहादित्य स्यापि च राम सैन्य नगरे नित्या. नायं प्रदः। प्रोत्तुंगेप्य पराजितेश सबने सौवर्ण-अध्वजारोपी रूप्यज मेखता विमरण रतस्यैव देवस्य यः॥ ५१॥ चक्रे श्री अप रागितेश भवने शाला तपा- २० कलाम प्रतिमलिलोक कमलालंकार रत्नोच्चयः। येन क्षोणि परंतरेष निनामानंद मंचितो भाग्यं वा निज मेव पर्वत तुलां नीतं समंतादपि ॥ ५॥ ... दान भिगिर गुटगी माध्यो दधीधि स्तथा हृद्यः कल्पतरुः प्रकाम मधुरा 10 मिनामणिः। भागवाचिगदेव दान मुदिता स्तन्नाम गृहणंति यत्तत्कीले मममममीजा राममु ॥ ५२ ॥ स्फूर्ज न्निर कांकृतेन सुभगं तो मिनमानेक कप कदली देन घोऽन्न यः। आमाणां विपिन - देव ना को ये गोदामोट करावी कवचितं जम्बू यने नाचितं ॥ ५१ ॥ मरी 2 मिना ना कति मदनं गुगन्धा दिनानातक निकर सन्नाह सुभगः। मराह रचय र प्रकं पानी पीठ रतिरस अशात्तेन ददृशे ॥ ५॥ *नार पनि यदा नाज द्वयां दयानां चामुंडा मघटेश्व रीति विदिशा नया व्यर्थ नाथ विदधस्या मदिवे मंडपं कोरिया ai' पर मयूरी का ६॥ मम्वन १३१४ अयोदय ने कीन विणी पर नयायां प्रनिता मह द्वितः ॥ ५॥ संपदाम घटा 1. मिदियानि मात्र नामां चंडिका धाम मृतिः। करमामाग anा गव्यं जन विपी स्म्द देव द्वियः ॥ ५ ॥ शिवानि नामचन्द्रः। यिने यो नयमका पिचर-विजय पाण-पत्रेण नाम्पमा । -> ཨ ཨཱ ཙ ༩༧ པ༌ ri 1 Ph -- -- daunwar Ame .
(245) प्रणि पटोईन सोसं । मोर प.. र बतियण क्यं पा पलस Rs देष जणं राजसप सपरि ( २५६ ) घटियाला। यह स्थान मारवाड़ के राजधानी जोधपुर के पश्चिम उत्तर की ओरमें अवस्थित है और इसी गांव पास यह शिला लेख मिला था इतकी झापा माइत है और मारवाद के सम लेखों से प्राचीन है। यह लेख जोधपुर के प्रसिद्ध ऐतिहासिक मुंशी देवीप्रसादजी ने सपने मारतार के प्राचीन लेख नामक पुस्तक में संस्कृत अनुवाद के साथ पधाया था वही यहां पर प्रकाशित किया जाता है। घटियाला नों सग्गापवरगमगं पढ़ में सपलाण मारणे. देवं जीप दुनिया मह जिणणाहं ॥ १ ॥ रहतिठलो परिहारो बागी मिरिजोतिरामाग। परि पर वन्सो समुणई एत्य सम्पत्तो ॥२॥ विपो भिरि निकायोrief भद्दा । अस्स सुओ उप्पणो वीरो सिरि रवि :: PTET : riti मोसिरि पहड़ोतिए जस्सा लधि तो हासी राम या अस्मवि चन्दुस णांमा उप्पणो हिलो दिए र ? in its वि सिरि जिल्लुओ जाइ ॥ ५॥ सिरि शिकार 42 काज परिहोणं ॥ T * रिक्षा जिणियम ह । '' - M r - मस्सवि कज णामो दुरुसह देशोर उ 14 1 व * Ay 60 ཅུང་ཙུ་ཙི ཀྐe: བ ང༌ ས ཎ …. भजन । गक सोदो दिम :: " Mer - ( २६० ) घनरिटु समिटाणं नि पउराणं णिअकरस्स अठसहिअं। लक्खं सयञ्च सरिसं सर्णच तह वेण दिट्ठाई ॥ १२॥ णवजोठवणरूअपसाहिएण सिंगार गुणग कक्केण । जणवयाणज्ज मलज्जं जेण णेह संचरित ॥ १३ ॥ वालाण गुरु तरु णाण तह सही गय वयाण तण मोटव । इय सुचरिऐहि णिच्चं जेण जणो पालिओ सधो ॥ १४ ॥ जेण णमन्तेणच्या सम्माणं गुण युई कुणं तेण । जम्पन्वेण य ललिअदिण्णं पणईण धणियह ॥ १५॥ मरु मारवल्ठ समणी परिका अजगुञ्जरित्तासु । जणिओजेण जणाणं सच्चरिअ गुणेहि मणुरामओ।॥ १६ ॥ गहिऊण गोहणाई गिरिम्मि जाला उलाओ पल्लिओ। जणिआओ जेण विस मेवडणाणय मण्डले पयर्ड ॥ १७ ॥ णीलुप्पल दल गन्धारम्मा मायं दमहु अविं दैहि वस्तुपण्ण छण्णा एसा भूमी कया जेण ॥ १८ ॥ वरिस सएसु अणवसु अद्वारा ममम्गले मु चेतम्मि । णक्खत्ते बिहु हत्थे यहवारे धवल वीआये॥ १८ ॥ सिरि कक्कुएण र महाजणा विप्यपय हयणि बहुलं । रोहिन्स कुअ गामे णिवेसि किशि विहिए ॥२०॥ मम्मे पको यीओ रोहिन्स कुअगामंम्मि । जेण जसरस व पुजांए एस्थम्मा स. मुपविा ॥२१॥ नेण सिरि कक एणं जिणस्स देवरस दुरिअ णिलणं । कारथि मनट मिमं नया पत्ती! मुहजणयं ॥ २२ ॥ अप्पिअमेए भवणं सिद्धस्स धणेसरस्स गरस्मि । मह मन्न जम्य अम्यय वणि भाउड पमुह गोट्ठीए ॥ २३ ॥ श्लाध्ये जन्म कुले फरक पहिन रूप नवं योवनं । सौलाग्यं गुण मावन शुचि मनः शांति PM नभत्रा २८१ संस्कृत अनुवाद Karma मा मकटानां कारणं देवं । निःशैव दुरित दलनं परम गुरु नमन जिन नायम् : युनिटका प्रतिहार आमीन श्री रमण हत्ति समस्त्र । नेन प्रतिहार नवनि मनाम ॥ विप्रः पी पिचंद्र: मायां आमीन हात प्रिया भद्रा। म. बीरी जियोत्र अायापिना नामा जानः श्री नाग प्रदर अगापि जनयबाट नम्यापि यगो बटुंनी जान 2 अम्माधि .. ( २६१ ) घंटुक नामा उत्पन्नः सिल्लुकोपि एतस्य। शोट इति तस्य सनयः अस्यापि श्री भिल्लुको जातः ॥ ५॥ श्री भिल्लुकस्य तनयः श्री कक्कः गुरु गुणैः गर्वितः । अस्यापि कक्कुक नामा दुर्लभ देव्यामुत्पन्नः ॥ ६ ॥ ईषद्विकाशं हसितं मधुर प्रणितं प्रलोकितं सौम्यं । नमनं यस्य न दीनं रासः स्येयः स्थिरा मैत्री ॥ ७॥ नो जल्पितं न हसितं न कृतं न प्रलोकितं न संवृतम् । न स्थितं न परिभातं येन जने कार्य परिहीनं ॥ ८॥ सुस्था दुःस्था द्विपदा अधमा तथा उत्तमा अपि सौख्येन । जनन्येव येन धूता नित्यं निज मण्डले सर्वे ॥ ६ ॥ उपरोध राग मत्सर लोमैरपि न्याय वर्जितं येन न कृतोद्वयोर्विशेषः व्यवहारे कदापि मनापि ॥ १०॥ द्विजवर दत्तानुझं येन जन रक्तवा सकलपि । निर्मत्सरेण जनितं दुष्टा- नामपि दण्डनिष्ठपनम् ॥ ११॥ धन ऋद्व समृद्वानामपि पौराणां निज करस्याभ्यर्थितम । लक्ष शतं च सदृशस्वेन तथा येन दृष्टानि ॥ १२ ॥ नव यौवन रूप प्रसाधितेन शृङ्गार गुणज्ञ कक्व क्षेण जनवचनीयमलज्जं येन जने नेह संचरितम् ॥ १३॥ बालानां गुरुस्तरुणानां तथा सखा गत वयसां तनय इव । प्रिय सुचरितैर्नित्यं येन जनः पालितः सर्वः ॥ १४ ॥ येन नमता सदा सन्मानं गुणस्तुति सर्वना । जल्रता च ललितं दत्तं प्रणयिभ्यो घन- ॥ १५ ॥ मरुमाडवल्लख मणी परि का अज्जगुर्जरेषु। जनितो येन जनानां सच्चरित गुणैरनुरागः ॥ १६ ॥ गृहीत्वा गोधनानि गिरी जाला कुलाः पल्लयः । जनिता येन विपमें वदनाण कमण्डले प्रकटम ॥ १७ ॥ नीलोत्पल दलगत्या रम्यमाकन्द मधुप वृन्दः । वेरा एर्णछन्ना एपा भूमिः कृतायेन ॥ १८ ॥ वर्ष शतेषु च नवसु अष्टादश सम ग्रलेषु चै नक्षत्र विधु प्रस्थे बुधवारे धलि द्वितीयायाम् ॥ १६ ॥ श्री कक्केन हह महाजने विप्र प्रकृति वणिज बहुलम् । रोहिन्स कूप ग्रामे निवेशितं कोर्ति वृद्ध ॥ २० ॥ मण्डोवरे एको द्विनोयो रोहिन्स कूप ग्रामे । येन यशस इव पुजावेसी स्तंनी समुत्तब्धी ॥ २१॥ तेन श्री ककुकेन जिनस्य देवस्य दुरित निर्दलनम्। कारितमचलमिदं अवनं भक्तया शुल जनकम् ॥ २२ ॥ अपितमेतद्धवनं सिद्धस्य धनेश्वरस्य गच्छे । सहगांत जम्यु प्रावक पनि नाटक प्रमुख गोष्टयै ॥ २३ ॥ श्लाध्य जन्म कुले कलंक रहितं सपं नवं यौवनं । सौलाग्यं गुण सावनं शुचिमनः क्षान्तिर्यशो नम्रता ॥ २१ ॥ निवहः - " - - ( २६२) पिंडवाडा। सिरोही राज्यका यह स्थान भी प्राचीन है। यहां रेलवे स्टेशन है और सिरोही जाने वाले लोग यहां उतर कर जाते हैं। ( 946 ) ॥ ओं ॥ संवत १६०३ वर्षे माह वदि शुक्र श्री सिरोही नगरे रायि दूर्जण सालजी श्री विजय राज्य प्राग वंशे साह गोयंद भार्या थनी पुत्र केल्हा आर्या चापलदे गुसदे पुत्र जीवा जिणदास केल्ला पीडरवाड़ा ग्रामे श्री माहावीर प्रासादे देहरी कारापितं श्री तपा गच्छे श्री कमल कलस सूरि तत्पह श्री विजय दान सूरि। साः जीवा अयो) सा. जीवा दिने १० अणसण सीधा संवत् १६०२ का० फागुण यदि ८ दिने अणसण सीधा शुभं भवतु कल्या०॥ ( 947 ) औं ॥ संवत् १६०३ वर्षे माह यदि ८ शुक्र श्री सीरोही नगरे। रायि श्री दुर्जण साल जी विजय राज्य प्राग वंशे कोठारी छाछो भार्या हासिलदे पुत्र कोठारो ओ पाल भार्या घेतलदे तस्य पुत्र कोठारी तेजपाल राज पाल रतन सी राम दास वाई लाखल दे श्रेयो) पींडरबादा ग्रामे श्री माहावीर प्रासादे देहरी कारापितं । श्री तपा गच्छे श्री हेम विमल सूरि तत्प श्री आणंद विमल सूरि तत्प४ श्री विजय दान सूरि। शुन्नं भवतु कल्याणमस्तु प्रा० वा. लालदे थे। (949 ) सं० १६०३ वर्षे माह बाद शुक्र श्री सिरोही नगरे रायि श्री दूर्जण साल जी विजय राश्ये प्राग वंशे कोठारी छाया भार्या हासठ दे पुत्र कोठारी श्री पाट नार्या पेसलदे।
( २६३ ) लाछलदे ससारदे पुत्र कोठारी तेज पाल राजपाल रतन सी रामदास शहंस कर्ण पीडरवा ग्रामे श्री माहावीर प्रासादे देहरी करापित कोठारी तेजपाल अयोथै भो तपा गच्छे धी हेम विमल सूरि तत्प? श्री आंणद विमल सूरि तत्पर श्री विजय दान सू० शुत्तं तवतु कल्याणमस्तु॥ ( १८ ) ओं ॥ संवत् १६०३ वर्षे माह वदिप शुक्रे श्री सिरोही नगरे रायि श्री दूर्जण साल जी विजय राज्ये प्राग वंशे सा थाथा सार्या गांगादे पुत्र सा मा तार्या कसमीरदे पुत्री रसी पीहर वाडा ग्रामे श्री महावीर प्रासादे देहरी करापितं बाई गांगादे श्रेयो) श्री सपा गच्छ श्री कमल कलस सूरि सुझं तवतु कल्याणमस्तु । (60) ओं। संवत् १६१२ वर्षे लागुण वदि १९ शुझे नी सिरोही नगरे माहाराज श्री उदः सिंघ जी विजय राज्ये प्राग वंशे कोठारी छाछा मार्या राष्टदे पुत्र कोठारी भी पाठ भार्या लाछलदे पुत्र रामदाउ बरण सी नहर करण पीडर याला ग्रामे भी माहावीर प्रासादे देहरी फरापितं श्री ८पा गच्छे भी हेम यिमय मृरि तत्प? आणंद - विमल सूरि {51) मोनमः श्री वर्द्धमानाय ! प्रारबाट जे व्यहारि मागा मनः प्रानीय, प्रांग गरिः । श्री पुण्य पुष्पा जनि पूर्व सिंह स्वस्थ प्रिया जान देवि नाम्ना : मदर मद्रारत रोरु कटापः विष्ट र पाठः । जाया धर्म मादिकन्दो प्रमका प्रम्या मरकामट देवि नान्नी : २ " सवयी २ वामाननः दिनों में दिली मात्र मात्र ।
(४६४) सनयी विमयी चिती चणी विजयते सनयी तयोरिमौ ॥३॥ सत्राधः सज्जन श्रेणी ख रत्नाभिधो धनं। धनाणढ्य जन मूढ़ - राज मान्यो धियां निधिः ॥ ४॥ द्वितीय सुद्विती- येंदु कांति कांच गुणोच्चयः । धरणः शरणं श्रीणां प्रवीणः पुण्य कर्मणि ॥ ५॥ रत्ना देवी धारल देव्यी जास्यो तयोरनु क्रमतः । समभूता मति निर्मल शीलालंकार धारिण्यो ॥ ६॥ तस्य सुता ५-तेजा पासल वास जाहणेनाख्याः। शांत स्वभाव कलिसा गुण सरु मलयाः कला निलया: ॥७॥ इतश्च । श्री प्राग्वाटाभिध जाति शूग शृंगार शेखरः। पुरा भून्महुणा नामा व्यवहारी घरस्थितिः ॥ ८॥ तस्य जोला निधः सूनु स्त- त्पुत्रो भावठोऽशठः ॥ ६ ॥ तदीय पुत्रः सुगुणैः पवित्रः स्वाजन्य वित्तः सुनया सूवित्तः । लीवाभिधानः सुकृति प्रधानः सत्कार्य घुर्यों व्यवहार वर्यः ॥ १० ॥ नयणा देवी नाम सू देवी विख्यात संज्ञिक तस्या दयिते ढययो पेते शीलाद्युद्यम गुण कलिते ॥ ११ ॥ नयणा देवी सनुजो मनुजो चित चारु लक्ष्मणोपेतः । अमरो धमरो गुरु जन जन -- जनन्यादि पद कमले ॥ १२॥ भीम कांत गुण ख्याते प्रजा पालन लालसे। हाजानिधे धरा धीशे प्राज्य राज्य - रीक -- ॥ १३ ॥ आल्यामुनाभ्यां धनि पूर पाल लोबामिधाभ्यां सदु- पासकाभ्यां। ग्रामेऽग्रिमे पीडर वाडकाख्ये प्रसाद विरुद धारि सारः ॥ ११ ॥ विक्रमाद्वाण सर्वाब्धि भूमिते वत्सरे तथा। फाल्गुनाख्ये शुझे मासे मुलायां प्रतिपत्तियो ॥ १५ ॥ कल्याण बद्धघ भ्युदयैक दायकः, श्री वर्द्धमान श्चरमो जिनेश्वरः । श्री मत्तपः संयम धारि सूरिभिः प्रतिष्ठितः स्पष्ट महा महादीह ॥ १६ ॥ आरवींदु समयादनया श्री वर्द्धमान जिन नायक मूर्त्या । राजमानमभिनंदतु विश्वानंद दायक मिदंवर चैत्य ॥ १७॥ श्लो.॥ (958) राज श्री अमर सिंह जी लपावता देहनारा देहथी आरोहयो- कमन काथोछ । माजक वान देरा माहि घोलसह तिनई गाइड गाल छइ संवतु १७२२ मगसिर सुदि- वर्ष
(२६५)
वीरवाडा (सिरोही)
महावीर स्वामी का मंदिर ।
( 953
सं० १४१० वर्षे अ० महणा मा० कपूर दे० पु. जगमालेन मा० सुतलदे पु० कडूया
देल्हा समं वीरवाडा ग्राम श्री महावीर चैत्योहारः कारितः कछोपीबाल गच्छे १० लो
मरचंद्र सूरि पडू श्री रत्नप्रत सूरीणामुपदेशेन प्रतिष्टितः । मंगल ॥ प्रारबाट ज्ञातीमः ।
वसंत गढ़ (सिरोही)
किले के अन्दर जैन मंदिर के मूर्ति पर ।
(जसन के दोनो तरफ पीठ पर )
सं० १५०७ वर्षे माघ सुदि ११ वुधे राणा श्री पुंज फर्ण राज्ये या पर
सदहार
कारको प्राग्वाट व्य० शगड़ा मा० मेघादे पुत्र व्य. संटनेन ना० माणिकदे पत्रकार
पौत्र जोणादि युतेन प्रारवाट व्य० घणसी घाटींची पुन ट्यभादा मा जा
पुत्र जान मोजादि युतेन मूल नायक धी शांतिनाथ घियं फागि प्रतिष्ठिर नपा
सोम सुन्दर सूरि तत्पहालंकरण को नुनि नुन्दर नृरि श्री यन्त्रपरि पर प्रतिदिन
गरछाधिराज श्री रत्न शेपर सूरि गुरुभिः ।
पालडी (सिरोही)
*
सं. १२१६ वर्षे माप दि गुगे जोर की
रेव राज्ये हरपुत्र राज को लपत काही विची ?..
गधिमात्र श्री
नामांवधिना
( २६९) श्रीस्मय वाल्हण प्रति पंच कुलेन महं सूम देव सुप्त राजदेवेन देव श्री महावीर प्रदत्त द्र० १ पाहाली मध्यात् । बहुभिर्वसुधा भुक्ता राजति सागरादिभि यस्य यस्य यदा दत्तं तस्य तस्य तदा फलं । श्री पावं - कालाजर (नवाना के निकट) ( 956 ) सं० १३०० वरषे जेठ सुदि १० सोमे अद्यह चंद्रावत्यां महाराजाधिराज श्री आपण सिंह देव कल्याण विजय राज्ये तनियुक्त मुद्रायां महं श्री घेता प्रभुति पंच कुलं शासन मभि लिख्यते.यथा महं श्री ताकेन नान कलागर ग्रामे - नाथ देवस्य लो रहिता एवं ॥ आचंद्रार्क यस्य यस्य यदा भूमी तस्य तस्य तदा फलं ॥ साखि राउल वा अलिणव ब्राद उव - ब्रजव - सोहण वणादे कल्हा। कामद्रा (सिरोही) . सणा ( 957 ) भो। श्री भिल्लमाल निर्यातः प्राग्वाटः वणिजांवरः श्री पतिरिव लक्ष्मी युग्गो । (छों) - राज पूजितः ॥ आकरो गुण रत्नानां वंधु पद्म दिवाकरः अजुजकस्तस्य पुत्र स्थात् नम्मराम्मै ततो परी ॥ जज्जु सुत गुणाद्य धामनेन प्रसाद्धयम् । दृष्ट्वा चक्रे र जैन मुक्त विश्व मनोहरम् ॥ सम्बत् १०९१ - सपुने । उथमा (सिरोही) ( 959 ) संवत् १२५१ आषाढ़ यदि ५ गुरी श्री नाणकीय गच्छे उघण सदधिष्ठाने । श्रीपार्थ- नाय बेस्ये । घनेश्वर पुत्रेण देव धरेण धीमता । सयुक्त न यशोभद्र आल्हा पाहा ( २६७) सहोदरैः । यसो सदस्य पुत्रण। सार्दु यरो घरेण ना पुत्र पौत्रादि युक्तेन धर्म हेतु मह मंना गनी घारमस्याख्या। असश्चैव यशो नदः । कारितं श्रेयसे ताम्यां । रम्येदस्तुंग मंडप छ। पघीणा (सिरोही) (959 ) संवत् १३५६ वर्षे वैशाल शुदि १० शनि दिने न ल देशे वाघ सीणग्रामे महा- राजा श्री सामंतसिंह देव कल्याण विजय राज्ये एवं काजे वर्शमाने सोठं पासट पु० रज. रसोलं. गागदेव पु० आंगद मंडलिक सोल० सी माल पु. कुंताधारा सो० माला पु. मोहण त्रिवण पहा सोहरपाल सो० धूमण पर्द पायत् वणिग् सीहा सर्व सोलंकी समु. दायेन वाघसीण ग्रामीय अर हट अरहट प्रति गोधूम से० १ ढीयड़ा प्रति गोधूम सेई २ तथा धूलिया ग्रामे सो० नयण तोह पु० जयत माल सो. मंडलिक मरहट प्रति गोधूम सेई १ ढीवड़ा प्रति गोधूम सेई २ सेतिका २ श्री शांतिनाथ देवस्य यात्रा महो- रसव निमित्त दत्ता ॥ एतत् ओदानं सोलंकी समुदायः दातव्यं पानीयं च । आचंद्राकं । यस्य यस्य यदा भूमी तस्य तस्य तदा फलं । मंगलं भवतु ॥ लाज-नीतोड़ा (सिरोही) ( 863 ) वर्षे ११ माह सु. ६ ० जेतू लासष्ट प्रति पतेमधिक कुअर सीह पाऊ स्नु । पतिना। (1) मन्दिर घर उपम सिंचेत करावी।
( २६८) नोदिया (सिरोही) ( 962 ) संवत् ११३० वैसाष सुदि १३ नंदियक चैत्य साले वापी निर्मापिता सिव गणैः । ( 983 ) - ॐ॥ सतिणि सील बंता घ। सद्धाव भक्ति संयुता ॥ जिन गृहे सैल स्तंभा द्वौ। मंडप मूले थापिताः॥१॥ श्री महावीर स्वामि जी के मादर के स्तंभ पर । . (. 964) ओं ॥ संवत् १२०१ भादया सुदि १० सोम दिने निधा मार्या वरा पुत्र मोतिणिया स्तंभका०२ (965 ) श्री विजयते । संवत् १२८८ वर्षे पोस सुदि ३ राठउड पून सीह सुत रा० कमण योथं पुत्र भीमेण स्तंभो कारितः । श्री कोटरा (सिरोही) सुरि श्री- (969) । पूर्व डीडिला ग्राम मूल नायकः श्री महावीरः संवत् १२०८ वर्षे पिप्पल गच्छीय वजय सिंह सूरितिः प्रतिष्ठितः पश्चात वीर पल्या प्रा. साह सहदेव कारिते प्रसादे र्य श्री वीर प्रश्न सुरिमिः स्थापितः। संवत् १४१५ वर्षे ।
( २६६ )
वरमांण (सिरोही)
।
( 967 )
सं० १३५१ वर्षे माघ वदि १ सोमे प्राग्वाट ज्ञातीय श्रे० साजण मा० राल्हू पु० पून
सीह ता० २ पद्मल जालू पुत्र पदमेन ना मोहिणि पुत्र विजय सोह सहितेन जिन
युगल युग्मं कारितं । छ।
( 968)
ओं संवत ११४६ वर्षे वैशाख वदि ११ बुधे ब्रह्माणीय गच्छे सहारक श्रो मदन पत्र
सूरि पह श्री नादिश्वर सूरि पढे श्री विजय सेन सूरि पहे श्री रत्नाकर सूरि पट्टे श्री
हेम तिलकं सूरिनिः पूर्व गुरु योर्थ रंग मंडपः कारापितः ॥
लोटाना (सिरोही)
( 25 )
संवत १३०८ वर्षे उदे सीह सुत पदम सीह ।
माकरोरा [सिरोही ]
(80)
-
श्री सुविधि जिन प्रासादाद माकोड़ा मध्येः । संवत् १५ वरपे कमर मटमा गई
महारिक श्री मत् रत्नसूरि प० बम विजय गणिवेठामा मंगानगीमामा
(१७०) मोटा सा० धनामु० दसरथ जीवा सा० अमरा सा० कोठारी करमसीसा केसरसा जग- बाधसा लषमा सा० राजालाघासंषा तेजाः जीवाः पीथाःजगा अमरारण छोड़ देवा देवा भगवान रामजीराज जोगा कल्याणः सुजाणः जोगाः रामजी आसावाई चांपी बाई जगी समस्त प्राधिक प्रावि-काइ सेवा अगति अली रीति कीधी संघस्य कल्याणाय भवतु । धवली [सिरोही] ( 971) ॥ सं० । १९६१ वैशाख शुक्ल ५ वुध वासरे श्री महावीर प्रसाद जीर्णोद्धार श्री संधन प्राग्वाट ज्ञातीय सा०। खुषचंद मोती सा। लुंघा उमा सा। तलका वाला प्रमुम कारापितम् तस्यो परी ध्वज दंड गच्छ नायक श्री कमल कलसा गच्छेश महा। श्री विजय महेंद्र सूरिस्वरभिः प्रतिष्ठितम् गं०। पं० डुगर विजय वां० । मथु प्रमुख, इति ज्ञेयम् । शुभ सीवेरा [सिरोही ] ( 972 ) संवत् १९६५ वर्षे पंडित श्री माहा शिष्य जय कुशल जस कुसल कातिक चौमासु कीधु ठाणा: २ सीवेरा ग्रामे। जरिवल पार्श्वनाथ [सिरोही ] ( 973 ) संवत् ११८३ वर्षे प्रथम वैशाख सुदि १३ गुरी श्री अंचल गच्छे थी मेरु तुज सूरीणां पदोद्धरण यो जय कीर्ति सूरीश्वर सुगुरुपदेशेन पत्तन वास्तव्य ओसवाल ज्ञातीय मीठ ( २७१) डोया सा० संग्राम सुत सा० सलपण सुत सा० सेजा भार्या तेजल दे तयोः पुत्रा सा. डोडा सा पीमा सा० भूरा सा० काला सा० गांगा सा• डीडा सुत सा० नाग राज सा० काला सुप्त सा० पासा सा. जीव राज सा. जिणदास सा० तेजा द्वितीय भ्राता सा० नर सिंह मार्या कउनिग दे तयोः पुत्री सा• पास दत्त सा० देव दत्त श्री जीराउला पार्श्वनाथ स्य चेत्ये देहरी ३ कारापिता श्री देव गुरु प्रसादात् प्रवर्द्धमान नद्रं मांगलिकं भूयात् ॥ ( 86 ) जो ॥ सं. ११८३ वर्षे माद्या पदि गुरु कृष्ण पक्ष श्री सपा गच्छ नायक श्री श्री देव सुंदर सूरि पदे श्री सोम सुंदर सूरि श्री मुनि सुंदर सूरि श्री जय चंद्र सूरि प्रो भुवन सुंदर सूरि उपदेशेन श्री कल वर्या नगरे कोठारी याहउ सामत सं नाने को नरपति मा• देमाई पुत्र सं० उकदे पासदे पूनसी मना भी उसवाल ज्ञातीय कटारीया गोत्र श्री जीराउला भुवने देव कुलिका कारापिता ॥ शुभं भवतु ॥ श्री पाश्र्वनाथ प्रसादात् ॥ ओं कटारिया गोत्र वर महीयं नानु पिता मे जननी देमाई । श्री सोम सुंदर गुरुगुरव भदेयाः भी छालज मंडन मात्र शालं ॥ १ ॥ । ( 975) जों । सं० १४८३ वर्ष भाद्र वदि ७ गुरु दिने कृष्ण पक्षे श्री तपा गरछ नायक थी देव सुंदर सूरि पर श्री तोम तु दर सूरि श्री मुनि सुटर सूरि श्री जयचंद्र मूरि श्री भुवन सुंदर तरि श्री उपदेशेन धी सवा नगरे धी उसबाट ज्ञातीय सा० घणसी समाने सा. जयता ना. वा. तिलक सुत सं० समाती तं: मोपनी श्री जीराउटा मुयने देयकुटिका कारापिता । शुभं भवतु । श्रीपार्श्वनाथ प्रसादाद । (S मों । सं० ११८३ वर्ष भाद्रवा वदि गुरु दिने कृपय पर्व श्री नपा गाय नायर यो देव सुंदर सृरि पहे श्री सोम सुंदर कृरि भी मुनि नदर मूरि प्री जयवंट मरि श्री वन
(२७२)
सुंदर सूरि उपदेशेन श्री कलवा नगरे ओसवाल ज्ञातीय म. मलुसी संताने सं. रतन
भार्या वा वीर सुत सं० प्रामसी श्री जीराउल भुवने देवकुलिका कारापिता । नमस्तु
श्री पार्श्वनाथ प्रसादात छ । सा० आमसी पुत्र गुणराज सहस राम।
( 977 )
३
स्वस्ति श्री संवत् १४८१ वर्षे वैशाख सुदि ३ वृहत्तपा पक्ष मटाश्री रखाकर सूरी-
णामनुक्रमेण श्री अजयसिंह सूरीणा प? श्री जय तिलक सूरीश्वर पहावतंस महा श्री
रत्न सिंह सूरीणामुपदेशेन श्री वीसल नगर वास्तव्य प्रारबाटान्वय मंडन श्रे० पेत सीह
नंदन श्री देवल सीह पुत्र अ० षोषा सस्य भार्या सं० प्रण देध्ये तयोः सुता सं० सादा
सं० दादा सं० मूदा सं० दूधाभिधै रेतेः कारि।
.(...978 )
1
स्वस्ति संवत् १५०८ वर्षे आषाढ़ सुदि १२ शने सू० काला सुहहा नरसी सीमा
मांडण सांडा गोपा मेरा मोकल पांचा सूरा नित्य प्रणम्य अष्टांग सकुटुय।
( 979 )
.
औ॥ सं० १८५१ वर्षे आसाढ़ सुदि १५ दिने श्री जीरावल पार्श्वनाथजीरो जीणोद्धार
कारापितः सकल महारक पुरंदर महारक जी श्री श्री श्री श्री श्री १०८ - श्वर राज्येन
जीर्णोद्धार करापितं हजार ३०१११ रुपीया परचीवी माल लीधो भी जीरावल वास्तव्य
मु०। बजा। को। दला। सा० कला।
सा० सघा। सा. जोयन सा०
अणला। सा० बारम । सा० रामल
यकी काम कारापितः । जोसी दुरगा।
भात राजा जात्रा सफलः ।
सा. रसा।
-
• •
( २७३ ) श्री अंजारा पार्श्वनाथ । ( 930) स्वति श्री संवत् १६५२ वर्षे कार्तिक यदि ५ बुधे येषां जगद्गुरुणां संवेग वैराग्य सोनाग्यादि गुणगण अषणांत् चमत्कृतमहाराजाधिराज पानि शाहि श्री अकबरा- निघानः गुर्जरदेशात दिल्ली मंडलेश बहुमानमाचार्य धर्मोपदेश कर्णन पूर्वकं पुस्तक कोश समर्पणं डायरानिधान महासरो मत्स्यवध निवारणं प्रति वर्ष षडमासिकामारि प्रवर्तनं सर्वक्ष श्री शत्रुज तीर्य मुंहकाभिधान कर निवर्तनं जीजियामिधान करकर्तनं निज सकल देश दानमृत्त स्वमोचनं सदैव बंदय रुप निवारणं वित्यादि धर्म कृमानि प्रवत्त तेषां श्री शत्रुजये सकल देश संघयुत कृत यात्राणां माद्रपद शुक्ल कादशी दिने जात निवाणां शरीर संस्कार स्छानासन फलित सहकारणां श्री हिर विजय सरिश्वराणां प्रति दिनं दिव्य नाद्यनाद श्रवण दीप दर्शनादिकै जीय प्रतायाः स्तूप सहिताः पादुका: कारिताः५० मेधेन नार्या लाडकी प्रमुख फुटुव युतेन प्रतिष्ठिाश्च तपागच्छाधिराजे महारक श्री विजयसेन सूरिभिः ओं श्री बिमल हर्ष गणि ओं श्री कल्याण यि जयगणि श्री सोम विजय गणिनिः प्रणता प्रध्य जनैः पुज्यमानाशिवरं नन्दनु। लिखना प्रशस्ति पद्माणंदगणिना भी उनत नगरे शु मवतु ॥ श्री कापड़ा पाश्र्वनाथ । ( 1 ) संवत् १९७८ वर्षे वैशासतित १५ तियो सोमबारे स्यानी महाराजाधिराज महाराजश्री गजसिंह विजय राज्ये उशेरायटारवप संताने मांडागारिक गो जमरा पुत्र सामान नार्या जगतादेः पुत्र रत्न नारायण नरसिंह सेटटा पात्र ताग घंट मगार-नैमि दामाद
(२०४ )
परिवार सहितेन श्री भीकर्पटहेटके स्वयंभु पार्श्वनाथ चैत्ये श्री पार्श्वनाथ
सिंह सूरि पहालंकार श्री जिन चंद्र सूरिभिः सुप्रसन्नो प्रवतु ।
अलबर।
अलवर राज्यकी राजधानी यह छोटा और सुन्दर शहर है।
( 982)
सं० १२५५ माघ सुदि ६ . . . . ।
(983 )
सं० १२९४ धै० ५० ५ गुरौ श्री - : वंशे पिता मही प्याजपिउ पितृ सोला श्रेयो) पुत्र
नाग दिन - न मा० जागत्र मात एतेन सहितेन श्री पार्श्वनाथो विवं कारितः ।
प्रतिष्ठित श्री पार्श्वनदेव सूरिभिः ।
( 984 )
सं० १३०३ वर्षेमाघ सुदि: - सोमे देवानं हितगच्छे श्री.१माला भार्या सिंगार देवी
पुण्यार्थ सुत हरिपाठादिमिःो शांतिनाथ बिंब कारित प्रतिष्ठिम श्री सिंहदत्त सूरिभिः ।
( 985 )
स० १३२१ वैशाख सुदि ३ थरुपति कुलेन साणे छोता
३
.
( 986 )
सं० १३७८ जेष्ट वदि ५ गुरु श्री उपकेश गरछे लिङ्ग - । गोत्रे
सा. खिंत घर
सिर पाल भार्या पुत्र कील्हा मुणि चंद्र लाहट वाहादि सहिताभ्यां कुटुम्ब श्रेयोय श्री
शांतिनाय यिंमकाप्रति श्री कक्क सूरितिः।
(२७५ )
( 987 )
सं० १९८० वर्षे
फागुण सुदि १० -
सोनादे-
शांति नाथ विंच
उ० छत्रपाल गोत्रे सा० तिहुणा पु० सोना मा.
-
( 988 )
सं० ११६६ वर्षे मागसिर सुदि ५ काकरिया गोत्र सा० सधारण तत्पुत्र, सा० सांगा
श्री आदिनाथ बिवं करापितं श्री नयचन्द्र सूरितिः प्रतिष्ठितं ।
.
( 989 )
सं० १५०१ पोष वदि ६ बुधे श्री हुंवड ज्ञातीय परज गोत्रे ठ० कहुआ भा० काम दे
सुत ठकुर पीमा जा० रूपिणी
सुसीया पीमा सुत देवसी करमा देवसी मा० चमकू
सुत लखमा धरमा धना वना देवी । करमा मा० गांगी लखमा भार्या मोली एवं समस्त
परिवार सहितेन ठ० देव सिंघेन श्री संभव नाथ विवं कारापित स्व पुण्याय प्र० श्री
सर्व सूारानः।
( 990)
सं० १५०१ वर्षे माघ वदि ६ उपमेश ज्ञाती लोढ़ा गोत्रे सा० सार्या पूना पु० हांसा-
केम निज पूर्वजा पेमधर मोहा प्रीत्यर्थं श्री आदिनाथ चिंचं कारितं श्री रुद्रपल्टीय
गच्छे १० श्री देव सुंदर सूरि पदे प्र० श्री सोम सुंदर तृरिरिः ।
(31)
सं०
१५१२
वर्षे फागुण सुदि १२ बुधे उ० नाम्हट्यट गोत्रे मा. पाहा भायां
पाल्हीदे पुत्र सं० साद्य सायर सोठारय जात्म यसे भी नुमनिनाघ यिं कारितं .
घी मलधार गच्छे गुण सुन्दर सूरिभिः ।
(२७६ ) ( 992 ) सं० १५१९ वर्षे अषाढ़ वदि ६ शनी भरतपुर- ज्ञा० डीघोडीया --- सा जगसी सा. हर श्री पु० स० हापा स० धर्मा हापा घर्मा भा० खेहा पु० माहवा मा. गागी पु. नाथ धांदा युतेन श्री शांतिनाथ विंध का० प्र० श्री चैत्र गच्छे १० श्री गुणाकर सूरिमिः। ( 993 ) सं० १५२६ वर्षे जेठ वदि १३ मंगल वारे उपकेश जासीय नाहर गोत्रे घेता पु० रुल्हा भार्या रजलदे खुकांषर अमरा श्री शांतिनाथ विंवं कारित प्रश्री धर्मघोष गच्छे श्री महेंद्र सूरिभिः। ( 994 ) सं. १५२६ वर्षे वैशाख वदि ५ दिने उप० ज्ञा० वालत्य गोत्रे सा० - - दे पु० राउल पु० सुर जल सीहा मातृ पितृ पुन्यार्थं आत्म श्रेयसे श्री वास पूज्य विवं करापित प्र० उप० गच्छे ककु० संताने प्र० श्री कक्क सूरिभिः । ( 995 ) पं० १५२७ वर्षे पोप वदि ४ गुरौ श्री माल ज्ञातीय श्रेष्ठि जोगा भार्या स्नू सुत हेमा हरजाभ्यां पितृ मातृ निमित्त आत्म श्रेयो) श्री अजिसनाथ विवं का० प्र० श्री महकर गच्छे भी धन प्रा सूरिभिः । मेलिपुर नगरे। ( 996 ) सं० १५२८ वर्षे अपाढ़ सुदि २ सोमे श्री उकेश वंशे संखवाल गोत्रे सा० मेढ़ा पुत्र सा० हेफकिन मातृ उधरण चेला पु० पोमादि सहितेन श्री शांतिनाथ विवं का० प्र० श्री सरसर श्री जिन चंद्र सूरिभिः ।
(२७७)
( 997)
संवत् १५५८ वर्षे --सु. ११ गुरौ उपकेशज्ञासीय श्री रांका गोत्र साप तध सुत साध्यू-
हटेन महराज महिय -- युतेन आत्म श्रेयसे श्री मुनिसुव्रत स्वामि बिंवं कारित प्रतिष्ठित
श्रीमदूकेश गच्छे श्री ककुदाचार्य संताने श्री कक्कसूरि पह श्री देव गुप्त सूरिभिः।
( 998 )
सं० १५६१ वर्षे पोस वदि ५ सोमे ओश वंशे लोढ़ा गोत्रे तउधरी लाधा आर्या
मेलणि सु० प्रेम पाल सुश्रावकेण - तेजपाल श्रेयो) श्री अञ्चल गच्छे श्री सोय सागर
सूरिणामुपदेशेन श्री आदि नाथ विवं का० प्र० श्री र
५
( 999 )
सं० १६६१ वै०
सु० ज०म० सचटी
( 1000)
सं० १९३१ मोघ शुक्ल पक्षे द्वा. तिथौ १२ युधे श्री ऋपत जिन यिंयं कारित अलवर
नगर वास्तव्य श्री संग मलघार पुनमियां विजय गच्छे सार्वी महारफ थी जिन
चंद सागर सूरि पट्टालंकार सोनित भी जिन शांति सागर सूरिभिः प्रतिष्ठित
मधुबन मध्ये।
पटना म्युझ्यम ।
संवत् १८७४ शाके १७३६ प्रश्र्तमाने शुभ उभेष्टमा कृपा पले पंचम्यां नियो गोमदिने
श्री व्यवहार गिरि शिखरे धीशांतिजिन घर: प्रतिष्टिनं हारक श्री जिनहर्ष मूर्गिः ।
( २७८ ) (634) संवत् १९११ वर्षे शाके १७७६ शुधि ॥ दिने श्री शांतिजिन पाद म्यासः। प्रतिष्टिता खरतर गच्छ भहारक श्री महेन्द्र सूरिभिः सेठ श्री उदयचंद नार्मा पास कुमारजी। उपसंहार । सर्व शक्तिमान परमात्माके कृपासे यह "जैन लेख संग्रह" एक सहस्र लेख सहित वर्षप्रयमें समाप्त हुआ। इस संग्रह के लेखोंके गुण दोष विचारको आवश्यकता नहीं है। जैनियों की प्राचीन कीर्ति संरक्षण ही मुख्य उद्देश्य है । मुद्राकरके दोष से, संशोधन कर्चा के प्रमाद इत्यादि कारणों से छपाई में बहुत अशुद्धियां रह गई हैं। प्रर्थना है कि विद्वज्जन अपराध क्षमा करें और सुधार कर पढ़ें। और पाठक जनों से निवेदन है कि बहुत सी अशुद्धियां मूल में ही विद्यमान है, जिसको सुधारा नहीं गया है। पाठकों के - सुगमताके लिये ज्ञाति, गोत्र, गच्छ, आचार्यों की अकारादिक्रमसे तालिका भी दी गई है। जिन सज्जनों ने "संग्रहमें" मदद दी है उन सभीका मै कृतज्ञ हूँ। यदि यह संग्रह जैन भाई आदरसे ग्रहण कर मुको अनुगृहीत करें तो इसका दूसरा भाग शीघू प्रकाशित करने का उत्साह बढ़ेगा। मलमिति विस्तरेण । कलकत्ता संग्रह कर्ता ई. सं. १९१८ श्रावकों की जाति-गोत्रादि की सूची। ज्ञाति-गोत्र लेखांक ओसवाल- १९, १८, २४, ३५, ४६, ५१, ६४, ज्ञाति-गोत्र लेखांक मायचणाग ५३४, ६२३ ... ... নাৰ আৰী भाभूस उचितवाल कटारिया ... ... १४,६३७, ६७ .. कंठरसिया ... ... ७६. ६५. १०५, १०६. ११५, १२३, १३३, २१२, २२६, २३८, २४२, २३, २६६१२७७, २७६, २८७, ३८६, ४.१, ४०३, ४०६, ४११, ४१६, ४२०, ४३१० ४४५, ४५२, ४६०, ४६४, ४७५१५६०, ५७३, ५९८, ५८८.५६२, ५६७, ५६८, ६.४, ६३५, ६६२, ६६५.६६८, ६२, ७०५,909, ७२६, ७११, ७३१, ७३६) ७६५,७६६, ८८४, ८१८, ६२१, ६२०. १७५, ६७६, ८६ ओसवाल [ लघुशाखा] गोत्र गांधी मोनी नागड़ा ६५४, ६०५ सोसवाल [वृद्धशाखा] ०६. २. १६६. १९४, :. ८०,८२५ साकरेचा शायरिया पातेड F७, १६.२७१.८८८ , पादेशमा पुर पेटान ܕܙܪ ... ... ... .. -- ... ओसवाल गोत्र मादित्यनाग ... ER [चोरटीपाशाला] rrier *. ...
... ... ... ... ... ... ... ... ... [-] ज्ञाति-गोत्र लेखांक ज्ञाति-गोत्र लेखांक गांधि ५६-६२, ७५, २०८, २४०, २४६ तिलहरा ६२५ २५५, २५६, ४२५, ६४८, ७५२ तीवट ५५० गुगलिया ५४६, १५७, ८२० दणवट गोखरू ७७६ ५६, ६३,४८५ दूगड़ गोलेच्छा ३६,४४,५७,६८,८५, १४६, १४२, ३४० १४८, १५०-१६४, १६५, १६९-१६५, १७४, चत्तकरिया ६८ १७७, १७६, १८४, २७४,३०४,३०६,३३६, चंडलीया ५९६ ३४१, ३५२, ४३४, ४७०, ७३४ चरवडिया ४४ दुधेडिया २२,९६२ चोरवेडिया ५५८ दोसी २२० चोरडीया १८२, ३०१, ५८१ धनेरिया चदालिया, ८२२ धाड़ेवा १८३ चोपड़ा धीर चोपडा (गणधर ७७१, ७८५, 969 १५ छजलानि ३१,४२१,४३६ नवलखा २६४, ३४३ छत्रवाल ६८७ नाहटा ४७३, ४१६ छाजहड ५३३, ७१२ नाहर ५, ४६६,५६२, ६१५, छाव २८२ ६५९,६६६६६३ जडिया ... १२०,४९० पमार ५०० जारउडिया '' ३३ पामेचा ६८ जम्मड २२५ पावेचा जांगडा ४८० पालडेचा ឧ១ जारउडा દરર पीपाडा ... ... २६४, २६५ जाणेचा पीहरेचा ६७२, ६७६ टप ४६८, ६७८, ७५८ पोसालेवा ... ६३ डागा १२१ अच्छस ५७३ डागलिक ४२७ ... वरडा १२६ डीक ४७ बर्द्धन ६७१ तातहड १२८, ४९, ५३१ वरहुडिया ... ... ... ... ... ... ... ... ... ४ ... ... ... ... ... ... ... EF -- [] लेखांक ... १०१,४४८ ... ज्ञाति-गोत्र बहुरा बुहरा वाप(फोपा पावेला दांडीया यांभ छाच মানী ३८६, ७३८, ७७४,६२० ४२६ ज्ञाति-गोत्र लेखांक लोड़ा १२२ २१३. २२४. ३०७-३१२ ३२६, ४३३,४४३,४७८,६०9 ७१३.७८०,६२६, ६६०, ६९८ वरलद्ध वलहि ( रांकाशासा) । वाहडा वहरा ७१२७३३.७३५.७६७ ব্রাউন ... ram ... ५६४ ... ... १. मं ... ५१२ भांजापारिक विदाणा वीराणी मंजारी ६८२ १७, १७०, ५८७, ५६६.६११, । १५२. ८५३ ५०८ ९०६ ४६१ ८६६ ३९०, ३११-२१५. ३३५. ३४८, ३५२, ३५३ ३५, ३६१,३६३.१६,३६. ३२.३७६, 32.200 20८८१ .. भूरि भोर मोढ़ा मोगर महोरा নভীর मिठडीया स(म)हणोत्र वेलास वैध देदमहता বাবা सनाती सुनेत सुधितित ७०६ ... ... ... ६५८.६३ ८२८.८४.६:५ .. ... सुधाला ... . १६. रायजडारी रांश मंट ... ... लूपीया ८.५६३ ...
७३७, ८२३ ... ... ... ... ... : ... ." ... ... ... [ I] ज्ञाति-गोत्र लेखांक झाति-गोत्र लेखांक श्रीमाल-३, ६, १, २४, ५५, ६६, १००, १०४, फोफलीया यदलीया १११, ११६, १७, १२५, १२७, १३२, २००, २३१, ३२१ पदरा १८.. २५७, ३८३, ४००, ४२२, ४२३, भांडावत ४२७, ४३०, ४३, ४५२, ४५४, ४७६, ७99 ४८१, ४६४, ४६८, ५०६, ५१०, ५१६, भांडिया ४२, २८९,७६३ मउवीया ५३२, ५३६,५५४, ५६१, ५७२, ५७४, ४१४ मदता ६०६, ६०८, ६१४० ६३०, ६५३, ६७३, २१८,२६० ६७५, ६८२, ६६०,६९१, ६६३, ६१७, महरोल १६ ७४०, ७४१, १४५, ७५३, ७६८, ७६६, माथलपूरा .." ११० मौठिप्पा ८२५, ८२, ८६६) ६००, ६६५ १८७ वहकटा ४६३ श्रीमाल (लघुशाखा) २५, ६२९ साह श्रीमाल (वृद्धशास्त्रा) २६५, ९८५ सिघूड ४४७, ५.३, ५२४ श्रीमाल (गोत्र) श्री श्री ११९, २६२, ६६४, ६ गोयलिया ४१२ , पल्हयड (गोत्र) ५५६ मेवरिया २८४,४१३ चंसालेचा ८३० प्राग्वाट ( पोरवाड )२,१५, ४०, ५२, ५४, ५८, जम्पहरा ३६४ .०, ७२, ९०, ६१, ६४, १.६, १५२, जरगड १५७, २८०,२८३, ३९२, ३६३, ३९५, टांक ... १२ ३९८,३८६, ४०५, ४२५, ४४४४४६, डउडा ... ३८ ४५६, ४६३, ४६६,४५३, ४८४,४९६) सेर ४३ ५०४, ५२१, ५३५, ५३७, ५३८, ५४५) दोसी ५४६, ५५३, ५५७, ५६३, ५८५, ५६५, धामी ६७५ ६४७, ६४६, ६५०, ६६०.६६१,६६, धीधीद ५२८ ६८४, ६८६, ६१८,900,90४, ७१३॥ नलुरिया ... ७१४,१४२, ७५५, ७६२, 99५, ७99, पाताणी 9१६, ८३६, ८३६, ६४६, ६४६, ७ पापड़ ६५३, ६५४, ६७, ६६७, (७११६७१, ... ... - : : ... , ... ... ... ... ... ३६१, ७६१ ... ... ... ... ।
लेखांक ज्ञाति-गोत्र रेखांक १५५. ८५४ सत्ता जाति-गोत्र प्राग्वाट (वृद्धशाखा) [गोत्र] मोटारी मर दोनी ... ... ... । नागर ६४७,६४८.६५. नारसिंह [गोत्री बोरटेन लीमा १६ पल्लीगल पापडीवाल. मंत्रिकीय मदतिमा ) . . . . . ... ... .. . ... मुरलिया लीया अग्रवाल [ अग्रोतक] [गोत्र ] गागल गोयल पिपर বাৰি, सत्ताल [ गोर] गोपट ... ... ... 1 :: . . . रुहेलवाल गोत्र मारहटवाट लेसवाल . . * [1] लेखांक ज्ञाति-गोत्र लेखांक ज्ञाति-गोत्र मुंटतोट रोहदिया ce १०१. १७२ १६० २२६ गोत्र ( ज्ञाति, वंशादि उल्लेख नहीं है। चाया ... उजागल ... ... चार्तिदीपा १६ ... ५४३, ७, सयला १६२ मोए मालाण ... मोट ५४., ८८६ गोठी पोरवटांशु ५६७ राजपूत ८०५ एट जलहर डोसी ... चाहमान चौलुकर प्रतिहार ६४२ ६८१ ६४५ दूताद धांध ... ... ७४३ राठउड सोलंकी फसला ... मिधून १६२ २६१ | मुहता ... ... . २२८ ५८६ ५४७ ... लघुशाखा वघेरवाल [गोत्र] राय भंडारी शंग्ववाल शानापति पंडरेक सीढ राउखा वरही रतुराली (1) वणागीआ वपुगणा तुडिला वालिडिवा ५७६ ४३८ ... ७२७ ... १९७ ५०६ ... ८४२ श्रवाणा पटवड ... ७६ ... ३४, ५०, ५५१, ५७१, ६६६, ६८६ पांटरा संखवालेचा ... हुबड [गोत्र] ५०२ ...
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[ ॥] संषत् लेखांक संवत् नाम लेखांक देवगुप्त सू० १४६७ देवगुप्त सू० कक सू० १५८३ १६०३ २१६१४७१ ककसूर १० १३ ज्वराधगच्छा १४६६ १५११ १५१२ १५१५ ४०९।६२३ । १६८० ताराचन्द [क] छोलीवाल गच्छ। विजयराज सू० " १५२४ १५२५ १५२६ १५२८ ५५८ ५०१२२६ । १५५४ ५१ ६६४ ६२५ सिद्ध सू० कक सू० देवगुप्त सू० कडुआमति गच्छ। ... ८०१ कमलकलसा गच्छ। ३० १७९० १५४६ १५५६ १५५८ ७१० रत सू० कमलविजय गणि विजयमहेंद्र सू० डुमरविजय गणि कृष्णर्षि गच्छ। १६७ ६७२ कक सू० देवगुप्त सू १३७६ 4 १२८१४६१ २० १५५६ १५६२ १५६३ १५७६ १५८५ १६३४ १६५६ १५०३ १५०६ प्रसन्नचंद्र सूर जयशेखर सू० नयचंद्र सू० कोरंट गच्छ। सिद्ध सूर ह019 ७४ देवगुप्त सू० १३४० सिद्ध सू० CEO ननसू-सं० ककसू. पट्टे ११५ ७३० कुंकुम सू० विवंदणीक गच्छ। ( उपकेश) सर्वदेव सू० सार्वदेव सूर १४९२ १५०६ ... ... 1,१५२७ मर्त सू० कक सू० ६६७ । ९५७६ कक सू० [-] संवत् नाम लेखांक संवत् नाम लेखांक खरतरगच्छ। २६॥४८८ जिनचंद्र सू० जिनसमुद्र सू० ६१७ ७३५ সিমটি मोदमूर्सिगणि हर्पमूर्तिगणि १५३७ १५४८ ६५३८ ४६३ লিনাল মুন १५५३ १५५८ जिनहंस सू० १५४९ १० " २११ ६१५ ५८३ २४ १५६३ २२ जिनबद्धंन सू० जिनभद्र सू० . १४५६ १८० ४६५ ११६ ४९1359 १९८४ १५६५ १९१७ ४२ २७५ जिनगन्द्र ६५.३ ६२० १५४ " २१४४७३१७६७ ५६३९११३२ ६६६८ 13 १९९२ FREES५६ गि जिनवन्द्र १६ १६. १५१ १५२८ १.३.१८६१५.२१०४१६ । २१८१६६।१६८८ PES m १५३४ : - [] लेखांक संवत्तू . लेखांक संदत १६२१ १८५४ जिनलाभ सू० जिनचन्द्र सू० १५२७ . घा० अमृतधर्म १५३१ २८४ वारक्षमाकल्याण जिनचन्द्र २२ १२७६३३ १५५१ १५२४ 3. कमलसंयम ३५८ १५२० २५८ १३८११४४ १५६२ जिनहर्ष सू० जिनतिलक सू० पट्टे जिनराज सू० श्रीभिः ४२४ १८४८ १८४६ १८५६ १९५५ १८६१ १८७१ १८७४ १८८५ १८७१ १६०० १६०३ ८७१५२७ २६१।२६२१५२५ जिनचंद्र० २६०१५२४ १५६६ १५६७ १५७१ ५६७ " १६२ ७२३ जिनसौभाग्य सू० २२४॥३३९।३४० १२।३०६ १६८६ जिनरत सू० आचार्यसिंह सू० रततिलक सू० घा० लम्धिसेन गणि कल्याणकीर्ति जिनरंग सू १६६।२७२ पं० हीराचंद जिनसौभाग्य सू० २४५ २०५ १७०० १७८० १७६७ ५६६ १४७ ३४७ १००४. १९०७ १९१० १६५७ १५०४ २०२ घा भुवनचंद्र २०३ ३८५ जिनकीति सू० चा० शुभशीलगणि जिनकीर्ति सू० १७१४२३६॥ १८०३ ६३७ फरमचन्द हरखचन्द प्रतापसी ४२५ ६ १६११ १८५७ १५१५ । १५९६ १५१६ २५६२७० धर्मसुन्दरगणि 990 उ० हीरधर्मगणि जिनसुन्दर सू० १८२९ ४८० १८४६ ४८२ ४८।१६१ / १८७६ २१६।२८१४४१८ | १८७७ . महेंद्रसागर सू० रूपविजय ६८ जिनहर्ष सू० उ० रनसुन्दगणि कोर्युदयगणि ३८० लेखांक सां .........। जरपतीयगन्छ उदयचन्तन सागरनंदमू० ५९२ CRPF r: -~- ET तपागच्छ। सोमसुंदर सू० ४ : . ५५३.०३ 889 रतसिंह सू० 1 नियात जिगररासस १७१-७ भुवनसुंदर सू. हेमहंस सू० ५४८ ३३ ६२२ ||२४॥ १४. २९:- १४७ २४५२६८३४ २४८६ १४६ म:मोगबाट १४१६ ५२८ १४८६ ५२६ १४६६ ६४८३ चन्द्रगच्छ । पूर्णभद १४८५ ८६१ १४६० चंद्रप्रताचार्य गच्छ। १५०७ १५०१ विनवाल गच्छ। १५०३ मुनितिलक सू० २१३ १५०४ २99 दोणाकर सू० १०१ लोमकीर्ति सू ४३२ १५१० सोमदेव स १५१२ रतवंद सू. १५१३ का तिलकचंद्रमुः। १५१४ चैत्र गच्छ। अजितदेव सूर ह गुणाकर सूर १५१३ मुनिसुन्दर सू० जयचन्द्र १९२० ६४६८ ६२१ ४७५ उदयनंदि सू० সহীহ মুe ४98 રાહક " ८१८ १५४८ १९८६ २७१६७४२ ४१५७३२२६ ३९२ ३४ रत्नसिंह सू० १३३३ - [m] संवत् संवत् नाम लेखांक 1 लेखांक विजयतिलक सू० पट्टे ७.9 विजयधर्म सू० लक्ष्मीसागर सूः २८०४८३ ६६३५ १५३६ १५४६ १५५१ १५४५ सोमरत्न स० ६५२९ ४४४३५३५ १५० ५८६ १५५२ m १ १.३३ १४ 1011०६।२८३५६० ४८४६२४ सोमसुन्दर सू० इन्द्रनन्दि सः कमलकलश सू० हेमविगल मू० कमलफलश स० कमलकलश सृ० हेमविमल सू० ३.८/७३६ ६६३ । १६०२ 90१४८५६२४ १२ म " १५६६ ३६५३ १६०१ १५६६ पं० अनंतरागणि ६८६ १५०० १५६ उतरत गर सोनाग्यगागा रा० मममुद्र राजमारा १५८० पनामा निगालोम ० विजयदान पर हिमा रविना r
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-- Fa संवत् लेखांक | संवत् नाम लेखांक नाम त्रिविया गच्छ। धर्मदेव सू० सं० ५२१ ५८५ १४२० १५१५ ४२७, ३५१७ धर्मरत्न सू० १५२८ ८२७ देवानंदित गच्छ। सिंहदत्त सू० धर्मघोप गच्छ। १५७२ सिंहदत्त सू० विनयप्रभ सू० गुणदेव सू० सोमरत्न सू० गुणवर्द्धन सू० नाणकीय गच्छ। शांति सू० धनेश्वर सू० वीरचन्द्र सूर १३०३ ६८४ १४०६ ४५६ सागरचन्द्र सू० मलयचन्द्र सू० १२३५ १३२३ ६०७ ४२० पद्मशेवर मू० १४८२ नाणवाल गच्छ। ४२१४६६ १५३६ धनेश्वर सूर १९६२ १०९ ५०६ महेंद्र सू० विजय नरेंद्र सू० १५५६ निगमा विनायक गच्छ। इन्द्र नदि मू० पल्लिवाल गच्छ। साधुरन सू. १५१७ ... ४७४ १५०८ पद्मसिंह सू० महेंद्र० पानन्द मू १५.३ यशस० ७७६ १५२८ नमसूर उजोयण सः ... पुण्यवर्द्धन मृः ४६२ १६६८ १६३८ १ १५५१ १.५३ १५. २१० " ६५, १५०७ पवीर्य गच्छ। यादव म पार्श्वनाथ गच्छ। 1 नंदिवईन मः उदयप्रभ ग्लू० नयचंद्र मू० नागेंद्र गच्छ! १७८३ १८२१ ... दिनांगर मानचन्द्रमा
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१] संवत् लेखांक | संवत् लेखांक महुकर गच्छ। १५२७ धनप्रभ सू० ६६५ १५०५ नाम विधिपक्ष गच्छ। जयकेशर सू० वृद्धपोसल गच्छ। आनंदसोम सू० यशसूरि गच्छ। १२४२ ५३० ६८५ वृहद् गच्छ। रुद्रपल्लीय गच्छ। देवसुन्दर ९० सोमसुन्दर सू० पं० पद्मचन्द्र गणि ८३३३८३५ * १४५४ शोतिप्रम सू० ७०२ १५०१ १५१६ १५२५ १४३३९४४ जयमङ्गल सू० विनयचंद्र सू० यमरप्रभ सू० १५६६ १६०५ ४६१ / १२१५ ६६० १२६० " १२२ १३१६ ७३४.१४३३ गुणसुन्दर सू० ५७६ १४३८२ उ० गुणप्रभ ५०१ / १४८६ ४६ १४६३ १५०८ १५१९ उ. सागरचंद्र गणि १४९।१५० १५१९ १८४।२०७ भावतिलक सू० प्रभ सू० हेमचन्द्र सू० महेंद्र सू० रक्षाकर सू० महेन्द्र सू० ६१८ ६८१ २३ लुंपक गच्छ। १६२५ ५५६ अजयराज सू० सरवाल गछ। . १६५५ १६३३ ... संडेरक गच्छ। १७१८ १६३१ १६७१३४६ | १३५० सुमति सूरि अमृतचंद्र सू० १६८।१६९ १११० विजय गच्छ। सुमतिसागर सू० १३८ १२८ शांतिसागर सू ३५१६३५४१३५१३६०।३६२ १३१६ ३६४।३६६३६८१३७०१३७२ १४५० ३७६३७८१३८०।३८२२१००० १४६६ विद्याधर गच्छ । १४७२ उदयदेव सू० ८८६ / १४८३ हेमप्रभ स० 984 ४१५ ७५१ शांति सू० सुमति सू० शांति स० १५८ ४६४ १४२६ १५३४ १४८६
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संवत् नंग मं . गोर- TU १५.१ २५८२ १५५ IMer an गहन २८१ Aur ग 11. NYO ARRO ४२ती ११. १६ नपचन्द्र कामा १५.१ ९.८७ शीर श्रीगर शुभकानि २७ १६८ नयचन्द्र रा. श्री. मर्यानन्द म् १५१३ २५१४ ३५१४ १५१६ १५१७ जिसमन्द्रा कियानन्द स० भ० होगविलाय मा कुगनिमय विजयदि मृ. कर्पूर विजय ग० श्रीसुन्दर मा अमृतधर्म १७१० १७२१ १.२ १७. ६४ २०११ १९८० ૨૮૪૨ १८४८ रतशेयर ३६३ वा: मोदगज गणि ८१ ६१३ दयारत २४ ३.५ अमृतधर्म वाचनाचार्य ६६१ / १८४८ -- विजयजिनेन्द्र सू० १५१६ ६५२० १५२१ पहनानन्द सू० उदयवल्लभ सू० भ० विजयकीर्ति सू० सुविहित सू० साधुसुन्दर स० ७४६ १८८३ १८८७ ३४१ वा० चारित्रनंदि गणि ५७४ जिनचन्द्र स० ३४२ १५२६ १२५ १८८८ १८९७ १५२७ श्री सू० वा० नारित्रनन्दन ग० १५२ १५२१ भावदेव सू० - [ १८ ] संवत् लेखांक संवत् . जिनमहेंद्र सू० ४४० १६३:१६६ १५२३ ५७ १५२४ लेखांक मूलसंघ [ सरस्वती गच्छ । भाविद्यानन्द भः विमलकीर्ति विमलेन्द्रकीर्ति भ० देवेन्द्रकीर्ति अमृतवन्द्र सू० चा:सदालाभ ४४ १५२५ १६०४ सागरचन्द्रग० सशुभचन्द्र २.२ १७६ १७७ १६०८ १७४ १६३८ १८।१८३ २२१ उसदालाभग सागरचन्द्रग मुनिपयजय जिनमुक्ति सूः मंक मेरुकीर्ति विईकीर्ति ९६५ १६६० ... ... २३३ दालचंद गणि १७.० जिनचन्द्र सू० १६३ १७११ ... १७४६ १६१ यनीति १८८ मूलसंघ। गुणभद्र सू० लिनवंद्र देव भर देवकीर्ति (२२१ १२३ ६४२ - मूलसंघ-नन्दि संच। भः गति मूलसंघ-काष्ठासंघ । 11.riii काष्टामंच। १५०४ जिनचन्द्र सूर ४७२ विद्यानन्द १५३१ भःसानभूपण ११ काष्टानंघमापुर गट] १९१२ भः जिनयन्द्रदेव SET. ना ... སུཀྐ་ अप AUGARCHAND BHAIRODAH SETHIA, JALI LIBRARI: BIKANER, RAJPUTANA, गरोदात सेठिया 'गोकार, (राजपुताना.) -
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