Bharti Bhawan Liabrary, Allahabad
Hindu Tauharon Ka Etihas
Front matter
घरोंकाइतिहास सी समस्त ज़रूरी त्योहारों की उत्पत्ति और उनके सम्बन्ध में प्रसिद्ध आख्यायिकाओं का अपूर्व संग्रह हाहन्छ mean RETRIEmineneta Pramom लेखक- श्रीयुत् शीतलासहाय जी, बी० ए० प्रकाशक- पुस्तक मिलने का पता “चाँद” कार्यालय, इलाहाबाद S अप्रैल, १९२७ द्वितीय संस्करण, २००.] [मूल्य ) एक रूपया E S प्रकाशक- “चाँद” कार्यालय, इलाहाबाद मुद्रक- आर० सहगल, फाइन आर्ट प्रिन्टिङ्ग कॉटेज, इलाहाबाद BE
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उपहार
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विषय-सूची
विषय
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१-एकादशी
२-एकादशी की उत्पत्ति का कारण
३-मोक्षदा एकादशी
४-सफला एकादशी
५-पुत्रदा एकादशी
६-षट्तिला एकादशी
...
७-जया एकादशी
-विजया एकादशी
१-आमलकी एकादशी
१०-पाप-मोचनी एकादशी
११-कामदा एकादशी
--१२-वरूथिनी एकादशी
१३-मोहनी एकादशी
१४-अपरा एकादशी
१५-निर्जला एकादशी
१६-योगिनी एकादशी
१७-पद्मनाभा एकादशी
१८-कामदा
और
पुत्रदा एकादशी|...
...
..
....
[ श्रा] क्रमात विषय पृष्ट Luinod ३१ ३२ "१६-अजा एकादशी -२०-बामन एकादशी २१-इन्दिरा एकादशी १०:२२-पापाङ्कुशा एकादशी २३-रमा एकादशी २४-तुलसी-विवाह एकादशी २५-भीष्म एकादशी २६-दत्तात्रेय-जन्म २७-बामन द्वादशी २८-धन त्रयोदशी २६-हरतालिका व्रत या तीज ३०-सिद्धिविनायक पूजा या गणेश चतुर्थी ३१-नागपञ्चमी ३२-कपिला षष्टी ३३-शीतला षष्टी ३४--गङ्गा सप्तमी ३६-शीतला सप्तमी ३६-कृष्ण-जन्माष्टमी ३७-सत्यविनायक ३८-शिवरात्रि ३६-दीपावली या दिवाली ४०-दुर्गाषष्टी 919 । ।
क्रमाङ्क
विषय
४१-रक्षा-बन्धन
४२-उमा-महेश्वर व्रत
४३-कालाष्टमी
४४-हनुमान-जयन्ति
१५-रामनवमी
४६-नवरात्र या दुर्गापूजा
४८-कोकिला व्रत
४६-होली
५०-अनन्त चतुर्दशी
५१-अन्नकूटोत्सव या गोवर्द्धनोत्सव
५२-यमद्वितीया या भ्रातृद्वितीया
२३-अक्षय-तृतीया
२४-सोमवती अमावास्या
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प्रकाशक का निवेदन
न्दू-समाज में त्योहारों का बड़ा मान है।
हमारा तो ख्याल है कि भारतवासी जिस
भक्ति और श्रद्धा से अपने त्योहार मनाते
हैं, शायद भूमण्डल की कोई भी जाति
अपने त्योहारों को इतना महत्व न देती
होगी। लेकिन यह बात स्पष्ट है कि
६६ प्रतिशत स्त्री-पुरुष इन त्योहारों की उत्पत्ति के सम्बन्ध में
बिलकुल अनभिज्ञ हैं । वे न तो इनकी उत्पत्ति का कारण ही
जानते हैं और न महत्व ही । यद्यपि विषय इतना जरूरी
है। किन्तु हिन्दी-भाषा में ऐसी एक पुस्तक भी हमारे देखने में
नहीं आई।
वर्तमान पुस्तक के सुयोग्य लेखक ने महीनों कठिन परिश्रम
करके और भाँति-भाँति की धार्मिक पुस्तकों का अध्ययन करके
ही लेखनी उठाई है । वे किस उत्तमता से और कितनी सरल
भाषा में यह पुस्तक हिन्दी-संसार में उपस्थित कर सके हैं, सो
( २ )
पाटक-पाठिकार ही देखेंगी । पहिले संस्करण में प्रेस-सम्बन्धी
अनेक भूलें रह गई थीं, इनके लिए हमें वास्तव में दुख है ।
कारण यही था कि यह संस्करण कलकत्ते में छपा था और इसका
प्रूफ वगैरह वहीं पढ़ा गया । प्रस्तुत संस्करण में हमने यथाशक्ति
इन्हें सुधारने का प्रयल किया हैं।
यदि पुस्तक उपयोगी सिद्ध हुई तो लेखक तथा प्रकाशक
दोनों ही अपने परिश्रम को सफल समझेंगे ।
“चाँद” कार्यालय,
विद्यावती सहगल
इलाहाबाद
घरोंकाइतिहास
एकादशी
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र मास में यह दो दफा होती है। प्रत्येक पाख
के ग्यारहवें दिन पड़ती है। साल के हर
एक महीने की एकादशियों के माहात्म्य
और उनकी उत्पत्ति के कारण जुदा-जुदा हैं।
एकादशी का व्रत निर्जल भी होता है और
सजल भी। इस व्रत में रात्रि को जागरण
करने का भी विधान है।
एकादशी की उत्पत्ति का कारण
भविष्यपुराण में यह बताया गया है कि
सतजुग मुर नाम
का एक दानव हुआ था। इस दानव
समस्त देवताओं को हरा
दिया । इन्द्र को भी इन्द्रासन से गिरा दिया। इस पर तमाम देवता
दुखी होकर पृथ्वी पर फिरने लगे। इन्द्र ने देवताओं की यह बुरी
में
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जन किया
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२ में एक हजार हिन्दू-त्योहारों का इतिहास अवस्था देख कर शिव जी से सारा वृतान्त कह सुनाया। शिव जी ने देवातत्रों को विष्णु के पास जाने की सलाह दी। देवताओं ने विष्णु से क्षीरसागर में मुलाकात की और उनसे सहायता मांगी। विष्णु को देवताओं की दुर्दशा का हाल सुन कर क्रोध आ गया और मुर से लड़ाई करने को तैयार हो गए। विष्णु ने अपने वाणों से तमाम दैत्यों को मार डाला; किन्तु मुर को न हरा सके। उन्होंने अपने शस्त्रों को मुर के शरीर पर बिलकुल निष्प्रभाव देख कर यह निश्चय किया कि मुर से मल्ल-युद्ध किया जाय । विष्णु और मुर वर्ष तक मल्ल-युद्ध जारी रहा। एक हजार वर्ष के मल्ल- युद्ध से थक कर विष्णु रण-क्षेत्र से भाग निकले और बदरिकाश्रम की एक गुफा में जाकर सो गए । मुर ने विष्णु का पीछा किया और हूँढ़ते-ढूँढ़ते बदरिकाश्रम में पहुँचा। यहाँ विष्णुको सोते हुए देख कर उसने यही विचार किया कि अब विष्णु को मार ही डालना चाहिए। मुर की इस दुर्मति को देख कर विष्णु के शरीर से एक महा-तेजयुक्त कन्या उत्पन्न हुई । वह देवी अच्छे-अच्छे शस्त्र लेकर मुर से युद्ध करने के लिए उपस्थित हो गई। देवी ने थोड़ी ही देर में उस दानव को स्थ-विहीन कर दिया । तब वह दैत्य भुजाओं से युद्ध करने के लिए दौड़ा, किन्तुदेवी ने दैत्य की छाती के बीच में हाथ से प्रहार कर उसे नीचे पटक दिया और उसका सिर काट डाला। बचे हुए दैत्य पाताल में भाग गए। इतने में भगवान विष्णु की निद्रा भङ्ग हुई तो देखते क्या हैं किदैत्य मरा पड़ा है और एक कन्या हाथ जोड़े खड़ी है। भगवान विष्णु ने आश्चर्य में होकर उस कन्या से सबहाल पूछा।कन्या ने बताया कि मैं ।
EE ३ एकादशी • आपके शरीर से उत्पन्न हुई एक शक्ति हूँ। इस दैत्य के मन में आपके मारने के विचार को जान कर मैं ने इसे मार डाला। भगवान विष्णु इस बात से बहुत प्रसन्न हुए और कन्या से कहा कि कोई वर माँग ! कन्या ने उत्तर में कहा कि यदिभगवान मुझ पर वास्तव में प्रसन्न हैं तो मुझे यह वरदान दीजिए कि जो मेरे निमित्त उपवास करे, उसे ब्रह्म- हत्यादि पापोंसे मैं तार दूं। जो मेरे नाम पर जितेन्द्रिय होकर व्रत करे, वह करोड़ कल्प पर्यन्त वैष्णव-धाम में जाकर निवास करे और नाना- प्रकार के भोग भोगे । एकादशी के दिन जो कोई भी मनुष्य उपवास या नक्त-व्रत या एक समयभोजन करे, उसे धर्म और मोक्ष प्राप्त हो। भगवान ने एवमस्तु कहा और कहा कि, तू मेरी परमोत्तम शक्ति है। एकादशी के दिन उत्पन्न हुई है, इसलिए तेरा नाम एकादशी होगा। जो तेरा व्रत करेगा, मैं सब पाप भस्म करके उसे मोक्ष पद दूंगा। अगहन महीने के कृष्ण पक्ष की एकादशी मुर दानव के मारने के लिए पैदा हुई थी, इसका वृत्तान्त ऊपर दिया गया है। Patter मार्ग-शीर्ष शुक्लपक्ष की मोक्षदा एकादशी -- M शुक्ल पक्ष के बारे में यह कथा प्रसिद्ध है कि, गोकुल में वैखानस म Late ESSES SadSAN HALA rani वा -- E । ... । । हिन्दू-त्योहारों का इतिहास नाम के एक राजा रहते थे। वह अपनी प्रजा को पुत्र के समान पालते थे। एक दिन राजा ने स्वप्न में देखा कि उनके पिता नरक में पड़े हैं और उनसे कह रहे हैं कि मेरा उद्धार करो। इसे देख उन्हें बड़ा दुख हुआ, और उन्होंने प्रातःकाल उठ कर अपने दर्बार के पण्डितों से अपना स्वप्न सुनाया। पण्डितों ने राय दी कि थोड़ी ही दूर पर पर्वत ऋषि का आश्रम है वहाँ जाकर उनसे सब वृतान्त कहना चाहिए। राजा पर्वत ऋषि के आश्रम को पधारे और ऋषि के समक्ष जाकर दण्डवत् किया । ऋषि ने राजा से उनके आने का कारण पूछा । राजा ने अपने स्वप्न की कथा सुनाई । इस पर थोड़ी देर तक ऋषि ने आँख बन्द करके ध्यान किया और राजा के पितरों की अधोगति के कारण को जान गए। आँखें खोल कर ऋषि ने कहा कि तेरे पिता की अधोगति को प्राप्त होने का कारण मैं जान गया। वह यह है कि, तुम्हारे पिता के पूर्व जन्म में दो स्त्रियाँ थीं। वह उनमें से एक का मान एक का मान तो बहुत रखता. था, किन्तु दूसरी का ज़रा भी नहीं। उससे केवल विवाह कर लिया था, किन्तु उसके साथ स्त्री का व्यवहार नहीं करता.था । काम- पीड़िता उस स्त्री के शाप से तुम्हारा पिता नरक-गामी हो गया है। राजा ने इस पर ऋषि से इस पाप के निवारण का उपाय पूछा । उन्होंने कहा कि अगहन महीने के शुक्ल पक्ष में मोक्षदा नाम की एकादशी होती है। उस एकादशी में विधिपूर्वक व्रत करो, तब तुम्हारे पिता का पाप नष्ट हो सकता है । राजा ने अपने नगर SEARNER S Sid S म
सफला एकादशी
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में आकर इस एकादशी का व्रत किया, जिसके प्रभाव से उसके
पिता नरक से स्वर्ग चले गए।
पौष महीने के कृष्ण पक्ष की
सफला एकादशी
सास
इस एकादशी का नाम सफला है। नारायण इसके देव हैं।
नागों में शेष जी, पक्षियों में गरुड़, यज्ञों में अश्वमेध, नदियों में
जैसे गङ्गा और मनुष्यों में ब्राह्मण हैं, वैसे ही एकादशियों में पौष
के
कृष्ण-पन की एकादशी है । नारियल, आँवला, दाडिम,
सुपारी, लौंग, अगर आदि से इस दिन देव की पूजा की जाती
है। इस एकादशी को दीप-दान किया जाता है और रात को
जागरण भी होता है।
महिष्मत नाम के राजा की चम्पावती नाम की पुरी थी। इस
राजा के चार पुत्र थे। उनमें लुयङ्कनामक ज्येष्ठ पुत्र बड़ा पापी था ।
वह पर-त्रियों से कुकर्म करता, जुआ खेलता, वेश्याओं के घर जाता
और इस तरह अपने पिता का द्रव्य उड़ाता था। महिष्मत राजा
ने
इसी लिए इस पुत्र को अपने राज्य से निकाल दिया । यह लड़का
वन में चला गया और सोचा कि दिन भर जङ्गल में रहूँगा
।
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ATER हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ६ । और रात में पिता के यहाँ चोरी करूँगा। यह सोच कर वह वन को चला गया और बरसों चोरी करके अपना जीवन व्यतीत करता रहा । लुयङ्क जहाँ रहता था वहाँ एक पीपल का वृक्ष था। एक दिन का हाल है कि सफला एकादशी के दिन इसे कुछ खाने को नहीं मिला और न इसके पास कोई वस्त्र ही शरीर ढंकने को मौजूद था। रात को बहुत जोर से जाड़ा पड़ा जिसके कारण यह चेष्टा-रहित हो गया । शीत के मारे उसे रात भर नींद न आई । रात भर दाँत कटकटाते ही बीता । सूर्योदय होने पर भी लुयङ्क को होश नहीं आया। ऐसे चेष्टा-रहित पड़े-पड़े सफला के दिन दोपहर को धूप के लगाने से लुयङ्क को होश आया और भोजन की तलाश में निकला । शक्ति न होने के कारण उसे न तो कोई शिकार मिला, न अन्य वस्तु । मजबूर होकर फल बीन लाया और पीपल के वृक्ष के नीचे डाल कर कमजोरी के मारे गिर पड़ा। इतने में शाम हो गई और जाड़ा पड़ने लगा। इस पर दुखित हो पीपल की जड़ पकड़ कर वह रोने लगा कि हे पिता ! मेरा क्या होगा ? इसी अवस्था में वह सारी रात जागता ही रहा। भगवान बड़े दयालु हैं, उन्होंने देखा कि लुयङ्क ने तो एक प्रकार सफला एकादशी का व्रत, जागरण, पूजा इत्यादि सभी कर लिया है, अतः प्रसन्न होकर उन्होंने इसे निष्कण्टक राज्य दिया। सुबह होते ही उसके पास एक घोड़ा आया और वह लुयङ्क के सामने खड़ा हो गया। उसी समय आकाशवाणी भी हुई-“हे राजपुत्र ! वासुदेव भगवान की कृपा से और सफला एकादशी के प्रताप से तुझे निष्कण्टकराज्य प्राप्त हो।" RAMMELONDO । ।
पुत्रदा एकादशी उसकी बुद्धि सुधर गई, वह अपने पिता के पास आया। पिता ने उसकी भक्तियुक्त बुद्धि देख कर उसे राज्य दे दिया। यह सब एकादशी के प्रताप से हुआ। । पौष शुक्ल पक्ष की पुत्रदा एकादशी इस एकादशी का नाम पुत्रदा एकादशी है। भद्रावती नगरी का सुकेतुमान राजा था। शैव्या उसकी रानी थी। परन्तु, उसके कोई पुत्र नहीं था जिसके कारण राजा और रानी दोनों दुखी रहते थे। एक दिन इसी कारण से व्यथित हो राजा ने आत्म-घात करने का विचार किया, किन्तु आत्म-घात की दुर्गति सोच कर इस कार्य से दूर रहा । एक दिन सुकेतु राजा घोड़े पर सवार होकर एक गहन-वन में चला गया, पुरोहित आदि किसी को खबर न की। इस जङ्गल में घूमते-घूमते दोपहर का समय हो गया । भूख और प्यास से राजा का गला सूखने लगा, तब इधर उधर डोलता फिरता मन में विचार करने लगा कि मैं ने क्या दुष्कर्म किया कि मुझे इतना कष्ट मिला। राजा सोचता हुआ जाता ही था कि उसे एक सुन्दर तालाब दिखाई पड़ा जो कि मानसरोवर के समान चारों तरफ कमलों से भरा हुआ था। मुनि लोग किनारे बैठे वेद-पाठ कर रहे । S । ।
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ८ थे। राजा ने मुनियों से पूछा कि आप लोग यहाँ क्या कर रहे हैं? मुनियों ने कहा कि माघ मास आज से पाँचवें दिन आने वाला है, और आज पुत्रदा नामक एकादशी है । यह शुक्ला एकादशी पुत्र की इच्छा करने वालों को पुत्र देती है। राजा ने इस पर अपना हाल कह सुनाया । मुनियों ने राजा को उस व्रत के करने की सलाह दी। राजा ने यह व्रत किया जिसके प्रभाव से राजा के एक पुण्यवान पुत्र पैदा हुआ। माघ कृष्ण पक्ष की ट्तिला एकादशी पौष के महीने में पुष्य नक्षत्र में गोबर लेकर उसमें तिल और कपास मिला कर गोले बना लेते हैं और होम करने के लिए सुखा लेते हैं। माघ के कृष्ण पक्ष की एकादशी को इन गोलों का हवन करते हैं और दिन भर उपवास और रात को जागरण करते हैं। काली गाय या काले तिल का दान इस तिथि पर बहुत शुभ माना गया है। इस एकादशी का नाम पट्तिला एकादशी है । इस एकादशी को तिल का तेल मलकर स्नान करते हैं, तिल ही से होम करते हैं, तिल ही पीने के पानी में डालते हैं, तिल ही का भोजन करते हैं और तिल ही दान देते हैं। SAR ९ षट्तिला एकादशी । पौराणिक कथा एक दिन नारद जी बैकुण्ठ में श्रीकृष्ण के पास गए और उनसे जाकर यह पूछा कि षट्तिला एकादशी का माहात्म्य बताइए। श्रीकृष्ण ने कहा कि पहले मृत्युलोक में एक बहुत व्रत करने वाली ब्राह्मणी थी। उसने उपवास और विष्णु-भक्ति में अपना शरीर दुर्बल कर लिया था। एक दिन कृष्ण स्वयँ भिखारी बन कर इसके दरवाजे पर गए और भिक्षा माँगी । ब्राह्मणी ने क्रोध करके एक मिट्टी का ढेला इनके खप्पर में डाल दिया। इस मिट्टी के ढेले को लेकर ये बैकुण्ठ चले आए। कुछ दिनों के बाद जब ब्राह्मणी स्वर्ग में आई तो मिट्टी के दान के कारण स्वर्ग में उसे बहुत अच्छा घर रहने को मिला, किन्तु उसके अन्दर खाने-पीने को कुछ भी न था। इस पर वह श्रीकृष्ण के पास आकर शिकायत करने लगी और पूछने लगी कि जब मैं ने मृत्युलोक में इतनी भक्ति की तो फिर क्यों मुझको बैकुण्ठ में सुख नहीं है ? श्रीकृष्ण ने कहा कि इसका कारण तुम्हें देव-स्त्रियाँ बताएँगी। देव-स्त्रियों से जब उस ब्राह्मणी ने पूछा तो उन्होंने कहा कि तुमने षट्तिला एकादशी का व्रत नहीं किया था। इस पर उस ब्राह्मणी ने षट्तिला का व्रत किया और उसके प्रभाव से तुरन्त ही धन-धान्य वस्त्र आदि सम्पदाओं से युक्त हो गई। भविष्यपुराण से हिन्दू-त्योहारों का इतिहास HAR १० माघ शुक्ल पक्ष की जया एकादशी पद्मपुराण में लिखा है कि एक समय इन्द्र वृन्दावन में बहुत आनन्दपूर्वक क्रीड़ा कर रहे थे। हजारों अप्सराएँ और गन्धर्व लोग इन्द्र को प्रसन्न करने के लिए वहाँ नाचते-गाते थे। माल्यवान नाम का एक गन्धर्व भी वहाँ गान कर रहा था और वहीं पुष्पवती नाम की एक अप्सरा भी गान कर रही थी। माल्यवान और पुष्पवती दोनों ही एक दूसरे को देख कर मोहित हो गए और एक दूसरे को इशारा करने लगे। दोनों गा तो रहे थे इन्द्र समक्ष, किन्तु दृष्टि एक दूसरे पर रहती थी। थोड़ी देर के अन्दर ही इन लोगों का नाचना-गाना अप्सराओं और गन्धवों के सुर-ताल से अलग हो गया, और इन्द्र की सभा में विन्न होने लगा। इन्द्र ने इन दोनों को इस प्रकार परवश देख कर और अपना अपमान समझ कर इन लोगों को शाप दे दिया कि जाओ तुम पिशाच हो पिशाच हो। तब ये दोनों हिमालय पर जा पड़े और पिशाच बन कर भयङ्कर दुख पाने लगे। पिशाचपने के दुख के मारे गन्ध, रस, स्पर्श सबका ज्ञान जाता रहा। न दिन को आराम मिलता था और न रात को नींद आती थी। जाड़ों के मारे दाँत कटकटाते और पहाड़ की गुफाओं में भ्रमण करते फिरते थे। इसी अवस्था में थे कि "जया" नाम की माघ मास के शुक्ल- ब ९ देख कर बड़ा जया एकादशी पक्ष की एकादशी आई। इस दिन न इन्हें कुछ खाने को मिला और न पीने को। इसलिए ये दोनों ही दुखित हो शाम को एक पीपल के वृक्ष के नीचे जा पड़े। रात्रि को जाड़ा अधिक पड़ रहा था, इसलिए रात्रि में जाड़े के कारण दोनों में से किसी को भी नींद न पड़ी और दोनों को जागरण करना पड़ा। इस तरह इनके अनजाने ही इन दोनों का एकादशी-व्रत पूर्ण हो गया । प्रातःकाल उठते ही व्रत के प्रभाव से इन दोनों का पिशाचत्व' नष्ट हो गया। जैसे पहले थे वैसे ही हो गए और फौरन ही इन्द्र- आश्चर्य हुआ। उन्होंने पूछा कि आखिर किस देवता के प्रताप से तुमने मेरे शाप को भङ्ग करा लिया ? माल्यवान ने पूरी कथा कह सुनाई और कहा यह "जया" एकादशी का प्रताप है कि मैं आज शाप से मुक्त हो, अपने पुराने रूप को धारण कर सका हूँ। जो मनुष्य इस व्रत को श्रद्धायुक्त होकर करता है वह पुराणों के कथनानुसार करोड़ कल्प-पर्यन्त बैकुण्ठ में रहता है। फाल्गुन कृष्ण पक्ष की विजया एकादशी जिस समय श्री रामचन्द्र जी लङ्का पर आक्रमण करने के लिए बानरों और रीछों की सेना लेकर समुद्र-तट पर पहुँचे तो । हिन्दू-त्योहारों का इतिहास १२ अगाध समुद्र को देख कर उन्हें बड़ी शङ्का पैदा हो गई कि. इस ग्रहयुक्त समुद्र को कैसे पार किया जायगा। लक्षमण ने इस पर रामचन्द्र जी को सलाह दी कि आप यहाँ से थोड़ी ही दूर पर बसने वाले मुनि से इस बारे में सलाह कीजिए । रामचन्द्र उस आश्रमवासी मुनि के पास गए और उनसे अपना वृत्तान्त कह कर पूछने लगे-महाराज, इस गम्भीर समुद्र को पार करने का कोई सरल उपाय बताइए। तब मुनि ने कहा कि मैं व्रतों में उत्तम व्रत तुम्हें बतलाता हूँ जिसके करने से तत्काल तुम्हारी विजय होगी। इसके करने से केवल समुद्र ही पार न होगे, बल्कि लङ्का पर भी विजय पाओगे। वह व्रत यह है कि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की दशमी को सोने, चाँदी, ताँबे या मिठी का एक 'घड़ा बनवाना चाहिए, उस घड़े को भर कर उसके ऊपर पीपल, बट, गूलर, आम और पाकर के पल्लव रख देने चाहिएँ। इस कुम्भ के नीचे सात धान्य और ऊपर जौ रखकर उसके ऊपर सोने की लक्ष्मी-नारायण की मूत्ति रखनी चाहिए। एकादशी के दिन प्रातःकाल स्नान करके उसकी पूजा करो, रात भर कुम्भ के सामने बैठ कर जागरण करो और द्वादशी के दिन उस कुम्भ को जल-स्थल में पहुँचा कर मूर्ति को वेद-पाठी ब्राह्मण को दे दो। इस विधि से अगर सेना-सहित तुम व्रत करोगे तो तुम्हारी सब कठिनाई जाती रहेगी। राम ने ऐसा ही किया और विजयी हुए। -स्कन्धपुराण से
आमलकी एकादशी
फाल्गुन शुक्ल-पक्ष की
श्रामलकी
एकादशी
।
-
इस एकादशी का नाम “आमलकी' एकादशी है। इसके
माहात्म्य में यह कहा जाता है कि वैदिश नाम के नगर में चैत्ररथ
राजा रहता था। वह एकादशी का बड़ा भक्त था । फाल्गुन शुक्ल
एकादशी आने पर उसने आँवले के नीचे बैठ कर जलपूर्ण कुम्भ
स्थापन कर उसके पास छत्र और जूते रक्खे, पास ही परशुराम
की मूर्ति स्थापित की और उसकी पूजा की। इतने में वहीं एक
व्याध या जो माँस का एक लोथड़ा अपने साथ लिए हुए था।
वह बड़ा पापी था, किन्तु श्रम की वजह से थक कर आँवले के
वृक्ष के नीचे बैठ गया और रात भर कथा सुनता रहा, जिसके
प्रभाव से मरने के बाद उसने बड़े प्रतापी राजा का शरीर पाया
और धर्मपूर्वक राज्य करने लगा। एक दिन वह शिकार
खेलने गया, जङ्गल
में
रास्ता भूल गया
और
पहाड़ की एक शिला
पर जाकर सो रहा । इतने में कुछ म्लेच्छों का मुण्ड आया और
उसे सोता हुआ देख कर उसको मारने के लिए तीर भाले आदि
फेंकने लगा, किन्तु तीर आदि उसके शरीर पर पहुँच कर बिलकुल
बेकार हो जाते थे। जब म्लेच्छों ने यह देखा तो जोरों के साथ
आक्रमण करने का विचार किया। इतने में उस राजा के शरीर से
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास एक सुन्दरी पैदा हुई । वह बड़ी भयङ्कर थी और उसने छन म्लेच्छों को मार डाला । जब राजा जागा तो उसने शत्रुओं को इस तरह मरा हुआ देख कर बड़ा आश्चर्य किया। इतने में आकाशवाणी हुई कि हे राजन् ! तुम उस जन्म में व्याध थे, किन्तु तुमने शुक्लपक्ष की एकादशी को जागरण किया था उसी का प्रभाव है कि आज तुम इस प्रकार से अपने शत्रुओं पर विजयी हुए हो। चैत्र कृष्ण पक्ष की पापमोचनी एकादशी में इसका नाम “पाप-मोचनी एकादशी है। इसके बारे में यह कथा है कि एक समय वसन्त-ऋतु में चैत्ररथ नामक वन इन्द्र अप्सराओं और गन्धों के साथ आनन्द करते थे। उसी समय वन में ऋषि-मुनि अपनी-अपनी तपस्या में रत थे। मुजघोषा नाम की अप्सरा ने वहाँ पर तप करने वाले मेधावी नाम मुनि को अपने वश में करने का विचार किया और मुनि के समीप जाकर अच्छे-अच्छे वस्त्र और आभूषणों को पहन, मधुर स्वर से वीणा 'पर गाने लगी। मेधावी का चित्त विचलित हो गया और दोनों पाप-मोचनी एकादशी 'कामासक्त हो, एक दूसरे के साथ रहने लगे। मुनि ने अपनी तपस्या को तिलाञ्जलि दे दी और अप्सरा इन्द्रलोक को नहीं गई। दोनों इसी तरह बहुत काल तक रहते रहे । जब-जब अप्सरा देवलोक जाने की इच्छा प्रगट करती, तब-तब मुनि उसे यह कह कर रोक लेते कि कल जाना । एक दिन अप्सरा ने कहा-महाराज, आपका कल कितना बड़ा है ? इस पर मुनि को कुछ विचार पैदा हुआ। उन्होंने ध्यान करके देखा तो मालूम हुआ कि इस अप्सरा के साथ रहते उन्हें ७५ वर्ष व्यतीत हो गए। मुनि को इस बात पर बड़ा क्रोध आया और उन्होंने इसे यह शाप दिया कि तू पिशाचिनी हो । अप्सरा ने दुखित होकर पूछा कि आपने शाप तो दे दिया, यह तो आपके साथ रहने का मुझे फल मिला, किन्तु अब यह बताइए कि इस शाप का प्रतिकार क्या है ? इस पर मुनि ने कहा कि चैत के महीने की एकादशी तुम्हारा शाप नाश करेगी। इसके बाद मेधावी अपने पिता के आश्रम में आए और उन्होंने अपने पतन होने का पूरा वृत्तान्त कह सुनाया। उनके पिता च्यवन ने कहा-बेटा तुमने बुरा तो किया, किन्तु जानो चैत की “पाप- मोचनी एकादशी का व्रत करो, इससे तुम्हारे सब पाप नाश हो जॉयगे। --भविष्योत्तरपुराण से sinese ----- S SSSS SS see HERE REEN । । S न कामदा एकादशी हिन्दू-त्योहारों का इतिहास चैत्र शुक्लपक्ष की कामदा एकादशी ॥ इसका नाम "कामदा" एकादशी है। इसका माहात्म्य बाराह- पुराण में यह बताया गया है कि एक बार नागलोक में पुण्डरीक राजा रहता था। उसके यहाँ गन्धर्व और किन्नर सभी मौजूद थे। एक दिन उसके सामने ललिता नाम का गन्धर्व गान कर रहा था। उसे अपनी स्त्री ललित का गाते-गाते ही ख्याल आ गया, जिससे उसके ताल और स्वर में विघ्न पड़ने लगा। कर्कर नाम के नाग ने यह बात पुण्डरीक राजा से कह दी । इस पर पुण्डरीक राजा ने अप्रसन्न होकर ललित को राक्षस हो जाने का शाप दिया। राजा के शाप से ललित राक्षस होकर फिरने लगा। ललिता भी उसके साथ फिरने लगी। ललितकी दुर्दशा देखकर उसकी बुरी हालत होती जाती थी। अन्त में ललिता विचरते विचरते. विन्ध्याचल के शिखर पर ऋष्यमूक ऋषि के पास पहुँची । उन्होंने इसे चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी का व्रत करने की सलाह दी और इसी व्रत के प्रताप से ललित फिर गन्धर्व-रूप को प्राप्त हुआ।
PriLE
१७
मोहनी एकादशी
वैशाख कृष्ण पक्ष की
वरूथिनी एकादशी
इसका नाम "वरूथिनी एकादशी है। इस एकादशी व्रत के
रखने से बड़े-बड़े फल बताए गए हैं।
शुक्ल-पक्ष की
वैशाख
मोहनी एकादशी
इसका नाम “मोहनी" एकादशी है। इसके सम्बन्ध में कूर्मपुराण
में यह कथा कही गई है कि सरस्वती के तट पर 'भद्रावती' नाम की
नगरी में द्युतिमान नामक राजा राज्य करता था। इसके कई पुत्र
थे। एक पुत्र का नाम धृष्टबुद्धि था, जो बहुत पापाचारी था । जुआ
खेलना, व्यभिचार करना, दुर्जनों का सङ्ग, वृद्धों का अपमान करना
इत्यादि दुर्गुण उसमें पाए जाते थे । उसकी बुराइयों को देख
कर उसके पिता ने उसे निकाल दिया और वह वन में रहने लगा।
वहाँ पर कभी चोरी करता और कभी जानवरों को मार कर खाता
था। एक दिन वह अपने पूर्वजन्म के पुण्य-प्रताप से कौण्डिन्य मुनि
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास १८ के आश्रम में जा पहुँचा। उस महामुनि के कपड़े के स्पर्श से उसका पाप जाता रहा। ऋषि ने कहा कि वैशाख शुक्ल एकादशी का व्रत करो, इसके प्रभाव से बड़े-बड़े पाप नष्ट हो जाते हैं। वह ऐसा कर पाप-निर्मुक्त हुआ। esi ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष की अपरा एकादशी इसका नाम "अपरा" एकादशी है। इसके प्रभाव से ब्रह्म- हत्या-जैसे बड़े-बड़े पाप भी दूर हो जाते हैं। ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की निर्जला एकादशी में इसका नाम "निर्जला" एकादशी है । इस एकादशी के सम्बन्ध यह कहा जाता है कि भीमसेन ने व्यास जी से कहा कि प्रत्येक एकादशी के दिन अर्जुन, नकुल आदि भाई मुझसे कहते हैं कि आप आज उपवास करें, किन्तु मुझसे भूखा नहीं रहा जाता। इसलिए कोई ऐसा उपाय बताइए कि उपवास न करते हुए मैं पाप १९ योगिनी एकादशी का भागी न बनूँ। इस पर व्यास जी ने कहा कि जो लोग एकादशी को अन्न खाते हैं, वे अवश्य नरक जाते हैं। यह सुन कर भीमसेन काँपने लगा और कहने लगा कि हे पितामह, मुझसे तो भूखा नहीं रहा जायगा । तब व्यास जी ने बताया कि, अगर ज्येष्ठ-मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को व्रत रक्खो, तो तुम्हारा सात एकादशी व्रत न करने का जो पाप है वह अवश्यमेव मिट सकता है। इसमें एकादशी के सूर्योदय से द्वादशी के सूर्योदय तक जल की मनाही रहती है । इस एकादशी के दिन एक घड़ा भरके जल-दान करने से सब पाप छूट जाता है। इसको "पाण्डव" एकादशी भी कहते हैं। आषाढ़ कृष्ण पक्ष की योगिनी एकादशी इसका नाम “योगिनी" एकादशी है। इसके बारे में यह कथा कही जाती है कि कुबेर के यहाँ 'हेममाली' नाम का फूल लाने वाला माली था। उसकी स्त्री का नाम 'विशालाक्षी था । प्रतिदिन वह समय पर कुबेर के यहाँ शिव-पूजन के लिए पुष्प दे आया करता था, किन्तु एक दिन अपनी स्त्री के वश हो, घर पर ही रह गया और कुबेर के यहाँ फूल न पहुँचा सका। कुबेर को शिव-पूजा
२०
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास
करते-करते दोपहर हो गयी, किन्तु फूल लेकर वह न गया। कुबेर
को बड़ा क्रोध आया और उसको बुला कर पूरा हाल
जान, उन्होंने शाप दे दिया कि तूने देव की अवहेलना की है,
इसलिए कोढ़ी होकर पतित होजा और सदा के लिए अपनी स्त्री से
जुदा हो। यह वचन सुनते ही हेममाली वहाँ से नीचे गिर गया
और उसका शरीर कुष्ठ से भर गया। वह असह्य दुखों को सहता
हुआ इधर-उधर फिरने लगा। अन्त में मार्कण्डेय मुनि के
आश्रम में जा और वहाँ मार्कण्डेय से उसने अपना पूरा हाल
सचसच कह दिया। इससे प्रसन्न होकर मार्कण्डेय ने उसे बताया
कि आषाढ़ मास के कृष्ण-पक्ष की एकादशी के व्रत करने से
कुष्ठ रोग नष्ट हो जाता है।
हेममाली ने मुनि के आज्ञानुसार इस व्रत को किया और कुष्ठ
से
छुटकारा पाकर फिर अपने पूर्व-जैसा ही हो गया।
Aswips
आषाढ़ शुक्ल पक्ष की
पझनामा एकादशी
--
इसका नाम "पद्मनाभा" एकादशी है। इस दिन व्रत करने
से यदि वर्षा न होती हो, तो हो सकती है।
२१
कामदा और पुत्रदा एकादशी
एक राजा के यहाँ एक बार तीन वर्ष तक पानी न बरसा,
जिससे उसकी प्रजा मरने लगी। राजा को प्रजा की दशा देख बड़ा
दुख हुआ और वह गहन-वन में प्रवेश कर मुनियों से इस के उपाय
पूछने का प्रयत्न करने लगा। वन में घूमते-घूमते वह अङ्गिरस
ऋषि के पास आया। उन्होंने राजा को “पद्मनाभा" एकादशी को
उपवास करने की सलाह दी, जिसके पालन से राजा के राज्य में
बहुत काकी वर्षा हुई और प्रजा का दुख जाता रहा।
ब्रह्माण्डपुराण
श्रावण कृष्ण तथा शुक्ल पक्ष की
कामदा और पुत्रदा एकादशी
।
आवण कृष्ण एकादशी का नाम “कामदा" एकादशी है, और
श्रावण शुक्ल पक्ष की एकादशी का नाम “पुत्रदा" है । इसके सम्बन्ध
में यह कथा कही जाती है कि द्वापर-युग के आदि में महिष्मती नगरी
में महीजित नाम का राजा था।वह अपनी प्रजा को पुत्र के समान
पालता था और देश पर न्याय और धर्म के अनुसार राज करता
था। किन्तु, उसके कोई पुत्र न था। कुछ दिन तक चुपचाप बैठे
रहने के बाद पुत्र-प्राप्ति से निराश होकर वह अपने राज्य के पण्डितों
के पास गया और उनसे कहने लगा कि, मैं ने कभी प्रजा पर कोई
S
BE
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।
।
Erapati
SEN
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास
अत्याचार नहीं किया, अपने भाई बन्धुओं को भी अन्याय करने
पर दण्ड दिया, प्रजा को अपनी सन्तान के समान पाला, फिर क्या
कारण है कि मैं इस समय तक पुत्र-हीन हूँ ? ब्राह्मण-गण राजा
की इस बात को सुन दुखित हो, उसके इस दुख के दूर करने
का उपाय मालूम करने के लिए वन में लोमश मुनि की कुटी
पर पहुँचे और मुनि से अपने आने का कारण बताया । 'मुनि
थोड़ी देर तक ध्यानावस्थित हुए और उस राजा का सब हाल
जान कर कहने लगे कि पूर्व-जन्म में यह राजा बड़ा धन-हीन
वैश्य था। गाँव-गाँव घूम कर वाणिज्य करता था। एक
दफा ज्येष्ठ मास के
शुक्ल पक्ष की द्वादशी के दिन दोपहर के समय
गाँव की सीमा पर इसे प्यास लगी। पास ही एक निर्मल सरोवर
देख कर वहाँ पानी पीने गया । वहाँ तुरन्त ही प्रसूता गाय भी प्यास
से व्याकुल होकर आई । इसने उस गाय को हाँक कर स्वयं पानी
पहले पी लिया। उसी पाप के कारण यह इस समय पुत्र-हीन
है। इसलिए अगर "पुत्रदा" नाम की एकादशी का व्रत करे तो उसे
पुत्र-प्राप्त हो । ब्राह्मण लोमश ऋषि के बचन सुन कर अपने घर .
वापस आए और राजा से सब हाल कहा । राजा ने यथायोग्य
व्रत का पालन किया और उसे पुत्र प्राप्त हुआ।
-भविष्यपुराण
HER
वामन एकादशी
भाद्रपद कृष्ण-पक्ष की
अजा एकादशी
इसका नाम “अजा" एकादशी है। ब्रह्माण्डपुराण में लिखा
है कि राजा हरिश्चन्द्र बड़ा सत्यसन्ध और दृढ़व्रत था। अपनी
सचाई के कारण उसे अनेक कष्ट उठाने पड़े। उसे अपनी स्त्री,
बालक और स्वयं अपने को भी अपने ही प्रण के कारण बेचना
पड़ा। वह एक श्वपच के घर में बिका और वहीं रहने लगा।
किन्तु, हमेशा चिन्ता में निमग्न रहता था कि क्या कारण है,
मैं ऐसे दुख में पड़ा। एक दिन एक मुनि से भेंट हो गई।
मुनि से हरिश्चन्द्र राजा ने अपना वृत्तान्त सुनाया, इस पर मुनि ने
भाद्रपद के कृष्ण पक्ष की एकादशी का व्रत करने को कहा, जिससे
राजा के सब दुख कट गए। वह अपनी स्त्री और पुत्र से फिर
मिला और राज्य भी उसे फिर प्राप्त हो गया, और अन्त समय
में स्वर्ग-लोक को प्राप्त हुआ।
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की
कामन एकादशी
इसका नाम "बामन" एकादशी है, और किसी-किसी ने जयन्ती
२४ हिन्दू-त्योहारों का इतिहास भी कहा है। कहते हैं कि इस दिन क्षीरसागर में शय्या पर सोए हुए भगवान करवट लेते हैं। इस दिन बामन भगवान की पूजा की जाती है। दही, चावल और रुपयों का दान किया जाता है। आश्विन कृष्ण पक्ष की इन्दिरा एकादशी इसका नाम “इन्दिरा" एकादशी है। अधोगति को प्राप्त हुए पितरों को गति देने वाली है। इसके सम्बन्ध में ब्रह्मवैवर्त-पुराण में यह कथा लिखी है कि माहिष्मती पुरी में सतजुग में इन्द्रसेन नाम का एक राजा था। उसके सामने नारद ने एक दिन आकर कहा कि मैं स्वर्ग-लोक से अभी यम-लोक गया हुआ था, वहाँ तुम्हारे पिता को दुखी पाया। उन्होंने मेरे द्वारा तुम्हारे पास यह सन्देशा भेजवाया है कि “इन्दिरा" व्रत करके मुझे स्वर्गलोक पहुँचाओ। नारद ने “इन्दिरा" व्रत की रीति इत्यादि भी इन्द्रसेन से कही। तब पितृ-भक्त इन्द्रसेन ने उस व्रत को किया और उसका पिता गरुड़ पर बैठ कर उसी समय स्वर्ग को चला गया।
पाफाकुशा एकादशी
--
पर मजबूर किया। परिणाम यह हुआ कि द्वादशी के प्रातःकाल
रमा एकादशी
आश्विन शुक्ल पक्ष की
इसका नाम “पापाङ्कुशा" एकादशी है । पद्मनाभ भगवान
की इस दिन पूजा की जाती है। इसका भी ब्रह्माण्ड पुराण में बड़ा
माहात्म्य बताया गया है।
कार्तिक कृष्ण पक्ष की
रमा एकादशी
इसका नाम "रमा” एकादशी है। इसके सम्बन्ध में यह कथा
कही जाती है कि 'मुचकुन्द' राजा की कन्या 'चन्द्रभागा' का विवाह
'शोभन' नामक एक राजकुमार से हुआ था। एक दिन शोभन
अपने के घर गया। उस दिन एकादशी थी। शोभन बहुत
ही दुर्बल था, किन्तु मुचकुन्द राजा इतने दृढभक्त थे कि दुर्बलता
का कुछ खयाल न करके शोभन को एकादशी-व्रत करने
राजकुमार शोभन मर गया। राजा मुचकुन्द ने उसकी यथाविधि
दाह-क्रिया कर दी और चन्द्रभागा को आज्ञा दी कि वह अपने पति
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास के साथ सती न हो। चन्द्रभागा उस दिन से विधवा होकर, किन्तु एकादशी को मानती हुई, रहने लगी। शोभन ने मरने के बाद एकादशी के प्रभाव से मन्दराचल पर एक सुन्दर देवपुर पाया, जहाँ इसको हर-एक प्रकार का आनन्द प्राप्त था । मुचकुन्दपुर का रहने वाला सोमशर्मा नामक एक ब्राह्मण तीर्थ यात्रा करता-करता एक दुफा मन्दराचल पर गया, तो शोभन को देखकर पहचान गया कि ये तो हमारे राजा के दामाद हैं। वह उनसे मिलने गया। शोभन ने अपने पिता, ससुर और स्त्री का हाल पूछा। सोमशर्मा ने सबका कुशल-सम्बाद सुनाया। फिर सोमशर्मा ने शोभन से पूछा कि यहाँ कैसे पहुँचे ? शोभन ने सब हाल कह सुनाया और बताया कि रमा नाम की एकादशी के प्रभाव से मैं मरते ही मन्दराचल में देवपुर का स्वामी हो गया था। सोमशर्मा, इसके बाद, मुचकुन्दपुर वापस आया और राजकुमारी चन्द्रभागा से सब हाल कह सुनाया। चन्द्रभागा ने जब यह वृत्तान्त सुना, तो उसे बड़ा आश्चर्य हुआ और अन्त में सोमशर्मा से कहा कि मुझे मन्दराचल ले चलो सोमशर्मा उसे लेकर चला और ऋषि के मन्त्र के प्रभाव से चन्द्रभागा को दिव्य-रूप धारण कराके उसे मन्दराचल में शोभन के पास ले गया। वहाँ शोभन और चन्द्रभागा आनन्दपूर्वक रहने लगे। चन्द्रभागा ने अपने पति के मरने के बाद बराबर एकादशी का व्रत किया था और इसका प्रभाव यह हुआ कि अन्त में उसकी अपने पति से भेंट हो गई। । Songs MARA vasana Ratnagar Saini
२७
तुलसी-विवाह एकादशी
A
कार्तिक कृष्ण पक्ष की
तुलसी-विवाह एकादशी
में
कार्तिक कृष्ण एकादशी और अमावस्या के शुभ दिन,
तुलसी और कृष्ण का, प्रति वर्ष विवाह किया जाता है। इस
त्योहार के सम्बन्ध पुराण आदि ग्रन्थों में दो मुख्य कथाएँ
लिखी हैं:-
कालनेमि नामक दैत्य की कन्या वृन्दा का विवाह जलन्धर
नामक दैत्य के साथ हुआ था। जलन्धर की उत्पत्ति महादेव जी
के पसीने से हुई थी। जिस समय देव और दैत्य दोनों मिल कर
सागर का मथन कर रहे थे, उस समय इन्द्र ने महादेव जी का,
किसी बात पर, अपमान कर दिया था। इस अपमान से महादेव
जी के शरीर से जो पसीना निकला और समुद्र में गिरा, उससे
जलन्धर नाम का दैत्य पैदा हुआ था। इसी दैत्य का विवाह
कालनेमि की कन्या वृन्दा के साथ हुआ। जब जलन्धर बड़ा
हुआ, तो उसने सागर से पैदा होने के कारण जलाशयों का
अधिपति होना घोषित किया और महासागर से उत्पन्न * १४ रत्नों
निम्न-लिखित १४ रत्न सागर से पैदा हुए थे :-(१) लक्ष्मी (२)
कौस्तुभ (३) पारिजात (४) सुरा (५) धन्वन्तरि (६) चन्द्रमा
(७) अमृत (८) कामधेनु (१) ऐरावत (१०) रम्भा (११)
कालकूट (१२) उच्चैःश्रवा (१३) सुदर्शन चक्र (१४) शङ्ख
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास २८ को इन्द्र से माँगा। इन्द्र ने इन रत्नों को देने से इन्कार किया। इस- पर, जलन्धर ने इन्द्रलोक पर आक्रमण करने का विचार किया और इसके निमित्त एक कठिन तप करना शुरू कर दिया । ब्रह्मा ने प्रसन्न होकर उसे यह वर दिया कि जब तक तुम्हारी स्त्री तुमको छोड़कर किसी अन्य पुरुष से सम्बन्ध न करेगी, तब तक तुम्हारी मृत्यु असम्भव है। अब जलन्धर को अपनी सफलता का पूरा विश्वास हो गया और उसने इन्द्र के ऊपर चढ़ाई कर दी। अमरावती को लूट लिया और देवताओं को हरा दिया। विष्णु भगवान लड़ाई से भाग निकले और देवताओं में आपत्ति फैल गई । विष्णु भगवान 'भाग कर बैकुण्ठ में छिप गए और वहाँ लक्ष्मी से सब हाल कह सुनाया। उनसे पूछा कि इस दैत्य के मारने का क्या उपाय है ? लक्ष्मी ने ब्रह्मा के वरदान का पूरा किस्सा कह सुनाया और कहा कि जब तक वृन्दा पवित्र सती है, तब तक दैत्य जलन्धर की मृत्यु असम्भव है। तब देवता लोग वृन्दा के सतीत्व को भ्रष्ट करने का उपाय सोचने लगे। विष्णु ने शिव को भेजो कि जाओ, वृन्दा का 'सतीत्व, किसी प्रकार से, भ्रष्ट कर आयो; किन्तु महादेव जी सफल न हुए। फिर विष्णु स्वयं वृन्दा के पास जलन्धर का रूप धारण कर गए। वृन्दा ने समझा कि यह मेरा पति है। वह उनको अपना पति समझने लगी। ज्योंही विष्णु वृन्दा का सतीत्व नष्ट करने में सफल हुए कि जलन्धर का सिर इन्द्र ने काट दिया और वह वृन्दा के आँगन में आ गिरा। वृन्दा को जब सब हाल मालूम हुआ, तो उसे बड़ा क्रोध आया और उसने विष्णु me indias । । SP । । । S । । तुलसी-विवाह एकादशी को शमप दिया कि "जाओ तुम काले पत्थर की बटिया शालग्राम हो जाओ"। विष्णु ने इसके उत्तर में उसे यह शाप दिया कि “तुम तुलसी-वृक्ष होो"। उसी समय से विष्णु शालग्राम हुए और वृन्दा तुलसी-वृक्ष हो गई। विष्णु भगवान के मानने वाले प्रति वर्ष तुलसी-रूपी वृन्दा का विवाह शालग्राम से करते हैं दूसरी कथा इस त्योहार के सम्बन्ध में यह कही जाती है कि सत्यभामा को अपने सौन्दर्य पर बड़ा अभिमान था । वह समझती थी कि कृष्ण को मैं सबसे ज्यादा प्यारी हूँ। इसलिए एक दिन जब नारद जी द्वारका-पुरी पहुँचे और सत्यभामा के महल में गए तो सत्यभामा ने कहा-हे मुनि ! मैं चाहती हूँ कि कृष्ण मेरे जन्म- जन्मान्तर पति हों । इसका क्या उपाय है ? नारद मुनि नेसत्यभामा के स्वार्थ और अभिमान को देखकर उसे सबक सिखाना चाहा। उन्होंने कहा कि यह सिद्धान्त तो तुम्हें मालूम है कि जिस वस्तु की तुम जन्मान्तर में इच्छा रखती हो, वह इस जन्म में तुम्हें किसी सुपात्र ब्राह्मण को दान करनी चाहिए । यदि तुम चाहती हो कि तुम्हें इस जन्म के बाद कृष्ण मिलें, तो तुम्हें कृष्ण को दान कर देना चाहिए। तब सत्यभामा ने कृष्ण को नारद जी को दान कर दिया। नारद ने कृष्ण को अपना शिष्य बना लिया और उन्हें अपने साथ वीणा लिए रहने पर नियत किया, तथा अपने साथ लेकर स्वर्ग-लोक को चल दिए । जब यह समाचार कृष्ण की अन्य रानियों और महारानियों को मिला ( रुक्मिणी के अलावा) तो सब वहाँ आकर नारद के पैरों पर पड़ीं और प्रार्थना करने लगी कि । हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ३० कृष्ण को स्वर्ग न ले जाओ। किन्तु, नारद ने कहा कि सत्यभामा ने कृष्ण को हमें दान कर दिया है। अनन्तर और सब रानियाँ सत्यभामा के पास पहुंची और उससे पूछने लगी कि सोलह सहस्र एक सौ आठ स्त्रियों के हृदयेश्वर श्रीकृष्ण को दान कर देने का अधिकार केवल एक सत्यभामा को कैसे था! सत्यभामा इसका ठीक उत्तर न दे सकी और नारद से पूछने लगी कि आप ही कोई उपाय बतावें । नारद ने कहा कि कृष्ण के ही वजन के बराबर हमें सोना और मोती दो, तो हम कृष्ण को न ले जायें। सत्यभामा बड़ी प्रसन्न हुई। तराजू लटकाया गया और सत्यभामा ने अपना सुवर्ण और मणियाँ तराज पर रखना सुरू किया, किन्तु जिस ओर कृष्ण बैठे हुए थे उस ओर का पलड़ा ज़रा भी न उठा। तब और सब रानियों ने एक-एक कर अपना-अपना गहना पलड़े में रख दिया, किन्तु तराजू का पलड़ा ज़रा भी न उठा । नारद ने कहा कि रुक्मिणी कृष्ण की, प्रियतमा है। उसके पास गहने ज्यादा होंगे। उसी को बुलाओ। उसी के गहनों के रखने से शायद कृष्ण के बराबर सोना पूरा हो जाय । सत्यभामा को यह बात अच्छी न लगी, किन्तु लाचार थीं, अन्त में रुक्मिणी के पास गई। रुक्मिणी उस समय स्वच्छ वस्त्र पहने तुलसी की पूजा कर रही थीं। सत्यभामा को देख, उठ कर खड़ी हो गई और आदर- बाद उनसे पूछा कि आपने किस लिए कष्ट किया ? सत्यभामा ने सब हाल कह सुनाया। रुक्मिणी ने उत्तर दिया कि मैं तो आभूषण पहिनती ही नहीं और न मेरे पास इतने सत्कार के हिन भीष्म एकादशी । आभूषण हैं कि मैं उनसे जगत्पति की बराबरी करा सकूँ । किन्तु, मैं कृष्णचन्द्र की प्रियतमा तुलसी से प्रार्थना करूँगी कि वे कोई ऐसी चीज दें, जो उनके पति श्रीकृष्ण की, वजन में, बराबरी कर सके। हाथ जोड़कर प्रार्थना करने पर तुलसी के वृक्ष से एक पत्ती गिर पड़ी। रुक्मिणी उसे लेकर सत्यभामा के साथ वहाँ आई, जहाँ नारद जी थे। उसने पहले तो नारद को प्रणाम किया उसके बाद कृष्ण को और तत्पश्चात् तुलसी-दल को तराजू के पलड़े में रक्खा । रखते ही श्रीकृष्ण का पलड़ा एकदम से उठ गया। नारद जी उस पत्ती को लेकर चले गए। उसी समय से रुक्मिणी कृष्ण की पटरानी कहलाई। किन्तु, उन्होंने अपना यह सौभाग्य तुलसी को दे दिया, जो कि जलन्धर की विधवा स्त्री थी और उसी के साथ उस समय से प्रति वर्ष विवाह होने की प्रथा चल पड़ी। पद्मपुराण भीष्म एकादशी कार्तिक एकादशी को भीष्म-पञ्चक व्रत मनाया जाता है। इसी दिन भीष्म पितामह पाण्डवों के वाण से जख्मी होकर शय्या पर लेटे हैं, और लेटे-लेटे ही पाण्डवों को उपदेश किया है, जो 63 ।
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ३२ शान्ति पर्व महाभारत में वर्णित है। इस दिन लोग व्रत रहते हैं और भीष्म ने जो उपदेश दिया है, उसे पढ़ते हैं। । दत्तात्रेय-जन्म । [ मार्गशीर्ष कृष्ण-दशमी को होता है ] दत्तात्रेय के तीन सिर और छः हाथ हैं । ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों देवताओं की यह संयुक्त मूर्ति मानी जाती है। इसके सम्बन्ध में यह कथा कहाँ जाती है कि एक समय ब्रह्मा की स्त्री सावित्री, विष्णु की स्त्री लक्ष्मी और शिव की स्त्री पार्वती को अपने- अपने पातिव्रत्य और सुशीलता पर बड़ा अभिमान हो गया। ये समझने लगी कि सारे विश्व में हम लोगों के समान पतिव्रता और सुशीला कोई और खी है ही नहीं। नारद मुनि से यह अभिमान न देखा गया और उन्होंने इसलिए इस अभिमान को तोड़ना चाहा। उन्होंने पहिले-पहल पार्वती जी के पास जाकर कहा- "मैं सारे विश्व में भ्रमण करता फिरता हूँ, किन्तु अत्रि मुनि की स्त्री अनसूया के समान पतिव्रता, शुद्ध-चरित्रा और सुशीला मैं ने किसी भी लोक में न देखी । पार्वती जी को अनसूया की यह प्रशंसा अच्छी न लगी। नारद जी के चले जाने के बाद उन्होंने ।
* दत्तात्रेय-जन्म । शिवजी से कहा कि तुम अनुसूया पर इस प्रकार से कोप करो कि उसका पातिव्रत्य भ्रष्ट हो जाय । नारद ऋषि पार्वतीजी से यह बात कह कर अपनी माता सावित्री और अपने पिता ब्रह्माजी के पास गए और वहाँ भी अपने माता के सामने अनुसूया की प्रशंसा करने लगे। सावित्री को भी अनुसूया की प्रशंसा अच्छी नहीं मालूम हुई । उन्होंने भी ब्रह्मा से यह आग्रह किया कि किसी प्रकार से अनुसूया का पातिव्रत्य और सच्चरित्रता भ्रष्ट करो। नारद जी ने इसके बाद लक्ष्मी के सामने जाकर यही बात कही और लक्ष्मीजी भी अनुसूया की प्रशंसा न सुन सकीं और उन्होंने भी विष्णु भगवान से कहा कि तुम सावित्री को उनकी इस जगत्- विख्यात सच्चरित्रता से भ्रष्ट कर दो। तीनों देवता अपनी-अपनी स्त्रियों से प्रेरित होकर अत्रिमुनि की कुटी की ओर अनुसूया को उसके धर्म और कीर्ति से भ्रष्ट करने के लिए चले । कुटी के द्वार पर आकर उन्होंने भिक्षा माँगी। अनुसूया भिक्षा लेकर आ गई; किन्तु उन्होंने इसे स्वीकार नहीं किया और कहा कि हम लोग इच्छानुसार भोजन करेगें। अनुसूया इस पर भी राजी हो गई । उनसे कहा कि आप लोग जाकर नदी में स्नान कीजिए और फिर आइए। इतने में मैं भोजन तैयार करती हूँ । ब्रह्मा, विष्णु, महेश जो संन्यासी का रूप धारण करके आए थे, स्नान करने गए और जब लौटे तो उनके लिए भोजन तैयार मिला । जब अनुसूया उनके सामने भोजन का थाल लाई,तो उन्होंने उसे खाने से इन्कार किया और कहा कि जब तक तुम नग्न ३ । ।
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास । होकर हमारे लिए भोजन न परोसोगी तब तक हम लोग भोजन न करेगें । अनुसूया को यह बात सुन कर बहुत घृणा और क्रोध उत्पन्न हुआ; किन्तु जब उसने जरा विचार किया तो उसे देवताओं के इस छल-कपट का पता चल गया । यह अपने पति के पास गई, उनका पैर धोया और उसी जल को लाकर इन देवताओं के ऊपर डाल दिया। इस जल के प्रभाव से ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों दुधमुंहे बच्चे हो गए । तब अनुसूया नग्न हो गई और हरेक को उठा कर उनकी इच्छा भर उन्हें अपना दूध पिलाया और फिर तीनों को पालने में डाल कर डोलाने लगी। जब कई दिन हो गए और ब्रह्मा, विष्णु, महेश तीनों में से कोई भी न लौटा, तो इनकी खियाँ बड़ी चिन्तित हुई और रो-रोकर इधर-उधर अपने-अपने पति को तलाश करने लगीं । स्वर्ग-लोक के चौराहे पर इनसे और नारद से भेंट हो गई। इन्होंने नारद से पूछा-तुमने कहीं हमारे पतियों को देखा है ? नारद को यद्यपि सब हाल मालूम था; किन्तु उन्होंने केवल इतना कह कर टाल दिया कि उस रोज मैं ने उन सबों को अत्रिमुनि के आश्रम की ओर जाते देखा था । सावित्री, लक्ष्मी और पार्वती तीनों अत्रिमुनि के आश्रम पर पहुँची और वहाँ जाकर अनुसूया से पूछा-क्या यहाँ हमारे पति लोग आए थे ? अनुसूया ने उन्हें उस पलने को दिखाया, जहाँ यह तीनों देवता शिशु- अवस्था में पड़े थे और उनसे कहा-यही तुम्हारे पति हैं। अपने- अपने पति को तुम लोग पहचान लो । तीनों बच्चे एक ही समान थे, इसलिए पहिचानना मुश्किल था; किन्तु लक्ष्मीजी ने बहुत SURE ESS Tit
३५
दत्तात्रेय-जन्म
ज्याझ गौर करने के बाद उनमें से जिस एक को विष्णु समझ
कर उठाया, वह महादेव जी निकले, इस पर लक्ष्मी का बड़ा
उपहास हुआ।
यह अवस्था देख कर लक्ष्मी, पार्वती आदि अनुसूया से हाथ
जोड़ कर प्रार्थना करने लगी कि हमें अपने-अपने पति प्रदान
करो। अनुसूया ने इस पर कहा कि चूंकि इन्होंने हमारा दूध
पिया है, इसलिए हमारे बच्चे हो चुके और इन्हें किसी न किसी
रूप में हमारे बालक होकर रहना पड़ेगा। इस पर यह निश्चित
हुआ कि तीनों देवता ही एक संयुक्त-स्वरूप धारण करें, यही
दत्तात्रेय का जन्म था। इसके बाद अनुसूया ने अपने पति के पैर
धोए और वही जल फिर उनके ऊपर डाल दिया। इससे इन
देवताओं ने फिर अपना पुराना रूप धारण कर लिया।
।
-
SANE
।
।
-
reles
।
कामन द्वादशी
--
उसके बल की परीक्षा करने गया था।
त्यराज विरोचना का पुत्र बलि बड़ा प्रतापी
था। वह जैसा ही बलवान था, वैसा ही
युद्ध-विद्या-विशारद था। उससे बड़े-बड़े
राजा-महाराजा-यहाँ तक कि देवता-गरण
भी थर-थर काँपते थे। एक बार रावण
बलि ने अपना कवच उठाने के लिए उससे कहा । रावण न उठा
सका और लजित होकर वहाँ से चला गया। धीरे-धीरे बलि
का प्रताप इतना बढ़ा कि देवताओं को शङ्का होने लगी। उसने
अपने बाहु-बल से कितने ही देवताओं को जीत कर कैद कर
रक्खा था । यह देख बहुत से देवता एकत्र होकर विष्णु भगवान
के पास अपना कष्ट निवेदन करने के लिए गए।
इस समय विष्णु भगवान क्षीर-सागर में शेषनाग पर सोए
हुए थे । देवताओं की स्तुति सुन कर भगवान बोले-आप लोग
चिन्ता न करें। शीघ्र ही बलि का प्रताप नष्ट होगा, उसका गर्व
खर्व हो जायगा।
विष्णु भगवान की बातों से सन्तुष्ट होकर देवता अपने-अपने
।
।
animalkin
३७ वामन द्वादशी दान की स्थान पर लौट आए और भगवान विष्णु की कृपा से बलि के मान- मर्दन की राह देखने लगे। यद्यपि बलि ने देवताओं से कितनी ही बार युद्ध किया था; पर वह वास्तव में बड़ा दानी था। वह जिस समय पूजन करने बैठता, उस समय जो कोई उससे जो कुछ आकर माँगता था, वही पाता था। उसके यह कीर्ति देश-देशान्तर में फैली हुई थी। उसका दान-प्रताप इतना बढ़ा हुआ था कि इन्द्र को भी शङ्का हो गई थी कि कहीं अपने दान-बल से वह मेरे सिंहासन पर अपना अधिकार न जमा ले और देवताओं का भी राजा न बन बैठे। इस भय से इन्द्र भी थरथर काँपा करता था। इसी तरह बहुत दिन हो गए ; पर राजा बलि का कुछ न हुआ । न तो देवता ही उसके बन्धन से मुक्त हुए, न देवराज की शङ्का ही किसी तरह मिटी। यह देख देवताओं ने सोचा कि शायद विष्णु भगवान भूल गए। अतः इस बार बहुत से देवता एकत्र हो, विष्णु भगवान के पास जाकर उनकी नाना प्रकार से स्तुति करने लगे। देवराज इन्द्र ने भी अपनी दुख-कथा कह सुनाई। सुन कर विष्णु भगवान हँस पड़े, और बोले-देवराज, शङ्कित न हों । आपका इन्द्रासन कोई न ले सकेगा । पर, समय आए बिना कोई काम नहीं होता। दैत्यराज बलि कोई साधारण जीव नहीं है। उसको नीचा देखना कोई साधारण काम नहीं है । वह अपूर्व दानी है, तपस्वी है। उसकी तपस्या का फल जब तक नष्ट नहीं होता, तब तक कोई भी उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकता। अतः । ।
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ३८ आप लोग शान्त हों। शीघ्र ही वह समय आएगा, जब आप लोगों की शङ्का दूर हो जायगी । देवी अदिति ने अत्यन्त कठोर तपस्या कर मुझसे वरदान प्राप्त कर लिया है कि मैं पुत्र-रूप में उनके गर्भ में जन्म धारण करूँ । अतः वह समय शीघ्र ही आने वाला है, जब पुण्यात्माओं का दुख दूर करने के लिए मुझे भारत में जन्म ग्रहण करना पड़ेगा। अब आप लोग अपने-अपने स्थान पर जाएँ और निशाङ्क-भाव से, सुख से अपने दिन बिताएँ । देवतागण फिर भी सन्तोष कर अपने-अपने स्थान पर चले गए । इधर यथा समय देवी अदिति गर्भवती हुई और नवें मास में उनके गर्भ से एक पुत्र उत्पन्न हुआ। यह पुत्र पूरा बौना था। उसके हाथ पैर छोटे-छोटे, पर सिर बहुत बड़ा था। इस वामन को देख कर अदिति मन में बड़ी प्रसन्न हुई। उन्होंने समझ लिया कि किसी उद्देश्य से इसी रूप में भगवान ने मेरे घर में जन्म ग्रहण किया है। इधर उसी दिवस दैत्यों में हाहाकार मच गया। इस वामन के जन्म का समाचार सुनकर अत्यन्तू शङ्कित हुए। पुत्र-जन्म का समाचार सुनकर अदिति जैसी प्रसन्न हुई, वैसी ही प्रसन्नता महर्षि कश्यप को भी हुई। भगवान विष्णु को पुत्र- रूप में अपने घर में आया देख उनकी प्रसन्नता का वारापार न रहा। उन्होंने उसी समय अन्यान्य ऋषिगण को निमन्त्रण देकर बुला भेजा, जातिकर्म तथा नामकरण आदि संस्कार किए। इसके बाद यथा समय उनका यज्ञोपवीत-संस्कार भी हुआ। वे
दशी
३९
वामन द्वादशी
उस काल ब्राह्मण-वेश में यज्ञोपवीत, कुशचर्म पहिने हुए वामन
बड़े ही शोभायमान दिखाई देने लगे।
इन दिनों राजा बलि एक यज्ञ कर रहा था। इस यज्ञ-काल
में भी उसका यही नियम था कि जो कोई उससे कुछ माँगता था,
बलि निःसङ्कोच भाव से उसे वह देता था। वामन ने यही अवसर
उपयुक्त जाना और उसके द्वार पर जा पहुँचे
राजा बलि यज्ञ-मण्डप में बैठा हुआ था। अनेक ऋषि-मुनि
तथा ब्राह्मण वहाँ विराजमान थे। दैत्यों के कुल-गुरु शुक्राचार्य भी
उपस्थित थे। इसी समय द्वारपाल ने वामन वेषधारी एक ब्राह्मण
के आगमन की सूचना दी। सुनते ही राजा बलि ने उसे भीतर
बुला भेजा । उसका वह विचित्र वेश देख कर सारी सभा
आश्चर्यचकित हो गई। यद्यपि वामन का वेश विचित्र था, तथापि
उसके चेहरे पर एक अलौकिक तेज झलक रहा था।
वामन का यह वेश देख कर शुक्राचार्य के मन में सन्देह हुआ।
उन्होंने अपनी दिव्य दृष्टि से विचार लिया कि वामन कोई साधारण
पुरुष नहीं है यह अवश्य ही कोई अवतार है । अतः सम्भव है
कि राजा बलि पर कोई आपत्ति आ जाए । इसलिए राजा बलि को
विशेषरूप से उन्होंने सावधान कर दिया।
पर, राजा बलि को उनकी बात पर विश्वास न हुआ। बलि
ने कहा-क्या चिन्ता है ? यह सब धन-वैभव कोई अपने साथ
लेकर नहीं जाता। यदि यह चला ही जायगा, तो मेरा क्या बिगड़
जायगा?
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास शुक्राचार्य ने बहुत कुछ समझाया, पर बलि ने एक न मानी। उसने तुरन्त ही वामन को अपने पास बुला कर कहा-क्या माँगते हो, माँगो! वामन ने कहा-अधिक कुछ नहीं। केवल तीन पग पृथ्वी। यदि इतनी कृपा आप करें तो मैं अपने पढ़ने के लिए एक कुटी बनवा लूँ और उसी में बैठ कर विद्याध्ययन किया करूँ । बलि ने हाथ में कुश और जल उठा लिया, पर शुक्राचार्य दान- मन्त्र कहने के लिए किसी तरह तैयार न हुए। वे बारम्बार राजा बलि को इस तरह पृथ्वी दान करने के लिए निषेध करने लगे। पर, विनाश-काल में बुद्धि भी विपरीत हो जाती है । शुक्राचार्य के लाख मना करने पर भी बलि ने न माना | लाचार शुक्राचार्य को दान-मन्त्र कहना ही पड़ा। बलि ने वामन के इच्छानुसार तीन पग पृथ्वी दान कर दी। यह कार्य समाप्त होते ही वामन ने एक पैर से भूमि, दूसरे से आकाश में अधिकार जमा लिया, और बोले-अब तीसरे पैर का स्थान बताओ। बलि ने अपनी पीठ दिखा दी। इस अद्भुत और आश्चर्यमय कार्य को देख कर सभी विस्मित हो पड़े। चारों ओर दुन्दुभी बजने लगी। सभी साधु-साधु कहने लगे। इसके बाद वामन ने सब दैत्यों को विजय किया और तीनों लोकों पर अधिकार जमा कर बलि से बोले-अब तुम अपने दल-बल सहित पातालपुरी में जाकर स्वच्छन्दतापूर्वक राज्य करो। । । ।
४१
वामन द्वादशी
इस इन्द्र का समय बीतने पर तुम्ही इन्द्रत्व का पद प्राप्त करोगे।
बलि ने भगवान वामन से इतना सुनते ही प्रणाम कर कहा-
आपकी आज्ञा शिरोधार्य है।
इतना कह कर बलि पातालपुरी को चला गया।
श्रीकृष्ण बोले-महाराज युधिष्ठर ! जिस दिवस वामन ने
बलि को छला था, उस दिवस द्वादशी-तिथि थी, इसी लिए इसका
नाम वामन-द्वादशी पड़ा है। भाद्र-मास की शुक्ल-द्वादशी को जो
नियमपूर्वक नदी में स्नान कर यह व्रत करता है और वामन का
पूजन करता है, उसके सब पाप तो छूट ही जाते हैं साथ ही
उसके सब मनोरथ भी उसी तरह पूरे हो जाते हैं, जिस तरह
अदिति और कश्यप के हुए अथवा देवताओं के मनोरथ परिपूर्ण
हुए । इसलिए इस व्रत को अत्यन्त श्रद्धापूर्वक सब किसी को
करना चाहिए।
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धन त्रयोदशी जत्र कृष्ण त्रयोदशी को बङ्गाल में लक्ष्मी-पूजा होती है। इसके सम्बन्ध में यह कथाकही जाती है कि एक समय विष्णु भगवान मृत्युलोक को आ रहे थे, तब लक्ष्मी ने कहा-मुझे भी ले चलो। विष्णु ने सङ्कोच किया और कहा कि अगर तुम मेरी आज्ञा को अक्षरशः मानने की प्रतिज्ञा करो, तो मैं तुम्हें अपने साथ ले चलूँ। लक्ष्मीजी राजी हो गई। मृत्यु- लोक में एक स्थान पर पहुँच कर विष्णु ने लक्ष्मी से कहा कि तुम यहीं ठहर जाओ; किन्तु दक्षिण की ओर न देखना, मैं अभी आता हूँ, यह कह कर विष्णुजी चल दिए । जब वह नजर से गायब हो गए, तब लक्ष्मी के दिल में कौतूहल पैदा हुआ कि आखिर इन्होंने मुझे दक्षिण की ओर देखने से क्यों रोका । लक्ष्मीजी ने विष्णु की आज्ञा का कुछ ख्याल न करके दक्षिण की ओर देखा, तो वहाँ सरसों का खेत फूला हुआ दिखाई दिया। वे उस खेत में गई और उसके फूल तोड़ कर अपने सिर के बालों को खूब अच्छी तरह सँवारा । जब विष्णुजी लौटे, तो उन्होंने लक्ष्मी को इस प्रकार सुशोभित देखा । उन्हें जब यह मालूम हुआ कि लक्ष्मी धन त्रयोदशी ने खेत वाले की बिना आज्ञा लिए ही फूल तोड़ लिए हैं, तो उन्होंने बताया कि इस देश में तो यह कायदा है कि जो इस प्रकार से किसी के धन को ले ले, उसे उसके यहाँ बारह वर्ष तक सेवा करनी पड़ती है। नियम के पालन के लिए लाचार होकर विष्णुजी ने ब्राह्मण का रूप धारण करके और लक्ष्मी जी को ब्राह्मणी का रूप धारण करा के खेत के मालिक से सब हाल कह सुनाया और लक्ष्मी जी को सेवा करने के लिए छोड़ आए, और कह आए कि बारह वर्ष के बाद आकर ले जाऊँगा । लक्ष्मीजी ने ब्राह्मण के यहाँ रहना शुरू किया, तो इन्हें मालूम हुआ कि ब्राह्मण के यहाँ खाने तक को नहीं है। लक्ष्मी ने इस पर उस ब्राह्मणी की एक बहू से कहा कि तुम स्नान करके देवी की पूजा करो और रसोई में जाओ।वहाँ तुम्हें सब कुछ खाने को मिलेगा। ब्राह्मणी की बहू ने ऐसा ही किया और रसोई में जाकर जब देखा तो हर प्रकार का खाना मौजूद पाया। इसी प्रकार लक्ष्मी की सलाह के अनुसार चलने पर इस ब्राह्मण का घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया । ऐसी प्रभाववाली स्त्री से सेवा लेना ब्राह्मणी ने उचित नहीं समझा; किन्तु लक्ष्मी ने कहा कि मैं बिना अपराध की सज़ा काटे हुए न जाऊँगी। चैत्र-कृष्ण त्रयोदशी को लक्ष्मी बारह वर्ष समाप्त हुए । लक्ष्मी को घर के और सब लोग मानते थे; किन्तु एक मझली बहू लक्ष्मी को बहुत सताती थी, इसलिए लक्ष्मी उसके हाथ की कोई चीज नहीं खाती थीं। जो कुछ वह दे जाती थी, उसे अनार के वृक्ष के नीचे गाड़ देती । के . । SH ।
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास थीं। जब चैत्र-कृष्ण त्रयोदशी को लक्ष्मी का बारहवाँ वर्ष समाप्त हुआ और उसी दिन वारुणी पर्व पड़ा, तब ब्राह्मणी सकुटुम्ब गङ्गा-स्नान के लिए जाने लगी। लक्ष्मी को भी साथ ले जाना चाहा; किन्तु लक्ष्मी नहीं गई। उन्होंने केवल चार कौड़ी बड़ी बहू को दी कि गङ्गा में छोड़ देना । ब्राह्मणी की बहू ने जब उन कौड़ियों को गङ्गा में छोड़ा तो उसमें इन कौड़ियों को लेने के लिए चार हाथ निकले। इसको देख कर ब्राह्मणी और उसके कुटुम्ब को पूरा विश्वास हो गया कि हो न हो मेरे यहाँ की दासी जरूर कोई देवी है । जब घर पर आई, तो विष्णु भगवान लक्ष्मी को वापस ले जाने को तैयार मिले । जब लक्ष्मीजी दासता से मुक्त हो गई, तो उन्होंने अपना परिचय दिया और चलते समय कह गई कि तुम अनार के नीचे खोदना, तुम्हें बहुत धन और रत्न मिलेंगे और भाद्रपद, कार्तिक, पूस और चैत्र में लक्ष्मी की पूजा अवश्य करना, इससे तुम्हारे यहाँ धन की कभी कमी न रहेगी। अनार के नीचे ब्राह्मणी और उसकी बहुओं ने जब खोदा, तो सबको तो रुपये-पैसे मिले, किन्तु जो बहू लक्ष्मी को सताती थी उसे साँप मिला; जो उसे काट खाया और वह मर गई। । IN Wealth L Dipak i म । । । । । । R हरतालिका बत या तीज य ह व्रत श्रावण शुक्ल पक्ष में तृतीया को किया जाता है। स्त्रियों के लिए इसे सबसे उत्तम व्रत बताया गया है। इसमें केले के खम्भे गाड़े जाते हैं। चित्र-विचित्र वस्त्रों से मण्डल को आच्छादित किया जाता है और शिव- पार्वती की बालू की मूर्ति स्थापित करके इसकी पूजा की जाती है। इसका फल यह बताया जाता है कि इसको करने वाली स्त्री विधवा नहीं होती। । वर्ष तक हरतालिका-व्रत के अर्थ हैं "हरित, आलिभिः” अर्थात् जिसमें आलि सखियों के साथ पार्वतीजी हरी गई हों। इसके सम्बन्ध में यह कथा कही जाती है कि हिमवान नाम पर्वत पर पार्वतीजी ने बाल्यावस्था में बहुत कठिन तप करना शुरू किया। बारह केवल धुआँ पीकर रहीं और चौंसठ वर्ष तक सूखे पत्ते खाए । पार्वतीजी के इस तप को देख कर उनके पिता बड़े चिन्तित हुए और सोचने लगे कि क्या करना चाहिए। इतने में नारदजी श्रा गए और उन्होंने सलाह दी कि इस कन्या के लिए विष्णु भगवान ४६ । हिन्दू-त्योहारों का इतिहास से बढ़ कर और कोई वर नहीं हो सकता। पार्वतीजी के पिता सहमत हो गए ; किन्तु जब यह समाचार पार्वतीजी ने सुना तो उन्हें बड़ा दुख हुआ। वह बेहोश होकर गिर पड़ीं। उन्होंने अपनी सखी से कहा कि महादेवजी के अलावा मैं किसी और से कदापि विवाह न करूँगी। तब सखियों ने उन्हें सलाह दी कि चलो ऐसी जगह भाग चलें, जहाँ तुम्हारे पिताजी को पता तक न चले। पार्वतीजी को सखियाँ इसके बाद एक ऐसी जगह में ले गई, जहाँ उन्हें कोई ढूँढ न सका । हिमवान ने अपनी कन्या को जब गायब पाया तो तलाश करना शुरू किया। समझा कि शेर या भालू खा गया होगा। इधर पार्वतीजी भागती-भागती एक मनोहर नदी के किनारे पहुंचीं। वहाँ एक गुफा थी। बिना अन्न-जल खाए हुए उसी नदी के किनारे बालू की मूर्ति बना कर पार्वतीजी ने शिवजी का आह्वान शुरू किया। यह श्रावण शुक्ल त्रितीया का दिन था। महादेव जी की समाधि इस ध्यान से भङ्ग हो गई और वह पार्वती जी के सामने आ पहुंचे और पूछने लगे कि क्या चाहती हो ? पार्वतीजी ने कहा कि अगर आप प्रसन्न हैं, तो मेरे साथ विवाह कर लीजिए। शिवजी एवमस्तु कह कर कैलाश पर चले गए। थोड़ी देर बाद जब हिमवान आए और उन्होंने अपनी कन्या को नदी के किनारे सोती हुई देखा, तो पार्वती को गोद में उठा लिया और पूछा तुम यहाँ कैसे चली आई। पार्वती ने कहा कि जब मैं ने सुना कि आप मुझे विष्णु को देने वाले हैं, तो मैं भाग आई, क्योंकि मैं विष्णु के साथ विवाह नहीं करना चाहती। । ।
हरतालिका व्रत या तीज
यदि आप मेरा विवाह महादेवजी के साथ करें, तो मैं घर को
वापस जा सकती हूं, अन्यथा नहीं। हिमवान ने पार्वती की
बातें स्वीकार की और पार्वती का महादेवजी के साथ विवाह
कर दिया।
भविष्योत्तरपुराणा
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।
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सिद्धिविनायक पूजा
মাথায় কী
या
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ह पूजा भादों-कृष्ण की चतुर्थी को की जाती
है। इस तिथि में गणेश जी की पूजा होती
है। गणेश जी के जन्म के सम्बन्ध में यह
य
कथा प्रसिद्ध है कि एक समय महादेव जी
कहीं बाहर चले गए। घर पर केवल पार्वती
जी ही अकेली रह गई। पार्वतीजी ने
स्नान करना चाहा, किन्तु किसी गण को उस स्थान पर मौजूद
न देख कर उन्हें यह चिन्ता हुई कि दरवाजे पर किसे बिठाऊँ
क्योंकि भय यह था कि कहीं उनके स्नान के करते समय ही कोई
आदमी या शिवजी स्वयं मकान में न आ जाएँ । इसलिए उन्होंने
अपने शरीर की मिट्टी से एक पुतला बना कर दरवाजे पर बिठा
दिया और स्वयं नहाने चली गई। थोड़ी देर में शिवजी बाहर
से वापस आए । जब मकान में घुसने लगें, तो मिट्टी के इस पुतले
ने उनको जाने से रोका। शिवजी को इस पर क्रोध आया। उन्होंने
इसका सिर काट डाला और अन्दर चले गए। शिवजी को आते
हुए देख पार्वती को विस्मय हुआ। उन्होंने पूछा कि तुम कैसे चले
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Masala
गणेश चतुर्थी आए ? क्या चौकीदार ने तुम्हें दरवाजे पर नहीं रोका ? शिव जी ने पूरा किस्सा कह सुनाया। जब पार्वती जी ने सुना कि उनका चौकीदार मार डाला गया, तो वह रोने लगी और उन्होंने कहा कि जब तक मिट्टी का यह पुतला, जो मेरे पुत्र के समान है फिर से जीवित नहीं होता, मैं शान्त न हूँगी। शिव जी को मजबूर होकर उसे जीवित करने का उद्योग करना पड़ा; किन्तु अभाग्यवश इतनी देर में इसका असली सिर कहीं गायब हो गया। बहुत तलाश करने के बाद जब सर न मिला, तो मजबूरन शिव जी ने हाथी का सिर उसमें जोड़ दिया। गणेश जी की उत्पत्ति इस प्रकार हुई । गणेश जी मङ्गल करने वाले और हर एक काम को सिद्ध करने वाले कहे जाते हैं। भाद्रपद की कृष्ण चतुर्थी को इनकी सुवर्ण की मूर्ति और दो-चार और चीजें दान में दी जाती हैं। इस व्रत का उपदेश स्कन्धपुराण के अनुसार कृष्ण जी ने कुरुक्षेत्र में युधिष्ठिर को किया था और इसी व्रत के प्रभाव से कौरवों पर विजय पाने की आशा दिलाई थी। कृष्ण जी ने कहा था-इस व्रत के करने से गणेश जी बहुत प्रसन्न •होते हैं। pathetrailer स्कन्धपुराण के अनुसार इस व्रत को पहले-पहल कृष्ण जी ने स्वयं उस समय किया था जब कि उन पर स्यमन्तक मणि के चुराने का दोष लगा था। स्यमन्तक मणि चुराने का किस्सा यह है कि द्वारकापुरी में अग्रसेन नाम का एक यादव रहता था। उसके दो पुत्र थे सत्रजित और प्रसेन । सत्रजित ने सूर्य देवता की बड़ी स्तुति और तपस्या की। सूर्य देवता ने प्रसन्न होकर सत्रजित को हिन्दू-त्योहारों का इतिहास स्यमन्तक नाम की मणि दी और कहा कि यह मणि अमूल्य । प्रत्येक प्रातःकाल इसके वजन से अठगुना सोना इसमें से निकलता है। किन्तु जो पवित्र है वही इसे धारण कर सकता है। अगर कोई अपवित्र आदमी इसे छुएगा, तो तुरन्त मृत्यु हो जायगी। सत्रजित यह मणि लेकर द्वारका आया। द्वारकानिवासी इस मणि को देख कर आश्चर्य से मुग्ध हो गए। उन्होंने उसके प्रकाश को देख कर समझा कि शायद यह सूर्य ही है । जब इस मणि को पहन कर सत्रजित कृष्ण से मिलने गया, तो कृष्ण बहुत प्रसन्न हुए, और उन्होंने कहा कि अगर ऐसा ही मणि मुझे मिल जाता, तो बहुत अच्छा था। कृष्ण के इन विचारों को सुन कर सत्रजित. को यह भय हुआ कि कहीं ये मुझसे यह मणि जबरदस्ती.न. छीन लें। इस भय से उसने इस मणि को अपने भाई प्रसेन को दे दिया और उसे खबरदार कर दिया कि मनसा, वाचा, कर्मणा से पवित्र रहना, नहीं तो यह मणि तुम्हारे नाश का कारण हो जायगा। एक दिन प्रसेन और कृष्ण शिकार को गए; किन्तु कृष्ण तो लौट आए और प्रसेन वापिस नहीं आया । सत्रजित ने कहना शुरू। किया कि कृष्ण ने मेरे भाई को मार डाला और मणि ले लिया। द्वारकानिवासी भी सन्देहपूर्ण बातें करने लगे। कृष्ण को जब। यह पता चला कि उनकी बदनामी हो रही है, तो उन्होंने यह निश्चय, किया कि जङ्गल में जाकर देखें कि मणि क्या हुआ ?
भी । गणेश चतुर्थी कृष्ण और कुछ सिपाही मणि की तलाश में जङ्गल की ओर चल पड़े। थोड़ी दूर जाने के बाद देखते क्या हैं कि प्रसेन और उसका घोड़ा मरा पड़ा है। देखने से यह मालूम हुआ कि किसी शेर ने उसे मार डाला है। शेर के पैरों के चिह्न देखते- देखते यह लोग आगे बढ़े। थोड़ी देर के बाद इन्हें शेर मरा हुआ मिला; किन्तु मणि उसके पास भी नहीं था। गौर से देखने पर मालूम हुआ कि रीछ और शेर से लड़ाई हुई है, इसलिए रीछ के पैरों के चिह्न देखते-देखते यह लोग आगे बढ़े। अन्त में इन्हें एक गुफा मिली, जो बिल्कुल अँधेरी थी। कृष्ण ने अपने साथियों को तो के द्वार पर छोड़ा और स्वयं उसके अन्दर गए । यह, गुफा आठ सौ मील लम्बी थी। चलते-चलते जब गुफा के अन्त में पहुँचे, तो उन्हें एक महल दिखाई दिया। यहाँ उन्होंने देखा कि एक लड़का पालने पर लेटा है और मणि पालने में इस लड़के के खिलाने के लिए लटकाया हुआ है। वहीं एक सुन्दरी कन्या भी बैठी है, जो लड़के को पालने पर डोला रही है। कृष्ण और कन्या की आँखें दो-चार होते ही एक-दूसरे पर मोहित हो गए । कन्या ने कृष्ण से कहा कि तुम अगर मणि के लिए आए हो, तो मणि लेकर भाग जाओ, शोर न मचाओ; क्योंकि अगर मेरा पिता जामवन्त जगेगा, तो तुम्हें मार ही डालेगा। कृष्ण ने इसकी परवाह न की; बल्कि अपना शङ्ख जोरों से बजाया। जामवन्त जाग पड़ा और आपस में लड़ाई आरम्भ हो गई। गुफा के द्वार पर बैठे हुए लोगों को इन्तजार करते-करते जब MARAT हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ५२ बहुत दिन हो गए, तो उन्होंने यह समझा कि कृष्ण मार डाले गए। यह लोग द्वारका वापस आए और कृष्ण का क्रिया-कर्म करने लगे। जामवन्त और कृष्ण में इक्कीस दिन तक लड़ाई होतीरही । अन्त में जामवन्त को कृष्ण ने हरा दिया।जामवन्त ने प्रसन्न होकर अपनी कन्या और दायज में वही मणि कृष्ण को भेंट किया । कृष्ण जामवन्ती और मणि को लेकर द्वारकापुरी वापस आए और यादवों की सभा करके उसमें उन्होंने सारा हाल कह सुनाया। मणि सत्रजित को वापस दे दिया। सत्रजित ने कृष्ण कीजो बदनामी की थी, उस पर उसे बहुत पश्चात्ताप हुआ । उसने अपनी कन्या सत्यभामा का कृष्ण के साथ विवाह कर दिया और कृष्ण तथा सत्रजित मित्रता से रहने लगे। स्यमन्तक मणि जब फिर सत्रजित के पास आया, तो शतधन्व और अकर ने इस पर अपने दाँत लगाए। सत्रजित को मार कर इस मणि को छीन लेने की तरकीबें सोचने लगे। एक दिन जब कि श्रीकृष्ण जी हस्तिनापुर में थे और सत्यभामा अपने पिता के घर में थी, इन दोनों ने आकर सत्रजित को मार डाला और मणि लेकर चम्पत हुए। सत्यभामा ने अपने पिता की मृत्यु और स्यमन्तक मणि की चोरी का किस्सा कृष्ण से कहा। कृष्ण और बलराम दोनों शतधन्व को मारने के लिए चले । शतधन्व ने जब यह किस्सा सुना, तो उसने ।
। ५३ गणेश चतुर्थी मणि अकर को दे दिया । वह उसे लेकर बनारस भाग गया और स्वयं दक्षिण को रवाना हो गया । कृष्ण ने शतधन्व का पीछा किया और उसे मार डाला; किन्तु मणि नहीं मिला। जब कृष्ण बिना मरिण के वापस आए, तो प्रजा को और बलराम जी को भी यह शङ्का हो गई कि कृष्ण ने मणि अपने पास रख लिया है । कृष्ण को यह समाचार सुनकर बड़ा खेद हुआ। यह चिन्ता में बैठे हुए थे कि नारद जी आए । उनसे उन्होंने पूरा हाल कहा । तब नारद जी ने उन्हें बताया कि आपने भादों की कृष्ण चौथ को चन्द्रमा देखा है, इस कारण आप पर इस प्रकार कलङ्क लग रहे हैं । आप गणेश जी की विधिवत् पूजा कीजिए, इससे आपकी बदनामी दूर हो जायगी। कृष्ण ने नारद से पूछा कि भादों की चौथ को चन्द्रमा देख लेने से कलङ्क क्यों लगता है ? नारद ने कहा कि एक समय गणेश जी लड्डू हाथ में लिए हुए स्वर्ग जा रहे थे। रास्ते में चन्द्रलोक पड़ा। यहाँ पहुँचे तो ठोकर खा- कर गिर पड़े। इस पर चन्द्रमा हँस पड़ा। गणेश जी को क्रोध आया, उन्होंने उसे यह शाप दे दिया कि जो तेरा मुँह भी देखेगा कलङ्की कहलाएगा। चन्द्रमा यह शाप सुनकर पश्चात्ताप से कमल- सम्पुट में अपना मुँह छिपा कर बैठ गया। चन्द्रमा के अभाव से देवताओं में खलबली मच गई। सबों ने जाकर ब्रह्मा से स्थिति बताई । ब्रह्मा ने कहा कि गणेश की स्तुति के अतिरिक्त चन्द्रमा को इस कलङ्क और शाप को मिटाने का कोई मार्ग नहीं है। ब्रह्मा ने यह भी बताया कि पूजा कैसे होगी । वृहस्पति ने गणेश-पूजाविधि
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हिन्दू-त्योहारों का इतिहास
चन्द्रमा को बताई । चन्द्रमाने गणेश की पूजा की। गणेश जी. प्रसन्न
हुए । अपना पूरा शाप तो इन्होंने वापस नहीं लिया; किन्तु इसका
प्रभाव परिमित कर दिया और अपना अन्तिम शाप यह निश्चित
किया कि जो केवल एक रोज, अर्थात् भादों की कृष्ण चौथ को
चन्द्रमा का मुख देखेगा वही कलङ्कित होगा।
उन्होंने इस कलङ्क को मिटाने का भी उपाय बता दिया कि
कृष्णपक्ष भादों की चतुर्थी को गणेश की पूजा करने से कलङ्क दूर
हो जाता है।
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नागपञ्चमी वन महीने की शुक्लपक्ष की पञ्चमी नाग- पञ्चमी कहलाती है। इस पञ्चमी को नाग सा की पूजा की जाती है। इस दिन दरवाजे के दोनों तरफ़ गोबर से नागों का चित्र खींचा जाता है । जल, दूध और घी से इनका स्नान कराया जाता है और गेहूँ, दूब, धान की खील, दही, दूध आदि से इनका पूजन किया जाता है। अगर कहीं साँप की भीट होती है, तो वहाँ उनका दूध, चावल आदि से पूजा-सत्कार किया जाता है। काले रङ्ग के सर्प की विशेष पूजा लिखी है। इस पूजन का फल यह लिखा है कि इसके करने से सप्तकुल पर्यन्त साँप से भय नहीं रहता। एक विशेष मन्त्र के भय से सर्प के विष से आदमी बच जाता है। इसके बारे में दो कथाएँ कही जाती हैं। किसी ब्राह्मण के सात बहुएँ थीं। छः के तो नैहर था; किन्तु जो सबसे छोटी थी उसके नैहर' में कोई नहीं था । जब सावन का महीना आया, तो सब बहुओं को तो उनके नैहर वाले आकर ले गए; किन्तु सातवीं के कोई था ही नहीं। उसने कहा कि शेषनाग के अलावा हमारा और R हिन्दू-त्योहारों का इतिहास कौन है । शेषनाग को इस स्त्री की इस करुणापूर्ण दशा पर बहुत दया आई, इसलिए उन्होंने एक वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण किया और उक्त ब्राह्मण के यहाँ जाकर कहा कि तुम्हारी कनिष्ठ बहू मेरी भतीजी है, उसे तुम मुझे विदा कर दो। ब्राह्मण ने इन्हें कभी देखा तक नहीं था, इसलिए बड़ा आश्चर्य हुआ । ब्राह्मण ने अपनी बहू से इसके बारे में पूछा । यह विचारी ससुराल में रहते-रहते इतनी दुखी हो गई थी कि इसने कहा-हाँ, मैं जानती हूँ। शेषनाग इस तरह से ब्राह्मण का रूप धारण करके इस बधू को विदा करा लाए, थोड़ी दूर चल कर जब यह किसी बिल के पास पहुंचे, तो अपना असली नाग-रूप धारण कर लिया। लड़की को परेशानी तो हुई; किन्तु समझाने पर शेषनाग के फण पर सवार होकर नागलोक को चल दी । नागलोक में जाकर यह लड़की रहने लगी। शेषनाग ने और नागों से यह कह दिया था कि कोई इसे न काटे, इसलिए यह मजे में शेषनाग के यहाँ रहा करती थी। एक दफ़ा ऐसा हुआ कि शेषनाग के यहाँ बच्चे पैदा हुए । छोटे-छोटे बच्चे जमीन पर रेंगने लगे। उन्हें देखकर यह घबड़ाई । इसलिए शेषनाग की स्त्री . ने इस लड़की से हाथ में पीतल का चिरारा लटकाए रहो, इससे तुम्हें भय न होगा। इसके हाथ से चिराग़ गिर गया जिससे कई साँपों की पूछे कट गई। मामला उस समय रफा- दफा कर दिया गया । थोड़े दिन रह कर यह फिर अपनी ससुराल चली आई। श्रावण की पञ्चमी को इसे अपने नाग भाई याद आए। इसने एक पाटी पर नाग की तसवीर बना कर उनकी पूजा कहा कि तुम अपने SMS Help TES हिन्याहारा का इतिहास नागपञ्चमी की और परमात्मा से प्रार्थना करने लगी कि वह नाग भाइयों को प्रसन्न और जीवित रक्खे । उधर श्रावण-पञ्चमी को शेषनाग के पुंछकटे लड़कों ने अपनी माता से अपनी पूँछ के नाश होने का कारण पूछा । माता ने पूरा किस्सा बता दिया । नागों को बड़ा क्रोध आया और वे इससे बदला लेने के लिए इसके घर पर आए। सौभाग्यवश जिस समय यह नाग लोग इसके घर पर पहुंचे, उसी समय यह लड़की नाग भाइयों के कुशल-क्षेम की प्रार्थना कर रही थी। इस बात को देख कर क्रुद्ध नागों का दिल पसीज गया और वे बहुत प्रसन्न हुए । इसने अपने नाग भाइयों को दूध-चावल खाने को दिया । चलते समय वे लोग इसके लिए एक मणिमाला छोड़. गए, जिसके प्रभाव से यह आनन्दपूर्वक रहने लगी। दूसरी कथा एक किसान खेत जोत रहा था । अकस्मात् उसके हर का फार किसी साँप के बिल में धंस गया, जिससे उस बिल में जितने साँप थे मर गए। थोड़ी देर में जब उन साँपों की माँ वापस आई, तो अपने बच्चों को मरा पाकर उसने किसान के सारे कुटुम्ब को काट लिया; किन्तु उसका क्रोध शान्त नहीं हुआ । उसे यह मालूम हुआ कि इस किसान के एक कन्या है; अतः उसे मारने के लिए यह उसके घर को चली। जब नागिन इसके घर पहुँची, तो वह शेषनाग की पूजा कर रही थी। थोड़ी दूर पर चन्दन, अक्षत और दूध रखा हुआ था। नागिन ने चन्दन अपने शरीर में लगाया * हिन्दू-त्योहारों का इतिहास और दूध-चावल पान किया । तबियत ठण्डी हुई और अपनी इस प्रकार पूजा-सत्कार देख कर नागिन लड़की से विशष रूप से खुश हो गई । जब लड़की ने ध्यान के पश्चात् अपनी आँखें खोली, तो उसे अपने कुटुम्ब के नाश का समाचार मिला। लड़की को बड़ा दुख हुआ। उसने नागिन से प्रार्थना की कि उसके कुटुम्ब को जिला दे नागिन प्रसन्न थी ही; उसने अमृत दिया, जिसको पिला कर इस लड़की ने अपने सारे कुटुम्ब को फिर से जिला दिया। कहते हैं कि उस समय से श्रावण-पञ्चमी को हल चलाना मना कर दिया गया है और किसी को शाक-पात काटने की इजाजत नहीं है, उसी समय से नागों की पूजा भी शुरू हुई है।
कापलiari
थे। एक दिन ये गङ्गा में स्नान कर रहे थे,
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कपिला षष्टी
ह त्योहार साठ वर्ष में एक दफ़ा पड़ता है।
कहते हैं, इस दिन नारदी को नारद का
रूप मिला था। नारद मुनि बाल-ब्रह्मचारी
काँचल
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वहाँ पर इन्होंने दो मछलियों को आपस
में क्रीड़ा करते देखा । यह देख कर इन्हें
गृहस्थ जीवन में रहने की इच्छा पैदा हुई । इन्होंने चाहा कि कहीं
विवाह हो जाय तो अच्छा हो; किन्तु इनके पास रुपया-पैसा तोथा
नहीं, कन्या का मिलना इन्हें असम्भव सा ही मालूम होने लगा।
इन्होंने अपने दिल में सोचा कि चलो कृष्ण के पास चलें । उनके
सोलह हजार एक सौ आठ रानियाँ हैं, अगर वह उनमें से एक रानी भी
दे डालेंगे, तो उन्हें दिक्कत भीन होगी और मेरा काम चल जायगा।
यह विचार कर नारद द्वारकापुरी चले। वहाँ पहुँच कर उन्होंने
कृष्ण से कहा कि आपके पास जरूरत से ज्यादा रानियाँ हैं,
आप इतनी रानियों के पास जा भी न सकते होंगे; इसलिए हमें
कम से कम एक रानी दे दीजिए। कृष्ण जी ने कहा कि जाओ
और जहाँ तुम देखो कि मैं न होऊँ, उस घर की स्त्री ले जाओ।
नारद ने सारा रनवास छान डाला। उन्हें एक भी ऐसा स्थान
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ६० न मिला, जहाँ कृष्ण जी न हों। निराश होकर वे वापस आ रहे थे कि सन्ध्या का समय आ गया, जप-वन्दना आदि करने के लिए यह गङ्गा के किनारे चले; किन्तु मन में विवाह करने का ही विचार मौज मार रहा था। जैसे-तैसे गङ्गा के किनारे पहुँचे। स्नान करने के लिए नदी में उतरे; लेकिन मन में यही सोच रहे थे कि कृष्ण के पास जाकर एक स्त्री माँगनी है। नारद इन विचारों में डूबे हुए थे और स्नान कर रहे थे; किन्तु इन्होंने ज्योंही दूसरा गोता लगाया और उठे तो स्वयं ही पुरुष से वह स्त्री हो गए- नारद से नारदी बन गए। आश्चर्य और विस्मय से परेशान ज्योंही यह बाहर निकले, इन्हें एक संन्यासी मिल गया। वह इन्हें पकड़ ले गया और इनके साथ उसने जबरदस्ती विवाह कर लिया। साठ वर्ष तक यह संन्यासी नारदी के साथ रहा। साठ वर्ष में नारदी के साठ लड़के * पैदा हुए। लड़कों की सेवा-सुश्रूषा से दुखित नारदी को गृहस्थ जीवन से बड़ा दुख हुआ और यह * नारदी के साठ पुत्र:- प्रभव; विभव; शुक्ल, प्रमोद प्रजापति; श्राड्डीरा; श्रीमुख; मव; युव; धत; ईश्वर; बहुधान्य; प्रमाथी; विक्रम; वृष, चित्रभानुः सुभानु; तारण; प्रार्तिव; व्याय; सर्वजित; सर्वधारी; विरुधि; विकृति; खर; नन्दन; विजय; जय; मनमथ; दुरमुख; हेमलम्बी; विलम्बी; विकारी; शरवरी; प्रव; शुभकृत; शुभान; कुधि; विश्ववासु विरुधिकत; परिधावी; प्रमादी; अनन्द, राक्षस, नल; पिगल; कलयुक्ल, सिद्धार्थी; रौद्र; दुरमति, दुन्दुभि; रुधिरोदगामी; रक्तखि कुधन; चय; आदि। । ।
६१ कपिला षष्ठी भगवान से प्रार्थना करने लगी कि इस महान दुख से निवारण करो। विष्णु भगवान ने दर्शन दिया और नारद हृदय में गृहस्थ बनने की जो अभिलाषा पैदा हुई थी, उसकी असत्यता का उपदेश दिया। इतने में उनके साठों लड़के इकट्ठे हो गए और चिल्लाने लगे। कोई खाना माँगने लगा, कोई पानी । नारदी ने विष्णु भगवान से प्रार्थना की कि इन बच्चों को चुप कीजिए। विष्णु ने इन बच्चों को क्रमानुसार एक-एक वर्ष का राज्य दिया और नारदी को फिर नारद बना दिया। हर एक साल पर इन ६० बच्चों में से एक न एक का अधिकार होता है और कपिला षष्ठी के बाद फिर नए सिरे से क्रम प्रारम्भ होता है। शतिला षष्ठी माघ शुक्ल छठी को यह त्योहार मनाया जाता है। इसके • सम्बन्ध में यह कथा कही जाती है कि एक ब्राह्मण था, जिसके एक स्त्री, एक पुत्र और एक पुत्रवधू थी। ब्राह्मण के कोई पौत्र नहीं था, इसलिए ब्राह्मण और उसके सारे कुटुम्ब ने साल भर तक बराबर छठी की स्तुति की, जिसके प्रभाव से उसकी पुत्रवधू गर्भवती हुई; किन्तु साल भर से ज्यादा गर्भवती हुए हो गया और कोई बच्चा न पैदा हुआ। एक दिन उसकी बधू नदी पर स्नान करने आई और वहाँ अकस्मात् फिसल कर गिर गई, हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ६२ जिससे उसके पेट से कुम्हड़े के बराबर एक थैला निकल पड़ा। बहू ने घर आकर अपनी सास से पूरा हाल कह सुनाया । ब्राह्मण उस थैले को घर ले गया और वहाँ खोल कर देखा, तो मालूम हुआ कि उसके अन्दर साठ बच्चे थे। ब्राह्मण ने इन्हें पालना प्रारम्भ किया । जब यह विवाह करने योग्य हुए, तो इनकी माता ने यह प्रण कर लिया कि इनका विवाह उसी के यहाँ होगा जिसके साठ कन्याएँ होंगी। बुड्डा ब्राह्मण इस प्रण को सुन कर ऐसे आदमी की तलाश में निकला । भाग्यवश इसे थोड़ी दूर चल कर एक ऐसा कुटुम्ब मिल गया जिसके यहाँ साठ कन्याएँ थीं; किन्तु वह दायज के कारण इनका विवाह करने में असमर्थ था। अन्त में विवाह हो गया। जब कन्याएँ बहू होकर अपने ससुराल आई, तो एक दफ़ा शीतला षष्ठी पड़ी। इस रोज विशेष रूप से ठण्डी पड़ रही थी। ब्राह्मणी ठण्डे पानी से जाड़े के मारे नहाना नहीं चाहती थी, इसलिए उसने अपनी पौत्रबधुओं से कहा कि पानी गरम कर दो। यह बात शीतला षष्ठी के दिन वर्जित है। फिर उसने कहा कि हमारे लिए चावल बना दो। यह भी निषिद्ध है, इसलिए पौत्रबधुओं ने कुछ इन्कार किया, तब बुड्डी ब्राह्मणी बहुत नाराज़ हुई। क्रोध के डर से पौत्रबधुओं ने उसकी आज्ञा का पालन किया । परिणाम यह हुआ कि दूसरे दिन उसका सारा कुटुम्ब, उसकी गाएँ इत्यादि मरी हुई मिलीं। ब्राह्मणी ने विलाप करना प्रारम्भ किया। थोड़ी देर पश्चात् षष्ठी देवी ब्राह्मणी का रूप धर कर आई और कहने लगी कि अपने कुटुम्ब के हर एक । । । MES । ।
६३ शीतला षष्ठी व्यक्ति पर भात लगा कर उसे गरम पानी से नहला दो, जसा तुमने स्वयं कल किया था। ऐसा करने से सब फिर जीवित हो जायेंगे। इस बात को सुन कर ब्राह्मणी को बड़ा पश्चात्ताप हुआ। फिर षष्ठी देवी ने कहा कि शीतला षष्ठी को दही और इमली मिला कर कुत्ते को टीका देना और यही अपने कुटुम्ब के हर एक व्यक्ति के साथ करना । बच्चों के हाथ में इमली ( Turmeric ) बाँधना । यह कह कर ब्राह्मणी अन्तर्धान हो गई। बुढ़िया ने वैसा ही किया और सब लोग फिर जिन्दा हो गए। उसी समय से यह पजा प्रारम्भ हुई । बङ्गाल और पूर्वीय भारत में इसका प्रचार है । ।
गङ्गा सप्तमी
शाख शुक्ल सप्तमी को गङ्गा जी की पैदाइश का
दिन माना गया है। कहते हैं कि इस दिन
राजा जह्न ने क्रोध से गङ्गाजी को पान कर लिया
था, फिर दाहिने कान के रन्ध्र से इन्हें निकाल
दिया था।
-ब्रह्मपुराण
शीतला सप्तमी
श्रावण शुक्लपक्ष में सप्तमी के दिन शीतलादेवी की पूजन का •
दिन है। शीतलादेवी के व्रत का वर्णन इस प्रकार किया गया है
कि इनकी सवारी गदहे की है, इनके एक हाथ में झाडू है और
दूसरे हाथ में कलश; सर इनका सूप से अलंकृत है। इनकी
सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए बताई गई है। इसका फल यह बताया
गया है कि इससे वैधव्य और दरिद्रता नहीं आती। स्त्री पुत्र-पौत्रादि
से परिपूर्ण होती है । इसके सम्बन्ध में भविष्योत्तर पुराण में यह
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शीतला सप्तमी
कथा बयान की गई है कि एक राजा की कन्या अपने पति के साथ
अपनी ससुराल जा रही थी। रास्ते में उसके पति को सर्प ने डस
लिया। कन्या उसी वन में विलाप करने लगी। इस पर
एक वृद्धा स्त्री ने उसके पास आकर उसको शीतला की पूजा करने
की सलाह दी और उसने यह भी बताया कि एक मरतबा उसका भी
पति साँप के काटने से मर गया था; किन्तु शीतला के व्रत से उसका
वैधव्य जाता रहा । राजकन्या ने उसकी सलाह मान ली और
उसका पति जीवित हो गया।
५
S
कृष्णा-जन्माष्टमी
द्रपद कृष्णाअष्टमी को होती है। श्रीकृष्ण जी
का जन्म इसी दिन का माना जाता है। कंस
भा
को आकाशवाणी द्वारा यह मालूम हुआ
था कि उसका भानजा उसकी मृत्यु का
कारण होगा। इसलिए जब वसुदेव के
साथ उसने अपनी बहिन देवकी की
शादी की, उसी समय उसने यह विचार
किया था कि देवकी को ही मार डालूँ, किन्तु वसुदेव के समझाने
पर वह इस बात पर राजी हो गया कि उनके बच्चों को मार
डाला करें और देवकी को छोड़ दें। इसीशर्त पर कंस ने देवकी और
वसुदेव दोनों को कैद कर लिया। उसे जब यह भी मालूम हो
गया कि देवकी का आठवाँ बच्चा उसका प्राणनाशक होगा, तो उसे
सन्देह हुआ कि आठवें से न जाने कौन से मतलब हो, ज्येष्ठ से
आठवाँ गिना जायगा या कनिष्ठ से, इसलिए उसने सब बच्चों को
मारना शुरू किया । जब कृष्ण का जन्म हुआ तब कैदखाने
।
कृष्ण जन्माष्टमी के सब दरवाजे खुल गए, सिपाही लोग सो गए और वसुदेव कृष्ण जी को लेकर नन्द जी के यहाँ पहुँचा पाए । कृष्ण ब्रज में कैसे रहे, कंस को उन्होंने कैसे मारा, महाभारत में उन्होंने क्या-क्या किया, इसे अधिकांश हिन्दू जानते हैं। इन्हीं के जन्म के उपलक्ष में कृष्ण- जन्माष्टमी मनाई जाती है। - -- l सत्यविनायक to शाख पूर्णिमा को गणेश जी की पूजा सत्य- विनायक के नाम से की जाती है। सत्यविनायक का दूसरा नाम "ओ३म" है । इनसे ही सारे संसार की उत्पत्ति मालूम होती है । ब्रह्मा ने नारद से इस व्रत के बहुत ज्यादा माहात्म्य बताए हैं। ब्रह्माण्डपुराण में लिखा है कि दरिद्र सुदामा जब अपनी दरिद्रता से बहुत दुखी हो गए तो उनकी स्त्री ने कहा कि जाकर अपने मित्र कृष्ण- चन्द्र से कुछ माँग लाओ । नियम के अनुसार मेहमान को अपने साथ कुछ ले जाना चाहिए । सुदामा के घर में तो कुछ था नहीं, उनकी स्त्री पड़ोस से दो तीन मुट्ठी भुने चावल माँग लाई और उसे लेकर सुदामा द्वारकापुरी को सिधारे । कृष्णचन्द्र ने इनका बहुत आदर-सत्कार के साथ स्वागत किया और इनसे पूछा कि तुम हमारे लिए कुछ लाए भी हो । सुदामा कुछ हिचकिचा ही रहे थे कि कृष्ण जी ने इनके बग़ल से चावल की पोटली छीन ली और भुने चावल खाना शुरू कर दिया। फिर कृष्ण जी ने सुदामा से पूछा कि तुम कैसे रहते हो, बाल-बच्चों का पालन-पोषण कैसे करते हो। सुदामा ने लज्जा के कारण कुछ विशेष उत्तर न दिया। केवल इतना कहा कि ।
हिन्दू त्योहा का शवास ६९ सत्यविनायक बिना भिक्षा माँगे ही गुज़र होती जाती है। कृष्ण को सुदामा की दरिद्रता तो मालूम ही थी, इसलिए उन्होंने इन्हें सत्यविनायक-व्रत करने को कहा और इसी व्रत के प्रभाव से सुदामा का घर धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया। इसी प्रकार की ब्राह्मणपुराण में मरिम वैश्य और चित्रभानु मन्त्री की भी कथा बयान की गई है जो इस व्रत के प्रताप से दरिद्र से धनी हो गए हैं। और जिन्होंने इसका अपमान किया है वह निर्धन और कुष्ठी हो गए हैं।
शिवरात्रि
ल्गुन कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को यह
फा
व्रत किया जाता है । इस व्रत में
उपवास, जागरण और शिव-लिङ्ग-पूजन
होता है।
इसके माहात्म्य के सम्बन्ध में यह कथा
कही जाती है कि म्लेछदेश में एक मांसा
हारी निषाद रहता था। गोह के चमड़े का
दस्ताना पहनकर वाणों से वह जानवरों को माराकरता था और यही
उसको जीविका थी। फाल्गुन कृष्ण की चतुर्दशी के दिन वह शिकार
खेलने के लिए अपने घर से निकला । दैववशात् वह एक जगह दिन
में कैद कर लिया गया, किन्तु सायङ्काल को छोड़ दिया गया। दिन
भर बिना खाए रहा था, इसलिए सायङ्काल को क्षुधा से पीड़ित
था। वह अपने घर भी न जा सका, क्योंकि घर पर भी कुछ खाने की
सामग्री नहीं थी। इसलिए वह शिकार की तलाश में बन की ओर
चला । वहाँ पर उसने एक स्थान देखा जहाँ एक सुन्दर-सा तालाब
था और जहाँ रात्रि के समय मृग पानी पीने के लिए आया
करते थे। उसी तालाब के किनारे एक शिव का मन्दिर भी था
जिसके ऊपर बेल का वृक्ष लगा था। इसी मन्दिर में बेल के पेड़
।
विनि शिवशति ७१ शिवरात्रि । - की आड़ में यह निषाद बैठ गया और मृगों की बाट देखने लगा। उसे बैठे-बैठे एक पहर रात बीत गई, किन्तु कोई। मृग न आया। वह निराश मन सोच ही रहा था कि उसे जवान सुरूपा मोटे स्तनों से युक्त, चञ्चल नेत्रों से चारों दिशाओं को देखती, एक मृगी आती हुई दिखाई दी। तब उस व्याध ने उसके मारने की तैयारी की । बेल-पत्र तोड़कर शिव पर चढ़ाया और उनका ध्यान करके मृगी को मारने के लिए वाण खींचा। मृगी व्याध को यम के समान समझकर बोली-हे व्याध! तुम मुझे क्यों मारते हो ? व्याध ने कहा कि मैं और मेरे कुटुम्बी प्रातःकाल से भूखे हैं । भूख से उनकी बुरी हालत है, इसलिए मैं तुम्हें मार कर खाना चाहता हूँ। किन्तु, मृगी को मनुष्य की बोली बोलते देख कर उसे आश्चर्य हुआ और उसने पूछा-हे मृगी! तुम कौन हो और मनुष्यों की भाषा कैसे बोल लेती हो ? मृगी ने उत्तर दिया कि पूर्व जन्म में मैं स्वर्ग में इन्द्र की एक सुन्दरी अप्सरा थी, यौवनावस्था में मैं ने हिरण्याक्ष महासुर से अपना विवाह कर लिया था। महादेव जी मेरा नाच रोजाना देखा करते थे। एक दिन ऐसा हुआ कि हिरण्याक्ष से बातें करते-करते मुझे देर हो गई और मैं समय पर शिव जी के यहाँ नाचने को न पहुँच सकी । इस पर शिव जी ने क्रोधित होकर मुझे शाप दे दिया कि जा तू मृगी और हिरण्याक्ष मृग हो । फिर कुछ दयालु होकर शिव जी ने शाप की अवधि बारह वर्ष की कर दी और कहा कि जब तुम दोनों को परस्पर शोक होगा तो तुम्हारे शाप का अन्त होगा। उसी ७२ । हिन्दू-त्योहारों का इतिहास समय से मैं इस वन में घूम रही हूँ। तुम मुझे न मारो, क्योंकि एक तो मेरे पेट में बच्चा है, दूसरे दुख से मांस और चरबी सूख गई है । मैं तुम्हारे खाने के योग्य न हूँगी। हाँ, अभी थोड़ी देर में यहाँ दूसरी मृगी आवेगी, उसे तुम मार सकते हो। तुम मुझे जाने दो। इस पर व्याध ने कहा कि अगर तुम भी चली गई और दूसरी मृगी भी न आई तो क्या होगा ? इस पर उसने कहा कि अगर तुम्हें इसका विश्वास नहीं है तो मैं तुमसे प्रतिज्ञा करती हूँ कि मैं तुम्हारे घर पर स्वयं कल प्रातःकाल चली आऊँगी और अगर वह मृगी न आवे तो तुम उस समय मुझे मार सकते हो। मृगी ने कसम खाई और कहा कि जो पाप ब्राह्मण होकर वेद से भ्रष्ट सन्ध्या, स्वाध्याय से रहित, सत्य और शौच से विवर्जित, दुष्ट बुद्धि, धूर्त, प्राम-कण्टक, निःशील आदि पापियों के होते हैं, वह मुझे हों, यदि मैं कल प्रातःकाल तुम्हारे पास न आ जाऊँ। व्याध ने उस मृगी को जाने दिया। जब एक पहर रात और बीती तो उसे सत्रास, भय से परेशान, बार-बार पति को ढूँढती हुई एक दुर्बल मृगी दिखाई दी। व्याध ने फिर महादेव पर बेल- पत्र चढ़ा और उनका ध्यान कर, मृगी को मारने के लिए वाण खींचा। जब मृगी ने व्याध को देखा तो बोली-हे व्याध ! तुम मुझे न मारो, मेरा तेज और बल तो विरह की अग्नि में जल चुका है, मुझमें मांस जरा भी नहीं रहा है। मुझको मारने से तुम्हारा भोजन नहीं होगा। तुम मुझे छोड़ दो, मेरे जाने के बाद यहाँ एक S । ७३ शिवरात्रि हृष्ट-पुष्ट मृग आवेगा उसे मारना। उसके मारने से तुम्हारा और तुम्हारे कुटुम्ब का कुछ सन्तोष भी हो सकता है। व्याध ने इस मृगी से भी कहा कि अगर तुम चली गई और मृग न आया तो मैं कहीं का भी न रहूँगा । इस पर मृगी ने कसम खाई और प्रतिज्ञा की कि मैं सुबह अवश्यमेव तुम्हारे घर पहुँच जाऊँगी। व्याध ने दूसरी मृगी को भी जाने दिया। जब सूर्योदय को केवल एक पहर रह गया तो उस समय व्याध ने सम्पूर्ण दिशा और मृगियों के चरण-चिन्ह को ढूँढता हुआ सौभाग्ध, बल और दर्प से युक्त एक मदान्ध और मोटा मृग आता हुआ देखा। उसे भीवाण चढ़ाकर मारने को उद्यत हो गया। मृग ने जब निषाद को देखा तो मृत्यु को निश्चित रूप से आई हुई समझ कर कहा कि हे व्याध ! तुम्हें अगर मुझे मारना हो तो तुम पहिले मेरी बात सुन लो, फिर मारना। व्याध ने पूछा क्या कहना चाहते हो ? मृग ने कहा कि हमारे आने के पहिले यहाँ दो मृगियाँ आई थीं, वह किधर गई ? व्याध ने बता दिया कि दो मृगियाँ यहाँ पानी पीने को आई थीं, मैं ने उन्हें मारा नहीं, छोड़ दिया। इस पर मृग ने कहा कि यदि उन्हें छोड़ दिया तो तुम मुझे भी छोड़ दो, क्योंकि मेरी स्त्री प्रसूता है और मुझे वहाँ जाना परमावश्यक है। व्याध ने कहा कि तुम भी यदि प्रातःकाल आने की प्रतिज्ञा करो तो मैं तुम्हें भी छोड़ सकता हूँ। मृग ने कसम खाई और पानी पीकर उसी रास्ते से, जिस रास्ते से मृगियाँ गई थीं चला गया। व्याध भी अपने घर गया। जब प्रातःकाल हो गया और भूख ने उस निषाद को बहुत । हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ७४ सताया तो वह इधर उधर देखने लगा। इतने में उसे मृगी पाती हुई दिखाई दी। इस मृगी के चारों ओर बच्चे थे। व्याध ने जब इसे मारना चाहा तो मृगी ने रोक दिया और कहा कि बच्चे वाली मृगी को मारना पाप है । अगर तुम्हें मुझे मारना ही है तो मुझे इजाजत दो, मैं अपने बच्चे अपने घर पर छोड़ आऊँ और फिर तुम मुझे मार डालना। इतने में दूसरी मृगी और मृग भी आ पहुँचे और मृग और मृगियों ने एक दूसरे से अन्तिम भेंट की और मरने को तैयार हो गये । अब प्रश्न यह था कि पहिले कौन मरें; मृग या मृगियाँ। व्याध से यह करुण दृश्य न देखा गया। उनसे उसने कह दिया कि मैं तुम्हें कदापि न मारूँगा, तुम अपने-अपने स्थान पर जाओ। हम आज से किसी भी जीव को कष्ट न देंगे। सत्य- धर्म में स्थित हो, मैं आज से शस्त्रों का त्याग करता हूँ। मृग ने कहा कि हम भी अपने वचन से बद्ध हैं और तुम्हारे सामने मरने को आए हैं। जैसी तुम्हारी इच्छा हो वैसा करो। उसी समय स्वर्ग से पुष्प-वर्षा हुई और व्याध और मृगियों को स्वर्ग में ले जाने के लिए विमान आया। मृगराज अपनी तीन स्त्रियों के सहित स्वर्ग को प्राप्त हुआ। दो हिरणी और उसके पीछे मृग इन तीन ताराओं से युक्त मृगराशि नक्षत्र आज तक पाया जाता है। दो बालक आगे और पीछे और उसके पीछे तीसरी मृगी निकट वर्तमान है। यह नक्षत्रों का राजा अब भी आकाश में पाया जाता है। लिङ्मापुराण । । --- E Pos
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दीपावली या दिकाली
दि
थे
वाली के सम्बन्ध में कई कथाएँ प्रचलित हैं।
कुछ लोगों का ख्याल है कि इस दिन राजा
बलि पृथ्वी के साम्राज्य से वञ्चित कर
पाताल भेजे
गए
। महाराष्ट्र देश में इस
दिन स्त्रियाँ राजा बलि की मूर्तियाँ बनाती
हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस दिन विष्णु
भगवान ने नरकासुर नाम के दैत्य को मारा था, अतएव उसी के
उपलक्ष में यह त्योहार मनाया जाता है। कुछ लोग इसे लक्ष्मी पूजा
का दिन मानते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि इस दिन महाराज
विक्रमादित्य का राज्याभिषेक हुआ था। कुछ लोग कहते हैं कि लङ्का
से वापस आने के बाद महाराज श्री रामचन्द्र जी इसी दिन सिंहासन
पर बैठे थे । इस दिन जुआ खेलने के सम्बन्ध में एक पौराणिक
कथा यह कही जाती है कि इसी दिन शिव जी ने पार्वती के साथ
जुआ खेला था, जिसका नतीजा यह हुआ कि शिवजी के पास
जो कुछ था, सब हार गए । इसलिए दुखी होकर कैलाश छोड़ कर,
गङ्गा-तट पर निवास करने लगे। कार्तिकेय ने जब देखा कि जुए में
सब कुछ हार जाने के कारण महादेव जी ( उनके पिता) बड़े दुखी
रहते हैं, तो उन्होंने भी पासा फेंकना सीखा और जब अच्छी
।
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास ७६ तरह सीख गए तो अपनी माता के पास गए। पार्वती जी कार्तिकेय से जुए में सब कुछ हार गई। कार्तिकेय ने इस तरह से महादेव जी के लिए उनकी हारी हुई जायदाद फिर दिला दी। पार्वती जी को यह बात बुरी लगी और उन्हें बहुत दुख हुआ। जब गणेश जी ने देखा कि जुए में हार जाने के कारण इनकी माता जी दुखी रहती हैं तो इन्होंने भी पासा फेंकना सीखा और अपने भाई कार्तिकेय को हरा दिया। शिव जी ने फिर गणेश जी से कहा कि पार्वती जी को बुला लाओ, जिससे आपस में सुलह हो जाय। गणेश चूहे पर सवार गङ्गा जी के किनारे-किनारे जा रहे थे, यह नारद को पता चल गया। उन्होंने विष्णु से बता दिया कि गणेश जी पार्वती जी को शिव जी से मेल कराने के लिए बुलाने जा रहे हैं। विष्णु जी उसी समय शिवजी से मिलने आए थे। विष्णु ने फौरन ही पासे का रूप धारण कर लिया। शिव, नारद, रावण और पार्वती ने उसी पासे से जुश्रा खेलना शुरू किया, किन्तु पासा तो विष्णु स्वयं ही थे, बार-बार पार्वती जी के खिलाफ ढुलक जाते थे। पार्वती जी सब कुछ हार गई, किन्तु जब बाद को पता चला कि यह विष्णु भगवान का मजाक था तो क्रोधित होकर उन्होंने शाप देना चाहा, किन्तु अन्त में समझाने पर प्रसन्न होकर यह आशिर्वाद दिया कि जो उस दिन, अर्थात् दिवाली के दिन जुआ खेलेगा वह साल भर बराबर समृद्ध और प्रसन्न रहेगा। MOON H
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दुर्गाषष्टी
श्विन शुक्लपक्ष छठ के दिन दुर्गा जी ने
महादेव जी से कहा कि मुझे लड़का
आ
खिलाने और उसे दूध पिलाने की बड़ी
इच्छा हो रही है। महादेव जी ने कहा-
तुम तो सारी संसार की माता हो, तुम्हें
इस प्रकार इच्छा क्यों होती है ? किन्तु,
दुर्गा ने कहा कि जब तक वास्तव में कोई बच्चा गोद में न हो तब
तक अच्छा नहीं मालूम होता । थोड़ी देर तक वार्तालाप होती रही,
अन्त में यह तय पाया कि कार्तिकेय को बुलाया जाय। शिव
जी स्वयं कार्तिकेय को बुलाने गए। किन्तु, दुर्गा जी को लड़का
खिलाने की इतनी इच्छा थी कि इन्होंने एक गुड्डा बनाया और
टकटकी लगा कर उसे देखने लगीं। विष्णु भगवान को इतने में
मजाक सूझा । फौरन ही इस गुड्डे के शरीर में प्रवेश कर गए
और
गुड्डा जी गया । जब शिव जी कार्तिकेय को लेकर लौटे
तो उन्हें दुर्गा की गोद में दूसरे बच्चे को देख कर आश्चर्य
हुआ । दुर्गा ने इस बच्चे की उत्पत्ति का पूरा हाल कह सुनाया।
शिवजी बड़े प्रसन्न हुए और उन्होंने सारे देवताओं को इस सुन्दर
शिशु के देखने के लिए निमन्त्रित किया। सब देवतागण जमा
--
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास
हुए। शनि अर्थात् शनीचर देवता भी पधारे, किन्तु इनकी नजर
इतनी खराब थी कि ज्योंही इन्होंने इस बालक को जरा गौर से
देखा कि इसका सिर कट कर गायब हो गया। देव-सभा में
हाहाकार मच गया। महादेव जी ने भी गण भेजे कि बच्चे का सर
तलाश कर लाओ, किन्तु फिर भी सर नहीं मिला । अन्त में महादेव
जी ने कहा कि जो कोई भी जानवर उत्तर की ओर सिर किए
सोता हुआ मिले, उसका सिर काट लायो। हाथी का एक बच्चा
ऐसी अवस्था में मिला । उसका सिर गण लोग काट लाए । शिव
जी ने इसी सिर को इस शरीर पर रख दिया और यही गणेश जी
के जन्म की भीकथा है। बङ्गाल में यह माना जाता है कि आश्विन
शुक्ल की षष्ठी को दुर्गा जी ने गुड्डे को बनाया था।
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रक्षाबन्धन
वण की पूर्णमासी को यह त्योहार मनाया
जाता है। "येन वद्धो बलीराजा दानवेन्द्र
महाबलः । तेन त्वामापि बन्धनामि रक्षे
माचल माचल"। इस मन्त्र से रक्षा बाँधी
जाती है। इसके सम्बन्ध में
यह कथा कही
जाती है कि एक बार देव और असुरों में १२ वर्ष तक बराबर
युद्ध होता रहा और जब उसके समाप्त होने की कुछ आशा न
हुई तो इन्द्राणी ने इस व्रत को विधिवत समाप्त करके इन्द्र के
हाथ में रक्षा बाँधी, जिसके प्रभाव से इन्द्र ने असुरों पर विजय
प्राप्त की थी।
-~-भविष्यपुराण
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उमा-महेश्कर व्रत
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ह व्रत भादों की पूर्णिमा को होता है।
इसमें महादेव जी की
पूजा
की जाती है।
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इसके सम्बन्ध में मत्स्यपुराण
में
कथा कही जाती है कि किसी समय
शिवजी के सर्व-श्रेष्ठ भक्त दुर्वासा ऋषि
घूम रहे थे और उन्होंने विष्णु को भी
घूमते हुए देखा। शङ्कर जी की दी हुई बेल-पत्र की माला इन्होंने
विष्णु जी को दिया। विष्णु जी ने इस माला को लेकर गरुड़ के
कन्धे पर रख दिया, इस पर दुर्वासा ऋषि को क्रोध आया, उन्होंने
विष्णु जी को शाप दिया कि तुमने शिव जी का अपमान किया
है, जाओ तुम्हारी लक्ष्मी नाश हो जायगी, क्षीर समुद्र में गिर
पड़ेगी और गरुड़ नष्ट हो जायगा । बैकुण्ठ से तुम्हारा अधिकार
जाता रहेगा और आज से निस्तेज होकर बन-बन में फिरने लगोगे।
इस शाप के सुनते ही विष्णु जी अपने पद से भ्रष्ट हो गए।
उनकी लक्ष्मी क्षीर समुद्र में गिर पड़ी, गरुड़ नष्ट हो गया और
वे स्वयं निस्तेज होकर बन में इधर-उधर विचरने लगे। इसी तरह
शाप-वश विचरते-विचरते जब विष्णु को बहुत दिन बीत गए तो
८१
उमा-महेश्वर व्रत
भाग्यवश एक दिन उन्हें गौतम मुनि मिल गए। विष्णु ने गौतम
मुनि से आँखों में आँसू भर कर अपनी सारी दुर्दशा और उसका
कारण कह सुनाया। गौतम मुनि ने उन्हें उमा-महेश्वर व्रत करने
की सलाह दी, जिसके करने पर उनका शाप जाता रहा । वह फिर
पूर्ववत् लक्ष्मी-सम्पन्न हुए और वैकुण्ठ का उन्हें अधिकार
मिल गया।
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कालाष्टमी
में
रव या कालभैरव की उत्पति महादेव
जी से मानी जाती है। यह बड़े
भयङ्कर देवता हैं और रक्त से ही
सन्तुष्ट होते हैं।
लड़ाई के मैदान में
यह बराबर मौजूद रहते हैं।
इतने क्रोधी हैं कि इन्होंने क्रोध में
आकर ब्रह्मा का पाँचवाँ मुँह अपने
अँगूठे के
नाखून
से काट डाला था।
पहले ब्रह्मा पञ्चानन थे, अब चतुरानन ही रह गए हैं। कुत्ता
भैरव का वाहन है, इनके एक हाथ में त्रिशूल, एक हाथ में रक्त पीने
का प्याला, एक में तलवार और एक हाथ में मुरदे का सिर है।
बनारस इनका खास निवासस्थान माना जाता है।
इनकी उत्पत्ति की कथा इस प्रकार कही जाती है कि एक
समय देवताओं में इस बात की कथा चली कि कौन देवता सर्वश्रेष्ठ
है। ब्रह्मा, विष्णु, शिव और इन्द्र हरेक अपने को सर्वश्रेष्ठ बताते
थे। आपस में इस प्रकार बातचीत होरही थी। ब्रह्मा अपनी श्रेष्ठता
पर बहुत जोर दे रहे थे। महादेव जी इसे मानते नहीं थे, बल्कि
अपने को सर्वश्रेष्ठ बताते थे। इस पर ब्रह्मा जी को क्रोध आ गया,
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कालाष्टमा
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इन्होंने शिव जी की निन्दा करनी शुरू की। वे कहने लगे-शिव
को तो मैं ने बनाया है और जब बना कर तैयार किया, तो यह रोने
लगा, इसलिए मैं ने इसका नाम रुद्र रख दिया; आज यह मेरी
बराबरी कर रहा है। इस पर शिव जी को भी गुस्सा आ गया,
उन्होंने तुरन्त कालभैरव को पैदा कर दिया । शिव जी की आज्ञा पाकर
भैरव ने ब्रह्मा का एक सिर तुरन्त ही काट डाला ! फिर शिव जी ने
भैरव को बनारस में जाकर रहने की आज्ञा दी। कार्तिक शुक्लाष्टमी
को कालाष्टमी इन्हीं के नाम पर मनाई जाती है।
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हनुमान-जयन्ति
जी का जन्म
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त की पूर्णिमा को हनुमान
माना जाता है। इनकी माता का नाम
अञ्जना और पिता का नाम केशरी था।
कुछ लोग इन्हें महादेव जी का अवतार
मानते हैं। इनके जन्म के सम्बन्ध में
यह कथा प्रचलित है कि राजा दशरथ
ने पुत्रहीन होने के कारण पुत्रोत्पत्ति के
लिए एक यज्ञ किया था। यज्ञ से इन्हें तीन पिण्ड प्राप्त हुए,
जिन्हें इन्होंने अपनी रानियों को खाने के लिए दे दिया; किन्तु
१ एक रानी ने उसे बेपरवाही से कहीं ऐसी जगह रख दिया कि उसे
चील उठा ले गई और ले जाकर उसे वहाँ गिरा दिया, जहाँ
अञ्जना बैठी थी। अञ्जना ने उसे खा लिया और उसी के प्रभाव
से हनुमान जी का जन्म हुआ। इनकी कीर्ति और यश रामायण
आदि ग्रन्थों में काफी तौर से वर्णित है और उनका प्रचार भी
हिन्दूसमाज में काफी है; इसलिए उनके बयान करने की कोई
अावश्यकता नहीं है।
रामनवमी
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त्र शुक्लपक्ष नवमी को श्रीरामचन्द्र जी का जन्म
माना जाता है। मन्दिरों में चैत्र की प्रतिपदा
से ही राम-कथा प्रारम्भ हो जाती है। रामनवमी
के दिन लोग व्रत रखते और राम का गुण
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गाते हैं।
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नवरात्र या दुर्गापूजा
श्विन शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से प्रारम्भ होता है, और
नौ दिन तक मनाया जाता है। देवी-उपासक
इन नव दिनों तक बराबर व्रत रखते और
देवी-महात्म्य (दुर्गापाठ) का पाठ तथा हवन
करते हैं। नवरात्र समाप्त होने के बाद ही दशहरा
होता है। नवरात्र के बारे में यह कथा प्रसिद्ध है
कि जब श्रीरामचन्द्र और रावण में युद्ध हो रहा
था, उस समय श्रीराम को मालूम हुआ कि रावण में कुछ ऐसी शक्ति
है कि जिससे उसका जैसे ही सिर कटता है, वैसे ही फिर जीवित
हो जाता है। यह देख कर श्रीराम को भी विस्मय हुआ और
उन्होंने जाकर देवी से प्रार्थना की। देवी आश्विन शुक्ला प्रतिपदा
को आधी रात के समय देवता की प्रार्थना से प्रेरित होकर अपनी
निद्रा से जी और श्रीराम को रावण के मारने का वर और शक्ति
दी। देवतागण देवी के इस महान अनुग्रह से बहुत कृतकृत्य
हुए; और उन्होंने यह निश्चित किया कि जब तक रावण की पूरी
पराजय न हो जायगी बहु व्रत और देवी की
देवताओं ने बहुत श्रद्धा और विधि से देवी की पूजा की।
जब आठवें रोज श्रीराम ने रावण को मार लिया, तब देवी ने
करेंगे।
भार भाविधा n: ice th get in IS 1 Co नवरात्र या दुर्गापूजा -मिटा देवताओं को दर्शन दिया। देवता लोग बहुत प्रसन्न हुए; उनका बहुत आदर-सत्कार किया और नवें दिन बड़ा भारी यज्ञ रचा। इस यज्ञ में देवी के नाम पर उन्होंने अनेक पशुओं का बलिदान और अन्य रीतियों से देवी का सत्कार किया। दसवें दिन श्रीरामचन्द्र रावण पर विजय प्राप्त करके अयोध्या की ओर चले, अतएव दशवाँ दिन विजय-यात्रा के उपलक्ष में दशहरा के नाम से मनाया जाता है। राजे-महाराजे इस दिन अस्त्र-शस्त्रों की पूजा करते हैं और उत्तमोत्तम आभूषणों से अलंकृत होकर निकलते हैं । देवी की शक्ति की कीर्ति और उनके कार्य मार्कण्डेयपुराण सप्तशती में विस्तृत रूप से वर्णित हैं। संक्षेप में हम उन्हें यहाँ पाठकों के सूचनार्थ लिखे देते हैं: सुरथ नाम के एक राजा थे। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी; किन्तु उनका मन्त्री दुष्ट था। वह उनके दुश्मनों से मिल गया। सुरथ के शत्रुओं ने राजा पर आक्रमण कर दिया, राजा की पराजय हुई। सुरथ शिकार खेलने का बहाना कर के जङ्गल में चले गए। जङ्गल में इन्होंने एक रम्य स्थान पर एक महात्मा की कुटी देखी । महात्मा राजा को आते हुए देख कर उनका यथायोग्य सत्कार किया; किन्तु राजा का चित्त सिंहासन से भ्रष्ट हो जाने के कारण विक्षिप्त हो रहा था, यह वहाँ से उठे और जङ्गल के एक कोने में फिर घूमने लगे। वहाँ उन्हें समाधि नाम का एक बनिया घूमता हुआ मिला । समाधि भी बड़ी परेशानी की हालत में था। राजा ने उसे अपने ही int ir ffei trea1 f1 ng du he SO ने uld atid ary Tue bc & th TI inco on ti -1 ८८ - । हिन्दू-त्योहारों का इतिहास विक्षिप्त देख कर पूछा-तुम कौन हो ? उसने उत्तर दिया कि मैं समाधि नाम का बनिया हूँ। धनी वंश में पैदा हुआ था; किन्तु मेरे पुत्रों और सम्बन्धियों ने धन के लालच से मुझे अपने घर से निकाल दिया है, इससे मैं आज जङ्गल में मारा-मारा फिर रहा हूँ। मुझे अपनी स्त्री का हाल नहीं मिलता कि वह कैसी है और न अपने पुत्रों का ही कुशल-संवाद मिलता है। इस कारण मैं और भी परेशानी में हूँ। मुझे जङ्गल की तकलीफें इतनी असह्य नहीं हो रही हैं, जितना स्त्री-पुत्रों का वियोग। राजा ने कहा कि बड़े आश्चर्य की बात है कि जिन पुत्रों ने और कुटुम्बियों ने तुम्हें घर से निकाल दिया, उनके लिए तुम इतना शोक कर रहे हो। बनिये ने जवाब दिया कि मैं क्या करूँ, मेरा मन नहीं मानता और मैं उनके लिए विह्वल हो रहा हूँ। ऐसी बातें करते करते राजा और बनिया दोनों ऋषि के आश्रम पर आ गए। और ऋषि के सामने प्रणाम करके बैठ गए। राजा ने ऋषि से प्रश्न किया कि महाराज क्या कारण है कि यह वैश्य इस बात को जानते हुए भी कि इसके पुत्रों ने इसके साथ अन्याय किया है, उनके लिए इस प्रकार विह्वल हो रहा है। ऋषि ने उत्तर दिया कि हे राजन् ! यह महामाया का प्रभाव इस महामाया के प्रभाव से ही यह सारा जगत् चल रहा है। इसी देवी का यह सारा प्रपञ्च रचा हुआ है। राजा ने पूछा-यह देवी जिसको आप महामाया कहते हैं, कौन हैं और इनका जन्म कैसे हुआ ? ऋषि ने कहा कि प्रलय हो जाने के पश्चात् जब सारा संसार जलमय हो गया; किन्तु भगवान् के नाभी से कमल और - -- नवरात्र या दुर्गापूजा IC all oth get n co int ffe कमल से ब्रह्मा जी की उत्पत्ति हो चुकी, उस समय विष्णु भगवान शेषनाग की शय्या बिछा कर योग-निद्रा में सो गए। विष्णु भगवान् को योग-निद्रा में सोते-सोते हजारों वर्ष बीत गए कि उनके कान के मल से मधु और कैटभ नाम के दो दैत्य पैदा हुए ।मधु और कैटभ की भयङ्कर सूरत और उनका उग्र बल देख कर ब्रह्मा जी को बहुत परेशानी हुई और उन्होंने विष्णु को जगाने के लिए उनकी माया की प्रार्थना करनी शुरू की। विष्णु जग पड़े और इन दैत्यों से पाँच हजार बरस तक लड़ते रहे; किन्तु इन्हें न मार पाए । तब महामाया ने इन असुरों पर अपना मोहनी-मन्त्र डाल दिया, जिस से प्रेरित होकर इन्होंने अभिमान में आकर विष्णु से कहा कि तुम हम दोनों से जो वर माँगना हो माँगो ! विष्णु ने कहा कि में यह वर माँगता हूँ कि तुम्हें मार डालूँ और तुम दोनों मर जाओ। असुरों ने कहा-अच्छा, तुम हमें वहाँ मार डालो जहाँ पानी न हो। विष्णु ने इस पर उन्हें जल से उठा लिया और मार डाला। यह माया का प्रथम अवतार था। इसे महाकाली का अवतार कहते हैं। महाकाली के दश सिर और दश पैर बताए जाते हैं। इनका रङ्ग बिलकुल काला बताया जाता है। दूसरा अवतार महालक्ष्मी का माना जाता है। यह अवतार महिषासुर के मारने के लिए हुआ था। महिषासुर ने अपनी वीरता और पराक्रम से सारा संसार जीत लिया था। देवताओं को स्वर्ग- लोक से निकाल दिया और वह लोग मृत्युलोक में साधारण आदमियों के समान फिरने लगे थे। तमाम देवताओं ने जाकर area. f ng du the SO atid iry lue b Eth T inca on t savel cat ९० हिन्दू-त्योहारों का इतिहास विष्णु और महादेव जी से सब स्थिति वर्णन की । देवताओं की दुर्दशा सुन कर विष्णु और महादेव जी दोनों को ही बड़ा क्रोध आया और इनके शरीर से तेज निकल पड़ा । जितने देवता थे, उनके शरीर से कुछ न कुछ तेज निकला और सब इकट्ठा होकर एक स्त्री का रूप धारण कर लिया। इस तेज से एक सिंह की भी उत्पत्ति हुई । तेजों से उत्पन्न इस स्त्रो को देवताओं ने अपने-अपने अमोघ अस्त्र प्रदान किए। महालक्ष्मी इस प्रकार से अस्त्र-शस्त्र से समालंकृत हो, सिंह पर चढ़ कर महिषासुर को मारने के लिए रवाना हुई। युद्ध कर के इन्होंने इस महिषासुर का वध कर दिया। तीसरा अवतार महा सरस्वती का है। शम्भु और निशम्भु नाम के दो दैत्यों ने देवताओं को जीत लिया । इन्द्र को स्वर्गलोक से निकाल दिया और अन्य देवताओं को भी उनके स्थान से गिरा दिया । देवता लोग इससे दुखी हो हिमाचल पर्वत पर जाकर देवी की स्तुति करने लगे। पार्वती जी इतने में गङ्गा-स्नान के लिए आई और स्तुति के प्रभाव से उनके शरीर से एक सुन्दर स्त्री पैदा हो गई यही महा सरस्वती थीं और इन्हीं से इन दैत्यों का बध होना था। जब महा सरस्वती इन दैत्यों के निकट गई, तो दैत्य लोग इन्हें देख कर बड़े मोहित हो गए। इन्होंने चाहा कि इस स्त्री के साथ विवाह कर लें, इसलिए इन्होंने सुग्रीव नाम के एक दैत्य को इस स्त्री के पास विवाह की बात लेकर भेजा । सुग्रीव असफल वापस गया। इस पर शम्भु ने धूम्रलोचन सेनापति के अधिकार में एक प्रबल सेना इस शक्ति को पकड़ने के लिए भेजी। इस देवी ने दैत्यों की । । ।
ic all Oti ge1 n IS Ci नवरात्र या दुर्गापूजा सेना का सत्यानाश कर दिया। इसके बाद चण्ड-मुण्ड दो राक्षस अनन्त सेना लेकर इस देवी को पकड़ने के लिए आए। उन्होंने देवी पर आक्रमण किया। उनके आक्रमण को देख कर यह देवी इतनी क्रुद्ध हुई कि इनका चेहरा काला हो गया और इनके शिर से काली का जन्म हुआ। जिसके गले में मुण्ड की माला थी और शरीर पर सिंह का चर्म था। आँखें इनकी लाल थीं और जिह्वा बाहर लपलपा रही थी। काली ने दैत्यों की सेना को खाना शुरू कर दिया और जब हजारों का नाश कर चुकीं, तो चण्ड सामने आया। काली ने चण्ड और मुण्ड दोनों को मार डाला और इनका शिर लेकर महा सरस्वती के पास गई। महा सरस्वती ने इस कार्य के लिए काली को चमण्डु की उपाधि दी। चण्ड और मुण्ड के मरने के बाद शम्भु और निशम्भु नुद लड़ने के लिए आगे आए । इस समय देवी के शरीर से दूसरी शक्ति पैदा हुई, जिसका नाम चण्डिका था। चण्डिका ने दैत्यो से कहा-तुम लोग पाताल-लोक में जाकर रहो; किन्तु इन्होंने नहीं माना । लड़ाई हुई और दैत्य लोग मारे गए । जो कुछ बचे सो भाग गए; किन्तु रक्तवीज रह गया। रक्तवीज में यह गुण था कि अगर उसका एक बूंद भी रक्त जमीन पर गिरता था, तो उससे रक्तवीज के समान ही शक्ति वाला दूसरा दैत्य तैयार हो जाता था, इसलिए जब रक्तवीज का सिर काटा गया तो जितने बूंद खून के ज़मीन पर गिरे उतने ही रक्तवीज तैयार हो गए। इसलिए महा सरस्वती ने यह निश्चय किया कि काली रक्तवीज का खून एक बूंद भी जमीन पर न tn1 11 ffe rea. f ing du he SC uld atic ary Tue b - th T inco ont vel cat
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास
९२
गिरने दें। ज्योंही उसके शरीर से खून की धारा निकले, त्योंही
काली उसे पी जाय । काली देवी इस पर तैयार हो गई और
इस तरह से रक्तवीज मारा गया। शम्भु और निशम्भु दोनों
मार डाले गए । देवी ने तीसरा अवतार धारण कर के इस प्रकार
देवताओं को स्वर्ग का राज्य दिलाया।
चौथा अवतार नन्द के गृह में हुआ था। इस कन्या का
नाम नन्दा था और इसे कृष्ण के बदले वसुदेव ने कंस को
दिया था; किन्तु जब कंस ने इसे पत्थर पर पटक कर मारना
चाहा, तो यह
उसके
हाथ
से
छूट कर आकाश में चली गई और
वहाँ से कहा कि हे कंस
तुम्हारा घातक पैदा हो गया है।
पाँचवाँ अवतार रकदन्ती का है, इसमें देवी ने एक दैत्य को
दाँतों से दबोच कर मारा है। छठा अवतार शाखाम्बरी का है,
जिसमें देवी ने सौ वर्ष से अकाल-पीड़ित प्रजा की रक्षा की थी।
सातवें अवतार में दुर्गम राक्षस को मारा है, जिससे दुर्गा कहलाई।
आठवाँ अवतार मातङ्गी और नवाँ लभराम्बरी का है। इसमें देवी
ने अरुण राक्षस को मारा था।
-मारकण्डेयपुराण
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orn कोकिला व्रत hc al oti a gel on 1S Ci lunt i ii effe trea 병 ह व्रत आषाढ़ पूर्णमासी को किया जाता है। जिस साल मलमास पड़ता है, उस साल शुद्धासाढ़ की पूर्णिमा को होता है यह व्रत स्त्रियों का ही है और इसकी विधि यह है कि आषाढ़ महीने की पूर्णिमा के सायङ्काल से प्रत्येक सौभाग्यवती स्त्री को यह प्रतिज्ञा करनी चाहिए कि मैं एक महीने तक बराबर प्रतिदिन स्नान करूँगी, ब्रह्मचारिणी रहूँगी, केवल सायङ्काल को ही भोजन करूँगी, जमीन पर सोऊँगी और प्राणियों पर दया करूँगी । यह भी कहा गया है कि प्रतिदिन प्रातःकाल इस व्रत को करने वाली स्त्री दतून करने के पश्चात् नदी, तालाब या किसी कुएँ पर जाकर स्नान करे, सुगन्धित आमले का तेल लगावे । आठ रोज ऐसा करने बाद फिर. बच का उपटन लगावे और सूर्य देवता की पूजा किया करे । इसका फल यह कहा गया है कि बी कभी विधवा नहीं होती। इसके सम्बन्ध में यह कथा कही जाती है कि एक समय दक्ष ने अपने यहाँ यज्ञ किया और इस यज्ञ में सब देवताओं को निमन्त्रित किया; किन्तु महादेव जी को नहीं बुलाया। महादेव जी ing edi he SC buld sati ary Slue b t th T incc ont evel Icat हिन्दू-त्योहारों का इतिहास कैलास पर्वत पर अपनी तपस्या में मग्न थे और उनको पता भी नहीं था कि दक्ष ने कोई यज्ञ किया है। नारद जी दक्ष के यज्ञ गए हुए थे, उन्होंने जब दक्ष के यहाँ महादेव जी को अनिमन्त्रित देखा, तो उन्हें बुरा मालूम हुआ। वे यज्ञशाला से उठ आए और महादेव जी के पास जाकर सब हाल कह सुनाया । महादेव जी ने जब अपने अपमान की यह कथा सुनी, तो उन्हें क्रोध आया। उन्होंने दक्ष को इस अपमान के लिए दण्ड देने का विचार किया; किन्तु पार्वती जी ने कहा कि तुम कुछ न करो, मैं स्वयं जाकर अपने पिता को उनके इस अनुचित कार्य के लिए दण्ड दूंगी। यह कह कर गणेश जी को लेकर पार्वती जी और नारद जी दक्ष की यज्ञशाला के लिए रवाना हुए। जब पार्वती जी दक्ष के यहाँ पहुँची, तो इनको किसी ने भी न पूछा। यह दरवाजे पर खड़ी रहीं और किसी ने इनको नहीं बुलाया । इस पर पार्वती जी को बड़ा क्रोध हुआ और उन्होंने विचार किया कि अब मेरे जीने से क्या फायदा ? यह विचार कर वह हाहाकार करके यज्ञाग्नि में कूद पड़ीं। गणेश जी ने माता की यह दशा देख कर दक्ष और वहाँ एकत्रित अन्य देवताओं को मारना शुरू कर दिया। नारद जी ने जब यह देखा कि दक्ष का यज्ञ भङ्ग हो गया और गणेश जी के साथ सारे देवता लड़ाई कर रहे हैं, तो वह फौरन ही फिर शिव जी के पास पहुंचे और उनसे सब हाल कह सुनाया। महादेव जी इस बात पर बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने अपनी जटा फटकारी। इस जटा से वीरभद्र नाम का लाल-लाल आँख ९७ कोकिला व्रत Dim hc all oti gei On S 1S C वाला अति विकट पुरुष पैदा हुआ और महादेव जी से पूछा कि जो आज्ञा हो बताइए। महादेव जी ने आज्ञा दी कि जाओ दक्ष के यज्ञ में जितने देवता हों, उनको मार डालो और दक्ष का भी सिर काट लो। वीरभद्र ने यज्ञशाला में आकर देवताओं से युद्ध प्रारम्भ कर दिया और थोड़ी ही देर में उसने अनेक देवताओं को मार डाला, अनेकों को घायल किया और जो बचे, उन्हें भगा दिया । दक्ष का सिर कट कर शीघ्र ही महादेव जी की जटा में जाकर प्रवेश कर गया । महादेव जी को थोड़ी देर के बाद जब तसल्ली हुई और उनका क्रोध ठण्डा हुआ, तो ब्रह्मा और विष्णु ने आकर उनसे प्रार्थना की कि देवताओं के मरने से बड़ी हानि हुई है, आप इन पर कृपा करिए । जो मरे हैं, उन्हें जिला दीजिए, जिनके अङ्ग कटे हैं, उन्हें पूर्णाङ्ग कर दीजिए। इस पर महादेव जी फिर प्रसन्न हो गए, उन्होंने सब को जिला दिया और जिनके हाथ-पैर टूटे थे, उन्हें पूर्णाङ्ग कर दिया; किन्तु यज्ञ-विनकारणी पार्वती को नहीं जिलाया । उन्हें यह शाप दिया कि जाओ, पक्षि-योनि को प्राप्त होकर कोकिला हो। पार्वती जी इसलिए. नन्दन-वन में दश हजार वर्ष तक कोकिला-रूप धारण करके विचरने लगी और फिर इस मनुष्य-जन्म को पाकर महादेव जी की अर्धाङ्गिनी बनीं। उसी समय से आषाढ़ मास के उत्तम मलमास ( अधिक मास ) में यह व्रत माना जाता है। ini dil effe srea f ing idu he SC Sulc ati । ry Tue b - Ett T ncc ont evel icat
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में
ल्गुन की पूर्णिमा को यह त्योहार मनाया
जाता है । भविष्योत्तरपुराण में इसे
फाल्गुन पूर्णमोत्सव कहा गया है। इसकी
उत्पत्ति का कारण इसी पुराण में इस तरह
बयान किया गया है कि
सतजुग पृथु
नाम का एक राजा था। यह राजा बहुत
प्रतापी और यशस्वी था। प्रजा को अपने पुत्रों के समान पालता
था। इसके राज्य में न कभी दुर्भिक्ष पड़ता था, न कोई बीमारी
आती थी और न कोई अकाल मृत्यु होती थी; किन्तु एक दिन
ऐसा हुआ कि तमाम प्रजा पृथु राजा के द्वार पर इकट्ठी होकर
त्राहि-त्राहि पुकारने लगी। राजा को बड़ा आश्चर्य हुआ कि
आखिर यह एकदम से प्रजा पर कौन सी आफत आ गई
राजा को पूछने पर मालूम हुआ कि उसके राज्य में ठौंठा नाम की
राक्षसी आती है और रात के समय या दिन को किसी वक्त
बच्चों पर आक्रमण करती है, जिससे वे बीमार पड़ जाते हैं या
मर जाते हैं। राजा को ठौंठा राक्षसी की यह कथा सुन कर बड़ा
विस्मय हुआ और इन्होंने अपने पुरोहित वशिष्ठ जी से पूछा कि
यह ठौंठा कौन है और इसके मारने के क्या उपाय हो सकते है ?
होली PRONIRDOID om nc al ot! gei On S 15 ci ना के इन वचनों को याद वशिष्ठ जी ने ठौंठा का पूरा इतिहास राजा पृथु को कह सुनाया। उन्होंने कहा कि यह ठौंठा राक्षसी मालिन राक्षस की लड़की है. इसने एक समय महादेव जी को प्रसन्न करने के लिए बहुत उग्र तप किया था । महादेव जी ठौंठा के तप से बहुत प्रसन्न हुए और उससे बोले कि तुझे जो कुछ वर माँगना हो, माँग ! ठौंठा ने कहा कि आप मुझे यह वर दीजिए कि मुझे न तो कोई सुर-असुर, न मनुष्य और न शस्त्र मार सके । महादेव जी ने 'एवमस्तु कह दिया; किन्तु अन्त में यह भी कहा कि उन्मत्त बालकों से तुम्हें करके ठौंठा राक्षसी हमेशा बच्चों को पीड़ा पहुँचाया करती है। वशिष्ठ जी ने इसके बाद राजा पृथु को इस राक्षसी को निवारण करने का उपाय बताया। उन्होंने कहा कि फाल्गुन की पूर्णिमा को आप बहुत बड़ा उत्सव मनाइए। सब लोगों को अभयदान दे दीजिए । सब लोगों को यह अधिकार दे दीजिए कि जो उनके दिल में आवे वह कर सकते हैं। बच्चे लोग प्रसन्नचित्त होकर ख्खूब चिल्लाते हुए समरोत्सुक वीर के समान एक स्थान पर लकड़ी, कपडा इत्यादि इकट्ठा करके जलावें, तालियाँ बजावें, इस अग्नि की तीन बार परिक्रमा करें, गावें और हँसें। इन शब्दों को सुन कर ठौंठा राक्षसी भाग जायगी और नजदीक न आवेगी। रात्रि के समय बच्चों की रक्षा करने का, उनके उपटन लगा कर उनको स्वच्छ करने का भी इस उत्सव में आदेश दिया गया है। भविष्योत्तरपुराण के अनुसार होली का उत्सव effe trea f Ing Edu he । SC Sulc atid iry lue b th T ncc on t evel icat हिन्दू-त्योहारों का इतिहास १०० उसी समय से चला है और इसे हुँडेरी भी इसी कारण से कहते हैं। इसकी उत्पत्ति का दूसरा कारण होलिका और प्रह्लाद की कथा कही जाती है । हिरण्यकश्यप राक्षस नास्तिक था; वह विष्णु की भक्ति में विश्वास नहीं करता था, उसके विपरीत उसका पुत्र प्रह्लाद विष्णु का अनन्य भक्त था। अपने पुत्र की भक्ति और श्रद्धा की परीक्षा करने के लिए हिरण्यकश्यप ने अपने पुत्र पर अनेक अत्याचार किए। कभी तो उसे कुम्हार के आवे में रख कर जलवाया, कभी पहाड़ पर से गिराया; किन्तु हर एक कठिनाइयों में प्रह्लाद की भक्ति अटल रही और विष्णु भगवान ने उसे तमाम कष्टों से निवारण किया। जब हिरण्यकश्यप प्रह्लाद की आस्तिकता से बहुत परेशान हुआ, तो उसने अपनी बहिन होलिका को यह आज्ञा दी कि प्रह्लाद को लेकर अग्नि में बैठ जाओ, जिससे प्रह्लाद जल कर मर जावे । होलिका ने ऐसा ही किया; किन्तु अपने विश्वास और भक्ति के कारण प्रह्लाद तो अग्नि से भी बच गया और बेचारी होलिका जल कर भस्म हो गई। उसी समय से कुछ लोगों के मतानुसार होलिका दहन का उत्सव प्रारम्भ हुआ है। यह उत्सव एक प्रकार से विष्णु-भक्ति की विजय की खुशी मनाने के लिए और विष्णु के विरोधियों की निन्दा करने के लिए किया जाता है। पाठकों को यह तो मालूम ही होगा कि इस उत्सव पर घृणित गालियाँ बहुत बकी जाती हैं। भविष्योत्तरपुराण के १०१ oirm Inc Sot! ge on. IS lis Cc un di effe trea अनुसार तो ये गालियाँ वशिष्ठ जी के इस आदेश के अनुसार . कि "लोगों के मन में जो कुछ आवे कहें दी जाती हैं, जिससे ठौंठा राक्षसी भाग जाय । और दूसरी कथा के अनुसार होलिका को और उसकी जाति ( Sex ) के व्यक्तियों को इसलिए दी जाती है कि उसने प्रह्लाद ऐसे सत्याग्रही भक्त को जिन्दा ही भस्म करने का प्रयत्न किया था; किन्तु गालियों की मात्रा कई प्रान्तों में इस हद तक बढ़ी है और विशेष कर गाँवों में पुरानी चाल के आदमियों में इतनी ज्यादा पाई जाती है कि मेरा विचार यह होता है कि मैं होलिका-दहन-उत्सव के वर्णन के साथ ही साथ और देशों में गालियों और अश्लील बातों से परिपूर्ण दो-एक त्योहारों का वर्णन करके यह दिखाऊँ कि ऐसे त्योहार किस श्रेणी के राष्ट्र में और किस अवस्था में पाए जाते हैं। अश्लील गान और अश्लील बातें बकने की प्रथा भारतवर्ष के लिए ही नई नहीं है। जहाँ असभ्यता और नीचता का प्राबल्य रहता है, वहाँ इस प्रकार की बातें होती हैं। आज भी जो कौमें असभ्य हैं, इस प्रकार के त्योहार मनाती हैं। आजकल जो राष्ट्र सभ्य हो गए हैं उन्होंने भी अपनी-अपनी असभ्यता की अवस्था में इस प्रकार के त्योहार मनाए हैं। मैं उदाहरण के लिए अगरेज़ और फ्रान्सीसी जाति के उस त्योहार का वर्णन करूँगा, जो बिलकुल होली से मिलता-जुलता है। इङ्गलैण्ड, फ्रान्स, जर्मनी और बेलजियम देशों में छ: ननवरी को एक त्योहार मनाया जाता था, जिसे ( Festival of । f gag Ldu he SC Sulc atid । iry lue b th T ncc int ਮਨlevel पुराना icat हिन्दू-त्योहारों का इतिहास १०२ Fools) अर्थात् मूखों का त्योहार कहते थे। इस त्योहार में लोगहर एक गाँव में इकट्ठे होकर अपना एक प्रमुख चुनते थे। उसे “दाल का राजा" (King of the Beans) कहते थे। यह राजा अपनी एक रानी स्वयं चुनता था, वह Queen of the Beans कहलाती थी। निर्वाचन का काम समाप्त होने के बाद सब लोग इस राजा और रानी को प्रणाम करते थे और वह कुटुम्ब भर को आशीर्वाद देते थे। इसके बाद गाँव भर के या कुटुम्ब भर के सब आदमी इकट्ठ होकर शराब पीना शुरू करते थे, और बैठे-बैठे बराबर घण्टों तक शराब पीते रहते थे। जब-जब राजा या रानी शराब पीते थे, तब- तब सब जोर से चिल्लाते थे-“राजा पी रहे हैं", "रानी पी रही हैं"। अगर कोई आदमी समय पर चिल्लाने में चूक गया या पिछड़ गया, तो उसका मुँह काला कर दिया जाता था या उसके सिर पर सींग लगा कर गदहे का स्वरूप बनाया जाता था। जब तक यह त्योहार समाप्त नहीं होता था, तब तक इसको इसी अवस्था में रहना पड़ता था। इसके एक दिन के पहले अर्थात् ५ जनवरी को चौराहे पर अन्न-दाह किया जाता था। तीसरे पहर जवन लड़के और लड़कियाँ गाड़ियों में बैठ कर निकलते थे और ईधन इकट्ठा कर लाते थे और शाम को इस इकट्ठ किए हुए ईधन में अग्नि जला दी जाती थी। लोग इसके चारों ओर नाचते थे। इङ्गलैण्ड के लोगों का विचार था कि इस अग्निदाह से फसल बहुत अच्छी होती है और साथ ही साथ इसके प्रभाव से भूत-प्रेत का भय बिलकुल नष्ट हो जाता है। दिसम्बर के अन्त में, अर्थात् इस त्योहार के ठीक पहले १०३ होली inc Hal ot) ge n S CI ii ffe इङ्गलैण्ड तथा स्कॉटलैण्ड आदि देशों में एक त्योहार और मनाया जाता था, जिसमें एक (King of Mis-Rule ) "कुशासन राजा" निर्वाचित होता था, इसे (Abbot of Unreason ) "अर्थात् दुबद्धि पादरी” भी कहते थे। राजा के दरबार में, नवाबों की हवेलियों, धनियों की कोठियों में और गरीबों के घर में सभी जगह यह व्यक्ति निर्वाचित होता था। अक्सर यह त्योहार तीन महीने तक बराबर जारी रहता था। फ्रान्स में Lord of MMis-Rule को Festival of Fools कहते थे । यह कहीं २६ दिसम्बर को मनाया जाता था और कहीं पहली जनवरी को । इसके मनाने का तरीका यह था-बड़े दिन के रोज शाम को जितने पादरी होते थे, सब गिरजाघर में इकट्ठ होकर एकदम से चिल्लाते थे-"बड़ा दिन" और फिर मस्त हो जाते थे। औरतें मरदों का रूप धारण करती थीं और मर्द औरतों का,और एक दूसरे से लिपट कर नाचते-गाते थे। शराब पीते और चिल्लाते थे। गन्दे से गन्दे गाने गाए जाते थे। गन्दे से गन्दे और अश्लील से अश्लील दृश्य दिखाए जाते थे। साधारण मनुष्य तो आपे से बाहर भी रहता था। पादरी लोग और समझदार आदमी अपना-अपना रूप बदल कर औरत मर्द और मर्द औरत बनकर चेहरों पर नकाब डाल कर इकट्ठ होते थे। गिरजाघर, जहाँ परमेश्वर का नाम लेना चाहिए, शराबखाना बन जाता था। यहीं ताश और जुश्रा खेलते थे। जूतों को आग में जलाते थे, जिससे असह्य दुर्गन्ध उठती थी। सब लोग मिल कर जो जिसको पाता था लिपटा कर नाचता था, चूमता था और ea 01) Home SC alc ti b th T CC nt vel cat.
हिन्दू-त्योहारों का इतिहास १०४ GeteA गन्दा से गन्दी गालियों की गीत गाता था। इसके बाद ये सब लोग गाड़ी पर सवार होकर शहर या गाँव की सड़क पर निकलते थे और जनता को देख कर जो इकठ्ठा रहती थी, गालियों बकने लगते थे और जनता इन्हें गालियाँ देती थी। इस तरह से यह त्योहार समाप्त होता था। यह हाल इङ्गलैण्ड और अन्य पश्चिमीय देशों का अठारहवीं सदी के पहले का है। मैं इस वर्णन को बहुत विस्तार नहीं देना चाहता और न हर एक चीज़ को तफसीलवार और स्पष्ट बयान करने में ही मुझे बहुत शिष्टता मालूम होती है। किन्तु मैं पाठकों को यह विश्वास दिलाना चाहता हूँ कि यूरोप में ही नहीं, सारे संसार के हर एक समाज में असभ्यता के जमाने से इस प्रकार की घृणित कुप्रथाएँ पाई जाती थीं। Salurnatia, Lupercalia: Festum Stultorum, Matrolania Festa; Liberaha इत्यादि त्योहार जो पश्चिमीय देशों में एक न एक समय पर मनाए जाते थे, होली के समान ही अश्लीलतापूर्ण थे। मिश्र देश के इतिहास में यहाँ तक लिखा है कि यहाँ के लोग होली के त्योहार पर नावों में बैठ कर हजारों की तादाद में एक मन्दिर में देवता के दर्शन के लिए जाया करते थे। रास्ते में स्त्रियाँ और पुरुष गाते थे। जहाँ कहीं रास्ते में कोई गाँव या कस्बा पड़ता था, वहाँ ये लोग उतर पड़ते थे, कुछ औरतें गाने लगती थीं, कुछ उस गाँव के मर्दो और औरतों के देखते ही उन्हें गालियाँ सुनाने लगती थीं और कुछ खियाँ नङ्गी होकर उनके सामने खड़ी हो जाया करती थीं। assed । । । WHA १०५ होली enc al ot] ge n हमारे देश में भी होली के त्योहार पर जो अश्लीलता पाई जाती है, वह अन्य देशों से कम नहीं हैं। भेद सिर्फ इतना ही है कि यह अश्लीलता अन्य राष्ट्र अपनी असभ्यता के ज़माने में रक्खा करते थे; किन्तु हम सभ्य ही नहीं, ऋषि-सन्तान होने का दावा करते भी इस अश्लीलता को बरतते हैं। होली का त्योहार एक प्रकार का, स्त्रीत्व के अपमान करने का एक साधन हो रहा है। पतित लोग इस त्योहार से फायदा उठाते हैं। समझदार लोग भी परम्परा के फन्दे में फंस कर इसमें सहयोग देते और समर्थन करते हैं। निस्सन्देह यह बहुत दुख की बात है। जब तक हमारे कर्म और आचार-व्यवहार असभ्यों और पिशाचों के समान हैं, तब तक अपने मुँह से हम ऋषि-सन्तान ही नहीं, साक्षात् ब्रह्म ही होने का दावा क्यों न करें, पर संसार की नजरों में और वास्तव में हम वहीं रहेंगे जो हैं अर्थात् असभ्य और पतित ! IS C In 13 ea ng du he SC ulc le b ti T ICC nt vel cat अनन्त चतुर्दशी Antive ह व्रत भादों के शुक्लपक्ष की चतुर्दशी को होता । इस व्रत में अनन्तदेव की पूजा की जाती है। इसके सम्बन्ध में यह कथा कही जाती कि जिस समय युधिष्ठिर जुए में राज- पाट हार कर वनवास भेज दिए गए और वे अपने भाइयों और द्रौपदी के साथ वन में रहने लगे, तो उनके वनवास हो जाने की कथा सुन कर श्रीकृष्ण जी उनसे मिलने के लिए वनमें गए । श्रीकृष्ण को देख कर युधिष्ठिर को शान्ति हुई और उन्होंने उन से पूछा कि मैं इस दुख से कैसे मुक्त होऊँ ? श्रीकृष्ण ने उन्हें इसी व्रत के रखने की सलाह दी। इस पर युधिष्ठिर ने पूछा कि अनन्तदेव किस देवता का नाम है और इसका क्या माहात्म्य है ? इस पर श्रीकृष्ण ने यह वर्णन किया कि अनन्त मेरा नाम है और इस दिन मेरी पूजा होती है। इसके सम्बन्ध में कृष्ण जी ने युधिष्ठिर को यह कथा सुनाई- उन्होंने कहा कि पहले सतजुग में सुमन्त नाम का ब्राह्मण था। उसकी स्त्री का नाम दीक्षा था। इन दोनों के शीला नाम की कन्या पैदा हुई । जब शीला कुछ बड़ी हुई, तो उसकी माता दीक्षा का देहान्त हो गया और सुमन्त ने कर्कशा नाम की स्त्री से अपना or. enc cal दिया। दायज pot] ge on IS 1S C un effe १०७ अनन्त चतुदशी दूसरा विवाह कर लिया। शीला थोड़े दिनों में विवाह करने योग्य हुई। सुमन्त ने इसका विवाह कौण्डिन्य नाम के ब्राह्मण से कर के समय सुमन्त ने कर्कशा से कहा कि दामाद घर में आया है, उसको कुछ दायज देना चाहिए । कर्कशा इस पर बड़ी क्रोधित हुई। मकान की दीवारें फोड़ डाली और बहुत साधारण भोजन, ईट और पत्थर बाँध दिए और कहा कि दामाद को दे श्राश्रो। कौण्डिन्य ये बातें सुन कर बहुत दुखी हो विदा होकर चला आया। कौण्डिन्य को अपने घर जाते समय मार्ग में यमुना जी मिली। यहाँ पर शीला ने दोपहर के समय लाल वस्त्र पहिने हुए बहुत सी स्त्रियों को यमुना में स्नान और पूजा करते हुए देखा । शीला गाड़ी से उतर कर इनके पास गई और पूछा कि यह कौन सी पूजा है ? स्त्रियों ने बतलाया कि यह अनन्त-व्रत है और हम लोग अनन्त भगवान् की पूजा करती हैं। शीला ने भी यही पूजन किया और विधि के अनुसार एक डोरे में चौदह गाँठे बाँध, केशर में रङ्ग, उसका पूजन कर अपने हाथ में बाँध लिया और गाड़ी में बैठ कर अपने घर आई। उसी क्षण उस अनन्त-व्रत के कारण उसका घर, गौ और धन-धान्य से परिपूर्ण हो गया और कौण्डिन्य, शीला आदि सपरिवार आनन्द से रहने लगे। एक दिन कौण्डिन्य ने शीला के हाथ में अनन्त-व्रत में पूजन किए हुए डोरे को देखा। उसने समझा कि शीला ने मुझे वश में रखने के लिए यह कोई यन्त्र बाँध रक्खा है। उसने उसे छीन कर आग में डाल दिया। शीला.हाहाकार करके उठी और आग से उस डोरे rea du ne SC ulc tit b T CC ht vel हिन्दू-त्योहारों का इतिहास को निकाल, दूध में भिगोकर फिर बाँध लिया। इस कर्म से कौण्डिन्य की धीरे-धीरे सारी सम्पदा नष्ट होने लगी, चोर लोग माल-असबाब उठा ले गए । घर में दरिद्रता आ गई। रिश्तेदारों ने साथ छोड़ दिया । कौण्डिन्य जब बहुत दुखी हुश्रा, तो उसने शीला से कहा कि मैं अब जिन्दगी से आजिज आ गया हूँ। कुछ समझ में नहीं आता कि क्या करूँ ? शीला ने कहा कि तुमने अनन्त भगवान का उस दिन निरादर किया था, उसी का परिणाम तुम्हें मिला है । अनन्त भगवान् को प्रसन्न करो, तो तुम्हें सब कुछ फिर मिल सकता है। इस पर कौण्डिन्य घर से अनन्त भगवान की तलाश में निकल पड़ा और वन में वायु खाता हुश्रा उनकी खोज करने लगा। उसने वन में भ्रमण करते-करते एक बड़ा आम का वृक्ष देखा, जिसमें फूल लगे थे; किन्तु उस पर कोई चिड़िया नहीं थी और उसमें सैकड़ों कीड़े किलबिला रहे थे। कौण्डिन्य ने वृक्ष से पूछा कि तुमने अनन्त भगवान् को कहीं देखा है ? उसने उत्तर दिया कि नहीं देखा। फिर यह ब्राह्मण और आगे बढ़ा तो एक बछड़े सहित गाय देखी, जो वन में फिरती थी। ब्राह्मण ने . इस गाय से भी वही प्रश्न किया और वही जवाब पाया। आगे एक बैल देखा, वह हरी-हरी घास चर रहा था, इससे भी वही सवाल किया और वही जवाब पाया। आगे बढ़ा तो दो मनोहर झीलें देखीं, जिनका पानी एक दूसरे में हिलोरें मार कर जा रहा था और कमल और कुमुद से सुशोभित था । इनसे भी ब्राह्मण ने अनन्त भगवान का पता पूछा और इन्होंने भी वही जवाब दिया ।
OT enc cal pot] oge on IS 11S Ci १०९ अनन्त चतुर्दशी कि हमें नहीं मालूम । आगे बढ़ा तो एक गदहा और एक मस्त हाथी खड़े देखे। इनसे ब्राह्मण ने पूछा-भाइयो, तुमने कहीं अनन्त भगवान् को देखा है ? उन्होंने भी वही जवाब दिया । जब सबसे वह निराश हो गया तो वहीं बैठ गया और फन्दा लगा करमर जाने के लिए तैयारी करने लगा। यह देख कर वृद्ध ब्राह्मण का रूप धारण करके अनन्त भगवान ने स्वयं उसका हाथ पकड़ लिया और उसको एक गुफा में ले गए। वहाँ पर उसे अनन्त भगवान के नर-नारायण रूप के दर्शन हुए। ब्राह्मण ने साष्टाङ्ग दण्डवत् किया और उसने कहा-महाराज, कोई उपाय बताइए, जिससे मेरा कष्ट दूर हो । अनन्त भगवान ने उत्तर दिया कि तुमने मेरा अपमान किया था, इसी कारण तुम्हारी सम्पदा का नाश हुआ। अब घर जाकर तुम चौदह वर्ष तक अनन्त भगवान की पूजा करो, तो तुम्हारा पाप नाश होगा । ब्राह्मण ने इस पर फिर महाराज यह तो बताओ कि रास्ते में ग्राम का वृक्ष, बैल, झील आदि जो मुझे मिले थे, वे कौन थे ? इस पर वृद्ध ब्राह्मण ने कहा कि हे कौण्डिन्य! वह श्राम का वृक्ष पूर्वजन्म में वेद-विद्या विशारद था। उसने शिष्यों को वेद-विद्या का ज्ञान नहीं दिया था, इसलिए इस जन्म में वृक्ष हुा । और जो गऊ देखी थी वह भूमि थी; उसने पहले बीज हरण किया था। तुमने जो बैल देखा था, वह धर्म-रूप था, उसने यथावत् धर्म की व्यवस्था नहीं की थी, इसलिए बैल हुआ। जो दो झीलें थीं वे पहले दो बहिनें थीं, जो अपने-अपने पाप-पुण्यों को एक दूसरे से कहती थीं। इससे दोनों तलइयाँ हुई । इन दोनों ने un Hit effe tea f पूछा कि mg du ne SC ulc iti ie b T ICC vel icat हिन्दू-त्योहारों का इतिहास अतिथि, ब्राह्मण और दुर्बल को कभी भी भिक्षा नहीं दी ! जो तुम गदहा देखा था वह मूर्तिमान् क्रोध और हाथी का मद था। वह ब्राह्मण अनन्त भगवान ही थे। और जो तुमने गुफा देखी वह संसार-सागर था। यह बात कह कर वह वृद्ध ब्राह्मण अन्तर्धान हो गया। कौण्डिन्य ने अपने घर को फिर सम्पदा और समृद्ध से परिपूर्ण देखा। । m om enc cal अन्नकूटोत्सव या गोबद्धनात्मक pot oge on as lis CE un di effc irea f शुक्ल की प्रतिपदा को यह उत्सव होता है। इस दिन अन्नकूट भगवान् की पूजा होती है और गोवर्द्धन की भी पूजा की जाती है। सनत्कुमार संहिता में यह लिखा है कि एक दिन कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा को कृष्णा जी गऊ चराते-चराते गोवर्द्धन के निकट जाकर क्या देखते हैं कि सब गोप, ग्वाल और गोपियाँ गोवर्द्धन के चारों ओर इकट्ठे हैं और नाना प्रकार के भोजन वहाँ इकट्ठ कर रक्खे हैं। श्रीकृष्ण जी ने उनसे पूछा कि हे गोप-ग्वालो! तुम लोग इस समय किसका पूजन कर रहे हो ? उन्होंने उत्तर दिया कि हे कृष्ण ! यह दिन इन्द्र की पूजा का है। बहुत दिनों से गोकुल में यह पूजा चली आती है। श्रीकृष्ण ने कहा कि भाई यह तुम्हारी बड़ी भूल है कि जो देवता खाते नहीं, उन्हें तो तुम भोजन देते हो और जो खाते हैं, उन्हें भोजन नहीं देते। इस पर गोपों ने कहा कि हे श्रीकृष्ण ! तुम ऐसा न कहो। इन्द्र हम लोगों को पानी देते हैं, हमें धन-धान्य और गऊ, इन्हीं की कृपा से प्राप्त होती हैं। श्रीकृष्ण जी ने कहा कि यह बात भी ठीक ng du he । SC ulc atii ue b th T aca vel cat हिन्दू-त्योहारों का इतिहास नहीं है, क्योंकि तुम्हें साक्षात् अन्न देने वाला तो गोवर्धन पर्वत ही है। यही तुम्हारे लिए जल की वर्षा करता है और तुम्हारी गौवों की रक्षा करता है। यह तुम्हारे भोजन को भक्षण भी करेगा । इसी की तुम पूजा करो। श्रीकृष्ण जी की यह बात मुन कर गोप-गोपीजन आपस में बातचीत करने लगे और यह सोचने लगे कि श्रीकृष्ण जी की बात माने या न मानें । अन्त में यह निश्चित हुआ कि अगर गोवर्द्धन हमारे अर्पित भोजन को खा ले, तोश्रीकृष्ण जी की आज्ञानुसार इसकी पूजा की जाय और अगर न खाए तो इन्द्र की। इसलिए थोड़ी देर के बाद नाना प्रकार के स्वादिष्ट भोजन बना कर गोप-ग्वालों ने गोवर्द्धन के सामने रक्ख । फिर कृष्ण जी ने इनसे कहा कि हे ग्वालो ! तुम अपनी आँखें मूंद कर गोवर्द्धन का ध्यान करो। जब ग्वालों ने आँखें मूंदी, तो श्रीकृष्णजी स्वयं गोवर्द्धन-रूप होकर सब भोजन खा गए। जब ग्वालों ने आँखें खोली, तो सब भोजन गायब देख कर बहुत चकित हुए और बड़ी श्रद्धा से गोवर्द्धन की पूजा की। नारद जी ने यह खबर इन्द्र को पहुँचा दी । इन्द्र यह सुन कर कि उनके स्थान पर गोवर्द्धन की पूजा हुई है, बड़े नाराज हुए और अपने यहाँ के बड़े-बड़े मेघों को यह आज्ञा दी कि जाकर गोकुल को बहा दो। थोड़ी देर में मूसलाधार वर्षा आरम्भ हो गई और सारा गोकुल व्याकुल हो गया। गोप-ग्वाल कृष्ण जी के पास त्राहि-त्राहि करते हुए पहुँचे। कृष्ण ने कहा कि गोवर्द्धन की पूजा करो, गोवर्द्धन ही तुम्हारी रक्षा करेगा। यह सुन कर । । Simple ka ११३ अन्नकूटोत्सव या गोवर्द्धनोत्सव lom "enc cal bot] oge on is Lis C सब गोप-ग्वाल और श्रीकृष्ण गोवर्द्धन के समीप आए और ज्योंही ग्वालों ने आँखें मूंद कर गोवर्द्धन का ध्यान किया, त्योंही श्रीकृष्णचन्द्र ने झट से गोवर्द्धन को अपनी उँगली से उठा लिया। सब गोप-ग्वाल उसके नीचे आ गए। इन्द्र ने जोरों से वर्षा आरम्भ की, यहाँ तक कि गोकुल के अतिरिक्त और सारे गाँव नष्ट होने लगे। नारद जी ने यह समाचार ब्रह्मा जी से जा सुनाया और कहा कि इन्द्र सारी सृष्टि का नाश कर रहे हैं। ब्रह्मा जी यह समाचार सुन कर अपने हंस पर सवार होकर इन्द्र के पास आए और पूछा कि मृत्युलोक में क्या कोई दैत्य पैदा हो गया है, जो आप सृष्टि का नाश कर रहे हैं ? इन्द्र ने कहा नहीं, यह बात नहीं है। गोकुल-निवासियों ने हमारी पूजा का निरादर किया है, उनको हम दण्ड देना चाहते हैं । तब ब्रह्मा ने इन्द्र को श्रीकृष्ण का दर्शन कराया और कहा देखो, जब साक्षात् विष्णु भगवान श्रीकृष्ण का रूप धारण करके गोकुल की रक्षा कर रहे हैं, तो तुम उनका कैसे नाश कर सकते हो ? यह सुन इन्द्र को पश्चात्ताप हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण से क्षमा की प्रार्थना की। इसके बाद श्रीकृष्ण ने कहा कि हे इन्द्र! तुम इन गोपों को क्षमा करो और यह वर दो कि ये गोवर्द्धन की ही पूजा किया करें। इन्द्र ने इसको सहर्ष स्वीकार किया और उसी समय से अन्नकूट भगवान् और गोवर्द्धन की पूजा आरम्भ हो गई। un di: effe rea f ing di he SO ulc ati try ue b th T acc unt rvell Lcat
यमद्वितीया या प्रावृद्वितीया
Va
र्तिक शुक्लपक्ष की द्वितीया को यमद्वितीया कहते
हैं। इसके सम्बन्ध में यह कथा कही जाती
का
है कि पहले किसी समय में यमुना जी
नित्यप्रति यमराज से जाकर प्रार्थना
करती थीं कि भाई तुम मेरे घर अपने
सब गणों के साथ भोजन करने को चलो।
यमुना जी की इस प्रार्थना को यमराज
टालते रहे। कभी कहते थे कि आज चलेंगे, कभी कल; किन्तु
जब इसी तरह बहुत दिन बीत गए और यमराज नहीं आए, तो
यमुना जी ने जबरदस्ती यमराज को अपने यहाँ बुलाया। जिस
दिन यमराज यमुना जी के यहाँ आए उस दिन कार्तिकी द्वितीया
थी। यमुना जी ने अपने भाई यमराज का बड़ा सत्कार किया।
चलते समय यमराज ने अपनी बहिन से कहा कि कुछ माँगो ! इस
पर यमुना जी ने कहा कि भैया मैं यही माँगती हूँ कि तुम प्रति
वर्ष इसी दिन मेरे यहाँ भोजन करने आया करो। यमराज ने
आने की प्रतिज्ञा की और यह भी कहा कि केवल इतना ही नहीं,
।
११५ यमद्वितीया या भ्रातृद्वितीया GOIN tenc cal इस दिन जो बहिन अपने भाई को बुला कर भोजन करायेगी, उसको वैधव्य कभी भी न होगा। हर एक मनुष्य का कर्तव्य है कि इसी दिन अपनी बहिन के यहाँ भोजन करे और बहिन को वस्त्र और आभूषण दे। जो बहिनें इस यमद्वितीया को यथाविधि मनावेंगी, उनके भाई चिरायु होंगे। pot. bge - on as lis SC un di effe rea f ins edi he S6 Sul ati miry ue ti । T acc nt evel cat - S HAR
अजयकृतीया
।
।
शाख कृष्णपक्ष की तृतीया को यह होती है । कहते हैं
कि परशुराम इसी दिन पैदा हुए थे और त्रेता युग
का भी इसी दिन आरम्भ हुआ था। इस दिन
तिलों से मृत पितरों का श्राद्ध किया जाता है।
ब्राह्मण को इस दिन एक कलश जल, एक पञ्चा और एक जोड़ी
जूता दान दिया जाता है, ताकि गरमी में स्वर्ग में यह चीजें उन्हें
मिल जायें । गरमी इसी दिन से प्रारम्भ हो जाती है। इस दिन
गौरी की अन्तिम पूजा भी होती है। सधवा स्त्रियाँ और कन्याएँ
इस दिन गौरी की पूजा करती हैं और मिष्टान्न, फल और भीगे
हुए चने बाँटती हैं।
महात्म्य और पौराणिक कथा
व्रतराज में लिखा है कि किसी समय एक बड़ा महोदय नाम
का वैश्य हुआ। उसने एक दिन किसी पण्डित के कथा कहते
समय अक्षयतृतिया का महात्म्य सुना कि यदि यह
तृतिया बुधवार के दिन रोहिणी नक्षत्रयुक्त हो, तो यह
अत्यन्त फल देने वाली होती है । महोदय वैश्य ने यह
सुन कर गङ्गा में स्नान किया और पितृ देवता का तर्पण किया।
११७ अक्षयतृतीया Rom tenc cal घर में मकर अन्नोदक सहित कटोरों का, पङ्खों का, अन्न, व्यजन, . छत्र सहित घटों का दान किया और जौ, गेहूँ, लवण, सत्तू, दध्योदन और इक्षु-विकार (गुड़ के बने हुए पदार्थ) सुवर्ण सहित ब्राह्मण को दिए । जब यह वैश्य कुछ दिनों बाद वैकुण्ठवासी हुआ, तो इस व्रत के प्रताप से कुशवती नाम की नगरी में राजा हुआ और उसको अक्षय सम्पत्ति मिली । इसीसे इस पर्व का नाम अक्षयतृतीया पड़ा। pot. oge on Ins nis SC un. di leffe rea of int Edi he SU bulc ati ary ue T ncc eve] cat
सोमवती अमावस्या
z
ब अमावस्या सोमवार को पड़ती है, तब यह
तिथि मनाई जाती है। पीपल के वृक्ष के
नीचे जाकर सौभाग्यवती स्त्रियाँ वृक्ष की
जा
१०८ प्रदक्षिणा करती हैं। १०८ फल, मिष्ठान्न
या रुपये-पैसे लेकर इस दिन उसी वृक्ष के
नीचे फेरी देती हैं। स्त्रियाँ इस दिन तेल नहीं
छूती । दान की हुई चीज्र ब्राह्मणों को दी जाती है । सुहाग के पुष्ट
करने और सन्तति-प्राप्ति के लिए यह व्रत किया जाता है।
पौराणिक कथा
महाभारत युद्ध के समाप्त हो जाने के बाद शर-शय्या पर
पड़े हुए भीष्म के पास युधिष्ठिर ने जाकर कहा-कि हे पितामह !
इस युद्ध में कुरुवंश के भी सभी मुख्य लोग मर गए । बचे हुए
राजाओं को भी क्रोधी भीमसेन ने मार डाला, भरत-वंश में
केवल हम ही शेष हैं। सन्तति के विच्छेद को देख कर हमारे
हृदय को बड़ा सन्ताप होता है । उत्तरा बहू के गर्भ से उत्पन्न हुमा
परीक्षित भी अश्वत्थामा के अन से दग्ध हुश्रा। इससे अपने वंश
के नाश को देख कर मुझे दूना दुख है। हे पितामह ! मैं क्या करूँ,
।
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सोमवती अमावस्या 2017 siend ical pot. ogc on ns his so । जिससे चिरञ्जीवी सन्तति प्राप्त हो। तब श्रीभीष्म जी ने उत्तर दिया कि जिस दिन सोमवार को अमावस हो, उस दिन पीपल के पास जाकर जनार्दन की पूजा * और पीपल की १०८ परिक्रमा करे। १०८ ही रत्न या सिक्के या फल को लेकर प्रदिक्षणा करे। हे राजन् ! यही व्रत तुम उत्तरा से कराओ, तब उसका मृत गर्भ जी जायगा और तीनों लोकों में विख्यात और गुणवान् होगा । तब युधिष्ठिर ने पूछा कि कृपा करके बतलाइए कि यह व्रत मनुध्य-लोक में किसने किया ? भीष्म जी ने उत्तर में कहा कि इस भूमि में कान्ति नाम की पुरी थी। जिसमें रत्नसेन नाम का राजा राज करता था। वहाँ देवस्वामी नामक ब्राह्मण रहता था। इस ब्राह्मण की धनवती नाम की स्त्री थी। ब्राह्मण के इस पत्नी से सात पुत्र और एक कन्या पैदा हुई। लड़कों का तो विवाह हो गया था; किन्तु लड़की का विवाह नहीं हुआ था । ब्राह्मण योग्य वर की तलाश में था। एक दिन एक बड़ा तेजस्वी ब्राह्मण भिक्षा माँगने आया। बहुओं ने जब इस ब्राह्मण को पृथक्-पृथक् भिक्षा दी, तब उस समय इस ब्राह्मण ने उन्हें सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद दिया ; किन्तु जब गुणवती कन्या ने मिक्षा दी, तो उस ब्राह्मण 'धर्मवती हो ऐसी आशीश दी। गुणवती ने अपनी माता जाकर जो आशीर्वाद ब्राह्मण ने उसे और उसकी भावजों को pun di eff of ing Edu the न 12 SI buld ati ary lue . तस्यामश्वत्थमात्यपूजयेञ्चजनार्दनम् । T । व्रतराज,४४३ c tl T ncc ont evel acat । हिन्दु-त्योहारों का इतिहास दिया था कह सुनाया। माता ने उस ब्राह्मण के पास आकर इसका कारण पूछा कि गुणवती को सौभाग्यवती होने का आशीर्वाद क्यों नहीं दिया ? ब्राह्मण ने उत्तर दिया कि गुणवती को भाँवर के समय ही वैधव्य प्राप्त होगा, इसलिए मैं ने ऐसा वरदान दिया है। उसके इस वचन को सुन कर धनवती को बड़ी चिन्ता हुई और बारम्बार प्रणाम करके ब्राह्मण से प्रार्थना की कि इसका कोई उपाय बताइए; तब भिक्षक ने कहा कि जब तेरे घर में सोमा आए, तो उसी समय उसके पूजन से वैधव्य का नाश होगा । धनवती ने पूछा कि सोमा कौन जाति है और कहाँ रहती है ? ब्राह्मण ने कहा कि यह जाति की धोबिन है और सिंहलद्वीप की रहने वाली है। वह जब आवेगी, तब तेरी लड़की का वैधव्य भङ्ग होगा। यह कह कर ब्राह्मण भिक्षा माँगता-माँगता अन्यत्र चला गया। माता ने अपने पुत्रों को बुला कर कहा कि तुम लोग अपनी बहिन गुण- वती को साथ लेकर सिंहलद्वीप जाओ और सोमा को बुला लाओ । लड़कों ने दुर्गम मार्ग की चिन्ता करके जाने से इन्कार कर दिया; किन्तु पिता के कुपित होने पर शिवस्वामी नाम का सबसे छोटा लड़का अपनी बहिन को लेकर रवाना हो गया। बहुत दिन सफर करने के बाद वह समुद्र के तट पर पहुँचा और वहाँ से समुद्र को पार करने की चिन्ता करने लगा। समुद्र के तट पर ही एक वट का वृक्ष था। उस वृक्ष पर गिद्ध ने अपने बच्चे रख छोड़े थे। उसी वृक्ष के नीचे बैठ कर गुणवती और शिवस्वामी ने सारा दिन व्यतीत कर दिया। सायङ्काल को गिद्ध जब अपने बच्चों को चारा ।
सोमवती अमावस्या hon ienc ical (pot. toge on ns his es pun ad i effe चुगाने लम्प, तो बच्चों ने नहीं खाया । कारण पूछने पर बच्चों ने कहा कि जब तक वृक्ष के नीचे बैठे हुए दोनों मनुष्य भोजन नहीं करते, तब तक हम लोग भी भोजन नहीं करेंगे। इस पर गिद्धराज ने आकर शिवस्वामी से उनका वृत्तान्त पूछा । मालूम होने पर गिद्धराज ने उन्हें दूसरे दिन प्रातःकाल सोमा धोबिन के यहाँ पहुँचा देने का वचन दिया । दूसरे दिन अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार गिद्धराज ने गुणवती और शिवस्वामी को सिंहलद्वीप में सोमा घोबिन के यहाँ पहुँचा दिया। यह दोनों सोमा धोबिन के घर में साल भर तक बराबर दास-दासी का काम करते और घरलीपते-बुहारते रहे। घर की असाधारण सफाई देख कर सोमा ने एक रोज पूछा कि आखिर मेरे घर की नित्यप्रति सफाई कौन कर जाता है । बहुओं ने कहा हम नहीं जानतीं, हमने स्वयं तो कभी बुहारी दी नहीं और न लीपा। एक दिन छिप कर देखा, तो ब्राह्मण- कन्या को घर के आँगन की बुहारी देते हुए और ब्राह्मण-बालक को लीपते हुए पाया। उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। उसने इनसे पूछा- . ब्राह्मण होकर तुम इस प्रकार शूद्र की सेवा क्यों करते हो ? उन्होंने अपनी कथा सुनाई और उससे प्रार्थना की कि वह उनके साथ चले सोमा चलने पर राजी हो गई। चलते समय उसने अपने घर के बी-पुरुषों को यह आदेश दिया कि मेरी अनुपस्थिति में यदि कोई मर जाय, तो उसको ज्यों का त्यों रखना। सोमा गुणवती के घर बाई । गुणवती का विवाह रुद्र शर्मा से निश्चित हो चुका था। भाँवरें हो ही रही थीं कि रूद शर्मा का एक दम प्राणान्त हो गया gres of cinę Edi the h si oul tati हिन्दू त्योहारों का इतिहास सारे घर में रोना-पीटना होने लगा। किन्तु सोमा को जरा भी चिन्ता नहीं हुई। उसने गुणवती को व्रतराज का फल सङ्कल्प करके दिया, जिसके प्रभाव से रुद्र शर्मा निद्रा से जागने के समान उठ खड़ा हुआ। जब सोमा अपने घर वापस भावे, तो यहाँ उसके पुत्र, स्वामी और दामाद सब मर चुके थे। उस दिन सोमवती अमावस्या थी, जिसे मृत सचीवनी तिथि भी कहा हैं। रास्ते में उसे एक बी रुई से लदी हुई मिली, जो दबी जा रही थी। उसने सोमा से बहुत प्रार्थना की कि बोन में कुछ सहारा दे दे; किन्तु सोमा ने इन्कार कर दिया और कहा कि आज सोमावती अमावस्या है, इस दिन नई या मूली कुछ भी नही हुई जाती । सोमा ने तुरन्त ही पीपल के वृक्ष के नीचे जाकर हाद में शकर लेकर वृक्ष की १०८ प्रदक्षिणाएँ की और विष्णु भगवान का पूजन किया । पूजन के प्रभाव से उसके पुत्र, दामाद और कन्या भी जी उठे। सोमा जब अपने घर आई, तो सारा हाल सुना। बहुओं ने अपने कुटुम्बों के मरने और उनके फिर से जीने का कारण पूछा, तब उसने बताया कि मैंने गुग्गवती कन्या को जिसका सुहाग खरिडत था, व्रतराज का फल प्रदान किया, इससे उसका वैधव्य तो नष्ट हो गया। मेरे कुटुम्ब का सवाग जाता रहा । फिर जब सोमवती अमावस्या को पूजन किया। तब उसके प्रभाव से पहिले की तरह फिर हो गया इसी समय से इस पत्र का प्रचार हुआ है और आज हिन्दू मात्र इसे मानता है ! -- M n011 riend lical विद्याविनोद-ग्रन्थमाला pot toge के on प्राहक बनिए। ons his es c इसमयमाला का एकमात्र उद्देश्य सामाजिक जीवन में क्रान्ति पैदा कर देना, खियों के स्वत्वों के लिए अन्यायी समाज लेझगडना और स्त्रियों के हित की बातें उन्हें बतलाना है। इन्हीं হে আলী জা জানেন হজ কাৰ অনৰ লশের মাই অজান नक प्रकाशित होती हैं। यही कारण है कि इसके स्थायी- আনুক অঙ্কে সহ নাবীল অননী জ্বী আঃ দু আৰব । आप भी इस मन्थमाला के स्थायी-ग्राहक बन कर उसके लाभ oun ad i effe grea bf ting Edu the h SE ould Cati नियमावली 1-अाइ जाने प्रवेश-फीस' देने से कोई भी स्थायी-ग्राहक बन सकता है। वह प्रवेवा-कीस' एक साल के बाद, यदि मम्बर न रहना चाहे, ती वापस भी कर दी जाती है। स्थायी प्राहकों को हमारे कार्यालय की प्रकाशित कुल पुस्तके पानी कीमत में दी जाती है। ইনানুক অন ক ভ ক থাৱিন্ত এক্সামির যে জয়া আ sary lue . It.ti T incd ont eyel ucat
( २ )
लेना प्राहकों की इच्छा पर निर्भर है। परन्तु आगे निकलने वाले
ग्रन्थ उन्हें लेने पड़ते हैं।
४ वर्ष भर में कम से कम बारह रुपयों के मूल्य के (कमीशन
काट कर ) नवीन प्रन्थ प्रत्येक स्थायी-ग्राहक को लेने पड़ते हैं।
बारह रुपये से अधिक मूल्य की पुस्तकें, यदि एक वर्ष में निकलें,
तो १२) रूपये की किताबें लेकर शेष प्रन्यों के लेने से प्राहक, यदि
वे चाहें, तो इन्कार कर सकते हैं।
५-किली उचित कारण के बिना, यदि किसी पुस्तक की
वी० पी० वापस आती है, तो उसका डाक खर्च आदि प्राहक को
देना पड़ता है । वी० पी० वापस करने वालों का नाम प्राइक-श्रेणी
से अलग कर दिया जाता है।
६- प्रवेश फीस के आठ आने पेशगी मनीऑर्डर से भजने
चाहिए।
७ स्थायी-प्राहक पुस्तकों को चाहे जितनी प्रतियाँ। चाहे
जितनी बार, योनी कीमत में मंगा सकते हैं।
८-स्थायी-ग्राहकों को अपनी पुस्तकों के अलावा हम समी.
हिन्दी पुस्तकों पर, जो हमारे यहाँ विक्रयार्थ प्रस्तुत रहती है। एक
आना फी रुपया कमीशन भी देते हैं।
पत्र-व्यवहार करने का पता :-
व्यवस्थापिका
'चाँद' कार्यालय, २८ एल्गिन रोड, इलाहाबाद
बिद्याविनोद अन्यमाला को विख्यात पुस्तके snon प्रेम-प्रमोद riend lical ypot toge on ons this es a loun nd i eff grea of বি- সাত মণব লী । গ্রন্থ আল মর-অন্তু বিরানী আৰ জনজ এ-মিলা নহৰু স্নৰ ৰ ৰান্ধায় আ হ ই ক্ষিী মনৰ জী ক্ষী ভৰা নামিক মলা, “বার ছ ল মঙ্কাৰিাৰ দুই। উনুন । স্কা দিলী আছিয় ৪ বা আন ই বা দুই ঘানা ন । অথঙ্কৰ অৱকাই ভিন্না বন্ধ ঘর আর আঁ আৰু ৰ ঘন ।বিৰীৰলাই মলীবিছাল জানিবল জুম্মা অ্যয়ৰ মন ভাল জিয়া , অন্য জিলী নড় ছিলাে। অধী কাজে ই কি ভারী দলবিরী গান ডায়ানা জ মনে ম আৰু কা লা অষম হয়না । তার জীবনে আর্মী আমীমবৰাজী জা অe অন কর । দুজন বন মন্ত্র লী কী অসী জাকিয়া কা করে জিয়া আনা হল আর ৪ বিতর নীল-নাৰ সুষ ৪ মুয়াবিন না। মুনম হত না জানি না ভাই गई. जिनस पुस्तक का महत्व और भी बढ़ गया নাম জান্নালিলী জ ল চিৰ ৰ যত্মহল বিহা হা ৪। অন্ধ হন হল অব স্বী আল দ ন হজ অনি না আন্থিৰ । ৰ কাম ব্যায় কম আবিদা ন fা অৱ লাল, হজ আলী খঃ তডিজ স্বামী অাল হয় না আযী জীৰ বৰিখন হজ আৰজভক ভী। কে জাহাবি অাঁর জানায়, জলাভাই ting Edu the ch s could cati sary Blue s, E tE ১. T incc itt on t eve. ucat विद्याविनोद-प्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें कहानियाँ चाहे दस वर्ष बाद पढ़िए, आपको उनमें वही मज़ा मिलेगा । छपाई-सफाई सुन्दर । बढ़िया काग़ज़ पर छपी तथा समस्त कपड़े की सजिल्द पुस्तक का मूल्य २१) १०; पर स्थायी-प्राहकों से AMRमात्र! - हिन्दू-त्योहारों का इतिहास [ले. श्री. शीतलासहाय जी, बी० ए० ] हिन्दूत्योहार इतने महत्त्वपूर्ण होते हुए भी, लोग इनकी उत्पत्ति के सम्बन्ध में कुछ भी नहीं जानते ! जो खियाँ विशेष- रूप से इन्हें मानती हैं, वे भी अपने त्योहारों की वास्तविक उत्पत्ति से बिलकुल अनभित है। कारण यही है कि हिन्दी संसार में अब तक एक भी ऐसी पुस्तक प्रकाशित नहीं हुई । वर्तमान पुस्तक के सुयोग्य लेखक ने छः मास कठिन परिश्रम करने के बाद यह पुस्तक तैयार कर पाई है ! शास्त्र-पुराणों की खोज कर स्योहारों की उत्पत्ति लिखी गई है। इन त्योहारों के सम्बन्ध में जा. कथाएं प्रसिद्ध है, वे वास्तव में बड़ी रोचक हैं। ऐसी कथाओं का भी सविस्तार वर्णन किया गया है। प्रत्येक त्योहार के सम्बन्ध में जितनी अधिक खोज से लिखा जा सकता था, लिखा गया है। यापिका चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद Prani का एक Hindi -- --- S nou iend ical विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तके विशेष तूलन देकर हम केवल इतना ही कहना चाहते हैं कि ऐसी उपयोगी और अनमोल पुस्तक की एक प्रति प्रत्येक भारतीय गृह में पहुँचनी चाहिए और खास कर, स्त्रियों को इसे पढ़ कर शान-वृद्धि करनी चाहिए । मूल्य सजिल्द पुस्तक का ) १०; पर स्थायी प्राहकों के लिए केवल || नवीन संस्करण अभी प्रकाशित हुआ है। pot coge । ons This 25 C विधवा-विवाह-मीमांसा oun nd i : effe grea of N ting Edi the [ले. श्री गंगाप्रसाद जी उपाध्याय, एम० ए० ) यह महत्वपूर्ण पुस्तक प्रत्येक भारतीय गृह में रहनी चाहिए। इसमें नीचे लिखी सभी बातों पर बहुत ही योग्यतापूर्ण और जबर्दस्त दलीलों के साथ प्रकाश डाला गया है :- (१)विवाह का प्रयोजन क्या है ? मुख्य प्रयोजन क्या और गौण प्रयोजन क्या? आजकल विवाह में किस-किस प्रयोजन पर रष्टि रक्खी जाती है ? (२) विवाह के सम्बन्ध में स्त्री और पुरुष के अधिकार और कर्तव्य समान है या असमान ? यदि समानता है, तो किन-किन बातों में और यदि भेद है, तो किन-किन बातों मैं ! (३) पुरुषों का पुनर्विवाह और बहु-विवाह धर्मानुकूल है या धर्म-विरुद्ध ? शास्त्र इस विषय में क्या कहता है ? (४) स्त्री व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद Ich se vould icati. ssary alue es,E ut ti "s. T inco tion t
विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें
"का पुनर्विवाह उपर्युक्त हेतुओं से उचित है या अनुचित ? (५)
वेडों से विधवा-विवाह की सिद्धि । (६) स्मृतियों की सम्मति ।
(७) पुराणों की साक्षी ।(८) अगरेजी-कानून ( English
Law ) की आज्ञा । (९) अन्य युक्तियाँ। (१०) विधवा
विवाह के विरुद्ध आक्षेपों का उत्तर:-(अ) क्या स्वामी दयानन्द
विधवा-विवाह के विरुद्ध हैं ? (आ) विधवाएँ और उनके कर्म
तथा ईश्वर-इच्छा ; (इ) पु षों के दोष स्त्रियों को अनुकरणीय
नहीं; (ई) कलियुग और विधवा-विवाह; (3) कन्यादान
विषयक आक्षेपः (ऊ) गोत्र-विषयक प्रश्न; (क) कन्यादान
होने पर विवाह वर्जित है; (ऋ.) बाल-विवाह रोकना चाहिए,
न कि विधवा-विवाह की प्रथा चलाना; (ल) विधवा-विवाह
लोक-व्यवहार के विरुद्ध है; (ल) क्या हम आर्य-समाजी हैं,
जो विधवा-विवाह में योग दें? (११) विधवा-विवाह के न होने
से हानियाँ:-
(क) व्यभिचार का आधिक्य; (ख) वेश्याओं की
वृद्धिः (ग) भ्रूण-हत्या तथा बाल-हत्या; (घ) अन्य ऋरताएँ
(अ) जाति का हास; और (१२) विधवाओं का कच्चा चिट्ठा।
इस पुस्तक में बारह अध्याय हैं, जिनमें क्रमशः उपर्युक्त
विषयों की आलोचना बड़े ही ओजस्वी एवं मार्मिक ढङ्ग से की
गई है। कई तिरों और सादे चित्र भी हैं।
त व्यवस्थापिका चाँद कार्यालय, इलाहाबाद
non विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें इस मोटी-ताजी सचित्र और सजिल्द पुस्तक का मूल्य केवल १०. है; पर स्थायी प्राहकों को पौने मूल्य अर्थात् २) रु० में दी जावेगी। J ziend ical rpot toge on Ons this es c noun ndi effe grea of [ले० श्री रामकिशोर जी मालवीय, सहकारी-सम्पादक अभ्युदय'] इस पुस्तक में देश-भक्ति और समाज-सेवा का सजीव वर्णन किया गया है। देश की वर्तमान अवस्था में हमें कौन-कौ सामाजिक सुधार करने की परमावश्यकता है; और वे सुधार किस प्रकार किए जा सकते हैं आदि आवश्यक एवं उपयोगी विषयों का लेखक ने बड़ी योग्यता के साथ दिग्दर्शन कराया है। उपन्यास होते हुए भी, यह पुस्तक एक व्याख्यान है और इसके पढ़ने से देश की वास्तविक स्थिति आँखों के सामने चित्रित हो जाती है। शान्ता और गङ्गाराम का शुद्ध और आदर्श प्रेम देख कर हृदय गद्गद् हो जाता है। इनमें इन दम्पति का सत्चरित्र और समाज- सेवा की लगन का भाव ऐसी उत्तमता से वर्णन किया गया कि पुस्तक छोड़ने की इच्छा नहीं होती। साथ ही साथ हिन्दू- समाज के अत्याचार और षड्यन्त्र से शान्ता का उद्धार देख कर ma व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहापाद utin Edu the Ich s vould icati ssary alus es,H ut tl •s. T inco iont level lucat विद्याविनोद ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें साथ ही साथ अनुचित प्रेम से, मनुष्य की अधोगति के चित्र से आपकी आँखें खुल जायँगी । उलझाने वाली मनोरजक घटनाओं साथ ही साथ इसमें ऐसी उपयोगी बातों का खाका नज़र आवेगा, जो बिगड़े का सुधार और बिगड़ने वालों को सावधान कर देगा । स्त्रियों का सुधार बहुत कुछ पुरुषों की सच्चरित्रता और उनकी विज्ञता पर निर्भर है; किन्तु इससे मालूम होगा कि स्त्रियाँ यदि चाहे, तो अपनी शक्ति को पहिचान कर लम्पट और अज्ञानी पुरुषों के दाँत खट्टे कर सकती हैं और इस प्रकार उन्हें सन्मार्ग पर लाकर समाज तथा देश का मुख उज्ज्वल कर सकती हैं। यह उत्तम और गुणकारी रत्न प्रत्येक स्त्री-पुरुष कोअपने पास रखना चाहिए । हमारा आपसे विशेष अनुरोध है कि, इसे ज़रूर पढ़े ! इसको पढ़ कर आप अवश्य प्रसन्न होंगे इसमें किञ्चित्मात्र भी सन्देह नहीं है । सर्वसाधारण की पहुँच से बाहर न होने पावे- इस विचार से, सर्वगुण सम्पन्न रहने पर भी इसका मूल्य इसका मूल्य केवल २) रुपए । स्थायी-प्राहकों से इसके ।।) ० ही लिए जाते हैं। बनमाला [ ले० श्री० चण्डीप्रसाद जी, बी० ए०, हृदयेश' ] इस पुस्तक की उपयोगिता और सरसता को आप लेखक के REP व्यवस्थापिका 'चाँद कार्यालय, इलाहाबाद :onom erienc anical wypot. > toge S 012 विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें नाम ही से मालूम कर सकते हैं। कहने की आवश्यकता नहीं है कि 'इदयेश जी ने अपनी लेखन-शैली द्वारा हिन्दी-संसार को चकित कर दिया है और वे स्वर्ण-पदक भी प्राप्त कर चुके हैं। प्रस्तुत पुस्तक में 'हृदयेश जी की लिखी हुई "चाँद" में प्रकाशित सभी गल्पों का संग्रह किया गया है। इन गल्पों द्वारा सामाजिक अत्याचारों तथा कुरीतियों का हृदय-विदारक दिग्दर्शन कराया गया है और इस विश्व के रड-मञ्च पर होने वाले पाप और पुण्यमय कृत्यों का मधुर और सुन्दर विवेचन किया गया है। जिन सज्जनों ने 'हृदयश जी के उपन्यासों और गल्पों को पढ़ा है, उनसे हमारी प्रार्थना है कि इन छोटी, परन्तु सारगर्भित एवं सरल भाषायुक्त गल्पों को भी पढ़ कर अवश्य लाभ उठावें । पुस्तक के अन्त में २ छोटे-छोटे रूपक (नाटक) भी दिए गए हैं। पुस्तक की छपाई-सफाई अत्यन्त सुन्दर और पृष्ट-संख्या लगभग ५५० है । सजिल्द पुस्तक का मूल्य केवल ३) रुपय स्थायी-ग्राहकों से २०० मात्र । ions this cies C noun and i c effe । grea of 'ating 1. Edi Tr the ich si voul icati -ssary ralue अंकलानों पर अत्याचार [ले० श्री० जी० एस० पथिक, बी० ए०, बी० कॉम ] इस पुस्तक में भारतीय स्त्री-समाज का इतिहास बड़ी रोचक - व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद es, b ut ti is. T incc ion t level · lucat
-14
7.1
।
विद्याविनोद ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें
- भाषा में लिखा गया है। इसके साथ स्त्री-जाति के महत्त्व को,
उससे होने वाले उपकार, जागृति एवं सुधार को बड़ी उत्तमता
1 और विद्वत्ता से प्रदर्शित किया गया है । पुस्तक में वर्णित स्त्री-
ला- जाति की पहिली अवस्था, उन्नति एवं जागृति को देखकर हृदय
6-2 छटपदा उठता है और उस काल को देखने के लिए लालायित हो
जाता है।
साथ ही साथ वर्तमान स्त्री-समाज की करुणाजनक स्थिति
का जो सच्चा और नग्न चित्र चित्रित किया गया है, वह दय में
शान्ति पैदा करता और करुणा एवं घृणा का मिश्रित भाव हदय में
अङ्कित कर देता है।
इतना ही नहीं, स्त्री-समाज के प्रत्येक पहलू को लेखक ने बड़ी
योग्यता से प्रतिपादित किया है। अधिक न कह कर, यदि कह
जाय कि पुस्तक स्त्री-समाज के लिए अत्यन्त उपयोगी है तो कोई
अतिशयोक्ति नहीं होगी। इस पुस्तक को प्रत्येक गृहस्थी में
रखना चाहिए।
छपाई-सफाई अत्युत्तम । लगभग ५०० पृष्ठ की। सजिल्द
पुस्तक का मूल्य केवल २ स्थायी प्राहकों से ) मात्र!
हो ।
।
SH
व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद
विद्याविनोद-प्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें Onon riend thical ypoti toge - 3 on cons this ies C noun find is मंगल-पमात [ ले० श्रीयुत चण्डीप्रसाद जी, बी० ए०, 'हृदयेश' ] इस सुन्दर उपन्यास में मानव-हृदय की रङ्गभूमि पर वासना के नृत्य का दृश्य दिखलाया गया है। सामाजिक अत्याचार और बेमेल विवाह का भयङ्कर परिणाम पढ़ कर जहाँ हृदय काँप उठता है, वहाँ विशुद्ध प्रेम, अतुल सहानुभूति और समाज की हित-कामना इत्यादि के सुन्दर दृश्यों को देख कर हृदय में पक अनिर्वचनीय शान्ति का स्रोत बहने लगता है। कहने का तात्पर्य यह है कि प्रस्तुत उपन्यास में इस विश्व की रङ्गभूमि पर अमिनीत होने वाले पाप और पुण्य के कृत्यों का बड़ा ही मधुर- सुन्दर विवेचन किया गया है। भाषा सरस, सरल एवं कवितामयी है । बहु-भाषा के ऐसे- वैसे अगणित उपन्यासों की तो गिनती ही क्या, प्रस्तुत पुस्तक बैंगला के अच्छे उपन्यासों से भी श्रेष्ठ सिद्ध हुई है। छपाई-सफाई बहुत ही सुन्दर है, साथ ही मनोहर, सुनहरी समस्त कपड़े की जिल्द से भी पुस्तक अलंकृत की गई है । पृष्ट- संख्या लगभंग ८०० कागज़ ४० पाउण्ड एन्टिक, मूल्य ५) मात्र । स्थायी-माहकों से ३५ रु! आज ही एक प्रति मँगा कर लाभ उठाइय; केवल २०० कापियाँ शेष बची है। c effe grea of ating 1. Edu the ich sc vould icatio nissary 'alue es, b ut tH व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद 's. T inc ion lev Much विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें शैलकुमारी (ले० पं० रामकिशोर जी मालवीय, सहकारी-सम्पादक "अभ्युदय"] यह उपन्यास अपनी मौलिकता, मनोरञ्जकता, शिक्षा, उत्तम लेखन-शैली तथा भाषा की सरलता और लालित्य के कारण हिन्दी- संसार में विशेष स्थान प्राप्त कर चुका है । अपने दङ्ग के इस अनोखे उपन्यास में यह दिखाया गया है कि आजकल एम० ए०, बी० ए० और एफ० ए० की डिग्री प्राप्त स्त्रियाँ किस प्रकार अपनी विद्या के अभिमान में अपने योग्य पति तक का अनादर कर उनसे निन्दनीय व्यवहार करती हैं, किस प्रकार उन्हें घरेलू काम-काज से घृणा उत्पन्न हो जाती है, अपने पति से वे किस प्रकार खिदमतें कराती हैं। और उनका गार्हस्थ्य जीवन कितना दुखपूर्ण हो जाता है ! 1. दूसरी और यह दिखाया गया है कि पढ़े-लिखे युवकों के साथ फूहड़ तथा अनपढ़ और गंधार कन्याओं का बेजोड़ विवाह जबर्दस्ती कर देने से दोनों का जीवन कैला दुखमय हो जाता है। इन सब बातों के अलावा स्त्री-समाज के प्रत्येक महत्वपूर्ण विषयों पर प्रकाश डाल कर उनकी बुराइयाँ दूर करने के उदाहरण दिए गए हैं। चित्रों को देख कर आप हँसते-हँसते लोट-पोट हो जायेंगे। व्यवस्थापिका चाँद कार्यालय, इलाहाबाद -- NE समान -- ।
on011 विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तके इस पुस्तक में एक खास विशेषता यह है कि समाज में. फैली हुई लगभग सभी बुराइयाँ आपके आँखों के आगे नाचने लगेंगी। दो तिरों और चार सादे चित्रों से सुसज्जित लगभग २५० पृष्ट की इस सुन्दर पुस्तक का मूल्य केवल ||); स्थायी ग्राहकों से १०), पहिला संस्करण केवल २ मास में हाथों-हाथ बिक गया था । यही पुस्तक की उत्तमता का सबसे भारी प्रमाण है। नवीन संस्करण अभी प्रकाशित हुआ erienc inical lypot. toge 'S 017 ions है this cies C noun iandi t.c effe grea of । cating $11. Edi r the मनोरञ्जक कहानियां [ ले० श्री० अध्यापक ज़हूरबख्श जी, “हिन्दी-कोविद'' ] श्री० जहरबख्श जी की लेखन-शैली बड़ी ही रोचक और मधुर है। आपने बालकों की प्रकृति का अच्छा अध्ययन भी किया । आपने यह पुस्तक बहुत दिनों के कठिन परिश्रम के बाद लिखी है। इस पुस्तक में कुल १७ छोटी-छोटी शिक्षाप्रद, रोचक और सुन्दर हवाई कहानियाँ हैं, जिन्हें बालक-बालिकाएँ बड़े मनोयोग से सुनेंगे। बड़े-बूढ़ों का भी इससे यथेष्ट मनोरञ्जन हो सकता है। पृष्ठ-संख्या २०० से अधिक, छपाई-सफाई अच्छी है । इस TUE- व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद ich se youk nicati ssary ralue es,E utti 'S. T न MARAT incc ion t level Bucat
SH
विद्याविनोद-ग्रन्यमाला की विख्यात पुस्तकें
• बार पुस्तक सचित्र प्रकाशित हुई है। फिर भी मूल्य दही रखा
गया है--१); स्थायी प्राहकों से II) मात्र ।
मनारमा
[ले. श्रीयुत चण्डीप्रसाद जी, बी० ए०, 'हृदयेश ]
यह उपन्यास निःसन्देह हिन्दू समाज में ऋान्ति उत्पन्न कर
देगा। समाज का नगा चिन्न जिस योग्यता से इस पुस्तक में अङ्कित
किया गया है, हम दावे के साथ कह सकते हैं कि वैसा एक भी
उपन्यास अब तक हिन्दी-संसार में नहीं निकला है । बाल-विवाह
और वृद्ध-विवाह के भयङ्कर दुष्परिणामों के अलावा भारतीय
हिन्दू-विधवाओं का जीवन जैसा आदर्श और उच्च दिखलाया
गया है, वह बड़ा ही स्वाभाविक है।
इस पुस्तक के लेखक हिन्दी-संसार के रत्न है, अतपय भाषा
के सम्बन्ध में कुछ भी कहना वृथा है ! पुस्तक की भाषा इतनी
सरल, रोचक और दयग्राही है कि उठा कर कोई इसे छोड़
नहीं सकेगा। इस पुस्तक की छपाई-सफाई देखने ही योग्य है।
पुस्तक सजिल्द निकाली गई है। मूल्य केवल २॥) 5०, स्थायी--
- व्यवस्थापिका चाँद कार्यालय, इलाहाबाद
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विद्याबिनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तके प्राहकों से (1) मात्र! पहिला संस्करण केवल ४ मास में विक्र . चुका है, नीन संस्करण छप रहा है। ! Con017 serienc hnical hypot ) toge मनोहर ऐतिहासिक कहानियाँ Son ions this cies C noun and i c eff: grea of [ ले० श्री. अध्यापक जहूरज श जी, "हिदी-कोविद" ] इस पुरतक में पूर्वीय और पाश्चात्य, हिंदू और मुसलमान स्त्री-पुरुष सभी के आदर्श छोटी-छोटी कहानियों द्वारा उपस्थित किए गए हैं, जिलस बालक-बालिकाओं के हृदय पर छोटेपन ही से दयालुता, परोपकारिता, मित्रता, सच्चाई और पवित्रता आदि सद्गुणों के बीज को अकुरित करके उनके नतिक जीपन को महान पवित्र और उज्ज्पल बनाया जा सके। इस पुरतक की सभी कहानियाँ शिक्षाप्रद और ऐसी हैं कि उनसे बालक-बालिकाएँ, स्त्री-पुरुष सभी लाभ उठा सकते हैं। रेखक ने बालकों की प्रकृति का भली-भाँति अध्ययन करके इल पुरतक को लिखा है। इससे अनुमान किया जा सकता है कि पुस्तक कैसी और कितनी उपयोगी होगी। हमें आशा है, देश- यासी इस पुस्तक को अपनाकर हमारे उद्देश्य को सफल करेंगे। पुस्तक की छपाई-सफाई देखने याग्य है । २५० पृष्ठ की स्मरत न व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद atins Edi the ch si voul icati ssary alue Ittl inco Hont level lucat
विद्याबिनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें
कपड़े की जिल्द सहित पुस्तक का मूल्य केवल १॥) 5०, स्थायी
ग्राहकों से १०) मात्र ! आज ही एक प्रति मँगा लीजिए ! नवीन
संस्करण छप रहा है।
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यह काफेर
[ले० श्री. योगेन्द्रनाथ चौधरी, एम० ए० ]
इस पुस्तक की विशेषता लेखक के नाम ही से प्रकट हो जाती
है। यह बङ्गला के एक प्रसिद्ध उपन्यास का अनुवाद है। लड़के-
लड़कियों की शादी-विवाह में असावधानी करने से जो भयङ्कर
परिणाम होता है, उसका इसमें अच्छा दिग्दर्शन कराया गया है।
इसके अतिरिक्त यह बात भी इसमें अङ्कित की गई है कि अनाथ
हिन्दू-बालिकाएँ किस प्रकार ठुकराई जाती हैं और उन्हें किस प्रकार
ईलाई अपने चङ्गुल में फंसाते हैं । पुस्तक पढ़ने से पाठकों को जो
आनन्द आता है, वह अकथनीय है। छपाई-सफाई सब सुन्दर
होते हुए भी पुस्तक का मूल्य केबल आठ आने बथा स्थायी
ग्राहकों से छः आने मात्र ! नवीन संस्करण प्रेस में है।
व्यवस्थापिका 'बाँद' कार्यालय, इलाहाबाद
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विद्याबिनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें *Con017 प्राशा पर पानी teriend hnical hypot toge SON [ लेखक श्री. जगदीश झा, विमल' ] यह एक शिक्षाप्रद सामाजिक उपन्याल है। मनुष्य के जीवन में सुख-दुख का दौरा किस प्रकार होता है, विपत्ति के समय मनुष्य को कैसा-कैसी कठिनाइयाँ सहनी पड़ती है, किस प्रकार घर की फूट के कारण परस्पर वैमनस्य हो जाता है और उसका कैसा दुखदाई परिणाम होता है, यह सब बातें आपको इस उपन्यास में मिलेंगी। इसमें क्षमा-शीलता, स्वार्थ-त्याग और परोपकार का अच्छा चित्र खींचा गया है। एक बार अवश्य पढ़िए ! छपाई. सफाई उत्तम है। मूल्य केबल आठ आने स्थाबी ग्राहकों से छः आने मात्र! नवान संस्करण छप रहा है। 310ns this cies o noun and i c eff. gre: 3 of rating देवदास 1. Edt r the ich s vould ucati [ले. श्री. शरचन्द्र चट्टोपाध्याय ] देवदास को उपन्यास न कह कर यदि विषिष अवस्थाओं के मानवी हद्गत भाबों का जीता-जागता चित्र कहें तो विशेष सार्थक होगा। देवदास पर पार्वती का अगाध प्रेम तथा धनी और निर्थन के कुटिल प्रश्न के कारण पार्वती का देवदास के साथ विवाह न ssary ralue es, H kutti व्यवस्थापिका 'बाँद कार्यालय, इलाहाबाद 'S. T incc iont leve jucat विद्याविनोद-ग्रन्थमाता की विख्यात पुस्तके होने पर भी उसका देवदास पर अपने पति से अधिक दावा देखकर देतों तले ऊँगली दबानी पड़ती है ! पार्वती के वियोग के कारण देवदास का शिक्षिमावस्था में करुणाजनक पतन पढ़कर हृदय व्याकुल हो जाता है । सन्चे प्रेम के अभुत प्रभाव के कारण चन्द्रमुखी नाम की एक पतिता वेश्या को, धर्ममय जीवन को अपनाते देख कर चमत्कृत हो जाना पड़ता है। अधिक प्रशंसा कर कागज़ काला करने से कोई लाभ नहीं । पुस्तक पढ़ने ही से सथा आनन्द मिलेगा और उसका महत्व मालूम होगा। पुस्तक की भाषा भी सरल, ललित और मुहावरेदार लिखी गई है पौने दो-सौ पृष्ठ की इस उत्तम पुस्तक का मूल्य केवल १) ० है। पर ग्रन्थमाला के स्थायी प्राहकों को पाने मूल्य अर्थात् ॥) में ही दी जाती है। नवीन संस्करण उप रहा है। राष्ट्रीय मान [ चुने हुए वीर रस पूर्ण गानों का पूर्व संपह ] यह पुरतक चौथी बार छा कर तैयार हुई है। इसी से इसकी लोक-प्रियता का अनुमान हो सकता है। इसमें वीर-रस में सने हए देश-भक्तिपूर्ण सुन्दर गानों का अपूर्व संग्रह है ; जिन्हें पढ़ कर आपका दिल फड़क उठेगा। यह गाने हारमोनियम पर भी गाने व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तके काबिल हैं और हर समय भी गुनगुनाए जा सकते हैं। शादी.. विवाह के उत्सव पर तथा साधारण गाने बजाने के समय यदि गाए जाँय ता सुनने वाले प्रशंसा किए बिना नहीं रह सकते ! यह गाने बालक-बालिकाओं को कण्ठस्थ कराने के योग्य भी हैं। ५६ पृष्ठ की पुस्तक का दाम केवल चार आना !! सौ पुरत के एक साथ मँगाने से २०) रु० । एक पुस्तक वी० पी० द्वारा नहीं भेजी जाती। एक पुस्तक मँगाने के लिए 1-) का टिकट भेजना चाहिए। econom perienc :hnical | hypot o toge IS 0n Gions this ities C M 20un nd i effe grea of cing Edu he [ ले. श्री० मदारी लाल जी गुप्त ] इस महत्वपूर्ण उपन्यास में वृद्ध-विवाह के दुष्परिणाम घड़ी योग्यता से दिखलाए गए हैं ! श्रीराम का माया के फन्दे में फंस कर अपनी कन्या का विवाह दीनानाथ नाम के वृद्ध जमीशर ले करना, पुराहित जी की स्वार्थपरायणता, जवानों के उमर में हाया ( कन्या का नाम है) का डगमगा जाना। अपने पति के भाई सखाराम पर मुग्ध होना, सखाराम की सचरित्रता, दीनानाथ का पश्चात्ताप, तारा नाम की युपती बालिका का स्वदेश प्रेम, सखाराम की देश और समाज-सेवा और अन्त में प्या का खत, उसकी देश-भक्ति और सेवा, दीनानाथ, सखाराम, श्रीराम, ताग ध्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इ हाद SO ild tra T inca iont level lucat elhimim.ma । विद्याविनोद अन्यमाला की विख्यात पुस्तकें और उसके सुयोग्य पिता का वैराग्य लेकर समाज-सेवा करना, सूख की आँखें खुलना, तारा का स्त्रियों को उन्नति के लिए उत्साहित करना आदि-आदि अनेक रोचक विषयों का प्रतिपादन बड़ी योग्यता से किया गया है। पुस्तक इतनी रोचक है कि उठा कर छोड़ने को दिल नहीं चाहता। टाइटिल पेज पर वृद्ध-बियाह का एक तिरङ्गा चित्र भी दिया गया है। पृष्ठ-संख्या २००, कागज़ बहुत सुन्दर २८ पाउण्ड का, छपाई-सफ़ाई सब सुन्दर होते हुए भी मूल्य केवल एक रुपया रक्खा गया है; पर स्थायी प्राहकों को पुस्तक पौने मूल्य अर्थात् केबल बारह आने में ही दी जाती है। पुस्तक दूसरी बार छप [ले. श्री० जी० पी० श्रीवास्तव, बी० ए०, एन्-गल० बी० ] श्रीवास्तव महोदय का परिचय हिन्दी-संसार को कराना लेखक का अपमान करना है। पाठकों को यह जान कर प्रसन्नता होगी कि हास्य-रस के नामी लेखक होने के अलावा छायागतव महोदय कट्टर समाज-सुधारक भी हैं । "लम्बी दाढ़ी" आदि अनेक पुस्तकों में भी लेखक ने सामाजिक कुरीतियों का नङ्गा चित्र जनता के सामने रक्खा है। -व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद ।
econon periend hnical hypot o toge विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें इस वर्तमान पुस्तक (प्राणनाथ ) में भी समाज में होने वाले अनेक अन्याय, अत्याचार लेखक ने बड़ी योग्यता से अङ्कित किए हैं। स्त्री-शिक्षा और सामाजिक सुधारों से परिपूर्ण होने के कारण यह एक अनूठा उपन्यास है। चार भागों के इस सुन्दर रेशमी जिल्द से मण्डित, स्वर्णाक्षरों से अङ्कित उपन्यास का मूल्य केवल २॥) (दो रुपय बारह आने ) कही रक्खा गया है । काग़ज़ और छपाई आदि बहुत सुन्दर है। फिर भी स्थायी ग्राहकों को पुस्तक पौने मूल्य अर्थात् २-) में मिलेगी। शीघ्र स्थायी ग्राहकों में नाम लिखा लीजिए !! नवीन संस्करण अभी प्रकाशित हुआ है। "S on sions this cies C noun nd i eff पाक-चन्द्रिका grea of [ सम्मादिका श्रीमती विद्यावती जी सहगल ] ting Edu the uld यह पुस्तक हमने विशेष कर हिन्दी जानने वाली महिलाओं के लाभार्थ प्रकाशित की है। इस पुस्तक में प्रत्येक अन्न तथा मसालों के गुण और अवगुण वर्णन करने के अतिरिक्त, पाक-सम्बन्धी सभी वस्तुओं का सविस्तार सरल भाषा में वर्णन किया गया है। प्रत्येक चीज़ के बनाने की विधि सविस्तार और सरल भाषा में दी गई है। इस पुस्तक से थोड़ी भी हिन्दी जानने वाली कन्याएँ व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद । T incc ion + level ducat विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें भरपूर लाभ उठा सकती हैं। मन चाहा पदार्थ पुस्तक सामने रख कर आसानी से तैयार किया जा सकता है। दाल, चावल, रोटी, पुलाव, मीठे, नमकीन चावल, भाँति-भाँति के शाक, सब तरह की मिठाइयाँ, नमकीन, बङ्गला-मिठाई, पकवान, सैकड़ों तरह की चटनी रायते, अचार-मुरब्बे आदि बनाने की विधि बड़ी उत्तमता से इस पुस्तक में लिखी गई है। प्रत्येक महिला को यह पुस्तक सदैव पास रखनी चाहिए। लगभग ८०० पृष्ठ कीसुन्दर सजिल्द पुस्तक की कीमत केवल ५)रु० । स्थायी प्राहकों से ३॥) १०! सती-दाह [ ले० श्री. शिवसहाय जी चतुर्वेदी ] हिन्दी में 'सती' विषय की यह पहली ही पुस्तक है। 'सती- प्रथा' का इतिहास इस पुस्तक में बड़ी उत्तमता से सप्रमाण अक्षित किया गया है। इसके अतिरिक्त 'सती-प्रथा' द्वारा होने पाले अनर्थ आदि का दिग्दर्शन भी कराया गया है। इस पुस्तक को पढ़ने से हृदय में करुणा का स्रोत उमड़ आता है । पुस्तक लेखन की प्रणाली और भाषा इतनी उत्तम और प्रभावोत्पादक है कि जिसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यह पुस्तक प्रत्येक हिन्दी- प्रेमी को पढ़नी चाहिए । २०० पृष्ठ की सचित्र और उत्तम सजिल - व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद -- विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें पुस्तक का मूल्य केवल २॥) १०, पर, स्थायी प्राहकों से शा) हा लिया जायगा! मनमोदक [सम्पादक प्रेमचन्द जी ] यह पुस्तक बालक-बालिकाओं के लिए खिलौना है । जैसा पुस्तक का नाम है, वैसा ही इसमें गुण है। इसमें लगभग ४५ मनोरञ्जक कहानियाँ और एक से एक बढ़ कर ४० हास्य-प्रद चुटकुले हैं। एक कहानी बालकों को सुनाइए, वे हँसी के मारे लोट- पोट हो जायगे। यही नहीं कि उनसे मनोरञ्जन ही होता हा; परन् उनसे बालकों के शान और बुद्धि की वृद्धि के अतिरिक्त, हिन्दी-उर्दू के व्याकरण-सम्बन्धी ज़रूरी नियम भी याद हो जाते हैं। इस पुस्तक को बालकों को सुनाने से 'आम के आम और गुठलियां के दाम' वाली कहावत चरितार्थ होती है। छपाई-सफाई सुन्दर, १६० पृष्ठ की सजिल्द पुस्तक की कीमत केवल बारह आने, स्थायी- ग्राहकों से 1-) आने। - । Hindustan PAAR Nashi WARA - min .... व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद । T
विद्याविनोद-ग्रन्धमाला की विख्यात पुस्तके
गल्फ-विनोद
[ले. श्रीमती शारदाकुमारी देवी, भूतपूर्व सम्पादिका 'महिला-दर्पण]
इस सुन्दर पुस्तक में देवी जी की समय-समय पर लिखी हुई
कहानियों का अपूर्व संग्रह है । सभी कहानियाँ रोचक और शिक्षा-
प्रद हैं। इनमें सामाजिक कुरीतियों का खाका खींचा गया है।
छोटी-छोटी कहानियों के प्रेमी पाठकों को अवश्य पढ़ना चाहिए ।
पृष्ठ-संख्या १८०, मोटे ३५ पाउण्ड के काग़ज़ पर छपी हुई पुस्तक
केवल १) रु० । स्थायी प्राहकों से ॥) मात्र ! दूसरी बार
छप रही है।
को मूल्य
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मेहरुनिसा
[अनुवादक श्री० मंगलप्रसाद जी विश्वकर्मा विशारद ]
भारत-सम्राट् जहाँगीर की असीम क्षमताशालिनी सम्राज्ञी
नूरजहाँ का नाम कौन नहीं जानता ? भारतवर्ष के इतिहास से
আলী আশ্রয় নিত্য নুতন গল র আ ম নীলা
हो रही है। इसी सम्राज्ञी का पुराना नाम मेहरुन्निसा था।
जहागीर उसके अपूर्व लावण्य पर मुग्ध हो गया और उसने
येन केन-प्रकारेण उसके पति शेरखाँ का मरवा डाला।
ध्यवस्थापिका बाँदा कार्यालय, इलाहाबाद
SEN
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। विद्याविनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें मेहरुन्निसा विधवा हो गई। भारतीय वातावरण में पली हुई पतिगतप्राणा मेहरुन्निसा सतीत्व धर्म को खूब पहचानती थी। पर हाय, उसका रूप ही उसका काल हुआ! वह अबला जहाँगीर के अन्तःपुर में लाई गई। उसने सम्राट को अपना मुँह तक दिखाना उचित नहीं समझा। जहाँगीर ने क्षोभ और क्रोध से उसकी उपेक्षा की। मेहरुन्निसा ने दुखी होकर अपनी प्यारी सखा कल्याणी के आग्रह से सम्राट् की सम्राज्ञी होना स्वीकार कर लिया । फिर भी सम्राट ने उपेक्षा की। एक दिन मेहरुन्निसा ने अत्यन्त दुखित होकर, बड़े ही करुणापूर्ण शब्दों में कहा- "आज सभी शान्त होकर सो रहे हैं। बाँदियों को आनन्द मनाने के लिए कह चुकी है। इसकी अपेक्षा और सुन्दर सुयोग कहाँ मिलेगा ! आज महँगी । हे जगदीश्वर ! हे यामय ! हे अगति की गति ! तुम साक्षी हो । यह अविधान्त दुख अब नहीं सहा जाता । अब यह घृणित अवस्था अच्छी नहीं लगती। कहाँ हो तुम हृदयेश्वर! बड़े आदर के साथ हृदय में रखते थे- एक पहर के लिए भी मुझे न छोड़ते थे! आज तुम्हारी समाधि के पास, सुख के साथ बर्दवान में नहीं मर सकी। यही बड़ा दुख है। और तुम दुनिया के बादशाह, असीम क्षमताशाली दिल्लीश्वर ! तुम्हारी करुणा को धन्य है ! तुम्हारे प्रेम को धन्य है ! तुम्हारे मनुष्यत्व को धन्य है !" ता त SH मुक सार use i बाद व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद SINHIVe
विद्याबिनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें
आत्माभिमानिनी वधव्य-दुख-कातरा, प्रताड़िता, रूपसी
मेहरुन्निसा का यह करुण-रस-पूर्ण चरित्र एक बार दिल को
दहला देता है। इसक परवान् यह उदात्त-चित्ता मेहरुनिसा
सम्राट् की प्रेयसी और श्रेयसी बनकर किस प्रकार नूरजहाँ के
नाम से भारत को सम्रासी बनो-ये सब घटनाएं इस उपाख्यान
में बड़े ही कपि वपूर्ण शब्दों में पर्णत है । प्रत्यक रमणी को
इस रमणी-रत्न का चरित्र पाकर अर्ण लाभ उठाना चाहिए ।
मूल्य केवल 1) आठ आने ।
स्कृति-कुञ्ज
[ले. एक निर्वासित ग्रेजुएट'' ]
नायक और नायिका के पत्रों के रूप में यह एक दुःखात
कहानी है। प्रमय-नय में निराशा क मार्मिक प्रतिवातों से उत्पन
मानपनाय में जी-जो कल्पना उता है और उट-उठ कर
चिन्त:लोक के अस्फुट साम्राज्य में विलीन हो जाती है। इस
पुस्तक में भली-भांति व्यक्त की गई है। हश्य के अन्तःप्रदेश में
সব জা অনুজ অঙ্ক শিক্ষাৰ সাৰ নে আনে আমলা
की अनन्त तथा अविछिन्न साधना में मनुष्य कहाँ तक अपने
व्यवस्थापिका चाँद कार्यालय, इलाहाबाद
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विद्याबिनोद-ग्रन्थमाला का जीपन के सारे सुखों की आहुत कर सकता है, ये बातें इस पुस्तक में एक अत्यन्त रोचक और चित्ताकर्षक रूप से वर्णन की गई हैं। जीवन-संग्राम की जाटल स्मरयाओं में मानवी उत्कण्ठाएं किस प्रकार विधि के कार विधान से एक अनन्त अन्धकार में अन्तर्हित हो जाती हैं एवं चित्त की सारी साचित अशाएँ किस प्रकार निराशा के भयानक गह्वर में पतित हो जाती है-इनका जो हस्य-विदारक वर्णन इस पुरतक में किया गया है, यह सर्वथा मौलिक एवं नवीन है। आशा, निराशा, सुख-दुख, साधन, उत्सर्ग एवं उतम आराधना का साधिक चित्र पुरतक पढ़ते ही कल्पना की सजीप प्रतिमा में चारों ओर दीख पड़ने लगता है। फिर भी यह पुरतक मलिक और हिन्दी-संसार के लिए नवीन उपहार है। यह एक अनन्त रोदन का अनन्त सङ्गीत है, जो प्रायः प्रत्यक भावुक हृदय में व्यक्त अथवा अव्यक्त रूप से एक बार उस्थित होकर या ता आजीवन बजता रहता है अथवा कुछ काल पर्यन्त बज कर पुनः विरमृति के विशाल साम्राज्य में अन्तरिक्ष हा जाता है। इस पुस्तक में व्यक्त याणी की अनुषम पिलीनता एवं अव्यक्त स्वरों के उच्चतम सङ्गीत का एक हृदयमाही मिश्रण है। पुरतक हाथ में लेते ही आप इसे बिना पढ़े नहीं छोड़ सकते। हिन्दी-संसार में यह पुस्तक एक क्रान्ति उपस्थित कर देगी। पुरतक छप रही है। मूल्य लगभग ३) होगा। Plar arekinar .. - Purwant Baarent Haon ME व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद जी
विद्याबिनोद
माला की विजयात पुस्तकें
कमला के पत्र
अनुवादक-एक निर्वास्ति प्रेजुएट' ]
यह पुस्तक कमला नामक एक शिक्षित मद्रासी महिला
द्वारा अपने पति के पास हुए पत्रों का हिन्दी अनुवाद है।
इन गम्भीर विद्वत्तापूर्ण पर्व असूल्य पर्ण का मराठी, बहला तथा
कई अन्य भारतीय भाषाओं में बहुत पहले अनुवाद हो चुका है।
पर आज तक हिन्दी-संसार को इन पत्रों के पढ़ने का अवसर
नहीं मिला था। इस अभाव की पति करने के लिए हम ही इसका
हिन्दी-अनुवाद प्रकाशित कर रहे है।
इन पत्रों में कुछ पत्रों को रोड माया समी पत्र सामाजिक
प्रयाओं पर्व साधारण घटला चचाजी से परिपूर्णपर उन
साधारण चर्चाजों में भी जिस मार्मिक दर से रमणी-हदय का
अनन्त भणय, उसकी विश्व-व्यापी महानना। उसका उमादल
पति-भाव औरणय-पथ में उसकी आवय साधना की पुनीत प्रतिमा
चित्रित की गई है, उसे पढ़ते ही जाती भर जाती है और
अत्यन्त कोमल तार : एक अनियन्त्रित गति से बन
दुर्भाग्यवश रमणी-इदय की उठती हुई सदिय भावना
कारण कमला की आशा ज्योति अपनी सारी. प्रभा छिटकाने
पहिले ही सन्देह एवं निराशा के अनन्त तम में विलीन होगई । इसका
परिणाम वही हुआ जो होना चाहिए । कमला । को उन्माद-रोग
व्यवस्थापिका चाँद कार्यालय, इलाहाबाद
Plean विद्याबिनोद-ग्रन्थमाला की विख्यात पुस्तकें हो गया। उसके अन्तिम पत्र प्रणय की स्मृति और उन्माद की विस्मृति की सम्मिलित अवस्थाओं में लिखे गए हैं। जो हो, उन पत्रों में जिन भावों की प्रतिपूर्ति की गई है, वे विशाल और महान् है। उन पत्रों के प्रत्येक शब्द से एक वेदना उठती है, उस वेदना में मानव जीवन का नीरव रोदन प्रतिध्वनित होता है और उस प्रति- ध्वनि में अनन्त का अव्यक्त सङ्गीत प्रतिपादित होने लगता है। यह एक अनुपम पुस्तक है । मूल्य लगभग ३) रु० ! M निर्मला [ ले० सुप्रसिद्ध उपन्यासकार श्रीयुत प्रेमचन्द जी ] इस मौलिक उपन्यास में लब्धप्रतिष्ठ लेखक ने समाज में बहुलता से होने वाले वृद्ध-विवाहों के भयङ्कर परिणामों का एक धीभत्स एवं रोमाञ्चकारी दृश्य समुपस्थित किया है। जीर्ण-कार्य वृद्ध अपनी उन्मत्त काम-पिपासा के वशीभूत होकर किस प्रकार प्रचुर धन-व्यय करते हैं, किस प्रकार वे अपनी वामाङ्गना षोड़शी नवयुवती नवल लावण्य सम्पन्ना के कोमल अरुण वर्ण अधरों का सुधारल पोशण करने की उद्भ्रान्त चेष्य में अपना विष उसमें प्रविष्ट करके, उस युवती का नाश करते हैं, किस प्रकार ग्रहस्थी के परम पुनीत प्राङ्गण में कौरव-काण्ड प्रारम्भ हो जाता है, और किस प्रकार ये वृद्ध अपने साथ ही साथ दूसरों को लेकर व्यवस्थापिका 'चाँद' कार्यालय, इलाहाबाद - दे SSS । । । SE R