Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Padh Pushpaanjali
Front matter
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पद्य पुष्पाञ्जलि.
लेखक
श्रीयुत पाण्डेय लोचन प्रसाद शर्मा
प्रकाशक
नारायण प्रसाद अरोड़ा, वी. ए.
पटकापुर, कानपुर.
थाबू अयोध्या प्रसाद भार्गव के प्रवन्ध से
स्टार प्रेस कानपुर में मुद्रित
प्रथम बार
[ मूल्य
१९७२
4
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समर्पण
सजन सुहृद् निज मातृ भाषा का जिन्हें अनुराग है
भाता जिन्हें प्रिय देश की हित-साधना का राग है
सम्पन्न है रस भाव से जिनकी विमल मृदयस्थली
सादर समर्पित है उन्हें यह पद्य की पुष्पाञ्जली
निवेदन।
स संग्रह को छापने की भाशा देकर पाण्डेय लोचन
प्रसाद जी ने मुझ पर यड़ी कृपा की है। साथही में
श्रीमान राय देवीप्रसाद जी पूर्ण वी. ए., बी. एल.
का भी घड़ाही कृतज्ञ हूं जिन्होंने इसकी भूमिका लिख कर
मुझे बहुत अनुग्रहीत किया है ।
इस संग्रह के पद्यों को पढ़ कर अथवा सुन कर मेरे प्यारे
भाई, भारतीय युवकों के हृदय में यदि थोड़ी सी भी देशभक्ति
उत्पन होगी तो मैं अपने परिश्रम को सफल सममूंगा ।
प्रकाशक
सूनी। पृष्ट ... विपय भारत स्तुति मेरीजन्मभूमि जय हिन्दुस्तान प्रार्थना हमारा अधःपतन ... ... nnn Cum ... ... हमारी दशा ... ... ... २३ २६ ... ... जागहुमात! हमारी दुःखमयी दशा गोविलाप करुण क्रन्दन भारत-दुर्भिक्ष हमारी अस्वस्थता भारत की होली विदेशी चीनी त्यागो देशोद्धार सोपान स्वतन्त्रता-प्रति भारत माता आलस को तजिए मेरी अर्जी उद्बोधन उपदेश नम्र निवेदन ३६ ... ... ४१ ... ... ...
... ... ... ... ... ७७ विपय पृथ्विराज के उत्साह घाफ्य कहां गये? छत्रपति शिवाजी का मनो महत्व छत्रपति श्रीशिवाजी के उत्साह वाक्य नन्चाय शिराजुद्दौला को पदच्युति की मन्त्रणा उद्गार हिन्दू विश्वविद्यालय जातीय विद्यालय स्वदेशानुराग राष्ट्रभाषा मातृभाषा हिन्दी वङ्गभाषा के प्रति हिन्दी नीलध्वज के प्रति जना जीवन्मरण हृदयोद्गार अन्योक्तियां स्नेहलता अर्थात् अवलाओं परमत्याचार जय तिलक फर्मवीर मिस्टर गांधी विनय ८६ ११ ... ... ... ... ... ... ... १०७ १०८ ... ... मेरी कामना ... ११० नवयुग भावना
मृमिका।
रसिकों में श्रीयुत पाण्डेय लोचन प्रसाद जी का
बि
नाम हिन्दी जगत् में प्रसिद्ध ही है। विद्या रसिक
होने के साथ २ देशानुरांग और कवित्व शक्ति के
गुण भी परमेश्वर ने उनको दिये हैं, यही कारण है कि
भब तक वह अपनी कई उपयोगी पुस्तकें हिन्दी साहित्य
को उपहार दे चुके हैं। अब उनकी बहुतसी कविताओं
का संग्रह देश-हित-गर्मित साहित्य के प्रेमी याबू नारायण
प्रसादजी मरोड़ा “पद्य पुप्पान्जलि" के नाम से छपवा
। रहे हैं । कवि और प्रकाशक दोनों का अनुरोध है कि मैं
ही उक्त पुस्तक की भूमिका लिखू, इस अनुरोध को सहर्प
स्वीकार फरके मैं इतनाही लिखना पर्याप्त समझता हूं कि इस
संग्रह में अनेक पद्यों से देश हित का ललित राग गाया गया
है, ईश्वर की प्रार्थना देश भक्ति के भाव से परिपूरित है, गो
जाति की अवस्था पर करुणा का प्रकाश किया गया है, दुर्भिक्ष
और दरिद्रता के सताये दीन भारत वासियों के प्रति आर्द्र
हृदय से सहानुभूति दराई गई है, "हमारी अस्वस्थता" पर
भी विचार किया गया है, "चीनी" सम्बन्धी पद्यों में
"स्वदेशी" की भी पूरी झलकहै, शिक्षा, हिन्दू विश्वविद्यालय,
-
शिवाजी, हिन्दी, राष्ट्र भापा, इत्यादि लेखों द्वारा विविध
प्रकार से पाठकों का मनोरंजन किया गया है और देश सेवा
और उन्नति-उद्योग का उपदेश दिया गया है । मैं माशा करता
हूं कि ऐसी पुस्तकों के प्रादर से देश-हितैपियों का उत्साह
वर्द्धन समझ कर हिन्दी पद्यसाहित्य के प्रेमी इस पुस्तक का
प्रेम से स्वागत करेंगे । किंबहुना?
सोरठा-चन्द्र नदी निधि भान फागुन कृष्णा पञ्चमी
पुस्तकगुन पहिचान लिखी भूमिका पूर्ण यह
देवी प्रसाद
कानपूर.
से पद्य पुष्पाञ्जलि
भारत प्रस्तुतिः ।
जय जय जय भारत-भ
तू जन्मभूमि है, भारत-भूमि हमारी ।
है तेरी ही सन्तान सफल हम प्यारी ॥
तू पुण्य-भूमि है, सुर नर मुनि धन्दित है।
तू कर्म-भूमि है. मुक्ति-सुधा सिञ्चित है ।
तू धर्म-भूमि है, दया-दान-दीक्षित है।
तू मार्य भूमि है, सभ्य शिष्ट शिक्षित है ।।
गुरुता तेरी है सव देशों से भारी ।
T-भूमि हमारी प्यारी ॥१॥
मुनि-गण मन-रञ्जन पुण्य तपोवन तू है !
विष-विषय-विभंजन पावन अञ्जन तू है !
नय-नीति-निपुणता-निधि नव नागर तू है !
स्वातन्त्र्य, शान्ति, सुख-शासन-सागर तू है।
साहित्य-शिल्प-समुदय शिक्षा-सर तू है !
शुचि-सृष्टि-सार सौरभ-शोभाकर तू है !
गुरुता तेरी है सब देशों से भारी ।
जय जय जय भारत-भूमि हमारी प्यारी ॥२॥
( २ )
सजला सफला शुचि शप्य श्यामला तू है।
अयला सयला सद्धर्म-निश्चला तू है ॥
तू अन्न-पूरणा अन्न-शाक का घर है ।
तू स्वर्ण रत्न मुक्ता मणि का माफर है ॥
तू मालय है हे अम्य ! भेषजामृत का।
तू निर्भर है सुमधुर शुचि गोरस घृत का ॥
गुरुता तेरी है सब देशों से भारी ।
जय जय जय भारत-भूमि हमारी प्यारी ॥३॥
तू देव-दुर्लभा धीर-जननि विख्याता ।
तू असुर दमन को शमन तुल्य है माता ॥
है मन्त्र-सिद्ध मुनि, साधु, तपस्वी तुझ में ।
हैं सवल सुफवि विद्वान यशस्वी तुझ में ॥
हैं भीम तुल्य यल वीर धीर नर तुझ में।
हैं अर्जुन सम विख्यात धनुर्धर तुझ में ।
गुरुता तेरी है सय देशों से भारी ।
जय जय जय भारत भूमि हमारी प्यारी ॥४॥
तेरे गुण- गण भू-कण सम अगणित जननी !
है शिप्य रूप तेरे यह सारी प्रवनी॥
हम सुखी होयँगे माता ! तेरे सुख में।
"हम रुदन करेगें दुख से तेरे दुख में
तेरे पद पूजन हित हम तन मन देगें।
हम साभिमान तेरे गुण गान करेगें।
गुरुता तेरी है सव देशों से भारी ।
जय जय जय भारत-भूमि हमारी प्यारी ॥५॥
मेरी जन्मभूमि ।
--
जय जय मम जनम भूमि स्वरगहुँ तें प्यारी ॥ टेक ॥
शोभित सुन्दर सरूप, अद्भुत आभा अनूप
दमकत जिमि जात रूप तीन लोक न्यारी ॥१॥ जय जय
कत पिक, नचत मोर, सरिता जल करत शोर,
धन गिरि सुपमा अथोर नयन ह्रदय हारी ॥ २ ॥ जय जय०
लभि मृदु तृण मधुर नीर, बिहरत गो महिप भीर
घन वन भ्रमि श्रवत छीर बुध बल वपुकारी ॥३॥जय जय
डोलत सुरभित समीर बोलत खग विविध गीर
घोलत मधु भ्रमर भीर सुमन वन विहारी ॥४॥ जय जय०
वन धन वन गज विहार फरत मुदित करि चिंधार
कीड़त जल बीच धार विजन विपिन चारी ॥५॥ जय जय०
गेहूं, सन, तिल, जुमार, अलसी, मधु, लाख, चार
उपज धान जहँ अपार जग जन दुखहारी ।। ६ ॥ जय जय०
रेशम, कोषा, कपास. सुरस ईख अनन्नास
लभि जहें विहरत सहास, सुखयुत नर नारी ॥७॥ जय जय०
मिलत सुभग हेम हीर, मधुर, सन्तरा, उार,
घनत जहाँ चार चीर, अचरजमय भारी॥८॥जय जय०
दण्डक बन मुनि निवास, प्रेम पुगय कार प्रकाश
विविध ताप करत नाश हरि पद-रज धारी।।६॥ जय जया
विद्या, वैभव, विभूति, प्रतिमा, पाण्डित्य, पूति शुभ दया सहानुभूति, विविध सुगुन धारी ॥ १० ॥ जय जय विविध चित्र मय सुगात, जहँ अगम गुहा सुहात जग गुरु-गौरव दिखात, विस्मय मुद कारी॥ ११ ॥ जय जय. , जय हिन्दुस्तान । जय विद्या-यल-बुद्धि निधान । जन्म भूमि गुण-गौरव-खान ।। शान्ति सौख्य का वास स्थान । जय जय पावन हिन्दुस्तान ! ! ॥१॥ सब सुख साधन पूर्ण महान । तू है जग में स्वर्ग समान ।। तुझ में जन्म ग्रहण के काज । लालायित. हैं देव-समाज ॥२॥ तेरा रुजहारी जल-वायु । चर्धित करता है जन-आयु ॥ तेरे अन्न, शाक, घृत, दुग्ध । किसके प्राण न करते मुग्ध ॥३॥ तेरा विद्यामृत फर पान । मूर्ख हुए शिक्षित विद्वान् ।। गुरुता तेरी अपरम्पार । शिप्य रूप तव है संसार ॥४॥ .-
तेरी कौशल कला अनूप ।
निर्धन को करती है भूप ॥
तेरे स्वर्ण, रत, मणि धान ।
हरते हैं कुबेर का मान ॥५॥
कर देता तेरा घेदान्त ।
विषय भ्रान्त प्रात्मा को शान्त ॥
नर को दे कर भक्ति सयुक्ति ।
प्राप्त कराता दुर्लभ मुक्ति ॥६॥
तेरे चल विक्रम अवलोक.।
होते विश्मित तीनों लोक ।।
हम को है तेरा अभिमान ।
हम है तेरी प्रिय सन्तान ॥७॥
तेरे पद पूजन के काज ।
तज कर फुत्सित स्वार्थ समाज ॥
सौंपेंगे हम अपने
प्राण ।
नित्य करेगें तव गुण गान ॥८॥
लख तेरे भानन्द-विधान ।
हम सब होंगे सुखी महान ॥
तेरे दुख में हम हो म्लान ।
रुदन करेंगे दुःखित प्राण ॥९॥
शोभित तव सिर-मुकुट समान ।
पूज्य हिमालय औपाधि-खान ॥
पाच देश में शोभित रम्य ।
ब्रह्मपुत्र, नद सिन्धु अगम्य ॥ १०॥
रनाकर नित करता नाद । चुम्बन करता है तवपाद ॥ कटि में तेरे पावन नाम । शोभित विन्ध्याचल छवि धाम ॥ ११ ॥ महानदी शुचि-सलिल सुशान्त । विमल नर्मदा नित्य प्रशान्त ॥ सरयू गोदावरी गंभीर। पातक हारी जिनका नीर ॥ १२ ॥ गङ्गा यमुना मादि अनेक । नदियां सुभग एक से एक। प्राक्षालन करते तव अङ्ग। दिखारहीं है लहर-उमङ्ग ॥ १३ ॥ कालिदास भयभूति समान । कविवर तुझ में हुए महान ॥ भीमार्जुन गाङ्गेय समान । रथी हुप तुझ में पलवान ॥१४॥ फर्ण सदृश दानी विख्यात । भारत ! हुए तुझी में जात ॥ हरिचन्द्र से सत्य प्रतिश । जात हुए तुझ में ही विश ॥१५॥ शिवि दधीच पुरु नृप आदर्श। धर्म हेत तज प्राण सहर्ष। हरा इन्द्र का जिनने गर्व । हैं घे सुत तेरे ही सर्व ।। १६ ।।
( ७ )
ध्रुव, चैतन्य, भक्त, प्रहाद ।
जौमिनि, गौतम, कपिल, कणाद ॥
करता जग जिनका गुण-गान ।
हैं वे सब तेरी सन्तान ॥ १७ ॥
पाणिनि, बाल्मीकि शुभनाम ।
शङ्कर, मनु, भास्कर गुणधाम ॥
ब्यास देय शुक विमल चरित्र ।
सब की है तू भूमि पवित्र ॥ १८ ॥
रामचन्द्र की है तू भूमि।
कृष्णचन्द्र की है तू भूमि ॥
सुख स्वतन्त्रता की तू भूमि ।
धर्म धीरता की तू भूमि ॥ १८ ॥
हमको है तेरा अभिमान ।
हम सब हैं तेरी सन्तान ॥
तेरे हित हैं जीवन प्राण
जय जय पायन हिन्दुस्तान !! ॥२०॥
प्रार्थना।
माइए हे भाइयो । यह प्रार्थना सुन जाइये ।
सुन भुला मत दीजिये कुछ ध्यान इसपर लाइये ।
निज मधोगति पर यहां है आज कुछ कहना हमें ।
पूर्व गौरव स्मरण कर है शोक में बना हमें ॥१॥
कौन हैं हम भाइयो ! किनके विमल सन्तान हैं ?
फ्या न निजता ज्ञान से पूरित हमारे प्राण हैं ?
क्या हमारी योग्यता है ? क्या हमारा धर्म है ?
विश्व में फरणीय उत्तम क्या हमारा कर्म है ? ॥२॥
मनुज क्या सुर दनुज के श्री पूज्य हमही पार्य थे।
बुद्धि विद्या में न हम फिस देश के प्राचार्य थे।
मनुकरण के योग्य मान्य न क्या हमारे कार्य थे।
नृप पचन सम फ्या'न निज मादेश सयको धार्य थे ॥३॥
देश भर छाया हुमा सुख शान्ति पूरित हर्प था ।
मर्त्य होफर अमरतामय पुण्य भारतवर्ष था ।
स्वर्ग से भी सुखद सुन्दर यह हमारा देश था ।
खोजने पर भी न मिलता भघ रुजों का लेश था ॥४॥
स्वर्ग सुख थे तुच्छ गिनते देवगण लखकर जिसे ।
प्राप्त या सौभाग्य ऐसा और भूतल पर फिसे ?
देव दुर्लभ इस मही में जन्म धारण के लिए ।
हो रहे सय काल थे सुर मृन्द लालायित हिए ॥५॥
रोग दुख दुष्काल का न कभी कहीं भी नाम था। शान्ति सुख से देश में प्रत्येक घर था ग्राम था । कृषक थे सम्पन्न सब विधि मुफ्त होऋण भार से। थी मजा करती न हाहाकार अत्याचार से ॥६॥ गाय महिपी सकुल निर्भय मोद युत घर घर रहीं। पय दही घृत तक की यह भूमि पर निर्भर रही। पादपों पर खग वनों में मृग हृदय हरते रहे । प्रकृत हिंसा तज विविध पशु एक में चरते रहे॥७॥ थे सुधोपम फल वरों से युक्त तरुवर सोहते । सुमन सौरम दान से थे प्राण सबफे मोहते ॥ भ्रमर करते गुञ्ज पिकवर कुञ्ज में थे बोलते । घोलते श्रुति में सुधा स्वच्छन्दता से डोलते ॥८॥ सिंह के सम शक्ति शाली छात्र गण गुरु भक्त थे । देश के हितके लिये निज प्राण पन से रक्त थे। पद्य कुलके सद्म थे जाति के अभिमान के। गेह थे आरोग्यता के देह थे विज्ञान के ॥६॥ ग्रा चिन्तन में मगन मन आर्य ऋषिगण थे सदा। शुचि तपोवन में सहज ही प्राप्त थी सब सम्पदा ॥ हधि सुरभि मारोग्य कारी पान करते क्षेम से । भक्ष्य भक्षक भाव तज खग मृग यहां थे प्रेम से ॥१०॥ समय पर होती सुखद अमृत रूपी पुष्टि थी। अन्नपूर्णा नाम से विख्यात भारत सृष्टि थी। थी जनो की धर्म में मनुरक्ति उज्वल निश्चला। धीर जननी थी हमारी भूमि शप्य श्यामला ॥११॥ ।
( १० )
पर समय के फेर से यह दास माता हो रही ।
कुम्भकर्णी नींद, खो सर्वस्व अपना, सो रही !
हाय ! जिनके शिष्य होके सभ्यता पाई नहीं।
प्राण रकमसभ्य कुक्षम्भरि कहाते मय वही॥१२॥
हाय खाया भ्रात कैसा समय ने पलटा यड़ा ।
शान्ति सुखके स्थान में दुखका कटक भीषण पड़ा।
हो रहे निज पूर्व गौरव चिह्न क्रमशः लोप हैं।
सत्य हा हा ! अब नहीं दुर्दैव का यह कोप है ॥ १३ ॥
भय महिंसा प्रेम शुचि का पुण्य माश्रम है कहां?
माज वह भव भष्मकारी मन्त्र विक्रम है कहां?
विमल तत्वज्ञान की शिक्षा अलौकिक है कहां?
त्रिकालज्ञ मुनीन्द्रकृत दीक्षा मलौफिक है कहां? ॥१४॥
हाय ! मय योधेन्द्र जननी वह अयोध्या है कहां ?
आज क्या रवि-कुल-कमल-रविराम राजाहै यहां ?
यह प्रजा-प्रियता कहां है ? आज दुर्लभ सर्वथा
प्रजा रञ्जन हित सगर्भा पनि-पर्जन की प्रथा ॥१॥
हो गया क्यों लुप्त वह दाम्पत्य प्रेम पवित्र है।
नेत्र सुख कर मार्य दम्पति का कहां यह चित्र है ?
शान्तिमय शुचि मार्य गृह अवतो कलह का धाम है।
हाय ! गृह लक्ष्मी हमारी माज हमसे याम है !! ॥१६॥
पान जननी का किया था दुग्ध जिनने सङ्ग में ।
रफ्त हैं सोदर वही अब छल कलह के रङ्ग में ।
एक में रह नित्य छोटे से हुए थे जो बड़े ।
अय यही माई परस्पर खड्ग ले कर हैं खड़े ! ॥१७॥
( ११ )
पुत्र सजते साथ अपने जर्जरित मा याप का ।
उचित प्रायश्चित्त करते पितृ ऋण के पाप का ।
म्याप्त घर घर कपटा, कलह, मत्सर, वेष है।
खोजने पर भी कहीं मिलता न सुख का लेश है ॥१८॥
सो गई हा हन्त ! मन की अप्रतिम सब शान्ति है।
हो रहे निष्प्रभ हुई गत देह की सय कान्ति है।
रोग यहु विधि नित हमें करते व्यथितचित क्षीण है।
काल पा कर अमृत सम मौषधि हुई गुण हीनहे॥१॥
शान में, विज्ञान में जो जाति जग में जेष्ट है।
हीन हा ! कहला रही भाषा उसी की श्रेष्ट है।।
लेश लज्जा भी न माती कह रहे जो नित्य हैं।
मार्य वृन्दों के महो! उन्नत नहीं साहित्य है ॥२०॥
माज माविष्कार कर जो गर्व लाते हर्प से।
प्राप्त थे ये विषय हमको गत सहस्रों घर्प से ।
जो हमें ममरत्व के हैं तत्व हा ! सिखला रहे।
क्या न चे निज बाल कौतुक ही हमें दिखला रहे ? ॥२१॥
शुष्क नीरस मलिन निष्प्रभ माज वृक्ष निकुञ्ज हैं।
शान्ति सुखमा नाटिका, मृत वाटिका के पुञ्ज हैं।
मृत्यु भय से विपिन से हैं मृग विहङ्गम भागते ।
देख हिंसा रति महा! पशु वृन्द निज थल त्यागते २२
हीन हो सब भांति गोकुल दीन वाणी योलती।
डोलती है रोग जर्जर विष हृदय में घोलती।
घृत मलाई हो रही दुर्लभ दवाई के लिए ।
पय दही रुचिकर मठा की यात कुछ मत पूछिए ॥२३॥
( १२ ) होगयी काया पलट हा ! देखते ही देखते । माज क्या से क्या हुमा भारत तुम्हारा श्रीपते ? घल विभव विक्रम हुए सब नष्ट निजता खो गई। धो गई सम्पत्ति सारी लोप विद्या हो गई ॥२४॥ देश में चहुँ मोर मीपण मूर्यता घस छा गई । दुखद निर्धनता हमारे सद्गुणों को खा गई। जय हुए निर्धन कहां तक धर्म रह सकता मही! धर्म हीन मनुष्य पशु है पुच्छ शृङ्ग विहीन हो ॥२५॥ भूख से मरता हुमा करता नहीं है पाप क्या ? पाप में फंस लोग हा! पाता नहीं है ताप क्या ? नित लगे यहु भांति हम सब भोगने गुरु यन्त्रणा। यन्त्रणा दूनी मिली की मुफ्ति की जय मन्त्रणा ॥२॥ यस रहे तब मौन हो के धैर्य को धारे हुए। निज सफल हारे हुए से विकल मन मारे हुए । देव को हम दे रहे बदनाम आठों याम हैं। कर रहे कर से सदा पर पतनही के काम हैं ॥२७॥ जाति के अभ्युदय के माधार फेवल छात्र हैं। हीनता रूपी सुधा हित शुचि सुधा के पात्र हैं। हो रहे कर्तव्यच्युत हैं छात्र हा ! जिस देश में। कठिन है पाना उसे निज धर्म में या पेश में ॥२८॥ नित्य गुड़ियों की तरह माता पिता जब मोदमें । हैं कराते ब्याह लेके सुत सुता को गोद में । तय यहां दाम्पत्य सुख का यास फिर किस भांति हो। बुद्धि, यल. विद्या, विभव युत किस तरह यह जाति हो!!२९
( १३ )
समय जो है वेद विधि से उपनयन संस्कार का।
गुरु कुलागम सहित विद्यारम्भ के व्यापार का॥
शान्ति मय शुचि वीर्य रक्षा का समय जो है खरा ।
शिशु हृदय में हा! तभी विष विन्दु जाता है भंरा ३०
श्रवण कर के जन्म कन्या का जहां विद्वान भी।
बोलते हो व्यथित यह मरजाय हे हे हरि भभी॥
जो कहीं जीवित रही सकुटुम्य हम मर जायगे।
जन्म भर दारिद्र कन्या जन्म का फल पायेंगे ॥३१॥
इस दशा में उचित शिक्षा यालिफा क्या पायगी?
हाय ! वह मादर्श जननी; धीर सुत कय जायगी?
पुत्र पर निज सम्य का पड़ता अपूर्व प्रभाव है।
पुत्र का होता जननि अनुरूप प्रादुर्भाव है ॥ ३२ ॥
हो गया अतएव दुखफा खान हिन्दुस्थान है।
भीर निर्वल हो रही ऋपि वृन्द की सन्तान है ॥
छिप गया सब शौर्य, साहस पुण्य आर्यावर्त्त का।
गास भारत हो गया दुर्भिक्ष दुख रुज गर्त का ॥३३॥
क्या कहें अपनी बुराई माप कहना पाप है।
भोग हम हा! हा !! चुके क्या २ न भीषण ताप है !'
निज फरों से हम कुल्हाड़ी पैर पर हैं मारते ।
चोट पहुँचे पैर में मत प्राश ऐसी धारते ॥ ३४ ॥
देख कर अज्ञानता यह हँस रहा संसार है।
हा! हमारी हीनता का अब न पारावार है।
स्वीय रिपु यनता जगत में नर कभी है आपही।
दुःख देते हैं नरों को घोर निज कृत पाप ही ॥३५॥
( १४ )
विम मस्तक, हृदय क्षत्री, कटि यणिक, पद शूद्र है।
पूज्य हिन्दुजाति तू किस यल विभव में तुद्र है?
पर घृणा, छल, कलह, ईर्ष्या, द्वेष का तू दुवार है।
भाज तेरे पतन का जिससे न पारावार है ॥ ३९ ॥
हीन से भी हीन नर अस्पप्य अपने मित्र हों।
किन्तु अपने अङ्ग रूपी शूद्र गण अपवित्र हों।
दूर है छूना उन्हें ये पास मा सकते नहीं।
मिष्ट वाणी या कभी आश्वास पा सकते नहीं ॥३७॥
हा ! हमारे हेतु अतिपय घृणित करते काम जो।
दें हमारे हेतु जीवन, लें न सुख का नाम जो ।।
प्रेम पूर्वक जो स्वयं अनुचर हमारे हो रहे ।
हाय ! सह-अनुभूति तो भी ये हमारी खा रहे ॥३८॥
हो निपट निष्ठुर तथव मलीन पशु अशान भी।
नित्य के धिक्कार से आता निकट नहि स्वान भी॥
शूद्र ऊंची जाति के तय नित्य के दुतकार से।
अर्चना कबतक करे उनके पदों की प्यार से ॥३६॥
सर्वदा व्यवहार में सम भाव होना चाहिए ।
उभय कुल में निष्कपट सद्भाव होना चाहिए ।
ईश के हग में सदा सवका यरावर स्वत्व है।
विश्व में स्वातन्त्र्य का पावन परम यह नत्व है ॥४०॥
शूद्र होते नीच भी हैं बन्धु ही अपने सदा।
दूर करना धर्म है निज बन्धु गण को आपदा ।।
बन्धु का चल विश्व में होता अतुल है हे सखे ।
प्रेम शृदा सेन ऊँची जाति क्यों नव फिर रखे ॥४॥
योजनों के दूर पर लख बन्धु को निज क्षेम से।
मत्त होते कुमुद पा नव वल अलौफिक प्रेम से॥
दूर दर्शन मात्र से निज बन्धु के दुख शोक हो ।
यन्धु सम सञ्चे सहायक मिल नहीं सकते हो ! ॥४२॥
नुच्छ तुप से रिफ्त हो कर नाज जम सकता नहीं।
छिद्र लघु होते हुए भी धन्ध थम सकता नहीं।
छाल से भी रहित होकर तर न जी सकते कभी।
अङ्ग में से अल्प अन्तर नष्ट कर देता सभी॥४३॥
शूद्र गण को नीच कह कर ऊँच हम होने चले ।
काट पद को अन्य अवयव रह कभी सकते भले!
पाद पर ही देह के प्रत्यङ्ग का सब भार है।
विपद-तारण सौख्य-कारण का यही आधार है ॥४॥
पांच कटते लोग हा ! हा !! पङ्गु जो हो जायगा ।
विकट जीवन युद्ध में फिर विजय कैसे पायगा ॥
युक्त हो सब अङ्ग से भी आज हिन्दूजाति तू ।
देख पीछे है पड़ी भव-दौड़ में किस भांति तू ? ॥४॥
त्याग कर के छल घृणा कर नित्य पालन फर्म का।
हास दिन २ हो रहा है देख शाश्वत धर्म का ॥
प्राप्त यल विद्या विभव सम्पत्ति सुख होंगे सभी ।
निरत रह कर्त्तव्य में गत रोग दुख होंगे सभी ॥४॥
(उचित अपने कर्म का पालन करो हे भाइयो!
यातना कट जायगी तज धैर्य मत घबड़ाइयो ।
दुःख के सङ्गीत को वस आज से विसराइयो।
सुख तथा स्वाधीनता का गान सुख से गाइयो ॥४७॥
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(२)
ऐक्य. प्रेमोपकार, प्रखरतप तथा धैर्य धर्मानुरक्तिः
स्वातन्त्र्य, स्वावलम्ब, प्रणय अब कहाँ, हा कहाँ देश-भक्ति ?
थी जो थोरप्रसू हा ! भरत-भुव वही, हो गई दास-माता
आर्यों में आर्यता का अहह ! अब न है, चिन्ह कोई लखाता
(३)
भीष्म, द्रोण प्रतापी रिपु-कुल-मद हा पार्थ धीर प्रधान
राणा श्रीमत्प्रताप प्रकट जगत में, श्री शिवाजी समान
योद्धा स्वातन्त्र्य प्रेमी सुगुणयुत बली, उद्यमी सच्चरित्र
होता है आज कोई न भरत-भुव में, जात क्यों ? हाय मित्र
(४)
क्या से क्या हो गई है भरत-सुत सुता आज, आश्चर्य धोर
देवों के तुल्य जी थे निशिचर सम ये हो गये है कठोर
ईर्ष्या, आलस्य, हिंसा, छल, मद, शठता, फूट, अज्ञान, द्वेष
छाये हैं देश में हा! नहिं अय करुणा का रहा लेश शेप
(५)
कैसी निःसत्यकारी प्रचलित हम में, याल-ब्याह प्रथा है
हा ' हा सर्वस्त्र हारी प्रतिफल, जिसको देख होती व्यथा है
क्षीणायु प्राण-रङ्क ब्यथित कर हमें, रोग से फांस सर्व
खाया सारे गुणों को गिन गिन इसने तोड़ के आर्य-गर्व
३
{ भोगें मल्पावयस्का अति मृदु ललना, हाय ! थैधव्य पड़िा
होती है भ्रूणहत्या छिप २ नित ही, पै हमें है न प्रीड़ा
अत्याचार प्रसार प्रति घर अब तो हो रहा है महान
तो भी हा! मूर्खता में पड़ हम इनके त्याग में देंन ध्यान
।
चीर्य ही है मायु इससे वीर्य की रक्षा करो। चीर्य ही से लभ्य हैं चारों पदार्थ सुहृद्यरो! स्वास्थ्य ही संसार में सारे सुखों का मूल है। सौख्य सामग्री, बिना मारोग्यता के मूल है ॥८॥ एफ मग में एक मति से साथ हो कर सय चलें। हों न हम फर्त्तव्य-च्युत रवि भूमि चाहें तो टलें ॥ जान भाई तुल्य चारों चर्ण हिलमिल के गले। हम फरें जय-गान मा का प्राप्त होंगें फल भले ॥४॥ टेक पूर्वक मान मर्यादा हमारी हम रखें। सुख तथा स्वाधीनता के फल सुधोपम हम चखें ॥ फूट, मद. मालस्य सह तज कर विषय की वासना । फर्म में हों निरत, होगी पूर्ण मन की कामना ॥ ५० ॥ हमारा अधः पतन। देखो तो हो गया है पतन यह अहा! भ्रात ! कैसा हमारा । विधा, वीर्य, प्रतिष्ठा, धन अब न रहे, खो गया गवं सारा॥ निन्दा होती हमारी नित अब हमको, श्वान देता न मान । तो भी लज्जा ज़रा भी नहि, हम सब हैं गूस्त शुष्काभिमान ॥
( १७
एक्य, प्रेमोपकार, प्रखरतप तथा धैर्य धर्मानुरक्ति;
स्वातन्त्र्य, स्वावलम्ब, प्रणय अब कहाँ, हा कहाँ देश-भक्ति ?
थी जो चीरप्रसू हा
भरत-भुव वही, हो गई दास-माता
आर्यों में आर्यता का अहह अब न है, चिन्ह कोई लखाता
(३)
भीष्म, द्रोण प्रतापी रिपु-कुल-मद-हा पार्थ वीर प्रधान
राणा श्रीमत्प्रताप प्रकट जगत में, श्री शिवाजी समान
योद्धा स्वातन्त्र्य प्रेमी सुगुणयुत बली, उद्यमी सच्चरित्र
होता है आज कोई न भरत-भुव में, जात क्यों ? हाय मत्र!
(४)
क्या से क्या हो गई हैं भरत-सुत सुता माज, आश्चर्य घोर
देवों के तुल्य जो थे निशिचर सम ये हो गये है कठोर
- ईर्ष्या, आलस्य, हिंसा, छल, मद, शठता, फूट, अज्ञान. द्वेष
छाये हैं देश में हा! नहिं अब करुणा का रहा लेश शेप
कैसी निःसत्यकारी प्रचलित हम में, याल-च्याह प्रथा है
हा ' हा सर्वस्व हारी प्रतिफल, जिसको देख होती व्यथा है
क्षणायु प्राण-रङ्क व्यथित कर हमें. रोग से फांस सर्व
खाया सारे गुणों को गिन गिन इसने तोड़ के मार्य-गर्व
। भोर्गे अल्पावयस्का प्रति मृदु ललना, हाय ! धन्य पीड़ा
होती हैं भ्रूणहत्या छिप २ नित ही. प हमें है न प्रीड़ा
अत्याचार प्रसार प्रति घर अब तो हो रहा है महान
तो भी हा! मूर्खता में पड़ हम इनके त्याग में देंन ध्यान
७
-
हे हे भाई! न होगा जय नफ घर के दुर्गुणों का सुधार
छुटेगा स्वप्न में भी तय तफ न कभी राष्ट्र फा दुःख-भार
हो के निःसत्य रोगी धन-यल-रहिता सन्तति शान-रङ्क।
पावेगें दुःख नाना तय तक जग में शीश पे ले कलङ्कः ।।
हमारी दशा।
प्रभुवर ! दनुजारे दुःख दारिद्रय हारी।
महह यह दशा है हो रही क्यों हमारी?
हम धन-यल-विद्या-घुद्धि-विज्ञान यान |
इस तरह हुए क्यों दीन, हा ' हा! महान ? ॥१॥
वह तप यल सारी श्रष्टि सन्ताप हारी।
वह जप पल सारी श्रष्टि सन्ताप हारी
महह ! सव हुए हैं आज को हाय ! लोप ।
हम पर यह कैसा देव का तीन कोप ? ॥२॥
वहु मणि-खणि, नाना रल माणिक्य मुक्ता ।
यह नव-निध, चॉदी-स्वर्ण सम्पत्ति युक्ता ?
अहह अव, कहाँ हैं आर्य-आनन्द-हेतु ?
अय हम न रहे क्यों सौख्य-संसार-सेतु ? ॥३॥
यह अवनि हमारी थी सभी अन्न पूर्ण ।
यह अयनि हमारी थी कभी अन्न पूर्ण ?
यह अवनि हमारी थी प्रभा-ऊप्म पूर्णा ।
महह अब वही है आज हा ' भष्म पूर्णा ॥४॥
द्विज सकल अविद्या के उपासी बने हैं। कपट कलह सारे क्षत्रियों में घने हैं। बणिक कृपण हो के हो रहे दास आज । पतित बन रहा है अन्त्यजों का समाज ॥५॥ विविध रुज हमें है नित्य सन्ताप देते। वल सहित हमारे धैर्य को छीन लेते ॥ सुलभ न हम को है सञ्चिकित्सा विधान । विवश सब हमारे वैद्य-विद्या निधान ॥६॥ निशि दिवस जगी है भूख की तीव्र ज्वाला । गुण गण जिसने हैं कर हो सोख डाला ॥ अब रह न गया है पाप या पुण्य ज्ञान । उदर भरण ही का है हमें एक ध्यान जा कृपि कृति करते हैं नित्य पा कष्ट नाना । घर पर न हमारे नाज है एक दाना ॥ सिर पर ऋण का है भार भारी सदैव । अब फिर दुहिता का व्याह है. देव देव ॥८॥ . जागहु मात ! त्यागि नींद भव उठहु मात भारत कित सोये । काहे अस निरदयी भई किमि सुनत न रोये ॥ बिलपत तव सुत फिरत करत फन्दन अधीर ह। पूरि रह्यो है आर्तनाद चहुं दिशि गंभीर है ।।
( २० )
(२)
धुनि धुनि सिर कहि मात मात तव सुत अकुलावै ।
है शोकाकुल हाय ' मात ' मुर्छित है जावै ।।
थर थर कांपत गात वात कछु समुझि परै ना।
मुख मलीन तन छीन दीन दुख कहत यनै ना ।।
(३)
विखर केश कुवेप धूरि है अङ्गन छाई ।
तन मन धन सुधि योरि भूमि निज सयन सजाई ॥
यारि विहीन मलीन मीन सम व्याकुल भारी ।
छटपटात काहि 'मात मात' दुख गिरा उचारी ॥
(४)
मरिण विहीन है जात दशा जिमि सर्पराज की।
का, अधीर सुत-दशा,मात ' नहिं लखहु आजैसी ॥
कह मत कस विन मात धरै धीरज जग माहीं।
को करिहै तिनको लालन पालन ?- कोउ नाहीं॥
(५)
का निज मधुरी वाणीसो मुत चित्त चुर है ?
'पुत्र पुत्र' कहि चूमि चूमि मन मुदित करे है ।।
को करिहै सनमान मान सव भांति हमारो?
खान पान असनान ध्यान महें मात । विचारो॥
याहि संवं दुख-अगिन जरावत पुत्रन छाती ।
भभकत दहकत ज्वाल यन ढिग सों कदि आती ॥
यदपि करत बहु जनन मात भारत सुत समरथ ।
ज्वलि प्रज्ज्वलित-शान्ति हेतु सींचत जल सत्पथ ।।
( २१ )
पै दुर्दैव ! हतास होत सव मास बिलावै ।
तदपि यत बहु भांति करतह शान्ति न पावै ॥
भात ' उठहु अय वेगि निठुरई त्यागु, दयाकर ।
देखहु भारत दशा दुर्दशा भोग्या दुखकर ।।
(८)
शोफ अथ को वारि माहि दुख अगिनि वुझावहु ।
चूमि यहुर मुख चन्द सुतन के हिय हुलसावहु ॥
उठहु मात ' तजि नींद दशा भारत कह देखौ ।
जहँ सुख शान्ति समाज साज के रह्यो भनेको ।
सोर भारत तच माज मात, है गयो भिखारी।
पूछत कोउ न बात हाय ! पावत दुख भारी ।।
'धन सम्पति मुख साज लूटि दुर्व्यसनन लीन्हो ।
जन समूह सब नाश रोग राफस करि दीन्हो ।।
(१०)
मन है छिन छिन छीन होत परि शोकन पाले।
तन झांझिरसों सखि गयो रोगनन वाले ॥
पेट हेतु है सूमि परत जहें कछु न उपाई।
तह व्यापार कला-कौशल का पूछिय भाई ?
(११)
जहँ विद्या विज्ञान धर्म को होत हास नित।
तहँ कस उन्नति आस रहत जहँ जन जर्जर-चित ।
इया आरज मान ध्यान अभिमान शान को।
हिन्दुस्तान सुथान बन्यो अब हा! अजान को!
( २२ )
(१२)
जागु जागु प्रिय मात विलंब को समय नाहि अव ।
तव स्वागत के हेतु देख इत होत साज सब ॥
जागि मुमति करिदेहु सुतन तय नीति सिखावहु ।
करन देश निज प्रेम याहि तिहिं मन्त्र पढ़ावहु ॥
.
सबै स्वदेशी वस्तु लेन हित एवमस्तु फरि।
परदेशी वस्तुन नमाम नाशन को प्रण धरि ॥
देश-दुर्दशा-दलन, देश सेवा महँ कार मन ।
शुभ स्वतन्त्रता लाभ हेतु वार नित तनधन ॥
(१४)
यहि शिक्षा दै सुतन, मात 'निज भगिनि जगावहु ।
कलकत्ता कालीमाई कहँ चलहु उठावहु ।।
कालगालसों सुतन अचे काली उद्धारहिं ।
लेग महामारी यसन्त दुर्गति रिपुटारहिं ।
(१५)
वीणापाणी सरस्वती गुणवर्ती भगिनि तव ।
काशी माह जगाइ देहु मा! तजि बिलम्ब सब ॥
कृपा तनिक जिन पाइ होत नर बुधि-विद्या घर ।
कला रुपी विज्ञान फरें उन्नत सय सत्वर ।
(१६)
जाइ यम्यई मात ! जगावहु मुम्या माई।
भरि देवरि घरघर मारत सुख सम्पति लाई ॥
महालक्षमी मात यनिज व्यापार यदावहिं ।
ढावहिंयस्तु विदेश ढेर. मुखसाज सजायहिं ।।
( २३ ) (१७) जावहि दुख सय माग उदय सुख रवि को होयाहे । होवहि चहुँदिशि नाम धाम मारज मन मोहहि ॥ मोहहि 'वन्देमात' धुनी तय कान घोरतम । तम दुखजाहि विलाय; जागु मा ' लखु अधीर हम ।। हमारी दुःखमयी दशा। प्रिय जिसे अपना तुम मानते प्रफट जन्म लिया तुमने जहां. विविध कष्ट सह जिसके लिए, सुधि न क्या उसफी भय है ? हरे ! ॥ १ ॥ सुरभि संग लिए अति भोद से मधुर घेणु यजा वन देश में विचरते जिन की कहते 'सखा महह ! क्या मय भूलगये उन्हें ? ॥२॥ यह यही प्रज मण्डल है प्रभो! यह रही जमुना यह है वही। यह यही सब ग्वालिनि ग्याल है। पर न क्या तुम आज रहे यही ?"
( २४ )
यह दया, वह कोमलता कहां?
वह सखा-प्रियता, वह बन्धुता,
यह दुखी-दुख फातरता कहां?
जननि-भक्ति कहां वह ? हे हरे ! ॥४॥
न सुनते दुख-मारत नाद फ्या--
श्रवण ? नेत्र न क्या यह देखते
अति दरिद्र-दशा इस देश की?
फिर कहें हम क्या करुणानिधे ! ॥५॥
विषय कोप हरे ! वह इन्द्र का !!
न ब्रज मण्डल ही पर माज तो
सकल भारत है यह डूवता--
जल यिन-दुख सागर में हहा ! ॥६॥
मरण सा यह "काल" कराल है
महह ! मार्य-कुवेर निरन्न है।
मच रही दशहू दिश "हाय" है
न मिलता हमको अय अन्न हा!" ॥ ७ ॥
मुरस गोरस घी जिन को सदा
सुलभ थे नित भोजन के लिए
प्रय वही हम कर्कश अन्न भी
महह ! पा सकते दुख से नहीं ॥८॥
कर रहे नितही उपवास हैं
बिलखते शिशु-यालक यालिका
मति सुधा घश मा स्तन से महो !
निकलता इक बूंद न क्षीर है ॥ ६॥
( २५ ) विविध रोग पुनः दुख दे रहे ज्वर, तथा क्षय, प्लेग, विसूचिका । उदर में फिर भूख फराल है घसन गेह मलीन महान है ॥ १० ॥ कुल यधू मति ही सुफुमारियां कृश-शरीर अधीर अपार हो पति सुता सुत की लख के दशा विकल भू पर मूर्छित हो रही !॥ ११ ॥ उदर अग्नि बुझे जिस भांति ही घृणित निन्दित का न विचार है। कर पसार "तुधा" कह रो रहे विविध ये नर कातर भाव से ॥१२॥ मर रहा नर जो अति भूख से वह न क्या अघ है करता हरे ! न रहता उसको कुछ शान है स्वकुल का अथवा निज धर्म का ॥ १३ ॥ चुन दियं हम थे कितने गये विपम भीपण भीत कठोर में । जल गये--पर "माह" न थी ज़रा सब सहे पर धर्म तजा नहीं ॥१४॥ अब वही हम कातर भूख से उदर ज्वाल निवारण के लिए सहज ही तजते निज धर्म हैं महह ! पेट ! फराल कठोर तू ॥ १५ ॥ ।
गिरि नदी वन गोचर भूमि की जननि थी यह शप्यमयी महीं। अब वहीं तृण घास यिना. लखो, मररहीं मृदु गो गण भूख से ॥ १६ ॥ कृषक के धन प्राण समान जो पशु-समूह. उन्हें लख व्याकुल कृपक हैं करुण स्वर रो रहे न अय प्राप्त उन्हें तृण हो रहा ॥ १७ ॥ भवन में जिसके शिशु रो रहे विलपत प्रति भोजन के बिना तय कहो, उस दीन किसान का बल कहां पशु-रक्षण का रहा ॥१६॥ यदि कहीं पर गो वध हो रहा हम सभी उसके हित प्राण को समझ तुच्छ, किया करते रण तुरत गो बध जाकर रोकते ॥१६॥ कुटिल कर तथा कपटी महा। यवन से जब था रण हो रहा लख गऊ उसके पनि सामने रखदिये हमने निज शस्त्र थे ॥२०॥ "मतल-मापद-सागर यांच में पड़, महा दुग्न भारत पायगा । पृथ्वीराज मौर शहाबुद्दीनगोरी की लड़ाई। 1 शत सहस्र युगों तक दासता सकल भारत भू पर छायगी" ॥ २१ ॥ यह प्रभो ! हम ये सय, जानते पर न 'गो बघ' था हम से हुमा हम यहीं निज गो-गण को लखो यधिक के कर में मय पंचते । ॥ २२ ।। हम हुए इस भांति निरुष्ट है हमहुए इस भांति कठोर हैं हम हुए अति भारत-अन्ध हैं हर लिये गुण सर्वस "भूख"ने ! ॥ २३ ॥ प्रय अतः करके फरणा प्रभो स्य-भुवि भारतको रख लो. महो! मयं न और ब्रजेश ! विलम्ब हो हम स्व पातक का फल पा चुके ॥ २४ ॥ स्वसुर मालय से प्रति प्रेम है तज समुद्र न पा सकते यदि तब मुकुन्द ! दया इतनी करी हृदय दो धनवान-समाज को ॥२५॥ कुछ यहांपर दानव जाति के अधम मानव है. अति हिंसक स्वजन थाहर कातर री रह परन व निज 'फाटक' खोलते ॥२६॥ श्रवण हैं पर ये सुनते नहीं व्यथित बान्धव मारत-नादको। .
( २८ ) नयन है पर ये लखते नहीं स्वजन के दुख, दारिद, दुर्दशा ! ॥ २७ ॥ मति इन्हें कुछ उत्तम दो तथा रति इन्हें प्रति दो परमार्थ में! यदि कहीं यह लोग कृपा करें दुख दरिद कटें इस देश के ॥२८॥ इस धनी धनवान समाज के हृदय में करुणा भरदो हरे ! यह हरे दुखदीन मलीन के तुधित पीड़ित निर्धन बन्धु के ॥२८॥ न जिससे हम आतुर भूखसे यवन हो निज धर्म बिगाड़ लें न अथवा प्रभु ईसु मसीह के शरण में पड़ दें तज धर्म को ॥३०॥ कवच हैं दृढ़, भारत वर्ष का सरल शान्त किसान-समूह ये कृषि सुधा मय जीवन प्राण है कृषक का बल पा हम धन्य है ॥३१॥ यदि किसान हुए वरवाद तो नृप रईस धनी पल में मिटें न फिर नो 'सर', रायबहादुर यन, फिर चढ़ मोटर, हों कुली ॥३२॥ कृषक रोदन हैं करते हरे! जठर ज्वाल कराल कठोर से ( २६ ) उठ धनी इनको धन अन्न दें कृपक हीन मरुस्थल देश है ॥ ३३ ॥ गो-विलाप । यह दैव-कोप मुझसे अब है सहा न जाता । जाऊँ कहां, करूं क्या, कह तू मुझे विधाता! सुत तीस कोटि मेरे विख्यात धुद्धि वल में । संसार को उलट दें चाहें तो एक पल में ।। सुत तीस कोटि मेरे कर साठ कोटि जिनके। चाहें तो बन लाखों दें तोड़ यथा तिनके ।। मुत तीस कोटि मेरे पद साठ कोटि जिनके। डालें कुचल मही के एकेक देश गिनके । यदि एक साथ जिह्वा हिन्दू सकल हिलावें। क्या बात मेदनी की. सुरधाम कांप जावै ॥ इस भांति शक्तिशाली सुत तसि कोटि रहते । गो मात कट रही हूं लाखों विपत्ति सहते ।। ए पुत्र हिन्दवासी मैं अम्ब हूं तुम्हारी । माराध्य अन्नपूर्णा अवलम्ब हूँ तुम्हारी ॥ दुख से मुझे बवामी, हिन्दू, यवन, इसाई । असहाय में शरण में तुम सब के आज आई ॥ भव भी न जो करोगे गो मात की भलाई । इससे अधिक न जग में होगी कृतघ्नताई ॥
करुण क्रन्दन ।
प्रेगमें भारतके गरीबों के चित्तकी दशाका दिग्दर्शन।
हे हरि मातंत्राण दुखी सोदर दुख पाता !
दीन बन्धु भगवान दयासागर सुखदाता ।।
सर्वशक्ति सम्पन्न ! तमा-जलनिधि अविनासी !
शरण आपकी आज हिन्द के सकल निवासी ॥
अन्तर्यामी पाप आपसे है क्या कहना?
होता है पर कठिन नाथ! दुख में चुप रहना ॥
धीरज धरता मन न व्यथित होने पर दुख से।
'नाथ ! मरे हम' यही निकलता है नित मुखसे ।
दिन दिन हरि ! मापत्तिरूप भीपण धरती है।
हम दीनों को व्यथित विक्रल विह्वल करती है।
रुदन विना अब और सहारा पास न कोई ।
वन्धुहीन हम दीन, हमारी आस न कोई ॥
हुआ प्लेग का कोप लगे त्यों चूहे मरने ।
दुखका आगम देख लगे पुरवासी डरने ।
क्रम क्रम बढ़ने लगी मौत की संख्या घर घर ।
पुर बाहर जा टिके धनी निज निज बगलों पर ।।
त्योंही वैभवयुक्त लोग तज निज घर, भागे ।
जा गामों में रहे अभयचित सुख से पागे ॥
वाहन हय रथ भृत्यु सहित सुख साज सजाय ।
दौरके हित गये बहुत हाकिम मन भाये ॥
भगवाहमापा मारा और नहीं है।
एक नहीं होनी का उपवास एप है।
लनामाम उदास हताश दुपह.
भूख माइरिसम्म विलन पालक रोने हैं।
लगे हमारे पाणगगन में दस-पन पिरले।
सिरसरत देस. प्राण धीरज सोते हैं।
सरकार नाश न पड़ी हुई है।
संगर प्रिय मित्र काल के मुख में गिरने ।
रपिदरी फाजत दिन सड़ी है।
यमनदल पनि दीनद फिरादत्त जारर
पुन र जाहिर
-
केवल हम मा माग्य को देने अपने ।
रहे मैच ही हुए शान्ति सुन हम को सपने ।
हुए हाट बार मिथिला दूकानें सारी-
मुरी मनोई तात कप हमको भारी ||
मजदूरी सहारा हमारा भार नहीं है ।
मिलना इनोसानहाय ! उधार कहाँ है।
ফিগা,
इस हुए न कुछ माघार फहीं है।
नाई॥
रोज मेरो मानने हा
रे॥४॥
( ३२ )
भारत-दुर्भिक्ष ।
निज यथा शक्ति भिक्षा दीजे अब, प्यारे ।
मर रहे भूख से नारी नर घेचारे ।।
इस वर्ष पड़ा दुर्भिक्ष हिन्द में भारी ।
मर जाती तलफ २ बालक नर नारी॥
उमकी आखें हैं भीतर हाय सिधारी।
हो गई हाड़ सय देह सूख कर सारी ॥
नहिं कान सुनाई देता लाख पुकारे।
है कण्ठ सूख हा गया भूखके मारे ।
ऐसे दुखियों को दुख से कौन उवारे ?
निज यथा शक्ति भिक्षा दीजे अव प्यारे !
मर रहे भूख से नारी नर बेचारे ॥१॥
कहिं अनावृष्टि, अति सृष्टि कहीं पर भाई।
है दशा फहीं की हा ' हा ! अति दुखदाई ॥
मापाढ़ मास से गिरा कहीं नहिं पानी।
ह खेत पड़े विन वोये, सुनिए दानी ॥
होगये धनी मानी भी हाय !भिखारी।
उपवास करें नित श्रेष्ठ कुलों की नारी ॥
यरबाद हो रहे ज़मीदार गण सारे।
नहिं मिले नाज हा! खोज २ कर हार ॥
निज यथा शक्ति मिक्षा अव जे प्यारे !
मर रहे भूख मे नारी नर येचारे ॥२॥
( ३३ )
कोइ, “भूख २" कह रोते औ चिल्लाते,
कोइ, 'प्राण उड़े जाते है, कह अकुलाते ॥
पत्ते खाकर कोई हैं दिवस बिताते,
कोई २ नर हा! हा! घास चबाते ॥
जो कुछ पाते उसको झट मुहँ में डारे,
महिं भला धुरा औ भक्षाभक्ष विचारें।
निज यथा शक्ति भिक्षा अब दीजे प्यारे,
मर रहे भूख से नारी नर वेचारे ॥ ३॥
जय देख न सकती निज पति का दुख भारी,
निज हत्या कर लेती कुलवन्ती नारी ॥
मुट्ठी भर चावल के हित हा हा! भाई,
माता धेचें निज बच्चों को दुखदाई ॥
ऐसी विपत्ति भारत में घर २ छाई,
निज भ्राताओं की लखो मात फठिनाई ।।
विन माप कौन दे धन प्रय इन्हें उयारे,
मर रहे भूख से नारी नर बेचारे ॥४॥
हमारी अस्वस्थता।
हे करुणा वरुणालय ईश्वर ! हे जगदीश विधाता!
हे हे पतित जाति के रक्षक, रोग-शोक-मय-त्राता!
हे दयालु हे भारतवन्धो ! हे सुख सद्गति दाता!
कय तक और सहेगी ऐसे दुख यह भारतमाता ? ॥१॥
शान्ति सौख्य का पाकर था यह भारतवर्ष हमारा ।
सुरगण को ईर्ष्या होती थी लख कर हर्ष हमारा ।
भूमण्डल को चकित किया करता उत्कर्ष हमारा।
पर अब रोते रोते ही कटता प्रति वर्ष हमारा ॥२॥
धम्मै अर्थ अरु काम मोक्ष का स्वास्थ्य मूल कारण है
स्वास्थ्य पिना जग में लोगों का व्यर्थ प्राण धारण है।
हाय ! स्वास्थ्य खोकर येठे हैं जय हम भारत वासी ।
हो सकते देशोन्नति के हम कैसे, कहो, प्रयासी १ ॥३॥
हीन वीर्य, हत बुद्धि, पुनः छल कपट कलह में पागे ।
सदाचार, शुचि,सुमति, शील, सत्कर्म, एकता त्यागे।
हम फिस भांति उठा सकते स्वदेश हित के यीड़े हैं
नहीं फूल फल सकते वृक्ष लगे जिनमें कीड़े हैं ॥ ४॥
मतः ध्यान दें सर्व प्रथम स्वास्थ्योन्नति में हम भाई!
आयुर्वेद प्रचार कर फ्रम क्रम से मश्रम भाई!
कर्माधीन सौख्य है. देहाधीन कर्म हैं सारे
कर्म-शक्ति का साधन है निज देशोन्नति ही प्यारे ॥५॥
ऋषि प्रणीत वैज्ञानिक विधि से पूर्ण परीक्षित ऐसी आर्य-चिकित्सा है भूतल में और न कोई जैसी। चीर फाड़ की क्रिया जहां करते वैदेशिक सारे । करते हैं मारोग्य वहां जड़ियों से वैद्य हमारे ॥६॥ जिसकी जो है मातृभूमि सुख शान्ति दायिनी प्यारी । उसको है सब भांति वहीं की औषधियां गुणकारी शाक, अन्न, जल वायु वहां का सुधा तुल्य है उसको. स्वास्थ्य विधायिनि रेणु वहां की भी अमूल्य है उसको ॥७॥ अतः अन्यथा करें नाश हम नहीं धर्म धन अपने शिक्षा देकर सविधि करें तैयार वैद्यगण अपने । राज वैद्यगण निज निज राजाओं को दें शुभ शिक्षा. आयुर्वेदोद्धार कार्य की लें वे उत्तम दीक्षा ॥८॥ भारत के नृपवर्यों का कुछ ध्यान इधर जव होता । नाच गान या रास रङ्ग का फिर जाता व्यय-सोता इसी ओर-इस आयुर्वेदोद्धार हेतु यदि भाई ! हित भारत का होता, मिटतीं रोक-शोक समुदाई ॥९॥ हे भारत के प्रान्त प्रान्त के 'विज्ञ वैद्यगण प्यारे ! ईश्वर से हम करें विनय, वह हमें दुखों से तारें करें यन हम जी से तो क्या रुज भय नहीं करेंगे? कहती महा! प्रतिध्वनि, इसमें संशय नहीं, "कटेंगे" ॥१०॥ 4.
भारतकी होली।
अन्न न मिले पेट भर कयहूं. है मकाल जहँ बारह मास ।
मागी महँगी की लागी प्रय, चहुँदिसि जहां दुःखकी यास॥
इस प्रकार जय मांगत घर घर, फर धर तूमा झोली है।
ईश! हाय हम भारतयासी, कह कौन मुख "होली है" १॥
उहददारों के घोड़े वन, नित हम कोड़े खाते हैं।
ऊँघ जाय तो हाय ! हमारे, सिर तक फोड़े जाते हैं।
एक नहीं दो नहीं जान, कितनों ही ने तो खोली है।
ऐसे दुख में पड़े पड़े हम, कहैं कौन मुख "होली है" ॥२॥
मओहो ! क्या अब करें, भगें, नित कहां, लेग जव हमें सतात।
औरत बच्चे मार कहीं. मारी जर औ वसन्त घहरात ।।
अंग-शोक-चिन्ता से दुर्थल, मन्द हो गई बोली है।
मः कैसे कह सकें खोलमुख, यह भारत की "होली है"॥३॥
कटत क्लेश से दिवस हमारे, शान्ति नेकह नहीं लखात ।
खलमल होत आर्य गृह २ प्रय, भाइन बीच कलह घहरात ॥
गति है क्या? जा अदालतोंमें, खाली करते झोली हैं।
घर घर हिन्दू लरत रुदत सों, रुदन शब्द की होली है ॥४॥
चख होटल में जूटे हम सप, छिप छिप करें कसाई काम ।
छली कुटिल व्यभिचारी होकर मह पेट के यने गुलाम ॥
जनम ठाढ़ होवत ही कूदें, पढ़ते गिटपिट बोली है।
भख मारें नौकरी हेत शिर, पीट पीट, बस, होली है ॥२॥
( ३७ ) टके एक के लिये विप्र, धोवी हो जायें जनेव उतार । ठगते रूप धरे पण्डित के. मृड़ मुड़ाय छोड़ घर द्वार।। डगर चलत जोरू फर लेते, देते लहँगा चोली है। ढरत आंख से आँसू सुन, ऐसी गति धांकी होली है ॥६॥ तकफि हैं खूव भोगते, जिनका हो नहिं सके बखान । थर थर करें भूख के मारे, कारीगर श्री कुली किसान । दगा विदेशी चीजों ने दे, मारी हमको गोली है। धन सय जाय विदेश चला अव फह कौन यल होली है ॥७॥ नहिं गोरस नहिं घीव दही नाहिं गेहूं की भी पूछो वात । । पर उपास जर नित छाती, हमरे भाग न नूनहु भात ॥ । फसल दुःखसे उपजा पहु. पर अन्य की झोली है! | भोग लगाओ भाजी की अब, अहो देवगण ! होली है ॥८॥ १. बहुत दुःख पाते हम सब हैं, बाल-विवाह तापसे हाय! मर जाती सन्तान कभी औ. कमी गर्भ तक भी गिर जाय॥ यदि कोई बच जाय जन्म ले, वह सब दुखकी गोली है। । रकन वीर्य सय पानी होके, बल बुधि जरती होली है ॥६॥ लगे रहें हम सेवकाई में, चौविस घंटे सय कुछ भूल । वर्णविचार कर्म धर्मादिक, सब जूए में हार समूल ।। शक्ति न कौड़िहु उपजाने की, विक गइ नागर डाली हैं। पट रिपुके हो दास च नित, फूहड़ कहते होली हैzon सहत दुःख दिन काटें तेहि पर हाकिम दरें हरदम रसद विगा लेवें, फोकट दब गर्ग मार क्षमा रूप धर भारतवासी, मुखत पानद मोनी है। त्राहि त्राहि ! भगवान दयाकर नतु मागीली है। ।
( ३८ )
विदेशी चीनी त्यागो।
जागो जागो सुत विपति पड़ी है भारी ।
यह खड़ी पुकारे भारत माता प्यारी ॥
कैसे तुमको भय भी है नींद सुहाती?
कैसे तुमको भय लाज नही कुछ माती ?
कैसे कैंप उठती नहीं तुम्हारी छाती ?
कैसे उज्ज्वल तव बुद्धि मन्द हो जाती?
हो जाते क्यों तुम भ्रष्ट असभ्य भिखारी?
जागो जागो सुत ! विपति पड़ी है भारी ।।
सब धाम नाम होते हैं नष्ट तुम्हारे ।
व्यापार कला कृषि कौशल इवे सारे ॥
कुल मान जाति भी हुई नष्ट अव हारे ।
विद्या बल पौरुप यचा न तुममें प्यारे ।
लुट गई वस्तु वह भी प्राणो सम प्यारी ।
जागो जागो सुत ! विपति पड़ी है भारी ॥
है बचा धर्म ही अपनी सम्पति सारी।
धन जन विद्या वल पौरुष कीर्ति तुम्हारी ॥
दुख नरक यातना से जो तुम्हें छुड़ावै ।
दोनों लोकों में काम सदा,जो पावै ॥
क्यों वृथा समझते तुम उसको दुखकारी।
जागो जागो सुत । विपति पड़ी है भारी ॥
है सार जगत् में केवल यही लखाता ।
सब दुख दरिद्रता से है तुम्हें छुटाता ॥
जब पिता मित्र औ ज्ञाति बन्धुबर भाई ।
माते फिर भवन चिता पर तुम्हें चदाई ॥
यह तजे न तुमको तब भी देख दुसारी ।
जागो जागो सुत ! विपति पड़ी है भारी
इसके ही कारण हुई लड़ाई भारी ।
हो गई सती सोलह हज़ार घर नारी ॥
इसके कारण नर तृण सम माण तजे है ।
पर धर्म जाति का नेक न ध्यान तजै है ।।
अय प्रीति धर्म की गई कहां वह न्यारी ।
जागो जागो सुत ! विपति पड़ी है भारी॥
चीनी जो लेते तुम बज़ार में जाकर ।
जो बिकै मिठाई हलवाई के घर पर।
चीनी न बनी यह सांटा रस सुन्दर से ।
पर यनी चुकन्दर बीट और गाजर से।
जिनको छूने से तुम्हें नहाना पड़ता।
उलटा नहिं होकर हाय ! तुम्हें क्यों रुवता॥
तुम तजो इसे यह है विकार अधकारी।
जागो जागो सुत! यिपति पड़ी है भारी॥
( ४० )
इसको ही खाकर हुए क्षीणयल सारे।
विद्या पौरुप उत्साह घटा सव प्यारे ।।
ब्राह्मण तेरे ब्रह्मत्य में लागी आगी।
क्षत्री ! तुम निर्वल हुए अशक्त विरागी ।
तुम वैश्य ! हो गये लोभी औ व्यभिचारी।
सेवकाई शूद्र न करते हुए भिखारी ॥
गुरु ब्राह्मण को भी देते अवये गारी।
जागो जागो सुत ! विपति पड़ी है भारी ॥
यह भ्रष्ट विदेशी चीनी तुम झट त्यागो।
सौ कोस दूर अब इसे देखते भागो ।
यह याघ रूप गौका धर कर है आया।
सय हिन्दवासियों को चाहे अव खाया ।।
खुद समझ दूसरों को भी तुम समझाओ ।
यह पद्य दुवारा गाकर उन्हें सुनाओ ॥
उठ धर्म नीति की रक्षा करो तुम्हारी ।
जागो जागो सुत! विपति पड़ी है भारी ॥
( ४१ )
'देशोद्धार सोपान
(केसरी के एक लेख का पद्यबद्ध अनुबाद)
प्रश्न-हैं कौन आपके अतिथि बोलिये प्यारे ?
उत्तर-भारत के प्रेमी औ कारीगर सारे ।
प्र०-किस भांति देशकी। दरिद्रता यह भागे
उ०-जव करें स्वदेशी ग्रहण विदेशी त्यागें।
प्र० है बड़ा लाभ क्या ? तप क्या बड़ा हमारा ?
उ.--देशीप्रचार, सेवा स्वदेश शुभ प्यारा।
प्र०-फैली स्वदेश भर में क्या चीज़ दुखारी
उ०-निज देशदशामें अज्ञानता हमारी।
प्र०-है क्या विप? लज्जा कौन बात करनेमें ?
उ०-~अन्यावलम्य, परदेश-वस्तु लेने में ।
प्र०-भरपूर शान अब हमें चाहिए किसका ?
-बनती क्या क्या चीजें स्वदेश में हैं इसका.
श्री कौन कौन चीजें हैं बननेवाली ।
कैसे हो देशोद्धार देश धन-शाली ॥
प्र०-है मोहजाल क्या? हमें बता दो भाई !
उ०-भड़कीली वस्तु-विदेश ग्रहण दुखदाई ।
प्र०-क्या है मालस्य ? हमें उसको है तजना ।
उ.-मन और कार्य से देशकार्य नहिं करना ।
प्र०-क्या सत्य मान है ? कहो हमें है सुनना ।
उ०-सब देश भाइयों से स्वदेश हित मिलना॥
-है खेद हमें किस किस प्रकार की क्षति पर?
.
.
( ४२ )
उ०-- उन पढ़े लिखे लोगों की उलटी मति पर।
जो डरे स्वदेशी मान्दोलन फरने को।
नित देश जाति हित हेतु ध्यान धरने को॥
-स्थिरता किसमें हो हमें इसे यतलामो?
-निज देश-प्रेममें, जिससे सय सुख पामो ।
है सत्य धैर्य क्या कहो ? हमें है सुनना ।
उ०-~परवाह न करके देशोन्नतिका करना।
सङ्कट में घघरा करके कभी न रोना ।
उत्साह देशकी प्रीति कभी नहिं खोना ।।
प्र०-किस लिए चाहिए हमें स्नानका करना !
~परदेश-माल संसर्ग हेतु ही डरना ।
मी पहिले के संसर्ग पाप मोचनको,
कर स्नान शुद्ध करना शरीर भी मनको ॥
प्र-पण्डित है कौन स्वनाम धन्य भति नीके?
जिसको यथार्थ हो ज्ञान वस्तु-देशी के ।
-क्यों हृदय यांच है ताप हमें दुख कारी?
उ०-~लख देशीकारीगरियों का दुख मारी।
है दम्भ क्या उसे सर्प तुल्य है तअना?
उ०-केवल करना बकवाद, काम नहिं करना ।
प्र--कह कौन नरक मक्षय भागी होते हैं ?
उ०- सब स्वदेशद्रोही जो नित सोते है।
औ धनरहते भी सुयश कमा नहिं लेते।
देशी धन्धोंको उत्तेजना न देते ॥
---हैं कौन देशके भक्त, बोलिये भाई ?
उ०-मन यातचीत भी कामों में सुखदाई ।
जिनका देशाभिमान हो. सुनिये प्यारे ।
है वही सपूत स्वदेश-भक्त रतनारे ।
प्र--मीठी बातोंसे कहो हमें क्या मिलता?
उ०-सय लोग स्वयश में भाते, होती स्थिरता।
प्र०- हैं मीठी बातें कौन, हमें समझा दो?
--जिसका, सुनिये, परिणाम सदा अच्छा हो।
प्र०-यतलाय मोक्ष किन किन लोगों को मिलता?
उ०-दिखलाते जो सेवा स्वदेश में स्थिरता )
प्र०-मुर्दा समान है कौन पुरुष जीवित हो?
उजो शक्ति मानसिक मार्थिक से भूपित हो,
भोगता स्वार्थ, परमार्थ भूल जाता है।
निज देश धर्म का ज्ञान वेंच खाता है ।
५ Fo-किसका प्रचार हो वायुवेगसे घर घर?
.30--उज्वल देशाभिमानही का भारत भर।
प्र-है कोन पुरुप जागता सदा निद्रित हो?
उ०-जिसके मनमें निज देश-प्रेम जागृत हो ।
प्र--भारत के सच्चे मित्र कौन हैं प्यारे?
उ०-देशी व्यापारी, देशोद्धारक सारे ।
कल कौशल कृषि व्यापार बढ़ाने याखे।
विज्ञान कारखाने फैलाने वाले ॥
प्र० है सुख का साधन कहो मुख्य क्या मा?
उ.-सेवा स्वदेश मन धन से देश मन्ना।
प्र०-है कौन पुरुष मानन्द में मदा गाना ?
-निरपेक्ष बुद्धि से देश काम न करना।
उ०-
?
उ०-
प्र०
(४४)
प्र०-आश्चर्य कौन सी यातों पर है दुरखकर
-हो परावलम्य मित्तुक होने की मति पर ।
प्र०-है देशोन्नति का मार्ग कौन मन भावन ?
उ०-उद्योग और धन्धों का पुनरुज्जीवन ।
संस्थापन जनन आदि धन मन से करना।
भी देशोद्धार-उपाय चित्त में धरना ॥
प्र०-है खबर आज क्या हमें सुना तो दो अब ?
उ०-प्रशान घोर तम बीच पड़े हैं जो सव ।
धन धर्म-विनाशी प्रारत भारत वासी।
हैं जाग रहे कुछ कुछ अव त्याग उदासी॥
- है पुरुष कौन जगवीच जन्म नर पाकर ?
उ०-जो देश-कार्य-हित पाय प्रशंसा घर घर ।
-दारिद्र पुरी से सम्पतिपुर को जाने,
के इच्छुक हिन्दनिवासी कौन सयाने ?
उ.-निज देश भाइयों के हित माल स्वदेशी,
जो भक्तिभाव से घना, तजें परदेशी,
कम दाम से सदा सत्य येचने वाले ।
ो दृढ निइचय से देशी लेनेवाले ॥
प्र०-~-अतिसार हिन्द को पैशाचिक जु लगा है।
उसकी अति उत्तम औषधि कहिये क्या है?
उ०-केवल एक ही दवाई, भात न येशी ।
देशाभिमान अनुपान संग शुम देशी;
चीजें प्रचार के दृढनिश्चय की गुटिका;
का सेवन करना, बदला हो उम क्षतिका ।
.
--
( ४५ )
प्र०-इस समय लोक प्रियता हो क्या करने से?
उ.--निज देश विपय में अनास्था तजने से।
प्र०-है दया नाम किसका? चूको क्यों करने ?
उ०-निज देश बान्धओं को भूखे नहि रहने-
देने की इच्छा, दृश्यरूप है इसका,
कि देशी माल ग्रहण की सुदृढ़ प्रतिज्ञा ।
-है साधु कौन, क्या उनकी परीक्षा नीकी?
उ०-जो करें साधना देश भलाई ही की।
प्र०-अति मूर्ख किसे कहते हैं लोग सयाने ?
उ०-निज देश लाभसे निज न लाभ जो जाने ।
प्र०-अभिमान हमें हो प्यारे कहिये किसका?
उ०-निज देश, धर्म औ देशभाइयों ही का।
प्र०--मानन्द महै किस बातका हमें भारी?
10.-इस बातका कि भारत सरकार हमारी।
कहती सहायता देने को हम सबको ।
देशी प्रचार की सब बातों में अब तो।
da
-
(४८) स्वतन्त्रता-प्रति भारत माता । हे हे प्रजा-पाण-प्रमोद दात्रि । स्वतन्त्रते, देवि, गई: कहां हू। हे राज्यपीड़ा-दुख-काल-रात्रि आई नहीं क्यों अयली यहां तू ? जीर्णा हुई मैं यल युद्धि-हीना, तो भी मुझे हा! करके प्रधाना देती सदाही दुख तू मुझे है, लज्जा न तौभी कह क्या तुझेहैर क्यों है हुई रुष्ट मुझे बतादे. बेटी, सनाथा कर आ पता ले। मेरी हुई भूल ग्रहो कदापि. घेटी क्षमा कर, आ तथापि३ तेरी व्यथा से नित अश्रु-धारा. माता वहाती यह मैं, अपारा। तौभी दया देवि तुझे न आई. सीखी कहां हाय ! कठोरताई ४ तू क्या गई छोड़ मुझे अनाथां? त्यागा मुझे ज्यों नृपचन्द्र-गुप्त! सम्बन्ध त्यागा तव हिंदसेक्या? ज्योंही हुआ पुत्र 'अशोक' लुप्त भ्रष्टा हुई भूमि सुधर्म भागा, ज्योंही अविद्या तम-मोह जागा। तू क्या तमी हो विधवा दुलारी, राजा*पृथी के सँग देह जारी या देवि तूने तय हिन्द छोड़ा, सम्बन्ध क्या भारत सँग तोड़ा? ज्योंही शिवाजी तज नेह नाते, हा हा!गये छोड़ मुझे रुलाते ७ तूने नहीं जो तब हिंद त्यागा, वेटी, रही जोझिप के कहीं भी। लै साथ राजा रणजीता को तू, हा! हा! गई छोड़ मुझे अवश्य यीते युगों, पैन कहीं रिफार्म', हूं एक मैं शास्वत रूप-धषा । जाना इसी हेतु तुझे, अवश्य, हुई घृणा भारत से अशेषा * पृथ्विराज' रणजीतसिंह (पंजाब केशरी) ( ४७ ) स्वार्थी हुए लोग सुनीति त्यागे, स्वाधीनता थेंच हुए अभागे। दासत्व में होकर के प्रावट, जातीयता-ज्ञान किया चिनष्ट १० ठंढा हुमा खून, रहा न जोश, द्वेषी हुए है न हवास होश । धिकार गाली नित मार खाते, तौभी सदाही सिर है मुफाते ११ हो दास भारी दुख हैं उठाते, हा!'नीच फाले' सब हैं कहाते । स्वच्छन्दताफा सुखभी न पाते, आजन्म गाली नित मार खाते १२ सौभी परों के मुख को निहारें, हा! भूल के भी न दशा सुधार। व्यापार विद्या कृषिको विसार, उपाय कोई न स्वयं विचारै १३ विद्या कला कौशलके उपासी, होते नहीं है अय हिन्दवासी । बैठे निउले सय हो उदासी, पैदा हुए उन्नति-मूल-नासी १४ लेते सदा वस्तु विदेश धारी, भूले स्वदेशी प्रियवस्तु सारा। है रुष्ट, जाना इस हेतु प्यारी! तूने दिया है यह दुःख भारी १५ जैसे गई तू तज देवि जेष्टा ! भग्नी सभी छोड़ मुझे सिधारी। विद्यादि देवी रण-ऐक्य-श्रेष्टा, हा! हा! तभी सँग गई तुम्हारे१६ हूँदें तुझे फायर जीच सारे, पाते न पै ये नित मूड मारे । तेरा कहां जन्म न जानते जो, कैसे कही ये तव रूप जानें! १७ है जन्म-भूमी शव-शूर-धूर, लै जन्म रोती जहँ तू अधीर । दै प्राण के दान स्वदेश सेवी, सोते वहाँ हैं कवि शूर धीर १८ जातीयता ही तव है शरीर, आत्मा सुस्वच्छन्द विचार सार। आभूपणादी कवि शूर धीर, देवी! सुवक्ता तव वन भार १६ होती जहां प्रेम, स्वदेश बीड़ा, जाकै करै तू तहँ बाल-क्रीड़ा। होती सदा तू उनपैऽनुरक्त, पाती जहाँ है हृद-उण-रक्त २० है उम्र तेरी सुन, काल, प्यारी सम्पत्ति आशा तब देवि, सारी।
( ४८ ) जो जानते हैं यह बात सारी, वेही तुझे पा सकते कुमारी!२१ है किन्तु तेरी यह जन्म-भूमि, घेटी इसे जा, न कदापि भूल । है स्वर्ग से भी यह भूमि प्यारी. संसार-सारा-सुख-शांति-मूलर जो पै अहै फूट विरोध भारी, है एकता भारत यीच जो न। तो भी ज़रा तू भयभीत हो न, बेटी यहां आ, अथ तू यहां आर३ विद्यादि देवी रण-ऐक्य-श्रेष्टा, जो सँग तेरे सय थीं सिधारी । लैसाथ सारी भगिनी तुम्हारी, सानन्द आयो घर हे कुमारी २४ मामो, गई भाग कुरीति सारी, निद्रा मिटी भारत-मोह-कारी। देखो सभी होफर सावधान, हैं काटते फूट-विरोध-शान ॥२५ कांग्रेसनेसफलभारतकोमिलाया जातीय ज्ञानसपकेमन मेंजगाया। हैएकतासुख-लतानव-जातकैसी देखीम तकनहोतुमदेवजैसी२६ मामो आयो बिलम तजि सभी जोहते राह तेरी. देखो कैसी जयध्वनि करते आरती हाथ लै के मामो, कीजै सुखद तव प्रजा, राज्य भोगो अनन्त, पीछे प्यारी ! अवसर न तुझे और ऐसा मिलेगा ॥२७॥ महो! मामो प्यारी रुदन इमि माता करति है। दया कीजै दीजै बल, सुयश-छाती जरति है। प्रजा देख तेरा मुख, विपति भारी सहति है। "उयारो उद्धारो दुख विपति टारों" रटति है ॥२८॥ - ( ४ ) बालस को तजिये। देशाभिमान के ज्ञान ध्यान से छुटे । यह प्रीति, नीति, परतीत, सनातन टूटे । जानें न मर्म अव धर्म कर्म के कोई । हो नष्ट भ्रष्ट करते मन भाते सोई॥ माती न लाज क्या ? सुमति साज सब सजिये। भारतवासी! अव तो मालस को तजिये ॥१॥ येचे स्वतन्त्रता होकर दास अभागे । व्यापार-कला विज्ञान कृषी अब त्यागे॥ जूते खाफर सेवकाई जिन्हें मुहाई । उनकी उन्नति गति मतिफी हाय ! दुहाई॥ माती न लाज क्या ? समति साज सय सजिये । भारतवासी ! अब तो मालस को तजिये ॥२॥ फूर्फ स्वदेश धन लै विदेश की चीजें। निज देश-वस्तु लेने में हम हा! खीमें । होकर परावलम्बी हा ! दिवस बिताते । जाने सब तब भी घृणा न हम कुछ लाते । माती न लाज क्या? समति साज सय सजिये । भारतवासी !अब तो मालस को तजिये ॥३॥ दुर्व्यसन हमारे सगुण छीन लेते हैं। सय भांति विवश कर हमें दुःख देते हैं। ४ ( ५० ) हा! फिन्तु नींद हम कुम्भकर्ण की सोते । हो विषय लिप्त तन मन धन निर्भय खोते । माती न लाज क्या ? मुमति साज सब सजिये। भारतवासी! मय तो मालस को तजिये ॥४॥ तजिये अभिमान स्वदेश को नाहिं, रहे जय लों प्रिय प्रान हिये। न हिये कछु मान विचारिये जू. डरिये न फछु सुमती सजिये। सजिये सय साज स्वदेश सुधार फो. भारत-मात सदा भजिये। भजिये निज देश की वस्तु प्रिया, मविलम्यहि मालस को तजिये ॥५॥ मेरी-अर्जी। ज़रा भारती भाइयो हो जो मर्जी। सुनाऊँ तो मैं एक छोटी सी अर्जी। जगत में रहा नाम भारत का भारी। यही भूमि वीर प्रसू थी हमारी। यही रत्न गी थी विद्या की भाकर। यही सब कला कौशलों का भी थी घर ॥ इसी ने धरम को जगत में जगाया। है स्वातन्त्र्य मी सभ्यता को यदाया ।।
( ५१ )
यही था सभी देश का ज्ञान दाता।
यही एक था वीरता का विधाता॥
वही है हुमा माज देखो तो कैसा।
जाही हां न विद्या न यल धर्म पैसा ।
रहे तुम जो दानी हुए सो भिखारी।
फिरो दास हो खा रहे मार गारी ।।
न तो भी तुम्हें हाय कुछ लाज माती ।
नहीं शोक से हाय फटती भी छाती।।
कहां माज अर्जुन ? कहां द्रोण हा ! हा!
कहां भीम ? सब का हुमा नाम स्वाहा !!
कहां माज मेवार के वीर राना ।
कहां हैं शिवाजी धरे वीर याना?
फहां आज चित्तौर की वीर नारी?
कहां हाय ! दुर्गावती है सिधारी?
है छाई लखो प्लेग जर और मारी।
घ फैला है भारत में दुर्मिक्षभारी ।।
हुमा चाहता हिन्द है खाक हा! हा!
यचामो इसे यह तो होता है स्वाहा !
कहाँ माज सोते हो राजे हमारे।
कहां हो धनी हिन्द माता के प्यार ॥
कहो कैसे सुख की तुम्हें नींद आती।
अगर द्वार थाहर रलाई सुनाती॥
तुम्हें पेट भरना लो कैसे प्यारा।
परोसी मरे भूखस जब तुम्हारा ॥
( ५२ )
विचारा है तुमने कि “हमतो है राजे ।
"करें चैन सुख राजसी साज साजे ॥
"मरें दूसरे लोग तो हम करें क्या ?
जो जलते हैं उन लोगों के संग जरें क्या!
भरा घर में धन है मज़े है .उड़ाते ।
जहां हम हैं जाते वहीं मान पाते ॥"
प, भाई तुम्हारे इसी देश वाले।
कहाते हैं काहिल कुली और काले ॥
यतामो कहां तय रही है बड़ाई ।
है भारत की निन्दा सभी मोर छाई॥
गरीयों के दुख की न परवा है जिसको।
न भाई के संकट प है माह जिसको।।
घहे जानवर पूछ मौ सींघ के दिन ।
है दुनिये का योझा, कर उससे सव धिन ।।
करो चेत भारत य भारत यहुत है।
न देरी किये देश की खैरियत है।
न बिगड़ा अभी तक है कुछ देखो भाई ।
अगर तुम में हो धर्म मी-धीरताई।
तिजारत की चाहो अगर तुम तरफ्की ।
कला कृषि की उन्नति भी चाहो जो पक्की ॥
घ छोड़ा चहो मांगना भीख दर दर ।
फरो तो सदा यस्तु देशी का आदर।
यही स्वावलम्बन का है एक द्वारा।
यही सिद्धि का एफही मंत्र प्यारा॥
यही एफ तुम में है यिनती हमारी।
इसी में है सारी भलाई तुम्हारी ॥
उद्योधन ।
घेश्य भाइयो ! धीर पुत्र तुम हो भारत फे।
नाशफ हो यस एक तुम्ही इसके भारत के॥
हरने वाले तुम्ही एक दारिद्रय देश के।
भरने वाले सौम्य, सम्पदा, धन मशेष के।
म्यापार तुम्हारा समर है. युद्धस्थल याज़ार है।
है विफट अस्त्र विनिमय प्रफट. फवच सत्य-व्ययहार है।
गिरी हुई है दशा देश की मति दुखदाई।
क्षत्रिय भी बन गये दास वो मान सदा।
धर्म, जाति-अभिमान, फर्म का ध्यान यिमार।
जीवित भी मृत तुल्य देश यामीमा।
भय नहीं फिसी फो डान है. निजता या कृर-।
हो वैश्य भाइयो । एक प्रय, वीर तुम्ही प्रम देश
माने पर भी विपद धैर्य तुम नं नहि मंड़ा।
रहे धर्म में डटे दामन मम मांडा।
तज फुल का व्यवसाय, फोन मेसी
सहफर लाग्यों कष्ट टेक.गदिश घरफी।
व्यापार विदेशी वणिकगगा न ममी।
जो चैश्य भाइयो ! इमे तुम.रदिय यी ॥३६
-
( ५४ )
हुमा समय का फेर तुम्हारी मति गति यदली।
हुई फलान्त हाय ! तुम्हारी जाति-मण्डली ।।
अवगुण धुसे हज़ार भवन में भ्रात! तुम्हारे ।
भगे शील. औदार्य, सत्य-चल, सद्गुण सारे ।।
मिलते नहिं तुम में चिन्ह कुछ वैश्य धर्म के प्राज हैं।
तुम में छल. मद. दुर्वासना, लख कर माती लाज है १५॥
थे परिश्रमी, वली तुम्हारे पुरपे नामी ।
उनकी ही सन्तान हुए तुम निर्वल कामी ॥
थे सहिष्णु, निर्भीक, वैश्य जो गो-द्विज-पालक ।
आज वही तुम बने भीरु, कपटी, कुल-पालक ।
मांगम सा समझते सारे हिन्दुस्तान को ।
दूकान-गमन-हित चाहिये रथ उनकी सन्तान को ॥५॥
उठो न देरी करो नींद तज, नयन उधारो।
जो है घर की दशा गिरी तुम उसे सुधारो ।।
मकपटता. सत्प्रेम सत्य मारग हैं स्थायी ।
गहकर इनको बनो भात ! सच्चे व्यवसायी ।
दरिद्रता मिट जायगी. फिर भारत में सुख शान्ति हो।
हम दुःख न ऐसे पांयगे. दूर मकाल अशान्ति हो ॥६॥
व्यवसायी के लिए दूर है देश कौनसा ?
व्यवसायी के लिए शूर है देश कौनसा?
व्यवसायी के लिए असम्भव हैं क्या यातें?
व्यवसायी के लिए दिवस बन जाती रातें।
व्यवसाय विमल वाणिज्य में सुख सम्पति का द्वार है।
जातीय समर में विश्व के यही विजय आधार है॥७॥
( ५५ )
उपदेश।
विद्यार्थियो जो सुख चाहते हो
न व्यर्थ खोमो पल भी तुम्हारा।
डरोन मागे लख विघ्न-बाधा,
कर्तव्य से आनन को न मोड़ो ॥१॥
जहां नहीं साहस धैर्य होता
वहां न जाती फिर सिद्धि देखी।
क्या भीर को भी जगमें कदापि ।
मिली कभी है जय, सोच देखो ? ॥२॥
सत्प्रेम, सद्भाव, नहीं जहां है
मशान्ति का राज्य वहां सदा है।
सदर्म, स्वातन्त्र्य सुनीति-निश
है शान्ति के द्वार प्रशस्त भू में ॥३॥
है शील ही भूपण मानवों का
देता यही है जग में भरत्व,
विद्या विना शील, न काम माती
अतः बनो निश्चय शीलवान ॥४॥
विपत्तियों में.मत धैर्य छोड़ो,
होना नहीं कातर शोक देख
हो सारमाही मधुमक्षिका से
पिपीलिका से यन फर्म साधो ॥५॥
( ५६ ) प्रलोभनो से परिपूर्ण भू है न भक्ष्य होना इनके कभी भी मालस्य हिंसा जल को विसार धारो हिये में श्रम स्वावलम्ब ॥ ६ ॥ लड़े जहां सोदर सोदरों से हुई भलाई उनकी कभी क्या ? यिसार के यन्धु-विरोध, मित्र; मिले रहो आपस में सयत्न ॥७॥ है वीर्य ही जीवन प्राणियों का है वीर्य से लभ्य पदार्थ चारों दो वीर्य रक्षा पर नित्य ध्यान कर्तव्य साधो यन फर्मवीर ॥८॥ माशा तुम्ही हो इस भव्य भूमि की दायित्व भारी यह है सखे ! यड़ा. ज्यों मातृ भू के दुख शीघ्र ही मिटे प्रयत्न त्यों नित्य किया करो सभी॥॥
नम्र निवेदन। भावी भारत के सन्तान दृद प्रतिज्ञ गुण शील निधान छानो हे सुजन शिरोमणि ज्ञानवान जो सारे हो । स्वतन्त्रता प्रेमी यल बीर सत्य न्याय ग्राहक अति धीर हिन्दू मुसलमान भारत हित रत, जो सकल हमारे हो ॥१॥ उनमें कितने राज कुमार प्रथया कुली कृपक परिवार था इस धनियों के लड़के ब्रह्मचर्य व्रत के पालक । तज के ऊँच नीच का ज्ञान द्वेष कपट का कर अवसान एक भाव रख कर आपस में वनो सभी देशोद्धारक ॥२॥ हिन्दी भाषा का उद्धार कर, उसका सब करो प्रचार जिस से सरल नागरी लिपि का घर २ होय बोलयाला। सुन्दर सुखद सनातन धर्म भिन्न २ वर्णाश्रम कर्म पालो, तुम सब पाखण्डों का करदो झटपट मुंह काला ॥३॥ जिनमें नहीं जाति अभिमान वे नर हैं यस मृतक समान अतः वनो तुम देश तथा निज जाति धर्म के प्रेमी बीर ।
( ५८ ) विद्या पढ़ो यनो मातमान मर्जन फरलो सच्चा ज्ञान न्यायी कार्य दक्ष हो फरफे बनी सुशील साधु घर धीर ॥४॥ हाय 'दास यनते जो लोग मिलता उन्हें न सुख सम्भोग मित श्यानसम घृणित दृष्टि से सब देने जाते हैं। नत मस्तक भय कम्पित गात सहते हैं स्वामी की बात मौन भाव से खड़े २ कुछ नहीं बोलने पाते हैं ॥५॥ जोड़े हाथ खड़े दिन रात भूखे प्यासे निर्वल गात सदा निरुत्तर हो स्वामी की आज्ञापालन हित जाते। धर्म कर्म माचार विचार देना पड़ता सभी विसार पूजा पाठ ध्यान जप चे नहिं सपने में भी कर पाते ॥६॥ जात पांत सब करते नष्ट हो कर भ्रष्ट उठाते कष्ट नाना भांति पाप कर्मों के करने में रत रहते हैं। ऊपर भरे शुष्क अभिमान चक्रवर्ति नृप राज समान किन्तु कांच की भट्टी के सम भीतर तन मन दहते हैं ॥ ७ ॥ माता पिता कहां घर रहा औरत यच्चे भाई कहां कहां अकेले घन जंगल में फिरते दुख से दिन जाते ।
बुरी कहीं की है जलवायु जिससे पल २ घटती मायु रोगाकान्त पुनः हो करके हीन वीर्य हो पछताते ॥८॥ स्वतन्त्रता तज बनो न दास प्यारे उस में है अति त्रास नहीं देखते भाई ! क्या तुम अपनी हीन अवस्था हाय । क्या थे हम सब हैं क्या प्राज सोच न यह क्या माती लाज कहां गये वे सफल हमारे अत्युनत स्वतन्त्र व्यवसाय ॥ ६ ॥ कृषि फौशल फल फला अपार कारीगरी विविध व्यापार तजकर, हम सब हुए माज इस भांति हीन से भी हैं हीन । ब्रह्मचर्य का पूर्ण अभाव विपमय पाल्य-विवाह प्रभाव करते जाते दिन २ हमको निर्वल भीरु कापुरुप क्षीण ॥१०॥ कर्णार्जुन, कृप, द्रोण समान हम थे वीर रथी बलवान सुर गण भी लज्जित होते थे भारतीय बल वीर्य समक्ष । यह न निरा पौराणिक गल्प मिथ्या है इसमें नहिं अल्प "राममूर्ति" है इसका विमल प्रमाण माधुनिक प्रति प्रत्यक्ष ॥११॥ उच्च नीच सय बन्धु समान रखकर देश भक्ति का ध्यान देश दशा अनुसार फरो तुम हे छात्रो! स्वतन्त्र व्यवसाय । --
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( ६० )
ब्रह्मचर्य है जीवन सार
ब्रह्मचर्य प्रत को उर धार
थाल्य विवाह रोकने का तुम करो सशक्ति सदैव उपाय ॥१॥
तज मापस का वैर विकार
करो एकता प्रेम प्रचार
कृषि वाणिज्य कला कौशल की उन्नति मन देकर करिये।
जाकर अमरीका जापान
सीखो नव
विद्या-विज्ञान
नूतन शक्ति विभूपित होकर मातृ भूमि का दुख हरिये १३॥
हो चाहे तुम सभ्य वकील
या सम्पादक, सुकवि, सुशील
अथवा व्यापारी, किसान या उच्च पदस्थ-
-कर्मचारी।
रखना उर में इसका ध्यान
मात्मोन्नति का मंत्र महान
गला काटना दीन दुखी का है सब पापों से भारी ॥ १४ ॥
दीन दुखी पर अत्याचार
कर, भर लेना निज भण्डार
वर्तमान में मनुष्यत्व का लोग समझते इसे विकास ।
पर इसके सम अघन महान
इसे त्यागना सर्प समान
कष्टोपार्जित दीन-प्रास हरने से उत्तम है उपवास ॥ १५ ॥
पृथ्विराज के उत्साह वाक्य ।
-रामानः
सावधान सब होहि, जाहु क्षत्रांगन मेरो।
यवन करन प्रय चहत, पुण्य भारत मह डेरो ॥
हम क्षत्रिन फे रहत. दुर्दशा गो ब्राह्मन कहँ ।
होवहिं तो धिक यल, विक्रम क्षत्री जीवन महूँ ।।
चलहु करहु निज धर्म, अटल निर्भय है भाई ॥
जमि रण भूमि चटान, तुल्य लरि शत्रु भगाई ॥
घरसिन देहु चढ़ाय तोप, लखि मुरचे सारे ।
गरजि सिंह सम लेहु. कादि असि निजकर प्यारे
सुमरि देव-फुल. चूमि, सुता सुत मानन अन्तिम ।
'वन्दे भारत मात' शब्द, फरि घार घोर तम ।।
मारू बाजे बजन देहु, सब मारु मारु रट।
धरि २ प्रूफहु नरसिंघन, भेरी हूं चटपट॥
झटपट करि रन साज, पीर झपटहु शत्रुन पहूँ ।
जिमि झपटत है लवायाज, पक्षी झुण्डन महँ ।
पहि विधि देहु विदारि मारि पापिन कहँ भाई।
धर्म युद्ध महँ अवशि, होहिं रघुनाथ सहाई ॥
दांत वतीसो झारि मारि, दोउ कान मरोरहु ।
शत्रु रक्त महँ अजय, खड्ग-भारत की पोरहु ॥
विजय धैजयन्ती,
भारतकी.चहुँ फहरावहु ।
जय २ धुनि सो महोयीर, आकाश कँपाबहु॥
*
*
*
पांच न पीछे धरहु. करहु घमसान खेत महैं। प्रान देशनित देह. लेहु यश विमल जाहु जहँ॥ भारत भूमि पवित्र, मनोहर शुपमा शाली । जल थल विपुल सुहात. नित्य नूतन हरियाली । निर्मल जल नर्मदा गङ्ग सुतरङ्ग ले। धोबत फलिमल कलुप नशावत भरत अंग फै। कवि अपार सुखसार, धार यमुना जहँ सोहत । प्रकृति देविका सुघर. रूप जहँ मुनि मन मोहत॥ जहँ नित यादल अदल, यदल कल छल दिखरावत दल घल ले धावत फहुँ. वरसावत तरसावत ॥ जहँ उत्तर दिशि अचल, हिमाचल रत विभूपित । समाधिस्थ है फरत राज. प्रकृती सों पूरित ॥ शिखर समाज अनेक, एक सों इक अति सुन्दर । कृष्ण वर्ण तरु हरित खेत जल झील मनोहर॥ * * तरुवर। ताल जह तह फूलत फलत महै नित नूतन कहुँ कदम्ब कचनार. मनारन कहुँ पीपर घर ।। कतहुँ महै झूमत रसाल, फहुँ मनोहर। फतहुँ पलास विशाल, साल श्रीफल कहुँ सेमर ।। कतहुँ बेर कहुँ चार. नीम अमली कहुँ सुन्दर। कहुँ सरसीवां घेल, जाम गूलर फहुँ फटहर।। कहुँ अकोल अनमोल, सराई सिरिस सुहावन। मह निम्बु मागौन, सन्तरा कहुँ मनभावन । कहुँ गुलाय सौरभ, सवारत विमलवायु महें। कतहुँ माधवी फूल. शूल हिय काटत नर कह।।
कह चमकत चम्पा, चपलासी कतहुँ चमेली।
लपटि मालती फतहुँ, करत तरुसों अटखेली ॥
सरिता
सर भरपूर, नीर सों शोभा खानी ।
देतदान जल नरन, सदा लखि सकुचर्हिदानी
तिन महँ फूले कमल, कमोदिनि जन मन मोहत
हंस यतक यक चक्र, धाक प्रमुदित जहँ डोलत॥
कुज कुञ्ज कूजत केकी, कोयल कहुँ कुहफत ।
ठोर ठौर गुजार भीर को, मुनि मन मोहत॥
रतन खान को थान, धान धन सों परिपूरित।
ज्ञान कला
विज्ञान, गान-विद्या गुण भूपित ॥
शूर समर कवि धीर, वीर दानी मानी नर।
धर्म धीर
सम्यता, शिष्ठ को हिन्द इष्ट घर ।
सप सुख-सम्पति-साज, राज नृपराज जगत को।
ताकी ममता छोड़ि सके, भस अधम कहहु को॥
जय ली मारज राज माहि, भारज कुल
यासा।
जब लौ भारज नाम धाम, जन-तन मह स्वासा ॥
तय · ली बीर कृपान, म्यान महँ थान न पावै ।
ध्यान, मान सय हान गिरावै॥
शत्रु एकहूं यचन नाहिं, बनहूँ मह
यन बन खोजि विदारि, मारि म्यानहि त्य जावै ॥
'अस विधि साहस धैर्य, देई" नृप निज वीरन कहँ ।
धर्माधर्म सिखाइ, सुशिच्छा देइ सवन कहूँ॥
चल्यो खेत नृप सुमार, देवि-भारत शुभरासी ।
मनहुँ चीर रस प्रकट भयो, कुल यवन विनाशी ।।
शत्रु मानको
पावै ।
( ६४ )
कहां गये? .
अपने धनुष याण से सुरपति सैन्य लजाने वाले।
भू मण्डल में मार्य-विजय दुंदुभी यजाने वाले ॥
धर्म कर्म स्वातन्त्र शान्ति के साज सजाने वाले।
कहां गये चे धीर हमारे 'मार्य' कहाने वाले ? '
(२)
निर्वल, भीरु, कापुरुष, कायर हुए माज हम ऐसे ।
नहीं स्वप्न में भी देखा था मार्य भूमि ने जैसे ॥
निष्प्रभ हो, निद्रा, आलस में माते, हम दुख पाते।
जन्म काल से रोगी होकर निष्फल जन्म विताते ॥
(३)
सौ में से निन्यानवे हैं ऐसे हम लोगों में।
फंसे हुए हैं जो दो से भी अधिक दुखद रोगों में ।
सिर दुखने लगजाता है यदि करते हम कुछ श्रम हैं।
एक मील भी चलते हाय ! फूलने लगता दम है ।।
(४)
यह शारीरिक दशा, मानसिक दशा विपम है इससे ।
हुए निरक्षर भट्टाचार्य आर्य ऋषि सुतगण जिससे ।।
चारों घेद मुखान रहा करता था जिनको माहा !
वे द्विज पुस्तक यिना नमव तर्पण कर सकते हा ! हा !
( ६५ ) . छत्रपति शिवाजी का मनो महत्व । -- राजभोग के साथ योग का देखो अद्भुत योग, प्रभुता में संयम का है यह सुर-दुर्लभ-सम्भोग ॥ मनोमन का है प्रति निर्मल उदाहरण यह चित्र, सुन इसका वृत्तान्त न होंगे फिसफे श्रवण पवित्र ? ॥१॥ स्वाभिमान-स्वातन्त्र्य-सत्य के मूर्तिमन्त अवतार | लिया शिवाजी ने फरमें जय सत्शाशन का भार ॥ उस अवसर पर "श्री आवाजी सोनदेव सरदार" गये सदल कल्याण-प्रान्त पर करने को अधिकार ॥२॥ सत्य-धर्म के अनुयायी हों जो नृपवर नीतिश ! विजय-विभूपित हो कैसे नहिं उनकी सेना विश ॥ अनायास ही आवाजी ने जीत लिया कल्याण, सूबेदार वहां का माया घश में तज अभिमान ॥३॥ शीलवान स्वामी के सेवक हो कर भी गुणधाम । कभी लोभवश नर कर जाते अतिशय निन्दित काम ॥ पद-उन्नति की मृगतृष्णा में पड़ "मायाजी" भाज। क्या कर डाला तुमने, तुम पर हँसता विश-समाज ॥en सुयेदार को जीते जी कर हा! हा!! मृतक समान । उसके कुल की इस कन्या को छीन बने यलयान ! होंगे इसकी सुन्दरता से भूप शिवाजी मुग्ध । इस विचार से उन्हें दे रहे यह विष-मिश्रित-दुग्ध ॥an ५ ॥ भस्तु, दूत ले गुण-गण-धन्या इस फन्या को साय पहुँचे नृप सम्मुख फिर योले सविधि झुकाकर माय ॥ "रूप-रदिम लावण्य-लता यह याला परम मनोश महाराज के अन्त:पुर में है रखने के योग्य" ॥६॥ फौशल पूरित मायाजी की विनती यों कर व्यक्त । हुए दूत भय-विकल देख नृप को निस्तब्ध विरक्त । मथुप्लावित नेत्र स्तब्ध हो कन्या चित्र समान । खड़ी हुई थी मन में कहते "लाज रखो भगवान् !" insil सुन फर दूत-पचन भूपतिवर शील-शिष्टता-सन । देख तथा कन्या का.निष्प्रभ हिम ग्रसित मुख-पद्म योले यवन यसन्तकाल के कोकिल के अनुरूप ऐसे भी सेवक है तेरे देख, शिवाजी भूप!॥८॥ फरके फिर सम्बोधन नृपवर अपने ही को आप घोले वचन सुधा-सिञ्चित यों फरते पश्चाताप ॥ "यदि मेरी माता होती यों रूपवती विख्यात, अहा ! न होता क्या ऐसे ही सुन्दर मैं भी जात ! 10 "धर्म-पुत्र है प्रजा नृपतिका" कहती है यो नीति । धिक है प्रजा-पुञ्ज पर जो नृप करता व्यर्थ अनीति, मेरी प्रजा-सुता यह इसका मैं हूँ सदा सहाय, देखो, इस पर होने पावे लेश भी न अन्याय ॥१०॥ इस साध्वी को लेकर जामो इसी समय कल्याण सौंपो इसे पिता को उसके, मांग क्षमाका दान । विनय-युक्त तुम उससे योलो यह मेरा सन्देश "होने देगा कहीं शिवाजी अत्याचार न लेश" ॥११॥ !
( ६७ )
खड्ग याण जिस शत्रु हृदय को सकते कभी न जीत ।
पल में उसको वश में करते ऐसे चरित पुनीत ॥
ऐसे उपकारों को कैसे रिपु सकता है भूल |
रिपु हो कर भी मित्र बनेगा वह तज वैर समूल ॥१२॥
सच्चरित्रता देख नृपति की. उनके भृत्य समूह ।
भेदन करने लगे भीति से व्यभिचारों के ब्यूह ॥
हुमा भूप के वृहत् राष्ट्र में यह सिद्धान्त प्रधानः-
"गो-द्विज अयला रक्षा करना देकर भी निज प्राण"॥१३॥
मर्त्यधाम को स्वर्ग बनादें पल में
प्रभुतावान,
या चाहें तो उसको कर दें विप-मय नर्क-निदान ।
इस चरित्र से मित्र ! यही उठते हैं मनमें भाव :--
बड़े जनों के कार्यों का पड़ता ह बड़ा प्रभाव ॥१४॥
गो-ब्राह्मण-अयला प्रतिपालक धन्य शिवाजी पार!
हरते हैं तुम जैसे सुत ही मातृभूमि की पार ॥
अतुलनीय है मित्र 'शिवाजी का यह मनोमहत्व
मनुष्यत्व में देखो यह अमरत्व-पूर्ण देवत्व ॥१५॥
कठिन समय में रक्खी तुमने हिन्दूगण की लाज
यवन-दर्प को दल भारत में स्थापित किया स्वराज ।
महाराष्ट्र-केशरी शिवाजी महाराज गुणखान,
रिपु भी करते महा ! तुम्हारे सच्चरित्र का गान ॥१६||
मन को करना दमन सर्वथा दुष्कर है यह कार्य
है फ्या वस्तु असम्भव जिसको कर नहिं सकते प्राय?
भूप शिवाजी का आर्योचित मनोदमन-उत्कर्ष,
अहा ! प्रजा प्रियता का है यह अत्युत्तम आदर्श ॥१७॥
(६८)
यदी देश है जहां पफ दिन थे एम नरपाल.
माज यही फ भूपालों का देख रहे हो हाउ ।
पूज्य-पूर्वजों के चरितों को देन हम न पिसार.
तो फ्या "हिन्दू जाति हीन है" फहना यो मंमार?
छत्रपति महाराज
श्री शिवाजी के उत्साह वाक्य ।
उठो उठो ए धीर-शिरोमणि-गरण ! सय प्यार!
उज्जल छत्री वीर वंश मयतंश दुलारे!
उठो हिन्द के प्राण मान गौरव, उजियारे !
उठो उठो ए धर्म सनातन के रखवारे ।
अन्यायी शठ छली अधर्मी नर कुल घालक!
इन से बचो उठो गो तिय वालक मति पालक !
उठो साधु गुरु दीन दुखी बलहीन सहायक !
भारत वीर प्रसू माता के सुत सय लायक !
उठो न और विलम्ब किये है हिन्द भलाई।
रफ्खो इसकी बची खुची अव लाज बड़ाई ।।
बीत गये वे दिवस मौज जब रहे उड़ाते ।
सुख से सोते हुए, मोह आलस से मात ॥
घर में था तय धान भरा सम्पति धन नाना।
पर अय तो हा ! रहा नाज भी एफ न दाना ॥
कृषि कौशल वाणिज्य सभी में प्रागी लागी।
धर्म कर्म सय इय गया महँगी है जागी॥
देश दुर्दशा देख हाय ! फट जाती छाती।
तप्त प्रथु की धार हगों में है यह पाती ।।
देखो देखो पड़ी सिसकती भारत माता ।
तन फी सुधि युधि नहीं, स्वास है रुफरफ जाता ।।
रोने को चाहती हाय पर रो नहीं पाती।
हृदय वेदना हृदय वीच ही दय दब जाती ।
रक्त मयी है पीठ फूट की लागी गांसी ।
गले लगी विश्वास घात ईर्षा की फांसी ॥
छल अधर्म प्रतिसार, लगी दारिद की खांसी ।
ऊपर ज्वर है चदा मोह का सत्यानाशी ॥
पेसी दुखिया दान मातकी दशा निहारो।
इसकी पूर्वावस्था की सब यात विचारो।
नहीं रहे अय यहां भीम अभिमन्यु वीरगण ।
अर्जुन रहे न द्रोण रहे नहिं भीष्म विलक्षण ॥
नहिदिधीचि शिवि नहीं, नहीं हा!रामकृष्ण अय ।
पृथ्वीराज प्रताप आदि भी गये आज सय ।।
मातृ भक्त अय यचा कौन जो विपद भगावै ?
भारत माता प्राज शरण में किसकी जावै ?
नहीं तुम्हारे बिना वीरगण इसका त्राता।
अय तो तुमहीं बचे, हिन्द के प्रांश्रय दाता ।
सम्मुख लड़के मरो पीठ नहिं कभी दिखाओ।
मिला प्राज है समय मातृ ऋण शीघ्र चुकानो।'
(
७० )
खा खा जिसका अन्न, साग, घृत, दुग्ध, मलाई ।
छोटे से हो बड़े, पिण्ड पाला है भाई ?
नित प्रति सेवन कर जिसका जल वायु मनोहर।
रहे स्वस्थ चित तुम सब रोगों से बच २ कर ।।
खा कर जिसका नमक देह को सुदृढ़ बनाया।
उसे दुखी लख क्या न तुम्हारा जी मुरझाया ।
उठो दिखाओ वीर आज निज नमक हलाली।
चलो वहाओ शत्रु रक्त की नदी पनाली ।
नहीं रहा अव समय और रोने का हा ! हा!
शिर पर नाचे यवन हिन्द होता है स्वाहा !
उठो कमर कस शीघ्र देर मत ज़रा लगाओ।
फरके सय रण साज, आज जग सुयश कमानो
देखो देखो यवन सैन्य आया यह आगे।
महामत्त भरपूर गर्व से रण रस पागे ॥
थर थर कांपे धरा देख इनकी अधर्म रति ।
दशों दिशा है प्रस्त, रक गई चपल वायु गति ।।
कहो धीर सव एक तान हो करके निर्भय ।
"जय जय दुर्गे दुष्ट निकन्दनि! जय भारत जय"
मारू बाजे यजे पीर धांसा धमकारो।
भेरी तुरही शंख फूफि रिपु हृदय विदारो॥
रणसिंहा के घोर नाद से गगन फँपाओ।
भारत मा का मुयश गान कर मान बढ़ानी ॥
चढ़ा चढ़ा कर तोप चरवियों में अब भट पट ।
प्राग लगा दो सी यत्तियों में अय चटपट ।।
ले ले कर फरवाल फरों में धानी पारी
( ७१ )
यवन सैन्य को मारकूट फर फाड़ो चीरो॥
दुष्ट, विधी, नीच, लिच्छ, हिंसक ये सारे ।
पाप वृत्ति में लिप्त कपट-रण चित्त में धारे ॥
नहीं हिन्द में कभी हाय ! ये थे आ सकते ।
नहीं स्वप्न में भी इसका दर्शन पा सकते ॥
पर जिस दिन से छोड़ एकता भारतवासी ।
हुए मोह छल फूट कपट के इष्ट उपासी ॥
घर घर भेद विचार होगया सुमति भगाई ।
मेल मित्रता तोड़ लड़े भाई से भाई ॥
अवसर पाकर इसे चोर सम यवन घुस पड़े।
इधर उधर से फौज जोड़ कर वीर वन खड़े ॥
उसी दिवस से विमल आर्य गौरव रवि सुन्दर!
डूब गया दासत्व उदधि के जल से प्रियवर।
चिर वान्धन में पड़े आर्यगण तब से भारी ॥
छोड़ सनातन धर्म हो गये अन्ध भिखारी ॥
अन्य देश के लिए न हमको लोभ ज़रा है।
क्या स्वदेश में प्रचुर सौख्य साधन न भरा है ॥
है स्वदेश यह पुण्य भूमि हम सब की जननी ।
सजला, सुफला देव-दुलभा दारिद दरनी ॥
स्वर्ग लोक में भी न कहीं पर इसका सानी ।
चलती इसी लोक लोक में सुयश कहानी ॥
विविध कला विज्ञान सभ्यता का है यह घर।
रत्न धान धन कन्द मूल फल का है आकर ॥
सब देशों का ताज राज यह भारत प्यारा।
हमें इसे प्रभु ने दे सौंपा इसका भारा ॥
( ७२ )
इसकी रक्षा हेतु दिया है अतुल बाहु यल ।
इसके शासन हेतु दिया है बुद्धि सुनिर्मल ||
है इच्छा यदि धीर ! भोगने की घर के सुख ।
घर में रहकर, तो न कभी मोड़ो रण से मुख ॥
पुण्य भूमि भारत से यवनों को गिन गिन कर।
मार भगाओ शीघ्र, उठो, दौड़ो ले धनु सर ॥
महाराष्ट्र घर वंश जगत में जबतक भ्राता।
तव तक नहीं कदापि अधीना भारतमाता ।।
वीर वंश में जन्म लाभ कर शीश झुकाना।
छिः छिः उससे भला मार कर ही मर जाना ।।
शूर सिंह का काम शत्रु वध करना द्रुततर ।
हो नहिं यह, तो मधुर मृत्यु नद रक्त बहाकर ॥
नहीं तुम्हें क्या ज्ञात दुर्दशा सोमनाथ की।
धूर उड़ गई जहां हाय ! शिव लिङ्गमाथ की ॥
कञ्चन माणिक रत्न लूट मन माने भागे।
जिन्हें स्वप्न में भी न कभी देखा था भागे।
मथुरा पुरी पुनीत इन्हों ने लूटी हा ! हा!
किया घोर उत्पात धर्म धन करके स्वाहा ।
हैं अन्यायी म्लेच्छ प्रजा पीड़क ये सारे।
जात पांत का ज्ञान नहीं इनमें कुछ प्यारे ।
मांसाहारी दयाहीन लम्पट व्यभिचारी।
हठी विधर्मी नीच अहङ्कारी ये भारी ।।
पुण्य भूमि यदि चली हाथ में इनके जावै ।
दया धर्म स्वातन्त्र्य कला कल सभी भगावै॥
( ७३ )
सुख सम्पति का चिन्ह कहीं ना दिखलावेगा।
हाय ! हाय ! का रुदन देश भर छा जावेगा।
अत्याचार कराल होंय नित हृदय विदारी।
सहें कौन विधि प्रान उन्हें हा ! हा त्रिपुरारी ?
वां, वां, रोती नित्य कटेंगी गऊ विचारी।
यवन बनाये जांय हाय ! द्विज देव अचारी ॥
घुस घुस जावें यवन हिन्दुओं के हा! घर घर ।
पकड़ बांध लेवेंगे उनको मार पीटकर ॥
सती पतिरता धीर धालिकाओं को धर धर।
नष्ट भ्रष्ट कर देवेंगे हा ! बलात्कार कर ॥
यही देखने अर्थ अगर तुमको जीना है।
धर्म त्यागकर अगर अमृत तुमको पीना है।
तो कह दो यह साफ, फेंक हाथों से प्रसि अब ।
कि क्षत्रिय के विमल वीर्य-सम्भूत न हम सय ॥
नहिं तो धामो वीर ! करो घमसान खेत में।
विजयी हो या करो विसर्जन प्राणखेत में ॥
अगर न बांधो कमर न साहस दिखलाओगे।
कष्ट सिन्धु में डूब थाह कुछ नहिं पावोगे ।
धर्म कर्म करि नाश दास हो पछताओगे।
कभी हिन्द को हाय !न अपना कह पाओगे।
यवन पादुका त्राश सहोगे गौरव खो के।
विश्व विदित इस आर्य वंश के यालक होके ॥
इससे होके सावधान मत हिम्मत हारो।
"जै जै भारत मात जयति जय हिन्द" पुकारो ।
वीरो दौड़ो करो आज निर्मूल यवन सय ।
( ७४ ) रिपु शोणित से आई करो तुम भारत को अय।। जयतक तन में प्राण घायु हो धीर ! तुम्हारे । तयतक विमुख न कभी समर से होना प्यारे ॥ मारो अथवा मरो अन्यथा पग न हटाओ। क्षात्र धर्म करि वीर हर्षयुत सुरपुर जाओ ।। क्षण भङ्गुर यह तुच्छ देह इसका न ठिकाना । आज न तो कल भ्रात इसे है निश्चय जाना ॥ महा पुण्य है अगर स्वदेशोद्धार हेतु यह । खण्ड २ हो गिरे उड़े यश सीरम मह मह ।। जहां धर्म वस वहीं धीर होता निश्चय जय । यही भरोसा रखो शत्रु कुल का होगा क्षय ॥ मरो देश के लिए वार कर तन मन सर्वस । फरो अमरता लाभ जगत में फैले शुभ यश ॥ १० ॥ नव्वाब सिराजुद्दौलाकी पदच्युति की मन्त्रणा रात्रिका द्वितीय प्रहर है । घोर अन्धकार छाया हुआ है। आकाश में काले काले बादल मँडरा रहे हैं । फी २ विजली चमक उठती ही । प्रकृति नीरव निस्तम्ध है। सारी मुर्शिदा- याद नगरी जनयातायात शून्य स्पन्दन रहित हो रही है। ऐसे "तिमिर अनन्यकाय शून्य धरातल" समय में सुप्रसिद्ध जगत सेठफे प्रासादमें सेनापति मीरजाफर, जगत मेठ अमीचंद, पिन कविगुरु नवीन चन्द्रसेनकृत "पासीरयुद्ध" से अनुवादित।
। ७५ )
- मन्त्री राय दुर्लभ, महाराज राजवल्लभ और राजा कृष्णचंद्र
1 तथा रानी भवानी नन्याव शिराजुद्दौला के विरुद्ध मन्त्रणा कर
रहे हैं । महाराज कृष्णचन्द्र को सम्बोधन करके मन्त्री राय
दुर्घभ अपनी सम्मति प्रकट करता है:-
फर कर अनेकों चिन्तनाएं स्थिर किया मैने यही ।
मुझसे कभी इस कर्म का होगा अहो ! साधन नहीं ।
प्राजन्म जिसके अन्न से घर्द्धित हुई यह देह है।
मुझपर विमल विश्वास पूरित अटल जिसका स्नेह है।
तज धर्म, घोर कृतघ्नता-पास प्रकट धारण की क्रिया।
उस बङ्ग भूप विपक्ष में क्योंकर करेगा यह हिया !!
जिस वृक्ष की छाया तले हूं प्राण शीतल कर रहा
क्योंकर उसी को मूल से मैं मूढ़ काटुंगा प्रहा!
जिस गायका शुचि दुग्ध पीकर मुग्ध करता प्राण में।
अहि सम उसेहीफिस हृदय से फिर करूं विपदानमैं !!
है घोर पाप कृतघ्नता ! मुझ से न सो होगी अहो !
इस तुच्छ मेरे प्रश्न का उत्तर तुम्ही मुझ से कहो ॥
देना सदा जो हाथ है आहार निज मुख में घना !
है कौन ऐसा मुर्म उसको चाहता जो काटना ।।
आहा ! कृतघ्न हृदय जगत में घोर नर्फ समान है।
इस निन्ध गुम कुमन्त्रणा में अहित पाप महान है ।
सामान्य उपफारी पुरुष का यदि अहित जाये फिया।
होता फलडिन्त पाप से नो भी, विचारी तो हिया ।।
है मन्नदाता एक नो विश्वास भाजन फिर महा।
उसका फरूं अपकार तो फ्या राजमन्धी में रहा।
है राजविद्रोहिता-फिर परिणाम भी निश्चित नहीं।
(
हो, कौन जाने, पापका फल, हित न हो अनहित कहीं!
हत भाग्य इस नव्वाय को च्युत राजपद से कर महो।
होगी सुखपद कौन सी अभिसन्धि-साधित फिर कहो।
जो हाथ में नृप दण्ड ले अपना जहां लेगा उसे ।
देगा वही यमदण्ड फिरतो कौन रोकेगा उसे ?
यदि दुष्ट नादिरशाह सा कोई पुरुष निर्दय महा।
कर नए दिल्ली का विभचं, ले सैन्य आवेगा यहां ।।
रक्षा कहां तब फिर हमारे प्राण धन जन मानकी।
घल यांध रण में जायगा रख कौन बाजू प्राणकी ॥
सुख शान्ति के बदले मिले दासत्य शृङ्खल मात्रही ।
सर्वस्व खोकर प्राप्त होगा अन्त भिक्षा पात्र ही ॥
मैं सहज ही दुर्वल पुनः चिरकाल पर-आधीन है।
निज देश रक्षा हेतु अय मैं शक्ति-साहस-हीन है।
शुचि यङ्ग को है शौर्य वीर्य विहीन कर डाला महा।
निज पाहु में-निज हृदय में यदि बङ्ग शाशन शक्तिहै ॥
पीड़ित प्रजाओं के प्रवर्णित दुःख नाशन शक्ति है ।
तो दमनकर नव्याय का रणसाज द्वारा नाहि, अहो ।
तुमने शरण ली है वृथा क्यों कपट कौशल की, कहो।
यदि यङ्ग शाशन हित न अपनी शक्ति पर विश्वास है।
नव्याय के आधीन में तय रहो, नहिं प्रति वास है।
घर राजपद पर मन्त्रिपद पर है विराजित नीति से।
दें धन्यवाद अहट को इस हेतु समुचित रीति से ॥
मैं मानताहूं यह, न इसके कथन में कुछ लाज
निष्ठुर तथा पामर महा दुन्ति भूप सिराज है।
हैं किन्तु क्या नहिं पालते जन विपिन के शार्दूल को ।
( ७७ )
क्या पालते नहिं काल समविषधरविकट विष मूलको॥
निज बुद्धि कौशल से हरणकर क्रूरता शठता तथा ?
फिर भूल है भारी हमारी क्या न करना यह कथा ।
हम सब विचारेंगे हृदय में यदि ज़रा नृप नीति को॥
शुचि धर्म नीति तथैव पातक पुण्यभय की रीति को ।
तो सकल दुर्दमनीय ये प्रवृत्ति असि की धारसी।
होने लगेगी ज्ञात अति कोमल कुसुम के हारसी ॥
शुचि स्निग्ध सौरभ रूपमें फिर दुःख शान्ति विधानहो ।
इस यगन्देश समस्त में यह बङ्ग स्वर्ग समान हो ।
अतएव पाप कुमन्त्रणा में पांव मैं क्योंकर धरूं ।
फलुपित वृथा को पाप से मैं स्वीय आत्मा को करूं ॥
पड़ मोह छल में मत्त होऊं क्यों दुराशा में, कहो।
हित में कहीं विपरीति हो पीछे न जनूं मैं अहो ।
उद्गार।
चार दिनों का है यह जीवन तो भी भार हुमा ।
यह सुख-प्रद संसार हमें अय हा निःसार हुमा ।
जाते जहां वहीं दुख माते पाते हम • पीड़ा ।
हा! हा! अपने हाल सुनाते लगती हैं घोड़ा।
मात्मग्लानि, . शोक, भय, चिन्ता, रोग लगे पीछे ।
घर में यन में निंदय निन्दफ लोग लगे पीछे ॥
किससे अपनी दुख की गाथा र मन! हम गायें ।
( ७८ )
फिस उपाय से इन दुःखों से छुटकारा पायें ।
भय्या मुँह मत खोलो जी, भय्या मुँह मत खोलो जी ।
मन की बातें मन में रक्खो कुछ मत बोलो जी ॥
कौन सुनेगा दुःख तुम्हारा ए दुखिया भाई !
दुःख सुनाकर किसने दुख से कहो मुक्ति पाई ?
जग में सहिष्णुताही औषधि है सारे दुख की
दुख की पीड़ा सहते जाम्रो आशा रख सुख की ।
सुख की आशा में ही सुख है सुख के लिए नरोना ।
निश्चित है इस जग में सुख के पीछे दुख का होना ॥
सुख किसको है यहां, विलोको जिधर उधर दुख है।
शोकित सब का मन है, मयका मति मलीन मुख है ॥
शोफित जन हर सकता कैसे दुख पर के मन का ?
देख दुःख परका दुख बढ़ता है उसके तन का ।
ध्यान हृदय में रख ईश्वर का करो कार्य अपना ।
दुख में मत घयरामो, सुख को समझो यस सपना ।।
रहो कर्म-पथ में दृढ़ हो के धर्म न निज छोड़ो ।
पुरुषारय दिखलाने में तुम कभी न मुख मोड़ो ॥
सहिष्णुता के शुचि प्रभाव से दिन ऐसा आवेगा ।
रंश कृपा से दुख का यन्धन आप टूट जायेगा ।
( ७६ )
हिन्दू-विश्व-विद्यालय।
विदित था संसार में कैसा हमारा नाम !
शान्ति सुख से पूर्ण थे कैसे हमारे धाम !
मर्त्य थे हम तदपि था अमरत्व हमको लभ्य.
विश्व में सर्व-प्रथम थे एक हम ही सभ्य ॥१॥
किन्तु अब क्या हो गया है यह हमारा हाल,
हो रही है दुर्दशा कैसी विषम विकराल !!
शान्ति, सुख, स्वातन्त्र्य अपने हैं कहां चे आज,
क्यों गिरी हम पर अचानक यह विपद की गाज ॥२॥
माज भारत म नहीं है लेश भी सुख-भोग
व्याप्त है सर्वत्र भय, दुर्मिक्ष, चिन्ता, रोग
ख्दन सुन पड़ता दिवानिशि "हाय हा हा हाय"
'प्राण धारण कठिन है, अय हम हुए निरुपाय" ॥३॥
क्यों सदा हम भोगते है इस तरह के ताप ?
श्राप फ्यों ऐसा मिला है, क्या किया था पाप !
प्राणी सफल निज दुःख सुख फे हेतु होते माप
विद्या-जनित अपमान के हैं कुफल ये सन्ताप ॥ ४ ॥
एक विद्या के बिना हम होरहे हैं दीन,
एक विद्या के बिना हम हो रहे हैं हीन,
एक विद्या के बिना हम हो रहे हैं क्षीण
एफ विद्या बिना हम हो रहे तेरह तीन !॥५॥
( ८० )
जो अविद्या के न हम इस भाँति यनते दास
तो हमारा इस तरह होता न सत्यानाश ।
पा गये जो देश विद्या का पवित्र प्रकाश
यन गये हैं वे न क्या स्वातन्त्र्य-सौख्यावाश ?॥६॥
कुछ दिनों के पूर्व थे क्या तुद्र इंग्लिस्थान,
फास. जर्मन और ममरीफा-तथा जापान
भाज विद्या-विभव से बन गये मालामाल
शक्ति-शाली, विश्व-वेदित हो रहे इस काल.॥
भात । हैं यद्यपि नहीं हम अन्ध और असभ्य
फिर हमें क्यों हा! न होते पूर्व-गौरव लभ्य ?
हो जहां पर विषम तम का भीति-कारक वास
चतु रहते भी वहां दिखता न लेश प्रकाश ॥८॥
पस, अविद्या छा रही है देश में चहुँ ओर
फूट, इया, छल. कलह का बढ़ रहा है ज़ोर ।।
प्रेम दम्पति में नहीं, है भाइयों में रार
फिर कहो जातीयता लेगी कहां अवतार ? Met
"दो सभी सन्तान को अपनी सुशिक्षा दान
उन्हें सिखलाओ सुविद्या सह विविध विज्ञान"
भाइयो । उद्धार की है राह यस, यह एक
चलो चारो वर्ण इस पर त्याग के सय टेक ॥१०॥
मोह तजकर भ्रात ! विद्या-सुधा कर लो पान
फिर बनेगा आप ही जापान, हिन्दुस्थान
प्रकट होंगे कपिल, गौतम, भीष्म, अर्जुन, कर्ण
ख्यात होंगे मार्य-कुल के विदित चारो वर्ण ॥११॥
( ८१ )
गठित "हिन्दू-विश्व-विद्यालय” हुआ है आज!
अमर कर उसको रखो जो कुछ यची है लाज ॥
अपव्यय जो वित्त पा कर, कर रहे हैं नित्य ।
वे यहांपर दान दे हो जाय अय कृतकृत्य ॥१२॥
हैं अभी भी भरत-भू में दान-वीर अनेक ।
वित्त में बढ़कर विलोको एक से हैं एक ॥
एक की है घात क्या ? चाहें अगर वे भात !
"विश्व-विद्यालय” यहां खुल जाय अपने सात ॥१३॥
जातीय विद्यालय।
है मन्दभाग्य नर भारतवर्ष पासी !
हे भष्ट-ज्ञान, गत गौरव, देशराशी !
मालस्य क्रोधरत, तेज प्रतापनाशी ।
फ्यों हो कही इस प्रकार घने उदासी॥२॥
क्यों मात्म गौरव समी तजके, प्रभागे!
जातीय शान फर नष्ट सुधर्म त्यागे।
क्यों लोभ-फूट-मद-मत्सर-मोह पागे?
निलंज नीच कहला कर भी न जागे ? ॥२॥
( २ ) चीनी विदेशज तुम्हें यह क्यों सुहाती? फ्यों है विदेश यर वस्तु तुम्हें लुभाती ? होते चले तुम गरीव, न हष्टि पाती। जाता चला धन स्वधर्म, जरै न छाती ॥३॥ बोलो कहां यह पुरातन कीर्ति-साज । माती कला कृषि न हा ! वह दृष्टि माज.! विधान-कौशल तुम्हें सज माज भागे। विद्या पराक्रम नहीं तुममें, प्रभागे!॥४॥ शुप्काभिमान यल से मदमस्त होके, दारिद्र-प्लेग-जर अर्जर प्रस्त होके, हा! हा! स्वदेश-कुल-उन्नति शस्त्र होके, निर्लज, जी तुम रहे दुख ग्रस्त होके ! ॥५॥ विज्ञान कौशल जिन्हें तुमने सिखाया। उत्कर्ष का पथ जिन्हें तुमने दिखाया । वे ही फला कल तुम्हें सिखला रहे हैं। हा ! हिन्द के गुरु यही कहला रहे हैं॥६॥ श्री जैमिनी, कपिल, गौतम,,श्री कणाद । पया कीर्ति हाय ! इनकी तुम को न याद ? वाल्मीकि शङ्कर, पतञ्जाल, वेद व्यास । विख्याति हा ! भय हुई सय की विनाश ॥७॥ दगडी, मुरारि, मनु, शुश्रुत, कालिदास । श्री भीम भास्कर प्रताप रहा न पास ॥ * भीष्म पितामह | भास्कराचार्य (सुर्यसिद्धान्त के रचयिता) जागो तुरन्त अय म्रात ! करोन लाज। हो मोह-प्रस्त सयका करके विनाश। हा ! देखलो तुम चने अव मूढ़ दास ॥८॥ हा! है कहां भरता-कीर्ति-कलाप माज ? व्यापार, नीति, कृषि-कार्य, कला-समाज, जूठा परन्तु मति मिष्ठ विदेश-साज। छि सीखते तुम वही, लगती न लाज ! ॥९॥ हे भ्रात ! शीघ्र परदेशज-वस्तु छोड़ो। छोड़ो तुरन्त उनसे अय प्रेम तोड़ो ॥ तोड़ो विलम्य विन बन्धन को न जोड़ो। जोड़ो कभी न, उनसे मुख शीघू मोड़ो ॥१०॥ 'त्यागो विदेश मनुराग बनो विरागी । मात्मावलम्य-रत क्यों न बनो अभागी ? धारो उपाय हिय देश-सुधार-काज । जागो तुरन्त तज मालस के समाज ॥११॥ देखो अभी तक महो यिगड़ा न काज। भारम्म फार्य फर शीघ्र रचो समाज । हो उथ शीर्ष फिर भारत राज-राज ॥ १२ ॥ विधान-कौशल फला फिरसे यदामो । विद्या पदो, फल अनेक नई यनामो ॥ संगीत-काव्य-कविता-तर भी लगामो ।' सानन्द.मात ! रुपि-फोशल भी दिखामो ॥१३॥ भरतमुनि (मादि संताचार्य) देखो रहोगे न फभी भिखारी। हों फामनायें परिपूर्ण सारी॥ जातीय-विद्यालय की तयारी। जो पै करोगे तुम भ्रात ! जारी ॥१४॥ निद्रा तजो अय विलम्य न भ्रात फोजे । कीजे न देप मद मत्सर त्याग दीजे । दीजे तुरन्त मय फान सुफीति लीजै । लीजे विचार विनती यदि चित्त राम ॥१५॥ स्वदेशानुराग। तजि कपट कलह छल भारतवासी भाई ! सोचहु सब मिलि निज भाषा देश-मलाई । सुनिए हिन्दू और मुसलमान हूं सारे । तुम उमय हिंद के उद्धारक हो प्यारे । माता हमरी यहि भारत भूमिहिं जानो। वह जगन्नाथ जगदीशहिं पितु करि माना ॥ भाइन इहि नाते से हम तुम सय प्यारे । तोहूं काहे सोचत निज निज को न्यारे ।। निज माता जिमि है जग में सवहीं प्यारी; तिहि सों स्वदेश भाषा-जननी नहिं न्यारी ।। बधि जाहु एकता सूत्र माह सब जाती।
तजि राग रोप द्वैपादिक को सब भांती॥
करि प्यार अवै निज देश, सुयश जग लीज
निज देश हेतु धन जीवन अर्पण कीजै॥
देशी कृषि कारीगरी शिल्प विस्तारो
निज देश-वस्तु को मादर उर में धारो।
घर घर विद्या की जोति समुज्वल धारो
उर उज्वल हो, कोउ कह न तुमको कारो॥
विन एक राष्ट्र भाषा के, सुनलो भाई !
हो सकै नहीं कछु कयहूं देश भलाई ॥
है विदित लोक महँ भारतेन्दु की बानी
निज भाषा-शान विना न मिटै भ्रम ग्लानी॥
हिन्दी भाषा है हिन्द देश की भाषा
याकी उन्नित है देशोन्नति की भाशा ॥
फरि उन्नति हिन्दी भाषा की तुम प्यारे!
फैलामो नागरि लिपि स्वदेश में सारे॥
निज मातृ भूमि की कर न सेवा जो जन
जानो प्यारे, उसका निष्फल है जीवन ।।
वह नर है साँचो पशु समान जग माही
जाको स्वदेश का है घमंड कछु नाहीं॥
,
( ६ )
राष्ट्र भाषा।
-
घर पचन बिना है कार्य होता न कोई ।
घर वचन विना है आर्य होता न कोई ॥
घचन रहित पाता देश है क्लेश भारी।
यन वन अय हिन्दी राष्ट्र भापा हमारी ॥१॥
घर वचन बिना है शान्ति पाता न कोई ।
वर वचन विना है कान्ति पाता न कोई ॥
वरवचन महो! है क्रान्ति विभान्ति हारी ।
यन धन अव हिन्दी राष्ट्र भापा हमारी ॥२॥
अनुपम कृति रासो चन्द का कीर्ति केतु ।
समर-कुशल आर्यों का महाहर्प हेतु ॥
घर घर अब तो है पा रहा मान भारी ।
यन बन अब हिन्दी राष्ट्र भाषा हमारी ॥३॥
अमृत मधुर युक्ता भक्ति का दिव्य द्वारा ।
सुललितपद पूर्णा “सूर" की काव्य-धारा॥
घर घर यहती है पाप सन्ताप हारी ।
थन धन भय हिन्दी राष्ट्र भाषा हमारी ॥४॥
सरल सहज, प्यारी, रूप श्रीशक्ति धारी ।
शुचि सरस सुगम्या श्रेष्ट सर्वोपकारी ॥
हर कर इस भू की तू व्यथा भीति सारी,
बन यन भय हिन्दी राष्ट्र भाषा हमारी ॥५॥
)
मातृ-भाषा हिन्दी।
मिश २ भाषा नद लेकर हिन्दी रूप महा
(८७
ममर कवि-गुसाई की फया, शान्ति-सा ।
निलय रस-सुधा के भक्ति का पुण्य पक्ष ।।
भवन भवन पूजा पा रही सौख्यकारी ।
पन यन भय हिन्दी राष्ट्र भाषा हमारी ॥
रहती हुई सरस फर देवे जीवन्मृत भारत
पानव जीवन उर्बरता मय फर्म-भूमि यह फिर होवे।
राचि साहित्य रूप कृपि, अवनति प्राति दीनता फी खोये ॥
हो उन्नत साहित्य मिले.निज गत-गौरव फिर से भाकर।
मारता अपना दुख बिसरावे पुनः पूर्व
गुस्ता पाकर।
क्योंकि एक दिन यही देश था भू-मण्डल भरका सिरताज ।
हामभाग्य-यशपतित हुआहै वही काल के क्रम से माज।
कैसा था यह देश हमारा विद्यामय सय कला प्रवीण।
किन्तु समय ने सार हीन कर इसे किया बल बुद्धि विहीन ।
यह उन्नत साहित्य, हमारा यह संस्कृत भाषा विख्यात ।
सुममाय हो रही
हमारे भाग्य दोप से आय तो भ्रात!
पोल नहीं सकते अय कोई भाषा मिल फर हिन्दू लोग।
सात समुद्र पार की भाषा हम करते घर में उपयोग।
भाषा विपयफ घोर दीनता मार्य-भूमि में आई माज।
हाय ! राष्ट्र-रसना यिहीन हो- गये हमारे माई
धारा
सारा॥
( ८८ )
भापा बिना महत्व प्राप्त कर सकती कभी न कोई जाति !'
देशोन्नति का मूल प्रौद साहित्य सदा होता सय भांति ॥
प्रय है समय, मोह निद्रा हम तजकर अपना करें सुधार।
अपनी माता मातृभूमि को करें विपद से हम उद्धार॥
माता के उपकार स्नेह शुचि प्रात्म त्याग हैं अपरम्पार।
उसके ऋण से कौन, कहो, हे भाई! पा सकता उद्धार ।
उसी भांति है मातृभूमि की महिमा अतुल असीम अनूप
स्वगधाम से भी बढ़कर है जिसका शान्ति सौख्यमयरूप।
दोहा ।
माता है निस्वार्थ का, मूर्ति मन्त अवतार ।
कृतघ्नता है घोर प्रति, देना उसे विसार ।
रोला।
माता के सम देव जगत में और न कोई ।
मातृ-भूमि सम सुखद जगत में और न कोई ।।
मातृ-भूमि हैं प्राण प्राण हैं माता प्यारी ।
प्राण-हीन हम हुए जहाँ ये गई विसारी ॥
हपित हो दश मास गर्म में हमको धारे ।
त्यागे भोजन शयन जिन्हों ने निज सुख सारे ॥
जिन से फशन मई हुई मिट्टी की फाया.
है कृतघ्न जो भूल जाय उस मा फी माया ॥
भन्न घायु जल दुग्ध मुग्ध मन जिसके फरते ।
रोग शोक सन्ताप जहां के रजकण हरते ।
--
( पर )
हैं जिसका शुचि नाम जाति की विभव-भूमिका ।
• पशु है वह जिस को न ध्यान उस मति-भूमिका ॥
जन्मभूमि से भिन्न नहीं होसकती माता।
शब्द अर्थ के तुल्य परस्पर का है नाता ॥
पूजो यदि तुम एक, हुई दोनों की पूजा।
जननी से न स्वदेश फभी हो सकता इजा॥
माता का प्रति दिव्य दान 'भाषा' है भाई।
जिसके बल से मिली हमें जग में प्रभुताई ॥
'भाषा' का सम्मान, मान है माता ही का।
भाषा का अपमान कुटिलता का है टीका ॥
संघ प्राणी में श्रेष्ट जेष्ट सुतवर विज्ञानी ।
भुक्ति मुक्ति के पात्र सृष्टि के नायक मानी ।
बने हुए हैं बन्धु प्राज जो हम मद माते ।
भाषा बिना कदापि कहो क्या यह पद पाते।
हैं कार्यों के मूल हृदय के भाव हमारे ।
भाव प्रकाशाधीन कर्म फल होते सारे ॥
माय-प्रकाशन-द्वार जगत में भाषा ही है।
महिमा अपरम्पार जगत में भाषा की है।
भाषा के प्राधीन हमारे सर्व कार्य हैं।
पिना सुभाषण नित्य हुआ करते भकार्य है।
भसि से भी अत्यधिक सुभाषा का प्रभाव है।
फिस पदार्य का फहो सुवाणी का ममाव है।
साहित्यों की जगत पीव जननी है भाषा।
.
है उन्नत-साहित्य देश-उन्नति की प्राशा
( ८८ )
भाषा यिना महत्व प्राप्त कर सफनी कभी न कोई जाति
देशोन्नति का मूल प्रौढ़ साहित्य सदा होता सय भांति ॥
प्रय है समय, मोह निद्रा हम तजफर अपना कर सुधार ।
अपनी माता मातृभूमि को करें विपद से हम उद्धार ॥
माता के उपकार स्नेह शुचि प्रात्म त्याग हैं अपरम्पार ।
उसके ऋण से कौन, कहो, हे भाई! पा सफता उद्धार॥
उसी भांति है मातृभूमि की महिमा अतुल असीम अनूप ।
स्वगधाम से भी बदकर है जिसका शान्ति सौख्यमयरूप॥
दोहा।
माता है निस्वार्थ फा, मूर्ति मन्त अवतार |
कृतघ्नता है घोर भति, देना उसे विसार ॥
रोला।
माता के सम देव जगत में और न कोई ।
मातृ-भूमि सम सुखद जगत में ठौर न कोई ॥
मातृ-भूमि हैं प्राण, प्राण हैं माता प्यारी ।
प्राण-हीन हम हुए जहाँ ये गई विसारी ॥
हर्पित हो दश मास गर्म में हमको धारे ।
त्यागे भोजन शयन जिन्हों ने निज सुख सारे ॥
जिन से कञ्चन मई हुई मिट्टी की काया.
है कृतघ्न जो भूल जाय उस मा फी माया ॥
अन्न घायु जल दुग्ध मुग्ध मन जिसके करते ।
रोग शोक सन्ताप जहां के रजकण हरते ॥
( 6 )
है जिसका शुचि नाम जाति की विभव-भूमिका !
पशु है वह जिस को न ध्यान उस मति-भूमिका ॥
जन्मभूमि से भिन्न नहीं होसकती माता।
शब्द अर्थ के तुल्य परस्पर का है नाता ॥
पूजो यदि तुम एक, हुई दोनों की पूजा |
जननी से न स्वदेश फभी हो सकता दूजा ॥
माता का प्रति दिव्य दान 'भाषा' है भाई !
जिसके बल से मिली हमें जग में प्रभुताई ।
'भाषा' का सम्मान, मान है माता ही का।
भाषा का अपमान फुटिलता का है टीका ॥
सय प्राणी में श्रेष्ट जेष्ट सुतवर विज्ञानी ।
भुक्ति मुक्ति के पात्र सृष्टि के नायक मानी ॥
बने हुए हैं बन्धु आज जो हम मद माते ।
भाषा बिना कदापि कहो क्या यह पद पाते?
हैं कार्यों के मूल हृदय के भाव हमारे ।
भाव प्रकाशाधीन फर्म फल होते सारे ॥
भाव-प्रकाशन-द्वार जगत में भाषा ही है।
महिमा अपरम्पार जगत में भाषा की है।
भापा के प्राधीन हमारे सर्व कार्य हैं।
बिना सुभाषा नित्य हुआ करते भकार्य हैं।
असि से भी अत्यधिक सुभाषा का प्रभाव है।
फिस पदार्थ का कहो सुवाणी का प्रभाव है ।।
साहित्यों की जगत बीच जननी है भाषा।
है उन्नत-साहित्य देश-उन्नति की भाशा ॥
( ० )
है साहित्य प्रधान शक्ति मानव उन्नति की।
है यह दुर्लम खान जाति के सुख सम्पति की।
दर्पण है साहित्य देश के विद्या, बल का
रीति, नीति, विज्ञान, शान, कृपि, फल, कौशल का ॥
भचल मानसिक शक्ति-रूप साहित्य नित्य है।
जिससे होता हट पुरातन काल-कृत्य है ।
धर्म, फर्म, प्राचार, बुद्धि, वल, विभव, यड़ाई।
है उन्नत साहित्य, कोप इन सयका, भाई!
घेश, भाव, स्वातन्त्र्य, साधुता, उच्च व्यवस्था ।
उन्नति-पतन-विधान, दुर्दशा, दीन-अवस्था ।
प्रेम, प्रीति, विद्वेष, नीति-कौशल नृप-समता ।
प्रकटाता साहित्य विविध देशों की क्षमता ॥
विविध कार्य जो हुए सहस्रों वर्ष पूर्व थे।
जिनके नायक-निकर सभ्यता में अपूर्व थे।
जिनके विमल चरित्र-चित्र-समुदय विचित्र है।
इस सय का साहित्य अकेला "मानचित्र" है॥
प्रतएव हे प्रिय बन्धुगण ! अव ध्यान इसपर दीजिए।
सय एकमत हो एक भाषा हिन्द भर में कीजिए।
साहित्य के प्रत्यङ्ग की फर: पुष्टि-साधन प्रेम से।
संसार यात्रा पूर्ण अपनी फीजिए अति म' से ॥
व्यापक भापा है न यहां हिन्दी भाषा सी,
सरस सुबोध सुपाट्य सरल शुचि सद्गुणराशी ॥
मल्प कर से साभ्य अल्प समयागम युक्ता।
मुक्ता सम निभ्रान्त नागरी लिपि संयुक्ता ॥
अब तजफर और विरोध सय हिन्दी को अपनाइए।
कर इसको भाषा राष्ट्रकी सिद्धि सफल नित पाइए ॥ .
हिन्दी का साहित्य समुमत सब प्रकारहो।
उन्नत भाष विचार युक्त गत सय विकारहो।
रीति नीति विज्ञान शान उपदेश-सार हो।
राष्ट्र मभ्युदय मूल-मन्त्र शिक्षा प्रसारहो।
हिन्दी का हिन्दुस्थान में घर घर पुण्य प्रचार हो ।
इस भार्यावर्त पुनीत का शुभमय जय जय कारहो ।
बङ्ग-भाषाके प्रति हिन्दी।
तेरी उमति देख. हृदय में हर्षित होते महा! अपार ।
बहिन बङ्ग भाषे! देती हूं तुम को मैं माशीप हज़ार ॥
ऋद्धि सिदि-संयुक वृद्धि यह मति अनुपम तेरी अवलोक।
उठते हैं जो भाव हृदय में उसे न मैं सकती हूं रोक ॥१॥
पुत्रवती तू धन्य, धन्य है मातृभक्त तेरी सन्तान !
करती है अंगरेज़ जाति भी गर्च त्याग जिनके गुणगान ॥
जिनके माविष्कारों को लख विस्मित होता है संसार ।
भूमण्डल भर के सुधियों के जो हैं मति अमूल्य शृङ्गार ॥२॥
ईश्वर चन्द्र, विदित पडिम पावू. प्रसिद्ध मधुसूदन दत्त । हेमचन्द्र काय नवीन चन्द्र मधुमय फाव्यामृत पान प्रमत्त । शिशिर कुमार, रमेशचन्द्र, श्री राधाकान्त देय धीमान । यसुधा में चिरफाल फरेंगे गौरव तुझको यहिन ! प्रदान ॥३॥ पूज्य सुरेन्द्र, प्रजेन्द, शारदा, पिपिन, सतीश चन्द्र गुणवान मासुतोप, जगदीश चन्द्र, गुरुदास, प्रफुल्ल चन्द्र धीमान ॥ मुफघि रवीन्द्रनाथ ठाकुर घर फयि फल कण्ठ महा विद्वान् । इन सुधियों का तुझको ही क्या भारत भर को प्रभिमान ॥५॥ पहिन । शात है तुझको यिना राष्ट्र भाषा के कोई जाति । कर न सकी मभ्युदय कभी निज पाकर भी सुयोग सप भौति ॥ घाणी विरहित रण-नायक गण यदि फरने जावें संग्राम । बहिन सोच तूतय उनकी सेना का क्या होगा परिणाम ॥ ५॥ भाई भाई भेद न कुछ इन भारत के सन्तानों में । भाष प्रकट कर सकता किन्तु न एक अन्य के कानों में ॥ कर तू महिन! इस दशा में हो जातीयता कहां से प्राप्त । एक भाय हो भारत भर के सन्तानों में कैसे म्याप्त ? ॥२॥ बहु भाषा-भाषी होने से प्रान्त २ के प्रधिवासी। एफ देश घासी होकर भी हैं जैसे विदेश वासी ॥ कहीं परस्पर मिलते हैं जब कभी सफल भारत के लोग । पिना राष्ट्र-भाषा परदेशी भाषा का करते उपयोग ॥७॥ यह भाषा वैषम्य बड़ी बाधा है मार्य-प्रभ्युदय में । नहीं एकता मा सकती है हम में इसके ही भय में ।
इस बाधा की जड़ काटें, इस भय को हम कर दे। पूर । एक राष्ट्र भाषा- स्थापन कर देशोन्नति साधे भरपूर ॥८॥ मतः देश उन्नति हित मावश्यक है एफ राष्ट्र भाषा । विना राष्ट्र भाषा के पूर्ण न हो सकती है निज माशा ॥ यिना राष्ट्र भाषा स्थापनके जाति देश हैं मूक समान । एक राष्ट्र भाषा देती है देश जाति गौरव का ज्ञान ॥९॥ एक एक यदि मिलें “शक्ति" ग्यारह की उनमें माती है। इसी नीति का पालन हमको गणित रीति सिखलाती है। भिन्न भिन्न ये प्रान्तिक भाषा मिले प्रेम से विधि अनुसार। एकादश गुण वल से होगा फिर यह वर सिद्धान्त प्रचार ॥१०॥ मुझे घोलने वालों की संख्या भारत में इतनी है। मन्य अन्य भाषा भाषी जन की कुल संख्या जितनी है। पुनः प्राकृतिक विधि से मैं हूँ जेष्टा सभी भाषामों में। है सर्वोच मभ्युदय मेरा राष्ट्रोन्नति माशामों में ॥ ११ ॥ है मेरी लिपि देवनागरी दोपहीन शुचि, विगत विकार । सरल सहल है मल्प कष्ट से साध्य, पुनः प्राचीन अपार ॥ जैसी जाती लिखी पढ़ी वैसी ही जाती है तत्काल । नहीं मनर्थ मर्थ का इसके होता कहीं कभी विकराल ॥ १२ ॥ परम पुरातन संस्कृत भाषा लिखी इसी में जाती है। अपनी प्रकृत सरखता से वह "पालवोध" कहलाती है। प्रिान्तिक भाषामों में किसी प्रान्त या किसी देशवासी हो गोरा या काखा, दो दिनमें वह अहा ! सीख सकता इसकी सु-वर्णमाला ॥१३॥ प्रान्तिक भाषा लिपि में संस्कृत लिखती है तेरी सन्तान । घह मेरी लिपि में संस्कृत लिख दे मुझ हिन्दी को सम्मान ॥ बङ्ग विश्वविद्यालय जिसमें है प्रचलित यह नियम नवीन । संस्कृत लिखने को कृपया वह फरखें नियत लिपि प्राचीन ॥१४॥ ऐसा करने से भारत का सय प्रकार होगा उपकार। पुनः राष्ट्र-लिपि संस्थापन का खुल जावेगा उत्तम द्वार॥ कृष्ण स्वामि भूदेव मुफर्जी, मित्र शारदा चरण तथैव । मेरी लिपि की सर्वश्रेष्ठता करते हैं स्वीकार सदैव ॥१५॥ सेरे प्रिय सुत दे सहाय यदि मुझ पर प्रेम दिखावेंगे। भारत उन्नति के पथ में ये बड़ी सुगमता पावेंगे। अधिक न घे मेरी लिपि का प्रचार करना करलें स्वीकार । कई मंश में खुल जावेगा इससे राष्ट्रोन्नति का द्वार ॥ १६॥ तुझे देख अपनाते मुझको फिर उत्कल द्राविड़ तैलङ्ग । भादर देंगे बहिन ! हर्ष. से पुलकित होगा मेरा मन ॥ है यह मुविदित भारत में है मेरी व्यापकता सब मोर। विदित विश्व में है मेरी सारल्य तथा गुरुता सय मोर ॥१७॥ पङ्ग निवासी या उत्कल के वासी जय होते हैं मुख, तय वे मुझ हिन्दी में ही करने लगते हैं याचिक युद्ध । बंगाल।
उसी भांति द्राविड़ तैलंगी महाराष्ट्र गुर्जर घासी। तीर्यों में निज भाव प्रकाशन हित यनते हिन्दी भाषी ॥१८॥ एक भांति या अन्य भांति वे करते हैं मेरा सम्मान । यदि स्वीकार करें ये मुझको तो होगा सयका कल्याण । उन्नति हो स्वदेश की, हममें जातीयता शीघ हो जात, . हिन्दी, हिन्दवासियोंकी, मैं यनूं राष्ट्र भाषा विख्यात ॥ १८ ॥ में यह कहती नहीं कि केवल मेरा ही माराधन हो। अन्य मन्य प्रान्तिक भाषामों का मेरे हित त्यागनः हो। यह न कभी हो सकता है इससे न भलाई होगी लेश । ऐसा कयन ऐक्य के बदले यहिन! बढ़ा देवेगा द्वेप ॥२०॥ घर में जननी जन्म दात्रि माता के रहते भी क्या लोग। - निज रानी की पूजा करने में न लगाते हैं मन-योग! उसी भांति में रानी, प्रांतिक भाषाएँ ज्यों माता है। नीति निपुणता निष्ठा नवनिधि, नूतन निर्मल नाता है ॥ २१ ॥ मेरे कुछ सत्पुत्रवरों ने सम्मेलन का करके साज । तेरे इस विद्यानगरी में किया बहिन । अधिवेशन माज॥ इन की मातृभक्ति को लखकर दे तू इनको यह माशीप । तुम सबकी शुभ इच्छामों को पूर्ण करें मंगलमय श ॥ २२ ॥ --- हिन्दी साहित्य सम्मेलन (फलकत्ता) के अधिवेशन में पठित ।
* नीलध्वज के प्रति जना । हदकम्पकारी रण वाद्य घोर है याजता क्यों नृप-द्वार: मोर? सरोप क्यों बोल रहे तुरङ्ग ? निघोप क्यों हैं.करते. मतङ्ग? माफाश में क्यों उड़ती विशाला माकाश चुम्बी नृप-केतु माला? - क्यों राज सेना तव साभिमान हुँकारती केसरि के समान ? क्या साजते हो रण साज वीर- सद, या पुत्रवर प्रवीर- की मृत्यु काही बदला चुकाने चले प्रभो तत हिया जुड़ाने! है वार का काम यही प्रधान स्वहस्त में ले धनु और यांण विदारना दुर्धर शत्रु पक्ष या प्राण रण में समक्ष जामोप्रभो फाल्गुण शीश छेदो जामो प्रभो फाल्गुणि वक्ष भेदो उसे शरों से कर खंड खंड शोकाग्नि मेटो उरकी प्रचंड ।। गजेन्द्र जैसा कर घोर घोष कृपाण ले के फर में सरोप किरीट का दर्प दलो तुरन्त संग्राम में हे नृप वीर्यवन्त काटा हुमा सद्य मुंड किरीटि मुंड त्रिशूल पेले जय वीर चंड -स्वगेह मामो तवही कराला बुझे जनाकी-सुत-शोक ज्वाला! म पाथेका मुंड सकू यिलोक तो शान्ति हो क्या यह पुत्रशोक! माहेश्वरी पुरी के युवराज नीलध्वज राजा के पुत्र प्रवीर ने पाण्डव कृत मश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकड़ा । इससे अर्जुन ने प्रवीर को युद्ध में मार डाला। महाराज नालध्वज । पार्थ से युद्ध में पराङ्मुख हो कर सन्धि करने लगे। पुत्र शोक कातरा नीलध्वज की महिपी ने तब अपने पति के पास यह पत्र प्रषण किया। * (७ ) है जन्म में मृत्यु यही निदान संसार में है विधिका विधान । सत्पुत्र मेरा सुमति प्रधीर महा प्रतापी रण धीर धीर॥ स्वराघुसे सम्मुख युद्ध ठान किया अहा इन्द्र पुरी प्रयाग। तो क्यों वृथा शोफ करू तदर्थ था पुत्र जो वीर रथी समर्थ ।। पालो मही, क्षात्र सुफर्म पालो प्राणेश! राजोचित धर्मपालो। मानन्द में मग्न सभा तुम्हारी. है व्याप्त यंशी ध्वनि मोदफारी है नर्तकी नृत्य फरें चिनीत है गा रहे गायफ घृन्द गीत । सगर्व राज्याशन पै तुम्हारे बैठा हुआ है धनुवाणं धारें। स्त्र पुत्र हन्ता रिपु पार्थ पापी न लाज माती तुम को तथापि? है पार्थ अभ्यागत तुल्यं माज महा सभा में धिक धीर राज! सहर्ष जोड़े तुम युग्म पाणि पूजो उसे हा! कह मिष्ट वाणी स्व दुःख गाथा फिससे कहूं मैं अपार निंदा जग में सहूं मैं। खो पुत्र को क्या भय ज्ञान हीन हुए सुनीलध्वज भूप दीन ।। दुर्दव ने क्या तव पुत्र छीन, किया तुम्हें भी अव शक्ति हीन होती न जो घात यही यथार्थ पूजा न जाता यह नीच पार्थ! स्व मित्र के कोमल युग्म पाणि के तुल्य हा हा कह मिष्ट पाणी प्रवीर रक्तान्ति पार्थ हाथ छूते कहो क्यों कर पाप नाथ!! स्व पुत्र हन्ता कुल नाश कारी छली निधर्मी रिपु दुप भारी । है पार्थ पैरोप तुम्हें नहीं क्या?, है क्षात्र फाधर्म कहो यही क्या कहां तुम्हारा धनु और थाण, कहां गदा शूल कहाँ कृपाण ! कहां तुम्हारी यल धीरता है कहां तुम्हारी रण धीरता है ! न शत्रु के यक्ष विदार हाय संग्राम में. आप उसे बुलाय । प्रसन्न हो क्या करते सुमिष्ट भालाप द्वारा तज धर्म इष्ट ॥ कहो कहें क्या तुमको नरेश! फैले कथा जो यह दश देश। .
संसार के धार्मिक छत्र धारी विचार देखो यह यात सारी॥ मुना कि नारायण तुल्य जान हो पार्थ को पूज रहे सुजान । है किन्तु स्वामी यह भूल भारी विचार देखो तुम छत्र धारी ॥ फहो मुझे क्या गुण देख नाथ हो पूजते हा तुम जोड़ हाथ । या देव का है उलटा विधान मनुष्य को है जिस कान मान! देके मुझे वीर रथी सुपात्र गुणी प्रतापी सुत एक मात्र | हा हन्त छीना उसने उसीको दिया अहो दुःख मपारजीको ।। था मान ही शेष बचा हमारा हे कान्त सो भी इस पार्थ द्वारा समूल होगा मय क्या विनिष्ट मुझे इसीसे दुख है घनिष्ट । प्राचार्य है पार्थ कुवंश का जो पूजाई होगा तब कान्त क्या सो? कहो मुझे क्या गुण कान्त देख हैं प्राह्य धातें उसकी विशेष ।। मैं जानती हूं यह भी नरेश कि थोलते हैं सब देशदेश- कि है प्रतापी रथिराज पार्थ न किन्तु पाणी यह है यथार्थ।। विवेचना कान्त फरो, कदापि महारथी है नहिं पार्थ पापी । होता रथी तो धर छद्म वेश क्या द्रौपदी को हरता नरेश' महारथी लक्ष नृपाल वीर प्रतापशाली मति मान धीर । क्या द्रौपदी को सकते न छीन न पार्थ होता जय,धर्म हीन !! विवार के ब्राह्मण भीरु पार्थ- से कौन योद्धा लड़ता यथार्थ देता न धोखा नृपमंडली को पाता कभीक्या यह द्रौपदी को सहाय जो श्री हरि कान पाता तो पार्थ क्या खाण्डवको जलाता न योग देता जय श्री शिखण्डी तो पार्थ पापी कपटी घमण्डी पितामह क्षत्र कुल' प्रदीप- -कोमार क्या हा! सकतामहीप स्व पूज्य आचार्य पिता समान प्रसिद्ध थे द्रोण रथी महान ।। उन्हें विनाशा यह पार्थ, भूप छल क्रिया हा! करके अनूप । थे सु प्रतापी रण अग्रगण्य महा रथी कर्ण स्वनाम धन्य अन्याय कैसा करके अपार उन्हें विनाशा यह पार्थ छार! महारथी का यह धर्म है क्या कहो यही क्षत्रिय कर्म है क्या? करें सदा जो छल का प्रयोग क्या धीर हैं वे शठ नांच लोग जो जाल में कौशल से फँसाय मृगेन्द्र को व्याध बधे कदापि तो क्या कभी वीर रथी कहाय संसार में भी वह व्याध पापी!! नरेश क्या है तुमको न ज्ञात कहूं तुम्हें क्या फिर और बात जो छोड़दें लोग स्वधर्म इष्ट फ्या चीर हैं वे नर भी निकृष्ट कहां तुम्हारा वह धीर दर्प? कहां तुम्हारा वह मान दर्प? क्यों व्यर्थ होके अव प्राण रंक, लगा रहे हो सिर में कलंक। है मृत्यु से भी बढ़ के फलंक अहो यचाओ इससे स्व अंक न सत्य से पांच कभी हटाओ, स्वयं मरो यारिपु को भगायो । हा कौन सा पातक हेतु आज वीरान नीलध्वज राज राज है पार्थ मागे नत शीश मान हा राम! होके हत बुद्धि ज्ञान!! चाण्डाल के पाद प्रलिप्त धूल- से होय जो भूपित विप्र भाल तो घोर अन्याय तथा समूल असह्य है क्या नहिं हे नृपाल . है किन्तु ऐसाभव दोप देना संसार में व्यर्थ कलंक लेना नृपाल स्वामी तुम हो मदीय अतः सदा हो मम पूजनीय जो दोप दु व्यर्थ तुम्हें नरेश तो पाप होगा मुझ को अशेप ॥ तो भी तुम्हारे हित हेतु नाथ! है धाय मेरा यह जोड़ हाथ। में प्रार्य कन्या कुल कामिनीहूं पुनः अधीना तब भामिनीहूं अतः अशक्ता अति सर्वथा मैं कैसे मिटाऊं मनकी व्यथा मैं !! 'फिरीटि ने दुःख मुझे दिया हा! सन्तान हीना मुझको किया हा! मदीय भा तुम वीर राज दुर्दैव से हो अति वाम श्राज!! खो पुत्र को हाय न क्यों मरू में, संसार में जीयन क्यों धरूं मैं!
( १०० ) हुआ जना कीर्ण जगत् विशाल मेरे लिए निर्जन हे नृपाल ! ललाट में था विधिने लिखा जो कालान्तमें आज महो फला सो हा! पुत्र प्राणोपम हा! प्रवीर? तेरे बिना प्राण धरें न धीर! इसीलिए क्या सह कष्ट नाना तुझे रखा था दश मास वत्स स्व गर्भ में थी किस जन्म में मैं दोपी, कियाथा तब पाप क्याजो तूने दिया हा ! यह ताप वत्स! मुझे, उसी के हित-क्या विनाश आशालता को इस दुःखनीकी, हा! वत्स माता ऋणभार सेक्या हा अरे तू इस भांति मुक्त ? क्या वत्स! तेरे मनमें यही था! । रे आँख रो रो अब यारि धारा क्यों है यहाती इस भाँति आज पोंछे तुझे कौन ? अरे अयोध! है प्राण तू भी जलता वृथा क्यों तुझे जुड़ावें, कह कौन आज सुमिष्ट वाफ्यामृत-धारिद्वारा! है पार्थ के भीषण याण द्वारा शिरोमणी ही तय खण्ड खण्ड अरे पड़ा है ! विल में लुकाके सखेद त्यागो निज प्राण रो रो अरे मणीहीन फणी अनाथा !! जामो प्रभा क्षात्र कुलप्रदीप जामो तुम्हार चिर मिन पार्थः -के सङ्ग नीलध्वज धीर श्रेष्ट जामो कुरुक्षेत्र प्रसन्नवित्त! स्वपुत्र के हेतु जना मभागी चली तुम्हारे घर से परन्तु वीर क्षत्री कुल की यधू में। हूं क्षात्र बंशोद्भव चीर याला कैसे सहूं मैं अपमान ऐसा निलज होके धर धैर्य हा! हा! श्री जान्हवी में करके प्रवेश विश्राम लूगी अब मैं अनन्त अतः विदा में चिर काल हेतु हूँ माँगती त्वत्पद की, नृपाल ! जो लौट के राजपुर प्रवेश स्वामी! करोगे, फिर से पुकारो "जना कहां है" कहके कमी जी प्रतिध्वनी उत्तर दे तुम्हें तो "जना फहॉह" कह के नृपाल! यिङ्ग कविगुरु श्री माइफेल मधुसूदन दत्त कृत धीरागना काव्य के 'जना पत्र' नामक सर्ग का अनुवाद । -
( १०१ )
जीवन्मरण ।
दुष्यों की दुष्टता की प्रकट यह हुई मंत्रणा गुप्त माज।
कीर्ति ख्याति प्रतिष्ठा सकल यह हुई हन्त ! हा! लुप्त माज ॥
निन्दाके भक्ष्य होफे प्रति विषम व्यथा चित्त पाता सदैव ।
जीते जी पा चुफा मैं मरण दुख यहां हाय ! दुर्दान्त देव ॥१॥
वार्ता क्या मैं यताऊं अबतक जगमें प्राण धारे हुआ हूं।
मर्यादा को गुमा मैं धिक धिक यह यो मान धारे हुमा हूँ ॥
मातः पृथ्वी मुझे क्या फटकर अपनी गोद में ठौर दोगी।
हा हा हा हन्त ! हाहा! यढ़कर इससे मृत्यु क्या और होगी ॥२॥
जाते जो प्राण मेरे निकलकर अभी क्लेश पाता न और ।
निन्दा व्यापी न होगी इस तरह कहीं देखता मैं न ठौर ।।
होती है आत्म निन्दा रह रह मन में चैन पाता न जी है।
जीना भी तो यहां हा! विषम विपमयी मृत्यु है, मृत्यु ही है ॥३॥
क्या मेरे पातकों का प्रतिफल यह है ? तीव्र से तीव्र हाय !
पापों का घोर मेरे प्रतिफल यह है, न्याय
सत्य, न्याय ॥
जीते जी हाय ! देना मरण जगत में दण्ड है चण्ड, देव !
पापों की मोर देखू निज जप तप तो ग्लानि होती सदेव ॥४॥
( १०२)
हृदयोद्गार।
जीवन का है लक्ष्य नहिं, भौतिक सुखका भोग ।
विषय वासना तज करो, परम शान्ति उपभोग ।।
परम शान्ति उपभोग प्रेमके बल से होगा।
मार्योंने है इसे पूर्व मात्रा में भोगा ॥
मार्यों को प्राचार्य कर तत्वशान्ति का सीखलो।
पाश्चिमात्य देशो अहो, स्वत्व शान्ति का सीखलो ॥१॥
हम सबके फर्ता वही विश्वनाथ जगदीश ।
भाई भाई हम सकल परम पिता है ईश ॥
परम पिता है ईश, सकल हम भाई भाई।
उचित न हम में भ्रात ! व्यर्थ की कपट-लड़ाई ॥
भूल स्वार्थ में बन्धुका रक्त यहाना पाप है।
वन्धु प्रासको छीनकर छलसे खाना पाप है ॥ २ ॥
ईश्वर का मावास है दीन जनों के द्वार ।
ईश्वर को ढूंदो वहीं भ्रातृ-भाव उर धार ।।
भ्रातृ-भाव उर धार प्रेम समता की दीक्षा,
प्रहण करें हम सभी, एषय की अनुपम शिक्षा ।
निर्यल जन पर जो सयल हो, करता अत्याचार है।
करता ही है उस जाति का, ईश शीघ्र संहार है ॥३॥
( १०३ )
अन्योक्तियाँ।
मेघ
कृषक होते हैं विफल, ये खेत सूने जा रहे ।
गगन में हैं सघन घन हा! जल-यिना मँडरा रहे ।
तू फहाता है जलद ! संसार में दानी बड़ा,
कर लिया है आज तूने हृदय क्यों अपना कड़ा ! ॥१॥
लाख बे-मौके लुटावे, लाभ उससे कुछ नहीं
समय पर है एक मुद्रा लक्ष से यद फर कहीं !
सोच त् इस बात को, हो दूरधन अभिमान से
इन्दिरा के वाहनों का पैर है क्या शान से १॥२॥
भारतीय कृषक
इन पुरखौती हल बखरों से कृषफ ! उम् तुमने काटी।
भूमि जोतने. खाद-डालने की न गई यह परिपाटी ।
सोलह आना फसल लु। यदि इन्द्र फरेंगे जीवनदान ।
यह कहते तुम भाग्य भरोसे घेठो, इधर मररहीं धान ॥३॥
प्रथम मुर्खता. यहुकुटुम्यता, पुनः विषम दारिघ अपार
फिर शैलाक्ष साहुकारों का शोणित-शोपक गुरु ऋण भार,
करे कहां से निज उन्नति तू कृषफ ! जलाशय यना महान
पेशानिफ विधि से कृषि होगी भारत में भी क्या? मगवान!॥४॥
( १०४ )
न कर घृणा तू सिंह ! शृगालादिक लघु धन जीवों से नित्य
लघु गुरु का जग में जोड़ा है, मति अद्भुत हैं हरि के कृत्य ।
पड़ा जाल में विकल बड़ा तू गरज रहा था जय खो शान,
भूल गया क्या किसके द्वारा गये बचाये तेरे माण ? ॥५॥
यदि, मगराज ! श्यार मादिक को देगा तू कुछ मादर मान
है माश्चर्य न, मौके पर यह फर येठे तेरा अपमान ।
इसी लिए उनका शाशन है उचित, सिंह ! तय गौरव-योग्य
पिर उचाशय गजराजों का दमन सर्वथा हुमा अयोग्य ! ॥६॥
अवगुण तुझमें देख अनेकों तुझे दोष देते हैं लोग,
गुण हैं उनको नहीं दीखते जिन्हें लगा पर-निन्दा-रोग ।
रत्नाफर तू रक्षाफर है, क्षार हुमा जल तो क्या सोच !
"लवण यिना सब रस फीफा” यह कहते वुधजन तज संकोच७॥
रक्षाफर ! तेरे दोषों को प्रकट किये यदि कवि ने सर्व
उसे देख तू सच है या नहिं. तजफर अपने गुण का गर्व ।
महर्जनो में भी दोषों का होना संभव है सब काल
प्रकृति पुरुष से जात हुई यह द्वन्दमयोहै सृष्टि विशाल ॥८॥
( १०५ )
स्नेहलता
मर्थात
अक्लानों पर अत्याचार ।
कन्या हित सहते विविध दुःख पितु माता ।
दे कन्या जन्म न भारत में तू. धाता ! । टेक ।
भारत के मानव दानव-प्रकृति दिखाते ।
भारत के मानव हिंसा प्रकट सिखाते ।
भारत के वासी शान धर्म सब भूले
भारत के पासी मान फर्म सय भूले ।
मयलाओं के दुख के न रहे अष त्राता ।
दे कन्या जन्म न भारत में तू, धाता ! ॥१॥
शिक्षित सुसभ्य जग-पूज्य जाति बंगाली ।
कन्याओं के हित दिखा रही फंगाली ।
तय अपद मनाड़ी जाति घरों में भाई ।
क्यों हो न सुता सेवा में अति कठिनाई ।
भागनी हित भिक्षुफ बने अनेकों भ्राता ।
दे कन्या जन्म न भारत में तू. धाता ! ॥२॥
ब्राह्मण हो सय अब भूले निज प्रामणता ।
धन आगे रही न धर्म जाति की ममता ।
द्विज स्वार्थ मंध हो त्यागे सारी समता ।
हिंसा की सब में यची एकही क्षमता ।
दुर्यल को दहना सवल नरों को भाता ।
दे कन्या जन्म न भारत में तू. धाता! ॥३॥
( १०६ ) हम दो हज़ार का टीका जय गिन लेंगे । निश्चय यिवाह होने का उस दिन देंगे । दाई सी की यारात हमारी भारी । सब की हो पूरी पूरी खातिरदारी । यों निधन पिता है नाहक मारा जाता । दे फन्या जन्म न भारत में तू, धाता ! ॥ ४ ॥ ए हिन्दू मेरे यन्धु वर्ण घर चारो । मथ तो भी अपने फूटे नयन उधारो | धन तृष्णा में पड़ निज को निज मत मारो । नर हो कुछ फरणा हृदय यीच तुम धारो। देखो देखो यह देश रसातल जाता। दे कन्या जन्म न भारत में तू, धाता ! ॥ ५॥ ऐ मार्यो ! में यह स्नेहलता जलती हूं। फर्तव्य पूर्ण कर अम्ब निकट चलती हूं। तम हरे तुम्हारे हृदयों का, यह ज्वाला। दुख सहे न घर घर मार्य पोड़शी याला ॥ मेरे हित पैतृक घर था बेचा जाता। दे कन्या जन्म भारत में तू, धाता ॥६॥ + स्नेहलता फलफत्ते के एक कुलीन पर निधन ब्राह्मण की कन्या थी. इसका पिता लाख यत्न करने पर भी इसके लिए कोई ऐसा सुयोग्य 'घरपात्र' न पा सफा जो विना रुपये लिये स्नेहलता से विवाह करने को प्रस्तुत होता । लाचार उसने अपने घर को बेंचकर कन्या के लिए घर खरीदने का संकल्प किया। यह यात स्नेहलता को असह्य हुई । उसने अग्नि द्वारा प्राण विसर्जन किये । न ( १०७ ) जय तिलक। जय राजर्पि प्रधान ज्ञान-आगर गुन सागर । जय जय प्रतिभावान परम विद्वान् उजागर ॥ जय जप करुणासिन्धु दीन के वन्धु प्रेमघन । जय भारत भुवि इन्दु करन मालोकित जन-मन ।। अय वेद और उपनिपद के सारामृत यरसा करन । जय जय विदेश विद्वान्वर चित चकोर सन्तत हरन ॥१॥ जय स्वदेश उद्धार हेतु शुचि व्रत हिय धारन । प्रजा स्वत्व हित न्याय-युक्त आन्दोलन कारन ॥ गम्भीर विचार राजनैतिक परसारन । जय जय जन मन धीच धर्म को दीपफ वारन । जय कर्मवीर सचरित वर, न्याय निरत, उन्नत-हृदय। धृति सहिष्णुता निर्भीकता के मूर्तिमान भगवान जय ॥२॥ जय मादर्श ग्रहस्थ गृहीगण को संचालक । जय गङ्गासुत सहश सुभग भीष्म प्रणपालक ।। जय तन से मन से धन से भारत सुख साधक | जय वाणीसुत सुभग स्वावलम्बन-माराधक। जय भार्यविगतगौरव सफल प्रकटावन छितिपर अमल जय भारत-दुर्गति सघन वन दहन करन अनुपम अनल ॥३॥ जय ब्राह्मण कुल दीप रतन भारत उज्ज्वलतर। नव उमङ्ग नित भरन मृदुल युवकन यि भीतर ॥ जय अति सरल सुभाव, सौम्य मूरति चित-चोरन । परमुख जोहन निन्द्य प्रथा. को जड़ तों तोरंन ।
( १०८) जय हरिदचंद्र सम सत्य प्रिय, दारत सत्पथ सों पग न पैर न हंजाको सुयश सुठि गान फरत नित मनहिं मन ॥४॥ जयली जग में राजनीति प्रति सांचो प्रादर। जय ली भुवि स्वातन्त्र्य स्वन्य को तत्य उजागर ॥ जय लों प्रारज धर्म फर्म मर्मज्ञ धीरवर । जय माँ सत्य स्वदेश भक्ति प्रति हृदय पटल पर ॥ तथलों वसुधा पर सुयश तय रहहि अटल अविचल अमर "जयजयतितिलफ फहि घोपिहें पुलकित चित सुरनागनर५ स्वावलम्यनाचार्य प्रार्य कुल विशद वंशधर । महो राजपि तिलफ ! तिलक भारत को शुभतर ॥ काह प्रांखि सों भई भोट जो पै तुव मूरति । मन मन्दिर महँ यसत हमारे जब तुम नित प्रति ॥ शिक्षा दीक्षा मादेश और सुठि दर्शित पथ तव सकल प्रति भारत वासिन हृदयपर रहिहैं नित मन्ति अटल*॥६॥ कर्मवीर मिस्टर गाँधी। शत शत बाधा-विघ्नों से भी पीर-हृदय कब रुकता है । नाच नरों के सम्मुख मार्य-धीर-मस्तक कय झुकता है । 'देशमान' रखने में तुमने बड़ी अजय हिम्मत चाँधी । जुग जुग जीमो फर्मवीर तुम देशभक्त मिस्टर गाँधी ॥१॥ * खोकमान्य तिलक के कारावास पर।
.
( १०६ )
जय तक प्राण रहेंगे तन में, हम न बनें जीवन्मृत दास, ।
सत्य न्याय मर्यादा के हित त्यागेंगे सय भोग विलास ॥
जेल जायगे, तुधित रहेंगे, सहें सभी पानी आँधी ।
ऐसे प्रत के प्रती धन्य तुम देशभक्त मिस्टर गाँधी ॥२॥
सभी जाति हो प्रजा-तन्त्र-प्रिय, पक्षपात का होवे नाश ।
जबरदस्त मत छीन सके फिर दीन-जनों के मुख का ग्रास ।
भूतल में फिर रामराज्य हो कलियुग में आवे प्रेता ॥
फर्मवीर मिस्टर गांधी से न्यायनिष्ठ जय हों नेता ॥३॥
हिंसा प्रिय दानव-गण होवें धर्म भीरु मानव मृदु प्राण ।
मिटे द्वेप अन्याय, बनें सय काले गोरे एक समान ॥
शुभ समत्व का तत्व व्याप्त हो रहे न कोई जित जेता ।
कर्मवीर मिस्टर गाँधी से न्यायनिष्ठ जय हो नेता ॥४॥
धन्य तुम्हारे तात-मात हैं, धन्य सुरम्य काठियावाड़।
पना आज यह जगत नेत्र में गौरव-गेह अन्य मेवाड़
जा विदेश तुम बिना कौन ? निजदेश-हेतु सर्वस देता।
जुग जुग जीओ, मिस्टर गाँधी, कर्मवीर भारत नेता ॥५॥
विनय ।
। शुभ सुख सुगति सुमति के सागर. शान्तिसद्म, स्वातन्त्र्य स्वरूप!
शील-शौर्य-सौरभ-शुचि-श्री-पति, शोभा शक्ति-समूह अनूप !
परम-पिता, करुणा वरुणालय. श्रद्धा स्नेह सुधा के स्रोत !
हो यह मेरा हृदय पूर्ण तव दिव्य प्रेम से ओतप्रोत ॥१॥
( ११० )
सर्वशक्ति सम्पन्न ईश ! दे मुझे कृपा कर ऐसी शक्ति ।
जीवनभर मैं मातृभूमि की सेवा ज्यों कर सकूँ सभाक्त ॥
प्रीति सहानुभूति आदिक गुण लू तुझसे मैं नित्य. उधार ।
तजकरहिंसा स्वार्थ कलह छल, करूं हृदय से "जाति-सुधार"२
प्रनृत, दुष्टता. कुरुचि, कपटता द्रोह दंभ का फर संहार ।
सत्य, साधुता, सुरुचि, सरलता. स्नेह शील का फर्क प्रचार ।।
क्रोध, विरोध, मोह हिंसा मद लोभ काम माया व्याभिचार।
कर न सकें मुझ पर या मेरे जाति-भाइयों पर अधिकार ॥३॥
स्नेह मयी जननी का अनुपम दान “मातृभापा" सुखमूल ।
ज्ञान प्राप्त कर जिसके द्वारा हरते हैं हम हिय के शूल" ॥
उस हिन्दी-उस प्यारी हिन्दी भाषा की मैं भक्ति समेत ।
सेवा किया फर्क है इश्वर ! सदा सर्वदा शाक्ति समेत ॥ ४ ॥
नर्क यात्रा सम दुखदाई पाशव वृत्ति त्याग सब लोग।
रहें प्रेम से ईश! कर शुचि शान्तिसुखामृत का उपभोग ।।
अमृत मधुर जीवन यात्रा हो, भारत भू हो स्वर्ग समान ।
हो सब पाप ताप दोपादिक विषय विकारों का अवसान ॥५॥
मेरी कामना।
दीनदुखी रोगी लोगों की सेवा में मैं काई आयु.
उनकै चिन्ता-शिशिर-प्रस्त गृह में फिर यहै सौख्य मधु-नाय ।
रात्रि दिवस में किया करूं निज बन्धु बान्धमों पर मति प्यार.
हो मेरा यह स्वार्थ सदा साधन करना पर फा उपकार ॥ १ ॥
( १११) ददिता के विषम उदर में पड़े हुए है जो-जो लोग । जीर्ण शीर्ण है तनु जिन सबका, जिन्हें सताते बहु विधि रोग। घृणा जिन्हें करते उनके जो जाति विरादर हैं धनवानः। ऐसे देश भाइयों के हित वारू मैं अपने धन प्राण ॥२॥ भाई माता पिता न जिनके जो हैं सभी भांति असहाय । ऐसे दुखित अनाथ अनाश्रय नरनारी बालक समुदाय ॥ हों मेरे आराध्य देवता. सेवा सुश्रूपा के पात्र । उनके फ्लेश मिटाने में हो तत्पर निशि दिन मेरा गात्र ॥३॥ जो शैलाक्ष साहुकारों के पंजे में पड़ पाते कष्ट । एक एक कर निज भू सम्पति करने परवश में पड़ नष्ट । घर पर रोते जिन कृपकों के बच्चे नित्य भूख से हाय ! उनके कष्ट निवारणं का मैं यथाशक्ति नित करूं उपाय ॥ ४॥ भाई भाई जो आपस में रात दिवस करते तकरार । बने वकीलों के बन्दर जो उड़ारहे निज धन भाण्डार ॥ मिथ्या छल विश्वासघात का जो करते हैं नित व्यवहार । उन की मति गति को सुधार कर 'पंचायत' का फर्क प्रचार॥शा नवयुग भावना। . शिक्षा-सङ्गीत गानो इस नवयुग की शान्ति स्वाधीनता का! मामो भाई! उड़ामो छल मद तज के एकता का पनाका !! यीता हिंसा घृणा का समय भय लखो फूट का भाग फटा! छटा आर्धानता का भय, फलह फटा, दुःख का दुर्ग टा. !! १
( ११२ )
आशा उत्साह के ये वचन वर हमें दे रहे दिव्य शक्ति
ढाले देती नहीं क्या ध्वनि जय जय की प्राण में मातृभक्ति ।।
ईर्ष्या, तन्द्रा, भविद्या, अनुत, अघ भगे भीरता, रोग, शोक ।
मावेगा शीघ्र भाई! न उतर अव फ्या विश्व में स्वर्ग लोक ?२
भागी कुत्सा-मविद्या शुभ नवयुग का हो रहा सुप्रभात ।
तन्द्रा मालस्य पूर्णा अव दुरितमयी है न धीभत्सरात ॥
प्रना की दिव्य कैसी प्रकट यह हुई है प्रभा पुण्यशाली ।
होगा सझान रूपी उदित अब सखे ! पूर्व में अंशुमाली ॥३॥
वर्षा-वैषम्य चिन्ता निशि दिन न हमें अग्नि सी ताप देगी।
भन्नाभावादि पीड़ा न सुगुणगण को हीनता से हरेगी।
भिक्षा या दासवृत्ति व्रत तज विष सा लोग होंगे स्वतन्त्र ।
होगी प्रेमानुकम्पा, विनय, सरलता, मुक्ति का मूल मन्त्र ॥ ४ ॥
'शिक्षा, दीक्षा, परीक्षा, नित परहित की धर्म है मुख्य मित्र!
पूर्वख्याति प्रतिष्ठा अमर विभव है जातियों का पवित्र" ॥
धारेंगे लोग सारे सतत यही शास्त्र-प्रादेश वाणी।
उद्धारेंगे दुखों से निज निज जनको हो स्वदेशाभिमानी ॥५॥
होगी वाणिज्य लक्ष्मी इस नव युगकी सिद्धि का दिध्य द्वार
लक्ष्मी का पास होगा पूति भवन. मिटा दुःख दारिद्रय-मार ॥
विद्या, विज्ञान-शिक्षा, कृषि, फल, कविता वृद्धि को प्राप्त होंगी।
मर्यादा, मान, ज्योत्स्ना मुगनि सुकृति की लोकमें व्यात होंगी॥६॥
सत्सवा मातृ-भू की फर तन मन से लोग होंगे कृतार्य ।
धारेंगे त्यागधर्म, प्रणय, धृति, दया, त्याग पाखण्ड स्वार्थ ।।
फाटेंगे शान्तता से दिन हिल मिल के भाइयों के समान ।
श्रद्धा से दान देंगे फठिन समय में यन्धु फे हेतु प्राण ॥७॥
( ११३ ) होती है सत्य ही की जय नित जग में सर्वथा सौख्य युक्त । देता है हार-रूपी फल अनृत सदा दुःख से हो प्रयुक्त ॥ शिक्षा पीयूष पूर्णा यह निज मनकी भ्रान्ति सारी हरेगी। देके शान्ति स्वरूपा विजय-निधि हमें भाग्यशाली करेगी ॥८॥ न्यायी कारुण्य सद्म प्रभु परम पिता हैं हमारे सहारा । दीनों के वन्धु वे हैं कब नहिं उनने दुःखितों को उबारा? रक्खो भाई उन्हीं के अभय-चरण में आश विश्वासपूर्ण । दुःखों के साथ होंगे रुज, भय, पल में, विघ्न याधादि चूर्ण ॥६॥ देखेंगे दृश्य नाना सुरगण फिर भी आर्य स्वाधीनता के ! गावेंगे गान आहा ! जय जय कहते धीरता धीरता के !! देवों के हस्त द्वारा हम पर फिर भी पुप्प की वृष्टि होगी! हे भाई ! है न देरी भरत-चसुमती सौख्य की सृष्टि होगी !! १० समाप्त।
( ११४ ) शुद्धि पत्र । पद्य अशुद्ध पृष्ट ३ ४ ६ T ८ उबार १० प्रतिमा ७ विश्मिन १२ गंभीर ६ पद्य कुलके १२ पाई नहीं ३८ मतिपय २ माजको ३ नव-निध १८ १८ भष्म पूर्णा २० ६ ज्वलि ३० पंक्ति ४ निवाशी १६ मृत्यु १ हाड़ सब १० नहीं करेंगे १ दुःख की वास जनेव ३८पंक्ति१३ प्राणो सम ४१ ११ परया है ५ माँगन सा उशीर प्रतिभा विस्मित गभीर पद्म पाई मही मतिशय प्राज क्यों नव-निधि प्रभा-अश्म(रत्नविशेष) भस्म पूर्णा ज्याल निवासी भृत्य हाड़ मय नहीं फटेंगे? दुःख का घास जनेउ प्राणोपम में इस का परवाह माँगन सा थे مر में हैं इसका २२ " १ छात्रो " " १६ अमली जल में पद्य अशुद्ध ६ जल हे छात्रो! १२ पंक्ति ३ शुपमा सुपमा इमली १४ मधम कहहु को कहहु अधम को ६४ ३ निन्नानवे हैं नन्बे हैं, देखा, ७१ । १३ जल से ७३ ,२१ वाश त्रास . १४ यहाँ १ पंक्ति छूट गई है। अतः दोनों पंक्तियाँ लिखी जाती हैं:- शत पंच वत्सर के दुखद दासत्व जीवन ने हहा शुचि घंग को है शौर्य वीर्य विहीन कर डाला महा ११ हिन्दू मौर हिन्दू मरु १७ कञ्चन मई कञ्चन मयी ६ तत १८ निधर्मी विधी , १० पूजाई १०० १२ शिरोमणी ही शिरोमणी हो १०७ ४ जड़तों तोरन जड़सों तोरन १०८ बैर न हूँ ११० ५ नर्फ यात्रा ११२ ५ सारे सतत सारे भय सतत इनके अतिरिक्त मात्रामों के टूटने की कुछ अशुद्धियाँ रहगई हैं उन्हें पाठक सुधार कर पढ़ें। . . " वैरिन हूँ नर्क यातना , ... ( १२६ ) गृहिणी भूपण । मूल्य आठ आना स्त्रियों की वास्तविक शोभा कीमती कपड़ों और जेवर से नहीं होती किन्तु उत्तम गुणों के सीखने से होती है । इस पुस्तक में स्त्रियों के योग्य उत्तमोत्तम २४ गुणों का वर्णन यड़ी खूबी के साथ सरल भाषा में किया गया है । पति प्रेम, सतीत्व रक्षा, स्वजन वात्सल्य, चरित्र गठन, गृह-प्रवन्ध, माता का कर्तव्य, गर्भवती का कर्तव्य. सन्तान पालन आदि कई बातों का समावेश करके यह भूपण तैयार किया गया है। इस पुस्तक के उपदेश से आपका घर स्वर्गधाम वनजायगा । सुन्दर चिकने कागजपर वम्बई की छपी हुई १३२ पृष्ट की पुस्तक का मूल्य केवल आठ आना । मंगाकर देखिए, आप अवश्य प्रसन्न हो जायगे। जर्मनी के विधाता। मूल्य चार आना इस पुस्तक में जर्मनी के उन २४ भादमियों को जीवनी और कारनामे हैं जिन्हों ने जर्मनी को इस उन्नति के शिखर पर लाने के लिए तन मन धन से कोशिशकी है। इस पुस्तक के पढ़ने से आप को मालूम हो जायगा कि राष्ट्र की उन्नति कैसे होती है। साथही साथ आप यह भी समझ जांयगे कि वर्त- मान युद्ध क्यों हुमा ! जल्दी से मंगवाइए यहुत थोड़ी कापियां बची हैं नहीं तो पीछे से पछताना पढ़ेगा पुस्तक हाथों हाथ बिफरही है। -
( ११७
देशभक्त हरदयालजी
स्वाधीन विचार
--
न
मूल्य चार माना
भारत के शिक्षित समुदाय में ऐसा कौन है जो देशभक्त
हरदयालजी को नहीं जानता ? उनके लेख अंग्रेजी के मासिक
पत्र 'माडर्न रिव्यु' में सभी देश हितैषी बन्धु बड़े चाव से पढ़ते
रहे हैं । परन्तु वे लेख सर्व साधारण तक नहीं पहुंच सकते
थे । कुछ लेस हिन्दी में अनुवादित होकर निकल चुके थे और
कुछ अन्य लेखों का अनुवाद करके मैंने सबको "स्वाधीन
विचार" नाम से पुस्तकाकार छाप दिया है इस पुस्तक में नौ
लेख हैं । एक स्वयं हरदयालजी का लिखा हुआ है और आठ
अनुवाद हैं । अब आप 'स्वाधीन विचार' की कापियां खरीद
कर सर्व साधारण में प्रचार कीजिए । यदि आपने मेरा उत्साह
बढ़ाया तो मैं इसका दूसरा भाग भी आप की सेवा में भेंट
कर सकूँगा।
देश सेवकों को इस पुस्तक का प्रचार बढ़ाना चाहिए ।
भारत के प्रादर्श वालक ।
मूल्य चार आना।
इस पुस्तक में बहुत से धर्मवीर बालकों के जीवन चरित
है जिन्हों ने धर्म के लिए अपने क्षणभंगुर प्राणों को अर्पण
किया है। यदि आप अपनी सन्तान को धर्मवीर बनाना चाहते
है तो इस पुस्तक को अवश्य मंगाइए ।
( ११८ )
का
परमहंस
श्री स्वामीरामतीर्थ जी
राष्ट्रीय सन्देश।
मूल्य छः पाना
इस पुस्तक में स्वामी रामतीर्थजी के उत्तम २ लेख और
उनकी संक्षिप्त जीवनी है इनमें से अधिक तर लेख स्वामीजी
ने अमेरिका ही से या अमेरिका से माने के पश्चात् लिखे थे।
इन में स्वामीजी का अमेरिका का अनुभव भीमौजूद है। इन लेखों
से स्वामीजी का देश प्रेम और अमली वेदान्त टपकता है ।
पुस्तक मंगाकर पदिए और जो मेरा कहना मिथ्या निकले तो
माप पुस्तक वापिस भेजकर अपना मूल्य लौटा सकते हैं
कृपा करके कमसे कम एक प्रति तो अवश्य मंगाइए और मेरे
उत्साह को बढ़ाइए, ताकि स्वामी जी के कुछ प्रत्य लेखों का
मनुवाद माप की भेंट कर सकू ।
स्वर्गीय जीवन ।
मूल्य ग्यारह आना
यह पुस्तक सुख और शान्ति प्राप्त करने की कुंजी है।
यह महात्मा राल्फ वाल्डो ट्रायून की यनाई हुई अंगरेजी पुस्तक
'In Tune with the Infinite ' को हिन्दी अनुवाद है । इस
पुस्तक ने पाश्चात्य देशों के यहुत से मनुष्यों के जीवन को,
पलट दिया है। यदि आप इसे आद्योपान्त पढ़ जायेंगे तो आप
को घर यठे स्वर्गीय सुख प्राप्त हो जायगा।
..-
.
( ११८ ) भारतकी वीरता और प्रेम । वीर-वधू । यह पृथ्वीराज और संयोगिता की प्रेम कहानी है। नहीं नहीं, यह भारतवर्ष के प्रतीत गौरय का इतिहास है । इसमें वीरों की वीरता, फुटिलों की कुटिलता और प्रेमियों के प्रेम का अच्छा दिग्दर्शन कराया गया है इसमें पांच तीन रङ्ग के चित्र हैं । ऐसी पुस्तक हिन्दी में प्राज पर्यन्त नहीं छपी । बालक, यालिकामों तथा मित्रों को त्योहारों के अवसर पर मेंट करने की यह मनोखी वस्तु है। मंगाकर देखिए, हाथ में पहुंचते ही यह पुस्तक मन हरलेती है। तुरन्त मंगाइए!! मू०॥) शिशु शिक्षा। मूल्य एक माना मात्र प्रत्येक माता-पिता चाहता है कि उसकी सन्तान संसार में उन्नति करे । परन्तु यच्चों की उन्नति माता-पिता पर निर्भर है । जैसी शिक्षा माता-पिता अञ्चों को देते हैं वैसेही घे यो धनते हैं । इस छोटी सी पुस्तक में लेखकने यह दिखलाया है कि पांच वर्ष की अवस्था तक हम अपने यचों को क्या क्या सिखला सकते हैं और उनके सिखाने का तरीका ..क्या होना चाहिए । यदि इस पुस्तिका की माप लोगों ने कुछ भी "कदर की तो लेखक शीघ्रही मापकी सेवा में "याल शिक्षा" मामफ पुस्तक उपस्थित करेगा । उस में पांच वर्ष के उपरान्त की शिक्षा प्रणाली का वृतान्त होगा। हर एक माता-पिता तथा शिक्षा प्रेमी को डेढ़ माने के टिकर भेजफर "शिशु शिक्षा" अवश्य मंगानी चाहिए।
( १२० )
मेरे गुरुदेव
अर्थात्
श्री स्वामी रामकृष्ण परमहंस ।
मूल्य चार माना।
श्रीरामकृष्ण परमहंस के शिष्य, जगत प्रसिद्ध
स्वामी विवेकानन्द जी ने अमेरिका के न्यूयार्क शहर में मप
गुरु देव के सम्बन्ध में AMy master नाम की जो यकृता दं
थी, इस पुस्तक में उसी वक्तृता का अनुवाद है । स्वामी जी
अपने गुरुदेव के सम्बन्ध में अमेरिका निवासियों के सामने
क्या कहा है यह जानने की फिसे इच्छा न होंगी? इस पुस्तर
में परमहंस जी के अलौकिक और कौतूहल पूर्ण धर्म-मय
जीवनरहस्य का वर्णन और उनके धर्म सम्बन्धी मन्तव्यों का
अच्छा दिद्गदर्शन किया गया है । पुस्तक में परमहंस जी का
एक सुन्दर हाफटोन चित्र भी दिया गया है !
भारत गीताञ्जलि ।
मूल्य चार प्राना
इस पुस्तक में श्रीयुत माधव शुक्ल रचित देशभक्ति
पूर्ण पद्यों का संग्रह है । इस पुस्तफ की उत्तमता के विषय में
इतनाही कहना अलम होगा कि कुछ ही महीनों में इसकी
प्रथम संस्करण की २००० प्रतियां चटनी हो गई और बहुत
शीन ४००० प्रतियों का दूसरा संस्करण निकाला गया । उस
में से भी बहुत सी प्रतियां विक गई हैं। शीघ्रता कीजिए नहीं
तो तीसरे संस्करण के लिए ठहरना पड़ेगा।
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