Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
Prasada Manjari
Front matter
॥ श्री विश्वकर्मणे नमः ।।
मूत्रधार नायजी विरचित वास्तुमजर्यान्तर्गत
॥ प्रासादमञ्जरी॥
॥सुमम नाम्नी भापाटीका ॥
.
PRASADAMANJARI,
BY
AAMINATA
SUTRADHARA : NATHJI.
संपादक
स्थपति : प्रभाशंकर मोघडभाइ सोमपुरा
शिल्प विशारद - पालीताणा सौराष्ट्र
है।
भूमिका:
डो. वासुदेवशरण अग्रवालजी
भध्यापक-हिन्दु युनिवर्सिटि-बनारस-वाराणसी
: प्रकाशक:
श्री वलवंतराय म० सोमपुरा एवं भ्राताओ
वि.सं. २०२१
सने १९६५
ग्रंथ प्राप्तिस्थान:
स्थति प्रमाशंकर ओ. सोमपुरा, शिल्पविशारद
मोरवाडी, शिल्पिनिघास-पालीताणा-(सौराष्ट्र)
श्री बलवंतराय प्र. सोमपुरा
३. पथीक सोसायटी
सरदार पटेल कोलोनी अहमदाबाद नं.१३
मारतीय विद्याभवन
चोपाटी रोड
चंबइ ७
4
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गुर्जर ग्रंथरत्न कार्यालय,
गांधी रोड- अहमदाबाद
एन. एम. त्रिपाठी एण्ड कुा.
प्रिन्सेस स्ट्रीट-बघा
परस्वती पुस्तक भंडार
स्तनपोळ-हाथीखाना
अहमदाबाद
.
यह ग्रंथका प्रत्येक विभाग एवं चित्राकृति आदि प्लान डीझाईन्य
प्रथकर्ता के स्वाधिन है।
प्रथमावृत्तिः
प्रत १०००-हिन्दी अनुवाद तथा मूल
प्रत १०००-गुजराती अनुषाद तथा मूल
प्रत्येकका मूल्यः
रुपीया ६-५०
पोस्टेज पृथक
मुद्रक : श्री चंदुलाल लल्लूभाई भट्ट : अपना छापखाना : भावनगर (सौराष्ट्र)
. स्तुति तथा ग्रंथकर्ता का परिचय गणाधिपं नमस्कृत्य देवी सरस्वती तथा प्रमा विष्णु महेशादि सूर्य दिनकरं सदा ॥१॥ शिल्पशास्त्रप्रफर्तारं विश्वकर्मा महामुनिम् । मनसा वचसा नत्वा प्रथारम्भ कगेम्यहम् ॥२॥ गणोंके अधिपति श्री गणेश, देवी सरस्वती, ब्रह्मा, विष्णु, महेश आदिको और दिनको प्रज्वलित करने वाले सूर्यको नमस्कार करके शिल्पशास्त्रोको उत्कृष्ट करने- पाले (प्रयोजक) महामुनि श्री विश्वकर्माको मनवचनसे वंदन करके में प्रभाशंकर , इस प्रथके अनुवादका प्रारंभ करता हूं। वंशेऽस्मिन् रामजी शिल्पी ख्यातोऽवं वास्तुकर्मणि । तस्मिन्नयान्वयेजातः प्रभाशङ्करः पञ्चमः ॥३॥ सूत्रधार इति ख्यातो नाथनामाभिधानवान् । वास्तुमञ्जरी नामाऽयं ग्रंथः प्राणकृतवान् शिवः ॥४॥ तस्मिन्नवान्तरगते प्रासादमञ्जरी संज्ञके। सुप्रबोधिनी टीकां प्रन्येऽस्मिन् हि करोति सः ॥५॥ भारद्वाज गोत्र जिसमें श्री रामजीभा जेसे वास्तुकर्म में प्रख्यात शिल्पी हो गये। ऊसी फुलमे श्री ओघडभाइ के कनिष्ठ पुत्र प्रभाशकर पांचवी पीढीमें हुए । नाथजी नामके विख्यात सूत्रधारने कल्याणकारी " वास्तुमञ्जरी ग्रन्थ सोलहवीं शताब्दिमें" लिखा। जिसके अंतर्गत " प्रासाद मञ्जरी नामके ग्रन्थ पर सुप्रबोधिनी नामकी टीका उसी विख्यात कुलमें पैदा हुए स्थपति श्री प्रभाशंकरने लिखी है । ગના અધિપતિ એવા શ્રી ગણપતિને, શ્રી સરસ્વતી દેવી અને બ્રહ્મા, વિષ્ણુ અને મહેશ આદિ દેને અને દિવસને ઉજ્જવળ કરનારા એવા સૂર્ય- નારાયણને નમસ્કાર કરીને તથા શિલ્પશાસ્ત્રના ઉત્કૃષ્ટ કરનારા (પ્રાજક ) મહામુનિ શ્રી વિશ્વકર્માને મન અને વાણીથી નમસ્કાર કરીને હું પ્રભાશંકર આ ગ્રંથને અનુવાદને પ્રારભ કરૂં છું. વાસ્તુકર્મમાં પ્રખ્યાત એવા જે ભારદ્વાજ ગોત્રમાં શ્રી રામજીભા નામના સ્થપતિ થયા તેમના વંશમાં પાંચમા શ્રી પ્રભાશંકર જે સ્થપતિ ઓઘડભાઈના કનિષ્ઠ પુત્ર થયા તેઓએ શ્રીનાથજી નામના વિખ્યાત સૂત્રધારે ક૯યાણકારી * વાસ્તુમાંજરી” નામનો ગ્રંથ પહેલાં સોળમી સદીમાં રચેલો. તેના અંતર્ગત प्रासाद मंजरी" नामनी अय ५२ सुप्रबोधिनी नामनी राते प्रसिद्ध વશકુળમાં ઉત્પન્ન થયેલા શ્રી પ્રભાશંકર સ્થપતિએ કરી. .
. अभिनन्दन पत्रम् निर्मायिवा च । यस्याः पठनमानेण पामरोपि धायते । किमधिरजल्पितेनतिशम। ॥ श्री शंकरः पातु वः ॥ इह सलु गीर्वाणगीझ विपश्चितोऽविपश्चितश्च जनन्ति ब्रह्मस्वरूपिणं शिल्प- शानदक्षं बहुकलाप्रवीण नाम प्रभाशंकरम् । सोमपुराविप्रस माजे जरीजागर्ति तस्य विपुलं यशः, तद्यथा- श्लोक-मुदाधिकयोत्फुल्ल द्विजवरशतास्य श्रुतिसावलि । - व्याप्त शश्वञ्जयतु यमुने पालितानः ॥ प्रभा पूर्वी यत्र द्विज कपटवेपी स्मरहरः । गृहिणी तु पार्वती रूपा मोतीवाईति विश्रुता ॥ १ ॥ अनेक शिल्पशास्त्र कृत भूरि परिश्रमः। ओघडभाई जनकस्तस्य शिल्पशास्त्रसुदीक्षितः ॥ २ ॥ स साक्षा विश्वकर्मा हि जगत्यां मन्यते बुधैः । क्षीरार्णव टीकायां चमत्कारः वेधवास्तु प्रभाकरस्य टीका ग्रन्थानधीत्यापि सः । वेदाया प्रासादतिलकमुभयं शास्त्रान्समभ्यस्य च ।। नूतनाचक स्वहस्तलेखनकला लोके समक्षीकृता । सोय वै विधातु तस्य मनसः कीर्ति सदो माधरः ॥ ४ ॥ सर्वशास्त्रान् समाधीत्य शुद्धाशुद्धिविवेकतः । निरमापि प्रयत्नेन प्रभाशंकर अद्यावधि न पेनापि विदुषा पूर्गोकाना ग्रन्थानामेतादृशी टीका निर्मिता प्रदर्शितः ॥ ३॥ धीमता ॥ ५ ॥ तत्र भवतां शुभचिंतक । पं. चुन्नीलाल व्याकरणाचार्य ठे. नगरापाइसा, मु. मथुरा
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श्री गोमनाथनीय महाप्रसाद
प्रगः (मध्यम सराय)
१ श्री सोमनाथ प्रासादके निर्माता श्री प्रभाश करजी
३ ना. जामसाहेब.
राष्टपति डो राजेन्द्रप्रसादजी.
प्रस्तावना देशकी संस्कृतिका मूल्य प्राचीन स्थापत्य और साहित्य पर निर्भर है। विना और कला देशका अनमोल धन है। शिल्प स्थापत्य माना जीवन का अत्यत उपयोगी और मर्मसे भरा हुआ अग है । असके द्वारा ही प्रजा जीपनका विकास, सुघडता, ध्येय, कलाप्रियता स्पष्ट देखनेमे आता है । यह फन हृदय और चक्षु दोनों को आकर्षित करता है। शिल्प सादर्य मात्र तरण नहीं है किन्तु हृदयका भरपूर भाव है। जगतमे भारतीय स्थापत्य अन्य कोटिका ओर गौरवान्वित करे जैसा है। धर्मबुद्धिसे प्रेरित होकर भारतमे सर्व साहित्यका प्रारभ हुआ है। इससे शिल्प शास्त्रभी धर्मभावना के साथ संकलित हुआ है और शुसकी बुद्धि पूर्वककी रचना प्राचीन प्रपि मुनियोंने की है। प्रागैतिहासिक कालमे संसारके प्रत्येक प्राणीको शीत ताप वर्षा आदि विविध प्राकृतिक कठिनाभी के सामने अपनी रक्षाकी जरूरत महसूस हुअी। भिसीसे वास्तु विद्याका प्रारभ स्थूलरूपसे आदि कालसे हुआ मनाया जाय । जिस तरह भूचरोंने जमीनमे विल बनाया, सेयरोंने घोंसला बनाया, असी तरह मनुष्यने भी घासफूसकी पर्णकुटी बनायी या तो पहाडोमे गुफा सोज वास किया है। अिस तरह माना निवास के प्रारभ के बाद मामुहिक वासका ग्राम स्वरुप और बादमे नगररूप देखनेमे आता है। मानर सभ्यताके साथ ही शिल्प विज्ञानका विकास क्रमशः होता रहा। भारतीय वास्तुविद्या का प्रारभ काल बहुत प्राचीन है। घेद, ब्राह्मणप्रथ, पुरान, गमायण, महाभारत, जैन आगम प्रथ, योद्धप्रथ, सहिता, और स्मृति यथोंमे भी वास्तुविद्यावे अहेव पाये जाते हैं। ऋग्वेदादिमे वास्तुविद्या वर्णन और अन्य उल्लेस जब नजर आते है तब ज्ञात होता है कि जिनके भी पूर्व कालमे यह विद्या व्यवहारमे होनी चाहिये । अथर्व वेदके सूक्तो मे स्थापत्य कलाके बारेमें बहुत कुछ कहा है। शिल्प शब्दका प्रथम अपयोग ग्राह्मणग्रन्थोंमे हुआ है। प्रतिमा पूजनका प्रारभ वैदिक ब्राह्मण युगमे हुआ है । आश्वलायन गृह्यसूत्र और अन्य सूत्रप्रथोमे वास्तुविद्यावे कितने सिद्धात देसने मिलते हैं । सामवेदमे गृह्यसून गोमिल मे वास्तुविद्या के सिद्धात दिये है । घरका द्वार किस दिशामे रसना, अिमका फल क्या है, किन किन दिशा या विदिशाओंमे कौन कौनसे वृक्ष बोना, भूमिफल स्तुति. भूमि परीक्षा, रस, वर्ण, गध, प्लर (दाल) और आकार परसे कहे है। १ .
२ पापाण, प्राचीन आर्ययुगमे यह कला सरल रूपमे अल्पजीवी पदार्थ युक्त थीं । काष्ठ, बादमे इष्टिका, धातु आदि वास्त द्रव्योंका झुपयोग शनैः शनैः होता गया। रामचरित मानस और महाभारत जैसे अतिहासिक महाकाव्योंमे देवालय, महालय और सामान्य गृहोंके विविध वर्णनके शाब्दिक चित्र हैं । मानव उत्क्रांतिके साथसाथ शिल्प विदाका भी विकास होता गया । समरांगण मूत्रधार और अपराजित सूत्रस तानमें' वास्तुउद्भवकी पौराणिक आख्यायिकाओमे ओफ मनोरंजक क्था है । पृथ्वी विकास प्रारंभकालमें पृथुराजासे भयत्रस्त पृथ्वी सष्टिकर्ता ब्रह्माके पास गयी । और अपने पर गुजरते त्रासका निवेदन किंग । ब्रह्माजीने पृथुराजको बुलाया और हकीकत पूछी । पृथुने ब्रह्माजीसे प्रार्थना करते हुझे कहा कि हे जगन्नाथ, आपने मुझको जगतस्वामि बनाया । पृथ्वी के अपर तो गढे, टीले, पर्वत आदि बहुत है तो वर्णाश्रमधर्म के योग्य लोगो के वास के लीये समतल भूमि बनाना अनिवार्य है ही। जिसके सिवा उपाय क्या है ? महाराजा पृथुकी बात सुनकर, दोनों को शांत करके प्रजापतिने कहा "हे महीपाल, आप मही याने कि पृथ्वीका विधिवत् पालन करें तभी यह पृथ्वी निस्संदेह निष्पाप होकर आप और समस्त प्राणिवर्ग के उपभोगके लिये योग्य बनेगी । अपने स्थानादि के लिये सर्व सिद्धि प्रवर्तक भृगुऋपिके भानजे (प्रभास के पुत्र ) विश्वकर्माका बहुमान करे, सुनको सेवा संपादन करें। वे बृहस्पतिसम प्रसरबुद्धिवाले हैं। वे आपके राज्यमे पुर, नाम, नगर गृहादि वसायेगे जिससे यह पृथ्वी स्वर्गसम बसने योग्य बनेगी । अतः हे वत्स, तुम जाओ अपना काम करो। और हे पृथ्वी, तुम भी भय छोडके राजा पृथुकी प्रियंकर बनो और हे विश्वकर्मा आप भी राजा प्रजाके अिच्छित कार्य कीजिये ॥" अिस तरह पृथुराजाने विश्वकर्माकी से प्राप्त की और पृथ्वीको शिल्प-स्थापत्यसे सजाया। जैन आगम प्रथोमे भी वास्तुदेवों के नाम और सुनकी बलिपूजादि विधियां दी गयी है । अस संप्रदायके स्थापत्योमें चैत्य. स्तूप, विहार और स्तंभोंकी प्रथा थी । बौद्धोंने भी अनका अनुसरण किया या नहीं यह वात खोजनेकी है । ईसवीसनके पूर्वका मथुरामें अक जैन स्तूप था । जैन आगामे देवालय को चैत्य कहते है। जैनसाधुओंके वासके लिये विहारकी प्रथा अम संप्रदाय मे थी । जिस प्रथामे परिवर्तन हुआ और वर्तमानमे शहरों में "उपाश्रय” होने लगे। जैनोंमे स्तंभकी प्रथा अबतक दिगम्बर स प्रदायमे मौजुद है । भगवान वृषभदेवके बाद सुनके पुत्र भरत चक्रवर्ती और गहुबलीने कभी स्थापत्यों की रचना की, और असा ब्योरा जैन ग्रंथोमे किया गया है । बाहाली ने तक्षशिला बसायी जहाँ इक्कीस इक्कीस २१४२१ प्रत्येक वाजूके मडपबाला चतुमुर्ख प्रासाद अन्हो ने बंधाया भरतचक्रवतीने पुन सोमयशने त्रैलोस्य दीपक नामका प्रासाद घनाया जिसका अद्भुत वर्णन जैन प्रथो मे है । पवित्र शगुंजय नदीकी पूर्वमें और दक्षिणमें "सुरविश्राम" और "रत्न तिलक" नामकं प्रामाद, और गिरनार पर "सुरसुदर" नामरे चतुर्मुस प्रासादके अिर्दगिर्द ४४ ११ चौचालीस म उपवाला उद्यान सहित प्रासाद और पश्चिममे "स्वस्तिका-लिंक" नाममा प्रासाद भी बनवाया था। भरत चक्रवर्तीने अशापद पर्वतपर की जहाँ ऋषभदेव के अग्नि संस्कार हुआ थे असी स्थलपर तीन बड़े स्तूप गये और ओक योजन लंबा और चौडा चतुर्मुख 'सिहनिषद्या" नामक प्रासाद बनवाया और यहाँ पर अघा स्तूप और छोटे छोटे स्तूप बँधाये । अिन सो के वर्णन जैन ग्रंथोमें दिये हैं । परंतु अनके अवशेष आज देखनेमे आते नहीं । महाभारतकी पांडयो की सभाका वर्णन देते हुओ "विश्वकर्मा" या "मय" स्थपतिके स्थानपर अर्जुनके मित्र मणिधुडविद्याधरने विद्यायलसे इंद्रसमा जैसी नवीन सभाका निर्माण किया था अमा वर्णन दिया है। घौद्ध संप्रदायके स्थापत्योमे भी जैनियों जैसी चैत्य, स्तूप विहार और स्तंभकी प्रथा विद्यमान थी ! बुद्ध निर्माण के दो शताब्दि बाद प्रतिमा पूजनका प्रारंभ हुआ । झुमके अपर देवालय बनाये गये जिनको चैत्य कहते हैं। बुद्ध या जुनके संप्रदायके महापुरुषोंके अस्थि, बाल. या भस्मके अपर स्मारक बनाने मे आते । जैसे स्थापत्यको 'स्तूप (उलटे टोकरेके आकारका)" कहते हैं । यौद्धसाधुओंके रहने के या अध्ययन करनेके स्थानको “विहार" कहते है । खुद बुद्ध भगवानने विहारके मापके बारेमे कहा है। बुद्ध भगवानने जहाँ जहाँ बास किया हो या अपदेश दिया हो, जैसे पवित्र स्थानोंपर अनुयायीयोंने स्मृतिरूप विशाल "स्तंभ" खड़े किये हैं। वर्तमा. नमे यह सब स्थापत्य संपूर्ण रूपसे या अवशेष रूपमे देसनेमे आते हैं। पेदिक, जैन, या बौद्धसप्रदायकी कंदराओ बनामी जानेके बाद देशालयोको बांधनेकी प्रथा शुरु हुी होगी औमा मानने का कारण मिला है । देशके पृथक पृथक भागोंमे कंदराओं बन सके औसी गिरिमालाओ मौजुद है । वहाँ पहले तो सरल रूपमे गुफा होने लगी और बादमे पाट और नक्काशी कामसे अलंकृत होने लगी। अिनमेसे कभी गुहाओं की छत काष्ठकी प्रतिकृति रूप है । असा माना जाय कि यह कला लकडीपरसे पत्थरमे उतरी । असी कलामय गुफाओकी छत- । .
दिवारोंपर पौराणिक धार्मिक प्रसंग सुदर मूर्तिओ के माथ नराशी गयी है । अनको देखते ही जगत भरके कला रसिको के सर भारतीय शिल्पियोंके सामने झुक जाते हैं। महाबलिपुरम्, धारापुरी, नासिक, भज, अजंटा अिलोरा विहार झुडीमाकी उदयगिरि संडगिरि इत्यादि गुफाओं दर्शनीय हैं । जहाँ शिल्पियों ने जड पत्थरको सजीव रूप दिया, और पुराण के कालका हूबहू प्रदर्शन किया, वैसे स्थानोंको देखकर गुणज्ञ प्रेक्षक शिल्पि की सर्जनशक्तिको सराहते हैं। यहाँपर टॉकीके शिल्पसे या (पीछी) तूलिकाके चित्रोंसे ये शिल्प अमर कृतियाँ सिरज गये हैं। असंड पहाडमेंसे बनायी गयी इलोराके कलामंदिरकी रचना तो शिल्पिकी अद्भुत चातुर्यकलाका अजोड नमूना है । मूर्तिपूजा और देवालयोंकी आवश्यकता मारतके प्रत्येक संप्रदायमें मूर्तिपूजा प्रधान है। असके आरंभ कालके बारे में विद्वानोंका मतभेद है। वेदेमेिं मूर्तिके विषयमें उल्लेख हैं। ध्यान योगकी सिद्धि के लिये शानी महापुरुषोंने प्रतिमाफी जरूरी स्विकारी । वेदकालमें यज्ञके क्रियाकाडेमें देयोंकी स्तुतिके साथ बलि दिये जाते थे । अिन देवोंके वर्णनमें सुनके आयुध, वाहन, वर्ण इत्यादिकी कल्पना परसे प्रतिमाका स्वरूप निर्माण हुआ। भक्तिमार्गमें प्रतिमा पूर्ण अवलंबनरूप होनेसे मूर्तिपूजाकी जरूरत सी हुश्री । अिस विचारका मूल प्रारंभ निराकार लिङ्ग पूजनसे हुआ, जिसके बादमें ही माकार मूर्तियाँकी कल्पना पैदा हुओ। आर्यावर्तके सिवा पच्छमके देशोंमें आदम-इयाको पृथ्वीकी प्रजोत्पत्तिको आद्य मानने लगे। आर्यावर्तने झुनको शिव और शक्ति सरूपमें स्विकारा | धादमें वैदिक धर्ममें सर्जक, पालक और संहारक देयो-ब्रह्मा विष्णु और महेशकी कल्पना प्रादुर्भूत हुआ। धार्मिक दृष्टि से साधक, साध्य और साधन अनुममसे भक्त, प्रतिमा और माक्ष,-माने जाते हैं। प्रतिमा मूर्ति की जरूरत स्वीकार्य होनेके याद देवालयोंकी आवश्यकता हुश्री। त्रिमूर्ति और यादमें पंचदेव-प्रमा, विष्णु, शिव, गणेश, और सूर्य की पूजा भारतमें थल स्थल पर होने लगी । विविध तीर्थ स्थानों के माहात्म्य अनुसार देव- देवियोंके. मंदिर भारतके प्रत्येक प्रांवमें यंघाने लगे। शिल्प स्थापत्यकी कितनी ओस शैलियों का जन्म ही भारतीय आध्यात्मिक विचार धारा से हुआ है । पुनर्जन्म के सिद्धांत अनुसार जीव-प्राणी विकास करते फरते अनेक उथ कोटियोंमें जन्म लेते हुसे आखिरको ब्रह्ममें विलीन हो जाता है । 'यह सिद्धांत देवमंदिरके शिसगरूप कु आकारमें समाया हुआ है । अिसमें भारतीय शिल्प पद्धति अंडसृष्टि के सिद्धांत की विलीनताका दर्शन कराती है । शिल्प की आध्यात्मिक भावनाका यह अक स्पष्ट चिन्ह है । धर्मप्रवृत्तिसे ही धार्मिक स्थापत्य भारत भरमें सडे हुओ है । और जिनके द्वारा ही शिल्पि वर्गको प्रोत्साहन भी मिला है । प्राचीन कालमें शिल्पीको ब्रह्माका पुत्र मानते थे और शुसका पूजन होता था। अशिया खंडमें जापानमें यौद्ध धर्मका प्रचार हुआ तव सुस देशकी राजमाताने बाखुशी मुनाद द्वारा अपनी अिच्छा प्रदर्शित की थी कि "अपने राज्यके नगरों या अद्यानों में शिल्पियो के टॉकों का गुंजार हमेशां सुनाता रहे" । संहिता और स्मृतियों में स्थापत्य ॥ असा कहा है कि चतुर्विध स्थापत्य, अष्टादश आयुर्वेद और ज्योतिप-जिन सम शास्त्रों के मूल प्रवत क ब्रह्माजी हैं। चतुर्विध स्थापत्यमें (२) पुरनिवेशादि (२) भवन निर्माणादि (३) प्रासाद वास्तुशास्त्र (४) जलाशयादि का समावेश होता है। वास्तुविद्या अथर्ववेदका अपवेद है। जिस तरह शुक्राचार्यजी कहते है अनंत विद्या और असंख्य कलाओं की गिनती नहीं हो सकती किन्तु मुख्य विद्या बत्तीस ३२ हैं और मुख्य कला चौसठ ६४ उन्हो ने कही हैं । अिन विद्या और फलाओं की व्याख्या देते हुओ शुक्राचार्यजी कहते हैं- यद् यत्स्याद् वाचिकं सम्यक्रम विद्याभिसंज्ञितम् । शक्तो मूकोऽपि यत्कर्तुं कलासंज्ञं तु तत्स्मृतम् ॥ जो कार्य वाणीसे हो सके असे “विद्या" कहते हैं । और मूंगा भी जिस कार्यको कर सके वह कला । शिल्प, चित्र, नृत्य आदि मूक भावसे हो सकते है । अतः सुन सबको कला कहते हैं । शुक्राचार्यजीने ६४ कला कही हैं। जैन सूत्रों में समुद्रपालने ७२ कला गिनानी है । कामशास्त्रमें यशोधरने ६४ कला कही हैं जिन के अव्यं सर भेदसे ५१२ कला दी है । ललित विस्तारमें ६४, कामसूत्रमें २७ और श्रीमद् भागवतमे ६४ कही है । मालाकार (माली), लोहकार (लोहार) शंसकार (शंखके आभूपण बनाने वाला ) सुवर्ण कार (सुनार), कुलिन्दर (जुलाहा), कुंभकार (कुम्हार) फेसकार (कसेरा), सूत्रधार और चित्रकार । अिस तरह कलाओ मे विविध हुन्नर का समावेश किया है। नृत्य, गीत, वादिन ये सब फलाओं हैं । महाभारतमे विश्वकर्माको हजार शिल्पिका स्रष्टा कहा है। भृगुस हितामें महर्षि भृगुने १ धातुसंड, २ साधनखड ३ वास्तुसंड का , वर्णन दिया है जिनमें (१)धातुसंडके तीन वर्ग कृषि, जल और सनिजखेती करना जलयाँध बनाना और जमीनमेंसे सनिज द्रव्य खोद कर निकालना । (२) साधनसंडमें "नौकारवामियानानां कृतिः साधनमुच्यते । नौका, रथ, अग्निसे चलता वाहन (जिन) ये तीन वाहन पृथ्वी पर रथ, अग्नियान, और जलमें नौकायान और हवामें व्योमयान-"आकाशे अग्नियानं च व्योमयानं तदेव हि" जिस तरह जलचर, भूचर और खेचर तीन प्रकारके वाहन कहे है। (३) वास्तुसंटमें 'वेश्मप्राकारनगररचना वास्तुमंज्ञितम् ” मकान, किले, नगर, देवालय, जलाशय इत्यादि कहे हैं। आजीविकाके साधनकी हैसियतसे जिस कलाफा मनुष्यने स्विकार किया, झुसी व्यासाय वर्गके ममूह के अनुसार शातियां हुी विविध कला विविध क्रिया- द्वारा होती है। मनुष्य जिम फलाका आश्रय लेता है झुमीके अनुसार शुसकी प्राति या विरादरीका नाम होता है । जिस तरह कलाके धर्म अनुसार पेशेवाली शातियोंके समूह हु । वास्तुशास्त्र, शिल्प और स्थापत्यकी व्याख्या पास्तु स्थापत्य और शिल्प शब्दकी स्पष्ट व्याख्या के अभावमें उनका मिश्र स्वरूप समजकर भाग प्रयोग हम करते हैं किन्तु वास्तुशास्त्र अिन सर्वके विस्तृत अर्थ में है । अमफे अंतर्गत स्थापत्य और स्थापत्य के अंतर्गत शिल्प है- वास्तुशास-स्थापत्य-शिल्प यान्तुशाम्य-देशपथ, नगर, दुर्ग, सरोवरादि जलाशय, उद्यान, याटिका, आराम- स्यान, राजपामाद, देवप्रामाद, सामान्यगृह, शल्यज्ञान, सिरामान, भूमि परीक्षा जिन सर्व विद्यापे शाम को वास्तुशाग्र कहते हैं। स्थापत्य नगर, दुर्ग, जलासय, गनप्रासाद, देवासाद, सामान्य गृह इत्यादिका काम स्थापत्यमें आता है। शिल्प-दुर्गाद्वार, गजमान, देवप्रामाद, जटाशय, आदि स्थापत्यो में मुशोभन, अलंपरण, गोग, मरोग्य यगंराद को अकृत करना इम फलाको गिल कहते है। स्थापत्य का विज्ञान भारतीय मापत्यका विकास यया धार्मिक भावनामे हुमा है । देवमंदिरों के पाद गजाद्वारा नगर, दुर्ग और गाभान हुए। घनिनि अपनी जारी ७ मुताविक अदार पृत्तिसे इस कामको आगे बढाया । इसवी पूर्व पाँचवीं शताब्दि के प्राचीन भमानशेप मिलते हैं जिनको देखकर हम कह सकते हैं कि यह विकास राजा और धनिको की बदौलत ही हुआ है। इस देशकी शिल्प स्थापत्य और विद्याकला कौशल्यकी समृद्धि अजोड है जिसके वर्णन प्राचीन महाकाव्यो मे उपलब्ध हैं। प्राचीन स्थापत्यके कालक्रमसे हम असा अंदाजा लगा सकते हैं कि दीर्घकालकी व्यवहारू अनुभूति के वादही स्थापत्यके नियम गढ़े गये थे। भारतके अलावा और प्रदेशो में भी अिसफा असर देसनेमे आता है । स्थापत्योंमें सास करके देवमंदिरो के विविध विभागों की रूप पद्धति का विकास पृथक्पृथक् कालमें प्रत्येक विभागमें भयम् होता गया । धार्मिक मान्यता, भावना और साधनके योगसे भिन्नभिन्न रूपों का अद्भव हुआ है । अिससे यह कहना कि अमुक पद्धति चौकस संप्रदायकी है यह गलत है । अमुकरूपका प्रवर्तन अमुक सप्रदायने किया अिससे यह ब्राह्मणी, वैदिक, बौद्ध या जैन संप्रदाय की शैली है यह कहना ठीक नहीं, मनगढत है । देशके चौकस विभागमे प्रचलित ओक या दूसरे संप्रदायकी शैलीमें देशके अस विभागमे कालक्रमानुसार नवीं दसवीं शताब्दि पर्यंत स्थापत्यों के रूप संबंधी परिवर्तन होते ही रहे हैं, जिसके बाद ही स्थायी सिद्धांत तय हुसे होंगे जैसा मानना होता हे । पाश्चात्य विद्वान- लोग भारतीय स्थापत्य कलाके सांप्रदायिक भेद बताकर रचनाकी पहचान कराते है यह बिलकुल असत्य हैं । ये तो मात्र कालभेद और प्रांत भेदसे प्रचलित शिल्प पद्धति के भेद हैं। भारतीय स्थापत्य कलाका सास लक्षण तो अिसमें बाँधका- मके रूपकी सहेतुक रचना है जो वैदिक, बौद्ध या जैन किसीभी संप्रदायके मदिरमे स्पष्ट रूपसे देसनेमे आती है । कलाको प्रोत्साहन भारतमें राजा, धर्माध्यक्ष, आचार्य और श्रीमंत वर्गने शिल्प स्थापत्य और कलाको प्रोत्साहन देकर असे जीवंत रसा है । चे असे अपना प्रधान धर्म मानते। द्रविड़के बड़े बड़े राजाओने अपना राज्य धन देवधर्म मानकर खूब सरचा था । भिसीसे ही द्रविडके स्थापत्य विशाल और भव्य हुझे हैं। वर्तमान में राज्याध्यक्ष, धर्माध्यक्ष, और धनाध्यक्ष ये सीनो वर्ग अदृश्य होते जाते है । जिस तरह कलाका कदरदान वर्ग घिसता जाता है । अफसोसके साथ कहना पड़ता है कि वर्तमान राज्य सरकार भारतीय शिल्प स्थापत्य प्रति उदासीन है। वर्तमान सरकार नाटक, चेटक, नृत्य, सगीत जैसी क्षणिक मनोरंजक कलाको स्थान देकर .
प्रोत्साहित करती है, जब स्थायी स्थापत्य कला और उसके प्राचीन ग्रथो के संशोधन की और दुर्लक्ष करती है । अतः मर्मज्ञ फलाविदों को लाजिम है कि वे अिस प्रश्नको झुठा लें और जुत्तजन के लिये प्रवल प्रयत्न करके थचेसुचे कला- मर्म झोंको प्रोत्साहित करें। विद्यापीठों का भी यह कर्तव्य है। मेजिनीयरीग कालेजों मे जिस विद्याको स्थान मिलना चाहिये । उसमें थीअरेटिकल और प्रेकटिकल (कियात्मक ) ज्ञानकी व्यवस्था होनी चाहिये । शिल्पि प्रशंसा भारतीय शिल्पियोंने पुराण प्रसंगोको पत्थरमे सजीव किया है। उनके टॉफैकी सर्जन शक्ति परम प्रशंसापान है । पाषाण शिल्पसे शौर्य और धर्मा योध होता है । अचेतन पत्थरको वाचा देने वाले से कुशल शिल्पि भी कवि हैं। सचमुच वे हमारे धन्यवाद के काबिल हैं । अलबत्ता, कला को धर्म या जाति विशेषकी पूंजी नहीं, यह तो समग्र मानव समाज की है । भारतीय शिल्पियोंने जिस कलाद्वारा स्वर्ग यमुठको पृथ्वीपर उतारा है । राष्ट्र जीवनको समृद्ध बनाया और प्रेरणा अर्पण की है। हमारी असी स्थापत्य क्लाफी ओर आज राजफर्ता सरकार घिरत हुी है । धनीवर्ग दुर्लक्ष करे असे संयोग है । देशका यह दुर्भाग्य है । जड पापाणमें प्रेम, शौयं , हास्य या करुण भाव दिसाना मुश्किल है। चित्रकार तो रंगरेपासे यह दिसा सकता है। किन्तु शिल्पी विना रंग पापाणमे अिनका भागत्मा सर्जन कर सकता है यही उसकी राधी है यहां पर उसकी अपूर्व शक्तिकं दर्शन होते है । भारतीय फलाने तो जगत के शिल्प स्थापत्यमे अनमोल हिस्सा दिया है ॥ सार्वजनिक उद्यानोमे नमस्वरूप बनानी हुश्री प्रतिमा अभद्र विकारांको जगाती है । अपने शास्त्र भिसका निषेध करते हैं और असे शिल्ली को अपराध मानते हैं। फिन्तु कभी आधुनिक कला विधेयक कहते हैं कि नग्न देह तो नैसर्गिक है। उसके उपर (पृत्रिम) यनावटी यवोंके परिधागसे कलाकी हत्या हो जाती हैं। उनके प्रति हमारा अक ही सवाल है कि कलाके माथ नीति का फोभी संबंध है या नहीं? मूर्तिविधानमें मर्य शिल्पि ममान फर्तव्यकाल नहीं हैं । अपनिम कौशल्य विना किमी गति पडना ही नहीं अमा प्रतिबंध तो रस्य नाही। मिरासे ही मिन मिन पटाकारों में निर्मित मूर्तियाम कम या अधिक मौन्दय दम्पनेमें जाते है।
। कलाकृति कुदरतके साथ साम्य धराती होनी चाहिये। जिस दृष्टिसे भारतीय कलाकृतियोंको हम देखें तो भारतीय शिल्पि कुदरतकी बनिस्तत भावनाको भनल मानते हैं। वास्तु शास्त्रके महान मणेता- मत्स्यपुराण और अन्य शिल्पप्रथोमे वास्तुशास्त्रके अठारह आचार्यके नाम दिये हैं । उन्होंने शिल्पग्रंथों की रचना की और अन्य शास्त्रो पर भी उन्होने लिसा है । वे ऋपिमुनि अरण्य के शांत वातावरणमे रहते थे और विद्याके जिज्ञासुओंको अपने आश्रममे रखकर उन्हें विद्यादान देते थे। अिनके नाम है- १ भृगु, २ अनि, ३ वसिष्ठ, ४ विश्वकर्मा, ५ मय, ६ नारद ७ नग्नजित, ८ विशालाक्ष, ९ पुरंदर, १० ब्रह्मा, ११ कुमार, १२ नंदीश, १३ शौनक, १४ गर्ग, १५ वासुदेव, १६ अनिरुद्ध, १७ शुक्र, १८ बृहस्पति । अिनके अतिरिक्त बृहत्संहितामे और सात नाम दिये हैं। ये हैं १ मनु, २ पराशर, ३ काश्यप, ४ भारद्वाज, ५ प्रल्हाद, ६ अगस्त्य और ७ माकंडेय । अग्निपुराण अ० ३९ की लोकाख्यायिकामे शिल्पशास्त्रके २५ मंथोंकी नोंध मिलती है । वे तंत्र प्रथ है । पर जिनमे शिल्प उल्लेस मिलते है । उनमे १ शाडिल्य, २ गालप, ३ स्वयंभूव, ४ कपिल और ५ नृसिंह आदि के नाम है । चे तांत्रिक शिल्पग्रंथोके प्रणेता माने जाते हैं। उपरोक्त मुनिप्रणित शिल्पप्रथ आज प्राप्य नहीं है किन्तु उन ग्रंथोके अलग अलग अध्याय मिलते हैं । या उन प्रथोके अवतरण या रेफरन्स अन्य ग्रंथोंमे देसनेमे आते हैं । बृहत्संहितामै गर्गमत का समर्थन है । स्मृति, संहिता और नीतिशास्त्र के ग्रंथोमे शिल्प के उल्लेस है । पुराणो मे तो अध्याय के अध्याय दिये है । तांत्रिक प्रथोंमे भी जैसा ही है । ज्योतिष प्रथों में भी शिल्प का विषय बहुत कुछ मिलता है । हमारे कममाग्य है कि उपरोक्त आचायों का ओक असंड अटूट ग्रंथ उपलब्ध नहीं है । मासाद शिल्पशैली के प्रकार- नागरादि शिल्प ग्रंथोंमे कहा है कि भारतके विविध प्रांतोंके प्रासाद शिल्पकी चौदह जातियाँ विद्यमान थीं, जिनमेसे आठ जातियोंको उत्तम कहा है। देशक किन किन भागोंमे उस जातिके प्रासादकी रचना होती थी भिसका अस्पष्ट उहेस है। २ १० --- नागरा द्राविडाश्चेव भूमिजा लतिनाग्तथा । सांधाराच विमानाश्च मिनकाः पुष्पकान्विताः ॥ १॥ एते चाप्टौ शुभा ज्ञेयाः शुद्धन्छंदाः प्रकीर्तिताः । दशजाति-कुल- स्थान-वर्णभेदैरुपस्थिताः १ नागरादि, २ द्राविडादि, ३ भूमिजादि, ४ लतिनादि, ५ सांधारादि. ६ विमानादि. ७ मिश्रकादि, ८ पुष्पकादि अिन आठ जाति के प्रासाद (चौदहमेसे) शुद्ध छंदकी, देश, जाति, कुल, स्थान अनुसार वर्ण रूप भेदसे उपस्थित हुओं । और आगे किस प्रांतमे किस जाति के प्रासादकी रचना होती है यह भी कहा है। शिल्पप्रथोमे प्रामाटोंकी जातियोंके उद्भवके बारे मे कथा आती है कि हिमालयकी उत्तरमें दारुकावनमें जिन जिन देव दानवादि गणेोंने जिस जिस प्रकार और आगरमे शिवजी के पूजनकी रचना की उसी के अनुसार प्रासाद के अिस घाटकी आकृति का जन्म हुआ। द्रविड शिल्पग्रंथोंमें १ नागर, २ द्राविड ३ वेसर-ये तीन जातियां कही हैं। उत्तरमें नागरादि जाति, दक्सनम द्राविडजाति, और अिन दोनों के मध्यभागमें वेसरजाति के प्रासाद कहे हैं । तब उत्तर भारतके ग्रंथोमें विस्तार पूर्वक चैदह जातियाँ कही है । ब्रह्मदेश, सियाम, वाली, सुमात्रा आदि अग्नि पूर्वमें प्रवर्तती हुी जातियाँ, भारतकी अिन चौदह जातियों से है असो लगता है। अिन सब जाति के प्रासाद किन किन प्रांतोमे किन किन स्वरूपमि बनाये जाते थे, जिसके संशोधन की जरूरन हैं । विद्वान और अनुभवी ज्ञाता स्थपतियोंकी नियुक्ति करके सरकार को यह आवश्यक श्रेष्ठ पुरातत्व कार्य त्वरित करना चाहिये। स्थापत्याधिकारी- वास्तुशास्त्र के ग्रंथमे कहा है कि यजमानको चाहिये कि शिल्पके गुणदोषकी कसौटी के बाद ही श्रेष्ठ शिल्पिको चुनकर कार्यका आरंभ कराना । स्थपति के गुणदोष संबंधमे कहा है ---गुणवान्, शास्त्रज्ञ, गणितज्ञ, धार्मिक, सदाचारी, चरित्रवान्, मिष्टभाषी, निष्कपटी, निलामी, बहु वधुवाला, नीरोगी और शारीरिक दोपहीन, निव्र्यसनी, चित्ररेसा कार्यमें भी प्रवीण, कुशल होना जरूरी है । स्कंदपुराण के प्रभाम संडमे सोनपुरा शिल्लि श्रेष्ठ माना गया हैं । शास्त्रकाराने बांधकाम के अधिकारी के वर्ग कहे हैं - १ स्थपति, २ सूत्राही, ३ तक्षक, ४ वर्धकी । अिन चारोंके कर्तव्यकी नधि है ! १ स्थपति-स्थापत्यकी स्थापनामें संपूर्ण योग्यतावाला (चीफ अंजीनीयर) २ सूत्रमाही-स्थपति के गुणकर्मको अनुसरनेवाला पुत्र या शिष्य जिसे शिल्पिओंको भाषामे “ सुनर छोडो" कहते हैं । रेखा चित्र बनानेवाला ड्राफ्ट्समेन . " ठार और सर्व कार्यों का चलान कर सके असा निपुण, स्थपतिका आज्ञापालक । सूत्रमाही-आर्किटेक्ट अॅजिनीयर । ३ तक्षक-सूत्रमान प्रमाणको जाननेवाला छोटेवडे पत्थरोंका काम करनेवाला या करानेवाला । सरल या नक्काशी या रूप काम करनेवाला, सदा प्रसन्न चित्त, स्थपति प्रति सद्भाव धरानेवाला तक्षक (ओवरसीयर) है। ४ वर्धकी-शास्त्रमें अिसके दो प्रकार कहे हैं । अक तो काष्ठ कार्य करनेवाला (सूत्रधार) और दूसरा मिट्टी कार्यमें निपुण (मोडलिस्ट) गुरुभक्त वर्षकी जानना । आधुनिक कालमें सोमपुरा शिल्पिओं को कच्छ देशमे " गीधर" कहते हैं। वह शब्द गजधर (गज को धारण करनेवाला) का अपभ्रंश है । सौराष्ट्र गुजरात आदि पश्चिम भारतके पुराने शिलालेखोंमें शिल्प शास्त्रीको . सूत्रधार कहा है। उसका अपभ्रंश . हुआ और सौगष्ट्रके शिल्पी परस्पर जिस शब्दका प्रयोग करते हैं। अंग्रेजी राज्य शासन कालमें कारीगरोंके समूहके अधिकारी को " मिखी” कहते हैं परंतु यह शब्द शिल्पियोंके लिये ठीक नहीं। शिला को घडने वाला शिलावट, जिसका अपभ्रंश सलाट हो गया। उत्तर भारतमें "शिलावट" शब्द विद्यमान है। भारतका शिल्पि वर्ग-भारतके प्रत्येक प्रांतमे प्राचीन शिल्पका अभ्यासी वर्ग बसा हुआ था । अपने अपने प्रांतोंमें वे प्रचलित जाति (नागरादि, द्राविडादि, भूमिजा, इत्यादि) के प्रासादोंकी रचना करते । परंतु कालधर्म और विधर्मीयोंकी धर्मा धतासे अमुक प्रांतोंमें अिस वर्गका नाश हो गया और उसके स्थापत्य भी (नष्ट) मलियामेह हो गया । प्राचीन शैलीके शास्त्रोक्त नियमानुसार जैसे स्मपत्य होते जिससे उन प्रांतोकी शिल्पशैली (पद्धति) मूलमें किस प्रकारकी और किस कालकी थी यह जानने के साधन अप है। बगाल, विहार, सरहद प्रांत, पजाय, उत्तर प्रदेश, कश्मिर या आंध्र प्रदेशमें प्राचीन शिल्प स्थापत्य अभ्यासके लिये तुलनात्मक दृष्टिसे अल्प हैं । यद्यपि खुदाी में ये अवशेषरूपमे पाये जाते है। उपर कहा हुवा शिल्पका अभ्यासी वर्ग तेरहवीं चौदहवीं शताब्दि तक अस्तित्वमे था । उन्होंने शिल्पप्रथों की अच्छी हिफाजत की थी। ग्रंथोके अनुसार उन्होंने कार्य करवाये थे। जैसा शिल्पिवर्ग आज भी सोमपुरा शिल्पिवर्ग पश्चिम भारत गुजरात राजस्थान और मेवाड़में भी है। उनकी उत्पत्ति का अितिहास सोमनाथ महादेव की स्थापना के साथ जुड़ा हुआ है । स्कंदपुराणके प्रभासखंडमें सर्वश्रेष्ठ शिल्लि सोमपुराको विश्वकर्मा रूप मानकर देवाने शिल्प स्थापत्यका व्ययमाय उनको सुपूर्द किया था । उन के पास प्राचीन शिल्पग्रंथोका संग्रह है। पूर्व , ।
- भारतमें उडिया-आरिस्सा प्रांत में महापात्रका अपभ्रंश महाराणा जातिका शिल्पिवर्ग आज भी विद्यमान है, उनके पास भी शिल्प ग्रंथोका संग्रह ठीक प्रमाणमें है। पुरी और भुवनेश्वर के अनेक मंदिरोंका निर्माण उनके पूर्वजोंने किया था । भुवनेश्वर में उनके दो परिवार (कुटुम्ब) है । जगन्नाथपुरी में यीस परिवार (कुटुम्ब) है और याज पुग्में दो वसते हैं द्रविड के शिल्पि विश्वकर्माके वंशज-ब्राह्मणकुल के होनेका दावा करते है। उनमेंसे की सिलोनमें बसते हैं । कुंभकोणम् के पास शिल्पिओंका ओक छोटासा गांव बसा है । वे धातुकी मूर्तिकलामें प्रवीण हैं। म्हैसुर प्रदेशमें कर्णाटकमें शिल्पि वर्ग बसनेका सुना है । हलशाल राज्य कालने बंधाये हुओ हलीबड, वेलुर और सोमनाथपुरम् के मंदिरोंकी सर्वोत्तम आश्चर्यकारक कृतियाँ अिनके पूर्वजोंकी बनाभी हुी हैं । १११७ ईसवीमें डंकनाचार्य नाम के प्रसिद्ध शिल्पि हो गये । उस काल के अन्य शिल्पियेकि नाम-मलितम्मा, वालेया, चंदेया, पामया, भर्मया, नानज्या, पालमसिया इत्यादि के नाम उपरोक्त मंदिरेमें पापाण पर खुदवाये मिलते हैं । कर्णाटककी शिल्पशैली वेसर या विराट जातिकी द्रविडसे उत्तरमें होती। जयपुर और अल्वर की तर्फ के प्रदेशोंमें गौड ब्राह्मण जाति के शिल्पि. प्रासाद शिल्पि की बनिस्बत प्रतिमा विधानके व्यवसाय में प्रवीण है। उत्तर प्रदेशके कितने भागोंमें "जांगड" नामकी जाति है जो अपनेको शिल्पिवर्ग में सपाती है। वे काष्टकाम, सादा पापाणकार्य, चित्रकाम, कपि, और लोहेका काम भी करते हैं । विश्वकर्माको अपना इष्टदेव मानते हैं। गुजरात और मेवाटमें वैश्य, मेवाडा, गुर्जर और पंचाल ये चारों शिल्पिवर्गली ज्ञातियाँ हैं । वे दावा करते हैं कि हम विश्वकर्माके पुत्र हैं । वैश्य, मेवाडा, और गुर्जर काष्ठकर्म करते हैं । और पांचाल लोहकार्य में कुशल हैं । भारतके की प्रांत में धर्माधता और धर्मभ्रष्ता से धर्म परिवर्तन के कारण कुल परंपरा के व्यवसाय याला शिल्पिवर्ग नष्ट हो गया हो औसा लगता है। शिल्पकार्य में आजीविका की अमाव महसूस होने से वे अन्य व्यवसायमें जुटे हों। वास्तुशास्त्र के ग्रंथांका साहित्य- वास्तुविद्या, ज्योतिष, गणित, भूमिति इत्यादि शास्त्रोंका प्रादुर्भाव, भारतमें ही हुआ है । ये शास्त्र अरव और प्रीक प्रजाद्वारा पश्चिमके देशों में गये । प्रत्येक विद्याके सिद्धांतोंका वर्णन उस विद्याके प्राचीन संस्कृत ग्रंथोंमे उसकाल के प्रसिद्ध पिमुनियोंने किये हुओ, पाये जाते है । उन ग्रंथों में उनके नाम भी जुटे हु , - १३ है । यह साहित्य अमूल्य था। पिछले समयमें प्रयोगाभावसे ये वैज्ञानिक अद्भुत विद्याओं पड़ी रही । दुर्भाग्यसे चौदहवीं सदी के बाद विधर्मी धर्माध शासकोंके हाथ से स्थापत्यारे साथ अिस अमूल्य साहित्य का भी नाश हुआ । अिसके अलारा शिल्पियों की संकुचित वृत्ति के कारण भी विद्याचोरीसे विकास कक गया । कालकमसे शिल्प ग्रंथ दीमक भाग बने । और अज्ञान विधवाने जिन ग्रंथांको भिगोकर "थेपडे" (कागजसे बनाये हुआ बरतन) भी बनाये ! उनमें से जो कुछ बचाखुचा साहित्य रहा यह छिन्न भिन्न अवस्थामे हस्तलिखित प्रतेक रूपमे प्राप्य है। पूरेपूग संपूर्ण प्रथ क्वचित् हि मिलता है। देवमंदिरे के चाँधनेवाले शिल्पियोंके पास अपने पेशेकी जरूरत के लिये पर्याप्त भाग मौजुद होता है, याकी के ग्रंथका कोई हिस्सा अप्राप्य हे हस्तलिखित प्रतों परसे बनी ही नकलेमि भी असंख्य अशुद्धियाँ होती है क्योंकि शिल्पिवर्गमे बहुधा संस्कृत पढे कम है । पिना पुत्रको सक्रिय ज्ञान दे जिससे परंपरासे विधाका क्रियात्मक ज्ञान टिक रहा । प्रथों पर या सिद्धांतो पर ला कम रहा । सोलहवीं सदीमे शिल्पथ जिस कालमें छिग भिन्न हुमे थे उसीकालमें भारद्वाज गोत्र के सोमपुरा मंडनका जन्म सूत्रधार क्षेता - खेता के घर हुआ । अिस विद्वान कुलको मेवाडके कुंभाराणाने गुजरात पादणसे' बुलाया, राज्याश्रय दिया और उनके पास भव्य स्थापत्योकी रचना करवाओ । विद्वान मंडनने छिन्न भिन्न शिल्पग्र का उद्धार किया | अस्त व्यस्त शिल्पग्रंथोंका संशोधन किया । संक्षिप्त रूपमें वास्तुविदाका पुनरुद्वार किया । प्रथोद्धार का महान कार्य किया जिसके लिये शिल्प जगत उनका अत्यंत ऋणी है। उन्होंने पूर्वाचार्य के मतानुसार- राजयस्लभ, वास्तुसार प्रासाद मंडन, रूप मंडन, रूपावतार• देवता मूर्ति प्रकरणम्- मथोकी रचनाएं की उनके छोटे भाी नाथुजीने भी वास्तुमंजरी नामक ग्रंथ तीन स्तयक (अध्याय) का लिसा । उस ग्रंथका मध्यका प्रकरण “प्रासाद मञ्जरी"। सूत्रधार शीरमाल, सूत्रधारमल, मनधार राजसिंह सूत्रधार गोविंह, सूत्रधार गणेश, सूत्रधार कौशिक, सृ. सुखानंद, पंडित वासुदेव आदि विद्वानोंने शिल्प पर छोटे बडे प्रथ लिखे है । ये प्रथ शिल्पियोंके प्रथ संग्रह और भंडारामे मिलते है । जिन विद्वानोंके स्थल और काल संबंधी निर्णय अभी तक नहीं हो सका है। शिल्प हमारे कुल परंपराका व्यवसाय होने से नीचे के ग्रंथ संग्रहमें उपलब्ध हैं । कितने प्रथांकी एक, दो तीन या पाँच प्रले, जुदे जुदे कालकी थोडे बहुत प्रमाणमे मिलती हैं । ज्ञान रत्न कोश की एक प्रत चौदवी सदीकी पडीमाता शैलीकी है । पंद्रहवीं सदीका एक ज्योतिप प्रथ है । अन्य कितने प्रथ तीनसौ से सौ वर्षकी अंदर के हैं । -- .
१४ २ शिल्प स्नम् ३मानसार ४ काश्यप शिल्प ५ वास्तुविद्या ६ मनुष्याल चंद्रिका ७ ईशान शिव गुरुदेय पद्धति पुराण १ मत्स्य २ अग्नि ३ भविष्य ४ गरुड ५ स्कंध ६ अन्कल ७ विष्णुधर्मा तर संहिता म्मृति आदि ? वृहत संहिता श्री विश्वकर्मा प्रणीत १ क्षीरार्णव २ घृक्षार्णव ३ दीपार्णव ४ वास्तुविद्या ५ सूत्रसंतान अपराजित ६ ज्ञानरत्नकोश ७ जय पृच्छाधिकार ८ सूत्रप्रतान ९ विश्वकर्मप्रकाश ५० विश्वकर्म विद्याप्रकाश ११ वास्तुशास्त्रकारिका महाराज भोजदेव कृत १२ समराङ्गण सूत्रधार सुत्रधार मडन प्रणीत १३ राजवल्लभ १४ वास्तुसार १५ वास्तुमंडन १६ प्रासामंडन १७ रूपमंडन १८ रूपावतार १९ देवता मूर्ति प्रकरण ठक्कुर फेस कृत २० वास्तुसार सूत्रधार नाथु कृत २१ वास्तुमञ्जरी सुन्न वीरपाल २२ वेडाया प्रासाद तिलक सू. मल्लदेव रचित २३ प्रमाणमञ्जरी म. राजसिंह रचित २४ वान्तुराज २५ वास्तुराज (अन्य सवी विष्य) सू. गणेश रचित २६ वास्तुकौतुक सू गोविद रचित २७ कलानिधि २८ वास्तु उद्धार धोरणी सु. कौशिक रचित २९ वास्त्वध्याय सु सुसानंद ३० सुसानंदवास्तु ३१ वास्तुराजतिलक ३२ सूत्रप्रतान ३३ देव्याधिकार पं. वासुदेव ३४ वास्तुप्रदीप ३५ सन्छिल्पतंत्र ये ३५ ग्रंथो अन्य ग्रंथोफे प्रकरण है ये अपगंध अन्य ग्रथोका छूटे अध्याय है १ आयतत्व २ देशराज ३ जिनप्रासाद ४ ऋपभादि प्रासाद ५ प्रासाद् तिलक ६ अविशति मेह मुद्रित ग्रंथोंमे द्रविड १ मयमत्तम् २ वसिष्ठ ३ नारद ४ गर्ग शुगनीति विवेकविलास जैन ग्रंथ १ शत्रुजय महात्य २ वृहवृत्ति ३ प्रवचन सारोद्धार ४ आचार दिनकर ५ मत्राधिराज ६ त्रिषष्ठि शलाका पुम्प ७ जिन चतुर्विशतिका ८ कुमारपाल भूगल चरित्र आगमनथ १ सुप्रभेद कीमिका ३ किरण ४ अंगुमभेट ५ मरला ६ पूर्व किरणा ७ सिद्धांत होसर ८ मार संग्रह ९ जीर्णोद्धार दशक rate मासाद रचना और राज्याश्रय- भारतके प्रत्येक प्रांतकी प्रासाद शिल्पशैली भिन्नभिन्न देखनेमें आती है, किन्तु उसमें तलदर्शन प्लानकी रचना का विकास होता गया । ओरिस्सा, मध्य प्रदेश, गुजरात, राजस्थान, द्रविष्ट, हलशाल, आंध्र, कश्मिर, बिहार, बगाल वगैरह प्रांत बचे खुचे स्थापत्यांफा अभ्यास दर्शन करते | उनकी शिल्प शैली और रचनामें थोड़ी बहुन भिन्नता है । मूलदेव, स्थापन गर्भगृह (निजमंदिर) को द्रविड उडीसामे विमान कहते हैं । उससे आगे अंसराल, अिसके बाद प्रार्थना मंडप और आगे चतुष्किफा (चौकी) इतना सामान्यतः होता है । उडीसामें नृत्य मंडप और भोग मंडप सास फरफे होते है । गजरात राजस्थानमें गूढमंडप (दीवार पाला मंडप) श्रींकमंडप और नृत्य मंडप-तीन मंडप तेरहवीं सदीके याद जनेमे होने लगे । अिस तरह क्रमशः विकसते हुए देवमंदिरेकी रचना पूर्ण हुी । हरेक मंदिरमे थोडे बहुत संडीका आधार देव महात्म्य, द्रव्य और स्थान पर निर्भर हैं । यह ग्चना उत्तर भारत के मंदिरेमे देसने मीलती है । जब द्रविड मंदिर तो एफ छोटी नगरी जैसे विस्तारमे होते हैं। निजमंदिर और प्रार्थना मंडप तो उत्तर भारत जैसे ही हैं, परंतु द्रविड मदिरे में सुंदर कलामय प्रदक्षिणा पथ एक दो तीन या सात तक फी संख्यामे होते है । दो प्रदक्षणाके बीच चौक होता है मदिरफी सुरक्षाके लिये अत्तरोत्तर दुर्ग-कीला जैसे प्रदक्षणा मार्ग होता है। मदिर के विस्तार मे जलाशय, कुंड, भजनकिर्तन मडप, अन्य परिवार देवोंके मदिर खुला चौक और बाजार भी होते हैं । कभी मंदिगेंमे तो मडप मी हजार हजार स्तभो के हैं । अिससे ही द्रविड मंदिरोंकी विशालता अधिक होती है। मंदिरको ऊँचाभी भी बहुत और भव्य है । प्रवेशद्वार भव्य और अनके अपर के सातसे बारह दरजे तक के गोपुर मीलोतक देखने में आते है। द्रविड मंदिरोंका विशाल स्थापत्य समूहरुपसे ग्रेनाअिट जसे काले पत्थरोंका है । करोडौ का सर्च हुआ होगा । विख्यात पांड्य, चौल, पल्लय, चेरा और चालक्य -गजबुलाने शिव, विष्णु, देवी, कार्तिकस्वामि आदि जुदे जुदे देवों के ये मदिर है । ये राज्यफुल मंदिर निर्माणको भावप्रधान मानते । प्रत्येक भाविक भक्त भगवान के साकाररूपका पूजन अर्चन करनेमे अपने को धन्य समजता । अपने राज्य को देचोंका राज्य मानते राजकी विपुल आयका ज्यादा भाग देव द्रव्य मानते । परिणामरूप द्रविडमे असे भव्य और विशल देवमंदिर के निर्माण हुआ है। विधर्माओके धंससे वंचित होनेसे आजभी अनका अस्तित्व है । अत्तर भारत के राज्यशकी धर्मभावना द्रविडोसे कम न थी। गुजरातमे १६ दगी से तेरहवीं सदी तक जैसे विशाल स्थापत्य चालुक्य राज्यकुलने बधाये । सिद्धपुरका रद्रमहालय, सरस्वती के पूर्व में महाराज प्रासाद, पाटण के सहसलिंग तालाब की विशाल रचना सोलंकी राजाने की थी । अत्तर भारतमें असे विशाल स्थापत्योंका नाश विधर्मीयांकी धर्माधताके कारण हुआ । सुनके कालमें असा भय सात सदी तक रहा अतः मंदिर रचना का अद्भव संयुचित स्वरूपका दुआ । भारतके पूर्वमें समुद्रपार हिंदी चीन , अनाम (चंपा), श्याम (सियाम स्थाअिलेन्ड), जाया, सुमात्रा वगैरह दूर पूर्वके अनिशियाके टापुओमि भारतकी साहसिक प्रजा देढ दो हजार वर्षांसे यसी हुी थी । यहाँ के भव्य स्थापत्य भारतीय फलो और धर्मके हैं । कंबोडिया के अंगरवाटके विशाल मंदिरमा वर्णन करते तो घडा गंध हो जाय । भारतकी मय जातिके शिल्पियोंका समुदाय ममुद्रपार (पातालभूमि) अमेरिकाकी और जाफ. वर्तमान मेकिसको प्रदेशमें असे । हालमे भी माया नामको अलग प्रजाकेरूपमें वे विद्यमान है। सुनके रस्म-रिवाज, धर्म पृथक् है। अिजनेरी फलामें अमेरिकामें ये लोग-मेक्सिकन होशियार हैं। ये लोग सर्व । विश्वकर्माके शिष्य शिल्पशानी मय के वंशज हजारो वोंसे यहाँ यसे है असा माना जाता है । मुस्लिम शासक और भारतीय शिल्प । मुस्लिम गजाओंने तेरहवी' या चौदहवीं शताब्दि के याद कितने शहर यसाये । दरगाहे, मन्जि, राजसभा, दीयान-अ-पास, दीयान-अ-आम और बिले देशकी गजपूत सैलरीके यथाये । जिस प्रकार सुन्दाने भी काफी अत्तेजन दिया यह न भूलना चाहिये । याहरफे मुस्लिम यारशा भारतमे आये, पुयाल दृष्यको लूटफे साथ, हमारे शिगियोंका भी साथमे ले गये और अपने देश सुंदर भवन निर्माण कराया । ताजमहल और दक्षिण के पीजापुर के विशाल गुंबद आवाज में पराव . पारण भूय प्रशंसनीय हैं। दिल्टी, आमा, पनहपुरमीनी, लगना, ला. मांडणगढ, अहमदाबाद, पांपानेर आदि महर नीलम यादगाह और मुलानेनि पंधाये और सुनमें येतोड काम पगये। भारतीय शिल्प के माय पायात्य मिपकी तुलना । भासीय फला अधिक मौलिक और विध्य पूर्ण है अन्यन मा कम दाग्नेने आता है। भारतीय गिज सर पर आत मातमी वा प्रधा बाद जीवती कलाके दर्शन होते हैं । पाश्चात्योंके साथ भारतीय शिल्पियोंकी तुलना फरते कहना पडता है कि भारतीय शिल्पिका लक्ष्य अपनी कृतिमें सिर्फ भावना अतारनेका होता है जब पाश्चात्य शिल्पि तादृश्यताका निरूपण-अनुकरण करते है । भारतीय शिल्पियोंने अपनी कृतियों में पृथकरणीय भावना अँडेलने का कठिन कार्य किया है। भारतीय और पाश्चात्य शिल्पियोंके मूर्ति विधानका अंक ही अदाहरण पर्याप्त है । अनेक पवियोंने स्त्रीकी प्रकृति-विकृति के गान गाये है । असके सौदर्य पान करानेवाले भवभूति-कालिदास जैसे महान कवियों ने उसके रूपगुण की शाश्वत गाथा गाी है । भारतीय शिल्पियोंने स्त्री सौंदर्य को मातृत्व भावनासे प्रदर्शित किया जब पाश्चात्य शिल्पियोंने वासनाके फल स्वरूप असको कोरा है । भारतीय शिल्पियोंने भारतीय जीवन दर्शन और संस्कृतिको अपना सर्वोत्तम लक्ष्य माना, राष्ट्र के पवित्र स्थानों को पसंद किया, और अपना सर्वस्व जीवन चीताकर विश्वकी शिल्पकलाके सिंतिहासमे अद्वितीय विशाल भवन निर्माण किये जिनको देखते हम दंग रह जाते हैं । भारतीय शिल्पियोंने पहाडोंके सफेद, मुंगिया, रक्त राता, श्याम, रेतीला और चूनेदार पत्थरे की दीर्घकाल शिलाओंको तोडा और भूस प्यासकी परवाह किये विना अपने धर्मकी महत्तम भावनाको राष्ट्रके चरणोंमे अर्पित किया । जनता जनार्दन और धर्मकी संस्कृति के प्रतीक को प्रस्थापन किया । जनताने भी शंखनादसे अपने शिल्पकारोंकी अक्षय कीर्तिको पलाया। असे शिल्पियोंकी अजय स्थापत्य कलाके कारन जगतने भी भारतको अजर अमर पद पर संस्थापित किया है । असे पुण्यवान शिल्पियोंको कोटि कोटि धन्यवाद । मासाद मजरी ग्रंथ के बारेमें यह छोटासा ग्रंथ प्रामाद मञ्जरी" -मूलमे वास्तु मञ्जरी नामक प्रथ के तीन स्तबकों में से मझला प्रकरण है । पंदरहीं शताब्दि के प्रारंभ में जब मेवाडके राणा कुंभा के बाद सुनके पुत्र रायमलजी गद्दी नशीन थे सूत्रधार खेताके पुन नाथजीने यह ग्रंथ लिसा है । सूत्रधार क्षेत्र यानी खेताके ज्येष्ठ पुत्र मडन महान स्थपति थे जिन्होंने शिल्पग्रंथोका अद्धार किया और सातेक प्रथोंकी रचना की । अनके लघुबंधु नाथजी अिस प्रथके कर्ता हैं। ये भारद्वाज गोत्र के थे । सोमपुरा के पूर्वज गुजरात पाटण के रहेनेगाले थे। महाराणा कुंभाने सुनको मेवाडमें बुलाया और चितोडगढ मे बसाया । अस काल में ३ मूल ग्रंथ वास्तुमञ्जरीमें तीन स्तबकों में से प्रथम स्तवक गणित, ज्योतिप, नगर, जलाशय, सामान्य गृह, राजगृह, किल्ला वगेरे विषयका है। दूसरा स्तबक -प्रासादमञ्जरी,-प्रासाद विषयका है। तीसरा प्रकरण मूर्ति विधानका है । कुमाराणा के बाद महाराणा रायमल्लजीने विक्रम संवत १५३० से ६६ तक राज्य किया और अनके समयमें नाथजीने वास्तुमञ्जरी ग्रंधकी रचना की । प्रासाद मंडन के कितनेक श्लोक मंडनने रचे हुओ प्रासाद मंडनसे मिलते जुलते हैं । अमुकको काट छाँट करके नयी रचना की है । मंडनने भी विश्वकर्मा प्रणीत ग्रंथों में से अपने प्रथमें लिया हो जैसा महसूस होता है । और यह म्वाभाविक भी है । पूर्वाचार्योका कहा हुआ भूतकाल के आचार्य दुहराते हैं। सूत्रधार खेताके दो पुत्र मंडन और नाथजी, मंडनके दो पुत्र गाविद और अिशन | अिशनका छिता वि. सं. १५५५ । सूत्रधार गोविंदने कला निधि, शुद्धार धोरणी और द्वार दीपिका ग्रंथ लिखे । अिस ग्रंथकी पाँचेक प्रते अपने पास हैं जिनमें अक ओळिया (टीपणा) वि. स. १८०० का है । जिसको मेरे पूर्वज श्री नरभेराम मंगलजी जव अदेपुर गये थे तब लिख आये थे अस प्रतका आधार भी लिया है। निजी नोंध-सामान्यतः आत्मश्लाघाके भयसे मनुष्य निजी नांध देनेमे सकुचाता है । मैं भी असा ही महसूस करता हूं, फिर भी वृद्धजन, मिन्न और शुभेच्छकों का यही आग्रह रहा है कि जिससे जैसी नौव द्वारा जिज्ञासु पाठको को कुछ प्रेरणा या मार्ग मिले । अतः नेधि लिसने प्रोत्साहित हुआ हूँ जिसे सुज्ञ वाचक क्षमा करे। शिल्प स्थापत्यका पेशा हमारे वंशपरंपराका व्यवसाय है । यालपयमे अंग्रेजी विद्याभ्यासकी अिच्छा थी परंतु विधिने कुछ और ही निर्माण किया था। कौटुम्यिक आर्थिक स्थिति के कारण शिल्प व्यवसायमे जुटना पडा । समय मिलने पर घरमें पुराने बडे पिटारों में से शिल्पग्रंथोकी पोटलियाँ, संग्रहकी हस्तलिखित पाथियाँ, टीरणे, नांधके कागजात, पुर्वजांने किये हुआ बांधकाम के नक्शे-जिन सर्य में पढता । नकल करता । दिनको काम पर जाता रातको यह पढाीका काम चलता । प्रथम तो शिल्प के प्राथमिक गणितका "आयतत्य” नामक सौएक टोको का ग्रंथ मुसपाठ किया । यह "दीपार्णन " का प्रथम अध्याय है । जिसके बाद “केशराज" और प्रासाद मंडनके चार अध्याय जवानी किया । ये सब फर्राटेसे बोल जाना। अिन तीन प्रधों की समज और गणित के अटपट अंगोको जानकारी के N । याद, सुनके सक्रिय ज्ञान आलेखन (ड्रॉसिंग) भी करता । जहाँ वडिलांकी सहाय जरुरी लगती वहां पहुंच जाता । सबसे छोटा होने के कारण कुल परंपराकी यह विद्या चालू रहेगी जिस हिसाबसे सुनको भी संतोप होता । शिल्प शास्नके संस्कृत मंथ लोक भोम्य भाषामें अनूदित हो तो सामान्य शिल्पि वर्ग असका लाभ झुठा सके औसी . तमन्ना दिलमें होती थी। शिल्पका सक्रिय ज्ञान गुरुजनों द्वारा दिनको काम पर मिलता ही था और रातको अनुवाद करने की कोशिश करता । शुरू शुरू में तो यह कठिन लगा किन्तु दृढ संकल्प वल साथ था। कभी कभी तो रात को दो तीन बजे तक बैठता । निष्ठाके साथ जब कामके पीछे पड़ जाते है तो कठिन विपयोंके प्रश्न आपही हल हो जाते है । विश्वकर्मा और सरस्वतीकी प्रार्थना की कि अपनी वानी बुद्धि और लेखनीमें बल सीचे । ई. स. १९१७ में प्रासाद मंडन प्रथका अनुवाद शुरू किया | कठिनाश्री तो बहुत हुी । शब्दोंका भापा और कियामे मैल बैठे तभी यह अपयोगी हो सकता है असी मानसिक मुश्किलें पैदा होती थी। जिसमे पुरखोंने किये हुआ आलेस भी कभी मददगार होते । शिस तरह अनुवादकी गाडी प्रगति करती गयी । ई. स. १९२४ से २९ के समयके वर्पोमें आरासण कुमारीयाजी की स्थिरता और शान्ति के कालमे मेरे अनुवाद कार्यमें जोश मिला । श्रीरार्णव, दीपार्णव दुप्फर ग्रंथों का संशोधन कार्य यथा शक्ति पूर्ण किया। अिसके बाद रूपमंडन, प्रासादमञ्जरी, यास्तुसार और जिनप्रासाद के अनुपाद किये । संस्कृत भागमा अपना मर्यादित झाम होने से अिन सर्व साहित्योंकी टीप पेन्सीलसे करता । दरमियान कुटुम्बकी आर्थिक स्थिति सुधरती चली । शिल्प ग्रंथोंमें अनगिनत अशुद्धियाँ पायी जाती है । अमुक शब्दों के मूल, झुनकी व्याकरण शुद्धि यह काम विद्वानों के लिये भी दुष्कर है क्योंकि पारिभाषिक शब्दाकी सूझ बडों बडे के लिये भी कठिन है । ई स. १९३० से छ सालों के मेरे कदमगिरिके वास दरम्यान जिन सर्व अनुरादोंको-कि जो मैने पेनसिलसे किये थे-पका कितावों में सुधारकर लिस लिये । अिसमें वृक्षार्णव जैसे अमूल्य प्रथकी वृद्धि हुी । तेरहवी सदी के बाद सांधार प्रासाद जैसे महाप्रासाद बंधाते नहीं । जिनके प्रमाण और यमनियम बिलकुल जूदा होनेसे हमारे शिल्पि वर्ग जिनको भूल गये थे । किन्तु क्षीराणव, दीपार्णव और पृक्षार्णव ग्रंथोंमें अिनके विशद वर्णन हैं जिससे प्रारंभमें जिनको समजने में बहुत दिकते हुआ। परंतु पुरखों के पुराने नक्शे (स्वेच) और जैसे क्रमोंके प्रत्यक्ष अवलोकन के बाद श्री विश्वकर्मा २० और सरस्वती देवीकी कृपासे ये भेद स्वयम् समजने में आते रहे और उनके पाठोंके प्रत्यक्ष प्रमाण मिलते रहे । जिससे मेरा मन मयूर नाच अठता । मेरे अिन प्रयत्नों का प्रयोग श्री सोमनाथके भ्रमयुक्त सांधार महा प्रासादके निर्माण में सफल करनेका मौका मिला। यह आकस्मिक ही हुआ। किसी भी विद्याकी साधना किसी भी समय पर-जल्द या देरीसे-सफल होती ही है । शिल्पग्र यों के प्रकाशनकी अपनी महेच्छा मैंने दीपार्णवसे शुरू की है और पाँचेक पुस्तकों की प्रेस कापी अपने पास है-जिनको क्रमशः यथाशक्ति प्रकाशन करनेकी अपनी अिन्छा है । दीपार्णय के प्रकाशनमे खर्च ज्यादा हुआ यद्यपि राष्ट्रपतिजीने मुझे ४००० रुपयांका पारिनोपिक दिया था। अिसके बाद प्रासादमञ्जरी प्रकाशित करनेका अपना और प्रयत्न है जिसे शिल्पज्ञ और कलारसिक विद्वान अपनायेगे असी आशा रखता हू । प्राचीन विद्यामंथोंका संशोधन अक बात है और संशोधनके साथ सुनका अनुवाद करना यह तो अिससे ही कठिन बात है । अनुवादके साथ मम तो सिर्फ अस कलाके परंपरागत वारिस ही समझते हैं अगर केवल अनुवाद मम और रेसाचित्र विहीन हो तो झुमकी कीमत ही नहीं । भाषानुवादके साथ प्रत्येक अंगकी टीका, अन्य प्रथेकि मतभेदोशी नोंध भी देना जरूरी है । विषयों का मम समझने के लिये सुनके नीचे फुटनोट देकर समझानेकी कोशिश की है। फोठे, नो, चित्र देकर विषयको बराबर समझानेकी भरसक कोशिश की है। क्रियात्मक (प्रेस्टीकल) ज्ञान के मम देने से ग्रंथ संपूर्ण होता है । ग्रंथ के मूल पाठों के साथ गुजराती, हिन्दी और अंग्रेजी आवृत्तियांका प्रकाशन करके देश और विदेशम रसन विद्वान वर्ग असकी कदर करेगे औसी आशा है । किसी भी विषयमे मतमतांतर तो होते ही हैं। मूलपाठका अर्थ विठानेमें मतभेद हो सकता है । कभी यार मूलपाठ और कियामे भिन्नता होने से असा होता है। किन्तु विद्वान कभी दुरामह नहीं रसते । क्रियाका अलग अर्थ विठाकर कोजी कार्य हुआ हो तो वह गलन है असा नहीं कहा जा सकता। क्षमायाचना- कविकी जिया और शिल्पिके हाथमे सरस्वती का वास है। जिससे शिल्पिको याणी या कलाम योी त्रुटी या गलती हो तो जिसके प्रति दुर्लभ करना असी मिन्नत है । अशुद्धि की ओर उपेक्षा करके प्रथका मूल अर्थ-भाव ही प्रहण करें और हंस रम वृत्तिको करें यही आशा है। , २१ कैलास वासी पूज्य पिताजी और अपने ज्येष्ठं वधु श्री. व्यंबकलाल भाजी और भाभीशंकर भाभी ने संस्कारका सिंचन किया और मार्गदर्शन दिया-जिसका कर्ज कभी नहीं चुका सकुंगा । कनिष्ठ बंधु रेवाशंकर भाीने अपने प्रथ प्रकाशनमे जो श्रम अठाया और अपने अनुभव का लाभ दिया अिमके लिये में सुनका भी ऋणी हूँ। अिस तरह बड़ों-बुजर्गोका ऋण स्विकारते मे पुलकित हो अठता हूँ । झुनके शुभाशिर्वादोंकी कृपा वर्षा अहर्निश अपने पर होती रहे असी जगन्नियंता श्री हरिके पास अपनी नम्र प्रार्थना है। अिस ग्रंथका हिन्दी अनुवाद डुंगरपुर निवासी कुशल आचार्य श्री भारता- नंदजी सोमपुराने किया और प्रस्तावना का हिन्दीकरण अपने स्नेही मित्र श्री. कपिलराय जेसुसलाल आचार्य ने किया । अिन दो भाभियोंका मैं आभारी हूँ। ग्रंथकी भूमिका समर्थ पुरात्वज्ञ डॉ. वासुदेव श्री शरणजीअग्रवालजीने लिसने की कृपा की अन महाशयका मे ऋणी हुँ। अिस ग्रंथका अंग्रेजी अनुवाद तथा प्रस्तावना अपने परम मित्र पुरातत्व रसज्ञ श्री. मधुसुदनमाजी अमीलालभाजी ढाकीने कर दिया जिसके लिये उन्होंने मुझे उपकृत किया है । अगर अनकी मदद न होती तो यह कार्य अितना न हो सकता और बार बार जैसे प्रकाशनों के लिये अन्होंने मुझे प्रोत्साहित किया । ग्रंथका छपाभी काम जितनी जल्दी से अपने प्रिन्टिंग प्रेसमे कर देने के लिए श्री. चंदुलाल भाभी (अपना प्रेस भावनगर) और प्रेस कामदारको धन्यवाद । प्रथमे दिये हुओ चिन-नक्शे आदिफे ब्लोक के लिये राजकोटकी रूपम् प्रिन्टरी के मालिक श्री. नाबुभाभी याघेला का अहसानमंद हूँ । " सर्वेऽत्र सुखिनः सन्तु, सर्वे सन्तु निरामयाः । सर्वे भद्राणि पश्यतु, मा कश्चिद् दुसमाप्नुयात् ।। ता. ३० ओगष्ट-१९६४. श्रावण वद ८ जन्माष्टमी वि.सं. २०२०. शिल्पि निगास, पालीताणा (सौराष्ट्र) स्थपति-प्रभाशंकर ओघडभाभी सोमपुरा शिल्पशास्त्री अथ प्रासादमञ्जरी की विषयसूची श्लोक पत्र । एवं नाम ४ १-३ १ ४ १ २ ५ २ छाद्य. निर्गम श्लोक पत्र विपये संख्या संख्या प्रम विषय संरया संख्या १ प्रासादकी चौद जाति १४ पास्तुपूजन के सप्त पुण्याह २ शक्तयनुसार वास्तुद्रव्यसे १५ वास्तुशान्ति चौदाह मंदिर निर्माणका फल १६ प्रासाद प्रमाण कहांसे ३ कार्यारंभके शुभ मुहूर्त एवं लेना भूपरिक्षा, भूमिफा, ढाल. ६-७ २ १७ भ्रमयुक्त सांधार ४ वास्तुपूजा एवं दिग्पालादि पासाद एवं निरंधार पूजन ८-११ प्रासादकी समज ओर ५ त्याज्य मुहूर्त एवं मेरु प्रासादका प्रमाण. ३१ वत्सदोष १२-१३ १८ मंडापरको थर एवं ६ आयादि गणितशुभ ५ आय, नक्षत्र और १९ प्रासादका अंत व्यय (देवगणा शुभ फोलना संख्या ३३-३४ नक्षत्रका गणितका .२० प्रासादके अंग फालना कोष्टक) १४-१५ निर्गमका दोरिधान ७ साव मुहूर्व धर्मशिला समदल एवं हस्तांगुल ३५ रोपण विधि केसी २१ एक प्रकारके तल पर भूमिमें करना १५-१६ ३ अनेक प्रकारके शिखर ८ सुवर्णरोप्य फूर्म प्रमाण १७-१८ चढते हे परंतु शिसरका ९ शिलारोपण विधि क्रम आकारादि से प्रासाद बलिदान पूजनादि १९-२१ फा नाम और जा १० गृहारंभ गुम नक्षत्रो २२ समजाती है ११ शिलास्थापनके शुभ २२ जगती का नक्षत्रो ૨૩ स्वरूपाकृति ३७ ६ १२ प्रासाद योग्य स्थान २३ प्रासाद से जगतीका २४-२५ प्रमाण भ्रम २४ मिन ब्रह्मा विष्णु एवं पान्तुद्रव्यानुसार शिप प्रासाद से छे सात गुनी जगती यनाना ३९ ६ ३ MY ३ ३ पाच ४ एवं पुण्य ४ १३ प्रासाद निर्माण ४ पुण्य प्राप्ति श्लोक पत्र - फा अंतर ७ छोडकी समसूत्रता ७ श्लोक पत्र कम विपय संख्या संख्या क्रम विषय संख्या संख्या २५ जगत्योदय मान प्रमाण ३५ भासाद उदयमान २६ जगती का उदयमें (उभणी) ६१-६२ ९ दिक्पालका स्वरुप ३६ मंडोवर १४४ भागका ६३-६५ प्रनाल प्राकार किल्ला ३७ सांधार निरंधार प्रासा- द्वार मंडप तोर दका भित्तिमान ६६-६७ १० णादि करना ४१-४३ ६ ३८ गर्भगृह स्वरुप २७ देव बाहन स्थान ३९ मंडोवर ओर स्तंभ ६९ १० २८ जिन प्रासाद रचना ४० गर्भगृहोदय स्तंभ समसरण गुढ मंडप छोड विभाग ७०-७१ १० चौविश पावन यहांतेर ४१ द्वार मान प्रमाण जिनालय अष्टापद (नागरादि) ७२-७३ १० निशाला पलाणक ४५-४७ ४२ निपंच सप्त नव २९ नामिवेध अन्य देव शास क्या देव के लिये प्रासादोका निर्माण घनानी शासा परिकर करने में नाभिवेध म- युक्त बनानी प्रतिहार जनाओर देोप पर्याय ४८-४९ द्वारपाल प्रमाण ७४-७६ ११ ३० प्रनाल विचार उत्तर ४३ उदम्बर शंसोद्वार ७७-७८ ११ या पूर्व दिशामे प्रनाल ४४ कोली कपिली ७९ ११ रखनी मयमत ५०-५१ ८ ४५ शिसर श्रृङ्गो पर ३१ अथ पंचदेव आयतन ८१ १२ की रचना १ सूर्य २ ४६ श्रङ्ग सवाइ प्रमाणका गणेश ३ विष्णु ४ चंडी बनाना ८२ १२ ५ शिव आयतनकी ४७ मूल कर्ण पायचा रचनाका तल दर्शन ५२-५४ ८ गर्भगृहसे थोडा ३२ निदेय स्थापन क्रम विस्तीर्ण रखना ८२-८३ १२. एवं उदयमान ३३ अथभिट्ट मान ५६ ९ १ से ९ तफचढाना ३४ पीठमान एवं महा १९ पहेले से दुसरा उरु- पीठका थर विभाग ५७-६० भ्रा उदयका प्रमाण श्री चढानेकी विधि ८ ४८ भद्र पर उरुङ्ग, ८४ १२ २४ भोक पत्र ८६ १२ शोक पा विषय सरया सरया क्रम पिपय सरया सख्या ५० शिखरको मूल कर्ण मर्कटि पोटलीका (पायचे १० भाग प्रमाण दड सुशोभन करके स्कचे छ भाग पताका प्रमाण ९९१०३ १४ रखना ८५ १२ ६१ धजा हीन देव ५१ साया शिरसर क प्रतिष्ठा रहित प्रासाद लिये चतुर्गुणी का- रसने से दोप १०४ १४ मडी रसना ६२ अथ प्रासाद-वैरा ग्यादि प्रासाद का ५२ रेसा सून १२ सरुप नदन प्रासाद ५३ आमल सोरा प्रमाण विभाग ८८-८९ १२ तम्भन साचार प्रा. ५४ मूल शिसरका उपाङ्ग साद की भ्रममिति प्रमाण वालजर ९० १३ १०५-६-७ १५ ५५ शुकनाश शिसरोदय ६३ केशरादि विभक्ति से शुकनाशविभाग ९१ १३ अप्ठाइ तल ५६ श्रृङ्ग अरुङ्ग एव ६४ विभक्ति (२). दशाइ प्रत्याग की गणना तल सर्वतो भद्र प्रा अडकः शृङ्गमे होती हे तव तिलक ये साद (२) नदन प्रा०३ १०९ १५ प्रासाद का भूपणरुप हे ९२-९३ १३ नदिशालि प्रा० ४ नदिश आ० ५ ११०-११ १५ ५७ आमलसारा विस्तार ६५ विभक्ति ३ बाराइ १३ मदिर प्रा० सुवर्ण का प्रासाद् ६६ विभकि ४ चौदाइ पुरपकी स्थापना ९४ १३ तल श्री वृक्षा प्रा०७ ५८ ध्वजाधार-ध्वना अमृतोद्भव प्रा०८ ११३ १४ १६ सडे रखने का हेमवान प्रा० ९ फ्लापा विधर रसना ९५ १३ हेमट प्रा० १० ५९ क्लश इडाका मान ११ प्रमाण एर विभाग ९५-९८ १३ पृथ्वीनय प्रा० ० ६० ध्यजादडमान प्रमाण ६७ विभक्ति ५ सोलाइ दङका स्वरूप पाष्ट तल इद्रनीले १ केशरी प्रासाद १५ 1 मान में क्लास प्रा० ११५ १६ (१७-१८ १६ ऋम विपय शोक पत्र संख्या सख्या प्रा०१३महानीलमा० १४ भूधर प्रा० १५ ६८ विभक्ति ६ अढाराइ तल रत्नकट प्रा०१६ वैडूर्य प्रा०१७ पद्म राग प्रा०१८ पत्रक१९१२०-२३ १७ ६९ विभक्ति ७ विशाइ तल मुकुटोज्वल प्रा० २० गजराज प्रा०२१ राजहंस प्रा० २२ गरुड मा० २३ १२४-२८ १७ ७० विभक्ति८चोविसको तल पम प्रा०२४ मेरु प्रासाद २५ १२९-३२ १७ ७१ केशरादि सांधार अथ- वा निरंधार प्रकारका प्रासाद पच्चीश करना ७२ मेरु प्रासाद पांच हाथ को १०१अंडका करना विश पिश अंडक की घृद्धि करके ५० हाथ तकका मासाद राजा- ओंके लिये बनाना अन्य वर्णके लिये नहि बनाना । मेरुप्रासाद ब्रह्मा विष्णु शिव ओर सूर्य के लिये बनाना अन्य देवो के लिये नहि बनाना १३४-५ १८ विषय शोक पत्र संख्या संख्या ७३ अथ मंडप-प्रासाद के आगे एक या तिन द्वारका मंडप जिन एवं त्रिपुरुषके लिये बनाना प्रासाद के प्रमाण से मंडपका प्रमाण १३६-३९ १८ ७४ अथ चतुष्फि प्राग्रीव मंडप ९४०-४१ १८ ७५ प्रासादना मध्यपदने अनुसार मंडपका पद रसना १४२ १८ ७६ प्रासाद का शुकनाश के प्रमाण से मंडप का आमलसारा रसना १४२ १८ ७७ कक्षासन युक्त स्तंभ का छोड विभाग १४३-४५ १९ ७८ अथ गुढ मंडप आठ का स्वरुप एव नाम १२ १४४-४७ १९ ७९ अथ सत्तावीशकी स्तम संख्या नृत्य मंडप भूमि युक्त करना १४८-४९ २० ८०-८५ अथ बलामक पांच स्वरुप एवं नाम बलाणक कहा करना १ चामन २ विमान ३ हर्यशाल ४ पुष्कर ५ उत्तुङ्ग १५०.५४ नृत्य मंडप वितान गुम्बज २६ क्रम नोक पत्र ८९ मिन्नदोप कर्मकार पूजा विषय , लोक पत्र विपय संख्या संख्या संख्या संख्या ८६ संवरणा (शामरण) ९४ अथ प्रतिष्ठा मुहूर्त १६८-७१ २२ पांच से पचिश घंटा ९५ प्रतिष्ठा मंडप १७२-७३ तककी १५६ २१ ९६ यज्ञकुंड आहुति ८७ स्वयंभू वाण एवं संख्यासे यज्ञकुडका रत्नलिन मानसे न्यु- प्रमाण नाधिक का दोष नहि ९७ सर्वतोभद्र मंडल घटितलिङ्ग शाखविधि भद्र मंडळ प्रमाण से बनाना १५७-५८ २१ ९८ सूत्रधार स्थपति ८८ देवपुर का प्रमाण '" पूजन सत्कार अन्य १५९-६० २१ ९. मानसे अधिक या १८२-८३ २४ ९९ यजमाने प्रार्थना हस्व दीर्घवक होने छेद भेद के जातिभेद करनी सूत्रधारके या हीनमान का दोष आशिर्वचन १८४ २४ महामय उपजाती है १५९-६० २१ १०० गुरु मार्ग से सर्व ९१ प्रतिमा मान प्रमाण ज्ञानका भेद प्राप्त (१) द्वार का प्रमाणसे होता है १८५ २४ प्रतिमा प्रमाण (२) १०१ अनेक शास्रो का प्रासाद या गर्भगृह अभ्याससे पदार्थकी का मानसे प्रतिमा सिद्धि होती है १८६ २४ प्रमाण १६१-६४ २१ १०२ सूत्रधार क्षेत्र-खेताका ९२ प्रविमा द्रष्टि स्थान १६५-६६ २२ पुत्र नाथजीने ये ९३ देवता पद स्थापन प्रासाद मारीकी विभाग १६५ २२ रचनाकी मंथ प्रशस्ति , मासादमजरी ग्रन्थमें उपर्युक्त शास्त्रीय ग्रन्थसूचि ऋण स्वीकार विश्वकर्मा प्रणित: सूत्रधार मंडन कृत भोजदेव कृत :- १क्षीरार्णव ७ प्रासाद मण्डन ११ समराङ्गण सूनधार २ दीपार्णव ८ देवतामूर्ति प्रकरणम् १२ बृहद्संहिता द्रविडग्रन्थ - सत्रधार विरपाल कृत:- १३ मानसार ४ ज्ञान रत्नकोश ९ बेडाया प्रासादतिलक २४ मयमतम् १५ काश्यपशिल्पम् ५ सूत्र स तान अपराजित सूत्रधार राजसिंह कृत:- १६ मत्स्यपुराण ६ विश्वकर्मा प्रकाश १० वास्तुराज १७ अग्निपुराण .. ३ वृक्षार्णव , हमारा शिल्प स्थापत्य ग्रन्थोंका प्रकाशन १ दीपार्णव :- श्री विश्वकर्मा प्रणित शिल्पका प्राचीन महान प्रन्थ-७६+४८८:५५४ पृष्ठों, ३५० लाइन ब्लोक रेसाचिन्न; १०५ हाफटोन ब्लोक सहित, मूल श्लोक, टीकायुक्ति, मर्म और टीपणी आदिसे भरपूर, संपूर्ण विवरण के साथका । दलदार ग्रन्थ; अध्याय २७ जिनमे अनेक देव-देवीओंका शिल्पाकृतियाँ-सांधार तल प्लान इलिवेशन साथ दिये गये हैं। अिस मन्थ पर ना० जामसाहेब, श्री कनैयालाल मुनशीजी, डो. वासुदेवशरण अग्रवालजीने विस्तृत भूमिका दी है। सरकारका टेम्पलसर्वे सुप्री. श्री कृष्णदेवजी, द्वारिका पीठके श्रीमद् शंकराचार्यजी, जैनाचार्य श्री विजयोदयसूरिश्वरजीने प्रन्थकी प्रामाणिकता, उपयोगिता, और श्री प्रभाशंकरभाइके दीर्घ अनुभवकी प्रसंशा की है। ४६ पृष्ठोंकी विद्वत्तापूर्ण प्रस्तावना पढनेसे संपादकके अनुभव और विद्वताका परिचय होता है। मूल्य रु २५ डाक पर्च पृथक २ मासामञ्जरी (हिन्दी):- पंदरवी शताद्विका यह अन्य सूत्रधार नाथजी- जो सूत्रधार मण्डनके छोटे बन्धु थे उन्होने वास्तुमरी" नामक वही ग्रन्थ लिसा था उसके मध्यका रतयक प्रासाद विषयका संक्षिप्त रुप है। उसमे ९० पृष्ठ, ८० व्लोक रेसाचित्र और हाफटोन २० है । इस ग्रन्थकी भूमिका एशिया सण्डके सुप्रसिद्ध पुरातत्वज्ञ डो. घासुदेवशरण अग्रवालजीने लिखी है। जिसमे प्रथकी और सगदा श्री प्रभाशंकरभाइकी विद्वताका परिचय दीया है । प्रन्यकी हिन्दी आवृत्तिका मूल्य रु. ६-५० " डाक सर्च पृथक " :- ३ पासादमञ्जरी (गुजराती):- उपरोक्त लिखे विवरणवाली गुजराती आवृत्ति मूल्य र ६-५० ४ PRASADAMANJARI (अग्रेजी): उपरोक्त दीये हुये विवरणपाली अग्रेजी आवृत्ति-जिसका अग्रेजी अनुवाद और अन्य विभाग प्रस्तावना आदि विभाग पुरातत्वज्ञ विद्वान श्री मधुमुदन भाई ढाकीने अच्छी तरहसे लिसा है। भारतके प्रत्येक प्रात और विदेशो शिल्प विपयका रसज्ञ विद्वानोंको भारतीय प्राचीन कलाका परिचय हो। अिस तरहसे लिसा है। मूल्य र ७-०० सात, डाक सर्ग पृथक ५ वेधवास्तुमभाकर - इस ग्रन्थम प्रासाद गृह, प्रतिमा आदिवे वेधतोपका विवरण दीये हैं। विविध प्राचीन प्रन्थोंने प्रमाणोंके सार अच्छी तरहसे लिखे है। "दीपार्णव " अन्यकी पूर्तिरूप है । असम क्रिया, विधि आदिका साहित्य भी दीया है। ये ग्रन्थ प्रेसमें छपा रहा है। मूल्य रु ६ छ, डाक खर्च पृथक ६-७ क्षीरार्गद-क्षार्णव :- विश्वकर्मा और नारदजीका सवाद रुप दोनो प्रन्य-अद्भूत अद्वितीय है । साधार महा प्रासादो, और चतुर्मुल महा प्रासादोंके विषयमे तीनसे-वारा भूमि तकका उदययुक्त महा प्रासादका अद्भुत विवरण दीया है। दुप्पाप्य शिल्प माहित्य प्राप्ति हुआ है। क्षीरार्णवका २२ अध्याय, ८०० श्लोक सरया है और प्रासाद १८०१ शोक प्रमाण है। यह दुष्प्राप्य ग्रन्थका सशोधन हो रहा है। दोनु ग्रन्थमे महा चतुर्मुस प्रासादकी चारो और २७, २७ मण्डप मेघनाथ आदि बनानेका विवरण है । तीन भूमितककी लिंगकी स्थापना की विधि चतुर्मुखमे कहा है । एसा अद्भुत ग्रन्थ दुर्लभ है। ८ बेडाया प्रासाद तिलक:- ये ग्रन्थ पदवी शताद्वीका सूत्रधार रिपालकी रचना है। शिल्पका अन्य ग्रन्थकी अनुष्टुप छन्दमे रचना है। ये प्रासाद तिलक सस्कृत राग रागिनीम शार्दूलविक्रीडित, वसततिलका आदि छदमे ग्रन्थकी मुहर रचना की है। असतक उमका चार अध्याय प्राप्त हुआ है । ग्रन्थका सशोधन कार्य चल रहा है । प्रकाशको घरवंतराय प्र. सामपुरा एवं भाती ३. पथिक सोसायटी सरदार पटेल कोरोनी अमदाबाद-१३ भूमिका लेसक, अशियासंड के सुप्रसिद्ध कला स्थापत्य का मर्मज्ञ-खर पुरातत्वज्ञ डॉ. वासुदेवशरणजी अग्रगलजी-अध्यापक-कला और स्थापत्य विभाग-काशी विश्वविद्यालय भूमिका पासाद मजरी॥ डो. श्री वासुदेवशरण अग्रवाल श्री प्रभाशंकर ओघडभाई सोमपुरा हम सब के धन्यवाद के पात्र है। क्योंकि उन्होंने भारतीय स्थापत्य एवं शिल्प शास्त्र के कई उत्तममन्यों का उद्धार किया है । इससे पूर्व वे शिल्प के महान् ग्रन्थ दीपाय का मूल सानुवाद और सचित्र प्रकाशन कर चुके हैं। वह प्रमाणिक ग्रन्थ देय मन्दिरों के निर्माण से सवान्ति बहुविध सामग्री से युक्त है। प्रस्तुत ग्रन्थ को मूल अनुवाद और विस्तृत प्रस्तावना के साथ प्रकाशित करने का श्रेय श्री सोमपुराजी को है । मुझे इस बात का हर्प है कि दीपार्णय की भांति " प्रासाद मारी" की भूमिका लिखनेका कार्य श्री प्रमाशंकरभाई ने अपने सहज-स्नेह वश मुझे सोपा है । में उनके इस सत्प्रयत्न का स्वागत करता है। उन्होंने अपने इस अन्य का विस्तृत प्रस्तावना मे भारतीय स्थापत्य शास्त्र और स्थपतियों के मंबन्ध में बहुत सी मूल्यवान् और रोचक सामग्री दी है-उसे पढकर मुझे ज्ञान-लाभ और प्रमन्नता हुई हैं। श्री ममाशंकर ओघडभाइ माचीन स्थापत्य वंश के रत्न है और उन्होंने स्थापत्य शास्त्र के प्रायोगिक विज्ञानकी अभितक रक्षा की है। परंपरागत ऐसी किंवदत्ती है कि सौराष्ट्र देश में प्रभास पट्टन में भगवान सोमनाथ के महान् देवालय का निर्माण हुआ इसी समयसे सोमपुरा स्थपतियों के पूर्व वंशो का प्रारंभ हुआ। अवश्य ही उन स्थपनियों ने एक नवीन स्थापत्य शास्त्र,वास्तुशास्त्र और शिल्पशास्त्र का जन्म दिया। उन्हीं की संचिलित प्रयोग विधि से सौराष्ट्र प्रदेश में एक से एक विलक्षण मन्दिरों का निर्माण होता रहा । इस संबन्ध मैं रैवतक या गिरनार के शिखर पर बने जैन मन्दिरों का एर पालिताना के निकट शत्रुजय पर्वत पर बने मन्दिरों पर विशेष ध्यान जाता है । उसी संदर्भ में अर्बुद या आपूपर्वत पर बने महान् जिनालयों का स्मरण भी आता है। कितने देवाल र सोमपुरा के स्थापतियों द्वारा बांधे गए अथवा उनके द्वारा प्रचारित शैली में निर्मित हुए। इसका सर्वेक्षण गुजरात सौराष्ट्र और दक्षिणी क्षेत्रमें होना आवश्यक है। ऐसा उल्लेख है कि मेड 1 के महाराणा कुम्भा ने जर अपने प्रदेश मे स्थापत्य और शिल्प को चीन प्रोत्साहन देना चाहा तो उन्होने सौराष्ट्र से शिल्पीयो को आमंत्रित किया। राणा कुम्भा ने चित्तौड मे सुप्रसिद्ध कीर्तिम्तम्भ का निर्माण कराया। उनके राज्य में कई प्रसिद्ध शिल्पी थे। उनके द्वारा राणा ने अनेक वास्तु और स्थापत्य के कार्य सम्पादित कराये । कीर्तिस्तम्भ के निर्माण का कार्य सूत्रधार 'जइना' और उसके दो पुन 'नापा' और 'पूँला' मे १८८२ से १८९८ तक के समय मैं पूरा किया। इस कार्य मे उसके दो अन्य पुत्र पामा और बलगज भी उसके सहायक थे। राणा कुम्मा के अन्य प्रसिद्ध राजकीय स्थपति सनधार भण्डन हुए। वे साकृत मापा पे भी अच्छे विद्वान थे। उन्होने निम्निलिखित ग्रन्थों की रचना की। प्रासादमण्डन, वास्तुमण्डन, ३पमण्डन, रानवल्लभमण्डन, देवतामूर्ति प्रकरण, रूपावतार, वास्तुसार, वास्तुशास्त्र । राजबल्लभ पन्ध में उन्होने अपने अपने सरक्षक राणापुम्भा का गौरव के साथ उल्लेख किया है। रूपमण्डन ग्रन्थ मे सूत्रधार मण्डनने अपने विषय में लिया है श्री मद्येशे मेदपार्यभिधाने क्षेना योऽभून सूनधारो वरिष्ठ । पुनो ज्येष्ठो मण्डनम्तस्य तेन प्रोक्त शास्त्र मण्डन रूप पूर्वम् || ६-४० इससे मात होता है कि मण्डन के पिता का नाम सूत्रधार क्षेत्र था । इन्दे ही अप लेगी में क्षनाक कहा गया है। क्षेत्राफ का एक दूसरा पुत्र सूत्रधार नाथ था जिसने पास्तुमञ्जरी नामक अन्य की रचना की । इस वास्तुमसरी म तीन स्तक है, उसी का मध्य स्तरक यह प्रासाद मजरी है।जिसे अलग अलग करपे श्री प्रभाशाजी ने यहा सपादित किया है और अभिप्रायसूचक अनुपात भी प्रकाशित किया है । इस ग्रन्थ मे १८७ लोक है। उनमें वण्य विषय प्राय यही है तो प्रासाद शिम्प के अन्य अन्यों में पाए जाते है । सूनधार मण्डन कृत प्रासाद भण्डन एप ठाकुर फेर कृत वास्तुसार इसके निदर्शन है। फिर भी जमा मन्यवः सूत्रधार नाथ ने अपने प्रथ के अत में लिखा है। उहा ने प्रासाद या देवमनिर का जो उनके समाग्रीन या पूर्ववर्ती साहित्य था उसका सार महण करके अपने अन्य की रचना की ! इसा अनक वर्ण-विपय इस प्रकार जानने पाग्य है आरम्भ में कल्पना की गई है कि हिमालय में दिन भगवान् शिकी पारिग देता अमुर और मनुष्य पर हुए और भगवान् सर्वोत्तम प्रकार इहे, यही प्रतीत हुआ कि इहोंने देश भर में व्याप्त (४ - पूना कि।
३१ जोतियों के मन्दिर बनाकर उनमें शिवलिगो की स्थापना की और भगवान शिव की अर्चना की। यह लेसक की बुद्धिमण्डित कल्पना है जिसकी पृष्ट भूमि मे उन्होंने देशभर मे व्यात १४ जातियों के प्रासादों के नाम गिनाए हैं (इलोक १-३)। इसके अनन्तर कहा है कि वास्तु निर्माण में मिट्टी, काप्ट, इष्टिका, शिला, धातु और रनों का यथारुचि-यथाशक्ति उपयोग किया जाता है और तदनुसार ही उत्तरोत्तर अधिक फल भी प्राप्त होता है (श्लो० ५-५)। फिर निर्माण कार्य आरम्भ करने के लिए शुभ मुहूर्त बताए गए हैं । भू परीक्षा (७) वास्तुपूजा. वास्तुपुरुप पूजन (८-११). त्याज्य या अशुभ मुहूर्त (१२ - १३), आयव्यय (१४ - १५) नाग पास्तु (१६) र्भ (१७ - १८); शिलारोपण विधि (१९-२१) गृहारम्भ शुभ नक्षन (२२), शिला स्थापन शुभ नक्षत्र (२३), प्रासाद योग्य स्थान (२४ – २५) वास्तु द्रव्यानुसार पुण्य प्राप्ति (२६), धास्तु पूजन के सात विशेष अवसर (२७), वास्तु पुरुप शान्ति के १४ मुहूर्त (२८-०९); प्रासाद प्रमाण (३.) प्रदक्षिणा पथ के साथ सांधार प्रासाद का प्रमाण (३१-३३ ) प्रासाद की रेसा में रथ, प्रतिरथ, कोणरथ और फालनाओं का निर्गम (३३-३६) जगती (३५-४०) जगती पीठ के उदय का प्रमाण (४०-४१) चतुरस्र आयत वृत्त अष्टान, पर्नुलायत (वेसर जिसका पीछे का भाग वर्तुल और आगे का आयत होता है) प्रासाद के संमुस भाग में बने हुए सोपान के ऊपर तोरण (४२-४३) । प्रासाद के सामने कुछ हय हुआ देवता के वाहन का मण्डप (४४) जिन प्रासाद रचना (४५-४७), नासिवेध (४७-५०), प्रणाल विचार (५०-५१), आयतन अर्थात् मूल पुरुष के प्रासाद मे अन्य देवों के स्थान, (५२ - ५४) त्रिदेवस्थानम्म (५५) इतने विषयों का प्रस्तावना रूपमे वर्णन है। इसके अनन्तर प्रक्षासूनमे प्रासाद निर्माण विधि का वर्णन करते हुए सर्वप्रथम अनगढ संइ शिला के अपर तीन भिट्टों की कल्पना का उल्लेख है। मिट्ट एक प्रकार से प्रासाद की नीन होते है। उनकी दृढता पर प्रासाद की दृढना निर्भर करती है ( ५६-५७) भिट्टों के उपर पीठका निर्माण किया जाता है उसेही जगती पीठ इसी पीठ मे कई प्रस्तर के घर बनाए जाते थे किन्तु उनकी कल्पना पन्छिक थी श्री सोमपुराजी ने नामतः उनका उल्लेस किया है। इनके अन्तर प्रासाद के उत्सेध का वर्णन किया गया है जो छाजे के भाथेतक लिया जाता हैं (६१-६२) इसी मे मण्डोवर विभाग की कल्पना है। मण्डोवर शब्द अपना विशेष महत्त्व रखना है। प्रासाद के अत्सेध छन्द का मध्य भाग मण्डोवर में विशेष रूपमे से देखा जाता है। मण्डोवर शब्द की व्युत्पत्ति विशेषरुप से उसनीय है। किसी अचे मय या चबुतरे को मण्ड कहते थे कुए की जगत मण्ड़ कही जावी । है। प्रासादका मण्ड उत्सेका जगती पीठ होता था उसके अपर प्रासादका जो भाग पीठ से छज्जे तक बनाया जाता था वह मण्ड के उपर होने के कारण मण्डोपरि या मण्डोर कहलाया । इसी मण्डोवर भाग मे गर्भगृह रहता है। यहा मण्डोवर पे उत्सेध या उदय अथवा उचाई के १४४ भाग करके उन भागो के भिन्न भिन्न नाम दिए गए है-जैसे सरा कुम्भा, कलश, अन्तराल, केवाल आदि, मण्डोर के रूप सपादन के लिए उनमे से प्रत्येक का अपना महत्त्व है (६३-६५) गर्भगृह के द्वारमान का वर्णन सुनिश्यित और सटीक है । यह वर्णन प्रासाद-शिल्प समन्धी सभी छोटे बड़े प्रन्यो में पाया जाता है। वराहमिहिर ने बृहत्सहिता में द्वार के पाइयस्तभोपर माङ्गल्य विहगो का उल्लेख किया है। अबतक केवल सेनपुर के दहपर्वतिया मन्दिर के पास्तम्भा पर ही उत्कीर्ण पाए गए है। वे अत्यन्त सुन्दर उडते हुए हसो के रूप में हैं। द्वार के पार्श्वस्तम्भो को द्वार शाखा कहते है और प्रत्येक शासा के कई अवान्तर भाग होते हैं जिन्हे सस्कृत में उपशासा या हिन्ही मै बाट कहते है। प्रासाद मञ्जरी के अनुसार द्वार शाखा के १, ३, ५, ८ और ९ तक खाचे या अवात्तर विभाग बनाए जाते है । हिन्दी मे अभीतक रिसाही (निशासा) पचसाही (पञ्चशासा) शन्द चलते हैं। इन शासाओ के अस्करणों पर स्थपति और काष्ट कर्म करनेगले बहुत ध्यान देते है । ज्ञात होता है कि इनकी रचना में प्राचीन परम्पराए भी अवशिष्ट रह गई है। शासाओ पर प्रतिहार या द्वारपाल की मूर्तिया विशेषत बनाई जाती थीं। कभी कभी उनके हाथ में पूजा को मालाए भी रहती हैं । द्वारका सबसे विशिष्ट अल कार गगा और यमुना की मूर्तिया है जो अपने वाहन मकर, कन्छप पर पूणघट और चामर लिए हुए दिखाई जाती है। गुप्त कालीन मन्दिरो मे ही इन्हे उत्कीर्ण किया जाने लगा था। जैसा कालिदास के स्पष्ट उल्लेस से ज्ञात होता है। मूर्ते च गगा यमुने तदानीं स चामरे देवमसेविपाताम् । समुद्रगा रूप विपर्ययेऽपि सहसपाते इव लक्षमागे । [ कुमार सभर ७-४२] चामर लिए हुए गङ्गा यमुना की मूर्तियों के उडते हुए. हसो का वह उल्लेख बहुत ही महत्त्वपुर्ण है । इस अल करण का सबसे विशिष्प्र स्वरूप देवगढ के गुमकालीन दश धनार मन्दिर मे पाया जाता है। उसमे गङ्गा यमुना की मूर्तिया द्वार के अपरी कोना में बनाई गई है किन्तु कालान्तर मे वे पार्वस्तम्भ के रेचन भाग म बनाई जाने लगी । और भी उपशासाओ पर मिथुन प्रथय या गण चतुर्दल कमल आदि शोभनीय अल करणो से द्वार को सुन्दर बनाया जाता था।
भारतीय मन्दिर द्वारों का सर्वाङ्गीण अध्ययन अभीतक नहीं किया गया । द्वार के देहली भाग मे निकलता हुआ अर्द्धचन्द्र और शसोद्वार अल करण भी रसते थे जिनका उल्लेख श्री सोमपुराजीने किया है। मध्यकालीन उपशाखाओं में और भी पई प्रकार के अलंकरण बनाए जाते थे। द्वार के शीपैदल (हिन्दी-सिरहल) या उत्तरंगे पर मध्यभाग मे गर्भगृह के देवताके अनुरूप एक प्रतिमा बनाई जाती थी जिसे ललाट-बिम्ब कहा जाता था। विष्णु के मन्दिरों में वह गजलक्ष्मी की मूर्ति होती थी-जिसके कारण उसे लक्ष्मी-वन्ध भी कहते थे। देवगढ के दशावतार मन्दिर मे कुण्डलित शेषनाग के आसन पर स्वयं विष्णु की चतुर्भुजी मूर्ति अकित की गई है । उसी पृष्ठ भूमि मे कालिदास ने विष्णु के लिए भोगीभोगासनासीन (रघु० १०-७) विशेषण का प्रयोग किया है। प्रासाद के निर्माण मे दूमरा अन शिसर है । उसके विषय मे उरुङ्ग और झंगो को कल्पना महत्त्वपूर्ण है । जिसका अच्छा वर्णन यहां किया गया है। मध्यकालिन मन्दिरों मे शिखरों का बहुमुखी विस्तार हुआ । शिखर के अन भत्यगों का और उनकी रेसाओं का संपूर्ण अध्ययन अभी स्पष्टता से करने योग्य है । शिरसर के निर्माण मे अण्डक तबग और तिलक का भी उल्लेख किया गया है किन्तु उनका स्पष्टीकरण व्याख्या सापेक्ष है। शिसर की चोटी के पर आमलक शिला का भी महत्त्व पूर्णस्थान है । अवयवों का कुछ स्पष्ट उल्लेख इस ग्रन्थ मे पाया जाता है। इसके अनत्तर विभिन्न प्रकार के प्रासादों का वर्णन किया गया है। (श्लोक १०५-१३४) । प्रासादों के भेद मुख्यः शिसरों की विभिन्न कल्पनाओं पर निर्भर है। एवं शिरसरों के भेद शृङ्ग ऊरुशृङ्ग अण्डक और तिलक आदि के भेदोपभेदों पर निर्भर करते हैं। उनका विवरण इस प्रासाद मञ्जरी ग्रंथ मे तथा शिल्प के अन्य अनेक प्रथों में भी दिया गया है । परम्परा प्राप्त स्थपति इन्हें जानते आए है। और इन्ही के अनुसार विभिन्न प्रकार के शिखर युक्त प्रासादो का बन्धान बाधते है । प्रासाद निर्माण मे मण्डपों का भी विशेष महत्त्व है। गर्भगृह के सामने अंतराल मण्डप रङ्गमण्डप, नृयमण्डप, मुसमण्डप, भोगमण्डप आदि कई प्रकार ये मण्डों का निर्माण किया जाता था । और उनके द्वारा ही प्रासाद का पूरा मरूप विकसित होता था । मध्यकालीन मन्दिरों मे मण्डपों के स्वरूप का आयधिक विस्तार किया गया । मण्डपो के स्तम्भ, वितान, गुमट संचरण और शिसर आदि के विषय मे बहुत अधिक सामग्री शिल्प ग्रयों में पाई जाती है। उसका भी विशेष रूप से अध्ययन आवश्यक है । विशेषत: उड़ीसा के मन्दिरों .
३४ मैं रङ्गमण्डप को पीड़ा देउल कहा जाता है और उनके कई प्रकार के उठान वाले पीढ या पीढाओं की संख्या उनके घण्टा और सिंह के विवरण पर विशेष ध्यान दिया जाता था । मध्यदेश के चन्देल मन्दिरों (खजुराहो) में भी रज- मण्डप के विधान की कल्पना अत्यन्त सुन्दर रूप में पाई जाती है। चालुम्य कालीन मन्दिरों एवं राजस्थानी मन्दिरों में भी उनके शिल्प पर विशेष ध्यान दिया गया और उनके स्तम्भों की संख्या का अधिकाधिक विस्तार किया गया । प्रासाद निर्माण में सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण स्थान अर्धा या देवप्रतिमा का है जिसकी स्थापना गर्भगृह में की जाती है। इस शाख को विशेष विधि प्रतिमालक्षण नामक ग्रन्थों में पाई जाती है। प्रतिमा का प्रमाण और स्वरूप दोनों ही वर्णन के विषय हैं । इन्ही के सूक्ष्म परिचय के आधार पर कुशल शिल्पी सुन्दर प्रतिमाओं का निर्माण करते हैं । प्रतिमा जिवनी सुन्दर होती है 'उतना ही अधिक देवता का सांनिध्य उसमें माना जाता है। प्रतिमा के सौन्दर्य से दर्शक को मनः समाधि प्राप्त होती है। देवता का सान्निध्य यही प्रतिमा का साफल्य है, और उसी-की चरितार्यता के लिए मासाद का निर्माण किया जाता है। एक और सौदर्यशास्त्र के अनुसार देवप्रतिमा की सुन्दरता का अस्तित्व रहता है, दूसरे और देवता की आराधन करने वाले भक्त के मन को शकि या मनः समाधि-अस्तित्त्व है । दोनों के संयोग से प्रासाद में देव पूजन की सफलता सिद्ध होती है । विष्णु धर्मोचर पुराण में कहा है कि प्रासाद निर्माण में अन्तर्वेदि ओर बहिर्वेदि दोनो की मिद्धी प्राप्त होती है। अन्तर्वेदिका तात्पर्य यज्ञ-यागादि से एवं वाहिर्वेदि इष्टपूजादि धार्मिक कार्याने है । प्रासाद निर्माण से इन दोनोका फल प्राप्त होता है । प्रासाद् निर्माणका एक प्रत्यक्ष फल पातु स्थापत्य, शिल्प, चित्र, नृत्य, गीतादि कलाओं की आराधना भी है एवं इन कलाओका दर्शन सर्वसाधारण के लिए सुलम हो जाता है। अतः प्रासाद निर्माण कोई साधारण वस्तु नहीं. अपितु महान् पुण्य हैं। जिसके द्वारा समस्त लोक को देवत्व प्रभावका अनुभव होता है। प्रासाद निर्माण के परिसमाप्ति पर सूत्रधार स्थपति का पूजन अवश्य करना चाहिए सूत्रधार की प्रतिमाही सुन्दर प्रासाद का रूप ग्रहण करती हैं स्त्रधार के आराधन ही प्रासाद निर्माण की सानन्द समाप्ति समजनी चाहिए। (ह.) वासुदेवशरण का हि. नि. वि. वाराणसी 3 "Priyar -- पर SANY ar- เช่น Aneminant. सोमनाथ के सन्मुस दर्शन । HIMAA 4...----- मोढेराका सूर्यमदिरका द्वार और स्थभो
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आयु- देलवाडा जैन मंदिरका श्यंभ और हिन्दोल के तोरण ।
सूत्रधार नाथुनी विरचित यास्तममर्यान्तरगत प्रासादमञ्जरी प्रासादजाति हिमालये दारुखने सुरासुर नरादिभिः । मासादाकार प्रजाभिः पुरोदेवः शिवोऽर्चितः ॥१॥ प्रासादानां तत्र जाता जातयस्तु चतुर्दशः । नागरा द्राविडाश्चैव लतिनाख्या च विमानका ॥२॥ भिधाः ॥३॥ मिश्रकारूपावराटाच सांधाराभूमिमास्तथा । विमाननागरास्तद्विमानपुप्पका चलभी फांसनामारा सिंहावलोक रथारुहाः । वास्तुद्रव्यानुसारपुण्यफल मृदाकाप्टेप्टकाशैल धातुरत्नादिभिः सुधीः ॥४॥ कूर्याद स्वशक्त्या मासाद चतुर्वर्गफलमदः । पासुनापि मुरागारे कीडया विहितश्रियः ॥५॥ १ २ १ * प्रासादमञ्जरी कार्यारभेशुभमुहूर्त सुलग्ने शुभनारे पंचग्रहपलान्विते । मास संक्रांतिवत्सादि निषिद्धकालवर्जिते ॥६॥ भू परिक्षा सर्व दिशुमचाहो वा मागुदा शंकरप्लवम् । भुवंपरीक्ष्यसिंच्येद पंचगव्येन कोविदः ॥७॥ वास्तुपजा मणिना स्वर्ण रुप्येण विद्रुमेण फलेन वा । चतुःषष्टिपदेवांस्तु लिख्यद्वापि शतांशके: ८० पिप्टे च वातवरुध्वं ततोवास्तु समर्च येत । पूर्वोक्तेन विधानेन बलिंपुष्पादि पूजयेनैः ॥९॥ इन्द्रोवतिः पिटपति नैऋत्यो वरुणो मरुद । कुवेर इश पतयः पूर्वादिनां दिशांक्रमावः ॥१०॥ दिपाल: क्षेत्रपालश्च गणेशवंटिका तथा । एतेषां विधिवत पूजा कृत्वा कर्म समार भेव ॥११॥ त्याज्यमुहूर्त धनुर्मीने स्थिते सूर्य गुरौशस्तगे विषा । वती व्यतिपाते च दन्ये नप कदाचन ॥१२॥ कन्यादि विभिगेस्र्ये द्वारंपूर्वादिषु त्यजेत् । सप्ट्या वत्समुलं तर स्वामिनोहानिप्रदमयेत् ॥१२॥ Vss. 6-29 absent in B; VS. 17, However, is given elsewhere with a print reading in the selfsame texl. . N 1.
3 • Prasad Manjari . आयादिगणित भायो व्ययः मंशस्य भिचिनाये मुराये। ध्वजायादेवनक्षत्रं व्ययांशी प्रयमौशमी ॥१४॥ केपांच मरुतां गेहे वृपसिंह गमाः शुभाः । नक्षत्र लपादि-चिन्तनं पूर्वशास्त्रः ॥१५॥ नागवास्तु नागवार समालोस्य कवि सावविध सुधीः । पापाणांतं जलां वा ततः कूर्म निवेशयेत् ॥१६॥ रौप्यसुवर्णादिकूर्मप्रमाण अर्थी गुलो भवेद कूर्म एक हस्ते मुरालये। अगुम्टो ततो वृदिः कार्यातिथि फरावधि ॥१७॥ एक विंसद करांतं च तदध्यां धृदि रिष्यते । नतोऽर्धापि शवादति कोमङ्गलोत्तमः ॥१८॥ चतुर्था भोऽधिको ज्यष्टः कनिप्टो होन योगतः । शिलारोपणविधि सौरों रोप्यनी वापि स्नाय पंचामृतेन साः ॥१९॥ 2. इशानादमिकोणाम शिलाः म्याप्या प्रदक्षिणाः । मध्ये धर्मशिलापवाद् गीतवादित्र मंगलः ॥२०॥ ५.R.inB. एकहावं मुरागारे यूमन गुलं न्यसेत । अागुलाः प्रतिकर पृद्धिः पंचदशावरि ॥
*
प्रासादमतरी.
4
बलिदानं च नोध विविधानं घृतप्लुतम् ।
देवताभ्यः मुधीर्दधात् कर्मन्यासे शिलाम्मु च ॥२१॥
गृहारंभशुभनक्षत्रों
सूत्रार भो गृहादानां मुत्तरायां करत्रये ।
बाये पुण्ये मृगे भन्ने पोणे वासवारुणे ॥२२॥
शिलास्थापनशुमनक्षत्रो
गिलान्यासानु रोहिण्यां श्रयणेडस्वपुष्ययोः ।
मृगशीर्ष च. रेवत्यां मुत्तरात्रितये नमः ॥२३॥
प्रासादयोग्यस्थानपुण्य
नद्यांसिद्धाश्रये नी पुरंग्रामे व गछरे ।
वापी बाटी दागादि स्थाने कार्य मुरालयम् ॥२४॥
देवानां स्थापनं पूजा पापहदर्शनादिकम् ।
घर्ष दिन वेद फामा मोक्षस्ततो नृणाम् -१२५।।
वास्तुद्रव्यानुसारपुण्यप्राप्ति
कोतिनं तृणजे पुण्य मन्मये दासंगम् ।
ऐपके मनकोटिन मेनिफर, मवेद ॥२६॥
वास्तुपूजनसप्तमुहर्त -
फर्म गरमापने द्वार पराग्यापां च पौरुषे ।
पटमले पनिझापा पार गजाम् ॥२७॥
5 * Prasad Manjari * वास्तुशान्तिचतुर्दशमुहूर्त भूम्यारभे तथा कर्मे शिलायां सूत्रपातने । खुरेद्वारोछूये स्तंभे पढे पशिलासु च ॥२८॥ शुकनासे च पुरुपे घंटायां कलशे तथा । ध्वनोच्छाये च कुर्वीत शान्तिकानि चतुर्दश ॥२९॥ प्रासादप्रमाणस्थान एक हस्तादि मासादे यावद् हस्त शताधके । प्रमाणं कुंभके मूलनासिके भित्तियाह्यतः ॥३०॥ भ्रमयुक्तसांधारप्रासादप्रमाण दशहस्तादोंनस्यात् मासादो भ्रम संयुतः । स्यादेकादिरसग्नंत निरंधारो भ्रमं विना ॥३१॥ - 4 पंचहस्तादितोमेरु श्यात्पंचाशत्करावधिः ।। कुंभादि स्थराणां तु निगमः समसूत्रतः ॥३२॥ पीठस्य निर्गमो बाह्ये कर्तव्य छाद्यकस्य च । समदलहस्तांगुलफालना त्रिपंचसप्तनवमिः फालनाभिर्विभाजयेत् ॥३३॥ प्रासादमन संख्या च वारि मार्गान्तरे स्थिताः । फालना कर्ण तुल्यास्याद् भद्रंतु द्विगुणंमतम् ॥३४॥ 3. पट् निशतम् in B. पंचहस्वोभवेत्मेरु in B. - 6 * प्रासादनखरी सामान्योऽयं विधिस्तत्र द्विविधा विनिमः । अद्व्यास समो यद्वा धामहस्तमिताद्गुलैः ॥३५॥ मासादां शाश्वतर्मागाद् यावत् सूर्योतरं शतम् । एकस्पापि वलस्योर्चे शिखराणि पहन्यपि ॥३६॥ नामानि जातयतेषां मांकारानुसारतः । जगतो पंदावमायतंयुतमप्यासंवर्तुला तम् ॥३७॥ मासा कारयेत्तस्यानुरुपा जगतोयपि । प्रासादात्रिचतुः पंच गुणेति जगती त्रिधा 1८11 ज्येष्ठादिषु क्रमायोज्या नियुक्ये भ्रमसंयुताः । पट् सप्तनिजिनेगृहे द्वारका पुरुपये ॥३९॥ दय सपादासाइर्धा वा द्विगुणामंडपक्रमात् । जगत्योत्यप्रमाण मासादे करांते दें त्र्यंशेद्वाविंशदंतके ॥४०॥ उया युगांशा दारिशे भूवांशोधाशवाईके । मथ्या कर्णेषु दिक्पाल: माकार द्वार मंडपः ॥४१॥ सोपान तोरण मोपानतोरणेर्युक्ता चर्दिक्षु भगालकः । मंटपाने मवाल्याने सोपानाने च तोरणम् ॥४२॥ मिनिगमित सीमा-मानं वा गर्ममानत । वारण मान्वरे स्थान पदपटानु सारतः ॥१३॥ प्रसादं कार्य वन जगविम्यानुरुपत: in c. 5 7 * Prasad Marjari . देववाहनस्थान चतुष्कि वाइनस्थाने मासादाने मकारयेत् । एकद्विधि चतुष्पंच रससप्त गुणान्तरे ॥४४॥ जिनप्रासादरचना जिनाग्ने समवसरणं मुखाग्रे गूढमंडपः। चतुर्विशतिपिंचाशद् वा द्विसप्ततिः प्रक्रमै ॥४५॥ जिनालये चतुर्दिक्षु युक्त स्यात् जिनमंदिरम् । मंडपाद् गसूत्रेण वामदक्षिणोर्दिशोः ॥४६॥ अष्टापद मंडपायो त्रिशाला या बलाणकम् । नाभिवेध मासादस्याग्रत' पृष्ठे वामनोदक्षिणोऽयवा ॥४७॥ मासाद कारयेदन्यं नाभिवेध विवर्जितम् । लिंङ्गामे प्रतिमारुपां न कुर्याद देवताः सुधी ॥४८|| ब्रह्मविष्णवीशजैनाकस्विस्वमृर्त्यग्रतो न्यसेव । शिवस्यामेऽन्य देवस्य दष्टिभेदे 'महद्भयम् ॥४९॥ माकार राजपथयोरंतरे न्यानपि न्यसेत् । प्रनालविचार पूर्वापरास्य प्रासादे नालसौम्ये प्रकारयेव ॥५०॥ तत्पूर्वे याभ्यसौम्यास्से मंडपोवामदक्षयोः । 6. Missing in.
* प्रासादमञ्जरी* 8 मयमते इष्टदिग् मुखलिङ्गस्य नालयामे प्रकारयेत् ॥५१॥ आयतनं 'रुद्रस्यायतने सृष्या गौरी मात् रवि मठम् । विष्णुं शान्तिगृह विनराजमाग्नेय कोणत ॥५२॥ विष्णोगणाधिप मावः सूर्य जलशयं विधिम् । नाट्येश पार्वती ताई न्यसेत् भृशेविष्णु च मध्यतः ५३॥ वाराहो मात विनशांतरे वा मातृमूर्ययोः । ॥५४॥ .... त्रिदेवस्थापनक्रम मध्येदक्षे रुद्रखिपुरुपे रुद्रवपन ब्रह्मावामोहरिः । हरिरर्धेविरच्यूमे ॥५५॥ • त्रिभागोनो 7. In lieu of this Vss. 35, 36/2 of Prasadamandana have been given in C. 8. The topic is thus elaborated in Prasadamandana. सूर्यायतनः-सूर्या गणेशो विष्णुश्च चंडीशभुः प्रदक्षिणे । भानोहे ग्रहास्तस्य गणाद्वादश मूर्तयः ॥ गणेशायतनःणेशस्य गृहेतद्व झंडी शंभुर्हरी रविः । मृतयो द्वादशान्येऽपि गणाः स्थाप्या हिताश्चये ।। विष्णुमायतनः-विष्णोः प्रदक्षिणेनैव : गणेशोऽकोऽम्बिका शिवः । गोप्यस्तरयारतारस्य मूर्तयो द्वारिका चंडयायर्तनः-चंड्याः शंभुर्गणेशोऽओ निष्णुः स्थाप्यः 'प्रदक्षिणे । मावरो मूर्तयो देव्या योगिन्यो भैरवादयः ।। शिमपंचायतन-भोः सूर्योगणेशश्व चंडी विष्णुः प्रदक्षिणे । स्थाप्या' स शिवस्थाने दृष्टिवेधपिवर्जिताः 11 तथा ॥
9 * Prasad Manjari भिट्टः भिट्टशिलोर्द्ध मासादे एकहस्ते 'युगांगुलम् । अर्दाि गुलं वृध्यातु यावत् पंचाशतफरान् ॥५६॥ एकद्धे प्रोणि वा हीनहीनानि पादनिर्गमः । पीठः मासादस्य समुत्सेचे एकविंशति भाजिते ॥५७।। पंचादि नवभागान्ते पंचधापीठमुछ्ये । त्रिपचाशत्समुत्सेधे द्वाविंशत्यशनिर्गमे ॥१८॥ कुर्यानवादि सप्तार्क दशवस्वंशकानक्रमात् । जाड्यकुंभ कणी पासपट्टी माश्चनरस्तरान् ॥५९॥ पंचसार्दात्रि सा ब्धि चतुतिध्वंशनिर्गमान् । सर्वेषां पीठमाघारः पीठहीन निराश्रयम् ॥६०|| पीठहीनं विनश्येद मासाद भवनादिकम् । पासादोदयःमानः हस्त्रादि पंचहस्तांते भासादे च समोच्छ्यः १६११ सूर्या गुला प्रतिकर - वृद्धि त्रिंशत्करावधिः । नवाजुली शतान्तिमेच्छातमुच्य. ॥६२॥ मंडोवरविभाग १४४ - उत्सेधो वेदवेदेन्दु भस्ते पीठोतो न्यसेत् । पंच नखाष्ट सार्धदि वास्त्रकैः पंचत्रिंशतः ॥६३।।
१० .. * प्रासाठमारी तिथ्यष्ट दया पश्चशै सार्धद्वि विश्व भागकै । क्रमेण सुरर्फ कुंभकलशं चान्तरपत्रकम् ॥६॥ कपोताली मंची जंघोम्माश्च भरणींततः । शिरः पट्टी कपोतालिमंतरच्छाधमाचरंद ॥१५॥ दशांशे निर्गतो वारि-मागोंदल कलांशवः । मित्तिमान इष्टिकाभित्ति कृतेगेहे भित्तिपादेन कारयेत् ॥६६॥ पंचमांशेऽयवासा पहशेवापिशैलने । दारजे सप्तमांशस्याद सांधारेटमांशतः ॥६॥ दशांशे धातुरत्नजस्याउ कुर्भमूलनासिके । गर्भगृहस्वरुप गर्भगेह, युगाथं वा भद्राव्य । वायतमम् ॥६८॥ स्तरसमसूत्र कुंभकेन समाकुंभी स्तंभउद्गम साम्यतः । भरण्यां मरण शीर्ष कपोताल्यां समभवेत् ॥६९।। कूटछायस्य पेटान्तं कुर्याद परस्पपेटकम् । गर्भगृहोदय 'गृहदेवालयेगमें व्यासाद साई सपादकः ॥७०|| गदियः स्यात् पट्टांते तस्य तु यसमाजिते । एफसाद शरादिक माधैः क्रमेण इंभिका IN१|| 9. Vos. 70, 71 are absent in B. bat found in C.
11 * Prasad Manjari स्तंभोध भरणंशीप पट्टोदोर्द्ध पट्टोदोर्द्ध फरोटकम् । द्वारमान - एकहस्ते मुरागारे दैर्द्धद्वारं कलांगुलम् ॥७२॥ पोडशाङ्गुला या वृद्धयाः प्रतिहस्त युगान्तकै । ज्यंगुलाचाऽट हस्तांते द्विद्धया स्यात् शताड़के ॥७३॥ द्वारोच्छ्याई विस्तिर्ण पोडशांशाधिकहिता । शाखास्त्वंग समा एक त्रिपंचाद्रि नवांशके ॥७४॥ हीनानेष्टाऽधिकाश्रेष्ठास्तास्युर्देवालय गवत देवानां सप्तशाखवा नवांत हरिन्द्रयो ॥७॥ पंचशाखं सार्चभौमे त्रिशाख मंडलेश्वरे" । द्वारेस्वस्व प्रतीहारान् परिकरयुतस्थितान् ॥७६॥ • - द्वारद्वय चतुर्थाशे द्वारपाल प्रकारयेत् । दुम्बरार्धचन्द्र मूलकर्णस्य सूत्रेण कुंभिनादुम्बर समम् ॥७७॥ गर्भका संदस्यात् तंदāस्यात् मंदारस्तुत्रिभागतः । द्वार व्यास सौदैयों अर्द्धचन्द्रस्त्वनिर्गतः ॥७८|| खुरकेन समोत्सेध' स्वत्रार्धा शस्तु चंद्रिका । मंडपेषु समस्तेषु पीठान्ते रङ्गभूमिका ॥७९॥ 10. Missing in B. *11. न्यसेत् परिकर स्थितान् in A. 12. कोणेना in A. 13. Absent in Band c.
१२
* प्रासादारी
12
कपिलीप्रमाण
मासाद दशभक्ते द्वीत्रिवेदांशाच वाधवः ।
ज्यशेऽय पादेका कौलीस्याः शूकनाशकः ॥८०॥
शिखरः
छायस्योध्र्व महार स्यात् ततः गाणि कारयेत् ।
शूटगे झ्गे वधच्छाध मूर्ध्वशृङ्गाधोऽजुद्गमम् ॥८१॥
स्वस्याङ्गास्य प्रमाणांतु सपादं शृङ्गमुच्छये ।
स्कंध स्याफोदये घंटा (शृङ्गे महति वालधौ ?) |८२
मूलकणे रथादी बाप्येकद्विविक्रमा न्यसेत् ।
निरंधारे मूलभित्तौ सांधारे भ्रमभित्तिषु ॥८३॥
रेखागर्भ समाशस्ता विस्तिर्णवान संकटा ।
उस्मृणाणि भद्रपुरेकादितो नाचकम् ॥४॥
लुन्या सप्तसप्तास्तां तूों रसांशस्त्रयोदशः ।
रेखामुळे देशभक्ते कूर्यादयं पदंशकम् ।।८।।
रेखामुछेत्सपादकर्ण मानेका शिखरोदये ।
रेखोदयेऽध मक्ते तु स्कंधोध्ये
सप्तभागिकम् ॥८६॥
उधों शे तिर्यगलस्य (लांछना।पिका मतः ?)।
यद्वारेखा मूलस्य विस्तराम पृषकसूत्रे चतुर्गुणे १८७।।
पभको समाठेख्य सपाई शिस्वरोदयः ।
आमलसाराप्रमाण
स्वकोशान्तर
भक्तेग्रीवांशकोदयः ॥८॥
13 * Prasad Manjari * साई आमलसारः स्यात् पद्मछत्रं तू सार्द्धतः । विभागमञ्च कलशं कुर्याद्विभाग विस्तरः ।।८९॥ मूलशिखरउपाङ्गचालंजर रेखामूले तु दिग्भक्ते कोणः कार्योंद्विभागकः । ज्यशभद्रं रथः सार्द्ध स्कंधोवं च नवांशके ॥२०॥ 1*कोणौ युगांशी भद्रं च द्वचंशव्यंशोरथो भवेत् । शुकनासमान छाद्यांतः स्कंधान्तमेकद्वि भक्तैकदिकशिवांशकै ॥११॥ सूर्य' विश्वांशकैरुचे च छायोर्वे शुकनासक । शृङ्गोरुङ्ग मत्या गणयेन्दंडकानिहि ॥१२॥ तवदा तिलकं कर्णे कूर्याद मासादभूपणम् । आमलसार विस्तारमान द्वयो प्रतिरथोमध्ये वृत्तमामलसारकम् ॥१३॥ व्यासार्डेन तदुत्से, धृतपानं तदंतरे । मासाद पुरुष हेमपर्यकशायिनः ॥१४॥ ध्वजाघरस्थान प्रासाद पृष्ठे नैरुत्ये रथे कूर्याद् ध्वजाघरम् । कलश: पासादस्पाष्टमांशेन कलशांऽके विस्तरः ॥१५॥ 14. C. stops here. . 15. Absent in B.
* प्रासादमञ्जरी * 14 1"पूर्वोक्त मानतो व्येष्ठः पोडशांशाधिको भवेत् । तादंशोनः कनीयो: नवांशैरुदयं भवेत् ॥१६॥ ग्रीवापीठं भवेद्धार्ग विभागं नाण्डकं तथा । कर्णिके भाग तुल्ये च त्रिभागं वीजपुरकम् ॥९७|| एकांशोऽग्रे च मूलेद्वौ वहि वेदांश कर्णिको । ग्रीवाद्वौ पीठम द्वौपडभागं विस्तराण्डके ॥९॥ ध्वजादंड तदुच्छायो भवेदंडः मासाद व्यास मानतः । दीग् शरांशोन तो वास्या हस्ते पृथु पादौनाङ्गला ॥९९|| मति इस्ते शवादति त्वांगुल वृद्धितः । वृत्तसार समग्रंथी पर्वभिविषमर्युतः ॥१०॥ शिंशव वंश खदिर मधुकोलग चंदनै । "अगर कंगरेण वा दंडः कार्यः सुशोभना ॥११॥ मर्कटी दंडः पप्ठांशे दादन तु विस्तृता । 1 समुच्छ्रिता त्रिभागैश्च किंकिणीयुत चंद्रिका ॥१०२।। यशो कलशश्वर अधः घंटा मलंययेत् । ध्वजादंड शृतार्दर्य साप्यामांशेन विस्तृता ॥१३॥ निम्विन्दं शिखरं दृष्ट्या ध्वजाहीनं न कारयेव । अमुरा बाममिन्छन्ति ध्वनहीन मरालये ॥१४॥ 16. Vss. 93 to 95 absent in B, 17. Absent in B. 18. Absent in B.
15 * Prasad Manjari प्रासादाः चतुरस्र ' चतुर्दारी द्वारांने च चतुष्फिका । वैराज्योऽय चतुर्भक्ते कोणाशोद्वोतुभद्रकम् ॥१०५।। भागार्च निगमं भद्रं मुखं भद्रं कारयेत् । शृङ्गमेकं न्यसेत्कण भद्रद्वोद च नंदनः ॥१०६॥ सांधारकेशरीप्रासादः सांधारे दिग् नवांप्टांशे भ्रमौमित्तिश्च भागतः । क्षेत्रेऽष्ट भक्ते द्वौ को भद्रं वेदांश विस्तरम् ११०७१ भागार्द्ध निर्गम पचांऽकोयं केसरीमंतः । चतुरऽक वृध्यान्ये यावदेकोत्तर शतम् ॥१०॥ . दशभक्ते द्वयं कर्णः द्वयं कर्णः साई · भद्रा केरथे । श्रीवत्स शिखरं सर्वतोभद्रो नव शृङ्गवानं ॥१०९॥ भद्रे श्रीवत्स सहितो रथिकाधव नंदनः । शृङ्ग सर्वे भद्र व सदश नंदशालकः ॥११॥ कर्णेशृङ्गाद्वयंत्वेक रथे नंदिशईरितः । सूर्याशे परयः कर्णो · भद्रार्द्ध द्विद्विभागतः ॥११॥ कर्णे भने च शृङ्गद्वे स्थेत्येक स मंदर" । मनुभक्ते रथः कर्णो भद्रार्घ द्वि द्वि भागतः ॥११॥ 19. क्षेत्रेप्ट भक्तेद्वोकर्ण तन्न भद्रांश विस्तरम् in B. 20 Absent in A and B, but kuorra in mss. from Rajastbab. 21. Ibid.
. प्रासादमञ्जरी 16 भद्रपार्थ द्वये कुर्याद् भाग भागेन नंदिके । कर्णेशृङ्गाद्वय शृङ्गो परिष्टाव तिलकरथे ॥११३॥ नंद्यामकैक तिलक भद्रे शृङ्ग अयं न्यसेत् । श्री वृक्षस्तत्र कर्णे त्रिशृङ्गः स्यादमृतोद्भवः ॥११४॥ दे द्वे मतिरथे द्वेद मद्रे च हिमवान् मतः । भद्रे तृतीयं नद्यांस्तु तिलकं हेमक्टक: ॥११५।। रेखोर्ध्वस्तिलकं नंघा शृङग कैलास संशकः । रेखायास्तिलकं स्थाने शृड्ग पृथ्वीजयस्तदा ॥११॥ पोडशांशे भागमाना कोणी कर्ण रथान्तरे । शेप मन्वंशवद्भवे निर्गमोऽशः परे समा ॥११७॥ फर्णेशृङ्गद्वयं नंद्या तिलक च प्रत्याङ्गाकम् । द्वय र अयं भद्रे नंदी संकेन्द्र तोलकः ॥११८॥ नंघा शृङ्गे महानिलो रेखोर्षे विलके सति । रेखास्तिलकै स्याने शृङ्मा यदि सभ्वरः ॥११९॥ अप्टादशांशे भद्रस्य पार्श्वयो नंदिका द्वयम् । शेप कलांवत्कणे हे गृहगे विलफस्सया ॥१२०॥ कर्णे नंदा शृग तिलक मत्पाना युग्म भागिकम्" 22. Vis. 121 10 123 Are variously giren in B. as: : नंगा वेतु तिलके प्रत्यारे युग्म भागिफम् । दागं प्रयस्यमढ़े युग्मनंद्यातु वैनके भद्र नंद्यान्यसेन विल; रत्नाटकः । रेगा इवीय पनेतु सतिवडूर्य उच्यते ॥ प्रयं नंपातु तिल है श पधरागरुः । रेसापः स्नान पुनः न कारयेषिकस्तदा ।। ॥
* Prasad Manjari नंद्या द्वे द्वे विलक भद्रे 'युग्म रथे त्रयम् ॥१२१॥ नाम रत्नकटस्तता शिवलिङ्गेषु कामदः । रेखायां तृतीय शृङ्ग सति चट्टर्य उच्यते ॥१२२॥ रेखोय तिलक रथ नये शृङ्गो द्वे पद्मरागः । रेखोर्ध्वस्ताद पुनः शृङ्ग कारयेद्वजकस्तदा ॥१२३।। नख भक्ते द्वयकणे साढे कोणीद्वय रथः । सार्द्ध ,नंदी भद्र नंदी भागोभद्र युगांशकः ॥१२४॥ कर्णे द्वि शृङ्ख तिलक रेखामन्वंश चिस्तरा । नद्या शृङ्गं च तिला प्रत्यक्षं च तदूर्ध्वतः ॥१२५।। वयं भद्रं चतुः शङ्ग नद्या शूगां च तिलक । भद्र नधं तथा शृङ्ग प्रासादो मकुटोज्ज्वलः ॥१२६।। तत्र रेखोर्थ च शृङ्गे प्रासादो गजराजका तथैव तिलकं कुर्यात् भद्र कर्णेतु शृङ्गकम् ॥१२७॥ राजहंसः समाख्यातः कर्तव्यो ब्रह्मम दिरे । तथैव शृङ्ग कूति भद्रे कर्णे तु तिलकम् ॥१२८।। गरुडः स समाख्यातः कर्तव्यश्च श्रियः पते । द्वाविंशत्य शके नंदी भागेन भद्र पार्थ यो ॥१२९।। प्रयप्रतिस्थः कर्णो भद्रार्ध च द्वि भागियम् । कर्णे द्वि शृङ्ग तिलक' भद्रे शृङ्ग चतुष्टयम् ॥१३॥ 23. Vss. 124--133 absent in B, 21, प्रत्यङ्गस्या दधोरथे in A. 25. Vss. 127 and 128 missing in A but kao o in mes from Rajasthan.
१८ 18 गद नंद्या * प्राप्तामारी शृङ्गाद्वयं प्रतिरथे प्रत्यङ्गोनि त्रिमागतः । रथे 'शृह अयं कूर्याद वे हे उपरथे तया ॥१३१॥ वतः शृङ्गं कृपभोऽयं हरमियः कणे' शृङ्ग तृतीयस्या नोरु सिद्धि प्रदायकः ॥१३२॥- सांधारा वा निरंधाराः पासादा पंचविंशति । पंचहस्तो भवेन्मेरु रेकोचर नख वृध्या शतार्थेऽका न्येकोत्तर सहस्रकम् । पूर्व कृर्यान्नुपोमेर वर्णहीन तवःपरम् ॥१३४॥ मेरुः कूर्याद ब्रह्मविष्णु शिवार्काय नान्ये क्वचित् । मंडपाः शतांडकः ॥१३३॥ पासादाने मंडपस्यादेक त्रिद्वार संयुतः ॥१३५।। जिने त्रिपुरुषे द्वारि काम त्रिमंडपाः क्रमाद । एकटे हस्ते प्रासादे कूर्यादग्ने चतुष्किका १३६॥ विकरे द्विगुण वेद हस्तांशोन द्विसंगुणम् पंचादि दश हस्तांते प्रासादे साई मंडपः ॥१३७॥ दश हस्ता शताईते सपाई वा सर्मशुभम् । पायेण मंडपाः साो द्विगुणं प्रत्यलिङ्गाकै ॥१३८॥ जयमते प्रासादस्प प्रमाणेन मंडपं कारयेत्तसमम् । सपादं साई मंशोन द्विगुणं द्विगुण दिवा ॥१३९॥ 26. Vss. 135 to 138 missing in 19 * Prasad Manjari F कक्षासनयुक्तस्तभविभाग विश्वांश भक्तं तूत्सेधै सपाद राजसेनकः । सपादं व्यंश कावेदी भागबासनपट्टकम् ॥१४०॥ स्तंभ साचे सरांशोऽय पादोन भरणं मतम् । शीर्ष सपादे तस्योर्ध्वं कार्यः पट्टो द्विभागकः ॥१४१॥ तर्चे अंशक छायं तत्पेटं पट्ट पेटके । कार्याहस्तांगुलोन मासनोचे मत्तवारणम् ॥१४२।। गढमंडपाः स्यागुदमंडपो चेदास सुभद्रोप्रतिभद्रकम् । मुखभद्र युतो द्वाभ्यां त्रिी प्ररथयुतः ॥१४३॥ कर्णोदकान्तरे वापि भद्रोदकयुतखिभिः । कतो द्विगुणं भद्र पादोनस्तु रथो भवेत् ॥१४४॥ भद्रा मुखभद्रही भद्रे चंद्रावलोकितः । चतुष्कीपारिवमंडपाः एक त्रिवेद पट् सप्त नव चतुष्कयं खिकत्रये ॥१४५।। अग्ने भद्र युते पाच द्वयेपार्थाग्रतस्तथा । अग्रतस्त्रिचतुष्किमिः सालिंद पार्श्वयोर्द्वयोः ॥१४॥ मुक्तकोणे चतुष्क्यौ? इतिद्वादशमंडपाः । मंडपे स्तंभ पदाद्या मध्यपदानुसारतः ॥१४७॥ 27. Iss 140 to 144 absent in B. 28. Vss 145 to 147 absent in B.
* २० 20 प्रासादमसरी क समापं न्यूनाथेष्टानतोच्छ्तिा । नृत्यमंडपाः नृत्यार्य द्वादशस्तंभो द्विद्विस्तंभ विवर्धनम् ॥१४८॥ यावत् स्तंभाश्चतुपष्टि सप्ताविंशति मंडपाः । नृत्यमंडप बार्दा भूमिमूवें वितानका ॥१४९॥ अथरलाणका ब्रह्मेश विष्णु चंद्रार्क जिनाग्रे स्याद् चलाणकः । मासादाने गृहे दुर्गे राजद्वारे जलाशये ॥१५॥ . वामनश्च विमानय हर्यशालय पुष्करः । तथा चौतुड्गा नापा च पर्वते च वलाणकाः ॥१५१॥ बलाणं जगती पादः व्यासं पादो नितंडिया । एक द्विति चतुः पंच रससप्त गुणान्तरे ॥१५२॥ मूलमासाद बद् द्वारं उत्तरगाणा च पेटके । वामन जगतो अस्त विमान तु तदाश्रितम् ॥१५३॥ हर्पगृहे वाऽपि गोपुरे नगरानने। पुष्करं वारिमन्यस्यमन तयैव भूपितम् ॥१५४|| विमानम्तृड्गनामा च राजश्माग्रतः समः । सप्तभूम नवभूमं अतउर्थ न कारयेत् ॥१५॥ लक्षणं तस्य वक्ष्यामि म्यानमान च भूमिकाम् । 29 Absent in B. 30. Abent in a . 31. तमासाद घ द्वारं उत्तरंगो पण यधि in B. 32. Ps. 153 to 15 absent in B. न 21 * Prasad Manjari * २१ संवरणा पंचायकोत्तरं शत घंटा संघरणा भवेत् ॥१५६॥ पंचविंशतिरित्युक्ता प्रथमा वसुभागिका । लिङ्गमान मानन्युनाधिकं वापि स्वयंभूगण रत्नजे ॥१५७॥ घटितेषु विधातव्यमर्चा लिड गेषु शास्वतः । जगत्यांनीचतुः पंचगुणां देवपुर त्रिधाः ॥१५८॥ भिन्नदोपादि ब्रह्माविष्णु शिवााणां गृहभिन्नं न दोपदम् । शेपाणां दोपदं भिन्न व्यक्ता व्यक्तगृहशभम् ॥१५९।। दीर्घमानाधिकहस्से वक्रेचापि सुरालये । छदमेदे जातिभेदे हीनमाने महद्भयम् ॥१६०॥ प्रतिमा मानप्रमाण द्वारोच्छ्योऽष्ट नवधा भागमेके परित्यजेत् । शेषत्र्यंशे द्विभागार्चा अंशोनाद्वारतोथवाः ॥१६॥ द्वारदैये तु द्वात्रिंशे तिथिशक' कलांशकै । उर्चाि आसनस्थातु मनुविश्वार्फ भागतः ॥१६२॥ चतुरस्त्रीकृते क्षेत्रे दशभाग विभाजिते । मित्ति विभाग कर्तव्या पड्माग गर्भ मंदिरम् ॥१६॥ 33. Vs. 157' absent in B 34 मान न्युनाधिका कार्या in A V's. 158' absent in B 15.
૨૨ * प्रासादमञ्जरी * 22 तृतीयांशेन गर्भस्यात् भासादे प्रतिमोत्तमा । मध्यमा स्वदशांशोना पंचाशोना कनियसी ॥१६४।। प्रतिमा द्रष्टि स्थान आयभागे मजेद् द्वारमटमवंतः त्यजेत् । सप्तमा सप्तमे द्रष्टियसिंहे ध्वजे शुभा ॥१६॥ पष्ट भागस्य पंचाशे लक्ष्मीनारायणस्यदछ । शयनाचर्चाश लिङ्गानि द्वाराध्न व्यतिक्रमात् ॥१६६।।' देवता पद स्थापन विभाग पट्टाधो यक्षभूतायाः पहाग्रे सर्वदेवताः उदग्रे वैष्णवं ब्रह्मा मध्ये लिङ्ग शिवस्य च ॥१६७॥ se प्रतिष्ठामुहूर्त पूर्वोक्त सप्तपुण्याह मतिष्ठा प्रतिष्ठा सर्वसिदिदा। रवी सौम्यायने कुर्याद् देवानां स्थापनादिकम् ॥१६८॥ मतिष्ठा चोतरामूल' आदायां च पुनर्वसौ । पुप्ये हस्ते मृगे स्वाती रोहिण्यां खुतिमैत्रमे ॥१६९।। तिथि रिक्ता कुंजधिण्य अरविद विधुं तथा । दग्यां तिथिं च गण्डान्त' चरमोगग्रह त्यजेत् ॥१७०।। मुदिने मुमुहुर्ते च लग्ने सौम्पेयुतेक्षिते । अभिषेक प्रविष्टा च भवेशादिकमिप्यते ॥१७१० 36. Vs. 1GB to 181 are absent in all the mss. knolyn from Saurasbtra: these bave hopeger, beer goticed in those from Rajasthan.
23
* Prasad Manjari *
प्रतिष्ठामंडपः
प्रासादाने तथैशान्ये उत्तरे मंडपंशुभम् ।
त्रिपंच सप्तनदैका दशविश्व करान्तरे ॥१७॥
मंडपः स्यात् करैरष्टा दशसूर्य कलाभित्तैः ।
पोडश हस्ततः कुंडे वशादधिक इष्यते ॥१७॥
स्तंभः पोडश संयुक्त तोरणादि विराजितम् ।
मंडपे वेदिका मध्ये पंचाष्ट नव कुंडकम् ॥१७४।।
हस्तमात्रं भवेत् कुंड मेखलायोनिसंयुतम् ।
आगमैर्वेद मंत्रैश्च होमर्याद विधानतः ॥१७५॥
अयुते इस्तमात्र हि लक्षार्धेतु द्विहस्तकम् ।
त्रिहस्त लक्षहोमे स्यात् दक्षलक्षे चतुष्करम् ॥१७६।।
त्रिंशलक्षे पंचहस्त कोट्यधै पटकर मतम्
अशीति लक्षेऽद्रिकर कोटिहोमेऽष्ट हस्तकम् ॥१७७॥
ग्रहपूजा विधानेन कुंडमेकंकर भवेत् ।
मेखला त्रितयं चेद रामयुग्माशुलैः क्रमात् ॥१७८||
एकद्वि त्रिकर कुर्याद् वेदिको परिमंडलम् ।
ब्रह्मा विष्णु वीणां तु सर्वतोभद्रमिष्यते ॥१७९॥
भद्रं तु सर्वदेवानां नवनाभिस्तथा त्रयम् ।
लिङ्गोद्भव शिवस्यापि लत्तालिगोद्भवं तया ॥१८०॥
भद्रं गौरी चिलके च देवीनां पूजन हितम् ।
अर्धचंद्र तटागेषु चापाकार तथा ॥१८१॥
२४ * प्रासादमञ्जरी - * सूत्रधार पूजनः पूजनम् । : इत्यनंतरतः कुर्याद सूत्रधारस्य वस्त्रालंकार भूचित्त गोमहिप्याच वाहनः ॥१८२।। अन्येषां शिल्पिनां पूजा कर्तव्या कर्मकारिणाम् । स्वाधिकारानुसारेण वखाम्ब्ल भोजनः ॥१८॥ पूण्य प्रासादर्ज स्वामी प्रार्थयेत् सूत्रधारतः । मनधारो वदेव स्वा मन् अक्षय'. भवतात् वयः ॥१८४॥ लक्षलक्षणतोऽभ्यासाद् गुरुमार्मानुसारतः । मासाद भवनादिनां सर्वज्ञानमवाप्यते ॥१८५॥ । एकेन शास्त्रेण गुणाधिकेन वितद्वितीयेन पदार्थसिद्धिः। तस्मात् प्राकारान्तरत्तो विलोक्य मगिगुणाढयोऽपि सहायकांक्षी ॥१८६॥ ग સુત્રધાર નાથજીના પિતા ખેતા-સેવા इय श्री क्षेत्रपुत्रेण सार प्रासादा प्ठ संस्कृता । सूत्रधारेण नाथेन निर्मिता वास्तुमारी ॥१८७|| इति श्री मेदपाट राजमल्ल पृथिवीपति मूनधार क्षेत्रात्मजो विविधशाख । कला सुधार गोत्र भारद्वान सूत्रधार नाथजी विरचिवायां वास्तुमचर्यांतर्गत प्रासादाधिकार स्तबक द्वितीय।।२।। 37 These Ves are like-wise absent in mss from Siurashtra
श्री गणेशाय नमः॥
श्री विश्वकर्मणे नमः ॥
थी सरस्वत्यै नमः ॥
सूत्रभर नाथुजी विरचित
वास्तुमञ्जर्यान्तर्गत
प्रासादमञ्जरो
(स्थपति प्रभाशंकर कृते
सुप्रभ टीका
हिन्दीभाषानुगद सहित)
COSOMANIA
ROSCMFORA
S SOMSURA
ACSO 14
B.SONALA
ROSOMPORA
भी सरस्वती
अक्षमाला पुस्तकं च
वीणावाद्यं च पद्मकम् ।
मयूर सारूढां च
वदेऽहं तां सरस्वतीम् ॥
श्री विश्वकर्मा
अक्षमालां कंपासून
पुस्तकं च चतुर्भुजम् ।
हंसस्थं च त्रिनेत्रं तं
वंदेहं विश्वकर्मणम् ॥
श्री गणपति
गणेशाय नमः तस्मै
सर्वविघ्नविदारिणे।
मूपारुढ चायदेयं
वदेऽहं तं गजाननम् ॥
है 28 २८ प्रासादमसरी पदि दिशाओंके आठ दिपालों के अनुक्रमसे तथा क्षेत्रपाल गणेश एचडी की विधिवत पूजा कररे कार्य का प्रारम्भ करना चाहिये । १०-११. निषिद्ध मुहूर्त :-~-धन अथवा मीन राशिमें जब सूर्य का प्रवेश हो; गुरु एवं शुरू के चंद्रका अस्त काल, वति, व्यतिपात योग एवं दग्धा तिथिमे कार्यका प्रारम्भ अथा वास्तु कदापि नहीं करना चाहिये । कन्यादि तीन राशि के सूर्य में पूर्रादि द्वार वाले वास्तु नहीं करना चाहिये (अर्थात् प्रारम्भ नहीं करना) इसका कारण यह है कि सृष्टिनमानुसार वत्सका मुख उपरोक्त दिशाओं में रहता है। जिससे उस निपिद्ध कालमे यदि कार्यका प्रारम्भ करें, तो स्वामीका नाश होता है। १२-१३. सपचोरस क्षेत्रका देवगणादि श्रेष्ट गणित आमना नक्षत्र सामाअका गण आमना आय नक्षेत्र बामना अका गण खाय " . " " " " " " " " " " . " " " " " " . ११४३३ मृगशिर्ष देयगण पूर्व वजाग ५.४.५ अनुराधा देवगण पश्चिम बजाय १.३४१३ रेवती उत्तरे २१३४५१३मृगशिर्ष १.२५१.गशिर्ष पूर्व १.१५५५.१५ रेवती उत्तरे १.२३.१.१३/मनुराधा पश्चिम ५१७४९.१७ मृगशिप पूर्वे १.२१४१.२१ रेवती उत्तरे ६.९४६ १. रेवती पुष्य पूर्य १७४६२७ पुण्य पूर्वे २७४२७ पुष्य ध्यनाय ६.१९४६ १९ पुष्य देवगण पूर्चे २.१५४५१५ रेवती उत्तरे ७ ३४७३] रेपत्ती २.२३४५.२३ अनुराधा पश्चिमे ७.११४७.१ अनुराधा पश्चिम ३७४३७ मृगशिप १७ ११४७. मृगशिप ३९४३९. रेवती उत्तरे १७२०४७२९ रेवती उत्तरे ३.११४३.११ मृगशिप ये जाय७२३४७२३ मृगशि, पूर्व ३१९४३.२१ अनुराधा पयिमे ८७४८.७ अनुराधा पश्चिमे ४३४४३ | रेवती ८.१५४८१५ रेवती उत्तरे ४.११४४ १२ पुण्य ८२३४८२३) पुण्य पूर्वे ४.२३४४१३, पुप्य १९४९१ पुष्य पूर्वे ११४ रेवती उत्तरे १९४९९ रेयती ९ ३७४९.३७ अनुगधा पश्चिम " " २ " " . " " . " . " . " " , " A " उत्तरे " 29 * Prasad Manjarn आयादि गणित -आय, नक्षत्र, व्यय, एव अशकादि अगोंका गणित देव मदिरोकी दीवारों के बाहरी भागसे मिलाना चाहिये, धज, देवगण नक्षत्र, प्रथमव्यय, एर अशक मिलाने पर शुभ गणित जानना चाहिये देवपासाद मे वृष, सिह, और गजाय ये तीनों आयमी श्रेष्ठ है, कार्यारंभ करनेमे मास नक्षन एर लग्नादिका विचार पूर्वाचायोंके शास्त्रानुसार प्रमाणपूर्वक करना। १४-१५ नागारतु चक्र एन सात -वास्तुशास्त्रमे कहे हुए नाग चरको देसकर, जिस समान्तिमे जिस कोनेमे 'सात" निश्रित होता हो वहा गड्डा बनाकर, वास्तुपूजन करसे जबतक पत्थर या जल न आवे (अथवा रेतके अन्त तक । अथवा कच्ची मिट्टीपे अन्त तक) भूमि शुद्धिकर-सोदकर धर्मशिलाकी स्थापना करनी चाहिये । १६ १७ सुवर्ण अथवा चादीके चूर्मका प्रमाण -एक हाथके देवालयके लिये आधे अगुलका चूम चादी अथवा सोनेका बनाना चाहिये। इस प्रकार पद्रह हस्त तक प्रासादके लिये अध अर्ध जगुलकी वृद्धि करनी । सोलहसे इकत्तीस हस्त तक प्रासाद निर्माण में चोथाइ : अगुलकी वृद्धि एक एक हाथमे करनी । बत्तीस से पचास हस्त तकके प्रासादके लिये एक एक दोरा अर्थात एक अष्टमाश आगुलकी वृद्धि करनी । चौद आगुल्की धर्म ५० गजके लिये करना । गणितके अनुसार आये हुए १ सोना चादीके धर्म मान के पश्चात् पापाणकी कम शिलाका प्रमाण भी अन्य अथामे दिया हुआ है। मध्यकी धर्मशिला नय विभाग खानाको आकृति वाली एच पीरती दिशा यिदिशाको कोणकी अष्ट शिला स्थापित करनी । नवशिलाकी प्रथा गुजरात, राजस्थान पव सौराष्ट्रमे है। क्षोराणय' ग्र थमे नवशिला एच दीपाणंघ प्रथमे नय अथवा पशिला। इस प्रकार दो एक प्रकारसे विसर्जित करनेया प्रमाण है-प वशिलाए-चार काणे पथ मध्यम स्थापन करनेका विधान विश्वकर्म प्रकाश ' प्रथम है उन शिलाओ मे बनाने के चिह्नो र विषयमे प्रथा विभिन्न मत है , मध्यकी धर्म शिला के नौ साने बनाकर पूर्व दिशासे कमसे चिह्न परनेशा क्षीरा' प्रथम वर्णन है। पीरपाल सूत्रधारन प्रामाद तिल्कन थमें आग्नेय दिशार क्रमस चिह्न बनानेका विधान दिया है। मध्यको पाणकी धर्मशिला पर सोने-चादीका कूम स्थापित करना । और उसपर खड़ी नाल पर देवस्थप नकी सीधमें ऊपर तक लेना उसे " नामी' कहते है । यह अग्निपुराग पर विश्यक प्रकाश प्रथमे कहा है। यह प्रथा द्रविड स्थापन्यमे भी है। और अष्ट शिगोको स्थापनाकी भूमिमे एक फलश सप्तधान्य, पबरन आदि रखकर घहा धातुर नाग एप कच्छप (कच्छू भा) ताम्र अथा सोने या चार बनाके उसपर शिला स्थापन करने की विधि शिल्पि लोग जै। पररासे करते आये है पद्द उचित है। शिगपर नत्र लपटनेमे निम्न विधि।
30 • प्रासादमसरी मध्यमान में : (चतुर्थांश) भाग जाटने से ज्येष्ठ मान और । पटाने से कनिष्ठ मान जानना चाहिये। मा upost RMसमानी असा वायच्या A गर -- SERIES ggtvะปี 41 मंस भोगनिमी 4 StateNew তুরি বা প্রতি गिलागेपन किर:-मुरंग या मांदीके पूर्म (सया शिळा)पंचायत मेम्नान immerशिला ঘিাে} বিয়া সিন্ধ্যা विरिण म पार पपिदिशा पिट लापन पूर्व मा পল্লি প্লিা पाता पांड गतिमा मरपा यायध्यागजीता पंत मेलन पाग HIRमा मामांगागिनो विराम Fifa Raut पर या.
31 * * Prnsad Manjari फराके इशान अग्नि आदि सृप्टिमार्ग से अष्टशिलाका स्थापन करके मध्यमें फर्म शिलाका स्थापन करना चाहिये। इस समय मंगल गीत एवं वाद्य यजाने चाहिये। धान्य धृतं आदिका नैवेद्य एवं बलिदान-कूमन्यास शिला स्थापन समय में देवता- ओंको पास्तुपूजन करके देना चाहिये-२०-२३. आरंभके शुभ नक्षत्रः-प्रासाद अथवा गृहके निर्माण हेतु, जमीन पर सूत्र छोडनेके लिये-तीन उत्तरा, हस्त, चित्रा, स्वाति, रोहिणी, पुष्य, मृगशीर्ष, अनुराधा, रेवती, धनिष्ठा एवं शतभिषा ये नक्षत्र शुभ जानना-(२२) शिलान्यासके शुभ नक्षत्र -रोहिणी, श्रवण, हस्तपुष्य, मृगशीप, रेवती और तीनों उत्तरा, 'उत्तरा-पाढा उसरा- भाद्रपद उत्तराफाल्गुनी ये नक्षत्र शुभ जानना (२३) प्रासाद योग्य स्थान और पुण्या-नदीके तीर पर; सिद्धपुरुषोंफे आमममें, तीर्थ स्थान में शहर या प्राममें; अथवा पाहर, पर्वतकी गुफाके आगे, पागमें. बावडी या तालाब के किनारे-इन स्थानों पर प्रासाद स्थापन करने चाहिये । देव स्थापन पूजन और दर्शनादि से पुण्यलाभ होता है और पाप क्षय होता है. धर्मकी वृद्धि होती है, द्रव्यसे कामनाएं पूर्ण होती है, और मोक्षप्राप्ति होती है ! (२४-२५) वास्तु द्रव्यानुसार पुण्य प्राप्तिः-~ण-पासका देवालय स्थापन करने से शिलाका नाम पृथक् पृथफ प्रथम भिन्न भिन्न कदा है। मष्ट शिला धर्म शिलासे ३ विस्तार विस्तारसे पृथुमोटी रखनी ! मास शिरा सम्बो रस करनी अर्थात् मध्यका कर्मशिला सामान्य रीवसे गर्म गृहको मारने स्थापन करनेफा फहा है। परंतु "दीपार्णध प्रयो ग पादे दिमागे था शिला चैव प्रतिष्ठयेत् ॥ का प्रमाण स्पष्ट दिया है। यदि गर्भ रहके अर्धमाग (शिवलिङ्ग विषयमें) अथवा तीसरे या चौधे भाग शिला स्थापन करनेका विधान है। इसका तात्पर्य यह है कि देव स्थापन निम्न स्वानारशिला स्थापन करना। तदनुसार देवके नीचे नाल और नामि मलंगशाआये। सौराष्ट्रकी कितनी ही प्रतियों में और अग्निपुराण और निम्न प्रकार शिला स्थापनके विधानमें कहा है। स्वस्या पाइनायजे तार पा मुस्त दोष विधानान्तो सुनो। जिस देशका मंदिर हो-रसी देश पान पर महिला मंति करना चाहिये। शिलाके नीचे भातुरा (सेना वादीमा तान) मनधि, सप्तधान्य, शेषाल, कोदो, चोटी, गंगाजल पान आदि मानिन तथा कच्छपके साथ पधराना चाहिये। इस शारशे किलो दराप्रपा है। कितने ही प्रथामें शिला में स्वस्तिकदिवस्ति रशियान । ।
. प्रासादमञ्जरी 32 कोटिगुना पुण्य मिलता है । मिट्टिका बांधने से उससे दशगुना, इंटका निर्माण करनेसे सौकरोडगुना और पापाण का देवालय बांधने से तो अनंत गुना फल प्राप्त होता है। २६ वास्तु पूजन के सात मुहूर्त:-१ कर्मशिला स्थापन काल, २ द्वार स्थापन काल, ३ पद्मशिला स्थापन काल, ४ सुवर्ण पुरुष पधराने के समय, ५ आमल सारा स्थापन काल, ६ वजारोहण काल, ७ देव प्रतिष्ठा समय । ये सान पुण्य कार्य करते समय वास्तु पूजन अवश्य करना चाहिये-२७ वास्तु शान्तिरे चौदह मुहूनः-१ भूमिका आरंभे, सनन समय • कूर्मशिला स्थापन काल ३ (भूमि तल होने बाद) सूत्र छोडते समय ४ खुरा चिपकाते, ५ द्वार ग्थापने ६ म्तंभारोपण काले ७ पाट भारोट स्थापन काले ८ गुम्पनकी पद्मशिला स्थापने ९शिसरके शुकनारा स्थापन समये, १० सुवर्णका प्रामाद पुरुष पधराते ११ आमलसारा स्थापने १२ कळश स्थापने १३ ध्वजा रोहण काले १४ देव स्थापन भ्रमयुक्त सांधार महापामादका तलदर्शन आधारमा परम Pan रामय दि (सीक Tu Hिसार- निरंधार प्रासादा तलदर्शन
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यक्ष दर्शन.
३२ कोटिगुन रिंगा (भ्रमयुक्त) मांधार प्रासाद तलदर्शन या मंडोवर स्तंभोदय फरनेसे प्राप्त हो श्रीतरी RTHIR (IAgay ३ पद्मशि काल, ६ धास्तु H स्थापन य ग्धापने स्थापने Kund- ११ आम 6. ma-.. Hin-ti-finiARAT మణి "...........मे. डोवरेश्वल.. ..........--. freement aasamsun P-INEransi- KERARTH HTRA .
* गर्भगृ M रस्ता लउपा गर्भगृह मायुस) 33 Prasad Maujari ३३ (प्रतिष्ठा) समय इन चौदह मुहूतों में वास्तु शान्ति अवश्य करनी चाहिये। २८-२९ प्रासादका प्रमाण कहाँसे लेना ? एक हाथ हस्त (चोविश आंगुल) पचास हाथ (गज) तक का प्रासाद का प्रमाण दीवार के बाहर रेखासे कुंभाकी बीच के अंतर के अनुसार लेनेको कहा है। दश हाथसे ऊपरके प्रासादके लिये भ्रम (परिक्रमा) करना चाहिये । जो ३६ हाथ-गज तकके प्रासादके लिये (एक दो तीन अथवा चार भ्रम होते हैं) भ्रम कर- नेका विधान है। ऐसे भ्रम पाले प्रामाद "सांधार" प्रासाद कहाते हैं, और भ्रम रहित प्रासादको निरंधार प्रासाद कहते हैं। ३०-३१ पांच हाथसे पचास, हाथ (गज) तक का मेरु प्रासाद होता है। प्रासाद के कुंभादि थरोंके निर्गम-निकाले समसूत्र में अवलंब-ओलम्बाके अनुसार रसने चाहिये। किंतु उनकी पीढ से छज्जा थोडा याहर निकलता रसना चाहिये। प्रासादके अङ्ग विभागसे तीन, पांच सांत या नव फालना (भद्ररथ प्रतिस्थादि) रसना चाहिये, अंगोकी संख्या उनके मध्य स्थित पानीतार से भिन्न होती है फालना रेखा-कर्णसे दुगुना भद्र विस्तार (सामान्यतया) होता है । ३२. ३३. ३४. समदल हस्तांगुल फालना विधि :-रथ नदी प्रतिरथादि फालनो का निर्गम-निकाला की विधि साधारण तथा दो प्रकार की कही गई है। जितने अङ्ग फालना रथ नंदी प्रति- रथादिके विभाग हो, उतना उनको निकाला रखना चाहिये यह "समदल" कहा जाता है ! और जितने हायका प्रासाद हो उसने अंगुल प्रमाण अंग फालना (रथ प्रतिस्थादि) केनिर्गम निकाला रसना। यह हरतांगुल" विधि जाननी ३५ 3 प्रासादके अंग प्रत्यगके निकाल चार प्रासादना गर्भगृह-(१) अ तर उपांग-प्रतिभद्र, सुभद्र, भद्र, चतुरस्त्र २ बाह्य-समदल, भागम, हस्तांगुल, मार्च) गर्भगृह शुभन्युझा गर्भट (प्रमिला ॥ ५ * प्रामादमरी प्रासादके अंगों चारसे लेकर ११२ तक के भाग कहते हैं। एक तलको प्रासाद (अट्ठाई दशाई बाराई चौदाई) के ऊपर शिरसर. अनेक प्रकारके चडते हैं छिन्तु उनके ऊपर के शिखर अंत की संख्या एवं आकारसे प्रासादकी जाति एवं नाम ज्ञात होता है। ३६-६७. अथ जगती चोरस, लम्बबोरस, अप्ठांश गोल और लम्बगोल। यह पांच प्रकारकी और जैसा प्रासादका आकार हो वैसा जगती के तलके स्वरुप जानना 1 ३७ प्रासादसे तिगुनी चारगुनी या पांचगुनी इस प्रकार तीन विधि जगतीके विस्तार मानसे (ज्येष्ठ मध्यम एवं कनिष्ठ मानके झमसे) एक दो या तीन भ्रमयुक्त । जगतीकी योजना होती है, प्रासादसे छगुनी सातगुनी और तीन भ्रमयुक्त जगसी जितेंद्र प्रासाद एवं द्वारका के विष्णु, शिष तथा ब्रह्मा के प्रासादकी जगती रखनी लंबाई में सवायी डयोढी. या दुगुनी। इस प्रकार. मंडपके क्रमसे जगती करनी चाहिये । ३७-३९ जगतीकी उंचाई एक हायसे वारह हाय तकके प्रासादके लिये गजमे आधे गजकी रसनी । तेरहसे वाइस हाथ (गज-हस्त) तक प्रासादके लिये गजसें एक तिहाई अर्थात आठ आठ आंगुलकी वृद्धि करते जाना । तेइस से बत्तीश हाथ (गज) के प्रासाद के प्रत्येक गज-छ छ आंगुलकी वृद्धि करते जाना । तैंतीससे पचास हाथ गज के प्रासाद के लिये प्रत्येक गज गजका पांचयाँ भाग अर्थात् ४il आंगुलकी धृद्धि जगतीकी उंचाईमें करते जाना । जगती में कोणों पर दिग्पासों के स्वरुप सृष्टिमार्ग से बनाना चाहिये । प्रासादके प्राकार (किल्ला)के आगे द्वार मंडप बनाना प्रकारसे रखने की प्रथा शिल्पिों पर पराप्त है। १ समदल २ हस्तांगुल ३ भागवा ४ आर्भ ये चार प्रकार से फालनाके निर्गम रखे जाते हैं भागमा अर्थात प्रासादको विभक्ति के जितने विभाग कहे गये है। उनमें से एक भाग का निकाला-निर्गम रचना वह भागवा कहलाता है। उपड़ों में "मा" प्रनारक (निगम) निकाला अंगुल दो अंगुल जितने अल्पही होते हैं परंतु इस प्रकारके निकाला संघरपा (मरण) युमा प्रासादक ही होते हैं। भागवा पर्व हस्ताङ्गल विधिके उपालीका निकाला छोटे होते हैं। जिमसे उनके ऊपर शिखर बनानेके कार्य में शिल्पिोंकि बुद्धि चातुर्य की कसौटी ३७ होता है । जब कि समदल" निकाले को विधि में बहुत छुटछार रहती है। ४ जगती के उदयसे पीठ परा कुंमा कलशा अन्तराल और उनके मबके, अपर पुषट (गीलता) के घाट करनेका विधान है। "
काठालात
मासपीठ
ता
पुपक84
कपात
BE
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जाम
S/
जाती उपय भाग२८
ManaKAG
A
---
जगती JAGATI
सिमरायाच्या
प्रकार आचारसपुर.
स्थापति, Manangy
अगती प्रवश चतुष्किका-महापीठ त्था शासन
36 * प्रासादमञ्जरी * जिसे "मुस मंडप"भी कहते हैं। जगत पर चढनेकी सीढियोंकी पंक्तियाँ बनाना जिसके आगे तोरण सहित स्तम्भ बनाना, जगतीकी चारों ओर पानीकी निकासी के लिये मकरमुग्न प्ररनाली बनाना। ४०-४१. मंडपके आगे प्रोल्या और उनके आगे सीढियां रखनी इनके आगे तोरण बनाना, जिसके स्तम्भका अंतर प्रासादकी दीवारके गर्भसे अथवा स्थान के मानसे अथवा गर्भगृहके पद के अनुसार-विस्तारमें रखना। और वे पदके अनुसार उँचाईमें पाट अनुसरण करके रसना । ४२-४३ देव वाहन स्थानकी:-चतुष्किका या मंडप प्रासादके आगे एक दो तीन चार पांच छ या सात पद दूर (पदरे गुणान्तर) रखना । ४४-४५ जिन प्रासादाम रचना: :-जिन प्रासादके आगे समवसरण बनाना उसके आगे (मुस के आगे) गुढ मंडप बनाना । जिन मंदिरके चारों दिशामें चोवीस जिनागतन या धावन जिनायतन अथवा बहुतर जिनायतन मूल जिनमंदिर सहित संख्या में बनाना । मंडपके गर्मसूत्रके अनुसार दाई व बाई ओरकी दिशामें अष्टापद मंडप त्रिशाला और उसके आगे वलाणक का निर्माण करना चाहिये । ५५-५६-५७ नाभिवेधः-एक ही जो मूल प्रासादके बाई ओर अथवा दाई ओर. या आगे पीछे दूसरा प्रासाद बनाना हो तो उसका नाभिवेध नहीं होने देना चाहिये यहाँ नाभिवेधका तात्पर्य आडे खडे प्रासादके गर्ममें दूसरा प्रासाद बनाने में गर्भ समालना । शिवलिङ्ग अथवा शिव प्रतिमा के मंदिरके आगे दूसरे मी देवका मंदिर सामने गर्भ में नहीं बनाना चाहिये । ब्रह्मा विष्णु शिव जिन और सूर्यके मंदिरों के सामने अपनी अपनी मूर्तियोंके प्रासादों की रचना आमने सामने करना । किन्तु शिय के आगे अन्य देवताओंकी स्थापना नहीं करना। क्योंकि इससे द्रष्टि भेद होने से महान भय उत्पन्न होता है। परंतु उन दो के वीचमें किल्ला राजमार्ग अथवा दुगुना अन्तर होवे तो कोई दोष नहीं। ५८-५९ ५ जगतीके आगे प्रताल्या करनेको कहा है जिसके पांच प्रकार हैं । १ उतना २ मालाधर ३ विविध ४ चित्ररुप एवं ५ मकर. ध्वज। उसका स्वरूप दो स्तमयाले प्रतात्याको १ उतनः जोडरुप दो स्तंभ वाले प्रतोल्या को २ मालाधर; चार समा.की चौकी एवं तारण युफ्त को ३ पिचित्र विचित्र प्रताल्याके यदि दोनों ओर कक्षासन हाये तो ४ चिधरुप; और चोकोके जुडया स्तमो हो तो उसे मकरध्यान नामक मतोल्या करते हैं। उसका स्पष्ट स्वरूप आकृती दीपाणघ प्रथके तीसरे अध्यायमें दीया गया है। एफ ही प्रामाद के विस्तार में दूसरा प्रामाद धनाते समय जो गर्भ मिलान के लिये स्थलका अमाय हो तो मंडपके गर्भ को प्रासादके गर्भ से मिलान करके दमरे प्रासारका निर्माण करना। परंतु ऐसा करते समय परस्पर मंदिरों
37
* Prasad Manjari
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चोधीश जिनायतन (तीन प्रकार) )
38
* प्राप्तादमञ्जरी
प्रनाल विचार:-~-पूर्व एवं पश्चिम मुखी प्रासादके गर्भगृह के पानी की निकासी
के लिये प्रनाल उत्तर दिशा में रखनी । उत्तर एवं दक्षिण मुखी प्रासाद के लिये
४३.
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सली चौक
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के स्तभी एवं कोणोंका रुप फिसी हार मा पदमें नहीं पहना चाहिये इन
दापदि का विचार करके कार्यारम करना चाहिये ।।
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* Prasad Manjari
३९
३१/३२ ३३|३२|३५
३०/३८३१
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३३
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बदेतिर
जिनाउन
. 40 प्रासादमजरी पूर्व में प्रनाल रसनी । अर्थात् देवमंदिर गर्भगृहकी प्रनाल पूर्व या उत्तर इन दो दिशाओं में ही रसनी चाहिये मंडपके वाई-दाई ओर मनाल रसनी। जगती के चारों ओर प्रनाल रसनी । मयपि कहेते हैं कि पूर्वाभिमुख लिङ्गकी नाल वाम मागमें रखनी । ५०-५१ अथायवनःये प्रासाद मंजरी ग्रंथ, दीया हुआ पाठ अपूर्ण एवं अशुद्ध होने से अन्य ग्रंथका प्रमाण लिया हुआ है। देवों का जो क्रम लिया है वो अग्नि, नरुत्य, वायव्य एवं इशान कोणकी स्थापना का क्रम समजता ५२, ५३, ५४. १ सूर्यायतनमे:--अग्नि कोणके क्रमसे गणेश विष्णु चंदी एवं शंगुकी स्थापना करनी और सूर्य मंदिर, आदित्य नव ग्रहो गणादिकी मूर्तियां धनवानी । २ गणेशायतनमें:--कोणके क्रमसे चंडी, शिव, विष्णु एवं सूर्यकी स्थापना करनी । गणेश मंदिर में अपने हितबाच्छुको वत्रीश प्रकारके गणेश स्वरुप और बारह गणकी मूर्तियाँ धनवाना। ३ विष्णु आयतनमें कोणके क्रमसे गणेश, सूर्य, अंबिका एवं शिवकी स्थापना करना। विष्णु मंदिरमे गोपी दशावतार, विष्णव स्वरुप द्वारका जैसी मूर्तियाँ बनवाना । ४ पंडयायतन में कोणके कमसेः शिव, गणेश, सूर्य एवं विष्णुको स्थापना करना। देवी मंदिर में पोडश मातृकादि देवी स्वरुप, योगिनीका स्वरुप भैरवादय मूर्तियाँ बनवाना। ५ शिवायवन मे कोणके कमसे सूर्य, गणेश, चंडी, एवं विष्णुको स्थापता करना। शिवालय में शिवजीकी द्वादश मूर्तियाँ आदि बनवाना ।" इन पंचाययन स्थापनामै शिर स्थापन पर दृष्टि वेध आगे कहा ऐसा वेध नहीं होने देना। त्रिमूर्ति स्थापना-एक पंक्ति में ब्रह्मा विष्णु एवं शिवकी मूर्तिके त्रिपुरुप प्रासाद मै स्थापना करनी हो तो मध्यमे रुद्रकी मूर्तिकी स्थापना करना । उनकी दाई ओर ध्रझा । ओर बाई ओर विष्णुको स्थापना करना । (इससे विपरीत आगे पीछे उलटा सुलदा स्थापित करने से महाभयं उत्पन्न होता है) रुद्रकी मूर्तिके मुसके तीन भाग करके एक भाग नीचा विष्णु और उससे आधे भागका ब्रह्मा जी और पार्वतीजीकी मूर्तिकी स्थापना करनी। १पंचायतन में प्राधान्य देयके प्रासादक चारों कोनों में चार देव देवीका मंदिर या देरियां धनाने की विधि है उनमे मदिरोंकी फिरती जंघादि में मूर्नियां पनावानी पूना विधि में । पचायतनं देव स्थापना करते हैं। गर्भ गृहमें भी इसी प्रार स्थापना करते है इसी प्रकार कोण । प्रमाणसे आयतन का प्रयेग प्रासाद रचनामें जानना चाहिये अन्य प्रथम आयतन विषयमै उलट सुलट मत भी है।
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管 * Prasad Manjari अथमिट्ट-जगती के ऊपरी भागमे खरसिलाके उपर मिट्ट बनाना। उसका प्रमाण यह है। कि एक हाथ (गज) के प्रासाद के लिये चार आङ्गरका मिट्ट उदय बनाना उसके उपरान्त दो से ५० गन तक के प्रासादके लिये प्रत्येक गजमे आध आधे अगुलकी वृद्धि करनी। उन मिट्टो मे से एक दो-और तीन इस प्रकार उत्तरोतर वेड से छोटा बनाते जाना चाहिये-ज -उसका निकाला अपनी अपनी उचाइ के चौथे भागका रखना। ५६-५७ अथपीठ-प्रासादकी उपाई (पीठ उपरसे छज्जा मथाला तक) के .१ भाग करके उसके पांच से नव भाग तक पीठका उदय रसना । इस प्रकार पीठ के पार भेद उदय प्रमाणो कहे है (दूसरे भी प्रमाण अन्य प्रयोम कहे हैं)। Marg Fry af an || OmELILIBERARRANI RIMERI JIghte HORREAST Curna ८ क्षोराणध दीपाण व प्रथम पीठर १ + पृथर पृथर चार मान
* प्रासादमारी *
42
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3#पीमारी मराठ।
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महापट प्रकार तीमरा
कद । उगने ६० और १२ दिमाग पीटमें अश्वथरका विधान नहीं है।
गाडम्या; वी मामपट्टी गजथर और नरपरका ही विधान है। कितने पुराने
मरिगम कमी मश्चयर विमीम दंगने में नहीं आता. पकि ६१ भाग
महापोटमे गा अश्वयर, पयात मातृपीठ और नरपरका विधान है। देवीक
मंमि मापीठ में रयकी मात करते हैं। महाशियालयमें पृपम पर भी
पीटमें पारा पक्षाण य स० १६७ में शिघ प्रासाद के लिये गथर यश्वपर
मी पहा है। किन्तु वृरपीठ एवं मरयर का विधान किया है। अल्पव्यय में
मर पुण्योगान करनेवी या गगने पाये. लिये जादम्य कर्ण बाजी
पयं प्रामाही पीटको 'कामद पोठ' पहा है। उमसे भी अल्प व्यायप
का पोटोता है। जिसमें माइम्पा मोर कर्ण. दीदी परेका विधान
वापर पीट मोर "कगं पीर" मदा पीट के मानमे उपयम मार होता
ही पद म्यामाविक है। हम दिये शिरमाने है।
भ भागे त्रि भागे था पोर्ट भय नियोजयेत् ।
म्यानमानापमा सरोगे न विद्यते । दीपा अ.१-२१
हम पीरमान गेम मण्या तीमो मागये. पीरशा नियोजन म्यान मान
काम जार करने में कोई भए नहीं। कामपोट या कर्ण पीठ
-
43
५३
* Prasad Manjari *
पोठ प्रकार-पहेले
पीठ प्रकार-दुसरे
आधी-की-
-८.1-31
की+-यासपट्टी+मपी +मनपीजीबो- ----पी---नरी
-८-..---१२----
10-+9-30-6.-१०-.-..."
- भाग वृक्षाय अ०१७
भीमायो-aci sx-URNA
कामद-पीठ....
करो.Nिavak
आपको
कमग्री
महापीठ-वृक्षार्णय
कर्ण पीठ
सामान्य प्रासादों में होता है सांधार प्रासादों के महापोठ होता है। भौर
निरंधार प्रासादके लिये प्राय कामद पोट पर्व सामान्य प्रासाद अथया एक
पंक्ति धाले विशेष मंदिर यथा पावन जिनालय सहस्र लिङ्गकी देरियाँ और
चौसठ योगिनी को पंक्तिबद्ध देरियाँ के लिये पर्ण पीठ अल्पमानका करने में
कोई नही है। उपरोक्त प्रमाणका द्वारिकाधीश जगत्म दिरमे मिला है।
५० थर २ नीर्गम २२ प्रासादमखरी * आये हुए पीठमानके उदयके ५३ भाग करने और निकाला २२ भागका रसना । थरो में नव भागका जाम्या, सात भागकी कणी अंतरालः सात भागका निकाल छनी प्रासपट्टी, बार भागका गजधर (गजपीठ); दश ९ जाडम्या भागका अश्वधर और आठ भागका नरथर। इस अनुक्रम ७ कणी अंतराल ३६ से थरोंका निर्माण करनाः निर्गम निकाला कर्णिका अग्र ७ उज्जी ग्रासपट्टी ॥ भाग से जार्डवा ५ भागः पास पट्टोसे कर्णिका साडातीन: १२. गजथर गजथरसे प्रासपट्टी साडाचार भागः अश्वथरसे गथरका ३ ८नरथर निर्गम चार भाग; नरथर से अश्वथर तीन भागः खुरा से नरथरका निर्गम दो भाग। कुल निकाला (उठाय) का फुल २१ भागका सर से जाइय पट्टी तकका जानना। प्रासाद एवं राजभवन को पीठका ही आधार होता है। विना पीठका प्रासाद आयहीन जानना । पीठ बिना के पामाद से विनाश होता है। ५४.५८-५९-६० अथ प्रासादोदयमानः--एक हाथसे पांच हाथ ( राज) तक के प्रासाद करें जितनी चोडाई हो उतना उसका उदय-उंचाई मानना 1 छ: से तीस हाथ (गज) तक के प्रासादके लिये प्रत्येक गज पर बारह बारह आंगुलकी नागरम सीधर वृद्धि करते जाना; इकत्तिस से पचास हाथ तक के प्रासाद के ५गरस लिये प्रत्येक हाथ पर नौ नौ आंगुलकी वृद्धि करते जाना; इस २० कुंभा प्रकार उदयमान पीठ के मथाले से छज्जा मयाले तककी २. अंतराय उचाई जानना ६१ ८ चाल ९ मांचिका अधम डोवर:-~-(१४४ भाग) पीठके उपरसे छज्जो तक प्रासादकै उदयो १४४ भागकरने, उनमें से पांच भागका मराकाथर: कुंभा वीश भाग; कलशा आठ भाग; अन्तराल: ८ भरणो अंधारी दाई भागः केवाल आठ भाग, मंचिका नो भाग, जंघा १० शिरायटी पंतीस भागः हिमयोढिया पंदरा भागः भरणी आठ भाग: ८ मदाबाट शिरावटी दा भागः महास्वाल आठ भागः अंतराल ढाई भाग २॥ अंतराल उपका उना तेरा माग उंचा: और दश भाग निर्गम-निकाला १३ जाप रगना; प्रासाइके अन उपाद्न (फालना) स्पष्ट दिखाने के लिये ८कलशा ३५ जपा - सीराणघ मंग एप गज से प्रासार लिय ३३ मांगुल: दो गजरे ५५ aiगुला तीन गवर. ७७ आंगुल' चार गज ६ गन्न ! आंगुष्टः पांच गजर्फ पांच गज १ गुल छ गायः ५ गज २१ मांगुल सान ग ६ गज १७ मांगुल माट गाणे. प्रासादिये ७ गज ९ आंगुलका उदय उँचाई रमनी।
45 * Prasad Manjari 24 THE nitisong किन MASTERE JURI FAR एमा FAama GA tenkamu- नाम- मेर- ARE पानीतार पाडना' । (६२ से६५) १० एकता पव्वालीस भागका मडावर नागर मंडोवर कहलाते है। उसी प्रकार अन्य १०८ भाग, अथवा १६९ भाग शथया २७ भाग तथा ७॥ भाग आदि भी मंढोधरकदे गये है: माधारण मंडोवरके विषयमें कहा गया है कि जिस प्रकार कामद या फर्ण पीठका निर्माण किया गया है, उसी प्रकार महीपर पनाने में १ गरा २ मुभा ३ कलश ४ अंतराल : कंगल; ६ उमपर सादी जंधा (दिना साधार महामासादया दो घायुफ मेर मरोवर 47 * * ४१ Prasad Manjari दिशाके दिक्पालो raz400 मेरु मढोपर ५ सरा २० कुंभा ८कलश २।। अंतराल ८ फेयान ९ मचिका ३५ जंघा N-- Lama उत्तर-कुबेर १५ उद्गम ८ भरणी ११०॥ ८ मचिका २५ जंघा २३ उद्गम ८ भरणी २१ शिराषटी ८ महाकेवाल २॥ अंतराल पूर्व-इंद्र दक्षिण-यम १२छज्जा ८७॥ रुपका) ७ भरणीः ८ महाकेवाल ७ मंचिका ९ अंतराल १० छन्ना इस प्रकार २६ जा दश थर बनानेका विधान है। ७ भरणी मंचिका उद्रमन्दादियाः एच ४ शिरापटी शिराघटी ये तीन धर सामान्य मंडोवर में नदी पनाने में दोप १२छाद्य नहीं है। कितने महोयर में शिराघटीका थर कदा नहीं है। २४९ भाग मदा प्रासादः-सांधार मदा म डेपर प्रासादके लिये दो तीन भूमिका मेह मंडोपर कहा हैः यदों पर १४४ भागका नागरादि मंडोवर कहा है। जिसमें भरणी तक के नव धरों के ११०॥ भाग जिनके उपर मचिका आठ माग; जघा पशील भागः उद्गम दोदिया तेरा भागः भरणी आठ शिरापी आयारा भाग; महा केवाल माठ भाग; अंतराल दाई भाग; और छज्जा याद्य धारा भाग मिलकर ऊपरकी मंजिल को उक्त ५पाट पश्चिम घरण
*
48
१८
प्रासादातरी
विदिशा दिग्पाला
Rud
made
.
-
इशानदेय अग्निदेय नेपदेष पाययदेय
८॥ भाग हुयेः नीचे ११०|| भाग से मिलाकर १९८ भाग हुए। इनके ऊपर
५१ भाग के तीमरे मंजिलका मंडोवर र थर पा, मंचिका सात भाग, जंघा सोल
भाग भरणी मात भाग, शिगपटी चार भागः पट्ट पांच भागः उपरका छजा यार
भाग मिटरे ९१ भाग मिलर. १४९ भागका यह 'महा मंडोवर" तीन जंघा तीन
मजिला और दो मजा वारा अपराजित पंधर्म यणित है।
यो जंपा और उन्ना याली दुमंजिला १९८भागका मेग मंडोवर कहा गया है। ऐसे
मेक महार, मारिका, आयूरा चौमुग्र एवं सोमनाथ में है। ऐसे मडोपरके
आलेय एवं चित्र देने से मीतरी नमो आदि भूमिके उदयमान प्रमाण एवं
तरीके समसूत्रका स्याट ही सरना है. यादरी मंडार के स्तर पर भीतरी स्तभनि
भूमि उपस-यरोश ममन्य समयादि मांधार प्रामादों के लिये शिल्पग्रयों में
पहें गई. निग्धार प्रामाद में पृथक रीनगे कहे गये हैं (शोक ६६-६७).
दो उधा महोश मम दोीया ये घर पहली मंजिल के पाट सममूर
में रगनेका पहा । उग पाट पं. पर भूनिकी इन मरीफ थम्म आ जानी चाहिये.
पास जा एवं दूम भूमि पाट मममम में ग्यना । नेरु, मंटोपर एवं गद्दा-
मंटोपर गांधार दामाद के लिये मनाने का यही विधान है। दूसरे निरंगर प्रामाद
६. लिये (भोट ६६-६७ में) मामान्य प्रमाण पहा है।
।
मध्यप्रदेश - सजुराहाका कंद्वर्य महादेवका साधार प्रासादका
जंधायुक्त मडोवर ओर भद्र गवाक्ष
नय
PATANGA
Vic
*
आरिम्सा (उडीया) प्रदेशमा प्रामाका महोनर - पीठ
* Prasad Manjari ४९ अथमित्तिमान- प्रासाद की दीवारके ओसार (मोटाई) पृथक् पृथक् वास्तु द्रव्य के अनुसार प्रमाण कहे है। प्रासाद के बाहर रेसा कर्ण हो उनके चांश भागकी मोटाई दीवार ईद के प्रासादके लिये रसनी, पापरण के प्रासाद के लिये पांचवें या साढे पांच या छटे भाग की दीवाल मोटी रसनीः काष्ठ के प्रसाद सातवें भाग और सांधार प्रसाद के लिये आठवें मुनि-तापस युग्मरुप भागः धातु एवं रत्नके प्रासाद के लिये १० दशवें भाग दीवारकी चौडाई रखनी; यह मूलनासिक के कुंभा से दीवारकी चौडाई का प्रमाण जानना. ६६-६७. ११ घृक्षार्णव-महान थमे भ्रमवाला सांधार अयं निरंधार प्रासादको मित्तिमान ११ कहा है। दशमांशे यदा भित्ति-दिशांते हि मध्यतः । विविध मित्तिमानं च ज्येष्ठमध्यमकन्यसम् ।। १५१॥ मध्यस्तूपे प्रदातव्या भित्तिः स्यात् पोडशाधिका। पंचमांश निरंधारे मितिः प्रासादशैलजे ॥१५२।। वृक्षार्ण य. अ० १६७।। भ्रमवाला सांधार प्रासादका भित्तिमाग १ दशवा २ अग्यारहवाँ ३ वारहयों भाग का रसना ये ज्येष्ठ मध्यम एवं कनिष्ठ एसे त्रिविध मान भित्तिका जानना. भ्रम छोडके मध्यके स्तूपकी भित्ति सोलहयाँ भाग पृद्धि करके बनानीः विना भ्रमके निरंधार प्रासादकी प्रापाणक मित्तिका मान पांचवे या छठे भाग से रखना, ७
50
प्रासादमारी
नाटयेश शिव
निपुरावा जि
त्रिपुरान्तक शिव
अथ गर्भगृह-गर्भगृह भीतर से समचौरम
अथवा भद्वारा अथवा लवचारस आऊतीका
श्रेष्ठ समजना
(चौडाईसे उडाई जास्ती हो
ऐसा ल बसोरस गर्भगृह नलाङ्ग कहा जाता है
ये देोपकारक है।)२
१२ लप चौरस गर्भगृह श्रेष्ठ माना गया
है। परतु शिल्पकी क्रियाविधिसे अज्ञात अपनेको
शिल्पका ज्ञाता मानने वाले उनका अर्थ विना
समजे श्रेप यु नेष्ठ रहते हैं। चोडाईसे
उडाई जास्ती होवे एसा र चोरस गर्भगृह
अधकेश्वर
51 * Prasad Manjari ૧૩ 15 बाहर मडावर और स्तंभके छोडके थरका समन्वय निरधार प्रासादमें कुभे के चराबर कुम्मी-स्तंभ एवं उद्गम दोढीमा भरणी एवं भरणा; महाकेवाल एवं शिरा और पाट एवं' छज्जा का थर एक सूत्रमें रसना; पाटके छज्जाका तल उनके निम्न के तलके बराबर रसना. ६८-६९. देवालयके गर्भगृहकी चोडाईसे (सामान्य रीतसे) सवा- या अथवा डयोढी उंचाई रखनी । गर्मगृहकी उंचाई पाटके तल तक आठ भाग करनी, जिनमें से एक भाग कुंभी; साढे पांच भागका स्तंभः आधे भागका भरणा. एवं एक भागका शरा-इन आठ भाग पर देढ भागका पाट और- पाटके ऊपर अष्टांश, पोडशांश और गोल थरका निर्माण कर करोटक (कलाडिया गुम्बज) बनाना, ७०-७१ अथ १ মাখা १ द्वारमान-एक कुंभी हाथके प्रासादके लिये सोलह स्तंभ अंगुलका द्वार उंचाईमें रखना. इसी प्रकार चार सरा २॥ पाट हाथ तक सोलह सोलह अंगुलकी वृद्धि करनी, पांच हायसे आठ हाथ तकके प्रासादके लिये तीन तीन अंगुलकी वृद्धि करनी, नौसे पचास हाथ तकके प्रासादके लिये प्रत्येक हाथ (गज) पर दो दो अंगुलकी वृद्धि करनी. द्वारकी ऊंचाईके आये हुए मानसे आधी चौडाई द्वारकी रसनीः इसमें सोलहवां भाग चौडाईमें बढ़ानेसे गर्भगृह स्थंभ प्रमाण वह शोभा जनक होता है. (यह नागरादि द्वारमान कहा; अन्य जातिके प्रासादों का द्वारमान अल्प होता है।) ७२-७३ । मलाङ्ग कहा जाता है : ऐसे नलाग गर्भगृहसे यम चुली नामका वेध उत्पन्न होता है। १३ यहां निरंधार प्रासादके लिये । स्तंभका छोड और मंडावरका थरका समसूत्र कहा है सांधार प्रसाद में कु भीकुमी उद्गम दोढीया एवं पाट समसूत्र रसनेको कहा है। ..
.
प्रासादमारी
52
DETAIL I DOAR tox GALERACTORA
SOMWTHMARDER.
सतशासा द्वार-सद अर्धचन्द्र और द्वारदर्शन
DATA tirtic HTTER.ADIPAT CAMERA maitra 40. nant . ap - 28 Ansteatime काप NE TALA Iments Immiyak4- EvarouTENY. MITHINKS PAama PHomeman mamtaandrrertime ran LATKAmavenar AAAAwww.news Aswamarta Britik WANT FurA bmitality sww thi Birthdlalalahu" Fagan h M reval Powe TRIINILIYA --- Kान समदल रुपस्तंभयुक्त पंचशासा द्वार- आव देलवाडा.
શ્રી કુંભારીયાના નાને
અનાયની વચલી કેરીન
વારો જાણી - સારા-સુમરિવા.
53 * Prasad Manjari * निभाया NEmसा विस्तारभाग११ नवशारवा. पभिनी. दिसामान धंसावा नानी- विस्तारभाग सप्तशारवा. हस्तिना Ran द्वार शासाकी स्पस उपशासाओं के एक पशास्य तीन, पांच, सात, गंधारमा एवं नव अंग साचे रुपसभा होते हैं। शासाकी मध्यक्षमा पृथुता(मोटाई) अल्प खत्यशाया. BAR फरना नेष्ट और रयामा अधिक करना श्रेष्ठ सपसम Meena फलदाता है। देवा- स्या . लयके अंग (स्थ रसल्या. पर सिंसारया. निशा प्रतिरथ नंदी भद्रादि) मि. के अनुसार उसकी [भ. शारसा रसनी । सप्त शाखा सर्व देवोंको रुपया. Rane. और नव शाखा विष्णु या रुद्रके प्रासादके -च-सप्त-नय शापा तळ विभाग-नाम तथा प्रतिशाषी लिये इनानी; पंच- शासा सार्वभौम राजा के द्वार में और त्रिशाया मंह. लेश्वर राजा के द्वारमें बनानी। द्वारकी शासाओं में जिस देवका प्रामाद हो उसके प्रतिहार (द्वार- पाल) के स्वरूप बनाने, बल्कि मध्यकी शाखा रूपयाली देव के परिकर स्वरूप पनानी, द्वार शासाकी ऊंचाई के चौथे भागका द्वारपाल बनाना अथोदुम्बर- अर्धचंद्र-प्रासादके मूलरेसा-सूत्र के प्रमाण से उदुम्बरका सूत्र रखना और कुम्भीकी उंचाई के घराबर समसूत्र में उदुम्बर (उंबरा) स्पना या कुंभीक अर्ध, धारशापाके ठेका-प्रतिहारी-चामर छपधारी
64
* प्रासादमवरी*
या कुमी के तृतीयांदाहीन या कुभी चतुर्थाश भाग उदुम्बर निम्न नीचा विठाना४
द्वारविस्तारके तीसरे भागसे उदुम्बरके मध्य का गोल माणा चौडाई में रसना ।
यथाहा
मारवळ-शंसोद्वार और द्वारदर्शन
१४ मंहोपरः मुम्भ के यरार पुम्मी-इस प्रकार स्तभ छोड और मंढोरर
घरोरा समन्वय पहा गया है। इमी प्रसर उदुम्बरको "अर्थ भाग निभाग या पाद
55 * Prasad Manjari अभाशंकर ओरियामी रसिनी सशस्या "विमा भाग इलिनी समय विस्तार भाग wane URIA २भाग मप्रशासानल स्वरुप (लकडा)-श'योद्वार अने उदुम्बरमा तल अने दर्शन हीनोप्युदुम्बरम्" के प्रमाण से कुंमी के आधे, तीमरे, अथवा चोथाई भाग तक उंबरा नीचा करना जमाना इसी समय तलकडा एवं कुम्भी को कायम रखकर ही केवल उदुम्बर नीचा जमाने का विधान है। शिल्पी भाईओं मे से कितनोंही या मत ऐसा है कि उदुम्बर जमाने (निचा) के साथ साथ ही तलक्डा और कुम्भी को भी नीचे उतारनी चाहियेः इससे स्तम्भकी उंचाई बढ जाती है, क्षीरार्णव मै इसी प्रसंग में "कुम्भीरतम्भौ च पूर्व- चन्" अर्थान् कुभी और स्तम्भको पूर्ववत कहे गये विधानके अनुसार उसी प्रकार से हैं वैसे ही रहने देनाः इस प्रकार कहा गया है यदि तलकडे के साथ कुंमीभी निम्नरखे तो मंडोवरके घुमा को बराबर कुंभी का सममूत्र नहीं रहता है; क्षीरार्णव में कुंभी नीचे उतारने का विधान नहीं है। फिर भी कितने ही प्राचीन मंदिरों में * 56 प्रासादमरी अर्धचंद्र-शंसोद्वार-द्वारकी चौड़ाईके समान लंबा और उससे आधा निकलता हुआ बनाना चुराका थरके मवाले घरावर अर्धचंद्रका मथाला समसूत्रम रखना। रङ्गमंडप ओर चौकीका भूमितल पीठके मथाले के समान रसना (गर्भगृहका भूमितल उदुम्बरके कर्णपीठके समसूत्र रखना । ७८ अथ कौली प्रमाण-१प्रासाद जितना रसाये हो उनके दशमाग करके उसमे से दो-तीन-चार या गर्भगृहके पदके समान अथवा पदसे आधा तृतीय अथवा चौथैभागके बराबर निकलती हुई कौली (शलिलान्तर कवली) का प्रमाण जानना । कौल पर शिसरको शुफनाश रखा जाता है। ४९ अथ शिखर-प्रासादफे छग्जेके ऊपर महार(पाल)का स्तर थर धनाकर उस पर शृङ्ग चढाने चाहिये, शृङ्ग पर शृङ्ग चढाने मे नीचेके शृङ्गके आवे भाग से जन प्रव कुंभे से मुंमी नीची हुई देग्मने मे आती है यह देखते हुए तो इस प्रकार वाद-विवाद में शिल्पीग्धुओं को न पडकर जो अपने भतके अनुसार ये करें, उसमे हमे कोई दोप दिखता नहीं है क्योंकि हमारा आशय किसीको अप्रमाणिक कहेनेका नहीं है। १५ शिखर युक्त प्रासादके लिये कौली परम आवश्यक हेतु शास्त्रकारों ने कहा है. मंडप ओर गर्भगृह के बीचका अंदर कौली-शलिलान्तरके लिये रसा है । इस अंतरको रसनेकी आवश्यकता है इसलिये शाखो मे इसे सलिलान्तर कहा है । शिसरके तीन पांच उपाइ होते हैं. इस लिये अरगे कौली छोडनेका विधान है। प्रासाद पे उपागोका निर्गमके हेतुसे बुद्धिमान पूर्वाधानि कोली घनानेका विधान किया है। कोकिला बनानेका विधान शाखारोने कहा है: कोरिला अर्थान् प्रासाद पुर रंसा का समान कोलीके वामदचिण भागमे करना.
शरिफाधिश- जगन्मदिर महाप्रसाद (Eरिका पुरि म ३ SHA JA हराम FOR मना -- +H -UN | भुमिका -- - सीमाप - ११- Mariye.५४ 1५-२"NEW CHEMENSE Y २१ A सा एमय पभार भीस्थति R स R lam --- द्वारकाधीश जगत्मदिर (संभ्रम) सौधार महाप्रासाद तलदर्शन या महोवर स्तंभोदय भूमिउदय मा Hait ----- shan -मेलवर जय- -Hin 10-0- PRODil apil म.पी88430 0-0--- श्री सोमनाथजी फैलास महामेरु प्रासादभ्रमयुक्त सांधार प्रासाद वलदर्शन या मंडावर स्तंभ * 59 * Prasad Manjari ऊपरका शृङ्ग पीछे हटता हुआ चढाना; अपरके शृङ्गके नीने थोडी जंघा-थाल छजी और दोढिया जैसी आकृतीयाँ बनानी फिर उन पर शृङ्ग चढाना । शृग-शिखरी अपने अपने अंग विस्तार के प्रमाण से सवाइ १ ऊँची करनी नीचे जितनी चौडाई हो, उससे अपर स्कंध-बांधणे आधा (कुच्छ अधिक) चौडा रखना और उसके ऊपर आमलसारी । स्कंध विरवार जितनी चौड़ी और उससे अर्ध ऊची करनी । ८०-८१ शिसर की मूल रेखा-कर्ण, प्रतिरथ कौर रथादि अनके ऊपर एक, दो या तीन अथवा जितने शृग कहे गये हों,प्रमशः चढ्यना; निरंधार प्रासाद मे गर्भगृहकी दीवारकी अंदरकी फ़र्क से मूलकण रेगका पायचा फर्क रखना, (गर्भगृहकी अंदर पायचा जडना नहीं चाहिये । महा दोष उत्पन्न होता है) सांधार प्रासाद के लिये गर्भगृहकी प्रथम दिवारकी बहारकी फर्क से मूलरेसाका पायचा मिलाना । शिपरकी ..-६ भाग - भाग- -- . श्रृंग पर श्रृंग विधान उरभंग विधान BAGT ELEVATOV. JENPLE PANCHAYARA PARSVAANATH PATAN Zincontre- PRADWAE NTIA a SONRA ANGH TECT शिवरकी जपा-कर्म (श्रृंग) या जाता संवरपर 61 * Prasad Manjari * मूलरेखा अर्थात् पायचा गर्भगृहसे थोडा विस्तार चौडा रखना। गर्भगृहसे पायचा सकुचित नहीं करना चाहिये. (क्योंकि संकोचनमें दोप कहा गया है)1 ८२, ८३, शिखर के भद्र पर उमंग एक से नौ तक चढानेको कहा गया है। शिसरमें उपरापर ऊरुथंग चढानेमें ऊपरके पहले अरु/गके पायचा .से उसके बांधणे स्कंध तककी ऊंचाईके तेरह (१३) भाग करके नीचेका अरुथंग स्कंध तक ७ सात भाग और ऊपरके छ माग रखने ।१७ ८४ "शिखरकी मूलरेखा-पायचे के विस्तारके दश भाग करके उपर संध AND Relan) 4 साभार) -२ मा १. मा गय (१० भाग) Bाग (Roभयो भाग---- -९भाग ROS. (भाग- पारगंगा रे भाचार गुणा भूक्षये via भूवन रेखा १६ शिखरका पायचा गर्भगृहकी भीतरी दीवालके बराबर मिलाना । कितनेही शिल्पी, जहांपर छोटे मंदिरोंका निर्माण होता है यहाँ पर, जहाँ ओसार अल्प हो, वहां गर्भगृहके पाटके फर्क से पायचा-मूलरेखा मिलान करते हैं । अपितु जिनालय सहस्रलिंग देवकुलीका एवं चोसठ योगिनी जैसी सीधी शिखरिणियोकी पंक्तिमें जहां छोटे बडे पदकी देवकुलीकाले हों, उसके पीछे मंडोवर एवं उपरसे शिखरके लिये एकरुप प्रदशिनि करने के लिये आडा गर्भचलित करने के विषयमें वृक्षार्णव जैसे महापंथ में भी कुशल शिल्पीने छुट की आज्ञा दी गई है जिसका कुरूप योग न हो एसी चेतावनी भी दी है। १७ उपरे पर उरुचंग चढाने के विभाग हेतु सामान्य नियम कहा है। किंतु नीचे के उपाङ्गो के विस्तार पर उसका विशेप आधार शिखर के सूत्र छोडते समय होता हैं, उस समय ग्रह नियम संभालने के लिये बहुत विचारनीय प्रश्न बन जाता है। यहां बुद्धिमान शिल्पिको विवेकसे काम लेना पड़ता है। १८ शिखरकी मूल रेसाके पायचेका विस्तारका दश फरके ऊपर स्कंध
.
-
દર
प्रासादमश्वरी
वाधणे (साझपाचसे) छ माग सामान्यतया चौडा रखना चाहिये । शिखर
मूलरेया-पायचा के विस्तारसे सराया सवागुने शिसरका उदय कंधे रसना ।
(पायचा विस्तारसे चारगुना सूत्र सबागुने शिखरका रसकर घृत सीचनेसे
अविकसित कमल के समान शिसरकी मुदर आकृति बन जाती है) ८५
रेसारे उदयम अष्ट भाग करना एवं स्पधे (माधणे) सातभाग करके वासी
उमी रेसा बनारे चिद्र परना (८६ ८७ अस्पष्ट अपूर्ण)
२३
मा at
१८
विस्तार भाग
आमल्सा154
HTTभाग
-
शिघर स्कंध भाग
शिखरकार विसार भा६-आपलसापिसारमा
विनार पाबसे उमा के बीचका प्रमाण रपनका विधान अन्य प्रयोम यणित
है। किंतु साढे पांच भाग रपने से अवि मुंदर दिखाता है सगुने उनपगाले
शिमर रिये भारगुना मन रमार पृत गौचनेसे रेम्पा होती है योटे शिवर
लिये पाच गुना पृत मूत्र पीचना और 11 उदक शिवर जिवना मूटोना-पायचे
हो उससे साहा पार गुना पृत मन सोचा कसा रेसा होती है। इससे निगरकी
नमन रंग्या यहुन मुन्दर रगनी है और मय के चिह यरायर मिलने रहते है।
63 * Prasad Manjari 4 अथ आमलसारा प्रमाण शिसरके स्फंच यांधणे उभाग फरके आमलमारा माव १ प्रीय भाग विस्तार करना चाहिए. किन्तु फलश सहित मामल. १॥ आमला सारेकी ऊंचाई सात भाग तकसी होनी चाहिये। आमल on चंद्रस सारेका गला १ भाग 1-मध्यका गोला आमलक डेड 0||| जांजरी भाग, चंद्रस सहित जांजरी (गोला) डेढ भाग, इम ४ चार भाग उदय प्रकार चार मागका आमलसारे फा उदय जानना. ३फलश शेष तीन भाग ऊँचा कलश (हंडा) और फलशका निम्तार दो भाग रसना. ८८८९ मूल शिखर उपान यालंजर-मूल शिसर के पायचा विस्तारका दश भाग फरना उसमेंसे दोदो भागकी दो रेसा-या फर्ण, टेढ टेढ भागके दो प्रतिरथ, और सारा भद्र ३ तीन भागका । इस प्रकार पुल दश भाग हुए और उपर स्कंध यांधणा विस्तारका नौ माग करना जिसमे दो दो भागकी दो रेसाये, हेद डेढ भाग माग ग य- मानवभाग-1 शव परा: ३२RROR३ ३ ३२.२२ मूल रेस २०भाग- -पालसर २१ भाग- १९ दीपार्णव प्रधमें आमलसारेका विस्तार विमाग २८ और उदय भाग १४ चोदा कहा है। गला तीन माग अहम भाग पांघ, चंद्रम भाग ३ मीन और अपरफी आमलसारी गोला माग मीन मीटर चौदद माग उदय ! अब विस्तार भाग फहते हैं, ऊपरका गोला आमलसारी विस्तार १३ तेरा माग, पंडग विस्वार, १८ अठारा और आमलसारो पुर रिम्वार २८ अहारी माग कहा है।
* प्रासादमञ्जरी 64 दो प्रतिरथ, और शेप दो भागका । इस प्रकार कुल नौ भाग हुए। इसी प्रकार मूल शिरसरका उपाइ घालंजर समजना । ९० ९१ अथ शुरुनाश-प्रमाण प्रासाद के छज्जे मथाले से शिखरके स्कंध बांधणे तक की उंचाई के २१ भाग करना जिसमेंसे नौ, दश, ग्यारा, धारा, और तेराह भाग उदय इस प्रकार पंचविध शुकनाशके प्रमाण जाने२१ ९२ शिसरके शृंग उरुश्रृंग और प्रत्यक्ष (चोयगराशिया) ये सब अंडककी गिनती संख्या में ली जाती है, शेप तवन, तिलक, कर्ण या दुसरे उपाङ्गो पर चढायें जायें तो वे प्रासाद के भूषणरुप जानने । ९२ आमलसारे के विस्तारका दूसरा मान -शिसरके स्कंधका उपाङ्ग में आमना-सामना दो प्रतिरथ का कोण बराबर गोल घृत आमलसारे का विस्तार रसना (ये प्रमाण ओर छे भागके स्कंध के हिसाबसे सात भागका आमलसारा विस्तार । ये दोनों प्रमाण परामर भीलता है। आमलसारे का विस्तार से अर्ध उदय मान जानना । ९३ र भुवय २० शुक नाशके प्रमाण में अन्य प्रथोंमे छज्जास शिरर के कंघ बांधणा सफ की उंचाई फा २१ भाग कर, नौसे तेरह भाग तकका शुरुनाश का स्थान ररने को कहा है। ये प्रासाद मंजरीकी एक प्रतिम " छाधातः कंघांतं मेफद्विशा भक्ते दिक शिवांश । सूर्य विश्वांश श च छायोध्ये शुरुनाशके ।। ८९ इस पाठमें परिवर्तन हो गया-दो या पुछमी हो, परंतु २१ मागमें १०, ११, १२, १३, १४, भागे शुरुनाशका स्थान कहा है. मूत्र. नाथुजीको यह पाठ यहां से मिला हो? शुमनासके परामर मंडपका गुम्यज्ञ-या संवरणाकी घंटा श्रामलमारा समसूत्र में रखने यद्यपि मंडपका आमलसारा नीचे भी रखा जा मकना है।
65 * Prasad Manjari * सुवर्णका प्रासाद पुरुष-आमलसारेके उदर भाग मे घृतपात्रके साथ सुवर्ण के प्रासाद पुरुषकी मूर्ति चादीके ढोलिये पर सुलाकर पधराना ९४ ध्वजाधार स्थान२२-प्रासाद शिरपरके पीठेके भागमे दाहिनी ओर के पढरेमे ॥ ध्वजाधार"- स्तभवेध-बलाचा ध्वजादड खडा रसने सहारे लिये लुम्बी बनाना । ९५ २५ प्रासादके जीव स्थान स्वरुप सुवर्ण मय प्रासाद पुरप । एक गजके प्रासादके प्रपाणसे आधे अ गुलका चनानेका विधान है । ५० गजके प्रासादके लिये २५ अगुलका प्रासाद पुरुप बनाना उसकी आकृति-दाहिने हाथमे कमल एव बाये हाथ मे तीन शिखा वाली पताका घजदड सहित धारण किये हुए है (आकृति देखीये) इस सुवर्ण के प्रासाद पुस्पको आकृति छाती पर हाथ रखे हुए होती है। आमलसारेमे पीके कलश पर चादीके पलंग पर गही व तकिये पर सुलाते हुए पधगना । इस प्रासाद पुरुषका स्वरुप पापाण मूर्तिके रुपमे शिसाकै पिछले दाहिने पढरेमे रसनेकी प्रथा लगभग १५० वपसे प्रचलित हुई है। ध्वजाधार क्लागारे स्थान पर इस आकृतिकी मूर्ति स्थापनेका यह प्रचलन उचित नही है । २२ ध्वजाधार-तमवेध (क्लावा) का स्थान शिवरकी मूल रेसाका उदय (पायचासे स्कंधतक) का चोविश भाग करके नीचेसे २१ इनीश घे भाग पर ध्वजाधार-रतभवेध-ध्वजादड टकाने का कलाया शिखरके पीछले भागमे पढरेमे बनाना । ध्वजाइडकी पाजुमे मजबुत आधार रस काष्ठकी स्तमिका आमलसारकी बरार उत्यमे रग्गनी । वजादड के साथ स्तमिका यननयो AttuRK शिखरके धजा दड ९ *प्रामादमञ्जरी 66 अथ कलशमान विभाग-प्रासाद कर्ण रेखाये विस्तार में हों उनके आठवें भागका कलश (इंडक) का विस्तार जानना । कहे गये मान में से १६ सोलहवां भाग बताने से ज्येष्ठमान और १६ सोलहवा भाग घटाने से कनीप्ठमान आनना । कलशका विस्तार से डयोढी उचाई करनी । ऊंचाई के नौ भाग करना जिनमें गला एक भाग, अंडक-पडया तीन भाग, छजी एक भाग, कणी एक भाग, और मला मान TE PAIN प्रभाकर नित भाग, अंडक परधा छ होला पीजोग तीन भाग इस प्रकार नौ मांग उदयका जानना । अब कलशको चोडाई के भाग कहते हैं। डोडला-बीजोरका अग्र भाग एक, उसके नीचे मूलमें दो कणी विस्तार तीन भाग, छजी विस्तार चार भाग, भाग विस्तारमें; नीचे गला दो भाग : नीचे पीठ गर्भसे दो (कुल चार) भाग जानने । इस प्रकार कलशके विस्तार के छ माग जानना । १६ से ९८ अथ पजदंडमान-प्रासाद जितने कर्ण-रेस्राओंसे विस्तार हो इतना ध्वज दंतु नायफे पट्टासे मजबूत बांधना । स्तंभिका के उपर कलश बनाना। कितने ही प्राचीन मंदिरेमि यह स्तंभिका देखने में आइ नहीं है। परंतु शाम्रोका पाठ यही है । लगमा २०० दो मो वर्षों में आमलसारे में ध्वजादंट स्थापन करते हैं। यह दंड पहुत ऊषा लाता है । ध्वजादंडका माल (नीचला माग आमलसारे प्रविष्ट होता ) प्रमाणसे अधिक ग्यनेको प्रथा है। वो उचित नहीं है।
67 * Prand Manjari P २३ ૨૪ M लम्या करना । उसमें से दशवाँ भाग हीन करने से मध्यमान होता है और पांचवां भाग हीन करने से कनिष्ठ ध्वजदंडका जानना । दंडका पृथुमान (एक गज हस्त) के प्रासादके लिये पौन अंगुलका ध्वजदंड मोढा बनाना । दो से पचास हाथ तकके प्रासादके लिये प्रत्येक हाथ पर आधे आधे अंगुलकी वृद्धि करते जाना । ध्वजदंड गोल (या अष्टांश बनाना) ध्वजादंडके सम (बेकी २.४..६.) कंकणी-ग्रंथी ओर गाला पर्व विषम (एकी १. ३. ५. कग्ना धजादंड के काष्ठ सीसम, बांस, खेर महुआ, चंदन अथवा अगर सगर का ऐसा बनाना चाहिये । काष्टमें छिद्र तुट पाट ग्रंथी (गांठ) आदि दोष नहीं किन्तु अच्छा काष्ठका सुशोभित ध्वजदंड बनाना । ९९ से १०१ ध्वजादंडकी उपरकी पट्टिता (पाटली मर्कटी) दंडकी लंबाईसे छट्ठा भाग की लंबी करनी । बाइसे अर्ध चौडी बनाना । और घोडाइके तीसरे भाग पृथु मोटी बनाना चाहिये । पट्टिकाके फिरती चारों ओर कंगूरी बनाना और नीचे अर्ध चद्राकृतिकी आरुति (शंखोद्वारजेसी) करनी । ६६जदंडके उपर मस्तके फलश और - २३ ध्वजदंडके पृथक पृथक मान दीपार्णव प्रथमें दिये हुए हैं। (१) प्रासादकी जंघा-कटि विस्तार मानका दंड "विजय" (२) चोकीके पदके दो स्तभके विस्तारके समान दंड “शक्तिरूप" (३) गर्भगृहके विस्तार के समान दंड "सुप्रभ" (४) प्रासाद कर्णे विस्तार के समान दंडका "जयवह" और शिसरके पायचे-मूलकर्ण के विस्तार के समान दंडका “विश्वरुप" नाग विश्वकर्माने कहा है । यह पंचविध प्रमाण ध्वजदंडके दीर्घ नाम सहित कहा । क्षीरार्णवमें कहा है कि शिसरके कलश से नीचे खुरा तककी उंचाईके तीसरे भागके ध्वजदंड समान लंचा जेष्ठमानका छट्ठा प्रमाग कहा है । सातवा मानप्रमाण पृथक् कहा है । एक हाथसे सात हाथ तक के प्रासादके लिये कोण रेखा विस्तार बराबर ध्वजदंड लंबा करना । आठसे पशिश हाथ तक के पासाद का वजदंड गर्भगृहके विस्तारमानः और छव्यीशसे पचास हाथके प्रासाद के लिये शिसरके पायचा मूल रेखाके मानसे ध्वजदंड लंयो रसनेका विधान है। २४ ध्वजाहँडमे सामान्यतया सम कंकणी-ग्रंथी और विषम पर्व-गाला रसनेका विधान है। किन्तु शिर एवं शक्तिके प्रासादके लिये उससे विपरित करने का विधान “क्षीराव" प्रथमें है। महायज्ञ याग के उत्सव पर ध्वजा रोपण करनेका शास्त्र विधान है। चबुतरे पर मजदंड पंदरा विश हाथका ऊँचा सडा करते हैं। एक 68 * . शामाभनरी पट्टिका (मर्कटि) पर मी कलश बनानो पट्टिका (मर्कटि) के नीचे घंटिकाओ लटकती रसना । १०२ २४यजादंडकी लंबाइ समान पताका ध्वजा लंबी रखनी । और पताका-ध्वजाको लंबाई आठवे भाग चौडी पताका चौड़ी रखनी (यह पताका तीन या पांच शिवाय वाली बनाने के लिये विधान है) १०३ तैयार किया हुआ शिखर अधिक समय तक ध्वजा हीन नहीं दिखना चाहिये। ऐसे ध्वज हीन मंदिरोमें असुर लोग निवास करने की इच्छा करते हैं। (अर्थात देव प्रतिष्ठा तुरन्त करनी चाहिये) १०४ अथ प्रासादः--वैराज्यादि प्रासाद चोरम चार द्वारवाले और उनके आगे चोकी (चतुष्किका) का निर्माण करना । वैराज्यादि दूसरे प्रासाद के चार भाग करके उनमें से एक एक भागकी रेसाकर्ण और सारा भद्र दो भागका चौडा और अर्थ भागका भद्रका निर्गम निकाला रखना भद्र मुख मन युक्त करना । कर्ण पर एफ एक शृङ्ग और भद्र पर दो दो मशृद्ध चहाने से वह "नंदन" नामका वैराज्यादि दूसरा प्रासाद डानना । १०५ सांगर जातिके भ्रम युक्त प्रासाद में दश, नौ और आठ मागकी भ्रम की मिमि दीवारकी मोटाईको प्रमाग जानना । १०६ २५ प्वजा पताका में देवका चाहन अथवा आयुधका चिन्ह करनेकी प्रथा उनर भारतमें है । अपितु कलश अथवा घडाइंडफे उपर मी से आयुधका चिन्ह करते हैं । मिरका प्रासाद हो तो हमर । देवीशक्तिरे. प्रासाद हो तो त्रिशूल । विष्णुके प्रासाइ हो तो याका चिन्ह और गमचंद्रजीके प्रासादको वजा पर हनुमान की आरति करते हैं। पत्ताका-बाकी आकृति के बारे में क्रियाकांडी ब्राह्मण विवाद करते है कि ध्वजा निकोण होनी चाहिये । इस विषय के बारेमें उन विद्वानोके साथ चर्चा की है। यज्ञादि फर्ममा पता धामण विद्वान प्रमाण बताते हैं, परंतु ये प्रमाण यज्ञ मंहपकी प्रासंगिक चलाये. वर्णनमें है । कोइ स्थाइ कार्य या प्रासादके विषयका यता निकोग करनेश विधान अभी तफ मैं नहीं देखा। अविधिमर के छोटा , शिवालय ओर हनुमानजी या अन्य मंदिरोमें कमी त्रिकोण घजा अविधिसरकी मिस Tara - दशी - शताब्दीका यूटछादा विहिन शिवप्रसाद. वेशकोटा (कच्छ) ( आयोलोजी. राजकोटया सौजन्यसे ) ग्दरपुर (माल्या) उदयेश्वर मासा का परामय निगरका मुक्नाश.
69 * Prasad Manjari शिखरमा आवना रमेना समज. अथ सांधार केशरादि प्रासादर कम अनुलो मा बीयानि 0 विभक्ति ॥१॥ प्रासाद क्षेत्रके नित्यानंद आठ भाग करके दो भागकी कर्ण- रेसा और सारा भद्र चार भाग चोडा करना। भद्रका निर्गम आधे भागका रखना । (चारो कर्ण पर एकैक अंडक और मूल एक मिलके) पांच अंडकके सरी जानना । केसरी से. चार चार अंडक की घृद्धि करते हुए एकसो एक अंडक तक का मेरु प्रासाद होता है । १०८ इति केसरी प्रासाद १ तुल मत्ररी भाग ८ शृङ्ग ५ ॥ विभक्ति ॥२१॥ प्रासादके क्षेत्र के दश भाग करके उसमें से दो दो भाग को कर्ण-रेग्या, डेढ मागका प्रतिरथ (पढरा) और डेढ भागका आधा भद्र बनाना । रेसा पर एक एक श्री वत्स (श्रृङ्ग) और भद्र पर एक एक उरुश्रृङ्ग चढाने से सर्वतोभद्र" नामक नौ अंडक का प्रासाद दूसरा जानना । १०९ करते ये प्रमाण नहीं माना जाना । पताका ओर ध्वजाका दोनो का भेद पाडते है। जो कोइ विद्वान त्रिकोण धना के बारे में शास्त्रोक्त प्रमाण प्रासाद विषयमें बतायगा तो हम सहर्प स्विकार करेंगे । २६ यहां दिये हुए केशरादि पचीश प्रासाद सूत्र संतान अपराजित सूत्र १५९ के अनुरूप है । अपराजित में मविस्तर वर्णन है । यहाँ पर बहुत ही संक्षिप्त में बताया है। उससे कितने ही स्थान पर अध्याहृत रहना पाया जाता है। उसकी पूर्ति करने के लिये अनुवाद मे हमे स्पष्ट करना पड़ा है । सावंधारादि केशरी पचिश प्रासाद के खरुप अन्यग्रंथो में जो दिये गये हैं। उनमें से श्रृंग चढाने की रीति मी भिन्न है । उसी प्रकार तलच्छंद में भी आगे पीछे है । श्रङ्गकी कुल क्रम संख्या तो मिटती रहती है। Lat RECEN मापस.
प्रासादमखरी
.
70
पाली.
(यह प्रासाद दूसरे प्रकार
से मी कहा गया है । रेखा
कर्ण उपरे उपरापर दो श्रृद्ग
और रथ-भद्र
टोढिया
चढाने से वह
सर्वतोभद्र नामक नौ अंडकका
प्रासाद जानना । इतिसर्वतोभद्र
प्रासाद २ । तुल माग १०
दूसरा भेद
तृतिय प्रासादः दशाई
तलो उपर
कहते है। भद्रके ऊपर एक
श्रङ्ग चढाने से "नंदन"
नामका तेरह अंडकका तीसरा
प्रासादजानना । ११०
चौथा प्रासाद ---इमी प्रकार दशाइ तन्द पर तीसरा भेद कहते है । रेसा
कर्ण पर दो श्रृङ्ग है, सो एक रसवे प्रतिस्थ पर श्रृङ्ग चढाने से चोथा “नंदशाल "
नामक प्रासाद सत्रह अटकका जानना । इति नंदशाल ११०
१
71 * Prasad Manjari ww 31 ANA ali साधार-कमरीयागार नलगाए विभाष पास! माया सार्वता प्रसाद जलमग] मान Mw Halna sode-tta HTRA एक स्मारक RAI ५ मा लि ARE पांचमा प्रासाद-दशाई तल पर चौथा भेद कहते हैं । नंदशाल प्रासाद के स्थान पर कर्ण-रेसा पर एक अङ्ग है यहा दो दो श्रृङ्ग चढ़ाने से पांचवा 'नदिश" नामक २१ अंडक का प्रासाद् जानना । इति मंदिश । विभक्ति ॥३॥ प्रासादके क्षेत्रके १२ भाग करके कर्ण-रेसा प्रतिस्थ और भद्रार्ध दो दो भागके करके कर्ण पर दो और भद्र पर दो दो उरुश्रङ्ग एर प्रतिरथ पढरे पर एक अङ्ग पढानेसे छठ्ठा "मदर" प्रासाद २५ अंडक तुल भाग १२ का जानना । इति मदर। १११-११२ विभक्ति ॥४॥ प्रासाद के क्षेत्रके १४ चौदह भाग करके रेसा, कर्ण, प्रतिरथ ओर भद्रा दो दो भाग के रसने तथा भद्रकी दोनों ओर (पक्षमे) एक एक भागकी नदी करनी कुल चौदहाई तल हुआः कर्ण-रेसा पर दो दो, प्रतिस्थ पढरे पर एक एक और उन पर एक एक तिलक चढाना, नदी पर एक तिलक और भद्रके उपर तीन अरुभग चढाने से सातना "श्री वृक्ष" प्रासाद तुल भाग १४ अंडक उनतीम जानना । इति श्री वृक्ष । आठरा प्रासाद-श्रीवृक्ष प्रासादये शिसर पर रेखा-कर्ण के उपर दो के स्थान * प्रासादमी * 172 ७८ EL ولايت ww HERI पी समोना mameapes भावm iORN नागRM SafartRR समस्यामा मालभर भावारीपाद TiATC ममायाम " पर तीन श्रङ्ग चढाने से आठमा अमृतोद्भव प्रासाद तुल भाग १४ अंडक ३३ इति अमृतोद्भव। ननमा प्रासाद-अमृतोद्भवरे स्थान पर भद्र पर तीन मिश्र के स्थान एक ऊरुश्रद छोडकर प्रतिरथ-पढरे पर एक्के स्थान दो दो श्रङ्ग चढाने और कर्ण-रेसा पर तो तीन अङ्ग है ही। ऐमा नवां "हिमनान" प्रा० तुल भाग १४ अडक ३७ होवे ११३ इति हिमवान। दशवा प्रासाद-हिमवानरे स्थान पर भद्रके उपर दो अस्अङ्ग हैं। वहा तीन तीन अगम चढ़ाने से दशवा " हेममूट" प्रा० तुल भाग १४ अडक १५ होने ११५ हेमस्ट। ग्यारहवा प्रासाद-हेमकूट के ग्थान पर कर्ण-रेसा पर से एक शृङ्ग छोडकर नदीने उपर एक एक श्रृङ्ग चढाने से और रेसा-वर्ण पर एक तिलक चढाने से ग्यारहया "कैलास" प्रा० तुल भाग १४ । अडर ४५ होवे इति कैलास । चाहा प्रासाद कैलास के स्थान पर वर्ण-रेसा पर दो के म्यानपर तीन श्रद्ग चढाने से चारहया "पृथ्वीजय" प्रा. तुल भाग १४ अडक उनपचास १५६ इति पृथ्वीजय। जानना 73 * Prasad Manjari विभक्ति ||५|| प्रासाद के क्षेत्र के १६ भाग करके कर्ण रेखा पडरा-प्रतिरथ और भद्रार्ध दो दो भागके रखने-कर्ण एवं प्रतिरयके वीच एक भाग कोणी तथा भद्रके पास में एक भागकी नन्दी करनी । भद्रका निकाला एक भागका रखना । रेखा-कर्ण पर दो उसके पास कोणी के उपर एक एक तिलक चढाकर प्रत्यक्ष चढाना । प्रतिरथ पढरे पर दो दो शृंङ्ग और भद्रके उपर तीन तीन ऊरशृङ्ग चढाने और भद्र नन्दी पर एक एक शृङ्ग चढाने से तेरहवां "इन्द्रनील" मा० तुल भाग २६ अंडक ५३ जानना । ११७-११८ इति इन्द्रनील । चौदहवाँ प्रासाद- इन्द्रनील के स्थान पर कर्ण रेखा के उपरका एक शृङ्ग छोडकर वहां तिलफ चढाना और रेखाके पासको कोणी के उपर तिलक छोडकर यहां शृङ्ग चढाने से पौदहवां “महानील" प्रा० तल भाग १६ अंडक ५७ जानना । २१९ इति महानील1 पंद्रहवां प्रासाद-महानील के स्थान पर रेखा कर्ण परका तिलक तजकर शृङ्ग चढाने से पंद्रहवां " भूधर" प्रा० तल भाग १६ अंडक ६१ जानना १२० इति भूधर । विभक्ति ॥६॥ प्रासादके क्षेत्रके १८ भाग करके उनमें उपरोक्त सोलाइ तलके भद्रकी ओर एकके स्थान दो दो नन्दी करनी। शेष सोलाइ तलके समान तल भाग जानने । कर्ण के उपर दो शृङ्ग और एक तिलक चढाना । रेखा-कर्ण के पास वाली कोणी पर एक शृङ्ग ओर उस पर तिलक चढाकर उस पर प्रत्याग दो दो भागके करने । शेपकी दो नन्दी पर दो दो तिलक चढाने । भद्रके उपर चार अरुशृङ्ग और प्रतिरथ-पढरे पर तीन तीन शङ्ग चढाने से सोलहवां " ५८ अंडक ६५ का शिवलिङ्ग हेतु । कामना को पूर्ण करने वाला जानना । २२१ इति रत्नकूट । सनदयां प्रसाद रलकूटके स्थान पर रेखा-कर्ण पर दो के स्थान पर तीन तीन शुग चढाने से सत्रयां बेहूर्य प्रा० तल भाग २८ अंडक ६९ जानना । ૧૨૨ इति वैडूर्य । अठारहवां प्रासाद-पैडूर्य के स्थान पर रेखा-कर्म के उपर के तीन में से एक कोडफर प्रतिरथके पासवाली नदी पर राग पाने से अठारहवाँ " पद्मराग" मा० तल भाग १८ अंक शङ्ग ७३ जानना । इति पद्मराग। उन्नीसवाँ प्रासाद-पद्मरागके स्थान पर कर्ण-रैया पर जैसे कि पूर्व ही थे उसी प्रकार तीन तीन शृङ्ग रसने से उन्नीसवा " प्रा० तल भाग १८ शङ्ग ७७ जानना १२३ इति पम्रक । प्रा० तलभाग यमक १० " * प्रासादमअरी 74 विभक्ति 11 प्रासादके क्षेत्रके वीश भाग करके दो भाग कणं-रेसा कोणी डेढ भाग, रथ दो भाग, नंदी डेढ भाग, भद्र नंदी एक भाग एवं सारा भद्र चार भागका बनाना । इस प्रकार पुल घीसाइ तल भाग हुआ । रेसा पर दो शृङ्ग और एक तिलक चढाना । तब शिसरका पायचा चौदह भागके विस्तारका होगा। नंदी पर एक एक शृङ्ग और तिलक चढाके उस पर प्रत्यङ्ग चढाना । प्रतिस्थ पर तीन तीन शृङ्ग और भद्र पर चार चार उरुगङ्ग चढाना । नंदी पर एक एक शृङ्ग और तिलक । उसी प्रकार भद्र नंदी पर एक शृङ्ग चढाने से वीसवां " मुकुटोज्वल प्रा० इक्याशी अंडकका प्रासाद जानना १२४-२५-२६ इति मुकुटोज्ज्वल । इक्कीसवाँ प्रासाद- मुकुटोज्ज्वल प्रासादके स्थान पर रेसा पर तीन शृङ्ग चढाने से इफीसवां "गजराज" प्रा० तल भाग २० अंडक शृङ्ग पिन्याशी १२७ इति गजराज । वाइसवाँ प्रासाद-गजराजके स्थान पर रैसा पर जहां तीन शृङ्ग हैं उनमें से एक शृङ्ग छोडकर वहाँ तिलक रखना । और भद्र फर्ण पर एक शृङ्ग चढाने से ब्रह्माजी को प्रिय ऐसा बाइसवों राजहंस" प्रा० तल भाग २० निव्वाशी शृङ्गका जानना । १२८ इति राजहंस । तेइसवां प्रासाद-राजहंसके स्थान पर रेसा पर जैसे कि पूर्व थे, वैसे ही तीन शृङ्ग चढाने से और भद्र नंदी पर तिलक चढाने से लक्ष्मीपति विष्णुको प्रिय ऐसा तेइसवां गरड प्रा० तल भाग २० शृङ्ग तिरानवेका जानना । १२९ इति गरुड । विभक्ति ॥८॥ प्रासादके क्षेत्रके बाईस भाग करके भद्रकी पक्ष-पडसो पर एक एक भागकी नंदी तीन प्रतिरथ और रेखा तथा आधा भद्र-ये सब दो दो भागके मनाने से घुल वाईस भागका तल हुआ; कर्ण रेसा पर दो शृङ्ग और एक तिलकः भद्र पर चार चार अरु कर्णकी याजूवाले प्रतिरथ पर दो दो शृङ्ग ओर उन पर तीन भागके विस्तारका प्रत्यक्ष (चोथगराशिया) चढाना; रथ पर तीन तीन शृङ्ग उपरथ पर दो दो शृङ्ग और भद्र नंदी पर एक एक शृङ्ग चढाने से हर-शिवको पिय ऐसा घोगीसवां "वृषभ" प्रा० तलभाग बाइस शृङ्ग सतानवेका जानना इति पुपम. १३०-१३१ पञ्चीशया प्रासाद-पभके स्थान पर रेसा पर जो तृतीय शृङ्ग चढाया जाये तो सिद्धिको देने वाला ऐसा पचीसवा "मेरु" प्रासाद तल भाग २२ शृङ्ग एफसो एक का जानना. १३२ २७ इसी प्रकार फेशरादि सांधार अथवा निरंधार प्रासादा पनीश शिरसर यनाये जा सकते हैं इति मेरु प्रासाद. २७ सांधार फेनारादि प्रासादकी आठ विभक्तियो पर पचीस भेद कहें यथा 75 • Prasad Maujari * ७२ अथ मण्डप । मेरु प्रसाद-पांच हाथका एक सौ एक अंडक शृङ्गका कग्ना; ' जिसमें वीस वीस अंडककी वृद्धि करते हुए पचास हाथ तकके मेरु प्रसादके लिये एक हजार एक अडक होने पर, वह "महामेरु प्रासाद" कहलाता है। पूर्वोक्त मेरु प्रासाद राजाओं के लिये ही बनवाने, दूसरे वीके लिये नहीं; मेरु प्रसाद ब्रह्मा, विष्णु, शिव एवं सूर्यके लिये बनवाने चाहिये, अन्य देवोंके लिये नहीं. १३३-३४ --प्रासादके आगे एक या तीन द्वारका मंडप बनानाः जिन ब्रह्मा, विष्णु ओर शिवके प्रासादों के लिये गूढ स्त्री एवं नृत्य मंडप अनुक्रम से बनाने । एक या दो हाथकी डेरीके आगे चोकी चतुष्किका बनानी ! तीन हाथके प्रासादके लिये दूना, चार हाथके लिये पोने दोगुना, पांच हाथसे दश हाथके लिये ड्योढा और दशसे पचास हाथ तक के प्रासादों के लिये सवा गुना अथवा सम. (अर्थात् जितना प्रासाद होवे उतना) मंडप बनाना । यह शुभ जानना । प्रवेश मंडप गर्भगृहसे ड्योढा या दुगुना बनाना । १३५-३६-३७-३८ जयमत-विश्वकर्माके पुत्र जय कहते हैं कि प्रासादके प्रमाणसे मंडप सम अर्थात् प्रासादके बराबर सवागुना, डोटगुना; पानेदोगुना अथवा दूना करना। ऐसा पंच विध प्रमाण कहा है। १३९ अथ चतुष्किका प्रानिव मंडप---एक पदसे अठारह पदकी चोकी चतुष्फिका की रचना के प्राप्रिय मंडपाके घारह स्वरुप कहे हैं। २८ १ एक चोकी; २ तीन चोकी. ३ तीन चोकी और आगे एक चोकी, ४ छ चोकी; ५ छः चोकी और आगे एक चौकी; ६ नव चोकी; ७ नय चोकी के आगे एक चोकी: ८ नव चोकीके दोनों ओर एकैक चोकीः ९ नव चोकीके आगे ओर दोनों ओर एकैक चोकी मिलकर बारह पदः १० बारह पदके दोनों ओर एकैक चोकी: ११ यारह चोकीके दोनों ओर दो दो चोकी, १२ पंदर पद ५४३ के आगे तीन चोकी; इस प्रकार वारह प्रकार के प्रामिव मंडप चोकीके चार स्तंभो से २८ स्तंभ संख्या तक जानना। एक पदचोकी। १४०-१४१ मंडपका मध्य पदका अनुसरण करते हुए अन्य पदयेः स्तमोका पद रखना। मंडप परकी संवरणा परकी घंटा (अथवा गुम्बजका आमलसारा) शिखरके शुकनाश अट्ठाइका एक भेद, दशाइके चार भेद, वागहाइके एक, चौदाइके छ भेद, सोलहाइके तीन भेद, अठारहाईके चार भेद, बीसाईके तल पर चार भेद और बाइसाई तल पर दो भेद कहे है। इस प्रकार कुल आठ विभक्तियों पर पचौश भेदके शिखर कहे हैं। २८ इन बारहके नाम और स्वरुप अपराजित सूत्रमें कहे है एवं दीपार्णव मंथके प्रकाशमे उसके तल दर्शनके मानचित्र भी दिये हुए हैं। चोकी-चतुप्किका अर्थात चार स्तंभके पदको चौकी कहते है। ३ ..
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明 77 Prasad Manjari * ७७ Pाशिवादिसंख्य उपद मद् કર ત્રમ पद सीमयs २यद। ia नक, ६५ दम GO घपद O वरावर मिलाना। मंडपकी घंटाका आमलसारा नीचे हो यह श्रेष्ठ है परंतु ऊंचा नहीं होना चाहिये । १४२ निरंधार प्रासादके मंडपका उदय प्रासादके घरावर रखकर उसके उदय के १३ भाग करने । पीठ. पर सवा भागका गजसे- सवा तीन भाग वेदिका एक भाग आसन पट्ट (आसरोट); साढे पांच भागका स्तम्भ; पोने भागका भरण, सवा भागका शरा: इस प्रकार तेरह भाग और उस पर दो भागके पाटः भारोद; पाट भारवट ये सब मिलकर उदयके पन्द्रह भाग हुए । पाटमें एक भागका मोटा छज्जा बनाना । जो पाटके पेट में ढालू समाविष्ट करनाः आसन पट्टके उपर एक हाथ ऊचा ढलता हुआ कक्षासन करना । १४३, ४४, ४५. 97- पद ૫ ધરસમ मन ३६यदे द OO न cha CRY aantianR. अथ गूढमंडप-प्रासादोंको जोडने वाले मिति दिगार चाले गूढ मंडपके आव प्रकारके स्वरुप कहे हैं । १ चोरम, वर्धमान, २ भयुक्तः स्वस्तिक, ३ प्रतिरथ युक्त गरुड नामकः ४ भद्र और उसके साथ प्रभद्र युक्तः सुरानंद नामक, ५ कोणी युक्त सर्वतो भद्र नामक; ६ अधिक भद्र युक्त मुखभद्र युक्त कैलास नामकः दो प्रतिरथ युक्त इंद्रनील. नामक, तीन प्रतिरथ युक्त लसंभव' नामक; इस
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77 Prasad Manjari धाशिवादिमंऽय वरावर मिलाना । मंडपकी घंटाका आमलसारा नीचे हो यह श्रेष्ठ है परंतु ऊंचा नहीं होना चाहिये । १४२ १३पद स्टार ३०स्तम सीकै मयाय H3२यदा २२समा -ង ६ पदम Orin उधोद पदधाम 20 निरंधार प्रासादके मंडपका उदय प्रासादके घरावर रखकर उसके उदय के १३ भाग करने । पीठ . पर सवा भागका राजसे- नक, सवा तीन भाग वेदिका एक भाग आसन पट्ट (आसरोट); साढे पांच भागका स्तम्भ; पोने भागका भरण, सवा भागका शराः इस प्रकार तेरह भाग और उस पर दो भागके पाटः भारोटः पाट भारवट ये सब मिलकर उदयके पन्द्रह भाग हुए। पाटमें एक भागका .रज्जा बनाना। जो पाटके पेट में ढालू समाविष्ट करनाः आसन पट्टके उपर एक हाथ ऊंचा ढलता हुआ कक्षासन करना । १४३, ...... यदे (१३ J-..- मोटा HIM भर्यातक पद : RCRA ३ प्रतिरथ अथ गूढमंडप-प्रासादोंको जोडने वाले मिति दिवार पाले गूढ मंडपके आठ प्रकारके स्वरूप कहे हैं । १ चोरस, वर्धमान, २ भद्रयुक्तः स्वस्तिक, युक्त गरुड नामकः ४ भद्र और उसके साथ प्रभद्र युक्तः सुरानंद नामक; ५ कोणी युक्त सर्वतो भद्र नामक; ६ अधिक भद्र युक्त मुखभद्र युक्त फैलास नामकः दो प्रतिरथ युक्त इंद्रनील, नामक, तीन प्रतिरथ युक्त रत्नसंभव' नामक; इस
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77 * Prasad Manjari * भागियादिमध्य D P उपद घरावर मिलाना ! मडपकी घटाका आमलसारा नीचे हो यह भ्रष्ठ है परनु ऊचा नहीं होना चाहिये। १४२ ३पद स्म साफमs Or- 무 ६५८ (२R व P -DP D.ro POTA मनोहर प पद ५ सम O प निरधार प्रासादके मडपका उदय प्रासादये चराचर रखकर उसके उदय के १३ भाग करने । पीठ पर सवा भागका रानसे नक, मया तीन भाग वेदिका एक भाग आसन पट्ट (आसरोट) साढे पाच भागका स्तम्भ, पोने भागका भरण सा भागका शरा इस प्रकार तेरह भाग और उस पर दो भागके पाट भारोट पाट भारवट ये सब मिलकर उदयने पन्द्रह भाग हुए। पाटमे एक भागका मोटा छज्या बनाना । जो पाटके पेटमे ढालू समाविष्ट करना आसन पट्टके उपर एक हाथ ऊचा ढलता हुआ कथासन करना । १४३, ४४, ४५ सिंह शान्त . EVELORER ३६यदे म O o 3.42 सूर्यात्म 0 D ૬૮ RCH D n अथ गूढमडप-प्रासादोंको जोड़ने वाले मित्ति दिवार वाले गृह मडपके आठ प्रकारके स्वरूप कह है। १ चोरस वर्धमान, २ भयुक्त स्वस्तिक, ३ प्रतिरथ युक्त गरड नामक ४ भद्र और उसके साथ प्रभद्र युक्त सुरानद नामक, ५ कोणी युक्त सर्वतो भद्र नामक, ६ अधिक भद्र युस्त मुसभद्र युक्त कैलास नामर दो प्रतिरथ युक्त इगनोल नामक, तीन प्रतिस्थ युक्त रत्नसभर' नामक इस ,
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प्रासादमारी
READS
yeer NAYAcar
PARAMANAसामHASTRI RAMANमाकामयाब
२
प्रभार आठ गृह महप के स्वरुप जानने । (मान चित्र यहाँ दिया गया है) पण
मा से दूना भद्र और पौन भा'का प्रतिरथ और भद्रसे अर्थ मुखभद्र बताना ।
ये मुसभद्र कशासन चदारलोरित करना । (४६४७
२९ गूढमरुप मित्ति दिवार युक्त होते इस लिये महपो प्रासाद जैमा पीठ
र महापरला स्तर बनाना । एक रा तीन द्वार परने से कामना पर प्राप्त
होता है। दार आगे एक या तीन या चार पकी चोरी चतुष्पिा करना।
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* Prasad Manjari *
७९
वमान
REP
સોમ પ
गुटमंडय
variatiane
1 गरुड
कौली
સરના
अध नृत्यमंडप-पुप्पकादि सताईस प्रकारके मंडप स्तंभ संख्याके अनुसार
फहे है। प्रधमबार स्तंभो के सुभद्र नामका मंडप से दो दो स्तंभाको पृद्धि करते
८२
+ प्रासादमञ्जरी *
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पुस्यकादि मण्डयो
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• समतल अर्थात् मीधी छत-छतियासे ढाती छत ये "समतल" यह छातीया
सादा हो या पदकी आकृति जैसा उत्तीर्ण हो।
३ उदित-अर्थात् गुम्बजका कोल गपालुका थरो एक से एक संकिर्ण संकोची
सक्षिप्त करके आन्छादित करके ढकनेकी रीति " उदित में नामक कहाना है ।
बीचका झुमर जैसा विभाग पद्मशिला कहा जाता है ।
83
Prasad Manjari
८३
युध्यकादि२७
मयडयो.
कोशी
२
(भगना
२७
पुष्यमत
दम
(
युथक
सम
अथ बलाणक-3 ब्रह्मा, विष्णु, शिव, सूर्य, चंद्र और जिनके देवालयो, जलाश्रयों
राजप्रासादो, सामान्य घरों, एवं दुर्गाके आगे घलाणक पनाने चाहिये । बलाणक
पांच प्रकारके कहे गये हैं। १ वामन, २ विमान (उत्तुङ्ग), ३ हशाल,
वितान यनाने की प्रथा दो सो तीनसो सालसे कम होती जाती है। निम्नः
नीचे वितान उसके उपर संवरणा होती है। संवरणा भी कम होती है। उस
स्थान पर संन्यासीका मस्तक जैसा सीधा सादा गोल गुम्नज होने लगा है
वितानके तीनों प्रमुख प्रकारकी आकृति एवं फोटा अिस ग्रंथमे दिया हुआ है
सो देखनेसे स्पष्ट समझमें आ जायेगा ।
३१ बलाणकके स्वरुप अन्य प्रयोमे थोडे फेरफार के साथ दिये हुए हैं। देय
प्रासादके आगे और जगती मे समाविष्ट हुए मंडपके लिये "धामन " दुर्ग, एवं
राजभवन के आगे विमान, प्रजाजनके भवनके आगे डेल "हर्यशाल," जलाश्रयके
84 . प्रासादमसुरी Rour- Pent -113 YATRो स्थापति --- SALESE 2113 विताना विस्तान माग ६६ आगे या मध्यमे मंडप होवे उसको "पुष्कर"; राजभवन के आगे पांच या मात या नो भूनि ऊंचे चलाणा को उत्तुङ्ग" कहते हैं; उत्तद्न टायर या कीर्तिस्तंभ जैसा जानना | चितोडमें उत्जुन मंदिर के आगे और एक स्वतंत्र है। जो युद्ध विजय के स्मारफमे बनाया होनेका कहते है। पाटश सहनलिङ्ग के बडे सरोवर के किनारे पर ऐमा उत्तुह पीति म जैसा बनाया था अब उनका अवशेष मी नहि दिखाते। साहित्यमें उसका उम्य है । प्रज्ञाका भरनरे आगे हर्यशाल जो मूल घरसे नीचे
श्री सोमनाथ प्रतोल्या परका ईलिफाफा अंश,
श्री सोमनाथ -प्रतोल्यापरका तोरणका अंश.
मोदेरा सूर्यमदिरकी जंघाका देवम्वरूप
समनलानि प्रकारके वितान (छत - छोतीया) कदितानी प्रकारचे क्लामय पिदान (गुम्बन ) रुपकोल, गजवालु - गवालु.
85 • Prasad Manjari * " ४ गोपुरम् ५ पुष्कर नामक बलाणक जानना । एक दो तीन चार छ एवं सात पद दूर स्थल विस्तारके प्रमाणसे वलाणक बनाना । बलाणकके द्वार उत्तरङ्ग, पाट मूल प्रासाद के अनुसार समसून उदयमे रखना । १५०, ५१, ५२. १ प्रासादकी जगतीके आगे या जगतोके बराबर देव प्रासादफे आगेका बलाणक का गम “वामन" कहा है। • राजप्रासादके आगेका बलाणरुको “विमान' एय उत्तुङ्ग भी कहते हैं। उत्तुग पाच या सात या नौ भूमि मजिलका होता है । नत्र भूमि से ज्यादा उदय करना नहीं। ३ सामान्य घरोंके भवनो आगेका बलाणक " डेहली" को " हर्यशाल फहते हैं । यह मूल भवनका उदयसे नीचा रसना । ४ नगरके द्वार-दरवाजे परका बलाणकको गोपुर नामक जानना । उसकी गोपुर जैसी आकृति करनी । रखना । यदि ऊंचा होये तो वेध शेप जानना । द्रविड प्रदेशमे मूल प्रासादसे द्वारपरका गोपुरम् बहुत उंचा करते हैं । यह प्रथा पुरानी नहि है। विजय नगर राज्यकी उन्नति कालसे चारसो पांचसो साल से द्वारपरका गोपुर उचा करनेका 1 परिघका दो तीन पांच किया परना । मंडपके उपर वितान (गुम्बज) अर्थात् आकाश या उपरकी चंदनी आच्छादित
घरिना
परिसर
पुषिका नाम संवर्धा () पिटका ५२८ १६. सिंह भाग
प्रभार.ओ.स्पति
87 * Prasad Manjari कसासन RO.S. मंदिका ५ जलाशयके बीच या आगे सीढियांके पहले बनाये हुए बलाणकका नाम पुष्कर जानना । इसी रीतसे. बलाणकका लक्षण स्थान मान देखके भूमि मंजिल करना । १५४, ५५ yo अथ संवरणा--३२प्रासाद- के मंडप पर विशेप करके संवरणा (शामरण) हो । उसके पचीश प्रकार कहे हैं। इनके नाम घंटा कूट आदिकी संख्याके साथ शिल्प मंथोमें अलग दिये हुए है। वे पांच घंटा से लेकर चार चार घंटाकी घृद्धि करते हुए १०१ घंटे तक पचीश नाम 'संवरणा'का कहा है। प्रथम आठ भाग तलसे शुरु होती है। १५६,५७. शिवलिङ्ग-प्रासादके मानके अनुसार पापाणका घटित लिङ्ग-राजलिङ्ग शास्त्रमें कथित विधिसे बनाना । परंतु स्वयंभूलिङ्ग बाणलिङ्ग, अथवा रत्नके लिङ्ग प्रासाद प्रमाणसे न्युनाधिक छोटा या बडा हो तो उसका दोप कहा नहीं है । प्रासादकी जगती से तीन चार एवं पंचगुणा ऐसे तीन विधिसे देवपुर प्रासाद बनाना । १५७,५८ अथ भिन्नादिदोप-ब्रह्मा विष्णु शिव एवं सूर्यके प्रासादमें यदि मकडी आदिके जाले हो तो उसका भिन्नदोष लगता नहीं है। परंतु दूसरे देवो यथा गणेश, गौरी और जिनके प्रासादमें जो ऐसा हुआ तो यहां भिन्नदोप लगता है। लिङ्ग या ३२ संवरणाकी शास्त्रोक्त प्रथा लगभग दो सोक वर्षसे विस्मृत हुई हो ऐसा लगता है । संवरणा के मुख्य अद्गो के थरो में घंटा, कूट, छाद्यको उद्गम, उरुघंटा, मूलचंदा और सिंह उरुघंटा शिखरके ऊरुशृङ्ग रुप है। अपराजित दीपाव ज्ञानरत्नकोशमें संवरणा विषय दिये गये हैं। संवरणा के अपभ्रंश शामरण हुआ। वर्तमानमें यनती संवरणा अकीला घंटाका थरोकी होती है कूट छाद्यकी या उद्गम नहीं + 88. प्रासादमञ्जरी * ८८ मुसलिङ्ग के प्रासादमै भिन्नदोष लगता नहीं परंतु दोष कहा हो या न कहा हो तो भी प्रासादमें स्वच्छता स्मनी चाहिये। १५९ कहे हुए मान प्रमाणसे अधिक लम्बा चौडा अल्प या वक्र टेढा जो प्रासादमे होवे छेद भेद या जातिभेद या मान हीन होवे तो यह महान दोपका उम्पादक है। १६० अथ प्रतिमामान-१ गर्भगृहके द्वारको ऊंचाईके नौ भाग करके उनमें से उपरका भाग तज कर शेष आठ भागो के तीन भग्ग करके दो भागोकी सडी प्रतिमा और शेप एक भागको पीठिका (सिंहासन) बनवाना । १६१ N३ ३ । 4_3/२२॥ या ५ र कगना शासपीक) माकप.. पीविका-मिहामउदय भाग३० N३॥ माकन ओ•स्योत. M परीकी २ प्रतिमाका दूसरा प्रमाण-देवगृहके द्वारको ऊंचाईके ३२ भाग करके जिनमें से चौदाह पंद्राह एवं मोला भागकी सडी प्रतिमाका प्रमाण जानना । और चौदाह तेराह एवं वाराह भाग की वठी प्रतिमा का प्रमाण जानना १६२ प्रासादके चोरम क्षेत्रके दश भाग दो दो भागकी दीवारोंकी मोटाई जाननी । शेप छ भागका गर्भगृह जानना ! १६३ । उस गर्भगृहक तीसरे भागी प्रतिमा का ज्येष्ठमान जानना। दमत्रां भाग क्म करनेसे मध्यमान और पांचा भाग हीन करनेसे कनिष्ठ मान प्रतिमाका जानना ३३ १६४ (ये प्रतिमाका तीसरा मान) ३३ प्रतिमा प्रमाणका चोथामान-प्रासादके दो कर्ण तक का मापका चौथे भागकी प्रतिमा का प्रमाण जानना | शेषशायी-सुप्त प्रतिमाका प्रमाण कहते है । गर्भगृहके सात भाग करके उनमेंसे पांच भागकी शयन प्रतिमा लम्बी करनी । प्रतिमाका पांचवाँ प्रमाण-एक से पांच हाथ तक के प्रासादके लिये प्रत्येक गज छ छ आंगुल, छ से दश हाथ तक के प्रत्येक हस्ते तीन तीन आंगुल, ११ से ५० तक के प्रासादके लिये प्रत्येक हाथ एकंक आंगुलकी वृद्धि करने से बैठी प्रतिमाशा मान समजना । छठ्ठा प्रमाण सड़ी प्रतिगाका.११ आंगुल से एक हाथ के प्रासाटके लिये ११ आंगुलकी सडी प्रतिमा चार हाय तक प्रत्येक गज दश दश आँगुलकी वृद्धि 89 * Prasad Manjari अथ प्रतिमा इष्टिमान-गर्भगृहके द्वारकी ऊचाईके आठ भाग करके उपरका भाग छोडकर सातवे भागके फिर आठ भाग करके उसके सातवें भाग पर देवद्रष्टि धृपाय-सिंहाय या ध्वजाय पर रखना शुभ है। १६५ उपरोक्त आठ भागो में से छटे भागके आठ भाग करके उनमें से पांचवें भाग पर लक्ष्मीनारायणकी द्रष्टि रसनीः शेषशायीन भगवान और मुखलिङ्गकी द्रष्टि द्वारके अर्धभाग पर रखनी । परंतु द्वारके नीचेका अर्ध भागका उल्लंघन करके (शिवलिङ्ग सिवाय) द्रष्टि न रखनी । देवता पद स्थापन -गर्भगृहके पृष्ठ पाट-भारवटके नीचे यक्ष भूतादिकी करनी। ५ से १० हाथ तक के प्रासादके लिये प्रत्येक हाथ दो दो आंगुलकी पृद्धि करनी ११ से ५० हाथ तक के प्रासादके लिये प्रत्येक गज-हाय एकैक अंगुलकी वृद्धि करनी यह उत्तम मान कहलाता है । ३४ देवता द्रष्टि संबंधमें विभिन्न ग्रंथोमें मत मतांतर कहे हुए हैं। यहाँ दिये हुए द्रष्टि विभाग में घृष, सिंह और ध्वज आय देनेका विधान है। ऐसा सू० मंडनका भी कथन है। इन दोनों भाईयों का मत, विश्वकर्मा प्रणीत ग्रंथो और अन्य कोई भी प्राचिन मंथोमें आय प्रमाण विषयक नहीं दिया गया है। एक पुराने ग्रंथमें गजांश शब्दका प्रयोग कीया हे किन्तु इसका अर्थ सातवाँ भागके बदलेमें कहा है नहीं के आय के हिसायसे । शिल्पि वर्ग तो विभागसे जहां द्रष्टि सूत्र बताया हो वहीं पर बराबर चक्षुकी पुतलीका गर्भका मिलान करता है। अब कितनेक जैन विद्वान दृष्टि सूत्र में आय मेलका आग्रह रसते है। अपराजित सूत्र, क्षीराणेव, दीपार्णव, समराङ्गण सूत्रधार, ठकरफेरु वास्तुसार आचार्य वसुनंदी कृत प्रतिष्ठासार-ये सभी ग्रंथकार द्रष्टि सूत्र में एक मत ही है। बहुत अंतर है। इसी प्रकार प्रतिमा स्थापन पद विभाग विषयमें भी यही बात है। द्रष्टि सूत्रके आये हुए मान से आयका मेल बिठाते हुए द्रष्टि नीची रसनी पडती है। यह प्रश्न पडा विवादास्पद है। ऐसा हम मानते हैं। 'देवता मूर्ति प्रकरण' और 'ज्ञान रस्नकोश' ग्रंथमें द्रष्टि विषयमें विभिन्न मत है। इस सम्बन्ध में बहुत विस्तार से दिपार्णव ग्रंथके अनुवाद प्रकाशन में कोटकादि से स्पप्रिकरण किया गया है। ३५ देवता पद स्थापन विभागमें मिन्न भिन्न मत है । क्षीरार्णव, दीपाव, अपराजित सूत्र, ज्ञान रत्नकोश प्रथोमें गर्भगृहके २८ भाग करके अमुक विभागमें अमुक देव स्थापन करनेका कहते है-देवता मूर्ति प्रकरणम् और समराङ्गण .
90 " * प्रासादमसरी * प्रतिमा स्थापित करनी । पाटडे-भारक्टके आगे सभी देवताओंकी स्थापना करनी । उनसे भी आगे विष्णु एवं उनसे भी आगे ब्रह्माकी स्थापना करनी। गर्भगृहके मध्यमें शिवलिङ्गको स्थापना करनी । १६७ अध प्रतिष्ठा मुहूर्त-पूर्वोक्त (लोकं २७ मे ) कहा हुआ सप्त पुण्याह दिन और प्रतिष्ठा करने से सर्वसिद्धि प्राप्त होती है। सूर्य उत्तरायणमें हो उस समय प्रासादकी प्रतिष्ठा करनी शुभ है । १६८ प्रतिष्ठाके शुभ नक्षत्र-तीन उत्तरा : उत्तरापाढा, उत्तरा फाल्गुनी, उत्तरा भाद्रपद, मूल, आर्द्रा, पूनर्वसु, पुष्य, हस्त, मृगशीर्ष, स्वाति, रोहिणी, श्रवण और अनुराधा इतने नक्षत्रोंको प्रतिष्ठा कार्यमे शुभ जानना । १६९ वर्जनीय-रितातिथि, मंगलवार, नक्षत्रवेध नेप्टग्रह, दग्धातिथि, अपयोग, गंडात योग घर राशि और उपग्रह ये सर्व प्रतिष्ठादि शुभ कार्यमें त्याज्य है । १७० शुभदिन शुभ मुहूर्तमें शुभ ग्रह लममें सौम्य मह देसकर राज्याभिषेक देवप्रतिष्ठा और गृह प्रवेश फराना शुभ है । १७१ प्रतिष्ठामंडप-प्रासादके आगे या ईशान या उत्तर दिशा में प्रासादसे तीन, पांच सात नौ ग्यारह या तेरह दाथकी दूरी पर प्रतिष्ठाके यज्ञमंडपका निर्माण फरना । १७२ यह मंडप आठ दश वारह या सोलह हाथ तकके प्रमाणका समचतुरस करना। पुंडोकी अधिकता के कारण सोल हाथसे भी अधिक प्रमाणका सूत्रधार में ४९ विमाग गर्भगृहके कहते हैं और भी मत दिया है। सूत्रधार करपाल विरचित प्रासाद तिलक में और सूत्रधार राजसिंह विरचित वास्तुराज भंथ ये प्रासाद मखरीफे नाथुजीके मतका समर्थन करते हैं। प्रासाद मंडनमें मूत्रधार मंडन भी यह मन यताते हैं । दोनों भ्रातृके एफी मत है। परंतु मंहनके अन्य प्रथमे मिन्न मत प्रदर्शित किया है। शिव विष्णमादि देव मंदिरों में विधि सहित फधित विभागोमें स्थापित किये गये हैं। उनके पीठे प्रदक्षिणा मार्ग प्रथानुमार रहता है। किन्तु जैन प्रतिमाको पघरानेका विधान शाम्रोक्त विधिसे देखने में आया नहीं है। बडे पड़े जैन प्राचिन तीमिं भी नहीं है। यापन जिनालय या चोरिस जिनालयको देवपुलिफाओं मे फधित भागसे पधरानेका घ्यावहारिक नहीं होता। दूसरे देवोंरे लिये विभागसे स्थापन हो सकता है। जिन प्रभुफे लिये तो विचारणीय है। जिन प्रमु " पट्टायो यक्षभूवाद्या" सूनके आधारसे स्थापना होती है । अठाश रिमाग जो कहे हैं ये अन्य देवोरे लीये ठीक है कहा हुआ दिमाग प्रविमाका फर्ण गर्ममें पादुका गर्भने अधया याहु गर्ममें म्थापन परनेफा शास्त्र प्रमाण है।
91 Prasad Manjari * मंडप करना । १७३ (यज्ञ मंडप वीस गज-हाथका बनाने का विधान तुला प्रदान के विषयमें है । ) तोरणोंसे सुशोभित सोलह स्तंभोके मंडपमें चारों ओर चार द्वार रखना । मडपके मध्यमें वेदिका और पांच आठ या नव कुंड बनाना । १७४ यज्ञकुंडका मान-एक हाथके यज्ञकुंडके तीन मेसलाएं और योनि बनानी । आगम एवं वेद-मंत्रसें विधिपूर्वक देवताओं को आमंत्रित करके यज्ञ होम करना । १७५ दशहजार आहुतियों के लिये एक हाथका, पचास हजार आहुतिओं के लिये दो हाथका, एक लाख आहुति के लिये तीन हाथका । दश लासके लिये चार हाथका, त्रीश लाखके लिये पांच हाथका, पचास लाखके लिये छ हायका, ऐसी लासके लिये सात हाथका, एक करोड आहुतियों के लिये आठ हाथका यज्ञकुंड बनानेके प्रमाण है । १७६-७७ ग्रह पूजा आदि विधान के लिये एक हाथका कुंड बनाना । उसके चार तीन एवं दो अंगुलकी तीन मेखलाएं अनुक्रम से करनी । १७८ वेदी उपर एक दो या तीन हाथका मंडल भरना । ब्रह्मा विष्णु एवं सूर्य के लिये सर्वतोभद्र मंडल भरना । १७९ सर्व देवताओंकी प्रतिष्ठामें भद्रं नामक मंडल भरना । तथा नव नाभि वाला लिलोद्भव मंडल भरना । शिवप्रतिष्ठा में लिगोद्भव तथा ·लतो लिङ्गोद्भव नामक मंडल भरना । १८० सर्व देवीओंकी पूजा प्रतिष्ठामें भद्र मंडल तथा गौरी तिलक नाममा मंडल भरना । तालाब की प्रतिष्ठा में अर्धचंद्र मंडल धनुष्याकार भरना । १८१ स्थपति पूजन-विधिपूर्वक देव प्रतिष्ठा यज्ञयागादि करके सूत्रधार प्रमुख स्थपतिकी सन्मान पूर्वक पूजा करके भूमि, उत्तम प्रकार के वस्त्र, सुवर्ण रत्नादि के आभूपण द्रव्य, गौऐं, दास दासियां, गृह, घोडे आदि वाहन देकर संतुष्ट करना । अन्य कार्य कर्ता शिल्पिओ का भी योग्य रीतिसे पूजन करके अपनी अपनी योग्यता के अनुसार उन्हें वस्त्र भोजन ताम्बुल आदिसे सन्मान करना। १८२-८३ तत्पश्चात् यजमान अर्थात् गृहपतिको मुख्य स्थपति से इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये कि 'हे स्थपते हमारा पुण्य प्रासाद पूर्ण हुआ।" इसके उत्तरमे स्थपति को कहना चाहिये कि-" हे स्वामिन् . आपका कार्य अक्षय हो।" १८४ गुरु मार्ग-देय प्रासाद या राज प्रासाद वा अन्य भवनके निर्माण के लिये सर्व प्रकारका शिल्पज्ञान उसके लक्ष (ध्येय) एवं लक्षणों का अभ्यास गुरु मार्गका अनुमरण करने से प्राप्त होता है। (गुरु शिक्षासे शिल्पके सर्व ज्ञानकी प्राप्ति होती है । ) १८५ 92 * प्रासादमञ्जरी * शिल्पशास्त्र अनेक है-एक शासके अभ्याससे सभी गुणांका विकास नहीं होता है। अन्य प्रथोके अभ्यास के विना कार्यकी सिद्धि नहीं होती है। इस लिये प्रकारान्तर-अन्य मतमतान्तरों का विचार कर विवेक बुद्धिसे कार्य करना चाहिये । जिस प्रकार मणिके गुण जानने के लिये किंकिणी की सहायता लेनी पड़ती है इसी प्रकार महान गुणवान पुरुषोंको तो बहुत प्रधोका अभ्यास मनन करके कार्य करना चाहिये । १८६ इस प्रकार शिल्प प्रयोका संशोधन करके साररूप यह वास्तु - मञ्जर्यान्तर्गत प्रासाद मञ्जरी की श्री क्षेत्र (खेवा) सुत्रधार के पुत्र सूत्रधार श्री नाथजीने रचना की । १८७ इति श्री मेवाडाधिप पृथिवी पति राजमल्लजी राज्ये :सूत्रधार क्षेत्रा ' (खेताका) पुन विविध कला शस्त्रका सुधीर सोमपुरा ज्ञातिय भारद्वाज गोत्रमें उत्पन्न सूत्रधार नाथजीने यास्तुमारी के प्रासादाधिकारके दूसरा स्तबक का निर्माण किया । पादलीप्तपुर (पालीताणा) स्थपति प्रभाशंकर ओघडभाई शिल्प विशारद । सोमपुरा ज्ञातिय भारद्वाज गोत्रने इस प्रासाद मञ्जरी पर गुर्जर भाषान्तर कर सुप्रभ नाम्नी भापा टीकाकी रचना की जिसका राष्ट्रभाषा हिन्दीमे पुनः अनुवाद सोमपुरा भारतेन्दुने किया ।
मनसतान-अपराजित विविध ग्रंथोके मतानुसार देवद्रष्टि स्थान दर्शक कोष्टक दीपार्णय यास्तुविधा प्रतिष्ठामार घास्तुसार ठकुर क्षीराणघ दी. धसुनंदी फेर प्रासादमडन प्रासादमारी - २ शिवलिङ्ग दिगम्बराचाय २ शिष-शक्ति ठक्कुर फेरु पास्तुसार -शिवलिङ्ग स्वरुप तत्वो- -शिवलिङ्ग- प्रासाद मंडन मत द्वारोदय १ शिवलिङ्ग उ ३ २- १क्षा ब १० सूर्य करके ४मधा - <- अनुर पुत्र रचना गर्भगृपना मध्य गमें शिवलिंग गभगृहना मध्य गर्भ शियलिन १० विभप, उमा गर्भगृहाध का पांच भाग गर्भगृहाथ का २८ माग करके देवता पद स्थापन । अग्नि पुराणके मत से गर्भ गृहका छ भाग करके पीछेका १ भाग June आठ भाग करके पीछेका १ भाग त्याग कर गर्म गृहार्यका ४९ भाग करके देवर ९ विष्णु एमासन फ उत्सम मास्य-पराह ८ दशावतार उमा शिय शेषशायी ७ प्रामा सावित्री सरस्वती दिर ण्यगर्भ मिथयुग्म ६ कार्निकस्यामि ৫ নায়ি ४ सावित्री ३ नफुटीश २ हेमगम, शालिन ग्राम, मक्षा गर्भगृहाना पीछा पाट वीमकी नव विभाग ब्रह्मांश ब्रह्मा विष्णु स्थापन १६ विभाग मानुशार 1 । । । ।।।।।।।।।।।।।।।।।।। गर्भगृहका मध्य गर्भ शिलिम . गर्भ गृहका गर्भ गृहके मध्य गर्भ शिलिम मध्य लिङ्ग मध्ये शियलिङ्ग एफ हस्तः गजसे पचास गज तकके प्रासादका कूर्मशिला, जगती मीट, पीठ, उदयमान, द्वारमान, स्तंभमान, सडी, वेठी प्रतिमाके प्रमाणका कोप्टक कूर्मशिला जगती प्रमाण मीट्टमान पीठमान प्रासादोदय प्रतिमा मान ਬ घेठी सडी पृथुमान प्रतिमा प्रतिमा द्वारमान पापाण दीपाव प्रा. म. दीपाव श्रीरामव दीपार्णव आंगुल आंगुल हाथ आं. ग. आ. आंगुल ां. ग. आं. ग. आं. ग. आं. ग. आं. आंगुल ग. आ. ग. आं. ०-२१ ०-३१ १३॥ १-३ १ गज | ओ. ४ १ गज 0-१२ २ गज १ आं. ६ १-१२ ३ गज १॥ आं. ९ २-० ४ गज २ आं. १२ २-१२ २॥ आं.१२॥ ३-० २-१२ ६ गज ३ आं. १३॥ ३-१२ ७ गज ३॥ आं. १४॥ ८ गज ४ आं. १५ ९गज ४ा आं. १५।। ५-० ४-१२ १० गज ५ आं. १६॥ ५-१२ ५-गज आं. २२ ३० गज ११॥ आं. २५।। १२-० ११-० ४० गज २२ आ. २७॥ १४-१२ १३-० ५० गज १४ आ. २८॥ १७ गज १५-० ०-१२ ४ा १-८ ६ -२२ ३-० २-० ५|| ७ २-३ ६ ८ २-२० ६॥ ८॥ ५-१२ ३-० ७ ९॥ १-१६ ७॥ १०॥ १-२० ६-१२ ३-८ ८ ११ ३-१२ ३-६ ८11 ११॥ २-४ ७-१२ ३-१६ ३-८ १३॥ १६।। ३.१० १२-५ १८॥ १९॥ १६-१० ५-२८ ५-० २३॥ २१॥ ४-२२ २०-१४ ६-४ २८॥ २४॥ ५-८ २४-१८ ६-१४ ६-१६ १.२१ १-२३ १६॥ १-९ १८ १.-१२ १९॥ २-३ ३२।। २.-१४ ३-१० पंचायतन देवोकी देवकुलीका स्थान । वायव्य चंडी आयतन सूर्यायवन गणेशायतन चैष्णवायवन चंडयायतन शिवायतन विष्णु ईशान शिम सूर्य सूर्य विष्णु विष्णु अग्नि गणेश चंडी गणेश शिम EEEEEE नैऋत्य विष्णु शिव शिव गणेश गणेश चंडी सूर्य गौरी । सूर्य Mand LA पंच्यायतन गणेश विष्णु सूर्यायतन चंडी १२ अUR शित 12 re যায় 50 शिकायतन विष्णु UT PAL CHAYATAN विष्णु सूर्य वैष्णवायतन चढी गौरी गणेश