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Purnjanakhyanam

Shreemannarayan Shashtri · 2009/09

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॥श्रीः॥
श्रीमद्भागवतचतुर्थस्कंधान्तर्गत
पुरंजनाख्यानमः
श्रीमन्नारायणशास्त्रिविरचितया
पदार्थमुक्तावली
समाख्यया भाषाटीकया सनाथीकृतम.
तदिदम्
श्रीकृष्णदासात्मज-गङ्गाविष्णुना
नैजे “लक्ष्मीवेङ्कटेश्वर” मुद्रणालये
संमुद्य प्रकाशितम्.
कल्याण-मुंबई.
संवत् १९५२, शकान्दाः १८१७.
यह पुस्तक सन् १८६७ के आक्ट २५ के मुंजवरजीष्टरी
कराके हक प्रकाशकने अपने स्वाधीन रक्खा है.

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- ॥ श्रीः॥ अथ श्रीमद्भागवतचतुर्थस्कन्धान्तमेल पुरंजनाख्यानम। भाषाटीकासमेतम् । ॥मैत्रेय उवाच॥ इति संदिश्य भगवान्बार्हिषदैरभिपूजितः॥ पश्यतां राजपुत्राणां तत्रैवान्तर्दधे हरः॥ १॥ श्रीमैत्रेयजी बोले कि अब पुरंजन उपाख्यान वर्णन करै हैं " ऐसे शिवजी कहिकरकै चुप्प भए तब प्रचेतानने पूजा कीनी तब राजपुत्रनके देखते २ तहाई हर अंतर्धान होते भए ॥१॥ रुद्रगीतंभगवतःस्तोत्रं सर्वे प्रचेतसः॥ जपन्तस्ते तपस्तेपुर्वर्षाणामयुतं जले ॥२॥ रुद्रकोगायो भगवतको स्तोत्र सब प्रचेताजपतेभए जलमें दशह- जार वर्षतक तप करते भए (यह पहला कथाभाग समाप्त हुआ)॥२॥ प्राचीनबर्हिषं क्षत्तः कर्मस्वासक्तमानसम् ॥ नारदोऽध्यात्मतत्त्वज्ञः कृपालुःप्रत्यबोधयत् ॥३॥ ॥अथ पुरंजनाख्यानम् ॥ हे विदुर! कर्ममें आसक्त मन ऐसे प्राची- नवीह राजाको कृपालु वेदांततत्वज्ञाता नारदजी ज्ञान देतेभए ॥३॥ श्रेयस्त्वं कतमद्राजन्कर्मणात्मन ईयसे ॥ दुःखहानिःसुखावाप्तिः श्रेयस्तन्नेह चेष्यते॥४॥ .

४ पुरंजनाख्यानम् । हे राजन्! कर्मकरकै आत्माकी चेष्टा करके अर्थ कितनो कल्याण है दुःखहानी और सुखकी प्राप्तिके लिये यत्न करते हैं पर श्रेय वामेंभी नहीं है ॥४॥ ॥राजोवाच ॥ नजानामि महाभाग परं कर्मापविद्धधीः॥ ब्रूहि मे विमलं ज्ञानं येन मुच्येय कर्मभिः॥९॥ राजा वोले कि हे महाभाग ! परमकर्ममें मेरी बुद्धि विद्ध रही है, सो मैं मंगल नहीं जानूंहूं निर्मल ज्ञान मोसे कहो जासे कर्मसे मुक्त होजाऊं ॥५॥ गृहेषु कूटमार्गेषु पुत्रदारधनार्थधीः॥ न परं विन्दते मूटोभ्राम्यन्संसारवर्त्मसु ॥ ६ ॥ छल छिद्रवाले धर्मयुक्त घरोंमें पुत्र दारा धन अर्थ बुद्धि है मूढ हूं सो संसारके मार्गमें घूमूंहूं परमेश्वरकू जानूं नहीं हूं ॥६॥ ।नारद उवाच॥ भोभोः प्रजापते राजन्पशून्पश्य त्वयाऽध्वरे ॥ संज्ञापिताञ्जीवसंघान्निघृणेन सहस्रशः॥७॥ श्रीनारदजी बोले कि हे राजन् ! हे प्रजापते ! तुझारे मारेभए . हजारहीं जीव जो तुमने दयारहित होकर मारे हैं उन्हें देखो ॥७॥ एते त्वांसंप्रतीक्षन्ते स्मरन्तो वैशसं तव ॥ संपरेतमयःकूटैश्छिन्दन्त्युत्थितमन्यवः॥८॥ यह सब तुझारे दिये दुःखका स्मरण करते तुह्मारी वाट देखते हैं सो जव तुझारा शरीर छुट जायगा तब यह लोकयंत्रके झंगोंसे तुमको छेदन करेंगे ॥८॥ १जीव तौ अपने कर्मानुसार जन्म ले लेते हैं फिर यज्ञके राजास बदला लैनेको -- +- भाषाटीकासमेतम् । अ०१ अत्र ते कथयिष्येऽमुमितिहासं पुरातनम् ॥ पुरञ्जनस्य चरितं निबोध गदतो मम ॥ ९॥ इस विषयमें तुमसे पुरातन इतिहास कहितेहैं जो पुरंजनको चरित्र है तुम सुनो मैं कहूंहूं ॥९॥ आसीत्पुरंजनो नाम राजा राजन्हच्छ्रवाः॥ तस्याविज्ञातनामाऽऽसीत्सखा विज्ञातचेष्टितः १०॥ हे राजन् ! बडो यशस्वी पुरंजन नाम राजा होतोभयो,ताको अवि- ज्ञातनामक सखा भयो, जो सब चेष्टानकू जानै ॥१०॥ सोऽन्वेषमाणः शरणं बभ्रामाथिवीं प्रभुः॥ नानुरूपं यदाऽविन्ददभूत्स विमना इव ॥११॥ या अध्यायको व्याख्यान आगे अध्यायमें विस्तारसे कहेंगे, परंतु कोई कोई कठिनतर शब्दनको व्याख्यान जहां शन्द आवैगो वहाको वहभी करेंगे जैसे, स्वकर्मभिः पुरं शरीरं जनयतीति पुरंजनो जीवः न विज्ञानं चेष्टितं यस्य स ईश्वरस्तस्य सखा" अविज्ञातनामा पुरंजन जीवको नाम है " अविज्ञातावचेष्टितं नाम ईश्वरको है" सो प्रभु पुरंजन रहिवेको स्थान ढूंढते पृथिवीपर घूमते, अपने समान स्थान जब न देखा तब दुर्मनकी नाई होते भए ।॥ ११॥ न साधु मेने ताःसर्वा भूतले यावतीःपुरः॥ कामान्कामयमानोऽसौ तस्य तस्योपपत्तये॥१२॥ पृथिवीमें जितने पुर हैं उनको अच्छे न मानतो भयो तिस २ विषयकी सिद्धिके निमित्त कामनानकी चाहना करतो भयो ॥१२॥ 'यशुरूप कैसे रहे ? उत्तर यह है जीव तो अपने कर्मानुसार योनियोंमें जातेही है जो प्राणी जिस जीवको मारताहै यमराजके दूत उस जीवका रूप धार उसै दुःख देते हैं ह जीव यह जानता है कि जिसे मैंने मारा यह वही है इस कारण वे जीव दीखे। "

पुरंजनाख्यानम् ।
स एकदाहिमवतो दक्षिणेष्वथसानुषु॥
ददर्श नवभिाभिः पुरी लक्षितलक्षणाम् ॥ १३॥
एकसमय हिमाचलकी दहिनी भूमिकै नीचै नौ दरवाजेयुक्त सुंदर
सब लक्षण सम्पन्न पुरकू देखतो भयो ।॥ १३ ॥
प्राकारोपवनाट्टालपरिखैरक्षतोरणैः ।।
स्वर्णरौप्यायसैःशृङ्गैः संकुलां सर्वतोगृहैः ॥१४॥
प्राकार उपवन अटारे खाई इन्द्रियरूप तोरण, सुवर्ण चांदी लो-
हाके शंग सब ओर बने गृहोंसे संकुल ॥१४॥
नीलस्फटिकवैडूर्यमुक्तामरकतारुणैः॥
तप्तहर्म्यस्थली दीप्तां श्रिया भोगवतीमिव ॥ १५॥
नील स्फटिक वैडूर्य मुक्ता मरकत अरुण रत्नोंसे रचीभई हर्म्य-
स्थलीसे प्रकाशित श्रीस भागवतीकी समान शोभित ॥ १५॥
सभाचत्वररथ्याभिराक्रीडायतनापणैः॥
चैत्यध्वजपताकाभिर्युक्तां विद्रुमवेदिभिः ॥ १६ ॥
सभा चौराए राजमार्ग ओरसे खेलवेके स्थान जनोंके विश्रामस्थान
ध्वजा पताका, और मूंगाकी वेदीकरकै युक्त ॥१६॥
पुर्यास्तु वायोपवने दिव्यद्रुमलताकुले ॥
नददिहङ्गालिकुलकोलाहलजलाशये ॥१७॥
पुरीके वाहिरके उपवन दिव्य वृक्षलतासे सघन सरोवरोंके भीतर
पक्षी और भौरों के नादका कोलाहल था॥ १७ ॥
हिमनिर्झरविपुष्मत्कुसुमाकरवायुना ॥
चलत्प्रवालविटपनलिनीतटसंपदि॥ १८ ॥
शीतल झरनानके कणसें लगीभई वायुसे चलायमान होनेसे वृक्षोंकी
शाखा और पत्रोंको शोभा सरोवरियोंके तटपर पूर्ण हो रही थी॥१८॥

भाषाटीकासमेतम् । अ० १
नानारण्यमृगवातैरनाबाधे मुनिव्रतैः॥
आहूतं मन्यते पान्थो यत्र कोकिलकूजितैः ॥ १९॥
अनेक वनके मृगसमूह मुनिव्रत धारके किसीको बाधा नहीं देतेथे
जहां कोकिलानकी कूजितसे पांथोंको ये मालुम पडै है कि मानोहमै
कोई बुलावे है ॥ १९॥
यदृच्छयाऽऽगतां तत्र ददर्श प्रमदोत्तमाम् ॥
भृत्यैर्दशभिरायान्तीमेकैकशतनायकैः॥२०॥
तहां अपनी इच्छासे एक उत्तम स्त्री दश चाकर सहित एक एक
शतनायक लियै आती भई उसे पुरंजननै देखा ॥२०॥
पञ्चशीर्षाहिना गुप्तांप्रतिहारेण सर्वतः ॥
अन्वेषमाणामृषभमप्रौढां कामरूपिणीम् ॥२१॥
पंचशिरके सर्पसे रक्षित हो यह कामरूपधारिणी कशोर अवस्थामें
पूर्ण पतिको ढूंढती थी॥२१॥
सुनासांसुदती बालां सुकपोलां वराननाम् ॥
समविन्यस्तकर्णाभ्यां बिभ्रतीकुण्डलश्रियम्॥२२॥
सुंदर नाक, सुंदर दांत, सुंदर कपोल, श्रेष्ठ मुख बराबरके दोनों
कानोंमें कुंडलश्रीकों धारे ॥२२॥
पिशङ्गनीवीं सुश्रोणीश्यामां कनकमेखलाम् ॥
पद्भ्यां वर्णद्भयां चलती नूपुरैर्दैवतामिव ॥२३॥
पीरी फरिया पहिने सुंदर कटिपश्चाद्भागवारी श्याम सुवर्णकी कौं-
दुनी धारे,शब्दायमान नूपुरौं देवताकी नाई मालूम पडती भई॥२३॥
स्तनौ व्यश्चितकैशोरौ समवृत्तौ निरन्तरौ॥
वस्त्रान्तेन निगृहन्तींनीडया गजगामिनीम् ॥२४॥

पुरंजनाख्यानम् । तरुणाईको प्रगट करनेहारे वर्तुलाकार स्तनोंको लाजके मारे वस्त्रोंसे ढक रहीथी ।। २४॥ तामाह ललितं वीरः सव्रीडस्मितशोभनाम् ॥ स्निग्धेलापाङ्गपुकेन स्टष्टःप्रेमोदमब्रुवा॥२५॥ लाज भरे मंद हास्यसै शोभित इस वालेके प्रेमसै ऊपरकी ओर स्फुरायमान भृकुटीरूप धनुष निर्गत हुए स्नेह भरे नैनोंके पंखवाले कटाक्षरूपी वाणोंसे विद्ध हो पुरंजन उस्सै वोला ॥२५॥ का त्वं कलपलाशाक्षि कस्यासीह कुतःसति ॥ इमामुपपुरी भीरु किं चिकीर्षसिशंस मे ॥२६॥ हे कमलनैनी! तुम कौन हो । कौनकी हो हे सति! कहांते आई हो। यह उपपुरीौनकी है ? कहा करकी इच्छा है ! सो कहो॥२६॥ क एतेऽनुपथायेत एकादश महाभटाः॥ एता वा ललनाःसुभूः कोऽयं तेऽहिः पुरस्सरः ॥२७॥ ये ग्यारह महाभट कौन हैं ? हे सुभ्र! ये ललना कौन है ? और ये तुझारे आगे चलवेवारो महासर्प कौन है ॥२७॥ त्वं ह्रीभवान्यस्यथवारमापति। विचिन्वती किं मुनिवद्रहो वने ॥ त्वदत्रिकामाप्तसमस्तकाम। व पद्मकोशः पतितःकराग्रात् ॥२८॥ तुम इस निर्जन वनमें अपने पति धर्मकों ढूंढती लज्जा तो नहीं १ कवित्त ॥ "जबसे द्वै पात भयो विरुला फलफूल रह्यो अपनी रुचिौं । कोज सुंदर नारिके हाथ परो तो कताय बुनाय धरो गनसौ ॥ नितही तिनतांतकी आंच सही धो दियाकी पछार सही रुचिसौं । इतनो दुःख पाय भयो अंचरा तब कॉन किलोल कर कुचसौं॥१॥"

भाषाटीकासमेतम् । अ०१
हो अथवा शिवको ढूंढती पार्वती वा ब्रह्माको ढूंढती सरस्वती
अथवा भगवानको ढूंढती लक्ष्मी हो तुम मुनियौंकी भांति नियम
धारे हो जो तुझारा पति होगा तुह्मारे चरणौंकी कामनासै उसके
सब मनोरथ पूरे होंगे जो लक्ष्मी हो तो तुम्हारे हाथका कमल कहां
गिरगया ॥२८॥
नाऽऽसां वरोर्वन्यतमा भुविस्टक-
पुरीमिमां वीरवरेण साकम्॥
अर्हस्यलंकर्तुमदभ्रकर्मणा
लोकं परं श्रीरिव यज्ञपुंसा ॥ २९॥
हे वरोरु ! परन्तु इनके मध्यमें भूमिकी छूयवेवारी तो कोई नहीं
है महा कर्मकारी मुझ वीरवरके साथ या पुरीमें तुम रमण करवेकों
योग्य हो, जैसे यज्ञपुरुषके साथ श्रीलक्ष्मी रमण करै ॥२९॥
यदेष तेऽपाङ्गविखण्डितेन्द्रियं ।
सवीडभावस्मितविभ्रमभ्रुवा॥
त्वयोपसृष्टो भगवान्मनोभवः ।
प्रबाधतेऽथानुगृहाण शोभने॥३०॥
हे शोभने ! लाजभरी मुसकानकी भूकटाक्षस खंडित इंद्रियवारे
मोको तो करकै रचोभयो भगवान मनोभव कामदेव बाधा करै है सो
तुम कृपा करो ॥३०॥
तदाननं सुभ्र सुतारलोचनं ।
व्यालम्बिनीलालकवृन्दसंवृतम् ॥
उन्नीय मे दर्शय वल्गुवाचकं ।
यद्रीडया नाभिमुखं शुचिस्मिते ॥३१॥

पुरंजनाख्यानम् ।
हे शुचिस्मिते ! लाजसे सामने तू नहीं आती सो सुंदर विशाल
नेत्रयुक्त लंबे लंबे नीले अलकसमूहसै सुंदर वाणीवारे मुखकू खोलके
दिखाओ॥३१॥
॥ श्रीनारद उवाच ॥
इत्थं पुरंजनं नारीयाचमानमधीरवत्॥
अभ्यनन्दत तं वीर हसन्ती वीरमोहिता॥३२॥
श्रीनारदजी बोले कि ऐसे पुरंजन नारीको अधीरवत् याचनाकर
रहेथे तब वो नारी उसे मोहित हो हसती भई उस वीरकी सराहना
करती भई ॥३२॥
न विदाम वयं सम्यक् कर्तारं पुरुषर्षभ॥
आत्मनश्च परस्यापि गोत्रं नाम च यत्कृतम् ॥३३॥
हे पुरुषश्रेष्ठ ! हम अपने बनायवेवारेकों जिसने तुम्हारा और
हमारा नाम गोत्र किया है अच्छी तरह नहीं जानती॥ ३३॥
इहाद्य सन्तमात्मानं न विदाम ततः परम् ॥
येनेयं निर्मिता वीर पुरीशरणमात्मनः॥३४॥
याते परे कवसे हमारी आत्मा है सोभी नहीं जानती हे वीर! जाने
ये पुरी निर्माण कीनी और जो इस पुरीका रक्षक है उसेभी नहीं
जानती ॥३४॥
एते सखायःसख्यो मे नरा नार्यश्च मानद॥
सुप्तायां मयि जागर्ति नागोऽयं पालयन्पुरीम्॥३५॥
हे मानद! यह पुरुष तो मेरे सखा और स्त्रिये सखी हैं जब मैं
सो जाती हूं तब यह नाग मेरी रक्षा करता है ॥ ३५ ॥
दिष्टयाऽऽगतोऽसि भद्रं ते ग्राम्यान्कामानभीप्ससे॥
उदहिष्यामि तांस्तेऽहं स्ववन्धुभिररिन्दम ॥३६॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०१ हे शत्रुनाशक ! तुम यहां आये यह बहुत भली हुई तुम्हारा मंगल हो जो आप संसारी विषयौंके भोगनेकी इच्छा करते हो तो मैं बंधुओं सहित आपकी सेवा करूंगी ॥३६॥ इमां त्वमधितिष्ठस्व पुरी नवमुखी विभो॥ मयोपनीतान्गृह्णानः कामभोगाञ्छतं समाः॥३७॥ हे विभो! इस नवमुखकी पुरीमें तुम वसो मो करकै प्राप्त कामभोग सैकडों वर्षतक ग्रहण करो ॥३७ ॥ कं नु त्वदन्यं रमये ह्यरतिज्ञमकोविदम् ॥ असंपरायाभिमुखमश्वस्तनविदं पशुम् ॥३८॥ रतिज्ञानहीन मूर्ख परलोक चिंता इस लोकसे वंचित पशुतुल्य पुरुषोंको त्याग आपके सिवाय और किस्से विहार करूंगी॥३८॥ धर्मो ह्यत्रार्थकामौ च प्रजानन्दोऽमृतं यशः॥ लोका विशोका विरजा यान्न केवलिनो विदुः॥३९॥ इस गृहस्थाश्रममें धर्म अर्थ काम पुत्रसुख अमृत सम यश, शोक और रजोगुण रहित लोक सब मिलते हैं उसे यति नहीं जानते॥३९॥ पितृदेवर्षिमानां भूतानामात्मनश्च ह ॥ क्षेमं वदन्ति शरणं भवेऽस्मिन्यद्गृहाश्रमः॥४०॥ पितर देवता मनुष्य सब जीवमात्रके आत्माको ये गृहाश्रम है या संसारमें क्षेमको देवेवारो है ऐसे कहैं हैं ॥४०॥ का नाम वीरविख्यातं वदान्यं प्रियदर्शनम् ॥ नवृणीत प्रियं प्राप्तंमादृशी त्वादृशं पतिम् ॥४१॥ वीरोंमें विख्यात उदार प्रियदर्शनदायक तुमसरीखेकूप्राप्त होयकर मोसरीकी ऐसी कौन नामकी है जो आपको न वरैगी॥११॥ ।

पुरंजनाख्यानम् ।
कस्या मनस्ते भुवि भोगिभोगयो।
स्त्रियान सज्जेमुजयोर्महाभुज ॥
योऽनाथवर्गाधिमलं घृणोद्धत-
स्मितावलोकेन चरत्यपोहितुम् ॥ ४२ ॥
हे महाभुज ! सर्पको देह समान भुनावारे पुरुषमें कौनको मन
आसक्त न होयगो जो तुम अनाथसमूहोंके सब दुःखनको दयायुक्त
लज्जाके अवलोकन करकै दूर करवेको विचरो हो ॥ ४२ ॥
॥ नारद उवाच ॥
इति तौ दंपती तत्र समुद्य समयं मिथः ॥
तां प्रविश्य पुरी राजन्मुमुदाते शतं समाः ॥४३॥
नारदजी बोले कि हे राजन् ! ऐसे वे स्त्रीपुरुष वा समयमें उद्यत हो
वा पुरीमें प्रवेश कर शतवर्षतक आनंद करते भए ॥४३॥
उपगीयमानो ललितं तत्र तत्र च गायकैः॥
क्रीडन् परिवृतःस्त्रीभिह्रदिनीमाविशच्छुचौ॥४४॥
तहां तहां गायक ललितराग गायरहे हैं, क्रीडा करै हैं स्त्रीसहित हैं,
पवित्र पुष्करिणी में स्नान करतेभए ॥४४॥
सप्तोपरिकृता द्वारः पुरस्तस्यास्तु द्वे अधः॥
पृथग्विषयगत्यर्थं तस्यां यः कश्चनेश्वरः॥४५॥
यामें सात तो ऊपरके द्वार हैं और दो नीचेके द्वार हैं (या शरीरमें
अलग अलग विषयोंके गत्यर्थ) जिनमें जन निवास करतेहैं (सोई
शरीरमें सात नेत्रादि ऊपर हैं गुदाआदि नीचे दो हैं)॥ ४५ ॥
पञ्चद्वारस्तु पौरस्त्या दक्षिणैका तथोत्तरा ॥
पश्चिमे द्वे अमूषां ते नामानि नृप वर्णये ॥ ४६॥

भाषाटीकासमेतम् । अ० १ हे राजन् ! उस पुरीके पूर्व दिशामें पांच द्वार हैं एक दक्षिण दिशा- को द्वार है एक उत्तर दिशाको द्वार है पश्चिम दिशाको दो द्वार हैं, इन द्वारनके नाम अब कहताहूं ॥ ४६॥ खद्योवाविर्मुखी च प्रारद्वारावेकत्र निर्मित ॥ विभाजितं जनपदं याति ताभ्यां घुमत्सखः॥४७॥ पूर्वकी ओर खद्योता और आविर्मुखी नाम दो द्वार हैं (जो दाहिने बाये नेत्र हैं) यह एक सीधमें है इनमें पुरंजन राजा विभाजित देशमें (रूप) धुमान नामक मित्र (नेत्र इन्द्रिय) के साथ जायहै ॥४७॥ नलिनी नालिनी च प्राग्द्वारावेकत्र निर्मिते॥ अवधूतसखस्ताभ्यां विषयं याति सौरभम् ॥४८॥.. सो घुमत्सखासे प्राप्तभई नलिनी वामदक्षिण दोनों नाक छिद्र पूर्वको है, वायुसखासे सुगंध याको प्राप्त होती भई॥४८॥ मुख्या नाम पुरस्तावास्तयाऽऽपणबहूदनौ । विषयौ याति पुरराइसज्ञविपणान्वितः॥४९ ॥ बोलनो अनेक अन्नको स्वाद लेनो ये मुख्य मुख प्रथम है या पुरका राजा रसज्ञाता व्यवहारकारी विषयस्वाद लेतो भयो॥४९॥ पितृहर्नूपपुर्या द्वादक्षिणेन पुरंजनः॥ राष्ट्र दक्षिणपञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः॥५०॥ या नृपपुरीमें पितरोंको बुलायवेवारों दहिनो कर्ण, देवनको बुलायवेवारो वामकर्ण है इन श्रवणसे पुरंजन, दक्षिणपंचालराज्यको भोगतो भयो “तैसे लिखा है कि ॥ पितृहृर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः - स्मृतः॥ प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पंचालसंज्ञितं ॥ पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छ्रुतधराद्जेदिति " ॥५० ॥ ..

पुरंजनाख्यानम् ।
देवहूर्नाम पुर्या द्रा उत्तरेण पुरंजनः॥
राष्ट्रमुत्तरपञ्चालं याति श्रुतधरान्वितः॥५॥
देवनको बुलानेवाला द्वार उत्तर ओर वामकर्ण है, श्रवणसे उत्तर
पंचालराज्यको सुख पुरंजनको प्राप्त होतो भयो॥५१ ॥
आसुरीनाम पश्चाद्दास्तया याति पुरंजनः॥
ग्रामकं नाम विषयं दुर्मदेन समन्वितः॥ १२ ॥
आसुरी सुखदायी शिश्न नामक पच्छमको द्वार है तासे दुर्मदके
कारण ग्रामक नामक विषयनको प्राप्त होते भए ॥ १२॥
निति म पश्चाहास्तया याति पुरंजनः॥
वैशसं नाम विषयं लुब्धकेन समन्वितः॥५३॥
नितिनाम पश्चिमको द्वार गुदा है उससे भलत्याग होयहै पायु
इंद्रिय सहित पुरंजन मल त्यागते भए॥५३॥
अन्धावमीषां पौराणां निर्वाक्पेशस्कृतावुभौ ॥
अक्षण्वतामधिपतिस्ताभ्यां याति करोति च ॥५४॥
इन पुरवासीनके मध्यमें अंधवत् पाद हस्त भए, नेत्रोंको पति
पुरंजन इन इंद्रियोंसे जाते भए, कर्म करते भए ॥५४॥
स यन्तिःपुरगती विषूचीनसमन्वितः ॥
मोहं प्रसादं हर्ष वा याति जायात्मजोद्भवम् ॥५५॥
सो जब अंतःपुरमें गयो तव पवनसहित मोह प्रसन्नता हर्ष बुद्धि
स्त्रीपुत्ररूप इंद्रियोंसे प्राप्त होतोभयो ॥ ५५ ॥
एवं कर्मसु संयुक्तःकामात्मा वञ्चितोऽबुधः॥
महिषी यद्यदीहेत तत्तदेवान्ववर्तत ॥५६॥

भाषाटीकासमेतम् । अ० १ १५ ऐसे कर्ममें आसक्त कामी आत्मा ठगोभयो बुद्धिहीन नृप बुद्धिरूप पटराणीकी आज्ञा मानतो भयो जो वह कहै सो करतो भयो॥१६॥ कचित् पिबन्त्यां पिबति मदिरांमदविह्वलः॥ अनन्त्यां कचिदश्नाति जक्षत्यां सह जक्षति ॥१७॥ पुरंजन मदमें विह्वल होकर जो पुरंजनी मदिरा पीये है तो आपभी पीवै वोखाय तो वोभीखावै वो भक्षण करे तोवोभी भक्षण करै है९७ वचिद्गायति गायन्त्यां रुदन्त्यां रुदति क्वचित् ।। क्वचिद्धसन्त्यां हसति जल्पन्त्यामनुजल्पति ॥५८॥ वो गावै तौ योभी गावै है वो रोवै तौ पुरंजनभी रोवै वो हंस तोवोभी हंसैहै, वो बोले तो वोभी बोल है ॥१८॥ १ इस समय तौ स्त्रीकेही पशीभूत बहुत है-एक पंडितजीने कथा बांचनेमें कहीं कि जो गुरुदीक्षा ले है उसे फिर कुछ कार्य करना शेष नहीं रहता, एक लाला जो बडे धनी है, उनके पुत्रने कही पंडितजी कंठी देदो, पंडितजीने माला कंठी देदी,तब उस दिनसै वह कथा सुन्नेभी नहीं आया, एक दिन पंडितजीको कहीं मार्गमें मिला तव उन्होंने कही कि कथामें नहीं आते ? यह बोले महाराज ! अब कृतार्थ होगये कंठी लेली अव सुन्नेकी क्या आवश्यकता है, और कलकू हम दूसरे देशको जायगे कभी दर्शन दीजो, पंडितजी दो तीन वर्षके पीछे उसके घर गये, उसने ठहराया,भोजनकी तो बडी पूछगछ करी, जव तीन चार दिनके पीछे विदा मांगी, तब लालाजी बोले ठहरो, इसी प्रकार बहुत वार कहतेही रहे, परन्तु दिया कुछ नहीं एक दिन उनकी स्त्रीने उन्हें देखकर पुछवाया तुम कौन हो कहाँ रहो हो पंडितजी वोले यह लाला हमारा चेला है, कुछ लेनको आये हैं, पर यह रोज ठहरनेको कहता है कुछ देता नहीं, स्त्रीने सुनतेही कही महाराज ! तुमारो चेला है तौ तुमारा कहना नहीं मान्ता, अच्छा यह लो, ऐसा कह अपनी पहुंचि पंडितजीको उतार दी और बोली भयरहित इन्हें लो पंडितजीने डरते २ लेली, इधर वह मुख लपेटकर पड़रही, लालाजी घर आकर बोले कैसे पडी हो ? वह बोली कि पहुंचि खोगई लाला वोले और बनजायगी, वह बोली जब आजायगी जभी भोजन करूंगी, लालाजीनै तुरत बनवादी और वोले अब तो भोजनादि करो वह उठी और दूसरे दिन पंडितजीको बुलाय नई पहुंची दिखाकर कहीं कि अब बताओ तुझारा चेला है कि मेरा ? पंडितजी चुप हुए उसने कही कलकी पहुंची विदाईमें ले घर आयो, यह कुछ न देगा,पंडितजी वह ले घर आये ।

पुरंजनाख्यानम् ।
क्वचिद्धावति धावन्त्यां तिष्ठन्त्यामनुतिष्ठति ॥
अनुशेते शयानायामन्वास्ते क्वचिदासतीम् ॥१९॥
पुरंजनी धावै तो पुरंजनभी दौडै है, वा बैठे तो वोभी बैठे है वो
सोयजाय तो वोभी सोयजाय है वो वैठी होजाय तो वोभी बैठा
होजाय है ॥२९॥
क्वचिच्छृणोति शृण्वन्त्यां पश्यन्त्यामनुपश्यति ॥
कचिजिघ्रति जिघन्त्यां स्पृशन्त्यां स्टशति कचित६०
वो सुने है तो वोभी सुने है, वो देख है तो वोभी देखेहै वो सुंघे
तो वोभी संधै है वो छुवै तो येभी छुवै है ॥६० ॥
कचिच्च शोचतीं जायामनुशोचति दीनवत् ॥
अनुहृष्यति हृष्यन्त्यां मुदितामनुमोदते ॥६॥
जो अपनी स्त्रीको शोच करती देखे है तो आपभी दीनकी नाई
शोक करैहै, वो हर्षित होय तो वोभी हर्षित होयहैं, वो मुदित होय है
तो वोभी मुदित होयहै ॥ ६१ ॥
विप्रलब्धो महिण्यैवं सर्वप्रकृतिवञ्चितः॥
नेच्छन्ननुकरोत्यज्ञः क्लैब्याक्रीडामृगो यथा॥२॥
इति श्रीपुरञ्जनाख्याने पुरंजनपुरंजनीरमणचरि-
त्रवर्णनं नाम प्रथमोऽध्यायः ॥१॥
सब प्रकारसे वाकी स्त्रीने जब वाकू वस करलियो, तब वह अपने
असंगत्वादि स्वभावोंको दूर कर अपनी अभिलाषा न होनेपरभी
क्रीडामृगके समान भायोके वचन अनुसार चलता है॥६२॥
इति श्रीपुरंजनाख्याने पुरंजनपुरंजनीरमणचरित्रवर्णन
नाम प्रथमोऽध्यायः॥ १॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०२ अथ द्वितीयोऽध्यायः। ॥ नारद उवाच॥ स एकदा महेष्वासो रथं पञ्चाश्वमाशुगम् ॥ दीषं द्विचक्रमेकाक्ष त्रिवेणुं पञ्चबन्धुरस् ॥१॥ श्रीनारदजी बोले कि एक समय वह पुरंजन जीव बडासा एक धनुष्य (मैंही कर्ता भोक्ता हूं ऐसा अहंकार) धारण कर पञ्चज्ञानेंद्रि- यरूप शीघ्र जायवेवारे पांच अश्वोंसे युक्त अहंता ममतारूप दो डं- डोसे युक्त पुण्यपापरूप दो पैया लगे मायारूप धरी त्रिगुणरूप तीन वेणु पांचप्राणरूपी पांच बन्धनसै बंधे स्थपर बैठ विहार करनेको गया ॥१॥ एकरश्म्येकदमनमेकनीडं द्विकूवरम् ॥ पञ्चप्रहरणं सप्तवरूथं पञ्चविक्रमम्॥२॥ मनरूप रस्सी बुद्धिरूप सारथी एक हृदयरूप स्थान रथीके बैठवेकी और है, दो शोकमोहरूप रथके धुराके बन्धन है, पंचकम- द्रिय विक्रम जाकी गति है, सप्त त्वचारूप जामें वरूथ पांच शन्दादि विषय प्रक्षेपकारी हैं ॥२॥ हैमोपस्करमारुह्य स्वर्णवर्माऽक्षयेषुधिः॥ एकादशचमूनाथः पञ्चप्रस्थमगाद् वनम् ॥३॥ सुवर्णके आभरण सुवर्णको वखतर रजोगुणरूपी पहरे अक्षय बाणभरो तर्कस (अनंत वासना), दश सिपाही (दश इन्द्रिय) १८ पुरंजनाख्यानम् । एक उनका अधिपति (मन) ग्यारह जनोंको संग ले पांच प्रकार (पंचेन्द्रिय) की गतिवाले वनको गया ॥३॥ चचार मृगयां तत्र दृप्त आतेषुकार्मुकः ॥ विहाय जायामतदहाँ मृगव्यसनलालसः॥४॥ धनुषमें राग द्वेषादि वाण चढाय भोगादिरूप स्थानधारी मृगस- मानविषयोंके मारने (भोगने)की जाकी लालसासे पुरंजन जीव त्यागके अयोग्य विवेकवती बुद्धिकू त्यागकर शिकार खेलवेकों जाते भए॥४॥ आसुरी वृत्तिमाश्रित्य घोरात्मा निरनुग्रहः॥ न्यहननिशितैबाणैर्वनेषु वनगोचरान् ॥५॥ आसुरी वृत्तिमें स्थित होयकै घोरात्मा निर्दयी पैने बाणोंसे वनमें बनके जीवनकों हनतो भयो ॥६॥ तीर्थेषु प्रतिदृष्टेषु राजा ध्यान पशून् वने ॥ यावदर्थमलं लुब्धो हन्यादिति लियम्यते ॥६॥ तीर्थश्रादादिको राजा पवित्र पशूनकों इनमें लुब्धककी नाई मार लावै, ये नियम है ॥६॥ य एवं कर्मनियतं विद्वान् कुर्वीत मानवः ॥ कर्मणा तेन राजेन्द्र ज्ञानेन न स लिप्यते ॥७॥ जो मनुष्य विद्वान ऐसे निश्चय कर कर्मनकों करै हैं, हे राजेंद्र! वा कर्म करकै ज्ञानसे वो लिप्त न होयगो।। ७॥ अन्यथा कर्म कुर्वाणो मानारूढो निवध्यते ॥ गुणप्रवाहे पतितो नष्टप्रज्ञो बजत्यधः॥८॥ १ शास्त्रमें मांस खानका मृगयाका विधान नहीं है किन्तु जिनके चित्त हिंसामें आसक्त हैं उनको उस कार्यसे पृथक करनेहीके निमित्त उपदेश है कि सर्वथा हिंसा न करनी, केवल श्राद्धमें सोभी सब पशुनहीं किन्तु जिसकी आज्ञा है,सोभी अधिक नहीं जितनी आवश्यकता हो इत्यादि वाक्य हिंसा निवृत्तिकेही निमित्त हैं।

भाषाटीकासमेतम् । अ० २
यासै अन्यथा कर्म करै तौ मानमें आरूढ होयकर बंधनको प्राप्त
होता है, या संसारमें गिर बुद्धि नष्ट होनेसे नर्कमैं जाय हैं ॥८॥
तत्र निर्मिन्नगात्राणां चित्रवाजैःशिलीमुखैः॥
विप्लवोऽभूद्दुःखितानां दुःसहः करुणात्मनाम्॥९॥
उस वनमें विचित्र पंखवाले बाणोंसे भग्न शरीर हो दुःखी मृगौंका
नाश होने लगा जिसको दयालु पुरुष सहन नहीं करसक्ते ॥९॥
शशान् वराहान् महिषाव गवयान रुरुशल्यकान्॥
मेध्यानन्यांश्च विविधान् विनिघ्ननश्रममध्यगात् १०॥
खर्गोश शूकर महिष लीलगाय रुरु शेहो पवित्र अपवित्र अनेक
पशूनको मारते अपने स्थानको आते भए ॥ १०॥
ततःक्षुत्तृट्रपरिश्रान्तो निवृत्तो गृहमेयिवान् ॥
कृतस्नानौचिताहारः संविवेश गतलमः ॥११॥
तब भूखप्याससे थके भए, बगदके घरपर आए स्नान भोजन कर
सब परिश्रम दूर होनेपर शय्यापै आए ॥ ११ ॥
आत्मानमर्हयांचक्रे धूपलेपनगादिभिः ॥
साध्वलंकृतसङ्गो महिष्यामादधे मनः ॥ १२॥
धूप चन्दन मालासे शरीरको शोभित करे सब अंगमें सुन्दर
गहिने पहिरे स्त्रीमें मनको लगाये ॥ १२ ॥
तृप्तोहृष्टः सुदृप्तश्च कन्दप्कृष्टमानसः ॥
नव्यचष्ट वरारोहां गृहिणी गृहमेधिनीम् ॥ १३ ॥
तृप्त भए हृष्ट और महा गर्वसे कामविवशचित्त हो राजा महलोंमें
गये परन्तु तहां घरका कार्य संपादन करनेहारी रानीको न देखा।॥१३॥
अन्तःपुरस्त्रियोऽष्टच्छद्विमनाइव वेदिषत् ॥
अपि वः कुशलं रामासेश्वरीणां यथा पुरा ॥१४॥

२० पुरंजनाख्यानम् । तब अंतःपुरकी स्त्रीनसे पुरंजन पूछते भए हे स्त्रियो! तुह्मारी कुशल तो है अपनी स्वामिनी सहित जैसे पहिले विचरतीथी तैसे या समय क्यों नहीं विचरो हो॥१४॥ नतथैतर्हि रोचन्ते गृहेषु गृहसंपदः ॥ यदिन स्यादृहे माता पत्नी वा पतिदेवता ।। १५॥ व्यङ्गरथ इव प्राज्ञः को नामासीत दीनवत् ॥ मदीयं मानसं नित्यं मोहयन्वी पदे पदे ॥१६॥ गृहमें गृहकी सम्पदा तैसी अब नहीं रुचै है, याको कहा कारण है जिस गृहमें माता वा पतिव्रता स्त्री नहीं होती वह घर विना पहियेके स्थकी समान है ऐसे घरमें दुःखी हो कौन पुरुष रहै ॥ १९ ॥१६॥ क्व वर्ततेसा ललना मजन्तं व्यसनार्णवे ॥ या मामुद्धरते प्रज्ञा दीपयन्ती पदे पदे ॥ १७॥ वो ललना कहां है,जो.या व्यसनरूप सागरमें डूबते भये मोकों उवारतीही, और पदपदमें मेरी बुद्धिको प्रकाश करती रहतीही सो कहां गई ॥ १७॥ ॥रामा ऊचुः॥ नरनाथ न जानीमस्त्वत्प्रिया यद् व्यवस्यति ॥ सूतले निरवस्तारे शयानां पश्य शत्रुहन् ॥१८॥ लियें बोली हे नरनाथ ! हे शत्रुनाशक! तुमारी प्रियाको जो निश्चय है सो हम नहीं जाने है, परंतु विन विछाये धरतीपर सोय रही है ।। ३८॥ ॥नारद उवाच॥ पुरंजनः स्वमहिषी निरीक्ष्यावधुतां भुवि ॥ तत्सङ्गोन्मथितज्ञानो दैव्यं परमं ययौ ।। १९॥

भाषाटीकासमेतम् । अ६
श्रीनारदजी बोले कि पुरंजन अपनी स्त्रीको धरती में कोई लेनकर
ताके संगसे ज्ञान नष्ट होय वडी भारी विवशताको प्राप्त होतो
भयो ॥१९॥
सान्त्वयन श्लक्ष्णया वाचा हृदयेन विदूयता ॥
प्रेयस्याः स्नेहसंरम्भलिङ्गमात्मनि नाभ्यगात्॥२०॥
मधुर वाणीसैं सांत्वना कर दुःखी हृदयसै प्यारीके स्नेहके क्रोधका
कोई चिन्हभी न देखा जिस्सै जानता कि प्यारीने यह प्रणयकोप
किया है ॥२०॥
अनुनिन्येऽथ शनकैर्वीरोऽनुनयकोविदः ॥
पस्पर्श पादयुगलमाह चोत्सङ्गलालितम् ॥२१॥
नीतिमें चतुर वीर धीरेसे वाके पास जाय गोदमें चरण राख
ललित प्रियाके दोनों चरणको छूयकै बोले ॥२१॥
॥ पुरंजन उवाच ॥
नूनं त्वकृतपुण्यास्ते भृत्या येष्वीश्वराः शुभे॥
कृतागःस्वात्मसात् कृत्वा शिक्षादण्डं न युञ्जता२२
पुरंजन बोले कि हे. शुभे! दास अपराध करें और उन्हें दंड.
न हो तो वे मंदभागी जान्ने स्वामियौंका धर्म है कि अपराधी दासौंको
शिक्षा करनेके निमित्त दंड दै ॥ २२ ॥
परमोऽनुग्रहो दण्डो भृत्येषु प्रभुणार्पितः॥
बालो न वेद तत् तन्वि बन्धुकृत्यममर्षणः॥२३॥
अपने नौकरोंमें जो प्रभु दंड दे हैं, वो परम अनुग्रह है, हे तन्वि'
बालक इस बातको नहीं जाने है और जो सेवक दंडसे मनमें दुःख
मान क्रोध कर उसै मूर्ख जाना उचित है ॥२३॥

२२ पुरंजनाख्यानम् । सा त्वं मुखं सुदति सुष्टनुरागभार-1 ब्रीडाविलम्बविलसद्धसितावलोकम् ॥ नीलालकालिभिरुपस्कृतमुन्नसनः। स्वानां प्रदर्शय मनस्विनि वल्गुवाक्यम् ॥२४॥ हे सुदति ! हे सुक्षु ! हे मनस्विनी ! अनुराग भरे लाजसे शोभित, हसितयुक्त चितवन, नीली अलकपंक्ति उच्चनासिका मनोहर वचन युक्त मुखकों अपनोको दिखाओ ॥ २४ ॥ तस्मिन् दधे दममहं तव वीरपनि । योऽन्यत्र भूसुरकुलात् कृतकिल्बिषस्तम् ।। पश्ये न वीतभयमुन्मुदितंत्रिलोक्या- मन्यत्र वै मुररिपोरितरत्र दासात्॥२५॥ हे मोसरीके वीरकी पत्नि! एक ब्राह्मण और भगवदासके विना और जो कोई तेरो अपराध करवेवारो है,वामें दंड धारेंगे, कारण कि त्रिलोकीमें वा त्रिलोकीसे अन्यत्र मेरा डर न मानकर आनंदसे रहनेहारे कोई सुझे नहीं दिखता ॥ २५ ॥ वक्त्रंनते वितिलकं मलिनं विहः । संरम्भभीममविसृष्टमपेतरागम् ॥ पश्येस्तनावपि शुचोपहतौ सुजातौ । बिम्बाधरं विगतकुङ्कुमपङ्करागम् ॥२६॥ तिलक शून्य,मलिन,हर्षरहित,कोपसेभयंकर तेरो मुख कभी हमने न देखो, शोकसेलचे सुंदर स्तनभी ऐसे कभी न देखे, कुंकुमकीसी कांतीरहित कंदूरीके फलसमान अधर शोकग्रस्त न देखे ॥२६॥ तन्मे प्रसीद सुहृदः कृतकिल्विषस्य । स्वैरंगतस्य मृगयां व्यसनातुरस्य ।

भाषाटीकासमेतम् । अ०३ २३ का देवरं वशगतंकुसुमास्त्रवेग-1 वित्रस्तपौंस्नमुशती न भजेत कृत्ये॥२७॥ इति श्रीपुरंजनाख्याने पुरंजनेन स्वापराधक्षमा- पन-वर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः ॥२॥ ताते मोपै आप प्रसन्न हो मैं तेरी आज्ञा विना व्यसनमें आतुर होय शिकारको गयो,अब कामवेगसे धैर्यरहित,तथा अपने आधीन मित्ररूप अपने भाकी कामनावाली कौन नारी उचित कृत्यमें न भजे ॥२७॥ इति श्रीपुरंजनाख्याने पुरंजनेन स्वापराधक्षमापनवर्णनं नाम द्वितीयोऽध्यायः॥२॥ अथ तृतीयोऽध्यायः। ॥नारद उवाच ॥ . इत्थं पुरंजनं सम्यग्वशमानीय विभ्रमैः॥ पुरंजनी महाराज रेमेरमयती पतिम् ॥१॥ श्रीनारदजी बोले कि हे महाराज ! या प्रकार पुरंजनी पुरंजनको अपने सुन्दर कटाक्षोंसें मोहित करके वशकर रमण कराती भई आपभी रमण करती भई ॥१॥ १ " तापे एक पद है ॥ बिहाग ॥ तिताला ॥ तिरिया जो न होतं हरिदासी ॥टेर ॥ सो तिरिया गनिकासम जानो दुखरावति जगहांसी ॥१॥ परमारथ कवहू नहि जानति आपन परी गलफांसी ॥२॥ कहा भयो रूपगुण सुंदर नाहि न श्याम उपासी ॥.३॥ व्यासदास यह संगत तजिये मिटत है जमकी फांसी ॥४॥ +

२४ .
पुरंजनाख्यानम् ।
स राजा महिषी राजन सुनातां रुचिराननाम् ॥
कृतस्वस्त्ययनां तृप्तामभ्यनन्ददुपागताम् ॥२॥
हे राजन् ! सो राजा सुन्दर स्नान करीभई, सुन्दर मुखवारी
स्वस्त्ययन युक्त तृप्त अपने निकट रानीको आता देख राजाने उसका
बहुत सत्कार किया॥२॥
तयोपगूढः परिरब्धकन्धरो।
रहोऽनु मन्त्रैरपकृष्टचेतनः॥
ल कालरंहो बुबुधे दुरत्ययं ।
दिवा निशेतिप्रमदापरिग्रहः ॥३॥
तासे लिपटे मिले कन्धासे उसै आलिंगन करकंठ लगाय एकांतमें
गुप्त भाषणसे चित्त वशीभूत होनेके कारण दिनरात दुरत्यय कालवे-
गको न जानतो भयो, स्त्रीके संगमें दिनरात व्यतीत हुए ॥३॥
शयान उन्नद्धमदो महामना।
महार्हतल्पे महिषीभुजोपधिः ॥
तामेव वीरो मनुते.परं यत-1
स्तमोऽभिभूतो न निजं परं च यत्॥ ४ ॥
महामदांध महामनस्वी महासेजपै स्त्रीकी भुजाको तकिया लगाये
सोता वाहीकों श्रेष्ठ मानता भया, और तमसे तिरस्कृत हो वह वीर
अपना परायाभी न मानता भया॥४॥
तयैवं रममाणस्य कामकश्मलचेतसः॥
क्षणार्धमिव राजेन्द्र व्यतिक्रान्तं नवं वयः॥५॥
हे राजेन्द्र! कामासक्त हो इस प्रकार उसके साथ विहार करते
करते उनकी नवीन अवस्था क्षणाईकी नाई व्यतीत होतीभई ॥५॥

भाषाटीकासमेतम् । अ० ३ ॥ तस्यामजनयत् पुत्रान् पुरंजन्यांपुरंजनः॥ शतान्येकादश विराडायुषोऽर्धमथात्यगात् ॥६॥ पुरंजन पुरंजनीमें इंद्रियोंकी परिणामरूपएकादशसहस्र पुत्र रचतो भयो,आधी आयु सम्राटकी व्यतीत होतीभई॥६॥ दुहितुर्दशोत्तरशतं पितृमातृयशस्करीः॥ शीलौदार्यगुणोपेताःपौरंजन्यः प्रजापते ॥७॥ हे प्रजापते! एकसो दस बेटी भईवे पितृमातृयश करवेवारी भई, शीलउदारगुणयुक्त पौरंजन्यवंश भयो॥७॥ स पञ्चालपतिःपुत्रान् पितृवंशविवर्धनान् ।। दारैः संयोजयामास दुहितः सदृशैर्वरैः॥८॥ सो पंचालपति पिताके वंश बढानेवारे पुत्रनको विवाह करतो भयो, समान वरनको बेटी व्याही ॥८॥ पुत्राणां चाभवन्पुत्रा एकैकस्य शतं शतम् ॥ यैः पौरंजनो वंशः पञ्चालेषु समेधितः ॥९॥ उन पुत्रनके एक एक शतपुत्र भए, जिन करके पौरंजनवंश पंचालदेशमें बढो ॥९॥ तेषु तद्रिक्थहारेषु गृहकोशानुजीविषु ॥ निरूढेन ममत्वेन विषयेष्वन्वबध्यत ॥ १०॥ उनके दायभागी गृहखजानेके मालक विन सबोंमें महाममताके वश होयकर विषयोंमें फस जातो भयो ॥१०॥ ईजे चक्रतुभिर्घोरैर्दीक्षितः पशुमारकैः॥ देवान पितृन भूतपतीन् नानाकामो यथा भवान११ यह राजाभी तेरी समान दीक्षा लेके विविध प्रकारकी अभि-

२६
पुरंजनाख्यानम् ।
लाषाओंके भयंकर पशु हिंसावारे यज्ञोंसे देवता पितृ और भूतप-
तियोंका यजन किया ॥ ११॥
युक्तेष्वेवं प्रमत्तस्य कुटुम्बासक्तचेतसः॥
आससाद सवै कालोयोऽप्रियः प्रिययोषिताम्॥१२
ऐसे योग्य प्रमत्त कुटुंवमें आसक्त चित्तकू वो काल आयके प्राप्त
भयो जो योषितानको अप्रिय है, वाको नाम जरापन है ॥१२॥
चण्डवेग इति ख्यातो गन्धर्वाधिपतिर्नृप।
गन्धर्वास्तस्य बलिनःषष्टयुत्तरशतत्रयम् ॥१३॥
हे नृप ! चंडवेग (वर्ष) नाम एक गंधवोंको अधिपति हो, वाके
वली गंधर्व ३६० (दिन ) होते भए ॥१३॥
गन्धय॑स्तादृशीरस्य मैथुन्यश्च सितासिताः ॥
परिवृत्त्या विलम्पन्ति सर्वकामविनिर्मिताम् ॥१४॥
उनकी उतनीही स्त्रिये (रात्रि) होती भई जो सित असित नामवाली
है और बलवान हो जो विचरण करके इस नगरीको लुटती है ॥१४॥
तेचण्डवेगानुचराः पुरंजनपुरं यदा ॥
हर्तुमारेभिरे तत्र प्रत्यषेधत् प्रजागरः॥ १५॥
जब चंडवेगके अनुचर पुरंजनके पुरको हरखेकोप्रारंभ करते भये,
तव प्राणरूप प्रजागर मनै करतो भयो ॥१५॥
स सप्तभिः शतैरेको विंशत्या च शतं समाः॥
पुरंजनपुराध्यक्षो गन्धवैयुयुधे बली ॥१६॥
सातसे इक्कीस बली गंधोंसे पुरंजन पुरको अध्यक्ष बलवान नाग
सौ वर्ष युद्ध करता हुआ ॥१६॥
क्षीयमाणे स्वसंबन्ध एकस्मिन् बहुभिर्युधा॥
चिन्तां परांजगामातः सराष्ट्रपुरबान्धवः ॥ १७ ॥

P
-
भाषाटीकासमेतम् । अ०३
जब बहुत जनोंके साथ इकला युद्ध करनेसै यह नाग क्षीणबल
होने लगता है तब पुरंजन देश नगर और कुटुम्ब सहित व्याकुल हो
चिन्तामें प्राप्त होता है।॥१७॥
स एव पुर्या मधुभुक् पञ्चालेषु स्वपार्षदैः॥
उपनीतं बलिं गृह्णन् स्त्रीजितो नाविदद्भयम्॥१८॥
परन्तु मधुभोजी स्वपार्षदों सहित पंचाल देशमें प्राप्त बलिको
ग्रहण करता स्त्रीजित होनेसै भयकों नहीं प्राप्त होता है ॥१८॥
कालस्य दुहिता काचित्रिलोकी वरमिच्छती॥
पर्यटन्ती न बहिष्मन् प्रत्यनन्दत कश्चन ॥१९॥
हे राजन् ! इसी अवसरमें कालकी कोई दुहिता त्रिलोकीमें वरकी
इच्छा करती डोलती भई परन्तु कोई वांकी सराहना न करतो भयो
किसीने उसके वरणकी इच्छा नहीं की ॥१९॥
दौर्भाग्येनात्मना लोके विश्रुता दुर्भगेति सा॥
या तुष्टा राजर्षये तु वृतादात् पूरवे वरम् ॥२०॥
अपनी आत्माकी दुर्भाग्यता करकै लोकमैं वह दुर्भगा विख्यात
ही, इसका प्रथम पुरु राजानै वरण किया था इस कारण इसने प्रसन्न
हो राजाको वर दिया ॥२०॥
कदाचिदटमाना सा ब्रह्मलोकान्महीं गतम् ॥
वज्र बृहद्रतं मां तु जानती काममोहिता ॥२१॥
किसी समय पर्यटन करती कामसे मोहित होवह ब्रह्मलोकसे मही:
पर प्राप्त हो महानती हमसे बोली कि तुम मुझे वरण करो॥२॥
मयि संरभ्य विपुलमदाच्छापं सुदुःसहम् ॥
स्थातुमर्हसि नैकत्र मद्याच्याविमुखो मुनेः ॥२२॥

पुरंजनाख्यानम् ।
जव मैंने उसे स्वीकार न किया तब मुझै निवृत जा क्रोधकर दुःसह
शाप देती भई बोली, हे मुनि ! मेरी यांचासे तुम विमुख भये सो तुम
एकजगै स्थित न रह सकोगे (सो प्रगट है युवा पुरुष एक स्थानपर
स्थित नहीं रहते जराग्रस्त पडे रहते हैं)॥२२॥
ततो विहतसंकल्पा कन्यका यवनेश्वरम् ॥
मयोपदिष्टमासाद्य वत्रे नाम्ना भयं पतिम् ॥२३॥
जब उसका अभिलाष पूर्ण न हुआ तब वह मेरो आज्ञासै यवनीके
अधिपति भयकी वरण करने गई और बोली ॥२३॥
ऋषभं यवनानां त्वां वृणे वीरेप्सितं पतिम् ।।
संकल्पस्त्वयि भूतानां कृतःकिल नरिष्यति॥२४॥
हे वीर! मनवांछित पति यवननके ऋषभ तुमकू मैं वरूंगी,
तुमारेमें जीवनके संकल्प नाश न होयगे ॥२४॥
द्राविमावनुशोचन्ति बालावसदवग्रहौ ।
यल्लोकशास्त्रोपनतं नराति न तदिच्छति ॥२५॥
लोक और शास्त्रकी रीतिके अनुसार जो देने योग्य वस्तुको नहीं
देता और लेने योग्य वस्तुको नहीं लेता यह दोनौ मूर्ख और अस-
ग्राही शोच करते हैं ॥२५॥
अथो भजस्व मां भद्रभजती मेदयां कुरु ।।
एतावान् पौरुषोधर्मो यदानिनुकम्पते॥२६॥
अब मोको भजो हे मंगलरूप! भजती भई मोपर दया करो,
पुरुषको येही धर्म है जो आतपर कृपा करनी ॥२६॥
कालकन्योदितवचो निशम्य यवनेश्वरः॥
चिकीर्षुर्देव गुह्यं स सस्मितां तामभाषत ॥२७॥

भाषाटीकासमेतम् । अ० ३ कालकन्याको कह्यो वचन सुन यवनेश्वर देवताऔंसेभी गुप्त बात करनेकी इच्छासै मुसकाय कर वाते बोलो ॥२७॥ मया निरूपितस्तुभ्यं पतिरात्मसमाधिना॥ नाभिनन्दति लोकोऽयं त्वामभद्रामसंमताम्॥२८॥ आत्मज्ञानसे मैं तुमको पति निरूपण कर चुकाहूं तू अमंगल- रूप लोकौंको अमाननीय है इस्सै प्रार्थना करनेपर तो कोई तुझे स्वीकार न करेगा ॥२८॥ त्वमव्यक्तगति झवलोकं कर्मविनिर्मितम् ॥ याहि मे एतनायुक्ता प्रजानाशं प्रणेष्यसि ॥ २९ ॥ कर्मसे विनिर्मित्त लोककों तू अप्रगट गतिसे भोग मेरी सेनाले जाओ तो प्रजानाशकों प्राप्त होगी ॥२९॥ प्रज्वारोऽयं मम भ्राता त्वं च मे भगिनीभव ॥ चराम्युभाभ्यां लोकेऽस्मिन्नव्यक्तो भीमसैनिकः३० इति श्रीपुरञ्जनाख्याने कालकन्योपाख्यानवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः ॥३॥ ये प्रज्वार गन्धर्व मेरोभाई है, तू मेरी बहन होजा और भयंकर सेना लेकर जाओ मैंभी तुम्हारे पीछे अप्रगट गति होकर विचरूंगा॥३०॥ इति श्रीपुरंजनाख्याने कालकन्योपाख्यानवर्णनं नाम तृतीयोऽध्यायः॥३॥ आमा"

पुरंजनाख्यानम् ।
अथ
चतुर्थोऽध्यायः।
॥ नारद उवाच ॥
सैनिका भयनानो ये बर्हिष्मन दिष्टकारिणः ॥
प्रज्वारकालकन्याभ्यां विचेरुरवनीमिमाम् ॥१॥
श्रीनारदजी बोले कि हे बर्हिष्मन् ! भयनामा यवनके सेनाके लोग
रोगप्रज्वार और कालकन्याके सहित या धरतीपर विचरते भए॥१॥
तएकदातु रभसा पुरंजनपुरी नृप।
रुरुधुढेमभोगाढयांजरत्पन्नगपालिताम् ॥२॥
हे नृप! वे एक समय वेगसे भूमिके भोगयुक्त, जीर्ण, प्राणरूप
सर्पसें पालित, पुरंजनकी पुरीको रोकते भये ॥२॥
कालकन्याऽपि भुजे पुरञ्जनपुरं बलात् ॥
ययाऽभिभूतः पुरुषः सद्यो निःसारतामियात् ॥३॥
कालकन्यासी पुरंजनकी पुरीको बलसे भोगती भई, जासे तिर-
स्कृत पुरुष शीघ्र निस्सारताको प्राप्त होने हैं ॥३॥
तयोपभुज्यमानां वै यवनाः सर्वतो दिशम् ॥
द्वाभिः प्रविश्य सुभृशं प्रादयन् सकलां पुरीम्॥४॥
ता करके भोगे भये यवन दारोंमें सब ओरसें प्रविष्ट होकर सब
पुरीको पीडा देते भये ॥४॥
तस्यां प्रपीडयमानायामभिमानी पुरञ्जनः ।
अवापोरुविधांस्तापान कुटुम्बी ममताकुलः ॥५॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०४ जब वा पुरीमें पीडा भई, तव अभिमानी पुरंजन कुटुंबी ममतामें व्याकुल बहुत तापोंको प्राप्त होतो भयो ॥६॥ कन्योपगूढो नष्टश्रीः कृपणो विषयात्मकः॥ नष्टप्रज्ञो हृतैश्वर्यो गन्धर्वयवनैर्बलात् ॥६॥ उस कन्यासै आलिंगन करनेके कारण कृपण तथा कांतिहीन हो पुरंजन अपना ऐश्वर्य गंवाय सामर्थहीन होगया और वे गंधर्व और यवन उसकी पुरीको विध्वंस करने लगे ॥६॥ विशीर्णी स्वपुरी वीक्ष्य प्रतिकूलाननादृतान् ॥ पुत्रान पौत्राऽनुगामात्यान जायां च गतसौहदाम् ॥७॥ अपनी पुरीको टूटी देख आदर हीन अपनेसे प्रतिकूल चलनेहारे पुत्र पौत्र चाकर मंत्री और स्त्रीकोभी सुहृदता त्यागे देखता हुआ (जरा अवस्थामें बुद्धि मलीन होती है) ॥७॥ आत्मानं कन्यया ग्रस्तं पञ्चालानारदूषितान् ।। दुरन्तचिन्तामापन्नोन लेभे तत्प्रतिक्रियाम् ॥ ८॥ अपनी देहको जरा कन्यासै ग्रसित देख और पंचाल देशोंको वैरियोंसे पीडित देख, पुरंजन महाचिन्तामें मग्न हुआ जिसके दूर करनेका उपाय न मिला ॥८॥ कामानभिलषन् दीनो यातयामांश्च कन्यया ॥ विगतात्मगतिस्नेहः पुत्रदारांश्च लालयन् ॥९॥ यद्यपि कालकी कन्याके भोगनेसै उसके सब विषय सारहीन होगये थे तथापि दीन पुरंजन उन्हीकी इच्छा करता परलोक कृत्य और इस लोकके पुत्रादि स्नेहसे शून्य होकरभी पुत्र स्त्रीका लालन करताथा॥९॥ गन्धर्वयवनाकान्तां कालकन्योपमर्दिताम् । हातुं प्रचक्रमे राजा तां पुरीमनिकामतः ॥ १०॥ 1

पुरंजनाख्यानम् ।
गंधर्व यवनोंसे घिरी कालकी कन्या जरासैं मर्दित वा पुरीको इच्छा
न होनेपरभी पुरंजनरूप जीवराजा त्यागकी इच्छा करते भये ॥१०॥
भयनाम्नोग्रजो भ्राता प्रज्वारःप्रत्युपस्थितः ॥
ददाह तां पुरीं कृत्स्ना भ्रातुः प्रियचिकीर्षया ॥११॥
तब भय मृत्युकाभ्राता प्रज्वार कालज्वर आय उपस्थित भयो, सो
भाईके प्रियकी इच्छा करकै सव यवन वा पुरीकों जरावतो भयो।।११
तस्यां संदह्यमानायां सपौरः सपरिच्छदः॥
कौटुम्विका कुटुम्बिन्या उपातप्यत सान्वयः॥१२॥
पुरवासी सब परिवार सहित जब वो पुरी जरगई, तब कुटुंबी वा
कुटुंबिनीके साथ राजा वंश सहित संतापको प्राप्त होतो भयो।।१२।।
यवनोपरुद्धायतनो ग्रस्तायां कालकन्यया ॥
पुर्या प्रज्वारसंसृष्टः पुरपालोऽन्वतप्यत॥१३॥
यवनोंकरकै सव स्थान जब रुक गए कालकन्याने पुरी सब ग्रसी
प्रज्वारसे पुरी सव घिरी देख पुरपाल नाग अतिताप करता भया३३
नशेके सोवितुं तत्र पुरुकृच्छ्रोरुवेपथुः ।।
गन्तुमैच्छत् ततो वृक्षकोटरादिव सानलात् ॥१४॥
यह नाग जब महादुःखसै कंपित्त होकर जब उस पुरीकी रक्षा
समर्थ न हुआ तब जलते वृक्षसै जैसे सर्प निकलनेकी अभिलाषा
करे इसप्रकार उस नगरीसे निकलनेकी इच्छा की ॥ १४॥
शिथिलावयवो यहि गन्धर्वैर्हतपौरुषः॥
यवनैररिभी राजन्नुपरुद्धो रुरोदह ॥१५॥
हे राजन् ! जब सब अवयव याके शिथिल भए, गंधवाने सव
बल हरलीनो और शवरूप यवनोंने जब पुरीको रोकी तव पुरंजन
रोतोभयो ॥ १९॥

३३ । . भाषाटीकासमेतम् । अ०४ दुहितः पुत्रपौत्रांश्च जामिजामातृपार्षदान्॥ स्वत्वावशिष्टं यत् किंचिद् गृहकोशपरिच्छदम् १६ दुहिता पुत्र पौत्र जमाई पार्षद गृह खजानो सब परिवार यामें एक स्वत्वमात्र बाकी रहिगयो, ये मेरे हैं ये स्वत्वभाव भयो ॥१६॥ अहं ममेति स्वीकृत्य गृहेषु कुमतिही ॥ दध्यौप्रमदया दीनो विप्रयोग उपस्थिते ॥ १७ ॥ अहंता ममतासै अपना माने कुमतिसै घरके भीतर बंधाहुआ गृहस्थी पुरंजन स्त्रीके वियोगके समय विचारने लगा ॥ १७॥ लोकान्तरं गतवति मय्यनाथा कुटुम्बिनी ॥ वर्तिष्यते कथं त्वेषाबालकाननुशोचती ॥१८॥ मैं जब और लोकांतरकों जाऊंगो, तो अनाथा कुटुंबिनी ये बाल- कनको सोच करतीभई कैसे वर्तंगी ॥१८॥ न मय्यनाशिते भुते नास्नाते स्नाति मत्परा॥ मयि रुष्टे सुसंत्रस्ताभत्सिते यतवाग भयात् ॥१९॥ जो मेरे बिनाखाए खाती नहीं मेरे बिनान्हाये न्हाती नहीं, मेरी भक्त जो मेरे रोष करने पर त्रसित होती, मेरे झिडकने पर भयके मारे मौन हो बैठ जाती है ॥ १९॥ प्रबोधयतिमामव्युषिते शोककर्शिता॥ वत्मैतद् गृहमेधीयं वीरसूरपि नेष्यति ॥२०॥ मेरे व्याकुल होने पर मुझै बोध करती है मेरे परदेशमें जाने पर शोकसे कर्षित होतीथी गृहस्थनको येही मार्ग है पुत्रवती ही तोभी मेरे विना मरीसी होजाती थी॥२०॥ कथं नु दारका दीना दारकीर्वा परायणाः॥ वर्तिष्यन्ते मयि गतेभिन्ननाव इवोदधौ ॥२१॥ ३

पुरंजनाख्यानम् ।
ये दीन वालिकी वालक मेरे परायण हैं, मैं जब जाऊंगो तो कैसे
वतेगी, जैसे सागरमें नाव टूटनैसे उसके बैठनेवाले व्याकुल होतेहैं ऐसे
उन सबकी दशा होतीहै ॥२१॥
एवं कृपणया बुद्धया शोचन्तमतदहणम् ॥
ग्रहीतुं कृतधीरेनं भयनामाऽभ्यपद्यत ॥ २२ ॥
ऐसे कृपणवुद्धिसें अयोग्य शोच करतेहुए• पकडनेकी बुद्धिकर
भयनामक यवनराज आनकर प्राप्तभयो ॥२२॥
पशुवधवनैरेव नीयमानः स्वकं क्षयम् ॥
अन्वद्रवन्ननुपथाः शोचन्तो भृशमातुराः॥२३ ॥
पशुकी नाई यवन याको अपने घर ले जाते भए उनके अनुयायी
अत्यंत आतुर होय शोकके मारे उनके कुटुम्बी उसके संग दौडे २३
पुरी विहायोपगत उपरुद्धो भुजंगमः ॥
यदा तमेवानु पुरी विशीर्णा प्रकृतिं गता ॥ २४ ॥
जौ सर्प वाकू रोके रहताथा वोभी पुरीको त्यागकर जब गयो
ताके पीछे सब पुरी विशीर्ण हो अपने आप नाश होय अपनी
प्रकृतिको गई ॥२४॥
विकृष्यमाणः प्रससं यवनेन बलीयसा॥
नाविन्दत् तमसाऽऽविष्टःसखायं सुहृदं पुरः॥२५॥
हठसे वली यवनने जब वाकों खीचो,तो तमोगुणसे आविष्ट होनेके
कारण पुरंजनको अपने पूर्व मित्रका स्मरण न आया ॥२५॥
तं यज्ञपशवोऽनेन संज्ञप्ता येऽदयालुना॥
कुठारैश्चिच्छिदुःक्रुद्धाःस्मरन्तोऽमीवमस्यतत्६
या दया रहितने जो यज्ञके पशु मारे है सो वे याके अपराधकों
मरण कर क्रोधित हो कुहाडोंसे उसै छेदने लगे ॥२६॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०४ अनन्तपारे तमसि मग्नो नष्टस्मृतिः समाः॥ शाश्वतीरनुभूयाति प्रमदासङ्गदूषितः॥२७॥ अपार तममें स्मृति नष्ट होनेके कारण वा प्रमदाके संगसे दूषित हो बहुत वर्षपर्यंत पीडाकू भोग कर ॥२७॥ तामेव मनसा गृह्णन् बभूव प्रमदोत्तमा । अनन्तरं विदर्भस्य राजसिंहस्य वेश्मनि ॥२८॥ वो पुरंजन वा पुरंजनी स्त्रीकोंही मनमें स्मरण करता रहा यासे राजोंमें श्रेष्ठ विदर्भराजके घरमें जायकर स्त्रीका जन्म पाताहुआ या प्रसंगमें ये जानने कि स्त्रीध्यानसें स्त्री होय है ॥२८॥ उपयेमे वीर्यपणां वैदर्भी मलयध्वजः॥ युधि निर्जित्य राजन्यान् पाण्ड्यः परपुरंजयः॥२९॥ युद्धमें शत्रुओंको मारकर पांड्य देशके राजा मलयध्वज वैदर्भीकों व्याहते भए मलय उपलक्षितदक्षिणदेशध्वज इव दर्शनीयः" वो देश विष्णुकी भक्तिको प्रधानदेश है "पंडा निश्चयबुद्धिस्तामर्हतीति पांड्यः” अर्थात् पुरंजनको भागवतका संग हुआ॥२९॥ तस्यां स जनयांचक्र आत्मजामसितेक्षणाम् ॥ यवीयसः सप्तसुतान् सप्तद्रविडभूभृतः॥३०॥ वो मलयध्वज वामें श्रीकृष्णमें रुचीवारी श्रीकृष्णसेवारूप कन्या उत्पन्न करतो भयो द्रविडदेशका राजा श्रवण, कीर्तन, विष्णोः स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्यरूप सप्त तरुण सुतनकों उत्पन्न करतोभयो॥३०॥ १ पतिव्रताके ध्यानसे पूर्वजन्मके धर्मके कारण श्रेष्ठाचार विदर्भके घर जन्म हुआ उस धर्मात्मा राजाके संगसै मलयध्वज वैष्णवका संग हुआ उस भक्तिसै वैराग्य हुआ तथा पतिरूप गुरुकी सेवा करनेसै भगवानकी कृपास ज्ञान प्राप्त होनेके कारण मुक्तिको प्राप्त हुआ।

पुरंजनाख्यानम् ।
एकैकस्याभवत् तेषां राजन्नर्बुदमदम् ॥
भोक्ष्यते यवंशधरैर्मही मन्वन्तरं परम् ॥३१॥
हे राजन् ! उन पूर्वोक्त सप्त श्रवण आदि अर्बुद अर्बुद सुत भए,
जो इस पृथ्वीका मन्वन्तरसैभी अधिक पालन करने लगे ॥३१॥
अगस्त्यःप्राग्दुहितरमुपयेमे धृतव्रताम् ॥
यस्यां दृढच्युतो जात इध्मवाहात्मजो मुनिः॥३२॥
अंगानि निष्क्रियाणि स्त्यायति संघातयतीति अगस्त्यो मनः"
अगस्त्य मनको नाम है सो मन व्रत धारवेवारी पहिली कृष्णसेवारु-
चिरूप दुहिताकू व्याहतो भयो, जामें इध्मवाहात्मज मुनि दृढच्युत
श्रीकृष्णप्रीतिरूप विराग भयो (इध्मवाह आत्मजो यस्य सः॥तद्वि-
ज्ञानाथै स गुरुमवाभिगच्छेत्समित्पाणिःश्रोत्रियं ब्रह्मनिष्ठमिति)॥३२॥
विभज्य तनयेभ्यःक्ष्मां राजर्षिर्मलयध्वजः॥
आरिराधयिषुः कृष्णं स जगाम कुलाचलम् ॥३३॥
राजर्षि मलयध्वज पुत्रोंके अर्थ पृथिवीनकों विभागकर श्रीकृष्णकी
आराधन करवेकों कुलाचल पर्वतपर जातो भयो ॥३३॥
हित्वा गृहान सुतान् भोगान् वैदर्भी मदिरेक्षणा ॥
अन्वधावत पाण्डयेशंज्योत्स्नेवरजनीकरम्॥३४॥
मदभरे नेत्रवारी वैदर्भी गृह सुत भोगनकों त्यागकर जैसे चंद्र-
प्रभा चंद्रके पाछे दौडे तैसे पांड्येशके पीछे जाती भई ॥३४॥
तत्र चन्द्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका ॥
तत्पुण्यसलिलैर्नित्यमुभयत्रात्मनो मृजन ॥३५॥
तहां चंद्रवसा नाम ताम्रपर्णी वटोदका नदियों के पवित्र जल करके
अन्तःकरण और अपनपेको स्नानकर शुद्ध करती भई ॥३५॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०४
कन्दाऽष्टिभिर्मूलफलैः पुष्पपर्णेस्तृणोदकैः॥
वर्तमानः शनैःत्रकर्षणं तप आस्थितः॥३६॥
कंद कोय मूल फल पुष्प पर्ण तृण जलसे धीरे धीरै पायकर शरीर
कृशकर तप करती भई ॥३६॥
शीतोष्णवातवर्षाणि क्षुत्पिपासे प्रियाप्रिये ॥
सुखदुःख इति द्वन्द्वान्यजयत् समदर्शनः ॥३७॥
शीत ग्रीष्म पवन वर्षा क्षुधा प्यास प्रिय अप्रिय सुख दुःखकों
जीतते भए समदर्शी होते भए ॥३७॥
तपसा विद्यया पककषायो नियमैर्यमैः॥
युयुजे ब्रह्मण्यात्मानं विजिताक्षानिलाशयः॥३८॥
तप विद्या यम नियमसे सब कषाय पक गए, इंद्रियें पवन अंत:-
करण जीत ब्रह्ममें आत्माकों लगावते भए ॥ ३८ ॥
आस्ते स्थाणुरिवैकत्र दिव्यं वर्षशतं स्थिरः॥
वासुदेवे भगवति नान्यद वेदोदहन रतिम् ॥३९॥
खंभकी समान एक जगह दिव्यशतवर्ष स्थित रहै, वासुदेव भग
बानमें प्रीत करते और कुछ न जानते भए ॥३९॥
स व्यापकतयात्मानं व्यतिरिक्ततयात्मनि ॥
विद्वान् स्वप्न इवामर्शसाक्षिणं विररामह॥४०॥
देहादिकोंमें प्रकाश करनेसे आत्मा भिन्न है तथा जड़ वृत्तिवाले
अन्तःकरणसभी शुद्ध है, जैसे स्वपमें अपना अनिष्ट देखनेसे जागृत
अवस्थामें उन अन्तःकरणकी वृत्तियोंका प्रकाशक आत्मा पृथक् है,
इस प्रकार मनमें सम्यक् ज्ञानकर पांड्यराजा सब पदार्थोंसे उपशमको
प्राप्त हुआ।॥४०॥

पुरंजनाख्यानम् ।
साक्षाद् भगवतोक्तेन गुरुणा हरिणा नृप।
विशुद्धज्ञानदीपेन स्फुरता विश्वतोमुखम् ॥४१॥
हे नृप ! साक्षात् गुरु भगवान् हरिके कहे भये विशुद्ध ज्ञानदीप
करकै विश्वमुख ईश्वरकी स्फूर्ति होय आई ॥११॥
परे ब्रह्मणि चात्मानं परं ब्रह्म तथात्मनि ॥
वीक्षमाणो विहायेक्षामस्मादुपरराम ह॥४२॥
परब्रह्ममें तो सब जीवनको मानते भये, परब्रह्मकों सब जीवनमें
देखनेहारी दृष्टिसें देखकर या शरीरको त्यागतो भयो ॥४२॥
पतिं परमधर्मज्ञं वैदर्भी मलयध्वजम् ॥
प्रेम्णा पर्यचरद्धित्वा भोगान् सा पतिदेवता॥४३॥
परमधर्मज्ञ पति मलयध्वजकी प्रेमसे सेवा करती भई, वैदर्भी सब
भोग त्याग पतिको देवताके समान मानती भई ॥१३॥
चीरवासा व्रतक्षामा वेणीभूतशिरोरुहा ॥
बभावुपपति शान्ता शिखा शान्तमिवानलम्॥४४॥
चीर वस्त्र पहिरे व्रतसे कर्षित एकवेणी युक्त वार लिये धूमरहित
अग्निकी ज्वाला अमिक शान्त होनेपर स्वयमेव जैसे शान्त होजाती
है ऐसे वह पतिके समीपमें पतिहीकी नाई शान्त होगई ॥४४॥
अजानती प्रियतमं यदोपरतमङ्गना॥
मुंस्थिरासनमासाद्य यथापूर्वमुपाचरत् ॥४९॥
अपने प्रीतमको उपरामको प्राप्त हुआ न जानकर स्थिर बँके
आसनपर बैठ पहिलेकी समान सेवन करती भई ॥१५॥
यदानोपालभेताशावूष्माणं पत्युरर्चती ॥
आसीत् संविग्रहृदया यूथभ्रष्टा मृगी यथा ॥४६॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०४ पतिकी सेवा करनेमें जब चरणों में गरमपन न मालूम पडो तब संविग्रहृदय भई यूथभ्रष्ट मृगीकी समान शोक करती हुई ॥१६॥ आत्मानं शोचती दीनमबन्धुं विक्लवाऽश्रुभिः॥ स्तनावासिच्य विपिने सुस्वरं प्ररुरोद सा ॥१७॥ अनाथ और दीन अपने आत्माको शोच करती व्याकुलताके आंसुओंसे स्तनोंको भिजोती ऊंचे स्वरसै रोती हुई ॥४७॥ उत्तिष्ठोत्तिष्ठ राजर्ष इमामुदधिमेखलाम् ॥ दस्युभ्यः क्षत्रबन्धुभ्यो विभ्यतीं पातुमर्हसि ॥४८॥ हे राजर्षे ! उठो उठो समुद्रपर्यंतकी डरती भई पृथिवीको क्षत्री- नसे चोरनसे रक्षा करने योग्य हो ॥४८॥ एवं विलपती बाला विपिनेऽनुगता पतिम् ॥ पतिता पादयोर्भ रुदन्त्यश्रूण्यवर्तयत् ॥ ४९ ॥ ऐसे विलाप करती भई वाला वनमें पतिके पाछे जाती भई, भताके चरणों में पतित हो रोती आंसू डारती भई ।। ४९ ॥ चितिदारुमयी चित्वा तस्यां पत्युः कलेवरम् ॥ आदीप्य चानुमरणे विलपन्ती मनो दधे ॥ ५० ॥ काष्टकी चिता बनाय वामें पतिको देह धर जराय विलाप करती भई, और आपभी मरणमें मन धारती भई ॥१०॥ तत्र पूर्वतरःकश्चित् सखा ब्राह्मण आत्मवान् ॥ सान्त्वयन वल्गुना साम्ना तामाहरुदतीं प्रभो॥५॥ हे प्रभो! तहां प्राचीन कोई वेदान्ती ब्राह्मण वाके सखा (ईश्वर) आयकर मनोहरवाणीसे सांत्वनाकर रोती भईसे बोलें ॥५॥ १ पहले पुरंजनको अहंकार था इस कारण भगवानने दर्शन नहीं दिया अब अभिमानशून्य हो धर्मयुक्त बैठनेपर भगवानने दर्शन देकर उपदेश किया।

. पुरंजनास्यानम् । ॥ ब्राह्मण उवाच ॥ का त्वं कस्यासि को वाऽयं शयानो यस्य शोचसि॥ जानासि किंसखायं मांयेनाग्रेविचचर्थह ॥ १२ ॥ ब्राह्मण बोले कि तुम कौन हो कौनकी हो ये कौन सोयो है। जाको तुम सोच करो हो,मैं तुह्मारो सखा हूं मोकों जानोहो कि नहीं जो पहले तुम हमारे संग विचरतेथे ॥५२॥ अपि स्मरसि चात्मानमविज्ञातसखं सखे ॥ हित्वा मापदमन्विच्छन् भौमभोगरतोगतः ॥५३॥ हे सखे! मैं अविज्ञातनामक तुह्मारो सखाहूं सो मेरी और अपने शरीरकी तुम्हें कुछ स्मृति है तुम मोको त्यागकर स्थानको इच्छा- कर भूमिके भोगमें रत होगये ।। ५३॥ हंसावहं च त्वं चार्य सखायौ मानसायनौ॥ अभूतामन्तरावौकः सहस्रपरिवत्सरान् ॥५४॥ हे आर्य! हम तुम दोनों शुद्ध सखा मानसवासी हंस हैं, सो हजार वर्षाको अंतर पडगयो,स्थानके विना तुम जीव हो मैं ईश्वर हूं॥९॥ स त्वं विहाय मां वन्धोगतो ग्राम्यमतिर्महीम् ॥ विचरन् पदमद्राक्षीः कयाचिनिर्मितं स्त्रिया ॥५५॥ हे बन्धो! गांवके विषयमें तुह्मारी मति ही सोमोको त्याग करके तुम गए, और किसी स्त्रीकी रचीभई पुरीमैं विचरते रहे, ऐसे पृथ्वी पर मैंने तुम्हें देखा ॥ ५५॥ पञ्चाराम नवद्वारमेकपालं त्रिकोष्ठकम् ॥ षटकुलं पञ्चविपणं पञ्चप्रकृति स्त्रीधवम् ॥५६॥ उस पुरीमें पांच (शब्दादि विषय) वाग थे नौ छिद्रूप) द्वारथे भाषाटीकासमेतम् । अ०४ एक पुरीका पालक (प्राण) था तीन (पृथ्वी जल तेज) किले थे छः (पांच ज्ञानेन्द्रिय और मन) व्यौपारी थे पांच (कर्मेंद्रिय) दुकानें थीं पांचही (पंचभूतौकी प्रकृति) मूल कारण थे स्त्री (बुद्धि) स्वामी थी ऐसी वह पुरी थी॥५६॥ पञ्चेन्द्रियार्था आरामा द्वारा प्राणा नव प्रभो॥ तेजोऽवन्नानि कोष्ठानि कुलमिन्द्रियसंग्रहः ॥१७॥ हे प्रभो! पांच इन्द्रियोंके अर्थ जामें आरामस्थान नव प्राणरूप जामें दुर्वाजे हैं, तेज जल अन्न ये कोठे हैं, इन्द्रियोंके संग्रह वामें कुल हैं। विपणस्तु क्रियाशक्तिर्भूतप्रकृतिरव्यया ॥ शक्त्यधीशः पुमांस्तत्र प्रविष्टो नावबुध्यते ॥ ५८॥ क्रियाशक्तिरूप व्यवहार होता है, वा पुरीमें जाको नाश नहीं वो भूत प्रकृति है यामें जो पुरुष है वो शक्तिको अधीश है वो या पुरमें प्रविष्ट है पर जाने नहीं जाते हैं ॥१८॥ तस्मिंस्त्वं रामया स्टष्टो रममाणोऽश्रुतस्मृतिः ॥ तत्सङ्गादीदृशीं प्राप्तो दशां पापीयसी प्रभो॥१९॥ हे प्रभो! उस पुरीमें तुम उस स्त्रीसे रमण करते रहे अब सुनक- रभी तुम्हें उसकी स्मृति नहीं आती वाईके संगसे. ऐसी पापीयसी दशाको आप प्राप्त होते भये ॥ १९ ॥ न त्वं विदर्भदुहितानायं वीरः सुहृत् तव॥ न पतिस्त्वं पुरंजन्या रुद्धो नवमुखे यया ॥६०॥ न तुम विदर्भकी बेटी हो न ये वीर तुझारोसुहृद है, न पुरंजनीके तुम पति हो, या नवमुखके पुरमें तुम रुक रहेहो ॥६॥ माया ह्येषामया सृष्टा यत् पुमांसं स्त्रियं सतीम् ॥ मन्यसे नोभयं यद् वै हंसौ पश्यावयोगतिम् ॥६॥ 1 ४२ पुरंजनाख्यानम् । ये माया मैंने रची है, कभी पुरुष कभी स्त्री करतीहै सिद्धांतसे दोनों बात नहीं हैं, हम तुम दोनों शुद्ध हंस हैं जो अब हम आगे कहें हैं सो सुनो हमारी गति देखो ॥६॥ अहं भवान्न चान्यस्त्वं त्वमेवाऽहं विचक्ष्व भोः ॥ न नौ पश्यन्ति कवयश्छिद्रंजातु मनागपि॥६२॥ हे जीव ! हम तुम दोनों येक हैं, अन्य नहीं जो पंडित हैं वे कभी हमारे तुम्हारेमैं भेद नहीं देख है ॥ १२॥ यथा पुरुष आत्मानमेकमादर्शचक्षुषोः ॥ द्विधाभूतमवेक्षेत तथैवान्तरमावयोः॥६३॥ जो ऐसे है भेद तौ कैसे माने है ताको उत्तर है कि जैसे पुरुष अपने एक आत्माको दर्पणमें चक्षुसे दो रूप देखे है, तैसेई हमारो तुझारो विचाअविद्या उपाधिकृत भेद है, परन्तु वास्तवसे भेद नहीं है।।६३॥ एवं समानसो हंसो हंसेन प्रतिबोधितः॥ स्वस्थस्तयभिचारेण नष्टामाप पुनःस्मृतिम् ॥६॥ ऐसे वो मानस इंस जीवको मानसहंसवासी ईश्वरने ज्ञान करायो, तब स्वस्थ भयो, और ईश्वरकरके वियोगकी बुद्धिरूपस्मृति नष्ट हुई फेर प्राप्त होती भयी ॥ ६४॥ बहिष्मन्नेतदध्यात्म पारोक्ष्येण प्रदर्शितम् ॥ यत् परोक्षप्रियो देवो भगवान विश्वभावनः ॥६५॥ इति श्रीपुरञ्जनाख्याने स्त्रीविचिन्तया स्त्रीत्वं प्राप्तस्य पुरंजनस्य दैवेन कदाचिन्मुक्ति- वर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥ हे बहिष्मन् ! ये अध्यात्मज्ञान परोक्ष करकै हमने तुमें दिखायो

भापाटीकासमेतम् । अ० ५
जो परोक्षविधिसै वर्णन करनेके यह कारण है कि जगत्पालक नारायण
परोक्षरीतसे बहुत प्रसन्न होते हैं ॥६५॥
इति श्री पुरंजनाख्याने स्त्रीविचिन्तया स्त्रीत्वं प्राप्तस्य पुरं-
जनस्य देवेन कदाचिन्मुक्तिवर्णनं नाम चतुर्थोऽध्यायः॥४॥
अथ
पञ्चमोऽध्यायः।
॥ प्राचीनवर्हिरुवाच ॥
भगवंस्ते वचोऽस्माभिर्न सम्यगवगम्यते ॥
कवयस्तद्विजानन्ति न वयं कर्ममोहिताः॥१॥
प्राचीनवर्हि नृप बोले कि हे भगवन् ! तुह्मारो वचन हमको
सुन्दरतासे समझमें न आयो, हम सब कर्मकांडोंसे मोहित हैं, जो
वेदांती अध्यात्म ज्ञानी कवि हैं, वे इस जाने है यासे समझायकै
फिरसे कहो ॥ १॥
॥ नारद उवाच ॥
पुरुषं पुरंजनं विद्याद्यद्वयनत्त्यात्मनः परम् ॥
एकद्वित्रिचतुष्पादं बहुपादमपादकम् ॥२॥
१ याको ये पद है || कालंगडा तिताल ॥ भूलोमनठगियनके संग अटको । टेरे।।
बहुतठगोरे भएइठोरे काहेर्दू इनसंग भटको ॥ १॥ जीभचटोरीबहुतठगोरीखानपानव
हुगटको ॥ नयन निपूतेनेनारदिखाईरूपदेखकरमटको ॥२॥ कौनवातनके छानकरत
हैवेदवचनसवपटको । नाकठगैयानताकलगाई अतरचाहत टटको ॥३॥ कौडीमिलनकी
मासाताकतजायकरतनितलटको || चोरनकेसंगचोरभयो तूकालफांसमैपटको ॥४॥
बहुतजन्मभएकरतठगाईवेदगुरुजीनेहटको ॥ सतसंगतऔरधर्मकाममें कबहुजायनहिफ
टको ॥ ५॥ पुरुषोत्तमक,सर्वेश्वरभजपापपुण्यसवपटको ॥ ६ ॥

पुरंजनाख्यानम् ।
श्रीनारदजी बोले कि "पुरं जनयतीति पुरंजनो जीवः” या देहमें
पुरंजन पुरुष जीवकू जानो, जो अपने आत्माके पुरनको प्रगट करे
है, जो जीव येक दो तीन चार पांवको होवै है, कभी बहुतपगको होय
है, कभी विना पगको होय है ॥२॥
योऽविज्ञाताहतस्तस्य पुरुषस्य सखेश्वरः।
यन्न विज्ञायते पुंभिर्नामभिर्वा क्रियागुणैः ॥३॥
जो अविज्ञातनामक पुरुष जीवका सखा कहा है, वो ईश्वर है, जो
ईश्वर नाम क्रियागुणोंसें पुरुषों करके न जाने जायहैं ॥३॥
यदा जिघृक्षुः पुरुषः कात्स्न्येन प्रकृतेर्गुणान् ॥
नवद्वारं द्विहस्ताझिं तत्रामनुत साध्विति॥४॥
जब संपूर्णता करके पुरुष प्रकृतिके गुणनकी ग्रहण करवेकी इच्छा
करै है, तब नव द्वारयुक्त दो हाथ पगवारे देहको बहुत सुन्दर मान
बसे है॥४॥
बुद्धिं तु प्रमदां विद्यान्ममाहमिति यत्कृतम् ॥
यामधिष्ठाय देहेऽस्मिन् पुमान भुङ्क्तेऽक्षभिर्गुणान्य
या देहमें बुद्धिरूप स्त्री वसे है, वासे मम हम ये जीव करने लगे हैं,
याके आश्रित होयकै या देहमैं पुरुष इन्द्रियोंके द्वारा गुणनफू भोगे है५
सखाय इन्द्रियगणा ज्ञानं कर्म च यत्कृतम् ॥
सख्यस्तदृत्तयः प्राणः पञ्चवृत्तियथोरगः ॥ ६ ॥
ज्ञान कर्म करवेवारे इन्द्रियोंके गण याके सखा है, और इन्द्रियोंकी
वृत्तियें सखियें हैं, पंचवृत्तिरूप पंचशिरको प्राणरूप यामें सर्प है॥६॥
बहरलं मनो विद्यादुभयेन्द्रियनायकम् ॥
पञ्चालाः पञ्च विषया यन्मध्ये नवखं पुरम् ॥७॥

४५ भाषाटीकासमेतम् । अ०५ जो बलवान सैनापति कहा गया है वह मन है कारण कि यह मन ज्ञानेंद्रिय और कर्मेंद्रियका स्वामी है पंचेंद्रियका विषय सो पंचाल देश है, जामें नवद्वारको पुर शरीर है ॥ ७॥ अक्षिणी नासिकेको मुखं शिश्नगुदाविति॥ देवेद्वारौबहिर्याति यस्तदिन्द्रियसंयुतः॥८॥ नेत्र नाक मुख कान शिश्न गुदा ये दो दो द्वार बाहिरको निकसे भए है, सो इन इन मार्गोंसे जीव इन्द्रियों को साथ ले बाहर जाता है८ अक्षिणी नासिके आस्यमिति पञ्च पुरः कृताः॥ दक्षिणा दक्षिणः कर्ण उत्तरा चोत्तरःस्मृतः॥९॥ अक्षिणी २ नाक २ मुख १ ये पांच पूर्वकी ओरके द्वार हैं दक्षि- णकी ओरको दक्षिण कर्ण है उत्तरको उत्तर कर्ण है ॥ ९ ॥ पश्चिमे इत्यधोद्वारौ गुदं शिश्नमिहोच्यते ॥ खद्योताविर्मुखी चात्र नेत्रे एकत्र निर्मिते॥१०॥ पश्चिम ओर नीचेके दो द्वार गुदा शिश्न देहमें है, खद्योत आवि- मुंखीद्वार बराबर निर्माण नेत्र है ॥ १० ॥ रूपं विभाजितं ताभ्यां विचष्टे चक्षुषेश्वरः॥ नलिनी नालिनीनासे गन्धःसौरभ उच्यते॥११॥ जिनसे यह जीव चक्षु इन्द्रियकी सहायतासै इन द्वारोंसे विभाजित नाम देशमें जाता अर्थात् रूप देखता है नलिनी नालिनी नाक है, जामें सुगंध ज्ञानगंध कहा है ॥ ११ ॥ घ्राणोऽवधूतोमुख्याऽऽस्यं विपणो वाग्रसविद्रसः॥ आपणो व्यवहारोऽत्र चित्रमन्धी बहूदनम् ॥१२॥ सौरभ देश गंध है अवधूतः मित्रप्राण इन्द्रिय है मुख्य द्वार मुख है विपण अर्थात् वाणी रसज्ञ अर्थात् रसना इन्द्रिय ये दोनों सखा हैं १२

1
पुरंजनाख्यानम् ।
पितृहूर्दक्षिणः कर्ण उत्तरो देवहूः स्मृतः॥
प्रवृत्तं च निवृत्तं च शास्त्रं पञ्चालसंज्ञितम् ॥ १३ ॥
पितरनके बुलावनेवारोदहिना कान है, देवनको बुलायवेवारोवायो
कान है, प्रवृत्तिमार्गको शास्त्र निवृत्तिमार्गको शास्त्र पंचाल देश है१३
पितृयानं देवयानं श्रोत्राच्छुतधराद्रजेत् ॥
आसुरी मेट्रमर्वाग्द्वाय॑वायोग्रामिणां रतिः ॥१४॥
पितृयान देवयानन सुनवेसे श्रोत्रसे प्राप्त होय है, आसुरी मेटू इंद्रिय
नीचके द्वारसें मैथुन होय है, जिसमें गाववारोंकी रति होय है ॥१४॥
उपस्थो दुर्मदः प्रोक्तो निर्ऋतिर्मुद उच्यते॥
वैशसं नरकं पायुर्लुब्धकोऽन्धौ तु मेशृणु ॥१५॥
दुर्मद उपस्थ है निति गुदा है लुब्धक पायु इन्द्रिय है वैशसदेश
नरक है, अब अंघद्वार वर्णन करते हैं सो तुम सुनो ॥१५॥
हस्तौ पादौ पुमांस्ताभ्यां युक्तो याति करोति च ॥
अन्तःपुरं च हृदयं विष्चिर्मन उच्यते॥१६॥
हाथ पावसे युक्त पुरुष चलता और कर्म करताहै, अंतःपुर हृदय
है, पदार्थों को अनुवाद करवेवारो मन है ॥ १६॥
तत्र मोहं प्रसादं वा हर्ष प्राप्नोति तद्गुणैः ।।
यथा यथा विक्रियते गुणाक्तो विकरोति वा ॥१७॥
जिसके सत्व रज तम गुणसे हृदयमें प्रमाद हर्ष और मोह होते
हैं गुणौसे आवृत होकर दर्शन स्पर्शनादि जो कार्य बुद्धि संपादन
करती है ॥ १७॥
तथा तथोपद्रष्टात्मा तवृत्तीरनुकार्यते ॥
देहो रथस्त्विन्द्रियाश्वः संवत्सररयो गतिः॥१८॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०५
उन सब कर्मोंको अपना किया मानकर स्वप्नमें उसीके अनुसार
अधिकारको प्राप्त हो स्वयं साक्षी होकरभी जीवात्मा जाग्रतमें उसीके
अनुसार परिवर्तित होता है. देह रथ है इंद्रियरूप घोडा इसमें लगे
है, संवत्सरका वेग इसकी गति है ।। १८॥
द्विकर्मचक्रस्त्रिगुणध्वजः पञ्चासुबन्धुरः ॥
मनोरश्मिर्बुद्धिमूतो हन्नीडोद्वन्द्वकूबरः॥ १९॥
पुण्यपापरूप दो पैया है, सत्वादि तीनों गुणोंकी ध्वजा है, पंचप्रा-
णरूप बंधनकी डोर है, मनरूप रस्सी है, बुद्धिरूप हांकनवारो है,हद-
यरूप रथके मध्यको स्थान है, सुखदुःखरूप दोनों ओरके जूआ है१९
पञ्चेन्द्रियार्थ प्रक्षेपःसप्तधातुवरूथकः॥
आकूतिर्विक्रमो बाह्यो मृगतृष्णां प्रधावति ॥२०॥
पांचइंद्रियोंके अर्थरूप धुराके वांस है, सप्तधातु रथके ऊपरके
वैठक है, आकूति प्राणोंकी शक्ति रथको पराकम है, मृगतृष्णामें
ये दौडै है ॥२०॥
एकादशेन्द्रियचमूः पञ्चमूना विनोदकृत् ॥
संवत्सरश्चण्डवेगःकालो येनोपलक्षितः॥२१॥
एकादश इंद्रियरूप सेना है, पंचसुनाही या स्थको आनंद कुरवै-
वारो है, चंडवेग कालरूप संवत्सर है, जासै काल उपलक्षित होय है२१
तस्याहानीह गन्धर्वा गन्धया रात्रयः स्मृताः ॥
हरन्त्यायुः परिक्रान्त्या षष्टयुत्तरशतत्रयम् ॥२२॥
दिनरूप गंधर्व हैं, रात्री गंधविनी कही हैं, जो दिनरात व्यतीत
होयकर तीनसे साठ दिनकों व्यतीत करै हैं ॥२२॥
कालकन्या जरा साक्षाल्लोकस्तांनाभिनन्दति॥
स्वसारं जगृहे मृत्युः क्षयाय यवनेश्वरः॥२३॥

पुरंजनात्यानम् ।
कालकी कन्या साक्षात् जरा है जाकी कोईभी इच्छा नहीं करते
यवनोंका राजा मृत्यु है उसनें लोकनाशके निमित्त जराको अपनी
भगिनी बनाय ॥२३॥
आधयो व्याधयस्तस्य सैनिका यवनाश्चराः॥
भूतोपसर्गाशुरयः प्रज्वारौ विविधज्वरः ॥२४
आधी व्याधी तिस यवनके सेनाके लोग हैं, सब जीवनके पीडामें
शीघ्र वेगवारो प्रचारनामक विविधप्रकारको ज्वर है ॥ २४ ॥
एवं बहुविधैर्दुःखैर्देवभूतात्मसंभवैः॥
क्लिश्यमानः शतं वर्ष देहे देही तमोतः॥२५॥
ऐसे बहुत प्रकारके अध्यात्मादि त्रितापसे क्लिश्यमान देहमें देही
तमोगुणमें होयकर वर्ततो भयो ॥२५॥
प्राणेन्द्रियमनोधर्मानात्मन्यध्यस्य निर्गुणः ॥.
शेते कामलवान्ध्यायन्ममाहमिति कर्मकृत् ॥२६॥
प्राण इंद्रिय मनके धर्म आत्मामें निश्चयकरकै यह निर्गुणजीव काम-
के लंबमात्र सुसकू ध्यान करता सोयजाय है मम अहम् कर्म करै है।।
यदात्मानमविज्ञाय भगवन्तं परंगुरुम्॥
पुरुषस्तु विषज्जत गुणेषु प्रकृतेः स्वदृक् ॥ २७॥
जासमय भगवान परमगुरुकी आत्मा न जानकै पुरुष स्वप्रका-
शक प्रकृतिके गुणोंमें आसक्त होय है, ॥२७॥
गुणाभिमानीस तदा कर्माणिकुस्तेऽवशः॥
शुक्लं कृष्णं लोहितं वा यथा कर्माभिजायते ॥२८॥
तव गुणोंको अभिमानीसे जीवं अवश होयकर सात्विक राजस
तामस कर्म करें है जैसो कर्म करे तेसो जन्मैहै ॥२८॥

भापाटीकासमेतम् । अ०५
शुक्लात्प्रकाशभूयिष्टॉल्लोकानाप्नोति कर्हिचित् ॥
दुःखोदौन्क्रियायासांस्तम-शोकोत्कटान्वचित्॥
सात्विक कर्म करनेसे महाप्रकाश युक्त लोकनमें जायहै, राजस
कर्म करनेसे महादुःखदायक लोकनमें जायहै, क्रियाकरकै उन राज-
सकर्ममें बडो परिश्रम होयहै तामसकर्म करनेसे महाशोकभरे लो-
कॉमें जायहै ।।२९॥
क्वचित्पुमान्कचिच्च स्त्री क्वचिन्नोभयमन्धधीः॥
देवो मनुष्यस्तिर्यग्वा यथाकर्मगुणं भवः ॥ ३०॥
कभी तो पुरुष कभी स्त्री कभी नपुंसक ऐसी अंधी बुद्धि हो जाय है,
देव मनुष्य पक्षी पशु होय है, जैसा कर्म गुण होय वैसो जन्म होय है३०
शुत्परीतो यथा दीनः सारमेयो गृहं गृहम् ॥
चरन्विन्दति यद्दिष्टं दण्डमोदनमेव वा ॥३१॥
मुंखे दीन और घर २ डोलते कुत्तेकी समान भाग्यसें कहीं मार
खाय आवै है कहीं लड्डु खाय आवै है ॥३१॥
तथा कामाशयोजीव उच्चावचपथाभ्रमन् ॥
उपर्यंधोवा मध्येवा याति दिष्टं प्रियाप्रियम्॥३२॥
तैसे कामासक्तहृदयवारो जीव ऊंचे नीचे मार्गमें घूमते ऊपर
नीचे मध्यमें जाते हैं, भाग्यसें प्रिय अप्रियको प्राप्त होते हैं ॥३२॥
दुःखेष्वेकतरेणापि दैवभूतात्महेतुषु ॥
जीवस्य नव्यवच्छेदः स्यान्चेत्तत्तत्प्रतिक्रिया ॥३३॥
दुःख दूर करनेका सत्य उपाय तो दुर्लभ है जो करै तौभी प्रार-
ब्धसै जीवोंसे शरीरसै, होते हुए क्लेशोंमें किसी संकट यह यथार्थ
रीतिसे नहीं छुट सत्ता.॥ ३३ ॥

५०
पुरंजनाख्यानम् ।
यथा हि पुरुषोभारं शिरसा गुरुमुद्रहन् ।
तं स्कन्धेन स आधत्ते यथा सर्वाः प्रतिक्रियाः॥३४॥
जैसे बहुत बोझके भारको पुरुष शिरपर लेचले है कभी कंधापै धरे
है, भार सब शरीरहीपर है, तेसेही सब याकी प्रतिक्रिया जीवपर है३४
नैकान्ततः प्रतीकारः कर्मणां कर्म केवलम् ॥
द्वयं ह्यविद्योपसृतं स्वप्ने स्वप्न इवानघ ॥३५॥
हे अनध! एकांत कमसे कर्मको केवल प्रतीकार न होय सकै है
या दोनों अविद्यासे हैं, जैसे स्वप्नमें स्वप्न जागेसे मालुम पडैहै॥३५॥
अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संमृतिर्न निवर्तते ॥
मनसा लिङ्गुरूपेण स्वप्ने विचरतो यथा ॥ ३६ ॥
संसार असत्य है तथापि मनमें जबतक विषयोंका ध्यान रहे तब
तक नहीं मिट सक्ता जैसे स्वप्न असत्य है परन्तु उपाधिरूप मनकी
स्वप्नावस्था न गयेतक वह नहीं मिटता ॥३६॥
अथात्मनोऽर्थभूतस्य यतोऽनर्थपरम्परा ॥
संसृतिस्तव्यवच्छेदो भक्त्या परमया गुरौ ॥३७॥
इसकारण अज्ञान कि जिसके हेतु परम पुरुषार्थरूप आत्माके
अखंड प्रवाहवाला जगत हुआहै उस अज्ञानको नष्टता गुरुरूप भग-
वानकी मतिस होती है ॥ ३७॥
वासुदेवे भगवति भक्तियोगः समाहितः॥
सध्रीचीनेन वैराग्यं ज्ञानं च जनयिष्यति ॥३८॥
वासुदेव भगवानमें करो भयो भक्तियोग सुन्दरता करके वैराग्य
और ज्ञान दोनों उत्पन्न करै है ॥ ३८॥
सोऽचिरादेवराजर्षे स्यादच्युतकथाश्रयः॥
शृण्वतः श्रद्दधानस्य नित्यदा स्यादधीयतः॥३९॥

भाषाटीकासमेतम् । अ०
हे राजर्षे ! सो थोरेसेमें अच्युतकी कथा सुनवेसे श्रद्धासे नित्य
याके पढनेसे भगवान प्रसन्न होय है ॥ ३९ ॥
यत्र भागवता राजन्साधवो विशदाशयाः॥
भगवद्गुणानुकथनश्रवणव्यग्रचेतसः ॥ ४० ॥
हे राजन् ! भागवत साधु निर्मल अंतःकरणवारे भगवतके गुण
कथाश्रवणमें जिनके चित्त सदा लगे हैं वे जहां हौं ॥४०॥
तस्मिन्महन्मुखरिता मधुभिच्चरित्र-
पीयूषशेषसरितः परितः स्रवन्ति ॥
ता ये पिबन्त्यवितृषो नृप गाढकर्णे-
स्तान्नस्टशन्त्यशंनतृड्भयशोकमोहाः॥४३॥
तहां मधुनामा दैत्यके मारवेवारे श्रीकृष्णके चरित्रामृतकी नदियें
सब ओरसे वहैं हैं, सो हे नृप ! जो गंभीर कौँसे अत्यन्त पान
करते है तिनको क्षुधा पिपासा भय शोक मोह नहीं स्पर्श करें हैं ४१
एतैरुपद्रुतो नित्यं जीवलोकः स्वभावजैः॥
न करोति हरेर्नूनं कथामृतनिधी रतिम् ॥४२॥
कारण कि सत्संग विना स्वयं विचारसै ऊपर कहे उपद्रवास
आलसके कारण रसकी प्राप्ति कठिन है विना इसके भगवतकथारूप
अमृत सागरमें प्रीति होनी कठिन है ॥४२॥
प्रजापतिपतिः साक्षाद्भगवान्गिरिशो मनुः॥
दक्षादयः प्रजाध्यक्षा नैष्ठिकाः सनकादयः ॥४३॥
प्रजाके पतिनके पति साक्षात् भगवान शिव मनु दक्षादिक प्रजाके
अध्यक्ष नैष्ठिक सनकादिक ॥४३॥
मरीचिरत्र्यङ्गिरसौ पुलस्त्यः पुलह क्रतुः ।।
भृगुर्वसिष्ठ इत्येते मदन्ता ब्रह्मवादिनः ॥४४॥

पुरंजनाख्यानम् । मरीचि अत्रि अंगिरा पुलस्त्य पुलह ऋतु भृगु वसिष्ठ ये मोपर्यंत ब्रह्मवादि भगवत्कथामें प्रीति करते हैं ॥४४॥ अद्यापि वाचस्पतयस्तपोविद्यासमाधिभिः ॥ पश्यन्तोऽपि न पश्यन्ति पश्यन्तं परमेश्वरम्॥४५॥ परन्तु अवतकभी वाणियोंके वक्ता तप विद्या समाधि करकै सबके देखनेवारे परमेश्वरकों देखतेहुएभी न देखे है ।। १५ ।। शब्दब्रह्मणि दुष्पारे चरन्तं उरुविस्तरे ॥ मन्त्रलिङ्गैय्वच्छिन्नं भजन्तोन विदुः परम् ॥४६॥ अनन्त महाविस्तृत शब्दब्रह्ममें मंत्ररूप चिन्हकरकै विचरते हुए सबमें वासी परमेश्वरको भजन करते हुएभी नहीं जानते ॥ ४६॥ यदा यमनुगृह्णाति भगवानात्मभावितः॥ स जहाति मति लोके वेदे च परिनिष्ठिताम् ॥४७॥ जा समय भगवान् आत्मासे भावित हो जापर अनुग्रह करे है, तब वह मनुष्यलोक और वेदमें सदालगनहारी बुद्धिको त्याग करै है।।४७॥ तस्मात्कर्मसु वर्हिष्मन्नज्ञानादर्थकाशिषु ॥ माऽर्थदृष्टिं कृथाः श्रोत्रस्पर्शिष्वस्टष्टवस्तुषु ॥४८॥ हे बहिष्म ! ताते अज्ञानसे सत्यकी नाई विहित होते कर्ममें परमार्थ दृष्टि मत करो वे कर्म श्रोत्रइंद्रियस्पर्शि हैं सिद्धान्त वस्तुके स्पर्श करखेवारे नहीं है ।। ४८ ॥ स्वं लोकं न विदुस्ते इयत्र देवोजनार्दनः॥ आहुधूम्रधियो वेदं सकर्मकमतद्विदः॥४९॥ वेदके अभिप्रायको न जानकर जो कहतेहैं कि वेदका तात्पर्य केवल कर्मपर है वे यज्ञके धूमसै अपनी बुद्धि मलीन होनेके कारण :

भ
भाषाटीकासमेतम् । अ०५
आत्मतत्त्वके तात्पर्यवाले ईश्वरहीका कथन करनेहारे वेदके यथार्थ
अभिप्रायको नहीं जान्ते ॥१९॥
आस्तीर्य दर्भेः प्रागणैः कात्स्न्येन क्षितिमण्डलम् ॥
स्तब्धोबहद्वधान्मानी कर्मनावैषि यत्परम् ॥५०॥
पूर्वको अग्रभागवाले कुश बिछायकर सब भूमंडलपर यज्ञ कर
तैंने महागर्व कीनो पशुवधसे मानी हो परमकर्मकू न जाना ॥५॥
तत्कर्म हरितोषं यत्सा विद्या तन्मतिर्यया ॥
तपूर्ण तत्कुलं श्रेष्ठ तदाश्रमं शुभं भवेत् ॥५१॥
वोही कर्म है जासे हरि प्रसन्न होय, सोई विद्या है जो ईश्वरमें बुद्धि
लगैं, वो वर्ण वो कुल वो आश्रम शुभ होय है ॥५१॥
हरिदेहभृतामात्मा स्वयंप्रकृतिरीश्वरः॥
तत्पादमूलं शरणं यतःक्षेमो नृणामिह ॥ ५२॥
श्रीहरि सब देहधारीनके आत्मा है, आप प्रकृतीके ईश्वर है,
तिनके चरणकमलकी शरणागति छे प्रकारकी करनेसे या संसारमें
मनुष्यनको क्षेम होय है ॥५२॥
सवै प्रियतमश्चात्मा यतो न भयमण्वपि ॥
इति वेद सवै विद्वान्यो विद्वान्स गुरुहरिः॥५३॥
उनके प्रसन्न करनेमें कुछ कठिनता नहीं है कारण कि वे सबके
प्रियतम आत्मा हैं उनके भजनमें किंचित्भी भय नहीं है जो ऐसा
जान्ते हैं वही पंडित है पंडितही.गुरु और भगवान है ॥५३॥
॥ नारद उवाच॥
प्रश्न एव हि.संछिन्नो भवतः पुरुषर्षभ।
अत्र मे वदतो गुह्यं निशामय सुनिश्चितम् ॥५४॥

पुरंजनाख्यानम् ।
श्रीनारदजी बोले कि हे पुरुषश्रेष्ठ! तुह्मारो प्रश्न निश्चय भयो अब
मैं इसमें गुह्य गोपनीय निश्चय सो कहूं हूं तुम सुनो ॥ ५४॥
क्षुद्रं चरं सुमनसांशरणे मिथित्वा।
रक्तं षडजिगणसामसु लुब्धकर्णम् ॥
अग्रे वृकानसुतृपो विगणय्य यान्तं।
पृष्ठे मृगं मृगय लुब्धकबाणभिन्नम् ॥१५॥
"जीवको एक और प्रकारसे वर्णन करै हैं क्षुद्र पदार्थोंको चरने-
हारा एक मृग फूलवाडीमें स्त्रीके संगक्रीड़ा करता है भौरोंके शब्दोंसे
उसके कर्ण लुब्ध हैं मुखके सन्मुख भक्षण करनेहारे वृक खड़े हैं तथापि
यह मृग कुछ चिन्ता न कर आगे बढता चला जाता है पीठ व्याधेके
बाणसे विद्ध है हे राजन् ! तुम इसका मर्म विचारो ॥५५॥
॥ दण्डकम् ॥
सुमनःसधर्मणां स्त्रीणां शरण आश्रमे पुष्पमधु-
गन्धवक्षुद्रतमं काम्यकर्मविपाकजं कामसुख-
लवं जैवयोपस्थ्यादि विचिन्वन्तं मिथुनीभूय
तदभिनिवेशितमनसं षडविगण सामगीतवद-
तिमनोहखनितादिजनालापेष्वतितरामविप्र-
लोभितकर्णमग्रे वृकयूथवदात्मन आयुर्हरतोऽ-
होरात्रान्तान्काललवविशेषानविगणय्य गृहेषु
विहरन्तं पृष्ठत एवं परोक्षमनुप्रवृत्तो लुब्धकः
कृतान्तोऽतः शरेण यमिह पराविध्यति तमिम-
मात्मानमहोराजन्भिन्नहृदयं द्रष्टुमर्हसि ॥५६॥

भाषादीकासमेतम् । अ०५ जो श्लोक पीछे को है वाकोही या दण्डकमें व्यासजीने व्या- ख्यान करो है । पुष्पोंके समान धर्मवाली स्त्रीनके शरणरूप बागमें पुष्पोंकी मधुगन्धकी नाई अत्यन्त तुच्छ,काम्यकर्मके फलसें उत्पन्न, कामसुख लवमात्र जीभके स्वाद, शिश्नके विषयभोग आदिकों ढूंढते स्त्रीके उन विषयनमें मन लगायकर, भ्रमर गणके सुन्दर गीतकी नाई अति मनोहर वनिता आदि जनोंके सम्भाषण करनेमें अत्यन्त लोभित मन कर्णवाले ये जीव आगे भेडियानके यूथवत् अपनी आयूके हरवेवारे दिनरात कालके लवको न गिनकर घरमें विहार कर रहाहै और गुप्तरूपसै तेरे पीछे लगा हुआ काल भीतरही गुप्त बाणसे तेरा हृदय विदीर्ण करता है सो तुम्है अब अपनी आत्माका विचार करना उचित है ॥५६॥ सत्वं विचक्ष्य मृगचष्टितमात्मनोऽन्त-। श्चित्तं नियच्छ हृदि कर्णधुनी च चित्ते ॥ जह्यङ्गनाश्रममसत्तम यूथगाथं । प्रीणीहि हंसशरणं विरमक्रमेण ॥१७॥ सो तुम वा मृगकीसी चेष्टा अपने आत्माकी विचारो और हृद- यमें चित्तको आकर्षण कर चित्तमें बहित्तिकूरोध करो परं च अस- त्तमोंके यूथकी गाथावारे या संसारको त्याग कर जीवनके रक्षक ईश्वरकों प्रसन्न करो, क्रमकरकै सबसे विरामको प्राप्तहो॥१७॥ ॥ प्राचीनबर्हिरुवाच॥ श्रुतमन्वीक्षितं ब्रह्मन्भगवान्यदभाषत॥ नैतज्जानन्त्युपाध्यायाः किं न ब्रूयुर्विदुर्यदि ॥५८॥ प्राचीनबर्हि बोले कि हे ब्रह्मन् । हे नारदजी! जो आपने कह्यो सो हमने सुनो विचारो परन्तु या ज्ञानको ये उपाध्याय जो मोको कर्मका पुरंजनाख्यानम्। उपदेश करै है वे कहा नहीं जान है जो जानते है तो मोसे कह्यो क्यौ नहीं।। ५८॥ संशयोत्र तु मे विप्रसंछिन्नस्तत्कृतो महान् ॥ ऋषयोऽपि हि मुह्यन्ति यत्र नेन्द्रियवृत्तयः ॥१९॥ इस विषयमें उपाध्यायौंने बडा संदेहमें डालदिया था परंतु वह आपने सब दूर किया परन्तु यह एक और संदेह है कि जिससें ऋषिभी मोहको प्राप्त होते हैं और इन्द्रियोंकी वृत्तिभी नहीं जासक्ती ॥१९॥ कर्माण्यारभते येन पुमानिह विहाय यम् ॥ अमुत्रान्येन देहेन जुष्टानि स यदश्नुते ॥ ६०॥ जा देह करके पुरुष या जगमें कौका प्रारंभ करें है, वा देहकों यहाँ छोडकर परलोकमें और देह सेवित कर्मनको ये जीव प्राप्त होय है ६० इति वेदविदां वादः श्रूयते तत्र तत्र ह ॥ कर्म यक्रियते प्रोक्तं परोक्षं न प्रकाशते ॥६१ ॥ ये वेदवेत्तानका वाद जहां तहां सुनवेमें आवें है तथा आपनेभी कहा कि पुरंजननें कर्मकर दूसरे शरीरसै भोगे मेरा प्रश्न यह है जो करै उसै कर्मका फल मिलना उचित है एक देहके किये कर्मका फल दूसरा देह कैसे भोगताहै जो करे उसै भोगना उचित है, दूसरा प्रश्न यह है कि मनुष्य जो कर्म करताहै वह थोडे समयमें अदृश्य हो जाताहै जो कर्म अदृश्य हो गया उसका फल पीछे मिलना कैसे संभव है ६३ ॥ नारद उवाच ॥ येनैवारभते कर्म तेनैवामुत्र तत्पुमान् ॥ भुळे ह्यव्यवधानेन लिङ्गेन मनसा स्वयम् ॥ ६२॥ श्रीनारदजी बोले कि जिस कर्तृत्व भोक्तृत्त्वं स्थूल देहको नहीं है परन्तु मनकर कर्मीका आरंभ करताहै अन्तःकरण स्थूल देहके संग - भाषांटीकासमेतम् । अ०५ नाशको प्राप्त नहीं होय है, इस कारण जिस मनने वह कर्म कियाथा वही उसै भोगताहै ॥६॥ शयानमिममुत्सृज्य श्वसन्तं पुरुषो यथा॥ कर्मात्मन्याहितं भुले तादृशेनेतरेण वा ॥६३॥ जैसे सोते समय श्वास लेते हुए इस पुरुषका जाग्रत अवस्थाका अहंकार दूर हो जाताहै.और उसमेंभी स्वप्न अवस्थामें वही अनेक सुख दुःख भोगताहै परन्तु जो मन जागृत अवस्थामें था वही स्वप्नमें है जब जीवित अवस्थामेंभी अनेक देह प्राप्त होते हैं परन्तु भोक्ता मन एकही है इसी प्रकार दूसरे जन्ममेंभी यही भोगता जो यहां करताहैं ॥६३॥ ममैते मनसा यद्यदसावहमिति ब्रुवन् ॥ गृहीयात्तत्पुमात्राई कर्म येन पुनर्भवः ॥ ६४॥' ये पुत्रादिक मेरे हैं ये हम हैं ऐसे कहताहुआ पुरुष महा अभिमान करताहै तो इस्सै यह जानिये कि मन अंतःकरणके अभिमानका स्थान स्थूल शरीर है परन्तु इस्सै यह कर्ता नहीं हो सक्ता अन्तःक- रणही कर्ता होकर दूसरी देहमेंभी जाकर वही भोगताहै ।। ६४॥ यथानुमीयते चित्तमुभयैरिन्द्रियहितैः॥ एवं प्राग्देहजं कर्म लक्ष्यते चित्तवृत्तिभिः॥६५॥ सम्पूर्ण इंद्रियोंको अपने विषयौंके संग एक कालमें सम्बंध होने- परभी उन विषयौंका ज्ञान एकसाथ नहीं होता इस्सै इन्द्रियोंपर अंधिकार करनेहारा कोई दूसरा प्रतीत होता है वही चित्त है उसका जब जिस इन्द्रियसै संयोग होता है वह उसीको ग्रहण करता है इसी प्रकार चित्तकी वृत्तिभी एक समय उत्पन्न न होकर क्रमानुसार हो- तीहै इसीसै विदित होता है कि चित्तवृत्तिका उत्पादक पूर्व देहका पुरंजनाख्यानम् । . कर्म है जिससमय जो कर्म भोगनेको होता है चित्तकी वृत्ति उसी प्रका- रकी उत्पन्न होती है इससे पूर्वदेहके कर्म माननायुक्ति युक्त है।॥६५॥ नानुभूतं व चानेन देहेनादृष्टमश्रुतम् ॥ कदाचिदुपलभ्येत यद्रूपं यांहगात्मनि ॥६६॥ इस देहमें किसी समय ऐसी वस्तु स्वनमें दीखतीहै जो न कभी देखी न सुनी न अनुभव की हो तो उससे यही माना जाता है कि अवश्य यह अनुभव पूर्वदेहमें हुआ होगा ॥६६॥ तेनास्य तादृशं राजल्लिङ्गिनो देहसंभवम् ॥ श्रद्धत्स्वाननुभूतीर्थो न मनः स्पष्टुमर्हति ॥६७॥ कारण कि विना अनुभवकी वस्तु चित्तमें कदाचित नहीं आती इससे पूर्व देहका और इस देहका लिंग मन एकहीं हैं और पूर्वजन्मके संस्कार मनमें लगे हैं यह निश्चय और अनुभव है हे राजन् ! इस वाक्यमें आप श्रद्धा कीजिये और मनसे स्पष्ट कीजिये ॥६॥ मन एव मनुष्यस्य पूर्वरूपाणि शंसति ॥ भविष्यतश्च भद्रं ते तथैव न भविष्यतः॥६८॥ इसीसै भूत भविष्य योनियोंका जन्म इस वर्तमानकालके प्रा- णिका जाना जाता है उसके चित्तकी वृत्ति देखकर शुभ अशुभ देखकर नीच योनिका जन्म प्रतीत होताहै आगेका जन्मभी उसके कृत्य देखकर युक्तिसे जान लिया जाताहै ॥ ६८॥ अदृष्टमश्रुतं चात्र क्वचिन्मनसि दृश्यते॥ यथा तथाऽनुमन्तव्यं देशकालक्रियाश्रयम् ॥६९॥ किन्हीका प्रश्न है कि यदि पूर्वजन्मकी अनुभव वार्ताही दीखती है तो कटाशिर तथा दिनमें नक्षत्र इत्यादि असम्भव वस्तु क्यों देखती है इसका उत्तर यह है कि शिरका कटना प्रतिविम्वमेंभी

भाषाटीकासमेतम् । अ०५
दीखता है और तारौंका प्रतिबिम्ब जलमें दीखता है यही वार्ता
देशकाल और क्रिया (युद्ध आदि) का निद्राके दोषसै अन्तर दिखाती
है इससै शंकाकी अवश्यकता नहीं पूर्वजन्म न माननेवालेकोभी तौ
स्वप्न निद्राका दोष माना पड़ेगा ॥६९॥
सर्वे क्रमानुरोधेन मनसीन्द्रियगोचराः॥
आयान्ति वर्गशोयान्ति सर्वे समनसोजनाः॥७॥
सम्पूर्णविषय जिनका पुरुष अनुभव करता ध्यान करता है क्रमसै
मनमें आते जाते हैं हां मनरहित पुरुषको कुछ भान नहीं हो सक्ता
इसकारण विना अनुभवका कुछभी पदार्थ नहीं है किसी सब पदार्थ
एक साथही मनमें उदय होते हैं इससे सब लोकौंके सब पदार्थ कभी
न कभी देखनेसै अनुभव किये स्वप्नमें आते हैं॥७॥
सत्वैकनिष्ठे मनसि भगवत्पार्श्ववर्तिनि॥
तमश्चन्द्रमसीवेदमुपरज्यावभासते ॥७१॥
केवल सतोगुणी निष्ठावाला मन भगवानके ध्यानमें होता है उस
समय यह सम्पूर्ण विश्व मनमें लगा प्रतीत होताहै जैसे राहु दीखता
नहीं परन्तु चन्द्र संयोगस दीखता है ऐसेही मन शुद्ध होनेपर सिद्ध
योगियोंको एक कालमें सब जगत दीखता है ॥७१॥
नाहं ममेति भावोऽयं पुरुषे व्यवधीयते॥
यावद् बुद्धिमनोऽक्षार्थगुणव्यूहो ह्यनादिमान्॥७२॥
बुद्धि मन इंद्रिय और विषयों के समूह यह अनादि सम्बन्ध जब-
तक लिंगशरीर है तबतक इस जीवके स्थूल देहका सम्बन्ध नहीं
मिटता इससै स्थूलके न होनेसै लिंगदेहमें कर्तृत्व और भोक्तापन
रहनेसै उसकी मुक्ति नहीं हो सक्ति क्योंकि लिंगदेहका बुद्धि
मनसै सम्बन्ध है ॥७२॥

पुरंजनाख्यानम् । सुप्तिमूच्र्छापतापेषु प्राणायनविघाततः॥ नेहतेऽहमिति ज्ञानं मृत्युप्रज्वारयोरपि ॥७३॥ सुषुप्ति मूर्छा अत्यंत दुःख मृत्यु ज्वरादिमें इंद्रियोंके व्यग्र होनेसे स्थूल देहका अहंकार जाता रहता है पर सूक्ष्मतासे रहता है उस समय उसका लिंगदेहसे विच्छेद नहीं होता ।। ७३ ॥ गर्ने बाल्येप्यपौष्कल्यादेकादशविधं तदा ॥ लिङ्गं न दृश्यते यूनः कुह्वां चन्द्रमसो यथा ॥७४॥ गर्भ में बालकपनमें ऐसा स्थूलदेहका अभिमान प्रतीत नहीं होता जैसा तरुणाईमें एकादश इन्द्रियोंसे प्रतीत होताहै जैसे अमावास्यामें चन्द्रमाका चिन्ह होनेपरभी नहीं दीखता ऐसेही वाल और गर्भ अवस्थामें स्थूलदेहका अभिमान विद्यमान होतेभी नहीं दीखता इससै यह सिद्ध है जबतक लिंगशरीर है तबतक स्थूलदेहका अभि- मान नहीं मिटता ।। ७४॥ अर्थे ह्यविद्यमानेऽपि संमृतिर्न निवर्तते । ध्यायतो विषयानस्य स्वप्नेऽनर्थागमो यथा ॥७॥ अर्थके विद्यमान होने में संसारकी निवृत्ति नहीं होती क्यों कि विषयोंके ध्यान करनेसे स्वप्नमें जैसे अनर्थका आगमन हो जाताहै विना जागे वह नहीं छूटता ऐसे विषयोंके ध्यान छोडे विना संसार नहीं जाता॥७९॥ एवं पञ्चविधं लिङ्गं त्रिषोडश विस्तृतम् ॥ एष चेतनयायुक्तो जीव इत्यभिधीयते ॥७६॥ ऐसे पंचभूतात्मक त्रिगुणमय एकादश इंद्रिय पंचतन्मात्रा विकारात्मक यह लिंगदेह बुद्धिकरकै जव चेतनसे युक्त होयहै तव जीव कह्यो जायहे लिंगशरीरके त्यागपर अपने रूपको प्राप्त होताहै।।७६॥

भाषाटीकासमेतम् । अ० ५ अनेन पुरुषो देहानुपादत्ते विमुञ्चति ॥ हर्षशोकं भयं दुःख सुखंचानेन विन्दति ॥ ७७ ॥ या जीव करकै पुरुष देहुनकू प्राप्त होयहै त्यागै है हर्ष शोक भय दुःख सुख लिंगदेहके निमित्तही प्राप्त होयहै ॥ ७७॥ यथा तृणजलूकेयं नापयात्यपयाति च ॥ नत्यजेम्रियमाणोपि प्राग्देहाभिमति जनः॥७८॥ यावदन्यं न विन्देत व्यवधानेन कर्मणाम् ॥ मन एष मनुष्येन्द्र भूतानांभवभावनम् ॥७९॥ यदि कोई कहै कि स्थूल छोडकर जब दूसरे शरीरमें यह प्रवेश करै तब इसकी मुक्ति हो जाय सो नहीं जैसे जोक जबतक दूसरी घासको नहीं पकडती तबतक पहलीको नहीं छोडती इसी प्रकार मरण समयभी जबतक दूसरे देहको प्राप्ति न हो जाय तबतक यह पूर्वदेहके अभिमानको नहीं त्यागन करता इस कारण हे राजन् ! यह मनही प्राणियों को इस संसारका हेतु है ।। ७८ ॥ ७९ ॥ यदाऽक्षैश्चरितान्ध्यायन्कर्माण्याचिनुतेऽसकृत् ॥ सति कर्मण्यविद्यायां बन्धः कर्मण्यनात्मनः॥८॥ जिस समय इन्द्रियोंके आचरण किये कर्मोंके यह मनुष्य वारंवार ध्यान करता कर्म करता है उन्ही कर्मों के संबंध मन संसारका कारण है यद्यपि आत्मा असंग है तथापि अज्ञानके कारण जड़ पदार्थोके संगमें बंधनसा प्रतीत होता है ॥ ८०॥ अतस्तदपवादार्थ भज सर्वात्मना हरिम् ॥ पश्यंस्तदात्मकं विश्वं स्थित्युत्पत्त्यप्यया यतः८१ याते इन सबके दूर करनेके लिये सर्वात्मभाव करकै श्रीहरिको भजन करो विश्व भगवद्रूप देखो जाते उत्पत्ति पालन नाश होय हैं८३ ६२ पुरंजनाख्यानम् । ॥मैत्रेय उवाच॥ भागवतमुख्यो भगवान्नारदो हंसयोर्गतिम्॥ प्रदर्श्य ह्यमुमामन्त्र्य सिद्धलोकं ततोऽगमत् ॥८२॥ मैत्रेयजी बोले कि भागवतोंमें मुख्य भगवान्नारदजी जीव ईश्वरकी गति दिखायकर यासें आज्ञा ले सिद्ध सत्यलोकको जाते भए॥८२॥ प्राचीनबी राजर्षिःप्रजासगांभिरक्षणे ॥ आदिश्य पुत्रानगमत्तपसे कपिलाश्रमम् ॥८३ ॥ प्राचीनबर्हि राजर्षि प्रजासर्गकी रक्षा करवेमें सब पुत्रनको लगाय कर तपके अर्थ गंगासागर पर कपिलाश्रममें जाते भये और सब संग त्याग करते भये ॥ ८३ ॥ तत्रैकाग्रमना वीरोगोविन्दचरणाम्बुजम् ॥ विमुक्तसङ्गोऽनुभजन्भक्त्या तत्साम्यतामगात् ८४ तहाँ जाय वह वार एकाग्र मन कर गोविंदचरणांबुजको भजतो भयो भक्ति करकै भगवत्की समान भावको प्राप्त भयो ॥८॥ एतदध्यात्मपारोक्ष्यं गीतं देवर्षिणानघ । यःश्रावयेद्यः शृणुयात्स लिङ्गेन विमुच्यते ॥८५॥ हे अनध! ये अध्यात्म पारोक्ष्य देवर्षिने गायो है, जो याकों सुनै सुनावै वो देहसे विमुक्त होय है ।। ८५ ॥ एतन्मुकुन्दयशसाभुवनं पुनानं। देवर्षिवर्यमुखनिःसृतमात्मशौचम् ।। १ राजाको नारदजीने गूढ वचनसै इस कारण उपदेश किया कि दृष्टांत दातिसै राना शीघ्र ज्ञानी होजायगा और सहजमें समझ जायगा इसी कारण राजाको शघ्रि ज्ञान हुआ।

३ भाषाटीकासमेतम् । अ०५ यकीय॑मानमधिगच्छति पारमेष्ठयं । नास्मिन्भवे भ्रमति मुक्तसमस्तबन्धः॥८६॥ मुकुन्द यश युक्त भुवनको पवित्र करवेवारो देवर्षिवर्यके मुखसे निकरो भयो मनके शोधक इस ज्ञानको जो कीर्तन करै है, वो ब्रह्म- लोकको जाय है, समस्तवन्धसे मुक्त होयकै या संसारमें कभीभी नहीं भ्रमैगा॥८६॥ अध्यात्मपारोक्ष्यमिदंमयाऽधिगतमद्भुतम् ॥ एवं स्त्रियाऽऽश्रमःपुंसश्छिन्नोऽमुत्रचसंशयः॥८७॥ इति श्रीपुरंजनाख्याने प्राचीनबर्हिनारदसंवादे- ऽध्यात्मज्ञानवर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः॥५॥ ये अद्भुत अध्यात्म परोक्ष ज्ञान मैंने तुमसे कह्यो, इससै देहाभि- मान दूर हो जाता है तथा परलोकमें कर्म फल भोगनेके संदेहकी निवृत्ति होती है “जबतक याके संशय मोह दूर न होय है तक तव मोक्ष न होय है क्योंकि ऐसे लिखा है श्लोकोयम् ।। मोहं ब्रह्म विना न याति सततं दुःखं च मित्रं विना मार्तडेन विना न नश्यति तमः शत्रुश्च भेदं विना ॥ संतोषेण विनान लोभलहरी व्याधिश्च पथ्यं विना दारि- द्रयं च तथा न याति सततं श्रीकृष्णतुष्टि विना ॥"॥८७॥ इति श्रीपुरंजनाख्याने प्राचीनबर्हिनारद संवादे अध्यात्मज्ञान- वर्णनं नाम पञ्चमोऽध्यायः ॥५॥ f श्रीमद्भागवतचतुर्थस्कन्धान्तर्गत भाषाटीकासहितं पुरंजना- ख्यानं समाप्तम्.

निवेदना. श्रीमद्भाल्मीकीयरामायण गोविंदराजीय भूषण और तनिश्लोकी, रामा- नुजी इन तीनों व्याख्या सहित छपके तैयार है. ग्राहक लोगोंको इसका मूल्य २५ रु० पडेगा. और भगवद्गुणदर्पणाख्य श्रीविष्णुसहस्रनामभाष्य १२००० अन्थ जेटमें दिया जायगा. इसका डाकमहसूल अलग पडेगा. डाकमहसूल प्रथम आनेसे पुस्तक व्हाल्युपेबलसे भेजा जायगा. इसका कमिशन नहीं मिलेगा। सुन्दरकांड-उक्त भूषण आदि तीन टीकाओंसे सहित छपके तैयार है. यह अलगजी बेचा जाता है की० ३ रु० । श्रीविष्णुसहस्रनाम. १ भगवद्गुणदर्पणभाष्य निर्वचन और निरुक्ति इन तीन संस्कृत टी- कासहित छपके तैयार है, यह पुस्तक बहुत बड़ा है, कीमत ५ रु.। २ भगवद्गुणदर्पणभाष्यकी व्युत्पत्ति और उसके अनुसार दीपिका नामक भाषाटीका सहित, कीमत १२० । ३ शंकराचार्यकृतभाष्यकी व्युत्पत्ति और उसके अनुसार चंद्रिका नामक भाषाटीका सहित, कीमत १२ आना । ४ केवल भाषाटीका सहित गुटका की० ८ आ० । गीता पंचरत्न (गुटका ) भाषाटीकासहित. पांचों रतनोंकी सरल सुबोध जापाटीका छपके तैयार है. की० २२० । जीवनचरित्र (नवीन) गोस्वामी तुलसीदासजीका (श्रीरानी कमल- कुँवरि कृत पं० ज्वालाप्रसादजीसे परिशोधित) । इसमें गोस्वामीके एक सौ साठ चरित्र हैं। यद्यपि इनका जीवनचरित्र अनेक स्थानोंमें मुद्रित हुआ परंतु महा परिश्रमसे अनेक ग्रंथोंका अवलोकन कर तथा नानाजीकृत भक्तमा- लसे यह जीवनचरित्र अनेक छंद चौपाई आदिमें परम प्रेमसे वर्णन किया है। यह बहुतही रसाल हुआ है। जिसके पाठ करनेसे मनुष्योंका चित्त आल्हादित होकर परमभक्तिसे श्रीरामचंद्रजीके ओर दौड़ता है। की० ८ आना।

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Purnjanakhyanam

Author
Shreemannarayan Shashtri
Title
Purnjanakhyanam
File name
Purnjanakhyanam
Text
OCR done
Citation
1895
Published
2009/09
Publisher
Mumbai
Language
Sanskrit
Pages
66
Library
Sanmati Library, Jaipur
DLI number
322460
Barcode
99999990252932.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
VMLT id
X3qy6gA0Ljh
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