Prakrit Bharati Academy, Jaipur
Pathyaratnakosh Granthank-90
Front matter
राजस्थान पुरातन यात्थमाला
राजस्थान राज्य द्वारा प्रकाशित
सामान्यतः अखिलभारतीय तथा विशेषतः राजस्थानदेशीय पुरातनकाली
संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, राजस्थानी आदि भाषानिबद्ध
विविधवाङ्मयप्रकाशिनी विशिष्ट-मन्थावली
प्रधान सम्पादक
फतहसिंह, एम. ए., डी. लिट.
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
ग्रन्थाङ्क ६०
..
भेदपाटेश्वर श्री कुम्भकर्ण अथित
पाठयरत्नकोश
( संगीतराज-ग्रन्थान्तर्गत )
प्रकाशक
राजस्थान राज्याज्ञानुसार
निदेशक, राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान
जोधपुर ( राजस्थान )
१६६.5 ई०
वि० सं० २०२४
भारतराष्ट्रीय 'शकाब्द १९६६
प्रधान - संपादकीय - प्रस्तुत ग्रन्थ को प्रकाशित करते हुए हमें बहुत हर्ष और संतोष का अनुभव हो रहा है । ग्रन्थ के प्रकाशन में जो विलम्ब हुआ है उसका स्पष्टीकरण विद्वान् सम्पादक ने अपने सहज सौजन्य के साथ. कर दिया है। इस विलम्ब के लिए प्रतिष्ठान की ओर से में विद्वानों से क्षमायाचना करता हूँ। यह ग्रन्थ.. महाराणा कुंभा के महाग्रन्थ संगीतराज का एक अंश है जिसका.- प्रकाशन दोः बार पहिले भी हो चुका है। अत: यह प्रश्न हो सकता है कि .इसी...... अंश को फिर.प्रकाशित करने की क्या..आवश्यकता थी, ..विशेषकर उस समय, जब कि संगीतराज के. दो अन्य भाग वाद्यरत्नकोश.और रसरत्नकोश.अभी तक नितान्त., अप्रकाशित हैं । इस प्रश्न... का सांगोपांग उत्तर सम्पादक महोदय ने अपनी-पाण्डित्यपूर्ण भूमिका में अत्यन्त सुन्दर शब्दों में व्यक्त कर दिया है । ...... उन्होंने बतलाया है कि इस प्रति के उपलब्ध होने पर यह स्पष्ट ज्ञात हो जाता है कि ग्रन्थ को पाण्डुलिपियों में किस प्रकार कुम्भकर्ण के स्थान पर कालसेन. के नाम का आगमन महाराणा कुंभा की मृत्यु के लगभग:४०. वर्ष उपरान्त हुआ, और उससे पूर्व की प्रतियों में (जिनमें से एक के.आधार पर प्रस्तुत ग्रन्थ प्रकाशित हो रहा है.) कुम्भकर्ण, तथा उसकी वंशावली अक्षुण्ण एवं स्पष्ट रूप से विद्यमान है। इसके अतिरिक्त भो. ग्रन्थ-सम्पादक:-श्रीगोपालनारायण. बहुरा.. ने कई नये तथ्यों को बड़े रोचक. ढंग से प्रस्तुत किया है.। ...उन्होंने जिसः, लगन और परिश्रम के साथ इस कार्य का सम्पादन किया है उसके लिए प्रतिष्ठान की ओर से वे हार्दिक धन्यवाद के पात्र हैं । इस ग्रन्थ के सम्पादनः और प्रकाशन में श्री लक्ष्मीनारायण गोस्वामी... और महोपाध्याय विनयसागर. ने. भी बहुत परिश्रमः किया है. अतः उनके प्रति भी मैं आभार प्रकट करता हूं। . .. फतहसिंह। माघ शुक्ला, अष्टमी, सं०.२०२४.. जोधपुर.
प्रास्ताविक परिचय महाराणा कुम्भकर्ण कृत सङ्गीतराज के प्रथम रत्नकोष अर्थात् पाठ्यरत्न- कोष के अब तक दो संस्करण निकल चुके हैं। प्रथम संस्करण, 'गङ्गा ओरियण्टल सिरीज' बीकानेर के ग्रन्थाङ्क ४ के रूप में, सन् १९४६ ई० में प्रकाशित हुआ था। इसके सम्पादक कीर्तिशेष डॉ० सी. कुन्हन राजा थे । यह संस्करण अनूप-संस्कृत- पुस्तकालय, बीकानेर में उपलब्ध संगीतराज की १२ प्रतियों में से दो प्रतियों के आधार पर तैयार किया गया था, जिनमें पाठ्यरत्नकोष का पूरा पाठ प्राप्त हो सका । विद्वान् सम्पादक ने अपनी प्रस्तावना में स्पष्ट स्वीकार किया है कि यद्यपि ग्रन्थ का प्रकाशन मेवाड़पति महाराणा कुम्भकर्ण की रचना के रूप में हुआ है, परन्तु इसमें कहीं भी उनका नाम नहीं आता है। यही नहीं, कृति के कर्ता का 'कालसेन' नाम से उल्लेख है और ग्रन्थ में कर्तृ-प्रशंसा के रूप में जो वंशावली दी गई है वह भी कुम्भकर्ण को प्रसिद्ध वंशावली से सर्वथा भिन्न है । ग्रन्थ के वस्तु-भाग और पुष्पिकानों में भी जो विवरण दिए गए हैं वे भी कुम्भ- कर्ण के ज्ञात विवरणों से मेल नहीं खाते। परन्तु, ऐसी बहुत सी हस्तलिखित प्रतियां (पाठ्यरत्नकोष की नहीं) मौजूद हैं जिनके मूलपाठ में कुम्भा का नाम है और कालसेन का बिलकुल नहीं है। इनकी पुष्पिकानों में भी उन्हीं तथ्यों का उल्लेख है जो महाराणा कुम्भकर्ण के विषय में विश्रुत हैं। परन्तु, ऐसी सभी पाण्डुलिपियां अपूर्ण एवं खण्डित हैं; ऐसी एक भी प्रति नहीं है जिसमें ग्रन्थ का आदिभाग उपलब्ध हो । यदि कोई ऐसी प्रति मिल जाय जिसमें ग्रन्थ का श्राद्य भाग प्राप्त हो और जिसमें ग्रन्थकर्ता का नाम कुम्भा दिया गया हो तो, निस्सन्देह, उसके पद्यों में महाराणा के पूर्वजों के नाम भी यथावत् मिल जावेंगे। अनूप-संस्कृत-पुस्तकालय, बीकानेर में संगीतराज की एक ही सम्पूर्ण प्रति है, जिसका लिपि संवत् १४२४ शाके (१५०२ ई०) है और लिपिकार रामेश्वर- सुत म्हालसा भट्ट है । यह प्रति कामगिरि स्थान में राजा कालसेन की नाट्यशाला- स्थित नर्तकियों के पठनार्थ लिखी गई थी। शेष सभी प्रतियां, जिनमें कुम्भकर्ण- कृत पाठ वाली प्रतियां भी शामिल हैं, अपूर्ण एवं त्रुटित हैं । दूसरा संस्करण हिन्दू विश्वविद्यालय नेपाल राज्य संस्कृत ग्रन्थमाला' के के अन्तर्गत सन् १९६३ ई० में निकला है। इसका सम्पादन डॉ० कुमारी प्रेम- . -- ....
[ २ ] लता शर्मा ने बड़े परिश्रम और. योग्यता के साथ किया है। इस संस्करण को तैयार करने में भी अनूप संस्कृत पुस्तकालय, बीकानेर की बारहों प्रतियों को टटोला गया है, परन्तु पाठ-ग्रहण में उपयोग तीन ही प्रतियों का किया गया है। इनके अतिरिक्त 'भाण्डारकर अोरियण्टल रिसर्च इंस्टीटयूट', पूना की एक अपूर्ण प्रति सं० ३६५ का पाठान्तर भी परिशिष्ट में दिया गया है। यह अपूर्ण प्रति बहुत काम की है । इसमें मूलपाठ शुद्ध है और कर्ता का नाम सर्वत्र कुम्भकर्ण ही लिखा है, कालसेन नहीं। पुष्पिकाओं में भी कुम्भकर्ण के पराक्रम और उसकी उपलब्धियों का ही उल्लेख है । प्रति में प्रायः पड़ी मात्राओं का ही प्रयोग किया गया है । बीकानेर की कालसेन-पाठ वाली प्रति में ऐसा नहीं है, अत: यह अपूर्ण प्रति उससे पुरानी होनी चाहिए । दुःख. इसी बात का है कि यह पूरी नहीं है । इस संस्करण में पाठय और गीत दोनों रत्नकोषों का प्रकाशन हुआ है। जहाँ तक पाठ्यरत्नकोष का प्रश्न है, प्रायः डॉ० कुन्हन राजा वाले संस्करण का ही पाठ ग्रहण किया गया है; यत्र तत्र विदुषी सम्पादिका ने अपनी ओर से सम्भावित पाठ भी सूचित किए हैं और पाद-टिप्पणी में K. संकेत देकर डा० कुन्हन राजा द्वारा सुझाया गया पाठ भी अङ्कित कर दिया है। . इस प्रकाशन से बात इतनी ही आगे बढ़ी कि पाठ्यरत्नकोष की एक ऐसी प्रति का पता चल गया जो अन्य प्रतियों की अपेक्षा प्राचीन है और जिसके मूलपाठ और पुष्पिकाओं से कर्ता के रूप में महाराणा कुम्भकर्ण के नाम तथा उनके अभीष्ट वास्तविक पाठ का पता चलता है, और इसके आधार पर यह भी अनुमान लगायाः जा सकता है कि पाठ और नाम-परिवर्तन में किस कला से काम लिया गया है । परन्तु, यह प्रति अपूर्ण है और इसके आधार पर उक्त संस्करण के परिशिष्ट में जो पाठान्तरों की तालिका दी गई है उससे विदित होता है कि इस प्रति में प्रथम अनुक्रमणिकोल्लास के 'प्रारम्भ-समर्थन नाम द्वितीय परीक्षण' के १३ वें पद्य से तृतीय छन्द उल्लास के ३ रे पद्य तक का ही पाठ प्राप्त है। इस अंश में सब मिलाकर सात पुष्पिकाएं हैं जिनमें ग्रन्थकर्ता के स्थान पर कुम्भकर्ण, महीमहेन्द्र कुम्भकर्ण या राजाधिराज श्री कुम्भकर्ण नाम आता है । परन्तु, यह सब होते हुए भी प्रथम अनुक्रमणिकोल्लास का 'कर्तृ प्रशंसा नाम प्रथम परीक्षण' इसमें उपलब्ध नहीं है, जिसमें ग्रन्थकर्ता महाराणा कुम्भकर्ण को वंशावली और प्रशस्ति-पद्य दिए हुए हैं । यही इस ग्रन्थ का कर्तृ विषयक- समस्या का निर्णायक अंश है। अतः ऐसी प्रति की प्राप्ति की इच्छा का प्रबल हो जाना स्वाभाविक था ।
[३] पिछले कई वर्षों से प्रतिष्ठान की 'राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला' में संगीतराज के तृतीय रत्नकोष अर्थात् 'नृत्यरत्नकोष' के प्रकाशन का कार्य चल रहा था। इसके सम्पादक भारतीय विद्या के सुप्रसिद्ध विद्वद्वरेण्य प्रो. रसिक- लालजी पारिख हैं । पुस्तक का प्रथम भाग, जिसमें मूलपाठ है, सन् १९५७ में ग्रन्थमाला के २४ ग्रन्थाङ्क के रूप में प्रकाशित हो चुका है । दूसरा भाग, जिसमें सम्पादक की सारगर्भित भूमिकादि सम्मिलित है, शीघ्र ही प्रकाशित हो रहा है। इस संस्करण में भी अनूप संस्कृत पुस्तकालय को तीन हस्तप्रतियों का उप- योग किया गया है और उन्हीं के आधार पर पाठ-सम्पादन हुआ है । विस्तृत भूमिका में नृत्यरत्नकोष (सामान्यतः संगीतराज) के कर्ता के रूप में कालसेन की वंशावली पर समसामयिक साक्ष्य और स्थलनाम-परीक्षण के आधार पर . विचार किया गया है। इसी प्रकार महाराणा कुम्भकर्ण के जोवन, कृतित्व और ऐतिहासिक एवं सामरिक उपलब्धियों पर भी विशद विवेचन हुआ है । भूमिका के परिशिष्ट १ में सेन्ट्रल लायब्रेरी, बड़ौदा को हस्तलिखित प्रति सं० ६६३२, ६६३३ और ६६३४ में से पाठयरत्नकोष, रसरत्नकोष और वाद्यरत्नकोष के विविध उल्लासों के विभिन्न परोक्षणों को पुष्पिकाएं भी उद्धृत की गई हैं, जिनमें अविकल रूप से सभी पुष्पिकाएं महाराणा कुम्भकर्ण के नाम से समन्वित हैं । इससे विदित हुआ कि बड़ौदा ओरियण्टल इंस्टीटयूट की सेन्ट्रल लायब्ररी में भी संगीतराज के कोषों की प्रतियाँ मौजूद हैं, जिनमें पाठयरत्नकोष की भी प्रति है। १९६४-६५ ई० के सत्र की प्रतिष्ठान की ग्रंथ-क्रय-समिति की बैठक में जब सदस्य-रूप में श्री रसिकलालजी पारिख और श्रोरियण्टल इंस्टीटयू ट, बड़ोदा के निदेशक, श्री भोगीलालजी सांडेसरा जोधपुर आए तो प्रतिष्ठान के तत्कालीन सम्मान्य सञ्चालक, मुनि श्री जिनविजयजी ने इन दोनों ही विद्वानों से उक्त प्रतियों के विषय में बात की। परिणामतः प्रतिष्ठान से मांग करने पर बड़ीदा के पुस्तकालय से 'पाठ्यरत्नकोष' की प्रति नियमानुसार प्राप्त हो गई और पूर्व-प्रकाशित दोनों संस्करणों से पाठ मीलान करके इस प्रति का सम्पादन करने का कार्य मुझे सौंपा गया। अपनी सुविधानुसार कार्य पूरा करके मैंने १९६६ ई० में सम्मान्य संचालकजी को प्रस्तुत कर दिया । उनका विचार इस पर बहुत कुछ विस्तार से लिखने का था, परन्तु अन्यान्य कार्यों में व्याप्त रहने के कारण वे इस कार्य को हाथ में न ले सके । अन्त में, जव १ जुलाई, १९६७. ई० से में और वे दोनों कार्य-निवृत्त हुए तो चलते समय उन्होंने 'पाठयरत्नकोष' का भी किंचित् प्रास्ताविक लिख कर कार्य पूरा कर देने का आदेश दिया। मैंने यह १ .
- [ ४ ] सूचना नव-नियुक्त निदेशकजी को दी और उन्होंने सहर्ष इसे स्वीकार कर लिया । पाठ्यरत्नकोष के पहले से दो-दो संस्करण होते हुए भी तीसरा अभि- नव संस्करण प्रकाशित करने का यही उद्देश्य और प्रकरण है । बड़ौदा से प्राप्त ६६३२ संख्या वाली ८७ पृष्ठात्मक प्रति में पाठयरत्न- कोष और गीतरत्नकोष दोनों कृतियाँ हैं। पाठयरत्नकोष पत्र ४० B पर समाप्त हो जाता है । इस प्रति के विषय में एक विशेष बात यह है कि इसके अन्तिम पत्र सं० ८७ के पृष्ठ भाग पर यह उल्लेख है- संगीतराज ५७ श्रीसर्वविद्यानिधान कवीन्द्राचार्य सरस्वतीनां संगीतराज पाठयरत्न- कोश-पुस्तकम् ०राम ८७ अर्थात् यह प्रति काशी के महान् विद्वान् सन्यासी कवीन्द्राचार्य के पुस्तका- लय की है ! कवीन्द्राचार्य शाहजहाँ के समकालीन थे। महान् विद्वान् होने के साथ-साथ वे बड़े धनवान् भी थे। उन्होंने बनारस में एक बहुत बड़े पुस्तकालय की स्थापना की थी। कृष्णभट्ट नामक ब्राह्मण उनका भण्डारी एवं कार्यकर्ता था। स्वयं कवीन्द्राचार्य और कृष्णभट्ट दोनों ही गोदावरी-तट पर किसी स्थान के रहने वाले थे । जब शाहजहां ने निजामशाही के अवशिष्ट परगनों को साम्राज्य में मिला लिया तो वे बनारस चले आये। कवीन्द्राचार्य के जीवनकाल में उनका पुस्तकालय निरन्तर समृद्ध होता रहा और देश-देश के पण्डित वहां आकर लाभान्वित होते रहे। सन्यासी होने के कारण कवीन्द्राचार्य के कोई बाल-बच्चा या उत्तराधिकारी तो था नहीं, इसलिए उनकी मृत्यु के बाद वह पुस्तकालय छिन्नभिन्न हो गया। कुछ प्रतियाँ तो बनारस की गवर्नमेंट संस्कृत लाइब्रेरी में चली गई और अन्य कई संस्थानों तथा व्यक्तियों ने भी बहुत-सी प्रतियाँ प्राप्त कर लीं। यह भी असम्भव नहीं है कि बहुत सी प्रतियाँ विविध माध्यमों से विदेशों में भी चली गई क्योंकि उन दिनों वहां के लोग ढेर-की-ढेर पुस्तकें यहां से खरीद-खरीद कर ले जाया करते थे। ऐसा महामूल्यवान् साहित्य का विपुल भण्डार उनकी आँखों से कैसे बच सकता था ? सैण्ट्रल लायब्रेरी, बड़ौदा के श्री प्रार. अनन्तकृष्ण शास्त्री को इस पुस्तका- लय की सूची स्व० महामहोपाध्याय गङ्गानाथ झा के पास १६१६ ई० में देखने को मिली। झा महोदय इसको अखिल प्राच्यविद्या सम्मेलन के प्रथम अधिवेशन में पूना ले जाने वाले थे। श्री शास्त्री ने इसकी रातों-रात नकल कर ली और - [ ५ ]. बाद के वर्षों में जहां भी मिलों इस पुस्तकालय की प्रतियों को बड़ोदा को सेण्टल लायन्नेरी के लिए प्राप्त कर-करके उन्हें सुरक्षित करते रहे। उन्हीं के प्रयत्नों के अन्तर्गत यह संगीतराज की प्रति भी उक्त लायनेरी में प्राकर जमा हु - 8 . ५ परन्तु, अब यह विचारणीय है कि ये प्रतियां चित्तौड़ से कवीन्द्राचार्य के संग्रह में कैसे पहुंचीं ? आश्चर्य की बात तो यह है कि मेवाड़ के महाराणानों के वंशपरम्परागत संग्रह में अर्थात् सरस्वती-भण्डार, उदयपुर में संगीतराज की कोई पूर्ण या अपूर्ण प्रति प्राप्त नहीं है; केवल एक गुटके में, जो वि० सं० १६९४ में लिपीकृत है, रसरत्नकोष का एक अंश गीतगोविन्द की टीका के साथ ही लिखा मिलता है । संगीतराज के अन्तिम रसरत्नकोष के अन्त में ग्रन्थ के सम्पूर्ण होने को तिथि इस प्रकार सूचित की गई है- श्रीमद्विक्रमकालतः परिगते नन्दाभ्रभूतक्षितो वर्षेऽक्षाद्यनलेन्दुशाकसमये संवत्सरे च ध्रुवे । ऊर्जे मासि तिथी हरे रविदिने हस्तक्षयोगे तथा योगे चाभिजिति स्फुटोऽयमभवत् सङ्गीतराजाभिधः ॥१५॥ ग्रन्थेऽत्र पञ्चोत्तररत्नकोशा, उल्लाससंज्ञा (ख्या) खलु विंशतिश्च । परीक्षणानां गदिता शशीतिः, संख्या सहस्राणि च षोडशाऽत्र ॥१६॥ इसके अनुसार संगीतराज विक्रम संवत् १५०६ में कार्तिक मास कृष्णपक्ष की ११, रविवार को तदनुसार शक संवत् १३७४ में समाप्त हुआ था। अनूप- संस्कृत-पुस्तकालय में लिपि-समयोल्लिखित प्रति में लिपिकर्ता का पुष्पिकोत्तर लेख इस प्रकार है- ४ । , शाके वेदकराम्बुधिक्षितिमिते संवत्सरे दुन्दुभी चैत्र मासि सिते रवी फरिणतिथौ ब्राह्मय तथायुष्मति । ; योगे वालवंसंज्ञक तिथिदले कामेश्वरीपर्वते कामाक्षावनदेवपादयुगलध्यानाप्तराज्यश्रियः ॥ लक्ष्मीपङ्कजभूभुवोरनुदिनं सम्पादयन्न क्यतां स्वयंभू (स्वर्भू )योनिपुरेषु लोकमहितं विस्फारयन् सद्यशः । प्रास्ते यो तामराजतनयः श्रीकालसेनो विभु- स्तद्भाण्डारनिकेतनस्थितममुं सङ्गीतराज सुधीः ॥ श्रीमद्गार्यकुलप्रजो निधिकुलावासालया देवता- पादद्वन्द्वविराजितंकसुमनाः श्रीरामचन्द्रात्मजः।
[ ६ ] सद्विज्ञाननरेश्वराञ्चितगुणः सन्मानशाली लसद्- युक्ति: प्रोद्भवचातुरीचतुरवाक् श्रीम्हालभट्टोऽलिखत् ।। स्वस्ति श्रीनृपशालिवाहनशके १४२४.दुन्दुभीसंवत्सरे चैत्र शुद्ध ५ . रवो रोहिणीनक्षत्रे प्रायु- मान् (मति)नाम योगे वालवकरणे एतस्मिन् दिने कोमगिरिस्थाने राज्ञः श्रीकालसेनस्य नाट्य- शालास्थितनर्तकीनां पठनार्थे निधिवासस्थितरामेश्वरभट्टसुतम्हालसाभट्टेन पुस्तकं लिखितम् ॥ इस पुष्पिकोत्तर लेख में निम्नलिखित बातें ध्यान देने योग्य हैं- (१) यह प्रति शक संवत् १४२४ (विक्रम संवत् १५५६; १५०२ ई०) में लिखी गई थी अर्थात् संगीतराज के रचनाकाल से ५० वर्ष बाद और महाराणा कुम्भकर्ण की मृत्यु के ३४ वर्ष बाद । (२) यद्यपि बीच-बीच के वस्तुभाग में रचयिता के रूप में अथवा उदा- हरण के श्लोकों में प्रायः सर्वत्र ही कुम्भकर्ण के स्थान पर कालसेन, कृष्णराज, कालुजि आदि नाम लिख दिये गये हैं, परंतु इस अंतिम लेख में यह नहीं लिखा गया है कि सङ्गीतराज का कर्ता कालसेन था अथवा लिंपिकर्ता ने कालसेन-कृत संगीतराज की ही प्रतिलिपि तैयार की है । (३) तामराज के पुत्र श्री कालसेन के भण्डार निकेतन में स्थित संगीतराज' की प्रति को लिपिकार ने लिखा है; अर्थात् कालसेन नृप के भण्डार (पुस्तकागार) में पहले से हो संगीतराज की प्रति मौजूद थी और उसी से यह प्रति तैयार की गई है। (४) लिपिकर्ता गार्यकुलोत्पन्न रामचन्द्रात्मज म्हालभट्ट है जो अपने आपको युक्ति: 'लसद् प्रोद्भवचातुरीचतुरवाक्' कहता है अर्थात् वह जुगत बैठाने और चतुराई से बातचीत करने में तेज़ था । (५) यह प्रति कालसेन की नाट्यशाला-स्थित नर्तकियों के पठनार्थ लिखी गई थी। कालसेन कौन था, कहाँ का राजा था और ग्रन्थ में वर्णित उसके पूर्वजों और स्थल-नामों की संगति बैठाने के लिए विद्वान् अपने-अपने अनुमान लगा रहे हैं, परन्तु वे इस बात पर एकमत हैं कि वह दक्षिणदेश का था; वह पण्डितों का सम्मान करने वाला और कलाप्रेमी भी रही होगा। उसकी नाटयशाला भी थी, जिसमें कितनी ही नर्तकियाँ नियमित रूप से नियत थीं। उनके लिए सम्बद्ध विषय के पठन-पाठन की भी व्यवस्था थी। राजा का विद्वन्मण्डल भी होगा और उसी के सदस्य म्हालभट्ट ने अपनी चतुराई से जुगत वैठा कर महाराणा कुम्भकर्ण-कृत संगोतयाज को प्रति को कालसेन के नाम का जामा पहना दिया .
७ ] होगा। एक प्रति पूरी तैयार कर दी और शेष अधूरी प्रतियों में भी यथावसर हरताल फेर कर कालसेन का नाम लिख दिया गया; नई प्रति में कहीं-कहीं रिक्त स्थान भी छोड़ दिया गया, जैसा कि प्रत्यक्ष निरीक्षण करने वाले विद्वानों ने लिखा है ! ऐसा करने का उद्देश्य यह रहा होगा कि चित्तोड़ अथवा कुम्भल- गढ़ से, जहाँ भी मूल प्रतियां रही होंगी, हटाने वाले ने सब-की-सब प्रतियां हटाई थीं। अब, उस बात को ३०-४० वर्ष हो चुके थे और परिवर्तनकारियों ने सोचा होगा कि हरताल फेर कर कुम्भकर्ण का नाम सहज ही भुलावे में डाला जा सकेगा और उनके अभिभावक कालसेन की योग्यता प्रदर्शित करके राज- नर्तकियों को आसानी से अभिभूत किया जा सकेगा। इसी भावना के वशीभूत होकर उन 'युक्तिप्रोद्भव चातुरी-चतुरों' ने इतना बड़ा छद्म कर डाला । दुर्भाग्य से महाराणा कुम्भकर्ण के अन्तिम दिन अच्छे नहीं बीते । उलझन- भरी राजनीति ने उनके मन और मस्तिष्क को अस्वस्थ कर दिया था। उनकी राज्य-लोलुप संतान ने स्थिति का संतुलन बिगाड़ कर अनुशासन को उतार फेंका था। ऐसे अवसरों पर अवसरवादी सब कुछ भूल-भुला कर स्वार्थ-साधन- तत्पर हो जाते हैं । महाराणा की पण्डितमण्डली विच्छिन्न हो गई होगी; जिसके जो कुछ हाथ लगा, ले भागा। इसोलिए तो, शायद, उदयपुर के शास्त्र- (सरस्वती) भण्डार में कुम्भकर्ण की इतनी रचनाओं में से इक्की-दुक्की की ही प्रतिलिपि प्राप्त होती है, बाकी सब इधर-उधर हो गई। हाँ, शिलोत्कीर्ण अक्षरों को उठा कर ले जाना आसान नहीं था और, इन्हीं के सहारे उस महान् साहित्यकार की कतिपय कृतियों का धीरे-धीरे पता भी लग रहा है । अस्तु, किसी भी तरह ये प्रतियां दक्षिण में पहुंच गई और कुछ वहाँ के विद्वत्परिवारों में यथावत् रहीं. और कुछ उक्त प्रकार से विकृत की हुई भी वहीं रहीं । कवीन्द्राचार्य और उनका भण्डारी कृष्णभट्ट भी . दाक्षिणात्य थे। उनके संग्रह में ऐसी.. महत्त्वपूर्ण प्रामाणिक और अविकलित कृतियों का संग्रह होना कोई आश्चर्य की बात नहीं है । जैसा कि ऊपर लिखा गया है, कवीन्द्राचार्य के निधन के उपरान्त उनके पुस्तकालय की सामग्री इधर-उधर हो गई थी । वीकानेर के अनूप-संस्कृत- पुस्तकालय में भी उक्त संग्रह की अनेक प्रतियां हैं, जिन पर कवीन्द्राचार्य का नाम लिखा हुआ है। बीकानेर के महाराजा अनूपसिंह (१६६६-१६६८ ई०) बड़े विद्वान्, विज्ञ और विद्या एवं विद्वत्प्रेमी थे। उनके यौवराज्य काल में ही वे पण्डितों और कवियों से घिरे रहते थे और उनको निवाजते रहते थे। वे . . । -Hit [८] बादशाह शाहजहाँ और औरंगजेब के समकालीन थे। विद्वान शाहजादा दारा- शिकोह से भी उनका सम्पर्क रहा होगा। कवोन्द्राचार्य दाराशिकोह के गुरु थे। उनके संग्रह के ग्रन्थों का बीकानेर के पुस्तकालय में आने का एक यह भी स्रोत हो सकता है। महाराजा अनूपसिंह बादशाह औरंगजेब की दक्षिण की मुहिम में साथ रहे थे। उन्होंने गोलकुण्डा के किले को फतह किया था और वे गोलकुण्डा, बीजा- पुर, सागर, अडोनी तथा औरंगाबाद के सूबेदार भी रहे थे। जब शाही सेना ने इन इलाकों पर अधिकार कर लिया तो, कहते हैं, अडोनी के ब्राह्मणों ने, इस भय से कि उनके पवित्र शास्त्र यवनों के हाथों पड़ेंगे, अपने संग्रहों को नर्मदा में प्रवाहित करने का विचार किया। उनके इस संकल्प की जब महाराजा अनूपसिंह को खबर मिली तो उन्होंने उन विप्रों के मुखियाओं को बुला कर समझाया और उनकी शास्त्र-सम्पदा को सुरक्षित रखने का आश्वासन देकर वह विपुल संग्रह हस्तगत कर लिया। अनूप-संस्कृत पुस्तकालय का एक बड़ा भाग इसी सम्पदा मे समृद्ध है। इस तथ्य की पुष्टि में यह प्रमाण भी प्रत्यक्ष है कि इस पुस्तकालय के अधिकांश ग्रन्थों के निर्माता महाराष्ट्र हैं । बहुत सम्भव है, संगीतराज की जो बारह प्रतियां अब इस पुस्तकालय में प्राप्त हैं वे अनूपसिंहजी की इसी उपलब्धि का परिणाम हों। इन महाराजा का देहान्त १६९८ ई० में अडोनी में ही हुआ था। संगीतराज की प्रतियों के इस प्रकार विकृत हो जाने और बिखर जाने की यही कहानी है। अब तक प्रकाशित संस्करणों के विद्वान् सम्पादकों ने महाराणा के जीवन, चरित्र, निर्माण कार्यों और पराक्रमों पर पर्याप्त प्रकाश डाला है; साथ ही, कालसेन के मुकाबले में संगीतराज का कर्तृत्व उनका ही सिद्ध करने में भी कोई कसर नहीं उठा रखी है। परन्तु, इन सभी के मन में यह कस- मसाहट अवश्य रही है कि यदि पाठयरत्नकोश को कोई ऐसी पूर्ण अविकृत प्रति मिल जाती कि जिसमें कुम्भकर्ण रचित मूलपाठ और उनकी सही वंशावली प्राप्त होती तो इस प्रश्न पर दिवास्फीत प्रकाश पड़ता और प्राप्त प्रतियों में र परिवर्तन होने के छद्म का भी पर्दा फाश हो जाता। बड़ौदा की लाइब्रेरी में संगृहीत प्रति प्रायः इन सभी की दृष्टि से बची रह गई । इसी की पूर्ति के लिए यह संस्करण प्रकट करना आवश्यक हुआ। इसमें मूलपाठ का आधार तो बड़ौदा - १. कालसेन कौन था, इस विषय में बीकानेर की पत्रिका 'विश्वम्भरा' के रेऊ विशेषांक' में प्रकाशित श्री ब्रजमोहन जावलिया, एम. ए., साहित्यरत्न का लेख पठनीय है ।
विषयानुक्रम १-८६ १-२० १-१ १०-१४ १५ १६-२० २१-४५ २१-२४ २५-२६ २७-३६. ३६-४५ पाठ्यरत्नकोश (मूलग्रन्थ) १. अनुक्रमणिकोल्लास (क) कर्तृ प्रशंसा नाम प्रथम परीक्षण (ख) प्रारम्भसमर्थन नाम द्वितीय परीक्षण (ग) संगीतस्तुति नाम तृतीय परीक्षण (घ) अनुक्रमणिका नाम चतुर्थ परीक्षण २. पदोल्लास क) पद नाम प्रथम परीक्षम (ख) वाक्य नाम द्वितीय परीक्षण (ग) संज्ञा नाम तृतीय परीक्षण (घ) परिभाषा नाम चतुर्थ परीक्षण ३. छन्द उल्लास (क). अनुष्टुम् नाम प्रथम परीक्षण (ख) वृत्त नाम द्वितीय परीक्षण (ग) आर्यावलोकन नाम तृतीय परीक्षण (घ) प्रस्तार-परिपाटी नाम चतुर्थ परीक्षण ४ अलङ्कारोल्लास (क) उद्देश नाम प्रथान परीक्षण (ख) लक्षण नाम द्वितीय परीक्षण (ग) शब्दालंकार नाम तृतीय परीक्षण (घ) गुणदोष नाम चतुर्थ परीक्षण पंद्यानुक्रमणिका शुद्धिपत्र ४६-६४ ४६-४८ ४६-५३ ५४-६२ ६३-६४ ६५-८६ ६५-६६ ७९-८० ८७से९५ ६६ राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला पाठयरत्नकोश MING श्रीगणेशसारदापानमा उद्यहास्वछतामहीमाहेश्वरं नुमायनकाशेशकारी तिनकराजीवराजयः योगीतानुगाताधतत्व परमावाद्यावनेडाननानंदाधकधनोतरूप शुषिशेतत्यप्रधानाध्ययानास्वत्सरसैक गन्यमहिमाविचाजतयोगिनिःसेगीतायशिवा शमसेतस्परस्मसम:२. निर्मथ्यागमसागर परिस्तसद्विजानमंथाडिणासंगीतामाम।। जहारजगतामत्यसतानंददा स्फर्जन्मोहमहाहिदष्टजन तातापापनत्यनमस्लास्मिनाभर जाय दियमुनयेस्वाईनडात्मनेसायोवेदोमटरोवगायबउरोवश्वशिउर्वर्गस्येव उरस्वमुख्यसविरवलैन्निनियन विज्ञानिकनिकेतनायनरतावार्या यराजोविताचाराईवट रिंगनत्यमदिशन्तस्मिनमोब्रह्मात्यादिस्वविततिनिर्जगदिदैव्याप्यवनित्यस्तिता दुःखी प्रोरिएन्टल इन्स्टीटयूट, बड़ौदा के संग्रह की प्रति का आदि पत्र वाली प्रति को रखा गया है (जिसका विवरण ऊपर दिया जा चुका है) और पाठान्तर डॉ० कुन्हन राजा एवं डॉ० प्रेमलता वाले संस्करणों से दिए गए हैं, जो अनूप संस्कृत लाइनरी की उन सभी प्रतियों पर आधारित हैं जिनमें कालसेन के पक्ष में पाठ-परिवर्तन किया गया है। इससे यह सहज ही ज्ञात हो जायगा कि मूल पाठ क्या था और उसको किस प्रकार परिवर्तित किया गया है। डॉ. कुन्हन राजा द्वारा स्वीकृत या संभावित पाठ K, अक्षर से सूचित करते हुए डॉ० प्रेमलता शर्मा ने तीन प्रतियों को आधार बना कर पाठ-सम्पादन किया है और गृहीत पाठ का अतिरिक्त दो प्रतियों के A. और B. संकेतों से सूचन किया इसके अतिरिक्त डॉ० शर्मा ने भाण्डारकर ओरियण्टल रिसर्च इंस्टीटयू ट, पूना वाली त्रुटित प्रति के पाठान्तर अपनी पुस्तक के परिशिष्ट १ में दिए हैं। हमने इस संस्करण में पाठान्तरों के जो संकेत दिए हैं उनकी तालिका इस प्रकार है डा० प्रेमलता के संस्करण में स्वीकृत पाठ डॉ० प्रेमलता द्वारा A प्रति का पाठान्तर . P. A. B. K.. B . डॉ० कुन्हन राजा द्वारा स्वीकृत या संभावित पाठ BO. डॉ. प्रेमलता द्वारा भाण्डारकर प्रतिष्ठान की खंडित प्रति से दिया हुआ पाठान्तर इस प्रकार इस संस्करण में पाठय रत्नकोष के यावत्प्रकाशित पाठों को मूल पाठ से मिलाया जा सकेगा। प्रति में जो पाठ अशुद्ध या अग्राह्य लगा वह भी प्रतिस्थित पाठ के रूप में नीचे सूचित किया गया है । संगीतराज का कर्तृत्व महाराणा कुम्भकर्ण के पक्ष में सिद्ध करने के लिए यह संस्करण अपने आप में एक अकाट्य प्रमाण है। इसके अनुक्रमणिकोल्लास नामक पहले उल्लास के कर्तृप्रशंसा-संज्ञक प्रथम परीक्षण में ग्रन्थकर्ता महाराणा कुम्भकर्ण की प्रशस्ति में एवं अलंकारोल्लास में उदाहरण के रूप में जो श्लोक दिए गए हैं उनमें से बहुत से 'एकलिंग माहात्म्य' (उदयपुर सरस्वती भण्डारस्थ प्रति सं० १४७७) में मिलते हैं। जैसे कर्तृ प्रशंसा के पद्य सं० ३४ से ३८ तक के इस एकलिंग-माहात्म्य में राजवर्णन के पद्य १६६ से २०३ तक हैं । एकलिंग-माहात्म्य का सङ्कलन महाराणा कुम्भकर्ण के समय में ही हुआ था और इसमें महाराणा मोकल तथा कुम्भकर्ण की विविध शिलोत्कीर्ण प्रशस्तियों एवं अन्य रचनाओं में से भी श्लोकों को सङ्कलित किया गया है। अन्य श्लोकों की भी शब्द-रचना एवं वस्तु में ऐसा साम्य है कि उनको महाराणाओं के महनीय वंश के कोति-परक ही मानना पड़ेगा। इसी प्रकार गीतगोविन्द-व्याख्या-रसिक प्रिया' और चण्डीशतक व्याख्या में से भी बहुत से प्रशस्ति-पद्य एकलिंग-माहात्म्य में मिलते हैं । .
. [ १० ]. इसके अतिरिक्त पाठयरत्नकोष में हो एक श्लोक अन्तःसाक्ष्य के रूप में गूढरीत्या गुम्फित है जो 'युक्ति-प्रोद्भवचातुरी-चतुरों के भी चक्षुर्गत नहीं हो सका और अपने मूलस्वरूप में उन सभी प्रतियों में यथावत् बना रहा जिनमें कुम्भकर्ण के नाम को कालसेन में बदला गया है। यह चतुर्थ उल्लास के द्वितीय परीक्षण का अन्तिम पद्य (७१, पृ. ७८) है- न्यस्य लक्षणसङ्घातं यस्मिन् मेने कृतार्थताम् । समुद्रः स्वस्य तेनायं कृतो लक्षणसंग्रहः ॥ 'समुद्र ने जिसमें अपने लक्षणसङ्घात को रख कर अर्थात् कुम्भ में रख कर अपने को कृतार्थ माना उसके द्वारा यह लक्षण-संग्रह रचा गया । :: - स्पष्ट है कि सन्दर्भित न्यसन-क्रिया कुम्भसम्भवा ही हो सकती है' काल- सम्भवा नहीं । पाठ्यरत्नकोष के वस्तु-विवेचन एवं अन्य विषयों पर पूर्व-प्रकाशनों में सविस्तर विचार हुआ है, जिनकी प्रस्तावनाएं पठनीय हैं । इस संस्करण का उद्देश्य, जैसा कि पहले निवेदन किया गया है, पाठ्यरत्नकोष के मूल अविकृत पाठ को प्रस्तुत करने मात्र का है, जो संगीतराज के कर्तृत्व का निर्णायक मुद्दा है। चण्डीशतक वृत्ति' के प्रास्ताविक में महाराणा कुम्भकर्ण को साहित्यिक प्रवृत्तियों एवं अन्य बातों का विवरण हम दे चुके हैं। इस आवेदन में उन सब को दोहराना चर्वितचर्वण मात्र होगा। राजस्थान प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान के निवृत्त सम्भान्य सञ्चालक मुनि श्री जिनविजयजी महाराज ने कृपा करके मुझे इस प्रति के सम्पादन का कार्य देकर अध्ययन का अवसर दिया, अंत: मैं उनको परम श्रद्धा सहित प्रणामाञ्जलि अर्पित करता हूँ। वर्तमान निदेशकजी ने भी इस कार्य को पूरा करने में जो सहयोग और सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया तदर्थ उनको भी धन्यवाद प्रस्तुत करता हूँ। मेरे कार्यकाल में और निवृत्युपरान्त जिन विभागीय सहयोगियों ने मुझे अपेक्षित सहायता दी उनका आभारी हूँ । आशा है, यह पुस्तक विद्वान् गवेषकों के लिए सहायक सिद्ध होगी। इति जोधपुर कार्तिक शुक्ला पूर्णिमा विनिवेदक गोपालनारायण बहुरा वि०सं० २०२४ राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला पाठयरत्नको नाराजाधिराजनअरिराजमनगजसिहेनमेदपाटसमुइसनवरोदिणीरमणेनअभिनवरतनप्रश्वा वितरपतिगनपतिराजयतोडरमलेनरांजगुरुचायगुरुसेलगुरुइत्यादिविरुदावलीविराजमाननमः हामाइनाऊनकपेनिविरवितिसंगीतगजेबोडशसाहन्यासंगीतमीमांसायोपावरलकोशिअलेकार लासादामगुणाबासापायरलकोशसमाप्तिसमगोदितिविततमतीनामनिमतसिदिः नित्ययासनकादिनि स्वहदयध्येयापरोनिर्गुणोनदोनादतसंज्ञकापरमविपारवत्तावाकलासो यादासगुणाहतस्वतनयाऋत्पादिगम्यात्मतोबिनशक्तनवाहितपरशिवनन्मूनिसपत्कलात् याद्यात्मकलाजीतस्य धमन्याहाद्यरत्ययोशतस्मादनुततापूर्वतनिरुपणमिष्यायायवस्वरूपा परज्ञात्वावितन्पपरमनात विदात्मातमहवादनादेब्रह्मादिवेदिताशाहरिदरदिएपग यस्यविता तपुरापुराविदागदितायावाचामविषयरूपासकर्यनादीविदोगम्यधागाततस्वानसमाहात है . पोरिएन्टल इन्स्टीट्यूट, बड़ौदा के संग्रह की प्रति का अन्तिम पत्र राजस्थान पुरातन ग्रन्थमाला पाठ्यरत्नको संगीतराज [.) श्रीसर्वविद्यानिधानकवादावार्यतरस्वतीनांसंगीतराजपायरतकोशतकम् रा प्रोरिएन्टल इन्स्टीटयूट, बड़ौदा के संग्रह की प्रति के अन्तिम पत्र का पृष्ठ भाग मेदपाटेश्वर राजराजेन्द्र श्रीकुम्भकर्ण विरचित सङ्गीत राज ग्रन्थान्तर्गत प्रथम पाठ्यरत कोश १. अनुक्रमणिकोल्लास-कर्तृ प्रशंसा नाम प्रथम परीक्षण ॥ श्रीगणेशशारदाभ्यां नमः ॥1 उद्यद्भास्वच्छतप्रख्यं महो माहेश्वरं नुमः । यत्प्रकाशे प्रकाशन्ते भक्तराजीवराजयः ।। १ ।। यो गीतानुगतौघतत्त्वपरमो वाचावनद्धानना' नन्दा धेकघनोक्तरूपशुषिरो नृत्यप्रधानोऽव्ययः । भास्वत्सर्वरसैकगम्यमहिमा विभ्राजते योगिभिः सङ्गीताय शिवाय शुद्धमहसे तस्मै परस्मै नमः ।। २ ।। निर्मथ्यागमसागरं परिलसद्विज्ञानमंथाद्रिणा सङ्गीतामृतमुज्जहार जगतामत्यद्भुतानन्ददम् । स्फूर्जन्मोहमहाहिदष्टजनतातापापनुत्यै नम- स्तस्मै श्रीभरताय दिव्यमुनये स्याच्चन्द्रचूडात्मने ।। ३ ।। यो वेदांश्चतुरोऽवगाह्य चतुरो वक्त्रैश्चतुभिश्चतु- वर्गाप्त्यै चतुरस्रमुख्यरुचिरं वर्णैश्चतुभिर्युतम् । विज्ञानकनिकेतनाय भरताचार्याय राजोचिता'- चाराहं चतुरङ्गनृत्यमदिशत्तस्मै नमो ब्रह्मणे ।। ४ ।। प्रतिस्थित पाठ- *गणेशसारदाभ्यां। 1. P. श्रीगणेशाय नमः। श्रीवनचामुण्डायै नमः । श्रीदत्तात्रेयाय नमः । श्रीकामाक्ष्य नमः । श्रीभरताचार्याय नमः । संगीताधिष्ठातृदेवताभ्यो नमः । स्वस्ति शारदायै नमः । B. श्रीगणेशाय नमः । दत्तात्रेयाय नमः। 2. P. गीतानुगतो (तो) घनत्वपरमो । 3. P. नद्धाननो। 4. P. नन्दा (न्धा) अक- ततोक्तरूपसुखि (वि)रो; B. शिखरो। 5. P. राज्ञोचिता। -14 २] सङ्गीतराज १. अनुक्रमणिकोल्लास 1 3 5 श्रुत्यादिस्व विभूतिभिर्जगदिदं व्याप्यैव नित्यस्थिता दुःखो १B]न्मूलनमूलहेतुरखिल स्वर्वासिवन्द्यप्रिया । ब्रह्मानन्दरसातिशायिसुखदा ब्रह्मादिभिः संस्तुता विद्या काचन नूतना विजयते सङ्गीतरूपा शिवा ॥ ५ ॥ अस्त्येकलिङ्गाप्तवरप्रसादः श्रीवैजवापान्वयदुग्धसिन्धुः । यो विभ्रदत्युज्ज्वलधामराज- रत्नानि रत्नाकरतां विर्भात्त ।। ६ ।। तत्रोदितो मन्दिरमिन्दिराया- श्चित्रं स वप्पो द्विजराज पासीत् । तत्तत् क्षमाभूत्कमलाकरस्य प्रकाशने भासुरवासरेशः ॥ ७ ॥ तस्मिस्तत: पल्लवित: प्रतापः प्रभूतशोभी' यशसां प्रतानैः । वनीयकप्रत्तधनैः फलाढयो' हमीर10 नामाऽजनि कल्पवृक्षः ॥ ८ ॥ अमुष्यो/भर्तुः* प्रतिभटचमूः सङ्गरमुखे समुल्लासिमासप्रमुखघृततत्तत्प्रहरणा*। कराग्रप्रोद्भूता11 चिररुचिसकाशासिफलके- ऽनुबिम्बव्याजेन प्रविलयमगादद्भुतमहो ।। ६ ।। तन्नन्दनो निन्दितचन्दनेन्दु:12 कुन्दावदातैर्यशसां कदम्वैः । श्रीक्षेत्रसिंह:13 प्रवलारि[२] वर्ग- स्वर्गार्गलाभेदनकृन्नृसिंहः ।। १० ॥ . -- . प्रतिस्थित पाठ-. ६. *अमुष्योर्वीभत्तुंः। *प्रहरण । 1. P. नित्यं स्थिता। 2. P. रखिलं (ल)। 3. P. श्रीवत्सदेवाप्तवरप्रसादो। 4. P. ऽस्ति व्याघ्रचामीकरवंशसिन्धुः। 5.-5. P. श्रीतामराजो। 6. P. चित्रं। 7. P. प्रसूनशोभी। 8. P. विनायक०; A. वनीयक०; B. वनयक०। 9. फलाढ्य 10. P. प्रामोद | II. P. प्रोडु (धू)ता। 12. K. शारदेन्दुः । 13. P. श्रीरामनामा ।
कर्तृप्रशंसा नाम प्रथम परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [३ -- - - स्वच्छन्दोद्धत चण्डवेगपवनप्रख्यातिविख्यातिभृत्- खङ्गाग्रप्रविघूर्णनाऽनवरतप्राज्यापितोद्घट्टनम् । क्षत्राकृत्युडु सङ्घमुज्ज्वलयितुं श्रीमेदपाटाम्बर व्यापिम्लेच्छघनाभ्रसङ्घमनघः प्रभ्रंशयामास यः ।। ११ ॥ *लक्षस्तदीयस्तनयो वलक्ष- पक्षक्षपा*4जीवितकृत्सदृक्षः । .5त्र्यक्षप्रसादाप्त विपक्षपक्ष- च्छेदैकदक्षः क्षणयुक्सपक्षः ॥ १२ ॥ निर्दूषणस्यापि सतोऽस्य नून- मिदं जना वाच्यमुदाहरन्ति । प्रत्यर्थिकीतिप्रमदाहृतो यन्- मृधे मृधे कर्म जगत्प्रसिद्धम् ।। १३ ।। यः प्रत्यहं तुल्यसुवर्णराशि- दानेन देवैश्चकितं व्यलोकि । कदाचिदाच्छिद्य नु नो निवास- गिरि द्विजेभ्यः ख [लु]* दास्यतीति ।।१४।। अमुं गयाया जगतीविमुक्ति- *हेतोविमुक्तेर्यवनानुरोधात् । शशंसुरस्यान्वयिनः परेऽपि जेष्यन्ति देवा यवनानिति' द्राक् ॥ १५ ॥ प्रतिस्थित पाठ-११. * क्षत्राकृत्युदु । १२. *क्षिपा। १३. *मृधै। नहीं है। २५. *हेतो। १४. *'लु' I. P. कल्पान्तोद्धत । A. कल्पातोद्धत । 2 A. प्रज्यापितो०; B. प्रज्यापितोद्घटनं ; K. प्रज्ञापितोद्घाटनं । • 3. P. श्रीब्रह्मशैलाम्बर० । 4-4. P. श्रीपेडराजस्तनयस्तदीयः शुक्लक्षपा० । 5. P. अक्ष। 6. P. दाक्ष्यः (दक्षः)। 7. इस पद्य के प्रागे. और K. में निम्न पद्य है, जो प्रति में नहीं है। ततोऽवनि पूर्वजराजगुप्ता मुल्लासयन् द्राक्फलिनी* प्रतापः। श्रीम्हागराजः क्षितिपालपाल: पद्मावतीप्राणपतिः समासीत् ।। १३ ।। 9. P. यवनानति। 8. P. मे सु०। +-* A. B. मुल्हास्यघान्द्रीफलिनी।
४] सङ्गीतराज [ १. अनुक्रमणिकोल्लास G तितो मोकलो लोकपालानुभावो' भुवो भारजातस्य वोढाऽऽविरासीत् । जगन्मङ्गलश्रीशसे[२B]वानुभावा- ज्जगन्मङ्गलं यं जगुर्जन्मतोऽपि ।। १६ ।।.. दिग्दन्तावलदन्ति कान्तिहरणप्रावीण्य*वित् कीर्तिना तत्तद्राजगुणैकदेशमिलनप्रेप्सेण्टसन्मूर्तिना। के वाऽन्ये सहशा भवन्तु गुरिगनानेन क्षमापालका ग्रामीणीकृतराजकेन कवयः किं साम्यतः श्राम्यथ ।। १७ ॥ पूर्वराजगुणान् सर्वान् एकत्रस्थान् दिदृक्षुणा । निर्मितो विधिनाऽतोऽयं' सर्व राजगुणातिगः ।। १८ ।। कृतेऽमुना कृते सम्यक् कलिना* लुप्तकेलिना । न कालोऽस्य चिरं स्थातुमिति स्वर्गातिथिः कृतः ।। १६ ॥ ततस्तं तं विनिर्जेतुकामः काम इवापरः । कुम्भकर्णोऽस्ति तत्पुत्रो राजा साम्राज्यभाजनम् ।। २० ।। गर्जन्मदोसिक्तगजोमिमालि°- तौरुष्क1 सैन्यार्णवमध्यसंस्थम् ।11 श्रीमेदपाटावनिमुद्धरन्तं12 वाराहमाद्यं13 यमिह स्तुवन्ति ॥ २१ ।। अपूर्वा दूतिका काचित् खड्गावल्यस्य* भूपतेः । अनघान् निशि या चित्रं तत्परान् कुरुते परान् ॥२२॥ : प्रतिस्थित-पाठ- १७. *प्राविण्य । १७. *नामीरिण। १६. *केलिना। २२ *खड्गाव- ल्ल्यस्य। I-I, P. ततस्तामराजोऽष्ट दिक्पानुभावो। 2. P. दन्त । 3. B. प्राविण्य 4. B. ग्रामणी। 5. B. शाम्यतः। 6. P. में पद्य १७ के बाद निम्न पद्य और है, जो प्रति में नहीं है। यस्मिन् शासति काश्यपी नयपरे श्रीरामचन्द्रो न कि लोकोक्तिः परयोषिदीक्षणकृतभ्रातृत्वमेतीत्ययम् । कि सत्सत्यतया विशङ्कुतनयः श्रीजामदग्न्यो नु कि प्रत्यथि (प्र) नरेश्वरान्तकरणं शार्दूलविक्रीडितम् ।। १६ ।। 7. P. तोयं(सोऽयं) । 8. P. कालसेनोऽस्ति । 9. P. गजोमिमाल. I. I0. B. तौरक। II..P. सैन्यार्णवमध्यमग्नाम् । 12. P. श्रीब्रह्मशैला । 13. P. घराहमाद्य। 14. P. . अनम्रान् । A. अनमान हि भियया । 15 P. हि भिया।
कर्तृ प्रशंसा नाम प्रथम परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश | ५ 21 पशुत्त्वं त्यजे- अपकुर्वनयं बिभ्रन्नुपकर्ता रिपुष्वपि [३A] । त्याजयन् पूर्ववनिताः संयोजयति तान् भिया ॥ २३ ॥ मत्सैन्यैर्लुण्ठमानेऽस्मिन् मालवे मालवोऽपि किम् । 'इति सारङ्गनगरं निःशेषं कृतवानमुम् ॥ २४ ।। मालवाधिपति दन्तिवक्त्रतः तत्तदम्बुनिवहस्य निभेन । चित्रमेष भुवने निजकीर्तेबीजवापनविधिं विदधाति ।। २५ । 'यः पुरा सुपर्वण* ( ? ) मन्दीभूत'कोष्ठयहुतभुक्सुरसङ्घान् । प्रेष्ठनूत्नयवनाहुतिदीव्यत्तन्मुखान् वितनुते* रणयज्ञे ॥ २६ ।। यः सुरान् सुखयतीह गुग्गुलु'क्लुप्त धूपनिवहेन धूपितान् । "दह्यमानरिपुराजवेश्मग-गुर्जरीयघनसारचन्दन:*11 ॥ २७ ॥ चैतन्यं यदि संश्रयेत् सुरतरुः स्वौं :12 च्चिन्ताश्मापि सुरत्त्वमेति फणिनामीशः सुरेज्यो* भवेत् । पुंस्त्वं वागधिदेवता यदि भजेदीशो13 विवादाऽतिग*- श्चेत्तत्तद्गुणसाम्यत: 'क्षितिपतिः कुम्भो* लभेतोपमाम् ॥ २८ ॥ स राजराजः करदीकृतान्यनरेश्वरः शासितदृप्त राजः । तनोति तुष्टये 15 शिवयोः शिवात्मा सङ्गीतकं दिक्पतिगीतकीतिः ।।२६।। [३B द्रष्टव्यं कृतकृत्यतामुपगते" नेदं विधातुं तथा- ऽऽधीत्याशेष महागमान्वसुमती कृत्वा वशे चाखिलाम् । दानीर्घः19 परितर्पयन् द्विजवरानगेन् सुपर्वत कामं याचककामदो वितनुते सङ्गीतमुर्वीश्वरः ।। ३० ।। प्रतिस्थित पाठ-२५. *मालवाधिपति । २६. *इस पंक्ति में दो लघु वक्षर कम हैं; 'सुपर्वण' शब्द का अर्थ स्पष्ट नहीं है । संभवतः 'पुराऽसुरपचर्वण' पाठ हो । चितपते । २७. *गुग्गुल; *रिपुराजवेश्मगागुर्जरोयपनसार. चन्दनः । २६. *सुरेज्या । *विवादो। *कुम्भ। । . I. P. चित्रमुपकर्ता । 2. P. सैन्यैल्यमानेऽस्मिन् । 3. P. गौ रे । 4-4. P. दहत्यस्तं पुरं। A.B: इत्यास्तंलपुरं। 5. P. निशेषी। 6-6. P. गुर्जराधिपति- दन्तवक्त्रतः कृत(त्तदन्तनिवहस्य । 7-7. P. यः पुराणतिलधर्वरणमन्दीभूत । 8. A. तन्मुखे । 9. B. सुखान् । 10. P. फ्लुप्त (स्निग्ध) । यहाँ कोष्ठगतपाठ K. समर्थित है। A. फ्लुप्त । II-II. P. दह्यमानरिपुराजवेश्मगा (न ) गुर्वमेयघनसारचन्दनः । 12..B: स्वगैः। B. में यह पद्य दो पद्यों में विभक्त है । 13. B. भुजेदीशो। तदुपमा श्रीकालसेनो भजेत् ।। 15. P. पुष्ट्यै ।16. P. ()ष्टव्यं । 17. P. कृतकृत्यतामुपगत (ते)। 18. A. धीत्योशेष। 19. B. दानोघः । 14. P..
६ ] सङ्गीतराज [ १. अनुक्रमणिकोल्लास 2 केचिदानकनिष्ठाः 'कतिचन रणभूलम्पटा:*1 केऽपि दक्षा: केचित् कामैकतानाः क्वचन कतिपयेऽगण्यनैपुण्यपण्याः । 3*श्रीमान् कुम्भोऽत्र तत्त"नृपतिगुणगणार्णोधिरीशप्रसत्त्यै सङ्गीतं तत्त्वभाजां जनिरिति तनुते विश्वविश्वोपकृत्यै ।। ३१ ।। दाक्ष्यं साक्षादिहास्ति व्यवहृतिरतुला राजकार्यावधार्या नार्याश्चेष्टात्र चेष्टा नयविनयनयौ* सप्ततिद्वै कलाश्च । प्रौदार्यस्थैर्य धैर्याकरनिधिर खिलज्ञानविज्ञान विज्ञः8 कुम्भः क्षमापालचूडामणिरिति तनुतेऽदभ्रसंदर्भमेतत् ।। ३२ ।। कामं सन्ति परःशताः क्षितिभुजो भूताः परे भाविन- स्तैस्तैः स्वाचरणक्रमैः स्वसमयप्रोद्यत् प्रभाभास्कराः । जातः कोऽप्यतुलप्रभावविभव प्राग्भारविश्वम्भरो जीयान्निजितपूर्वराजचरितः श्रीकुम्भकर्णो11 विभुः ।। ३३ ॥ यः पूर्वं भरताय नाट्यनिगमं पद्मोद्भवप्रीतितः साङ्गं शम्भुरदीदिशत् स स[४०]मयादुच्छन्न कल्पोऽभवत् । लोकानां हितकाम्यया स भगवान् श्रीकुम्भकर्णक्षमा-14 धीशव्यासमुपेत्य वीतविषयं तं वक्ति16 भूयोपि सः17 ।। ३४ ।। ग्रंथात्18 सम्यगधीत्य "वुद्धिविषयान्कृत्वाऽनुभूयार्थतः कृत्वा दर्शनगोचरान भिनवैर्नृत्या*ऽभिनेयाश्रितः20 । प्रतिस्थित पाठ ३१. *रणलंपटाः । *श्री श्रीमान्, 'श्री' अधिक है । ३२. *नयदि ( न य) नहीं है। ३३. *स्वसमयोद्यत । ३५. *नृत्यो - I-I. P. कति च (वितरणे) लम्पटाः । A. तरणभुलंपटाः । B. तरणलंपटा। B में 'ण' के बाद एक प्रक्षर का स्थान रिक्त है। 2. P. केचिदृक्षाः; A. केचिदक्षाः। 3-3. P.श्रीमान् कालायसेनो। ६. P में 'तत् तत्' नहीं है । 5. P. तद्रसानां) 6. P. सप्ततिद्वे। 7. P. प्रौदार्यस्थ (य)। 8. P... 'खिलविध(?) ज्ञान- विज्ञानवैज्ञ 19-9. P. श्रीमत्कालाख्यसेनो नृप इति तनुतेऽदभ्रसन्दर्भमत्र । B... दर्भसंदर्भ । 10. P. विभवं (व)। 11. P. श्रीकालसेनो। 12. P. शम्भुरदीदृशत् । 13. P. समया- दुत्सन्न। 14. P. श्रीकालसेनक्षमा । 15. P. व्याजमुपेत्य । 16. P. वक्ति प्र (?) । 17. P. भूयो वशी। 18. P. ग्रन्थान् । 19-19. P. बुद्धिविषयं नीत्वाऽनुभूयार्थतः । 20. P. नानाभिनेयाश्रितः।
पाठ्यरत्नकोश कर्तृप्रशंसा नाम प्रथम परीक्षण ] [७ तान् शिष्यप्रतिशिष्यलक्षणपथं नेतुं यथावस्थितान्* श्रीकुम्भः पृथिवीश्वरः प्रतनुते स्वोपज्ञसंदर्भतः ।। ३५ ।। यः पूर्व चतुराननेन चतुरः [संस्मृत्य वेदांस्तत- स्तत्त्रैवणिकताs] भिधानपरतां* चावेक्ष्य सम्यक् पदैः । 'श्रीकुम्भः सकलागमा धिमथनः शास्ताs]* खिलक्ष्माभृतां भर्ता वक्ति स] 'सार्वणिकमिमं वेदं विदामग्रणीः ।। ३६ ॥ यः श्रुत्वा भरतं चतुर्भि रखिलैर्भाष्यश्चरित्नाकरं] सोपायं बहुशोऽवलोक्य निखिलानाट्यागमान् वीक्ष्य च । [गौरीनन्दि] 1°मते मतङ्गकथिते सङ्गीतशार्दूलके 10 दृष्ट्वा "दन्तिलदुर्गशक्तिभणिते ता11 नारदोक्तीरपि ।। ३७ ।। [वायुस्वा]तिमहेन्द्रकश्यप[मरुत्सून्व] जुनाद्यैः कृतान् रम्भातुम्बुरु' 'कम्बलाश्वतररक्षोराजसंदशितान् । श्रीसोमेश्वरभोजराचरचितान् ग्रंथान् विलोक्य त्वमु तत्सारेण समुद्धृ[४B]तेन14 कुरुते 1 कुम्भो नृपग्रामणी:1" ॥ ३८ ॥ सङ्गीतरत्नानि गवेषितु वो यद्यस्ति काङ्क्षा सुधियस्तदानीम् । तेषां 16प्रदाने नितरां16 प्रवीणः सङ्गीतराजः क्रियतां सुसेव्यः ॥ ३६ ।। प्रतिस्थित पाठ- ३५. *यथा वक्ति तान्। ३६. *प्रति में यहां 'स' अक्षर मात्र है और इससे पूर्व स्थान रिक्त है । ३७. *भरतश्चतुभिः। ३८. *प्रति में 'मरुत्' के स्थान पर 'गुरु' लिखा है; आगे दो वर्णो का स्थान रिक्त है। यहां P. के अनुसार पाठ दिया गया है। . I. P. शिष्य(क्ष)गर्षयं । 2. P. श्रीमत्कालुजिभूपतिः । 3. P. प्रयतते। 4. P. विधानपरतां । 5. P. स्थितः, A. स्मृतः। 6-6. P. श्रीमत्कालुजिभूपतिः शिवपरः शास्ताखिलक्ष्माभृतां । 7-7. P. सं (बध्नाति हि)। A. 'संदृ' के बाद दो वर्णों का स्थान रिक्त है, फिर 'तकि सार्ववणिकमिम' पाठ है । 8. A. शृत्वा । 9. A. विलोक्य 10-10. P. मतङ्गशिवसङ्गीते सशाईलके । II-II. P. दत्तिलदुर्गशक्तिभणितीस्ता। 12. P. तुम्बर (३) । 13. P. सन्दर्भितान् । 14 P. समुच्चितेन । 15-15. P. श्री- कालसेनो 16-16. P. प्रदानेऽतितरं। नृपः।
८] सङ्गीतराज [१ अनुक्रमणिकोक्लास यान्यज्ञानमदान्धराजसदने शास्त्रोधकोशान्तरे गुप्तान्यक्षिपथं न यान्ति" सुधियां सङ्गीतरत्नान्यहो ! तेषां चिन्तितमात्रमर्थमथ चेदिच्छास्ति तत् सेव्यतां श्रीमत्कुम्भनरेश्वरेण रचितः सङ्गीतराजोऽन्वहम् ।। ४० ॥" भरतमतमतीवदुर्गमं यन्* मतिविमतेरवगाहितु प्रवृत्तः । तदखिलमपि मे महानुभावा- स्स्खलितमपि क्षमयोरुरीकुरुध्वम् ॥ ४१ ।। यस्मात् स्थावरजङ्गमात्मकमिदं धृत्वानुरागादिदं तत्सापेक्षमतोऽतिमात्रगहनं दु यमस्मादृशैः । किन्तु स्वानुभवाय वालिशतया संदर्भितं यन्मया तत् सर्वत्र समानदृष्टय इदं संशोधयध्वं वुधाः ॥ ४२ ॥ दुस्तरं भारताम्भोधि10 तरीतु तरिरेकिका। 1जडान प्रवचनान् कत्तु क्षमेयं मत्कृतिः सताम्' न प्रार्थयेऽहं सुधियो युक्तायुक्त [कृति प्रति [स्व]तस्त उपकुर्वन्तु यतश्चन्दनवृत्तयः13 अथवा सर्वभावेन 1 जाग्रत्सहृदयान् यतः 114 ते स्वभावे [५]न कुर्वन्ति[श्रयन्तं स]ममात्मना ॥ ४५ ॥ 11 । ४३ ॥ ॥ ४४ ॥ प्रतिस्थित पाठ- ४१ *थान् । I. A. 'या' के बाद कुछ लिख कर काट दिया है। दो खड़ी पाई के बाद 'न्य' लिख कर पंक्ति समाप्त है। दूसरी पंक्ति के प्रारम्भ के अक्षर त्रुटित हैं। फिर 'आ' अन्त में है और उसके बाद 'न' है। 'यान्यज्ञानमदान्ध' [या न्य"श्रा न] । B. यान्य' "मदान्ध। K. यान्यत्यन्तमदान्धराजसदने । 2-3. P. गुप्तान्याप्तिपयां. (थ) न ति (यान्ति) । 3. P. सुधियः। 4-4. P. चिन्तितमात्रमाप्तुमथ । 5-5. P. श्रीमत्कालुजि- भूभुजा विरचितः B. श्रीमत्कालुजिभूभुजा"चेतः । 6: . B. यह दो पक्षों में विभक्त. है.। 7. P. क्षमयोररीकुरुध्वम् । B. क्षमयोरी. कुरुध्वम् । 8-8: P. यस्मात् स्थावरजङ्ग- मात्मजगतो वृत्तानुकारादिदम् । B..यस्मान्मया 9. P. संशोधयन्तूत्तमाः । 10. P. भरताम्भोधि । II-II. P. जडान प्रवचनं (नान्) कत्तुं यद्रामानुकृतिः सताम् । 12. P. सुधियोऽयुक्तयुक्त । 13. P. उपकुर्वन्ति यत्त (त)श्चन्दनवृत्तयः । 14-14. P. श्रये सहृदयाम्य(न्य) तः ।
कत प्रशंसा नाम प्रथम परीक्षण ] पाव्यरत्नकोश [8 ननु सति गणनानोपकार ] शास्त्रं किमिह तव न [... ]* से। इति खलु नमिते [...... *त्रातिरुद्ध- वदत निमनु स्यात् कौस्तुभा * ॥ ४५ ॥ [विचार्यमाणमत्रैव तत्त्वं ग्रन्थान्तरे न तत् । मथ्यमाने हि दुग्धाब्धावमृतं न मरुस्थले]* ॥ ४६ ।। [यत्किञ्चिद्भरतादिभिर्निजनिजे ग्रन्थेऽस्ति सन्दभितं, यच्चान्यद्विवृतं विशेषविदुषां वृन्दैः स्ववृत्तिष्वपि । यत्न्यस्तं क्वचिदेव किञ्चिदपि चातज्ज्ञ: स्वमत्याहतं सर्वं चर्वितचर्वणेन रहितं तद्वस्त्विहा] लोक्यताम् ॥ ४७ ।। क्वचिल्लक्ष्म परीक्षार्थमुक्त[स्यातिशयाय वा । सम्बन्धस्मारणार्थ वा] *पुनरुक्तिन दुष्यति ॥ ४८ ।। इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णविरचिते सङ्गीतराजे पाठ्यरत्नकोशेऽनुक्रमणिकोल्लासे कर्तृप्रशंसानाम प्रथमं परीक्षणम् ॥ छ ।' प्रतिस्थित पाठ- ४५. *कोष्ठान्तर्गत स्थान सर्वत्र रिक्त है । P. में यह पद्य इस प्रकार है- ननु सति गणनातोऽगोचरे नाट्यशास्त्रे किमिह तव नवोद्यत्तद्विधानप्रयासे। इति खलु न नियोज्यं तत्र तत्वानित्क्ते- र्वदति खनिमनुष्यात् (न.) कौस्तुभः कि मणीन्द्रः ।। ४८ ।। ४६. *पूरे पद्य के वर्षों के लिए पांच पंक्तियों रिक्त हैं। ४७. *पूरे पद्य के घों का कोष्ठकान्तर्गत स्थान रिक्त है, केवल अन्तिम तीन वर्ण 'लोक्यताम्' लिखे हैं । ४८. *लक्ष्मी । *कोष्ठकान्तर्गत वर्षों का स्थान रिक्त है। I. A. B. K. ग्रन्थान्तरेण तत् । 2. इति श्रीसरस्वतीरससमुद्भूतकरवोद्याननायफेन अभिनवभरताचार्येण . गुर्जराम्भोधिनाथमन्थमहीघरेण त्रिसंध्याक्षेत्रसमुद्रसंभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्तमातङ्गपञ्चाननेन प्ररूढपत्रयवनदवदहनदावानलेन प्रत्यथिपृथ्वीपतितिमिरतति- निराकरणप्रौढप्रतापमार्तण्डेन वैरिवनितावैधव्यदीक्षादानदक्षोद्दण्डकोदण्डदण्डमण्डिताखण्डभुज- दण्डेन भूमण्डलाखण्डलेन श्रीब्रह्माद्रिविभुना' अध्युष्टतमनरेश्वरेण गजनरतुरङ्गाधीशराज- त्रितयतोडरमल्लेन वेदमार्गस्थापनचतुराननेन याचककल्पनाकल्पद्रुमेण वसुन्धरोद्धरणादिवराहेण परमभागवतेन जगदीश्वरीचरंणकिङ्करेण भवानीपतिप्रसादाप्तवरप्रसादेन राजगुर्वादिवि- रुदावलीविराजमानेन राजाधिराजश्रीकालसेनेन विरचिते सङ्गीतराजे पाठयरत्नकोशे' अनुक्रमणिकोल्लासे कर्तृप्रशंसानाम प्रथमं परीक्षणं समाप्ति समगात् ॥ ॥ इति विततमतीनामभिमतसिद्धिरस्तु ।। १. ब्रह्मादिविभुना। २. B. प्रसादाप्ताप्रसादवरप्रसादेन । ३. B. रत्नाकरे।
. आरम्भसमर्थन नाम द्वितीय परीक्षण प्रारम्भणीयं किल' शास्त्रमेतन् माङ्गल्यरूपं जगतोऽखिलस्य । आनन्ददं पुष्टि [५B]करं परं च सुरासुराणां भुवि भूपती [नाम्] ॥ १ ॥ आरम्भणीयं न हु** धर्मशास्त्र- विरोधतो नाटकशास्त्रमेतत् । प्रयोजनाभावतया* प्रवृत्तिः प्रेक्षावतामत्र न जाघटीति ॥ २ ॥ [न शास्त्रतामुष्य तु शङ्कनीय विना प्रवृत्तीतरतापदेशात् । महाजनानाम [परिग्रहाच्च मूल [प्रमाणप्रविहाण] तश्च* ॥ ३ ॥ नो धर्माय विधायकोक्तिविरहान्नार्थाय तत्कुत्सना* नो कामाय चिरादनन्य] मनसोडूं नोः स पुंभि:* स्मृतः । ज्ञानादेव [तु साव] धारणवचो [गुम्फैरिति ज्ञानतो] सान्यस्मादिह मुक्तिरित्यनुचितं संगीतसंकीर्तनम्] * ॥ ४ ॥ [ऊचुः प्राग्विद एकजाति] विषयं धर्म त्वमुं नो ततः प्रायोऽयं विषयो द्विजा [ति जनु]षां धर्मोऽस्तु[गानादिकः । प्रतिस्थित पाठ- १.* प्रति में प्रथम परीक्षण से आगे की पद्य-संख्या चालू रखी है परन्तु यह क्रम आगे के उल्लासों में नहीं चला है । अतः यहां प्रत्येक परीक्षण में पद्य-संख्या १ से लगाई गई है । मंगल्यरूपं । २. तदु। प्रीत्याजनाभावतया ३. *'मूलप्रधा' और 'तश्च' के बीच का स्थान रिक्त है । ४. विरहा. नार्थायतः' के बाद दो वर्णों का स्थान छोड़ कर 'सनातनोक्ता'। *पद्य में कोष्ठगत वर्षों का स्थान सर्वत्र रिक्त है। *पुभि । *'सङ्गीत' के स्थान पर 'संमात' है, प्रागे स्थान रिक्त है । ५. *निजा। 1. P. B. नन । 2. P. तुष्टि । 3. P. B. नारम्भणीयं । 4. P. ननु । 5. B. 'न' नहीं है। 6. P. प्रवृत्ती (त्ति)भरतोपदेशात् । 7. P. विरहाना(नार्थाय। 8. P. नान्यस्मादिह ।
प्रारम्भसमर्थननाम द्वितीय परीक्षण ] पाठयरत्नकोश [ ११ १ .3 4 [गाने प्र]त्युत तन्निषेधवचनान्युक्तानि मन्वादिभिः तत्सर्वाण्यविचारचारुमतिभिस्तत् स्वास्थ्यमालम्व्यताम् ।।५।। किं चात्र श्रवणं प्रमाणपदवीमाटीकते ब्रूत तत् तन्मूलश्रुतिबाधितं क्वचन* किं निर्मूलमुन्मीलति । इत्या[६A}द्युक्तनयेन चांतिनिपुणं संरूप्यमाणं* त्विदं शास्त्रं नैव विचारचारुतरतामांरोहतीह. स्फुटम्* ॥ ६ ॥ - ब्रूमोऽथ प्रतिपक्षपक्षविलसत् तत्तत्तदीयोल्लसद् वाचो युक्तिपिशाचिकाभ्रमिभरप्रोद्भूनन ध्वंसकृत् । तन्त्रं तु प्रसरीसरीति सरणिः सत्पक्षकक्षागिरा- मङ्गीकारिधुरीणकुम्भवसुधा वागीशवाक्योत्करः ॥ ७ ॥ नारम्भणीयं यदवोचदेतत् कश्चिद्विपश्चिन्न विचारचारु । तदन चित्रं तदहो यदस्य 'जगत्प्रसिद्धोऽप्यपलापलापः ॥ ८ ॥ यद्धर्मशास्त्राच्च विरुद्धमेत -दुक्तं तदज्ञानविजृम्भितं ते । निदानता धर्मतरोरमुष्य मन्वादिभिर्यद् गदिताऽभियुक्तिः उपवीणयता मयोदितं*11 स च योगिप्रवरोऽभ्यभाषत । अमृतं भवितेति तद्वचः कथमावि:कुरुते न मानताम्* ॥ १० ।। निःप्रयोजनता योक्ताभियुक्तरस्य मा क्रुध. सुखाप्तेर्दु :ख हानेश्च मुख्यत्वे मति!* वृथा ॥ ११ ।। 10 ।। है ॥ प्रतिस्थित पाठ-६. *कचन । *सरूप्यमाणं । *स्फुतं । ७. *प्रोद्भ नन । 8. *यद्धर्मशास्त्रादविरुद्ध । १०. *उपवीणयता मदूदितं । *मानता। ११.. मति नो। T-I. P. °स्तत्प्रामाण्यविचारचारुमतिभिर्माध्यस्थ्यमालम्ब्यताम् ।; B. माध्यस्थमाल- म्यताम् । 2. P. स्मरणं । 3. P. तत (ब्रू त चेत्); P. का पाठ K. सम्मत है। 4. P. निमू- 5. P. विसरत् । 6. P. कालुजिधरा०, B. कालुजभरा। 7-7 P. जगत्प्रसिद्धेऽप्यपलापलापः 8. P. यद्धर्मशास्त्रेण विरुद्धमेत० । 9. A. B: विजभनं । 10. P. गदिता भियुक्तः। P. के अनुसार A. B. में ८ और ६ पद्य एक ही में लिखे हैं II. P. उपवीणयतो(ता) मखद्विषं । 12. P. अमृताभरणस्य । A. B. अमृता (B. अमृताभरण); K. अमृताभरणं सुशं तद्वचः । 13. P. सा कथम् । 14. A. दुख । 15 P. सति नो वृथा |... ।
१२ ] सङ्गीतराज [ १. अनुक्रमणिकोल्लास 6 . ब्रह्मद्वयानन्द रसातिरेक-सहोदरास्यन्द सुखानुभूतेः। परात्मतुष्टि: परमास्ति काचित् सा चेत्स्वयं नो मनु[६B]षे मनीषिन् ॥ १२ ॥ राजैवात्रोपदेश्यो* रघुपतिकुणपाधीशवृत्तोक्त्य नुक्ता- चारप्राप्ति प्रकर्षतरफलविभवादन* हेयाप्ततत्त्वः । अर्थो धर्मोऽनुषङ्गादतनुरपि* गतो रङ्गकोत्तीर्णन-- 'क्यन्वेषात्तत् प्रवृत्त्यै* न हि घटति कथं शास्त्रमेतन्निवृत्त्यै ।। १३ ।। "माह च भगवान् याज्ञवल्क्यः- हंहो विप्रा गुह्य मेतच्छ णुध्वं तत्त्वं द्रष्टुं वोऽस्ति यद्यत्र वाञ्छा। *नानारूपैर्भावितां भावलेशै रङ्गोत्तीर्णा नर्तकी कामयध्वम् ।। १४ ।। इति" तस्मादेतदुपासनास्य नियता तच्छासनाशंसना।। ब्रह्माद्याप्तपरिग्रहाच्च ननु भो नामूलमाकाङ्क्षति ।13 वेदत्वादिह निर्मितेनिगमता* धातुः प्रमाणीकृता तत्सारेण तु सार्ववर्णिकममुं* निमित्सत:* संभ्रमम् ।। १५ ।। किञ्चोपवेद 5 एवायं साम्नः सामैव वा पुनः । सामाख्या गीतिषु प्रोक्तेऽन्यतोऽस्माच्च प्रमाणता ।। १६ ।। 1'वेदेनाप्यात्ममूलत्वादिह मोहाद्यपेक्षितम् । स्वरजातमुदात्तादि यदायत्तं18 यतः स्मृतम् ।। १७ ।। प 1 प्रतिस्थित पाठ- १३. *देशो !* दन । *धर्मोनुसङ्गादतनुरपि । ० *क्यन्वेषतत् प्रवत्त्य । ० नाना । १५. *निमिते निगमना। *सार्वणिकममुं । *निमित्सता । 1. P. ब्रह्माद्वयानन्द । 2. P. सहोदरास्वाद । 3. B. मानुषे। 4-4. P 0 नुक्त्याचार- प्राप्त० । 5. P. ०देयहेयाप्ततत्त्वः । 6-6. P. अर्थो धर्मानुषङ्गात (त्त)वनरपि(भि)मतो रङ्गकोत्तोर्णनर्त० । 7-7. B. ० क्यन्वेषातत्प्रवृत्त्यै । 8. P. भवति । 9.9. यह अंश B.O. के अतिरिक्त अन्य किसी प्रति में नहीं है 10. P. तस्मादेव त शास्त्रतास्य। II. A. तछासनाशंसना। 12. P. न तु। 13. P. नो मूलमाकांक्षति । 14. P. पञ्चमम्। 15. P. फि रूपवेद; K. वेदरूप। 16. P. प्रोक्तत्यतो। 17-I7. P. मेवेनाप्यात्ममूल- स्वादिदमेव ह्यपेक्षितम्। 18-18. P. स्वरजातमुवात्ताद्यस्थि(स्मिनायत्तं ।
प्रारम्भसमर्थननाम द्वितीय परीक्षण ] : पाठ्यरत्नकोश [ १३ तथा हि नादधर्मोऽयमुदात्तादिः स्मृतः स च । नाद:[७A]प्राणान्न संयोगाज्जातः श्रुत्यादि भेदभाक् ॥ १८ ॥ श्रुतिभ्य: स्युः स्वराः षड्जर्षभगान्धारमध्यमाः । पञ्चमो धैवतश्चाथ निषाद इति तेषु च ।। १६ ।। उदात्ताः समपाः प्रोक्ताः स्वरिती च रिधौ स्वरौ। अनुदात्ती ततस्तस्माज्जगतोऽप्यस्य हेतुता ।। २० ।। अङ्गत्वेनाथवाऽस्यास्तु' प्रामाण्यं तत्त्वमृत्विजाम् । चार्यापकान्तया होमविधानात् षट्केन* च ॥ २१ ॥ मानान्तरमधिगतेयतीति10 विधिः स्फुटः । प्रौद्गात्रस्य विधानाच्च त्रैकाल्ये नाट्यदर्शनात् ।। २२ ।। अश्वमेधक्रती गानविधानमपि दृश्यते । ब्राह्मणस्य दिवारात्री राजन्यस्य च शासनात् ।। २३ ॥1 नरेशस्यानुगामित्वं यन्निषेधस्य तत्र हि । नृदेवो न निषिध्येता नृमात्रस्य निषेधनात् ।। २४ ।। शाम्येद्यथाहिदष्टस्य विषेण विषमुल्वरणम् । तथाऽस्मिन् विषयाउकाङ्क्षा विषयासक्तचेतसाम् ॥ २५ ॥ जीमूतवाहनदधीचिमुखाधिपानां नाटये विलोक्य चरितं स्वभिनीयमानम् । प्राणर[पि प्रयतते न] हितं परस्य' कत्तु मनः खलु नरस्य लघीयसोऽपि [७B]* ।। २६ ।। 15 16 प्रतिस्थित पाठ- २१. *मृत्विजां। *षटकेन। २६. *"स्य लघीयसोपि ॥७३॥', यह अंश पृ. ८ A में भी दोहराया गया है। गनी। I P. प्राणाग्नि । 2. A. शृत्यादि। 3. B. भेदभाग् । 4. B. शृतिभ्यः। 5. P. 6. B. हेतुतां । 7. P. स्यात् (तत्); A. का पाठ प्रति के समान । 8. P. चार्याध्य () क्रांतया । 9. P. खटकेन; K. कठकेन । 10. P. ०गतेगा()यतीति । II. B. में.. 22-23. पद्य एक में ही दिए गए हैं। 12. P. नाराशंस्यनुगामित्वं ।। 13. P. निषेध्यता 14. B. तथास्मिन्निविषया। IS. P. चेतसः। IS. K. प्रयतते(ऽभि)हितं १४ सङ्गीतरान [ १. अनुक्रमणिकोल्लास न नृत्येदिति यनृत्यनिषेधः कामत्तिनः । तद्ब्रह्मचारिविषये वचनं पर्यवस्यति ॥ २७ ॥ द्विजातिविषयो गाननिषेधो यस्तु' कुत्रचित् । तद्विदां स्यादपात्रत्वं तत्त द्विद्योपजीविनाम् ।। २८ ।। अस्येतिहासवदयं समयः प्रदिष्टो- ऽनध्यायरूप ऋषिणा निगमानुरोधात् । प्रासारितादिवरगीतकसंप्रयोगात् धर्माद्यवाप्तिरुदितेह परा मुनीन्द्रैः ॥ २६ ।। प्रचुराणि प्रमाणानि यथायथमिहार्थतः। अष्टावपि विलोक्यानि पुराण इव सूरिभिः ।। ३० ॥ अप्रस्तुतत्त्वात्तल्लक्ष्म न वयं व्याहरामहे । प्राकटयमुपयास्यन्ति प्रयोगादेव तानि यत् ।। ३१ ।। ' इति श्रीराजाधिराजमहीमहेन्द्रश्रीकुम्भकर्णविरचिते :पाठ्यरत्नकोशेऽनुक्रमणिकोल्लासे प्रारम्भसमर्थनं नाम द्वितीयं परीक्षणम् ॥' .. प्रतिस्थित पाठ-२६. *निगमोनुरोधात् । I.P.फामवर्गतः । 2.P. यथा 3. P. यदपात्रत्वं 4. B. में 'तत्' नहीं है। 5-5. P. प्रासादिता० । 6. P. प्रत्यक्षादि । 7-7. P. इति श्रीराजाधिराजमहेन्द्र- श्रीकालसेनविरचिते सङ्गीतराजे पोडशसाहस्रयां सङ्गीतमीमांसायां पाठ्यरत्नकोशे अनुक्रमणि- कोल्लास प्रारम्भसमर्थन द्वितीयं परीक्षणम् ।
सङगीतस्तुति नाम तृतीय परीक्षण सिद्धप्रमाणभावस्य सङ्गीतस्य निरूप्यते । स्वरूपस्य विचारोऽथ कुम्भकर्णेन' भूभुना ॥ १ ॥* ऐक्यं* जीवपरात्मनोदिशति यद्* बालेश्वरौ* सङ्गतं' तुल्यं लम्भयदद्भुतं विगलिता शेषेन्द्रियार्थग्रहो। माEिA]यान्तःपतितं मदादविरमं* सम्मोहयेन्मायिनं लोकातीतचमत्कृतिश्रुतिगतं गीतं परं तत् स्तुमः ॥ २ ॥ जीवातुर्गदिनां प्रियं विरहिणां ध्येयं परं योगिनां दीनानामतिदुःखिनामपि नृणां विश्रान्तिभूमिः परा । निःस्वानां परमो निधिर्नवनवो नार्मोत्करो भोगिनां'* गीतं किञ्चिदमेयरूपमहिमप्राग्भारमुज्जृम्भते ।। ३ ॥ गीतमेव वशीकारकार्मणं वशिनां नृणाम् । त्यक्तान्यत्कार्यसम्भारा' मुनयो यदुपासते ।। ४।। स्वर्गतं पुनरानेतुं शक्तिर्यस्य जगत्त्रये । अगोचर:* कविगिरा* तद्गीतं केन वर्ण्यते ॥ ५ ॥ 10 इति श्रीराजाधिराजमहीमहेन्द्रविरचिते सङ्गीतराजे पाठ्यरत्नकोशेऽनुक्रमणिकोल्लासे सङ्गीतस्तुति म तृतीयं परीक्षणम् ।10 .. 'प्रतिस्थित गाठ- १. *प्रति में संख्या ७६ से चलती है । २. *एको। *यो। *वालेथरी। *विगलितः। ३. * ०*वनयो मोत्करो। *भागिनां । ५. *भागोचरः। कति गिरी। -- .- 1. P. कालसेनेन • । 2. P. संमदं । 3. P. लम्भम (व) तं; A. B. लंभययद्भुतं । : A. B. शेषेन्द्रया। 4. P. म (य)दत्यविरतं । -5-5. P. लोकातीतचमत्कृतं श्रुतिगतं । .A. में 'चमत्कृ' के पश्चात् एक अक्षर का स्थान रिक्त फिर 'तिश्रुतिगतं' है। 6-6. P. प्रिया- विरहिया। 7:7. P. परशेवधिनवनवो भोगोत्करो भोगिनां । 8. P. वशिनामपि। 9. P. त्यक्तान्यकार्यसम्भारा। 10-10. P. में 'महीमहेन्द्र' के बाद कालसेन', शेष ययावत् ।
अनुक्रमणिका नाम चतुर्थ परीक्षण यस्तु निर्यवनं कर्तुमवतीर्णोऽस्ति भूतलम् । तेन श्रीकुम्भकर्णेन क्रियते गीतनिर्णयः ।। १ ॥* सम्यग्गीतं तु सङ्गीतं गीतादित्रितयं नु वा । समष्टिव्यष्टिभावेन शब्देनानेन गीयते ॥ २ ॥ 'त्रिविक्रम क्रमासक्तचेतसा कुम्भभूभुजा [८B] . उपक्रमक्रम' तस्य विधातुं संविधीयते ।। ३ ॥ प्राज्यं राज्यतन: परेति परमादृग्वेदतः सामतो गीतं गीतमनोहरात् कमलभूरादाय वै सृष्टवान् । नेपथ्याभिनयौ यजुभिरुदितो ऽथाथर्वणस्तान्० रसान् गम्भीर11 स्थितपाठ्यगीतविवरे वाद्यं पुनस्तद्वयात् ।। ४ ।। पाठय वाक्यात्मकं वाक्यं सर्वाभिनयमूर्द्धनि । भरतेनाभिषिक्तं तद्वाचि * यत्नं विधि]त्सताम् ॥ ५ ॥ 14प्रबोधकाद्भतं कालं14 विशेषादस्य हेतुतः15 आदावतो नरेन्द्रेण सर्वस्यैव16 विविच्यते ।। ६ ।। सङ्गीतराजे तत्र स्यू* रत्नकोशा:* क्रमादमी' । 1 पाठ्यगीतवाद्यनृत्यसरसा*स्तत्त्वतः18 क्रमात् ।। ७ ।। प्रतिरत्नकोशमुक्ता उल्लासा वेद सम्मिता:19 । परीक्षणानि चत्वारि प्रत्येकं* तेषु च क्रमात् ।। ८ ।। -- प्रतिस्थित पाठ-१. *केवल इसी पद्य पर सं. १ दी गई है पागे ८४ से चालू है । ३* त्रिविक्रम । ५. *तद्वादि। ७. *स्यु । *रत्नकोश । . *वाद्यादिपरसास्तत्वतः । ८. *उल्लासावेव । *प्रयोगां। १ Aamr----- I. P. निर्वचनं । 2. P. 0 तीर्णोस्तु (स्ति) । 3. P. भूतले। 4. P. श्रीकालसेनेन । 5. P:तु। 6-6. P. त्रिविक्रमक्रमासक्तचेतसा तासराजिना। 7. P. उपक्रमः क्रमं । 8-8. P. पाठ्य नाट्यतनुः। 9. P. यजुनिगमतो। 10. P. ०थर्वतस्तान् । II. P. संगीत । • 12. A. B. यत्तं। 13. P. विचित्सता। 14-14. P. प्रबोधस्य प्रवन्धानी। हेतुता। 16. P. सर्वस्येतद् । 17. P. रत्नकोशाः क्रमादमी। 18-18. P. पाठय- गीतवाद्यनृत्यरसाह्वास्तत्र च । 19. B. वेदसम्मताः। 15. P.
पाठ्यरत्नकोश अनुक्रमणिका नाम चतुर्थ परीक्षण] [ १७ =- - अनुक्रमणिका वाद्य स्वरूप पदवाक्ययोः । छन्दांसि भूषणानीह पाठयोल्लासाः स्फुटा' अमी ।। ६ स्वरोत्पत्तिस्तथा रागाः प्रकीर्णकमथापि च । प्रबन्धाख्यश्च ते गीतरत्नकोशे द्वितीय ॥ १० ॥ ततं च शुषिरं*4. चाथ घनं चैवावनद्धकम् उल्लासाः क्रमशो' वाद्य [EA] रत्नकोशे प्रकीर्तिताः ॥ १.१ ।। अङ्गसंज्ञस्तथा* चारीसंज्ञकः करणाभिधः । प्रकीर्णकाभिधो नृत्यरत्नकोशे कथानकाः ।। १२ ।। 'रसलक्षणभावादिरनुभाषाभिधं तथा ।' ततः संचारिभावस्यरत्नकोशे रसाभिधे ।। १३ ॥ अनुक्रमणिकोल्लासे कर्तुः शंसनमादितः । प्रारम्भसार्थता । तेषामीश्वरस्य स्तुतिस्ततः ॥ १४ ॥ अनुक्रमणिका चेति चतुर्थं परिकीर्तितम् । पदलक्षणमेतस्मिन् लास्यलक्षणमेव च ॥ १५ ॥ संज्ञा च परिभाषा चेत्युल्लास पदनामनि । अनुष्टुप्शासनं [वृत्तार्ययो:13 शासनमेव च] . प्रस्तारपरिपाटी च छन्द उल्लास ईरिताः ।। १६ ।। उद्देशो लक्षणानीह 1"ततोऽलङ्कृतिरेव च । गुणदोषाश्च तत्त्वेनोल्लासेऽलङ्कारसंज्ञके ।। १७ 15स्थानं श्रुतिपदनाममूर्च्छनातानरासकाः ।। साधारणं तथा वर्णाः सालङ्काराश्च जातयः ।। १६ ।। ॥ . प्रतिस्थित पाठ--- ११ *शुखिरं । १२ *अंगसंगस्तथा। १४ *कत्तुं । १६ *शासन' के बाद स्थान रिक्त, फिर 'र्थयो:'; 'पुनः स्थान रिक्त के बाद 'रो' तथा फिर स्थान रिक्त है। पद स्पष्ट नहीं होता, अतः P का पाठ दिया है । - 5. P. ऋमतो। 1. P. चाथ । 2. P. स्मृता । 3. B. प्रकीर्णमथापि । 4. P. सुखि (बि)। 6. P. मान्मताः। 7-7 P. रसलक्ष्मविभावादिरनुभावाभिधस्तथा । 8. P. संज्ञश्च । 9. P. कर्तृ । 10-10. P. चेति संगीतस्य स्तुतिस्ततः । वाक्य-II. P. लक्षणमेव। . 12. P. चेत्यल्लासे । 13. B. वृत्ताययोः। 14-14. P. ततोऽलंकृतयः पुनः । 15-15. P. स्यानश्रुनिस्वरग्राममूर्च्छनातानसंज्ञकाः। ।
१८] सङ्गीतराज [ १. अनुक्रमणिकोल्लास 'दृशः स्वरूपभेदाश्च' चतुर्भिश्च परीक्षणैः । ग्रामरागादिरागाङ्गोपाङ्ग भाषाङ्गनिर्णयः ।। १६ ॥ क्रियाङ्गानि च वर्ण्यन्ते रागोल्लासे क्रमादिति । वाग्गेयकारकथनं शब्दभेदाश्च तत्त्वतः[[B].|| २० ।। गमकाश्च तथा स्थाया वर्णनीयाः प्रकीर्णके। गीतकानि तथा सूडत्रयमालिक्रमस्थिताः ॥ २१ ।। प्रकीर्णकाः प्रवन्धाश्च प्रबन्धोल्लास गोचराः । ततोल्लास* एव तन्त्रीपञ्चक नकुलादितः ।। २२ ।। मत्तकोकिलका चात्र' किन्नरी परिकीर्त्यते । सौषिरै वेणुनिर्माणं स्वरोत्पत्तिस्तदाश्रिता' ।। २३ ॥ गुणदोषाश्च10 गाथादि11 साङ्गोपाङ्गं12 निरूप्यते ॥ २४ ॥* मार्गतालास्तथा देशीतालास्तत्प्रत्यया अपि । ताललक्षणमेतस्मिन् धनोल्लासे समाप्यते ॥ २५ ॥13 1 *अङ्गप्रत्यङ्गभणितिरुपाङ्गानां क्रियाभिधा14 | आहार्याभिनयश्चैवमङ्गोल्लासे प्रकाश्यते ॥ २६ ।। स्थानकानि तथा चार्यः शुद्धदेशीविभेदतः । मण्डलानि तदुत्थानि चारिकोल्लासके क्रमात् ।। २७ ।। करणानि द्विधा15 16 1 शुद्धदेशीदेश विभेदत:16 अङ्गहारा रेचकारच करणोल्लास ईरिताः ।। २८ ।। । प्रतिस्थित पाठ- २२. *प्रबन्धोल्लस; *ततोल्लस । २४. *पञली पर ही पद्य संख्या है। . 1-I. P. दश स्वरगते भेदाश्च । 2. P. ०पाङ्गे । 3. P. क्रियागा(ङ्गा)नि । A. B. श्च । 5. B. प्रकीर्णकाश्च । 6-6. P. एकतन्त्रीपञ्चकं । 7. P. चाथ। 8. P. सौखि (पि)रे; B. सौखरे । 9. B. श्रिताः। 10. P. गुण(रणा)दोषाश्च । II. P. पात्रादि । 12. A. B. सांगोपांग । 13. प्रति के पद्य २५ और २६ के बीच में P. में निम्न पद्य और है- "अवनद्धसमुल्लासे वाद्यं पुष्करसंज्ञकम् । पाटा धाधप्रबन्धाश्च पटहादिनिगद्यते ॥ २६ ॥ 14-14. P. 'अङ्गप्रत्यङ्गभरिणतिरूपाङ्गानां क्रिया तथा । B ०रूपकानां । 15. P. 16-16. P. शुद्धदेशीभेदविभेदतः ।
मनुक्रमणिका नाम चतुर्थ परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ १६ वृत्तयश्च तथा न्याया लास्याङ्गानि च तत्त्वतः । पात्रलक्षणमेतस्मिन् प्रकीर्णोल्लास उच्यते ॥ २६ ॥ रसस्वरूपकथनं रसविद्रूपवर्णनम् । रसाश्रयाभिधं चा[१०] न्यद्रसलक्षणसंज्ञकम् ॥ ३० ॥ परीक्षणानि चत्वारि रसोल्लासेऽनुरस्यते" नायकानां प्रकथनं नायिकालक्षणं तथा ॥ ३१ ।।* चेष्टादीनां विभावानां विभावनमतः परम् । उद्दीपनविभावोख्यं विभावोल्लासके कमात् ।। ३२ ।। अनुभावास्त्वस्थायाः स्वरूपं सात्विकाः पुनः । प्रवासाद्यनुभावाश्चानुभावोल्लासगोचराः ॥ ३३ ॥ निर्वेदादिप्रतिरसं भावावस्थानसूचकम् । रससंकरनामाचं* ग्रन्थस्य च समापनम् । परीक्षणानि सञ्चारिसंज्ञकोल्लासके* क्रमात् ।। ३४ ।। येनानुक्रमतः शकान् विशकलीकर्तुं रणप्राङ्गणे तत्तद्गूजरमालवीयमरुपा' नीताः सदुर्गा वशे । "दुर्गेणाजयमेरुणा' निजसमुन्नत्या स्वया10 सम्पदा सोऽयं11 तेन चिरादनुक्रमणिकोल्लासः समुल्लासितः ।। ३५ ।।* 12सरस्वतीरससमुद्भ तकरवोद्याननायकेनाभिनवभरताचार्येण मालवाम्भोधि- प्रतिस्थित पाठ-३० *रसत्वरेपवर्णनं । ३१. *प्रति में ३१ वें अर्थात् ११४ वें पद्य के मागे पद्यांक नहीं हैं । ३४ *रसकंकर० । *संशकोल्लासके । ३५ वें के स्थान पर ११६ अंक है। -- . I. P मित्यस्मिन् । 2. P. में इस पद्य के बाद यह श्लोकार्ध और है- 'सभापतिः सभायाश्च निवेशो रसकीर्तनम्' 3. A. रसत्वस्य च वर्णनम् ; B. में कुछ वर्षों का स्थान ताराङ्कित करके छोड़ दिया गया है । P. का पाठ र समर्थित है और प्रति के पाठ से मिलता 4. P. रसज्ञस्य च वर्णनम् । 5. P. तु रस्यते । . 6. B. रसशंकरनामा। 7. P. त्तत्तद्गुरदाक्षिणात्यनरपा; B. नगरी। 8. P. घशं। 9.9. P. दुर्गेशा महिषाद्रिणा; B. दुग्गैशा | I0. K. स्वयं । 'II. P. साकं। 12-12 P. इति श्रीजगदीश्वरवनदेवनिजगणेत जगदम्बिकाकामाक्षी . १. B. कामाक्षा। - २. ] सङ्गीतराज १. अनुक्रमणिकोल्लास माथसंथमहीधरेण मेदपाटसमुद्रसंभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्तमातङ्गपञ्चा- ननेन प्रारूपत्रयवनदवदहनदवानलेन प्रत्यर्थिपृथिवी|१०B]पतितिमिरतति- निराकरणप्रौढप्रतापमार्तण्डेन वैरिवनितावैधव्यदीक्षादानदक्षोद्दण्डकोदण्डदण्ड- मण्डिताखण्डभुजादण्डेन भूमण्डलाखण्डलेन श्रीचित्रकूटविभुना अध्युष्टतम- नरेश्वरेण गजनरतुरगाधीशराजत्रितयतोडरमल्लेन वेदमार्गस्थापनाचतुराननेन याचककल्पनाकल्पद्रुमेण वसुन्धरोद्धरणादिवराहेण परमभागवतेन जगदीश्वरी- चरणकिंकरेण भवानीपतिप्रसादाप्तापसादवरप्नसादेन राजगुर्वादिविरुदावली*- विराजमानेन राजाधिराजश्रीकुम्भकर्णविरचिते श्रीसङ्गीतराज़े पाठ्यरत्न- कोशेऽनुक्रमणिकोल्लासेऽनुक्रमणिको नाम चतुर्थं परीक्षणम् । छ। उल्लासश्च प्रथमः समाप्ति समगादिति विततमतीनामभिमतसिद्धिरस्तु ।।।छ।।।12 प्रतिस्थित पाठ- * विरुदावली विली. विराजमानेन । चरणकिङ्करेण श्रीकामेश्वरीगिरिविभुना अध्युष्टतमनरेश्वरेण भीष्मपुरजयानीतानेकराज- कन्यारत्नेन श्रीपुरग्रहणसंक्तियशोभरेण वाटिकाचलग्रहणजनितकीतिपूरपराजिता चल- नायकेन संगमतीर दुर्गाद्धरणोद्धृतसकलमण्डलाधीश्वरेण : दमनपुरविध्वंसनबन्दीकृतयवनी- निचयेन महिषमेरुजयाजेयविभवेन शाकम्भरीरमणपरिशीलनपरिप्राप्तशाकम्भरीपरितोषित- शाकम्भरीप्रमुखशक्तित्रयेण अष्टादशगिरिशिखरपरिवारिताञ्जनादि-गिरिविजयविल्यात- वायंगण महदम्बमातृकापुरो लनषितमहोरगपुरेण श्रीवनदेवस्वामिप्रसादरचनापरमेश्वरेण व्यम्बकेश्वरसनिधिकोत्तिस्तस्भोन्नतजयस्तम्भेन श्रीब्रह्मगिरिभौमस्वर्गतायथार्थीकरणरचित- चारुपथेन श्रीकामाला गिरिनवीननिर्मितिपराजितसमैरुणा श्रीमहिषाचलोपरि श्रीहरि- शरणरचिताचलदुर्गेण अभिनवभरताचार्येण वीणावादनप्रवीणेन यवनकुलाकालकालरात्रिरूपेण त्रिसंध्याक्षेत्रसमुद्रसंभवरोहिणी रमणेन परमभागवतेन महाराजाधिराजराजश्रीराजमानमृगाङ्क- तामराजनेन्दनेन महाराज्ञी सौभाग्यवती'° श्रीजसमाम्बिकाहुदयनंदनेन सकलसीमन्तिनी- शिरोमणिनिकुम्भराजन्यवंशावतंसमहाराज्ञीश्रीकर्मवतीश्रीलघुमादेवीहृदयाधिनाथेन घिराजधीकालसेनेन विरचिते संगीतराजे षोडशसाहस्यां सङ्गीतमीमांसायां'' पाठ्यरत्नकोशे अनुक्रमरिणकोल्लासे अनुक्रमणिका नाम चतुर्थ परीक्षणम् । उल्लासस्य (श्च)प्रथमः समाप्तिमगात् ।। इति विततमतीनामभिमत'३.सिद्धिरस्तुं ।। , राजा- कामाक्षा। १. B. पुरपराजित० । २. B. संगमनीर। ३. B. में 'परितोषितशाकम्भरी' नहीं है। ४. B. 'परिचारिताजनाद्रि'; . K. में उपरिमुद्रित पाठ ही है । ५. B. धषिता। ६. K.' ७. B. पराजिति सुमेरुणा । म. B. दुगर्गेण । ६. K. में 'श्री' और है। १०. K. में 'जसमाम्बिका' से पूर्व 'श्री' नहीं है। ११. A. संगीतमिमांसायां। समाप्ति समगाविति । १३. B. में 'मत' नहीं है । १२. B.
२. पदोल्लास - पदनाम प्रथम परीक्षण -- अध्यासिताया निजपूर्वपुंभिः पदं सरीसत्ति न यः कदाचित् । विशुद्धमत्याः सरणेः स राजा पदं चरीकत्ति विचारवत्ति' ॥ १ ॥ पाठय तु द्विविधं ज्ञेयं संस्कृ[११ तं प्राकृतं* तथा । यथावेदं* तयोरङ्गान्याख्यामः पाठयसिद्धये ॥ २ ॥ नामाख्यातोपसर्गाश्च निपातास्तद्धिताः कृतः । समासाश्च स्वराश्चैव सन्धयोऽथ विभक्तयः ॥ ३ ॥ व्यञ्जनान्यङ्गकैरेतैर्नानाधातूंपबृहितम् । प्रयोगाह प्रविज्ञेयं संस्कृतं पाठ्यमित्यदः ॥ ४ ॥ नादादिहेतुको यः स्यादक्षराणां* समुच्चया। आनुपूर्वी समुल्लेख:* स शब्दव्यपदेशभाक् ॥ ५ ॥ साध्यसाधनसंयोगसामानाधिकरण्यकाः* पदार्थप्रतिपत्तिश्च विधिः पञ्चविधः स्मृतः ॥ ६ ॥ अधिष्ठानं स्वभावश्च गुणाः कार्यान्वयस्तथा । तादात्म्यं* चेति शब्दस्य तद्गुणा: पञ्च कीर्तिताः ॥ ७ ॥ तस्य सप्तविधं प्राहुरधिष्ठानं पुरातनाः । मुख्यतादिस्वभावोऽस्य साध्यादिश्च गुणो मतः' ।। ८ ।। स सिद्धसाध्यसंबन्धः कार्यान्वयं इतीरितः । शब्दस्यार्थस्वभावो यस्तादात्म्यं तत् प्रकीर्तितम् ॥ ६ ॥ प्रतिस्थित पाठ- २.*प्राकृतं प्राकृतं । यथा वेद । ५. *स्यावक्षराण्या समुच्चय । *समुल्लेक्षः। ६. *समानाधिकरण्यकाः । ७. *कार्यान्यास्तथा। *तदात्म्यं । 1. P. K. विशुद्धिमत्याः । B. विशुद्धिमत्या । 2. P. विचारवत्ति(ती)। 3-3. P. यथावदनयोः। 4. B. स विज्ञेयं । 5-5. P. तद्गुणाः पञ्च कीतिताः। 6-6. P. विधि: पन्चविषः स्मृतः। 7. B. गुणोसमः; परन्तु 'त' और 'म' पर क्रमशः २ पोर १ अंक हैं। 8. P. प्रसिटसाध्यसंबन्धः ।
२२ ] सङ्गीतराज [२. पदोल्लास प्रकृतिप्रत्ययासत्तौ पदमर्थोपलम्भने । तत्राभिधत्ते यो मुख्यमर्थ* मुख्यः स उच्यते ॥ १० ॥ तथा लाक्षणिको 'लक्ष्माश्रित* इत्यभिधी[११B]यते । व्यङ ग्ययुक्तो व्यञ्जक:* स्यादेषां व्यापृतिरुच्यते ।। ११ ।। अभिधा लक्षणा चाथ व्यञ्जाना]क्रमतो मता' ।. रूढियौगिक मिश्राख्यास्ते* शब्दास्त्रिविधाः स्मृताः ।। १२ ।। प्रकृतिप्रत्ययद्वारा न ते वै रूढिमाश्रिताः' मण्डपाखण्डलाद्यास्तु तत्तवृत्तिमुपाश्रिताः ॥ १३ ।। गुणेन क्रियया वापि सम्बन्धेन च यो भवेत् । परस्परार्थानुगमः सम्बन्ध' इति [कीर्त्यते ॥ १४ ॥ गुणतो नीलकण्ठाद्याः संख्यातः षण्मुखादयः । क्रियातः स्रष्ट्रप्रमुखाः* संबन्धाद्भभु]गादयः ॥ १५ ॥ मत्वर्था* अपि संबन्धे कपालिप्रमुखास्ततः । जन्यात कृत्सूतिधान्याद्या विश्वकृत्प्रमुखास्ततः ।। १६ ।। जनकाद्योनिमुख्या स्युरात्मयोनिमुखास्तत:10 अपत्यप्रत्ययायेभ्य आदितेयादिकान् जगुः ॥ १७ ।। धार्यधारकसंबन्धे वृषध्वजपिनाकिनः । भोज्यभोजकसंबन्धेऽमृतभुक्तावतादयः ॥ १८ ॥ 12पत्युः कान्ताः प्रियातुल्या:12 शिवकान्तादिकास्ततः । पत्न्याः प्राणेश्वरमुखा गौरीप्राणेश्वरस्ततः ।। १६ ॥ प्रतिस्थित पाठ- १०. *मुख्यमर्थ । ११. *लक्ष्म्याश्रित; *व्यञ्जक। १२. *रूढ़ियो- गिकमित्स्याख्याते । १३. *श्रिता । १५. *सृष्टप्रमुखा। १६. *मन्वर्या । 1.I. P. मुख्याश्रितमयं ब्रवीति यः; BO. लक्ष्याश्रितमित्यभिधीयते। 2. B. व्यंग- युक्तो। 3-3. K. व्यञ्जनाः क्रमत: समीरिताः। 4. P. रूढयोगिक । 5-5. P नत्वर्था रूढिमाश्रिता: K. नन्वर्था०: BO. न ते वै रूढिमाश्रिताः । 6-6 P. K. न व्युत्पत्तिमुपा- 7. P. स योग। 8. P. ख (ष) ण्मुखादयः । 9. P. भुजगावयः। मुखात्ततः। II. P. ०ऽमृतभुक् तव्रतादयः; B. • भुक्तवतादयः । 12-12..P. पत्युः कान्ता(:) प्रिया(स्)तुल्याः । श्रिताः। Io. B.
[ २३ पद नाम प्रथम परीक्षण] पाठ्यरत्नकोश - सख्युः सखिप्रभृतयस्तत: शि[१२] वसखादयः । वृषवाहनमुख्याः स्युर्वाह्यवाहकभावतः ॥ २० ॥ ज्ञाते:* 'स्वसूदुहित्राहिमवदुहितृप्रथाः । आश्रयाश्रयिभावेन दिवौक:प्रमुखा अपि ।। २१ ।। स्युर्वध्यवधकत्वेन पुरजिन्मरजिन्मुखाः । पतिधार्यत्वे वाह्यत्वसंबन्धो हि विवक्षया ॥ २२ ।। रुद्रे वृषात्तदेकस्मात् पतिलाञ्छनवाहनाः । स्याद् व्यक्तिवाचको *जातिशब्दोऽपि व्यक्तिचिह्नित: ।। २३ ।। दक्षिणा दिग्यथागस्ति निवासत्वेन कीर्त्यते । त्रिपञ्चादिपदे योज्यौ शब्दो' हि विषमायुजी ।। २४ ।। तेन त्रिनेत्रो विषमनेत्रोऽयुङनेत्र इत्यपि । गुणो विरोधिनं वक्तीतरान्तो* नत्रपूर्वकः ॥ २५ ॥ सितेतरोऽसितस्तस्मात् कृष्णोऽथो व्यपदिश्यते । जलादिषु प्राक्पदेषु पर्यायपरिवर्तनम् ।। २६ ।। जलदस्तोयदस्तस्माज्जलधिरधिस्तथा। 'जनिरुट प्रभृतिष्वस्त्युत्तरेषु परिवर्तनम् ।। २७ ।। सरोरुहं सरोजं च तत:12 स्यादेवमादिकम् । सुरपत्यादिषु प्राय उभयोः परिवर्तनम् ॥ २८ ॥ ततः सुरपतिर्देवराजः स्यात्रिदशेश्वरः । इत्याद्या यौ[१२B]गिकाः शब्दाः परिवृत्त्यसहाश्च ये 4 ।। २६ ।। २३. वक्ति वाचको। प्रतिस्थित पाठ-२१. *ज्ञाते । २२. *पुरुजिन् पुरुजिन् मुखाः । २४. *कीर्तते । २५. *वक्तीतरान्तो। 3.P. I. P. ज्ञात (ति); BO. ज्ञातेः। B. ज्ञातस्वमृ० । 2. P. ०वधकत्वे तु। पतिधार्यत्ववाह्यत्वसंबन्धो। 4. P. व्यक्तचिह्नतः। 5. P. ०यांगस्ति (स्त्य); K. पथा- गस्त्य० । 6-6. P. त्रिपञ्चादिपदे (5) थाज्यो (स्थाप्यो) । K. त्रिपञ्चादिपवस्थाने । 7. B. शब्दो। 8. P. ०ऽप्ययुङ नेत्र । K. का पाठ प्रति के समान है। 9. P. नम्पूर्वकः । K. नन् न पूर्वकः । 10. K. कृष्णोऽतो। II-II. P. जनिरुधप्रभृतिषु तूत्तरेषु ।। A. जनि- ध्रप्रभृतिष्वस्त्युत्तरेषु B. जनिरुघ्रप्रभृतिषु स्यूत्तरेषु । P. का पाठ K सम्मत है। 12. B. तत् । 13. P. सुरपल्यादिषु । 14. K. सहाश्रयः।
२४ ] सङ्गीतराज [२. पदोल्लास गीर्वाणप्रमुखाः शब्दास्ते मिश्राः परिकीर्तिताः । एतेषां कविरूढचव ज्ञेयोदाहरणावलिः ॥ ३० ॥ तथा हि समयं प्राहुः कवीनामिह तद्विदः । जात्यादिनियमापेक्षमर्थं बध्नति कुत्रचित् ।। ३१ ॥ असंतमपि* बध्नति न सन्तमपि कुत्रचित् । दिङ्मात्रमेतदत्रोक्तं नाम्नामन्यान्यपि स्वयम् ।। कुम्भकर्णोपदेशेन तर्कयेदनया* दिशा ॥ ३२ ।। यद्यशः पदमाधातुं त्रिलोक्या गोः पदं व्यधात् । अपि विष्णुपदं नाम पदं राजा स्थिरीकृतम् ।। ३३ ।। इति श्रीराजाधिराज० पदोल्लासे पदपरीक्षणं प्रथमम् ॥ छ ।। • . प्रतिस्थित पाठ- ३१. *प्रतिमपि । ३२. *तयादनया। 1. P. पेक्ष्यमय। K. का पाठ प्रति के समान है। 2. A. B. नाम्नामन्यापि; 3. P. कालसेनोपदेशेन । K. कालदेशोप० । 4. A. B. स्ययात् । 5. P. तेन । 6-6. P. इति धीराजाधिराजश्रीकालसेनविरचिते संगीतराजे षोडशमाहस्यां सङ्गीतमीमांसायां पाठपरत्नकोदो पदोस्लासे परपरीक्षणं प्रथम समाप्तम् ।।
वाक्य नाम द्वितीय परीक्षण अतीतो वाक्यमार्ग यो वेदमार्गण मृग्यते । वागवाक्यादिरूपेण 1 ततवाक्यं भजे शिवम् ।। १ ।। यतः पूर्व पदार्थोऽयं वाक्यार्थे पर्यवस्यति । ततस्तेषां समूहोऽत्र वाक्यं वाक्यविदोच्यते ॥ २ ॥ पदव्यवहतिर्वाक्ये पदबन्धाङ्गतो* मता। द्विविधं तत्पदं ज्ञेयं निबद्धं चूर्णमेव च ॥ ३ ॥ तत्र चूर्णपदस्यादी लक्षणं संगृणाम्यहम् । अनिबद्धपदं छन्दोहीनं* चा{१३नियताक्षरम् ।। ४ ।। अर्थापेक्षाक्षरोपेतं ज्ञेयं चूर्णपदं बुधः । यतिच्छन्दः समायुक्तं तथा च' नियताक्षरम् ।। ५ ॥ पादश्चतुर्भिनियतं निबद्धं पदमीरितम् । एवं नानार्थसंयुक्तः पदैवर्णविभूषितः ।। पदबन्धाः प्रकर्तव्याः प्रथालक्षणलक्षिताः ॥ ६ ॥ प्राद्येष्वष्टसु देवता निगदिता वर्गेषु सोमः कुजो शेज्यों* शुक्रशनी रविस्तम इति स्यात्तत्फलं च क्रमात् । आयुर्वाच्यपदं धनं सुभगता कीर्तिश्च मान्द्यस्मृतिः शून्यत्वं मुखतस्तदक्षरवशाद् वर्ण्यस्य गीतादिषु ।। ७ ।। एवं मित्रावरुणसदनादुच्चरत्प्राणशक्त्या- संगप्रोद्यत्पवनहतितत्स्थानजीर्णोत्करेण*10 । आरब्धतत्पदघटनया11 कारणं गीतकादे- लॊके सर्वव्यवहृतिपदं वाक्यमत्र न्यरूपि ॥ ८ ॥ प्रतिस्थित पाठ- १. *वाकवाक्याविरूपेण । ४. *छेदोहीनं। ७. *ज्ञेज्यो। ८. *जाणोत्करेण I. P. K. बाक्यवाच्यादिरूपेण । B. वाक वाक्यादिरूपेण । 2. P. K. तमवाक्यं । 3. P. BO. सर्वः ।, 4. P. पदबन्धागता । B. पदबंधागतो। .5-5. B. अनिबद्धपद ज्ञेयं छन्दोहीनं चानियताक्षरम् । 6. P. यतिछ (च्छ)न्द(:)। 7. K. तथाऽत्र । यथा लक्षणलक्षितः(ता.)। 9. P. वर्णस्य। 10. A. जारिकरण । II. P. प्रारब्धे तत्पदघटनया; B. घट्टनया । 12. P. वाक्यमन्यन्न्यरूपि। K. वाक्यमन्यन्न रूपि। A. B. वाक्यमन्यन रूपि। 8. P.
२६] सङ्गीतराज [ २. पदोल्लास . प्राकृतं चापि विज्ञेयं संस्कृतस्य विपर्ययात् । तद्भवं तत्समं देशोत्येवं त्रैविध्यमस्य तु ॥ ६ ॥ स्वरवर्णान्यतां वापि न्यूनतां वापि ये पदे । न्यस्ता गच्छन्ति* संयुक्तास्तद्भवास्ते* प्रकीत्तिताः ॥ १० ॥ तरङ्गलोलसलिलकमलामललक्षणाः । तुल्या[१३]तिघरा ये तु संस्कृते ते च तत्समाः ।। ११ ॥ महाराप्तादिदेशानां भापामाश्रित्य वर्तते । यत्तद्देशीति' विज्ञेयं सुज्ञेयमिह तद्विदाम् ।। १२ ।। भापा चित्रप्रवन्धेपु गाथादावुपयुज्यते । यद्यप्येतत्तधाप्यत्र* नास्माभिरिह तन्यते ।। १३ ।। यद्वाक्यं राजवृन्देन शिरसा विष्णुमाल्यवत् । शिरसा धार्यते तिन कुम्भेनान निरूपितम् ॥ १४ ॥ इति श्रीराजाधिराज श्रीकुम्मकाणं० वाक्यपरीक्षारणं नाम द्वितीयं समाप्तम् ।। R e-harAK AurationwinANA mantrvm. IA-04-1-mm-mantrik arfiers.- १. गरि ! रागांस। १. *हमलाम मसाला:। १२. *4tr. 11. *रताना .. ! . refrika ...marat... P. पाय सान सेन t: TER ...rftifuोमाधिभिती गीtamat HERE Main EnRST संज्ञा नाम तृतीय परीक्षण व्याकृते जगतां येन नामरूपे नमाम्यहम् । समरूपमनामानं शङ्करं लोकशङ्करम् ।। १ ।। गीतं वाद्यं तथा नृत्यं त्रयं सङ्गीतसंज्ञितम् । तदि]द्विधा भिद्यते. मार्गदेशीभेदेन तत्त्वतः ।। २ ॥ मागित्वाद्विरञ्चेन' प्रयुक्तत्त्वात्तथर्षिणा । "महोदयनिमित्तत्त्वानियतो मार्ग उच्यते ॥ ३ ॥ तदेव रुचिवैचित्र्याच्चित्तरञ्जनकृज्जनः । प्रयुक्तं स्वस्वदेशे यत्ततो देशीति कीर्तितम् ॥ ४ ॥ छादनादपयत्यादेरुक्ताधं छन्द ईरितम् ॥ ५ ॥ उपमाद्या अलङ्काराः पाठ्यालङ्कृतिहेतवः । श्रवणाच्छ तयस्ताश्च तीवाद्याः स्वर[१४AJहेतवः ।। ६ ।। स्वरयन्ति मनांसीहं श्रोतृ णां स्वार्थतो यतः षड्जादिका:* स्वरास्तेन ते च साधक्षराभिधाः ।। यथा गोत्रकुलाचारोत्पन्नं पुन्नामसंमतम् ।। ७ ।। तथा ज्ञेया रसानां च स्वराणामभिधा इमाः । श्रुत्युत्कर्षापकों हि विकृतिः प्रकृतिर्मती11 ॥ ८ ॥12 व्यवस्थितश्रुतियुता यत्र संवादिन:*13 स्वराः । मूर्च्छनाद्याश्रयो.नाम स ग्राम इति संज्ञितः ॥ ६ ॥ 8 प्रतिस्थित पाठ-७. *खनादिका । म. *श्रुत्युत्कर्षापकर्षे । ६.*संवासिनः । 1. B. तमरूपनामानं । 2. A. गीतवाद्य। 3. P. संगीतमुच्यते । 4. P. विरिञ्चेन । 5. P. प्रयुक्तत्त्वात्तपा(थ)षिणा। 6-6. P. महोदयनिमित्तत्वाद् विख्यातो मार्ग उ(ए)ते; B. निमित्तत्वाद्विषयतो। 7. B. इरितम् । 8-8. P. में यह पंक्ति मागे ८वें पद्य का उत्तरार्ध है। 9. P. चे त (ते च)। 10. P. स्वरानामभिधा। II. P. प्रकृतिमतौ(ता)। 12. P. ८ वा श्लोक इस प्रकार है- विभूषयन्ति च रसं केयूरादिबदङ्गिनाम् (नम्)। ... श्रवणाच्छ तयस्ताश्च तीवाद्याः स्वरहेतवः ॥८॥ 13. P. संवासि(दि)नः । .. ।
२८ ] सङ्गीतराज [२. पदोल्लास . आरोहेणावरोहेण क्रमेण स्वरसप्तकम् ।.... रागादेमूर्च्छनादत्र' मूर्च्छना परिकीर्तिता ॥ १० ॥ ता एव शुद्धतानाः स्युः षाडवोडविकाः स्मृताः । पूर्णापूर्णविभेदेन द्विधा या मूर्च्छना स्मृता' ।। ११ ।। ता एव कूटतानाः स्युव्युत्क्रमोच्चरिताः स्वराः । प्रस्तारे पूर्वरूपाणि तेषां मूलक्रमाः स्मृता ॥ १२ ॥ साधारणीकृताशेषभूभुजा कुम्भभूभुजा । साधारण्यात् स्वरजात्योः साधारणमिहोदितम् ।। १३ ।। स्थाय्यादिभिश्चतुर्दासो वर्णो गानक्रियामतः । एक एव स्वरो यस्तु स्थित्वा स्थित्वा पुनः पुनः ।। १४ ॥ प्रयुज्यते स तु स्थायी परावन्वर्थनामको । आरो[१४B]ही वाऽवरोही' च संचारी तद्वियोगजः ॥ १५ ॥ प्रतिपक्षक्षमापालभालालङ्काररूपिणा ।' विशिष्टो वर्णसङ्घातोऽत्रालङ्कार उदीरितः ॥ १६ ॥ अतारविश्रम स्वांशापन्यासन्यास]भूषणात् । क्रियते कुम्भभूपेन शुद्धजातिपरिग्रहः ।। १७ ।। स्वनामस्वरविश्रामविशिष्टत्वेन तद्वहिः । '. शुद्धलक्ष्मविनाभूता विकृताः किं नसम्मताः ॥ १८ ॥ गीतमुद्ग्राह्यते येन स स्वरो ग्रह उच्यते । प्रयोगे बहुलोंशः स्यान्न्यासो गीतिसमाप्तिवत् ॥ १६ ॥ विदारी गीतखण्ड:* स्यादपन्यासस्तदन्तकृत् । विन्यासः स विदार्यशपदप्रान्ते स्थितस्तु यः ।। २० ॥ . । प्रतिस्थित पाठ- ११. *स्मताः। १२. *कूटताना । २०. खंड। I. A. रागादेमूर्च्छनावत्र; B. रागादेमू छनादत्र । 2. P. षाडवोडुषितीकृताः । 3-3. P. स्युव्युत्क्रमोच्चारितस्वराः। 4. P. तामराजिना। 5. B. स्थायादिभिश्चतुर्धासौ । 6. P. चावरोही । 7. P. भाल(ला)लंकाररूपिणा । 8. P. उरीकृतः। 9. B. प्रतारविःश्रम। 10. P. कालसेनेन। II. A. किन P. किं न (तु); कि च' भी संभव पाठ है। 12. B. विदायंस।
संज्ञा नाम तृतीय परीक्षण ] पाठयरस्नकोश [ २६ 3 - अंशाविवादी 'सन्यासः कुम्भस्वामिगणोदितः ।। २१ ।। यस्मात्तारस्य' मंद्रस्य च मतिरनुवादी च' संवादिसंज्ञ. त्यस्यान्य: स्याद्विवादी स्वर* इह जनयेद्यश्च गेयेऽत्र रक्तिम् । न्यासापन्याससन्यासकविधिकलसन्यासवर्गे ग्रहत्त्वं प्राप्तोंशो योग्यतातो भवति च बहुलो यो विदार्यां स वादी ।। २२ ।। रा[जा] सः स्याद्विवादी रिपुरि[व] विवदन् मुख्यमंत्रीव त[१५BJस्मिन् संवादी संवदन योऽनुवदति खलु तं सोऽनुवादी स्वरोऽस्मिन् । अंशत्वं व्यापकत्वे* सति पुनरुदितं गेयकर्मण्यमुष्य" क्षोणीसुश्रोणिभर्ती' तदनु च बहुशो' गानतानप्रयोगे ॥ २३ ॥ षाडवं* षट्स्वरं प्रोक्तं तत्पञ्चस्वरमौडवम्* 110 11पुनरावृत्तिरभ्यासात् परामर्शोऽत्र लङ्घनम् ॥ २४ ।। अलङ्घनं तथाभ्यासो बहुत्त्वे लक्ष्म चक्षते । वादिसंवाद्यनपरंपर्यायं12 तु तदिष्यते । अलभ्यविषयोऽल्पत्वबहुत्त्वस्य विपर्ययात् ॥ २५ ॥ हित्वा न्यासादेः स्थिति यः स्वराणां मध्ये 1 मध्येऽल्पत्वमाहुश्च केचित् । सङ्गोऽशाद्यैः कोऽपि वैचित्र्यहेतु: प्रोक्तो मार्गः सोऽन्तराख्यः स्वरज्ञः ।। २६ ।। अल्पप्रयोगः सर्वत्र काकली चान्तरस्वनः15 ॥ २७ ॥* प्रतिस्थित पाठ-२२. *स्याद्विवादीश्वर । २३. *त। *त्यापकत्वे । २४. *षांडवं; *०मोड। २८.*इस प्रर्खाली पर २६ के बाद सीधा २८ पद्यांक दिया है। I-I. P. संन्यासो वनदेवगणोदितः। 2-2. P. K. गतिरनुवादी च | A. B. मंद्रस्याव- गतीरनवादी च । 3. P. K. संवादिसंज्ञो। 4. P. यस्यान्यः A. यः स्यान्यः; B. में 'य:' के बाद दो तीन अक्षरों का स्थान रिक्त है फिर 'स्याद्विवादी' है; K. यः स्याद्वादी विवादी। 5: A. B. यो नन वदति । 6. B. शक्तिम् । 7. P. भी। 8. P. बहुलत्वं । 9. P. सुगानप्रयोगे। 10. P. मोड (ड)वम् । II-II. P. पुनरा- वृत्तिरभ्यास ईषत्स्पर्शोऽत्र । 12. P. वादिसंघाधनपरायं। 13. P. अनंशविषयो। 14-14. P. मध्येऽल्पवभाजां कदाचित् । IS. P. चान्तरः स्वरः ।
३० ]] : सङ्गीतराज [२. पदोल्लास 3 - . मन्द्रप्रसन्नो मृदुसज्ञकश्च लिपी भवेद्विन्दुशिराः स एव । तारस्तु दीप्तः परमूर्द्धरेखा' शिरालिपौ* त्रिर्वचनात् प्लुतः सः ।। २८ ।। स्यान्मूर्च्छनायाः प्रथमः स्वरोऽत्र मंद्रः स एव द्विगुणस्तु तारः । तत्पूर्वपूर्वो भवतीह मंद्र:* परोऽपरोऽन्यः स विभूषितश्च ।। २६ ॥ स्वरसाधारणमुदितं[१५B]मम येष्वंशेषु नियतमनुरूपम् । पञ्चमिकामध्यसिकाजात्योस्तु सषड्जमध्यमयोः ॥ ३० ॥ अल्पद्विश्रुतिकासु जातिषु तथा रागेषु भाषास्विदं तावंशी* यदि षड्जमध्यमिकया न स्यात् सहस्थास्नुकम*। एवं कैमुतिकेन निश्चितमिदं तस्यापि तत्राश्रयाः' प्रायः स्युविकृता इहैव भणितौ श्रीचित्रकूटेशितः ॥ ३१ ॥ सलयतालपदा स्वरराजिता विविधवर्णविभूषणभूषिता । गमकपेशलगानगुणाञ्चिता मुनिवरैरिह गीतिरुदाहृता ॥ ३२ ॥ विचित्रवर्णालङ्कारो विशेषो11 यो ध्वनेरिह । ग्रहादिस्वरसंदर्भो रञ्जको राग उच्यते ।। ३३ ।। तत्र ग्रामसमुद्भ तः पञ्चगीतिसमाश्रयात् । शुद्धादिभेदसंभिन्नो ग्रामराग इतीरितः ।। ३४ ।। -1 प्रतिस्थित पाठ- २८. *लपो। *प्लुता । २६. *मंद्राः। ३१. *अथ द्विजातिस्वर- जातिषु, *तोवंशौ। *सहस्थाणुकम् । ३३. *ध्वनरिह । I. P. परमूर्ध()रेखा। 2. P. प्लुत सः । 3. P. में पद्य संख्या यहां २८ है जो सही है। प्रति में एक संख्या आगे चल रही है। 4-4. P. परः परोऽभ्य: स विभूषणेषु । 5. P. समपेवंशेषु । 6. P. कौतुकिनात्र (कैमुतिकेन)। A. कौमुतिकेन । K. कौतुकिना। 7. P. तत्रापि तस्याश्रयाः । 8. B. स्युर्वीकृता । 9. P. श्रीब्रह्मशैलेशितुः। Io.B. गानपुणांचिता। II. P. विशेषे (षो) । : 12-12 P. ग्रामसमुद्भ तपञ्चगीतिसमाश्रयात् ।
संज्ञा नाम तृतीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ३१ तदुद्भवश्चोपरागो रागो रञ्जनकृत्तमः । भाष्यते येन तच्छाया' स भाषाराग उच्यते ॥ ३५ ॥ तां मिश्रित्य* प्रवृत्ता या विभाषा भाषिताऽत्र सा। भाषाविभाषयोरन्तरुत्पन्नान्तरभाषिका ।। ३६ ॥ भाषाद्या गीतयस्तिस्रों या[१६AJष्टिकेनोररीकृताः । तत्र भाषा समाख्याता मुख्यानन्योपजीविनी ।। ३७ ।। स्वरनाम्ना स्वराख्या तु देशाख्या* देशनामतः । अभ्यिस्तिसृभ्यो* जायन्ते यास्ताः स्युरुपरागजाः ॥ ३८ ॥ स्वजात्युद्योतकत्त्वे येऽनुवर्तन्ते तु तामिह । अन्यजातिविरूपा ये ते शुद्धा राजसम्मताः ॥ ३६ ।। श्रुतिभिश्च स्वरैश्चैव शुद्धत्त्वेन च जातिभिः । चतुर्भिभिद्यते यस्तु स भिन्न इति कीर्त्यते ॥ ४० ॥ रागाङ्गत्वं ग्रामरागच्छायामात्रोपजीवनात् । भाषाणामाश्रिता छाया वैस्तदङ्गानि तानि च ॥ ४१ ॥ क्रियाङ्गानि च कथ्यन्ते दीपिकांदिक्रियायुजे । श्रोतृचित्तोत्साहकमुखयोगाच्च कोविदः* ॥ ४२ ॥ अङ्गाश्रयसमुत्पन्नान्युपाङ्गानि च मेनिरे । देशीरागत्त्वमप्यस्य 'रागाङ्गादेरुदीरितम् ॥ ४३ ।। पदं वागभिधेयं स्यात् सा मातुरभिधीयते । गेयं धातुस्तयो[:]कर्लोच्यते* वाग्गेयकारकः ॥ ४४ ।। गान्धर्वो 11 मार्गदेशीवित् स्वरादेर्गिकोविदः । गान्धर्व तत्र विज्ञयं स्वरतालपदात्मकम् ॥ ४५ ॥ प्रतिस्थित पाठ ३६. *तामिश्रित्य । ३८. *देशाख्यो * अभ्यस्तिसृभ्यो। ३६. *नामिह । ४२, *कोविदे। ४३. *देशीयराग। ४४. *घातुस्तयोऽकर्लोच्यते । ४५. *गंधर्वो। . I. P. भाव्यते । 2. P. तछा (च्छा)या। 3- P. भाषा (षा)राग। 4. P. तामा- धित्य । 5. P. याष्टिकेयो(नो). । 6. K. भियन्ते । 7. P. राज (ग)सत्तमाः (राजसम्मताः) 8. P. दीपकादिक्रियायुजः। 9. P. ०करणयोगाच्च । I0. P.दाग- भिधेया। II. B. गंधर्व । 12. P. स्वरादिर्गिकोविदः । .
३२ ] ३ सङ्गीतराज [२. पदोल्लास पुरा प्रणष्टां देवेभ्यो वाचं गोरूपधारिणीम् ।। [१६B] अधारयदिति प्रोक्तं गान्धर्वमिह सूरिभिः ॥ ४६ ।। अत्यर्थमिष्टं देवानामत एव प्रकीर्तितम् । वंशवीणाशरीरेभ्यः प्रभवस्तस्य सम्मतः ।। ४७ ।। तथा चोक्तं-- पदस्थस्वरसङ्घातस्तालेन' सुमितस्तथा । प्रयुक्तश्चावधानेन गान्धर्वमभिधीयते ।। ४८ ।। "पुनर्गीति पुनर्वाचं गेयं योज्यं पुनः पुनः । अलात चक्र प्रतिमरसभावविभावकम् ॥ ४६ ॥ श्रोतुश्चित्तस्य सुखदो गमकः स्वरकम्पनम् । स च वाग इति स्थायो" रागस्यावयवः स्मृतः ।। ५० ।। यत्नतोऽतिशयारोपो रागस्य भजनं मतम् । गमकस्थायवर्णाद्या नानालङ्कृत्यलङ्कृताः ॥ ५१ ॥ रागाल (1)पनमालप्तिर्भूरिभङ्गिमनोहरा । प्रयोगाद्वा* तथालापसंज्ञा साक्षरवज्जिता ॥ ५२ ।। अनिबद्धं च तामाहुर्गीतं गोतविशारदा: गातृ णां वादकानां[च] समूहो वृन्दमुच्यते ।। ५३ ।। रागोऽभिधीयते गीतं दशलक्षणलक्षितः। लक्षणानि च तत्रांशन्यासौ षाडवमोडवम्' ।। ५४ ।। अल्पत्वं च बहुत्वं च ग्रहोपन्याससंयुतः । मन्द्रताररता चापीत्येवं ज्ञयानि सूरिभिः ॥ ५५ ।। प्रबं[१७A ]धो रूपकं वस्तुनिबद्धं गीतमुच्यते । निबद्धावयवो धातुर्धराधीशस्य' सम्मतः ॥ ५६ ।। -- प्रतिस्थित पाठ-४६. प्रायातचक्रप्रतिमः । ५३. *प्रयोगाह्वा। I-I. P. पदस्थ (:)स्वरसंघात(स्)तालेन । P. पुनर्गीतं पुनर्वाद्यमेवं; B. पुनर्वा- द्यमेव । 3-3. P. अलातचक्रप्रतिमं रसभावविभावकम् । 4. P. स्थायी। 5. P. यत्ततो। 6. P. ०कृता । 7. P. षाडवमोडुवम् । 8. P. मंद्रता तारता । 9. P. धातुघ(घ)- राधीशस्य ।
पाठयरतकोश संज्ञा नाम तृतीय परीक्षण ] [३३ ० ० ० ० ० कलाकालप्रमाणेन ताल इत्यभिधीयते । अर्द्धमात्रा द्वे च तिस्रो द्रुतो लघुगुरुप्लुताः ।। ५७ ॥ क्रमात्तेषां चतुर्णा स्युः संज्ञा दलगपा" इति । *० ० ० ००० [द्रुते स्याद्देवता शम्भुहिमवद्दुहिता लघौ । शिवी गुरुणि संप्रोक्तौ प्लुते ब्रह्मादयस्त्रयः ।। ५८ ||]* *द्रुते व्यञ्जनं व्योम विद्वर्धमात्रं लघौ व्यापकं ह्रस्वमृज्वेकमात्रम् । गुरौ वक्रदीघों कला च द्विमानं प्लुते सामजन्यङ्गदीप्तत्रिमात्रा* ॥ ५६ ।। द्रुतलघ्वादिरूपाढ्य 'क्रियामानोपलक्षितः । गीतादिकं परिच्छिन्दन् कालस्ताल इतीरितः ।। ६० ।। पञ्चलघ्वक्षरोच्चारमिता मात्रा कलाऽत्र सा' । मार्गभिन्नलयोपेता छोटिका चात्र मागिता ॥ ६१ ॥ ततः कलाकालकृतो लयः सलयमीरितः । तत्प्रवृत्तनियमनं यतिर्यतिभिरीरिता ।। ६२ ।। ततं वीणादि सुषिरं वंशादि मुरजादि च । आनद्धं* च' घनं कांस्यतालादिपरिकीर्तितम् ॥ ६३ ॥ वाद्यवर्णसमूहस्तु पाट: पटुधियां मतः । वाद्यमात्रोच्यते तत्तत् पाणियोगेन वादनम् ।। ६४ ।। रूपादिकं तत्करणं वाद्यप्रकरणें मतम् । [१७B] स्वरास्ते धातवः प्रोक्ता ये प्रहारविशेषजाः ।। ६५ ।। गुणप्रधानभावेन याऽसौ व्यवहृतिर्मता । • वृत्तिनिगद्यते साद्या वाद्यविद्याविशारदः ।। ६६ ।। प्रतिस्थित पाठ-५८. *-*विन्दुओं द्वारा स्थान रिक्त छोड़ा गया है; कोष्ठान्तर्गत पच नहीं, ५६. *यहां 'ए' अक्षर मोर लिखा है। *विबर्धमात्र । *मात्राः। ६०. *रूपाद्य० । ६२. *०मीरितिः ।। ६३. *शुखिरं । *अनद्धं । .. I. P. अर्ध (घ)। 2. P. दलपगा(गपा)। 3. A. दीर्घो। . 4. A. B. परिछिदन । 5 P. कला च सा। 6. P. सुखि(षि)रं । 7. P. अवनद्धं । 8. P. कांस्यं तालादिक ।
३४ ] सङ्गीतराज [२. पदोल्लास गीतानुगं त्रिःप्रकारं 'वाद्यं ततादिकं* मतम् । विन्यासाः पाटवर्णानां वाद्यानि मुरजादिषु ।। ६७ ।। स्कन्धादिकम्पः सञ्चः स्यात् कोणः कुरणप' इत्यपि । वीणादिवादनो दण्डः प्रवीणरुपवर्ण्यते ॥ ६८ ॥ उद्ग्राहा विविधा वाद्यप्रबन्धाः पाटवर्णजाः । विभावयन् विचित्रार्थनङ्गाद्यैर्यः प्रयोगतः ।। ६६ ।। रसाविर्भावको द्रष्टुर्नृत्यार्थाभिनयस्तु सः । स चतुर्द्धा बुधै यस्तत्राङ्गैर्दशितो मतः ।। ७० ॥ आङ्गिको वाचिकश्चैव नाटकादिषु तत्त्वतः । तान् वा विरच्यते यस्तु विज्ञ यः सात्त्विकः पुनः ।। ७१ ।। विभावितस्तु यो भावः सात्त्विकर्भावकैन हि । आहार्यः स तु विजयः किरीटादिविभूषणैः ।। ७२ ।। शोभामाहृत्य जनितो नटेऽनुकृतितस्ततः । तत्राङ्गोऽभिनयस्यैतत् त्रयं मुख्यं प्रकीर्तितम् ।। ७३ ।। शाखा चैवाकुरश्चैव नृत्तं चेति समासतः । व्यापा[१८A]राः करयोर्येऽत्र विचित्रार्थावबोधकाः ॥ ७४ ।। ते स्मृता वर्तनास्तज्ज्ञस्ताः शाखाः परिकीर्तिताः । भूतवाक्यार्थविषयमुपजीव्य प्रवर्तितः ।। ७५ ॥ : चित्तवृत्त्यर्पकोऽङ्गानां' व्यापाराकुर ईरित: । स एव सूचीसंज्ञ:11 स्याद्भाविवाक्योपजीवकः ॥ ७६ ।। अङ्गहारविनिष्पन्नं नृत्तं तु करणाश्रयम् । एतच्चतुर्दाभिनयेनोपेतं नाटयमुच्यते ।। ७७ ।। प्रतिस्थित पाठ-६७. *तत्त्वादिकं । I-I. P. मतं वाद्य ततादिकम् । 2. P. कुल (त ?) 3. P. द्रष्टुनटेऽर्थोभिन- यस्तु सः । 4. P. याचा। 5. P. सात्त्विकर्भावकेन हि ।; BO. में भी यहां पाठान्तर नहीं है। 6. P. नटेऽनुकृतितः सतः । 7. P. तत्राङ्गाभिनयस्येतत् । 8. P: करयोर्यत्र। 9. P. चित्तवृत्यर्थकोऽङ्गानां । 10. P. व्यापारोऽङ कुर इ(ई)रितः । II. P. सूचासंज्ञः ।
- पाठ्यरत्नकोश संज्ञा नाम तृतीय परीक्षण [ ३५ नृत्यं तत्राङ्गिकैरेवाभिनयव्यंजकं तु यत् । भावानां मार्गशब्देन तदेवात्रोपवर्णितम् ।। ७८ ।। [" नाट्यादित्रितयं ह्येतत् द्विविधं परिकीर्तितम् ।। ७६ ।। लास्यताण्डवभेदेन तत्र लास्यं तदुच्यते । ललनाललिताङ्गर्यत् साधितं कामवर्द्धनम् ॥ ८० ।। प्रासारितादिभिर्गीतैरुद्धतप्रायद्धितः*3. । करणरङ्गहारश्च निवृत्तं विषमैरिह ।। ८१ ॥ ताण्डवं तण्डुना* प्रोक्तं नृत्तं नृत्तविदो विदुः । केचिद् भेदत्रयं चान्यन्* नृत्तस्याहुर्मनीषिणः ॥ २॥. विषमं विकटं लम्वित्यत्र तद्विषमं मतम् । यदभ्यासंवशाद्रज्जुभ्रमणादि प्रदृश्यते ॥ ८३ ॥ विकटं रूपवेषादो वरूप्येण* प्रवर्तितम् । १८B] . लघु: स्यात् करणैरल्परञ्चिता_विशेषितम् ।। ८४ ।। नन्वत्र नाटयशब्दोऽयं नर्तने वर्तते कथम् । यतोऽ[त्र] मुख्यया वृत्त्या रसाविर्भावकत्वतः ॥ ८५ ।। अभिधत्ते रसं नैतद्वृत्त्या लक्षणया कथम् । रसाभिव्यञ्जकत्वेनाभिनयादि चिकीर्षता ।। ६ ।। नर्त्तने नाट्यशब्दोऽयं वर्तते नात्र दूषणम् । अभिनेयपदार्थस्योल्लेखने प्रक्रिया पुनः ।। ८७ ॥ प्रतिस्थित पाठ-८१. *वतितः । ८२. *तडुना । ८४. *नरूप्येण । ८५. *वत्तंने। *चान्य -- I. P. तदेवात्रोपदर्शितम् । 2. P. में इस स्थान पर यह पद्य और है; BO. के पाठान्तरों में इस पद्य का उल्लेख नहीं है-प्रतः यह उसमें भी होगा- आङ्गिकोक्तेन विधिनाभिनय द्विना कृतम् । गात्रविक्षेपणं तद्धि' नृतमत्रोपणितम् ॥.७६ ।। 3. P. प्रायवर्द्धनः। 4. P. नृत्यस्याहुमनीषिणः। 5. P. लघुः। 6. B. रसाविर्भावकात्ततः। 7. P. स्वयम् । 8. P. चिकीर्षतः। १. B तद्धि।
३६ ] सङ्गीतराज [२. पदोल्लास कुत्रचिल्लोकधर्मीति नाटयधर्म्यपि* कुत्रचित् । तत्रादी लोकधास्तु लक्षणं प्रोच्यते मया ॥ ८८ ।। स्वभावाच्चेतसो वृत्तेरुपगन्त्री विवर्जिता। विकारेण विशुद्धा च लोकवार्ता क्रियायुता ।। ८६।। स्वभावाभिनयोपेता ह्यङ्गलीला* विना कृता । नानास्त्रीपुंश्रिता लोकधर्मी नाटयक्रिया स्मृता ॥ ६ ॥ न श्रूयते यत्र वाक्यं योग्य श्रवणकर्मणा । अनुक्तमपि वा यत्र श्रूयते कुतुकांदिव* ॥ ११ ॥ लोके यदप्रसिद्धं तु नाटये किञ्चित् प्रयुज्यते । मूर्तिमत् साभिलाषं च नाट्यलक्षणलक्षितम् ।। ६२ ॥ अतिवाक्यक्रियोपेतं स्वरालङ्कारसंयुतम् । लीलाङ्गहाराभिनयं रागाभिव्यक्तिकारणम् ।। ६३ ।। अश्वस्थपुरुषोपेतमतिसत्त्वविभावकम् । शैलयानविमानानि चर्मवर्मायुधध्वजाः ॥ १४ ॥ मूर्तिमन्तः प्र[१६]युज्यन्ते नृत्यते गम्यतेऽपि वा। ललितैरङ्गविन्यासैस्तथाक्षिप्तपदक्रमैः ।। ६५ ।। सुखदुःख क्रियारूपः स्वभावो यस्तु लोकगः । सोऽङ्गाभिनयसंयुक्तो* दिव्यमानुषरक्तिदः ॥ १६ ॥ ब्रह्मोक्तश्चेतिहासोऽयं नाटयधर्मीति कीर्तिता (तः ?)। यस्मात् सर्वोऽपि रागोऽयं नाङ्गाभिनयाहते ॥ १७ ॥ सर्वोऽप्यभिनयो ह्येष पदार्थज्ञानसंभवः । अङ्गालङ्कारचेष्टादि नाट्यधर्म प्रतिष्ठितम् ॥ १८ ॥ अङ्गानि शिर आदीनि प्रत्यङ्गानि तथैव च । ग्रीवादीनि तथोपाङ्गं दृष्टिपार्ष्यादिकं मतम् ।। ६६ ॥ ... प्रतिस्थित पाठ-८८. *धर्मपि । ६०. *मंगलीला । ६१. *कुतकादिव। ६८. चेष्टा- श्चेनाट्यधर्मा प्रतिष्ठितं । -- I. P. धवणकर्मणः। 2. P. केचित् (कश्चित्) । 3. A. चर्मघर्मायुधधजाः; B. चर्मधर्मायुधः । 4. A. संयुक्तो। 5. P. नाटयपा। 6. P. वृष्टिपाश्र्वादिकं ।
संज्ञा नाम तृतीय परीक्षण ] पाठघरत्नकोश [ ३७ व्यज्ञकाः स्युर्मनोवृत्तेर्मु खरांगा रसाश्रयाः । करप्रचारा: करयोापाराः करणानि च ॥ १० ॥ क्रियाविशेषो हस्तस्य स्वतन्त्रोऽभिनयाय' यः । निष्पत्तिविषये तानि ध्वननाद्यास्तु तत् क्रियाः ।। १०१ ।। विश्रान्तिस्थानकं क्षेत्रं सविलासं करस्य तु । सविलासा रसोपेता[:] करपादादिकक्रियाः ।। १०२ ।। कारणं नृत्यकरणं तदेव परिकीर्तितम् । 'तदेवोत्प्लुतिपूर्वं स्यादुद्धतप्रायनर्तने ।। १०३ ॥ अङ्गहारोऽङ्गविक्षेपः करणरुपवृहितः । चालनं करपादादे* रेचकः सविलासकम् ।। १०४ ।। विचित्रं चरणादीनां कर्म चारीसमं कृतम् । चारणं चरणं चित्रं मण्डलं संप्रचक्ष[१९B]ते ।। १०५ ।। स्थानं स्यादक्रियः कश्चित् सन्निवेशः शरीरगः । तदर्थसाधनी चेष्टा वाङ्मनःकायसंभवा ।। १०६ ।। वृत्तिः स्यात् स्वान्यशस्त्राणां' कत्तु पातमपातने*8 | उचिता नर्तनाङ्गस्य संग्रामे न्याय उच्यते ।। १०७ ।।* [मनोहरा स्थिती रेखा त्वङ्गानां मेलके सति ।। योग्यः श्रमविधि:10 पात्र नर्तनाधार इष्यते ।]* ॥ १०८ ॥ तदेव गौण्डली प्राहुः स्वयं गायनदर्शनात् । स्यादाचार्य उपाध्यायः12 संप्रदायस्तु तद्विदाम् ।। १०६ ।। वृन्दमाहुः पद्धतिश्च नृत्यस्य परिपाटिका । वर्णकैरुपलिप्ताङ्गो लयताल विचक्षणः ॥ ११० ॥ -- 4 , प्रतिस्थित पाठ-१०४. *०पादारे । १०६. कश्चि । १०७. *पद्य सं० १०७ नहीं है । १०७. *पातमयातने । १०८. *यह पद्य प्रति में नहीं है। I. B. स्वतन्त्राभिनयाय । 2. P. धूनानद्यास्तु । 3. P. करपादादिका क्रिया। 4-4. P. तदेवो (त्)प्लुतिपूर्व स्यात् उद्धतप्रायनत्तने । 5. P. चारीणां । 6. P. पुमर्थसाधनी। 7. B. शास्त्राणां । . 8. P. च्यावनपातने । BO. पातमपातने । 9. P. वर्तनाङ्गस्य। 10. BO. गेयधिषिः । II. P. गायननत्तनात् । 12. P. उपाध्याय () ।
३८] . सङ्गीतराज [२. पदोल्लास . सभाजनमनोहारी यो नृत्यति स प्रेरणी । नटोऽभिनयवेदी स्यानर्तको मार्गनृत्यवित् ।। १११ ।। रस्यते यः सहृदयैः स रसो रसिकप्रियः । शेषं स्वावसरे लक्ष्माभिधास्ये लक्ष्मविन्मुदे ॥ ११२ ॥ भूभृत्त्वं भूभृतां येन कुटुम्बीकरवत्* कृतम् । संज्ञायै केवलं तेन राज्ञा संज्ञा निरूपिता ।।.११३ ।। "इति श्रीराजाधिराज श्री कुं० पदोल्लासे रसपरीक्षणं तृतीयं समाप्तम् ॥ छ ।* . प्रतिस्थित पाठ-१११. *पेरणी। ११३. *कुटंबीकरवत् । I. A. B. लक्ष्म्याभिधास्ये। 2. A. लक्षभ्यविन्मुवे । 3. P. कुटुम्बीकरणात्। 4-4. P. इति श्रीराजाधिराजश्रीकालसेनविरचिते संगीतराने पाठपरत्नकोशे पदोल्लासे . संतापरीक्षणं तृतीयं समाप्तम् ।।
परिभाषा नाम चतुर्थ परीक्षण - पुमानिति परात्मेति' कर्तेति परिभाष्यते । यस्तीथिकैस्तमीशानं* भाषातीतं नमाम्यहम् ॥ १ ॥ अंशान्मध्यमसप्तक स्थि[२०]तवतस्तारावधाव (1)व्रजेत्- तारस्थाश्चतुरः स्वरानिह ततोऽक्किामचारः स्मृतः । आरो[हादपि* तारषड्जमवधि तं* नन्दयन्त्यां विधा- यारोप्यो गणनाविधाविह परं लुप्तस्वरोऽप्याहतैः ॥ २ ॥ अंशान्मध्यमसप्त वा स्थितवतो) ह्यामन्द्रकस्थांशक* मन्द्रन्यासकमाप्य वा तदधरत्रिश्रुत्यवस्थावधि । कार्य जात्ववरोहणं निगदिता सीमा परेयं सदा मन्द्रस्थानगतेरतोऽवगमनेक्किामचारः स्मृतः ॥ ३ ॥ पूर्णत्वे सति षाडवौडुवकृतोरल्पत्वमत्यल्पता वाक्यादेव विधीयते क्रमतया प्राप्तापि विद्या ततः पञ्चम्यां तु विपर्ययेण10 भवती जाती यतस्ते* द्वयोः प्राप्तौ तत्परिसंख्ययैकवचनं प्रायोऽभिधेयास्पदम् ॥ ४ ॥ ये12 प्रयोगमवन्तीह मिलित्वा षट्स्वरास्तु ते । षाडवाः षट्स्वरं13 गीतं षाडवं तद्भवत्वतः ॥ ५ ॥ यस्मिन् वांत्युडवस्तदुक्तमुडुवं भूतेषु तत्पञ्चमं तत्संख्यौडुविकावशेन गदिताः पञ्चस्वरास्त्वौडुवाः । संञातास्त इमे तदौडुवितमत्रोक्तं तु गीतं बुधैः संबन्धास्तत16 एव वि[२०] श्रुतिमगात्? पञ्चस्वरं त्वीडुवम् ॥ ६ ॥ प्रतिस्थित पाठ- १. *यस्तीर्थे कैस्तमीशानं । २, *बधितं । ३..*०स्थांकशं। ४. *यस्ते । ५. *५ का अंक पुनः दोहराया गया है और यही क्रम प्रागे तक चालू रहा है। 9 I. B. कुछ स्थान छोड़ कर 'पुमान् परमात्मेति' । 2. P. अंशान् मध्यमसप्तकं । 3. P. ततो वाक्कामचारः। 4. P. पारोहेदपि । 5. P. अंशान्मध्यमसप्तकं। 6. A. B. न्यासकमाघ। 7. B. गमने वाक्कामचारः । 8. P. षाडवौडव०। 9. P. विद्यावता। 10. B. विपर्येण । II. P. प्रायो विधेयास्पदम् । 12. P. यो(ये)। 13. P. प(द)स्वरं। 14. P. तद्भवं ततः। 15. B. यस्मि वात्युडप० । 16. P. संबंधात्तत। विभूति गात्। 'ति' के बाद स्थान छूटा हुआ है। 17. B.
४० ] सङ्गीतराज [ २. पदोल्लास ताल एककले मार्गश्चित्रो' गीतिस्तु मागधी । द्विकले* वात्तिको मार्गो गीतिः संभाविता मता ॥ ७ ॥ चतुष्कले तु पृथुला गीतिर्गिस्तु दक्षिणः। या जातिषु कला प्रोक्ता सा दक्षिणपथाश्रिता' ।। ८ ।। चित्रवात्तिकयोया द्विगुणा द्विगुणा तु सा । अंशस्वररसस्तज्ज्ञातव्यः सर्वजातिषु ।। ६ ।। अंशश्च जन्यरागाणां ज्ञेयो जनकजातिषु । स्यातां* मेलापकाभोगी रूपकेन क्वचित् क्वचित् ॥ १० ॥ यत्र वस्तुकृता* वस्तु नोक्तमाभोगलक्षणम् । पर्दस्तत्र प्रकर्तव्य आभोगो गीतकोविदः ॥ ११ ॥ आभोगध्रुवयोरन्तरतरो धातुरस्ति यः । छायालगान्तरे सोऽत्रं रूपकेषूपवर्णितः' ।। १२ ।। Bोव्यादीनि* तु यान्यत्र रूपकाणि न्यरूपकन् । केचिन्न तेषु कर्तव्य आभोगः कहिचिबुधैः ।। १३ ।। अत्र यन्मानमाख्यातं तालज्ञ स्तालकर्मणि । विश्रा[न्ति]युक्तया काले क्रियया तदिहेष्यते ।। १४ ।। धात्वादिवादनं मत्तकोकिलायां यदीरितम् । तदेकतन्त्रीमुख्यासु वीणासु स्याद्यथायथम् ॥ १५ ॥*[२१] यदेकतन्त्र्यामुद्दिष्टं नकुलादिषु तत् स्मृतम् । वेणुप्रवीणा वीणास्थं वेणुष्वतिदिशन्ति तत् ।। १६ ।। . प्रतिस्थित पाठ- ७. *द्विकुले। १०. *स्याता। ११. 'पसुकृता । .१२. *०ध्र वयोरन्तर- तरंतरो। १३. *तुद्यादीनि तु । क्तव्य।. I. B. ०श्रित्तो। 2. A. B. दक्षिणपथाश्रिताः। 3. P. रूपकेन (ण)। 4. P. प्रयो. 5. P. ध्रुधयोरन्तरतु(त)रो। 6. P. घातुरस्त्रि (स्ति) यः 7. P. रूपकेपू- (यू) पणितः। 8. -B. अव्यादिनी तु यान्यत्र । K. अव्ययादीनि । 9. P. न्यरूपपन् । 10. B. तदीरितम् । .
परिभाषा नाम चतुर्थ परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ४१ आहुरेकमानतालयुक्तं ताभ्यां विजितम् । वीणावाद्यं कश्चिदाह मानेनैतद्विना कृतम् ।। १७ ।। लीलाकृते ध्रुवातालयुगं स्यात् स्वेच्छया कृतम् । अस्य लक्ष्यप्रधानत्वाद् व्याख्या लक्षानुसारिणी ॥ १८ ॥ कर्तव्या लक्षतत्त्वज्ञर्लक्ष्ये' तत्त्वविरोधिनी । ग्रहादिनियमो द्रष्टानुरोधाच्छास्त्रगोचरः ॥ १६ ॥ लक्ष्येऽन्यस्वरसंदर्भो नान्यथात्वमिहार्हति । स्वस्थानानां चतुष्केण स्वरैः स्वस्थानसंभवैः ।। २० ॥ वेणावपि च वीणावद्रागोत्पत्तिरिहोच्यते । लक्षणेन* विरुध्येत यत्र रागस्तु तत्र हि ।। २१ ॥ लक्षणस्थं द्वितीयादि ग्रहापेक्षं प्रकल्पयेत् । किन्तु ग्रहादधो' ये स्युः स्वरा लक्ष्मणि तावताम् । यथासम्भवमेव स्यात् स्थायी रागो स्वरोऽपि च ॥ २२ ॥ पात्रं रंगं प्रविश्य प्रथमत उदितं चातुरस्यं सुरेखं देहे धृत्त्वाऽङ्घ्रियुग्मं सममथ लतया लक्षितं पाणियुग्मम् । कृत्वा वामं हृदिस्थं करमपि ललितं प्रायशो ने[२१Bत्रपात्रं14 लक्ष्यं साक्षात्तु तत्तच्चरणमनुगतं नर्त्तनं प्रारभेत ॥ २३ ।। एककं करणं विशिष्य कलया' कार्य गुरुप्रायया पार्थक्येन तदङ्गहारनिवहेष्वाद्यं हि शेषाण्यतः । न्यूनत्व करणस्य नाप्यधिकता दोषाय तेषु स्फुट लक्ष्मस्थं यदसूत्रयन् स्वयमयं वा शब्दमृष्यग्रणीः ।। २४ ।। प्रतिस्थित पाठ-२१. *लक्ष्यणेन । २२. *स्वरोत्रि च। २४. *न्यून्यत्त्वं । 4. A. में . I. P. द्वाभ्यां। 2. P..लीलाकृतः । 3..P. लक्ष (क्ष्य)प्रधानत्वाद् । रेफ नहीं है। 5. P. लक्ष्म (1) विरोधिनी । 6-6. दृष्टोऽनुरोधा० । . 7. P..रिहोदिता। 8. P. निरुध्येत। 9. P. ग्रहापेक्ष्यं । : 10. A. ग्रहादघो। II. B. यथासंभमेव । 12. P. रांगेश्वरोऽत्र च3 B. रोगेश्वरो। 13. P. उचितं । 14. P. नेत्रपात्र- K. नेत्रपत्र। 15. P.' दक्षः; K. दक्षं। 16. P. विशिष्टकलया । 17. B. लक्ष्म्यस्थं। 18. P. यदसूत्रयत् ।
४२ ] सङ्गीतराज [२. पोल्लास लीनं तत् समनन्तरं समनखं कृत्वा ततो व्यंसितं 'पाणी चात्र * तु विच्युतो विरचयन्नालीढकं संश्रयेत् । प्रत्यालीढकसन्निवेशविधिनोज्झित्त्वा तदालीढकं* कार्य सर्वमशेषमाश्रितमिदं * सर्वाङ्गहारेष्वपि ।। २५ ।। चार्यो युद्धनियुद्धयोनिगदिता* वृत्तिस्थिता भारती नाट्यादित्रितये गती च ललितैरङ्गः प्रयोज्याश्च ताः। मुख्यो यः करपादयोस्तदनुगो यः स्यात् स चानेसर- स्तत्र स्यात् समकालता तदुभयोः प्राधान्यसाम्ये सति ॥ २६ ॥ अथवा- मुख्यत्वं यदि हस्तकस्य चरणस्य स्यात्तदा सोऽग्रगो- ऽन्यस्य स्यादनुगामिता तु समकालत्वं द्वयोः साम्यतः । यत्र स्याच्चरणः करस्तदनुगो हस्तस्ततः स्या[२२]त् त्रिकं ह्यङ्गोपाङ्गनयस्तदा' चरणयोः स्यात् किङ्करत्वाग्रणीः ।। २७ ।। इत्यङ्गस्य नियोजनं चरणयोः प्राधान्यमाभाषितं8 प्राधान्ये करयोस्तदादिगदितं तज्ज्ञः पदाद्यङ्गकम् । °चारं चारमुपाश्रयश्च पदयो:10 पृथ्वी यथा स्यात्तथा कारं कारमपूर्वहृत्करयुगं11 कटयां 12भजेत स्थितिम् ॥ २८ ।।* अर्द्धन्दु:18 स्वललाटके सदितर:14 सत्पक्षप्रद्योतको भूत्वा15 संश्रयते कटीमथ यथाशोभं* तु हस्तान्तरम् । तत्र भ्रूवदनास्यरागपवनाद्योपाङ्गकोल्लासिताः प्रत्यङ्गरुपवृहिता 1 अनुसरं स्युनर्त्तने हस्तका:1' ॥ २६ ।। 1 प्रतिस्थित पाठ-२५. *पाणीपा चात्र । 'तदालीढक त । *सर्वमशेषमाधित इदं २६. *युद्धनियुद्धयो निगविता । २८. *पद्य सं. २८ नहीं है। २६. *यथाशोतं। I. P. सममखं। 2-2. P. पाणी चात्र तु । 3. P. सर्वमशेषमादित इदं । 4. P. वृत्ति (त्ति) श्रिता भारती । 5. P. ज्यः । 6. P. नुगामितान । 7. P. ह्यङ्गो- पाङ्गवय (?)स्तदा । 8. P. प्राधान्य प्राभासितं । 9. A. B. करयोलस्तादि० । 10-10. P चारमुपाश्रयश्चरणयो(:) । B. वारंवार । . II. P. कारं कारमपूर्ववत् । · 12. P. भवेतस्थितिम् ।. A. भवेत् स्थितिम् । B. भवेत स्थितिम् । BO. भजेत्तत् स्थितिम् । 13. A. B. अर्धेदुः । 14. P. स च नाटके स च भवन् । 15. P. नृत्ते। 16. P. नेत्र । 17-17. P. इह कराः कार्या रसव्यञ्जकाः । B. इति।
परिभाषा नाम चतुर्थ परीक्षण ]. पाठ्यरत्नकोश [[ ४३ - - पात्ररुत्तममध्यमैः सललिताः सुव्यक्तलक्ष्मान्विता योज्याः सौष्ठवसंयुतास्तदितरैस्तद्वैपरीत्यान्विताः । भालक्षेत्रगता:* सदा सदभिनेये* वक्षसः क्षेत्रगा- स्ते स्युर्मध्यमकेऽधमे त्वधरगा नेयं व्यवस्था नटे ॥ ३० ॥ श्रेष्ठ: सन्निहिता न दूरकलिता मध्येऽधमे दूरगा: प्रत्यक्षादिषु तत् प्रचार उचितः स्यादल्पताधञ्चितः । भीतव्याकुलतन्द्रिमूच्छितविषण्णग्लानवृद्धज्वरि- *क्षुच्छीताशियालुतापप्रमदोन्मत्तप्रमत्तादिषु ॥ नो हस्ताभिनयः प्रयोक्तुमुचितः स्यात् कर्कटादि विना यस्मात्ते पुरुषस्य भावमखिलं संसूचयन्त्यान्तरम्* ॥३१ ।। सामस्त्यव्यासयोगः करकरण मिलद्वाहुसंयोजन जायन्तेऽसङ ख्यरूपा: क्रमत इह रसोल्लासवैचित्र्यतश्च । आवावर्तनास्ता रसमनुरुचि रास्तेन' लास्यानुरूपा याभिर्नु त्यप्रपञ्चस्वभिनयचतुराः पाणयोऽनेकशः स्युः ॥ ३२ ॥ रेखाया "अनतिक्रमात् सुनिपुणं नानाविभङ्गि स्फुरत्- तत्तद्भावजवर्तनाविचलिताः शोभाभृतो बाहवः । रच्यन्ते यदि चालना11 नियमितास्तज्ज्ञ स्तदा "ते पुनः 1 शर्वाणीभरणानुरागरसिक श्रीकुम्भभूमीभृता18 ।। ३३ ।। ओव्यादिगोणी [मलपं]*पदं* स15 छायालगस्थध्रु[वकान्त्यसंस्था: । - प्रतिस्थित.पाठः-३०. *लाभक्षेत्रगताः। *सदभिनये येः। *ते । ३१. * *क्षछीतात- शयालुतापप्रमत्तोन्मत्तमत्तादिषु। *संसूचयत्यान्तरं । ३२. *.विचित्र्य- तश्च ।. -३.३. *.रसिकः । ३.४.. * तीन वर्णो का स्थान रिक्त है । *यद। पांच वर्षों का स्थान रिक्त है। । T. P. योज्या (:)। 2: P. त्वधरगांश्चेयं । 3. P.श्रेष्ठे। B. श्रेष्ठेन । 4-4. P. क्षुत्क्षान्ताशयालतापसजनोन्मत्तप्रमत्तादिषु । BO: क्षुत्क्षीतात; A. B. क्षुत्क्षान्तार्तशयालु- तापसप्रमत्तोन्मत्तमत्तादिषु। 5. P. जायन्ते सख्यरूपाः। K; BO. जायन्तेऽसंख्यरूपाः । 6. P: प्रावविर्तनास्ता। 7. P: स्वेन । 8. P. याभिन (ने)त्यप्रपन्चेष्वभिनयचतुराः । 9. P. अनतिक्रमास्तु 10. B. नानाविभूगि। II. P. चालका। 12..P....निगदि- तास्तज्ज्ञस्तदा। 13-13. P. शर्वाणीचरणानुरागरसिकश्रीकालजिद् भूभृता । प्रोन्तारिगोणी० 1. BO.. पोव्यादिगोणी० 15. P.च। 14. P. ।
४४ ] सङ्गीतराज [ २. पदोल्लास 2 हृदि प्रपूर्वा च तदन्त्यखण्डे- ऽप्यवत्सकस्यापि* तथान्त्यखण्डे ।। ३४ ।। एलादिगामि[गजरोपश] मान्त्यखण्डे* वाद्याश्रिते तु तुडुके ऽप्यखिलप्रबन्धे । प्रायः प्रयोगमुपयान्ति भुजप्रपाताः ना] न्य[त्र] ते च कविते' सुतरां प्रशस्ताः ॥ ३५ ।। चित्रकूटैकदेशस्थो यो देशा[२३]नखिलानपि । शास्ति तेन तथा भूता परिभाषाऽत्रं भाषिता ।। ३६ ।। यो मूनि द्विषतां पदं प्रतिपदं धत्ते पदं स्वं गुणः स्फीतैरुन्नमयन् पदार्थमपि यत् संवर्तनोल्लङ्घयन् । तेनात्रैकपदे पेदे धृतवता कुम्भेन' राज्ञा हृदा शर्वाण्याः पदबन्धहेतुकपदोल्लासः पदि स्थापितः ।। ३७ ।। इति श्रीराजाधिराज श्री कु० परिभाषा नाम चतुर्थ परीक्षणं परिपूर्ण पदोल्लासश्च समाप्तः । - प्रतिस्थित पाठ- ३४. *०कस्त्यापि । ३५. *पांच वर्गों का स्थान रिक्त । *३६ का अंक बीच ही में पुनः दोहराया गया है । का स्थान छोड़ा गया है । *एक वर्णन का स्थान रिक्त है। चान्त्य- *एक वर्ण खण्डे । I. P. तुडके। 2. P. भुजा: समस्ता । BO. भुजप्रपाता। 3. P. कविते (?)। 4. P. ब्रह्मशैलेकदेशस्यो। 5. B. ये। 6. P. स्वं वर्मनोल्लङ्घयेत् । 7. P. कामेन । 8-8. P. इति श्रीजगदीश (श्व) रवनदेवनिजगणेन जगदीश्वरी' कामेश्वरीचरणकिङ्कारेण श्रीकामाक्षा गिरिविभुना अध्युष्टतमनरेश्वरेण भीष्मपुरजयानीतानेकराजकन्यारत्नेन श्रीपुर- ग्रहणसंबंधितयशोभरेण वाटिकाचलग्रहणजनितकीत्तिपूरपराजिताचलनायकेन गं(सं) गमतीर- दुर्गोद्धरणोद्धृतसकलमण्डलाधीश्वरेण दमनपुरविध्वंसनबन्दीकृतयवनोनिचयेन महिषमेरुजया. जेयविभवेन शाकम्भरीरमणपरिशीलनारप्राप्तशाकम्भरीपरितोषितशाकम्भरीप्रमुखशक्तित्रयेण अष्टादशगिरिशिखरपरिवारिता४-जनगिरिविजयविख्यातवीर्यगण महदम्बमातृकापुरोद्- धूलनर्षिता(त)महोरगपुरेण श्रीवनदेवस्वामिप्रसादरचनापर-परमेश्वरेण त्र्यम्बकेश्वर- सन्निधिकात्तिस्तम्भोन्नतजयस्तम्भेन श्रीब्रह्मगिरिभोमस्वर्गतायथार्थीकरण रचितचारुपथेन (चालू) १. K. जगदम्बिकाकामाक्षी। २. K. कामेश्वरी। ३. K. बलनायकेन । ४. K. परिवारिताञ्जनादिगिरि etc. I ५. K. में 'पर' नहीं। ६. K.अम्बकेश्वर ।
परिभाषा नाम चतुर्थ परीक्षण ] पाव्यरत्नकोश [ ४५ श्रीकामाक्षागिरिनवीननिमितिपराजितसुमेरुणा श्रीमहिषाबलोपरि श्रीहरिशरणविरचिता- चलदुर्गेण अभिनवभरताचायण वीणावादनप्रबोणेन यवनफुलाकालकालरात्रिरूपेण त्रिसन्ध्या. क्षेत्रसमुद्रसम्भवरोहिणीरमणेन परमभागवतेन महाराजाधिराजश्रीराजमानमृगाश्तामराज- नन्दनेन महाराज्ञीधी-सौभाग्यवतीजसमायिफाइदयनन्दनेनः सफलसीमन्तिनीशिरोमणि- निकुम्भराजन्यवंशावतंसमहाराजोत्रोफर्मवती -लघुमादेवीहृदयाधिनायन इति राजाधिराज- श्रीकालसेनविरचिते । संगोतराजे पोडशसाहस्रयां संगोतमीमांसायां पाठ्यरत्नकोशे पदोल्लासे परिभाषापरीक्षणं चतुर्थ समाप्तम् ।। ( पदोल्लासश्च समाप्तिमगात् ) १. B. श्रीकामाक्षी० ॥ २. A. में 'श्री' नहीं। ३. K. हृदयानन्दनेन । ४. र.में 'श्री' और है। ५. K. में 'इति' नहीं। ६. K. के मत से कालसेनेन विरचित' पाठ श्रेष्ठ है।
३. छन्द उल्लास-अनुष्टुब् नाम प्रथम परीक्षण - छन्दानुवृत्तिकारीणि यस्य छन्दांसि जाग्रति । तमच्छन्दकृतं वन्दे स्वच्छन्द गिरिजापतिम् ॥ १ ॥ समासेन प्रबन्धानां मूलभूतानि कानिचित् । तत् प्रयोगोपयोगीति छन्दांसि व्याहरामहे ।। २ ।। मयरसतजभनसंज्ञाः कथिता अष्टी गणा: क्रमेणैते । विज्ञया वर्णभावाः प्रस्तारे ते त्रिकाः सर्वे ।। ३ ।। सर्वगुरादिल उक्तो मध्यलघुः स्यात् तथान्त्यगुरुलघुको । मध्यगुरादिगुरन्यौ सर्वलघुः स्यात् तथैवान्त्यः ।। ४ ।। पृथ्व्यम्बुवह्निमरुदम्बरसूर्यचन्द्र- नाकाधिदैवतयुता मगणादयोऽमी । श्रीवृद्धिम[२३B]त्युपरदेशफलानवाप्ति" रुत्कीत्तिसौख्यफलदा मुनिभिः प्रदिष्टा: ।। ४ ।। दतचपषा मात्राख्या* द्वित्रि चतुःपञ्चषट्कला: क्रमशः । द्वित्रिशरशैलविश्वा* भेदास्तेषामिमे गदिताः ॥ ५ ॥ उक्तात्युक्ता तथा10 मध्या प्रतिष्ठातिप्रतिष्ठिका । गायत्र्युष्णिगनुष्टुप् च11 बृहती पंक्तिरित्यपि ॥ ६ ।। त्रिष्टु12 जगती चातिजगती[च] शक्वरीति च । सैवातिपूर्वाष्टयत्यष्टी धृतिश्चातिधृतिस्तथा ।। ७ ।। - प्रतिस्थित पाठ- ४. *प्रदिष्टां । ५. *'मात्रात्या' के प्रागे 'द्वित्राख्या' अधिक पाठ है। *कला। *द्विद्विशरशलविश्वा । 4. P. कला। 1. P. छन्दानुवृत्तकारीरिण । 2. P. तम(च) छन्दकृतं । 3. B. स्वं छन्दं । प्रयोगोपयोगीनि । 5. BO. वर्णभवाः । 6. B. मृत्युरपदेश० । 7 B: द्वित्रिः । 8. B. 9-9. P. द्वित्रिवेदशररस० । B. रसशर। 'द त च प ष' के (द) द्विफल के (वि) दो, त (निकल.) के (त्रि) तीन, (च) चतुष्फल के. (शर) पांच, (प) (पंचकल) के के (शैल) पाठ और (प) षटकल के (विश्व) तेरह प्रस्तार भेद होते हैं । Io. B. में 'तथा' नहीं है। II. B. में 'च' नहीं है। 12. P. त्रिष्टुप् च । B. में 'च' नहीं है। --.-..- मनुष्टुन नाम प्रपम परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ४७ - कृतिश्च प्रकृतिश्चैवाकृतिविकृतिरेव च । संकृत्यभिकृती चैवोत्कृति' च्छन्दांसि नामतः ।। ८ ।। प्रारभ्यकाक्षरात् [पादात् षड्विंशत्यक्षरावधि । पादैः क्रमादिमानि* स्युर्मालावृत्तमतः परम् ।। ६ ।। एकमात्रो* ऋजुर्हस्वो लघुज्ञेयो गुरुः पुनः । वको दी? विसर्गान्तः सानुस्वारो द्विमात्रिकः ॥ १० ॥ अंह्रयादिसंयुते 8 वर्णे व्यञ्जने चाग्रगे लघुः । पादान्ते वा लघोर्गत्त्वं वंशस्थादिषु नो पुनः ।। ११ ।। पदान्तेऽत्र यतिः कार्या' लुप्तालुप्तविभक्तिके । ध्यादिकाक्षरविच्छिन्ने० पदान्ते च तथावि[२४]धे ।। १२ ।। नार्द्ध समाससन्धी* स्तो *यतिविच्छेदसंज्ञिका । औचित्यादत्र11 विज्ञ या यतिः श्रुतिसुखा बुधैः ।। १३ ।। यतो मधुरता श्लाघ्या भारत्यां भरतादिभि:13 ॥ १४ ॥ अविशेषे* तुरीयांशश्च्छन्दसः पाद इष्यते । द्विपदाधौ द्वितायांशादिक: पादो यतः स्मृतः ॥ १५ ॥ उक्ता ग: श्री, अत्युक्ता गौष्टा* सा स्त्री, मो मध्यायाम् । नारी,15 शंभा: पातु त्वां सा कन्या मगौ प्रतिष्ठायां* स्यात् ।। १६ ।। गौरी पायात, शंभीर्या 116 शेते हृत्पद्म ॥ १७ ॥ अत्युक्ताया रतिगणा भेदा मध्याभवास्तथा । कामस्य तु प्रतिष्ठाया भेदा बाणगता? मता:* | अत्युक्तायां18 लपूर्वा ये* तेष्वादावधिको लघुः ।। १८ ।। प्रतिस्थित पाठ-8. *क्रमाविनामानि । १०. *एकमात्र । ११. *प्रहादि संयुते । १३. *समासंधी। *.तिविछेवसंज्ञिका। १५. प्रविशेष । दृष्टा। *प्रतिष्ट।। १८. *मता । . यथा- सेयं कन्या 3. P. I. P. चवोक्तानि । A. B. ०क्तति छंदांसि । K. चैवोक्तातिच्छन्दांसि । 2.P. ०क्षरावधिः । स्य: माला। 4. P एकमात्रो ऋजुह्न(ह)स्वो। B. एकमात्र० । 5. P. लघुज्ञ (ज)यो। 6. P. नको। 7. P. विसर्गो(ग)न्तः। 8. B. अंघ्रादि। 9-9. P. यतः कार्यो। 10. P. प्रादिकाक्षर० । A. विछिन्ने । II. P. प्रोवित्पदेऽत्र । A. कवित्पदे । 12. P. भारत्या। 13. P. में यहां पद्यसंख्या १४ दी है। 15..A. में 'नारी' द्वितीय चरण में है। 16. P. पायाच्छम्भोर्या, A. पायात शंभीर्या... 17. A. बारणगरणा। 18. P. प्रत्युक्ताया। 14. A. B. श्री प्रत्युक्ता।
४८ ]
सङ्गीतरान
[ ३. छन्दोल्लास
समासमविभेदेन द्विधानुष्टुबिहोच्यते ।
चित्रपदा भभगा गः*, उक्ता विद्युन्माला मो गौ ।। १६ ।।
जरी लगो प्रमारिएका नाराचमन तलंगाः ।
[अनुष्टुब् न सनावाद्याद्वक्त्रं ये तुर्यतोऽभीष्टम् ।]*.
अनुष्टुब्रसमावाद्याद्वक्त्रं ये तुर्यतोऽभीष्टम् ।। २० ॥
पथ्यावक्त्रं समुद्दिष्टं तुर्याज्जे युग्मपादयोः ।
तुर्या दो जे नतभरमसनविपुलादयः ।
प्राय [२४B]स्तुर्यो गस्तास्वोजे युजि पड्भ्यो लघुः सदा ।। २१ ।।
पञ्चवक्त्रप्रसादाप्तसाम्राज्येन महीभृता ।
"कुम्भन वक्त्रवृत्ताद्यमनुष्टुप्परिकीतितम् ॥ २२ ।।
3
"इति श्रीराजाधिराज कुं० छंद उल्लासेऽनुष्टुप्परीक्षणं प्रथमं समाप्तम् ।
२०. *यह पंक्ति दो बार लिखी गई है।
प्रतिस्थित पाठ- १९. *त्रिपदा भभभाग ।
२२. *परिकोत्तिता।
1. B. द्विधा अनुष्टुप्"। 2. P. नतं-भरम( ? )सन० 1; B. नतरभ""। (नवि-
पुलादि भेद यथा-नविपुला, तविपुला, भविपुला, इत्यादि) । 3. P. कालसेनेन वृत्ताधमनुष्टप
परिफीतितम् ।। २२ ।। 4-4. P. इति श्रीराजाधिराजमहीमहेन्द्र श्रीकालसेनविरचिते
संगीतराजे पोटशसाहस्रयां संगीतमीमांसायां पाठयरस्नकोशे छन्द उल्लासे अनुष्टपपरीक्षणं
प्रथमं समाप्तम् ॥
--
।
वृत्त नाम द्वितीय परीक्षण - अज्ञातवृत्तं ब्रह्माद्यैः 1 श्रितं वृत्तं महात्मनाम् । परिज्ञात जगद्वृत्तं सद्वृत्तं तं भजे शिवम् ॥ १ ॥ अथ वृत्तं प्रकीर्त्यते- तद्विधा* वर्णमात्राभ्यां पद्यं चैव चतुष्पदी । समः पादः समं वृत्तं द्वाभ्यामर्द्धसमं स्मृतम् । उक्ताभ्यां विपरीतं यत्तद्वृत्तं विषमं स्मृतम् ।। २ ।। [ ६ अक्षर ] भद्रिका भवतिरो] नरौ । [१] [ १० अक्षर ] उक्ता मत्ता मभसगयुक्ता । [२] | ११ अक्षर ] स्यादिन्द्रवज्रा' ततजा गुरू चेत् [३] उपेन्द्रवज्रा जतजा गयुग्मम् । [४] रो नरौ* लघुगुरू' रथोद्धता । [५] स्वागता तु रनभाद्गुरुयुग्मम् । [६] वेदैश्च्छिन्ना शालिनी मात्ततो गौ' । [७] दोधकमुक्तमिदं भभभा गौ10 || [] [ १२ अक्षर ] ख्यातेन्द्रवंशा ततजै रसंयुतः । [1] वदन्ति वंशस्थमिदं जती जरौ। [१०] जरद्वयं वदन्ति पञ्चचामरम् ।। [११] द्रुतविलम्बितमत्र नभौ भरौ । [१२] इह तोटकमम्बुधिसै: प्रथितम् । [१३] प्रतिस्थित पाठ-- २. *तद्विधा [५] *मरौ । I-I. P. श्रुतवृत्तं । 2. P. (तं)। 3. P. छि(शि)वम् । 4. A. स्यादिन्दवजा। 5. P. त(ज)तजा गयुग्मम् । 6. B. गुरुलघू। 7. P. रनभा गुरुयुग्मं । 8. P. वदे 9. A. B. गैः। 10. A. B. गैः। II. A. दृत०, B. द्रत० । . छिन्ना।
५० ] सङ्गीत राज [ ३. छन्द उल्लास गणैर्यैश्च[२५A]तुभिर्भुजङ्गप्रयातम् । [१४] सम्मता स्रग्विणी रैश्चतुभिर्युता । [१५] [ १३ अक्षर ] त्रिच्छेदा* 2 मनजरगैः प्रहर्षिणीयम् । [१६] [ १४ अक्षर ] ख्याता वसन्ततिलका तभजा जगौ ग: 1 [१७] । १५ अक्षर ] वसुयतिरियमुक्ता मालिनी नौ मयौ* यः । [१८] [ १६ प्रक्षर ] भ्रौ ननना* गुरुश्च वृषभगजविलसितम् । [१६] [ १७ अक्षर "गुहास्यविश्रान्तिर्यमनसभला ग: शिखरिणी । [२०] [ १८ अक्षर ] नसमतभरा वेदैर्यैः' षड्भिश्चेद्यतिहरिणोपदम् । [२१] यतौ न्यौ यः सोऽत्र* मुनिभिरियं चित्रलेखा गदिता। [२२] [ १६ अक्षर ] आदित्यैर्यदि*मः सजो सततगा: शार्दूलविक्रीडितम् । [२३] [ २० अक्षर ] अश्वैश्छिन्ना सुगीता मरभनयभला* गान्तः10 सुवदना । [२४] [ २१ अक्षर] विख्याता स्रग्धरेयं मरभनययया सप्तकाश्वैर्यतिश्चेत् । [२५] प्रतिस्थित पाठ- [१६] *त्रिछेदा। [१८] मयो। [१६] *भी ननभा । [२२] *यतो न्यो जस्तत्र । [२३] यति । [२४] *मरभनयतला। [२५] सप्तः काश्वर्यतिश्चेत् । - I. A. B. समंता । 2. A. बिछेदा । 3. B. प्रहपंणीयं । 4. P. भ(त)भजा जगौ गः। 5. P. वृषभुजगविलसितम्। 6-6. P. गुहास्यवि (वि)श्रान्तियमनसभला गः । 7. P. तुZः। 8. P. यतो न्यो(न्यौ) यः सोऽत्र । 9. A. शादूल०॥ 10. P. गाङ्कुः ।
वृत्त नाम द्वितीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ५१ [ २२ अक्षर ] पंक्तिर्यतौ* भरौ नरनरा नगौ भवति मद्रकं सुललितम् । [२६] [ २३ अक्षर ] रो नरौ नरनरा लगाविह भवन्ति चेद्भवति चित्रकं तदा । [२७] [ २४ अक्षर ] ननभनजननाश्च यगणसहिता मुनियतिललितलतेयम् । [२८] [ २५ अक्षर ] उक्तेति रतौ तो यो "भभना ननन गुरु किल हरिणशिशुनयना । [२६] | २६ अक्षर ] अत्राष्टाभी रुद्रैश्छिन्नं ममतनननरसलघुगा [२५B] भुजङ्गविजृम्भितम् । [३०] . प्रथवा- 6 नजनसभा नननगणलवका इति यति भवति [च] सततगतिः । [३१] इति वा ॥ अथ दण्डकाः शेषजात्यादिकं मुक्त्वा षड्विंशत्यक्षराधिकम् । यत्किञ्चिदृश्यते छन्द स्तत् सर्वं दण्डकं विदुः । नद्वयं' रगणाः सप्त चण्डवृष्टिरुदाहृतः ।। ३ ॥ अथार्णवव्याल जीमूतलोला- करोद्दाम1 -शङ्खादयः स्युः प्रबन्धाः । परं चोत्तरेणोत्तरेणैककेन प्रवृद्धाश्च ते रेण विद्वद्भिरूह्याः ॥ ४ ॥ - प्रतिस्थित पाठ- [२६] *पंक्ति यतौ । [२६] ३. *षत्रिंशत्यक्षराधिकम् । • तायो। [३०] *ममतनननरयलघुणा। *छंद तत् । . I. P. मगौ। 2. B. मंद्रक। 3. B. मुनियतिललितेयम् । 4-4. P. पङ्क्त्या विरतो तो यों। 5. B. में एक 'न' नहीं है । 6-6. P. न ज न स (न)भा नननगणलच- (ग)का इति वसति भवति सततगतिः । 7. K. तद्वयं । 8. P, चण्डवृद्धिरुदाहृता। 9. A. B. ० व्याज । 10. A. करोदाम। B. करोद्वाम ।
५२ ] सङ्गीतराज [३. छन्द उल्लास . * [एवं मालादिवृत्तानि भवन्त्यन्यान्यनेकशः । यथेष्टं रचितानेकशुभनामान्यनुक्रमात् ।। ५ ।। चरणो यावदेकोनसहस्राक्षरनिर्मितः । मालावृत्तानि तावत् स्युरित्यादिष्टं महीभृता ॥ ६ ॥ अथवा वर्णयुग्वृद्ध-सहस्राक्षरनिर्मितः । पादो भवति तावत् स्युर्यथेष्टमिह दर्शनात् ।। ७ ॥] * तथाष्टादिभी रैः पदैर्नाद्गुरोः स्युः परं पन्नगाद्या: प्रबन्धाः परेऽपि । ते च दम्भोलि-हेलावली-मालती- केलि-कङ्कल्लि-लीलाविलासादयः ॥ ८ ॥ यथेष्ट रगणैः प्रोक्तो लघुपञ्चकतः परैः । चण्डकालोऽथ यैः सिंहविक्रान्तो लघुपञ्चकात् ॥ ६ ॥ ल-षटकाद्गत्रयाच्चापि यथेष्टं यगणैः परैः । मेघमालादण्डकोऽयं प्रबन्धः सम्मतः सताम् ।। १० ।। स्वेच्छया रगणैः प्रोक्तो* मत्तमातङ्गसंज्ञकः । कुसुभास्तरणस्तद्वद्यथेष्टं [सगणै]रिह ॥ ११ ॥4 सिंहविक्रोडको नाम स्वेच्छया यैः प्रयोजितैः। निरन्तरं लघुगुरू यत्र सोऽनङ्ग[२६]शेखरः ॥ १२ ॥ प्रयुज्येते गुरुलघू साऽशोकपुष्पमञ्जरी' । यथेष्टं तगणाश्चान्ते' गद्वयं कामबाणकः ॥ १३ ॥ यथेष्टा भगणा* गौ च स्याद् भुजङ्गविलासकः । नद्वथात् स्वेच्छया पञ्चमात्रैरुत्कलिका* मता। प्रतिस्थित पाठ- ५-७. *-*कोष्ठगत अंश प्रति में नहीं है; P. प्रति में है । ८. *लीला- सादय । ६. *लघुपंचकतः । ११. *प्रोक्ते । १४. *यथेष्टास्तगणा । *पञ्चमैरुत्कलिता। 1. B. • युद्ध । 2. P. कलि । 3. P, ल ख(षट्काद् गत्रयाच्चापि। 4. B. में यह पद्य नहीं है। 5. P. शेष (ख)र। 6. P. प्रयुज्यते । 7. P. साशोकपुष्पमञ्जरी । 8. P. नगणाश्चान्ते ।
वृत्त नाम द्वितीय परीक्षण ]
पाठ्यरत्नकोश
[ ५३
एकैकगणवृद्धया स्युरेवमेते ह्यनेकधा ।।। १४ ।।
श्रुतेन यस्य वृत्तेन पवित्रीक्रियते जगत् ।
तेन श्रीकुम्भकर्णेन वृत्तमत्रोपवर्णितम् ।। १५ ।।
३ इति श्रीमहाराजाधिराज श्री कुं० छन्द उल्लासे वृत्तशासन परीक्षणं नाम द्वितीयं समाप्तम् ।।
I, P. श्रीकालसेनेन । 2. A. B. वृत्तमात्रोपर्वणितम् । 3-3. P. इति श्रीराना-
घिराजश्रीकालसेनविरचिते संगीतराजे पाठ्यरत्नकोशे छन्द उल्लासे वृत्तपरीक्षणं नाम द्वितीयं
समाप्तम् ॥
आर्यावलोकन नाम तृतीय परीक्षण सुरासुरैनमस्कार्या*1 स्वकार्यापेक्षयंव या । योगिभिश्च हृदा धार्या तामार्यामहमाश्रये ।। १ ।। प्रथमेढे ज: पप्ठे न्ली वा ग: सप्तमो* न विषमे जः । अपरेऽद्ध लः पण्ठे लक्ष्मेदं * नियतमार्यायाः ॥ २ ।। पूर्वार्द्धं पष्ठे न्ले नल्ले" पूर्वे यतिरिह मुनिगणगे । तस्मिन् पष्ठप्रान्ते यतिरुदिता मुनिभिरिह मुख्यैः ।। ३ ।। अपरात्रै पञ्चमके न्ले सति सोक्ता चतुर्थगणनिधने । श्रीकुम्भकर्णनृपतियुक्तमिह वदति तामार्याम् ।। ४ ।। यस्यामर्द्धद्वितये [२६B] भवति यतिश्च त्रयेऽत्र सा पथ्या ।। ५ ॥ पूर्वार्द्ध मुख्यचपला” च-त्रययतिविरहिता सदा-वि[हिता*B] [जघन]* विपुला परार्द्ध* च-अययतिविरहिता गदिता ॥ ६ ॥ प्रोक्ताऽर्द्धयोर्द्वयोर्या यतिरहिता [च-त्र] ये महाविपुला । शेपा विस्तररीत्या भेदा नोक्ता महासुधिया17 ॥ ७ ॥ जगणविहीना विषमे चत्वारः पञ्च युजि चतुर्मात्राः । द्वी षष्ठाविति चगणास्तद्घातात्12 प्रथमदलसंख्या ।। ८ ।। एवमपरार्द्धसंख्या पष्ठे स्याल्लघुनि चैकस्मिन्13 | 1"पार्यासंख्योभयदलसंख्याघाताद्विनिर्दिष्टा14 | E 115 प्रतिस्थित पाठ १. नमस्फुर्यो। २. *न्लो । *सप्त वा । *ल दी दं। ६. "दो अक्षरों का स्थान रिक्त । *तीन अक्षरों का स्थान रिक्त । *पलाढ़ें। अक्षरों का स्थान रिफ्त । ८. *"चतुर्माया' के पहले 'पञ्च' अधिक है। ७. *दो । 4. P. । . 1. B. नमस्कारा। 2. P. पष्ठोन्लो। 3. P. पप्ठो। तल्ले 5. P. श्रीकालसेन · । । G. B. यस्यामधे द्वितीये। 7. P. मुखचपला। 8. P. सदाभिमता। 9-9. P. द्वयोर्द्वयोर्या यतिरहिता। 10. P. विस्तरभीत्या। II. P. मया सुधिया । 12. K. ० स्तद्यातात् स्तद्योगात्] 1 1 3. P. चैक एफस्मिन्; B. चैकस्मिन् । 1 4:14. P. प्रार्या संख्योभय० । 15. वृत्तरत्नाफर को नारायणी टीका में श्लोक सं० ८ और है इस रूप में मिलते हैं..- जगणविहीना घिषमे चत्वारः पञ्च युजि चतुर्मात्राः । पल्ट द्वाविति चगणास्तथाऽवत: प्रथमदलसह ख्या.।। एवमपराद्ध संख्या पप्ठे स्याल्लघुनि चैकस्मिन् । श्रार्यासह त्योभयदलसह ख्याघाताद्विनिर्दिष्टा ।। - मार्यावलोकन नाम तृतीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ५५ . अन्योन्यं प्रथमदले ताडनयाऽष्टौ शतानि जायन्ते । अर्कसहस्राण्येवं चरमेऽद्धेऽन्योन्यताडनया ॥ १० ॥ षट्साहस्री गदिता चतुःशती चाप्युभयदलविकल्पाः । अन्योऽन्यं ताडनया जायन्ते कोटयश्चाष्टौ ॥ ११ ॥ लक्षाणामेकोना वितरिह विंशतिः सहस्राणाम् । आर्याभेदा उक्ताः षष्ठे ले त्वे[क]एकस्मिन् ।। १२ ।। आय वेयं गाथा प्राकृतभाषापथे विनिर्दिष्टा । गीतिविशेषानधुना शिवजायांसेवको ब्रूते ।। १३ ॥ द्विर्य २७A]स्या आर्याया अभ्यासो जायते दले प्रथमे । सा तन्नाम्ना गीतिः स्यादुप] गीतिस्तथा चरमे ॥ १४ ॥ दलयोरत्रोभययोः स्यादुद्गोतिः कृते विपर्यासे । तत्तन्नाम्ना सर्वा जायन्ते भेदतो ह्यमिताः ॥ १५ ॥ त्रिंशन्मात्रास्तु पूर्वार्द्ध विंशतिः सप्त चापरे । सप्तपञ्चाशदुभयोर्मात्रा ज्ञेयास्तु योगतः ॥ १६ ।। त्रिंशतो येऽधिका वर्णा द्विगुणास्ते त्रयाधिकाः। लघवस्तेऽत्र विज्ञेयाः शेषास्तु गुरवो मताः ।। १७ ।। ऊनिता अथवा वर्णर्मात्राः स्युर्मुरवोऽखिलाः । गुरुभिस्तूनिता वर्णा लघवः परिकीर्तिताः ।। १८ ।। वसन्तोत्सवबन्धः* स्यान्नवभिः पञ्चमात्रिकैः । द्विषष्ट्यन्ते' तथा गीतौ द्विभङ्गिः परिकीर्तितः ।। १६ ।। द्विपद्यन्ते *तथा गीतिरन्ते मध्येऽवलम्बकम् । स त्रिभङ्गिद्विपदिका 'दद्वयं चाथ दद्वयम्' ।। २० ।। • - - प्रतिस्थित पाठ १४. *पांच वर्षों का स्थान रिक्त है । १६. *वापरे । १६ *वसन्तोत्सवः प्रबन्धः। *पंचमातृकः। २० *द्विपद्यान्ते। I. B. लक्षाणामेनोना । 2. P. तदा। 3. P. दलयोरत्रोभयोः । 4. B. भेदितो। 5. B. लघवस्तत्र। 6. A. पंचमात्रकैः । B. पंचमातृकैः । 7. P. द्विपद्यन्ते। 8. P. द्विपद्यादौ । 9-9. P. दद्वयं चाप्यदढयं । K. तद्ववयं च पदद्वयम् । .
५६ ] सङ्गीतराज [३ छन्द उल्लास लघुद्वौ * चस्तथा दौ*1 लास्त्रयः कर्पूरपूर्विका । तिथिच्छेदेऽश्वचैर्नेऽन्त्ये द्विपदी* विषमेऽपि जे ॥ २१ ॥ इति वा । ललितौ विच्युतः सप्त चगणैः स्युः परा अपि । लयोऽथ भ्रमरपदमुपपूर्ण तदेव हि ॥ २२ ।। कुङ कुमाङ्गसूडपदं हरिणीपदमेव च । कमला[२७B]करं भ्रमररुतं स्याद्रत्नकण्ठिका* ॥ २३ ॥ कुङ कुमतिलकावली कदलोपत्रमित्यपि । एवमा_स्त्रिभिभ्यिां योगे स्याद्वस्त्वनेकशः ॥ २४ ॥ चतुर्मात्र[व]यं पञ्चमात्रं स्यात् खञ्जनामकः । षण्मात्रश्चतुर्मात्रस्त्रिमात्रश्चोपखञ्जकम् ॥ २५ ॥ षण्मात्री* द्वौ चतुर्मात्री* खञ्जिकाथावलम्बकः एते त्रयः पृथरभेदास्त्रिभङ्गिः स्यात् परैरपि ॥ २६ ।। त्रिभिर्मनोहरैश्छायाभिः. स्वेच्छया ग्रथितैरपि चद्वयं लघुकान्तौ द्वौ तगणौ चगणद्वयम् ।। २७ ।। तगणश्चेदृशैः पादैश्चतुभिर्वस्तुकं भवेत् । विषमे सप्त मात्राः स्युः समे यस्य त्रयोदश ॥ २८ ॥ स रासो विषमे पञ्चमात्री द्वौ च तथैकदः ।10 युग्मे च चत्रयं पञ्चपदा11 मात्राभिरीरिता ॥ २६ ॥ आसां तृतीयपादस्य प्राप्ते स्यात् पञ्चमेन तु । अन्ते तु दोहके वस्तु रड्डा वा परिकीर्तिता ।। ३० ॥ 6 प्रतिस्थित पाठ- २१. * लघुदी। *वस्तथादो । *कर्पूरपूर्विकाः । *द्विषदी *विषमेषि २३. * रक्तकण्ठिका। २६, *षण्मात्री 'चतुर्मात्रै । I. P. लघुद्वौ च तथा दौ । 2-2. P. विषमे वि(ऽपि)जे । 3-3. P. यतिवैचित्र्यतः । 4. P. कुङकुमो गरुडपदं । 5. A. ० मात्र । 6. P. खञ्जिकाथावलम्बकम् । 7. P. A. B. ०छन्दोभिः । 8.8. P. स्वेच्छाग्रथितैरपि। 9. P. भगणः सदृशः । 10. P. तथैकदा A. तथैकदः, B. तयेकद II. P. पञ्चपदी। 12. P. मात्रादिरीरिता । वस्तुरडा(?); A. 'डा' अक्षर स्पष्ट नहीं है । 13. P.
पार्यावलोकन नाम तृतीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ५७ आद्यन्तयोश्च षण्मात्रे चत्रये मध्यगे सति । 1*प्रोजेजो वस्तुवदनं समे जो ग्लौ*1 विकल्पतः ।। ३० ॥ स्याद्रासावलयं पूर्वमोजः षश्चषौ [पा]त्ततः । षचतेभ्यः परे ते स्याद्वदनं* चोपपूर्वकम् ।। ३१ ।। षचचा[२८]हो वदनक* यमिते तेऽडिला:* स्मृताः। स्यादष्टषट्चतुःपाच्च धवलं तन्निरूप्यते ॥ ३२ ।। श्रीयशो गुणपूर्वं तत् क्रमादोजे तु चत्रयम् । दः समे चौ श्रीधवलं तथाये च तृतीयके ।। ३३ ।। तथाविधे द्वितीये च तथा तुर्ये तु चत्रयम् । पञ्चमे सप्तमे द्वौ चौ तश्चैकः समयोः* पुनः ॥ ३४ ॥ चद्वयं दस्तथा चैकश्चत्रयं वा यशः परम् । धवलं तु षडंह्रो त्वाद्ये चतुर्थे तु षद्वयम् ।। ३५ ।। द्वौ द्वितीये' पञ्चमे च दी षष्ठे* च तृतीयके । षद्वयाऽथ 10 कीर्तिधवलं चतुरंहिके ॥ ३६ ।। पश्चौ* जे षचचाद्दस्तो वातः स्याद्गुणपूर्वकम् । आद्ययोः षश्चत्रयं11 च प्रत्येकं त्वन्त्ययोस्तथा ।। ३७ ।। पञ्च चाः सर्वपादेषु 12 चान्ते तो दोऽथ मङ्गलम् । आदिस्ते वदनाये तु तदाधं धवलादिकम् ॥ ३८ ॥ यदाह उत्साहहेलावदनाडिलाद्यैः* संजायते मङ्गलवाचि किञ्चित् । प्रतिस्थित पाठ- ३०. *नो जे जो वस्तुवदनं समे ग्लो। ३१. *स्यावदनं। ३२. *वदकं । *विसर्ग नहीं है । *स्मृता। ३३. *चस्वयं । ३४. *तृतीये । *समयो । ३७. *पश्चो। ३८. तोदनाये। ३६. *वदनानिलाय। *वात । I-I. P. समे जो वस्तुवदनमोजे जो न्लो 2.2. P. पूर्वमोजश्च चषपो (पा?)ततः B. मोजश्चषपौ। 3-3 P. K. श्रीयशसो गुणपूर्व क्रमाद्दोजे तु चत्रयं !; A. तत्क्रमादोजे । .4. P. दशमे; B. दसमे । 5. P. द्वितीये। 6. P. षड्गौ; A. षटद्गौ। 7. P. चतुर्थे (ऽपि)तु षद्वयम् | B. षद्वयम् । 7. B. द्वितीये तु पंञ्चमे । 8. P. तु। P. षट्ठ- याच्चेऽथ । 10. P. पे। II. B. षचत्रयं Kषत्रयं चश्च । 12-12, P. चात्ततो K. चात्तोदोऽथ तु मङ्गलम् | A. B. चांततो। 13. A. धवलादिकान्; B. धवलादिक । 14. P. यद् गीयते। 9. P. .
५८ ] सङ्गीतराज [३. छन्द उल्लास तद्रूपकाणामभिधानपूर्व छन्दोविदो मङ्गलमामनन्ति' ।। ३६ ॥ चत्रयं दो यदा पादे तदा डुम्बडकं मतम् । घत्ता ध्रुवकसंज्ञेयं ध्र वा त्रेधा मता सताम् ।। ४० ॥ षट्पदी चतुःपदी' च द्विपदी चेति[२८ B]नामभिः । सप्तादिसप्तदशान्तकलाः पादास्तु पूर्वयोः ।। ४१ ।। तत्र सप्त कला: पादे10 च 11ती चाथ पदी गणौ11 । अष्ट षत्वे12 पती पदी नवकले13 षतौ पचौ ॥ ४२ ॥ चषो च14 दोऽथवा पौ च चरणे तु दशाक्षरे । चपदा: पचदा वापि रुद्राणे चरणे गणाः ।। ४३ ।। चपताः षचताश्चेति15 पदे द्वादशवर्णके। त्रयोदशाक्षरे पादे पौ तश्च चपषा*16 स्मृताः ॥ ४४ ।। चत्रयं दौ तु षश्चौ च चरणे तु चतुर्दशे । चत्रयं तोऽथवा पानां* त्रयं पञ्चदशांह्रिके ।। ४५ ॥ षद्वयं च: षोडशांह्रौ दचतुष्कं तु चद्विकम् । पादे सप्तदशकले षश्चौ* 2 °तश्चत्रयं तु प:2० ॥ ४६ ।। ४४. *चकषाः। ४५. *दोषचश्चाथ । प्रतिस्थित पाठ-४३. *पञ्चदा धापि । ४६. *श्चो तश्च । I. K. ०माचरन्ति । 2. प्राचार्य हेमचन्द्रकृत छन्दोऽनुशासन की स्वोपज्ञ टीका में यह पद्य यथावत् मिलता है । 3. B. चत्रय । 4. P. कम्बडकम् । K. कम्बलकम् । छन्दोऽनुशासन में हेमचन्द्र ने इस लक्षण के छन्द का नाम 'झम्बटकम्' लिखा है । यथा- 'गाने चिदौ झम्बटकम्' । यस्य कस्यचिद्गाने चगणत्रयं द्विमात्रश्च पादे चेत्तदा झम्बटकम् ॥" 5. P. यत्ता (त्सा)। 6. B. ध्रुवो। 7. P, चतुष्पदी। A. चतुःपदी । 8. B. 9. P. सप्तकले। 10. P. में नहीं है। II-II. P. चतो पदो गणो मतो। 12. P. अष्टाक्षरे । 13. P. नद्याक्षरे । 14. P. चद्वयं। छन्दोऽनुशासन में लक्षण इस प्रकार है-'अंश्चादौ पचों पोवा।' 15. P. षचता वेति । 16. P. तषकाः । दास्तु। 18. P. चद्वयं । 19. P. दचदुष्क। B. में 'चतुष्क' के पहले 'द' नहीं है । 20-20. P. तश्चत्रयं तु षः; I A. तः च, B. त च । ०कालाः। 17. P.
मार्यावलोकन नाम तृतीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ५६ 5 6 [एवं]* गण स्त्रिभिस्तुल्यैस्तुल्यातुल्यैरतुल्यकैः । पादा यत्र भवन्त्यः षट्पदी सा प्रकीर्तिता ।। ४७ ।। अस्यामाद्यस्य पादस्य द्वितीयस्य तथा पुनः । तृतीयस्य तु षष्ठेन तुर्यस्य पञ्चमेन तु* ॥ ४८ ।। अनुप्रासस्तु कर्त्तव्यः प्रायेण द्विचतुर्थयोः । चतुष्पदी विशेषास्तु वस्तुकार्द्ध समादयः ।। ४६ ।। "अनुप्रासंस्तु कर्तव्यश्चतुष्पद्यामथोच्यते । प्रथमस्य द्वितीयेन तृतीयस्येतरेण तु ॥ ५० ॥ [२६A] ओजे' कलास्तु सप्ताद्या: षोडशान्ताः समे पुनः । प्रत्येक सैकिकाः सप्तदशान्ताः परिकीर्तिताः । व्यामिश्राद्ध समा सर्वसमा संकीर्ण काश्च ताः ।। ५१ ।। चम्पक*-कुसुम-सामुद्रक-मल्हरणक-सुभगविलास-केसर रावणहस्तक-सिंह- विजृम्भित *-मकरंदिका-मधुकरविलसित-चम्पक' कुसुमावर्ताः । मणिरत्नप्रभा-कुङ कुमतिलक*-चम्पकशेखर11-क्रीडनक1 2* बकुलामोद- मन्मथतिलक-मालाविलसित*-पुण्यामलक-नवकुसुमितपल्लवाः ॥ ५२ ॥ मलयमारुत-मदनावास-माङ्गलिकाभिसारिका-कुसुमनिरन्तर-मदनोदक-चन्द्रो- द्योत-रत्नावल्यः ॥ ५३ ।। भ्रू वक्ररणक' 3-मुक्ताफलमाला-कोकिलावली-मधुकरवृन्द-केतकीकुसुम-नव- विद्युन्माला-त्रिवलीतरङ्गकाणि ।। ५४ ।। . प्रतिस्थित पाठ-४७.*दो वर्णों का स्थान रिक्त । ४८. *तुः। *यहाँ ५० का अंक दिया है, अगला पद्यांक भी ५० ही है । ५१. *समासर्वममा। ५२. *पञ्चम | *विजत० । तिलकं । क्रीडन । *विलसित। भवन्त्यढे। 4: I. P. एवं गुणः। B. एवं ग गुणः। 2-2. P. पादत्रयं भवत्यर्थे । A. B. पादत्रय 3. P. द्वितीयेन । P. वस्तुकार्थ । 5. P. में ४६ वें और ५० वें पद्य में विपर्यय है । 6-6 B. अनुप्रासस्तु कर्त्तव्यो धीमता द्विचतुर्थयोः। इसके प्रागे ५० वें पद्य की दूसरी पंक्ति है । ४६ वें की दूसरी पंक्ति छूट गई । 7. P. ओं(?)जे। B. ओं ों जे। 8-8 P. समासदसमा (s)संकीर्ण०; A. B. समासर्वसर्व० । 9. B. केशर । K.चंपक। II. A. पंचकशेषर; B. चंपक शेषर । 12. P. क्रीडन । 13. हेमचन्द्र ने इसका नाम 'भ्रूचक्रणक' दिया है । 10. P. पञ्चक।
६० ] सङ्गीतराज [३. छन्द उल्लास अरविन्दक-विभ्रमविलसितवदन-नवपुष्पंधय-किन्नरमिथुनविलास-विद्याधर- विलसितलीला-सारङ्गाः ।। ५५ ।। कामिनीहासापदोहक-प्रेमविलास-काञ्चनमाला-जलधरविलसिताः ॥ ५६ ।। अभिनव-मृगाङ्कलेखा-सहकारकुसुम[२६B]मञ्जरी-कामिनीजीवनक'-कामिनी- कङ्कण-हस्तकाः ।। ५७ ।। सुखपाल-तिलक-वसन्तलेखा-मधुरालापनिकाश्च ॥ ५८ ॥ मुखपंक्ति-कुसुमलतागृहे रत्नमाला चेति पञ्चपञ्चाशद्भदाः ।। ५६ ।। व्यत्यासे* सुमनोरमा-पङ्कज-कुञ्जर-मदनातुर-भ्रमरा[वलि]मुखपङ्कजश्री- किङ्किणी-कुङ कुमलता-शशिशेखरलीलालयाः ॥ ६० ॥ चन्द्रहासमधुर-वचना -कुसुममाल-मालतीकुसुम-नागकेसर-नवचम्पक- माला -विद्याधरकुब्जक-कुसुमकुसुमास्तरणाः ।। ६१ ॥ मधुकरीसंलाप-मुखवास-कुङ कुमलेखा-कुवलयदाम-कलहंस-सन्ध्यावली'- कुञ्जरललिता-कुसुमवल्ल्यः ॥ ६२ ॥ विद्युल्लता-पञ्चाननलालिता - मरकतमाला - अभिनववसन्तश्री-मनोहरा- क्षिप्तिका -किन्नरलीलाः ।। ६३ ।। मकरध्वजहास-कुसुमाकुलमधुकर-भ्रमरविलास*-मदनविलास-विद्याधरहास- कुसुमायुधशेखराः ।। ६४ ॥ उपदोहक-दोहक-चन्द्रलेखिका-सुतालिङ्गन-कङ्कल्लिलता-भवनानि ॥ ६५ ॥ कुसुमित केतकीहस्त-कुञ्जरविलसित-राजहंसाशोक[३०]पल्लवच्छायाः ।। ६६॥ अनङ्गलता-मन्मथविलसित-हुल्लणकानि । कज्जललेखा-किलकिञ्चिते* शशिविम्बितं चेति ता बद्धाः ॥ ६७ ।। प्रतिस्थित पाठ- ६०. *वासन्त्य। ६२. *संघावली। ६३. *पंचाननलालसा । *.क्षिप्तका। ६४. *समरविलास। ६७. *झल्लणकानि । *किलि. किञ्चते । *बद्धा। I. P. क्रीडनक० । 2. P. मधुरालापिनीहस्ताः । 3-3. P. रत्नमाला च । इति एञ्चपञ्चाशदभेदाः ।। 4. P. गोरोचना० । 5. P. कुसुमबाण। 6. P. नवपञ्चकमाला।
पार्यावलोकन नाम तृतीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ६१ शुद्धा द्विपदिका पादे पश्चा* पञ्च च गान्तकाः । जौ स्तः षष्ठद्वितीयौ तु मात्रा-द्विपदिका ततः ।। ६८ ॥ षष्ठेनैकेन गुरुणा पूर्णा शुद्धैव गाधिका' । षश्च द्वयं मानवी स्यात् पौ तौ* लौ चन्द्रिका मता। षश्चत्रयं धृतिस्तारान्तगा षष्पचतुष्टयम् ॥ ६६ ॥ इति द्विपदी॥ प्रानन्त्यान्न प्रतन्यन्ते द्विपद्यादेभिदा मया । प्रबन्धविधिहेतुत्वात् काश्चिदत्रोपवणिताः' ।। ७० ।। कलहंसो नभौ जयौ ।। ७१ ।। षो गणद्विपदी नाम चतौ सा स्वरपूर्विका । उपगन्धर्वकं नाम पत्रयं चचतुष्टयम् ॥ ७२ ।। दश्चाकैर्वसुभिः श्रान्तो तत् संगीतं यतो पुनः । 10*चतुर्दभिरष्टाभिश्चर्चरी षश्च10* सप्तकम् ॥ ७३ ।। त्रिमात्रश्च11 यतिश्चात्र चतुर्दशभिरष्टभिः । चतुर्भिश्चगणः प्रोक्ता पद्धडी, रासकः पुनः।। ७४ ॥ मात्राभिरष्टादशभिर्नगणेन यतो पुनः । चतुर्दशभिरेवायं मात्राभिः कथितो बुधैः ।। ७५ ॥ केषांचिज्जातयः सर्वा रासकाः सम्मते मताः । चपञ्चकं12 लघुगुरू यदि[३०B]वा रासको मतः। गोपालानां तथा क्रीडा रास इत्यभिधीयते ॥ ७६ ॥ प्रतिस्थित पाठ-६८. *पश्चाः। *कान्तकाः। ६६. *तो। *षश्च चतुष्टयम् । ७२. *यो । ७३. *-* चतुर्दशभिश्चच्चरी षश्च षश्च । 4. P. । I. P. शुद्धद्विपदिकापादे। 2. P. जो(जो)स्तः । 3. P. गान्धिकाः। स्या(त्)। 5. B. पुष्पचतुष्टयम् । 6. B. तन्यन्ते । 7. P. काश्चिदेव हि वणिताः । A.B. काश्चिदशेषणिताः । 8. K. श्रान्तेः। - P. में 'लान्ते' अथवा 'गान्ते' पाठ अधिक सार्थक बताया गया है। 9. B. तत्संगीतयंती। 10-10. P. चतुर्दशभिरष्टाभिश्च चरोष(?)श्च । II. P. निमात्रस्य । 12. B. च चंपकं।
६२ ] सङ्गीतराज [ ३. छन्द उल्लास में विश्व मानवस्तिथयो गुणचन्द्रौ शरविधू शिखीन्दू च । तिथयो विश्वे विषमे समे तु रव्यंक* विश्वमनुरवयः ।। ७७ ॥ गुणचन्द्रौ युगचन्द्रौ षोडशसंख्याकलाः क्रमशः । सारसभ्रमरौ हंसः कुररश्चन्द्रलेखिकाश्चैव कुञ्जरतिलको हंसक्रीडो ह्येतेषु निद्दिष्टाः ।। ७८ ।। लघुभिः पञ्चादिभिरिह यद्येषामर्द्धयोः शिखान्ते स्यात् । तं सूरयो मयूरं नाम शिखाद्विपथकं प्राहुः ॥ ७६ ।। रतिषष्ठदशमः कामगणस्त्रिपदी मता । एकादशभिराद्यैश्च षादौ द्वि-द्वि-गणी10 मती ।। ८० ।। चतुर्गुणद्वितीयस्तु चतुर्थस्त्रिगणस्तथा ।" तस्यामोजे13 पञ्चदश कलाः षोडश ता:* समे ।। ८१ ।। अर्द्धयोभिन्नयमको कीर्तिता सा चतुष्पदी । बाणान्ते * चरणी त्रि-त्रिगणो यस्यास्त्रिषष्ठको ॥ २ ॥ चत्वारो द्वि-द्विगणा सा गणैः कामस्य षट्पदी । तृतीये पञ्चमे चाद्ये मात्राः पञ्चदशैव तु ।। ८३ ।। तुर्ये द्वितीये रवयस्तद्वस्तु परिकीर्तितम् । प्रबन्धस्योपयोगीनि छन्दांस्युक्तानि कानिचित् ।। ८४ ॥ छन्दःशास्त्रानुसारेणोहनीयानि पराण्यपि । यस्यार्या धर्म[३१]कार्यार्थ 14चरितं पर्युपासते । तेनार्याकिङ्करेणेदं कृतमार्यापरीक्षणम् ।। ८५॥ 16इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णविरचिते तत्त्वप्रदीपे पाठ्यरत्नकोशे छन्द उल्लासे आर्यावलोकनं नाम तृतीयं परीक्षणम् ॥16 प्रतिस्थित पाठ-७७. * रव्यकं । ८१.* षोडशशताः । ८२. *बाणान्तो। . । I.P. नवतिथयो। 2. P. शरविधी। 3. P. रत्यर्क 4. B. सारसभ्रमरो। 5. P. लेखकश्चैव । 6. A. में 'म' और 'यो' के बीच का अक्षर अस्पष्ट है। P. यद्यष- मह (?)योः। 7. P. रतिरष्टदशमः । 8. P. एकादशभिराद्यौ तु । 9. P. मादी। 10. P. द्वि-द्विगुणौ । II. P. चतुर्गुणस्तृतीयस्तु । 12. P. त्रिग(गुणस्तदा । 13. P. यस्यामोजे; B. यास्यामोजे । 14. P. कामार्थ । 15. P. कृतमार्यावलोकनं । 16-16. P. इति श्रीराजाधिराजकालसेनमहीमहेन्द्रेण विरचिते संगीतराजे पाठ्यरत्नकोशे छन्द उल्लासे प्रार्यावलोकनं नाम तृतीयं परीक्षणम् । B. में 'समाप्तम्' और है ।
प्रस्तारपरिपाटी नाम चतुर्थ परीक्षण . येन प्रस्तारमाधातुं भूतानां भूतयोनिना। प्रसृतं परमाण्वादि नमस्तस्मै परात्मने ॥ १ ॥ समवृत्तस्य [तु] पादेऽर्द्धसमस्याद्धेऽखिले'तु विषमस्य । ये वर्णास्यु[]गुरवः प्रथमविकल्पे तु ते स्थाप्याः ॥ २ ॥ प्राग्रूपस्याद्याद्गोऽधो ल[:]स्यादुपरि समं तु परम् । प्रस्तारे पूर्व विधिरसमयभेदकृदिह भवेत् प्राक् ॥ ३ ॥ भूयः कुर्याद्विधिममुं यावत् सर्वलघुर्भवेत् । मात्रागणे तु प्राग्रूपमात्राः पूर्व' नयेत् सुधीः ।। ४ ।। चरणस्य व्यवस्थोक्ता नार्यादिषु पुरातनः । नष्टाके विषमे सैके गुरुः स्यादथिते पुनः ।। ५ ।। समे चार्द्ध त[दच नष्टाङ्के लघवो मताः । *प्रारभ्याधाद्विगुणितानेकतोकान् समालिखेत् ।। ६ ।। संकयुक्तैर्लघुस्थांकरुद्दिष्टस्य मतिर्भवेत् । उद्दिष्टाङ्कसमाहारात् [सैकात्]* संख्यापि लभ्यते ॥ ७ ॥ येन वर्णादिवृत्तानां विन्यासः प्रसृतो भुवि । तेन श्रीकुम्भकर्णेन' प्रस्तारोऽयं प्रपञ्चितः ।। ८ ।। [३१B] इति श्रीराजाधिराजमहीमहेन्द्रश्रीकुम्भकर्णविरचिते छन्द उल्लासे प्रस्तारपरिपाटी नाम चतुर्थं परीक्षणम् ।। छ ।। छन्द उल्लासश्च तृतीयः समाप्त: ॥8 प्रतिस्थित पाठ- ६. *प्रारम्याद्याद्विगुणितातानेकतोंकात् समालिखेत् । ७. *स्थान रिक्त है । I. B. पादेधर्ममस्याऽखिले । 2. P. पूर्वविधिस्समय० । 3. P. प्राज्ञः। 4. P. प्राधे- पमात्रापूत्तिम् । 5. B. नेकतोंकान् । 6. P. मितिर्भवेत् । यहाँ छन्दोभंग है । श्रीकालसेनेन। 8-8. P. इति श्रीजगदीशवनदेवनिजगणेन जगदीश्वरीकामाक्षा' -चरणकिङ्करेण श्रीब्रह्माद्रिविभुना अध्युष्टतमनरेश्वरेण भीष्मपुरजयानीतानेकराजकन्यारत्नेन श्रीपुरग्रहण- 7. P. १. K. कामाक्षी। Arthatam ६४ ] सङ्गीतराज [ ३. छन्द उल्लास संबंधितयशोभरेण वाटिकाचलग्रहणजनितकीर्तिपुरपराजिताचलनायकेन संगमनीरदुर्गोद्धरणो'. द्ध तसकलमण्डलाधीश्वरेण दमनपुरविध्वंसनबन्दीकृतयवनीनिचयेन महिषमेरुजयाजेयविभवेन शाकम्भरीरमणपरिशीलनपरिप्राप्तशाकम्भरीपरितोषितशाकम्भरीप्रमुखशक्तित्रयेण अष्टादश- गिरिशिखरपरिवारिताञ्जनगिरिविजयविख्यातवीर्यगण महदम्बमातृकापुरोद्ध लनर्षित- महोरगपुरेण श्रीवनदेवस्वामिप्रसादरचनापरपरमेश्वरेण त्र्यम्बकेश्वरसन्निधिकीर्तिस्तम्भोन्नत- जयस्तम्भेन श्रीब्रह्मगिरिभौमस्वर्गयथार्थीकरणरचितचारुपयेन श्रीकामेश्वरी गिरिनवोननिर्मिति- पराजितसुमेरुणा श्रीमहिषाचलोपरि श्रीहरिचरणरचिताचलदुगण अभिनवभरताचार्येण वीण.- वादनप्रवीणेन यवनकुलाकाल-कालरात्रिरूपेण त्रिसन्ध्याक्षेत्र समुद्रसंभवरोहिणीरमणेन परमभागवतेन महाराजाधिराज महाराणाक्षीमृगाङ्कतामराजनन्दनेन महाराज्ञीसौभाग्य- वतीजसमाम्बिकाहृदयनन्दनेन सफलसोमन्तिनीशिरोमणिकुम्भराजन्यावतंसमहाराज्ञी श्रीकर्मवतीलषु (घु)मावतीहृदयाधिनाथेन श्रीराजाधिराजश्रीकालसेनेन विरचिते संगीतराजे षोडशसाहस्रयां संगीतमीमांसाया पाठ्यरत्नकोशे छन्द उल्लासे प्रस्तारपरिपाटी नाम चतुर्थ परीक्षणम् । । छन्द उल्लासस्तृतीयः समाप्तः ।। ४. K. मैं १. K. दुर्गाद्ध तक। २. A. में 'काल' नहीं है। ३. A. संध्य"। 'महाराजाधिराज' नहीं है। ५. B. में 'नायेन' के बाद इति' और है ।
४. अलङ्कारोल्लास-उद्देश नाम प्रथम परीक्षण - -- क्रियते स्वस्वसिद्धान्तैस्तीथिकर्यस्य* लक्षणम् । वृषादिलक्षणं नौमि सि[द्धिम]त्सद्विलक्षणम् ॥ १ ॥ प्रमदा इव नो भान्ति प्रबन्धाः सुष्ठ्वलंकृताः । विलक्षणा अतो लक्ष्म" ब्रुवेऽलंकृतिभिरिह ॥ २ ॥ विभूषणं तथा शोभाभिमानोऽक्षरसंगतिः । प्रोत्साहायुदाहरणे निरुक्तं गुणकीर्तनम् ।। ३ ।। गुणानुवादोऽतिशयो हेतुः सारूप्यसिद्धयः । पदोच्च*[याकन्द मिथ्याव्यवसायप्रियाशिषः ॥ ४ ॥ प्राप्तिश्च पश्चात्तापनं संशयोऽर्थानुवर्तनम् । कार्यनिर्भासनाख्यान -याञ्चायुक्त्यनुनीतयः ॥ ५ ॥ दृष्टान्तप्रतिषेधौ10 च क्षमा पृच्छा11 ततः परम् । मनोरथोपपत्ती च कपट परिदेवनम् ॥ ६ ॥ पत्रिंश देतान्युक्तानि लक्षणानि समासतः । उपमाद्यैरलङ्कारः सम्मितानि च ते यथा ॥ ७ ।। उपमा दीपकञ्चैव रूपकं यमकं तथा । चत्वारोऽमी समादिष्टा अलङ्काराः पुरातनैः ।। ८ ॥ लक्षणा13 ल[३२]क्षणैरेभिर्नानावृत्तै विचित्रिताः । बुधैः प्रबन्धाः कर्तव्या नानालंकृत्यलंकृताः ।। ६ ।। । २. *वेऽलंकृतिभि रह । ४. *यदोच्च । प्रतिस्थित पाठ- १. *तीर्थकर्यस्य । ६. *परिवेदनम् । I-I. P. तमससिद्धिलक्षणम् । 2. P. प्रतस्तानि(?)। 3-3. P. (ब)वेऽलंकृतिभिः 4. P. प्रोत्साहनोदाहरणे। 5. P. हेतुसारूप्य० । 6. P. मिथ्याध्यवसायप्रिया- शिषः । A. प्रियशिश:(?) B. प्रियाशिखः । 7. P. संशयोत्थानुवर्तनं । 8. K. निर्भ- सनाख्यान० । 9. B. युक्तानुनीतयः। 10. P. प्रतिषिद्धौ (षेधों) । II. P. श्रद्धा। 12. B. षड्विंशत्रिश... | 13. P. लक्षिता। .
६६ ]
सङ्गीतराज
[ ४. अलङ्कारोल्लास
अल्पमुद्दिश्यते येन दीयते बह्वहर्निशम् ।
तेन भूषितविज्ञेन राज्ञोद्दिष्टं विभूषणम् ।। १० ।।
इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णविरचिते. संगीतराजे पाठयरत्नकोशेऽलङ्कारोल्लासे
उद्देशपरीक्षणं प्रथमं समाप्तम् ।।
T-1. P. इति श्रीराजाधिराजश्रीकालसेनविरचिते संगीतराजे पाठ्यरत्नकोशे प्रलं.
कारोल्लासे उद्देशपरीक्षणं प्रथम (समाप्तम्) ।।
लक्षण नाम द्वितीय परीक्षण महाभूतादिकानर्थान् योऽञ्जसा सृजतीश्वरः । अलंकृतिनिमित्तं तं पदार्थानां नमाम्यहम् ॥ १ ॥ यथारसं येन निरूपितेषु भवन्त्युपादेयगुणाः प्रबन्धाः । तदर्थशोभाजननार्थमेषां प्रचक्ष्महे भूषणलक्षणानि ।। २ ।। अलङ्कारैर्गुणैश्चैव भूषणैरिव यद्युतम् । रूपकं रसवद्भाति तद्भूषणमितीरितम् ॥ ३ ॥ यथा- उच्चस्फाटिकहय॑भित्तिविलसत् सत्पद्मरागांशुभिः सिन्दूरप्रकरैरिवातिविततैनित्ये वसन्तोत्सवे । चञ्चद्हेमघटावतंसविलसन्नानानिलिम्पालय- रिन्द्रस्येति पुरी* विभाति सततं श्रीचित्रकूटालयः ॥ ४ ॥ इति विभूषणम् ॥ १ ॥ पूर्वसिद्धार्थवाक्येनाप्रसिद्धार्थ[स्य साधनम् । यत्र श्लक्ष्णविचित्रार्थी तां शोभां जगदुर्बुधाः ॥ ५ ॥ [३२B] यथा- . श्रीकुम्भेन' किरीटिनेव* शतशो दन्दयमाने कुले शाके कौरववत्सुयोधन इव त्वय्येकशेषं गते । त्वं रे मालवभूमिनाथ कुरुषे नो चेन्मदीयं वच- स्तन्मन्ये विधिनात्तुमीप्सित इदं मंत्र्यं च शाठ्य* रणे11 ॥ ६ ॥ इति शोभा ।। २ ।। प्रतिस्थित पाठ- ४. *पुरा। ६. *किरीटेनेव । *मंत्र्यंन शाय। I. A. B. योजसा । 2. P. येषु । 3-3. P. तदत्र० । 4. P. विसरत् । B. विसर- सत्पद्म"। 5. P. नित्यं । B. विततेनित्ये । 6. B. में केवल इ की मात्रा (f) है और 'लंपालय नहीं है। 7. श्रीब्रह्मशैलालयः। 8-8. P. पूर्वसिद्धार्थवाक्येन प्रसिद्धार्थस्य साधनम् । 9. P. श्रीकृष्णेन । 10. B. विधिना तमीप्सित | K. विधिना त्वमीप्सित । II.B. में 'शाठ्य' से पहले 'च' नहीं है।
६८ ] सङ्गीतराज [४. अलङ्कारोल्लास सहेतुकों* वचनैः प्रतिषिद्धोऽप्यनेकशः । न निवर्तेत यत्रासावभिमान इति स्मृतः ।। ७ ।। यथा- येनानर्गलदुर्गवर्गजयिना नाजीगणन्* वैरिणो दुर्गाग्रयो जयते क एष समरे भूपेन शौर्याब्धिना' । [ध्वस्ते भीतमभूदलं. शककुलं सारङ्गपूर्वे पुरे *[त्वं शेषोऽसि विमुञ्च गर्वमधुना स्वं जीवितं पालय]* ॥ ८॥ इत्यभिमानः ॥ ३ ॥ संश्लेषो यत्र वर्णानां वर्णवैचित्र्यतामगात् । 'तामित्यक्षरविन्यासां विदुरक्षरसंगतिम् ॥ ६ ॥ 6 यथा- या [सुलभा न सुरेशान्*] सुरतरुतः परिजनेन तामस्मै । वितरति कुम्भ*महीपतिरभिमतततिरभिमुखीभूतः ।। १० ।। इत्यक्षरसंगतिः ।। ४ ॥ 1°यत्रास्पष्टगुणोपेतैः10 सोपमानैर्वचोभरैः। गूढाथै यकोत्साहयोगः प्रोत्साहनं तु तत् ॥ ११ ॥ [३३] [यथा- उद्दण्ड[:]पटहध्वनिर्घनघनप्रध्वाननाभैरवो11 हेषा-"तुङ्गतुरङ्गमायखुरलीशब्दानुगा श्रूयते । दिग्दन्तावलदन्तभेदनपटुर्वीरालिसिंहध्वनि- निन्ये शैलशिलोच्चयान् पुनरहो कस्मादकस्मादिव ।। १२ ॥ इति प्रोत्साहनम् ।। ५ ॥ प्रतिस्थित पाट- ७. *सहेतुकयो । ८. *नाजोगणो। *'लं' के स्थान पर 'सं' है। *यह पंक्ति नहीं है, स्थान रिक्त है । ६. विदुरक्षयसंगतिम् । १०. *'यस्य' के बाद स्थान रिक्त है । 'भ' अक्षर छूट गया है। . I. B. प्रतिपद्धोप्यनेकशः। 2. P. ये नानर्गलदुगवर्गजयिना(नो)। 3-3. P. हि कुरङ्ग एप समरे भूपेन शौर्याहतः । B. एषस्समरे । 4. P. श्रीशुक्लपूर्वे। 5. A. स्व- जीवितं । 6-6. P. संश्लेषोऽक्षरगतो यत्र वैचित्र्यभाग्भवेत् । 7-7. P. तामत्यक्षर... संगतिम् । B. सगतिः । 8. A. B. विरति । 9.9. P. कालुजिभूपतिरभिमतततिमभि- मुखीभूतः। 10-10. K. यत्रास्त्यष्टगुणोपेतः । II. B. भैरव। 12. P. हषा। 13. P. भिन्दिन् । - ..
20NAApt- लक्षण नाम द्वितीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ६६ श्रवणादेव' शब्दस्य यत्र कार्यान्तराण्यपि । प्रयुक्तान्यपि सिद्ध्यन्ति तंदुदाहरणं स्मृतम् ।। १३ ।। [यया-] लेखिन्या नलकूवरं पृथुकुचप्रारम्भगुा तथा वैदी निषधाधिपेन च रति कामेन कृष्णं श्रिया । पश्यन्त्यो मुहुरन्वहं नृपसुताः श्रीकुम्भकर्णक्षमा नाथेन स्वमतुल्यरागविभवाः सादृश्यतोऽकल्पयन् ।। १४ ।। इत्युदाहरणम् ।। ६॥ तथ्यातथ्य विभेदेन निरुक्तं* द्विविधं स्मृतम् । सिद्धिप्रसाधितं पूर्वमपरं चाप्रसाधितम् ।। १५ ॥ 6 , तथ्यं यथा- - चन्द्रः काश्मल्यमागात् कथमिति गदिते कश्चिदस्याशयज्ञो- ऽवादीदस्योदयोऽयं त्रिभुवनधवलीकारकामस्य जाने । तच्छीकुम्भस्य' राज्ञः कृर्तामति विधुभिः कीर्तिपूरैः कृतं मे तथ्यारम्भेण हृत्स्थो बहिरिति समभू[३३B]त्कालिमातथ्यमस्य ।।१६।। अतथ्यं यथा- सत्यं नासत्यमेतन् मुनिवचनमहाभ्यास योगोऽवहद्यत्10 कौशल्यं कर्मणां नो यदि कथमभजत् सोऽपि राजा द्विजानाम् । दृष्ट्वा11 श्रीकुम्भकर्णक्षितिपतियशसां राशिमुद्रिक्तक्षोभं हित्वा स्वल्पोचिती12 तां निशिचरणचणत्वोचितं1 3 कालिमानम् ।।१७ । इति निरुक्तम् ॥ ७॥] । प्रतिस्थित पाठ- १४. * नन कूवरं। १५. *नि निरुक्तं । १६.*०सस्य। १७.."प्रथ तथ्यं । *०महोभ्यासयोगो । *कालिमानाम् । t 1. P. प्रवणादेक। 2. P. अनुक्तान्यपि । 3. P. लेखित्वा । 4-4. P. पृथुचप्रा. रम्भया रम्भया । 3. P. वंदर्भा(भी) 6. P. श्रीकालसेनक्षमा-1 7. P. तच्छी- कृष्णस्य। 8. P. कृतमति । 9. B. तथ्यापूरेण । 10. P. वहेद्यत् । श्रीकालसेनक्षितिपति० । 12. P. स्वस्योंचिति । B. स्वस्यौचिति । 13. K. निशिचर- चरए । II. P.
७० ] सङ्गीतराज [४. अलङ्कारोल्लास बहूनां गुणिनां यत्र नानार्थजनितैर्गुणैः । एकोऽपदिश्यते तत्तु कोतितं गुणकीर्तनम् ।। १८ ।। यथा- -- ये दृप्तप्रतियोधशौर्यशमनप्रख्यातवीरव्रताः प्रद्युम्नप्रतिरूपका वितरणप्रावीण्य कल्पद्रुमाः । ते सारङ्गपुरे हठेन' यवना नीताः क्षयं भूभुजा धृष्टो यातु “महम्मदो धुरमिमां कालंदरी मन्दधीः ॥ १६ ॥ इति गुणकीर्तनम् [1॥ ८ ॥] उत्तमानां गुणैः स्पर्द्धा हीनानामुपमाकृते । गुणानुवादः स प्रोक्तः प्रबन्धे कुम्भभूभुजा ।। २० ।। [यथा--] ऋते हिमाद्रिं सरितः सुराणां न संभव: स्यादिति युक्तमेतत् । इत्यूहि रे' शुभ्रितसर्व लोकां विलोक्य कोति नृ[३४]पतेरमुष्य ।। २१ ।। इति गुणानुवादः ।। ६ सामान्यस्य जनस्यात्र बहूनां गुणकीर्त्तनैः । उत्तमार्थविशेषो यः स प्रोक्तोऽतिशयो बुधैः ॥ २२ ॥ . . . यथा- - पूर्णेन्दुमेतन्मुखमब्जयोनि- निर्माय पश्चात् समवाप दौस्थ्यम् । तद्दर्शनात् संकुचदासनाब्ज- मिलद्दलोत्पेषणखिन्नगात्रः ॥ २३ ॥ इत्यतिशयः [॥ १० ॥] बहूनां भाषमाणानां अनेकार्थविनिर्णयात् । सिद्धौ' समानवचने हेतुरत्रोपवर्णितः ।। २४ ।। I. A. प्राविण्य। 2-2. P. तेऽमी दल्लिपुरे० । A. नेपाऽल्लिपुहटेन । A. नेपाऽल्लिपुहटेन। B. नेपादु- लिपुहटेन । 3. P. यवनानीताः। 4-4. A, B. महम्मदोद्ध रमिमां । 5. B. कालंदरी। 6. P. कृष्णभूभुजा। 7. इत्यूह्यते । 8. P. योनि (योनि)निर्माय । 9. P. सिद्धो (द्धे) ।
लक्षण नाम द्वितीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ७१ ७ यथा- धिङ्मां' शकाधममहं प्रथमोऽभवं यद्- वैधव्यहेतुरतुलं यवनीकुलानाम् । क्षत्रोद्भवे शककुले निधने' निदानं येनाभियुक्त' इति मालवनाथ ऊचे ।। २५ ।। इति हेतुः [॥ ११ ॥] परोक्षो ऽपि हि वाच्योऽर्थो यस्माल्लक्षणसाम्यतः । उत्पद्यते ऽनुकरणात् सारूप्यं तदिहोदितम् ।। २६ ।। यथा- 8 ४ .. सम्मोचितो* नागपु[२] किलैक: स तादृशः शाङ्गपुरे* ऽपराधः । एतद्विचिन्त्यास्य लभे न10 शर्मे- त्यादिष्टवान् गुर्जरप:* स्वभृत्यान् ।। २७ ।। इति सारूप्यम् [॥ १२ ॥] बहूनां तु प्रधानानां तुल्यार्थवचनैरिह । एकार्थसाध[३४B]नं वाक्यं सिद्धिर्बुद्धिमतोच्यते ।। २८ ।। [यथा-] यद्वप्पेन11 पुराजितं भगवतः शम्भोः समाराधने यत् खुम्माणमुखैश्चित 12 नृपतिभिर्धमैकनिष्ठश्चितम् । शर्वाणी"चरणानुचिन्तनबलात् स्फीतीकृतं यत् पुन- स्तत् पुण्यं नृपकुम्भकर्णवपुषा18 स्फारं समुज्जृम्भते ।। २६ ॥ इति सिद्धिः [॥ १३ ॥] प्रशंसा क्रियते यत्र नानार्थ प्रथनात्मिका। पदैर्बहुगुणैरेकवाचकः स पदोञ्चयः ॥ ३० ।। प्रतिस्थित पाठ-२६. * परोक्षापि । २७. *शाङ्गपरे । *गूर्जरयः । .' I. B. धिक मां | A. धिक् मां। 2. P. निधनो (?)। 3. B. येनाभियुक्त । गुर्जरनाथ । 5. B. उत्पत्यते । 6-6. P. तत्सारूप्यमिहोदितम् । 7. P. मातृपुर। 8. P. कुलकः । K. किलकः । 9. P. स्थानपरे । 10. P. लभेत । II. P. श्रीतामेन । 12. P. यच्छीराममुखैश्चितं । 13. P. धर्मैकनिष्ठः सदा । B. धर्मक। कामाक्षी० । A. B. कामाक्षां।. 15. P. कालसेनवपुषा । 14. P.
७२ ] सङ्गीतराज [४. अलङ्कारोल्लास यथा- आसत्यलोकमुर्वीमहिनिलयं व्याप्य संस्थिता नित्यम् । आभाति विश्वमूर्तेर्वनमालेवास्य सत्कीर्तिः ॥ ३१ ॥ इति पदोच्चयः [।। १४ ॥] तीव्रार्थभाषणं यत्स्यात् परसादृश्ययुक्तिभिः । वस्तुस्वरूपोपन्यासे स ाक्रन्दः स्मृतो बुधैः ॥ ३२ ॥ यथा- - इत्यूह्यते संयति योऽरिवर्ग- रजातघातेषु शकेष्वकस्मात् । नवावतारं व्यसनस्य कुर्वन् कोऽप्येष कुम्भच्छलकैटभारिः ।। ३३ ।। इत्यानन्दः ॥ १५ ॥ अतस्मिन्नपि यत्रार्थे तुल्यसार्थस्य निर्णयः । स मिथ्याध्यवसायोऽस्ति*11 प्रवन्धादिषु लक्षणम् ।। ३४ ॥ यथा • . एत[३५A]न्मे शिशुभाषितं न च रुतं नो कुञ्जभूमिहं नो भृङ्गावलिगुञ्जितं मयि रुषा नाथस्य मे] हुङ् कृतम् । नो वल्ल्यश्चलपाणयः* मखिगणा इत्थं हते मालवे12 13यद् भीतेर्वचनानि[-]* मनुम्लेच्छाङ्गनाः सर्वशः13 ॥ ३५ ॥ इति मिथ्याध्यवसायः ।। १६ ।। यत्पूर्वं क्रोधजननमन्ते 4 हर्षप्रवर्धनम् । प्रियोक्तिर्गदिता सा जैराशीर्वादसमन्विता ॥ ३६ ॥] प्रतिस्थित पाठ-३१. प्राः सत्य० । ३४. *मिथ्याध्यवसायस्ते। ३५. *तीन वर्णों का स्थान रिक्त, बाद में 'हु' अक्षर है। *पाणया । *स्थाल रिक्त है। ३६. *यह पद्य प्रति में नहीं है। 3. B. 7. P. . 1. P. श्रासप्त०। 2. P. K. कोतिततिः। A. कीतिः। B. कीत्तिता। तीवयंभाषणं । 4. P. यस्मात् । 5. A.परशादृश्यं । 6. P. ०रज्ञातः । सोऽप्येष । 8. P. कालच्छलकैटभारि। 9. B. एतस्मिन्नपि । 10. P. तुल्यस्यार्थस्य। A. B. तुल्यस्यार्थेऽस्य । II. P. मिथ्याध्यवसायस्तु । 12. P. गुर्जरे 13-13. P. यद्गीतेर्वनमाश्रिता भ्रममगुर्लेच्छा गताः सर्वशः । B. भ्रममगुम्लेच्छा। म्लेंच्छां। 14. A. B. जननं मंते । A. भ्रममगु लक्षण नाम द्वितीय परीक्षण । पाठ्यरत्नकोश यथा- I "जित्वा नागपुरं बलादथ हृता शाकम्भरी हेलया जित्वा वाजयदुर्गमेरुसहितं नागं सरन्नाङ्गदम् । स्वस्थानं पुनराप यस्तदधिपं वृद्धत्वशेषीकृतं रामादप्यधिकं तवेति चरितं श्रीकुम्भकर्ण प्रभो ! ।। ३७ ॥ इति प्रियोक्तिः ।। १७ ।। वाक्यमाशंसनोपेतं मनोरथसमुद्भवम् । प्रार्थनीयपरान्या वा साशीविज्ञैरिहोच्यते ॥ ३८ ॥ यथा- यमभ्यमित्रीयितुमुद्यतासि- माशीभिरार्या इति वर्द्धयन्ति । यन्मङ्गलं वृत्रवधोद्यतस्य वृत्रहिषस्तद् भवतेऽद्य भूयात् ॥ ३९ ॥ इत्याशीः ।। १८॥ दर्शनादेकदेशस्याभिधानं' यस्य कस्यचित् । कार्यान्तरस्य सा प्राप्तिर्गदिता कुम्भभूभुजा ॥ ४० ॥ पथी- गूर्जरेशनृपव्याज-राज्यलक्ष्मी हठाहृतेः । अस्मिन् राजकरांज्यश्रीरेष्यतीत्यनुगीयते ॥ ४१ ॥ इति प्राप्तिः ।। १६ ॥ कार्योवा]प्यथवाऽकार्ये सहसैवोपपादिते । चेतसो यस्तु संतापः स पश्चात्ताप उच्यते ।। ४२ ॥ 1 T-I. P. जित्वानेकपुरा (रो)घृता भुजबलात् कामेश्वरीलीलया । नीत्वा स्वं नगरं रुषा प्रतिभटा' ये(s) खर्वगर्वोद्धताः।। 2. P. स्यं स्थानं। 3. P. पुनरापयंस्तदधिपा। 4. P. वृद्धत्वशेषीकृता। 5. P. श्रीकालसेन । 6. P. साशी: शिष्टरिहोदिता। 7. P. ०देशस्यानुमान । 8. P.ताम- राजिना। 9. P. गुर्जरेशगजव्याज । To P. राजलक्ष्मी। II. P. ...त्यनुमीयते । १. B. प्रतिभटाः ७४] सङ्गीतराज [ ४. अलङ्कारोल्लास यथा- एतत्सैन्यरथेभवाजिविदलद्भूकम्पतागमा मुक्त्वाऽकस्मिकजातसंभ्रमवशान्मार्गे कुरङ्ग क्षणाः । गत्वाद्रीनिति चिन्तयन्त्यरिगणा दुश्चेष्टितं चेष्टितं हा कष्टं किमिदं मिलेयुरपि ताः क्वास्ताः क्व वा ताः पुनः ।। ४३ ।। इति पश्चात्तापः ।। २० ।। अजाततत्त्वो' वाक्यार्थसमाप्ति यत्र नीयते । नानाविचारसम्पन्नः संशयः स उदाहृतः ॥ ४४ ।। . यथा- .4 यमधिकृत्य परः परतोऽपि सन् जलनिधेर्जनतावदनोदरात् अयमितः स किलेति रवश्रुते- र्वदसि किं स इहागत इत्यहो ॥ ४५ ।। इति संशयः ।। २१ ॥ स्नेहाद्दाक्षिण्यतो वापि यत्परस्यानुवर्तनम् । विनयादर्थसंयुक्ता' साऽनुवृत्तिरिहोदिता ।। ४६ ।। 8 यथा- कुर्वते सुहृदो यस्य स्वं प्राप्तुं रक्षितुं तथा । 1°जय त्राहीति:चाटूनि विनीतवदुपस्थिताः* ।। ४७ ॥ इत्यर्थानुवृत्तिः ॥ २२॥ केनचिद्धेतुना यत्र दोषाणां* गुणयोजनम् । गुणेषु दोषयु[३६A]क्तिर्वा तत् कार्य कार्यवेदिनाम्12 ।। ४८ ।। प्रतिस्थित पाठ- ४७. *०दुपस्थितः । ४५. *दोषानां। 1. P. ने 'कास्ताः' अथवा 'कान्ताः' पाठ अधिक उपयुक्त बताया है । 2. P. K. अज्ञाततत्त्वो। A. B. अज्ञातत्वो। 3. P. वाक्यार्थः समाप्ति । 4-4: P. सन्न जलनिर्जनता वदनोदरात् । 5. P. वदति । 6. B. कं स । 7. P. संयुक्तं । 8. P. में नहीं है। 9. P. स्वप्राप्त। 10-10. B. यत्राहीति; 'य' के बाद एक अक्षर का स्थान रिक्त । K. अत्रायाहोति । II. P. वेदनम् । ------------- -------- लक्षण नाम द्वितीय परीक्षण ] पाव्यरत्नकोश [७५ यथा- युष्मच्छासनमद्य यावदपि मे मूर्ना धृतं काङ्क्षया लप्स्यामो* भुवमित्यथो व्रज सखे यास्याम्यहं स्वेच्छया । अद्याहं सुभगा न चास्मि गृहिणी नो जीवितेशो भवान् यस्येत्थं रिपुयोषितामनुवनं वाक्योत्करः श्रूयते ॥ ४६ ।। इति कार्यम् ॥ २३ ॥ निर्भासन मनेकार्थसाधकं युक्तिमद्वचः। यथा- सर्वदं त्वां विजानन्ति सर्वदा सुहृदोऽरयः ॥ ५० ॥ इति निर्भासनम् ।। २४ ।। अपृष्टैरथवा पृष्टैराख्यानं निर्णयः स्मृतः । यथा- मनोरथानामुपरि वर्ततेऽयं महीपतिः । परे' रजांसि वृत्तानि यस्येत्याख्यान्ति सूरयः ।। ५१ ॥ इत्याख्यानम् ।। २५॥ क्रोधमुत्पाद्य यद्वाक्यमन्ते हर्ष प्रयच्छति । पुनर्यत् प्रियतामेति सा याञ्चा परिकीत्तिता ॥ ५२ ।। यथा- क्रोधौद्धत्येन हत्वा निकृतिकरमिलाधीश्वराणां समूह दिष्टया तस्मिन्नुपेते शममुपरमतां1 तत् स्वभावो रिपूणाम् । शेषाः सर्वे नमध्वं हतरिपुनिकरं कुम्भकर्णं11 महीन्द्र तत्पादप्राज्यसेवोपनतसुखजुषां14 स्वस्ति राजां[३६B]कुलेभ्यः ॥ ५३ ।। इति याञ्चा15 || २६ ।। प्रतिस्थित पाठ-४६. *युग्मच्छासन । *लप्सामो। ५१. *अप्रष्टैरथवा। - I. A. युप्मछासन । B. युष्मछाशन । 2. P. लक्ष्यामो। 3. P. पा(अ) धाहं । 4. K. समर्थित 'निर्भर्सन' । 5. A. B. साकथं । 6. A. B. निर्भर्सनं । 7. P. प(पा)रे। 8. K. इति निर्णयः । 9. B. क्रोधोखत्येन। 10. A. तस्मिन्नुपेते। II. P. शममुपरता (तां) 12. P. स्वभावो (वे)। 13. P. कालसेनं 14. A. B. सुखं जुषां। Is. A. B. यांचा ।
७६ ] सङ्गीतराज [४. अलङ्कारोल्लास अन्योन्यस्यानुकूल्येन महद्भिः समवायतः। साध्यते योऽत्र सम्बन्धः सा युक्तिः परिकीर्तिता* ।। ४४ ।। यथा- 1 अन्योन्यस्यानुकूल्येन यस्येच्छन्त्यनुकूलनम् । कुम्भस्वामिमुखालेखा: केषामितरथा कथा ॥ ५५ ॥ इति युक्तिः ।। २७ ॥ अनुनीतिर्वचः क्रोधमपराधं प्रमार्जयेत् । . यथा- कुपितं परितोषयन्ति यं पुर एवेति समेत्य शत्रवः । कुरु नाथ दयां तृणाङ्क रे किमु तेऽयं परशोरुपक्रमः ॥ ५६ ।। इत्यनुनयः ।। २८ ॥ अन्यदृष्टान्ततोऽन्यस्य प्रतिज्ञार्थस्य याऽनुमा ।। ५७ ॥ "स दृष्टान्तः । यथा- निदानं नो देवं न भवति पुनर्हेतुरपरो निसर्गो यत् 'साक्षानिवसति* न' विद्वत्सु कमला। प्रमाणीकत्तुं तत् प्रभवतु विधाता पुनरिदं धनं दायं[दायं] विघटयति कुम्भः क्षितिपतिः ॥ ५८ ।। इति दृष्टान्तः ।। २६ ।। प्रतिषेधः सुविज्ञेयः कर्तव्यार्थनिवारणम् । यथा- एतत्प्रतापयशसी सूर्यचन्द्रमसाविह' । अलमाशूदयं प्राप्येत्याहतुः[स]स्मयस्मितम् ॥ ५६ ।। इति[३७A] प्रतिषेधः ।। ३० ।। ५८. साक्षानिवसति । ५६. *सूर्याच्चन्द्र- परिस्थित पाठ-५४. *परिकीर्तिताः । मसाविह। I. P. अन्योन्यस्यानुफूले(ल्ये)न । 2. B. यस्योत्यंत्यन कूलनम् । 3. P. वनदेव- मुखालेखाः। 4. B. अनुरीतिः। 5. P. (तं)। 6-6. P. में नहीं है। साक्षान धसति हि। A. साक्षांनिवसति । 8. P. कृष्णः । 9. P. स विज्ञेयः। 7-7. P.
लक्षण नाम द्वितीय परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ७७ अक्रोधः क्रोधजननैर्वाक्यर्यः सा क्षमा मता ॥ ६० ।। यथा- समुद्र मपि यस्योच्चैरतिशेते सहिष्णुता । नासूयति' तथाभूतशेषादीनपि कहिचित् ।। ६१ ।। इति क्षमा ।। ३१ ॥ यत्राभिनयतो भावजनित र्वचनरिह । पृच्छयतेऽन्यो* ३ऽथवाऽत्मा तु सा पृच्छेत्यभिधीयते ।। ६२ ।। यथा-- -- 6 यद्वैरिस्त्रणमाह व्यसनवशमिदं वन्यभूमावुपैहि स्वान्तःस्वास्थ्यं किमेभिः 'प्रकृतसुखकरैर्दुर्लभप्रार्थनैस्तैः?* यश्चित्ते रोपितैः स्यादियमतिविरतिस्त्वीदृशी सौख्यही तानद्यैव प्रियत्त्वादभिलषसि कथं त्वं पुनस्तद्वदस्व ॥ ६३ ।। इति पृच्छा ।। ३२॥ निजाकारस्य यद्वाक्यं सुश्लिष्टार्थप्रदर्शकम् । अन्यापदेशवचनैः कथ्यते स मनोरथः ॥ ६४ ॥ घथा-- श्रुतविश्रुतयद्गुणाकरा० अपि पारेतटिनीपति स्थिता11 स्मरसारथिभिर्मनोरथैर्नृ पकन्या वृणुते यमीश्वरम् ।। ६५ ।। इति मनोरथः ॥ ३३ ॥ उपपत्तिस्तु दोषाणां प्राप्तानां शमनं पुनः । पथा- . - स्वप्नलब्धमपि यं नृपकन्याः काङ्कितं नु सुचिरादनुनेतुम् । [३७B] मुञ्च मानमनिदानमिदानी देहि दर्शनमिदं निगदन्ति ।। ६६ ।। इत्युपपत्तिः ॥ ३४ ॥ प्रतिस्थित पाठ- ६२. *पृच्छते। ६३. *स्वीदृशी। *०प्रार्थनस्ते। पतिस्थिताः। ६५. *पारेतटिनी- 4. A. पृष्ठेत्यभि- । I. P. ता(धा)सूयति । 2. P. भावं जनित । धीयते । B. पृष्टे० । s. P. ०वशम। 7-7. P. प्रकृतकरमुखदुर्लभप्रार्थनस्तः । 10. P. श्रुतिविश्रुत० । II. P. स्थिताः । 3. B. पृछते । 6. A. धन्यभूमादुपहि। B. वन्यभूमादुहि । 8. P. तहदश्व(स्व)। 9. B. प्रन्योपदेश० । -- - को ७८ ] सङ्गीतराज [ ४. अलङ्कारोल्लास कपट छलयोगेनाभिसन्धानकरं वचः । यथा- यथा नागपुरादाने चाटूनि यवनेशितुः ॥ ६७ ॥ इति कपटम् ॥ ३५ ॥ अपराधैर्यलीकोत्थः प्रसिद्धैर्यत्प्रयोजयेत् । अर्थान्तरेण सम्बन्धं ज्ञेयं तत् परिदेवनम् ॥ ६८ ॥ यथा- बलादेते नेशाः* समरभुवि संत्याजितभुवा व्यलीकं वोक्ष्येदं कृतमकृतपूर्वं खलु मया । अहो किं कुर्वेऽद्य त्यजति सहसा मां सहचरी विमुक्तस्नेहोत्थं* विचरति वचो यन्द्रिपुकुले* ॥ ६६ ।। इति परिदेवनम् [ ॥ ३६ ॥] रसानामानुकूल्येन येषु न्यस्तेषु रूपकम् । भाति तानि समासेन लक्षणान्युदितानि हि ॥ ७० ॥ न्यस्य लक्षणसंघातं यस्मिन् मेने कृतार्थताम् समुद्रः स्वस्य तेनायं कृतो लक्षणसंग्रहः ।। ७१ ।।* इति श्रीराजाधिराजश्रीकुम्भकर्णमहीमहेन्द्रेण विरचिते. संगीतराजे षोडशसाहस्रयां संगीतमीमांसायां पाठ्यरत्नकोशेऽलङ्कारोल्लासे लक्षणपरीक्षणं द्वितीयम् ॥ [३८] प्रतिस्थित पाठ ६७. * यवनेशतुः । ६६. *नस्यादेतेनेशा। *स्नेहेत्थं । ७१. *यह श्लोक सभी प्रतियों में प्राप्त है। इसके अर्थ से नन्थकर्ता का नाम 'कुम्भ' ही प्रतिध्वनित होता है । सं० . I-I. A. कपटच्छला। 2. P. वेद्यचलादाने । 3. P. बलादेते। 4. A. यद्रिषु कुले । B. येद्रिषु फुले। 5. B. भावितानि । 6. समासेषु। 7-7. P. इति श्रीराजा घिराजश्रीकालसेन-महीमहेन्द्रेण विरचिते संगीतराजे पाव्यरत्नकोशे अलङ्कारोल्लासे लक्षण- परीक्षणं द्वितीयं समाप्तमिति ।। १. B. में श्री नहीं है। २. B. में 'महीमहेन्द्रेण' नहीं है। ३. B. समाप्तम् ।
-. शब्दालङ्कार नाम तृतीय परीक्षण विचार्यमाणस्तत्त्वेनोपमैवाखिलवस्तुनः । दीपको रूपकमिदं श्रये तं शशिभूषणम् ॥ १ ॥ अर्थ प्रबन्धस्य शरीरमाहु- र्योक्ता पदानां घटना ततोऽस्य । अलङ्क तिस्तेन वदे पुरोऽह- मलङ्क तीरथगतास्ततोऽन्याः ॥ २ ॥ उपमेयस्य यत्र स्यादुपमानसमानता। गुणाकृतिसमायोगादुपमा नाम सम्मता ॥ ३ ॥ धर्मवस्तु*विपर्यासनियमा[नियमा]दिभिः । समुच्चयान्योऽन्यातिशयोत्प्रेक्षिताद्भुतसंशयः ॥ ४ ॥ मोहनिर्णयनिन्दाचिख्यासा-श्लेषप्रशंसनैः । विरोधप्रतिषेधासंभाविताभूतहेतुभिः ।। ५ ।। "चटुतत्त्वाख्यातमाला विक्रिया प्रतिवस्तुभिः । प्रतिवस्त्वसाधारणवाक्याद्यैः स्यादनेकधा ।। ६ ।। प्रत्ययाव्ययतुल्यार्थसमासाद्यैश्च हेतुभिः । एकस्यैकानेककाभ्यामनेकस्यैककेन च ।। ७ ।। बहूनां बहुभिः साम्यात् सविकल्पास्त्वनेकशः10 न ते कात्स्येन शक्यन्ते भेदा वक्तुं कथंचन ।। ८ ।। न ते मयोदाह्रियन्ते* विस्तरत्रस्त-चेतसा । लक्ष्ममात्रं मया तेषामुक्तं11 विस्तरभीरुणा ॥ ६ ॥ प्रतिस्थित पाठ- ४. *वसु । ७. *स्यैवकेन च । ६. *मयोदाहृयन्ते । . I. P. रूपकमिति । 2. P. ०रर्थगत (ता)स्ततोऽन्याः। B. ततोऽन्या। 3. P. सा मता। 4. B. शंसयः। 5. P. चिकित्सा। A. चि स्या सा। K. चिस्या। 6-6. P. च(चा)दुतत्त्वाख्यानमाला । 7. B. नेककाभ्यामनेक च । 8. A. बहुभित्ता । 9. P. सा स्यात् । 10. P. तद्विकल्पास्त्वनेकशः । II. A. तेषां मुक्तं । B. तेषां चोक्तं । 12. P. विस्ता(त) रभीरुणा । B. विस्तारः । 1 . ।
८० ] L-J सङ्गीतराज [ ४. अलङ्कारोल्लास नानाधिकरणार्थानां शब्दानामेकवाक्यतः। संयो[३८B]गात् कथनं प्राहुर्दीपकं तद्विदो जनाः ।। १० ।। किञ्चित् साधर्म्यसंपत्तेस्तुल्यावयवलक्षणम् । स्वैविकल्पविरचितं रूपं रूपकमिष्यते ।। ११ ।। समस्तमसमस्तं च खण्डं चाखण्डमेव च चतुर्द्धा तत्समाख्यातं 'मेदपाटावनीभृता' ॥ १२ ॥ वर्णावृत्तिः पदावृत्तिरुभयावृत्तिरित्यपि । विकल्पादादिमध्यानां यमकं भिन्नवाच्यगा ।। १३ ।। पादान्तयमकं चैव काञ्चीयमकमेव च । समुद्गयमकं चैव विक्रान्तयमकं तथा ॥ १४ ॥ यमकं चक्रवालं च संदष्टयमकं तथा । पादादियमकं चैवमाम्रोडितमथापि वा ॥ १५ ॥ चतुर्व्यवसितं चैव मालायमकमेव च । एतद्दशविधं ज्ञेयं यमकं लक्षणाश्रयम् ।। १६ ।। वर्णसाम्यमनुप्रासः स्फुरद्गुणगणाञ्चितः । तत्पदातत्पदत्त्वेन रच्यते रचितो बुधैः ।। १७ ॥ अलङ्क तमलङ्कारैरेभिर्लक्षणलक्षितम् । रसानुरूपं कर्तव्यं रूपकं रूपकाथिभिः ।। १८ ।। आसंसारं पूर्वराजचरितानुगवेषणात् । उपमातीत-वृत्तेनोपमाद्या अत्र वर्णिताः ।। १६ ।। इति श्रीमहाराजाधिराज श्रीकुम्भ० शब्दालङ्कारपरीक्षणं तृतीयम् ॥" - I-I. P. जनस्थानाधनीभृता। 2. P. प(पा)दान्तयमकं । 3. A. सन्दृष्टयमक। 4..P. च। 5. P. उपमानीत। 6-6. P. इति श्रीराजाधिराजश्रीकालसेनविरचिते सङ्गीतराजे षोडशसाहस्रयां संगीतमीमांसायां पाठ्यरत्नकोशे अलङ्कारोल्लासे शब्दालङ्कार- परोक्षणं तृतीयं समाप्तम् ।
सङ्गीतराज-पाठ्यरत्नकोश ८० १८ १७ अलंकृतमलङ्कारः अलङ्घनं तथाभ्यासो १ १७ २९ २५ १ १ अविशेषे तुरीयान् ४७ १३ २० २३ उद्देशो लक्षणानीह उद्यद्भास्वच्छतप्रख्यं उदात्ता: समपा: उपदोहक-दोहक० उपमाद्या अलंकाराः उपमा दीपकञ्चव उपमेयस्य यत्र उपवीणयता मयोदितं ३६ ६४ ६ ६ ६५ २ ५९ ४८ ७६ ३ १ . ऊचुः प्राग्विद १४ २६ २४ ३२ ४७ ११ .३४ ७१ ११ १० ५५ ४७ १८ १० ३० ४१ २४ ७ ७४ ४३ २५ . ६१ ७० १० १२ २३ १३ ८३ ७२ ३५ ३५ ऊनिता अथवा एकमात्रो ऋजुह्रस्वो एककं करणं विशिष्य एतत्सैन्यरथेभवाजि० एतद्विपर्ययाज्ञया एतन्मे शिशुभाषितं एलादिगामिगज० एवमपरार्द्धसंख्या एवं गणस्त्रिभिः एवं मालादिवत्तानि एवं मित्रावरुण ऐक्यं जीवपरात्मनोदिशति ऋते हिमाद्रि 8 ४७. 8 १० अश्वमेधतो अश्वस्थपुरुषोपेत० प्रत्येकलिङ्गाप्तवरप्रसादः अस्यामाद्यस्य अस्येतिहासवदयं असंतमपि बध्नन्ति अंहयादिसंयुते आङ्गिको वाचिकश्चैव प्राद्यन्तयोश्च षण्मात्रे आद्य ष्वष्टसु देवता प्रानन्त्यान्न प्रतन्यन्ते प्राभोगध्र वयो० आर्यावृत्तसमन्वितं प्रायवेयं गाथा आरभ्यकाक्षरात् प्रारम्भणीयं किल प्रारम्भणीयं न हु प्रारोहणावरोहण अासत्यलोकमुर्वी प्रासंसारं पूर्वराज० प्रासारिताविभि० श्रासां तृतीयपादस्य प्राहुरेकमानतालयुक्तं इत्यङ्गस्य नियोजन इत्यूह्यते संयति ईप्सितार्थविशिष्टानां उक्ता गः श्री उक्तात्युक्ता तथा उच्चस्फाटिकहH० उत्तमानां गुणैः उत्साहहेला० १ १० २ २८. १० ७२ ३१ ५४ ४७ ५२ २५ १५ २ २१ ५९. ५१ ४३ ३४ ४० १३ ४० १० ३६ २ ८० प्रोजे फलास्तु ३५ ८१ ३० ४१ १७ ४२ २८ ७२ ८२ १३ ४७ ३६ ३ प्रोव्यादि गोणी श्रोत्यादीनि तु अंशश्च जन्यरागाणां अंशामध्यमसप्तक० अंशात्मध्यमसप्त वा अंशाविवादो क्रमातेषां चतुर्णा क्रियते स्वस्वसिद्धान्त क्रियाङ्गानि च कय्यन्ते क्रियाङ्गानि च वर्ण्यन्ते क्रियाविशेषो हस्तस्य क्वचिल्लक्ष्म कपट छलयोगेना० .२६ २१ ३३ am ३१ ४२ ४६ ६ ६७ ४ ७० २० ५७-५८ ३४ ६६ १८.२० ३७ १०१ & ४८ उद्ग्राहा विविधा उद्दण्डः पटहध्वनि० ६८ १२ । पद्यानुक्रमणिका पद्यांश पृष्ठाङ्क पद्याक ७७ ६० ५६ अनुनीतिर्वचः अनुपश्लिष्टशब्दं ७६ ८१ अनुप्रासस्तु कर्त्तव्यः ५६ ४३ ५६ १६ ७५ ५१ ५ २३ १ ४ ६८ १४ है ५० पद्यांश पृष्ठाङ्क पद्याङ्क अकोध: कोवजन श्रङ्गत्वेनाथवा १३ २१ अङ्गप्रत्यङ्गभणिति० १८ २६ थङ्गसंज्ञस्तथा १७ १२ अङ्गहारविनिष्पन्न ३४ ७७ अङ्गहारोऽङ्गविक्षेपः ३७ १०४ अङ्गानि शिर मादीनि 88 प्रजाश्रयसमुत्पन्ना० ४३ अज्ञातवृत्तं ब्रह्माध: ४३ अजाततत्त्वो ७४ ४४ अतस्मिन्नपि यत्रार्थे ७२ ३४ तारविश्रम० २८ १७ अतिवाक्यक्रियोपेतं १३ अतीतो वाश्यमार्ग २५ १ प्रत्यर्थमिष्टं ३२ ४७ अत्युक्ताया रतिगणा ४७ १८ प्रत्र यन्मानमाख्यातं १४ अथवा वर्णयुग्वृद्ध० ५२ अथवा सर्वभावेन ४५ प्रथाणिवव्याल ५१ अध्यासिताया निजपूर्वभिः २१ अधिष्ठानं स्वभावश्च २१ ७ अन्यदृष्टान्ततो ७६ ५७ अन्योन्यं प्रथमदले १० अन्योन्यस्यानुकूल्येन महद्भिः ७६ ५४ अन्योन्यस्यानुकूल्येन यस्ये० ७६ ५५ अनजलता-मन्मय० ६० ६७ अनिवद्धं च तामाहुः ३२ अनुक्रमणिका चेति १७ अनुक्रमणिका वाद्यस्वरूपं १७ & अनुक्रमणिकोल्लासे कतुः १७ १४ २२ ३५ ८६ २२ १२ ६० ४० ८२ ७ अनुप्रासस्तु कर्त्तव्यश्चतुष्प- धामथोच्यते अनुभावास्त्वस्थायाः अपृष्टैरथधा अपकुर्वन्नयं अपरार्द्ध पञ्चमके अपराधेळलीकोत्थः अप्रस्तुतत्त्वात्तल्लक्ष्म अपशब्दस्वरं अपूर्वा दूतिका काचित् अभिधत्ते रसं अभिधा लक्षणा चाय अभिनवमृगाकुलेखा० अभियुक्तोपलक्षार्थ अमुगयाया अमुष्यो:भर्तुः अयं प्रवन्धस्य अर्थव्यक्तिरुदारत्वं अर्थान्तरं तु तज्ज्ञेयं अर्थापेक्षाक्षरोपेतं अर्द्धयोभिन्नयमको अर्द्धन्दुः स्वललाटके अरविन्दक-विभ्रम अल्पत्वं च वहुत्वं च अल्पद्विश्रुतिकासु अल्पप्रयोगः अल्पमुद्दिश्यते येन अलंकारगुणश्चैव १८ १५ ३ 5 २ & ७६ २ १ ८२ ११ ८१ २५ ५ ६२ ८२ ४२ २९ ६० ३२ . ३१ १५ २७ ६६ १० ६७ ३ ८६ ] सङ्गीतराज [४. अलङ्कारोल्लास - श्रीसरस्वतीरससमुद्भूतकरवोद्याननायकेन यवनकुलाकालकालरात्रिरूपेण सततपराभूत-१ समागतसूर्यवंशीन्द्रसेन २-राजराज्यसंस्थापनदृढाङ्गीकारेण गुर्जर- राज्यधराधीशमहमदसुल- तानधीरत्वोन्मूलनप्रचण्डपवनेन श्रीविसन्ध्य-क्षेत्रसमुद्रसंभवरोहिणीरमणेन अरिराजमत्त- मातङ्गपञ्चाननेन प्ररूढपत्रयवनदवदहनदावानलेन प्रत्यथिपृथ्वीपतितिमिरततिनिराकरणप्रौढ- प्रतापमाण्डेन वैरिवनितावैधव्यदीक्षादानदक्षोद्दण्ड-कोदण्डमण्डिताखण्डभुजादण्डेन भूमण्डला- खण्डलेन गजनरतुरङ्गाधीशराजत्रितयतोडरमल्लेन' वन्सुधरोद्धरणादिवराहेण भवानीपति- प्रसादाप्तापसा (स)द६.वरप्रसादेन अनन्यमल्लीकगर्वखण्डनमुशल-हस्तबलभद्रपराक्रमेण महा- राजाधिराजमहाराणा-श्रीमृगाङ्कतामराजनन्दनेन महाराज्ञी-सौभाग्यवती' जसमाम्विकाहृदय- नन्दनेन विविधविज्ञानविज्ञचमत्कार'०-चातुरीधुरीण-सफलसीमन्तिनीधुरीणाशरोमणिरूप- लावण्य-लज्जालक्ष्मीनिधानशृगारसरसीशतराजकन्याप्रवरनिकुम्भराजन्यवंशावतंस-महाराज्ञी श्रीकर्मवतीलखु-मा' 'देवोहृदयाधिनायेन श्रीमहाराजाधिराज-२'महीमहेन्द्रधीकालसेनेन विरचिते संगीतराजे षोडशसाहलयां संगीत-मीमांसायां१३ पाठयरत्नकोशे अलङ्कारोल्लासे दोषगुणोल्लासः (दोषगुणपरीक्षणम्) ॥ . . । पाठ्यरत्नकोषश्च समाप्ति समगात् । इति वितत१४मतोनामभिमत१५-सिद्धिरस्तु ।। १. A. पराभूत । २. A. वशीद्रशेन । ३. B. गुर्ज। ४. K. श्रीत्रिसंध्याक्षेत्र । B. संध्यक्षेत्र । ५-५. K. में 'तुरंग' से पूर्व 'नर' नहीं है । ६. K. प्रसादाप्तासाद । ७. K. मुसल । ८. A. राजेन्द्रनन्दनेन । ६. A. श्रीसौभाग्यवती । १०. A. B. चमत्कारी। ११. A. B. लषुमा । १२. A. महाराजो० | B. इति महाराजा०। १३. A.मिमांसा । १४. A. B. विनत। १५. B. में 'मत' नहीं है।
गुणदोष नाम चतुर्थ परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [ ८५ जयस्तम्भन श्रीब्रह्मगिरिभोमस्वर्गतोयथार्थीकरणरचितचारतरुपथेन श्रीकामाक्षागिरिनवीन- निर्मितिपराजितसुमेरुणा श्रीमहिषाचलो'परिश्रीहरिशरणरचिताचलदुर्गेण रायगुरु-वार्यगुरु- सेलगुरु२-रायाञ्चापरमगुरुवागाङ्गला-रायाञ्चामुहवनराय हिंसल्लराय-माचल्ल-पूर्वपश्चिमो- तरदक्षिण: चतुर्दिशा-रायाञ्चायांबुला-इत्यादि-बिरुदावलीविराजमानेन अध्युष्टतमनरेश्वरेण सबलराज-सम्मूलनाचार्येण दुर्बल राजसंस्थापनाचार्येण पितृवैरिसमुद्भूतरोषपोषणमहीपतिमत्त- मातङ्गमस्तकाङ्क शेन अभिनवभार्गवेण राजभुजबलभीमेन हिन्दूकराजगजपतिना आसनसिहा. सनसितातपत्रमाणिक्यमालामण्डितवातान्दोलितजयपताका-कनकदण्डचन्द्रा-वदातचलचामर- युगलमकरध्वजादिराजराजालङ्करणावलोकनमत्सरितमानसेतरनपालमौलिनिहितवामचरणेन नलनहुषधुन्धुमारभरतभगोरथमान्धातृमेधातिथिप्रभृतिवीरराजरत्नोदात्तरितेन सर्वदा त्र्यम्बका-दिगोदाविमुक्तिसमस्तामुक्तिप्रवितीर्णमुक्तिमुक्ताकलापेन श्रीब्रह्मगिरिसन्निधिकृत- युगधर्मानुत्तिब्रह्मवृन्दाधिष्ठित्तानेकयज्ञाद्यखिलसुकृतकृतसत्सलोकेन" परमभागवतेन अभिनव- भरताचार्येण संगीत-मीमांसाहनिर्माणापरप्रभाकरेण प्रबन्धराजश्रीगीतगोविन्दनिर्माणपरितोषित- राधामाधवेन कामाक्षास्तुतिकरणाराधितकामेश्वरीचरणकमलेन श्रीगीतगोविन्दटोकारचना- गितसाङ्गशृङ्गाररसेन सकलराजवाग्गेयकारतोडरमल्लेन सकलकविराजचचूडामणिना धोणावादनप्रवीणेन सुशारीरशालिना पद्मनगरजनस्यानगोदावरी.विराजमानम्लेच्छोच्छेदित- चिरकालधर्मसंस्थापनेन . संस्कृतभाषा-महाराष्ट्रभाषा-तैलङ्ग' कर्णाटक-भाषाचतुष्टयरचित- नाटकराजचतुष्टयेन याचकजनकल्पनाकल कल्पद्रुमेण वसन्तसमयसमागतसमस्तसामन्तसीमन्तिनी- सीमन्त १-सिन्दूरपूरदूरोद्ध लनप्रकटितप्रौढप्रतापेन निसर्गदुर्ग्रहदुर्गवर्गदुर्गमप्राकारपरिखा- परिपातपरिखिद्यमानपरिशङ्कितपरिजनपरिचीतप्रथिनितम्बिनी लुण्ठाकार्गलादीर्घभुजायुग- लेन धीरोदात्तधीरशान्तवीरोद्धत-धीरललित चतुर्विधनायकगुणग्रामविचारचातुरीचतुराननेन अष्टविधनायिका' 3 - हावभाव - विवेको१४ - द्दामोद्दीपितस्मरविलोकनानुभूयमानशृङ्गाररस- सान्तरनिरन्तरान्तरानन्देन१५ नाटकनाटिकाख्याना १६-ख्यायिका-प्रहेलिका-कलाकलापकोश- त्येन' ७ भारतीयरसदृष्टिभावदृष्टिभावितभावनाभिनवभरताचार्येण नन्दिकेश्वरमतनुवर्तना- राधित-त्रिनयनेन परमपराक्रमार्जुनेन अथ बृहन्नटेन सतताराधितधर्मेण अथ वृकोदरेण १ ६. K. १. A. श्रीमहिखाचल। २. K. मेलगुरु । ३. A. सन्मूलनाचार्य । ४. K. चण्डाव- दात। ५. A. में 'सर्वदा' से पूर्व 'वेदमार्गस्थापनचतुराननेन' विशेषण और है सम्वका। ७. K. सल्लोकेन । ८. A. मिमांसा । ६. A. B. गोदावरों। १०. A. तेलंग। ११. A. सिमंत । १२. K. लुण्टार्गला। १३. A. नायका १४ A. कोदोमो। विवेक के स्थान पर विवोक पाठ अधिक संगत लगता है। (सं०) १५ K. नन्दनेन । १६. A. B. ख्याधिका। १७. A. कोशलेयेन । B. में 'न' नहीं है ।
८४ सङ्गीतराज [ ४. अलङ्कारोल्लास कल्याणकशलेन श्रीकालसेनेन द्वादशसहस्रजनस्थानप्रभृतिवसुंघरासमुद्धरणकधोरेण श्रीजगदी- श्वरी'-वनदेवनिजगणेन श्रीकामेश्वरीचरणकिङ्करेण श्रीब्रह्माद्रिविभुना प्रथमप्रख्यात - तामराज-प्रामोदराज-रामराज-पङ्कराज-तामराजेन्द्रप्रभृति - सकलमहीपालमौलिमाणिक्यरचित- सिंहासनादिसमस्तप्रशस्तराजचिह्नाधिष्ठातु -नरेश्वरेण अगस्तिपुरनिरस्तसमस्तवैरिवरोंण कामासाप्रसादासादितकुन्तीपुरेण शुद्धोद्धतोद्धतपतिनिपातपटुतरवारिधारेण उद्धतपुरनारोनयन- नीरनिरन्तरसाधारणी-समाप्यायितशौर्यतरुवरेण भीष्मपुरजयानीतानेकराजकन्यारत्नेन ममिपुरमईन'-दर्शितशोर्येण कल्याणपुरजयाजितजामदग्न्येन६ स्थानवलयितानेकदरीपरि- सरपरित्रासितमनीरवीरेण श्रीपुरग्रहणसंवर्धितयशोभरेण वाटिकाचलग्नहणजनितकीर्तिपुर- पराजिताचलनायकेन राजपुरी विध्वंसनचारुचापरचितेन सुवर्णगिरिखण्डनावनिवजहस्तेन नवसारी धनदेवीयुवतीजनवदनयामिनीनाथसिंहिकासुतायमानकरालवालेन पाटलीरण धरणिधीरधनुर्धोकारमुखरितत्रिभुवनेन तारापुरप्रज्वालनसमुद्भ तधूममलिनीकृतसकल- वैरिवदनेन कुक मपुरजयदर्शितसिंहविक्रमेण संज्ञापुरोपाजितरत्नेन वेदिकागिरि- निर्दलनदारणेन कुरङ्गगिरिकोटविघट्टनलम्पटोरुनाशीरेण -ठूलनोद्भूताद्भुतधैर्येण संगमनीरदुर्गोद्धरणोद्धृतसकलमण्डलाधीश्वरेण शुक्लपुरसमूलोन्मूलनप्राप्तजयश्रिया गिरिपुर- डुङ्गरग्रहणसार्थीकृतोग्राग्रहेण दमनपुरविध्वंसनवन्दीकृतयवनीनिचयेन प्रामदंकगिरिशिखरो- परिभावितशकनिकरेण महिषमेरुजयाजेयविभवेन शाकम्भरीरमणपरिशीलनपरिप्राप्तशाक- म्भरीपरितोषितशाकम्भरीप्रमुखशक्तित्रयेण निजभुजशौर्य:-वशीकृत-बग्गुलराजप्रमुखमहा- निधानेन बेदुर' भूपालराजकृतसंस्थापनेन १'नराणरणकर्म-कर्मठेन १३ मानमईनगृहीतराज्यलक्ष्मीसकलभाण्डागारनिचयेन अलङ्गगिरिगहन गह्वरकुहरविहारिवरिवोर- सिन्धुरमर्दननिर्दयकण्ठीरवेण अष्टादशगिरिशिखर-परिवारिवाजनाद्रिविजयविख्यातवीर्य- सप्तविंशतिसहस्रमहाराष्ट्रधराविधूननप्रबलप्रभञ्जनेन सप्ततिसहस्रगुर्जराम्भोधि- माथ१५ मन्थमहीधरेण महदम्बमातृकापुरोद्ध लनर्षिता(त) महोरगपुरेण अजीमखान १६-सकलगृहीतजयश्रिया जाङ्गलस्थलजलधितरतुङ्गतरङ्गनिकरसंरम्भकुम्भसंभवेन वस्तिसोपारकलहकलितकुन्तजनितकुन्दावदातकीर्तिधवलितदिगन्तरेण शशकगिरिलुण्ठनपटुतरेण श्रीवनदेवस्वामि-प्रासाद.रचनापरपरमेश्वरेण श्रीव्यबकेश्वरसन्निधिनिर्मितकोतिस्तम्भोन्नत- पुण्यस्तम्भो तुजारखांन१३ गण१४ पलायमान- १. A. जगदीश्वर। २. A. प्रख्यातं । ३. A. अधिष्ठात्रि। ४. A. सारणी। ५. K. मदन (प्रेस को भूल हो सकती है)। ६. A. जामदशेन । ७. K. सबलारी। ८. A. स्तम्बो। ६. K. भुजवीर्य । १०. K. बोद्धर । ११. K. नराणराण । १२. B. कर्म । १३. K. बुजारखान । १४. K. वर्गण। १५. K. नाथ। १६. K. षान। १७. K. प्रसाद । - गुणदोप नाम चतुर्थ परीक्षण ] पाठ्यरत्नकोश [८३ सुश्लिष्टसन्धिभिः शब्दः सुकुमारार्थयोजितैः । सुखप्रयोज्य[४० A]ळक्तार्थयुक्ता स्यात् सुकुमारता ॥ २२ ।। पार्यावृत्तसमन्वितं सुललितं लघ्वक्षरोल्लासितं रूपं रूपकदीपकरुपमया चालङ्कतं संस्कृतम् । शृङ्गारे पुनरद्भुते रसवरे वीरेऽथ रौद्रे भवेद् वर्णगौ रवगुम्फितैर्जगतिका मुख्यश्च वृत्तयुतम् ।। २३ ।। रसेपु शेपेपु यथारसं नु छन्दः प्रयोज्यं विदुपा विलोक्य । तस्यानुरूपा घटना पदाना- मलक्रिया चाक्षरसंहतिश्च ।। २४ ।। सुललितललनालपनालापनलघिमानुरूपपदरचनाः । नृत्यानुगगतिरुचिराः पदबन्धाः सुकविभिः कार्याः ।। २५ ।। रचितविविधमार्ग सधिसंधानयुक्तं सहृदयसुखगम्यं श्लेपगुप्तार्थहीनम् । मृदुसुललितवर्ण चित्रनृत्यानुरूप भवति जगति पाठ्य प्रेक्षकप्रीतिकारि ।। २६ ।। यद्गुणा गुणिनामेव दोपनिमुक्तिहेतवः । तेन श्रीकुम्भकर्णेन कृतं गुणपरीक्षणम्" ।। २७ ।। येन मावलये समुद्धतमहीनाथा नयं स्वं यश- स्तद्योपा: सलयं सुन त्यनिगम' साङ्ग]* पुनस्तत्सुताः । स्वाचारं जनतावदान्यचरितान्यथित्रजाः पातिता:8 पाठ्य तेन नृपेण* चारुभणितो सद्रत्नकोशः कृतः ।। २८ ॥ 9 इति[४०B]श्रीराजाधिराजेन अरिराजमत्तगजसिंहेन मेदपाटसमुद्रसंभवरोहिणीरमणेन अभिनवभरतेन अश्वपतिनरपतिगजपति राजप्रयतोडरमल्लेन राजगुरुचापगुरु-सेलगुरु-इत्यादि विरुदावलीविराजमानेन महीमहेन्द्रश्रीकुम्भकर्णेन विरचिते सङ्गीतराजे पोडशसाहस्रयां संगीत- मीमांसायां पाठयरत्नकोशे अलङ्कारोल्लासे दोप-गुणोल्लास: पाठयरत्नकोशश्च समाप्ति समगादिति विततमतीनामभिमतसिद्धिः॥" - Pr-mana- प्रति स्थित पाठ- ... २८. *सुनप्यति | *नुपेण नृपेण । I. P. शब्द()। 2. P. सुकुमारतः (ता)। 3. P. पार्यावृत्त:(त) | 4. P. तु । 5-5. P. श्रीकालसेनेन गुणोल्लासः प्रकीर्तितः। 6. P. स्तद्दोपाः । 7. P. सनृत्यनिगम। 8. P. पाठिताः। 9-9. P. इति निश्शाङ्कनिर्भयमल्लेन सफलभूवलयकवोरेण श्रीकला- ८२ ] सङ्गीतराज [ ४. अलङ्कारोल्लास अर्थव्यक्तिरुदारत्वं कान्तिश्च सुकुमारता । दशैते स्युर्गुणास्तेषां विशेषाल्लक्ष्म' चक्ष्महे ।। ११ ॥ यत्रा[३६B]र्थस्य प्रतीतिः स्यादनुक्तापि प्रयोगतः । शब्दानां स: प्रसादाख्यो गुणो* ज्ञेयो बुधैरिह ।। १२ ।। ईप्सितार्थविशिष्टानां सम्बन्धाद्यत्परस्परम् । श्लिष्टत्वं हि पदानां स श्लेष इत्यभिधीयते ॥ १३ ॥ स्वभावेन स्फुटार्थ स्याद्गहनं तु विचारतः । स्वतः सुप्रतिबद्धं च श्लिष्टमिष्टं सतां हि तत् ॥ १४ ॥ नातिचूर्णपदं यत्र न च व्यर्थाभिधायि च । न दुर्बोधाभिधानं सा समत्वात् समता मता ।। १५ ।। श्रुतमुक्तं तु यद्वाक्यं बहुशोऽपि विदां हृदि । पुनः पुनर्नवं भाति तन्माधुर्यमिहोच्यते ॥ १६ ।। समासविद्भि विविधैर्विचित्रैश्च पदैर्युतम् । सानुस्वारविसगैर्यत्तदोजः परिकीर्तितम् ।। १७ ॥ अभियुक्तोपलक्षार्थ -विशेषार्थस्य सम्पदा । सम्पन्नः कश्चिदर्थो यः स समाधिगुणो मतः ॥ १८ ॥ लोकमार्गव्यवस्थातः सुप्रसिद्धाभिधानयुक् । या काचिद्रचना काव्ये साऽर्थव्यक्तिरुदाहृता ।। १६ ।। नानाभावैरुपेतं यच्छृङ्गाराद्भ तसम्भृतम् । दिव्यभावपरीतं तदौदार्य भणितं गुणः ।। २० ।। चन्द्रवन्मनसो या स्यादाह्लादकरतोक्तिषु । 'लीलाद्यर्थोपपन्ना सा' कान्ति मगुणो मता ॥ २१ ॥ प्रतिस्थित पाठ- १२. *संप्रसादाख्यो गुणा । I. P. विशेषाल्लक्ष्य (चक्ष्म)हे । 2. P. यथार्थस्य। 3. P. शि (श्लिष्टत्वं । 4. P. माधुर्यमिहोदितम् ।: '5. P. समासद्भिः । 6. P. लभ्यार्थ। 7-7. B. लीला- अर्थोपपन्नानोसा।
गुणदोषनाम चतुर्थ परीक्षण दोषैर्युक्ता गुणैर्मुक्ताऽलङ्क ताऽपि[३९ A]न शोभते । ललनेव वचोभङ्गी तानतो वच्मि यत्नतः ॥ १॥ गुणातीतोऽपि सगुरगः सदोषो दोषवजितः। मुदे स्तान्मे शिवो नागभूषि[तोऽप्यगभूषि]तः ॥ २ ॥ गुरणार्थान्तरैकार्थ भिन्नार्थाभिप्लुतार्थकाः । न्यायादपेतविषमविसन्ध्यर्थविहीनकाः ॥ ३ ॥ शब्दच्युतमिमे* दोषा रूपके दश कीर्तिताः। गूढार्थ तत्र पर्यायशब्देनाभिहितं* मतम् ॥ ४ ।। अर्थान्तरं तु तज्ज्ञेयं श्रवणं यत्र वर्ण्यते। एकार्थमपि विज्ञेयमेकार्थस्याभिधानतः ॥ ५ ॥ भिन्नार्थ भिद्यते यत्रान्योऽर्थोऽन्येन विवक्षितः । अभिप्लुतार्थ यत्र* स्यात् तत्पदेन समस्यते ॥ ६ ॥ प्रमाणवर्जितं न्यायादपेतं परिकीर्तितम् । वृत्तभेदेन विषमं रूपकं परिकीर्तितम् ॥ ७ ॥ अनुपश्लिष्टशब्दं यत्तद्विसन्धि स्मृतं बुधैः । अर्थहीनमसंवद्धं सावशेषार्थमेव च ॥ ८ ॥ अपशब्दस्वरं शब्दच्युतं सद्भिरुदाहृतम् । सर्वत्र ग्राम्यतैवेष्टा* 5 यतः सार्थेऽरसावहा* ॥ ६ ॥ एतद्विपर्ययाज्ञया गुणा गुणिभिराहतैः । प्रसादश्लेषसमतामाधुर्योजःसमाधयः ॥ १० ॥ प्रतिस्थित पाठ- ४. *शब्दं च्युतमिम। *शब्देनाभिहतं । 8. *ग्राम्यते चेष्टा । साथै न सा वहा। I. P. में मंगलाचरण की दृष्टि से दूसरा पद्य पहला और पहला दूसरा दिया गया है । 2. P. गूढार्था० । B. गूढार्थान्तर कार्य० । 3. A. ज्ञेयं अवयं । 4. P. यत्तत् । B. यत्त । 5. B, ग्राम्यते चेष्टा। 6. P. एतद्विपर्ययान्(ज)।
[ ८६ :: अनुक्रमणिका ४. o ३ ४१. १६ १८ ६१. ७१ ३३ ५७, ८१ २२ । १४ ७३ ..४१ : ७९. .६ ४० ५८ ४५ ६२ः ८३ ६ ४२ ::३७ १०३ :५० ११ १२ . १६ ११ २४ ५६ - २३ ७४ ४७० ६० ६६. ३६. ,८८ .४७ ५७ .. ३५ ६२ ८१. ५६ २५ ८० १६ १ ६६ ८२ २१. ६१ ६० ५८ ४४. कर्तच्या लक्षतत्त्वज्ञ करणानि द्विधा कलहंसो : कलाकालप्रमाणेन काम सन्ति परःशताः कामिनीहासापदोहक कार्ये वाप्यथवा कारणं नृत्यकरणं किञ्चित् साधर्म्य० किञ्चोपवेद एवायं कि चात्र-श्रवणं कुङ कुमतिलकावली कुङ कुमाङ्गसूडपदं कुर्वते सुहृदो यस्य कुसुमितकेतकीहस्त. कुत्रचिल्लोकधर्मीति कृतिश्च प्रकृतिक कृतोऽमुना कृते सम्यक केचिदानकनिष्ठाः केनचिद्धेतुना यत्र केषांचिज्जातयः क्रोधमुत्पाद्य क्रोधौद्धत्येन हत्या गमकाश्च तथा स्थाया गर्जन्मदोसिक्त० गान्धर्वो मार्गदेशीवित् गीत वाद्य तथा नृत्यं गीतमुद्ग्राह्यते येन गीतमेव वशीकार० गीतानुगं त्रिःप्रकारं गीर्वाणप्रमुखाः गुणचन्द्रो युगचन्द्रौ गुणतो नीलकण्ठाद्याः गुणदोषाश्च गाथादि गुणप्रधानभावन गुणातीतोऽपि सगुणः गुणानुवादोऽतिशयो गुणार्थािन्तर० गुणेन क्रियया वापि गूर्जरेशनृपव्याज.. ग्रंथात् सम्यगधोत्य चटुतत्त्वाख्यातमाला चत्रयं दो यदा चत्रयं दौतु चत्वारो द्वि-द्विगणा चयं दस्तथा चतुर्गणद्वितीयस्तु . चतुर्मानद्वयं पञ्चमानं चतुर्व्यवसितं चैव चतुष्कले तु पृथुला चन्द्रःकाश्मल्यमगात् चन्द्रवन्मनसो चन्द्रहासमधुरवचना० चपताः षचताश्चेति चम्पककुसुम० चरणस्य व्यवस्थोक्ता चरणो यावदेकोन० चषौ च दोऽथवा चार्यो युद्धनियुद्ध० चित्तवृत्त्यर्पको० चित्रकूटकदेशस्थो चित्रवार्तिकयोर्जेया. चेष्टादीनां विभावानां चैतन्यं यदि संश्रयेत् छन्दःशास्त्रानुसारेणो० छन्दोनवृत्तिकारीणि छादनादपयत्यादे० जगणविहीना विषमे जनकाद्योनिमुख्या जरी लगो प्रमाणिका जलदस्तोयद० जित्वा नागपुरं ४. १६ ५२ M ७४ ४८ ६१ ७६ ७५ ५२ . ७५ ५३. १८. २१: ४. २१, ३१.४५ २७. २ २८ - १६." ४ ६३ ५ ५२ ६ ५८ ४३ ४२ २६ ३४ ७६ ४४ ४० & १९ ३२ ५.२८ . ६२ ८५ १ २७ ५ ५४ ३४. ६७: २४ ६२ ७८. २२. १५ । १०: २४ ३३ २२ ४८ १७ २० २७ २३ ૨ ६० ] सङ्गीतराज-पाठ्यरत्नकोश ज्ञातेः स्वसृ० स्मृता वर्तना० ६२ ८४ २३ २५ ३४. ७५ ५६ २७ ६१ ७४ १६ ३ १७ ७ ४६ २३ २४ ४६ ५ ७३.४० ५५ १५. ६१ 6 0 २ ६ ३२ जीमूतवाहन० १३ २६ जीवातुर्गदिनां ३.. २३ २१ तगणश्चेदृशै ५६ २८ ततो मोकलो ४ ततः कलाकालकृतो ३३ ६२ ततस्तं तं ४ २० ततः सुरपतिर्देवराजः २३. २६ ततं च शुषिरं चाथ १७ ततं वीणादि ३३ तत्र ग्रामसमुद्भूतः ३० तत्र चूर्णपदस्यादी २५ ४ तत्र सप्त कलाः ४२ तत्रोदितो मन्दिरमिन्दिरायाः तथा ज्ञेया रसानां तथा लाक्षणिको २२ ११ तथाविधे द्वितीये च ५७ ३४ तथाष्टादिभी रैः ५२. ८ तथा हि नादधर्मों .१३. १८ तथा हि समयं प्राहुः २४ ३१ तथ्यातथ्यविभेदेन तदुद्भवश्चोपरागो ३५ तदेव गौण्डली ३७ १०६ तदेव रुचिर्वचित्र्यात् २७ ४ द्विधा वर्णमात्राभ्यां २ तन्नन्दनो निन्दितचन्दनेन्दुः २ १० तरङ्गलोलसलिल. तस्मादेतदुपासनास्य १२ . १५ तस्मिस्ततः पल्लवितः प्रतापः २. ८ तस्य सप्तविध .२१ ता एव कूटतानाः २९ १२. ता एव शुद्धतानाः २८. ११ : ..३५: ८२ तां मिश्रित्य ताल एफकले ४०. तोवार्थ भापणं ७२ तुर्ये द्वितीय तेन त्रिनेत्रो ते त्रिभिर्मनोहरेश्छायाभिः त्रिमात्रश्च यतिश्चात्र . त्रिविक्रमक्रमासक्तचेतसा त्रिशतो येऽधिका त्रिंशन्मात्रास्तु त्रिष्टुब् जगती दक्षिणा दिग्यथागस्ति दतचपषामात्राख्या दर्शनादेकदेशस्या० दलयोरत्रोभययोः दश्चा:र्वसुभिः दाक्ष्यं साक्षादिहास्ति दिग्दन्तावलदन्ति दुस्तरं भारताम्भोधि दृशः स्वरूपभेदाश्च दृष्टान्तप्रतिषेधौ दोषयुक्ता गुणैर्मुक्तो द्रष्टव्यं कृतकृत्यतामुपगते द्रुतलध्वादि० द्रुते व्यञ्जनं द्विजांतिविषयो द्विपद्यन्ते तथा द्विर्यस्यार्याया द्वौ द्वितीय पञ्चमे च धर्मवस्तुविपर्यास० धात्वादिवादनं घार्यधारकसम्बन्ध घिङमां शकाधममहं न ते मयोदाहियन्ते नन्वत्र नाटय० न नृत्येदिति ननु सति गणना न प्रार्थयेऽहं ४३ १६ १८ ६ ow ५ . mr . ६० ५६ ३३ १४ ४९ २८ २० ५५ १४ ५७ . ३६ ७६ ४० ताण्डवं तण्डुना २२ १८ ७१ २५ ७४ & ३५ ८५ १४ २७ ६ ४५ ३२ मनुक्रमणिका [६१ २ पाठयं २१ ५ ४१। २३ ८० तु द्विधि, गेयं .. पाठय वाक्यात्मक पात्रं रंगं प्रविश्य पादान्तयमकं चैव पादश्चतुर्भिनियतं पुनर्गीतं पुनर्वाद्य पुमानिति परमात्मेति १४ २५ ६ ३२ ४६ ३९ १ ३२. ४६ ३६. ....४ . पुरा प्रणष्टां पूर्णत्वे सति ७०... २३ " ४: १८ पूर्णेन्दुमेतन् पूर्वराजगुणान् पूर्वसिद्धार्थवाक्येन पूर्वार्द्ध मुख्यचपला "..६७ ६ ५. .५४. ५४ पूर्वार्द्ध षष्ठे ३. २२.१३ २२ १०. १ ३ नर्तने नाट्यशब्दोऽयं ३५ ८७ नरेशस्यानुगामित्वं १३: २४ न शास्त्रतामुष्य १० ३ न श्रूयते यत्र नाट्यादित्रितयं ३५ ७६ नाति चूर्णपदं यत्र ८२.१५ नादादिहेतुको ..२.१ .,५ नानाधिकरणार्थानां ::८०. १० नानाभावेरुपेतं ८२ २० नामाख्यातोपसर्गाश्च २१. : ३ नाढे समाससन्धी ४७ १३ नारम्भणीयं यदवोचदेतन्. ११., . ८ निजाकारस्य यद्वाक्यं ७७. ६४ निदानं नो देवं ७६. ५८ निर्दूषणस्यापि ३ .१३ निर्भासनमनेकार्थ० ७५ : ५० निर्मथ्यागमसागरं निर्वेदादि प्रतिरसं १६. .३४ निःप्रयोजनता नृत्यं तत्राङ्गिक ३५...७८. नो धर्माय १० न्यस्य लक्षणसंघात ७१ पात्रैरुत्तममध्यमैः ४३ : ३०. प्राप्तिश्च पश्चात्तापन प्रोक्तार्द्धयोद्धयोर्या पञ्चचाः सर्वपादेषु ५७.::३८ पञ्चलध्वक्षरो० ३३ : ६१ पञ्चवक्त्रप्रसादा० ४८.२२: पत्युः कान्ताः प्रियातुल्याः २२ १६. पथ्यावक्त्रं समुद्दिष्टं .४८:२१: पदं वागभिधेयं ३१....४४, पदव्यवहृतिक्येि २५.... ३. पदस्वरसङ्घात० ३२ : ४८ पदान्तेऽत्र यतिः :::४७.१२ परीक्षणानि चत्वारि परोक्षोऽपि-हि वाच्यो १४ । ३०. १८.२२. ७६. ७. ८ .७८ २८. १६: ७६..: ५९ ४६.. प्रकृतिप्रत्ययद्वारा प्रकृतिप्रत्ययासत्तो प्रचुराणि प्रमाणानि प्रकीर्णका: प्रवन्याश्च प्रत्ययाव्ययतुल्यार्थ० प्रतिरत्नकोशमुक्ता। प्रतिपक्षक्षमापाल० प्रतिषेधः सुविज्ञेयः पृथ्व्यम्बुवह्नि प्रथमेऽद्धेःजः प्रबन्धो रूपक प्रबोधकाद्भुतं प्रमदा इव नो भान्ति प्रमाणजितं न्याया० प्रशंसा क्रियते यत्र प्रयुज्यते स तु. प्रयुज्यते गुरुलघू प्राकृतं चापि विज्ञयं प्राग्रुपस्याद्याद् :५४::::२. ७. ::.:.:८१७ ७१.३०.. २८. १५ ..५२ २६ ६.- ३ ४.. १३. प्राज्यं राज्यतनुः बलादेते नेशा: बहूनां गुणिनां यत्र ७८: ६६ ७०.१८ ६२ ] सङ्गीतराज-पाठ्यरत्नकोश ४० ७७ ६२ ७१ २८ ७९ ७० २४ १२ १२ ३६ ८२१२ ६८. ११. ४७ १४ ११ ७ २. ६७ ५२ १४ २६ ४१ १३ ३७ ५२ २७ or ११ ह ७१ २६ २६ १४ ४० ७७ ६३ २४ १५ बहूनां तु प्रधानानां बहूनां बहुभिः साम्यात् मां भापमाणानां ब्रह्मानन्दरसातिरेक ब्रह्मोक्तश्चेति० ब्रू मोऽथ प्रतिपक्ष भरतमतमतीवदुर्गम भाषा चित्रप्रबन्धेषु भाषाघा गीतयस्तित्रो भिन्नाथ भियते भूभृत्त्वं भूभृतां भूयः कुर्याद्विधिम, भूवक्रणक-मुक्ताफल० मकरध्वजहास० मत्तकोकिलका चात्र मत्वर्था अपि सम्बन्चे मत्सैन्येलुण्ठमाने मधुकरीसंलाप० मन्द्रप्रसन्नो मनोहरा स्थिती रेखा मयरसतजभनसंज्ञाः मलयमारत-मदनावास० महाभूतादिकानन् महाराष्ट्रादिदेशानां मात्राभिरष्टोदश० मानान्तरमधिगतेायतीति मार्गतालास्तथा मागित्वातिरञ्चेन मालवाधिपति मुख्यत्वं यदि हस्तकस्य मुखपंक्ति-कुसुमलता० मूर्तिमन्तः प्रयुज्यन्ते मोहनिर्णयनिन्दा० यत्किञ्चिभरतादि यत्पूर्व कोवजनन० पत: पूर्व पदार्योऽय ८१ ३८ ११३ ४ ५६ ५४ ६० ६४ १८ २२ १६ ५ २४ ६० ६२ ३० . २८ ३७ १०८ ४६ ५९. ५३ ६७ ७४ .३६ यत्र वस्तुकृता यत्राभिनयतो यत्रार्थस्य प्रतीतिः यत्रास्पष्टगुणोपेतैः यतो मधुरता श्लाघ्या यथारसं येन यथेष्टभंगणा यथेष्टं रगणेः यद्गुणा गुणिनामेव यद्धर्मशास्त्राच्च यदवप्पेन पुराजितं यद्वाक्यं राजवृन्देन . यदेकतन्त्र्यामुद्दिष्टं यरिस्त्रणमाह यद्यशः पदमाघातुं यमकं चक्रवालं यमभ्यमित्रीयितु० यमधिकृत्य परः यो मूनि द्विषता यत्ततोऽतिशयारोपो यस्तु निर्यवनं यस्मात् स्थावर० यस्मात्तारस्य यस्मिन् यान्त्युडव० यस्यामर्द्धद्वितये यः प्रत्यहं . यः पुरा सुपर्वण यः पूर्व चतुराननेन यः पूर्व भरताय यः श्रुत्वा भरतं यः सुरान् सुखयतीह यान्यज्ञानमवान्धराजसदन या सुलभा न सुरेशान् युष्मच्छासनमद्य ये वृप्तप्रतियोध० येत क्षमावलये ७४ ४५ ४४ ३७ ३२. ५१ ३ .१ ४२ २६ : २२ 0 0 8. G. MG, C: W: .. २६: १२ ६१ । ७५ १३. २२ १८ २५ २७ . . ३ २५. ४२ २७ ५९ ५४ ३. १४ २६ --- २७ ७९ ... ४७ ६८ १ ७५ ४६. १६ ८३. २८ ७० ७२. .३६ २५. ૨ अनुक्रमणिका [ ६३ ६३ ६३ ." ६५ ८२. १६ ३६. १२ ८० १३ ८० १७ ५५ -१६ ३३ ६४ ७३ ३८ ७ ३६ ५ २ १ ४ ८३ २६ ३५ ८४ ६२ ८० ३८ ११२ १७ १३ १६ ३० ७६ ७८ ७० ७० येन प्रस्तारमाधातुं येन वर्णादिवृत्तानां येनानर्गलदुर्ग० येनानुक्रमतः शकान् ये प्रयोगमवन्तीह यो गीतानुगतौघपरमो यो वेदांश्चतुरोऽवगाह्य रचितविधिधमार्ग रतिषष्ठदशमः, रस्यते यः सहृदयः रसलक्षणभावादि० रसंस्वरूपकथनं रसानामानुकूल्यन रसाविर्भावको रसेषु शेषेषु यथारसं न रागाङ्गत्वं ग्राम रागालापन रागोऽभिधीयते गीत राजा सः स्याद्विवादी राजैवात्रोपदेश्यो रुद्रे वृषात्तदेकस्मात् रूपादिकं तत्करणं रेखाया अनतिक्रमात लघुभिः पञ्चादिक लघुद्वौं चस्तथा दो ललितो घिच्युतः लक्षणस्थं द्वितीयादि लक्षणा लक्षण लक्षस्तदीयस्तनयो लक्षणामेकोना लक्ष्येऽन्यस्वर ल-षट्काद लास्यताण्डवभेदेन लोनं तत् समनन्तरं लोलाकृते ध्रुवतालयुतं लेखिम्या नलकूवरं ३ ३४ २४ ३१. ४१ ३२. ५२ ३२ ५४ २६ २३ १२ १३ २३ २३ लोकमार्गव्यवस्थातः लोके यदप्रसिद्ध वर्णवृत्तिः पदावृत्ति वर्णसाम्यमनुप्रास घसन्तोत्सवबन्धः वाधवर्णसमूहस्तु वाक्यमांशंसनोपेतं घायस्वातिमहेन्द्र विकट रूपवेषादी विचार्यमाणमत्रैव विचार्यमाणस्तत्त्वेनो० विचित्रचरणादीनां विचित्रवर्णालंकारो विद्युल्लता-पञ्चानन विदारी गीतखण्ड. विभावितस्तु विभूषणं तथा विश्वे मानवस्तिथयो विश्रान्तिस्थानक विषमं विकट वृत्ताश्च तथा न्याया वृत्तिः स्यात् स्वान्य वृन्दमाहुः पद्धतिश्च वेणावपि च वेदेनात्ममूलत्वादिह व्यञ्जका: स्यु० व्यञ्जनान्यङ्गक व्यत्यासे सुमनोरमा० व्यवस्थितश्रुतियुता व्याकृते जगतां येन शब्दच्युतमिमे • शाखा चैवाङ्क रश्चैव शाम्येद्ययाहिदष्टस्य शुद्धा द्विपरिका० शेषजात्यादिकं मुक्त्वा शोभामाहत्य ३७ १०५ ३० ३३ ६० २८ २० ३४ ७२ ६५ ६२ ७७ ३७ १०२ ६५ १६ २९ ३७ १०७ ३७ ११० ४१ २१ १२. १७ ४३. ३३ ६२ ७६ ५६ २१ ५६ . २२ ४१ २२ 8 . २१ ४ ६० ३ १२ है २७ २७ ४१.२० ५२ । १० ३४ ७४. ६० २५ ४२. २५ ४१ १८ ६६ १४ ५१. ३४ ७३ १४ ] सङ्गीतराज-पाव्यरत्नकोश ५. . २६ ६७ ६ २ ५६. २६ २३.. २८. ३०. ३२ ४६.. ४ ८२ १६ ७७ १३ १६ ३६ ६८ ५३. १५ श्रवणादेव शन्दस्य श्रीकम्भेन किरीटिने श्रुत्यादिस्वविभूतिभिर्जगदिदं श्रुतमुक्तं तु यद्वाक्यं श्रुतविश्रुतयद्गुणाकरा श्रुतिभ्यः स्युः स्वराः श्रुतिभिश्च स्वरश्चैव श्रुतेन यस्य वृत्तेन धेष्ठः सन्निहिता श्रोतुश्चित्तस्य पचचाहो वदन पत्रिंशदेतान्युक्तानि पट्पदी चतुःपदी षट्साहली गदिता पण्मात्री द्वौ चतुर्मात्री पद्वयं चः पोडशाही पश्ची जे पचचाद्दस्तो ३२.४० m x १६.. ६८ . ७ २१ ६. २८. .. १३ ४३. ३२ ७०. २२ २३. .. २६. ३२ ७ १ ५८. ४१. ५५. ११. २६ ५८ ४६ Nm ५२ १२. १६. ६०. ५८ १ ५७ ३७ पष्ठेनफेन गुरुणा स राजराजः स रासो विषमे सरोरुहं सरोजं च सलयतालपदा सर्वगुरादिल उक्तो सर्वोऽप्यभिनयो स. सिद्धसाध्यसम्बन्धः सहेतुकों वचनैः साध्यसाधनसंयोग साधारणीकृत सामस्त्यव्यासयोगः सामान्यस्य जनस्यात्र सितेतरोऽसितस्तस्मात् सिद्धप्रमाणभावस्य सिंहविक्रोडको सुखदुःखक्रियारूप: सुखपालतिलक० सुरासुरैनमस्कार्या सुललितललनालापन० सुश्लिष्टसन्धिभिः शब्दः सेयं कन्या संयुक्त स्कन्धादिकम्पः स्थानकानि तथा चार्य: स्थानं श्रुतिपदग्राम० स्थानं स्यादक्रियः स्थाय्याविभि० स्नेहाद्दाक्षिण्यतो स्याद्रासावलयं स्यादष्टचतुः पाच्च स्यान्मूर्छनायाः. स्य॒र्वघ्यबधकत्त्वेन स्वच्छन्दोद्धत० स्वनात्युद्योतकत्त्वे स्पनामस्थर० स्वप्लम्धमपि ६९ २६ २४ ६१. .७२ ७ : ३६ ८३ २५ ५३ २२ ४७... १७ ६३ ७ ३४ ० २७ २३. २० १७ १६ ६६. १७ ... पाडवं षट्स्वरं पोगणद्विपदी सङ्गीतरत्नानि संगीतराजे तत्र स्यू सस्यः ससिप्रभृतयः संज्ञा च परिभाषा सत्यं नासत्यमेतन् संश्लेपो यत्र वर्णानां सभाजनमनोहारी सम्मोचितो नागपुरं सम्यगीतं तु संगीतं समस्तमसमस्तं च समवृत्तस्य तु समासमविभेदेन समांसयिििवविध० समासेन प्रसन्यानो समुहमपि यस्योच्च समे चाहें तद १७ १८. ३७. १०६ २८ ..१४ ४६ ३८ १११ २७ ७१ ७४ ३०, २६. २३ . २२ . १२. ६३ २ ४ १६. ८२.१७ ४६.. २ ७७ ६० २८....१०. ७७
अनुक्रमणिका
[ ६५
80
स्वभावाभिनयोपेता
स्वभावाच्चेतसो
स्वभावेन स्फुटाथं स्यात्
३६
३६
८8
स्वर्गतं पुनरानेतुं.
८२ १४
५
३८
२७ ७
स्वरवर्णान्यता
२६ १०
स्वरसाधारणमुदितं
३० ३०
स्वरोत्पत्तिस्था रागाः.
९०
स्वेच्छया रगणः
ह हो विप्रा गुह्यमेतच्छृणुध्वं १२ १४
हित्वा न्यासादेः
२६ २६
स्वरनाम्ना स्वराख्या
स्वरयन्ति मनांसोह
शुद्धिपत्रक पृष्ठांक पंक्ति अशुद्ध शुद्ध ५ ६ 8 २० निजकीबीज० पद्यांकः४५,४६,४७, ४८ प्रारूपत्र० वेदमाग० कोत्तिस्तस्भोन्नत तामराजनेन्दनेन षोडशसाहस्यां श्रीकालतेनेन मृदुसज्ञकश्च सहस्थास्नुकम त्रय २२ १४ १६ २४ २६ ३० निजकीजि० ४६, ४७,४५,४६. प्रारूढपत्र वेदमार्ग० कीत्तिस्तम्भोन्नत० तामराजनन्दनेन पोडशसाहलयां श्रीकालसेनेन मृदुसंज्ञकरच सहस्थास्नुकम् त्रयं पाडवं अंहयादिसंयुते द्वितीयांशादिकः शम्भोः संख्याघाताद् १ १२ १४ ३४ ३६ १७ ४७ ७ १४ १६ पाडव ग्रहयादिसंयुते द्वितायांशादिकः शंभाः सख्याघाताद् १८ ६ ५५ ६४ रचिताचलदुग वीणवादनप्रवीणेन परिकीत्तिता रजिताचलदुर्गेण वीणावादनप्रवीणेन परिकीत्तिता - १७ ७६ २ ४४ ८३ ८४ १३ ११ १२ १६ २५ १६ सघिसंधानयुक्तं धनुर्धोकार० कुंकुमपुर वशीकृत वैरिवोर० श्रीन्यबकेश्वर लुण्ठाकार्गल० मतनुवर्तना- प्रत्यथि० वन्सुघरोद्धरणा० सन्धिसन्धानयुक्तं धनुर्धोकार० कुंकुमपुर वशीकृत वरीवीर० श्रीव्यम्बकेश्वर लुण्टाकार्गल० मतानुवर्तना० प्रत्यथि० वसुन्धरोद्धरणा० २५ २ ६
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