Bharatiya Jnanpith
Shri Bhadrabahu Chritra
Front matter
No text on this page.
No text on this page.
No text on this page.
1320
8888888TOR
0
DO685006
आचार्यश्री रत्ननंदी उर्फे रत्नकीतिजी पिरवित
श्री भद्रबाहुचरित्र
हिंदी अनुवाद, मूल ११७ संस्कृत श्लोक सहित
SARKAR0050002026.060.4220aaaaaAAAOR
अनुवाद
कर्ता :
वर्गीय पं. उदयलाल कासलीवाल जैन (बडनगर नि०)
प्रकाशक:
मूलचंद किमनदास कापडिया
दिगम्बर जन पुस्तक लय, गांधी चौक - सरन
8888888888888588888888899
A
में पुस्त
नीमरीवार ।
वीर स. २४९ | प्रति. १०००
'जैन विजय' प्रि.प्रेस- गांधी
मूलचद किसनदास कापडियाने
F मं
मूल्य • दो रुपये*
Bee83ae8888888s UGGES
*
सूरत।
. निवेदन . इस भद्रबाहु स्वामी चरित्रकी दूसरी आवृत्ति हमने वीर सं. २.४७९ इ. मन् १९५३ में म्व. मेठ किमनदाम पूनमचन्द कापडिया (पूज्य पिताजी) के स्मणार्थ प्रन्थमाला न. ८ में प्रकट की थी वह भी खत्म हो जानेसे इशकी यह तीसरी आवृत्ति मूल संस्कृत श्लोक सहित ही प्रकट की जाती है। यह ग्रन्थ आचाय श्रीरत्ननन्दी उफ श्रीरत्नकीर्ति कृत संस्कृतमें था जिमका हिन्दी लनुवाद स्वगवासी पं. उदयलालजी काशलीवाल (बइनगननिवासी) ने स्थाद्वाद महाविद्यालय काशीमें रहकर किया था और उसे मूल सस्कृत लोक सहित उपाकर प्रकट किया था जिमको आज ५५ वर्ष हो चुके है। इम प्रन्थ में जनोंके मुर दिगम्बर-निर्ग्रन्थ मतमेंसे ही नाम्बर जैन मनकी स्थापना कब व कसे संयोगोमें हुई थी, उसका पूरा इतिहास है तथा दिगम्बर मत ही प्राचीन है और श्वेताम्बर मत अर्वाचीन है यह इस प्रन्यके अनेक प्रमाणोंसे सिद्ध होता है। पं उदयलालजीने प्रथमावृत्तिमें इस पर बड़ी व पढ़ने कोग्य प्रस्तावना लिखी थी उसको भी हमने अक्षरशः प्रकट की है तथा- इस प्रन्यके रच यता आचार्यश्री रत्ननन्दीजी या रत्नकीर्तिजीके समय व कार्यके विषयमें विशेष ऐतिहासिक खोज करनेको हमने तीन चार पर विद्वानों को लिखा था उनमेंसे जैन ऐतिहासज्ञ बाबू कामताप्रसादजी (अलीगंज । ने इस विषयमें एक "ऐतिहासिक विवेचन " बड़ी खोजपूर्वक लिखकर मेगा था जो साथमें प्रकट किया जाता है। जिससे पाठकोंको मालूम होगा कि भद्रबाहुचरित्रके कर्ता आ. रत्ननन्जी १३ वो शनिमें (३) ये थे व इस विवेचनसे भी श्वेतांबर जैन मतकी उत्पत्ति का व कसे ई थी, यह स्पष्ट मालम होजाता है और दिगम्बर निन्य जनमत प्राचीन टहरता है। यह एक प्रामाणिक ऐतिहासिक प्रन्थ है इस लिये संस्कृत लोक सहित ही प्रकट किया है जो संस्कृतज्ञ हु नझेद्धव! लिये तो बडा उपयोगी है। इसको मूल आशा है कि इस प्रन्धराजकी तीसरी भावृत्तिका भी शीघ्र प्रचार हो जायगा। सरत वीरा सं. २४९२ म.२.२३ हद. श्रावण सुदी १० (अक्षय दशमी) ता. २५-८-१६, निवेदक- मूलचंद किसनदास कापडिया -प्रकाशक।
विषय-सूची
नं.
विषय
८
४१
१ भद्रगड और उसके कर्ताके विषयमें ऐतिहासिक निवेदन
२ प्रथम आवृतिकी विस्तृत प्रस्तावना (पं. उदयलाल कासलीवाल कृत)
३ भद्रवादुचरित्र-सभाषानुवाद
४ प्रन्यारंभ-प्रथम परिच्छेद-श्री भद्रबाहुस्वामीकी
दीक्षा पर वर्णन करनेवाला प्रथम परिच्छेद
५ दूसरा परिच्छेद-सोलह स्वप्नोंका फल तथा
भद्रबाहुस्वामीके बिहार का वर्णन
६ तृतिय परिच्छेद-द्वादश वर्ष पर्यंत दुष्काल तथा
विशाखाचार्यका दक्षिण देशमें भ्रमण
७ चतुर्थ परिच्छेद-श्वेतांबर मतकी उत्पत्ति तथा
खापली संघकी उत्पत्तिका वर्णन
८ अनुवादकका परिचय
१०९.
९ श्री रत्ननन्दी आचार्य विरचिन् श्री भद्रबाहु
चारित्रम् (संस्कृत)
११०-१६०
११
(१) श्री मद्रबाहु चरित्र व उसके कर्ता विषयमें- ऐतिहासिक विवेचन श्री भट्टारक रत्ननंदि अथवा रत्नकीर्ति आचार्यका रचा हुआ "भद्रबाहु चरित्र" नामक प्रस्तुत ग्रन्थ पुराणकोटिमें आता है। और पुराण ग्रन्थ भारतीय इतिहासकी परम्पराको जाननेके लिये उपयुक्त माधनोंमें एक मूल्यमयी साधन है। कदाचित् पुरःणगत वार्ता अन्य श्रोतमे अबाधित हो, प्रत्युत दूसरे प्रकारसे उमका समर्थन शिलालेखादिसे होता हो तो वह प्रमाण मानी जाती है-ठोम इतिहास बनता है उसमे। अतः "भद्रबाहु चरित्र" में वर्णित तथ्यों पर इस दृष्टिमं विचार करना अभीष्ट है । कहा जाता है कि "भद्रबाहु चरित्र के रचयिता श्री रत्न- नंदि अथवा रत्नकीर्तिजी कोई प्राचीन आचार्य नहीं है। वह भद्रबाहुस्वामीमे सैकड़ों वर्षों बाद हुये-उनकी बात कैसे प्रमाणभृत हो ? शङ्का निरर्थक नहीं है-ठीक है; परन्तु इस सम्बन्धमें एक बातको ध्यान रखना उचित है और वह यह है कि प्राचीन भारतमें ज्ञानकी परम्परा गुरु-शिष्योंकी लड़ीसे जुड़ती चली आई है । रत्ननंदीने जो लिखा वह पूष परम्परासे जो उनको मिला उसीको अपने शब्दोंमें लिख दिया-इसे इन्होंने अपने ग्रन्थको आदिमें ही यूँ व्यक्त कर दिया है:- (२) "शक्त्या हीनो:पि वक्ष्येऽहं, गुरुभक्त्या प्रणोदिनः । श्रीभद्रबाहुचरितं, यथा ज्ञानं गुरूक्तितः ॥ ७ ॥" इस प्रकार “भद्रबाहुचरितत" में जो वार्ता लिखी गई वे उस समय गुरुपरम्परा चली आई प्राचीन अनुश्रुनियां थीं। अतः उन्हें 'अर्वाचीन' कहकर अविश्वसनीय नहीं कहा जा सकता। इम प्रमंगमें श्रीरत्ननंढीजीक सम्बन्धमें कुछ जान लेना आवश्यक है। परन्तु दुर्भाग्य में उन्होंने अपने विषय में कुछ अधिक लिग्या नहीं है । पट्टायलियोंमें इस नामक दो आचार्योंका उल्लेख हुजा है । पहले रत्ननंदीका समय विक्रम सं० ५६१ है और वह वीरनदीक पश्चात् पट्टाधिकारी हुये थे। दूसरे रत्ननंदि अथवा रत्नकीर्तिका ममय वि० मं. १२९६ दिया हुआ है और वह भ० धर्मचन्द्रके पश्चात् पट्ट पर आरूढ़ हुये थे। उस समय पट्ट म्यान अजमेरमें था। 'भद्रबाहु चरित्र के आन्तरिक दिग्दर्शन में यह दुसरे रन्ननंदीजी ही उसक रचयिता भामने हैं। उन्होंने शिक्षा-गुरु श्री ललितकीनि बताये हैं। पट्टावलीमें दूसरे रत्ननंदीमें पहले एक ललित कीर्तिजीका उल्लेख मिलता है जो वि० सं० १२५७में पट्टाभिक्ति हुये थे। हमारे विचारसे यही ललितकीर्तिजी भ० रत्ननंदीके शिक्षागुरु थे। इस प्रकार "भद्रबाहु चरित्र"के रचयिता विक्रमीय तेरहवीं शताब्दिके विद्वान ठहरते हैं, परन्तु उन्होंने जो लिखा वह पुराना या और गुरु परम्परासे उनको मिला था। इसमें एक आपत्ति (३) यह है कि 'भद्रगहु चरित्र' में ढूंढिया मतकी उत्पत्तिका भी जिक्र है। हो सकता है कि यह श्लोक प्रक्षिप्त हों! अथवा ग्रंथकारका ममय मोलहवीं शताब्दि हो। इस ओर विशेष खोजकी आवश्यकता है। प्रस्तुत ग्रन्थमें रचयिताने निम्नलिखित बातोंपर प्रकाश डाला है:- -- ) ( १ ) भद्रबाहु नामक श्रुनकेवली हुये थे; जिनके उपदेशसे मौर्य मम्राट चन्द्रगुप्त दिगम्बर जैन मुनि हो गये थे (२) उनके समयमें द्वादश वर्षीय दुर्भिक्ष पड़ा था; जिसके कारण निग्रेन्य संघ दक्षिण भारतकी ओर चला गया था। ( ३ ) जो निग्रेन्य श्रमण दुर्भिक्षक विषयमें उज्जैनके आमपाम उत्तर भारतमें रह गये व उसकी कठिनायोंको झेल न मके और श्रावकोंक अनुरोधमे उन्होंने बंड वस्त्र कलाई पर लटकाना प्रारंभ कर दिया एवं जिनकल्प और स्थविर कल्पकी सृष्टि कर ली कालान्तरमं पूर्वका “ अर्द्धकाल" सम्प्रदाय बिल्कुल स्पष्ट होकर श्वेत वस्त्र धारण करने लगा और श्वेताम्बर नाममे प्रमिद्ध हो गया । भद्रबाहु और चन्द्रगुमक गुशिष्यत्र और द्वादशवर्षीय दुर्भिक्षकी वार्ता एक निर्णीत इतिहास मानी गई है; जो प्राचीनतम साहित्य (जैसे तिलोयपण्णति ) एवं शिलालेखीय साक्षीस प्रमाण- । (४) भूत सिद्ध है। अतः उसके विषय में ऊहापोह करना आवश्यक नहीं। रह जाती है तीसरी बात कि क्या पहले अद्धंफालक सम्प्रदाय हुआ और वही श्वेताम्बर सम्प्रदायमें परिवर्तित हो गया ? रत्ननदिजीका यह लिखना कहां तक ठीक है, यह विचारणीय है। मनोवैज्ञानिक दृष्टि से यदि विचार करें तो भी यही भासता है कि प्राचीन प्रथाका मूलोच्छेदन और परिवर्तन एकदम नहीं हो जाता --वह धीरे२ ही बदलती और स्पष्ट होती है। पहले उसके विद्रोहमें बीज बोया जाता है-वह छोटे रूपमें अंकुरित होता है और फिर पनप कर बड़ा हो जाता है—उसका अपना अस्तित्व बन जाता है। श्वेताम्बरीके सम्बन्धमें भी ऐमा हुआ हो तो आश्चर्य नहीं ! परन्तु प्रश्न यह है कि क्या रत्ननंदीजीसे यहले भी किमी आचार्यने “अद्धंफालक" सम्प्रदायका उल्लेख किया है ? हां, श्री हरिपेणजीने अपने "कथाकोप"में उसका | उल्लेख किया है जिसे उन्होंने वि० सं० ९८९ में रचा था। इसके अतिरिक्त मथुरासे उपलब्ध कुशनकालीन पुरातत्वसे "अईफालक" सम्प्रदायकी मिद्धि होती है। मथुराके "कंकाली टीला" से कुछ ऐसे प्राचीन आयागपट्ट मिले हैं, जिनमें जैन साधु यद्यपि नग्न बताये गये हैं; परन्तु वे अपनी नग्नताको एक कपड़ेके टुकड़ेसे छिपाते हुये अंकित किये गये हैं। हरिषेणजी भी यही लिखते हैं कि कपड़ेके टुकड़ेसे वह (५) साधु नम्रताको बांये हाथसे छुपाते थे और दक्षिण हाथमें कमंडलु अथवा भिक्षा पात्र लेते थे। यावन्न शोभनः कालो, जायते साधवः स्फुटम् । तावच्च वामहस्तेन, पुरः कृत्वाऽर्धफालकम् ॥ ५८ ॥ भिक्षापात्रं समादाय, दक्षिणेन करेण च । सहीत्वा नक्तमाहारं, कुरुध्वं भोजनं दिने ।। ५९ ।। कथा नं. १३३ मथुराके पुरातत्वमें बौद्धस्तूपाले शिलापट्टमें जो दिगम्बर साधु अङ्कित हैं उनकी कलाई पर एक कपड़का टुकड़ा पड़ा हुआ है । ( देखो चित्र नं. १)। डॉ० बुन्हरका हवाला देते हुए श्री चीमनलाल शाहने यह स्पष्ट रूपमे स्वीकार किया है :- “ Tlie Vodia Stupi ......the milk figure on the right of Dharmchakra is considered by Dr. Buhler to be that of a naked ascetic, wh), as usual, las a piece of cloth hanging over his right arm."-Jamısın in Vorth Indi P. 257. इसी प्रकार प्लेट नं० २२ में कण्हश्रमणको नग्न अङ्कित करके उनकी कलाई पर भी खंडवस्त्र लटकता उकेरा गया है। श्वेतांबर परम्परामें कण्हश्रमण प्रमुखस्थान रखते हैं। कण्ड- श्रमणका दूसरा हाथ आयागपट्टमें पीछी लिये हुये उनके कन्धेपर है। वह किसी राजमहिषीको उपदेश दे रहे हैं व है एक नागकन्या उनके पीछे खड़ी हुई है। (देखो चित्र नं० २) श्री रत्ननन्दीजीने भी 'भद्रबाहु चरित्रमें स्पष्ट लिखा है कि जब एक मंटानी निर्ग्रन्थ श्रमणोंके नंगे रूपसे डरी तो संठानीकी प्रार्थना पर उन साधुओंने एक 'आधा बस्त्र' स्वीकार कर लिया जिसमें वह अपनी ननना छिपाने लगे ; ( धृत्वा सुरलकं शो परिधायार्द्धकालकम् ) इसी प्रकार नेगमेश-पट्टमें भी जो मथुराके कंकालीटीलासे मिला था, एक माधुका चित्रण अद्धंफालक बेपमें किया गया । (देखो चित्र नं. ३) डॉ.बुल्हरने उसके विषय में यही लिखा है It his (Acmes's left hnee stands a small nhici male, cuncturised by the clih in his left ll.and. .in .in . MUTIL Nirlh uplhited 11ght Irand." -- Dr. Buliher, (Ep. Indit . l jit) पुरातत्वकी इस प्राचीन माक्षीसे स्पष्ट है कि ईस्वी सन्के प्रारंभिक एवं उसके कुछ समय पहलेस निर्ग्रन्थ साधु यद्यपि रहते नग्न थे: परन्तु अपनी ननता छिपाने के लिए कपड़ेका टुकड़ा काममें लाते थे। इस प्रकार के माधुओंके संघको “अर्द्धफालक" सम्प्रदाय कहा गया है। यही सम्प्रदाय आगे चलकर श्वेताम्बर सम्प्रदायक नामसे वि० सं० १३६ में स्पष्ट हो गया। प्रारंभमें उसका उल्लेख “निग्रन्थ श्वेतपट महाश्रमण संघ" नामसे होता (७) था-उपरान्त वः श्वेताम्बर कहलाया । * दिगम्बर सम्प्रदाय पहले 'निग्रन्थ श्रमण संघ' के नामसे प्रसिद्ध रहा --उपरान्त वह 'दिग्बाम' और फिर 'दिगम्बर' नाममे प्रचलित हो गया। भद्रबाहु चरित्र" में बताई गई मुख्य बातें ऐतिहासिक तथ्यको लिये हुये प्रमाणित होती हैं। उनका समर्थन पुगतत्वकी पतन्त्र माक्षीमे होता है । इस प्रकार यह अरगन. ( पहा ७ ७-१९५३ वनीन - कामताप्रसाद जैन । *कदम्बवंशीय राजा श्री विजयशिवमृगेश वर्माक देव- गिरिबाले दानपत्र में दिगम्बरों और श्वेताम्बराको साथ साथ दान देनेका उल्लेख इन शब्दों में है- द्वितीयोर्हन्प्रोक्तमर्द्धम्मकरणपरस्य । श्वेतपटमहाश्रमण- मयोपभोगाय, तृतीया निर्ग्रन्यमहाश्रमणमंघोपभोगाये हि ।" मथुगके कुछ लेखामें भी दिगम्बरोंका उल्लेख 'विप्रेन्थ' नाममे हुआ है । इसके लिये हमाग अंग्रेजी लेख देखना चाहिये जो कि 'जर्नल ऑब दी यू० पी० हिम्टोरीकल सोसाइटी' में छपा था।
प्रथमावृत्तिकी प्रस्तावना।
पाठक महाशय।
जिस ग्रंथकी प्रस्तावना लिखनेका हम आरंभ करते हैं
वह वास्तवमें बहुत महत्वका है। ग्रंथकर्त्ताने इम ग्रंथका
संकलन कर जैन जातिका बड़ा भारी उपकार किया है । इस
ग्रंथके निर्माताका नाम है श्री रत्नंदी । आपके विषय में बहुत
कुछ लिखनेकी हमारी उत्कण्ठा थी परंतु जैन समाज ऐतिहासिक
विषयोंकी खोज करने में संसारमें सबसे पीछा पिछड़ा हुआ है
और यही कारण है कि आज कोई किसी जैनाचार्य की जीवनी
लिखना चाहे तो पहले तो उसे सामग्री ही नहीं मिलेगी। यदि
विशेष परिश्रमसे कुछ भाग कहीं पर मिल भी गय। तो वह
उतना थोड़ा रहता है जिससे पाठकोंकी इच्छा पूरी नहीं
हो सकतो।
इसका कारण यदि हम यह कहें कि “जैनियों में शिक्षाका
प्रचार बहुत कम हो गया है और इसीसे कोई किसी विषयकी
खोजमें नहीं लगता है" तो कोई अनुचित नहीं होगा। क्योंकि
ऐतिहासिक बातोंका शिक्षासे बहुत घनिष्ट सम्बन्ध है। आज
संसारमें बुद्धका नाम इतना प्रसिद्ध है कि बच्चा२ उन्हें जानने
लगा है। परन्तु जैन इतने महत्त्वका होकर भी उसे बहुन कम
जानते हैं। इसका कारण क्या है ? और कुछ लोग जानते भी
(९) हैं तो उनमें कितने ऐसे हैं जो जैन मतको स्वतंत्र मत न समझ कर बौद्धादिकी शाखा-विशेष समझते हैं । इसे हम जैनियोंकी भूल छोड़कर मरोंकी गल्ती नहीं कह सकते । क्योंकि-जिम प्रकार बौद्धोंका इतिहास प्रसिद्ध होनेसे उन्हें सब जानने लग गये, यदि उसी प्रकार जैनियोंका इतिहास आज यदि समारमें प्रचलित होता तो क्या यह संभव था कि जैनी लोग योंही संसारके किसी कोनेमें पड़े२ मड़ा करते ? हम इस अन्ध श्रद्धा पर विश्वास नहीं कर समते । क्या आज जैनि- योंमें विद्वान, महात्मा तथा परोपकारी पुरुषोंकी किसी तरह कमी है जो उनके प्रसिद्ध होने में कोई प्रतिबन्ध हो ? नहीं। हां यदि कमी है तो उस प्राचीन महापियोंके वास्तविक ऐतिहासिक वृत्तान्तकी । यदि जैन समाज इस बात पर लक्ष देगा और इस विषयकी खोजमें जी जानसे लगेगा तो कोई आर्य नहीं कि वह फिर भी अपने पूर्वजोंका उज्वल सुयशस्थम्भ संसारके एक छोरसे लेकर दूसरे छोरतक गाढ़ दे। और एक वक्त सारे संसारमें जैनधर्मका वास्तविक महत्व प्रगट कर दे। क्योंकि- उपाये सत्युपर्यस्य प्राप्त का प्रतिबन्धना । पातालस्थं जवं यन्त्रान्करस्थं क्रियन यतः ॥ प्राप्त होनेवाली वस्तुके लिये उपाय किया जाय तो उममें कोई प्रतिरोधक नहीं हो सकता। क्योंकि-यंत्रके द्वारा पातालसे भी जल निकाल लिया जाता है ।
(१०) हमारे ग्रंथकारका भी इतिहास गाढान्धकारमें पड़ा हुआ है और न हमारे पाम मामग्री ही है जो उम अंधकारम निकाल- कर उजालेमें ला सकें। अन्तु, ग्रंथकारने ग्रंथक अंतिम श्लोकमें कुछ अपना परिचय दिया है उसीपर कुछ श्रम करके देखते है कि हम कहां तक मफल मनोरथ होंगे? वादीभन्द्रमदग्रमर्दनहरः शीलामृताम्भोनिधः शिष्यं श्रीमदनन्तकोनिगणित: मत्कार्तिकान्ताजुपः । म्मृन्वा श्रीललितादिकीर्तिमुनिपं शिक्षागुरूं मद्गुणं चक्रे चारू चरित्रमनदनपं रत्नादिनन्दो मुनिः ।। भाव यह है कि परवादीरूप गजराजक मदका नाश करनेवाले. शोलामृनके समुद्र और उज्वल कोनि-कांतासे विरा- जित श्री अनन्तकीनि महाराज शिष्य और अपने विद्यागुरु श्री ललितकीर्नि मुनिगजका हृदयमें स्मरण कर रत्ननन्दी मुनिने यह निदपि चरित्र बनाया है। यही ग्रन्थकारके इतिहासकी नींव है । अथवा यों कहिय कि पहली सीड़ी है। पाठक स्वयं विचारें कि यह नींव कहां तक काम आ मकेगी ? बर ! इस भोकमे यह तो मालूम हो गया कि रत्ननंद। ललितकीति मुनिके शिष्य है । और ललितकीर्ति श्री अनन्तकीति आचायक शिष्य हैं । इन महानुभावोंका मंसारमें का अवतार हुआ है यह निश्वर करना तो जरा कटिन है। परन्तु भद्रबाहु चरित्रम श्री रत्ननन्दीने एक जगह ।
(११)
लिखा है कि-
मृत विक्रमभूपाले मप्तविंशतिसंयुते ।
दशपञ्चशतेऽब्दानामतीत शृणुतापरम् ।।
लुङ्कामतमभृदकं लोपकं धर्मकर्मणः ।
दशेत्र गौर्जरे ख्याने विद्वत्ताजिननिर्जरे ।।
अणहिल्लपत्तने रम्ये प्राग्वाटकुल जोऽभवत् ।
लुङ्काभिधो महामानी श्वेतांशुकमताश्रयी ।।
दुष्टात्मा दुष्टभावन कुपितः पापमण्डितः ।
नीत्रमिथ्यान्वपकिन लुकामतमकल्पयत् ।।
अर्थात्-महाराज विक्रमकी मृत्युक बाद १५२७ वर्ष
बीत जानेपर गुजरात देशके अणहिल नगरमें कुलुम्बी वंशीय
एक महामानी लुङ्का नामक श्वेतांबरी हुआ है । उमी महामानी
तीव्र मिथ्यात्वक उदयमे लङ्कामत (ढिपामन ) का प्रादुर्भाव
किया । यह मत प्रतिमाओंको नहीं मानता है।
ग्रन्थकारके इस लेखमे यह सिद्ध होता है कि विक्रम
मं० १५२७ के बाद वे हुये हैं। क्योंकि तभी तो उन्होंने
अपने ग्रन्थमें दहियांका उल्लंग्य किया है। परंतु यह ग्चुलामा
नहीं होता कि उनके अवतारका निश्चित समय क्या है ?
सुदर्शन चरित्रके रचयिता एक जगह रत्नकोनिका उल्लंख
करते हैं-
मूलमंघाग्रणीनिन्यं रत्नकीनिगुरुमहान् ।
रत्नत्रयपवित्रात्मा पायान्मां चरणाश्रितम् ॥
(१२) । यद्यपि भद्रबाहु चरित्रके रचयिताने अपना नाम रत्ननंदी लिखा है परन्तु आश्चर्य नहीं कि उन्हें उनसे पीछेके मुनियोंने रत्रकीर्ति नामसे भी लिखे हों। क्योंकि रत्ननंदी और रत्न- कीर्ति के समयमें विशेष अंतर नहीं दीखता। इससे भी यही प्रतीत होता है कि रत्ननन्दीको ही सुदर्शन-चरित्रके रचयिता विद्यानन्दाने रत्नकीर्ति लिखा है। ये विद्यानंदी भट्टारक हैं । इनके गुरुका नाम है देवेन्द्रकीर्ति जैसा कि सुदर्शन चरित्रके इस लेख में जाना जाता जीवाजीवादितत्वानां समुद्योतदिवाकरम् । वन्दे देवेन्द्रकीर्ति च सूरिवयं दयानिधिम् ॥ मद्गुरुपोर्विशेषेण दीक्षालक्ष्मीप्रमादकृत् । तमहं भक्तितो वन्दे विद्यानंदी सुसेवकः ॥ भावार्थ-जीवाऽजीवादि तत्वोंके प्रकाश करनेमें सूर्यकी उपमा धारण करनेवाले और दयासागर श्री देवेन्द्रकीर्ति आचार्य के लिये में अभिवंदन करता हूं, जो विशेषतया मेरे गुरु हैं। इन्हीं के द्वारा मुझे दीक्षा मिली है। देवेन्द्रकीति भट्टारक विक्रम संवत् १६६२ में सांगानेरके पट्टपर नियोजित हुये थे। इनके बनाये हुये बहुतसे कथाकोषादि ग्रंथ हैं । इससे यह सिद्ध तो ठीक तरह हो गया कि सुदर्शन- चरित्रके कर्ता विद्यानन्दी भी विक्रम मं० १६६२के अनुमानमें हुये हैं। यह हम ऊपर लिख आये हैं कि-रत्नकीर्ति और (१३) रत्ननन्दी एक ही होने चाहिये। क्योंकि भद्रबाहुचरित्रको दोनोंके बनाये हुये लिखे हैं। परन्तु रत्ननन्दीके भद्रबाहु चरित्रको छोड़कर रत्नकीर्तिका भद्रबाहुचरित्र अभी तक देखनेमें नहीं आता और न इन दोनोंके समयमें विशेष फर्क है मद्र बाहुचरित्रके अनुसार रत्ननंदीका समय वि० १५२७२ ऊपर जचता है और विद्यानंदीसे सुदर्शनचरित्रके अनुमार रत्नकीर्तिका समय भी १६६२ के भीतर होना चाहिये। वैसे अंतर है १३५ वर्षका है परंतु विचार करनेमे इतना अंतर नहीं रहता है। भद्रबाहुचरित्रमें जो रत्ननंदीने ढूंढियोंके मतका प्रादुर्भाव वि० १५२७ में हुआ लिखा है इससे रत्ननंदीका इंटियोंमे पीछे होना तो सहज मिद्ध है। परंतु वह कितना पीछे यह ठीक निश्चय नहीं किया जा सकता। यदि अनुमानमे यह कहें कि उस समय इंडियोंको पैदा हुजे मी मबामी वर्ष हो जाने चाहिये तो वि० १६२५ के आमपाम उनका होना जाना जाता है यह बात भद्रबाहु चरित्रमें टूढियांकी उत्पत्तिम जानी जाती है। दूसरे भद्रबाहु-चरित्रके बनानेवाले रत्ननंदी तथा रत्नकीतिक एक होने में यह भी एक प्रमाण मिलता है कि जहां परिच्छेद पूरा होता है वहां रत्ननंदी तथा रत्नकीर्ति इन दोनोंका नाम पाया जाता है। इसलिये यही निश्चित होता है कि भद्रवाहु-चरित्रक बनानेवाले दोनों महानुमाव एक ही हैं। वैसे रत्नकीर्ति और भी हुये हैं। पाठक यदि इस विषयमें
(१४)
परिचित हों तो अनुग्रह करें, पुनरावृत्तिमें ठीक कर
दिया जायेगा।
रत्ननंदी किम कुलमें तथा किम देशमें हुये हैं यह ठीकर
नहीं जाना जा सकता। जिसमें कि हम उनके विषय में कुछ
और विशेष लिम्ब मकें। और न हमारे पास विशेष माधन ही हैं।
रत्ननन्दीने भद्रबाहुचरित्रमें एक जगह यह लिखा है कि-
श्वेतांशुकमनोद्भूतमूहान् ज्ञापयितु जनान् ।
विरचितमिमं ग्रन्यं न स्वपाण्डित्यगर्वतः ।।
इसमें यह जाना जाता है कि उनके भद्रबाहुचरित्रके
लिग्वनेका अमली अभिप्राय श्वेताम्बर मतकी उत्पत्ति तथा
उनकी जिन शासनमे बहिर्भूतना बताना था। हम भी
कुछ प्रकरणानुमार श्वेतांबर मनके बाबत विचार करेंगे-
पाठक जरा पक्षपात रहित तात्विक दृष्टि में दोनों मतकी तुलना
करें कि प्राचीन मत कौन है ? और कौन उपादय तथा जीवोंक
सुखका माधन है ?
श्वेतांबर और दिगम्बरों में जो मतभेद है वह तो रहै ।
सबसे पहले हम अपने लेख में यह बात सिद्ध करेंगे कि दोनोंमें
प्राचीन मत कौन है ? और किसका पीछेसे प्रादुर्भाव हुआ है ?
इस विषयका पर्यालोचन करनेसे दोनों मनवाले दोनोंकी
उत्पत्ति अपने अपनेसे कहते है। इमलिये हम सबसे पहले
दोनोंकी ओरसे एक एककी उत्पत्तिका उपक्रम दोनों संप्रदायके
ग्रंथोंके अनुसार लिख देते है-
.
(१५)
श्वेतांबर लोग कहते हैं कि-
दिगम्बरस्तावत्-श्रीवीरनिर्वाणनवोत्तरपट्शतवर्षानिक्रमे
शिबभृत्यपरनाः सहस्रमल्लतम्रः सजात:-
यथा- छच्यामसयाई नवृत्तराई तईयामिद्धि गयस्म वीरम्म ।
तो बोडिआण विट्ठी रहवीर पुरे समुप्पण्णा ॥ (प्रबननपरीक्षा)
भावार्थ-श्री वीरनाथक मुक्ति जानेक ६३९ वर्ष बाद
स्थवीरपुरमें शिवभृति (महम्रमल्ल में दिगम्बरोंकी उत्पत्ति हुई है।
इमका हेतु यों कहा जाता है-
'रहवीरेत्याद्यात्रियाणायभथः'.
तात्पर्य यह है कि स्थवीरपुरमें एक शिवभूति रहता
था । उसकी स्त्री अपनी मासुके साथ लड़ा करनी थी। उसका
कहना था कि तुम्हारा पुत्र रात्रिके ममय बाहर २ बजे
सोनेके लिये आता है मो में कबतक जगा कर । शिवभृतिकी
माताने इसके उत्तर में कहा कि आज तू मोजा और मैं जागती
हूं । बाद यही हुआ भी। शिरभृति मदाक अनुसार आज भी
उसी ममय घर आये और किवाड़ खोलनेके लिय कहा तो
भीतरसे उत्तर मिला कि-इम ममय जहां दरवाजा खुला हो
वहींपर चले जाओ* । शिवभूति माताकी भत्सनामे चल दिये।
* क्यों पाठकों ! मापने भी यह बात कभी भी सुनी है कि-
जरासे स्त्री के कहनमें पाका माटा अपने हृदयके टुकड़को अपने
जुदा की है ? जिसके विषय में यहांतक १६ारत श्रद्ध
(१६)
घुमते हुये उन्हें एक साधुओंका उपाश्रय खुला हुआ दीख
पड़ा। शिवभूतिने भीतर जाकर साधुओंसे प्रवृजाकी अभ्यर्थना
को । परन्तु साधुओंको उनकी अभ्यर्थना स्वीकृत नहीं हुई। x
तब निरूपाय होकर वे स्वयं प्रवृजित हो गये। फिर साधुओंकी
भी कृपा हो गई मो उन्होंने शिवभूतिको अपने में शामिल कर
लिया। बाद साधु लोग वहांसे बिहार कर गये ।
कुछ कालके बाद फिर भी उसी नगरमें उन सब
माधुओंका आना हो गया। उस समय वहांके राजाने शिवभूतिको
एक रनकम्बल दिया । उसे देखकर साधुओंने शिवभूतिमे यह
कह कर कि-माधुओंको रत्नकम्बल लेना उचित नहीं है छीन
लिया। और उसके टुकड़े करके रजोहरणादिके काममें लाने
लगे। माधुओंके ऐसे वर्तावसे शिवभूतिको बहुत दुःख पहुंचा।
किसी समय उस संघके आचार्य जिनकल्प साधुओंका
स्वरूप कह रहे थे तब शिवभूतिने यह जाननेकी इच्छा की कि
जब जिनकल्प निष्परिग्रह होता है तो आप लागोंने यह
आडम्बर किम लिये स्वीकार किया ? वास्तविक मार्ग क्यों
नहीं अंगीकार करते हैं ? इसके उत्तरमें गुरुमहाराजने कहा कि
।
है कि " पुत्र चाहे कुपुत्र भले हो होजाय परन्तु माता कभी कुमाता
नहीं होती" तो यह कल्पना कहांतक ठोक है ? बुद्धिमानों को
विचारना चाहिये।
xशिषभूतिको उस समय दीक्षा क्यों नहीं दो गई ? और जब
इन्कार ही था तो फिर क्यों दीगई ? कुछ विशेष हेतु होना चाहिये।
(१७) । इस विषम कलिकालमें जिनकल्प कठिन होनेसे धारण नहीं किया जा सकता। जम्बूस्वामीके मोक्ष जाने बाद जिनकल्प नाम शेष रह गया है । शिवभूतिने सुनकर उत्तरमें कहा कि- देखिये तो मैं इमे ही धारण करके बताता हूं। इसके बाद गुरुने भी उसे बहुत समझाया परन्तु शिवभूतिने एक न सुनी और जिनकल्प धारण कर ही तो लिया। यही श्वेतांबरियोंके शास्त्रोंमें दिगम्बरियोंकी उत्पत्तिका हेतु है। इसकी समीक्षा तो हम आगे चलकर करेंगे। अब जरा दिगम्बरोंका भी कथन सुन लीजिये- वामदेव ( जो वि० की दशमी शताब्दिमें हुये ) है उन्होंने भाव मंग्रहमें लिखा है कि- भाव यह है-विक्रमराजाकी मृत्युक १३६ वर्ष बाद जिनचन्द्रक द्वारा श्वेताम्बर मतका मंमारमें आविर्भाव हुआ । कारण यह है कि उज्जयिनीमें श्रीभद्रबाहु मुनिराजका संघ आया। भद्रबाहु मुनि अष्टाङ्ग निमित्त (ज्योतिषशास्त्र ) के बड़े भारी विद्वान थे । निमित्त ज्ञानमें जानकर उन्होंने सब मुनियों में कहा कि-दखो! यहां बारह वर्षका घार दुर्भिक्ष पड़ेगा। सब साधु लोग उनके वचनॉपर दृढ़ विश्वासकर अपने २ गणक साथ दूसरे देशकी ओर चले गये । क्योंकि श्रुतज्ञानीक वचन कभी अलीक नहीं हो सकते । वैसा हुआ भी। मो एक दिन शन्त्याचार्य विहार करते हुये वलभीपुरीमें चले आये और वहींपर रहने लगे। उञ्जयिनीमें भीषण दुर्भिक्ष पड़ा। वह यहां तक कि (१८) भिक्षुक लोग एक एकका उदर फाड़कर भ तरका अन्न निकाल २ कर खाने लगे। उस समय माधु लोग वास्तविक मार्गको नहीं रख सके । परन्तु किमी तरह अपना पेट तो भरना ही पड़ता था । इमलिये धीरे२ शिथिल होकर वस्त्र, दण्ड, भिक्षापात्र, कम्बलादि धारण कर लिये। इमी तरह अब कितना काल बीता और मुभिक्ष हुआ तब शान्याचार्य ने अपने सब मंघको बुलाकर कहा कि- अब इस बुरे मार्गको छोड़ो और वास्तविक सुम.गं अङ्गीकार कगे। उस समय जिनचन्द्र शिष्यने कहा कि हम यह वस्त्राहि रहित मार्ग कभी नही म्बीकार कर सकते। और न इस सुम्बमार्गका परित्याग ही कर मकते हैं । इमलिये आपका इसीमें भला है कि-आप चुप माध जावें । शान्त्याचार्यने फिर भी ममझाया कि तुम भले ही इम कुमार्गको धारण करो परन्तु यह मोक्षका माधन नहीं हो सकता, हां उदर भग्नेका वेशक साधन है। शान्न्याचार्यके बचनोंमें जिनचन्द्रको बड़ा क्रोध आया और उसी अवस्थामें उसने अपने गुरुके शिरकी दण्डों २ से खूब अच्छी तरह खबर ली-जिससे उसी समय शान्त्याचार्य शांत परिणामोंमे मर कर व्यन्तर देव हुये । और अपने प्रधान शिष्य जिनचन्द्रको शिक्षा देने लगे। उससे वह डरा मो उनकी शांतिके लिये उमने आठ अंगुल चौड़ी तथा लम्बी एक काठकी पट्टी बनाई और उसमें शान्त्याचार्यका संकल्प कर पूजने लगा सो वह उमी रूपमें आज भी लोकमें नलादिसे पूजा जाता है।
(१९) । अब तो बही पर्युपासन नाम कुलदेव कहलाने लगा। बाद भेत वस्त्र धारण कर उनकी पूजन की गई तभीम लोकमें श्वेतांबर मत प्रख्यात हुआ। * यही दोनों मतोंके शास्त्रका मिद्धांत है । इसमें किमका कहना मत्य है तथा कौन पुरातन है वह जग पयालोचनसे आगे चलकर अवगत होगा। दिगम्बरियोंकी उत्पत्ति बाबत श्वेतांबर लोगोंका कहना है कि ये लोग विक्रमकी २ री शना- ब्दिमें हुये हैं। अस्तु, यदि थोडी देरके लिये यही श्रद्धान कर लिया जाये तोभी उसमें यह मन्देह कैसे निराकृत हो सकेगा ? श्वेतांबर भाइयों के पास अपने ग्रंथों के लिखे हुये प्रमाणको छोड़कर और ऐमा कौन सुदृढ़ प्रमाण है जिसमें सर्व-माधारणमें यह विश्वाम हो जाय कि यथार्थमें दिगम्बर मतका ममाविर्भाव * हमारे पाठकों को यह अमेह होगा कि-भद्रबाहुचरित्र में तो स्थूराचार्य मारे गये रिखे हैं और भावसंग्रह में शान्त्याचार्य सो यह फक क्यों? मालूम होता है कि-गन्दाचार्यहीका अपर नाम थूराचार्य क्योंकि यह बाद तो दोनों प्रन्धकारने मानी है कि-श्वेनांवर मत का संचालक जिनचन्द्र हुआ है और उन्होंने दोनोंका उमे शिष्य भी बताया है। दूमरे दर्शनमारमें भी शान्त्याचार्य के शिष्य जिनचन्द्र के द्वाराही श्वेतांबर मत की स्त्ति बनाई गई है और यह प्रन्य प्राचीन भी अधिक है। इमाये हमारी समझ में तो स्थूसराचार्यका ही दूमग नाम शान्त्यचार्य था, ऐसा हो जाता है और न ऐसा होना असम्भव ही है।
(२०)
विक्रमकी दूसरी शताब्दिमें हुआ है ? क्योंकि प्रतिवादीका
संशय दूर करनेके लिए एमे प्रमाणकी बड़ी भारी जरूरत है।
हमने दिगम्बर मतके खण्डनमें वेतांबर सम्प्रदायके आधुनिक
विद्वानोंकी बनाई हुई कितनी पुस्तकें देखीं परंतु आजतक किसी
विद्वानने प्रबल प्रमाणके द्वारा यह नहीं खुलासा किया-जैसा
श्वेतांबर शास्त्रों में दिगम्बरोंका उल्लेख किया गया है । इमलिये
यातो इस विषयको सिद्ध करना चाहिये अन्यथा हरिभद्रसूरिके
इन बचनोंका पालन करना चाहिये कि -
पक्षपानो न मे वीरे, न द्वेषः कपिलादिषु ।
युक्तिमद्वचनं यस्य, नस्य कार्यः परिग्रहः ।
केवल कथन मात्रसे निष्पक्षपाती होनेकी डींग मारनेको
कोई बुद्धिमान भला नहीं कहता । जैसा कहना वैमा परिपालन
भी करना चाहिये । उपदेश केवल मगंक लिये ही नहीं होता
किन्तु स्वतः भी उमपर लक्ष्य देना चाहिये ।
हम यह बात तो आगे चलकर बतायेंगे कि पुराना मन
कौन है ? और कौन यथार्थ है ? इस समय श्वेताम्बरियोंने जो
दिगंबरियोंकी बावत कथा लिखी है उमीकी ठीक २ ममोक्षा
करते हैं-
श्वेताम्बरियोंने यह बात तो अपने आप स्वीकार की है कि
शिवभूतिने जिस मतका आदर किया था वह जिनकल्प हैं। और
उसे खास इसी कारणसे ग्रहण किया था कि और साधुलोग जो
।
(२१)
जिनकल्प छोड़े हुये बैठे थे वह उचित नहीं था। सो उसका
प्रचार हो । इससे दिगम्बरियोंको तो बड़ा भारी लाभ हुआ जो
अनायास उनका मत प्राचीन सिद्ध हो गया । अरे ! जिनकन्प
पहले था तभी तो शिवभूति गुरुके मुखसे उसका कथन सुनकर
उसके धारण करने में निश्चल प्रतिज्ञ हुआ ।
इसमें उसने नबीन मत क्या चलाया ? जो पुराना था,
जिसे तुम लोग उच्छेद हुआ बताते हो वह नवीन तो नहीं है।
नवीन उस हालतमें कहा जाता जब कि जिनकल्पको जैनशास्त्रों में
आदर न मिलता । मो तुम भी निर्वाद स्वीकार कर चुके हो ।
उसमें उस समय तुम्हारा विरोध भी तो यही था न ? जो
कलियुगमें इसका व्युच्छेद हो गया है इमलिग धारण नहीं
किया जा सकता । और यही कहकर शिवभृतिको समझाया भी
था । यदि तुमने उमे कलियुगके दोप मात्रमे हेय ममझकर
उपेक्षा की तो हम तो यही कहेंगे कि तुम्हारी शक्ति इतनी न
थी जो उसे धारण कर मको ? अस्तु, परन्तु केवल तुम्हारे
धारण न करनेसे मार्ग तो बुरा नहीं कहा जा सकता। भला
ऐमा कौन बुद्धिमान होगा जो एक मिथ्याष्टिकी निन्दासे
पवित्र जैनधर्मको बुरा समझने लगेगा।
कदाचित् कहो कि-शिवभूतिने जो मत धारण किया है
वह जिनकल्प भी नहीं है किन्तु जिनकल्पका केवल नाम मात्र
है। वास्तवमें उसे कोई और ही मत कहना चाहिये ।
।
(२२)
यह कहना भी ठीक नहीं है और न उस ग्रंथ ही से यह
अभिप्राय निकलता है । वहां तो खुलामा लिखा हुआ है कि-
जिनकल्पका व्युच्छेद होजानेमे कलियुगमें वह धारण नहीं
किया जा सकता। उम विषयको देखते हुये दिगम्बरियोंका
श्वेतांबरियोंके बाबत जो उल्लेख है वह बहुत ही निराबाध तथा
सत्य जंचता है। बडी भारी बात तो यह है कि-जैमा दिगम्बरी
लोग श्वेताबरियोकी बाबत लिखते हैं उमी तरह वे भी स्वीकार
करते हैं, जरा देखिए तो--
संयमो जिनकल्पस्य दुःसाध्योऽयं ततोऽधुना ।
व्रतं स्थविरकल्पस्य तस्मादस्माभिराश्रितम् ।।
तथा-
दुर्द्धरी मूलमार्गो यं न धत्तुं शक्यते ततः ।
कहिये जैसा दिगम्बरी लोग उनकी उत्पत्तिक बाबत
वास्तविक मार्गका छोड़ना बताते हैं श्वेताम्बरी लोग भी तो
वही बात कहते हैं कि-जिनकल्प वास्तवमे सत्य है । परन्तु
कालकी करालतामे उसका व्युच्छेद हो गया है। इसलिये वह
अब बहुत ही कठिन है । सो उमे हम लोग धारण नहीं कर
सकते । यही पाठ शिवभूतिम भी कहा गया था न ? तो अब
पाठक ही विचारें कि कोन मत तो पुरातन है और किसका
कहना वास्तव में सत्पथका अनुशरण करता है ?
यह बात तो हमने श्वेताम्बरी लोगोंके ग्रन्थोंसे ही बताई
।
(२३)
है और उन्हीस दिगम्बर मत पुरातन सिद्ध होता है। जब स्वयं
अपने शास्त्रों में ही ऐसी कथा है जो स्वयं अपनेको बाधित
ठहराती है—फिर भी आग्रहमे दूसरोंको बुरा कहना भूल है।
जरा हमारे श्वेताम्बरी भाई यह बात सिद्ध तो करें कि
दिगम्बर मत आधुनिक है ? वे और तो चाहे कुछ कहैं परन्तु
अपने ग्रंथका किम रीति समाधान करते हैं यही बात हमें
देखना है।
दिगम्बर लोग श्वेताम्बरियोंकी बाबत कहते हैं कि यह
मत विक्रम संवत १३६ में निकला। उसी तरह श्वेताम्बर
दिगम्बरियों के बाबत लिखते हैं कि-वि० सं० १३८ में
दिगम्बर मत श्वेताम्बरमं निकला। दोनों मतोंकी कथा भी हम
ऊपर उद्धृत कर आये हैं। मार किसके कहनेमें है यह
बात बुद्धिमान पाठक कथा पर ही में यद्यपि अच्छी तरह
जान सकते हैं; और इस हालतमें यदि हम और प्रमाणीको
दिगम्बरियोंकी प्राचीनता सिद्ध करनेमें न दें तो भी हमारा
काम अटका नहीं रहेगा। क्योंकि जो बात खण्डन
लिखनेवालोंकी लेखनी ही में एमी निकल जावे जिमम बण्डन
तो दूर रहे और दूसरोंका मण्डन हो जाय तो उम छोड़कर ऐमा
कोन प्रबल प्रमाण हो सकता है जिसमें कुछ उपयोग निकले ?
श्वेतांबरी भाई यह न समझें कि इस लेखमे हम और
प्रमाण देनके लिये निर्बल हैं। हम अपनी ओरसे तो जहां तक
.
(२४)
हो सकेगा दिगम्बर धर्मक प्राचीन बनाने में प्रयत्न करेंगे ही।
परंतु पहले पाठकों को यह ममझा दें कि दिगम्बर धर्म
श्वेतांबरम प्राचीन । वह भी श्वेतांबरके ग्रंथोंम !
अस्तु, अब हम उन प्रमाणोंको भी उपस्थित करते हैं
जिनसे जैनियोंका कोई संबंध नहीं है। और उन्हीं में यह भी
सिद्ध रेंगे कि दिगम्बर धर्म पहलेका है ।
श्वेतांबर ग्रन्थों में यह लिखा हुआ मिलता है कि दिगम्बर
धर्म विक्रमकी दूसरी शताब्दिमें रथवीरपुर से शिवभूनिके द्वारा
निकला है । अस्तु, श्वेताम्बर भाइयोंकी इस भृलपर चाह जैमा
अन्ध श्रद्धान हो ! परन्तु इतिहामक जाननेवाले वह बान कमी
स्वीकार नहीं करेंगे। प्राचीन इतिहामक देखने पर यह श्रद्धा
नहीं होती कि इन कथनका पाया कितना गहरा और सुदृढ़ होगा।
इन अपने प्राचीनत्वक सिद्ध करने के पहले यह बनला
देना बहुत समुचित समझते हैं कि-दिगम्बर माधु लोग धन
वस्त्र आदि कुछ भी परिग्रह अपने पास नहीं रग्बते हैं । अर्थात
घोडे अक्षरोंमें यों कहिये कि वे दिशारूप वस्र धारण करने-
वाले हैं इसलिये उन्हें दिगम्बर (नग्न) साधु कहते हैं ।
जैमा कि.-श्रीभगवत्समन्तभद्रने माधुओका लक्षण अपने
रत्नकरण्ड उपासकाचार में लिखा है
विषयाशावशातीतो निगरम्भोऽपरिग्रहाः ।
ज्ञानध्यानतपोरक्तस्तपस्वी म प्रशस्यने ।।
(२५)
यह दिगम्बरियोंके साधुओंका लक्षण है। और श्वेतांबरि-
योंके साधु लोग बस वगैरह रखते हैं। इसलिये वे श्वेतांबर
कहे जाते हैं। अथवा हम यह व्याख्या न भी करें तो मी
उनके नाममात्रसे यह ज्ञान हो जाता है कि वे श्वेत वस्त्रके
धारण करनेवाले हैं। इसमें यह सिद्ध हो गया कि निर्ग्रन्थ
माधुओंके उपासक दिगंबर लोग हैं और श्वेत वस्त्र धारक माधु-
ओके उपासक श्वेतांबरी लोग।
अब विचार यह करना है कि-दिगंबर मत जब प्राचीन
बताया जाता है तो एम कौन प्रमाण हैं जिनमें मर्वमाधारण
यह समझ जाय कि दिगंबर मत वास्तवमें पुरातन है ?
हम यह बात ऊपर ही मिद्धकर चुके हैं कि दिगंबर लोग
नम साधु तथा नग्न देव उपासक हैं। तो अब देखिये कि-
वराहमिहिर जो ज्योतिषशास्त्रक अद्वितीय बिद्वान हुये है* उनके
समयका निश्चय करते हैं तो उस विषय में यह प्रसिद्ध श्लोक
मिलता है।
* हमने तो यहां -5 किम्बान्नी सुनी है कि बगहमिहिर
और श्रीभद्रबाहु ये दोनों महदा थे। यह वक्त कहां तक ठीक
है ? सहसा विश्वास होता क्यों क ५ विषयमं हमारे
पास कोई ऐमा सबल प्रमाण नहीं है-जियमे इम किम्बदन्तीको
प्रमाणित कर मक। यदि हमारे पाठक इस विषय कुछ जानते
गे तो सू'चत कर, हम उनके बहुत आभारी होंगे।
(२६) धन्वन्तरिक्षपणकाममिहशङ्क- चनालभट्टघटखपरकालिदामाः । ग्च्यानो वराहमिहिरा नृपतेः मभाषां, रत्नानि चैवररुचिनव विक्राम्य ।। कहनेका आशय यह है कि-श्रीविक्रम महागजकी मभामें धन्धतरि, अमरसिंह, कालिदाम प्रभृति जो नवरत्न गिने जाते थे उनमें वगहमिहिर भी एक रत्न थे। इन्होंने अपने प्रतिष्ठाकाण्डमें एक जगह लिखा है कि- विष्णाभागबना मयाचा मचितुर्वित्रा विब्राह्मणां । मातृणामिनि मातृमण्डलविठः शंभो ममम्या द्विजः ।। शशक्या: महिताय शांतमनमो नग्ना जिनानां विद्- येयं देवमुपाश्रिताः म्वविविना न नम्प कुपः क्रियाम् ।। भाव यह है कि-वैष्णव लोग विष्णुकी प्रतिष्ठा करें, सूर्योपजीवी लोग सूर्यको उपासना करें. विप्र लोग ब्राह्मणकी क्रिया करें, ब्राह्मणी इन्द्राणी प्रमृति मप्त मात्र मण्डलकी उनके जाननेवाले अर्चा करें, बौद्ध लोग बुद्धकी प्रतिष्टा करें, नग्न (दिगम्बर माघ ) लोग जिन भगवानको पर्य पामना करें। थोड़े शब्दाम यों के हये कि जो बिनदेवके उपासक हैं वे अपनीर विधिम उमीकी क्रिया करें। अब इतिहासके जाननेवाले लोग इस बातका अनुभव करें किया हमिहिका कथा दिगंधर मतका असिसा महाराज (२७) - . विक्रमके समय तकका सिद्ध करता है या नहीं ? यदि करता है तो जो श्वेतांबरी लोग दिगंबरो लोगोंकी उत्पत्ति विक्रमकी मृत्युक १३८ वर्षे बाद बतलाते हैं यह कहना मन्य है क्या ? हमें खेद होता है कि श्वनाम्बगचार्यों ने इस विषय पर क्यों न लक्ष दिया ? वे अपने ही हरिभद्रमूरिक- पक्षपातो न मे वीरे, न द्रुपः कपिलादिप । युक्तिमद्वचनं यम्य, तस्य कार्यः परिग्रहः ।। इन वचनोंको क्यों भूल गये ? अथवा यों कहिये कि "अर्थी दोब न पश्यति । जिन्हें अपने ही मतलबसे काम होता है वे दूसरे की ओर क्यों देखनेवाले ? क्या वे लोग यह न जानते थे कि यह बात डिपो न रहेगी ? हम कितनी भी क्यों न छिपाये परन्तु कभी न कभी तो उजलेमें आवेगी ही। यह तो हम ऊपर ही लिग्ब आये हैं कि-वराहमिहिर विक्रमक ममयमें विद्यमान थे। नो अब यह निश्चय हो गया कि दिगम्बरियांक बाबत जो श्वेताम्बरियोंकी कज्पना वह-मवथा मिथ्या है। उसका एक अंश भी एमा नहीं है जो श्रद्धय हो । बल्कि दिगम्बरियोंको बाबत वि० सं० १३९ उनकी उत्पत्ति लिखी है वह बिल्कुल ठीक है। इनके माक्षी वराहमिहिराचार्य है । ( जिनका जैनियाम कुछ भी सम्बन्ध नहीं है) उनके ममय में श्वनांवरियोंकी गंध तक नहीं थी इमीम उन्होंने "नग्न" पद दिया है । । म (२८) इस विषय में कितने ही श्वेतांबर लोगोंका कहना है कि जो लोग जैन मतमे अपरिचित तथा ग्रामीण होते हैं, वे जैन मंदिरके देखते ही झटम कह उठते हैं कि यह नग्नदेवका मंदिर है । उमी प्रमिद्धिके अनुसार यदि वराहमिहिरने भी एमा लिख दिया हो तो क्या आश्चर्य है ? परन्तु कहनेवालोंकी यह भूल है । वराहमिहिर विक्रमकी मभाक रत्न गिने जाते थे। वे मब शास्त्रोंके जाननेवाले थे । इमलिए एम अपरिचित तथा ग्रामीण न थे जो वे शिर पेड़की कल्पना उटा लेते। और यह तो कहो कि उम ममय तुम्हाग मत जब विद्यमान था तो भी उन्होंने तुम्हारे विषय में न लिखकर दिगंबरियांक विषय में क्यों लिग्वा ? तुम्हारे कथनानुमार तो दिगंबर धमका उस समय सद्भाव भी न होना चाहिये ? फिर यह गोलमाल क्यों हुआ? इसका उत्तर क्या दे सकते हो ? तुम वराहमिहिरके इन वचनोंको होते हुये यह कभी मिद्ध नहीं कर माने कि दिगंबर मत विक्रमकी दूसरी शताब्दिमें निकला है। किंतु इतिहाम-वेत्ताओंकी दृष्टिमें उन्टे तुम हो निम्नर कहे जा सकोगे। कदाचिन कहो कि केवल नग्न शब्दके कहने मात्रमे तो दिगंबर लोगोंका अस्तित्व सिद्ध नहीं होता, क्योंकि हम भी तो जिन कल्पक उपायक हैं। और जिन कन्पवालोंकी प्रवृत्ति नग्न रूप होती है।
(२९)
केवल कथन मात्रमे कहना कि-हम जिन कल्पके
उपासक हैं और जिन कल्प नग्न होता है इसमे कुछ उपयोग
नहीं निकल सकता। माथमें म्वरूप भी वैमा होना चाहिये ।
और यदि यही था नो शिवभृति क्यों बुरा समझा गया ?
अरे ! जब तुम्हारा मन ही श्वेतांबर नाममें प्रसिद्ध है तो उसे
नग्न कहना केवल उपहाम कगना है। हम तो फिर भी कहेंगे
कि-माधुलोग वास्तविक नग्न यदि मंमारमें किमा मनके होते
हैं तो वे केवल दिगंबगियोंक। बम्बाढिमे माङ्ग वंटित
माधुओंको कोई नग्न नहीं कहेगा। यदि तुम अपना पक्ष मिद्ध
करने के लिये कहो भी तो यह बड़ा भारी आश्रय है !
दूसरे तुम्हारे ग्रंथामें जब यह बात भी पाई जाती है कि
तीर्थङ्कर देव भी मयंया अचल नहीं होने क्तुि देव-दृप्य
वन म्वीकार करते है "* नो तुम्हारे माध नग्र हो यह कमे
माना जाय ? यह यान धारणम मानारण मनुप्पन भी यदि
पूठी जाय कि दिगंबर और श्वेतांबरियांक माधुओम नग्न साधु
कौन है ? मो यह भी दानाका म्वरूप देवकर झटम कर देगा
कि दिगंबरियांक माधु नग्न हान है ।
इमलिये यह नहीं कहा जा मकता कि गहमिहिरका
वचन विक्रम महागजक समयमै दिगंबर धर्मका अस्निन्ध मिद्ध
* इस विषयको श्री सत्मारामजी माधुने अपने निमाण किये
तत्वनिणयप्रामादक ५४४ ३ पन्ने में स्वीकार किया है।
(३०)
करता है वह ममन्देह है। और श्वेतांबरी लोग जो विक्रमकी
दूमरी शताब्दि में चला बनाते हैं वह बिलकुल काल्पनिक है ।
महाभारतके तीसरे परिच्छेदके आदि में दिगम्बरियोंकी
वाबन कुछ जिकर आया है। महाभारत वराहमिहिरमें बहुत
प्राचीन है । इसके बनानेवाले श्री वेदव्याम महर्षि हैं । जिनक
नामको बचा जानना है। इनके विषय में यदि विशेप शोध
करना चाहो ना किमी सनातन धर्मके विद्वानमे जाकर पूछो
वह मब बातें बता मकंगा।
x माधयामम्तावदित्युक्त्वा प्रतिष्टतोत्तङ्कम्त कुण्डले
गृहीत्वा मोपस्यदथ पथि नग्ने क्षपणकमागच्छन्तं
मुहम हुदृश्यमानमदृश्यमानं च ॥
आशय यह है कि कोई उत्तङ्ग नामा विद्यार्थी अपने गुरुकी
भार्या के लिये कुण्डल लाने के लिये गया। मागमें पोप्यक मात्र
उसका बार्तालाप हुआ नो किमी हेतुमे उत्तङ्कने उमे चक्षु
विहीन होनेका शाप दे दिया। पौप्य भी चुप न रह मका सो
उसने व लेका शाप दे डाला कि-तू भी मंतानका सुख न
देखेगा। अब मानमे वह कहता हुआ कि अच्छा शापका अभाव
हो कुण्डक लेकर चल दिया। सो राम्नमें उसने कुछ दीखते
हुये कुछ न दीखते हुये नग्न ( दिगंबर ) मुनिको बारबार देखें ।
x मुनि आत्मारामजीने भी इस प्रमागको तत्वनिणयामारम
जैन मतकी प्राचीनता दिखाने के लिये उद्धन किया है।
(३१)
कहो तो नग्न माधु दिगंबरिकोंके ही थे न ? ये वेद व्यास
तो आजकल के माधु नहीं हैं ? किंतु उन्हें हुयं ना आज कई
हजार वर्ब बीन चुके हैं। उस विषय में तुम यह भी नहीं कह
सकते कि क्या आश्चर्य है जो ये जिनलल्पी ह माध हो ?
क्योंकि उम ममय जिनकल्प विद्यमान या। बामणोंक ग्रंथों में
जहां कहीं नग्न शब्दम संबंध रखनेवाला विषय आता है वह
केवल दिगंबर धर्मम संबंध रखना है। बेर ! पंढव्याम नो
प्राचीन हुये हैं उनके ममयमे तो तुम्हारा नाम निशान भी न
था किंतु जो आचार्य विक्रमकी मानवीं नथा नवमी शताब्दिमें
हुये हैं वे भी नग्न शब्दका प्रयोग दिगंबग्यिाँक लिए ही
करते हैं।
कुसुमांचलिक प्रणेता
उदयनाचाय १६ पृष्ठमें
लिखते हैं कि-
निगवरण इति दिगंबग:
इमी नरह न्यायमीक जयन्त भट्ट १६७३ पृष्टमें
लिखते हैं
क्रियातु विचित्रा प्रन्यागमं भवतु नाम । भम्मजटा
परिग्रहो वा दण्डकण्डलुग्रहणं वा रक्तपटधारणं या
दिगंबरता बाग्लंव्यतां कोऽत्र विगंधः
इनके अलावा और भी जितनी जगह प्रमाण आत हैं वे
'विवमन' 'दिगंबर' 'नग्न' इत्यादि शब्दाम व्यवहत किये जाने
हैं। वे सब दिगंबर मनम मंबंध रखते हैं तो फिर क्यों कर
(३२)
यह माना जाय कि दिगंबर धर्म आधुनिक है ? उसके आधुनिक
कहनेवालोंको एम प्रमाण भी देने चाहिये जिन्हें सर्व साधारण
मान मके। केवल भलता ही किमीपर आक्षेप करना मर्वथा
अनुचन है। आजका जमाना नवीन इँगक प्रवाहमे वह रहा है।
अब लोग यह नहीं चाहते हैं कि बिना किसी प्रबल
युनिक कोई बात मान ली जाये। किंतु जहांतक हा मके उमे
युनि और प्रवृत्नियों द्वारा अच्छी तरह परामर्श करके मानना
चाहिये । जब प्रत्येक विषयकं लिये यह बात है तो यह तो
एक बड़ा भारी विषम विषय है। इसमें तो बहुत ही सुदृढ़
प्रमाण होने चाहिये । हम यह नहीं कहने कि आप लोग हमारे
वह हुयेको अपने हृदय में स्थान दें। परन्तु माथ ही इतना
अवश्य अनुरोध करेंग कि-
बंद इनाग लिया हुआ अयुक्त हो तो उसे मवे-
मारपणाम अयुक्त मिद्ध कमे हमे म बानमे बड़ी खुशी
हामी कि-जिम तम्ह हमने अपने पानीमा मिद्ध करनेमें
एव तोमर ही मतंक प्रमाणोंका उपम्टिन किये है उमी तरह
तुम
भो अपने कटे हुये प्रमाणको म'माण प्रमाणभत ठहम दोंगे।
।
हम प्ररिता पूर्वक यह बात लिखते है और न एमे
लिम्बनम हमें किसी तरहकी विभीपिका है। यदि हमें कोई
यह बात खिद्ध करके बता देंगे कि-दिगवर धर्म आधुनिक
(३३) है. इसका ममाविभाव विक्रमकी दूसरी शताब्दिमें हुआ है तो हमें दिगंबर धर्ममे ही कोई प्रयोजन नहीं है किंतु प्रयोजन है अपने हिनमे मो हम फौरन अपने श्रद्धानको दूसरे रूप परिणत कर सकते हैं । परन्तु माथ ही हमारे ऊपर कहे हुये वचनोंका भी पूर्ण बयाल रहे । केवल अपने ग्रंथमात्रके लिखनेमे हम कभी उमे मप्रमाण नहीं समझेंगे । यदि लिग्वने मात्रपर ही विश्वास कर लिया जाय तो मंमारके और २ मतोंने ही क्या बिगाड़ा है? । है इसपर प्रश्न यह हो सकता कि जैसे तुम्हें अपने धर्मपर लिग्ये इयका विश्वास है वह भी तो लिग्या हुआ ही है न ? शक. वह लिया हुआ है और उमपर हमारा पूर्ण विधाम भी है कोंकि वह हमारी परीक्षामें शुद्ध रन्न जचा है। और यही कारण है कि दमपर अश्रद्धा है। परन्तु इसका यह मत- लर नहीं है कि हमें कोई यह बात समन्ना दें कि दिगंबर धर्म आधुनिक और जीवोंका अहिन करनेवाला है फिर भी उस पर श्रद्धा न रहे । अन्यथा हम नो यही अनुरोध करते हैं और करते रहेंगे कि मबसे पहले यह विचारना जसरी है कि- जीवका वास्तविक हित किम धमक द्वारा हो सकता है ? और कौन धर्म ऐमा है जो मंमारमें निराबाध है ? इस विषयकी गषणामें लोगोंको निष्पक्षपाती होना चाहिये और नीचेकी नीति चरितार्थ करना चाहिये - । ३ (३४) । वारि हंम इव क्षीरं, मारं गृह्णाति मञ्जनः । यथाश्रनं यथामन्यं. शोच्यानां हि कृतिमता ।। वैदिक मंप्रदायके महाभारताढि पाचीन ग्रंथों के अनुसार यह अच्छी तरह सद्ध कर चुके है कि दिगम्बर धर्म वेतांबर धर्ममें प्राचीन है और दिगम्बराहीम हकी मंमार नवीन रूपमें अबतारणा हुई है । वह कल अपनी मामर्थ्य हीन होनेसे। क्योंकि यदि उनकी शक्तिका हाम न होता तो न धर्मशास्त्र विहिन जिनकल्पका अनादर करते और न उन्हें अपने नवीन मतके चलानेकी जरूरत पडनी । कदाचित कहो कि यदि, जिनकल्पक तुम बड़े श्रद्धानी हो और उसे ही प्रधान समझते हो तो आज तुम लोगोंमें यह हालत हे कि एक माधु तक ऐसा नहीं देखा जाता जो जिन- कल्पका नमूना हो ? और हम लोगों में साधु तो दखने में आने हैं। क्या जिन भगवानका यह कहना है कि पञ्चमकाल अन्त पर्यन्त साधुओंका मद्भाव रहेगा व्यर्थ ही चला जायगा ? इसके उत्तर में विशेष नहीं लिखना चाहते। किन्तु इतना ही कहना उचित समझते हैं कि जो बात जिन भगवानकी ध्वनिसे निकली है वह वाम्नबमें मन्य है और वैमा हो वर्त- मानमें दिखायी भी दे रहा है । जिन भगवान ने जो यह कहा है कि पंचमकालके अन्त पर्यन्न साधुओंका सद्भाव रहेगा परन्तु इसके साथ२ यह भी तो कह दिया है कि बहुन ही विरलतासे ।
(३५)
नो यदि केवल हम देशमे वर्तमान ममयमें उनके न भी
होने यह विश्वाम तो नहीं किया जा सकता कि मुनियोंका
सर्वथा अभाव हो ? दूर-तुम लोगोंमें शासन विरुद्ध वेपके
धारक यदि बहुत ही माध मिल जाये तो उसमें हमें लाभ
क्या ? अरे! आज इम देगी हम मथा नहीं देखे जाने नो
क्या विश्वास भी यही कर लिया जाय कि हम होता ही नहीं
है ? विचारशील इम कभी बाकार नहीं करेंगे । दुसरे-
ध्यानो गाड़बाधेन, न हि हन्नि विपं बकः ।
बगलेका गमड़ रूपमें कोई कितना भी ध्यान क्यों न करे
परतु वह कभी विपक्षी दूर नहीं कर सकता। नो उमी नरह
केवल एमे चैम माधुआंका मद्भाव होनीम यह नहीं कहा जा
मकता कि माधुओंके अभावकी पूर्ति हो जायगी । बम ना आज
कंवल भारतवपमें ही बावन लाग्य माधु
उपयोग क्या मधेगा ?
हैं
। परन्तु उनमे
हां, एक बात और धताम्बर लोग कहते हैं जिसमें ये
अपने प्राचीन होने का दावा रग्बत हैं। वह यह है कि-हम
लोगों में अभीतक खाम मणधगक बनाये हुने अङ्गशान है और
तुम लोगोंमें नहीं हैं । इमीम भी हम प्राचीन मिद्ध होते हैं ।
परन्तु यह प्रमाण भी मंगन नहीं है । इसमें हमें बाधा यह
देना है कि-यदि तुम खाम गणधरोंक शाम्र अभीतक अपने में
(३६) विद्यमान बताने हो तो कोई हर्ज नहीं। हम तो यही चाहते है कि-किमी तरह वस्तुका निश्चय हो जाय । परन्तु माथ ही इतनी बातें और मिद्ध करनी होगी ? यदि वे शाम खाम गणधरोंक बनाये हुये हैं तो जिम- जिम अंगकी तुम्हारे ही शास्त्रीने जितनी-जितनी संख्या कही है उतनीकी विधि टोक-ठीक मिला दो। यदि कहोगे कि- कलियुगमें बहुतमा भाग विच्छेद हो गया है। अस्तु, यही सही, परन्तु उन शास्त्रों के प्रकरण देखनमें तो यह नहीं जाना जाता कि यहांका भाग म्बण्डित हो गया है, वह तो आदिमे लेकर अन्त पर्यन्त बिल्कुल मसम्बद्ध मालूम पड़ता है फिर यह कैम माना जाय कि इमका भाग नष्ट हो चुका है ? और न इतनी पदोंकी संख्या ही मिलती है जितनी शास्त्रांमे लिखी हैं । फिर भी कदाचित कहा कि -पद नो हम व्याकरणक नियमानुसार सुबन्त और निङन्तको मानेंगे। खैर ! यही मही, परंतु एमा मानने पर तो यह संख्या शास्त्रों कथनको भी बाधित कर देगी। फिर उसका निवाह कम होगा ? फिर भी याद कहो कि-ये जो अङ्ग शान हैं वे गणधरों के कथनानुसार महर्पियोंके द्वारा बनाये गये हैं। यदि यही ठीक है तो महषियोंने उनके रचयिताओंमें अपना नाम न रखकर गण- धरोंका नाम क्यों रक्खा ? क्या उन्हें किसी तरहकी विभीषिका
(३७)
थी ? जो उन्होंने बड़ोंके नाममें अपने बनाये हुये ग्रन्थ प्रकाशित
किये ? जानि पर इसका कैमा प्रभाव पडेगा? उन्होंने अपने
दूसरे महाव्रतका उल्लंघन करना क्यों उत्तम ममझा ? दुमो-
गणधरोंकी जैमी गम्भीर वाणी होती है वैमी इनकी क्यों नहीं ?
जैसे ऋषियों के ग्रंयोंकी भाषा है वेमी उनकी भी है।
इत्यादि कई हेतुआम ये अंगादि शास्त्र ग्वाम गणधरोंके द्वारा
विहित प्रतीत नहीं होने । यदि सिद्ध कर सकते हो तो करो !
उपादेय होगा तो मभी म्वीकार करेंगे।
दिगम्बका तो इस विषयमे सिद्धांत है कि-अँग
पूर्वादि शास्त्रोंका लिम्बा जाना ही जब निदांत असंभव है तो
उनका होना तो कहांतक संभव है उसका जग अनुभव करना
कठिन है । परन्तु अभी जितने शास्त्र हैं वे मब परम्पराक
अनुमार
अंगशाम्रक अंश ले लेकर बने हैं। उनके पनानेवाले
गणधर न होकर आचार्य लोग हैं। और यही कारण है कि-
उन्होंने मव ग्रन्थ अपने ही नामम प्रसिद्ध किये है ।
यह युक्ति भी श्वेतांबर मतकं प्राचीन सिद्ध करनेमें
असमर्थ है तो अभी एमा कोई प्रबल प्रमाण नहीं है जिसमे
चनाम्बर मत दिगम्बर मतमे पहलेका सिद्ध हो जाय ।
और दिगम्बर मत पहले का है यह बात वैदिक मंप्रदायक
ग्रंथों के अनुमार हम पहले ही सिद्ध कर आये हैं। इसके अलावा
दिगम्बरोंक प्राचीन मिद्ध होने में यह भी हेतु देखा जाता है कि-
(३८) । । उनक कितनं आचार्य एम हुये हैं जो उनका अस्तित्व विक्रम महाराजकी पहली ही शताब्दिमें मिद्ध होता है। दग्विये ना- कुन्दकुन्दाचार्य विक्रम मं० ४९ में इये हैं। उन्होंने पञ्चाम्तिकायादि कितने ही ग्रंथ निर्माण किये हैं। समन्तभद्र- स्वामः वि. मं. १२५ में ये हैं इनके बनाये हुये गंधहम्ति- महाभाप्य, गन्नकरण्ड, आम-परीक्षादि किन्ने ग्रंथ बनाये हुये है। बनारसका शिवकाटि गजानी उन्हीं के उपदेशम जेनी हुआ था। उसने भी भगवती आराधना प्रभृति कर ग्रंथ निर्माण किये हैं। इनके मियाय और भी कितने महपि दिगंबर मंप्रदाय में विक्रमकी पहली शताब्दिमें हुये हैं । इसलिये श्वेतांबरोंका- दिगंबर मतकी उत्पत्ति वि० सं० १३८ मे कहना मर्वथा बाधित मिद्ध होता है। जब किमी तरह दिगंबर मन श्वेतांबर मतक पीछे निकला सिद्ध नहीं होता तो उनकी कथा-कल्पना कहांतक ठीक है ? इमकी परीक्षाका भार हम अपने पाठकों के ऊपर छोड़ते है और प्रार्थना करते हैं कि वे निष्पक्ष दृष्टिमे दोनों मनके ऊपर विचार करें। यद्यपि हमारी यह इच्छा थी कि-ऊपर लिखे हुये आचार्यों के बाबत यह सविस्तार सिद्ध करें कि ये सब विक्रमकी
(३९)
पहली शताब्दिमें हुये हैं । परन्तु प्रस्तावना इच्छामे अत्यधिक
बढ़ गई है । इसलिए पाठकोंकी अरुचि न हो मा यहींपर विराम
लेकर आगे लिये आशा दिलाते हैं कि हम श्वेतांबर तथा
दिगंबर्गक संबंध में एक म्वतन्त्र ग्रन्थ लिखनेवाले हैं उमोमें
यह बात भी अच्छी तरह मिद्ध करेंग । पाटक थाई समयक
लिए हम अपनी क्षमाका भाजन बनावें ।
हमने यह :म्नावना ठी१२ निणपक अभिप्रायम लिखी
है । हमारी यह इच्छा नहीं है कि हम किपाक दिलको दुःखावें ।
परन्तु मर झटक निर्णयकी परीक्षा करने का अवश्य अनुरोध
करेंगे । और हम आशय में हमने लेम्वनी उठाई है। यदि कोई
महाशय इमका मङ्गन उनर देंगे तो उमपर अवश्य विचार
किया जायगा । बम इतना कहकर हम अपनी प्रस्तावना मनाप्त
करत है और माथ ही-
मच्छनः मवलनं क्व पि, भवत्येव प्रमादतः ।
हमन्ति दुजनाम्नत्र, ममादधति मजनाः ।।
हम नीनिक अनुमार क्षमाकी प्रार्थना करते हैं। क्योंकि-
न मनः म जानाति ।
मलिय
भूल
होना उगम्थोंके लिये माधारण बात
बुद्धिमानोंको उम पर खयाल न करके प्रयोजन पर दृष्टि
देनी चाहिये ।
sho
(४.)
भद्रबाहुचरित्रकी हमें २ प्रतियें मिली है परंतु वे दोनों बहुधा
अशुद्ध हैं । इमलिए संस्कृत पाठक संशोधनमे हम कहां तक
सफल मनोरथ हुये है इमे पाठक ही विचारें। तब भी बहुत
ही अशुद्धियोंके रह जानेकी सम्भावना है। उन्हें पुनरावृत्तिमे
सुधारनेका उपाय करेंगे। हिंदी अनुवादका यह हमारा दूसरा
ग्रन्थ है । अनुवाद जहांतक हो मका मरल भाषामें करनका
उपाय किया है, पाठकोंको यह कहांतक रुचिकर होगा उमका
हमें सन्देह है । क्योंकि हमारी भाषा वैमी नहीं है जो पाठकों के
दिलको लुभाले । अस्तु, तो भी मूल ग्रंथका तात्पर्य तो समझमें
आ ही जावेगा। अभी इतने हीमें संतोष करते हैं।
जातिका दाम
काशा
ता० १७ २११
उदयलाल जैन काशलवाल
ॐ नम : श्रीभद्रबाहुमुनये । श्री भद्रबाहु-चरित्र दान अपार बाप। (सभामानुवाद) श्री शिविशद जिनपद, कुन भ्रमण दुख नाप । सकर निजचैतन्यगग, करहु गनपाप! ।।१।। त्रिभुवन जन तुब भक्त, त्रिभुवन अबतक । हुये, प्रभो ! अब क्यों न मुझ-पर करुणा है अंश? ॥२॥ दिनर्माण भी तुब बानिस, निबर कान्ति ह नाथ ! । चूरहिं जगतम तो न क्यों, हरहु हृदय तम ? नाथ ! ।। ३ ।। जनभात शशि शोतल है, मुझे न यह स्पोकार । जनन-ताप मिटता नहीं, फिर यह क्यों निराधार ? ॥४॥ सन्तापके, हुये বিনায় तिहिं मृगा शीतल प्रभो! कहनाये जग आप ॥ ५ ॥ गुण मुक्तामणि रत्नके, गुण मुक्तामणि दान कर, नाप! करहु भवपार ॥ ६॥ ३० विध मङ्गल-प्रभव शुभ, विवि-प्रभाव वश विन्न । निगम, हा प्रन्य शुभ, निर्विन ॥ ७ ॥ नाथ ! सुबिनय अनायका, सुनकर करूगा पूर!। कर कमलका, देर कलिर विचूा ॥ ८ ॥ रत्नकीति मुनिराजने, मुनिराजने, रपी सुजन हित हेतु । भद्रबाहु मुनि निक वृत, सो भव नीधि सतु ॥ ९॥ निहि भाषा मैं मन्द-धी, मूल प्रन्य अनुसार । लिखहँ कहीं यदि मूर हो, शोध सुजन विचार ॥१०॥ पाराबार अपार। . हो पूण अबउम्बन .
ग्रन्थारम्भ . जा अपन कवलज्ञान-रूप मूर्यके हाग हृदयास्थत अन्धकारका भेदन करक. महावीर ( अनुपम मुभट ) पनको प्राप्त हुये हैं वे मन्मनि महावीर । जिनेन्द्र हम लोगोंके लिये समीचीन बुद्धि प्रदान करें ।।। || धमर शोभायमान, वृपक चिह्नम चिह्नित, इन्द्रम अचनीय, धमनीकं प्रवनक. तथा शत्रक भदनवाले एसे श्रीवृपमनाथ भगवानक लय में नमाकार करता हूँ ।। २ ।। मनोमिलपित उपदक प्राप्तिक. लिये उत्कृष्टपदको प्राम हुय पञ्जपग्मेटिक उत्कृष्ट-लक्ष्मी-विगाजेन चरणांका में नमस्कार करता हूं ।। ८ ।। लोक नथा अलोकक अवलोकनके लिय प्रदीपक ममान जिनवाणी ( मरम्वती हमारे पाप रूप रजका नाश कर निरन्तर निर्मल बुद्धि प्रदान कर ॥ ४ ॥ मंमार-ममुद्रमं पवित्र आचरण रूप यानपात्र के द्वारा गौरवको प्राप्त हुये माधु पाक पढ़पङ्कज मेरे मनोभिलपित अर्थको मम्प्राप्तिक करनेवाले हावें ॥ ५ ॥ ग्रन्यसार मासुमन रन्नकीर्ति महाराज अपनी लघुता बताते हुये कहा है कि-यद्याप में ग्रंय निर्माण करने की शक्तिमे है (४३) रहिन हूं तथापि गुरुवर्यकी उत्तेजनामे जैमा उनके द्वारा भद्रबाहु मुनिराजका चरित्र सुना उस उमी प्रकार कहूंगा ॥ ६ ॥ जिसके श्रवण-मन बुद्धियांक मिल्या-मोहरूप गातान्ध- कारका नाश होकर पवित्र जैनधममं निमल वृद्धि होगी ।। ७ ।। इम भग्नक्षेत्र सम्बन्धी मगदशम अन्नकापुरीके ममान गजगृह नगर है ॥ ८ ॥ उमा पालन करनेवाले-जन्हें ममम्न राज्यमण्टल नम- कार करते है नया कानाणक निला भव्यानाका महागज श्रणिक है । और उनी कान्ताका नाम चलनी है ।। १५ ।। एक ममय महागन श्रेणिक-जनपालक मुम्बमं विपुलाचल पर्वत पर श्री महावीर जिनेन्द्रका मन्त्र कारण आया सुनकर उनके अभिवन्दनकी अभिलाषाये गीत नृत्य नादित्रादि प्रचुर महोत्सव पृषक । जिनके द्वारा समस्त विशाय शब्दमय होती थी। चले ।। १०-११ ।। और देवता लोगय बन्दनीय नया केवललान रूप उचल शांनिक धारक श्री बीजिनेन्द्रका ममवलोकनकर तथा स्तुति नमस्कार पूजन कर मनुष्योंकी ममाम बैट ॥ १२ ॥ वहाँ जिन भगवानके द्वारा कहे हुये यनि और श्रावकका स्वरूप विनयपूलांक मुना, नथा करकमल-मुकुलित कर नमम्कार (४४) पूर्वक पूछा-देव ! हम भारतवर्णमें दुषम पंचम कालमें आगे कितने केवलज्ञाना तथा कितने श्रुतकवली होंगे? और आगे क्या होगा ? ॥ १३-१४ ॥ अणिक महागजके प्रश्न उत्तरमें भगवान वीर जिनेन्द्र गम्भीर मेघ ममान दिव्यध्वनिक निनादम भव्यरूप मयूगेको आनन्दित करते हुये बोले - नगधिनाथ ! मेरे मुक्ति जाने के बाद--गौतम, सुधम, जम्बू ये तीन कंवलज्ञानी होंगे । और समस्त शास्त्रक. जाननेवाले श्रतंकवली-विष्णु, नन्दिमित्र, अपराश्रित, गोवर्द्धन तथा भद्रबाहु ये पांच महर्षि होंगे । और पचम कलिकाल में ज्ञान धर्म तथा सुख ये दिनों दिन घटने जावेंगे ॥ १५-१८ ॥ हे श्रेणिक ! अब आगे तुम भद्रबाहु मुनिका चरित्र सुनो। क्योंकि जिसके श्रवणसे मुर्ख लोगोंको अन्य मतोंकी उत्पत्ति मालूम हो जायगी ।। १९ ॥ उस समय श्रेणिक महाराजने श्री वीरजिनेन्द्र के मुख से भद्रबाहु मुनिका चरित्र जिस प्रकार सुना था उसे उमी पकार इस समय संक्षेपमे गुरुभक्तिके प्रसादसे मैं कहता हूं ॥ २० ॥ इम लाकर्म विख्यात जंबूद्वीप है। वह आदि होने पर भी अनादि है । परन्तु यह अमभव है कि-जो आदि है वह अनादि नहीं हो सकता। इस विरोधका परिहार यों करना
(४५)
चाहिये कि-वह जंबूद्वीप और २ धातकी खण्ड आदि मब
द्वीपोंमें आदि ( पहला ) द्वीप है। इसलिये जंबूद्वीपक आदि
होकर अनादि होनमें दोप नहीं आता। यह द्वीप षटकुलाचल
पर्वतामे मेवनीय है। अर्थान-इमक भीतर छह कुलाचल शैल
है तो समझिये कि-लक्षमी तथा कुलक्रममे वशवत्ति राजाओंके
द्वार। मेवनीय क्या वमुन्धगधिपति है ? उम जंबूद्वीपक ललाटके
ममान उत्तम भरनक्षेत्र सुशोभित है । और उसके तिलक ममान
पुन्ड्वद्धन देश है || २१-२२ ॥
जिम दशमें धन धान्य नथा मनुष्योंक, धेनु कि मम-
हम विभूपिन तया महिप भैम) नियहमे परिपूर्ण छोटे२ ग्राम
राजाक समान मालूम देते है । क्योंकि गजालोग भी धनधान्य
जनसमूह पृथ्वीमण्डल नथा गनियाम शोभित दोन हैं । २३॥
जिम दशमें यात्रिन पुरपाका उनम फल देनेवाले, शीतल
छापाक करनेवाले, विशाल शोभाम युक्त. पृथ्वीके आश्रिन तथा
देखने में मनादर वृक्ष भावकोंक मपान मालूम होते हैं, क्योंकि
श्रावक लोग भी लक्ष्मीग युक्त, उसम क्षमा स्थान नथा
मम्यग्दर्शन धारक हान है ॥ २४ ॥
जिस देशम नदी मात्र निप्पन्न तथा मेघ मात्र निष्पन्न
क्षेत्र (खेत ) में मुशोभित तथा मनाभिलपित धान्यकी देनेवाली
वमुन्धरा चिन्तामणिके समान मालूम पड़ती है। क्योंकि
चिन्तामणि भी तो वांछित वस्तुओंको देनेवाला होता है ॥२५॥
(४६
जिस देशमें पुरुषोंको भ्रमर विलमित कमल-लोचनाम
आनन्दको बढ़ानेवाली, पक्षियोंकी श्रेणियामे शोभिन. निर्मल
जलमे परिपूर्ण तथा जिनका सुन्दर आकार देखने योग्य है
एमी मरमिय शोभती हैं तो समझिये कि देशकी उन्कृष्ट शोभा
देखने के लिये कौनहलमे प्रगट हुई पृथ्वी रूप कान्ताकी आनन
श्री है क्या ? क्योकि मुखश्री भी लोचनाम आनन्द देनेवाली
दांतांकी पंक्तिमं विराजित, निमल तथा दखने योग्य
होती है ।। २६-०७॥
तथा जिम देशमें प्रमूति गृहमें अरिष्ट शब्दका व्यवहार
होता था, प्रतारण पना जम्बुक । इसाल ) में था, बन्धन
हाथियोंमें था, पल्वाम छेदन होता था, भङ्गपना जलतरंगमें
था, चपलता बन्दरोंमें थी, चक्रवाक गत्रिमें मझोक होता था,
मद विशिष्ट हाथी या तथा कुटिल ना बियोकी भृवहरियों में
थी, इन बातोंको छोड़कर प्रजामें न कोई अरिष्ट बुरा
करनेवाला) था, न ठगनेवाला था, न क्रीमीका बन्धन होता
था, न किमीका छेदन था, न किमीका नाश होता था,
किमीमें चपलता थी, न किमीको किमी तरहका शोक था, न
कोई अभिमाना था, तथा न किमीमें कुटिलता थी।
भावार्थ
-पुण्डबद्धन देशकी प्रजा तरह आनन्दिन
थी, उसमें किसी प्रकारका उपद्रव न था ।। २८-२९ ।।
जिस पुण्ड्रवर्द्धन देशमें स्वर्गके खण्ड समान अत्यन्त
.
.
न
मनोहर कोट्टपुर नाम नगर अट्टाल महिन बड़े २ ऊंचे गोपुरद्वार
खानिका तथा प्राकार सुशोभित है ।। ३ ।।
जिसमें-अतिशय उन्ननः शिवबाली म्यश्रेणियें एमी
मालूम पड़ती हैं समझिये कि.- अपने घना कप हायाम
चन्द्रमाका कलंक मिटाने के लिये बड़ी है ॥३१ ।।
जिम नगरीम-निमल. मुक्तक समूह ममान भव्य
पुरुषोंक द्वाग मेवनीय जिन चन्यालयोंक शिम्बर मम्बन्धी
अनेक प्रकार महा अमूल्य-मणि-माणिक्यमं जड़े हो मुवणाक
कलशोंकी चारों ओर फैलती हई किरणाम गगन मण्ड में
विचित्र चन्द्रोपक ( चन्दावा । की शोभा होती थी ॥ ३२-३३ ।।
जिम नगरीम दानो लोग यद्यपि थे तो दयाशानी परन्तु
बिचारे कुवेरको ना निदेय होकर निरन्तर महापाड़ा करने
भावार्थ-वहांक दानी लोग धनदम भी अधिक
उदार थे ।। ३४ ॥
जिन लोगोंका धन तो जिन पूजादिमें व्यय होना था,
चित्त जिनभगवान धर्ममें लीन रहना था, गमन अच्छे २
तीर्थोंकी यात्रा करनेके लिये होता था, कान जैन शास्त्रोंक
श्रवणमें लगते थे, वे लोग म्तुति गुणवानांकी करते थे तथा
नमस्कार जिनदेवके चरणों में करते थे। अधिक क्या कहें;
.
(४८) कोट्टपुग्नगर निवासी मब लोग धर्म-प्रवृत्तिमें सदैव तत्पर रहते थे ।। ३५-३६ ॥ उम पुण्डवर्द्धनका-जिमने अपने तंजमे समस्त राजा लोगोंको वश कर लिये हैं, मन्तानके ममान प्रजाको देखनेवाला, गजा लोगोंके योग्य नोन शक्तिम मण्डित, काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, प्रभृति छह अन्तरङ्ग शत्रुओंको जीननेवाला नया उत्तम मार्गमें सदैव प्रयत्नशील पद्मधर नाम राजा था ॥ ३७-३८ ॥ । उमके-दूमरी लक्ष्मीकी ममान पद्मश्री नाम महिपी तथा मोभशर्म पुरोहित था । ३९ ।। वह पुरोहित विचारशील, विशुद्ध हृदय तथा वेदविद्याका ज्ञाता था और द्विजराज ( ब्राह्मणोंमें श्रेष्ठ ) होकर भी द्वीजराज ( चन्द्र अथवा गरुड़ ) न था । क्योंकि द्विज नाम नक्षत्रोंका है और नक्षत्रोंका राजा चन्द्र होता है, अथवा द्विजनाम पक्षियोंका है और उनका राजा गरुड होता है। परन्तु यह दोनों न होकर ब्राह्मणोंमें उत्तम था : क्योंकि द्विज नाम ब्राह्मणका भी है ॥ ४० ॥ मोमशम के--चन्द्रवदनी, विशाल लोचनवाली, म्वाभाविक अपने सौन्दर्यसे देवाङ्गनाओंको जीतनेवाली तथा मूर्यकी जैसी कान्ति होती है चन्द्रमाको जैसी शिखा होती है उसी समान (४९) सुन्दर लक्षणोंकी धारक प्रशंसनीय मोमश्री नामकी कान्ता थी ।। ११-१२ ॥ मामशर्म अपनी मुन्दरीके माथ अतिशय रमण करता हुआ मुग्यपूर्वक कालको बिता था, जिस प्रकार कामदेव अपनी गनिकांनाक माथ प्रणपपूर्वक रमण करता हुआ कालको बिताता है ॥ १३ ॥ पुण्य कर्मक उदय कृशोदरी सोमश्रीने शुभ नक्षत्र शुभ ग्रह नया शुभ लग्नमें अनेक प्रकार शुभ लक्षणोंमे युक्त तथा काम्यक समान सुन्दर म्वरूपशाली पुत्रग्न्न उत्पन्न किया, जिस प्रकार उनम वृद्धि नान उत्पन्न करती है । उस समय मामाने प्रत्रकी वसीम याचक. लोगांक लिये उनकी उनकार दान दिया ।। ४४-४५ ॥ और विर -मधुर गाने गाने लगी, नृत्य करने लगी, दमि वजने लगे तथा गृहों पर ध्वजायें लटकाई गई । इन्पादि नाना प्रकारचे पत्रका जन्म महात्मव मनाया गया ।। ४ ।। अधिक क्या कहा जाय उम पुण्यशाली मुमुनक अवतार लना सभीको आनंद हुआ। में सूर्य के उदयाद्रि पर आनेसे कमलाको नया चन्द्रोदयमे चकोराको आनंद होता है ॥४७॥ यह बालक कल्याणका करनेवाला होगा, सौम्य मूर्तिका धारक है, मरल चित्त है इमलिये बंधुओंके द्वारा भद्रबाहु नाममें सुशोभित किया गया ।। ४८ ।। ४ (५०) मो मुन्दर म्वरूपशाली भद्रबाहु शिशु स्त्रियों के द्वारा खिलाया हुआ एकके हाथमे एकके हाथमें ग्येला, पृथ्वी में कभी नहीं उतग ॥ ४०॥ मारे मंमारको आल्हादका देनेवाला शुक्ल द्वितीयाका चद्र जमे दिनोंदिन कलाआके द्वाग वृद्धिको प्राप्त होना ई उमी तरह अग्विल जातको आनंद देनेवाला यह बालक भी अपने गुणोंक माथ ही माय प्रतिदिन बढ़ने लगा ॥ ५० ॥ अपने सौभाग्य, धर्म, गंभीरता नथा रूप लावण्यम पृथ्वीमण्डलको मुग्ध करनेवाला भद्रबाह शिशु कुमार अवस्थाको प्राप्त होकर देवकुमार्गक ममान शोभने लगा ॥ ५१ ॥ कला विज्ञान में कुशल भद्रबाहु अपने समान आयुक धारक और २ कुमारोंके माथ आनंदपूर्वक ग्वलना ग्हता था॥ ५२ ।। मो किमी ममप यह कुमार जब अपने नगरके बाहिर और२ कुमारोंके माथ खेलता था, उस समय उसने अपनी कुशलतास एकके ऊपर एक इमतरह क्रमशः तरह गोली चढ़ा दी और शीघ्र ही उनके ऊपर चतुर्दशमी गोली भी चढ़ा दी॥ ५३-५४ ॥ जिसप्रकार चंद्रमा ताराओंसे विभूषित होता है उसी प्रकार मुनिमण्डलसे विराजित अनेक प्रकार गुणोंसे युक्त, अपने उत्तम ज्ञानरूप शझिकिरण--संदोहसे सर्व दिशायें निमल करनेवाले (५१) तथा शोभावमाम चारित्ररूप मुन्दर आभूषणमे शोभित श्रीगोवद्धनाचार्य गिरनार पर्वत पर श्रीनेमिनाथ भगवानकी यात्राकी अभिलापामे विहार करते हुये कोट्टपुरमें आ निकले ।। ५५..५७ ॥ पुरके ममीप आते हुये दिगंबर माध-ममूहको दबकर खेलते हुये वे मब बालक भयमे माग गये ।। ५८ ।। उनमें केवल बुद्धिमान, शुद्धान्मा, विचारशील तथा मंतोपी भद्रबाहुकुमार ही वहांपर ठहरा ।। ५०. ।। गोवर्द्धनाचार्यने एकके ऊपर एक गोली इसी तरह ऊपर२ चतुर्दश गोली चढ़ाते हुये उमे देखकर अपने अंतरङ्गमें विचार किया कि-पञ्चम श्रनकवली निमित्तमे जाना जायगा- एमा कंवलज्ञानी श्री वीरभगवान ने कहा है मो वह महा नपम्बी, महा नेजम्बी, ज्ञानरूपी ममुद्रका पारगामी तथा भव्य रूप कमलोंके प्रफुल्लित करने के लिये मूकि ममान भद्रबाहु होगा ।। ६०-६२ ॥ मा निमिन लक्षणांमें तो यह उत्पन्न हो गया एमा जाना जाता है । इस प्रकार हृदय में विचार कर कुमार गोव- द्धनाचार्य ने कहा-दशनश्रेणी रूप चांदनीक. प्रकाशमं समस्त दिशाओंको उज्वल करनेवाले हे कुमार ! हे भाग्यशाली !! यह तो कह कि तेरा नाम क्या है ? तू किम कुलमें ममुत्पन्न हुआ है ? और किमका पुत्र है ? मुनिराजके उत्तम वचन सुनकर (५२) और उनके चरणोंको वारम्बार प्रणाम कर विनयपूर्वक कुमार बोला-विभो ! मेरा नाम भद्रबाहु है, द्विजवंशमें मैं ममुत्पन्न हुआ हूं तथा मोमश्री जननी और सोमशर्म पुरोहित मेरे पिता फिर मुनिगज बोले-महाभाग ! इमें अपना घर बताओ । मुनिगजके वचनमे, विनयमे विनम्र मम्तक मन्तुष्ट चिन भद्रबाहु, म्वामीको अपने गृहपर ले गया। भद्रबाहुके माता-पिता महामुनिको आये हुये देखकर अत्यन्त प्रमन्त्रमुग्व हुये; और मानंद उठे तथा मुनिराजको भक्तिपूर्वक नमस्कार कर उनक बिराजनके लिए मनोहर सिंहासन दिया। जिस प्रकार उदयाचल पर मूर्य ठहरता ई उमी तरह मुनिगज भी सिंहासन पर बैठे। इसके बाद कांतामहित मोमशर्मने हाथ जोड़कर कहा- दयामिधा ! आज आपक चरण-मरोजके दर्शन में मनाथ हुआ ! तथा आपके पधारने मेग गृह पवित्र हुा । विभा ! मुझ दामक ऊपर कृपाकर किलो योग्य काम अनुग्रहीत करिए । बाद मुनिराज मधुर वचनम बोले-भद्र ! यह तुम्हारा पुत्र भद्रबाहु समस्त विद्याका जाननेवाला होगा। इसलिए इस पढ़ाने के लिए हमें देदो। मैं बड़े आदरमे इसे सब शास्त्र बहुत जन्दीपढ़ाऊंगा । मुनिराजक वचन सुनकर कांता सहित सोमशर्म बहुत प्रसन्न हुआ।
(५३) फिर दोनों हाथ जोड़कर बोला-प्रभो ! यह आपका ही पुत्र है इसमें मुझे आप क्या पूछते हैं ? अनुग्रह कर इसे आप ले जाईए और मब शास्त्र पढ़ाईए । मोमशर्मके कहनेम-भद्र- बाहुको अपने स्थानपर लिवा ले जाकर योगिराजने उमे व्याकरण, माहित्य तथा न्याय प्रभृति मब शास्त्र पढ़ाये । यद्यपि भद्रबाहु तीक्ष्ण बुद्धिशाली था तो भी गुम्क. उपदेशम उमन मब शास्त्र पढ़े। यह बान टीक है कि मनुष्य चाहे कितना भी महमदर्शी नेत्रवाला क्यों न हो परन्तु प्रदीपक बिना वह वस्तु नहीं देख मकता । मो भद्रबाहु-गुरु रूप कृणधार के द्वारा चलाई हुई अपनी उत्तम बद्धिरूप नौकाम चढ़कर विनयरूप वायुवेगमे सुशास्त्रम्प ममुद्रक पार हो गया ॥ ६७-७९ ।। फिर कितने दिनांक प्रमन्न-मुम्बमरोज भद्रबाहुने करकमल विराजित गुरुवरम प्रार्थना की कि प्रभो ! म्यामीकी कृपामे मझे मब निर्मल विद्यामं मंप्राप्त हुयीं । आप जन्म इन- वाले माता-पिताक भी अत्यन्त उपकारक हैं। माना पिना नो जन्म-जन्ममें फिर भी प्राप्त हो सकते हैं किन्तु मनोभिलापिन फलकी देनेवालो और पूजनीय ये उनम विद्याएं बहुत ही दुर्लभ हैं ॥ ४०--८२ ॥ यदि आप आज्ञा दें तो मैं अपने गृहपर जाऊं ? इम प्रकार प्रार्थना कर और उनकी आज्ञा लेकर कृतज्ञ तथा मम्य- जोड़कर गुण
(५४)
क्व रूप मुन्दर भूषणमे विभूषित भद्रबाहु-गुरु महाराजके
चरणोंको वाग्बार नमस्कार कर "गुरु मातांक समान हितक
उपढश करनेवाले होते हैं" इत्यादि उनके गणांका चित्त में
मंचिन्नवन करता हुआ अपने मकान पर गया। यह बात ठीक
है कि जो मत्पुरुप होते है व गणानुरागी होते हैं ॥८३-८५॥
उम ममय माना--पिता भी अपने मुपुत्र भद्रबाहुको रूप
यौवनसे युक्त तथा मुन्दर विद्याआम विभूपिन देखकर बहुत
आनंदको प्राप्त हुये । ७६ ।।
यह बान ठीक है कि सुबर्णकी मद्रिका में जड़ा हुआ मणि
आनंद को देना ही है । बाद-आनन्दित भद्रबाहूंके माता-
पिनाने पुत्रका दोनों हाथोंमें आलिंगन कर परम्परमें कुशल
समाचार पृछ । भद्रबाह भी अपनी विद्याओं के द्वारा समस्त
कुटुम्बको आनन्दित करता हुआ वहीं पर अपने गृहमें रहने
लगा ।। ८७-८८ ॥
किमी समय भद्रबाह--समारभरमे जिनधम्के उद्योतकी
इच्छाम अत्यन्त गर्वरूप उन्नतपवतके शिखर ऊपर चढ़ हुये,
अभिमानी, अपनी कपोलरूप झालरीमे उत्पन्न हुये शब्दम
इच्छानुसार प्रचुर रसयुक्त महाविद्यारूप नृत्यकारिणीको नृत्य
करानेवाले तथा दूसरोंमे बाद करनेम प्रवीण एमे २ विद्वानोंमें
विभूषित महाराज पद्मधरकी मुन्दर मभामे गया ॥८९-९१॥
पद्मधर नृपति भी समस्त विद्याओंमें विचक्षण द्विजोत्तम
(५५) भद्रबाहुको आना हुआ धेखकर तथा उसे अपने पुरोहितका पुत्र ममझकर मनोहर आमनादिने उमका मत्कार किया। वह भी महाराजको आशीर्वाद देकर सभाके बीचमें बैठ गया ॥ ९२-९३ ॥ वहांपर उन मदोद्धत ब्रामणांक माथ विबाद करके उदयशाली तथा विशुद्ध आन्मांक धारक भद्र बाहुने-म्पाद्वाद रूप ग्यङ्गमे उन मबको जीत ॥ १४ ॥ और माथ ही उनके नेत्रको दबाकर अपने तंजको प्रकाशित किया जैमें चन्द्रादिक नजको मूर्य अपना तंज प्रकाशित करता है । ९ ।। बुद्धिमान भद्रबाहुने अपनी विद्या प्रभावसे मभामें बैठे हुये ममम्न राजादिको प्रतिबोधित करके जैन मागेकी अत्यन्त प्रभावना की ॥ ९६ ॥ भद्रबाहुके इस प्रकार प्रभावको देखकर राजाने जिनधर्मको ग्रहण किया और मन्तुष्टचित्त होकर उसके लिये-वस्त्राभूषण पूर्वक बहुत धन दिया ॥ ९७ ।। बाद-वहांम भद्रबाहु अपने गृहपर आया। न कोई ऐमा वाग्मो है, न कोई वादी है, न कोई शास्त्रका जाननेवाला है, कोइ ज्ञानवान है तथा न कोई एमा विनयशाली है, इसप्रकार बुद्धिमानों के द्वारा प्रमिद्धिको प्राप्त हुये बुद्धिशाली भद्रबाहुने एक दिन अपने माता-पिताम विनयपूर्वक कहा-॥ ९८-९९ ।। न । ? तात ! मैं मंमार भ्रमणमें बहुत डरता हूँ। उमलिये इस समय तप ग्रहण करनेकी इच्छा है। यदि प्रीतिपूर्वक आज्ञा दें तो सुम्ब प्राप्तिक अर्थ तप ग्रहण करूँ ॥ १८० ॥ इस प्रकार पुत्रके दुःवहारी वचनोंको सुनकर मानापिनाने कहा-पुत्र ! डम प्रकार निष्ठुर वचन तुम्हें कहना योग्य नहीं ॥ १.१॥ प्यारे ! अभी तुम ममझते नहीं । अरे ! कहाँ यह केलेक गर्भ समान अतिशय कोमल शरीर ? और कहाँ अच्छे सत्पुरुषों के लिये भी दुर्लभ अमह्य वनका ग्रहण ? ।। १०२ ।। अभी तो तुम्हारी बाल्यावस्था है इसमें तो पचन्द्रिय समुत्पन्न सुखोंका अनुभव करना चाहिये। उसके बाद पृद्धावस्था में तप ग्रहण करना ॥ १०३ ॥ मातापिताके वचनोंको मुनकर मरल-हृदय भद्रबाहु बोला–तात ! आपने कहा मो ठीक है परन्तु व्रत धारण किये विना यह मानव जीवन निष्फल है, जैसे सुगन्धक विना पुप्प निगल समझा जाता है ।। १०४ ॥ देखो ! मोही पुरुषोंक दहको ग्रहण करने के लिये एक ओर तो मृत्यु तैयार है. और एक ओर वृद्धावस्था तेकार है ना ऐसे शरीरमे मन्पुरुषोंको क्या आशा हो सकती है ? ।। १०५।। और फिर जब जरासं जजेरित तथा तृष्णांक म्यान इस शरीरमें वृद्धावस्था अपना अधिकार जमा लेगी तब, नए तथा ?
(५७) हैं। व्रत वहाँ ? दुसरे ये भोग पहले तो कुछ सुन्दरमे मालूम पड़ते हैं परन्तु वास्तवमें – मर्पक शरीर ममान दुःखक देनेवाले है, सन्तापके करनेवाले हैं और परिपाकमें अन्यन्त दुःखके देनेवाले ॥ १०६-१०७ ।। कुगनि रूप खारे जलम भरे हुये तथा पीडारूप मकगदि जन्तुआम कलंकप डम अमार संभार ममुद्रमें जीवोंको एक धर्म ही शरण है ॥ १०८॥ देखो ! मोही पुस्प इन भागामें व्यथ ही मोह करते हैं किन्तु जो बुद्धिमान हैं वे कभी माह नहीं करत इमलिये क्या मोक्षका साधक मंयम ग्रहण क. १ ॥ १०९ ।। इत्यादि नाना प्रकारके उत्तम २ बचनोंमें वैराग्य-हृदय भद्रबाहुने अत्यन्त मोहक कारण अपने माता पितादि ममस्त बन्धुओंको समझाया । और उसके बाद-मातापिनाकी आज्ञासे- संयमक ग्रहण करनेकी अभिलाषामे गोवर्द्धनाचार्यक पास गया ॥ ११०-११५ ॥ और उन्हें नमम्कार कर विनयपूर्वक हाथ जोड़कर बोला- स्वामी! कमाँ के नाश करनेवाली पवित्र दीक्षा मुझे देओ ॥ ११२ ॥ भद्रबाहुक वचनोंको मुनकर गोवर्द्धनाचार्य बोले-वन्म ! मंयमके द्वारा अपने मानव जीवनको सफल कगं ! गुरुकी आज्ञासे भद्रबाहु भी आन्माके दुःखका कारण बाह्याव्यन्तर परि- ( । (५८) ग्रहका न्यागकर हर्षक माथ दीक्षित हो गये ॥ ११३-११४ ।। निर्दोष तथा श्रेष्ठ व्रतामे मण्डित कांतिशाली, मंमारक बन्धु नया दिगंबर ( निग्रंथ माधुओंके मागमें स्थित भद्र- दाहु, मयंक समान शामने लगे। क्योंकि मूर्य भी तो गत्रिम रहिन तथा बनलाकार होता है, ने जम्बी होता है, मार मानका बन्धु ( प्रकाशक ) होता है तथा तथा गगन मार्गम गमन करता रहता है ॥ ११५ ॥ मनियांक मूलगुण रूप मनोहर मणिमय हारटनाम विभूषित नया दयाके धारक भद्र याह मुनि जीवोंके प्रिय तथा हिवरूप वचन बोलते थे ।। निजाओंक ग्रहणावक दुनिवार कामरूप हाथीको त्र-च- यरूप वृक्षम बांधनेवाले, पग्ग्रिहमे ममत्व परिणामका छैदन करनेवाले, गत्रि आहारक त्यागी. अपने आन्मम्बम्पको जाननेवाले. शास्त्रानुसार गमन आलाप भोजनादि करनेवाले, यथाविधि आदान निक्षपणादि ममितियों में अतिचार न लगाने- वाले, इन्द्रियरूप अश्वको आत्माधान करनेवाले, छह आवश्यक कमेके पालक, बम्ब-याग, लांच, पृथ्वोपर शयन, म्नान, बड़े होकर भोजन, दन्तका न धोना तथा एकमुक्त आदि परीपक जोतनेवाले, ममम्त मंयका आनंदित करनेवाले तथा अत्यन्त विनयी वाद्धमान नद्रबाहु मुनिने अपने गुरुके अनुग्रहमे द्वादशाङ्ग शाम पढ ।। १७-१२१ ॥
( ५९ फिर अपनेमें श्रुतज्ञानकी पूर्णता हुई ममझकर भद्रबाहु- जब श्रुतज्ञानकी भक्तिम कायोत्मर्ग धारणकर स्थित थे, उस ममय शतःकाल में समस्त देव तथा मनुष्योंने आकर भद्रबाहु महामुनिकी अत्यन्त भक्तिपूर्वक हपके माथ पूजन की ॥ १२२-१२३ ॥ अपने गाम्भीपमे समुद्रको जाननेवाला, कांतिम चन्द्रमाको लज्जित करनेवाला, नेत्रक द्वाग मूको जीतनेवाला तथा धैर्याम मुमेरु पानको नीचा करनेवाला इन्यादि गुणमणिमाला रूप भूपणमे विभूपिन तथा सम्पूर्ण जगतको आनन्दका देनेवाला भद्रबाहु अन्यन्त शोभन लगा ॥ १२४-१-२५ ।। फिर कुछ दिनों बाद-गोवर्द्धनाचार्गने भद्रबाहको गुणान्नका समुद्र ममझकर अपने आचार्यपद में नियोजित किया। भद्रबाहु भी अपनी कांतिममूहको प्रकाशित करता हुआ तथा महामोह रूप अन्धकारका नाश करना हुआ गोवर्द्धन गुरुक पदमें एमा शोभने लगा, जैमा उदयाचल पर्वत पर मूग शोभता है। क्योंकि-- मूग भी तो जब उदयपान पर आता है उस ममय अपने कांतिममूहको भामर करता है तथा अन्धकारका नाश करता है ।। १२६-१२७ ।। यह ठीक है कि-पुण्य कर्मक उदयम जीवांका अच्छे उत्तम वंशमे जन्म होता है, उन्कृष्ट शरीर संप्राप्त होता है, मनोहर तथा अनवद्य विद्यायें प्राप्त होती है, गुणांमे विशिष्ट गुरुत्राक. चरण- । - (६०) कमलमे अत्यन्त भक्ति होती है, गम्भीरता, उदारता तथा धैर्यादि गुणोंकी उपलब्धि होती है, उत्तम चारित्र होता है, प्रभुत्वता होती है, जैन धर्ममें श्रद्धा ( आस्था ) होती है तथा चन्द्रमाक ममान निमल अनन्तकीर्ति प्राप्त होती है ।। १२८ ॥ निर्मल ज्ञानम्प क्षीर समुद्रकी वृद्धि के लिये चन्द्रमा, श्री गोवर्द्धन गुरुक चरण रूप उदयाचल पर्वतक लिये सूर्य, मनोहर- कीतिक धारक, उत्तम २ गुणोंक आलय तथा मुनियांक म्वामी श्री भद्रबाहु मुनिराजका आप लोग मंवन करें ॥ १२९ ।। इन श्री नीति प्राचार्यके बनाये हुवे भद्रबाहु चरित्रके अभिनव हिन्दी भाषानुबादमं भद्रबाहुको दोक्षाका वर्णनबाला प्रथम परिच्छेद पराप्त हुधा ।। १ ।।
(६१ द्वितीय परिच्छेद पश्चान् श्री गोवर्द्धनाचार्या-नाना प्रकार तपश्चरण कर अन्नमें चार प्रकार आहारक परित्याग पूर्वाक चार प्रकारकी आगधनाओंके आगधनमें तत्पर हुये और ममाधिपूर्वक शरीरको छोड़कर देव तथा देवाङ्गनायासे युक्त और उत्कृष्ट सम्पतिशाली म्वर्गमे जाकर देव हुयं ॥ १-२ ।। उधर श्री भद्रबाद आचार्या--अपने ममम्न मंघका पालन करते हुये भव्य मनुष्योंको संतुष्ट करते हुये नया दूसरे मनोंको बाधित टगते दुयं शोभते थे ॥ ३ ॥ तथा पृथ्वी मण्डलम आनन्द बताते हुये और मामृत वपान हुये श्री भद्रबाहु मुगिज--नागओक समूहम युक्त जैमा चन्द्रमा गगन मण्डलमें विहरता रहता है उसी तरह पृथ्वीवलम विहार करने लगा ।। ४ ।। वित्रक विनय धनधान्यादि मंपढाओम समस्त देशको जीतनेवाले अवंती नामक दशमं प्राकारमें युक्त ( वेष्टित ) तथा श्री जिनमंदिर, गृहस्थ, मुनि, उत्तम धर्मम विभूपिन उज्जयिनी नाम पुरी है ।। ५-६ ॥ उममें-चंद्रमाक ममान निम्'ल कीतिका धारक, चंद्रमाके समान आनंदका देनेवाला, सुन्दर२ गुणोंसे बिराजमान, ज्ञान
(६२)
तथा कलाकौशलमें सुचतुर, जिन पूजन करनेमें इन्द्र समान,
चार प्रकार दान देनेमें ममर्थ, तथा अपने प्रतापमे मूर्यको
पराजित करनेवाला चंद्रगुप्ति नाम राजा था ।। ७-८ ।।
रमक-चंद्रमाकी ज्योत्स्नाक समान प्रशंसनीय तथा
रूप लावण्यादि गुणाम शोभायमान चंद्रश्री नाम रानी थी ।।९।।
किमी समय महाराज चंद्रगुप्ति--मुन्वनिद्रामें वात पित्त
कमादि रहित ( नीरोग अवस्थामें ) सोये हुये थे, उस समय
रात्रिक पिछले पहरमें आश्चर्याजनक नीचे लिखे सोलह खोटे
स्वप्न देखे । वे ये हैं-
(१) कल्पवृक्षकी शाम्बाका टूटना, (२) मूर्याका अस्त
होना, (३) चालनाके ममान छिद्र सहित चन्द्रमण्डलका उदय,
(४) बारह फणवाला मर्प, (५) पीछे लौटा हुआ देवताओंका
मनोहर विमान, (६) अपवित्र म्यान पर उत्पन्न हुआ विकमित
कमल, (७) नृत्य करता हुआ भृतोंका परिकर, (८) खद्योतका
प्रकाश, (९) अन्तमें थोड़ेग जलका भग हुआ तथा बीचमें
सुखा हुआ सरोवर, (१०) सुवर्णके भाजनमें श्वानका खीर
खाना, (११ . हाथी पर चढ़ा हुआ बन्दर, (१२) ममुद्रकी
मर्यादा छोड़ना, (१३) छोटे २ बच्चोंमें धारण किया हुआ और
बहुत भारसे युक्त रथ. (१४) ऊँट पर चढ़ा हआ तथा धृलिम
आच्छादित राजपुत्र, (१५) देदीप्यमान कान्तिमुक्त रत्नराशि,
(१६) तथा काले हाथियोंका युद्ध ।
.
( ६३ )
इन स्वप्नोंक देखनेमे चन्द्रगुप्तिको बहुत आश्चर्य हुआ ।
और किमी योगिराजसे उनके शुभ तथा अशुभ फल पूछनेकी
अभिलापा को ॥ १८-१७ ॥
उधर शुद्ध-हृदय भद्रबाहु आचाया---- अनेक दशामें
विहार करते हुये बारह हजार मनियाको साथ लेकर भव्य
पुरुषों के शुभोढ़यम उजयिनी में आये और पुर बाहिर उपवन में
जंतु रहिन स्थानमें ठहरे ॥ १.८..१९ ।।
माधुके महात्म्यमे वन-फल पुष्पादिमे बहुत ममृद्ध
गया । वनपाल मुनिराजका प्रभाव समझकर वनमेंमें नाना
प्रकार फल पुप्पादि लेकर मविनय मधुरनामे बोला--दव !
आपके पुण्यकम के उदयमे मुनिममूहमें विराजमान श्री भद्रबाहु
महर्षि उपवन में आये हुए हैं। वनपालके वचन मुनकर महाराज
चंद्रगुप्ति अन्यंन आनंदित हुये। जैसे मेघ गर्जनमे मयूर
आनंदिन होता है । उम ममय राजाने वनपालके लिये बहुन
धन दिया और मुनिराजके अभिवन्दनकी उत्कण्ठाम नगर
भरमें आनंद भरी दिलवाकर गीत नृत्य वादित्र तथा
मामन्तादि महिन महाविभूति पूर्वक नगरम बाहिर
निकले ।। २०-२५ ॥
और आचार्य महागजके पास जाकर विनयभावमे उनको
प्रदक्षिणा की । पश्चात् क्रममे और २ मुनियोंकी भी अभिवन्दना
(६४)
-
म्तुनि नथा पूजनादि करके उनके मुखारविंदमे मप्ततत्व गर्भित
धमा म्वरूप मुना। उसके बाद-मौलिविभूषित मम्नमे
भक्तिपूर्वक प्रणाम कर दोनों करकमलोंको जोड़कर भद्रबाहु
श्रुनचलिमे पृछा। नाथ ! मैंने गत्रिक पिछले प्रहरम
कल्पद्रमको शाग्याका भंग होना प्रभृति मोलह मनन देखे
हैं, उनका आप फल कहें। गजाके वचन सुनकर-दांतोंकी
किरणाम मा दिशामण्डलको प्रकाशित करनेवाले योगिराज
भद्रबाह बोले- राजन ! मैं म्बनोंका फन्न कहता हूँ उमं तुम
म्वाचन होकर मुन । क्योंकि इनका फल, पुरुषोंको वैराग्यका
उत्पन्न करनेवाल नथा आगामी वोट कालका सूचन करनेवाला
है । मयसे पहले जो रविका अम्न होना दया गया है--मा
उममे इस अाम पंनमकारम एकादशाङ्ग पूर्वादि श्रुतज्ञान
न्यून
हो जायगा।
। कल्पवृक्षको शान्याका भंग देखनम अब आगे कोई
राजा जिन भगवान के बहे हुये मंरमका ग्रहण नहीं करेंगे ।
१२) चंद्रमण्डलका त-रिदत्त. दग्गना-पंचम बलि-
कालम जिनमतकं अनेक मतोका प्रादुभान बहना है ।
(३) बारह फणयुक्त मगजके दसनेम बारह व पर्यन्त
अन्यंत भयंकर दुर्भिक्ष पड़ेगा।
(४) देवनाओं के विमानको उल्टा जाता हुआ देखनमें
पंचमकालमे देवता विद्याधर तथा चारणमुनि नहिं आवंगे।
-
(६५)
( ५ ) खोटे स्आनमें कमल उत्पन्न हुआ जो देखा है
उममे बहुधा हीन जातिके लोग जिनधर्म धारण करेंगे किन्तु
क्षत्रिय आदि उत्तम कुल--संभृत मनुष्य नही करेंगे।
( ६ ) आश्चर्यजनक जो भृतोंका नृत्य देखा है उममे
मालम होता है कि मनुष्य नीचे देवोंमें अधिक श्रद्धाके
धारक होंगे।
( ७ ) ग्वद्योतका उद्योत देखने-जिन सूत्रक उपदेश
करनेवाले भी
मनुष्य
मिथ्यात्व करक
युक्त
होंगे और जिनधर्म
भी कहीं२ रहेगा।
( ७ । जल रहित तया कहीं थोड़े जलमे भरे हुये
मावरक टम्बनम-जहां तीर्थकर भगवानके कल्याणादि हुये
एम तीथम्थानोम कामदेवके मढका छैटन करनेवाला उत्तम
जिनधर्म नाशको प्राप्त होगा। तथा कहीं दक्षिणादि देशमें
कुछ रहेगा भी।
.. मुवर्णक भोजनमें कुत्तेने जो खीर वार्ड है उसमे
मालूम होता है कि लक्ष्मीका प्रायः नीच पुरुप उपभोग
करेंगे और कुन्नीन पुरुषोंको दुष्प्राप्य होगी।
(१०) ऊंचे हाथीपर बंदर बैठा हुआ देखनेमे नीच
कुल में पैदा होनेवाले लोग राज्य करेंगे, बत्रिय लोग राज्य
रहित होंगे।
.
।
(६६)
(११ मर्यादाका रलंघन किये हुये ममुद्रके दबनेसे
प्रजाकी ममम्न लक्ष्मी गजा लोग ग्रहण करेंगे तथा न्यायमार्गक
उल्लंघन करने वाले होंगे।
(१२ । बछवाम वहन किये हुये ग्यक दग्बनम बहुधा
करके लोग तारण्य अवम्याम मंयम ग्रहण करेंगे किन्तु शक्तिके
घट जानम वृद्धा अवस्थामें धारण नही कर सकेंगे ।
(१३) ऊंट पर चंटे हुये गजपत्रके देखने ज्ञान होता है
कि-राजा लोग निम्ल धर्मको छोड़कर गिमार्ग स्वीकार करेंगे
(१४) धृलिम आच्छादित रत्नगशिक देखनेम-निग्रंन्य
मुनि भी परम्पर में निन्दा करने लगेंगे।
(५) तथा काले हाथियोंका युद्ध देखनमें मेघ
मनोभिलपित नहीं वगे।
(१६) राजन ! हम प्रकार स्वप्नांका जैसा फल है वैमा
मैंने तुमसे कहा। राजा भी बोका फल सुनकर मंमारम
भयभीत हुआ और मनमें बिचाग्ने लगा ।। १६-०९ ।।
अहो ! विपत्ति रूप घातक दुष्ट जीवोंम ओतप्रोत भरे
हुये तथा कालरूपी अनिमें महा भयंकर इम असार मंमार वनमें
केवल भ्रममे यह जीव भ्रमण करता रहता है । ५० ।
अहो ! रोगके स्थान, नाना प्रकारकी मधुर २ वस्तुओमे
परिवद्धित किये हुये, गुणरहित, तथा दुष्टोंके ममान दुःख
(६७) देनेवाले इम शरीरमें यह आत्मा कैमे मोह करता होगा? ॥५१॥ ये भोग सपके समान भयंकर हैं, अमन्नापक कारण हैं, मेवनके ममय कुछ अच्छेमे मालूम देते हैं परन्तु परिपाक । आगामी ) ममयम किम्पाक फलक ममान प्राणांक नाशक हैं भावार्थ-किम्पाक फल ऊपर तो बहुत अच्छा मालूम देता है । परन्तु खानेपर बिना प्राण लिये नहीं छोड़ना । मे ही ये भोग हैं जो मंबन ममय तो जग मनोहम्मं मालूम देन हैं परन्तु बाम्तवमै दुःम्ब ही के कारण हैं ॥ ५२ ।। अहो ! कितनं बंदकी बात है कि -यह जीव भागांको भोगता तो है । परन्तु उत्तरबालमें होनेवाले दुःयोंको नहीं दखता । जिस प्रकार विलाव, श्रीनिपूर्वक दृध पीता आ भी ऊपरमं पड़नेवाली लकड़ीकी मार महन किये जाना है। इस प्रकार भव भ्रमण भयभीत महागज चन्द्रगुप्पिने शरीर गृहादि मब वस्तुआम विरक्त होकर - अपने पुत्र के लिये राज्य दे दिया । नथा ममम्त बन्धु-ममूहमे क्षमा कराकर भद्रबाहु गुरुके ममीप गया और विनय पृषक जिनदीक्षांके लिये प्रायना की । फिर म्यामीकी आजाम व द्याभ्यन्तर परिग्रहका परित्याग कर शिव-मुखका माधन शुद्ध मंयम म्याकार किया ॥५३-५५।। एक दिन श्री भद्रबाहु आचागं जिनदाम शेटके घर पर आहारक लिये आये। जिनदामने भी स्वामीका अन्यन्त आनन्द- ।
(६८)
पूर्वक आह्वानन किया । परन्तु उम निर्जन गृहमें केवल साठ
दिनकी आयुका एक बालक पालनेमें झुलता था। जब मुनिराज
गृहमें गये उम समय बालकने-जाओ !! जाओ !! ऐसा
मुनिराजमे कहा। बालकके अद्भुत वचन सुनकर मुनिराजने
पूछा-वत्म ! कहो नो कितने वर्पतक ? फिर बालकने
कहा-बारह वप पर्यत । बालकके वचनमें मुनिराजने निमित्त
झानमें जाना कि-मालव देशमें बारह बपे पर्यंत भीषण दुर्भिक्ष
पड़ेगा । दयालु मुनिराज अन्तगय समझ कर उसी समय घग्मे
वापिस वनमें चले गये ॥ ५६-६१ ।।
पश्चात श्री भद्रबाहु आचार्यने-अपने स्थान पर आकर
समम्त मुनि संघको बुलाया और तप तथा संयमकी वृद्धिक
कारण ये वचन कहने लगे-माधुओ ! इस देशमें बारह वपका
भीपण दुर्भिक्ष पड़ेगा। धन धान्य तथा मनुपादिमे परिपूर्ण
और सुखका स्थान यह देश चोर राजादिक द्वारा लुटाकर
शीघ्र ही शून्य हो जायगा। इमलिये मंयमी पुरुषांको एम
दारुण देशमें रहना उचित नहीं है। इस प्रकार स्वामीक
वचन सम्पूर्ण संघने म्बीकार किये और भद्रबाहु मुनिराजने
भी उसी समय ममस्त संघ महित उम देशके छोड़नेकी
अभिलाषा की ॥ ६२-६५ ॥
जब श्रावकोंने मुनिराजके संघ सहित जानेके समाचार
सुने तो उसी समय स्वामीके पास आये और विनयसे मस्तक
(६९) नवाकर बोले-भगवान् ! आपके गमन सम्बन्धित समाचारोंके सुननेमे भक्तिके भारमे वश हुआ हम लोगोंका मन क्षोभको प्राप्त होता है ॥ ६६-६७ ॥ नाथ ! हम लोगों पर अनुग्रह कर निश्चलनामे यहीं पर हैं। क्योंकि- गुरुङ विना मब पशुओंके ममान समझा जाता हे ॥ ६८ ॥ जिम प्रकार मरोवर कमलके बिना, गन्ध रहित पुष्प सुगन्ध विना, हायी दानके विना शोभाको प्राप्त नहीं होना उमी तरह भव्य पुरुप गुरुके बिना नहीं शोभते ।। ६० ।। इस प्रकार श्रावकाक वचनोंको मुनकर भद्रबाहु मुनिराज बोले-उपासकगण ! तुम्हें मेरे वचनोपर भी ध्यान देना चाहिये । देखा, उस मालवदशमें बारह वर्ण पर्यंत अनावृष्टि होगी तथा अन्यन्त भयंकर दुर्मिक्ष पड़ेगा। इमलिग वन मङ्ग होनेक भयमे माधुओंको इधर नहीं रहना चाहिये ।।७०-७१।। ममम्त श्रावक मङ्घने म्यामीक वचन मुने, परन्तु हाथ जोड़कर फिर म्वामीमें प्रार्थना की ।। ७२ ।। नाथ ! यह मङ्घ धनधान्यादि विभूतिम परिपूर्ण तथा समम्न कार्य करनेमें ममर्थ है और धर्मका भार धारण करने के लिये धुरन्धर है ॥ ७३ ॥ मो हम उसी तरह कार्य करेंगे जिस प्रकार धर्मकी बहुत
(७०
प्रवृत्ति होगी। आपको अनावृष्टिका बिलकुल भय नहीं करना
चाहिये । किंतु यही अच्छा है कि आप निश्चल चितमे यहीं
निवास करें ।। ७४ ॥
उम ममय कुवमित्र मंट बोला-ाव ! आपके प्रमादमे
मेरे पाम बहुत धन है, जो धन दान दिया हआ भी कुवेरके
समान नाशको प्राप्त नहीं होगा। मैं धमक लियं मनोभिलपिन
दान करूंगा ।। ७५-७६ ॥
हुनने जिनदाम मंट भी मधुर वाणीम बोले-विभो !
मग यहां भी नाना प्रकार मान्यक. बहुतने कोठे भरे हये
है । जो मौ वर्ष पन्ति दान दन भी कम नहीं हो सकते,
तो सारह वर्णकी कथा हा क्या है ? दोन हीन रङ्कादि
दुःखी पुरुषांके लिये यथेष्ट दान देऊँगा फिर यह दुर्भिक्ष
क्या कर सकेगा? ॥ ७७-७० ।
-
इसके बाद--माधवटन प्रार्थना करने लगा-दयानीधि!
पुण्यक उदय वृद्धिको प्राप्त हुई सब सम्पत्ति मेरे पाम है मो
उमे पात्रदानादिम तथा म्मीचीन जिन धमक बढ़ानेमे महल
करूंगा। उननमें बन्ददत्त बोला-दव ! आपके प्रमादमे मेरे
पाम बहुत धन है मो उसके द्वारा दान मानादिमे जिनशासनका
उद्यान करूंगा । इत्यादि मर्व सङ्घने भद्र बाहु आचार्याम प्रार्थना
की। तब मुनिराज बोले-आप लोग जग अपने मनको
सावधान करके कुछ मेरा भी सुनें-यद्यपि कल्पवृक्षक समान
।
उस मय
मब
यह आप लोगोंका सङ्घ सम्पूर्ण काम करनेमे ममर्थ है । परंतु
तो भी मुन्दर चारित्रके धारण करनेवाले माधुओंको यहां
ठहरना योग्य नहीं है। क्योंकि-यहां अत्यन्त भयानक तथा
दुःग्य देनेवाला दुर्मिळ पड़ेगा। धमकी इच्छा करनेवाले
पुरुपोका यह प्रय भार म्मान अन्यन्न दुर्लभ होनेवाला
है । यहां पर जिनने मात्रु रहेंगे व संयमका परिपालन कभी नहीं
कर सकेंगे इसलिये हम तो महाग अवम कणाटक देशकी
ओर जाग ।। ७०-८६ ।।
आक लोग श्री भद्रबाहम्बामीके
अभियाको नमझकर गमय, मुलानामा तया स्थूलभद्रादि
माधुआको प्रणाम कर भक्तिपूर्वक उनमें वहीं रहने के लिये
प्रार्थना की । माधुआन भी जब श्रावकोका अधिक आग्रह देखा
तो उनकी प्राथना म्वीकार कर ली। और फिर बारह वर्ष
पयन्त यही रहनेका निश्चय शिगा।
गंप बारह हजार माधुओको अपने माय लेकर श्री मद्र बाहु
आचाय दक्षिणकी ओर रवाना -ये। ग्रन्थकार कहते है कि
उस समय श्री भद्र बाहुम्वामी टीक नाग मण्डलमे विगजित
सुधांशुका अनुकरण करते थे।
उग श्रीभद्रबाहु माधुगज चले गये तब अन्ती
( उज्जयिनी , निवामी लोग म्वामीक चले जानेके शोकसे
परम्पग्मे कहने लगे कि- अहो ! वही तो देश भाग्यशाली है
।
(७२)
जिसमें
सुन्दर
चारित्रक धारक निग्रन्थ
माधु विहार करते रहते
हैं, जो कमलिनियोंम शोभित होता है तथा जहां राजहंम शकुन्त
रहते हैं, एमा जो पुराने काान्तिक ( ज्योतिषी ) लोगोंने कहा
है वह वास्तवमे
बहुत
ठीक है ।। ९२॥
अहो ! धर्म ही एक एमी उत्तम वस्तु है जिसमे जिन
भगवानकी परिचर्याका मौभाग्य मिलता है, निर्दोष गुरुओंकी
सेवा करनेका मुअवसर मिलता है, विशुद्ध वंशमें जन्म तथा
ऐश्वर्य समुपलब्ध होता है। इसलिये धर्मका मंचय करना
समुचित है।
इति श्री रत्नन आचार्य विनिर्मित श्री भद्रबाहु चरित्रके
बभिनव हिन्दी भाषानुवादमें सोलह स्वप्नों का फल
तथा स्वामी के विहार वर्णन नाम द्वित य
अधिकार प्राप्त हुमा । २॥
(७३)
तृतीय परिच्छेद
श्री भद्रबाहुस्वामी विहार करते हुये धीरे धीरे किमी
गहन अटवीमें पहुंचे । और वहां बडे भारी आश्चर्यमें डालनेवाली
आकस्मिक आकाशवाणी सुनी। जब निमित्तानमें उमका फल
विचाग तो उन्हें यह मालूम हो गया कि अब हमारे जीवनका
भाग बहुत ही थोड़ा है। उसी समय उन्होंने सब माधुममूहको
बुलाया और उनमें श्री विशाग्याचार्यको गुणरूप विभवमे
विगजित, दशपूर्वक जाननेवाले तथा गम्भीरता धैर्यादि उत्तमर
गुणों के आधार समझ कर उन्हें समस्त माधु संघकी परिपालनाके
लिये अपने पट्टपर नियोजित किये । और मब माधुओंसे
सम्बोधन करके कहा-माधुओ ! अब मेरे जीवनकी मात्रा बहुत
थोडी बची है इसलिये मैं तो यहीं पर इमी शैलकन्दरामें
रहूंगा। आप लोग दक्षिणकी ओर जावे और वहीं अपने
मंघक माथमें हैं। स्वामीक उदामीन वचनोंको सुनकर श्री
विशाखाचा बोले-विभो ! आपको अकेले छोड़कर हम
लोगोंकी हिम्मत जानेमें कैमी होगी ? इतनमें नवदीक्षित श्री
चन्द्रगुप्त मुनि विनयपूर्वक बोले-आप इस विषय की चिंता न
करें, मैं बारहवर्ष पर्यन्न म्यामीक चरणोंकी मभनि परिचयां
करता रहूंगा । उम ममय भद्रबाहुम्बाम ने चन्गुनिमें जाने के
लिये बहुत आग्रह किया परन्तु उनकी अविचल भक्ति उन्हें
कैसे दूर कर सकती थी ? माधु लोग भी गुरु-वियोगजनित
(७४)
उदगम् उद्वजिन नो बहु हुये, परन्तु जब स्वामीका अनुमामन
ही मा था तो कर दी क्या मते थे? मोकिमी तरह
यहां चले ही।
ग्रन्थकारकी गह नीति बहन हा ठीक है कि वे ही तो
उत्तम मिष्य कहे जाते है जो गुरुकी आनाक पालन अग्ननारे,
हात है।
पश्चन या निगावाचा-ममम्न माधुर्मक मा
याममिनिका शुदिया. इक्षिा देशम विहार करते हुये
मागर्म भन्; पुया. मुभानर उभिमुग्ध करते हुये और
माई लिन माओको पनाते हुये चौलागम आये । और फिर
व रहकर मापन करने से
।
उया न जाननेवाले विशुद्धा-मा नया योग मायनम
पुरुषायंगाल श्री भ, बाद योगीराजन अपने मन बचन कार्यक
योगाको प्रनको रोककर बना विधि स्वीकार की। और
फिर वहीपा गिरिगुहाम रहने लगे। उनकी परिचा के लिये
जो चन्द्रगुमि मुनि रहे थे, परन्त वनमं धारकांना अभा। होनम
उन्हें मगध करना पटग था। मा एक दिन म्बामीने उनमें
कहा - वय ! निगहार तो रहना किसी तरह उचित नहीं है।
उमालय तुम बनम मी आहार लिये जाओ । क्योकि यह जैन
शाखाकी आज्ञा है।
चन्द्र गुम मु न गमके कहे हुये वचनोको स्वीकार कर
।
। ७५
और उनके पादारविन्दोंको नमस्कार कर आहारके लिय वनमें
भ्रमण करने लगे । उम अटवीम पांच वृक्षों के नीचे घुमने हुये
चन्द्रगुप्ति मुनिको गुरुभन तथा मुदृढ़-चारित्रके धारण
करनेवाले ममझ कर कोई जिनधर्मकी अनुरागिणी तथा शुद्ध
हृदयकी धारक बनदेवीन--वहां आया और उसी समय
अपना रूप बदल कर एक ही हाथम- वृक्षके नीचे से हुई,
उत्तम अन्नम भगे ह.' तथा घी शकगटिम मुशोभित शाली
मनिक लिय दिग्बलाई ।
चन्द्रगुमि पुनि उप आश्चर्यको अटया में देखकर मनमें
विचारने लगे कि-जन गले ही नयार क्यों न हो ? परन्तु
दानाके बिना को लेना योग्य नहीं है । एमा कह कर बम
चल दिये और जुरुक पास जाकर उन्हें नमस्कार किया नशा
चनम जो कुछ दया था र यसका को गुम्म ; दिया।
उम ममय भद्रबाहम्घामाने अपने शिष्यकी प्रगंशा की नथा
बोले- बत्ल ! तुमने यह बहुत ही अच्छा किया। क्योंकि-जब
दाता निग्रहादि निधिगे आहार दे नभी हम लोगों को
लेना चाहिये ।
दुसरे दिन सिर चंद्रगुनि मुनि म्वामीको ननम् मार कर
आहारक लिय दम वृक्षामं गये। परंतु यहां उन्होंने केवल
भोजन पात्र देवा। उसी वक्त वहांमे लौटकर गुम्के पाम गये
और प्रणाम कर बीत हुयं वृत्नांनको कह सुनाया। गुरुर भी
(७६) प्रशंमा कर कहा-भव ! तुमने यह बहुत ही अच्छा किया क्योंकि माधुओंको अपने आप दूसरोंका अन्न ग्रहण करना योग्य नहीं है। इमी तरह तीसरे दिन भी गुम्के चरणपङ्कजोंको नमस्कार कर चंद्रगुप्त मुनि आहार के लिये गये। परंतु उस दिन भी केवल एक स्त्रीको देखकर अपने आहारकी योग्यता न भमझकर शीघ्र ही लौट आये । गुरुके पास आकर और उन्हें नमस्कार कर देखे हुये वृत्तांतको कह सुनाया। चंद्रगुप्तिके वचन सुनकर भद्रबाहुने उनकी प्रशंसा कर कहा- वत्म ! जैमा शात्रोंमें कहा वैमा ही तुमने आचरण किया क्योंकि---जहां केवल एक ही स्त्री हो वहां माधुओंको जीमना योग्य नहीं है । फिर चौथे दिन गुरुको प्रणाम कर आहारके लिये जब चन्द्रगुप्तिमुनि घृमने लगे तब वनदेवीने उन्हें निचलवतके धारण करनेवाले तथा पवित्र-हृदय समझकर उसी समय वनमें गृहस्थ- जनामे पूर्ण नगर रचा। मुनिराजने भी-मनुष्योंसे पूर्ण नगर देखकर उसमें प्रवेश किया और वहाँ गृहस्थोंसे पद पदमे नम- स्कार लिये हुये होकर श्रावकों के द्वारा यथाविधि दिरा हुआ मनोहा आहार ग्रहण किया। चन्द्रगप्ति मुनिराज पारणा करके अपने स्थानपर गये और गुरु हो भक्ति पूर्वक नमस्कार किया। उस समय स्वामीने पूछा- वत्म ! अन्तराय रहित पारणा तो हुआ ? चन्द्रगुप्ति मुनि
।
(७७)
बोले-मैंने जाते समय पाममें एक नगर देखा था । नाथ !
वहीं अन्तराय रहित आहार किया है । गुरुने उनकी प्रशंसा कर
कहा-तुमने ठीक शास्त्रानुसार किया ।
विचारशील तथा विनय गुणक धारक चंद्रगुप्ति मुनि
निरंतर उमी नगरमें आहार करते हुये गुरुके चरण कमलोंकी
मेवा करने लगे।
भद्रबाहु मुनिराजने मप्नभय रहित होकर क्षुधा पिपामा
संबंधी उत्कट उपद्रवको जीता। और चार प्रकार क्षाराधना-
आंका शास्त्रानुसार आगधन तथा शुद्धोपयोग स्वीकार कर
निरभिलापी ही ममाधिपूर्वक, गेगक आलयभृत शरारका परि-
न्याग किया। और देव देवाङ्गनाक द्वारा नमस्कार करने के
योग्य म्वगमें आकर देव हुये ।
मुन्दर चारित्र रूप भूपणमे शोभिन चंद्रगुप्ति मुनिगज नो
वहीं पर श्रीगुरुक चरणकमलोंको लिखकर निरंतर उनकी
मेवा करने लगे । ग्रंथकार कहते हैं कि-गुरुभक्तिके प्रामादमे
वैभव, विनय, विद्या, विवेक, यश तथा बुद्धि प्रभृति सभी
उत्तम२ गुण प्राप्त होते हैं तथा इमा गुरु भक्तिक प्रामादमे
बड़े भारी अरण्यमें नगर बम मकता है और अपने मनोभिला-
पित वस्तुकी कल्पवृक्षक ममान उपलब्धि होती है। दान, तप,
ध्यान, क्षमा, इन्द्रिय-जय आदि मब उत्तम क्रियायें गुरु मेवाके
विना निष्फल समझी जाती हैं। ऐसा समझकर इसलोक तथा
( ७८ ) परलोकम जो मुम्बकी इच्छा करनेवाले भव्य पुरुप हैं उन्हें अभीष्ट फलकी देनेवाली गुरुओंकी मेवा निरंतर करते रहना चाहिये। उधर अरन्तीम रामल्प नथा म्यूलभद्रादि मुनि जो भद्रबा. आचार्यकी आनाका रल्लंघन कर टहरे हुये थे उनका जो जो वृत्तांत हुआ है उम कहते है। भद्रबाहु मुनिगजर दक्षिणी आर चले जाने पर मारे अवनी दशम-अत्यंत दुःखका दनेवाला नथा छटे कालके ममान दारण दुर्भिक्ष पड़ा। उम समय कुवर्गमत्रादि दयालु लोगाने दीन हीन दरिद्री तथा दुःग्वी पुरुषों के लिये कुवरके समान अनिवार्य दान देना आरम्भ किया। परंतु दुसरे देशोमे दुर्भिक्षक पडनेसे लोग अत्यन्त दुःखी हुये और सुभिक्ष समझ कर उज्जयिनीम आये । और क्षुधादिकी पीड़ामे क्षीण शरीर तथा दीन दुःखी निलज्ज होकर धूमने लगे। किनने अस्थिमात्र अवशिष्ट शरीरक हो जाने क्षुत्पिपामादिम पीडित होकर मग्ने लगे, कितने रोगमे मरने लगे, कितने शरीर पर मूजन चढ़ आनेमे मरने लगे, कितने अपने बालबच्चोंको इधर उधर फेंकने लगे, कितने मुदोका मांस खाने लगे। हाय ! एक२ ग्रामके लिये माता पुत्रको मारने लगी. पुत्र माताको मारने लगा। जब सुना कि कहीं दान दिया जा रहा है तो उस समय दौड़ते हुये फितने विचारे तो आगे गिर पडते थे, किनने पृथ्वी पर पड़े हुये दूसरोके द्वारा पीडा दिये जाते थे, कितने रोते थे । हा ! जिधर देखो उधर
( ७९ )
.
ही मारे नगरमें, मागम, गलियोंमें अधिक क्या पढ२ मे रङ्क
लोग व्याप्त हो रहे थे । किनने विचार धाम ले रह थे. कितने
अंतिम दशाको पहुंच चुके थे। उस समय यह मालूम होता था
कि उज्जयिनी ही रंकमयी हो रही है।
एक ममय जब रामल्यादि मुनि आहार लेमा वनम
गये उस समय एक मुनि पीछे रह गये थे। उन्हें उदर भरे
हुये देख कर बहुत लोग इट्ट हो गये । और निदय नया
क्रूरचित्त होकर उनके उदरको चोर डाला और उनमम अन्न
निकाल कर उसी ममय खा गये । जब नगर के लोगाने दम घोर
तथा अन्यन्त भापण उपद्रवक समाचार मुने नो माग नगर
उमी ममय हाहाकारमे पूर्ण हो गया। दुग्ध रूप दावानलग
मलीन हुये मत्र श्रावक लोग मिले और दयाकुल मन होकर
मुनि मङ्घक पाम आये । यति लोगामें विराजमान गुरुको
नमस्कार कर प्रार्थना करने लंग-म्वामी ! यह काल अन्यन्त
भीषण है अथवा या कहिये कि यह दृमग यम आया है ।
इमीलिय अनुग्रह कर हम लोगों के वचनों को बीकार करें और
वनको छोड़कर समस्त मुनि लोग पुरक बीचमे हैं तो अच्छा
हो, जिसमें हम लोगोंक चित्तमें मन्तोष हो और माधुओंकी भी
रक्षा होगी। क्योंकि शुद्ध ज्ञानके धारक. आप लोगों के लिये
तो जैमा वन है वैसा ही नगर है। आवक लोगोंकी प्रार्थनाम
साधुआन भी उनके बचनोंको म्वीकार किया। श्रावक लोग भी
(८०)
उमी समय ममम्द मंघको उन्मवपूर्वक नगरमें लिवा लाये ।
जातिके अनुसार वे सब माधू पृथक२ स्थानमें ठहराये
गये । व माध भी मंयमपूर्वक वहीं पर ठहरे। इसी तरह प्रति
वर्ष मालव देशमें दुःग्य देनेवाला दुर्भिक्ष पड़ने लगा और जब
मुनि लोग आहारके लिये जाने तो उमी ममय उनके पीछे२
रक
लोग हो जाते थे । और देओ ! देओ !! एमा करुणामय
बचन बोलने लगनं थे। उन लोगोंकी रुकावटमे माधु आहार
लेने तक नहीं जान पाते थे। जब कितने लोग क्रोधित होकर
लकड़ी आदिम उन क्षीण शरीरक धारक रङ्क लोगोंको मारते
थे उस समय दोन लोग दुःखित मन होकर विलाप करने लगत
थे. गेने लगते थे । दयालु मुनिराज ऐसे लोगों को तथा गृहके
द्वारको बंद देखकर अपने लिये अंतराय ममझ स्थानपर लौट
आते थे। उस समय श्रावक लोग भक्ति भाग्म अत्यंत व्याकुल
होकर गुरुक पास गये और नमम्कार कर विनयपूर्वक प्रार्थना
करने लगे-
नाथ ! क्या किया जाय ? मारी पृथ्वी दीन लोगाम पूर्ण
हो रही है और उन्हीं के भय में कोई क्षण मात्र घरके किवाड़
नहीं खोलते हैं। इसी कारण हम लोग दिनमें भोजन नहीं
बना मकते. रात्रिमें भोजन बनता है । यह काल महा भयंकर
है धर्मका नाश करनेवाला है तथा असह्य है । इसलिये आप
m गामिले समय हमारे गृहोंसे पात्रों में अपने स्थान पर
(८१.
आहार ले जायें और रङ्क लोगांस भय रहित होकर दिन
निहारने बाद वहींपर आहार करें । सुखकी कारण हम लोगों की
विननि आर म्वीकार करें।
श्रावक लोगोंके वचन सुनकर साधु लोग भी उन्हें कहने
ग जब तक अच्छा काल आवंगा तब तक यही किया
मा एमा कहकर मागम परिभ्रष्ट हुये उन कुमार्गगामी
मध लोगगन तम्बीके पात्र म्बीकार किये । और भिक्षुक तथा
उन आदिक भ प से हायमे लाड़ी लेकर गृहम्याक घाम अपने
र आहार लाने लगे नया गृहक द्वागको बन्दकर गायके
य परम्परम आहार देने लगे वे कुपथगामी माधु इमो
ई. 'नरन्तर आटा लाकर आना उदर ण करने लगे।
-
क. समय कोइ क्षीण अर्गरका धारक एक माधु
आपके लिये पा को हाथमे लेकर गत्रिक ममय गृहम निकला
औः सोमद गेटक मुन्दर मकानमं घमा । उम ममय मंठकी
धन्य नामकी माया गर्भवती थी। गा के समय लकड़ी और
पारिसे युक्त माधुके भयंकर रूपको देखकर वह ममझा कि यह
व रक्षम है उनी भ्रमम उनक हृदयम बहुत भय हुआ और उसी
पर उनका गर्भपात हो गया । मुनि भी उमी ममय घरसे
लौट गये और वहां हाहाकार मच गया। फिर गृहस्थलोग
मुनियों के पास जाकर कहने लगे-विभो ! यह काल तो बब
व्यतीत हुआ, कृपया हमारे वचनों पर ध्यान दें।
( ८०)
उमी ममय ममस्त संघको उत्मवपूर्वक नगरमें लिवा लाये ।
जातिके अनुसार वे सब माधू पृथक २ स्थानमें ठहराये
गये । वे माध भी मंयमपूर्वक वहीं पर ठहरे। इसी तरह प्रति
वप माल व देशमें दुःग्य देनेवाला दुर्भिक्ष पड़ने लगा और जब
मुनि लांग आहारके लिये जाने तो उमी ममय उनके पीछे२
रङ्क
लोग हो जाते थे । और देओ ! देओ !! एमा करुणामय
बचन बोलने लगते थे। उन लोगोंकी रुकावटमें माधु आहार
लेने तक नहीं जाने पाते थे। जब कितने लोग क्रोधित होकर
लकड़ी आदि में उन क्षीण शरीरक धारक रङ्क लोगोंको मारते
थे उस समय दीन लोग दुःखित मन होकर विलाप करने लगत
थे, गेने लगते थे । दयालु मुनिराज ऐसे लोगोंको तथा गृहके
द्वारको बंद देवकर अपने लिये अंतराय ममझ स्थानपर लोट
आने थे। उस समय श्रावक लोग भक्ति भारम अत्यंत व्याकुल
होकर गुरुके पास गये और नमस्कार कर विनयपूर्वक प्रार्थना
करने लगे-
नाथ ! क्या किया जाय ? मारी पृथ्वी दीन लोगोंम पूर्ण
हो रही है और उन्हीं के भयमे कोई क्षण मात्र घरके किवाड़
नहीं खोलते हैं। इसी कारण हम लोग दिनमें भोजन नहीं
बना सकते, रात्रिमें भोजन बनता है। यह काल महा भयंकर
है धर्मका नाश करनेवाला है तथा असह्य है । इसलिये आप
लोग रात्रिके समय हमारे गृहोंसे पात्रोंमें अपने स्थान पर
(८१
आहार ले जायें और रङ्क लोगासे भय रहित होकर दिन
निहलने बाद वहींपर आहार करें । मुखको कारण हम लोगों की
विज्ञप्नि आप नीकार करें।
श्रावक लोगोंके वचन सुनकर माधु लोग भी उन्हें कहने
7.1 |-जब तक अच्छा काल आवेगा तब तक यही किया
जामा एमा कहकर मागम पग्भ्रिए हुये उन कुमार्गगामी
साथ लोगान तम्बीक पात्र म्बीकार किये । और भिक्षुक तथा
कुन आदिक भरम हायमें लकड़ी लेकर गृहम्याक घग्मे अपने
या आहार लाने लगे तया गृहक द्वागंको बन्दकर गायके
में परम्परमें आहार देने लगे। वे कुपथगामी माधु इमी
नग्न्नर आरा लाकर पाना उदर तृण करने लगे।
क नमय कोइ क्षीण शरीरका धारक एक माधु
आपकालय पात्रों को हाथमे लेकर गत्रिक ममय गृहमं निकला
और दमो भद्र गुटके मुन्दर मकान में घुमा । उस समय सेठकी
बन्धी नामकी भाया गर्भवती थी। गा के समय लकड़ी और
पाः रिसे युक्त माथुक भयंकर रूपको देखकर वह समझी कि यह
को सक्षम है डग्मी भ्रममे उनके हृदय में बहुत भय हुआ और उसी
गरम उनका गर्भपात हो गया । मुनि भी उसी समय घरसे
लौट गये और वहां हाहाकार मच गया। फिर गृहस्थलोग
मुनियों के पास जाकर कहने लगे-विभो ! यह काल तो अब
व्यतीत हुआ, कृपया हमारे वचनों पर ध्यान दें।
(८२)
H
यह विपम कर गांक भयका कारण है । इमलिय का
पर कम्बल धारण करें और गत्रि में माइन लाकर दिन में किया
करें तो माहो। जयनक, पाल अन्छा न आवे तबतक उमी
तरह का अंग्रे । और न्ययाल अच्छा आ जाय, देशम मुभिक्ष
होने लगे नबरण काश्रिय । उग्म समर समान सोने
श्रावका वचनांनी कार किय , मी तरह से मा
धीर शिपिल होकर प्राहिम दोप माने लगे । प्रत्यार
- बान टीक है कि-मानगामी लोग : I.
अकार्य नही करते है ?
।
कहते है
.
हम प्रकार अन्यन्त दुःवपूलक जब बारह वप बन चुके.
अच्छी वपा होने लगी, लोग गम्बी होने लग. नया दशमं गमिक्ष
होने लगा तो विकावाचाय मब मुनियों को साथ लेकर दक्षिण
देशम उत्तर दशकी ओर आये । और जहां श्री भद्र बाह, आचार्य ने
ममाधि ली थी वहां आकर टहरे नया विनय पृषक श्री भद्र बाह,
गुरुके पद पङ्कनको प्रणाम फिका । पश्वान श्री चन्द्रगुप्त मुनिगनने
विशाखाचार्यको प्रणाम किया। उस समय विशाग्वाचायन मनम
विचारा कि श्रावके बिना ये यहां में रहे होंगे? इसी
बिचारसं प्रति वन्दना भी न को । उस जगह श्रावकों का अभाव
समझ कर उस दिन मब मुनियाने उपवाम किया। नत्र
चन्द्रगुप्ति मुनिराज बोले-भगवन ! उत्तम २ लोगाम परिपूर्ण
बड़ा भारी यहां एक नगर है। उसमें श्रावक लोग भी
। ८३ ) मुनिक निवास करते हैं। वहां आप जाकर आहार करिये । चन्द्रगुप्नि वचनोंमें मत्र माघको आश्चर्य हुआ और फिर वे भी वहीं पारणाक लियं गये। नगरमं पद में श्रावक लोगांक द्वाग नमम्कार किये जाकर वे मुनि विधिपूर्वक आहार कर जब अपने म्यानपर आये उम समय नगरम एक ब्रह्मचारी अपना कमण्डल भूल आया था परन्तु जब वह फिर उसे लेनको गया तो वहांपर नगर न दंग्या किन्तु किमी वृक्षकी डाली पर कमण्डल टंगा हुआ उसे दीग्ब पड़ा। उम लेकर ब्रह्मचारी गुरुके पास आया और वह आश्चर्य जनक ममाचार ज्यांका न्यो यह सुनाया। विशाग्याचाये मी तुम वृत्तान्तको सुनकर मनमें विचारने लग- अहो ! यह चन्द्रगुप्ति मुनि शुद्ध चा ग्त्रका धारक है। में तो निश्चयम यही समझना हूं कि एमीक पुण्यप्रताप दयना लोगने यह नगर रचा था । हम प्रकार शुद्ध चाग्त्रिक धारक चन्द्रगुप्तिमुनिकी प्रशंसा कर उन्हें यहांका मब उदन्त कह सुनाया और फिर प्रति बन्दना कर कहा कि देवना लोगों के द्वारा कल्पना किया हुआ आधार माधुओं को लेना उचित नहीं है। इम लियं मयका प्रायश्चिन लेना चाहिय । विशाग्याचा संह अनुसार चन्द्रगुप्त मुनिगनने प्रायश्चित्त लिया और उसी समय समय मा संघने भी स्वामी प्रायश्चिन लिया। इसके बाद-पापरूपी मंघोंके नाश करनेके लिय वायुके - (८४) ममान, उत्तम२ चारित्रक धारक माधुओंमें प्रधान, सूर्यके ममान तेजम्बी तथा विशुद्ध ज्ञानके अद्वितीय स्थान श्री विशाग्वाचार्य, माधुओंके मंघक माथ२ दक्षिण देशकी ओरमे विहार करते हुये उञ्जयिनी नगरी में आकर फलफूलादिमे ममृद्ध उसके उपवनमें ठहरे। निरंतर मिद्धभगवानका ध्यान करनेवाले, अज्ञान रूप अंधकारक समूहको विध्वंम करनेवाले तया विशुद्ध चारित्रके धारक श्रीभद्रबाहु रूप मयेक लिये अपने मनोभिलपित स्वाभाविक सुम्बकी ममुपलब्धिके लिये वारंवार अभिवंदन करता हूँ । इम लोकमें श्रीभद्रबाहुम्बामीको मूर्यकी उपमा दी है क्योंकि सूयं भी निरतर आकाशमें रहता है, अंधकारका नाश करनेवाला होता है तथा निष्कलङ्क होता है । इति श्री रत्ननन्द प्राचार्यावाचित श्री भद्रबाहु चरित्र द्व दश वष पर्यन्त दुभिश्न तथा विश'खाचार्य के दक्षिण देशम पागमनके वणनबाला तृतीय अधिकार समप्त हुश्रा । .
(८५ । चतुर्थ परिच्छेद जब स्थूलाचार्यने-सुना कि श्री विशाखाचार्य ममस्त मंघ महिन दक्षिण देशमे मालव देशकी ओर आये हुये हैं तो उनके देखनेके लिये अपने शिष्योंको भनें । शिष्यने भी म्यामीके पाम जाकर भक्तिपूर्वक उनकी वंदना की। परंतु श्रीविशाग्वा- चार्यने उन लोगोंक माथ प्रनि- वंदना न की और पूछा कि- मेरे न होते हुये यह कौन दर्शन तुम लोगाने ग्रहण किया है ? शिष्य लोग श्रीविशाग्याचाग के वचनोंको सुनकर लजित हुये और उमी ममय जाकर मय वृत्तांत अपने गुम्मे कह सुनाया। उम समय रामल्प, स्थूलभद्र तथा म्लाचार। अपने अपने मंधके मब माधुओंको बुलाकर उनमें कहने लगे-कि हम लोगों को अब क्या करना चाहिये ? तथा एमी कौन स्थिति है जिमम हमें मुम्ब होगा ? उस वक्त बिचारे वृद्ध स्थलाचार्य ने -माधुओ ! मनोभिलांपत मुख दनवाले मेरे कहनेपर जग ध्यान दो। श्री जिनभगवान कहे हुये मागका आश्रय ग्रहण कर शीघ्र ही इम बरे मार्गका परित्याग कगे। और मोक्षकी प्राप्तिक लिये छेटोपस्थापना लेओ। म्यूलाचार्य के कहे हुये हिनकर वचन भी उन लोगोंको अनुगगजनक न हुये । ग्रन्थकार कहते हैं कि यह ठीक है कि जो लोग पित्तच्चर अमित होते हैं उन्हें (८६) कालम शकग भी ऋडवी लगती है। उम ममय और २ मुनि लोग योवनक घमण्ड में आकर बोले-महागज : तुमने कहा तो है परन्तु एमा कहना तुम्हें योग्य नहीं। क्योंकि इस विपम पंचम क्षुधा पिपामादि दुम्मह वालीम परिपहोंको तथा अन्न- गयादिको कान महंगा ? मालूम होता है कि अब आप वृद्ध हो गये है इमीमे अच्छे, युगको नहीं आनते हैं। भला यह तो कहा कि एम सुग्घमाय मागको छोड़कर कौन मा होगा जो कटिन म'का आचरण करेगा ? फिर भी विचार । स्थूलाचार्य ने कहा- तुम यह निश्चय र वो शि.-- यह मन उत्तम नहीं है । इम समय तो किम्बाफलक समान मनोहर मालूम देता परन्तु आगे अन्यन्त ही दुःग्वका देनेवाला होगा। जो लोग मृलमार्गको छोड़कर ग्वाटे माकी कल्पना करने हैं वे समाग्रूप बनम भ्रमण करते हैं। जैसे मारीचादिन कुमाग चलाकर चिरकाल पयन्त मंमाग्मे पर्यटन किया। यह मार्ग कभी मुक्तिप्रद नहीं हो सकता किन्तु उदर भग्नेका माधन है । जब म्चाचाय के ऐसे बचन सुने नो कितने ही भव्य भाधुओंने नो उर्मी ममय मूल माग । दिगम्बर मागे ) म्वीकार कर लिया और कितने ही मुनि महाक्रोधित हुये। यह ठीक है कि शीतल जलमे भी क्या गरम नेल प्रज्वलित नहीं होता ? किन्तु अवश्य होता ही है ॥ ७-१५ ।। तब वे क्रोधी मुनि बोले- क्या जानता है है -यह बुढा है
(८५)
जो एमा विना विचारे बोल रहा है
। अथवा यो कहिय कि
वृद्धावस्था बुद्धिक भ्रममे विक्षिप्त हो गया है। और जब तक
वह जना रहेगा तब तक हम लोगोंको मुग्य का ? एसा
विचार कर पापा-माने मला नायक मारने का संकल्प किया ।
और तिर अन्यन्त कुपित होकर उन दुष्ट तथा मृखा न निर्वि-
चार में विचार पत्राचायको इण्टा दुष्टांग मारकर नहीं पर
पक. गरे नटेम डाल दिया।
नतिकार कहते हैं कि यह ठीक है-बाट शिगोको
दी : उनम शिक्षा मी दृशोक माथ मित्रनाकी तरह दुःख
दन्याच होनी है।
उस समय म्लाचार प्रातः पानस मरण का मंतर
दर
है।
और अवविज्ञानम अपने पुत्र जन्मक वृत्तांतको जानकर
उन मन धमाभिमानिक ऊपर जैसा उपद्रव पहले तुमने मेरे
ऊपर किया था बैमा ही उपद्रव में भी अब तुम्हारे ऊपर
का मा कहने हा धूलि पन्थर नय! अग्नि आदिको वृष्टिमे
घोर उपद्रव करने लगा ॥ १६..२१ ।।
नब माधु लोग अत्यन्त भयभीत होकर व्यन्तरम प्रार्थना
करने लगे—देव ! हमाग अपराध क्षमा कंगे। यह हम लोगोंने
मृदय में किया था ' देव बोला- यही यदि तुम्हें अन्छिन है
तो जब तुम लोग हम कुमार्गको छोड़कर थार्थ मार्गको ग्रहण
वर गे तब ही तुम्हे उपद्रव रहित मंगा। दवक वचन सुनकर
-
(८८) -- माधुओंने कहा- तुमने कहा सो तो ठीक है परन्तु मूलमार्ग (निग्रंथ मार्ग) को हम लोग धारण नहीं कर सकते । क्योंकि वह अत्यन्त कटिन है, किंतु आप हमारे गुरु हैं इसलिए भक्ति- पूर्वक आपकी निरन्तर पूजन करते रहेंगे। इस प्रकार अत्यन्त विनय मे उम क्रोधित व्यन्तरवा शांत करके गुरुकी हड्डियां लाये और उसमें गुरुकी कल्पना की । आज भी इन लोकम हहियें पूजी जाती हैं तथा नमस्कार किया जाता है और उनमें क्षपण (मुनि) की हड्डीकी कल्पना होने से ("खमणादिहडी") बन भी उमी दिनम चल पडा है । इसके बाद उसकी शान्तिक ही लिये आट अंगुल लम्बी नया चार अंगुल चौडी एक लकडकी पट्टी बनाकर यह वही गुरु है एमा कल्पना कर उसे पूजने लगे। इस प्रकार यथायोग्य उसकी स्थापना करके भय भंत अफलक लोगाने जब पूजना आरम्भ किया तब उसने उपद्रव करना बंद किया । फिर धीरे २ इसी तरह पुजाना हुआ वह प्यु पामन नामक कुलदेवता कहलाने लगा। मो आज भी ब्ल गंधादि द्रव्योम पूआ जाता है। यही आश्चर्यजनक अद्ध- फालक मन कलियुगका बल पाकर आज ब लोगों में रेल गया। जैन जलमें तैलके चिन्द न जाने हैं ... यह अर्द्ध'फालक दर्शन जिम भगवानक. बाम्नविर नुम्ब की कल्पना करके बिचारे मूर्ख लोगोंको खोटे मार्गमे मारा है।
) (८९) जिस प्रकार इन इन्द्रियोंके वशवर्ती लोगोंने स्वयं ही व्रत धारण किया उसी तरह जिन भगवान के सूत्रकी भी अपनी बुद्धिके अनुमार मिथ्या कल्पना की ।। ३१-३२ ।। इमी तरह बहुत काल बीत जाने पर उज्जयिनीमें चंद्रकीर्ति नामका राजा हुआ। उसके लक्ष्मीकी ममान चंद्रश्री नामकी पट्टरानी तथा उन दोनोंमें रूपलारण्यादि गुणोंम मुशोभित चंद्रलेखा नामकी उनम एफ कन्या हुई । उमने उन कुपथगामी अर्द्धफालक माधुओंके पाम शास्त्र पढ़ा । मौराष्ट्र ( मौरठ ) देशम उत्तम बलभीपुर नाम पुर था । उमका-अपने नेजमे समस्त शत्रुओंको मंतापित करनेवाला तया नीति शाम्रका जाननवाला प्रजापाल नामका राजा था। उमक-सुन्दर२ लक्षणाम सुशोभित प्रजावती नामकी रानी थी। उन दोनोंमें मुन्दर गुणोंका धारक, रूप मौभाग्य लावण्यादिमे युक्त तथा ज्ञान विज्ञानका जाननेवाला लोकपाल नामका पुत्र था ।। ३३-३४ ॥ प्रजापालने-अपने पुत्र के लिये गुणाम उज्वल चंद्रकीनिकी नवयौवनवती चद्रलेग्वा पुत्री के लिये प्रार्थाना की । लोकपाल भी चन्द्रलेखाके साथ विवाह करके उमक माथ नाना प्रकार के उप- मांगोंको भोगने लगा। जम शचिक माथ इन्द्र अनेक प्रकारक भोगोंको भोगना रहता है। पश्चात् धीरे २ शुभादयम अपने पिताके विशाल राज्यको याकर चन्द्रलेखाको अपनी पट्टगनी ।
बनाई। और फिर ममम्त गजा लोगोंको अपने शामनकी
आधीन नामें रग्बकर गनीक माथ उपभोग करता हुआ गज्यका
निर्भय पालन करने लगा ।। ३०-४२ ॥
किमी ममय जब चन्द्रलेवाने म्वामीको प्रसन्नचिन दवा
ना प्रापना की-नाय मर गुर. उज्जयिनी पुरीम है ।
उन आज गुरुओं मरे कहने में आप अवश्य वृगवे ।
गजाने इस माय कि कहीं ६६ अमनट न होनाप लिये
उम्. बचनाको घीकार किया और उनके मिलने
हि अपने लोगोंको में वहां जाकर उन लोगाने
गुमनांग भनि पुगक नगरहार किया और बलमपुर
चला लिये प्रार्थना की। उनकी वार २ प्रार्थनाम नया
विनय जिनचंद्रादि अफाटक बलभीपुर में आये। जब मन ने
उन लोगों का आगमन मुना तो व. २ आनंदित होकर-यमन
मंत्री पुग्वामी नया परिवार के लोगांक. मायः गीत नृत्य
मंगीतादि उनम दम दमा दिशाओंको परिपूण करता
हुआ उनकी नाक. लिये नगरम निकला। और दृम्हीये
माओको दबकर मनमें विचारने लगा-अहो ! लोकम
अपनी विटम्बना करनेवाला नया निन्दनीय यह कौन मन
प्रनलिन हुआ है ? नग्न होकर भी बत्रयुक्त तो कोई माधु नहीं
दग्ग जान है । इमलियं उनके पास जाना योग्य नहीं है। एम
ननन तथा आविष्कार देखकर राजा शीघ्र ही उम म्यानम
(९१)
-
लौटकर अपने मकान पर आ गया। तब रानीने राजाले
हृदयका भाव समझकर गुरुओंकी भक्तिम उनके लिये वस्त्र.
भेजे । माधुओने भी उसके कहने वस्त्रांको ग्रहण किये । उसके
बाद - गजाने उन माधुओंकी भक्तिपूर्वक पूजन की तथा मन्मान
विप्र' , ग्रंयकार कहते हैं कि यह बात ठीक है कि-बियोंक
गगम अनुग्क्त हुये पुरुष का कार्य नहीं करते है ?
उमी दिनम श्वनयन्त्रक ग्रहण करनम अदमा कमतम
श्वेताम्बर मन प्रसिद्ध हुआ। य. मत महाराज विक्रम नृपतिक
मृत्युकालके १३. वपके बाद लोकमे प्रादर्भूत हुआ है। तिर
उम मुन्चे जिनचंद्रने-जिन प्रतिपादित आमममहका-काली
भगवान कवलाहार करन है, म्रियों को तथा ममंघ म न लोगों को
उमा भवम मोक्ष होता है और महावीरम्बामांके गमका अपहरण
होना न्यादि प्रतिकुल गनिम वर्णन किया ।। १३--'५७ ।।
परन्तु यह कथन प्रत्यक्ष बाधित है इभ हो मिद्ध करते
जिम
अनन्तसुत्र
है उमक आदारकी कल्पनाका मम्भर
मानना ठीक नहीं है। यदि कहांगे कि कवली. कवला-आहार
है तो उसके अनन्न मुग्यका
व्याघात होगा। क्योंकि
आहार नो भुवाक रग्ने पर ही कया : 1 है और वे बला
भगवानके नो क्षुधाका अभाव रहता है। याक अभाव
आहारकी भी कोई आवश्यकता नहीं दीखती ह भी तो
टीक. जैसे मूलका नाश हो जानेपर वृक्ष मि.मा 1. बढ़
।
।
(९२) । मकता. उमी तरह क्षुधाका अभाव हो जानेमे आहार करना भी नहीं माना जा सकता। यदि फिर भी आहारकी कल्पना की जाय तो जिन भगवानके शरीरमें मदोषता आती है ॥५८-५९।। ये बुभुक्षा आदि तो वेदनीय कर्मक मद्भाबमें होती हैं और जिन भगवानक मोहनीय कर्मका नाश हो जानम वेदनीय कर्म अपना कार्य करने शक्तिविहीन (अममर्था) है। उसे जली हुई रम्मी बन्धनादि कालाके उपयोग में नहीं आ सकती । रम- लिय वली भगवान के दोपपद केवली-आहारकी कल्पना करना अनुचित है । और मोहमूल ही वेदनीय कर्म सुधादि वेदनाका देनेवाला होता है । जिन भगवानक मोहनीय कर्मका नाश हो जानम बेदनीय कम अपना कार्य नहीं कर मकता । जैमें मूल रहित वृक्षपर फल पुष्पादि नहीं हो सकते । भोजन कग्नेकी इन्छाको बुभुक्षा कहते हैं और वह मोहसे होती है और मोहका जिन भगवानक जब नाश हो गया है तो क्योंकर आहारकी कल्पनाका मंभव माना जाय ? ॥ ६०-६४ ॥ उमे ही स्फुट करते हैं- जो इन्द्रिय सम्बन्धी विषयोंमें विरक्त हैं, तीन गुप्निक पालन करनेवाले है ऐसे माधुओंके कर्मों के नाश करनेवाले ध्यान की मिद्धि होती है, ध्यानम शुद्ध शांतरमका ममुद्भव होना है, श म अत्रज्ञान होता है, फिर उमी आत्मावबोधर्म
(९३ ।
मोहनीय कर्मका नाश करके साधु लोग क्षीणमोही होकर और
शुक्लध्यानरूप खड्गके द्वारा चार घातिया कर्मों का नाश करके
जब केवली होने हैं तो क्षुधा तृषादि अठारह दोषोंमे रहित
अनंतमुख रूप पीयूपके पानसे मंतुष्ट तथा लोकालोक प्रकाशक
कंवलज्ञान धारक एम कंवली भगवान आहार क्या कर सकते
है ? यदि य क्षुधादि दोप जिन भगवानम माने जावें तो दोष
रहिन शुद्ध म्वरूप जिनदव फिर वीतराग कमे कहे जा सकेंगे ?
पदाचित कहो कि–जिम्म तरह भोजन करते हुये
उदामीन माधुओंके बीतगगता बनी रहती है तो कंवली
भगवानक का कर न रहगो ?
परन्तु यह कहना बुद्धिमानोंका नहीं है, किन्तु विक्षप्त
पुमका केवल प्रलाप है। मुनियोंकि आहार कम्नम बोनगगताका
अमात्र नहीं कहा जा सकता। कोकि उनमें कंबल उपचार
(कथन मात्र में बीतगगता है
।
कहानिन कहो कि-आहारक विना शरीरकी स्थिति
कढीपर नहीं दग्बी जानी है उमीलिय कवली भगवानके आहारकी
कल्पना अनुचित नहीं है ।। ६७-७१ ।।
यह कथन भी अबाधित नहीं है । मो ही स्फुट किया
जाना है-नोकर्म आहार (१) कर्म आहार (२) कवलाहार
(३. लेप आहार (४) उजाहार (५) मानस आहार (६) ऐसे
।
(९४)
।
आहारक छह विकल्प हैं । तो अब यह कहा कि-शरीग्धारि-
यांक शरीरकी स्थितिका कारण कवलाहार ही है या औग्मं भी
शरीरकी स्थिति रह सकती है ? हम लोग तो कर्म नोकम
आहारक ग्रहण में कवली भगवानके शरीरकी स्थिति मानते हैं ।
कदाचिन कहां कि- शरीरका स्थिति कवलाहार हीन है तो
भी व्यभिचार आता है। क्योंकि केन्द्री जीवों के लेप आहारका
मंभा है, दयताओं के मान माहार होता है और पक्षियोंकि उजा-
आहार होता है । यही बात दूसरे ग्रन्योंमें लिम्बी है
"चली भगवानक नोकर्म आहार होना है, नाकियोंक
कम आहार होता है, हाताओंक मानम आहार होना है.
पक्षियोंक ऊजा आहार होता है तथा एकन्द्रियाक लेप आहार
होता है।
इमलिये स्वममें भी बुद्धिमानोंको केवली भगवान के लिये
कवलाहारकी कल्पना करना योग्य नहीं है । अथवा इनरी यह
भी वान है कि उनके आहार की भी कल्पना कवल बदनीय
कर्मक मद्राव होनमें मानी जाती है ।। ७२-७८ ।।
अम्तु. वह रहै परंतु यह तो कहीं कि-जब वली
भगवान मर्व लोकालोकके दंग्वने जाननेवाले हैं तो मारम
नाना प्रकारक जीवांका वध देखते हुये में भोजन कर सकते
हैं ? अथवा जिन भगवान भी अल्पज्ञानी लोगोंकी तरह शुद्ध
तथा अशुद्ध भोजन करेंगे क्या ? और यदि अन्तरायांक होते
हये भी भोजन करेंगे तो कवली भगवान श्रावको भी अन्यंत
निन्दनीय होनता टहरेगी। उनके आहारकी भी कल्पना केवल
बदनीय कर्मक सद्भाव होनसे मानी जाती है।
अरे ! मांस रक्त आदि अपश्नि यस्तयाको दग्बत हुये भी
यदि कंवली भगवान आहार का तो फिर को कहिये कि जिन
भगवान ने अपने मवानपनको जलाञ्जलि दी। तीमी कवनी
भगवान कवला आहार करते है. मा जो लोग कहत है समझिये
वि. वे निर्लज्ज है. बोट मरूपी महिगंक महम नकचर हों
रहे है ।। ७०-८० ।।
हम प्रकार केवली भयानक आहारका पतिपय किया
गया। उमी तरह जो लोग म्रियामा उनी भामं माक्ष प्राप्त
होना कहते हैं. मझिये कि-वे लोग दर ग्रहम्प पिशाच
यशवी है । अथवा या कहिये कि वे विक्षिप्त हो गये हैं। यदि
वि अन्यन्त घोर तपश्चरण भी कर नामी उम जन्ममं उन्हें
माक्ष नहीं हो सकना ।। ८:-.
कदाचिकहो कि-निश्चय नयने स्त्री और पुरुपोंकी आत्मामें
कुछ भी विशेषता न होनम उसी भवमे स्त्रियांका मालकी
ममुपलब्धि क्यों नहीं हो सकती ? परन्तु यदि केवल तुम्हारे
कथनानुमार मब जीवों के मामान्य होनहीम स्त्रियांको मोक्षकी
प्राप्ति मान ली जाये तो चाण्डाली तथा धीवरी आदिकी स्त्रियां
क्योंकर मोक्षमें नहीं जाती ? क्योंकि वे भी तो बियां ही है
(९६)
sho
-
न ? तथा स्त्रियोंक योनिस्थानमें प्रमवादिम निरन्तर अशुद्धता
बनी रहती हैं और महीने में निंद्यनीय रजोधर्म होता रहता
। म्नन कुक्षि नया योनि आदि म्यानां शरीर ममावसे ही
सूक्ष्म अपर्याप्त मनुष्य उत्पन्न होते रहते हैं
वियोंकी प्रकृति (म्वभाव बुरी होती है । लिंग अत्यन्त
ही निन्दित होता है. उनके माक्षान्मयम (महाव्रत) नहीं हो
मकना नो मोक्ष ना बहुत दूर है । दूसरे स्त्री-लिंग नया म्ननोंमें
युन मी रूपमें बनी हुई तोकगंशी प्रतिमायें कहीं हो तो
कहा : इन दोपाम बियोंको मोक्षकी सम्भावना नहीं मानी
ज' मानी।
दखा : त्रियांको चक्रवनि, नागपण, बलभद्र,
मण्डलेश्वर
आदि पद तथा शुनज्ञान, मन:पय पजान जब नहीं होने है और
उमी तरह गणवर, आचाय, उपाध्याय आदि पद भी नहीं होते
है तो उन्ही के त्रैलोक्य महनीय मवेजपनेका कैमे मद्भाव माना
जाय ? इमलिये समझा कि- मुकुलमे पढ़ा हुआ, कुशल,
संयमी. परिग्रह रहित तया इन्द्रियोका जीननेवाला पुरुष ही मुक्ति
कान्ताक माय परिणय कर सकता है ।। ९०-९४ ।।
-इति स्त्रीमुक्तिनिराकरणम् ।
जो मूर्ख लोग निर्ग्रन्य मागक विना परिग्रहके मद्भावमें
भी मनुष्योंको मोक्षका प्राप्त होना बताते हैं उनका कहना
प्रमाणभूत नहीं हो सकता। यदि परिग्रहके होने पर मोक्षका
(९७)
होना ठीक मान लिया जाये तो कहो कि भगवान आदि
जिलेन्द्र ने अपना प्रशस्त गज्य किपलिये छोड़ा ? उत्तम कुलमें
ममइव, महाविद्वान तया व वृषभ-नाराच-पंहननका धारक पुरुष
भा यदि पग्निहो हो नो वह भी माक्षमें नहीं जा सकता
आपकी क्या कह ? इसलिये शिव-सुम्वामिलापी साधुओं को-वस्त्र,
कम्बल, ड तथा पात्रादि उपकरण कभी नहीं ग्रहण करने
चाहिये । ऋयोंकि वाक ग्रहण करने उनमें लोग्वे तथा जू
नीचांकी उत्पनि हाती रहती है और उनके धरने उठाने
नमः वानमें जीवोंकी हिंमा होनी है। दूसर. वर्मक लिये प्रार्थना
मान दोनता आनी है और वन प्राम होने पर उसमें मोह
:.:. ना दे. माहम मंयमका नाज होता है तो उसमें निर्मलता
हार को दर्लभ ही नहीं किंतु नितांन 'अमममय है। इसलिये
- नया बाह्य परिग्रहके त्यागयुन. मालाजिनलिङ्ग ही
नक है! और सम्यक्त्वयक जीवोंक शिव-मुम्बका
नई : ..५-१०१॥
उदाचित यह कहा कि-जिनकन्ए लिङ्गक बहुन कठिन
२थ दानाध्य होनेमे हम लोगान म्यविर कन्प मंयम धारण
किया है ! परंतु जिनकल्प नया म्यांवर कन्या लक्षण जब तक
न समझ लो नबनक एम मिथ्या वचन भी मन कही। क्योंकि
म्यविर कल्प भी तुम्हारे कथनानुसार परिग्रह महित नहीं
!
होता है।
( ९८) . अब पहले ही जिनकल्प मंयमका लक्षण कहा जाता है- जिसके द्वारा मुनिगज मुक्यङ्गनाके आलिङ्गनके सुखका उपभोग कर सकते है, जो मम्यक्य रूप रत्नमे भृपित होते हैं, जिन्होंने इन्द्रियरूप अश्वांको अपने वशमें कर लिये हैं, जो एकाक्षरक समान एकादशाङ्ग शाम्बके जाननेवाले हैं, जो पायाम लगे हुये कांटेको नथा लोचनामें गिरी हुई रजको न तो म्घयं निकानत हैं और न दुसगम कहते हैं कि तुम निकाल निम्तर मौन सहित रहते हैं. वनवृपभ नागच मंहननक धारक होते हैं, गिरिकी गुहायाम. वनमें, पर्वतमें नया नदियों के फिनागमें रहते हैं. वर्षाकालमें मार्गको जीवाम पूर्ण हो जाने पर छह माम पर्यन्त आहार रहिन होकर कार्यान्मग धारण करते हैं, परग्रह रहित होते हैं. रत्नत्रयमे विभूषित होने हैं, मोक्षक साधनमें जिनकी निष्ठा होती है. धर्म ध्यान तया शुक्ल धान होमें निम्त रहते हैं, जिनके स्थानका कोई निश्चय नहीं होता तथा जो जिन भगवानक समान विहार करनेवाले होते हैं एमे साधुओं को जिन भगवानने जिनकल्पी माधु कहा है || १०२-१० ।। और जो जिनलिङ्ग धारक होते हैं, निर्मल मम्यक्त्वरूप अमृतस जिनका हृदय क्षालिन होता है, अट्ठाईम मूलगुणांक धारण करनेवाले होते हैं, ध्यान तथा अध्ययनमें ही निरत रहने हैं, पञ्च महाव्रतके धारक होते हैं, दर्शनाचार प्रभुति पञ्चाचारक पालन करनेवाले होते हैं, उत्तम क्षमादि दश धर्मसे विभूषित .
. (९९) रहते हैं, जिनकी ब्रह्मचर्य व्रतमें निष्ठा (श्रद्धा) होती है, बाह्या- भ्यन्तर परिग्रहमे विरक्त होते हैं, तृणमें मणिमें नगरमें वनमें मित्रमें शत्रमें मुख तथा दुःखमें मतत् ममान भाव रखनेवाले होते हैं, मोह अभिमान नया उन्मत्तता रहित होते हैं। धर्मोपदेशक ममप तो बोलने हैं और शेप ममय में मदेव मान रहते हैं, शास्त्ररूपी अपार पारावारक पारको प्राप्त हो चुके हैं उनमें कितने तो अवधिज्ञानक धारक होते हैं, कितने मनःपर्ययज्ञानके धारक होते हैं अवधिज्ञानक पहले पंचसूत्रकी मुदर पिच्छी प्रतिलग्बनके (शोधनक) लिये धारण करते हैं. मचक माय २ विहार करते हैं, धर्म प्रभावना तथा उत्तम २ शिष्योंका रक्षण करने हैं, और वृद्ध : माधु-ममूहके रक्षण तथा पोपणमें मावधान रहने हैं । इमीलिये उन्हें महर्षि लोग स्थविर कल्पी कहते हैं। इस भीपण कलिकाल में हीन मंहननक होनम व लोग स्थानीय नगर ग्रामादिक जिनालयमें रहत है । यद्यपि यह काल दुम्मह है, शरीरका मंहनन हीन है, मन अत्यंत चंचल है और मिथ्या मन मारे मंमारमें विस्तीर्ण होगया है नाभी वे लोग मंयमक पालन करनेमें तत्पर रहते हैं ।। १११-२० ॥ । [दूसरे ग्रंथमें भी कलियुगक बाबत यो लिम्बा है-"जो कम पूर्वकालमें हजार वर्पमें नाश किये जा मकते हैं, कलियुगमें एक वर्षमें भी नहीं किये जा सकते" यह तो हुआ गाथाके अक्षरोंका अर्थे । परंतु यह गाथा बिल्कुल अशुद्ध है। हमारे पाम दो (१००) प्रतियां थीं उन दोनोंमें एमा ही पाठ होनेमे परवश यही पाठ छपवाना पड़ा। वास्तव में एमा अर्थ होना चाहिये-"जो कर्भ पूर्व कालमें एक वर्षमे नाश कर दिये जाते थे उतने ही कर्म इम कलियुगमें हजार वर्षमें भी नाश नहीं किये जा सकने । ] इमीमें मोक्षाभिलापी माधु लोग मंयमियोंक योग्य पवित्र तथा मावद्य ( आरम्भ) रहित पुस्तकादि ग्रहण करते है । इम- प्रकार सर्व परिग्रहादि हिन स्थविर कल्प कहा जाता है। और यह बबादिका धारण करना है वह स्थविर कल्प नहीं है किन्तु गृहस्थ कल्प है। मैं तो यह समझता हूं कि इन श्वतांवरियान जो यह गृहम्थ कल्पना की है वह माक्षकी प्राप्तिक लिये नहीं किंतु इन्द्रिय संबंधी विषयानुभवन करनेके लिये की है ।। १२१-२४ ॥ तथा दग्यो ! इन लोगोंकी मूर्खता अथवा विवेक शून्यता जो श्री वर्तमान म्यामांक गर्भका अपहरण हुआ कहते हैं। जब श्री वीरजिनेन्द्रको-वृपभइत्त ब्राह्मणकी दिवानन्या नाम बीके गर्भमें आये हुये निरामी ८३ दिन बीत गये तब इन्द्रने भिक्षु- कका कुल समझ कर श्री वीरनाथका गभ वहांम लेजाकर सिद्धार्थ राजाकी कांताके उदरमें स्थापित किया। परंतु यह बात कम हो सकती है ? अस्तु, हमारा कहना है कि पहले तुम यह कहो-इन्द्रने पहले उस कुलको जाना था या नहीं ?
। १०१ यदि कहोगे जाना था तो पहिले ही गर्भका हरण क्यों न किया ? यदि कहोगे नहीं जाना था तो गर्भ शोधनादि क्रियायें कैम को होगी ? यदि फिर भी कहोगे कि गर्भ शोध- नादि क्रियायें ही नहीं की गई तो तुम्हीं कहो फिर तीर्थकरों तथा और सामान्य मनुष्योंमें विशेषता ही क्या रही ? दुसरे यह भी है कि जब द्विजक यहांम गर्भ हरण किया गया तो उमका नालका तो छेद वहीं पर हो गया फिर छिन्ननाल गर्भ दृमरी जगहँ क्यों बढ़ सकता है ? जैसे जिम फलका बंधन एक जगहँ छिन्न हाजाता है कि वह दूसरी जगह नहीं बढ़ रहना । किंतु उमा ममय नष्ट होजाता है। कदाचिन कहो कि.---जैसे वल्लग दूसरी जगहें भा गपी हुई वृद्धिको प्राप्त होती है तो गर्भ क्योंकर नहीं बन सकता ? परंतु यह कहना भी टीक नहीं है। क्या क लता ता माताकममान हाता है आर मुन फलक ममान होना है। कदाचिन फिर भी कहा कि माता मंबंधम गर्भ दूसरी जगह ग्ग्य दिया गया तो गर्भका क्या बिगहा ? नो कुछ नहीं परतु यही दुःग्य होता है कि तुम्हारे मदोप वचन विचार मन्पुरुषाको मन्ताप उत्पन्न करते है। इसी तरहम श्वना- बरी लोग नानाप्रकारक मिथ्या वचनाम शाम्रांकी कल्पना करने हैं और विचार मूर्ख लोगोंको मंशपमें डालने है। इनके कुछ दिनों बाद यही मन शांमयिक कहलाने लगा। इसी प्रकार ~ अपने कपोल-कल्पित मार्गमें वे दुराग्रही लोग रहते हैं ॥ १२५-३४॥ इन्हीक भक्त जो लोकपाल तथा चित्रलेखा रानी थी, उनके सुवर्णकी तरह कान्तिकी धारक तथा अपने मुन्दर रूपये देवां- गनाओंको भी जीतनेवाली मनोहर लक्षणोंमें शोभित नृकुलदेवी नामकी बाला हुई । मो उसने उन गुरुओंके समीप अनेक शास्त्र पढ़े । और फिर क्रम में युवा लोगोंको अन्यंत प्रिय मनोहर तरुण अवस्थाको प्राप्त हुई। धन परिपूर्ण एक करहाटक नामका नगर है। अनिवाय पराक्रमका धारक मपाल नामका उमका राजा है। उनने उम सुन्दर शरीरकी धारक नृकलदेवी माथ अपना विवाह किया। नृकलदेवी भी एव पुण्य मैक. उदयमे और मवै गनियों में प्रधान पट्टरानी हुई और यह भूपाल भृपति भी उसके माथ नाना प्रकारक भोगांको भोगने लगा। १३५-३९ ।। किमी दिन अवमर सुअवमर पाकर म्वामीम प्रार्थना की कि-प्राणप्रिय ! मेरे पिताजीक नगरमें गुरु हैं, उन्हें धर्म- प्रभावनाक लिये आप भक्तिपूर्वक बुलाईये । गजाने गनीक वचन सुनकर उसी समय अपने बुद्धिमागर मंत्रीको बलाया और उन्हें सत्कार पूर्वक लाने के लिये उमे करहाटाक्षपुर भेजा । मंत्री भी उनके पास गया और अत्यंत बिनयपूर्वक नमस्कार कर (१०३ । तथा बार२ प्रार्थना कर उन्हें अपने पुग्मे लिया लाया । राजाने जब उनका आगमन सुना तो बहन आनंदित हुआ और बड़े भारी आनंदपूर्वक उनकी वंदना करने के लिये चला । परंतु दृग्मे ही जब उन्हें देव तो आश्रययुक्त हो विचारने लगा- अहो ! निग्रन्थमा रहिन यह दण्ट पात्रादि महिन नवीन मत कौन है ? उनक पान मंग जाना योग्य नहीं है । ऐसा कहकर उसी समय वहांग अपने महलकी ओर लौट गया और जाकर अपनी कानाग कहा- बोट माग चलानेवाले, जिन भगा के शासन-विरुद्ध मनके धारण करनेवाले नया परिग्रह मानक वशनि य हो तुम्हारे गुम है ? मैं उन्हें कमी .ही मानेगा ! वह मजाका आम समझकर उमा ममय गुरुके पान और विनर विनीत मम्नकम नमस्कार कर प्रार्थना करने ...गी ।। भगवन ! मेरे आग्रह आप मब परिग्रह छोड़कर पहले प्ररण यः हुई देवनाआम पूजनीय नया पवित्र निग्रंय अवस्था ग्रहण कीजिये। उन मब श्वेतांबर माधान गनीक वचन सुन- कर मी ममय बम्बादि मत्र परिग्रह छोड़ दिया। और हाथमें क.मण्डल तथा पाठी लेकर जिन भगवानकी दिगम्बरी दीवा अङ्गकार का। फिर राजा भी उनके मन्मुग्व गया और अन्यंत भक्तिपूर्वक नमस्कार कर अपने नगरमें उन्हें लिवा लाया ।। १४९-५२ ।। १०.-४८ ॥
( १०४)
उम ममय गजादिक द्वारा मत्कार किये हुये तथा पूजे
हुये वे माध लोग दिगम्बरका वेष धारण कर श्वेतांबर मनक
अनुमार आचरण करने लगे ॥ १५३-५६ ॥
गुगंपदेशक विना नटके ममान उपहासका कारण लिङ्ग
धारण किया । और फिर कितने दिनों बाद इन्हीं कुमागियोंमें
यापनीय मंघ निकला।
फिर मी मिथ्यात्व माहम मलीन श्वेतांबर मतम. शुभ
कार्य में परांगमुम्ब कितने ही मत प्रचलित हो गये । उनमें
कितने तो अहङ्कारके वशम, कितने अपने आप आचरण धारण
करनेमे, जितने अपनर आश्रयके भेदम तथा कितने खोट कमक
उदयमें निकले । इसी तरह अनेक मतांका ममाविभाव हो गया।
और भी सुनो-
महाराज विक्रमकी मृत्युक १५२७ वप बाद धम कमका
सर्वथा नाश करनेवाला एक लैकामत (टियामत) प्रगट हुआ,
की विशेष व्यवस्था यों है-
अपनी अलौकिक विट साम देवताओंको भी पगजिन
करनेवाले गुजर गजरात) दजम अणहल नाम नगर है । उसमें
प्राम्बाट (कुलम्बी) वुलम लुङ्का नामका धारक एक नाबरी
हुआ है। उस दुष्टान्माने कुपित होकर तीव्र मिथ्यात्वक उदय में
खोटे परिणामों के द्वारा लंकामत चलाया, और जिन सूगास
( १०५ ? प्रतिकूल होकर देवतााम भी पूजनीय जिन प्रतिमा. उसका पूजा तथा पवित्र दानादि मब कम उठा दिय ॥१५७-६१।। उम मतमें भी ऋलिकारका बल पाकर अनेक भेट होगये मो टीक है, दृष्ट लोग कार नहीं करने हैं ? अहो ! देखो ! मोहरूप अन्धकारम वे लोग स्वयं ना आच्छादन । ये और उन्हीं पापी लोगान जिन भगाना निमल शासन भी कलंकित किया. परन्तु मुम्बानि अदाको मलामनमें प्रमाद नहीं करना चाहिंग , इमरग नहीं करना चाहिये किंतु उन्हें अपना है। मा ग्रहण करना उचित है। क्योंकि कर्दमसे (कीचड़म) लिप्त महामणिको कौन ग्रहण नहीं करता है ? किंतु मभी करते हैं । अं! निःशक्त (व्रत तथा मम्यक्त्व रहिन) पुरुषों के दोषम क्या धर्म भी कभी मलीन हो मक्ता है ? किंतु नहीं हो सकता है । मो ठीक है-मेंढकक मरनेमें समुद्र कहीं दन्धित नहीं होता । इमी तरह मब मनामें मार देखकर सम्यग्दृष्टि पुरुषों को अपनी बुद्धि मर्वज्ञ भगवानके दिखाये हुये मागमें लगानी चाहिये ॥१६..६६॥ अब उपसंहार करते हुये आचाय कहत है कि जो वत्र रहिन होकर भी मुदर है, अलंगागदि विडीन होकर मी ददी- प्यमान है तथा जो क्षुधा तपााद अटारह दोपाम गहन है वही तो वास्तवमें दब कहलाने योग्य है और शंप सुवादि महित कभी देव नहीं कह जा सकते ।।१६७।।
(१०६) उसी जिन भगवानक मुख-चंद्रमे विनिर्गत स्याद्वादरूप अमृतमे पूरित तथा परम्पर विरुद्धता रहिन जो शाम्ब है वही तो शास्त्र है और दूसरे लोगोंक द्वाग कहा हुआ शास्त्र नहीं हो मकता ।।: ६८॥ और जो नाना मारक ग्रन्ध ( शास्त्र । महित होकर भी निग्रन्थ परिग्रह रहित द नथा जो सम्पन्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक चारित्ररूप ग्न्नया विजित है ये ही यथाथमे गुरु हो मकन ॥१६॥ इमलिय बुद्धिमानीया दूसरी ओर वृद्धि हटाकर मल्यार्थ देव. शास्त्र, गुरुके. श्रद्धानमें उम लगानी उचित है । और सप्त तत्वांका निश्चय करके उत्तम सम्यक्ष म्वीकार करना चाहिय ।।१८०॥ अंतमं ग्रंथकार करते हैं कि श्रेणिक महाराज प्रश्नक उत्तर में जैमा श्री बीर जिनेन्द्र ने भद्रबाह चरित्रका वणन किया था उसी तरह जिन मानक द्वारा समझकर मैंने भी श्रीभद्रबाहु, श्रुतकवलीका चरित्र लिया है ।। १७१॥ जिमका अवतार म्वगं ममान मनोहर कोटपुरमें हुआ है, जो मोमशमं तथा श्रीमती मोमत्रीका अनेक गुणोंका धारक पुत्र-रत्न है. जिमने गोवर्द्धनाचार्य मरीख महात्माका आश्रय लेकर निमरतान रूपी रत्नाकर तिर लिया है वे श्री भद्रबाहु महपि मेरे हृदयम का करें ।
-
(१०७)
जो म्नेह (राग का नाश कर देनेमें यद्यपि आभरणादिसे
विहित है तो भी बहुत मुदर है, जो वेद्यनीय कर्मक अभाव
हो जानेमे यद्यपि निगहार है तोभी निरंतर संतुष्ट है, जो
कामरूप प्रचण्ड हाथीका नाश करनेके लिये शरी गिना
जाना है और जो इन्द्रिय का काननक जलानर लिय बति
कहा जाता है हमी लिय कि-वे मुझे मनोमिलपित सुख
वितीर्ण करें।
सम्यग्दशन जिगका मूल कहा जाता है. जो श्रत मलिलमे
अभिमिचित किया गया है. उत्तम चारित्रका ग्राण की
शाम्बायें मानी जाती है, जो मुदर २ गुणारे विगत
और जिममें इन्छानुमार फल प्रदान करने की अचिन्य पभुत्वता
है तो फिर आप लोग उभी धर्म रूप मन्दारतकका क्यों न
आश्रय करें?
ग्रन्थकर्ताका परिचय ।
जो प्रतिवादी रूप गजगजक मदका प्रमर्दन करनेके लिये
केशरीकी उपमा विगजिन है, जिन्हें शील-पोपका जलधि
कहते हैं और निमने उज्वल कीनिमुद का आलिंगन किया है,
उन्हीं अनंतकीनि आचार्य के विनय और अपने शिक्षा-गुरु
श्री ललितकीर्ति मुनिगजका ध्यान करके मैन इम निदपि
चरित्रका मंकलन किया है।
॥
॥
श्रीभद्रबाहुचरित्रम् ।
माधभानुना भिन्या जनानामन्तरं तमः ।
यः मम्मनित्यमापन्नः मन्मनि मन्मनिः क्रियान ॥॥
वृपमं वृषभं वंदे वृषभाई. वृषाऽचिंतम् ।
वृपतीर्थप्रणेतारं भत्तारं कर्मविद्विषाम् ॥ २ ॥
परमष्टपदालनां परमपदाप्तये ।
परमेष्टपदो बन्दे मत्पश्चपरमेष्टिनाम् ।। ३ ।।
आहेतो भारनी पूज्या लोकाऽलोकप्रदीपिका ।
ग्जो बिधृय नो निन्यं तनोतु विमलां मनिम् ।। ४ ।।
म्वधामिद्धिकरणाचणाः मन्तु गौरवाः ।
गौरवाप्ताः मुचरणम्तरणमें भवाऽम्बुधौ ॥ ५ ॥
सक्तया हीनोऽपि वक्ष्येऽहं गुमभक्तया प्रणोदितः ।
श्रीभद्रबाहुचरितं यथा ज्ञातं गुरूक्तिनः ॥ ६ ॥
यच्छुतं मुग्धबुद्धीनां मिय्यामोहमहातमः ।
धुनुते तनुते शुद्धां जैनमार्गेऽमलां मतिम् ।। ७ ।।
अथाऽत्र भारत वर्षे विपयतं मगधाऽभिधे ।
पुरं राजगृहं भाति पुरन्दरपुरोपमम् ॥ ८ ॥
नताःशेषनृपश्रेणिः श्रेणकः श्रेयषां निधिः ।
भावुक: पालकस्तस्य चेलनी महषीशिता ॥ ९ ॥
( १११) एकदाऽसौ विशांनाथो विदित्वा वनपालतः । विपुलाऽद्रा महावीरममवमृतिमागताम् ।। १० ।। परानन्दथुमापन्नोऽचलद्दवं विवन्दिपः । तौयत्रिकवगवधिकृतदिङ्मुम्बम् ।। ११ ।। नीरीक्ष्य मुरममयं केवलोज्यलगनिपम् । म्तु-वा नत्वा मम पच्यं नम्थिवानग्नंगदि ।। १२ ।। द्विधा धर्म जिनोहीतमायामश्रयान्वितः । प्रणिपन्य-ततोऽप्राचीन कगं मुकुल यन्नृपः ।। १३ ।। देवाऽत्र दुःपमं काले कालश्रना | कियंतो न भविष्यन्ति कि कि चान्त भविष्यति ।। ४ ।। श्रत्वा नदीयं व्याहारं व्याजहार गिगम्पतिः । गम्भीरघननिया पैदियन भव्यक्निः ।। मयिमुक्तिमित गजन ! गौतमाटर : म्बधर्मवाक । जम्बृनामा भविष्यन्ति त्रयोऽमा कयनेक्षणाः ॥ १६ ॥ विश्वश्रतविदो विष्णुः नंदिमित्रोऽपराजिनः तुर्यों गोवर्द्धनो भद्रा भद्रबाहुम्नथाऽन्तिमः ॥ १७ ॥ श्रुनकेवलिमीमानः पञ्चतंत्र महर्षयः । बोधी धर्मा धनं मोग्यं कलो हीनत्वमेष्यति ॥१८॥ युग्मम् भद्रबाहुभवं वृत्तं श्रेणकाऽनो निशम्यताम् । यच्छतेऽन्यमतोन्पत्तिबु द्धयते मुग्धमानसः ॥ १९ ।।
(११२ -- श्रेणिकन यथाऽानि श्रीवीरमुम्बनिर्गतम् । नयाऽहमधुना वच्मि ममान गुरूक्तितः ॥ २० ॥ जम्दीमय विग्यान आयोऽनादिरपीरितः । कुलभूधग्मंगच्यो नृपो वा विपुलश्रिया ॥ २१ ।। नई भालबहानि धारन क्षेत्रमुनमम् कालपत्र व नम्प देशो भन्पोण्डयद्धेनः ।। २२ ।। धनवान्यजनाकीणां गामंडलविमंडिताः । ग्राम' न नृपाउन्ने महिपोकुलमंकुलाः ॥ २३ ॥ Tी विहिनन्छायाः श्रितानां पृश्रियः । अद्रले नगा व धनाधागः मुदर्शनाः ॥ २४ ॥ नई पत्र कामदयमान कक्षेत्रमंडिताः । "मणीयते यत्र म्बेष्टाम्प प्रहा मही ।। ६५ ।। मम्मी रात्र जन्ते मलिवारिलोचनैः । पंम मोटकारियो दि जाजिरिमजिताः ॥२६॥ प्रान्ना दशमीगऽङ्गा पगवधा मुगाः । चटयां मुसमां द्रष्ट्र कुन काडा विजम्मित': ।।२७।। युग्मम् । प्रमनिगड रिटारख्या जम्बुक वञ्चकननिः बंदी नई छदै छेदो यत्र भङ्गाम्नाङ्गके ॥२८॥ चारन्यं तु कपो नक्त कोके शोको मदो द्विप । कौटिल्यं स्त्रीभ्रुवोर्यस्मात्ततोऽमौनिरुपद्रवः ।।२९॥ युग्मम् ।
(११३)
तत्र कोट्टपुरं रम्यं द्योतनाकवण्डवत् ।
आगाधोत्तुङ्गमाट्टालः ग्वानिकाशालगोपुरैः ॥ ३० ।।
प्रोत्तंगशिवग यत्राऽऽवभुः प्रामादपंक्तयः
कलङ्क वा विधालाप्नं केतुहम्नः समुद्यनाः ॥ ३१ ॥
नानानकमहानध्य मणिमाणिक्यमंडिने ।
कनन्कनककुम्भारप्रसरकिरणाकरः ।। ३२ ।।
विचित्रमिचयालाचश्रियं चक्रन मागणे ।
विशदा पुष्पापण्डामा भव्यमेव्या जिनालयाः ॥३३॥ युग्मम्
चत्रन्याम्न्यागिनी लोका: मढया माप निदयम् ।
दुधि धनपम्यापि ममाप निरन्तरम् ।। ३४ ॥
विनं पां जिन दिन पहनः ।
मनि येपर नुमात्राटी श्रीन या जिनादित ।। ३५ ॥
स्तुतिय मुपियर ननिपा नाम ।
नाम्याम्तऽग्विन्ग लोका जिरे घमंचननान ॥ ३६ ।।
नत्र वाभायने भूपः ज्यान भित्रभिधः ।
काई'कृताने गंपभूपाला निजलेजमा ।। ३७ ॥
म्वप्रजातजालोकी शनित्रयविराजिनः ।
जिनान्तगम्पिड्यगों यः मन्मार्ग ममुग्रमी ॥ ३८ ॥
बभूव तन्महादेवी पद्मश्री श्रीग्विाऽपरा ।
पुरोधा मोमशाह्न आमीत्तस्य महीक्षितः ॥ ३९ ॥
विवेकी विशदम्बान्ता वदविद्याविशारदः । न चंद्रो द्विज राजोऽपि न चापि गरुडो यकः ॥ ४० ॥ सती मतल्लिका नाम्ना मोमश्रीम्नप्रियाऽभवत् । चन्द्रानना विशालाक्षी रूपापाम्तसुराङ्गना ॥ ४ ॥ मानोविभव चंद्रम्य चंद्रिकव दया यनः । शीखा दीपस्य वा मक्ता तम्याऽमीत्मा मुलक्षणा ।। ४२ कामं रंगम्यमाणो मी कांतया कांतया ममम् । अनीनयत्मुखं कालं प्रीत्या रन्या यया म्मरः ॥ ४३ ।। पुण्यात्प्रास्त मा तन्वी पुण्यलक्षणलक्षितम् । तनूजं स्मरमंकाशं मुबोध वा मती मतिः ।। ४४ ।। शुभ शुभग्रहे लग्ने शुभ तातम्तदा मुदा । वित्तं विश्राणयामाम याचकभ्यो यथेग्मितम् ॥ ४५ ।। कामिनीकलगानोरुनृत्य दुन्दुभिवादनः । तस्य जन्मोत्सवं चक्र केतुमाला वलम्बनैः ।। ४६ ।। तजन्मतो जनाः मर्वे सुप्रमोदं पपेदिरे । स्यों दयादिवाऽज्ञानि चकोरा वा विधृदयात् ।। ४७ ।। भद्रको भद्रमूर्तिबालो-सौ भद्रमानस : भद्रबाहुरितिख्याति प्राप्तवान्बन्धुवर्गतः ॥ ४८ ॥ सोऽभकः सुन्दराकारो लालितो ललिताजनैः । कदाचिन स्थितो मयां करात्करतलेचरन् ।। ४९ ॥
(११५ . दिने दिने तदा बालो वृधे सद्गुणैः ममम् । कलानिधिः कलाभिर्वा जगदानंददायकः ।। ५० ॥ सौभाग्यध थेगाम्भीर्यरूपरजितभृतलः । क्रमात्कृमा रतामाप्य रेजे मरकुमार वत ।। ५१ !! भद्रबाहुकुमारोऽमी मवयाभिरमा मुदा । कलाविज्ञानपारीणो रममाणावतिष्ठते !! ५२ ।। एकदा दिव्यता तेन कुमार बहुभिः समम् । दिव्यकोट्टपरम्यान्ने बच्छया वष्टकैरलम् ॥ ५३ ॥ एकैकोपरि विन्यस्ता पट्टकाम्तु त्रयोदश । स्वकौशल्याद्रनं तेषु निपपात चतुदश ॥ ५४ ।। तदा गुणगणैः पूर्णी गोवर्द्धनगणाधिपः । मण्डिता मुनिमण्डल्या बिधुम्तारागणेरिव ॥ ५५ ॥ विमलं कृत विश्वामः महाधेन्दकरोकरः । प्रोट्रमन्पृथुचारित्रचंचचारुविभूपणः ॥ ५६ ।। चिकीपमितीर्थशयात्रां रैवतकाचले। विहरन्क्कापि पूतात्मा कोट्टपुरमवाप मः ॥ ५७ ॥ तत्पुराऽभ्यर्णमायानं वीक्ष्य दिग्वाममां व्रजम् । अपीपलन्कुमारास्ते क्रीडन्तनम्तचेतसः ।। ५८ ॥ तेषां मध्ये मुधीरेको भद्रबाहुकुमारकः । तस्थिवस्तित्र शुद्धात्मा विवेकी हृष्टमानसः ।। ५९ ॥
(११६)
तं कुमारं त्रिलोक्याऽमो गोवर्द्धनगणाधिपः ।
उपर्यु परि कुर्वाणं वट्टकांताश्चतुर्दश ।। ६० ॥
स्त्रम्वान्तचिन्तयामाम निमितज्ञः श्रतान्तगः ।
इ-युक्त वीग्दवन पुग केवल चक्षुपा ।। ६१ ॥
महानपा महातेजा बोधारम्भानिधिपारगः ।
भव्याम्बोरुडचण्डांगुर्भद्रबाहुभविष्यनि ।। ६२ ।।
निमित्तलक्षणः मोऽयं ममुत्पन्नावबुध्यने ।
इति निश्चिन्य योगीन्द्रः कुमारं तं वचावदत् ।। ६३ ।।
दन्नालिचंद्रिकाद्योनप्रयोतितदिगन्नरः।
भो कुमार : महाभाग ! किं नामा किं कुलस्त्वकम् ॥ ६४
किं पुत्रा बद वाक्यं मां निशम्येति वचोवरम् ।
नाम नामं गुरोः पादौ प्रोवाच प्रश्रयन्वितः ।। ६५ ।।
भद्रबाहार नाम्ना भगवन ! द्विजवंशजः
सोमश्रियां ममुद्धृतः मोमशर्मपुरोधमः ।। ६६ ।।
जगाद नं नतो योगी महाभागः निदशय ।
तावकीयं निशान्तं में श्रुत्वाऽमौ दृष्टमानमः ।। ६७ ॥
अननयन्निनं गहं विनयानतमस्तकः ।
तदीयो पितरी वीक्ष्याःऽगच्छन्नं तं महामुनिम् ॥ ६८ ।।
प्रफुल्लबदनौ क्षिप्रं मुदा समुदतिष्ठताम् ।
विधाय विनयं भक्त्या प्रादायि वरविष्टरम् ।। ६९ ॥
(११७)
उपाविशन्मुनिम्तत्रोदयाद्री वा दिवाकरः ।
मजातिः मोमशर्माऽनो व्याचष्टे विहिताचलि. ॥ ७० ॥
सनाथो नाथ ! जानोऽय वन्पादाम्भोजवीक्षणान ।
मामकं ममभृदय पृतं गेहं बदागतः ।। ७१ ।।
विभो ! मयि कृपां कृत्वा कृत्यं किञ्चिन्निमयनाम् ।
व्याजहार तनो योगी गिग प्रम्पमिटया । ७२ ॥
भवदीयाऽत्मनो भद्र ! भद्रबाहममाहयः ।
भविताऽयं महाभाग्या विश्वविद्याविशारद ।। ७ ।।
ततो में दीयनामेपो यामनार महादगत ।
शाम्राणि महलान्यनं पाटयामि यथाचिगन ।। ७४ ।।
गुरुव्याहारमाकण्य वभाण मप्रिया द्विजः ।
महानंदमापन्नो मुकुलोकन्य मन्कग ।। ७५ ।।
योम्माकोऽयं सुता दर ! किमत्र परिपृच्छयने ।
पाठयंतु कृपां कृत्वा शास्त्राण्यनमनकाः ॥ ७६ ।।
इति तद्वाक्यता नीन्या कुमारं स्थानमात्मनः ।
शब्दामहि यतकादिशाम्राण्यध्यापयदभृशम् ।। ७७ ॥
गुरुपदशा मोऽझा मीच्छात्राणि मुक्ष्मवीरपि ।
मूमेक्षणपि कि दीपं विना वस्तु विलोक्यने ।। ७८ ।।
मयुद्धिनावमामा गुम्माविकनोदिताम् ।
विनयानिलयोऽगाम्म शास्त्राऽब्धेः पारमानवान ॥ ७९ ॥
(११८)
ततो विज्ञापयामाम प्रफुल्लऽऽतननीरजः ।
कृड्मलीकृत्य हस्ताजी गरीयांमं गुणगुरुम् ।। ८० ॥
प्रभो ! प्रभुप्रमादन विद्या लब्धा मयाऽमला ।
जन्मदभ्योपि पितृभ्यो भृशं त्वमुपकारकः ।। ८१ ।।
पितरः प्राणिभिर्लभ्या नूनं जन्मनि जन्मनि ।
अभीष्टफलदाऽभ्यच्या मद्विद्या दुर्लभा जनैः । ८२ ।।
आज्ञापयति चवम्तहिं यामि निजालयम् ।
निगद्यति गुरोगज्ञामादाय म कृतजकः ।। ८३ ।।
नामं नामं गणाधीशपादाम्बुजयुगं मुदा ।
हितोपदेष्टा मानव बालम्प नित्यशो गुरुः ।। ८४ ॥
इत्यादितद्गुणांश्चित्ते कुवन्सम्यक्त्वभूपणः ।
आजगाम निजागारं मन्तो हि गुणरागिणः ॥ ८५ ॥
रूपयौवनमम्पन्नं हृद्यविद्याविभासुरम् ।
पितरी स्वात्मजं वीक्ष्य परमां मुदमापतुः ।। ८६ ॥
नानन्दयनि कि हममुद्रिकाजटितो मणिः ।
पितरी ते परिष्वज्य दो मम्प्रीतचेतमी ॥ ८७ ॥
क्षेमादिकं मिथः
पृष्ट्वा
नस्थिवान्म स्वमद्मनि ।
विद्याविनोदैर्बन्धूनामानन्दं जनयन्भृशम् ।। ८८ ॥
तत्रामावन्यदा पद्मधरभूपतिसंसदम् ।
चिकीर्षु जिनधर्मस्योद्योनं लोके समामदत् ॥ ८९ ॥
(११९)
-
।
अग्ववंगवतुइगाद्रिशृङ्गारूद महोद्धतः ।
पण्डितत मंण्डिता रम्या वादविद्याविशारदः ॥ ९० ।।
वगल्लझल्लरीजम्भनिनादेन निजेन्छया ।
नत्तयद्धिमहाविद्यानटीमुहम्मानिताम
भद्रबाहमहामट्टं दृप्या 5ऽयानं विशांपनि: :
पुरोधमः मुतं ज्ञान्या विश्वविद्याविनक्षणम् ।। ९२ ।।
बह मंमान गमाम मनोजगमनादिभिः ।
दत्वाऽ शीवचनं मोऽपि मध्यमभामपाविशन ।। ९३ ॥
कुर्वम्नत्र महाबाद ममं विप्रमदोद्धनः ।
म्याद्वादकरवालेन मकलांम्तान तीन ।। १.४ ।।
विध्य वादिना नेनो निजमाविश्वकार मः ।
महादया विशुद्धा मा चन्द्रादीनां यथा रविः ॥ ५५ ॥
प्रनियोध्य महीपादाम्नत्र जनभावनाम् ।
अकापन्निनगं धीमाना मविद्याप्रभावनः ॥ १६ ॥
गृहीतजिनमानण भृगुजा तुष्टचनमा ।
दत्तं बहुधनं नम्मै सोमाभग्णपूर्वकम् ।। १७ ।।
ततः म्बावामापाऽमी नंग्याग्मा कविभु वि ।
वादी चागमकः कोऽपि विज्ञानी विनयी परः ।। ९८ ।।
इत्थं मंणिनः च्याति परामाप वुधात्तमः ।
एकदा पितरी प्रांचे प्रश्रयान्मद्गि मुधीः ॥ ९९ ॥
॥
(१००
भवभ्रमणभीतोऽहं मंजि घृचम्ततोऽधुना ।
आज्ञापयन्ति चेत्रीन्या नहिं गृह्णामि शर्मणे ॥ १०० ।।
भाषितं भापितं ताभ्यां अन्यत्तद् दुःखदं तुजः ।
पुत्रेदं ते वचो वक्त न युक्त निष्ठरं कटु ।। १० ॥
कुत्र पुत्र ! वपुस्ते दः कलीगर्भवन्मृद ।
काऽयं व्रतग्रहोऽमयो महनामपि दुद्धरः ।। १.२ ।।
भुवाऽधुना मुखं बाल्ये पंचेन्द्रियममुद्भवम् ।
गृहणीयं ततः मूनो ! वादिस्य विमलं तपः ।। १०३
वचस्तदीयमाकत्रिवीनानं मदाशयः ।
व्रतहीनं वृथा तान : नार्य निगन्धपुप्पयत् ॥ १०४ ।।
एकतो असते मृत्युग्कनो ग्रमते जरा ।
मोहिनां देहिनां देहं काऽऽशा तत्र महात्मनाम् ।। १०५
बाद्धिक्येय ! पुनः प्राप्न जरा जरिनाङ्गक ।
तात ! तृष्णाम्पद तत्र क तो क जपो व्रतम् । १०६ ।
भोगास्तु भोगिभोगाभा दु ग्बदास्तापकारकाः ।
आपातमधुराकारा विपाक नीव बढाः ।। १०७ ।।
संसारसागरे मार कुगनिवारजीवने ।
यातनानकमंकीर्णे शरण्यं धभमङ्गिनाम् ।। १०८ ।
मोमुहीति मुधा मूढो न चैनप विचक्षणः ।
ततोऽहं के ग्रहीष्यामि मंयम शिवमाधनम् ।। १८९. ।।
१२१ इत्यादिविविधैर्वाक्य भेद्रोऽमो समधन । पित्रादीनिस्त्रिलान्बन्धृन्महामोहनिवन्धनान् ॥ १९० ।। ततो निदेशतम्तपां निर्वदाहिनमानमः । अयामीत्मयमं लिप्मुगाँवईनगणाधिपम् ॥ ११ ॥ प्रणम्य प्रश्रयान्पोचे मुनी विहिताञ्जलिः । देहि देवामलां दीक्षां यम-मनिवणाम् ॥ ११ ॥ तद्वाक्यारुणनाद्योगी वमा भापितं म्म । विधेहि वत्म ! मान्यं यमनान्म जन्मनः ॥ १३ ॥ गुरोरनुग्रहात्मोऽपि प्रावाजीन्पग्य। मुदा । हित्वा मङ्गं द्विधा धीरो दहिदुःग्वनिबन्धनम् ।। ११५ निदपिवरवृत्ताट्या भामुगे लोकमान्धवः । निरम्बरपथम्थोऽपि जेऽमी रविबिम्बवत ॥ ११५ ॥ मुनिमूलगुणोदारमणिहारविगजिनः । उद्ययारमाम्बादी प्रियपध्ययचोवदन ॥ ११६ ।। गृह्णन प्रतापगीनि गीलगाले नियन्त्रगन । वाग्माग्मानझं मूली हिन्दनपरिग्रह ।। ११७ ॥ क्षेपयन्क्षणदाहारं म्बम्बम्पादितागयः । सूत्रोक्तगमनालापाननं कुर्वन्विादधीः ।। ५१८ ।। यथोक्तादाननिक्षेपलाञ्झनमात्रयन । जिनपश्चशदुर्वानी पडावश्यकमाघदन ॥ ११० ।।
१२२, विचललोचभृशय्याम्थानेषु स्थितिभोजने । अदन्तधावने चैकभुक्त जितपरीपहः ॥ १२० ॥ गुगेग्नुग्रहाद्धीमान द्वादशाङ्गमपीपटन । मोदयन्मकलं पङ्घ वहन्धिनयमुल्यणम् ॥ १२१ ॥ पञ्चभिः कुलकम् । श्रुतसंपृणनामानमिति मंचिन्त्यभद्रदोः । श्रुतभन्या ममाढाय कार्यान्मास्थितः प्रभो ॥ १२२ ।। नदा मुग्नग म ममभ्ये-यातिभक्तिन । चक्रः पृनां प्रमादेन भद्रबाहमहामुनेः ।। १२३ ।। गाम्मीर्येण जिनाम्भोधिः कान्त्या निर्जिनशीतगुः । तजमा जिनममाधो धर्येण जितमन्दरः ।। १२४ ॥ इत्यादिगुणमाणिक्यमालालङ्कार भासुरः। निःशेषजगदानन्ददायकः मूरिरावी ।। १२५ ।। गोवर्द्धनो गणी ज्ञान्या ममग्रगुणमागरम् । स्वपदं योजयामाम भद्रबाहुँ गणाग्निमे ॥ १२६ ॥ भामयनिजभाभारं महामोहतमी हरन । शुशुभेऽयो गुगे म्याने हेलिया पूर्वाधरे ।। १२७ ।। विख्यानो तुङ्गवंश जननमुरुगुणं देहिनां देहमुद्धं हृया विद्यानविद्या गुणगुमगुरुपादारविन्देऽतिभक्तिः ।
(१२३)
गाम्भीयोदाय धैर्यप्रभृतिगुणगुणो वयवृत्तं प्रभुत्वं
श्रद्धा श्रीजैनमार्गे शशिकरविशदानन्नकीर्तिः पुण्यात्॥१२८॥
विमलबोधमधाम्बुधिचंद्रकं
गुरुपढोदयभूधरभाम्करम ।
ललितकीर्तिमुहारगुणालयं
भजन भद्रभुजं मुनिनायकम् ॥ १२९ ।।
इति श्री भद्रबाहूचम्नेि बाचायश्रीरत्ननन्दिवाचिते
भदावाहुरे भावर्णनो नाम प्रथम परिच्छेदः ॥१॥
द्वितीय परिच्छेदः
गणी गोवर्द्धनश्वाय विधाय विविध नपः ।
प्रांत प्रायं ममादाय चतुर्वागधनारतः ॥ १ ॥
ममाधिनाङ्गम-मृज्य प्रपंद त्रिदशाम्पदम् ।
देवदेवीगणैजुष्टं पुष्टं परमसम्पदा ॥ २ ॥
ततो गणाधिपा भद्रः पापयन्मकलं गणम् ।
तोपयन्निग्विलान्भव्यांदपयंभ वभौ ।। ३ ।।
कुर्वन्कुवलयानन्दं किरन्धर्मामृतं भुवि ।
मुनितारागणाकीणः शशीव बिजहार म ॥ ४ ॥
(१२४ ) अवंतीविषयेऽत्राथ विजिताखिलमण्डले । विवेकविनवानेकधनधान्यादिमम्पदा ।। ५ ।। अभादुयिनी नाना पुरी प्राकाम्वष्टिता । श्रीजिनागारमामाग्मृनिमद्धममण्डिता ।। ६ ।। चन्द्रारदातम कीनिश्चन्द्रवन्मादकतणाम् । चंद्रगुमिनृ पम्नत्रा चकच्चारगुणोदय: ।। ७ ।। मानविज्ञानपारीणो निनपजापुरंदरः । चतुर्द्धा दानदक्षो यः प्रतापजितमाम्करः ।। ८ ।। चंद्रश्री मिनी लग्न ठर: श्रीग्विापरा । मती मल्लिका जाना रूपादिगुणशालिनी ।। १ ।। एकदाऽमी विशांनाथः प्रमुप्तः सुखनिद्रया। निशायाः पश्चिम याम वातपित्तकफातिगः ॥ १० ॥ इमान पोडश दुःग्यमान ददर्शा:ऽश्चर्यकारकान । कल्पपादपशाखायण भङ्गमस्तमनं रवः ॥ ११ ॥ नृतीयं तितरप्रक्षम्यन्त विधुमण्डलम् । तु पणिनं म्म कणद्वादशमण्डितम् ।। १२ । विमान का ३ नं व्याघुटन्तं विभामुरं । कर. तु नाम्प वृत्यन्तं भृतवृन्दकम् ॥ १३ ॥ ख, नाक्षत्रान्त तुच्छ जलं मरः । मध; छहक्षरानभक्षण ।। १४ ॥ .
(१२५ ।
ज्ञानामृय गजाम्टमब्धि कलपलोपनम ।
बाह्यमानं तथावत्मै रिभाग्भृतं रयम । १५ ॥
गजपुत्रं मयारुट र जमा पिहिनं पुनः ।
रजराशि कनकान्ति युद्ध चामिदन्निनोः ॥ १६ ॥
म्घप्रानिमाविलोक्या मानमदिम्मिनमानमः ।
पिपृच्छ्यागिनं कश्चिकलं नपां शुभा- • म ।। ७ ।।
अथामी विविधान्दशान्देशाविटग्न गनापक ।
द्विद्वादशमण मनिम मंयुनः रमान ।। १८ ।।
विशालामावालमम्यिवान्भवण्यन ।
नत्र नि:न्तुकम्पाने बाघोद्यान समाप ॥ १५ ॥
फलितं नमान वनं नानासमका ।
वनपास' झान्या नमः महामने ।।
फलादिवं. नतो लान्या जगाम नृपानिविष्ट ।
मुमादिकं पुरस्कृन्य जगाढवचनं बरम ।। २१ ।।
गजबः चपुण्यन भद्रबाहरण वर्ग : ।
आजमाम न्यद्याने मुनिमन्दाहमयुनः ॥ २२ ॥
ममा वचम्नम्य चंद्रगुप्तविशापतिः ।
परमामुटमापन्न शिविर घननिम्वनं ॥ २३ ॥
बहु वित्तं ददौ नम्मै चिकीर्पगणिवंदनाम् ।
आनंदभरिकां रम्यां दापयिन्या नराधिपः ॥ २४ ॥
( १२६) गीतन नायैः मामतादिनृपैयुत. । निर्जगाम महाभृत्या वन्वितु संयताधिपम् ॥ २५ । ममासाद्य म मरीशं परीत्य प्रश्रयान्वितः । ममभ्या गुगः पादावगंधमदकादिकैः ।। २६ ।। प्रणनाम महाभन्या क्रमादन्यमनीनपि । सप्ततत्वान्वितं धर्ममश्रीपीद्गुरुवाक्यतः ॥ २७ ।। ततोऽतिभक्तितो नत्वा मॉलिमण्डितमौलिना । मुकुलीकृतहम्ताजः पप्रच्छेति श्रुतेक्षणम् ।। २८ ।। निशायामहमद्राक्षं म्बमान्पोडशकानिमान । मुरद्रशाखाभङ्गादीस्तत्फलं कथयश ! माम् ।। २० । निशम्य भापितं भोपं वभाण भापितं म्वयम् । दंताशुद्योतिताशेपदिक्चक्रं योगिनायकः ॥ ३० ॥ प्रणिधाय मनो राजन्ममाकणंय तत्फलम् । निर्वेदजनकं पुसां भाव्यमत्कालमूचकम् ।। ३१ ॥ रवेरस्तमनालोकाकालेऽत्र पञ्चमःशुभे । एकादशाङ्गपूर्वाधिश्रुतं होनत्वमेष्यति ।। ३२ ।। सुरद्रुमलताभङ्गदर्शनाद् भूप ! भूपतिः । नातोग्रे सयम कोपि ग्रहीप्यति जिनोदितम् ॥ ३३ बहुरन्ध्रान्वितस्येन्दोमण्डलोकनादिह । मतभेदाभविष्यन्ति बहवः जिनशासने ।। ३४ ।।
( १२७ )
द्वादशोरुफणाटोपमण्डितोरगवोक्षणात् ।
द्वादशाब्दमितं रीन्द्र दुर्भिक्षं तु भविप्पनि ॥ ३५ ॥
व्याधुट्य मानं गीवाणविमानं वीक्षितं ततः ।
कालेस्मिन्नाऽऽमिप्यन्ति सुरखेचरणचारणाः ॥ ३६ ॥
कचारम्बुजमुत्पन्नं दृष्टं प्रायण नन वं।
जिनधर्म विधाम्यन्ति हीना न क्षत्रियादयः ।। ३७ ॥
मूतानां नर्तनं राजन्नद्राक्षारद्भुतं तपः ।
नोचदंवरतामृहा भविष्यन्दीह मानवाः ।। ३८ ।।
खद्योतोद्योतनाल्लाका जिनमत्रोपदेशकाः ।
मिथ्वाम्बबहुलाम्तच्छा जिनधापि कुत्रचिन ।। २० ॥
मरसा पयमा रिक्त नातितुच्छ जलेन च ।
जिनजन्मादिकल्याणक्षेत्र तीर्थन्वमाश्रित ॥ ८० ॥
नाशमष्यति मद्धमा माग्वीर मदच्छिदः ।
स्थाम्यतीह कचि प्रान्त विपर्य दक्षिणादिक ।। ४१ ।। युग्मम्.
कलधौतमय पात्र भपकक्षीरभक्षणान ।
प्राप्स्यन्ति प्राकृताः पद्मामुत्तमानां दुराशया ॥ ४२ ॥
तुङ्गमातङ्गमामीनशाखामृगनिरीक्षणान ।
रान्यं हीना विधास्पन्ति कुकुला न च बाहुनाः ।। ४३ ॥
सीमोल्लङ्घनतः मिन्धोास्यन्ति सकलां श्रियम् ।
जननां च भविष्यन्ति भूमिपा न्यायलयकाः ॥ ४४ ॥
( १२८)
वन्मैरूद्वाहितोदाररथालोकान्मुसयमम् ।
तामण्य चाचरिष्यन्ति वार्धिक्ये नाल्पशक्तितः ॥ ४५ ॥
क्रमेलकममाम्राजपुत्रम्य व क्षणात ।
हिमाविधि विधास्यन्ति धर्म हि-वा-मलं नृपाः ।। ४६ ॥
रजमा :-च्छादितमद्रवराशेरीक्षणनो भृशम् ।
करिष्यन्ति नपाः स्तयां निर्ग्रन्थमनमो मिथः ।। ४७ ।।
मत्तमातङ्गयोयु द्धवीक्षणाकृष्णयोरिह ।
मनोभिलायनां वृष्टिं न विधाम्यन्ति वाग्दिाः ॥ ४८ ।।
इति बम मलं प्रोक्तं मयका धरणीवत ! ।
निशम्य भवभीनोऽमी चिन्तयामाम मानमे ॥ ४९ ।।
मंजारामारकान्तारे विपनिम्बापदाकुले ।
कामानलमहाभीम चंभ्रमीति भ्रमावा ।। ५८ ।।
देह मेहे मजामिष्टे: पापित-पि गुणानिंगे ।
मोहोनि कयं प्राणो बलबददुःबदायक ।। ५१ ।।
भांगास्तु भोगिवद्भीमा अतृप्तिजनका नृणाम् ।
आपाते
मुन्दराः
पाक किंपाकलवन्मला: ।। ५२ ।।
भुञ्जन्भागानवेत्त्यङ्गी दुरन्नं दुःचमायती ।
पर्यः पिवन्यथा प्रोत्यालकुटं वृपदंशकः ॥ ५३ ।।
इति निर्वेदमासाद्य भवभ्रमणभीनधीः ।
राज्यं स्वमूनवे दत्चा देहे गेहेमंप्रभात् ॥ ५४ ॥
(१२९) क्षमाप्य मकलान्बन्धृन्ममासाद्य गुरुं ततः । प्रश्रयात्प्रार्थयामाम दीक्षां भवविरक्तधीः ॥ ५५ ॥ गणिनोऽनुनया भृपो हित्वा मङ्ग द्विधा सुधीः । जग्राह मंयमं शुद्ध माधक शिवशर्मणः ॥ ५६ ॥ अकम्मिन्दिने भद्रो भद्रबाहुः ममाययौ । श्रष्टिनो जिनदासम्म कायस्थिन्य निकेतने ॥ ५७ ।। दृष्ट्वाऽमी परमानंदान्प्रतिजग्राह योगिनम् । तत्र शून्यगृहे चैको विद्यते केवलं शिशुः ।। ५८ ।। झोलिकांतर्गनः पष्ठिदिवसानिनम्नदा । गच्छ : गच्छ !! बचायादीनन्छुत्वा मुनिनाद्रुतम् ॥५९॥ शिशुरुक्तः पुनम्तन कियन्तोऽब्दाः शिशा ! बद द्वादशाब्दा मुने ! प्राचे निशम्य नद्वचः पुनः ।। ६० ॥ निमित्तज्ञाननोऽज्ञामीन्मुनिरुपानमद्भुतम् । शग्वादशपर्यतं दुर्भिक्षं मध्यमण्डले ॥ ६१ ।। भविष्यतितगं चंति कृपाद्र ननमा मुनिः । अंतगयं विधायाऽऽशु ततो व्याधुटिनो गृहात् ॥ ६२ ॥ ममभ्येत्याऽन्मनः स्थानं ममाहूय निजं गणम् । व्याजहार ततो योगी तपः संयमवृहणम् ॥ ६३ ।। ममा द्वादश दुर्भिक्षं भवितात्रैव योगिनः । धनधान्यजनाकीर्णो जनान्तोऽयं सुखाकरः ॥ ६४ ॥ ९
(१३०
शून्या भविष्यति क्षिप्रे तस्कर नृपलुण्टनः ।
ततः मंयमिनां युक्त नाऽत्र स्थातु सुखातिगे । ६५ ।।
निखिलेन गणेनेति प्रतिपन्नं गुरोवचः ।
शिजहीपस्ततो जातो गणीगणगणान्वितः ।। ६६ ।।
श्रुत्वेति मकलाः श्राद्धा अभ्यत्य मुनिनायकम् ।
प्रणिपत्य वचः प्रोचविनयानतमस्तकाः ॥ ६७ ।।
विजिहीष ममाकर्पा भगवन ! भवतामतः ।
क्षोभमेति मनाऽस्माकं भक्तिभारवशीकृतम् । ६८ ।
मामिन्नत्र कृपां कृत्वा स्थीयनां स्थिरचेनमा ।
यतो गुरु विना मर्चे भवन्ति पगुमन्निभाः ।। ६५ ।।
पद्यकरो विनापद्य निगन्धं कुसुमं यथा ।
भाति दन्तं विना दन्ती नद्वद् भव्यो गुरुं विना ।। ७० ।।
इति तद्वाक्यतोवाचेच्छाद्धाः ! शृणुत महचः ।
द्वादशाऽब्दमनावृष्टिमध्ये देशे भविष्यति ।। ७१ ।।
दुर्भिक्षं रौरवं चापि ततो युक्तम् न योगिनाम् ।
कदाचिदत्र संस्थातु वतभङ्गभयात्मनाम् ।। ७२ ।।
श्रुत्वा सकलमंघेन गिरं गुरुमुखोदितम् ।
करौ कुड्मलतां नीत्वा गणी विज्ञापितः पुनः ।। ७३ ।।
भगवन् ! सर्वसंघोस्ति धनधान्यप्रपूरितः ।
विषकायकरो दक्षो धर्मभारधुरन्धरः ।। ७४ ।।
( १३१) विधास्यामस्तथा यद्वद्धमस्यात्यन्तवर्तनम् । नावृष्टेरऽपि भेतव्यं स्थातव्यं स्थिरचेतसा ।। ७५ ॥ श्रेष्ठीकुवेगमित्राग्यम्तदेव ममुदाहरत । विपुलं विद्युत वित्तं वन्प्रमादन मे किल ।। ७६ । प्रत्तं न क्षीणतामति धनदम्यैव यद्धनम् । दाम्य यष्मिनं दानं धर्मकर्मादिहेतवे ॥ ७७ ॥ जिनदामम्तनः श्रेष्ठी प्रोचे मधुरया गिग । कोष्ठा विविधधान्यानां विद्यन्ते विपुला मम ।। ७८ ॥ येत वर्षशतनापि नक्षीयन्ते प्रदानतः । का वाना द्वादखाब्दानां तुच्छकालावलम्बिनाम् ।। ७९ ।। हीनदीनदरिद्र भ्यो रङ्कवादिदुःग्विने । दाम्ये यथेप्सितं धान्य दुर्भिक्षं किं करिष्यति ।। ८० ॥ ततो माधवदत्ताख्यो विज्ञापयति मे प्रभो ! वत्तंते मकला मंप प्रतीता पुण्यपोपिता ॥ ८१ ।। तत्माफल्यं विधाम्यामि पात्रदानादिभिभृशम् । सद्धर्मवृहणेनापि बन्धुदत्तस्ततोऽवदन ॥ ८२ ॥ देव ! देवप्रमादेन मन्ति मे विपुलाः श्रियः । विधास्य शामनोद्योनं दानमानक्रियादिभिः ।। ८३ ।। इत्यादिसकले: संघर्गणी विज्ञापितो ब्रवीत् । ममाधाय मनः श्राद्धा ! मद्वचः श्रृणतादरात् ।। ८४ ॥ सोऽयं सुरवृक्षाभः ममयः मवैकर्मसु । तथापि नात्र योग्यास्था चारुचारित्रधारिणाम् ।। ८५ ।।
(१३२) पतिष्यतितरां रौद्रम् दुर्मिक्षं दुःखदं नृणाम् । धान्यवदुर्लभो भावी संयमः मंयमैपिणाम् ॥ ८६ ॥ स्थास्यन्तिः योगिनो येऽत्र त नं पास्यन्ति संयमम् । ततोऽस्माद्विहरिष्यामोऽवश्यं कण टनीवृतम् ।! ८७ ॥ विदित्वा विश्वमोऽमी गुरूणामाशयं पुनः । रामल्यम्थूलभद्राख्यस्थूलाचार्यादियोगिनः॥ ८८ ॥ प्रणम्य पार्थयामास भक्त्या मंम्यिनिहतवे । श्राद्धानामुपगंधेन प्रतिपन्नं तु तद्वचः ।। ८९ ।। रामल्यप्रमुग्यास्तस्युः मःमद्वादशवर्षयः । भद्रबाहुगणी तस्माञ्चचाल वरवर्षया ॥ ९० ॥ द्वादशपिमहसूण परीतो गणनायकः । द्योतत स्म सुधांशुर्वा तारतारालिराजिताः ॥ ९१ । यदृशे विचरन्ति चारुचरिता निग्रन्थयोगीश्वराः पद्मिन्योऽपि च राजहंमविहगाम्नत्रैव भाग्योदयः । इत्युक्त हि पुगः निमित्तकुशलैस्तत्तथ्यतामाश्रिता- म्तवत्या सुगुरुप्रयाणजशुचा प्रोचुर्मिथस्ते जनाः ॥९॥ धमतो जिनपतेः सुसपया धमतोऽनघगुरोः परिचर्या । धर्मतोऽमरकुलं विभवाप्तिर्वोन्वीति हि ततः स विधेयः।।९३॥ इति श्रोभद्रबाहुपत्रे वाचार्यश्रीरत्ननन्दिविरचिते षोडशस्यनकटगुरु बहारवणनो नाम हितीयः परिच्छेदः ।२।
(१३३ । तृतीयः परिच्छेदः। अथाऽसौ विहरनस्वामी भद्रबाहुः शनैः शनैः ': । प्रापन्महाऽहवीं तत्र शुश्राव गगनध्वनिम् ॥ १ ॥ श्रुत्वा महाद्युतं शब्दं निमित्तज्ञानतः सुधीः । आयुरल्पिष्टमा-मीयमज्ञामीद्वोधलोचनः ॥ २ ॥ तदा माधुः ममाहृय तत्रैव सकलान्मुनीन् । विशाखाचार्यमापनं ज्ञात्वा सद्गुणमम्पदा ॥ ३ ॥ दशपूर्वधरं धीरं गाम्भीर्यादिगुणान्वितम् । स्यकीयगणरक्षार्थं म्बपद पर्यकल्पयत् ॥ १ ॥ ममप्ये मलं मङ्घ वभाणाऽमी पुनवेचः । मदायुर्विद्यतेऽन्यल्प म्थाम्याम्यत्र गुहान्तरं ।। ५ ।। भवन्तो विहरन्धम्माइक्षिणं पयमुत्तमम् । संघेन महता माधं नत्र निष्ठन्तु सौख्यतः ॥ ६ ॥ श्रुत्वा गुरुदिनं प्रोच विशाखा गणनायकः । मुक्त्वा गुरुं कथं यामो वयमेकाकिनो विभो ! ॥ ७ ॥ चन्द्रगुप्तिस्तदावादीद्विनयानवदीक्षितः । द्वादशान्दं गुरोः पादौ पर्युपामेति भक्तितः ॥ ८ ॥ गुरुणा वार्यमाणोऽपि गुरुमक्तः स तस्थिवान् । गुरुशिष्टिवशाद्दन्ये तस्मालुस्तपोधनाः ॥९॥ .
(१३४)
गुरोविग्हसंभृतशुचा मव्यग्रमानमाः ।
त एव कीर्तिताः शिष्या ये गुर्वाज्ञानुवर्तिनः ॥ १० ॥
विशाखो विहरन्मूरिगया निहितलोचनः ।
परीतो मुनिमंधन दक्षिणापथमुल्वणम् ।। ११ ।।
बोधयन्मकलान्भव्याञ्चोलदेशं ममामदन ।
द्योतन्छामनं जैनं पाठ्यत्रबदीक्षितान ।। १२
तस्यो नत्र गणाधीशः कुर्वन्धमपिदेशनम् ।
अथ बाहुविशुद्धात्मा भद्रपूर्व सुनचवित ॥ १३ ॥
निरन्ध्य निखिलान्योगान्योगी योगपरायणः ।
सन्यामविधिमादाय तस्यो तव गुहान्दा ॥ १४ ॥
चन्द्रगुप्तिगरीम्तत्र कुरुने पर्युपामनम् ।
सागाराणागभावन कुर्वाणः प्रोषधं परम् ॥ १५ ॥
गुरुणोक्तम्तदा शिष्यो वत्मतनत्र युज्यते ।
कुरु कान्तारचर्या चं यथोक्तां श्रीजिनागमे ।। १६ ।।
गिरं गुरूदितां रम्यां प्रमाणीकृत्य संयनः ।
प्रणम्य गुरुपादाब्जो भ्रामय स व्यचीचरन् ।। १७ ।।
म्रमंस्तत्र स भिक्षार्थ पञ्चानां शाखिनामधः ।
वनदेवी विदित्वा तं गुरुभक्तः दृढ़वृतम् ॥ १८ ॥
वत्सला जिनधर्मस्य तत्रागत्य स्वयं स्थिता ।
परावृत्य निज रूपमेकैनैव स्वपाणिना ॥ १९ ॥
(१३५ दशयन्ती शुभम्बान्ता पादपाधोधृतां पराम् । परमान्नभृतां म्थाली मर्पिवण्डादिमण्डिताम् ॥ २० ॥ तच्चित्रं तत्र वक्ष्याऽमी चिन्तयामाम मानमें । मिळू शुद्धमपि भोज्यं न युक्त दातवर्जितम् ॥ २१ ॥ ततो व्याधुटितम्तम्मादामाद्य गुममानमन ! पदृष्टं नर तन्मर्व ममाची गुगः गुरः ।। २. ॥ गुमणा गमितः शिपी यन्मदं विपिन परम् । प्रतिग्रहादिविधिना इन दाना हि गृह्यने ।। ३ ।। चन्द्रगमिति यति नन्वा योगिनम् । जगामान्यमहीप बालो.के.म् ।। - १ || मन्यां गुमं वन्देऽगी तदनं मचायन् । मूरि। गंमित शिष्यो भव्य : म चा कृतम् ॥ २५ ।। न युक्त यतिनामेनम्बयमन्यात्रमेवनम् । चन्द्रगुप्निम्तनीय:ति प्रवन्ध गम्पङ्कजम् ।। २६ ॥ कायम्यिन्यै चचालामा तत्राप्यकाकिनी त्रियम् । विलोक्यायोग्यतां मन्वा विग्गम नतो जवान ।। २७ ।। गुरुमभ्येन्यवन्दित्वा पुनम्नवृत्नमालपन् । तटाकये ममाचष्ट दीक्षितं मंशयन्गुरुः ।। २८ ।। यदुक्तमागम वन्म ! नंदवानुष्ठितं त्वया । न युक्त यत्र वामेका यतीनां तत्र जेमनम् ॥ २९ ।।
(१३६)
चतुर्थेऽहि गुरुं नत्वा लेपार्थ व्यचरन्मुनिः ।
ज्ञात्वा रखवतं धीरं देव्या तं शुद्धचेतसम् ॥ ३० ॥
नगरं निर्मितं तत्र सागारिजनं संकुलम् ।
गच्छस्तत्र मुनिवक्ष्यि नगरं नागरभृतम् ॥ ३१ ॥
प्रविष्टस्तत्र सागारवेन्द्यमानः पदे पदे।
जग्राह रुचिराऽऽहारं प्रतं श्राद्धयथाविधिः ॥ ३२ ।।
कृत्वाऽसौ पारणं गत्वा म्वम्थानं त्वरित गुरुम् ।
प्रणनाम महाभक्त्या पृयोऽमो गणिना ततः ।। ३३ ।।
पारणं विहितं वत्स ! नैग्न्तर्येण सोऽवदत ।
भगवमेकमामन गमालोकि गच्छता ॥ ३४ ॥
लेपस्तत्र कृतो देव ! नैरन्तर्येण माम्प्रतम् ।
गुरुणा संशितः शिष्यः सूत्रोक्त विहितं त्वया ॥ ३५ ॥
चन्द्रगुप्तिमनिर्भक्त्या विवेकविनयात्मकः ।
पारगां तःपुरे कुवन्नु पास्त गुरपंकजम् ॥ ६ ॥
भयसप्तपरित्यक्तो भद्रबाहुमहामुनिः ।
असनायापिपासोत्थं जिगाय श्रममुन्वणम् ।। ३७ ॥
चतुर्थागधनां शुद्धामाराध्य विधिवन्मुधीः ।
शुद्धोपयोगमाधाय देह निम्पृहमानमः ।। ३८ ।।
समाधिना परित्यज्य देहं गेहं रुजां मुनिः ।
नाकि लोक परप्राप्तो देवदेवोनमस्कृतम् ।। ३९ ।।
चन्द्रगुप्तिमु निस्तत्र चंचेचारित्रभूषणः ।
आलिख्य चरणी चारु गुरोः संसंवते सदा ॥ ४० ॥
(१३७) वैभवं विनयो विद्या विवेको विपुलं यशः । मतिभूत्यादयोन्येऽपि भवन्ति गुरुभक्तितः ।। ४१ ।। गुरुभक्त्या भवेद्यत्र महारण्ये मह.पुरम् । तत्राभीष्टं फलं चैव कल्पवल्येव विन्दते ॥ ४२ ॥ दानं तपो तथा ध्यानं क्षमाक्षजयमक्रिया। गुरुशिष्टिं विना म पृथा निर्नाथसैन्यवत् ॥ ४३ ॥ विदित्वेति सदा भव्या इहा मुत्रमुग्वैषिणः । कुर्वन्तु श्रीगुरांपाम्नि मवाभीष्टफलपदाम् ।। ४४ ॥ रामल्यस्थूलभद्राद्या अवन्त्यां ये तु मंस्थिताः । गुरोः शिष्टि ममुष्टय तेषां तत्फलमुच्यते ॥ ४५ ॥ अथाऽखिलजानन्तेपु दुर्भिकं ममपी पतत् । नितरां दुःखदं नृणां दारुणं पष्टकालवत् ॥ ४६ ॥ तदा कुवेरमित्राद्या अनिवाय कुबेरवत् । हीनदीनदरिद्र भ्या ददुदान दयालवः ।। ४७ ॥ अन्यदेशभवालोका दुर्भिक्षणाति दुःखिताः । विदित्वा विजयऽवन्त्यां मीभिक्ष्यं मुखकारणम ॥ ४ ॥ इतस्ततः ममाजग्मुः क्षुधा क्षीणकलेवगः । रङ्का वङ्का गताशङ्का वभृयुम्नत्र भूरिशः ॥ ४० ।। कोचपगस्थमात्राङ्गः क्षुप्तिपमाऽनपीडिताः । व्याधिताः शोकिताः कचिन्मयन्त न्येत द ग्बत ॥ ५० ॥ क्षिपन्ति स्पशिशन्कचित्म्बादन्न्यन्यं शवादिकान । ग्रासैकार्थ सुतं माता हन्ति पुत्राऽपि मातरम् ॥ ५१ ।।
दीयमानं कचिच्छुन्वा धावन्तेस्तेप्रतस्तत् । कचिल्लु ठन्नि भूपीट पोड्यन्तेऽन्ये रटन्ति च ॥ ५२ ।। अन्तरङ्का बहिरङ्का वीथ्यारङ्का पदे पदे । म्वमिताश्व मृताः कचित्माऽऽमीद्रवमयी ततः ।। ५३ ।। एकदाऽहारमादाव गमल्याद्या बने गताः । मुनिरक स्थितः पश्चाद्वीक्ष्य रङ्का भृतोदरम् ।। ५४ ।। मिलि-वा बहवस्त तु निर्दयक्रुर चेतमः । विदार्ग जटरं तम्य तदन्नं द्रागभक्षयन् ।। ५५ ।। मुनरुपद्रवं घोरं निशम्या तीव भीपणम् | हाहारवकलं जातं निग्विलं नगर दनन् ।। ५६ ।। सर्वे मंभव मागाग व्याकुलीभृनमानमाः । दुःखदायाप्नलम्लाना आमेदर्मनिमण्डलीम् ॥ ५७ ।। नत्वा विज्ञापयामामुर्ग मुनिगणावृतम् । भगवन : भीषणः कालः कृतान्ती वा ममायया ॥ ५८ ॥ ततोऽनुग्रहं कृत्वा प्रमाणीक्रियतां वचः । मध्ये पुरं वनं त्यक्त्वा तिष्ठन्तु यतयोऽखिलाः ।। ५९ ॥ स्वथाऽम्माकं भवेत्स्वास्थं मयतानां च रक्षणम् । भवतां शुद्धबोधानां यथारण्यं तथा पुरम् ।। ६० ।। श्राद्धैरभ्यर्थिना भृयोङ्गीचक्रुस्तद्वचो वरम् । संयता: ममानीता मध्येद्गं महोत्सवात् ।। ६१ ॥
(१३९)
रक्षिता ज्ञानिबन्धेन भिन्न भिन्नाश्रयेष ते ।
तस्थिवांमोऽखिलास्तत्र संयमाहितचेतमः ।। ६२ ॥
प्रमिवर्ष पनल्यवं दुभिक्षं दुःखकारणम ।
यदा ते यान्ति लेपार्य रंका म्यु. पृष्टम्तदा ।। ६३ ।।
बदन्तो देहि देहीनि दानं वचो दयाभयम् ।
गन्तं तेभ्यो न लभ्यता हारार्थं मुनिमत्तमः ॥ ६४ ॥
ताड्यन्ति तदा श्राद्धा यष्टयाद्यः क्षीणविग्रहान ।
विलपन्ति बगकाम्ते कान्ति दीननानमाः ।। ६५ ।।
विधाय विन्नमायान्ति मुनयोतिदयालयः ।
तन्निरोश्य इचिचापि दत्तद्वारं निकननम् ।। ६६ ।।
मागारा व्याकलीभृतः ममाजग्मुगुरोः पुरः ।
विज्ञप्ति चक्रिरे नत्वा भक्तिमारवशीकृताः ।। ६७ ।।
किं कार्यामधुना नाथ ! रङ्कव्याप्त खिला मही।
क्षणकं न जनो द्वारमुद्घाटयति तद्भयात् ।। ६८ ।।
दिवा न पायने वक्तं ततो नं निशि पच्यते ।
कालो-यं विषमो भीमो धर्मध्वंसकगेऽमहः ॥ ६ ॥
नतम्तम्यां ममादाय पात्ररम्मनिकनात् ।
मदन्नं म्बाश्रये नीत्वा भवन्तो रङ्कमाध्धमान ।। ७० ।।
तत्रैव वाम यात कुरुवं भोजनं पुनः ।
प्रमाणीकुमनास्माकं वचः मर्व सुखप्रदम् ।। ७१ ॥
तच्छुन्वा नान्पुनः प्राचुर्विमृश्याऽखिलसंयताः ।
तावदेवं विधास्यामो यावत्कालो न शोभनः ॥ ७२ ॥
इत्वदीर्याऽदधुः पात्रमलावूनममागंगाः । भिक्षुव श्वमयात्तेऽतो गृहीत्वा यष्टिकां करे ।। ७३ ॥ स्वस्वाश्रमे समानीय भक्तं ते गहिगेहतः । आहारे दढते न्योन्यं स्वय मार्गपरिच्युताः ॥ ७४ ।। दत्वा च वमनद्वारं गवाक्षम्य प्रकाशतः । इत्याचरन्ति ते नि-यं कापथम्या लम्बिनः ॥ ७५ ।। अन्यदेको मुनिः कश्चि क्षीणाङ्ग मवर्जितः । भिक्षापात्र कर कृत्वा निशीये निर्ययो तनः ।। ७६ ।। प्रविवेश यशोभद्रष्टिनो बरमद्मनि । गृहिणी गुर्विणी नम्य धनश्री नामधारिणी ।। ७७ ।। विलोक्य भीपणे रूपं यष्टिपात्रादिमंयुतम् । ध्वान्ते मो राक्षसभ्रान्त्या तत्रास नितरां हृदिः ।। ७८ तद्भियाऽपीपत्तस्या भ्रूणो बिभ्रमकारकः । मुनियाधुटितम्तस्यात्तदा हाहारवोऽभवत् ॥ ७९ ।। सागराः संयतान्प्राप्य प्रोचिरे गिरमुत्तमम् । विनष्टो मुनयः कालः श्रूयतां नो वचस्ततः ॥ ८० ॥ एतञ्च विषमं रूपं जनानां भीतिकारकम् । धृत्वा सुरल्लक शीर्षे परिधायार्द्ध फालकम् ॥ ८१ ।। नक्त भक्त समानीय वासरे कुरुताऽशनम् । यावन शोभनः कारम्तावदेवं विधीयताम् ।। ८२ ।। काल मन्जुलतां प्राप्ते पुनस्तपसि तिष्ठत । तहम्युपगतं वाक्यं तेषां सकलसाधुभिः ।। ८३ ॥
(१४१)
इन्याचरन्तम्त प्रापुः शैशन्यं तु शनैः शनै:।
प्रत्यृहादिव्रतेचैः किं न कुर्यु : कदप्वगा ॥ ८४ ॥
इथं तु द्वादशाब्देप गतेषु बहदुःखतः ।
सुवृष्टिः सुम्थितिः मौग्य मौभिक्ष्यं ममजायत ॥ ८५॥
अथापाचीजनपदाद्विशाखो गणनायकः ।
उत्तरापथमागच्छ संस्कृतो मुनिसत्तमैः ।। ८६ ।।
भद्रवाहगुरुयत्र तस्थौ तत्राममाद म ।
गुगेनिधिका केन बबन्द विनयान्वितः ॥ ८७ ।।
चन्द्रादिगुप्तिमुनिनान्दिनः मू ग्मित्तमः ।
कथं श्राद्धं विनास्त्राम्यने येप प्रतिवन्दितः । ८८ ।।
तहिने मुनिभिः मरमपामं कृतं शुभम् ।
मागगभावमन्वानश्चन्द्रगनिम्नतो लपत् ।। ८९ ।।
भगवन : भागमागारं नगरं नागरमृनम् ।
विद्यते विपुलं नत्र क्रियता कायमस्थिति ॥ ९० ।।
माश्च हद माम्ले तपाहणार्थ प्रपंदिरे ।
मकलवरश्राद्ध वन्यमानाः पदे प्रदे ।। ९१ ।।
विधाय विधिनाऽहारमाजरग्मुम्न निजाश्रयन ।
तत्रेका कुण्डिकां वणी विस्मृतो वरपत्तने ॥ ९२ ।।
स गतस्तां पुनातु नेक्षते तत्र न.पुरम् ।
कुण्डियां शाखिशाग्वाम्यां व्यलो किष्टव केवलम् ।। ९३ ।।
आदाय तां तदा वीं प्राप्य तद्गुरुमालपत् ।
तदद्भुनं नियम्यामो चिन्तयामास मानसे ॥ ९४ ॥
(१४२) अयं विशुद्धचारित्रश्चन्द्रगुप्तिर्महामुनिः । तदीयपुण्यतो नूनं देवतारीरचत्पुरम् ॥ ९५ ।। विघुगुप्ति प्रशस्यासावणाक्षीहि सदाशयम् । तत्रत्यं मकलोदन्तं प्रतिवंद्य च नं पुनः ।। ९६ ॥ न योग्यो यतीनां लेपो मन्येति सुरकल्पितम् । प्रायश्चितं ततो प्राहि मुनिना मूरिजन्पितम् ।। ९.७ ।। तढा बिलगणेनापि गृहीतं गणिनः म्फुटम् । ततोऽमो विहरनम्वामी कन्यकुब्जां ममापनत् ।।८।। अधधनपयमानः मच्चरित्राबधानो, मिहिरकरसुधामा शुद्धबोधैकधामा । फलितनगनिवेशे तत्पुगेद्यानदेश, मुनिबरगणपूर्णः सूरिवर्योऽवनीर्णः ॥ ९९ ।। निरन्तरान्तगतात्रवृत्ति, निरस्तांधभतोवितानम् । श्रीभद्रबाहुष्णकरं विशुद्धं, विनंनमीमीतिशातसिद्धये ॥ १० ॥ इति श्रीभद्रबाहुचरित्र साध यंभीरवनन्दिविरपिने द्वादश वर्ष दुभिम व खिाचार्यगमन वर्णनोगम तृतीयोऽधकार: ।३.
(१४३)
चतुर्थ: परिच्छेद:
स्थूलाचार्याभिधानोश्र ममाकर्ण्य गणान्वितम् ।
विशाखाचार्यभायातमवाचीविजयादिह ।। १ ।।
तं दृष्टुप्रोपिताः शिष्या गताम्त मूरिमन्निधी ।
तत्रामौ वंदितः समुनिभिभक्तित परः ।। २ ।।
विहिता गणिमा तर तपां न प्रतिवंदना ।
किमिद दर्शनं नूनमादृतं चंति भापितम् ।। ३ ।।
श्रत्वा तेऽतित्रपापन्ना व्याघुट्य तद्गुरुं जगः ।
रामल्यम्थूलभद्राख्यो लाचास्त्रियोप्यमी ॥ ८ ॥
एकीकृ-याऽखिलांमाधृन्ग्रोचिरे ते मिथो वचः ।
किं कार्यामधुनाऽस्माभिः का स्थिनिश्च सुग्घप्रदा ।। ५।।।
स्थूलाचार्यस्तदा वृद्धी व्याजहार बचो वरम् ।
शृणुध्वं मामिकां वाचं माधवाभीष्टमौरव्यदाम ।। ६ ।।
जिनोक्तमार्गमाश्रिन्य हिन्वा कापथमञ्जमा ।
कुरुव्वं शिवमंसिद्ध छेदोपस्थापनं परम् ।। ७ ।।
न तेषां तद्वचः प्री 2 माधूनां हितमप्पभृन ।
पित्तज्वरवतां किं न मिनापि कटुकायने ।। ८ ॥
ततोऽन्ये मुनयः प्राचुर्यविनोद्धनबुद्धथः ।
यदुक्त स्वयका सूर : तने वक्तु न युज्यते ॥ ९ ॥
..
(१४४)
ततोऽत्र विपमे काले द्वाविंशतिपरीषहान् ।
क्षुत्पिपामाऽ तरायादीन्कः महेता तिदुस्सहान् ॥ १०॥
भवन्तः स्थविराः किश्चिनविदन्ति शुभाऽशुभम ।
सुखमाध्यमिमं मार्गमुक्वा कः दुष्करं चरेत् ।। ११ ॥
स्थूलाचार्यम्तन. प्रोचे नैनदर्शनमुत्तमम् ।
किंपाकफरवद्रम्यमधुनानि दु खदम् ।। १२ ।।
मृलमार्ग परित्यज्य कापर्थ कल्पयन्ति ये ।
भ्रमंनि नं भवारण्ये मरीचाया यथा पुग ॥ १३ ।।
नायं मार्गा भवेः मुक्त्यै परं स्त्रोदरपूर्तये ।
कचित्तदृक्तिनो भव्या मूलमार्ग प्रपंदिरे ॥ १४ ॥
कचिम्नदुक्या माया मनयः कोपमागताः ।
जाज्वलीति न कि तप्तं तैलं शीनाम्बुनापि हि ।। १५ ।।
कुपिता ने तदा प्रोचुवीयानेष वेत्ति क्रिम् ।
वक्तीत्थं वातुलीभूतो वार्धिक्ये वा मतिभ्रमात् ॥ १६ ॥
वृद्धोयं यावदनास्ति तावत्रो न मुखस्थितिः ।
इति मंचिम्य ते पापातं हन्तु मनिमादधुः ।। १७ ॥
दुटैश्चण्टे शिष्यमण्डदण्डैहनो हटान् ।
जीर्णाचार्यस्ततो क्षिप्ता गर्ने कूटेन तत्र ते ॥ १८ ॥
कुशिष्याणां हि शिक्षाऽपि खलमैत्रीव दुःखदा ।
मृत्वाऽऽत्तध्यानतः सोऽपि व्यन्तर समजायत ॥ १९॥
(१४५ । विदिश्वाऽवधिबोधेन देवोऽमौ पूर्वमंभवम् । चकार मुनिमन्या नां तिगं दुरुपद पम् ।। २० ।। रेपलानियांद्यैवदन्निति वचोभृशम् । तथा जन्यं विधाम्ये वो यथा मे विहितं पुरा ॥ २१ । मर्वेतमृचु मंत्रम्ता नान्या गुरुचरं नके । क्षमम्ब मामकीनागो देवाःज्ञानाद्विनिर्मितम् ।। २२ ॥ यदीमं विषयं त्यकन्या ग्रहिष्यथ सुमंयमम् । नहा जन्महिमाश् च ते नहाकर मंजगः ॥ २३ ।। दर्धगे मलमानीगं न धतुं शक्यते तन । निम्यं गुमधान पूजा विधाम्यामा निभक्तिः ॥ २४ ॥ नी-वानिविनयाच्छान्ति कुपितं यत्नरा मनम् । गुगेगस्थि ममानीय तत्र मंकल्पने गुरु ।। २५ ।। नियमान्त वन्दन्ते लोक द्यापि लपति तम् । खमणादिहडी याग्यं क्षपणास्यिप्रकल्पनात् ॥ २६ ॥ तथा तच्छान्तये काष्टपट्टिका टाङ्गतायता । चतुग्म्रा म एवेयमिनि मंकल्प्य पूजिता ।। २७ ।। यथाविधि परिम्थाप्य पूजितः मोडेफालकैः । परित्यक्त ततम्तन चेष्टितं विक्रियामयम् ।। २८ ।। पर्युपामननामा मौ कुलदेवोऽभवत्ततः । भक या महीयतेऽद्यापि वारिगन्धाक्षतादिकः ॥ २९ ।। अतोद्धफलकं लोके व्यानसे मतमद्भुतम् ।
(१४६
कलिकालबलं प्राप्य मलिले नलबिन्दुत् ।। ३० ।।
श्रीमजिनेन्द्रचन्द्रस्य सूत्र मंकल्पते न्यथा ।
वर्तयन्ति स्म दुर्भार्गे जनान्मूढत्वमाश्रितान ।। ३१ ॥
यथा म्वयं ममारब्धं व्रतं पंचाक्षलोलुपैः ।
निरङ्कशैम्तथा मूत्रे सूत्रितं निजबुद्धितः ।। ३२ ।।
एवं बहुतरे काले पनिकालेऽभवत्पुरे ।
उज्जयिन्यां विशांनाथश्चन्द्रयच्चन्द्रकीर्तियाक ।। ३३ ।।
चन्द्रश्री: श्रीग्विख्याता तम्याप्रमहिपी शुमा ।
दम्पत्याश्चन्द्रलेखाख्या तयाजात्मजा बग ॥ ३४ ॥
माभ्याने मुनिमन्यानां शास्त्राणि ममपीपठन् ।
विचक्षणा भवद्र पलावण्पादिगुणान्विता ।। ३५ ।।
मौराष्ट्रविजयेऽथा:स्ति वलभीपुरमुत्तमम् ।
धरेशिताप्रजापालनाम्ना तत्र नयान्वितः ॥ ३६॥
निजप्रतापतापन तापिताऽ खिलशात्रवः ।
प्रजावती गिरा राज्ञी तस्याऽऽसीचारुलक्षणा ।। ३७ ।।
लोकपालाभिधस्तोकस्तयोश्चारुगुणोऽभवत् ।
रूपमौभाग्यसम्पम्रो ज्ञानविज्ञानपारगः ॥ ३८ ॥
प्रजापाल. स्वपुत्रार्थ चन्द्रकीर्तिनृपात्मजाम् ।
प्रमोदाप्रार्थनायामास चन्द्ररेखां गुणौजलाम् ॥ ३९ ॥
उपयम्य कुमारोऽसौ तां कन्यां नवयौवनम् ।
बोभुजीति तया भोगान् शच्या वां सुरनायकः ॥ ४० ॥
: १४७
क्रमात्मप्राप्य पुण्येन प्राज्यं गज्यं पितुम दा ।
चकार चन्द्रलेखां ना मदनममहिषोपदे ॥ ४१ ॥
लोकपालो नृपः मार्थ कुर्दन्नामान्मनो भृशम् ।
विधत्ते विशद राज्यं नताऽशेषपमहीपति ॥ ४२ ॥
एकदाऽनन्दचित्तोमो राइमा विज्ञापितो नृपः ।
नाथा स्मद्गुरवः मन्ति कन्यकुजारख्यपत्तने ॥ ४३॥
तानानाय य वेगेन जगत्पूज्यान्मदाबहान ।
प्रियाप्रियतया भूपस्तद्वचो मानयन्मुदा ॥ ४४ ॥
नॉल्लातु प्रपयामाम नवाऽमीयमञ्जनान ।
गत्व नेन्वा भृशं भवन्या गुरूंम्तं तत्र मंस्थितान ॥ ४५ ॥
तैः समभ्यर्थिता भृयो विनयादद्धफालकाः ।
जिनचन्द्रादयः प्रापुर्वलभीपुरभेदनम् ।। ४६ ।।
आकाऽऽगमनं माधुमहस्य धरणीश्वरः ।
वन्दितु निःससाराशु परानन्दश्वामितः ॥ ४७ ॥
तूयत्रिकवराराववधिरीकृतदिङ्मुग्वम् ।
सामन्ताऽमात्यपरित्यपरिवारपरिष्कृतः ॥ ४८ ॥
विलोक्य दूरतः साधृन्विस्मयादित्यचिन्तयत् ।
किमेतद्दर्शनं निन्यं लोकऽत्र स्वविडम्बकम् ।। ४९ ॥
नग्ना वस्त्रंण मंविता नेक्ष्यन्ते यत्र माधवः ।
गन्तुन युज्यते नोत्र नूनदर्शनदर्शनात् ॥ ५० ॥
व्याघुट्य भूपतिम्तमानिज मन्दिरमेयिवान् ।
ज्ञात्वा राज्ञी नरेन्द्रस्य मानसं सहसास्फुटम् ॥ ५१ ॥
(१४८)
गुरूणां गुरुभक्त्वा सा प्राहिणोम्सिचयोच्चयम् ।
तैगृहीतानि वासांमि मुदा तानि तदुक्तिनः ।। ५१ ।।
ततम्ते भूभृता भक्त्या पूजिना मानिता भृशम् ।
किमकार्यन्न कुर्वन्ति गमागेण रत्रिताः ॥ ५३ ॥
धृ नानि श्वेतवामांमि तहिनात्ममजायत ।
श्वेताम्बरमतं ग्व्यातम् तनोई सालकतात् ।। ५४ ॥
मृत विक्रमभृपाले पटिवशाविक शने ।
गते व्हानामभृलोक मनं श्वेताम्बराभिधम् ॥ ५५ ॥
भुनक्ति कंवलजानी वीणां मक्षोपि तद्भवे ।
साधनां च ममङ्गानां गभापहरणादिकम् ।। ५६ ।।
इगागममन्दोहं विपरीतं जिनोदितम् ।
व्यरीरचत्म मृदामा जिनचन्द्रो गणाग्रणी ॥ ५७ ।।
अनन्तमाख्यता यम्य न तम्या हारमभव ।
यदस्ति तर्हि जायन व्यायना नन्तसम्मंगाम् ।। ५८ :
नारत्या ऽदारः क्षुधा मात्र हुन्मूलो दोपमंचयः ।
इदि हताः सदापवं जिनदेहस्य जायते ।। ५९ ।।
बोभत्रीनि चुमुक्षाऽ द्यं मद्भावे वेद्यकम्र्मणः ।
भुक्ति केलिनां तस्मान्न युक्ता दोपदायिनी ॥ ६० ।।
क्षीणमाहे जिने वेद्यं स्वकार्यकरणे.क्षमम् ।
स्वकीयशक्तिरहितं दग्धरज्जुवदखमा ।। ६१ ।।
मोहमूढ़ भवेद्वेद्यं क्षुधादिफलकारकम् ।
तदभावेऽक्षम वेद्यं छिन्नमूलतर्यथा ॥ ६२ ॥
(१४९) भोक्तुमिच्छा बुभुक्षा स्यात्स्वेच्छापि मोहमंभवा । तद्विनाशे जिनेन्द्रस्य कथं स्याद्भुक्ति मंभवः ॥ ६३ ॥ तद्यथा- विरक्तस्येन्द्रियार्थेषु गुमित्रित पमोयुषः । मुनेः मंजायते ध्यानं कर्ममर्मनिवहणम् ॥ ६४ ।। ध्यानात्माम्यरमः शुद्धम्तम्माम्पात्मावबोधनम् । विदधाति तनोऽशेष मोहनी यक्ष सुधीः ।। ६५ ।। क्षीणमोही ततो भृ-त्रा कन्या वनित्र यक्षयम् । शुक्लध्यानाऽमिना योगी कंवलोम्याद्विभामुः।। ६६ । मुक्तोऽष्टादशभिपिस्तृप्ता नन्तामुग्वामृतैः । लोकालोको लमद्वोधो भुइत मी कवली कथन ।। ६७ ।। दोपाः क्षुधादयः केचि द्वयन्त चन्नप्रभा । कथं पाहीतरागा:मी गद्दामा दोपविच्युतः ।। ६८ ।। उदामीन्य जप माधोः कुर्वना भोजनादिकम् । यदिम्याद्वीतरागावं तर्हि कवलिनी न किम् ।। ६५ ।। चातुलानां प्रलापोऽयं भवन तु मनीषिणाम् । यतम्तत्रोपचारेण चीनगगवकल्पना ।। ७० ।। तनुम्थितिनेचाऽऽहारं विना कापीह दृश्यने । कवलज्ञानिभिस्तम्मादाहारो गृमने निशम् ।। ७१ ।। नोकर्म कर्म नामा च कबलो लेपनाम भाक् । उजश्व मानसाऽऽहार आहारः पड्विधो मतः ।। ७२ ।।
(१५० ) देहिनामवमाहारम्तनुमंस्थितिकारणम् । तन्मध्ये कवलाहारादन्यम्माद्वा तनुस्थिति ।। ७३ ।। कर्मनाकर्मकाऽहार ग्रहणादेहमंस्थितिः । भवनकवलिन चैत मम्मं नो मते म्फुटम् । ७१ ।। आहोम्बिवत्कवलाहार पूर्षिकाङ्गस्थिभवेत् । त्वयं कथ्यते तत्र गमिट्ठा व्यभिचारिता ।। ७५ ।। एकाक्षजानिजीवेषु लेपाहरी हि सम्भवेन् । देवेषु मानमाऽ हार उजश्च खगजानिपु ॥ ७६ ॥ उक्तश्चाऽन्यत्र- - गोकम्मं तिन्थारे कम्म णारय माणमो अमरे । कबलाहागे णरयम् परम्वी उज्जोणगे लेऊ ।। ७७ ॥ ततोऽर्हनी न स्वनऽपि प्रामाऽऽहारो रद सुधीः । अथास्तु तस्य वेग्रेन युभुक्षापरिकल्पनम् ।। ७८ ।। कथं भुक्त जिनः पश्यन जन्तूनां विविधं वधम् । जिनोऽल्पज्ञानिवच्छुद्धमशुद्धं वा भुनक्ति किम् ॥ ७९ ।। अमावेनान्तरायाणां कुरुते यदि भोजनम् । श्राद्वेभ्योऽप्पतिहीन वमाप्नुयात्तर्हि गर्हितम् ॥ ८० ॥ विलोक्य मांसरक्तादीनान्तरायान्करोति च । तदा सर्वज्ञभावम्व तेन प्रत्तो जलावलिः ।। ८१ ।। केवली कालाहारं करोतीति वदन्ति ये । तथापि ते न लज्जन्ते दुर्मताऽऽसवमोहिताः ॥ ८२ ।। -इति केबलिभुक्तिनिराकरणम् ।
५१) भ अथ तम्मिन्भवे त्रीणां मोक्षं ये निगदन्ति । ने दुराग्रहग्रहग्रम्ना जनाः किं वा तियानलाः ।। ८३ ॥ नपेऽपि दुर्द्धर धोरं कुमते रहियोपितः । तपोपि तद्भों नूनं मुस्किान: दबी लो ।। ८ } !! बीपुयोस्तु जदा विशेष-वन निधान् । मोक्षाऽत्र मिनु नारीणां कथं मात्र पता पत: ।। ८५ ।। यद्यस्ति जीव मानान्यदना ली याविनः । मानङ्गीधीवरीमग्मा: पिन नम:।।। ८६ ॥ योनाऽवशुद्धता कि सूबनभि: आनंयं जायने नाम निर: योनिझक्षाचम्य रक्षा: पातु । सदा बीणां प्रान्त न. I HIT:. ८८ ।। प्रकृतिः कुन्मिना नामां लिङ्गं चानान्तनिन्दितम् । तना न संयमः माक्षान्मक्तिथापि कुनम्तना ।। ८९ ॥ वीरूपनीयकतणां तल्लिङ्गवमण्डिताः । विद्यन्त हिदाक्वापि प्रतिमाश्चनिगद्यतः ।। ९.॥ पक्षहानिर्न चन्मन्नि मन्ति चद्भण्डिमाम्पदम् । इति दाण्यावामी न स्त्रीणां शिवसंभवः ॥ ९१ ॥ चक्रिकशवगमा नमण्डलेशादिमत्पदम् । तथव श्रुतकवन्यं मनःपर्ययबोधनम् ।। ९२ ॥ गणेशमूग्यपाध्यायपदं स्त्रीणां भवेन्न चेत् ।
(१५२)
कथं सर्वज्ञता तामां जगत्पूज्या घटामटेत् ।। ९३ ।।
कुलीनः कुशलो धीरः मंयमी मंगवर्जित. ।
निर्जिताक्षः पुमानेब वृणीते मुक्तिमानिनीम् ।' ९४ ।।
-स्त्रीमुक्तिनिराकरणम् ।
निग्रंथमार्गमुत्सृज्य मग्रन्यन्वन ये जडाः ।
व्याचक्षन्ते शिवं नृणां दुचो न घटामटेत् ।। ९५ ।।
ससङ्गत्वेन निर्वाणमाघनं यदि विद्यते ।
प्राज्यं राज्यं कथं त्यक्तमादिदेवेन ब्रहि मे ॥ ९६ ।।
कुलीनोऽपि महाविद्य आधसंहननान्यतः ।
नरोनिग्रन्थना भावान्न निवाति सुलक्षणः ।। ९६ ।।
मचेलकम्बलं दण्डभिक्षापात्रादिमंयुतम् ।
साधुजा नोपकरणं गृलने मोक्षकांक्षिणा ।। ९८ ।।
गृहणाचोवरादीनां लिक्षायूकाश्रयो भवेत् ।
निक्षेपाऽऽदानतस्तेषां क्षालनाच्च वधोङ्गिनाम || ९९. ।
चेलाऽम्पर्थनया दैन्यं लब्धे स्यान्मोहमोहिन. ।
ततः संयमताहानिर्मल्यं च कुतम्तनम् ।। १०० ।.
ततः सङ्गद्वयत्यक्त जिनलिङ्ग प्रशस्यते ।
ससम्यक्त्वस्य जीबम्प मोक्षमाख्यम्य माधनम ||१०॥
संयमो जिनकल्पस्य दुःमाध्यो ततोऽधुना ।
वृत्तं सविरकन्यस्य तस्मादस्माभिगश्रितम् ।।१२।।
भावदैतदचोऽसत्यमज्ञाचा लक्षणं नयोः ।
ततः सविरकन्पेऽपि नैवास्ति संगमंग : ॥ १३ ॥
( :५३) अथाऽभिधोयते ताजिनकल्पारख्यमंयमः । मुक्तिकान्तापरिम्वङ्गमौख्यं गुङ्क्ते यतो मुनिः ।। १०१ ॥ सम्यक्त्वरत्नसद्भूषा विजितन्द्रियवाजिनः । विदन्त्येकादशाङ्गं ये श्रुतमेकाक्षरं यथा ॥ १०५ ॥ क्रमयोः कण्टकं भग्नचक्षुपा मङ्गतं रजः । स्वयं न स्फेटयन्त्यन्यापनातमभापणम् ।। १०६ ।। दधानाः मनतं मोसमा हनना , श्रिताः । कन्दसँ कानन जले वन्ति तटनीतटे ।। १०७ ॥ पण्माममबतिष्ठन्ने प्रावृट्कालङ्गिकले । जाते मार्गे निगहाग काग:मग ममाश्रिताः ॥ १०८ ॥ नैग्रन्थपदमापन्ना रत्नत्रितय मण्डिताः । निर्वाणमाधने निष्टाः शुभध्यानद्वये रताः ॥ १०९ ।। यतया निश्चिनावामा जिनवद्विहरन्ति वै तस्मात्त जिनकल्पाग्या गदिता गणनायकैः ।। ११० ॥ अथ स्थविरकल्पा ये जिनलिङ्गधग वगः । मुनयः शुद्धमम्क्वमुधामन्धान चनमः ॥ १११ ।। युक्ता मूलगुणरष्टा विशनिप्रपितैः शुभैः । ध्यानाध्ययनमलीना धृतपञ्च महावता || १ || पञ्चाचाररता नियं दशधा घमहिनाः । ब्रह्मवनेषु मन्निष्ठा वाग्धान्तग्रन्यात : । ।।३।। तृणे मणी पुरेऽरण्य मित्रं मित्र मुग्ने मु.। 'ममानमतयः शश्वन्मोहपानमहोझिना ।। १.४ ।।
(१५४ - धर्मोपदेशतोऽन्यत्र मदाऽभाषणधारिणः । श्रतमागरपारीणा: कंचनावधियोधगाः ॥ ११५ ॥ मन.पायिणः केचिद्गृह्णन्त्यवधिनः पुग। चारु पञ्चगुणं पिच्छं प्रतिलेखननवे ।। ११६ ।। विरहंति गणे: माकं नि-यं धर्मप्रभावनाम् । कुर्वन्ति च मुशिष्यागां ग्रहणं पोषणं तया ॥ ११७ ।। म्थविगदिवनितानत्राणपोपणचतम । ततः स्थविकल्पम्घा प्रच्यन्त मरिमनमै ॥ ११८ ।। माम्प्रत कलिकाले म्मिन्हीन महननन्वतः म्यानीयनगरनामनिनमनिनामिनः ॥ ११९ ।। कालोऽयं दुःमहो हीनं शरीर तरल मनः । मिथ्यामनमनिल्याप्तं तथापि मंधमाद्यताः ॥ २० ॥ ( ? ) उक्त च- वरिसमहम्मेण पुग जं कम्मं हण तंण कार्यण । तं मंपद वरिमण न णिज्जाड होणमंहणणे ।। १२१ ।। गृहन्ति पु तकाद्यं ये योग्यं मंयमिनां शुचि । सावद्यसंभवापेनं मुनयो मोक्षकांक्षिणः ।। १२२ ॥ इक्स्थविरकल्पः स्यान्सरलोपधिविच्युतः । एप गृहस्यकल्पोन्यो यत्र चेलादिधारणम् ॥ १२३ ।। ननु ग्रहस्थकम्पोऽयं का पतः पाण्डुगंशुक ! । परमक्षज वयाय न चायं शिवशर्मणे ॥ १४ ॥ -'त सङ्गन निराकरणम् ।।
१५५ कथयन्ति कथं मूडा वर्धमानजिनाशन । गर्भापहरणं निन्द्यं निवकविकनाशयाः ।। १२५ ॥ दिवानन्यास्त्रिया गर्भे वृषदत्तद्विजन्मनः । अवतीर्णे जिने विरेच्यमीति दिवमा गताः ॥ १२६ ।। ततो भिक्षुकुलं ज्ञात्वा शक्रम्तं गर्भमाप-त् । मिद्धार्थनृपते पन्यां कथभेद्व ची भवेत् ।। १२७ ।। वञिणा ताकुलं पूर्व विदितं वा र किं वद । विदिनं चे पुग किं न भ्रणापहरणं कृतम् ।। :२८ ।। न ज्ञातं चन्कयं गम शोधनादिक्रिया कृता । न कृता चे द्विशेपः कम्तीर्थेशाऽपरमर्गयोः ॥ १२० । तथा च छिन्ननालोऽमी कथम यत्र वर्द्ध ते । छिन्नवृन्नं फलं यद्व क्षणाक्षीणन्धमृच्छति ।। १३० ।' गेपिका गरितान्यत्र वदामा न कि नया । मावदैनद्यतो मातृतुल्या मा कलवन्मुनः ॥ १३१ ।। मातुरन्यत्र पिन्या भ्र गप बद किं गतम् । बहुदूपणमद्वाक्यं तावकं तापकं मनाम् ।। १३२ ॥ एवं बहुविवैवाक्यविरुः शाम्बमंच यम् । प्रकल्यने जनान्महान्मशय वमनानयन ।। १३३ ।। ततः मांशयिकं जातं मतं घालवाममाम् । एवं स्वन्दित मार्गे वर्तन्ते ते दुराशयाः ॥ १३ ॥ तद्भक्तलोकपालाख्यमहीक्षिचित्रलेखयो ।
(:५६)
सुता नृकुलदेव्याख्या बभूव वरलक्षणा ॥ १३५ ।।
अध्ये हाऽनेकशास्त्राणि मनीढ़ म्वगुगे'तु सा ।
कलाकुलकन कांती रूपापाम्नसुराङ्गना ॥ १३६ ।।
अवाप तारतारुण्यं तारुण्योद्धतनृप्रियम् ।
अथारित करहाटाक्षं गं द्रविणमभृतम् ।। १३७ ।।
तच्छाम्नाबार्ग वीर्याभृद् भृषो भृपालनामभाक् ।
क. यां तां कमनीयांगी प्रमोटापरिणीतवान् ।। १३८ ।।
माऽसीन्मकलराजीप मुख्या पुण्यविषाकतः ।
नयामा विपुलान्भोगा भुनने मौ विपुरानति । १३०. ॥
अ यदाऽवमरं प्राप्य गत्रया विज्ञापितो नृपः ।
म्वामिःमदगुग्यः मन्नि मुमोम्मपितुः पुरं ।। :४० ।
आनाययत् तान्भक्त्या धमकमा भिवृद्धय ।
निशम्य तद्वचा भूभृदाहृयाऽमात्यम मा ।। १४ : ।
बुद्धिमागरनामानमपील्लातुमादरात् ।
आमाद्यामी गुरूं भक्त्या प्रवरप्रश्रयान्वितः ॥ १४२ ।।
भूपोऽभ्यथानयामात्यः पत्तनं निजमानयत् ।
निशम्याऽऽगमनं तेषां मुदमापपरं नृपः ॥ १४३ ।।
महना डाबरेणाम्गवचालीद्वन्दितु गुरुन् ।
दा , लोक्य ता माध दध्यादिति सुविस्मपात् ॥ १४४ ।
अ ! निर्ग्रन्थताशून्यं किमिदं नौतनं मतम् ।
न मन्त्र युज्यते गंतु पात्रदण्डादिमण्डितम् ।। १४५ ॥
(१५७;
व्याघुट्य भूपातस्तस्मादागाय जिमंदिरम् ।
भाषने म्म मादेवीं गुग्वस्ते कुमार्गगाः ॥ १४६ ।।
जिनोदितबहिभूतदर्शनाश्रितवृत्तयः ।
पग्ग्रिहग्रहग्रस्तान्नैनान्मन्यामहे वयम् !। १४७ ।।
मा तु मनोगतं गनो ज्ञान्या गाद्गुरुमन्नियिम् ।
नन्या कितापयामाम विनसाननाम्नका ।। १४८ ।।
भगवन्मदाग्रहादस्या गृह्णातामा नाम ।
निग्रन्थपदवी पूतां हिन्बा मङ्गं मुदा-विलम ।। १४९ ।'
उग्रीकृाय ने गजया वचनं विदुपाचितम् ।
त्यजुः सकलं मङ्गं चमनादिकमलना ।। १५० ।।
को कमण्डलु कृत्या पिछि च जिनादि नाम ।
जग्रदुनिनमुद्रां न श्वलांशुकधारिणतः ।। १५१ ।।
विशंपनिम्ता गन्या भिमुखं भृ संभ्रमात ।
नवानि भनिः माधृन्म ये ननमानयत् ।। ...२ ।।
तदानिवलं भृपाई पूजिता मानिनाश्च नः ।
धृतं दिन्याममा रुपमाचार: मिनु वामनाम् ।। १५३ ।।
गुरुशिक्षानिगं लिङ्गं नटइण्डिमा पाम् ।
नतो यापनम्वोऽभृत्तपां कापयतिनाम ।। १५४ ।।
श्वनांशुकमनादेवमनभदाशुभानिगा ।
अहंकृतिकशात्काचि कोचितम्बचरणाश्रयात् ॥ १५५ ।।
स्वस्वाश्रयभिदा कचि केचिदुष्कर्मपाकतः ।
ततो बभूवुर्भू यांसो मिथ्यामोहमलीमसात् ॥ १५६ ॥
( १५८) मृतविक्रमभूपाले सप्तविंशनिमंयुने । दशपञ्चशतेऽब्दामतीने शृणुना प.म् ॥ १५७ ॥ लुङ्कामतमभूदेकं लोपर्क धर्मकर्मणः । देशेऽत्र गोजरे रूपात विद्वानाजिननिजरे ॥ १५८ ।। अणहिल्लपत्तने रम्ये प्राग्वाटकुल जोऽभवत् । लुङ्गाऽभिधो महामानी श्वनांशुक्रमताश्रयी ।। १५९ ।। दुष्टा मा दुष्टाभवेन कुपिनः पापमण्डितः । तमिथ्यात्वपाकेन लङ्कामतकन्पयन् ॥ १६० ॥ मुरेंद्राची जिनेंद्रार्ची तत्पूजां दानमुत्तमम् । ममुत्थाप्य स पापात्मा प्रतीपो जिनसुव्रतः ।। १६१ ।। तन्मतेऽपि च भयांसो मतभेदोः समाश्रिताः । कलकालबलं प्राप्य दुष्टाः किं किं न कुर्वते ॥ १६३ ॥ बहुधा दुर्मतरेवं मोहान्धतममावृतः । जिनोक्तम लमार्गो पी निर्मल: स मलिकृतः ॥ १६३ ।। तथापि न प्रमाद्यति मंतस्तत्र सुखैपिणः । महामणि रजोलिप्तं कि न गृह्णन्ति सजनाः ॥ १६४ ॥ मलिनः किं भवेद्धर्मो निःशक्तस्यापराधतः । न हि मे मृतऽम्बोधिः प्रामोति पूतिगंधताम् ॥ १६५ ॥ विदित्वा सारतामन्यमतेष्वेवं मदर्शनाः । वितन्वंतु मनि सर्वदर्शिना दर्शितेऽध्वनि ॥ १६६ ॥ निरम्बरमनोहारी निराभरणमासुरः ।
दशाएदोपनिमुक्त आप्तो न्यायाः क्षुधादिमात्र ॥ १६७ ॥ तदाननेंदुमम्भूतं म्याद्वामृतभितम् । विरुद्धागितं शास्त्र शस्यते ना यजल्पितम् । : ६८ ।। निग्रंथो ग्रंथयुक्तो-पि रत्नविनय गजिनः । उदिति गुरुं रम्यं तम नैव ग्रंदिलम् । ६५ ।। श्रद्धातव्यं त्रयं चंति हि वा यणनदतिम् । तथा निश्चिन्य तत्वानि ग्राह्य सम्यक मुनम्म् ।। १७ ॥ श्रेणिकप्रश्नतोड्याच्या बीवनेश्वरः । तथादिष्टं मयात्रापि ज्ञावा श्रीजिनमूत्रतः ॥ १७५ ।। यः श्रीकोटपुरे जितामर पुरे मामादिशमद्विजा- दामीदकगुणाकरा:जवरः मोमश्रियां मुश्रियाम | प्रोत्तीर्णोऽमलबोधदुग्धजनधि श्रिवा गरीयोगुरु भद्रोऽसौ मम भद्रबाहुगणप. प्रद्योतनां मानमे ॥ १७२ ।। निपोप्यतिभामुर: कुनरनिक्षेपात्मदा नतिमा- निर्लेपोडप निरंम्तवैद्यविभवात्मवाधट माग्यमान । कामोद्दामरिमर्दनहरि: पञ्चाक्षकक्षानल मोऽहन्नो वितनोतु वाच्छितमुवं भक्त्यार्हिनोऽभिष्ट नः । १७३ । सदृष्टिमूलं श्रुततोयमिक्त सुवृत्तशाखं प्रगुणोद्रुणाट्यम् । दषं सदाऽभीष्ट फलप्रदाने भो ! धर्भदेवद्रुममाश्रन्य तु । १७४ । वादीभेन्द्रमदप्रमर्दनहरेः शीलामृताम्मानिधेः शिष्यं श्रीमदनन्तकीर्तिगणिनः सत्कोतिका ताजुपः ।
( १६०)
स्मृत्वा श्रीललितादिकीर्तिमुनिपं शिक्षागुरूं मद्गुणं ।
चक्र चारुचरित्रमेतदनघं रस्ना देनंदो मुनिः ॥ १७५ ।।
भद्रदोश्वग्निं वक्तुं शक्यतेऽल पधिया कथम् ।
तथाप्यपिम्नरं दृब्धं हीरवार्योपरोधतः ॥ १७६ ।।
श्वेतांशुक्मतोद्धृतमहान् ज्ञापयितु जनान् ।
व्यरीरचमिमं ग्रंथं न स्त्रपाण्डिम्यगर्वतः ॥ १७७ ।।
इन श्रीरत्ननाद्य पायविचिते भद्रचारित्रे श्वेताम्बर
मतपस्यापर संवत्तरणको नाम
चतुर्थोऽधकार: समासः ।। ४ ।।
समानेऽयं प्रन्धः ।
No text on this page.
No text on this page.