Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner

Sanskriti Gaurav Ki Ekanki

Giriraj Sharan · 2011/03

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सांस्कृतियों
गौरवको
एकांची
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प्रमात प्रकाशन, दिल्ली

प्रकाशक प्रभात प्रकाशन चावडी बाजार, दिल्ली ११०००६
मुद्रक क्ला भारती नवीन शाहदरा दिल्ली ३२/सवाधिकार सुरक्षित
सस्करण प्रथम, १९६०
SANSKRITIK GAURAV KE EKANKI
Ed by Dr Giriraj Sharan
Published by Prabhat Prakashan Chawrı Bazar Delhi 110006
मूल्य सनर स्पय
Rs 7000

एक शाम, अपने साथ शाम का समय है। मेरे एक तरफ जगल है और दूसरी ओर पक्के मकानो में रहने वाली धनी शहरी आबादी। बीच मे सडक है, जो इन दोना सस्कृतियों को मापस मे विभाजित कर रही है । मुये लगता है जैसे इन दोना में तालमेल न बनाये रखने के कारण सामाजिक सतुलन बिगड जाता है । मैं उस ओर अधिक युग जाता हूँ, जहा पत्थर की लम्बी सडक तो है, ऋपि मुनियो की भांति घने घने ध्यान मग्न पेड नही हैं । मैं अपने इतिहास पर दष्टि केन्द्रित करता हूँ और अपने सास्कृतिक मूल्यो पर विचार करता हूँ, तो मुये लगता है कि मेरी जीवन-पद्धति तो इन विशाल मैदानो, इन वृक्षो और इन सेतो म बिखरी पडी है, जो देवताओ की तरह दयालु हैं । प्रकृति की भांति विशाल और आकाश की तरह असीम और सुली पुली। सोचता हूँ, मैं यहाँ क्यो आया, इस अवेले और निजन मैदान मे? क्या वह सस्कृति अप्रत्यक्ष प म फिर मुझे अपनी तरफ खीच रही है, जिसे मैं औद्योगिक सभ्यता की तरफ बढत हुए बहुत पीछे छोड आया हूँ। मेरे तलुभा के नीचे भुरभुरी मिट्टी है, जिसमें हरी हरी पास के अकुर फूटने आरम्भ हो गए हैं। लगता है, गर्मियो पी गतु धरती पर महीनो तक आग बरसार र अपने अग्नि-पप समेट घुपी है, और या ऋतु के पहले पानी ने जलती-सूखी मिट्टी के होठ तर कर दिय हैं । हरी-हरी पास उग आई है । वृक्षा न अपा मते वस्त्र उतार दिए हैं वह धुले ध्रुले नये-नय-से दिनाई पड़ रहे हैं । हवा के हितोरा मे नृत्य करती हुई पत्तियाँ, वर्षा की पहली हरियाली लिय छाट-बडे और मझोले मापार में खेत--यह मानव-सस्कृति की पाना ये चिह्न हैं जिनमे सामाजिक जीवन की शान्ति, सुय और नैतिक मूल्या मी परम्पराएं निहित हैं। मुहबर पाहूं तो इम स्पारस पुछ ही दूरी पर भवन पलामा का यह बटोर मिलसिला है, जहाँ ठण्ही पकाने सड हैं, क्त-वारा यिद्युत प्रकाश है, ना है, लेपिन मवेदनहाा-गुप-गमति है लेपिन मानव रहित गान और मुग-गमदिरे बीच मरी सोच पा बिंदु भावर फम गया है-मैं परपर एर टोले पर बठ गया हूँ। माद माता- - ससार का सृजन पूण हो चुका है, धरती अपना वतमान आकार ग्रहण कर चुकी है, मिटटी को छाती चीखर पेड पौधे बाहर निकल आए हैं, सूय देव ने उदय और अस्त होना आरम्भ कर दिया है, समय रात और दिन के बीच विभाजित हो चुका है। आदमी अपनी कमर के बल सीधा खडा हो चुका है, वह ज्ञान का प्यासा है, जानना चाहता है, प्रकृति का रहस्य क्या है, जीवन व्यतीत करने का सर्वोत्तम माग कौन सा है ? पेट की आग बुझ चुकी है, लेकिन मस्तिष्क की आग दहक रही है, सनसना रही है। वह उस नान को प्राप्त करना चाहता है, जो उसे यह बताये कि आदमी जय जीव जतुनो से श्रेष्ठ क्यो है ? तभी प्रजापति मानव की मनोस्थिति भाप लेते हैं। वह विश्वकर्मा को इस लम्बी चौडी धरती पर भेजते हैं। प्रजापति न विश्वकर्मा को दो सुदर मटकिया सौप दी है। आदेश होता है कि वह इन मटकिया का इसाना के बीच ले जाएं और इनमे रखी हुई सामग्री रोटी और ज्ञान के लिए व्याकुल लोगो के बीच बाट दी जाए। एक मटकी पूरी तरह भरी है, दूसरी लगभग खाली, भरी हुई मटकी मे सुख है, और खाली मटकी मे थोडा सा ज्ञान, आदेश हुआ है कि भरी हुई मटकी मे जितना सुख है, वह बिना भेद भाव और पक्षपात क्येि, निरीह मानव के बीच वितरित कर देना और थोडे से ज्ञान की पूजी को जा मटकी के पेंद में पड़ी है और अधिक भरना, और अधिक नान अजित करना, ताकि मानव जाति उससे लाभ उठा सके विश्वकर्मा विशाल आसमानो के फलाव को लांघते हुए धरती को ओर चल पड हैं । याना लम्बी है और मटविया साथ हैं। विश्वकर्मा उटते गए उडत गए यहा तक कि धरती निक्ट आ गई। उहाने अपनी भुजाओ के बीच दवी मटक्यिो को देखा और यह सोचकर विचलित हा गए कि जो आदेश प्रजापति से मिला था, वह उसे भूल गए हैं। उहे याद नहीं रहा कि कौन सी वस्तु उहें बाँटनी थी और कौन-सी अजित करनी थी? विश्वकमा धरती पर आए । उहाने भूलवश ज्ञान बांटना और सुख बटोरना आरम्भ कर दिया । ज्ञान था ही कितना कितने लोगो मे वैट सक्ता था? उसे और अजित तो क्यिा नहीं गया था कुछ ही व्यक्तिया म बँटकर समाप्त हो गया- लेकिन भूल थी जो हो चुकी थी और उसका सुधार सम्भव नहीं था विश्वकर्मा धरती पर नान बांटन और सुख वटोरने का काय पूण कर कभी के वापस जा चुके हैं । लाखा और लाखा वप वीत गए इस घटना को (७ ? और तब से आज तक आदमी सुष बटोर रहा है और ज्ञान बांट रहा है। ज्ञान बाटन वाले कम हैं और सुख बटोरने वाले सब एक होड लगी है, सुख- सुविधा प्राप्त करन को, जीवन से रस निचाडन की, एश्वय और विलासिता अजित करने को। आदमी सोता नहीं है, भाग रहा है सुप सुविधाआ की खोज मे, धन दौलत की लालसा म। लाखो साल गुजर गए हैं, इस दायरे में घूमते हुए मानव जाति को सोचता हू यदि विश्वकमा, प्रजापति का निर्देश न भूले होत तो यह दुनिया कैसी होती, मानव सस्कृति की स्थिति व गति क्या होती तब तब शायद लकश्वर रावण पैदा ही न हुआ होता इतिहास म । क्या वह विश्व- कर्मा की भूल ही थी जिसन रावण को उत्पन किया? रावण, जो एक प्रतीक है धमड और स्वाथ का । घमड और स्वाथ, जो पैदा होते हैं सुख और सुविधाओ की खोज से धन शक्ति और सत्ता के गम स । विश्वकर्मा से भूल न हुई होती तो क्या आदमी ज्ञान की भूख मिटाने के बदले धन को भूख को शात करने के लिए इस तरह मारा-मारा फिरता अपनी ही जाति का दुश्मन हो जाता एक गिरोह दूसरे पर आक्रमण करता एक राजा दूसरे राजा पर चढाई कर निर्दोष लोगा का खून बहाता, दुनिया में कभी युद्ध होते, शनुता जन्म लेती? शायद नही । ज्ञान बाटन और सुख बटोरन की लालसा ने आदमी के सास्कृतिक जीवन को क्तिना विकृत किया सोचता हूँ तो भय से काप उठता हूँ। क्ल्पना होती है कि यदि विश्वकर्मा न प्रजापति का आदेश याद रखा होता तो यह दुनिया वसी न होती जैसी आज है। तब मानवो का एक शात समाज हाता वगविहीन, पूण आर्थिक समानता लिय हुए । लोग पेट भर रोटी खाकर प्रसन रहत और ज्ञान की खोज म एक-दूसरे से सहयोग करते, काले गारे और ऊचे नीचे के बीच बँटा हुआ यह समाज इतना असहनीय कभी न होता जितना अब है। हर हाथ म पुस्तक होती, हर हाथ म क्लम । दुनिया में अज्ञानता के उधकार का नही ज्ञान के प्रकाश का राज्य होता। ससार निधन और समद्ध क्षेत्रा के बीच कभी न बंटता । लेकिन खेद दि ऐसा नहीं हुआ। आदमी फंस गया सुख-सुविधाओ की दल दल मे विलासिता के धनघोर और अपार जगल म, जहा से बाहर निकलने का कोई माग कही है, क्योरि विलासिता की धरती से जिस स्वाथ के बीज अकुरित होते हैं उसका कोई मत नहीं है कोई सीमा नही उसकी ८] हो , विश्वकर्मा की भूल थी कि मानव सस्कृति, ज्ञान प्रधान होन के स्थान पर- अथप्रधान हो गई और इस अथ प्रधान सस्कृति मे में पुन दुखी होकर विश्वकर्मा से पूछना हूँ-- 'भगवन | यह क्या किया तुमने, तुम्हारी एक भूल स रितना अनथ गया दुनिया में वह धीरे से मेरी पीठ पर हाथ रख देते हैं, नम और मुलायम । आवाज आती है- मगर ज्ञान ही ज्ञान होता तो तुम अज्ञानता को पहचानते कसे? देवता ही देवता हाते, ता राक्षसो के अभाव में उनकी महानता को पहचानता कौन ? मरी एक स्वाभाविक भूल न दुनिया को स्वग तो नही बनाया, नरक का स्वग मे परिवर्तित करने की प्रेरणा अवश्य दी- सुख-सुविधाओ की मटकी ने रावण को पैदा किया तो ज्ञान के पात्र ने राम को। राम का अस्तित्व इसी में है कि वे रावण को पराजित कर सके, उसका वध कर सके, समाप्त कर सके उसे लेकिन उसका वध कहाँ हुआ? वह समाप्त कब हुना। वह तो मरकर फिर जीवित हो उठता है- 'लेकिा फिर मार दिया जाता है। विश्वकर्मा को धीमी आवाज मेरे कानो म रस घोलती है 'मेरी भूल ने सस्कृति को अथ प्रधान अवश्य बनाया लेकिन रावण का महत्त्व नहीं दिया। आज भा ससार मे नान का महत्त्व है नान का आदर है, धन का नहीं। 'धन दौलत और भोग विलास का महत्त्व होता तो रावण जीवित रहता वह मर गया तो सिद्ध हुआ, नान जीत गया है, स्वाथ और घमड हार गया है- 'और रावण तो तभी हार गया था जब कि राम के हाथा उसका वध भी नहीं . हुआ था में चौकार विश्वकर्मा की आर देखता हू, 'क्या कह रह हैं भगवन !" आवाज सुनाई देती है 'नान का दवी प्रभाव राक्षसा की प्रवत्ति तक बदल देता है। तुम शायद इस वास्तविक्ता से परिचित नहीं हो रावण तो तभी हार गया था जव कि राम के हाथा उसका अन्त भी नही हुआ था। और यही मानव सस्कृति की जीत थी धमकी अधम पर विजय थी। आवाज वही दूर अतरिक्ष म गुम हो गई है। मैं बाश्चय के सागर म डूबकर जसे ही पुन तट पर आता हू पिर वही आवाज मरे निकट आती है मुझसे बहती है 'याद रो-1 असाधारण देवी शक्तियो वाले रावण ने सीता मां का हरण कर लिया है और वदी बनार अशोक वाटिका मे रख छाडा है। वह प्रयास कर रहा है, सीता को अपने फद म काम ले लेकिन काई भी प्रयास सफल नहीं हो रहा है उसका। 'रावण बहलाता है, पुसलाता है धमकाता है, डराता है लेकिन पतिव्रता सीता पर उसका कोई प्रभाव नहीं है । फाई भय नहीं है, रावण का उनके मन मे । खीज उठना है रावण यह देखकर, यह सोचकर कि एक महाशक्तिशाली रासाये सामने एक निरीह महिला पहाड की तरह अडिग बनी खडी है और वह उसका कुछ भी नहीं विगाड पा रहा है। 'बीज और काध से टूटकर रावण व्यग्रता के साथ अपने महल के अहाते मे टहल रहा है। उस कोई उपाय नही सूप रहा है कि किस प्रकार वह सीता को सहवास के लिए सहमत करे। हर चाल असफल हो चुकी है, हर प्रभाव बेकार जा चुका है। 'एसा पहले तो कभी नहीं हुआ था, रावण सोचता है, उसन जब जो चाहा, पूरा हुआ। पर अब यह कैसी अनहोनी हुई है कि एक निर्वल औरत उसके अधिकार को चुनौती दे रही है और उसके कब्जे मे नही आ रही है। 'रावण पाव पटक्ता हुआ राजगद्दी तर आता है और सोचने लगता है वह उपाय जिससे सीता उस पर मोहित हो। 'लेकिन कुछ नही सूझता। वह निराश हा चुका है-लेकिा काम पिपासा उसे चैन से बैठन नहीं दे रही है। 'तभी मायावी 'कालनमि' उसे सलाह देता है-- ''रावण | तुम असीम शक्तिया स सपन हो । तुममे हर पल, हर प्रकार का रूप बदलने की पूर्ण क्षमता । ऐसा क्यो नही करते राजा कि तुम अपनी असीम और निहित शक्तिया से राम के रूप में परिवर्तित हो जाओ। राम बनकर जब अशाव वाटिका मे जामागे और सीता की तरफ बढोगे, ता वह तुम्ह रावण नही, राम ही समझेगी और अपना स्वामी मानकर तुम्हारे चरणो म झुक जाएगी। तब तुम अपनी मनोकामना पूरी करने मे स्वतन हाग तब कोई तुम्ह रोक्न वाला नहीं होगा । 'रावण ने एक लम्बी ठण्डी सास भरी है। साली याली दृष्टि से जतरिक्ष की तरफ झांका है और निराशापूण स्वर म बोल उठा है-- ''यह भी करके दख चुका हूँ कालनमि । यह भी करके देख चुका हूँ, चितु सफलता नहीं मिली है मुझे। जब भी राम के रूप में अपने भापका परिवर्तित करता हूँ, तो मेरी बुद्धि भी राम जैसी ही बन जाती है। तब मुझे विलासिता की नही, दया की बात सूझती है। शरीर का सुख याद नही आता, मानवता की याद आती है । स्वाप की अग्नि बुझ जाती है । वलिदार का भाव उत्पन हो जाता है।' आवाज एक बार फिर चुप हो गई है और मैं ठगा ठगा-सा बेटा हूँ। राम एव सस्थति है और रावण पाशविक जीवन का एक क्षण। राम आदश जीवन का एक लक्ष्य है और रावण मानव इतिहाम म लज्जा पा चिह लेविन यह रावण वही है जा राम के वश म राम जसे आचरण वाला बन जाता था, जैसे सुगध के समर मे आकर निगध वस्तुएं भी सुगधित हो जाती हैं। याद माती है एक महाकवि द्वारा कही गई वह यथा-जिसमगदी और तुच्छ मिटटी महत्वपूर्ण हो गई पी- जब वह ववि एक रूपमती के निवास के साथ वन स्नानपर के पीछे से निकल- कर गया तो उसन अनुभव क्यिा वि स्नानघर के पीछे की गदी मिटटी गुलाव वे फूल की तरह महब रही है। कवि निस्तब्ध भाव से खबर खडा हो गया। वह झुका, थोडी-सी मिटटी हाथ में ली सूधकर दा | उस लगा जैस सचमुच गया पानी पीन वाली इस मिटटी ने कोई सुगधित जल पिया हो और गदा स्वभाव बदलकर एकदम सुगधित हो उठी हो। कवि देर तक उस मिट्टी को मूघता रहा, सोचता रहा और फिर उससे सम्बोधित होकर बाला- स्नानघर के पीछे की गदी मिटटी बोल दुगंध के स्थाा पर यह सुगध तूने कहा से पाई? चुप के कुछ भारी पल बीत गए । तब अचानक मिटटी के भीतर से स्वर फूटे- 'यह गुण मेरा नहीं, उस रूपमती के सुगधित शरीर का है, जिसका पानी मेरे कण्ठ के भीतर आया और मुपे भी सुगधित कर गया।' पथा की मिटटी मेरा हाथ थामवर मुझे उन महापुरुषो की ओर ले जाती है जिनको एक हल्की सी छाया भी मानव समाज को पुण्य की ओर परिवर्तित करन के लिए पर्याप्त है । सोचता हूं जब रावण जसे दुष्ट की बुद्धि राम के वेश में आकर अपनो प्रवृत्ति बदल सकती है, तो मानव इतिहास के उन महापुरुषो का सम्पक, जिनके कन्धो पर मनुष्य की लाखो वर्ष पुरानो सस्कृति खडी है आज के आदमी का क्या नहीं बदल सकता? सूरज क्व का डूब गया है। चारो ओर अंधेरा है । मैं पुन रोशनी की तलाश म यावादी की तरफ चल निवला हूँ। १६, साहित्य विहार बिजनौर (उ० प्र०) (डॉ.) गिरिराजशरण अग्रवाल

क्रम
अग्नि परीक्षा/कुवर चद्रप्रकाशसिंह
कुरुक्षेत्र की एक साझ/च द्रशेखर २८
प्रबुद्ध/आचाय चतुरसेन
६०
महाभारत की सांझ/भारतभूषण अग्रवाल
नरमेध/भैरवप्रसाद गुप्त
अधकार/डा० रामकुमार वर्मा १३१

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अग्नि-परीक्षा
कुंवर चद्रप्रकाशसिंह
पान परिचय
रावण प्रसिद्ध लकाधिपति दानवेद्र
मदोदरी रावण की पत्नी
विभीषण रावण का अनुज, प्रसिद्ध रामभक्त
राम प्रसिद्ध मर्यादापुरुषोत्तम, दाशरथि
लक्ष्मण राम के प्राणतुल्य अनुज
सीता राम की पत्नी जगज्जननी जानकी
हनुमान प्रसिद्ध रामभक्त, बजरग बली
सरमा विभीषण की पत्नी
क्ला विभीषण की पुत्री
त्रिजटा सीता की सरक्षिका ममतामयी राक्षसी
जाम्बवान, सुग्रीव, अगद, नल, नील, अयाय राक्षसियां, पृथ्वी, अग्निदेव
आदि।
.
समय
दिन का तीसरा प्रहर।
लका का युद्ध-क्षेत्र।
स्थान
दृश्य एक
[कुछ ही समय पूर्व युद्ध समाप्त हुआ है। विशाल रण
भूमि असघ्य आहत एव मृत वानरो, भालुआ एव राक्षसो

२/अग्नि परीक्षा से पटी पड़ी है। रक्त के प्रवाह म वीरा और वाहनो के कटे हुए हाथ-पैर एव आयुध बह रह हैं। काको, चीला, गद्धो और शृगाला के झुण्ड के झुण्ड लाशो पर टूट रहे हैं, कोई नत्र निकालकर भागता है, कोई अंतडिया नोच नोचकर पा रहा है । कोई रक्त पीकर तप्त हो रहा है। युद्धभूमि के मध्य भगवान राम के वाणा से आहत होकर रावण मुमूर्षु अवस्था म पड़ा है। उसके आसपास उसके सैक्डो सिर और वाहु भगवान राम के बाणो से विद्ध पडे हैं, मानो सूर्य की किरणा ने राहुओ की सना को बेध डाला है। पट्टमहिपी मदोदरी रावण का सिर अपनी जघा पर रखे हुए विलाप कर रही हैं । वे विलाप करती हुई रावण की अनेकानेक पत्नियो और दास दामियो से घिरी हैं। रावण के चरणा को अपनी गोद में लिये हुए अवनतमुख विषण्णवदन विभीषण बैठे हैं ।] रावण धय धारण मदोदरी शौय का मूर्तिमान विग्रह जा रहा है सूय धरती पर पड़ा है, चद्रमा अंधेरे मे डूब गया है। आकाश से भी उनत आपके वे सिर, जो ग्रहा और नक्षत्रा के आतपन से सेवित रहते थ, आज जम्बुका द्वारा ठुकराये जा रहे हैं। हाय । आँखें खालो स्वामी । (धीरे से आखें खोलकर) मदोदरी। करो राजराजेश्वरी। म दोदरी (रोती हुई) नाथ । वरुण, यम कुबेर, विवस्वान एव उनचासो मस्त् मिलकर भी जिसके समक्ष युद्धम खडे होने का साहस नही करते थे रावण (आंखें खोलकर) ठीक कह रही हो, मदोदरी। स्वय इद्र जिसके पाद पीठ की अचना क्यिा करता था, वही रावण आज अपदाथ की तरह इस युद्धभूमि म पडा है । (पीडा से आखें मूद लेता है।) मदोदरी कमलासन ब्रह्मा जिसकी सभा म प्रतिदिन वेदपाठ करने आते थे, जिसका 5 भग दखबर अग्नि भय से शीतल हो जाता । । था . रावण (पुन आंखें खोलवर, आकाश की आर देखकर) लवेश्वरी जिस रावण को कुद्ध देखकर मेघ गारे बरसान लगते थे, उत्तुग तरगाकुल सागर अगुलि निर्देश मात्र से छाटे सरोवर की तरह ५५ रावण रावण शान्त हो जाता था, उसी को आहत एक भूपतित देखेको देवता कितना आनद मना रह है आगोश से जयजयार है शब्द सुनाई पडता है।) मन्दोदरी हा, नाथ ! ये देवता ही हैं, जो राम की जय बोल रहे हैं । (ध्यान से सुनता है) बडे कायर हैं य देवता। काल को अब भी मेरे पास आने मे भय लगता है। यदि राम के बाण का अवलम्ब न मिलता, तो वह मेरी ओर आख उठाकर देख भी नहीं सकता था। (आँखें पोलवर चारा ओर देखता है ।) क्या ये मेरे सिर और बाहु हैं? मदोदरी हो, देव । दिग्दतिया के दन्तोत्पाटन म समथ आपके प्रतापी बाहु आज गीधा के श्रीडनक बने हुए हैं । आकाश से भी उनत आपके वे सिर, जो सूय और चद्र आतपत्र से सेवित रहा करते थे, आज जम्बुको द्वारा ठुक्राय जा रह हैं । हाय । (धीरे से आंखें खोलता हुआ) मदोदरी। धैय धारण करो। काल को मैंने बदीगृह मे डाल रखा था, पर मैने प्रमादवश वैसा नही किया। (आखे मूद लेता है) विभीषण (रावण के चरणा पर सिर रखते हुए) भाई, अपराध क्षमा हो। काल जिनकी इच्छा से मर सकता है, आपने उही राम से अकारण वैर ठान लिया। रावण (आखें खोलकर) तुम कौन, विभीषण? विभीषण (रावण के चरणो पर सिर टेककर) हाँ, मैं ही हूँ भाई । अन्तिम दशन करने और क्षमा मागने आया हूँ। (आसुओ से रावण के चरण सिक्त हो जाते हैं।) रावण तुम्हारे आने से मुझे बडो प्रस नता हुई, विभीषण । अब मेरे मन मे तुम्हारे प्रति किसी प्रकार का क्षाभ या रोष नहीं है। तुमने उच्चतर धम का पालन किया है। मैंने भी वीर धम का पालन करते हुए वीरगति पाई है। वीर का तपण आसुओ सनही होना चाहिए। मदोरी नाथ, विभीषण ने और मैंने आपको कितना समझाया, सीता को लौटा देन का कितना आग्रह किया। माल्यवन्त जैसे वृद्ध और विवेकी मत्रियो ने भी आपको इस अधम से विरत करने का प्रयत्न किया, पर तु आपने किसी की भी नहीं सुनी। ठीक ही कहती हो, मदोदरी | मैंने किसी की नहीं सुनी। मुझे अपनी अपराजेयता का महकार था। दिक्पालो का मद चूण रावण रावण 7 । रावण ४/अग्नि परीक्षा करने वाला रावण एक वनवासी राजकुमार राम की शक्ति को क्या समझता । परन्तु । मदोदरी परतु क्या नाथ? मदोदरी । मेरा अनुमान है कि राम की शक्ति का अधिष्ठान सीता ही है, वे पुण्यतमा परमाशक्ति हैं। मदोदरी यह अनुभव आपको कैसे हुआ रावण देवी मदोदरी | जीवन के इन अतिम क्षणो मे स्मृति अत्य त निमल और सतेज है, एक एक पूर्व घटित घटना सजीव होकर सामने आ रही है । सुनो, जव मेंने सीता का हरण करन क लिए उह पक्डा था, तब मुझे लगा कि मैंने प्रज्वलित अग्निशिखा का पक्ड लिया है। फिर भी मदोदरी फिर भी आप उस अधम से विरत नहीं हुए? हा मदोदरी | फिर भी मैंने अपना निश्चय नही छोडा । प्रत्येक प्रकार के विरोध प्रतिरोध को पददलित कर देना रावण का स्वभाव था । एक जवला के प्रतिरोध से मेरे अहकार का दव और भी प्रदीप्त हो उठा । मैंन ज्वलत जनल शिखा-सी सीता को बलपूर्वक पक्डकर अपने आकाशचारी रथ मे डाल दिया। मदोदरी फिर? रावण मैन सीता को उठाकर रथ मे डाल तो लिया पर अपनी जिन भुजाआ पर मैंने शम्भु समेत कैलास को लीला कमल की तरह उठा लिया था, वे ही सीता को उठाने मे थक गइ। मैंने अनुभव क्यिा मानो मेरी अपराजेय शक्ति का अक्षय स्रोत सूख गया है। मदोदरी यह अनुभव आपको कैस हुआ? रावण मदोदरी | सीता की पुकार पर अति जरठ जटायु गद्ध ने मुझ पर आक्रमण किया। उसन अपन भीषण नख-चचु प्रहार से मुझे मूच्छित कर दिया। बडी कठिनाई से मैं अपने शिव प्रदत्त कृपाण से उसे जीत पाया। अपनी शक्तिहीनता का वह पहला अनुभव मुझे हुआ था। विभीषण फिर भी आपन हम लोगा के अनुरोध पर ध्यान नही दिया। अहवार विवेक का सबसे बडा शत्रु है, विभीषण | प्रवुद्ध विवेक के विना राशक्ति अघ और वधिर हो जाती है, उस केवल चाटुकारिता ही प्रिय लगती है । मुद्रो इसका अनुभव हो रहा है । मेरे बदीजन रावण अग्नि परीक्षा/५ . रावण [लक्ष्मण का प्रवेश। सिर पर जटा, पूण चद्र जैसा तेजोदीप्त मुखमण्डल, मायतावार अरुण नेत्र, प्रशस्त पीन वक्ष स्थल, माजानु विलम्बित भुजाएँ, तप्त स्वण जैसा वण, मत मृगेद्र जैसी चाल, हाथ मे धनुप, पीठ पर तूणीर वसा हुआ। विभीषण के पीछे कुछ हटकर खडे होत हैं। विभीषण उठना चाहते हैं, पर वे सकेत से रोक देते हैं, जिससे रावण अपनी बात पूरी कर सके।] मेरी यौवनश्री को सुरागनाप्रार्थित कहकर अभिनदन करते थे । देव, दानव, यक्ष विनर, नाग आदि सब कुलो की कितनी ही राजकुमारियो का मैन वरण किया और सबने मुझे पाकर अपना जीवन कृतकृत्य माना। पर यह मानवी सीता मादोदरी हा, नाथ । मानवी सीता ने कभी आख उठाकर भी आपकी ओर नहीं देखा। रावण मानवी सीता ने मेरे गा को खव कर दिया, मदादरी। उसका हृदय जीतन के लिए मैंने क्या नही क्यिा । साम, दाम दण्ड, भेद, छल कपट म प्रबल आसुरी माया आदि सब प्रयोग मैंने क्येि और सब व्यथ हो गय। मैं तो नारी के केवल कामिनी रूप से ही परिचित था, उसके इस अपराजेय रूप का साक्षात्कार तो मैंन मानवी सीता को देखकर ही क्यिा। नारी इतनी निक्लुप, इतनी पविन हो सकती है इसका अनुभव मुझे सीता को देखकर ही हुआ। मदोरी यथाथ है नाथ ! सीता को पाकर राम ध य हुए लका की यह भूमि भी उसके चरण स्पश स पविन हो गई है। रावण एक बात और सुनो । यह मैंन तुमस कभी नहीं कहा । एक बार मैं राम का रूप धारण कर सीता को छलने के लिए चला। वह रूप धारण करते ही मेरी चित्तवृत्ति परिवर्तित हो गई, मुझे चतुर्दिा अपनी माता के दशन होने लगे। सत्त्वगुण का ऐसा उद्रेक मेरे अत करण मे हुना कि मेरा तमोगुणी स्वभाव उसे सहन न कर सका। मैंन वह रूप छोड दिया। उस दिन जब मैं पूजाथ शिव मदिर म गया, तब भगवान न मेरी पूजा स्वीकार नही की। उनकी भकुटिया म रापपूण भगिमा थी, जगज्जननी पावती के नेत्रा मे भी करुणा ने स्थान पर विराग था। मदोदरी अपने इष्टदेव को असन्तुष्ट देखकर भी आपका विचार नहीं बदला 7 ६/अग्नि-परीक्षा रावण मुझे तो अपने इष्टदेव पर क्रोध आया। मदादरी, मैंन यह निश्चय किया कि यदि ये भी सीता को लौटा दने का आग्रह करेंगे, तो मैं इनसे लडू गा। मदोदरी भयानक । भगवान शकर के प्रति ऐसी विद्रोह भावना ।। ओह, मुो लगता था, लकादहन उही के रुष्ट हो जाने से हुआ है। विभीषण भैया, लकादहन करन वाले हनुमान तो ग्यारहवें रद्र के अवतार हैं ही। जिस आग मे लया जली, वह वही थी, जिसवा दशन में प्रति दिन मीता के व्यक्तित्व के प्रभामण्डल म करता था। मैंने सवत्तक मेघा को वह भाग बुझाने का आदेश दिया था, उनके द्वारा वरसाया हुआ जल उस आग के लिए घत बन जाता था। (वोलते बोलते थक्कर आखें मूदकर मौन हो जाता रावण पर रावण लक्ष्मण विभीषण (खडे होकर) भया, कोशनपति राघवेन्द्र राम के अनुज लक्ष्मण आपमे भेंट करने पधारे हैं। लक्ष्मण मैं चक्रवर्ती दशरथ का पुत्र, राघवेन्द्र राम का अनुज लक्ष्मण आपको प्रणाम करता हूँ, लकेश्वर । (ससम्भ्रम जाखें खोलकर) रामानुज लक्ष्मण । मेघनादजयी लक्ष्मण । स्वागत है आपका। इस युद्धभूमि म मरे इहलौकिक जीवन व अतिम क्षणा म आप किस उद्देश्य से पधारे हैं ? मैं क्या सवा कर सकता हूँ? आपने दीघकाल तक त्रैलोक्य का शासन किया है । पूज्य अग्रज ने मुझे आपसे राजनीति की शिक्षा प्राप्त करने के लिए भेजा है। रामानुज, यह आपके अग्रज की उदारता है । उहान मुझे आदर दिया है । वितु अब मेरी वाक्शक्ति क्षीण हाती जा रही है मैं अधिक बोल नहीं सकता । थोडे म अपने शासकीय जीवन के अनुभव का सार कहता हूँ। इस कृपा के लिए अनुगहीत हूँ लकेश्वर । शासक्वग को विलासिता स दूर रहना चाहिए । प्रशासकीय वेद्रो से वितासिता का उमूलन करना राजनीतिक सुख ঘারি और सुरक्षा के लिए अनिवाय है। यदि शासक्वग विलासी बन गया जोर राजधानियां विलासिता के केंद्र बनी, तो पतन अनिवाय है । लका का और मेरा पतन विलासिता के अतिरेक के कारण हमा। रावण लक्ष्मण रावण अग्नि परीक्षा/७ सक्ष्मण रावण रायण चिरस्मरणीय है आपका यह निर्देश । विलासी शासक्वगप्रमादी, अहकारी एव अदृढनिश्चय होता है। राजा को प्रमादी राजपुरुषाको विसी प्रकार का उत्तरदायित्व नहीं सौपना चाहिए । प्रमाद और अहवार राजशक्ति को भीतर सखोखला कर देते हैं । इसलिए, सदाचारी पुरषो को राजशक्ति के सचालन के काय मे नियुक्त करना चाहिए। लक्ष्मण अनुगहीत हूँ, नकेश्वर । शासक को प्रजावग को सदाचारी एव सयमी बनाने का सतत प्रयत्न करना चाहिए। सदाचारी प्रजा ही राजशक्ति का दृढ आधार बन सकती है । वेवल भौतिक समृद्धि स राष्ट्र किंवा राजशक्ति दीर्घकाल तक सुरक्षित नहीं रह सक्ती। मैंने इस सत्य का महत्त्व नही समझा, इसलिए मेरी यह दशा हुई। (हॉफ्ता है) आपको बोलने मे क्प्ट हो रहा है, लवेश्वर । रावण हां, रामानुज, अधिक बोल नही पाऊँगा। अपने अग्रज से एक बात और कह देना । शासको का सबसे बड़ा शत्रु होता है चाटु- काग का वग । राजपुरपों को इनसे बचना चाहिए । लक्ष्मण । आपके अग्रज स मैंने यह सीखा है कि विपक्ष की शक्ति चाहे जितनी बडी हा, पर विजय उसी को मिलती है, जिसके पक्ष मे धम होता है। इसलिए राजसत्ता को धममूलक होना चाहिए, अब मेरी ऐसी धारणा है। (थक्कर आखें मूद लेता लक्ष्मण लक्ष्मण रावण अब आप कष्ट न करे, तपेश्वर। एक बात आपसे और कहनी है। मेरे बाद जब विभीपण का राजतिलक करें, तो मदोदरी को ही प्रधान राजमहिषी का पद प्रदान करें। जिस प्रकार बालि की मत्यु के पश्चात तारा सुग्रीव की पटरानी हुई, उसी प्रकार मदोदरी विभीषण की पटरानी बनेगी । इस देश की परम्परा मे यह विहित है। आपकी इच्छा पूर्ण होगी,लकेश्वर (लक्ष्मण प्रणाम करवे चले जाते हैं।) लक्ष्मण ८/अग्नि परीक्षा दृश्य दो [लका ये समरागण म भगवान राम का शिविर । भगवान राम एक शिला परसमासीन हैं । मामन चरणा के पाम लक्ष्मण और हनुमान बैठे हैं। दोनों की मुद्रा अत्यन्त गम्भीर है। लक्ष्मण राम लक्ष्मण | रावण ने सीता के विपय मे जो कुछ कहा है, वह यथाथ है। फिर भी सीता को अग्नि-परीक्षा देनी ही होगी। (विक्ल होकर, राम के चरण पकडकर) स्वामिन् मैं आपका दासानुदास हूँ। मेरा यह विश्वास रहा है कि आप जो कुछ कहते हैं सो करते हैं, उसमे धम का सारतत्त्व निहित है । फिर भी, भगवती की अग्नि परीक्षा का औचित्य मेरी समझ म किसी भी प्रकार नहीं आता। लक्ष्मण तुम यह तो जानते हा कि मेर वनवास और लका पर अभियान का एक महत्तर उद्देश्य भी है। अच्छी तरह से जानता हूँ, प्रभु। आप अनावृतचरण दुर्गम पवता, अरण्यो और समुद्री तक को पार करते हुए समाज, सम्प्रदाय देश एव काल निरपक्ष सावभौम मानव सस्कृति और धम की प्रतिष्ठा कर रहे हैं। हनुमान, इस सम्बध म तुम्हारा क्या अभिमत है ? मेरे लक्ष्य की प्राप्ति में तुम्हारा योगदान सवस महान है। हनुमान (हाथ जोडकर) ऐमा न कह स्वामी हनुमान सवा के अति रिक्त और कुछ नही जानता। हाँ, इतना समझता हूँ तातवरण सौमित्र ने जो कुछ कहा है, वह सत्य है । धानर, क्षक्ष और रजनीचरा जैसी असभ्य जातियां भाप सम्पय मात्र स उच्चातिउच्च सस्कारा में दीक्षित हार आयत्व प्राप्त करती जा रही हैं। आप दशन मात्र म देवत्व सुलभ हो जाता है, जीवन के समस्त ताप त्रास दूर हो जाते हैं। प्रत्यन मानव अपरिमित दवी सम्पत्ति का अधिष्ठान है। इन अन्तनिहित शक्तिया वे पूर्ण विकास मा ही नाम है-आयत्व अपवा देवत्व । हमारे ऋपियो ने इसी घम और सस्कृति में प्रचार और प्रसारको विश्व को आयत्व प्रदान करता रहा है। मैं भी उसी माग पर चल रहा हूँ। राम चार शनि राम हनुमान जानता हूँ, स्वामी । अगस्त्य नै इसका प्रचार के वष्ट सहे हैं। उनके क्तिने शिष्यों नारदमोगियांका निणा ने अवारण ही वध कर डाला है। लक्ष्मण तुम अपि को पत्नी अनुसूया को जानते हो? तुमने भी उनके विषय म सुना होगा, हनुमान हनुमान मैंन उनके दशन भी किये हैं, प्रभु । वे ही महर्षि अत्रि को महा- शक्ति हैं। रब तो तुम यह भी जानते होगे, वे ही महर्षि वेधम प्रचार की सयस बडी सहयोगिनी हैं। दक्षिण की, श्वापदो से भी अधिक भयकर और यूर जातियो मे सती धम की प्रतिष्ठा का काम वे ही कर रही हैं, क्यादि सतीत्व ही सस्कृति और धम के विकास या मूलाधार है। लक्ष्मण स्वामी, अगस्त्य के साथ रहकर अनसूया दवी ने जो कुछ विया है, उसस अधिक आपके साथ रहकर जननी मैथिली कर रही हैं । आप उही की अग्नि परीक्षा लेना चाहते है ? राम तात | तुम जानत हो, सीता का और मेरा जीवनोद्देश्य एक ही है। सीता की अग्नि परीक्षा उस उद्देश्य की सिद्धि मे सहायक सिद्ध होगी। प्रभु मैं जानता हूँ कि जननी जानकी और आप अभि न हैं । यह भी जानता हूँ कि आप मर्यादापुरुषोत्तम है फिर भी मैं आपके, अग्नि परीक्षा के प्रस्ताव का अनुमोदन नहीं कर पाता। मैं तो समझता हूँ कि सीता जैसी सती को अग्नि परीक्षा देने के लिए बाध्य करना अपने-आप म ही धम मर्यादा का उल्लघन है। इस सृष्टि का एक एक अणु परमाणु भगवती की पवित्रता का साक्षी लक्ष्मण लक्ष्मण राम तुम्हारी भावना को मैं समझता हूँ लक्ष्मण | पर तु धम का माग कठोर होता है। स्वामी, यह बठारता आपकी नीति के पूर्णचन्द्र के लिए अमाज्य क्लक बन जायगी। सीता जैसी महासती के साथ आपका यह यवहार युग युग तक अक्षम्य माना जायगा। इसलिए आप अपना यह निणय त्याग दें प्रभु ! (चरणोपर गिरते हैं) उद्देश्य कितना भी महान् हो, इस कठोरता की तुलना मे वह नगण्य हो जायगा। हनुमान मेरा भी यही निवेदन है, प्रभु।

१०/अग्नि-परीक्षा राम लक्ष्मण राम लक्ष्मण (लक्ष्मण को उठापर हृदय स लगाते हुए) धेय धारण करो तात | सीता की अग्नि-परीक्षा के समय से विचलित होन की आवश्यकता नहीं। क्या तुम्ह अपने अग्रज के विवेक और चरित्र बल पर सदेह हो गया है ? शात पापम् ।। यह कैसे सम्भव है, प्रभु लक्ष्मण | तुम सीता के प्रति मेरे अनुराग का कुछ अनुमान कर सकते हो । घनश्याम मे विद्युत की भांति सीता मेरे अन्तरतम मे सतत विद्यमान रहती है। सारा ससार जानता है, प्रभु के नन स्वप्न म भी परनारी को ओर नही उठे। ऐमै पवित्र हृदय मे भगवती ये प्रति प्रेम का जा महासागर भरा है उमपी अमिमाला ये दशन मुझे प्रभु के विरह-काल म होता रहा है। यह भी जानता हूं कि आर्यों में बहुपत्नीत्व की जो कुप्रथा चल पडी थी, प्रभु ने उस मिटाने के लिए एकपत्नीत्व की उदात्त परम्परा का प्रवत्तन दिया है। यह भी जगज्जननी के प्रति प्रभु के अनय प्रेम का प्रमाण है। लक्ष्मण, फिर भी तुम कहते हा कि लोक अग्नि-परीक्षा का उद्देश्य न समझकर सीता के प्रति कठोर व्यवहार के लिए मुझे लाछिन राम करेगा। लक्ष्मण सत्य है, प्रभु । लोक आपके उद्देश्य को नहीं समझेगा। वह तो केवल अग्नि परीक्षा की इस घटना को प्रत्येक युग मे नारी पर पुरुष के क्रूर व्यवहार और अत्याचार के प्रमाण रूप मे स्मरण करेगा। राम मेरा समस्त जीवन लोकाराधन के लिए अर्पित है, लक्ष्मण ! मैं जानकी का तुमको तथा अपने-आपको भी लाक-सग्रह की वेदी पर बलि कर सकता हूँ। क्या वही लोक मेरे साथ ऐसा भयाय करेगा? हनुमान स्वामी लोक की मेधा और स्मृति दानो ही अत्यत अल्प और मीमिा होती है । महज्जना के मन उद्देश्या को समझ लेना लाक के लिए प्राय सहज नही होता। प्रभु मैं ही आपको अग्नि परीक्षा के वास्तविक अभिप्राय को अब तक नहीं समझ पाया हूँ। लोकमानस में युग युग तक इस घटना की उचित त्रिया प्रतिक्रिया हो होगी यह कसे कहा जा सकता है? लक्ष्मण अग्नि-परीक्षा/११ राम राम हनुमान तातचरण ठोक रहते हैं । हम लोग स्वय अब तक इसका उद्देश्य नहीं समझे हैं। आश्चय है, तुम लोग मेरा उद्देश्य नहीं समझे। लक्ष्मण, विकिधा म तुमने सुग्रीव का राज्याभिषेक किया और बालि की पत्नी तारा उसकी पटरानी बनी। लका मे विभीषण वा अभि- पेक तुम्हारे ही हाथा होगा। तुम कहते थे, रावण की यह इच्छा थी कि मदोदरी ही विभीषण की पटरानी हो। लक्ष्मण सत्य है, प्रभु सुना लक्ष्मण ! आयनारी तारा और मदोदरी से भिन शील वाली होती है, इसे प्रमाणित करने के लिए सीता को अग्नि- परीक्षा देनी ही होगी। लका भोगवादी यात्रिय आसुरी सभ्यता काकेद्र रही है। स्वच्छद, उ मुक्त विलासही इस सभ्यता म नारी के जीवन का उपयोग है। ऐसे परिवेश म नारी के व्यक्तित्व का पूर्ण विकास सभव नहीं । भोगपरायण स्वार्थी पुरुष उसवे केवल प्रमदा और कामिनी रूप की उपासना करके उस प्रवचित करते हैं। वह पेवल भाग्य बनकर रह जाती है, उसके मातत्व, भगिनीत्व और पत्नीत्व का अमृत स्रोत सूख जाता है । हनुमान यथाथ है प्रभु इन वानर ऋक्ष और यातुधान जातियो में नारी को उपभोग का अपरिमित अधिकार प्राप्त है । सतीत्व का सयम के कुछ सस्वार यहा उही कुलवधुओ न डाले हैं, जो देव पुल अथवा आयकुल से अपहृत होकर आई हैं। क्या एसी नारी सीता की तरह वर्षों तक अनेक प्रकार की यात नाएँ सहती हुई भी अपने चरिश की मर्यादा सुरक्षित रख सकती हैं? हनुमान कदापि नही प्रभु । इमीलिए जगदबा का चरित्र लका के समाज के लिए बुतूहल का विषय रहा है। राम मारुति, समाज के स्थिति-सम्पादन का मूलाधार है नारी का पवित्र शील,वही समाज की सुव्यवस्था और सुप्रगति का अमोध साधन है । इसीलिए नारी के सात्त्विक शील का बहुमुखी पारि- वारिक एवं सामाजिक सम्बधा के रूप मे विकास हमारी सस्कृति म अभीष्ट रहा है । कामिनीत्व भी उसका एक उपादान हो सकता है, पर वह गौण है और उसकी सीमा से प्रत्येक भारतीय नारी परिचित है। हनुमान यह सत्य है, स्वामी।

१२/अग्नि परीक्षा राम लक्ष्मण राम चरम ऐहिक सभ्यता के अधबार मे डूबे हुए इस प्रदेश म माय नारी के चरित्र के उदात्त आलोक वे प्रसार के निमित्त सीता को अग्नि परीक्षा देनी ही होगी। सीता के परम निप्पलुप शील का माक्षात्कार कर यहां की नारियां भी उनका यह आदश अपनाने का प्रयत्न करेंगी। तभी इन समाजा और राष्टो का कल्याण होगा ! लका विजय की यही साथक्ता है। यह सब ता विना अग्नि परीक्षा से भी सम्भव है । इसके लिए इतन निमम विधान की क्या आवश्यक्ता है, प्रभु? हनुमान सुमिग्रान दन ठीक कहते हैं, स्वामी । आपका जीवनादश तो जापके आगे आगे सभी समाजो और राष्ट्रो म प्रतिफलित होता चल रहा है । उसकी प्रतिष्ठा के लिए भगवती की अग्नि-परीक्षा का क्या औचित्य हा सक्ता है, मेरे प्रभु? औचित्य है, हनुमान ! मैं नर और नारी के जिस आदश और मर्यादा को प्रतिष्ठित करना चाहता हूँ, उसको वेदी पर सीता को आत्मत्याग का यह उदाहरण प्रस्तुत करना ही होगा। मैं जाति, वश, कुल, राष्ट्र-समाज सम्प्रदाय निरपेक्ष जिस आदश की सम्यक प्रतिष्ठा करना चाहता हूँ, उसी का नाम आयत्व है। यह आयत्व मानव मात्र का सहज स्वकीय धम है। इस सत्य की प्रतिष्ठा क लिए ही देवी जानकीन इतनी यत्रणाएँ सही हैं । इसी के लिए उह अग्नि परीक्षा भी देनी होगी ध्यान मुद्रा में अवस्थित होकर) कौन कह सकता है लक्ष्मण, भविष्य म देवी जानकी की तुमको और मुझ इस अग्नि परीक्षा से भी अधिक कठोर परीक्षा देनी पड़े। प्रभु, देवी के लिए अब कौन सी परीक्षा शेष रह गई है ? शिरीष सुमन और पाटल दल से भी अधिक सुकुमार चरणा से उहोने शल सकुल कण्टकाकीण दुगम मार्गो म हजारो योजन आपका अनुगमन किया है । अपन पातिव्रत के जनत अपरिमित तेज से उहान कोटि कोटि चिताओ से भी अधिक दाहक राक्षसग की यातना ज्वाला को विफल कर दिया है। उनकी अग्नि परीक्षा का विधान स्वय अग्नि को भी सहन नहीं होगा, स्वामी | आप और हम कठार से कठोर परीक्षाएँ देते रहगे पर भगवती नही नही, स्वामी। मेरे उद्देश्य को समझने का प्रयत्ल क्रो लक्ष्मण | लोक-कल्याण के लिए धम के लिए मैं इससे भी कठोर कम करूंगा । लका की (कुछ देर लक्ष्मण अग्नि परीक्षा/१३ लक्ष्मण राम विजय मानवता की जय यात्रा बने, इसके लिए जलती हुई अग्नि में प्रवेश कर सीता को अपनी पवित्रता का प्रमाण लोक को देना ही होगा। इसकी सारी व्यवस्था तुमको करनी होगी। प्रभु । मुझे । ओ भीरु मत बनो लक्ष्मण ! इस कठोर वम द्वारा तुम्हे मेरे कलकित होने की आशका है । हो सकता है आनेवाले युग मेरे उद्देश्य को न समझकर मुझे क्रूरकर्मा ही वह, पर सोता तो शील और पाविन्य का चरम प्रतिमान बन ही जायगी। राम भले ही सदोष माने जाये, पर सीता का चरिन कोटि कोटि गगाओ से भी अधिक लोक पावन बन जायगा। देव । इस निमम विधान मे भी भगवती के प्रति आपका अनुराग व्यक्त हो रहा है । मापके विधान का रहस्य समझ सकना कठिन लक्ष्मण भारुति | तुम आदरपूर्वक देवी मैथिली को लका से ले आओ। विभीषण तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। हनुमान जो आज्ञा प्रभु । समस्त वानर सेना भी जगदम्बा के दशन पाने के लिए आकुल है। देवी मैथिली का यह बता देना। दृश्य तीन [स्थान अशोक वन । सुवण जैस दीप्तिमान शिशपा- वृक्ष के नीचे निर्मित वेदिका पर देवी मैथिली अत्य त प्रशान्त मुद्रा में विद्यमान हैं । उनके दाहिनी और बायी ओर विभीषण की पत्नी सरमा और पुत्री क्ला खडी है। वेदिका के नीचे बहुत सी राक्षसियां हाथ जोडे हुए भय भीत एव त्रस्त बैठी हुई हैं। इनने लिए देवी सीता का दाहिना हाय अभय मुद्रा में उठा हुआ है। सरमा परमेश्वरी । यह अशोक उपवन जो आपके नि श्वामो से स्तब्ध- दग्ध दिखाई देता था आज क्तिना प्रसन दिखाई दे रहा है। मयूरो की केका म क्तिना आमोद है, आपकी वेदना की अनु- भूति से मूक बनी हुई कोक्त्तिाएं भी आज कितनी वावदूव हो गई हैं । चातवियो को विरह व्यया का भी मानो अवसान हो १४ अगि परीगा , गया है। आपाश म दव और दवांगााा साप-गाय इम उपराये लता दुम भी आपां अभिनदामरित्तर पुष्प-वष्टि पर रहे हैं। दिशा प्रमान, परार जगत् पा आहान्निी या चरम प्रमाद मिला है। आप उठपर स्नान परें और दश वदन निधनवारी भगवान गपपट दान में लिए तयार हो। राजराजेश्वरी । आप मेरी माता पो प्रापना स्वीकार करें और हम लोगा को प्रमाया गया गा अवगर। मेरे पिता आपर दशनाप आ ही रहे होंगे। ये आपया समागहवर भगवान योशलेद्र के पास ही ल जायेंगे। सीता (दाना को योचकर हृदय से लगात हुए) सगी सरमा । तुम्हारे उपकारो या मैं क्या बदला द सकती हूँ ? अशाप उपयन भी इस वाल के लिए भी दुगम पारा म तुमन प्रियतम पे दशन की आशा बंधार आव वार देह वा बांध ताडपर जाते हुए प्राणी को रोक रखा है । अनर' जमा मे भी तुम्हारे ऋण से उग्रण नही हा सवती। सरमा देवी । यह कार आप हम लज्जित न करें। यदि सचमुच आप मुझ पर प्रसान हैं, तो मुझे यह वर दें कि मैं कोटि-कोटि ज मो तक आपन चरणो की किंकरी बनी रहूँ। आचद्रदिवाकर सौभाग्यवती और लवा की सम्राज्ञी बनकर रहो । मेरे हृदय के अनन्त मगलमा भावोच्छ्वाम इस अवसर पर तुई अभिषिक्त कर रहे हैं। और यह बेटी क्ला (प्रगाढता से हृदय से लगाती है और सिर पर हाप परती है।) मैं तुम्हारी क्या सेवा कर पाई, सर्वेश्वरी । सीता बेटी । तुमन मुझे एक साथ माता का वात्सल्य और पुत्री का स्नेह दिया है । अत्यत दुखी देखकर जब तू अत्यन्त करुण दष्टि स मुझे निनिमेष निहारने लगती थी, तब मुझे अपनी वात्सल्य मयी जननी सुनयना और अन त करुणामयी माता कौशल्या का स्मरण हो आता था। ववि मेरे प्रति किए जानवाले रावण के अनिचार का देखकर तरे मगशावकी जैस भोले नत्र म रोष स्वेप की लालिमा झलक उठती थी, तब मुये वत्स लक्ष्मण की याद आ जाती थी।तु मरे हृदय से बार-बार लगकर इस शीतल कर । (नेत्रो से आंसू झरते हैं ।) इस लडकी ने 7 मालूम कितनी रातें आपके दुख से दुखी रह कला सरमा अग्नि परीक्षा /१५ कर, रो रोकर बिताई हैं और अपने पिता स निर तर आपकी मुक्ति के लिए उद्याग करने का आग्रह किया है। सीता यह मैं जानती हूँ, सखी । और ये वृद्धा त्रिजटा, इनवे उपकारो का अवशेप भार मुझ पर है। इही की कृपा से मेरे जीवन मे प्रियतम के दशन का यह योग फिर आया है। माता त्रिजटा। आशीर्वाद दो। मरा प्रत्यक रोम न बन जाय और मैं असख्य नेमा स आज राघवेद्र का दशन कर सकू। प्रिजटा (हाथ जोडकर राक्षसिया ये वीच से उठ खडी होती हैं। मैं क्सि योग्य हू, सवमगले। (आंसू गिरने लगते हैं ।) [विभीषण और हनुमान या प्रवेश | विभीषण प्रसन हैं और हनुमान शात एव गम्भीर । दोना भगवती जानकी के समक्ष प्रणत होते हैं । हनुमान को देखकर राक्षसियों भयभीत हा उठती हैं। सीता (हनुमान से) मगल हा वत्स । (किंचित सकुचित सरमा को जिज्ञासा की दृष्टि से देखकर, फिर विभीपण से) स्वागत महा- भाग ! लकेश्वर उत्तरोत्तर कल्याणभागी बनें। हनुमान माता। रावण रूपी कण्टक धन राघवेद्र के रोप की दावाग्नि मदग्ध हो गया है। रावण रूपी गधहस्ती राघवेद्र के शौय के शार्दूल द्वारा विदलित कर दिया गया है । तीना लोक जिस भय और आतक के कालानल मे दग्ध हो रहे थे, उसे भगवान राम के अनुग्रह के मेघ ने बुझा रिया है। आपकी विरह निशा के सुप्रभात का उदय हुआ है, आपके परम पुण्य-अनुष्ठान की सिद्धि की मगलबेला आ गई है। विभीषण देवी लका आपके चरणो की धूलि धारण कर अयुतायुत तीर्थों से भी अधिक पवित्र हो गई है। इस धरती पर आपके द्वारा ससार का सबसे महान व्रत सम्पन हुआ है। मानवता के इति- हास की यह सबसे गौरवपाली घटना है। आपके अपराधी विश्वप्रपीडक लकाधिपति आपके नि श्वासो से दग्ध होकर रणभूमि मे क्षत विक्षत शयन कर रहे हैं। आप विश्वजयी राघ वेद्र के दशन के लिए चले, वे आपकी प्रतीक्षा कर रहे हैं। हनुमान माता ! भगवान राम के माहारमानकापूनी, सल्का पदा और उनके मनोरथ को तत्त्वं से समप्रत विल आपनेती हैं। विभीषण लकेश्वर कानडेदन या हा आदेश से में १६ / अग्नि परीक्षा आपको लेने आया हूँ। आप शीघ्र चलपर नवादित पूण चद्रमा वे समान राघवेद्र का मुप देखें। विभीषण राघवेद्र त्रिकूट पवन के शिखर पर ऐरावत पर समारढ इद्र के समान शोभित हैं । समरागण म प्रतापकालीन मूय के समान प्रकाशित हानवाले प्रमत्त दिग्गजा के हृदय मे त्रास उत्पन करनवाले रावणजयी राम के पास चतकर आप उह हप प्रदान करें। सीता वत्स आजनेय । दूत पे रूप म तुमन जो वचा मुझे दिये थे, वे पूरे करके ही तुम मेरे पास आय हो। मैं तुम्ह पया दू? तुम्हारे समक्ष मैं अपने आपको अतीव अकिंचना अनुभव करती हूँ। जजना देवी की तरह मैं भी तुम्ह पाकर पुत्रवतो हो गई है। भगवान राघवेद्र के नाम और यश की भाति तुम भी युग-युग अनाथो को सनाथ करते रहो। हनुमान (हाथ जोडकर) जननी । मैंने आपसे जो कुछ कहा था, वह सब उसो प्रकार घटित हुआ है। भगवान राम न महस्रो कोटि वानरो और ऋक्षो की सना लेकर लकाको आनन्त कर लिया। इस सेना में ऐसा कोई वानर नही, जा बल और पराश्रम में मुझस क्म हो। आपके वियोगजय शोक से प्रमत्त बने हुए भगवान राम के बाणा न ग्रहो की गति रोक दी और अग्नि, मरुद्गण तथा सूय का तेज भी नष्ट कर दिया। आपके लिए ही उहान अपने धनुष की प्रत्यचा से छूट हुएवाणसमूहो से आकाश को भर दिया, समस्त पिशाचो और राक्षसो का सहार कर डाला और विश्वजयी रावण को क्षुद्र कीट की तरह धरती पर सुला दिया। आप चलकर उनकी वह विरह ज्वाला शान करें। सुग्रीव की सना के कोटि कोटि वीर भी आपके दशन के लिए उत्कण्ठित हैं । उन युद्धश्रा ता को आपकी पुत्रवत्सला दृष्टि की अभिषेक अपेक्षित है। विभीषण (सरमा से) भगवती को सम्राज्ञी के उपयुक्त वेष मे राघवेद्र के निकट जाना है, उसकी व्यवस्था करो देवी । मैं शिविका लेकर आता हूँ। जो आना। सोता लकापति ! मरे स्वामी शत शत योजन दुगम पन शैल सकुल भूमि एव महासमुद्र पैदल पारवर मरे उद्धार के लिए यहाँ आये सरमा अग्नि-परीक्षा/१७ हैं मैं भी पैदल ही चलकर उनके दशन करूंगी। शिक्षिका की अपेक्षा मुझे नहीं। सरमा देवी । आपका यह शरीर प्राय एक वर्ष के निराहार स अत्यत ही कृश हो गया है, अव तक वेवल तप ही आपका आहार रहा है । आप पैदल चतने योग्य नही रह गई हैं। सोता शिविकारूढ होकर प्रभु के दशन के लिए जाने से मेरे व्रत की मर्यादा भग होगी। मुझे इतना कष्ट और सहन कर लेने दो, सखी। सरमा आपके व्रत न इस धरती को दिव्य चेतना एव नवीन जीवन दप्टि प्रदान की है । लका की चरम ऐहिक भोगपरायण सभ्यता की अमानिशा का आज अवसान हो गया है, आपका व्रत सुप्रभात बनकर उदित हुआ है। हम सब आपके दशन पावर ध य हैं। त्रिजटा ठीक कहती हैं, देवी लकापति को आपके तप की अग्नि मे पहले ही दग्ध हो जाना चाहिए था। वे इतने दिन जीवित रह सके, यही आश्चय है। [हनुमान त्रिजटा की आर देखते और पहचानते हैं फिर कठार दृष्टि से अय राक्षसियो की ओर देखते हैं । राक्षसिया भयभीत होकर कांपने लगती है और हाथ जाडवर सीता की ओर कातर दष्टि से देखती हैं। उनमे से कुछ 'क्षमा करो, रक्षा करा' कहती हुई, दौडकर सीता वै चरणो मे गिरती हैं। सोता (अभयमुद्रा मे हाथ उठाकर) डरो मत, तुम्ह काई भय नहीं। वत्स हनुमान 1 ये राक्षसियां रावण की आज्ञा से ही मुझे कष्ट देती थी, इनका कोई दोष नही । ये तुम्हारे लिए क्षम्य हैं। इही मे त्रिजटा जैसी परम सहृदया भी हैं जिनके स्नेहपूण आश्वासनो से मैं अपना जीवन धारण कर सकी। हनुमान जैसी आना, करुणामयी। सीता रावण को ये परिचारिकाएं आपस मे तुम्हारे बल और पराश्रम की बराबर चर्चा करती थी। तुम्हारे द्वारा विध्वस किया गया रावण का यह प्राणोपम प्रमादवन और यह दैत्य प्रासाद देखकर इहं तुम्हारा स्मरण मात्र भयभीत करता रहता था। त्रिजटा कपिप्रवर । हम तो तुम्हारे गजन स भी परिचित हो गई थी युद्ध म तुम्हारा गजन जब ब्रह्माण्डा को क्षुद्र घटा की तरह दर- 1 - १८/अग्नि परीक्षा काता हुआ चतुर्दिक फैलता था, तब हम भगवती जानकी से कहती थी कि यह उसी लका को जलानवाले वानर वीर या सिंहनाद है। सीता (हनुमान स) प्रिजटा देवी ठीक कहती हैं । वत्स, तुम्हार गजन में नस्त इन राक्षसियो न अनेक वार मुझसे कहा है कि जब य कपिराज विजयी होकर लका में आवें, तो उस समय इनस हमारी रक्षा करना । इह अभय क्रो महावीर । [राक्षसिया जयजयकार करती हैं] हनुमान माता । आपने जिस अभय क्यिा, उसके लिए फिर निकाल और त्रिलोक मे कोई भय शेप नही रहता। विभीषण आपकी यह करणाविभूति है। सप्टि का परम अवलम्ब है भगवती । भगवान राघवेद्र की सेवा म चलने का समय हो रहा है, महिमामयी। सोता मुझे भी प्रभु के दशन के बिना एक एक क्षण युग हो रहा है । आप समुचित व्यवस्था करें, लकेश्वर । विभीषण (सरमा से) दवी आवश्यक तैयारी शीघ्र करो। मुझे विश्वास है, मेरा आग्रह मानकर ये करुणामयी लका के यहिरि तक शिविका मे जायेंगी और उसके आग अपने व्रत की रक्षा के लिए प्रभु के दशन होने तक पैदल चलेंगी। हनुमान लकेश्वर का प्रस्ताव स्वीकाय है, माता! इसमे जापके व्रत की रक्षा है और विभीषण की मर्यादा की भी। विभीषण लका के बहिर को पार कर जब भगवती पैदल चलेगी, तम इनके दशन के लिए आकुल वानर और भालु सैनिक सनाथ हो जायेंगे। सरमा । शिविका भेज रहा हू तुम आवश्यक व्यवस्था 1 करो। [विभीषण और हनुमान जाते हैं।] दृश्य चार [स्थान लका को युद्धभूमि । जहा तक दृष्टि जाती है। युद्धभूमि म वानर और भालुओ की सना का प्रसार दिख पडता है । विजय दृप्त सैनिक हपनाद कर रहे हैं । त्रिकूट पर्वत के पाद प्रात म स्थिर एक शिला पर भगवान राम अग्नि परीक्षा /१६ बैठे हैं। उनके सामने जाम्बवान सुग्रीव और अगद बठे हैं। नील, नल, जय आदि सेनापति उनके दायें-बायें खडे हैं। उनकी दाहिनी ओर सुमितानदन उतरे हुए धनुप के सहारे सिर झुकाये हुए खडे हैं । कुछ दूर पर काष्ठखण्डो का एक ऊंचा विशाल समूह आयताकार चुना हुआ दिखाई पड़ रहा है । लक्ष्मण बार-बार उद्विग्न-से होकर उधर देखते हैं। जाम्बवान हाथ जोडकर भगवान राम के सामन उठकर खडे होते हैं।]] राम राम राम कुछ कहना चाहते हैं ऋक्षराज जाम्बवान यदि आपकी आज्ञा हो, देव । आपके स यबल और बुद्धिबल दोनो ने मुझे लकायुद्ध का महाणव पार करने मे अप्रतिम अवलम्व प्रदान किया है । मैं आपका ऋणी हू। आप जो कुछ कहना चाहते हैं अवश्य कहे, मरलपति । जाम्बवान आपके शील स्वभाव की ही यह विशेषता है कि आप मुझ-जैस क्षुद्रो को भी आदर देते रहे हैं । आपने इस सकटकाल मे अपना राजमत्री बनाकर मुझे अपरिमित विश्वासभाजन माना । मेरी सभी मानणाओ को स्वीकार कर आपने मुझ वद्ध को गौरवावित किया। यह सब आपकी उदारता है, राजराजेश्वर । महात्मन् । विद्या और वय दोनो दृष्टियो स आप मेरे लिए पूज्य हैं। आप जैसे मनतत्त्व के ममज्ञ, शास्त्र और शस्त्र दोनो के अप्रतिम ज्ञाता, बायकुशल जितेन्द्रिय, तेजस्वी, क्षमाशील तथा सधि और विग्रह के सम्यक् उपयोग और अवसर को जानने वाले राजपि को मत्री के रूप मे पाकर ही में इस युद्ध मे लोक- द्वेपी पराक्रम और उत्साह की विजम्मित अचियो वाले रावण रूपी ज्वालामुखी का शमन कर सका हूँ। आपके कथन को मैं शक्ति भर आदेश मानकर स्वीकार करूंगा, मल्लराज । जाम्बवान यह आपका परम अनुग्रह है, देव ! कितु, आज मैं आपसे जो कुछ कहने जा रहा है, वह केवल मेरा व्यक्तिगत निवेदन नही है। वह कपीश्वर सुग्रीव, तरुण युवराज अगद, नल, नील, जय, गवाक्ष, द्विविद, शरभ आदि आपके सब मत्रियो और सेना- पतियो का अभिमत है। मैं आपके समस्त सुहृदो और अनु- यायियो वा प्रतिनिधि बनकर याल रहा हूँ। सुग्रीव कोशलेद्र । ऋक्षपति हम सबका अभीष्ट निवेदन करेंगे।

२०/अग्नि परीक्षा राम कपीश जो कुछ कहना हा, जवश्य वह। मैं जानता हूं, ऋक्ष राज जनमत और साधुमत दोनो मे समवय करने मे कुशल हैं। जाम्बवान महाराज आपने मानव के वैयक्तिक, पारिवारिक एव समग्र सामाजिक जीवन को परम कल्याणकारी उच्चाति उच्च आदर्शों की मर्यादा में बाधा है। जापन हम सब दाक्षिणात्य वनोक्सा का आयत्व प्रदान किया है और यह बतलाया है कि आयत्व क्सिी कुल, जाति, वण, सम्प्रदाय, क्षेन या देश विदेश की वस्तु नही । वह सदाचारमूलक और आदशमय जीवन के उत्कप पर जवलम्बित है। आयत्व का वास्तविक स्वस्प यही है, तात । जापसे और हनुमान से श्रेष्ठ आयत्व का कोई अय प्रतिमान तीनो लाका म दुलभ है। जाम्बवान प्रभु! आपने गाहस्थ्य जीवन में एक्पत्नीव्रत की महिमा प्रतिष्ठापित की। भ्रातद्वैप से विषाक्त एव जजर किष्कि धा और लका जैसे राजकीय एव अय अनेकानेक सामाय परिवारो वे समक्ष आपन भातप्रेम का अद्वितीय उदाहरण प्रस्तुत किया और यह बतलाया कि आदश भ्रातृत्व ही श्रेष्ठ पारिवारिक जीवन की आधारशिला है। किंतु, आज आपन महासती देवी मैथिली की अग्नि-परीक्षा लेने का निश्चय कर अपने ही द्वारा प्रतिष्ठित आय मर्यादा का उल्लघन किया है। आपके इस निश्चय का अनुमोदन हम लोग नहीं करते, ससार का कोई सत्पुरप नही कर सकेगा। (आवेश मे) इश्वायुतिलक । यद्यपि आपन मेरे पिता का वध विया पा, फिर भी मुझे यह विश्वास हो गया था कि आप धम और याय के मूतिमान् विग्रह हैं । तभी मैंन आपके प्रति आत्म समपण किया था और नापका अनुयायी वना था । यदि ऐसा न हाता, ता मुझे आपरे वाण म वीरगति पाने म ही प्रमनता हाती। किन्तु मीता देवी की अग्नि परीक्षा का निश्चय कर यापन स्वय सत्य और धमकी मर्यादा का उन्नया करने का मरय किया है। यह ययाय और अधम हम देश नहीं गवत । (गम्भीरता से) युवराज अगर । यधीर मत बनो। रापवद्र श्रेय जय तर यानी मर्याम रहना है तभी तर यह चारोंशभूपण माना जा हनुमान चारित्र्य जैमी पूर्णता सामिान अयत्र ती माराम यहाँ है' राराने पर। गप्प और पापप अप्रतिमा समातिन मराम अगद राम अगद अग्नि परीक्षा/२१ । अगद लौटकर हम लोगो से जो कुछ कहा था, अग्नि-परीक्षा का साक्ष्य उससे अधिक विश्वसनीय नही हो सकता। मल-नील युवराज सत्य कहत हैं, सीता के निप्कलक शील का उससे बडा साक्ष्य और काई नहीं। जाम्बधान युवराज } आजनेय न लका से लौटकर हम लोगो से जो कुछ कहा था, उसे आप कोशले द्र से कह। मैं क्या कहूँ, पितृय । आप ही उसे कह । आपकी वाणी से अनु- मोदित होकर सम्भव है वह महाराज के द्वारा माय हो। जाम्बवान वह मैं अनेक बार कह चुका हूँ। तुम्हार अनुरोध से इस विशाल वानरवाहिनी के समक्ष फिर क्हे देता हूँ। हनुमान ने कहा था-- सीता का पातिव्रत, उनका शील-स्वभाव अन य और अभूतपूर्व है। जिस नारी का शील-स्वभाव आर्या सीता के समान होगा, वह अपनी तपस्या से तीनो लोको को धारण कर सकती है, अथवा कुपित होकर तीना लोका को जला सकती है। हाथ से छू जान पर अग्नि की प्रज्वलित शिखा भी वह काम नहीं कर सक्ती है, जो क्रोध दिलाने पर जनकनदिनी सीता कर सकती हैं। नील उन्होंने यह भी कहा था-तपस्या, सत्य भाषण तथा पति मे अनय भक्ति के कारण आर्या सीता अग्नि को भी जला सकती हैं, आग उहे नही जला सकती। [सहसा वडा कोलाहल होता है । 'आर्या सीता की जय', 'मैथिली देवी की जय', 'जनकनदिनी की जय' या स्वर चारा आर फल जाता है । विभीषण प्रवेश करते हैं ।] विभीषण (अभिनदन कर) प्रभु ! आर्या मैथिली आजनय के साथ आ रही हैं। ये लका के द्वार तक ही शिविका पर चढकर आई हैं । वहा स वे पैदल ही चलकर आ रही हैं । वानर भालु सेना मातृदशन का यह सुयोग पावर हपविभार हो जयजयकार कर रही है। जाम्बवान तप से अत्यत कृशऔर शील सुकुमारी विदेह राजनदिनी पैदल क्या भा रही हैं ? आपन राजकीय मर्यादा का उल्लघन क्या होने दिया, लकेश्वर । उहाने लका के द्वार तक आकर शिविका का परित्याग क्या क्यिा? विभीषण मैंने जान-बूझकर यह अपराध नहीं किया, ऋक्षराज | उन्होंने कहा, मेरे स्वामी सकडा योजन दुगम जल-स्थल पार कर मेरे उद्धार के लिए यहा आये हैं, मैं भी पैदल ही चलवर ही उनके । 1 -- २२/अग्नि परीक्षा दशन करूंगी। उनके इस आदेश के समक्ष हमे विवश हो जाना पडा, महात्मन् । जाम्बवान धय हैं वे! अगद (आवेश स) कोशलेद्र ने उही आर्या के शील की अग्नि परीक्षा की व्यवस्था की है । लकश्वर । देखिए वह चिता, जिसके निकट सुमिनान दन नतमुख पडे हैं । विभीषण यह मैं क्या सुन रहा हूँ, प्रभु । क्या सूय के प्रकाश धम को भी परीक्षा होती है ? क्या अग्नि का ताप गुण भी सदेह का विषय माना जा सकता है ? भगवती जनकनदिनी के शील की परीक्षा का विचार ही अत्यन्त अनाय कम है । यह क्या होने जा रहा है। आय लक्ष्मण । लक्ष्मण मैं अनुगत पात्र हूँ, लकेश्वर । [फिर सिर नीचा कर लेते हैं] विभीषण अनुगत तो मैं भी हूँ, वीर शिरोमणि । आर्या जानकी का अप्रतिम, निप्पलक, सूय, अग्नि, पवन और त्रिपथगा को भी पवित्र करने की क्षमता वाला शील देखकर ही मैंने अपने बडे भाई से विद्रोह किया था और कोशलेद्र का अनुगामी बना था। मेरे अग्रज ने युद्ध भूमि मे प्राण छोडत समय देवी मैथिली के सम्बध म जो कुछ कहा था वह आपने सुना है सुमित्रानन्दन । लक्ष्मण वह सब मैं जानता हूँ लकापति । विभीषण आय भी जानत है । फिर भी यह निमम विधान क्यो? लकेश्वर | लका का युद्ध लोकहित सम्पादन के लिए लड़ा गया है लोकरचि-सवद्धन के लिए नही। विभीषण लोकहित के लिए देवी जानकी ने क्या नहीं किया और क्या नही सहा है देव ! उसके लिए देवी विदहराज नदिनी को अब अधिक क्प्ट दना अनुचित है। [हनुमान का प्रवेश जाम्बवान, नल-नील और हम लोग भी यही कह रहे हैं लकेश्वर। हनुमान (जगद से) आप लोग विस विषय को लेकर क्षुब्ध दिखाई दे रह हैं युवराज क्या आप नहीं जानते जिन भगवती जानकी के शील के प्रभाव । अपद अगद अग्नि-परीक्षा/२३ RE से रक्षित रहकर हम लोगो ने लका पर विजय प्राप्त की, उहे ही भगवान राघवेन्द्र न अग्नि म प्रविष्ट होकर अपन शील की शुद्धता प्रमाणित करने का आदेश दिया है। हनुमान यह मैं जान चुका हूँ युवराज । अगद जाश्चय । फिर भी आपन इसका हनुमान विरोध अवश्य क्यिा । पर अगद पर क्या? सापा हनुमान पर, मैं यह समझ गया हूँ कि प्रभुकोशलेदजननी जानकी का हृदय जानते हैं और वे इनका हृदय जानती है। वे कुछ क्षणाम यहा आ रही हैं, उनके आने तक हम लोग शान्त रहत जाम्बवान ठीक है, हम लोग भगवती के आने की प्रतीक्षा करें। हनुमान भगवती के प्रेम से आकृष्ट होकर वे सव राक्षसिया भी उनके पीछे पीछे चली आ रही हैं जिनको रावण ने उनकी आरक्षिका और प्रपीडिका के रूप में नियुक्त किया था। विभीषण मेरे रोक्ने पर भी वे नही रुकी, चारित्र्यदेवता आर्या जानकी के अप्रतिम शील से उनका हृदय विजित है। कहती थी, वे उनके चरणा का अवलम्ब नहीं छोड़ना चाहती। हनुमान उनकी एक प्रमुख आरक्षिका निजटा वह रही थी, यौवन के उद्दाम उपभोगो की विराट राजधानी लका म जहा सतत उच्छृ खल, सदायौवना प्रखर रूपसिया ने जीवन भर वासना के उद्दीप्त दीप कीतरह जलकर लकेश्वर को प्रसन्न करने मे अपना जीवन सफल माना था, वही इस मानवी सीता ने स्वेच्छा से असख्य त्यागो और कप्टो का वरण कर एक नया इतिहास लिखा विभीषण यह सत्य है । वस्तुत , लका के हृदय को आर्या विदेदिनी ने जीता है। लका का जीवन अन्तमुख होता जा रहा है। लोग विषय-परागमुख होते जा रहे हैं और अपने भीतर अब तक अज्ञात एव अनिवचनीय अतश्चेतना का अनुभव करते हैं। जाम्बवान वधु ' हम लोगो की विजय तो उस विजय के समक्ष नगण्य है। आर्या की आरक्षिकाएँ आ रही है। उनके शील का सबसे बडा साक्षी और कौन हो सकता है ? क्या फिर भी भगवती के शील की अग्नि परीक्षा की आवश्यक्ता रह जायेगी? अगद [कोलाहल बढता है । 'आर्या जानकी की जय', 'विदेह २४/ अग्नि परीक्षा राजनदिनी की जय' या आदि रव निकट सुनाई पडन लगता है। हनुमान (राम से) प्रभु 1 देवी आ रही हैं। 1 आन दो लक्ष्मण तात । यदि भाज्ञा हा तो, मैं आगे बढकर आर्या ये चरणा का वदना करूँ। जाओ वत्स (लक्ष्मण जाते हैं) (स्वगत) मुझे पप्ट और त्याग की पूर्णतमा प्रतिमा वदेही के प्रति भी कठोर होना होगा। आह, राम देव। राम [पीडा से आयें मूद लेत हैं] [लक्ष्मण हनुमान को साथ लेकर जाते हैं] [कोलाहल वढता है, एक शुभ्र आलोक मण्डल अवतरित हाता हुआ प्रतीत होता है । वह धीरे धीरे निफ्ट आता है, सीता देवी सामन आ जाती हैं. उनके पीछे लक्ष्मण और हनुमान है ।] लक्ष्मण (आगे बढकर) तात ! जिनके असहनीय वियोग मे ससार के सभी पदाथ आपके लिए दु खजनक बन गये थे, वे विदहराज नदिनी आपके समक्ष उपस्थित है। देवी । (कण्ठ भर आता है) आर्या । आपकी वियोग वदना ने जाते जाते भी प्रभु का कण्ठा वरोध कर दिया है । आप विरह मे वे अलौकिक धैय के कारण ही अब तक जीवन धारण कर सके हैं। सीता | पुनर्जीवन प्राप्त कर मैं आपको प्रणाम करती हूँ। अमतशलाका जसी आपकी नील जलद छवि के दशन पाकर मेरे तप हुए नेत्र शीतल हो गये हैं । मेरा मुरयाया हुआ जीवन सुमन विकसित हो उठा है । प्रभु । मुझे अपने चरणाम स्थान दे। देवी विदेहराज नदिनी। इक्ष्वाकु कुलकमले (चुप हो जाते हैं, मुख पर उदासी छा जाती है।) सीता आय पुन | आना दें। आप एकाएक चुप क्या हो गये? वनवास की अशेष यत्रणाओ के बीच सतत अम्लान रहन वाली आपकी मुखधी आज इस अवसर पर मलिन क्या हो रही है ? वत्स लक्ष्मण यदि तुम कुछ जानते हो, ता बताओ। लक्ष्मण आय पुन राम लक्ष्मण अग्नि परीक्षा/२५ माता। प्रभु के हृदय की बात आपसे अधिक और कौन जान सकता है? सीता वत्स । प्रभु किसी असाधारण गम्भीर चिन्ता में निमग्न प्रतीत होत हैं, वे किसी धम सक्ट मे हैं। क्या मैं प्रभु की चिन्ता दूर परन का कोई उपाय कर सकती हूँ। देवी। चौदह वर्षों तक वन में अथवा वदिनी रहकर धार कष्ट सहन करते हुए तुमने सर्वोच्च मानवीय आदर्शों की स्थापना में काय में मेरे साथ सहयोग क्णि है। आज उस अनुष्ठान की पूर्णाहुति की वेला प्राप्त है। नारीत्व के सर्वोच्च आदश की प्रतिष्ठापना के लिए अन्तिम बलिदान शेप है। सोता यदि वह पूर्णाहुति मेरे शरीर से भी सम्भव हो, तो मैं उसके लिए प्रस्तुत हूँ आयपुत्र दवी हृदय पर पत्थर रखकर मुझे यह व्यवस्था देनी पड़ रही है कि तुम प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश कर अपने शील की निप्कलकता प्रमाणित करो ! लावहित वे लिए यह विधान अनिवाय है। लपासे आई हुई राक्षसिया (हाहाकार कर भगवान राम के समक्ष प्रणत होकर) महाराज यह धार अयाय है। य देवी वैदेही समस्त तीर्थों के जल और सक्डा यना स भी अधिक पवित्र हैं। अग्नि के द्वारा इनकी पवित्रता की परीक्षा का विचार अनुचित है। इस साक्ष्य के पश्चात अग्नि परीक्षा का विधान धम का अपमान । अगद राक्षसीगण महात्वी वंदेही के शील की पवित्रता प्रमाणित करने के लिए हम सब प्रज्वलित चिता मे प्रवेश करने के लिए तयार हैं । लका वी यह धरती, यह नाकाश, यह पवन, य सूय, चन्द्र, नक्षत्र, मागर की उद्वेलित अमियां सभी महारानी जानकी के पवित्र चरित्र के गान म निष्ठ हैं। सीता सखियो । आप लोग शात रहे। मेरे स्वामी ने मानव धम की प्रतिष्ठा के लिए बात्यावस्था में ही वनवास का पवित्र व्रत लिया था। धमवृद्धि और लोकहित के लिए ही उनकाजीवन अर्पित है वे अनुचित नहीं कर सकते। उनवे लादेश-पालन म सबका मगल है। वत्स लक्ष्मण ! अपने अग्रज की आना का पालन करो। लक्ष्मण ! अग्नि प्रज्वलित करो। लोक के समक्ष वैदही अपन शील की पवित्रता प्रमाणित करें। राम ।

२६/अग्नि परीक्षा । [लक्ष्मण बिना कुछ बोले हुए काष्ठ-समूह के पास जाकर उसे प्रज्वलित करते हैं। अग्नि की, कालसर्पो की जसी लपलपाती हुई जिह्वा आकाश को ग्रसती हुई प्रतीत होती है। चारो ओर हाहाकार होता है। देवी सीता भगवान राम की परिक्रमा कर धीरे धीरे उस अनल समूह की ओर बढती हैं। सुग्रीव, जाम्बवान, अगद, विभीषण, अन्य अनेक सेनापति और सैनिक तथा लका से आई हुई राक्षसिया उनके सामने सिर टक देती हैं। वे उस प्रज्वलित अग्नि के निकट पहुंचकर ध्यानस्थ रहकर कुछ देर खडी रहती हैं, फिर बोलने लगती है।] सीता अग्निदेव । यदि मन, वचन और कम स मैंने पति की सेवा की है, तो तुम मेरे लिए शीतल होजाओ। यदि मेरा हृदय एकक्षण के लिए भी राघवेद्र मे पृथक् न हुआ हो, तो सम्पूण जगत के साक्षी अग्निदेव मेरे लिए शीतल हा जाये। यदि मैंने मन, वाणी और त्रिया द्वारा सव धर्मों के मूत्तिमान विग्रह रघुवशशिरोमणि का कभी अतिक्रमण न क्यिा हो, तो अग्निदेव मेरी रक्षा करें। यदि भगवान, सूय, वायु दिशाएँ, चन्द्रमा दिन रात, दानो सध्याएँ, पृथ्वी देवी तथा अन्य सब देवता मुझे पवित्र चरित स युक्त जानते हा, तो अग्निदेव उसे लोक म प्रमाणित करें। [यह कहकर वैदेही प्रज्वलित चिता की लपटो में प्रवेश पर जाती हैं। ऐसा प्रतीत होता है उस अग्नि मे कामधेनु के घृत को अखड शुभम पूत वसुधारा अपित की गई ह। सहसा चिता तीव्रातितीव्र आलोक विकीण परती हुई अधिक वेग से प्रज्वलित हा उठती है। लक्ष्मण हनुमान, सुग्रीव, जाम्बवान अगद आदि भय और आशका सनत्र मूद लेते हैं। वानर, राक्षसियां और राक्षस आत्तस्वर स क्रन्दन करने लगती हैं । सहसा धरती के अन्तराल स एव वरण ध्वनि सुनाई पडती है। पृथ्वी रामभद्र । सीता को जन्म देवर मैंन जपन का ध य माना था। किन्तु उसका यह दुम अब मुझसे रहा नहीं जाता। वत्से ! सीता हा ददि । निमति ने मुझे युनिश मे भी कठोर बनाया है । विन्तु, मैर भीतर जलते हुए दावानल काकोन दस गका है। सधि

Jama
स्थान टूट रहे हैं, शिराएँ विशीण सी हो रही हैं. (आंसू गि
(सहसा वातावरण हिमशीतल हो जाता है। प्रज्वलि
चिता की लपटे प्रफुल्लित अरुण कमलो के रूप मे खिलती
हुई दिखाई पड़ती हैं । उसके बीच मे दिव्य काति सम्पन
देवी सीता अम्लान खडी दिखाई पड़ती है। वे सूय की
भाति अरण पीत वाति से प्रकाशमान हैं। प्रतप्त सुवण
के आभूपणो से उनका दिव्य विग्रह शोभित है। सरमा
के द्वारा पहनाये गये उनके कण्ठ मे शोभा पाने वाले फूला
के हार कुम्हलाये तक नहीं हैं । घन नीलालका सौदामिनी
की फाति को लज्जित करने वाली सीता देवी के चरणो
के निकट अग्निदेव विनीत भाव से सस्थित दिखाई पडते
हैं । आकाश से पुष्पवप्टि होती है।]
अग्निदेव पुरुषोत्तम श्रीराम | विदेह राजकुमारी के चरण स्पश से मैं
पविन और शीतल हो गया है। इस महासती को जलाने का
सामथ्य मुझमे नहीं। ससार की नि शेष पवित्रता इनके विग्रह
मे मूर्तिमती है । आप इह स्वीकार करें।
दव ! मैं जानता हूँ, विदहनदिनी जानकी तीनो लोको मे परम
पवित्र हैं | मैं यह भी जानता था कि जिस प्रकार सागर अपनी
तट-भूमि का उल्लघन नही कर सकता, उसी प्रकार रावण भी
अपन ही सतीत्व के तेज से सुरक्षित सीता पर अत्याचार नही
कर सकता था। ये तपोमयी सीता अपने तप के कारण परम
दुद्धप और मन से भी दूसरे के लिए अप्राप्य हैं। अन यहृदया
जानी मुझसे उसी तरह अभिन हैं, जैसे मूय से उनकी प्रभा।
[वानर सेना जयजयकार करती है । नील श्वेत आलोक
के तीव्र प्रसार के साप पटाक्षेप होता है।]

कुरुक्षेत्र की एक साँझ
चद्रशेखर
स्वर
राधा
व्यास
यशोदा
कृष्ण
वसुदेव
वस
अर्जन
शिशुपाल
द्रौपदी
सुयोधन
दृश्य एक
[प्रभाव कुछ समय तक मुरली का मादक स्वर उभर
कर मद पड़ जाता है और धीर धीरे चलता रहता है ।
बीच-बीच में कभी उभर भी जाता है और पुन मद पड़
जाता है। पक्षिया का क्लरव उभरता है तथा यमुना
के
बहने का प्रभाव भी
। पुन मुरली का स्वर प्रधान रूप
म उभरकर मद मद चलता रहता है।

। राधा कुरुक्षेत्र की एक साझ / २६ एक युग बीत गया है कृष्ण ! मेरे कणु मेरे मोहन ! तुम्ह गए तुम्हे देसे जैसे अनेक कल्प हो गये हो । तुम्हारी राधा की आखा म तुम्हारे शतरगी सपना का अजन वैसे ही चमकता है । मन म तुम्हारे प्यार की केसर-गध वैस ही गमक्ती है | क्णु | मेरे प्राण | प्राणा मे तुम्हारे स्पश की मीठी गुदगुदी वस ही जगती [प्रभाव मुरली का प्रभाव पुन तेज होकर मद पड जाता है। मुरली की मादक तरग । मेरे भीतर से ही ज्वार बनकर मचलती यह रसधार | मेरे से ही फूट रही है । राम गेम से फूट रही है । मैं ही वह मुरली हूँ। विंधकर, छिदकर बिलख रही [प्रभाव यमुना की छलछल करती लहरो का प्रभाव उभरता है और मद-मन्द पार्श्व मे चलता रहता है। यमुना यमुना भी मरे भीतर की वासुरी का व्याकुल स्वर सुन- कर आदोलित हो रही है । कणु । यही है वह कदम्ब वृक्ष जहा तुम्हारे सग अनेक बार यूली हूँ तुम्हारी बांहा मे झूली हूँ यही हैं वे विपिन-वीथियो जहाँ मैंने अपना अथ पाया, यही हैं वे कुज निकुज, जहा मैंन तुम्हे नया अथ दिया। यही है वह वशीवट, जहाँ तुम्हारी मुरली की मादन ध्वनि सुन, मैं मात्र कीलित हिरणी को भाति बेसुध हो जाया करती थी। यही है वह पनघट, जहा तुमने न जाने कितनी बार मेरी गगरी फोडी। यही है वह रासभूमि, जहा से हमने जीवन को नया अथ दिया। सब कुछ वैसा ही है मेरे कणु ! वही है मोहन | पर मैं ? मैं तो अब और भी अमूत हो गई हूं, सूक्ष्म हो गई हूँ, तुम्हारे मे जो भावना बनकर मैं जगी थी अब भी वही भावना हूँ मैं भावना, जिसके पास स्वय जीने को एक शरीर था तब शरीर को भावना मिली थी, अब शरीर ही भावना हो गया है। [प्रभाव बादल धीरे धीरे गरजते हैं। गजन प्रखर होकर मन्द पड़ जाती है । पाश्व म उभरती रहती है।] गावधन से घटाएं उठ रही हैं। तब भी ऐम ही घटाएं उठी यो इसी पदम तले कान्ह । मेरे क्ण । तुमने अपनी बावरी ३०/ कुरुक्षेत्र की एक साँझ राधा मुझे ओढा दी थी उम आढकर भी मैं अदर तक भीग गई थी वर्षा मे नही कृष्ण 1 तुम्हारे स्पश मे वह सीलन अभी तक मेरे म है मैं उसे ही जीती हूँ, उसमे ही जीती है । [प्रभाव बादल गरजन का प्रभाव पुन उभरता है और साथ ही वर्षा वा प्रभाव उभरकर साथ साथ चलता रहता है। काहा । मेरे कणु | जब भी बादल घिरते हैं, मैं इस कदम तल आ जाती हूँ । वर्षा मे भीगती हूँ उसको रस पुहार की मीठी बूदे मुझमे से होकर बह जाती हैं ठीक वम, जैसे गोवधन की घाटिया में से तब तुम्हारे स्पश मेरे मे उगने लगते हैं, फूल बनकर महकने लगते हैं । मै खिल जाती हूँ। मुझम से तुम्हारी गध मेरे सांवले मोहन । तुम्हारी गध झरने लगती है । [प्रभाव वर्षा का प्रभाव पुन तेज होकर मद पड जाता । पर आज मेरे काहा | मैं भीग गई हूँ इस घनश्याम बदली को मैंने तुम्हारी काली कांवरी की तरह ओढ लिया है पर म तुम्हारे स्पश अगारो की तरह जलन लगे हैं । यह क्या कणु तुम्हारी छुवन मेरे मे चिनगारिया छोड रही हैं। मोहन । मैं सुलगने लगी हूँ। मेरे मे से तुम्हारा दिया यह कौन-सा अथ फूटने लगा है। ओह । कृष्ण कृष्ण | मेरे माथे पर यह फफोला कहा से आ गया? मेरे हाठा से धुआं? सारे चेहरे पर छोटे छोटे छाले । तुम्हारी दृष्टि का स्पश जहाँ भी पडा था वहां जलन । का हा । मुझम यह कैसा ग्रहण | आज इस राशि में यह कौन ग्रह मेरे मे चढ आया है? जो मुझे ही ग्रस रहा है । मुझे ग्रहण लग गया है | मेरी भावना को ग्रहण लग गया है । [प्रभाव वर्षा का प्रभाव पुन तेज होकर मद पड जाता 7 जस मेरे में गधर उबल रही हो । तेज धुआ उठकर मेरे मस्तिष्क म चढ़ रहा हो। कान्हा काहा! मेरी आंखो म कुरुक्षेत्र की एक सांझ/३१ धुआं घिर रहा है | धुआं घिर रहा है । मुझे कुछ भी तो दिखाई नहीं पड़ रहा है कुछ नही दीख रहा सूय ग्रहण से पूर्व ही यह कमा ग्रहण | कैसा ग्रहण काहा तुम तो कुरुक्षेत्र में सूय-प्रहण पर आ रहे हो । सोचा था बूढे नन्द यशोदा के साथ मैं भी कुरक्षेत्र जाऊंगी क्ल जाने से पहले मैं यहां क्दम तले भीगने चली आई चाहती थी। इस बदली में भीगकर गगा धुले तुलसी पत्र को भांति तुम्हे समर्पित । [प्रभाव वर्षाका प्रभावी उभवती पिसांत से दशमी तर] . [प्रभाव यात्रीदल के जाने का प्रभाव उभरता है, रथो, गाडिया के चलने का प्रभाव बीच-बीच मे जन कोला- हल का प्रभाव बैलो की घण्टियो की आवाज, ये सभी प्रभाव काफी देर उभरकर विलीन हा जाते हैं। (कुरुक्षेत्र मे ग्रहण के प्रभाव को व्यक्त करने के लिए जन- कोलाहल, पटिया, घडियाला, शखो का प्रभाव उभरता व्यास (गाकर) धमक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव । मामका पाडवाश्चैव किमकुवत सजय ॥ धमक्षेत्रे ये शब्द पुन उभरकर विलीन हो जाते हैं। राधा कुरुक्षेत्र आ गया है काहा ! तुम्हारा कुरुक्षेत्र आ गया है तुम्हारी कमभूमि आ गयी है माँ । यशुदा माँ | तुम्हारे गोपाल की कमभूमि आ गयी है । यशोदा मैं पहले ही जान गई थी मेरे में एक पुलक्न कव से जाग रही है। हृदय में दूध का स्रति उमड रहा है। घ्यास (गावर) पाचज य हुपीके शो देवदत्त धनजय । यह पक्ति दो-तीन बार उभरती है।

राधा राधा राधा ३२/ पुरोष पी एव सांझ [प्रभाव शव पनि उभरती है। मो। यह ऋषीकेश तुम्हारा लाडला नटवट पण ही है इम कमभूमि म उसन बांसुरी छाहवर पाचजय शव पूजा था । यशोदा राधा | सा हो गया होगा मरा श्याम मा लगता होगा? उस ही एक बार दपन के लिए इन माया को संभाल पी पर अब ता दष्टि हो मद पड गई है। मां । मरी आँखाम भी बाला परदा उतर आता है और कभी सफे। सब धुधला ही घुघला व्यास (गाकर) पश्य म पाथ | रूपाणि शतशोऽथ सहयश । नाना विधानि दिव्यानि नाना वणाहतीनिच ॥ हे अर्जुन मेरे हजारा रगा और स्पा को देप। मों। सुना अपने क हेया कास्प हजारा रग हजारारूप यह व्याग गीता गान कर रहे हैं कृष्ण की वमभूमि म कृष्ण गीता का गान कर रहे हैं। यशोग हो । गीता गान कितना मीठा है तुमसे न जाने कितनी बार सुन चुगो हैं ? हर बार नये अथ बताए हैं तुमन हर बार नये अर्थ । पर मैं तो उसका केवल एक ही रूप जानती हू बाल गोपाल का, नटपट उद्दण्ड का। राधा यशोदा एक बार वचपन म काह को मिट्टी खात हुए मैंने पकड लिया जब उसन मरे सामन मुह खोला तो तो जानती हो मैंने क्या देखा? जानती हो? राधा नही मां। यशोदा मैंने काह के मुह म त्रिलोकी देखी तीनो लोका की माया पर दूसरे ही क्षण में सब भूल गई सब भूल गई । राधा | इतना बड़ा मेला जुडा तुम्हारे नाद बाबा की आंखें भी रह गई हैं हम अकेले कृष्ण को यहा कहा ढूंढेगे कहा कहा ढूढ़ेगी? [प्रभाव घोडो को हिनहनाट के साथ साथ रुकने का प्रभाव । कृष्ण मैय्या । मंग्या । मैं स्वय आ गया हूँ म्वय आ गया हूँ मैग्या। हामा। है यहाँ कुरुप की एक माझ | ३३ यशोदा मेरा गोपाल | मरा मोहन ! मरा माखन चोर । वहाँ है रे तू? किधर है तू? (गद्गद स्वर म) मैय्या मैय्या । मेरी मैय्या यशोदा तू गले से लग गया है वर्षों से जल रहा उपले की भांति सुलग रहा मन शान्त हो गया है (सिसक्ते हुए) तू इतना निर्मोही कस हो गया रे ? हूं। बोल रे निठुर | बोलता क्यो नहीं। कृष्ण कष्ण मैय्या । तुम्हारी गोद में अपार शाति मिल गई है एक मीठी पुलकन जग रही है यके टूट प्राणा को नयी शक्ति मिल गई है मय्या । मुझे पता था मैय्या तुम आओगी । मैं कब से इम पथ पर खडा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा था मैय्या। [प्रभाव यशोदा को सिसकी उभरती है।] मैय्या । तुम रो रही हो । मैय्या | मैय्या । यशोदा सूखी तलया-सी आँखा म पता नही कहा से आँसू उमड आए हैं ? सब धुधला है । तुम्हे पूरी तरह कहाँ देख पा रही हूँ ? केवल अनुभव ही कर रही हूँ या हाथो से टटोल रही हूँ तुम्हें । हाथो से देख रही हूँ । मैय्या । अपन स्नह-भरे हाथ से मेरे राम रोम की थकान हर तो । मैं तुम्हारी ममता के स्वच्छ अमृत कुण्ड मे नहा रहा हूँ मय्या | मैं नहा रहा हूँ। यशोदा यह क्या रे? तुम्हारे कोमल माखन से शरीर को क्या हो गया है । सूख गया है ? पत्थर हो गया? पिंजर निक्ल आया है ? रुक्मिणी सत्यभामा, वदा किसी ने भी तुम्हारी चिता नहीं की? करती भी क्यो? तुम किसी एक का होते तब न ? मेरी राधा साथ होती तो क्या तुम ऐसे होत? बोलो बोलते क्यो नहीं? तब क्या तुम ऐसे ककाल बन जाते ? राधा । ओ राधा मय्या | राधा आई है न ? बोलो मय्या। आई है न राधा । यशोदा अपने विश्वाप्त से पूछो | राधा | वह माखन ले आओ मिश्री भी । राधा राधा ! कहा चली गई ? अभी यहाँ थी मेरे पास । ? कष्ण राधा। कृष्ण मैं उस मानिनी को जानता हूँ मैय्या! मैं अभी आया अभी आया मैय्या। [सगीत से दृश्यान्तर] ३४ / कुरुक्षेत्र की एक सांझ दृश्य तीन राधा 7 राधा कष्ण । 1 [प्रभाव जन कोलाहल उभरकर काफी दर चलता है गौर फिर धीरे धीरे शात हो जाता है।] भीड के रेलो मे न जाने कहाँ पहुँच गई हूँ ? पैर धरती पर लगते ही नही न मेरी कोई दिशा है न कोई गति भीड ही मेरी दिशा और गति है मय्या चितित हो रही होगी और माहन कृष्ण मोहन तुम्हारे पास खडा है तुम्हारे पासखडा है तुम्हारा मोहन मेरा माहन हुँ । किस किसका माहन सबका मोहन सवका होकर सव मे से तुम्हारा मोहन मात्र तुम्हारा नही तो केवल अपना, नही अपना ही नहीं अपना ही नही ममझी ? मानिनी । ओ मानिनी | चला चलो। राधा मुझे कहा लिये जा रहे हो क्णु ! कहा लिये जा रहे हो? मुझ छुओ मत कणु । छुओ मत | तुम्हारे स्पश मेरे मे आग बनकर दहक रहे है मुझे ग्रहण वनकर भस्म कर रहे हैं मेरे स्पश तुम्ह ग्रहण बनकर न निगल जाएँ । मोहन । कणु छोड दो मेरा हाथ राधा । तुम्हे वहाँ लिय जा रहा हूँ, वहा जहा मुझे ग्रहण लगा था युग छाया का ग्रहण लगा था मैंने सक्रमण का विषपान वह ग्रहण अब तक मुझे लगा है उसी से मुक्त हान के लिए मैं यहा आया हूं राधा | लोग सूर्य ग्रहण पर कुर क्षेत्र मे स्नान कर पावन होते हैं । राधा | राधा | मेरा कुरक्षत्र तुम हो । तुम हो तुम्ही हो राधा | राधा तुम्ही हो । मैं तुम्हारा कुरक्षेत्र हूँ? कृष्ण हा राधा । एक कुरुक्षेत्र यह है, जहा तुम खडी हो ।मैं खडा है! और एव कुरुक्षेत्र मेरे भीतर है वहा भी तुम हो मैं हूँ वहाँ भी एक महाभारत हुआ था दोनो महाभारत मेरे म हुए हैं मेरे म हुए हैं राधा उनको मैन अपन ऊपर लिया है। क्णु । मैं भावना हूँ तुम्हारे हो शब्दो म भावना हूँ तुम्हारी इन वाता की गहराई क्या जानू । देख नहीं रहे मेरी दष्टि मद पद गयी है है ही नही कभी आँखो म सफेद धरा तैरता है और कभी काला मगर अब तो सब वाला ही वाला है एक्दम काला है कष्ण किया था राधा राधा - कुरक्षेत्र की एक साँझ / ३५ कृष्ण पूण सूर्य ग्रहण लग गया है सूय मर गया है भस्म हुआ उपला बन गया है दिशाओ की काली कनातो पर अंधेरे का वितान बन गया है काला पूरे का पूरा काला राधा कणु । मैं तुम्हे देख भी पाऊँगी? बोलो कणु ! कृष्ण अवश्य तुम मात्र भावना ही नही भावना ही होती तो बह गई होती तुम अपने म खडी हो टिकी हो मात्र भावना अधी होती है तुम्हार पास विवेक की आखें हैं वे खुलेंगी अवश्य ही खुलेंगी वे अब भी खुली हैं। राधा मुझे सब कुछ काला हो दीख रहा है। कृष्ण ठीक ही तो है तुम्हारी आँखो मे ग्रहण उतर आया है यह ग्रहण सूर्य ग्रहण तुम्हारा ग्रहण अवश्य उतरेगा कहेगा टूटेगा तुम्हारे ग्रहण को भी मैं अपने ऊपर लूंगा राधा तुम्हे सब काला ही दीख रहा है ? राधा वह सब मैं हूँ मैं काला पड गया हूँ राधा! स्मरण है तुम्हे ? मैं कालियनाग की फुकारो से बचपन मे ही श्याम पड गया था? राधा यह पूछकर तुम मुझे कितना छोटा कर रहे हो? कृष्ण नही, मैं स्वय छोटा पडा हूँ राधा । हो। सुनो । वह केवल कालिय नाग नहीं था, उस छोट से ग्राम खण्ड का विप था सश्मण का विष जो मुझे ग्रस गया था वह मेरा पहला ग्रहण था जन पीडाका ग्रहण (ठोकर लगने पर चीखते हुए) उई । कृष्ण राधा | क्या हुआ? ओह । इस शिलाखण्ड से ठोकर लगी है ? खून निकल आया है रुको राधा । अभी कुछ लगाता हूँ नहीं । कुछ नही । केवल मेरी भेजी औषधि ही मेरे लगा दो। कृष्ण तुम्हारी भेजी औषधि? राधा हाँ। जो नारद के हाथ भेजी थी। तुम्हारी शिरोपोडा के लिए । कृष्ण ओह । वह औषधि ? तुम्हारे चरणो की धूल । राधा जानती हो न मैंन क्तिना युग विष पोया है परिवतन के रप चक्र को अपनी छाती पर लिया है सत्रमण के विषनाग का डक सहा है इम पीडा से मुक्ति पाने के लिए तुम्हारी चरण धूलि की आवश्यक्ता पडी भावना के शीतल चन्दन लेपन मे मेरे माथे मे डक चला रहा विष-सप मर गया राधा हो। वहीं मुझे लौटा दो। क्णु। राधा । राधा - राधा राधा सौतिन कहा राधा Iमैं भी ३६ / कुरुक्षेत्र की एक साँझ कृष्ण मैं फिर सत्रमण के विष से काला पड़ने लगूगा मद पड चुकी आग पुन धधकने लगेगी मेरी नसें मेरी शिराएं फट जाएगी फट जाएँगी । क्णु ! मुझसे चला नही जाएगा यही थोडी देर रक जाओ क्णु हा। वह मेरी वैरिन ? वह बासुरी कहाँ है? कृष्ण राधा | वह तो ब्रज मे ही छोड आया था उसका स्थान शख ने ले लिया है मुरली का भी एक समय और स्थान था और वहथा ब्रज तक ही वही मुरली शख का जयघोष करने लगी। मुरला ही शख बन गई है। तुम एक बार भी व्रज क्या नही आए मोहन । मथुरा की वह कुवडी कैसे भा गई तुम्ह? कभी न द बाबा, मा यशोदा का स्मरण नहीं हुआ तुम्ह ? वे गउएँ, ग्वाल बाल, सखा सगी और मैं मैं माहन | क्या कोई भी तुम्ह याद नही आया नही । बोलो काहा राधा । मैं तुम्हार लिए एक अनुभव हूँ। सभी के निकट रहने वाला अनुभव । मैं मान अनुभूति हूँ, मुझे शरीर नहीं मिला है। तुम स्वय कितने निठुर निकले ? हूँ| आ निर्मोही । तब अब मिले व्रज आने को एक बार भी मन नही हुना। वह रंभाती गउएँ किलकारते बाल गोपाल, यमुना के कछार क्सिी के भी आपण ने तुम्हारे मन को आदोलित नही किया। स्वार्थी कहागे । जो पूछ, मेरा तनिक स्मरण भी तुम्ह नहीं हुआ। हूँ | बोलो नागर। कृष्ण राधा । तुम जसे एक सूक्ष्म शुद्ध भावना हो, मैं भी वसे ही एक अनुभव मात्र हूँ मात्र अनुभव सब के निकट एक अनुभव मैं हर स्थान-सम्बध से आगे ही बहा हूँ वहाँ की मिट्टी की गध अपन मे संजोए मैं निठुर निर्मोही हूँ तो केवल अपने प्रति, वेवल अपने प्रति राधा । और तुम मेरे म हो एक शीतल सुखद स्पदन बनकर मर मन के रमातल म, तलातल में समाई हो राधा। तुम्हारे साथ बिताया प्रत्येक क्षण मेरे मे जीवित है वही मेरे मन मे वृदावन की तरह लहराता है मैं तुम्हें सदा उसी म पाता हूँ। कृष्ण । के राधा राधा । - क्णु ! एक वदावन मेर म भी है, जहा मैंने तुम्हारे संग जो क्षण रोप लिय हैं अब वे कमल-पुष्प बनकर खिल उठे हैं। कान्हा | ओ पाहा । स्मरण है ? स्मरण है तुम्हे अपने मितन का वह प्रथम क्षण! [प्रभाव सगीत उभरकर मद मद चलने लगता है।] कृष्ण (गद्गद स्वर मे) अरे वाह ! तब तुम इत्ती छोटी थी। गुडिया सी गोरी चिट्टी चिक्नी । वडी-वडी आंखो म लपालपा काजल, वेणी म बंधे पीत कनेर पुप्प लाल भोढनी। राधा तुम भी ता इत्ते छोट थे मोर मुकुट पीताम्बर वन माला बांसुरी पूरे नटखट पण मैंने पूछा था (हंसते हुए) अरी ओ अहीरन की छोरी। कोन है रीतू? किसकी बेटी है? यहाँ रहती है। पहले तो कभी देखी नहीं। राधा (हंसते हुए) मैंने भी तुनकर कहा था ओ गूजर के छोरे । अरे मैं ता तुम्ह जानू हूँ रोज ही तो सुनती रहती हूँ नद के नटखट छोरे कीवातें। कृष्ण (हंसते हुए) हम नटखट हैं ? तेरी कौन सी चुटिया काटी है हमन ? हूँ हम भी ता जाने तू कौन है? राधा (हसत हुए) अरे तू नद का बेटा है तो मैं भी बषभानु की बेटी हू, बरसान को गूजरी हूँ। कृष्ण (हंसत हुए) और हम गोकुल के अहीर। [प्रभाव दोना मिलकर बहुत देर हँसते हैं । सगीत का प्रभाव उभरकर मद पड जाता है।] तुम थ भी कितने शरीर । सच क्णु । तुम्हारी शरारता के स्मरण से रामाचित हो उठती हूँ एक वार तुम्हारे घर आई यो तुम तुम गाय दूह रहे थे मुझे देखत ही तुम्हारी शरारती आँखें नाच उठी थी। कृष्ण (हँसते हुए) अरे हाँ, राधा । तू तो महा ठगनी थी आई थी हमे अपने रूप से छलने हमने भी वह घात लगाई वह घात लगाई दूध की धारा तुम्हारे पर बरसा दी। राधा (हँसते हुए) हाँ काहा ! तुम एकटक मुझे अपनी आंखो से बाघ रहे थे एक धार दुहनी मे और एक मेरे पर मैं दूध में राधा धुल गई थी कष्ण ३८/कुरक्षेत्र की एक सांझ कृष्ण (हँसते हुए) दूध मे धुली चांदनी-सी लग रही थी। [प्रभाव दोना का मधुर हास्य कुछ देर उभरखर मन्त पड़ जाता है। राधा हंसती रहती है परतु कृष्ण का हास्य बीच में ही रुक जाता है।] राधा (चाककर) श्याम ! काह ! तुम अचानक गम्भीर क्यो हो गए। बालो श्यामा राधा । क्तिने वर्षों बाद ऐसे हँसा हूँ खुलकर, उ मुक्त होकर गदगद भाव से, मथुरा, हस्तिनापुर, द्वारिका, कुरक्षेत्र यहा आकर मैं कब हँस पाया? आज तुम्हारे साथ बीत क्षणा को पुन जीते हुए लगता है मुझम प्राण शक्ति का पुन ज्वार जग आया है । नसा मे जो गाठे पडी थी, वे खुल रही है । राधा मुझे भी ऐसा ही आभास हो रहा है। मानो मेरे मे जमा मेरा शाप, मेरा ग्रहण हिमशिला सा पिघलने लगा है । वह मेरे मे घुल रहा है अब मानो वह सिमट सिमटकर बाहर बह जाएगा। राधा । तुम्हारे आगे खुलकर ही मेरा ग्रहण भी उतरेगा । तुम मेर आत्म विसजन की भूमिका भी रही हो, तुम्ही तो मेरी मुक्ति का धरातल हो। और मैं | मैं एक सकल्प, एक विनियोग हूँ। ऐसा सकल्प विनियोग, जिसका जम ही किही दुष्ट ग्रहो की छाया मे हुआ है। राधा | मैं ज म से अब तक सघर्षों के अग्नि-कुण्ड म माहुति बनकर जला हूँ हविष बनकर उसमे विसर्जित हुआ हूँ। अपन विगत जीवन के भयानक सघर्षों का स्मरण कर मैं और भी काला पड जाता हूँ पर आज सघप वे शिखर से अपनी लम्बी यात्रा सपासपूर्ण यात्रा-पथ और पडावा का दशन कर रहा हूँ उनम लगे अपने पद चिह्ना को ढूढ रहा हूं राधा हूँ । रुक क्या गए काह। कृष्ण मरा जम ! भाद्रपद की पराल विकराल महाकाल रात्रि, युद्ध गगन, पुकारती दिशाएँ [प्रभाव आंधी तूफान, विजली और वारिस का भयकर प्रभाव काफी दर उभरकर मद पड़ जाता है और पाश्च मे चलता रहता है। कृष्ण

कुरक्षेत्र की एक साँझ/३६
कृष्ण
हाँ राधा । जैसे शेषनाग के सभी पन एक माथ विष-ज्वाला
वरसा रहे हा, बिजली की प्रलय ध्यनि
[प्रभाव बिजली के कडक्ने का प्रभाव कुछ देर उभर
कर मन्द पड़ जाता है।
और क्स की काल-कोठरी म पीडा से कराह रही मां देवकी
[प्रभाव देवी को प्रसव पीडा का प्रभाव उभरता है,
उसकी पीडा की अनाट्ट उभरती है ।।
[दश्या तर का सगीत]
दृश्य चार
[प्रभाव नवजात शिशु के रोने का प्रभाव भी उभरता
वसुदेव ओह । देवकी मूच्छित हो गई है इससे पूर्व किस का कोई
प्रहरी उसे बालक के जम की सूचना दे, मैं इसे पूर्व योजना-
नुसार गोकुल के नन्द बाबा के घर पहुंचा दूगा।
[प्रभाव प्रहरी के आने का प्रभाव 1]
प्रहरी । वचन याद है न ? कोई सुन तो नही रहा । सुनो ! पास
आकर | सब काम ठीक प्रकार से हो गया है न? शाब्बास ।
हम तुम्ह पुरस्कार देंगे । सुनो । मेरे जाते ही पुन ताले लगा
देना मैं दो प्रहर में ही लौट आऊँगा मुख्य द्वार पर आज
का गुप्त सकेत वताकर फिर अदर आ जाऊंगा। हो टोकरी
की व्यवस्था हो गई है न । मुझे तुरत जाना होगा अभी
इसी क्षण
[प्रभाव ताला और द्वार खुलने रा प्रभाव। वर्षा
आधी, तूफान और बिजली का प्रभाव उभरकर मद
पड़ जाता है । यमुना की वाढ या प्रभाव बडी भयकरता
स उभरता है और बराबर मद-मद चलता रहता है।
मोह | यमुना तो सागर वन आई है
M

४०/ कुरुक्षेत्र की एक साय मैं क्या करू ? कैस पार जाऊँ ? इस बालक को कसे पहुँचाऊँ? [प्रभाव वसुदेव का स्वर ईवो होकर उभरता है।] (यसुदेव का स्वर) वसुदेव । यादववश के कुल दीपक की रक्षा तुम्हारा क्त्तव्य है यदि मरना ही उसकी नियति है ता कस के हाथा क्या? क्या कस के हाथा? यमुना की लहरा मे वह जाना, इनमे डूब जाना क्स के हाथा मरने से कही अच्छा (स्वर विलीन हो जाता है) वसुदेव ठीक है । सक्ल्प लौह सकल्प के आगे सागर नहीं रुक पाते पहाड उसे रास्ता देते हैं। मैं यमुना को चीरकर उस पार जाऊँगा उस पार जाऊँगा [प्रभाव तेज यमुना का प्रभाव पुन उभरता है।] ओह, पानी का प्रवाह किनारे पर ही कितना क्षिप्र है, किनारे पर ही पांव नही लग रहे [प्रभाव विजली, आधी, वर्षा का प्रभाव मद पड जाता है।] यहा तैरना ठीक रहेगा मा यमुना ! नमस्कार ! माग दे माँ । जय यमुना मय्या [प्रभाव वर्षा आंधी का प्रभाव पुन तेज होकर मद पड जाता है। (चढी हुई सास उभरती है।) पता नहीं लहरें मुझे किस ओर ले जा रही हैं ? (विस्मय और भय से) यह क्या? इतना भयकर साप नाग पन तानकर मेरे पीछे पीछे चला आ रहा है। नागराज । दया करो। शकर-कण्ठ हार दया करो। वह गया क्से टोकरी पर पन तान रहा था मोह ! पानी का पारावार नही मैं जैसे रसातल म डूब रहा हूँ। [प्रभाव यमुना की वाढ का प्रभाव तेज होकर मद पड जाता है। यमुना की लहर टोकरी म भर गई हैं मां । यमुने । तू क्या बालक को लहरा व हाथा स मगल आशीप देन आई थी।मा। उभरकर माग . ।

कुरक्षेत्र को एक साँझ ४१
(विश्वास भरे स्वर मे) यमुने । तू भले ही सात सागरो का रूप
धारण कर ले मैं पार जाऊँगा अवश्य ही जाऊँगा।
[वसुदेव के तरने का, पानी चीरन का प्रभाव उभरता
[प्रभाव वर्षा, आधी का प्रभाव उभरखर मद पड
जाता है।
[दश्यान्तर का सगीत]
दृश्य पाँच
[प्रभाव नद के घर बधाई के मगल-वाद्य बजते हैं।
शहनाई का प्रभाव काफी देर उभरखर विलीन हो जाता
कष्ण
राधा । जैसे मैंने और सघर्ष ने एक साथ ही जम लिया हो ।
मेरा मामा ही मेरे रक्त का प्यासा बन गया है मुझे मारने के
लिए असध्य पड्यत्र हुए, योजनाएं बनी।
पूतना आई, फिर शकटासुर थापा और फिर सुनो । मरी
हत्या के प्रयत्नो का अतहीन म आरम्भ हो गया मेरे ही
कारण ब्रज गोकुल पर आए दिन विपत्तियां आती रहती
मुझे मारने के लिए भेजा गया वकासुर, अपासुर, धेनुकासुर
राधा तुमसे छोटी हूं न इन सवका मुझे स्मरण नही हो। मां से
सुना सब है इन सवको तुमने मार भगाया।
पता नही राधा ! तब मुमम कहाँ से कोई दिव्य शक्ति उतर
आती थी। तब मैंने ग्वाल-बालो, अहीर गूजर युवका का एक
दल वनामा, उहे सगठित क्यिा, क्स ये अत्याचारो के विरुद्ध,
उसके शोषण के विरुद्ध, सारे व्रजमण्डल म नव-जागरण की यह
चेतना पल गई मैं और बलराम इस आयोजन में जुट गए
राधा I मेरी अन्तरगगवा मित्र राधा सव सुन रही हो
कृष्ण
देख भी रही हूँ, अपन वल्पनालार म इन सबका धरित होत देख

४२ / कुरुक्षेत्र पी एव मांश कृष्ण मा चपन म एप पहानी सुनाई पो आय दिन नयी-स-नयी पहानी सुनन का मरा हट होता था मुग उस दिन नीद नही आ रही थी [प्रभाव पनवर या प्रभाव उभरपर फेड हा जाता [दृश्यान्तर] । दृश्य छह [प्रभाव वृष्ण का वाल-स्वर म सिसक्ने, हठ करने का प्रभाव। यशोदा गोपाल । सो जा मेरे लाल | सो जा। बावा तेरे लिए मिश्री बादाम लन गए हैं, प्रात ही तुम्ह माखन के साथ वादाम मिश्री मिलेंगे कष्ण (वाल-स्वर मिसक्ते हुए तुतलाती भाषा म) हम नहीं खाएंगे। नहीं खाएंगे। नहीं पाएंगे। यशोदा क्या नहीं खाएंगे नद कुमार ! करण तू वलराम का अधिक दती है तेरे मन म कुछ भेद आ गया है मैय्या ! उसे माखन दही देती है और मुझ कच्चा दूध ही पिलाती है तू झूठ बोलती है मैय्या! कहाँ बढी है मेरी चोटी? देख तो। वसी वी वैसी ही है और मेरे पर ही सदा माखन चोरी का दोप लगाती है। बल भैय्या को कुछ नही वहती। यशोदा अच्छा मरे लाल ! मदन गोपाल ! मैं वनराम को तुम्हारे सामने ही डाटूगी कान खीचूगी मय्या | ग्वाल-बाला के सामने वह मुझे चिढाता है कहता है तुझ मैय्या ने सुखिया मालिन से लिया है। तू वाला है और मा वावा गारे हैं तू उनका पूत नहीं (सिसक्ता है)। यशोदा अरा ले वलराम ! उसकी वह पिटाई करूंगी कि दय्या दय्या कर उठेगा। जच्छा । अव राजा बेटा सा जाएगा? मैय्या पहले वह कहानी सुनाओ। यशोदा कौन-सी? करण -4. RAND कृष्ण वही धरती मैय्या की मैय्या! क्या सचमुच यह धरती चल के सीग पर खडी है? यशोदा हां वेटे | यह धरती बैल के सीग पर खडी है। कृष्ण पर कैसे मैय्या? वह बैल कहां खडा है ? यशोदा वह बैल अपने बल से खडा है लाल । कृष्ण धरती तो उसके सर पर है, वह कहा खडा है ? यशोदा (कुछ तग आकर) मेरे सर पर | अब सो जा । कृष्ण अच्छा, एक बात और मैय्या | श्रीदामा वोलता है जव बैल थक जाता है तो वह धरती को एक सोग से दूसरे सोग पर ले जाता है तब भूचाल आता है यह सच है मैय्या? यशोदा ये बातें श्रीदामा से ही पूछना ! अव सोजा। देख मैं दिन भर की थकी हुई हूँ। कृष्ण अच्छा मैय्या । अव भूचाल कव आएगा? हैं मैय्या । यशोदा (डाटते हुए) तू सोता है कि नहीं | अच्छा बुलाती हूँ बूढे बाबे को। कृष्ण (मा को खिजाते हुए) बूढा बावा नही आएगा नही आएगा हम नद बाबा ने सब बता दिया है मय्या । तुम झूठ बोलती हो । वोलती हो न? हम नही सोएंगे बुला लो अपने बूढे बाबा को (चिढाने का स्वर उभरता है।) [प्रभाव सगीत से पशबैक समाप्त होने का प्रभाव ।] [दश्यान्तर] । दृश्य सात राधा कृष्ण [प्रभाव कृष्ण और राधा की उमुक्त हँसी का प्रभाव उभरता है। (हंसते हुए) तुम बचपन से ही नटखट थे, चचल न द किशोर । कुछ बडे होकर जब इस कहानी का अथ समझ में आया तो मेरे सामन जसे जीवन का लक्ष्य खुल गया हम गूजर अहीर, कृषक, गो और बैल ही तो हमारा सहारा हैं । दूध-दही-माखन का व्यापार खेती यातायात, सव गोधन पर ही निभर है सचमुच ही वैल ने धरती को अपने सीग पर उठा रखा है ।

४४ / कुरुक्षेत्र की एक साँझ राधा तुम क्तिने विलक्षण रहे होगे यह अथ समझने मे । कृष्ण राधा 1 मैंन और वलराम न सक्ल्प किया इस गोधन की रक्षा का ताकि हमारी धरती खडी रहे और कोई भूचाल न आए। इस काय के लिए मैंने बासुरी उठाई और बलराम भय्या न हल वह हलधर बन गए और मैं गोपाल हल और बल, वासुरी और गाय गाधन राष्ट्र का पवित्र धन है गा हमारी मा है । हा राधा । तुम्ह स्मरण है? वह भयकर अग्नि काड | अन खलिहानो मे पडा था पुआल के अम्बाल तगे थे उस रात हम क्तिना थक गए थे अचानक आधी रात चारो ओर आग आग का कालाहल फैल गया [प्रभाव आग जाग का जन-कोलाहल और आग की लपटो का प्रभाव काफी दर उभरता है और मद मन्द रूप मे चलता रहता है।] राधा । वह सवनाश की रानि थी आग की लपटें आकाश को डस रही थी दिशाएँ धुएँ से घुट रही थी मीला तक आग का फैलाव था फिर आयी एक जोर की आधी से जगल तक फैल गई मैं बलराम हमारा युवक-दल जन मेवा में जुट गया खेत बुझे हुए हवन कुण्ड लग रहे थे घर बुझे हुए श्मशान सारा प्रदश एक मरघट लग रहा था यह अग्निकाड क्स के आदेश आग खेता मे हुआ था [प्रभाव आग आग का जन कालाहल और आग की लपटो का प्रभाव कापी दर उभरता है और मद मद रूप म चलता रहता है। इस अग्निकाण्ड म बरसान की कई हजार गउएँ और बल जल गय थे। हम सब जल गए थ मानो मैंन मेरे दल न सारी आग पी लो हो नग्निपान कर लिया हो । और राधा | इसमे भी भय पर थी वह वर्षा [प्रभाव वर्षा और बिजली का भयकर प्रभाव पापी देर उभरपर मद मद चलता रहता है। कृष्ण - कृष्ण राधा दल पुरुक्षेत्र की एक सांझ /४५ वह वर्पा थी या प्रलय काली घटाओ के भीपण आमाश म तुमुलनाद करते बादल | मूसलाधार वर्षा यमुना मे भयकर बाढ आ गई सम्पूर्ण ग्रज प्रदेश उसमे डूब गया गांव के गांव बह गए चारा ओर गरजता गुर्राता सागर असख्य लोग डूब गए पशु मर गए वह जन-सहार का कितना विदारक दश्य था ? [प्रभाव वर्षा का प्रभाव पुन तेज होकर मद पड जाता राधा कृष्ण इस पार सक्ट म मैंन तुम्हारा नया ही रूप देखा कृष्ण तुम भी तो मेरे साथ थी बराबर मेरे साथ हमारा युवक- दल नावा म जा-जापर जल म घिरे लोगो को निकालने लगा तुमने न जाने क्तिनी अबलामा-बालको को बचाया होगा? राधा वह सपप स्मरण कर प्राणा म एक भयावह कम्पन उठने लगता है गोवधन पवत ने हमारी रक्षा की थी उसकी कदराओ में बाढ पीडिता का छिपाया गया सुरक्षा शिविर खोले गए । [प्रभाव वर्षा का प्रभाव पुन तेज हो जाता है। कृष्ण सक्ट का गोवधन आ गिरा था। राधा उस गोवधन को तुमन उठाया था । पण नही । राधा नहीं । मैं इस छोटी सी अंगुली सा अशक्त, इस पहाड को कैसे उठाता? राधा नहीं कृष्ण तुमने उसी छोटी अंगुली पर, गोवधन को, सकट के गोवधन को उठाया नही राधा ! तुम मेरी प्राण शक्ति थी सभी के सह्योग की लाठियो ने मिलकर इस गोवधन को उठाया था। [प्रभाव वर्षा का प्रभाव उभरकर समाप्त हो जाता - कष्ण राधा | जब बाढ उतरी तो हज़ारा लाशो की दुगध से महामारी पडन लगी और मैं भूखे नगे, बीमार व्रज के लिए नव-निर्माण की, पुनर्वास की योजनाएँ पूर्ण करने में जुट गया जनता मे घोर निराशा और हाहावार था ४६/ कुरुक्षेत्र की एव सोश राधा [प्रभाव अशात जागोलाहल उभरकर धीर धीरे विलीन होने लगता है। राधा हाँ कृष्ण भूसे नगे, बीमार विलयते लोग सेत रेत से मर गए थे गउएं, बैल सब वह गए थ पंसा दुभिल पडा था? फष्ण राधा । तब सामूहिम श्रम-वेद्र खोल गय दूर-दूर से अन की सहायता मंगवाई गयी और मेरे मामा कसन इतनी घोर विपत्ति म भी राजा पा क्त्तव्य पूरा नहीं किया था। इस पगु समाज को खडा करने लिए एक दिव्य मनोग्ल की आव श्यकता थी उसे पूरा किया तुम्हारी बांसुरी न काहा। जब तुम कदम तले बांसुरी बजाते [प्रभाव वासुरी का प्रभाव काफी देर उभरकर मद मद चलता है।] का हा ' तुम्हारी बासुरी हमे कोन देती हम मात्र विधी-सी तुम्हारे पास पहुंच जाती [प्रभाव बांसुरी का प्रभाव पुन तेज होता है और मद मद चलता रहता है।] क्तिना जादू था मुरली मे? वह वशीकरण भरी तान टोना चलाने वाली लहरें मानो रस का अमत स्रोत थी। मैं चाहता था अपने लोगो की थकान और पीडा को बांटना उसे कम करना रास का आयोजन इसीलिए किया करता वह सत्रास से मुक्ति का कणु । तुम्हारे नटवर नागर, रास रसेश, रसिक शिरोमणि रूप ने किसको नहीं बाधा मोहन । [प्रभाव मुरली का प्रभाव पुन तेज होने लगता है। पूर्णिमा की रात्रि स्वच्छ शीतल चन्द्रिका पव यमुना की गध सिंचा पवन तुम्हारी मुरली की मादक तान पर सभी चरण थिरक उठे थे घुघरू खनक उठे थे मदगगमक उठेथे [प्रभाव मुरली का प्रभाव तेज होता है और नत्य का प्रभाव भी उभरता है। घुघरुमा और मृदग का स्वर भी ।] कच्ण था पव था। राधा रेतिल कछार कुरक्षेत्र की एक सांझ/४७ राधा यमुना की एव एक लहर मे चांद उतर आया था प्रत्येक गोप- रवाल कृष्ण था और प्रत्येर गोपिन ग्वालिन राधिका वितना अपूर्व यानद और उल्लास था। प्राणों पर एक दिव्य मादकता खुमार चढ रहे थे हम उदात्त हो रहे थे-उदात्त विशद यह आनद-पव था महान आनद पव [प्रभाव मुरली और नत्य ये प्रभाव पुन उभरकर लीन हो जाते हैं ] दियार MN दृश्य आठ । भयंकर रना । कृष्ण राधा ग्रज को खडा करन मै मुझे कितनी पढा? यहाँ के ग्वाल-बाल दूध के लिए तरसते थे । दूध दही माखन मथुरा की मण्डिया म बिक्ता था मैं अपने युवक- सगठन का शक्तिशाली बनाना चाहता था इसीलिए मथुरा जात दूध माखन को रोकना पड़ा। हा राधा | तुम्हारी गोप-बालाओ ने, सहेलियो न जब तुम्हारे लाख ममझाने पर भी यमुना-कुडो में अध नग्न स्नान बद नहीं विया, तब उहे ठीक माग पर लाने के लिए उनके वस्त्र छिपाने पडे। जब उन्होंने कभी भी ऐसा न करने की शपथ ली तभी उनके वस्त्र लौटाए गए क्स के अनुचर एक बार ऐस ही नग्न नहा रही गोपी को उठा कर ले गये थे कितना हाहाकार मचा था। कृष्ण क्स के ऐस अत्याचारो को मैंने चुनौती दी। मैं और बलराम कस के मल्ल-युद्ध में भाग लेने के लिए मथुरा गये थे। साथ थी मेरी ग्वाल सेना मेरा युवक-दल गधा। वह बडा ही भव्य समारोह था राधा (विकल स्वर म) क्णु क्णु । मुझे उस क्षण का स्मरण न करवाओ कणु | वही तो हमारे वियोग के समारभ का दुखद रा क्षण था। कृष्ण वियोग का नही राधा योग का साधना का महान् क्षण था ४८/कुरुक्षेत्र की एक सांय राधा तुझे और मुझे समी और तपना था हाँ राधा मथुरा म वह एक बडा भारी उत्सव था मेग युवक-दल सर्वत्र फन गया था मथुरा को युवन शाखा भी कस विरोधी थी उसने हम पूरा महयोग दिया गुप्त रूप मे ही हमन बस के विरुद्ध जनता थे रोप को और भी उभार दिया था। मैं बनगम और मेरे कुछ युवक ग्वाल क्स के अखाडा मे जसे ही द्वार प्रवेश करने लगे हम पर महावत ने बुवलयपीड हाथी छोड दिया यह मदिरा पीकर आधा हुआ था चिपाहता हुआ वह हमे कुचलन के लिए लपका प्रभाव हाथी के विधाडन और जन कोलाहल का प्रभाव उभरता है। हाँ। यह सब सुना था जब नद वावा तुम्हे मथुरा छोड अकेले ही आए थे तब हमारी क्या दशा हुई होगी ? मैं यशुदा मय्या और गोपियां सब उनस तुम्हारी गाथाएँ सुनती तव मेरे म सुख दुख की विचित्र पुनवन जगती। राधा । मैंने और बलगम ने वह हाथी मार गिराया बलराम ने हल के फाले से उसका पेट ही चीर डाला {प्रभाव हाथी की मरणात चिंघाड उभरती है।] अखाड मे हमारा सामना हुआ बस के मल्ला से जो वज शरीर वाले थे। एक एक कर चार मल्ल दो मेरे साथ और दाबलराम के साथ भिडे वे हम मारा चाहते थे मल्ल-युद्ध के नियमो के विरुद्ध भिड रहे थे हमने चारा को मार डाला चारो और कोलाहल फैल गया। [प्रभाव जन-कोलाहल का प्रमाव।] तभी कुद क्स गरज उठा जैसे भपकर बादलोम विजली कडकी कस (डक्ते स्वर मे) सनिको बलगम और कृष्ण को तुरत याड लो।इहें भी काल कोठरीम डाल दो। भागने नशा । पण (मोजावी स्वर म) म | सावधान ! क्स | देव मैं कृष्णामा गया हूँ तेरा रात आ गया है । (और भी मोजस्वी स्वर म) कोई भी सभा से हिनने न पाए।

कुरुक्षेत्र की एक सांझ /४६ जो जहाँ है वही रुक जाए क्स के सैनिको। सावधान | मेरे युवक-दल ने इस पण्डाल का घेराव कर लिया है। नगर में कस के सभी सैनिक मेरे दल के आगे जात्म-समपण कर चुके हैं आप सभी अपने शस्त्र धरती पर रख दो। मेरे ग्वाल युवको । क्स के सैनिका से शस्त्र ले लो ! कस | देख रहे हो, वसुदेव के पुत्र को | देवकी के पुत्र को ! जो तुम्हारे असख्य पडयो के बाद भी जीवित है। क्स | मैं यहा आया हूँ जनता या प्रतिनिधि बनकर तूने जनता पर जा घोर अत्याचार किये हैं, उनका हिसाब करने । देख । कृष्ण तुम्हारी ओर आ रहा है तुम्हारा काल आ रहा है क्स तुम्हारा काल आ रहा है | बलराम ! आप इस ओर से बढ़ें। (कडक्ते स्वर म) रुक जाओ । कृष्ण | बलराम । रुक जाओ वही I मैं बालको के वध का पाप नहीं लेना चाहता! (ओजस्वी स्वर मे) मेरे जिन छह भाइयो को जम लेते ही तूने मार दिया, क्या वह बाल हत्या नहीं थी? रुक जाओ कृष्ण ' तुम्हारे माता पिता का जीवन मेरे हाथ मे कस कष्ण कस है कृष्ण क्स, अव तो तुम्हारा अपना हाथ भी तुम्हारे हाथ मे नहीं है भागना मत कस | भागना मत मत भागना कस । ग्वाल युवको । आगे बढकर कस को पक्ड लो। चारो ओर से आगे बढ़ो। [प्रभाव जन-कोलाहल का प्रभाव उभरता है है। हे | मारो मारो। पकडो पकडो की ध्वनियां भी। भयकर प्रभाव उभरकर मद पड जाता है।] राधा | ग्वालो न कस को घेर लिया मैंन और बलराम ने उसे केशो से पकडकर नीचे गिरा दिया मैं उसकी छाती पर सवार हो गया राधा | इन धूसा से ही मैंने उसका वध कर दिया। राधा वणु । तुम्हारी योजना इतनी सफल रही। इतने बड़े शक्ति शाली शासक को मुट्ठी-भर गूजर-युवकाने समाप्त कर दिया। राधा | फिर एक नये सघप का समारम्भ हुआ । फस की दोनो कृष्ण । -० / कुरक्षेत्र की एक सांझ पलियां मगधराध जरासध की वेटिया थी। वह प्रतिशोध की आग बुझान के लिए दल-बल सहित मथुरा पर घिर आया। [प्रभाव आक्रमण का प्रभाव, घोडा रया की टाप ध्वनि काफी देर उभरकर मद पड जाती है। कृष्ण राधा ! जरास ध ने सोलह वार आक्रमण किया। उसे मैंने और बलराम ने प्रत्येक बार पराजित किया यह एक बहुत बडी चुनौती थी एक नये राज्य के लिए उठ रहे यदुवश ६ लिए जरास ध का भय बराबर बना हुआ था। मैं और युद्ध नही चाहता था चाहता था शक्ति सचय करना मैंने एक नया निर्माण किया दूर सागर मे एक द्वीप पर नया नगर निर्माण किया द्वारिका नगर और सम्पूण यदुवंश को वहीं ले गया। [प्रभाव काफिले के जाने का प्रभाव उभरकर विलीन हो जाता है।] [दृश्यान्तर का सगीत] दृश्य नौ राधा जन-कल्याण मेरा कृष्ण कृष्ण ! तुम द्वारिका चले गए। मुझे लगा मानो मेरी चेतना मेरे प्राण वही उडे जा रहे हो मथुरा मे तुम थे तो निकटता की अनुभूति बराबर बनी रहती थी । राधा ! मैं ता वेवल सक्ल्प बन चुका था प्रत या मैं कही भी जाने को तत्पर हो सकता था। हाँ राधा ! अब द्वारिका से सघप का एक और मायाम घुलता है। मुझे हस्तिनापुर से पाहवों का निमत्रण आया राजसूय यम भाग लेने का पाडवो ने दिग्विजय के उपलक्ष मे इसका आयोजन किया था। वहा भव्य समारोह था। [दृश्या तर का सगोत] कुरुक्षेत्र की एक सांझ/५१ दृश्य दस [प्रभाव मगल ध्वनियो का प्रभाव और जन कोलाहल उभरता है। व्यास शात । शात सभी शात हो। आर्यावत भारत खण्ड के वीर क्षत्रिय योद्धाओ। इस राजसूय यज्ञ में आपका अभिन दन करता हूँ हार्दिक स्वागत करता हूँ। यदुकुल भूपण, वीर शिरोमणि, श्रीकृष्ण निष्काम जन सेवी हैं। जन-कल्याण लोक मगल ही उनकी आराधना है । आज के सभापति पद के लिए मैं उनका नाम प्रस्तावित करता अर्जुन में इस प्रस्ताव का अनुमोदन करता हूँ श्रीकृष्ण से अनुरोध करता हूँ कि वे सभापति पद ग्रहण करें । [हप ध्वनि का प्रभाव उभरता है ।] फष्ण बधुओ | इस आदर के लिए मैं आपका आभारी हूँ। शिशुपाल ठहरो कृष्ण । आसन ग्रहण मत करना । एक गूजर ग्वाला सभा- पति-पद का अधिकारी नहीं हो सकता। अर्जुन (क्रोध मे) शिशुपाल । कृष्ण रुको अर्जुन | शिशुपाल को अपने विचार व्यक्त करने का पूण अधिकार है। अर्जुन मगर अशिष्टता का अधिकार तो नही। शिशुपाल यथार्थ, सत्य भापण अशिप्ट नही होता अजुन | यह कृष्ण, कहाँ का निष्काम साधक है ? यह निम्नजाति का गूजर ग्वाला अहीरो की छोकरियो से नाचने वाला यह कहाँ का वीर- शिरोमणि बन गया है ? हो । चोरी म यह बहुत प्रवीण है दूध माखन को चोरी नहा रही गूजरियो के वस्त्रो की चोरी राजकयाआ की चोरी अर्जुन शिशुपाल | तुम इतने नीच हो सकते हो ? शिशुपाल , तुम्हारे इस निष्काम लोक सेवक से अधिक नहीं यह महा धूत पाखण्डी छलिया क्पटी पूछो इससे । द्वारिका क्यो भाग गया है ?

५२ / कुरक्षेत्र की एक साँझ कृष्ण शिशुपाल क्च्ण । (दढ स्वर म) शिशुपाल । अब यदि एष भी शब् कहा तो तुम्हारा कुशल नहीं। (अटटहास से) मेरा युशल । अरे कायर | साहस है ता सामने आ? (ओजस्वी स्वर मे) सावधान शिशुपाल ! मैं सामने ही आ रहा हूँ सुदशन | मेरे वीर चक्र | शिशुपाल-से उद्दण्ड का शिर छेदन करो। तुरत । अविलम्ब । [प्रभाव सुदशन चत्र के चलने को गूज उभरती है और शिशुपाल का भयकर चीत्कार। वीर वधुओ। शिशुपाल की मा को मैंन इसक एक सौ एक अप क्षमा करने का वचन दिया था यह सीमा सहनशीलता की अतिम सीमा है। इसके जागे क्षमा कायरता है अभिशाप है अपमान का पान है। वीरो। यह राजसूय यज्ञ शाति-यज्ञ है यह अस्तित्व का अनुष्ठान है एकछत्र राज्य के अतगत, दढ केद्र के अन्तगत सभी राज्य शाति से रहे निर्वैर और निविरोध जीएँ यही इसका उद्देश्य है राज्यविस्तार की अमानवीय कामना इसके मूल मे कदापि नही । कदापि नही । [प्रभाव श्रीकृष्ण की जय श्रीकृष्ण की जय यह जयघोष उभरकर शात हा जाता है।] [दश्या तर का सगीत राधा कृष्ण दृश्य ग्यारह यह शिशुपाल तुम्हारी पटरानी रक्मिणी का मगेतर था न? हा । वही था मेरी फूफी का पुत्र भी तभी से इसके मन मे ईर्ष्या का नाग पल रहा था हा राधा ! इसी राजसूय यज्ञ मे प्रात मैं सभापति बना और दोपहर का मैंने सभी जूठे बतन उठाए और साफ किए मेरे लिए यह सेवा अधिक सुखद थी राधा । इसी यज्ञ म महाभारत का विप-बीज बाया गया।

कुरुक्षेत्र की एक साझ/५३
पाडव जूए मे कौरवो पे हाथ न केवल राज्य ही हार गए,
द्रौपदी को भी हार गए दुशासन द्रौपदी को कौरव सभा म
देशो से घसीटता हुआ ले आया द्रौपदी चीलार कर रही
थी
[दृश्या तर का सगीत]
दृश्य बारह
द्रौपदी
सुयोधन
द्रौपदी
सुयोधन
[प्रभाव द्रौपदी का चीलार उभरता है । सभा का
कालाहल भी।
बचाओ । बचाआ । छोड दे दुष्ट 1 छोड दे । सुयोधन ! यह सब
तुम्हारे आदेश से हो रहा है ? सुशासन को रोको सुयोधन ।
हाँ द्रौपदी | मेरे ही आदश से हो रहा है। तुमने कहा था न
अधे का पुत्र जधा
यह उसका प्रतिकार है।
नीच । नारी से, अपनी भावज से ऐसा नीच व्यवहार ?
(अट्टहास) द्रौपदी । अब तुम मेरी सम्पत्ति हो । जूए मे जीती
हुई हो। मैं तुम्ह अपनी जघाना पर विठाऊँगा सुशासन
इसका आचल उतार फेंयो। दुकूल उतार दो। आदेश पालन
हो।
सुशामन | निलज्ज ! छोड ६ । मेरा नाचल छोड दे। नीच ।
पशु ! मा गाधारी | तुम्हारी पट्टी अव भी नहीं खुतगालि
धृतराष्ट्र | पितामह । गुरु द्रोण ! आप मर मौन है?
विदुर । कहा गई आपको नीति ? सय मौन है!
खाने वाले अपनी अतर्रात्मा भी खा चुप हैं ।
द्रौपदी

५४ / कुरुक्षेत्र की एक साँझ [प्रभाव सुदशन की गूज का प्रभाव उभरता है। कृष्ण मैं आ गया द्रौपदी । में आ गया। (दृढ स्वर में) सावधान ! सुयाधन । सुशासन । छोड दो द्रौपदा का आँचल । हट जाओ आगे से मेरा सुदशन देख रहे हो? शिशुपाल वध भूल गए सुयोधन कृष्ण के होते हुए अबला नारी रक्षिता है कृष्ण का जन्म ही दीना-दलितो की रक्षा के लिए हुआ है । द्रौपदी सभा के बाहर चलो । वस्त्र संभालो। सावधान ! कोई अपने स्थान से न हिले । धतराष्ट्र | आज की एक भयकर दुखान्त की भूमिका है यह स्मरण रखना। चलो द्रौपदी [प्रभाव आतक भरा सगीत उभरता है।] [दृश्यान्तर का सगीत उभरता है] । घटना , राधा दृश्य तेरह कृष्ण । तुमन द्रौपदी के चीर बढाए उसके चीर, वस्त्र उतरने नहीं दिए जब यह घटना मैंन ब्रज म सुनी थी तो खुशी से झूम उठी थी राधा । तुम से जुदा होकर मैं एक सक्ल्प बन गया था लोक । कृष्ण कल्याण का संकल्प - राधा । जानती हा ! मेरे सरक्षण में सोलह हजार एक सौ राजक्याएं रही हैं उन सभी को भौमासुर ने भ्रष्ट किया था वे उसकी वदिनी थी मैंने भौमासुर को ललकारा था। [प्रभाव युद्ध का कोलाहल उभरता है और मद-मद चलता रहता है। [दृश्या तर का सगीत] कुरक्षेत्र को एक साँझ /५५ दृश्य चौदह कृष्ण राजक याओ । भौमासुर युद्ध में मारा गया है। उस दुष्ट ने आपको ध्रप्ट किया है मैं जानता आपके माता पिता आपको स्वीकार नही करेंगे कोई आपसे विवाह के लिए आगे नहीं आएगा। आपको समाज का कुष्ट माना जाएगा। मैंने आप सबके लिए द्वारिका में व्यवस्था कर दी है। आपके पूण भरण-पोषण का दायित्व मुझ पर होगा। वहा चलें। स्वावलम्बी बनें ।पवित्र आचरण से नये जीवन का समारम्भ करें। [दश्या तर का सगीत] दृश्य पन्द्रह मण (हंसते हुए) राधा ! मैं उनका स्वामी था, पति नहीं। तुम भी ऐसा मानने लग गई थी ? हूँ कही इतिहास म ऐसी भूल हा गई तो? हा राधा । फिर समारम्भ हुआ महाभारत का बनवास से लोटे पाडवो को उनके अधिकार देने से सुयोधन ने इकार कर दिया तनाव बढ़ने लगा मैं पाडवो की ओर से शाति दूत बनकर कौरव सभा मे गया। [दृश्यान्तर का सगीत] दृश्य सोलह कृष्ण [प्रभाव सभा का कोलाहल उभरता है।] महाराज धृतराष्ट्र | पितामह श्री। गुरुवर द्रोण | कौरव सभासदो। मैं सधि दूत शान्ति दूत के रूप में आया हूँ। चाहता हूँ कौरवा पाडवों का सघप टल जाए महायुद्ध की विभीपिका बहुत ही भयकर होती है युद्ध-पूव आतक युद्ध- ५६ / पुरुक्षेत्र की एक साझ कालीन विध्वस विनाश, युद्धोतर विषम मत्रास य युद्ध के ताडव चरण हैं। किसी के अधिकारी का दमन युद्ध का निमत्रण है शाति दोना पक्षा के लिए हितकर है पाडद केवल पांच गांव लेकर सतुष्ट हो जाएंगे बालिए महाराज सुयोधन देशव | पाच गाँव तो क्या सूई के अग्र भाग जितनी धरती भी हम उह नहीं देंगे । कृष्ण सुयोधन ! इसे युद्ध पी चुनौती मान लिया जाए? सुयोधन जैसी तुम्हारी इच्छा कृष्ण ठीक है । मैं पाण्डवा की ओर से युद्ध की चुनौती स्वीकार करता हूँ स्मरण रहे सुशोधन । युद्ध हमने चाहा नही है हमन मागा नही है हम पर आरोपित हुआ है सिवा इसे स्वीकारने के हमारे पास कोई विकल्प नहीं । सुनो सुयोधन । सभी सुनें । मैं, कृष्ण इस महाभारत युद्ध में भाग लूगा मगर अकेला नि शस्त्र युद्ध-काल म शस्त्र नही उठाऊंगा मैं अकेला एक ओर हूँगा मेरी सम्पूण सशस्त्र सेना दूसरी आर होगी मैं किम ओर हूँगा और मेरी सना किस ओर सुयाधन । इमका निणय तुम और अर्जुन मिलकर कर लेना युद्ध को स्वीकार करता हूँ अब महाभारत अनिवाय है अनिवाय है {प्रभाव सभा-रव उभरता है।] मैं [दश्या तर का सगीत भी] दृश्य सत्रह [प्रभाव युद्ध के रणसिंहो और वाद्यो का प्रभाव कुछ समय तक उभरकर मद मद चलता रहता है ।] अर्जुन केशव । जो शत्रु, बनकर माए हैं सब मेरे अपने हैं गुरु पितामह मातुल चाचा वधु सखा। राज्य के लिए इनका वध करूँ केशव। गोपाल | मेरी भुजाएँ शिथिल पड़ रही हैं । नसो म रक्त जम रहा है। हाथा म कम्पन जग रहा है। गाण्डीव उठाए नहीं उठना कृष्ण १ । कुरक्षेत्र की एक सांझ / ५७ अर्जुन | यह धमयुद्ध है अधिकारी के लिए किया जा रहा युद्ध अयाचित, आरोपित युद्ध यह सीमा विस्तार, राज्य विस्तार का युद्ध नहीं है। यह कायरता अशोभनीय है कौन क्सेि मारता है ? कौन मरता है ? अजुन | सब निमित्त बनते है अयथा आत्मा अमर अजर, अविनाशी है। तू निमित्त बनेगा मा माध्यम माध्यम मात्र शरीर बदलना पुराने वस्त्र बदलने के बराबर है सुना ! धमयुद्ध मे मरेगा तो स्वग मिलेगा, विजयी हागा तो राज्याधिकारी बनेगा कौन्तेय | उठ। युद्ध का सकरप बनकर उठ निश्चय बनकर उठ अजुन । धम मे आस्था रस वही अधिकार है फल मेरे पर छोड आप पर । (विस्मय म) आप पर । हा । मुझ पर मैं 'मेरा मैं' आत्मा का सकल्प है सब आत्मा के सक्रप पर छोड द देख अजुन | देख आत्मा का विराट् रूप मेरा विराट रूप अर्जुन कण अर्जुन [प्रभाव एक दिव्य प्रकार की गूज-सी उभरती है और मद मद चलती रहती है।] हजारा करोडा सूर्यो का प्रचण्ड प्रकाश हज़ारा मुख। उनसे निकल रही भीषण ज्वालाएँ । हजारो नेत्रो से बरस रहा आग्नेय तेज । हजारा भुजाएँ । हजाराचरण ह सनातन पुरुप । हे आदि देव । स्वामी | मुझे आत्मज्ञान हो गया। केशव । जनादन | मैं सब जान गया। मेरा मोह भग हो गया - प्रभाव पूर्व प्रभाव एक बार पुन उभरकर विलीन हो जाता है।] मधुसूदन | मेर मे नयी शक्ति नया ज्वार नयी प्राण चेतना जा गई है । मरी भुजाएँ पडक उठी हैं। देशव अपना पाचजय शख बजा दो करने वाला शख बजा दो। दिशाआको प्रकपित ५८ / कुरुक्षेत्र की एक साँझ [प्रभाव श्रीकृष्ण के शख का तुमुलनाद उभरकर मद पडता है और महाभारत युद्ध का भयकर प्रभाव काफी देर उभरकर मद पडन लगता है। [दृश्यान्तर का सगीत] दृश्य अट्ठारह । कृष्ण राधा उस युद्ध मे कोई नहीं मरा मैं ही बार-बार मरा मैं ही बार बार घायल होकर गिरता मैं ही घायल होता मैं ही चीत्कार करता १८ दिन के महाभारत मे मेरा ही रक्त बहा है उस सम्पूण युद्ध का सवनाश मैंने अपने पर आढ लिया है उसकी विभीपिकाओ को अपने पर सहा है (थके स्वर म) राधा | इसीलिए मैं काला पड गया हूँ मुझे ग्रहण लग गया है मेरा शख मेरी वासुरी का ही स्वर है मेरा सुदशन मेरे शख का ही तेज है बासुरी, जीवन का आनद, उल्लास, माधुय है शाख सकरप का जयघोष जयनाद है और सुदशन, शौय पराक्रम का रूप है यही तो है तुम्हारा कृष्ण [प्रभाव दूर से व्यास के स्वर मे गीता का श्लोक उभरता है। व्यास (गाकर) सप धर्मान् परित्यज्य मामेक शरण ब्रज । अह त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुच ॥ क्णु लगता है सूय ग्रहण समाप्त हो गया है। कृष्ण हो । सूय राहु की कालछाया स मुफ्त हो गया है। [प्रभाव बांसुरी का प्रभाव उभरकर मद मद चलता रहता है। राधा (उल्लास भरे स्वर मे) पण । वणु। मेरी ज्योति लौट रही है ! आँखा स अधकार उड़ रहा है । आँखा मै रग भर रहे हैं प्रवाण यी सुनहरी किरणें, आलाक के पावन कण, पुत लियामोधा रह हैं पण । कणु ' मैं तुम्ह देख रही हूँ वही सलाना स्प | वही राधा 1 कुरुक्षेत्र की एक सांझ / ५६ उस राधा माधुरी । वही लावण्य | नयनो की वही बाकी चितवन ।और वही बांसुरी । कृष्ण वर्षों पूर्व कुरक्षेत्र का महाभारत ही मुझे ग्रस गया था राधा । यही से मैन गीता स देश दिया था अर्जुन मे मैंने स्वय को देखा था स्वय को शिथिल हाते पाया था गीता-ज्ञान स्वय को दिया था स्वय को तुम्हारे सामने खडा कर शान मे थी तुम तुम्हारा योग तुम्हारी शक्ति तब से तुम मेरे ध्यान मे तिरती रही मैं तुम्हारा प्राणायाम करता रहा | मैंन युग सम्मण का विष पिया है उस हलाहल का पान कर युग चेतना को प्रतिष्ठा दी है तुम्ही तो मेरे युगबोध को दष्टि हो। तुम्ह पाकर मानो मेरा ग्रहण भी टूट गया है वही कुरुक्षेत्र मे वर्षों पूर्व मुझे महाभारत का सत्रास ग्रस गया था और आज यही मैं उस काल ग्रहण से मुक्त हुआ हूँ। राधा क्णु । मेरे मोहन ' का हा । तू मेरा है न ? मेरा ही है न राधा तून ही तो मुझे अथ दिया है रेखाक्ति क्यिा है राधा के सदभ मे ही कृष्ण का, कृष्ण की गीता का अर्थ है तुम मेरा मात्र हो और मैं तुम्हारी टीका हूँ तुम्हारा भाग्य हूँ आज हम सटीक हुए हैं। कणु | मा यशुदा की आखो का ग्रहण भी उतर रहा होगा बह रहा होगा। चलो मा बाबा के पास चल ! कृष्ण चलो राधा। [प्रभाव वासुरी का प्रभाव बहुत देर उभरकर धीरे धीरे विलीन हा जाता है ।] ? करण राधा ।

प्रबुद्ध
आचाय चतुरसेन
दृश्य एक
[मृदु त तु वाध की अस्फुट ध्वनि]
(नेपथ्य म) वृद्ध महाराज शुादन विशेष प्रसन दिखाई पड़ रहे
हैं। ये प्रासाद वे भीतरी अलिद में एक स्फटिक्मणि पीठ पर
बैठे हैं । उहाँने सम्मुख यो प्रतिहार का पुकारकर कहा
महाराज अरे, दख ता, युवराज सिद्धाथ अभी मगया स लौटे या नहीं।
प्रतिहार (आगे बटने को पदचाप और बालम धरती पर टक्न का शब्द)
महाराज की जय हा । परम परमेश्वर भट्टारक पादीय महाराज
कुमार अभी अभी मगया म लौटे हैं। अब वे वायुमण्डप में
विधामभर रह हैं।
महाराज (बुछ हमरर) अच्छा, अच्छा । महानायर प्रयुद्धसेन और महा-
मात्य विजयादियका यहाँ
সনি বা সাদা মাল।
जान थी पदचाप बसम पृथ्वी पर टेक्न का
महाराज ठहर, चयरवाहिनी को यहाँ
प्रतिहार जो आना।
प्रतिहार में जाम
परवाहिनी जय हो दव, निसरी ।
आन
है
mp

प्रवुद्ध /६१ महाराज (प्रसन स्वर मे) अरी विजया, जा राजमहिषी मे कह दे, कि आज ही तो भाण्ड वितरण का दिन है। सभी राजकुमारियां आ गई होगी। महिषी स्वयं उनकी सुश्रूषा करें। ऐसा न हो कि किसी को खिन होने का अवसर मिले। घवरवाहिनी जैसी महाराज की आज्ञा । [चवरवाहिनी के जाने और महानायक प्रबुद्ध सेन के आने का शब्द महानायक (खड्ग कोप से खीचन और उप्णीप से लगाने का शब्द) परम परमेश्वर, परम वष्णव महाराज (हँसकर) हुआ । महानायक, आज सारी ही सना सज्जित रहनी चाहिए। ज्या ही कुमार सिद्धाथ अतिम भाण्ड वितरण करें, त्या ही जयघोप और सैनिक अभिवादन होना चाहिए। आज ही कुमार सिद्धाथ सना को पताका प्रदान करेंगे। महानायक महाराजाधिराज की जय हो । समस्त सेना सज्जित होकर महा भट्टारक महाराजकुमार के अतिम भाण्ड वितरण की प्रतीक्षा कर रही है। कचुकी (पुकारकर) महामहिम महामात्यचरण विजयादित्य पधार रहे महामात्य महाराज की जय हो। महाराज (हंसते हुए) महामात्य, अब तो समय उपस्थित है। फिर विलब क्यो? सभी राजकुमारियां आ तो गइ। तुम कुमार सिद्धाथ को तृतीय अलि द मे ले जाओ। वही भाण्ड वितरण होगा। हाँ, तुम कुमार के सवथा निकट रहना और उनकी गतिविधि का सूक्ष्म निरीक्षण करते रहना । नेत्रा का तारतम्य और ओष्ठ स्फुरण गूढ मनोगत भावा को प्रदर्शित कर देगा। ज्यो ही तुम देखो, कुमार किसी क्या के प्रति आकर्षित हुए हैं त्यो हो तुम शखध्वनि करना और पुरोहित को शुभ सवाद देकर मेरे निक्ट भेजना । (हंसते हैं।) [अमात्य भी हंसते हैं। अमात्य (हंसते हुए) जो माज्ञा ।' पिरन्तु पालोयन हत्यार तक नहीं आई है। वह [दण्डधर वे आपर माला टेकने की आवाज - ६२/ प्रवुद्ध दण्डधर महाराज (पुवारकर) जय हो दव, कोली राजनदिनी महाभट्टारक महाराजकुमार के भाण्ड-प्रसाद पान की अभिलाषा से आई हैं। वे द्वार पर उपस्थित हैं, और देवचरणा मे अभिवादन निवेदन कर रही हैं। (उठते हुए जल्दी म) जाओ, जाओ, महामहिषी से कहो कि वे स्वय कोली राजनांदनी वी यथोचित अभ्यथना करें। [जाने का पदचाप] (स्वगत) अहा, आज हमारे पूर्वजो के पुण्य प्रताप से यह शुभ दिन आया । अस्तगत जीवन म आशा की ज्याति पूटी। हमारा सिद्धाय, मेरे नयो की ज्योति,मेरो वद्धावस्था का सहारा, हमारे शाक्य वश को उज्ज्वल करेगा। अब तो मैं इस दुस्सह राज्य भार को उसी के कंधो पर डाल निश्चित हाऊँगा। (जरा ऊंचे स्वर से) जाओ, अमात्य जाओ, तुम भी जाओ। दखना, काय नम म काई त्रुटि न रहने पाए। मैं चला महाराज। [जाने को पदचाप] अमात्य दृश्य दो (नेपथ्य म) वायुमण्डप की एक स्वच्छ स्फटिक शिला पर सिद्धाथ विषण्ण वदन बैठे थे। उनके शरीर पर केवल एक उत्तरीय और अधोवस्त्र था। वे मानो किसी गहन चिन्ता मे मग्न थे। वसत की मृदुल वायु उनके काकपक्ष को लहरा रही थी। कुसुम गुच्छ झूम झूमकर सौरभ बिखेर रहे थे। तप्त स्वण के समान उनको शरीर काति उन महीन वस्त्रा से बिखरी पडती थी। उनका मुख, चिन्तन की गम्भीर भावना के कारण प्रस्फुटित विशारावस्था की उत्फुल्लता से रहित हो गया था। पर उनका अप्रतिम सौदय कुछ और ही रंग ला रहा था। उनको सुडौल गदन विशाल वक्षस्थल, प्रलम्ब वाहु और केहरो जसी ठवन असाधारण श्री। सुकोमल हृदयगत भाव सुकुमार देह और पुसत्व और उदगम, एक अलौकिक मिश्रण बना रहे पे। वे शिलाखण्ड पर बैठे दोनो हाथ जागुआ मे देकर सम्मुख प्रबुद्ध/६३ पुष्करिणी म खिले एक कमल पुष्प पर वार वार मत्त भ्रमर का प्रणय आक्रमण देख रहे थे। परतु उस विनोद का कुछ प्रभाव उनके हृदय पर था, यह नहीं कहा जा सकता। उनकी दृष्टि भ्रमर पर भी अवश्य, पर वे क्सिी गूढ जगत मे विचरण कर रहे थे। कभी कभी उनके होठ फडक उठते और काई अस्फुट शब्द- ध्वनि उनम से निकल जाती थी। वे इतने मग्न थे कि कब कौन उनके निकट आ खडा हुआ, यह उहे नही ज्ञात हुआ। [बलाधिकृत के आने की पदचाप] बलाधिकृत महाभट्टारक राजकुमार की जय हो। सिद्धाथ (घबराफर) मोह, आय हैं। आपके पधारने का तो मुझे भान तक नही हुआ । अभिवादन करता हूँ। बलाधिकृत (हँसते हुए) आयुष्मान एधि कुमार | मेरे आने का तुम्हे कैसे भान होगा भला, तुम तो वत्स, अपन ही म भूले रहते हो । क्षण भर भी विलम्ब हुना कि तुम गम्भीर चिन्तन मे मग्न हुए। कुमार क्या प्रतापी शाक्य वश के एकमात्र उत्तराधिकारी के लिए यह उचित है? सिद्धाथ आय, क्षमा कीजिए। मैं भविष्य में ध्यान रखूगा। परतु आज मेरी परीक्षा हो गई न? बलाधिकृत आशातीत वत्स । तुम्हारे जैसे अन्यमनस्क शिष्य से मुझे इतनी आशा न थी। सभी कहते थे, कुमार लक्ष्यवेव नहीं कर सकेंगे। तुम अभ्यास ही कब करत थे। परतु आज मैं ध य हुआ। तुम वाक्य-वश के दीपक हो। मैं भविष्यवाणी करता हूँ-तुम अप्रतिम योद्धा सिद्धाय (धात काटकर) आय, पुरजन फिर तो मेरी परीक्षा का हठन करेंगे? बलाधिकृत कभी नहीं । वे पूण सन्तुष्ट हैं। सवन ही तुम्हारी अप्रतिम शस्त्रकला की चर्चा हो रही है । पर तुम क्या विशेष परे हुए हो पुष ? सिद्धाथ तनिक भी नहीं । बलाधिकृत तब यह एषान्त सवन क्यो? यह गम्भीर चिन्तन क्या? और यह विषण्ण मुखमुद्रा क्या सिद्धार्थ आय अत्यन्त स्नह के कारण ऐसा विचारते हैं। परन्तु (रुकवर और बात अधूरी छोडकर) अरे, महामात्यचरण इधर ही पधार रहे हैं। आय, हम आगे बढकर अमात्यचरणा की अभ्यथना करनी चाहिए। बलाधिकत यही उचित शिष्टाचार होगा पुत्र [दोनो के चलन की पदचाप] सिद्धाय अमात्यचरण का अभिवादन करता हूँ। अमात्य स्वस्ति आयुष्मन् । तुम आज आखेट म विजय प्राप्त पर आए, इस समाचार से अत पुर म विशेष उरलास हो रहा है। महिपी पी इच्छा है कि आज सभी गजकुमारियां समुपस्थित हैं । कुमार उह अपन हाथ स रत्नभाण्ड प्रदान कर प्रतिष्ठित करें। दाय (लजाकर) जैसी मातचरण तीनो के चलने की पदचाप, माद वाद्य ध्वनि आना। दृश्य तीन नेपथ्य मे उपा की स्वणिम रश्मि रेखा को भाति सबके अन्त मे कोली राजनदिनी यशोधरा न वक्षम प्रवेश किया। मानो, उहे दयते ही कुमार सिद्धाथ का चिरनिद्वित यौवन जाग्रत हा उठा। वह धीरे धीरे सौरभ आलोक और शोभा विखैरती हुई व्यासपीठ तक पहुँचकर कुमार के सम्मुख खडी हो गई। वह सिमट रही यी और जुक रही थी। न जान अविकसित यौवन के भार से, अथवा लज्जा ने भाव से। वह सम्मुख खडी होकर भूमि पर दष्टि गहाए पदनख से धरती पर बिछे स्फटिक प्रस्तर पर रेखा खीचो वा असफल प्रयास कर रही थी। पुमार चित्रलिखित से उस देखते रह गए। ये जागृत ही प्रस्तुत से थे । कुमार के निकट राडे महामात्य ने कहा- पोलो राजनदिनी को भाण्ड प्रदान करो आयुप्मान् । (धवरावर अस्त-व्यस्त स्वर मे) शुभ, तुमने अतिविलम्ब कर दिया। भाण्ड तो मभी वितीय हो चुके। (पर) वितु यह मणिपाल पुमार अपने षण्ट में मणि माला उनारवर राज रागान्दिनी पेमण्ठ म हाल दी थुमारी न दृष्टि उठावर सुमार प्रदीप्त महामात्य सिवाय पप्यमे

प्रबुद्ध/६५
मुखमण्डल को देखावे पत्ते की तरह कापन लगी। उनका मुह
प्रस्वेद से भीग गया। बुमार जडवत् खडे थे-हठात
[शख ध्वनि और भुशुण्डिका का गजन]
सिद्धाय आय यह क्या हुआ? अरे, अमात्यचरण कहाँ चले गए।
राजकुमारी राजकुमारी! (कोमल स्वर म) राजनदिनी क्या
प्रतिदान की अभिलाषिणी हैं ?
नेपथ्य मे कोलिय राजकुमारी पुप्पभार से झुकी हुई, लतिका की भाति
अकेली ही उनके सम्मुख खडी थी। कुमार का वाक्य सुनकर
उनके अधरोष्ठ पर एक क्षीण हास्य रेखा और कपोलो पर लाली
आई और गई। उहोने नतजानु होकर मद स्वर मे कहा-
राजकुमारी कुमार प्रसन हो ।
[जाने की हल्की पदचाप]
दृश्य चार
नेपथ्य में क्या हम प्रेम की व्याख्या करें? उस प्रेम की जहा सम्पत्ति प्रेम
की माध्यम नही है, जहां केवल प्राणा में प्राणो का लय है। जो
नेत्र पटल पर तोला नहीं जाता, केवल आत्मा जिसमे विभोर
होती है । जो जीवन से मृत्यु तक, और मृत्यु से परे भी वैसा ही
पारिजात कुसुम की तरह अक्षय विकसित रहता है । वासना का
यह सम्पर नही भोग और तप्ति का यहाँ प्रसग नही । अभिलाषा
और अरुचि दोनो ही यहा नहीं। जहाँ दु ख नहीं आनद ही
आनद है। जहां कुछ भी प्राप्त करने की अभिलापा नहीं, सब
कुछ प्राप्त है। दाम्पत्य जीवन मे यह प्रेम सि महाभाग ने
प्राप्त किया?
गौतम (यशोधरा का आंचल खीचकर) अब बस करो प्रिये चगेरी तो
भर चुकी। अब इन पुष्पा को लताओ में इसी तरह विकसित
छोड दो, जिमसे कल तक तो खिले रह सकें । देखो, जिन डालियो
पुष्प तुम तोड चुकी हो, वे कितनी अशोभनीय हो गई हैं।
यशोधरा होने दो आयपुत्र, ये कल फिर फूलो से लद जाएँगी। यह तो
इनका प्राकृतिक स्वभाव है। आप व्यथ ही इतना विषाद करते

६६/प्रबुद्ध गौतम व्यथ ? ही नही, प्रिये । इन युसुम-लतियाना के प्रति तुम्हारा आचरण नितात निष्ठर है। अभी प्रात वाल तो तुम इह अपन हाथा सोच रही थी, सा क्या इसीलिए यशोधरा और नही तो क्या आयपुत्र ? क्या मुझे ऐसी ही निस्वाथ समय बैठे हैं। मैंने सोचा है तो मैं फूल भी चुनूगी । यह तो जगत की गति है और निष्ठुर आचरण क्या इतना ही, अभी तो मैं सूची से इह बोधकर माला गूथूगी। ये यूथिका, चम्पा, मालती और कुद क्या यो ही अस्त-व्यस्त चगेरी म पड़े रहग, जैस आयपुत्र के विचार। गौतम उलाहना मत दो प्रिये । तुम्ह तो उदार होना चाहिए। तुम तो राजनदिनी हो। हाय-हाय । क्या तुम इन कोमल पुप्पो को सुई से विद्ध भी करोगी? यशोधरा आयपुत्र दखते रह, मैं एक एक को विद्धकरूंगी। मैं राजर्नादनी हूँ। पालन करना, कर ग्रहण करना और दण्ड विधान से शासन और सुव्यवस्था बनाए रखना मेरा क्त्तव्य है। जल से सिंचन करके मैंो इनका पालन किया, पुष्प चयन करके कर ग्रहण कर रही हूँ, और भव सूची-वेध के बल इहें सुयवस्थित करके माला बनाऊँगी। फिर वह आयपुत्र के वक्ष स्थल पर सुशोभित होगी, और मेरे परिश्रम का वेतन मुझे प्राप्त होगा। (हंसती है।) गौतम (दढ स्वर मे) पर मैं विद्रोह करूंगा। अब मैं तुम्हें अधिक यह शापण न करने दूगा। प्रिये चाहो तो मुझे दण्ड दो। यशोधरा (हंसती हुई) अच्छी बात है। तो मैं आपको इन भुजवल्लरियो मे बाध लेती हूँ। नेपथ्य मे यशोधरा न कुमार के कण्ठ मे कामल भुज मृणाल डाल दिये। कुमार के अतस्तल मे सदैव जाग्रत प्रबुद्ध सत्ता उस मद से क्षण भर को मूच्छित हो गई। उहान पत्नी को प्रगाढ आलिंगन में क्स लिया। यशोधरा (हंसकर) आयपुत्र स्मरण रखें कि यह अनुग्रह वेतन मे नही काटा जागा, पुरस्कार मात्र समझा जाएगा। गौतम (हंसकर) गोपा प्रिये, उस दिन तो तुम इतनी चपला नहीं थी, जिस दिन भाण्ड वितरण यशोधरा (बात काटकर) आयपुत्र के पास इस बात का क्या प्रमाण है कि मैं वही बालिका हूँ? गौतम वही तो हो प्रिय । नत्र और ये ही अधरोष्ठ। इह क्या में प्रबुद्ध /६७ भूल सकता हूँ। ओह, इही ने तो मुझे ठगा। ओफ। (गम्भीर चिन्ता मे मग्न हो जात हैं।) यशोधरा (व्याजकोप से) आपको भ्रम हुआ है । वे थी कोलीराज नदिनी यशोधरा। और मैं हूँ भगवती गोपा-शाक्य सिंहासन की युवराज्ञी। गौतम अच्छा प्रिये, अब चलो, प्रासाद मे चलें। सूय अस्त हो रहा है। तुम्ह शीत का भय है। यशोधरा जैसी आयपुत्र को आना । [दोनो जाते हैं। दृश्य पाँच [कोई रात्रि का पक्षी रक-रुककर बोल रहा है। कभी- कभी हवा के झोंके का शब्द] गोपा अद रात्रि तो व्यतीत हो गई। त्रिशिरा नक्षत्र आकाश के मध्य भाग मे आ गया। आयपुत्र क्या अभी शयन न करेंगे? गौतम मोह प्रिये, तुम अभी तक जाग रही हो । गोपा सारा ससार मोहमयी निद्रा म शयन कर रहा है आयपुत्र । गौतम हाय, यह कैसे दुख की बात है । गोपा कैसा अधवार है गौतम पर मेरा हृदय प्रकाशित है। गोपा पर स्वामिन, आपके इतने निक्ट रहकर भी, मैं उस प्रकाश की एक किरण भी नहीं देख पाती है। गौतम मैं तो उसे ससार के प्राणि मात्र को दिखाने की बात सोच रहा गोपा इस स्तब्ध अघ निशा मे, गौतम अध निशा तो मानव हृदय मे ओत प्रोत है। तुम समझती हो, जब सूर्योदय होगा, तब वह छिन भिन्न हो जाएगी? गोपा मैं मूर्खा स्त्री क्या समझू भला । गौतम नहीं गोपा, आत्म प्रतारण की आवश्यकता नहीं। पर इस बात को तो सोचो। मानव-आत्मा न जाने कब से इसी प्रकार सो रही है, जैसे इस समय ससार, और वह उसी प्रकार अधकारम ६८/प्रबुद्ध । 1 व्याप्त है, जैसे इस समय यह पृथ्वी। यह निद्रा और अधकार कुछ समय मे दूर हो जाएगा, उपा का उदय होगा, जगत सुदर हा उठेगा । प्रकृति भाति-भांति का रग शृगार करेगी। आलोक से आकाश और भूलोक शाभायमान होगा । आहा कसी सुन्दर बात है। परन्तु मानव-हृदय का अधकार और सुपुप्ति तब भी दूर न होगी। वह अक्षय अधकार, यह चिर मोहनिद्रा मनुष्य पर अभिशाप है। मनुष्य जाति के इस दुर्भाग्य पर तुम्ह करणा नहीं आती प्रिये। गोपा और इस अन त मानव समुदाय में अकेसे आयपुत्र ही जानत हैं ? गौतम प्रिय, व्यग्य क्या करती हो? गोपा अच्छा आर्यपुत्र, आप इस अधकार मे जाग्रत रहकर किस सौभाग्य की आशा करते हैं ? इस अधकार मे तो जाग्रत पुरुष की अपेक्षा सुख से सोये पुरुष ही अधिक भाग्यशाली हैं। गौतम (उत्तेजित स्वर मे) कि तु उनका कभी प्रभात न हो तो उस निद्रा का कभी अवसान न हो तो? [गोपा निरुत्तर बैठी रहती है ।] प्रिये, यदि मैं अपने प्रकाश की रेखा से इस अधवार को छिन्न छिन कर सक-जाग्रत हार मानव समाज सुदर आलोग देखे, तो? गोपा, तब क्या हमारा जीवन ध य न होगा? गोपा गौतम तब इसके लिए हृदय विद्रोण करना होगा। गोपा (भीतर मुद्रा स) विदीण ? (कुछ स्ककर स्वगत भाव से) हृदय विदीण करना होगा। हृदय विदीण [देर तक रोने और सिसकियाँ लेने का शब्द] अवश्य । दृश्य छह [सदली हुई वाय-ध्वनि] गौतम दसो प्रिये, यह क्या हो रहा है। गोपा मायपुत्र का अभिप्राय क्या है ? उग पूली और दयो तनिर, अभी कुछ देर पूर्व सूप किरणों में इसे छुपाया और यह छिन पहा । मय गुम हो मान की प्रबुद्ध / ६९ हो रहा है और यह मुरझा कर डाली पर झुक गया है । अब यह सूखकर झड जाएगा। गोपा आयपुत्र इम पुष्प के प्रति विशेष आकृष्ट हैं । गौतम गोपा प्रिये, मनुष्य का जीवन भी ऐसा ही है । [गहर गहर सांस लेन का शब्द और मौन] गोपा (धवराई आवाज मे) आयपुत्र अब क्या सोच रहे हैं? गौतम (चौंक्कर) आह, कुछ भी तो नहीं प्रिये । आज मैं नगर मे गया था। वहाँ मैंन राजपथ पर एक पुरुप देखा, जो एक लाठी के सहारे बडे कप्ट से चल रहा था। उसके नेत्र इतने विभ्रम थे कि उनकी अपेक्षा नेत्र न होते तो हानि न थी। दांत सभी गिर गए थे। उससे उसका मुख तो विकृत हो ही गया था, वाणी भी अस्पष्ट हो गई थी। उसकी खाल दीली होकर लटक गई थी और हड्डिया चमक रही थी। उसका अग-अग कांप रहा था। वह घडे चाव से मेरी ओर देख रहा था । मैं उसके निकट गया। उसने कांपते कांपते हाथ को ऊपर उठाकर मेरा अभिवादन क्यिा, और कहा- 'कुमार, एक दिन मैं तुमसे भी अधिक सुदर था और एक दिन तुम भी ऐसे ही हो जाओगे।' मैंने सोचकर देखा-उसका कथन सत्य हो सकता था। गोपा (भरे हुए कण्ठ मे) आयपुत्र । गौतम कुछ और आगे चलने पर मैंने एक और हृदय द्रावक दृश्य एक पुरुष को लोग उठाकर ले जा रहे थे। मैंने उहे रोक्कर पूछा-यह क्या है ? उहाने कहा- यह आदमी मर गया है । मैंने उसे देखा । वह न हिल सकता था, न बोल सक्ता था । उसमे प्राण नही थे । वे उसे भस्म करने को ले जा रहे थे। एक ने कहा--अन्त मे सभी को यही भोगना पडेगा। गोपा हाय आयपुत्र गौतम (कातर कण्ठ से) यह कैसी भयानक बात है । राजा और रक यहा विवश हैं। क्या इस दुख से छूटने का कोई उपाय ही नही है ? फिर ये सुख? राजप्रासाद? धन और अधिकार ? क्या ये विडम्बना मात्र नहीं हैं ? जब ये चिरस्थायी ही नही -जब उस अवश्यम्भावी अवस्था के प्रतिकार मे ये समय ही नहीं तब? (जोर मे पुकारकर) प्रिये गोपा | तब? गोपा (भयभीत मुद्रा मे) आयपुत्र, आयपुत्र । देखा। 1

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प्रबुद्ध/७१ । वह सरम कैस होगा? गोपा के प्रेम-पाश को तोडन में मैं वितना बल लगा चुका । वह टूटा नही । अब यह पुत्र ! अरे, कैसा सुदर है। यह इसे केवल एक बार देखने के लिए मैंन समस्त सयम नष्ट कर दिया। वह स्वण को दीप्त कान्ति धारण परन वाले अद्ध निमीलित नत्र, छोटा-सा मुख, मानो मेरी ही एक सजीव छाया मुझसे पृथक परतु मेरे प्राणों की एक कोर। मैंने प्राण दिए, और गोपान शरीर । गोपा के समान सुदर और प्रिय, कोमल और रचिर । अरे, वह मेरा पुत्र है । हम दोना के प्राण और शरीर जिस महायोग में एक राशि पर आए, उस इद्रियातीत आनद का आदान प्रदान जिस क्षण हुआ, उसकी ऐसी स्थायी स्मति ? गोपा, जादूगरनी, यह क्या क्यिा । मैंने उसे गोद में उठाया, गोपा का वह मूक अनुरोध अप्रतिम उल्लास, जसे उसके प्राण हो नत्रो मे आ गए थे, जब उसने उस पुन को मेरी गोद मे देकर चरण चुम्बन किये। गोपा ने कहा था-उसके नेत्र मेरे ही जैसे हैं। अरे, कही मैंने ही तो जम नहीं लिया है। नही तो अबोध बालक पर मेरी इतनी ममता क्यो होती? नेपथ्य मे गम्भीर रात्रि मे गौतम इन विचारो मे डूबे हुए उपवन मे टहल रहे थे । कोमल शय्या पर उहे नीद नहीं आ रही थी। कभी वे स्वयं ही अपनी आहट से चौंक उठते । उनके मुह से फिर ये शब्द निकले- गोतम अरे, यह कैसा सुख, यह कैसा सौभाग्य जिसमे निद्रा का भी नाश हो गया। सारा ससार सो रहा है। अहा, यही तो चिन्तनीय विषय है । जो सुख है वह ही दु ख का मूल है । कोई भी ऐसा मनुष्य नही जो मानव जीवन की इस कठिन व्याधि का उपाय जानता हो। नेपथ्य मे सिद्धाथ एक जामुन के वृक्ष के नीचे बैठकर जीवन, मरण और उत्पत्ति के विचार म मग्न हो गए। उस अभेद्य अधकार मे उनके दियच खुल गए। उनसे उहाँने देखा, दुखदायी मत्यु अनिवाय है। फिर भी लोग अज्ञान के अधवार मे ही जीवन ध्यतीत करते हैं। सत्य की खोज नहीं करते। कुमार का हृदय जीव दया से भर गया। हात उन्हा नीचे एक गम्भीर महापुरुप है। गौतम तुम कौन हो भाई सम्मख ७०/प्रबुद्ध गौतम (उतावली से) प्रिये, कोई गूढ वस्तु कही छिपी है। गोपा (सहमती हुई) क्या इस राजसम्पदा से, अधिकार सत्ता से भी अधिक? गौतम (शात स्वर मे) हा। गोपा यौवन, सौदर्य और आनद से भी अधिक गौतम गोपा आपकी इम चिर किंवरी से भी अधिक। गौतम आह गोपा प्रिये | ठहरो। वह गूढ वस्तु हम प्राप्त करनी चाहिए। गोपा और वह है कहा ? गौतम मैं उसे ढूढ़ गा। वह मनुष्य मात्र के दुख को दूर करने की तालिका होगी। [कुछ दर स नाटा] गोपा उठिए आर्यपुत्र, हो गया आपका नगर निरीक्षण, अब आप मेरी सारिका का भी निरीक्षण कीजिए । देखिए, यह आपकी तरह मेरा नाम पुकारना सीख गई है। आज आपको उस मपूर के जोडे का स्वय भोजन कराना होगा। इसके सिवा माज आप अधबार निरीक्षण न कर पाएंगे। अभी से शयन-कक्ष मे चलना होगा। गौतम (ठण्डी साम लेकर) अच्छा प्रिये, तुम्हारी ही बात रहे। दृश्य सात [बहुत से शख और घडियाल बज रहे हैं। दूर पर स्त्रिया ये मगल गान मा अस्फुट स्वर । कई मनुष्य बात कर रहे हैं नि कुमार सिदाथ पे पुत्र उत्पन हुआ है । इस प्रकार पोधातचीत पो अस्फुट अभिव्यक्ति गौतम एकान्तम टहल रह है-वातावरण बदलता है शोरगुन कम होता है. एकाध पनी बोल उठता है । कोयल कर रही है। पुत्र ! यह सोएर नया व धन उपन हा गया । गापा क्याम पी। वह आनन्द और हास्य वा मधुर अमृत एराण भी मुस नोरम नही रहन दना पाहता। परतुना स्वभाव स नीरस है प्रबुद्ध/७१ । वह सरस कैसे होगा? गोपा के प्रेम-पाश को तोडन मे मैं कितना बल लगा चुका । वह टूटा नही। अब यह पुन | अरे, कैसा सुदर है | यह इसे केवल एक बार देखने के लिए मैंने समस्त सयम नष्ट कर दिया। वह स्वण की दीप्त काति धारण करने वाले अद्ध-निमीलित नत्र, छोटा सा मुख, मानो मेरी ही एक सजीव छाया मुझसे पृथक, परतु मेरे प्राणा की एक कोर। मैंने प्राण दिए, और गोपाने शरीर । गोपा के समान सुदर और प्रिय, कोमल और रुचिर । अरे, वह मेरा पुन है । हम दोनो के प्राण और शरीर जिस महायोग में एक राशि पर आए, उस इद्रियातीत आनद का आदान प्रदान जिस क्षण हुआ, उसकी ऐसी स्थायी स्मृति ? गोपा, जादूगरनी, यह क्या किया। मैंने उसे गोद में उठाया, गोपा का वह मूक अनुरोध, अप्रतिम उरलास, जैसे उसके प्राण ही नतो मे आ गए थे, जब उसने उस पुन को मेरी गोद मे देकर चरण चुम्बन किये। गोपा ने कहा था-उसके नेत्र मेरे ही जसे हैं। अरे, कही मैंने ही तो जम नहीं लिया है । नहीं तो अबोध बालक पर मेरी इतनी ममता क्या होती? नेपथ्य मे गम्भीर राग्नि म गौतम इन विचारो म डूबे हुए उपवन मे टहल रहे थे । कोमल शय्या पर उह नीद नहीं आ रही थी। कभी वे स्वयं ही अपनी आहट से चौंक उठते । उनके मुह से फिर ये शब्द निक्ले- गौतम अरे, यह कैसा सुख, यह कैसा सौभाग्य जिसमे निद्रा का भी नाश हो गया। सारा संसार सो रहा है। अहा, यही तो चिन्तनीय विषय है | जो सुख है वह ही दु'य का मूल है । कोई भी ऐमा मनुष्य नहीं जो मानव जीवन की इस कठिन व्याधि का उपाय जानता हो। नेपथ्य मे सिद्धाथ एक जामुन के वक्ष के नीचे बैठकर जीवन, मरण और उत्पत्ति के विचार म मग्न हो गए। उस अभेद्य अधकारम उनके दिव्यचक्षु खुल गए। उनमे उहान देखा, दुखदायी मृत्यु अनिवाप है। फिर भी लोग अनान के अधवार मे ही जीवन व्यतीत करते हैं। सत्य की खोज नहीं करते। कुमार का हृदय जीव-दया से भर गया। हात हातामह नीचे एक गम्भीर महापुरुषधी हे गौतम तुम कौन हो भाई, । 7 ७२ / प्रबुद्ध श्रमण भ्रमण व्यक्ति मैं श्रमण हूँ। गौतम तुम कहा से आये हो? मैं बुढापे के दुखा और रोग की पीडा तथा मत्यु के भय से घर द्वार त्याग कर निकला हूँ। मै मुक्ति का अवेषक हूँ, क्योकि ससार के सब पदाथ नाशवान हैं। केवल सत्य ही नष्ट नहीं होता । प्रत्येक वस्तु बदलती रहती है, कोई भी पदाथ स्थिर नहीं है । मैं अक्षय आनद को ढूढ रहा हूँ। मैंने ससार को त्याग दिया है और इद्रिया को जीत लिया है । गौतम मै भी इद्रियो के विषया की निस्सारता को भली भांति समझ गया हू। भोग से मुझे घृणा हो गई है। मेरा जीवन मुझे शूय दीखता है। क्या तुम बता सकते हो कि इस अशात जगत म शाति कहां मिल सकती है? जहाँ उष्णता है वहा शीतलता भी है । पर महत्वल्याण के हेतु महत्यम भी करना चाहिए। तुम्हे निर्वाण की ओर जाना चाहिए। निर्वाण सरोवर मे स्नान करने से सारे पाप ताप दूर हो सकते हैं। गौतम तुम्हारे वचन शुभ हैं श्रमण । पर मेरे पिता और पत्नी घराने वी कीर्ति के इच्छुक हैं। धर्मावपण का समय वही है, जब उसका मान हो । वे सब बधन ताड दा कुमार सिद्धाथ, जो धम प्राप्ति म वाधर हो । तुम महान् हो, तुम तथागत हो । दखो, सत्य वा पराकाष्ठा तर पहुंचाना । जिस प्रकार सूय सव ऋतुआ मे स्थिर होकर अपन नियमित माग पर ही चलता है उसी प्रकार तुम भी सत्य-पथ पर अटल रहना। तुम बुद्ध होगे। तुम लक्ष लक्ष मनुष्या की बुद्धि को शुद्ध कराग। तुम जगत में पय प्रदशर बनोगे । तुम्हारी जय हो महाश्रमण | तुम्हारा पल्याण हो तथागत ! गौतम महा, मैंन मत्य या साक्षात् पर लिया है, मैं अब बधनों को तोहंगा । मैं बुद्धत्व प्राप्त करूंगा। धमण । [मद स्वर म घण्टी बजती है। कुछ देर तर बरती रहती है।

प्रबुद्ध /७३ दृश्य आठ नेपथ्य मे माता और पुत्र सुख की नीद म बेसुध सो रहे हैं। गोपा के अरुण अधर पर हास्य की एक रेखा फैल रही है और उनके बीच बुद-कली से दात चमक रह हैं । वह कोई सुख स्वप्न देख रहो हैं । कुमार सिद्धाथ क्लान्त भाव से खडे खडे यही सोच रहे हैं । गोपा का एक हाथ शिशु के वक्ष पर है । उस सुई धत कक्ष में शिशु का छोटा कितु मोहक मुख दीप्त हो रहा है। सिद्धाथ एक्टक यह सब देख रहे हैं-उन नेत्रो से अश्रुधारा बह रही सिद्धार्थ (स्वगत, मद स्वर मे) मैं सकल्प पर स्थिर रहूंगा। (कुछ रुक- कर अवरुद्ध कण्ठ मे) जोह, इस शाकावेग को रोकना कितना कठिन है। [ततु वाद्य की झनकार] नेपथ्य मे वे आगे बढवर धुटनो के बल शय्या के पास बैठ गए है । वे शिशु का मुह चूमन को झुके-परतु रुक गए। गौतम यह वही जाग न जाए। नेपथ्य मे वे सोते हुए माता और पुत्र को एकटक देख रहे हैं, उनकी आंखो स आस् वेग स उमड रहे हैं । (क्षणभर रककर) लो, वे उठ खडे हुए। वे वह दुधप साहस करने जा रहे हैं जो पथ्वी पर क्सिी तरुण ने आज तक नहीं किया। देखो देखो, वे दोनो हाथो की मुटठी बाधे सुदूर आकाश मे स्तब्ध तारागणा की ओर और कभी एक दृष्टि गोपा वे स्निग्ध यौवन और शिशु के भोले मुखडे पर डाल रहे है। [कोयल की कुहू दो बार ला, वे चल दिये । सिद्धाथ कुमार महाभिनिष्त्रमण कर रहे हैं। वे जा रहे हैं। -घर वार, राज्यभोग, महल अटारी, धन, रत्न, पत्नी पुत्र सबको त्यागकर। सबको त्यागकर | पृथ्वी पर अधकार छा रहा है । आकाश में तारे टिमटिमा रहे हैं । (जान की पदचाप) वे जा रहे हैं महान् प्रकाश की खोज मे। [कोई एक पक्षी बोलता है] ७४/ प्रबुद्ध गौतम चन, चन, क्या तुम जग रहे हो? चन्न (घबराकर) परम परमेश्वर महाभटटारक महाराज कुमार गौतम चन, एक घोडा तो ले आओ। जसी आज्ञा [कुछ दर ततु वाद्य] घोडा उपस्थित है कुमार। गौतम तो चलें,अधकार के उस पार -जहाँ अक्षय प्रकाश है। [घोड के जाने की क्षीण हाती हुई पद ध्वनि] दृश्य नौ [कुछ देर घोडे को टापा की निरतर आवाज आ रही है । सहसा आवाज रुक जाती है।] गौतम यही स्थान टोन है। वह सघन पट वक्ष है। यह निजन स्थान चन कुमार क्या चाहते हैं? गौतम लो, संभालो भाई, य आभूषण, यह दुकूल, यह उत्तरीय, कुण्डल, वह वलय, यह किरीट। स्वामी, यह क्या कर रहे हैं? गौतम वह कटार तो दो तनिक चन। यह कटार उपस्थित है स्वामी। गौतम तो अब इन सघन-मुगधित वेशा की क्या आवश्यक्ता है ? यह ला। (वालो को काटते हैं।) हाय हाय, हाय | आप यह क्या कर रहे हैं. प्रभु, यस मुदर देश काट हाले। गौतम सो यह कटार, यह तलवार भी लो। चन (रोत हुए) दुहाई महाराज कुमार । महाराज गौनम पाहा भी ले जामापन, अब तथागत पंदल जाएगा। (गते हुए) मैं आप परणाका छोडकर भी नहीं जाऊंगा प्रभु कभी नही जाऊंगा। (जोर जार म रोता है।) गार न परो दाम । आदितहा। मैं मरप बी पात्र मना रहा घन गौतम चन्न 1 प्रबुद्ध/७५ हूँ। जगत् को आनद प्रदान करने के लिए। पृथ्वी के मनुष्यो को अधकार से प्रकाश में लाने के लिए। महाराज, महाराज कुमार (जोर जोर स रोता है।) गौतम जाओ वत्स, हठ न करो। पिताजी को धैय प्रदान करना। गोपा को धीरज दिलाना । लो, मैं चला। [चलने की क्षीण होती हुई पदचाप] (रोते हुए) आप जा रहे हैं, महाराज कुमार, यह कैसा तेज प्रकट हुआ। सत्य के प्रचण्ड प्रकाश से दिशाएँ दीप्त हो रही हैं, यौवन सौदय पवित्र तेज म परिवर्तित हो गया है। चमत्कार है, चमत्कार है, अद्भुत है । हे प्रभु, ह स्वामी । (पछाड खाकर गिरता है।) [पदचाप माद होकर विलीन हो जाती है।] दृश्य दस - [कुछ देर तन्तु-वाद्य बजता रहता है।] नेपथ्य मे राजगह मे लोग आश्चय और उत्सुकता से मध्याह्न म एक तरुण भिक्षु की प्रतीक्षा करते हैं । गृहस्यों के भाजन कर चुनने पर वह तरुण भिक्ष नगर की गलियो मे भिक्षा मांगन निक्लता था। उसका प्रभावान मुखमण्डल, विनम्र गति, पृथ्वी पर झुके हुए नेत्र, और ओष्ठ-सम्पुट से निकलने वाली मृदु मधुर ध्वनि 'वल्याण' नगर निवासिया के पौतूहल का विषय थी।वे प्रत्येक घर से केवल एक ग्रास भोजन ग्रहण करते और बारह ग्रास लेकर नगर से बाहर चले जाते। [जन-कालाहल। दूर स शब्द ध्वनि] वह वही भिक्षु आ रहा है। अहा, तपाए म्वण सी उसकी अगाति है । अरे, वह कोमल भावुन सुकुमार तरण क्या भिक्षु होने योग्य है अभी, वह राजकुमार है । हट जाओ भाई, भिक्षु राज के लिए माग छोड़ दो। अजी, इस महामुनि को एक ग्रास अन्न दवर हम भी कृताय हुआ चाहते हैं। वल्याणपल्याण- कन्याण ७६/प्रबुद्ध अरे, साक्षात सम्राट विम्बसार इस तरण भिक्षु का अभिन दन कर रहे हैं । सुनो, सुनो ! सम्राट कह रहे हैं --तरण भिक्षु तुम्हारे हाथ राज्य रज्जु शोभा दती है, भिक्षापात्र नहीं। तुम्हारा सुकोमल शरीर और नवीन तारण्य तपस्या के योग्य नहीं है । श्रेष्ठ और ज्ञानी पुरपो को शक्तिसम्पन होना चाहिए। धम खोकर धनी हागा उत्तम नही। पर धन, धम और शक्ति पाकर जो इह दूरदर्शिता से भाग करे, वही बुद्धिमान है। गौतम राजन आप धर्मात्मा और विवकी हैं । आपका कथन सत्य है । पर मैं निर्वाण का इच्छुक हूँ। जिस सत्य क नान की अभिलाषा है उसे उन वातो मे विरक्त रहना चाहिए, जो चित्त को अपनी आर खीचती हैं । उसके लिए काम, नोच लोभ, मोह, अधिकार और वासनाओ का त्याग करना आवश्यक है। मैंने वैभव की असारता को समझ लिया है और अब मैं अमत के धोखे मे विषपान नही करूँगा । सम्राट, आप मेरे ऊपर करुणा करने का कप्ट न उठाइए। करणा के पात्र वे हैं जो ससार की चिन्ताआ मे दिन-रात व्याकुल रहते हैं। जिनके हृदय मे न शाति है, न मन में एकाग्रता । है राजन, कहिए ता एक राजा और एक भिक्षुक की मतक देह म क्या अतर है? सम्राट हे त्यागो, आप ध य हैं । मैं आपको प्रणाम करता हूँ। कामना करता हूँ, आपकी कामना पूर्ण हो। पर तु आप पूण बुद्ध होन पर मुझे अपना शिष्य स्वीकार कर कृताथ करें। गौतम ऐसा ही हो सम्राट् । ? दृश्य ग्यारह [बुछ देर तक प्रचण्ड वायु के चलने का शब्द । वन पक्षिया या शब्द] गौतम ह विद्वानो, क्या आप ही प्रसिद्ध दाशनिक और तत्ववत्ता आशद और उदरव हैं ? मैं आपसे आत्मा के विषय में जिनामा करने भाया हूँ। दारानिक है मुनि, हम वही है। तुम्ह जा सशय हो वह वहो। गौतम में यह जानना चाहता हूँ कि आत्मा क्या है ?

प्रबुद्ध /७७ दाशनिक आत्मा वह है जो देखता, चखता, सूघता और छूता है। फिर भी वह न तुम्हारा शरीर है, न आँख या नाक और मुख । आत्मा वह है जो त्वचा के द्वारा छूता है जिह्वा से रस लेता है, आँख से देखता है, और कान से सुनता है। गौतम हे विद्वानो, आत्मा की मुक्ति क्या है ? दाशनिक जिस प्रकार पक्षी पिंजरे से छूटकर स्वत त्रता प्राप्त करता है, उसी प्रकार मात्मा सबब धनो और उपाधियो से छूटने पर मुक्त हो जाता है। गौतम परतु क्यो उष्णता अग्नि से भिन है ? रूप, रस-वासना, सस्कार, बुद्धिचित्त का सपात ही 'मैं' है। वही 'मैं' आत्मा तब वह भिन सत्ता कसे? दाशनिक परतु तरुण मुनि, तुम क्या कर्मफल को नहीं देखते जिसने मनुष्य के आचार विचार, अधिकार जाति और वैभव मे भिन्नता उत्पन कर दी है। गौतम विद्वाना, कारण ही से काय होता है, परतु 'अह' को भिन्न सत्ता और शरीरोत्तर गमन का प्रमाण क्या है ? दानिक है मुनि, तुम अभी मूख हो। गौतम हे विद्वानो, तुम अभी और मनन करो। है। दृश्य वारह [निरन्तर तेज़ पहाडी हवा का गजन-तजन, वय पशु- पक्षियो का बीच-बीच में शब्द जो प्रस्तावक के वक्तव्य के साथ साथ चलेगा। नेपथ्य मे मुनि सिद्धाथ को विल्ववन मे घोर तप करते छह वष व्यतीत हो गए। उनका शरीर सूखकर काटा हो गया। वे मृतप्राय हो गए। [घण्टी का शब्द गौतम इन उपवासो और व्रता से मुझे कुछ भी शाति न मिली। न दाशनिको के थोथे तक से शान्ति मिली। यह सब मिथ्या है- मिथ्या अरे तुम कौन हो भद्रे?

८/प्रबुद्ध - नदा मुनिवर, मैं गोपन या नदा हूँ। तपस्या स आप बहुत जजर हो गए है यह थोडी सीखीर है। भगवन्, यह खीर खाइए आपको चल मिलेगा। गौतम तुम्हारा कल्याण हो भने । लाओ, दो। (कुछ रुक्कर) अब मुझे नवजीवन मिला । कल्याण, कल्याण [जाने की पदचाप]] दृश्य तेरह [भांति भांति के डरावन शब्द । बिजली की कडक । पहाडो से वायु के टकरा का शब्द जो निरन्तर चलगा।] नेपथ्य मे भगवत् गौतम बोधि वक्ष के नीचे वठे हैं। घोर अध निशा है। पथ्वी कापने लगी। प्रकाशपुज ने मुनि गौतम को घेर लिया है। मार, जो विषयो का पोपक और मत्यु का प्रेरक है तथा सत्य का शत्रु है आया है । (भयानक शब्द) अरे । अरे, उसके साथ उसकी तीनो पुत्रियां भी हैं । सम्मुख आकर मार ने भयानक गजना की (गजना) मुनि शात बठे है, यद्यपि उसको पुत्रिया बाण मार रही हैं । प्रवल जिते िद्रय हृदय में कोई तामसी इच्छा का उदय नही होता । देखो, देखो समस्त दुष्ट आत्माओ ने मुनि पर आक्रमण किया है । (एक साथ बहुत से पुत्सित शब्द शोर, फिर एकाएक सनाग) अहो यह चमत्कार है- चमत्कार नारकीय ज्वालाएं सुगधित पवन के झोकों मे परि- वर्तित हो गइ। वज्रपात ने कमल पुष्प का रूप धारण कर लिया। (कोकिल की कूक) मार पराजित होकर भाग गया । मुनि गौतम तेज से परिपूर्ण है-- वोल रहे हैं-सुनो, सुनो। (उत्तेजित स्वर म) धम सत्य है | धम ही मनुष्य को अज्ञान, पाप और दुखो से बचाता है। जीवन विकास की बारह कड़ियाँ हैं। आज से वे द्वादश निदान बहायेगी । सत्य चतुष्टय ये हैं-~-दुख, दुख का कारण और दुख की समाप्ति । अष्टाग माग--जिन पर चलकर दुखो का विनाश हो । (कुछ रुक्कर) अब मैं बुद्ध है। मैंने धम को समझ लिया है । मैंन पापो पर गौतम प्रबुद्ध /७६ विजय पा ली है । मैं सम्यक् सम्बुद्ध हूँ। तथागत बुद्ध मैं बुद्ध ? दो अतिथि तथागत बुद्ध की जय हो। बुद्ध तुम कौन हो भद्र अतिथि प्रभु, मेरा नाम तपसु है, और इसका मल्लिका । हम व्यापारी हैं। यह चावल की रोटी और शहद लाए हैं। इसे ग्रहण कर बुद्ध तथागत हम कृताथ करे। बुद्ध कल्याण हा तुम्हारा । हे सज्जनो, मैंने तुम्हारा भोजन ग्रहण किया । बुद्ध पद प्राप्त होने पर यह मेरा प्रथम भोजन है। हे धर्मात्माओ, तुम तथागत बुद्ध के प्रथम शिष्य हो। तथागत का क्थन है कि --जगत का कोई अयाय अत्याचार और पाप स्वाथ से रहित नही है । सारे दोपोका मूल स्वार्थी मन के भीतर ही है। पाप न धरती मे है, न आवाश मे । न हवा मे, न पानी मान रात म, न दिन मे। वह स्वार्थी मनुष्यो के मन मे है । इसलिए स्वाथ त्याग के बिना कोई यथाथ सुख को अनुभव नहीं कर सकता। याद रखो, यथाथ सुख स्वाथ और भोगो मे नही है, उनके त्याग मे है। अतिथि हे प्रभु, हम बुद्ध की शरण हैं । हम बुद्ध के धम को ग्रहण करते कल्याणा कल्याण दृश्य चौदह १ [नगर का कोलाहल । भांति भांति की बातें।] अजी वही राजकुमार मुनि फिर राजगृह मे आया है। २ यह पतियो को बहका बहका कर पलियो से पृथक् करता है। ३ वह वशो का लोप करता है। ४ सारिपुत्र, मौद्गलायन, अश्वजित् आचाय महाकश्यप, और उनके भाई सभी उस तरुण तपस्वी के शिष्य हो गए हैं। ५ अजी, विख्यात तत्त्वदर्शी महाधनपति यश भी उसकी शरण जा चुका है। ६ यही क्या, उसके चारो धन-कुबेर मित्र भी घर-बार छोड उसके शरणागत हुए हैं।

७८/प्रद नदा मुनिवर, मैं गोपक या न दा हूँ। तपस्या स आप बहुत जजर हो गए हैं यह थोडी सीखोर है। भगवन्, यह पीर खाइए। आपको बल मिलेगा। गौतम तुम्हारा क्ल्याण हो भने । लाआ, दो। (कुछ रुपकर) अब मुझे नवजीवन मिला ।पल्याण, पल्याण [जाने की पदचाप] दृश्य तेरह [भांति भांति के डरावन शब्द । बिजली की कडक । पहाडो से वायु के टकराने का शब्द जो निरन्तर चलेगा।] नेपथ्य मे भगवत् गौतम बोधि वक्ष के नीचे बठे हैं। घोर अघ निशा है। पथ्वी कापने लगी। प्रकाशपुज न मुनि गौतम को घेर लिया है। मार, जो विषयो का पोषक और मत्यु का प्रेरक है तथा सत्य का शनु है, आया है। (भयानक शब्द) अरे । अरे, उसके साथ उसकी तीनो पुत्रिया भी हैं । सम्मुख आकर मार ने भयानक गजना को (गजना) मुनि शात बढ है, यद्यपि उसको पुत्रियां बाण मार रही हैं। प्रवल जिते िद्रय हुदय म कोई तामसी इच्छा का उदय नहीं होता । देखो, देखा, समस्त दुष्ट आत्माओ न मुनि पर आक्रमण किया है । (एक साथ बहुत से कुत्सित शब्द, शोर फिर एकाएक सनाटा) अहा यह चमत्कार है-~ चमत्कार नारकीय ज्वालाएँ सुगन्धित पवन के झोको मे परि- वर्तित हो गई। वज्रपात ने कमल पुष्प का स्प धारण कर लिया। (कोकिल की कूक) मार पराजित होकर भाग गया । मुनि गौतम तेज से परिपूर्ण है~-वै वोल रहे हैं- सुनो, सुनो। गौतम (उत्तेजित स्वर मे) धम सत्य है । धम ही मनुष्य को . पाप और दुखो से बचाता है । जीवन विकास को बारह हैं । आज से व द्वादश निदान कहायेंगी। सत्य चतुष्टय हैं-दुख, दु ख का कारण और दुख की समाप्ति । मागजिन पर चलकर दुखों का विनाश हो । (कुछ स्कार अब मैं बुद्ध हूँ। मैंने धम को समझ लिया है। मैंन पापो - n प्रबुद्ध/११ धम्म सरणम गच्छामि । धम्म सरणम गच्छामि। सब दृश्य सोलह [भरी, तुरही और शव को ध्वनि। घोडो और रयों के दौडन का शद] नेपथ्य में शुद्धोदन जनता शुद्धोदन सात बरस बाद युद्ध कपिलवस्तु नगरी मे पधारे हैं । महाराज शुद्धोदन मात्रया सहित युद्ध के स्वागत का आए हैं। वे अपने पुष ये तज और प्रतिष्ठा या दखवर प्रेमाशु पहा रहे हैं। (स्वगत) निस्सदह यही मेरा पुत्र है। पर यह महामुनि अब सिद्धाथ नहीं रहा । वह बुद्ध है । पविमात्मा है । सत्य का स्वामी और मनुष्यो का शास्ता है। अरे सारथी, रथ रार दो। इस मुनि-पुत्र थे पास मुझे पांव-प्यादे ही जाना उचित है। महाराज शुद्धादन की जय हो । शाक्य गणपति को जय हो। नही इस तरह नही-सब मनुप्या ये उदारपर्ता गौतम बुद्ध को जय हो। ह पिता, मैं आपका पुत्र, अभिवादन करता हूँ। (रोते हुए) बरे पुष, इच्छा होती है, तुम्ह एक बार तुम्हारे रान नाम से पुकारू । आज मैंन तुम्ह सात बरस 4 वाद देया पितु नहीं। तुम तयागत हो। सम्यर सम्बुद्ध हा, सब 1 के उद्धारपर्ताहा। मगधरामाट विम्यमार अपा अस्सी ग्रामपतियो और नागरी सहित तुम्हारा अनुगत शिष्य * आपसा यानव सिमाप हूँ। आपको प्रगन्ना के परू? महिए। रा राज-पाट तुम्ह गोपना पाहापा, पर देयता तु समजत हो। हृदप प्रेमपूर है, पर आरा निनना मुझ पर यदिप्रजा प्रसाध्यतिपर। ता आप पुन मिा गाते हैं । आप मान मन मे बद निसान हामिए। माप अपन समय उस दुर ८०/प्रबुद्ध ७ अब स्वय सम्राट उसकी सेवा में जा रहे हैं । चलो भाई चलो | हम भी उस तपस्वी राजकुमार को देखें। दृश्य पन्द्रह [मनुष्यो की पदचाप । बहुत से थादमियो का जनरव।] सम्राट हे शाक्यमुनि, क्या तुमन महाकश्यप को अपना गुरु बनाया है या वह महाज्ञानी तुम्हारा शिष्य हो गया है ? बुद्ध हे कश्यप ! तुमने कौन सा नान प्राप्त किया है, वह कौन सी बात है, जिसने तुम्ह अग्निहोत्र और कष्टदायक तपश्चर्या छोड़ कर बुद्ध की शरण आने पर बाध्य किया है । सम्राट यह जानना चाहते हैं । कश्यप तो सम्राट सुनें । मैं तप और यज्ञ त्यागकर निर्वाण की प्राप्ति के लिए बुद्ध की शरण आया हूँ। बुद्ध धर्मात्मा सम्राट, जिसने अह को समझ लिया है, वह मन की उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है जापूण शाति, परम पुरुषाथ और सत्यज्ञान की दात्री है। सत्य के व्रती को सदा परहित कामना करनी चाहिए। इसी से निर्वाण प्राप्त होगा । यही बुद्ध का धम है। भगवन जब मैं राजकुमार था, तब कुछ भावनाएँ मरे मन मे थी--एक मैं राजा होऊँ वह पूरी हुई, दूसरी बार बुद्ध मेरे शामनकाल मे मेरे राज्य मे पधारें, वह पूण हुई । आपका सत्य महान है । आपन अव्यक्त को व्यक्त किया है। आपने अधवार मे भटकते हुओ के लिए दीपक जलाया है। आज मैं बुद्ध शरण लेता हूं-धम की शरण लेता हूँ~-सघ की शरण लेता सम्राट । सारी प्रजा हम सब बुद्ध की शरण लेते हैं सघ की शरण लेते हैं-धम की शरण लेते हैं- बुद्ध तो आर्यो, इस प्रकार कहो- 'बुद्ध सरणम गच्छामि। बुद्ध सरणम गच्छामि। बुद्ध सघ सरणम् गच्छामि। संघ सरणम् गच्छामि। सब प्रबुद्ध /११ धम्म सरणम् गच्छामि। धम्म सरणम गच्छामि। दृश्य सोलह [भेरी, तुरही और शव को ध्वनि। घोडो और रथो के दौडने का शब्द । नेपथ्य मे सात बरस बाद बुद्ध कपिलवस्तु नगरी मे पधारे हैं । महाराज शुद्धोदन मनियो सहित बुद्ध के स्वागत का आए हैं । वे अपने पुत्र के तेज और प्रतिष्ठा का देखकर प्रेमाथु बहा रहे हैं। शुद्धोदन (स्वगत) निस्सदेह यही मरा पुत्र है। पर यह महामुनि अब सिद्धाथ नही रहा । वह बुद्ध है। पविनात्मा है । सत्य का स्वामी और मनुष्या का शास्ता है। अरे सारथी, रथ रोक दो। इस मुनि पुत्र के पास मुझे पाव-प्यादे ही जाना उचित है। जनता महाराज शुद्धादन की जय हो । शाक्य गणपति की जय हो। शुद्धोदन नहीं इस तरह नही -सब मनुप्या के उद्धारकर्ता गौतम बुद्ध की जय हो बुद्ध हे पिता, मैं आपका पुन अभिवादन करता हूँ। शुद्धोदन (राते हुए) अरे पुन, इच्छा होती है, तुम्ह एक बार तुम्हार पुराने नाम से पुकार। आज मैंने तुम्हे सात बरस के वाद देखा है। कि तु नही । तुम तथागत हो । सम्यक सम्वुद्ध हो, सब मनुष्यो के उद्धारकर्ता हो । मगध-समाट बिम्बसार अपने अस्सी हजार ग्रामपतिया और नागरो सहित तुम्हारा अनुगत शिष्य हुआ है। युद्ध हे पिता, मैं आपका वालक सिद्धाथ हूँ। आपकी प्रसनता के लिए मैं क्या करू ? कहिए । शुद्धोदन पुत्र, मैं यह सारा राज-पाट तुम्हें सौपना चाहता था, पर देखता तुम तुच्छ समझते हो। ह पिता, जापका हृदय प्रेमपूर्ण है पर आपका जितना मुझ पर प्रेम है, उतना ही यदि प्रजा के प्रत्यक व्यक्ति पर हो तो आपको सिद्धाथ से बढकर पुन मिल सकते हैं। आप अपन मन से अन मेर लिए पुत्र भाव निवाल डालिए। आप अपन समक्ष उस बुद्ध हूँ, राज्य को ८० /प्रयुद्ध अब स्वय सम्राट उसकी सवा म जा रहे हैं। चलो भाई लो ! हम भी उस तपस्वी राजकुमार को दखें। सव दृश्य पन्द्रह सम्राट कश्यप [मनुष्यो की पदसाप । यहुत स आदमियो का जनरव । हे शाक्यमुनि, क्या तुमन महारश्यप का अपना गुरु बनाया है या वह महाज्ञानी तुम्हारा शिप्प हो गया है? बुद्ध हे कश्यप | तुमन यौन सा नान प्राप्त किया है, वह कौन सी बात है, जिसने तुम्हे अग्निहोय और क्प्टदायक तपश्चर्या छोड कर बुद्ध को शरण आने पर बाध्य किया है । सम्राट यह जानना चाहते हैं। तो सम्राट सुनें । मैं सप और यज्ञ त्यागकर निर्वाण की प्राप्ति के लिए बुद्ध की शरण आया हूँ। युद्ध धर्मात्मा सम्राट, जिसने अह को समझ लिया है वह मन की उस अवस्था को प्राप्त कर लेता है, जोपूण शाति, परम पुरुषाय और सत्यज्ञान की दात्री है। सत्य के व्रती को सदा परहित कामना करनी चाहिए। इसी स निर्वाण प्राप्त होगा। यही बुद्ध का धम है। सम्राट भगवन जब मैं राजकुमार था, तब कुछ भावनाएँ मेरे मन में था-एक में राजा होऊँ, वह पूरी हुई, दूसरी बार बुद्ध मेरे शामनकाल मे मेरे राज्य मे पधारें, वह पूर्ण हुई । आपका सत्य महान है। आपने अव्यक्त को व्यक्त किया है। आपन अधकार मे भटकते हुओ के लिए दीपक जलाया है। आज मैं बुद्ध की शरण लेता हूँ -धम की शरण लेताह-सम की शरण लेता सारो प्रजा हम सब बुद्ध की शरण लेते हैं--सघ की शरण लेते हैं-धम की शरण लेते हैं- बुख तो आर्यो, इस प्रकार कहो- 'बुद्ध सरणम् गच्छामि।' बुद्ध सरणम् गच्छामि। बुद्ध सघ सरणम् गच्छामि। संघ सरणम् गच्छामि। सय धम्म सरणम गच्छामि। धम्म सरणम् गच्छामि। दृश्य सोलह [भेरी, तुरही और शख की ध्वनि। घोडो और रथो के दौडने का शब्द] । जनता नेपथ्य मे सात बरस बाद बुद्ध कपिलवस्तु नगरी मे पधारे हैं । महाराज शुद्धोदन मत्रियो सहित बुद्ध के स्वागत का आए हैं । वे अपने पुन के तेज और प्रतिष्ठा को देखकर प्रेमाश्रु बहा रहे है। शुद्धोदन (स्वगत) निस्सदेह यही मरा पुन है। पर यह महामुनि अब सिद्धाथ नहीं रहा । वह बुद्ध है । पवित्रात्मा है । सत्य का स्वामी और मनुप्या का शास्ता है। अरे सारथी, रथ रोक दो। इस मुनि पुन के पास मुझे पाव-प्याद ही जाना उचित है। महाराज शुद्धोदन की जय हा । शाक्य गणपति की जय हो। शुद्धोदन नही, इस तरह नही -सब मनुष्या के उद्धारकर्ता गौतम बुद्ध की जय हो। बुद्ध हे पिता, मैं आपका पुत्र, अभिवादन करता हूँ। शुद्धोदन (रोते हुए) भरे पुत्र, इच्छा होती है तुम्ह एक वार तुम्हारे पुराने नाम से पुकारूं । जाज मैंन तुम्ह सात बरस के बाद देखा है। किंतु नहीं। तुम तथागत हो। सम्यक सम्बुद्ध हो, सब मनुष्यो के उद्धारकर्ता हो । मगध-सम्राट विम्बसार अपने अस्सी हजार ग्रामपतियो और नागरो सहित तुम्हारा अनुगत शिष्य हुआ है। बुद्ध हे पिता, मैं आपका वालक सिद्धाथ हूँ। आपको प्रमनता के लिए मैं क्या कर ? कहिए सुद्धोदन पुत्र, मैं यह सारा राज पाट तुम्ह सौंपना चाहता था, पर देखता हूं, राज्य को तुम तुच्छ समझत हो। युद्ध हे पिता, आपका हृदय प्रेमपूर्ण है, पर आपका जितना मुझ पर प्रेम है, उतना ही यदि प्रजा के प्रत्येक व्यक्ति पर हो तो आपको सिद्धाथ से बढकर पुत्र मिल सकते हैं। आप अपने मन से अब मेर लिए पुत्र भाव निकाल डालिए । आप अपने समक्ष उस बुद्ध १२/प्रबुद्ध को देखिए, जो सत्य का शिक्षक और सदाचार का प्रचारक है। इससे आपका निर्वाण प्राप्ति होगी। शुद्धोदन (रोते हुए) आश्चयजनक परिवतन है । इसस मेरे हृदय को दुख और व्याकुलता नही होती। पहले मैं शोकपूण था, मानो मेरा हृदय फट जाएगा। अब मैं प्रमान हूँ। तुम ससार मे अप्टाग माग का प्रचार करा! परतु तुम जब भिक्षापात्र लेकर कपिल- वस्तु की गलियो मे जाते हो और एक ग्रास भिक्षा मागते हो तो मेरा हृदय हाहाकार कर उठता है । एक दिन रत्न बखेरते हुए इही गलिया मे रथ और हाथियो पर सवार होकर निकलत थे। ऐसा न करो पुन, तुम्हारे भोजन का प्रबध तो मैं करूंगा। पर यह हमारी धम-परिपाटी है पिता । शुद्धोदन पुन, तुम उस राजकुल के हो, जिसन भी भिक्षा नही मागी। मैं उस बुद्ध-वश का हूं जो सदा भिक्षा वत्ति पर सतोष करता आया है। परतु आप आज्ञा कीजिए कि मैं आपको प्रसनता के लिए क्या करूं? शुद्धोदन पुत्र, एक बार अत पुर मे चलकर वधू यशोधरा तथा सभी परिजन स्त्रियो के नेत्रो को अपने दशनो से तप्त होने दो। बहुत अच्छा पिता । ऐसा ही हो। नेपथ्य मे दृश्य सत्रह [मधुर वीणा का वादन] मलिन वस्त्र और धलि धूसरित केशविहीना यशोधरा-मूर्ति मती वियोग और विषाद की छाया। चुपचाप अपा सप्तवर्षीय पुन को लिये खडी अपलक महावीतरागी प्रिय पति को धरती पर दष्टि दिए कक्ष मे आता देख रही है। वह इस बात को भूल गई कि उसका पति जगदगुरु और सत्य का अवषक है। [घण्टी का धीमा धीमा शब्द] वत्स सारिपुत्र, मैं तो मायापाश से मुक्त हुआ, पर यशोधरा अभी वृद्ध है। उसे मैंन चिरवाल से नहीं देखा। वह वियोग से व्याकुल है। यदि मिलन-अभिलाया अब भी पूर्ण न हुई तो उसका हृदय फट जाएगा। इसलिए मैं तुम्हें सावधान किये देता हूं कि यदि वह मुये छूना चाह, तो रोक्ना मत । सारिपुन जैसी भगवान की आज्ञा । [पद शब्द और धीरे धीर सिसक सिसवर रोने का बढता हुआ शब्द ।] शुद्धोदन पुत्र, यशोधरा को अपने चरणो म कुछ देर रहने दो। रोन से उसका हृदय हलका हो जाएगा। यह उसका रदन हृदयस्थ प्रकृतप्रेम के स्रोत का प्रवाह है। जब उसे ज्ञात हुआ कि तुमने अपन केश काट डाले हैं तो उसने भी इसका अनुसरण किया। अब वह भूमि शयन करती और एकाहार करती है। बुद्ध (करुण स्वर मे) हे कल्याणबुद्धे तुम ध य हो । पुण्यात्मा हो। तुम्हारी पवित्रता और सुशीलता और भक्ति ने मुझे लाभ पहुंचाया। मैं सत्यनान लाभ कर चुका हूँ। तुम्हारा शोक अवणनीय है । परतु तुमने जो आध्यात्मिक सम्पत्ति अपने थेप्ट और शुद्धाचरण से प्राप्त की है, वह तुम्हारे समस्त दुखा को आनद मे परिवर्तित कर देगी। यशोधरा हे प्रभु, पिता की सम्पत्ति पर पुन का अधिकार होता है। यह आपका पुन है । लीजिए, इसे अपनी धम सपदा से सम्यक् सपन कीजिए। बुद्ध तुम्हारा मातत्व ध य है शुभे, तुम्हारे पुत्र को मै वह द्रव्य न दूगा जो नाशवान हो और उसे शोक और चिता म डाले। यदि वह योग्य हुआ तो मैं उसे चारो सत्य का भेद समझाऊंगा। बालक पिता, मैं योग्य बनूगा । बुद्ध वत्म, तुम्हारा कल्याण हो, तुम मेरे साथ आओ । यशोधरा जाआ, मर प्राणधन, मेरे नेत्रो की ज्योति, मेरी आत्मा के अव- लम्ब, अपने महान् पिता के घरण चिह्ना के पीछे । जान की पदचाप और सिसक सिसककर रोने की बहुत देर तक ध्वनि [पर्दा गिरता है।

महाभारत की साँझ
भारत भूपण अग्रवाल
पात्र-परिचय
धृतराष्ट्र
सजय
भीम
युधिष्ठिर
दुर्योधन
-
[सारगी पर आलाप उठता है]
धृतराष्ट्र (ठण्डी साँस लेकर) कह नही मकता सजया किसके पापा का
यह परिणाम है, क्सिकी भूल थी जिसका भीपण विषफल हमे
मिला । जोह । क्या पुन-स्नह अपराध है पाप है ? क्या मैंने
कभी भी सभी भी
शान्त हो महाराज } जो हो चुका उसका शोक करना व्यथ है ।
धतराष्ट्र (सास लेकर) फिर क्या हुआ सजय'
आत्मरक्षा का और उपाय न देखकर महावली सुयोधन द्वैतवन
के सरोवर में घुस गय, और उसके जल-स्तम्भ म छिपकर बैठे
रहे । परन जाने कस पाण्डवा को इसकी सूचना मिल गई और
वे सत्वाल रथ पर चढकर वहां पहुंच गए
रिम की गडगडाहट]
सजय

भीम लीजिए महाराज ! यही है द्वैतवन का सरापर। वे अहेरी कहो। थे कि उहाँने दुर्योधन को इसी जल मे छिपते हुए देखा। युधिष्ठिर आआ, हम लोग उसे बाहर निकालन की चेष्टा करे। [जल को क्ल-क्ल ध्वनि] (पुकारकर) ओ पापी ! अरे ओ कपटी, दुरात्मा दुर्योधन । क्या स्त्रियों की भाति वहा जल म छुपा बैठा है | बाहर निकल आ। देख, तेरा काल तुझे ललकार रहा है । भीम कोई उत्तर नहीं। (जोर से) दुर्योधन | दुर्योधन | अरे, अपने सारे सह्योगिया की हत्या का क्लक अपने माथे पर लगाकर तू वायरा की भाति अपने प्राण बचाता फिरता है | तुझे लज्जा नही आती? युधिष्ठिर लज्जा! उस पापी को लज्जा भीमसेन ! ऐसी अनहोनी बात की तुमन कल्पना भी वैसे की? जो अपने सगे-सम्बधिया को गाजर मूली की भांति कटवा सकता है, जो अपने भाइयो को जीवित जलवा दन मे भी नहीं हिचकता, जो अपनी भाभी को भरी सभा मे अपमानित करान मे आनद ले सकता है, उसका लज्जा से क्या परिचय । (सव्यग्य हँसी) दुर्योधन (दूर जल म से) हंस लो हंस लो दुप्टो | जितना जी चाहे हंस लो, पर यह न भूलना कि मैं अभी जीवित हूँ, मेरी भुजाओ का बल अभी नष्ट नहीं हुआ है। युधिष्ठिर (जोर से) अरे नीच । अभी तेरा गव चूर नही हुआ | यदि बल है तो फिर आ न बाहर और हम पराजित करके राज्य प्राप्त कर। वहाँ बठा-वठा क्या वीरता बधारता है । तू क्या समझता है हम तेरी थोथी वातो से डर जाएंगे? दुर्योधन अपन स्वार्थों के लिए अपन गुरुजना वधु-बाधवो का निममता से बध करने वाले महात्मा पाण्डवो के रक्त की प्यास अभी वुझी नहीं है, यह मैं जानता हूँ। पर युधिष्ठिर । सुयोधन कायर नहीं है, वह प्राण रहते तुम्हारी सत्ता स्वीकार नहीं कर सकता। भीम । तो फिर आ न बाहर और दिखा अपना परायम! जिस कालाग्नि को तूने वर्षों घत देकर उभारा है उसकी लपटो मे तेरे साथी तो स्वाहा हो गय । उसके घेरे से अब तू क्यो बचना चाहता है ? अच्छी तरह समझ ले, ये तेरी आहुति लिये विना शान्त न होगी।

८६/महाभारत को सांझ दुर्योधन जानता हूं युधिष्ठिर । भली भांति जानता हूँ । वितु सोच लो, मैं थक्कर चूर हो गया हूँ। मेरी सारी सेना तितर बितर हो गई है, मेरा क्वच फ्ट गया है, मेरे शस्त्रास्त्र चुक गये हैं । मुझे समय दो युधिष्ठिर, क्या भूल गये हो, मैंन तुम्ह तेरह वप का समय दिया था? युधिष्ठिर (हंसकर) तरह वप का समय दिया था? दुर्योधन | तुमन तो हम वनवास दिया था, यह सोचकर कि तेरह वप वन म रहकर हमारा उत्साह ठण्डा पड़ जाएगा, हमारी शक्ति क्षीण हो जाएगी, हमारे सहायक बिखर जाएंगे, और तुम अनायास हम पर विजय पा सकोगे। इतनी आत्म प्रवचना न करा। दुर्योधन युधिष्ठिर । तुम तो धमराज कहलाते हो । तुम्हारा दम्भ है कि तुम अधम नही करत ! फिर तुम्हारे रहते तुम्हारी आखो के आगे ऐसा अधम हो, सोचो तो। भीम (हँसकर) अच्छा, तो अव तुझे धम का स्मरण हुआ। सच है कायर और पराजित ही जत मे धम की शरण लेते हैं। युधिष्ठिर रे पामर । तेरा धम तव कहा चला गया था जब एक निहत्थे बालक को सात मात महारथियो ने मिलकर मारा था जब आधा राज्य तो दूर, सुई की नाक के बरावर भी भूमि देना तुझे अनुचित लगा था। अपन अधम से इस पुण्य-लोक भारत भूमि म द्वेष की ज्वाला धधकावर अव तू धम की दुहाई देता है। धिक्कार है तरे भान को धिक्कार है तेरो वीरता का । दुर्योधन एक निहत्थे, थके हुए व्यक्ति का घेरकर वीरता का उपदेश देना सहज है युधिष्ठिर । मुझे खेद है, मैं उसके लिए तुम्हारी प्रशसा नहीं कर सकता पर मैं सच कहता हूँ तुमसे, इस नर हत्या काण्ड से मुझे विरक्ति हो गई है। इस रक्त रजित सिंहासन पर बैठकर राज करन को मरी वोई इच्छा नहीं है। तुम निश्चित मन से जाओ और राज्य भागो। सुयोधन तो वन में जाकर भगवत् भक्ति मे दिन विताएगा। भीम व्यथ है दुर्योधन | तेरी यह सारी कूटनीति व्यथ है । अपने पापा के परिणाम से अब तू किसी भी प्रकार नहीं बच सक्ता । बाहर निक्लकर युद्ध कर, बस यही एक माग है। दुर्योधन अप्रस्तुत को मारने म यदि तुम्हे स तोप मिलता हो तो ला मै बाहर आता हूं। (नल से बाहर निकलकर पास आने तक की महाभारत की साझ/८७ आवाज) पर मैं पूछता हूँ युधिष्ठिर । मेरे प्राणो का नाश कर तुम्ह क्या मिल जाएगा ? युधिष्ठिर अरे पापी । यदि प्राणो का इतना ही मोह था तो फिर यह महा भारत क्यो मचाया। याय को ठोकर मारकर अयाय का पथ क्या ग्रहण किया? दुर्योधन युधिष्ठिर | मैंन जो कुछ किया जपनी रक्षा के लिए | मैं जीना चाहता था, शाति और मेल से रहना चाहता था। मैं नहीं चाहता था कि तुम्हारे रहते मेरी यह कामना, यह सामाय सी इच्छा ही पूरी न हो सकेगी। भोम पाखण्डी | तुझे झूठ बोलते लज्जा नहीं आती। दुर्योधन ले लो राक्षसा | यदि तुम्हारी हिंसा इसी से तप्त हाती हो तो ले लो, मेरे प्राण भी ले लो। जब मैं जीवन भर प्रयास करके भी अपनी एक भी घडी शाति से न विता सका, जब मैं अपनी एक भी कामना को फलते न देख सका, तो अब इन प्राणो को रखकर भी क्या करूंगा। तो, उठाओ शस्त्र और उडा दो मेरा शीश । अव देखते क्या हो? मैं निहत्था तुम्हारे सम्मुख खडा हूँ। ऐसा सुअवसर कब मिलेगा, मेरे जीवन शनुओ। युधिष्ठिर पहले वीरता का दम्भ और अत मे करणा की भीख-कायरो का यही नियम है। परन्तु दुर्योधन | कान खालकर सुन लो। हम तुम्हें दया करके छोडेंगे भी नही, और तुम्हारी भांति अधम से हत्या कर घधिक भी न कहलायेंगे। हम तुम्ह क्वच और अस्त्र देंगे? तुम जिस जस्त्र से लडना चाहो, बता दो। हममे से वैवल एक व्यक्ति ही तुममे लडेगा । और यदि तुम जीत गये तो साग राज्य तुम्हारा कहो, यह तो अधम नहीं है ?--स्वीकार भीम इस दुराचारी के साथ ऐसा व्यवहार विलकुल अनावश्यक है। दुर्योधन मैं तो वह चुका हूं युधिष्ठिर। मुये विरक्ति हो गई है। मेरी समय म आ गया है कि अब प्राणो की तृप्ति की चेप्टा व्यय है। विफलताये इस मरस्यल मे अब एक यूद आएगी भी तो सूखवर श्रो जाएगी। यदि तुम्ह इमो मे सन्तोप हो वि तुम्हारी महत्त्वा- कामा मेरी मृत दह पर ही अपना जय स्तम्भ उठाए तो पिर यही सही। (सांस लेयर) चलो यह भी एक प्रकार से अच्छा ही होगा। जिहाने मरे लिए अपने प्राणा की बलि दी, उह मुह ५८/महाभारत की साझ सजय सजय 1 . तो दिखा सकूगा। (स्क्वर) अच्छी बात है युधिष्ठिर | मुझे एक गदा दे दो, फिर देखो मेरा पौरुप। इस प्रकार महाराज | पाण्डवो ने विरक्त सुयोधन को युद्ध के लिए विवश क्यिा। पाण्डवा की ओर में भीम गदा लेकर रण म उतरे। दानो वीरो मे घमासान युद्ध होन लगा । सुयोधन का पराक्रम सबको चक्ति वरदताथा, ऐसा लगता था मानो विजय श्रीअत म यही का वरण करेगी। पर तभी श्रीकृष्ण के सकेत पर भीम न सुयोधन को जघा म गदा का भीपण प्रहार किया। कुरराज आहत होकर चीत्कार करते हुए गिर पड़े। धतराष्ट्र हा पुन । इन हत्यारो ने अधम स तुम्ह परास्त किया। सजय मेरे इतने उत्कट स्नेह का ऐसा अत । आह । मैं नही सह सक्ता । मैं नहीं सह सकता। धैय, महाराज, धैय । कुरकुल के इस डगमगात पोत के अब आप ही क्णधार है। धृतराष्ट्र सजय | बहलाने की चेप्टा न करो। (स्कर) पर ठीक कहा तुमने कुमकुल का क्णधार ही अधा है, उस दिखाई नही देता महाराज । ठीक यही बात सुयोधन ने कही थी। धतराष्ट्र क्या ? क्या कहा था सुयोधा ने जब सुयोधन आहत होकर निस्सहाय भूमि पर गिर पड़े ता पाण्डा जयध्वनि करत और हप मनाते अपन शिविर का लौट गए । सध्या होन पर पहले अश्वत्थामा आए और कुरुराज की यह दशा देखकर बदला लेने का प्रण करके चले गये । फिर युधिष्ठिर आए। सुयोधन के पास आकर वह झुके, और शात स्वर म बोले- [दुर्योधन की वराह जो बीच बीच मे निरन्तर चलती रहती है] युधिष्ठिर दुर्याधा | दुर्योधन ।। आखें खोलो भाई । दुर्योधन (कराहत हुए) कौन ? कौन ? युधिष्ठिर ! युधिष्ठिर । तुम क्यो जाए हो? अब क्या चाहते हो? तुम राज्य चाहते थे वह मैंन दे दिया मेरे प्राण चाहते थे वे भी मैंन दे दिये। जब क्या लेन आए हो मेरे पाम ! अब मेरे पास ऐसा कौन-मा धन है जिसके प्रति तुम्ह ईर्ष्या है । जाओ । जामो दूर हो मेरी आखा से । जीवन म तुमने मुपे चन नही लेने दिया, अब कम से कम मुझे शानि स मर तो लने दो युधिष्ठिर । जाजो चले जाओ। सजय ? कब ? सजय महाभारत की साझ/६९ युधिष्ठिर तुमने भूल समझा दुर्योधन ! मैं कुछ लेने नही आया । मैं तो देखने आया था कि दुर्योधन कि अतिम समय म मैं किस तरह निस्सहाय निवल पशु की भाति तडप तडपकर अपना दम तोडता हूँ? मेरे मृत्यु का पव मनान आए हो न? मेरी आहो का आलाप सुनन आए हो न? अर निदयी। तुम्ह विसने धमराज की सज्ञा दी? जो सुख से मरन भी नहीं देता वही धम का ढोल पीट, कैसा अयाय है। युधिष्ठिर अथ का अनय न करो दुर्योधन ! मैं तो तुम्ह शाति दने आया था। मैंन साचा, हो सकता है तुम्हे पश्चात्ताप हो रहा हो । यदि ऐसा हो, तो तुम्हारी व्यथा हल्ली कर सकू इसी उद्देश्य स मैं आया था। दुर्योधन हाय रे मिथ्याभिमानी ! अभी यह दया का ढाग नही छोडा । पर युधिष्ठिर । तनिक अपनी ओर तो देखो | पश्चाताप तातुम्ह होना चाहिए था। मैं क्या पश्चात्ताप करूंगा। मैंने ऐसा कौन सा पाप दिया है ? मैंन अपने मन के भावा को गुप्त नहीं रखा मने पड़यत्र नहीं किया, मैंने गुरुजना का वध नहीं किया। युधिष्ठिर यह तुम क्या कह रहे हा दुर्योधन ? दुर्योधन (क्टिविटाकर) दुर्योधन नही, सुयोधन कहो धमराज ' सुयोधन । क्या अव भी तुम्हारी छाती ठण्डी नहीं हुई? क्या मुये मारपर भी तुम्ह सतोप नही हुआ जो मेरी अन्तिम घडी मे मेरे मुह पर मेरे नाम की पिरली उडा रह हो । निदयी ! क्या ईप्या में अपनी मानवता भी भस्म कर दी? युधिष्ठिर क्षमा परा भाई । अब तुम्ह और अधिक कष्ट नहीं पहुंचाना चाहता। पर मर बहन या न कहने से क्या, आने वाली पीढियाँ तुम्ह दुर्योधन के नाम म ही मम्बोधित करेंगी, तुम्हारे कृत्यो का माक्षी इतिहास पुवार पुकारवर । दुर्योधन मुझे दुर्योधन कहेगा । यही न ! जानता हूँ युधिष्ठिर ! मैं जानता हूँ। मुझे मारकर ही तुम चुप नहीं बठोग। तुम विजेता हा अपने गुरुजनो और सग-सा धया के शोणित की गगा मे नहापर तुमन राजमुकुट धारण किया है। नुम अपनी दख रेख मे इतिहास लियवाआगे और उसका पूरा पूरा लाभ उठान स क्या चूकोगे? सुयोधन वो मदा के लिए दुर्योधन बनाकर छोडोगे ।(क्राहार) उसको दह ही नहीं उसका नाम तर मिटा दोगे। यह में अच्छी तरह जानता हूं। (स्वकर) मेर मरन पर तुम जो पाही करना, wnld ६०/महाभारत की सांझ मैं तुम्हारा हाथ पकडने नहीं आऊँगा। पर इस समय जब तुम्हारा सबसे बडा शत्रु मर रहा है, उसे इतना याय तो दो कि उसका मिथ्या अपमान न करो। युधिष्ठिर युधिष्ठिर ने सदा न्याय ही किया है सुयोधन ! याय के लिए वह बड़े बड़े दुख उठान से भी नही चूका है। सगे-सम्बधियो केतडप-तड़पकर प्राण त्यागने का यह भीषण दश्य | अबलाजा, अनाथा का यह करुण चीकार किसी भी हृदय को दहलाने के लिए पर्याप्त था। पर सुयोधन । मैं इस सहार के दश्या को भी शात भाव से मह गया, क्याकि याय के पथ पर जो भी मिले, सब स्वीकार है। दुर्योधन यह दम्भ है युधिष्ठिर । यह मिथ्या अकार है । मैं तुम्हारी यह आत्मप्रशसा नहीं सुन सकता, इस तुम अपने भक्ता के ही लिए रहन दो। तुम विजय को डीग मार सकते हा, पर याय धम को दुहाई तुम मत दो। स्वाथ को याय का रूप देकर धमराज की उपाधि धारण करने म तुम्ह स तोप मिलता है तो मिले, मेरे लिए वह आत्म प्रवचना है, मैं उससे घणा करता हूँ। युधिष्ठिर म्वाथ 1 सुयोधन, स्वाय? दुर्योधन और नही ता क्या । जिस राज्य पर तुम्हारा रत्ती भर भी अधिकार नहीं था उसी का पाने के लिए तुमने युद्ध ठाना, यह स्वाथ का ताण्डव नत्य नही तो और क्या है? भला क्सि याय से तुम गज्याधिकार की माग करते 4? युधिष्ठिर सुयोधन । मन का टटोलकर दषो। क्या वह तुम्हारे क्थन वा समथक है ? क्या तुम नहीं जानते कि पिता के राज्य पर पुत्र का अधिकार सवसम्मत है ? फिर महाराज पाण्डु का राज्य मेरा हुआ या नहीं? दुर्योधन बस, तुम्हारे पास एक यहा तक है न परतु युधिष्ठिर क्या तुमन कमी भी यह सोचा कि जिस राज्य पर तुम अधिकार चाह्त थे वह तुम्हारे पिता के पास कम आया? क्या जमा धिकार से नहीं तुम्हारे पिता को राज्य की देखभाल का वाय येवल इसलिए मिता कि मेरे पिता मधे । राज्य संचालन म उह असुविधा हाती। अयथा उस पर तुम्हारे पिता या कोई अधिकार न था, वह मेरे पिता का था। युधिष्ठिर यह ता टीर है। पर एक वार, चाह किसी भी वारण स हो, जब मेर पिता का राज्य मिल गया, तब उम पश्चात उम पर मग उ । , ? महाभारत की साझ /११ अधिकार हुआ या नहीं ? क्या राज नियम यह नही कहता दुर्योधन राज नियम की चिता कब की तुमने | अयथा इस बात के समयन म क्या कठिनाई थी कि तुम्हारे पिता के उपरात राज्य पर मूल अधिकार मेरे पिता का ही था। वह जिसे चाहते, व्यवस्था के लिए उसे सौंप सकन थे। पुधिष्ठिर यह केवल तुम्हारा निजी मत है। आज तक किसी ने भी इस प्रकार का कोई स दह प्रक्ट नहीं किया। पितामह भीष्म, महात्मा विदुर, कृपाचाय अथवा स्वय महाराज धृतराष्ट्र न भी कभी ऐसी कोई बात नहीं रही। दुर्योधन यही ता मुझ दुख है युधिष्ठिर । कि तश्य तक पहुंचने की क्सिी न भी चेप्टा नही की। एक अयाय की प्रतिष्ठा के लिए इतना ध्वम किया गया और सब अधा की भांति उसे स्वीकार करते गए। सवन मेरा हठ ही देखा, मरे पक्ष का याय किसी ने न देखा और जानते हो, इसका क्या कारण था? युधिष्ठिर क्या दुर्योधन सर तुम्हारे गुणा से प्रभावित थे, सब तुम्हारी वीरता से डरते थे। कायरा की भांति, रक्तपात स वचन के प्रयत्न म वयाय और सत्य का बलिदान कर बैठे। वे यह नहीं समझ पाए कि भय जिसका आधार हो, वह शाति स्थायी ही हो सकती। युधिष्ठिर गुरजना पर तुम व्यथ ही कायरता या आरोप कर रहे हो । यदि मेरे पक्ष मयाय न होता तो कोइ भी मुयको राज्य देने की मांग क्यो करता? दुर्योधन तभी तो कहता हूँ युधिष्ठिर । कि स्वाथ ने तुम्ह अधा बना दिया। अयथा इतनी छोटी सी वात क्या तुम्हें दिखाई न पड जाती कि जितने धार्मिक और यायी व्यक्ति थे, सबने इस युद्ध म मेरा साथ दिया है। यदि याय तुम्हारी ओर था तो फिर भीष्म द्रोण, कृप अश्वत्थामा-सव मेरी ओर से क्यो लडे? क्या वे जान बूझकर अ याय का साथ दे रहे थे? यहा तक कि कृष्ण जस तुम्हारे परम मित्र ने भी मेरी सहायता के लिए अपनी सेना दी । वह चतुर थे, दोना से मत्री रखना ही उहान अच्छा समया ! ऐसा क्या हुआ? बोला इसीलिए न, कि याय वास्तव म मेरी ओर था? युधिष्ठिर सुयोधन ! मैं तुम्ह सा त्वना देन आया था विवाद करने नहीं।

६२/महाभारत की सांझ ? मैं ता तुम्हारी पीडा बंटा लेने आया था। क्यावि तुम चाह कुछ ममझो, मेगे इस बात का तुम विश्वास करो कि मैं इस रक्तपात * लिए तैयार न था, मेरी इच्छा यह कदापि नहीं थी। दुर्योधन में इसका कंस विश्वास करूं? क्या तुम्हार कह देने स ही पर तुम्हार वचना स भी सशक्त स्वर है तुम्हार कार्यो का, जीवन की गतिविधि का, और वह पुवार पुकारकर कह रही है कि युधिष्ठिर शोणित तपण चाहता था, युधिष्ठिर रक्त की हाली खेल के लिए ही सारे अवसर जुटा रहा था। भविष्य का भी तुम चाहो तो यहका सक्ते हो युधिष्ठिर । पर सुयोधन को नहीं वहवा सक्ते। क्योकि उसन अपन बचपन से लेकर अब तक की एक एक घडी तुम्हारी ईर्ष्या के रथ की गडगडाहट सुनते हुए बिताइ है, तुम्हारी तैयारियो ने उसे एक रात भी चैन से नहीं सान दिया। युधिष्ठिर सुयोधन । मुये लगता है, तुम सुध बुध खा रठे हो, तुम प्रलाप कर रहे हो । भला ज्ञान मअभी पाई ऐसी असम्भाव्य बातें कहता है? जो पाण्डव तुमस तिरस्कृत होकर घर घर भीख मागते फिरे, वन जगला की धूल छानते फिर, उनके सम्ब ध म भला कौन नानी व्यक्ति तुम्हारे इस कथन का विश्वास करेगा? दुर्याधन में जानता हूँ युधिष्ठिर। कोई विश्वास नही करगा। और कसा भी चाहे तो तुम उस विश्वास न करने दाग । पर इससे क्या? सत्य को दबाकर उस मिथ्या नहीं किया जा सकता। बचपन स, जब हम लोगो ने एक साथ शिक्षा पाई, तब स आज तक के सारे चित्र मेरी दष्टि में रहे हैं। पुराचन को कपट से भागकर तुम पाचाल गए, और वहा द्रुपद को अपनी और मिलाया। तभी तो तुम्हाग यल बत्ता देखकर पिताजी न तुम्ह आधा राज्य दिया। युधिष्ठिर मैं तो यह जानता हूँ कि आधे राज्य पर मेरा अधिकार था। दुर्योधन सत्य को ढंकन का प्रयत्न न करो युधिष्ठिर | उस निष्पक्ष होकर जाचो। मेरे पास प्रमाणो की कमी नहीं है । आधा राज्य पाकर भी तुमने चैन न लिया तुम अजुन को चारा आर दिग्विजय के लिए भेजा। राजसूय यज्ञ के बहान तुमने जरास ध और शिशुपाल को ममाप्त किया। यहा तक कि जुए म, खेल-खेल म भी तुम अपनी इा नही भूले, और तुमने चट से अपना राज्य दाव पर लगा दिया कि यदि तम जीते ता तुम्ह मेरा राज्य अनायास ही ।

मिल जाए । वावास उसी महत्वाकाक्षा का परिणामाया मेर उसमे कोई हाथ न था। Nivran युधिष्ठिर तुमने जिस तरह भरी सभा में द्रौपी का लपीन क्यिों दुर्योधन मेरा अपमान भी द्रौपदी ने भरी सभा में ही किया थाति तुम्हारी यह “याय भावना क्या सो रही थी। फिर द्रौपदी को दांव पर लगाकर क्या तुमने उसका सम्मान करने की चेष्टा की थी जिस समय द्रौपदी सभा मे आई, उस समय वह द्रौपदी नही थी, वह जुए म जीती हुई दासी थी। युधिष्ठिर यह तुम कैसी विचित्र वात कर रहे हो। दुर्याधन सत्य को विचित्र मानकर उडा नहीं सकते युधिष्ठिर । अपने ही कृत्य से वनवास पाकर भी उसका दोप मेरे ही माथे मढा गया, और फिर उस वनवास का एक एक क्षण युद्ध की तैयारी मे लगाया गया । अर्जुन न तपस्या द्वारा नये नये शस्त्र प्राप्त किए। विराट राज से मैनी पर नये सम्बध बनाये गए, और अवधि पूर्ण होते ही अभिमन्यु के विवाह के बहाने मित्र राजाओ को निम नण देकर एकत्रित किया गया। युधिष्ठिर। क्या इस पटु सत्य को तुम मिटा सकते हो? युधिष्ठिर यदि जो कुछ तुम कह रहे हो वह सत्य है तो सुयोधन ' तुम मेरा विश्वास करो कि तुमने प्रत्यक घटना के उलटे अथ लगाए हैं। जो नहीं है, उसे तुमने कल्पना के आराप द्वारा देखा है । यह सब मिथ्या है। दुर्योधन किंतु यही बात मै तुम्हारे लिए कह सकता हूँ क्याकि अन्तर्यामी जानते हैं कि मैंन कोई बुरा आचरण नहीं करना चाहा । मैंने देवल अपनी रक्षा की। जब तक तुमने आरमण नहीं किया, मैं चुप रहा, जब मैंन देखा वि युद्ध अनिवाय है तो फिर मुझे विवश होकर वीरोचित कत्तव्य करना पड़ा। युधिष्ठिर अभिम यु वध भी क्या वीरोचित था? दुर्योधन एक एक बात पर कहां तक विचार करोगे युधिष्ठिर । जब भीष्म, द्रोण और कण का वध वीरोचित हो सरता है, तो अभिम यु वध मे ही ऐसी क्या विशेषता थी? और आज भी भीमसेन ने मुझे जिस प्रकार पराजित किया है वही क्या चोरोचित रहलाएगा पर युधिष्ठिर। मेरे पास अर इतना समय नहीं है कि इन सबको विवेचना करें। मैं तो सबकी सार बात जानता हूँ कि तुम्हारी महत्वाकाक्षा हो इस नर-सहार का, ६४/ महाभारत की सांझ इस भीषण रक्तपात का मूल कारण है। मैं तो एक निस्सहाय, विवश व्यक्ति की भाति केवल जूझ मरा हूँ। तुम्हारे चक्रा त म मेरे लिए यही पुरस्कार निर्धारित किया गया था। युधिष्ठिर सुयाधन । तुम्हें नाति हो गई है, तुम सत्य और मिथ्या का भेद करने में असमथ हो। तुम्हार मस्तिष्क की यह दशा सचमुच दयनीय है। दुर्योधन बड निष्ठुर हो युधिष्ठिर | मरणो मुख भाई से दुराव करते तुम्हारा हृदय नहीं पसीजता । कुछ क्षणो म ही मैं इस लोक के परे पहुँच जाऊँगा। मेरे सम्मुख यदि तुम सत्य स्वीकार कर भी लोगे तो तुम्हारे राजत्व को कोई हानि न पहुंचेगी (कराहता है) पर नही, मैं भूल गया। तुम तो अपने शत्रु की इस विक्ल मत्यु पर प्रसन हो रहे होगे ! आज वह हुआ जो तुम चाहते थे, और जो मैं नहीं चाहता था। मैंन अपन मम्पूण जीवा का एक एक पल तुम्हारी महत्वाकाक्षा की टकराहट से बचने मे लगाया। परतु मेरे सारे प्रयत्न निष्फल हुए। वह देखा, वह अँधेरा बड़ा आ रहा है। साझ हो रही है। मेरे जीवन की अतिम सांझ । (पष्ठभूमि मे सारगी पर करुण आलाप, जो चढता जाता है) और उधर मेघ घिरे आ रहे है द्रौपदी के बिखरे केशो को भाति । व मुझे निगल लेगे | युधिष्ठिर | जाओ, जाओ मुझे मरन दो। तुम अपनी महत्वाकाक्षा को फलते फूलते देखो। जाआ, गुरुजनो और वधु-वाधवा के रक्त से अभिषेक कर राज्य सिंहासन पर विराजो | मैं तुम्हारे चरणो से रौद हुए कांटे की भाति तुम्हार माग से हटे जाता हूँ। युधिष्ठिर इतने उत्तेजित न हो सुयोधन । वीरो की भांति धय रखो शात हो जाओ। दुर्योधन घबराओ नहीं युधिष्ठिर । मेरी शाति के लिए तुम जो उपाय कर चुके हो, वह अचूर है । दो क्षण और, फिर मैं सदा कोशात हो जाऊंगा। पर अतिम सास निकलने से पहले युधिष्ठिर । एक बात कहे जाता हूँ। तुम पश्चात्ताप की वात पूछने आए थे न? मेरे मन में कोई पश्चाताप नही है। मैंने कोई भूल नही की। मैंन भय से तुम्हारी शरण नहीं मांगी। अत तक तुमसे टक्कर ली, और अब वीरगति पाकर स्वग जाता हूँ। समझे युधिष्ठिर । मुझे ग्लानि नहीं है, कोइ पश्चात्ताप नही है। केवल एक केवल एक दुख मेरे साथ जाएगा। -

महाभारत की सांझ/६५
युधिष्ठिर क्या?
दुर्योधन यही-यही कि मेरे पिता अधे क्या हुए । नही तो, नही तो
महाभारत न होता।
[करण आलाप उठकर धीरे धीरे लुप्त हो जाता है ।
[पर्दा गिरता है।]

नरमेध भरपप्रसाद गुप्त (नपथ्य स) महाँप विश्वामित्र के सम्बंध म दा यथा बहुत प्रचलित हैं। एक पथा उनके तप भग की है, जिसस महाकवि कालिदास र महान काव्यनाटक अभिनान शाकु तलम की अमर नायिका शकुतना का जम हुआ था। दूसरी क्था उनके द्वारा ली गई राजा हरिश्चद्र की परीक्षा की है जिसस राजा हरिश्चन्द्र की प्रसिद्धि मत्यवादी राजा हरिश्च द्रवे रूप म हुई और जिस पर अमर नाटक सत्य हरिश्च द्र' की रचना भारते दु हरिश्चन्द्र ने की। महर्षि विश्वामित्र ऋग्वद के क्तिन ही मात्रा के द्रप्टा अथवा स्रष्टा हैं। पुराणों में भी उनकी कितनी ही कथाएं बिपरी हुई हैं । वे एप दुद्धप महर्षि के रूप म हमारे सामने माते हैं, जिनके तेज के समक्ष अय ऋपि मुनि छायाग्रस्त से हो जाते हैं । ऐतरेय ब्राह्मण मे एक नरमेध का उल्लेख है। इस नरमेध के सदभ मे महपि विश्वा मित्र के जिस दृढ चरित्र, महान त्याग, निभयता तथा सत्य सिद्धान्तनिष्ठा के दशन होते है अदभुत हैं । प्रस्तुत नाटक का आधार वही नरमेध क्था है । नाटक रचना तथा वतमान स्थिति की माग के दबाव मे मैंने जो थोडी स्वतत्रता ली है उमे मेरे जीवनदशन, आदश तथा सजन का हस्तक्षेप समझा जाए । भरवप्रसाद गुप्त नरमेध/६७ पात्र परिचय पुरुष पात्र महषि विश्वामिन पैतालीस वप जमदग्नि विश्वामित्र का भानजातीस वष वरुण देव प्रौढ वय हरिश्चद्र पैतालीस वप रोहित हरिश्चद्र का पुन-अठारह वर्ष अजीगत अगिरा चालीस वप शुन शेष बीस वष-अजीगत का पुन दूत पच्चीस वप एक स्वर नारी पान रोहिणी विश्वामित्र की पत्नी-चालीस वप वेश भूपा पौराणिक काल वैदिक युग [नेपथ्य से कुछ देर तक मेघगजन, गडगडाहट की तेज आवाजें होती हैं । पर्दा उठता है तो बिजली चमकन का प्रकाश मच पर पड़ता है। सिंहासन पर हरिश्च द्र चितित बैठे हैं। वरुण (पुकारता आता है) हरिश्चद्र। हरिश्चन्द्र ! हरिश्चन्द्र (चौंक्कर) कौन ? कौन है ? इधर देखो, हरिश्च द्र क्या तुमने मुझे मेरे स्वर से नही पह- चाना? तुमने तो मरी आराधना की थी हरिश्चन्द्र (सकपकार) ओह वरुण देव ! मेरा प्रणाम स्वीकार करें, देव। मैं तुम्हारा प्रणाम लेने नहीं आया हूँ। इतने वर्षों प्रतीक्षा करने के पश्चात मैं तुम्हें स्मरण दिलाने आया हूँ। कुछ स्मरण है वरुण वरुण तुम्हें हरिश्चन्द्र है देव । मुये सव स्मरण है।

१८/नरमेध वरुण मुझे तो नहीं लगता कि तुम्ह कुछ भी स्मरण है। अयथा तुम इतन वर्षों तक मुझसे प्रतीक्षा न करवाते । उन दिना तो तुम प्रतिदिन मेरी आराधना करत थे, मेरी पूजा करते थे तथा मुझसे प्राथना करते कि हे वरुण देव । मुझ पर कृपा कीजिए। मेगे प्राथना सुनिए । मुझे केवल एक पुन प्रदान कीजिए। केवल एक पुत्रा हरिश्चद्र मुझे सब स्मरण है, देव, सव! मैं वह सब विस्मत करने की धृष्टता कसे कर सकता हूं? क्या आपको ज्ञात नहीं है कि मैं अब भी नित्य प्रतिप्रात आपकी आराधना करता हूँ,पूजा करता हूँ तथा प्राथना करता हूँ? वरुण (क्षुब्ध) मुझे तुम्हारी आराधना-पूजा प्राथना नहीं चाहिए । मुझे जो चाहिए, तुम उसकी बात करो। वह तो तुम विस्मत कर चुके हा न? हरिश्चद्र नहीं-नही, देव । मुझे सब स्मरण है, देव, सव | आपका जो चाहिए उसी के निमित तो मैं प्रतिदिन प्राथना करता हूँ कि आप वरुण वरुण नही नही। अब मैं तुम्हारी कोई प्राथना नही सुनूगा। पहले तुम अपना वचन पूरा करो। तुमने मुझे एक वचन दिया था, तुम्हे स्मरण है? हरिश्चद्र है महाराज, है क्या है? स्पष्ट शब्दा में बोलो। हरिश्चद्र मैंने आपके आदेशानुसार आपको वचन दिया था कि यदि आपने मुझे एक पुत्र प्रदान करने को कृपा की, तो में बाझपन के अभि शाप से मुक्त होकर उस पुन की बलि आपका दे दूगा ! वरण मुझे प्रसन्नता है कि तुम्हे अपना वचन स्मरण है। किंतु तुमने अभी तक अपना वचन पूरा क्या नही किया ? पुत्र का जम हुए तो वर्षों हो गए। हरिश्चन्द्र हां देव, अठारह वप हो गय इस वीच मैंने कितनी ही बार अपना वचन पूरा करन का सकल्प किया कितु कि तु पुन के मोहवश तुम अपने कत्तय का पालन न कर सके। वरुण यही न? आपस क्या छिपा है देव । हरिश्च द्र वरुण क्या तुम्हे यह नात न था कि ज्यो-ज्यो पुन बडा होता जाएगा, उसका मोहब ध अधिक अटूट होता जाएगा - SAF- वरुण हरिश्चन्द्र पहले जब मैंने आपको वचन दिया था, मुझे ज्ञात न था, देव कि पुत्रप्रेम क्या होता है। रितु जब मैं पुत्रवान हो गया वरुण हूँ। तो अब तुम अपना वचन पूरा करना नहीं चाहते हरिश्चन्द्र नहीं-नहीं, देव। यह कैसे हो सकता है कि मैं वचन पूरा न करत आपका कोपभाजन बनू और अपना सवनाश देखू ? कि तु इस समय तो मैं विवश हूँ। क्या तुम विवश क्या हो? हरिश्चन्द्र क्या आपको नात नहीं कि मेरे पुत्र रोहित का पिछले छ वर्षों से कोई पता नहीं है । उसे जब यह ज्ञात हुआ था कि मैं आपको उसकी बलि दन के लिए वचनबद्ध हूँ ता वह भयातुर होकर भाग गया था। धरण हूँ। यह ता तुम्ह एक बहुत अच्छा बहाना मिल गया हरिश्च द्र नहीं-नही देव । मैं तो स्वय उसके लिए व्याकुल रहता हूँ। मैंने कहा कहा न ढुढवाया उसे। लेकिन उसका कही भी पता न चला। मापने उसे वही देखा है, देव ? वह अतिसुदर, सुशील तथा निरीह बालक है। जाने कहाँ भटव रहा होगा ? जाने क्या खाता पीता होगा? सोचकर मेरा हृदय विदीण हो जाता है। छ वप हो गए देव । (सिसक्ता है)। वरुण वाह | क्या क्था सुनाई है तुमन। क्या तुम सोचते हो कि तुम्हारी यह क्या सुनकर मैं अपनी बलि लिये बिना तुम्हे छोड - दूगा? हरिश्च द्र वरुण नही नहीं, महाराज | वह तो मुझे दनी ही है, रोहित मेर पास आ तो जाए, उसके पश्चात उसके पश्चात तुम क्या करोगे, वह भी मैं देखूगा । किंतु नगक पूर्व तुम्ह अपने कत्तव्यपालन म विलम्ब करने का दण्ट भोगा पडेगा । अब तक तुम्हारा हृदय विदीण होता रहा है और तुम्हारा शरीर भी बरुण हरिश्चन्द्र (बदन करता है) देव । देव । ऐसा शाप मत श्रीति, मुझे बलि की प्रतीक्षा करते हुए अठारहवा समय तक तुम्हे क्षमा नही किया जा गाgree वित तुम्हारे हृदय की व्यथा या नी Pre, MAT अदश्य व्यथा है । तुम्हारे शरीरmarmar समगा और भागा भागानुया-Artha के पश्चात मैं दखूगा विमr awrt firrrrt १००/नरमेध एक बार पुन मैं तुम्हे सावधान करता हूँ कि यह बात तुम भूल पर भी अपने मन मन लाना कि मैं किसी भी दशा में अपनी चलि त्याग सक्ता हूं। [जाता है ।खडाऊं की आवाज धीरे धीरे नपथ्य मे तिरो हित होती है। मच का प्रकाश बुझता है, फिर प्रकाश होता है तो शय्या पर हरिश्च द्ररोगग्रस्त पडा है। उसके पायताने राहित खडा है] (रोता हुआ) पिता जी । पिता जी । यह आपको क्या दशा हो । रोहित गई? - हरिश्च द्र रोहित हरिश्चन्द्र 1 तुम क्यो आ गय, पुन ? तुम चले जाआ, अभी चले जाओ, पुन नही, पिता जी। अब मैं आपको छोडकर कही नही जाऊँगा। मेरे ही कारण आपकी यह दशा हुई है न नहीं, पुन | तुम अभी चले जाओ। तुम जहा भी रहो, जीवित तो रहोगे । मैं जीते जी अपने हाथो से तुम्हारी बलि नही दे सक्ता, नहीं दे सकता। वरुण देव मेरे प्राण ले लें तो भी मैं तुम्हारी बलि नहीं दे सकता । पुन तुम चले जाओ, तुम्हारा यहाँ एक क्षण भी स्कना ठीक नहीं। हो सकता है कि वरुण देव अभी या जाए रोहित आने दीजिये पिताजी, उह आन दीजिए। में स्वय उहे अपनी बलि द दूगा । मैं आपके प्राण सक्ट मे डालकर जीवित रहना नही चाहता। रह भी नहीं सकता, पिता जी । अपने प्राण जाने के भय से जब मैं भागा था, मैं एक बालक था। किन्तु अब मैं बालक नही हूँ । वना मे ऋषि मुनियो के आश्रम मे भटक्कर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है । यह जीवन नश्वर है। इसकी रक्षा के निमित्त किसी के प्राणा को सक्ट म डालना महा अपराध है, महापाप है। आप तो मेरे पिता हैं-जनक हैं, जान-बूयकर अपने तुच्छ जीवन के लिए मैं आपका जीवन सकट में नहीं डाल सक्ता । जैसे ही मुये समाचार मिला कि वरुण देव न आपको शाप दिया है कि जब तक आप मेरी बलि उहे नहीं दे देंगे आपका शरीर कष्ट में पड़ा रहेगा मैं भागा भागा आपके पास आया हूँ। अब आप मेरी बलि देकर शापमुक्त होकर सुखी हो, पिताजी।

नरमेध/१०१ हरिश्चद्र नहीं नही। यह मुझसे नहीं हो सकता, नही हो सकता पुत्र तुम यहा से चले जाओ। चले जाओ। (रोता है) रोहित मैं तो कायर था, पिता जी, इस कारण मत्युभय से भाग गया था, जितु आप तो एक वीर, प्रतापी, सत्यवादी राजा हैं । आप इस प्रकार धैय क्यो छोड रहे हैं? आपने वरुण देव को वचन दिया था। आप उसका पालन कीजिए। आप मेरे मोह में पड- कर कतव्यच्युत न हो पिताजी। आप विचार कर देखें। क्या आपके प्राण दे देने से वरुण देव मरी बलि छोड़ देंगे? हम दोना के प्राण जाएं, इसस अच्छा क्या यह नहीं है कि एक मेरे प्राण जाएँ तथा आपके वचन की रक्षा हो। आपकी अजित कीति में वद्धि हो। हरिश्चद्र नही नहीं। यह नही हो सकता। नही हो सकता (रोता गिड- गिडाता है) वरुण देव । वरण देव ! आप देवता हैं | आप राजाआ के राजा हैं । आपको मेरे इस निरीह, पितृभक्त पुत्र की बलि लेकर क्या प्राप्त होगा? (पुकारता है) वरुण देव । वरण देव । [नपथ्य से मेघगजन और गडगडाहट की आवाजें आती हैं। बिजली चमकने का प्रकाश मच पर पड़ता है। फिर नेपथ्य से खडाऊँ की आवाजें पास आती सुनायी पडती वरुण (प्रवेश कर) मैं आ गया, राजा हरिश्चद्र । कहो, तुमने मरा जाहान क्यो किया? बोलते क्यो नही ? ओह मैं समझा। मैं जानता था हरिश्च द्र कि यही होगा। रोहित नहीं देव । अब मैं स्वय उपस्थित हूँ । अब पिताजी अपना वचन पूरा करेंगे। हरिश्चन्द्र नही, यह मुझसे नही होगा। पुत्रवलि मैं न दे सकूगा । हो । मैं अपन प्राणोत्सग के लिए तत्पर हूँ। रोहित नहीं-नही पिता जी । ऐसा मैं नही होन दूगा । मेरी बलि दर आप अपना वचन पूरा करें, अपनी प्रतिष्ठा पर क्लर लगने से वचायें मुझे आज्ञा दें कि मैं बलि का आयोजन करूं। हरिश्चन्द्र नहीं, तुम बलि का आयोजन नहीं कर सकते। तत्सुओ के राज- पुरोहित महर्षि विश्वामित्र ने नरयलि पर प्रतिवध लगा दिया 1, १०२ / नरमेध १०२/नरमेध वरुण वरण (जीम ऐठकर) महर्षि विश्वामिन ' विश्वामिन न ही तो विश्व मे तुम्हारी सत्यवादिता का ढोल पीटकर तुम्ह आकाश पर चढा दिया है । जनता चिल्ला चिल्ला तुम्हारा गुणगान करती है-- 'चद्र टर, सूरज दरै, टर न सत्य विचार।' अव जनता आक्र दसे, तुम्हारी सत्यवादिता । विश्वामित्र को क्या ज्ञात था कि राज पाट दान दे रैना सरल है, पत्नी तथा स्वय का विस्य कर देना भी कठिन नही, पुन को मृत देखकर हृदय की व्यथा सहन कर लेना भी सभव है कि तु पुन की बलि देकर अपने वचन का पालन करना हरिश्चन्द्र असभव है, देव असभव है। तो बुलाओ अपने विश्वामिन को इसे सभव करने के लिए। अयथा वे ही अब घोषणा करें कि हरिश्च द्र सत्यवादी नहीं है, वह वचन देकर उसे पूरा नहीं करता। हरिश्चन्द्र देव, आप देव हैं, विश्वामित्र महर्षि हैं। मेरे लिए आप दाना पूज्य है । ऋपि ने मेरे लिए जो किया, उसके लिए मैं उनका कृतज्ञ हूँ। आपने जो मुझे दिया, उसके लिए आपका भी वृतज्ञ हूँ। हम मानव आपका आदर सत्कार, पूजा-पाठ, विनय प्राथना करन के अतिरिक्त कर ही क्या सकते हैं ? आप लाग प्रसन होकर जो दते हैं, हम शीश नवाकर ले लते हैं आप लोग हमसे अप्रसन्न हाकर जा ले नेत हैं हम शीश झुकाकर दे देते हैं। हमारा वश ही क्या है ? महर्षि विश्वामिन न मनुष्य जाति का नई गरिमा प्रदान की है । उहान घोषणा की है कि मनुष्य पशु नहीं है, उसकी बलि नही दी जा सकती, उसका वध नही किया जा सक्ता, उसका य विस्य नहीं क्यिा जा सकता चाहे वह आय हो, अनार्य हा अथवा दास हा । सब मानव एक समान हैं। वरुण हूँ। क्या तुम्ह यह तान नहीं कि मुीि वसिष्ठ महर्षि विश्वामित्र को राजपुरोहित पद से हटाकर स्वय राजपुरोहित पद पर आमीत हान जा रह हैं और उहान घोषणा कराई है कि माय- आय हैं अनाय आय ही हा सरते, दोनो समान कदापि नही हा सक्ते । वाई भी अनाय विसी भी आय अथवा आर्या के साथ दुव्यवहार करतो उमका वध कर दिया जाना चाहिए। हरिश्चन्द्र दव यह ऋपिया मुनिया तथा देवा के मध्य परस्पर दद का विषय है। इमवे मध्य हम सामा यजन यहाँ आत हैं ? हम ता यही जानत हैं कि जो काप महर्षि विश्वामित्र कर रह हैं किसी . भी ऋषि ने नही क्यि । उहोंने स्वेच्छा से राजा का पद त्याग- कर राजपुरोहित का पद स्वीकार किया था तथा भने नाम विश्वरथ का भी त्याग कर, विश्वामिन, विश्वका लिया था। क्या उह राजपुरोहित के पद का मोह होगा, देव? वे तो एक वीतरागी की भाति राजधानी मे न रहकर आश्रम मे रहते हैं और आर्यो-अनार्यों को एक समान शिक्षा-दीक्षा देते हैं। उही के प्रताप से सारे राज्य में शान्ति और सौहाद है और सबकी उनति हो रही है। जातिभेद अथवा रगभेद के कारण किसी को भी कोई यातना नही दे सकता। निवलो, दुखिया तथा सतप्तो की सहायता तथा रक्षा के लिए महर्षि सदा सनद्ध रहते हैं। वरुण यह सब उनका ढकोसला है । अब भण्डा फूटने मे अधिक विलम्ब नहीं होगा । तुम्ह ज्ञात है कि शबर के पुत्र अनाय राजा भेद ने सशस्त्र जाकर अजय को पुनी तथा सेनापति हयश्व की पुत्रवधू शशीयसी का अपहरण कर लिया है । ऋपि वसिष्ठ ने घोषणा की है कि आय राजा अनाय भेद का सहार कर उसे इस महा अपराध का दण्ड दें। उहोंने यह भी घोषणा की है कि आयत्व के उदधार तथा अनार्यों के निमित्त ही देवो ने उहे आवित के राजपुरोहित का पद प्रदान किया है। कितु विश्वामित्र क्या कर रह हैं, तुम्हे ज्ञात है? रोहित पिता जी को क्दाचित ज्ञात न हो। इह तो आपने शैय्यासेवी बना दिया है। आपको तो सव ज्ञात है देव । आप ही बताने की कृपा करें। वरुण महर्षि विश्वामिन का कहना है कि अनाय राजा भेद का सहार करना महा अपराध होगा। क्या कोई जाय किसी अनार्या का अपहरण करता है तो ऋपि वसिष्ठ उस आय के सहारा आदेश देते हैं ? न्याय मे ऐसा अन्तर क्या? एक ही अपराध के लिए आय को कोई दण्ड नही और अनाय को मृत्युदण्ड । यह नही होना चाहिए। साथ ही उनका यह भी कहना है कि अनाय राजा भेद तथा शशीयसी के बीच प्रेम सम्बध था । अनाय राजा भेद न बलात शशीयसी का अपहरण नहीं किया है । बोलो, अब तुम्हारा क्या कहना है? हरिश्चन्द्र क्षमा परें देव । महर्षि विश्वामित्र का पपन ही मुझे मायोचित लगता है।

१०४/नरमेध घरुण हूँ। तो बुलानो अपने विश्वामित्र को। वे आकर तुम्हारे और मेरे बीच वे विवाद को सुलझाएँ। हरिश्चन्द्र महर्षि वो आप इस विवाद मे न घसीटें देव । क्षमा करें, यह विचार मेरे लिए बडा दुपद है कि आप-सव लोग जैसे भी सभव हो महपि को अपमानित कर उह ऋषिपद से भी च्युत करना चाहते हैं। क्या आर्यो का अपमान करन तथा उनकी श्रेष्ठता नष्ट करने का अधिकार उही को है ? हरिश्चद्र जो भी हो, कृपा कर मुझे आप इस दुरभि सधि का भागीदार न बनाए वरुण तो तुम अपने वचन का पालन करो। अपने पुत्र की बलि मुझे यरूण दी। हरिश्च द्र आप मेरी बलि ले लें देव । रोहित नही दव | वचन मेरी बलि के लिए दिया गया मैं प्रस्तुत हरिश्च द्र मेरे जीवित रहते यह नही हो सकता। पुन रोहित, तुम यहाँ से जाआ। रोहित मैं आपको इस दारुण दशा में छोडकर कही नही जा सकता पिता जी। वरुण तो एक विकल्प रखता हूँ। स्वीकार हो तो वसा ही क्रो। हरिश्च द्र आज्ञा दें देव? बरुण अपन पुन के स्थान पर किसी अन्य तरुण की बलि दी । मैं सतुष्ट हो जाऊँगा। हरिश्चन्द्र नही नही। यह भी नहीं कर सकता। कोई अ य तरण भी तो अपन पिता का ही पुत्र होगा, देव । कोई भी पिता अपने पुत्र को बलि के लिए ही देगा। रोहित पिता जी, मेरे ज्ञान मे एक ऐसा तम्ण है जिसे उसका पिता मदा यातना देता रहता है। वन मे यह तम्ण मुझे मिला था। वह यातना से मुक्त हान के लिए आत्महत्या करने जा रहा था। मेरे समझाने से उसन आत्महत्या करने का विचार त्याग दिया था। ढूढने पर वह मिल जाएगा। आप वरण देव का विकल्प स्वीकार कर लें। हरिश्चद्र वह तरण मिल भी जाए तो कौन पुरोहित या ऋषि ब्राह्मण नर बलि का यज्ञ कराएगा?

नरमेध/१०५ वरुण बरुण महपि विश्वामित्र करायेंगे। विश्व के वही तो मित्र हैं। सकट म पडे मनुष्यो का उद्धार करने वाले वही तो हैं न । क्या वे तुम्ह इस महासक्ट से नही उबारेंगे? रोहित उबारेंगे, देव । महर्षि अवश्य हमे उबारेंगे। वे किसी भी सक्टग्रस्त मनुष्य की गुहार अनसुनी नहीं करते। यही तो मुझे देखना है । (हंसकर) विदा होने के पूर्व एक बार पुन मैं तुम्हें सावधान कर रहा हूँ हरिश्चन्द्र | जब तक तुम बलि नही दे दोगे, तुम्हारा रोग बढता जाएगा तथा शरीर क्षीण होता जाएगा रोहित (चीखता है) वरुण देव । वरुण देव । मेरे पिता जी को तो वरुण जव कुछ नही सुनूगा । मैं विदा लेता हूँ। [वरुण जाता है। नेपथ्य से खडाऊँ की आवाजे आकर तिरोहित होती हैं । मच पर अधकार छा जाता है फिर प्रकाश होता है तो नेपथ्य मे डुगडुगी बजने की आवाज आकर बन्द होती है और डुगडुगी बजाने वाले के साथ दूत मच पर आता है। दूत महाराज हरिश्चन्द्र के आदेश से मैं यह पापणा पढ़ रहा हूँ। सभी आयजन ध्यान से सुनें । वरुण देव को बलि देन के निमित्त एक तरुण की आवश्यक्ता है, जो पिता बलि के निमित्त अपना पुन प्रदान करने को प्रस्तुत हो वह अविलम्ब महाराज के समक्ष उपस्थित हो । महाराज उसे मुहमागा मूल्य चुकाएंगे। (चलते हुए) महाराज के आदेश से मैं यह घोषणा शुन शेप दूत । दूत | रुको । मेरी वात सुनो क्या यह घोषणापत्र मुझे पढने को दे सकते हो? दूत क्यो ? तुम इमे पढकर क्या करोगे | क्या तुम्हें सुनाई कम देता है? शुन शेष नही मुझे सुनाई तो ठोक देता है। किन्तु इस घोषणा पर मुझे विश्वाम नहीं होता। क्या राजा हरिश्चन्द्र सचमुच नरबलि दना चाहते हैं ? नरवलि पर तो प्रतिबघ लगा है। दूत तुम्ह विश्वास नहीं होता, तो लो, घोषणापत्र स्वय पढकर देख लो। इस पर जो लिखा है, वही मैं सुना रहा हूँ वरुण देव को बलि देन के निमित्त एक तरण को आवश्यक्ता है जो पिता अ सुनो, दूत । तुम मेरे पिताजी से शुन गेष अ १०६/नरमेध मिलो। कदाचित वे मुझे बलि के निमित्त दने को प्रस्तुत हो जाएं। दूत (चक्ति) क्या? क्या तुम सचमुच स्वय अपनी बलि देने को ? प्रस्तुत हो शुन शेष हां, मैं प्रस्तुत हूँ। पितु इसके लिए पिता जी की अनुमति लेना जावश्यक है। दूत क्या वे अनुमति दे देंगे? शुन शेष मुझे विश्वास है कि वे अनुमति दे देंगे। वे मुझ सदा शारीरिक यातना देते हैं । वे मुझे चोरी करन के लिए भी विवश करते हैं। उह प्रतिदिन पीन को मदिरा चाहिए। व दरिद्र हैं । वे धन के लिए निश्चय ही मेरा विक्रय कर सकते हैं। तुम मेरे साथ चलो और पिताजी से मिल लो। दूत (स्वत ) ससार म ऐस भी पिता पुत्र हैं, मुझे ज्ञात न था। मैं कई दिनों से यह घोषणा करता घूम रहा हूँ, लोग सुनकर घृणा से मेरी ओर दृष्टिपात कर हट जाते थे । यह काय सपन हो गया ता महाराज की प्रसनता की मीमा नहीं रहेगी। उह नया जीवन प्राप्त होगा। [दोसा जाते हैं। मच पर अधकार होता है फिर प्रकाश हाता है ता मच पर अजीगत, शुन शेप और दूत दिखाई दत हैं । अजीगत घटाई पर बैठा है, उसके हाथ मे मदिरा पान है।] शुन शेष पिताजी, यह महाराज हरिश्च द्र का दूत है। निक्ट के ग्राम मे महाराज की एक घोषणा करता घूम रहा था। इस मैं आपस मिलान ले आया हूँ। अजीगत क्यो ? इसे तुम मेरे पास क्यो ले आये? महाराज हरिश्चद्रको बलि देने के निमित्त एक तरण की आव श्यक्ता है। जो पिता अपने पुत्र को बलि के निमित्त दगा, उसे महाराज मुहमांगा धन देंगे। आपको मदिरा के लिए धन चाहिए न? अजीगत क्या दूत क्या मेरा पुत्र सत्य कह रहा है ? दूत हाँ महाशय, वह सत्य कह रहा है। मैं यही घोपणा करता घूम अजोगत हाँ । (गम्भीर) कौन ऋपि नरबलि-यन कराने के लिए प्रस्तुत हो गए हैं। शुन शेष नरमेध/१०७ दूत यह मुझे ज्ञात नहीं। वह महाराज ही बता सकते हैं। क्या आप । ? अजीगत मुझे विचार करने के लिए कुछ समय चाहिए। तुम अब लौट जाओ । महाराज से कहो कि मैं कल उनसे भेंट करूंगा। दूत धन्यवाद, महाशय प्रणाम ! आप कल अवश्य पधारिएगा। मैं सिंहद्वार पर आपकी प्रतीक्षा करूंगा । आपका शुभ नाम अजीगत अजीगत अगिरा। दूत और आपके सुपुत्र अजीगत उसका नाम शुन शेष है । देख रहे हैं न कितना सुदर, सुशील तथा प्रतिभावान तरुण है। महाराज को जाप बता दीजिएगा। दूत अवश्य-अवश्य ! मैं जाता हूँ। अजीगत क्यो, शुन शेष' तुम बलि होने का प्रस्तुत हो' शुन शेष हा पिताजी । मैं तो घाषणा सुनते ही प्रस्तुत हो गया था। तभी तो दूत को आपके पास ले आया। आपको मुहमागा धन मिलेगा और मुझे शुन शेष अजीगत तुम्हे क्या मिलेगा? शुन शेष मुझे ऋषियो के दशन का सौभाग्य प्राप्त होगा । उनके मुखार- विदु से मत्रोच्चारण सुनने का सुयोग प्राप्त होगा। देव वरुण मेरी बलि लेने आएंगे। तो मुझे उनके भी दर्शन होगे। नजीगत कितु नरमेध सपन कैसे होगा? कोन आय ऋषि मुनि ब्राह्मण नरमेध कराएगा? मुझे तो आशा नही है कि कोई भी यह यज्ञ कराने को प्रस्तुत होगा। दूत कह रहा था कि महाराज हरिश्च द्र का जीवन सकट मे है जब तक बलि न दे दी जाएगी, वरुण दव उह शापमुक्त कर जीवनदान नहीं देंगे। अतएव सभव है कि कोई ऋपि महा राज के जीवन की रक्षा के लिए यह यन कराने को प्रस्तुत हो जाए। अजीगत आर्यावत में तो ऐसे एक ही ऋषि हैं, विश्वामित्र, जा सक्ट- अस्ताकी सहायता करने के निमित्त तत्पर रहते हैं। क्या वे यह यन करन के लिए प्रस्तुत होंगे? हा सक्त है। अजोगत किन्तु वे तो कहते हैं कि मनुष्य अवघ्य है । भला वे नरमेघ क्से शुन शेष कराएंगे? शुन शेष उहाने ही तो राजा हरिश्चद्रको सत्यवादी हरिश्च द्र रूप म १०८/नरमेध प्रतिष्ठित किया था। सभव है कि इस महासकट के अवसर पर वे उनको जीवनरक्षा परत आएं। अजोगत तव तो ठीक है । क्ल में राजा हरिश्च द्र के पास अवश्य जाऊगा (अट्टहास करता है)। [मच पर अधवार छाता है, फिर प्रकाश होता है तो नेपथ्य से हरिश्चन्द्र के कराहने की आवाजें पाती हैं। मच पर विश्वामित्र कुशासन पर बठे दिखाई दते हैं।] रोहित (रोहित व्याकुल होकर चीखता हुआ प्रवेश करता है) महपि । रक्षा कीजिए। मेरे पिताजी की रक्षा कीजिए, इह क्या हो रहा है? 7 विश्वामित्र कौन है ओह राजकुमार रोहित ? तुम्हारे पिताजी को क्या हुआ है ? क्या बाहर रथ म पडे वे कराह रहे हैं ? रोहित हा महर्षि । आप चलकर उ ह देखिए तो। विश्वामित्र (पुकारते हैं) जमदग्नि । जमदग्नि | बाहर आओ। देखो। महाराजा हरिश्चन्द्र आए हैं। उनकी दशा ठीक नहीं लगती। जमदग्नि (प्रवश कर) मामाजी। विश्वामित्र देखो, बाहर रथ म महाराज को देखो। जमदग्नि (बाहर जाकर उपथ्य से) मामा जी इनकी दशा तो शोचनीय है। राजकुमार तुम इहें इस दशा म यहा क्यो ले आए रोहित ये माने नही ऋषिवर | मैंने तो इहें रोका था। आपको तो सब ज्ञात है। वरुण देव हम पर कुपित हैं। व नरबलि लिय विना शात न हागे। हम बलि के लिए एक तरुण मिल गया है। किन्तु कोई भी ऋषि मुनि नरमेध कराने को प्रस्तुत नही हैं। अब पिताजी स्वय इस दशा म भी आपकी सवा मे उपस्थित हुए हैं। बलि म अब अधिक विलम्ब हुआ तो मेरे पिताजी के प्राण नही बचेंगे । (रोता है) विश्वामित्र धय रखो वत्म । वरण देव नरबलि लेना ही चाहते हैं तो उहें नरबलि मिलेगी। मैं नरमेध सपन कराऊंगा। महाराज को मैं वरुण देव के क्रोध का आखेट नही बनन दूगा। तुम महाराज वो राजमहल म जागो और यन वा आयोजन करो। कल प्रात मृगा के उदित होने पर मैं पूर्णाहुति दूगा । बलि तरण का वध करनेवाला भी मिल गया है न? रोहित मैं अभी खोज निकालूगा ऋपिवर । उसको चिता आपन करें। 1 जब बलि के लिए तरुण मिल गया है तो वध करनवाला अवश्य मिल जाएगा। अभी भी अथलोलप का अभीष नही विधा जमदग्नि अब तुम जाओ, वत्स ! सूर्यास्त हो रहा है। महाराज को वशा गम्भीर है। रोहित जा रहा हूँ। (जाता हुआ) पिताजी, महषि ने आपकी-प्रार्थना स्वीकार कर ली है। वे कल प्रात ही पूर्णाहुति देंगे। आप स्वस्थ हो जाएंगे, पिताजी। हरिश्चन्द्र (नपथ्य से) कराहते हुए। महर्षि से कहो पुत्र कि वे अपनी चरण- रज मुझे देने की कृपा करें। मुझमे तो इतनी शक्ति नहीं है कि अपने हाथ उठा सकू। विश्वामित्र (मच स) मैं आपको चिरायु होन का आशीर्वाद देता हूँ राजन जीवित रहते कोई भी आपका जीवन नही ले सकता । बस, कुछ समय और आपकष्ट सह ले। ले जाओ, राजकुमार, इहे ले - जाओ। [नेपथ्य से रथ के घोडो की टापो की आवाजें फेडयाउट होती हैं। जमदग्नि मामाजी। क्या आप सचमुच नरमेध कराएंगे? बीस वर्षों तक तपस्या कर आपने मानव कल्याण के लिए जिस सत्य को प्राप्त किया उसे आप स्वय ही विनष्ट कर देंगे? विश्वामित्र (दुखी) क्या करूँ जमदग्नि? मुझे लगता है कि देव मेरे द्वारा प्रतिपादित जीवनदशन के सत्य का परीक्षण करने को तत्पर हैं। यदि मैं नरमेध कराता हूँ तो स्वयं अपने ही द्वारा प्रतिपादित सत्य के प्रति द्रोह करता हूँ। यदि नहीं करता हूँ तो एक सकट- ग्रस्त मनुष्य के प्रति अपने क्तव्य से च्युत होता हूँ । देव ने मुझे जिस घमसकट म डाल दिया है जमवग्नि ऐसा आप समझते हैं तो क्यो नही आप स्वय वरुण देव से प्राथना करते कि वे आपको ऐसे धमसकट मे न डालें? विश्वामित्र उहाने जान-बूझकर मुझे इस सक्ट मे डाला है, वे मेरी प्रार्थना नहीं सुनेंगे। रोहिणी (मावर) आप लोग क्या वार्ता कर रहे हैं? जमदग्नि मामा जी घोर धमसक्ट म पड गये हैं मामी जी। रोहिणी (चक्ति) क्यो अवानक ऐसा क्या हो गया?

११०/नरमेध । विश्वामित्र देवि । महाराजा हरिश्चन्द्र के प्राण सकट मे हैं । उहें हमारी सेवा की आवश्यकता है। हम अभी उनकी यनशाला में चलेंगे। आप और देवदत्त भी चलें जमदग्नि हम सब भी चलेगे? विश्वामित्र चलो, सब लोग चलो । पत्नी, पुन सभी स्वजन चलो तथा मेरे पतन का दश्य देखो। रोहिणी (व्याकुल) यह आप क्या कह रह हैं स्वामी ? अभी जमदग्नि आपने धमसकट की बात कर रहे थे और अब आप अपने पतन की बात कर रहे हैं? विश्वामित्र जमदग्नि, इहें सब बता दो और प्रस्थान की तैयारी करो। [नेपथ्य से घोडो कोटापा की आवाजें आती हैं] यह कौन हमारी ओर आ रहा है ? (हाथ जोडकर) देव, महा- राज को कल तक का समय देने की कृपा करें। क्ल प्रात ही आपको बलि मिल जाएगी । (टापो की आवाजें पास आकर रुक्ती हैं)। दूत (आवर) महाराजा हरिश्चद्र का दूत आप सबको प्रणाम करता है जमदग्नि सब समाचार ठीक है न? महाराज दूत महाराजा की दशा अत्यधिक गम्भीर हो गई है। उनके मुह से अब बोली भी नहीं निकलती। राजकुमार रोहित न मदेश भजा है कि बलि-तरण को वध करने वाला मिल गया है। ऋपिवर शीघ्र पधारें तथा यज्ञ-सामग्री को सहज लें। जमदग्नि एक राक्षस ने अपने पुत्र को बलि के लिए दे दिया तथा दूसरे राक्षस ने बलि तरण को वध करने का काय संभाल लिया। ये क्रूर व्यक्ति कौन हैं। दूत जिस व्यक्ति ने अपने पुत्र को दिया था वही वध करने के लिए भी प्रस्तुत है, ऋषिवर । उसन एक सौ गाएं पुत्र के लिए ली थी और एक सौ गोएँ वध करने के लिए ली हैं। रोहिणी घय है। विश्व मे ऐसे पिता भी हैं, यह कौन सोच सकता है। मरमध कौन करेगा दूत जमदग्नि आप अदर चलिए, मामीजी मैं आपको सब बताता हूं (धोना 7 जाते हैं)।

नरमेध /१११ विश्वामित्र । दूत तुम चलो, दूत। हम लोग अभी आ रहे हैं। राजकुमार से कहना, बे चिता न करें। भाप लोगो को ले जाने के लिए रथ आ रहा होगा।आप प्रतीक्षा करें। (जाता है।) [घोडे की टापो की आवाजें दूर जाकर फेडआउट होती रोहिणी (आर) क्षमा करें, स्वामी, तो मैं एक बात पूछू ? विश्वामित्र पूछिए, देवि । रोहिणी यदि आप समझते हैं कि नरमेध कराने से आपका पतन हो जाएगा, तो आप इमे करवा ही क्या रह हैं ? विश्वामित्र जमदग्नि ने तुम्हे यह नहीं बताया? वरुण देव की यही इच्छा रोहिणी देव की इच्छा के अधीन काय करन स किसी का पतन क्या होगा? देव इच्छा तो सर्वोपरि है न? विश्वामित्र हा देव ही मेरा पतन देखना चाहत हैं । जमदग्नि (आर) मामा जी, मैं समझता हूँ कि आपके लिए ऐसी आत्म ग्लानि का कोई कारण नहीं । कौन जाने, इस अकल्पनीय काड के पीछे देव का क्या उद्देश्य है ? आपने अपने तप की शक्ति से सत्य की स्थापना की है नई सृष्टि का सजन किया है, आयत्व को नया अथ दिया है रोहिणी आपके प्रताप से ही कितन अनार्यों को आयत्व प्राप्त हुआ है, स्वामी। विश्वामित्र रोहिणी जमदग्नि इस सबका यश मुझे न दो। यह सब देव की कृपा से ही सम्भव हुआ था। आज वही देव मुझसे यह नरमेध करवाकर रोहिणी नहीं नहीं ! यह सम्भव नही है। एक वसिष्ठ को छोडकर सभी ऋषि-मुनि मापके मादेशो का सम्मान करते हैं स्वामी । विश्वामित्र मुनि वसिष्ठ की बात मत करो देवि । उनका माग भिन्न है । जस दो माग और मेरा भाग अलग-अलग ही रहते हैं, वैसे ही मुनि वसिष्ठ का मार्ग अलग-अलग ही रहेगा। आज मुझे लगता है कि वरुण देव का माग भी मुनि वसिष्ठ का ही माग है । अयथा वे नरबलि की मांग नहीं करत, मानव को पशुओ की भांति ऋय विश्य तथा बलि की वस्तु नहीं समझते ! राजा ११२/नरमेध हरिश्चद्र के प्राणो के रक्षाथ यह नरमेध करवाने के पश्चात मैं ऋषिपद से च्युत हो जाऊंगा, तब इस पृथ्वी को अपने भार से पीडित करने का कोई अधिकार मुझे नहीं रहेगा। मैंने तो साधना तथा अनुभव से जो सत्य प्राप्त किया था, उसका समाज मे प्रसार किया है । मैंन घोषणा की थी कि माराव मानव मे भेद असत्य है, आयत्व वण में, जाति मे रक्त म नही, सस्कार मे है रोहिणी कौन कहता है कि यह असत्य है ? (सिसकती है।) विश्वामित्र वरुण देव स्वत कहते हैं अय किस प्रकार कहा जाता है ? मुझे अब भी आशा है और यही आशा लेकर मैं चल रहा हूँ कि मैं अपने सत्य की शक्ति मे राजा हरिश्चन्द्र को शापमुक्त करूँगा तथा नरमेध रुकवा सकूगा। यदि मैं असफल रहा तो समझ लूगा, मनुष्य अक्चिन है तथा केवल देव ही शक्तिमान है, मनुष्य का अनुभवजय सत्य कुछ नही, देव की इच्छा ही सब कुछ है । उस स्थिति मे देव की आराधना करने योग्य मैं नही रहूंगा। रोहिणी (रोती हुई) तब आप क्या करेंगे, स्वामी? विश्वामित्र रोहिणी | देवी रोहिणी | तुम भगवान अगस्त्य की सुपुत्री हो तपस्विनी हो हमारे तीन पुत्र हैं तुम उनका ध्यान रखना, उहे भरतो की कीर्तिवद्धि करने का पाठ पढाना । जमाग्नि (व्याकुल) मामाजी, आपका मतव्य क्या है ? विश्वामित्र सत्य की रक्षा करना । सत्य की रक्षा के लिए जीवन होम कर देना । यदि वरुण दव मुझसे नरमेध करवाएंगे, तो मैं जीवित रहते मत हो जाऊँगा। किन्तु रोहिणी किन्तु क्या, स्वामी विश्वामित्र यह अवसर आने पर में वरुण देव को ही बताऊँगा। तुम, सब लोग ध्यान से सुनना। वह मेरा अन्तिम उद्घोप होगा। मैं ता मानव गौरव का तेज अवलोकन करने वाला नम हूँ। मनुष्य का तेज विनष्ट हो, यह देखने लिए मेरे नत्र नहीं हैं। पिच पर अघकार छाता है । कुशासन पर विश्वामित्र बैठे हैं। उनके अगल-बगल रोहिणी और जमदग्नि पश पर बैठे हैं। दूत (माकर) महपि । मजीगत आपसे मिलने आया है। - नरमेध/११३ । विश्वामित्र पौन अजीगत? दूत यही, जिसन बलि के लिए अपना पुत्र दिया है तथा विश्वामित्र यह मुगरा क्यो मिलना चाहता है ? क्या उसने अपना निणय परिवर्तित कर दिया है? दूत मुये मात नहीं । आपकी आज्ञा हा तो मैं उसे बुला लूं । रोहिणी बुला लीजिए, स्वामी । ज्ञात तो हो कि वह किस मन्तव्य स आया है? जमदग्नि हाँ, हां मामाजी, आप उसे बुला लीजिए। विश्वामित्र मैं ता राहिणी किन्तु मैं देखना चाहती हूँ कि वह कौन सा पिता है जो अपने पुत्र को वलि के लिए द ही नहीं, उसका अपन हाथ स वध भी घर सकता है। जमग्नि हां हां मामा जी, आप बुला लीजिए। कौन जाने, दव ने ही क्सिी मत य से उस आपस मिलने को प्रेरित किया हो विश्वामित्र अच्छा, दूत, उस लिवा लाओ। दूत जो जाज्ञा । (जाता है) रोहिणी (उत्सुक) हे प्रभु क्या होन का है। अजीगत (आकर) क्या अधम अजीगत का प्रणाम अधमाद्धारक महर्षि स्वीकार करने की कृपा करेंगे? विश्वामिन देव तुम्हारी रक्षा करें। कहो, मुझसे ऐसा क्या काम है कि इतनी राति में जजीगत भगवन, मैं एका त म आपसे कुछ निवेदन करने आया हूँ। पास ही नदी बह रही है। दो क्षण के लिए तट पर चलने का कष्ट करें, तो बडी कृपा होगी। मेरी बात अय कोई भी सुन लेगा, तो वडा अनथ हो जाएगा। विश्वामित्र क्या अथ तथा अनथ का ज्ञान तुम्हे है, अजीगत? तुम्हारा आचरण तो वनले पशुओ जैसा है। अजीगत (कृत्रिम दपनीयता से ज़रा हंसकर) विश्व के मित्र दीनो, असहायों, सतप्तो, अधमो, पापिया के सहायक ! क्या आप मेरी बात भी नही सुनिएगा? मैं आपके चरणो मे उपस्थित हुआ हूँ। नहीं, आप ऐसा नहीं करेंगे। आप सतप्त राजा हरिश्चन्द्र के प्राणो की रक्षा के लिए अपने जीवन का सम्पूण अजित यश बलिदान करने के लिए उद्यत पर दुखकातर महर्षि, क्या अपने बचपन के सहपाठी का तिरस्कार करेंगे?

११४/नरमेध विश्वामित्र (चकित) सहपाठी? रोहिणी (चक्ति) क्या तुम मेरे स्वामी के सहपाठी हो? जमदग्नि (चक्ति) क्या तुम मेरे मामाजी के सहपाठी हो? नहीं नहीं । तुम्हारे जैसा राक्षस मेरे मामा जी का सहपाठी नही हा सकता। ? अजीगत यह मेरा दुर्भाग्य है कि मैं इस अधम दशा को प्राप्त हुआ हूँ कि मेरे बाल सहपाठी आज मुझे पहचान नहीं रहे हैं। (कृत्रिम हंसी के साथ) महपि विश्वामित्र । आप तो भूत, वतमान और भविष्य तीना के महाद्रप्टा हैं । तनिक स्मरण करने का कष्ट तो करें। इस अधम ने आपको मत्रोच्चारण सिखाया था। यह राक्षस, जो आपके समक्ष नतमस्तक खडा है, अजीगत अगिरा है। विश्वामिन (चक्ति) अजीगत जगिरा। रोहिणी (चकित) क्या तुम भी भगवान अगस्त्य के शिष्य हो जमदग्नि (चकित) अजीगत अगिरा जिमे भगवान अगस्त्य न शाप दिया था। विश्वामित्र पतित । तूने यहाँ आने का साहस कैसे किया? अजीगत क्षुब्ध न हो, पतितो के उद्धारक । रोहिणी तुम शाप से अभी मुक्त नहीं हुए' अजीगत (कृत्रिम हँसी के साथ) शाप से मुक्त होने के निमित्त ही ता आज मैं मुक्तिदाता के चरणो मे उपस्थित हुआ हूँ। यही अवसर प्राप्त करने के लिए तो मैंने अपना पुन बलि के लिए विक्रय किया है, इसी कारण क्ल प्रात उसे वध करने का वचन भी मैंन दिया है । मेरा भी उद्धार कीजिए, महा उद्धारक महपि । रोहिणी यह सब क्तिना रहस्यमय है ? जमदग्नि वरुण देव । वरुण देव । आप कसा नाच नचवाना चाहते हैं मेर मामाजी से? रोहिणी ह ईश्वर, रक्षा करा | रक्षा करो। विश्वामित्र शापमुक्ति के लिए तुम भगवान अगस्त्य के पास जाओ। मेरे पास क्यो आए हो? अजीगत (व्यग्य से) क्या इसी प्रकार आपन राजा हरिश्चन्द्र से कहा था कि तुम वरण देव के पास जाओ, मेरे पास क्यो आए? विश्वामित्र तुम तो इस प्रकार अधिकार से बात कर रह हो मानो श्राप मुक्त होना तुम्हारा अधिकार हो । सब पतित ऐसा ही समझन नरमेध / ११५ लगें, तो पतितो के लिए एक अलग आचारसहिता का निर्माण हो जाए। तुम नितात सस्कारहीन हो गए हो? रोहिणी पतितो को तो आप सिर पर चढा लेते हो, यह उसी का परि- णाम है, स्वामी। अजीगत नहीं-नहीं, भगवती, इसका कारण मैं बताता हूँ। महर्षि विश्वामित्र | क्या आपको स्मरण है कि भगवान अगस्त्य ने मुझे शाप क्ब दिया था? विश्वामित्र लगभग बीस वप होन का आए । अजीगत धयवाद, महपि, धयवाद | वीस वर्षों से मैं बहिष्कृतो की भाति कप्ट भाग रहा हूँ। आर्यो न मुझे मारा पीटा, दुत्कारा। मुझे या मेरे बाल-बच्चो को उहोने अपने मामा के निकट फटकने भी न दिया। महपि अगिरा की सतान को-भगवान अगस्त्य के शिष्य को कैसी क्सी दारुण यातनाएं भोगनी पडी हैं, आप सहज ही कल्पना कर सकते हैं । ऐसे म क्या मेरे आय आचार- व्यवहार-सस्कार की रक्षा सम्भव थी? तब भी मैं नहीं चाहता कि आपके जीवन की अजित सम्पूर्ण कीर्ति विश्वामित्र अभी तुम अपने स्वाथ की बात कर रहे थे और अभी तुम्हे मेरी कीर्ति की चिता हो गई? अजीगत आप विश्वास कीजिए, महर्षि । मेरी शपथ और आपकी वीति वे बीच गहरा सम्बध है । इसी कारण मैं आपस एकात म बात करना चाहता हूँ। रोहिणी इसकी बातें तो अधिक रहस्यमय होती जा रही हैं । जमदग्नि यह सब तो मुझे वरुण दव की बुद्धि का चमत्कार ही लगता है । विश्वामित्र और मुझे इस पर गहरा स देह हो रहा है । अजीगत, सत्य आचरण तथा सत्म भाषण के लिए किसी दुराव छिपाव की आवश्यकता नहीं पड़ती। मेरा कोई भी आचार विचार गोपनीय नहीं है। मुये कभी भी यह भय नही हुआ कि किसी भी सत्य बात से मेरा कोई अनय हो सकता है । य दोना मेरे स्वजन हैं। तुम्हे जो भी कहना हा, यहो। तुम्हारी यातो के ये साक्षी रहगे, यह अच्छा ही रहेगा। तुम मुझे सत्यवादी नही लगत अजीगत मैं सत्यवादी रहता तो मेरा जावन अभिशप्त क्या होता महाप, वितु इस समय आपके समक्ष में असत्य भापण परन नहीं आया हूँ। आप विश्वास करें, मैं हृदय से कामना करता हूँ कि यह नरमेध आपके हाथ से न हो।

११६ / नरमेध 7 ? रोहिणी चमत्कार । चमत्कार। जमदग्नि आप देखते जाइए, मामाजी | वरुण देव अभी हमे कैसे कसे चमत्वार दिखाते हैं। विश्वामित्र हा हा, चमत्कार है । कि तु तनिक इससे यह तो पूछा कि यदि यही इसकी मनोकामना है, तो इसन अपना पुन वलि के लिए क्यो दिया और वध करन के लिए स्वय प्रस्तुत क्या हुआ अजीगत इसका उत्तर मैं पहले ही आपको दे चका हूँ, महपि । क्या आपका विस्मरण हो गया? रोहिणी हा हा, रवामी, इसने बताया था कि शापमुक्त होन के लिए ही जमदग्नि यह सव कैसा ऊहापोह है, मामाजी? विश्वामित्र इसी से पूछो कि यह इसका कैसा प्रलाप है अजीगत महर्षि ! मेरे नान मे एक माग है, जिससे आपरी इस अपकीर्ति से रक्षा हो सकती है । वही बताने में आया है। विश्वामित्र कौन-सा माग अजीगत महर्षि । आप मुये शाप से मुक्त करें और एक सहस्र गौएँ दें तो मैं आपकी रक्षा का उपाय बता सकता हूँ। रोहिणी क्या? जमदग्नि यह तो मुये धूत लगता है मामाजी। जाप आज्ञा दें तो मैं इस भगा दू। अजीगत (धृष्टता से हँसकर) नही, जमदग्नि ऋपि मैं वटमार अथवा दस्यु नही हूँ। मैं कपि अगिरा का पुत्र तथा भगवान अगस्त्य का शिष्य हूँ। आप धैय मेरी बातें सुनिए । महर्षि विश्वामित्र । मैं इतन वर्षों स इसी अवसर की प्रतीक्षा कर रहा था। मैंने अपार कष्ट येले हैं । मैं एक सहस्र से एक धेनु भी कम नही लूगा रोहिणी तुम विश्वामित्र आप तनिक रविए, देवि । अजीगत, मुझे अब पात ही नहीं कि भगवान अगस्त्य न तुम्ह शाप क्या दिया था, तो मैं उस शाप से तुम्हें मुक्त क्स कर सकता हूँ? जजोगत महपि मैं क्या बताऊँ ? समय लीजिए, मैन श्राप को स्वय आमति दिया था। विश्वामित्र (चक्ति) कम' मजीगत एक रात्रि गुस्माता भगवती लोपामुद्रा न मर अब म वस्त्र म 1 नरमेध / ११७ लिपटा हुआ एव सद्य जात शिशु को डालकर कहा, वत्स अजीगत तुम हमारे सर्वाधिक विश्वासपात्र शिप्य हो। इस शिशु को लेकर तुम वन में चले जाओ तथा वही एक वर्ष तक इस शिशु का पालन पोषण कर लोटना और इसे हमे सौंप रोहिणो यह दुष्ट तो हमे कथा गढकर सुनाने लगा स्वामी । जमदग्नि अजीगत, तुम्हारे मस्तिष्क की मजूपा मे क्या क्या भरा है ? मामाजी, आप इस प्रकार गम्भीर क्या हो गए विश्वामित्र तर? आगे की घटना का वणन करो, अजीगत । अजीगत मैंन भगवती की आना का पालन किया । उस सद्य जात शिशु को लेकर मैं वन म चला गया । मधु तथा फलो का रस पिलाकर मैंने उसे जीवित रखा । फिर उसके दूध की व्यवस्था की। इस हेतु मैं एक धेनु चुरा लापा । शिशु की माता बनकर मैंने उसका पालन पोपण किया। उसे मैं गोद म लेकर दूध पिलाता, खैलाता तथा सुलाता । मुझे उससे वैस ही प्रेम हो गया जैसे एक माता को अपने शिशु के साथ होता है । शन -शनै एक वष बीत गया कि तु शिशु को लेकर मैं भगवती के पास नहीं गया। मैं शिशु के मोहपाश में बंध गया था। उसे अपने से अलग करना मेरे लिए असम्भव हो गया था। विश्वामित्र (गम्भीर) तब रोहिणी वाह | स्वामी, क्या आप इसकी कथा पर विश्वास कर रहे हैं ? क्या इम पुनहता के शिशुप्रेम की बात पर विश्वास किया जा सकता है? विश्वामिन मनुष्य बडा ही जटिल प्राणी है, देवि | इसे बोलने दो। आगे कहो अजीगत? अजीगत कि तु भगवती ने मुझे खोज निकलवाया । एक दिन मैं नदी तट पर जब जल लेने गया तो कुछ बटुकोन मुझे पक्ड लिया और कहा, शिशु को लेकर चलो। भगवती लोपामुद्रा न तुम्हे स्मरण किया है । तब मैं असत्य बोल गया, शिशु तो मर गया था। इसी भय से मैं भगवती के पास नही गया। तब वे मुझे पकडकर भगवती के पास ले आए। मैंने उनके समक्ष भी असत्य भाषण क्यिा। कितु त्रिकालदर्शी भगवान अगस्त्य से मेरा असत्य भाषण छुप न सका । उहोने शुद्ध होकर मुझे शाप दे दिया। रोहिणी सुन ली आपने इसवी स्था, स्वामी । यह मूख क्या शिशु के ?

११८/नरमेध साथ भगवती के पास नहीं रह सकता था। इसे असत्य भाषण करने की क्या जावश्यक्ता थी? जमदग्नि और क्या, जब भगवती का इस पर इतना विश्वास था तो वे इस शिशु के साथ ही अपने यहा नही रहने देती। विश्वामित्र (खोये हुए से) हा, यह वात तो है । क्यो अजीगत ? अजीगत महपि, ये नही समझते कि मैं उस समय यदि सत्य भाषण कर देता, ता प्रलय हो जाता, कि तु आप तो समझ सकते हैं । विश्वामित्र कुछ नहीं समझता | अब अपना प्रलाप समाप्त करो। जजीगत (हंसकर) सहनशीलता के अवतार महर्षि । इस प्रकार क्षुब्ध होना आपको शोभा नहीं देता। विश्वामिन क्या मैं मनुष्य नही हूँ? अजीगत यही तो आपकी महानता है जो सव ऋपियो में आपको शीपस्थ बनाती है । आपने इतने महान होकर भी मनुष्य तथा मनुष्यता को कभी दृष्टि से ओझल नही किया। इस समय भी एक मनुष्य के प्राणा की रक्षा के लिए ही आप रोहिणी तुम प्रकरण परिवर्तित मत करो। तुम पिसी प्रलय की बात कर रहे थ? जमदग्नि हाँ, इसके मत्य भापण स प्रलय आ जाता ऐसा इसने कहा था। जजीगत हा, मैने यह कहा था और अब भी मैं अपनी बात पर अटल विश्वामित्र अजीगत वितु क्यो, तुम्हारे मत्य भाषण से प्रलय क्या आ जाता? बताना ही पड़ेगा, महपि आपका अब भी कुछ स्मरण नहीं आता? बोलो। विश्वामिन नहीं, मुझे कुछ भी स्मरण नहीं। तुम रोहिणी हां, शीघ्र बोलो, अजीगत । जमदग्नि हा, हा, हमारे धेय की परीक्षा मत लो। रहस्य का उदघाटन करो। अजोगत तो सुनिए। भगवती लोपामुद्रा तथा भगवान अगस्त्य न उस सपय उम शिशु के जम को गोपनीय रखना आवश्यक समझा था क्यावि महर्षि तनिक उस समय की परिस्पिा का स्मरण करें। उस समय आप तथा तत्सुआ के बीच शत्रुता चल रही थी । साथ ही भरता का भी आपका अनाय प्रम न भाता था। आपको स्मरण है न?

ST विश्वामित्र बोलते जाओ। अजीगत यदि उस समय उस शिशु वे जन्म को गोपनीयन रखा जाता तो विश्वामित्र आपकी, भरतो की तथा नाय को क्या-दशा होती? रोहिणी क्या कह रहे हो? उस शिशु वा मेरे स्वामी से क्या सम्बध? जमदग्नि दखिए, मामा जी यह उस शिशु के साथ आपका सम्बध जोड अजीगत जाप क्या कहते हैं सत्यरक्षक महापि? विश्वामित्र तुम्ही बहो । अजीगत इन लोगो के समक्ष मैं भेद खोलना नहीं चाहता था। किन्तु आपने मुझे विवश कर दिया। तथापि मुझे सकोच हो रहा है । महपि । क्या आपको स्मरण नहीं कि वह शिशु आप तथा अनाथ राजा शवर की कुमारी पुत्री उग्रा के प्रेम का उपहार था, आपका उत्तराधिकारी था | उस समय यदि यह रहस्य खुल जाता तो आयावत मे भरत तथा तत्सु आपका कोई चिह्न भी न रहने दते। इसी कारण मैंने आपके उस प्रथम पुत्र को भगवती लोपामुद्रा को नही सौपा तथा स्वय अभिशप्त होना तथा पतित होना स्वीकार किया। आपकी सुरक्षा का यही उपाय मेरी समझ मे उस समय आया था, महर्षि । रोहिणी क्या यह सत्य कह रहा है, स्वामी ? (सिसक्ती है) जमदग्नि नही नही, यह सत्य नही हो सकता। रोहिणी आप कुछ बालते क्या नहीं स्वामी? विश्वामित्र (अवरुद्ध कण्ठ से) क्या सत्य है क्या असत्य, मैं कैसे कह दूं । मैं कसे यह विश्वास कर लू कि भगवती लोपामुद्रा ने असत्य भाषण किया था तथा यह नीच, पतित, अधम ब्रह्मराक्षस सत्य भाषण कर रहा है। रोहिणी (रोती हुई) भगवती लोपामुद्रा ने क्या कहा था? विश्वामित्र भगवती लोपामुद्रा ने मुये बताया था कि उना एक मृत शिशु को ज म देकर स्वय भी मत्यु को प्राप्त हो गई थी। क्योरे असत्यभाषी भगवती भी क्या असत्य भाषण कर सकती हैं ? अजीगत मैं भगवती को असत्यभाषी कैस कह सकता हूँ? कितु मैंने असत्य भापण नही किया। सम्भव है, उस समय आपको सुरक्षा के लिए भगवती ने वैसा कहना ही उचित समझा हो। किंतु इस समय मैं असत्य भाषण क्यो क्हूगा?

१२०/नरमेध जमदग्नि मामा जी से एक सहस्र गोएं हस्तगत करने के लिए। राहिणी कितु मेरे स्वासी तथा अनार्या कुमारी उग्रा का सम्बध क्या सत्य है? अजीगत (हँसकर) इस सम्बध को भी आप अस्वीकार कर दीजिए, महर्षि । आप इन वस्तुआ का अवलोकन तो कीजिए देवि । विश्वामित्र क्या है ये? जमदग्नि मैं देखू । [अजीगत जेब से निकालकर एक मुद्रा और एक कुण्डल राहिणी के हाथ मे देता है।] रोहिणी शवर की मुद्रा तथा कुडल । क्या यह कुडल नापका है, स्वामी? अजीगत बोलिए, बोलिए, महर्षि । क्या आप इन वस्तुओ को नही पह चानते ? ये शिशु के कण्ट मे बँधी थी। रोहिणी हे भगवान । हे भगवान ' (जार से राती है) जमदग्नि वरुण देव, वरण देव, क्या यह रहस्य भी आपको आज ही उदघाटित वसा था। विश्वामिन (कापते स्वर म) कहा है वह शिशु ? अजीगत (हमकर) शिशु नही, अब वह शिशु वीस वप या तरण शुन शेप है जिस आप प्रात यज्ञकुण्ड में होम करने का पुण्याम करन वाले हैं। रोहिणी मही नही । यह नहीं होगा जमदग्नि असम्भव । असम्भव। विश्वामित्र (शुद्ध) नराधम | तेर अमत्य की कोई सीमा नहीं है । भगवान अगस्त्य ने तुझे इसी असत्य भाषण के लिए शाप दिया, अब में भी तर असत्य भापण के लिए अजीगत सावधान, महपि आप भी प्राधम आकर मामाय पिया तथा नेवा की पक्ति म पडे न होइए । मुझे श्राप देन के पूर्व आप भली भांति विचार कर लकिशुन शेष आपका ज्यप्ठ पुत्र है, आपवा उत्तराधिकारी है । आपकी मत्यु के पश्चात यह भरता के राज्य का अधिकार मागगा। मैन या ही बीस वर्षों तक उसका पालन पोषण नहीं किया है। उसका मूल्य बल एप सहन गौरी तो कुछ नहीं। मैंा उमे या ही यज्ञकुण्ड म हामन के लिए बड़ा नहीं दिया है । वह ता दासी उना या पुत्र है। उसी वलि वरुण दव वस स्वीकार करेंगे? - नरमेध/१२१ रोहिणी हे भगवान । हे भगवान ! यह सब मैं क्या सुन रही हूँ? जमदग्नि मामा जी | क्या अब भी आप मुझे अनुमति नहीं देंगे कि मैं इस दुष्ट को यहा से भगा दू? विश्वामित्र राक्षस | तू भाग यहा से। अजीगत जा रहा हूँ। कि तु आप विचार कर लीजिएगा, महपि प्रात यज्ञमण्डप मे हमारी फिर भेट होगी। (जाता है) वरुण सगीत की एव धुन बजने के बाद] रोहिणी (कुठित) स्वामी, आप इस प्रकार शात गम्भीर क्यों हो गए है ? अजीगत तो चला गया। पता नही अब वह क्या उत्पात करे ? प्रात भरे यज्ञमण्डप मे भी वह यही कथा सुनाने लग तो? विश्वामित्र (धीर गम्भीर) यज्ञमण्डप मे शुन शेष भी उपस्थित होगा न ? जमदग्नि हां मुये ज्ञात हुआ है वि शुन शेप महाराज के सैनिको के पहरे मे है। विश्वामित्र तो शुन शेप का देखने के बाद ही मैं निणय कर पाऊंगा कि क्या सत्य है, क्या असत्य है, भगवती लोपामुद्रा ने सत्य भाषण किया था अथवा अजीगत का भाषण सत्य है । रोहिणी वितु यह सत्य तो आप स्वीकर करते हैं न स्वामी कि उग्रा के साथ आपका प्रेम-सम्बध था तथा उग्रा न आपके पुत्र को जन्म दिया था? विश्वामित्र (विभोर) हा, यह सत्य है मैं इस अस्वीकार नहीं करता । उग्रा के माथ मेरे जीवन का वह प्रथम प्रेम था। उग्रा को मैं आजीवन विस्मृत नही कर सकता । शवरगढ की श्यामा, सुदर सुवोमल, मेरे प्रेम मे विह्वल वह बालिका उग्रा आज भी मेरे नत्राम, हृदय मे बसी है। उसने एक दिन मुझस मेरा कुण्डल प्रेमचिह्न के प म माग लिया था । यह यही कुण्डल है । उस वक्षस्थल पर एर मुद्रा का लाल चिह्न था। यह वही मुद्रा है। मैंने प्रेम- विह्वल होकर कितनी ही चार इस कुण्डल तथा मुद्राचिह्न का चुम्बन किया था। उग्रा वे गभवती होन पर मैं उसम विवाह करने वो उद्यत हो गया था कि तु भगवान अगस्त्य तथा भगवती लोपामुद्रा ने हमारा सम्बध स्वीकार नहीं किया। भगवान अगस्त्य ने मेरा विवाह अपनी पुत्री अर्यात आप साप सम्पन करा दिया। इससे मुये तथा उग्रा का वडा दुख हुआ। किन्तु हम विवश थे।

१२२/नरमेध रोहिणी फिर क्या हुआ? विश्वामिन एक अशुभ रात्रि में उग्रा प्रसवपीडा सै मूच्छित हो गई, फिर भगवती ने जो मुझे बताया, वह सुम लोगो को अभी-अभी मैं बता चुरा हूँ। किन्तु अजीगत उनका प्रतिवाद कर गया है। इन दोनो मेक्सिकी बात सत्य है, यह शुन शेष को देखने स ही ज्ञात हो सकती है । यदि शुन शेष मेरा तथा उग्रा का पुत्र होगा, तो तुम लाग भो उसे पहचान सकते हो। हो सकता है कि उसके वक्ष- स्थल पर इस मुद्रा का चिह्न भी हो। रोहिणी (सिसक्ती हुई) यदि शुन शेप सचमुच आपका पुन हुआ तो? जमाग्नि क्या आप उसको बलि दे देंगे? विश्वामित्र नही, मैं उसकी बलि नही दूगा I मैं नरबलि दे ही नहीं सकता हूँ शुन शेष मेरा पुन नहीं होगा, तब भी मैं उसकी बलि नहीं दूगा। जमदग्नि यह क्या कहते हैं मामा जी? आपने राजा हरिश्चद्ध को वचन दिया है विश्वामित्र मैंने जो वचा दिया है, उसे मैं पूरा करूंगा। रोहिणी किंतु कमे? विश्वामित्र क्ल यज्ञमण्डप मे तुम लोग उपस्थित रहना । वरुण देव सोचत हैं कि मेरे हाथा नरमेध कराकर मुझे सत्यभ्रष्ट कर देंगे । वे यह नही सोचते कि सत्य मर्वोपरि है, मेरे भ्रष्ट होने से वह भ्रष्ट नहीं हो मकता? फिर क्या वरण देव मुझे सत्यभ्रष्ट कर सकते हैं ? मुझे सत्यभ्रष्ट करन के पूर्व ही वे देखेंगे कि अग्निकुड म शुन शेष के स्थान पर मेरा होम होगा। मैं अपना होम देकर सत्य तथा हरिश्चन्द्र की रक्षा करूंगा। रोहिणी (चीसकर) स्वामी | स्वामी । यह क्या कह रहे हैं आप? जमदग्नि (चीखकर) मामा जी ! मामा जी ! क्या ऐसा भयकर सकल्प आपने कर रखा है? विश्वामित्र तुम लोग शात रहो । वरण देव वसिष्ठ मुनि तथा अजोगत राक्षस मेरा अपमान करने पर तुले हैं मेरे सारे प्रतिपादित सत्य को मिटाने के लिए कटिबद्ध हैं । व कल्पना भी नहीं कर सकते कि विश्वामिन राजपुराहिन, यन अथवा सुख ऐश्वय के लिए जीवित नहीं है। उसका जीवन सत्य निष्ठा, क्तव्य, मानवता वे निमित्त समर्पित है। उसन यन, ऐश्वय अथवा प्रतिष्ठा के लिए सत्य-साधना नहीं की है। वह तपस्वी है सत्य का । सत्य नरमेध | १२३ यज्ञ सृजन की रक्षा के लिए स्वत अपने प्राण दे सकता है, सत्य की वेदी पर अपनी बलि दे सकता है। यज्ञज्वाला का आलिंगन कर सक्ता है! तुम लोग साक्षी होग कि नरबलि के भूखे देव वरुण किस प्रकार मेरी बलि स्वीकार करते हैं । का माधन है, मानव विनाश का कुड नही । जिस यज्ञवुड मे मानव का होम हो, वह यज्ञ हो ही नहीं सकता । मैं अपने सत्य पर अटल है, सदा अटल रहूंगा। जमदग्नि वितु वरुण देव तो रोहित के समवयस्व तरण की बलि लेना चाहते हैं? विश्वामित्र तो उहै पिता-पुत्र दोनो को बलियां मिलेंगी। रोहिणी आपका तात्पय | क्सि पिता पुत्र की? विश्वामित्र मेरी तथा मेरे पुत्र शुन शेष की। जमदग्नि तो क्या आपने स्वीकार कर लिया कि शुन शेप आपका ही पुत्र है? रोहिणी हे भगवान । हे भगवान ! शुन शेप आपका पुत्र है, यह आप यज्ञमण्डप मे सब लोगा के समक्ष स्वीकार करेंगे? विश्वामित्र यदि मुझे विश्वास हो गया कि शुन शेष ही मेरा पुत्र है, तो मैं डके की चोट पर यह घोषणा करूंगा। रोहिणी (रोती है) फिर आप यह भी घोपणा करेंगे कि शुन शेप ही आपका उत्तराधिकारी है । हे भगवान । मेर देवदत्त का क्या जमदग्नि ओ हो । सभावनाएँ सत्य ही नही हुआ करती, मामी जी। मेघगजन से आप भयानात हो रही हैं कि विद्युत प्रहार आप ही पर होगा ! मामा जी तो कह रहे हैं कि यदि रोहिणी नही, जमदग्नि, नही । मुझे लगता है कि अजीगत सत्य भाषण कर गया है विश्वामित्र सम्भव है । कि तु वह मुझे जो भय दिखा गया है, वह असत्य है ! में सत्य को ढाक्न के लिए उसे एक सहस्र गौएँ घूस नही टूगा । प्रत्युत सत्य की घोषणा स्वय कर उसके मुख पर कातिख पोत दूगा। रोहिणी मुझे तो अपने देवदत के लिए चिन्ता हो गई ! क्या उस उत्तरा धिकार से वचित कर शुन शेप को जमदग्नि ओ हो मामी जी विश्वामित्र देवि की आशका निर्मूल नही है जमदग्नि ! परिपाटी तो यही १२४/नरमेध - है कि ज्येष्ठ पुत्र को ही उत्तराधिकार मिलता है । शुन शेप यदि मेरा ही पुत्र हुआ तो ज्येष्ठ पुत्र होने के नाते वही मेरा उत्तरा धिकारी होगा। वितु जमदग्नि यह नहीं हो सकता, मामा जी | भरत लोग एक दासीपुत्र को अपना राजा नहीं मानेगे! रोहिणी हाय-हाय 1 ये विश्वामित्र मेरी पूरी बात तो तुम लोग सुनो । शुन शेप दासीपुन है, इसी कारण क्या मैं उम उसके अधिकारो से वचित कर दूगा? नहीं नही, विश्वामित्र यह नही कर सकते कि तु भरत लागा का पूरा जधिकार है कि वे जिस चाहे अपना राजा बनाएँ भरतो का राजा कोई मेरी निजी सम्पत्ति तो नही है कि उसका उत्तरा धिकार मैं जिसे चाहूँ, तत्सु मुझे अपदस्थ कर वसिष्ठ मुनि को अपना राजपुरोहित बनान जा रह हैं, तो क्या मैं कहूगा कि नही, ऐसा करने का तुम लोगो को काई अधिकार नहीं है ? नही नहीं विश्वामित्र यह नहीं मानता कि उसका काई जम जात अधिकार है। उसे जो कुछ प्राप्त हुआ है उसके कम में प्राप्त हुआ है, वह सब चला जाए, तो भी उस द्वारा प्रतिपादित सत्य वा पालन करेगा। वह किसी से कोई अधिकार नहीं मागगा, आप लाग निश्चित रहिए ! [नेपथ्य से घटा बजने की आवाज़ आकर फेड जाउट होती है। फिर भीड के शोर की बावाज़ जाती है । मच पर अधकार छा जाता है। फिर प्रकाश होता है, तो मच पर यज्ञमडप का दश्य दिखाई देता है। चारो ओर ऋषि मुनि बैठे है जिनमे विश्वामित्र, जमदग्नि और सावित्री भी हैं। रोहित (आकर) महर्षि! यन की सम्पूण मामग्री आ गई। आप देखकर बताएँ, कोई वस्तु छूट तो नही गई है । जमदग्नि हमन महज ली है। कोई वस्तु कम नही है। अब तुम महाराज को स्नान क्गर नवीन वस्त्र धारण क्रावर ले याओ । रोहित पिता जी की दशा अति गम्भीर है । वे चेतनाहीन होकर पड़े हैं। उह कैमे स्नान कराया जाए कसे यहां ले आया जाए? जमदग्नि शय्या पर ही स्नान बरामो तथा शय्या पर ही उह यहाँ ले नरमेध/१२५ ? आओ। तुम भय न करो उहे कुछ नही होगा। यज्ञमण्डप मे उनको तथा महारानी की उपस्थिति आवश्यक है। रोहित क्या आप मेरी सहायता करन की कृपा करेंगे? मेरा तो साहस टूट रहा है। माता जी भी विक्षिप्त सी हो रही हैं । दास तो स्नान नहीं करा सक्ते न जमदग्नि नही। मामा जी, मैं जाऊँ? विश्वामित्र जाओ, सावधानी से महाराज का स्पश करना । अधिक विलब नहीं होना चाहिए । (जमदग्नि और रोहित जाते हैं) दूत (आपर) महपि, सेनापति पूछ रहे हैं कि क्या वे शुन शेष का ले आने के लिए सैनिको को आज्ञा दें। विश्वामित्र हा । उनसे कहो कि ब शुन शेप के साथ ही अजीगत को भी ले आएँ । (दूत जाता है) रोहिणी स्वामी । तब तक आप वरुण देव का आह्वान कर उनसे एक बार प्राथना क्यो नहीं करते कि वे नरबलि के लिए हठ न करे? विश्वामित्र आप अधीर न हा, देवि | पहले मैं शुन शेष का देख लू, फिर कुछ क्रूँगा । आप भी उम ध्यान से देखिएगा। मैं तो भगवान से प्राथना कर रहा हूं कि शुन शेप मेरा ही पुन हो! रोहिणी कितु मैं तो प्राथना कर रही हूँ कि वह आपका पुन न हो, न हो । विश्वामित्र नही हागा, तब भी मेरी योजना तथा सकल्प में कोई अन्तर न पडेगा । नरबलि नहीं होगी। चाहे मुझे अपनी ही बलि देनी पड़े। रोहिणी हे प्रभु । क्या होने को है ? [नेपथ्य से भीड का शोर तेज़ होता है । शोर के ऊपर आवाजें आती हैं यही वह राक्षस पिता है जिसने अपने ऐसे सुशील पुत्र का बलि के लिए विश्य क्यिा है। हाय हाय [हाय कैसा सुदर सुशील, निरीह तथा प्रतिभावान तरण है यह तो इस चाडाल का नहीं क्सिी ऋषि का पुत्र नात होता है। दूत (आकर) शुन शेप आ गया, महपि । [शुन शेष को सनिक अपने घेरे म लकर आते हैं।

१२६ / नरमेध विश्वामित्र उस स्तभो के मध्य पहा करो। ब्राह्मणो | तुम लोग तरुण को दुग्ध, घृत, मधु तथा जल से स्नान करावर नवीन कोपीन तथा यनोपवीत धारण कराओ! रोहिणी (चक्ति) ओह, यह शुन शेष है अथवा मेरा देवदत्त। इतनी एक- स्पता स्वामी, मरे देवदत तथा इस तरण में तो कोई भेद नहीं लगता। स्वामी, स्वामी, देखिए, यह क्तिना प्रसन है। वह आप ही की ओर एकटक देख रहा है । विश्वामित्र (गम्भीर) शात रहो, देवि । ब्राह्मण तरुण के वस्त्र उतार रहे हैं । आप ध्यान से तरुण के वक्ष स्थल पर दष्टि डालिए । मुझ तो लगता है, भगवान ने मेरी प्राथना सुन ली। यह मेरा तथा उना का ही पुत्र है। जमदग्नि (आकर) महाराज को लाया जा रहा है मामा जी, मुझे तो लगता है कि उनके प्राण कण्ठ म आ गए हैं । अब भाप एक क्षण भी विलबन करे। विश्वामित्र स्तभा के मध्य शुन शेप का स्नान गया जा रहा है। जमदग्नि तुम भी उसे ध्यान से देखो। जमदग्नि हे भगवान | मामा जी, वह तो देवदत्त का ही प्रतिरूप लगता विश्वामित्र देवि भी यही बात कह रही थी । वह मेरा पुत्र है, वत्स | तुम ध्यान से उसका वक्ष स्थल तो देखो। कुछ लाल-लाल दिखाई दे रहा है क्या? रोहिणी हाँ स्वामी, काई लाल चिह्न अवश्य है । स्पष्ट दिखाई दे रहा जमदग्नि विश्वामित्र हां, हाँ, मामा जी, है, लाल चिह्न है। अब मेरा काय सरल हो गया। [नपथ्य म शोर तेज होता है। उसके ऊपर भीड का नारा गूजता है महाराज हरिश्चद्र की जय । सत्यवादी हरिश्चन्द्र की जय ! महाग शतायु हो। मामा जी! अब आप शी देव कीजिए! [शोर तेज होता है औ वी हा । जमदग्नि नरमेघ / १२७ जमदग्नि उसे रोको, रोको। विश्वामित्र नहीं-नही, उसे आन दो। शुन शेष (विश्वामित्र के सामने आकर, हाथ जोडकर) आप महर्षि विश्वामित्र हैं न बलि के पूष आप मुझे चरण स्पश की अनु मति देने की कृपा करें महाराज! आपके दशन से मेरी आत्मा तृप्त हुई । आज मैं कृताथ हो गया। विश्वामित्र (गदगद) चिरजीवी होओ वत्स! [नेपय्य म शार उभरता है। ऊपर स भोड की आवाज आती है महर्षि ने बलि तरुण को यह कैसा आशीर्वाद दिया है ? अब ता वह कुछ क्षणा का ही अतिथि है।] आप तपस्विनी रोहिणी माता हैं न! रोहित (चीखता है) महपि ! महपि पिताजी विश्वामित्र जाओ, जमदग्नि, महाराज संभाला। शुन शेप, तुम अपने स्थान पर जाओ। वरुण देव तुम पर कृपा करेंगे। शुन शेष वे मुझ अपने साथ देवलोक ल जाएंगे न महपि । दूत शुन शेष चलो। विश्वामित्र अब मुझे कोई संदेह नहीं हो रहा है, देवि। शुन शेप मेरा ही शुन शप पुत्र है। [हरिश्चद्र को शैय्या पर लावर कुण्ड के समीप रखा जाता है। रोहिणी शैय्या के पास बैठ जाती हैं ।] (आह्वान करत हुए) हे वरुण देव हे वरुण देव ! इस यज्ञ मण्डप म पधारने की कृपा करें। हे वरुण देव ! आप अपनी बलि प्राप्त करने के लिए पधारें। रोहिणी आश्चय है, शुन शेप को प्रसनता को तो कोई सीमा ही ज्ञात नहीं होती। वह अब भी एकान केवल आपको देख रहा है स्वामी। विश्वामित्र नही, देवि, अब वह आकाश माग की ओर देख रहा है। वह वरुण देव के पधारने की प्रतीक्षा कर रहा है। रोहिणो वह देखिए ! वरुण देव श्वेत अश्व पर पधार रह हैं । [नेपथ्य मे शोर उभरता है और उसके ऊपर आवाजें आती हैं, वरण दव आ गए वरुण देव आ गए!] विश्वामिन विराजिए, वरुण देव!

१२८/नरमेध शुन शेष घरुण महपि विश्वामित्र | मुझ नरबलि देने का अनुष्ठान कराना आपने स्वीकार किया। इसके हित में आपका कृतज्ञ हूँ। रोहिणी वरण देव । वाण दव । मरे स्वामी पर कृपा कीजिए। घरुण (हंमवर) इस समय मैं विमी पर कृपा करन नहीं, अपनी बलि लेने आया हूँ। मुझे नात था कि केवल विश्वामिन ही सकटग्रस्त राजा हरिश्चन्द्र की सहायता करेंगे। जमदग्नि आप महाराज पर अब तो कृपा करें, वरण देव ! आपकी बलि प्रस्तुत है। विश्वामित्र अजीगत, बाधो बलि का स्तम्भ से वम्ण देव । वरुण देव । आपके दशन कर मैं ध य हुआ। आप मुझे अपने साथ ले चलें। मैं प्रस्तुत हूँ। वरुण महपि आप यन प्रारभ करें। विश्वामित्र आपको आज्ञा शिरोधाय है, वरुण देव वि तु क्षमा करें, मुझसे एक नुटि हो गई। वरुण आपसे त्रुटि ? नहीं, यह सभव नहीं । विश्वामिन मैं देव नही, मान मानव हूँ, वरण देव । मानव से चूक हो ही जाती है। वरुण आप कोई सामा य मानव नही महपि मापने महान सत्य की साधना की है। विश्वामिन आप मुझसे परिहाम कर रहे हैं वरुण देव । आज मेरी सम्पूण साधना विनष्ट होने जा रही है आप अपनी बलि लीजिए तथा महाराज पर कृपा कीजिए। कि तु इसके पूर्व आप हमारी त्रुटि जान लीजिए तथा क्षमा वरुण वहिए? विश्वामित्र अभी इस यनमण्डप मे मुझे ज्ञात हुआ है कि बलि तरुण एक दासीपुत्र है। दासीपुर नेपथ्य में भीड का शार उभरता है । शोर के ऊपर आवाजें गूजती हैं दासी-पुत्र । दासी-पुत्र ] विश्वामित्र क्षमा करें वरुण देव इस तरण के विक्रेता अजोगन ने महाराज से छल किया है। इसन तरुण को अपना पुत्र बताया था मितु यह उसका पुत्र नहीं है, यह अभी ज्ञात हुआ है। फिर विसका पुत्र है? वरुण वरुण नरमेध/१२६ विश्वामिन यह मेरा पुत्र है, वाण दव, शबर पुनी दासी उग्रा से ज मा । (शार उभरता है और आवाजें गूजती है। एक क्या? क्या? यह महर्षि विश्वामित्र या पुत्र है 1] आप इमकी बलि स्वीकार करेंगे, वरण देव ? अनुमति दीजिए शुन शेष (चीसता है) पिताजी पिताजी, आप मेरे जमदाता हैं? घरुण नही नहीं, मैं दासीपुत्र की बलि क्स स्वीकार कर सकता हूँ? विश्वामित्र तब ता जापकी तृप्ति का एक ही माग रह गया है ? वरुण वा क्या? [नपथ्य म शोर उभरता है तथा आवाजें गूजती है। कई स्वर महपि अपनी बलि दे रह हैं। महपि अपनी स्वय की बलि दे रह हैं | धय हैं | ध य हैं महर्षि ] विश्वामित एक तपस्वी को स्वत अपनी वलि देन का अधिकार है। मैं उसी अधिकार का प्रयोग कर रोहित (चीसता है) वरुण देव । वरण देव । महाराज का श्वास रद्ध हो रहा है। रोहिणी (चीखती है) वरण देव । वरण देव । स्वामी । पाप नपनी वलि द देंगे, तो आपके सत्य का क्या होगा? (अटटहास) विश्वामिन मेरा सत्य अब विश्व मानव का सत्य हा गया है | मेरी बलि से उसकी रक्षा होगो, उसका प्रकाश उज्ज्वलतर होगा। मैं धन्य वरुण [नेपथ्य मे शोर उभरता है और ये मावाजे गूजती हैं धय है महपि । धय हैं महर्षि । अरे। वह तरुण तो अपने बधन तोड रहा है। उसने बधन तोड लिये। अरे ।] उसे मुक्त कर दो सैनिका! अजीगत, खडग मुझे दो। वरुण देव आप बलि लीजिए। रोहिणी हे वरुण देव । हे वरुण दव । है पिताजी ह पिता जी | मुझे अपन चरणा म स्थान दीजिए। विश्वामित्र आना, पुत्र आओ। मेरी उग्रा के हृदय-अश आओ । मेरे हृदय से लग जाओ ! राहिणी, मुझे विदा दो। जमदग्नि मुझे शुन शेष

१३०/नरमेध
।
विदा दो नागरिका, मुझे विदा दो सभी मेरा प्रणाम
स्वीकार करो।
[वरुण जाता है।]
जमदग्नि मामाजी | मामाजी! महाराज के प्राण लौटकर आ रह हैं।
यह देखिए । इनके नत्र खुल रहे हैं।
रोहित पिता जी शापमुक्त हो गए।
विश्वामित्र वरुण देव । वरुण देव । आप कहाँ हैं ?
वरुण (नपथ्य मे वरुण की गूजती आवाज़ आती है) महपि
विश्वामित्र | आप खड्ग फेंक दीजिए। बापके महात्याग, महा-
निभयता के समक्ष मैं शीश युकाता हूँ।
[नेपथ्य मे भीड का शोर उभरता है और आवाजें गूजती
हैं । उल्लास की सगीत धुा बजती है। कई स्वर महर्षि
विश्वामित्र की जय ! महर्षि विश्वामित्र की जय ।
धीरे-धीरे गूजें तिराहित होती हैं और पर्दा गिरता है]

अन्धकार
डॉ० रामकुमार वर्मा
सूचना
इस नाटक मे रगमच मी व्यवस्था इस भौति हा कि उसम स्वग के वातावरण
पा आभास स्पष्टतया दिखाई दे। दिव्य प्रकाश के लिए नीले और हरे रंग की
राशनी अपभित होगी, इद्रधनुप पे छोटे छोटे टुकडो का आभास उत्पन करने
के लिए परदा पर रंगीन स्लाइट या बिंब फेंका जा सकता है। यातायन के
पीछे आपाश-गगा वा आभास, यस्त्र ये पीछ विजली रे प्रकाश की व्यवस्था
से हो साता है। नीलम और मूग आरान वे लिए प्रमग नील और साल
पस्त्र से बाम पस रापता है।
अभिनय र लिए प्रति पारा में आई हुई काध्य पो पल्पनाएं छोटी जा सस्ती
पात्र-परिषय
সলনি ছি ই হৰি
विवापर प्रजापति मा सहाया
मेना स्वगमी पाग
माया प्रतापीकत
सरिवनौरमार उपाशी प्रेमी और देवनामा
पप गाशियारेगा
निरिपा

१३२/ मधवार स्विग पा एक पक्ष । दिव्य प्रवाश । समस्त वातावरण जैस चदपिरणा स निर्मित है। चारा ओर एक कामल उज्ज्वलता छाई हुई है । कक्ष या स्प इद्रधनुप के छोट छोट टुकडो से बना हुआ है। सामने दो वातायन मयूर के फले हुए पुच्छाकार व ढग के हैं। उनसे आकाश-गगा की धवल राशिनि कोरको की भाति वन दीख रही है। स्फटिकमणि के बन हुए दो दो हस वातायनो के दोना ओर सजे हुए हैं, जिनकी अरुण चचु में मानसरोवर से लाय हुए अरण कमल है --उन पर ओस की भाति मोतियो के दाने हैं। रेव शिल्पी विश्वकर्मा न इस कक्ष के बीचावीच एक सिंहासन बनाया है जिसम नीलम का फश और मूगे का आसन है। वह सिंहासन आरती पात्र की भाति बना हुआ है। इद्रनील मणि का गुम्बज और हीरको क स्तम्भ ! सिंहासन भव्य ह जस सौदय और अनुराग घनीभूत हो गया है। समीप ही दो तीन छाटी पीठिवाएं है। एक वातायन खुला हुआ, जिसस वायु गति दीख रही है। दूसरे वातायन पर किरणा का ध्रवल वस्त्र है, जो भैरव राग की भांति मदगति से टहल रहा है। सम्भवत इद्र को पुरी दवधानी म विवाह करती हुई देवागनाना के केशो से गिरे हुए तरण कमला की गध से उठी हुइ समीरण इस ओर प्रवाहित होकर वातायन वस्न को गतिशील कर रही है। के काने से अगर की गध वाला श्वेत धूम्र धीरे धीर उठ रहा है । उसके साथ वक्ष मे सूक्ष्म उल्लाम फ्ल रहा है । तुलसी की मजरी के साथ मदार, उत्पल, कुद और पारिजात को पुष्प मालाएं स्थान स्थान पर सजी हुई हैं। उनके साथ ही मोनिया की मालाएं हैं, जिनसे काति-जल टपक रहा है। कोन म ध्वजा और पताका। सिंहासन पर प्रथम प्रजापति मरीचि वटे हुए हैं। तेज से परिपूण, मत्य त सूम और श्वत परिधान हैं जमे किसी शल शृग को स्थान-स्थान पर हिम गशिरा नाच्छादित कर लिया है। वे पुण्य की गरिमा म आसीन हैं। माथे

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१३४/ अधिकार आलोक-प्रदेश के बीच एक विशाल पवत है लोकालोन । तीनो लोको की सीमा उसी पवत स बाधी गई है। लोका लोक पवत के ऊंच उठने से ही भू भाग के दूसरी आर अधकार है अिधकार भयाक पाप, भीपण दुराचार (पुकारकर) विद्याधर ] [विद्यावर का प्रवेश । लम्बे गौरवपूर्ण केश क्लाप, अग राग और पीन पट वस्त्र । केश कुचित और पुप्पो से सुसज्जित । आकर प्रणाम करता है । । - प्रजापति विद्याधर, एक भूभाग म प्रकाश है, दूसरे म अधवार । विद्याधर विस प्रकार, प्रभु प्रजापति लोकालोक पवत के अधिक ऊचे होने के कारण सूय आदि नक्षत्रो को किरण केवल अवलोक तक ही पहुंचती हैं । केवल अधकार, महा धकार। विद्याधर सत्य है प्रभु प्रजापति और विद्याधर, जानते हो यह अधिकार क्या है ? विद्याधर क्या है प्रजापति? সাবরি (हँसकर) कोई नही जानता । केवल मैं जानता हूँ और मरे आठ भाइ प्रजापति | इनके अतिरिक्त यह रहस्य काई नहीं जानता। विद्याधर क्या रहस्य है प्रभु प्रजापति तुम जानना चाहते हो, विद्याधर | गायको के लिए रहस्य की बात नहीं होती । वे रहस्य का गीत बनाकर गा देंगे । विद्यापर किन्तु प्रभु, भर में गायर विद्याधर नहीं, अव ता विश्वात्मा की आना से प्रभु यो सेवा म नियोजित हो गया हू आपसी मेवा में। प्रजापति (नील-कमल को सामने करते हुए) यह नील वमल विश्वात्मा को समर्पित होकर भी नील कमल रहेगा । उमी तरह तुम भी अपना स्वभाव तो नहीं छोड़ सकत । अवसर आन पर विद्याधर मैवल गायर विद्याधर हा सकता है। विधायर प्रम एसा नहीं हा सकेगा। प्रजापति विद्याधर, जलमा यदि में हिम बना दू, ताषया वह जल वही रहमा पारी भाव पात हो वही हिम पिर जल यनगर बहन ।

अधकार/१३५ ? लगेगा। तुम भी बहने लगोगे विद्याधर | तुम इद्र के सेवक हो। मायावी का सेवर क्या मायावी नही होगा विद्याधर प्रभु, मैं अपना स्वभाव भूल गया हूँ। कहा मैं प्रेम की उपासना मे लीन विद्याधर सोमरस के पान मे अपन जीवन की तरलता समझता था, आज प्रभु के साधना-कक्ष में आकर तपस्वी हो गया हूँ। गायन के स्थान पर मनोच्चारण करता हूँ। सोमरस के स्थान पर प्रभु की मुख-श्री की शोभा का पान करता हूँ। प्रजापति उनति करो विद्याधर, यही विश्वात्मा की इच्छा है। विद्याधर प्रभु, आपके पथ प्रदशन मे उनति हो करूंगा । गायव अब साधक बन गया है, प्रेम अव उपासना बन गया है। मैं मधुरालाप के स्थान पर रहस्य सुनने का अधिकारी बन गया हूँ। प्रभु की सेवा म रहत हुए निमाण-काय मे सहायता पहुंचाते हुए, मैं तो आपके सभी परामर्शों का पात्र बन गया हूँ, प्रभु । प्रजापति ठीक है विद्याधर, तुम प्रियवद हो, कामरूप हो, इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हो। किन्तु अधकार का रहस्य बहुत बडी मर्यादा का रहस्य है। विद्याधर प्रभु, आप मेरी उत्सुकता बढा रहे हैं । मैं सुनने के योग्य है। प्रजापति अच्छा, मैं तुम्हे सुनाऊंगा। तुम विदुष् हो-यह ज्ञान भी प्राप्त करो। किन्तु वह अत्यन्त विश्वस्त और गोपनीय है। विद्यापर प्रभु, मेरे समीप आकर वह और भी गोप्य और विश्वस्त बन जायेगा। प्रजापति अच्छा, अब तुम्ह सुनाऊँगा । देखो, यहाँ कोई है तो नहीं? [विद्याधर द्वार तक पाकर लौटता है] विद्याधर कोई नही, प्रभु प्रजापति तव सुनो । वायु को प्रथम बार इन शब्दो का भार वहन करने का अवसर आ रहा है। यह रहस्य एकाकीपन से निकलकर आज वायुमण्डल का स्पर्श करेगा। विद्याधर सत्य है प्रभु प्रजापति (कुछ निक्ट आकर) सुनो, पिता विश्वगुरु ब्रह्मा हैं। हम नव पुत्रों के अतिरिक्त उनके एक क या भी हुई। अत्यन्त सुन्दर पया उसका नाम जानते हो? स र स्व ती वहन सरस्वती के शरीर से रूप बद्रक्ला की भांति आकाश के रोम-रोम मे स्वग की सृष्टि करता था। महात्मा ब्रह्मा सरस्वती - । मेरी १३४/ अधकार आलोक-प्रदेश के वीच एक विशाल पवत है लोकालोक तीनो लोगो की सीमा उसी पर्वत स बांधी गई है। लोमा लोक पवत के ऊंचे उठने सही भू भाग के दूसरी भार अधकार है । अधकार || भयानक पाप, भीषण दुराचार (पुकारकर) विद्याधर ] [विद्याधर का प्रवेश । लम्बे गौरवपूण वेश क्लाप, अग राग और पीत पट-वस्त्र । केश कुचित और पुष्पा से सुसज्जित । आकर प्रणाम करता है ।] 1 ? प्रजापति विद्याधर, एक भूभाग में प्रकाश है, दूसरे म अ धकार । विद्याधर किस प्रकार, प्रभु । प्रजापति लोकालोक पवत के अधिक ऊचे होन के कारण सूय आदि नक्षत्रो की किरणे केवल 5 वलोक तक ही पहुँचती हैं । केवल अधकार, महाधकार 1 विद्याधर सत्य है प्रभु प्रजापति और विद्याधर, जानते हो यह अधकार क्या है ? विद्याधर क्या है प्रजापति? प्रजापति (हंसकर) कोई नहीं जानता। केवल मैं जानता हूँ और मेरे आठ भाई प्रजापति | इनके अतिरिक्त यह रहरय कोई नहीं जानता। विद्याधर क्या रहस्य है प्रभु प्रजापति तुम जानना चाहते हो, विद्याधर । गायका के लिए रहस्य की बाते नहीं होती। वे रहस्य का गीत वनावर गा देंगे। विद्याधर पितु प्रभु अब मैं गायक विद्याधर नहीं, अव ता विश्वात्मा की आज्ञा से प्रभु की सेवा मे नियाजित हो गया है । आपकी प्रजापति (नील-कमल को सामन करते हुए) यह नील कमल विश्वात्मा को समर्पित होकर भी नील कमल रहगा । उसी तरह तुम भी अपना स्वभाव तो नहीं छोड़ सकते । अवसर आन पर विद्याधर येवन गायक विद्याधर हा सक्ता है। विद्याधर प्रभु ऐसा नहीं हो सकेगा। प्रजापति विद्याधर, जल को यदि मैं हिम बना दू, तो क्या वह जल पही रहेगा' याही आंच पाते ही वही हिम फिर जल वनवर बही । सेवा में।

अधकार/१३५ लगेगा। तुम भी बहने लगोगे विद्याधर ! तुम इद्र के सेवक हो। मायावी का सेवक क्या मायावी नहीं होगा? विद्याधर प्रभु, मैं अपना स्वभाव भूल गया हूँ। कहा मैं प्रेम की उपासना मे लीन विद्याधर सोमरस के पान म अपने जीवन की तरलता समझता था, आज प्रभु के साधना-कक्ष मे आकर तपस्वी हो गया हूँ । गायन के स्थान पर मत्रोच्चारण करता हूँ। सोमरस के स्थान पर प्रभु की मुख-श्री की शाभा का पान करता हूँ। प्रजापति उनति करो विद्याधर, यही विश्वात्मा की इच्छा है । विद्याधर प्रभु, आपके पथ प्रदशन मे उन्नति ही करूंगा। गायव अब साधर बन गया है प्रेम अब उपासना बन गया है । मैं मधुरालाप के स्थान पर रहस्य सुनने का अधिकारी बन गया हूँ। प्रभु की सेवा में रहते हुए निर्माण-वाय मे सहायता पहुंचाते हुए, मैं तो आपके सभी परामर्शों का पान बन गया हूँ, प्रभु। प्रजापति ठीक है विद्याधर, तुम प्रियवद हो, कामरूप हो, इच्छानुसार रूप धारण कर सकते हो। किन्तु अधकार का रहस्य बहुत बडी मर्यादा का रहस्य है। विद्यापर प्रभु, आप मेरी उत्सुकता बढा रहे हैं । मैं सुनने योग्य हैं। प्रजापति अच्छा, मैं तुम्ह सुनाऊँगा। तुम विदुप् हो-यह ज्ञान भी प्राप्त करा। किन्तु वह अत्यन्त विश्वस्त और गोपनीय है। विद्यापर प्रभु, मेरे समीप आकर वह और भी गोप्य और विश्वस्त बन जायेगा। 7 प्रजापति अच्छा, अब तुम्ह मुनाऊँगा । देखो, यहाँ कोई है तो नहीं [विद्याधर द्वार तक झक्कर लौटता है] विद्याधर कोई नहीं, प्रभु ' प्रजापति तव सुनो । यायु को प्रथम धार इन शब्दो का भार पहन करने का अवसर आ रहा है। यह रहस्य एवावीपन से निवसकर आउ वायुमण्डल का स्पा करेगा। विद्याधर सत्य है प्रभा प्रजापति (बुछ निष्ट पावर) मुनो, मेरे पिता विश्वगुण ब्रह्मा है। हम नव पुमो में अतिरिक्त उनके एक पया भी १६ अत्यन गुगल पयामिरा नाम जानते होश यहनगरम्यवीरे शरीर से कप पानापोभानिमाकाम के रोम रोम मैरवामीमप्टिलापा। महामायापाथली १३६/अधकार - के पिता होकर भी उसके रूप वी-अपनी क्या वे स्प की अवलना नहीं कर सके। वे उसे काम भाव स चाहन लगे, विद्याधर | ओ हृदय जल रहा है--विश्व म आग लग जायेगी । (नील कमल हाय से फा देते हैं) विद्याधर प्रभु, शात हो । जशाति के व्यूह स स्वतन हा, प्रभु प्रजापति विद्याधर । पिता को इस अधम पथ पर जात देखकर हम लोगा ने प्राथना की-'विश्वगुर यह क्लक पथ है। उस पर अपने पवित्र हदय को गतिशील कर आप भविष्य की सप्टि का दूषित न कीजिए। हस के वाहन पर आपका क्लुप शरीर पुण्य पर पाप की तरह ज्ञात होगा।' विद्याधर, पिताजी लज्जित हुए और उहोने उस कामुक शरीर का परित्याग किया। वही परित्याग किया हुआ कलुष शरीर अधकार है विद्याधर, वही कलक शरीर अधकार है। यह मेरे पिता के दुराचरण की क्या है । पुन मरीचि को पिता के क्लफ का मिटाना है ।मैं इस अधकार का नाश करना चाहता हूँ। विद्याधर आप ध य है प्रभु । पिता के महान् पुन । वितु आप अधिकार का नाश शिम प्रकार कर सकेंगे? प्रजापति (कुछ स्क्रर) सोच रहा हूँ किस प्रकार करूँ । स्वग और पथ्वी का मध्य भाग ब्रह्माण्ड कहलाता है । तुम भी वहा रहते हो और वही सूर्य की स्थिति भी है। तुम जानत हागे कि सूय इसीलिए तो मातण्ड कहलाता है कि वह अधकारमय मत ब्रह्माड म वराट रूप स प्रविष्ट होता है और हिरण्यमय जड में प्रकट होन के कारण उसका नाम हिरण्यगभ भी है । मैं चाहता हूँ कि सपूण सृष्टि इस प्रकार पुनर्निमित करूं कि समस्त अस्तित्व एक हिरण्य मय अड हा और उसग मातण्ड की स्थिति गतिशील न होकर स्थिर रह, जिससे अधकार का अस्तित्व ही न हो। विद्याधर वितु प्रभु आप प्रजापति होकर भी मातण्ड को नहीं रोक सक्त। सष्टि का नियम ही गतिशीलता है। आपम भी गतिशीलता है । आप स्वय गतिशील होकर सूय की गति स रा मक्ते हैं ? प्रजापति मैं यदि एक गतिशील धूमक्तु होकर सूय से टकरा जाऊँ तो? विद्याधर प्रभु, सूय नष्ट हो जायगा और अधयार ही अधकार चाराओर व्याप्त हा जायेगा। उमस तो आपरा उद्देश्य अपूण ही न रहेगा वरन् उसका बीज ही नष्ट हो जायेगा। प्रजापति (हंसकर) तुम अतत एक गायक हो विद्याधर। तुम्हारा सगीत ।

अधकार/१३७ नक्षत्रा म भले ही भर गया हो कि तु नक्षत्रा की बात तुम्हारे सगीत म प्रवेश नहीं कर मकी। अरे, जो धूम्रकेतु वेग से गतिशील होकर सूय माग का भवरोध करगा, वह सूय स सहस्र गुना प्रकाशमान होगा और सूय गति मे रक न सवा ता वह स्वय शूय म सहसा सूय बनकर कण कण को प्रकाशित करेगा और तव धूम्रक्तु अपन ही वेद्र पर घूमता हुना स्थिर होगा। विद्याधर मितु प्रभु स्थिरता मे अन्त है । प्रजापति मुझे चिता नही है। विद्याधर यदि मैं स्थिर रहकर नष्ट हो जाऊँ तो मुझे भय नहीं है। पिता की क्लव वालिमा ता दूर पर सगा। विद्याधर कि तु प्रभु अपने पिता विश्वगुर की वलय-कालिमा रहन दीजिए न । वह आगामी सृष्टि के लिए व्यापर प्रमाण बनकर ससार के दुराचरण को रोकेगी। प्रजापति (साचबर)-तुम ठीक पहत हो विद्याधर, कि तु इस दुराचरण को रोकने के लिए बुद्धि की आवश्यकता होगी। मुझे बुद्धि का केद्र भी उत्पन्न करना होगा। (फिर कुछ सामत हैं और यातायन की ओर बढ़त हैं) विद्याधर आप क्या साच रहे हैं? प्रजापति रज प्रधान प्रकृति का गतिशील कर उससे महत्तत्व उत्पन क्यिा गया और महत्तत्व से अहबार । यही अहकार सत्वा म व्याप्त हाकर तेजमय ब्रह्माइ-माप की रचना म समथ हा सका। ब्रह्माड-कोप म त यी नाभि से बमल और उसग ग्रह्मा और देवी-देवतामा की मष्टि विद्याधर यह सत्य है प्रभु पितु इसम क्या निपप निकलेंगे? प्रजापति विद्याधर मैं एप पीन चम की मुष्टि पपा गारता हूँ। विद्याधर पह क्या? प्रजापति पुष्प और स्त्री का निर्माण । विद्याधर (आम्चय म)मार म्यग पो सप्टिका मारत म भी न जाना चाहन यह न्यो नेवताभी की मष्टि आप भू मण्डल मस्त्री पुरपये रूप में परेंगे? प्रजापति (दता ।) हां, वगा। अपन पिता य इम पाप-माक्षय लिए मर कुछ सगा। विद्याधर (पौतूहल 7) पाप मारहामा प्रम' १३८/अन्धकार प्रजापति अधकार का नाश करने के लिए बुद्धि का केद्र चाहिए न? मैं बुद्धि का समय वे द्र पुरुष और स्त्री मे स्थापित करूंगा। पाप की जड पुण्य से काटूगा। विष का विनाश अमृत से करूंगा। दुराचार को सदाचार से नष्ट करूंगा। विद्याधर कितु स्वग की सप्टि भू मण्डल मे ले जाना अधम न होगा? प्रजापति विद्याधर, यदि यह अधम होगा तो मैं उसके लिए धम के नये मिद्धात बनाऊंगा। धम की परिभाषा तक म परिवतन करुगा। विद्याधर प्रभु कोई अनथ न होगा? प्रजापति मै इसके लिए विश्वगुरु को सहायता मागूगा। उहोन पापमय शरीर त्यागकर पुण्य देह धारण की है। मैं उनसे उस पुण्य देह का त्याग करन की प्राथना करूंगा। विद्याधर उससे क्या होगा? प्रजापति उस देह के एक भाग से होगा पुरप और दूसरे भाग से होगी स्त्री । मैं जीव को पुरुष और म्नी शरीर धारण करन को आज्ञा दूगा। विद्याधर क्या विश्वगुर इसके लिए तैयार हागे ? प्रजापति यदि व क्लक से बचने के लिए एक शरीर छोट सक्त हैं तो क्या अपने पुत्र को इस सदिच्छा के लिए दूसरा शरीर नहीं छोड़ सकते फिर नया शरीर धारण करेंगे। तुम म्वय कहते हो कि काल जोर अवस्था दोनो गतिशील हैं। विद्याधर सत्य है । यही कीजिए, प्रभु। प्रजापति मैं अभी विश्वगुरु से मिलने जा रहा हूँ। उनके पाप को अपनी सदिच्छा के पुण्य से दूर करूंगा। उनका जो दुराचार अहकार बनकर फैला हुआ है, उसे पुद्धि की किरण से नष्ट करूंगा। पुरप और स्त्री की सष्टि ! म व तर समाप्त हो रहा है । जात जाते पिता के ऋण से उमण होना चाहता हूँ विद्याधर । इमसे पहले कि मैं प्रजापति का आसन छोड़ विश्वगुरु को दिखला दू कि मैं क्तिने कौशन से उनके पापाचार को पुरुष स्त्री के बुद्धि केद्र म विनष्ट कर सकता हूँ। विद्याधर ठीक है, प्रभु प्रजापति पुरुष और स्नी। दोनो माया से निर्मित हागे किन्तु उनमे जो मर्यादा की रेखा होगी, उसस वे व्यवस्थित हांगे। आग और सर्दी एक साथ प्रवाहित होंगे। किंतु उसमे एक विभाजक रेखा होगी। इद्रधनुष के रग साथ रहते हुए भी अलग रहते हैं। प्रत्यक रग धकार/१३ की एक एक विभाजक रेखा है। इसी प्रकार पुरुप और स्त्री के सम्बधो की एक एक विभाजक रखा होगी। मैं उस बुद्धि की विभाजक रेखा के एक रग को दूसरे से न मिलने दूगा। पिता पुरुष, व या स्त्री को देखकर भी न देखे। छूकर भी न छुए। प्रेम करता हुआ भी प्रेम न करे | विद्याधर प्रभु आप बहुत बडा काय करेंगे। प्रजापति माया, मोह और भ्रम से उत्पन मेरे ये खिलौन देवी देवताओ की अपेक्षा अच्छा व्यवहार परे विद्याधर, मैं यह चाहता हूँ। जो काय देवताआ स नहीं हो सका, वह पुरुष और स्त्री के रूप कर सकें। मेरे ये क्षणिक रग शाश्वत रगा से अच्छे हो सके। विद्याधर कल्पना अच्छी है, प्रभु प्रजापति उस कल्पना को सत्य से आलाक्ति करना चाहता हूं। अच्छा अब मैं विश्वगुरु के समीप जाऊँगा। तुम तब तक यही रहो। मेनका इस समय अपनी पूजा समाप्त कर मुझसे आशीर्वाद लेने आई होगी। वह बाहर ही होगी। मेरे आने तर तुम उसे नत्य करने की आज्ञा दो, जिससे यह समस्त वातावरण पुरुष और स्त्री का निर्माण करने की राग रजित भावनाओ से परिपूर्ण हो जावे। विद्याधर जो आज्ञा । प्रजापति अच्छा, मैं जाता हूँ। इस समय मैं मेनका से नहीं मिलूगा। विलम्ब होगा। मैं इस दक्षिण द्वार से जाऊंगा। शुभमस्तु । विद्याधर प्रभु आपका माग प्रशस्त हो, आपका निर्माण काय मगलमय हो। प्रणाम । [प्रजापति प्रणाम स्वीकार कर शीघ्रता से दक्षिण द्वार से जाते हैं । (गहरी सास लेकर) प्रजापति के मातर वे समाप्त होने के पूर्व यह महाविधान क्या रूप धारण करेगा, यह विश्वात्मा के अति- रिक्त कौन कह सकेगा। शुभ हो, मगलमय हो । (पुकारपर) मेनका। [मेनका का प्रवेश । अत्यन्त रूपवती नवयुवती । मुस्कान से ही जिसके शरीर की सृष्टि हुई है । चितवन से जिसकी गति बनी है और चुम्बन से ही जिसके अधराका निर्माण हुआ है । इद्रधनुषी वस्त्र पहन जाती है। विशाल नेत्र, १४०/अधकार जैसे प्रेम ने दो कमलो म निवास कर लिया है। माथे मे कुकुम, कानो मे कुण्डल, पोला पर श्याम बलक । देश पाश म रल रेखा। कठ मे कोक्नद का हार । वह गिरते हुए उत्तरीय को बाये हाथ से राक रही है। कटि मे किंकिणी, हाथो म वलय और परो म नूपुर। शरीर म मद्य प्रस्फुटित कमलो की सुगधि । उस पर अगराग, जो आलिंगन का मान निम नण है । शरीर म चचलता और उमा । उसके हाथो में पूजा पात्र है, जिसम पुष्प राशि और मलय सुसज्जित है। क्पूर जल रहा है और अगर का धूम है, मानो शृगार के हाथ म भक्ति है । वह मद गति स प्रवेश करती है जैसे मिल जल राशि मे चद्रक्ला का उदय हो रहा है। विद्याधर मेनवा, प्रजापति विश्वगुरु से मिलने गये हैं। मेनका (अय त मधुर शब्दा म) तब तुम अते हो विद्याधर ? विद्याधर हा, मेनका, मैं अकेला हूँ भाग्य की तरह, किन्तु प्रभु की शक्ति साथ । मेनका {विद्याधर को बातो को अनसुनी वर) सुनते हो, लतिकाआ ने क्या कहा है ? लतिकाआ ने कहा-'आज हम नहीं खिलगे क्यो नहीं खिलेगे। (भाह सिकोडकर) नही खिलगी क्याकि समीर कही भटक गया है, दूर देश चला गया है । विद्याधर देवी, दूर देश नही गया होगा, यही वही पास होगा। मेनका (हरिण की चक्ति दष्टि म) वहाँ है (चारा ओर देखती है।) विद्याधर देवी, प्रतिदिन तो वह लतिवाओ से मिलता है। आज वह तुम्हारी मदिर सास मे भरकर तुम्हारे हृदय के स्पदन का मुख ले रहा होगा (संभलकर) नहीं, वह प्रभु के कक्ष म मेनका (हृदय स्पश करते हुए) म्पदन का सुरा (किंचित् मुसरावर) स्पदन का मुख । विद्याधर, स्पदा का सुपल रहा है । और विद्याधर, वह तुम्हारी तरह निष्ठुर नहीं है। विद्याधर दवी, मैं अब प्रजापति का सहायक हो गया है। अब मैं प्रेमी विद्याधर नही अब तपस्वी विद्याधर हूँ। मेना (मकर) मोहा, तपम्वी महाराज । नत्रा म तेज-कामरेव वे वाणा की नोक नहीं शरीर में भस्म-अगराग नही, वाणा म मत्र~प्रणय निवदन नहीं। तपस्वी महाराज को प्रणाम ।

। सिमीप विद्याधर देवी, अब मैं प्रभु प्रजापति नही अव मेरी शक्ति विकास में लगी मेनका विद्याधर, विलास मे से ही सप्टि विकास होता है। विद्याधर देवी, यह प्रभु प्रजापति का कक्ष है, इद्र का न दन-निकुज नही । यहा की पवित्रता में केवल नूपुर की झनवार हो सकती है उसके साथ मन की झनकार नहीं। यहा वादल गरज सकते है कि तु पानी नहीं बरस सकता । फूल पिल सकते हैं, पर वे वली की जार नहीं देख सकते। यहा मेनका केवल नतकी है विलासिनी नहीं। मेनका न नतकी हू, न विलासिनी । स्वय मैं प्रभु प्रजापति का आशी वर्वाद लेन के लिए आई थी। विद्याधर कि तु मेनका, इस समय वे यहा नही हैं ? यह पूजा का पान रख दो और वातावरण को इस प्रकार राग रजित करा कि मेनका विस तरह (पूजा का पान पीठिका पर रख देती है)। विद्याधर (संभलकर) मैं प्रभु प्रजापति के निर्माण-काय का भेद हर किसी से नही पह सकता। जो उनकी आज्ञा है, उसी का पालन होना चाहिए। मेनका विद्याधर, तुम्हारे हृदय से तो समाधि अच्छी है । विद्याधर मेनका, मैं धम के आचरण की बात के अतिरिक्त कुछ नही सोच सकता। मेनका विद्याधर, तुम वेद पढते हो, लेकिन क्या यह वतला सकते हो कि कोकिल बसत मे क्यो कूजती है । सुगधि क्सेि रिझान के लिए फूल वे द्वार खोलती है ? लहरें किसके हृदय-तट को छूना चाहती हैं। विद्याधर विश्वात्मा के। मेनका (प्रजापति के हाथ से गिरा हुमा नील-वमल उठाकर) यह नील कमल जो अपने विखरे हुए शरीर को इस पतले मृणाल के छोर पर समेटकर बैठा है किसकी प्रतीक्षा मे सुगधि के प्राण लिये है? विद्याधर प्रभु प्रजापति की। मेनफा (मुस्करावर) तुम्हारे विश्वात्मा और प्रभु प्रजापति के हृदय में भीतर कौन है? विद्याधर धम इस प्रश्न के पूछने पी आना नहीं देता। मेनका विद्याधर, में बताऊं कौन है ? है १४२/ अधकार . विद्याधर मैं सुनना नहीं चाहता। मेनका विद्याधर, विश्वात्मा और प्रजापति के हृदय के भीतर तुम हो, पुरप हो । सुनते हो । सुन सकते हो? विद्याधर (आश्चय से) मैं हूँ? मेनका हा विद्याधर तुम, अनेक रूपो सेवस त बनकर-देवता बन- कर हृदय बनकर तुम हो पुम्प, विद्याधर । विद्याधर (सोचते हुए) तुम ठीक कहनी हो, देवी | ऋग्वेद के पुरुष सूक्त मे ब्रह्मा की भावनाम पुरुषत्व है। विश्वगुरुने स्वय मुझे सुनाया था-- --कितु मेनका मेनका (तिरछी दृष्टि से) अब मेरी ओर देख सकते हो विद्याधर देवी, क्षमा कगे। मैं तुमसे प्रेम करते हुए भी यहां तुमसे को बात करने मे विवश हूँ। मैं प्रजापति की सेवा मे हूँ। मेनका मैं भी अपने देवता कामदेव की पूजा कर अभी आ ही रही हूँ। में भी माधना मदिर से लौट रही हूँ। विद्याधर कामदेव भी पूजा का देवता है, मेनका ? मेनका मावधान, विद्याधर । कामदेव ब्रह्मा के हृदय से उत्पन हुआ है। वह ता उसी समय मे देवता मान लिया गया, जब से विश्व गुरु ने उसी देवता के सवेत स सरस्वती देवी विद्याधर (रोक्कर) चुप मेनका एक शद भी नही। यह बात मुह पर नलाना। मेनका विद्याधर, मुझे इस चर्चा का अवकाश भी नहीं । अमर हा विश्वगुरु ब्रह्मा के विचार । मैं यदि प्रेम-वार्ताएं सुनान लगू तो विद्याधर, तुम्हारे साधना-कक्ष म पलियां भी देवियों बनकर नृत्य करने लगेंगी। विद्याधर शात, मेनका । यह रहस्य येवल मेरे प्रभु प्रजापति कोशात है, जो उहाँने मुझे आज बतलाया। तुम इस पस जानती हो देवी? मेनका यदि तुम्हारे प्रभ प्रजापति मुझे न यतसा तो क्या मुझ पुछ मालूम ही न होगा? अय प्रजापतियों न मुझ पर अनुग्रह किया पा। विद्याधर ओर, मयविजयिनी मेनका, मैं तुम्हारा अनुपर हूँ। मेनका स्वय अनगरिषु भगवान शबर मेरो सपी र अनुपर हैं, तो तुम्हार अनुपर होन म क्या सनोपा विनापर भगवा मार भी अनुचर हैं। मेनरा हो, संसार पर्वत पर बिहार बरनवासी मेरी सपी मोरार अधवार/१४३ भगवान शवर भी मुग्ध हो गये। फितु पावती घे भय से वे उसे स्पष्ट स्पस देख नहीं सकते थे। जब मेरी सखी भगवान की प्रदक्षिणा पर रही थी, तो भगवान शवर न उसे प्रत्येक क्षण दखन के लिए चारा ओर अपने चार मुप और बना लिये। विद्याधर अच्छा, इसीलिए भगवान शकर के पांच मुष हैं । मेनका हो विन्तु नारद को तुम जानते हो। विग्रह वे सूत्रधार । उहाने पावती स यह भेद कह दिया तो पावती ने चारा मुखो की आँखें पद पर दी। विद्याधर (हँसकर) ओह पावती ने यह पिया । मेनका तुम सम्भवत स्त्री की ईर्ष्या नहीं जानत, केवल अप्सराआ से प्रेम कर सके हा न ? इसीलिए । जव पावती न किसी भाति भी भगवान के नया को नही खुलन दिया, तो भगवान ने अपन मस्तक पर तीसरे नत्र की सष्टि की। विद्याधर ओह । तीसरे ने की। मेनका प्रिय विद्याधर, यह धम की जीत है कि प्रेम की? विद्याधर मेरे लिए प्रेम ही धम है, मेनका । जो भावना-पक्ष म प्रेम है, वही साधना-पक्ष मे धम । साधना पक्ष म प्रजापति का सेवक हूँ, भावना पक्ष में तुम्हारा अनुचर । मेनका यदि मेरे अनुचर होने मे तुम्हें साधना पक्ष छोडना पडे तो? विद्याधर देवी, तुम मेरी परीक्षा ले रही हो। मेनका अच्छा, जाने दो! यही बहुत है कि भावना पक्ष मे विद्याधर मेनका के अनुचर हैं। किसलिए मुझे बुलाया था विद्याधर प्रजापति, अभी विश्वगुरु की सेवा मे गये हैं, उनसे उसी समस्या का हल पूछने के लिए। उहोने मुझे आज्ञा दी है कि मैं तुमसे नृत्य करने वै लिए निवेदन करूं, जिससे यह समस्त वातावरण अनुराग के रग से रजित हो उठे। मेनका एक बात है विद्याधर, इस नृत्य के बाद न दन कुज म मेरे हाथो ? एक मधु पात्र विधापर तुम्हारी इच्छा, देवी। मिनका वातायन की ओर जाती है] मेनका मेरी किनरियां अलका से नवीन शरीर धारण कर आज ही आयी हैं । उह भी बुला लू? (सकेत करके दो किनरियो को बुलाती है। फिर आकर नृत्य की मुद्रा धारण करती है। इतने १४४/ अधिकार 1 मे ही पिनरिया नूपुर शाद के साथ नत्य मे सम्मिलित हो जाती हैं । कुछ दर तक लास्य नत्य होता है। विद्याधर तमय होकर देवता है।) गम्भीर मुद्राम प्रजापति का प्रवेश। वे तीची दृष्टि किये हुए आत हैं। मेना और बिनरिया का नृत्य र जाता है। व प्रजापति को हाथ नाडकर प्रणाम करती हैं। प्रजापति (स्मे स्वर में) तुम लाग जागो । मैं जशात हूँ। मेनका और वि नरिया का प्रस्थान] विद्याधर क्या हुआ प्रभु? प्रजापति कुछ नहीं हो सका विद्याधर, कुछ नहीं हो सका विद्याधर आपा विश्वगुरु के दशन किय? प्रजापति विय, किंतु कुछ फल नहीं हुआ। विद्याधर (आश्चय से) कुछ पल नहीं हुआ? সকারি हा, विश्वगुरु मेरे मत स सहमत नहीं हैं। विद्याधर क्यो? प्रजापति वे कहते हैं कि क्लक को छिपान के लिए जो भी काय किया जायगा यह भी क्लक हागा। मेरे पलक को छिपान की बाव श्यकता नहीं। ससार मे मेरी पलक कथा अधिकार बनकर ध्याप्त रहने दो। विद्याधर वे महात्मा हे प्रभु, व विश्वगुर हैं। प्रजापति वितु मेरे हृदय को स तोप कम हो । विद्याधर, उह मेरी इच्छा पूर्ति में सहायक हाना ही होगा। यदि वे मेरा साथ न दंगे तो मैं अपनी शक्ति का प्रयोग करेगा। विद्याधर जब उन्होंने एक बार अपनी सहमति नहीं दिखलायी, तो फिर वे आपके सहायक कस हो मक्त हैं ? प्रजापति तो विद्याधर सुना, मैं भी अपन योगवलस उनके शरीरका नाश करके उसके दो भागास स्त्री पुरप बनाऊँगा। मैं अपन क्तव्य- पथ से नही हट सक्ता । अधवार का नाश तो करेगा ही। विद्याधर वितु यदि विश्वगुरु नही चाहत, ता अधवार वा नाश नहीं होगा। प्रजापति नहा, मैं ययाशक्ति उसको दूर कराया उपाय करूंगा। (कर) माह में कुछ और यात देख रहा है। मुरे इस वाना वरण में कुछ वासना को दुगय सो मिल रही है। - अधकार /१४५ विद्याधर प्रभु। कैसी वासना प्रजापति तुमने मेनका से प्रेम की बातें की हैं । विद्याधर (हाथ जोडकर) प्रभु, क्षमा हो। प्रजापति मेरे साधना गह में तुम इद्रियो को आग नही जला सकते। आत्मा के प्रकाश को तुम इद्रियों के धूम्र से धुधला करना चाहते हो? विद्याधर, तुमने मेनका से प्रेम की बातें की हैं। विद्याधर मैं बाध्य क्यिा गया, प्रभु । प्रजापति पुस्प होकर यह कहते हुए तुम्हे लज्जा नही आती? पुरुष बाध्य नहीं किया जा सकता, विद्याधर ! आकाश को कोई खीचकर वढा नहीं सकता। कल्पतरु को कोई दबाकर छोटा नहीं कर सकता । पुरुष को कोई खीच नहीं सकता, उसे कोई छोटा नही कर सकता। इद्रियो के घडे म आकाश को घटाकाश बनाया जा सकता है, कल्पवृक्ष के फूल को ताडकर वेणी का शृङ्गार किया जा सकता है। विद्याधर (फिर हाथ जोडकर) क्षमा हो प्रभु । प्रजापति मुझम आकाश का शब्द कह रहा है कि तुम आज सध्या-समय नदन-कुज मे मेनका के हाथ से मधु-पात्र पी रहे हो। जाओ, पुरुष होकर नारी की कोमलता मधु-पान भरकर पिओ। (और सोचते हुए) मेनका, तू देवी होकर भी स्त्री ही है | अच्छा तुम दोनो के भविष्य का निर्माण भी मैं अपने समाप्त होते हुए क्षणो में करूंगा। विद्याधर प्रभु, मेरा अपराध भी । प्रजापति मेरे साधना गह को तुम इस प्रकार अपवित्र नहीं कर सकते। आत्मा के पुण्य-गृह का तुम पाप की कालिमा मे मलिन करना चाहते हो? विद्याधर, मेनका से तुम्हारा प्रेम है तो करने के लिए इन के नदन की भिक्षा मांगो। कलियो से कहो कि वे तुम्हारी इच्छा की आग मे भी खिली रहे। पवन से कहो कि वह तुम्हारे सयोग मे सांस बनकर सजीव हा जाय, विन्तु मेरे सहायक होकर मेरी पूजा मे रौरव की दुगंध नहीं भर सकते । मैं जानता था कि गायक विद्याधर अतत गायक ही है। जल हिम बनकर भी जल का गुण रखेगा । कमल सूखकर भी कमल ही रहेगा। तुम तपस्वी नही हो सके, विद्याधर । गायक भी कही विचारख हुआ है? विद्याधर प्रभु, गायिका सरस्वती देवी मे विचार ।

१४६ / अधवार प्रजापति चुप रहो, विद्याधर । उफ सरस्वती। फिर वही आग । फिर वही भयपर प्रतारणा! विद्याधर, जाओ । मेरे वातावरण का और क्लुपित मत करो । अभी पिता के क्लक्-कृत्य स पीडित हू । कही धीरे धीरे सेवक वे क्लक-वृत्य स पीडित न हो जाऊ। तुम आज स मेरी सेवा में नहीं रहोगे। घुघराली अलका की भांति विधर्मी, विद्याधर । [विद्याधर का नतमस्तक होकर प्रस्थान] (अशांत चित्त से) सरस्वती, गायिका होत हुए भी विचार कर सक्ती है। उसने यह विचार नही किया कि पिता के चचल हृदय को ठोकर मारकर स्थिर कर दे ? (जोर से) सृष्टि, स्थिर हो । मैं भी तेरी मर्यादा सुरक्षित रखूगा। अपने पद के अतिम दिवस म भी तेरे लिए प्रबध करके बिदा लूगा। [नपथ्य म विद्याधर को कण्ठ ध्वनि-'मेनका, मुझे सहारा दो सहारा दो"] (दुहराते हुए) सहारा दो | मेनका और विद्याधर? दोना में एक- दूसरे के प्रति आक्षण जैसे जम मृत्यु मे परस्पर आक्पण हो। जम और मृत्यु मत्यु और जम। इनमे कौन जम है और कौन मृत्यु 7 [नेपथ्य मे प्रजापति की विजय हो] (घूमकर) कौन ? माया? [माया का प्रवेश--सुदर युवती श्वेत माडी, जिस पर लहरो के चित्र, जो अस्थिरता के द्योतक हैं। वास ती शृङ्गार, जिससे नश्वरता का बोध होता है। नेत्र विशाल जिनमे अजन । क्ण्ठ में त्रिगुणमय तीन पुष्प मालाए। मुक्त केश, जिनसे सुगध शतमुखी होकर दिशामा मे वरदान की भांति वितरित हो रही है। माथे मे अरण बिदी, जिसको लालिमा मे अपनी किरणों का डुबाकर बाल सूय प्रभात का चिन खीचता है । हाथो मे अगराग और पुष्प वलय किंकिणी और नूपुर । वह भाकर प्रजापति को प्रणाम करती है ।]

अधकार/१४७ माया माया प्रजापति के अनुसार पृथ्वी और च द्रमा का निर्माण हो गया। प्रजापति ठीक पृथ्वी मे कौन ऐसी विशेषता रक्खी है ? वहा उत्साह मे बने हुए पहाड हैं, प्रेम की गहरी नदिया हैं, रूप के चचल झरने है ! लहर वहा अभिलाषा की तरह फैलती है। फूल क्ली के उभार म मुस्कराते हैं, इद्रधनुप आकाश मे प्रेम की क्यारिया सप्त रङ्गो से सजाते हैं। प्रजापति और चद्र? माया करपवृक्ष के कुसुम के आकार का मैंने एक चित्र बनाया था। उसको पखुडिया मिटाकर मैंने उसी को गतिशीलता दे दी है। वह मिलन और वियोग की क्सौटी है, जिस पर हँसी और आंसू की रेखाएं खीची जा सकेंगी। वह आशा की तरह घटता और निराशा की तरह बढ़ता है। ससार को परिवतनशीलता का आकाश मे जैसे प्रतिविम्ब पड रहा हो, ऐसा वह दिखाई देगा, वितु इस तरह से कोई समझेगा नहीं। प्रजापति माया, मेरी प्रेरणाओ को तुम इतना अच्छा आकार दे सकती हो । मेरा वरदान है कि तुम्हारे चित्र मिथ्या हाते हुए भी सत्य के समान प्रतीत हागे । अच्छा, तुम जाओ । अब मैं योग साधन करूंगा। हाँ, तुम्हे एक बात मालूम है ? क्या प्रजापति? प्रजापति मेनका और विद्याधर ने मेरे साधना कक्ष को प्रणय-गह बना लिया था। माया (विकृत स्वर से) यह धृष्टता, प्रजापति । प्रजापति हा मैं जानता था कि इस प्रकार की घटना हो सकती है। मलय और पवन को एक साथ रखने से सुगधि का फैलना स्वाभाविक है, किन्तु मैं यह जानना चाहता था कि गायक विद्याधर तपस्वी हो सका है कि नहीं। यह उसकी छोटी-सी परीक्षाथी और वह उसमे सफल नहीं हो सका । माया, प्रेम की भावना तो ऐसी होनी चाहिए कि उससे जीवन का अन्त जीवन के आदि से अच्छा बन जाय। माया प्रजापति अभी तुम्हे ज्ञात हो जायगा । मेनका के प्रणय की एक मनोरजक विकृति होगी। प्रभु, प्रणय तो मेरी सबसे बड़ी शक्ति है। प्रजापति जिसमे आंसू और हंसी साथ मिलकर जीवन का चित्र खीचत माया किस प्रकार प्रभु १ माया १४८/अधकार । हैं। जिसमे विवशता का नाम यात्म समपण हो जाता है । इच्छा ऐसे व्यूह मे घूमवर बढ़ती है कि उसका नाम प्रेम हो जाता है जहाँ दो निर्विकार प्राण शरीर के निकट स्पश की मादकता मे फूलो की सुगधि पर बैठकर कोकिल के कठ मे गा उठत हैं और तव शरीर के प्रत्येक राम की नोक पर सुख या दुख ध्र वलोक की भांति स्थिर हा जाता है । और तब मुस्कान को रखा म वसत मचलने लगता है और कपोलों के हलये उभार की सीमा पर आसू की रुकी हुई एक विकल बूद म विषाद एक प्रलयकारी वर्षा को सष्टि कर देता है । यही है न तुम्हारा प्रणय ? माया किन्तु प्रभु, इस श्रीडा मे अमर सौदय है । प्रजापति वह सौदय मेरे कक्ष ने देखा है। आज ही कुछ क्षण पहले-- अब उसकी चर्चा ससार मे होगी। मेनका और विद्याधर की प्रेम चर्चा माया प्रजापति, उनकी प्रेम चर्चा तो इन्द्रलाक तक फैली हुई है। पुरदर ने दोनो की प्रणय क्रीडा के लिए नदन-वन के क्जो मे पुप्पो को चिरकाल खिले रहने को शिक्षा दी है। घताची और तिलोत्तमा ने अपने दष्टि पथ पर अनग को चलने की आशा दी -- प्रजापति क्यो? उवशी को विद्याधर को दृष्टि स पचाने के लिए पुरदर और स्वग की नव अप्सराओ ने मेनका को उससे प्रणय निवेदन की आज्ञा दी है। प्रजापति पुरुरवा की उचशी? माया प्रभु, आपका व्यग मैं समझती हूँ । पुरदर सौदय के सामन ग्राह्य और अग्राह्य म अन्तर नहीं समझते। गधों की सहायता से उहाँने उवशी को फिर अपनी सभा म बुलवा लिया है। अब पुरुरवा का जीवन परिताप की कहानो बन गया है । प्रजापति और अश्विनीकुमारो ने बाधा नहीं डाली? प्रभु, अश्विनीकुमार दो हैं। उवशी ने अश्विनीकुमारो से कहा कि प्रेम केवल दो व्यक्तियो म होता है। सरिता के दो किनारे हैं, तीन नही। आप दोनो परस्पर प्रेम कीजिए और मुझे छोड दीजिए या फिर आपम मे केवल एक मुझे प्रेम करे, दूसरा छोड दे।प्रेम वेवल दो मे होता है, तीन में नही । अश्विनीकुमार दो हैं। वे एव नहीं हो सके। माया अधकार/१४६ माया प्रजापति (हँसकर) अश्विनीकुमारो को चाहिए कि वे ऐरावत के पैरो से दबकर एक हो जाते ! बेचारे दो। तब माया, उनकी बात का विश्वास क्या? वे दो मुंह से बोलते होगे। माया (हंसकर) प्रभु, उनसे कोई एकात मे बात नहीं कर सकता और उनसे तो प्रेम हो ही नहीं सकता। सूय और चन्द्र एक साथ हो तो न दिन हो, न रात । प्रजापति (स्मरण कर) ओह रात अधकार माया, तुम जाओ। मैं चितन करूंगा। माया फिर प्रभू, विद्याधर और मेनका के सम्बध मे आपने कोई निणय नही दिया। प्रजापति हा, उनके सम्बध में मेरा निणय है। आना। प्रजापति मेनका को पुरुष रूप मे और विद्याधर वो स्त्री रूप में ससार के पाड मे भेजना होगा। माया यह रूप परिवतन क्यो? प्रजापति मेनका मे विजय-गर्व है, यह पुरुष की विशेषता है, और विद्याधर म आत्म समपण, यह स्त्री की विशेषता है। उनके इन चित्रो से पृथ्वी के चित्रपट पर कुछ प्रयोग करूंगा। उसमें मेरे दड की व्यवस्था भी होगी उनकी दुविनीतता के लिए। जो आज्ञा । मैं जाऊँ? प्रजापति हो विश्वात्मा की प्राथना के लिए पुष्प-हार लाओ। अभी लाई। प्रजापति (सोचते हुए) विश्वात्मा की इच्छा । स्त्री और पुरुष का निर्माण । पृथ्वी पर जीवन की सृष्टि। मेरी सदिच्छा की प्रेरणा से विश्वगुरु के शरीर का विभाजन । (माया नीलकमल का हार एक स्वण-थाल मे प्रस्तुत करती है। प्रजापति कमल-हार स्वीकार करते हैं । माया प्रणाम करके जाती है । प्रजापति कुछ देर तक हार हाथो म फेरते हुए सोचते हैं। फिर दोनों हाथ उठाकर नतमस्तक हो माखें बन्द कर खडे रहते हैं) प्रजापति (नेन बन्द क्येि हुए) सत, चित, आनद । [कुछ क्षण शाति, फिर द्वार पर शब्द] प्रजापति (आंखें खोलकर) कौन आओ। [अश्विनीकुमारा का प्रवेश दोनो का एक ही रूप। दोनो माया १५०/ अधकार बटु वेश मे हैं। पीत वस्त्र हैं । मुक्त देश । माथे पर पोत च दन । पैर मे पादुकाएं] दोनो (म से) एक-दा-एक-दो। प्रजापति उवशी का सिखलाया हुआ यह सख्या पाठ। विश्वात्मा का नाम लो। केवल एक । प्रथम अश्विनी प्रभु । उवशी का नाम । उवशी । द्वितीय अश्विनी प्रभु । उवशी का प्रेम । उवशी। प्रजापति (प्रथम अश्विनी से) तुम कहते हो नाम (द्वितीय अश्विनी से) तुम कहत हो प्रेम | एक वान कहो तो कुछ समझ मे आये। प्रथम अश्विनी नाम। द्वितीय अश्विनी प्रेम । प्रजापति अच्छा प्रेम का नाम । हा, कैसी उवशी? प्रयम अश्विनी प्रभु, पुरदर स्वार्थी है । वह उवशी से प्रेम करने के लिए मुझे माग से हटाना चाहता है । द्वितीय अश्विनी हटाना चाहता है, प्रभु प्रजापति हो, अब एक बात कहते हो। प्रथम अश्विनी पुरदर ने उवशी को न जाने क्या सिखला दिया? वह कहती है, सरिता के किनारे दो होत है, तीन नहीं । द्वितीय अश्विनी मैंने कहा--चार किनारे पर लो। तालाब बन जाओ। हम अपने साथ प्रजापति को ते आयेंगे। हम लोग तीन हो जायेंगे, तुम चौथी हो जाना। प्रजापति मैं उवशी से प्रेम करूं? द्वितीय अश्विनी क्या हानि है। प्रयम अश्विनी कोई हानि नहीं । प्रजापति (अधिकार के स्वर मे) अश्विनीकुमार, तुम लोग यदि मेरा नाम लोगे तो योग-साधन से तुम्ह दड दूगा। सावधान । तेल और पानी नहीं मिल सक्त । मेरा प्रेम तरल है वितु वह ईश्वर के स्नेह मे है । तुम्हारा प्रेम तरल है, किंतु वह दनिक जीवन म है । स्नेह और जीवन रहन दो मेरे लिए, वेवल मेरे लिए। प्रथम अश्विनी क्षमा कीजिए प्रभु, दापी हूँ। द्वितीय अश्विनी क्षमा कीजिए प्रभु । मैं भी अदापी नहीं हूँ। प्रजापति एक ही बात कि तु भिन्न शब्द । तुम लोग स्वभाव स हसे हो, प्रेम नहीं कर सक्ते। प्रेम के लिए आवश्यक्ता है मुस्कान की, तुम मुसग नहीं सकते।

अधकार/१५१ प्रथम अश्विनी द्वितीय अश्विनी प्रजापति प्रयम अश्विनी द्वितीय अश्विनी प्रजापति प्रभु, मैंने उवशी को मोहित करने के लिए अश्व का मस्तक उतारकर फेंक दिया। देवताओ का मुख धारण किया और मुस्कान उत्पन्न की, फिर भी उवशी प्रभु, सुरो का मुख धारण किया, फिर भी उवशी घोडे का मुख बदल जाय, कितु स्वभाव नहीं बदल सकता। प्रभु उवशी को आप घोडी बना दीजिए। अश्विनी बना दीजिए, प्रभु। (हँसकर) फिर तुम्हारी मा भी अश्विनी और स्त्री भी अश्विनी ! देवताओ को अधिक लाछित मत करो, अश्विनी . कुमार। प्रथम अश्विनी प्रभु, प्रेम मे क्या स्त्री और क्या अश्विनी? द्वितीय अश्विनी प्रेम में क्या प्रजापति तुम लोग वीणा के दो तारो की तरह हो, मिलकर भी अलग हो । देखो, तुम ऐरावत को जानते हो? प्रथम अश्विनी हा प्रभु, पुरदर का हाथी । समुद्र माथन का चौथा रत्न । द्वितीय अश्विनी हा, प्रभु, पाचवें रत्न कौस्तुभ पदमराग मणि के पूर्व का चौथा प्रजापति उस ऐरावत के पैरो से दबकर दोनो एक नही हो सक्ते? अमर होने से तुम लोग मर नही सक्ते, कि तु एक हो सकते हो ! प्रथम अश्विनी प्रभु यदि उसने हृदय पर पैर रख दिया तो प्रेम की भावना ही गई-उवशी तो दूर की बात है। द्वितीय अश्विनी प्रभु फिर उदशी गई। प्रथम अश्विनी और पुरदर हम लोगो से जलता है। उसने यज्ञ के देवो म हमे नही लिया । अवेला सोमरस पीता है और हम लोग मुंह देखते द्वितीय अश्विनी कभी इसका, कभी उसका। प्रजापति और उवशी का? प्रथम अश्विनी प्रभु, उवशी मिल जाय तो मैं अपने रथ पर बिठला कर सूर्योदय से पहले ही उसके मुख से प्रकाश फैला दूगा । पक्षियो से खीचा जानेवाला हमारा रथ सदव सूय के रथ से आगे रहता है। द्वितीय अश्विनी प्रभु उवशी मिल जाय तो मैं अपने रथ पर विठला कर चद्रोदय से पहले ही उसके मुख से प्रकाश फैला दूगा। पक्षियो से खीचा जानवाला हमारा रथ सदैव चद्र के रथ से आगे रहता है। प्रजापति तुम दोना प्रकाश के पूर्व की धुधली ज्योति हो, प्रकाश में बीज १५२/ अपार हो। मैं तुम्हारा हित कर सकता हूँ। मितु तुम यदि एक हो तो अभ्छा है। प्रथम अश्विनी प्रभु च्यवन ऋपि को युवक बनाने महम दोना या हाथ है। द्वितीय अश्विनी प्रभु, सिद्धिनिमित सरोवर म च्यवन को हम दोना ने नहलापर युवक बनाया। सती सुर या वा मापीवदि हम दाना का प्राप्त है। हम एक केस हो सकते हैं प्रभु! प्रजापति तुम दोनो नेशा की तरह हो । एष दृश्य देखते हो, रितु रूप म अलग-अलग ! अच्छा है तुम लोग अलग ही रहो। प्रथम अश्विनी में प्रकाश का रूप हूं। द्वितीय अश्विनी मैं म धकार का पहूँ। प्रजापति माह, अ धकार तुम लोगा म स भी एक अधिकार वा समय है । जाओ तुम लोग ! अधवार धार ! फिर याद दिला दी। प्रथम अश्विनी (जाते हुए करुण स्वर मे) आह, उवशी द्वितीय अश्विनी (जाते हुए करण म्बर स) माह, उवशी प्रजापति नाआ, वैद्यक स देवताओ को प्रसन्न करो पहले। फिर 'माह उवशी', आह उसी कहना। य भी अधवार के अग्रदूत हैं । मैं पुरुष और स्त्री के निर्माण से इस अधवार को अवश्य दूर करने की चेष्टा करूंगा। हदरवाजे पर शब्द] कौन ? आमो। (सोचकर) ओह, मेनका की जीवात्मा ! [एक जीवात्मा का प्रवेश, प्रवेत वस्त्र से सुसज्जित] जीवात्मा (अधे को तरह लडबडात हुए) सत्, चित् मानद । प्रजापति आमा, आओ | तुम जागे' जीवारमा (आँख खोलकर) कोन? प्रजापति मैं प्रजापति । सृष्टि का रचयिता अपने मवत्तर के अन्त मे मेर द्वारा तुम्हारा निर्माण । तुम जीव हो । विश्वामा की इच्छा और मेरे सहयोग से उत्पन। विश्वगुर के शरीर के भाग विश्वात्मा में रुप। जीवारमा (धीरे धीरे दुहराता हुआ} विश्वात्मा के प्रजापति (दृढता से) तुम विश्वात्मा के रूप उसबै अश हो। जीवात्मा जैस प्रकाश की विरणा को विभाजित कर दिया। सागर की अधकार/१५३ लहरो को स्थिर कर तट पर रख दिया। वैसे ही अनुभव हुआ, जागति की एक लहर आई और मुझमे समाकर लौट गई। यह जागति, यह स्पदन । (हृदय छूता है) देखो प्रजापति । प्रजापति (जीवात्मा का हृदय स्पश करते हुए) हा, स्पादन हो रहा है। विश्वात्मा की अनन्त शक्ति से तुम जागे हो। [जीवात्मा चकित हाकर शूय मे देखता है] विस्मित होकर क्या देख रहे हो? जीवात्मा (विह्वल होकर) प्रकाश, आन द, उत्लास, सौदय । सीमा नहीं हैं । प्रत्येक पाएक आकाश है । उसमे वही, सब कुछ वही। और वह आकाश मुझसे निकलकर मुझी मे समा रहा है प्रजापति (मुस्कराकर) इतना अधिक । जीवात्मा बहुत अधिक, असह्य प्रजापति तो भूमडल मे चले जाओ। सभव है, यह उल्लास, यह सौदय कुछ कम हो जावे। भूमडल म देखना-इतना प्रकाश, इतना आन द–इतना उल्लास है या नहीं। जीवात्मा (आश्चय से) भू मडल। प्रजापति हां, भू महल । जीवात्मा कहाँ है? प्रजापति इधर आआ। (दक्षिण द्वार की ओर ले जाकर शूय मे सकेत करते हुए) देखो, इधर क्या है ? जीवात्मा (आश्चयचक्ति होकर) अनेक प्रकाश पिंड, बडे और छोटे। क्तिनी गति से घूम रहे हैं । (प्रसनता से) अरे, यह कितने पास आ रहा है । ओहो, यह । (प्रजापति से) प्रजापति, बचो। अरे, यह घूमकर उधर चला गया! (प्रजापति की ओर देखकर आश्चर्यचक्ति) प्रजा पति? प्रजापति ये अनक सौर मडल हैं। सहस्रो सूय और उनकी प्रदक्षिणा परनवाने अनव ग्रह और उपग्रह, देखो! यह सूय देखो। यह जतरिक्ष के मध्य भाग म स्थित है । भूगोल के मध्य-स्थान का नाम अतरिक्ष है । उसी म सूय गतिशील होता है। जीवारमा (जिनासा से) मूय से क्या होता है? प्रजापति जीवन या प्रकाश, आनद उल्लाम। उत्तरायण, दक्षिणायन विषुवत गतियो म जसे सूप वा उत्थान, पतन और समत्व होता है।

१५४ / अधकार जीवात्मा (उंगली से सकेत कर) और वह स्तूप क्या है ? प्रजापति वह मेरु पवत है । उसी के चारो ओर सूर्य प्रदक्षिणा करता है। उम मेरु के उत्तर मे इद्र की नगरी देवधानी है, दक्षिण म यमराज की नगरी सयमिनी है, पश्चिम मे वरुण की नगरी निम्लोचनी है और उत्तर मे कुबेर की नगरी विभावरी है। जीवात्मा इनम से ही किसी स्थान पर मुझे भेज दीजिए। प्रजापति नही, तुम्हे भूमडल में जाना होगा, पृथ्वी पर । जीवात्मा पृथ्वी कहाँ है ? प्रजापति (दिखलाते हुए) देखो, उस कोन से जा सबसे छोटा सूय है, उसके चारा ओर बिदु घूम रहे हैं, उहे देखते हो? जीवात्मा (भाह सिकोडवर झुकते हुए) ओह बहुत छोट छोटे हैं ? प्रजापति उही मे एक बिदु है जिसकी प्रदक्षिणा एक और छोटा बिदु कर रहा है । उसे चद्र कहते हैं भू मडल है। दिखा? जीवात्मा (देखते हुए) हां, कुछ कुछ दीख रहा है । बहुत छोटा है । यह तो मेरा अणु मात्र भी नहीं है । म उसम समाऊँगा कैसे? प्रजापति मैं तुम्हे क्ल्पना का शरार दूगा। उसी मे सचित होकर तुम जाआगे। जीवात्मा मैं समझ ही नहीं सकता, प्रजापति | जहाँ इतने बड़े आकाश मुझमे मिल रहे हैं, भू मडल मे में अपने को किस प्रकार बाद करूंगा। प्रजापति एक चचल स्वप्न के पख पर उडकर तुम वहाँ पहुच जाओगे और तब तुम्हें वही भू मडल अपनी आशा से भी बडा ज्ञात होगा। और जिस शरीर म तुम जाआगे, वह एक नगर से किसी भाति भी कम न होगा। उसमें एक राजा होगा पुरजय की तरह। उसकी एक सुदर स्त्री होगी। उसकी रक्षा एक बडा भारी साप परेगा । उस नगर के दस दरवाजे हागे । जीवात्मा तुम मुये आश्चय मे डाल रह हो, प्रजापति । प्रजापति नही, वह भू-मडल बहुत मोरजक स्थान है । आओ, बैठो तुम्हें सुनाऊँ । (दोनो छोटी पोठिकाओ पर बैठते हैं।) जीवात्मा (बैठते हुए) बहुत मनोरजक स्थान है वह प्रजापति हाँ, यह एक ठोस चमक्दार मिट्टी होगी। उसका नाम होगा 'सोना । वहा का जीव उस मिट्टी की परिधि म बिदु बनकर बैठेगा और उसी मे चक्कर लगाएगा । वह मिट्टी का सिंहासन बनाकर उस पर ईश्वर को बिठलान के बदले स्वप बठ जायगा।

अधबार/१५५ -- और अपने साथिया से कहेगा कि वे उस सिंहासन को उठाकर चलें। स्वभावत वह उस मिट्टी के रग से पाप को पुण्य बना देगा। हो, पाप का भी पुण्य जीवात्मा असम्भव बातें मत कहो, प्रजापति । प्रजापति य असम्भव बातें नहीं हैं, जब तुम वहां जामोगे तो उसी 'सोने' स अपने साथियो मे भेद उत्पन करोगे। कोई होगा राजा, कोई होगा किसान । कोई स्वामी होगा, कोई श्रमजीवी। यह सुनहली मिट्टी जिसके पास जितनी अधिक होगी वह उतना ही वडा होगा, हाँ उतना ही वडा । वह अपने को ब्रह्मा से भी बडा समझेगा। राजा कहेगा-अन उत्पन करो और मेरा कोष भरो। किसान अन्न उत्पन करेगा और राजाका कोप भरेगा। स्वामी कहेगा [-काम करो और भूखे रहो । सेवक काम करेगा और भूखा रहेगा। जीवात्मा (आश्चय से) बडी विचिन वात होगी। ऐसे 'सोने' को जरूर देगा। प्रजापति हा, जाओ। मैं तुम्ह पुरुष बनाकर भेजूगा। जीवात्मा पुरप क्या? प्रजापति शक्ति के सचित कोष का नाम 'पुरुष' है। कितु वहा प्राय ऐसे अवसर आयेंगे, जहा पुरष शक्ति के प्रयोग मे अपना ही नाश करेगा। वह ऐसे यत्र निकालेगा, जो दैत्य बनकर उसे या जायेंगे । वह अपने विनाश के बीज वोकर कहेगा कि मैं अमर हूँ। कि तु तुम? तुम्ह मैं आज्ञा देता हूँ कि तुम वहाँ जाकर जहा तक हो सके अधकार से युद्ध करोगे। उसका विनाश करो। यही मेरी आज्ञा है । मैं समस्त पापाचार का अत देखना चाहता । जीवात्मा पापाचार मैं नहीं जानता प्रजापति । प्रजापति पापाचार? जब तुम अपने उस वल्पना के शरीर से अपनी आत्मा पर बैठ जाओगे तो पापाचार होगा। अपने सेवको को जब तुम स्वामी बनाकर स्वय उनके सेवक हागे तो पापाचार होगा । इच्छा के ऐरावत पर बैठकर तुम आरमा को पदचर बना लागे तो पापाचार होगा। जब तुम अपनी पवित्र भावनाओ के पिता होते हुए स्वय उत्पन की हुई निधियो स प्रेम करोगे तो पापाचार होगा। जीवात्मा यह तो बडी भयानक बात होगी प्रजापति ।

१५६ / अधिकार 7 प्रजापति तुम्हे इस भयानक्ता का विनाश करना होगा, मैं यह उत्तरदायित्व तुम्हें देता हूँ। जीवात्मा स्वीकार करता हूँ । अव मैं जाऊँ? प्रजापति तुम्हे तीस वर्ष की आयु देता हूँ। तुम मेरे पास केवल तीस क्षणो मे आ जाओगे, क्योकि मेरा एक क्षण तुम्हारे एक वप के समान होगा। तुम मेरे और अपने बीच मे सास की दीवाल उठाओगे। जीवात्मा जा माज्ञा मैं भू मडल का रास्ता तो नहीं भूलूगा प्रजापति तुम वायु का रूप रखकर बह जाओ। तुम्हारे लिए पुरुप का शरीर प्रस्तुत हो चुका है । माया के द्वारा तुम सास बनकर उसी शरीर में प्रवेश कर जाओगे। मेरी शक्ति तुम्हाग पथ प्रदशन करेगी। जीवात्मा बहुत अच्छा । सत् चित् आनद [जीवात्मा का प्रस्थान प्रजापति (सोचते हुए) आज मेरे मवतर का अतिम दिन है। मैं चाहता हूँ कि दूसरे प्रजापति के आने के पूर्व मैं भू महल मे पुरुष स्त्री की सृष्टि कर दू । मैं गतिशीलता मे प्राण भरना चाहता हूँ। मैं पुरुप म सुगधि भरना चाहता हूँ। अधकार का विनाश मेरे जीवन का उद्देश्य होगा। हाँ, अधकार का विनाश । पिता के पापाचार की स्मृति रेखा का काला चिह्न उज्ज्वलता मे लोन हावर मात्तड की भांति चमकने लगे । [दरवाजे पर शब्द कौन ? (स्मरण कर) ओह, विद्याधर की आत्मा? मेरे अभिशाप की पूर्ति (जोर से) आओ। [विद्याधर को आत्मा का प्रवेश] तुम वहां से आ रहे हो? जीवात्मा जागृति के अथाह सागर से। प्रजापति (व्यग से) नदन कुज से नहीं ? देखो वत्स, क्या तुम ऐसी लहर बनना चाहते हो, जिसमे किसी इंद्रधनुष का प्रतिबिंब पडे । जोवारमा (आश्चय से) कैसे इद्रधनुष का? प्रजापति भू मडल मे प्रेम का? जीवात्मा प्रेम क्या?

अधकार/१५७ प्रजापति (हँसकर) ओह, प्रेम ? उससे लोग दिन मे हंसते और रात म रोते हैं। जीवात्मा (आश्चय से) रात मे रोत है। प्रजापति हा, भू-मडल म दो प्रकार के व्यक्ति होंगे । भू मडल जानत हो, कहां है? जीवात्मा कहा है? प्रजापति देखो, उस सौरमडल म । किंतु तुम चिंता मत करो। तुम्हे अभी वहा पहुंचा दूगा। जीवात्मा बहुत अच्छा। प्रजापति मैं प्रजापति हूँ। मैं तुम्हे वहाँ अभी भजूगास्नी बनाकर। हा, उस भूमडल में दो प्रकार के व्यक्ति हाग । एक का नाम है पुरुष, दूसरे का स्त्री। कभी पुरुष कठोर और स्त्री कोमल और कभी स्त्री कठोर, पुरुष कोमल । जीवात्मा दोनो कोमल नहीं होते? प्रजापति हाते हैं कि तु दोनो की कोमलता का अथ प्रेम न होकर विवाह होता है। स्त्री का पुरुष के लिए कोमल बनना पडता है और पुरुप को स्त्री के लिए। इसी आत्म बलिदान का नाम 'विवाह' है। जीवात्मा विवाह ? प्रजापति हा, विवाह और प्रेम मे अतर है । विवाह कहते हैं ऐसी हँसी को, जिसमे रोना छिपा रहता है और प्रेम कहते हैं ऐसे रोने को, जिसम हँसी छिपी रहती है । ससार के लोग प्राय एसे रोने को विशेष पसद करेंगे, जिसमे हँसी छिपी रहती है। जीवात्मा और जो लोग रोना और हँसना नही जानते, वे लोग ? प्रजापति ऐसे लोग पत्थर की तरह हागे । काई ठोकर मार दे तो ठीक है काई ईश्वर बनाकर पूज ले तो ठीक है । ससार के लोगो के लिए रोना और हँसना आवश्यक है। जीवात्मा आवश्यक है? प्रजापति हा, अयथा वे लोग ससार छोड दें। बहुत से ज्ञानी लोग रोना और हँसना छोडकर वन में प्रवेश करेंगे, किंतु ऐसा करने से वे मनुष्य नही रहगे । वे हो जायेगे वन के पेड, पहाड के पत्थर । जीवारमा मैं क्या करूंगा? प्रजापति तुम । स्त्री बनकर पहले तो रोना सीखोगे । वाद मे तुम्ह रोने को हंसी बनाना होगा। मैं चाहता हूँ कि तुम स्त्री होकर भी वैसी बनो | पतिव्रता होना सीखो। - १५७/अधकार जीचारमा पतिव्रता क्या? प्रजापति विवाह मे मिले हुए पति की छाया मे समा जाना होगा । उसके काटो को गूथकर कहा कि यह कमल की माला है। उसके चरणो का नाम हो तुम्हारा मस्तक । उसकी अधी आख तुम्हारी दष्टि हो, उसवा लगडा पैर तुम्हारी गति हो। उसके वधिर कान तुम्हारी श्रवण शक्ति हो। उसको दीनता तुम्हारी सपत्ति हो और वत्स, उसकी विरह राति म मिला का प्रभात क्षाकता हो । जीवात्मा विरह रानि किसे कहते हैं, प्रजापति? प्रजापति विरह-रात्रि आह, विरह-रात्रि उम कहते हैं, जिसमें तारा म अगार के अकुर निकनते हैं, चद्रमा एक ज्वालामुखी का मुख दोष पडता है और कली क विकास मे तोर खिलता है, सुगधि चुपचाप आकर डस लेती है। जीवात्मा तो वहा मैं नहीं जाऊँगा, प्रजापति । प्रजापति अनुभव प्राप्त करो, वत्स । सुगधि से इसे जाने पर यहा के क्ल्प वृक्ष म तुम्हे सच्ची शाति मिलेगी। च द्रमा अपने अमत से तुम्हारे पैर धो देगा। जीवात्मा सचमुच प्रजापति निस्स देह । जीवात्मा अच्छा तब चला जाऊँगा । कि तु मैं विस प्रकार वहा पहुंचू? प्रजापति सोकर। तुम जागकर वहा नही पहुंच सक्ते। तुम्हे सोना ही होगा। वेश बदलकर तुम वहाँ जाओगे--सोते हुए। तभी तुम वहा के अनुभव प्राप्त करोग-~अपनी नीद मे स्वप्न की भाति । जीवात्मा फिर जागूगा कैसे? प्रजापति विश्वात्मा की इच्छा से । इस गीद को भू मण्डल में जीवन कहते - 1 जीवात्मा (आश्चय से) जीवन कहते हैं । बडे विचित्र व्यक्ति हैं वहां के । तब तो सत्य को मिथ्या और मिथ्या को सत्य कहनेवाले ही व्यक्ति वहाँ होंगे? प्रजापति तभी तुम्हारे अनुभव यहाँ से भिन होंगे। तुम यहाँ के अनुभवा से भिन्न नवीन अनुभव प्राप्त करोगे । जोवारमा साचते हुए) नीद को कहते हैं जीवन | आनद को पहते होंगे पीडा और प्रकाश को कहते होगे मधकार प्रजापति हाँ, अधिकार । तुमने अच्छा स्मरण दिलाया। तुम्ह वहाँ अध कार का नाश करना होगा।

अधकार/१५६ जीवात्मा कैसे अधवार का? प्रजापति वह अधिकार, जो पाप से उत्पन है। जिसके तामसी रहस्प मे पाप के विकास की सीमाएँ वहुत दूर तक फैल जाती हैं। जीवात्मा किस प्रकार नाश करूँगा? प्रजापति अपने मस्तिष्क की शक्ति से अधकार को प्रकाश में परिवर्तित करना होगा, मैं तुम्ह स्त्री का रूप दूगा। ऐसी स्त्री जो अपने क्रोध म ज्वालामुखी शक्ति के साथ जीवित रहगी। वह चाहेगी तो आग मे जल की शीतलता उत्पन्न करेगी और यदि चाहेगी तो जल की शीतलता से आग उत्पन करगी। जीवात्मा उसे प्रेम करने का अधिकार तो होगा ही? आपने अभी कहा था। प्रजापति सबसे अधिक । किन्तु वह अपने प्रेम की भाषा में प्रकट न कर सकेगी। एक मुस्कान और दो मासू ही उसके प्रेम की भाषा होगी, प्रेम को आशाम मौन और प्रेम की निराशा मे भी मौन । लेकिन इस प्रेम की निराशा मे उसका जीवन आसू बनकर बहेगा-इस आकाश गगा की भांति । करुण, वितु शब्दहीन । जीवात्मा मैं ऐसे प्रेम को निबाह सकूगा ? प्रजापति यदि आत्म-हत्या या प्राणदण्ड से बचे रहे तो । जीवात्मा अच्छा, तो अब जाऊँ ? आपकी आज्ञा है ? प्रजापति सत, चित, आनद । [जीवात्मा का प्रस्थान] (पुकारकर) माया 1 (माया का प्रवेश) भाया। मैंने विद्याधर को स्त्री और मेनका को पुरप बनाकर ससार मे भेज दिया है। इनके द्वारा मैं अधकार का नाश करूंगा। प्रतिभा, मेधा और वाक्शक्ति से अज्ञान एक क्षण म नष्ट हो जायेगा। माया प्रभु, अधकार का रहना आवश्यक है। प्रजापति यो? अधकार मे हो मेरा निर्माण-पाय होगा। रात कोकली सोयेगी, अधकार के बाद वह फूल बनकर उठेगी | सध्या समय बद्ध भूय मस्त होकर अधकार वे बाद बाल रवि होकर तेज-सम्पन होगा।मबार वे भीतर ही चद्रवे शीश पर क्ला का अभि रेक होगा या प्रेमी की भांति वह पलाहीन होगा। अधिकार में 1 १६०/अधकार । प्रजापति माया ही स्वप्न होगे और उन स्वप्ना मे ही ब्रीडा को उपा मे स्नात मोन निमत्रण साकार होगा। प्रतीक्षा के वृत पर मिलन का फूल धोरे से अपनी पपुडी म पराग रेखा का बाहु पाश बनायेगा। ज्योत्स्ना मे उमगो के हिंडोले पर कित्तने हृदयो की ध्वनि प्रेम का वृत्त बनायेगी। प्रभु, अ धकार का रहना आवश्यक है अधकार तो जैसे प्रकृति का विश्राम होगा। विश्राम। हाँ, प्रभु, विश्राम ही म रहस्य का निर्माण होता है। फिर एक बात और भी है। यौवन का विकास छिपकर होता है। यदि यह प्रकाश में नगा के मामन हो ता उमका सारा रहस्य, सारा कोतूहल, साग आकषण वमा हा जायगा जैसे किरणो का स्पष्ट ६प से बढता हुआ उत्ताप । तर यह यौवन किरणा को मोति गरम होकर सारी पृथ्वी को झुलसा देगा। उसम अनुराग के उभार की कोमल उष्णता न रहगी। माया, मैं इस यौवन से ही ससार को जलाना चाहता हूँ। इस तरह जलाऊँ कि ससार जलता हुआ अगार बना रहे और उसकी उन विनाशकारी किरणो से अधिकार प्रकाश म परिवर्तित हो प्रजापति जाये। माया जैसी आ प्रभु, किन्तु जिस प्रकार उज्ज्वल फूल के विकास के लिए पाली मिट्टी को आवश्यक्ता है पुण्य के विकास के लिए पाप की पृष्ठभूमि है उस प्रकार प्रकाश के विकास के लिए अधकार की भूमि भी चाहिए। प्रजापति ठीक है, किन्तु मेरा निणय ऐसा नही होगा। जाओ सप्तर्षियो रा कहना कि वे एक क्षण को मुझे दशन दें। जो आमा। (जाती है, किन्तु सरर) विन्तु प्रभु, सप्तपि धम की व्यवस्था के सिद्धान्त सोच रहे हैं। कैयन कश्यप समाधि स जागे हैं। वे अपनी यमपनी अदिति यी उदासी दूर परन की माया चेष्टा में हैं। प्रजापति अच्छा । कश्यप से कहना कि भगवान् के अवतार मे यदिति को उदासो दूर होगी। और सप्तपि इतनी शोधता से मेरी मागा* पालन म प्रवत्त हा गये? आपकी आज्ञा प्रमाण है प्रभु अच्छा मेरे पुत्र श्यए ही पो भेजा। माया प्रजापति मापा जो आना।

अधकार/१६१ प्रजापति अत्रि, वशिष्ठ, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और भरद्वाज, तुम धम की व्यवस्था परा। में तुम्हारी सहायता करूंगा। ऐमा धम धनाऊंगा जिसस अधकार कही रहेगा भी नही। वत्स कश्यप, तुम मेरे सहयागी वना। (द्वार पर शब्द होता है) प्रजापति वत्स मश्यप, चले आओ। [कश्यप का प्रवेश । ऊँचा रद । कमल के समान आखें। सिर पर लम्बी जटाएँ । वल्क्ल वस्त्र । विना परादी हुई मणि के सदृश स्खे शरीर में काति। मुश और कास का लिपटा हुआ आसन वक्ष भाग म दवा हुआ है। वे उसी भाति प्रवेश करते हैं, जैस लवडियो में सघप से आग उत्पन होती है। प्रजापति वत्स कश्यप, क्या कर रहे थे? कश्यप अग्निहोत्रशाला म हवन कर प्रजापति मैं जानता हूँ। अदिति का पुत्र की इच्छा है । स्वय ब्रह्मा उनमे अवतार लेंगे । कि तु कश्यप, तुम जानते हो-मेरी ही आज्ञा से पवन चलता है, सूय तपता है, मेघ बरसते हैं, आग जलती है। मैं प्रजापति हूँ। मैंन अपनी शक्ति से स्त्री और पुरप का निर्माण किया है। क्या पुरुष और स्त्री मेरे मन स अधकार का नाश नही करेंगे। मैं इस समय विश्वात्मा की शक्ति का प्रतीक हूँ। पृथ्वी जल, तेज, वायु और आकाश महाभूतो के साथ मैंने गध, रम, रूप, स्पश और शब्द का निर्माण किया है। क्या ये विषय पुरुष और स्त्री के लिए पर्याप्त न होगे। क्या आपन स्त्री और पुरुप का निर्माण कर दिया है प्रजापति कुछ क्षण पहले । अपने मव तर म नवीन ढग से। कश्यप पितदव, स्त्री और पुरुष को सृष्टि अपूण हुई। प्रजापति (भौहे सिकोडकर) क्या? क्याकि वे प्रलय के अधकार म समा जायेंगे? प्रजापति कि तु स्त्री और पुरुष के निर्माण के बाद अधवार रह कैसे सकेगा? यक्षा और राक्षसा के पालनाथ | रात्रि यक्षो और राक्षसोधी है । उही की भूख प्यास अधकार मे शात होती है । यक्षो और राक्षसो के जीवन के लिए अधिकार आवश्यक है। प्रजापति ठीक है कश्यप विन्तु । कश्यप कश्यप कश्यप १६२/ अधकार प्रभु, देवताला की सात्विक भावनाआ के साथ राक्षसों को ताम सिक भावनाएं भी रहगी। ब्रह्मा ता सबका पालन करते हैं और इसी प्रकार सृष्टि सन्तुलित करते हैं। प्रजापति तुम विस अधकार का पक्ष ग्रहण करते हो कश्यप ? तुम कच्छप रूप से उत्पन हुए थे। अत तुम्ह भी अपन पूर्व स्वभाव से अधकार और कच्छप का काला रग अच्छा लगता है। कश्यप प्रभु मुझे तो सभी रग अच्छे लगते हैं। सव रगो में प्रभु की काति है। वितु यह सोचिए प्रभु, यदि अधिकार न हागा तो पुरप और देवताओ म अतर ही क्या रह जायेगा? (एकाएक चौंक्वर) प्रभु यह क्या । अरे, परिवतन कसा? प्रजापति कश्यप कुछ मत कहो, मैं जानता हूँ। कश्यप वितु प्रभु, अब आपकी नवीन सष्टि क्या होगी? आप उसे कायशील होते हुए देख भी नहीं सके प्रभु । प्रजापति मुझे चिन्ता नहीं है, कश्यप । कश्यप प्रभु, आपका हीरक्-पदिक धूमिल दीख रहा है। आप दुवल होते जा रहे हैं। आपका मवातर समाप्त हो गया ज्ञात होता प्रजापति हा, मवतर समाप्त हो गया। इसलिए प्रजापति का यह चिह्न धूमिल होता जा रहा है । (कण्ठ का हीरक पदिय दिखलाते हैं) कश्यप इसी के मलीन होने से आप क्षीण होते जा रहे हैं ।(कुछ प्रकाश बुझ जाता है) आपकी शक्ति शेष हाती जा रही है। आपके क्क्ष में अधिकार होता जा रहा है। प्रजापति कश्यप, मैं मवतर को समाप्ति के साथ ममाप्त हो जाऊँगा। यही इच्छा थी कि मैं पुरष और स्त्री के निर्माण का परिणाम देख लेता कि तु मुझ चिता नही है। परिणाम कुछ भी हो । मेरी सष्टि का इतिहास तो सुरक्षित रहेगा ही। (शिथिल स्वर मे) कश्यप, अब मैं शेष हा रहा हूँ। (अधकार हो जाता है) कश्यप पिताजी, कहा आप अधिकार का नाश करना चाहते थे और कहा आप स्वय अधकार मे लीन होत जा रहे हैं । प्रजापति (शिथिल स्वर मे) विश्वगुरु की इच्छा । मैं विश्वगुर का इसकी सूचना द? प्रजापति वे जानते हैं कि मैं समाप्त हो रहा हूँ। कश्यप मैं अपन सहयोगी जय छ ऋषिया को सूचित करू कि व आपका स्तवन करें। मैं उनम सम्मिलित हो जाऊंगा। कश्यप अधकार/१६३ [नेपथ्य में भयानक कोलाहल होता है] ? कश्यप यह क्या प्रजापति अधकार वा आगमन । (कुछ प्रकाश और बुझ जाता है) कश्यप आह, मैं आपकी शाति के लिए स्तवन मरने जाऊंगा। प्रणाम, प्रभु [प्रजापति प्रणाम स्वीकार करते हैं । पश्यप का प्रस्थान] प्रजापति (विकृत स्वर मे) अधकार अधकार विश्वगुरु तुमने अपने आपको जीवित रखा। क्या महापुरुषो का पाप भी पुण्य हो जाता है ? [नेपथ्य से फिर भयानक शब्द । विद्याधर और मेनका का जीव रूप में प्रवेश] मेनका (ककश स्वर म) प्रजापति, तीस वर्षों म मैंन अनुभव किया कि तुम्हारे अस्तित्व की भावना मनुष्य की सबसे बडी दुबलता है। तुम्हारा धम जीवन का विष, वही धम जीवन का सबसे बड़ा अधकार है। विद्याधर (ककश स्वर मे) प्रजापति प्रेम हो नहीं सकता यदि वासना न हो। बिना शरीर की आसक्ति के प्रेम कालवत ऋषियो की असफल वासना है। प्रेम मे चुम्बन है और चुम्बन म प्रेम । तुम पतिव्रता के मन और शरीर दोनो का बाधना चाहते हो? मैं अधकार फेलाऊँगी, प्रजापति । प्रजापति (शाति से) तुम दोना ससार के सस्वारो से भरे हुए हो। पवित्र बनो। मेनका (जार से) मैं तुम्हारा नाश करूंगी। मैंने आत्महत्या की है (वक-दप्टि)। विद्याधर (जोर से) मैं तुम्हारा नाश करूंगा। मैंने प्राणदण्ड पाया है (क्रोध दष्टि)। प्रजापति (शाति से) मैं स्वय समाप्त होन जा रहा हूँ विद्याधर, मैं स्वय नष्ट हो रहा हूँ, मेनका । (पुकारकर) माया । [माया का प्रवेश आज्ञा प्रभु मैं केवल बारह क्षणो तक ही आपकी आज्ञाकारिणी माया १६४/ अन्धकार प्रजापति (आदश स्वर वितु क्षीण) इसी काल म मनमा और विद्याधर की आत्मा का पवित्र करा और अपना प्रभाव इन पर से हटा लो। मामा जो आज्ञा। हमापा मेनका और विद्याधर की आर देखती है। दोनो के श्याम आच्छादन गिर जाते हैं। उनके गिरते ही माया चली जाती है। विद्याधर और मनका पूर्ववत हैं, हो जाते 14100 P)1142 मेनका। प्रजापति विद्याधर । विद्याधर (हाथ जाडकर) प्रभु प्रजापति को प्रणाम । प्रजापति मेनका (हाथ जोडकर) प्रभु प्रजापति का अभिनन्दन । प्रजापति विद्याधर और मेनका। अब तुम दोनो एक दूसरे से प्रेम कर सक्त हो। मेनका विद्याधर (परस्पर देखकर) प्रभु की वृपा । प्रजापति (कमश क्षीण हात हुए स्वर म) विद्याधर मेरो सष्टि अपूण रही। मेनका मैंन पुरुष और स्त्री के निर्माण की कल्पना व्यथ की । विश्वगुरु को स्था की भाति मरी भी यह पाप-क्या अमर रहगी विद्याधर (लडखडात हैं) मेनका (मलित हुए) मेर विनाश म आज पुरुष और स्त्री की सष्टि अमर हो। [प्रजापति गिरत हुए सिंहासन का सहारा लेते हैं। क्षीण प्राश रह जाता है। विद्याधर ओह प्रजापति । (दोडवर प्रजापति का संभालता है।) मेनका (स्तम्भित स्वर मे) म {परदा गिरता है ०००

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गिरिराज शरण
रचनात्मक लेखन हो या शोध सपादन
हो या समीक्षा-साहित्य की हर प्रमुख विधा
में अपनी करामाता कलम के कमाल
दिखानेवाले डॉ गिरिराज शरण हिन्दी के
सुपरिचित साहित्यकार हैं। इनका जन्म सन्
1944 में मुरादाबाद (उप्र) के अनजाने कस्बे
सभल में हुआ।
इनके साठ से अधिक मौलिक और
सपादित ग्रन्थ हिन्दी ससार में अलौकिक
लोकप्रियता के कीर्तिमान सिद्ध हुए हैं। शोध
और समीक्षा के क्षेत्र में भी इनक दो ग्रन्थ
असाधारण महत्त्व प्राप्त कर चुक है--'तुलसा
मानस सन्दर्भ (दो भाग) और 'शोध
सन्दर्भ । हिन्दी साहित्य के आरम्भ काल से
सन् 1986 तक हुए सम्पूर्ण हिन्दी शोधकार्य का
अद्वितीय सन्दर्भ ग्रन्थ 'शाघ सन्दर्भ अपनी
नवीनता और उपयागिता में अप्रतिम है। प्रस्तुत
एकाको सकलन माला और बहुत कहानी
सक्लन माला तथा उनकी अन्य महत्त्वपूर्ण
कतियों का परिचय एक अलग अध्याय में
समाने याग्य है।
सम्प्रति वर्धमान स्नातकातर महाविद्यालय
(बिजनौर) में हिन्दा विभाग क वरिष्ठ प्रवक्ता
डॉ गिरिराज शरण का अनवरत रचनाधर्मिता
कुछ अर उल्लखनाय ग्चनाआ की आशा अर
विश्वास जगाती हैं।

Sanskriti Gaurav Ki Ekanki

Author
Giriraj Sharan
Title
Sanskriti Gaurav Ki Ekanki
File name
Sanskriti Gaurav Ki Ekanki
Text
OCR done
Citation
1965
Published
2011/03
Publisher
Prabhat Prakshan Dehli
Language
Sanskrit
Pages
188
Library
Shree Jubilee Naagari Bhandar Bikaner
Classification
Literature
DLI number
551151
Barcode
4990010031921.00
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C-DAK, Kolkata
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