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अपने
अपने
कारावास
(पहानिया)
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अपने अपने
कारावास
सरोज वशिष्ठ
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उस हवा माम जो मेरे और मेरे सपनों के बीच से गुजरती है
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उम हवा के नाम जो मेरे और मेरे अपनों के बीच से गुजरती है अपनी बात - - किसी देश में कितनी प्रगति हुई, कौन-सा देश कितना अधिक शक्ति- शाली है यह तो इतिहास और राजनीति के विषय हैं, पर हर पल बदलते संसार में हर इन्सान सोचता ज़रूर है, जूझता जरूर है, अनुभव और कामनाएं करता है । और अन्त में हर इन्सान किसी न किसी हद तक प्रस्त और अकेला रह जाता है। जो कोई भी अपनी आकांक्षाओं, सपनों, अपने अकेलेपन, अपने विचारों को व्यक्त कर लेता है उसी की रचना को मैं कहानी मानती हूं। लिपि अलग-अलग ज़रूर होती है पर नाम एक ही होता है-कहानी । एक प्रवल प्रचण्डता, एक संक्षुब्ध लालसा, विकार, वेदना या अन्तर्वेग हर कोई हर रोज हर पल अनुभव करता है । हर रोज़ एक कहानी लिखी जा सकती है। वैसे यह हवा ही चलनी बन्द हो जाए तो कम से कम कहानी खत्म हो सकती है। पर उस हवा का क्या किया जाए जो यक व यक विना पूर्व सूचना के, अचानक ही, गर्म हो जाती है, एक हादसा बन कर आसपास मंडराती रहती है। इम संग्रह की मेरी सभी कहानियों का केन्द्र विन्दु यही गर्म हवा है- जो बिना वजह चलने लगती है, वम यू ही-ठीक वैगे ही जैसे अचानक एक दिन वियाना बहुत बड़ा स्वास्तिक बन गया। वैसे हादसे मेरे नाथ, मेरी कहानियों के साथ बेहिसाब हुए हैं । उन हादमों से सब नए-पुराने लेखक परिचित हैं । अपनी कहानियों के संदर्भ में पत्रकारिता और अनुवादों के क्षेत्र में अपनी सक्रियता भी मेरा एक बहुत बड़ा हादसा है । पर फिर मोचती हूं अनुवाद ही मेरे लेखन का कारण बने । सारिका में विदेशी लेखकों के मेरे - ।
हिसाब बनुगद प्रकाशित हो चुकने के बाद एक दिन सुदीप से अचानक हायो में मुझेप की बहुत आभारी हूँ। उमने मुझसे कहा था, "आपके अनुगः इतने संवेदनशील हैं, आप स्वयं कहानी क्यों नहीं लिखती ?" 'म्ही फरमा' मेरी पहली कहानी थी और सारिका में प्रकाशित हुई थी। इम बाद मचेतना ने मेरी दो कहानिया प्रकाशित की थी। इनके अनाश में भारत जी की भी बहुत आभारी हू । तेरह-चौदह वर्ष तक हम सोग विविध भारती के स्टूडियो मे उनमे डरते रहे, वावजूद उम डर के जो ने?, कानांचना और प्रोत्साहन उनमे मुझे मिला वह मेरी अपनी अमूल्य निधि है । मन में मैं सबसे अधिक आभारी हू सतीश को जिसने मुझे कभी पुरा भी परने में रोका नहीं। "इस कहानी मे तुम कितनी हो" जैसा प्रान मगर आदरणीय जैनेन्द्र जी पूछ सकते हैं तो सामान्य पाठक को पंदन राष्ट्रीय रोग से ग्रस्त मान कर क्षमा कर देना चाहिए । यह प्रहार सतीग ने महे हैं, अगर न महते तो 'सही फैसला' मेरी आखिरी कहानी होती। एकजानिक सहयोगी ने तो अनाधिकार सन्देश तक भेज दिया था,"नसे पाहिए ऐमीकहानियां उन्हें नहीं लिखनी चाहिए।" यह हादसा नहीं नी और पपा है? । ए-112एन. पी. एल. कालोनी नसरी दिल्ली-110060 --सरोज वनिष्ठ
क्रम
9
अपने-अपने कारावान
आसिरी दलील
16
सही फैसला
25
रिहाई
31
36
42
51
ऐसा क्यों?
बाटियों की पातार
कुछ तो करना चाहिए
टूटा हुआ दायरा
बन्द मुट्टी पर टिकी नजरें
60
66
73
79
संग तरागाछ
अपने-अपने कारावास पर अनूटा नगा होता है मिगी परिसर में अपना नाम गहमा दंग- पर। अपने लिगे पानी को पारर, देगर यह नना नहीं पाता तो अपना नाम पसर, देगरर भाता है । अक्षरो मेही र मनते है, मानों ग मनते है माम । पद-एक पएं पी समीर की तरह मन में उठने है और हमंगामा लिएकागर पर अंकित हो जाते है अमिट, स्पापी, गाया। है कोई और पीरम दुनिया में इतनी गिपर "पाप पिग नाम में निगेंगी?" "अपने ही नाम में।" "पर आप एष गरपारी मुमाग्मिा है, आपको र नही ममता "पर? किस बात पा? मोई सत बाम पाने जाहीर कपा ? मनोयन नाटोमी गमीसाही निगगी।" बंगे भी मेरा मोर भय का सम्बन्ध महिला पहले टूट गरा था, और दिने ऐगे है जो परदोगरा र नही गमने है। पही नियम जीया अन्य रिती पर भी मागू हो माना। हम सो मार-बार टूटरर रिर र गा है। शायद मीलिए निम दुनिया में हर राम मनोगही पाता है। यहां भी-भी परपरी पोहोरे-मोती पहना पाता. मोर मयूरन रिगो मेम्पार पायागयो मानना परमा।।मर. पूरी!गवी गा दुनिया में दूगरी मोरनी है। मग सरनेम नगई नर्गमा नहीं है। "मागे मिनिए । एमी चार महिला में पापा परी भी परिपरनमाहोगा।" - अपने-अपने पाराबाग -- . यह तो फेवल एक ही परिचय है मेरा। कोई बला कहकर परिचय करवाता है, कोई पहना है तूफान है, अंधेरी है, फलर्ट है यह सच है कि मेरे मन में जो भी आए, जब भी आए, जब जी चाहे जिने चाहे कह देती हूं। पुरुषों में बैठ कर डर्टी जोक्स ऐन सुना देती हूं मानो गाजर का हलवा बनाने की विधि समझा रही हूं। अगर किसी के चेहरे गुलाबी होते है तो जाहिर है पुरुषों के ही । मुझे तो यह कभी भी समझ नहीं आया किन किस्मों को डर्टी जोक्स नाम कैसे दिया गया। यह तो गिर्फ सूक्ष्मता और अक्सर धूर्तता की इन्तहा भर होते हैं जिसे कुछ लोग समझ ही नहीं पाते। पर मैं जानती हूं-मिर्फ मैं - कि.में न नो बला हूं, न तूफान. न अंधेरी और न ही फलटं। यह तो एक नुखौटा भर है.-~~नहीं, कई एक मुखौटे है.--जब जैनी ज़रूरत हुई जान-अनजाने पहन लिया। अगर यह मुखौटे मेरे पास न होते तो शायद मैं अब तक कहीं दूर अंधेरे में लुन हो गई होती। कभी कोई मुझे दोबारा ढूंद ही न पाता । क्योंकि जो मैं चाहती हूं, उसे पा नहीं सकती। क्या चाहती हूं, यह ठीक से नहीं जानती, या शायद बहुत कुछ चाहती हूं और उतना सब कुछ पा लेना नामुमकिन है। इस मव कुछ में भौतिक चीजें नहीं के बराबर हैं। दरअसल कुछ घाव हैं जिन्हें मैं हर समय महसूस करती हूँ, सुननी हूं पर भर नहीं सकती। चुप नहीं करा सकती। मुझे लगता है.मैं एक घेरे के बाहर बड़ी हूं जिसके अन्दर मेरा प्रवेश निषेध है। पर मेरी अंगु- लियां हथौड़े मी मजबूत हैं और इन से मैं इस घेरे को तोड़ सकती हूं तोड़ने की अनजानी कोगियों में लगी भी रहती हूं। इनमें से एक कोगिन का जरिया मैंने खोज निकाला है। वह है लिखना-कुछ भी, कहीं भी, कैमा भी। कहा न मने एक अनूठा-ना नगा है, अपना नाम किमी पत्रिका में छपा देनफर मुझे लगता है मैंने उस घेरे को पूरा नहीं तो एक हिस्सा नो पार कर ही लिया है। या फिर इसे थोड़ा-सा तोड़ दिया है। अमर मुझे किली प्रसिद्ध व्यक्ति को मेंट करने के लिए अनुबद्ध किया जाता है । पिछले नौ वपों में मैं अनगिनत गायकों, नतंकियों, लेखकों, नाटककारों ने मिल चुकी हूं। उनने बात की हैं, उन पर लेग लिगे हैं। हर बार भयभीत-गी अन्दर ही अन्दर कांपनी हुई मैं नन्द प्रश्न लिवकर - , 10/अपने-अपने कारावास
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- - - हिले, यु.छ बुदबुदाए और मुझे बैठने को कहा। इससे पहले कि मैं कमरा पार कर सकू वह जल्दी-जल्दी बाहर आ गया था। वह मुझे अपनी केविन में ले गया। छोटी-सी केविन, चारों ओर शीशे की दीवारें । आसपास की किसी भी केविन मे झांक लो। कमरे में सहसा एक सहज-सी आत्मीयता भर गई। उसने मेरे बारे में, मैंने उसके बारे में सवाल पूछे। चाय का दूमरा कप मेरी ओर सरकाते हुए धीमे से उसने पूछा था, "आप इतनी यंग कैसे लगती हैं ?" वह मेरी सराहना नहीं कर रहा था, उसके चेहरे पर सचमुच कौतूहल फैला हुआ था। "आप झूठ बोल रही हैं । आप पैंतालीस वर्ष की हो ही नहीं सकती। यह बच्चे जरूर आपके सौतेले बच्चे होंगे। यह कैसे हो सकता है ? इस का रहस्य क्या है ?" "मैं तेरह वर्ष की उम्र से ही प्रेम कर रही हूं । लव हैज़ केप्ट मी यंग, परहेप्स।" यू ही कह दिया था मैंने, और कोई उत्तर सूझा न था। पर मोचती कितनी अजीब बात है ! मैं इतने वर्ष से एक ही आदमी से प्रेम कर रही । अल्हड़पन में किए वादे अभी तक निभा रही हूं, ऐसा नहीं कि मेरे पति दोपरहित है । सबसे बड़ा संतापक दोप है हर बात में अत्युक्ति का प्रयोग । गुरू-शुरू में कहा करती थी मैं कि यह जार्ज बर्नार्ड शा के भतीजे हैं। अतिवाद का गांक नीधे वहीं से पैतृक सम्पत्ति के रूप में प्राप्त किया है। समय बीतता गया और ऊंची आवाज़ में किए गए बढ़े छोटे दावे पूरे न हो पाय तो निद-सी आने लगी। हर उतार चढ़ाव को सफाई से संभालने में में धीरे-धीरं माहिर होती गई पर मेरे पति की वाचालता और मर्यादा का उल्लंघन करके बातें करने का तरीका न बदला। मुझे बहुत से ऐतराज है पर प्रेम अभी भी है। "नलिए सोमोवार चलते हैं ।" यह पैसेजनुमा रेस्तरां जिन की दीवारों पर पतंगें लटका रही थीं, हमारा मेन्टेवू बन गया । हर गाम पांच बजे हम वहां मिलते। सात बजे वह मुझे टंगनी में बिठाकर घर छोड़ आता। में रोज पाहनी किम स्वयं ही चली जाऊंगी। पर वह हर बार मना कर देता 04.04. 12/अपने-अपने कागवान मानो मैं नन्ही-सी बच्ची हूं जो बम्बई की भीड़ में खो जाएगी। चाय कॉफी व टैक्सी का बिल में एक बार भी न चुका सकी। हर वार पर्स की ओर चढ़ा मेरा हाथ वह हवा में थाम लेता, "आप मेरी मेहमान हैं।" मात, आठ, नौ, दस और फिर रात के बारह भी बजने लगे। इस बीच हम क्या करते ? समुद्र किनारे बैठ चार्ली चैपलिन के बचपन से लेकर जामानूरी फायावाटा के अकेले बुढापे तक पहुंच जाते। वातें, वातें और वार्तं । हर दूसरे दिन मैं उसे याद दिलाती कि मुझे उसके बारे मे लेख लिख- कर भेजना है-जल्दी। "जल्दी ? जल्दी क्या है ?" मुझे हर काम जल्दी ही करना पसन्द है। पर उसे कोई जत्दी न थी, और फिर उसने पूरी तरह से मेरा भार सभाल लिया था, मुझे किम दिन कितने बजे कहा पहुचना है, क्या करना है, वह निधारित करता। अजीय आदमी है, आधी-आधी रात तक म अकेले घूमते रहते हैं, पिक्चर देखते हैं, नाटक देखते हैं, कई लोगों को मिलने जाते हैं पर उमने कभी कोई असंगत व्यवहार मेरे माथ नहीं किया । मेरा मन कई धार सवाल करता कि क्या उसका इतना विनम्र व मदाचारी होना उमका मामान्य रूप है ? प्राविर कोई भी पुरुप किमी नारी पर इतना ममय व धन क्यो बहाता है ? उमे मेरे साथ-माथ घूमने मे क्या मिलता है । इस जान-पहचान को वह इतना व्यापक और विस्तृत रूप क्यो दे रहा है ? आखिर एक दिन मैं जिद कर के अपने लेख के लिए मामग्री एक. पित कर ही रही थी। वह बोलता रहा और में लिपनी रही। काम पूरा हो गया पर हमारा माथ न छटा । हमे शायद एक-दूसरेकी आदन-मी पड़ गई थी। बम्बई में मेरा आखिरी दिन भी उमी के साथ ही चीता था। मैं बेहद खुश थी। मेरे लिए जो अमहाय घडिया थी, वे कितनी महजता में बीत चुकी थी। उसने मुझे फिल्म देखने का निमत्रण दिया था। हाल में हम दोनो अपनी पूरी शक्ति मे कृत्रिम वनावटी सहजता में बैठे थे। 4- "मुझे डर था कि तुम नही आओगी।" उमके होठ मेरे यालो को छू रहे थे । मैं मानो झूले में लटकी मानचित-मी उमकी मौजूदगी को मन- ही-मन पालने में झुला रही थी। मेरी आंखें परदे पर टिकी पी और मैं अपने-अपने कारावास / 13 अत्यन्त निदचलता की हालत में बैठी थी। उसका हाय जो मेरे हाथ के एकदम नजदीक था, जल्दी से हिला और मेरे हाथ पर आगर लग गया। मंने कोई आपनि न की नाहते हुए भी न कर सकी। मेरा हृदय एक तीगी पीटागे फैल गया जंगे प्रसव के समय गर्भापाय। मैंने आंखें बंद कर ली । उनका हाथ अब मेरी अंगुलियों को महसूस कर रहा था। दवा रहा था। मसल रहा था। उसके तीरो नान मेरी हथेली में चुग रहे थे। मुझे पता नहीं चल रहा था कि एकाएक जीवित हो उठी गिराएं मेरी अंगु- लियों की थी या उसकी। गोक्ति हमारी अंगुलियां एक-दूसरे में बेतरह उलझी हुई थीं। एक फव्वारा-गा मेरे अन्दर से फूट निकला था। हम दोनों विवाहित थ इन लिए यह नव निषेध था। न तो इसकी इजाजत भगवान दे सकता है न मैं । जब हम हाल से बाहर आए तो जगमा चेहरा एकदम बिना हुआ था। बहुत हिम्मत बांध कर उसने कहा, "आज रात नुम मेरे माथ ही विना दो।" एका पल ममगार बोला. "चलो, नापर निगनी नलते है।" देर हो गई है।" उसकी आहत आंग देखकर पल-भर के लिए मुझे लगा कि मैं अपना एन आवरण उतारने वाली हूँ, एक मुखौटा उतारगार फेंकने वाली हूं.-अमे- घना वाला। गमे पहले कि यह मेरी कमजोरी को महमूग कर मके, मैने टैगमी आश्चर को कफपरेड की ओर जाने का आदेश दे दिया। वह गदा की तरह मुझ से कुछ दूरी पर बैठा था। चन्द मिनटों में टैनगी घर गोवाहर रानी थी। मैने टैगनी की लिड़की पर शुककर कहा, "थैरम फार आल यूनिट फार मी!" उत्तर में उसने धीमे में मेरे हाथ दवा दिए । अपने कमरे में मैंने एक अजीय अलेगन में स्वयं को घिरादापाया। पीने में मैंने अपना नालीन वर्ष बूदा चेहरा देगा। गाल जब मैं अपने पनि गी बाहों में पहन जाऊंगीनो यागज़द पन्नीम वर्ग के वह मुझे उनना ही अनजिन कर देंगे जिनना पहली बार हुने पर किया था। हिम्की में धुला-मिला अनुराग और एक प्रणय-व्यनि मेरे कानों से होकर पूरे शरीर "नहीं, बहुत 14/अपने-अपने गायान मे छा जाएगी । अन्त में उनका हाथ मेरे शरीर के किसी भी अग पर रख कर अपना स्वामित्व जतलाता हुआ, रुक जाएगा । वह सो जाएगे और मैं भी। या शायद मैं पत्थर की तरह जड बनी पड़ी रहूगी। एकाएक मेरी आखो मे आसू उभर आए। बात कुछ भी नहीं थी। कुछ भी तो नहीं । एक अचानक हुई मेंट, एक छोटा-सा प्रसग । एक उप- कथा का एक अश, अधेरे में विताए कुछ क्षण, जिन्हे कविता का नाम भी दिया जा सकता है । पर मैंने उन्हे अस्वीकृत कर दिया, निष्फल जान- कर तिरस्कृत कर दिया। अब आगे क्या हो सकता है ? कुछ भी नहीं । अगर हम कभी दोबारा मिले भी तो क्या होगा? पर हम क्यो कर मिलेंगे ? जिस काम से मुझे उसमे मिलना था वह तो बखूबी पूरा हो चुका था। एक बार फिर मेरा नाम एक पत्रिका मे छप गया, हर बार की तरह खूब नशा चढ़ा। और फिर दोबारा मुलाकान पर तो पहरे लगे हुए हैं । जिन्हें हटाना व तोड ना मेरे बस का नहीं । मुझ से ज्यादा शक्तिशाली प्रतिनिधि मेरे रास्ते में खड़े हैं । सदियों से क्रूर शासन से पीडित, अतिनिर्दयता से शासित मेरा मन मुझे अपने लिए मन्तोप या अनुकूल सुख ढूढने की आज्ञा ही नहीं ऐमी भी तो औरतें हैं जो इन पहरो को तोड-फोड कर अपने-अपने बन्दीगृ हो से भाग निकलती है, पूरे रेगिस्तान पार कर जाती हैं और कई वीरानो से गुजरकर एक नए क्षितिज पर पहुच जाती है। पर मेरा दायाद मुझे ऐसा करने से रोकता है । एक अजीव तरह की दुर्बलता, एक गहन अनुयोग मेरे अन्दर भरा हुआ है । मुझे अपनी ही बनाई दीवारो के अन्दर रहना है । अपने न्यायालय में मैंने स्वय को यही निर्णय सुनाया है, कारावास का दंड प्रलय दिवम तक मुझे सहना है। अपने-अपने कारावास / 15
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किया था । वगीचे के बीच मे लगे सौ साल पुराने पीपल के पेड़ के नीचे वह बैठी थी---अकेली-मानो किसी का इन्तजार कर रही हो। वच्ची एक हाथ में मेरा चाबी का गुच्छा थामे और दूसरे हाथ में मेरा एक हाथ मज- चूनी से पकड़कर अपनी मां के पास ले गई थी। वह हम दोनों को देखकर थोडी मुस्कराई थी-एक बहुत ही उदाम लुटी-सी मुस्कराहट, एकाएक मुझे लगा या उसके अन्दर एक शोर था जो एक चुप आह वनकर उसके चेहरे पर पूरी तरह से छा जाने के बाद हमेशा के लिए थम गया था- वह योडा रुककर फिर मुस्कराई थी--मानो किसी पीटा का आभास पूरी शिद्दत में जाग उठा हो । वह आहत चेहरा मुझ जाना-पहचाना-मा लग रहा था। मैंने मुस्कराते हुए कहा था-"आपकी बच्ची बहुत प्यारी है। देखिए न मेरे गुच्छे को लेकर कमे नाच रही है।" "सुजाता क्या कर रही हो ? चावियां लौटा दो।" "न, न, रोकिए मत, खेलने दीजिए न । इसने मुझे बताया कि आप नृत्य करती हैं ?" मैं मन-ही-मन अन्दाजा लगा रही थी-दिल्ली की यह कोन-मी नई-पुरानी कलाकार है जिसे मैं पहचान नही पा रही हू । "जी हा, मैं भरत नाट्यम करती हूं।" "बहुत ही जाना-पहचाना चेहरा है आपका..." "मेरा नाम करुणा सेठी है।" "ओह नो "तुम तो इती-सी होती थी, करुणा "सलीमा की बेटी हो - "क्या आप अम्मी को जानती हैं ?" "उन्हे भी और तुम्हें भी, बहुत अच्छी तरह से । याद नहीं है पन्द्रह साल पहले सलीमा के अमरीका चले जाने से पहले तुम अम्मी का हाय 'पकडे नाट्यकला केन्द्र हर शाम आया करती थी, नाचती ठुमक्ती । मरोजनी हूं, सरोजनी।" मैंने याद दिलाया। "हां, याद है कुछ कुछ उमकी आखें धुधला गई थी। "सलीमा तो मुझे पता है यूब काम कर रही है अमरीका कहो, तुम भी तो साथ ही चली गई थी।"
. "हां" "क्या किया उसने बग्न ?" "नृत्ल नीला," मेरी आंखों में उभरे प्रश्न का उत्तर उगने स्वयं ही दे दिया था, "अमरीका में ही नीना और अब भारत लौट आई हूं. हमेगा के लिए।" उसने ऐसे याहा था मानो किमी लाम को पात्र में दफनाने तीनैयारी कर रही हो। "पनि नया करते है ?" बच्ची नही गलल नो जाहिर था हि पिना विदेशी है। प्रश्न पूछते ही मैं पटना गई थी । पति के रहते कोई युवती तनी उदास, इतनी आहत कभी नही लग सकनी । वह कुछ बुदबुदाई थी, मानोस अप्रिय विषय पर वह बात न मरना चाहती हो।यनी ठोकर साकर गिर गई थी। हमें वातनीन गेकने का बहाना मिल गया था और उने आश्वस्त होने का समय भी। हमेगा की तरह गोपी का वीना बहुत से लोगों से सजा हुआ था। छ जनमुन ही कविता पाठ मुनने आए थे, कुछ किन्हीं महत्त्वपूर्ण अति- थियो में नम्पर्क स्थापित गरने. कुछ पत्रकार थे, कुछ गोपी के बीन वर्ष पुगने दोस्त । करुणा गोष्ठी के समाप्त होने बहुत बाद पहुंची थी। कर किसी को पता भी न चला था. सब वियर या भरवत के गिलास थामे अपने-अपने संमार में खोए, मस्ती-भरी गप्पं लगा रहे थे। आज गोचती हूं, क्यों मैंने उस जन-ममूह से हटगार करणा ने बात- नीन गुरु की। बच्नी ठोकर गाकर गिर गई थी तो मुझे हट जाना चाहिए था । यो में करणा ने पान ही खड़ी रही ? उनकी मां को मैं बरनों पहले जानती थी, यह मन है, पर मुझे इस युवती ने क्या लेना-देना ? अमरीका ने भरत नाट्यम नीखकर भारत आई है। कुछ दिनों में तंग आकर लोट जाएगी। पर नही..'ठोकर माई बच्ची फिर ने मेरा गायी गा गुच्छा उठाकर ठुमक रही थी। मैं करुणा की ओर देखकर मुस्करा रही धी... एनन्दम बेमानी मुस्कान नही होगी मेरी पर मैं मुम्कराई जार थी। यह गोपी को मिलने आई थी । गोपी ने उगे महा था-गोष्ठी बारह बजे नमाप्त हो जाएगी। फिर बात करेंगे । पर यहां नो एन बजने को आया। काफी लोग जमे हुए थे, नाग नार पर यह लोग जिनके हाथों में बियर के 18/ अपने-अपने कारावास " गिलास थे । हमे बहुत पहले लोट जाना चाहिए था पर बातों का कोई अन्न नहीं, चाहे मुलाकाती पहली बार मिले हों या पुराने मित्र हो । खर एक बजे के बाद नो वहा रुकने का सवाल ही नहीं उठना था। चलने से पहले स्वतंत्र पत्रकार होने के नाते मैंने करुणा के बारे में कभी लेख लिखने की इच्छा व्यक्त की थी । उमे तो मानो डूबते-डूबते मैंने वचा लिया था। यही उसकी मबसे बडी ममस्या थी । अपने भारत लौट आने का प्रचार- प्रमार वह कैसे करे? कैसे उसे नृत्य करने के लिए निमंत्रण अनुबन्ध प्राप्त हो ? उमने मुझे कहा था, "मेरी मदद कर दीजिए. जैसे भी हो.. "तुम चिन्ता ही मत करो। मैं तो लिखूगी ही, अन्य पत्रकारो, समी. क्षको से भी परिचय करवा दूगी। और फिर तुम्हे दूर दर्शन पर भी नो प्रोग्राम मिल मकते है।" "मैं वहा किसी को नहीं जानती हूं।" "तो क्या हुआ? मलीमा को नो सभी जानते है । तुम ल ही वहां जाना । देखना तुम्हे तुरन्त प्रोग्राम मिलेगा।" ठीक वैसा ही हुआ, जैसा मैंने आश्वासन दिया था। न केवल दूर. दान बल्कि अन्य कई सास्कृतिक संस्थाओं ने भी उसे निमत्रित किया। मभी पत्र-पत्रिकाओ मे उसकी चर्चा हुई. पर कई बार फोन पर बातचीत के बावजूद मैरा लेख न लिखा गया। महीनो वाद एक सस्था की ओर से निमत्रण पत्र आया-करुणा की भरत नाट्यम कला का प्रदर्शन था। सुबह करणा का फोन आया। "आप आएगीन "ज़रूर, और इस बार लिखूगी भी। अपने कुछ चित्र मुझे दे देना।" "उसकी चिन्ना आप मा कीजिए, बस आप आ जाइएगा।" शायद इस लेख पर कोई प्रतिवन्ध किमी वाहरी शक्ति ने लगा दिया था। मैं उस दिन भी न जा सकी। बहुत बुरा लग रहा था । अपनी एक पत्रकार मित्र निशा को फोन पर करुणा के बारे में सब बताया। उसमे निवेदन किया कि वह मेरी जगह चली जाए। "हां, हो, तुम निमत्रण पत्र भिजवा दो, मैं तुम्हारा काम कर दूगी।" महीनो बीत गए । जव-जब निशा मुझे मिलती, वह मुझे आश्वासन 21 आखिरी 19 T, "यह मेरा जल्दी ही छप जाएगा। कोनिन करंगी अगले अंग में ननेगी।" गॉफी ग पाले, काफी हाउग का निरन्तर बढ़ना शोर, लोगों का रा प्रवाह आगमन और इग गव मे घीन पल रही हमारी गप्पं । एका- का विषय परिवर्तन गारते हुए निशा बोली. "सुनो, यह गरणा वाला लेप नाज एप गया है। सुबह उगका फोन आया था, बेहद गुग थी," निशा ने गगार पले में गे पनिका निकाली । निम व लेग ने पूरा राफा घेर गगा या । मैंने जल्दी-जल्दी नेग गला था। गणों का गभी न गत्म होने वाला प्रम तोड़कर में जल्दी से बाहर गले मटर की ओर लपकी थी। लंग से परले पर पहुंचना जरूरी था । स्कुटर पालियागेट स्ट्रीट पर आ गया था। दूरवर्णन गेन्द्र ग बाहर मेरी निगाह फुटपाथ पर फुदकनी गुजाता पर पड़ी थी। स्मटर रोककर मैं वहीं उतर गई । सोना, पांच मिनट दात कर ही लू, "अभी अभी तुम्हारी ही बातें हो रही थी। उस दिन में आ न सकी। पर तुम्हारा नृत्य दूरदर्शन पर हर बार देखा । अच्छा नृत्य करती हो । यहां धी इतने दिन ?" "मैं गल ही नोटीहूं। यूरोप गई थी दो महीनों के लिए। आपको वाहन-बहुग धन्यवाद । आपने मेरी किलनी मदद ली है..." दो नन्हें गरेकोमल हाथ मुख संथे । मैंने थोड़ा नीगे शुकपर सुजाता का हाथ धाम लिया था, "हैलो गुजाता," उसने उत्तर तो दिया था पर होठों गे मही। उगने मेरा हाय और गगकर पकड़ लिया था। मैंने भी जवाब में उगगहाथ पर हल्ला-गा दवाव डाला था। "यहां मैगे आई हो ?" मरणा के हाथ में एक बड़ा-गा थैना था, "आज प्रोग्राम ?" मैंने पूछा था । "नहीं, पिटला न उठाना है। मैं तो बाहर चली गई थी, शायद लिए मुझ राग नहीं पनाह । यो गमगार गाट नुनी भभी मन यह नही पना गला कि मुझे मग कहां ग मिलेगा।" "क्या कहती हो. यह तो बड़ी मामूली-गी गमगा है। नीधी मंजिल परमोगा मगर । नल, में माथ चलती 1पांन ही मिनट 'लगंगे।" - 20/ अपने-अपने कारावास चौथी मंजिल पर पहुंचकर पहले सही कमरे को फिर सही व्यक्ति को ढूंढा और फिर चंक की खोज शुरू हुई। इस बीच सुजाता ने मेरा हाय एक पल के लिए भी नहीं छोड़ा था। मैं और करुणा धीमे-धीमे बातें करती रही । एकाएक सुजाता ने अपना निर्णय दृढ़ स्वर में सुनाया था, "आई एम नाट गोइंग विद माई ममी। आई वान्ट टू कम विद यू।" "हा-हा क्यो नही, मैं तुम्हें अपने साथ ले जाऊगी।" मैंने उसे टालने के लिए यह बात न कही था, यू ही बस अनजाने में अपना स्नेह जतला दिया था। उत्तर सुनकर उसने अपनी जकड और कस दी थी। बातो के दौरान एक-आध बार मैंने अपना हाथ छुडाने की कोशिश भी की थी, अकारण ही, पर हर वार सुजाता बोली थी, "डोन्ट लीव माई हैन्ड ! आई एम कर्मिग विद यू।" चैक की खोज समाप्त हो चुकी थी। जल्दी ही वह धारणा को मिलने वाला था। पाच मिनट की जगह मैने करुणा के साथ आधा घटा बिता दिया था। उसने एक-दो बार कहा भी था, "आप तो फंस गई।" "कोई बात नहीं, तुम्हारा काम हो गया। घर जरूरी पहुंचना है नही तो कॉफी पीते, फिर कभी सही।" इस बीच हमने बहुत से विषयों पर चर्चा कर डाली थी । करुणा को हर कलाकार की तरह बहुत-सी शिका. यतें थी, कही से अनुदान नही, यात्रा मे वाद्य यत्रो को सुरक्षित रखने के लिए प्रथम श्रेणी की रेल यात्रा मे किसी तरह की रियायत की व्यवस्था नही और सबसे भयकर शिकायत कला का सही मूल्याकन करने वाले व्यक्तियो को कमी। एक लम्बी कहानी है रचनात्मक सघर्ष की जिसे करुणा भी सह रही थी । वैसे सस्कृति के चोट खाए चेहरे मैं वरमो मे देख रही हू-जिनमे मे अधिकाश जाने-माने प्रतिष्ठिन चेहरे रहे है । अनेक अतर्राष्ट्रीय प्रदर्शनो मे भाग ले कर पुरस्कार जीत कर जिस देश को इज्जत वढाई जाती है, जिस देश की निधिया सवारी जानी है, उसी देश में लौटकर वह चेहरे दौखला उठते है। बातो के दौरान मैंने महसूम किया था कि क्या ऐसी लडकी को जिसके चेहरे पर त्राहि-त्राहि स्पष्ट लिखी हो, और त्रसित किया जा सकता है ? कसा क्रूर होगा वह पुरुष आखिरी दलील/ 21 . चंक लेकर हम तीनों सीढ़ियों तक आ गए थे । करुणा को पांचों मंजिल पर जाना था-~-अपने भारत लौट आने की सूचना उसे सम्बन्धित अधिकारी को देनी थी। मुझे नीचे जाना था। हम दोनों के बीच बड़ी थी सुजाता, एक नन्ही नी मूवमूरन-नी कोमल-सी गली । न वह नाणा को ऊपर जाने दे रही थी और न मुझे नीचे। बस वार-बार एक ही बात दोहरा रही थी कि वह अपनी मां के साथ नहीं जाएगी । मैंने पूछा था, "पयों नहीं जाओगी?" "विकाज यू आर माई फ्रेण्ड, आई विल गो विद यू ।" आठ महीने पहले गोपी के बगीचे में अचानक हुई छोटी-सी मुलाकात के आधार पर जो शायद मुजाना को याद भी न होगी-इनी बच्ची ने मुझे अपनी दोस्त बना लिया था। या शायद याद हो, कुछ तो आधार होगा मुजाता के इस निर्णय का। "तुम्हारी ममी भी तो तुम्हारी दोस्त हैं।' पर वह नहीं मानी थी। उसने मेरा हाथ अपने हाथ में कैद कर रया था । मैंने दलील पेग की, "मैं तो तुम्हें अपने घर ले जा सकती हूं, पर मैं जानती हूं वहां पहुंच कर तुम अपनी ममी को याद करके रोने लगोगी।" "नो! नो! नेवर । आई डोण्ट वाण्ट माई ममी ।' टेक मी विद - यू यू आर माई मन्ड।" यह कमी चानना थी? करुणा की असहाय आंखें मेरी ओर देय रही थीं । क्षमा मांगती हुई नी उमने हल्के से सुजाता को डांटा भी था, "बाई आर यू बियंग नो एगमिव ?" पर सुजाता पर कोई असर नहीं हुआ था । अपनी मौन मृक जिद बड़ी निर्भीकता मे व्यक्त कर रही थी वह । उनका फैसला अन्तिम व अटल था। कोन सी शक्ति थी जो उसका पगला बदल दे। "आई डोण्ट वाण्टमाई ममी 1 टेक मी विदय।" दवना से मुजाता ने अपनी जिद दोहराई थी उमः कारण राणा का आहत नहरा मौधित हो गया था। पर यह अपना गुम्मा पी गई थी। नोट नह गई थी वह । मैंने अपनी प्रौढ़ना का आवरण ओदकर 22 / अपने-अपने कारावास ? स्थिति को नजरअन्दाज करने का अभिनय करते हुए अपना चेहरा दूसरी ओर फेर लिया था। सुजाता के नन्हे-नन्हे हाय मेरी टागो को अपनी गिरफ्त में घेर रहे थे। मैंने स्वय को झुठलाना चाहा ---यू ही मरारत कर रही है, बच्ची है । पर नहीं वह तो अपने लिए एक सुरक्षित जगह दूट रही थी । माथ-साथ रहने का सुख तलाश रही थी। एक ऐसा घर द रही थी, जिममे मा-बाप दोनो हो । फिर मैंने स्वयं को मम- झाया । यह केवल मेरी कल्पना है, इत्ती-सी बच्ची को क्या मालूम घर क्या होता है ? टूटा हुआ या फिर जुडा हुआ। "अच्छा चलो, तुम मेरे साथ चलो," उसका एक पैर नीचे जाने वाली पहली मोदी पर पहुच गया था, “पर चलने से पहले एक बात बताओ?" अव सुजाता की आग्यो मे सम्पूर्ण आशा झलक उठी थी। "तुम तो अपनी ममी को याद करके नहीं रोओगी। पर तुम्हारी ममी का क्या होगा वह तो तुम्हें याद कर के बहुत रोएगी।" "आई डोन्ट केयर।" एकाएक स्थिति ने एक भयकर मोड ले लिया था। करुणा की आखों में आतक छा गया था, पीड़ा भी, वेवसी भी । व्यस्त नृत्यागना थी वह । राजधानी की नई प्रतिभा । एक नया चेहरा । नृत्य ही उसकी जिन्दगी थी, उसकी महत्त्वाकाक्षा थी । उसमे निहित उसका अह, उसके सालीपन को भरने का माध्यम, नृत्य की गहराइयो मे डूबी हुई करणा। इम सबके बावजूद मैं जानती थी कि करुणा पूरे मनोयोग मे सुजाता की दखरेख अच्छी तरह से कर रही थी । जहा कही भी जाती मुजाता साथ ही रहती। पर जाहिर था कि मुजाता न तो मन्तुष्ट थी न ही सुरक्षित । एक अनाम भय से ग्रस्त थी वह । शायद करुणा उमे डाटने की तैयारी कर रही थी। या फिर उसे घसीटकर अपने साथ ऊपर ले जाने के बारे में सोच रही थी । मेरे अन्दर भी अग्नि दहक रही थी । नहीं, सुजाता के लिए नहीं, उसके माता-पिता के लिए । क्यो शादी करते हैं लोग ? अगर करते हैं नो क्यो नहीं निभा पाते ? कितने सशोधन किए गए है सविधान मे । नये कानून बनाए गए हैं । क्यो नही किमी को मूझा कि कोई ऐमा कानून बनाया जाए कि अगर शादी कर ही ली है और अगर बच्चे पैदा आखिरी दलील /23 । ।
लो। किए हैं तो कानूनन वह शादी तोड़ी नहीं जा सकती। क्या दोप है वच्चों का? दो समझदार पढ़े-लिये संभ्रांत व्यक्तियों को किसने अधिकार दिया है कि एक नन्ही-सी काली को तुफानों के थपेड़े सहने के लिए बगीचे में असुरक्षित छोड़ दिया जाए ? पर इस समय मैं क्या करूं? एक विचार' विजली की तरह मेरे दिमाग में कौंधा था। "अच्छा सुजाता, मेरी एक बात और सुन तुम्हारी मगी को तो ऊपर जाना है, उसे किसी को जरूरी मिलना है, है न ?" सुजाता ने सिर हिलाया था और साथ ही दूसरा पैर भी नीने जाने वाली सीढ़ी पर रख दिया था। "और मुझे जाना है रेडियो स्टेशन के अन्दर । वह सामने देखो, हां, नीचे देखो, वह सिपाही खड़ा है न, दीख रहा है न तुम्हें, बन्दूक है उराग हाथ में । जब मैं और तुम वहां पहुंचेंगे न, तो वह मुझे तो अन्दर जाने देगा गयोंकि मेरे थैले में अन्दर जाने का पास है । पर तुम्हें यह वहीं रोक लेगा।" सुजाता ने मेरी बात समझने की कोशिश में मेरी आंखों में झांका "और जानती हो फिर क्या होगा? तुम्हारे पास न गमी रहेगी और नही दोस्त।" गेरी आखिरी दलील कितनी भयावह थी, कितनी भूर थी, इसका अहसारा मुझे तब हुआ जब सुजाता मेरा हाथ छोड़कर धनुप से छूटे बाण की तरह ऊपर जाने वाली सीढ़ियां चढ़ गई । उसने एक बार मुडकर यह भी देखना परूरी नहीं समझा कि उराकी मां उसके पीछे- पीछे आ रही है या नहीं । और मैं अकेली रेलिंग के सहारे देर तक खड़ी रही, निश्चल, जड़वत, स्थिर वायु की तरह अपनी हथेली में सुजाता की हथेली को महसूस करती हुई, स्वयं को धिक्कारती हुई। 24 / अपने-अपने कारावास सही फैसला -मम्मी यह कौन-सी किताव है ? -बच्ची, वडो की है। -नाम बताओ। -द डे इन शंडो। -इसका मतलब? -मतलब यही है, द डे इन शैडो। तुम्हे इतनी अंग्रेजी आती है कि मतलब समझ लो। मैंने पढने को बेकार कोशिश की। मैं जानती हूं। वह मन- ही-मन क्या सोच रहा है। यही न कि ममी ने मुझे मतलब नहीं समझाया है। वह हमेशा ऐसे ही करती है। अच्छा, मैं भी देख लगा। इतना सोचते-मोचते उसकी आखो मे पानी डवडवाने लगा था। यह खतरे की निशानी थी। पक्का अभिनेता जो ठहरा। जानना है कि अभी रोना जरूरी नहीं है, रोनी सूरत से काम चलाया जा सकता है । किताब की काली सादी जिल्द, सुनहरे अक्षरो मे लिखा लेखिका और किताब का चमकता हुआ नाम । यू ही मन मे हैरानी और आदर का भाव आ जाता है। एक बार मैं बगलौर से दिल्ली जा रही थी । ऐन रेण्ड की 'फाउटेन हैंड' के सात सौ पृष्ठ केवल मैंने तीन दिन के सफर मे पढ़ी थी। साथ बैठे यात्रियो मे में तीन दिन मुझ में कोई न वाला था। भारतीय व्यवहार के कितने विपरीत था यह ! एक यात्री ने भयभीत स्वर में मुझ से पूछा था--- 'आप ला स्टूडेंट है या मेडिकल ?' उसे आगरा ही उतर जाना था। और सही फैसला/ -ओह, यह अगर वह मुझ से यह सवाल न पूछता तो न जाने कब तक उसका मन अशांत रहता। मैंने मन-ही-मन हंस दिया था। तीन, चौदह-पन्द्रह साल के बच्चों की मां किसी भी चीज की स्टूडेंट कैसे हो सकती है । मैंने हैरानी से उसे देखा। वह कुछ घबरा गया था- आपकी किताव... तो एक उपन्यास है. -~-इतना मोटा. "कुछ सम्मान मिश्रित स्वर में वह कुछ कहता गया था। और अव गप्पू भी मुझे वैसे ही कुछ-कुछ कह रहा था-अपनी आंखों से । ऐसा पहले कई वार हो चुका है। इसे अपनी समझ पर बड़ा नाज है। हर नाटक, हर फिल्म को यह बहुत गौर से देखता और सुनता है। फिर अनजाने ही किसी समालोचक की तरह उसकी चीरफाड़ भी करता है। कभी-कभी मैं कहती हूं----गप्पू तू कितना बड़ा हो गया है। -~-~~-कहां ममी, आठ साल में मैं आठ साल का ही तो हुआ हूं। जब कभी वयस्कों के लिए नाटक अथवा फिल्म प्रदर्शित होती है तो वह हमारे साथ नहीं जा पाता । घर पर अगर उसने 'कारोशी' जैसी बढ़िया फिल्म देखी होती है तो हमें वह उत्तेजित होकर कहानी सुनाता है। पर टेलीविजन पर हर रोज 'कारोशी' जैसी फिल्में नहीं दिखाई जातीं। अक्सर उसकी जिद्द होती।- मुझे कहानी सुनाओ। -~-बच्चे, अगर कहानी तुम्हारे मतलव की होती तो तुम्हें हम साथ ही ले जाते । यही उत्तर मैं सदा देती! ----ममी प्लीज! टेल मी द आउट लाइन ओनली । -अच्छा सुन । एक ममी है स्मृति और एक डैडी है सोम । दोनों का झगड़ा हो जाता है । ममी अपने बच्चों और कितावों को लेकर दूसरे घर में चली जाती है। गप्पू ध्यान से सुन रहा है। यह बात तो एकदम उसकी जानी-पह- चानी है। वह कितनी बार इस खतरे से गुजर चुका है। जब हम आपस में टकराते हैं तो कहीं न कहीं हजारों वार उसने यह शब्द सुने हैं। आल 'राइट ! गो अहैड, डिवोर्स मी! कैन यू डू इट ? हर विस्फोट इसी विंदु पर आ कर बिखर जाता है । वाकी रह जाती है राख । जब मैं पांच साल की 26/ अपने-अपने कारावास । । थी तो किसी ने मेरी हस्तरेखाएं देखकर कहा था, इसका डाइवोर्स होगा! शायद तभी मैंने मन-ही-मन फैमला कर लिया होगा : मैं ऐमा कभी न होने दूंगी । शायद तीस वरम पहले किया फैसला कही न कही मेरे मन मे छिपा बैठा है । यह कैसा इंद्रजाल है ! कैसा वशीकरण है ! सान माल की मनोरम कोर्टशिप के बाद अपनी ही इच्छा से किया गया प्रणय- विवाह ! और विवाहित जीवन के पहले ही वर्ष मे घर से निकाले जाने की धमकी। हर वार यही सोचना : अब ऐमा कभी न होगा। -ममी, हां, हां, बोलो न, आगे क्या हुआ ? वह वेताबी मे है। मन-ही-मन क्या सोच रहा है, मैं जानती हूं। यही न, कितने धीरे- धीरे कहानी सुनाती है। इस बच्चे के लिए क्या एक ही बचपन काफी होगा? शायद नहीं ! खाना-पीना, सोना, पढना-नहाना सव वेकार के काम हैं। हा, कहानी सुनने के लिए वह अपना खेल कुछ देर के लिए स्थगित कर सकता है । वम -अव स्मृति दूसरे घर में रहने लगी है। पर उमे अकेले रहना नही आता है । लोग उसमे यह नही पूछते कि वह क्या करती है । वह पूछते हैं, तुम्हारा पनि क्या करता है ? जब वह उन्हें कहती है कि उसने अपने पति को छोड दिया है तो औरतें उससे बात ही नहीं करती हैं। -क्यो नहीं? ---बम यू ही । वह समझती हैं कि स्मृति अच्छी औरत नहीं है। -अच्छा-अच्छा आगे बोलो न । -हा ! शायद यही सब मे बड़ी उलझन है। लोग क्या कहेंगे? यही न कि प्रेमिका से वह डिवोर्सी बन गयी है। एक और प्रेम कथा का अंत हो गया है। हमारे यहां वार-बार प्रलय क्यो आती है ? हर वार मैं थोडी और आहत होकर फैसला कर लेती हूं . ठीक है रोज-रोज मरने से अच्छा है कि एक ही बार मर जाओ । चलो मुझे आपकी बात मजूर है। पर चूकि तलाक आपको चाहिए, इस शुभ काम का मपादन भी आप ही करेंगे। शादी करने आप आए थे, मैं नही । अव "यहां पहुचते-पहुचते मेरा मिम- सही फैमला।
- damous कना शुरू हो जाता है । यही बिंदु है जो मेरे लिए कभी न सुलझने वाला कठिन प्रश्न बन जाता है। -~-ममी, आगे बोलो न । गप्पू अब बेहद नाराज है। -बस, आगे क्या? वह लोग नये घर में रहने लगते हैं। उसका वड़ा बेटा वृज एक दिन अपने डैडी से मिलने जाता है। -क्यों? वह तो डंडी को छोड़ आए हैं। -डैडी ने वृज से कहा था कि जब जी चाहे मिलने आ जाना। वह साइकल पर नढ़कर चला जाता है। गप्पू की आंखों में एक चमक-सी आ गयी है। -लक्की वम्म ! तुम मुझे साइकल पर कहीं नहीं जाने देती। -वह बहुत बड़ा है । तुम तो नन्हे-से बच्चे हो ! और फिर तुम्हारे उडी तो यहीं हैं। अच्छा, बस ! मैंने इतनी ही कहानी पढ़ी है। भागो- भागो। वह बौखलाकर सचमुच ही भाग जाता है। -पेस्ट। X X X आगे फिताब पढ़ने का क्या फायदा ? अपने जीवन का सबसे बड़ा कदम तो स्मृति ने उठा लिया है। कितनी साहसी होगी वह । और शायद कितनी दुखी भी। उसका भी तो प्रेम-विवाह था। इस प्रणाली का आविष्कार शायद येवल सुख-शांति को खत्म करने के लिए ही किया गया होगा। पर इस पाखंड को पवित्र रूप क्यों दिया गया? हम दोनों के बीच एक निश्चित दूरी है । लेकिन फिर भी हम अभिन्न हैं, एक स्थायी इकाई की तरह। किसी कारणवश किया गया मर्यादा का उल्लंघन मैं राह सकती हूं पर अक्सर विना कारण ही मुझे अपमानित होना पड़ता है। हर बार कितना मैल भर जाता है । ठोक दिन है, पर दिन फैलते इस ज्वालामुखी से मैं अपने बच्चों को बचा सकती हूं। इस फफोले को अब फूट जाना चाहिए। अगर स्मृति में इतना साहस है तो मुझ में क्यों नहीं? इस अराध पीड़ा से बचने का यही एक तरीका है। 28/ अपने-अपने कारावास -गप्पू मुन, एक वात पूछनी है। तू मुझे ज्यादा प्यार करता है या डंडी को? कमा वेकार-सा प्रश्न है । उत्तर मैं जानती हूं। -दोनी को। -~~नही बच्चे, मान लो मम्मी, दीदी और मैया दूसरे घर में रहने लगें तो तुम कहा रहोगे? इस निर्दोप बच्चे को इम टूटने मे कैमे वचाऊ उमे हमारा झगडना बिल्कुल पसद नहीं है। वह अक्मर मुझे सलाह देता रहता है, मम्मी इग्नोर हिम । ही कान्ट फाइट एलोन । मलाह बेहद दोपरहित है पर मैं हर वार विसर जाती है। हर बार मोचती हू, शायद यही हमारा आखिरी झगडा है, हर वार में ही दोषी सावित होती है । मुझे स्वय विश्वास हो जाता है कि मैं इम प्रहार को रोक मकती थी। और फिर बाद में, बहुत बाद में, जब मुझे लगता है कि मेरा कोई भी अस्तित्व नहीं है, तो मेरी झोली अनुराग से भर दी जाती है । और वार-वार में छली जाती है। इतने अनुष्ठान ने की गई आराधना मूरज की पहली किरण के माय ही कोई को मुला सकता है ? हर बार निल-तिल टूटने मे अच्छा है कि एक बार ही टूट जाओ। X x X -हे माम, वह किताव पढ ली? -हा, यू नो बाबा, आइ रेड टिल ग्री इन द नाइट । -~ओह नो माम ! अच्छा चलो, वाकी की कहानी सुनाओ। -बस होना क्या था। अपने डंडी में गप लगाकर वह अपने घर आगया। -वम? -उमका डैडी बहुत अमीर था। वह उसे बहुत मे पैसे देता है और कहना है कि अगर वह स्कूल मे फर्स्ट आएगा नो उमे अमरीका भेज दिया जाएगा। वृज बहुत खुश होता है । पर मन-ही-मन चिढ़ना भी है क्योंकि उमका डंडी हर अच्छी बात के साथ एक गनं लगा देता है। हर बात मे अगर-मगर करता है। सही फैमला | 29 - -- A कना शुरू हो जाता है । यही बिंदु है जो मेरे लिए कभी न सुलझने वाला कठिन प्रश्न बन जाता है। -ममी, आगे वोलो न । गप्पू अव वेहद नाराज है। -बस, आगे क्या ? वह लोग नये घर में रहने लगते हैं। उसका बड़ा वेटा वृज एक दिन अपने डैडी से मिलने जाता है। -क्यों ? वह तो डैडी को छोड़ आए हैं। -डैडी ने बृज से कहा था कि जब जी चाहे मिलने आ जाना। वह साइकल पर चढ़कर चला जाता है। गप्पू की आंखों में एक चमक-सी आ गयी है। -लक्की वम्म ! तुम मुझे साइकल पर कहीं नहीं जाने देती। ----वह बहुत बड़ा है । तुम तो नन्हे-से बच्चे हो ! और फिर तुम्हारे डैडी तो यहीं हैं। अच्छा, बस ! मैंने इतनी ही कहानी पढ़ी है। भागो- भागो। वह बौखलाकर सचमुच ही भाग जाता है। -पैस्ट। X X X आगे किताब पढ़ने का क्या फायदा? अपने जीवन का सबसे बड़ा कदम तो स्मृति ने उठा लिया है। कितनी साहसी होगी वह ! और शायद कितनी दुखी भी। उसका भी तो प्रेम-विवाह था। इस प्रणाली का आविष्कार शायद केवल सुख-शांति को खत्म करने के लिए ही किया गया होगा। पर इस पाखंड को पवित्र रूप क्यों दिया गया? हम दोनों के बीच एक निश्चित दूरी है । लेकिन फिर भी हम अभिन्न हैं, एक स्थायी इकाई की तरह। किसी कारणवश किया गया मर्यादा का उल्लंघन मैं सह सकती हूं पर अक्सर विना कारण ही मुझे अपमानित होना पड़ता है। हर वार कितना मैल भर जाता है । ठोक दिन है, पर दिन फैलते इस ज्वालामुखी से मैं अपने बच्चों को बचा सकती हूं। इस फफोले को अब फूट जाना चाहिए। अगर स्मृति में इतना साहस है तो मुझ में क्यों नहीं? इस असह्य पीड़ा से बचने का यही एक तरीका है। 28/ अपने-अपने कारावास -गप्पू सुन, एक बात पूछनी है। तू मुझे ज्यादा प्यार करता है या डैडी को ? कमा वेकार-सा प्रश्न है । उत्तर मैं जानती हूं। -दोनों को। -~नही बच्चे, मान लो मम्मी, दीदी और मैया दूसरे घर में रहने लगे तो तुम कहां रहोगे? इस निर्दोप बच्चे को इम टूटने मे कैमे वचाऊ ? उमे हमारा झगडना विल्कुल पसद नहीं है । वह अक्सर मुझे सलाह देता रहता है, मम्मी इग्नोर हिम । ही कान्ट फाइट एलोन । मलाह वेहद दोपरहित है पर मैं हर वार विखर जाती हूं। हर वार सोचती हू, शायद यही हमारा आखिरी झगडा है, हर बार मैं ही दोपी सावित होती है । मुझे स्वय विश्वाम हो जाता है कि मैं इस प्रहार को रोक सकती थी। और फिर बाद में, बहुत बाद मे, जब मुझे लगता है कि मेरा कोई भी अस्तित्व नहीं है, तो मेरी झोली अनुराग से भर दी जाती है। और बार-बार में छली जाती है। इतने अनुष्ठान मे की गई आराधना मूरज की पहली किरण के साथ ही कोई को मुला सकता है ? हर बार निल-तिल टूटने से अच्छा है कि एक बार ही टूट जाओ। X X X -हे माम, वह किताव पढ़ ली? -हा, यू नो बाया, आइ रेड टिल श्री इन द नाइट | —ओह नो माम ! अच्छा चलो, बाकी को कहानी सुनाओ। -बम होना क्या था। अपने डंडी में गर लगाकर वह अपने घर आ गया। 7 -वस -~-उसका डैडी बहुत अमीर था। वह उमे बहुन मे पैसे देता है और कहना है कि अगर वह स्कूल मे फर्ट आएगा तो उसे अमरीका भेज दिया जाएगा। वृज बहुत खुश होता है। पर मन-ही-मन चिढ़ता भी है क्योकि उसका डंडी हर अच्छी बात के माथ एक शर्त लगा देता है। हर बात में अगर-मगर करता है। सही फैमला | 29
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-
-
-सव डैडी करते हैं । चलो जल्दी करो। आगे बोलो !
--ओफ्फ मम्मी ! मुझे खेलना भी तो है ।
-उफ ! तुम या तो कहानी सुन लो या फिर गाड़ी पकड़ लो।
नालायक, इसका टाइम सबसे कीमती है। हम सव वेवकूफ हैं, जो
दिन-भर इसके आगे-पीछे घूमते हैं।
-फिर क्या हुआ?
एक दिन वृज अपनी ममी से कहता है कि वह डैडी के घर रहने जा
रहा है। थोड़ी देर में कार आ जाती है । वृज बहुत जल्दी में है। उसे डैडी
से बहुत बातें करनी हैं। वह ममी को कहता है मेरा सामान वांध कर
तैयार रखना । बाद में मंगवा लूंगा।
-बस ! आगे बोलो।
-~-बस, वह चला जाता है और कहानी खत्म हो जाती है।
-~-~~-झूठ ? तुम वताना नहीं चाहती हो।
-बच्चे जान, तुम अंग्रेजी पढ़ लेते हो।
-हां।
-तो लो, यह आखिरी पृष्ठ पढ़ लो।
वह धीरे से पढ़ रहा है। उसके चेहरे पर आए भाव साफ बता रहे
हैं कि बृज का फैसला, सही फैसला था। मन-ही-मन मैं भी समझ गई हूं।
डैडी के विना न गप्पू जी पायेगा, न मैं। गप्पू को खोने से, अच्छा है,
मैं
खुद को ही खोने दूं।
30/ अपने-अपने कारावास
रिहाई "येम पदमा " मुझे एकाएक लगा कि मैंने फिर कोई गलती कर ली है। मैं हमेशा गलत काम ही करती है । यह भी मेरो एक विशेषता है। डा. मित्रा के प्रश्न का उत्तर मैंने नहीं दिया। मेरे पीछे-पीछे एक आदमी अन्दर आ गया था । बड़ी वेबस तरमी हुई आवाज़ में कह रहा था--"वह नहाती नहीं, कपटे नहीं बदलती-कुछ भी काम नहीं करती।" आदमी पचास से ऊपर था। इसने अपनी पत्नी के साथ कैसा व्यवहार किया होगा कि वह इतनी जड हो गई है ? अव क्यों यह उसका इलाज करवाना चाहता है ? मन हुआ डाक्टर की जगह मैं उत्तर दे दू"तो खुद काम कर लिया करो। उसके कपड़े भी बदल दिया करो । शायद वह ममल जाए" या फिर "उमे तुम अब ऐसे ही रहने दो। अन्त में इन्मान जड़ हो जाता है, जम जाता है, टूट जाता है। तुम उसे क्योकर बदलना चाहते हो। बदलना ही है तो इस सड़ी-गली परम्परा को वदलो, जिमे हमारे पूर्वज विवाह जसा पाखंडी नाम दे गए हैं । और काम तुम खुद क्यों नहीं कर लेते हो?" पर न तो मैं डाक्टर थी, न वह मुझसे बात ही कर रहा था। मुझे बेहद गुस्सा आया, उम आदमी पर, डाक्टर पर और खुद पर भी। आदमी पर इमलिए कि जो पीडा वह औरत सह रही है, उसकी जिम्मेदारी पूरी तरह मे उम आदमी पर है। अपने पर इसलिए कि मैं फिर एक महीने के. अन्तराल के बाद फिर से इम मनोविकार विभाग में क्यो मा गई हूं? डाक्टर पर इसलिए कि वह अपनी आवाज मे इतनी सहजता रिहाई/31
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-सब डैडी करते हैं। चलो जल्दी करो। आगे बोलो !
-~ओफ्फ मम्मी ! मुझे खेलना भी तो है ।
----उफ ! तुम या तो कहानी सुन लो या फिर गाड़ी पकड़ लो।
नालायक, इसका टाइम सबसे कीमती है । हम सव वेवकूफ हैं, जो
दिन-भर इसके आगे-पीछे घूमते हैं।
-फिर क्या हुआ?
-एक दिन वृज अपनी ममी से कहता है कि वह डैडी के घर रहने जा
रहा है। थोड़ी देर में कार आ जाती है । वृज बहुत जल्दी में है। उसे डैडी
से
बहुत बातें करनी हैं। वह ममी को कहता है मेरा सामान बांध कर
तैयार रखना । बाद में मंगवा लूंगा।
-वस! आगे वोलो।
-वस, वह चला जाता है और कहानी खत्म हो जाती है।
--झूठ ? तुम बताना नहीं चाहती हो।
-~-बच्चे जान, तुम अंग्रेजी पढ़ लेते हो।
-हां।
-तो लो, यह आखिरी पृष्ठ पढ़ लो।
वह धीरे से पढ़ रहा है। उसके चेहरे पर आए भाव साफ बता रहे
हैं कि वृज का फैसला, सही फैसला था। मन-ही-मन में भी समझ गई हूं।
डंडी के विना न गप्पू जी पायेगा, न मैं। गप्पू को खोने से, अच्छा है,
मैं खुद को ही खोने दूं।
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30 / अपने-अपने कारावास
रिहाई "येम पदमा?" मुझे एकाएक लगा कि मैंने फिर कोई गलती कर ली है। मैं हमेशा गलत काम ही करती है। यह भी मेरी एक विशेषता है। डा० मित्रा के प्रश्न का उत्तर मैंने नही दिया। मेरे पीछे-पीछे एक आदमी अन्दर आ गया था । वडी वैवस तरसी हुई आवाज़ में कह रहा था-"वह नहाती नही, कपड़े नही बदलती-कुछ भी काम नहीं करती।" आदमी पचास से ऊपर था। इसने अपनी पत्नी के साथ कैसा व्यवहार किया होगा कि वह इतनी जड हो गई है ? अव क्यो यह उसका इलाज करवाना चाहता है ' मन हुआ डाक्टर की जगह मैं ही उत्तर दे दू"तो खुद काम कर लिया करो। उसके कपडे भी बदल दिया करो। शायद वह सभल जाए" या फिर "उमे तुम अब ऐसे ही रहने दो। अन्त में हर इन्मान जड हो जाता है, जम जाता है, टूट जाता । तुम उसे क्योकर बदलना चाहते हो । बदलना ही है तो इस सडी-गली परम्परा को बदलो, जिसे हमारे पूर्वज विवाह जैसा पाखडी नाम दे गए है । और काम तुम खुद क्यो नही कर लेते हो ?" पर न तो मैं डाक्टर थी, न वह मुझसे बात ही कर रहा था। मुझे वहद गुस्मा आया, उस आदमी पर, डाक्टर पर और खुद पर भी आदमी पर इसलिए कि जो पीडा वह औरत सह रही है, उसकी जिम्मेदारी पूरी तरह से उम आदमी पर है। अपने पर इसलिए कि मैं फिर एक महीने के अन्तराल के बाद फिर से इस मनोविकार विभाग में क्यों आ गई हूं? डाक्टर पर इसलिए कि वह अपनी आवाज मे इतनी सहजता रिहाई /31 कैसे भर लेता है ? कल रात.जब मैंने फोन पर कहा था कि डाक्टर साहब मैं आपको मिलनी चाहती हूं तो उन्होंने कहा था 'ओ० के०' समय मैं निश्चित नहीं कर पा रही थी। अनिश्चितता की स्थिति में थी। तय हुमा था कि मैं या तो एक से पहले या फिर दो बजे के बाद अस्पताल पहुंच जाऊंगी; फिर उत्तर आया था : "ओ० के०।" दो अक्षर ! पर ढेरों सहजता से भरे हुए, लदे हुए। मैं कितनी पीड़ा- ग्रस्त हूं यह डाक्टर मित्रा भलीभांति जानते हैं। फिर अपनी आवाज़ में इतनी सहजता कैसे और क्यों भर लेते हैं ? क्यों नहीं मेरी तरह विचलित हो उठते ? और अब एक अजनबी के सामने मुझसे पूछ रहे हैं : "येस पदमा ?" मैंने चुपचाप अपनी हथेलियों में अपना मुंह छिपा लिया था। उस आदमी से निपटने के बाद फिर वही दो अक्षर डाक्टर मित्रा ने कहे थे; मुंह से नहीं आंखों से। "डाक्टर साहब"कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूं ? और क्या बताऊं आपको ? सिर्फ इतना जानती हूं कि मैं आपकी मदद चाहती हूं। मैं अपने पति के साथ अव नहीं रह सकती हूं। अब और यातना मैं नहीं सह सकती। वह मुझे, मेरे बच्चों को, धीरे-धीरे बड़े सलीके से ढाह रहे हैं, नष्ट कर रहे हैं और अगर नष्ट ही होना है तो मैं अलग रहकर नष्ट होना ज्यादा पसन्द करूंगी।" मैं अगर चाहती तो बोलती ही चली जाती । डाक्टर मित्रा मुझे कभी न टोकते। हां वे मुझे वरावर निहार रहे थे, मुझे टोह रहे थे। ज्यादा कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं थी। पिछले चार महीने से हम लोग नियमित रूप से सप्ताह में दो बार मिल रहे थे। मैं, मेरे पति, मनोविज्ञान के डाक्टर मित्रा और मानस शास्त्रज्ञा डाक्टर मिस दवे । अपना कोई भी आवरण ऐसा न था जो मैंने इस कमरे में उतार न फेंका था,. कोई भी भेद ऐसा न था जो उनसे छुपा था। दोनों डाक्टर मेरे कुछ भी नहीं लगते पर दोनों की सहानुभूति से भरपूर आंखे मुझे हमेशा शक्ति देती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि मैं निपट । 32 / अपने-अपने कारावास भयभीत भी! एकदम क्षोभ रहित वावय फिर मेरे कानो मेराया। हैं, बेमायनी, बेवजह धमकियां और अपमान सुनती और सहती आ रही नही फटेगा। पर हर बार में छली गई हूं और अब में एक पल भी रुकने के लिए तैयार नहीं हूँ।" मैं बेहद उत्तेजिन थी और मन-ही-मन बेतहास बोनी बेहारा सडी हूं और मैं मे ही गिरने लगूगी यह दोनो मुझे संभाल लेंगे। एक आना को वारोक-सी किरण जो केवल इन दोनों को ही नजर आती है गायद कभी भूले में मुझे भी छू जाए। इलाज की शुरूआत मे एक सवाल पूछा गया था, "क्या तुम दोनों माथ रहना चाहते हो।" हमारा दोनों का उत्तर एक ही पा, "हां ।" इसी समझौते की नीव पर छानबीन की शुरआत हुई थी कि क्यो हम दोनों के बीच इनने भयानक विस्फोट होते है ? एक समझौता और भी हुआ था। "अगर कभी यह फैसला बदला तो वह फैमला इम कमरे में बदला जाएगा।" यह कोई कचहरी तो है नही, मान लो मैं डाक्टरो को सलाह लिए बिना ही घर छोडकर चली जाती है तो यह लोग मेरे पीछे-पीछे वाट मेकर नो आने मे रहे। बस मेरी वेदना को समझकर, महमूग-भर इन दोनो ने मुझे वाध लिया था। या शायद यह मुझे एकाएक मसीहा- नजर आने लगे हैं जो कोई-न-कोई हल जरूर निकाल लेंगे। या शापद में इतनी अकेली हू कि मुझे यह अपने से दोसने लगे है जो शायद किमी तरह मेरा अकेलापन तोड डालेंगे। "तुम अपना फैसला अगले शुक्रवार तक स्थगित कर दो।" "नही । जिम आदमी ने मुझे एक महीने का नोटिग दिया है, उसे मैंने । एक मिनट का नोटिस दे दिया है। मैं एक पल भी उग पर गे नहीं रह सकती हूं । रहना भी नहीं चाहती हूं। वैसे इस तरह के नोटिस मुझे पिछले पच्चीग सातो गे मिल रहे है। हर युद्ध के बाद समझौता हो जाता और मैं मन में विश्वास र लेती थी कि अब कभी दम घर गे महाभारत नहीं होगा। अब कभी लावा करके 1 । - "शुक्रवार तक रुक जाओ। डाक्टर दवे छुट्टी से लौट आएंगी, उसी दिन बात करेंगे । और तुम सात दिन तक यह दवाई खाओ।" एक हल्के हरे रंग का कागज मेरी ओर सरकाते हुए डाक्टर मित्रा वोले, “एक गोली सुबह, एक शाम।" मेरा मन अन्दर-ही-अन्दर चीख उठा । यह गोलियां मुझे शान्त नहीं कर सकती हैं । मैं पहले भी यह बात यहां कह चुकी हूं। बार-बार यह लोग मेरी बात सुनते क्यों नहीं ? "मुझे नहीं चाहिए. यह शान्तिदायक गोलियां। मैं इन्हें एक साथ निगल जाऊंगी और हमेशा के लिए सो जाऊंगी । पर मैं तो जीना चाहती हूं एक भरपूर जिन्दगी । पिछसे पच्चीस सालों से मेरी केवल एक ही मांग है, एक ही इच्छा है। मैं सिर्फ शान्त जीवन चाहती हूं। मुझे केवल एक ही चीज़ की तलाश है और वह ही मुझे नहीं मिली।" पर आज मैंने यह शब्द नहीं दोहराए । जरूरत ही नहीं महसूस हुई। इसलिए मैंने चुपचाप उस हल्के हरे रंग के कागज़ को अपने पर्स में रख लिया । क्या बुरा है ? वैसे भी तो मैं एक झूठी जिन्दगी जी रही हूं। अगर शांति भी झूठे माध्यम से मिल जाए तो क्या बुरा है ? रूसी कवि याकोव पैट्राविच पोलोस्की ने ओका नदी के किनारे एक मठ के पास अपनी कब्र के लिए जगह पसन्द की थी। हर कोई सोचता कि उसकी आत्मा उसी की समाधि के आसपास मंडराती है और वह मर- कर भी वहीं कहीं सुन्दर वादियों को निहार रहा है। अब वह मठ वहां नहीं है और उस प्राचीन राज्य पर उन राक्षसों का राज्य है जिन्हें वाचटावर के नाम से पुकारा जाता है। वहां कुछ वर्ष पहले खुदाई की गई थी। नक्शे के अनुसार पोलोस्की की कन वहां मिलनी चाहिए थी। पर वह मिली नहीं। यह राक्षस नहीं जानते कि पोलोस्की बाह्य रेखा के अन्दर है । अब उस तक कोई नहीं पहुंच सकता है । क्योंकि बहुत पहले ही पोलोस्की की कन्न को खोदकर उसके शरीर को राईजान पहुंचा दिया गया था, उसने. अपना समय पूरा कर दिया था"उसे अब छोड़ दिया गया था.. पोलोस्की की कहानी वेहद लम्बी व गहरे दुःख से भरी है । पर वह कितना खुश किस्मत था, वह जीते जी तो इन दुष्टों से बच न सका पर 34 / अपने-अपने कारावास अब उसके अवशेषों को रिहा कर दिया गया था। पर मेरे अवशेपो का क्या होगा? मुझे रिहाई कब मिलेगी? "शुक्रवार को तुम बारह बजे आना।" "अकेली आऊ?" "नहो । अगर हो सके तो अपने पति को भी साथ लाना।" यही डाटर मित्रा का आखिरी फैसला था। जिस बीमारी की जड़ तक मैं पहुंच चुकी हू वहां पहुचने में इस मनो- वैज्ञानिक और मानस शास्त्रज्ञा को इतना समय क्यों लग रहा है ? क्यों इतने लोग मनोविकार विभाग में आते हैं। अपना ही विकार ढूढना कितना आसान होता है। मेरे विचार में इन मनोवैज्ञानिकों को चाहिए कि वह हममे मदद लें, खासकर कलाकारो और लेखको से। मुझे क्या मिला यहा आने से एक हलके हरे रंग का कागज जिस पर किसी गांतिदायक गोली का नाम लिखा है। कितने दिन जीवित रह सकता है इन्मान जीवित रहने की इच्छा कितनी अनावश्यक,क्षणिक, पर फिर भी किननी अद्भुत होती है । शायद इमी इच्छा पूर्ति के लिए मैं बार-बार डाक्टर मित्रा व डाक्टर दवे की आलो में झाक्ती रहती हूं। एक बात अब मैं भलीभांति समझ गई हू-रिहाई अब न मुझे मिलेगो, न मेरे अवशेषो को, मुझे इसी तरह भटकते रहना होगा, इमी तरह, चाहे मैं आगामी शुक्रवार यहां आऊ, चाहे न श्राऊ । रिहाई प्रलय - "जब कोई चीज़ गल-सड़ जाती है तो उसे उठाकर वाहर फेंक देना चाहिए। घर में रखने से बू फैलती है। बीमारी फैलती है।" अपने 'विचार में किसी-न-किसी तरह डाक्टर मित्रा तक पहुंचना चाहती थी, पर उनकी आंखों में असहमति भरी हुई थी । क्योंकि इन्हीं आंखों में मैं पहले सहानुभूति और संवेदना भी देख चुकी हूं इसलिए असहमति को मैंने जान-बूझकर नजरअंदाज कर दिया। मन-ही-मन खीझ भी उठी । क्योंकि इतनी सीधी-सी बात मनोवैज्ञानिक के दिमाग में घुस नहीं रही है । क्यों मुझे बार-बार समझाया जा रहा है, वहकाया जा रहा है । "इस स्थिति से क्यों भाग रही हो तुम?" बताया न आपको, मैं अब कुछ भी नहीं सह सकती~न आवाज़ की क्रूरता, न आंखों में भरा गुस्सा, न एक पल की अवहेलना, न बेमानी बेसिर-पैर की बातें-कितना समय नष्ट होता है। और मुझे बहुत कुछ करना है..."किसके लिए ?' ठीक ही सवाल पूछा गया था । अक्सर जब कोई पत्नी अपने पति को त्यागती है तो कोई-न- कोई दूसरा पुरुप उसके पीछे होता है, कोई-न-कोई ठोस सहारा ज़रूर होता है। डाक्टर भलीभांति जानते हैं। मेरे पीछे कोई ऐसा सहारा नहीं है इसलिए मुझसे असहमत हैं । फिर यह सवाल मुझे झकझोरने के लिए 'किया गया है और मैं बहुत ही पतली टहनी पर बैठी हूं । एक नए कोमल पत्ते की तरह जो समय आने पर गिरेगा जरूर। "अपने बच्चों के लिए । मेरे साथ-साथ वह भी तो पीड़ित हैं। कोई भी मां अपने बच्चों की पीड़ा नहीं सह सकती। और अगर मैं ऐसा भयानक ‘कदम उठा रही हूं तो जरूर मैं वेहद पीड़ित हैं। इनके साथ रहकर तो मैं - 36 / अपने-अपने कारावास पागल हो जाऊंगी। और "और"अलग रहकर तो में निश्चित रूप में पागल हो जाऊगी।" 'ठहरो' हाथ ऊपर उठाकर डाक्टर देव ने मुझे टोका । 'आगे कुछ मत कहो । अगर यह तुम खुद ही जाननी हो कि ऐमा क्यो कर रही हो। 'अपने बच्चों के लिए बच्चे मासूम, कोमल हृदय वाले बच्चे, कलात्मक मनःस्थिति वाले बच्चे, सुन्दरता की खोज में परेशान दिशाहीन हो गए हैं । उन्हें नहीं मालूम किम ओर जाना है और क्यो जाना है ? पर बडा बेटा कहना है : 'मालव'; हा वह मुझे इमी प्यारे मे नाम से पुकारता है और उम प्यार मे थोडी-मी मात्रा दया की भी होती है । 'मालव, अब तुम जो भी कदम उठाओ, सोच समझकर उठाना । एक बार तुम घर छोडकर लौट आई हो । अब तक सब तुम्हारे माथ हैं, तुम्हारे पीछे खड़े हैं। मगर इस बार अगर तुमने फिर वैमी ही जल्दबाजी की तो मव मोचेंगे यह तो रोज़ का ही किस्सा है । कोई माथ नहीं देगा।" 'बेटा, कल रात जो हुआ उसके बाद भी तुम यही सलाह देते हो? कल रात जो हुआ वह एक पागलपन था। कोई सामान्य औरत होतो तो जहर खा लेती । पर में मामान्य नहीं हूं और फिर एक बात और कि मैं जीना चाहती हूं । पूरी तरह जीना चाहती हूं । मबको कुचलकर मैं जीना चाहती हू । जीवित रहने के लिए मेरी मांग सीधी-मादी है। कितनी शान्ति से बीती थी हमारी दाम । वैसे तो हमारी हर शाम शालि में ही बीतती है । पर कभी-कभी क्यों अक्मर छोटी-मी, निकम्मी- सी बात पर झगडा शुरू हो जाता है। टेलीविजन पर फिल्म खत्म हुई नो परदे पर ममात दाद आया । मैंने गापू की बांह पकड़ी बडे लाइ-दुलार में। आखो-ही-आखो मे इशारे हुए और हम दोनो भागते हुए ऊपर चले गए। चवालीम वर्षीय मा दस साल के बच्चे के माथ दोस्नाना अन्दाज में व्यवहार करे तो बच्चे को कितना भला लगता है । पौने दस बज चुके थे। गप्पू मीधे गुमलखाने मे घुस गया। मैंने उसकी लुगी, टी-शर्ट और तौलिया उमके बिस्तर पर लगी भीड में मे ढूढ निकाला। एक समझौता गप्पू के माय मेरा पक्का है। जब तक वह गुसलखाने में रहे, मैं नीचे नहीं जाऊंगी। उसे डर लगता है। वचपन में मुझे भी बहुन डर लगा करता था। मैं प्रलय । "जब कोई चीज़ गल-सड़ जाती है तो उसे उठाकर वाहर फेंक देना चाहिए। घर में रखने से वू फैलती है। बीमारी फैलती है।" अपने 'विचार में किसी-न-किसी तरह डाक्टर मित्रा तक पहुंचना चाहती थी, पर उनकी आंखों में असहमति भरी हुई थी। क्योंकि इन्हीं आंखों में मैं पहले सहानुभूति और संवेदना भी देख चुकी हूं इसलिए असहमति को मैंने जान-बूझकर नजरअंदाज कर दिया। मन-ही-मन खीझ भी उठी। क्योंकि इतनी सीधी-सी बात मनोवैज्ञानिक के दिमाग में घुस नहीं रही है । क्यों 'मुझे बार-बार समझाया जा रहा है, बहकाया जा रहा है। "इस स्थिति से क्यों भाग रही हो तुम?" बताया न आपको, मैं अब कुछ भी नहीं सह सकती-न आवाज की क्रूरता, न आंखों में भरा गुस्सा, न एक पल की अवहेलना, नवेमानी वेसिर-पैर की बातें-~-कितना समय नष्ट होता है। और मुझे बहुत कुछ करना है.."किसके लिए ?' ठीक ही सवाल पूछा गया था। अक्सर जब कोई पत्नी अपने पति को त्यागती है तो कोई-न- कोई दूसरा पुरुष उसके पीछे होता है, कोई-न-कोई ठोस सहारा ज़रूर होता है। डाक्टर भलीभांति जानते हैं। मेरे पीछे कोई ऐसा सहारा नहीं है इसलिए मुझसे असहमत हैं । फिर यह सवाल मुझे झकझोरने के लिए किया गया है और मैं बहुत ही पतली टहनी पर बैठी हूं । एक नए कोमल पत्ते की तरह जो समय आने पर गिरेगा ज़रूर। "अपने बच्चों के लिए ! मेरे साथ-साथ वह भी तो पीड़ित हैं। कोई भी मां अपने बच्चों की पीड़ा नहीं सह सकती। और अगर मैं ऐसा भयानक कदम उठा रही हूं तो ज़रूर मैं वेहद पीड़ित हं । इनके साथ रहकर तो मैं , 36 / अपने-अपने कारावास पागल हो जाऊंगी। और "और"अलग रहकर तो मैं निश्चित रूप में पागल हो जाऊंगी।" 'ठहरो' हाथ ऊपर उठाकर डाक्टर देव ने मुझे टोका । 'आगे कुछ मत कहो । अगर यह तुम खुद ही जानती हो कि ऐमा क्यों कर रही हो। 'अपने बच्चों के लिए वच्चे मासूम, कोमल हृदय वाले बच्चे, कलात्मक मनस्थिति वाले बच्चे, सुन्दरता की खोज में परेशान दिशाहीन हो गए हैं । उन्हें नहीं मालूम किम ओर जाना है और क्यों जाना है ? पर बड़ा बेटा कहना है : 'मालव'; हा वह मुझे इसी प्यारे-मे नाम से पुकारता है और उम प्यार मे थोडी-मी मात्रा दया को भी होती है । 'मालव, अब तुम जो भी कदम उठाओ, सोच ममझकर उठाना । एक बार तुम घर छोडकर लोट आई हो । अब तक सब तुम्हारे साथ हैं, तुम्हारे पीछे खड़े हैं। मगर इस बार अगर तुमने फिर बैमी ही जल्दबाजी की तो मव मोचेंगे यह तो रोज़ का ही किम्मा है । कोई माय नहीं देगा।" 'बेटा, कल रात जो हुआ उसके बाद भी तुम यही सलाह देते हो? कल रात जो हुआ वह एक पागलपन था। कोई सामान्य औरत होती तो जहर खा लेनी । पर मैं मामान्य नहीं है और फिर एक बात और कि मैं जीना चाहती हू । पूरी तरह जीना चाहती हूं। सवको कुचलकर मैं जीना चाहती हू । जीवित रहने के लिए मेरी माग सीधी-सादी है। कितनी शान्ति मे बीती थी हमारी शाम । वैसे तो हमारी हर शाम शान्ति मे ही बीनती है। पर कभी-कभी क्यो अक्सर छोटी-मी, निकम्मी- सी बात पर झगडा शुरू हो जाता है। टेलीविजन पर फिल्म खत्म हुई नो परदे पर ममाप्त शब्द आया। मैंने गापू की बांह पकडी वडे लाड-दुलार से। आखो-ही-आग्यो मे इशारे हुए और हम दोनो भागते हुए ऊपर चले गए । चवालीस वर्षीय मा दम साल के बच्चे के माय दोस्ताना अन्दाज से व्यवहार करे तो बच्चे को कितना मला लगता है । पौने दम वा चुके थे। गप्पू मोघे गुमलखाने मे घुस गया। मैंने उसकी लुगी, टी-शर्ट और नौलिया उमके बिस्तर पर लगी भीड मे मे ढूट निकाला । एक समझौता गप्पू के साथ मेरा पक्का है। जब तक वह गुसलखाने में रहे, मैं नीचे नहीं जाऊगी उमे डर लगता है । वचपन मे मुझे भी बहुन डर लगा करता था। मैं । प्रलय /37 -- - कभी अकेले कमरे में नहीं जा सकती थी। मुझे हमेशा लगता था कि कहीं-न-कहीं भूत छिपा बैठा है । और वह मुझे आ दबोचेगा। डर मुझे अभी भी लगता है । इस अकेलेपन से, भूतों से, प्रेतों से । इसीलिए मैं गप्पू की मनःस्थिति पूरी तरह समझती हूं। उसे मुझ पर पूरी तरह भरोसा है कि जब तक वह नहा रहा है, मैं ऊपर ही रहूंगी । एकाएक मुझे याद आया कि मैं एक बहुत ही जरूरी कागज नीचे छोड़ आयी हूं। हो. सकता है कि उसे कोई बेकार समझकर भूल से इधर-उधर कर दे या फिर मैं ही उसके बारे में भूल जाऊ । भागती हुई मैं नीचे गई । भूखों की तरह उस कागज की अहमियत पति को सुनाने लगी। जल्दी-जल्दी क्योंकि मुझे एकदम ऊपर लौटना था। अभी मैं चन्द सतरें ही बोल पायी थी कि गप्पू की चीखती हुई आवाज़ सीढ़ियां पार कर नीचे पहुंची । हिचकाक की किसी भी फिल्म में उस चीख का इस्तेमाल वेहद खूबसूरती से किया जा सकता था। क्योंकि गप्पू चीख रहा था : 'मम्मी-मम्मी, तुम कहां हो ?' मैंने भी काफी ऊंचे स्वर में बौखलाकर उत्तर दिया था और ऊपर की ओर भागी थी। 'आई बेटा! सॉरी बच्ची, मैं तो यहीं हूं।' तौलिया लपेटे वह खड़ा चीख रहा था । मानो कोई भूत उसे दबोचे खड़ा हो। और वह छटपटा रहा था। इससे पहले कि मैं ऊपर पहुंचकर उसे अपने गले से लगाकर आश्वस्त कर सकूँ, मेरे पति तूफान की तरह ऊपर पहुंचे और मुझे पलंग पर फेंककर पीटना शुरू कर दिया । मैंने सिर्फ हाऊस कोट पहन रखा था। मैं पूरी तरह नंगी हो चुकी थी और मुझ पर हथोड़ों जैसे हाथ टूट रहे थे । गप्पू का तौलिया जमीन पर गिर गया था : "डैडी, छोड़ दो ! इट 'इज़ विटविन मम्मी एण्ड मी।" वह चिल्ला-चिल्लाकर कह रहा था। मुझे भी चोटें लगी थीं पर इसका दुख मुझे बिल्कुल नहीं था । दुख था मुझे केवल एक बात का कि गप्पू एक बार फिर दहशत में डूब गया 'था, यातना के नीचे दब गया था। वह एक बार फिर टूटकर निःशब्द हो गया था। पर उसके भीतर की ध्वनियां-प्रतिध्वनियां मुझे साफ सुनाई दे रही थीं । मार-पीट का दौर जव समाप्त हुआ तो गप्पू ने जल्दी- जल्दी लुंगी और टी-शर्ट पहन ली। और मेरे साथ आकर लेट गया। मेरी दबी-दवी सिसकियों को उसने मुझसे लिपटकर रुकवा दिया था। . 38 / अपने-अपने कारावास .. है । कुछ धोमे से बुदबुदाकर उमने मुझे सलाह दी थी : "मां मो जाओ।" धीरे- धीरे नन्हें-नन्हें हाय मुझे थपकियां देने लगे थे। वरमों पहले एक बार मैंने गप्पू को समझाया था : "नन्ही जान, तुम डंडी के मामने जिद मन क्यिा करो । रोया मत करो। वह चिढ़ जाते हैं । यू ही झगडा शुरु हो जाता भी कहना हो, कोई गडबड हो तो मुझे बताया करो। मेरे कान मे चुपके मे । मैं तुम्हें कभी नहीं डांटूगी । नन्ही मी जान इतनी गहरी वातें समझ गई थी। तीन साल के बच्चे से मैंने कितनी वडी आकाक्षा कर ली थी। उसने अपनी बात रखी भी थी। "मम्मी, मैं तो अब रोता भी नही, जिद्द भी नहीं करता, तुम्हें तग भी नहीं करता पर तुम लोग भी नौ अभी भी झगडते रहते हो।" कुछ ही दिनो मे उमने मब कुछ समझ लिया था । उसका अन्दाजा ठीक निकला था। वह कुछ भी करे, कोई कुछ भी करे, इस घर में झगडा होगा, इस घर में ज्वार-भाटा जरूर उठेगा । जलते हुए लावा की लपटें उठेगी । इन लपटो में पिछले दस वर्षों में हम इतने जल चुके हैं। जलने के बाद चीज मष्ट जाती है । फिर बू फैलने लगती है, वीमारी फैलने लगती है । दस क्यो पच्चीस वर्ष हो गए अव । तो क्या हम अपने जीवन के अगले पच्चीम वर्ष दाान्ति से नहीं विना मकते? "पर अलग तो तुम लोग होना नहीं चाहते," डाक्टर मित्रा बोले । "मैं होना चाहती है। पहले नहीं चाहती थी । अब मुझमे मक्ति नहीं बची है।" "दाविन 'तुम मे बहुत है।" मैंने मदेह से भरपूर आखें डाक्टर के तटस्थ चेहरे पर टिका दी। यह मुझ पर व्यग्य तो नही कर रहे ? "तुम्हारी शक्ति मैं महसूस कर रहा हूँ इम ममय, पहले भी कई बार की है।" एक लम्बी-नोडी मेज और पाइप का घुआ हमारे बीच फैला हुआ था। मुझे स्वय मे ही महानुभूति हो गई । मैं अन्दर से कितनी रिक्त हो चुकी हू केवल मैं ही जानती हूँ। एक लम्बी चुप्पी, जिसमे एक सवाल कही अटका हुआ था, कमरे में भर गई। "शायद आप मच ही कह रहे हैं। मुझमे शक्ति है-पर, पर वह प्रलय 39 - इस कमरे तक ही सीमित है, इसी कमरे में सिमटी हुई है। जो प्रहार मैं इतनी बहादुरी से इस कमरे में कर लेती हूं, वह मैं वाहर नहीं कर सकती। बाहर तो मुझ पर प्रहार होते हैं। जो बातें मैं इस कमरे में कह सकती हूं, वे बाहर जाकर नहीं कह सकती । मुझे बोलने की इजाजत नहीं है। वह कमी मैं इस कमरे में पूरी करती हूं। घर में यह मुझे तोड़ते हैं, यहां मैं उनको तोड़ती हूं। पर अन्त में मेरे हाथ कुछ भी नहीं आता । कुछ क्षणों की राहत के अलावा मैं खाली हूं, अन्दर से वाहर से।" "मैं तुमसे सहमत नहीं।' ये शब्द मेरे उपचार के सिलसिले में कहे गए थे। मुझे हौसला देने के लिए। "क्या आप मुझे सब कुछ नकारने की सलाह दे रहे हैं ? सब कुछ एक शुद्ध भारतीय नारी की तरह सहती जाऊं?' "नहीं, अपनी शक्ति का सही इस्तेमाल करो। पिछली बार तुमने कहा था कि इनके लिए मनोविकार विभाग में आना सिर्फ क्रिकेट का खेल है । तुम्हें यह गेंद की तरह इधर-उधर उछालते रहते हैं । याद है ?" "हां" "तुम इन्हें ऐसा मत करने दो।" मैं फूट-फूटकर एक शुद्ध औरत की तरह रोने लगी। "आप फिर मुझे सब कुछ चुपचाप सहने की सलाह दे रहे हैं, और स्थिति सुधार कर पूरा भार मुझ पर डाले दे रहे हैं।" सिसकियों के बीच जितनी जोर से चीखा जा सकता था उतनी जोर से चीखकर मैंने उत्तर दिया। एक मरीज को एक डाक्टर पर चिल्लाने का कोई हक नहीं है। वह चाहते तो मुझे डांट सकते थे। पर मैंने देखा, वह बहुत ही सहजता से अन्तर्वेग रहित नजरों से मुझे देख रहे थे। धीमे-धीमे थोड़ी-सी सहजता मुझमें भी समा गई। मैं थोड़ी आश्वस्त हो गई। न्यूयार्क की आवादी नब्बे लाख से ज्यादा है। उस शहर में एक हजार से अधिक मस्तिष्क रोग के चिकित्सक हैं। उनके पास अधिकतर कला- कार, बुद्धिजीवी तथा लेखक आदि खक आदि ही उपचार के लिए आते हैं। जापान में तीन हजार से भी ज्यादा ऐसे चिकित्सक हैं पर उनके पास न तो लेखक ." 40) अपने-अपने कारावास आना पसन्द करते हैं, न कलाकार, न बुद्धिजीवी, न ही आम आदमी। ऐसा क्यों हुआ? सन् १९३० समाप्त होने से पहले ही फायड की कृतियां जापानी भाषा में अनुवादित रूप से लोकप्रिय हो चुकी थीं। शायद इसी- लिए कि जापानी पुरुष स्वाभिमानी होते हैं, आत्मवाद के अनुयायी होते हैं, अपने को ईश्वर मानते हैं । शायद में भी एक ऐसे ही पुरुष की पत्नी हूं, जिसे मैं स्वीकार नहीं कर सकती और जिसे अस्वीकारने की हिम्मत मुझमें नही है । मुझे वही करना होगा जो डाक्टर मित्रा कह रहे हैं, जो डाक्टर दूबे कह रही हैं, जो गप्पू कह रहा है, जो मेरा इक्कीस वर्षीय पुत्र कह रहा है, जो मेरे सास- ससुर कह रहे हैं । मुझे एक विनाशकारी, प्रलयकारी जीवन जीना है। जितनी शान्ति, सुख, स्नेह, प्रेम, प्रहपं मेरी ओर नपी-तुली मात्रा में फेंकी जाए उसी के सहारे अति उत्साहपूर्वक चारो ओर जब-जब हो सके अत्युत्साहजनक वातावरण का सृजन करना है । इस बंजर रेतीली गर्म जमीन में उगे गुलाब के फूलों को सोचना है। इस सड़ी-गली बदबूदार जिन्दगी को मुझे अकेले ही सुगन्ध से भरना है । प्रलय/41 ऐसा क्यों? "आप कहां थीं?" मैंने चौंककर फटी-फटी आंखों से डाक्टर दवे की ओर देखा । "अभी जब आपके पति बात कर रहे थे तो आप यहां नहीं थीं। पर जैसे ही आपके पति ने आपकी बेटी की बात शुरू की तो आप एका- एक जीवित हो उठीं। यहां वापस लौट आई ?" देखने में वह कितनी सीधी-सादी महिला हैं। जितनी सादी फीकी साड़ी उतना ही फीका सादा चेहरा। एक बार तो लगता है कि विदेशों से प्राप्त लम्बी-चौड़ी डिग्रियां यह ले ही नहीं सकतीं और वह भी मानस- शास्त्र की। मैं काफी हैरान हुई थी क्योंकि जो मुझसे वह कह रही थीं, वह एकदम सच था । मैं कुछ पल पहले वहां नहीं थी पर बेटी का नाम सुनते ही लौट आई थी। एकाएक जीवित हो उठी थी। अविश्वास से भरी सम्मान मिश्रित नजरों से मैंने उन्हें मुस्कराकर देखा था । मुस्कराई मैं इसलिए थी "कि कहीं मैं एक बार फिर न रोदूं। मेरी मुस्कराहट में थोड़ा अभिमान भी था~मेरा भी कोई है जिसके लिए मैं हर समय वेताब रहती हूं। उसके नाम के जिक्र-भर से मेरे चेहरे पर पूरा तूफानी समुद्र थपेड़े खाने लगता है। पर फिर भी मैंने पूछा- ''मैं आपका मतलब नहीं समझी ?" "अभी-अभी जब आपके पति वात कर रहे थे आप कहां थीं? अपनी बेटी का नाम सुनते ही आप एकाएक यहां लौट आई।" मैंने भर्राई आवाज़ और फूटते मन से कहा था, "क्योंकि यह एकदम । 42 / अपने-अपने कारावास वेग वातें कर रहे थे--बेमतलब, बेमानी, निराधार, जो इन्हें चन्द पलों के बाद याद नहीं रहेंगी। पर मेरी बेटी तो बेमानी नही है। बेकार नहीं है और जो कुछ भी यह कह रहे हैं वह मच नहीं है । इन्हें यह भी नही पता कि यह बातें झूठ हैं, सिर्फ मुझे चोट पहुंचाने के लिए यह सब कुछ कहा जा रहा है, मुझे दवाने के लिए, डराने के लिए... मैंने डाक्टर की ओर, डाक्टर ने मेरी ओर भरी आंखों दर तक झांका था। यह मेरी मदद कैसे कर सकती हैं ? मैं तो उस मुकाम से बहुत आगे आ गई है । पूरा सुख तो समार में किसी को भी नहीं मिलता है, बहुत सारा तो कल्पित ही होता है न । पर मेरा तो अस्तित्व ही कल्पित है। मैं क्या हूं? कोई नहीं जानता। कोई नही समझना । और अगर समझ भी जाय तो क्या होगा ? सब वैसे ही चलता रहेगा। कभी बबण्डर, कभी शालि और फिर घूम-फिर कर प्रचड आधिया। "यह सच है कि हमारी वेटी हममे नाराज होकर घर छोड़कर चली गई थी। इनको बस इतना ही याद है। यह याद नहीं कि वह पयो चली गई यी। और अगर यह तूफान बन्द न हुए तो फिर चली जाएगी, पर छोडकर, हो सकता है दुनिया छोड़कर चली जाए। उसे जीवित रहने के लिए एक भी कारण नजर नहीं आता है । वह कहती है, दिस इज एसिट वर्ल्ड । कोई नई बात नहीं कहती, पर इस पुरानी घिसी-पिटी स्थिति को एक भयानक तरीके से महसूस करती है और मैं डर जाती है । यह नही डरते, ऐसा वयों?" "क्या हम तुम्हारी बेटी मै मिल सकते हैं ?" डाक्टर मित्रा ने पूछा "नही ।" मैरी नहीं में चीत्कार अधिक थी उत्तर कम । "क्यों?" "उसने बहुत महा है, वहुन चोटें खाई हैं। मैं उसे और बात नहीं कर सकती हूं। मेरे लिए उनके मन मे भरा अटूट स्नेह और प्रेम, पहले दया में बदला था, फिर शायद थोडी धृणा मे । वह नहीं चाहती कि मैं इस तरह का दलित, कुंठिन जीवन व्यतीत करू। बेमानी वेकार के त्यागों से, अपनी खाली झोली बार-बार भरने की नाकाम कोशिश करती हूं।
नहीं, आप उसे नहीं मिल सकते।" पहली बार जब मैं इस कमरे में आई थी तो डाक्टर मित्रा ने अपने पाइप का धुआं अपने सामने फैला लिया था । शायद वह मेरी मदद करना चाहते थे। पर मुझे यह लगा था कि यह सिर्फ एक गिमिक है। अपने और मेरे बीच धुएं की दीवार इसलिए खड़ी की गई थी कि मुझे. बात करने में कम-से-कम पीड़ा हो । बड़ी शांति से वह मेरी बातें सुनते रहे थे और एक लम्बे अरसे के बाद वह वोले थे : "तुम्हारी बातों से लगता है कि सारा दोष तुम्हारे पति का है।" "नही, दोष शायद मेरा ही ज्यादा है। मैंने आपको जो कुछ भी बताया है, अपने दृष्टिकोण से बताया है। शायद मेरी प्रतिक्रियाएं ही गलत होती हैं।" "अच्छा मैं तुम्हें होमवर्क देता हूं। आने वाले सप्ताह में तुम्हारे साथ जो भी हो उसे लिखकर लाना।" चिकित्सा का यह पहला कदम था। आने वाले सप्ताह में काफी विस्फोटक घटनाएं घटी थीं । डाक्टर से मिलने का दिन आ गया था और मैंने एक शब्द भी नहीं लिखा था। घर से चलने से आध घंटा पहले, बड़ी कठिनाई से मैंने बीते हुए सप्ताह का सारांश लिखा था। कितनी पीड़ा सही थी मैंने उस समय । कितना अपमानित महसूस किया था मैंने । पर. यह पीड़ा और अपमान तो मैं कब से सह रही हूं। अब तक तो मुझे इसकी आदत पड़ जानी चाहिए थी। पर नहीं पड़ी थी। सच्ची बातों को लिखने. पर क्यों दर्द और बढ़ गया है। जिन्दगी का नाम तो वहाव होता है। जो चीज़ बहती है, वह बदलती जरूर है, उसमें कुछ भी स्थिर नहीं रह सकता है। फिर मेरे ही जीवन में यह पीड़ा व अपमान क्यों आकर ठहर गया है ? क्या मैं जीवित नहीं हूं ? तो क्यों इतनी संवेदनशील हूं? पढ़कर डाक्टर मित्रा ने वह कागज का टुकड़ा मुझे लौटा दिया था। फिर मेरे पति को अन्दर बुलाया और उनसे अकेले में वातें कीं। ऐसा ही तय हुआ था । हमारा इलाज शुरू हो गया था। अगले दो सप्ताहों में चार वार हम दोनों से डाक्टर मित्रा ने बातें 44 / अपने-अपने कारावास की। पांचवी वार उस कमरे में डाक्टर दवे भी मौजूद थी। शायद हमारा केस इतना जटिल था कि एक डाक्टर इलाज कर ही नहीं सकता था। कितने ही शुक्रवार और सोमवार चीत चुके हैं। एक दिन तग आकर मैंने पूछ ही लिया था- "क्यो आते हैं हम दोनो यहां?" मानो सारा दोपहमारा नही डाक्टरों का है। "तुम्ही वताओ?" डाक्टर मित्रा व डाक्टर दवे अच्छी तरह से जानते हैं कि जो मैं सहती हू विल्कुल मेरी निजी, व्यक्तिगत आन्तरिक चेतना है, जिसे कोई नहीं समझ सकता है। "मुझे नही पता ! मैं बेहद अव्यवस्थित हूं।" डाक्टर मित्रा ने अपने जूते उतार दिए थे। क्यो? उसमें से तसमें निकाले । फिर बडी लगन से दोबारा जूतो मे उन्हें डालना शुरू कर दिया। क्यों? क्यो ? क्यो ? मानो कोई अबोध बच्चा मिट्टी के ढेर मे किला चना रहा हो । उनकी इस हरकत पर पहले मुझे बेहद खीझ महसूस हुई यो। कोई इतना सहज कैसे हो सकता है ? पर फिर मुझे लगा कि डाक्टर मित्रा की सहजता सरककर धीमे-धीमे मुझमे समा गई है । हां, मुझे सब से ज्यादा जरूरत है सहजता की और यही एक ऐसी दुर्लभ चीज है जो मेरे जीवन मे कभी आई ही नहीं । मैं एक खौफनाक भय से ग्रस्त हू । न मालूम कब कैसे और कहा कोई भी सामान्य-सी स्थिति विस्फोटक रूप धारण कर ले। और हर विस्फोट कितना भयानक होता है। हर बार वह मुझे थोड़ा और अपग बना जाता है। और मैं, जिसके बारे में कहा जाता है, "यह तो एक लहर की तरह माती है और मौज की तरह लौट जाती है," थोडी- सी और मिट जाती हूं। थोडी और नीचे हो जाती हू, योड़ा-मा और लौट जाती हूँ । मेरे अन्दर उठने वाली लहरें थोड़ी-थोडी हल्की हो जाती हैं । मेरे अन्दर भरी मौजें कुछ देर के लिए रो देती हैं । पर मैं वेवस होते हुए भी हर वार अपने आपको दोबारा ढूढ लेती हूं. ऐसा ही नियम है । हर लहर चट्टान से टकराकर लोट हो तो जाती है, तुफान आता है तो ऐसा क्यों ? | + भी तो है। - जब यह एक निश्चित स्थिति मेरे जीवन में आकर ठहर ही गइह लोग मेरी क्या मदद कर सकते हैं । एक स्थिर शान्ति में डूबकर क्यों दोनों डाक्टर हफ्ते के दो घंटे हम पर वर्वाद करते हैं ? क्या करते हैं ? मा इन्हें कोई माशा नजर आती है ? "तुम्हें हम पर विश्वास नहीं?" शायद डाक्टर दवे आहत हो गई थीं। "विश्वास तो है पर इस स्थिति को समझने के लिए पिछले पच्चीस वर्षों का एक-एक पल आपको मेरे साथ दोबारा जीना पड़ेगा। क्या यह मुमकिन है ! दूसरी बात यह कि आप जिसकी मदद कर रही हैं, उसे इस मदद की ज़रूरत ही नहीं है।" "कौन लाता है इनको यहां ? तुम ?" "नहीं । हमारी एक मित्र हैं, उन्होंने हमें यहां, लगभग जबर्दस्ती भेजा है।" "वह तो एक बार हुआ न । अव पिछले दो महीनों से कौन ला रहा । है ?" है "स्वयं आते हैं ?" "आना चाहते हैं ?" "हां" "तो फिर तुमने कैसे सोचा कि यहां आने से कोई फायदा नहीं होगा? या फिर इनको मदद की ज़रूरत नहीं।" "क्योंकि मैं जानती हूं, मैं तटस्थ थी।" अथाह सागर-सी चार आंखें मुझे देख रही थी और मेरी असहाय डबडवाई आंखें उन दोनों को। क्यों न इस सागर में डूब जाऊं? लहरे लहर का मिलन कितना सुन्दर होगा । हर वार की तरह आज भी रू लाना मैं भूल गई थी। पर फिर भी फूट-फूटकर रो रही थी। यह सच है कि पिछले दो महीनों में उतने विस्फोट, उतने प्रहार न जितने पहले होते थे। पर यह तो तूफान आने से पहले की क्षणिक है। तूफान किसी वेकार-सी बात पर आएगा और मैं उसे सह नहीं 46 / अपने-अपने कारावास मेरे बच्चे उमे सह नहीं पाएंगे।" पीडा मे भरे मम्बन्ध विच्छेद के वीस दिनो के बाद जब हम-मैं और मेरे बच्चे अपने घर लौटे तो गप्पू ने कहा था -"डेडी, मैं तुम्हें सिर्फ एक चान्स और दूगा। और अगर एक और झगडा हुआ नो मैं घर छोड़कर चला जाऊगा।" मैंने अपनी भरी आंखें उसके नन्हे कोमल कन्धो मे छुपा ली थी। और उसे बाहो में भरकर वायदा किया था कि "नही वच्ची जान, कभी नही होगा झगडा। कभी भी नहीं।" "तब तो फिट है।" कहकर वह खेलने चला गया था। मेरी ही जान का एक टुकड़ा एक भारी संकट से बचकर और कितने ही संकटी में फस गया था। पर जब तक उन संकटो और उसके बीच में सुरक्षा की दीवार बनकर खडी रह सकती हूं मुझे कोई चिन्ता नही है। गप्पू से किए गए वायदे को निभाना है मुझे--अकेले ही। इस तपते रेगिस्तान को पार करना है मुझे-अकेले ही। "तुम लोग क्या अपने बच्चो के हुक्म पर चलोगे?" एक परेशान शायद नाराज आवाज मेरे कानों से टकराई। "क्यों नहीं ? बच्चो ने जो कुछ हमारे कारण सहा है, उसके बदले में मैं वही करूगी जो वह कहते हैं । कम-से-कम घर मे शान्त वातावरण की माग जरूर पूरी करूगी । यह सच है कि वह कभी भी सामान्य बच्चों की तरह मुस्करा नही सकते, हस-खेल नहीं सकते, पर इतना हक उन्हें भी है कि हर रोज प्लासी का युद्ध देखने से अब उन्हें छुट्टी मिल जानी चाहिए। तभी तो कहती है कि आपको मेरे साथ पिछले पच्चीस साल फिर से जीने पड़ेंगे। जी सकती हैं आप?" "पच्चीस साल पहले की कौन-सी बात याद है कोई भी एक बात इस समय...... "मैं तेरह वर्ष की थी जब मैं इन्हे पहली बार मिली थी । मुझे केवल प्रेम ही मिला था; बहुत-सा स्नेह, बहुत-सा अनुराग, जिसे मैं कभी नहीं भुला सकती हूँ। आज मुझे एक बात समझ नही आ रही। दो इन्सान एक-दूसरे को अथाह प्रेम करते है, फिर भी एक-दूसरे को सहन नहीं कर सकते? ऐसा क्यों?" इसी तरह की बकवास करते सुनते एक महीना और बोत गया। पर ऐसा क्यों?
बार मैंने महसूस किया कि दोनों डाक्टर मेरी पीड़ा को पूरी तरह से जी रहे हैं, पर हमारी मदद करने में असमर्थ हैं। कम-से-कम मुझे ऐसा लगा था । मैं स्थिति सुधारने की जल्दी में हूं पर उन्हें कोई जल्दी नहीं। हर बार मेरी वाचालता के कारण मेरे पति थोड़े-से हार जाते, थोड़ा-सा टूट जाते। मुझे लगता कि मैं अव जीतने ही वाली हूं ! सब घाव भर जाएंगे। सब अपमान धुल जाएंगे । डाक्टर दवे कई बार कहतीं, "आपकी पत्नी जो भी कहती हैं, हमें समझ आता है। पर आपकी वातें समझ नहीं आतीं।" "ओह ! क्योंकि मेरी पत्नी एक अच्छी अभिनेत्री हैं।" डाक्टर दवे का चेहरा तन जाता। उस दिन हमें थोड़ी देर हो गई थी। अन्दर कोई दूसरा मरीज बैठा था। मेरे पति ने कहा था, "ज़रा पूछो कि हम इन्तजार करें या लौट जाएं ?" "आप पता करो । मरीज़ मैं नहीं आप हैं।" सामने डाक्टर को देखकर हम उठ खड़े हुए थे। हमेशा की तरह उन्होंने हमारा स्वागत किया था, एक घण्टा समाप्त हो गया और हम घर लौट आए। x x X मेरे पति बैठे अखवार पढ़ रहे थे। एक-दो बार मैंने याद दिलाया कि आज अस्पताल जाना है। दस बजे तो फैसला सुनाते हुए बोले- "मैं नहीं जा रहा हूं।" "क्यों ?" "मेरी मरजी।" "वट हाऊ कैन यू डू इट ?" मैं विफरकर चीख उठी थी। "ह्वाई नाट? क्यों नहीं ?" ठीक ही तो है। ह्वाई नाट ? जब इतने अपमान मैंने सहे हैं तो एक और सहना मेरे लिए क्या कठिन काम है। दो अजनबी डाक्टरों के सामने अपने सव मुखौटे, सब आवरण उतारकर मैंने रख दिए और आप पूछते हैं ह्वाई नाट! "पर याद है डाक्टर दवे ने आपसे कहा था कि अगर दो बार नियत दिन आप नहीं आएंगे तो वह हमारा केस छोड़ देंगी।" मैंने आखिरी 48/ अपने-अपने कारावास हथियार छोड़ा था, "पिछले दो हफ्तों से आप पीठ में दर्द का बहाना बना कर टालते रहे है । कम-से-कम उन लोगों को वता तो दें कि अब हम लोग अपनी चिकित्सा नही करवाना चाहते हैं । अच्छा लगता है कि वह अपने 'दो कीमती घंटे यू हमारी इन्तजार में बर्वाद कर दें।" किसी दूसरे इन्सान को समझने का मतलब होता है अपने आपको बदलना । और कुछ लोगों के लिए यह एक खतरनाक बात है। हम सब बदलने से डरते हैं, इसलिए एक-दूसरे की आज्ञा स्वयं को नहीं देते हैं । "मैं नहीं जाऊगा। हा, तुम जाना चाहो तो चली जाओ।" "पर डाक्टर दवे ? वह क्या सोचेगी, क्या कहेगी?" "ओह ! शी! शो इज ओनली ए वूमैन ।" मैं अकेली अस्पताल चली गई, गुस्से से भरी हुई । अन्दर जाते ही मैंने 'कहा-"मुझे पिछली बार ही पता चल गया था कि अब वह कभी यहा नही आएंगे । वह मरीज वाली बात मुझे नही कहनी चाहिए थी।" "तुम्हारा यहां चिकित्सा के लिए आना कभी भी बन्द हो सकता था । तुम दोनों यह सोच रहे थे कि हम इस समस्या को अलग-अलग कानो में डालकर एक-एक करके हल कर लेंगे। तुम्हें बता देंगे कि तुम दोनो में कौन सही है और कौन गलत । पर ऐसा हुआ नहीं।" डाक्टर मित्रा मुझे समझाते रहे। कई बार गुस्से से बिफरकर मैं चीखकर-चीखकर कह चुकी हू, "इनके लिए घर कुछ माने नही रखता है । इनके लिए या तो जेल ठीक रहेगी या 'पागलखाना।" जेल का विचार तो तभी रद्द हो गया था जब मैं अपने वकील की सलाह-मशवरे ठुकराकर अपने घर लौट आई थी। भव तो दूसरा रास्ता ही वाकी था । पर डाक्टर दवे बीच का रास्ता अपनाने की ठोस सलाह दे रही थी और वह भी वडी सूक्ष्मता से, मृदुता से । उनके शब्द मैं सुन भी रही थी और समझ भी रही थी । अन्दर-ही-अन्दर में जमे डूब गई थी। बीच का रास्ता तो मेरा जाना पहचाना है। इस रास्ते पर तो मैं कई बरसो से चल रही हूं। ठीक ही तो है । जब हमने पहली बार मनोविकार विभाग में कदा ऐसा क्यों ? 145 -- रखे तो सबसे पहला फैसला डाक्टर मित्रा व हमारे बीच यही हुआ था। "आप पहले यह वताइए कि आप एक-दूसरे को त्यागना चाहते हैं या एक साथ रहना चाहते हैं ?" मेरा उत्तर था, “एक साथ रहना चाहते हैं।" अपने ही उत्तर के अनुसार मुझे ही वीच का रास्ता अपनाना है, मुझे ही सब त्याग करने हैं, सब कुछ सहना-हमेशा की तरह। और फिर अगर हर इन्सान को पूरा सुख मिल भी जाए तो जीवन कितना नियमित, कितना अनभय हो जाए। कोई कुछ नया करने का सोचे भी न। और फिर नियम, निष्ठता, अनभयता का विकास-चाहे वह डाइनोसोर में हो चाहे डिक्टेटरशिप में, अतिजीवी नहीं है। चिरस्थायी नहीं है। , 50/ अपने-अपने कारावास 'चींटियों की कतार' रेगिस्तान की तरह फैला दिन अजगर की तरह मुह फाई मुझे घूर रहा था । सतीश अपनी अनुसंधानशाला और अंश और बौव ठुमक्ते मचलते बाय कहकर अपने स्कूल चले गए थे। चार प्राणी-चारों के पाम घर की अपनी-अपनी चाबी । जब जिसका समय हो जाएगा, या जव किमी को घर आने की जरूरत हो, वाहर से ही चाबी धुमाकर किवाड़ खोलकर अन्दर चला आए । जैसे किसी को किमी से कुछ सरोकार नहीं, किसी को किसी की जरुरत नहीं, कोई किमी पर निर्भर नहीं-सब स्वावलम्बी। एक खामोश दीवार ने मुझे घेर लिया था । एकाएक न जाने मुझे क्यो ऐमा लगा था कि यह घेरा छोटा होता जा रहा है । दीवार मेरे और, और भी नजदीक आ रही है। अब यह मेरे गरीर को छू लेगी और मैं इमी के नीचे दब जाऊगी। खुद को एक झटका दिया था मैंने । क्यों न एक कप काफी पी जाए । रसोई घर का किवाड सोला। सब कुछ सलीके से रखा धरा-था। सिर्फ एक चोटियों की कतार न मालूम कहा से कहा जा रही थी। अलमारी में मे गमेक्सीन का डिब्बा निकाला। पचाम ग्राम के साली काफी के डिब्बे में सतीश ने छ. छेद किए थे ताकि जब जरूरत हो गैमेक्सीन का छिडकाव सही मात्रा में हो मके । मेरी जिद थी कि क्या जरूरत है इतने छेद बनाने की अगर दवा ज्यादा गिर भी जाए तो क्या डर है ? वाद में माह से मन सफा हो जाएगा। इसी बात पर एक मामूली सा युद्ध भी हुआ था। अगर डिब्बे मे छः छेद किए गए थे तो उम युद्ध के कारण ज्यादा नहीं तो एक ऐद कही-न-कहीं मेरे भीतर जरूर हुआ होगा। चीटियों की कतार/5 । ? और ऐसे कई अकारण हुए युद्धों के कारण हुए छेदों से मुझे आज लगता है कि मैं अन्दर-बाहर से छलनी बन चुकी हूं। आंखों पर पट्टी बांधकर समर्पण की विलक्षण परम्परा को न जाने कैसे जीवन पर्यन्त, गांधारी ने निभाया होगा । असमय बांहों को शून्य में फैलाना, वस्तुओं और व्यक्तियों को टटोलना कहां सुखद रहा होगा उसके लिए? उसके भी शिशु धीरे- धीरे हिमखंड होते चले गए थे। उनकी तो एक मजबूरी थी जिसके कारण कभी जान न पाए कि वाणी से अधिक मुखर वत्सल दृष्टि होती है। पर मैं क्यों अपनी आंखों पर पट्टी बांध रही हूं ? मैं क्यों इस हद तक समर्पण कर रही हूं? ठीक है बच्चों को आत्मनिर्भर होना चाहिए। पर इस हद तक तो नहीं कि मां की दृष्टि को सेतु न बनने दिया जाए। इस साधना का मूल्य मैंने ज़रा महंगे में ही चुकाया। छोटी-छोटी बातों के लिए हर बार आहत होकर झुकना मुझे ही पड़ता है । वात कभी कुछ भी नहीं होती पर फिर भी कहानी बन जाती है। कहानी पढ़ लो तो खत्म हो जाती है पर यह कहानी ऐसी है जो पढ़ लेने के बाद भी खत्म नहीं होती है। फिर भी कहीं न- कहीं एक सेतु है जिसे पार करके हम चारों वार-वार मिल जाते हैं, कोई- न-कोई खास किस्म का आरलडाइट है जो हमें तोड़-तोड़कर फिर जोड़ देता है। गममेक्सीन छिड़ककर मैंने चींटियों की कतार को देखा । पर कुछ समझ नहीं आया कि कहां से आ रही हैं और कहां जा रही हैं ? क्यों जा रही हैं ? अपने लिए एक कप काफी बनाकर बालकनी में जा वैठी थी। अच्छी तरह से याद है उन दिनों में लायड-सी डगलस के उपन्यासों पीछे पड़ी थी। मैं ऐसे ही पढ़ती हूं। एक लेखक को पकड़ लिया तो पकड़ लिया। और फिर डगलस के उपन्यास भी तो ऐसे हैं कि जिन्हें पढ़ते-पढ़ते कोई भी बंध सकता है। और मुझे स्वयं को बांधना बहुत जरूरी था। वैसे मैं न भी बंधती तो कर भी क्या सकती थी? दिल्ली से बंगलौर तवादला हुआ था सतीश का। बेहद सुन्दर शहर । साफ-सुथरा, हरा-भरा, पर करने को कुछ भी नहीं। दो महीने में एक वार रेडियो से बुलावा आता, एक आध घंटे का प्रोग्राम प्रस्तुत करने के लिए। साल में चार नाटक खेले जाते, जिनकी समीक्षा डेक्कन हैलंड के लिए मैं बड़ी लगन से लिखती। पर साल 52 / अपने-अपने कारावास मे तो तीन सौ पैसठ दिन होते हैं । बाकी के दिन कैसे विताए जाएं ? यह समस्या मेरे लिए कभी न हल होने वाली समस्या थी। हमारे घर की दीवार में बाल्डविन स्कूल की दीवार लगभग जुड़ी यो। हर रोज की तरह उस दिन भी एक बजने ही वाला था। अभी अंग आएगा साना साने और अपने लवबहस को दाना-पानी देने। आएगा क्या, आया था। हर रोज की तरह उस दिन भी अपनी चाबी से द्वार खोलकर घर मे भागा आया था । खाना तैयार था पर वह मीधे अपनी चिडियों को देखने चला गया था। खाना खाकर जाते-जाते कह गया था, "आज फुटबाल का मंच है। 8 बजे लौटूंगा, मौम ।" हां वह मुझे इसी प्यारे से नाम से पुकारता है--"मोम।" पर मैच नहीं हुआ था-किसी कारणवश । याद नहीं क्या कारण था। पर इतना याद है जब वह घर लौटा था तो बहुत रोया था। रोने का कारण भी अच्छी तरह मे याद है। पिंजरे में घरी दोनों ही चिड़ियां निढाल-मी पड़ी थी । मुझे खीचकर वह रसोई में ले गया था । एक नजर देखकर माफ़ ममम आ गया था कि दोनो का स्वर्गवास हो गया है । पांच बजे जब मतीश घर सौटा तो हम चारी ने बैठकर एक दिवार गोष्ठी की थी। फैमला एक मत में किया गया था। इसलिए विना चाए पिए ही पिंजरे को गाड़ी म रखकर हम लोग पशु-चिकित्सक के यहां गए थे। पशु-चिकित्सक साहब ने कोई प्रश्न नही पूटा था। बस अपनी पतली- सी नाक पिंजरे के नजदीक ले जाकर धीमे से कहा था, "इनकी मृत्यु गमे- मीन के कारण हुई है।" याद माया, सुबह मैंने चीटियों को मारने के लिए मही मात्रा में गंमेक्मीन का छिडकाव किया था। जाहिर ही वह सही मात्रा इन परिन्दों के लिए ही मात्रा न थी। क्या फायदा हुआ छः छेद बनाने का । दिन-भर हवा चलती रही पी, धीमे-धीमे । गमेक्मीन भी धीमे-धीमे उनके अन्दर जाती रही होगी और मैं सिमटती दीवारों में घिरी काफी पीती रही थी, धीमे-धीमे। हम चारों बहुत दुसी हुए थे। अन मबसे ज्यादा। क्योंकि उसे मन-ही-मन यकीन हो चुका था कि दो से अब यह जल्दी ही चार या छः होने वाले हैं। ऐमा उम आदमी ने परिन्दै वेवते समय अंश से कहा चीटियों की कतार / 53 अब जवकि वह दोनों ही न रहे तो बच्चे कैसे पैदा होंगे ? तह एक त बड़ा सवाल था जो जैश के मन को मथ रहा था। ऐसा नहीं कि ने इससे पहले या फिर इसके बाद कभी मौत न देखी थी। अभी : बरस पहले डालमिया दादरी में हमारे साठ कवूतरों में से एक कबूतर को एक विल्ली ने खा लिया था। उस दिन खाना न तो वाकी के 59 कबूतरों ने खाया था और न ही हमने । और फिर अभी दिल्ली में दो बरस पहले हमारे दो तोते अकारण ही मर गए थे। उस रात मुझे एक भयानक स्वप्न आया था जिसमें मैंने देखा था कि दुनिया में खाने को कुछ भी नहीं बचा है और लोग अपने-अपने घरों में पाले हुए जानवरों व पक्षियों को ही धीरे-धीरे खाने लगे थे। हम भी इसी फैसले पर पहुंच जाते हैं कि अव हमें अपने दोनों तोतों को ही पका लेना चाहिए और जब मैं पिंजरे में से तोते निकालने के लिए रसोई घर में जाकर उन पर ओढ़ा हुआ कम्बल हटाती हूं तो दोनों को पहले ही से मरा हुआ पाती हूं। कैसा खौफनाक स्वप्न था। अगली सुवह बच्चों के जगने से पहले मैंने जब रसोई में जाकर पिंजरे से कम्बल हटाया तो हमारे तोते ठीक उसी तरह लेटे हुए थे जैसे मेरे स्वप्न में निढाल मृत्यु प्रायः से। उस दिन भी हम मृत तोतों को लेकर पशु-चिकित्सक के पास गए थे, पर वह मौत का कारण बता न सका था। और वह दो चिड़ियां जिन्हें हमने बड़े शौक से पिछले साल जामा मस्जिद से खरीदी थीं कैसे उन्हें बचाने के लिए हमने उन्हें डाक्टर के हवाले कर दिया था। दो दिन तक उसने क्या-क्या उपचार न किए थे। पर वे वच न सकी थीं। पर यह मौत जाहिर है मेरी लापरवाही के कारण हुई थी! ये बातें कितनी पीछे अतीत में खो गई हैं। कितने ही वर्ष बीत : हैं। इस बीच, हमारे घर में एक और प्राणी भी आ चुका है-गप्पू । उ पास भी घर की अपनी अलग से चावी है। यह हमारी पांचवीं चावी पर अब दिन रेगिस्तान की तरह न तो फैलता है और न ही अजग तरह मुंह फाड़कर मुझे घूरता है । सतीश अपनी अनुसंधानशाला औ और वीव स्कूल की जगह विश्वविद्यालय चले जाते हैं। उनके वेहद विस्तृत हो चुके हैं । पर मेरा उनसे सम्पर्क टूटा नहीं है । एक PA| अपने-अपने कारावास । सा सेतु मैंने अपने उनके बीच बना रखा है जो बीच मे झूल बेशक जाए पर कभी टूटता नहीं है। पहले मैं बाहर जाने को तरसतो थी, बहाने ढूढ़ा करती थी। अब घर बैठने को तरसती हू, बहाने ढूंढती हूं । जब पैदा और बौव को मेरी जरूरत न रही~या मुझे जबरदस्ती यह अहसास कर. वाया गया कि उन्हें मेरी ज़रूरत नहीं है तो मैंने एक ऐसा काम किया, जिसे मैं आज अक्षम्य पाप मानती हूं-मैंने नौकरी कर ली। अब पन्द्रह वर्ष बाद मैं न तोनौकरी छोड़ सकती हूं और न ही सामोशी से घर बैठार धीमे-धीमे भर सकती हूं। उस सुबह मैं बेहद विचलित थी। बात कुछ भी नहीं थी । कुछ भी तो नहीं । सुवह पाच बजे उठकर मैं नीचे आई थी। दस मिनट मे सबको चाय देनी थी। गैस पर पानी चढाकर मैं सेटी पर जमे ही लेटी तो मुझे धीमे-धीमे घटी बजती हुई सुनाई दी थी। सुबह सवेरे बडी मोहक लगी थी मुझे वह आवाज । मुझे लगा अर्घ निद्रा की अवस्था में गायद सपने मे घटिया सुनाई दे रही हैं । मैंने करवट ली और मन-ही-मन पानी उबलने का इन्तजार करने लगी। मुझे लगा, यही दस मिनट का आराम मेरे नसीव मे लिखा है। यह दस मिनट मेरे लिए बहुमूल्य हैं । यही दम मिनट मुझे पूरे दिन का सामना करने की शक्ति देंगे। पर जैसे ही मैंने करवट ली तो नजर बैठक मे ही रसे सरगोश के घर की ओर उठ गई थी । अरे ? खरगोश कहा गए ? उठकर देखा तो जाली टूटी हुई थी और दोनो सर- गोश गायब थे। कितने दिनो से मैं कह रही थी कि देखना एक दिन यह दोनों भाग निकलेंगे। दोनों ही पूरा दिन जाली को कुतरते रहते थे। कितनी बार अंग को निवेदन कर चुकी थी, "जब फुरसत मिले तो दो कीलें और ठोक देना," दोनो भाइयो ने एक दोपहर व्यय करके जगला तैयार किया था। दोनों सरगोशो के गले में एक एक घंटी बांधकर गप्पू खुश हुआ था, "हां इम शनिवार को तुम्हारे सब काम कर दूगा। तुम चिन्ता मत करो", पेश ने आश्वासन दिया था। इम शनिवार के बाद अगला और फिर अगला शनिवार भी निकल - गया था चीटियों की कतार / 55 - "बेटा जी, वे कीलें तो ठोक देते," कई वार याद दिलाया था मैंने। "वस कल यही काम करूंगा। तुम ऐसा करो और भी जो काम करवाने हैं एक कागज पर लिख दो। कल सब कुछ हो जाएगा। पक्की वात," कहकर अंश मुस्कराया था। न जाने ऐसा क्या हुआ था कि न मैंने ही कागज पर रुके हुए कामों की लिस्ट बनाई और न ही उस शनिवार को जैश ने कुछ किया। और आज दोनों ही खरगोश गायव हैं । घंटियां फिर धीमे-धीमे बज उठीं तो मैंने लपककर सेटी को कमरे के बीचों-बीच खींच लिया था। एक खरगोश दीवार के साथ चिपककर दुवका हुआ बैठा था। उसे अकेला देखकर मैं डर गई थी । दूसरा कहां गया? ऊपर गप्पू की घड़ी का अलार्म बज' चुका था। धीमी-धीमी आवाजें बता रही थीं कि वह उठ चुका है और स्कूल जाने की तैयारी कर रहा है। मैंने पुकारा भी था। "गप्पू नहा रहे हो ?" "हां।" वह चिढ़ गया था। उसे लगा था मानो मैं उसकी चौकीदारी कर रही हूं। उसकी चिढ़ी हुई आवाज सुनकर उसे नीचे बुलाने की हिम्मत ही न जुटा पाई थी मैं । अगर मैं उसे बता देती कि खरगोश अपना जंगला तोड़कर बाहर निकल आए हैं तो शायद वह नंग-धडंग ही नीचे भाग पहले सोचा एक को उठाकर अन्दर घर दूं फिर दूसरे की खोज शुरू चाय-पानी जरूर खौल गया होगा, मैं वौखला गई थी। सुबह का एक-एक पल कितना कीमती होता है। पानी को केतली में उंडेल बाहर के कमरे में गई थी, जैश के कमरे में। "श । बेटा उठ तो जरा, खरगोश कमरे में घूम रहे हैं, कहीं विल्ली न खा जाए । भई बात सुना करो, जल्दी उठो न।" अंश ने अन्दर आकर दीवार से चिपके खरगोश को उठाकर जंगले में डाल दिया। फिर दुसरे की खोज शुरू हुई थी। तब तक गप्पू भी तैयार नोकर नीचे आ गया - 7 तख्त पोश के नीचे दूसरा खरगोश बैठा था । सपने..
" और उसकी गर्दन दिल्ली के मुंह में थी। बड़ी कठिनाई से दिल्ली को भगाया पर खरगोश हिला नहीं । या शायद हिल न सरापा। "हाय । यह तो मर गया है," गप्पू नोखा था। आलो में पानी भर आयाया उसके! "नहीं नहीं, सिली फूल। सिर्फ चोट आई है । ठीक हो जाएगा।" अंग ने डांट पिलाई यो । गप्पू की आंखें हवडया आई थी पीड़ा से। बड़े भाई में उमे असीम विश्वास है न इसलिए उसकी बात का यकीन करके विश्वस्न-सा होकर स्कूल के लिए रवाना हो गया था गप्पू । माता-जाता जम्मी स्वरगोग की पीठ पर हाय फेर गया था। जव तक दोपहर को गप्पू स्कूल से लौटा तो सतीय का अनुसंधान- शाला लौटने का ममय हो चुका था और मेरा आराम करने का । केवल आप घंटे का आराम और फिर मात घटे की ड्यूटी। माते ही गप्पू ने सवाल उडाला था- "मरगोश को डाक्टर के पाम कब लेकर जाएगे?" "इमे कुछ भी नहीं हुआ है । चिन्ता मत कर।' वह बैवारा नहीं जानता था कि उसे टाला जा रहा है। उसका अवोध शिशु हृदय मान गया था। पर शाम तक जस्मी सरगोश ने न कुछ खाया, न पिपा । मैंने गप्पू को समझाया, "बेचारा डर गया है।" भात खरगोरा को कही और तकलीफ न हो, उस शाम टेलीविजन भी न चलाया गया और गप्पू ने अपनी पढ़ाई भी उसके जंगले के पास हो वैठकर की। उसकी एक आस कापी पर और दूसरी पिंजरे पर टिकी थी। अगली दोपहर जब गप्पू स्कूल से लौटा तो सरगोश को वैसे ही बैठा पाया जमा कि वह मुबह बैठा था। लगता था आखिरी सांस ले रहा है। "हेडी, इसको अभी डाक्टर के पास लेकर चलो।" "अभी तो मैं काम पर जा रहा हू । शाम को चलेंगे वेदा । पांच बजे तयार रहना।" "में जाता हं आरके बहाने । इमको अभी ले चलो। नहीं तो यहाँ मर जाएगा." तब तक मती किवाड सोल चुके थे। यही पर निगाह डाली तो चोटियों की दो बज चुके थे। "नहीं बेटा, वहाना क्यों बनाऊंगा। तुम तैयार रहना । अब तो मैं चला।" "कम गप्पू "मम्मी तुम्हारी आज ड्यूटी है ?" वैसे तो यह सवाल मुझसे रोज़ ही पूछा जाता है पर बस अभी, चार बजे चली जाऊंगी सुनकर गप्पू की आंखों में एकाएक संकट भरा आतंक छा गया। मां अभी काम पर चली जाएगी, वाप टालकर वायदा करके चला गया है । हो सकता है वह सच्चा है पर सुविधा अनुसार बदला भी जा सकता है। घर पर रह जाएंगे गप्पू और खरगोश । "मम्मी, लिसन टू मी। लेट अस टेक हिम टू द वेट । यू एंड आई ।" गप्पू की आवाज़ में एक आतुरता थी जिसे मैं नकार न सकी । मुझे एका- एक वंगलौर की वह विचारगोष्ठी याद आ गई जिसके बाद हम मरे हुए परिन्दों को गाड़ी में डालकर पता करने निकल पड़े थे कि यह मर कैसे गए ? और आज एक मरते हुए खरगोश को चिकित्सक के पास ले जाने का समय इस घर में किसी के पास नहीं है। जी, , यू एंड आई विल गो," मैंने फैसला कर लिया था। शब्द तो आठ ही थे । पर निर्णय सुनाते समय मुझे लगा था कि कई टन ग्लानि मेरे शरीर से घुल कर वह गई है । अच्छा ही हुआ गन्दगी को वहा ही देना चाहिए। दोनों खरगोशों को एक थैले में रखकर हम दोनों एक नजदीक के ही पशु चिकित्सक के यहां पहुंच गए थे। कितनी सहानुभूति व समवेदना से उस डाक्टर ने जख्मी खरगोश की जांच-पड़ताल की थी। पहले महलम लगाई फिर एक टीका । जव - टीका लग रहा था तो गप्पू ने खरगोश की टांग पहले कसकर पकड़ी थी फिर सहलाई थी। कातर नजरों से चिकित्सक से गप्पू ने पूछा था. "यह बच तो जाएगा न, डाक्टर साहब ।" "वेशक । कल तक देखना यह पहले की तरह उछल-कूद मचाएगा। तुम कोई चिन्ता मत करो।" पहले उसने गप्पू की पीठ ठोकी थी और फिर चिकित्सक ने मेरे परेशान चेहरे की ओर देखा था। मुझे आध घंटे के -- 58 / अपने-अपने कारावास अन्दर ड्यूटी पर पहुंचना था। उससे पहले गप्पू और सरगोगों को पर पहुंचाना था। मुझे लगा मुफ्त में ही पाच रुपये खुल गए । इस सरगोश ने बचना तो है नहीं। कभी बिल्ली का काटा सरगोरा जीवित रह ही नहीं सकता। यह वात चिकित्सक भी जानता था और में भी। पर हम दोनों गप्यू को यह बात नहीं बता सकते थे। सायद गप्पू के लिए मही अन्दा था। कल तक या फिर परसों तक जब यह सरगोश नहीं रहेगा, कम-से- कम वह स्वयं से घृणा तो नहीं करेगा। पूर्ण सच्चाई से वह उसके मरने का शोक तो मना सकेगा। और मैं बिना किसी आत्मग्लानि के उसे सांत्वना तो दे सकूगी।
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"क्यों वावा, अच्छी पिक्चर है, चलते हैं।" "हां-हां; जैसे वह नूरी अच्छी थी न । मेरा पूरा दिन वरवाद कर दिया था। मैं नहीं जाता वेकार की फिल्में देखने । यू गो विद डैड।" रमन की अपनी समस्याएं थीं तो मेरी अपनी ।. वह अपने हाथों मजबूर था, मैं अपने । पर बदलना तो मुझे ही पड़ेगा, उसका अपना अलग संसार है, उसमें से जितना वह मेरे साथ बांटना चाहता है उतना ही मुझे हंसकर बांट लेना चाहिए। ऐसा मेरे साथ पहली वार थोड़े ही हो रहा है। मैं तो बड़ी अनुभवी मां हूं। इसी उमर तक आते-आते रानी और राजीव भी तो मुझसे कट गए थे। अपने मित्रों, सहेलियों, अपने-अपने कालेजों में और फिर अपनी-अपनी नौकरियों के संसार में खो गए थे। और अब मैं, उनके साथ उनका उतना ही जीवन बांट सकती हूं जितना वह चाहते हैं । न कमान ज्यादा। वेकार था रमन को वताना कि डैडी के साथ फिल्म देखने से वेहतर है अकेले देख लो, हजार मिन्नत चुनौती के साथ चलेंगे तो या तो अन्दर पहुंचते ही खर्राटे भरने लगेंगे या फिर पिक्चर के दौरान तरह-तरह की आवाजें निकालकर जतला देंगे--कहां फंसे। रमन यह सब जानता है। फिर भी अक्सर मेरे साथ चलने से इंकार कर देता है । तब मन करता है पूछू, क्यों ? पर छोड़ो, यह तो होना ही था। अपन डैड की ही ज्ञानोन्नति कर लेंगे । आखिर मैं क्या नहीं कर सकती? इसी बात का तो गुमान है मुझे, जो फैसला कर लिया वही कर दिखाया । और किसी को पता भी न चलने दिया। सव किया-धरा मेरा ही है। डैड को ही कलटीवेट करना पड़ेगा। "बेटा आपको झगड़ा नहीं करना चाहिए था।" "वट ममी बाई डोन्ट यू अण्डरस्टैंड । वह जान-बूझकर हर रोज प्रणव की बहन को छेड़ते हैं, वेचारी घर से बाहर निकलती है तो पीछे- पीछे चलने लगते हैं।" "देखो वच्चा, वह लोग वेहद फसटेटिड हैं । तुम लोगों को आपस में 62 / अपने-अपने कारावास मिल जुलकर, हंमते-खेलते देखते हैं, लड़के और लड़कियों को बिना हिचक वे बातें करते देख उन्हें लगता है उनमें कोई कमी है।" "चम-वस मैं सब जानता हूं ऐसा पाठ पढ़ाकर आया हूं, जिन्दगी भर याद करेंगे।" मैं महम-मी गई थी। "हाय क्या करते हो, कही चाकू-वाकू न मार दें, तुम्हें बरा पड़ी है।" "क्यो नही पड़ी है, अगर कोई रानी को छेडे तो क्या मैं खडा-खड़ा देखता रहूगा । यह सोचकर कि...।" "नहीं, मेरा यह मतलब नहीं है । अच्छा चल बता फिर क्या हुआ ?" "होना क्या था। मैंने उनके बीचोबीच स्टॉम लिया, वपा स्टांस का और वस गुरू हो गया, की 'की, या, मा."या"या"या...!" "हे राम तूने तो मुझे डरा ही दिया था। मैं तो समझी मारा-पीटा होगा मिर्फ कीया की चीख-पुकार से ही तूने डरा दिया उनको । पर कितनी बुरी बात । इनके मां-बाप इन्हें समझाते क्यो नही ?" "ममी तुम कह रही थी कि तुमने कभी भैया दीदी को शब्दों से नहीं समझाया फिर भी वे क्यो इतने वेल विहेन्ड हैं।" "वम बच्चा, यह बातें कही नहीं जाती। इनका अहसास बचपन में, अनजाने में ही करवा दिया जाता है।" "कैमे?" रमन को मैंने पूरी तरह मे विश्वस्त कर दिया था, एक सम्पूर्ण भाषण झाडकर , वह सहज-मा होकर अपने कमरे में पढने चला गया था। हर साल की तरह इस साल भी मई-जून में बिजली ने जी भरकर तंग किया या पर अगस्त के महीने की वर्षा विहीन गर्मी और विजली चार-चार घंटो तक गायव । बैवारा काफी हाल-बेहाल था। लालटेन के सहारे अगले दिन की परीक्षा की तैयारी में लग गया था। माल भर का पढ़ा-लिखा जब तक आखिरी क्षणों में न देख लो को लगता है कुछ आना ही नहीं। आज सुबह रमन पांच बजे उठा था। दो-दो पडियो में बलाम लगाया गया था। "ममी तम टेलीफोन पर भी छ बजे का अलार्म लगा दो। कही . - . 'क्या वात करता है दुनिया इधर से उधर हो जाए डैड ता डैड के जगने के बाद क्या कोई घर में सोया रह सकता है।" ओ० के०, ओ० के० कहते हुए रमन ने अपने कमरे का दरवाजा वन्द लिया था। सुबह दोनों अलार्म घड़ियां टनटना उठी थीं। पहली पांच जे और फिर पांच बजकर दस मिनट पर। उसके वाद रमन सीटियां जाता रहा था। मधुर संगीतयुक्त सीटियां मुझे सूचना दे रही थीं-सव ठीक है । नींद भी अच्छी आई, तैयारी भी पक्की है, सब ठीक है। ठीक दो वजे मेज पर सलाद, दही, दाल, सब्जी और कीमे की छोटी-छोटी कटोरियां और एक थाली में तीन परांठे मैंने रख दिए थे। सव कुछ यथा- स्थान था, सही मात्रा में था, सही अनुपात में था, बस अभी रमन सीटियां बजाता हुआ अपनी चावी से घर का मुख्य द्वार खोलेगा और सीधा ऊपर जाएगा कपड़े बदलने। दूर से मैं उसे आता हुआ देख लेती हूं। मन करता है किवाड़ खोलकर उसके पीछे छुप जाऊं और जैसे ही अन्दर कदम रखे मैं उसे हो-हो कहकर डरा दूं। पर नहीं, मैंने अपनी किताव उठा ली है। मैं बहुत व्यस्त हूं । सच मैं हूं, मैं बहुत अनुशासित हूं, कम-से-कम रमन को ऐसा ही जतलाना है । वह इसी में खुश है। मुझे उसे जैसे-तैसे खुश रखना है ताकि वह मुझे अपना दोस्ताना, चाहे थोड़ी-सी मात्रा में ही सही, देता रहे, मैं उससे बात करूं तो वह मेरी उलाहना न करे, ओह ममी, उफ मम्मी कहकर मुझे अपने मुकदमे से खारिज न कर दे। "आ गए वेंटा जी।" गरदन के हिलने का आभास मात्र हुआ मुझे । कैसा जुल्म है नन नन्हीं जानों को किसलिए इस गर्मी का प्रकोप सहना पड़ता है। किन घवराया हुआ-सा लग रहा है। उत्तर-पश्चिम भारत के बहुत-से मार मानसून सामान्य से कम हुई है तो कुछ राहत बच्चों को तो हि चाहिए। क्यों नहीं कुछ दिन के लिए स्कूल बन्द कर देते । वरसों से में इन दिनों रेन होलीडे मिलती रही है। कुछ तो करना चाहि स्कूल वालों को, अब इन्हें नो रेन होलीडे मिलनी ही चाहिए। "आइए खाना तैयार है।" रमन फ्रिज में से निम्बू पानी का जग उठा लाया है । ज 6A | अपने-अपने कारावास पकड़ते ही उसने जरूर कुछ राहत महमूम की होगी। "कमे हुए पेपर?" "ठीक हो गए। ममी में खाना खाकर पहले पडू गा, उ. बजे तकः!" "क्यों, क्यों, पहले थोडा आराम कर लो।" "न बावा, कोई आराम-वाराम नहीं कर सकते आजकल । कहीं फिर से विजली चली गई तो मैं क्या करूगा ?" मुझे लगा मानो किसी चीत अथवा गिद्ध ने राह चलते मेरे जिगर के टुकड़े को नोच लिया हो। क्या दोष है इस बच्चे का? यह कैमे मक्ट में हम सब प्रस्त हैं, कौन किम पकड़ेगा, सब थानेदार, सब चोर। पिछले दो महीनों से ऐसा भी देखा गया कि दिन में घरों में बिजली बन्द रही और गलो सड़कों पर ट्यूवें वल्व दिन भर जलते रहे। इस पड्यन्त्र के विरुद्ध कुछ तो करना ही चाहिए। "बाबा, तुम लोगो को भी वही करना चाहिए जो इन्दिरा गाधी ने कल किया।" "क्या?" "मारुति केस के सिलसिले में इन्दिरा गांधी की कल कचहरी में पेशी थी। लिखकर जवाब देने थे जिसके लिए २३ दिन का समय दिया गया था। कचहरी में इन्दिरा जी ने बयान दिया कि मंगलऔर बुधवार को चूकि दिल्ली में बिजली न थी, इसलिए हम अपने लिखित उनर तैयार नहीं कर सके।" "तो इसमे हम क्या कर सकते हैं ?" "हा वाबा, तुम लोग भी सर मे कह देते कि इम्तहान की तैयारी नहीं कर सके क्योकि दो दिन से बिजली नहीं है। हल्ला करते, शोर मचाते।" अविश्वास से भरपूर रमन की आंखें मुझे एकटक देख रही थी। यह क्या पाठ पढ़ा रही है मेरी मा? मुझे लगा दिना एक शब्द बोले, विना हाथ-पांव हिलाए वह मुझे चावुक मार रहा है और मेरे पास अपनी रक्षा का कोई तरीका नहीं है । मैं आसो-ही-आंखो में मुस्कराकर इस विषम स्थिति मे बचने का उपाय सोच रही हूं और रमन की दैदीप्यमान आएँ अपनी पाहता का स्पष्टीकरण दे रही हैं। कुछ तो करना चाहिए/65 टूटा हुआ दायरा , उसे मरे दस साल हो गए हैं, शायद ग्यारह । ठीक से याद नहीं आ रहा, पर इतना ज़रूर याद है कि वह मर चुकी है। और यह भी याद है. कि वह पहले जिन्दा थी वेहद जिन्दा, जिन्दगी से भी ज्यादा । जिन्दा और बेहिसाब खूबसूरत । अट्ठाईस साल पहले यहां व्यूटी कान्टेस्ट नहीं होते थे पर उसकी सुन्दरता के चर्चे बम्बई पहुंचने के बाद विदेशों में भी पहुंच चुके थे। एक फ्रेंच फिल्म निर्देशक दिल्ली आया तो उससे विशेष रूप से मेंट की थी। कितनी तस्वीरें खींची थीं उसकी। फिल्म में काम करने का निमंत्रण दिया था, कितने प्लान बनाए थे उसने । एक दिन वह तस्वीरे कालेज लाई थी। मिरैंडा हाउस की हरी भरी कुल एक साल पुरानी घास पर हम लोग दायरा बनाकर बैठ गए थे। तस्वीरें घूमती रही थीं। एक जोड़ी हाथ से दूसरी जोड़ी हाथ तक गुजरती जा रही थीं। रिमार्क पास होते रहे थे। हंसी फैलती रही थी और लाल ईंटों की दीवारों से टकराती रही थी। वह हंसी तो मिरेंडा हाउस की दीवारों में आज भी गूंज रही है, पर वह नहीं रही। अगर वह वैसे ही बैठी रहती, उसी दायरे में, तो शायद इतनी जल्दी न मरती, इतनी अकेलो न मरती। उस दायरे से निकलकर उसने खुद को ही मार डाला। उसकी हर बात हम सबको चौंका देने वाली होती। उसकी पोशाकें, उसका दाएं कान के ऊपर किया गया जूड़ा, उसके जूते, उसके ब्लैरो स्वेटर, उसके चलने का तरीका सव निराला था। अभी हम वी० ए० के प्रथम वर्ष में ही थे कि एक दिन उसने हमें बताया- "मैं शादी करने जा रही हूं।" 66 / अपने-अपने कारावास
"जरूर बीवी होगा?"
"पर यह कम हो सकता है ?"
"यह फैमला कैसे हो गया?" सवालों की बौछार-मी गुरू हो गई
थी।
"नहीं बीवी नहीं है । उसका नाम है रोनो," उसदिन वह जैसे मुस्कराई
वैमे दोबारा मुस्कराना उसके नसीब मे नही लिया था।
"रोनो? कौन रोनो ?"
"मेरी मौसी का देवर है। वे लोग मनीला में रहते हैं।"
कितनी हसरत-भरी निगाहो से सबने उसे देखा था। अगले ही दिन
मंगनी की रस्म थी। उसके घर मे लोगो का एक हजूम-सा उमड़ पड़ा
था, किसी को विश्वास ही न होता था। उसी भीड में वीवो का चोट
खाया चेहरा भी घूम रहा था । पर वह अनगिनत हीरो से जड़ा मैट और
गुलाबी बनारमी साडी पहनकर बहुत खुश थी। शादी दम दिन बाद
होनी थी।
मेहमानों के जरा छट जाने के बाद मैंने उससे पूछा था:
"तू इस बदसूरत दानव से शादी करने जा रही है ?"
"बट ही इज सो अगली ?"
उसका उत्तर सुनकर मैं कमे चोंक गई थी।
"बट ही इज सो रिच।"
"मनी इज़ नाट आल ?"
दम दिन बाद वह सजी-सवरी कार में बैठकर रोनो के साथ मैडनज
होटल के लिए रवाना हो गई थी।
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उमकी सब से निकटतम व प्रिय सहली होने के नाते मैंने अगली
सुबह दस बजे मंडनज फोन किया था। और फिर उसके घर । उसका
घर? कहां था उसका घर? वह भी कभी न जान पाई । उमका घर तो
मनीला में बनना था न। पर बना नहीं । गमियो की छुट्टिया शुरू हो
टूटा हुआ दायरा/67
थीं। पहाड़ों पर जाने की तैयारी के दौरान उससे सम्पर्क स्थ की काफी कोशिश की थी। कुछ ठीक से उत्तर न मिलता । मुझे लगा सब कुछ सामान्य नहीं है। नैनीताल में एक शाम हम लोग मल्लीताल से तल्लीताल जा रहे थे। मने देखा तो सफेद सलवार कमीज पहने वह आ रही थी। मुझे देख- र वह ठिठक गई थी और मैं उसे देखकर चौंक गई थी, मैंने कहा न उसकी हर बात पर यह रूप" "तुम ? इस हालत में ?" याद नहीं मैंने यह शब्द कहे भी थे या नहीं पर मेरी फैली हुई आंखों ने ज़रूर कहे होंगे। इसी तरह फैली हुई हजारों आंखों से बचाकर उसकी मां उसे नैनीताल लाई थी। "रोनो कहां है ?" "मैंने उसे छोड़ दिया है।" "कव?" "जिस दिन शादी हुई थी।" उसकी और मेरी मां पीछे चल रही थीं। हम दोनों दवे स्वर में बात कर रही थीं । कहीं कोई सुन न ले- वह बात जो सबको पता लग चुकी थी- उसने मेरा हाथ धीरे से दवाया था। केवल मैंने ही उसे सलाह दी थी कि रोनो से शादी मत करो, उससे मैंने बार-बार पूछा था-"आर यू श्योर ?" मुझे हक था, इसलिए बार-बार पूछा था और आज वह मुझे ही बता रही थी कि उससे भूल हो गई। "जब हम मंडनज होटल के अपने कमरे में पहुंचे तो मैंने उस भयानक रूप देखा । वह क्षण जिससे पति-पत्नी अपना नया जीवन आर करते हैं, आया ही नहीं। जो चीज़ शुरू ही नहीं हुई उसके मिट जाने कैसा गम?" वह आहत-सी मुझे देख रही थी, उसने मेरा हाथ छोड़ा न था। "उसने मुझसे पहली बात यह की थी कि मनीला में उसके में उसकी तीन रचलें रहती हैं और वहीं बनी रहेंगी। वहां कहीं मुझे धक्का न लगे इसीलिए पहले ही दिन बताना ठीक मैंने तड़पकर पूछा था कि मुझसे शादी क्यों की ? तो कहने : । अपने-अपने कारावास पाम ये इन्तहा जायदाद है, जिसके लिए मुझे अपने बच्चे तुम मे चाहिएं। मैं अपना दुल्हन का जोड़ा पहने टैक्सी मे बैठकर उमी समय अपने घर लौट गई," मैं चुपचाप सुनती रही और उसकी पीड़ा को महमूम करती रही। "अव आगे क्या मोचा है ?" "कुछ भी नहीं । शायद पढ़ाई पूरी करूगी।" "कहा ?" "मिरंडा हाउस में।" में एक बार फिर चौकी थी। उसकी शादी गुपचुप नहीं हुई थी। पूरी दिल्ली मौजूद थी, उसे जानती थी, पहचानती थी। "हिम्मत है ?' मैंने उसका हाथ दवाकर आश्वामन दिया था, "मैं तुम्हारे साथ जुलाई में कालेज खुला तो सब सहेलियो ने उसे सहजता से अपना लिया था-मानो कुछ भी न हुआ हो। और हुआ भी क्या था? एक शादी जो टूट गई थी, जिसे उसने तोड़ दिया था। एक साल बीत गया । एक दिन हम सब यूनीवर्सिटी ग्राउट में क्रिकेट मैच देख रहे थे । मैंने देखा कि एक लम्बी-चौडी काली ब्यूक गाड़ी आस- पाम देर से मडरा रही थी। "मुनो यह गाड़ी रोनो की है। वह आजकल दिल्ली आया हुआ है। कहता है मैं उसकी पत्नी हू । सीधे-सीधे साय नही जाऊगी तो अपहरण करके ले जाएगा।" "ओह, द यूट।" अगले कई दिन सहमे-सहमे दम घुटते हुए मे बीते थे। बीबी उसे अपनी गाडी मे सुवह कालेज छोडने आता और दोपहर को ले जाता। काफी हाउम और लाइब्रेरी जाना एकदम बन्द कर दिया गया था। दानव-सी काली सूरत लिए रोनो कई दिन आगे-पीछे घूमता रहा । कई घंटों की जिद और बहम के बाद वह उसे तलाक देने के लिए राजी हो गया। टूटा हुआ दायरा/69 चुकी थीं। पहाड़ों पर जाने की तैयारी के दौरान उससे सम्पर्क स्थापित करने की काफी कोशिश की थी। कुछ ठीक से उत्तर न मिलता । मुझे लगा भी सब कुछ सामान्य नहीं है। नैनीताल में एक शाम हम लोग मल्लीताल से तल्लीताल जा रहे थे। सामने देखा तो सफेद सलवार कमीज पहने वह आ रही थी । मुझे देख- कर वह ठिठक गई थी और मैं उसे देखकर चौंक गई थी, मैंने कहा न उसकी हर बात पर यह रूप.." "तुम ? इस हालत में ?" याद नहीं मैंने यह शब्द कहे भी थे या नहीं पर मेरी फैली हुई आंखों ने ज़रूर कहे होंगे। इसी तरह फैली हुई हजारों आंखों से बचाकर उसकी मां उसे नैनीताल लाई थी। "रोनो कहां है ?" "मैंने उसे छोड़ दिया है।" "कब ?" "जिस दिन शादी हुई थी।" उसकी और मेरी मां पीछे चल रही थीं। हम दोनों दवे स्वर में बात कर रही थीं। कहीं कोई सुन न ले- वह बात जो सवको पता लग चुकी थी- उसने मेरा हाथ धीरे से दबाया था। केवल मैंने ही उसे सलाह दी थी कि रोनो से शादी मत करो, उससे मैंने बार-बार पूछा था-'आर यू श्योर ?" मुझे हक था, इसलिए बार-बार पूछा था और आज वह मुझे ही बता रही थी कि उससे भूल हो गई। "जब हम मंडनज होटल के अपने कमरे में पहुंचे तो मैंने उसका भयानक रूप देखा। वह क्षण जिससे पति-पत्नी अपना नया जीवन आरम्भ करते हैं, आया ही नहीं। जो चीज़ शुरू ही नहीं हुई उसके मिट जाने का कैसा गम?" वह आहत-सी मुझे देख रही थी, उसने मेरा हाथ अभी छोड़ा न था । "उसने मुझसे पहली बात यह की थी कि मनीला में उसके ही घर में उसकी तीन रचलें रहती हैं और वहीं बनी रहेंगी। वहां पहुंचकर कहीं मुझे धक्का न लगे इसीलिए पहले ही दिन बताना ठीक समझा। मैंने तड़पकर पूछा था कि मुझसे शादी क्यों की ? तो कहने लगा मेरे 68/ अपने-अपने कारावास के न थे। हीरे, रूबीज, सफेद सुच्चे मोती, एमड और एमेयिस्ट का एक मैला-सा था। कानपुर से गाड़ी अभी दस-बीस मील ही दूर पहुंची थी कि उसकी सीट के नीचे से एक नग-धडंग काला भारी भरकम गरीर वाला चोर बाहर निकला। दोनों सहेलियां बच्ची को उठाकर गुसलसान में भाग गई। जब तक गाड़ी की चैन सिंची, गार्ड आदि आए चोर सब कुछ उठा- कर जगल मे गायब हो चुका था। घबराकर वह अगले ही स्टेशन पर उतर गई थी। स्टेशन मास्टर द्वारा बौवी से फोन पर बात की, वह आध-पौने घटे में ही अपने एक मित्र के साथ वहां पहुंच गया था। पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई तो थानेदार साहब बोले थे, "अरे यह मेम माहब तो उस मंप्रेज बाबू के माप हर हफ्ते यहा के डाक बंगले में आती थी।" बोबी ने उसके पीले पड़े चेहरे को देखा था, बिना एक भाब्द बोले, बिना एक प्रश्न पूछे, उसे पुलिस स्टेशन ही छोड़कर कानपुर लौट गया उससे सच्ची वात पूछने का मुझे मौका नही मिला। एक दिन सपू हाउस में एक नाटक के मध्यान्तर मे मैंने उसे अपनी लाइन में बैठे देखा। वहीं इकहरा बदन, मस्ती-भरी आंसें, तंग सलवार और संक-कमीज, माय एक एग्लो इंडियन नव युवक । मिलने के वायदे हुए। अक्मर मैं उमे किसी स्कूटर के पीछे हवा में उडते हुए देखती, कभी-कभी किमी और युवक के साथ भागती हुई कार मे। उसने बताया था कि बच्ची नैनीताल में किसी बोडिंग में पढ़ती है, बौवी दिल्ली में ही है पर मुलाकात का सवाल ही नहीं उठता और वह स्वयं एक ट्रैवेल एजेंसी मे काम करती है। एक दिन मैं उसे मिलने गई भी। "वह लंच पर बाहर गई है।" कई बार सुवह फोन किया । "सो रही है।" शाम को भी। "बाहर गई है।" एक ही शहर में रहते हुए हम मिल ही न सके और मैं अमलियन दाहादापरा/71 तीन-चार साल लग गए। इस बीच पढ़ाई भी खत्म हो गई, मेरी भी शादी हो गई। उसके पत्र मुझे बरावर आते । एक पत्र में उसने लिखा कि पहली जनवरी को वौवी और उसकी शादी हो रही है। जीवन में किसी औरत को जो कुछ भी चाहिए वह सब वौवी के पास था, फिर वह तो उसे बरसों से प्रेम करता था। एक साल बाद हम लोग पटियाला में मिले तो उसकी गोद में उससे भी अधिक सुन्दर एक बच्ची थी। दोनों खुशी से पागल थे। उसके बाद तबादलों के चक्कर में हम पांच-छ: साल नहीं मिल सके और जव मिले तो वह काफी हद तक मर चुकी थी। आज दस साल बीत जाने पर भी वह मुझे हर रोज याद आती है। दफ्तर जाते और घर लौटते समय मुझे उसकी मां की भव्य कोठी के सामने से गुजरना पड़ता है। हर वार, दिन में दो वार-मेरा मन आत्मग्लानि से भर उठता है। उसकी शक्ल दिन में दो बार मेरी आंखों के सामने घूम जाती है । उसे जिन्दगी से कितना प्यार था पर वह जीवित नहीं है। उसकी बिगड़ती हालत देखकर मुझे शक ज़रूर हुआ था कि उसका जीवन सामान्य नहीं है । एक बार जल्दी-जल्दी में मुलाकात हुई तो उसने बताया था कि बीवी की वदली अब दिल्ली हो गई है। पर वौवी कहां है ? "दौरे पर गया है।" वौत्री के बारे में यही उत्तर मैंने आगामी चार महीने तक सुना तो मैंने उससे कहा था-"सुन, तू झूठ बोल रही है। बता बौवी कहां है ?" उसने टाल दिया था। अगर मैं जिद करती, सहानुभूति भरा हाथ वढ़ाती तो शायद वह किसी और दिशा की ओर मुड़ जाती। शायद वह इस कद् न भटकती, अपना दुख मुझसे वांट लेती तो उसका अन्त इतनी जल्दी न होता। लोगों से उसके बारे में बहुत बातें सुनी थीं। पहले भी और बाद में भी। पर एक वात ने मुझे बुरी तरह से चौंका दिया था। वीवी की बदली दिल्ली हुई तो वह अपनी वच्ची और एक सहेली के साथ सामान लेकर पहले ही दिल्ली के लिए रवाना हो गई थी। उसके पर्स में उसके सभी आभूपण थे, और वह आभूपण भी कोई आम किस्म . MA के न थे। हीरे, रूबीर, सफेद सुच्चे मोती, एमई मोरएमेपिस्ट का एक मेला-सा था। कानपुर से गाडी अभी दस-बीस मील ही दूर पहुंची थी कि उसकी सीट के नीचे से एक नंग-घहग काला भारी भरकम दारीर वाला चोर बाहर निकला। दोनों महेलियां बच्ची को उठाकर गुगलखाने में भाग गई। जब तक गाडी को चैन सिंची, गार्ड आदि आए चोर भव कुछ उठा- कर जंगल में गायब हो चुका था। घबराकर वह अगले ही स्टेशन पर उतर गई थी। स्टेशन मास्टर द्वारा बोबी से फोन पर बात की, वह आध-पौने घंटे में ही अपने एक मित्र के साथ यहां पहुंच गया था। पुलिस में रिपोर्ट लिखवाई गई तो थानेदार साहब बोले थे, "अरे यह मैम माहब तो उस अंग्रेज बाबू के साथ हर हफ्ते यहा के डाक बंगले में आती थी।" चौबी ने उसके पीले पडे चेहरे को देखा पा, बिना एक शब्द बोते, विना एक प्रश्न पूछे, उसे पुलिम स्टेशन ही छोडकर कानपुर लौट गया था। उसमे सच्ची बात पूछने का मुझे मौका नहीं मिला। एक दिन मधू हाउस में एक नाटक के मध्यान्तर में मैंने उसे अपनी लाइन में बैठे देखा। वही इकहरा बदन, मस्ती-भरी आंखें, तग सलवार और संक-कमीज, माथ एक एंग्लो इंडियन नव युवक । मिलने के वायदे हुए। अक्मर में उम किमी स्कूटर के पीछे हवा में उडते हुए देखती, कभी-कभी किमी और युवक के साथ भागती हुई कार में। उसने बनाया था कि बच्ची नैनीताल में किमी घोडिंग में पढ़ती है, वौवी दिल्ली में ही है पर मुलाकात का सवाल ही नहीं उठता और वह स्वय एक ट्रैवेल एजेंसी में काम करती है। एक दिन मैं उसे मिलने गई भी। "वह लंच पर बाहर गई है।" कई वार सुबह फोन किया। "सो रही है।" नाम को भी। "याहर गई है।" एक ही शहर में रहते हुए हम मिल ही न सके और मैं अमनियत - टूटा हुआ दायरा/71 भी पता न कर सकी। एक शाम होली फैमली अस्पताल की सीढ़ियां तरते हुए मुझे उसकी सबसे छोटी मीसी मिलीं ।. वह हमारी हमउम्र और काफी दोस्त थीं। मुझे देखकर वह ठिठकी और बोली-"कल सुवह वह चल बसी।" । "अखबार में नहीं देखा।" कहकर मैं झेंप गई, मानो मैं सुबह उठकरः मरने वालों के ही नाम अखबार में पढ़ती हूं, या जैसे यह कोई बहुत बड़ी घटना या दुर्घटना हो। "पर कैसे ? क्या हुआ उसे ?" "बस सुबह उठे तो वह नहीं थी। नींद की गोलियां तो वह दो साल से ले रही थी। डाक्टर ने उसे और हमें कई बार चेतावनी दी थी। उसने कहा भी था कि एक दिन वह सोई ही रह जाएगी ।" ठीक वैसे ही हुआ । कई रातों तक मैं सो न सकी । आंखें वन्द करती तो उसका मासूम चेहरा मेरी आंखों के आगे आकर टिक.जाता। उसकी मौत में काफी हद तक मेरा भी तो हाथ था। मैंने कहा न मुझे हर रोज दिन में दो बार उसकी कोठी के आगे से गुजरना पड़ता है। शायद आत्म- ग्लानि और पाप, बीत गए समय का भय ही तो होता है। पर किसी भी दोपी को आसानी से छुटकारा नहीं मिल सकता, पर फिर सोचती उसके रहते अगर मैं कुछ करती-कुछ भी-तो शायद मुझे इस यात को हर रोज़ सहना न पड़ता। या फिर शायद हमारा बनाया हुआ दा टूटता ही ही न । कारावास वन्द मुट्ठी पर टिकी नज़रें "मुनो, यह फोहम एट मिड नाइट किनने लिखी है ?" "वारी और दोमनिक ।" मेरी आखो में चमक आ गई पी मानो इन दोनों में मेरा गहरा रिस्ता हो । "कौन हैं ?" "हैं दो फांमीमी-अमरोरी लड़के, पहले भी, इनकी दो किताबो ने कई नदियों में भाग लगाई है पर इम..." कहते-कहते मैं रुक गई। अचा- नक मुझे ख्याल आया-मैं यह मब क्यों कह रही हू । उमका ध्यान तो कहीं और या। उसके माय हमेगा ऐसे ही होता है । वात सुनने-मुनते महमा उमका ध्यान कही-न-कहीं जरूर बहक जाता है और माय-ही-माप यह बहकावा उनके चेहरे पर वेतहागा अकित हो जाता है-इम हद तक कि बात करते-करते दूसरा व्यक्ति दुखी हो उठे। मैंने खुद पर लानत भेजी। मैंने क्यों मोचा कि इस पुस्तक के आलोक में बाघी रात आई आजादी की गरल, इतिहान के सन निर्णायक सम में सक्रिय शक्तियों व प्रवृनियों की व्यास्या में एक बार फिर कर मकनी हूँ? महीना-भर पहले जव मैंने इस पुस्तक पर एक मोटी रकम व्यय की थी तो मैं फिल्मों की गंली में एक के बाद एक गुजरते दृश्य, मूल क्या ये साय जुडी ममानेदार उपक्याओं का वर्णन सबसे बांटना चाहती थी। मदको सुनाना चाहती थी । वम भी किस्मागोई में जो मुख मिलता है वह और किमी प्रकार के मनोरजन में मुझे नहीं मिलता। आदत में मजबूर से भी मैंने कुछ विम्म मुनाए थे, जिन्हें सुनकर पहले तो वह चकित रह गई यो फिर मुझमें दन्द मुट्टी पर टिकी नजरें/73 1 । . - ा था कि वह भी इस किताब को जरूर पढ़ेगी। वैसे उसका ह जाना अपने में कोई विशेष घटना न थी। यह दस्तावेज तो पढ़ने लों को चकित करने के लिए ही लिखा गया था। पर यह एकाएक त इतनी विचलित क्यों हो गई है ? जाहिर है किताव तो इसने पढ़ी नहीं है । और जो भी मसालेदार प्रसंग इसे मैंने सुनाए थे उन्हें कव का भूल चुकी होगी। "तुमने फ्रीडम एट मिडनाइट के लेखकों के नाम क्यों पूछे ? कितार • ली तुमने ?" "नहीं," इस नहीं में अथाह निरीहता भरी हुई थी मानो इस कारण उसकी मौत उसके सामने खड़ी है। थोड़ा ठिठककर मेरे पहले प्रश्न का भी उत्तर उसने दिया था, "उनके हाथ में थी।" "कब ?" वह किसका जिक्र कर रही थी मैं समझ गई थी। "अभी-अभी," बड़ा अटपटा-सा लगा था मुझे। उसे किताब से कुछ लेना-देना नहीं था। पर वह किताव क्योंकि उनके हाथ में थी, इसलिए उस किताव का वजूद बढ़ गया था । मुझे एक घिसे-पिटे पर लोकप्रिय पंजावी टप्पे की एक पंक्ति याद आ गई- "साडे नालों वटन चंगे जेड़े छाती नाल लाए होए ने।" वे हमारे विभाग के उप संचालक थे। उनके हाथ में वह नव प्रकाशित "क ही क्यों, सभी कुछ था । हाथ में ही नहीं, वन्द मुट्ठी में सब कुछ था, से खोलकर वह जो चाहे दे दें, जितना चाहे उतना दे दें । इस महान् शक्तिशाली व्यक्ति पर उसकी ही क्यों कइयों की नज़रें टिकी थीं। जो सकते हैं उनसे न लेना भी तो एक पाप है। मैं तो इस विभाग में नई नई आई थी, पर बहुत जल्दी ही समझ गई थी कि वातावरण झूठापन पूरी तरह छाया हुआ है । मानवता और अमानवता के इतने ढेर में से मुझे हमेशा की तरह बहुत कम लोग भाए थे। उनमें से एक भी थी। इसका सबसे बड़ा गुण था सम्पूर्ण अनभिज्ञता । पर मन सच्ची, साफ, अपने काम में तटस्थ और स्नेहमयी । न जाने क्यों ए मुझे लगा था कि वह अपनी आंखों से एक बांध बनाना चाहते पर नदी का बहाव रोकना अव उसके बस का न रहा था और अपने कारावास जान-बूझकर अनभिज्ञ बनी बैठी यो । हकीकत को सबर मे तो दसर में सभी को थी पर अभी तक एक रपरखाव, चाहे हल्का-मा ही यना हुआ था। अपनी जिन्दगी के किमी एक मोड़ पर पहुंचकर उमने एक हमराज खोज निकाला था, जो उसका अफसर भी था। एक बहुत ही शक्तिशाली अफमर, जिसके बारे में अव यह मगहूर हो चुका था कि उमकी आंख का उठना या गिरना किमी की भी किस्मत बना या विगाड़ सकता है । स्वय, पिछले चन्द वों में सफलता की नई परिभाषाए तो वह लिख ही चुका था, पर साथ-ही-साय धीमे-धीमे अपने आसपास के कार्य- कर्ताओं को यह भी सिखा रहा था कि स्याह को मफेद कैसे बनाया जाता है, सही को गलत कैमे करार किया जाता है, जो झुक जाए वह सही व्यक्ति होता है जो न झुके उमे कैसे तोहा जाता है। यह मव वह विना कहे, चुपके-चुपके ऐसे कर रहा था कि जिसे जरूरल है वह आंखें बन्द रमे निमे नही जरूरत वह अपना रास्ता खुद ढूंढ निकाले । दफ्तर में ज्यादातर लोग उसकी इज्जत कम करते उमसे रश्क ज्यादा। पर इज्जत करने का दिखावा मभी करते, डरते सभी थे। कब किस हालत में वह किम को आसमान पर बैठा सकता है और कब अपने परों तले रौंद सकता है, यह सब इमी पर निर्भर करता था कि कौन क्तिना दिखावा कर रहा है। पर उमके लिए इसका इतना पागल हो जाना अपने-आप में एक अजीब बात थी और अब तो दवे स्वरो मे ही सही, चर्चा का विषय बन चुकी थी। यह कैसी मृगतृष्णा थी, कसा आवेश या, कमा दृढ आग्रह था । एक पुरुष के लिए एक नारी की यह कमी तीव्रता थी। एकान-भून से प्रस्त प्रेम कहानी ने केसा यातनापूर्वक रास्ता अपना लिया था। यह एक ऐमी प्रेम कहानी थी जिसमे न तो कोई वास्तविकता थी और न ही कोई उत्कटता, शामद कोई निजी मतलब था जिसके ऊपर प्रेम का आवरण भोढकर उसे अपनाने की विफल कोशिश की जा रही थी। हम दोनो आमने-सामने बैठकर स्थिति को समझने की कोशिश कर रही थी, अपनी-अपनी समझ के मुताविक । उम दीवानी की आखों में भरी अथाह और मञ्ची पीडा को महमूम करते ही बरबस मुझे प्रमिट उपन्यासकार विक्टर एगो को वेटी अहंल को याद आ गई। बन्द मुट्टी पर टिगी नजरें/15 अडैल की वेहन की मौत हुई, उसका चित्त व्यथित रहता, के प्रेत से उसकी मेंट होती । उसी विक्षिप्तता की हालत में वह । फौजी पिनसन के पीछे-पीछे नौवास्कोटिया चली गई थी। की खातिर वह अपनी मंगनी तोड़कर बन्धनमुक्त हो चुकी थी। कतरफा प्रेम से बौखलाकर, विना किसी प्रकार का दुखं मनाए, न कैनाडा चला गया था, विना अर्डल के । अडैल भी उसका पीछा हुई हैलीफैक्स पहुंच गई थी। तब तक वह पूरी तरह से प्रेतग्रस्तं चुकी थी। जव वह पिनसन को मिली तो पहले मिन्नत की फिर हार- र धमकियां दी, उसके बाद उसने अपने धन-दौलत से उसके कर्ज उतारने भी लालच दिया। पिनसन तो राजी नहीं हुआ था पर सदा से कर्जदार यह जरूर राजी हो गया था। वैसे तो जो कर्ज़ लेता है उसकी मदद कौन कर सकता है। पर फिर भी जो अनन्तरित संकट उस समय उसके सिर पर पहाड़ की तरह टूट पड़ा था वह इसने अपने वचाए हुए रुपयों से जरूर टलग दिया था। उन दिनों इसका प्रेम चरम सीमा तक पहुंच गया था । इसे लगा था अव यह वेशक मेरी जमा पूंजी न लौटाए, पर स्वयं को तो मेरे लिए सुरक्षित रखे । कव कौन उसे मिलने ऊपर गया या गई और कब तक ऊपर उसके कमरे में रुकी या रुका, इस सवका व्यौरां वह अपनी कुर्सी पर वैठे-बैठे बड़े ही रहस्यमय ढंग से इकट्ठा करती रहती। पर अनजाने ही उसकी आश्वस्तता अशान्ति व्याकुलता में बदलने वाली थी। वह अपनी चपलमति के सहारे एक अनूठे काल्पनिक संसार में जी रही थी-विल्कुल अडैल की तरह । अडल ने भी मन की तरंग में डूबकर एक बार अपने पिता को लिखा था कि उसका विवाह पिनसन से हो गया है । अडैल ने एक बार लावार होकर सोचा था कि किसी मोहनविद्या जानने वाले को बुलाकर क्यों न पिनसन को जैसे-तैसे मोह निद्र अचेत करके समर्पण के लिए तैयार किया जाए। समर्पण, पूर्ण समर्पण ही इसकी भी मांग थी। अपनी तरफ से तो ही-मन पूर्ण रूप से समर्पित थी ही, अब तो इन्तजार यह था कि ओर से वरावर की चोट हो । चोट तो हुई मगर वह इसकी मन । - अपने कारावास नथी। एक दिन न जाने कहां में एक युवा लडकी, एकदम भीर, निरीह, असहाय-मी, दृश्य पर उत्तीर्ण हुई और मव कुछ बातोन्माद में भरपूर दुम्वप्न मे वदल गया । वह युवती एक वुमार की नरह आई और मवकी जान के लिए खतरा बन गई। वह दफ्तर 4 काम मे बचा अतिरिक्त समय उमी के माय व्यतीत करती। उसकी यह विपना बेगक एक मलक- कारी रूप अपना चुकी थी पर कलक विलम्पिन लय में प्रमारित किया जा रहा था। प्रमारण करने वाले मभी डरपोक थे। अपना अपमान महकर मव म्वय को सुरक्षित रपना चाहते थे। पर यह जी बोलकर अपना दुख और पीडा व्यक्त करती । पहले अगर सबको इतना हक ए कि वह आकर इमने यह वह मर्क, "आप तो उनकी चहेती हैं, आप कुछ भी करवा सकती हैं ।" तो आज उन लोगों को यह भी हक था कि कह सकें-"आपका तो मब कुछ लुट रहा है। तरह की बातें, और इसका पागलपन भट्ठी में तावदाने या केवल एक मायन थी। क्यो था यह पागलपन? इमका उत्तर देवल वह हो दे माती थी। पर क्यों देती? उमने तो उन्नीमवी मताब्दी की अमभव वल्पना को उदाहरण मानकर भयानक रूप में अपने जीवन का रूपांतर कर लिया या। वहीं पुरुष जो कभी द्वार के बीचोबीच पल-भर के लिए रुककर धीमे से मुम्कराने भर का आभाममात्र देना था, उसके लिए कमरे में बलिया विमेर जाता था, अब भी उमी कमरे मे आता है, उमी द्वार पर खडा होता है, पर आंखों में तिरस्कारयुक्त उदामीनता लिए हुए । आजकल वह जब- जब उम कमरे में आया वह बेहद तटस्थ रहा, अप्रसन्नता, और कभी-कभी, घृणा की भावना के अतिरिक्त और कुछ भी व्यक्त न कर पाया । उमदी आवों में विरोध और सदिग्धता की एक अजीच-गी चमक होती, मानो यह मब कुछ जान-बूझार ओटा गया है, कुछ छुपाने के लिए, मानो वह एक पुरप नहीं, एक ऐमा पदापं हो जो केवल उन्माद को ही जन्म दे माना है। और यह पगली इम ममय पूर्ण यातना में डूबी मोच रही है कि ऐगी बौन-भी चोट की जाए कि वह बाजी जीत जाए । उगा घेहरा कितना कोमल, दिनना भाषक है और पुछ-कुछ तृप्न भी । गायर अगर यह इतने यन्द मुद्री पर टिकी नजरें/7 - में न आती तो उसकी हालत इतनी दयनीय न होती, इतनी विषाद- न होती। "मुझे तो एक ही बात समझ नहीं आती।" "क्या?" "उसे उस बदसूरत-सी बर्फ की ढेर से क्या मिलता है ?" अभी भी वह उसकी वापसी चाहती थी, किसी भी कीमत पर, किसी भी मात्रा में। "सचमुच जानना चाहती हो?" "हां, है क्या उसके पास ? क्या दे सकती है वह उसे ?" "दो चीजें ?" वह बाज़ की तरह हवा में झपटी थी। वस पता लग जाए, वह जरूर छीन लेगी उससे वह दोनों चीजें, "और वह दो चीजें ऐसी हैं जो तुम उसे कभी नहीं दे सकती, यौवन और समय । दफ्तर के बाद क्या तुम देर रात तक उसके साथ घूम सकती हो और वह भी बसों में ? अपने पति को कह सकती हो आज की रात मैं उसके साथ विता रही हूं ?" "फिर भी वह उसे कुछ नहीं दे सकती है, वह तो खुद भिखारिन है ?" "सुनो, वह अवयुवक नहीं है, नहीं न, मानती हो न। उसके दोस्त उसकी ही तरह ढल चुके हैं, जरा सोचो, इस उम्र में एक जवान लड़की वक्त उसके साथ हो तो दोस्तों में इज्जत बढ़ जाती है। तुम मेरी मानो इस सम्मोहन को अव तोड़ डालो, तुम्हें इस हालत में पहुंचाकर वह वि निरापद और निलिप्त बन गया है।" "पर अब यह भी तो मुमकिन नहीं कि मैं बैठकर शांति पाट रहूं।" उसने अपनी लाचारी व्यक्त की। चोट गहरी लगी थी। मुझे लगा कि यह जीवन भर, बहुत ज्यादा छोटी पड़ गई सं' को अपने अन्दर समेटे, यातनाओं के अन्धेरे में सफर करती रहे आकाश के नीचे, ऊपर से वेशक पथराव होता रहे और वह इस प्रेम से बौखलाकर मौका पाकर पिनसन की तरह, विना को कहीं और चला जाएगा. इन दोनों को छोड़कर । . . य संग तराशा झूठ - जून की नपती-पानी गाम, जो चाहना था कि कपड़े उतार, पूल में पुन जाएं और तब तक न निकले जब तक शीतलता का आभास हवा मे नतरले लगे । या फिर यह वस ही वर पडे । कुछ तो राहत मिले । गन्दगी, धूल- कूडा कर्कट, लिमलिमापन, इम बस अड्डे पर तीन करोड़ रुपये क्या इम- लिए व्यय किए गए थे कि बेचारे यात्री इस मतिनता के ढेर का मूक्ष्म निरीक्षण करें, और कुछ करने-देखने-सुनने को था भी तो नहीं। हमे सारी रात इम बम में सफर करना है । अगर यह बस यहां मे चल पड़ी तो "मुझे लगा कश्मीरी गेट से निकलने के बाद भी यहा की कर्कश तीन आवाजें मेरे कानों में गूंजती रहेंगी। पुरुआत अच्छी नहीं हुई थी। बेशक मैं अपने चेहरे पर एक भी शिकन न उभरने दे रही पी। दन साल के लम्बे अलराल के बाद में गोपाल के साथ भ्रमण के लिए निकली थी। एक मूर समझोता मैंने स्वयं में किया था। अब के इन दम दिनों की छुट्टियों में और लौटने के बाद किमी भी कीमत पर किसी भी तरह मुझे गोपाल के साथ एक नई भागिता का निर्माण करना है । बहुत माल वहम लिया, कुछ भी हाथ न लगा, अव इन दस दिनो में मैं एक ऐमी जाल बुनूगी जो पुरानी औरते बुनती थी। किसी भी मुंह मे एक भी गन्दा गन्द नही बोलना और करनी अपने मन की। पहले मुझे लगता था यह तो सरामर बेईमानी है। जो मन में है, कह दो, होता है विस्फोट तो होने दो, पर क्या फायदा हुआ स्नेहपात्र बनने बनाने की ठानी पी मैने । पर शुरुआत रितने फहडपन में रंगे स्थान से हो रही थी। पचास पैमे के बदले में बस की छत पर सामान रखने वाले गई मुली संग तराशा झूठ/79 . । दूसरी वसों पर सामान चढ़ा भी रहे थे, पर कोई भी मान रखने को तैयार न था। बस अभी आएंगे कहकर हमें थे । एक वार सामान ठिकाने लग जाए तो कहीं टहला भी जा । । कम-से-कम पंखे के नीचे तो सरका ही जा सकता है । एकाएक क कुली हमारी बस की ओर आ रहा है । "सुनो अव के यह नज- ए तो गरदन से पकड़ लेना।" न वह नजदीक आया न ही गोपाल बुलाने की कोई विशेष कोशिश की। गरदन से तो वह उसे वैसे भी कड़ता। इतना ठंडापन भी किस काम का । कुछ तो हरकत होनी ही हिए। गोपाल मुझे आंखों-ही-आंखों से सात्वना दे रहा था और मन-ही- न सोच रहा था बाज नहीं आएगी, यह झगड़ेगी ज़रूर, किसी-न-किसी , किसी भी बात पर। उम्मीद तो नहीं थी पर फिर भी वस ग्रैण्ड ट्रंक रोड पर चल ही निकली थी। यह मैंने पक्का फैसला कर लिया था कि पानीपत से एक मील पहले जो खेत है उस ओर न तो देखूगी और न ही वहां पहुंचने तक आंखों में आंसू आने दूंगी। उस खेत के किनारे जो बरगद का पेड़ है, उसी से मेरे पिता की कार पच्चीस साल पहले आज के ही दिन टकराई थी। उस टक्कर का नतीजा इतना भयंकर होगा यह किसी ने न सोचा था। आधी रात को छोटी बहन ने पानीपत अस्पताल से फोन किया था, “एक्सीडेन्ट हो गया है। हम सब अस्पताल में हैं । पिताजी के लिए डाक्टर और अलग से डी एल जैड टैक्सी लेकर पहुंचा । घबराने की कोई बात नहीं।" घबराने की बात थी। मैं, डाक्टर डो, और डा० महाजन एक बड़ी टैक्सी और अपनी मोटर समेत पानीपत पहुंची तो चारों बहनें, मां, चाचा और रतनसिंह, हमारा ड्राइवर, चारपाइयों पर एक लाइन में पड़े थे। पिताजी की चारपाई अलग रखी थी। वह वेहोश थे और पांच दिन बाद बेहोशी में ही चल बसे थे पर मैंने उन्हें कभी मरा हुआ नहीं माना। वह सदा मेरे सपनों में अ हैं । एक जिन्दा आदमी की तरह मुझसे बातें करते हैं। जागते में भी कहीं मेरे आस-पास हर वक्त मंडराते रहते हैं। पांचवीं बहन के जन्म मुझे अलग कमरे में ले जाकर उन्होंने मुझे सूचना दी थी, "आज से मेरा बेटा है।" और वेटे कहीं रोते हैं भला ? पता नहीं क्यों पर इस गाने-अपने कारावास -- मै वाक्य ने मुझ पर ऐना प्रभाव छोड़ा था कि मुझे लगता--में दहन जिम्मेदार ब्यक्ति हूं। एक मस्तिशाली पुरुष को नाई में गिनी-न-गिनी से वजह-वेवजह उसमनी-झगड़ती रही हूं, विरोध करती रही हूं। विरोध करना तो अब मेरी आदत-सी बन गई है। मुझे बेटा बनाने-मानने वाला पिता तो न रहा पर बेटा बनने की चाह पूरी करने का शायद कोई दूसरा रास्ता मुझे मूझा ही नहीं। वेगक एमा अनजाने में ही हजा-पर झा पानीपत मे एक मोल पहले, उम बरगद के पेड़ तक पहुंचने में बहुत पहले, मुझं तीन बार अपनी ऑलें बन्द करनी पड़ी, मुह में तीन बार एक तीखी हाय निकली, नीन बार मैंने गोपाल को वाह में अपने नासून गाड दिए और तीन वार गोपाल ने मेरे हाय महानुभूति में पायपाए। यह जानना था कि उम दरगद के पेड तक पहुचते-पहुचते मैं अन्दर-ही-अन्दर बुरी तरह में बिखर जाऊगी, मफर के शुरू में ही तीन ममकर महक दुर्घटनाए देखने को मिली थी। हे भगवान, आज कितनो के घर उजडे होंगे। क्यों होते हैं ऐसे बाकस्मिक आक्रमण, आज कितनी माए रात-भर विवाह पर गडी रहेंगी, कैसे सहेंगी यह प्रहार, यह आघान । लाशो की ढेर और उनके पीछे आहत लेटे मेरे पिताजी मब कुछ गडमड हो रहा था। मैं पयों आई इन मड़क पर, एक बार फिर से अपने घाव हरे करने के लिए। हमें रेलगाडी में सफर करना चाहिए या । यह सड़क ही मनहूस है। इम मड़क पर याता- यात बन्द कर देना चाहिए ।माम सात बजे पानीपत बस अड्डे पर हमारी वम पन्द्रह मिनट रुकी। जव यात्री लौटे तो ड्राइवर की बगल वाली मीट पर भगवे कपड़े पहने एक लम्बा-ऊचा काले स्याह रग के बावजूद पम- बता-दमक्ता एक बाबा विराजमान था । एक व्यक्ति ने वही विनम्रता में कहा, "वाबाजी यह मेरी सीट है।" "होगी, होगी। मैं तो ससद सदस्य हू, पहचानते नहीं मुझे, मिया सुर्द का बाबा हूँ ।" "बाप अगर ममद मदस्य है महाराज तो मैं भी मत्री हूं, वेन्द्रीय मर- कार में । लगता है बापने भी मुग्ने पहचाना नहीं।" वावाजी वावजूद इस धमकी के डटे रहे। THI --- "संसद सदस्यों के लिए यह सीट सुरक्षित है । और आप कोई मंत्री- नहीं हैं।" "अच्छा महाराज आप अपना प्रमाणपत्र दिखाएं कि आप संसद स्य हैं तो मैं भी आपको दिखाता हूं कि मैं मंत्री हूं या नहीं।" प्रमाणपत्र होता तो वावाजी दिखाते। खिसियाते हुए उठ गए । बोले, आप भी जनता के सेवक हैं और मैं भी, चलिए, आप ही बैठ जाइए।" "क्यों नहीं वैलूंगा, टिकट खरीदकर सफर कर रहा हूं।" बात यहां खत्म हो जानी चाहिए थी। पहले तो वावाजी ने ऐसा ही फैसला किया लगता था, पर शायद ज्यादा देर तक उनके अहं को लगी चोट सह न सके। कंडक्टर की पीठ पर बड़े याराना अन्दाज में हाथ रख- कर वोले, "सीट का इन्तजाम कर दो।" देर तक दोनों कुछ फुसफुसाते रहे। फिर बावा जी ने बस में चहल- कदमी शुरू कर दी। हम लोगों के आगे दो युवक बैठे थे । उनका एक साथी दाईं ओर की सीट पर बैठा था। तीसरे साथी ने जैसे ही थोड़ा झुक- कर अपने मित्रों से पानी की बोतल मांगी। बावाजी गिद्ध की तरह झपट- कर उस युवक द्वारा खाली की गई डेढ़ इंच जगह पर विराज गए । लड़के ने जल्दी से घूमकर हाथ जोड़कर कहा, "यहां नहीं, पहले ही तीन व्यक्ति वैठे हैं।" उसने धक्का तो नहीं दिया था पर फिर भी कम जगह होने के कारण वावाजी सीट पर जमे न रह सके । सीट न पा सकने का सन्ता अब वावाजी के लिए असहनीय बन चुका था। पलटकर वोले, "व कहां जा रहे हो।" "शिमला।" "पहुंचोगे नहीं।" वावाजी ने अपना शाप घोपित किया। a सन्नाटा-सा छा गया । क्यों वेचारे लड़के को अप्रिय कह रहे हैं। लड़का था, तैश में आता नजर आ रहा था । वावाजी ने आगे अपने विवरण दिया, "वस अभी करवाता हूं, बस का एक्सीडेन्ट । तृ चल । शिमले तो तू पहुंचने वाला नहीं । बस अम्बाला आने दे तेरा एक्सीडेन्ट करवाता हूं नहीं तो अम्बाला पहुंचकर दफा 103 करवाता हूं। पूरे तीन दिन तक अन्दर रहेगा तो ढूंढ़ियो अपनी से 1. . अपने कारावास । तो फिर एक्सीडेन्ट ही करवाता हूं।" कहकर वावाजी ने अपने टैरोलीन के बने भगवे कुरते से जो अदृश्य राख झाड़नी शुरू की तो सबकी सास रुक गई। लड़का खडा होने वाला था, न जाने क्यो मुझसे रहा न गया। जवान गर्म खून है क्या फायदा उलझने का । मैंने झुककर उस लड़के के कन्धे पर हाथ रखा और सलाह दी इगनौर हिम । मुझे लगा शायद बावाजी में उलझना ठीक न था,शायद कुछ देर बक कर चुप हो जाएगा । युवक ने मेरी बात मान ली । वह खिड़की के बाहर ताकने लगा था । वाकी के लोग मझे डरे बैठे थे । चुप-चाप । वावाजी अपना रोय पुनः स्थापित करने के लिए अपने हाथ फिर से अपने कुरते पर फेर रहे थे । जान-बूझकर या अनजाने मे या फिर नियमानुसार कंडक्टर ने एक बटन दबाकर अम्बाले की ओर भागनी वस की रोशनी गुल कर दी थी। हपूर्वक दावाजी फिर शुरू हो गए थे। "अब्बल तो अम्बाला तू पहुंचेगा ही नहीं। उसमे बहुत पहले करवा दूंगा तेरी छुट्टी मैं। बच्चा, जव दो चार घूसे लातें पढ़ेंगी तव जानेगा तू मुझे । बम देख अभी करवाता हूँ तेरा एक्सीडेन्ट"या फिर..." "बाबा- जी..." अपनी ही चीत्कार सुनकर मैं स्वय विस्मित हो उठी पी, "क्यों आप बार-बार एक्सीडेन्ट की बात कर रहे हैं, क्या अकेले इस सहा एक्मीडन्ट करवाने जा रहे हैं..." कहते-कहते मैं फूट-फूटकर रोने लगी। बत्ती जलने से पहले मेरी हिचकी बघ गई थी, ड्राइवर ने बस काफी धीमे कर दी थी और बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा था। बावाजी भी काफी विचलिन से लग रहे थे। पचास-साठ जोडी आंखें मुझ पर टिकी थी। गोपाल ने अपना हाय मेरे कधे पर रख दिया था। "यस मे बच्चे बैठे हैं, औरतें बैठी हैं । आप कब से सबको डरा रहे हैं। मतलब क्या है आपका.. एक मीट के लिए आप हमारी जान ले लेना चाहते हैं..." यह सब मैंने कहा जरूर था पर फूट-फूटकर रोते-रोते । आगे वाली सीट के दोनो मरके खडे हो गए थे और बस के सभी यात्री जो अब तक मन्द गति में, मूटिन से बावाजी की अरोचक बातें चुपचाप सुन रहे। अपनी सीटो मे चिल्लाने लगे थे। "मारो साले को।" संग तराशा झूठ/83 सार दो इसे नीचे।" स रोककर वाहर फेंक दो।" ही से एक मृदु स्वर भी उभरा था। "भाई साहब इन्हें तो चुप ।। वेचारी कैसे रो रही हैं।" कंडक्टर ड्राइवर एक-दूसरे से आंखों- में सलाह-मश्वरा कर रहे थे। ऐसा लगा जैसे बस में एकाएक तेज़ द भर गया है और विस्फोट होने में कुछ ही पल की देर है। झटके से रुकी। ड्राइवर ने जो कि एक जवान सरदार था, वावाजी को वांह से ड़ा, एक थप्पड़ रसीद किया और यह कहता हुआ, “साले मेरी वस का क्सीडेन्ट करवाएगा।" उसे घसीटता हुआ वाहर ले गया। वाहर धुप्प संधेरा था। पर हम लोग अन्दर वैठे देख रहे थे कि ड्राइवर और कंडक्टर बाबाजी पर वार-वार प्रहार कर रहे थे। वावाजी ने खूब शराब पी रखी थी। लड़खड़ाते पांव से जमीन से उठने से पहले ही दूसरे धक्के से फिर 'गिर जाते। आस-पास छोटी-छोटी खाइयां थीं जिन में वावाजी वार-बार गिर रहे थे। बड़ी निर्दयता से मार पड़ रही थी। एक पल को लगा, वावा संहार हो रहा है। कुछ लोग बस से उतरकर घेरा बनाकर खड़े हो गए थे । न जाने क्या बात हुई कि लहू-लुहान व.वाजी को ड्राइवर ने धकेल- कर फिर से बस में फेंक दिया। वावाजी की ऐनक उनके चेहरे से गायव थी। दाई बांह से धाराप्रवाह खून वह रहा था। वह बस में आकर एक सीट का हैंडल पकड़कर सीधे खड़े हो गए। मानो कुछ हुआ ही न हो। यात्री बौखला रहे थे। "इसे फिर वापस क्यों ले आए हैं ?" "वहीं छोड़-छाड़ देते।" "क्या जरूरत थी इतना पीटने की। वैसे ही बस से बाहर फेंक देते 'तो क्या हो जाता। पड़ा रहता सड़क किनारे रात-भर ।" पीछे से ए आवाज़ आई, "इसका फैसला अब पुलिस स्टेशन में ही होगा। यू का टेक द ला इन योर हैण्डस ।" क्या फजूल-सा फैसल. किया गया था। कौन था यह वेवकूफ, बड़ा न्यायप्रिय नागरिक का मुखौटे पहने बैठा है। थाने पहुंचकर होगा। सब जानते थे। इसलिए सव यात्री मन-ही-मन चिढ़ रहे थे 84 / अपने-अपने कारावास । घटना का वृत्तान्त पुलिस लिखेगी तो कण्डक्टर-ड्राइवर क्या यू ही छोड दिए जाएंगे ? मैंने गोपाल की ओर देखा, कही मुझमे नाराज़ तो नहीं । मैंने क्यो यू ही पंगा लिया। बाकी के यात्री भी तो थे बस में। उनमें से कोई क्यों नही रोया-चिल्लाया। मैं ही क्यो अगुआ बनी । बस मे अधिक- तर पुरुष थे। कुछ की पत्नियां बच्चे साथ थे। क्यों नहीं विरोध कर सके वे सब लोग? मुझे क्या पड़ी थी मुस्तारी करने को ? करनाल पुलिस स्टेशन के सामने बस रोकी गई। पुलिस के दो आदमी बाहर आए । डाइ- वर ने एक झटके से बस का दरवाजा खोला । बाबाजी को एक धक्का देकर मिपाही की ओर फेंका और वोला-" वन्दकर दो इमको, औरतो को छेड रहा है । पिस्तौल की धमकी दे रहा है और वेहिसाव गराब पी रखी है इमने।" तीन अभियोग लगाकर ड्राइवर काफी आश्वस्त-सा लग रहा था। थानेदार के एक इशारे पर वावाजी की तलागी ली गई । कोई पिस्तौल विस्तौल न मिली। शराब को गध दूर-दूर तक आ रही थी। थानेदार ने मुडकर कहा: "ठीक है, किसे छेड रहा था?" क्योकि वावाजी ने किमी भी औरत मे छेडवानी न की थी, बम में बैठी मभी महिलाएं चुप रहीं। थानेदार ने दो-एक बार अपना प्रश्न दोहराया। ड्राइवर जानता था कि सबसे पहले वह और कडक्टर ही सजा पाएंगे । मारपीट उन्होने की थी। एक आदमी को लहू लुहान किया था और उन दोनों के विरुद्ध गवाही देने वाला एक यात्री तयार खडा था। आखिरी दांव लगाते हुए ड्राइवर बोला, "ओए हुन की मव नू सप सुंघ गया। ओस वकत ते मव बोल रहे मन, मारो, कुटो, आए हुन की हो गया मद नू । कोई ता बोले। किनू घड़या-मी। ओए हुन बोल दे क्यो नई । केडी जनानी-मी..." बम की खिड़की के बाहर सडा थानेदार बावाजी ड्राइवर और वहुत-से लोग इन्तजार कर रहे थे। बम में सम्पूर्ण रूप से मन्नाटा था। मानो वस खाली हो। हद हो गई। हम लोग कितने दब्बू हो गए हैं। चुपचाप जुन्म सहते रहते हैं । सबके मव बदस्तूर ऐमे बैठे थे मानो कुछ घटा ही न हो और अगर घटा भी था तो उनमे से कोई भी उम ममय मौजूद न था। क्या इनका इरादा पूरी रात थाने में ही विताने का है ? अगर कण्डक्टर ड्राइवर फमते हैं तो बम और जातात.
. त यात्री क्या शिमला पहुंच जाएंगे ? अव थानेदार वस के अन्दर आ पा था और फिर से पूछ रहा था, "भई किसे छेड़ा है बावाजी ने ? ई बोलता क्यों नहीं ?" "मुझे छेड़ा था।" मुझसे रहा न गया। "आप आइए, अन्दर थाने में आकर अपनी रिपोर्ट लिखवा दीजिए।" "मैं बिल्कुल बस से बाहर नहीं निकलूंगी और न ही थाने के अन्दर जाऊंगी। इस वावाजी ने हमें काफी देर से परेशान कर रखा है। अब आप हम लोगों को परेशान करेंगे।" मैं लगभग चीख रही थी। इतनी जोर- जोर से कि थानेदार भी थोड़ा सहम गया। "पर बहन जी जब तक आप अपनी शिकायत हमें नहीं बताएंगी, हम वावाजी को सजा कैसे देंगे।" "वता तो दिया है, इतना काफी नहीं है कि इस आदमी ने मुझे छेड़ा है। शराब की बू तो आप को भी आ रही है । आप इसे ले जाइए और हम लोगों को जाने दीजिए।" "आपलोग ऐसे कैसे जा सकते हैं ? बाबाजी, अब आप बताइए आपको मारा-पीटा किस-किसने है।" कहते-कहते थानेदार वस से बाहर हो गया। वावाजी की ऐनक तो पिटाई के दौरान कहीं गिर चुकी थी। वह परेशान हालत अपने दुश्मनों को इधर-उधर ढूंढ़ रहे थे। जवकि आक्रमणकारी ठीक उनके सामने खड़े थे। वह न्यायप्रिय नागरिक जिसके कहने पर बस इस समय थाने के सामने खड़ी थी। वोला : "अजी, यह खड़े हैं दोनों ड्राइवर और कण्डक्टर। इन्होंने ईटों से मारा है वेचारे बाबाजी को।" "विल्कुल गलत, एकदम झूठ।" यह आवाज़ गोपाल की थी। गोपाल जो अब तक एकदम तटस्थ से बैठे थे। बस की चुप्पी को चीरती हुई गोपाल की रोवदार सहज, संतुलित आवाज, उच्च अधिकारी होने का विश्वास दिलाती हुई, “यह झूठ है। ड्राइवर तो अपनी सीट से उठा तक नहीं । जब सब लोगों ने वावाजी की धमकियों से तंग आकर इन्हें उतारने का अनुरोध किया तो बस रोक दी गई। बाबाजी जल्दी-जल्दी में खुद ही वाहर जा गिरे। खून बहता देख हम लोगों ने तरस खाकर वस । ।
में दोबारा बैठा लिया । वसमे चढ़ते समय बावाजी दो बार लुढ़क गए और इंटो के एक ढेर पर जा गिरे थे। इन्हें किसी ने नहीं पोटा है, गराब ज्यादा पी रखीहै, ठीक से सड़े भी नहीं हो सकते न।" न्यायप्रिय नागरिक इस अनैतिक बयान से व्या हो गया था। मन यात्री गोपाल के बयान का समर्थन कर रहे थे और वह वैचारा सीमें निपोर रहा था। वस फिर से ग्रेह ट्रक रोड पर रवाना हो चुकी थी। चर्चा का विषय हम दोनो ये-भई इन दोनो ने बचा लिया । नहीं तो आज रात पाने में ही कटती। रात बारह बजे अम्बाला से एक किलोमीटर दूर सड़क किनारे एक ढाबे के बाहर बस रुकी। "भाई खाना-पीना हो जाए। वस आधा घटा एकैगी।" कहकर ड्राइ- वर कण्डक्टर ढावे के पिछवाहे चले गए। ढादे के बाहर बहुत बड़ा मैदान या। वीस-पच्चीस लम्बे-लम्बे मेज लगे थे। आस-पास लकड़ी की दुनिया और चारपाइया पड़ी थी । वस से उतरते ही मुझे महिला यात्रियों ने घर लिया और दवे स्वरो मे पूछताछ करने लगी । सभी की आवाज में गौतूहल या। उनकी नजरों में मैं बड़ी ही विचित्र औरत थी, जिम बस के अधेरे में एक भगवे कपड़ो वाले बाबानी ने देड़ा था। उन्हे लग रहा था कि उनके साथ वहा भारी धोखा हुआ है। इतनी बड़ी वारदात हो गई और उन्हें सदर भी न लगी। उनकी आखें वह रही थी-वैचारी कैसे फूट-फूटकर रो रही थी। जरूर कोई ज्यादती की होगी बाबानी ने । मैंने एक स्यूल-सी दृष्टि से उन औरतो को देखा। व्यक्तिगत कारणों से ग्रस्त होकर मैंने बड़ी वेवमी की हालत में एक मूठ सगतरागापा। उसका खण्डन करना अब बेकार है और फिर मेरे मूठ के कारण इन औरतो को जो सहज गुदगुदी हो रही थी उसका मुस यीनने का अधिकार मुझे न पा । मुझे तो पानीपत के आस-पास पहुचते-पहुंचते रोना ही पा- वावाजी ने तो मुझे खुले आम फूट-फूटकर रोने का बहाना दे दिया बस यात्री क्या शिमला पहुंच जाएंगे? अव थानेदार वस के अन्दर आ गया था और फिर से पूछ रहा था, "भई किसे छेड़ा है बावाजी ने ? कोई बोलता क्यों नहीं ?" "मुझे छेड़ा था।" मुझसे रहा न गया। "आप आइए, अन्दर थाने में आकर अपनी रिपोर्ट लिखवा दीजिए।" "मैं बिल्कुल बस से बाहर नहीं निकलूंगी और न ही थाने के अन्दर जाऊंगी। इस बावाजी ने हमें काफी देर से परेशान कर रखा है। अव आप हम लोगों को परेशान करेंगे।" मैं लगभग चीख रही थी। इतनी जोर- जोर से कि थानेदार भी थोड़ा सहम गया। "पर वहन जी जब तक आप अपनी शिकायत हमें नहीं वताएंगी, हम वावाजी को सजा कैसे देंगे।" "वता तो दिया है, इतना काफी नहीं है कि इस आदमी ने मुझे छेड़ा है। शराब की बू तो आप को भी आ रही है । आप इसे ले जाइए और हम लोगों को जाने दीजिए।" "आपलोग ऐसे कैसे जा सकते हैं ? बावाजी, अव आप बताइए आपको मारा-पीटा किस-किसने है।" कहते-कहते थानेदार बस से बाहर हो गया। वावाजी की ऐनक तो पिटाई के दौरान कहीं गिर चुकी थी। वह परेशान हालत अपने दुश्मनों को इधर-उधर ढूंढ़ रहे थे। जवकि आक्रमणकारी ठीक उनके सामने खड़े थे। वह न्यायप्रिय नागरिक जिसके कहने पर बस इस समय थाने के सामने खड़ी थी। वोला : "अजी, यह खड़े हैं दोनों ड्राइवर और कण्डक्टर। इन्होंने ईटों से मारा है वेचारे वावाजी को।" "विल्कुल गलत, एकदम झूठ।" यह आवाज़ गोपाल की थी। गोपाल जो अव तक एकदम तटस्थ से बैठे थे। बस की चुप्पी को चीरती हुई गोपाल की रौवदार सहज, संतुलित आवाज, उच्च अधिकारी होने का विश्वास दिलाती हुई, “यह झूठ है। ड्राइवर तो अपनी सीट से उठा तक नहीं । जब सब लोगों ने वावाजी की धमकियों से तंग आकर इन्हें उतारने का अनुरोध किया तो वस रोक दी गई। बावाजी जल्दी-जल्दी में खुद ही वाहर जा गिरे। खून बहता देख हम लोगों ने तरस खाकर वस । - 06 / अपने-अपने कारावास । में दोबारा बैठा लिया। बसमें पढ़ते समय बाबाजी दो बार लुढ़क गए और इंटी के एक ढेर पर जा गिरे थे। इन्हें किसी ने नही पोटा है, शराब ज्यादा पी रखीहै, ठीक में खड़े भी नहीं हो सकते न।" न्यायप्रिय नागरिक इस अनंतिक वयान से व्यग्र हो गया था । सब यात्री गोपाल के बयान का समर्थन कर रहे थे और यह बेचारा सीमें निपोर रहा था। वस फिर से ग्रेड ट्रक रोड पर रवाना हो चुकी थी । चर्चा का विषय हम दोनो पे-भई इन दोनों ने बचा लिया । नहीं तो बाज रान पाने में ही कटती। रात बारह बजे अम्बाला से एक किलोमीटर दूर सड़क किनारे एक दावे के वाहर बस रुकी। "भाई खाना-पीना हो जाए। बस आपा घटा रुकेगी।" कहकर ड्राइ- वर कण्डक्टर ढाये के पिछवाड़े चले गए । ढावे के बाहर बहुत बडा मंदान था। वीस-पच्चीस लम्बे-लम्बे मेज लगे थे। आस-पास लकड़ी की मिया और चारपाइया पडी थी । वस से उतरते ही मुझे महिला यात्रियों ने घर लिया और दवे स्वरों में पूछताछ करने लगी । सभी की आवाज मे कौतूहल था। उनकी नजरो में मैं बड़ी ही विचित्र औरत थी, जिम बस के अंधेरै मे एक भगवे कपड़ी वाले बाबाजी ने ऐडा था। उन्हें लग रहा था कि उनके साथ बडा भारी घोसा हमा है। इतनी बड़ी वारदात हो गई और उन्हें खबर भी न लगी। उनकी आसे वह रही थी-वैचारी कमे फूट-फूट कर रो रही थी । जरूर कोई ज्यादती को होगी बाबाजी ने । मैंने एक स्यूल-सी दृष्टि से उन औरतो को देखा । व्यक्तिगत कारणों से ग्रस्त होकर मैंने बड़ी बेवसी की हालत मे एक झूठ संगतगा था। उसका खण्डन करना अब बेकार है और फिर मेरे झूठ के कारण इन औरतो को जो सहज गुदगुदी हो रही थी उसका सुख छीनने का अधिकार मुझे न पा । मुझं तो पानीपत के आग-पास पहुंचते पहुचते रोना हा था-- बावाजी ने तो मुझे खुले आम फूट-फूटकर रोने का बहाना द दिया था।
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