Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner

Mahila Gaurav

Shastri,vrandhawan · 2011/04

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उप गई।
छप गई।
उप गई!
एक अमूल्य पुस्तक
निवन्ध-कौमुदी
.
.
द्वितीयावृत्ति
( गोपालचन्द्र देव)
इसमें रत्न, भूपण, मिहल, मैट्रिकुलेशन, विशारद
और ऐफ० ए०परीक्षा में आए हुए तथा अपनी ओर से भी
बहुत से निबंध, पत्र, लेख, मुहावरे, लोकोक्तियाँ आदि
परीक्षोपयोगी विषय विस्तार पूर्वक दिए गए हैं। साथ
ही निबंध लेखन और शुद्ध लेख पर यहुत. सी महत्त्वपूर्ण
यातें बतलाई गई हैं। भापा अत्यन्त सरल है। निबंध
के पत्र के सभी विषयों की तैयारी करवाने वाली एक
ही पुस्तक की आवश्यकता बहुत दिनों से अनुभव की
जा रही थी। विद्वान् लेखक ने पड़े परिश्रम से इसे
तैयार किया है। कागज पहिया, छपाई सुन्दर । प्रत्येक
विद्यार्थी को इसकी एक प्रति अवश्य अपने पास रखनी
चाहिए । मूल्य ३) विद्यार्थियों से कमीशन काटकर २॥),
व्रतीभ्राता
पुस्तक-भंडार'
गणपत रोड, अनारकली, लाहौर
प्रकाशक
.

महिला-गौरव
लेखक
पृन्दावन शास्त्री, ऐम०ए०, ऐम्०
(भूतपूर्व प्रोफेसर, पार० ऐस० डी० कालेज, फीरोजपुर)
प्रकाशक
व्रतीभ्राता
गणपत रोड, अनारकली, लाहौर
द्वितीयवार
सन् १९४३

प्रकाशक
(व्रतेन दीक्षामामोति)
श्यामचन्द्र विशारद, प्रभाकर
प्रतीभ्राता, गणपत रोड, लाहौर
भूपण के छठे पत्र में पास होना चाहें तो
निवन्ध कौमुदी
(दूसरा संस्करगा)
आज ही मंगवाएं
भृपण के लिए
निवन्धों की ऐसी अमुल्य
बड़ी पुस्तक आज तक
नहीं निकली थी
इसमें नियन्ध लेसन-कला, शुद्र-लेसन, अनुच्छेदन-लेखन
रिक्त स्थानों की पूर्ति, शब्द-ज्ञान, कहानी-लेखन आदि सभी विषयों
के साथ साथ भूपण में पूछे गये तथा अपनी ओर से भूषण में सन्
११४४-४५ और ४६ में पूछे जाने वाले निवन्ध लिये गये
ह। साथ ही लोकोक्तियां-मुहावरे, पत्र आदि राय विषय दिये गए हैं।
लेखक-श्री गोपालचन्द्र देव
मुल्य ३) परीक्षार्थियों से कमीशन काटकर २॥)
आज ही इस पते पर पत्र लिखकर मंगवाएं
प्रतीभ्राता-पुस्तक-भण्डार, गणपतरोड, लाहौर
पत्र ७ से ३८ तक श्रार्य प्रेस लि०,मोहनलालरोड लाहौर में तथा शेष
संकपूर द्वारा पंचनद प्रेस.शिवाजी रोड.शाहदरामें मुद्रित ।

दो शब्द चरित्र की महत्ता इस बात में नहीं कि उसने किसी आदर्श का कितना अनुकरण किया है, अपितु इसमें है कि वह अपने आप में कितना मौलिक है। मौलिक भी ऐसा कि उसे देखकर अपने पराये मभी श्रद्धा से झुक जाएँ। जिस प्रकार कला में अर्थात् सुन्दरता, कोमलता, मधुरवाणी और मुकुमारता में मी-जाति पुरुषों से बहुत आगे है, उसी प्रकार चारित्रिक महत्ता में भी महिलाओं का गौरव कुछ बढ़ा-चढ़ा ही हैं। यही कारण है कि महिलाओ को मनुष्य जाति का उत्तम अंग कहा जाता है और आदर के लिये उनका नाम पुरुषों से पहले लिया जाता है । 'रामसीता' किसी के मुख गे कभी नहीं सुना, सभी 'सीताराम' कहकर कृतकृत्य होते हैं । स्त्री-जाति के आदर्श की उत्कृष्ट प्रतिमा सीता हमारी आराध्य देवी है। किसी भी महिला के चरित्र का अवलोकन करते समय 'सीता' का म्वरूप सामने उपस्थित हो जाता है, अतः सीता का पृथक् वर्णन न होते हुए भी उसे मय आदर्श- चरियों में व्याप्त ही समझना चाहिए। इस पुस्तक में शैव्या, विदुला, यशोधरा आदि महिलाओं के जिन गौरव-पूर्ण कार्यों का उल्लेख है, उनसे स्त्री-जाति को ही क्या समस्त मानव- ममाज को विशेष स्फूर्ति तथा अपरिमित आचरण-दल मिल सकता है। प्रस्तुत पुस्तक में विद्वान् लेखक ने महिलाओं के जीवन की घटनाएं मात्र न देकर उनके चरित्रों का मनोवैज्ञानिक, वैयक्तिक और सामाजिक विशेषण किया है । अन्य का व्यर्थ कलेवर न बढ़ाते हुए तत्त्व निरूपण पर विशेष ध्यान रखा । यह इस पुस्तक की बड़ी विशेषता है। कुछ भाषा के सम्बन्ध में भी । आजकल गद्य शैलियों के विकास की कमी का एक विशेष कारण यह है कि प्रायः लेखक अपने गद्य को परिमार्जित तथा सुसम्बद्ध बनाने का प्रयत्न नहीं करते। यह बात नहीं कि कर नहीं सकते, प्रत्युत कुछ प्रमाद ही समझना चाहिये। पर 'महिला- गौरव' में लेखक ने बड़ी सावधनता से भाषा को उदात्त बनाया है दृढ विश्वास है कि इस पुस्तक के अध्ययन मे पाटकों का गद्य उच्च बन गकेगा। F .

विषय-सूची
१. शव्या
१६:
३७-४५
२. विदुला
३. यशोधरा
५. विद्याधरी
५. पद्मा
६. दुर्गा
७.राजयाला
८. पन्नाधाय
...
..
६. अहिल्याबाई
१०. कमला नेहरू

माहिला और शैव्या सतयुग के चन्द्रवंशी राना वीरसेन को गरिमामयी पुत्रौ शव्या फा भादर्श परिन युग-युग को बियों को गौरवान्वित करता रहेगा। जिस प्रकार प्रातःस्मरणीय गमचन्द्र तथा सीता को गाथा घर-घर में प्रतिपल गाई जाती है, उसी प्रकार रामचन्द्र के पूर्वज सूर्यवंशीय सत्यवादी महाराज हरिश्चन्द्र तथा उनकी पत्नी शव्या का यशोगान सर्वत्रं सदा हुआ फरता है। महाराज हरिश्चन्द्र की सत्यवादिता तथा दानशीलता की महिमा सुनकर वीतराग ऋपि-मुनियों तथा इन्द्र आदि देवताओं में भी राग-द्वेष का संचार हुआ । सत्यवादी हरिश्चन्द्र को परखने की अथवा नीचा दिखाने की लालसा तीन हो उठी। उन्होंने प्रचण्ड- प्रकृति विश्वामित्र को इस कार्य के लिये प्रेरित किया । महाक्रोधी विश्वामित्र के सन्नद्ध होते ही सारा विश्वमण्डल फॉप उठा। + एक समय ऋतुराज वसन्त का एकाधिकार था। नये नये पत्ते, फूल और नई नई लताएँ राजकीय उपमन की शोभा बढ़ा रही थीं।

मालागाय की फोयहा गारमी थी, कही अतिमह ज थे। गोला, मन्द, सुगन्ध वायु के गाँफे कोमल शाखामों एवं मुमार लाताओं से घटापलियां कर रहे थे। रमणीयता तथा सौगम से -उपवन में, मादकता का संचार हो रहा था। इसी उपयन के एक सुम्य भान- वृक्ष के नीचे सुन्दर मंच पर बैठे हुए महारान हरिचन्द्र पुध, सोच रहे थे। इतने में एक प्रोर से उपयन सामग्री सौ, अपने. घालोक से सारा उद्यान गमगानी हु, महारानी शैन्या आई। उन्हें याते देख महागज हमिन्द्र पुच्च पुष मुस्कराए। फिर उन्होंने उठकर शैव्या फोअपने याम पार्य में बिठाना चाहा; किन्तु राज्या तुरन्स ही उनके चरणों में प्रणाम करफे नीचे यठ गई और उसने यो कहना थारम्भ किया- हे नाथ, नारी का नारीत्व स्वामी के चरणों में है। स्त्री को- सधा प्रेम-रस पति-सेवा से ही मिल सकता है। खी का मन स्थामी की पूजा फरफे ही धन्य होता है और पति का दय पत्री फो प्रेम देकर पश्चि होता है। पास्तविक प्रेम यही है, शेप तो घासनाएँ है । जहां वासना होती है यहां सुखकर प्रेम का अस्तित्व नहीं रहता। यौवन की उमंग का फामनारूपी प्रेम प्रेग नहीं पहला सकता । वह तृपया तो असत्य है। यह ऐसी अग्नि है कि जिसका परिणाम राख और फालिस है । उसमें स्वच्छता और मधुरता नहीं। है स्यामिन् , आप सब कुछ जानते हैं, मैं अकिंचन आपको क्या यता सकती हूँ। आपके सत्य का, आपकी महत्ता का यश दिग्-दिगन्त में प्रकाशित हो रहा है, आपसे कुछ पहना तेज:पुंज सूर्य को टिमटिमाता दीपक दिसाना है; किन्तु अर्धाङ्गिगी होने के नाते मैं भी तगिक प्रार्थना करने का अधिकार -- बाध्या - रखती हूँ। हे प्रभु, पाप छम-मय हैं, श्राप प्रजा-पालक हैं, आप फर्तव्य-अपर्तव्य को जानते हैं, तो भी वासना ऋषि-मुनियों तक को मत्त बना देती है। हे पतिदेव, श्रापको कीति प्रापफे अनेक ईयालु उत्पन्न कर सकती है। वे लोग आपको फष्ट पहुँचाने के लिये और आपके दुग्धवत् श्वेत यश में कालिमा लगाने के लिये भरसक प्रयत्न करने से न चूकेंगे । तब यदि हम वासना के वशीभूत होकर सच्चे प्रेम को भूले हुए होंगे तो उन बाधाओं का सामना न कर पाएंगे, इसलिये देव, मैं आपमें वासना का प्रभाव देखना चाहती हूँ। तब आप मुझे बहुत ऊँचे दिखाई देंगे। तभी मेरा मन सच्चा प्रेम पाकर प्रफुल्लित हो सफेगा । इस पिशाचिनी पासना का तो कोई अन्त ही नहीं। आप मुझे साथ लेकर ऋतुओं के अनुसार पर्वत को हरी-भरी चोटी पर, निर्मल-सलिला सरित के तौर पर, कमलों से सुशोभित सरोवर के किनारे पर अथवा इस प्रकार के रमणीक उद्यान में, कहीं भी जाएं! आपकी वासना मिट नहीं सकती, क्योंकि सुख निवृत्ति में है, प्रवृत्ति में सुख और शान्ति कहां? कुछ सोचकर शैव्या ने फिर कहा-स्वामिन् , अध्ययन किया है अथवा गुरुजनों से सुना है, उसका यही सार है फि स्वामी फे चरण ही मेरे लिये परम तीर्थ है। हे प्राणाधार, मुम्म अवला को शक्ति दो कि मैं वासना छोड़कर इस तीर्थ से अमर फल पा सकू। इतना कहते फइते उसकी आंखों से टप-टप कर यासू बहने लगे, जिनसे राजा के चरण भीग गए। उन्होंने शैव्या को गले लगा लिया और कहा कि हे भरे, श्राज मेरी आँखों के आगे से वासना का शंधकार दूर हो गया है। मैंने जो कुछ + महिला गौरव 'तमोमई अज्ञान अन्धेरी दूर भई प्रभु के गुण गायो। ज्ञान अरुन फो उदय भयो अब भय न पछु निर्भय यन जाभो।' फिर दोनों महान् आत्माएं उठकर धीरे धीरे महलों की ओर चली गई। + + आज रोहिताश्व फे हर्ष का पारावार नहीं । उसका गुरु के समीप जाने का निश्चय हुधा है। वह भी अन्य चालकों की भान्ति कुछ पढ़ेगा, कुछ स्मरण करेगा, कुछ लिखेगा । जब पढ़फर माता शव्या के पास आयगा तो उसे पाठशाला का सारा वृत्तान्त सुनायगा; जिसे सुनकर पिता जी भी अतीव प्रसन्न होंगे। यह सोचता हुना रोहिताश्व पिता जी की ओर चल पड़ा । पर यह क्या ! वहां माता तथा पिता दोनों सिर नीचा किये बैठे हैं ! चुपचाप, सर्वथा स्तब्ध ! रोहिताश्व का विकसित भानन पुछ उतर सा गया। फिर भी वह साहस करके पिता जी की गोदी में जा चढ़ा। महारानी शैव्या तनिक मुस्कराई; महाराज हरिश्चन्द्र ने प्रिय पुत्र का मुँह चूम लिया। कुछ देर और चुप्पी रही, फिर शैव्या ने कहा--पतिदेव, इसमें अधिक सोचने की क्या बात है ? यदि आप उचित समझते है कि स्वप्न में दिया हुआ दान भी देना ही चाहिये तो अवश्य दीजिये । यह राज्य क्या वस्तु है, यदि सत्य के लिये सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का राज्य भी देना पड़े तो हमें दे देना होगा। महाराज ने कहा-यह तो ठीक है, पर मैं इस चिन्ता में हूँ कि स्वप्न फे ब्राह्मण को किस प्रकार ढूंढा जाय । अच्छा, मैं दूतों को चारों ओर भेजता हूँ और उस जटाधारी लाल लाज नेत्र वाले स्वप्न-दृष्ट ब्राह्मण को खोज मंगवाता हूँ। इतना कहकर रोहिताश्व से दो-तीन सरस बातें --- परफे महागज हरिशन्द्र पने गये। शेव्या रोहिताश को गोदी में लेकर सहलाने लगी। ६५ महासमिन्द्र ने राजदरबार में पहुँचकर पतुर दुर्गा को युनाकर स्वा में देखे हुए शोधो प्राण की प्राप्ति समझाफर कहा कि उसे किसी न किसी प्रकार हूँटकर बड़े सम्मान सहित यहां ले पात्रो । ये इस प्रकार सममा ही रहे थे कि इतने में एक भाटाधारी पुरुष या उपस्थित था। महाराज फो पाचागते देर मगी। यह यात्रा में देखा हुमा प्राय हो या। उन्होंने तुरन्न सिंहासन से उठकर इस प्रण को प्रणाम किया और पहा- प्रमो, विराशिये, यह पास है। प्राण और फोई नहीं था, फौशिक विश्वामित्र मुनि धे। उन्होंने शोध में नेत्र लाल फरफ पहा-ठने फा समय नहीं है, तुमने मुझ साग राज्य दान में देने का निश्चय किया है, अब देर क्यों करते हो ? महाग ने उत्तर दिया - महामुने! यह सेवा प्रस्तुत है, यह गज्य आपका है. इस पर श्रय मेग घुछ भी अधिकार नहीं, यह कीजिये गज्य दण्ट। इतना कहकर महाराज सिंहासन से नीचे उतर आये और राज्य-दण्ड विश्वामित्र के हाथ देकर कहने लगे- श्रामा दीजिये, मैं स्वस्थान मा विश्वामित्र ने कुछ क्षण तक मन में सोचा-सा सास्यिफ महापुरुष है, राज्य दान करते तनिक भी देर नहीं लगाई; पर इससे क्या ? इस श्रात्माभिमानी का गर्व चूर कर के हो छोडूंगा। यह सोचकर विश्वामित्र ने कहा-पाशा कैसी ? क्या दान अधूरा ही दोगे ? इस दान फी दक्षिणा कहां है ? महाराज पहले तो कुछ पाये, फिर उन्होंने मन्त्री को बुलाफर - . महिमा पदा-गात्पर्य, गायकोष में महागुनि को एक सहल रंगा- मुद्रा दक्षिणा कप में दे दो। इतना गुनते हो दान पीसते हुए विवामित्र ने गुस्से में कहा-'अमात्यर्य, गज्यकोप से महामुनि , को एक सदर यमुना परिश-रूप में दो, धमाया से देगा ? क्या राज्यकोप सेग? तू नो मझे सारा गज्य दान में दे गुका है, फिर कोप पर किमी का यया अधिकार ? यदि दान देकर होटाना ही था तो दान दिया ही क्यों था? क्या सो यलपूते पर सत्यवादी पदालाना ? जा, हम तेग दान नहीं लेते। विश्वामित्र थे ऐसे बचन सुनकर महाराज ने पहा-भगवन धमा फरो, अपराय हुआ, मैं भगवश विपथगागी हुमा । श्राप मुझे एक मास की अवधि दें। मैं इतने समय में एक सय मुद्रा अवश्य प्रस्तुत कर दूंगा। 'तू कहां से प्रस्तुत फरेगा ? अच्छा देखते हैं, तू अपने धरन पर कहां तफ रद रहता है। देसना, यदि एक मास फे भीतर भीतर चूने यह ऋण न चुकाया तो मैं तुझे घोर शाप दूंगा।' मुनि फे. इस प्रकार कहने पर महाराज ने विश्वामित्र को प्रगाम फरफ आशीर्वाद मात पर महलों की ओर प्रस्थान किया। F + + विकट परिस्थिति यो । शैव्या को भी कोई मार्ग नहीं सुगना था। वह महाराज को सान्त्वना देती, धीरज बँधाती और धर्म पर दृढ़ रहने के लिये प्रोत्साहित करती। पर महाराज को एक सहस्त्र मुद्रा देने के लिये कोई उपाय दिखाई न देता था। उन्होंने शव्या फो नैहर जाने के लिये कहा। पर संपत्ति-विपत्ति की संगिनी शेव्या इस विपत्ति काल में किसी प्रकार भी संग छोड़ने को तैयार -१२- . गहुई। उसने पाहा-मुझे घेचकर आप अपने प्रण से उगा हो जाएं । महाराज पर यन्त्र को सी चोट पड़ी। उन्होंने कहा- तुम महारानी, तुम्हें घेचूं, चिः! घृणा को भी गुफ पर घृया पाती होगी; तुम यह क्या कहती हो! पर शव्या ने दृढ़ता- पूर्वक कहा-नाथ, पाप खिन्न न हों। पत्ती का धर्म पति के लिए सदा अपने आप को प्रस्तुत रसना है । आप मेरे चिकने से व्याकुल होते हैं ! यदि मेरा अंग-अंग फाटफर भी घेचना पड़े तो श्राप येच डालिये, मैं तैयार हूँ। मैं अपनी पवित्रता को सुरक्षित रखने में पूर्णतया समर्थ हूं। जिसफे हाथ पियूँगी उसे पहले ही प्रतिज्ञात कर लूंगी कि जूठा भोजन न करूंगी और पर-पुरुष से सम्भापण न करूंगी। हारकर हरिश्चन्द्र शैव्या और रोहिताय को लेकर काशी पहुंचे। सच है मनुष्य के जीवन में गम कोई प्रश्न उठना है, कोई दुविधा उत्पन्न होती है, फोई विपत्ति श्राती है, तप साध्वी पत्नी उसके हृदय में असीग उत्साह और धैर्य उत्पन्न कर देती है। उस समय पुरुप में एक विशेष यज्ञ का संचार हो जाता है । यह फगर फसकर आपदाओं का सामना करने के लिए तत्पर हो जाता है, रोहिताश्व को गोद में उठाए हुए शेज्या पति के लिये अपना विनय करने निकली । यहुतों ने खरीदना पाहा; किन्तु शतें सुनकर सय हाथ पीछे हटा लेते थे । अन्त में एक प्रारमण ने महाराज हरिश्चन्द्र को पांच सौ मुद्रा देफर शैव्या फो खरीद लिया। रोहिताश्य को शव्या साथ ही ले गई। धाधी दक्षिणा का प्रबन्ध हो गया, अब आधी काहां से पाये, अवधि समाप्त होने में कुछ ही दिन शेप रह गए। कोई उपाय: देखकर महाराज हरिश्चन्द्र पांच सौ मोहर लेकर शशान सेयक महिमा गोरय पाएढाल फे हाय पिक गए। इस प्रकार उन्होंने एक सहसा मोहर फो क्षतिमा पुकाई । पर विश्वामित्र को अभिलापा अभी पून । पन्होंने गदाराम को और अधिक होत पगैमाग्नि में डालना + + । पारद्वाल की आशानुसार हरिश्चन्द्र रातदिन श्मशान में रहने लगे। जो कोई शय को दाद-क्रिया करने माना, समसे पापा फफन ले लेते, फिर दाह-क्रिया फरने देते । एक सम्राट् फे लिये इससे अधिक कठिन परीक्षा और क्या होगी ? पर सत्यशादी प्रगावीर हरिश्चन्द्र अणुमात्र भी विचलित न हुए। विश्वामित्र फे प्रेरित कई व्यक्ति आ-आफर उन्हें प्रलोभन देते थे ; फिन्तु हरिश्चन्द्र सुदृढ शिलासरह की भांति स्थिर रहते । दृढ़ता का ऐसा उदाहरण मिलना कठिन है। पति ने सब कहा है कि- 'चन्द्र टरै सूज दर, टरे जगत व्योहार । हद-प्रत हरिचन्द फो टन सत्य विचार ।' विधाता को अभी कुछ और ही स्वीकृत था। अपने स्थानी उपाध्याय के लिये फूल चुनने गए हुए राजपुत्र रोहिताश्व फो विषधर ने डस लिया। शैव्या का हृदय टूक-टूक हो गया। विपत्ति पर विपत्ति सह ली थी; किन्तु ऐसी महाविपत्ति को सहना पन- हृदय के लिए भी असह्य होता है, फिर फोमल मन वाली शैव्या इसे फेसे सह पाई, यही माश्चर्य है। शैव्या शैव्या ही थी, ऐसी धोरा महिला धन्य है । यह असहाया रोती-विजखती रोहिताश्व फो अपने पांचल में लपेट जलाने चली। जिसके आगे-पीछे सैकड़ों दास-दासियां घूमती फिरती थी, जिसके एक इंगित पर .

-- छ फा कुछ हो जाता था, जिसके दिए हुए वस्त्राभूपणों से अनेफा- नेक व्यक्ति समृद्धिशाली धनते थे, वही आज निराश्रित अवस्था एकाकी बिना शव-वस्त्र के श्मशान में जा रही थी, उसे देखकर सदन को भी रोना आता था । श्मशान में हरिश्चन्द्र अपनी अर्धा- गिनी का विलाप सुनकर चौंक पड़े। उनका दिल धड़कने लगा। बुरी आशंका से उनके रक्त का वेग तीन हो गया। पास जाने पर पुत्र रोहिताश्व का मरण जानकर उनके पांव तले से भूमि खिसक गई, उन्हें चफार आने लगा। चे गिरने ही लगे थे कि उन्होंने अपने को संभाल लिया। फिर तुरन्त ही आत्महत्या कर लेनी चाही; किन्तु उसी क्षण यह विचार आया कि तू पराया क्रोत-दास है, स्वतन्त्र नहीं, तुझे स्वयं मरने का क्या अधिकार ! फिर उन्होंने सनिक सावधान होकर रोते-रोते, विलाप करती हुई रानी से, प्राधा फफन मांगा। शैव्या ने स्वर और प्राकृति से पति को पहचान फर कहा-हा देव, इतने दिनों तक कहां छिपे थे ? देखो, अपने गोदी के लाल प्रिय पुन फी दशा! हरिश्चन्द्र ने कहा--प्रिये, धैर्य धरो, यह समय रोने का नहीं है । देखो, सवेरा हुआ चाहता है। ऐसा न हो कि कोई आ जाय और हम लोगों को जान ले, फेवल लन्ना बची है, वह भी नष्ट हो जाय । चलो, हृदय पर पत्थर रखकर रोहिताश्व को दाह-क्रिया करो और आधा फफन मुझे दे दो। शैव्या ने रोते हुए कहा-स्वामिन् , मेरे पास तो एफ भी वध नहीं था, अपना आँचल फाड़कर इसे लपेट लाई हूं, यदि उसमें से भी आधा दे दूंगी, तो यह सुला रह जायगा । हाय! आज सम्राट सुन फो कफन भी नहीं मिलता! यह सुनकर हरिश्चन्द्र की आँखों से अश्रु को नदी वहने लगी ; पर उन्होंने किसी प्रकार

গছিলাম
धोरम परपर पहा-पिपे, विलाप मन परो। मैं जिसका दाम
हूँ इसको आशा मानना मेरा पग कर्नर है, इसीलिए में पाया
कफन मांगता हूँ। शेष्या में प्राकका पहा--गाय, आपका
धीरज धन्य है, पापणी गोमाशा, यह बोलिये माथा फन । यार
फहकर शव्या थापा फफन फाइने ही सगी थी कि विश्वामित्र मुनि
अपने साथियों सहित का पहुंचे। उन्होंने सहा-स, भद्रे, पस।
आप दोनों धन्य है, या फेवल पापको कीर्ति मा स्थिर रखने
के लिये ही मैंने छल रखा । थाप मुझे छमा करें और
थपना राज्य संगालों । पुत्र रोहिताश्व को मृत्यु नहीं हुई, पर
जीवित है। इनका पहका प्रहोंने गेहिताश्व पर बल दिएका ।
रोहिताश्व तुरन्त उठ ठा। चारों ओर महागज हरिश्चन्द्र और
शव्या का जय-निनाद होने लगा। भारतीय देवियों के ऐसे ही
चरित्रों से भारत आज तक जीमित है।
-
व्याकरण जैसे कठिन विषय का हँसते हँसते मान पाने
के लिए
व्याकरण-तच्व
पढ़िए
इसमें हिंदी का सारा का साराव्याकरण प्रमोत्तर रूप में
भन्छे ढंग से समझाया गया है।
भूपण, मिडल, मैट्रिक प रस सब के लिए उपयोगी।
मूल्य 12)

विदुला अाजकल जिस प्रान्त को सिन्ध नाम से पुकारा जाता है, घही प्राचीन काल में सौवीर नाम से प्रसिद्ध था । सौवीर देश का अञ्जन बड़ा प्रसिद्ध था। आज भी सौवीराजन नाग से सुरमा विकता है। सौवीर देश की राजधानी रोरुक थी, जिसे आजकल रोहरी या रोहड़ी के नाम से पुकारा जाता है। उस समय सिन्ध नदी के पार का प्रान्त सिन्धुदेश या सिन्ध पहाता था। यहां के सैंधव अर्थात् घोड़े बहुत प्रसिद्ध थे । सिन्ध देश और सौवीर देश दोनों के राज्य पृथक् पृथक् थे, और दोनों राज्यों का कभी कभी युद्ध भी हो जाता था। सौवीर और सिन्धु फे वीर योद्धा अपने रगा-कौशल में प्रसिद्ध थे। महाभारत के युद्ध को हुए प्राज ५००० वर्ष से ऊपर हो चुके हैं, तो भी सौवीर देश की वीर रानी विदुला का नाम श्राज भी भारत की महिलाओं में अपना विशेष स्थान रखता है। महा- भारत में विदुला की कथा कुन्ती ने श्रीकृष्णा जी को सुनाई थी। इससे यह निश्चय होता है कि महाभारत के समय में भी महारानी विदुला की यशोगाथा भारत के कोने कोने में फैल गई थी । त्रियां, विदुला का उदाहरण सुना कर, अपने रण-भीर पुत्रों को उत्साह दिया करती थीं। फुन्ती ने भी श्रीकृष्ण द्वारा, इस कथा को यह 35 हुआया। nituratri फा, अपने भाभीर पुत्रों को, गा परफे अपना प्राधा राज्य प्रात . करने का साहयक मन्देश भेजा गा| पागदयों ने माना पा निदेश पाकर युद्ध किया और भय पाई। श्रीकनगा जी फो पुन्नी ने गिदुना का जो चरित्र सुनाया था, यह इस प्रकार है- सीऔर देश प्राचीनकाल से ही प्रसिद्ध है। इस देश का नाम महागनी विदुला के कारगा और भी प्रसिद्ध हो गया है। प्रम घंश में उत्पन्न हुई, गजामागे विदुला को उस माता-पिता ने पचपन से ही सप प्रकार को प्रायश्यक शिक्षा दिलाई थी। यह व्याकरगा, साहित्य, गजनीति, तथा युद्धविधा में अच्छी पुशल थी। उसका विवाह सोयोर देश के महारामा महाराज अपनी पत्नी से राजकाल सहायता लिया करते थे। पद बुद्धि और चतुराई से राज्य के बड़े बड़े संकटों को टाल देती थी। वह राज्य-प्रयन्ध में जहां महाराज को पूरी पूरी सहायता देती थी, वहां अपनी स्वामिभक्ति से अपने गृहस्थ को भी स्वर्ग चनाये हुए थी। समय पाकर इनके एक पुत्र हुश्रा। उसका नाम संजय ग्या गया। संजय की शिक्षा का पूरा प्रबन्ध किया गया। उस समय फी पद्धति के अनुसार धनुविद्या में पूर्ण शिक्षा प्राप्त करना क्षत्रिय चालय के लिये आवश्यक समझा जाता था। संजय ने धन्यान्य शास्त्रों के साथ धनुर्विद्या में भी अद्भुत पुशलता प्राप्त की। उसकी विशाल भुजाएं, बड़े कठिन से कठिन धनुष को चढ़ा सफनी थी। उस वीर की हुंकार सुनकर शत्रुओं के हृदय फाँप उठते थे। संजय के साथ युद्ध करना सुगम न था। उसकी वीरता की धाक सब विदुला ओर फैल गई थी। उसफा विवाह एफ मुन्दरी गुणावतो क्षत्रिय पन्या से कर दिया गया। संजय अभी युवा ही था कि उसके पिता का स्वर्गवास होगया। राजनियम के अनुसार पुत्र राज्य का नत्तराधिकारी बनाया गया। संजय सिंहासनारूढ़ हुआ। राजकार्य के प्रबंध में उसने कुशलता दिखलाई ; परन्तु कुछ ही दिनों में कुसंगति का दोष लग गया। यह शीघ्र ही भोग-विलास के जीवन में लीन हो गया। उसे अपने राजकार्य का भी ध्यान न रहा । धीरे धीरे उसके राज्य में हो अन्दर पड्यन्त्र होने लगे। राजा को विलासी देखकर सिन्धु देश के नरेश ने सौवोर देश पर चढ़ाई कर दी। देश पर एक दम श्राक्रमण हुआ देखकर संजय हीनयुद्धि हो गया, उसने इस अका- स्मात् आई हुई विपत्ति को सोचा तक न था। युद्ध का आह्वान सुनफर संजय, क्षत्रिय धर्म के अनुसार युद्ध करने को उद्यत हो गया। उसने अपनी सेना को शीवता से एकत्र फिया और वह युद्धस्थल में जाफर युद्ध करने लगा। पर सिन्धु नरेश की सेना संख्या में बहुत अधिक थी। वह पहले से हो तय्यार होकर आई थी। इसलिये उस सुसंगठित सेना के साथ, संजय की अस्तव्यस्त तथा प्रसुसजित अल्पसंख्या वाली सेना का युद्ध कय तक चल सकता था। युद्ध अभी श्रारंभ ही हुश्रा था कि संजय हतोत्साह होगया। यह युद्ध से पीठ फेर घर की ओर भागा और उसने सीधे अपने राजमहल में आकर शरण ली। इधर संजय की माता विदुला शत्रु का आक्रमण सुन फर सैन्य. संग्रह कर रही थी। उसे प्राशा थी कि संजय को सहायता के लिये वह सहस्रों सैनिक थोड़े ही दिनों में भेज सकेगी।

महिला गौरव भरे शब्दों में देश-रक्षा के लिये उत्साह देकर सहस्रों सैनिकों को सेना में भरती फरा चुकी थी। सेना के लोग राज्य-रक्षा को शपथ लेकर आये थे। सभी क्षत्रिय इस समय शस्त्रास्त्र विद्या जानते ही थे। महारानी विदुला जम राज्य रक्षा के लिये इस उद्योग में लगी हुई थी, तभी उसे यह दुखदायफ समाचार मिला कि उसका पुत्र, देश का राजा, युद्ध से पीठ दिखाफर भाग पाया है। वह वीर क्षत्रागी इस कुसमाचार को सुनकर कैसे चुप रह सकती थी ? घस तुरन्त संजय के महल में पहुंची और अपने हताश हुए पुत्र को इस प्रकार संयोधन फरक फहने लगी- विदुला-पुत्र! तू इस प्रकार महल में क्यों पड़ा है ? क्या तुझे पता नहीं कि शत्रु ने देश पर आक्रमण किया है ? तुझे तो मैंने तिलक लगाकर और विजय-कामना फरफे युद्ध में भेजा था, फिर तू शत्रु को बिना जीते घर में कैसे लौट आया? शीन बाला, क्या तू अपने देश पर धावा करने वाले आत- तायियों को जीतकर और उन्हें अपने वश में करके थाया है या उनसे डरकर आया है ? संजय-(कुछ देर चुप रहने के वाद) माता जी! यह युद्ध नहीं है, यह तो ढाका है । विना सूचना दिये शत्रु ने आक्रमण किया है ! उसकी सेना असंख्य है, यह सुसज्जित और संगठिन सेना के साथ पाया है। हमारी सेना उसके सामने थोड़ी है । फिर भला यह युद्ध धर्मसम्मत कसे कहा जा सकता है ? बिदुला-अरे ! क्या कहता है ? मैं पूछती हूं कि युद्ध से भागकर श्रआया है या शत्रु को जीतकर । मैं शत्रु की सेना की प्रशंसा नहीं सुनना चाहती । तू मेरे प्रश्न का उत्तर दे, जिससे +

विदुला
मुझे सत्य का पता लगे।
संजय-माता जी! युद्ध है ही कहां, ये तो डाकू हैं। धर्म-युद्ध को
युद्ध कहते हैं। डाके को नहीं।
विदुला-अरे फायर! मैं सब समझ गई ! तू मुझे सीधा सत्तर भी
देने में लजाता है ! तू रणभूमि से भागा हुश्रा गीदड़ है। तू
युद्ध से डरकर घर भाग आया है ! तेरे लिये युद्ध के
उपस्थित होने पर धर्म और अधर्म का प्रश्न उपस्थित होगया
है। अरे नपुंसक ! शत्रु सिर पर पहुंच चुका है ! तेगे सेना
प्राण हथेली पर लिये लड़ने को उधत हो रही है। अरे!
शत्रु के युद्ध को डाफा कहफर सन्तुष्ट यहां बैठा है।
उठ, युद्धभूमि में जाकर डाकुओं का संहार फर । घर में
पड़े रहने से तो डाकू देश को लूटने से छोड़ेंगे नहीं, राजा
फा धर्म है कि डाकुओं से अपनी प्रजा को बचाये।
संजय-माता जी! मैं युद्ध नहीं करना चाहता।
विदुला-क्या कहता है ! त युद्ध नहीं करना चाहता! क्यों ? तू
अपने को इस देश का राजा नहीं समझता? क्या तेरा
धर्म प्रजा की रक्षा करना नहीं है ? जिनसे फर उगाह
फर भोगविलास कर रहा है, क्या विपत्ति के समय उनकी
रक्षा करना तेग धर्म नहीं ? क्या तू अपनी प्यारी प्रजा को
मन्ते फटते और लुटते हुए अपनी आंखों से देखेगा?
परे पामर ! अपने धर्म को तो सोच ! तू घर में
पड़ा पड़ा यातें बना रहा है और शत्रु गढ़ के समीप पहुँच
-
संजय-माता जी! आप चाहे धुछ यहें मुझसे युद्धमा
AM

महिला गत
विदुला--अरे फायर ! न लम्बिन होने के स्थान में माता को आशा
फा भी निमस्कार करता है ? तू मेरी फोरा से उत्पन्न हो
फ्यों हुअा ? क्यों ना घरपन्न होते ही मर गया! घरं,
तू अपनी गाता फे दूध में पलक लगाना चाहता है ! फ्या
सूने सत्रिय वंश फो फलकिन करने के लिये ही प्रयवार लिया
है ? अरे मिलन! जिन प्राग! फोटू पचाकर यहां भाग
अाया है उन माग्यों को क्या शत्रु कमी छोड़ेगा ? तुमे युद्ध.
भूमि में प्रागा देगे पाहिये थे अथया जीनफर पर पाना
पाहिये या । तुझे शत्रुओं को पानन्द देफर और अपनी
प्रजा फो दुःस्य देकर लगा न पाएगी? क्या शत्रुओं से
अपनी माता और अपनी स्त्री का अपमान कराना चाहना
है ? क्या तू अपनी निन्दा सिंप देश को फन्याओं से
सुनकर जीना चाहता है ? या सौवीर देश पी पन्याओं से
अपनी यशोगाथा सुनना पाहना है ? काह, नरपा में जाने को
इच्छा है अथवा अक्षय इन्द्र लोक में ?
संजय-माता जी, आप मुझे इतना अपमानित क्यों करती है?
यदि मैं ही मारा गया तो क्या मापका अपमान न होगा ?
अथवा हम जीत भी गये नो भी मेरी मृत्यु के बाद श्राप इस
राज्य को भोगफर क्या सुखी हो सकेंगी ? क्या किसी माता
पुत्र की मृत्यु-फामना की है ?
किदुला-अरे नीच! तू क्या कहता है ? क्या मैं तुझे प्रागा देने
फो इसलिये कहती हूं कि में राज्य का सुख भोग सकू ?
तू इस समय नपुंसक होकर प्रार्यधर्म को भूल चुका है।
तू नपुसकों के समान निस्तेज है। तुझे क्षत्रिय धर्म की लाज

- बिदुला नहीं ; नहीं तो क्षत्रिय-पुत्र होकर माता से ऐसा विवाद क्यों फरता! अरे डरपोक! थोड़ी देर भी तेजस्वी होकर जीना अच्छा है, पर देर तक निस्तेज होकर नीना अच्छा नहीं। शूरवीर पुरुष सूर्य की तरह सय जगत् पर राज्य फरते हैं। वे गोदड़ों के समान व्यू और डरपोक नहीं होते। तू सिंह फा पुत्र होकर सियार का सा आचरण कर रहा है। मैं तुझे सिंह बनाना चाहती हूं। संजय -माता जी! आप इतना तिरस्कार कर रही हैं तो भी मुझे युद्ध करने के लिये उत्साह नहीं हो रहा। न मेरे पास धन है, न सेना है ; अफेले अपने पौरुप पर लड़कर मर मिटने से देश फा क्या लाभ होगा? क्या आप मेरे प्राण देने से प्रसन्न हो जाएंगी? विदुला---पुत्र ! मैं तेरे प्राण जाने से कर प्रसन्न हो सफती हूँ। तू मेरा अकेला ही पुत्र है । पर बेटा ! यह तो सोच, हारफर जो जीवन भर के लिये सप लोगों से तेरा तिरस्फार सुनूंगी, यह क्या तेरी मृत्यु से बढ़कर न होगा ? पुत्र क्षत्रियों की युद्ध में मृत्यु भी माता के लिए अभिमान को वस्तु है। तेरी फोति सुनकर मैं तुमे अमर देखना चाहती हूँ। सेना और धन फी तू क्यों चिन्ता करता है ? तू एक पार उठ सो सही, युद्ध के लिए प्रस्थान तो फर । तुझे दृढ़ संकल्प देखकर सारी प्रजा तेरा साथ देगी । तेरी प्रजा के धनकुवर अपना भंडार खोल देंगे, सेना तो पहले ही मैंने सज्जित कर रखी है। पुन ! उठ, सिंह की तरह गर्जता हुआ, सांप की तरह फुकारता हुआ शत्रु को कीर्तिपताका को उखान 1 महिला गौग्य फैंक दे। अपने पिता फे राज्य को अपनी वीरता से फिर प्राप्त फर । मैं तुझे आशीर्वाद देती हूं, तू विजय कर 2 लौटेगा। . तुमे युद्ध के लिए प्राता हुआ देखकर शत्रु कांप उठेगा। संमय-माता नी! आपके सदुपदेश ने मेरे नेत्र खोल दिए हैं। आपने सेना का प्रबन्ध तो फर हो लिया है ।मैं अभी नाता हूं और शत्रु का नाश करके अपने पैतृक-राज्य को लौटाता हूं। किसको शक्ति है जो मेरे वाणों के प्रहार फो सह सफे। माता जी! आपका आशीर्वाद मेरे साथ है नो संसार में कौन शत्रु है जो मुझे जीत सफे। मेरे धनुष की टंफार सुनकर शत्रुओं के हृदय कॉप उठेंगे। इस सिंधु-नरेश की क्या सामर्थ्य है कि मेरे सामने कुछ काल ठहर सफे। आप अपनी चरण धूलि दीजिये। अब आप अपने पुत्र को विजयी होफर हो लौटा हुआ देखेंगी। विदुला-पुत्र ! संजय ! मेरे प्यारे पुत्र ! यही तो मुझे तुम से प्राशा थी । उठ बेटा! आ तुझे मैं तिलक लगाकर युद्ध में भेजूं । पुत्र, ना! शत्रुओं को अपने राज्य से शीघ्र निकाल फर था। मैं तेरे लिए विजय उत्सव मनाऊंगी। तू क्षत्रिय का पुत्र है। तेरी माता क्षत्राणी है । जा! परमेश्वर तेरी सहायता करेंगे। संजय ने माता के चरणों में प्रणाम किया और इसका पाशीर्वाद लेकर युद्ध में प्रस्थान कर दिया। पता लगते हो सहस्रों सैनिक साथ हो लिये । विजयोत्सव में मस्त हुए सिन्धुराज पर सौवीर का राजा संजय एकदम सिंह के समान टूट पड़ा । सौवीर की सेना ने सिंघ की सेना पर वह बाण वर्ग की कि उनसे भागते ही बना । सिंघुराज का नाश कर संजय विजयोल्लास से अपने -२४-

देश को लौटा। माता विदुला ने संजय का धूमधाम से स्वागत
किया। देश की रक्षा हो गई। प्रजा ने संगय को चौर राजा मान
पर पहुन सा धनधान्य देकर उसके कोप को भर दिया।
यह कथा सुनाकर फुन्तो ने श्रीकृष्णा से कहा कि मेरे पाँची
पुत्रों को यह पथा मुना देना और कहना कि अपने राज्य को युद्ध
फरक प्राप्त करो तथा माता को पराये अन्न पर पलने से यचायो।
श्रीकृष्ण से यह सब सुनकर पाण्डवों ने दुर्योधन से युद्ध करके
अपने राज्य को वापिस लेफर छोड़ा था।
भूपण परीपार्थियों को प्रावश्यक सूचना
कविना का पेपर फठिन होता है। उसमें निश्चित सफलता
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२. साहित्य सुधा-प्रकाश (श्री प्रतीभ्राता)
मू० ११)
इन दोनों का संपादन श्री प्रतीभ्राता जी ने स्वयं किया है।
सभी परीक्षोपयोगी वातें पूरी दी गई हैं।
इन्हें लेते हुए लेखकों के नाम मिला लें।
व्रतीभ्राता पुस्तक भंडार, गणपत रोड, लाहौर
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यशोधरा दण्डपाणि को स्नेहमयी पुत्री गोपा अत्यन्त सुन्दरी तथा गुणवती धो। पड़े चाय और दुलार से हालित पालिन होते हुए भी उसने वास्तविक शिता पाई थी। स्त्रीत्य को पास्तविकता को पाने पे लिये मिन जिन गुणों को प्रावश्यकता होती है, गोपा में ये सब गुग्ण विद्यमान थे । गोपा ही आगे चल कर यशोधरा नाम से प्रसिद्ध हुई। गोपा का समय ारतीय इतिहास में अपनी विशेष महत्ता रखता है। पाश से लगभग २५०० वर्ष पूर्व भारतवर्ष में इतना विस्मयकारक परिवर्तन हुआ कि उसका प्रभाव देश-देशान्तरों तक पड़ा । उस समय के बहुत पूर्वकाल के आर्यों का कोयन अत्यन्त सरल, पवित्र और उन था । कर्म-मूलक वर्णाश्रम-व्यवस्था, पशु- पालन, कृषि, कला, वाणिज्य आदि सय यथावत् थे । यज्ञ, दान और अतिथि सेवा आर्यों के स्वामाविक कार्य थे। स्त्रियों का विशेप आदर था, ये स्वतन्त्र होती थी, अध्ययनाध्यापन उनके लिये भी भावश्यक था। ये धाद-विवादों और शास्त्रार्थों में भाग लेती थी। यज्ञों में भी स्त्रियों का पूर्ण अधिकार था। लोगों में मामानिक भायना पर्याप्त थी, हिंसा नाम-मात्र फो न थी । पर उससे पीछे फे समय में लोगों में बहुत अन्तर आ गया । पवित्र मारतभूमि । यधि अपवित्र हो गई। मांस और मघ की प्रबलता, यज्ञों में मांस का प्रवेश, वर्णाश्रम-व्यवस्था की पथ-भ्रष्ट रुढ़ि, और निम्न श्रेणी के लोगों पर अत्याचार से तथा तपस्या आदि के विपरीत मार्ग पर चलने से भारत का उच्च-गौरव भूमिसात् सा हो गया। अपढ़ प्राह्मणों की खूब चलने लगी। चारों ओर अशान्ति का साम्राज्य छा गया। ऐसे समय में इस भूमि पर एक ऐसे महात्मा का जन्म हुआ, जिसने बडे होकर भारत फी फायापलट फर दी । इसका नाम था सिद्धार्थ जो कालान्तर में गौतम बुद्ध के नाम से प्राणिमात्र फा शिरोमणि यना । सिद्धार्थ के पिता शुद्धोदन, हिमालय की तराई में स्थित फपिलवस्तु नाम की नगरी के अधीश थे। प्रजा उन्हें सन्ततिवत् प्रिय थी । पुत्र सिद्धार्थ पर उन्हें प्रतीव स्नेह था। युवराज सिद्धार्थ कय राज-काज संभाले, उन्हें सदा यही ध्यान रहता था । पर सिद्धार्थ की श्रात्मा किसी दूसरी ही ओर लगी हुई थी । उस स्वभावत: वीतराग प्राणो के नेत्र बाय संमृति में जीवों को फरुणाभरी चित्रपटी देखने में तल्लीन थे और हृदय उनके कष्ट से द्रवित होकर रो रहा था । उन्हें पिता द्वारा प्रस्तुत किये गए श्रामोद-प्रमोद से तनिक भी लगाव न होता था। होते होते पिता ने पुत्र को विवाह बन्धन में बांधने की ठानी। विवाह की चर्चा चली । देश-देशान्तरों में दूत भेजे गए । अनेक राजा-महाराजा अपनी अपनी सुरूपा फन्याओं प्रो साथ लेकर फपिलवस्तु में आ उपस्थित हुए । प्रत्येक के मन में यही अभिलाषा थी कि उसी की फन्या स्वीकार को जाय । अपने मन के अनुरूप कन्या का चुनाव करने का पूर्ण अधिकार सिद्धार्थ को दिया गया ।

महिला गरिव जहाँ और सय कन्याएं नानाविध प्राफर्पक शृङ्गार करके उपस्थित थीं, वहां गोपा अपने सौम्य स्वरूप को लेकर अत्यन्त स्वच्छ और सरल वस्त्र धारगा किये एक ओर बैठी थी। उसके हृदय की निर्मलता, मधुरता, लता और त्याग-भावना उसके स्वभाव-मनोहर मुख पर मलफ रही थी; किन्तु इसे सिद्धार्थ के अतिरिक्त और कोई देख पाया था या नहीं, यह कहना कठिन है। सिद्धार्थ ने गोपा को चुना, यह देखकर गोपा फे श्रानन्द की सीमा न रही ( शुद्धोदन भी अतीव प्रसन्न हुए । गोपा को जीवन-सगिनी पाकर सिद्धार्थ ने भी अपने भाग्य की सराहना की। हितचिन्तिका पतिव्रता गोपा के मिलन से सिद्धार्थ का जीवन सुखमय बीतने लगा । कालान्तर में उन्हें पुत्र रन की प्राप्ति हुई। पर सिद्धार्थ के मन को विरक्ति में कुछ भी अन्तर न पाया। वह अग्नि तीन होती गई। पिता ने विलास की सामग्रियां बढ़ा दी, किन्तु सय व्यर्थ । प्रियवादिनी यशोधरा भी इसका कारण न समझ पाई। इससे क्या! सिद्धार्थ को तो कोई और ही लटक लगी थी। अन्त में वृद्ध, रोगी और मृतक के दृश्य ने उन्हें गृह का त्याग करने के लिये सत्तेजित कर दिया। राजपुत्र, उत्तराधिकारी, पनी प्रेम-प्राप्त, पुत्र स्नेह-बद्ध सिद्धार्थ रात्रि के समय राजमहल छोड़कर वन में जा यशोधरा जय सोते से उठी तो सिद्धार्थ को न पाकर अतीय विकल हुई। उनका पुत्र राहुल भी घर के कोने कोने में पिता को ढूंढ़ने लगा। यशोधरा रोती भी जाती थी और पुत्र राहुल को सान्त्वना भी देती नाती थी। बड़ा फरणा-पूर्ण दृश्य था। इस प्रकार बिना ही कुछ बताए प्रियपति के फही चले जाने से यशोधरा फा कोमल हृदय टूक-टूक होने लगा। तब कुछ समय के पश्चात् । यशोधरा सिद्धार्थ फे सारथि चन्दक ने भाकर सारागृत्तान्त सुनाया कि सिद्धार्थ यन में तप करने गए हैं। सच है, प्राणिमात्र को दुःख से छुड़ाने फा मइत् फल्याकारी व्रत जिन्होंने प्रहग्य किया है, उन्हें संसार का क्षणिक सुख-भोग कैसे रोक सकता है ! उधर वे तप करने लगे, इधर यशोधरा विरह फी घड़ियां गिन- गिन कर काटने लगी! इस वियोग में मोह था, फष्ट था, विपत्ति थी, अश्रु वहाना था, उपालम्भ देना और कोसना भी था, किन्तु यासना न थी । यशोधग इस बात को सोचती थी कि पतिदेव मुझे पताकर नहीं गए, मेगे दृढ़ता पर उन्होंने भरोसा न किया होगा; इसीलिये उसे अधिक दुःख होता; थन्यथा यह पति को सहर्प तप के लिये विदा फरनी । सिद्धार्थ सिद्धि के लिये गये हैं, इस पान से तो वह अपने फो गौरवशालिनी मानती थी। सच्ची क्षत्राणी यशोधरा को प्रात्मविश्वास था फि- "स्वयं मुसज्जिन करके क्षण में, प्रियतम को प्राणों के पण में। हमों भेज देती हैं रण में; क्षात्र धर्म के नाते। सखि घे मुझसे कह फर जाते ॥" इधा यशोधरा इस प्रकार सोचती थी, उधर सिद्धार्थ अपने ध्येय की पूर्ति के लिये जा रहे थे। जाते जाते मार्ग में उन्हें उस समय के तपस्वियों के तीन पाश्रम मिले। पर उन्हें वहां साधना फा सच्चा मार्ग दृष्टिगोचर न हुआ, वहां केवल स्वर्ग-कामना से शरीर को कष्ट देने का रूढ़िगत अनुकरण ही था। वहां से ये मगध की राजधानी की ओर गए। नगर के पार्श्व में एक गिरिफन्दरा का -२९- . मान प्राश्रय लेफर ये जीवन को सपाइयों और मुक्ति के गागं फो, सोचने लगे। उस स्थान पर घे एकाफी थे। भिमा मांगकर अन्न नाते और अपने हाथ से ग्मोई पपात छ । मिशा के लिये जाते तो दनको पांति देशपर लोग बड़ी भक्ति दिखाते थे। धीरे धीरे उनका यश मगध राजबिम्बिसार के कानों तक पहुंपा। उन्होंने सिद्धार्य से भेंट कर सन्यास-मार्ग का त्याग करने की प्रेरणा फो; किन्तु मिद्धार्य को सो सभा यगग्य हो चुका था। इमफे अनन्ना ये चैशाली में जाकर भाकडकालाम ऋषि के शिष्य पने। यहां उन्होंने थोड़े ही काल में मशी भांति विद्या पड़ी; परन्तु मन फी साप पूरी होते न देख ये यहां से पता पड़े। इसफे अन्तर सिद्धार्थ ने नैरजना नदी के तट पर छः वर्ष तक पठोर तप शिया। थाहार की मात्रा घटाते घटाते एक घायल नफ फर दी। शरीर कंकाल मात्र शेष रह गया । पर योधि-प्राप्ति न हुई, जीयन को गुत्थियां सुलम न सकी, जरा-मरण के रहस्य की “प्रतीति न हुई, संसार भर फो दुःखित करने वाले दुःख की सचाई फा भास न हुआ होता भी कसे, ये अभी सीधे पथ का अनुसरगा नकर पाये थे। फपिलवस्तु में फोमल हृदया यशोधरा की बहुत फारुणिक अयस्था थी। फभी कभी उसके नी में आता कि प्राणों पर खेल जाय; फिन्तु राहुल की रक्षा फा भार फिसे दे ? कौन उसे मातृवत स्नेह से गोदी में खिला सकता था ? उसफे हँसने पर हँसने की और रोने पर पुचकारने की सामर्थ्य किसमें थी १ फौन अहिनिश प्रतिविम्बवत् उसफे साथ साथ रह सकता था? यह विचार कर .यशोधरा ठिठक जाती। विरह की असीमित अवधि को विताना

फोई हँसी-खेल न था। वह जगत् भर में अपनी विरहाग्नि फा
परिगाम देखनी थी। प्रोम ऋतु में प्रचण्ड सूर्य से तपे हुए संसार
को देखकर यशोधरा कहती-
"तप मेरे मोहन फा उद्धय धूल नडाता आया,
हाय विभूति रमाने का भी मैंने योग न पाया,
सूखा फरठ पसीना छूटा मृग-तृष्णाा सी माया,
मेग ताप और तप उनका जलती है हालठर मही,
मैंने ही क्या सहा सभी ने मेरो वाधा-व्यथा सही"
इसी प्रकार चर्पा,शरद, शिशिर,हेमन्त,वसन्त ऋतुओं में यशोधरा
को अपने विरह-माय लक्षित होते थे। यह तारों में रात फाटती,
सदा पति-वियोग से व्यथित रहती; पर पुत्र राहुल की देख-रेख
में फभी प्रमाद न करती। वह कभी उसे कथा सुनाती, कभी उससे
खेलती, फभी उसे भोजन खिलाती, कभी उसे वस्त्र पहनाती, कभी
पुरानी और कभी नई चर्चा चलाती। राहुल भी सरल हृदय से
खेलता-कूदता और खाता पीता तथा पढ़ता-लिखता हुश्रा पिता की
स्मृति जागृत कर माता के हृदय में हूफ उठा जाता।
एक यार यशोधरा को अश्रु महाते देखफर राहुल ने कहा-
माता, तुम क्यों रोनो हो। अच्छा, मैं समझा, तुम पिता जी को
स्मागा कर के रोती हो । मन से माता, मैं अभी पिताजी को ढूंढने
जाता हूँ। माता सहसा चौंक पड़ी ! उसने कहा -हैं ! यह क्या!
क्या तू भी मुझे पिता की भांति अफेली छोड़ कर चला जाना
चाहता है ! सरल-हृदय गहुल सकपका गया, किन्तु उसने तुरन्त
उत्तर दिया-
-अच्छा मां, तुम मेरा विवाह कर दो, मैं अपनी बहू
फो तुम्हारे पास छोड़ कर पिता जी को हूँढ़ने जाऊँगा।
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महिला गौरव सोचा था कि मैग उत्तर अच्छा बन पड़ा है, पर उस भोले को क्या पता कि यह तो और भी गहरी चोट थी। यशोधरा ने सिहरकर कहा-भला ! मैं तुझे भी तेरे पिता के समान ही कठोर घनता हुआ देखती हूँ, तू भी अपनी कोमा मन वाली अर्धाङ्गियो को त्याग कर वन में जाने का विचार प्रफ्ट कर रहा है, पिता का अनुकरण करना चाहता है ? मैं अफैली तो किसी प्रकार विहाग्नि फो सह भी रही हूँ, फिर हम दो इस महान पष्ट को फेसे सहेंगी? राहुल खिसियाना सा हो गया। पर चुप रहने वाला यह भी न था। उसने झट ही नई कल्पना माता के सामने रखी- माता, 'यदि इससे तुझे कष्ट पहुँचा है तो ले मैं प्रतिज्ञा करता हूँ कि मैं विवाह ही नही करवाऊँगा। राहुल ने सोचा इस यार मेग उत्तर खूब धन. पड़ा है, पर उसे क्या पता कि उसके सरल हृदय से निकली हुई यह यात माता पर धन की चोट करेगी। यशोधरा की सारी देह काँप उठी-एँ ! यह क्या! क्या गहुल परम वैराग्य फो चालकपन से ही स्वीकार कर लेगा? कदाचित् उसे विदित न था कि भावी ऐसी ही है। इस प्रकार वियोग-व्यथा सहते सहते यशोधरा अपने हृदय को धोर बना रही थी, वह मानो राजमहल में ही फठोर तप कर रही थी। जब सिद्धार्थ बड़े प्रयत्न से वन में मुक्ति का साधन खोजने में सत्पर थे, तब सौम्य-स्वभाव पाली यशोधरा नगर में ही मुक्ति के स्वरूप को समझने में समर्थ हो गई। उसे जरा- , मरगा के बन्धन का भय न रहा । वह भी शक्तिशालिनी धनकर दृढ़ता-पूर्वक जरा-मरण का सामना करने के लिये प्रस्तुन हो गई | - - उसने निर्भय होकर कहा- यशोधरा "यदि हम में अपना नियम और शमदम है तो लाख व्याधियां रहें स्वस्थता सम है यह जरा एक विश्रान्ति जहां संयम है नवजीवन-दाता मरण कहां निर्मम है भव भावे मुझको और उसे मैं भाऊँ। कह मुक्ति भला किस लिये तुझे मैं पाऊँ।" इतना होने पर भी यह यह अवश्य चाहतो भो कि सिद्धार्थ यथाशीघ्र सिद्धि प्राप्त करके लौटें। उधर लगातार छ: वर्ष तक कठोर तपस्या करने पर भी जब सिद्धार्थ को अपने लक्ष्य को प्राति न हुई तो उन्होंने सोचा---- देह को षष्ट देकर कभी ज्ञान की प्राप्ति नहीं हो सकती, न ही घासना की आग बुझ सकती है। जिस प्रकार विषय-वासनायों में लिप जीवन व्यर्थ है, उसी प्रकार कठोर तपस्या भी निष्प्रयोजन है, निर्बल देह में रहने वाला प्रात्मा कभी ऊँचा नहीं उठ सकता। यह सोचकर उन्होंने बीच वाला मार्ग महण किया; शुद्ध और साधारण भोजन करते हुए श्रात्मचिन्तन करना प्रारम्भ किया। उन्होंने समझ लिया था कि जिस प्रकार चीणा का अत्यन्त कसा हुआ तार तीक्ष्ण स्वर याला होता है और बिलफुज ढीला तार स्वर-रहित होता है, किन्तु न ढोले और न बहुत कसे हुए तार में से अतीव सुमधुर ध्वनि निकलती है, ठीक उसी प्रकार साधा- रण दशा में रहते हुए ही मनुष्य उन्नति कर सकता है । इस प्रकार साधारया कीवन में प्रात्मचिन्तन करते हुए उन्हें यशोधरा का भी ध्यान पाता था। पतिधता पत्नी का ध्यान उन्हें अत्यन्त सहायक सिद्ध हुश्रा। उन्हें काम, फोर धादि ने डेगाना चाहा, महिलागीरय पर उन्होंने इन सब को पगस्त का पोधि प्राप्ति की। इसी से उनका नाम युद्ध प्रसिद्ध हुआ। उन्हें प्रार्य सत्य का ज्ञान हुमा और ये आत्मप्रकाश से प्रकाशित हो उठे। युद्ध को पार पार्यसत्यों का ज्ञान हुआ- (१) संसार में दुःख का अस्तित्व है । (२) दुःरा को उत्पत्ति फा कारगा पासना है । (३) पासना न रहने से दुःख से छुटकारा मिल सकता है और (४) दुःख दूर करने पे आठ पाय है- सम्यक दृष्टि, सम्यक् सङ्कल्प. सम्यक् वागी, सम्यक फर्मान्त अर्थात् पवित्र काम करना, सम्यक् जीविका, सम्यक् व्यायाम, सम्यक् स्मृति, और सम्यक् समाधि । युद्ध को यह स्पष्ट दिखाई दे गया कि जीव फे यन्धन का कारण फर्म ही है । यह कम यासना और तृष्णा से सत्पन्न होता है। पासना और तृष्णा के नष्ट होने पर इसका भी क्षय हो जाता है। जय मनुष्य में व्यक्तित्व फी भावना होती है-यह समझता है कि यह यस्तु मेरी है, इसका यनाने सिंगाड़ने घाला मैं हूँ, यह . मुगसे भिन्न है, अमुक मेरा मित्र या शत्रु है-तब उसमें वासना और तृभ्या उत्पन्न होती है। ऐसे कर्म से मुक्ति पाना कोई हँसी- खेल नहीं। केवल इच्छा पर लेने से हो कोई इसके यन्धन से मुक्त नहीं हो सकता । इसके लिये पर्याप्त साधना करनी पड़ती है। जय साधक साधना द्वारा संस्कार और अविद्या का नाश करफे अलौकिक आनन्द प्राप्त करता है तब जीव का निर्माण होता है। .:. इस ज्ञान के साथ ही कदाचित् यशोधरा की सहनशीलता का स्मरण करके युद्ध को गृहस्थ जीवन की सचाई का भी ज्ञान हुआ कि प्रत्येक गृहस्थ को अपनी गृहस्थी मंगल-मय तथा प्रशोधरा आडम्बर-रहित कानी चाहिये । उसका कर्तव्य है कि वह माता- पिता की सेवा करे, उनकी सम्पत्ति की रक्षा करे, सब प्रकार से उनका उत्तराधिकारी बनने की योग्यता प्रान करे, यदि माता-पिता देह त्याग चुके हों तो श्रद्धापूर्वक उनका स्मरण करे। शिक्षा देने वाले गुरुओं का आदर और उनकी सेवा-सुश्रूषा करे तथा उनकी आज्ञा में रहे। उनकी आवश्यकताओं को भी पूग फरता रहे। सहधर्मियो, सहकर्मिणी और सहयोगिनी पत्नी का आदर फरे, उससे फभी विश्वासघात न करे, उसे वस्त्राभूपयों से सदा सन्तुष्ट रखे। सन्तान को दुष्कर्मों से बनाए और उनकी शिक्षा-दीक्षा का भलीभांति प्रबन्ध करे,। अपने मित्रों और स्वजनों से निष्कपट सद्व्यवहार रखे । परोपकारी साधुजनों को सब प्रकार से सेवा करे। घर के भृत्यों की देख-रेख और उनका पालन-पोपण भली भांनि करे । प्राणिमात्र पर दया का भाव रखे। हिंसा कभी न करें। यदि यज्ञ में हिंसा अनिवार्य है तो ऐसे यज्ञ से क्या प्रयोजन। इस प्रकार योधि प्राप्त फरके भगवान् बुद्ध यत्र-तत्र अपने शान का उपदेश करते हुए फपिलवस्तु पहुंचे। उनके पाने फा समाचार फैलते तनिक भी देर न लगी। यशोधरा को भी इस अमृतमय संवाद ने उत्फुल्ल कर दिया। राहुल ने आफर कहा कि 'पिताजी सिद्धि प्राप्त कर के लौट आये हैं, चलो आगे जाकर स्वागत करें। फिर महाराज शुद्धोदन ने बतलाया कि इतनी देर के पश्चात् सिद्धार्थ लौटा है, हमें उसको अगवानी फरनी चाहिए । सेविकाओं ने भी चेताया पर मानिनी यशोधरा आत्माभिमान युद्ध हो उठा। उसने कहा ये ही स्वयं गये थे, यताफर भी বাবার नहीं गए थे, यदि उन्हें तनिक भी मेग ध्यान है तो वे स्वयं यहां श्रावें मैं उन्हें लेने फैसे क्षा सकती हूँ, जाना चाहूं भी तो जा नहीं सफनी. यदि मैं चली जाऊँ तो स्त्रीत्व का भली प्रकार प्रतिनिधित्व नहीं कर सकूँगी। महाराज शुद्धोदन सहित सारी फपिलवस्तु युद्ध के स्वागत के लिए गई, किन्तु मानिनी यशोधग महलों में हो रही । बुद्ध ने अब यह सुना तो वे स्वयं महलों में गए । वहा जाफर अन्होंने यशोधरा से पहा-लो मानिनी, तुम्हारे मान की विजय हो। यशोधरा गद्गद और रोमांचित हो गई। उसने बुद्ध के चरणों में अपने आप को डाल दिया। बुद्ध ने यशोधरा को ठाया । यशोधरा का सारा उद्वेग शांत हो गया। वह मानो युद्धमय हो गयो । अन्त में उसने अपने आप को तथा राहुल को भी युद्ध के तथा युद्धत्व के समर्पित करते . हुए यह पहा- 'तुम भिक्षुक बन कर पाये थे, गोपा क्या देती स्वामी ? था अनुरूप एक राहुल ही, रहे सदा यह अनुगामी । मेरे दुख में भरा विश्वसुख, क्यों न भरूँ फिर मैं हामो ! बुद्धं शराई, धर्म शरणं, संघ शरणं गच्छामि ।।" - - चरित्र माला इसमें रघु, वाल्मीकि, हनुमान, चाणक्य, शंकराचार्य, दयानन्द तथा जगदीशचंद्र वसु इन आदर्श गहापुरुषों की सरल और सरस जीवनियां दी गई है। प्रत्येक भारतीय नर- नारी को यह पुस्तक पढ़नी चाहिए। यतीमाता पुस्तक भंडार, गणपत रोड, लाहौर विद्याधरी ज्ञान-विज्ञान के चश्चरीक तथा नाना विद्याओं के प्रेमी व्यक्तियों सम्मुख जब आर्यावर्त की विदुपी महिलाओं का वर्गान आता है तो वे श्रद्धा से नतमस्तक हो जाते हैं। अपने देश की त्रियों की नाना विध गाथाएं गाने वाले विदेशी भी जब यहाँ की विद्याधरी सदृश देवियों की चर्चा सुनते हैं तो दांतों तले उंगली दबाने लगते । त्याग, माधुर्य, सरसता और शिक्षा को जन्मभूमि भारत का सिर ऊँचा करने वाली विदुपियों की कथा सुनने को कौन लालायित न होगा । उनको विस्मय-भरी वार्ता भारत की अतीत महत्ता को मन में प्रज्ज्वलित करके उत्सुकता और उत्थान-भरी गद्गुदी उत्पन्न कर देती है । उपनिषद् फाल फी गार्गी श्रादि ज्ञानमयी महिलाओं फो सत्ता को सहज ही प्रमागिात करने वाली विद्याधरी का नाम प्रात:स्मरणीय है। विद्याधरी फा द्वितीय नाम उभयभारती प्रसिद्ध हुआ। शैशव से हो विद्या की ओर इसको असीम अभिरुचि निरख कर इसर्फ माता पिता ने इसे पूर्ण शिक्षिता बनाने का प्रयत्न किया । शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द, ज्योतिप ये छः वेदाग उसे हस्तामलफवत् हो गए। विद्याधरी अथवा उभयमारती की मेघा-शक्ति, उसकी अध्ययन-पटुना, उसफी सात्त्विक भावना और उसकी सूक्ष्म बुद्धि महिला गौरव असे शास्त्र-पागमा यमाने में विशेष सहायक हुई। मारनवर्ग में যা মীং বিকা যথা:মীম যথানে থা। বিশ্ব फै फेन्द्र काशी का तो क्या हो कहना ! विद्याधी पांडित्य की पी पहा फोने कोने में अनिश होती रहती थी। ज्या ज्यों विधायी को श्रायु पद रही थी, स्यों क्यों उसफी विद्वता तथा फोनि और उसके पिता की आशा, उत्सुपता और.. शंका से पूर्ण चिन्ता अपना भाचल फैला रही थी। किमी पति ने कहा भी है-'पुत्री उत्पम हुई यह बड़ी भारी चिन्ना है। पिसे दी जाय, यह पहन वितर्क है ! आयर सुस भी पायगी या नही ! सघ- मुध कन्याका पिता होना पड़ा कष्टमय है।' से तो कदाचिन् विद्या- घरी फे पिता को चिन्ता न होती या फम चिन्ता होती, किन्तु परम विदुषी विद्याधरी के अनुरूप वर मिलाना कोई हमो-सेना नया और यदि पूर्ण पण्डित पर मिलता भी था तो उसके मम गृह में धन तथा जीवनोपयोगी सामग्री के प्रभाय में भाय माय होती थी। घड़ी विषम समस्या उपस्थित हो गई । अनेक प्रयन करने पर भी उभयभारती के योग्य कोई साना-पीता भारती-निध्यात पति न मिला।सभुष पिता की शंका यथार्थ निकली। महाराज जनक को भौति उनका हृदय भी पुकारने लगा कि 'वीर विहीन मही में भानी' पर विधाता के खेल को फौन समझ पाया है। विद्याधरी के फानों में मण्डनमिश्र के पारिडत्य का समाचार पहुँचा, उसने धन की विशेष चिन्ता न करते हुए पिताजी को स्वीकृति दे दी थन्तनो- गत्वा विद्याधरी का पाणिग्रहण परम पण्डित मण्डनमिश्र से हो गया। मण्डन मिश्र काशी में रहते हुए वेद प्रचार करते थे। उन की विद्वत्ता का डंका पहले ही घर घर बज रहा था। अब तो सोने . -- विद्याघरी में में सुगन्धि आ गई। विद्याधरी और मण्डन मिश्र की विद्या की कीर्ति- : सुरभि से सारी दिशाएं सुवासित हो उठीं। उन दिनों भारतभूमि । में बौद्धों का जोर था। वैदिक व्यक्तियों और वैदिक विधियों की, सर्वत्र हंसी उड़ाई जाती थी। विश्वमात्र की करुणा और मैत्री से परिपूर्ण भगवान बुद्ध की यास्तविक शिक्षा को भुलाकर चौद्ध लोग मनमाने कृत्य करते थे। धर्म-स्रोत संघ-विहार विलास- भूमि बनकर देश को पतन की ओर ले जा रहे थे । अहिंसा के नाम पर अकर्मण्यता और कायरता का पाठ पढ़ाया जा रहा था। ऐसे - समय में ज्ञान के मार्तण्ड पूर्ण बाल-ग्रह्मचारी स्वामी शंकराचार्य सारे आर्यावर्त में भ्रमण कर, वौद्धों से शास्त्रार्थ कर उन्हें पराजित कर रहे थे। इसके साथ ही वे वैदिक पण्डितों को भी परवना अपना कर्तव्य समझते थे। एक बार स्वामी शंकराचार्य घूमते घूमते प्रयाग पहुंचे। यहाँ उन्होंने विद्याधरी तथा मण्डन मिश्र की विद्वत्ता की चर्चा सुनी।" उनकी विद्या का प्रभाव सुनकर स्वामी शंकराचार्य उनसे शास्त्रार्थ करने के लिये काशी पहुंचे। काशी पहुंचकर उन्होंने एक कुएं के समीप जाकर कुएं पर जल भरती हुई कहारियों से मण्डन मिश्र का घर पूछा ! उनके उत्तर में फहारियों ने यह कहा- प्रत्यक्षशब्दान्तविधिप्रभेदैः नाना शुका यत्र गिरं वदन्ति । द्वारे तु नीडान्तर संनिरुद्धा अवैहि तन्मण्डनमिश्र धाम ।।' अर्थात् जिस गृह के द्वार पर घोंसलों में बैठे हुए अनेक प्रकार , के तोते प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान, शब्द (वेद) इन , पारों प्रमाणों से ब्रह्मविद्या पर विचार करते हैं उसे मण्डन मिश्रका : पर समझो। । .

महिला-गौरव शङ्कराचार्य यह सुनकर अतीय विस्मित हुए। सोचने लगे कि जहां की कहारिने इतनी पढ़ी हुई है, वहां के निवासी मण्डनमिय वो बहुत अधिक विद्वान् होंगे । इस प्रकार सोचते सोचते थे'. मण्डनमिश्र के द्वार पर पहुंचे। मण्डनमिय यद्यपि धनी नहीं थे, फिर भी अतिथि-सेवा और: दान दक्षिणा में सदा तत्पर रहते थे। उनके घर में कभी सत्संग होता, कभी अध्यात्म विषय पर सुमधुर वाद-विवाद होता, कभी साधु-सन्सों तथा प्राह्मणों को भोजन कराया जाता, कभी . जिज्ञासुओं के प्रश्नों का उत्तर दिया जाता। जिस समय स्वामी शङ्कराचार्य जी मण्डनमिश्रा के घर पहुँचे उस समय वे विद्वान् । माह्मणों को भोजन करा रहे थे। पतिनिष्ठ विद्याधरी छाया के, समान उनका अनुकरण करती हुई पूरी सहायता दे रही थी। उन्होंने नवागत संन्यासी को बड़े सत्कार के साथ सुन्दर श्रासन पर बिठाया तथा मधुर वाशी बोलते हुए उन्हें भोजन कराकर कुशल समाचार पूछा। शङ्कराचार्य ने कहा है विद्वद्वर्य, है आदरणीय . महानुभाव, मैंने आपको कीर्ति सुनी है । मेरी इच्छा श्रापसे, शास्त्रार्थ करने की हुई है, कहिये, आपकी क्या सम्मति है ? मएडनमिश्र ने तनिक मुस्कराते हुए गम्भीर और मधुर गिरी में इस प्रकार उत्तर दिया-'स्वामिन्, श्राप यह क्या कहते है ? कहां श्राप जैसे तत्त्वपत्ता परिप्राट् और कहां मुझ सा सामान्य गृहस्थ ! मेरा और आपका शास्त्रार्थ कैसा ? मुझे कुछ और प्राक्षा कीजिये।' शङ्कराचार्य ने कहा- है परम विद्वान् महाभाग, ऐसा न कहो, विद्वत्ता में सन्यासी-गृहस्थ, बालक- वृद्ध, स्त्री-पुरुप सब एक सा प्रभाव रखने के अधिकारी हैं। मैं आपका पाण्डित्य सुन चुका विद्याधरी हूँ, अब केवल उसे प्रत्यक्ष करने की कामना है; शास्त्रार्थ अवश्य कोलिए । शङ्कराचार्य को शास्त्रार्थ के लिये कटिपद्ध जानकर मिएडनमिश्र ने स्वीकृति दे दी। अय एक और उलझन उत्पन्न हुई । प्रचएड-रश्मि दिवाकर फी भांति ज्ञान-तंजःपुज पण्डित-श्रेष्ठ मण्डनमिश्र तथा विद्वन्मणि स्वामी शङ्कराचार्य के शास्त्रार्थ में मध्यस्थ कौन बने ! उनसे भी : उनकोटि के विद्वान का मिलना कठिन ही था। तय शङ्कराचार्य ने विद्याधरी के लिये प्रस्ताव किया, जिसे मण्डनमिश्र ने मान लिया। फिर क्या था ? शास्त्रार्थ की सूचना श्राग की भाँति सर्वत्र फैल गई। निश्चित समय पर सब एक विस्तृत स्थान पर शास्त्रार्थ फै लिये श्रा उपस्थित हुए। मध्यस्थोपयोगी एक सुरम्य पीठ पर विद्याधरी इस प्रकार सौम्यभाव से विराजमान थी मानो देवताओं को पढ़ाने के लिये बैठी हुई सरस्वती हो। आबालवृद्ध सय एक- टक उन्मीलित नेत्रों से विद्याधरी की ओर ही देख रहे थे, मानो जगज्जालनस्त जीव निर्वाण पाने के लिये जगन्माता को निहार रहे हो। कभी कभी स्वामी शङ्कराचार्य और पण्डित-शिरोमणि मएडन मिश्र की ओर देख लेते थे, किन्तु तुरन्त ही उनके लोचन, चुम्बक से आफर्पित लोह-कोल की भांति, विद्याधरी की ओर खिंच जाते थे। विचित्र दृश्य था, विस्मय को भी विस्मय हो रहा था, चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। श्राकाश भी मानो शास्त्रार्थ सुनने की उत्सुकता में स्तब्धथा । सब ठीक समय पर सहसा मोतियों की वर्षा सी करती हुई मध्यस्था उभयभारती विद्याधरी ने कहा-'पूर्व निश्चयानुसार अब शास्त्रार्थ प्रारम्भ होता है, आशा है उभय Kant महिला-गौरव शास्त्रार्थ के नियमों का पालन करते हुए अपने अपने समय का विशेष ध्यान रखेंगे तथा श्रोतागण अत्यन्त पन्धुभाव से यया. स्थान बैठे हुए शाखार्थ को श्रवण करेंगे और सभा की सौम्यता. को सुचारू रूप से स्थापित रखेंगे। शास्त्रार्थ प्रारम्भ हुआ। शालार्थ क्या था, निगमागम का प्रवाह प्रवाहित था, तर्फ और युक्तियों का ससैन्य थाक्रमण था। दोनों के दोनों शाखों के पारंगत थे। अब जो बोलता अपने अगाय पाण्डित्य से तथा अपनी अकाट्य युक्तियों से सारे श्रोताओं को अपनी थोर कर लेता था। श्रोनागा चकित थे कि आज यह क्या अभूतपूर्व घटना घट रही है। श्रोताओं के मन यह निश्चय न, कर पाये कि किसके पक्ष में अपने मन को ले जाएं। दोनों में से कोई भी पराजिन होता हुश्मा दिखाई न देता था। इतने में सहसा शङ्कराचार्य की युक्तियां और उन प्रमाणा मण्डनमिश्र की युक्तियों' ओर उनके प्रमाणों को अतिक्रम कर गए । परम विदुषी विद्याधरी तत्काल ही जान गई कि उसका पति कुछ पिछड़ गया है। उसने अपने पति के तथा अपने मानापमान की तनिक भी चिन्ता न. करते हुए यों कहा-'कविर्दण्डी- कविर्दण्डी-कविर्दण्डी न संशयः। अर्थात् निःसन्देह दण्डी स्वामी शङ्कराचार्य अधिक ,परिहत हैं, वे विशेष विद्वान हैं, वे जीत गए हैं। विद्याधरी का, इतना कहना था कि शङ्कराचार्य की प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। यह प्रसन्नता दूसरे पक्ष के लिए श्रप्रसन्नता का कारण थी, किन्तु क्या इससे. विद्याधरी ,फे मुख पर तनिक भी मलिनवा श्राई ? क्या उसके आयत ललाट पर चिन्ता की . नाम-मात्र को भी रेखा दिखाई दी। क्या प्रकृति-सौम्य मण्डनमिश्र का हंस-मुख आकार विद्याधरी अणुमात्र भी विकृत हुश्रा ? नहीं ! वे दोनों वैसे ही थे, जैसे शास्त्रार्थ से पहले, मानो वीतराग परमहंस हों। पर दर्शकों में से बहुतों पर इसका गहरा प्रभाव हुआ, उनमें से कइयों के सिर लटक से गए, कुछ एक की वाणी में शिथिलता पा गई, कई उदास और उन्मना हो गए। ऐसे आन्दोलित समय में अानन्दमग्न शङ्कराचार्य जाने के लिये प्रस्तुत होने ही लगे थे कि विदुपी-रत्न उभयभारती ने शङ्कराचार्य से इस प्रकार कहा- तु त्वयाय न समप्रजितः प्रथितामणीममपतिर्यदहम् । पपुर मस्य न जिता मतिमन् अपि मां विजित्य कुरु शिप्पमिमम् ।।' अर्थात् यद्यपि श्राप उनसे अधिक पण्डित हैं, तो भी आपने आज मेरे यशस्वी पति को पूर्णतः नहीं जीता, क्योंकि उनका आधा शरीर मैं आपसे जीती नहीं जा सकी, इसलिए हे बुद्धिमान्, 'श्राप मुने जीतकर फिर उन्हें अपना शिष्य बना सकेंगे। मण्डनमिश्र की अर्धाङ्गिणी उभयभारती की बात सुनकर शङ्कराचार्य भौचक रह गए । उनसे न उठते बनता था, न बैठते । घे क्या कहें और क्या न कहें। फिर कुछ काल तक सोचते रहने के पश्चात् दण्डी स्वामी शङ्कराचार्य ने कहा- 'यवादि यादकलहोत्सुकता प्रतिपद्यते हृदयमित्यवः । तदसाम्प्रतं नहि महायशसो महिलाजनेन कथयन्ति कथाम ।। अर्थात् है अयले, जो तुमने यह कहा है कि हृदय वाद-फलह के लिये उत्सुकता को प्राप्त हो रहा है, सो अनुचित है; क्योंकि महा- यशस्वी पुरुष महिला-जनों से याद-विवाद नहीं करते। इतना कहकर शङ्कर स्वामी ने कुछ स्मित हास्य किया । उनके . महिला-गौरव हृदय-वारिधि में पुनः विजय-लहरी ली। पर विद्याधरी ने तुः ही इस प्रकार उत्तर दिया- 'स्वमतं प्रमंतुमिह यो यतते स यधूजनोऽरतुयदि यास्स्यितरः । यनितव्यमेव सलु तस्य जये निज-पक्ष-रक्षण-परभगवन् ।। अतएव गार्यभिधया फलहंन्या याज्ञवल्क्यमुनिराकरोत् । जनकम्नथा सुलमयाऽवलया किममीभवन्ति न यशोनिधयः। अर्थात इस संसार में अपना मत सिद्ध करने के लिये जो प्रयत्न फरता है, वह स्त्री हो या पुरुष, अपने पक्ष की रक्षा करने में उद्यत लोगों को चाहिये कि वे, उसे जीतने के लिये अवश्य प्रयत्न करें; इसीलिये कलहंसी गागों से मुनिराज याज्ञवल्क्य ने तथा अवला सुलमा से जनक ने शास्त्रार्य किया था। क्या ये लोग महायशस्वी नहीं थे? शङ्कराचार्य निरुत्तर हो गए। उन्हें विद्याधरी से शास्त्रार्थ करना ही पड़ा । यह वादविवाद सत्रह दिन तक होता रहा। वेदों और शाखों फे नए नए प्रमाणों और तर्क तथा युक्तियों से युक्त यह शास्त्रार्थ इतना गम्भीर, इतना प्रौद, इतना प्रभावशाली तथा इतना विचित्र था कि बड़े बड़े विद्वानों के लिये पूर्णतः उसका. समझ सफना भी कठिन था। वह शास्त्रार्थ अपने आप में एक बहुत महत्त्य-पूर्ण तथा ज्ञान-मिश्रित शास्त्र है । दोनों एक-दूसरे को जीतने की उत्कट इच्छा से नानाविध वाक्य बोलते थे। दोनों पण्डित थे, अनेक विद्या-निष्णात थे । कोई भी पराजित होता दिखाई न देता था । तब उभयभारती ने अन्तिम चार किया। पति-विजयाभिलापिणी विद्याधरी ने प्रश्न किया-काम की भीतरी और.याहरी कितनी कलाएं है ? प्रश्न बालब्रह्मचारी दण्डी स्वामी ।

विद्याधरी शहराचार्य के लिये सचमुच अपरिचित था; ये स्तब्ध से हो गये। फिर उन्होंने कहा-मैंने ब्राह्मचर्याश्रम से ही संन्यास ले लिया है, इसलिये मैं फाम के सम्बन्ध में नहीं जानता और श्रापफे प्रश्न का उत्तर देने में असमर्थ हूँ। फिर क्या था ? विजय-ध्वजा उभय- भारती के पक्ष में लहराने लगी। मण्डनमिश्र का उदास प्रानन रूपा समय की किरणों से विकसित पद्म की भांति खिला और विद्याधरी का यशःसौरभ दिगदिगन्त में प्रसारित हुश्रा । पटना की रेतीली तह तक जाने वाले कथान्येपक भले ही यह पतला कि शङ्कराचार्य ने कुछ अवधि लेकर पुनः इस प्रश्न का उत्तर दिया, किन्तु यह सर्वथा सत्य है कि उस समय शास्त्रार्थ को प्रत्यक्ष सुनने वालों के अतिरिक्त अन्य भी जिस जिस ने उस याद-विवाद की बात सुनी उस उसने विद्याधरी की प्रशंसा की। और जिस जिस ने ही क्या, इस शास्त्रार्थ की चर्चा तो सय फे कानों में पहुँची होगी । आज भी विदुपियां और विद्वान उभय- भारती का विरद गा-गाकर अपनी रसना को रसमयी बनाते हैं। विद्याधरी जैसी विदुपी महिलाओं से भारत का मस्तक विशेष गौरवान्वित हुआ है।

पमा दिन गाति के श्रादर्श कंवल माग्नीयों को ही नहीं, प्रत्युत जगत्मर की सभी जातियों को जीयन फेमस्य की शिक्षा देते हैं। यहाँ मिस यदिन का परित्र लिया जा रहा है, उसे हुए बधिर समय नदी हुा। यह प्रसान्त सत्र का है, जय भारतवर्ष अपने गौरष-मय सामान में नीचे उतर थाया था, समाज में युमधाओं" और पुराइयों का ईका पज रहा था, लोग परस्पर फे सय्यवहार को भूत रहे थे, पियों को शिक्षा देना शाविरुद्ध सममा जाने . लगा था। ऐसे समय में भी पद्मा जैसी पादर्श देवियां इस भूमि पर हुई है। इसी से इस भू-भाग का मम्नफ आज भी आग. गौरय मे उन्नत है। एमा का हदय कितना विशाल था, उसने भ्रातृस्नेह को फिम प्रमार, निबाहा, इसे पढ़कर हिन्दू जाति अभिमान कर सकती है। भूपाल राज्य में एफ घना जंगला है। उसर्फ समीप ही एक छोटे से गांव में हरदयालसिंह नाम का एक राजपूत रहता था। हरदयालसिंह की पनी बहुत मधुरभापिणी थी। उनके एक पुत्र तथा एक पुत्री थी। पारों प्राणी सुख से रहते थे। हरदयालसिंह पड़े मिलनसार, साधु-प्रकृति, वीर और कार्य-धुशल थे 12 परले भूपाल राज्य की सेना में नौकरी करते थे। अनुपम धीरता सथा, प्रमा ". अदम्य उत्साह के कारण राजा को बहुत प्रिय थे। पर युट्टोपा आ "जाने के कारण उन्हें नौकरी त्याग देनी पड़ी। अब ये अपने परिवार में परम सन्तोष से जीवन यापन कर रहे थे। निर्धन होते हुए भी आत्मतुष्ट थे। उन्हें लोभ न था, इसी से उन्होंने कदाचिदपि राजा से कुछ याचना नहीं की थी। उनके सुयोग्य पुत्र का नाम जोरावरसिंह तथा आदरणीय कन्या का नाम पद्मावती 'था होनहार विरवान के होत चीकने पात' यह लोकोक्ति पद्मा पर पूर्णतः चरितार्थ होती दिखाई देती थी। उस लीलामय की लीला अनोखी है। यह पलभर में राई से पर्वत और पर्वत से राई बना देता है। उसके एक इंगित पर कल्पना-पुज मनुष्य की श्राशाओं का किला धूल में मिल जाता है। ऐसा ही हुश्रा । न माता-पिता अपनी सन्तति को सुख भोगते देख , सफे, न पुत्र-पुत्री ही चिरकाल तक माता-पिता की छत्र-छाया का आनन्द ले सफे। हरदयालसिंह और उनकी पत्नी एक साथ ही अपने बालकों को इस संघर्षमय विकट संसार में त्यागकर दूसरे लोक में चल दिये। जोरावरसिंह और पद्मा एकाकी थे-निःसहाय, धन-रहित, अयोध, दुःखित और अनुभव-हीन । पर उन दोनों ने धैर्य न छोड़ा, हिम्मत न हारी। जोरावरसिंह अपनी तथा अपनी यहिन की प्रदर-पृर्ति फे "लिये मजदूरी करने लगा। उसे अपने से अधिक अपनी स्नेह-मयी सुकुमारी बहिन पना की चिन्ता थी। वह उसकी अपने प्राणों से भी अधिक रक्षा करता था, उसफे सुख से सुखी तथा से दुःखी होता था। यह सदा यही प्रयत्न करता कि पद्मा प्रसन्न "रहे, उसके मुख पर विपाद की रेखा भी दिखाई न दे। कहीं . महिला-गौरव पिशाचिनी चिन्ता पमा को अभिभूत न कर ले, इसी से वह दूर नौकरी करना नहीं चाहता था। मजदूरी कभी मिलती, कभी न मिलती । मिलती भी तो बहुत स्वल्प, इतनी कि कभी कभी हो घह स्वयं भूसा ही सो जाता। पर पद्मा फो कभी भी फष्ट न होने देता। खून पसीना एक करके भी उसके लिए कहीं न कहीं से धुछ ले ही आता। उसे सुखी रखने के लिये यह कुछ उठान रखता। उसके ऐसे महान स्नेह को देखकर आस-पास के लोग चकित थे। जोरावरसिंह के इस च, पवित्र और प्रादर्श स्नेह में घड़े यन से फाकर पमा की अवस्था द्वादश वर्ष की हुई । इतने थोड़े से समय में जोरावरसिंह ने उसे घर के कामों में दक्ष कर दिया था। इसफे साथ ही सब से अधिक श्राश्चर्य की बात यह थी कि उसने पद्मा को प्रख-शस्त्र-परिचालन, अश्वारोहण तथा मृगया आदि में भी सिद्ध-हस्त बना दिया था । अब मुशील और सचरित्र पद्मा युद्ध-विद्या-निपुण वीर भगिनी बन गई थी। उस समय उन निरीह बालकों की कुछ बातें नितान्त वेग से बढ़ रही थी । जोरावर तो बढ़ ही रहा था, उसके साथ पद्मा बढ़ रही 'थी, व्यय का बोझ बढ़ रहा था और जोरावर सिंह की चिन्ता बढ़ रही थी; क्योंकि आय का कोई उपाय न था,अतः ऋण की मात्रा भी बढ़ रही थी। जोरावरसिंह ने पूर्ण प्रयत्न किया कि ऋण का हाल बहिन पद्मा को विदित न हो, अन्यथा इसे बहुत दुःख पहुँचेगा और यह उदास रहने लगेगी। पर पद्मा बुद्धिमती थी, वह भाई की अवस्था को समझती थी. उत्तमणों के आवागमन ने. इसे निश्चय करा दिया कि वे ऋण के बोझ तले दवे जा रहे हैं । लेनदार प्रतिदिन चक्कर काटते और. जोरावरसिंह से लड़ते तथा अपना •४८ अपना - . । रुपया मांगते थे। पना ने यह भी अनुभव किया कि यह सारी आपत्ति उसके भाई को उसके ही कारण उठानी पड़ रही है। इस विचार ने उसके कोमल मानस को गहरी ठेस पहुँचाई । यह व्यथित हो उठी; किन्तु यचारी फर ही क्या सकती थी । भाई को कहीं अधिक कष्ट न हो, यह सोच कर मन मसोसफर रह गई। एक दिन एक साहूकार पद्मा के द्वार पर आकर जोरावरसिंह फो पुकारने लगा। उसने जोरावरसिंह को बुरा-भला भी कहा। जोरावर घर में न था। पद्मा ने बाहर निकलकर साहूकार से कहा--श्राप धैर्य रखें, भाई जी इस समय घर में नहीं हैं । उन्हें आपका ऋगा उतारने की पूरी चिन्ता है; वे इसी के लिये यन करने गए हैं। श्राप क्षमाशील हैं, आपने जहां इतने दिवस तक क्षमा किया है, श्रव भी क्षमा कीजिये । यह कहकर पद्मा का गला भर आया। वह घर के भीतर चली गई। वह धनी उस समय तो मान गया, किन्तु मार्ग में उसने सोचा कि इस पर तो बहुत सा ऋण है, यह किस प्रकार चुका पायगा। यह सोचकर उसने घर जाकर अपना रुपया लेने के लिये नालिश कर दी। असहाय जोरावरसिंह धन्दीखाने में डाल दिया गया। पदा का अब कोई आश्रय न था। अनाथ, निर्धन, निराश्रित पद्मा एकाकी रह गई। उसकी आंखों के आगे अंधेरा छा गया। यह किंकर्तव्य विमूढ़ हो गई। कुछ दिन तक वह मूछित की सी अवस्था में रही। -चतुर्दिक धना अन्धकार ही अन्धकार दृष्टिगोचर होता था। श्राशा फी क्षीण सी भी रेखा फहीं दिखाई न देती थी। पर अन्त में पद्मा ने अपने को संभाला, हृदय को दृढ़ किया, कमर यांध ली, और भाई को बंधन मुक्त कराने का निश्चय किया। वह जीवन-संप्राम + .. महिला-गौरव में साहस के साथ यूद पड़ी। उसने सोच लिया कि यदि मैने इस अवसर पर अपने पिता की श्रान न रखी, अपनी शक्ति का परिचय : न दिया, अपने स्नेह-पूर्ण सहोदर को स्वतन्त्र न किया, तो मुझे धिकार है। पना घर से निकल पड़ी। यह सच्ची क्षत्रिया थी। भाई की शिक्षा ने उसे धीर बना दिया था। भाई का अपमान उसे असह्य था। उसके वंश पर यह फलंक था। उस समय ग्वालियर के शासक दौलतराव सिन्धिया थे। ये प्रायः अङ्गरेजों से युद्ध करते थे, इसलिये उनकी सेना सुसंगठित थी । प्रसिद्ध प्रसिद्ध योद्धा देशदेशान्तरों से आ-श्राकर उनकी सेना में भर्ती हुआ करते थे। ग्रीष्म ऋतु में एक दिन सेना की टुकड़ियां सैनिक शिक्षा प्राप्त करके शिक्षण-स्थान से लौटी धीं। पसीने से नहाये हुए सैनिक टहल रहे थे। फिर गणवेप उतारे जाने लगे। सेनापति अपने डेरे के आगे की भूमि में एक फुर्सी पर बैठे हुए थे। भृत्य गण सेवा के लिये प्रस्तुत थे । सहसा एक सुन्दर बांके युवक ने श्राफर सेनापति को सैनिक विधि से अभिवादन किया। सेनापति ने विस्मय से उस सुगौर, मनोहराकृति, जनत-ललाट युवा को पल भर एकटक देखकर प्रश्न किया-तुम कौन हो ? यहां किसलिये आये हो। युवक ने निर्भीक होकर उत्तर दिया-मैं पश्चिम का रहने पाला एक राजपूत हूँ। मेरा नाम पद्मसिंह है। मैं आपकी सेना में भी होना चाहता हूँ। इसी उद्देश्य से आपकी सेवा में उपस्थित ।

पमा सेनापति ने गले को तनिक गम्भीर बनाकर पर सशंकित हृदय से कहा-'तुम्हारी आयु सेना में भरती होने के अयोग्य जान पड़ती है। फिर भी भविष्य में तुम अच्छे सैनिक वन सकोगे, यह सोचकर तुम्हें अपनी सेना में भरती करता हूँ । खगसिंह, इसे नायक रामभद्र के पास ले जाओ और इसका नाम अंकित करवा दो।' पद्मसिंह का नाम सैनिकों में अंकित कर लिया गया। यह भी सैनिक शिक्षा के लिये जाने लगा। अन्य सैनिकों ने देखा कि नवा- गन्तुक सैनिक पहले से ही सब नियमों को जानता है, सैनिक शिक्षा में निपुण है । सेनापति को भी इस बात का पता चला । वह अतीव प्रसन्न हुया। अश्वारोहण तथा लक्ष्यवेध में उसे अनुपम जानकर सब को आश्चर्य हुआ। पर जव सेनापति ने देखा कि वह दौड़ते हुए घोड़े पर से अति सूक्ष्म भी निशाना मार लेता है, तो उसके आश्चर्य की सीमा न रही। युद्ध प्रायः होते ही रहते थे। पद्मसिंह पहले से ही सिद्ध सैनिक था, अतः उसे भी युद्धों में भाग लेना पड़ा। एक मास के भीतर ही उसने कई लड़ाइयों में अपनी वीरता और शूरता का परिचय दे दिया और विजय प्राप्त की। इससे सेनापति के हृदय में उसके पराक्रम की धाक बैठ गई। वह उसे अपना ही समझने लगा। इसी समय में पद्मसिंह ने अपने जीवन की परवाह न फरते हुए पड़ी धीरता से सेनापति के प्राणों की रक्षा की, इससे सेनापति उसे अत्यन्त प्रिय समझने लगा। उसने उसफे युद्ध- फौशल से प्रसन्न होकर उसे सेना में उच पद दे दिया और उत्तम अश्य पारितोषिक में दिया। अपने विस्मयकारक शौर्य से शत्रुओं को पराजित करने वाला दुर्गा आदर्श घोर महिलाओं में गढ़मएडो की महारानी दुर्गावती की भांति दुर्गा भी वीर-याला धी। दुर्गा जयपुर-नरेश की कन्या थी। सुन्दर, कान्ति-मयी, कोमलांगी, उदात्त विचारों पाली, धर्मात्मा और आत्म-गौरय की पदीप्त ज्याला । साक्षात् शक्ति- रूपिणी दुर्गा थी। उसका विवाह यूंदी के राजा अजीतसिंह से हुआ था। अजीतसिंह को मानो अमूल्य न मिल गया था। दोनों परस्पर इतने अनन्यरूप से अनुरक्त थे कि इसका वियेक करना कठिन था कि किसका अनुराग अधिक है। एक पल के लिये भी वियुक्त होना दोनों के लिये असह्य था । इस प्रकार के अनुपम लौकिक प्रेम को यद्यपि फई विचारवान् पुरुप श्रेयस्कर नहीं मानते; किन्तु भावुफ-जन ऐसे ही लौकिक-प्रेम से अलौकिक परमानन्द की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त हुया बताते हैं। हां, प्रेम में स्वार्थ-परता नहीं पानी चाहिये । तो सचमुच दुर्गा में विशुद्ध सात्यिक-प्रेम की सरिता श्राकंठ प्रवाहित हो रही थी। उसमें पासना का नाम तक न था। तृष्णा और कामना की धूलि, जो कि सत्य को आच्छादित किये रहती है, पति-प्रेम के शीतल और निर्मल वारि से धुल गई थी । दुर्गा एक प्रकार से जीवन-मुक्त थी। उसका जीवन पति के चरणों में अर्पित था, उसका शरीर दुर्गा अपना नहीं अजीतसिंह का था। वह निरन्तर पति के सुख की कामना से ही प्राप्लावित रहती थी। अजीतसिंह दुर्गा की भांति ही प्रेम के सत्य, शिव और सुन्दर रूप से श्रोत-प्रोत था या नहीं, यह कहना कठिन है। पुरुष-जाति की महत्ता स्त्री-जाति की महत्ता के सम्मुख इस दृष्टि से अभी तक तो पनप नहीं सकी; आगे भी पनपना तनिक फठिन ही है। कोमल-मानस स्त्री जाति की विशेषताएं अपनी न ही हैं, उसमें यदि दोष की कालिमा न लगे तो वह सदा पवित्र ही रहती हैं। यही कारण है कि 'स्त्री-जाति समाज-शक्ति का प्राण है।' रूप-रंग की विभिन्नता, आचार-विचार की अनेकता, फाल, देश और रूढ़ियों की विविधता होने पर भी सारा मनुष्य- समाज एक सूत्र में पिरोया हुआ सा है। एक व्यक्ति की स्वतन्त्र सत्ता कुछ भी नहीं | समाज-शक्ति के सहारे ही सब का व्यक्तित्व, सब का सौख्य और सब का निर्वाह है । यह सामाजिक शक्ति स्त्रीजाति से ही प्राप्त होती है । जितना अत्याचार, जितनी उच्छृङ्खलता, जितने युद्ध, जितनी वासना पुरुष जाति की ओर से फैलाई और बढ़ाई जाति है, यदि स्त्री जाती न हो तो उनका नियन्त्रण करने की शक्ति समाज में न रहे। स्त्री जाति प्रेम की विभिन्न अवस्थाओं द्वारा समाज को चलाती है, उसे जीवित रखती है। माता-पिता के प्रति भक्ति-रूप में स्त्री-जाति अपना प्रेम प्रकट करती है। पति में निष्ठा रखकर स्त्री मनुष्य- समाज को अपूर्व संयम में रखती तथा बल प्रदान करती है । पति की शक्ति केन्द्रित होने से समाज को शक्ति फेन्द्रित होकर,ढ़ होने लगती है। स्लो जाति की पति पर अनुरक्ति, सन्तान से ममता, दुःखियों पर फरुणा, दुष्टों के प्रति उप्ररूपता तथा उचित स्थान पर ११ महिला-गौर और औषमात्र पर दया मनुष्य समान फो नियन्त्रण म रमन बाला अनेक शातियों के रूप हैं । पापि यह ठीकोतो भी इसमें सन्देश नदी कि अजीतमिह भद्र सथा श्रेष्ठ पुगा था। दुर्ग दान-पुण्य यहुन किया करती थी। बूंदी में ऐसा कोई भी मथा, जिसने दुर्गा को प्राशीयर्याद न दिया हो। सम्बन्धी तथा प्रमा के लोग सब उसका सामान फरत थे। बूंदी में मानन्द का स्रोत उमड़ा हुआ था। पर असंयन लोग सदा से ही प्रेमात में विष पाजा करते हैं, क्योंकि "मनुष्य माभूमि में मृग मरीचिका के पीछे दौड़ता फिरता है। यह धाशा को घलगा में दूपकर 'वाई', सुख है, यह सुख है' कहता हुआ ममरा की भांति सुखामास का पीछा करता है। सैंकड़ों पार ठगा जाकर भी नहीं सीखता, असंयम तथा उरलता से थपथपाया हुश्रा निभिन्त होकर थखयर सोता है। दुरन्त काल पल-पन में प्रायु हरम्प करता है, तो भी नित्य नई नई वासनाएँ है, गई नई कल्पनाएँ हैं, नए नए खाभास के लिये उत्तेजना है।" दुर्गा की एक छोटी बहिन थी, जिसका वियाह उदयपुर के जा अमरसिंह से होने वाला था। जय उसफे विवाह के दिन मीप आये तो दुर्गा ने पति से निवेदन किया-स्वामिन् , यदि. प्रज्ञा हो तो मैं कुछ दिन के लिये जयपुर हो पाऊँ, माता जी ने. लाया है। अजीतसिंह ने हँसते हुए कहा-बड़ी प्रसमता से जाओ, . कन्तु वियाह के अनन्तर मै लेने पाऊँ या तुम स्वयं श्रा जाोगी। गों ने उत्तर दिया- यहिन की डोली जाते ही मैं स्वयं सेवा में, पस्थित हो आऊँगी, श्रापको कष्ट उठाना न पड़ेगा। दुर्गा जयपुर पहुंची। वहां घड़े समारोह से विधि-पूर्वक विवाह' . .

दुर्गा सम्पन्न हुआ। पर वहां कुछ और ही होने को था । रूप के पीछे मन्या हुआ पुरुष कर्तव्य और अकर्तव्य न सोचता हुआ मनमानी कर बैठता है, उसका परिणाम कितना विषाक्त और घातक है, यह समझता हुआ भी नहीं समझता। राना अमरसिंह ने त्रियों का रूप देखकर एक दिन दासियों से यों पूछा-यहां सर्वाधिक हुन्दरी कौन है ? दासियों ने उत्तर दिया-जिसका आपने आणिग्रहण किया है, उसका रूप किसी से कम नहीं। पर राना ने 3 किया। उसका दुराग्रह देखकर एक ने कहा- यहां सब से रधिक रूपवती आपकी बड़ी साली है, उसका नाम दुर्गा है, वह दी नरेश अजीतसिंह से ब्याही गई है। उसका मुख पूर्णिमा फे चन्द्रमा की भांति सुन्दर है, और नेत्र कमल के समान सुहावने है, नख से शिख तक सुषमा की प्रतिमा है, ऐसा रूप संसार भर. में कठिनता से मिले । श्रमरसिंह का चित्त चंचल हो उठा, उसने सोची-किसी प्रकार दुर्गा को देखना चाहिये । उसने दासियों को प्रलोभन दिया, फुछ अनुनय-विनय की। लोभप्रस्त. दासियां मान. गई । उन्होंने दुर्गा को दिखा दिया । अमरसिंह पागल हो उठा । दुर्गा का रूप देखकर उसकी बुद्धि . जाती रही । यह उसका पहिनोई तो धन हो चुका था, उसने घेखटफे दुर्गा के पास जाकर दुर्गा की बांह पकड़ ली। यह सर्वथा सत्य है कि 'विपम विधिकृत संसारचक्र में मानव फिर रहे हैं, वे पासना और तृष्णा से सदा घिरे रहते हैं, उनका परिणाम बस मृत्यु है। यूथा आशा और इन्द्रिय-लालसा उन्हें अन्त को रुलाती है। छोटा बहिनोई पड़ी साली फो स्पर्श करने का दुःसाहसे करे ! इतनी नीचता ! अमरसिंह का आचरण उसे निन्दनीय तथा घृणित प्रतीत हुआ। दुर्गा ने अनिमय नेत्रों से अमरसिंह की ओर : : महिला गौरव देसा, अमरसिंह की प्राति स्पष्ट दूषित थी, मलिन. हृदय फुत्सित भाव मुख पर छाया की तरह दिखाई दे रहे थे। रानी को यड़ा क्रोध श्राया, यह प्रचण्ड हो उठी। उसने अमरसिंह का हाथ मटफकर सिंहनी की भांति गर्गत हुए कहा-प्रभागे! मूर्ख! यह तूने क्या किया ! क्या तू नहीं जानता कि मैं बूंदी के अधीश की रानी हूँ, जहाँ की स्त्रियां दूसरे पुरुष को देखना सक अनुचित सममती है ! नीच ! पापी ! मैं तुमे इस अपराध का दण्ड अयश्य दूंगी! यह कहकर उसने तत्काल ही पास रखा तमंचा उठाकर याद भरना प्रारंभ किया। प्रमरसिंह के काटो तो शरीर में रक्त नहीं, नितान्त भयत्रस्त, जड़, प्रत सा । उसे ऐसी संभावना न थी कि रानी इतनी मुद्ध हो जायगी। उधर रनिवास में एक पार ही सलबली मच गई। दुर्गा की माता तुरन्त ही भागी हुई आई। उसने याते ही सफरुण शब्दों में दुर्गा से कहा--पुत्री, इसे क्षमा फर दे, आखिर तेरा बहिनोई है, अज्ञानी, मूर्ख, चंचल है। तेरी स्नेहमयी बहिन का श्राज हो तो विवाह हुआ है ! क्या तू उसे श्राज ही विधया बनाने लगी है ? येटी, मेरी यात मानकर, इसे क्षमा कर दे, पुत्री, तमंचा रख दे। इतना कहकर दुर्गा की माता ने दुर्गा के पांव पकड़ लिये। दुर्गा ने कहा-माता, यह पापात्मा. अवश्य ही दण्डनीय है । मैं अब बंदी की लाज़ हूँ, तुम्हारी पुत्री नहीं। इसने तुम्हारी; पुत्री का अपमान नहीं किया, अपितु बूंदी की रानी का. अनादर किया है। में अपनी ओर से तो इसे क्षमा कर सकती हूँ, किन्तु बूंदी: फे राजा इस अपमान को कदापि न सह सकेंगे। मन तो कहता, । . " .५८..

है कि इसका यहीं वध कर दिया जाय, किन्तु तुम्हारी आज्ञा • मानकर मैं इसे दण्ड नहीं देती, अपना हाथ रोकती हूँ। फिर उत्तेजित होकर रानी ने कहा-पर इसने जिस हाथ फा स्पर्श किया अब उसे फाटकर फेंक देना ही ठीक है। अब वह इस योग्य नहीं कि बूंदी के पवित्र राज्य की सेवा कर सके ! अब में पलभर के लिये भी यहां ठहर नहीं सकती! इतना कहते कहते -दुर्गा बहुत उद्वेल्लित हो गई। उसकी आंखें अंगारे की भांति लाल हो गई। फिर रानी ने अपनी सखी से कहा-सखि, कटार ले आ, अमरसिंह ने जिस हाथ का स्पर्श किया है, मैं उसको अभी काट दूं। रानी का मुख दमक उठा, सखी सहम गई, दुर्गा की माता चकित थी, अमरसिंह भूमि में गड़ सा गया था, चुप, मानों सौंप सूंघ गया हो। सिंहनी को छेड़कर उसने विपत्ति मोल ले ली थी। सखी ने कुछ भागा पीछा किया। दुर्गा ने कड़ककर फहा। क्यों ? तू अपनी रानी की श्राज्ञा नहीं मानती १ सखी रोने लगी और पांव पर गिर पड़ी। दुर्गा उत्तेजित थी, फिर भी उसने मुख पर हँसी की रेखा दौड़ाते हुए कहा-ऐसे अवसर पर कोमलभाव प्रकट करना ठीक नहीं; जा, कटार ले था। सखी निरुत्तर थी, चुपचाप फटार उठा लाई । माता रोकती ही रह गई कि शीघ्रता से फटार दाएं हाथ में लेकर, घाएं हाथ को, जिसे अमरसिंह ने छुआ था, एक झटके में काट दिया। हाथ एक पोर जा गिरा। रक्त की धारा बहने लगी। यदि कोई पुरुष भी होता तो पैदना और क्षीणता के कारण अचेत हो जाता; किन्तु नापी दर्गा विचित्र स्त्री थी । 'उसने दासियों से कहा- अभी महिला-गौरव मेरा घोड़ा ले आओ, और सब मेरे साथ बूंदी चलो; हमारे लिये. अब यहां का अन्न-जल खाना पाप है, यहां बूंदी-नरेश का घोर अपमान हुआ है। अश्व प्रस्तुत हो गए । रानी की बांह से रुधिर यह रहा था, वह उसी तरह कूदकर घोड़े की पीठ पर सवार हो गई, दाएं हाथ में फेवल लगाम थी। दुर्गा की माता को हृदय और नेत्र रो रहे थे, पर वह विवश थी, दुर्गा फै क्षत्रियत्व को जानती थी, उसे जाने से भी न रोक सकी। दुर्गा चल पड़ी, बूंदी के सब लोग उसके पीछे थे; सब उत्तेजित, अस्त, क्रुद्ध, हैरान और चुप । चारों ओर शून्य ही शून्य प्रतीत होता था। उघर अजीतसिंह रानी के चले आने से प्रशान्त साथा । यई आखेट तथा भ्रमण के लिये जयपुर की ओर ही आ रहा था। किसी ने श्राकर दुर्गा को महाराज का समाचार सुनाया। रानी ने एक दासी को बुलाकर कहा-तू जाकर महाराज को अभी मेरे पास बुला ला, मैं उनसे कुछ बात करना चाहती हूँ | दासी दौड़कर अजीतसिंह के पास पहुंची। राजा ने चकित होकर पृधा-दासी, तू यहां कहां ? रानी कहाँ है ? तू इतनी घबराई हुई क्यों है ? दासी ने कहा-महाराज, मुझे विशेष समाचार बतलाने की प्राज्ञा नहीं, रानी जी थोड़ी दूर पर श्रापकी प्रतीक्षा कर रही हैं। राजा तुरन्त. रानी के पास पहुँचा । उसने देखा कि रानी का सारा शरीर रक्त से सिंचा हुआ है, एक वाह हाथ से रहित है, दूसरे हाथ में घोड़े की लगाम है । अपनी प्रिय रानी की यह दशा देखकर राजा की चीख निकल गई । उसने कहा-ओह ! यह क्या हुआ! क्या मैं स्वप्न तो नहीं देख रहा! यह आपत्ति कैसे, आई । दुर्गा ने । ५ - २ धोका | कहा--प्राणपति, धैर्य और सन्तोप से मेरे तथा बूंदी के अपमान की वार्ता मुनिये । इसके अनन्तर रानी ने श्रादि से अन्त तक सारा वृत्तान्त सुना दिया। राजा ने पानी मंगाकर, रानी को घोड़े से उतारकर, रक्त को घोया । तब रानी का सिर घूमने लगा और वह अचेत हो गई। राजा ने उसे डोली में लिटाकर सेवा-सुश्रूपा प्रारम्भ कर दी। साथ ही मन ही मन यह प्रण कर लिया कि जब तक अमरसिंह को समाप्त न कर दूंगा तब तक दुर्गा के पास न आऊंगा। इतना सोचकर वह घोड़े पर सवार होकर जयपुर की ओर चल दिया । दासियां रोती हुई रानी की देखभाल में लगी । सेवक-गण भय और आतंक तथा 'दुःख और आवेग से किंकर्तव्यविमूढ़ थे। घर राना अमरसिंह ससुराल से विदा होकर अपने देश को चल दिया था। अजीतसिंह को ये लोग मार्ग में मिले । सब ने अजीतसिंह का आदर-सत्कार किया। उसने राना अमरसिंह से भेंट करनी चाही । पहले तो अमरसिंह के साथी शंकत हुए, क्योंकि उन्हें दुर्घटना का पता ही था, पर फिर भी उन्होंने यह सोचा कि कदाचिन् अजीतसिंह को इस घटना का पता ही न हो, रानी से इसकी भेंट ही न हुई हो। वे लोग इस प्रकार मोच ही रहे थे फि अजीतसिंह घोड़े को एड लगाकर तुरन्त अमरसिंह के पास पहुंचा। उसने जाते ही अमरसिंह से कहा-बूंदी के अपराधी, सावधान, जिस हाथ से तूने गनी का अपमान किया है, मैं उसे फाट दूंगा। अमरसिंह घबरा गया। यह संभलने भी न पाया था कि अजीतसिंह ने भाले का भरपूर हाय श्रमरसिंह फे यज्ञ में मारा, यह "भूमि पर गिरफर एटपटाने लगा। दूसरे ही क्षणा घजीतसिंह :- दीकी ओर सष्टि डाली, परन्तु ऐसा होना ही था, है.अन्तयामिन महिला-गौरव उसके पास जाकर उसका हाथ काटकर यहां से चल दिया। अमरसिंह की सेना में से किसी को साहस भी न हुआ कि अजीतसिंह को रोक भी सफे, अमरसिंह की हत्या का प्रति शोध लेना तो एक अोर रहा। सारी सेना में खलबली मच गई। नववधू विधवा हो गई। दुर्गा की छोटी बहिन और अजीतसिंह की साली वह वैचारी, जिसने अभी पति का मुंह भी न देखा था, पालकी से नीचे उतरकर पति के शव के पास आई। उस दुखिया ने राना को उठाकर गोद में रख लिया। उसने मनुष्यों को संत करके कहा कि चिना तैयार फरो। वह रो रही थी, पर योल नहीं सकती थी । उमपं हृदय में श्राहों की प्रबल नदी बह रही थी, किन्तु उमफे मुंह से श्राह तक न निकली । उस अभागिन ..फी फरा-पूर्ण दशा का वर्णन करना विधाता की सामर्थ्य से भी बाहर है। प्राइ ! लेखनी भी रो-रोकर आंसुओं के समुद्र में इयो जाती है। लोगों ने यहुन रोका, किन्तु अल्पायु, निर्दोष, नय विवाहिता, रामपुत्री, राजयधू पर विधि-यश विधवा याला अमरसिंह के शव को गोद में लेकर चिता में बैठ गई। जय चिता में अमि. लगाई गई, उस समय सब चीख-पुकार कर रो रहे थे। राज-पुत्री ने थों पक्षा-हे प्राणाधार, इसमें तुम्हारा दोष नहीं, मेरे भाग्य काही दोष है, किस पन में तुम्हारे मन में उस असन् संकल्प का दर दुआ, जिमने मुष और आशा को दुग्न और निराशा में बदल दिया। मनुष्य क्या सोचता है और क्या होता है, फर्म की गति को कोई नहीं जान सकता। में कम सुन्दर नहीं.धी कि मुमने पर प्रभो, नेरा नियम अटल है, तेरी अभिलाषा पूर्ण हो। इतना कहते +१२.

कहते अग्नि तीव्र हो उठी और जीती-जागती कोमलांगी याला देखते-देखते जल कर भस्म हो गई। उस हृदय-विदारक दृश्य फा ध्यान आते ही कौन अभागा धार अांसू न बहाएगा ! किस प्राणी का हृदय फूट-फूटकर न रोएगाहा! निरपराधिन, तुझ बंचारी पर विधाता इतना कठोर क्यों हुआ ? अणुमात्र भी बुरे विचार से सजा-सजाया उद्यान उजड़ गया। अमरसिंह की तनिक सी गंदी भावना ने दुर्गा की बांह कटवाई, अमरसिंह का संहार कराया, और करुणा-पात्र निदोष कन्या का प्राणान्त किया। अजीतसिंह को इतना क्रोध उचित था या नहीं, इसकी चर्चा को छोड़ यह कहा जा सकता है कि यह वृत्तान्त कम शिक्षापूर्ण नहीं। यदि हम इससे रंच मात्र भी पुछ सीख सकें, तो दुर्गा की पहिन का बलिदान चरितार्थ हो । अत्यन्त दुःखान्त होते हुए भी यह एक श्रादर्श है, यह महिलायों का गौरव है। जो व्यक्ति अनेक विघ्नयाधाओं का दृढ़तापूर्वक सामना करके, परमात्मा की रचना फे रहस्यों को समझते हुए फर्तव्य मार्ग से विचलित नहीं होते और उस पथ पर अवाधगति से चलते चले जाते है, ये आदर्श कहलाते हैं, उनका चरित्र गौरव-पूर्ण होता है। जीवन-पथ पर अप्रसर होते हुए लोगों को कई प्रकार के काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार आदि विकार रोकने का प्रयत्न करते हैं। मनुष्य का मन स्वतन्त्र हो कर कई प्रकार के प्रकर्तव्य कराने की बलीयसी प्रेरणा फरने लगता है। अस्थिर प्रकृति लोग तुरन्त उमफे वशीभूत हो जाते हैं, किन्तु ऐसे समय में श्रादर्श व्यक्ति स्थिर रहने है और भूवित्र्य में दूसरों को भी सावधान फरफ सन्मार्ग पर चनाने ....

महिला-गौरव धनते हैं । दुर्गा ऐसी ही देवीथी । श्रादर्श तथा गौरवमय मनुष्यं का लक्ष्य ऊँचा होता है। वह मानव हृदय की अनेक भावनाओं को हस्तामलकवत् देखकर मानव सभ्यता को पवित्र और उज्वल वनाकर धर्म तथा पुण्य की अविरल धारा यहा देता है। उसके द्वारा वासना और स्वार्थ की सत्ता नष्ट होती है। उसके आगे मनुष्य समाज की आत्मा अत्यन्त नत हो जाती है । इस प्रकार की विशेषता से विभूषित दुर्गा के आगे संसार क्यों न मुफै। श्रादर्श को पाकर तमोगुण-प्रधान पशुवन् लोग भी मनुष्य बन जाते हैं। यदि आदर्श सामने न हो तो वासना आदि के प्रभाव की पराकाष्ठा होने में प्राणि-मात्र में हाहाकार मच जाए। जिस प्रकार अत्यन्त अन्धकार-पूर्ण मार्ग पर चलते हुए पद पद पर ठोकरें खाना और अज्ञात गत्तों में गिरकर दुःख-पूर्ण विनाश को प्राप्त होना अवश्यंभावी है, उसी प्रकार गौरव-पूर्ण व्यक्तित्व के प्रभाव में मनुष्य का पतन और मरण अवश्य होकर रहता है। उसके साथ अन्य निर्दोष तथा निर्मल प्राणी भी हानि उठाते हैं। सचमुच ऊपर के वृत्तान्त में ऐसा ही हुश्रा। प्रभु फरे हम सब लोग सदा गौरवान्वित पथ का अनुसरण करें तथा कुत्सित भावनाओं से दूर रहकर विनाश की खाई में न गिरें।

। राजबाला राजपूताने के इतिहास में राजपूत महिलाओं की वीरता की कथाएं स्थान स्थान पर पढ़ने को मिलती हैं। प्रत्येक राजपूत का जीवन उसकी स्त्री के जीवन के बिना अधूरा और असम्पूर्ण दीखता है। यद्यपि प्रत्येक राजपूत अपनी अकेली वीरता को लेकर ही जगत् में जीता और मरता था, तो भी जहां उसकी पत्नी की वीरता उसकी वीरता से मिल गई, वहां दोनों की वीरता जगत् में अपूर्व हो की । वीरत्व के अतिरिक्त राजपूत युवक कैसे संयमी थे, इस विषय में अभी तक कम कहा गया है। श्रागे फो पंक्तियों में एक संयमी, तपस्वी, हढ़ प्रतिज्ञ राजपूत जोड़े का वर्णन है । जय तक ये प्रतिज्ञा से ऋण न हो गये, तब तक पूर्ण संयम में रहे। ओमरकोटा रियासत की राजधानी सोड़ा थी। यहां के राजा के पास अनारसिंह नामक एक प्रसिद्ध पीर थे। अनारसिंह के पास यहुस पड़ी सेना और एक जागीर थी। प्रत्येक क्षत्रिय वीर फे समान ही इन्होंने अपनी जागीर का विस्तार अपनी ही भुजाओं फे पल से किया था। कभी कभी ये अपनी सेनाले जाकर लूट-मार भी किया करते थे। एक बार राजकोटा के राज्यकोप को कही से सिपाही अपनी रक्षा में ला रहे थे। अनारसिंह ने सेना-सहित उस पर धावा बोल दिया, पर राज्य के सिपाही भी बड़े वीर थे। -१५- महिला-गौरव ग्ध युद्ध हुआ। अन्त में अनारसिंह हार गया। राजा को जत्र ; पता लगा तो उसने जागीर छीनकर श्रनारसिंह को देश निकाला दे दिया। अनारसिंह जब अपनी जागौर से निकाल दिया गया तो वह एक गांव में जाकर बस गया। अपमान और दरिद्रता के कारण उमने कुछ दिवस के अनन्तर ही प्राण त्याग दिए । अनारसिंह की पत्नी अपने एकमात्र पुत्र अजीतसिंह को बड़े यत्न से पालने लगी। पिता की मृत्यु के समय अजीतसिंह १३ घर्प का था। उसकी माता ने मेहनत मजदूरी करके उसे पाल-पोसकर बड़ा किया। अजीतसिंह के पूर्ण युया होने से पहले ही उसकी माता का देहान्त हो गया। अजीत संसार में बिना घर, यिना धन और बिना माता पिता के अकेला रह गया। उसे अपना योमा श्राप ही संभालने के लिए. कठिन परिश्रम करना पड़ा। वैशलपुर के एक जागीरदार ठाकुर प्रतापसिंह थे। इनकी एक पुत्री थी, जिसका नाम राजबाला था। यह कन्या वचपन. से ही. बड़ी धैर्यशालिनी, बुद्धिमती और चतुर थी। पिता ने इसकी शिक्षा- दीक्षा का भी यथोचित प्रवन्ध किया था। ठाकुर प्रतापसिंह की ठाकुर अनारसिंह से बड़ी मित्रता थी। अनारसिंह के पुत्र अजीतसिंह के साथ राजबाला को सगाई की घात वचपन में ही पकी हो चुकी थी । राजपूत बालक और बालिकाएं बात के बड़े धनी होते थे। एक चार माता-पिता ने कन्या के लिये जिसे वर दिया, कन्या उससे ही विवाह कराना ठीक समझती थी। उसके सिवा वह किसी दूसरे मनुष्य को देखना तक भी अच्छा न समझती थी। अजीतसिंह जब युवा हुआ तो उसने एक चतुर दासी के हाथ राजयाला राजबाला का मन जानना चाहा कि क्या वह उससे विवाह करना स्वीकार करेंगी । राजबाला ने कहला भेजा कि मुझे तो अजीतसिंह से ही विवाह करना है, फिर यह चाहे निर्धन ही क्यों न हो । धन तो श्राती जाता ही रहता है, परन्तु राजपूत कन्या का विवाह एक पार ही होता है । अजीतसिंह वीर है, सुन्दर है और राजवंश से हैं, फिर मैं उनके विना और किसी को नहीं कर सकती, परन्तु इस विषय परवश हूँ। अजीतसिंह को चाहिये कि वे मेरे पिता जी से कहें । वे अवश्य ही मान लेगें । मैं यदि विवाह करूंगी तो उन्हीं के साथ, अन्यथा प्राण दे दूंगी। दासी यह संदेशा लेकर अजीतसिंह के पास चली गई। अजीतसिंह राजबाला की इच्छा जानकर अतीव श्राह्लादित हुआ; उसने राजबाला के पिता प्रतापसिंह से कहला भेजा कि वह विवाह करना चाहता है । क्या वे अपनी पुत्री राजबाला का विवाह उसके साथ फरने को उद्यत हैं : ठाकुर प्रतापसिंह ने उत्तर में कहला भेजा कि अजीतसिंह से हम विवाह तो करने को तत्पर हैं, किन्तु उसके पास राजकुमारी के भरण-पोपण के लिये भी तो कुछ चाहिये। यदि वह बीस सहस्र रुपया इकट्ठा करके लावे तोहम विवाह कर देंगे। अजीतसिंह को विवाह की तो आशा हुई, पर रुपये की यात सुनकर बड़ी चिन्ता हुई । उसके पास तो धन था ही नहीं, किन्तु उसके सम्बन्धी या मित्रों के पास. से भी कुछ मिलने की आशा नहीं थी। बहुत कुछ सोच-विचारकर . अन्त में उसे अपने पिता जी फे मित्र एक बनिये की स्मृति हो आई । वह तुरन्त उस धनिये से मिलने के लिए जैसलमेर गया। वहां जाकर उससे अपनी सारी . महिला-गौरव कथा कही । यनिय ने सारी यान मममकर श्राधासन दिया और एक शर्त पर रुपया देना स्वीकार किया। उसने कहा-२०, हजार में देता हूं तुम विवाह कर लो। पर जब तक तुम मेरा रुपया ब्याज सहित न लौटा दो तय तक तुम पूर्ण ब्रह्मचर्य से रहना। यदि यह प्रतिक्षा करते हो तो ले जाओ। लिखा-पढ़ी करने की कोई प्रावश्यकता नहीं।" राजपून वात फ बड़े धनी होते थे । राजपूत की प्रतिज्ञाएं प्राणों फे साथ जाती थी। राजपूत का प्रण अवश्य पूरा होता था। जो धात आज कागत-पत्र लिखकर भी सिद्ध नहीं होती, यह राजपूत पं वचन कह देने मात्र से पूरी हो जाती थी। अजीतसिंह ने पहले तो कुछ सोचा, फिर दृढ़ता-पूर्वक प्रतिज्ञा कर ली और २० हजार रुपया ले लिया। ठाकुरप्रतापसिंह ने धूम-धाम से राजबालाफा विवाह अजीतसिंह के साथ कर दिया। विवाह के अनन्तर दोनों पानन्द से रहने लगे। सोते समय अजीतसिंह अपने पास एक. तलवार रख लेते, क्योंकि राजपूत खड्ग का अतीव श्रादर करते थे। कुछ दिन तक राजयाला यह कौतुक देखती रही। अन्न में उससे रहा न गया । उसने साहस फरके एक दिन अजीतसिंह से तलवार रखने का कारण पूछा। पहले तो अजीतसिंह ने बतलाने से टालमटोल किया, पर' अन्त में राजबाला को धनी से की हुई प्रतिक्षा सुना दी । राजयाला घड़ी थुद्धिमती थी। उसने धैर्य से सब बात सुनकर कहा-ऐसी अवस्था में हमें यहां से निकल चलना चाहिये और जाकर कहीं नौकरी करनी चाहिये । मैं भी पुरुष का वेश पहनकर आपके साथ चलूँगी। साला-बहनोई कहकर हम कहीं नौकरी करके यह ऋण चुका देंगे।

राजवाला पीस सहस्र रुपया थोड़ा नहीं होता। निर्धन मनुष्य के लिए सो जीवनभर में हजार पांच सौ जोड़ना भी कठिन होता है। बीस हजार ब्याज सहित चुकाना तो जीवन भर में एक निर्धन व्यक्ति के लिए कठिन था। पर नहीं बुद्धिमती त्यागशीला पत्नी पति के अंग संग है, जहां दोनों की बुद्धि एक है, वहां बीस हजार तो क्या, बीस लाख भी चुकाना पड़े तो भी कोई न कोई उपाय बन हो जायगा । लोगों ने जीवन भर में क्या क्या बड़े काम नहीं किए, सन् १९२१ ईस्वी में महात्मा जी ने कहा था कि एक करोड़ रुपयों एक साल में जमा कर लूंगा । बम्बई में नियत तिथि के सायं- काल को विदेशी कपड़े की घड़ी भारी होली जलाई जानी थी। उस सायंकाल तक एक करोड़ रुपया जमा हो जाना चाहिये था। महात्मा जी लंगोटी पहने हुए उठे । विदेशी कपड़ों को दियासलाई लगाने से पहले उन्होंने घोषणा की कि आज तक एक करोड़ पुछ लाख रुपया जमा हो गया है। लोग आश्चर्य कर उठे। अजीतसिंह और राजबाला ने भी इसी प्रकार की हद प्रतिज्ञा की थी। उनके २० हजार रुपये जमाकरने पर ही उनका गृहस्थ-सुख निर्भर था। दोनों उसी रात घोड़े पर सवार हो गये और घर से निकल कर चल पड़े। वे सीधे उदयपुर पहुंचे। राणा उदयपुर जिले की दीवार पर खड़े थे। उन्होंने दोनों को बुलाकर उनका परिचय पूछा। अंजीतसिंह अभी घोलने भी न पाये थे कि राजबाला ने प्रणाम करके फहा-महाराणा जी! ये मेरे यहनोई हैं। राणा-सुम्हारा नाम क्या है? अजीतसिंह- मेरा नाम अजीतसिंह है और इनफा नाम गुलायसिंह है, महाराज! १९.

+ महिला गौरव राणा--तुम्हारा यहां थाना कैसे हुआ ? अजीतसिंह-महाराणा जी! हम वृत्ति की खोज में यहां आये सौभाग्य से श्राप दर्शन हो गये हैं। रागाच्या ! तुम दोनों मेरे यहां रहो ! रहने को मकान और खान-पान के अतिरिक्त पाँच रपये मासिफ मिलेंगे। दोनों ने सिर झुकाकर महाराणा को प्रणाम किया । नौकरी लग गई, पर पांच रुपये मासिक से तो वीस हजार रुपया जीवन भर में एकत्र नहीं हो सकते थे । सब काम करते हुए भी दोनों चिन्तित रहने लगे । वर्षा वीत चुकी थी और दशहरे का त्यौहार धूम-धाम से मनाने की तैयारियां हो रही थीं । उदयपुर में क्षत्रिय लोग वीरता की परीक्षा के लिये एक जंगली भैंस को पकड़कर 'उससे युद्ध कर उसका वध करते थे। इस बार जंगली भैंस के स्थान पर एक सिंह श्रा फंसा था। सिंह का शिकार होने को था। कई दिन से सिंह भूखा रखा गया था। रोगा हाथी पर सवार होकर सिंह के शिकार को निकले । उन के पीछे पीछे अनेक राजपूत सरदार थे। अजीतसिंह और गुलाब:. सिंह भी घोड़े पर सवार होकर राणा के पीछे पीछे चल रहे थे । जब एक बड़े भारी बाड़े के अन्दर राणा का हाथी और सब सवार पहुंच गए तो बाड़े में भूख सिंह को छोड़ा गया। राणा की इच्छा थी कि सिंह को स्वयं ही मारे । सिंह को मारता वीरता का सब से बड़ा चिद था। रांगा अभी सोच ही रहे थे कि सब ओर से घिरा हुआ. भूखा सिंह स्वयं ही आगे बढ़ा । उसने उछलकर हाथी पर श्राकमया, किया । वह हाथी के मांस का लोथड़ा नोचकर पीछे हट गया। मारे भयं के राणा के हाथ से धनुपवाण भी छूट गया। हाथी चिंघाड़ । ।

राजबाला कर भागने की सोचने लगा। सरदार लोग अपनी अपनी जान पचाकर इधर उधर छिपने लगे। सब को अपने अपने प्रायों की पड़ रही थी । सिंह का मुकाविला था, भैंसे का नहीं। सिंह और भी उत्तेजित हो गया। उसने दूसरी बार झपट की तैयारी की। राणा पयराए हुए थे। सिंह का दूसरा आक्रमण होने को ही था। अजीतसिंह और गुजायसिंह यद्यपि बहुत दूर खड़े थे, तो भी गुलाय- सिंहं यह सव यात देखकर अजीत से योला,ठाकुर साहिय ! सिंह दूसरी पार राणा पर मपट रहा है । इस बार गया के प्राण संकट में हैं। अब उनके प्राणों की रक्षा का समय है। मैं चला। यह कहकर गुलाबसिंह ने घोड़े को एड़ दी। सिंह उछलने को ही था कि गुलाय ने भाले फा एक भरपूर हाथ दिया। सिंह धरती पर जा गिरा । साथ ही उसने तलवार का पार कर उसकी गर्दन भी काट डाली। बाद में सिंह के कान और पूंछ काट फर वह तुरन्त वहां से भाग कर अजीतसिंह के पास जा पहुंचा और उसने अपने घोड़े की फाठी के नीचे उन वस्तुओं को छिपा दिया । यह काम उसने इतनी फुरती से किया कि कोई भी यह बात न जान सका कि सिंह को किसने मारा है । अजीतसिंह तो सब कुछ देख ही रहा था, पर वह भी धकित था। राणा ने सिंह को मरा हुआ जानकर मारने पाले का पता करना प्रारम्भ किया। पर सभी सवार झूठ-मूठ अपना अपना नाम बताने लगे । राणा ने सब से कहा कि मारने वाले ने इतनी शीघ्रता से यह काम किया है कि उसे मैं ठीक ठीक नही पहचान सका। तो मी मैंने उसे सिंह की ओर जाते हुए अकी सरह देखा है । सामने आने पर मैं पहचान सकूँगा। यह महिला-गौरव एक एक सयार को अपने मामने गुजरने दिया। जय गुलायसिंह राणा के सामने आये सो राणा ने पापानकर कहा, 'मुयक, फ्या तुमने ही सिंह को मारा है ? गुला-महाराज ! जिस श्रीमान् कहें यही सिंह को मार सकता है। आपकी प्राशा के अधीन हो तो सिंह की मृत्यु है । राणा-यार! मैं उस समय यद्यपि पूरा-पूरा नहीं पहचान पाया, तो भी तुम्हें देखकर मैं सममता हूँ कि आज तुम्हीं ने मेरे प्राण यचाय हैं। मैं तुम्हें कुछ पहचान रहा हूँ। सच सच बात कहो । इनने में अजीतसिंह ने शागे धाकर कहा-- अजीत-अन्नदाता, सिंह पं. कान और पूछ नहीं है। मारने याने ने कान और पूंछ भी फाटफर प्रमाण के लिए रस लिए प्रतीत होते हैं। राणा-क्या तुमने सिंह को मारा है ? अजीत-महाराणा जी ! मैंने तो सिंह फो नहीं मारा। पर सिंह का मारने वाला यही हो सकता है जिसके पास उसकी पूंछ और कान हों। राया--(गुलाव से ) मैं यह भूल गया था कि यह अजीत तुम्हारे. बहनोई हैं, तो तुम सिंह के कान और पूंछ दिखा सकते हो ? गुलावसिंह ने तुरन्त घोड़े की जीन के नीचे से पूंछ और फान निकालकर राणा की सेवा में उपस्थित कर दिये । राणा ने प्रसन्न होफर गुलाबसिंह की बहुत प्रसंशा की और उसे तथा अजीतसिंह को अपना अंगरक्षक बना लिया। उनकी योरता से प्रसन्न होकर उन्हें बहुत घुछ पारितोषिक देने के लिए भी बचन दिया। उस दिन से गुलाब और अजीत की घड़ी प्रविष्ठा होने लगी। उन्हें धन -1 राजपाला मिलने लगा। अजीतसिंह और गुलाबसिंह दोनों दिन में इकट्ठे , रहते थे, पर रात को अलग अलग हो जाते थे। रात को अजीत राजा के दरबार में रहता था और गुलाब राजा फे महलों में पहरा देता था। विवाह हुए पूरा एक वर्ष बीत चुका था। नई वर्षाऋतु फिर से आई थी। आकाश में बादल छा रहे थे । सन सन करके शीतल पवन चल रहा था। बिजली चमक कर विरहिगियों को तड़पा रही थी। उस समय राणा अजीत के संग थे । वे रनिवास की ओर जाते हुए बोले, "अजीत ! तू जाकर अब आराम कर। में रनिवास में जाता हूँ।" रनियाप्त फे फाटक पर ही गुलाबसिंह पैठा था, राणा के जाने पर गुलाबसिंह ने वर्षाऋतु की 'मलार रागिणी में विरह का गीत गाया । राग सुनकर रानी' 'ने चकित होकर पूछा-महाराज ! ये दोनों राजपूत' जो श्रापफ अङ्ग- रक्षक है मुझे तो स्त्री पुरुष प्रतीत होते हैं। गुलाब जो हमारे पहरे पर है, यह ली प्रतीत होती है। किसी कारण से इनका रहस्य जानकर यदि कोई कष्ट हो तो दूर करना चाहिये । राणा-(हँसकर) रानी! तुम क्या कहती हो! ये दोनों तो साला-बहनोई हैं । दिनभर इकट्ठे हो रहते हैं। रानी-महाराज ! आपकी बात सत्य है, पर मैं भी. कुछ सोच कर ही कह रही हूँ । परीक्षा फरने में तो कोई दोष नहीं ? राणा-अच्छा, पता करते हैं । इसमें क्या दोष है। राणा ने अजीतसिंह और गुलायसिंह दोनों को माल में हो घुला भेजा ! दोनों घबराए हुए आये थोर राणा . कोमणाम करफ ए हो गये।

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महिला-गौरव
राणा-सप सच यतात्रो, क्या तुम दोनों पुरुष हो ।
अजीत और गुलाब चुप रहते हैं।
राणा-सच सच कहो। डरो नहीं । तुमसे में बहुत प्रसन्न है,
निशष्ट होकर मुझे अपना मंद सुनायो।
अजीत-अन्नदाता ! राजा सय का पिता होता है। हम आपके
दास है, आप ही हमारे माता-पिता है। प्रापसे क्या रिपा
"रह सकता है?
यह कहकर अजीतसिंह ने सारा हाल सुना दिया। राणा
उसी समय गुलाय पो दासी के साथ एक कमरे में भेज दिया और
कहा कि उसे सोयन पहनाकर खूब आदर मान से रखो।
रोजगाला लन्ना से संकुचित होकर दासी के साथ चली .
गई । तब राजा ने अजीत की प्रशंसा करते हुए कहा-
राणा-राजपूत वीर ! मैं तेरे यापदादों को जानता हूँ। ऐसा
प्रण का धनी मैने और कोई नहीं देखा । ऐसा योगी,
जती-सती राजपूत कोई विरला ही होता है । तेरी पत्री वीर
महिला है । उसको महत्ता की कोई तुलना नहीं कर सकता। धन्य
है तुझे और तेरे माता-पिता को अब जाओ, 'प्रातःकाल मैं तुम्हें
घुलाऊँगा।
प्रातःकाल महाराणा ने २० हजार रु० व्याज समेत ग्रंजीत'को
देकर साहूकार के पास भेजा । साहूकार रुपये प्राप्तकर बहुत प्रसन्न
हुआ। अजीतसिंह ने यहां से थाकर राणा के पैरों में सिर रख
दिया और कहा- अन्नदाता! आपकी दया से मेरी प्रतिज्ञा पूर्ण
हुई।" महाराणा ने प्रसन्न होकर उन्हें बहुत सी जागीर दी। उनके
लिए एक महल पृथक् बनवा दिया। राणा राजवाला को पुत्री के
.

राजबाला
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समान स्नेह करते थे। उसे उन्होंने प्राण-रक्षक के पद से विभूषित
कर दिया था। वह इसी नाम से उदयपुर में प्रसिद्ध थी। धन्य है
ऐसी पतिव्रता वीर देवी, जिसने अपना सारा सुख, जीवन, तन मन
धन अर्पण करके पति को दुःख से छुड़ाया, अपना भी उद्धार किया
और राणा को भी प्राणरक्षा की। राजबाला का नाम राजपुताने
की वीर बालाओं में सदा अप्राणी रहेगा। एक नारी अपने पति के
लिए कितना उत्सर्ग कर सकती है. यह इस कथा से स्पष्ट हो
जाता है । राजबाला और अजीतसिंह दोनों सजे राजपूत थे।
हिन्दी-भूपण परीक्षा में
पहली वार हँसते हँसते मानसहित उत्तीर्ण होने के
लिए नीचे लिखी सहायक पुस्तकें पढ़िये-
१ व्याफरगतत्त्व (श्री प्रतीभ्राता)
॥
२ छन्द नवनीत (कान्य दर्पण के छन्दों की कुओ)
३ अलकारतत्त्व (अलकार दर्पण की कुंजी)
४ साहित्यसुधाप्रकाश [कुंजी ] (प्रतीभ्राता)
श)
५ भापा कापसुधातरंग [ कुंजी ] (प्रती)
६ महिला गौरव चन्द्रिका [फुजी]
७ आदर्श-धीरता-हस्य [फुजी] 1-) ८ ख-रहस्य [कुंजी] 1)
है आधुनिक कहानियों की [कुंजी]
१० भूषणा इतिहासतत्त्व (महेशचन्द्र ऐम० ए०) 111)
११ हिंदीसाहित्य सरव (महेशचन्द्र ऐम० ए०
१२ हिंदी साहित्य-चित्र (प्रतीभ्राता)
१३ नियन्यकौमुदी ( श्री गोपालचन्द्र देय)
१४ निवन्ध मुनावली २॥१५ हिंदी योग्यठा कौमुदी (मठीभ्राता) ti).
१६ भूषणप्रभोत्तरायली (श्री प्रतीभ्राता जी)

पना धाय गानों का इतिहास भाग्न फे. मुगर को तय नायल फरता गंगा गयनक मष्टि अपनी प्रति प्रयन्या में नहीं पहुंच शानी | गजपून पोगेने शिम प्रभार सने हमने अपने प्राया देश रक्षा पर दिये , गापून योगायों ने जिस प्रकार अपने पुत्रों, माइयों और पनियों को देश की रक्षा के लिये युद्ध में भेगा, उसे पर पर किस हिन की छाती अभिमाग में गन न आयगी। राजपून मानि फो पत्ति अप्ति में हुई यतलाई जानी है। इम अमि से उत्पन्न हप, पीरों के जीवन में भी अनि रहती थी और मृत्यु भी अनि का संपई हता था! राजपा फो मृत्यु शय्या पर हो गाय तो उसका यहा दुभाग्य माना जाता था। राजपूत लड़ता हुआ युद्ध में मरे, यही उसकी माता, पनी या मन्तान कामना करती यो । राजात महिलाएं अपने पतियों और पुत्रों का पलिदान करना जानती थी, ये चिता में हमने इसने बैठकर अपने प्रायों का विसर्जन करना भी मानती थी। १ राजपूताने में सिसौदिया वंश सुप्रसिद्ध है। ये राजपूत सारे राजस्थान में उत्तम तथा पुलीन माने जाते थे। प्रातःस्मरणीय महाराणा सांगा इसी वंश के थे। महाराणां को धपने जीवन काल में अनेक युद्ध करने पड़े थे। उनके शरीर पर ८० पाय लगे थे और पमा धाय वर भी वे युद्ध से हटते न ये । कौन विदेशी वीर ऐसा हुआ है कि जिसके हाथ, पैर, मुख, ख सब पुल युद्ध में नष्ट होता आ रहा हो और फिर भी यह युद्ध करने में उसी दम्य तेज से उन्नत मस्तक होकर शत्रु यो ललकारकर युद्ध करता लाय । प्राज परा- धीनता के वश में पड़े हुए भारतवासियों को चाहे कोई कुछ कहे, परन्तु राजा सांगा की सन्तान को राजस्थान की भूमि पुकार पुकार कर देशभक्ति का पाठ सुना रही है पर दुःख है कि पराधीन भारत के पुत्रों को अपना दिलासी जीवन छोड़कर उसे सुनने को समय ही नहीं है। मद्वारा सांगा जब इस पांचभौतिक शरीर को त्यागकर स्वर्ग:को पहुंच चुके थे, तब उनके प्यारे चित्तौड़ में राजवंश के अन्दर गृह कलह उत्पन्न हा । महाराणा के ज्येष्ठ पुत्र रत्नसिंह उस गह कलह के शिकार हो चके थे। उनके कोई सन्तान न थी। राजगदी को सूनी देख ग्वसिंह के छोटे भाई विक्रमादित्य को सिंहा- सन पर बिठाया गया । विक्रमादित्य ने राजा बनते ही अपनी पिलानप्रियता के कागा वीर-धर्म को एकबारगी तिलांजली दे दी थी। यह प्रतिपल भोगविलास में रत रहने लगा । राजपूत सरदारों के पुनः पुनः समझाने पर भी उसे अपने कर्तव्य का ध्यान न रहा। प्रायः वह राजपूत सरदारों से दुर्व्यवहार करता रहता था। इससे सरदार तंग आकर अपने अपने पदों को छोड़ते जा रहे थे। धीरमाता मारानी कर्मवती ने भी विक्रमादित्य फो यइत समझाया, पर यह भोगविलास में अन्या हो रहा था। वह माता की बात को कैसे सुनता ? घन्त में ऐसी परिस्थितियों से लाभ उठाकर गुजरात के मुलतान पहादुरशाह ने चित्तौड़ पर चढ़ाई कर F . .

महिला-गौरव दो। कर्मवती ने नीति समझकर उसे कुछ देकर उस समय संधि :- फर ली । विक्रमादित्य को फिर भी सुध न आई । उसका चाल. चलन बिगड़ता ही गया । धीरे धीरे सब सरदार उससे खिन्न हो गये। अवसर पाकर यहादुरशाह ने फिर चित्तौड़ पर धावा किया । इस समय राजपूत लोग रागा से उदासीन हो रहे थे,परन्तु वीर माता कर्मवती ने बड़ी पुशलता से राजपूत सरदारों को एकत्रित किया और उन्हें अपना क्षत्रिय धर्म सुमाया । देश पर आपत्ति देखकर राजपूत सरदार एकत्र होकर युद्ध करने के लिये सन्नद्ध हो गये। विक्रमादित्य और उसके छोटे भाई उदयसिंह को बूंदी राज्य में भेज दिया गया, जिससे राजवंश सुरक्षित रहे। अब राजपूतों ने बहादुरशाह से डट कर युद्ध किया। राजपूत थोड़े थे और वहादुर शाहं की सेना उनसे बहुत अधिक थी। राजपूतों ने, फेशरिया बाना पहना हुआ था। भयंकर युद्ध हो रहा था। एक एक करके राजपूत सरदार फट गये, दुर्ग की रक्षा न हो सकी। महारानी फर्मवती ने जब कोई उपाय दुर्गरक्षा का का न देखा तो अनेक राजपूतनियों को साथ लेकर चिता में जलफर अपने प्राण दे दिये। बहादुरशाह जीत गया। चित्तौड़ पर उमका अधिकार हो गया। उघर पहन फर्मवती फी राखी को पाकर बादशाह हुमायूं बहादुरशाह से युद्ध करने को चल चुका था। वहादुरशाह को जब हुमायूं के आने का समाचार मिला तो यह चित्तौड़ से भागा 1 पर हुमायूं में उसका पीला किया। अन्त में यहादुरशाह समुद्र के किनारे मारा गया। इस समय अवसर पाते ही राजपूत संरदारों ने चित्तौड़ पर फिर अपना, अधिकार कर लिया। राणा विक्रमादित्य को गद्दी पर विठाया -- ३ - पन्ना धाय गया और उसके छोटे भाई उदयसिंह को भी बूंदी से बुला लिया गया। विक्रमादित्य यद्यपि सिंहासन पर बैठाया गया था, तो भी उसने अपने स्वभाव और चाल-चलन में तनिक भी परिवर्तन न किया। राजपूत सरदार उसके ऐसे क्षत्रिय-विरुद्ध व्यवहारों से तङ्ग श्रा चुके थे। इन्हीं दिनों रागासांगा के छोटे भाई कुंवर पृथ्वीसिंह का एक अनौरस पुत्र बनवीर भी राणा विक्रमादित्य का मुसाहब पना हुआ था। धनधीर नीति कुशल था। उसने अन्दर ही अन्दर सब सामन्तों को अपने साथ मिलाना आरम्भ किया और राणा फे विरुद्ध उन्हें भड़काना प्रारम्भ कर दिया। थोड़े ही दिनों में राजपूत सरदारों ने विक्रमादित्य को गद्दी से उतार दिया। उदयसिंह को गद्दी पर बैठने का अधिकार तो था, पर अभी आयु ६ वर्ष की ही थी। इसलिए काम चलाने के लिये कुछ काल तक पनवीर को ही राजसिंहासन सौंपा गया। धनवीर फुलीन न था तया पृथ्वीसिंह का औरस पुग्न न था। उसकी माता एक दासी थी । राजपूत सामन्तों को धनवीर ने धोखा दिया था । सरल स्वभाव राजपूत उसफे पाजाल में फंसकर उसे राजा घना धैठे थे। उन्हें क्या पता था कि यह दुष्ट-बुद्धि पुरुष चित्तौड़ फे राजवंश का अन्त करने को तुला हुआ है। धनवीर ने सिंहासन पर बैठते ही अपनी कुटिल नीति चलानी प्रारम्भ की। उसने धीरे धीरे राज्य परिवार के सभी लोगों को अपने प्रभाव में कर लिया । बनयीर राजपूतों की सहायता से चित्तौड़ पर एकच्या शासन करने लगा। उसकी श्राशा को कोई भी टाल न सकता था। इतने पर भी पाधीर सन्तुष्ट न था ।

- " মশা उसके अन्दर एक भाग सुलग रही थी, और यह सदा - उसमे जलता रहता था। उसकी इच्छा थी कि पित्तोड़ पे राजसिंहासन पर न फेयल स्वयं ही राज्य फरे प्रत्युत उसका वंश भी सदा फे लिये उत्तराधिकारी बने । इस पाठ को मने किसी पर प्रगट में किया था। इसके लिये यह हर समय चिन्तित रहता था। धनवीर ने एक दिन सुश्रवसर देखकर छाधी रात को बयेले. ही अपना संकल्प पूरा करने का निश्चय किया। यह जानता था कि . उसकी इच्छा का विधात करने वाला राज-परिवार में कोई नहीं। थीर राजपुत विक्रमादित्य फे विरुद्ध है। उदयसिंह अभी वालक ही है। यदि इन दोनों को श्रान रात में ही समाप्त कर दूं. तो फल प्रातःकाल पूर्णतया स्वतन्त्र हो जाउंगा | तलवार हाय में लेकर बनवीर आधी रात को विक्रमादित्य की खोज में निकला। विक्रमादित्य सो रहा था । वनवीर ने तलवार फ एक ही धार से विक्रमादित्य का सिर काट दिया। यनवीर की तलवार खून से रंग : गई और रंग गया उस फमरे का फर्श । बिस्तर खून से लथपथ था। विक्रम की लोथ खून में डूबी एक ओर पड़ी थी। राजपूतों का कलाई यही नीच पनवीर प्रसन्नता से मूंछों पर हाथ फेर रहा था; मानो एक सुप्त देह की हत्या करके वह त्रिलोकी का चक्रवती राज्य पा गया हो। । बनवीर फी फ्रोधाग्नि अभी शान्त न हुई थी। अभी एक और निरीह पालक की हत्या करनी शेष थी। बनवीर एक रात में ही उस राज्य को सदा के लिये अपने वंश के लिये पका करने की, आशा बांधे हुए था। पर विघाता उसी एक रात में उस राज्य की रक्षा करने का प्रण किये था। यह थनवीर पर हँस रहा . ...

पन्ना धाय था। पामर बनवीर को क्या पता कि उदयसिंह की मृत्यु फे स्थान पर धनवीर की मृत्यु का लेख विधाता ने लिख दिया है। इस दासी-पुत्र की इस काली करतूत से एक दास ही उत्तेजित होकर इसका वैरी हो उठा था। राजकुमार को जूठ उठाने वाले एक दास नेवनवीर की खूनी तलवार देखी थी। यह सीधा उदयसिंह फे कमरे में पहुंचा। वेचारा उदयसिंह बचपन से ही पितृहीन हो गया था। माता फर्मवती भी चिता में जलकर अपने पुत्र को निराश्रित छोड़ गई थी। इस बीच में उदयसिंह को अपना दूध पिला पिलाकर जिस नारी ने माता के समान पाला था, यह थी पन्ना धाय । पन्ना के पास उस समय उसका अपना पुत्र भी सो रहा था। उदयसिंह दूसरे पलंग पर सो रहा था। दास, जिसे बारी भी कहते थे, सीधा पन्ना के पास गया और उसे उसने बनवीर की कृतघ्नता और नीचता का हाल सुनाकर विक्रम की हत्या का फुसमाचार दिया । उदयसिंह के प्राणों पर संकट आया देखकर पन्ना सतर्क हो उठी। उसी समय उस क्षत्राणी ने उपाय सोच निकाला । एक टोकरे में उदयसिंह को लिटा वारी को दे दिया और उसे अपनी प्रतीक्षा करने के लिये नदी तट का स्थान बता दिया। अधिक बातें न करके धारी को गढ़ से तुरन्त निकले जाने का संकेत फरफै वीरमाता पन्ना ने अपने पुत्र को राजकुमार उदयसिंह के विस्तर पर लिटा दिया । फुछ क्षण के लिये पन्ना धाय का पुत्र राजकुमार धनकर राजशय्या पर शयन करने लगा । उस समय पन्ना पुत्र के मुख को अांखों देख रही थी और आततायी घनवीर की आहट को कानों से सुन रही थी। उसकी मन की दशा का फौन अनुमान लगा सकता है, . माहिला-गोरस इत्याग यनयोर नंगी तगार किये हुए पना के कमरे में घुसा। उस समय मर्षय अन्धकारमा । रातमदल के लोग सो गये। पन्ना और धनवीर ये दोनों उस फगर में अपने अपने काम में सतर्फ थे। पनीर उदयसिंह की हत्या का निश्चय करफे माया था, और पन्ना अपमिद को बचाने के लिये अपना सर्वम्य अपंग फर चुकी थी। विधाता पनवीर के भाग्य पर अफमोस कर रहा था। पनवीर ने उदयसिंह का पता पूदा | पहा ने पतंग फा संत फरक पारी की ओर से अपनी गोल फेर ली । उम समय, मकर पनीर की सूनी तलवार यातक की गर्दन पर पड़ी और मदा के लिये उस बालक को मृत्यु सेज पर, सुला गई। पर पन्ना ! यह रोई नहीं, चिल्लाई नहीं, खून का चूंट पीकर अपने पुत्र की लाश को लेकर नदी के किनारे पर अन्तिम संस्कार करने पर दी । संस्कार किया और यारी से उदयसिंह को लेकर उसकी रक्षा में लग गई। पता यहां भी रोई नहीं। यह सगी क्षत्राणी थी। फमा जयसिंह फोलिए हुए कई गज्यों में गई, पर सपा ने धनवीर के डर के मारे उन दोनों को आश्रय न दिया । अन्त में धह कुंभलनेर पहुंची। यहां के किलेदार आशादेपुरा से पन्ना ने उदयसिंह की रक्षा के लिए प्रार्थना की। पहले तो वह कतराया। पर जब उसकी माता को पता लगा सो उसने पुत्र को बहुत लत्रित किया । माता ने उसे स्मरण दिलाया कि तुम्हारा यह राज्य तुम्हें रापासांगा, की कृपा से ही मिला है। इस अनाथ बो. को पाश्रय देफर तुम ऋण-परिशोध करो। तय उसने उदयसिंह, और पन्ना को अपने यहां आश्रय दिया । ये वहां रहकर अपना ..

पन्ना धाय बल बढ़ाने लगे; क्षत्रिय माता के समान पन्ना उसे हर समय बदला लेने का उपदेश करती थी। धनवीर निष्कपटक राजा बन तोगया, पर वह अपनी नृशंसता, उद्दण्डता और अकुलीनता के कारण राजपूत सरदारों का विश्वास- पात्र न बन सका। धीरे धीरे सभी सरदार उससे बिगड़ गये। ठीक अवसर आने पर उदयसिंह का भी सब को पता लग गया। सभी सरदार उदयसिंह को पहचानकर उसकी शरण में आने लगे। उदयसिंह नेसब कोसाथ मिलाकर एक दिन चित्तौड़ पर चढ़ाई कर दी। उसने धनवीर की हत्या करके अपने भाई का बदला ले लिया। उदयसिंह चित्तौड़ के राणा बने और पन्ना ने अपनी आंखों से उनका राजतिलक देखा। बाद में उदयसिंह सदा पन्ना को अपनी माता समझकर उनके चरणस्पर्श किया करते थे। पन्ना धाय की यही कहानी है। ऐसी स्वामि-भक्ति क्या संसार के किसी देश में देखने को मिलेगी कि माता अपनी संतान को अपने ही सामने कटवाकर अपने देश के राजकुमार की रक्षा कर रही हो ? जय तक चाँद और सूरज आकाश में रहेंगे माता पन्ना का यह बलिदान भारत के इतिहास में स्वर्णाक्षरों से लिखा रहेगा । धन्य पन्ना धाय ! क्या आप जानते हैं ? भूपणा परीक्षा में इस वर्ष क्या क्या प्रश्न श्रायेंगे ? भूषण परीक्षा में पिछले वर्षों में कैसे प्रश्न आये थे? किस प्रकार के प्रश्न हों तो उत्तर किस तरह देना चाहिए ? आप यह नहीं जानते-आपको जानना चाहिए-यह पास होने की सब से बड़ी विधि है। इसफे लिए भूषण मुनोत्तरायली मगाएँ इसके लेखक श्री मतीभ्राता सी हैं।

में - अहिल्याबाई संसार में बहुत मे ऐसे फूल भी खिलने हैं, जिनकी सुगंध स्पोर सौंदर्य को कोई नहीं जान पाता। ये किसी निर्जन दुर्गम स्थान फूजकर अपनी शोभा से उस स्थान को प्रशमित करते हैं और सुगंध से यहां पं पायुमण्डल फो भी सुवासिन फरते हैं। दो चार भारे तथा मारियां भी उनके सहयास से लाभ उठाती हैं। पर वे फूल पाटिका के फूलों के समान जनता से आदर नहीं पा सकते । इस में उनका दोष कुछ भी नहीं होता; स्थान को ही दुर्गमता उन्हें लोगों तक पहुँचने नहीं देती। जिस प्रकार फूलों के साय प्रकृति का नियम है, उसी प्रकार मनुष्यों के साथ भी है। न जाने कितनी गौरवमयी विभूतियां गांवों में उदय होकर अपने गुग्गसौरम से यहां की जनता रूपी वायु को सुगंबित करफ अस्त हो जाती है, पर इतिदास उनके अस्तित्व को जानता तक भी नहीं। यदि भाग्य से किसी पुशल माली या.पथिक को उनफै गुण पता लग जाते हैं तो वह उन्हें जगत् के रंग-मंच में उत्तम अभिनेता रूप में ला खड़ा करता है। यहां जिस देवी का चरित्र लिखा जा रहा है, यह भी एफ सुगंधित फूल था, एक गौरवमयी मूर्ति थी, जिसे यदि मल्हारराव सा कोई चतुर मालीस मिनतातो जगत को उसकी मां और गों महिला-गौरव का कभी भी ज्ञान न होता। वह विना जाने ही अपने गांव में अनेक अन्य बालाओं के समान जीवन बिताफर संसार से विदा हो जाती । उस पवित्र महिला का नाम अहिल्यायाई था । वह श्रेष्ठ नारी न फेवल अपने माता पिता, सास ससुर, पति और सन्तान को ही अपनी सेवा से बहुमूल्य बना गई, प्रत्युत राज्य-शासन किस प्रकार करना चाहिये, इसका आदर्श भी संसार के सम्मुख रख गई है। भारतीय इतिहासकारों की भांति सर मालकम और विन्सेपट स्मिथ जैसे विदेशी ऐतिहासिकों ने भी अहिल्याबाई फी जी भर प्रशंसा की है। उनका कथन है कि अहिल्याबाई के विषय में जितनी खोज की गई, उसके विषय में हमारा पूज्यभाव, श्रद्धा और भक्ति घढ़ती गई है । यह एक आदर्श शासिका थी। उसकी प्रजातियता, नीतिमत्ता, जीवन की शुद्धता जैसी थी वैसी और कहीं कम मिलेगी। औरंगाबाद के जिले के थोड़े तालुके में चोट नाम का एक गांव है। वहां एक दरिद्र गृहस्थ मानकोजी शिंदे नाम का बसता था। उसी के यहां सन् १७३५ ईस्वी में एक कन्या का जन्म हुआ। यह कन्या ही भविष्य में इन्दौर को प्रसिद्ध महारानी अहिल्याबाई कहलाई । अहिल्या को माता-पिता ने बचपन में ही अक्षराभ्यास फरा दिया था। यह धर्म की छोटी छोटी पुस्तकें पढ़ लेती थी। उसे महाभारत, पुराण और धर्म अन्यों के सुनने का बड़ा पाव था । मिना पूजा किये और धर्मअन्य सुने वह भोजन न करती थी। यह माता पिता की आज्ञा में रहती थी ! घर के सब काम अपने हाय से फरके यह बड़ी प्रसन्न होती थी। माता-पिता इसकी सेवा से बड़े प्रसन्न थे और उसे सदा पाशीर्वाद दिया करते थे. अहिल्या ने धीरे-धीरे यौवन में पर रखा ।

अहिल्याबाई एक किसान के घर में एक पुत्र उत्पन्न हुआ। उसका नाम मल्हारराव होल्कर रखा गया। वह अभी यथा ही.था कि उसके पिता का देहान्त हो गया। उसकी माता अपने भाई के पास जाकर रहने लगी । मल्हारराव को उसकी माता और मामा ने ही. पाल पोस कर बड़ा किया । एक दिन खेत में मल्हारराव सो रहा था कि एक फणियर काला नाग उसके मस्तक पर अपने फर्ण फैलाकर छाया करने लगा। उसके मामा ने यह बात.देखकर समझ लिया कि यह यालक एक दिन अवश्य राजा , यनंगा, इसलिये महा- राष्ट्र की प्रथा के अनुसार उसने अपनी कन्या गौतमी को मल्हारराव से परिणय सूत्र में बांध दिया। मल्हारराव और गौतमी खेती करके सुख से दिन गुजारने लगे। 'मल्हारराव ने अपनी सैनिक प्रवृत्ति देखकर माता की आज्ञा लेकर सेना में नौकरी कर ली । उसकी सैनिक कुशलता और स्वामि- भक्ति को सुनकर प्रसिद्ध वाजीराव पेशवा ने उसे पुनः बुलाया और उसके गुणों से प्रसन्न होकर उसे सन् १७२८ ईस्वी में खिलअत प्रदान की । उले मालवा और खानदेश का सूर्यदार नियत किया। मल्हार- राय उन प्रान्तों से कर उगाह फर अपनी सेना का खर्च निकालकर शेष धन प्रतिवर्ष पेशवा के पास आज्ञानुसार भेज देता था। पहले ये प्रान्त निज़ामराज्य के अधीन थे । मल्हाररांव ने इनको जीत कर अपने अधीन कर लिया था। इन प्रान्तों की व्यवस्था का भार उसने गंगाधर पेशवा पर डाल दिया, क्योंकि वह एक संशा विश्वास-. पात्र, विद्वान तथा योर मनुष्य था। मल्हाररावं का प्रायः सारा समय युद्धों और सैनिक देख-रेख में ही बीतता था । सन् १७२५ ई० में उनकी पत्नी ने एक पुत्र को -८६. . . -- अहिल्याबाई जन्म दिया । उसका नाम खंडेराय रखा गया। उसका उत्तम प्रकार से लालन-पालन होने लगा। पढ़ने लिखने के स्थान में बालक खेल-कूद तथा मार-पीट में ही अधिक लगा रहता था। वह शरीर का बलवान् था तथा वीर स्वभाव का था । कभी कभी उदंडता भी कर बैठता था। मल्हारराव ने उइंडता कम करने के लिये उसे विवाह सूत्र में बांधने का संकल्प किया । एक दिन मल्हारराव घोड़े पर चढ़कर कहीं जा रहे थे। अकस्मात् जब अहिल्याबाई के गांव के पास से निकले तो उन्होंने अहिल्याबाई को देखा । उन्होंने उसी समय उसे अपनी पुत्रवधू बनाने का संकल्प किया। कन्या के माता-पिता के मानने पर अहिल्या का विवाह खंडेराव से हो गया । अहिल्या अपने पतिगृह में श्राकर उसी प्रकार पूजा-पाठ में लगी रही जिस प्रकार वह अपने घर में लगी रहती थी। सास-ससुर की सेवा करना वह अपना धर्म समझती थी। मधुर भापण से उसने सभी के मन को मोह लिया था। ऐसी देवी को पत्नी रूप में पाकर धीरे धीरे खण्डेराव का सुधार होने लगा। वह अहिल्याबाई से धार्मिक कथाएं सुनकर धर्मात्मा होने लगा। उसने अपव्यय करना बन्द कर दिया। वह पिता के साथ युद्धों में जाने लगा। इस प्रकार पुत्र को सुधरते देखकर मल्हारराव अहिल्या से बहुत ही प्रसन्न रहने लगे। वे उसे राज-काज भी सिखाने लगे। जब कभी ये युद्ध में अपने पुत्र सहित नाते तो पौधे सारा प्रबन्ध अहिल्याबाई फरती 1-राज-प्रबन्ध को अहिल्याबाई ने इतना शीघ्र जान लिया था मानो विधाता ने राज्य करने के लिये ही -८७- महिला-गौरव उसे उत्पन्न किया हो । अहिल्या महाभारत और पुराण श्रादि का पाठ करके दान पुण्य करती थी, बाद में राज्य ' का करती थी। इसी प्रकार दिन बीत रहे थे । उसफे. प्रमशः दो सन्तान उत्पन्न हुई। पुत्र का नाम माजीराव रखा गया और कन्या का नाम मुक्ता: याई । दोनों का लालन-पालन अहिल्याबाई ने बहुत अच्छी तरह से किया। दोनों बने चन्द्रमा की 'कला के समान दिन-प्रतिदिन यहने लगे। भरतपुर के जाटों ने बड़ा उधम मचा रखा था। उन पर मल्हारराव ने चढ़ाई कर दी। खंडेराव साथ ही ये । बड़ा भयंकर युद्ध हुआ खंडेराव इसी युद्ध में मारे गये। अहिल्याबाई, जिसका 'विवाह हुए अभी कुछ ही साल बीते थे, सदा के लिये पति बिहीन हो गई । अहिल्या ने उस समय की प्रथा के अनुसार पति संग ही चिता पर जल मरने की इच्छा की; परन्तु मल्हारराव ने उसे बड़ी फठिनता से रोका । उसने उसे यहां तक कहा कि । यदि तु सती होगी, तो तुमसे पहले मैं अपनी ह.या. कर लूंगा ! अहिल्या श्वसुर की बात मानकर सती न हो सकी। यह सन्तान की पालना को अपना कर्तव्य समझकर इसमें लग गई । वृद्ध महार- राय पुत्र के शोक को, अहिल्या तथा उसकी कर्तव्य-परायणता - देखकर भूल जाते थे. वे प्रायः युद्धों में ही रहते थे। राजकाज • का सारा प्रबन्ध अहिल्या ही करती थी। यह शाय-व्यय, वार्षिक कर, सेना का खर्च, सब अपने हस्तातर से करती थी। दान-धर्म, ..पूजा-पाठ और तीर्थ बत भी वह सदा करती ही रहती थी। मन्हारराव ने राज्य का उत्तराधिकार अहिल्या को सौंपकर पेशवा को भी इसकी सूचना दे दी पेशवा भी अहिल्या के गुणों ACC- अहिल्याबाई से बहुत प्रसन्नाथे । वे उसकी प्रशंसा करके लोगों को उसफी शासन-कुशलता का उदाहरण दिया करते थे। अहिल्या इतना राज्य-काज करते हुए भी क्रोध और अहंकार से रहित थी। मल्हारराव पानीपत के युद्धों में जा रहे थे कि ग्वालियर के पालम पुर गांव में उनका देहान्त हो गया। वे मरने से पहले, अपने विश्वास पात्र तुकोजीराव होल्कर को अपने पौत्र की. देख-रेख का आदेश दे गये। अहिल्याबाई को जय अपने श्वसुर की मृत्यु का समाचार मिला तो वह बड़ी दुःखी हुई। उसने उनकी इच्छानुसार ही तुकोजी- ‘राव के परामर्श ने अपने पुत्र माजीराव को राज्य तिलक किया । मालीराय राज सिंहासन पर विठाया गया, परन्तु यह अभी बालक ही था । गम्य का सारा प्रबन्ध अहिल्याबाई ही फरती रही। पर देव की गति बड़ी विचित्र है । पुत्र को राजा बनाये एक साल ही हुआ था कि अहिल्या को उसकी भी मृत्यु का दृश्य देखना पड़ा। अहिल्याबाई पति, श्वसुर और पुत्र को खोकर एक कन्या मात्र फो लिये हुए, सब दुःखों को सहते हुए भी धीरता से राज्य. प्रयन्ध चलाने लगी। उसके धर्म-प्रेम ने उसके मन को. विपद् में भी सहारा दिया। अहिल्याबाई भीतर बाहिर सब ओर से राज्य प्रबन्ध में लीन थी। उसी समय उसके मन्त्री गंगाधर राव की उससे.सदमट हो -गई। धन के लोम से गंगाधरराव अपने एक निकट सम्बन्धी को गोद लेने के लिये अहिल्याबाई से कहा करता था। पर महारानी उसफेस्वार्य को जानकर उसकी बात को नहीं मानती थी। इससे यह मुद्ध होकर राज्य से चला गया। उसने पेरावा.फे चचा. - महिला-गारव अपने साथ मिलाकर पहिल्या पर चढ़ाई कर दी। अहिल्या के गुप्तचरों ने शीघ्र ही सब समाचार रानी को सुनाया। जय अहिल्या को पता लगा तो उसने पहले एक पत्र नम्र भापा में रापोवा को लिखा, पर उसने पत्र की ओर दृष्टि भी न डाली । रानी ने गायकवाड़ और भौंसले से सहायता मांगी। भौंसला सेना लेकर नर्मदा तट पर आ पहुँचा और रापोया की सेना से टफार लेने को प्रस्तुत हो गया । पेशवा ने भी सहानुभूति का पत्र भेजकर अहिल्या की प्रशंसा की। सप प्रबन्ध करके महारानी अहिल्याबाई शस्त्र धारण करफे देशद्रोहियों से युद्ध फरने चली । वह अश्वारूढ़ होकर अपनी सेना साथ लेकर गड़वा- खेड़ी के स्थान पर शत्रु की प्रतीक्षा करने लगी। तुकोजीराव सेना लेकर क्षिप्रा के तट पर शत्रु सेन' के सम्मुख जा डटा । उसकी युद्ध-सज्जा देखकर शत्रु चकित हो गये । राघोबा ने संधि कर ली और इन्दौर में श्राकर महारानी के दर्शन किये। उसका आतिथ्य करफे रानी ने भी उसको सम्मानपूर्वक विदा किया। गंगावर दक्षिण की ओर जाकर कुछ काल बाद ही मृत्यु को प्राप्त हो गया। अहिल्याबाई के राज्य में यद्यपि शान्ति थी, सुप्रयन्य था, तथापि कुछ दुष्ट लोग लूट-पाट मचाकर प्रजा को बहुत पीड़ित कर रहे थे। महारानी ने सब गांवों के प्रतिनिधियों को एकत्र फरक चोर डाफुत्रों के उपद्रव की चर्चा की। उसने उस सभा में यह घोषणा की कि जो.कोई चीर मेरे राज्य को चोर डाकुओं से बचा देगा उसके साथ मैं अपनी कन्या मुक्ताबाई का विवाह फर दूंगी । इस घोषणा को सुनकर एफ मरहटा वीर यशवंतराव फारशे इस काम के लिए उद्यत हो गया। , अहिल्याबाद महारानी की सहायता के आश्रित यशवंतराव ने दो वर्ष में ही सब चोर डाकुओं से देश को छुड़ा दिया। महागनी ने प्रतिज्ञा- नुसार उससे अपनी कन्या का विवाह धूम-धाम से कर दिया। भीलों ने भी “भीलकौड़ी" नाम का एक कर पथिकों पर लगा रखा था, जो उस कर को नहीं देता था उसे वह मार देते थे। महारानी ने भीलों को भी उपदेश देकर, कार्य सौंपकर, धन देकर तथा दण्ड देकर सीधा किया। अहिल्या सम्भवतः विपत्ति पर विपत्ति सहने के लिए उत्पन्न हुई थी। पति, श्वसुर और पुत्र की मृत्यु के अनन्तर अहिल्याबाई का नाती और उसके दुःख में जामाता यशवन्तराव का भी प्राणान्त हो गया। यशवन्तराव के मरने पर पुत्री मुक्ताबाई ने सती होना चाहा । पहले तो अहिल्याबाई ने उसे बहुत रोका 1 पर जब उसने किसी प्रकार भी न माना, तो हृदय पर पत्थर रखकर मुक्ताबाई को पति के साथ सती होने की आज्ञा दे दी । इस प्रकार निरन्तर प्रिय बन्धुओं का वियोग सुनकर हृदय फटने लगता है । पर अहिल्या धन्य थी, जिसने यह सब कष्ट सहा। एफ चार राघोबा को फिर अहिल्या से धन बटोरने की इच्छा हुई। उसके संदेश को पाकर अहिल्या ने उत्तर में कहला भेजा कि मैं अपने श्वसुर की सब सम्पत्ति शंकर जी के निमित्त दान कर चुकी हूँ। श्राप उसमें से दान लेना चाहें तो ले सकते हैं। इस उत्तर को सुनकर रापोवा चिढ़ गया। यह सेना लेकर पढ़ दौड़ा । इधर अहिल्या भी स्त्रियों की सेना सजाकर उसके सम्मुख जा डटी। राघोया लजित और निराश होकर युद्ध किये बिना ही यहां से लौट गया। A महिला पोख महारानी अहिल्या र यन्त्र पहनती थी। सकी वेश-भूषा मादी थी । यह दान-पुण्य फरफ भूलों को रोटी सिलाकर, म्यं थोड़ा सा थाहार करती थी। दोनों का विशेष ध्यान रखती थी। यह राज्य कार्य के सय काम म्पर्य करती थी। प्रातः से मायंकाल तक यद भोजन और थोड़े विश्राम के अतिरिक्त लगातार राज्य की देखभाल करती थी। यह म्वये फागज-पत्रों पर हस्ताक्षर करती थी। उनसे मय लोग अपनी कार-पाया पह सकने थे। उसने फाशी, मथुरा शादि तीयों पर बड़े यो मन्दिर, घाट, धर्मशालाएं बनवा दी थीं। दरिद्रों के लिए सदाचन खुलया दिये थे। फाशी फे विश्वनाथ जी के मन्दिर में उसने स्वर्ण का पत्रा भी चढ़ाया था। राज्य में उत्तम सड़कें बना दी थीं । यह धर्मात्मा और दयालु स्वभाव की थी। प्रजा पर पुत्रमा प्रेमकरती. थी। यह स्तुति से बचनी थी । एक बार एक माझमा उसकी स्तुति में एक पुस्तक धनाफर लाया, अहिल्या ने प्रसन्नता प्रगट करके इस पुस्तक को नर्मदा में फिकवा दिया। मुक्ताबाई का पुत्र नत्यू भी २० वर्ष की आयु में चल बसा था। उसके शोक में यशवन्तराय भी म्यर्ग सिधार गया था। मुक्ता भी पति के साथ ही चिता पर जल मरी थी। अदिल्या ने सपछली कड़ा करके सहा । शायद यह सहने और तर्फ फरने को ही बनाई गई थी। उसने पूरे ३० वर्ष तक अपने देश पर सुशासन किया। सन् १५४५ ई० में यह देवी है येर्ष की आयु में अपनी प्रजाको रोता छोड़कर स्वर्ग सिधार गई । तुकोजीराव उसे सदा सहायता देते रहे थे। भाज अहिल्या की न्यायपरायणता को स्मरण फरफ लोग उसे पूजते हैं। ऐसी देवी से भारत का नाम संसार में उम्ज्वल कमलादेवी नेहरू आर्यावर्त की पुण्यभूमि गौरवमयी महिलाओं की खान रही है। संसारभर की व्य सिदों की गरना में यहां की देवियों का नाम प्रथम ही रहा है। स्वभावतः ही भारती. खिों की महत्ता- समय समय पर प्रकट होती रही है। हमारे देश के हृदय-सम्राट पं. जवाहरलाल नेहरु का नाम, किससे छिपा है । भारतवर्ष ही नहीं, सारा संनार ही उनके नाम से परिचित है। उन्हीं की सुयोग्या तथा त्यागीता पनी का चरित्र एक आदर्श चरित्र है। भारत की वर्तमान राजनैतिक हल- पल में जिन वीर नियों ने अपने सब सुखों को त्यागकर देश- पर तिल तिल करके अपने प्राणों की आधुति दी है, कमलादेवी, नेहरु उनमें से प्रमुख हैं। .. एक कारमीरी प्राझण पं० जयकृ.अटल जयपुर में रहते थे। इनफे कोई भी सन्तान न थी। निराश होकर इन्होंने एक फारमीरी प्राप्त चालक को गोदी लिया । उस. यालक का नाम जवाहरलाल कौल था। जवाहरलाल बड़े होकर दिल्ली में अपना व्यापार करने लगे। अब भी दिल्ली के अनेक व्यापारी उनके व्यापार घातुर्य को प्रशंसा करते हैं। इन्ही जवाहरलाल कौल फैं पर सन् , १६०० ई० में एक कन्या उत्पन्न हुई , जिसका नाम फमला देवी रखा गया।

महिलानारस कोल जी पं. पर और भी कई यच्चे हुए थे। उन सय से छोटे पुत्र फैलाशनाय फोल आजकल मीतापुर में रहते हैं। ये कमलादेवी फे सब से छोटे भाई है। कमलादेवी के पिता एफ म्नही पिता थे। ये अपनी सन्नान फे पालन-पोपा नया उनकी शिक्षा-दीक्षा की ओर विशेष ध्यान देते थे। कमलादेवी ने अपना बालकपन राजकुमारियों की भांति बिताया! काश्मीरी प्रामगों के यहां कन्याओं की शिक्षा प्रारम्भ से ही देवनागरी लिपि में होती रही है। यद्यपि वे स्वयं उर्दू भारसी. की प्रोर घहते रहे हैं, तथापि उन्होंने लड़कियों की पाठ-प्रणाली को दृषित नहीं होने दिया। फमलादेवी की शिक्षा का प्रबंध घर पर ही किया गया था । वे शीय ही हिन्दी में प्रयोगा हो गई। कमलादेयी फी युद्धि बड़ी नौत्र थी। वे जो फुछ पढ़तीं, उसे तुरन्त ही म्मरण कर लेती थी। जब ये सात वर्ष की थी तो इन प्रयाग में किसी मम्बन्धी के यहां जाकर स्थायी रूप से रहना पड़ा। फौल जी ने ऐसा क्यों किया, ठीक पता नहीं, संभवतः प्रयाग को शिक्षा का पेन्द्र समझकर कौल जी ने कमलादेवी को अपने संपन्धी के यहां भेज दिया हो। प्रयाग में कमलादेवी ने कुछ अंग्रेजी भी मीख ली। प्रयाग के सुप्रसिद्ध वकील पं० मोतीलाल नेहरू काश्मीरी पण्डितों में बहुत प्रादर की दृष्टि मे देखे जाते थे। ये घड़े धनी थे. और चोटी फे यकील थे। उनका कमलादेवी पं. माता-पिता से अच्छा परिचयं था। पं० मोतीलाल की तीन कन्याएं थीं और एक पुत्र था । इनके पुत्र पं० जवाहरलाल नेहरू अाज भारत के बेताज बादशाह कहे जाते हैं। पं० जवाहरलाल नेहरू जी की शिक्षा के लिये पं० मोतीलाल जी ने रुपया पानी की तरह यहाया था।

कमला नेहरू घर पर शिक्षा पाने के परगन् पं. जवाहरलाल नेहरू ने योरप में शिक्षा पाई। पण्डित जी जब इंगलैण्ड में वैरिस्टरी की परीक्षा देने वाले थे तब उनके माता-पिता प्रयाग में सुयोग्य कन्या की खोज में थे । पं० जवाहरलाल नेहरू की माता श्रीमती म्वरूप रानी की दृष्टि कमलादेवी की ओर लगी हुई थी । अन्ततोगत्वा उन्होंने कमलादेवी को ही वधू बनाने का निश्चय किया। पं० मोती लाल नेहरू और उनकी धर्मपत्नी स्वरूपरानी ने .फमला देवी को पं० जवाहरलाल नेहरू के लिए चुनकर अपने कीर्ति-शाली वंश को और भी उज्वल बना लिया । कमला के विना जवाहर कदाचिन् अधूरा रहता और जवाहर फे बिना कमला भी अपने सौरभ को जगत् में न फैला पाती । दोनों का चुनावं दोनों के माता-पिता को स्वीकृत था। एक बार जब पं० जवाहरलाल नेहरू योरुप से पाये हुए थे तो मसूरी उनकी कमलादेयी से भेंट कराई गई थी। दो वर्ष के अनन्तर जब वे वैरिस्टरी पास करके भारत लौटे तब कमलादेवी का उनसे विवाह सम्पन्न हो गया। . “विवाह के समय कमला की आयु १६ वर्ष की थी । विवाह की धूम-धाम के क्या कहने। दोनों ओर बड़ी सज-धज धज थी, अपूर्व समारोह था। पं० मोतीलाल तो राजाओं से बढ़ कर ऐश्वर्यमय -जीवन बिताते थे। उनके धन का ठिकाना न था। फिर अपने एक मात्र पुत्र के लिये उसका उपयोग न करते तो कर करते ? आपने ऐसे मारी भोज दिये कि जिसमें सरकारी अधिकारी तक निमंत्रित किये गये । वे भोज, सम्मिलित होने पाने लोगों के लिये, प्राज तक भी स्मरणीय हात रह गये हैं। यह जवाहरलाल, जो अंग्रेजी 'शिक्षा के प्रभाव से प्रभावित होकर. देशी भाषा, देशी भेष, देशी महिला-गौरव श्राचार विचार सब से घृणा करते थे, एक कश्मीरी पंडित' फे- उचारण किये हुए कुछ मन्त्रों द्वारा अनि-युएड के सामने, एफ बिल्कुल देशी शिक्षा प्राप्त कश्मीरी कन्या से जीवनभर के लिये ऐसे सुदृढ़ गठजोड़े में बांध दिये गये कि किर उससे निकलना तो क्या था, वे ज्यों ज्यों देवी जी को पहचानते गये त्यों-त्यों स्वदेशी धनते गये। कमला नेहरु वंश की पुत्रवधू यनी । पं० मोतीजान और स्वरूपरानी कम ना को अपनी पुत्री के समान ही स्नेह करते थे। कम ना जी ने घर में आते ही अपने स्वभाव से सब को मोहित कर. लिया । जवाहरलान जी की यहिने कृष्णा नेहरु और विजयलक्ष्मी जी पर उनका सगी बहिनों सा प्रेम हो गया । सास ससुर की चे, सदा सेवा करके उन्हें प्रसन्न रखने लगी । घर के नौकर-चाकर: और अन्य कर्मचारी सब से दया का वार करती। सगे संबन्धी: सब ही- फमला जी से प्रसन्न हुए। पं. जवाहरलाल जी का तो. कमजा जी से इतना प्रेम हो गया मानो उन्हें पाफर वे एक परितृप्ति, एक संतोप, पा गये हों। कमला देवी आज इस नश्वर संसार में नहीं। उसने अपना तन, मन धन सब कुछ अपने पति की इच्छा पर निछावर. कर दिया । पतिव्रता कमला जवाहरलाज की वास्तविक पत्नी थी। विवाह के बाद कमला नेहरू को अंग्रेजी समझने का भी अच्छा अभ्यास हो गया था। इनको १६१७ ई० में एक पुत्री' उत्पन्न हुई, उप्तका नाम इन्दिरा रखा गया । यह फन्याः भी अपने माता-पिता के समान ही चीर-हृदय और देश-भक्त है । परमेश्वर इसे. चिरंजीव रखे ।१९२४ ई० में फमलाजी को एक पुत्र भी उत्पन्न हुथा, 4 4 कमला नेहरू पर तीन दिन के बाद यह चल घसा । उसफे बाद कमला जी का स्वास्थ्य प्रायः क्षीण ही रहा। उनके और कोई सन्तान नहीं हुई। पं० मोतीलाल और माता स्वरूप रानी की, पौत्र का. मुख देखने की, इच्छा पूरी न हो सकी। एक बार पिता ने पुत्र को दृसग विवाह फरने के लिए चल देते हुए कहा, "शास्विर श्रानन्द भवन में कोई चिराग जलाने वाला भी होगा या नहीं" तब पं० जवाहरलाल ने इन्दरा को उन्होंने पुत्र के समान पाना है और उसे भी उच्च शिक्षा प्राप्त करने के लिये योरप में भेजा है। पं० जवाहरलाल नेहरू ने दो तीन वर्ष तक दैरिटरी की। पर उनका मन उसमें न लगा। वे भारत की राजनीति में मन लगाते रहे। धीरे धीरे उन्होंने बैरिस्टरी को छोड़कर राजनीति में भाग लेना आरम्भ कर दिया । पुत्र को देखकर पण्डित मोतीलाल नेहरू भी राजनीति में भाग लेने को बाध्य हुए। यह सब देखकर फमला देवी नेहरू अपने पति और ससुर से पीछे कर रह सकती थीं। इन्होंने भी राजनीति में उनके साथ ही साथ मनोयोग देना प्रारम्भ कर दिया। ' सन् १९१९ ई० में पण्डित मोतीलाल जी कांग्रेस के सभापति बनाये गये थे। उन्होंने अपनी जेब से हजारों रुपये खर्च करके पार्लियामेंट को तारें दी और निरपराध भारतवासियों को. फाँसी से छुड़वाया। जवाहरलाल जैसा स्वतन्त्र हृदय ‘युवक भला पीछे कब रह सकता था। उसने राजनीति में खुल्लमखुल्ला भाग लेना बारम्भ कर दिया। सौभाग्यवश महात्मा गांधी ने सन् १९२० श्रीर २१ में असहयोग, आन्दोलन पला दिया। जवाहरलाल, अपनी पैरिस्टरी को उसी समय छोड़ दिया। आन्दोलन में आपने - - महिला गौरव अपनी यात्राओं से जान डाल दो। मला सरकार फर तय मौन रहती । जवाहरलाल को बन्दी कर लिया गया। जवाहर का. वन्दी होना था कि कमला सिंहनी के समाय इस आन्दोलन में पूर्व पड़ी। असहयोग प्रान्दोलन फमला के श्राने से चमक उठा ! स्कूल, कानेज, कचहरी, सरकारी नौकरी का यहिष्कार होने लगा। लोग विदेशी कपड़ों की होली जलाने लगे । जवाहरलाल तो विदेशी कपड़ों को उतार ही चुके थे । कमला ने भी बड़ी बड़ी मूल्यवाली साड़ियों को इकट्ठा कर अपने हाथों से आग लगा दी। नेहरू परिवार का ऐसा त्याग देखकर लाखों स्त्रियों ने अपना सप विदेशी कपड़ा जला दिया। कमला ने जगह जगह होलियां जलानी प्रारम्भ कर दी, इससे अान्दोलन अहो गया। कमला नेहरू सुकोमल शरीर की थीं । इनका स्वास्थ्य प्रायः क्षीण रहता था। इस आन्दोलन में भाग लेने से और पति के कैद होने से इनके जीवन को भी बहुत धक्का लगा! स्वास्थ्य क्षीण होता गया और डाक्टरों ने राजयक्ष्मा का प्रारम्भ घतलाया। इससे नेहरू परिवार को इनके स्वास्थ्य की चिन्ता बढ़ गई । यहां पर उत्तमोत्तम चिकित्सा से भी जब लाभ न हुआ तो 'जवाहरलाल रिहा होते ही स्विट्जरलैण्ड ले गये। वहां इन्हें कुछ कुछ लाभ हुआ ।इनके साथ हो इन्दिरा और पण्डित जी की 'यदिन कृष्णा नेहरू भी गई थी। कमला स्वस्थ हो गई और पण्डित जी के साथ उन्होंने समस्त योरुप की यात्रा भी की। पंडित जी इन दिनों घूसेल्स में होने वाली साम्राज्य विरोधिनी सभा में भी सम्मिलित हुए । भारत में आने पर ये कुछ दिन स्वस्थ रहीं; पर फिर इन्हें देश-सेवा का कार्य करना पड़ा और इनका शरीर फिर अस्यस्थ) हो गया। एक धार नेहरू कमेटी के निर्णय पर पिता-पुत्र मैं वैमनस्य ' होंगे। वह वीर पुरुष A कमला नेहरू हो गया.! मोतीलाल जी का विरोध जवाहरलाल जी ने ही सर्व दल सम्मेलन में कर डाला! महात्मा गांधी के बहुत समझाने पर भी जवाहरलाल न माने । कमला जी को इससे बहुत धक्का लगा। उन्होंने भी पिता पुत्र की संधि कराने में भरसक यत्न किया। सन् १९२६ की कांग्रेस के सभापति पं० जवाहरलाल नेहरू वने । लाहौर के बाजारों में उनका घोड़े पर जलूस निकला। भला कम्पनी की दुकान के ऊपर बैठे हुए पं० मोतीलाल नेहरू और माता स्वरूपरानी नेहरू ने पुत्र को, वीरों की तरह जयमाल पहने, भारत का हृदय सम्राट् बना हुआ, देखकर रुपयों की थैलियां लुटा दी थीं। अनारकली में रुपयों को वा होने लगी थी। जवाहर -मुस्करा रहा था। कमला के मन में उस समय क्या क्या भाव आये वीर-पत्नी बनकर अपने को धन्य समझ रही होगी । कां मेस का कार्यक्रम प्रारम्भ हुआ। महात्मा गांधी ने पहली जनवरी सन् १९३० को आधी रात बीतने के ५ मिनिट : पाद जवाहरलाल के सभापतित्व में भारत के लिये पूर्ण स्वतन्त्रता का प्रस्ताव पास कर दिया। . . महात्मा गांधी जी ने डांडी का मार्च करकं नमक-कानून * तोड़ा। फिर क्या था, सारे भारत में नमक बनने लगा । धड़ा- धड़ लीडर पकड़े जाने लगे। महात्मा जी पकड़े गये। जवाहरलाल ने नमक बनाया; वे भी पकड़े गये । फिर तो मोतीलाल जी ने भी -श्रानन्द भयन में नमक बनाना शुरू किया। कमला ने तो गली गली नमक बनाना प्रारम्भ कर दिया । पर सरकार ने कमला को धन्दी न बनाया। मोतीलाल जी ने विदेशी कपड़ों के व्यापारियों से मिलकर उनके कपड़ों पर मोहर लगवाकर घेचना बन्द करा दिया। तय तो ध्यापारियों ने भी मोतीलाल का साथ दिया । जिसने साथ । .

को . महिमा-गौर नदिश, दन पर धरना देकर पदिकार करने का सगा गा। इसमें सरकार परा गई और मोतीलाल को को पराडका मास के लिए पन्दी कर दिया गया। अपने धर्म-पिता को फारागार में जाने देरा कमना सदी Nareी पं. समान मैदान में था इटी ! पद म्ययं परना देने लगी। स्वयंसेविकाओं और मेवों का तो उसने पहले ही गाय गाय, गाड़ी गती, घर घर जाकर संगठन किया था। अब स्वयं धरना देकर, विदेशी व्यापारियों का मान शिको से मच्याने लगी। कमा नेहरू और कमला मदीना भर में वालंटियर बनकर पाना देने सगी । प्रायः व्यापारियों ने विदेशी कपड़ा येचना पन्द कर दिया। पर यचने याले भी थे ही। गरमी के दिन थे; तग धूप धी, सू बदन मुस रही थी, पृथ्वी जल रही थी। फमला एक विदेशी कपड़े की पूफान पर धरना दे रही थी। जय कोई गाइफ पाता तो फमला उसे कपड़ा न खरीदने की प्रार्थना करती । कपड़ा रिकना तो धन्द हो गया, पर सुकुमारी फमला अन्दर ही अन्दर रोगी : रहने लगी। सोमी फगता जी ने स्वदेशी के प्रचार के लिए गांव गांव का दौरा किया, व्याख्यान दिये । निर्धन गांव वालों को धन देकर भी स्वदेशी कपड़े पहनाये। एक बार, एक गांव पाने कगला हो -से कहा "आपका स्याल , मुनकर ,में स्वदेशी कपड़ा पहनना र चाहता हूँ, पर मेरे पास एक भी पैसा नहीं, फहां से पह" कमला ने तुरन्त एक रुपया अपने पास से देकर पाहा-'इसकी घोधी लेकर 'पदनो.।' स्यदेशी के लिए उन्होंने चंदा भी किया। कमला को कार्य करते हुए, देखकर अच्छे अच्छे घरों को. स्त्रियों ने स्वदेशी . । . .

कमला नेहरू वस्त्र पहनने प्रारम्भ किये थे। कमला जी की अत्यधिक लगन और दौड़-धूप से स्वदेशी आन्दोलन बहुत बढ़ गया था। पं० मोतीलालजेल में रोगी होगये थे। सरकार ने उन्हें छोड़ दिया। वे आनन्द भवन में रोगी पड़े थे । कमला उनकी सेवा में लगी रहती थी, परन्तु देश के काम को भी साथ साथ करती जाती थीं। इन दिनों प्रयाग में सिविल लाईन्स में जलूस जाने बंद थे । पर कांग्रेस बाले जलूस ले जाने के लिए तुले हुए थे। लोग पकड़े जाते थे, तो भी जलूस ले जाने को उटे हुए थे । एक दिन कमला को अग्रणी बनाकर जलूस, चला, ५० सहस्र से अधिक मनुष्य जलूस के ::साय थे। पुलिस ने अलबर्ट रोड पर जलूस को रोका । सब लोग धरना देकर वहीं बैठ गये । जुलूस के साथ बैंड भी था। “श्रादी रात तक लोग बैठे रहे। जब पं० मोतीलाल को पता लगा तो ये रोगी अयस्था में ही मोटर में बैठकर पुलिस के घेरे को चीर कर जलूस में पहुंचे और उन्होंने सिंहनाद करके पुलिस को वहां से हटने के लिये बाध्य किया। अपनी पुत्र-यधू कमला पर पं० जी कितना स्नेह रखते थे, इसके लिए यह एक ही उदाहरण पर्याप्त है । शीय स्वास्थ्य को लिए हुए फमला काम कर रही थीं । इतने में कर-बन्दी का आन्दोलन श्रारंभ हुआ । प्रयाग इस आन्दोलन "का गढ़ था। कमला ने भी गांव-गांव में प्रचार करना शुरू किया। 'लोग फमला की चतता सुनकर सरकार को .फर देना बन्द करते "जाते थे। ये कमला की, सहानुभूति और प्रेम के वश में होकर उस माता के समान पूजते थे। कर घन्दी का आन्दोलन सफल "होते देख सरकार ने फमला जी को बन्दी कर लिया । - मोतीलाल जी का रोग बहुत बढ़ . . गया था।

महिला-गौरव सरकार ने कमला को छोड़ दिया । वे-पं०. जी की सवा करने लगी। इन दिनों सरकार से कांग्रेस की संधि हो गई। सभी नेता गयाग प्राये हुए थे। महात्मा गांधी मी उपस्थित थे। पंडित ली को ऐक्सरे के लिये लखनऊ भेजा गया। पर ६ फवरी को ६ बजे सायं पण्डित मोतीलाल जी का स्वर्गवास हो गया। कमला फो इस' से पहुत धका लगा । इधर जवाहरलाल जी का स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा था। दोनों लंका की यात्रा करने चले गये। वहां से आने पर देश में फिर पकड़ धकड़ होने लगी। गोलमेज़ कांफ्रेंस फे याद' भारत में आते ही महात्मा गांधी पकड़े गये । जवाहरलाल भी 'पकड़े गये । फमजा को फिर काम करना पड़ा। कांग्रेस कमेटियों को सरकार ने नियम-विरुद्ध घोषित कर दिया था । तो भी कमला 'जी विजयलक्ष्मी के साथ काम करती ही जाती थीं। उन्होंने स्वयं- सेवकों को संगठित किया। उनकी हर तरह से सहायता करके कांग्रेस के काम को जारी रखा। फिर कमला शहर के एक 'कोने से दूसरे कोने में दौड़ दौड़ कर वीरों को उत्साह देती किरती थी और भोजन-छादन का प्रबन्ध करती थी । इस गौरवमयी महिला के सामने बड़े बड़े नेता भी हार मानते थे। कांग्रेस-कार्य-कारिणी के सब सदस्य, प्रायः पकड़े जा चुके थे। कमला नो को और पं० मदनमोहन मालवीय जी को कांग्रेस # कार्य समिती का सदस्य चुना गया। यम्बई में इनका जलूस । निकाला गया। ५० या ६० सहस मनुष्य साथ थे, पुलिस ने जुलुस को रोककर मालवीय जी को पकड़ लिया। 1. परिश्रम और कष्ट के कारण कमला जी रोगी हो गई और रोग- शय्या पर पड़ गई । इस पर सरकार ने जवाहरलाल जी को पुछ । 36 . तबं.

Mahila Gaurav

Author
Shastri,vrandhawan
Title
Mahila Gaurav
File name
Mahila Gaurav
Text
OCR done
Citation
1943
Published
2011/04
Publisher
Lahore,arya Press
Language
Sanskrit
Pages
99
Library
Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Classification
Literature
DLI number
552332
Barcode
4990010033073.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
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