Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Rajasthani Gadya Sankalan

Dr. Kalyan Singh · 2011/03

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राजस्थानी गद्य संकलन
सम्पादक
डॉ. कल्याणसिंह शेखावत
राजस्थानी साहित्य संस्थान, जोधपुर

प्रकाशक:
राजस्थानी साहित्य संस्थान
यू.आई. टी. के पास,
जोधपुर
द्वितीय संस्करण 1990
मूल्य : तीस रुपये मात्र
प्रिटिंग हाउस,
जासोरी गेट के पन्दर
जोधपुर

भूमिका प्रो 'राजस्थानी गद्य संकलन' राजस्थानी भाषा रा विद्यार्थियों री जरूरत ने सामी रास र स्यार करयौ है । जुगां जूनी भर समृद्ध प्रापणी मायड़भामा राजस्थानी माजादी रं घई वरसां पछ भगाई-गुणाई री भाषा वणी है । विद्यालयां सूल'र विश्वविद्यालयो ताई दूजी भाषायां री मौत राजस्थानी भी पाठ्यक्रम री भाषा वणी है । इणसू महामना पंडित मदनमोहन मालवीय पर गुरुदेव कविंद्र रविन्द्रनाथ टैगोर रा संपळप पूरा हुमा है । ईसातर संस्कृत, हिन्दी पर मंगरेजी सूरिणी भांत हळको पाठ्यक्रम राजस्थानी रो नी म्है-- मा दीठ राख'रमा पोपी स्यार करीजी है। यूं तो राजस्थानी भाषा रा पद्य घर गद्य दोनू तर रो-न्यारी निरवाळी विधावां में घरपोई साहित्य मिळे पण प्राज रो जुग गद्य साहित्य रो जुग बाजे। गद्य री कई विधा में जिण नुयो साहित्य रो लेखन माज हू रियो है, उगरी बानगी इरा संकलन में देवरा री मैं पूरी कोसीस करी है । इण गद्य सकलन में मोपतो वणावरण री में पूरी संचळ करी है-पण साची परख तो पारखी ही करसी । ज्ञान-विज्ञान सूले'र इतिहास, साहित्य भर संस्कृति रा मनमावरण चितराम दिखावणी री भरपूर कोसीस करी हां जिणसूबाळक खुद री जलम- मोम, मायड़भाषा, उणरा साहित्य भन्न संस्कृति री छिब हीय भंगेज सके । इण संप्रै रा लेख ज्ञान-विज्ञान, जात्रा-वर्णन, घरम, इतिहास, गोवरण चरित, तीज त्यू हार, राजस्थानी जोवरण दरसरण पर गत गुमेज रे साथ-साथ माज र जुग री जाणकारी फरा सक प्रा दीठ राखीजी है। मैं प्रा भी कोसीस करी-हूं 'क जठाताई म्है सके राजस्थानी भापारी खास- खास वोलियां जियां मारवाड़ी, मेवाड़ी, हाड़ौती, ढूंढाड़ी, शेखावाटी पाद रा पोपता चितराम इण खूबी सूरास्या जाव'क वा सया रा न्यारा-न्यारा दर- साव राजस्थानी भाषा रो फूटरों पर टकसाळी रूप दरसायो जा सके। इण खातर राजस्थानी री टाळवीं गद्य रचनावां इण संकलन मे रासीजी है । यो गद्य संकलन प्रांत रा विद्यालयां पर विश्वविद्यालयां रा राजस्थानी पाठ्यक्रमा राखीज्यो पर विद्यार्थियां मे. इणरी मांग बढी । इणी वास्तै इरो प्रो दूजो संस्करण निकाळ रिया हो । भो संकलन राजस्थानी भाषा रा विसाळ साहित्य भण्डार री की ओळ- खाण करा सकसी इणी उम्मीद साथ इएने पारख्यां सामी राखू। डॉ. कल्याणसिंह शेखावत सम्पादक विगत 1 6 .. 9 15 20 26 33 41 48 56 अगोर् अणीयान् महतो महीयान् : नरोत्तमदास स्वामी वदनमाळ : रामसिंह रामजी भला दिन देव डॉ. मनोहर शर्मा कलाकार बधुवां सू : साने गुरूजी राषी रो त्यूहार : सौभाग्यसिंह शेखावत पूरण पुरुप कृष्ण सत्यप्रकाश जोशी गोगाजी रा घोडा डॉ. नेमनारायण जोशी ढूढाड महातम : गोपालनारायण बोहरा म्हारी जापान यात्रा : लक्ष्मीकुमारी चूडावत सह-अस्तित्व अन्नाराम सुदामा साहित्यकारां रो तीरथ रामनाथ व्यास 'परिकर' राजस्थानी काव्य : प्रेक निरख : कृष्णगोपाल कल्ला प्राळजंजाळ व्रजमोहन जावळिया श्री शिवचन्द्रजी भरतिया सत्यनारायण स्वामी राजस्थान र इतिहास माथ भूगोल रो असर जहर मां मेहर .. 63 गोरकी रो घर 66 . 80 अंक परख .. 94 101 .. .

प्ररपोर् अरणीयान्, महतो महीयान नरोत्तमदास स्वामी उपनिपद में परमात्मा ने मोर प्रणीयान् भोर महतो महीयान् केयो है-छोटै सूभी छोटो और बडं सूमो बडो । पण परमात्मा ही नहीं, जिण जगत में परमारमा व्याप्त है बो जगत भी, परमात्मामाळी दाई ही अणु सू भी अणु और महान सू भी महान है । (2) पैली पापां प्रणु सू भी अणु नै लेवां- जगत रा सगळा पदार्थ तत्त्वां सूबणियोड़ा है । इण तत्त्वां री संख्या 92 है। सत्त्व र सब सू छोटे भाग ने परमाणु कैवं । परमाणु अणु वरणावं भोर भणुवां सूजगत रा सगळा पदार्थ वर्ण । भणु कई भांत रा हुदै-फई भणु मेक ही तत्व र प्रैक परमाणु सूवर्ण, कई क ही तत्त्व रै भनेक पर- माणुवां मूवणे, और कई अनेक तत्त्वां रं परमाणुवां सू वर्ण । अनेक रो मतलब म क सूअधिक है अर्थात् दो या दो सूवेशी। सोने से अणु भेक परमाणु सू परिणयोडौ हुवै; पाक्सीजन रौ भणु पानसीजन रे दो परमाणुवा सूवणं मोर पाणी रो अणु माक्सीजन रे प्रेक तया हाइड्रोजन र दो पर- माणुवा र मेळ सूवर्ण । पली विज्ञान र विद्वानां री मानता ही के परमाणु रा मोर खंड नहीं हुय सके, बो प्रखंडनीय भोर पविभाज्य है । यूनानी भाषा में परमाणु नै atom कैवं जिण रो अर्थ हुवै म-विभाज्य । पण भब, रेडियोधर्मिता र मावि- प्कार पछ, परमाणु अखडनीय नही रयो है । उरण ने तोड़ीज सके है । तोड़ियां सूपरमाणु मूळ कणां में विभक्त हु ज्यावे । मूळ करणों में तीन मुख्य है- प्रकरण, निकरण मौर विकण मर्यात प्रोटोन, न्यूट्रोन भौर इलेक्ट्रोन। परमाणु र केन्द्र में प्रर्थात् मध्य भाग में नाभिक हुवं जिरा में प्रोटोन मोर न्यूट्रोन रखें। परमाणु सौरमंडळ नियां हुवै। सौरमंडळ में पृथ्वी वगैरा ग्रह न्यारी- न्यारी कक्षावों में सूरज रो परकमा कर जियो ही न्यारा-न्यारा इलेक्ट्रोन 2 गय संकलन पारी-न्यारी कक्षाओं में नामिक री परकमा कर । सौरमंडळ में ग्रहां री तुलना में अपार खाली जागा है, जियां ही परमाणु में भी परणी-सी जागा माली परमाणु में ऊपर बताया तीन मूळ कणां रे प्रलावा पौर घणा मूळ करण हुदै । इण री संख्या 100 ₹ भी ऊपर पूग चुकी है। इपा में न्यूट्रोन वास्तव में मूळ करण नहीं है क्योंके नामिक सून्यारी हुतो ही वो प्रोटोन पौर इलेक्ट्रोन में विभक्त हु ज्यादै । सब सू हळको परमाणु हाइड्रोजन तत्व से हुई। उण में अंक प्रोटोन और मेक इलेक्ट्रोन हुवे । उणरो परमाणविक भार लगभग । हुवे। हेलियम तस्व र परमाणु में नाभिक में दो प्रोटोन पौर दो न्यूट्रोन हवं तथा दो इले. क्ट्रोन उरणां री परकमा कर । हेलियम रो परमाणु भार 4 हुवै अर्थात् हाइडो- जन सू कोई चौगणो। सोने तत्व में नाभिक में 79 प्रोटोन और 118 न्यूट्रोन हुवै जिण रे बार कर 79 इलेक्ट्रोन 6 कक्षावों में परकमा करें। सब समारो तत्व यूरेनियम है जिण र परमाणु में 92 प्रोटोन और 146 न्यूट्रोन हुवे और 92 इलेक्ट्रोन ? कक्षावों में परकमा करें। उण रो भार 238 हवं । परमाणु रो लगभग सगळो मार नाभिक में रखें क्योक इलेक्ट्रोन में तो भार नांव-मात्र से ही हुदै। प्रोटोन इलेक्ट्रोन सू 1836 गुणो भारी हुवे । न्यारा-न्यारा तत्वां में बै ही मूळ कण हुवे पण हरेक तत्व में प्रोटोन, न्यूट्रोन और इलेक्ट्रोन री संख्या में फरक हुदै । परमाणु में जित्ता प्रोटोन हुदै उता ही इलेक्ट्रोन हुचे । इलेक्ट्रोनां में ऋण वीजळी रो आवेश हुदै, प्रोटोना मैं धन वोजळी रो पौर न्यूट्रोन पावेश-रहित हुवं । अणु, परमाणु प्रर मूळ-कण कित्ता छोटा हुवे ? पाणी रे मेक अणु रो अर्धव्यास 10.6 अर्थात् 1/1000000 सेंटीमीटर अर्थात् मेक सेंटीमीटर रो दस लाखों भाग हुदै । दस लाख अणुयां न कन-कन भेक कतार में राखीज तो इण कतार री लंबाई मामूली कागद री जाडाईरे बराबर हुदै । पृथ्वी रा सगळा समंदरां, नदियां धौर सरोवरां में जिता गिलास पाणी है उणा सू दो हजार गुणा अणु प्रेक गिलास भर पाणी मै हुवे 1 पाणी रीमेक बूद ने पृथ्वी जित्तो वही कर देवो तो पाणी र क प्रणु रो प्राकार मेक छोटी गेंदर बराबर हुसी। भेक परमाणु रो भर्घव्यास मोटे तौर 10-3 अर्थात् 1/10,00,00,000 सेंटीमीटर पर्याद पैक सेंटीमीटर रं कोई दस करोड़वं भाग रे बराबर हुदै 1 । वारोफ और धरमन:पिशनरी माफ सायंस, पृष्ठ 25 -tm.. गद्य-सकलन /3. (भेक इंचर कोई 25 करोड़ भाग र बराबर) । इण रो मतलब यो हुयो के पचीस करोड़ परमाणवां ने वरावर-बराबर मेक कतार में जमायने राखो तो कतार री लंबाई कोई दो इंच हुसो.। 'पेनी' नामक अंग्रेजी सिक्करी जाडाई, कोई दस करोड़ परमाणुवां री कतार रं बराबर हुवे । पाणी हाइड्रोजन पर माक्सीजन रे मेळ सूवर्ण ।. प्राधी छटांक पाणी में माक्सीजन रा कोई 10-12 मर्थात् मेक करोड़ शंख परमाणु हुदै । प्रोटोन रो अधंव्यास 10.1 अर्गत् 1/10,00,00,00,00,000 सेंटी- मीटर हुवे भर्याद अंक सेंटीमीटर रो दस खड़यों भाग। इलेक्ट्रोन तो पोर ही छोटो उण . रो. मधंव्यास कोई 10.13 अर्थात् 1,00,00,00,00,00,000 सेंटीमीटर हुवे मर्याद प्रैक सेंटीमीटर रो मेक नोलवों भाग । बरावर-बराबर जमायां सूक इंच में कोई सवा नील इले. क्ट्रोन हुवं । (2) महतो महीयान् पृथ्वी नै मही, भूमि और अनन्ता कवं, कारण बा बही है, लांबीचौडी है, धरणी विशाळ है और उण रो अंत निजर में नहीं पाये । पण पृथ्वी, मही, भूमि भोर मनन्ता कयीजणवाळी इण पृथ्वी री प्राकाश में दीखरणवाळा ज्यो- तिपिण्डों में कोई गिणती नहीं है । रात ववत आकाश में प्राणित ज्योतिपिण्ड बमकता दोस। 4 ज्योतिपिण्ड दो भांत रा है--(1) नक्षत्र और (2) ग्रह और उपग्रह । नक्षत्र घणा वड़ा हुवै और भाप री चमक सूचमकं । ग्रह और उपग्रह छोटा हुवे और ब नक्षत्र री चमक सूचमकं । मूरज, ध्रुव, रोहिणी, व्याध, मगस्त्य भौर ज्येष्ठा नक्षत्र है और बुध, शुक्र, पृथ्वी, मंगळ, वृहस्पति, शनि, मरण (यूरेनस), वरुण और यम (प्लूटो) में नव ग्रह है जिका सूरज रे वारकर परकमा करता रैवं । चन्द्रमा उपग्रह है। वो पृथ्वी रं वारकर परकमा करें। ग्रहों में बुध सगळां मूछोटो और वृहस्पत सगळा वडो है । बुध रो ध्यास कोई तीन हजार मील है और बृहस्पत रो कोई छयासी हजार मोतं ।' सूरज पृथ्वी मू.13 साख गुरपो यही है। पृथ्वी जित्ता-जित्ता 13 लाम पिंड हुवं उद कठई जायन सूरज रं बराबर हुवे । सूरज ग्रहां सूधपो वडो है पण पणा सारा नक्षन सूरज मूभी वहा .. '' 1 उपारो मोर मन : निरोबार मापस, पृष्ठ 25 2 सामी 4/बच संकलन नक्षत्र नक्षत्र सूरज सूकित्तो वहो व्याघ-- भरत 6 गुणो 13 गुणो 125 गुणो है । सूरज मेक मौसत वडाई रो नक्षत्र है, वहा नक्षत्रां में उण री कोई गिणती कोनी । सूरज सू वहा नक्षत्र में कई-मेक इण मांत है- सूरज सूकित्तो बडो १ हजार गुणो ममिजिद - स्वाति 27 हजार गुणो रोहिणी 54 हजार गुणो ब्रह्महृदय- 1728 गुणो मा 2 करोड़ गुणो ज्येष्ठा 11 करोड़ गुणो नक्षत्रां में ज्येष्ठा, पाप रे नांव र मुजब, मब सू वडो है। बो मेकलो ही 11 करोड़ सूरजोर बराबर है। वो इत्तो बडो है के मंगळ ग्रह री भ्रमण कक्षा समेत सगळो सौर-परिवार उप में सोरो-सोरो समाय जावं । सूरज पृथ्वी मूकोई 930 लाख मील दूर है । रोसणी मैक सेकंड में 1,86,000 अंक लाख छयासी हजार मील (कोई तोन लाख किलोमीटर) चाले । सूरज री रोसपी ने पृथ्वी ताई मावतां कोई 9 मिनट लागे । पए पृथ्वी और सूरज र जिको नेहलो ई-नेडलो नक्षत्र है (प्रोरजीमा सेंटारी) उरण री रोसणो ने मठ भाषतां ध्यार वरसां सूऊपर वखत लागे । इण रो मतलब मो हुमो के मो नक्षत्र मठ सूकोई पढाई नील मील दूर है । सूरज और इस नक्षत्र र बीच में दूजो कोई नक्षत्र कोनी । बीच री सगळी जागां खाली जागा (अवकाश पयवा पोप मात्र) है। सगढा नक्षत्र इणी भांत भेक दूजे सूघणा- पणा प्राधा है। मेक-दूजे सूमड़वां-खड़यां मीला रो दूरी मार्य विखरियोड़ा में सगळा मान पाकाशगगा नामक विश्व रे मायने है। पाकाशगंगा में कोई एक खड़ब नक्षत्र है।' माकाशगंगा रो विस्तार घणो मोटो है । उण र प्रेक सिर मूदूज सिर ताई पूगण में रोसणी ने कोई प्रेक साख प्रकाश-वर्ष साग (मेक प्रकाश-वपं कोई 58 सदन मीलां रे मराबर हुये)। इण ब्रह्माण्ड में भाकाशगंगा जिसा जिसा लाखनलास विश्व है। में विश्व नीहारिकावा रे रूप में दीस । इण विश्वां वीच में अपार खाली जागा मर्थात् मकाम मा माकाश है । मकाश जाणे प्रेक विशाल समंदर है। 1 योगीरो:बनी युनियने । 2 मोटर मार लामामी, पुष्ट 74 3 तापी, 74 गद्य संकलन/5 समदर में जियां भनेक टापू तैरता र जियांई अवकाश में में विश्व जाएं तरता र । देवयानी (मडोमीडा) री नीहारिका माकाशगंगा र निकट री नीहारिका है। उठ सूमठ ताई प्रावतां रोसणी न कोई 15 लाख वरस लागे ।' उण मूभाग घणी दूरी ताई करोडूं नीहारिकावां आकाश में विखरिपोड़ी है । संसार री सब सूबड़ी दूरवीण ममरीका में पलोमार पहाडी पर है। उरण में लागियोड़े काच रो व्यास दो सौ इंच है। बा मिनख री मांख री तुलना में साढी तीन लाख गुणी रोसणी वटोर । उप सूदो अहव प्रकाश- वर्ष तांई री दूरी पर मौजूद नोहारिकावां देखी जा सके है । इण नीहारिकावां ₹ भाग काई है इण वात नै जारपण रो मौजूदा हालत में कोई साधन नहीं कित्तो विशाल है मापणो मो ब्रह्माण्ड ! और कुरण जाणे इसा-इसा विशाल कित्ता ब्रह्माण्ड है इण जगत् में, इण संसार में, परमात्मा री इण सृष्टि में। इण भांत प्रापा देखियो के प्रो जगत् भी प्राप रे नियामक परमात्मा पाळी दाई हो, भेक ही साथ मोर अणीयान पोर महतो महीयान् दोनू है। 1 गोल्डन बुक बाप भंस्ट्रानामी, पृष्ठ 2 वंदनमाळ रामसिंह (१) प्रेम रो दृष्टिकोण म्हारो हृदय हूं पार पागे सोलन राखता हरू हूं-- कठई ये मा.नों के बैठो के इण ने तो मैं कदैई देख चूको हूं। म्हार गावणं में सुरमंग क्यों हुवे इण रो कारण पांरी मांखियां री कोर सूबूझो। हूं थांन म्हारो काव्य नहीं सुणाऊं हूं; मन हर लाग है के कठई थे प्रशंसा रा पुळ बांधण नों लाग जावो। थे मन संसार भर में सगळां सू सुन्दर समझो इण खातर हूं पार भाग मूंदो लुकाय लेऊ हूं पण इण ने थे कदास लज्जा रो परिणाम नी समझ लेवो इण वास्त हूं यार माग निश्शंक हुयन मार्क हूँ। निशीप री नि.स्तन्यता में जद थे भेकांत में म्हार सू मिलण ने भावो तो म्हारी इच्छा भाग जावरण रो हुवं । थे हंस न केवो-पायो, जावो । वर्ण म्हार मू सूनीकळे-ना ! हूं को जाऊं भी। जे हूं माभूखए सजाय नै माऊं तो पे पूछो-माज में माभूखण इत्ता सुवावणा क्यों लागे है ? और जे हूं सादा वस्त्रो मे आऊं तो ये कंवो-मोहो! माज मो निष्क- ळंक चन्द्रमा घरती माय कठ सूका पायो । फेर थे ही बतावो, हूं थार कन कियां माऊं? (2) प्रेम रो म्यवहार जद हूं जाचकां ने की देवण ने जाऊं तो भी उणां री पंगत में मा बस । ब हाथ माग कर मोर हूं उपां र कानी देखू भी नहीं हूं। सगळा जणा दान लेयन जावं परा जर हूं उणां ने कंॐ हूं-थे माप दे मागए न मावो हो । हूं पनि लागू हूं। । सको हो उण गद्य संकलन/7 4 चौसा-चोखा उपहार लेयने प्राव और म्हार माग हाय जोड़ियां जमा वै। हूं व्यंगपूर्ण हंसी हंसने केऊं-हूं माप दे सकूहूं उरण ने थे मन देवण ने प्रावो हो । हूं पनि जाणू हूं। ढळतोड़ी रात में पोस मूभीजियोई शिरीष रे फूलो री सुगन्ध लेयने समीर म्हारै घरैमावतो हो । म्हारी मांख लागगी और मैं सपने में उणां ने कंववा सुणिया--कांई तूं मने प्यार कर है ? थे इसी प्रश्न पूछो हो जिण रो उत्तर थे ही जाणो हो-मैं मुंभळायने उथळो दियो। फेर भी पार देवण-लेवण में और कैवरण-सुरगण में भेक अपूर्व प्रानन्द है- इयां कयन बै म्हारी नींद र साग-साग कुण जाणं कठीने रम जावै । (३) तू मोर पारी बना तू' चिणा चूट जद थारी छोटी-छोटी बनां नींव री नान्ही-नान्ही डाळिया मार्थ बैठी-बैठी गीत गावं । उ रो गीत बन्द हुसी जद ही थारो काम समाप्त हुसी और तू उगा र साग-साग भांबां रे कुज कानी उड जासी । वेला सू छायोड़ी थारी पड़ी रे द्वार माय गाय दीक है मौर थारी वाछी ऊपर लटकतं फूल नै जीभ सूपकड़णो चावै । धान माथे पडती पकी सूरज री पाखरो स्वर्ण-रश्मियां पारं केसां और कपोलो माथे, और थारी बना कंठां और पांखां माथे पड़े। रात में प्रकृति था सगळां री प्रात्मा में विश्राम कर और बा ही पार दिमाग में दूर देसां रा सपना मरै। प्राकाश थारै लिलाड़ ने, मौर निशापति थारी निमीलित प्रांसियां ने चूमरण ने ग्राव। तारा थारं अविरल घुघराळा केसा मे प्रांखमींचणी रमै । फेर उपा मायने यार कोमल कपोला ने स्पर्श कर, जद मदी. किनारै माय फूल चूटे पोर पारी बैना उण री लंरा में संगीत भरे|mer (४) दरिद गे दान जे जायणो ही हो तो माया क्यों हा? जद-कदई थे प्रावो तो विदा मांगता ही मावो हो।

8/गद्य संकलन
याचक ! मैं तो पारी दान-वीरता री घणी प्रशंसा सुरण राखी ही, फेर
मा उळटी रीत क्यों?
जे जावणो ही हो तो माया क्यों हा?
म्हारो और थारो कोई पैला रो सम्बन्ध है काई ? और जे नहीं, तो
बस म्हार ही कनै मांगण ने क्यों मावो हो ?
हूं दरिद्र, दरिद्र भी दरिद्र हूं, और ये ही म्हारा सर्वस्व । लो, देखो !
इण वार यांने ही त्यागर्न त्याग रोमादशं देखाऊ हूं।
जे जावो ही हो तो पाया क्यों हा?

रामजी भला दिन देव डा. मनोहर शर्मा दात कहणं री चीज है। राजस्थान में बात कहणं रो शैली विकसित भी खूब होई। माज भी अठे कई इसा बातळ मिळे है जिका मापरी कळा सू सुगमा पाळां ने विनाम सा बरणा देव । न वै बात कहता हार माने पर न बांसू सुणबा माळा ई उकताव । बात सरू करणं सुपहली वे नेम सू आपरी भोमका बांध- बात में हुंकारो, फोज में नगारो। कोई नर सोवै, कोई नर जाग। सूत्योड़ा री पापड़ी, जागता ले भागे ।। बातां हंदा मामला, दरियावां हंदा फेर । नदियां बहै उतापली, घिर-घिर घाल घेर ।। बात का चालणा, संजोग का पीवणा । जीवो बात का करिणया, जीवो हुंकारा देणिया। रामजी भला दिन देव पो वक्तव्य ध्यान देवण जोग है । इण मांय लोककथा रा सारा तत्व समा- योड़ा है। बात कहबा माळे न जद ई मानन्द मिळ, जद सुरणबा माळा उण री बात मे पूरो रस लेवे । जे मोठाठ न जमै तो बात विना नगारे री फोज सी लाग। कथासरित्सागर मांय भेक कथा नायक बात सुणतो नीद ले लेवे है तो उण परां प्राकास री देवियां कोप कर है । लोक विश्वास ₹ इण कोप रो निवारण करणं सातर 'जीवो' सन्द रो प्रयोग चल्यो प्राव है। माता रो दुनिया घणी रंगीन होवे है । वळं मांत-भांत री घटनावारी भोको मार्ग माव। भा चीज नदी र बुहाव सूं समझाई गई है। घणखरी लोककथायां पटणाप्रधान होवे है पर वां में संजोगतत्व री न्यारी ई छठा मिळे । ई तत्व री महिमा ने समझर ई भोमका-माग मांय ईरो साफ संकेत करपो गयो है। संजोग सूकुदहळ जाग पर बात में रोचकता भाव । मांग- ळिकता सातर रामजी रो ध्यान करधो गयो है । सायं ई भी बात री सुधान्त .

10/गद्य संकलन परिणति रो सूचक भी है । इतरी मोमका बांप'र बात केवरिणयो मूळ बात ने सरू करें। मठ बात रं मांगळिक तत्व नै सममावरण सारू थोड़ी सी चुगा वाता सार रूप में दी जावं है । मै बातां घणी रोचक पर लोकप्रिय है। अंक बामण भोत गरीब हो । बरी लुगाई भली ही पण पणी री कमाई बिना बिचारी के कर सके ? प्रासर बामण कमावण ने घर सूनिसरघो। 4री बिरामणी कलेवो करण खातर रात नै चूरमै रा धार लाडू बणाया मर प्रेक चीलडे में बांप'र धरणी ने सिघ करतां बखत सूप्या । बामरण मोळो. हो । बो मारग मे चाल्यो भर चालतो ईरयो । भाखर वीड़ मे मेक जोहड़ पर सांझ होगी तो बामण रुकग्यो । भूय घणी जोर मूलागरी ही पण वीड़ री झाड़ियां पर बिना रुत रा बोर पाक्योड़ा नजर पड़पा । लोभ में मायर बामण भापरा लाडू कोनी खाया पर बोरियां सू पेट भर लियो। पछ दो जोहड़ रोपाळ पर सोयग्यो । रात में च्यार चोर बीड़ में घणो घन लेयर माया अर पांती करवा बंट्या । पण च्यारुवा ने ई भूख सतावै हो । मेक चोर सूत्यौड़ बामण री पोटळी सिराण सूधीर सी काढ़ ल्यायो । पोटळी में चूरमै रा च्यार लाडू देख'र चोर भोत राजी होया पर मेक-भेक लाडू लेय'र खा लियो । लाडू खाया पर पोरा नै नीद मावण लागी । पछ च्यारूं इसा सोया के कदे जाग्या ई कोनी। जद बामणी माप २ घरी रात नै पूरमो ऊखळी में कूट्यो तो मन्धेरे मे बठे बैठयो भेक सांप भी सागै ई कुटग्यो पर लाइवां में मिलग्यो । लार जहर रा हा । पण ई चीज रो न बामणी न वैरो पर न बामण ने । चोर मारया गया। भागले दिन बामरण उपो तो ज्यार मरघोड़ा मिनस भर घणो मान नजर प्रायो। वामए माल उठायो भर गोठ बांधर पाछोई पाप रे घर रो मारग लियो । मामरण पाछो परां पूग्यो तो सांझ होय धुको ही। उणी दिन कामण री गाय बोड मे ज्यायो भर माछो स्यायी । पण साग ई मेक घोड़ी मी बढ़ई म्यायी । कोई रुखाळो हो कोनी । वाडियो घोड़ी रं पण पड़ग्यो पर बछेरो गायन प्रापरी मा मान लोनी । घर में पायर बामण पापरी सुगाई पाग घन री गांठ खोली तो था पथरज में मरगी। पाई वामण सारी बात बताई मर गाय रे साथ बछेरो देख्योतोजोल्यो- ।

गद्य संकलन/11 बात भलो, दिन बावड़या, वन मे पाक्या बोर। घर भीड़ी घोड़ो जग्यो, लाडू मारधा चोर ।। ईबात रा रूपान्तर भी सुण्या जावं है पण संजोग तत्व र प्रभाव रो मो अंक खासा नमूनो है। लाइवां में जहर रो मिलणो, बिना रुत बोरां रो 'पाकपो, चोरां रो माल बाभण र हाथ पावणो, गाय रे थरणा बछेरै रो पड़णो, में सारा काम संजोग मू होया है । मेक र पर्छ दूजे संजोग रो कड़ी-सी जुड़ती गई पर पूरी वात वणगी । यो दिन रो फेर है । जद भादमी रो दिन बावई तो भाप ई मलेरो संजोग बैठतो जाव भर मरणचीत्यो लाभ मिलतो चाल । इस दिनां में ई 'पाषरा दिन' कया गया है। बामण रा दिन पाघरा होया तो बो विना चेष्टा ई धन सूघर भर लियो । (2) मेक सेठ रे सात बेटा हा पर दिसावरां में कई दुकानां चालती । सेठ रा बेटा न्यारी-न्यारी दुकान संभाळता । ल्होड़ियो बेटो परां रहतो । व्याह होयां पर्छ वो भी दिसावर जावरण री त्यारी करी । उण री बहू भोत ग् घर री हो । दिसावर जावती वेळा सेठ रो बेटो घरका ने समझाया के बहू नै कदे भी महल सू नीचे मतना बुलायो भर सारी चीजां दासी रे हाय पर धोबार माय ई पूगता रैयो। सेठ रो वेटो दिसावर चल्यो गयो पर उण री बहू कदे महल सूनोचे ई भी उतरी । बहू रात नै चौबार मे सोवती जद उण नै भेक नई बोली सुणाई पड़ती-"मैं मायूँ, मैं मावू।" बहु चतर ही । बा सदा ई चुप रहती। यू साल भर बोली सुणती रयो । बहू क्युभो उत्तर कोनी दियो भर न किणी रे भाग ईपीज री चर्चा ई करी। पर्छ सेठ रो बेटो दिसावर सूमायो । रात पड़गी ही। बहू नै फेर वा ई बोली सुणी--"मैं मावू, मैं मायू।" सेठ र वेटें री बहू मन में सोची-प्रब तो उप रो घणी परां पायग्यो, अब किण रो टर है ? यूसोच'र बा बोली-"मावू भावूके कर है, भला ई भाज्या।" पण मो तो मिखो (संकट) हो। मिसो छोटो सो गीगलो वणर बहू रो गोद माय मायग्यो । बह चकित होई । इतर में ई उण रो पति महल में पग घरयो पर बहू री गोद भरी देखो तो उण रे कोप चढयो । सेठ रो वेटो बहू नै पिलंग समेत ई उठाय'र डोळी पर सूतळ पटक दी । महल नदी संसट कर हो । वद समेत पितंग नदी में पटशे भर पाणी hihir 12/ गद्य संकलन मे बह चाल्यो। गोदी रो गीगलो गायब होयो । बोचारी बीनणी आपरी वोली पर घणी ई पिसताई पण प्रब के वर्ण? बा पिलंग पर बैठी नदी में वह चाली। आगे जाकर भाव-सी पाटी पर पिलंग फिनार लाग्यो । किनारे पर प्रायोडो अंक दूसरो सेठ पिलंगन देख्यो तो लेवण न मनस्या करी । जद सेठ पिलंग नै पक्डयो तो ऊपर अंक लुगाई ने सूती देती। वो उस ने प्रापरी धरम री बेटी बरणार घरां ले पायो । मूसेट रै बेट री बहू नै भिख मे दो पगां नं ठोड मिती । बा बोली- 'मैं काम करे बिना पराई रोटी कोनी खावू।' उरण नै दीवै-वाती रो काम सूप दियो गयो।, वा सारी-सारी रात सेठ रे बेटा रे महल में बारी-बारी सूदी रो रुखाळी करती पर दिन में प्राप सोवती। यू करता कई दिन वीनग्या । श्रेक दिन सेठ र वेट री बहू रो भाई यापरी भंग न लवग ने पायो । प्राज ई पावणे रे महल में दीव री रुखाळी करणी ही । पावणो जीम'र महल में सोवण ने पायो तो दीर्य पाळी ने देवी पर चोल्यो के उरण नै सारी रात ध्यानणे री जरूरत कोनी, वा जा सके है। पगा या प्राप रो काम छोड' र गई कोनी तो फेर पावणो पाई बात प्रोजू बोल्यो । बा फेर भी कोनी गई तो पावणो उए ने नेई-सी पायर देखी। प्रा लुगाई तो उण री व्यायोडी यह नीसरी । बहू प्रापर घणी ने मिस री सारी बात बताई तो उग ने धीरज प्रायो । वो पूरी बात पितवाएं बिना ई बहू ने गेर दीनी, ई चीज रो पणो पिसतावो करयो । बात यूबणो के मिण घर में सेठ र बेट री बहू पूगी, बो उण रौ नणद रो सासरो हो । नगद कदे नापरी छोटी मामी ने पीहर माय देरी कोनी हो। बा माई ₹ ब्याह पर जा कोनी सकी। जद भाभी ने कियां पिछाएं ? पर मामी कदे पापो परगट कोनो करयो । अब माई रो दूसरो ध्याह मंडयो तो यो भैग ने लेवण ने पाप आयो । अठ मापरी लुगाई गू भेंट होगी पर भरम मिटग्यो तो पर्छ वो नयो बाह क्यूकर हो ? सेठ रो बेटो परी मंण पर लुगाई नै साग लेग र परा आयग्यो । प्रा घान भो संजोग मूई बपी है। सेठ रो बेटो गयो तो भंग ने ल्यावण पर प्राग मिली प्रापरी तुगाई । बा भो संभोग मूई प्रापरी नणद र सासर पूगी । नदी में बंवतं पिलंग रो के अन्दाज किस किनारे जा लागे? संजोग सूई महल मे लोग-लुगाई रीमेंट होई । प्रातर बिगडघोड़ी बात नगगी पर सगळा पाया मुगे होग्या। मिना रो बुरो दिन प्राव तो पायो गद्य संकलन/13 बावडक चोखो दिन भी प्रावै । धन है, बहू रे धीरज नै । धीरज सूई भिखो कट। (3) अंक राजा रो कामदार भोत हुँस्यार हो । बो सदा ई नेकी राख'र राज रो काम करतो, पण दूसरा दरबारी लोग उरण अळना अर राजा रा कान भरबो करता । राजा बां री चुगली पर ध्यान नी देवतो । लोग कैवता-काम- दार राज री चोरी कर है पर आप रो घर भर है।' ई बात री जांच करवा सारू पाखर राजा अक नई तरकीब सोची । कामदार न होर र जड़ाव री मूदडी बकसीस करी गई अर प्रो हुकम दियो गयो के कदे भी कामदार उण मूदड़ी ने मांगळी मांय पर नी करे पर रात दिन सदा ई पहरी राखे । कामदार राजाजी रो हुकम सिर-माथे करधो पर मूदड़ी पर लोनी । कामदार नेम सूतडकावू उठ'र नदी पर जावतो पर अन्धेरै-अन्धेरै स्नान करतो। पर्छ पापरी हवेली प्राय'र माळा फेरतो पर कलेवो करतो। पछै राजाजी र मुजर जाय'र पाप र काम लागतो । एक दिन कामदार राजा रै मुजर गयो तो उण री प्रांगळी में मूंदड़ी कोनी ही । दरवारी लोगां राजा ने सन करी तो राजा भी कामदार री मांगळी कानी नजर गेरी पर उण ने मूदड़ी पर करण रो कारण पूछयो । बिचार कामदार ने बेरोई कोनी के मूदड़ी कद प्रांगळी सूनोसरी पर कठे नीसरी ? बो के उत्तर देव ? काम- दार नाड़ नीची कर लीनी अर चुपचाप राजाजी र आगे ऊमो रैयो। ई सू राजा नं कोप चढ्यो पर हुकम हुयो के अंक मईने भीतर कामदार सागी मूदड़ी लाय र हाजिर कर पर जे बो न ल्या सके तो उरण नै सूळी पर चढ़ा दियो जावे। बिचारो कामदार घरां प्रायो पर मूदड़ी री सगळं खोज करी, पूछताछ करी पण मूदड़ी रो कठई ठिकारणो कोनी लाद्यो । मून्दड़ी मिली कोनी तो जिन्दगी रा बस तीस ई दिन और बाकी रया समझो । कामदार निरास होगग्यो पर माप रो ध्यान घरम-पुन में लगा लियो । बो नगरनूत करणे रो बिचार करयो पर बारी-बारी सूमेक-अक जात रै लोगां नै प्रापरी हवेली मे बुलाय'र जिमावणा सरू करया । कई रमोया राख्या गया । नित ताजा रसोई त्यार करी जावती पर लोग जीमण नै प्रावता । यू करतां गुणतीस दिन पूरा होया पर नगर री सगळी जातां रा लोग जीम चुक्या । तीसवें दिन नदी पर रंवणिये भीवरां री बारी भाई । भोवरां रो चौधरी भापरी पूरी विरादरी ने साग लेयर कामदारजी री हवेली में जीम्यो । जीम्या पर्छ बो भापरं पल्लं मू 14 गद्य संकलन - मेक मूदडी खोली पर कामदारजी री नजर करी । कामदार मूंदड़ी देखी- मा मूंदडी तो सागए ! कामदार र प्राणों में इमरत बरसग्यो । बो चौधरी सूमूदड़ी मिलणेरी पूरी बात पूछी तो बेरो पट्यो के बा तो प्रेक मछली २ पेट में सूनिसरी ही भर कामदारजी री नजर करणं सारू रिपियो कोनी हो तो मूदड़ी मेंट करदी गई। अब कामदार समझग्यो के मन्धेरे में नदी-स्नान करतांबा मदड़ी भांगळी में सूनिसर पड़ी पर बेरो कोनी रयो। आज तोसवों दिन हो । कामदार मापरी प्रांगळी में मूंदड़ी धारण करी पर राजाजी र मुजर गयो। राजा पूरी बात पूछी तो संतोस मायो पर कामदार रो मान बढायो। कामदार री बात भी सजोग सू वणी है। कठ मूदड़ी पर कठे कामदार! पण संजोग इसो यण्यो के प्राखरी दिन मूंदड़ी कामदार री प्रांगळी में पाप ई चाल'र पाछी मायगी। मा बात घरम-पुन रो प्रभाव पर- गट कर है। पुण्यकर्म सूमिनख रो संकट कट पर दिन मावड़े । वात रो सार प्रो ई है। पुग्न आप ई सारो संजोग रळायर असरमा कारज सार देव । मूळ रूप में अं बातां नियतिवाद सू सम्बन्धित है। मिनख नियति री होरी मे बन्ध्योड़ो है। बो प्रापरी समझ पर सगती मूसारा काम ठीक ई करणा चावं पण नियति पर उप रो कोई बस कोनी चाल । नियतिचक में फसर मिनख नै बुरा दिन मी देखणा पड़े पण धीरज धारण कर्या नेकी सू चालतो रैवं तो प्राखर उण रो दिन भले रो पावै पर वो पाछो सुख देख लेवे।

कलाकार बंधुवां सू साने गुरुजी तरुण कोमल हृदय ! उछळती-लहरती भावनावां रा, जिज्ञासु वृत्ति रा, ज्ञानपिपासु निराळा जीव ! मापर प्रादर्श में रच्योपच्यो रेवण आळा जीव ! उमंग, तरंग, उत्साह, सगती भर मेक प्रकार रो रटण --में सगळा जवानी रा सैनाण है । नवजवान रे सामने प्रत पाकास पर अपार भविष्य फेल्योड़ो हुवे। इण माकास में तू कठरी मुसाफरी करण पाळी है ? इण प्रपार भविष्य में यनै कठे पूगणी है ? थारं विचारां मांय सू, पारं सपना सू पर पारै भादर्शा न मावण पाळे काल रौ भारत त्यार हुसी । तू' भविष्य रो निर्माता है । यन पार फरज ने बराबर समझ लेवणो पाहीजे। थारी जीभ ऊपर जिका गीत, जिका सबद हुसी उणां माय सूई काल रो महाकाव्य, काल री साहित्य, काल रौ दर्शण पर काल रै इतिहास रौ निर्माण हुसी । मेक रूसी लेखक कयौ है-'धार बाळको री जीभ ऊपर प्राज कुरण-सा गीत रम है मी म्हने बतायौ तो म्हें तुरत थार राष्ट्र रौ भविष्य बता देसू।' म्हें ई पार गीता रौ विस जाणणी धावूहूं। पारी जीभ ऊपर प्राज कुण-सा गीत रमै है ? यारी जीभ माथे प्रेयसी ने रीझाएमाळा, उरणरं नख-शिख ₹ वर्णन पाळा, जी बहलायर मगज नै बहका नाखण माळा गीत है क देश भक्ति री भावना सूभरघोड़ा पर रचनात्मक कामां री प्रेरणा देवण पाळा गीत पारी जीभ माथ रम रेया है ? प्राज री कळा थनं किण तरं री संदेश देव है ? ध्यार मेर जद लाय माग्योड़ी हुवै जण तूं नोरो रो तरं गावण-बजावण में, राग-रंग में मस्त हुय'र पडयौ रेव है ? माजरी कळा यनै कोई सिखावं है ? काई प्रेरणा देव है? 'कळा री संदेश' सवद प्रयोग बांच र प्रभो हुवेला । 'कळा स्वातर कला' रोमात प्राजकालं सगळे चाल है। पण कला कला खातर हुय ई को सकनी । निर्विकार पर निविचार कला कळं है ? चित्र देखो, गीत सुरणी, प्रभिनय देखो, पोपी बांची; इण रोको-नकी मसर काई भाषा र मन माय कोनी पड़े? के इण तर प्रसर हुवे तो इस कला रो सरूप किसोक है प्रो देख री जरू- ।

रत है। प्रो परिणाम साचो है के कूड़ो ? जिका-जिका बीज पापां बावां हां उपां रा हजार गुणां दाणा आपां ने मिल है । दारणो लेवरणौ जे आपो खातर जरूरी ई हुवै तो आपां ने आछी तरियां विचार लेवणी चाहीज के प्रो दागो समाज र स्वास्थ्य ने बघायर उरण में रूप पर तेज पैदा करणियं गेहूं रो दाणो है के समाज नै माटी भेळ करणिय अफीम रौ कण है । समाज र मंगळ री साधना करणी-प्रो कला री ध्येय है। पण इण मंगळ री व्याख्या कुरण करें ? जिण जमाने में जिको जुगपुरुष पैदा हुवै वो ही प्रापर समाज रै ध्येय रो नकसो बणावं । दोनू हाथ ऊंचा कर नै हेला मार्या कर-नान्यः पथा विद्यते अयनाय, एप. पंथा एतत् कर्म अर्थात् जावरण सारू दूजो कोई मारग कोनी, इण हीज मारग माथै इण काम नं लेयर चाली। अाज अापो ने कुण-सो जुगपुरुष दीख है । जुगपुरुप कलाकार नै ध्येय बताया कर है, उण ध्येय ने कलाकार समाज री जड़ा ताई पुगावै । जगपुरुष नै जे पापां पति मानां तो कलाकार उरण री पत्नी है । जुगपुरुप द्रष्टा हुवे है, रिसी हुया कर है । कलाकार उपर फेर्यो लगावतो र है । अंक ईज आदमी कवि अर रिसो हुवे इसी बात तो कदैसीक ई देखण में पावै है । कलाकार ध्येयवादी हुवै जरणे ई बौ अजर-अमर कला रो निर्माण कर सके है। व्यास गर बाल्मीकि रिसी ई हा अर कलाकार ई हा इण कारण ई उणां री कला आज ताई जीव है । पण तुलना करणी हुवे तो कय सकां हां के व्यासजी मे प्रतिभा कमती ही पर प्रज्ञा मोकळी ही । वाल्मीकिजी में प्रज्ञा कमती ही पर प्रतिमा बेसी ही । व्यासजी ने कवि नी कैय'र महपि रे नांव सूबुलावणी पड़सी, बाल्मीकिजी ने रिसी रे बदले कवि कैवणी ज्यादा ठीक रेसी । संत ज्ञानेश्वर रिसी ई हा पर कलाकार ई हा। रवीद्रनाथ ध्येय ई बता सके हा, अर पाप री कता नै वै जनता ताई पूगा मी सक हा । पण कलाकार पर ध्येय बतावण पाळी अंक ई प्रादमी हुवै औ कमती देखण में प्राव है । घणी वार जुगपुरुप द्रष्टा हुया कर, विचार देवण पाळी हुवै पर कलाकार उणां विचारा नै जनता री भाषा में पर जनता रै हिरदै माथे असर कर इस ढंग सू साहित्य रे रूप में सामने लावै । विचारा रो विश्वस्वरूपदपंण जनता री प्राख्यां सह कोनी सके इण कारण कलाकार उपनं सौम्य पर सुदर बणा । ध्येय ने घर-घर में पुगावणी-मो कलाकार रो काम हुया कर । गिगन रा तारा सूरज २ च्यारु मेर परकम्मा देखें भर उप रो प्रकाश अंधारो हुदै जणं ई लोगां नं पुगाव, कलाकार रौ भी मौ होज काम हुई। लिए न पे जुगपुरुष मानौ उरण र संदेश ने घर-घर में पुगावण री लगन - गद्य संकलन /11 थार मांय हुवणी चाहीजे । इण सूभाख देश में भेक तर री भाब हवा पैदा हुसी । इण तरं सू राष्ट्र वर्ण है। हां जुगपुरुप नै चुणण में भूल करी न पर सळाई गेडिया रळपानी : लारले महाजुद्ध सूपैली जर्मनी में अंगरेजां सूटकर लेवणी-प्रो हिटलर रो ध्येय हो पर जर्मन प्रजा हिटलर ने जुगपुरुष मान्यौ हो इण कारण बठे कला रा सगळा प्रकार मैक होज काम करता हा । नाटक- कार इण भांत रा ही दरसावां ने लोगारे सामने रखता, कवि लोग इसा हीज गीत बणावता हा । पत्रकार इण री ई चर्चा करता-करास्ता । इण तर र आंदोलन सू समूचे देश में मेक वातावरण से निर्माण हुदै । पण जुगपुरुष पुगण में मापां ने भूल नी करणी जाहीजे । ध्येय जे 'सर्वेपाम् अविरोधेन' री साधना करण माळी नी हुवे तो राष्ट्र 'राष्ट्र' बणण सूपली ई ठिकाणं लाग जावै । पर्छ दूजी रिसी राष्ट्र नै दूजो ध्येय देव । रिसी कोई मास ई काल में जलमै इसी बात कोनी । सूरज पुराण सम में हुतो पर प्राजे भी है इणीज तरं रिसी पुराण काल में हा अर माज ई है । मेक-अक छिण सतजुग से ही है । हरेक पळ में सत्य रा प्रयोग हुवे है--जमान री जरूरत भुजब उण-उरण जमाने में जोगा रिसी पैदा हुवे है। आज भारत रा कलाकार जीवन सू की मळगा हुयग्या हुवै ज्यू लाग है राष्ट्रीय ध्येय री उरणां रे जीवन मे पूजा को हुवे नी। तो पर्छ उणां री कलम में बळ कठे सूपासी ? देश रे सामने माज जिको ध्येय है वो जनता ताई पूर्ग-प्रो कलाकार रौ काम है । जणं देश रो माज रौ सरूप बदळसी पर नुवै भारत से निर्माण हुसो । मेक 'वंदेमातरम्' र गीत सूजित्तो गहरो देश प्रेम जाग वित्तो हमारूं मापणां सूभी को गाग सकं नी । मेक रामायण ग्राज हजारां न राम बरगण री प्रेरणा दी है । प्राज री इण भांत रो विखमी टेम में भी दया, नेह, सांप, प्रेम वगैर रा मापणे समाज में जिका दरसण हवं है उस रो कारण मात्र रामायण है। महापुरुप प्रारी ध्येय मापरं जीवरण में ढाळ'र जीवण री कला लोगोरे सामने राख है । वे प्रापरी जीवण ईज कलामय पर काव्यमय बणाव है। भेकर मेक कलाकार कमो-'गांधीजी हरिजन-मान्दोलन सह कर्यो पर मापां रा कलाकार लिखण न लाग्या उणीज विस मे कहाग्यो । मेक ही पमा- रण, पा गयो पापी भरण ने । स्ट्यां सूफोड़िया पुराणा घमंडी लोग माया । उपर पड़े ऊपर उणां भाठा फंक्या । पोड़ी-घणी उरण र सागी, पर उपरो घड़ी फूटग्यो । माय लोही बंदण लाग्यो पण उणनं इस बात री कोई चिता को ही नी, उप नै तो मेक ई घुन हो के घर में तिसा बैठा छोरी 18/गद्य संकलन ने पाणी किण तर पासू। बस, हुयगी भेक कहाणी। इण में नी तो कोई कला है पर नों कोई तंत्र!' म्हें उरण साहित्यकार ने पूछ हूं के इण कथावस्तु ने लोगां सामी रामण सारू जिकै कलातत्र री जरूरत पड़े है उण ने को कोनी जाणं, पण चेहूं तांत्रिक पर यांत्रिक कला में, जाणती हो तो ये खुद ई पण मांदोलन रो चित्रण पारा-उपन्यासां में, लेखों में भर कहाण्यां में क्यू कोनी करयो ? में वस्तुवां काई यांन महत्व रो कोनी लागे ? लाखां-करोड़ों मिनखार जीवण री पारं मन में कोई कीमत कोनी ? मिनख नै जानवर ज्यू गिणतां देखकर कांई पारं हिरदै में लाय-पलीता को लागं नी ? पारी मांख्या मे माग रा मांसू कोनी भावं? भारत रा कलाकार ! इण तर रा हजारू ध्येय परि अमृत-स्पर्श रो मास में पारं व्यारमेर कमा है । यार सारू ध्येय-मगवान प्रापरी किरण लिपां कमा है । उणा र खातर पारो दरवाजो पूरी तरिमा खोल दौ । धारा मंधारा, मास्यां पर मायरा सू भरया परां में ध्येय र प्रकाश न मावण तो दो ! कला नै जे ध्येय री अभिव्यक्ति से साधन नी चणासौ तो समाज में कला री कोई कीमत ई को रैवं नी । कला देवी ने वासना पर विकारां रेमिंदर में ना बैठण दो। याज ई देश में कित्ता दुख-दर्द है ! इणो ने वाचा देवणी-~ी कलाकार रो काम है । सुख-सूतां लोगां री नीद हराम हुम जावे - इसो को लिखो, इसा गौत गावो । इण भात री कना कृतियां रो निर्माण करौ के समूचे देश में सामाजिक क्रांति री प्रेक लहर,ऊठ जावे। देश २ हजारूं-लाखू गांवा रा दरसा ने जावा। दरिद्रनारायण रा दरसरण करो। साचा देश कालेज रा च्यार छोरा-छोरपां सू कोनी बज्यो। देश रा पूरा दरसण हाल थे करिया ई कोनी । देश री साधारण जनता स महान कलाकार, साहित्यकार पर कवि वणण रो दावो करो हो ! देशर कलाकार रो मतलब च्यार-छय सहर माळा न रिझावण माळो कलाकार कोनी। प्रापणं प्रैक कलाकार रो उपन्यास वरप्रेक गांव माळे कयो-'पए में म्हारी तो की इज कोनी । इण में म्हारा सबद कोनी, म्हारी जीवण कोनी पर. म्हारी समस्या सुळझावण रा रास्ता कोनी !' मा सदा म्हार हिरद ने लोरा दाई पाल नास्यो ! हां, कई-कई कवि पर सेसक गांव माळी री मजाक उडायण सातर उप राज्यार-पांचक सबर प्रापरी कृतियों में वापर गद्य संकलन |19 मर ग्राम-कवि का लोक-कवि वगण री बातां करण लाग जावै। पररा इण तर रा सांग करर कोई लाख करोड़ री मूक जनता रो कवि कोनी वरण सके । उपार काठ जोवण ने देख'र पार हिरद में प्राग लाग है? वेचनी हुवे है ? इणां माथै हुवरण माळा भन्यायां ने दूर करण री तड़फड़ाहट मर्च है ? इणां सारू सुख रो जीवण छोड'र कष्ट उठावरण नै त्यार हो ? जे देश नं जगावणी हुई तो इण र मूळ में पाणी नाखणी चाहिजे । कमळ ने जे खिलावरो हुई तो उण री डांडी ने है ज्यूरी ज्यू राखणी चाहिज पर जे टैमसर इण मूळ नै पारणी नी मिळं तो हुय सके है के ऊपर खिलए माळी कमळ भी धूड़ में मिल जावै । महापुरुष इण मूळ नै पाणी पावणं सारू मापां ने हेला मार है- इण पुकार ने सुपो । देश रा मोकळा पादर्शी नै थारी जीवण-कला र जरियं पर पार साहित्य के जरिये लोगो ताई पुगावो । घर-घर मे ध्येय रा दीया संजो- संजोयर दीयाळी मनावो । अंधकार न परो भगावो । कला रो मो होज ध्येय है, मी हीज संदेश है। ~मूळ रो अनुवाद पुष्पा जेन रो राखी रौ त्यू हार सौभाग्यसिंह शेखावत भारतीय साहित्य में संस्कृति, त्यू हार, वारां रो घणो बखांण ने मान मोल मिळं है। घणकराक त्यू हारां रा पेटा में सामाजिक मान मोन मिळं है । दीवाळी दसरावा, होळी नै सांवणी रा त्यूहार तो घणा कोडीला गिणीज है। प्राखा देश में प्रो त्यू हारां न सान-मान, चाव-माव, उमंग-उबाव नै खुमी-सुस्याळी साथ मनायीज है । राजस्थान में त्यूहारां सूघणी हेत-प्रोत रेयी है। वैदिक ने पौराणिक काल रा देवी देवता ने लोकमानस आज भूल चुको है, पण त्यू हारां ने पूरा उछाव-उल्लास रै साथ. मनावती माय यो है । पर बताया च्यारा त्यू हारा में सावणी पूनम री त्यूहार घणौ पुराणी मानीज है । इणने सांवणी पूनम, रख पूनम, रक्षा बंधण, सलोगों ने राखी भी कव है। विद्वान कै है के वेदां ने सातरसां रे पैलपोत राखी बाघोजी ही । पछै राजा बळी रे समै जद बळी न घेतरवा छळबा विष्णु बावनी रूप धार बळ नै छळियी जणा बळी री बरबानी बळी रो रक्षा र खातर उणारं राखी बांधी पर उणा ने दैविक भौतिक संकटां सूउवारिया ने आपरी रक्षा री चावना कीवी.... येन बो, बलिराजा, दानवेन्दो महाबलः । त्येन त्वं प्रति बन्यामि, रक्षमाचल माचल ।। जिए रक्षा रा धागा सू राकसा रो राजा महाबळी बळी बांध्यो गयो उणीज बंघरण र सूत र तार सूपांन बाधू हूँ । थां थिर रैय न म्हारी रिच्छा करो। रिसी-विप्रा रो त्यूहार रासी रो त्यू हार मानीज । इसी कारण राखी रास्यूहार ने गुरुपूनम रीत्यू हार भी केवं है । पण, राजस्थान तो सती-सूरां, वचन-पूरा, परम-धीरां ने दान-वीरां री प्रांत रेयो है । अठ तो मरण नं मंगळ गिरी री धारी रयो है। जद ही तो मरणोनू मंगळ गिरण, मरणो मंगळावार प्राज मरण स्यूहारां रे रूप मे नूवा त्यू हारा री कल्पनावां कीवी गई है । जहें मरण नै गमसमायता रैवं उठ सदा हीज त्यूहार मनोज । पुराण परम्परा मू रासी रो त्यू हार मनोज । पुराण ट्रासी रीत्यू हार गद्य संकलन /21 सांवरण री पूनम ने मनायोजे है । राजस्थान में सावणा रो मास तिवारां री मौड़ जगचावा बसंत री जोड़ । उखाव उछाव में अजोड़। सांवरण मन मावणा राग रंगां गोतां री रमझोळ । झूला-हीडो री हिलोळ प्रियो र कण-कण पर हरियाळी री बोळ । पण, राजस्थान में बिना सावरण ₹ भी मेक बार राखी रो त्यूहार मनायोज्यो। भैरण-माई र इण पुनीत पर्व री भावना सूउछाह पाय हिन्दू तीरथ चौतौड़ री राजमाता हाडी करमावती चौतौड़ रक्षा रे सातर दिल्ली महल रा पातसाह हुमायूने राखी मोकळी । चीतोड़ रै गौरव री रक्षा खातर राम्बी डोरी मेलियो। मेवाड़ रो घणी राणेराव सांगोजी माळवा मोडव पातसाह नै रणभीम में हराय नै क्षमा दान दियो हो । सांगाजी ₹ पछ उणा री बाळक बेटी राणो विक्रमादीत मेवाड़ माय राज करतो हो । विक्रमादीत न बाळक जांण माळवा रौ घणी बादरसाह गुजराती चीतौड़ पर चढाई कीवी । राजमाता हाडी करमावती 'हाड कटै हाडा हरखावै । गाहो रळ पण हाडो नी टळे' र कुळ मादर्श र बिड़द री उजाळबा पाळी। घणी मरदाणी । वीरता री कहाणी । मेवाड़ री परिणयारणी । पत पाणी रखाणी । बादशाह हुमायूने चौतौड़ ने माळवा रा मद आया मैगल बहादरशाह री टक्कर सू उबारण सातर राखी मेली । चौतौड़ रो कासीद हुमायूकनै गयो । राखी निजर कीन्ही भर कागद दियो । हुमायू रासी देख नै कागद पांच ने गज नैं प्राह रा फंदा सू काढ़ण ने जदुनाथ दौड़िया ज्यू उतावळो-सो फौज ने त्यारी करण रौ हुकम दियो । राजमाता करमावती लिखियो हो । उण रौ म्यानो कवि देवतां थको कैयो- कागद लिखियो कोड कर, हुवण हेत हमगीर । बादरियो बद मंडियो, भाव हुमायू बीर ॥ दंग मांडव माळव धणी, दाबण मो घर देस । माय ऊबारो बीर भव, मा राखी है, पेस ।। कागद हुमायूवाचियो । मण रा हिवड़ा रा भाव उणां र उर उदध में हिलोरा उठावरण लागा। मां जायो सहोदरा रे मान नेह रा, ममता रा, मोह रा भाव मचळवा लागा। हुमायूकळाई माथे कुकम बरणो राखी बांधी ने मापरा पढारटंकी धनख नै तारिणयो। कवच री कड़ियां खणखणी। नौवतां माथ हंडा री चोटी पड़ी। नद नाग अमरां रे हिय दहल पडी। घोड़ा री टापां री दड़बड़ी की । अंबर में खेह उडी । मुल्ला मौलवी बाबर सांगा री पदावद रो वात केय ने हुमायूने बहकायो पण मोळी र काचा तारां री ती परीतील सरकारको 22/ गद्य संकलन मुल्ला काजी मोलवी, पावर सांगा बात । अड़स मदावट प्रापसी, बावारणी विख्यात ।। पण राखी बंध मण रौ स्नेह । सांवरण मादवा रो-सो मेह । दूठण लागी भलेह- काचा कुकम तार में, भाव भरया मरपूर । सेन चढाई सूर में, पण दिल्ली कोसा दूर ।। दिल्ली ने चीतोड़ र बीच घणी छेटी। उठी ने चीतोड़ री मदत ताई हुमायूचाल्यो ने प्रठीने माळवा री बाईसी चीतौड र पोळी दोळी घेरो लगायो । सेना र भार सू सेस नाग रो सिर अकुळायो । कमठ री पीठ भार नी सह पाई। वाराह रो दाढ़ मचकाई ने धवळ रो मोग हरड़ायो । अठी ने चौतौड़ रा किला में उछाह छायो । राजमाता करमावती जौहर रौ जलसौ-सो मंडायो । वीर जोधा जू भरण ने कमर कसी। रणदेवी जोगणियां हड़हड़ हंसी। वीरां खागां संभाळो। घोड़ा री लगामा झाली। नौवत नीसारण घुराया। शूरवीरां रा मन उमाया । नारियां मगन मैं होमी काया । वीरपोर रणभोम में चलाया। बैरियां माथ खड़गां झोकी । चण्ड मुण्ड मापं जाणं काळिका हीज कोपी । घड़ी पलक मे शूरवीरां रण-राटक कर रण साथ र सूता । 'घण जीते सूरमा हारे' सो मेवाड़ रा जंग जोधार रावत बाघ देवळिया रोघणी, भैरूदास सोलखो, राज राणा सज्जा, राज राणा सिंघा, रायत दूदा, माला सोनगरा, भाणा डोडिया साद बत्तीस हजार बीर काम माया नै तेरह हजार राणियां, रावतरिणयां मनळ संपाड़ो कियो। साका कर रण-सूरमा, जोहर मळ जळ नार। केसरिया बनड़ा बणे, गया सुरग रे द्वार॥ बादशाह हुमायूँ चौतौड़ पौचरण र पैला होज मो अनोखो खेल पूरी हुवा। हुमायू राखी बंध धरम री भण री रक्षा नौं कर सकियो । सम री छेटी नो लांघ सकियो । पण, इतिहास में विक्रम संवत 1592 चैत सुद 5 री दिन राखी री याद रोपवं बरणग्यो । रासी राजस्थान री, साखी भर ससार । राखी रजपूतांगियो, दोपण दळt दकार । राखी राखो रावतां, राखो बाहर वार । प्रण राखी राखी मती, राखी रखो विचार ।। इए मांत राजस्थान रा इतिहास में रावी मैरा री मी कथानक, भो प्रसंग पाज भी जीवती-जागती है। भाई भर मेण निरमळ, हेत-हिमळाम से गद्य संकलन/23 याद दिरावे । राती बंध भाई, पापरी धरम भैण री मला ही सम माथे नों पूगण सूमदत नी कर सकियो, पण हिन्दू-मुसलमान दोय न्याराग्यारा घरमा नै राखी रा तार अंक ठौड़ वांधता-सा तो लखाव होज है। हिन्दुस्थान रे बादशाह औरंगजेब रो मोबी वेटो बहादरशाह दिल्ली री तखत पायौ। जवानी रा जोम में राजतंत्र रो इमारत रा थामा राजावा सू रूसायो । कछावां रा भामेर पर राठौडा री मारवाड़ माथ प्रापरी होमपाव जमायो । कछावा नरेश सिंघ, न नौकोटी नाथ अजीतसिंघ रा राज ने खालसे लगाया । जोधपुर, ग्रामेर, नागोर, सोमर पानी ठोडां शाही पापा घरपाया। अली अमदखां, गरतयां, सैयद हुसनबा नै फौजदार, पारणेदार बणाया । राठौडा कडावां रा' खून मे उफारण प्रायौ । हाड लोही रा खाद- पाणी सूसीचो भोम जावती नवाई । अजीतसिंघ जैसिंघ दोवां रागावां मसलत कीवी । बादशाही यांणा ने जीतवा री उपाई । राठौड़ वीर दुर्गादास, रावराजा संगरामसिंघ, उणियाग नरूका पाद जोपारां री भी पाहीज राय भाई। 5 अक्टूबर सन् 1708 कार्तिक मास मे भामेर ने जोधाण नाथ री फौजा सांभर पर घोड़ा री रासां उठाई । कमठ री पीठ कसमसाई। रण बांका राठौडा नं कळह काटा कछावा री फौजां सांभर चाल्ली । सातो ही सागर उझल्ली सेस नाग रा शीश पर थमी धरणी हल्ली। घोड़ों री टापां मूळ उडी, किरणनाथ रा संहस किरण रज पंवर यूमिळी । प्रग-सा, मल्हपता चांकड़ी मरता सेस रा फरण-सी नामा फणकरता घोडा, वाळछां ने लळवळ पटकारता, कायरा ने कंपावता, कहर वरसावता शाही सेना पर घायल बाष के रीसायो नाग के मद प्रायौ हामी के जमराज गै नाती री भांत झपटी मारवा लागा ने सांभर रा थाणायत री सेना में सांथर पौडाय ने धारणायत ने कायरता र काळ रंग रो प्रोदसी प्रोडायो। संयद हुसनमा हाठ नं देवदानी मे सरस ली । पर्छ बोजे दिन मथुरा रौ पाणायत गरत सा, प्रावेर रो गाही फौजदार, नारनोळ रो फौजदार, भरतपुर रो नूडामणि जाट मगळा मिळ कछावा राठौडां पर घोड़ा उठाया। गजनाळा सूग्राममान गरणाया । जयरो सो पटक हो । कवि कलानिधि वाणिो, इण भात सांभा कहियो... संदन दळ हके समानि बैंक दुभि डंके जोर दिये। घर होत यमके सुरगन संके पर प्रातके लोक हिये। हम टापनि टु गिर तट ? फ्नपति कु? सहस फना।

241 गव संकलन धूली पर जुट्टे भंवर मुद्दे पावस छुटे मनहं पनो ॥ जयसाह सवाई पर दळ पाई मरिन प्रवाई देखि सरें। घवेंदळ साजे संगर गार्ज रघि ज्यों राज तेज घरं ।। संपरसर तीरनि केसर नीरनि रंगे चीरनि पारू ठये । दे दुंदुभि धीरनि के वीरनि करम मी रन करत भये ।। भलो-सो पकायो हुवौ । शाही पख प्रबळ जणाई। हजारों जोधारा ने रण भौम सुवाई। आमेर, जोधाण पत रणखेत कभी मेल घरी न चलाया । बादशाही फौजां फतह रा सैदाना बजाया । नौबतां पर त्रिधाई पड़ी। राजावा री फौजा में भगदड़ पड़ी। उणियारा रो राव संगरामसिंघ नरूको, भेकल बाराह, हठ रो पक्को । जलालिया री ठोकर के जमराज रौ धक्को, के बेड मास री लाय रो पलीतो के सांपरतपख पायो पाडोवळो पगां हलीतो । पांचसी काली कंधारी खरगोश कमा घोड़ा। पांच सौ कुत्ता लाहोरी जाया पांच सो हीज जोधार प्रेक मन्ना मां जाया, पूतां सारखा जोड़ा । जाता जम दूतां ने बाथ घाले । भीवारजश रो भांत गजां ने आकाश पर उछाळं । रहणी कहणी रा पूरा । रुद्ररागण के मेस रा फण । प्रळय रा मेघ के वेह लिखिया लेख । शाही फौज पर चलाया । खून रा खाळा बहाया । साभर रा श्वेत नीर राता लखाया। च्यारूं फौजदारा ने कब्रां में पौढाया। शंकर री माळा रा सुमेर बणाया। पांच सौ कुत्ता शाही सेना रा गज-घोड़ा ने गले लगाया। सांभर में गज-मोती बिखरिया । पराजे विजं हुई। हार से कळंक उणियारा रौ राव धोयो। कॅछावा घणी नरूका राव री वीरता पर मोयो । सावणी पूंनम राखी रौ दिन भायौ । महाराजा सवाई जैसाह फरमायौ । राव संगराम- सिंघ जावती प्रांबर ने पाछी लायो । कछावां में टणको जोघ लखायो- ऊंचा टेरा राव का, सब सू ऊंचौ राव । राखी बांधी राव के, सब की राखौ राव।। पर्छ कछावां नाथ सिर दरबार कर राव संगरामसिंघ र राखी बंधाई । रावजी रो मान बढायो । पांच सौ कुत्ता र खरच तांई सिंघपुरो गांव. इना- मत कियो । जिको मज भो कुता रो सिंगपुरो कहीज है । उण रौ हासन - गद्य संकलन /25 उणियार राव रे भुगतती । इण भांत सांमर पर फत पाई पर दोवां राजावां सांभर री दोय पांतो कीवी । प्राधी जैपुर नै प्राधी जोधपुर लार लीवी । इण भांत इतिहास में राखी री धरणी महत्व है। उण न जाणं है राज- स्थान रा वासी सह । मैण माई रौ भौ त्यूहार । पवित्रता, निरमळता, नेहता रो-सिरदार । अड़ा राखी रा पर्व री राजस्थानो इतिहासकारां, कवे- सरां घरणी महत्ता बताई । गुणगाथां, ख्याता, रूपकां मे गायी, जिकी थोड़ा रूप में भठे जताई।

पूरण पुरुष कृष्ण सत्यप्रकाश जोशी श्रीकृष्ण रो जीवण म्हने सगळा मूज्यादा मोह लेवै । महाभारत, हरि- वंश (अर बाद मे भागवत) ग्रंथों में जिकी जीवन्त पर भव्य व्यक्ति रेयावां, वेद व्यासजी री प्रतिभा, भारत रा जन मानस में उकेरी है, उगा में कृपण रौ उणियारो धुरी री ठोड है । दूगा सगळा उणियारा उरणां ने घेर कर उणारं सारे धरियोडा है । फेर भी हालात ा है के जे माप महाभारत रा श्रीकृष्ण ने ध्यान सु देखरण री चेष्टा करो तो पापरी निजर में जग उणियारा रो देहीबद सरूप सावळ भर कोनी सके । उण रूप नै रेखा रूप मे साकार कोनी किया जा सके। विराट रूप से फगत अंक उल्लेव, उरण रेखा वाला शरीर से ग्राखौ उणियारी पूछ दियो, ढक दियो । यू जाणे मेघ सूरज ने ढक लेवे । मेक सांवळी धूवासोरो वातावरण ई कृष्ण रा नाम में भरघोडो है। पण जठे कृष्ण र उरिणयारा री रेखा पल मर सारू दीस, फगत कोरा मे दीस जावे, उठ उठे म्हन रंगां री प्रेक मोटी पूजळी दीखण लाग-रंगा री छटा अंक दूजा सूधुळती पर फेर छिटकती, न्यारी पड़ती ! भै रंग, में घटावां, सिंझा रा मेघा ज्यू मलौकिक नावणहार है-दौड़ता भागता रंग ! कृष्ण रे व्यक्तित्व र भाभास रो भी रूप म्हनै पाखर साझ रा रंगा ज्यू लखावै । म्हन केई बार लागे जाणे में रंग, हीया राक मेक कण माय सूउफरार छळक जद इतिहास या साहित्य री अगणित व्यक्ति रेसावां म्हारा मन में सं-जीवरण होय वैवरण लाग तो म्हें भांत भांत राप्राभासा घिर जाऊं। उरण वगत में व्यक्ति रेखावां उण ग्रंयां अथवा इतिहास रा अंश कोनी रं जाये। कोई सुन्दर रेखावां मे घड़ीज'र पावै कोई फगत प्राख म्है, तो कोई काम करण वाळी सुदर हाय । कोई री 4 प्रख्यां म्हारी लारी कर, कोई रावं हाय म्हने झाला देव । कोई रा होठ को कंवरण नै उतावळा है तो कोई विना रोकटोक म्हनै पिडाद । बुद्ध जहा लोग शिलाखंड ज्यू जड होप म्हारं साम्है मंठ जाये। की प्रेकदम मूडो फेर लेवे । कृष्ण री रंगाक्रति घंटा कलापण रो प्रामास कोनी देव । सा रंगाक्रति गंर जैडी दूगी कोई जाण्योड़ी गप कोनी, गद्य संकलन/27 पए मा गंग हद उत्तेजक है। प्रा तीखी है पर घणी ताळ म्हन घेरचौड़ी रखें। की इण मांत री है मा गंघ जाणे सप्टी रा सगळा मरदां री प्राण सगत री गंग ने भेळी कह समस्त फूल री गंध में घोळ दी है। पर म्हने दोस उण गंध रा गरम में सुरा रौ मेक हरियो अकुर फूट पड़यो है। जांण धवत माथं ऊंची कोमल निसाद रा कोई रेखायोड़ा सुर! अर विराट रूप से प्राभास देवण वाळी पावरण कदेई कदेई पड़दा ज्यू बीच में फाट जावं । मलेगा पुराणकथावा मे, प्रांघी श्रद्धा में अर नारी री नस नस में जिको अंक नामहीए अनुभव झपकारा लेवे, वो अकाकार व्है जावं पर उग माय कर अवतरीज मेक ऊंचौ पूरण पुरुष ! वो आदम सू सगपण जोड़े शरीर पर वासना में ! पण को प्रादम करतां प्रलेखां दैविक उपहारां री हकदार है । प्रादम री कोई संस्कृति कोनी ही, पण इणमे संस्कृति साकार है इण रे मोळू दोळू सुख री क्यारियां खिल्योड़ी है । बापड़ी मादम बगीचा सूवार निकळयौ अर आ जाणण र पैला के प्री बगीची है धूळ सावती फिरण लागग्यो। इंद्रिया रे फरणां ग चावका खावतो घूमतो रहयो। पण भौ जीवतो रहयो पौरुप री, मिनख जात री सम्पूर्ण मस्ती न पी, पचाय'र भर मरण री विजोग री भेक-मेक पीढ़ नै होळं-हौले परस कर जीविया गयौ। इण में भरघोड़ो हौ परस सम्पूर्ण लालित्य, सगळी नसरी । व्यासजी रे हायां रचियोड़ा रंगां री झलकियां मे मौ दूजा धरातल वाळी पुरुष रूप इदको, मनमोहक भर घणी रेखावां में बघ्योडौ उभर्यो है । वो साख्यातकार रा चमत्कार सू मुगत व्है जावे, पार्थिव जीवण रं सारं हिलग इलए लागे । कृष्ण री चरित किणी मेक ग्रंथ में वधियोड़ी कोनी । प्रलेखां ग्रंथ, काव्य पर नर नारियां रो जीवण उस नं तिल तिल दे कर रच्यो है । कृष्ण रौ नाम जीव है प्राज लग, जीवण नै चारू कानी सूपरम करण वाळा, जरा जरा रै सुख दुघ रा झपकारां ने खुद भोग कर अर उप न संजीव पर कदा करियां। इस कारण के कृष्ण मिनख है, फगत मिनस ई नहीं, पृ" पूर्ण पुरुष । कृप्प रो जलम मौत रो छोयो मे, हर रा भंवर में पर धारा भरोसा मे हुयो । राम रो बाळापण कोई ने यात कोनी ग्राम मे बन पड़यो है : ईसा पर वुद रा टाबरपण मार्य वैरी । हयगी। पण कृष्ण रो बाळापण घर घर मे tr" अनुभवां मे थिर हुयग्यो है. वो वाळकियो, जिन :

28/गच संकलन जामण री गोदधा सूमागी चल्यो जावं, मर विरह री प्रांच में बळनौ जावं । प्रो वाळकियो, दूजा याळको ज्यू विराम कोनी पावै । यो जसोदा २ दामता होया मार्य हरियाळी पण छा जावे । यो गुहाळयां पाल, पालण में पड़ी रोवं, जाणं उप में कांटा विछपा है भर पथरणा गीला कर देखें । उपरो बाळहठ विख्यात है। वो कूटीज, भोवरी में बाद करीज पर घोघरडायो कर मौत नै नेडी बुलावं । यो मोटो बघे, मा ने पत पल याद करावती के म्हारी लाल कदम मक्कार है, णी कारण उण मूभही प्रीत है। इगर पर्छ दूजो पर्व ! ग्वाळ वाळो सू दोस्ती, सेत, चोरी, बज री गोपियां सूछेड़ छाड़, फाची ऊमर में राधा साप प्रेम क्रीड़ायां । पहलवानी में प्रवीण! कोई कोनो ही जवान होवता कृष्ण मे ? मेक कानो कंस हो, सिसपाळ हो, माळोझाळ पैर पळती हो पर दूजी कानी मोळा ढाळा टावर पर गोपियां ही जिको उए सारू हळी मे प्राण लियां घूमती ही। यही माई उपरो दास हो । गायां उणरा बछळ परस हरखावती, तगड़ी होवती । वैरी प्रसूती बघती ही, दूध री नदियां चैवती ही। उपरी मुरली जवानी रा सवेगाने झाला दैवती। भर इमो जादू हो उणरा संगीत में के गोपियां लटू ही मुरली बजावणवाळा माथै । वरो जोबन फकत उरगर सारू खिलतो पण जिको कदेई सार्वजनिक स्वैधाचार में कोनी बदळोजियो । समदर रो छोळां जिसी ही वो चिाव, जिको बार पावती बगत घेर लेवे पर पाछौ प्रापरी प्रेरणा ई उतर जाया करें । खिचाव जिको कृष्ण सूमागो हट, कृष्ण मे ही समां जांवती । मो वो सनमन हौ जिको अकदम मीठी हो, इणी कारण मजबूत हो । इण सगपण री सब सू कंची प्रतीक है राधा । द्रौपदी ने कृष्ण सूबन रा रूप में बांध र परम्परा, व्यव. हारिक नीत नै प्रतिष्ठा देवण री सफळ भर असफल प्रयास किया है। मागे चाल'र राधा जद पुराणां मे भवतरीजी तौ वा अं सगळा बंघण तोड दिया । कोनी रोक सक्या उण प्रीत ने व्याव रा बंधण घर ऊमर ! अणबंध पर नाजुक रेसमी सिणगार री बा इसी अनुभूति है जो कदेई जूनी कोनी पड़े। भारत री संस्कृति प्रायः लालित्य में कोनी खिल 1 वा अंक वार भरपूर खिली । राधा और कृष्ण री प्रीत रोबसंत प्रैक बार ई ग्रायो भर पाछौ गयो परौ । गयौ तौ परी पण की इसी छोड़ कर जिको सदा मिल्यो रैवं मर भए- छक महकतो जावं । भारतीय पतिव्रत धरम री कठोरता नै प्रणहद चुणीती देकर राधा मे प्रेकनिष्ठ प्रीत री चादरणी सूरंग्योड़ी पूर्ण सुन्दरता ने उद- पाटित कर दी । राधा ई ही जिको प्रेमानुराग रा दमकता लाल वरण नै । - गद्य सकलन / 29 ठागे लीलो रूपाळी बणा दियो । इणी सोवणी प्रीत ने मापर मांय अकाकार करता करतां कृष्ण रो व्यक्तित्व प्रकाश सू असीम होवतो गयो । वो अणू तो मीठो पर निगूढ बणग्यो, रात ₹ उनमान। कृष्ण अर राधा री प्रीत तू भारतीय प्रेम कथावां ने नई कवळास मिली । वो भाव मिल्यो जिको गिरस्थी रा बोझ सू भी बासी कोनी हुयो । प्रीत रो पूर्णता अमर यौवन रौ मूडी भाळया करं। उणन सिद्ध करण ने प्रो आदर्श प्रेमी जाणं खुद ने राधा रा विजोग सूबांध राख्यो है। कांई वो दिखावणी चाव के मौत में लीन अमरता ज्यू प्रेमी भी प्रापरी सार्थकता तद पावै जद वो प्रिय रा सैवास सू सदा रै वास्तै वंचित है जावं? काई वो आपरा अनुभव र आधार माथे प्रा बतावणी चावै के अंडी चिर विरह ही प्रेम री मपळता रा अशरीरी रूप री उत्कटता री विश्वास करावे? राघों पर कृष्ण कद भेक दूजा रे साथ रहा ? वैरी सहवास छिण भर रौ है, पण मी छिण घणी मुखर है । इण मुखर भाव नै पुराणा पर कथा काव्य घणी संभाळ सूराख्यौ है । वैरी संजीवणी प्रीत री प्रतीक है मुरली । पर पछ आवै प्रणंत विरह ? जिको मून है, निगूढ़ है । वो कदेई कोनी ग्रहण करें नाद रंग रूप रा ग्राभरण । वौ विरह कळह, उपेक्षा पर मौत से संकेत भी तो कोनो देव । इण अनामता रं कारण वो अकदम सजीव हुयोडो आवै । अंड़ो कोनी दीस के कृष्ण कदेई राधा री मोळू में प्राकळ बाकळ होय राम ज्यू खुले प्राम शोक मनायौ है । कांई वो इण कवळी प्रेम री खोज ने हिवड़ा रा कोई मेकान्त खूणा में इस मांत छिपाय राख्यो हो के कोई पिछारण भी नी सके ? दुनियादारी रा संकेत उणनै परस ई कोनी कर सक्या ? राम मरजादा-पुरषोत्तम है पर कृष्ण हर व्यापार में सीवा लांघण में प्रवीण । कृष्ण हर बात में निपुणता दी । उपमें अमरजाद, सुदरता पर घेतना भर दी। वो पवन रा माघी झपाटो रा सरणाटो री जीवण जियो । टाबरपणा में वो खेलण में प्रवीण हो, प्राणपण सूखेलतो । चोरी नै रम- णीक'बणाय दी । हास्य-विनोद ने वो जतनां मूपाळपो । भारतीय दार्शनिक पर हास्य-विनोद, दोनां में इतरीकांतरी है जित्तो धरती रा दोनू छेड़ा में-- संसार में सगळा ई दार्शनिकां मायं प्रा बात लागू है । फगत मेक अपवाद है कनफ्यूसि रस । दो मा थापना करी के जिको प्रादमी हंस कोनी बण सके वो संत कोनी बण सके। कृष्ण रो गीता में हास्य विनोद कोनी। वा भेक गमीर सिरजणा है । पर कृष्ण रा प्रारंभ रा जीवरण मे कौतुको विनोद भरपो पड़पो है। वो नी होती ती गीता री गंभीरता भोछी पड़ जाती।

धराकलन कृष्ण मूल रूप गू कळासयत प्रादमी है। वो संगीत रो उपासक है। उरणारी बळा प्रारापित भी प्रीत ज्यू धरती मा पा रोप्योड़ी कभी है। वो वीणा पारण कोनो पारी, बासरी उठाई । प्रागपण मू बांस रा टुकड़ा में मोगर उगाया। वृष्ण री लहरी मुरली रो मिटास प्रमर है। महारां री मामूली वाजी । पण श्रीकृष्ण उपनं मप्राण कर दिखायो। अकदम प्राक्त, देटी-बाकी चीजोन चिरंतन पळारमक माला मू समायणी फगत था ही जाणतो। कळाकार रो उफण उफण वरण याळी पर सुद नै होम करण वाळो व्यक्तित्व वृष्ण र जीवण री प्रमुख मंग है। प्री उफण कर वैयणी, गौ विमरगण गै गुरा की इण मात दुरनिवार है के कृष्ण देवता देवता पक भूमिका सूदूजी भूमिका में बेरोक-टोक प्रवेश कर जाव, नई भूमिका मे तन्मय दे जावै; पर इत्ती ई नही, नई भूमिका ने निभावती थको, पाटनी भूमिका मू जुड़घोड़ा लोगा ने होम देकर र ळगी व्हे जावै। देवकी ने मां रा पद मूसिणगार यो उणन छोड़ प्रार्ग बघ जादै । जसोदा पर नद री सभाग की न्यारो कोनी है। प्रो ई हाल गोप-गोपिया रो हुयो । पं तो सब ठीक पण काई यो मुथरा री प्रजा माय, कंस ने मारियां पछ चिप्योड़ो रह्यो ? बिलकुल नहीं । मुयरा छोड वो द्वारका पूगग्यौ । महा• भारत रा जुद्ध मे शस्त्र रो परस नी करण री प्रतिज्ञा लेय, वी में कमायोड़ी पापरी ख्यात न विसरजित कर भर मेंक दार्शनिक री भूमिका निभाई । इगाने स्वीकार करती वेळा वो जादयां न त्यागण री तैयारो दिखाई, वांरी उन्मत्त अवस्था देख वो जादवां रे विनाश रो कारण वण्यो । गुद्ध रा रूप कृपण जड़ा प्रनासयत जोगेसर सारू समाघ में मरणो ठीक व्हतो। वो पण परपरागत भूमिका ने भी त्याग दी · वो मरण सूसाख्यातकार कियो निरजन मे व्याध रा त.र सू। पूत, भागलो, साथी, बंधु, संगीतकार, प्रेमी, जोद्धा, पति, राजा, राजनीत रौ धुरधर, वक्ता, दार्शनिक इत्याद सगळी भूमिकावां में अपरंपार रस घोळ, कृष्ण प्रत वे सामान्य मानव ज्यू भापरी मरण स्वीकार कर जर सगळी भूमिकावा ने हराय दी । ईसा मसीह मरती वगत कहो हो, 'हे ईश्वर म्हैं वो कुणसो पाप किया जिको यूं म्हन प्रा समा दो?' म्हारा विचार सूईसारी वाणी उगरी विनम्र मानवीयता प्रगट करें । सूपर रा मांस री सेवन करण सूप्रतिसार रोग र कारण गौतम बुद्ध संसार लोला पूरी हुई। इस सूपा बात ममझ में प्रा के जोग री सिद्धि पावरण वाळा महात्मा भी मामान्य मिनसा र शरीर री नियति सूमुगत कोनी हो सके। कृष्ण रानम्र मरण रोमी पाई कथा है।

गद्य सकलन /31 कृष्णा रा गोपिया साथ कियोडा 'व्यभिचार' रो हाऊ हमेस भी किया जावै। साची वात है के कृष्ण जिका भी जीवण नै अगीकार कियो, उणन सामान्य मिनस री भात स्वीकार कियो, पण साथै सार्थ या भी भूलग री बात कोनी के कृष्ण में की इस भांत री निपुणता हो के वी सामान्य मिनख री निर्यात मे लूण रा कण री व्यू घुळ जावती पर उग मार्य प्रापरी छाप छोड जावतो। अवोध टाबर, ढोर, डांगर, मरणपढ, छोटी बडी, सुरूप कुरूप नारियां-वो सगळां नै समान रूप मूग्रहण करी वारो प्रापरौ बगर ग्रहण कियो पर मंडी लाग्यौ जाण वो थोडी ताळ उणमे पूरी तरियां उळझग्यो, पण जद उरण प्रागौ जावरण री जरूरी छिण हाजर हुयो तो दूजी वार मुड'र उरण साम्ही कोनी देख्यो । किशोर अवस्था पार करता करता जिको आदमी राधा सूमूडो मोड़ लियो वो भला गोपिया कांनी देखतौ ? बरस बोत्या वो गिरस्थी भी बल्यो । पर छला दिन ताई कुटुंब वात्सल्प रो व्यवसाय भी ईमानदारी सू करतो रह्यो । पण वो पापर वंश री विस्तार कोनी होवरण दियो । वो अपत्य मरण री वेदना मेकाकी रैय भेल ली, चुपचाप पर अप्टनायिकायां सू पिरियोड़ो भी वो भेकली ई रह्यो । प्रासक्ति पर विरक्ति दोनां री पराकष्टा वो चतुराई सू हासल फरली। वो मेघ ज्यू बरस कर रीतो होय गयो परो। द्वारका बळन भसम हुयगी । पांडव भी राम ज्यू राजसुख कठ पा सक्या ? महाभारत ₹ जुध रो दुख उणन जीवण भर बाळतो रह्यो । कृष्ण से भी कांई वच्यो ? की कोनी । बचगी फगत वळता कपूर री सौरभ । आपरा व्यक्तित्व नै आपरा ई हाथां सू पूंछण री पूर्व कळा ही कृष्ण में ! पर फेर भी म्हन लाग के श्रीकृष्ण माज र संसार री विसाळ अनुभूति में कोनी मावै । लागे कोनी के कृष्ण नै प्राज रा जुग में जीवत रूप मे फेलं विचरण करतां देखू-के वो जींवतो होयर पावै भर ससार में सुप बांट । बल्कि प्रो ई ठीक है के दो पुरातन साहित्य र घूघटा में छिप्यो है क्यू के इण सूही उपरी चिरंतनता अमरता बरणी रसी। जंतरजुग पायग्यौ है, बगत सावधान हमग्यो है । इदको जाणकार हुयग्यो है । अब नौ इत्तो सीधौ कोनी रैयग्यो है के किणी री मेकाको पगचाप सुरण उपर लार हाले परी, उणरी मूडो भाळ भापरी चक्कर चलावै । व्यास रा जग में, लोककया ग किणी मेक कल्पित काळ में मनाई कृष्ण रौ जीवण संसार व्यापी वरणग्यो है, प्राज जद व्यक्ति रा जीवण री सगळी इयत्तावां फैल चुकी है, तो मेक सरब संपूर्ण 32/गद्य संकलन आदर्श पुरुष प्राज रा सुसंस्कृत जीवण ने व्यापार भी दम नगळ नोछौ पड़ेला । वो महान बरण सकला, इसौ लागै कोनी । हो, हो सके पुराणा घरम चलावरिणया-इत्ता मोटा व्यक्तित्व मान उण प्रादोलनकारी जीवण रा हरा- वळ मे सोमा पावै । सो भी कोनी लाग के कोई अंक प्रादमी, रापूर्ण मानवी जीवण रो तात्त्विक अरथ समझावण री हिम्मत करेला । कृष्ण रौ प्रेम सुंदर ही प्रापरं जुग मे, उपरी राजनीति रो चतराई प्राज रा गणराज्य में पूरी कोनी सिद्ध है सके । उरण महामानव रो जिका भी निजी सत्व हो, वौ आज री सस्कृति री प्रगल्मता सारू पूरो कोनी पड़े। बो बिना संदेह मेंक खेतीकरसणारी सस्कृति रो प्रतीक हो । जे वो वर्तमान यांत्रिक नागर संस्कृति में रहो तो फगत मरामल मंदयोड़ी मजस रो सिणगार बण कर; पौरुप, प्रीत, संगीत और दर्शन री प्रतीक वण कर। समझदार काळ सैकड़ों वरसां लग करोड करोड़ मूडो सू कृष्ण री कथा रौ गान करवा कर, कृष्ण ने प्रतीक रूप में जीवतो राख्यौ है। चोखा चोखा लोग महामानव रा सपना देखे, पण जेवयुग मे महामानव विसरजित व्है जाया कर, जोवित कोनी है। कारण प्रो के, पापां मानव मन री मूळभूत कमजोरी न जाणग्या हो । काई महामानव रो मायली मन किणी दूजा गुणा पर वरणां मूबणण वाळो है । क्यू के पापा जाणां के प्रब पापां रे बीच अंडा महामानव कोनी जलमला, इण कारण मापा प्रतीत री महानता रा रूपां रोगरव करा, प्रतीकां रा रूप में उगान जतन सूराखां पर सावधानी बरतां । कठ ई इसो नी है के वैरे भर प्रापr ₹ बिच कोई मांतरोई कोनी रे जावे।

गोगाजी रा घोड़ा डॉ. नेमनारायण जोशी प्राई साल मादवा बदी पाठम-जलम पाठम- दिन सिंझया पड़यां पली-पली परजापत री घरमाळी काळी चीकरणो गार रा फूटरा घड़ियोड़ा दोय गोगाजी रा घोड़ा पूरा सूक्योड़ा, कदे प्रधगीला ई-हैली पुगाय जावती । दादी वां ने उठार रसोई माळ. अंधारी साळ मे मेल, जा पैली तो टावर- टीगर प्राप'र घेरो पाल देवता । वां री मौळी प्रख्यां मे मायोडी चमक जाग बूझती के में काई है ? टीगरा रे बात समझ मे नी प्रावती जर टाबर मायलो कोई बडगर हाथ मे मालो झाल्योडा असवागं पर घोड़ा रे बारी-बारी सूहाथ लगावतो कंवतो के मे तो है गोगाजी पर अ है प्रांरा घोड़ा । कहनाळो तो बुझागरजी री तरज में कंवतो पण सुरणबाळा कोरा रा कोरा ई रेय जावता । घर रा बूढा-दानां सूबूझ लेवतो कोई के गोगाजी कुरण-कठे रा हा, पर क्यू ग्राव है वां रा घोड़ा सालोसाल, तो जवाब मिलती चुवांरण हो, चुदाण; गोगोजी तो हौ चुवारण पर पाबूजी हो राठोड़ 1 सुणाबाळां रे मन मे फेर भी चानणी नों होतो । उण वगत तो खैर मैं टीगर हो, पण ग्राज घर रा दानां लोगों में म्हारी गिणती हुवै । टाबर-टोळी जे वा ई बात प्राज म्हनै बूझ लेवे तो मुस्कल पड जावै । गोगामेडी रा चुवारण राजा गोगादे री सात से बरसां री पुंध मे डूब्योडी का'णी री बिगता सायत ई बता सकू । इतरी जरूर ध्यान है के का'गी में देवळ चारणी पर पाबूजी राठोड रा नांव प्राव पण वै क्यू पाव भर नी यावं तो काई नुकसाग है, प्रा में नी जाणू। जिण में गोगाजी रो नाम प्राव इस्यो मेक दुवो पण कदे मुण्यो हो । उपरी भी प्रेक खूणो कद टूट' र बिरगो, म्हन वेरौ नी । करि राखो नेड़ांह । ढळिया हाथ न पावसी, गोगादे घोड़ाह । पर म्हनं लागं, के का'णी रो विगतो रा व घोड़ा साच्याणी ई ढळगा है पर अब प्रापणं हाथ भी नी मावणा ! पण दादो ने कारिणयां सू काई मतलब, जलम पाठम माई, तो इगरी मतलब हो उपास राखण माळा रं खातर संगार बगाएो-सिंघाड़ा री सीरो 34/गद्य संकलन पर पळीची री पुहियां, सो भान पणाय नाचो हो। प्रायगा गोगाजी रा पोड़ा, मतळव तहके गोगा नम हो जासी । गोगा नम, मतलब तीर वाणी पर मेदा री बिलोवरणा माय बटघोड़ी सेयां, जौं पर कड़कड़ सहि पर पिलोड़ी। टाबर टीगर समझ जावता के परमात तीन कोस माथूर्ण गांव पादू में गोगाजी री मेळो भरोजगी, पर सरची हाय मा जाय तो देतण ने पालो पण सरची ठे? माज रिपिया पीसा री घणी मोरळ है। पण वी बगत देखना न ई कठ हो पीसो ? जारज पंचम भर राणी री पोटू माळो तांचे रो पोसो जद गाडी रा पेड़ा नितरो सूठो दोसतो। रास्तं चालतां करें कोई छोरा-छपरा में लाए जावतो तो सगळा साथी सानो ने दिखाती फिरतो । छोत्तर माळी नै तळावरी पाळ चढ़ता मंक पानी काई लाधी, भावो गांव वीं तकदीर माळो मानण लायो । गांव रोई भादवा सुदी तेरम री मेळो व्हेती बालाजी रो, तो जोसीजी खुदोखुद मेळा में जायर मोडमा री दुकान र दोय रिपियां रा पोसा खुल्ला करा लावता पर पांती माया में ने बांट देवता । पांती मे कई व्यार पीसा प्रावता, कदै पांच दापर-टींगर दोय दिन तापी मान रैवता । पण यी मेळ रं माडा तो हाल घमा दिन पढ़या है, पर इण पराये गांव रा मेळा खातर खरची देवे भी कुरा ? म्हने वीं वगत नवमो (बरस) चालती। बह बाप रा बेटा माई रामचंदरजी-म्हारे सूबरस-बांड बडा, म्हारा जोडीदार हा । माघी रात रा झिझोडर म्हने जगायो तो च्यास्मेर झालर, टिकोरा भर नगाग से जती मावाज सुण'र में दाफाचूक व्हेगो फेर याद हाई के बजारको भारभुजा से मिंदर है जठ म्हैं दोयू भाई उमाव में भरपोडा, मिंदर र पुजारी पर मदन दरजी रे साग नी समझ में मावण माळा भजन घरणी देर ताणी गळो फाड़-फाड़'र गावता रिया हा~~या जाण'र के म्हार गळे जोर सूई भगवान री जलम होसी; मर जे मजन गाबा मे चूक रैयगी भर जतम नी होयौ तो पुजारी फेर पंजीरी नी देसी । सेवट जलम हुयो पर हथेळी मार्य दई रोचिरणामत प्रायो। वो नै चारूपो तो मूठी पंजीरी मू मरीजगी । बारी बारी तूं पंजीरी पर नीद रा झोका खावतो मैं माई र सागं हेली कांनी पाल्पो तो भेकर फेर म्हने पादरा मेळा रो ध्यान मायो । दूजे दिन घड़ीक दिन चढ्यो, न्हावा खातर तळाव में कड्या सूदा पाणी में भर मैं भाई ने बताई के म्हार कन मैक पीसो है, तो वे हाथ सूनाक पकड़यां चिमसी मारता मारता रयगा । नाक खोट'र दोयू हायां सूकड़ा ₹ भोफेर कमलो पासर पाणी काटता चौड़ी स्या सू म्हारं कानी देख्यो जाण में कोई जादू से खेल दिखा दियो हो । मुळकता होठां में थोड़ी गद्य सकलन/35 देर म्हारी बात री सच्चाई री या लेवता रिया । विश्वास मायो जरै बोल्या- तो मात्र तिरां कोनी -चालो मेळं । पर मट नाक पकड़'र वे बंगीचंगी दोय तीन विमस्यां मारी, मैं भी चिमख्यां सायर वारं मायगी। सांवट्योडी प्राली धोत्यां बारले चौक री तणी माय उछाळ'र में दादी ने याळी पुरमण री कयी, तो दादो कहो के पलो हागळे जाय'रई साळ रो मोखो उधाइयायो प्रठोन भाई नाळ कांना चाल्या, मठीने दादी थाळी में पूजा से सामान मेल'र साळ में बड़ो, जद में भी लार-रो-लार परो गयो । अंधारी साळ में चांगचकी चानणी होयगी मर साम्हला प्राळ्या में भागूगो मूडो करपां गोगाजी रा घोड़ा दोस्था । घोड़ा भर असवारां री घाटयां, काल करतां भाज, क्यूवैसी तण्योड़ी लागी पर भाला पण वां रा प्राज व बेसी लांबा पर तीखा दोस्या। दादी यां रे पाणी रे कळल्प रा छांटा दिया, मोळी बांधी, कूकू रो टोक्यों लगाई पर सीर सूमूडो जुठार'र हाथ जोड़ लिया। जोम-जूठ'र म्हे दोयू भाई पादूर गेले बहीर पड़या। गांव र गोरव ई परजापत्यो रा न्यावड़ा कन पूगता-पूगतां जद भाई म्हन बूझ्यौ के पोसो कठे है तो मैं डाव हाय सूकमीज रो पागट में पड़ी माचिस री डाबी ने हिलायर बजा दी। भाई मुळक र कैयौ के खाली डाबी मे कांकरो पण इस्यो ई बाज; जर पेटी ने खोल'र राणी छाप माळी पीसो वां ने प्राख्यां दिखा दियो । अब थावस प्रायां जमा-जमा'र पग मेलण लागा। जीवणा हाथ न माजीसा रो बंगलो लार छोडर म्हे मगर चढ्या तो प्राथूणी पून रा फटकारा लागण लागा । लार सू गुल्लो माई-गुलाबजी भूतड़ो-प्रायौ लांबा-लांबा उग मेलती पर धोती र चिल्ला रा सरहाट उड़ाती । 'भा ज्यावो रं मोटियारा'- कैयर बिना चाल धीमी करयां वो माग नोकळगां । माख गांव मे वीं सरीसो मापतो चालगियो नी हो; बगूळ या ई देख ल्यो जाण । म्हे वी रा त री कामडी जिस्या डील ने लबळका सा-खाय'र पाघरो होता देखता रिया। अब भाई ने भी मेळो तेजी सू खीचण लागो, अर म्हारा सू', पेली दो- तीन पावडा, फेर पाठ-दस पांवडा माग ई चालता रिया। कांई बेरो पून रा फटकारा लागण सू, के प्रापतो चालण सू म्हारी धोती चांघुकी खुल र उडण लागी । माय प्राय'र मदद नी करता तो पून रा वी वेग में प्रेकला सू पाछी बंधीजती मी कोनी । प्रोस्या देखता कद भी म्हारौ वी बगत छोटो हो । मैं बावन्यो नी रैय ज्याऊ, इण पि.कर सूघरमाळा दो महीणा 'तांणी घणी ई. दूध-मसाल्यो पायौ पण म्हारो गांठ नी खुलणी ही, सो नी खुली । फेर भी धोती वो म्ह म्हारं सायना-सारू छह बार री ईज परतो, जिण सू सांग - -- 36/गद्य संकलन टोका-टोकता लार ढीमरी बण जावतो। भाई कवता के तिलंगो परपा कर, तिलंगी; पण तिलगो परी चाय चुलंगी, दीमहो तो वा विना रवतो ई कोनीं। मगर रो ढलाण उतरथा तो वायरो बंद होयर प्रमूझो होवण लागी पर तिस लागी जोर री । प्रायटाळा नाइघा मै रातोपोळी माटो रो रंग लियां पालर पाणी मरधौ हो-गरी दूध नांगर उकाळ योड़ी धाय जिस्यो । पाळ पर ऊमा बबळ यां री छांग्योड़ी मूळासूदी डाळ या पाणी में हन्योड़ी, तोर पर मूडो काढयां पड़ो हो । वां ने टाळ' र जुगत सूपाणी पोयो । फेर पाद रा तळाव रे उतरादा ताल मे भरीजण प्राळ मेळ री सोय बांघ'र उठे सूऊजड़ पाल्या। पालर पाणी थोड़ी देर तांणी पेट में हबळक-डबळक बोलतो रियो । कोस-प्रेक पाल्या हस्यां के प्राधा सूई होलर-हींह रा घूमता पालणा दोसरण लागा। झोणे बादळां री पूठ मा चितरांम-सो दीसती डोलर पैली तो फरटी सूबण्यो नान्हो रमत्यौ-सो लाग्यो पण साकई पूगता-पूगतां पूरी कुंभकरण होयगौ । जमी सूसुरग मे जावता, अर सुरग सू जमीं माथे प्रावता पालणा मे हीडा खाता रंग-रंगीला गावा पर्यो मोटयार, झीणा मोट घूघटा काडघां लुगायां पर उपाई मूह झांकती डावड़,यां मुळक-मुळक'र मन विवर ही। पागट मे पोसो.प्रब पेटोसूदो कूदण लागौ । हाथ मे जाडा कपडा री लांबी कोथळी लटकायां, जिण मे कांई बेरी कितरी रेजगी मरी ही, गंजी परघोडा पर तैमत मारघोडा डोलर-हो.. ळा ने भाई बूझने के अंक पीसा मे म्हां दोयां ने हिंडाय देई के नो - वो बिना हां-नां करयां हाथ पसार दिया। मैं पीसो काढ'र झट बोरी हथेळी माथ मेल दियो, निको म्हार देखता-देखता लांबी कोथळी मे जायर हळको-सी आवाज करती गुम होयगौ । गोळ उतरी जर पनी पासपो खाली होता ई म्हे दोन्यू वी जा बैठ्या। राता पोन्या बांध्या पर हाथा मे डांगडा लिया दोय गूजरा रा डावडा प्रौवं प्रायगा । चरड़क-चूरी ग्रावाज र साग पालगौ ऊचानी चाल्यो : पण प्रांट ई जायर ठेरगौ। हेठानी झाक्या तो ठा पडी के जोड़ो पालणौ मरीन रियो है । जरहाट कठ्यौ अर म्हे मथारं पूचगा। निजर ध्यांरूमेर घुमाई तो दिखणाद पसवाडे गांव रो लूठो कटोरा ज्यू पोळांपोळ भरघो दीस्यो, जिगर बी-बीच बगरूडा माय ऊभा कला,रूवडा री लांबी परछाई पाणी र काच माथे पळक ही । प्रगणं पस- वाई सोयेक पावंडा छेड़े सरू व्हेय'र दूर तांणी खेता मे ऊभी कड्यांसूदी बाजरी हरव-उछाव । फेर तळाक गद्य सकलन/37 रो गैरी हरी रंग भरयो हो जिण में कठ-कठे जुवार रा खेतां रौ हळको घोळाम बापरयौ हो । उतराद मे मेळा रो जगा पर खेतां रे बिच दो-तीने'क कुत्तरडा प्रेक मरघोडा जिनावर रे मास मा बिलम्या हा, पर चील-कागला माया बैठ्या प्राप री बारी प्रावण री इंजार मे नान्ही-नान्ही फुटक्या लेवे हा । प्राथूर्ण पसवाड ताल में मेळो मरयौ हौ घेर-धुमेर जिण र बिच्च-बिच्च मौड़यां री चिकती योळी छोलदारघां रे मूडाग फिरता भात भतीला स्या, पोत्या, पागड़यां, टोप्यां पर लूगड्यां में बाण्या-विरामण, जाट-गूजर, रजपूत- क्यामखानी, भांबी-रेगर न्याराच्यारा नी पिलाणीजर मेक ई रंग-बिरंगी छोट रा छोटा हो रिया हा। चांगचको पालो हेठानी चाल्यो तो म्हारी काळजो ऊंचौ-मूई कानी मायो पर पालणो नीचानी चाल्यौ तो काळजो हेठानी सूडो-नड़ी बोल्यो । दोयेक पाटा काट्या पर्छ वो ठिकाणं पायौ पर फेर तो वे चक्कर चाल्या पर वो मजो मायौ के कंत्रण मे नी प्राव । सावण मे नीमड़ा रा ऊंचा डाळा में पाल्योड़ा नांवं दाव रा हीडा रौ मजो पण कमती कोनी, पण ई होंडे रो मजो म्यारो ई हो । म्हनं लाग्यो जाण में सूसाड़ करतो गोफण मे मेल्योडो माठी हूं पर जे छूटगी मा गोफण तो ? मागे में सोच नी सक्यो। डील री पाळी घड़ी-घड़ी मे ऊमी होतो रयो पर मैं इष्ट देव ने मुमरतो रियो । गांठ री पूजी तो सतम होयगी भर मेळो हाल पूरी ई बाकी पड्यौ हो। मेळा मे बडता ई डाव पसवाई मेडताळा हलवाई री दुकान हो जठ मात-भात रो मिठायां पर लोग दवाव सा रिया हा। भाई ग होयर भाव बूझयो तो हलवाई केयो के पीसा रा दोय घेरा । भाई मुळकर म्हारे कानो देख्यो । डा मे मायोडा पाणी ने ५'र मैं डाव हाथ सूपागट मे पडी मारस री डाबो ने हिराई पण वा बानी कोनी : झूभळ माई म्हने जिको डाबों ने फादर परी बाई पर हारोड़ा जुवारी सा म्हे दोयू मागे चाल्या । मोड्यो रो दुकाना मे रनड दहया, सलेट रा बडता री डाम्या, जोर बाजबाली सोट्यां, फूक मुफूलबाळा बम्बू पर दूनी भात-मांत रो चौता भरी पड़ी हो पण वं मुनाणी भी नी माई। मन मे मो हिसाब लगाता रिया के हो सावरा मे नी खरच कर देता पीसो तो मा मे सूकुएसो चीज प्रापणी होतो! प्रेक नीमह री छोयां में लोग हाथों पर पक्षका नांव खुदावं हा । नांव में जितरा पाखर, वितरा ई पंसा । जानी ''खुदावो तो अंक पीसो । पढाई पर पट्टामूदी घड़ी, जिरा मे हमेस भार ई बग्योहार, कुरावो सो दो माना।

38/ गय संकलन . नुवी बीनण्यो माऊमाव खुसपुम करती, माय उछाव मरी पर ऊपर सूं सरमातो, के तो हाप माय दूनी सुगाई र मू सूबतायोडौ पाप रे बौंद री नांव कुरा हो, के ठोडी मर गासां मा विद्या लगवाव हो । बेमाता जिण जगां तिल बरणाती-वणाती रंयगी, उठ गूव में हरी टिपक्यां लाग रयी ही। नांव खुदावा खातर म्हागे भी जीव माय सूमाकळ-वाकळ होतो रियो । माज म्हने साम्ही पीसा देयर कोई म्हारं हाथ पर म्हारी नांव खोदलो चावं तो मैं राजी नी होऊ पण वी बगत बात ई और हो । सेवट लांबी सांस छोईर म्हान उठा सू भी चालणी पड़यो । मन उदास म्हैगो पर हाथ-पग ढीला पड़गा । हकनाक प्राया मेळ ! मूडाग भेक लूठा नीमड़ा हेठ गोगाजी री पनि हो । मेक ऊंचा चांतरा मायं पक्की साळची में मकराणा रा माटो सूतरासियोड़ी गोगाजी री घोडं- पढी मूरत ही जिरा रे चर माथ नी तो उदासी ही भर न थाकेला री कोई निसांण । मालो ताण्यां निरम घोड़ा री पूठ माथै जम्या हा । मूरत र डावे पसवाड खुरसा मे या मधु मंरी लीय उठ रंयी ही प्रर मूडाग बदारचोड़ा नारेळां री डांड्यां पर टोपाळ्या रा टुकड़ा विवर्या पढ़या हा । चिटक तो भगत लोग गळती सू भी नी छोड़ी हो । कमर पाघरी करण सारू म्हे चूतरा माय पसर्या ई हा के भाई पाछा कठ'र बैठा व्हेगा । बोल्या- गांव में प्रापणी दादी रो पीर है, बोराजी र मठ, जिको उठ चाल'र मास्यां । घर पूग्या तो बोराजी दादोजी बार नीमह री छियां में मांची ढाळ्यां प्रकरोड ई बंठ्या हा । निजर कमती रंयगी है. जिको धोक देयर नांव बताया घणा राजी हुया डोकरो। पौळी भोपण्या न हिलाता म्हां कांनी देख'र बोल्या मेळो देबा माया दीसौ; जावो पली मांय जाय र दोपारी करयावी । खीर-पुडी खाय'र बार पाया जर दादोजी सांकड़े ई उ.भा भेक भादमी ने कह्यो-यू मेळा में तो जावं ई है मां ने दुकान सूकेक प्रांनी दिराय दीज्य । भाई म्हन कान मे कही के दुरगा काकाजी है । म्हे दोयू बारी-बारी सू घोक दी पर वा साग होयगा । मेळा मे बोराजी री पीतळ रं वरतणां रो दुकान ही जठे सूम्हांनै न्यारी-न्यारी यांनी मिली। प्रबै तो म्हारं धूपरा बंधगा । थाकेलो भूल'र चकरी वण्या चारू मेर माटा काटण लागा। पली तो लाग्यो जारण प्राख मेळे नै खरीद लेस्यां पण मिन्ट दस-पांचेक में ई जळेवी राघरा, मेड़ता रा पेडा पर पोकर जी सूऊंटो लदर मायोडा जाम्फळ खायां पछ म्हारा गोज्यां मे भेकेक पं.सो रेयगी । म्हे विचार कर उग के कत करा सी जिनस लेवा ग्तिरं तो मेह पौसर मोदी धारा शार - - गद्य संकलन /39 जम्योड़ी मेळो इयां खळबळोजगी जार मुवाळ मास्या र छाते में कोई माटो मार दीयो है । मेळा रा ताल मे बैत-बैत परिणी बवरण लागी जिरण में छपळक- छपळक करता घोती रा खोजा टांक्योहा मोट्यार-मेक हाथ मे डांगडो लिया मर दूजोड़े मे जूत्यां लटकाया, बैगा-बैगा पि.रण लागा । गोडा तणी घाघरी उठायो, उजळी पीडयां चमकती गोरड्या छाती रा उटाव ने पाली प्रोढण्या में लुकाबा री बिरया. कोसीस करती सरमा मरती सम्हाळ-सम्हाळ पग मेले मेळा री कोरां सू उतरादा, अगूरणा पर दिखणादा-भात-भांतीला प्रेरणा पर्योड़ा मिनष-लुगायां रा रेला चालगा। मेळो तेजी मूविपरबा लाग्यो जर भाई मी खोजा टांकर पगरख्यां हाथ मे ले ली भर म्हार कानी देख र बोल्या- तो फेर मापां में. अब टुळां । मैं मी सजगी । जितर तो गूलगरी रा सांटा बेचवाळी जीवणं हाय कांनी सूबोल्यो-ले ज्यावो केक पं.सो। माई पीसो देय र एक जाडौ-सो सांठी भारी मांय सूकीच लियो। मैं भी पीसो काढण लागो जरै मा कंवता केवता के के करसी, घणो क ई, डावा पग रै नं.चे दाबर झरड़-स वी रा दोय टूक कर नाख्या पर अंक म्हार कांनी माधौ करता बोल्या-अब मोड़ो मती कर, खावतों खावतों पग उठायर माज्या म्हारै गैल-गल। माथे बरसता पर हे बवता पाणी सू लड़ता हे गांव कांनी बहीर पड्या। मैं था'र चूरो होयगौ हो । माघेटाळी नाडयौ कोई मुस्कला सू लियो, म्हारी जीव जाण है । मैं तो पाळ पर पसरगौ पर कय दियो के म्हारा सू तो अब प्राग कोनी चालोज । पाळ पर पेली सूपूगोडा और लोगां रे साग म्हार ई गांव रो राऊ हेगड्यौ पर छौंतर दरजी भी कभी हो। छौंतर म्हारौ पड़ोसी हो । बोल्यौ--डाव-प्राव, म्हार खांदा पर बैठज्या । म्हने वी खांदा पर बिठा लियो पर मस्ती मूचाल पड्यौ । राऊ हेरडयो चालतो- चालतो गारणो सरू कर दियो: मेळा थारी मजो घणो प्रायो.... बरस्यो धारांधार ताल मे पाणी नी मायो । लैरयो भोज्यो टपक-टपक रंग गाला पर छायो मेळा धारी.... फेर मेळे मूसरीद्योड़ा बंसरी रा जोड़ा सूज्यार रंग-रंगीला फदा लटक हा, झूम-झूमर इणीज गाणा री धुन काढण लागौ । मगरी चढया जर डाव वाजू बिरखा मे भौज'र काळो पड़योड़ी माजीसा री बंगलौ पर मूडाग थोड़ा 40 / गद्य संकलन प्रांतरे गांव रा घर-घुमेर रूखड़ा दीसण लागा । छीतर म्हन सौदा सूनी उतारपो बोल्यो-प्रम चाल परो मोट्यार, मो रियो गांव मूडाग ई। खैर, जियां-तियां घरै पुग्या । पग थाक'र इस्या होयगा हा जाण अडारण मेल दिया व्है । प्राला गाभा खोल'र सूका परया । केलडी री गरम-गरम रोट्या पर बळबळती दाळ घणी सुवाद लागो । ब्याळू कर र मायला तिबारा में प्रकगई माचा मार्य प्राड-टेड करण खातर थोडोक डोढो होयौ ई हो के माख चिपगी । लारली रात रा सपनो भायौ । माखर उठायोड़ा हहमानजी दौस्या पर मैं पाछौ मेळा मे पंचगौ । गोज्या सूडौढ मानो काढ'र दियो पर हाय मार्थ नांव खुदायो । काई सोवणा पाखर हा ! इस्कून रा साथी सायनां ने दिखातो र्यो। फेर काई देखू के मेक गोरी डावड़ी रे मूडाग राऊ हेरडयो झूम- झूम' र फू दाळी बंसरी बजाती पर गावती ना रियो है-मेळा पारौ मजो घरणी प्रायो 555। मैं राऊ न ठरवा खातर हेलो पाडयो पस वो कदाच सुण्यो नी भर गावती रियो । जितर तो साम्ही सू गोगाजी पायगा-- काळा भुजंग घोड़ा माय असवार पर घोळा बुराक गाभा पर्वा । ख्यां रा मोटा- मोटा डोळा पर ऊची सूतवां नाक । पळपळाट करता चरा पर लांबी विच्योड़ी मूछयां । कागस्यो कर्योडी दाढी पर बध्योडो घोळो सपेत जाड यो । माथै उजळी पाग पर काध चमहा री रक्खी । डाव हाथ मे लगाम पर जीवण में चमाचम करतो मालौ । प्रांख्या सूमाग री चिरणगारी काढता 4 जीवणे हाथ मे भाला ने तोल्यो । जितर तो म्हारी नीद टूटगी । डील पसीना सूपाणी-पाणी व्हे रियो हो । पाछी सोयगौ । पारेक दिन चढ्यां कठ्यौ पर हाथ मे लोटो लेयर तळाव कांनी जावरण री सोची । बारल चौक में पायो तो काई देखू के हळकी बूंदा- बांदी मे भी जता गोगाजी रा घोड़ा पड्या है । अंक घोड़ री टांग टूट जावण सू घोडी सवार समेत मूढो टेक'र पाणी पी रियो है पर दूजोर्ड घोड़े सू पळगो होयर सवार टूट्योड़ा भाला पर झुग्यौ है । म्हारी छोटकी बैन कदाच काल सिझ्या खेलती-खेलती मां ने अठंई छोड़गी ही।

ढूंढाड़ महातम श्री गोपाल नारायण बोहरा म्हांका देखबा में प्रचार अंक पोथी प्राई । ईको सिरनामो छ 'पोथी ढूढार महातम की।' पोथी में भविष्य पुराण में सू मत्स्य देश को महातम लिख्यो । मत्स्य देश मे ही दडाड सामल छ । ई मे ई देश का तीरथां, नंद्यां और परवता को बरगान और उत्पत्ति लिखी छ । पोथी की भाषा संस्कृित छ जीको सार पढबाळा का मनबैलाव और जाणकारी के ताई अडे उतारी छ । इन्द्र बोल्यो 'हे बिरमा जी भाप मन मत्स्य देश को महातम तो बतायो पण म्हारी संका या छ के / मे कस्या-कस्या बड़ा तीरथ छ, रिस्यो मुन्यों का प्रासरम छ और वे कय्यां उत्पन्न हृया ।' बिरमा जी कही- 'हे इन्द्र मत्स्य देश में विराट राजा को पवित्र नगर छ ई के नजीक ही बाण गंगा प्रकट हुई । या बाण गंगा पाताळ में सू निकळी छ, विराट नगर सूदक्सण दिशा में पांच जोजन दूर छ । अंडे सब देवता जीको पूजा कर प्रसी जाम्बवती देवी विगज- मान छ या देवी जठे बिराज ऊ पर्वत की परकम्मा करया सू महान पुन्य होय । ई पर्वत का पश्चिम मे दो जोजन की दूरी पर मम्बिकेश्वर भगवान की अंपावतीपुरी छ जठं साक्षात मम्बिका देवी बिराज छ । अंबावती सू दक्षिण को तरफ चम्पावतीपुरी छ जठे चम्पा कुंड मोर बम्पकेश्वर महादेव को प्रस्थान छ । या पुरी चम्पा नाम की राजकुमारी बसायी छो । पार्ड ही गोदा- वरी नाम की बावडी सरस्वती को प्रस्थान और ब्रह्मशिरा कुह तथा तिलोद को बावड़ी छ । ईतर ई देश में अनेक तीथं छ । पत्र वन नाम का सुहावना बन में दर्मशिरा मुनि तपस्या करी और सिद्धि पाई । नजीक हो पातला देवी छ जीका दरसण कर रोगी निरोगा होय । ईका उत्तर में विजय मौर दुर्जय नाम का पर्वत छ।' ब्रह्मा जी फेर बोल्या-है इन्द्र प्रब में यो सब की उत्पत्ति बताऊंसो सावधान होकर सुलो । जद दुईदि दुर्योधन गायों को हरण कर्यो तो विराट राजा को कवर वा नै धुड़ाया गयो । ऊ बसत अरजुन नादर रो रूप पर कर विराट के नौकरी कर छो, सो वो भी उत्तर राजकवर को रय हारा ने - 42/ गय संकलन बैठपी । कौरवो री सेना देगकर उतरतो पबरा गयो पोर पापो भागमा साग्यो। जद परजुन क ने जबरदस्ती थाम्यो । क यात परतुन पेट पर योड़ा प्र पका पनुष पाग ने सेया गयो तो पारायाणी हुई है भरजुन बाण चला कर पाताळ मे मूभोगवती गंगा निकाळ पोर ॐ में प्रस्नान कर पौर पाचमन कर जद धारो नादरपणो दूर होलो मोर गाय पनामा लायक होलो।' या गुण फर परजुन पापया अनुप से पाण घोड्यो सो पाताळ मे सू भोगवती गंगा परगट हुई और वो के में पुरानान फर गांडीय पनुप लीनो पर विराट राजा की पते कराई।' . ब्रह्मा जी फेर कही पर जाम्यवती की बात मुणो. पुराणा जमाना में मेक देव द्विज नाम को मुनि हो । यो निराहार रह कर घोर तपस्या करी। कई बरसों तक तो वो ठूठ की नाई ही राड़ो रहयो । हवा के सिवाय भोर कुछ ग्याबा-पीया को काम नहीं । ई सू देवता में भोत चिन्ता हुई और यह सब म्हारे कन्नै पाया जद मैं लोक माता चंडिका देवी की प्रार्थना करी। माता प्रगट होर भने बरदान मांगवा बैई कही । सारा समाचार देवी ने परज कर्या प्रौर देवता को सकट राळया की प्रार्थना करी । देवी राजी होर मन वर दियो। फेर वा देवी गुवाळ्या की लड़की को भेस वगार उठ ही गाड चरावा लागी । ॐका हाथ में जामूण्यो छो । वा ब्राह्मण कने गई । यो प्राख्यो मीचर ध्यान लगाया बैठयो छो । देवी कही पर ब्राह्मण बिना बात ही क्यों काया न कळंश दे छ ? बड़ा लोग कही छ प्रक काया राखर परम करतो पायज्य । हू ने खावे, न पीवै पौर सूखर कांटो हया जाय छ । बड़ा लोग इन धरम नहीं माने । ले ये जामूण्या ल मौर बेखटक यौन खा। पुराणा जमाना मूरिसी मुनी पळ खाता माया छ। ब्राह्मण का ध्याग में विधन पड्यो । वो पात्या बोली तो मामन मेक गुवाळी में भी देखी ज्यो हंस रही छो और गाय बछड़ा ने घरा रही थी। वो मुनी तपस्या का जोर एंजारण गयो प्रक या तो साक्षात चंडका देवो छ। रोस की भारी ऊको प्रांख्यां ताल हो गई पर वो बोल्यो 'हे देवी में कोई अपराध तो फर्यो कोन, फेर भी जामूण्यां देर म्हारो तप मंग करबो चायो । जा, तू गाय बछड़ा समेत भाटा की होजा, थारो नाम जामवती ह तो, यो हो म्हारो वचन छ ।' देवी हंसबा लागी भोर बोली हे ब्राह्मण तू म्हनं सराप दियो ज्यो मंजूर छ पण मैं भी सराप यूक तू जम्बू पर्वत हो जा: गही खोळा मे विराजुली । प्रयाँ ब्राह्मण तो पर्वत मोर समेत जाम्बवती को मूरत बण गई। यातां सुगर T गद्य सकलन /43 अब भंबावती की उत्पत्ति सुणो- सतजुग में चन्द्रचूड़ नाम को राजा छो? ऊंको राज समन्दरां ताई फल्यो हुयो छो शृंगारकपुर को राजा तारा- धिप ईको बरी छो। सो वो ऊंका राज ने जीतबा ने बर-बर मे हमलो करतो। सूॐ को नगर खंड-चंड हो गयो और खजानो भी रीतो व गयो । या. देखर वो राजा आपकी राजधानी सूभाग निकळ्यो और मत्स्य देश का डंगरा का बीच में बोहड जंगलों में तपस्या करवा लाग्यो । वो महा- देव जी का पांच मौका को मतर जपतो (नमः शिवाय) । जिद भोत समै हो गयो तो शंकर भगवान परगट हुया । राजा प्रस्तुति करी । शंकर भगवान बरदान दियो, हे राजा थार ताई बडे ही भेक सुन्दर नगरी बस जावली जी मैं शम घुस नही सकंला । न थारी कदै हार होली । मैं भी म्हारा गणां समेत मंडे ही निवास करू ला । साथ मे अम्बिका देवी भी रहेली। म्हे यां दक्षिण और उत्तर में खड़ा नील और मेघ नाम का पबंता मे बिराजाला । या कह कर शिवजी उठ ही लिंग रूप सूखाड़ा में विराज गया। राजा भी आपको नगर ऊं. ही बसायो प्रोर नगरी को नाम अम्बापुरी राख्यो । अब मागे चम्पावती नगरी की उत्पत्ति को हाल सुणो । प्रागला जमाना में काम्पिल नाम को राजा छो। वो बड़ो बली, दयालु और विष्णु भक्त हुयो । मेक बार शांडिल्य मुनि ऊंक घरां माया । राजा सब तर सू वाको पादर सत्कार कर्यो और फेर वाँका भाषा को कारण पूछयो और भरज करी के हे रिषी मैं मापको उपदेश सुरणबो चावूछु । रिपी बोल्या हे राजा थे विष्णु भक्त छो । था जस्या भगवान का भगतां सूकुण मिलबो कोने चावे । विष्णु भगतां का दरसण सूसभी पवितर हो जाय छ । अब म्हारा बाबा को कारण सुयो- मैं थांन भगती का उपदेश देवा ने ही भायो छु। इन सुण कर थे जयां उचित समझो सो करो। ई सूसब तरह का पानन्द हला पौर यांको राज अविचल ह जायलो । या कह कर रिपी अन्तरध्यान हो गया। मेक बार तो राजा मोत दुवी हुयो पण फेर सावचेत होर विष्णु भगवान की स्तुति करी । जद मधुसूदन परगट होर बोल्या-हे राजा थारी स्तुति सू मैं प्रसन्न हुयो, अब तू वर मांग । राजा कही हे प्रभो माप मबका मालिक छो और सबका मन की जाएो छो। भगवान फरमाई-हे महोपाल थारा मन में ज्यो काटो छ ॐनै मैं जाणू छू और जल्दी हो ॐने दूर करू ला । तीन्यू काळो की भागली-पाछली जाणवाळा मुनि मन सांनी- सांची बात बतायी छ । पुत्र तो कौन पण पुत्री सू थारा कुळ को उद्धार हलो । बेटों से भी ज्यो काम न हो सके सो यारी देटी करली । या कह कर भगवान मन्तरध्यान ह गया। राजा का मन को सारो संताप मिटो।

441 गद्य सकलन समै पार राजा के रूपवती राणी सूप्रेक रूपाळी कन्या जनमी । ऊके जनमतो ही सारा घर में उजाळो ह गयो । राजा का मन में बड़ो पानन्द हुयो । चम्पा का सा रग को ॐ रूपवता कन्या न देखर राजा ऊंको नांव पम्पा ही काढ दियो । अब वा कन्या दिन-दिन बड़ी होबा लागी ! पण जद वा व्याव लायक हुई तो राजा काळ बस हुगे और ऊ की मा भी राजा की साथ ही मुरग मे चली गयी। राजा का देश पर वरी कब्जो कर लियो । जर राजकंधारी की धाय ऊन लेर मत्स्य देश में प्रा गो। ऊंठ जद वा दस बरस को हुई तो धाय भी भगवान नै प्यारी हूं गई अब वा राजवारी विनाप करवा लागी । हे भावान म्हारा हो हो । माग सूये सब काळ बम हो गया . अब मैं दुपारी कौड़े जाऊ और काई करू । सब बातों को कारण भाग ही छ ज्यो मैं अब मो जीऊ छ और डोलू फिरू'। घिरकार छ ज्यो मेरेन पहली ही म्हारा मा-चाप मर गया पौर प्रब बे बिचारा बिना पाणी पियो सब नरक में चल्या जासी । विधाता मनै कांई काम ने पैदा करी छ । अब मैं कुरण को सरण मे जाऊं । वा भैयाँ विलाप कर रही छी जद ही प्राकामवाणी हुई-कन्या तू भगवान की उपासना कर ये ही थारा मन चाया पूरा करसी । वा वो नी मैं बाळक और स्त्री होबा के कारण अज्ञानी छु । म तपस्या करबो काई जाण मैं तो या भी कोने जाणू के कस्पा देवता को ध्यान करू' और काई तरह से तपस्या करूं। जद प्राकास- वागी फेर हुई। थारा हिरदा में भगवान ही ज्ञान उत्पन्न करना और जयाँ भगवान की प्राग्या हो कयां ही कर । प्राणी तो अमानी ही हो छ। भगवान फी प्रेरणा ही वो स्वर्ग मे या नरक मे जाबा का काम कर छ । ॐ राजकंवरीने सामने ही बडो शोभायमान वन दिखाई पड़पो, जो मे तरह-तरह का पंछी बोल रह्या छा। कदम, पाम, दाड्यू: मां का पेड़ झूम रहा था । उत्तर दिशा में प्रेक बावड़ी छो जो मे कमल खिल रहा छा । ॐ बावड़ी में संपाड़ो बर वा राजकुमारी प्रापका माता-पिता और समी लागती. बिलागती का न जलांजली दी । फेर बावड़ी मे अठर वा चीक वन में गई और ऊंडे घाम और पत्ता कठा कर मापका हाथां सूपरणकुटी बणायो प्रौर ऊ में ही बैठ कर सात प्रक्षर वा मन्तर को जप करवा लागी (नमो नारायणाय)। कद पेडा का पत्ता सार रह जाती, कद कोरी हवा, पद डाम को पापी पी लेती, कोई दिन निराहार ही निकळ जातो । ऊकी तपस्या मे विधन भो भोत माया । भेक बार बावही और सलादी को पाणी सूरगो। जद वा दूर दूसरी बावड़ी मे गई । या मो सूची-सट्ट मिली। पण वा प्रापको धीरज नही छोड्यो प्रौर ऊई ही राहो होर गंगा, गोदावरी और सरस्वती को वाहन कर्यो मीर - गद्य सकलन/45 कही - ज्यो मैं सत्रु जय राजा की बेटी छ और सांचा मन से तपस्या करी छ तो सब पापा का नाश करवाळी नद्या को पाणी प्रां बावड्यो में आ जावं । या कहता ही बड़ा जोर सूपाणी वां वावड़यों मे डाक्यो और राजकंवरी प्रसनान, . ध्यान और तरपण करके आपकी कुटी मे पाछी आयो । यो अचरज देखर देवतां फूल बरसाया और ऊको भोत बड़ाई करी । सारा ही नाडा, खाडा और तळाव पाछा भर गया । चंपा फेर तप करवा लागी। ऊंकी घोर तपस्या नै देखर देवता चिन्ता करबा लाग्या मोर तक्षक नाग ने बुलार कही-थे सब साँपी ने लेर जावो और चंपा का तप में विघन पैदा करो । ऊन डरपावो । या सुगर महा जहरीलो सर्पराज सभी सांपां न लेर चपा की कुटी पर गयो । पण वा सांपों को फूकार सू डरपी नही और श्री नारायण का ध्यान में बैठी रही। भगवान विष्णु या देखर गरुड़ ने पाग्या दीनी । गरुड़ जी जावो-तक्षक नाग चंपा की तपस्या में विघन कर छ । म्हारा भगतां ने ज्यो दुग्व दे छ वांको थे नाश करो । चाहे वो दुग्वदायी गणेश्वर ही क्यो न हो। भगवान की प्राग्या से गरुड़ जी गया और कोस भर का फासला से देखता ही सारा सांप माग छुट्या । गण्ड जी भी सापां न मागता देखर प्रेक सीस्यू का पेड़ पर थोड़ी देर बिसराम कर्यो और फेर वापस आ गया। जी जगां सोस्यू का पेड़ पर गरुड जी विसराम को छो वो आज भी गरुडावास बाजे छ । सारा विधन दूर होबा पर चंपा फेर प्रापकी तपस्या मे लीन होगी । फर ग्रेक बर बड़ा-बडा बाळा हाळी अंक मोटी स्त्री प्रायी और बोली तू राजा की बेटी छ, ई सुन्दर शरीर नै क्यू कळेस दे छ । ठंड पर पाणी का दिनां मे ई बन में कयां रहली। कोई राजकुवर, गंधर्व या देवता सूब्याह करले। ई काया नं 'कळस देया मू कोई फायदो नहीं । या कह कर बा स्त्री भेक खाडा में बिलायमान हो गई । फेर की समं बाद दुर्जय और विजय कका तप में विचन करबा ने उत्तर सू पाया। पण वै चपा का तेज सूपर्वत हो गया। वांकी चोटी पर सीतला देवी बास कर छ । यो पर्वतां की परकम्पा पर जातरा करवा हाळां का सब रोग दूर व्है जाय छ । भोत बरसो तक तपस्या कर्यो पछ सारा संसार की प्रातमा स्वय भग- वान, राजकुंवारी नै दरसण दीना । वा मन मे जी सरूप को ध्यान करें छी ऊन साक्षात सामने देखर भोत खुशी हुई और मानन्द को मार्यो बोल्यो भी नही गयो। मगवान कही वर मांग, थारो बाप भी म्हारो भगत छो। थारी तपस्या सूप्रसन्न हुयो। जद चंपा कही-हे भावान मैं तो प्रापका दरसणां सू ऊपर कोई भी बात कोने जाणू। मगवान बोल्या-या ठीक छ पण फेर भी कोई तो वर मांग । तन मंडे हो वृहदश्व नाम को श्रेष्ठ पति मिललो 1 46/गद्य संकलन . और ' ही भेक श्रेष्ठ पुरी वम जाती। में में मात-भौत की प्रटार्या, महल माळिगा. याग-बगीचा मोर सड़को हो जामली । चंगपुरी का नाम मूं ही या पुरी प्रसिद्ध हैली और थारा नाव ही घंपाकुड, सरोवर बालो। बावही को नांव तिलोदकी होलो। जह माघ सुदन तिल और पाणी की जलांजली देवा सू गया में पिंड देया बरोबर फळ होलो। या कहर भगवान तो मन्तरध्यान हो गया और चंपा के सुन्दर नगरी में देसर अवाज में भर गई । फेर वा महल का द्वार ही कार का संड में जार रहबा मागी । कोई समै वृहदश्व नाम को इक्ष्वाकु कुली राजकुमार शिकार सेलतो-खेलतो उदै पायो और पूछो-या सुन्दर पुरी कुण को छ । सब जरणां कही मा घंपा राजकंवरी को चंपापुरी छ । चंपा दूर ही राजकंवार नै देस र महल में बुलायो और सुवसांता पूछी। को नुळ और देश तथा मामा को कारण पूछयो । जद पाह्मण लोग ऊंने सारी बात बतायो । ने भी भगवान की बात माद भापी। वा कमलो को माला राजकुंवार ने पहरायो मौर ऊन पापको भरतार मान्यो। मोत समै तक आनन्द सू भोगविनास करता हुया ये सौ पुतरा का माता- पिता हुया और फेर मगवान में लीन हो गया। ब्रह्माजी प्रगाड़ी कही है इन्द्र पव अंक और पवित्र तीर्थ को बरएन करू जंड देत्या का डर का माऱ्या देवता नार सरण ली छी, वो ब्रह्मगिरा नाम को मुड छ । है इन्द्र थान याद होली कुड मे ही अमनान करके थे बडो पद पायो छो । ऊही प्रस्थान पर ब्रह्मशिरा दैत्यां ने हराया छा। कुड का पश्चिम भाग में सतदंड नामक भस्थान छ में साक्षात नारायण देव विराज- मान छ । ॐका उत्तर पश्चिम मे दर्म नाम को ग्राम 2 ज दर्भवती नदी और पर वन छ । कळजुग का पापां को नाश करवा हाळा प्रस्थान भी ऊहे ही मौजूद छ ज्योकी स्थापना दर्मशिरा-नाव का मुनी करी। वै सरस्वती नदी को प्रावाहन करके कहो तू मंडे पिर होजा । फेर वे मुनी कठोर तपस्या करी । महादेव जो प्रसन्न हुया और कही - वर मांग जद मुनी अरज करो-हे पंचानन मंह सरस्वती घिर रहे मोर माप भी अंड ही निवास करो। जद शिवजी कही मर्यापी होली या सरस्वती कळजुग में भी लोप नही होसो। ई को नाम दर्भवती होलो । बैसाख का महना मे अंडे प्रसनान दान करवा सूपुन्य प्राप्त होलो। है इन्द्र यो मत्स्य देश को महातम में थाने सुणायो। ईका सुरणवा सू बहुत मानन्द मौर सुस को प्राप्ती होसी । ई महातम में दाड़ राज में सामल केई ठौर-ठीड़ा का नाव आया छ, हादेवजी को गद्य सकलन /47 जियां बिराट नगर (बैराठ), बाण गंगा, जाम्बवती (जमवायमाता), पाम्बावती (माम्बेर), मम्बिकेश्वर महादेव (ौडा म्हादेव), चम्पावती (चाटसू), शीतला (शील माता की डूगरी), गरुड़ावास (गरडवासी गांव), दर्मशिरा ग्राम (डाबच गांव) माद । पण ई में ढूंढाड़ नांद को कोई हवालो कोने पायो । इमू मालम होवे छ के यो नांव पार्छ पड़यो छ ।

म्हारी जापान-यात्रा लक्ष्मीकुमारी चूंडावत जापान रो असली नाम जापान नी है । उणरो असली नाम निप्पोन है । जापानी प्रापरा देश नै निप्पोन कैवे। परदेसियाँ रा अशुद्ध उच्चारण सू निप्पोन जापान बण गयो । जापान देश चार टापुवां मू बणघोड़ो है । मामे होन्शू टापू सबसू मोटो है। टोकियो, प्रोसाका, क्योटा, हिरोशिमा वगैरा जापान रा खास-पास शहर इणहीज टापू बसियोडा है। बोकिनो रा तीन टापू इणसू चिपियोड़ा है। उतराद मे होकायडो टापू है. दिखणाद में सिकोकू पर क्यूसू । इणा रे मलावा जापान र समदर में छोटा-छोटा हजारू टापू बिवरियोड़ा वसिया है । टोकियो र हेनेडा हवाई टेसए पर उतरतां ई घड़ी साम्ही झाकी । कळ• कत्तं रे और बढ़ रे टेम मे तीन घटा रो फरक हो । आ बात कवणी पड़ेला के अ रा कस्टमवाळा भला पादमी हा । कोई माता, काई जातां सामान र हाथ ई नी अडायो, कांई पूछताछ ई नी करी । पासपोर्ट देख भटपट छाप लगा, सीख दे दी। म्हांनै प्रिंस होटल में उतारिया । प्रो तो मैं टोकियो में पूगतां ई देख लियो के मठ नकसा रो जोर है । म्हारै कमर में नकसो टांगियोड़ो हो । कान्फ्रेंस री मोर सू' म्हांनै कागजात दिया हा उणा मे ई नकसो नत्थी हो । गले मे जिए किणी न ई मैं गलो पूछियो उण झट कागद पेंसिल काढ नकसो मांड म्हन गलो बतायो। टैक्सी ड्राइवर ने कठई जाया ने कहियो तो झट देसी नकसो जेय सू काई म्हार मूडाग राखियो जिण जागो जावणो हुदै, नकसे में बता देवो । बठ नकस सियाय कोई बात हो नी । रेला में सफर करबावाळi लाई नकसा मौजूद। (2) उए ईज दिन साम री गाड़ी सू म्हाने हिरोशिमा जावणो हो। टोकियो गय संकलन/49 टेसण मायं पूगिया । टेसण री इमारत में वड़िया पण बठनों तो प्लेटफारम दोस्यो, नी गाड़ी दीखी, नी इंजन नजर पायो । मभ में पड़गी--प्यार पासी दुकानां ई दुकानां। जापान कोंसल वाळा म्हांन कयो हो के मापने हिरोशिमा तक पुगागा ने म्हारी प्रादमी साय दे देवाला । वो प्रापन सोझन टेसण पर मिल जाला । गाड़ी घटण री वेळा नजीक मायगी । म्हे उडीकता उकतायीजम्या । टेसण पर भीड़ घणी हो । नी तो गाइड म्हांने मोळख नी म्हे गाइड ने भोळखां । भैन वकत पर गाइड हस्तिो यको मायो । मावना ई मन देख बोलियो-भलो हुवो पांरी इण साड़ी रो जो इण न देख मैं यांन मोळखिया। गाइड म्हांन लेय ऊपर चढियो। हूं सोचण लागी-पापांन तो गाडी चढणो है । भो ऊपर कठ ले जावं है ? ऊपर प्रविता ई देखियो के प्लेटफारम पर मायग्या हां। गाडी मूडाग ऊमो-हो। समझ में नही मायी के ऊपर चढिया गाडी किरण तर पायो । नीचे भोको । बाजार, सडक, दुकानो मी हो। टोकियो में प्राबादी घणी होवासू रेला दुकानां री छातां पर पाल । टोकियो शहर में रेला रो जाळ सो गुधियोडो है-पाग-पाठ, डांव-जीमरणे, ऊंच-नं. धड़धड़ करती रेला चालती रखें । जापानियों ने मापरी रेला रौ टाइमरी पाबदी घणो मांजस है। बठे रेला लेट नी हुवे, कदेई हुवै तो कुछ सेकंडी सारू ईज । म्हारो गाडी हिरोशिमा माही भागी जावं ही। रेल री पटडी र दोनां माही ने खेतों में पर जगळ तक में विजळो रा तारा रा खंमा इपियोड़ा यता हा के मठं उद्योग रो किस्तो विस्तार है। घरो मायं टेलीविजन रा मेरियलो राखमा साम्ही पांगळी दिलाता जापानी सज्जन श्री फुकुसिमा बोलिया- मेरियला रा पोक देखने माप अन्दाजो लगा लिरावो के जापान में कितरा टेलीविजन है । संकड़ां कोसां री मुसाफरी मे देखियो के जापान में मैक भोगळ परती बेकार कोनी पड़ी। मान लो कठई जमीन खेती र लापक कोनी, पाणी रो खाटो ई है, तो उणन ई काम में ले राखियो है । वीं सारे में कमल ई वाय दिया । कमल री डांडी, बोज, पत्ता फूल, पाखड़ियां रो साग बणाय । . (3) ता. 31 जुलाई, 1959 में सुबह 10 बनियां हिरोशिमा में विश्व सम्मे- सन सरु यो । प्रतिनिधि टम सूपहला ही भेळा हवए सागा । हूं वारं बरामदे में ऊभी ही । अपाणषक प्रेक लांबी मार रा सरकार 50/गद्य सकलन टोप उतार माथो झुकाय मुजरो करियो । बोलिया, पाप जरूर हिन्दुस्तान सू माया हो, मैं प्रास्ट्रेलियन हूं। पांच वरस दक्खरण-भारत में रियोड़ो हूं। प्राप किस प्रदेश नमाया हो। मैं कयो-में राजस्थान री हूं? 'प्राछो ! भायो ! उदपुर तक मैं ई ग्योड़ो हूं, म्हारो नाम भेडयूज एज है। मनं मराठी बोलवा री घणी मन में प्राय रयी है । प्राप रे सायवालों में कोई मराठी बोलगियो है के नों? दूजे दिन मैं उपां न म्हार प्रतिनिधि मंडळ रा नेता श्री हिरे सूं मिलाया। हज वासू मराठी मे घडाघड़ बात करवा लागा । मराटी रे'' भावर रो उच्चारण 4 घणो शुद्ध करता । मन उरणां रे 'ळ' र उच्चारण पर खुशी हुयी और अचम्भो ई प्रायो। भापर्ण अठरा हिन्दी बोलगियां मायां सूखासकर उत्तर प्रदेश पर बिहार वाळां सू'ळ' बोलणी नी मावै । 'ळ' रो प्रयोग राजस्थानी, पंजाबी, गुजराती भर मराठी में तो खूब हुदै । इण 'a' नै लय ने मनै प्रेक जूनी बात याद प्रायगी । बीकानेर राज में महाराज गंगासिंह जी र बगत मे महाजन रा राजा हरीसिंह जी ठावा सरदार हा । बीकानेर राज मे उणा दिनां मेक हुकम निकालियो के राज नौकरियों में बीकानेर रा लोगां ने ई राखिया जावे । फलाणों बीकानेरी है के नी इणरो इम्तिहान पणीं विरियां महाजन-राजा साहब लिया करता । इण इम्तिहान री जरूरत यू पायी के पणा जणा नकली सर्टीफिकेट ले बीकानेरी बण जावता । उम्मेदवार री जांच करवा में राजा साहब उणनं पूछता-बोलो खळळ-खळळ । बाहरवाळां सू शुद्ध उच्चारण नी करणी प्रावतो और वं बोलता खलल-खलल । उणई वगत राजाजी प्रापरो फैसलो सुणा देता-पारे बीकानेरी होवण में खलल है भाया । श्री राज महाराष्ट्र री मायली वाता री घणी जाणकारी राख । बरी जनजातियों ₹ बारे मे उप रो घणो ज्ञान है। जद जातियां रे जीवण पर संस्कृति री वातां सुणावा लाग्या तो मन में मने घणी सरम भाई । मैं तो वां जनजातियां रो नाम ई नी मुगियो । (4) काकरेंस हाल र बार ऊभा प्रतिनिधि लोग गप्पा लगाय रया हा। गर्मी तेज पर री हो । जापान में छातां रा पंखा तो हुवे ई नी । सब जणा हाया में जापानी कागज रा पंखा लोधा हिलाय रया हा । सूडान रा प्रतिनिधि इजिप्ट महाराष्ट्र री जन- । गद्य संकलन 151 . । री लुगाई प्रतिनिधि मिस करम ने बतळायी~गर्मी तो मठ ई मापां जिसी पड़े है पण जापानी मापां जिसा काळा क्यू कोयनो? पश्चिमी जर्मनी रो प्रतिनिधि हाफू हाफ़ करतो फूका देतो फिर रयो हो-'मर गयो गरमी मागे, मैं तो काल परो जादूसा।' यूरोप री भैक जवान लुगाई प्रतिनिधि प्रापरं बटवं सू कार्ड यूडीकोलन रो सोसी ने छाँट माथे पं । हूं कने बैठो, म्हार ई ललाट रे उण यूडीकोलन लगायो । मैं कहियो- -मने इसी ज्यादा गरमी कोनी लागे । हूं राजस्थान री पर वाई तपत बीकानेर री रेवणवाळी, जठे इणसू बेसी गरमी पड़े। जिए भवन में काफरेंस हुई उणर भेळ ईज शान्ति-स्मारक म्यूजियम हो । घणखरा म्हे वो म्यूजियम देखण लाग गया । इण म्यूजियम में हिरोशिमा में जी मैटम वम सूतबाही हुई ही उगरी तसबीरां, नकसा भर मांकड़ा जमाय राखिया है । पूरो विवरण उप प्रळ रो दे राग्वियो है। उप महानाश रा राखमी कर्मा ने देख वजर री छातीवाळा रे ई मांसू पायां विना नी रखें । भीत प क मोटी सारी तसवीर लाग री । उणमे धूवे रो मगरो रो मगरो लपकतो लगो ऊंचो चढ़ रयो है । अंटम बम रे फूटता ई हिरोशिमा नै प्रापरी काळी छाया में ढांकतो पो फोटू चार हजार मीटर दूरां सू संचियो हो । 1945 री छ अगस्त सुबह मैन पाठ वज'र 15 मिनट 4 अंक अमेरिका रे विमाण बम फैकियो । बो सत्यानामो विमाण बम फंकतां ई मटाटूट पार्छ पगा मागियो। इसो तेज मागियो के बम फूट-फूट जी पैला 16 किलो- मोटर भागनै दूर निकल गयो । बम जमीन सू570 मीटर ऊंचो आकाश में फूटियो । धरती पर पड़र फूटबा सूइतरो नास नी हो सके क्यू के बम में इतरो ताकत ही के जमीन में घंस जावतो। जां मिनयां बम नै प्राकाश मे फूटतो देखियो वां बतायो के बम फूटतां ई इसो लागियो जाणं परचंड मूरज धरती पं उतर रयो है। बम फूटियो जिण वेळा उणसूगरमी निकळी, वा दो ताख सेंटीग्रेड हो । सौ सेंटी- ग्रेड गरमी में पाणी उकळबा लाग जावं । वा गरमी ही दो लाख । भूगड़ा तिड़के ज्यूमिनख तिड़क गया। वो घूवै रो वादळो, जिन प्राणविक वादळ कैवे, अड़ताळीस सेकिंड में तीन हजार मीटर ऊंचो चढियो । साढ़ी माठ मिनट में तो नौ हजार मीटर ऊपर चढ गयो । पंद्रह मिनट पछ इण वादळ मे सू वरखा होण लागी । दो घंटा ताई बगवर कादो वरसतो रयो । रेडियो सक्रियता राजो कण धूवर साग ऊपर परा गया हा उणां ने वरखा पाया । । नीचे ले भाई।

32/जब संकलन बम फूटवा ₹ 20 मिनट पछ नीचे जमीन पलाय लागगी। लकडी रा भर बांसड़ां रा जंगळ भभक मभक बळवा लाग गया। छोटा-मोटा सब घर भसम हो गया। भाख ई पहर में खाली छाईस पर प्रध-वळिया रंप गया। नदियां रा पुळ टूट गया। गाडी री पड़ियां बांकी हूगी । गरमी इतरी हुई के लोह काई पत्थर पिघळ गया । हिरोशिमा लाय री लपटों में समाय गयो। तीन दिनां ताई धू-धू वळो रयो । हरियो-भरियो जंगळ प्रर शहर राख रो दिगलो हो गयो। (5) इण कयामत में लोग-लुगाइयां, टावर-टीकरां री दुरदमा हुई उणरी बात तो कवरण ओग ई कोयनी। प्रांखिया देखियोड़ा हाल,बठवाळा सुणाय रया हा । म्हार में तो सुणवा रो होमत ई कोयनी ही, काळ नो काप-कांप जातो । लपटा भाम र प्रहरी ही, मिनख वरळाय रया, टावर चरळाय रया, कुण किगरी सुण, कुण किरणनं बचाव मरिया-बलिया ! लपटों में भसम ! इस भयंकर कांड री याद सूईज मिन व री चेतना परी जाये। 2 लाख 40 हजार लोग-लुगाई पर रावर बरळावता यका जीवता बळ गया । 51 हजार बुरी तरह घायल हो गया । अंक लाख प्रासरं मामूली घायल हुया । इण मरमेघ में जळ न मर गया वो तो सुख पायो। पण जारी सांसों वाकी रंगी व जीवती लासा 'पाणी पाणी' कर री ही, पण पाणी रे जबाब में काळ उगो ने लाय री लपटों में छानो कर देतो। डोल रा गाभा बळ गया, डोल मूज गया, केस बळ गया, चामडी और हाडकिया बळन लटक गया। में नर काळ चेतो पावतां ई करळावता--'पाणी-पाणी'। पाणी कठे ? पावा वाळो कुण ? प्रापणं पुराणों में जो रौरव नरक से वर्णन कीयो वो इणरं मागे तुच्छ है । जो हाल तसबीरां में देखियो पर जो देखणवाळो रा मूडा कानां सुरिणयो उणन लिखवा ने पर कैवा ने कोई लबज ई नी । "चूजियम ने देखता मन दुष, गलानी पर अन्तर्वाह सूबळजा लाग गयो । मन में रेय-रेय प्रो सवाल उठतो-मिनख इसो हत्यारो हो सके है ? मैं देख रया हां जो सांची तसवीर है ? हे मगवान ! मिनखरं सार्थ भो बरताव कीयो ! मिनस ई इसो हो सके तो पर्छ राखस, पिशाच, दैत्य इणमू ज्यादा कोई हवला? (6) हिरोशिमा रै मत्यानाश रो जापानियां रे दिन भर दिमाग ६ घणो असर गद्य संकलन/53 पड़ियो । बठरा साहित्यकारी रं मागे तो माज ई हिरोशिमा यू हीज बळ रयो है पर राष्ट्रीय पंतनावाळा शापानियां रा काळजा मे तो मा होळी पीढ़ियो ताई सुनगती रचला। प्रेक चितराम हो 'भूतां री सवारी-हिरोशिमा में लाय लागवा रं तुरन्त पर्छ री दिवो हो। पूर्व काळा पहियोड़ा नर कंकाळी रो झड ज्यारा कपड़ा बळ गया; नागा, चामड़ी फाटियोड़ी, गाभा ज्यू सकियोड़ी, हाथ मूडा सूषियोहा, दुख सूहोस हवास गायब, ज्यों में प्रत सूझ न गत, विचळायोड़ा, दवा ज्यू वीरान हुयोड़ी गलियों में बेमतलब मटक रया । उण वखत री असली हालत ही मा। मेक चित्र भौर हो । घंटम बम सूनिकळी बेहिसाब गरमी सू लोग पवराय गया। पायल 'पाणी-पाणी' कर रया । पाणी कठं ? नळां री संगां टूटगी चारू माडी नै साय सागरी तिसिया मरतां कठ सूख रया । पारीर धावा हूं चिरीज रया । 'पाणी-पाणी' करता नदी साम्हां दौड़िया । दौड़ी वांसू प्राय नों रयो, सांस लेणी नी माय रयो । उठता-पड़ता नदी रे किनारे जाय पाणी रे होठ लगायो। हा बठं रा बढ़ ठंडा पड़ गया । नदी किनार लोथा रागिना लाग गया 1 हिरोशिमा शहर र माग्न सात नदियां वै पर सात नदियों लोथां सूभरगी। सुवह रो ववत हो । टावर पढण ने गया हा। मेक दिन पला हवाई हमले मू टूटियोहा घरां में मदद सारू नावा से स्कूल रा टावरां रो प्रोग्राम हो । मास्टर र लार स्कूलो गटावर टोळा रा टोळा मदद सारू जाय रया “हा। उपहीज वक्त वो हत्यारो पापी वम पड़ियो । 'मां-मां' करता भोळा- माळा मूडा र टावर बढ़ रायठ संझ गया । उरण वेळा रो चितराम देखणी नी प्राव । जई हिरोशिमा री मांवां प्राधी रात रा 'सणण-सणण' करते वायर मे मां-मां' रोवता टाबरा रा हेला सुरणे । म्हारे सूतो वै चितराम देखणी नी माया। प्रांखियां मोचन बैठगी । चितरामा नै देख-देख हिरोशिमा रो जापानी लुगायां रोय री ही । उणारे मूढाग उणां रा टावर यू ही 'मां मां' करता, बळता-वरळवता मरिया हा। कितरा ई टाबर बठ कमा-ऊमा प्रापरा मां-बाप ने याद कर रोय रया हा । हे भगवान् ! वो नजारो याद आ जद प्राज भी म्हारो काळजो थर-थर . करवा लाग जाये। (7) इण विश्व सम्मेलन में संसार रा सारा ई देशां सूप्रतिनिधि माया- हा।

54/गद्य संकलन अमेरिका सूई पांच-सात सरदार आया हा । उ में हा. पोलिंग ई हा। डॉ पोनिग अमेरिका रा नामी रसायन शास्त्री है । प्राणविक अस्त्रां ने काम मे लेवा पर्छ उपां से कोई-कोई असर दुनिया माये हुवे, इण विषय में हो पोलिंग घणी शोध कोधी है । इण ईज काम मार्य प्रान नोबल पुरस्कार मिलियो। डॉ. पोलिंग सम्मेलन में घणा जोरदार बोलिया। हा. पोलिंग रो भाषण सुरण, मुणबावाला रा कानां री खिड़कियां खुलगी । भाग दुनिया अंधारी दौखबा लागी । म्हारा रामजी ! म मोटा देशां रा मोटा लीडर में कुबुद्धि प्रायगी तो मा दुनियां, जिएन हजारां वरसां सूमानवी सजावतो, सिणगारतो खप गयो है, मैक पळ में गारत हो जावला। जापान रा लोगां इण मणुबम-विरोधी विश्व सम्मेलन रे मोकं 4 रहो जबरदस्त शांति मार्च कीयो । दूर-दूर सूमिन व पणां चालता, मार्य करता, हिरोशिमा तक पाया | ताबड़ छाया राषका ने पार रामूयियोड़ा मोटा- मोटा टोप माथ मेल राखिया हा। लांबी, खूब लांबी सवारी निकळी । सगळा भाग तो पैदल मार्च करने भावणियां, उणार लारं विदेशां भायोडा प्रतिनिधि पाच हिरोशिमा री भएपार जनता । भरी दुरी। कोई तीन बगियां रो ताबड़ो तड़क रयो। सूरज कड़क रयो। सवारी चाली। म्हां लोगो ₹ प्राप-मापरा देशां रा झंडा हाथ में। पसीनो टपक रपो। गेलै रदोई प्राडीने मिनस भरियो। पाळी फै तो भांगणं नौं पई। दुकानां रो, घरां रे छतां मिनखोलदरी । छतां पर मादमी-तुगायो फूला री वरखा कर रया। रंगियोड़ा कागजां री करतण री पुष्प-वरखा करणे री बठे रीत है। कंचौ अंधी हवेलियां सू कागज रा फीता नीचे म्हांप लटकाय रया । फूलो सू सड़क भरगी। माया पे रंग-रंगीला कागज रा फीता लटक रया । टेलिविजन सारू तसवीरां संचवा ने हेलीकाप्टर माया माय-माय, उह-उड जाय रमो। मो उछाह भर स्वागत जापानियां पण लोगां रो कोधो जो भाविक मरत्र पाबंदी लगावा रोमावाज उठावा ने देश-विदेश सूसमंदर लाय ने माया-पैदल चालता, शान्ति माचं करता, देश रा खुणा सुरक्षा म, टायू-टापू सूबट माया। यूं तो घारू कानी हरख-उछाह नजर भाय रपो हो, पण परता जमने नजर नाखवावाळा नं मतस में और ई वात दोखी। सड़क २ दोई करनी ममी सुगायो रा हमाल मामूहा माला हा मो मा देख उप री मोहियां मागे पक्षा बरसां पेला रो नमारो छाय गयो । पाने पर बीती गद्य सकलन/55 याद मायरी ही । वारा हिवड़ा हबका लेवा लाग गया। वं मांसूहा पूछती जाय री हो, पर फीका-पीका मूडा सूमुळक ने शान्ति-संनिका रो स्वागत करती जाय री ही । उलारी अन्तर रो भन्दाजो लगाणो कोई कठण नी हो । सगळी जापानी मावां री मेक भावान ही-म्हारा टाबरां री लैरियत सारू शान्ति री मावाज उठामो। मार्च कर न मावरिणयां पर परदेशा प्रायोड़ा प्रतिनिधियों सारू उप रा मन में घणो मान हो । मार्च करणियां ने रोक-रोक पाणी री गिलासा सुगायां मलाय री ही । मन तावई मे कळमळाती देव प्रेक लुगाई प्रापर माये रो टोप उतार म्हार मथि 4 मेल दोघो; भेक जणी माप रो पंखो म्हारे हाथ में झलाय दीधो । मन कड़कड़ते तावड़े में तपती भर पसीने सूलपपथ देख उपां ने दुत्र हो रयो हो यूरोप सूमायोडा प्रतिनिधि तो तावड़े मू लाल बम्ब पड़ गया। उणा रा कान तो इसा राता हो गया के जाणं प्रबार लोही टपक पड़ेला। सवारा सूची जूभारां री देवळी पं गई। घटम बम सू मरियोड़ा री याद में काळे माठ री समाधि बायोडी है। सगळा जणां बठे जाय माथो झुकायो, ढोल पं ताल लागी । ताल रै सार्ग बंड री धुन गगन गूजाय दीधो- Never again the Atom Bomb कदई नी, प्रब टम-बम कदैई नों। सुर में सुर मिलाय लावां कठ गावा लागीया-- अंटम-बम कदैई नी, कदंई नी । कदई खाली बैठी रंऊ तो उरण सांझ रीवै गहरी भावनांवां याद प्राय पर मैं वांमे गम जाऊं। - गद्य सकलन/57 योड़ी है कोरै थूल पर और प्रास्था उण री प्राधी उधार पर, आधी हवा पर । दृष्टि उरण री टेलीविजन र काच पर जादा और मानखरे प्रेम पर कम । कान उण रा टेलीफोन पर घणा पोर गरीब, असहाय रे दुग्बी सुर पर कम । पाखी चेतना उपरी अनासक्त सेवा मे कोई तावभाव, और प्रोपेगेंडा में बेहद । इण खातर ही तो प्रेक वर्ग साथ, भेक धर्म दूज धर्म साथ, अक राष्ट्र दूज राष्ट्र साथै, प्रेक पार्टी दूजी पार्टी साथ, पैक वाद (साहित्यिक हुवो चावै राज. नीतिक) दूसरे वाद साथ सावळ सुखदाई सूधिकरणा प्रौखा हुयग्या । धिक है, मरता-डूबता, पण संसे री नाव रो काई भरोसो, जठे ही थोडे-से स्वार्थ रो मार वध्यो, खुद री रोटी नै सिकताव कम लाग्यो (Interest clash) तो सळू सटै मेस मारतां ताळ ही कित्तो ? या समस्या गणित री नही, इण पांघे जुग री पर उग में जलभ्य माख मानख री है । से देख, से भोगै; माय रा मांय कूकै, कोसीस कम रोळो घणो ही करे। घणी दाया जापो वोगड़ो भला हो, सुघरण ने कठे? जुग री वात चालगी जद कणो पड़े, जुग तो जुग ही है। जित्तो सरावो थोड़ो, जित्तो थुथकारो नाखो कम; बस, कसर इत्ती ही है के है प्रांधो, बाकी चम- स्कार ने नमस्कार तो करणो ही पड़े। सिनेमा में साग वड़या जित्तै तो घर वस्योड़ो, वारं नोकळयां पर्छ माडी-सी छरणगी, तलाक; घर इत्तो सांकड़ो हयग्यो के दोनू दोरा-दोरा ही को मावे नी पण मौको पढ़यां भाषण तो सह-अस्तित्व रा छांटसी । टेम ही लंक्चर री है अबार । इण जुग में भादमी जद चाद पर भापरा गोरा, गंधहीण चरणारविंद राख दिया और बढ़ बसण री वात करण लागग्यो तो प्रावात अचम्मै री तो काई डा है क नहीं पण प्राशंका री जरूर है । हूं सोचू, जिको भादमी प्रठे निचळो को बस सके नी बो चांद पर जावतो ही सूधो देवता वरण जासी मा कम ही जचे; कम काई, डोळियो देखता तो जचरण ने जाग्यां ही कठे? महल री वीडी पर बैठयो कागलो हंस हुयो माज ताई तो किरण ही को सुग्यो नी, माग अकुरजी जाणं । बठे पूगणमाळां में हुसी तो कोई भमरीकी सिरदार हो, का कोई रूसी, का कोई मंगरेज मावड़ी रो जायो हो । घरतो पर, प्रेक- दूजे नै देख्यां तो जिकां री मांख्या में लूण बरस और बढ़ पग धरता ही उणां रै नैणा में नेह रो नदी ऊमड़ पड़सी, मा कियां वर्ण ? बढ़ भी तो अठली कमाई रा पुद्गळ ही काम करसी। अमरीका माप री वाड़ वघासी मौर रूस माप री। अंगरेज रा बावनी पग तो इण कामां में धरती पर नामी योड़ा है। वाड़ वधारणी सावळ ताब नी प्रायो तो दोनों में लड़ाई रा लाडू तो वांट 58/गद्य सकलन ही देसी । केवण रो मुतलब, बढ़ गयां पर्छ कगियोड़ा सीग और वषसी और बै आपस मे अझया बिना को रवै नी । फेर का तो ऊपर फैक्य कांकर-सा से पाछा ही नीचे, और का सारं साथ रा राजीखुसी रा समचार प्रावणा ही योखा, बठे ही पापो पाप समोसमा। राम कर इसी नही हुवै, बै समथं है तो जावं सुख वस; पण वळे सिरके ही कठे । फेर तो धरती री आबादी री समस्या सुळझी ही पड़ी है। भगवान ने पा ही माळा फेरो के घरणखरा समर्थ और सोग ऊगियोडा चांद पर जावै परा और गरीब सपूतां री जवानी मुक्त हुयर सोरा सांस लेवें। (2) सह-अस्तित्व सू म्हारो मुतलब अंक पर-घरमो बात दूसरी साग, मेक काळो, प्रेक गोर साग, अंक आदिवासी भेक नव साग, मेक साम्यवादी भेक गर-साम्यवादी साग सावळ वास कर मारण सूप्रेक-स हक-हकूकां री छाया में वस, खांध सूखांघो मिला'र चाल सके । सोचण री बात है के धरती पर प्रायोड़ा पादमी धरती छोड़'र कठे जावे । कूवो-खाड करे का फासी खार मरै परती पर स्वरा ने दो पावडा जागा चार का नी ? और वा सोरं सास कोई देवरो को चावै नी, सह-अस्तित्व रा कोरा प्रस्ताव पाम करयां तो की वट नही। लका संसार र नर्स मे अंगूरी टिक जितो देश है, बो प्राय दिन भार- तीयां ने गोदाम सूविको री बोरया निकाळ ज्यो निकाळ दै। बोरया तो बापड़ी निर्जीव है, अठे तो सजीव रो हाल ही बेहाल है। बर्मा काल ताई भापण घर ही मेक सूवो हो, प्राज उग भारतीयों ने, कोई हर खेत सू' गयां जियां, काढ दिया । धन-माल जबत, बो पड़यो रस्तो, कुकीजे जितो कूाको कठे ही । किसीक बात है ! जर्मनी यहूदियां नं पर अंगरेजा दक्षिणी अफ्रीका में इसी राफड़लीला पाली के जाणे धरती मार्थ गोरा काळां रा गांव ही न्यारा बसता हुवं । कबीर र शब्दां में जाएं गोरां रे पावरा रो रस्तो ही न्यारो । काळा री खाल वासती हुवै प्रर गोरा कोई सरेनरी मोगणी करता हु ! नीग्रो प्रमरीकन ने ऊमा ही को मुवावं नी, पानी वं के ही छिपा पड़गो मोर कोट लागायो तो किस के हुसी ? भायी तो ही धाम ने वएगो धिरियाणो ! इंगलैण्ड री रक्षा पातर लड़ो, कटो, मरो हिन्दुस्तानी, ये बगहाण तू बामणो जाथा, आन बान काहे नहिं आया। ने तुरंतु तुम्की गापा, भीतर सतना क्यून कराया।

गद्य सकलन/59 मौज लूटो पर मजा करो मंगरेज ! खावण ने सूर कूटीजण ने पाडा! जोर घोंगाणो और सोधापरणो किसोक ? ससार रे इतिहास में कठे मिले इसो भनूठो उदाहरण ? प्रो सह-अस्तित्व कित्ता दिन निर्म। पैला दुवै जिक री गाय, गाय हुवो मला ही किरण रो ही। अफ्रीका, पास्ट्रेलिया, कनाडा, अमरीका, जठई पोल लाधी, घंस बैठ्या । अगरेज उणां रादूना भाईवन्ध । बठे र मूळवास्यों ने कूट-पीट'र काढ दिया, रेवण दिया तो डांगरां मूही माड़ा कर परोटया और अज उरण सागरण ही लाठी सूवियांई चराव जाणे बै सं ग्रेवढ़ री भेडा हुवं । ऊन कतरता जुग वीतम्या, तोई पाप को माई नी । नागाई यारो ही प्रासरो। संयुक्त राष्ट्र-सघ, विश्व-स्वास्थ्य- कल्याण-संस्था जिसी दोखत री फूटरी संस्थावा खोल लांबी-चोडी वाता छमक, लाखो रुपियां रो परसाद प्रोपेगेंडा री प्रतिमा र भोग लगावै। विश्व- धर्म सम्मेलन, नाटो, सीटो और कुण जाणं कित्ता-कित्ता कुड़का रचं । सह- अस्तित्व और लारं रयोड़ा लोगां न स्वास्थ और सबळ बणावरण रा बिल पास कर, घोषणापत्र त्यार कर, मिशन भेज, मुलका नै ढकरण नै झुगला-टोपी बांट और घर में भूवाजी मा रे जायी जिसो फिर। सद्-विचार रो डोरो ही डील पर हुवे किसी पोल पड़ी है। बैठा-बैठा होळे-सीक नीचलो वासण इसो बंगो खिसकावे के मर जिका तो मरे, धम्मीड़ और बोले । पर्छ उणां ने लोग- दिखावं रा होळ-सीक बुचकार न्यारा ही- क्यो, लागी तो को नी ? पाप चूस प्रांतड़या ताई, पण दूजां ने समझा 'दया पाळो' । प्रा राजनीति है, साथ भौर स्नेह र तुळी लगावो । कागजी काम पक्को हुवणो चायोज, जमाने री मांग है, मायो जुग भा ही चावं । जमानो मांधो, हवा बोळी, जोड़ी मिली रे जोगियां ! मांगो'र खावो । । पाकिस्तान काल ताई मिनख री पूछ-सो कंठ ही को दीखतो हो नी । माज भारत मे उरण भारत रा वाड़ा कर'र प्रजा सागण पण घजा नूवी धारण कर ली। साग रेवतां पीदयां गळगी; काका, बाबा, केय-केयर कित्ती सदियां गुजार दी, अबार इसा काई खुर वघग्या हा के साथ उठणो-वसरणो मुसकल हुयग्यो । धरम खतरे में है, सह-अस्तित्व को निमें नो--में प्राग- लगाऊ सुर कठे सूनिकळया, जिकां करोडूं मिनखां री समझ री दिगली में चिराख नाख दी मोर आप भाग सूपरियां तमासो देखरण नं दूर जा बैठ्या । संकीर्णता इयांई कम को ही नी, धरम र नाव पर मोर सांकड़ी हुयगी, नही, कर दी। कोई बात नी, थारो अस्तित्व रंवो चाहीजे, पण मेकर कोई पूछ तो सरी उरगां ने कं मब सोरा हो का पला हा? दो जुगां सूघणा हुयग्या, 60/ गद्य संकलन अाजादी रो मोटियार जवान लुगाई मज चुणाव रे टाबर रो मूदो को देख्यो नी, ये बात करो सोराई री! चालो, वाड़िया मिलग्या, पर उणां सू पाप कठं ? भळं वघाऊ चावं, लड़ परार, कूक परार-जियां हो ताई पावै। गुड़ दे नही तो छोरी हुय जासू-- मा कित्ताक दिन निर्म? काचर रा बीज जागां- जागा सुक्या ऊमा थापी देवे, कान में समझाये के पस्त्र-शस्म म्हे देसा, लाम लगावरण रो सगळो सामान म्हारै कन है, पइसो हो को लेवां नी । गूगारे गूगा ! गांव मत वाळी, भलो चेतायो। बस, गूगसांड ने इत्तो ही चायोजे । म्हारी एक फूट तो फूटो भला हो, सामल री दोनू नही रेवणी चाहीजे । रोटी, कपड़ो और रेवण ने जागां, इणां री चिंता नही, शस्त्र पाती भेळा करो; नकद, उधार और माग'र किया ही । इसी समझ सोधी हो को लापं नी। प्राय दिन भारतीयों ने ही नही, मेशियावासियां ने भी कोई-न-कोई कर- चूर्ण में देय'र काढ दे, कोई की करे तो कगे देखां । समझाव बो पद और पड़े । मोडा घणा मौर मढी सांकड़ी। आगला ही पोचीज, तोई सरकारी बापड़ी बसाव हो । पण समस्या द्रोपदी रे चीर सौ सावटीज ही नहीं । लिप्सा री लाय समझ री बाड़ में लाग्यां पर्छ लारं ऊबर मणसमझ री राख, बा नागाई री पून मे भला ही घाप'र उडावो । वातां धरम करम री। इस सू काई ? लाभ तो भाव मे है मौर यो घर में ही वीगड़ग्यो । पस्तून कंव, स्वतंत्र हुयग्या, अवै म्हाने ही म्हारी पून मे सोरो सांस लेवण दो। प्रा सुण जद भाईजी चमक । वाड़ियां में भलं वाड़िया । इण में अचूम्भ री काई वात ? अं तो हुसी ही, नींव ही इसी लागियोड़ी है । फिटोळां रे कवरण सूप्रेकर बंगाल (पूर्वी) ने ही मसाणियो वैराग ऊपड़यो, मजब रा भगवां पैर र बाबोजी वण बैठयो । प्रापरो घर वळण लागियो जद चेतो हुयो, पूर फैक्या। ठंडे मार्थ सूसोच्या ही लारो को छूटघी नों, चौईस-पच्चीस साला रोखायो-पोयो सो निकळग्यो । निकळग्यो जिको तो नीकळग्यो, घरमाळो और उजाड़ बैठयो। समझ तो है लोग पण कूट खाया पर्छ । चीरा कूट तिब्बतिया ने, उरणारं ही देश में 1 हजारू ही प्रायमापन हिंदुस्तान में वसग्या । प्रा ही कोई वात हुयी ? लंका, बर्मा, कागो, केनिया, युगाडा, स्पेन, पुर्तगाल सगळा ने हिंदुस्तान सोनं री चिड़ी दीस, पाख्यां खुसगी तोई लागे को छोडे नी । पण दूजां ने दोप ही काई देवां, घरपाळा हो को समझ नी; सिक्खस्तान, जाटस्तान काई ठा काई-काई तान छेड़े। पासाम भेक रा तीन यग्या, पंजाब ग्रेक रा दो, मांध्र सवाल करण नै त्यार । प्रांतां रे पूत जलम । वडो तमासो है, नीवड़सौ तो कुण जाणे किसाक ? ईसाइयां मौर गद्य संकलन/61 विदेशी कूटनीतिज्ञां मुफत रो र देवण री दुकानां न्यारी-न्यारी खोल राखी है। सह-मस्तित्व नै वेमार करण सासर । तान लांबी, समझ सांकड़ी। देखां, कियां ताब भाव। पास्ट्रेलिया में सिवा अंगरेजो रे कोई वस ही को सके नी, जाणं उण नै किणी मंगरेजरपो ही जण्यो हुवे। सह-मस्तित्व र पस्तिस्व में विजोकलो करण रो उळटो पाठ छकड़ चाल्यो कठ सू? पणखरो पश्चिम र साम्राज्य- वादी देशां सू। उपनिवेशवादी देशां रो लूझो इसो घालियोहो है के जल्दी- सीक सुळझ जद फेर पाल्यो हो काई ? कोरिया दो, वियतनाम दो, भारत दो. तीन, जर्मनी दो मोर भठे ताई के बलिन दो। वसावणो ताब नही आवे तो विचाळ भीत पाल'र ही सही। विगाड़णो जिकै रो काई नाव ? दळिया रा गुठला मोर वीं साब नी मावं तो धान रो सवाद तो विगाड़ ही दै। फूट घालो मोर राज करो-यो मोटो मौर मूळ मंत्र अंगरेजी घरती ने विशेष रूप सूदियो । उग रो गुण कियां भूली ? पूजा हुवणी चापी उणां री तो । ताब नही भावं बा बात न्यारी है । 'उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुंबकम्' रो राग करगिया तो मकल-वायरा प्रवाडिया हा । वे घरतो र वैभव ने समझ ही काई हा? उगा रो तो इतिहास ही बदळ दियो । घर रा राख्या न पाट रा। इण खातर ही इणां रे राज में कदैई सूरज को छिप्यो नी परा लू को री चाल ने लख्यां पर्छ ताळ कितीक लागो ? सूरज देवता छिपतो हो दोस्यो । वायोड़ा तो काटणा हो पड़े, मोड़ा-चंगा कर्द-न-कद । (3) मापरी भाषा री भाग इसी पायी के लोगां घरमाळी ठंडाई री उळटी करणी सरू कर दी। जुगां सू दसू-वोसू भाषावां जिकं उपमहाद्वीप मै तीजणी-सी फूटरी सह-अस्तित्व री मास्था रो इमरत पी'र हंसती-मुळकती हो, अगरेजो प्रेकली उणा रो साग बसणो मुसकल कर दियो । गधै रो पूछ पकड़ायो तो इसो के मूढे पर लातां कित्ती ही पड़ो, सोर सांस छोडां जद झाल्यो ही काई ? माप र स्वार्थ खातर मादमी रो 'स्व' कित्तो सांकड़ो हुवे। 'स्व' जित्तो हो संकीर्ण, सह-अस्तित्व नै बित्तो ही डर । 'स्व' रो विस्तार सह- मस्तित्व रो प्राधार । हूं केऊ जिको साच, म्हारी पार्टी सोचें जिको ठीक-बस अं विचार ही पनपणा चायोजे, बाकी नही। सह-अस्तित्व नै फेर आसरो कठ ? प्रबार मा ही अवस्था नागी हुय र धरती पर नाच पाल; देखा, किया पार पड़े ? दवाई जद ताई उलटी, बेमारी ववसी ही। तो, घरती छकड़ चावं काई ? विविध वर्गा रो सह-अस्तित्व, उणां रो 62/ गद्य संकलन साग विकास वैभव, और साची पूछो तो इण वाव और सदभाव सूही उप विधाता-बागवान प्रापरी कळा रो विस्तार करधो है भो 'विश्व-बन'। पण जद सगळां सूस्थाशो, समझदार मिनख-विरको प्राप जिस वर्ग सार्थ को रंय सके नी, उण वेळा ग्राह और उसासा री पून इरा बाग सूप्रेक दुरगंय लेयर ऊपर उठती सरमा, बाग री सार्थकता इण में कट? मिनख रो मोल ही दूजां ने सुख पूगावरण मे है, आप रो पेट तो कागला कुत्ता ही भरं है। The glory of human life is to serve others and not to be served साव जचती है। कोसीस तो प्रा हुवरणी चायोजे के देवता मिनख री धरती पर उतरण नै मूंढो घोचे, और हुवे ग्रा है के मिन यो नै देख'र गराई चमके। फेर नो वाजो किया पार पड़े ? 'सर्वे भवन्तु सुखिनः'धरती सू मिनख ₹ इस पारमार्थिक प्रयास रीअंक दिव्य गघ जद-जद उठ र मनंत में फैले जणांही सह-अस्तित्व री बाजरी रे मानवी वैभव रा सिट्टा नोकळे; गंपवतो घरा रो अर्थ फेर ही समझ में प्राव मोर फेर हो हुवै मिनख रो मोल।

साहित्यकारां रो तीरथ : गोरकी रो घर रामनाथ व्यास 'परिकर' मक्सिम गोरकी रो नांव संसार रा मोटा साहित्यकारां में सिर गिरणीजे । म्हे म्हारी जिग्यासा ने पूरी करण सारू गोरकी-विश्वसाहित्य-संस्थान में उगा री पोती सूमिलण ने गया । म्हारा गुजराती भायला श्री अतुल सबानी साग हा। सोवियत्स्काया कल्तूरा (सोवियत संस्कृति) समाचार-पत्र री सवाददाता कुमारी लेविना इण मायोजन री सगळी व्यवस्था करी। मैक्सिम गोरकी र नांव जिसो ऊचो मोर प्रोपतो उणा रो घर रूस रे सगळा सू वडे रईस रो महल हो । घर में बडतां ही मैक्सिम गोरकी रे बेटे री बहू नदादा मैक्सिम पेश्कोवा मोर गोरकी री पोती धरण प्रादर सू म्हां लोगां री अगवाणी करी। पूरो घर भेक स्मारक रो रूप है, जिण रो देख माळ प्रेक संग्रहालय रे रूप में करी । माय बडतां ही घर र प्रांगण में खुलता दो हाल (बडा कमरा) है, भेक में गोरकी रो साधना-स्थळ और दूजे में उणा निजी पुस्तकालय है । गोरकी री साधना मेक मोटी और ऊंची मेज माथे हतो, कारण वे अक फेफड़े रा मिनख हा मोर राजयक्ष्मा रा रोगी हा । उणारे व फुट कदरै माफक जमी सूतीन फुट ऊंची कुरसी माय सीधे बैठरण री डाक्टरी सलाह मुजब प्रा रचना हो । मेज री कोई खास साज-सजावट नही ही, बेक कलम राखण री लकडी री ट्रे, दो पैड पानां रा, अंक दो खणां को दवातदान, रंगविरंगी पेन्सला राखरण खातर लकड़ी माथै लाख र काम री गिलास बस मा ही ऊंची मेज री सामग्री हो । मेज रे डावे हाथ माथै कई पोथियां पर नोट हा पर अंक ट्रे राम्बियोडी ही। मेज रे नीचे प्रेक मोरी टोकरी रद्दी मारू ही । कुरसी र लार मेक लाबी काच री मलमारी मे किताबा री कतार लागियोडी ही। डावे हाथ पासी प्रेक घग्गी मोटी काच री खिड़की बाग में झाकती हो, जिण माथ पड़दो नी हो । कमर र दो दरवाजां मांय सू दूजो रवण रे कमरे में खुले । जीवणे हाथ पासी मोटो पाठ-फुटी कपड़ा रावण री काच री मलमारी में .

641 गद्य संकलन गोरकी रो पोवरकोट भौर कपड़ा मंक एव फुट तक फौजी री पोसाक जिसा हा। अलमारी में नीच क जोड़ो ऊंचा बूट राखियोहा हा और मूटियो मायं फैल्ट री नाइट कप चौर रेसगपूरे जिसा दो रोप हा पुणं मे कभी वैत ही। सापले पासो अलमारी मे गौरकी नै मेंट में मिली सामग्री में हिंदु- स्तानो मूर्तियां और पीतळ री कला रा फलदान हो । इशा र अलावा हायो दोत, चमडो, रेसम, लकड़ी, चांदी, सीप पादिरी अनेक फठरी चोराखि- योड़ी ही जिकी चोरण, मांस, जर्मनी, इटली, ममरीका, ब्रिटेन, यूनान पौर जापान देशो री हो । सोवरण से फमगे मोर रवण रो कमरो कहा हो, कारण लिaat-लिखता थाकेलो प्रायता हो सारली पाराम-कुरसी मोर छोटी मेज कुरसी मार्य उणा ने नीद लवण पर फेरे उठन लिखण री मादत हो। कमरे में ग्रेक माठ फुटो पलंग हो रिको सादो और सफेद अनी-मूती चादर सूढकियोड़ो। सेज ₹ सिराग कन छोटी-सीक मेज माय गोरकी रं पुर मैक्सिम तसवीर ही । प्रा वात नेणा में जळ भरता उरणारी जोडायत म्हानं विशेष रूप सूबतायो। गौरकी ग्राखरी वरसां में नीचली मजल माय स्वता, कारण खून रो दार और दम से शिकायत हुवण सूकपरली मंगल माय जावणो मना हुयग्यो हो । वाता-ही-वाता में नदादा पेश्कोवा म्हांनै बतायो के गोरको दिन पर लोगां सू मिलती वखत कारखाना, गांवां, खेतो मे भाप रा मोट ले लिया करता और लिपरी क्सत सगळा नोट मेज माय राखनै लिखता जाता। कण-कण नोटा मा लाल-लीला सेनारा करता, मौर लिखाई रो काम पूरो हुता ही सगळा नोट दो रो टोकरी में भर देता, और प्रदीतवार नै बार बाग कबीच, उगा रो होळी जगावता । सगळा दाबर ने और दोस्तों ने बुगा- वता मोर सेवा रा पत्ता साग मोटी कैपफायर-सी लगावता और उठा-मसकरो करता । बगीचे में सेवा रा पौधां री संभाळ बैं खुद करता । माप रो कुहाड़ी सूनजीक रा जंगळां मे पंख काटग से शौक उणा ने घणो हो। बाफ रा खेल खेलता और घूमता रवता । भांगण र पार नीच री मंजल में गोरकी रो निजू पुस्तकालय हो, जिरा में च्यारू मेर भीत री जागां काच री प्रलमारियां पोथियां सू अटी-दटी ही। बीच में अडाकार भावनूस रो मोटी मेज हो जिएर च्यालमेर सोवणी कुर- सिया हो। पढ़ रो घणकरी पोथियां मापं गोरकी र हाथ रा सेना और किनारै रा हाशियां मार्च टीपा लिखियोड़ी मिले। घणी खुशी री बात मा है के इण पोथियां रीटीपी माय गोरकी रै दिमाग और चितन री शोध लारता गद्य संकलन 165 बीस बरसां सूबरोबर हुय रही है। भारत रा रवीन्द्रनाथ ठाकुर भोर गांधीजी बाबत कई टीपा इएरी कलम सूलिस्यिोड़ी मिले जिण मार्थ शोधप्रबन्ध उरणां दिनां गोरकी-विश्व-साहित्य-सस्थान रा विद्वान त्यार करता हा । इण रे मलावा भारत-सम्बन्धी, कई दूजी भाषावां रा ग्रंथ उठ हा जियो में रोम्यां रोला री पुस्तक 'महात्मा गांधी गे मूळ प्रति पौर स्वामी विवेका. नंद री जीवणकथा, विकी गोरकी नै मेंट में मिली ही, म्हाने दिखायीजी। शोध रो दूजो विषय देश-विदेश में हजारां साहित्यकारां, राजनेतावां पर कलाकारां सू हुयोड़ो गोरको रो पत्रव्यवहार है । इस विषय मे रूसी, अग्रेजी भोर दूजी भाषावां में गोरकी रा पत्र छप चुका है । लेनिन र साग गोरकी रो दोस्तानो हो । सो पत्र व्यवहार भी गोरकी साहित्य रो मेक प्रमुख अंग है। प्रांगण सूऊपर जावरण रो रस्तो रूस री भवन-निर्माण-कळा रो जीवतो- जागती चितराम है । भवन मालक रूस रो मोटो रईस हो जिके इटली रा कारीगरा सूपगोथियां री नाळ मोर हाथ धरण रो लरदार सापरो, वणवाया हा। हर रग र मकराण में रंगविरंगी धारियां री समुद्री लर रो भो कट- कड़ो म्हारे जीवण ओपीड़ी पदभुत कळानिवि हो । प्राजकाल इण नाळ ने काम में नहीं लायीजं, जिण सूबारल पासी लोह री नाळ मायंकर म्हे ऊपरली मंडल में गया, जठं खाएं री मेज म्हार स्वागत में सजी-सजायी त्यार हो। मांत-भांत रा पदारयां में रूस री चेरी, सेवां और फळां रा मुरब्बा, पटरिणयां, भर मीठी-नमकीन डबल-रोटियां, गोरकी री मनभावण, म्हारी भी भावण वणगी हो । 'समोवर' में राखियोड़ी चाय और मनभावता फळां रा रस पाणी री ठोड़। दही, दूध, माम्वरण, पनीर, सूका मेवा, सैत, साप री छतरिया, मालू री पापड़ियां और कासा (दळियो) मारतीय मैमाना रो विशेष भोजन पैली सूही त्यार हो । ऊपरली मंजल में मेक बडो कमरो साहित्यकारा र चितरामा सू च्यारू- मेर सजियोडो हो । भारत रा प्रेमचंदजी रो साधारण-सो फोट वतावता श्रीमती पेश्कोवा म्हांनै कयो के अमृतरायजी वादो तो करियो पण आ सौगात भेजी। प्रेमचन्द रो सोवियत संघ में विशेष सनमान है, कारण समस्यावां रा लेखक और जनवादी द्रष्टा गिणीजिया है। चतुर्वेदीजी इण बात रो कोल करियो के चोखे कनवास माथै रंगीन चित्र संग्राहलय खातर अमृतरायजी ने कयने भिजवासी। जनवादी साहित्यकारां मे तमिल और तेलगू रा सोवियत क्रांति रा दिनां में छपियोड़ा ट्रेक्ट और पुस्तिकावा है घणा सभाळन राखियोड़ा है । हरेक मुलक री पोधिया, जिको गोरकी रे हाथा मायकर निकळी पौर जिरणा रा अनुवाद गोरकी करवाया, भठं सार-संभाळम राखियोड़ी है। सोच री वचत गोरकी वश री इणां लामीणी लुगायां रे मार्ग म्हां जन- गोरकी माहिकानदायो।

राजस्थानी काव्य अंक निरख अंक परख कृष्णगोपाल कल्ला समय पारखी री परख परणी करडी । इस मूप में जबरी बिसेसता या के मो सार सार नै गहै, यो ने पण नी झाले 'मर फटके देय उड़ाय ।' मिनख पारखी घणखरी बातां सही निएम नी दे सके । बो ठहर्यो संसारी जीव, पर भापसदारी निभायां विना जोलो मुसकल । पण मम किण रो संगाती। बो किणी ने पण नी बगस। राजस्थानी काव्य में प्राखर को काई है, जो इस समै सूप में टिकसी ? इण से बेरो पाड़ा, इण पैली जै राजस्थानी काव्य री पीरफाड़ करां तो की बात बणं । बियां चौरफाड़ जीव मरे, सुदरता बिनस । पण जाणकारी खातर भो जरूरी है। राजस्थानी काव्य रा दो पम: विचार मर उण री अभिव्यक्ति रो माध्यम । अभिव्यक्ति रो माध्यम बा भाषा, जिको डिगळ रे गोद बैठो, पा उरण री नान्ही लाडो । हावड़यां जुड़वां ही । भेक उमर पर प्रेकर्स डील डोळ री। मां री दो मस्या सिरखी। दोन्यू पळी पोसीजी । हरिरस में गंगा-लाम करण र पैली वा बरोबर धन दड़बो दोन्यू डीकर्या ने बांटपो। की मिसो सोज हो, जिकी पर दोनुग रो बरोबर रो परिणयाप रयो । मेक सलगी रे मार्ग परणीत्री, मेक घरवाई पीव पाय पोर डटी। बा बारे निकळी तो भ्यान बढ़ यो। मा मधल्या उळझी, गणगोरा गाती, ईसर रिझाती-रमाती, टाबरी ई रंगी। घणा लाइ लढायां टाबर बिगड़े, घणा हेत जतायां भाषा । मुग्धा री बयसन्धि री भेक सीव, उरण रोम-वीझ री की पुक पड़ियां। घर वावरण खातर की तो अक्कल चाईजे। कोरे सरूप ने कोई कद तारणी निरख । चाम नों, काम न्हालो री उगत पण साची । गुजराती री चदकच्यानणी खिली, राजस्थानी मज सिंझ्या गावै, सिझारो कर, टाबरी-सी विरम्या गोव-जो। राजस्थानी मभिव्यक्ति पक्ष में देखा तो पावाला के उरण में बैणसगाई समदर र सूख्या बन्यो कादो कीच मोकळो। मनुप्रास री रुपए पणी। -- गद्य संकलन/67 उण बैगसगाई रे मांय, चितण रो अथाह हिलोळा लेता समदर ने बांघरण रो प्रतम हो । उण र सूख्यां इण अनुप्रास री बेकळू रेत मे बा सुरसती रमगी- गमगी। मन रो हिरण्यो अजे मरीचका में उण समदर रो भ्रम कर, छोळा लेव, तड़फा खाव, प्राण गमाव । मा वरण-मंत्री घणी मंहगी पड़े । जापानी छोऱ्या रा पग, लोहै र कसणं मे कसक जियां छोटा नान्हा राख्या जावे, उणी तरियां राजस्थानी सरस्वती रा काव्य-पद मा बरणमंत्री बांधे । 'बयण सगाई बांधिया पेखीजे' री उगत साव झूठी । राजस्थानी रे मरण रो मोटो कारण यो ई हुयो । पण प्रजे तक मरण रपट में लोग अंडी-बडी बातां बक। मान री राजस्थानी जो बाजणा प्राग्वरां रा बिछुवा बांब, घूधरा धमकाव, चालता काव्य रा मावका ने चैका बकावं, अर साच पूछो तो घणो मनरय कर। प्रो पाखरां रो मन्तरमेळ कवि ने की ऊंची चीज फुरण सूरोके । काव्य पर कळा रा मूळ सुर यूनानी मूरतां पर प्लाटो सुकरात रो बिचारणों ने परख्यां निजर पावै। उप मे जिण उदात्त पर निरावरण निरलकरण काव्यश्री री बात है, वा घणी ऊची । 'सूघे पाव न रि परत सोमा हो के भार' या बाणी साची । शिव पर सत्य तो सहजा सुन्दर हुदै । बिचार या कथा में काव्यतत्व हुयां, उण ने गणां गाठां रो दरकार नी पड़े । सोनं सूपोळीजी सेठाण्या कानी मांख्या रसिकां री वयू नी उठ ? काळिदास करणफूल री जागा सिरस पाकुन्ता नै क्यू पैरावै ? सिनेमा रा लोग गांवडं रा कथानकां कानो क्यू दौड़ ? अंक ई कारण है के ऊंची कळा अभिव्यक्ति प्रकृत्रिम चावै। मोना- लिजा रा होठां री मुळक लिजटेलर Vइधको सोहणी लागे ? यो क्यूकर हो ? स्यात में से प्रावरण सूरहित हुवे, इणा पर ऊपर सू पोती-पथेड़ी कळा री लिपस्टिक नी हुवे । यो ई कारण निजर पाच । पद्य पर गद्य री अभिव्यक्ति में कोई फरक हुवै ? पद्य कट गद्य रो कोरो दूरान्वय तो कोनी ? तो के गद्य पद्य रो प्रातरो छन्द पर व्याकरण सू हुवे ? गद्य री व्याकरण पद्य री व्याकरण मे कांई फरक हुवै ? कारक, क्रियापद- होए गद्य पद्य क्यू कर गिरणीजे? गद्यगीत कियां गीत कही? पद्य में मांडयां क्यूबंद्यक रा नुसबा भरम पैदा कर ? तुकात गद्य या चम्पू री बात भी उळझाव । बनिका ने कांई गिला? नाटकां-स्यातां रा बोल संस पदा करें। बोलणं री लकारी पर चारण बचना चातुरी या काणी रो मडारा वाघतो गारठ बड़वो, कठे गद्य बोल भर कठं पद्य मे हो देव, सोरठो समोव ? काना, बचना, प्रांख्या मर हिय रो विभेद की दमखम राखं । रश्य काव्य पर श्रव्य काव्य में घणो फरक कोनी । मैं कंवरणो चावूलो के दश्य कोरो नाटक ई कोनी । उए मे लिखी मोळी ने भी गिरगो, क्यूं के उग ने मांख्या पड़े पर 68/गय संकलन - देस्यां पलं ई काल्पनिक चितराम उपटे जद बधन पुरीज, तो कोरा कानां पर कठे भरोसो हुवै ? सुराणियो मुखभगिमा देख्यो चावे । रेडियो र कठे मन तिरपत हवै, बो टेलीविजन मांगे । कंची अंची विम्ब पतिविषित करती कमेंट्री की पए छोड़ देव, जो मांश्यां देख्यो चावै । 'मस्या देखो परसरामजी कदैन झूठी होमरी बात सिर। बज्जर पे बोरत दुसमी ने जद बाबूदा मुणे. तो शेलगरी निरमळाई मूड पर नी झलक । की बात है निगरो पूरो मेरो नीं पड़पौ। श्य, थय्य पळगा-पळगा भावे तो मिनस या तो सूरदास बणं या बापड़ो गूगो बोलो चरणं । भिव्यक्ति से माध्यम इसी सू दोनू बात न साग चावे नाटक रीसपळता रोको कारण प्रो ई लाग लपाव तो काव्य गद्य पर रं भेद सूनी परस्यो मा मरु, उण ने उप रे प्रभाव सूपरसो चाई। जद नेहरूजी भावड़े पर बोलता उरण बांध में मिंदर देवरं रा दरसरण करणं से बात करें तो उए ने गय गिण्या इन्याव हवं । लिकन गेटिसबर्ग में तीन मिनट बोल बोगद्य को गिणोज सके नौं। पूरणसिंह रा तीन निबंधों में तीन खण्डकाव्य गिगा तो पार पड़े। उणा में गद्य रो डोल है परण मात्मा तो काव्य ईनिजर यावं । राजस्थानी रो रनिका, भावार उतार-चढ़ाव पर हिलोळा खातो, कान्य सिरखी लागे । उरण नै गद्य नी कह सका। बात की साफ हुई के गद्य रो फरक छन्द-व्याकरण सू नो हुदै, उणा में कथ्य से प्रारमा उरण ने मळगा कर । मा काव्य री प्रात्मा काई हुवै ? काई दण ने कल्पना गियो ? परा कोरी कल्पना तो शेखचिल्ली सा सीकोट पड़े-दावै । तो इण ने विम्ब गिरणा ? पण बिम्ब तो हरा कल्पना सूवर्ण-मिटे? उगत री विचित्रता गिण? पण कण रो बेढब व तो सेवळ सू भी हुय जावे, फेर कवि ने विरमाजी जिस्यो मानणो नी संभव ? इण मात्मा ने, बीजा देशो रा बासी महत र उदात्त । पर मो उदात्त किरण में बस-बिरम ? उदात्त कयरा रे कध्य मे, सत्य मे हुप सके । उदात्त भावना पर मनुभूति मे हुय सके । उदात्त उण वायवी तत्व नै कय सका त्रिको मन रे ग्राम में इन्द्रधनुष ताण । प्रो इन्द पनुप कद तणे ? जद रस रो बिरवा थमं । हियो हिलोळा पाव, राव जदई मो उदात्त रो इन्द्र धनुष खिचे । बिरसा हुयां पर्छ, तिरपत मानि रो मनुभव हिम ने हुच को चिसो ई अनुभव पण काव्यात्मा रा दरसरण करपा पर्छ हुवे । संतो रा पद पढ्या हियो विभोर हुवे । 'एकोरस कारण एव' क्यू कर लाग? भाव की तो लौकिक हुवं, पर की मलौकिक । कार में जद लौकिक भावो रो रस बरस, जद हिय में की कसक हुवे, मेक तहाड़ाट जागे । हियो होला खा, पए उए ने शाति नों मिले। पिरपोराज संजोगिता हरे, कृष्ण रुकमणी हरण करं, पण भावक जद मोखाहरण पड़े, तो उचित मे बोजळी गद्य सकलन/69 चमक पण कुल मिला'र उण रै हिय ने में सारा रस शांति नी देव । संतां री बाणी में जो शांति है, मीरां रा पदां में जो शान्त खीरसमंदर है, उरण सूचन मिल । यो चैन चित रो दशा नी हुवं, हियं री हुवे, अर माव-लोक मे सारो मिनख रो अस्तित्व खो देव । स्यात आ ई मोक्ष री दशा हुवं । निह ई काव्य रो पा पात्मा संत साहित्य में मिळे । इण र प्रभाव में काव्य लौकिक, हीण, हेटो रस-दसावां सिरजं, पर उरण न हीगो-हेठो ई गिरणणो पड़े। सती जळ- बळ, जौहर कर-सूरो बिना कबंध जूझ, जूझार हुवं, पण भावा में उदात्तता इणां रा करतबां ने गायां नी माव। पण कबीरो अटपटी बाणी में, मन घुडल ममवार हुवे, मिरपला मार तो शिकार हिंसक होतां थका भी मनमोवरयो हुवे; पर निरगुण रा गायकां रे कीरत न लोक मे सिरजण मे सफळ हुबै; पर समूह प्रापो खो राळे, की मलमस्त हुयो मन गै हंस दसा पावै । पद लौकिक भावनगत सिरज सके, पण काव्य अलौकिक लोक में ले जावं । सूळी ऊपर सजी सेज मे मानखो इणी सूरसिय सूरीझे-मोजे । छंदा रा फद घणा कृत्रिम । वेदां मे में कोरा सात हा । सायद सात सुरा रा समायोड़ा में ई छद मूल छंदां री प्रोळ राखे । बो मतोळपो बिर्यो तो संस्कृत मे इण री बेल अमरवेल सी बिना मूळ ई पसरी भर काव्य रे मूळ विरछ पर .िसी छायी के छंद ई छंद रेग्या, रूंख नै बेल चरगी, ब्रह्म ने माया खागी । ठगणी रिसा नण मटकाया के कबोरो हाथ ई नी प्रायो, बी रो हुयने मरग्यो । पुरुप रे पुरसारथ ने जियां ठगणी बिस री बेल बरणो हंस-खेल खतम कर, प्रिसी होगी। बालमीक तेरा छंदां रा तोरण मार्या पर काव्य राण्या र रणवास में रास मांड्यो । वेदव्यासजी पठारा छंदां मे महाभारत मांडी पर भांडी । भागोत पच्चीस छतां मे वचीजो। पिंगल री पोथी छंदी री पली पोथी गिरणीज । प्राकृत पंगलम् ने इण रे बाद लोगा भणी-गुणी । अपभ्रंश में में छद टूट्या-फूट्या । की नुवै सिर सूसिरज्या गया । डिगळ छंद इणी अपभ्रंश राछोरा जायात्राम गिरणीजे । रतनू रो पिंगळ प्रकास, लखपत पिंगळ, जोगी. दास चारण रो हरि पिंगळ, उदराम रो कविकुळ-बोध, पर मंधाराम रो रघु- नाथरूपक इिंगळ छंदा रा प्रथ गिरणीजे । किसनं माद रो रघुवर सप्रकास भी या पर प्रकास गेरै । पण में से हरराज ने सिरोमणी मान । चंद नागराजर पिंगळ री याताई सुणी; दरसरण प्राज ताणी उग रा कोई, कर पायो नी । हरराज संस्कृत छंदा रे साग दूई-गाथा-छप्प रा लक्षण उदाहरण दिया है। उपन्तर छप्प रो सागो पाग महाण है। हिंगळ गीता रो, चाळीसो भी सौतरी, हुयो । जोगीदास तो बाईसो पंई थमम्यो हो। मा ई यसरी-शवेल राज- स्थानी रो मोर्ट रूप मरणोज-गुणीच । दूहे ने छोड़ा तो-राबोरया रा - 70/ गद्य संकलन - दरसरण प्राज र राजस्थानी काव्य में पण नी हुवं । बाकी रा छंद किसा मुळ छा में योग्या-खूटग्या? राजस्थानी छदा रो पौळ सू राजस्थानी लिखारो वाकिफ कोनी। बो हिन्दी रा छन्दा ने राजस्थानी में मां । मा बात घणी ब्रेजां नी । रुकी तो राजस्थानी सांमा तोड़ देसी। छ। विभेद रो पावर कारण काई ? क्यूह री बकरी रा दो पण, चूप-चूप बकरीजाया बबाट कर, मीगण्यो करें ? क्यूनों गायत्री फुरीजै ? सायद विषय मर छ मे की सगपण हो, मेळ हो, निको ने लोगड़ा भूलग्या । बात रोग सूमरी, पर छंद मूळ ले सोक रौ राखं, तो मी माज रा कवि कोकाट कूकई ज्यू कर मुळक । नासमझी ई गिरणीजसी । उगाने पिंगळ रो भ्यान ई कोनी । कई भाईड़ा तो कोरी तुको जोड, पर की चतर संगीत रा लंगा सा मलगा लोकगत रा सुरां साग सबद रळकावे । ठिम्मर बात तो या है के छंद रा फंद कवि न रहण र ढब रो अभ्यास करावं । सारे विश्व रे कवियों में प्रारम्म रा प्रमासा मे अभ्यास री सेवळ लवाने, उरण र पर्छ ईव सध्योई सुगं सू सहजै माये । राजस्थानी लिखारा कने पो श्रम कोनी, जिरणी र उपो रो काव्य-चतराई छंद रे गढरण-पढ़ण मे ई खतम इय रे । छन तो साधन है, साध्य तो उरण में कह्यो कथ्य ई हुवे, पण राजस्थानी मे अजै छन ई छ है। मा कथ्य री कमी हग भाषा नै मारसी। काव्य लोगड़ा कोरा छंदा रे खातर कोनो सराव । गीता रो श्लोक अनहद छंद नाद रे पाण कोनी पूजीजे-इए ने समझो-कण रे सारू की हुयां ई कणो मोपे, नीतर मांगीलाल परजी रे सांग २. रो पाघरो गुलाबी मंगनी ई मासी । गजानन्दजी री भोटी मूड लाडू पासी, पर इण छोटे नान्हे भूदर पर सवारी गांठसी। कान- सेना र कानो रस छोळता में तानसेन गवय्या खुद नै कंव, तो की मांट नई क्यू के उरणो ने कोरो कर रो ढव है, काई करणी है मा तो में वापड़ा कदे सोची ई कोनी ? सायद मा सोवणं री सामरय भी इणा गरीबड़ा करें कोनी । देवता से प्रा दात घणो दुरलम । राजस्थानी कास्य रा विषया नै देख्यो दिवाळो चोई मार्य। प्रो दाळद किया मिदं ? थोबड़ो चढ़ाया, गर- बायो. मून धारयां तो प्रो उप कोनी-- 'जानि परत है काक पिक' तो प्रेक बोल सूईचाच चोड़ कर उप ने की पण पदयो चाईज, गुगणी चाईजे? पण पर तो काईप, मुकलावा वहार पई के ख्याल ल्होड़ी देवर को पढ़? 'सोनो निप रेत मे' पढ़ के काई पढ़ ? उपनं पुराणं जून काव्या में डुबकी मारणी चाइज, पर नुवै विचारांमू जाण-पिछारण कादरी चाई। जद ई निस्तार निर मर्विन रचना र प्रत्तस मे मभा उप में मानन्द लेणे रो तब किसो ? सुन्दर पर गद्य सकलन/71 मूंचा विचारां रे बिना बात किणी ढब पण नी बणं । काव्य उपयोगहीण ठाळप रो कुबद कोनी ? उण सूहियो क्यूं हरखै ? काव्य सूहियो क्यू हरख ? स्यात उरण मे कई चीजा है जो मोळप र घरणी नेही । इणो सूकवि जात रो मोळियो टावर गिणीज। जियां टाबरां तूं हास्यां बोल्यां हियो हरख, उणी तरियां कवियां री भोळप में भी मन विरमै । कवि र हिय सवेदना रातार घणा झणकार मऱ्या । जाणे फिरांस री डाळ । थोड़े से बिचार-बाव र बह्मा जिया फिरांस मणकार कर, कवि भी उणी तरियां नाजुक संवेदना रो घणी । उण रे हिये जो ऊठ, उण नै बो पढ़रिणय र हिय उतारगो चावै । क्यूं चावं? क्यू के पापां कनै ढबण नै फुरसत कोनी, निरखरण न साबक मांख्या नही, सराव जोग जबान कोनी । कवि ने विधाता इरा ती दात न माला- माल पैदा कर-कवि जग र पङ्य प्रभाव रो बाणो में बरणन कर, बो मनुभूति नं बाणो देव, जो पातमा न पोस, ढाढस देव, प्यावस बवावै । कवि काव्य में प्रभाव कियां पैदा कर ? यो लय सू, बिम्ब सू, भाषा सू; बिचार सू, पाखरां ने प्रोळ्यां में विसो अक्षय क्रम देव, जियां पटुवो अडियो गळपटिय में मणिया पोवं। प्रेक ने अळगो कर्यो तिमण्यो तीन-तेरा हुय जावं, उणी तरियां कवि काव्य री ओळी ने जह-गढ़। लय पर तुक रो काव्य में काई लेण-देण? काव्य संगीत र समंदर सू निकळ्यो रतन। मन रो मंथरण लय मांग। दही बिलोती मरवण न देखो- बाजूबंद री लूबा जारणं थिरक, मायो झरणं री झगर-मगर पं ताल देतो लहातो मिणघर साप सो खिव पावै लहरावं 'अरे दहेड़ी जिनि घरं, जिनि लेहि उतारि; नोकं है ।श्रीकं घुवं ऐसे ई रहि नारिरी अरज जो मवाळण सू' चितेरो frहारी करें, उण री मनमोवणी छिबरी मामा मे दही बिलोती देह री लयता न रा चितराम रो उतार हुदै । प्राकृत रा कवियों में प्रो घणों व्हालो विषय रयो है। तो काव्य पर मंगीत से सगपण गाढो । काव्य संगीत सूनिसर, अर पद-पद ताल लगातो मन रो मानस लहराव, जद ही कषि गावै । जद माबर नों हा, उण बचत ध्वनि सू काम चालतो। गाय रंभावे, बाधा डोडाव, कोयल कूक, मोर हूक ! क्यूकर उरण मे मावां ग्रेप्रमर पापा मारोपा ? सवर्ड भी माम्बर काई है ? स्फोट घर ध्वनि प्रद मळगी इकाई ही तो सबद बरण-पर काव्य में जितगे फूटरी सगत हुवे, वो निवर--मरथ रो मारोप तो सबाप मिनाक्षी सोर ई मूळ मे गिरणीज-तो काव्य लय पर लयकारी मनमा। मन रोमांडयां में महाकोहाक मचाता ERY free * बहाद।

72/गव संकलन परय नी करी तो भी पळमळ पळसा मारं, बोजळी सी चमकाय, मायो सूरदास सटकं सूमिनसा ने पिधाण-कोयल, काग देश्या पिना सुण्यो भो जणी । तुक मासर काई करं? बा मेकसी योर र मनावा काई? प्रेकसी सोर नाड़ी पंत्र पंकणी भराकार पंदा करं, जो कान में मिसरी घोळं। प्रास्या परमं तूं फाटी री फाटोरे जावे, पर कवि सरावर्ण जोग जीम रो पणी होएं मूकुरै। हकल्प ने घंड्या को पारोपार बोतं-मसं । लेटमो मो मुळक पं मस्तापो कई जियो गुटरगू करे। वो बात मा रयो के भावो रे पडाव-उतार में मिनस लप मूरोते-हियो पढ़कें । सांस रो सुरलो वा-- प्रैट वैट क्यूनों इयो घड़क ? मांस चाल ? सहन सुभाव व सागर री महरा री जियो उठ-गिरं । फफूल रो तुको में भी टाबरपा सुख पावै । 'भरमो समंदर गोपीचन्दर, बोन म्हारी मयती कितरो पापी' ने जद टावरमा टेटें तो उरण रो सम्पूर्ण पस्तित्व पिरकं । मो क्यू हो ? प्रो उरा रे नियमित सोर रो प्रताप ई गिरणीजसी । संगीत भी तो बोर ई है, पण सोवणो सोर होगसू लोगो रोबो करणाभरण वर्ण । तु मासर में नी हुपर बीच-बीच में वाण सू' कविता, विचार लय सूछिटको पर मटकमी । वरण-मैत्री ठकराई री ठसक सो लाग क्यू के वा भाषी चीजरी मति है, पर प्रति सर्वत्र वर्जयेत् में साव है । तुक र प्रागम री सुरड़ाई इण में, के का मंत्री सहजता सू पार्व, जोराबरी रो बलात्कार नी हो, तो मोप? जोरावरी रे बलात्कार में लूठाई नी परपोज, पण उण मे रस कठं ?मिसरी गिरपां किसो मानंद, या तो मूडे धुळे, जद ई मिठास री पनुभूति हुवं । पुराणे दूहां ने लोग तुका र खातर कठं पढ़े । उण में कौं कथ्य रिसो हुदै के उरण नै पठाई सरं । तुक विचारां री मो हुवे, पण वां घणी ऊंची पर सूच्छम बात हुदै । इष्टांत भलंकार पर सूक्ति वृद, रहीम, माय, भडळी रीण विचारां री तुक रे कारण ई पढ़ोजे गुणीचे पण वा समानता मार्थ र सूच्छम सवेदना सू सम्बन्ध राखं, जिण र विवेचन वास्तं भेजो चाई। पलकार रो मो पख, पजे इण दीठ सूनिरखरणो-परहणो प्रकृतो पत्थो है। सोर सार्थक भर बिरथा भी करपो जावं । तुक सायंक सोर सूळगी कोई बीजी बात कोनो लागे। तुक रो म्यानो यो ईलाग । - पण के काव्य कोरो संगीत ई हुवे ? काव्य पुरता ईपलोपोत कानां तक नाद सौंदर्य ने उजागर करें । सममण सारू काव्य ने हिये तक उतारण खातर बीजी बार पदणी पई, जे समझ सांठरी नई हुवे। संगीत दो भांत रो हुवे। मैक होठां-काना रो, दूजो हिय रोभर चित्त रो। कण्ठ, होठ कोरा सोर संगीत गद्य सकलन/73 - कर-मर । हिय रो संगीत माथ में उपजे पर देह रे देवरं मे झालर ज्यूझणक पंदा करै । हिये मे गूज । कण्ठ सूहिये रो सगीत ऊचो पर निह ई सिरे गिरणीजे । गीता बेद रो पाठ दिव्य सुर जगावं । सागर री गरजण, बायर री 'रणित मुंग पंदावली करत दानु मधुनीर, मंद-मंद प्रावत चल्यो कुन्जर कुज कुटीर', काई गावं? वास र बोड़ में, जो भंवरा सूभेद्या हुवे, पवन बैवे पर किसी मनमोवणी मुरली वाजे । सख घुरे, तुरी गूज, प्रजान रा सुर, रुद्री रा मंतरी रो पाठ किसो सगीत सिरज? जैपर में प्रेफ हवामहल है । कितरा टूरिस्ट नित निरख-परखे, पण उण रा वारजां पार्यो मे सू छणकारा करती हवा की मिसो गावै जो इण लोक सृ पर री चीज । सात सुरां सू की ऊंची इघकी सुरा री सहगाई ग्वालेर र महलां री जाळ्या-झरोरगं मझोला खाती पुरवा व जावै । मगनगी पर ग्वालेर घराणा ना तान तराणा, उरण आगे फोका लाग- राणकपुर मे भाट झराक-भएक, नूपुर कंकण किकिरिण री बात की भ्रूची चीज है, उण तक सवद नी पूर्ण । खरळ रो तामड़ो जिकी ततकार कर, दुनियां रे किसी वाज प उण री नकल पण नी हो सके । मंत्राभिचार मे ही राजस्थानी रो 'ळ' 'लु' 'ऋ' को अजब सी निसर्ग री धुन धुर्ण । मिनख उण सूछिटक्यो-बिछटयो घणो कंगलो लागे । संकीर्तन रो सोर किसी मन री प्रोस्था बरगाव ? झांझर झरणक, घट री गूंजती टंकार, गिरज री घंटियां काई पैदा कर ? घणो अचंभो मावै, इणारे सोर पै। इणां रे सुरां सू, सोर सू सगपए करणो जरूरी, इणां ने हियो प्ररपो पर काव्य मे इणां सो सोर थरपो। भूचे काव्य में यो ई मावे । यो सोर रो जादू धरणो जोरावर । काव्य में इण ने लारण रो ढब कियां माये ? राम ई जाणं, मो कठे सूपा, पर कियां भाव ? हां, मायां पछ इण री चीरफाड़ पण करी जा सके। अमृत-' ध्वनि ने अमृतध्वनि क्यू कर कवां? उण में ध्वनि री प्रमृत अवस्था री बात तो कठे कोनी ? ध्वनि लहर ज्यू लहराव, कठे खतम हुवे, अर कठ मूसुर माडे, कों बेरो ई नी पड़े। जुझारू बाजा जूझार ने जूझाव ? लोगड़ा सांप रे फुफकार सू सबद प्रायो बतावै । पण सांप तो बहरी । पूगी रे सुरां पं बो कियां नाचे ? राम जाण ? सांप, शेषनाग बहरो ई भलो । माथै घरती रो बोझ मार सांभ्यो कठ कानां सूसुर सुण सीस चालण करे तो अनरथ हुवे, इसी सू सेसनाग बहरो लागे । कवि सेस सो सबद फूतकार, उण र पूंचे प्रमाव रो बेरो कोनी पड़े ? काव्य रामाखर्रा ने पवित्र गिरगो, उणां मे फेर-बदळ सूं घणो मनरय हुदै। ध्वनि, जे विचार सूरळमिळ चाल तो बात सांतरी रखें। कोरी ध्वनि - 74/गमकलन र विचार पैदा करणो निह ई चमत्कार , पण वा पपी में भी बात कोनो । हो. विचारां री मौजू मवदावली, जे सगीत मूकसोज, तो सोने में सुगप सिरमो वाल हुये। एद को हील डोळ गिणीज, जिस में काव्य रोजीर जी । घंद भी जूग जीचे, पर, मोठा जलमे । पद विषय वस्तु र जोगा होगा पाईन । नेपोलियन जे गाधी । औल में प्रोतार लेतो तो के होतो ? गौता अनुष्ठप में नी होर हरिगीतिका में होती तो काई प्रतिरो मातो? फूटरं शरीर मू मातमा रो फूट रापो जागोजे । पण मो सदा नई हुदै । मोपर डील में भी फूटरापो बापर सके पण वो अपवादी ई हुवे। काव्य में विव रो काई बोपार रे ? प्रतावर रूप में काव्य कुरणं री जगा जैविम्बा में कवि बतळावं, तो रूडो लाग । मिसो क्यूकर होवे ? काव्य भरपाई कोनी । साळ-पोसाळी सूवार निकळ्या, पीछो दुरायां, मानवी प्रतीकां मूळगा भागे, क्यू के उप में कृत्रिम भयं माख मूनोडगो पहे। कोड संग्वेज सी गत हुदै, मार्च मे चितराम उपाई तो सहजो हिय तक पूर्ण । प्रतीक दाळ भात में मूसळपद मा प्रोपरा लागे। कबाब में हाडक्यो खटके । काम्य रा बिच, जड़ जगत रीसाच मूभी इधका साचा ठहर: क्यू के * हिय र नेड़ा इव । हिय री प्रख्या सूकही बात, संगत लाग्यो तुरतो परत असर करे-इसी सूडिटेल' नो रूप योड़ स्वीपिंग लाइन्ज मे कषि चिते- रणी करै। मावरा रा सजोग सू कवि मुहावरा ई नही, चितराम भी उकेरें- घड़। मवद सही जगां जड़ी तो चितराम जीवतो-जागतो लाग, भीतर प्राखरां री रोळदट्ट लागे । सारा अलंकारी सूचितराम बणाणं से काम ई लियो जावै । सातरो कवि बो जो नुवा योवर बिना जरूरत नई घई, पुराणा भाखरा रा पूरा प्ररथ चौड़ कर, उरण ने नुको स्यानो देव । अलकार प्रोर काई काम करें? वै बगा बिना मे रंग भरै। चितराम ने लाइट भर मेड़ देखें । प्रोपमा जुग जूनी पर मलकारा री मूळ गिणीन। सरदश्यमूलक अलकार इणी मोपमा राणी रा नाया-जाम गिज। कालिदास री प्रोपमा विशेष क्यू सराईज ? बो उणां रो प्रयोग इयां कर के सारो प्रभाव केन्द्रीभूत हो, उप विश्य कानो सागोपांग ध्यानीचे; किबननुमा नियां 'निडिन' ने खोचे, पर चितराम ने पूरो बेरो दे उजागर करे। दीपशि वासी इन्दुपत्ति सुपबर में आगे बढ़ी, जद वो कैवं तो दिये री लो सिरखी इन्दु- मति री देह ई मिजरा मे नी मळमळ, सामी बैठया राजावां री पंगत रामा मू भूजळा मुख भी दोखे, पाछे छोडचा राजावा री निराण 'मुखकाळिमा भी चौड़ पाये। दीयो माग उमास करे, पार्छ प्रधेरो। पर प्रेको मोपमा सूपूरो गद्य सकलन/75 - - ? चितराम जगमगातो सामो प्रावं । मो ई अलंकारां रो चमत्कार हुवे । कल्पना री उड़ाण नै प्रलंकार सारो देव । विषय रो वेरो पाइती पर साग ई चितराम उमारती अलंकार री सौज घणी व्हाली लागे। प्ररथहीरा सवारी रामतरोळ कान्य नै मंडती वगणा छोडै । विचार साग छिब सोहणी बात हुवं। अलकार मांख्या मोल ने प्रख्या प्राग कर, रहस ने चोड़े करे । उपमा-रूप बात रो म्यानो बोल . समानता पर दृष्टांत मू बात लोजिकल हुवै, पर असरदार वर्ण हिय री उचाळ हुवे, गद्र ई प्रांख्यां प्राग री चीज री समानता पाळी बोजी चीजां रो बेरो प्रापूमाप प्राख्यां प्रागं निरत करें। याददास्ती पर पुराणी जूनी बिगतां रो मो ई सुभोतो मिनबादेही ने भगवान देव । अलंकार विचार नै भा पहराया जा सके, सबदा ने भी। लोगडा प्रांरा दो भेद कर: शब्दालंकार पर अर्थालंकार कै । प्ररथ में अलंकार देवे। मरथ मे प्रलंकार किया हुवै ? उग र विचारां मे जो वांकपण हुवै, अरथ र कर्या बो परो मिटे । मुळक ने, मुत्र सूअळी कर्यां वा काई र ? प्रख्या नै फिजिशियन निण प्रांत्र सू देखे, उण में क्यू कर ई ग्रानन्द री वात नई लखावै । 'वा चितवन पोरे कछु'--तो पाखर 'मोरे' क्यू कर हुवै ? उरण रे मोळू-दोळू मंडळाता बिचार ई तो उण में कदे इमरत देख, पर जिनगाणी पावै, हळाहळ गळं उतार, पर बिना मौत मरै । मद छक, अर झुक-झुक झूम। तो मलकार कथग सूमळगं कोर बिचार में भी संभव । कवि बिचार नै भी, छद देही ज्यू सरूप देखें । भावना जद सरक र गोद बैठे, पर करपना रा रम- तिया घई जद ई काव्य सिरजण संभव। बड़बोल पर बढ्य-चढ्य बरणन ने पढ्या असर पड़े । सत्य नै प्रसत्य र ग्रावरण सूअलगो करणो भावक रे सारू करड़ो काम कोनी । प्रतरभेदी दीठ बार रा प्रावरणां ने भेद भीतर तक पूर्ग । परिचित सूअपरिचित रो बेरो दियो जा सक, इणी खातर मेघदूत रो डाकियो झूठो होता थका भी मनमोवणो लागे । काव्य री झूठ जगत री झूठ सूमळगी हुदै । काव्य री कारीगरी धावं मिसी पास्यां जिकी सुपना देखें, सुपना सिरज, पर जीभ मूपाखरां री पोळ्यां ब सुपना वधे तो काव्य बणं । मूमल जलम सूई सरूपवती हुई हुसी, पण उप सरूप री घिराण्यां तो घर- बैठी चाकी झोवं, पर चून सवेरै । बो कवि भूल करो जिको उण र सीसडले ने सरूप नारेळ ज्यू देख्यो, केसडला हतियारी रा वासग नाग ज्यू-सू जो डसीज्यो, बो उण न अमरता रो इमरत देग्यो । आज जिकी सुदरता री देव्या भेक बरस सारू क्वीन प्रॉफ यूनिवर्स बणी गरबाव, बा ई दूजे बरस अक टीगर जण्या, कूड री चीज पण वरण परी करीजै । यो क्यूकर हो ? स्यात यो ई कारण लखाव के उरण हतियारी रा 76/गद्य सकलन डस्या लोगड़ा कन जोम कोनी जिकी इमरत रा मायर फुर। फोतं रो नाप्यो. जोख्यो डोल प्रभाव रे बिना भी सुन्दर गिणीज पर कबीर ने हांसी पावै । 'गुण ने रोऊ गंवार' जो सोरठ कैवे, पण ग्राज तो जात पर नछमी दान ने झोकती टोगरइयां किसी प्रमरता पावै ? हेलना घणी, पण उगने उजागर कर. गिया होमर कोनी । कवि तो पटबीज सो बिचारां री चमक देव, पर मंधारे मे उजाम हुवे । वो सुरज प सहस किरयां बरसावे, पर आळं री बाग सी फूट, अधियाळी मिट पर हिय रो पोयण पुळक-मुळक । चांद हुयर इमरत वरसावे, पर कुमोदण्या कर-झप, खिल-खिल विले । चोखो भूचो काव्य मिसो हवं । उरण री कळा, कला हुक्ता थका भी कळा रो भरम पण नों हुवरण देव। हीरो हीरो किया बणे ? उण री कटाई-छाई मू । उरातरियों काव्य कटाई-छटाई तो चावं, पण हर भारी चतर जौहरी भी कितरी ई कटाई- छाइ कर, होरी को वणा सके नी। काव्य सारू मेवळ पर कारीगरी करणी किती चोखो ? घणो कारीगरी मूबा कारीगरी हुम सके। पण काय बो कोनो रे । नाच-कूद हरेक कर मकै पण नतंक में के विशेषता ? वो उण खातर सदै, पर देव सूबरल-कूद। भो ई दब कान मे चावै । मावना सू कारीगरी मांभळी संयत करी जा सके, पण कोरी कारीगरी भावना किया जलमै 'पहड पडई वूदां पड़, गड़ड़- गड़ड़ पण गाजै' कोरो फ्लंट वरणन है। इण में किसी मावना री सुरमो सर्योड़ो है ? राम ई जाणं । चकारणी नटणी री चाल, पर गजगामण री चाल मे जो करक हुवे को ई सहन काव्य र खेचळ रे काम में जाग्यो । विचार री सघनता मुकाध्य निराकरण हुदै । बिचार री सोभा उण कर्न हुवै, तो भूधा पाव किया पडं ? साज-सिगार री, गैणा- गारी झांकी तो बै वर्ण जो कन इण सोभारी कमी हुवं । नानी के तो न्हावं पर काई निचोवे । न्यूड री कळा चाव के देह प्रिसी हु के देखणिया ने विदेह कर सके, भीतर "ताज मरू घे माय" से बात रखें--की हुया ई दिसायो माडीज । नी हुयां ई, धूघटा खिषी, इयां ढकीज। मावरा सूचितराम खीचरणो काम तपाई। जद चितराम विचीज, तो कवि ने सन्तोप हुदै, पर वो खुद री पूठ पेड़ । इसा पिए घणा कम प्राव, घर माया वा प्रापो सो मंड-बैंड बक - खुद नै बुदा माने। तुळसी घणो ठिम्मर कवि गिणी पण जद-जद वो मिसा चितराम सी, उप में भी दरप माव है, भी गरबावै। इस यंक विण मे बो चितराम सोध्यो तो वो विरमाजी बिमोतिराम नी सवर्ण री गर्वोक्ति कर बैठयो- - रामजी सोनारमार्थ सिंदूर दे रया है । तुळसी रखें: -- गद्य सकलन/77 'उपमा कहि न जाय विधिपं हीं । गम सीय सिर संदुर देही ।' चालो, उपमा विधि ई नई दे सके, तो फेर विपि रा पड़या पुतळा रो कांई विरतो-नुण उपमा देखें ? तुळसीदासजी म्हाराज फेरू खुद उपमा देश दूक्या पर वो चितराम चे खड्यो कर्यो, निह ई विधि सूविसो मो सड्यो हुप सके नी-यो पिरजापत पांच तत्त्वां मूपूतळा घड़े- तुळसी बापड़ो अंक पाखरी मूराम पई, सीता नितेरै-उरण रो उपमा बो देव- रंग है तुळसी पारी उगत नै, यारी सगत नै- वो फुर : 'ममिय पराग जलज भरि नीकं । ससिय भूपि जनु लोभ अमो के ।। इण चौपाई मे न गड़ह-गड़ड़ है न पड़ड़-पड़ड़, पळ-पळ पळका मारती बीजळी मी को सिंद नी, पर कोरो 'नीक' सूतुळसो नीको चितराम मण्डै । इए सबद सूचीपाई चेतना री जोत वरणगी, चितराम में राम माग्यो-कियां वगग्यो ? सिदूर रो पराग, कंवळ निसर्यो प्रांगळ्यां मे नीके सू, प्राछी तर मू, भरपूर भऱ्या हाय रो रूप जो वणं, वो फरण फैलाये साप सरीम्पो वर्ण । पर राम रो सांवळो हाथ साचं साप री ग्राकृति वरणावै । पर सीता रो मुख चंदरमा, चदरमा पर इमरत रो बासो, उण नै लेवण खातर जाणं राम रो सांप सो हाथ इमरत रे लालच चदरमा कानी फरण फैलायो । तो मेक नीक सू करामात हुयगी । विरमाजी ने मात दे दी, पर तुळसो बाबो गरब्यो-गरज्यो । तो सबदा सूचितराम इसा रामरोळा कर, खेला करै, मेळा मांड । मंत मे भेक दात रंगो । पाखर काव्य मे उपयोगिता कांई ? उण ने बियां तो सोख सारू भी लोगड़ा घोटै । 'वेताळ कहै बिक्रम सुणो जीभ समाळे बोलिये' में की तुकताल है ई । पण चेतावनी रा जूघटयां सू कोई चेतं या नी चेत-- नहिं विकास इहि काल सूकोई सबक लेवे नी लेव-काव्य मूडी मार कर-काव्य अच्छाई सारू हियो तयार कर-सखरी कल्पना सूमन निरमळ कर, सत्य सूसोहणो सामेळो करावै । हियो काव्य सू हिले, काव्य हिये ने भेक गेल घाले । भेजे पर हिय में जे की तालमेळ हुवै, तो काव्य उरण ने भी संचं ढाळे । पर नी हुवै तो अहिंसकां ने 'पाग्गी पीव घाण लोही प्रण- छाण्यो गि' री उगत सांच होती नित देखा परवा ई | काव्य सीख नी देव, बो प्रेरणा कर, मन मे फुरफुरी जगाव, उरण नै सिहरावै । काव्य पैगम्बरां, नबियां रा वचनां सो गूढ-ग्राखरां री उलटबांसी हुव, उरण ने जाणगियो ई जाणं-हर कोई नी पिछारणे । उण गोरखध रो असर पड़े । पण प्रो असर कियां पड़े ? इण रो वेरो घणो मुसकल । विया डील में दवा कियां असर करें? बो प्रोसेस भी विज्ञान कनै कोनी। काव्य तो माध्यम ई खिरण मिटती. बरगती करपना रो राखे । काव्य सूसीख ई देणी होती तो विधान री धारावा 78/गच सकलन कविता में मौजती, मर लोगड़ा उप रो पालण करता: पब टूट- हरि- पंद रो चद टर-नी टळे, बो नी टूट झूठ । इसो क्यू हवं ? प्रो यूह के वो 'इन्स्ट्रक्ट' नो कर, 'इन्पायर' करें, ये 'इन्स्ट्रक्ट' ऊंची बात हुई। काई कैव, भो जरूरी पणो कोनी, कियां कंचे, पणं, मेराई काम समावं, पर सफळ हवै। काव्य आएकारी चाज कोनो, वो समझ री चौर हवं काव्य माय रस रसिक र मतर हुवे । प्ररसिक रंगतर बो मैसे मागे वीणा सिरखो हुवे । इणो मू'परसिकेप काव्य निवेदनम् शिरसि मा लिस' । उगत कवि विनय. भख। केवळ रे कनै भीरको रंच, पण मुंवरो तो दूर देश रो बासी हुदै । वो कंवळ री पर बध, प्राण त्याग । पोडकाजी कवळ कनं २ र मी माछरां सारू छपाका मारं । सो काध्य रो रस काव्य में होणं रे साग, रसिक मे भी हुदै । 'चंदा बस पकास' सी बात काव्य री होतो थका भी 'जो जाही को भावता सो ताहो के पास', इशी मूहवं । भोई कारण बणं के कविता प्रेक उमर में दाय नी पार्व, पण बीजी उमर मे घणी रिझावं, मन भावे । करेला राबरा ने कहदाय पाव-भावळा बाळको ग स्वाद में कर तिरपत करें ? काव्य में अनुभी हुई बात भण्या पाठक झूमै । मनुभव रे बार री बात में साधारणी- करण घोड़ो मुसकल मूहुवेबठे ई कवि री चतरता परखीज, रसिक री समझ जागी। काव्य र कम्य में कथा नी भोपं, क्यू"के काव्य री काणी, जिण छिवियां सूसंवर, बै तत्व ई उरण में कोनी । काव्य तो विस्मय जगाव, मुफ्ना रो संसार रचा-बसावं भर दिखा। मकराणं मे मूरत थोड़ी हुवै- मूरत तो मूर्तिकार रे हिय में हुवे। बो छेसी मूउण हिय रीमूरत ने भाटे में सूरत देव, उरण नै ढाळे । तो काय जिण बायवी माध्यम सू रूपाकार पावे, बो घणो सूक्ष्म रवै। काव्य जो उगेरं, उण मे विषय-वस्तु अक तत्व है, बो सारं कान्य री जगा किया ले सके ? सत्य तो सदा ई सापेक्ष रं। वो ममय, स्थान, पात्र बदळण सूं भी बदळ । इए सूकाव्य जो टेरै बो भावना री वस्तु वरणं । काव्य जगत कल्पना पर भावना से जगत हुई तो कवि पड। इसी उरण ने जो पिरजापत करणो पड़े । उपरी जगती रोबोई घणी-धोरी हुवे । महान घटनावां सूई कोरो महाकाव्य नी बरण, उण र फुरण में भी मेव मंद्र महानता रो सुर पर भावना से स्फीत वक्ष चाईज । सो टेव सोनो महाकाव्य नई एप सके, चयू के महाकाव्य चावं महानता मूभित्रित खिण। प्रेसिपणा घोड़ा, पर धागो तो माळा रा मिणिया ने जोहं भर है, उए हार कियां का ? में महाकाय महाकाव्य रा बै पद्य नणे जो विशेष सरम, गद्य सकलन/79 मरमभेदी प्रोसरां री मोळ्या ने जोई । महाकाय काव्य नै महाकाव्य गिणगो मरम हुवे, वयू के डील सूडाको को हुवे नी, उप डील में की डाकीपणो हुयां ई यो डाकी कहावं । इणी तरियां महाकाय काव्य में की महान काव्य हुया ई वो महाकाव्य कहावं । प्रोसर मायां इण रो भो मेरो पाइस्यां। पण इण निवन्य में काश्य री चीरफाड़ री रपट मांडी है, सायद की अन्दरूपी झांकी रो बेरो इण सूलागसी । काव्य र जीव ने जाणवा री इंघा राख- गियो रो भरम मिटसी, वं मरम रीवात जाणसी-सराहसी-मर रस्तो पासी।

पालजंजाल व्रजमोहन जावलिया कितरो भोलो पर कितरी दयालू है तू म्हार जामराजायै रा डोकरा, कितरो रूडो भर रूपाळो है तूं इण निरमागरण बूढळी खातर, जो छिजीती रंवं मापरं काळज ने घर वाळतो रेवे प्रापरी कुदण जिसी काया नै, पारी जूनी पोळ रा पगोथिया सामं न्हाळती, प्रोझका लेती पर देखती सपना, खड़- खड़ाती थारा कुवाडा नै । साच हे या के म्है तन घणो मात दू, पण राणोजी मी तो दे है मन पणो मान, उरळे मन पर खुले हाथां । कई अर्पित न कर दीघो बै म्हारे मातर । सब कुछ तो सूप दियो है मन। पण, म्हारा लाल ! कठे मिल सकेली मने थारे हिबई में भोड़ी मा मोहाळू ममता पर सहजा ई मिलतो प्रायोडो पो सनेव? माई प्ररदास है पव म्हारा पूत ! म्हारो हिक्टो पाटग्यो, काया जोरणागी, मर टूक-टक होम्यो है काळजो म्हारो । जेक मोरू से हार सागं म्हारा इण माफत रा दिहाड़ाने । जिदगी री धूळ उड़री है नीचं, पण नीचं । मा बोदी माटी, पर गिणती रा नान्हा दिहाहा, भळस जासी इण धुवाई में। पणी रूडो, घणो रूपाको सपनो देख्यो है मैं-जाणं म्हारो लाल, सत- रंगो इन्द्रधनुख मू फूटते उजास र गाळ उतरती हेमायो म्हार पसवाई। हूँ भोळख न सकी बीन घणी देर तमिर जद पोळणी, तो मोळसायो को मापरी चौड़ी छाती माय झिलमिलतं रगताळू मुरंगी सितार । पशो भलो मिनस हो यो. जगमगात उणियार प्राळो, सगती पर रूप रो मोतार! याम लोधी वो म्हारी मांगळी, पर मेक बगर मोर बरागी मैं रूड़ी-रूपालो पर पाकर्षक उणियारं माळो चतर मार। थाम सीधो म्हारो हाय पर लेपो मन तार-तार इन्द्रधनुनी सतरंगी उजास र राजमारगर द्वारमाएं। है म्हारा राम ! में जो करणी की है, म्हारी जू मेरी बरो- परी को को दास नी ! अपनी है मा परती पर जद मूगी है मागतो. दगी है नई मिसो कामण, गोपाळ सर होर म्हारीकरणी! मनोकरसो कोई म्हारा नाय ! रा दोरो है मरगूमी, पर तेजपत है गद्य सकलन/81 । - सूरज रे ताप सू। संग जगती जद काट है मापरी जिन्दगी बवतां पाप-करमा री धार में, मर पिछतावतां बां पर, रोतां पर कळपतां, मैं कीधी ही मिसी करणी जो से सूऊंची, मातमबळि सूउठघोड़ी, गुणांमाळी पर भलपणा री करणी ही । रोती पर कळपती का हूं मैं वीं बगत सूई म्हार बुढाप रा में दिन-पछताती भापरी करणी पर ! छिटक देस्यूं मैं म्हारी जिंदगी भर म्हारो यो जीव, जिला नै डुबो राखी है मैं पाप रा समन्दर मे झूठी प्राण लेवतां । मिसी पाण जो थोथै ती सूतायोड़ो, झूठ रो पुळिंदो हुवै, पावतो रेजो प्रणाचोक, प्रणथक नारी री जुबान पर ! अर अब म्हारो संस मेवाड रा राणोजी री अम्मर गादी रो घरणी बएसी । सँग मेवाड़, प्रो गौरवाळो देश होवैलो बीर पगां हेठे। इस सूतो पाटी ई है या जे महान सागाजी र सिंगासग मार्थ श्रेक कायर, येक कपटी बैठं पर उजड़ जावै मा संग घरती । है मठ कोईक मिसा भी जो कव के पन्ना झूठ बोलगी ' तरवार री तीखी धार देखर कापण माळे इण राणं री घोळी धमणिया मे सांगा रोई शोणित वहतो होसी, कियां करां पतियारो इण पर? प्रा हत्यारी नार बचा लीयो भाप रै लाल ने पर नांख दीघो मेक मूरख नै मौत रे सामी बळि रो बकरो वरणावरण सारू-कपट सू भोडी प्रेक कूड कापणी र प्रासरे महान सांगाजी रो ऊजळ कीरत माथे घूळ उडावरण नं। प्रे संग मिनख बंध्योड़ा होसी म्हारे पाप-करमा सूपण राम र साम तो बोल्याई होसी बै साच, के किरण खातर कीधी ही मैं आ करणी। कई ! किरणी जबरी सगती रो जोर हो म्हां पर हर लीधी हुवै म्हारी संग चेतना नै, प्रापरं प्रतसरे जोर सू? हुई है कदेई निसी भी क कोई प्रेत प्रातमा कर लीघो हुवै अधिकार किणी जागती जोत पर ? कदास प्रभाव में जनम्योड़ी मय पर भ्रांत कल्पनावां री कोई छाया ही बा? कुण कह सके । क्यू कीधी हो मैं पा करणी ? हाड'र मांस री पजर इण छाती मझ बां गुणां रो बास कदेई नी हो ज्यारो बासो साधु-संतो रा हिवडा मे ई हुवै, कोरा संतां मे ई । में भेक गांवाळू गोरडी ही, पणखरी असपळतावां, प्रणाधार कल्पनावां, घोग्वाघड़ीर कूड़ वास्तविकतावा सू भोंडी कोरी मेक गोरड़ी । फेर भी मैं मिसी करणी कीधी है, जिणसू सिकुड़ जावला सगळा संत पर मुड़ जावला बै भेकाकानी, थरथराता डर हूं। मनै वीरागरणा कैवं है अं सगळा, पर जाणं है चोखी तरां के संग जगत में म्हारी कीरत रो पसारो है । म संग ऊचे सुर मे म्हारी सामघरमी रा गीत गावं । गुहिल, सोलादीत मर वा री खाप रा, रावळ- 82/ गद्य संकलन राणाका री प्रीत रा, पर मेवाड रा सामना री निभायोड़ी पारण बिडद सुगावै । पण बिरथा है मैं सब ! कई होणो-जागो है इस मू अव ! जो होणी हो, होगी पूरी होगी प्राई हो के म्हारो लाल चढ़ग्यो बळि पर, पर हूँ रोॐ हूं अाज तक भलाई सूभर्योडो बी करणी नै, जिरा सारू हलाल करायो मैं म्हारे लाल नै, पाय पूत रो रक्षा बातर । मैं घोटती री हूं इण कापणी ने सैकड़ा दाण म्हारी काळजे री कोर ! पर पोटरी हूं अब भी भरदास करती थां सूके अंक बार मोरू सामळले म्हारी अरज । संजोग सूत्रो पाखरी ग्रोसर है म्हारा पूत ! प्रैक दाण प्रोल सांभळनै न म्हारी प्रापवीतो ने। प्रणमावता उद्गारो म्हारो हिवडो फाटर्यो है म्हारा लात ! उगळ नावण दे म्हारा इणा उद्गारां नै मेक बार, जिरग सू शान्ति मिल सके, म्हारी कळपती काया नै । मा करणी म्हारे पूत री कोरत बहावरण माळी है, मैं चोपी तर जाणू हूं इण ने । कदास बी रोई है पा करणी। माहीतरी चीतो प्राव है मनै बो दिन, जद राणा सांगाजी न महीनो भर भी नई हुयो हो सुरग सिधार्या । खेत हॉकरण ने गया हा म्हारा घणी रामोजी हळ लेर । चित्तोड़ सूदिल्ली जावरण पाळी गेल मार्थ वस्योड़ी नगरी मे रवा हा म्हे प्रारा सगा सबधियां साग । बरस इमोठेक हुपो हो म्हारा पोळा हाथ हुयां, पर म्हारी झोळ्या रामजी रो रमकडो, म्हारो लाल तेले हो उधळतोर कूदतो, भरती किलकार्यो । माय मटको नै कड़िया कीक ने उठाया पएघट पर जावे ही मैं, के सोनं रा गणा सू लदाबद भळभळात माळ गाळो भेक राजवी पचन वेग सूपोड़ो दोडातो पायो सामी तणकारी लगाम ने .घोड़ो थाम्पो भर वजात बांपो सुरीले सुर मे, हाक मारी राणाजी रो दूत हूं ....रान री घोषणा सुणावण न पायो हूं ... सामळो, चेतो लगार सामळो इण ने भर माजमावो प्रापरा भाग में कदास चमक उठे भो इय मोसर पर । महान सांगजी री राणी करमेती जम्यो है टावर.... मा मांदगी सूजूमारी है ... इण सू' टावर नं धावण सारू भेक पाय चाईज अतरापी भसत इतरागी, रजपूती रो रगत वैवतो हुदै गिरा री धमणिया मे। जेज मत करो पूगो, बैगी ई पूगो माप-प्रापरा रावरिया सागं चित्तौड़ रावळे । जावो, थे मी जावो, कदास थारो ई चेत गाव माग भर मिल जाव भोसर -पावण ने पाय रं पद रोमी गौरव ।' उाग्यो केकाण पाछो पवन बेग पर सुकायो प्रसवार सागं घर में उड़ती काळोपालो पर पोळी धूळ रो बादळिमे । कदास परो गयो हो.... पड़ोस रा यांनी में डूंगे फेरण ने पाय और सारू । . . x x ...

गद्य सकलन/83 राज दरबार जुडर्यो हो, मंत्रणा करर्या हा भेळा होयर मोटा-मोटा सूर-सामंत । जी पूळ मैं, म्हारे ई बंस री दो दूजी गोरड़यां साग डाण भरती सांडयां माथे असवार होयर पूगी रावळे. उठ म्हा पैला ई पचासां गांवा सूप्रायोड़ी गोरड़ियां री भीड़ देखी, मैं जो पाई ही प्राप-प्रापरा छोरा-छोर्यो नं कड़िया उठाया, जांच करावण सारू मापरा दूध री, के कुण रो दूध है से सूसककड़, पर कुण री काया पर झिळमिळार्यो है किस्मत रो रूडो पर रूपाळो सैनाए । लजाती'र सरमाती, होळ-होळे बांता करती मैं रावळे री ड्योढ़ी मे बड़ी । राणी मा ऊमी ही सामं प्रापरं बूढळे पुरोहित साग, दूध- पूत पर गोरडिया रा भाग री जाच करण सारू । भाई प्रो भाई म्हारी किस्मत ! तन रूड़ी कंपू के कूड़ ! मैं बांन सक्कड पर साव निरोगी लागी पर चीतूहूं प्राज ताई बी बूढळ पुरोहित रा बोल, के द्वार जोवणं कांप झिळमिळतो लाछण करर्यो हो सिद्ध मने भाग पाळी-जून पुराण विसासा सू। घणपरा लोभी, लालची पर दुष्ट कागला, जे पोधो हो भापरी मावा रो बोदो दूध, कांव-काव करता ई रया भर म्हारो लाल, अब राणो हो संस मेवाड़ री मोम रो। म्हारो वरण होग्यो मर नान्होसोक टाबर प्राण पड़ यो म्हारी चोळ्यां, गरमावरण पर धावण सारू, पर जिंदगीर मौत रं मंझ होडते जीवण ने पाछो पावण सारू । म्हारी जामणजाई, जो माई ही म्हारं लारं अजमावण ने प्रापरी भी किस्मत, झेलियो म्हार लाल ने घर लेगी पापर घरा मापर टावर साग ने । पण, धीजग्या जद टाबर पर होग्या मादी पराई मावां री छाती रा, राणी करमेती राहणे प्रस्ताव म्हार लाल ने पायो रावळे लावण रो आपर कुवर उसिंघ रा भायलो बणावरण सारू । प्रादरतो राणी रो प्रादेश, बुला लियो मैं म्हार पूत नै भो गवळ । साथ-साथ रमता, खाता-पीता, रोता- हंसता पर दिवावता हेज बिना झिझक रे, सुख-दुख बटावता मापस मे, धीरे- धीरं हिळ-मिलग्या परस्पर दोई। टाबरा री संग रम्मता में म्हारो लाल, म्हारो जसवंत सं सूप्राग रवतो । सरदार हो वो कुवर री नगर मे सब रो। सूरवीर, साचो, सक्कड़ पर सतवादी हो बो पर अक्कल में सब सू कुवर मादो रवतो सदा ई, निमळीर बोदी ही बो री काया । तो भो गजब री मंकरूपता पनपी बा दोई मायला में, पर दोई बोड़ला लागता । दोई रजपूत हा, कई भात रा, दोयां रो रगों में दौड़र्यो हो म्हारो दूष, पर समोग सू बेमाता दीधी हो बानै उणियारो अंकसो, इणी बंस रे किणी पुराणं पुरख रो। म्हारे हळ पड़तं पणो ने भी रावळ ले आया ब, घणं मान, घणं पादर, नाग। पर कुंवर.

84/ सकलन .... भर यरप्या बनि मोटपार राणी रे रक्षक रं रूप । सेतार पळो रो चाळी छोडर रावळ में राणी री इवाळी मादरतां पणा राजी हा! पणा राजी हारे पापर गां मावथ लटकात प्रर ढान-तरवार थाम्यां रावळ री मोजरी बिन्दगी बितातो। कियां वर्णन करूं मैं राणी करमेतो र उपियार रो, मिण मे बोरं समतळ मन साग ई गजव रो रूप दीपो हो माता पितरो को भर भितरो रूपाळो के मोटधार होता भी टावर ई लाग हो बा~-फेर भी कांपता किणी भय सू देई नी देवी में बौने । बों रो निमळो छाती में वास हो किणी करई, कठोर पर साहस प्राळ काळ रो। कितरी भोळी, कितरी मधुर पर कितरो मोहाळू मा हो बा । मैं कितरी प्यार कर हो ने बों गत मारो संग सगनी सूपर मान भी प्यार करूंहूं बी ने बिया ई तो, जो तो बा म्हारे हिवड़े में रात दिन पनपती घोर घिरणा रो कारण हो, मिसी विरणा जिएन जामरण, कीरो आमरण, म्हां जिसो जामरण ई समझ सके । मांधी-म पड़, झगड़ा झाटी, प्रागसी फूट भर कळह सू भयोड़ो हो को जुग । रात-दिन फेरबळ होनी रवतो हो जमाने में। जेज कोनो मार्ग हो राज उळरतां पर पाट पळटता राणा सांगाजी मरग्या प्रमुभता मन ई मन के चारा विस्वासू सामन ई पो देग्या बोने पर मिलग्या मण नाणं देश भर मागविसासो जात में जलभ्योई सुलतान सू... मापरी मायड़-मोम री छाती में छुरो घोंपता । . महान सांगाजो रे पारची गंवार रतन, कर दो हत्या पापरं ई सग दी रे राव से, वमन्त रो माखेट री बेळा ....पर मरता-मरतां उतारयो राव भी रतन री नागो छाती में प्रापरी तरवार ।... मेवार गै गादो माथै प्रय विक्रम बंऽयो प्रगगुप्पो घुग पोभ्यां रो, बेमाता रो भारी घाप। काया सू काचो पर किस्मत सूबोदो हो बो फेर भी हो जोगो पर बोखो मिनस : मेवाड़ र सरवनाम गे मूळ, फूट री ताकत ने जारण हो यो चोखी तरी पर पिछाण हो वो तोपी पर बन्दुका री ताकत ने जिए। माग बी रं देश री समताहीणी सेना रो सम्बनास हुयो हो देखता ई देखता, कुछेक ई पुळां मे । रोजूने-पुराणं मावा सूसझ्योड़ो मेक-मेक जोपो वेसी हो पर भी फितराई तराई बदकचिका सू। पापरं गौरव माळे कुळ री मरजादा सारू चौकड़ी भर केकाण पर चढ्योडो कोसीस कीधी बो मापरा जोपां ने समझावरण री, कटार पर कुता छोड़र तोपा पर बंदूको पकड़ा- वण री मर घोड़ा सू हेठे उतर र पापरा खारड़ा री खुरताळो चमकाता प्रापगे झमर दियावरण री। पण निपट नटारो करता भंग करदो संग सरदार .मापरी अनुशासन री पाणं न पर परम्परा सूचालतं मायोड़े राणावा रे मान नै । ..

गद्य सकलन/85 संग निरासावां सूभरघोड़ी आपरी उमर सरदारा सूकदम कदम पर जूझतां पर आपरी गलतियां खोजतां बिताई विक्रम । भड़कगी बसान्दर समस्त सामन्ता र काळज भर चढग्या संग घोड़ां माथै उछाळो करण सारू । मागग्यो रातो बी डरतो विद्रोह सूअर देखता ई देखता टूट पड़ी प्रणाचोक तुरका री फोजां री फोजो भर घेर लीयो दुर्ग ने- फासतां म्हांने पिंजस में फस्योड़ें मूंदर ज्यू। उडीकता रैया म्हे बाट रंग ताई पर चिपायां री राणी मा उठा ताई प्रापर लाल ने काळज। बा अब मिला दियो कुवर नं म्हारी झोळ्यां पर झाल लियो मैं बीन म्हाग लाल रं सागं गढ सूबार निकाळरण सारू । सोच ई री ही मैं कोई जतन के पडया सळ पडदै माथे पर मोड़ यो जद मैं मूडो तो देखी राणी नै पछाट खायर घरण पर पडतां । होळ सूमुडी मैं पाछी पर कयो राणी ने-'म्हारी राणी ! जीजी म्हारी !! मैं करू हूं परदास थांसू म्हारे साग भावण री। वे थार लाल रो हरण करणो चाव है पर प्रठे रंवता वै कर देसी थारी भी हत्या बी र सातर । मा, म्हारी जीजी! ग्रा, म्हारं सागमा! मो गढ अवै मापां जिसी प्रबळावा रो रक्षाथळ कोनी रयो । मठ ठरण सूतो कम रगताळू रसी म्हार माथै मावणो, पर थागे प्रो लाडलो पूत मी रंसी थार ई लारं, यारी ग्रारया साम, जिगर सातर तरा कष्ट उठाया है थे । इणमू बघर कई होसी संतोष री बात पारं वास्तं ।' मेक मूगी सिसक मर उसड़ती उसास कपा दं. बी री काया ने घर उठी वा कती ..... पन्ना ! क्यूकर है किरा र तर री बात, रनपून हा गापा, घर में राणी हूं था सबा री । म्हारी ठोड़ अठ है म्हारी रंयत मे किया जा सकू मैं म्हारी पन्ना ! इण न छोड़र । जे अंतुरक तोड़ भी दे गढरी पोळा नं, पर मांगता कोट रा कांगरा प्राण पूर्ग इस गढ़ माय, तो भी म्हारी इज्जत, म्हारो सतत्व सुरक्षित रसी अगो गिणती रा हाथों में जो गिगती रा भल ई होवो, सामरय राय है बरी न करएकराती रा करण री पर होड़ पाळं है वै बरी रा बीस हजार जोधावा सू। मोत रा मारग ने में चोसी तरां पिछाणू म्हारी पन्ना ! बदलो में इस पर हरम्प अर उमाव र साग, हमतीर मुळकतो, नाचतीर कूदती ! भो मारग ले जासी म्हनै म्हार सावरिय रे देश, जठे उडोकऱ्या है बै म्हारी वाट घणी देर गू। जा, अब परी जा म्हारी १मा ! छोडजा मनै म्हारं भाग पर, अर पाळ म्हारं काळजरी कोर इए नान्हें कुवर ने, छाती--२.चिपाया प्रापरं साल र साग ।' माधो झुकायो मैं, परण टुया पर चाल पड़ी प्रापरी गेल मार्य, पाहाता आगळ्यां मापरा कुवर नं, मगजाणं देश कानी । फेर कदेई न देख सको में म्हारी रण होळं मू.. ....

जिंदगी में करमेती रो उणियारो, रूड़ो पर रूपाळो, जिरण में टिमटिमाता दो. दो मोटा नरा देख लीघा हा मापरं मावण पाळं दुरभाग ने। गिरती राई दिन बोत्या हा म्हानं वोछठयां पर राणी कूद पड़ी वळती लाय में तेरा हजार गोरड़ियां ने साग लेयर । कर लीपो का जोहर भर जूझ मरा जू भार केसरिया करने~तुरका सूंजूझता रण में। हा उठ कईक मिसा भी जो पूरण लाग्या थर-पर करता, वीडरता पर धाड पाह-पाहर रोवता , पण म्हारी राखी, सती करमेती कदई न की प्रापरी नीती गाठ निस्चमाळी नजर, विजयाळू मुळकरण पर हंसोड़ सुभाव ने, जो सुवाणग्यो बी ने मोह, ममता पर दयाहीसा सळा रा भएघट्ट लाकडी मार्य, जाणे सूतो हुवे होयर नचीती कोई नई नवेली भार परणेत र पलग मार्थ पलपोत री रात । सदा शान्ति दी म्हारा नाथ, सती रो प्रभीती पारमा नै । ची ई रात उठाया टाबरां ने मळसाई नोद सूपर लेगी बांने धोराऊ कानी, कोट कन, जठ उड़ीक हा म्हारी बाट म्हारा घणी, रामोजी । सौंदरी हो सतरो कने, जिण सूउतार दिया बो म्हाने कोट हेठे, किलं बार। कोप तोक्यां दो ई टाबरा न उतार्या म्है गरी रे ऊबड़-खाबड़ उणियार , घोरंधार मांझल रात मे लुकतार छिपता, लेता ओट झांक-झवाडार चाठा. भाटा री मगरी री तळंटी में । पूगग्या म्हे रामोजी री साय मूअोझल मारण रे पासर तुरक छावणियो रे परळे पार, जठे उड़ीके हो म्हारी बाट बळमे र रूंब हेट बध्योड़ी सांडपां दो । काई वान पर होवतां प्रसवार, पलक मारता, लगाई म्हे रड़ी सो-सो कोसा ताई मेक घड़ी में । भाग्या, भागता रंया रात भर, दिन भर पर तीज दिन पूग्या म्हे कुमळमेर, मेवाड़ रे प्रापतकाळ रे राजस्थान । तियां रैया मासरो उठो रो, जठा ताई भड़क न गो बसान्दर तुरका र बारूद मे पापोग्राप अळगी जायर । कवण द्यो काली स्यातकारा ने रजपूतारी परपरा सुरक्षा र सार इतिहास री, जो आफन रो वेळा सदा धोधी ई सिद्ध हुई। कवण द्यो बनि कोष मू कांधो भिडार रण में जूझता वोरा र बौरांगणा री वार्ता भर प्रापरा गांव, पाळिपा पर परजान बचावण सारू भाशा निरागावा रासायरा मे गिरता-पढ़ता मिना ने मापरी भसाधारण योग्यता स्मासरो देवणमाळी म्हारी राणीरा चरित री काणियां .. पण हाय ! सब विरमा है ! राणी मर जाणो चावं ही ता मरतो, फर भी वा भेन्यो मापर दूत ने, रासी २ कार्य पर साग साता सारू प्रणविसासी परम्लन्छ दिल्ली २ मुलतान कन, प्रपिकार मार्ग, जात जामणजाय से संबंध। मूरख कवि -

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88/गद्य सकलन - . म्हार जसवन्त री । म्हारो लाल व राजकंवर हो पर उदसिय वीरो चाकर पर रम्मत रो मोड़ । जसवन्त निमार्यो हो चतराई सार्ग प्रापरो राजसी अमिनय भर उदसिय कर दियो साव समपंग मापर मस्तित्व रोमापरी इच्छा सू। म्हे अब भी जो रेया हा सोळसोम री जिंदगी। जुग जुग जीवे म्हारो कुवर ! करे कदे ई मन लागतो के मेक छविळी म्हार पसवाई होयर निसरगी, परसता म्हारो हाथ मर म्हारो माल, गाळ्या काढती । प्रेत-मात्मा ही बा कोई जो कर री हो परवी भेक जीवत मिनखरी। बी ₹ प्रभाव नै परं नाखती सुपी-मणासुरणी करगी मैं पर लाड लडाया म्हारे लाल रा पणे कोड मू। संतोष कर म्हारी राणी! सतोख कर! म्हार अपराधां री सजा बारा अनुपाता बेसी ई होगी चाईज। इण सूई तो होडता रैया हो म्हे प्रणासरे घर पर घरहीणां होयर प्राडावळ रा माखरा पर पादरी में • विक्रम सोख न सक्यो कई भी वीर देश मे हुयोर्ड सरबनास सूपर रुक- रुक कर प्रावता झटका सू बगत पड़ यो सदा दुरभागी ई रेयो बो। संग सामंत कर दियो उछाळो पर बडबडाया जोर सू! अंक दिन मर्यं दरबार विक्रम, संस मेवाड रो घणी विक्रम, दीपो निरणो मूरखता किणी वाद पर, पर कीधी मापद इण पर श्रीनगर रो ठार. प्रापर अधिकार सू। रीस खातो उठ्यो राणो उतावळ सागंभ मर मार दी झापट बूडळे र सळां भरयोड़े गोरे गान टावर री पर बा भी भेक कायर री पर अपर मूबेरुको सामत ₹ साग जो कदेई दियो हो मासगे सांगा ने सागा ने जो विक्रम रो बाप हो पर सम्राट हो संग रा. सक्या कोई भी इणनै उछळ पड़ या संग माप री दियो राजमहल पर नीसरग्या बार उछाळो करण र माथे, पड़द र पसवाई उडीकती बार, जद कहो हो होळ सरदाराने ..'हालताई तो कोरा फूल सूघ्या है । पळतो अव चाखरणा है मापा नै ।' फड़क उठी कर मवारां ताई। हाथ बांधया मोरां पाई थूक्यो लाग्यो मन ई मन चीतल ज्यू घुवितो लेस्यां चोखो तरा इण रो स्वाद प्रापा कालई।' रगा रो देखता जोत वी बूढळ रानणां मनीसरती ही अपळक दुरभागी राणं रे भाग पर । ऊमर में : पण जाणगी मैं चोखी-तरां के मोत र मूडे। सायता बेवार मूरखता रो हर घड़ी, हर पुळ ।

गद्य सकलन/89 कदेई सोच तक कोनी सकी मैं के विक्रम र भाग पर मंडारतो मोत रे माम रोप्रो मडारण फाट पड़सी म्हां पर भी प्रापूमाप-भर न मैं सोच ई सके ही कदेई के म्हे भी सीरी हा बों रे पोर सताप में। व्यापगी शाति उठ पर दिन पाचेक ई हया हा म्हांनै जिन्दगी री सूदीसादीर बांको-डोढी लीगेटी पर चालतां के मेक दिन मागफाट्या ई मूमधार ऊभी ही मैं पलंग पथरणा छोड़र झरोखे माथे पर न्हाळी हे तो पैलपोत री नजर साग ई पोळल्यो मैं करमचंद ने करता होळे-होळे कानाफूसी उलझ्योड़े केसां माळ, कोयल ज्यू काळे उरिण- यार माळ प्रेक देत सू, जिगर काळं-कळूट उणियार पर चमक हा मणभीता दो नए शाळां उगळता--भर लटके हा अंग-मंग पर ग्रावध मांत-मात रा। मार्थ मोड़ बांध्यां न्हाळतो गर्व हो वो हर लिप हर पुळ महला री भीता पर प्रितरी तीखी, प्रितरी गाढ अर मितरी उतावळी नजर साग जाणे कदेई न देख्या बो इणां ने इण सूपली पर प्रो संग दिरस नुवो ई हवै बी सारू । पकराई में देखता ई वीन-'कुरण हो सके है मो मानवी ? नेचई अजनबी है प्रो-कोई पैलपोत ई पायोडो इण दुर्ग में ।' बी ई पुळ परसता होळे सूहाथ म्हारो, धीरै बोल्या म्हारा नाथ... .. 'देख ! पन्ना देख ! इण घोळे कागल भर वी काळे कावळे नै देस, जो लड़ा रेया है चूचा भापरी-परस्पर । जाप पड़े के मान प्रारी है बास कठई अड़भड़े ई मडते मांस री। विक्रम ने राखणी चाइज नजर इण पर ।' पूथ्यो मैं, 'कुण है मो' जद उत्तर हो म्हार घणी रो ‘पन्ना ! खवासण रो जाम है प्रो बरणवीर, पीथल गे पूत पर घणी गिरवा रो। हाऊ नी है इण रो अठ प्रावणो सांगाजी ग बंस सारू ।' ...निरखता रैया म्हे बौन उट ताई विछट न ग्या जठ तक प्रापा जार । 'पना! जे मो वरणवीर कर दे हत्या विक्रम री तो कई तू कांपती नई, थर-थर करती बीडरती, पाळ-पोसर मोटा करघोड़ा थारं घरमपूत पूँदै री जिंदगी खातर।' पूछ रैया हा रामोजी पर उत्तर हो म्हारो....... मितरो साहस कर लेसी वो म्हने पतियारो कोनी'.. पण कापग्यो म्हारो काळजो पड़ तर सार्ग पर मावण लाग्या प्रगाचोक, मय सू भरघोड़ा निरासार दुरासावां रा भाव टक- राता म्हार हिवड़ा सू... 'कई साची ई कर देसी हत्या में म्हारा नरमोल्या होसा नानकियां री....... सांगाजी री इणां प्राबरी पोलादां री भी.......मेवाड़ री गादी रो घणी अंक गोल ने, मेक पासवानिये न वणावरण सारू ? सामघरमा है में सगळा सामंत कदास नई करेला में भिसो दुस्साहस, नई करेला बैं कपट प्रापरं कुळ सू. मितरा लाजबिहूणा होर !..... पण... .. बकर ई ले दुस्साहस पन्ना ! तो कई कर सकली तूम्हारा इग्ण नान्हां टाब- रिया ने, म्हारै काळजे री कोर इण नानकियां ने प्रां कसाया की कटारां री .. 4..... ... ... ... .... परराजे 88/गद्य सकलन 1 म्हार जसवन्त री। म्हारो लाल व राजकंवर हो पर उसिप बोरो चाकर भर रम्मत रो भीड़ । जसवन्त निमार्यो हो चतराई साग प्रापरो राजसी अभिनय पर उसिंघ कर दियो साय समपंग प्रापर अस्तित्व रो प्रापरी इच्छा सू। म्हे मब भी जी रया हा सोळसोम रो जिंदगी। जुग जुग जीवे म्हारो कुंवर ! कदे-कदे ई मन लागतो के मेक छावळी म्हार पसवाई होयर निसरगी, परसतो म्हारो हाथ पर म्हारो भाल, गाळ्यां कादती । प्रेत-प्रात्मा हो वा कोई जो कर री ही पैरवी प्रेक जीवत मिनख री।वी प्रभाव ने पर नासती सुरणी-मणमुपी करगी में भर लाड लहापा म्हारं लाल रा घर्ष कोड मू। संतोष कर म्हारो राणी ! सतोस कर ! म्हार परापां री सजा बोरा अनुपांता मू वैसी ई होगी चाईज। इस सूई तो होडता रैया हो म्हे प्रणासर घर पर घरहोणा होयर पाडावळ रा माखरां पर खादरी मे विक्रम सोम न सक्यो कई भी बीर देश मे हुयोर्ड सरवनास सूपर रुक- रुक कर प्रावता झटका सू बगत पड यां सदा दुरभागी ई रयो बो । संग सामंत कर दियो उहाळो पर बडबड़ाया जोर सू' । मेक दिन भर्प दरबार विक्रम, सैस मेवाड़ रो घणो विक्रम, दीपो निरणो मूरखता भर्योड़ो किणी वाद पर, पर कोधी मापद इण पर श्रीनगर रो ठाकर करमचन्द भापर अधिकार सू। रीस खाती उठ्यो राणो उतावळ सागं प्रापरी गाड़ी में पर मार दी झापट वूडळ रे सळा भयोड़े गोरे गाल माथे । थाप ! प्रेक टावर री पर बा भी भेक कायर री पर ऊपर मू बेहवो बेवार मेंक पिस सामंत र साग जो कदेई दियो हो मासरो सागा ने प्रापरो झुपड़ी मे, बी सांगा ने जो विक्रम रो बाप हो पर सम्राट हो संग राजस्थान रो। सह न सक्या कोई भी इणन उरळ पड़,या संग पाप रो मासंद्यां सू, छोड़ दियो राजमहल पर नीसरग्या बारं उछाळो करण सारू । मैं ऊमी ही गोखड़े माथे, पडदै र पसवाई उडोकती बार, जद कहो हो चुडावत कानजी होळ. होळे सरदाराने ..'हालताई तो कोरा फूल सूया है ठारी, कोरा फूल-कडा फळ तो अवै चाखरणा है प्रापा ने ।' फड़क उठी करमचंद री मूछयां भर तणगी मुंवारा ताई। हाथ बायथा मोरां पाई थूक्यो बो जमों पर प्रर मुळकण लाग्यो मन ई मन चीतल ज्यू धुरवितो । 'कड़ा के मीठा....... चाख लेस्या चोखो तरा इण रो स्वाद प्रापा कालई।' सोळो पड़ग्यो रगत म्हारी रगा रो देखता जोत बी बूढळे रा नयां मनौसरती घोर चमक री, जो पड़ री ही प्रपळक दुरभागी राणं रे भाग पर। उमर मे हाल ताई टावर ई हो बो पण जाणगी मैं चौखी-तरा के मोत र मूडै ऊमो रहाळे हो टुकटुकर, सापता बेवार मूरखता रो हर घड़ी, हर पुळ ।

गद्य सकलन /89 कदेई सोच तक कोनी सकी मैं के विक्रम रे भाग पर मंडारतो मोत र भाभं रो मो मंडारण फाट पड़सी म्हां पर भी प्रापूमाप-पर न मै सोच ई सके ही कदेई के म्हे भी सीरी हां बी रं घोर सताप में। व्यापगो शाति उठं घर दिन पाचेक ई हुया हा म्हांनै जिन्दगी री सूदीसादीर बांको-डोढ़ी लोगेटी पर चालतां के मेक दिन मागफाट्या ई मूमधार ऊभी हो मैं पलंग पथरणा छोड़र झरोखे माथे पर न्हाळी हे तो पलपोत री नजर सागै ई प्रोळस्यो मैं करमचद नं करता होळ-होळे कानाफूसी उळझ्योड़े केसां माळ, कोयल ज्यू काळ उरिण- यार पाळे मैक देत सू, जिगर काळ कळूट उणियार पर चमक हा मरणभीता दो नण भाळां उगळता--भर लटके हा अंग-अंग पर ग्रावध मांत-मात रा। मार्थ मोड़ बांध्यां न्हाळतो गर्व हो वो हर रिण हर पुळ महला री भीता पर मितरी तीखी, नितरी गाढ अर मितरी उतावळी नजर साग जाणे कदेई न देख्या बो इणां ने इण सूपली पर प्रो संग दिरस नुवो ई हवं बी सारू । चकराई मैं देखता ई बीन-'कुरण हो सके है भो मानवी ? नेई मजनबी है यो--कोई पलपोत ई मायोड़ो इण दुर्ग में ।' बी ई पुळ परसता होळे सूहाथ म्हारो, धीर बोल्या म्हारा नाथ..... 'देख ! पन्ना देश । इण घोळे कागल भर वी काळे कावळ न देख, जो लड़ा रेया है चूचा मापरी-परस्पर । जाण पड़े के पान भारी है बास कठई प्रभड़े ई मडते मांस री। विक्रम ने राखणी चाइज नजर इण पर ।' पूथ्यो मैं, 'कुण है प्रो' जद उत्तर हो म्हार धरणी रो 'पना ! खवासण रो जाम है भो बरणवीर, पीथल गे पूत पर धणी गिरवा रो। हाऊ नी है इण रोम प्रावणो सागाजी ग बंस सारू ।' ...निरखता रया म्हे बांन उठताई विछट न ग्या जठे तक ग्राधा जार । 'पन्ना! जे पो वरणवीर कर दे हत्या विक्रम री तो कई तू कांपनी नई, थर-थर करती बीडरती, पाळ-पोसर मोटा करघोड़ा थार घरमपूत मूदै री जिंदगी खातर ।' पूछ रया हा रामोजी पर उत्तर हो म्हारो......'मितरो साहस कर लेसी बो म्हने पतियारो कोनी'... पण कापग्यो म्हारो काळजो पड तर साग पर भावण लाग्या प्रणाचोक, भय सूभरघोड़ा निरासार दुरासावां रा भाव टक- राता म्हार हिवड़ा सू .'कई साची ई कर देसी हत्या ग्रे म्हारा नरमोल्या होसा नानकियां री........सागाजी री इणा पायरी पोलादां री भी.....मेवाड़ री गादी रो घरणी अंक गोल नै, मेक पासवानिय ने बणावरण सारू? सामघरमा है में सगळा सामंत कदास नई करेला में प्रिसो दुस्साहस, नई करला बै कपट प्रापर कुळ मू.. प्रितरा लाजबिहूणा होर ।.... पण..... पण जे बैंकर ई ले दुस्साहस पन्ना ! तो कई कर सकली म्हारा इण नान्हा टाब- रियां न, म्हार काळ री कोर इण नानकियां ने मां कसायां की कटारां री ...... ...... .....

90/गद्य संकलन तीखी धारा बचावण सातर।' नेचई ना मेक साच ही .......पणी मोही परत पाई जिगने में। कदरो ही पसरयो हो जाळ च्यारूद, कई तो दानार कई मोटधार, फसग्या संग इल मोत री फांदी में.....प्ररम्हे ......कई न कर सश्या म्हे वार बचाव सारू। चोधता रेया म्हे प्रणमणा होयर धिल- खतार वीडरता. . . वैमाता री लीलारी इण परिणति री बाट देता। ..... ... .... होळे-होळे वगत बीत्यो सांमा जो म्हे ले रेया हा......पणा दुवां मूं घरपी मापता भरघोड़ी ही बा। खटखटायो में म्हार भेजने उळटपो ने पळटयो कोई उपाय निकाळरा सारू पण सब व्यर्थ ! सूरज प्राथम्यो घड़ी डोक में ई पर पोढम्या टावर दूध-भात खायर मेक ई दोत्य पर नाखता गवायां क दूसरे रे गळं में। समिळतोर सोचती री में बैठी पसवाड़े के पगाचोक पाई साद भागती भीड़ रा खारड़ा री, खड़गारी खडकावण पर अवर में उड़ते दर री भर मरणाचोक माधी मंधार मूजुडता-उपड़ता कुवाड़ा री सरड़क पर उड़ते खारड़े री एमचक साग वड़या रामाजी हाफतार नांखता निसासा ....बोलता उखड़ती उसासां सागे. 'वणवीरें कर दी है हत्या विक्रम री पर भबै प्रारभो है मठी ने ई करतो मन्सूबो मूद ने मारण रो। प्रागळ अटका दी है मैं कुवाडा पाडी, कदास रोक सकली वा वणवीर ने कुवाड़ा ने मांगर अठा ताई प्रविण सूं... .मनै म्हारो लाल झला दे.... लुका लेन्यू ई बोन म्हारे बाग मे पर निकळ जास्यू कोट बार इण ई पुळ । बावळ ज्यू बरड रेयो है बणवीर हत्यारी लाळा मूई टप- कावतो पर अवसकर मारसी वो आपरं खड़ग सू सांगा री इए भाखरी पोलाद ने भी। डर है म्हन, कठे ई उतार न दे वो मोत रे घाट प्रापर्ण जस- वन्त ने भी इणी तरवार सू। दे दे ....मनं म्हारो लाल दे दे.. .मनै म्हारो लाल दे दे।' पूरा हुया न हुया बोरा पोल के प्राई बार .......लांबी घर नांबी, किरणी कामगरे कंठ री.....सांभळ चुकी हो जिएन मै केई दारण इगी राजमहल ने इण सूपला भी। बार ही मा पुळ भर पेलो ई सुरग सिधारया किरणी जोघे रे सम्मान री। आई... भाती गो भगदड़ पाथियां माथे.., भारी नाद साग भर टकरावण लागी गुरजां बज्जर होसा सक्कड़ किवाड़ माथे। रड़बड़वा लागी में अठी-उठी मालिय मे बावळी होयर पर मोच तक भी सकी लाल ने बचावरण मारू म्हारै घणी री दियोड़ी राय पर । वळ यो हो जीवती-मरतो गुगळो दिवलो मिलातो सांसा आपरी ए टारिया री सास मू। पर जद मैं लुळी ढोलिये मार्य तो भोळवी येक छाया ने नौसरतां प्रार-पार उदधिरे गद्य सकलन/91 .. N उणियार मूं। टकराग्या टिमटिमाता दो निरमोही नैण म्हारै नैरगां सू-प्रेक रोगी दूबळी पतळी लहराती काया रा । छाया पाई पर गी । घुमड़त दिवळे री लो रं गूगळं उजास में उठयो अंक हाथ होळे-होळे उदैसिंघ रै भाळ माथे.... ...मुठ्यो हुवे जाणं बी री रिच्छा खातर । 'राणी . राणी करमेती।' पाड़ी बार मैं जोर सूअर मुड़गी पार्छ । होळ-होळ हालता होठ छाया रा कह रैया हा मरदास करता .'पन्ना ! हे म्हारी पन्ना ! बचाले म्हार लाल ने' .....वावळी होगी मैं पर लुटगी संग चेतनावा म्हारी । अणमणीर ममूझती मुड़गी मैं पाछी ....जाणे खोसली हुवै कोई संग इच्छावां म्हारी....... अरण- बोल्यो उठा लीधो में मूदै नै भर लपेटतां राली में लुकाता उरिणयारो बी रो झिला दियो म्हार घणी नै.... थरथराता, बीडरता, नैणां में गळगळा लावता भूभा हा जो म्हारे साम । उतरग्या रामाजी उतराघ र गळियार पर उडीकती री मैं, ऊभी छानी-मानी, गिणती सांसां पाखरी म्हारे लाल री, मितरी निर- दयी मितरो निरमोहो होयर जाणं म्हारो पर बी रो कोई सम्बन्ध ई न हो। न वो म्हारो पूत हो पर न मैं ई ही बी री जामण । पड़ री ही घात गुरजा री हाल ताई माळिये रा कुवाड़ा पर। टूटग्यो दरूजो चरमरार ... . अर बावड़गी भगदड़ पाछी, कदास लाजां मरती ! चांप, किणी रा पगारी प्रावती गी ऊपर, ने ऊपर हटग्यो पड़दो का कानी पर भू मो हो वणवीर साम तोलतां तरवार ऊची, झरग्यो हो रगत जिणसू करतो रगद-बगद बी रा हाथ, बी रा भुज, बी रा केस पर बी रै चौड़े माळ नै.. पर हो री ही वो री पाख्या चोळ-बोळी, साव सिंदूरी इण सू होड पाळती। कड़क्यो बो बेग सू भादरव र मेघ ज्यू धुजातो माळिय री भीतां पर कपातो म्हारी काया ने....'तू ई पन्ना, धाय धूदै रो ? देख ! अठो देख ! मा मोत ऊभी है थारै सामै जे रजेक भी झूठ बोली तो । कठे है प्रदो?' म्हें नुवा लियो माथो पर उठादी प्रांगळी धूजते हाथों पलंग कानी । उछळियो बरणवीर अणचोक अर खीचतां खीसलो म्हारै लाल री काया सू', उठाई माव- धाली मुज पर.... खच्च .. .. देखतां सिमटगी काया प्रेमाता री भेक ई पुळ में । उजड़गी दुनिया म्हारी खिरण भर में.. ....फूट पड़ यो फूवारो म्हार लाल री काया सू, छोड़तो छाप सुरंगी सितारां री बी री चोड़ी छाती पर । खुलग्या नैण वी रा सातरी निजर सागै भर मुंदण्या बी ई पुळ सदा-सदा रे खातर। लटकगी नाडकीर गड़कगी मूडकी ढीली होयर पर सूग्यो पाछो होळ मूजियां दखती आई हूं मैं बी ने सैकड़ो वार गुड़कतां सदा सू। पररा अाज बो सोयो है सदा र खातर, नचीतो होयर मायड़ र हिवड़े ने किलकार्यो सू भरण सारू फेर कदेई नी उठलो बो। ......

92/गद्य सकतन ......मरा ....... बड़बड़ायो बणवीर, भेक उद्दाम पळखळाट साग .. 'प्रव राणो हूं में इणी पुळ इण भोम रो' वावड़यो बरदातोर परोग्यो सड़सड़ातो खारडम उतरतो माळिये सू है। परी,गौ साद दूर, धण दूर, डूबती राजमहल रो सूनाड़ में । पर रोड़गी वा छाया भी, ग्रस मेली हो जो म्हारी काया ने, म्हार •मन भर म्हार हिबई ने घणी देर सू, कराती भान गर्न म्हारी करणी से, जो भाग हो इण रा फळां री सार-लार म्हारं प्रतल में । हत्यारो ही मैं. नांव्यो मैं म्हारे ई लाल ने... ... सूत्यो हो जो सुख भर नोद, करतो सोरो म्हारो जीव भर म्हारी काया नै । संमळ न सकी मैं. लड़खड़ावा लाग्या पग पर रुळवा लागो रड़बड़ती में कली, सातां ठोकरा मंधार में । गुड़ती-पड़ती, खावती तांवरा, पड़गी में पिलग माथं पर होगी निढाळ.......पर परस्या पाव म्हारे पूत रा, होता जाऱ्या हा जो सीळा घणे वेग सू। अगाचोक मायो भाव म्हार मंतस मे पर झाझरणाग्यो म्हारी काया नै बबड़ाता पाही मन होस में.. होगी, होगी ही जो होगी जिवदा....... बळि मी मच तो पूरण होगी। घरणी मूरग्वता होवली सब जे पारं लाल रो भो पळिदान ळो ई जावे। होगी चाईज नाणकारी किनी ने भी के वळि पर प्ररप्योड़ो श्री निर- दोप टावर पन्ना रो पूत है। मोळस्यो मैं म्हार लाल ने.. ...म्हारं काळजियरी कोर नं...... मुरझा- योड़ो मुखड़ो जिण रो, छितरायोड़ी हो रगत बोरी चोही बातो पर । लाई में माभूपण माणक-मोत्यां रा माळे सूपर बाघ दिया बी र कंठ, बी री भुजा पर वीरा पूचा र प्रोळदोद । फितरो रूड़ो पर तिरो रूपाळो लागे हो वो.... लीधो में बाच्यो बोरं भाळ पर पर असगो म्हारी भावनावो म्हारी उजड़ो प्राशावां रा घोर उकसावा । ग्राई रहार कनै अंक लुगाई डरती बोडरती थरथराती बेग सूअर उडीकरण लागी म्हनं जो बदबडावं ही सन्निपात में, बध्योड़ी ही मूठिया म्हारी, कूट ही छाती, हंसती पर रोतो बरड़ाती बावळी ज्यू .......अर करतो जार्यो हो प्रास्मा सू प्रापो परनाळो उकळता पासुवा रो। मतस में प्रावण पाळं घगा करई तणाव मे भी रास मेल्यो हो मैं बाध्योड़ो मेक रहसनं, पाळती हिवडा मंझ प्रापरो वोदी चतराई ₹ धासर निरदोस रगत बगो न चाईज घेळो ई........मर कुवर री रिछा खातर करणी चाई मन प्रसी करणी जो भोड़ी हुदै छळछदम सू सगळं हानी ........उठा ताई जठा तक पनप न जावं मामूठ निपट सांच में । म्हारा भाया ! कई कयों तू मैं सोचू के पसररर्यो है मचरज भर्यो उआळो चारू मेर पर फूल रैया है फूलड़ा लाल- ..."सूरज मांथग्यो"..

गद्य सकलन/93 - पोळाने घोळा रंग-बिरंगा मंग चराचर में। देख्या है वान काल ई तो पर लेती री हूं वास मीठी-मीठी बी री सांसां री सागै जोवन काळ री इण जीरणापी छाती में। क्यूंदाब है म्हारो हाय....... पर क्यू बोल है वोल म्हनं ? लेवण दे म्हन मरणत शांति । सांभळ.......पली समिळ म्हारा बोल, पूरी करूं हूं मैं म्हारी कापणी। मा भासरी वगत है म्हारा पूत जद करी हूं तन हेत तूं 1.. वी रात वैधुण्यो हो सळो, राजसी ठाठ न, काठ रो, पर पोटायो हो बी पर घणं मान घणं मादर म्हार लाल ने राणावां रै जोग संग सस्कारां साग लगायो वेलांपो। देसतो री पर देवहू अब ताई भळ- हळती माळां भर घुमड़तो धुवाड़ो ...प्रेक लहराती लपट, उड़े ही जो सुरग तांई सरंग तक । न्हाळ म्हारा लाल न्हाळ ! सगळो जगत जगमगा रेवो है सतरंग उजास मूं। कितरी स्वादू पर सोरमपाळी है इण फूलां री बास । व्यापरपो है उजाळी म्हार मोळदोळ मर लाग है म्हनै जारी होगो में मोटधार फेर सू। म्हारी कथा....बररागी प्रव लहराती घुघराळी धुघाड़े री बादळी । बादळी उकेरती भेक झिळमिळतो उरिणयारो, भागती मरपट, हेठ ढाळ मू सतरगी उजास साग । कितरो रूड़ो, कितरो रूपाळी मिळमिळतो उणियारो है वीं रो....सुरंगी सितारा! म्हारा लाल ! म्हारा लाल !! ..

96/गद्य सकलन भरतियाजी री जीवण-लीला उपां री 61 बरस री ऊमर में संवत् 1971 में इंदौर में समाप्त हुयी। - (2) भरतियाजी रे जीवण रो सव सूबड़ी उपलब्धि ही उषा द्वारा करी गयी राजस्थानी भाषा मोर साहित्य रो संवा । उगा साहित्य में समाज सू रती भर भी जुदो कोनी राख्यो । राजस्थानी जन-जीवण र स्तर नै उगा प्रास्या खोसन देख्यो, न देख्यो के राजस्थान री जन-सस्कृति, साहित्य, भाषा मोर प्रतिष्ठा-~सगळां ने लोग होण दीठ सू देस है । राजस्थानी जनरी प्रख्या सोलए सारू उणा कलम उठायी भर लोगों ने दरसायो के मापी रो समाज रसातळ ने जाय रयो है, 'मारवाड़ी' नांव री महत्ता घट रेयी है और मापणी भाषा री तो लुटिया ही डूब रयो है ! गराई सोचणं पर उणा ने राजस्थानी समाज री अपमानजनक अवस्था रो मूळ कारण प्रत-पंत मो लाग्यो के समाज में मज ताई शिक्षा रो घोर प्रसार है । इण न मिटायां विना समाज सुधरण रो कोनी, मारवाड़ी 'मारवाड़ी' ही रेसी। शिक्षा रे प्रचार-प्रसार सारू उरणा जनता री बोली ने ही माध्यम वरणावरको ठीक समन्यो । मातृभापा सूमाछो दूजी भाषा किए तर हुय सके है ? उगा री मीट मे आ बात मायी के 'मारवाड़ी' रो उद्धार मारवाड़ी भाषा ही कर सके है- "मारवाड़ी भाषा मापणी मातृभाषा थे। मारवाड़ी भाषा प्रापणी बोध- दात्री थे और मारवाड़ी भाषा प्रापणी स्त्रियों को सुधारकी छे । म्हारो तो सिद्धांत के के पापा लोगों को लक्ष्य प्रापणी मातृभाषा मारवाड़ी कानी नहीं रहणे सू प्रापणो समाज हाल ताई इशी होन दशा माहे पड़यो हुयो छ । मारवाड़ी भाषा विश्वविद्यालय तो दूर तथापि छोटी-मोटी पाठशाळा ताई भी पूग जाती तो पसरा मारवाड़ी सरदार विद्वान बण जाता । पाप । भाषा ने हीण समझणे सूअापणो उद्धार हो सके?" . .

गद्य सकलन/97 कीनी नहीं। छोटी-मोटी कोई पुस्तक वणाय ने सरदारां के सामने राखणी तो खरी । देखो भला, प्रादर होवे के अनादर होवे।' मातृभाषा में रचना करण री उरणा री इच्छा इण कारण भी ही के प्रशिक्षित मारवाड़ी भने उणां री लुगायो तो इण रे अलावा भारत री दूजी भाषावा नं जावक-ई को जाग ही नी, फेर उरणा भाषावा में लिखण सूमार- वाड़ी समाज ने कोई फायदो ? प्रेक मोर मी सबळ कारण राजस्थानी में लिम्बरण रो उपा मो बतायो के उरण सम इण माषा रो साहित्य दूजी भाषावा र साहित्य सू जावक ही थोड़ो लिस्यो जा रयो हो । राजस्थानी र गौरव ने भी दुनिया रे सामने लावणो हो । 'केसर-विलास' री भूमिका में उणी लिस्यो 'पापणो नोकोटी मारवाड़ मोर मारवाड़ी बोली कठो के मधेरा माहे पड़ी थे, माप जाणो नहीं काई ? प्रग्रेजी तो रवा दयो पण बंगाली, गुजराती, मरेटी, हिन्दी कानी तो जरा नजर करो, किशा-किशा पंप इण भाषा माहे तयार हुवा छे मोर हो रहा छ तिकां रो गिणती नहीं। मापणी मारवाड़ी बोली पान इमा सुधार का कळास ऊपर पूग्योड़ी दुनिया माहे पण मधेरी गुफा के अंदर गोता खाती रहे, इण को मभिमान प्राप सरदारा ने नहीं काई?' पर भरतियाजी राजस्थानी समाज ने मंवेरी गुफा सूवार लावण सारू कमर कसो और पाप री कलम से जागती जोत सूउण रो मार्ग प्रशस्त करण रो प्रयास रिपो, घरछूट प्रयास करपो। (3) भरतियाजी री लिखघोड़ी पुस्तकां री संख्या राजस्थानी में 9, हिंदी में 17, मराठी मे 13 पर संस्कृत में 3 है । सं. 1963 में छपी 'वुढापा की सगाई' नाटक र छेड़ल पृष्ठ र विज्ञापन में उणा री रचित पोथ्या रो विवरण इण भात है-- "सिदुचद्रिका (संस्कृत, मराठी), गीतार्थ-पद्यावळी (मराठी), केसर- विलास (मारवाड़ी)-दूसरी बार छप रही छे, कनकसुन्दर (मारवाड़ी), प्रवास- कुसुमावली गुच्छ 10 (हिंदी), बुढापा की सगाई-नाटक (मारवाड़ी), मोत्यों को कंठी (मारवाड़ी), गुर्वष्टक (संस्कृत), राज्यारोहण-प्रशस्ति (संस्कृत) शोककानन : --- (हिंदी)। लिखकर तपार-फाटका-जंजाळ नाटक (मारवाड़ी), मतिविलास नाटक 96/ गद्य संकलन भरतियाजी री जीयरण-लीला उणा री 61 बरस री कमर में संवत् 1971 में इंदौर में समाप्त हुयी। (2) भरतियाजी र जीवण री सब सूबड़ी उपलब्धि ही उणां द्वारा करी गयी राजस्थानी भाषा और साहित्य री सेवा । उणा साहित्य ने समाज सू रत्ती भर भी जुदो कोनी राख्यो। राजस्थानी जन-जीवण र स्तर ने उगो प्रख्यां खोलनं देख्यो, ने देख्यो के राजस्थान री जन-संस्कृति, साहित्य, भाषा और प्रतिष्ठा-सगळा ने लोग होण दीठ सू देख है। राजस्थानी जन री प्रास्यां खोलग सारू उषां कलम उठायी भर लोगा ने दरसायो के मापा रो समाज रसातळ न जाय रेयो है, 'मारवाड़ी नांव री महता घट रंयी है और पापणी भाषा री तो लुटिया ही डूब रेयो है ! गराई मूसोचणं पर उणा ने राजस्थानी समाज री अपमानजनक अवस्था रो मूळ कारण प्रत-पंत भो लाग्यो के समाज में मज ताई शिक्षा रो धोर प्रसार है । इण न मिटायां विना समाज सुधरण रो कोनी, मारवाड़ी 'मारवाड़ी' ही रेसो । शिक्षा र प्रचार-प्रसार सारू उणां जनता री बोली ने ही माध्यम वरणावरणो ठीक समझ्यो । मातृभाषा सू माछो दूजी मापा किण तर हुम सके है ? उणां री मीट मे आ बात मायी के 'मारवाड़ी' रो उद्धार मारवाड़ी भाषा ही कर सके है- "मारवाड़ी भाषा प्रापणी मातृमाषा थे । मारवाड़ी भाषा प्रापणी बोध- दात्री छे और मारवाडी भाषा पापणी स्त्रियां को सुधारकी छे । म्हारो तो सिद्धांत छे के पापां लोगों को लक्ष्य प्रापणी मातृभाषा मारवाडी कानी नहीं रहणे सू प्रापणो समाज हाल ताई इशी होन दशा माहे पड़यो हुयो छ । मारवाड़ी भाषा विश्वविद्यालय तो दूर तथापि छोटी-मोटी पाठशाळा ताई भी पूग जाती तो पणसरा मारवाड़ी सरदार पियान वण जाता । पापणी मातृ- भाषा ने होण समझणे सूमापणो उदार किण तरे हो सके ?" ('कनक-सुदर' री भूमिका) 'केसर विलास' नाटक री भूमिका मे उणा री मातृभाषा रे प्रति मा हूंस इण रूप में प्रगट हुयो है-- 'म्हारा दिल माहे हमेशा विचार मावता के पापा वाण्या के कुछ माहे जनम तीनो, रुजगार-पंघो मोकळो कीनो, दो-चार मापा को पम्यास करने सैकड़ों पुस्तको बांची पोर संस्कृत, मरेटी, हिन्दी महि रपना मी करो, कविता मोकळी कोनी, पण मापणी जनम-मापा मारवाड़ी तिका कानी तो नजर गद्य सकलन/97 कोनी नहीं। छोटी-मोटो कोई पुस्तक वरणाय ने सरदार के सामने राखरणी तो खरी । देखो भला, मादर होवे के अनादर होवे ।' मातृभाषा में रचना करण री उरणा री इच्छा इण कारण भी ही के प्रशिक्षित मारवाड़ी भने उणां री लुगायां तो इस रै अलावा भारत री दूजी मापावा ने जावक-ई को जाणं ही नों, फेर उणां भाषावों में लिखण सूमार- वाड़ी समाज ने कोई फायदो? प्रेक भौर भी सबळ कारण राजस्थानी में लिम्बरण रो उपा मो बतायो के उरण सम इण भाषा रो साहित्य दूजी भाषावा र साहित्य सू जावक ही थोड़ो लिख्यो जा रयो हो । राजस्थानी र गौरख ने भी दुनिया रे सामने लावणो हो । 'केसर-विलासरी भूमिका में उणां लिस्पो 'मापणो नोकोटी मारवाड़ मोर मारवाड़ी बोली कठो के प्रधेरा माहे पड़ी थे, सूमाप जाणो नहीं कांई ? अंग्रेजी तो वा यो पण बंगाली, गुजराती, मरेटी, हिन्दी कानी तो जरा नजर करो, किशा-किशा ग्रंथ इणा भाषा माहे तैयार हुवा छ भोर हो रह्या छ तिकां री गिणती नहीं। भापणी मारवाड़ी बोली माज इशा सुधार का कळास पर पूग्योड़ी दुनिया महेि पण अंधेरी गुफा के अंदर गोता खाती रहे, इण को प्रभिमान पाप सरदारा ने नहीं काई?' पर भरतियाजी राजस्थानी समाज ने मंवेरी गुफा सूवार लावण सारू कमर कसो और माप री कलम री जागती जोत सूउण रो मार्ग प्रशस्त करण से प्रयास करपो, घरलूट प्रयास करयो। (3) भरतियाजी रो लिखघोड़ी पुस्तकां री संख्या राजस्थानी मे 9, हिंदी में 17, मराठी मे 13 पर संस्कृत मे 3 है । सं. 1963 में छपी 'बुढापा की सगाई' नाटक र छेड़ल पृष्ठ र विज्ञापन में उणा री रचित पोथ्या रो विवरण इण भांत है- "सिद्ध दुचद्रिका (संस्कृत, मराठी), गीतार्थ-पद्यावळी (मराठी), केसर- विलास (मारवाड़ी)-दूसरी बार छप रही छे, कनकसुन्दर (मारवाड़ी), प्रवास- - कुसुमावली गुच्छ 10 (हिंदी), बुढापा की सगाई-नाटक (मारवाड़ी), मोत्या की केटी (मारवाड़ी), गुर्वष्टक (संस्कृत), राज्यारोहण-प्रशस्ति (संस्कृत) शोककानन ; (हिंदी)। लिखकर तैयार- फाटका-जंजाळ नाटक (मारवाड़ी), मतिविलास नाटक 96/ गद्य सकलन भरतियाजी री जीयण-लीला उणां री 61 बरस री ऊमर मे संवत् 1971 मे इंदौर में समाप्त हुयी। (2) मरतियाजी रं जीवण री सब सू बड़ी उपलब्धि ही उण द्वारा करी गयो राजस्थानी भाषा और साहित्य री सेवा । वणा साहित्य ने समाज सू रत्ती भर भी जुदो कोनो राख्यो । राजस्थानी जन-जीवरण र स्तर नै उहाँ ग्राख्यां खोलने देख्यो, ने देख्यो के राजस्थान री जन-संस्कृति, साहित्य, भाषा और प्रतिष्ठर-सगळो नै लोग होण दीठ सू देस है। राजस्थानी जन री प्रास्यां खोलग सारू उगा कलम उठायी भर लोगों ने दरसायो के मापा रो समाज रसातळ ने जाय रयो है, 'मारवाड़ी नांव री महत्ता पर रंयी है और पापणी भाषा री तो लुटिया ही डूब रेयो है ! गराई मूसोचणं पर उणो ने राजस्थानी समाज री अपमानजनक अवस्था से मूळ कारण अंत-पंत भो लाग्यो के समाज मजे ताई शिक्षा रो घोर प्रसार है । इण नै मिटायां विना समाज सुधरण रो कोनी, मारवाड़ी 'मारवाड़ी' ही रंसी । शिक्षा रे प्रचार-प्रसार सारू उरणा जनता री बोली नै ही माध्यम वरणावणो ठीक समझ्यो । मातृभाषा सू माछी दूजी भाषा किरण तरै हुय सके है ? उपां री मीट में प्रा बात मायी के 'मारवाड़ी' रो उद्धार मारवाड़ी भाषा ही कर सके है- "मारवाड़ी भाषा मापणी मातृभाषा छ । मारवाड़ी भाषा मापणी वोप- दात्री थे और मारवाडी भाषा मापणी स्त्रियों की मुधारक/ छ । म्हारी तो सिद्धांत के के पापां लोगों को लक्ष्य आपणी मातमापा मारवाडी कानी नहीं रहणे सू पापगो समाज हाल ताई इशी हीन दशा माहे पड़पो हुयो छ । मारवाड़ी भाषा विश्वविद्यालय तो दूर तथापि खोटी-मोटी पाठशाळा ताई भी पूग जाती तो पासरा मारवाड़ी सरदार विद्वान बण जाता । प्रापणी मात. भापा ने हीए समझणे सूपापणो उद्धार किए तरे हो सके ?" ('कनक-सुदर' री भूमिका) 'केसर विलास' नाटक री भूमिका में उणां री मातृभाषा र प्रति मा हूंस इस रूप मे प्रगट हुयी है~- 'म्हारा दिल माहे हमेशा विचार भावता के पापा वाण्या के बुळ माई जनम लीनो, रुजगार पंपो मोकळो कोनो, दो-चार मापा को अभ्यास करने सैकडों पुस्तक वांची पोर संस्कृत, मरेटी, हिन्दी माहे रचना भी करो, कविता मोकळी कोनी, पण मापणी जनम-मापा मारवाड़ी तिका कानी तो नजर भी गद्य सकलन/97 कोनी नहीं। छोटी-मोटी कोई पुस्तक वणाय ने सरदारां के सामने राखणी तो खरी । देखो मला, यादर होवे के अनादर होवे ।' मातृभाषा में रचना करण री उरण री इच्छा इए कारण भी ही के प्रशिक्षित मारवाड़ी भने उणां रो लुगायां तो इस रै अलावा भारत री दूजी मापावां ने जावक-ई को जारण ही नी, फेर उरणां भाषावां में लिखण सूमार. वाड़ी समाज ने कांई फायदो? मैक और भी सबळ कारण राजस्थानी में लिम्बरण रो उणा मो बतायो के उण समं इण भाषा रो साहित्य दूजी भाषावा र साहित्य सू जावक ही थोड़ो लिख्यो जा रयो हो । राजस्थानी ₹ गौरव ने भी दुनिया रे सामने लावणो हो । 'केसर-विलास' री भूमिका में उप लिस्यो - 'पापणो नोकोटी मारवाड़ पौर मारवाड़ी वोली कठो के अंधेरा माहे पड़ी छ, पाप जाणो नही काई ? अंग्रेजी तो रेवा दयो पण बंगाली, गुजराती, मरेटी, हिन्दी कानी तो जरा नजर करो, किशा-किशा ग्रंय इणा माषा माहे तयार हुवा छे और हो रहा छ निकां री गिणती नहीं। प्रापणी मारवाड़ी बोली प्राज इशा सुधार का कळास ऊपर पूग्योड़ी दुनिया माहे पण अंधेरी गुफा के अंदर गोता खाती रहे, इण को अभिमान माप सरदारी ने नहीं कांई?' प्रर भरतियाजी राजस्थानी समाज ने मंधेरी गुफा सूवारं लावण सारू कमर कसी और पाप री कलम री जागती जोत सूउग रो मार्ग प्रशस्त करण ये प्रयास करपो, घरट प्रयास करघो। (3) भरतियाजी री लिखपोड़ी पुस्तको री संख्या राजस्थानी में 9, हिंदी में 17, मराठी में 13 पर संस्कृत में 3 है । सं. 1963 में छपी 'वुढापा की सगाई' नाटक र छडले पृष्ठ विमापन में उणो री रचित पोम्यो.रो विवरण इण मांत है- "सिदुद्रिका (संस्कृत, मराठी), गीताप-पदयावळी (मराठी), केसर. विलास (मारवाड़ी)-दूसरी बार छप रही थे, कनकमुन्दर (मारवाड़ी), प्रवास कुसुमावली गुच्छ 10 (हिंदी), बुढापा की सगाई-नाटक (मारवाड़ी), मोत्या की कंठी (मारवाड़ी), गुर्वष्टक (संस्कृत), राज्यारोहण-प्रशस्ति (संस्कृत) शोककानन : (हिंदी)। कर तैयार~-फाटका-जंजाळ नाटक (मारवाड़ी), मतिविलास नाटक 98/गद्य संकलन (मराठी), अनुताप तीर्थ शतक (मराठी), प्रार्या लहरी (मराठी), विज्ञान पाशु- पत (हिंदी)। संयार हो रही छ-प्रब क्या करना चाहिए ? (हिंदी, मराठी, गुजराती, बंगाली मोर मारवाड़ी), बोपदपंण (मारवाड़ी)। भरतियाजी री पाखरी छप्योड़ी पोथी 'सूर्यचक्रवेघ' मिल है जिकी उरणारे 'विचार-दर्शन' नांवर प्रेक विशाल ग्रंथ रो प्रेक अंश है। उण रो विषय योग- विद्या भोर वेदांत मूसम्बन्धित है। पोथी लिखण र सिवा उणां हिंदी पत्र 'वैश्योपकारक' र सपादन में भी घणो सहयोग दियो। सामयिक समस्यावां पर उणा रा जिका विचार हा बै मोकळी कहाण्यां पर निबंधां रे रूप में उण मे नियमित रूप सूप्रकाशित हुया भरतियाजी री राजस्थानी रचनावा मे 'कनक-सुन्दर' नांव री कृति राज- स्थानी भापा रो पलो उपन्यास है और भरतियाजी री प्रतिनिधि राजस्थानी रचना मानी जा सके है। उप रो पैलो भाग ही छप सक्यो, दूसरो भाग प्रकाश में नहीं प्रायो। प्रो उपन्यास उण टेम प्रकाशित हुयो जद हिंदी में चंद्रकांता संतति, भूतनाथ जिसा तिलस्मी ने जासूसी उपन्यासां रो बोलबालो हो। कनक-सुन्दर सामाजिक उपन्यास है। इस मे उए. टम रे मारवाड़ी समाज री कथा ने जिण सरस ढग सूप्रस्तुत करी है उरण ने देखने लोग घणा प्रभावित हुया ! कनक मोर सुन्दर इण उपन्यास रा नायक-नायिका है जिका रो प्रारंभिक जीवण हो ले भाग में प्रा पायो है । उपन्यास से प्रारंभ इण मात हुदै-'दोपहर को वपन । चारयां कानो लू चाल रही छे । हवा का जोर मूवाळू मठी-की-उठीने उड-उडकर बी-का नवा-नवा टोवा हो रह्या छ, और भीजण भी रहया छे , मुंह ऊंचो कर सामने चालणो मुस्कल छ। लू कपड़ा मांहे बड़कर सारा सरीर ने सिकताव कर रही छे। धूप इसी जोर की पड़ रही छे के जमी ऊपर पग देणो मुस्कल छ। रास्ता माहे दूर-दूर कठेही भाड़ को नाव नही । बाळू उड़कर जगां-जगां नवा टोबा होणे सूरास्ते को ठिकाणो नहीं। मादमी तो दूर, रास्ता माहे कोई जीव-जिनावर को भी दरसरण नहीं। इथे वसत मेक जवान प्रादमी जिए की उमर सोळा सत्रा बरस की थी, मायो कपड़ा सूबध्यो हुवो, हुश-इश करतो-करतो अजमेर कानी चल्यो मा रहयो छ। रेती गरम होणे सूपगा के चरका लागकर फोडा मा रहया छे, तो भी जोर सूचाल रहयो छ ।' उपन्यास मे यापणे देश में फैली फूट री जिको कमजोरी ही उण कानी गद्य संकलन 199 भी भरतियानी संकेत करण में कोनी चूक्या 'प्रपणा देश माहे मेको नहीं जरा तो पापणी राज्यसत्ता पराया लोगों के हाथ गयी ... देखकर सारा झट बोल्या के मा तो 'फूट' छ। साहेब हंसकर बोल्या के प्रो इशो अनोखो फळ धारा देश माहे के जरा तो म्हा लोगों को राज हुवो; नही तो म्हांकी काई मगदूर थी सू हजारां कोस पर पाकर पाके ऊपर हकूमत करता? इण -माहे. कोई झूट छ। इण फूट तो सारा देश को सत्यानाश कर दीनो ।' । 'केसर-विलास' (प्रकाशन समै संवत् 1957) भरतियाजी रो पली राज- स्थानी रचना और राजस्थानी रो पलो नाटक है। इण प्रादर्शोन्मुखी यथार्थ- वादी नाटक री स्वाभाविकता मौर यथार्थवादिता हिंदी रे पंडित महावीरप्रसाद द्विवेदी ने भी घणा प्रभावित करया। उरणां 'सरस्वती' में लिख्यो-रचना इसको बहुत ही स्वाभाविक है । कही-कही पढ़ते समय, स्वामाविकता का इतना माविर्भाव हो उठता है कि इस बात को विस्मृति हो जाती है कि कल्पित कथा पढ़ रहे हैं। (सरस्वती, अक्टूबर, 1904, पृ. 368) इण नाटक में भणमेळ व्यांव री समस्मा उठायी है। मणमेळ व्याव री बुराई वतायन समाज ने उण सूविमुख करणो ही इण रो ध्येय है । पर लगभग मा ही समस्या 'वुढापा की सगाई' नाटक (प्रकाशन समै संवत् 1963) मे उठायी है । भरतियाजी श्ण री भूमिका में लिया है-'इण माहे स्त्रियों को स्वतंत्रता की हद, बों का परिणाम बुढापा माहे व्यांव की इच्छा, वों को प्रविचार, सगाई, वी को बंधन और बी बंधन को परिणाम, इत्यादि सरल मारवाड़ी बोली माहे दरसाया छ । जगा-जगां नीति, उपदेश, बोध, गिक्षा, धर्म और विचार को वण्यो जठे ताई उल्लेख कीनो छ । मारवाड़ी समाज की स्थिति, घर की और बाहर की वाता, विचार की भिन्नता, पचायत और स्त्री-पुरुष का बरताव पर खूब विचार करके कथाभाग इशो जमायो छ के जाणे मा इशी-को-इशी कठे हुवोड़ी सांची बान छ ।' 'फाटका-जंजाळ (रचना सम संवद 1964) भरतियाजी रो तीसरो नाटक "है । उणा इण में मारवाड़ी समाज ने फाटका (सट्टा) पर इण सरीखा दूसरा दुर्गुणां सू हुवणवाळा नुकसाण रो चितराम खेच्यो है-'प्रेम अनुभव बिना जाण्यो जावे नही । मधुपान करयां विना वी की माधुरी मालम होवे नहीं । --जिण सू अनिर्वचनीय अानंद होवे, जठीने हृदय सिंधीजे, जिण के वास्ते प्रबळ इच्या उत्पन्न होवे और जिण का लाम मू हृदय स्नेहपूर्ण होवे बो ही प्रेम । मी भाव परस्पर को हृदय मेक के कानो अंक ने मोवे। वोजळी का वार का ठोका के ज्यू क का हृदय ऊपर मेक का हृदय को ग्राघात करे। प्रेम का 100/ मद्य संकलन । भाव, प्रेम को भावुक और प्रेम की भावना इणा माहे सूमेक को भी लोप हो जावे तो फिर दूजो रहे नहीं ।' भरतियाजी री साहित्य-सेवा री मूळ प्रेरणा समाज-सुधार पर देश रो उत्थान है। विदेशी शोषण कानी भी उणां रो ध्यान हो-'भगरेज लोगा कानी तो जरा ननर करो, मठे सूमाटी के नाई पावड़ा सूरुपया खींचकर पापका देस ने ले जाकर इन्द्रपुरी वरणा दीनो छ । भपणा देश ने भिखारी कर दोनो छ।' समाज-सेवा री भरतियाजी री कितो हूंस हो, 'कनक-सुन्दर' री भूमिका रे इण उद्धरण सूमा माछी तर जाणी जा सके है- ''हाय पंसो! हाय पैसो !'करवाळा म्हारा सारा सरदारां ने राजा- महाराजा पर श्रीमंत वणाकर, हळका छळ-छिद्र का वेपार सू छुडाकर खरा- खरा वैश्य वरणा यू', उण की सारी कुरीतां मेट द्यू, उणका घर को सुधार कर दयू, उपकी फिजूल-खरची मिटा दयू, उणको राहरीत सुधार यूं, उण का बालविवाह रोक दयू, उण का वेजोड़ व्याव नहीं होबा दयू, मोटपारां ने विदधा सिखाकर स्त्रियों ने शाणी कर यू मोर वेश्या भी नहीं बोल सके उशा फीटा बोलो का गोत गावरणा छुडा यू।" स्त्री-शिक्षा रा बै गरा हिमायती हा । नारी री होण अवस्था देख-देखने उणां रो काळजो कटोज्या करतो। नारी नै उण री महानता और उण री जिम्मेवारी जतावरण रो उरणां जबरदस्त प्रयास करपो हो । उणा 'कनक-सुन्दर' री भूमिका में इण बाबत माप रा विचार प्रकट करथा है। भाषा रे संबंध में भी उणां रा विचार स्पष्ट ने महत्वपूर्ण हा। कोई भी राष्ट्र जद ही सबळ हुय सके है जद उण री भाषा मेक हुवे। 'कनक-सुन्दर' मे उपां लिख्यो है- "हर-प्रेक देश री सर्वत्र येक भाषा होगी मत्यन्त मावश्यक छ। यूरप, अमेरिका, विगेरा माहे मेक भाषा होणे सूउण लोगों की दृद्ध मेकता होकर वे मात्र सारी दुनिया माहे श्रेष्ठ हो रहा थे। पापणा हिंदुस्तान की मेक भाषा होती तो माज मापणा देश की इसी अवनति होती नहीं।" मापर्ण राष्ट्र र इण मांत र मूर्धन्य विचारक भने समाजसेवी पौर राज- स्थान-मारती २ सपूत-पूत री सेवावा रे प्रति सही-सही भाभार तो जद हो मात्यो जावेला जद के उण री ने उण र समै रा दूजा प्रवासी राजस्थानी साहित्यकारी री सारी रचनावा न विलंब माई-सू-पाई रूप में प्रकाशित करायन उणा रो प्रचार कराला। राजस्थानी रे इण समयं सेवक री ममर स्मृति ने पुनः पुनः प्रणाम ! - ..

राजस्थान र इतिहास माथै भूगोल रो असर जहूरखां मेहर भूगोल पर तवारीख रो घणो नेहो नातो है पर दोनुई अंक बीजं सूं काला जुड़,योड़ा है। इण बात नै रिचर्ड हैक्ल्यूट, हेनरी बक्कल, ई. ई. केलेट, मे. प्रेफ. पोलार्ड, रिचर्ड हैक्स्टर, वो. श्रे. स्मिथ पर हेरोडोटस' सरीखा धुरन्दरी मंगोकारी है। सायद इण सारू इणो सगळी इतिहास मनै भूगोल में काठो नातोमानियों के तवारीख मे मिनखा री करणी रो लेखो. जोतो है पर मिनखां री करणी माय पाब-हवा, सियाळी पर उन्नाळो घरको मसर नाखे । जळवायु रोजीनाई मानख र जीवन-दर्शण भर जीवण-पद्धति र मूळ में रच है भर उरणारी मार्थिक, सामाजिक, राजनैतिक , सांस्कृतिक पर वैचारिक परम्परावां ने भेक सास तर सू ढाळण मे घणो हाथ राख । टंडा रा पेस्कीमोन, समन्दर सूपिरयोड़ा डेन्स, पुराणी नदियां पाळी च्यारूई सभ्य- तायां, हिमाळ रा सेरपायां, थळी र वासियां बीजार रोजमर्रा रो जीवण उठे री जळवायु री देण नी है तो पर्छ काई है ? दुनियां में पनपी पर मुरझाई सगळी सम्यतावा रे बिच जे की खास फरक है तो उगा री असल वजे जळ- काथु इज है। इतिहास पर भूगोल रे इण लूट नातं ने देख र जे इतिहास ने भायो-प्राध भूगोल केदां तो की घरणापो को म्हेनानी । आज र ससार ने जे गौर सू देखो तो इण विज्ञान र जुग में ई घणी-पणी ग्रेड़ी सभ्यतावां दीखेला जिको भूगोल री बजे सूप्राधी-सभ्य बाजं । आपार मठ भारत में भी भेड़ी ठोड़ा है जठं मानस मार्थ भूगोल रो सावसीपो असर दोख । निकोबार द्वीप पर आसाम र मिनसा री करणी घणी कर भूगोल मूढकियोड़ी इज 1 रिचर्ड हेक्ल्यूट, 'भूगोल इतियास री मान्यां है'। 2 बकस, हेनरी, स्टोरीयाफ मिनिमाइजेसन । 3 केलेट, ई.६मासेक्टस आफ हिस्ट्री । 4 पोला, वे बेफ, फेक्टस इन मान हिस्ट्रो। 5 हेटर रिचई, रिअप्रेजल इन हिस्ट्री । 6 स्मिथ, बी. मे.. आक्सफोर्ड हिस्ट्री आफ इणिया । 7 हेरोडोटस, दो हिस्ट्रीश।

102 / गद्य संकलन लखावै । च्यार पांच सो बरां रे राजस्थान र इतियाम माथै निजर नाख्या मा ठा पड़े के प्रो भारत र इतियास रो भंग हूता थकां प्रापोआप में भेक निर- वाळी सांस्कृतिक चोखाई राख पर इण री कन्यारी पर सुतंतर ठोड़ है। भारत र इतियास मार्थ भूगोल रो असर विद्वाना मेनत पर गहराई मूं घणी बेळा बतायो है। मो असर बतावतां थकां सगळा मानीता विद्वान मारत ने इणां च्यार टुकड़ों में बांटे-घोराऊ (उत्तरी) माखर माळो खेतर, घोराक मगरा, विघ्यावटी पर लंकाऊ भारत । घणं विस्तार सूनख-चख समंत इणां च्यारूं हिस्सां रे भूगोल रो मठ री तवारीख मार्य प्रसर बतावरण वाळा री कसर कोनी । इण रो सामो प्ररय पो हुयो के राजस्थान री पळो घोराक भाखरां भर विध्यावटी र बिचल्ल घोराक मगरां (तालरा) में भेळी ठूसियोड़ी है। जे पापा इणां धोराऊ तालरां रै भूगोल रो उठ री तवारीख मार्च मसर देखा तो ठा पई के भो खेतर घणो उपजाऊ है, पर पेला री सोन-रूपं री चिड़ी प्रो इज है जिरणने दावरण खातर धरण बारला ललचाया मठा खाया। इणां तालरों में पुराणियां महाजनपद पनप्या, कळा-सहित पठई निखरियो पर घणकरी नदियां इण सेतर में इज बेवगण सूमाव-जाव सोरो रैयो। हम जे मगरा में भूगोल री व सूहूयोड़ी ऊपरली बातां राजस्थान में जोवण बेठा तो इयां मांयली कई बात मठ को मिळेनी। नी तो अठं उपजाक जमी है नी- नदिया-नाळा, कळा-साहित पर नी महाजनपद । सोने री चिड़ो इण रो नांव कदई को बाजतोनी, हां, मौत री बाड़ी प्रने मौत रे खेतर जड़े । नावां सू मिनख इण नै जरूर जाणता हा । मठ केई-केई कोसा ताई पसरि- योड़ो मरू खेतर हो जिपने डाकरणो काळी भीत गिरणीजतो । इण मरू खेतर में मिनख काई घोड़ा ताई गरक है जावता।' राजस्थान ने न्यारो भौगोलिक खण्ड मान'र 'अठ र इतिहास मार्च निजर नाखांतो ठा पड़े के इण खेतर माथे भूगोल रो जितो असर है उत्तो मळ किणी बीज खण्ड रो उठ री तवारीख माथे असर को व्हेलानी । इण मसर ने बतावरण सारू घरणी पंडताई छोटण री जरूत को पड़नी, मो साव सोरो हर किणी भोमजी-मोमजी ने ई दीस सके । राजस्थान 342, 274 वर्ग 1 मुषोंत नमसी री ज्यात । 2 Sharma, G.N., Social Life in Medicval Rajasthan, p. 33. "History provides no clearer example of the profound influcnce of geography upon a culture iban in the historical deve lopment of Rajasthan."

गध सकलन/ 103 कीलोमीटर ताई फैलियोड़ो है । जिएमें तीन करोड़ ने मानखे रो वासो है।' इण रे माधूर्ण सिन्ध, घोराऊ-भाधरण, घोराऊ पर घोगऊ-अगरण पंजाब, ऊगणे यू.पी. पर ग्वालियर ने लंकाऊ सामां गुजरात भायोड़ा है । भूगोल रे जारणकारी राजस्थान ने ई मापरी जाणकारी र पारण न्यारी न्यारी पांतियां में बोटयो है। राजस्थान 23.30 सू 30.120 घोराऊ अक्षांश पर 69.300 सू 78.170 जगणी देशान्तर र बिच्चे पसरियोडो है। राजस्थान मे तीन रितवा व्है । उन्नाळो घणकरो माचं सूजून रे मईनों रे विच्चे गिणीज । पर ठेट जन- वरी र नारले पाई सूलेर अगस्त ताई झलसरण वाळो तू, घूड री काळी-पोळी प्रांघियां, लूठा बतोळिया जिका धरावां सूले'र टिंगर-टांगर ताई नै लपेट ले जावे पर तड़तड़तो तावड़ो बग्यो रखें । बराळो यू तो माघे जून मूले'र सितम्बर र बिच्च ताई मानी पण मेह मावे नी प्राव किन्नेई ठा नी । खास कर थळी रा तो केई-केई वर लेणों-लेण बिना छांट निसर जा। सियाळो अक्टूबर सू फरवरी तांई, ठारी रेत सूकर'र अणूती पड़े ग्रन बिना ताप पर पटूडे र मिनस ठर'र ठाकर व्है बावै । भूगोल रे मुजब राजस्थान मोट रूप सू दो हिस्सा में पांतीज सके- मेक ऊगुणों भातर पर दूजो माथूणियो मरू-सेतर । ऊगूर्ण हिस्स मे पाडावळ भाखर री लड़िया है जिकी ठेट दिल्ली सूगुजरात तांई मायोड़ी है।' भाख- रियां रो लंकाऊ-प्राथूणो खुणों माउण्ट आबू पर घोराऊ-ऊगूणो झुन्झनू जिले र खेतड़ी ताई पोचियोड़ो है। सगळा सूमबती भावरिया माबू सू अजमेर ताई है। प्राडावळ सून्यारा भाखर भी निरा है। मामेर मन प्रलवर भाखरां 1 (4) घरमपाल, इण्डिया लन्ड पेन्ट पीपल, राजस्थान, पृ. 1 (ब) राजस्थान रो क्षेत्रफल सगळे भारत र क्षेत्रफल रो 112 फी सदो है । 2 (4) 1961 से सरकारी मदमसुमारी मुजब या तादाद 20,155 602 हो । (२) राजरी जनसख्या सगळे भारत री जनसंख्या री 46 फी सदी है। 3 इसीरियल गजेटियर राजपूताना प्रोपिन्स सिरीज, 1 4 (अ) अमल कुमार सेन, 'ज्योग्राफिकल रीस आफ राजस्थान' ट्राक्सन ऑफ दी इण्डियन कोसिल ऑफ ज्योग्राफर्स सेसल आई. जो मू. वोल्यूम, 1 99.104. (व) परमपाल, इण्डिया लग र दीपोत, राजस्थान, पृ1-7 (स) दो. सी मिश्रा, 'ज्योग्राफीका रीजन्स माफ राजस्थान', दो पियन बनरल ऑफ ज्योग्राफी, वोल्यूम !, न. 1.1966, पृ. 35-48. 5 (अ) इम्पीरियल गजेटियर, राज. प्रो. सी, पृ । (ब) रंगीन देशान्तरा दिन्न जिका बोजा मुनक बस्योहा है उषा में घोराळ वरण, पन- करो मित्र, साईवेरिया बर अफोकाराकी भोग है। 6 घरमपाल, इण्डिया ली शादी पीपल, राजस्थान, पृ. ।

104/गय संकलन सूपिरमोड़ाई है पर भरतपुर र पाई-पाई पाई भाखर है। करौली पर मुकन्दवाड़ा रा भावर मी घणा चावा जाणीज। इण भासरां वाळं जगणे राजस्थान में प्राबू, उदपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, प्रतापगढ़, अजमेर, कोटा, बून्दी, अलवर पर जैपुर है । घणकरी राजस्थान रेगिस्तानी है जिसमें जोधपुर, बाड़मेर, जैसलमेर, बीकानेर पर गंगानगर बीजा भेळा है।' राजस्थान मे पाणी री कमी भर घणी घणी मो विवरघोड़ी धूड री वजे सूअठ री जमी सगळं भारत री 11.2 फी सदी है पण मिनख नानी- नांनी ढाणियां भर गांवड़ा में फैटघोड़ा है भने उणां री तादाद देश री भावादी री सिरफ 4.6 फी सदी इज है। देश र पशुधन गे 10 फी सदी मठ इज है पण इण मे पणकरा गाडर, लरडियां भर ऊंट है । देश र कुल बकरा- बकरियां रा 13.2 फीसदी, भेड़ 18.2 सदी यनै ऊंटो री बात ई छोडो सगळं भारत रा पापा सूबत्ता ऊंट भठे है। राजस्थान री प्राव हवा रो इतिहास माय घणं खुलासे सू असर बता. वरणों तो अठ वाजब कोनी। थोडे में जिकी बातां के सका उणा मे पेला ऊगरणी भावरियां वाळ खंतर मा जळवायु रो असर देखा- -प्रे ऊगूणां भावर पाहावळ रा हिस्सा ई है। इण खेतर में चम्बल,' बनास, वेतवा, पर माही वीजी नदिया रे पांग जमी उपजाऊ है । सिंचाई भी है सके इण सारूं माणुण थळी विच्च प्रो राजस्थान थोड़ो खावतो। पीवती है। भाखरिया र पाई-पाई र रिन्द-रोई जड़ी-बूटियां बाजी उपज जिकी उठ रीमाबादी रो पेट पाळे । में नदियां केई बेळा हमळा कां ने मारग सजावग रो काम काटियो। केई वेळा ग्रं नदियां बचाव रो प्रायो साधन वणी । रजवाडा रा कांकड नदियां सून्यारा फंटता । चम्बल, जैपुर भर कोटा, करौली पर ग्वालियर रो कांकड़ रई । माही वांसवाड़ा पर डूंगर- पुर, खारी उदपुर पर अजमेर नै न्यारा फांटती ववती। । 1 राजस्थान र सगळे क्षेत्रफन रो घणों नी तोई 63 फी सदी हिस्सो पा वाळो है । 2 वी. सी. मिश्रा, राजस्थान रो भूगोल,6 3 सर नामा, 207, बे.फ. देवरिज, पृ. 485 4 (4) मुभोत नणी री सात टी. 13 बर 34 (1) फरिस्ता, पृ. 419 5 धर्मा, जी. अन., सोसियल साफ़ इन मेग्विल रान, 15 (R) अपनेम्बर सेख र पेलिग लेख। (1) इम्पीरियत गजेटियर (1908).4.4.407 408 गद्य सकलन / 105 --झीलां मर तालाब घणकरां अठ इज है। प्रकृति री चौखी जागां री मठो कमी को नी। उदयसागर, पिछोला, लक्की भर जयसमन्दर जेड़ी भोला भने अन्नासागर, राजसमन्द जेड़ा तळाव इण हिस्सं माय ई है जिणां रो फूट- रापो मळगं-पळग मुलका र मिनखां ने माप सामी खांचे । मध्यकाल मे प्रबखा अर'लूठा दुरग किणी दरबार र जोर मर मान री वर्ज मानीजता । गुरिणय राजस्थान री मारियां में चित्तौड़, कुम्भलगढ़, रणथम्बोर, मामेर पर तारागढ़ जड़ा सेन्ठा दुरग हा जिका ठोक शिवाजी रे पन्हाला, परतापगढ़ पर पुरन्दर दाई झगड़ा री बेळा घणां कारज साजिया। ---माखरियां भर घाटा रे पण ठीक महाराष्ट्र दाई गुरिल्ला युद्ध करी- जिया। इणां दावपेचां सूई कोटा, बूंदी पर चित्तौड़ रा रावराणां थोड़ीक फोजो ले, मोटी-मोटी मालवा, गुजरात पर मुगली फौजा सू लोहो ल सकिया। कुम्मा, प्रताप पर राजसिंह री बादरी र साग भठेरो भूगोल उणां री धरणी मदद करी। -- भाखरियां राजस्थान र बीज रजवाड़ा रो भी आडे-बकत मे कारज साथियो। मजीतसिंह, रामसिंह, चन्द्रमेन पर दुर्गादास ताई र बीख री बेळा री ढाल में भाखरियां ई बरणी। शणां भाखरियां में प्राधी सभ्य जातियां भील,' मीणा, ग्रासिया, बावरी पर गाडोळिया लवार बीजा मठरी अवखाई री वजे सूई प्राज ताई माप रो रीत-पांत ने ज्यूरी त्यू राख सक्या । इणां री सभ्यता प्रापरी सगळी चोखी भूण्डी बाता रै साग मजं ताई जीवती है । -जिरण तर शिवाजी रा मावला फौजी हा उरणी तरै राणावां ने भील पर मीणा घणी मदद करी। कुम्भा, प्रताप पर राजसिंह घणी मरदानगी सूदीयो। -ज्यू दिल्ली, मालवा पर गुजरात रो मोटी फौजां रो पाव-जाव भाखरा में दोरो हो जिण सूराणां री छोटी-मोटी फुड़तीली फौजां प्रासानी सू उणां रो सामनो करती के बच निकळती उणी तर धाड़ायती पर विद्रोही सिरदार, साध मौला 1 पृ. (२) दो इम्पीरियल गजेटियर राज. प्रो. सी. 86-89 2 (ब) पार्मा जी. बेन., सो लाइन मे. गज, पृ.7 (ब) परिस्ता. वारीम, दिग्स, 4,442 () सपोतराज, पाठ्य रलकोस ।

106/गद्य संकलन राणा री मोटी फौजा रे मुकाबले लड़ता-भिहता माप रा दिन काड सकता है। ~में मारियां धरणी प्रवखी हो सो मुलक र उण-सुर्ण सू' घरम ने समणिमा बैरिया सूपरम ने बचावण पातर प्रठ मा पोंच्या पर ऊंची टेक- रियां मार्य मोटा-मोटा मिन्दर चुपीज्या, परसराम महादेव, नाथद्वारा, प्रेक- लिंगजी हा नामी मिन्दर इणां भासरियां में ई बगियोड़ा है। सगळं मुलक रानी मध्यकाल में माप रं परमनं रावण साह पठी माय यूगा पर देल- वाड़ा-प्रावू, ऋषभदेव, रणकपुर, केसरियाजी पर महावीर जैन मिन्दर (उदपुर) जड़ा फूटरा मिन्दर चुरणीज्या । में भाखरियां राजस्थान र कांकड़ माथे पायोड़ी हुवण सू मठ रा रीत-पात, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश भर गुजरात सून्यारा र सक्या । राजस्थान री संस्कृति री सास विशेषतावा ने बणापोड़ी राखण मे में भाखर पणा पाडा प्राया। -~~-राजस्थान री 63 फी सदी जम्मी रेतीली है। रामापरा री सासरे पाण मानीज शणी थळी री ठोड़ पैला द्रमकुल्य नांव रो समन्दर हो ।' समन्दर शास्त्र रा जारणकार भी पा मान के इणा घोरा मे माज ताई सीप-संख मिळे सो पक्कायत सू, पेला भठं पापी व्हेला सगळं रेतील खेतर मे ऊंचा- ऊंचा रेत रा धोरा बिसरियोड़ा है जिका बायरे रे भोके प्रापरी जागां बदळ'र मारग बेवतां नं घोग्यो देवे। इण रेगिस्तान मे पाणी री पणी की वं। कठक जे बेरा है तो वे दस-दस बौसी सूपन्दर-पदरं बोसी हाथ ताई उण्डा है पर इणों में पाणी बेगोई निसर जावे। बाडमेर पर जैसलमेर २ घोरा मे रंवरिया मिनखां रीमेक रोजमर्रा रो काज माव-पाठ दस-दस कोस सूऊठा माथै पखाला लाद पाणी लावणो है। इस रेगिस्तान पर पानी री कसर रो मसर पर मिनखा, जीव-जिनावरां मर रूखड़ा माथे ताई साव सोरी दीस। इण खेतर मे जीवणो दोरो, मेनत घणी, मिनख रात-दिन अवखतो र, झूमतो रवै, जद जीवं। सोरापो नाव री की चीज नेडोई कोयनी । मल्खेतर में मिनखा रा घणां जमघट कठईक दोस । घणकरा वे नांना नाना गांवड़ा पर दारिणयां मे छी-छीण विखरपौड़ा है। मवे वर्ग किलोमीटर 1 पित्रा, वी, मी., राजस्थान का भूगोल, पृ23 2 स्मिकी रामायण, मुर काप, सर्ग 22 3 'वो पाणी मुल्तान गयो' कावत भी इण वात री साख मर कैम को हिलोका नेयतो समन्दर हो। 4 धरमपास, इण्डिया लेप र पोपस, राजस्थान,74 गद्य सकलन / 107 दीठ 59 मिनख रवै जिको भारत भर में कश्मीर रे पच्छ सगळा सूकम माबादी रो रेवास है । प्राज भी देश मे जमी र हैसाब सू सगळां सू मोटो ससद रो निर्वाचन क्षेत्र, इण मरू-खेतर रो जैसलमेर बाड़मेर ई है । इण रवास ₹ मीणापं रो वर्ज प्राब हवा इज है। मरू-सेतर में रैवरणों पर इणने पार निस- पाणी री कमी, बळती लू, बूतोळिया पर कळीजण जोग धूड़ सूमोटा लस्कर तो इण सेतर मे फुरक ई को सकता हानी। भोमद बिन कासिम 711 ई. में ठेट परब सूसिन्ध तांई प्राय धमक्यौ पण मरू खेतर में बढ़ण री हिम्मत को कर सक्यौनी । पाणीपत नै जुद्ध रो मैदान बावण रो जिम्मो भी मरू-खेतर रो ई है । खैबर, मोमा कुर्रम पर बोलन बीज दर्रा सू मांय बड़ण पाळा हमलावर नी तो कश्मीर री बर्फीली माखरियां कानी सूमाग बढ़ सकता पर नों मरू-खेतर सू, जद बापडा, हड़बड़ाय इण विचल्ल मारग, पाणीपत ने पकड़ता। राजस्थान री प्रा प्राथूणी पांती अठां रा भिड़मला र गाड र साग ई भूगोल री वजं सूहमलावरां सू कोरी र सकी। दिल्ली रा मुल्ताण मुगल पर अंगरेज पेला भारत रा बोजा मुलक जीत्यां पर्छ घणां मोड़ा मठी मूण्डो करघो। भूगोल रे पाण ई अठ मोटा साम्राज्य नी पनप'र नाना रजवाड़ा पर गणतंत्र बस्या। यौद्ध य जोहियां रा राज मठं ई हा। सिकन्दर रे हमले री बेळा सूभिड़मला रे बेखटके बसण जोग राजस्थान ई रियो । घणं वरसां हमलां सू कोरा रेवण पर अबखं जीवण मूठ मिनखां में सुतंतरता रा भाव, मान पर महंम घणो हुयौ। जे कदई हमलो हूवतो तो दोरो घणो लखावतो पर प्रठ रा मिनख विवणे खार सूभिड़ता। भूगोल रे पाण ई मठ सुतंतरता अर मान सारू बलिदान भर त्याग रा भाव बीज मुलका सूपणा हा । में सूरमा मान भर सुतंतरता खातर बैरयां सू भिड़ पड़ता। साका पर जौहर घणे चाव सूहूवता । शेरशाह मुठीक बाजरी सारू, दिल्ली गमाय बैठती। सिरदार पर जमीदार प्रठ घणा गाडवाळा भर भुतंतर हा, 1 (4) गुलबदन, हुमायू नामा, पृ. 151-155 (ब) अकबर नामा, 1, पृ. 182 (स) फरिस्ता, पृ. 219 2 फरिस्ता, पृ. 228 3 अन्वास सरवानी, तारीख शेरवाही, 4,406 .

108/गद्य संकलन पर राजावां ने उरणां न ढाबण मे घणां जतन करणा पड़ता। सामन्त-जमी- दार जित्ता सेंठा मारवाड़ में हा दूजी ठोड़ों को हेला नी । राज धरणीधरणी भो ताई विखरियोड़ा हूता थका राज रा चाकर इण्या-गिण्या ई व्हता पर की माछो राज री ढांचो को जम सक्यौनी। थोड़े मे प्रा केय सका कैमरे मानख में बादरी, त्याग, बलिदान, स्वाभीमान पर सुतंतरता जड़ा गुण, भूगोल इज पनपाया । मठरी राजनीति र मूळ में सगळां सूलूठी की बात हो तो वा ही जळवायु। राजस्थान री इण प्रायूरणी पांत रे समाज माथै सावळ निजर नास्यां इण माथै भी भूगोल रो भार घणो दीस। बीजा सू साव भागा कला रतां रतां मठ रो समाज निराळो ई बण गियो। भेकरण कांनी इणमें घरणो कठपणो पर मपणायत दीख तो बीज कानी मो झीर-झीर बिखरघोड़ो, ऊंच-नीच, जांत-पात पर ठाकर-चाकर सू किड़योड़ो लखावै । न्यातां भर जातां रो जोर अट ठेट सूई घणो रियो। बीजां वारला ने समाज में की ठोड़ को ही नों। जातां में भले जाता पर खांपा पर कुळ, रोजीना ई कळय रा मूळ वणयोड़ा रिया। स्यातां मर पञ्चा रो रो जाब इए सारूई हो के मिनल बीज संसार सूकटघौड़ा हा पर न्यात-जात सू मळगा होय जीव ई को सकता नी । ऊंच- नीच रो घणो बखांण नी कर भेक उदाहरण देपो चाऊं। राजावां रै गोला हूवता, ठाकरा रे न्यारा, मामूली रजपूता पर प्रोसवाळो रे न्यारा मन मजे री बात मा है के में ऊंच-नीच रै भावा मूडा भरघोड़ा हा के इया में सगपण ताई नी है सकता। घमड इत्तो के मेक चोखी गवाही राजवाई बीजा नी वणं सो छोरी जलम जावं तो मार नाख मो मोखाणो चावो हो- पेण्डो भलो नी कोस रो, बेटी भली नी प्रेक। देणों भलो नी बाप रो, साहिब राख टेक ।। प्रठा रा मुसलमानां ताई में जात-पात घर करयोड़ी ही, मोची, महावत, मापस 1 (4) टार, बनम और पेन्टीसोटीच आफ राज, 1, 1.560 (3) श्याममदाम, बोर विनोद, पृ. 806 (स) तारोप-जोधपुर बराल, 40, 47, (पुरा लेनापार, बीकानेर)। (4) बात-अनासोरी, 465 (५) सर्मा, जो. मेन., सोसियस माइफ इन मैडिवत राजस्थान, पृ.512 2 मारा में बाकावत पानी ही 'रिदमना पाप्या विकराया' शिणरो परप है पिने सिरहार पादो माथे पाप देता होई राजा बभटो। 3'परपसर्ग, 16, रसोक, 33-39 गद्य संकलन/ 109 छींपा, घोवो, जुलाहा, कायमखानी, सिन्धी, सलावट, लखारा, रंगरेज, पोंजारा वर्गरा मे मेंक दूजी जात में सगपणनी व्है सकता।' पण राजस्थान र समाज रे इण घणांप र माय मे कटपणो भी घणों हो ज्यू सगळी जातियों में कई नांव री सांपा है ठेट राजघराणं सूलेमर बाणियां, कसाई, छीपा, लवार, चमार, पांची, मोची भर मंगो ताई री जात सोलंकी, चौहान, राठौड़ के दूगी की भी कई है सके। सो घणाप र विच्चे में कटपणं रो पो भाव तो होई के सगळा भायां रा भाई हां । इण घणाप र धकां मापसी हेत पर कटपणो भी मणू तो हो । 'सहकारी-सेती' पेलापोंत मलं सूई जलभी। हर में करी 'उपज माय सू दोराप री वेळा तोळलियो रावळो भर पिंडत, मांभी, भील, मोची. सांसी, नाई, मेवड़ वाळं, सूपार वगरा रो हिस्सा हूवतो जिका 'पाय' बाजतो। रावळ न टाळ उपरला सगळा मापरी खेती को करता नी क्यू के गांव रा सगळा इयां न माय देता। 'ला' री वेळा जिण अपणायत सूसगळा गांव माळा ना नाठ भर 'सा' करण गळं र सूड़, निनाण, सिटियां म्यूटण में पर लाट री बेळा बिना किणी लालच रे काम करावं, देखरण जोग है। में लासिया, पड़ियां सू दोवड़ो काम करे। नवां झूपड़ा ठावण में भी सगळा गांव वाळा 'ला' बड़े उत्साह मूई काम कर । ठाकरी अर सेठजो मूलेमर सगळा गांव वाळा नवां झूपाने दड़बावण भर किडावरण में हाथ बंटावं । मड़ो प्रकटपणं रो भाव पनपावण मे भूगोल रो पूरो हाथ है। खावरण में थळी री उपज बाजरी पर ज्वार, मोठ नं कठक गेहू काम भावं। कड़ी मेनत करण सूभोजन दिन में च्यार वेळा है--सिरावण या कलेयो, रोटी, बेफारी (दोपारो) भर भ्यालू । पण च्यार वेळा खावणियां थोड़ा ई है। खावरण में घणो नी तोई माठ तोळा भार रो बाजरो रो सोगरो, राव, खीच, घाट पर दळियो रोज २ जीमण री पीजा हो । साग सगळा रे लिस्योड़ो को हूंवतो नो पण जिका जोग हा व्है केर, कूमटिया, सांगरियां, मोठ- फळी पर फोग वगैरा सावता । सगळी चीजा कम सूकम पाणी री ठोड़ा निपज सके इण सारू मठ भेइब निपजती । बाजरी प्रठं तो बूढ़ा मर बीमार ताई पचावं पण जे वीजा मुलको रा मिनस खावै तो को पच्च नों। डोकरियां भेक अंग्रेज साब री बात बताई । खेत में निसरतो साव री भूस भड़की। खेतवाळो उपां ने सोगर माथै सांगरियां घाल'र थमाई। दौरा-सोरा साव सांगरियां मुळमुळाई पर सोगर ने मेके पाई घनघनाय रोल्या 8 लोगों में माई कसर है वे पलेटा साफ नी कर । बाप साव को कसूर को हो नी सोगरो I पहलोत, पोशसिंह, रामपूताने का इतिहास, भाग 1, पृ. 102 110/ गद्य संकलन - - हैई भेड़ो करडो सीरा माथै सिक्योड़ो के साव जे उणन पलेट समझ गिया तो उणा री घरपी गलती को ही नी । अठं मिनस राबोडियां रो साग घणा चाव सूखाव जिगरो जलम ई भूगोल रै असर रो फळ है। बराळे में घास-फूस घणो है जद जिनावर दूध भी धणो देवं उरण बेळा धी-छाछ घणोई है । पण प्राग पाठ-दस मइना मेह-पाणी नी व्है पर पागले बरस ताई रीठा नी पाणी पड़े पर नी पड़े। धरावां ने मालव लेजारणा पड़े इण सारु जद घणी छाछ व्ह उरणने सुखाय माटो मे भर लेवे पर पाही-वेळा काम मे ले ले। अठ रे फल- फस्टा सारु दिसावरा पाच्यौड़े मेक थलिये री बात घरणी चावी है। उणन किरणी पूछियो के पांरी थळी में खजूर, दाड़म, दाख और माम्बा तांई नी म्है पछ केडा फळ व्है । इण माथै वो धळियो कियो- खोबा (ज्यू) खारक खोपरा ढालू (है) दाडम दाख मुठ-काचर र उपर - - वारा ग्राम्बा लाख पेराव कानी निजर नाखां तो उठई भूगोल दीखे। झीणा पतळा मलमला रा नी है मर गाबा जाही दो सूती खादी रा व्ह सो डील बळती लू भर तड़तडतं तावह सू बच सके । मिनखां रे सगळं गावा रो घोळो रंग सायद तावड़े रो फळ ई है । भर भूगोल री वजे सूई गाबा ने डील ढापण वाळा नी पण रक्षक मान । इण सारु ई मगरक्खा या मंगरक्खी भर पगरखी इणारा नाव बाजे क्यू के श्रे तावड़े, लू पर बळती घड़ सू डील पर पगारी रक्षा करें। हासळी, कड़ला पर चूई मूठिये रो भार थळी री लूठी लुगायाई झेले। मोटो फेंटो ई तावड़, लू पर दुस्मरणां रे सोटा सूमार्थ ने बचावरण रो कारज साथै । इण री बखत ठीक माज र लो-रै टोपे (हेल्मेट) दाई ही जिका तेज अस्वारियां वाळा, माथो-फूटण वचरण खातर पेरै जीवण मार-धाड़ पर लड़ण सूभरयोड़ो हो। इस सारुठे सगती री अम्बा, जगदम्बा, दुर्गा, भवानी, चामुण्डा जैड़े न्यारं न्यारं रूपा में पूजा व्हेती। मठ रा कला-साहित भी भूगोल रे प्रसर सू कोरा को रै सक्यानी । खुदाई पर मीनाकारी री इमारतां नी बरण, मण्डोर, जोधपुर, सीवाणा, जालोर, बीकानेर, जैसलमेर पर तन्नोट रा सेठा दुरग चुणीज्या जिणारी भीता बीस बीस फिट चवड़ी है। गावा रं भूपां री बिरणगत गोळाई में, पर छाजत ठेट 1 फेंटै रापाग, साफा, पोतिया, खिड़किया पाम इत्याद बोजा नाव म्हता।

गद्य सकलन / 111 ऊपर सू साव पतळी पर तर तर नीचे धरणी मोटो इण खातर ई है के घणं तेज बायर सू बच सके । गांवां रै पक्क घरां री यतां में ढाळ मायल कानी राख सो पनाळां सूपाणी घर र टॉक में भेळो व्है सके । मायड़ राजस्थानी भी घणी पुरानो, सुतंतर रूप सू फळी-फूली पर आपो- माप में भएमावती चौखायां राखे । राजस्थानी भाषा र विकास र साग मूगोल चुड़योड़ो रियो । मिनख छोण-छीण विखरयौड़ा रेवता, ग्रेक बीजं सू साव कटयोडा हा इण खातर भेके-जागा री बोलीचाली मे बोजी जागा सू थोड़ो फरक रेग्यो । थळी मे मा कावत घणी चावी है के 'वारा कोसां मार्थ बोली बदळे ।' पण सगळी बोलियां अर भापावां साव न्यारी को है नी, इयां मे साव चिन्योक फरक ई है। राजस्थानी में बोलण-सुरगण मे भारी लखावरण वाळा पावर घणा । मूर्धन्य पाखर ट, ठ, ड, ढ, ण जित्ता राजस्थानी मे है दुनिया री बोजी भासा में को व्हैलानी । ळ पर स जैड़ा माखर इण मे इज है। मा मायड़ भाषा मालदार घणी गू थोत्रण भेडी चोखी के घोड़े क प्राखरां सूघणी वात केईज सके । रेगिस्तान सू जुड़योडी चीजां रा जितरा सबद इण में है वे मापोनाप मे मिसात है । उदाहरण सारूं बीजी भाषावा में ऊंट री लुगाई सारू न्यारो नांवई कोयनी । हिन्दी, उर्दू में 'ऊँठनी' पर लाई अंग्रेजी वाळा तो She Camel' सूकाम चलावै । राजस्थानी में सांइड नांव तो है इज, ऊँटरी ऊमर रेवदाप रे सांगे जुडयोड़ा टोडिया, जाखोडा, पागल, करसळिया, मैया, सुतर पर ढागा जड़ा नांव भी मौजूद है । इणी तरे खेजड़ी रा नोखा सूकण सू पेला पीतळ, मिमजर, लौक, टोइया पर सांगरिया बाजे । ख्यात साहित अठरे इतिहास रा पारसी है भर घणकरी रचनावां वीर रस री है। पिणयारी, लूरा, गरमां, घूमर पर डंडिया जैड़ा नाच भेळापं सूतो हैई, घणां लूठा भी लखाव। इंडिया मे ठोकरण पर बचरण रा भाव भेळा है तो पिणयारी पाणी री कमी सूजुड़योड़ो। लार जावतां थोड़े में मा केगो चाऊं के राजस्थान में घोराऊ मगरां मे भेलो ठूसणो वाजब कोयनी । अ रो भूगोल इणो मगरां सू साव न्यारो है भर मोमर राजनीत, समाज पर घरम माथे तो हावी रियोइज, स्थापत्य, नाच अर साहित, धराव अर रूखड़ा ताई इण सू कोरा नी र सक्या । सो माग सू भूगोल र मुजब भारत र च्यार नी पांच न्यारा खण्ड म्हैणा चाइज । इरणां मे पांचवों नुवों मण्ड राजस्थान बणं ।

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Rajasthani Gadya Sankalan

Author
Dr. Kalyan Singh
Title
Rajasthani Gadya Sankalan
File name
Rajasthani Gadya Sankalan
Text
OCR done
Citation
1960
Published
2011/03
Publisher
Rajasthani Sahitya Sansthan Jodhpur
Language
Sanskrit
Pages
121
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551106
Barcode
4990010031880.00
Scanning centre
C-DAK, Kolkata
Digital publisher
Digital Library Of India
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