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Kesanjatak

2012/02

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दोहा-श्रीगणपति मन्दाकिनी, शारद दश दिक ईश ।
हरिहर ब्रह्मा शेष गुरु, तिनको नावाशीश ॥१॥
सोरठा-श्रीराजेन्द्र नरेश, नाके सुंदर राजमें।
नारनौल शुन देश, इन्द्रप्रस्थमें परदिशा ॥ ३ ॥
पंडित रामविलास, तिनके शिष्य जगदीशने ।
भाषा करी प्रकाश, केशवीजातक ग्रंथती ॥ २ ॥
मोहिं दासानुजदास, जान आप किरपा री।
क्षमा क्रो द्विज तास, मैं मूरख मतिमंद हूँ ॥ ३ ॥
चौपाई-मोर नाम हैगा जगदीशा । गुरुचरणनमें नावों शीशा ॥ १ ॥
रामविलास गुरुजी मेरा । उनके चरणनका हूं चेरा ॥ २ ॥
मथुरामें मेरी मित्राई । जिन या नाषा साथ बनाई ॥ ३ ॥
ग्रंथ देख मैं भति कठिनाई । संरकतम निज भाषा गाई ॥४॥
देख चपलता द्विजसमुदाई । क्षमा करो निजपुबकी नाई ॥ ५३
श्लोक-शास्त्रकर्ता भवेड्यासो लेखशे गणनायकः ।
तयोर्विचलिता बुद्धिर्मनुष्याणां तु का कथा ॥१॥

भमिका। V ज्योतिष नयनं स्मृतम् । प्रिय पाठकगण ! आप सब महाशयोंको विदितही होगा कि, चारें, वर्गों को शिक्षाप्रणाली बतलानेवाला दिव्यपुस्तक देदे है और उसके शिक्षा कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद और ज्योतिष यह छः अंग हैं और पडंग वे पढना ब्राह्मणोंसे लेकर वैश्यों पर्यंत तीनों वर्णांका धर्म है । उसही हमारे शिरोधार्य वेदका एक अंग ज्योतिष है उसके दो भाग एक व्यक्त कहिले प्रत्यक्ष दृष्टफल ग्रहण अस्तोदयादि दूसरा अव्यक्त कहिये अदृष्ट भविष्यफल जातक और वर्षफलादिक. अब यहां अपनेको जातकके विपे विचार करा है कि, पाणीके यावजन्ममें जो शुक्स किंवा अशुभ फल होता है कहिये कौन २ समयमें किसको लास किंवा हानि जय किंवा पराजय किससे सुखोत्पति किंवा पीडा और कौन समयमें शेगादिकोंसे मरणप्राय संकट और शरीरसुख, कुटुम्बसुख, मातृसुख, मित्रसुख, पुत्रसुख, कलनसुख, पितृमातृसुख इत्यादि बातोंका ज्ञान जिस ग्रंथसे होता है कहिये ज्योतिषीलोग जिस ग्रंथके आधारसे जन्मपत्रिका लिखते हैं उसको जातक ऐसा कहते हैं । संस्रुतमें जातकपर बहुत ग्रंथ हैं परंतु सबमें प्रसिद्ध और विदन्मान्य ऐसा ग्रंथ वेशवाचार्यकता जातकपद्धति जिसको "केशवीजातक" कहते हैं.सो.यह ग्रंथ संस्कृतनापामें इस वास्ते उसका उपयोग मनुष्योंको बहुत होता नहीं इसवारते उसका सान्वय भापाटीका निर्माण किया कारण इसकी सहायताले देशवीजातकका यथार्थ ज्ञान होके पत्रिकाका गणित कैसे करना सो खुलासे मालूम होगा, इसमें केशवीजातक मल श्लोक लिसके वह सब श्लोकोंका अन्वय और खडी आपामें अर्थ लिखाहै तथा ग्रह और षड्बल इत्यादि गणित अल्पायाससे करनेमें आ इस वारते सारणीको योजना करके उस सारणीका कैसा उपयोग करना यह स्पष्ट गीतिसे लिखके उनके पृथक् पृथक् उदाहरण लिखे हैं और ६ A जन्मपत्रिकाका गणित कैसे करना यह समझनेके वास्ते उत्तम उदाहरण लिखाहै इसमें वर्गमूल निकालनेको शति और उच्चयल तीन प्रकारसे करनेकी रीति लिसोहै और महोपरि तथा भावोपरि दृष्टि करनेको तीन प्रकारसे लिसा है और अटोत्तरीदशा और विंशोचरीदशा और योगिनी यह तीनों दशाओंकी नक्षत्रोंसे उत्पत्ति और उनके पति और वदि दशा अन्तर्दशा कोष्ठक प्रत्यंतर दशालिसके जन्मपत्रिका लिखनेका कम बनाया है। यह ग्रंथ लोकमें उपयुक्त होने के वास्ते जो परिश्रम किया है तो देखनेते मालूम होगा अब आशा है कि गुणपाहक सज्जन पुरुष इसको भलोग कर मेरे परिश्रम को सफल करेंगे । आशा है कि सज्जन पुरुष मत्सरताको छोडकर मुझसे मनुष्यधर्मानुसार जो भूल हुई है उसको क्षमा करें और मुझको सूचना दें कि जिससे वह भूल पुनरावृत्तिमें दुरुस्त की जायगी। श्लोक-विद्वानेव हि जानाति विद्वज्जनपरिश्रमम् ॥ न हि वंध्या विजानाति सुर्त प्रमवदनाम् ॥१॥ करोमि केवीप्रयोदाहाने लोककाम्यया ॥ बालानां सुखबोधाय न तु पांडित्पगर्विनः ॥ २ ॥ इत्यलम् ॥ पं० जगदीशप्रसाद. विशेष द्रष्टव्य-भ्रमवश ११३ से१२८ तक पत्रक भूलसे नहीं लगाये गये, किन्तु विषय सब बराबर है.

अथ केशवीजातकस्य विषयानुक्रमणिका । १ .... .in .... ... 1 .... .... .... ६ .... .... .... .... .... .... ... ... A... .... .... .... विपया पृष्ठ । उपय. पृष्ठ मंगलाचरण मंगलादिसष्टसारमा प्रवेश २९ थहर्गणादिसाधन २ शुक्र मंगल इनका विशेष ३० माइगणोदाहरण ..... ३ भौमादि ग्रहोंकी स्पष्टगति मध्यमग्रहसारणीप्रवेश भौम बुधशुक इनकी गतिमें विशेष । रविमध्यसारणी पंचताराचक्रम् चन्द्रमध्यसारणी भीमशीघ्रफलसारणी चन्द्रोशमध्यसारणी भौममंदफकसारणी रामव्यसारणी १० बुधशीघ्रफलसारणी. भीममध्यसारणी २ धर्मदफलसारणी ४९ मुधकेन्द्रमध्यसारणी... १३ गुरुशीघ्रफलसारणी गुरुमध्य सारणी १५ गुरुमंदकलसारणी शुक्रकेन्द्रमध्यसारणी.. १७ | शुक्रशघ्रफलसारणी.. शनिमध्यसारणी १९ शुक्रमंदफलसारणी मध्यमसूर्यसाधनोदाहरण २० | शनिशीघ्रफलसारणी तात्कालिकमध्यमग्रहगतिसहित .... २१ शनिमन्दफलसारणी.... मध्यमग्रहते स्पष्ट ग्रह प्रयमशीघ्रफल ... स्पष्टसूर्यसारणीप्रवेश २२ / मंदकल ८१ पयनांशसाधन उदाहरण तिमशीघ्रफल चरखंडसाधन उदाहरण २३ गत्युदाहरण सूर्यको स्पटगति .... २४ | वनमार्ग मस्त उदय.. दिनमान रात्रिमान सूर्यादिस्पष्टप्रहगाविसहित सूर्यस्मसारणीचक ...- लकोदयसे स्वदेशका उदय ल.ना ८४ . २५ लग्न वनानेकी रीति. त्रिफलचन्द्रसंस्कार २६ / लग्नसे अभीष्ट काल कानेको गति ८७ सष्टचन्द्रसारणोमोश .... २७ १ नतोन्नतपूर्वक दशमचतुर्वभाव ... ८८ चन्द्रको स्पष्टाति शेष माठ भाव साधन संधि चन्द्रस्पष्टसारणी .२८ क्षयचय पलसाधन. स्पष्टचन्द्र साधका उदाहरण २९ संधिसीहत द्वादशमाषचक्र ९३ .... " ८० .... ... .... .... ... .... ... .... " ... .. साटरविसाधन उदाहरण .. .... .... .... ... ....

(८) विषपानुक्रमणिका। पृय पय .. .... .4 .... .... .... .... .... " ... .... .... ... an .... .... विपप. जन्मरममावोदय मकरसागरात पदमावसलचर शंभरानियत प्रष्ट माधन मौनरानियन १५४ समिरमारणी ....९५ ग्रह ममवर्गपतिवनः गौचन्द्रपुधामगारणी ९७ मावसमवर्गपतिचा भै.महामारणी ... १९ मतपयकोदारण मानिटष्टिसारणी १०१ प्रहसमवर्गवलपक गुरुतमारपी १०३ युग्मायुग्मबलोदाहरण का उदाहरण १०० फन्द्रादिवलोदाहरण ग्राहिचक केन्द्रादिश्चक मावष्टियर १०६ देवाणपयोदाहरण पलसाधन १०७ देयाणपरचा १६० ग्रहोस उपादिक धक १० स्थानएसयोगया ग्रहोंकी तात्यालिक मैत्रीकरण दिश्यलकलिपल ग्रहकी पंचधाधिमंत्री शिवलसारणीप्रवेश .... निसर्गमैत्रीचक्र तत्वारिकपंचधा. रिश्यलसारणी ११२ दिग्यरोदाहरण उभयलसारणी प्रवेश.... ....॥ 4दिग्यलचानतोउतपलोदाहरणचक चपलसारणीराशिफल बंशकला १२९ सहित स्थलोदारण द्वितीय प्रफर १६० वर्षपति मासपति दिनपति १६८ उधवलचक | होगपति बनानेकी गति मेपराशिसप्तवार्ग पतिचक १३२/ पक्षलसारणी प्रवेश.... वृपराशिसप्तर्गपति चक १३४ पक्षयलसारणी मिथुनराशिसप्त०.... १३६] पक्षपलोदाहरण फराशिसत . १३८ पक्षवल्या 'सहसशिसप्त ..... १४० दिनराविनिमागवलोदाहरण कन्याराशिसप्त १४२ दिनरापिरिमागवलचक तुअगाशिसप्तक १४४ वर्षपतिपलोटाहरण वृश्चिकराशिसप्त १४६ मासपतियसोदाहण धनराशित १४८ दिनपतिबलोदाहण .... १६८ .... " मैत्रीच .... .... .... .... .... .... .... .... ... .... .... " .... .... .... .... .... क ....

विषयानुक्रमाणिका। पृष्टः विपय. .... .... " .... .... .... .... ...." .... .... .... " .... .... ... .... .... विषय. होरापतिपलोदाहरण.... १६८ भाषयलसाधन १८७ वर्षमासदिनहोरापतिवलचक्र मांपवळोदाहरण कालयलयोगचक भावषटचक्र चेष्टावलनिसर्गवल रविचन्द्रका चेष्टावल केन्द्र क्रांति बनानेकी रीति १६९/ चेष्टावलोदाहरण मोत्यंकचा १७० रश्मीष्टक्टसाधन १९१ शांतिसारणीप्रवेश पर्गमूल निकालनेकी गति क्रांत्युदाहरण सावयव मंकका मूल निकालनेको क्रांतिसारणी १७१ रीति.... क्रांतिचक्र सक्ष्म गीत और सबसे मच्छी रीति १९३ अयनवलसारणीमवेश १७७ रकम्युदाहरण । अयनवलसारणी १७८ सालसवलचेष्टार० स० च० " अयन बलोदाहरण १७९ इष्टोदाहरण इष्टचक्र ..... १९४ अयनवश्चक कटोदाहरण भीमादिकोंका शीघ्रोश बनाना .....१८० कष्टचक्र..... चटाकेन्द्रचक्र इटकटबलोदाहरण चेहायलसारणीप्रवेश. १८१/ इटक एदलचक्र विरसारिणी इटर एट्युदाहरण चेटावलोदाहरण १८२ इष्ट दृष्टिचक्र चटावलचक | सप्तवर्गशुभाशुमसाधन अयनचेष्टापलयोगचक्र उच्चमूलत्रिकोणस्वगृहका निर्णय ... १९७ नैसर्गिकवलोदाहरण | उदाहरण.... नैसर्गिकपलचक १८३ वर्गशसहितसमवर्गशुभ .२०० भौमादिकोश शीघ्रांकादिकोष्ठक.... १८४ वर्गशसहितसप्तवर्ग शुमन २०१ शर करने के वास्ते शोधकर्ण लगता | उदाहरण.... है उसकी रीति ०७. १८५ शुभाशुमपंक्तिक २०२ भौमादिकोश शर बनानेकी रीति.... " उदाहरण.... हम्पलोदाहरण १८६ मध्यम्शुमाशुमचक्र हरवलरुक इपलगुणनचक्र... पदवटेवयक १८७ इटवर गुणनपदपक २०५: ... .... " .... .... .... .... .... " ... .... .... .... ७ .... .... .... ..." .... ... ....

(१०) विषयानुफ्रमणिका। पृष्ट विषय .... .... .... .... .... " .... २०९ पिण्डयुचक .... .... .... ... २२४ ..." .... ... .... ...." ५." .... " विपय. पृष्ठ शुभाशुमचक २०६ निसर्गायु के गुणक २२१ अंशायुसाधनार्थ चेष्ट गुणक उस पिटायुरुदाहरण गुणक .... २०७ निसायुरुदाहरण स्फुटगुणक २०८ | जोरायुरुदाहरण २२२ माश्रयगुणकसाधन बाश्रयगुण साधनचक्र २१० निसर्गायुचक माश्रयगुणके विशेषसंस्कार भीर जीवायुचक्र कर्मयोगगुणकायुमीगसाधन पिण्डायुर्दायरये लग्न युयसा- पाश्रयगुणचक्र धनचक २२३ कर्मयोग्यगुणकोदाहरण चतुर्णामायुपां व्यवस्था कर्मयोग्यगुणकचक .... अंशायुश्चक २२५ मायुर्भागोदाहरण पिण्डायुश्चक २२६ मायुर्मागचक्र निमर्गायुश्चक हानिसंस्कृतायुभागक वंशपिंटनिसर्गायुर्योगचक चक्रपाताहानि योगस्तीयां शमिश्रायुश्चक पायंशापुर्यायानयन... २१४ पलापलज्ञान २२७ मायुर्मागकगचक्र २१५ शिष्यसंदेहनिवारण कर्मयोग्यगुणगुणितायुभोगकलाचक " पायुयानयन २२८ वाट्यशायुवक २१६ दशाध्याय पिण्डनिमर्मजीवर्मायुयायुर्भाग १ २१८ लगायदशामाप्तवल उचचक दशाक्रम... २३२ पिंडाद्यायुर्मागचक्र दशाकमवलचक्र चक्राहानिमस्कृतपिंडाचायुर्भाग चक्रम् अंशायुचक्र २३३ लने पापग्रहे सति विशेषसंस्कारः...२१९ ग्रह और लम इनका पलचतुर्थाश पूर्वोकहानिसंस्कृतपिंपडाघायुर्मा गृह और तदर्ध होरादि ६ स्थान २३४ गचक २२०/वर्गशवलसे गुणक पिंडानसर्गनीवशर्मायुयानयन | गुणाकारका ऐक्यदशाक्रमबलचक १ .... १२१ पिण्हायुदंशाचक २३६ .... .... ... .... .... दशकप ... ... .... .... जन्मला...... .00 .... ... .... पिण्डायुके गुणक .... .... ....

विषयानुक्रमाणका। पृष्ट .... ..." .... " .... ... .... ... .... . ..." .... .... .... .... " .... २११ .... विषय. शिपय. निसर्गायुश्चक २३६ महगंणमयोजन २४९ Rष्टभंगविचारांतर दशाक्रमवलदाऱ्या दशारंभसमये स्पष्टसूर्यादि २५१ मतांतरनिराकरण २३७ दशारंमसम्ये अंतर्दशाकरण सूर्यचन्द्रसे तिथि काण नक्षत्र और मंचर्दशाक्रम २३८ योग लानेका प्रकार समच्छेद करनेकी शव २३९ ग्रहदशामें प्रतिदिनचन्द्रफल मंशाछेदचक्र २४० दशाफलदशारिष्टदशाभंग २५५ समच्छेदचक अष्टकवर्गफल सूर्यदशामें अन्तर्दशा कचिज्जातकफरव्यभिचारमें कर्त- सुक्ष्मफलज्ञानार्थ चिदशादिसाधन....२४१ व्यता सूर्यमहादशांतर्गतस्यौतर्दशामध्ये ग्रंयोपसंहार २५८ विदशाचक्र २४२ ग्रंथप्रशंसा लपमहादशांतर्गतलग्नांतर्दशामध्ये चरसंस्कारसारणी विदशाचक बहुविधदेशोंकी पक्षमा चन्द्रमहादशांतर्गतचन्द्रातर्दशामध्ये लमसारिणीचक विदशाचा २४३ दशमभावसारिणीचक्र .२६४ भौममहादशावर्गतमंगलांतर्दशामध्ये लनसारिणीप्रवेश विदशाचक्र दशमभावसाशीणीप्रवेश शुक्रमहादशंतर्गत शुक्रांतर्दशामध्ये अटोत्तरीमहादशा २६६ विदशाचक्र २४४ अंतर्दशा बनानेका कम गुरुमहादशांतर्गतगुर्वन्तर्दशाममध्ये अष्टोत्तरीमहादशावक्र विदशाचा विंशोत्तरीमहादशाकरण शीनम्हादशांतर्गतशतिर्दशमध्य दशाका उदाहरण .. विदशाचा .... २४५ विंशोत्तरीदशाचक बुधमहादशांतर्गतबुधांतदेशामध्ये सूर्यमध्येऽनशाचक... विदशाचा चन्द्रमध्यान उपदनाचक २४६ मोममध्ऽनईशाचक दशप्रयेशालसावनाहर्गणसाधन २४७/ राहुमध्येऽतर्दशाचक्र... दशाप्रवेशचक ... २५८ गुरुमध्ये नईशाचा.... बाण करने की गति शनिमध्येऽवसाचा .... ... .... .... .... .... .... . 4. .... ... ... +04 ... ... ... ....

पियानुक्रमणिका। ... २७२/पष्टवक .... .... विपय. पृष्ट | विषय. बुधम पेडनदेशाचक्र .... २७८) मर्यसे लग्नसे इष्टकार बनानेकी रीबि२८६ केतुमयनदेशाचक २८७ भृगुमध्येऽनर्दशाचर सर्वतोभद्रचक्र २८० .....२८८ योगिनोदशाक्रम सूर्यकालानलचक २८९ चन्द्रकालानलबक २९० अंतर्दशाक्रम २८२ श्रीरामचन्द्रस्य जन्मकुंडली जन्मपत्रिका लिखनेका क्रम २८३ श्रीकृष्णचन्द्रस्य जन्मकुंटली २९१ करिवंशमशंसा २८४/ उभयोर्जन्मलग्ने इति केशवीजातकस्य विषयानुक्रमणिका समाप्ता । .... २८१ .... .. ... ..

॥ श्रीः॥
अथ ज्योतिर्वित्केशवाचार्यविरचितं
केशवीजातकम्।
भापोदाहरणसहितम् ।
अथ मङ्गलाचरणपूर्वकस्पष्टाध्यायः १.
नत्वा विनपशारदाच्युतशिवब्रह्मार्कमुख्यग्रहान्
कुर्वे जातकपद्धति स्फुटतरां ज्योतिर्विदा प्रीतये ॥
यंत्रः स्पष्टतरोत्र जन्मसमयो वेद्योऽच खेटाः स्फुटा
यत्पशे हि घटत उद्गम इहास्ता सपनः स च ।।१।।
हेम्बोऽम्वाथ वेधोहरिपशुपतयो भास्कराया ग्रहा ये
पंचैते लोकपाला अथ दश गदिता दिक्प्रपा ये महान्तः ।।
मेपाया राशयश्चाश्चिमुखमुखवरा याश्च नक्षत्रतारा
योगा विष्कममायाः सकलसुरवराः पातु मामत्र कृत्ये ॥१॥
नृगिरा केशवं नत्वा केशवीजातकं स्फुटम् ॥
जगदीशः प्रकुरुते जगदीशानुक्म्पया ॥ २ ॥
अन्वयः-अहं केशवाचार्यः जातकपद्धति कुर्व करोमीत्यर्थः। किं कृत्वा विना
पशारदाच्युतशिवब्रह्मार्कमुख्यमहानत्वा किंविशिष्टां जातकपद्धति, स्फुटतराम,
अतिशयेन स्फुटेति स्फुटतरा तां स्फुटतराम् । किमर्थ ज्योतिर्विदा प्रीतये ज्योतिष
विदंति जानंति ये ते ज्योतिर्विदस्तेपां पीतये । अत्र ज्योतिश्शब्देन त्रिस्कन्धो ज्ञेयः
गणितसाहिताजातकरूपमित्यर्थः । होराविगमित्यर्थे ये ज्योतिर्विदस्ते एतद्धोरा-
शास्त्रविदो भवत्येवेति शम् । स्रग्धरावृत्तम् ॥ ३ ॥
भापा:-गणपति, सरस्वती, विष्णु, शिव, ब्रह्मा और सूर्यादि नव यह इनको
नमस्कार करके ज्योतिर्विदके संतोपार्य यह स्पष्ट जानकपद्धति नामक ग्रंथ करते
हैं। इसमें जन्मकालपटी शंकु, चक्र, फलक इत्यादि यंत्रोंसे सूक्ष्म रीतिसे जानना
और स्पष्टयह जिस पक्षके प्रत्यक्ष होय उसे पक्षके ग्रहलाघवरीत्या लेना । जन्म-
कालीन लम स्वदेशीय उदयसे बनाना, अनंतर जो लम आवे उसमें ६ राशि
जोड देना तो सप्तमजाव होता है।॥ ३ ॥

केशवाजातकम्। उदाहरणः-संवत् १९४३ शालिवाहनशक १८०८ इस वर्षमै वैशायरुष्ण ७ रविवारको ४०। १५ उत्तरापाढा नक्षत्र ५३।३३ साभ्यनाम योग ५२ ॥ ४८ इस दिन सूर्योदयके अनंतर ३२ घटी १ पलार पंडितजी श्रीबालीरामजीके पौत्र तत्पुत्र पंडितजी श्री चिः गंगाविष्णुजीके पुत्र उत्सन्न भया उस वक्त दिन- मान ३२१४२ रात्रिमान २७ ॥ १८ अक्षमा ७॥ १० अयनांश २२ ॥ ४४ । ३ चरखण्ड ७० १ ५६ । २३ चर ८१ क्य । तात्कालिक मध्यमग्रहसाधनके वास्ते अहर्गणादिसाधन । "व्यधीन्द्रो १४४२ नितशक ईशहत्फलं स्या- चक्राख्यं रवि १२ हतशेपकं तु युक्तम् ॥ चैत्रायः पृथगमुतः सदृग्नचक्रा- दिग्युक्तादमरफलाधिमासयुक्तम् ॥” भापा:-१४४२ वर्तमानशकमें कम करना जोशेप रहे उसको ११ से भाग देना जो लमि आवे वह चक्र जानना और शेष जो रहा उसको १२ से गुण देना उसमें चैत्रादि मास इष्टमासतक युक्त करना वह मध्यम मासगण या उसको दो स्थानमें रखना एकमें चक्र दूना और दश३ ० मिलाकर ३३ का भाग देनाजोलब्धि आवे सो अधिमाप्त जानना उसको दूसरेमें युक्त करना तो मासगण होता है। "खत्रिनं गततिथियुरियावक्रां- गांशाड्यं पृथगमुतोऽन्धिपदलब्धः ॥ जनावियुतमहर्गणो भवे? वारः स्याच्छाहतचक्रथुग्गणोऽब्जात् ॥" भापाः-जो मासगण आवे उसको ३० से गुग देना और शुद्ध प्रतिप्रवादिसे इस तिथि तक जोइके चक्रका जो पटांश सो युक्त करके दो स्थानमें रखना एकमें ६४ से भाग देके जो लगि आरे सो ऊनाह जानना उसको दूसरे कम करना तब जो अंक आवे सो अहर्गण जानना जो अहर्गण आया सो शुद्ध किंवा १ मुधियाऽहर्गम.कायो यदि धारोनलभ्यते । खामपुक्तो होनो वासैको वापि निरकतः॥ न TA - केशवीजातकम् । । मध्यमग्रहसारणीमवेश. अहगणको ६० से भाग देना तो लब्धि और शेप ऐसे २ अंक आते हैं सो आगे मध्यम यहमारणीमें सूर्यादि ग्रहोंका १ से ६७ तक शेपलब्धिकाटक है, उसके नीचे वह कोष्ठकके राश्यादिक अंक लिखे हैं वह शेषकोष्ठकहीं लब्धि- कोष्ठक है परंतु उसका फल लेनेकी रीति जुदी है वह प्रकार ऐसा है जो लन्धिका अंक हो सो शेषकोठकमें देखना अनंतर वह कोटकके नीचे राशिसहिन जो अंक है निममें राशिका त्याग करके अंक लेना. अनंतर पहिला अंक जो हो उसको ६ से भाग देके जो शेप रहे तिसको दूना करना तो लब्धिकोष्टकका सारी अंक होता है। अनंतर उसके नीचेका अंक अंशस्थानमें आता है इसवास्ते ३० से अधिक होतो ३० से जाग देके जो अंक आवे उसको राशिस्थानमें जोडे देना तो लब्धिकोष्ठक फल तैयार होता है। सारणीका मोटशेषकोठकके नीचेका अंक हो सो और अभीष्टलब्धिकोष्ठ- 'कका जो अंक हो सो दोनोकर योग करना अनंतर उस अंकको चकनिनवोन- क्षेपक तैयार सारणीमें ऊपरके बाजूके नीचे अंक है सो अभीष्टचकके नीचे अंकमे युक्त करना तो प्रातःकालका मध्यम ग्रह होता है। इष्टकालका मन्य करना हो तो सूर्योदयके अनंतर जो इष्ट घटी और पल हो उसका कोठक ग्रहसारणीके पीछे राश्यादि लिखा है. उसमें से अपना जो इष्ट घटी, पल हो उसके नीचेके अंकको प्रातःकालका जो ग्रह उसमें युक्त करना तो इष्टकालका मध्यम यह होता है। मध्यमराहु बनानेकी रीति कुछ जिन्न है. सो ऐसी है कि शेपलब्धिकोठकके योगको १२ में कम करके जो बचे उसको चक्रनिनभुवोनक्षेपको मिलाना तो प्रातःकालका राहु होता है. इष्टकालका राहु बनाना हो तो जोअनीट्घटीकोष्ठकके और पलकोठकके नीचे के अंरुको लब्धिशेषकोष्ठकका जो फल सो युक्त करके जो अंक आवे उसको १२ में कम करना अनंतर चक्रनिनवोनशेपक मिलाना तोइष्ट कालका राहु होता है। इस प्रकार मध्यमग्रह बनाना ।

भापोदाहरणसहितम् । रविचक्रनिन्नधुवानक्षेपक. २३/२४२५२६२७४२८२९/३०३११३२/३३/३४३३६,३७,३८३२/२०१४१ १०/१०/१०१०१०/०९/०१/०९/०१/०९/०९/०९/०९/०९०९.०९/०९/०९ ७०६०३/०२/००१२८२६२५२३/२४१९१७१६/१४१२ ००८ ४९००११२२/३३४३/०५/१६२७३७/४८५९/२०२१/३२४३२२३०४ કરવી કરછ૩૧૦૮ વછવાર શરૂ કરાશર द रविशेपलब्धिकोष्ठक. ०1१,२३४|११६/७1८1100१२/१३/१४/११/१६/१७/1029२०२७/१२) . . . . . . . o . ... .... २३४५६७ ८९1०1१11३1४13-11७१८११/२००१ .५९५८/५७५६५५/५४,५३३५३५२/११/५०४९/८/४७/४७४६16५/४/४३/४२/४11 ८/१६२४३२/४.४९,५७५१३२१२९/३०४/४/२00194२. १०२०/३.४१५१/१२/०२३२/१२/१३/३/३/०४/३४४४५४/५/११/२१/३/६/ -१७३४५१८२५/१२/०३/३४१५:१८२५४२00१0३४/५/८५४३/००/10 ९१८२७३६४५/५४।३२/२१३०३९/४०/५७१५/२४४३३/४२/111001९१० २३/२४२५/२६२०२६२१३० ११३२/३३३१३५/३६/३७४३८/ ३०/४/२/४/ -1131/9/1121111111111" (२२/२३/२४/२१२६२७/२८/०९/018/01/1५1६1010/९/१०/११/१२/१३/१४ 11.३९/३०३५३६३५/३४३४३३३३३३०२११८१८२२६२५/२४२३२३/२०१७ ७/११/०४३२१४०८/५६५२१३/alth/10/10/२६३५४३/५/11/ (५६/६/१७४२७३८५८/0/14/0190२.३०/११/19/9/१२३३२ ४५०/८२५४३/-1292EFry31/0२६४३/०३३४ pula६४५/१४/३/R1३.rift. ७४५/12/YOUT . . . . . 114130/14/११/२०%3D २२.२०२९/०१/२/३/४/५ .01209999001003८ ६/4/11010 १५२४३२४.४८५६/४/३/१४-३01100४/७ 23/20४३४/ M8Pre-002085- .४१२/11/2013९४८ jamara-110७३६५४३ रविधीकोष्टक १२३४५६७८९१६११९५४१६१५९८२२७ 9 ८ . 10 ८ C 12 . . . . . D . . ३ ३ 0 . क . १२३४५.६७४२११tatan५१३१७९ १६२२२४/२/१३alwse દરેટરી '६ कशवाजावकम् । रविघटीकोष्ठक। २२२३२१२५२६२७०८/२९/२०१३२/३२/३३४३५३६२७३८३९/४०४१/०२ . . . . 6 क . G . क . . 0 . . . . . O . . . । -- . . 9 . . . . . . . ० ० . . o . b . . . ० 0 . . . 0 . . . . . --- रविपलकोष्टक ३१४१५६१७१८ १/१०/११/१२/१३/१४/१५/१६४१७/१८ ५९/२०२१ D . . . . २ . . . . . D ३.००० | ० ० . ० ० ० ० :००० . o . . . . 0 . . . ००० . . . . ० . . . ०० . २।३।४।५/६/७१८ ९/१०/११।१२/१३१४/१५/१६/१७/१८/१२ श२३२वश्वा२६७०८/२९/३०३१३२/३३१३४३५/३६/३७३८/३९/४०४१४४२ . . . . C . . . o . . . . ० . 0 . . 0 . . . ७ द D . D 0 . . . . 0 . b . . . २ . . . . . . . . . . . . . . . . ० 0 0 010 . . . . . . . ८ . 0 . . . . . . . ० . . . રિક્રિષદરદ ० ० २१७ १६५५५५/५६/५७/५८/५९॥ D चंद्रचनिनवोनक्षेपक ३२/३३५१६३७३८) ४. १९/२०१२ ५॥२६२७,२८२/३. 121८८ ८८1८1७ 33. ४७ ७७.६ . . . .

--- ७ भागोदाहरणसहितम् । चंद्रशेपलब्धिकोष्टक. "१२३६४१५६७1८190/9/१२/१३/१४/१५/१६११९२२.९२ . . o •१३३६९२५१९१२११५/२८/११/२४१८/२१४१५.१३/२०१०२३१ •1103032४२५२/३१४२४३५/४५/५६६१७२८३८४४/५९/१०२१३१४२/५२ ३४४४१९५४२५४३८/१३/४८२३/५८३३/ ८४२/१७/५२२७३३७/१२४७ ५१४३३५/२/१२/११३५५/४४३९३९२३१५७५९५०४२३४ 14 १५६५२६८/४/४०३६३२२८३ १२.१६१२/21/10/५६/५०/४८४० ३ . 4 ८ . 5 २०१५/2010/0४/२७/39/२४७ १२ ३१३२४३५५/५६६१४२८३८४९/५२१०२0109/४२५२/३१३/२४३४/४/५१ 01/14/३०/६/४/१६५११२५/०३/१०४५/२०११/201८३Saxxsixvf १४४६३८३०२२१४६५८४९४१३३१२५.१७७३/४५३७३३३५१९७) २८२४/२०१६/१२/८/४/०५६३५२/४८४४४०/६/३/२०२४/२०१६१२८४/- ४७/४८४९/५०१५११५२/५३/५४११११५६/५७,५८१५९1-01-४६२/३ ०७२/२/३/३/४/४ ६.१९/२/१५२८१२५/८/२/४/१७११४/२७५०२३६१३/१६२13 ६५७२७३८४९४५९/१०/२०३१४१५२/३ १३४१४४५५६.२०३८४०/- ४३१५३/२८३१८५३/४७/२२/५७३२/७00RETR129/01/1. ४८४०३२/२४(१६८ ०१५२/४४३६२८०५३/५/५९ १५.१५२४८/४४/४०३६३२२८२४२०/२८/२/rjaste.i३३२ و ۹۹۹أه وه ولوو، و केशवीजातकम् । चंद्रपलकाष्ठक. ११२१३१४ ७ ८९ . . . 5 . ८ . क . . . . . . . . . . ० . ० .om . . . . ३/३/३/३/३/४|४|४ (२३२६३२२२१५.१९३२४२/२८/११/२०/३०/५११४/१७/३०/३३२७२०२३/३६] રિવાર १३२वारदा२६/२७२८/२९/३०/३१३२३३/३०/३५३६३५३८३९/१०/११/४२ . . . . . . क ६ . ८ . क . ७ G . C . . . ८ ० . . . २ ७७ ७ ८ ८८ 17 - . . . . . . . . . . . . २ . . ३ . . . . . ९.९/९/१०/१०/१०/१०/१०/११/१२/११/११/१२/१२/१०/१२/१२/१३ . ७/३१/४४ . २ . चन्द्रोपचकनिन्नवोनक्षेपक. PR.२१/२२१२३२२२२६२२२११३०/३११३३३३३४३५१३ १३७३८१३.xy ५२०९/७१४/१५८६३ .२७२५२२/१९१४/१1८ ५३ .१२२ 11८३३/१८३३३/४/३/१३३/४४/३/१८.३३४१३/१०३३/१०/३/२०३३/४८ 101.11.1.1.. • चन्द्रोचशेपलब्धिकोष्ठक. . . . . . । १२1३1४1५1011९/१०/११/१२/१३111५/१६/१७११-१९४२०२१२२ ... .... . है . . . . . . . . . 10२६३३/४०६५३]. ६.१३/२०२६/३३]४०४.५३] . ६१०२६ 11०२१३२४५६२६/७४८२४५.१३२५२५३३४१५५६/३७५८५4 કારકિfs |-| નરક | 1१४२/३४/२५१७८ . . . 1 • • • • • • • • • • •••••••••• • १४२/३/२५/100011९२३. ८३४० .२६११७: ३३४ Erariapels: .

भाषोदाहरणसहितम् । चन्द्रोचशेपलब्धिकोष्ठक. ४६४७४४९/५०५१/५२/५३/५४/५५/५६५७/५८/५९/६०६११६२/६३१६४/६५१६६६७६ . a . . . . ० . ७ ७ ७ ७ ६.६६६६६६६७ ७/१४२०१२७३४४०४७५४. (७१४२०२७/३४८०४७५४० ७१४२०२७ १९/०१/२२/२३/२४/५/४६२७८४८२९/०१/३२/१३/५४३४/३४५६३७ २५/१७८10141४२३४२५.१७८ .11१४२३४२५१७८०५१/४२३४२५० १/०२६५११४४४३/९/३४ २६/५११७/४३९३४/०२६५११७४३] . . चन्द्रोचघटीकोष्टक 1२/२३४ाद ७/८/९/१०/१२/१२/१३६१यादावार७/१८२०२१ . ८ . ८ . . . . . . . . . . . . . . 0 . D २ . ८ . . 9 ० . ० . . . . . . ६२३/२०/२६३३४०५३ २२/२३१२४१२५/२६२७२८२९/३० . २ १ ६.१३ ६ ३२/३३३१४३५३६/३७३८३९/४०४१४२ ० . . . ० . . . ० . . ० a . 0 . 0 ७ . C . . . . . २ २ २३ .74 ३ ३ :58100n.bhi 301 19215 B.033000 . " . . . ० . . . ० D . . 010 o . ० . . ६४६ ७/१३० २७३ ० ० ० ६ . ७१३ ૨૦)ર૩૪૦૭૬ ૦ ८ ० . चन्द्रोचपलकाष्टक ६१७८९११११२ ३२११दारा१५१ १९/२०/२१ . ०७ ० . क . . ० . . . . ० ० ० ०10 ० ० ७ . द . . . ० ८ . . C ० ० ० ० . ० . . . . ० १११ ११.११ INo ० ० . . १ २ २२३२४। 4]०००० ००० २०. om १ २ १६२७२८२८३०/३५३२३३/३४६३५५३६/३७३८५३९/४०४२ . . . . . . . . . . . . . ० . . ० ० ०. . ० ० ० 0 ००० 40.. ०००m ० ० ० Do०० . . । . ८ . . व . OM . 81818181818 ०110 818 ३ ३ ३ ३ त केशवीजातकम् । चन्द्रोच्चपलकोष्टका शमशावादाराकादरावाददारवारवाददार ... . . ८ . . . ० 0 ० . ० . . . . . . . . . ० ० . . ०००० . . . ८ . . G . . . . . a . ४५६ ०४ mo द E ६ ६ ६६ ० . राहुचकनिनधुवोनक्षेपक. . . રરરર/૧ દશ૮૬૨ ૨૨ રદ્દ કરવાનું છે ૧૮૮ર૦ર૮૮૮ ૨૮૮ ૨૮ર૮૩૪૮૮૮૮૮૮૮૮૮૮ર 111011 ० . |01.1. . . . . . राहुशेपलब्धिकोष्ठक •२|३|४ ७1८11110119२/१३/१४/१५१६/30/12/२२१२ . . ... ९१२/२५२८/३१३४३ ४१1०1४२७. ३६ । . १ . . . . •101-1-1-1-1.0 •1.!.!. ६९/५०/५११५२/१३५१५६५७११८५१ [६३ . . FREE . . . 0 . . २ ३ ...

भासोदाहरणसहितम् । राहुघटोकोसक. २१२४३ ४५६७८1९१०११।१२।१३।१४ १२/२६१ (८१२/२०॥ . ० . . . . . ० C ००० ०० ० ० 3 ० ० ० ०० ० . . ८ ० . . ० ० . . . ० ० . ० ० o . . " . । . . . द्र C ० . 6.0 . ७०० 0 . . ood 6 १ oa1 0 १ . . . .. . . व . 3 9 ३ A ८ . . . ० . . ०० ... . . ० . . . . . a bom २१२२ २ २ २ २१२ २२ २ २।२ २ ૧૦૪૪૨૭રરરરરર રર૧૪૪૮ીરીથી ११४७ राहुपलकाष्टक. ४१५१६९७८ ९.१०२१६२५३१११११६७१८११९२० . . . ... १ . ० ० . . . २०० ० ० . 9 . . ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० . . C ० ००००० . 112 ३०३११३२/३३३४१३५३६/३७३८३९/४० २१/२२/२३४२४२५/२६२७/२८ . d० ० ० ० ० ० ० ० ०० . ० ० ० ० ० . ००० ०००० ००० . . . . ० १ १ १ 7 १ (४१४२४३४ारा४प९८४९/५०/५११९२१५ " १३ २ ४६५५५६२७/ . O . ० द . O . . . . . . . . . . o . . . क . . . . . . . . . क . G . a 10 . २१२ . २ २ २ ३ १३ केशवीजातकम् । m मंगलचनिन्नध्रुवोनक्षेपक. १२१२२२गत्यश्वारदा२७२८२९/३०३३३३३४३५/३६/३७३८३९/४०४२ ९/७१५३१११११०८६४१२/११/९/७/५/३/१/११/१०/८६ ६१०१५/१९ ર૮ ૨૭ દિશ૬૨૨ ४.९/१३/१७/२२/२६/१/५/११ २२/२०४८१६५४१२४०८३६४/३२० ८२६२४/२२२०४८१६) २४ार . ... . . 0 . . . . . . . - . मंगलशेपलब्धिकोष्ठक. १|२|३|४|१६|3|18/2013/201३/१४/१५/१६/10/14/११/२०२२२२३ ... ... ८८९९110199/११/१२ ३१२३४३७८४० ४०/१४४१७४८२०५७/२३५४२५५७०८ २६५३१९४६१०१३९५/३ १/१८४४११३७४३०५७२३/१०/१६४३९ ३१३३४ ३१६३७८ १०८१११४३१४४११६४८/१९५० ५२/२३३५४ [३/७/१११४/१८२१२५/२९/३२३६३९४३४७५०५४१० ११५/८/२/14/१९९३ २४/२५२६२७२८२९३०/३१३२/३३ ३५३६३७३८३९/४01311४२/४३४४४४४६ . 1. . . . २५,२६२६४२७२७२८२८२९/२९/. ३०/९/०५२४३/१४६/१७४१२०५१२३/१५२६५५२९/०३३३५ ४६१२३४/५ ३२/५०२५५११/११३८४३५७/२४/५०१७/४३/2.३६) १९५०२०३२४५१२६/५७२८५४/३/१३२/३/३४.३६/७/३०/1/00/- १९५२१५६. ३/७२:२५२८३३३६६२४२७,५०५४४५७१ मंगलपटीकोष्ठक २/२/३।४दा६/७/८/९/२०११/१२/२३३९४११६२६/१७/१०/१२० . . . . . . . . . . . . 5 . . . . . . . . . 0 e . २ ६ ७ ८ ८२ . ५ । . . . . . . . G . ० . ११/११/१२१२१३/१३/१४/१४/१२१५/१६/१०/११७/१८/५०३८२७११/४/- ૩૦ વાઈરોઈટ પરકરણ । भागोदाहरणसहितम् । मंगलपटीकोटका ४२१४२४३४४४दाय७/४८/२०१५१/५२३४५६/५६/५७/५८द . . . 6 . . . . . . . . 0 . 0 . O . . . . o . . ० . . . . . ... मंगलघंटाकोष्ठक। ७/८/९/२०११२११ १३१२४/१२/१६/१७/१ १/२/३४१५/६ १२ ० ० . . . a ० ० . ० ० ० ० ० ० . . ० ० ० ० ० ० . ००० ००० . . . . . . १ 01. . २ ३३.४४१५ २१९/१० २१२२२३२४२५/२६२७४२८२९/३०/३१३२/३३१३४४३५/३६/३७३८३९/४० २ . . ० ० . . ० ० . . . . . क ० ० . . . . . . . . . 6 . ० - - . . -- . . . . . . . ० ० ० ०० ट . ००० ००० . C . ८ . . . . . . . ००० ० ३ . ७ . . ८ રરરરર રરરરર૩૩ર૮૮૧રરરર૩ बुधकेन्द्रचक्रनिनध्रुवोनक्षेपक. 4 १/१०/६/3/२९/२६/२७/१९/१६/१०/९/५/२/२८/२०१८ १५/१२/८ ३३६/२२/१२/४६/९८५१२६/२७३०/३३६/९/४२११४८५११५४/२७ ३३६ 11101 ' . ' . ܘ . . . 10 . ० केशवीजातकम्। गुरुशेषलब्धिकोष्ठक. ५१५२/१३/४/११/१६५७/५८१५९/ [६४८ . . . . . . . ३३ (३1४/४४|४|४|४|४|४|४|४ ४४/५ ४९९४५९४ ९/१४/०९/२४२९३४३९४४९/५/५९/४४/२४९३४. २०६९/2010301६१५/१४/१३/१२/१२/31/2013/0/0/६/५/४/३/२ ३४४३५१]. ८१७२५३४४३५१.८१७२५/३४४०/५१. ८५७/२५/३४ १७९१२५/३४८/३/१७/५०२५३४८४३/१७५१२५.३४८४२/10/. . गुरुघटीकाष्ठक. २११०२१/१२ ११२||४ाद ६ ७.८ २४११६१७/१८/१९/२० 0 . . O 10 ० . . ८ o . . . ० ० C . . . . 6 . . . . . 6 . . . . I०० ० ० २ . ५१०१६/२०/२५/३०३५/४०४५/५०/५ ૯/૧૦/ર૦ર૦ર/ર૦૧૦ २२/२३२४२५/२६२७/२८/२९/३०३१/३२/३३३८३२६/३७/३८|३९/३० ८ D . . . . C . . . ७ . . . . : २ . . . . . . . १११ २१२/२ . . ................ . . . . . ००M . . . . C ० ० . . . o amr . ११४|४|४|४|४|४ ४|४|४|४|४ . ५१०१६/२०२९/३०/३५४०४५ २५/३०/३५ १०४५८ 0 गुरुपलकोष्टक. |२२|शदा६७९/१०१२/१२/१३१४२८१६/१७/१८१९२० ० . ० ३ C . . 11०००० ००० ००० ००० ०००।८ . . . .. . o० 010 ० . . ८ . 0 ० . ० . . ० . १ १ २ , १ २१२२३२४२ २७२८२९ ३० ३११३३ ४३५/३६३७,३८/३९/४० . . ८ . . ८ . . ० . .००० ००० ००० No०० ०० ० ० -no००:०० ० . ooom J००० ००० . . . . . २ २ २ २१२ २३३ . . . . 0 ०४ BAtal . to oM 0 . oco R - AN - R ० . 10 0 G ० O V . २४/१०२६ . - . o . W ० 0 هر ساری . क ०० - M. m . Var C aco . m . . Co WM N . . ० N or M . N . ० M भाषोदाहरणसहितम् । गुरुपलकोष्ठक. शुक्रकेन्द्रचक्रनिन्नध्रुवोनक्षेपक. शुक्रकेन्द्रशेपलब्धिकोष्टक. . . AMANG N- 0 . . ०0 D wrururam "N" . . . Co . ur V ० ० C 10 .ro mmल . क M "cle ." 9 . om . . om 0 .. . m" . m . red . AN - ० . D - . m ० om O . ... C . ० om OM ર NA ure . ० :૧૮ केशवीजातकम् । शुक्रफेन्द्रपटीकोष्ठक. ૧૨/૨/૧૬. ૭ (१०१११/१२/१३१४०११६१७५१ ૨૬/૨૦ છે s C ૨ છે. છે. છે 5. છે o o. e ૦ ૨ ૯ છે . છે છે છે. છે ૦ s ૨૩ ] ૧૬૭૮૮૧૧૨૦૧૨/૨ રિણી કર૮ ૧રરરરરરર રરરરર દુષિરૂર ૨૨ ૨૨૨૩૨૪ર૧૨૨૭૨૮૨૬/રરૂ? રરરરર૮ર૪/૪ R[ફરાર I n ૦ હ છે e ૦ છે ૦ છે ૦ ૦ 0 0 T છે. ૯ ૬ e - Tc ૨ ૨ ૨ ૦ હ U . હું છે જિ. ૨૨૨૩૨૪૬૭૨૧૩૬૭૨૧૧૧૧૨/૨૦ ૧રરરરરરર ધારી૨૮૨૦૨ રરર૭/૭ કરશે ૮૩૬J? 18 ઇશારા કાછિદ્દા ||૧૧|ર વહોણી ૨/૨ છે. ૦ 5. ૦ C 9 2 વ 9 છે e e છે છે. ૦ છે ૦ છે. s છે. s e p ૭ s રરકારરરર રરરરર રરરરરર રરરરરરરર છર ૮ દરરઈજીરરિી રહી છે ટીવીરર૧ર હ शुक्रकेन्द्रपलकोष्ठक. १/२/३१४१५/६/७१८/९/१०/१२/१३२१५१६५७१८६१९२० e છે. ક છે. ૨ | ૦ . છે e e s e ૦ ૦ s ૦ e ૨ ૦ ૧૦ ૦ ૩. છે ૦ છે ૨ છે ર o o o 5 ૦ ૧ ૦ છે. e ૦ e રૂ|| ૬ ||૮|૮|૧૧૨૦૧JRશી રર૩રર૯૨૨૭૨૮૨૪૦૩૨૩૩) રિવરફJરૂર૮૩૬eo છે છે. છે. 6 o ૦ છે છે. છે. છે વ છે છે t છે. છે. 6 છે છે o છે. s s e છે ૦ o o e 0 છે . 111 . s છે છે છે છે. છે ૦ છે છે 6. ૨ છે. છે છે. . કે ૦ છે 6 છે ક s છે. છે. e. - s છે ! . 6 1 0 1 1 e છે. E s R h E ૨૦ રરરરર રરરરરરરરર भाषोदाहरणसहितम् । शनिचनिनववोनक्षेपक. (२०१२१/२२/२३,२४२६२६२७२८१२९/३०३१॥३२॥३३३३५३६३३७/३८३९४४०४१ ३१७/११/४/८/१४५/१०/२७/११/४/८/११५/१०/२/७११ ४१८१ १५ २८/१२/२७/१०/२५ ०२४८२०७२१५/२०४९८) ३९५७/१५३३५१) २७४५३ २१/३२५७/१५३३४५१९२७३५/३/२१३९) . . ० . . . क . . . . . . ० शनिशेपलब्धिकोष्ठक ७1८1९1"०११/१२/१३/१४/१५११६१७११८१९/२०/२१/२२१२३ २ ३ 61५ ६ . . ० . . . . 0 o . . क b 9 २ ० ० . 6 . o . . . o ० . ० . . ४/६/८/१०/१२/१४१६१८/२०२२२१२६२८३०३२/३४/३६/20000४२४४४६. १ १२.२३1३1३४ ८८८ १२३४६९३२/-५.१८४१४२७५०१३३६५९/२३/४६९३२५५/१८/१/४२७५० ४|११611८/२३/२७/३२३७८१४६५३/५५/५९/४/९१४/१८२२/२८३२३७४१४६ ३७ २४२५२६२०१२८१२९४३०३११३२/३३/३४४३५४३८।३७३८१३९४०४१/४२/४३/४४/४५/४६ ० ० . ० ० . . . ० . . ० . . २ द १११ १११११ ८८५०५०४/५६/५८० ६ ८1१०1१२/१४१६१८२०२२/२४,२६२८ 15108090119011१२,१२,१३/१३/१३/१४/१४/१५ १५:१६५६१६१00 ४१२७१५१११३३६] • २३/४६९ ३२५५ . . . ० १ .].. 1138001019२J२२२२२/२/२/. ३४३६३८४० ६/८००१२/१४). 121 BAR १ १२ १२ ३/४३५१६६७.८ ५११२/१३/१२/१५/१६/१७/१८/१९/२० ० . . ० . . . ० . . . . . . . . . . . . . . . ० . . . . ० . . ૨૪ ૬૧૮/૧૦ २१/२२२३१२१२५ . १४१६/१८/२०/२२/२४ ६/२८/३०३२/३४/३६३८४० २७/२८/२९/३०/३१/३२/३३/३४३५३६३७३८/३९/४० . . . . . . ० . . २ . . . . . , . . . . . ० ० ० . . . . ० ४२४४४६४८५०५२/५१५६५८० २/४/६/८/१०/१२/१२/१६/१८२० केशवीजातकम् । एककेन्द्रपटीकोष्ठक. १४२४३४९१६७१८१९/२०१११/१२/१३/१४/१५/१६१७१८१९२० . . . . . 0 ट ७ . . . ० ० २ Dom . ० CO० . . . . . . 4 . . . .११.२३३/१४५.६६/७/८/०९/२/१०/११/११/१२ ३७/१४/५१/२८ ४२।१२/२६/३३/१०/४७/२४/१/३८१५९२२९/६/४३२० २१/२२/२३,२४/२५/२६/२७/२८१२९ १०३१/३२/३३/३४/३५/३६/३७३८१३९/४० . ० . . . . .10 . C . . . ० . . . C . २ . C . . 1G . . . . M- (१२/१३ १४ १४/१२१६१६/१७१७/१८/१२/१९४२०२०/२२२२२२२३/२४२४) ધીરે૪/૧૪૮રિલર રૂધિરૂરિન ૭ દિ૨૬૮ ૩૨, ४१४४२४३१४४४५४६/४७/४८१४९/५८५५/२२/२३५४१५६५६/२७/५८/५९/६० . . . ० . . ०० 9 . ० . . . ० રરરર૭ર૭ર૮ર૦રર રરરર રરરરરર રરરરરર f૨૭ર૧ ૮ ૨ વિરૂક २७/४/४१/१८ ९/४६२३/ . शुक्रकेन्द्रपलकोष्ठक. १/२/३।४।५।६।७1८1९.१२।१३/१४/१५/१६५७२८५२९/२० 6 . . . . . . . ३ . 0 01. . . . . ० . . . . क . . . . . . १२ . . . . ४|४|५६६७.८८ ९/२/१०/१०/११/२११२ २२२२२३/२४२५/२६२७२८२९/३०/३११३२/३३३३४/३५/३६/३७३८१३२/४० . . ०. . . . ० . ० . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . . .. . . . . 0 . 0 3. . ... 10 . . . . D . . . . . . .. ०.०० . . . . . ० . . . . . . . . . . . . 6 . . રવીરર૭૨૭૨૮૨૮રરર રરરરરર રરરરરરણ भाषोदाहरणसहितम् । शनिचक्रनिनववोनक्षेपक. ૮રર ७/४५३२१३९५७/२५३३५१९२७/४/३/२१/३९/ ९७ . १ . ० 0 . . . ० ० . शनिशेपलब्धिकोष्टक. ७1८1९०११/१२/१३/१४/१५११६/१७/१८/१९/२०२११२२१२३ ३ ६ . . . . ० 9 . . ० . , ० . . . ० । १ . . ० क . 10 . २४ ६/८/१०/१२/१४१६१८००१२२२४२६/०८/३०/३२/३४३६३८४०४२/४/४६. १ ७ ८1८1८ २३४६.९/३२१५५१०४१/४२७५०१३/३६५६२३४६९३२५५/१८-१/४/२७५० ४/९/१४/१०/२३/२७१३२/३७८१४६५१५५/५९/४/९१४/१८२२/२८/३२/३७८१४६ २४१२५४२६२७/२१२९३३.३३२३३/३४१३५/३६३७४३८१३९४४०४१/०२/४३/०४/५६) . . . २ . . . . ० . . . व 0 . . ० . . १ १ १ १ १ १ १ १ १ १ १७११ ४८.५०/५२१५४/५६५८. २ ८ ६/८/१०/१२/१४/१६/10/२०/२२१२४२६२८३०३२ ९०१०१०१०११११११/१२/१२/१३/१३१३/१४/१४१५११५४१६१६१६१७१८ ५५/१ ४१२७१५४१३६३६ ९/३२०५५/१८४१ .. . . १ १ ८ ... . १ ११.१ १११ २१२२१२२२२ ३४३६३८४०४२१४६१४६८८५०१५२/१६५६५८. २४ ६ १०/१२१४१ १८1१८१९१९/२०१२०००२१२१/२१/२२२२२३/२३/२३/२४ ४२७५०१३.३६.२३१४६९३२५५/१८४१/४/२७५०१३३६ ०२३ ३७१४६५१४१५.५१ ९/१४/१८२३/२८/३२।३०/४१४६५५५/- शनिघटीकोष्ठक. १ २३१४१५६/७१८ ११०१११११२/१३/१४१५१६५७/१८१९२० . . . . . . . ३ . ७ . . २ . . . a ७ ०.० . . ७० . . 0 5 . . . . ३ छ . . . . . . . . . . . . . 0 . . . . ० ००० ००० ०० ० . ... 0 . 1.0 . D ov . . 20 ७ રિઝgs૮૨૦૨૧૮૦ १ ८/२०१६ १ ર૮ર ५ २० केशवीजातकम् ।.. शनिपटीकोष्ठक. ४१४२।४३४४४५/४६४७/४८४२ १०/२१/५२/५३५६ पा९७ . ० . . . . क . . ० . . . 0 . . . . . ० . . १ ११११ રરરરરર રરરરરર રરરરરકિવિ૮િઈ. शनिपलकोष्ठक. ४/५/६/७१८११/१०/११/१२) ४१५ १७) . . . 9 . . . . ० . . 9० ० ० . ०० ००० ० ० ० ० . ० ० ० . ० . 10 . ० ० ० ० ० ० ०००० . . . ० . . . . . . . . . . २४२५२६२७२८१ १ ४३५३६/३७८३९२४० . . . . . . . . ० ० ० ० ० ० . ००० . ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ००० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ० ०० ० ० . . ० . . १ . १ . १ . ४१४२४ ४४४४६४७४८४९ ५२/५३ ५५ ९२ ६० . . ७ . . . 0 . ० ० . ० . . . . . a . १ १ मध्य रवि साधनका उदाहरण, यहां अहर्गण ११७८ आया है. इसको ६० से भाग देनेसे लन्धि १९ शेष ३८ रहा अव शेप कोष्ठकमें अठतीसके नीचे के अंक १७२७११०३० को लब्धि अंक १९ के नीचे राश्यक छोडके यह १८१४३३३५।१५/२५ अंक है. इसके ऊपरका अंक १८ में से पार दिया तो शेप. शून्य रहा दूना किया तो शुन्य रहा यह राश्यक जया. अब भागस्थानमें १३ आया ये ३० से अधिक है इसवास्ते इसमें ३० का भाग दिया तो सन्धि १ यह राशिम युक्त किया तो १३३१३५/१५/२५ यह अंक भया इसमें शेप ३८ कोष्टकका फल युक्त किया तो २।२१।२।२५।५५ यह अंक 1. इसको चक सारणीमें ३३ के नीचेका अंक ९।१९४३७५७ वह जापोदाहरणसहितम् । युक्त किया तो ०३०४०।२३ यह प्रातःकालका मध्यम सूर्म्य, बुध, शुक्र गया. अब इसको इष्टकालका मध्यम करना है. इसवास्ते इष्टवटी ३२ है इसके नीचे घटी सारणीका फल 010131३3 और पल ०३ है, इसका फल पलसारणीका 100101 यह है दोनों फल प्रातःकालके मध्यम यहाँ युक्त किया तो ०१११११११५६ यह मूर्य इष्टकालका मध्यम ग्रह गया । इसी रीतिसे प्रातःकालका इष्टकालका मध्यम सब ग्रह करना. मात कालिफर्यादिमध्यमग्रहाः । चच उ. रा म शुकेश C . ९ १४ २ ១ १० १७२१ २१ १२ १३ / १६ शुकश . तात्कालिकमध्यमग्रहा। स च चिउरा म बुक वृ ट ५ ७ ५ २८ २१ ७ ११/२८ ७ ५६/२१४ २४ ३ 1१०८३५/ ४१ ११।२६ २५ ४२] ३९ ८ ३७ २ . . . श्लोकः-जगदीशेन रचिते केशवीगन्याटिप्पणे । मध्याधिकारः पूर्णोऽयं तद्रापार्थप्रकाशकः ॥ स्पधाधिकारः। "मंदोच्चं अहवर्जितं निगदित केन्द्रं तदाख्यं बुधैः। केन्द्रे स्यात्स्वमृणं फलं कियतलाये" इति ॥ "दोखिमोनं त्रिभोद्धं विशेष्यं रसैश्चकतोऽकाधिकः स्यानु जोनं विभं कोटिरेकैकं विनिमः स्यात्पदं मूर्यमंदो- चमाइयाशा भवेत् ॥

केशवीजातकम् । सूर्यकी स्पष्टगति । केन्द्र जभागकोष्ठकके नीचे गतिफल लिखा है. यह केन्द्र कादि ६ राशि तक होय तो धन इसवास्ते रविकी जो मध्यमगति उसमें युक्त करना और केन्द्र मकरादिक द राशितक हो तो ऋण जानना इस वास्ते मध्यमगति कम करना तो सूर्यकी स्पष्टगति होती है. दिनमान-रात्रिमान साधन । जब सायनग्रह मेपादि६ राशिमें होय तब उत्तर गोलमें जानना और सायनग्रह तुलादि ६ राशिमें होय तब दक्षिण गोलमें जानना. जो चर आया होय उसको पल जानक उत्तर गोलमें होय तो १५ घडीमें युक्त करना और दक्षिण गोलमें कम करना तो दिनाई होता है. उस दिनार्द्धको ३० में कम करना तो राज्य होता है अनंतर दिनाई और राज्यईको दूना करना तो दिनमान और रात्रिमान होता है. सूटपस्पष्टसारणीः १२३४ ७1८ १२ ३|१४|१५ 1१७भ भा . . ७ . . . 5 . . . . . . . . . ० . . Bl2|হাহাহাহাহা . . . . . . . . . ४०४२४६४७४९/५१५३५५/२७ |७९११/१३१५ फ. ४२/२४/३/११/१७२३२८/३२३५/३६३७३६३५३२२८२२१५७ (२३३२/३२२१२१/३३३१/१२/२/२ २] २१२/२ १९२८११] । ६ १५/१५/१०/१०/११/२०२० १/१/१/११/१/१०/१५/६ है. २ २/२/११/१/११/१/११/११/११/११ ग. २९२८५७/५६२५/२४/५३२२५२२०४८४७४६२२ फ. 3 २ १ .

भापोदाहरणसहितम् । सूर्यस्पष्टसारणी. ३६३७३८३०४०४१४२४३४४५४५४६४७४४८४२/५०/५११५२/५३ मु.भा (२६/१८२०१२२२४२५२७२९/३०३२३४/३५,३७,३८४०४१/४२/२४ फ. २८१४७३५२१६५२,३११२५१ ३३७९३९८३१५९/२२) ३७७१७१७ गु. ६ ५ १ Hands - . .' PM h० . . . ४५४७२८/०९/२०/२२५३/५४/२२/५६/५७/५८/५९/०१/२ ४९.२/२२/३६४१/१/१०/२८ २६/३१२७२३/१८/११/१/४९/३५/ १९३१ ४/५/६/६/७७/१११११/१/१२/११/९ २०३/४/३/५/६/६/१०/१०/१/१/१२/१२/२०१६/५१४४ ग. १६३१५/१३/११/९/७/६/४/२/०५८/५६/५४/५२/५०/४८/४६/४१) फ. ७२/७३/७४/७५/७६/७७/७८७९/८०८१/८२/८३/८४८९८६९८७/८८८९ २/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२/२ ४१५/५/६६७७/८/८/९/९/९/१०/१०१०/१०/१०/२०१० फ १२/०४०१६/५०२२/२२२०४५/८/२८४६१ १६/२५/३४४०४३४५ भु.भा. ११/०गु. ५/५/१५/०२/१०/१०/३ . D . . . . . . . ग ४२४०३८/३५/३३।३११२८) २१/२२१९६१ ५२०फ स्पष्ट सूर्य साधनका उदाहरण । यह सम्यका मंदोच्च २।१८। इसमें मध्यम सूर्य ००३१३१॥ ५६ कम किया तो २।६।४८१४ यहशेप रहा इसका नाम केन्द्र है अयोइसका भुज २।६।४८१४ तो यही रहा अंश किया तो ६६१४८४ यह भया इस बास्ते यहां सूर्यस्पटसारणी कोठक ६६ के नीचेका अंक ११५९/२३ और इसका गुण १ से ४८ को गुणा तो ५२८ पल ४ को गुणा तो ४४ इसमें ६० का नाग दिया तो लब्धि हुई अब गुणके नीचे हर ३२ से ५२८ में

२८
केशवीजातकम् ।
नीचे जो गुण लिखा है उससे गुण करके ६० से भाग दे जो फल आबे
सो विकलात्मक वह लिया जो गति फैल उसमें कम करके वह गति फल
सूर्यके ऐसा केन्द्र परसे ' चंदके मध्यम गतिमें धन होय तो धन
करना, किंवा ऋण होय तो ऋण करना तो चंद्रकी स्पष्टगति होती है.
-
चन्द्रस्पष्टसारणी.
८५
१११२११३/१४११५/१६११
२०/२१/२२/.भा।
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भाषोदाहरणसहितम् । चन्द्रस्पष्टसारणी. .01011७२/७३/७४/७५/७६/७७७८७९/८०८११८२१८३८८५८६८४८८५८९,९०९भु.मा ४ ४ ४४४ ४४ ४ ४ 1० . फ. ३०५५/१५/२१/३७४०० गु. . |४|३|५/२/५/३/४/६/०५/०५/२/१२/३/४/१५ २४२३२२ १९१७/१६ १४/१३/१२/११८७६५३१२११ १७११ ११५४४ १५५५२४१२८२ १४६/३१११७/० ૨૨Jgl/pole ६९/७० Je૨૭૨eleslee૭ ૦ ग फ . -- स्पष्टचंद्र साधनेका उदाहरण. चंद्रोच्च ९४२८४४ इसमें त्रिफलचंद्र ९।३।१५।३८ कम करके बाकी ०७२४१४६०६ यह केन्द्र इसका भुजभाग किया तो २४। ५६।०६ इसवास्ते यहां सारणीकोष्ठक २४ इसके नीचे अंशादिफल २।२। ५० इसको गुण हरफल २१९ विकला युक्त किया तो २।६।२९ यह । चंद्रफल भया, यह केन्द्र मेषका है इसवास्ते फल धन भया त्रिफलचंद्र ९ ३१५॥३८ में मुक्ता किया तो ९।५।२२।७ यह स्पष्टचंद्र भया अब यहां केन्द्रजभाग कोष्ठक २४ का गतिफलकलादि ५९।१६ है इसमें गतिफलके नीचेका गुण ३१ इससे भुजज्ञागके नीचेकी कला ४६।०६ विकलाको गुणके यह १४२६।१८६ भया इसको ६० से भाग दिया तो फल २४ यह विकलामें कम किया वाकी ५८१५२ यह केन्द्र मेपका है इसवास्ते मध्य- 'मगति ७९०/३५ में कम किया तो ७३३१४३ यह स्पष्ट चन्द्रगति गई। मंगल बुध गुरु शुक्र शनि स्पष्टसारिणी प्रवेश मध्यमसूर्यमें मध्यम ग्रह भौम, गुरु शनि कम करना तो भौम राम शनि इसका प्रथम शीधकेन्द्र होता है मध्य बुध और शुक्र इन दोनोंका शीयोच्च पूर्वमें मध्यम ग्रहके साथही बनाना लिखा है उसी शीघोच्चमें वटानेमे शीर- केन्द्र होता है अब अभीट ग्रहका केन्द्र ६ राशिसे अधिक होय नो १२ में कम करना, अनंतर ६ से अल्प जो केन्द्र उसका करना, जो अंग भावे सो आगे लिखा शीघ्र फलमहसारिणीका अंशकाटेक देवार होना ३०. केशवीजातकम् । अनंतर अनीष्टकोष्टकके नीचेका अंशादि फल लेना, अनंतर अंशफलके नीचे ६० कला विकलाकोष्ठक लिखा है उससे अंशके नीचे जो कला विकला होय तत्परिमित कोष्टकके नीचेका कलाका फल क्लादि वैसा विकलासे विकलादि एकत्र करके धन किंवा क्ण सारिणीमें लिखा है उसके प्रमाण लिया जो अंशफल युक्त करना किंवा कम करना तो ग्रहोंका प्रथम शीवफल होता है. शीग्रफलका अर्थ करके केन्द्रके प्रमाण मध्यमग्रहमें युक्त करना किंवा कम करना तो दल संस्कृत ग्रह होता है. भौमादिग्रहोंका राश्यादि मंदोच्च नीमका ४ बुधका ७ गुरुका ६ शुक्रका शनिका ८ अब अभीष्ट ग्रहका मंदोच लेकरके दल .मस्रुत ग्रहमें कम करना तो मन्दकेन्द्र होता है. वह केन्द्रका पूर्वोक्त ति करके भुज करना. भुजका भाग करना जो अंश आवे सो आगे लिखा मंदफ़लसारिणीका अंशकोष्ठक तयार है अनंतर अभीष्ट कोष्ठकके नीचेका अंशादि फल लेना. अनंतर फलके नीचे ६० कला विकला कोष्ठक लिखे हैं उसमेंसे अंशके नीचे जो कलाविकला होय तत्अमित कलाका कलादि और विक्लाका विक- लादि फलको एकत्र कारके उमको पूर्वफलमें युक्त करना तो उन ग्रहोंका मन्दफल होता है ऋण धन मन्दकेन्द्रपरसे जानिके उस फलको मध्यम ग्रहोंमें धन वा क्ण करना तो मंदस्पष्ट ग्रह होगा और उसी मन्दफलको प्रथम- शीयफलकेन्द्रमें विलोम अर्थात् धन होय तो ऋण और ऋण होय तो धन करना तो द्वितीय शीघ्रकेन्द्र होता है उस शीघकेन्द्रपरसे प्रथमशीघ्र- फलके रीतिसे फल आनिकर मन्दस्पष्टमें ऋण धन करना तो वह स्पष्ट होता है । यही रीति भौमादिकोंकी है ॥ मंगल शुक्रका विशेष । "शुकारोश्चलभवोन्त्यगतोयदाङ्का० इति ॥" टीका-जब भौम और शुक्रका अंतिम शीघ्रकेन्द्रको पझाल्पकारके भाषोदाहरणसहितम् । अंश करते हैं तो वह अंश यदि १६५ से १८० तक होय तो संस्कार ' करनेकी पृथक् पृथक् सारिणी लिखी, है उसका नाम अन्त्यांकालसारिणी है. उसमेंसे शीच फलके सदृश फल ले आना और उस फलको केन्द्र के वश करिके ऋण धन करना तो स्पष्ट शुक्र और भौम ठीक होते हैं । भौमादिग्रहोंफी गति स्पष्ट करनेका प्रकार । मन्दफलसारिणी में दहनी तरफ गतिफल लिखा है पन्द्रह २ कोष्ठका, उसको कर्कादि मकरादि केन्द्र वश कर धन ऋण जानना और शीघसारिणीमें दहिनी तरफ १५ कोष्ठका गतिफल धन वाचण लिखा है उन दोनों गति- फलोंको एकत्र करना अर्थात् दोनों धन होय वा ऋण होय तो योग करना और एक धन एक ऋण होय तो अन्तर करना तो उस फलके सदृश ग्रह- गति स्पष्ट होती है। जब योग वा अन्तर ऋण बचै तो वक्रगति जानना यह स्पष्टगतिको मध्यमगतिका कारण लगता नहीं। " भौमबुधशुकफी गतिमें विशेप । भौम बुध शुक्रका पड्काल्प अंतिम शीवकेन्द्रका अंश १६५ से १८.. तक अंश आवे तो यह संस्कार करनेके वास्ते वह ग्रहोंका शीफलसारणीके अंत्यमें पृथक् अंत्यांक गतिफलसारणी लिखी है अनंतर इस सारणीमें जो अभीष्ट अंश आये तत्परिमित कोठकके नीचेका कलादि ऋणफल लिखा है वह लेकरके अंशफलके नीचे ६० कोटक लिखा है उसमें से अंशके नीचे जो कला विकला होय तत्तत्सरिमित कोष्टकके नीचेका कलाका वहीं कलादि फल विकलाका विकलादि फल एकत्र करके वह सर्वकाल ऋण है इसवास्ते लिया जो अंशफल उसमें युक्त करना तो शीघ्रगतिफल तैयार होता है.अनंतर यह पलका पहिले प्रमाण मंदसष्ट गति फलको संस्कार करना तो भौम बुध भृगु इनकी स्पष्टगति होती है.

३२ केशवीजातकम् । प्रथमशीघ्रकेन्द्रम् । आशुफलमौमादीनाम् । बु. वृ. शु. . म. ६ WGGION २८ १३ । २४ ४२ । ३२ म. ब. | वृ. शु. २८१७ २२ | २२ ५६ ५३ | ४२ ८ १ फ. फ . ७ ३२ । १९ आशुफलार्द्धम् । आशुफलार्द्धसंस्कृता भौमादयः। २. श. ग्र. म. बु. शु शु. २.न. l० मं. | बु. वृ. ३ ४१ । ११ २६ । २४ स 64 WAM T २०१४ ६ ९ २७ । ३६ ३३ mom मन्दकेन्द्रम् । मन्दफलन् । ग्र. म म. बु. ६ २१ । २७ । २० यु. १ पृ.शु. श. १ ७ ५ १ . १४|१८| ३९ . ४६ ५० . . ०० मन्दस्पष्टमौमादि। दिशीघ्रकेन्द्रम् । दि० शीघ्रफलम् । बु.न.शु.श. १४.९.१४/१२/१०/ १२१२/१२७/ न. म.बु..शु. श.प्र. ...श. ६ ३३१७/५/४५५ २६.९२६/१२२२ ५४/५/५२५२२४॥ • ६०२२/१२/ ४६२५/२६१३४ १८८०/३०२ प.पि. घि प.

(३३) स्पष्टयह भीमशीघफलसारिणी. सका.)२ ३ ४५)६७८१९१०५११२/१३/१४) ग.ध. . ३ . . ०२३/४६२/३२/५३/११/१२/२८/२२२६३८१२४४३ ०४१२२४३६/१८/१२/२५/३६80-२२२४३६४८ कर १२ ४५१६७/८/९/२०१५२११२/१३/१४ १५ ३३३ घ -२३/४०/९/३३/२०१८४२५/०२/२०११म१३४ १६/१०/२०११२२२२२२२२२६२०२०/२२३३१/३२ ६ १२३४/०७/२/४४७३०२३/१७/४ २६४२३६५९) २२ ३३३१/३५/३६/३७३८/३९/४४२२४३१२४४६४७४० ४२ .. . '. , : . . C १९ (300१२१२२२२००२३ ४३६२८२३/780 २२१४९/१० अंको १६/१६१५/२८/१२२00/२०००३२४२५०६/०७/०८/२९ गध. ८.८८९ फ०४८ ३८/२८/०४६९३३२१४७३४१८४३ ०३६/२०४८२४३६१२५४२४०३६/2012८०४ १४ क० १ ३२ ३ ध० ૩૬૮૩ ૭ = ૧૪ १६/१७/१८ 10000100103/२04/२६०७०८/२९३३१ ६६.७७७.८ ८1९९ ९.९/२/१०११/१२/११/२०१२ २८) ३०२/२६५०३३७१२४/१८/१२/ ३५ ३३ ३४३५/३६३७३८३९/०२/४३४६४४९ १२ ११३/१३/१४ १६१६ १७२८/१८१८ १९ ५८२२४६९ ७३२.२०१८५२०२०१६ ५० २१/२२ १९२०२० २ ३२ 3 છે. n) tઇ ૧૭ જરા 18 v U V - : - ૨ ર૬૭ર/Jes ૩૮ I, to us d) P . uu » જ 3. c) : 0 - s G આ ક.છ. o s : ૭/૨૮૩ lurly , * કરી ૧૦ t N ( શૈક છે मोमीप्रफलमारिणी. E - પ n wો * તે 1 છે. સ 6 છિદ્દ કરવ૮૦ રરરર રર૮૧ ૩૨ 3 | 5 AL n ૯ ] 3 M) S * 5 a u : - + a w uો છે 1) * . છે. ht in m: s G છે ? : *** i = == ૦૨૬૧-૨૬૬૨૬ છે 0 લ S 6 to ' . c ૧ ) ' !૧] છે le l . * cy - - રામ ls * T છે ! il table , up છે. » » કા 0 R પ : જ છે 18 . ૧૮ ૬૦ ! કે r ook છે. 3 - ( ૩) भौमशीघफलसारिणी. - ૮૮૬૬ ૩૦) ૩૨૨૨૩૨૨૧૩૩૨.૨ ૨૦૧૬ ૨૮ વલ ૨ | ૯૬ ૭ ૮ ૬-૨૨૨૩૨૦ ૯ . ૨૮૧ ૨ ૩ છે છે છે. es ૨) ૨૨) ૪/૨૪૪ ૧૯૪૬ ૨૬ ૭ ૭ ૨૮૨૮૮૨૧૬૨૨ ૩૦૪૧૧૪૩૧૧૪ ૩૨ વિરૂદરર૮ર૧ર૦૧ર૪ર૬૮ ૬ ૧૧ ૧૨ ૧૧૩ ૧૧ १२/१४/१५/१२/१५/१६, १६ ૨૩ ૩% ૨૬૬૭૩૭૧૮૧૮૮૬)- 9 ર૩ર૬૭૧૮૬૦ ૨૭૨૭૮૧૮૧૮૨૧૬૨૨) ૨૦ ૧ ૧ ૨૪ Rીટર સંક૭૭૭૮૧૭૨૮૦/૧ર૮૩૮૪૮૮૬૬૭૮૮૧૯૬ ૭૮ ૨૦૦૩ ડોર કાર ૨૦૨૨ ૨૧રઃ 1 ee S રિટરઃ રિ૬ર૪૨ ૩૬ ર૮રર # ૨૮ ૩ { { દ{ ૭ ૮ ૧૬ ૨૧ ૨૨ ૨૬ hક છે ક . ૫૦ ૦ હલધરાર ઇરિટ ૧૮ ૬ ૨૭૨૮૨૨૧૨૨૨૩૨, ૨૧રિદ હર૮ર૧૦ ૧ ૩૨ દ કે ૭૮ ૮ ક ક છે રિટ રદ્ધા 보이브의 ' ૨- દ ર !

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(9) કાનિવારHIT .િજી. “I was votivavhvi૪૪+૪+૪૧૪૮૪/ન.. ૧ To ગરવીરથ કી જીરૂ ૦ ડિરરરર૮૧૬૨૪૬૮ ૦ ૧૨ રાશિ ૦ ૧ ૨ ૩ ૪ ૬ ૭૮] ૧/૧૦/૧૧/૨૦૧૪ ૦] ૨] ૧ ૧||૨૨૪૬ર૮ર૪૮ ૧૮૨ ૭ ૧૯૨૩૨૧૮૧૨/૨૨૨૩૨૪૨૨૭૨૮૨૨ છે e . o છે છે s o o વ જી ૦, રાજ e ૦ ૧૨/૧૭ ૨૬૩૬૩૬૪૧ ૨૬૧ ૨ રિરરરરર રરરરરર રજિક ૧/૨/૧] ૨ ૨૪-ર૩ર૮રરર૮૧૮ર રા ૨૩૨ વિષ૮૨૦૧૩૭૮૨ ૬૦ | | 2 ५११००१ ૨૨૨૩૩૮ રૂ િg૮ શાશઘાળિો. મે ક્ર. ૧૨/PIN/" </lJદરર || 1.3 ૨૨ ૨૨ ૨૨૨/૧૨/૨/૨/૨૨. ૨ ૮િર૬ર૦ર૮૨) ૬ Re {e) છે. ક s ર છે. 2. ૧ E ૪૦ २०३४/५/६/७/८/९/२०११/१२/१३/१४/ છે. ક છે. છે. છે. A ક [૬ ૮િ૨૪ર૬ર૮e | ૨૨૨૧૮૨ ૨૦૧૭૧૮૬૨ ૨૨૨૩૨૪ર૬રર૭ર૮ર૧ ૩૦ ૨T ૨/૨ બ્રિજ ૩૨)રરરર રરરરરર રરરર૪૪૪ હ ૨૬૮ ૨૪૨૨૬૮૪ ૦ ૨૨૨૮૬૦ છોકર૬/૧૦૨કરીeઠ્ઠ૭૧૮૬૨ છે રિદિ૨ - ૬Jt૮ ર ફરીદદ (७७) शनिशीघ्रफलसारिणी. सं.को.१३/११/१६/१७०/301/ 11/ETV Prera १११ फ०४८४०३३२२६/११/१२/४५७/५०४३३६२८२१/१४ ०४८३६२४/१२/०१४८३६२४/१२/०१४८३६२४/१२, १२ क० ०१२३४५६७८९/१०/११/१२/२३/१४) क . क . . . . . . . P ७/२४२२ ३६४३ १२/१९/२६ १५.१६१७१८१९ २२/२२३,२४२५/२६२५ ।१।१२१२१२१२ २१२२ ४८ १७२४३२३८०६५ ७ . . • . . , . s/ १ . . . . . . . 1५1५1५/६६.६६६/६/61६१६७ २४॥३१॥३८४६५३० ७१४/२२२३६४३१५०९८५ १२ शनिमंदफरसारिणी. मं.को... २१३१/५/६/७/८/९/१०/११/१२/१३/१४.फ. . ૭૧૨૨૨૦૮૩ .३६१२४८ .३६ ४८/२४०३६/१२/४०/२५ क० ८/९/१०/१२/१२/१३/१४.. .१११११११२१ घ રે ર ૮૩ ૧૮ ૨૪૨૨૩૧૩૪૬ १५.१२.१७१८/१९/२०१२२२२/२३२२२२६/२७२८२९ १२.२२ २२ ९.१७२२/३२/४०४७ 11०/१०/२११३३४० ૨૦ રરરરરરર૬૭રર૧૪૦૪૨ કરૂણ ४४४४ . . . . ० . . . . . ५८ 4 'હિર| | શરીરગુરોદિ૦િ૨૦૧૬ શરતું (૭૮) शनिमंइफलसारिणी. भको एवारवारवाद१९२०२१२२३२४२वा२६२७२८२९,ग.फ. ૧) ૨૨૨ ૨ ૨ ૧૨] ૨] ૨) રૂ| ૨) ૨ ૩ ૩ ૨૦૧૮૨૨૨ ૧૧૬૮૨૨૪૩૨૨ ર૪૪૮૨૨ ૦ ૪૮૬ ૦ ૨૨૬૮૨૨૩૬ ૧૭ ૧૧ ૨ ૧ ૬ ૭ ૮૬/૧/૧૨/૧૪ e ૦ e . e e. છે. e ૦. ય G 5 To ૮/૧રવાર દર૮િ ૭૨૪ર૪ર૪૨૧૮ ૧૯૨૬૭૧૮રરરરરરર રરરરર૮૩૬ ૨૧] ૨] ૨૧/૧ ૬િ૧૪૨૩૩૨૦૬૮ ૧૨૩૨૩૦૮૪૭ ર૦રૂરરરરરરકારીe દાદર ક . e ---- ૮ હીદ ૦ ૨૨૨૦૨૬૩૭ ૨૨૮રક્ષણ દાદર-૨) ૦ર૧દ્દારીથી ઉ | ૬ ૭/૭[૮] ૨૮૩છ૩ ૮૭રલીઝ २४ शनिमंदफलसारिणी. બ: રરરર રરરરરરjકાર રૂ|. ૧ #{T૪] ] છે ૮૧૬ છટકી ૪૧૨૨૦૨૮૪૪૨ 영 છે. છે છે છે. ૦ 6. ૦ o e 6 0 9. o છે. ૦ ૧ ૨ ૩ ૪|૧|૧|૭૮) ૧૨૦/૧૨/૧૨/૧૪ છે o o oI છે ૮૧૬૨૪૨૪૮૬ ૪/ ૧૦૨૦૧૩ee ૧૬૭૧૮૨૭૨૨૨૨૩રરર૬૭૨૮૨૨ ૨૨ ૨૨૨૩૨૨૨૨ ૨૩/૨/૨/૨ 3ી| २०३६१४५२ રરરરરર રરરરરર રર કરાઇ ૦ છે. છે c ८१६२४३२/४०/१८५६४१२२० ષષિsઇટ ૨૦૧૧૧િ૨ २७५८/५९६० પિરાઇટી રિરરર ?

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भापोदाहरणसहितम् । (८) मर्थ किया तो १४।४।०० अब केन्द्र तुलाका है इस पारते ऋण यह मध्यममोग ५।२२।०७।२४ इसमें अई कम किया तो ५२४ यह दल संस्कृत भौम भया इसी रीतिसे अन्य यही करना केन्द्रादिसहित ३२ के पत्र लिखदिये है. भीमादिमंदोरम् । म. " ४ ७ ६ ८ 0 . . . क . . a . . . भौममंदफल. शोममंदोच राशि ४101010 इसमेंस दलसंस्कृत भौम ५।८।३।२६. कम किया तो याकी १०१२११५६।३६ यह भौमा मंदकेन्द्र मया इसका भुज १८२२४ इसके अंश ३८।३।२४ ह. इस वास्ते यहाँ मौनम- दफल सारिणी कोष्ठक ३८ के नाचेका अंक ७।११।३६ है अब अंशक नीचे कला ३ है इस वास्ते क्सविकला कोष्ठकके ३ के नीचेका फल कलारि ०३४ अब अंश कलाके नीचे विकला २४ है इसपास्ते २४ कलापिकला काधक के नीचेका फल विक्लादि ४।२९ एकत्र करके पूर्वफल्में बुरू किया तो यह ७ । १२ । १४ शौमका मंदफल नपा यह मंदकेन्द्र तुला- दिक है इसवास्ते ऋण, यह मध्यम भौम ५।०२।७।२४ में का किया तो ५१४५५/१० यह मंदरपद काम मया इसी रीतिते बुधादित यह करना भव यही मंदफल १४ विगत कहिये धन इसका प्रथम शीघ्रपन्द्र ६।१९।४।३२ में पत्र दिया को ६।२६।१६।४६ पढ़ भौमका अंतिम शीघान्द्र भया। अंतिम प्रकल, यह केन्द्र पडधिक है दावा ते १२ में पानत किया ५।३।४।१४ यह हुआ अब इसके अंश १५३१४३ इति सीमालवारि P ६ (८२) केशवीजातकम् । शोष्ठ १५३ का नाचेका अंशादि फल ३४।२५।१२ यह अब अंबके नीचे कला ४३ है इसवारते ४३ कलाविकला कोष्ठक के नीचेका फल फलादि ३४१७ यह अंश कलाके नीचे विकला १४ है इसवास्ते १४ कला विकला कोठकमेंका विकलादि फल ११ । ६ यह सब फल कणसारिणीमें लिखा है इसपास्ते प्रथम जो फल ३४॥२५॥१२ इसमें कम किया तो ३३ ५०५४४५४ यह अंतिम शीघ्रफल भया यह केन्द्र तुलाशाह इसवास्ते अग, मंदसष्ट नौम ५।१४।१५।१० में कम किया तो ४११६४१६ यह सष्ट मोम नगा जब नौमशुकके अंतिमशीय केन्द्रका अंश १६५ से १८० तक आप तो उसका शीवफल लेनेके खातिर और उदाहरण कहते हैं, मंगलका अंतिम शीवकेन्द्रका अंश ३७०।२०।२२ कल्पना करके अब मालवीय केन्द्रसारिणीमें अंत्यांक सारिणीमें १७० अंशके नीचे अंशादिफत 1101 यह मब अंशके नीचे कला २० इसका फल १०० और कलाके नीचे विकला २२ का ४।०१० फल एकत्र करके ४।४ नया इसको पूर्व, लापा जो फल है सो सारिणीमें धन लिखा है इसवास्ते कला विकला फल चुत करके ११४।४ यह फल केन्द्रले वासे मण धन ग्रहमें करना। गत्युदाहरणम्. औपका अंतिम शीघकेन्द्रका अंश १५३ या है इस वास्ते १५३ कोष्ठका गतिफल ७ । ३८ कलादि धन यह और मंदफलसारिणी कोहर ३८.का गतिफल ५।२६ दलादि यह मंदकेन्द्र मकरादिक है इसवास्ते भाग वो पूर्व गति फलमें घटाया तो बानी २।२ यह धन फल आया यही मंगलकी स्पृष्टगलि भई यह कारके सारिणीपरसे स्पष्ट बुध, गुरु, शुक, शनि इनकी सप्टगावि बनाना, राहु जो मध्यम है वही सर्वदा स्पष्ट समझना, उसमें.६ राशि युक्त करता तो केतु होता है। भोमादिकोंका द्विताय शीघ्रकेन्द्रांशपरसे अस्तादि जाननेका प्रकार। "त्रिनृपः शरजिष्णुभिः शरानंगभूपैत्रिभोः क्रमाकुनायाः । चलकेन्द्रवः प्रयाति वक्र भगणात्तः पतितजति मार्गम् ।। . -- जापोदाहरणसहितम् । (८३) क्षितिजोऽष्टयमेरुदेति पूर्वे गुरुरिन्द्रे रविजस्तु सप्तचन्द्रः ।.. स्वस्खोदयभागविहीनभंगणांशेरैपस्त्र यांति चास्तम् ॥ खशरैश्च निनः परेज्ञभृग्वोरुदयोस्तोऽक्षदिन गाद्रिभूमिः । उदयोक्षनखेल्यहीन्दुभिः प्रागस्तो दिग्दहुनेश्च षट्सुरैः स्यात्॥ टीका:-अंतिम शीघ केन्द्र के अंश भागसे भौमका १६३, बुधका १४५, गुरुका १२५, शुक्रका १६७, शनिका ११३ इतने अंश होय तो कमसे वकी ग्रह होते हैं. और कमसे भौम १९७, बुध २१५, गुरु २३५, शुक १९३, शनि २४७ इतने अंतिम शीय केन्द्रकै अंश होय तो क्रमसे वह ग्रह मार्गी होते हैं। अंतिम शीघकेन्द्र के अंश क्रमसे भौमका २८ शुरुका ११ और शनिका १७ होय तो कमसे इनका उदय पूर्वमें होता है. और अंतिम शोधकेन्द्र के अंद अनुक्रमो ३३२॥३४६।३४३ इतने होंय तो भौम गुरु शनि इनका भात पश्चिममें होता है और अंतिम शीघकेन्द्रके अंश वुधका ५० शुक्रका २४ यह होय तो बुधशुक्रका पश्चिममें उदय होता है और अंतिम शीशोदके अंत कमसे १५५।१७७ यह होय तो बुध शुक्रका अस्त पश्चिममें होताहै. और अंतिम शीमनेन्द्रक अंश क्रमसे २०५। १८३ यह होय नो वुर शुक्का पूर्वमें उदय होताहे और अंतिम शीघ्रकेन्द्र के अंश क्रमले ३१० १३२६ यह होय तो बुध शुक्रका पूर्वमें अस्त होताहै. : "पकोदयादिगदितांशकतोऽपिकाल्पाः केन्द्रांशकाः सितिसुत्तादि- गुणास्त्रिभक्ताः ॥ सांकांशका दशहतांगडताः कुभक्का बकायमा, तदिवसः क्रमतो गतष्यम् ॥" टीका:-यहाँका पक, उदय, मस्त मार्ग इन्होंके जो अंतन शीबकेंद्रांग है वह ठक्त शीवकेंद्रांश और अनीटशीवकेन्दांश इनानंतर करके अंतरांश क्रमसे भौमका दूना करना बुरको ३ से जान देना, एको १० से गुण भाग देना शुक्रको २० से एमके ६ से मानदेना और शनिको १ ते १ भाग देना तो जागाकार जो आवै सो वह लि भया, अनंतर उक्त शांघान्द्र +4 (८१) देशवीजातकम्। माशीयवेन्द्रोश अपिक होय नो वक्र उदय अस्त और मार्म यह होपके उतने दिन नये ऐसा जानना और जो उत्तशोधकेन्द्र से अमीट केन्द्रांश कमी होय तो वक, उदय, अस्त और मार्म यह होनेका इतने दिन आगे होगा ऐसा समझना. . खगाः स्पष्टाः सजवाः। च। म । बु || शुशि | रा प रोदयपल २७८ मी १३ . २६ २१ क ११।२१ २० ८३ १३ २१ २१ २२ ३७ ४ ८ . ८३ ३ नि ३९३1 म ५ । ३२३ प १ २७८ । ३ ४ ३९ . ६४ ३८ ११ . " लम बमानेके लिये लंकोदयसे स्वदेशोदय लानेकी रीति । लोदया नागतुरगदला २७८ गोङ्काश्विनो २९९ रामरदा ३२३ विनाड्यः ॥ क्रमोत्क्रमस्थाश्वर. खण्डकः स्वः क्रमोत्क्रमस्थाश्च विहीनयुक्ताः ॥ लंकाम मेपराशिका उदय २७८ पल, वृपाराशिका उदय २९९ पल, मिथुनराशिका उदय ३२३ पल, कर्कराशिका उदय ३२३ पट, सिंहराशिका उदय २९९ पल, कन्याराशिका उदय २७८ पल रहताह और लंका तुला- राशिसे मीनराशितक उदयके पल कन्याराशिसे उत्स्या मेपरशितक लिसा है सो जानना जिस देशका उदर करना होय उस देशका चरखंडा ले के क्रम भेप वृप मिथुनका पलात्मक जो उदय उसमें कम करना और वही चरखंडा उलटा कर्क सिंह कन्या इनका जो पलात्मक उदय उममें युक्त करना तो स्वदे- शुका उदय मेषसे कन्यातक होता है. और यही उदय उलटा तुलासे मीन- तक होता है। स्वदेशोदय बनानेका उदाहरण कहते हैं, मेपका पलात्मक उदय २७८ इसमें प्रथम चरखण्ड ७० यह कम किया २०८ मी. जापोदाहरणसहितम् । (८५) तो २०८ यह पलात्मक स्वदेशका मेपका उदय, वृपजका पलात्मक उदय २९९ इसमें द्वितीय चरखंड ५६ यह कम किया तो २४३ यह स्वदेशका वृपका उदय, मिथुनका उदय ३२३ इसमें तृतीय चरखंड २३ यह कम किया तो ३०. यह मिथुनका स्वदेशी उदय, कर्कका उदय ३२३ सिंहका उदय २९९ कन्याका उदय २७८ इन सबमें क्रमसे २३१५६ १७० यह युक्त किया तो कमसे कर्कका २४६ सिंहका ३५५ कन्याका ३४८ यह पलात्मक स्वदेशका लमजया अब यह उलटो रीतिसे तुलाका ३४८ वृश्चि- फका ३५५ धनका ३४६ मकरका ३०० कुंमका २४३ मीनका २०८ यह पलात्मक स्वदेशका उदय गया। स्वदेशादय. लम बनानेका प्रकार। तात्कालार्कः सायनः स्वोदयना भोग्यांशाः सिं. ३५२ . ख-युद्धृता भोग्यकालः ॥ एवं यातांभिवेद्यात- कं. १३४८ | तु. । कालो भोग्यः शोध्योऽभीष्टनाडीपलेभ्यः । "तदनुजहीहि ग्रहोदयांश्च शेपं गगनगुणनमशुद्धहल्लवाद्यम् । सहितमजादिरहरशुद्धपूर्वर्भवति विलयमदोऽयनांशहीनम् ।। भोग्यताल्पेटकालासरामाहतात्स्वोदयाताशयुग्मास्करः। स्यात्तनुः निशि तु सपइभाकात्स्वात्तनारिष्टकाले ॥ जिस कालका लग करना होय उस कालका सष्ट सूर्य करके उसमें अब- वांश युक्त करना जो अंक आवै उसमेंसे राशिका त्याग करके जो अंशा- दिक फल रहे सो भुक्त होता है और जो भुक्त है सो ३० अशमें कम करनेसे अंशादि भोग्यफल होताहै अनन्तर पूर्वमें जिस राशिका त्याग किया है उनमें १ युक्त करके तत्परिमित राशिके उदयसे तुक्त और भोग्य . म. क. १३४६ (८६) केशवीजातकम् । गुण देना जो गुणाकार आप उसको ३० से नाग देना जो भागाकार भाई सो कमसे भुनकाल और भोग्यकालका पल होता है अव अमीट घटिक जो होय उत्तका पल करके उसमें भोग्यकालका पल कम करना जो शेप उसमेंसे जिस उदयसे गुणन किया होय उसके भागेके जितने पलात्म उदय कम होय उतने कग करना और जो पलात्मक शेप रहै उसको ३० गुणके जो गुणाकार आवै उसको जो उदय कम न मया हो उदय भाग देके फल अंशादि आवेगा उसमें मेष राशिसे जितनी राशिका उदय का भया होय उतनी राशि युक्त करना जो फल आवे उसमें अयनांशा कमत करना तो अभीष्टकालका राश्यादि लाम होता है। भुक्तकालसे सम करना होय तो अनीटकाल रखते वक्त जो घडी पल होय उसको ६० में घटायकर जो शेष रहे उसको अनार रखना। मुक्त घटायकर जव लम घटावै उस वक्त उलटा लग्न घटावे जै मेपके उदयसे गुणे वो मीन कुमादिक कमवी करै और सब किया भोग्य वन करे। रात्रिका लग्न करना होय तो स्पष्ट सूर्यमें ६ राशि युक्त करना अनं तर पूर्व रीति प्रमाण सम बनावना परतु अभीष्टकाल रखते वक्त जो इ. काल हो उसमें दिनमान कम करके जो शेप रहै सोअनीट रखना। जन्मकाल सूर्योदयसे ३२ घटिका : पल पर है वसी वक्तका स! साधन करते तात्कालिक स्पष्ट सूर्य ००।१३।१०।२ । इसमें अय नांशा २२॥४४।०३ यह युक्त करके ११५।५४।४५ यह सायन सूर्य भय इसकी राशि त्याग करके ५॥५४॥४५॥ यह मुक्त जया। यह ३० अंश कम करके भंशादि २४१०५।१५। यह भोग्प गया यह वृपाराशिका भोग हैजिसलिये पहिले राशिस्थानमें एक मकथा इसलिये वृषके उदय इस २४ से गुणके अंशादिफल ५८५३ कला १५ विकला ४५ भया इसको ३० भाग देके १९५।३।१५।४५ यह पलात्मक नोग्यकाल मया इतही प्रका वापोदाहरणसहितम् । भुक पल साधम करना। अब सूर्योदय नीट घदी ३२ ल ०१ इसका पल किया तो १९२१ इसमें भोग्यकाल १९५।३।११४५ यह कम करके शेष १७२५।२६।४४११५ -यह इसमें मिथुनोदय ३००, कोदय ३४६, सिंहोदय ३५५, कन्योदय ३४४. तुलोदय ३४८ यह कम करो शेप२८ पल बचे इसमें वृश्चिकोदय कम होता नहीं इसवारते शेप पल २८ को ३० से एणके नीचेकाअंश २६ युक्त करके ८६६ यह मया इसको वृधियो- दय३५५ से भाग देके अंश २ लब्ध जया शेप १५६ को ६० से गुणा तो ९३६० मया इसमें कला ४४ युक्त किया तो यह ९४०४ नया इसन ३५५ से भाग देनेसे कला २६ जयाशेष १७४ रहा इसको ६० से गुणा तो ११ ०४४० इसमें विकला १५ युक्त किया तो १०४५५ यह जया इसको वृश्चियोदय ३५५ से भाग देनेसे २९ विकला प्राप्त नई अव पूर्वमें प्राप्त भया अंशादि ०२।२६।२९ यह है इसमें मेपादि शुद्ध पर्यंत राशि ७ युक्त किया तो ७।२।२६।२९ भया इसमें अयनांश २२२४४।३ कम पिया वो राश्पादिक लमस्पष्ट झया. ९४२२२६ इसमें ६ राशि युद्ध किया तो ह००।९।१२।२६ सप्तम भाव भयो. अभीष्टकालमें भोग्यकाल कमती न होय तो लन वनानेकी रीति। पलात्मक मशीटकालको ३० से गुणके उसको सायन ग्रहकी जो राशि हो उस राशि के उदय से भाग दे अंशादि फल को आवेगा यह स्पष्टर्यों युक्त करना तो इष्टकालका लग्न होता है। लग्रसे अभीष्टकाल करनेकी रीति । "अर्कभोग्यस्तनोर्मुक्तकालन्धितो युक्तमध्योदयोऽभीएला- लो भवेत् ॥ यदि तनुदिननाथावेकराशो तदंशान्तहत उद्यः स्यात्खामिहत्विष्टकालः । इनत उदय ऊनन्धेत शोध्यो झुरात्रात १८८) केशवीजातकम् । दीका-लममें अयनांस युक्त करके जो अंक आपै उससे मुक्त काल करना और स्पष्ट सूर्य कोम्पकाल करना अनंतर सायन स्म और सायन सूर्य इनके : सध्यके जो उदय होय उनका अंक लेके उसमें भुक्तकाल और भोग्यकालका, अंक युक्त करना तो पलात्मक पीटकाल होता है। सायनलम और सायन सूर्य एक राशिम होप तो लमसे अमीष्टकाल साधनका उपाय यह है कि, सायनलम और सायन सूर्य इनका अंतर करके उसको सायन सूर्य के उदयसे गुणके ३० से भाग देना जो भागाकार आवे सो पलात्मक टिका होता है. जो सायन सूर्य के अपेक्षा सायन लम कमती होय तो पूर्व प्रमाण साधन किया जो कला सो ६० मेंसे कम करना तो इष्ट- माल होता है. कार कहा वैसा प्रमाण जन्मकालका लम ६।९।४२।२६ यह इसमें ६ राशि युक्त किया तो यह सप्तम भाव हुआ ०९॥४२॥२६॥१॥ जगदीशेन रचिते केशवीगंथटिप्पणे । स्पष्टाधिकारः पूर्णोऽयं तद्भापार्थप्रकाशकः ॥ १॥ इति स्पष्टाधिकारः॥१॥ अथ भावाध्यायः २. नतोन्नतपूर्वकदशमचतुर्थभावसाधन । रायः शेषमितं युतं दिनदले नाह्नो गतं शेपक मिश्लेष्यं खलु पूर्वपश्चिमनतं त्रिंशच्युतं चोन्नतम् ॥ यत्पूर्वानतपइभयुक्तरवितः पश्चान्त्रतादित्यतो योदयकैच लममिव तन्माध्यं सपड्भं सुखम् ॥ २ ॥ अन्वयः-रानेः शेपं वा इतं (गत) दिनाईन युतम् अह्रो दिनस्य गत वा शेषांक दिनदलेन विश्लेप्यं खल्पिति निश्चयेन क्रमेण पूर्वपश्चिमनत स्थान तन्न गुनंच पुनः उन्नतं स्यात् । पूर्वोन्नतपयुक्तरवितः लंकोदयैर्लयामिव (९०) केशी जातकम्। मोग्यांश भया इसको लंकोदय वृपका मान २९९ से गुणा तो ७२०२।९ ४५ इसको ३० से भाग दिया तो २४०२।९।४५ यह योग्यकाल पला- स्मक या इसको नत १५॥४० इसकी पल ९४० में कम किया तो ६९९ २७१५०।१५ इसमें मिथुनोदय ३२३, कर्योदय ३२३, यह कम करके, शेप ५३।२७१५०११५ इसमें सिंहोदय २९९ कम नहीं होता इसवात्ते शेष ५३ को ३० से गुणा तो १५९० इसमें नीचेका अंश २७ युक्त किया तो १६।१७ इसको सिंहोय २९९ से भाग दिया तो अंशादि ५/५४॥३८ इसमें मेपादि शुद्ध पर्यंत राशि ४ युक्त किया तो ४।५।२४१३८ इसमें अय-- नांश २२१४४।३ हीन लिया तो यह ३।१२।४०।३४ दशम या इसमें ६ राशि युक्त किया तो ९११२१४०१३४ यह चतुर्थ भाव नया ॥ २ ॥ भावसन्धिसाधनं क्षयचयफलसाधनं च । ज्यशो व्यस्तखभस्य भूयमहतो योज्यस्तनौ हिच्युतो बंधौ तेपि च सांगभास्तनुमुखाः संघिड़ियोगोदितः ॥ शुन्यं संधिषु भावगेऽखिलफलं स्याद्रावसंध्यंतरे- णाप्त संघिसगांतरं क्षयचयं भायाधिकरपे खगे ॥३॥ अन्वयः-व्यस्तखजस्य व्यंशो मगमहतस्वनी योज्यस्वदा द्वितीय तृतीय- भावौ भवतः विगतमस्तं यस्मात्समात्नयस्तख तस्येत्यर्थः स एवं यशो दिच्युतो दायां च्युतो भूयमहतश्चतुर्थभावे योज्यस्तदा पंचपजावी भवतः एवं गुणितयुके पंचमनापः, द्विगुणितयुने परमावः स्यादित्यर्थः । तेऽनंतरा- नीताश्चत्वारो भावाः सांगाः पाशिसहितास्तदाऽधमनवमैकादशजावाः स्युः आपचशब्दावनुक्तयोषको चत्वारो भायाः प्रथमं साधितास्तदोषकमित्यर्थः । अथ संधि-संपिर्दियोगोऽदिमः, यायागो दियोगोऽद्धिता व्यासः सन् संधिः पालथम्भावस्य दिरामसंघिद्वितीयस्यारामतंधिर्भवतीति । संधिसमें यहे शुन्यं फलं स्यात् भावगे जापांशादिसमे अखिलं संपूर्ण रुपफलमित्यर्थः । आवाधिक रहे सति संघिसम्योरतरं भावसंध्यतरेण मतं क्षयास्पं फलं स्यात् । : mer २ -- । (९२) केशवाजातकम् । होता है। यह मह भावसे भाषिक होय तो क्षय ( अवरोह) फल, अथवा यह गावसे कमता होय तो चप आरोहफल जानना । उदाहरण-यह दशम भाव ३।१२।४०३४ इसमेंसे सप्तम भाव १९ ४२१२६ कम करके ३।२।५८८ यह भया इसका तृतीयांश ११०५९ २२१४० इसमें लम ६।९।४२१२६१० युक्त करके ७११०१४११८४० यह द्वितीय भाव मया तृतीयांशको दूना २१११५८१४५।२० में लम ६।९ ४२।२६।० युक्त करके ८५११४३।११।२० यह तृतीय भाव भया यह तृतीयांश ११०५९।२२।४० इसको २ राशिमें कम करके शेष ००।२९ ॥३७॥२० यह इसमें चतुर्थ भाव ९।१२।४०।३४।० युक्त करके १॥ ११।४।११।२० यह पंचम भाव या वहीं शेष दूना १२८1१1१४१४० को चतुर्थ भाव ९।१२।४०1३४।० युक्त करके ११॥१०॥४१॥४८॥४० यह पटनाव जया अब द्वितीय, तृतीय, पंचम, पष्ठ यह भावों में ६ राशि क्रमसे युक्त करे तो अश्म, नवम, एकादश, द्वादश यह सष्ट नाव होते हैं। लग्न ६।९।४२।२६१० द्वितीय भाव ७१०४१॥४८॥४० इनका योग १३।२०।२४।१४१४० इसका अर्द्ध ६।२५।१२।०७।२० यह प्रथम भावकी विरामसंधि और द्वितीय भावकी आरंगसंधि होती है इसी प्रमाण सर्वभावकी संधि करना अथवा चतुर्थमाव ९।१२॥४०॥३४८० में लग ६।९।४२।२६।० कम किया तो ३२।५८१८ यह नया इसका पष्ठांच । १५।२११४१२० इससे लग ६।९।१२।२६।० युक्त किया तो ६।२५। 1३11०७।२७ यही रीतिसे कमसे युक्त करना तो संघिसहित चार भार होते हैं पुनः पक्षांशको १ में हीन करना चतुर्थ भावसे युक्त करना दो सप्तम भावतक संघिसहित होता है। आगे पूर्वोतवत् । होते हैं । अनंतर यही पटीश १ में कम करके जो शेष रहै सो चतुर्थ भावमें युक्त करे तो चतुर्थ भाव पिरामसंधितक पाव होते हैं अनंतर इन ६ भायोंमें और संधियोंमें ६+६ राशि क्रमसे युक्त करे तो आगेके सर्व भाव संघि सुगम . रीतिसे होते हैं।

. . ३ . .भा. ७ ८ ८ ७ ० ४० . ० . . ८ 0 . . . २ M8.00 २० . २० a ४० १२०॥ भापोदाहरणसहितम् । (९३) २ ०। ५ ६ ६ ९ ९ २६ । ११ २७ १२ /२७ / ११ / २६/ १०५ ४२ १२ ४० १० ११ ११ १२) २६ ३० । ११ ५२ | ३४ |५२ ११ । ३० ४० ४०२० ४०२० ९ o १० १२ | मा. १ १ २ २७ १२ ११७ ११ । २६ १०२५ ४० |१८४१।११ ४१ १२ ११ ३४५२ १२ ३० ७ २० जन्मलग्नामिदम् ! क्षयचयोदाहरण-सूर्य०।१३।१०१४२ यह निकट भाव सप्तम १९४२।२६ इससे अधिक है इसवास्ते ।। सूर्य इस भावकी विरामसंधि ०।२५।१२।०७ में कम करके०।१२।०१।२५ इसकी विकला ४३२८५ यह अंतर इसको सप्तम भाव १९१४२१२६ और विराम संधि० १२५।१२।०७ इसका अंतर ०१५।२९। भावोद्धपचक्रमिदम् । ४१ इसकी विकला ५५७८१ इसे भाग देके । ४६।३३ यह सूर्यका भाव फल भया यह फल सूर्य निकट भावसे अधिक है इस वास्ते क्षय जानना इसी प्रमाण सर्व ग्रहोंका जाब फल करना इति ॥ २॥ १२शो ग्रहमावफलचक्रम् । सू. यु. वृ. श. ग्रहाः 'चं१० ५१० ४ म. . . . . . . ४४ क्षय क्षय चय १२ ३१ क्षय जगदीशेन रचिते केशवायटिप्पणे । मावाधिकारः पूर्गोऽयं तद्भापार्यप्रकाशकः ॥२॥ इति नावाध्यायः ॥ २॥ चय

(९४)
केशवीजातकम् ।
अथ दृष्टिसाधनाध्यायः३.
खेकामिद्विखवेदरामयमभूखाभ्राममेकादिभे
द्रष्टा वर्जितदृश्यकस्य गुरुणा चेदष्टवेदे कृताः। .
मदेनांकयमेऽसूजा नगगुणेशा भादिजाः संस्कृता-
भागनक्षयवृद्धिखा नललवेनाब्युद्धता दृग्भवेत् ॥१॥
अन्वयः पश्यतीति द्रष्ट्वा दर्शनयोग्यो दृश्यः प्रष्ट्या वर्जितश्यकस्यैकादिशे शेषे
सति सैकामिद्विखवेदरामयमभूखानाम्रम् ०1३।३।२।०४।३।२।१101010
एते स्युः तत्रैको शेषे खं शुन्यं विश विशेपे एक इत्यादि, द्वादशोऽर्थाव शून्य-
शेषेऽ शून्यं किंभूता एते अंका भादिजा राश्यादिजाः गुरुशानभौमानां विशे-
पः चद्रिति चेद्गुरुणा द्रष्ट्रा वर्जितदृश्यकस्याटवदेशशेष लताश्चत्वारोंकाः स्युस्त-
दा पूर्वाक नेत्यर्थः । मैदनांकयमे रुताश्चत्वारोंकाः। असृजा भौमेन द्रष्टायनित-
दृश्यकस्य नगगुणे से चत्वारोऽकाः स्युः। पूर्वोक्ता नेति जावः। एवं राश्यादाका-
नुक्त्वा राश्यधःस्थांशानां साधनमाह-जागति । किविशिष्टाअंकाः भागनश-
यवृद्धिखानललयेन संस्कृता एतदुक्तं भवति भादिजो योंकः सोऽग्रिमांका-
बेच्छुद्धस्वदा वृद्धिः यदायिमाको राश्यादिनांकाचेच्छुद्धस्तदा शयः तेन गणिता
राश्यावस्थांशायो त्रिंशदाज्या लब्धेन भादिजाः संस्तताः कार्याः क्षये हाना
वृद्धौ युक्ता इत्यर्थः । ततोऽन्ध्युद्धृताश्चतुक्का हामवेत दृष्टिः स्यादिति भावः ।
जिस ग्रहकी दृष्टि बनाना होय तो जिस ब्रा महली दृष्टि जिस
ग्रह पर अथवा चावपर देखना होय तो वह यह किंया भाव दृश्य होताहै
इटा दृश्य से कम करके जो राश्पादिक शेप रहै उस स्थानमें 0.19॥३॥२
००११॥३॥२॥11010101 यह दृष्टिफलांक कमने मेपादि द्वादशराशिक
१ भावोनकः खगः पूर्वसंधिना रहितस्तदा । अधिकदिरामाख्य-
संधैः शोध्यस्तदंतरम् ॥ भावसंध्यंतरेणाप्तं तदापफलमुच्यते । क्षयं चैव तदा
ज्ञेयमधिकडल्ले चयं भवेत् ॥ १ ॥

जापोदाहरणसहितम् । (९५) स्थानमें लेना परंतु निस वक्त गुरु द्रष्टा होय उस वक्त ऊपरका बाकी राश्यंक ८ किया ४ आवै तो और शनि द्रष्टा होय तो बाकी राश्यक ९ किंवा २ और मंगल दृष्टा होय दो बाकी राश्यक ७ किंवा ३ होय तो उसी ठिकाने ऊपर लिखा जो दृष्टिफलांक सो न लेना, ४ दृष्टिफलांक लेना अन- तर दृष्टिफलांकको, दृष्टिफलांकके आगे अंककी क्षय किंवा वृद्धि जो आवे उससे ऊपरका जो शेष राश्यंकके नीचे भागादिक है उसको गुणके जो गुणा- कार आवे उनको ३० भाग देके जो फल आवै उससे संस्कार करना आ- गेका अंक कमती होय तो यह दृष्टिफलांकमसे कम करना अथवा आगेका अंक ज्यादा होय तो यह दृष्टिफलांकम युक्त करना अनंतर यह संस्थत दृष्टि- । फांकको ४ से भाग देना जो फल आवै वह ग्रहकी दृष्टि होती है कारक 'लोकसे यह तथा नावदृष्टि करनेमें बहुत परिश्रम पडा हैं इसवास्ते नीचे लिखी जो कारणी उसपरसे बहुत जलदी दृष्टि फल आवा, है.

केशवीजातकम्। २/३1४/५/६७/८/९/१०/११/१२/ राशि . क्ला ०१५/४५३०६०/४/२०१५. श में च श - . का नीचका अंक लेके अंतर करे जो अंतर आवै उससे नीचे जो भागादेक होय तो गुण देना फिर ३ से भाग देना आवे मो फलांकमें संस्कार करना सो ऐसा कि आगेका अंक नाश होय तो युक्त करना पिउलेसे आगेका कमती होय तो पिठलेमें घटा देना तो दृष्टि होती है. यह दूसरा प्रकार होगा। दष्टा दृश्यों कम करके जो : राशि रहे तो शादिक्को आधा करे तो रधि होय और २ राशि बचे तो अंशमें १५ युक्त कर तो दृष्टि होय और तीन राशि है तो अंशारिक आधा रै और उन अंशोंसो ४५ में घटाय दे तो दृष्टि होय और चार राशि रहे तो अंशादिकको ३० में घटाव तो हष्टि होय । और ५ राशि रहै तो अंशादिक दूना करै तो दृष्टि होय और ६१७॥ ८1९ राशि बचे तो राश्यादिक १० में शाधै अंश करै पीछे आधा करे तो दृष्टि होय और १०।११।०० राशि बचे तो दृष्टि नहीं होय और मंगलकी करे तो ३३७ राशि बचे तो अंशको ६० में घटाय दे तो दृष्टि हो और २' राशि बचे तो मंशादिक आधा करै फेर उसी आधा जाडै और १५ जोडे तोष्टि हो और ६ शशि ऊपर होय तो १०० दृष्टि होग और गुरु दृष्टि करे नब तो राशि बचे तो भंशादिक भाषा करै अंशमें ४५ जोड दे तो दृष्टि. होय और चार राशि ऊपर होय तो अंशादिक दूगा करै पछै ६. में घटाई वोटि हाय और ८ राशि ऊपर हाय तो अंशादिक आधा कर सहित करे फेर ६० में घटाय देता दृष्टि होय शनैश्वरकी दृष्टि करे तो १ राशि ऊपर होय तो अंशादिय दूना दर दृष्टि होय राशि ८ होय तो संशोमें ३० जोडे तो दृष्टि होप मार २ गशि होय तो अंशादिक आधारे ६० में घटापरे, तो दक्षि होय और ९ गति ऊपर-बचै वो भशादिक दूना पर ६० में चयन देतो सष्टि होय ॥ ३ ॥ ' इति टिधीसरी शति ।

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Kno १५८० ११ . ० o ० ० २५८/३४७२८ L Suryod . . 5 ० . मगल: (५७५२० २७ . ० दृष्टि उदाहरण। द्रष्टा चंद्र९।५।२२।३५यह दृश्य सूर्य ००।१३।१०1४२ से कम करके शेप ३७४४८७ यह है. इसवास्ते चंद्रदृष्टिफल सारिणीमें ३ तृतीयराशि कोष्ठकके सामने ७ अंशके नीचेका फल ०४१॥३. इसको इष्ट अंशके नीचे काला ४८ विकला ७ है. इसको राशि- 'दूसरीरीति दृष्टिं उदाहरण. कोष्ठक ३ के सामनेका गुण १ से गुणके सूच.(मेव वृ.म.श. ग्रः कला ४८ विकला ७ इसको गुणके नीचेका हर २ से जाग देके २४१०३ यह विकलादि ०२८३१० ० (१५/ सूर्यः फलसारिणीमें ऋण लिखाहै इसवारते पूर्वमें लिया जो फल ०1४११३० है इसमें से कम ४२३०/२८/१०/१६/ चंदः ६. करके . ४११ ०६ यह चन्द्रकी सूर्यके ऊपर दृष्टि भई । इसीप्रमाण सर्व ग्रहोंकी दृष्टि ग्रहोंपर और भाव पर सारिणी परसे करना । द्रष्टा दृश्यमसे कम करके ३१४८७ इस- ०३३ ० ३७ बुधः वास्ते ३ राशिके नीचेका अंक ४५ आगेकी राशि ४.इसके नीचेका अंक ३. इसका ४७२८) ०५३/ ०/३७/१२ वृक्ष, अंतर १५ इससे भागादिको गुणके ११७। ०२००५४) ०३६ शुक्रः १४५ इसको ३० से भागदिया तो ३५४ अब अगली राशिका अंक कमती है. ०४८५५४४/४७/४३ ० (शनिः। इसवास्ते ४५ में ३। ५४ कम किया तो २१९९२६२ ३०३४ ४११६ यह चंद्रकी दृष्टि भई। ऊपर राशिक | RRRRR ३६६२०२४५६४८४२ शुभेक्य स्थानमें ०. पर.देना तीसरी विधि दृष्टिकी १२.३४/२२-१९११ अंशादिक ७।४८ । ७ अर्द्ध किया तो |१/११ ३३५४३ इसको ४५ में कम किया तो २९१३२६३३/९२/४३/१६/पापेक्यं २१३५२८४२३२/३४.११॥ ००1४११०६ पूर्व तुल्य चन्द्र दृष्टि भई ॥ ४॥ ० ० ०५० . . 5 5 ७११० ०५९/१७०४३). १ . ० . . ० 1 २९/३५) २६/०२७/२६ . . . . . ८ ०१६/०२२०४७ ७ . . . . ० . . ०९१० my बुधः गुरु ० ० ० VM m N . 0 . . 0 I LG त 80 VN Gm Wr ०० 4. २७ 4 D . 9 . ७ 0 U M GC 0 urrow 0 ० 0 0 a 0 . . D ० 1.2 m स ma 5o m n -VV ० 0 ० क o 39 mm- T m" ~ W0 o m २ M 0.30 १११२०१५ केशवीजातकम् । . जगदीशेन रचिते केशवीग्रंथटिप्पणे । हगाधिकारः पूर्णोऽयं तद्भापार्थप्रकाशकः ॥ ३॥ इति हटिसाधनाऽध्यायः ॥ ३॥ ० . 0 o . 50 ००० . E 010 सूर्यः ME000 1सुरिनामृघक आय | भाव भावापरिदृष्टिचक्रम् । 1378/४१६/201000१५/३०/१२/२२) ॥ 0 . ~ 0 0 0 0 ० ० 55 03 cal ० ५०४ ~ . 0 . . 0 O 0 . . ० . 40 . U C . 0 . o ० m . ४ d m . ७ - ० 0 o o O o 0 omr urn 1010101010 . ४ . ० O . . - o ४५९२५ क ~~ wor CC ०G UN 0 0 . . . " . ० o ७ ३८२३] ० v Yw 0 wm- 20 0 ३ ० m Pr IC om m D - (३०) भापोदाहरणसहितम् । (१०७) अथ बलसाधनाध्यायः॥४॥ नीचोनो भगणाच्युत्तः पडधिक क्षेत्पइदाचं वलं स्वाद समभेऽष्टमस्त्रिचरणा मूलनिकाणे बलम् ॥ मित्राधिस्वीटभे त्रय इभांशा वेरिभेष्टयंशको दन्तांशोऽध्यारिभे गृहादिपरशारखेटस्य सप्तक्यजम् ॥५॥ सप्तवर्गबलमिदम्. स्वक्षेचं भावमित्र मित्रं समः शधुः अधिशनः मूलत्रि. ० . 0 . . ० २२ ३ E बल. C . ३० ४५ ० - अन्वयः--नीचोनो ग्रहश्येत्पडधिको द्वादशराशियः शुद्धः पडहृत् औचं बलं स्यात् उच्चसंबंधी चलमित्यर्थः । अत्रेदं ध्येयं उच्चोनगहे शेपं पड़ा- शिस्तदा पशागे रूपं बलं पूर्णवलमिति चेत्पमाल्पस्तदा रूपस्थाने शुन्य स्थाप्यं पुनः शेष राश्यादिकं पृष्ट्या संगुण्योपरि पढ्जातः संलधं कलास्थाने स्थाप्यः पुनः शेष पष्टया संगुण्य पभिनागे विकलास्थाने स्थाप्यः एवमं- शायमुञ्चवलं स्यात् । स्वामित्यस्पार्थः। स्वः स्वगृहे अहे सति अई- रूपाधै बलं लेख्यम्, समराशिस्थेऽष्टमांशो वलम्, मूलविकोणे त्रयश्चरणाः; मित्रर्श चतुर्थांशो बलम्, अधिमित्र त्रयोऽष्टमांशाः, शत्रुराशिस्थे पोडशांश- • बलम्, अधिशत्रुराशिस्थे दात्रिंशवंशो बलं स्यादिति सर्वत्र क्रियापदं, सर्वत्र रुपस्पैदिक ग्राह्यम् । अत्र सक्षमित्युपलक्षणं किंतु स्वराश्यादिस्थिते. प्यई बलं यायं कुतः इत्यतः आह ग्रहारिपवशादिति आदिशब्दादोराऽष्का- पाइयो बाह्याः गृहादीन् पान्ति येते गृहादिपाः ग्रहादिरातवर्गस्वामिनो ये सान्त तदशास्वाऽदमित्यादीनि खेटस्य सतवर्गवलानि ग्राह्याणि सनातामेश्या- जायत शने सौक्यजम् ॥

. (१०८) केशवीजातकम् । अर्थ:-अव बलाध्याय लिखते हैं वहाँ वल छः प्रकार के हैं जैसा कि स्थान १ दिन २ काल ३ निसर्ग ४ चेष्टा ५ और दृष्टि ६ इन भेदों करके छः ६ प्रकारके बल है, इसके बीचमें १ स्थानवल उच्च, सप्तवर्ग, युग्मायुग्मं, केन्दादि, द्रेष्काण इन भेदों करके ५ प्रकार हैं। २ दिग्बल एक प्रकारका है । ३ कालबल नतोन्नत, पक्ष, दिनरात्रिनाग, वर्षमात द्यु होरेश इन जेदों करके ४ प्रकारके हैं। निसर्गबल एक प्रकारका है। ५ चेष्टावल अयन और चेष्टाकेन्द्रन इन भेदों करके २ प्रकारका है। ३ दृष्टिबल एक प्रकारका है। जिस ग्रहका उच्चपल बनाना होय उस ग्रहमें उत्ती यहका नीच घटाय देना शेषको ६ से भाम देना तो उच्चसंबंधी बल होता है. कदाचित शेप ६ राशिसे अधिक होप तो १२ राशिमें घटायके शेपको ६ से भाग देना यदि शेप ठीश६ बचे तो ६ से नाग देना पूर्णबल अर्थात् रूप १ बल होगा जब ३ राशिसे कम रहेमा तप राशि ६ से भाग देनेसे अंशस्थानमें शुन्य • फल आवमा पुनः राशिको ६० से गुण देना अंश दूना करके युक्त करना फिर ६ से भाग देना, जो पावे सो कलास्थानमें रखना । शेषको ६० गुग दना विकला दूना युक्त करना ६ से जाग देना लधि विकला होगी अथवा नीच यहांतरका कला करना १८० से भाग देना तो कलादि सुगम रीतिसे उच्चचल होगा अथवा नीच यहांतर जो होय उसकी राशिको १० से गुणना अंश कला विकलाको २० से एणना तो उच्चवल होता है. जो मह स्वगृहमें होप उसका अद्ध । ३० । • बल, समके गृहमें होय तो अष्टमांश०१३०, मूलत्रिकोणका होय तो चतुर्थाश विगित ० १४५०, मित्रगृहका होय तो चतुर्थांश १५1०, अधिभित्रका होय तो अष्टमार त्रिणित०।२२।३० शत्रुगृहमें होप तो पोडशांश०।३।४५अधिशत्रुका होय तो बत्तीसवां अंश०।१४५२ यह बल गृह होरादि समवर्गके खामा अनु- रोधसे कहिये स्वामी अपने गृहमें होय तो अर्धवल और स्वामी समगृहमें से मापोदाहरणसहितम् । होय तो अष्टमांश.वल इत्यादि जानना । यह समवर्गजबल एकत्र करनेसे. अहोंका सन योगजबल होता है। ग्रहोंका उच्चादिकोष्ठक. ग्रहा: सू. बु. . . डा. मं. ९ २८ ६ २० म. अं. स. अं. ९ 19 ३ २८ २७ . ८ कोण रा. सं. ६ २० २० स्वगृह म.गु. म.गु गु नसागक शत्रु नीच २० मूलधि- ना ५ न. २० सिंह कर्कः । मे. वृ. मि.क. ध. मी. वृ.तु. म.क. नैसर्गिक मित्र |र. मं. गु. र. बु. 1. च. गु. .शु. र. च. मं. बु. श. दु. शु. नेसगिकसम बु. शु. श. म.गु.श. श. गु.श. श. शु. बु. चं. बुः शु. र.चं. र.च.म. लिंग पु धी. नपं. पु. स्त्री. नपुं. ग्रहोंकी तात्कालिकमंत्री। जिस ग्रहकी तात्काल मैत्री देखना होय तो वह यह जिस स्थान होय उस स्थानसे २-३-४-१०-११ और १२ इन स्थानोंमें जो ग्रह होय सो अभीष्ट ग्रहके तत्काल मित्र होते हैं और १-५-७-८ और ९ इन. स्थानोंमें जो ग्रह होय सो अभीष्ट ग्रहके शत्रु होते हैं। ग्रहोंकी पंचधा अधिर्मवी। यहाँको नैसर्गिक मैयादि और तात्कालिक मैन्यादि इससे यहाँकी पंचधा अधिमैत्री उत्पन्न होती है सो इस प्रकार अनीष्टमहका जो ग्रह नैसर्गिक मित्र और तात्कालिक मित्र होय तो अभीष्टयहका आधिमित्र होताहै। अ- भीष्ट ग्रहका जो वह नैसर्गिकमें सम और तात्कालिक मित्र होय तो अभीष्ट यहका मित्र होताहै । अनीट यहका जो ग्रह नैसर्गिक मित्र और तात्कालिक (११०) केशवीजातकम्। शत्रु होय तो अभीष्ट ग्रहका सम होता है। अनौट ग्रहका जो ग्रह नैसर्गिक सम और तात्कालिक शत्रु होय तो अमीष्ट ग्रहका शत्रु होता है. और अमीट ग्रहका नैसर्गिक शत्रु वा तात्कालिक शत्रु होय तो अभीष्ट ग्रहका अधिशत्रु जानना अत्रेदं ध्येयम् । सम-मित्र-मित्र, मित्र-मित्र अधिमित्र, मित्र- शत्रु-सम, सम-शत्रु-शत्रु, शत्रु-शत्रु अधिशत्रु ॥ इति ॥ टीप-मेप, धूप, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धन, मकर, कुम, मनि यह १२ राशि है इनमेसे मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धन, कुंम यह विषम ६ राशि और वृष, कक, कन्या, वृश्चिक, मकर, मौन यह ६ राति सम होती हैं । यहाँ सप्तवर्ग, १ ग्रह, २ होरा, ३ द्रेष्काण, ४ सप्तमांश, ५ नवमांश, ६ द्वादशांश और त्रिंशांश होते हैं । १ गृह-(राशि काहिये ३० अंश इसके स्वामी पूर्वमें कहें हार होरा-(कहिये राश्यई १५अंश) विपम राशिम प्रथम होराका स्वामी सूर्य और द्वितीय होराका स्वामी चंद्र और समराशिम प्रथम होराका स्वामी चन्द्र द्वितीय होराका स्वामी सूर्य। ३ द्रेष्काण-कहिये राशिका तृतीयांश १० अंश इसवास्ते यह तीन हैं। प्रथम श्रेष्काणका स्वामी गृहाधिप, द्वितीय द्रेष्काणका स्वामी गृहसे पंचम राश्यधिप, तृतीय द्रेष्का- णका स्वगृहसें नवमराश्यधिप । १ सप्तमांश-कहिये राशिका सतमारा ४ अंश १७ कला विपमराशिम अपने गृहसे ७ राशिके स्वामी कमसे सप्तमांश- पति होते हैं और समराशिमें अपने गृहके सप्तमराशिसे सात राशिके स्वामी कमसे सप्तमांशपति होते हैं। ५ नवमांश-कहिये राशिका नवमांश ३ अंश २० कला, मेप, सिंह, धन यह गृह होय तो मेपसे ९ राशि स्वामी प्रमसे नवमांशाधिपति होते हैं । वृष, कन्या, मकर यह गृह होय तो मकर राशिसे ९ राशिका स्वामी कमसे नवांशाधिपति होते हैं। मिथुन, तुला, कुंज यह रासि होय वो तुलाराशिसे ९ राशिके स्वामी क्रमसे नवमांशाधि- पति होते हैं । कर्क, वृश्चिक, मीन यह राशि होय तो कर्क राशिसे ९ राशिका स्वामी नवमांशाधिपति होते हैं। ६ द्वादशांश-कहिये राशिका

भापोदाहरणसहितम् । (१११)
इदिश भाग २ अंश.३० कला सब राशिम वस्त्र गृहसे १२ राशि स्वामी
कम द्वादशांशपति होते हैं. ७ त्रिशाश काहये राशिका त्रिंशदाग १ अंश
वियम राशिमें प्रथम ५ अंशका स्वामी भौम मागे ५ अंशका स्वामी शनि
आगे ८ अंशका स्वामी गुरु आगे ७ अंशका स्वामी बुध आगे ५ अंशका
स्वामीशुक्र सम राशिमें उलटो रीतिसे ५ का शुक्र ७ का बुध ८ का गुरु
मागे ५ का शनि आगे ५ का गौम इसी रीति जानना ॥
प
होरालंगम्
द्रेष्काणलग्नम्
सप्तमशिक
६ मिच...
१०बु
'शशु
(७
४
११
म
१२
नवमांशकल। द्वादशांशकल.। त्रिंशांशकल.।
मंश/
७
१०
च
२
पशु
उच्चनीचे वराहा-अनवृपसमृगांगनाकुलीरा झपणिनी च दिवाकरादि
तुंगाः । दशशिखिमनुयुक्ति दिया खिनवकविरतिषिय तेऽस्तनाचाः ॥

(११२) केशवीमातरम् । निसर्गमत्री चक्रम्। स म च मसू चबूस असू म च चम! बुश ग्रह मिन डा म बृश मत सम शश . बु च बुशु । मूच मृचम श तात्कालमैत्रीचक्रम् । . जन्मलग्रम् । ६ सूच म बुशुशाग्रह सू बुबु |शाच ८ म 441 LCHI142 च १० श स प . GALAN शु यु १. पंचधामेत्रीचक्रम् । च म श 31 बु श 7 शु सूबु श वृ श म मिन उधमन ब शम | امي لدو सूबु सूच . वृम श म . . बु . कार ऽधानु . उच्चवलसारिणीप्रवश । सूर्यादि ७ ग्रहोंका १२ राशिकोठक लिखके प्रत्येक ग्रहके सामने राशि- कोटक्के नीचे रूप कलादि वल लिखा है उसमें से ग्रहका जो इष्ट राशिकोटक ोय उसके नीचेका फल लेके राशिकोठकके नीचे ३० अंशकोष्ठक और Ke Fantakti ६ ७ . १ OM १ -- o . . mtur ० २०.२.२.२.२.२.म. ०२० २०.ध.१.ध.२०धा४० घ.४०ध ० . ... ० . . क स २ D . . . . ० क D ४ द ३१ १९ । २९ ।,३२.चं. म... .ध..ध. ०५. प. . २९,२२८ २०.२.२. मा.२.४ प... ध.४०.४. ध २०२२.. . प.ध.ध. . प.1.0.0.0.1010.100. .. ० . ० ० ।... २८ | ३८. ४८.५८ | ५१ | ४२ / ३१ .२० घ.२०५. भातीहै तब फल लेनेत्री जुदी रीति है सो ऐसी कि पृथक पथक महोश उच्चर करना किंवा कम करना तो उच्चबल होता है परंतु जव.यहाँको उचनीचराखि किया ऋण राशिफलमें लिखा है उसके प्रमाण लिया जो राशिफल उसमें थुन नाचेकै अंशका कलादि और ब.लाका विक्लादि फल एकच करके यह पन्न कलाकोष्ठक लिखा है उसमें से ग्रहोंके जो इष्टांश और बला होय उसके भापोदाहरणसहितम् । ० . . . . . . नु. बु. ८ . ० ७ ३९ / २९ / १९, २७ २ ११ २. कामा...R.OR..ध ...ध..ध. ५१ ध. Ch D 3 ३ १३ / २३ / ३३१४३५३, ५६ ४६ २२६ १६ ४./२० घ.२३ घ.२०५.२.४०मा०.४०.०१. AN श.

केशवीजातकम् । घशफल.. . १।२।३।११५/६/७/८/९१० ११२/१३५१५ . २०४२०४00000 ०४२-४-10 १६:१७१८१९/२०१२२२२३,२२४२५२६२७२८२१३०) 0 O १४. ० રાઇડ રગદર . 210२०.. बलाफल. ७ . ३ ११/२/३१२ |१/१०/११११२४१३/१४ . ३/३/३४४४ २०४|०२०-४००२०४00२०४० ०२०/३0 ६/१६/१०/१८/१९,२०१२२२२३२४/२५/२६२७/२८/२९) ६/५/५/६६६.७७१७१८/८1८1९/९ २०४०.२०४००/२०४0000200/२०१६ -- . २०४० २०४०) ० २०४८, २०५० ० २०४० ४२४६४४/०८/९/५०५४४५२/५३/५४/५५/५६५७/२८/२९ २१/१५.२६६.६१७१७९७५ ॥१८९२)२२१९९) २०/...२०५०10 18010३०४० फिलम उनोच्चांस लिखे हैं उतन अशनकमात्र वह फल अंशादि पर जागे जो अंशादिअधिक आरे उतना अंशादिकोका तारिणामका फल लेके वह बार कहने के प्रमाण उक्तराशिकलंम युक्त करके रुप : (१) पलमें कम करना चचाल होता है सेती नीचराशिफलने उक्नीचांश लिखे हैं उतने अंशत- कमात्र यह फल कग आगे जो अशादे अधिक आये उतना अंशादिवाना सारणामका फल लेके वह कार कहने के प्रमाण नीचराशिफलमें कम न करके जो फल आये वही उचाल जानना । उदाहरण-यहां सूर्य । ९३।१०। ४२ है इसवास्ते ०. राशिको- नीका सूर्यकश फल ० १ ५६ । ४० यह लेके अनंतर १३ अंश- को के नीचेका कलानिपल ४१२० और कला १० कोष्टकके नीचेका कट मांगोदाहरणसहितम् । (१३१) ३। १२० यह विकलाम युक्त करके यह राशिफलमें धन लिखा है इसवास्ते .. १५६।४० यह राशिफलमें युक्त करके ०१ । ०१ । ३ अव यहां रवि -उचराशिका है इसवारते ऊपर १ न युक्त करके ०१।३ यह इसको रूप में का काके । ५८१५७ यह सूर्यका उच चल गया इसी प्रमाण चंद्रादि द्वितीयसारिणी प्रवेश जिस ग्रहका उच्चपल बनाना होप उस ग्रहमें उसी ग्रहका नीचे कम करना जो ६ राशिसे ज्यादा होय तो १२ राशिम कम करके नो शेष राश्यक होय उसके नीचे का अंशादिफल लेके उसके नीचे जो अंश कला होय उसका फल लेकर एकन करके युक्त करना तो यहाँका उच्चबल होता है. अंश कला विकलाका फल पूर्वोक्त सारिणीमसेलेना । उच्चराशिफल, |१२|३||१|दारा. . ० . २ . . उदाहरण-सूर्य ०।१३।१०।१२। यह इसमें इसका नाच ६१०१०० कम किया तो ६।३।१०। ४२ यह ६ से अधिक है इसवास्ते १२ में कम करके ५।२६।४९१३८ है. इसवारते ५ राशिकोटकके नीचेका फल ०१५०० पहलके अनंतर २६ अंश. कोष्टक पूर्वोतके नीचेका कलादिपाल ८४. और कला ४८ के नीचे विकलादिफल १६१२० यह एकत्र करके ८५६ यह राशिफल ०१५०० इसमें युक्त किया तो ०५८१५६ रह सूर्यका उच्चबल गया. इसी रीतिसे चंबादिकोंका करना तो सष्ट बल होता है। राशिफल में अंश कला फल सदा युक करना । उचालचकन. स. च. म. यु. ग्रहाः . . . . . ५८ २ २० १७ a ४९ ७ اهم في [عم مر ملقا م لكم ما د{ 2 که ای که 1 م * یادمه *' من | و | وجا و مه ية الثوم الموما ه ما می معلم م. م م و مول ه مي | می هل ایک : = :و هو غه هم F) مع مو 1 قناة میه|| یہ اور ای | واسه | از و تا اع15 #ام #} سه {As | مد ي و هه 4 فی الله = = = 2 = alaa 13 فه ة کلا ها دام و می کا من من 1 P - 1 ممه مامو | 0 h لا ممه # د و عطر 9 xalifaaiqari | | الله) - ه م | هه س عن سه | ما * * * * * 1 |:|:|:| MIK و f م | نامه ی یک { إ F ويا K امه | | کام { و مهر ما 6 و کا 611 511 3111 مهد| ا در هر m نما واج و مم الي به [ 4 ]H4[[[44 اح مه 1 : 41ء لها مي کر معي 1 مم | * و 4 عی म दाद سس می ki तिम لال bal सप्तम ۹۹۹ اله ا . م . نه اما . اهو م این : شامی ثوم - ام داد نه به د ہ |. هالنوم . الم . . . هرماه . » ها . ۸ تله » ء 3 و ادا و او مه 1 विशेष:-नीचोनं तु यह معه د الحلم ها | : لرم ، م ح م په فيه ته لا - عی W غواء ده اف ها نرم و م ا يهي د ۱۸ به ماه موم 0 معي با الا الله له ہی ملت ها برم داد ما الله ه} 3، 1.5 شم یا 45 لمعي 0 0 مه ق مع امه نمی الم - ]4[ دی ماه) - ) ماه) - ما अपराशिसतवर्गपतिचक्रम् । با هم لا 0 لی هي ما م نهاد ما به کا ما اهد ما م . م . ه م | لم | دن - لن . م . لم ا ا ،۰ عن له 0 مونا و 5 ها که ما به سهم نه ! ولی س دو ها س ایده ال . . أسي ها به سه 11 به اله . عن 0 माधिकं चनविशोधयेत् । गागीरुत्य त्रिमिक्तिं फलमुच्चालं भवेत् ॥ १॥ لمعة . . ای به . [الله و هر المه ع م . سم .الله ي م ف | .مد بر سر به هوا م ما الله | | 0 W .م م ج م و ه . م.ف ها کام . ہے اد وه هه ه} | In f f f f f سه که مه که مرا ه ه دهه ا ت دا ) ه دهم ا ه کا 'م 0 0 از ماه ها در ماه 0 م ) مج . G Rorwalpur TOur श/शश/श ~ N N . Popur ow -० Nm FM - . more ७ ० htar mari Four hirmw hlopmur mar Nirpur More 700 HrPor ब शशशशशा d ~mmulmur - Imurmur Dry ० D १०/१०/१०/१०/१०/१०/१० गुर ० o - manor . mur ristomer ४० mm Prava1 09 vH017 mon IN 7 MER o ८ U धूपराशिसप्तवर्गपतिचक्रम् । Rirls 11090 व G LO . ११११११११ २/१२/१२,१२/१२/१२ शशशशश|२०|शशशशशश गु गु गु गु गु गुम ममममम १०/१०/११/११/२१,११,१२,१३१ By aur प m ० 4 | 0 m . m- ० V [caro 510-ywor Forwwhirl mur ४० का mm-RN arror-20 torFT vm- 100 151 mRRImhar Rawara ym150 ROFERO. 8 ||na Maritra v In D -- १२२ . m- کلمه ها له * . ILAINER 0 . HorrNIRM 0 ~ રા ससम नवम ।माण 1 - ।

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(१५८) केशवीजातकम् । पोडशांग ४५ द्वादशांशपति बुध शत्रुक्षेत्रमें है इसयारते द्वादशांशबल पोडशांश०।३।४५ त्रिंशांशपति गुरु अधिशत्रु क्षेत्रमे है इसवास्ते विंशांशबल 198५२॥ सूर्यके सतवर्गके बलका योग 0154॥३७॥ इसी प्रमाण चन्द्रादिकोंका सतवर्गबल होताहै ॥ ५ ॥ शुक्रंदू समभांशके हि विपमेऽन्ये दारंत्रिं वलं केन्द्रायेषु च रूपकाईचरणान्यच्छंति खेटाः क्रमात् ॥ स्त्रीखेटो चरमे नराः प्रथमके क्लीवौ च मध्ये तथा द्रेष्काणे वित्तरति पादमुदितं स्थानास्पवीय विदम् ॥६॥ अन्वयः-समझांके स्थितौ शुक्रेन्दुहीति निश्चयेनाप्रिं चतुर्थांश वले दद्यातामा अन्य रविभौमबुधगुरुशनयो विषमजारो स्थितारनगवि बलं दद्युः । चांशश्य , मांशम् । विषमा राशयः ॥३।५।७।९।११ शेपाः इति केन्द्रदोष केन्द्रपण- फरामोहिमेषु स्थिताः खेटा कमाठ्ठपकाईचरणान्वलानि यच्छति ददन्ति एतदुक्तं भवति केन्द्र ग्रहे सति रूप १ वलं, पणफरे अई । ३० । बलं, आपोक्लिमे चतुर्थाश ०।१५ बलं यच्छति । स्त्रीखदौ शशिशुक्रौ तृतीयद्रेष्काणे वर्तमानौ पाद वलं दत्तः । नराः सूर्यमंगलगुरवः प्रथमद्रेष्काणे पादं बलं वितरंति क्लीबो बुधनी मध्ये द्रेष्काणे स्थिती पादं बलं दत्तः इदं यत्तचपा बलमुदितं तस्था- नारूप वाय पंचांनां योगे स्थानबलं स्यादित्यर्थः । अर्थ:-शुक चंद्र यह समरासिम धिा समांशमें होय तो और सूर्य, ममल, बुध, गुरु, शान यह विषम राशिम व विषमांश हो तो चरण 011410 बळ देते हैं। ग्रह केन्द्रों काहये लम चतुर्थ सनम दशम स्थानमें हो तो रूप *बल देते हैं। यह पणफरमें कहिये द्वितीय, पंचम, अष्टम, एकादश स्थानमें होय नो.1010बट देते हैं। यह आयोस्टिममें कहिये तृतीय, पट, नकम, द्वादश स्थानमें होय तो चरण ०1१५/० बल देते हैं । पुरुपयह प्रथम द्रेष्का " जापोदाहरणसहितम् । (१५९) में हॉप और नपुंसकमह द्वितीय द्रेष्काणमें हॉप और बीमह तृतीय द्रेष्का- में होय तो चरणबल १५० देते है यह ५ स्थान बलॉक योगको भी स्थान बल ऐसा कहते हैं. युग्मायुग्मवलोदाहरण। यहां सूर्य धौम और शनि यह विषम राशिमें हैं इसवास्ते इनका चरणबल, चन्द्र समराशिमें है इसवास्ते चन्द्रका चरण ०1१५१० बल, शुक्र समरा- शिम किंवा समनवांशमैं नहीं इसवास्ते इसका बल । } • बुध, गुरु विषम राशिम किंवा विषमांशमें नहीं इनका बल 0 1 0 10 युग्मायुग्मयलम् । म. मा यू.पू.शश.. ८ 4 ८ C १५१५/१५ क C . अब केन्द्रादिवलोदाहरणम् । सूर्य चन्द्र केन्द्रमें है इसवास्ते इनका रुप बल, भौम शुक्र पणफरये हैं सवास्ते इनका भई ०।३० १ ० बुध गुरु शनि यह आपोक्लिममें हैं इसवास्ते इनका चरणवल। केन्द्रादेवलम् । मंगर: वृदः शुत्रः ग सूर्यः १ १५ १५ . अर्थ केन्द्रादिवलोदाहरणम् । यहां गुरु पथम ट्रेष्काणम है इसवावे चरणवट, शुक्र वतीयामें स्वचारले चरणवट, शनि द्वितीय वेष्काणमें है इसपास्ते चरणपल मू.मे. है।

केशबीजातकम् ।
प्रथम द्रेष्काणी नहीं और बुध द्वितीय, देष्काणमें नहीं और चंद तृतीय
काममें नहीं इसबार इनका पल शुन्य.०1०1० ॥ ६ ॥
माणपत्चकम् ।
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स्थानबल्योगचकम् ।
सूर्य चन्द्र मग | बुध
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मन्दानामिनाकुनाचाहिबुक शोध्य विधोगिवान्माध्यंज्ञाहरु
तोस्तमनरसभात्पुरत्यजेचकतदिग्वीय रसहत्त्वयो समय
रुपं सदा स्यादिदधिशदतनतोनते शशिकुजाकीणों परेपी
बदम्॥७॥

जापोदाहरणसहितम् । (१६१) अन्ययः-शनेः सकाशानं, -सुर्याद्रौमाञ्च हिवुकं चतुर्थ, वियोः मार्गवाच माध्यं दशमं बुधागुरोः सकाशादस्तं सप्तमं शोध्यमिति सर्वत्र ध्येयं शेषं पड़ा- श्यधिक चेत्स्यानदा दादशराशियः शोध्यं ततः पहुंद पड्जतः सन् दिग्वीर्य स्यात् । तुशब्दादुचवलमागमकारोऽनापि बोध्य इति अत्यनंतर समय लज बलमुच्यते । वियोः बुधस्य सदा दिनरात्रौ रुप १ पलं स्यात् । निंशनतनतोनते शशिकुनाकाणां परेपां बलं भवतः नतं त्रिंशता शक्तं यलम्ध, तचन्दनौमशनीनां बलं भवेत् उन्नत त्रिंशद्भक्तं रविगुरुशुक्राणां बलं स्यात् ।। अर्थः-शनि से लग्न, सूर्य औममेंसे चतुर्थ भाव, चन्द्र शुझमेसे दशम जाय बुध गुरुमसे सप्तम भाव यह कमसे कम करके शेष राशिके अपेक्षा अधिक होय तो वह १२ राशि कम करके अनंतर जो शेष रहै उसको उच्चवलमें पूर्वेतिरीतिप्रमाण ६ से भाग देना तो यहाँका दिग्पल होता है । दिग्बलसारणी प्रवेश। यहाँसे. लमादि कथित भाव कम करके जो शेष रहै उसको ६ से कम करना अर्थात पडझाल्प करना अब यहां सारणीमें ६ राशिकोष्ठक लिसके वह कोडकके नीचे रूपादिफल उसमें से अनीष्ट महका जो ६ राशिमसे राश्यक होय उसके नीचेका फल लेना राशिशेष्ठकके नीचे ३० अंशकोइक और उसके नीचे ६० कलाकोष्ठक लिसा है उसमें से अधीष्टप्रहका जो अंश और कला भाये तत्परिमित काटेकके नीचेका अंशका कलादि और कलाका विक- लादि फल एकत्र करके पूर्वमें लिया जो राशिफल विसमें युक्त करना तो यहाँका शिवल होताहै ॥ हिम्बलबारीफलंचकम् । . . . . . १०२०३०४/५/- (१६२) केशवीजातकम् । अंशफलचक्रम् । . ११.२३४५६७८1९/१०/११/१२/२३१४१६ १।२ 3|2|| १० 200२०/४००/२०४२००० १० २१२२२३२६२५२६२५ २८0130 ६/६/७७/७/८/८/८.९९ va1012 ४०० Roteolo२०१४01020120 कलाफलचकम् । दाहाबारा २१वशारदाबा१७चार १२११२२२ २०४०२०४०. 101200 २०४0000000२०१० CC | - Ide: 0 R०२०/४०/- २0/2010/201012-10 २४३ ४/५/४६/esarje९/२०५२/५३५३२५२५६३५९3/2017 १३/१४/१४१४१५/१६२५/२६/१६२६/१७/१७/१७१८१८१८-२१२१/१८ 2010 २०४०४०२०/४/ 0 012000/10/20 उदाहरण--यहां सूर्य ०।१३।१०१४२ यह इसमेसे चतुर्थ भाव ९॥१२॥ ४०३४ कम करके शेष ३०॥३०१८ आया अब इसका रोश्यक ३ है इसवास्ते ३ राशिफल ०।३०१० और अंश है इसवास्ते अंशकोष्ठकका फल • 100 और कला ३० है इसवास्ते ३०. कलाकोठकका फल १०० यह विकलामें, युक्त किया तो ०।३०।१० यह सूर्यका दिग्बल अया इसी प्रमाण चन्द्रादिकोका सारणीपरसे दिग्बल करना, अव कालबल कहते हैं। बुधका सर्वदा दिनमें किंवा रात्रिमें रुप १ दिवलचक्रम। बल, नतमें ३० से जाग देनेसे चन्द्र गौम और मामलाश शनि इनका और उन्नतमें ३० से भाग दे तो सूर्य गुरु और शुक्र इनका नतोनन वल होता he's હર ૬ દર अथवा नत विरणित करे तो चंद्र भौम शनि इनका और उन्नत द्विगुण करे तो.सूर्य गुरु शुम इनका मुगम रीसिस कहानि बल होता है. 0 ८. ८ १ भाषोदाहरणसहितम् । उदाहरण-नत १५४० इसको ३० से भाग देके १३१।२० यह चन्द्र ओम शनि इनका बल या उन्नत १४ । २० नतोन्नतबलचक्रम् । इसको ३० से भाग देके ० १ २८१४० यह सूचीमा शश सूर्य गुरु शुक्र इनका बल शया, और बुधका GEE रूप बल ऐसा जानना ॥ ७॥ २०२१२००३० पक्षवलं यशवलं वर्षमांसदिमहोराबलम् । शुक्लेन्ते तिथिगतष्यतिथयो वीर्य सतां भूच्युत पापानां द्विगुणं विधोरिदमथाहत्यंशकेषु कमात् ।। सोम्याकार्कभुवां निशा शशिक्षिताराणां च रूपं सदे- ज्यस्यायांत्रिचयादली किल समामासद्यहोरेश्वराः ॥ ८॥ अन्वयः-शुक्ले अन्ते कृष्णे गतेप्यतिधयस्तिथिमि पंचदश१५जिभाज्याः फलं सतां शुतमहाणां चन्द्रबुधगुरुशुक्राणां वलं स्यात् । तदेव बलं भूच्युतं रूपा. कच्युतं पापानां रविभौमशनीनां पापयुतबुधस्य च वीर्य बलं स्यात् । इदं चन्द्रबलं दिगुणं कार्यम् अथ पक्षबलकथनानंतरं व्यंशवलमुच्यते अहो दिवसस्य अंश क्रमात बुधसूर्यशनीनां रूपं बलं स्यात् निशो रावयशकेषु कमेण चन्द्रशुक्रौमानां रूपं १ बलं भवति तव्यथा यदि दिने जन्म तदा दिनमानस्य विभाग कार्य चेलथमेशे जन्म तदा वुधस्य रूपवलम, अन्येषां शून्यं स्यात यदि द्वितीयेशे जन्म तदा सूर्यस्य रूपं बलम अन्येपां शुन्यं, तृतीयेशे शनेः रूप- पलम् अन्यषां शून्यं स्यात् । एवं राात्रवपि इज्यस्य गुरोः सदा दिवरात्रौ वा जन्म स्यात । तदारुपं चल भवति । अथेत्यनंतरम । अंघिचयावरणवृझ्या समामासाहोरेश्वरी बली स्यात् । एतदुक्तं वर्षशस्य बलं पाद ०1१५० पासशस्य ०१३०१० दिनेशस्य ०।४५/० होरेशस्य १1०1० बलम् । अर्थ-शुक्ल पक्ष गततिथिको १५ से भाग देना और रुष्ण पक्षों ऐष्य तिथिको १५ से भाग देना तो शुभमह (चन्द, बुध, गुरु, शुक ) इनका और यही १ से कम करके पापयह है (गी जीप शनिका पक्षपल होता है।

. " (३६४) केशवाजातकम् । उसमेंसे आया जो चन्द्रबल सो.दूना करना व तात्कालिक सूर्य और चन्द, इनका अंतर ६ राशिकी अपेक्षा ज्यादा होय तो १२ में कम करना जो शेष रहै उसको उच्चवलमें पूर्वोक रौतिके प्रमाण ६ से भाग देना तो शुभ ग्रहोंका और वही ६० मेंसे कम करके पापग्रहोंका पक्षवल होता है । व्यंशवल दिनके प्रथम विजाग, जन्म होय तो बुधका रूप १ बल, द्वितीय विमागमें सूर्यका, तृतीय विभागमें शानका ऐसाही रात्रिमें प्रथम विभागमें चन्द्रका, द्वितीय विभागमें शुक्रका, तृतीय विमागमें भौमका और सर्वकालमें गुरुका रूप । 0 1 0 जानना, वर्षपतिका चरणबल, मासपतिका अईबल, दिन- पतिका चरणत्रय बल, होरापतिका रूपवल यह वर्षमास दिनहोरापतिका बल जानना इन चारों बलके योगको कालबल ऐसा कहते हैं। वर्षपति बनानेकी रीति। द्विष्टोऽयं ग्रहलाघवयुनिचयश्चनाहतः पदशरैः पददश्व युतः सवाणतपन सेषुश्च खांगाग्निभिः ॥ खाग्यशविहृतं फले गुणयमध्ने चालिनाक्षरखोपेते सत्रियुगे नगोर्वस्तिकेस्तोऽसिमामासपो॥" अर्थ:-अभीष्ट चक्रको ५६ से गुणके उममें अहर्गण युक्त करना अनं- तर उसीमें १२५ युक्त करना ३६० से भाग देना जो भागाकार आवे उसको ३ से गुणके गुणाकारको चक्रके ५ से गुणके उसमें ३ युक्त करके सब अंक एकत्र करके ७ से भाग देके जो शेषांक रहे सो क्रमसे सूर्यादि वर्तमान वर्षाधिप होता है। मासपति वनानेकी ति। अभीष्ट चक्रको. २६ से गुण उसमें अहर्गण युक्त करना अनंतर उसीमें ५ युक्त करना,३० से भाग देना जो भागाकार- आवे उसको दूना करके उसमें ४ युक्त करके ७ ते भाग देके जो शेषांक रहे सो कमसे सुर्यादि वर्तमान मासपति होता है। .

(१६५) भापोदाहरणसहितम् । दिनपति बनानेकी रीति। अपने देशसे दक्षिणोत्तर मध्य रेखाका जो योजन होय उसमें उसका च. तुर्थांश कम करके तन्मित फल पूर्व मध्यरेषा होय तो १५ घडीमें कम करना अथवा पश्चिम रेखा होय वो १५ घडीमें युक्त करना अनंतर यह संस्कार युक्त बडी दिनाधसे जितना पल कमती होय उतना पल सूर्योदयके अनंतर वार प्रवृत्ति होती है । अथवा संस्कत बडी दिनार्धसे जितना पल अधिक होय उतना पलसे सूर्यादयके पूर्व वार प्रवृत्ति होती है इस प्रकारसे जन्म- कालमें जो वार होयं सो वारपति जानना। होरापति बनानेकी रीति. बारप्रवृत्ति लेकर इष्टकालतक जो घटी पल होय उसको दूना करना उसको २ स्थानमें रखना प्रथम स्थानमें ५ से भाग देना शेपको द्वितीय स्थानमें घटाय देना और १ युक्त करना तो वारपतिके कमसे अथीव १ बचे तो सूर्य २ में शुक्र ३ में बुध ४ में चन्द्र ५ में शनि ६ में गुरु ७ में भौम वह कमरो इष्टवार पतिसे गणना करके जो पार आये उसकी वह गत होरा जानना, अनंतर वर्तमान होराका खामी होरापति जानना। पक्षवलचारिणीप्रवेश. तात्कालिक सूर्य और चन्द इनका अंतर पइजाल्प करना अब सारणीमें ६. राशिकोष्ठक लिखके वह कोष्टकके नीचे रूपादि फल लिखा है उसमें से अंतरका जो राश्यक होय उसके नीचेका फल लेना राशिकोष्ठकके नीचे ३० अंश कोष्ठक और ६० कलाकोष्टक लिखा है उसमेंसे अंतरका जो इष्ट अंश और कला आये उसके नीचेका अंशला कलादि और कलाका विकलादि. फल एकत्र करके पूर्व में लिया जो राशिफल उसमें युक्त करना तो शुभग्रहोंका पक्षबल होता है और यह रूम 3 में कम करे तो पापग्रहोंका पक्षपल होता है इसमेंसे चन्द्रका वल द्विगुणित करना ।

(१६६) केशवीजातकम् । राशिफलचक्रम्। -- 01 ११२३४५६ 130 २ २ C 15010 अंशफलचक्रम् । द २ ११२१३१५/६७१८१९/२०११/१२/१३/१४/१५ १/१/१२/२/२/३/३/१४/६ P00२०४00/२०200018010/२०१० દી ૧૮રરરરરરરર રરરરરર दादा७१७,७१८८८1९/९/९/१: 712 : 020- कलाकोष्ठकम्। 7 . . ३१४ादा१०१शरमार,१६॥ ०११/१/१/२)२/२/३/३१३१४१४४१५ २०४०/०२०/४०.२०४०/०२०२०/४०० १६/१७/१८/१९/२०/२१/२२/२३/२४/२५/२६२७/१८/२२३० ७७.८1८1९/९/९२० २०४०/२०/४०० ४00/२00२०१४ ३१/३२/३३३३५३५/३६३७/३८३९/४/०९/०२/४३४४द १०१०१११ १३२३२९ २४०० १०/०२०१005020 क . 11. . . Blast-2018010 |Palkat siRaixel 2 |२०४:10 उहाहरण-सूर्य ०।१३।१०१४२ चन्द्र ९।५।२२।३५ इनका अंतर बा२२१११५३ यह ६ से ज्यादा है इसवास्ते १२ मेंसे कम करके शा ४८७ यह भया अब राशिकोष्टक ३ इसका फल ३० इसको अंशको . ट्रक ७ इसका फल २।२० और कलाकोष्टक ४८ इसका फल १६ एकत्र करके २१३६ युक्त किया तो०१३२१३६ यह शुनमहाका पक्षमा यहीं भाषोदाहरणसहितम् । (१६९) रूपमै कम करके ०।२७।२४ यह पापग्रहोंका पक्षबल और चंद्रका बिराणित ११५४१२ जानना. पक्षबलचक्रम् । मू. चं.. मं. चु. ३. ० 3 5 ० ०९ ३२ ३२/ २७ बल ३६ २४ २१ दिनरात्रित्रिभागबलोदाहरणम् । यहां दिनमान ३२१०१ इसका त्रिनाग १०1४० इस वास्ते दिनके तृतीय विभागमें जन्म इसवास्ते शनिका रूपबल और गुरुका रूपबल जानना १. और ग्रहों का शून्यनल जानना. दिनरात्रिविनागबल. सूचिं.मं.. वृ.शु. श) ग्र. १ . . . . . . . . बल . C , वर्षपतिवलोदाहरणम् । चक ३३ को ५६ से गुणके १८४८यह भया इसमें अहर्गण ११७८ युक्त करके ३०२६ यह भया, इसमें १२५ युक्त करके ३१५१ इसको ३६० में भाग देके ८ जया ३ से गुणके २४ या चक्र ३३ को ५ से गुणके १६० इसमें ३ युक्त करके १६८ जया पूर्वोक्त अंक २४ युक्त करके १९२ इसको ७ से भाग देके शेषांक ३ इसवारते वर्षपति मोम इसका बल 011५/० जानना. मामपतिवलोदाहरणम्। चा ३३ को २६ से गुणके ८५८ नया इसमें अहगंण ११७८ युक्त करके २०३६ यह हराये ५ युक्त करके २०४१ भया इसको ३० से मार

(१६६४)
१ केशवीजातकम् ।
दके ६८मया इसको दूना करके १३६ यह इसमें ४ युक्त करले १४० इसको
७ से भाग देके शेषांक ० इसवारते मारपति शनि इसका बल ३००है।
दिनपतिवलोदाहरणम् ।
देशांतर योजन ५ इसमें इसीका चतुर्थोश १ | १५ कम करके ३१४५
पल यह पश्चिम देशांतर है इसवास्ते १५ घडामें युक्त करके १५।३१४५
यह दिनार्ध १६ । २१ इससे १ घडी १८ पल कमती है इसवारते सूर्योद-
एके अनंतर १ घडी १८ पलसे वारप्रवृति नई जन्मकाल रविवारको ३२
घडी पलपर है इसवारते रवि यही दिनपति इसका वल ०1४५०,जानना.
होरापदिवलोदाहरणम् ।
वारप्रवृतिसे लेकर इष्टकालतल ३० ॥ ४२ इसको २ से राणके ६१
घडी २४ पल इसको ५ से भाप देके १२ आये यहां इष्टचारपति रवि
इससे गणनामें गत होरापति शनि और वर्तमान होरापति गुरु इसका बल
रूप (१)जानना ॥ ८॥
वर्षमातदिनहोरापतिचक्रम्।
सू दि] च
दिन
होस
.
म
घु
वृ
श
६५
मास
.
.
.
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०
A
.
८
.
.
कावल्योगबना।
माचा भाऊ
टाग्र
.
१२,
२१३६752012
23-122,३६१६१६
इदानी क्रमप्रापचेष्टापलं विविक्षुरादापयनबलमाह ।
सदा क्रांतिभागेर्युता ज्ञस्प सिद्धाः शनीन्द्रोद्युतोलाः
क्रमाद्याम्यसोम्पैः ।। पिलोमं परेपी गजाम्भाधि
४८ भक्ता भवेदायनं वीर्यमर्कस्प हान्नम् ॥ ९ ॥

. भाषोदाहरणसहितम् । - अन्वयः-जस्य धुधस्य दक्षिणैर्वोत्तरैः क्रांतिसागः सिद्धाश्चतुर्विशत्यशा युताः, शनींदोयुतोनाः क्रमात, याम्पसौम्यैयाम्यैर्युताः सौम्यैरूनाः, परेषां रवि- जोमगुरुशुमाणां विलोम सौम्यर्युताः याम्यैरुनाः सिद्धाः २४ कार्या गजा- म्भोधि ४८ भक्ताः संतः आयनं वीर्य मवेद । इदमायनवलम् अस्य द्विगुणितं सवेत् । अर्थः-सर्वकाल २४ अंशमै बुधका दक्षिण किंवा उत्तर क्रांतिनाग युक्त करना २४ अंशमै शनि और चन्द्र इनके दक्षिणकांविधाग युक्त करना और उनरक्रांतिभाग २४ अंशमेंसे कम करना २४ अंशमसे रवि , भौम, गुरु और शुक्र इनका दक्षिणक्रांतिधाम कम करना और उत्तर क्रांति जाग २४ अंशमे युक्त करना अनंतर सबमें ४८ ले भाग देना तो ग्रहोंका अयन बल होता है. परंतु यह बल सूर्य मात्रका द्विगुणित करना अथवा कांविभाग संस्कारित २४ अंशमें उसीका चतुर्थांश युक्त करना तो कलादि अयनमल होगा। कांति बनानेका श्लोक. "स्युः खंडानि खवाईयोम्बस्कृताः शेलामयोध्यानय- त्रिंशत्तत्वकृती नवारिनिधयस्तैः सायनांशमहात् ॥ बादशाकु १० भागसंख्यकयुतिः शेषेण्यघातादशा- ताच्या दिग्विहता लबादिरपमस्तदिक्स्वगोला भवेत् ॥" अन्ययः-अयनांशयुक्तारखेटाद ग्रहात् बावशा भुजनागास्तपां दिग्लयो दशमांशः तत्सितखण्डेश्यं कार्यम् | तच्छेपण घातागुणितायत् एप्पं ओग्यं संई पस्य यो दिनलयो दशमांशः तेन युतं सण्डैक्यं कार्य नवोदिग्मिहतो दश- भको लगायः अंशायः स्वदिक् सायनगोलदिए अपमः क्रांतिः स्यात् । अर्थ-ग्रहमें अयनांश युक्तः करके उसका पूर्वोक्त रीति करके भुज करना और उसके अंश करना १० से भाग देना जो भागाकार आये वत्परिमित नीचे लिखे अंकमें मिलान करना और भागाकारमें एक युक्त . ६ (१७०) केशवीजातकम् । करके तत्परिमित अंक लेके उसके ऊपरके अंशादि शेषको गुणके उस गुणा. कारको १० से नाग देके जो आगाकार आवे उसमें पीछेके अंककी मिलान युक्त करना और जो मिलान आवे तिसको १० से नाग देना जो भागाकार आवे सो अंशादि कांति जानना जो सायन यह उत्तर गोलमें होप तो उत्तर क्रांति और दक्षिण गोलमें होय तो दक्षिण क्रांति जानना गोल ऐसा कि, मेपसे ६ राशितक सायनयह होय तो उत्तर गोल तुलसे ६ राशितक सायन मह होय तो दक्षिण गोल जानना। क्रांत्यंकचक्रम् । १२।३१७/८९ १४०४०३७३४३०२१२८॥१२॥ क्रांतिसारिणीप्रवेश। प्रथम सायन ग्रह करके उसका भुज करके उसका नाग करना अनंतर सारिणीमें अंशकोप्टक ९० लिखके उत्तके नीचे अंशादिफल लिखा है और दश दश अंशके अंतरसे अलग अलग ६० कलाविकलाकोष्ठक लिखा है, अब अभीष्ट भुजभागकोठकके नीचेका अंशादि फल लेके उसको भुगनागके नीचे जो कला विकला हो तत्तत्सरिमित कलाबिकलाकोष्ठकके नीचेका कलाका कलादि और विकलाका पिकलादि फल एकत्र करके युक्त करना तो महाँको अंगादिकांति होती है। उदाहरण-सूर्य ००।१३।१०।४२ इसमें अयनांश २५१४११०३ युक्त करके ०१५५४४५ यह सायन सूर्य इसका भुज किया तो वही रहा ०१५।५४४५ इसके अंश ३५।५४।४५ यह है इसवास्ते भुजनाग- कोष्ठक ३५ से नीचेका अंशादि फल १३१२४१०० कला ५४ का कलावि- कलाकोष्ठकका कलादि फल १८२२ विकला ४५ का कलाषिकलाकोटकका विकलादि फल १५।१९ यह कलाविकलाकोष्टकाल एकत्र करके १८१३७ भापोदाहरणसहितम् । यह पूर्वोक्त अंशफल १३२२४०० में युक्त किया तो १३॥४२॥३७ यह सूर्यकी क्रांति भई इसी प्रमाण सब ग्रहोंकी क्रांति बनाके अयं सायन सूर्य उत्तरगोलमें है इस वास्ते उत्तर क्रांति जानना । कातिचक्रम् सूर्यः चद्रः मंगल: बुधः बृह. शुक्रः शनिः ग्रहार . १ ४२ ५६ / १७ ३७ / २२ ६५ बलम् ६७ २२ उत्तर उत्तर दक्षिण उत्तर उत्तर दक्षिणा दक्षिा उत्तर क्रांतिसारिणी। म.राशगा।६७ ७/८/९/ . ० ७ . १५८२२३६-२४४८/१२/३६ क. ८ क . . . कलाचिकलाफल। . २.३४६/६/७/८/९/२०१२१/१२/१३१४ ८ . . . 5.ध.10 १ ૨૮ ३६/०२४/८/१२/३६ ०२४४८/२२/३६ को./१२/१६/१७/१८/१२/२०२१/२२२३/२४२५२६२७/२८/२२ .. . ७/८/८1८1९1१/१०/१०/१०/२११ ०२६/१८/१२/३६ ०२४४८१२३६ ०२४/४८/१२/३६) को. રરર રરૂવારર૭૨૮Jee's . . C द . . .10 C ० . ०० . ० 9 .

(१७२) केशवीजातकम्। कांतिसारिणी। . भुभ १०/१२/१२/१३/१४/१५/१६/१५१८/१२॥ २४/४८१२३६०२४/८/१२/३६ फ. फ. ८ . . कलाविकलाफल। . C C ० . को १/२/३/५/६१७१८/९/२०११२/१२११३३१५ 10 . ३/३/४|४|१५ २४८१२ ૧૮/૩૬ का |१८||६|| २३॥ २९) ८ . 01 . . २ . . कप६/६/६/७/७/८/८/८/९/२/१०/१०/१०/११/१२) १२३६२४३८.१२.३३ को-३१३२/३३/३/३५/३६३३०३.४१४२४३४) क क. प.1 Relect२/३६ : २४४८/१२/३६1 = २४८३६ मोतिमारणी। इ.स.२०२१/२२२३२४२२२६ अश ६२८५११२. फल ८ielme भाषोदाहरणसहितम् । कलाविकलाफल। ११.२/३/५६/७/८/९/२०१२/१२/१३/११ 0 ० زوا اور ای कि.ध. ०२२१२ २८५२/१३/३०५७/१२/१२/१२६०१ को.१५/१६/१७/१८/१९/२०१२१/२२१२३/२४२३२३२७ ५ क.ध. २॥१२॥ का.३०/३१/३२/३३९३४३२३६/ ३८/३२/४०४२१२३/ १४१४ क.ध. ३९५७१९४४१३/२/१८/१० क्रांतिसारिणी। મુ. રરરરરર૮૩ (१२/१२/१२/२३१३/१३/११/२४१४ फ .२८/१२) 09/८/१२/३३ कलाविकलाफल । ६७/९/१०२११२/१३/१४ 313|३४|४|४ . २ . ૨૪ को .२७/८/२/५/२१/१२/२३,५४ (१६२६/१६२६१६/१७१७१७२८१८१८:१२/१२/१९/२५ ६३२५९२-18 ४२ २२१/३/२/ OC MV की 6 20 N . o कर Vt0 . V 1M wwi 2112 1818181201 SIMIRE m ~ ० r . 3 & m . N 0 Dur m 1७15 3 0.0 (० केशवीजातकम् । m 10101010101010 1:10 218 is โนะ कलाविकलाफल। ar कांतिसारिणी। 00 क्रांतिसारिणी। a 10 ur m M m . 20 0 141 V a m n I.Cine ~ क [९ १८३६२४२३ गे।४६/25/ Vw 11 212 20102/६/२:५२ ~ U . ग ~ 200 क ० . " o ० m Im-0" मे I को भ 11 (806) पापोदाहरणसहितम् । (१७५) ८ ० कला विकलाफल। का.J0 १४.५/६१७/८/९११७११/१२/१३२४ 12 २२/२३/३/३ क.ध. ०२५३० का. १५/१६/१७/१८१९२०२२२२२३२१२५/०६२७२८२९/ ६६६६७७ १५/०२६/३०/४ १९३० : 11 को. Yes = २६/५/e/ //2/: ४ि. को. म. प.९५/३०/४५/ . /१५/३/४० : १६/३/४०१५३ -२ क्रांतिसारिणी। सं. २.३८८६६/६७६८०६९) २०२०/०२/२१२१.१२१२२२९) ३६.३६/०७/८/२९/ ०१/२/२३ फल 4:5/२५ ० . ० ० C . कलाविकलाफल । को. १ २१३१४५१६७९१०१२/५३/५४ ११११११/२/२/२ ०२०/२१/३२४५२११६२६३७४८/५९/१०/२१/३२ का. १५/२६/१७/१८/१९२०२२/३२/२३/२४२५२६२७/२८/२२] .ध. ४२ ४१५/२६/३६४७/०८/२ मो. ३०/३१/३/३/३५/३०/३६/३/३९/४/०१/१२/४३/ ७/७/७७७७ F.ध. २४३५४६/२७/८/१८/२९/४ ३/०५६ को .४६४७४ ८८/८/८/८.९९ १९/९/१०/१०/२०१७ ६११ २010 १/२२/३१४२५

(१७६)
केशवीजातकम् ।
शांतिसारिणी।
म.मं]७०/७१/७२/७३/92/5/satsss.७२,
કોરર રરરર રરરર રર૩
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०/१२/२४ 124 रन
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कलाविकलाफल।
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को १/२/३१.५१६७८९१०/१२।१२।१३।११
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७/१४२११२८३६४३२०/२५४१२/१९/२६,३३/४०.
मे १६५६/२७१८/१९००२१/२२/२३/२४/२५२६२०/२८/२२॥
२/१२/२/२/२/३/३/३
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૭૧૨૧૮
को ३३१३२/३३३४३५३६/३७३८.३९/४४१/४२/४३
३३
३६८३२०२७/४/१२/१२/२३३/४८२/२/९/१६)
४६/४७/४८०२/२०/२२२०२२२२६२७/२८/६९
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२८
.
७
१/२

.मापोदाहरणसहितम् । पलापिलाल। '(१७७) का २ १ अ १८ हा७१८१२१११११२१ - १३/२३ -- ३ २ . . २ २ દર૮ર૧ર૩રર૭૩૦૩૨ बा १८१६ २०/२१/२२ ३२४२५२६२७२८२२ १/१/१/१० T... २२/५४ ५९/१४६८ का३३१३२३३,३४३५३६/३७३८/३२/१०/११/४२४३/४) ३ C २६२८३०३३/३/३७४०,४२/१४ Rin/ 2.२ हो.le/२२/१०/२२५२५३,५४२०३६५७/५८९२) १११११/१/२०१२/२/२/२/२१२ २१४६९ १८२० अयनबल्सारिणीप्रवेश. ग्रहों के दक्षिणोत्तरकांतिसंबंधसे अयनवलसारिणीमें शून्यसे २४ तक २५ शांतिभागकोटक दो ठिकाने लिखा है. जब सूर्य, मंगल, गुरु, गु इनकी उत्तरकांति और शनि, चन्द्र इनकी दक्षिणक्रांति और बुधकी दक्षिण किंवा उत्तर क्रांति हो तब प्रथमक्रांतिमागकोष्ठकोसे अगोष्ट क्रांतिभागकोडकके नाँचेका रूपादि फलको ले उसको अंशकोष्ठकके आगे ६० कलाबिकलाकोष्टक लिरमा है उसमेंसे शांतिभागके नीचे नो कला विकला होय तत्तत्परिमित कला- रिकलाकोष्टकके नीचेका ४७ कोष्ठकसे कलाका विकलादि और विकलाका अतिकलादि और ४८ कोष्ठकसे कलाका कलादि बैताही विकलाका विक- लादि फल एकत्र करके युक्त करना तो मिनाशन ग्रहोंका अयनवल होता है। जम सूर्य, भौम, गुरु, शुक्रकी दक्षिण क्रांति और शनि चन्दकी उत्तर क्रांति होय तब द्वितीय क्रांतिधागकोठकमेंसे अभीष्टक्रांतियागकोछकके नीका रूपादि फाल लेना अनंतर आगे ६० कलाविकलाकोष्ठक लिखा है उसमेसे मीट- कांतिभाग नाचे जो कला विकला होय तत्तत्सरिमित कला विकलाकोष्टक नोचेका कलाका कलादि और विकलाका विकलादि फल एकत्र करके लिया जो अंशफल उसमसे कम करना तो यहाँका अयनवल तैयार होता है. यह अयनवल सूर्यका मात्र दुना करना ।

मापोदाहरणसहितम् । (१७९) उदाहरण-सूर्यको उत्तर कांति १३३४२१३७ का अंश १३ है. इसवास्ते यहां प्रथम विभागकोटक १३ का फल 4.४ घटी १५ इसकी क्रांति- नाग नाचेकी कला १२ विकला ३७ इसका कलाका विकलादि और विकलाका प्रतिकलादि फल एकत्र करके ५३१६ यह विकलामें युक्त करके १७१८ यह दृना करके ११३४११६ यह सूर्यका अपनवल भया इसी प्रमाण मारणारी चन्द्रादिकों का अपनवल होता है ॥ ९ ॥ अपनवलचनमा . मृपः मगर: : ग्रहाः ८" पर ६ १८ ✓ इदानी भोमादिनां चेष्टावलमाह । मध्यस्पयुतेदलोनितचलं चेटास्यकेद्र कुजात स्यात्तचन्दगणाच्युतं पडधिक पइय चेष्टावलं ॥ स्यादेकोत्तारूपमद्रिविहृतं नैसर्गिक स्याटलं मंदारज्ञसुरंज्यशुकशशभृत्तीक्ष्णद्युतीनां कमाव ॥ १० ॥ अन्पपः-मध्यसष्टयाग्रहयोर्योगाधेनोनितं चल नाम शीघोचं तौमादीनां चेटासंसक केन्द्र स्वाद तत्केन्द्रं चेत्पडधिकं तदा द्वादशराशियः शुदं ततः पड़ढचेष्टारलं भवति चकारादुचवलसाधनवागविधिरत्रापि ज्ञेपः अत्रेदं ध्येयं पनि मध्यस्पश्यतो द्वादशाधिक तया द्वादशास्तष्टं ने कार्यमिति नैसर्गिक बल स्पादित्यम्प पूर्थन संबंधः एकोचररूपमदिविहतं तदा कमाच्छनिधोमयुर- रामशुमचन्द्रस्याणां नैसर्गिकं बलं स्पा तथा एकस्मिन् समभक्ते शनैन- सर्गिकपलं वयोः समभक्त भौमत्य एवं क्रमासपेषां ज्ञेयम् ॥ १० ॥ झापा:-मध्यम और सटाहका योगाई उसी ग्रहके शीघोच्चमें कम करना तो भौमादिग्रहोंका चेाकेन्द्र होता है. यह केन्द्र ६ राशिसे ज्यादा होय तो १२ - (१८०) केशवीजातकम् । राशिम कम करना अनंतर उच्चवलमें पूर्वरीतिप्रमाण ६ से जाग देना तो चेटा. बल होता है अथवा पलाल्प देन्द्रका अंशादिक करके इसको ३ से भाग देना तो सुगम रीतिसे चेष्टावल होता है यह अयन और चेशावल इनके योगको चेटावल कहते हैं । अनुक्रमसे ३ से तक अंकको ७ से भाग देना नो क्रमसे शनि, भौग, बुध, गुरु, शुक्र, चन्द्र, सूर्य इनका नैसर्गिक पल होता है। अथवा ८ । ३४ । १७ इनको कमसे १ से ७ तक अंकसे गुणना तो शनि भौम इत्यादि यहाँका कलादि नैसर्गिक्वल होता है अथवा शनिके बलको दूना तिगुना चौगुना करते जावे तो वही कमले बल हो जायगा। भामादिग्रहाका शीघ्रोच्च बनानेकी विधि । बुध और शुक्र, इनके शीमकेन्द्रों मध्यम सूर्य युक्त करनेसे बुध शुभका शीयोच होता है और मंगल, बृहस्पति, शनि इनका शीघ्रोश मध्यम सूर्य है । मध्यमग्रह। सहमह । म यु शु ग्र म म G . द ५ द म (सह १ ३७ मपमयोगदलचकम् । मध्यतरशतः। ध श्र ५ ६ ५ २ ८ . ८ :५ ४२ ट . ३ . ५१ ११ L शाप्रोच चक्रम्। धामन्दचक्रम् । मा म. भ 21 न . २ ७ ३ २ 1 भापोदाहरणसहितम् । (१८३). चेष्टावलसारिणी प्रवेश चेटाकेन्द्र पडसाल्प कर सारिणीम राशिकोष्टक लिखके उसके नीचे कोटकमें रूपादि फल लिखा है उसमें से पड़ताल्प चेष्टाकेन्द्रका जो इष्ट राश्यक होय उसके नीचेका फल लेना अनंतर राशिकोष्ठकके नीचे अंश- कोष्ठक और ६० कलाकोष्ठक लिखा है, उसगेसे पक्षाल्प केन्द्रके जो , इष्ट अंश और कला आये तत्परिमिति कोष्टकके नीचेका अंशका कलादि और कलाका किलादि फल एकत्र करके पूर्वमें लिया जो राशिफल उसमें युक्त करना तो ग्रहोंका चेक्षावल होता है यह सारिणी प्रवेशसे इष्टकष्टाध्यापका सूर्यचंद्रका चेदावल करनेके वास्ते काम पडता है। चेटायलसारिणीरराशिफल । ०१११२।३।४।९।६० . ३ . . ० २ १० १०२०/३०/४०५० 2 ८ ...J०० ० ० अंशफल । २४/२/६/७/०९/२०११/१२/१३/१४/१५ ०१.१ .. १६१७१८/१०/२००२२/०३/२८२२२६७१८२२६३० २.१ टीप:-आगपरेज्यसौरोणां शोधो स्यादिवाकरः ।।

(१८२) केपीजातकम् । PM ETV BIPI IMIRAT पला पिकलापला. (111211/10 ३११४ 06/2013 १२०२८ 013 Eaj६७७७ २0102010 ट c ३२३,२२३६३५/३८ ३९ipajar १.१११११५१२/१३ २.१०.२०४००२): ४६४७१८२/०७५५५०२३ ८० (१८४२५/१६२६१६१८/९८५८१८१२ २०१० 0 1000000 sonR०४० : उदाहरण-ओमका चेष्टाकेन्द्र ७।९।३६६ यह ६ से अधिक है. इम- पाने १२ मेंसे कम करके ४।२०१२३०४ यह इसका राश्यक है.इस- यास्ते ४ राशिकोटकला फल ।। ४ ० १ ० इसका अंश २० इसवास्ते २० कोष्ठकका फल ६।४० और क्ला २३ इसवास्ते २३ कलाकोटलका फल ७११० एकत्र करके ६ । ४८ यह राशिफलमें युत्तः करके ०४६।४८ यह सोमवा चेष्टायल भया, इसही प्रकार बधादिकका करमा चावलपन। अपनचेष्टायलचक्र। मनु च गु.श C ३ ३४५६२/२०१५/४६२२ ६१०४०/०१/१०/१३/३१ . नैसर्गिनवलोदाहरण। एकको ७ से भाग देके ०८।३४ यह शनिला, दोको ७ से झाग देके 011७1८ यह सौमश, ३ को ७ से जाग देके ०।२५।४३ यह बुधका, चारको ७ से नाम देके १३४.९७ यह गरुका, पांचको से नाग देके - भापोदाहरणसहितम् । (१८३) ०१४२१५१ यह शुक्रका, छको ७ से भाग देके ०५३।२५ यह चन्द्रका, ७ को ७.२ जाग देके ३०० यह सूर्यका इसी प्रमाण ग्रहोंका सब काल एकही नैसर्गिक बल होता है । यह वल सिद्ध है ॥ १० ॥ नैसर्गिकवल। ग्रह. म. म. 3. (रा.श. . C म 1०७२/२०/२५३४/३२८ ०२६/८/३/१७,५१३ युद्ध वाणवियोगहत्वचस्योवाक्पयोरंगरं स्वं सौम्यस्थवले क्षयं च यमदिवप्रस्थस्य कुर्यादले ॥ सदृष्टयंत्रियुगुनदृष्टिचरणोनं खेटवीर्य भवेत् भावानां बलमीशनं च नृचतुष्पादास्यकीटांबुजाः ॥११॥ जायाँबायखभोनिताः खलु ततो दिर्यवत्तद्युतं सदृष्ट्यात्रियुगुनदृष्टिचरणोनं शेज्यहम्युक्पुनः ॥ अन्वयः-स्वचरयोस्तारामहयोः भौमादिषहयोरित्यर्थः। युद्धे सतिवीर्यक्य- योलैश्ययोरतरं बाणवियोगहत शरांतरेण भक्तः सन् यल्लम् तत्सौम्यस्थस्यो- नरस्थस्य यहस्यं बले खं धनं कुर्यात् यमदिसंस्थस्य बले क्षयमृणं कुर्यात् । यहस्य दक्षिणोत्तरस्थज्ञानं तु शरशेन भवति तद्यथा यस्य ग्रहस्पोत्तरः शरः । स उत्चरस्थः यस्य दक्षिणः स दक्षिणस्थः यदि योरुत्तरः शरस्तदा यस्यापिक- शरैः स उत्तरस्थोऽन्यो दक्षिणस्थः यदि योदक्षिणशरस्तदा यस्याधिकारः सो दक्षिणोस्थोऽन्य उत्तरस्थ इत्यर्थः । इदानी हाबलम् ग्रहाणां धागानीतं, चलं सतां शुममहणां दृष्टिचतुर्थाशेन युतम् उग्राणां पापानां दृष्टिचतुर्थाशेन रहने काय तदा पक्षाणां वीर्य भवेत् । भाववलम् | मालामेकं बलं स्वामिवालमेनच पुनर्वितीयं बलं नचतुष्पादास्यकीटाम्बुजा गावाः नरचतुष्पादकीटजलचररा- शयो भावाः क्रमेण जायांम्वाद्यसनोनिताः, सप्तमचतुर्थप्रथमदशमनाङ्कहना (१८४) केशवीजातकम्। यदि पनाधिशास्तदा द्वादशशियः शुभाः पाल्पा यथास्थित एव ततः पड़ाताः फलं दिग्बलं भवेत् अनयोगिः कार्यः स तु शुनग्रहष्टिचतुर्थाशपाए- ग्रहष्टिचतुर्थाशयोत्तरं धनणे पूर्वोक्तमत्कार्य, बुधगुर्वोटियोरक्यं तृतीयंबई त्रयाणां योगे स्पष्ट जावबलं स्यात् । अर्थः--जब जन्मकोलमें २ ग्रहोंका युद्ध होता है कहिये यह ग्रह राशि- भागकलासे सम होते हैं तब ३० ग्रहाका कलात्मक शर करता अनंतर वही महाका पूर्वोक्त बलका जो ऐक्य उसका अंतर करके उसको शरके अंतरसे भाग देना जो फल आवे सो उत्तर दिशा में रहनेवाला जो ग्रह उसके बलमें युक्त करना और दक्षिणदिशामें रहनेवाला जो यह उसके बलमैसे कम करना यह संस्कार चेष्टावलका भेद है। टीपः-सूर्यसे चंद्रादिकोंका जो समागम उसको अस्त कहना और भौमादि ५ महांका परस्पर जो समागम उसको युद्ध कहना । शरका आनयन ग्रहलावधमे कहा है तो ऐसा उसमें प्रथम पानांशादि खाम्बुधयः खयमाः सभुजंगाः स्वांगमिताः सदशक्रमशः स्युः ॥ पातल्वाः कुसुताइधभृग्योर्मध्यमचंचलकेन्द्रविहीनाः ॥ कुहिम्याब्धियुगाश्विनोदलदयरपड्भपुर चलें। केन्द्र चाविशुद्धमत्य भमितादवयंलयनागतात् ।। शिल्लब्धयुत कुजात्कुयमलाब्धान्दाद्विभक्त क्रमात तदीना धृतिरिपिला गुणभुवो गोन्जा इना द्राक्श्रुतिः ॥ १॥ माया !! शीवाद | १/२/३121 2 ग्रहाः 0/३.१००पालाशाः भव्यांदाः २८१५१३१९] १२ शेघरण कः सांपोदाहरणसहितम् । (१८५) शरके लिये शीप्रकर्णका प्रकार । भौमादि जिस ग्रहका कर्ण साधना होय उसका अंतिम शीघकेन्द्र लेके यह ६ राशिकी अपेक्षा अधिक होय तो १२ राशिम कम करना और वह पड़माल्य केन्द्र के राशिपरिमित कोष्ठकमें लिखा जो शीपांक उसकी मिलान लेना, और एकाधिकाशिपरिमिव शीवाको केन्द्रकी राशि त्याग करके अशादिकको गुंणना और उस राणाकारको ३० से भाग देना तो फल अंशादि आयेगा उसमें शीनांककी मिलान युक्त करना जो योग आये उसको क्रमसे कोष्टकमेंके भाज्यांकसे भाग देना जो फल आवे सो अंशादि जानना वह क्रमसे कोटकमके शीघ्रकर्णीकमसे कम करना जो शेप रहै सो ग्रहोंका अंशादि शीमकर्ण होता है और जो बुध शुक्रका पातांश कहे हैं उसमें अहर्गणो त्पन जो बुध और शुक्रके जो शीघ्रकेन्द्र होय सो ऊपर कहा जो पातांश उसमेसे कम करके जो शेष अंश रहै सो बुध और शुक्रके पातांश होते हैं। भोमादि शर बनानेका प्रकार । मंदस्परसगात्स्यपातरहितानात्यंशकाः केपला- स्कर्णातात्रियमाहता अथ गुरोचेलोचनामा पुनः॥ स्वांध्यूना अमृजोऽहुलादिकशरः पातोनदिक स्या- दसो विघ्नः स्यात्कालिकादिकः ।। भाषा:-जिस महका शर बनाना होय उस महका पातांस मंदस्पष्ट महमेंसे कम करके जो शेप रहै सो पातोन मह मया अनंतर पातोनमहको अपनाशा देने विना उससे कांति लाना और उस क्रांतिको २३ से गुंण और उस राणाकारको शीघ्रकर्णरो भाग दे तो अनीट प्रहका अंगुलादि शर होता है, सो पातोन ग्रह उत्तर गोलमें होय तो उत्तर शर, दक्षिणगोलमें होय तो दक्षिण (१८६) केशवीजातकम् । शर ऐसा जानना वैसाही रास्का शर करना होय तो ऊपरकी रीति से ले आये जो शर उसको २ से भाग देना तो गुरुका अंगलादि शर होता है. और भौमका शर करना होय तो ऊपरकी रीतिसे ले आये जो शर उसमेंसे उसीका चतुर्थांश कम करना तो भौमका अंगुलादि शर होता है अनंतर बनाया जो शर उसको ३ से गुण देना तो कलात्मक शर होताहै। हाबल। यहाँ पर जिन ग्रहकी दृष्टि होवे उनमें शुमग्रहकी दृष्टिका ऐक्य करके उसका चतुर्थांश लेना तो वह धन हाबल होता है, और पापग्रहके दृष्टिका ऐश्य करके उसका चतुर्थांश लेना तो वह ऋण दृग्वल होता है. अनंतर धन हम्बल और ऋण हम्बल इनका अंतर करना तो : स्पष्ट हाबल होता है। टिप्पणः-चन्द्र, बुध, गुरु, शुक्र यह शुभग्रह और रवि, गौम, शनि यह पापग्रह हैं। बुध पाप ग्रहयुक्त होय तो पाप, शुभग्रह युक्त होय तो शुभ, मिश्रययुक्त होय तो मिश्र फल जानना । उदाहरणः-सूर्यके ऊपर शुभग्रहकी इटिका ऐश्य ॥३६४२ इसका चतुर्थांश ०२४३० यह धन दृग्बल और सूर्यके ऊपर पापग्रहकी दृष्टिका ऐक्य ०।२९।२१ इसका चतुर्थांश ०७।२० यह ऋण हम्बल इनका अंतर ०१६:५० यह धन हम्बल सूर्यका भया इसी प्रमाण चंद्रादिकोंका करना। टिप्पण:-शुभग्रहको दृष्टिका चतुर्थांश पापमहको दृष्टिक चतुर्थांशमें घट जाय तो ऋण दृम्बल अन्यथा धन हाल जानना। हम्बलकांमटम । सूयः चन्द्रमामा बुधः गभगः शन. . . 3 ३ ४७ चल धन मण भापोदाहरणसहितम् । (१८७) पडूबलैक्यचक्रमिदम् । सूर्यः । चन्द्रः। मंग. | बुधः वृह. | शुक्रः । शनिः ग्रहाःर २. १ १ ४८ ३ स्थानरल १ ९॥ १३॥ ५९॥ १०॥२०॥ २ m.o . C ०. . ० . o १ ४१ ४९ ४५ ३८] दिग्बल २ ३२ १ १ ३ २ ३२ १ १ २८ कारवल ३ ३२ २४ ३६ २६] १६ ४४ १ १ ५६. २९२१ १९| ४६ / २९/ चटावल ४ १२ ४६ १ . १ 20-052/05555 . १ . . ५१ २७] २५ ८ निसर्गबल५ . ८ १७/५१ ७ ७ २१, १२ ५२॥ १७॥ २६॥ २५/२७॥ २६ १० पाचोंका योग ७ . ८ ० हाबल २६ धन २मण क्षण | २ऋण ध.२३॥ माण२१धन २६ २० ७ पटूयल्योग १२/ ३५ ४॥५१॥ २३॥ २७॥ ७॥ १२ भाववल। भाषा:-लग्नादि भावोंके स्वामीका जो बल सो समादिभावपल होता है। मनुष्यराशिम मिथुन, कन्या, तुला, धनका पूर्वाई और कुँा इनमेंसे समम भाव कम करना चतुष्पद राशि मेप, वृपत, सिंह, धनका उत्तरार्द और मकरका पूर्वाई इनमें से चतुर्थ भाव कम करना कोटराशि कर्क, वृश्चिकमसे तनु जाव , - (१८८) केशवीजातकम् । कम करना। जलचर राशि मीन और मकरका पश्चिमाई इनमेंसे दशम भाव कम करना अनंतर शेप ६ राशिकी अपेक्षा अधिक होय तो १२ राशिमसे कम करके पझाल्प शेषसे दिग्बल में पूर्वोक्त रीतिप्रमाण बल साधन करना तो भाव दिग्बल होता है । अनंतर यह दिग्नल भावबलम युक्त करना । भावपर जिन २ ग्रहोंकी दृष्टि होय उसमें से शुभग्रहोंके दृष्टिका ऐक्य करना और चतुर्थांश लेना तो यह धनरम्बल होता है और पापग्रहोंके दृष्टिका ऐक्य करना उसकाजी चतुर्थांश लेना तो वह भणम्वल होता है। अनंतर धन ऋण दृम्बलका अंतर करना तो सष्ट दृम्बल होता है । यह दिग्यल संस्कृत जावबलमें धन होप नो युक्त करना, क्ण होय तो कम करना फिर भावके ऊपरकी युध गुरुकी दृष्टि युक्त करना तो स्पष्ट भाववल होताहै। भावपलोदाहरणम्:-तनुभावस्वामी शुक्र इसका पहलैक्य५।३१।३७३० यह तनुभावबल इसी रीतिसे धनादिभावोंका बल जानना । तनुभाव ६।९।१२।२६ यह लमराशिम भनुष्यराशि है । इसवारते इसमेंसे सप्तमभाव ०।९।४२।२६ कम करके ६।०१०१० यह ६ से ज्यादा नहीं इसवास्ते ६ इसका फल पूर्वोक्त दिक्यलसारणोपरसे १।०१० यह तनुभावदिग्बल और यह तनुनाव बल ५।११।३७।३० इसमें युक्त करके ६।३११३७।३० यह दिग्पलसंस्कृत तनुभावबल भया । तनुभाषपर शुजमहदृष्टियोग ११४३।२ का चतुर्थांश १२५४४५ धनहम्बल और पापग्रहदृष्टि ११३९।१२ योगका चतुर्थांश ०२४१४८ ऋणग्वल इन दोनोंश अंतर ०।०५७ यह धन स्पष्ट- हाबल नया यह दिग्बलमस्रुत तनुभावबलमें युक्त करके ६॥३२॥३४॥३० यह भया । अब तनुनावपर बुधदि ०१५०५० गुरुदृष्टि ०1०1४४ युक्त करके ७१२४६८।३० यह स्पष्टवनुभावपइरल भया इसी रोतिसे .धनादिनावोंका सपल करना।

भाषोदाहरणसहितम् ।
(१८९)
'मावाः
विंबलचक्रम् ।
त. घ.स.सुपु जा. मृ.ध.क.आ.व्य.
३८४२०३१९२२०५१,१२/ भावस्वामियटन
વિસર : ७२५/४/२३,२३
Pain
018
1
३
C
३/३/३०३०
०
०
०
.
.
०
.
२२/२०१५
०२०३९०
२०२०
७ ० ० ०
१/४२९३९
२२०३९/१/१९१९/ भावदिग्यलयकाम
.
.
.
.
.
.
.
.
...
(१६४३९
योगः
६/५/८/६/६८५६/५/७/८६
१/२१/२०१२
३७११/२७१२/३६
०३०३030/३०३०/३०
.
२
C
०
.
.
.
0
.
.
भावहावल
.
८२०
૨૪ર૬ર૧૨/૧૭
५७१२४३८]
घ
.....ध. ध ध ध ध.
६५८६६।८५६/५८/८६
योगः
-
.
.
.
३४/०९१०१३१३२ २८/६९/१२/१२५२/९
1०1३०० 0/३०/३०/३०/३०/३०/३०
२
०
९३६३२३८
२०० . ०/४/२/२0120/४२
.
.
.
.
C
बुघटिः
.
.
.
.
.
.
C
.
२
.
गुरुढाष्टि
०
०/११/११/५२/६५८४१५३२ .
.-10.la..
.
.
०
८८७
3८/२०/पष्टभावपरचक्रमः
૮૭ વાવ ३२.२
001003/23/2012०1३०
जगदीशेन रचिते केशवीग्रंथटिप्पणे ॥
बलाधिकारः पूर्णोऽयं तद्रापार्थप्रकाशकः ॥४
इति बलाध्यायश्चतुर्थः ॥ ४ ॥

- (१९०) केशवीजातकम्। अथेष्टकष्टाऽध्यायः ॥५॥ इष्टकष्टसाधनार्यरविचंद्रचेशावलकेन्द्रसाधनम् । व्यकैन्दुस्त्रिभयुक्तमायनरविश्वेष्टाल्यकेन्द्रं तयो- गोकप्टेटविधो बले कुरु ततः प्राग्पन्न वीर्याय ते ॥ १२ ॥ अन्वयः-पिगतोऽको यस्मादिन्दोः स चासो व्यर्केन्दुः त्रिनयुक्तसायनर- विश्व क्रमेण तयोश्चेष्टास्यकेन्द्र मवतः तपथा अर्कोनश्चन्द्रश्चन्द्रस्य चेष्टाकेन्द्र राशिवयेणायनांशैश्च युतो रविः सूर्यस्य चेटाकेन्द्र स्यात् नतस्तायां केन्द्रायां भाग्वद्रोमादिचेष्टापलसाधनवत् पडधिकं चक्राच्युतं पइहृदित्यादिना रवीदो- बलं कुरु भो गणकेत्पध्याहारः। कस्मिन् विधौ गोकप्टेटविधौ गायो रश्मयः कष्टं चेष्टं च कटेप्टे कटेष्टयोर्विधिः कोटविधिस्तस्मिन् कष्टेष्टविधौ अयनयो- चेष्टायलयोः कटेष्टसाधने उपयोगोऽस्तीत्यर्थः । न वीर्यायेति भावः यतः- "विसंगुणे चायनपक्षवीर्य चेष्टाबले तिग्मकराजयोस्तः" इति ।। मापा:-चन्द्रमेंसे सूर्य कम करना तो चन्द्रका चेटाकेन्द्र होता है. और सायनसूर्यमें ३ राशि युक्त करना तो सूर्यका चेष्टाकेन्द्र होता है अनंतर इस केन्द्रसे रश्मि क्टेष्टसाधनार्थ उच्चवलमें पूर्वोक्त रीतिप्रमाण चेष्टायल बनाना यह चेष्टायल पूर्वक ऐसा पइयलार्थ नहीं समझना कारण सूर्यका जो अयनवल वही चेष्टावल है इसवास्ते दुना करना और चन्द्रका जो पक्षवल वही चेटायल है इसवास्ते दूना करना । उदाहरण-चन्द्र ९।५।२२।३५ यह इसमसे सूर्य १११४२ यह कम करके ८१२२ । ११ । ५३ यह चन्द्रका चेष्टाकेन्द्र भया और ०।१३।१०। ४२ यह इसको अयनांशा २२। ४४ । ३ युक्त करके ११५१५४।४५ यह सायनसूर्य इसको ३ राशि युक्त करके ४।५१ ५४ । ४५ यह सूर्यका चेष्टाकेन्द्र अनंतर यह चेष्टाकेन्द्रसे पूर्वोत्तरी- विसे पूर्वमें लिखी जो चेष्टावलसारणी ऊपरसे बनाया मो यह चंद्रचेष्टावल ०३२ । ३६ सूर्यका चेटविल 1४११५८॥

भापोदाहरणसहितम् । (१९१) रहमीष्टकष्टसाधनम् । ये चेष्टोचवले रसविनिहत्ते के निजा रकमय- श्रेष्टातुंगवलाहतेः पदमिहेष्टं स्पाइलोनकयोः ॥ घातान्मूलमिदं हि कष्टमय तद्रूपं दशायाः फलं वीर्य हक् पृथगिष्टकष्टाणिते द्वे चेष्टकष्टाहो ॥ १३ ॥ अन्वयः-सूर्यादीनां मागानी ये चेष्टोच्चबले ने पनिगुणिने सैके कते सति निजा रश्मयः चेष्टाबलाचेष्टारश्मयः, उच्चमलादुचरश्मयो भवति इत्यर्थः । चेष्टाबलेनोचवलं गुणनीयं गोमूत्रिकागुणनरीत्या, तस्य मूलमिष्टसंज्ञे स्थान चेष्टबलतुंगबलोनकयोघीतान्मूलं कटसंज्ञं स्यात् दशाफलं तद्रूपं स्पात अर्था- दिष्टकटतुल्पफलमिति इष्टेऽधिके सति शुभमधिक, कटेऽधिकेऽशुभमधिकं, साम्बे मिश्रफळं दशायाः स्यात् ग्रहस्य बलं अर्थात्पड्वलैश्य स्थानद्वये स्थाप्यं तथा ग्रहोपरि या दृष्ट्रयस्ता अपि स्थानद्वये ग्रहस्येष्टकप्टेन गुण्यास्तदा क्रमेणेष्ट- बलं कटवलं, इष्टदृष्टयः कष्टदृष्टयश्च भवतीति ॥ १३ ॥ जापा:-ग्रहोंका चेष्टावल और उच्चबलको ६ चे गुणके गुणाकार १ एक युक्त करना तो ग्रहोंकी उच्चरश्मि और चेष्टारसि होती है ग्रहाँका चेष्टावल और उच्चबल इनके गुणाकारका वर्गमूल निकालना तो यहोंका इष्ट होता है. एक्रमैसे ग्रहोंकी उञ्चयल और चेष्टावल पृथक् पृथक् कम करके शेषका जो गुणाकार हो उसका वर्गमूल निकालना तो यहाँका कट होता है. इन इटकटके प्रमाण ग्रहोंका शुभाशुभ दशा फल जानना यहाँका पड्वलैंक्य और ग्रहोपरिदृष्टिको पृथक् पृथक् इष्टो और कष्टसे गुण देना तो ग्रहोंका इष्टवल और कटवल और यहाँको इष्ट दृष्टि और कष्ट दृष्टि होती है ॥ १३ ॥ वर्गमूल निकालनेका प्रकार। " अंत्ययावदिहाव्यांका तिर्यस्यरेखया। संज्ञा स्थानांककानां च विपमाख्यसमकमात् ॥

(१९२) केशवीजातकम्। त्यक्त्वान्त्याद्विपमात्वाति द्विगुणयेन्मूलं समे तद्भुते त्यक्त्वा लब्धकृति तदाद्यविषमालधं द्विनिघ्नं न्यसेत् ॥ पत्त्यां पंक्तिहते समेऽन्त्यविषमात्त्यक्त्वाप्तवगै फलं पंक्तयां तद्विगुणं न्यसेदिति मुहुः पंक्तेईलं स्यात्पदम् ।।" अन्वयः हे गणका! अंत्याद्विपमाव कृतिं त्यक्त्या मूलं दिमुणयेत् ममे तहते सति तदायविषमासन्धकति त्यस्त्वा लम्ब विनिम्नं पंक्त्यां न्यसेत् समे पनिहते सति अंत्यविषमादाप्तवर्ग त्यक्त्वा तत्फलं द्विगुणं पंक्त्यां न्यसेव इति मुहुः कुर्यात् तदा पंक्तः दलं पदं स्यात् । भाषा:-जिस संस्थाका मूल निकालना होय उसके दहने तरफसे विषम समका चिह्न करना जबतक अंककी समाप्ति न होय तबतक करना अंतरका सबसे बांई तरफ जो अंत्य विषम होय उसमें जिस संख्याका वर्ग घटे सो घटाय देना और जिसका वर्ग घटे उस संख्याको मूल कहते हैं उसको दूना करना उसका नाम पंक्ति है, उस करके भाग देना जो विषमके पास सम होय उसमें लब्धि ऐसी लेना कि जिसका वर्ग आगेके विषममें घट जाय तो उस लब्धिका वर्ग आगेके विपममें घटाय देना उसको दूना करके प्रथम जो पंक्ति संज्ञा है उसमें आगे एक स्थानमें बढायके रखना कदाचित् औरती अंक होय तो उसी पंक्तिसे पुनः पूर्वरीतिसे नाग देना लब्धिका वर्ग आगेके विषममें घटाना लमि दुनी पंक्तिमें रखना ऐसा अंक समातितक करते जाना फिर उस पंक्तिका आधा करना तो मूल होता है। सावयव अंकका मूल निकालनेकी रीति । "मूलावशेपकं सेकं परिघ्नं विकलान्वितम् ।। द्वियुक्तेन द्विनिम्नेन मूलेनाप्त स्फुटं भवेत् ॥" अर्थ:-जय मूल निःशेष न होय तो शेपमें १ युक्त करके ६० से गुण देना विकला मिला देना नब जो हो उसको आया जो मूल उसमें २ युक्त करके दूना करके भाग देना तो मूलका अवयव होता है यह स्थूल रीति है ।

मापोदाहरणसहितम् ।। सूक्ष्म रीति यह है। "सैकेन दिनमूलेन भक्तं मूलावशेषकम् ॥ लब्ध तु तदघः स्थाप्यं मूलं सुक्ष्मतरं भवेत् ॥" अर्थ:-जो मूल आया है उसको दूना करके १ युक्त करके मूलशेपमें भाग देना लब्धिको उस मूलके नीचे रखना तो सूक्ष्म मूलके आसन्न होगा। और यह सबसे अच्छी रीति है। जिसका मूल लेना होय उसको ६० से गुण देना कला युक्त करना फिर ६० से गुणना उसका मूल लेना उसको ६० से भाग देना तो ठीक मूल होगा.यदि ऊपरका अंश शून्य होय तो नीचेके अंकको ६० से गुणके विकला युक्त करके मूल लेना उसको ६० से भाग देना तो मूल होता है। रइम्युदाहरण। सूर्यका चेयावल ०1४११५८ इसको ६ से गुणके ४११११४८ यह भया, इसमें एक युक्त करके ५११३४८ सूर्यकी चेष्टारश्मि भयो सूर्यका उच्चबल ०५८५६ है इसको ६ से गुणके ५.१ ५३ । ३६ एक १ युक्त करके ६५३६३६ यह सूर्यको उच्चरश्मि भयी इसी रीतिसे चंद्रादिकोंकी चेष्टा रश्मि और उच्चरभि बनाना। चेष्टाबल। उबला . . . ३ ... सू.. मं... शुश . ४१३२४६२२२१ २८/२०४१२३८४२१५ 1८३६ १ १२६ १६७ २८९७ चेष्टारश्मि उच्चरश्मि । सूचनं. ७/३. शु./श.] ८४८५३ ६३६/३६ ३६/२२१६४२३०४२ -- (१९४) । देशबीजातकम् । इष्टोदाहरणम् । सूर्यका चेटावल ०१४३१५८ यह है इसको सूर्यका उच्चपल ०५८५६ से गुणके ०४१।३३ इसका वर्गमूल ०१४९१४३ यह सूर्यका इट गया इसी प्रकारसे चन्दारिकाका इष्ट बनाना। चेटचरल्गुणनपरन् । च म बुच सूचनाश . . . . G . . २१/११/३/१३२१८६ દરર૮ર૪રર૮ २६/११/१/४३३३/११ ३१७४२५८/७/२६ कष्टोदाहरण । सर्वका चेष्टायल ०1४१५८ यह एकमें कम करके 11 इसको सूर्यका उच्चबल ०५८।५६ को एकमें कम करके ०१४४ इससे गुणके १०।२९ भया इसका वर्गमूल ०१४२० यह सूर्यका कद भया इसी प्रमाण चन्द्रादिकोंका कष्ट साधना। एकोनचेटोचवलगुणनम् । दरचरम्। सूच मशग्र C . . . ० C D . २ . . १९५२) ७८२२१२ २०४७७/७३०३-०५ इप्टकटवलोदाहरण । सूर्यका पयलेय ७५१५३३० को सूर्यका इष्ट ०४९।४३ से गुणके ६।३१००।५३ यह सूर्यका इष्टपल, अथवा सूर्यका कष्ट ४२० से सूर्यका पइवलैक्यको 1०४५२+ कटबल भया इसी चंद्रादिकों भापोदाहरणसहितम् । इटबलचक्रमा कष्टवलचकम् । (१९५) सू.चं. मइ...श. स.चं. म. यु ... श.प्र. । ३१२१६३३.३/२७) (१८४२७/२९४८/५८ ३ ५८ २७६-20 '५०/८/२४०.१६/- उदाहरण-चंद्रके ऊपर सूर्यकी दृष्टि । १८ । ५४ इसको चन्द्रके इष्ट ०२६।३ यह इसको गुण १२ यह चन्द्र के ऊपर सूर्यकी इष्टदृष्टि, और चन्द्रका कष्ट ३२१४७ यह इससे सूर्यष्टि ०1१८५४गुणके 1१०1१९ यह कष्ट दृष्टिभई इसी रीतिसे सर्वग्रहोंपरकी इष्ट दृष्टि और क्रदृष्टि करना ॥ १३॥ इष्टदृष्टिचक्रम्। कष्टद्यष्टिचक्रम् । सू.चं. मं. सु. शु. श.प्र.सूचं. मं. बु... शु. श. . २ २ . 0 २ ०१.०१०/२४.१.१० ०१२२/०३/२५ ०१४ . . . २ २ . २ ० . . . ० . . . ८ . चं.२०१२/१२/७/३/१० ३1. ५७२७/२० ३ ३२/२/३१/४५ .३३ २३.२1000 ०/१९० २ . १५/७ . 0|३|२|०२४० शबु.. ४४. ०२४ ०२८२७/०२०२९ १/२८.. o 6 ० २ . . . . . . . . २२३९/०२७ २ . . ... .... ३९/२५०८/०२४.३/३/२६/०१२८ २२२६/०३८/०४०१ ०३९/०/१२/२२ . . ७ ०० . . . ० .... ३२.४६०/२२/०७ ० ० ० . ८ ८ ६ २११३७३४२४.श.२३ , केशवीजातकम्। -- 'सप्तवर्गशुभाशुभंसाधनम् । स्वोच्चे रूपं त्रिकोणे चरणविरहिते स्वतंगे? त्रयोष्टां- शाश्वाधीएक्ष इएसंयुजि च चरणः स्यात्समाष्टमांशः ॥ भूणशो वेरिंगेहेऽध्यरिभयुजिरदांशश्च नीचे खमीशा- दिष्टं गेहे तदुनैकमसदय दलं पदसु कार्य तदेक्ये ॥ १४ ॥ पंक्त्योः संप्तसु कोष्टयो प्रथमयोरिष्टासदेक्ये कृताऽते स्थाप्ये भदलादिपट्सु च तदधैं वर्गपानां पृथक् ॥ कृत्वोक्त्या सदसद्युती निजनिजे तन्निन इटाशुभे वर्गदतस्थखगोजसो सदसतो तात्पदन्ने स्फुटे ॥ १५ ॥ r अन्वयः--स्वोच्चे मूलत्रिकोणे स्वादिगते यहे रूपं पादोनं रूपार्थमित्यादि । गेहे गृहस्थाने ईशात्स्वामिन इष्टं स्यात् । तद्यथा । यहो यस्मिन् गृहे वर्तते तत्स्वामी यदि स्वयं तदा रूपान्दै , बलं, याधिमित्रगृहे तदा पोष्टांशाः, मित्रगृहे चतुर्थांशः समगृहेऽष्टमांशः, शत्रुगृहे भूपांशः, अधिशत्रुगृहे देतांशः, नीचे खं, शुन्यम्, एतदूनं रुपास्कटं गेहे गृहस्था- नस्थयोरिष्टकष्टपोरई होरादिपसु स्थाप्ये । एतदुक्तम् । सप्तस्थान- स्थितानां शुभानामैश्यं शुभम् अशुभानामैक्यमशुभं स्यात् ॥ १४ ॥ पंक्त्योरिति । इटासदेश्ये चतुर्भने पंक्त्योः स्थाप्ये एतदुक्तं भवति । प्रागानी- तमिष्टेक्यं चतुर्भक्तं शुतपंक्त्योः स्थाप्य कष्टैक्यं चतुर्थीशमशुज पंक्तौ स्थाप्यं प्रथगयोगृहकोष्ठयोरित्यर्थः । भदलादिपसु होरादिपद्सु तदई गृहस्थापि- तफलंस्या, स्थाप्पं, वर्गपानां गृहादिसतवर्मशानां पृथक् प्रत्येकं निजनिजे स्वस्वे सदसद्युती शुभाशुभयारेक्ये उत्स्येनेत्यनेन स्वोचेरुपमित्यादिना स्थापितयोरेवं भाषोदाहरणसहितम् । (१९७) शुभाशुभयारक्ये कार्य न पावर स्थापितयोरिति रत्वा तनिवाइटाशुभे तान्यां निघ्ने कार्य इष्टशु पंक्योः सनम कोठयोः स्थापितफले अनया रीत्या आनीते ये इष्टाशुने वर्गदतथखगोजसोः सदसतोपांताव पदने स्फुटे स्याताम् । वर्गद्र वर्गस्वामी, तत्स्थखगो वर्गस्थग्रह, ओजसो बलयोः तयोतिपदेन पूर्वफले गणिते सति स्फुटे स्तः ॥ १५ ॥ जापा:-गहेश परमोचमें होय तो रुपबल १, त्रिकोणमें होय तो तीन चतुर्थाश ०१४५०, स्वगृहमें हो तो अई । ३००, अधिभित्रके गृहमें होय तो तीन अष्टमांश ०।२२।३०, मित्रगृहमें चतुर्थाश ०1३५1०, समके गृहमें अष्टमांश ०।७।३०,शत्रुगृहमें पोडशांश ०।३।४५, अधिशत्रुगृहमें पन्नांश ०३१५२२३०, परमनीचमें होय वो शुन्यः यह गृहस्थानमें शुन जानना यह शुभ एक में हीन करनेसे अशुभ होता है. गृहस्थानमें यह शुभा- शुभ होरादि षड्वर्गस्वामीपरसे गृहस्थानके फल प्रमाणसे जो फल आवे उसका अर्थ जानना अनंतर सप्तवर्गोत्पन्न का और अराक्षकी ऐक्यता करना, उच मूलत्रिकोण व स्वगृहमें तीनका वा दोका एक स्थानमें संभव होनेमे निर्णय । सिंह २० अंशतक सूर्यका विकोण, अनंतर स्वगृह, वृपक्ष ३ अंशतक चन्द्रका उच्च, अनंतर पूलत्रिकोण, मेप १२ अंशतक भौमका त्रिकोण, अनंतर स्वगृह, कन्या १५ अंशतक बुधका उच, आगे ५ अंशतक मूल त्रिकोण, आगे स्वगृह, धनु १० अंशतक गुरुका त्रिकोण अनंतर स्वगृह, तुला १५ अंशतक शुकका त्रिकोण नंतर स्वगृह, कुंग २० अंशतक शनिका त्रिकोण अनंतर स्वगृह जानना । जब ग्रह उच्च किंवा नीच राशिका उतांश रहता है ग्रहका परमोच्च किया परमनीच जानना (१९८) केशवीजातकम्।। जापा:-दो सात सात कोष्ठक्की शुभाशुभ पंक्ति लिखना अनंतर शुन पंक्तिका प्रथम कहिये गृहकोष्ठकमें ग्रहोंके सप्तवात्पन्न शुक्पका चतुर्थांश लिखना और होरादि ६ कोठकमें इस चतुर्थांशका अर्थ लिखना. और अशुभ पंक्तिके प्रथम कोष्ठकमें ग्रहका सप्तवर्गोत्सन्न अशुभैक्यका चतुर्थांश लिसना और होरादि पट ६ कोष्ठकमें यह चतुर्थांश अर्ध लिखना अनंतर गृह होरादि सप्तवर्गस्वामीका जुदा जुदा किया जो सप्तवर्गोत्पन्न शुभेक्य उसको क्रमसे इस शुमपंक्तिमें लिखा जो गृहहोरादि सप्तवर्गफल है तिससे अलग अलग गुण देना तो मध्यम शुभ होता है. और गृहहोरादि सप्तवर्गस्वामीका पृथक पृथक किया जो सप्तवर्गोसन्न अशुभैक्य उसको क्रमसे अशुपंक्तिमें लिखा जो गृह होरादिसमवर्गफल उससे पृथक् गुण देना तो मध्यम अशुभ होता है । अनंतर जिस ग्रहका स्पष्ट शुभ साधन करना हो उस ग्रहके इटबलको उसी ग्रहके गृहहोरादि समवर्गस्वामीके इटबलसे पृथक् पृथक् एणके उनके वर्गमूलसे सस्वर्गस्थ मध्यम शुतको गणदेना तो ग्रहोंका स्पष्ट न होता है और जिस ग्रहका सष्ट अशुभ साधन करना हो उस ग्रहके वटवलको उसी महके गृहहोरादि सप्तवर्गस्वामी कटबटसे पृथक् पृथक् गुणके उनके वर्गमूलसे स्वस्ववर्गस्थ मध्यम अशुभको गुण देना तो यहाँका सष्ट भयुम होता है ॥ १५॥ उदाहरणः-सूर्य मंगलके गृहमें है इसवास्ते गृहस्वामी गौम सो समके गृहम है इसवाते सूर्यके गृहस्थानमें ०१७।३० शुन, यह एकमें कम करके ०१५२। ३० यह अशुभ, होरास्वामी सूर्य यह समके गृहमें है इसवास्ते सूर्य के होरास्थानमें १७३० शुभ, यह एकमें कम करके ०५२।३० अशुन, इनके अदं होरास्थानमें ०३।४५ शुभ और ०१२३४३५ यह अशुन, देष्काणस्वामी - सूर्य यह समके गृहमें है इसवास्ते सूर्यके द्रेष्काणस्था- नमें 011३० शुन यह एकमें कम करके ०५२।३० अशुज, इनके अर्ध गापोदाहरणसहितम् । देष्काणस्थानमें श४५ शुभ और ०१२६।१५ अशुभ, सप्तमांशस्वामी चन्द यह श गृहमें है इसवास्ते सूर्य के सप्ताशस्थानमें ०३१४५ शुम यह एकमें कम करके ०५६।१५ अशुभ इनके अर्ध सममांशस्थानमें 191५२ शुभ, और ०१२८१७ अशुज नवमांशस्वामी चन्द्र यह शत्रुगृहमें है इसवास्ते सूर्यके नवमांशस्थानमें १३१४५ शुभ, यह एकमें कम करके ०५६।१५ अशुभ बनका अर्ध नवमांशस्थानमें०11३५२ शुभ और ०१२८७ अशुभ द्वादशांशावामी बुध शवगृहों है इसवास्ते सूर्यके द्वादशांशस्थानमें ०१३।४५ शुभ यह को कम करके ०५६१५ अशुभ इनका अध द्वादशांशस्था- नमें ०१११५२ शुभ और ०१२८१७ अशुभ त्रिंशांशस्वामी गुरु अधिशत्रुके गृहमें है इसवास्ते सूर्यके त्रिंशांशस्थानमें ०1३१५२ शुभ, यह एकमें कम करके ०५८१७ अशन, इनका अर्धे निशांशस्थानमें 1०५६ शुभ और ०२९।३ अशुभ सूर्यके सप्तवर्ग शुभका ऐक्य ०।२१।३३।।। और सूर्यके सप्तवर्ग अशुनेका ऐक्य ३१३८२६ यह भया इसी प्रमाणसे चन्द्रादिक यहाँका शुभाशुन करके उनका ऐक्य करना । टिप्पणः-विंशतिरंशाः सिहे त्रिकोणमपरे स्वभवनमर्कस्य । उच्च भाग- त्रितयं नृप इन्दोः स्यात्रिकोणमपरेशाः ॥ द्वादश भागा मेपे त्रिकोणमपरे स्वा तु मौमस्य । उच्चमथो कन्यायां बुधस्य तुंगांशकैः सदा चित्पम् ।। परतस्विको- गजात पंचभिरंशेस्वराशिज परतः ! दशशिनी जीवस्य त्रिकोणं धनुपि तत्परं स्वगृहम् । शुक्रस्य च तिथयोंशात्रिकोणमपर स्व तुलायां वा कुसे त्रिकोण- स्वगृहे रविजस्य रवेयथा सिंहे। टिप्पण:- ग्रह परम उनमें किंवा परम नीचमें वा मूलविकोणम माप्त होय को मित्रादिज फल न लेना, वह उच्च किंवा नीच वा मूलत्रिकोण इसीका फल लेना।

मापोदाहरणसहितम् । सप्तवर्गअशुभचक्रमिदम् । (२०१) . सू च म बु PAN शु श . ० . . . . . ५८ ५६ ३७ ५६ ७]] १५ ३० १५ . ० ० ७ . ० होरा २६ ०८/२६ } २६ २८२८/२६ ७॥ ७॥ १५ होरा . . . ० ० D नेपाण! २६ / १८ २९ २६ २८ / २६ / २६, नेपा. . . . (सप्तमांश २८ ७|| २८ २६ सप्त. १५ . . 0 . . निवशि २८ ७॥ २९ / २८ | १८ ३11/७४५ नवमा ७॥ ० . ० २ . . द्वादशांश २८ २९ / २९ / २६ , २९ २६ . . . . . . त्रिशांश २९ २६ २६ / विशा. १५ ३ ३ ३ ३ ऐक्य mum ३ २१ | २८ 20 ऐक्य २६||३३॥ १८॥ ७॥ ज्दाहरण-सूर्यका शुन्य ०।२१।३३ इसको ४ से भाग देके ०।५।२३ यह सूर्यके शुपंक्तिके गृहकोष्ठकमें लिखना और इसका अर्थ ०१२३४३ यह शुभपंक्तिक होरादि ६ कोठकों लिखना। सूर्यका अशुभेक्य ३।३८४२६ इसको ४ से भाग देके ०५४।३६ यह सूर्यके अशुभपंक्तिके गृहकोष्ठकमें लिखना और इसका अर्थ ०।२७११८ यह भशुभपंक्तिके होरादि ६ कोठकमें लिखना इसी प्रमाण चन्द्रादिकोंकानी जानना। १६ (२०२) कैशधीनातकम्।। fa शुमपंक्तिचक्रम् । अशुमपंक्तिचक्रम। नसूच म बु.शशमसचम बुराम ० . . . . . . . O ३/१३/११/३/२७ गृ५५८१२१४८/२६ ४३४२३६५८ (३६/३१७२५२ . ३ . . . . . . . . ० ० ३ २७/२३/२७२४२८२५/२६) २८/१२/३२/८/७/१२१ ४१/१०/२७५१/२०१४८/५९ . . . . co10 . 10 ८ . 4 ६ . ८ . . ३ . . ५ ० २ ० . . २२/६/२04/१/२ કે રોટ૨૮રવરફ ११/१०/२७/२००५८/२९ १८१९/30/८/७/१०/१. . स/०६/२८/१/१/३ स २७/२३0. १५१८२२] २८१२८ ७१०१ २ न २६ ३]न.२७/२३/२७ २८ २८१२३८७१२१ . हा२/६/२/५/१/४३दा २७२३,२७५६ 188०२७ ११८/१२/३०/८/७/१२/१ ... न/२/६/२/५/१/४/३/२७२३२७/२४/२८२५२६ છ૭૮૪૦૬૮૧૨૮૬ . 3 C . o . . . २ . 1. . ८ C " उदाहरणः-सूर्य मेपका है इसवास्ते गृहेश मंगल है इसका शुभैश्य ।। १९१४१ इसको सूर्यके शुभपंक्तिमका गृहफल०१५।२३ इससे गुणके ०३। ४६ यह सूर्यका गृहमध्यमशुन, गृहेश मंगल इसका अशुभैक्य ३।४०३८ इसको सूर्यके अशुपंक्तिमका गृहफल ०११४१३६ से गुणके श२०१२८ यह सूर्यका गृहमध्यम अशुभ, इसी रीतिसे होरादिकोंका मध्यम शुमायुम करना और चन्द्रादिकोंका भी गृहाहि मध्यम शुभाशुभ करना ।

मापोदाहरणपहिवम् ।
(२०६)
--
मध्यमशुमचक्रम् ।
मध्यमाऽशुमचम्।
.
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०
प्र.सू.म.शुशनसचम ११. शश.)
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१/७१/२/२/५.६/०९/२०११५४२७
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१४.१२/३७७२/४/१०.३३ १३१
सूर्यका स्पष्ट शुभ साधन करना इसवास्ते सूर्यका इष्टपल ६।३।०५३
इसको सूर्य मेपका है इसपास्ते गृहेश भौमका इष्टवल ११११. इससे राणके
१२।१६ इसका वर्गमूल २।५०१६ इसको सूर्यका मध्यम गृहशुभ ०191
१५ से गुणके ०१५/० यह सूर्यका सष्ट गृहशुम जपा इसी रीनिसे सूर्यके
होगरिकोंका स्पष्ट शुप्त और सूर्यका गृहादि स्पष्ट अशुभ और चंद्रादिकोंका
सट शुज भोर भशुम करता ॥ १४ ॥१५॥

(२०४)
देशीशानका।
वर्गागृहेशेष्टवलगुणनचक्रम् । चर्गेशग्रहेशराष्टवलगुग्नचकम् ।
.
ISTIC.मानचिना |नागामाचसामागागा
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28/३२/३७ १८/० २१/०२२१२/९/१२/२०३५/२०
२०/२०/३/१/६१२/१३ २१२४|१०१ ४११०
स ५५/०५/२५३८/५११२२३८ - १६१३/१२/३७०२११३७
(१०/१०८४४२३७/२२५
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१०३२३९४२२२६/१२/ ३५२२५२/४०५६
५/१५६१३१६२
हा. २९/४२२६/२/५६५८२४वा (२२८२२/७२८२१३१
(१३४८३७१८२९७९ ७४२/९/१२/५६/०८/२३
१९२०४१०४/२/१
दि.१५४०२१६८४११८२४त्रि ३२८२०३७५२/११/३१
२३७
.

भाषाहरणसहितम् । (२०५) वर्गेशगृहेशेष्टवलगुण चर्गेशगृहेशपश्चल- नपदचनम् । गुणनपदचकम् । ग्र सूचम शमसू चा माशु श २२)२/२/२/२/१ गृ५०/२१/५०९/९/२६/१६) गु] ९ ११२/१२/२०/२५ ११/१२/२१/३१/३१२२/४० ६/३/२/२४३३ ११४२०२० ७ ३४हो ३४/९/१३५४/११/३१ ६० ६.२२ १२:३२ दे. ३१/२९३७ २,९३२६द्रे ३४/२/५/२८/१२/२०/८२ ३२) ५ १२/२५/२७/३१/२१/२१/ ० स३३३३५६१६३७२७१६ स ३०३० १९/११२०५८,९३०५८ ३७३७/१२/१०/२०/४१६० ४१.२५११ न 1३३२९ १६/३३३६५७/न ३०/२/३ /१२/२१/१०/३ २९/४५४५८४५९/१० ३७/१०/१८/१०/५७/११/५२ २१४२११५४१ १२२/२/१/१/३ द्वा २०१०३७१ ३३/७३३ १३४४/५ २०५१/१२ ८/५/२५/२७/५७५८ |६|3|२१२|३|१ १३/२/३/२ ८३७१६९ १९५८९०३ १००

(२०१)
केशवीजातकम् ।
सशुनचक्रम्
समाशुभचक्रम्।
न. सच (
म.शुशनसूचि (मबु| शुश
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जगदीशन रचिते केशवायंचटिप्पणे ।।
इएकप्यापिकारोऽयं पूर्णोपकाशकः ॥९॥
इतीएकाध्यायः पञ्चमः ॥५॥

मापोदाहरणसहितम् । (२०७)
अथायुयाध्यायः ॥ ६॥
महाँका सर्व शुभाशुभ फल दशामें ही होता है और दशाविभाग आयुदी-
विना मालूम होता नहीं, इसवास्ते आयुयाध्याय आरंग करते हैं
आयुर्दाय दो प्रकारका है ग्रहयोगज और गणितागत, उसमें ग्रहयोगज-
वायुय, परमायुदीय और अमितायुर्दाय ऐसा तीन प्रकारका है। गणि-
त अंशोदव, पिण्डज, नैसर्गिक और जीवशर्मोदित ऐसा चार प्रकारका है।
प्रथम योगजायुर्दायमेंसे अमितायुर्दायका उदाहरण कहते हैं ।
कौदीज्ययुतोदये बुधसितो केन्द्रे व्यरीशेतरे-
रायुविद्धयमितं हि योगजमिवान्यत्रोच्यतेथोन्मितम् । .
अन्वयः-चन्द्रज्ययुक्त कलिये यदि बुधशुको केन्द्रे एकत्र वा पृथक
ताम् इतरैः सूर्यभौममन्दैनयरीशस्थानेषु तृतीयषडैकादशस्थालेष्विहारिमन
मितमायुर्विद्धि जानीहि अन्यत्र ग्रंथे योगमायुर्षिद्धि । अथास्मिन् ग्रंथे
नागदोन्मितमायुरुच्यते॥
भाषा:-कर्क लममें जन्म होय उसमें चन्द्र और गुरु युक्त होय, बुध और
केन्द्रों होय और इतर ग्रह ( रवि, मंगल, शनि) ३२६।११ स्थानमें
इस प्रमाण सातों ग्रहाँका योग होय तो भमित आयुष्य जानना इस
रिसे योगनायुयके भेद . नातकशासमें कहे हैं यहाँ जातकपद्धति
तायुय मात्र कहा है।
अंशायुःसाधनार्यचेष्टागुणकोचगुणकस्फुरगुणकसाधनम् ।
पल्पाश्चेत्किरणाः सरूपकिरणांनिश्चेत्रयोर्दा
विभू गोई चैष्टिकतुंगसंभवगुणो तदातमूलं स्फुटः ॥१६॥
अन्वयः-यदि पूर्वोक्ताः चेष्टारश्मयः चरश्मयत्यल्पाश्चेत्तदा सैकचतुर्थाशः
पः, त्रयोस्तिदा विभूः एकरहितादै कार्य तदा यातुंगसंतकी गुणको
रावस्य मूलं कुटो राणः स्यात् ॥ १६ ॥

(२१२) वेशीजातकम् । आभयगुगावकर म. . वृ. . श. ३ ४ ४१ ३० ३ कर्मयोग्यगुणसोदाहरण । सूर्यका आश्रय गुणक २१५६४ और सुदगुणक २२२९१ राणाकार ७।१९।१९ इस वर्गमूल२१४२।२१ यह सूर्यका कर्मयोग भया दसी रीतिसे चन्द्रादिकोश कर्मयोग्य गुणक करना। कर्मयोग्यगुणकचक्रम। सचम बृ शु श . २२/३/१ ४२५६१५२ २५० १२१/१६३५-500343 आयुर्भागोदाहरण। सूर्य ११३१०४२ इसके अंश १३३०४२ इसको ४०२ देके शेष१३.२०१४२ यह सूर्यका आयुगि जया इसी रीतिसे चंदा आयुर्माग करना तथा लमकामी ॥ १८ ॥ आयुभागचक्रम् । हानिसंस्कृतायुभांगचक्रम् । सच मयुशुमचमाशुशल (१०/३/५/३१२०/६/२४/१२/२०१२/३१३८६३३/९ ३६१ 2341 चक्रपातादेवानिः। पहाल्पे सति खेचरीन उदयेऽस्यांशोतः सागिभि- स्वकाल्पे सति सानिभाजितलनेः सौम्यानित तर्षितः .. भापोदाहरणसहितम् । (२१३) उना भूर्गुणएको द्विबहुषु वेकस्य बहोजसः कार्यास्तणिताः स्वदायजलवाचकाहानिस्त्वियम् ॥ १९ ॥ अन्दय:-यहोनोदये साल्पे सति, अस्यांशोहतः खामिभिः खेचरोन एकाल्पे सति अस्यांशाः खामिनि जितलबैरूना भूरेको गुणः स्यात् गुगकेन गुणिता स्वदायजलया आयुर्भागा इयं काहानिर्भवेत् योको हुषु तदा बहोजस एकस्य - ग्रहस्येयं चकाईहानिः कार्या परसाये कालमपि ध्येयं सौम्पोनितैरत्ववितरित्यपि ध्येयम् ॥ १९॥ जापा:-लपमेंसे ग्रह कम करके बाकी ६ राशिसे कमती रहतेही चक्राई- । होती है. अनंतर पाल ग्रहोनित लगकी पलसे ३० अंशकी पलको देना जो भागाकार आये सो एकमें कम करना तो गुण होता है परंतु नित लम एकसे कमती होय तो यहोनित लग्नके अंशको ३० अंशसे भाग . जो भागाकार आये सो एकमें कम करना तो गुण होता है परंतु लममैसे . यह कम करके पूर्वक्ति रीतिसे भाग देके जो भागाकार आवे उसका अर्थ मिसे कम करना तो गुणक होता है एक राशिम दो किंवा दोसे अधिक होय उसमें जो यह बलिष्ट होय उसका मान गुण करना अनंतर इस गुणकसे कीय आयुर्मागको गुणना कहिये रविक गुणकसे रविके आयुनागको गाना इसी प्रमाण यहां गुणकरके चकाईहानि कथित किया है ॥ १९ ॥ उदाहरणम्:-यहाँ रवि, भौम, गुरु, शनि इन्होंका चक्राहानि संभव इसवारते लम ६।९।१२।२६ यह इसमें सूर्य ०11३११४२ कम कि १२६॥३११५४ इसकी पल ६३५५०४ इसमें ३० अंशको 101 इसमें भाग दिया तो ०।१०।११ यह एकमें कम करके ०४९।४९ सूर्यका गुणक, इससे सूर्यका आयुर्माग १३१३०१४२ यह गुणके १० ६१३० यह सूर्यका हानि संरहन आयुसांग मया इसी प्रमाणसे चौमका शिक ०।२९।१९ गुरुका ॥३२॥२६, शनिका०1४४१३२ इन गुणकों से के आयुगको गुणा तो भौमका ५४२४१३४, गुरुका २०११५, - ०० (२१४) फेशवीजातकम्। शनिका २४१४५१४४, यह हानिसंस्कन इनौका आयुभांग जया इसी णसे जिसका संभव होय उसका आयुमांग करना यहां जो ३० अंशकी १०८००० का भाग दिया है यह पल सिद्ध है ॥ १९ ॥ वर्षादयंशायुयानयनमाह। दायांशोत्थकलाः स्वयोग्यगुणकन्नाः साधनेत्रोद्धता अंशायुर्घसदां समादि तु तनोयाशकास्याहताः ।। दिग्भक्ता हि समादि चेतु बलवल्लनं तदा लग्नमें- स्तुल्यादैः सहितं द्विनिप्रशरहदागादितो मासयुक् ॥ २० अन्वयः-चक्राहानिकतानां दायांशानां कलाः कार्याः स्वयोग्यगुणं गुण्या दिशत्या का फलं वर्षाद्यमंशायुवति । एतदुक्तं भवति दायांशका शतद्वयेन भने फलं वर्पे, शेपमंशाचं द्वादशाभिः संगुण्य तेनैव हरेण भक्ते मासः एवं त्रिशना गुणिते भने दिनानि पथ्या गणिते मक्ते धदयः पुनप्पा गुणिते हरेण भक्तं फलं पलानि । लमस्य दायांशानिमि ३ गुण्या दशक्नेि वर्षादि लमायुभवेत् यदि वलवल्लनं पडधिकवलं तदा लगा, ल्यैपयुक्त कार्यम् अपि तु लमस्य भागादां द्विगुणं तत्पंचमक्ते सति मार भवति तद्युक्तं तदा लमायुः सप्टं स्यात् अधिकवलनानं तु अले हीनयल दत्त दिना ॥ २० ॥ भापा:- पूर्वानीत केवल और हानिसंस्कृत आयुर्भागकी कला क उसको स्वकर्मयोग्यगुणकसे गुणके जो राणाकार आये उसको २०० से। करके जो नागाकार आवे सो यहॉकी वर्षादि अंशायु होता है लमके अ भांगको ३ से गुणके गुणाकारको १० से भाग देके जो जागाकार आवे समका वर्षादि अंगायु होता है और जो लमबलवत् कहिये ६ रूकी अरे अधिकाल होय तो लनराशितुल्य वर्ष पूर्वानीन लमायुमें युक्त करके उन लमके भागादिकोंको २ से गुणके ५ से भागके मासादि फल युक्त का तो लमायु होता है ॥ २० ॥ d १३१) शवीजानका। सरपहाः! या। १/३/२८1१५०७/२३ १ द . : 120/220120 च कम करके। पड्यास '२ राशम कम करके। ८.६ ७ - २ ३ B15 , 1:17 .3 सिंडाद्यायुनागचक्रम् । म च म वृ शु. ३२१ २१२ ३० २८६ १ २७ भा. १८ ५३ काहानिर्मचारिडायामागचकम् । २ म. बु. . स २२६ श. भा. २० भा.. ५ २४ यहा कोई ग्रह अस्तादि नहीं है और शत्रुराशिकानी नहीं इस घारते संस्कार नहीं जया केवल चक्राईहानिका संस्कार है उसका उदाहरण कहते हैं। सूर्यका चाहानि गुणक ०४९।४९ इससे सूर्यके आयुरेश ३५६ ०५।१८ उसको गुणके २९६।१५।४० यह सूर्यका स्पष्ट आयुग मया ।

पापोदाहरणसहितम् । (२१९) शोमका चकाईहानि गुणक ०।२९।१९ इससे सोमके आयुरंश १९३ । १।१६ इसको गुणके ९४।२०१२ यह भौमका आयुरंश भया । गुरुका चक्राईहानि गुणक 1३११२६ इससे गुरुके आयुरंश २९६ । ४७।२३ इसको गुणके १५५।२९१५ यह गुरुका सष्ट आयुर्माग गया। शनिका चकाईहानि गुणक ०४४।३२ इससे शनिके आयुरंश २३३। २९१४५ इसको गुणके १७३।१२।२४ यह शनिका स्पष्ट आयुर्भाग अपा बाकी ग्रहाँका पूर्वोक्त ही आयुजीग लेना ॥ २१ ॥ लग्ने पापग्रहे सति विशेषसंस्कारः दायांशा धुसदा पृथक्तानुलवादिनाः खपट्युद्धृता आत्योनारतनुगे खले च यदि सहधयाथोपरे ।। निभ्योगोदयभावजेन तनुगोग्रो वेदलिप्टस्य तत् साम्ये पुष्टफलेन नेति तनुपेऽस्मीत्रांशजेऽसौ किया ॥ २२ ॥ अन्वयः-लमे पापे सति चक्राहानिर्गुणिता ग्रहाणां दायांशाः पृथक् स्थाप्या, लगस्य राशि विहाय अंशादिनिर्गुण्या पट्यधिकशतत्रयेण भाज्या: भात्या लब्धफलेमांशादिना पृथक्स्था हीनाः कार्याः । पापग्रहास्तु रविनौपशु- नयः सौम्येक्षिते वर्धया, शुभग्रहरष्टे लमस्थकूरखगे तदा लब्धफलस्पा पात- येशयुपिडादीत्यर्थः । अथापरेपो मनम् नियोयोदयभावजेनेति केचिदेवं पूर्वनि उमगे क्रूरे तदा पृथक्स्थाः आयुनांगाः उयोदयमावजेन गुण्याः पूर्वहरेणात्या ऊनाः कार्याः शुभहटेऽर्थया उग्रोदयभावजं तु उपयहस्य पापग्रहस्प यो नाव- स्तस्पावरोहारोहफटनेत्यर्थः । यदि लमे द्विवाः रास्तदा वरिष्ठस्य भावजेन गुण्याः तत्साम्ये बलसाम्ये पुष्टफलेन अधिकावरोहारोहफलेन फटसाम्ये या- रिगुणनं कार्यमिति भावः तदसत एकदेशत्याद अस्मिन् समे करे समाधी समगे सति असौ हानिन कार्या अंशजे ऋरत्यमेऽसौ न कार्या ॥ २२ ॥ जापा:-जो लग पापग्रह होय तो ग्रहका पिंडाद्यायुर्माग पृथक रखना उसको व्यका राश्यक छोडके सागा करो गुणक राणाकारको ३६०

केशवीजातकम्।
से भाग देके जो लब्धि भावे सो पृथक रस्खा जो भाग उसमेरो कम करना
परंतु जो पापग्रह शुभमहकरके दृष्ट हो तो लब्धिका अर्थ पूर्वोक्त मागमें कम
करना तो पिंडायुर्माग होता है।
दुसरे आचााँका मत यह है कि पृथक् सखा जो भायुनांग उसको
लमस्थ पापमहका जो भाय उसका जो फल उससे गुण देना और ३६० से
भाग देना लब्धि पूर्वस्थापित भागादिमें हीन करना तो पिण्डाद्यायुमाग होता
है शुगयह देखता होप तो लन्धिका आधा घटाना और लममें दो या तीन
पापग्रह होय तो जो बली होप उसीका जायफल लेना पापग्रह लमपति होकर
लाममें होय तो यह क्रिया न करना ॥ २२ ॥
उदाहरण-यहां लममें पापग्रह कोई नहीं इसवास्ते विशेष संस्कार नहीं
सया ॥ २२ ॥
पूर्वीतहानिसीरुपिण्डादायुभिवक्रम् ।
चं.
म.
चु.
.
श.
७.
१८६
२०
१२
१२.
10
इदानी पिण्डानसगंजीवरार्मायुयानयनमा ।
गोब्जास्तत्ततिथिप्रभाकरतियिस्वर्गा नखाः पेण्डजे
नेसगै नखभूद्विगोधृतिनखाः पञ्चाशदादणाः ।।
दायांशाः स्वगुणेहता हि भगणांशाप्ताः समाधायुपी
स्वर्गाताश्च समादि जैवमिभहस्तशिघटेणिन्वितम् ॥ २३ ॥
अन्वयः-गोन्जति अारिति अमात्य पिण्डावायुये गोना इत्या.
राय नखा इत्यन्तांका गुणकाः, नैसगै नखभूरित्यारयो गुणकाः ३, दायांशाः
सगुणगुणा गणांशै ३६० भोज्याः फगानि वपांघायुया भवन्ति । गोजा
इत्यादिमिरकणिते पिंडायुः नखारत्यादिभिर्यणित निसर्गायुः स्यात् ।
दायांशाः खर्गाना एकविंगत्या भाज्याः फलानि वादि जीवशमायुः स्यात्
पुनर्दायांशा घट्यादियोऽष्टमकायो यल्लम्धं घट्यादिकं तद्युक्तं घटी ॥ २३ ॥

भापोदाहरणसहितम् । जापा:-१९।२५।१५/१२१३५२१६२० यह कमसे सूर्यादि सान ग्रहों के पिंडायुदायके गुणक और २०१३।२।९।१८।२०१५. यह झम. से रव्यादि सातगहोंके निसीयुर्दायके गुणक जानना यहाँका आयुांग स्व (अपना ) गुणकसे गुणके गुणाकारको ३६० से भाग देना तो क्रमसे वर्षादि पिंडायु और निसर्गायु होता है पूर्वोक्त आयुगको २१ से भाग देना जो वादि फल आवेगा उसमें पूर्वोक्त आयुर्भागको ८ से भाग देके जो फल आये सो घटीमें युक्त करे तो जीवशमोक्त आयु होताहै यहां मासादिफल अंशायुदी- यमें कथितप्रमाण लेगा ॥ २३ ॥ विण्डायुके गुणक। निसर्गायुके गुणक। सू./चं. म. पु..श. श. सू | चं. म.| चु..शु.शि. १९/२६/१२/१२/१२/२१२०१२०११/२/९/२८/२०२० पिंडायुरुदाहरण। सूर्यका आयुर्माग २९६।१५।४० इसको सूर्यका गुणक ३९ इससे एणके ५६२८।५७१४० इसको ३६० से भागके लब्धि १५ वर्ष शेप २२८। ५७१४० इसको १२ से गुणके २७४७।३२ इसको ३६० से भाग देके लब्धि मान ७ शंप २२७१३२ इसको ३० से गुणके ६८२६ इसको ३६० से भागके लब्धि दिन १८ शेष ३४६ इसको ६० से गुणके २०७६० ० से नाग के लब्धि घटी ५७ शेष २४० इंसको ६० से गुण के १४४०० इसको ३६० से भागके लब्धि पल ४० इसी प्रकारसे सूपके पीदि पिटायु नये १५७१८५७४० इस प्रमाण चन्द्रादिकोंका करना । निसर्गायुरुदाहरण । सूर्यका आयुर्भाग २९६१५४० इसको सुपंका गुणक २० इससे ! गुणके ५९२५।१३।२० इसको ३६० से भागके सधि वर्ष १६ शेप २६२१३३२२० इसको १२ से राणके १९८२१४० इसको ३६० से भागके लशि मास ५ शेप १८२१४८ इसको ३० से गृणके ५४८० इसको (१२२) केशपीजातकम्। ३६० से नागके लब्धि दिन १५ शेप ८० इसको ६० से गुणके ४८०० इसको ३६० से भागके लधि घटी १३ शेष १२० इसको ६० से गुणके ७२०० इसको ३६० से भागके लब्धि पल २० इसी रीतिसे सूर्यका वर्षादि निसर्गायु भया १६।५।१५।१३।२० इसी रीतिसे चंद्रादिकोंका करना। जीवायुरुदाहरण:-सूर्यका आयुर्माग २९६१५४४. इसको २७ से भागके लब्धि वर्ष १४ शेष २।१५।४० इसको १२ से गुणके २७८ इसको २१ से भागके लब्धि मास १ शेप ६।८ इसको ३० से गुणके ३८४ इसको २१ से भागके लब्धि दिन ८ शेष १६ इसको ६० से गुणके ९६० इसको २१ से भागके लब्धि घटी ४५ शेष १५ इसको ६० से गुणके ९०० इसको २१ से भागके लब्धि पल ४२ इसी गतिसे सूर्यका वादि जीवायु भया १४।३।८।४५१४२ इसके घटीमें सूर्यके आयुगि २९६।१५।४० को ८ से भागके लब्धि ३७ शेप १५/४० इसको ६० से गुणके १५४० इसको ८ से भागके लब्धि २ यह युक्त कर के सूर्यका वर्षादि स्पष्ट जीवायु भया १४।१।९।२२।४४ इसी रीतिसे चंद्रादिकोंका करना ॥ २३ ॥ पिण्डायुचक्रम् । निसर्गायुच म् । सूचमबु शु श बसूच मधुशुश 01१७/१८२४ ૮ર૧૨૬૨૨૨૮૪ર૮૦ ૨૮૨૮૨૦ ર૦ ९५२४३ १०/१६३७/८/२२) २०७२० જીરૂ - - દર ૧૭૩૦૧૦. जीवायुचक्रम् । शु चं. मं. धु १. श. 8. ६ ५ १० ८ १० १० १२

जापोदाहरणसहितए । (२२३)
पिण्डायुदायत्रये समायुदायद्याधनम् । :
स्पालिताः खनखोद्धृता विभतनोपादिपंडात्रिके
लगायुनिखिलस्तदंशकसम कैश्विदतुल्यं स्मृतम् ।।
यस्येशोधिवलस्तदेव हि परस्तेनाव्यान्यैर्यदे-
शायुर्ववथ चांशतुल्यमखिलोक्तं ग्राहामवादिमम् ॥ २४ ॥
अन्वयः-विनतनोलिता राशि विहाय लगस्य , कलाः कार्याः द्विशत्या
माज्याः' फलं वदिपैडनिसर्गजीवशायुयेषु स्यात सर्वराचार्यस्तदंशक-
सम नवांशसमम् उक्तं लममतुल्य कैश्चिदायुरुकं लगेशनवमांशयोंमध्ये यो बली
तदेव ग्राह्यमित्यन्यो तेनाट्यमिति स्यालिता खनसोद्धृता इत्यादिनानीतं तत्र
तेनायराशीशो वली तदा राशितुल्यवर्पनयमांशे बलवति तदा नवमांशतुल्यं
वर्षम् आदर कुन अंशायुवदानीते लगायुपि इत्यपरमतम् अथ निखिलोक्तम्
अंशसममादिममेव प्रात्यमिति यावत् ॥ २४ ॥
मापा:-राशिको छोडके भागादि लगकी कला करके उसको २००
से जाग देना तो पिण्ड निसर्ग और जीवशर्मापुर्यायो - लमायु होती है यह
अंशतुल्य अर्थात् समभुक्तनवमांशतुल्प आयु सर्वाचार्य संमत है कोई आचार्य
लमकेरा
राशितुल्य कहते हैं । लग्नपति अंशपतिमें जो बली होप ततुल्य (अर्थात)
समाति चली होय तो लपके राशितुल्य आय अंशपति यली होय तो अंश-
तुल्य आयु. यह कोई आचार्यका मत है । आयुर्यायौ कथितरीति जो
आयु आये उसमें अंशपति चली होय तो अंशतुल्य, लमपति बली होय तो
समतुल्य वर्ष युक्त करना, यह परमत है । ऐमा पृथक पृथक् सर आचार्याने
कहाहै तथापि प्रथम प्रकार जो है साई सबका मत है। इसलिये उसीको
मानना इति ॥ २४॥
उदाहरणः-राशिरहित भागादि लग्न९।४६।२६ इसकी कला ५८२२६
इस को २०० से जाग २॥ १० ॥२८ । २२ । ४८ यह पिण्ड, निसर्ग,
जीपायुपके पिपे लमायु जानना ॥ २४ ॥

(२२४)
केशवीजातकम् ।
तुर्णामायुषा व्यवस्थामाह!
मंशायुश्च तनाविनेऽधिकवले पण्ड निसगै विधी
स्याचेत्तुल्यबलं योयुतिदलं तनायुपोक्षेत्रयः ।।
व्यायूंपि विबलेनिहत्य च युतिपायपदा विना-
युयुत्यात्रियोऽथ जैवमुदितं चेदीनीयस्त्रियः ॥ २५ ॥
अन्वयः-अधिकबलायां तनावरायुः, इने सूर्येऽधिकबले पिंडायुः, विधा
वधिकवले निसर्गायुः साध्यम् । यदा द्वौ सबली तदा तत्वायुषो योगदलं
मिश्रायुः स्यादिति गौणः, मुख्यस्तु तत्तायुस्तनदलेन संगण्य तयोोग तयोर्व-
लैक्येन भजेत्तदा मिश्रायुः स्यादित्यर्थः । यदि लमार्कचन्द्रारूपयोऽपि तुल्य-
बलातदा लमबलेन दिनादिकमंशायुः संगुण्यः सूर्यबलेन पिंडायु: संगण्य
चन्दयलेन निसगीयुः संगुण्य सर्वेषां योग लमार्कचन्द्रबलयोगेन ममेकलं
मिश्रायुः स्फुटं स्यात् । अथवा त्रयाणामायुपा योगस्य तृतीयांशो मिश्रायुः
स्यात् । चेल्लमाकंचन्द्राषयोऽपि होनबलास्तदा जीवशर्मायुः स्यादिति ॥ २५॥
भाषा:-लम बली होय तो अंशाय, सूर्य बली होय तो पिंडायु, चन्द्र
बली होय तो निसर्गायु लेना, जो दो समवल कहिये पहपाधिक बल होय
तो उसीसे उत्पन्न आयुष्पका योगा आयु होता है. लग और सूर्य समाल
होय तो अंशायु और पिंडायुका योगा करना, लम और चंद्र समबल हो तो
मंशायु और निसर्गायुका योगा करना सूर्य और चन्द्र समयल होय तो
पिंडायु और निसर्गायुका योगाध करना तो टम सूर्य और चन्द्र यह समबल
होय तो तीनों आयुष्यको तीनोंके बलसे गुणके ऐक्य करके उसको तीनों के
बलेक्यसे मागके जो भागाकार आये सो अथवा तीनोंके आयुष्यके योगका
तृतीयांश आयुष्य लेना वह मिश्रायु होता है, जो टम, सूर्य और चन्द्र
यह वीनोंही हीनवल होयके रूपश्याल्प बल होय तो जीवशक्ति भार
सेना ॥ २५॥

भाषोदाहरणराहितम्। (२२५) उदाहरण:-सूर्यका अंशायु ८1१०1१७।२९।२४ यह दिनादि करके ३३९४१२९।२४ इसको लमबल ७।२४।८।३० से गुणके २३६६८ ५८१३२ इसी प्रमाण चन्द्रादिकोंका अंशायु गुणना। रविका पिंडायु १५111८1५७१४० यह दिनादि करके ५६२८१५७ ४० इसको रविबल ७५११५३।३० से गुणके ४४२७०५९।५० वह भया, इसी प्रकार चन्द्रादिकोंका व सूर्यका निसर्गायु १६।५।१५।१३१२० यह दिनादिकरके ५९२५।१३।२० इसको चन्द्रबल ७।२०१४।३० गुणके १३।४५९।२।१० इसी प्रकार चन्द्रादिकोंका निसर्गायु करना । रविका यह गुणित तीनों आयुर्दायका योग दिनादि ३११३९९1०1३२ इसके पल ४.१०३६४३२ इसको लमबल ७।२४।८।३० रविबल ७।५।। ५३।३० चन्द्रवल २०१४।३० इनका योग २२।३।६।६ इसकी विकला ८१३६६ इससे भागके लब्धि दिनादि ४९२०1४७१४६ यह वादि करके १३१८८१४७१४६ यह सूर्यका मिश्रायु जया इसी रीविसे चन्द्रादिकोंका मिभायु साधन करना। अथया रविका अंशायुद्धा१1१७।२९।२४,पिण्डायु १५/७११८५७१४० निसर्गायु ३६५।१५।३३।२० यह तीनों भायु- दयिका योग ४०।११।२११४०।२४ इसका तृतीयांश. १३१७१२७११३॥ २८ यह रविका चदि मिश्रायु भया, इसी रीतिसे चन्द्रादिकोंका करना॥२५॥ अंशायुश्चक्रम् । स. च. मं. यो. पृ.शु. ६म ८ १ ४ २ २ २ ११ मास १ १९ दिन ४२ पत्र ४८ १२ १२ .

(२२६) केशवीजातकम् । पिण्डायुश्चक्रम् । च म घृ श. ल. यो. on ३ ६ ९ ७ वर्ष मास or 188m १६ २२ २८ ३ ८ घटी १३ . ४८ निसर्गायुश्चक्रम् । चं म बु बृ tru शु श. यो . ७२ वर्ष मास ७ १८ १ ८.) २८ ४१ २ urv २७ ७ ०-१०४ २८ 20 ३१ घटी पट ४८ अंशपिंडनिसर्गायुर्योगचक्रम् । चं. म सू बु बृ श. छ. ४० ६ २५ यो २२२ पर्प ३ माम २२ / दिन . २ C २७ १३ २१ योगतृतीयांसमिश्रायुश्चक्रम। यो २ ७ वध . १७ २७ दिन , नही

भाषोदाहरणसहितम् । (२३७)
इदानी बलावलज्ञानं तथेदमायुः केषां घटत इति वदति ।
ज्यल्पे हीनबले वली पडाधिक वाय ग्रहश्वोदयो
भिन्न स्वस्वमते स्मृतायुरिति तत्प्राज्ञय॑वस्थापितम् ॥
अंशायुर्वहुसंमतं भवति तत्सत्यं च सत्योदित
स्यामिष्ठसुशीलपथ्यसभुजां न स्यादिदं पापिनाम् ॥२६॥'
अन्वयः-यह उदयो लमं वा व्यल्पे सति हीनबलः, व्यधिक पझाल्पे मध्य-
बलः, पडधिके बली स्यादिति प्राज्ञैः श्रीपत्यादिभिर्व्यवस्थापित व्यवस्था कता
नितिमिति यावत् । अंशायुश्च तनाविनेत्यादिना जिनमिति स्वस्वमते चतु-
विधमायुः स्मृतमुक्तम् अंशायुर्वहुसंमतं बहूनामाचार्याणां संमतं भवति, सत्यं
च, तदेव सत्त्योदित स्यात बहुसाम्यं समुपैति सत्यवाक्यम् । इदमायुधमिठानां
सुशीलवतां पथ्यसुभुजां पथ्यहितं यदोजनं तत्सेवनं येषां भवति तेषां स्यात्
गणितागतमायुः न पापिना स्यात् ॥ २६ ॥
भापा:-ग्रह या लमका पड्वलैक्य ३ से कम होय तो हीनवल होते हैं ।
३ से अधिक होय तो मध्यवल और ६ से अधिक होय तो चली होता है ।
सब आचार्योने पृथक् ६ आयु कहा है । लग्न वली होय तो अंशायु, सूर्य
बली होय तो पिण्डायु इत्यादि कहा है। ऐसा है तथापि सत्याचार्यका मत
अंशायुपर है। बहुत आचार्योकाजी मत है और जो धर्मिष्ठ, सुशील, पथ्यमोजी
हैं उन्हीकी आयु मिलती है, पापियोंकी नहीं और पथ्यापथ्यसे रहित जो है
वह अकालमें भी मरते हैं ॥ २६ ॥
शिष्यसंदेहनिवारणमाह।
हानिर्यास्तमितेरिभेऽप्यनुमताशोत्थेऽल्पवृक्ष्या नतद्य.
स्माचेष्टिक आश्रयेऽस्ति निखिले पैण्डादिपूक्ताततः ॥
आयुः सौरमिदं यतोऽन्दगपना सौरात्ततः सुरिभिः
प्रोक्तं सत्यमसद्यदल्पकागतं नाशक सावनम् ॥ २७॥

. . (२२८) केशवीजातकम् । अन्वयः--या अस्तमितेऽदहानिः शत्रुसे व्यंशहानिः सा तु पैण्डादित्रिष्वा- युये उक्ता, केनचिशचार्यणांशायुर्शये कता सात्वलघुझ्या हेतुभूतया अल्पा चासौ बुद्धिचाल्पबुद्धिस्तपाल्पबुद्ध्याऽसत् यस्मात्कारणास्तम् इवे हानिश्चे- ष्टिक चेष्टागुणके यतोऽस्तं गतस्य चेष्टागुणके रूपाचमेव हानिः, अरिगृहे शहानिरुक्तास्तीति भावः । आयुः सौरमितमेव ग्राह्य यनोदगणना सौरान उक्तं च वर्षायनेंतुयुगपूर्वकमत्र सौरान्मासास्तथा च तिथयस्तुहिनांशुमानाव।। यत्कृच्छ्रसूतकचिकित्सितवासराचं तत्सावनाच घटिकादिकमार्शमानात ।' ततः सूरिभिः सत्यं पोकम् अल्पकथितं नाक्षत्रक सावन मिति केचिदमज्ञेन नाक्षत्रसापनेनायुः कथितं तददिति शम् ॥ २७ ॥ मापा:-पिण्डादि आयुर्दायमें अस्तंगत यह होय तो अर्ध हानि और शत्रु गृहमें होय तो व्यंश हानि जो सब आचार्योंने कहा है उसको अनुमानसे कोई अल्पबुद्धिसे अंशायुदीयमें करेंगे तो वह करना नहीं, कारण अर्थ हानि चेष्टा गुणकमें और व्यंश हानि आश्रय गुणकमें है, वर्षगणना सौरसे है इसवास्ते विद्वान्से यह आयुर्दाय सौर मानसे कथित है और वही सत्य है, नाक्षत्र किंवा सावन मान लेना ऐसा जो कोई कहते हैं सो असत्य जानना क्योंकि बहुमतसे विरोध है सो ठीक नहीं है ॥ २७ ॥ इदानीं मनुष्यपरमायुरन्यप्राणिनां परमायु:- कथनपूर्वकमायुयानयनमाह। पंचाई नखभूसमा नृकरिणां व्याघ्रायजादेन॒पाः गोकाल्योश्च जिनास्तयोष्ट्रखरयोस्तत्त्वानि सूर्या शुनाम् । अश्वायुः परमं रदा नृवदिहानीयायुरेषां परा- युनिघ्नं नृपरायुपा च विहतं तेषां स्फुटायुर्भवेत् ॥२८॥ अन्ययः-पंचदिनाधिकनसभूवाणि १२०1०५ नृकारणां परमायुः शव । व्यापायजादेपाः १६, गोकाल्यो!महिप्योर्जिनाश्चतुर्विशति २४ भापोदाहरणसहितम् । (२२९) पितापरमायुः, हीति निश्चयार्थबोधकः । वयोष्ट्रखरयोत्तत्त्वानि पंचविंशति २५ वाणि परमायुः, शुनां कुक्कुराणां द्वादशवाणि परमायुः स्यात् अश्वानां स्दा द्वात्रिंशत् ३२, एपा नृवत मनुष्यवदायुरानीय स्वस्वपरमायुयवर्षः संगुण्य नृपरायुपा भोत्तदा नेपां स्फुदायुर्मवेत् इति आयुयाध्यायः पंचमः॥ २८ ॥ मापा:-मनुष्य और हाथी इनका परमायु ३२० वर्ष ५ दिन, व्याघ्रादि और अनादि इनका १६ वर्ष गौ स इनका २४ वर्ष,ऊँट और गर्दन इनका . २५ वर्ष, कुत्तेका १२ वर्प, घोडेका ३२ वर्प यह प्राणीका मनुष्यके प्रमाण आयुदीय वनायके उसको स्वस्वपरमायुसे गुणके गुणाकारको मनुष्यके परमायु १२० वर्ष ५ दिन काग देना तो उस २ प्राणीका सटायु होता है इति ॥२८॥ जगदीशेन रचित केशवीग्रंथटिप्पणे ॥ पूर्णोऽयमायुध्यायो सार्थस्य प्रकाशकः ॥ ६॥ इत्यायुयाध्यायः पष्टः ॥६॥ अथ दशाऽध्यायः॥७॥ यस्थायुर्यदो दशास्प च शुभेष्टोचस्वभाशे तथा- रोहा नीचपरिच्युतस्य यदि सा कष्टारिनीचाशभे ॥ स्यक्तीचे ववरोहिणी भवति सा मध्याचमिवस्वभांशे सयुक्तः स्फुरत्करबलिलेऽष्टाधिक त्याच्छुभा ॥२९॥ अन्वयः- पश्य महस्य समस्य वा यदायुरसावत्य ग्रहत्य दशा स्यात, इष्टविस्वाशे वर्तमानस्य शुभा, इटस्य मित्रस्य मेंऽशे वा उचगृहे उच्चांशे या स्वले स्वाशे वा स्थितस्य ग्रहस्य दशाशुमा स्यात् । तथा नीचपरिच्युतस्य महस्य दशाऽऽरोहा शुभा स्पात यदि नीचारिच्युतमहोऽरिमांशे भरे शबोनी- चस्य या माशे तदा तस्य दशा क्टदा नेफरदा । त्यकोचे महे तदाऽवरो- हिणी अशुभा अशुअफटदा, यदि त्यक्ताचपह उच्चमित्रत्यारो स्थितत्तदा तस्य दशामाऽपि मध्या स्पात् । महास्वतस्फुरत्वरपालिटेशाधिक ग्रह सति जम्म ..

,
(२३०) केशवीजातकम् ।
दशा शुभा स्यात् । शुभयहेदृष्टो युतश्व स्फुरत्करा रश्मियो यस्य स सुरत्करः
बलिऽधिकवले इष्टाधिके इष्टम् इष्टबलमधिकं यस्य स इष्टबलः ॥ २९ ॥
झापा:-ग्रहका जो आयुर्शय वही उसकी दशा होती है. ग्रह मित्रगृहमें
उच्च वा स्वगृहमें अथवा मित्रांशम उच्चांशमै वा स्वांशमें होय तो उस ग्रहकी
दशा शुभ होती है ऐसाही यदि ग्रह परमनीचको छोडकर आगे जाय तो दशा
आरोहा शुभ होती है परंतु जो वह ग्रह शत्रुगृहमें वा नीचमें किंवा शत्रुके
अंश वा नीचांशमें होय तो आरोहा दशा यह अशुभ होती है और यह परम
उच्च छोडके आगे जाय तो दशा अवरोहिणी अशुज होती है परंतु ग्रह उच्चमें
मित्रगृहमें वा स्वगृहमें अथवा उच्चांशमें मित्रांशमें या स्वांशमें होय तो अवरोहिणी
दशा यह मध्यग होती है ग्रह शुनदृष्ट शुभयुक्त, उदित, पलिष्ट और इष्टाविक
कहिये पूर्वमें ले आये जो इष्ट सो अधिक होय तो दशा शुभ होती है॥२९॥
इदानी दशाक्रममाह।
स्थादाद्या हि दशाऽधिकोज इहान्दूदयानां तत-
स्तत्केन्द्रादियुजामथ द्विववो वीर्यक्रमेणेव हि ॥
चेदोजस्समतायुषोऽधिकतयायुस्तुल्यता चेद्दशा-
मोठ्यात्स्यादितकमात्नमविधौ वीर्य हि तत्रोच्यते ॥ ३० ॥
अन्ययः-अदृदयानां सूर्यचन्द्रलमानां मध्ये योऽधिकवलस्तस्पाद्या
दशा कल्प्या, ततस्तत्केन्द्रादियुजा तयथा अके वलाधिके प्रथमदशाऽस्य
ततस्तस्य केन्द्रस्थिनानाम् अर्थात् द्वितीया दशा रविस्थाने स्थितस्य तृतीया
चतुर्थस्थितस्य, चतुर्थी सप्तमस्थस्य, पंचमी दशमस्थितस्य एवं चन्द्रे बा लऐ
बलवनि सति । ततः पणफरस्थस्य २१५1८11१ तत आपोकिमस्था ३१६।
९।१२ नाम योवस्था द्विवहवः संनि तदा वक्ष्यमाणपलाधिकस्याद्या दशा,
ततो न्यूनस्य द्वितीया, एवं तृतीयाद्या, बलसाम्ये यस्याधिकायुः तत्रारि
न्यूनाधिक्य योज्यं, तस्यापि साम्ये यो ग्रहोऽस्तालथमोदितस्तस्याचा दशा
"
ज्ञेयेति ॥ ३० ॥

भापोदाहरणसहितम् । (२३३), आपा:-सूर्य, चन्द्र और लय इसमें जो बली होय उसकी दशा प्रथम जानना और उसके बाद केन्द्र ११४७१० स्थकी दशा, अनंतर पण- फर २१५/८1१३ स्थकी दशा, अनंवर आपोक्तिमस्थ महकी दशा ऐसा क्रम जानना केन्द्रों पणारमें और भापोक्लिमस्थानमें एकसे ज्यादा यह होय तो प्रथम दशा किसकी है तब उसमें जो अधिकबल होय उसकी प्रथम दशा अनंतर न्यूनवल होय उसकी दशा कदाचित् बलकी मी समता होय तो जिसकी आयु अधिक होय उसकी प्रथम दशा, आयुकीनी समता होय तो जो अस्तसे प्रथम उदय हुआ होय उसकी प्रथम दशा होती है ॥ ३० ॥ इदानी लगायदशाप्राप्तबलमाह । चेल्लनाथदशा स्वभावनफलोजांसि पाक्क्रमे केन्द्रोश्चेत्प्रथमाखगोयवलोनिर्भऽन्यवर्गेऽदितः ॥ स्वैवंगशवलैहतो बलमिहत्यं मूलितक्यं परे ज्येवं रिष्टदभत्कृजेऽधिकवले भक्ता तदा रिटद्धत् ॥ ३ ॥ अन्धयः-चेहाद्या लगदशा तदा भावफलनोजांसि कार्याणि ओजांसि स्वस्यषड्वलैक्यानि ग्रहाणां भावजफलैगुण्यानि दशानमे तानि दशा बलानि स्फुटानि भवति चेद:न्दोः प्रथमा दशा, अकस्य चंद्रस्य या प्रथमा दशा तदा यहाणा लनस्य च यत्पडलैक्यं तस्यांविश्चतुर्थांशी गो गृहस्थाने स्थाप्योs- न्यवर्ग होरादिषु चतुर्थांशस्याः स्थाप्यः, ते सप्तवर्गस्थितांकाः स्वर्गेशगलै- निहत्य गुणयित्वा तेपामैगं बलं स्यात् अपरमतं तु अपरे एवं त्रुति । तेषां रणनफलं प्रथम मूलानि गृहीत्वा नेपामैक्यं वलं स्यानदसदेवदेशत्यात सगोदयबलामीत्यादिप्रकारेणानीतवले रिष्टदशंकृतग्रयोर्यदि रिटना रिदद- महापेक्षयाऽधिकबलस्तदा रिटहत्स्यात् ।। ३१ ॥ जाणा-यदि लमको प्रथम दशा होय तो जायफल से यहके पलैक्यको गुण देना तो दशामसे बल होता है यदि सूर्य या चन्द्रमाकी प्रथम दशा (२३२) केशवीजातकम् । होप तो यह और लम इनके बलका चतुर्थांश सतवर्ग बलके गृहस्थानमें रखना और उसका आधा होरादि ,६ स्थानमें रखना और उनको अपने अपने वर्गस्वामी के बलसे गुण देना और सबका योग करना तो बल होता है और कोई आचार्योंका यह मत है कि गुणनफलका मूल लेकर योग करना तो बल होता है यह ठीक नहीं है पूर्वरीतिसे आया जो बल वह यदि रिष्टकती ग्रहके अपेक्षा रिष्टांगकर्चा ग्रहका बल अधिक होय तो रिष्टको नाश करेगा ॥ ३१ ॥ दशाक्रमोदाहरण। यहां सूर्य चन्द्र और लम इसमें सूर्य अधिकबल है इसवास्ते पिंडायुमें सूर्यदशा प्रथम लेके उदाहरणकम लिखना तथापि ग्रंथकमानुरोधसे ला- बलाधिक कल्पना करके अंशायुमें प्रथम लगदशा लेके दशाकम लिखते हैं प्रथमलमदशा अनंतर लमसे केन्द्रस्थानमें सूर्य, चंद्र है और पणफरमें शुक्र, मंगल है और आपोक्लिममें गुरु, बुध शनि हैं इनमें से प्रथम दशा किसकी है यह समझनेके वास्ते दशाक्रमबल करते हैं। दशाकमबलचकम् । जन्मत्तमम स चाशन म रविका षड्यलैक्य ७५११५३ इसको रविक्षावफल ०४६।३३ इससे गुणके ६।३।३६ यह रविका दशाक्रमबल भया इसी रीतिसे चंद्रादिकोका बल करना यहां केन्द्रों जो सूर्य चन्द्र है इसमें सूर्य अधिकाल है इसकी द्वितीय दशाचन्द्रकी तृतीय दशा, अनंतर पणफरमें शुक, मंगल हैं इसमें मंगल अधिकपल है इसकी चतुर्थ दशा, अनंतर शुक्रकी आपोक्लिममें गुरु, , भापोदाहरणसहितम् । बुध, शनि है, इसमें गुरु अधिक बल है इसकी दशा अनंतर शनिको दशा अनंतर बुधकी दशा इस प्रकार अंशाय करना । उदाहरणार्थ सूर्य अधिक बल कल्पना करके पिंडायुमें दशाक्रम लिखते हैं प्रथम सूर्य दशा अनंतर सूर्यसे केन्द्रस्यागमें लम चंद्र है इसमें प्रथम दशा किसकी है यह समझने के वास्ते दशाक्रम बल करते हैं। १९ अंशायुचरम् । लग्न. पन्द्रह शनि बुधः योगः १ ८ ७२ ९ २२ २ २ २४ २ २३ १३ १० २९ २७ RA १९ ४ १२ . १२ १८ . १२ चन्द्रका षडलैक्य १२०१४ इसका चतुर्थांश ११५०१३ यह गृहस्था- नमें बल इसका अर्थ १५५१० यह होरादि ६ स्थानमें बल अप चन्द्रका गृहेश शनि इसका पडलैक्य ६।२।३३ इससे चंद्रका वृह बल ११५०१ इसको गुणके ११।४।६ यह चन्द्रका हरिश चन्द्र इसका पडलैक्य ७।२०१४ इससे चन्द्रका होरावल १५५१० इसको गुणके ६।४३१२४ इस रीतिसे द्रेष्काणाविकोंश गुणाकार करके सप्तवर्णमके गुणाकारका ऐक्य करना तो दशानन बल होता है।

(२३४ संशयीजातकम् । . मह और लग इनका बलचतुर्थाश गृह और तदर्थ होरादि ६ स्थानमें। ग्रह सू च. म शु B. १ १८५३ | २२ ३० ५१ २ ४२ . . ० . . . ~~|.9.09. ८१ . ३ ३९ . G . . . मी 2018 . देवाण/५८५२ / ३८ S. ३९ ५६] ४१ ३ ५६ | २७ ( ० ३१ . . . . . सप्तमोश ५८ ५५ ३८ o ३ २७ . . . . . . नवमांश ८२ . २७ . . . . . द्वादशांश ५८/५९ ३९ ५६४१ ० . . ८ . . निशांश ३८ ३९, ५६ ४१ ५६ । २७ . .

(२३५) झापोदाहरणसहितम् । वर्गशवटले गुणके। . सू च. म. . श. बु ९ ८ १ १३ १० wr ५ or ६ ५३/२४ ३४ १६ ३७ ३२ ५ . ७ ३ देवा. २२ १० ६ . ५ ") ३ ३ ४ ५ ३ ७ १२] १२ ५३ ४ ३ ७ ३ नामा १२/ ३२ १ ० १५ ६ ३ ३ द्वाद ३५ ८ ३१ ५ २२ १२ १४ १९ ३८ ३ ३ ५६ ५ ४ निशा.२७४६ ५४ ७ गुणाकारका क्यदशाकमबलचक । पहः मगर: धुरः ४७ ३८ ३३ ३१ गुरुः171310: ४६ ६२ ३२ ८. 13 . यहां सूर्यसे केन्द्रस्थानमें राम चन्द्र है इसमें लम आधिक बल है उसकी 'द्वितीय दशा, अनंतर. चन्द्रकी पणपरम मंगल शुक्र इसमें मंगल अधिक पल है उसकी दशा अनंतर शुभ दशा आपोक्लिममें घुध, गुरु, शनि है, इनमें गुरु अधिक बल है उसकी दशा अनैदर शनिशा अनंतर बुपकी शा

(२३६)
केशवीजातकम्।
यहां मिश्रायुमें सूर्य अधिक बल है इसवास्ते यही दशाक्रम जानना यह
चल पिंडायुमें और निसर्मायुमें लेना अंशायुमें पहले जो पल किया है उसका
प्रमाणसे दशा रखना।
पिण्डायुर्दशाचक्रम् ।
च.
मं
शु
बृ.
श.
बु. । यो.10
१९
ur
९
urror
२
७
२८ २९
५७।१२।२४
૨૮
२८
२२
सर्प
१०मास
१६ | १३ | दिन
घटी
२१
.
३
१८
२
उदाहरणार्थ चन्द्रका अधिक बल कल्पना करके निसर्गायुमें दशाक्रम
लिखते हैं प्रथम चन्दशा अनंतर चन्द्रसे केन्द्रस्थानमें लम और सूर्य है
इसमें सूर्य अधिकपल है इसकी द्वितीय दशा भनंतर टमकी दशा चन्द्रमे
पणकरम शुक मंगल है इसमें मंगल अधिकबल है उसकी दशा अनंतर शुक्रकी
दशा, चन्द्रसे आपोक्लिमस्थानमें बुध गुरु शनि हैं इनमें गुरु अधिक बल है
इसकी दशा, अनंतर शनिकी दशा अनंतर बुधकी दशा पिंडायुमें जो पल
किया है उसी बलके प्रमाणसे निसीयुमेसी लेना, और जीवायुमेची रेना ।
निसर्गायुचकम् ।
चं. सू.
मं.
वृ.
श.
बु.
.
७
२५
४
.
यो.
७५ वर्ष
४ मास
१९ दिन
३१ । घटी
३
२८
१५ २०
२७
४३
४८
.
जीवायुपमें सूर्य, चन्द्र लममें हीन बल होय तथापि जो उसमें अधिक
बल होप उसकी प्रथम दशा कल्पना करके अनंतर उससे जो केन्द्रादि स्थानमें
होय उनकी दशा इत्यादि कम जानना ॥ ३१ ॥

मायोडाहरणसहितम् । (२३७) रिष्टमंगविचारांतरं दशाकमवलदार्थ , मतांतरनिराकरणं च । भक्तू रिष्टकृतो हिताहितशुभासत्वं च नीचोचमा. स्तावस्याश्रयतां विचार्य मतिमान रिष्टस्य भंग वदेत् ॥ श्रेष्ठं रिष्टहतो दशाकम इहोजः श्रीधरायोदितम् कटेष्टनबलांतरात्कच कृतं तद्युक्तिशून्यं त्वतत् ॥ ३२ ॥ अन्वयः-संतुरिति । रिष्टगंतुः रिष्टकतो रिष्टकारकस्य ग्रहस्य हिताहित शुभाशु विचार्य रिटमेग वदेव हित इटे, अहितं कष्टं शुशासत्वं शुभग्रहं पापयह च उच्चस्थितो नीचस्थितो या अस्तोदितो या मित्रगृहे शत्रुगृहे या स्यादित्यादि सर्व विचार्य रिष्टस्य गं वदेत मतिमान् । इहास्मिन्मथले दशाकमे श्रीधरयो- दितम् ओजो बलश्रेष्ठं इष्टवलेन गुण्यो दशाविधौ बलं स्यात् । अथ परमतम् कोयनेति । कच केचनाचार्या कष्टायां गुणिने चले लपोरंतरात्साधितं वीर्य इकू पृथगिएकटयुणितमित्यादिना इष्टकटगुणितं पडलं तयोरंतर काय तस्म चतुर्थांशो गृहे, होरादावर्धितः ततः स्वस्ववर्गेशपलेहतरतेपामैश्यं सष्टबलं स्थानदसत युक्तियन्यत्वात् ॥ ३२॥ जापा-अरिष्टकर्ता यह और अरिष्टांगकर्ता मह इनके इष्ट कष्ट वह शुभ है किंवा पाप हैं यह और वह नीचमें उच्च मित्रगृहमें शत्रुगृहमें और अस्तंगत उदित है इत्यादि इनका आश्रयत्वका विचार करके बुद्धिमान गणकने अरिष्ट. अंग कहना यह ग्रंथमें रिटरंगके विपे और देशाक्रमके विषे श्रीधरादिक आचार्योंने कहे प्रमाण वल लाने की रीति कही है वही श्रेष्ठ है श्रीमति इत्यादि इंधकारने इष्टसे वा क्टसे पड्डुल गुण के उसके अंतरसे जो पल साधन कथित किया यह अयुक्त है इसवास्ते असत् है ॥ ३२ ॥ अंतर्दशाकरणम् । अपस्यैकमगस्त्रिकोणगृहगस्पंशस्य चास्ते नगां- शस्पांप्रेश्चतुरखगो निजगुणः पंक्तको स्यादली ।।

(२३८) केशवीजातकम् अंशादो कुरु रूपमत्र समतो कृत्वा च नाशं छिदा- मंशनाः स्वदशा पृथकू खलु लवैक्याप्ताः स्युरंतर्दशाः ॥३३॥ अन्वयः-मूलदशेशगृहस्थो ग्रहो निजगुणैरपक्ता पाचको अवनि निष- गुणैरित्यस्यार्थरत्यारोहावरोह उच्चनीचक्यादिभिरित्यर्थः । त्रिकोणगो नवमपंचमस्थानगत्यंशस्य अस्ते सप्तमस्थे नगांशस्य सप्तमांशस्य चतुरस्रश्चतुर्था- मस्थानगोंधेऽश्चतुर्थाशस्य पत्ता पाचको भवति लमस्याप्येवम् । एकजे विहुपु सत्सु बली एक एव ग्रहः पाचयति न सबै, अत्रापि दशाकमवलं ज्ञेयम् । अंशादी रूपं रुत्वा ततः प्रथममेकगृहस्थितस्य, ततखिकोणस्थग्रहस्य, ततो अस्तगतस्य, ततश्चतुरस्रगतस्य ग्रहस्य मागाः स्थाप्याः ततः समच्छिदीसत्य छेदगर्म च कत्या पृथक् नेपामंशानां योगः कार्यः ग्रहदशा पृथग्भलैगुण्या अंश- योगेन भाज्याः अंतर्दशाः स्युः ॥ ३३ ॥ भापा:-मलदशापति अर्थात् महादशापति जिस राशिम होय उसी राशिमें जो मह होय वह दशातिके संबंधो दशारतिके अर्थफलका पाचक होता है । दशापतिसे ५।९ स्थानमें रहनेवाला यह दशापतिके तृतीयांश कालका पाचक होता है और दशापतिसे सनम ७ स्थानमेंका ग्रह दशापतिके सप्तमांशका पाचक होता है और दशातिसे ४८ स्थानमेंका ग्रह दशापतिके चतुर्थांश कालका पाचक होताहै, सर्वत्र ग्रह आरोहावरोह उच्चनीचादि पूर्वोक्त स्वगुणसे शुभाशुभफलका पाचक होताहै कहिये अन्य दशामें भी अपने पाककालमें शुभाशुभ फल देता है एकराशिमें एकसे ज्यादा यह होय तो उनमें जो बलिष्ठ ग्रह होय उसीको सेना यहां अंशस्थानमें १ लेके उसके नीचे छेद लिखना अनंतर समच्छेद करके छेदांक त्याग करना अंशांकसे स्वकीय स्वकीय वर्षादि दशा अलग अलग गुणके गुणाकारको अंशांक मिलानेसे जुदा जुदा भाग दना तो अंतर्दशा होती है। अंतर्दशाक्रमः। प्रथम दशापतिकी अंतर्दशा, अनंतर दशापतिके राशिमें रहनेवाले ग्रहमा अंतर, फिर दशापतिसे ९१५ स्थानमें रहनेवालोंका अंतर, फिर मापस्थानक - सापोदाहरणसहितम् । ग्रहका अंतर, भनंतर ४८ स्थानके ग्रहका अंतर, कदाचित् पूर्वोक्त स्थानों में दो तीन ग्रह होय तो बलके वशसे क्रम जानना जो दशाकमके विपे बल है वही अंतर्दशा में भी वल जानना। समच्छेद करनेकी गति। जिन संख्याओंका समच्छेद करना होय उनको बराबरसे रखकर एकके हरसे दूसरेके हर अंशको गुण देना और दूसरेके हरसे और सबके हर अंशको गुणना ऐसा परस्पर गुणसे सनानच्छेद होता है। पदाहरण:-जैसे लमदशाम अंतर करना है.ल. शु.श.सू.चं.. इनको समच्छेद करके २५२१८४८४ । ३६ । ६३ अं. २५२१२५२।२५२१२५२१२५२ है. इन अंशोंकी मिलान ५१९ इसको ३ से नागके १७३ अंशॉ ३ से भाग देनेसे ८४२८१२८१२।२१ इसी प्रकार जहां अधिक अंक होय उसको अपवर्तन देके सूक्ष्म अंक करलेना जो काम उस अंकसे होता था वह काम इस अंकसे हो जायगा ॥ ३३ ॥ उदाहरण:-यहां सूर्यवल अधिक है इसवास्ते मिश्रायुमें प्रथम सूर्य-शा १३१७१२७११३१२८ अव सूर्यदशामें अंतर्दशा विचार, यहां कुंडली में सूर्यके साथ कोई यह नहीं सूर्यसे विकोणमें मंगल है सो पाचक है और सूर्यसे सनममें लम है सो पाचक तब सूर्यदशामें मंगल और टन पाचक है सूर्य+में+ल. समच्छेद करके स. म.सेल. में इसके छेद त्याग करके सृ. २१ मं.७ ल.३ यह अंशांक भया यहां सूर्यकी मूलदा १३१७॥ २७१३।२८ इसको सूर्यके अंश २१ से गुणके २८६।१०।१४२१४८ इसको अंशांकमी मिलान ३१ से भागके ९।३।१३।२२ यह सूर्यमें सूर्यको दशा, सूर्पकी मूलदशा १३१७१२७११३।२८ इसको मंगलके अंश ७ से राणके ९५/११०३४४१६ इसको अंशांककी मिलान ३१ से .

१ (२४२) देशयोजातकम् । और विदशापतिको दशा पति कल्पना करके विदशाम उपदशा ल्पावना यही रीतिसे दशामें अंआर्दशापति अपने गुण प्रमाण फल देते हैं और अंतर्दशा विदशापति अपने गुणत्रमाण फल देते हैं और विदशामें उपदशापति अपने गुण प्रमाण फल देते हैं ऐसे उपदशासूक्ष्मकालिक फल जानना । यहां १ बलाका अंशायुर्शय सानेकी रीति प्रमाण आयुदाय किया तो १ दिन ४८ घटी माया ऐसा दीखता है ब्रह्म सौर आर्यभट्टादि पक्षसे ग्रहका भागादि अंतर आता है इसवास्ते आयुदायमें मासादि अंतर आवेगा । जब जन्मकाम पलमात्र अंतर आताहै तब लममें ६ कलाका अंतर आता है और इ क्लासे आयुदीयमें १० दिनका अंतर आयेगा ऐसा अंतर देखकर भी जो यह दशा प्रवेशादि लमफल कथित किया है उग दूर- दर्शीको दण्डवत है ॥ ३४॥ सूर्यम्ह दशात- सूर्यमह दशांतगत- सूर्यमहादशातर्गतहमा- |र्गतसूर्यातर्दशा- मगलातर्दश मध्ये तर्दशामध्ये विदश - मध्ये दशाच विदशाचरम् सूमाम |सू शु| बुलशुशसु च या चत्रम् ३ ६/२२२१२३४ ११/०२/१७/१७३२७०० २९/२२१११२३२२३८८२०३/११/१२/५१ |२७/२९।२६२.९१३८/२०५२२८१111 शापोदाहरणसहितम् । (२४३) लममहादशांत-लममहादशांतर्ग-न्द्रमहादशांतर्गत- वस्यौतर्दशा-चंद्रांतर्दशामध्य चन्द्रातर्दशामध्ये मध्य विदशा- विदाचाम् विदशावत्रम् ...[. सू. म.यो..सू...यच. बृ.सू. म./य २ ५५/१/११/201८१०८/८/१५ २८.९१६२८१७२०/११/११//२०२६/५/५/२७) (१३२/५५२७१९४६-९/४९.६८४६५४ ५९/ २०१४३३५५६/५६५५ चन्द्रमहादशांगत. चन्द्रमहादशा- चन्द्रमहादशावर्गत- जीवांतर्दशामध्ये नर्गतसूर्यान्तर्द- मंगलांतर्दशामध्ये विशाचक्रम्-शामध्ये विद विशाचक्रम् शाचकम, चं. (सूयासू माल.यो म.सू.शु./ बु.यो. २०० .३० ११/३/१२/७१०३१ ८/२/१/२२ १७२५/१२/२६२९/४/१२/२३२९२०२६/७/९/२९/ २४०३४४२२२७२८/१०/१७/०५/११/४/१० ૨૩ રવિવારવાવ શ . . . ० . मौममहादशांतर्गत- मीममहादशा मौममहादशांतगत. मंगलांतदेशामध्ये !तर्गतसूर्यान्तः शुशांतर्दशामध्ये विदशाचक्रम् देशामध्ये विदः विवशाचक्रम् शाचम्म. . ८ . . . ८/२/१ (३७२५४६/४ CO . ३।११२८/१०/moltiv३ ऐशवीजातकम् । मोममहादशातर्गत- शुकमहादशांतर्गत शुक्रमहादशातगंत- बुनिदेशामध्ये शुक्रांतदंशामध्ये समानदेशामध्य विदशाचत्रम् विदशा चक्रम् विवचनम् लश यो शुश मोलि शु श च को ०० . . . D २० ३७:३९५४/३५४६१५/१५५८९४१,५७२५) १/३/२/१२/५३२/३३३३६३९ २२५३११ शुक्रमहादशातर्गत शुक्रमहादशातर्ग-शुक्रमहादशांतर्गत- शमरतर्दशामध्ये समगशाम गुन्तिर्दशामध्ये विश चक्रम् ध्ये विदश चक्रम् विदशापक्रम् शल गयो मसू शु.यो बुये ०१ . C a ० . . . . . (४४४३३ २२१/७२८२०१७)२२२७२०)२८) ८ गुरुभइ दशांतर्गत (गुरुमह दर्शनर्गत. भुवनाशाम । चन्द्रनिदेशामध्ये विदशाचक्रम्. विदशाचरम् गुरुमहादशातर्गत- घुपान्तर्दशामध्ये विदशाचकम्. ल. शयो . ४०० २ . ० . १०/११/४/८/१०१०३.२.२१७/५/०१/२/८ar ११७ ८८१२ दि. ४९/१६२५५७१९४१९६ ६ १७२५२६२८ घ (३८३३३९२१४ ૧૮ટોરીકા૨૨૮ 4 पायोदाहरणसहितम् । (२४५) गुरुमहादशा- शनिमहादशांतर्गतश-शनिमहादशातर्गत. तर्गतसू. म. नेरंतर्दशामध्ये विद- लग्नांतर्दशामध्ये विद- विदशाचक्रम. शाचक्रम्. शाचक्रम्. सू. म.लया. श. ल. शु. ५. वृ.यो. ल. शु.शि.सू.चं.यो १३.१११० ९/३/१२/६/२१२/१०/१०७/२/४/४/२/३/६ २१/९/१२२१४४/१/११६१६/१०/२३१२७/२७/३/२०१३ ११८२६४२४१२३३७३५१३११३३६३४/२०५०२२/२३/३२ १६/५/२८४९/४६५५५५२७/२७/३२/०२०/० ०३०१० . 0 . . ०२ शनिमहादशीतर्गतशु- शनिमहादशातर्ग- शनिम. ६. गुपेत. कोतर्दशामध्ये विद तचंद्रातर्दशाविद- दश'मध्ये विद- शाचक्रम्. शाचक्रम. शाचक्रम्. शुल.श.मं. याचं समायो. चं.यु.सू.यो. . . ० ० . २३/२७/२७३ २०१३/३/११२३/२६/१६२२२६,९२५) ३४/५०/५०२२/५३/३२/३३(१९२३/२३/३०२४/१०/०२/२९ २०/२01013०1१/ १४/१९/१९५६/२७१९ बुधमहादशांतर्गत-| युधमहादशा-1 बुधमइ दशांतति- युधांतर्दशाविद तर्दशामध्पविद सनातर्दशामध्ये शचक्रम्, शाचक्रम्. विशाचकन. ..लश...! यु.म.पा. स.शु.श. सूचय ८ ४४७७१०३/१० ८/१२/२ ર૮રરર રરરરરર ७९/१२२११८२६२८४२३१८२०२२/९/१७२० १२५१ २ ४३१४२२६/१२/१५ . . . . ..

(२४६)
केशवीजातकम्।
बुधमहादशांतर्गतशन्यतर्दशामध्ये विदशा ।
श.
ल.
श
चं.
할
यो.
.
०
.
.
.
.
३५
२६
१७
२६
३३
३
इति विदशा संपूर्ण ।
जिस प्रकारसे विदशा करी है उसी प्रकार उपदशा करना किंचित् उपदशा
आगे कहते हैं।
उपदशा चनम्।
सू म द मू मू म द सूर्यत । स म दशा० लय तक
(तिम विदशाभगल घिद उपदर मध्ये विदशामें उपदशा।
उपदशा चक्रम्
चक्रम्
सू। मरयामसू शपल शशस्चयो
०१६/१].
|२|१७||२/४१२/३/१]५/१
२०२१/८/६/२५/२५ 1२/६/२२
२२. ९२२
.
०
.
इसी प्रकारसे अदशा सब करना यहां पथके
बढ़ने के अयसे तीनही लिखा।
जगदीशेन रचिते केशवीगंधटिप्पणे ।।
दशाधिकारः पूर्णोऽयं तनापार्थप्रकाशकः ॥ ७॥
इति दशाध्यायः सप्तमः ॥ ७॥

पापोपाहरणसहितम् । (२४७) अथ दशाकलाध्यायः॥ ८॥ दशाप्रवेशकालसापनाहगणसाधनम् । शाकोऽब्दा जनि मध्यमार्कमयुतं मासादि तद्युग्दशा- मुलं दाद्यं तत्र शके सभादितरणिमध्यो दशादी भवेत् ॥ घनीभूतदशा पृथक् त्रिकुहता खांशाप्टहत्तधुत्तों सा स्यात्सायनिकाऽन्दपव्युतधुर जनियुचनः ॥ ३५ ॥ शा अन्वयः-शाकोऽन्दा जनि शाक एवाव्या वत्सरा कल्प्पा, जनि मध्यमार्क- अमुखं मासादि जन्मकारिकमध्यमार्कस्य राश्यादिकं मासादिः कल्प्या, जन्म- शके एवं प्रथमदशामवेशो ज्ञेयः, द्वितीयस्तु तेन वादिना युक्तं दशादाय कार्यम्, दशामा शाकेपु योज्श अथ मासाद्ये दशामासाद्यं योज्यम् एवं तत्र शके अधस्थमासादां, समावि तरणिर्भध्यमो दशादौ मवेत एवं तृतीयादि दशादौ मध्यमो रविपः । तात्कालिकमासाबानयन पक्षीभूतदशेति दिनीकतदशा पृथक्स्थाप्या एकत्र त्रयोदश १३ मिर्गुण्या खांशष्ट ८९० मिक्ता लब्धेन दिनाद्येन पृथस्था युक्ता कार्या तदा सावना दशा स्यात् यदा दशाब्दपलयुक्ता तदा तयुग जनिधुवन इति तया दराया युक् जनियुब नो जन्मकालिकाहर्गणः सावतः सूर्योदय कालिकोऽहगः सूर्योदयापिटेन घटोपलेन युक्तस्ता साययाः स्पादिति भावः । स एष दशाहर्गणः पूर्वोक्ताकारण युतो वपादौ द्वितीयादिदशामरेशकालिकोऽहर्गणो भवति । एवं तृतीयादि ज्ञेया ॥ ३५ ॥ भापा:-जन्मकालीन शकको प्रथम दशावर्ष युक्त करना और जन्मकालिक मध्यमराश्यादि सूर्य को प्रथमदताका मातादि राश्यादि मानके युक्त करना तो वह दशावर्षयुक्त किया जया शको द्वितीयदशारंभ मध्यम सूर्य होता है। प्रथादशादिवसादि करके पृथक् रखके एक ठिकाने उसको ३३ से गुणके ८५० से नागके जो दिवसादिफल आपेगा सो और- दशावर्षतुल्य फाल पृथक रखे अंकमे युक्त करना तो वह प्रथम सावन दशा होती है. अनंतर वह जन्मकालीन सावपय अहणमें युक्त करना. तो द्वितीय दशारंग का अहाण होता है।

(२४८) केशमीजावकम् । शकको दशायर्ष युक्त करने के कालमें सर्वदशा वर्षादि रखना प्रथमदशाके नीचे शुक रखना और शक के नीचे जन्मकालीन मध्यम सूर्य रखना अनंतर सूप प्रथम दशामातादि युक्त करके वर्षशकमे युक्त करना ॥ ३५ ॥ माहरण-प्रथम सूर्यदशा वर्षादि १३१७१२७ ॥ १३ ॥२८ इसके नीचे जन्मकालीन शक १८०८ यह वर्ष मध्यम-सूर्य ०198119 1 ५६ इसके प्रथमदशामासादि युक्त करके ८1८।२५ १२४ और शकमें वर्ष युक्त करके १८२१ यह शक ८1८।२५ । २४ मध्यम सूर्य रहते सूर्यदशा पूर्ण होयके लम दशा प्रवेश गयी इसी रीतिसे सर्वदशा प्रवेश करना और इसी पारसे विदशा और उपदशा प्रवेश करना, अथवा रपट सूर्य और संवत् युक्त करना। दशाभवेशचक्रम् । सू. म. बृ श. वु यो. . ४ २७ २० Puron . १८०८९८२१/१८२८२८३७१८३२२८९३१८६२११८७०२८८४) ८ A. १२।२५। ३७ २४ २७ । ११ ५४ ३२ .. अहंगंण करनेकी गति. ११म सूर्यदशा १३७१२७१ १३२२८ यह दिवसादि करके १९१७॥ १३१२८ यह पृथक् १३ से गुणके ६३९२२५५१४ इसके ८९० से भाग के लब्धि दिवस ७१, शेष ७३३१५५१४ इसके ६० से गुणके ४४०३५॥ ५ इसको ८९० से भागके लन्ध घटिका ४९ शेप ४२५ । ४. इसको मागोवाहरणसहितम् । ६० से गुणके २५५०४ इसको ८९० से भाग देके लन्धि पल २८ और दशावर्षतुल्य पल १३ युक्त करके लम्प दिवसादि ७१ ॥४९॥४१ यह पृथक् रस्सा जो दिवसादि दशा ४९१७ ॥ १३॥ २८.इसमें युक्त करके ४९८९ १३॥ ९ यह प्रथम सावन दशा भई जन्मकालिक अहर्गण जन्म कालीन इष्ट घटीसहित १७८ १ ३२ । १ यह साधयव अहर्गण इसके सायनदशा ४९८९ । ३ १९ युक्त करके ६१६७१३५११० यह बुपदशा- रंतसमयमें सावयव अहगण अया। परंतु जब यह अहर्गण ४०१६ से ज्यादा आवे तब ४०१६ से नामके शेप रहे सो अहर्गण जानना और लब्धि आवे सो पूर्वमें आया जो चक्र उसमें युक्त करना अब यहां अहर्गण ६१६७ । ३५ ॥१० यह ४०१६ से अधिक है इसको ४.१६ से भागके लब्ध १ शेष २३५११३५।१० यह अहीण भया पूर्वाना ३३ लब्ध १ युक्तः करके ३४ चक नया ॥ ३५ ॥ अहर्गणप्रयोजनमा । तस्मात्सावयवाद्गुणात्स्वकरणात्साध्या दशादो खगाः क्षेपाज्जन्मसगाप्रकल्प्य यदि वा साध्या दशा सावनात् ॥ ते स्पशाच तिथिश्च संक्रमवशान्मासो दशादी तनुः पूर्वोक्तं जडकर्म चात्र तु मया तल्लाघवं दर्शितम् ।। ३६ ॥ अन्धयः-तस्मात्साययवादहनणादशादी स्वकरणाजन्मकाले यस्माका- पाहाः साधितास्तेन करणेन दशामवेशाहगंगाबहाः साध्याः । यदि जन्मख- गान्पाप्रकल्प दशादौ सावयवात्सावनाहाणात्साधिता महा जन्मकालज- मित क्षेप्यास्तदा ते दशादी सगा भवंति एवं कते मादनादशा भयंति अस्मा- हर्गणादानीतोऽका मजातेन दशाप्रवेशमध्यसूर्यण समस्तदाहर्गणः शुद्धो ज्ञेयो नान्यथा । तनो दशादी साधिता चन्द्रागियां जक्ता व्यकवियोलवा इत्यादिना विधिः साध्या राक्रमवशान्गालो ज्ञेगः शुकादिमारोपु यस्मिन्गासे पसंक्रांति (२५०) केशवीजातकम्। विति स चैत्रो मासो ज्ञेय इत्यादि वृपक्षादयो ज्ञेयाः । दशाप्रवेशे लममपि साध्य, स्वेटे पूर्वः पूर्वाचार्यः श्रीधरायैः सावनीदशानयने जडकम महतायासेन कृत- मित्यर्थः । अतो मया लाययं दर्शितम् ॥ ३६ ॥ भाषा:-पूर्वकथित सावयव अहर्गणसे जन्मकालमें जिस पक्षका ग्रह किया होय उसी पक्षसे दशारंभमें ग्रह करना अथवा सायनदशातुल्य अहम्णसे ग्रह करके उसमें जन्मकालीन ग्रह क्षेपक कल्पना करके युक्त करना तो वह दशा- रंभमें ग्रह होते हैं अनंतर वह सष्ट करना और सूर्य चन्द्रसे तिथि लाना यह केवल पांडित्य सावनीकरण पूर्वाचार्यने महान् प्रयाससे किया इसवास्ते वह जढ कम है हमने तो उसकी यहां लाघवता कथन की है ॥ ३६ ॥ उदाहरण-लमदशारसमें १८२१ शकमें सावयव अहर्गण २१५१॥३५॥ १० इससे जो मध्यम सूर्य आवे सो पूर्व सिद्ध दशाप्रवेश कालिक मध्यमसूर्य टाटा२५।२४ के बराबर होय तो यह अहर्गण शुद्ध है, अन्यथा अशुद्ध ग्रह समझनेके वास्ते पूर्वोक्त रीतिप्रमाण सारणीपरसे मध्यम सूर्य करते हैं:- अहर्गण २१५१ इसको ६० से भागके लब्धि ३५ और शेप ५१ यह शेप कोष्ठकके नीचेका सारणीमका अंक २०१५।५७ इसको लमध्यंक ३५ इसके नीचेका राशि छोडके मामादि अंक ४।२९।४६।० इसमेसे प्रथमांकको ६ से भागके बाकी ४ इसका दूना ८ यह राश्यक इसपास्ते टा२९।४।० यह लब्धि कोएकफल और वक्र ३४ के नीचेका सारणामका अंक ९।१७१४८ ४६ और घटीकोनक ३५ और पलकोष्ठक १० इसके नीचेका अंक ०१० ३४.३० और ०1०1०1१० यह युक्त करके ८८।२५।२३ यह मध्यम सूर्य पूर्वमध्यमसूर्यके बराबर है । अथवा दशासावनाऽहर्गण ४९८९।३।९ इससे चकांकफल मिलाये विना मध्यम सूर्य ७१२७१३२२७ इसको जन्म- कालीन मध्यम सूर्य ०११११११५६ युक्त करके ८1८।२५।२३ यह वहीं मध्यम सूर्य आया इसी रीतिसे चन्द्रादि मध्यम करना ।

१ भाषोदाहरणसहितम् । (२५) दशासायनाणसे मध्यम ग्रह करते वक्त उसको सारणी के चक्र के नीचे के अंक युक्त नहीं करना कारण उसको चक्रसंस्कत जन्मकालीन ग्रह युक्त करना होता है। सूर्य मौनराशिके होयके जो सूर्यचन्द्रसे चैत्रमासांतकी तिथि आवे तो शकमें एक युक्त करना तो अहर्गण बराबर आवेगा। दशारंभसमये स्पष्टसूर्यादि। यहां पूर्वकथितप्रमाण सारणीपरसे दशारंभदिवसमें प्रातःकालीन सष्ट सूर्य ८७२७।२८ गति ६१११७ चन्द्र ४१४३०२ गति ७३३१४३ इससे माई गततिथि ०४ इसयास्ते धनका सूर्य रहते पोपकष्णपक्ष जया । अव दशारंभसमय लिखते हैं। संवत् १८५६ शके १८२१ पौष कृष्ण पंचमी शुक्रवार १५ यहां अह- गंण २१५३ इस दिन सूर्योदयके अनंतर घटी ३५ पल १० इस समयमें स्पष्ट सूर्य ८८०२०८चन्द्र ४११११५३।२२ लग्न ३।२६।२२।१२ कहिये कर्कलग्नमें रविदशा निवृत्ति ( समाप्ति ) और लयदशा प्रवृत्ति (प्रारंज) भई इसी रीतिसे सर्वग्रहोंकी दशा, अंतर्दशा, विदशा, उपदशा प्रवृत्ति समयमें स्पष्ट सथ यह और लय करके दशापतिसे फलका विचार करना । सूर्यचन्द्रसे तिथि करण नक्षत्र और योग लानेका प्रकार । स्पष्टचन्द्र से स्पष्ट रवि कम करके जो बाकी रहै उसका अंश करके उसको १२ से भागके जो भागाकार आये वह गतातिथि जानना और जो शादिक वाकी रहेगा वह मुक्त तिथि होगी वह १२ अंशसे कम करके जो बाकी रहै सो भोग्य तिथि जानना, अनंतर मुक्त तिथि और जोग्य तिथि इनकी विकला करके उसको कमसे ६० से गुणके जो गुणाकार आवै उसको. अमसे रविचन्दरसरगतिके अंतरके विकलासे भागके जो भागाकार घटिकादि आवेगा वही क्रमसे भुक्ततिथि और भोग्यातिथिको पदो जानना। . " A (२५२) केशवीजातकम् । गतिथि जो होय उसको २ से गुणके ७ से भाग देना और पाकी मात्र लेगा वह ववकरणसे तिथिके पूर्वाध में करण होते हैं इसमें १ युक्त करे तो तिथि के उत्तरार्धमें करण होते हैं अनंतर तिथिको भुक्तमोग्यकी घटीका योग करके उसका अर्ध करना और उसमें से मुक्तघटी कम करना तो करणकी घटिका होती है जो तिथिकी भुक्तघटी सुमार ३० से घटिका ऊपर होय तो तिथिकी भुक्तभोग्यघटीमेंसे भुक्तघटी कम करना तो करणकी घटिका होती है, कृष्ण- पक्षको चतुर्दशीके उत्तराधिमे शकुनी करण और कृष्ण पक्षकी अमावस्याको पूर्वाई में चतुष्पद करण उत्तरार्ध में नाग करण और शुद्धमतिपदाको पूर्वाधम किंस्तुन्न करण यह स्थित करण हैं. करणोंके नामः-चव १ बालव २ कौलव ३ सैतल ४ गर ५ वणिज ६ भद्रा ७ अथवा विष्टि अथवा कल्याणी नाम है। स्पष्ट चन्द्रकी कला करके उसको ८०० से भागके जो भागाकार भावे सो गत नक्षत्र जनना और जो बाकी कलादि रहेगा वह गत नक्षत्रके आगेका भुक्त नक्षत्र होता है. वह ८०० कलामसे कम करके जो बाकी रहेगा वह योग्य नक्षत्र जानना, अनंतर भुक्त नक्षत्र और भोग्य नक्षत्र इनकी विकला करके उसको ६० से कमसे गणना उसको कमसे चन्द्रस्पष्टमतिके विकलासे भाग देना जो कमसे भागाकर आवे सो घटिकादि आवे वह कमसे मुक्त नक्षत्र और भोग्य नक्षत्र इनकी घटिका जनना। ४ स्पष्ट सूर्य चन्द्र के योगकी कला करके उसको ८०० से जागफे जो भागाकार आधे सो गत योग जानना भौर जो बाकी कलादि रहेगा सो भुक्त योग नपा सो८०० कलामसे कम करके भो बाकी रहेगा सो गत योगके भागेका जोग्य योग जानना । अनंतर मुक्त योग और भोग्य योग इनकी विकला करके उसको मसे ६० से गुणना और जो अनुक्रमसे राणाकार आपे टसको सूर्यचन्द्र के सष्टगनिके अंक विकलास भाग देना जो अनुक्रमसे भागाकार माये वह टिकादि आयेगे वह क्रमसे भुक्त योग और नोग्य इनकी पटिक! जानना।

नायोराहरणसहितम् । उदाहरण:-जन्मकालीन स्पष्ट चन्द्र ९१५।२२।३५ इससे स्पष्टरवि) १३।१०।४२ कम करके ९।२२।११।५३ इसके अंश २६२।११५३ इसमें अंशको १२ से भागके २१ गत तिथि शेप १०१११५३ यह भुक्त तिथि ७ शेपको १२ मेंसे कम करके १ । ४८ । ७ यह भोग्य तिथि सप्तमी अब भुरत तिथिकी विकला ३६७३३ इसको ६० से गुणके २२०२७८० इसको चन्द्रगति ७३१॥ ४३ रविगति ५८।१४ का अंतर ६७३१२९ की विकला ४०४०९ से भागके ५४ घटी ३० पल यह सप्तमीकी भुक्त घटिका मई । अनंतर भोग्य तिथिको विकला ६४८७ को ६० से गुणके ३८९२२० स्पष्ट रविचंद्र गतिके अंतरकी विकला ४०४०९ से भागके ९ घटी ३८ पल यह सप्तमीकी नोग्य घटिका भई। गत तिथि ६ को २ से गुणके १२ इसको ७ से भागके शेप ५ इसवारते सप्तमीके पूर्वाद्ध गरकरण और उत्तराध वणिजकरण अब तिथिकी भुक्त घटी ५४।३० और भोग्य घटी ९।३८ युक्त करके ६४।८ इसमें भुक्त घटी ५४॥३० कम करके ९।३८ यह गर करणकी घटिका भई। चन्द्र ९१५।२२।३५ इसकी कला १६५२२ विकला३५ इसको ८०० से भागके २० गत नक्षत्र वाकी ५२२ । ३५ यह भुक्त नक्षत्र उत्तरापाटा बाकीके अंकको ८०० आठ सौ कलामेसे कम करके शेष २७७ १२५ यह भोग्य नक्षत्र उत्तरापाट भया। अब भुक्त नक्षत्रकी विकला ३३३५५ इसको ६० से गृणके १८८। ३०. इसको चन्द्रगति विकला ४३९०३ इससे भागके ४२ घटी ५१ पल यह उत्तरारापाद नक्षत्रकी भुक्त घटिका भई अनंतर भोन्य नक्षत्रकी . विकला १६६४५ इसको ६० से गुणके ९९८७०० इसको चन्द्रगतिकी विकला ६३९०३ से भागके २२ घटी ४५ पल यह उत्तरापाडकी गोग्य घटिका मई।

(२५४) देशवीजातकम् । स्पष्ट सूर्य०१३।१०१४२ चन्द्र ९।५।२२१३५ इनका योग ९।१८। ३३।१७ इसकी कला १७३१३१७ इसको ८०० से भागके २१ गतयोग बाकी ५१३१७ साध्य भुक्त योग शेप ८०० आठसौमसे कम करके २८६॥ ४३ यह साध्य योग भोग्य अब भुक्त योगकी विकला ३०७९७ इसको ६० से गुणके १८४७८२० इसको रविगति ५८१४ चन्द्रगति ७३११४३ इनका योग ७८९५७ इसकी विकला १७३९७ इससे भागके ३८ घटी ५९ पल यह साध्ययोगकी भुक्त घटिका भई। अनंतर भोग्य योगकी विकला १७२०३ इसको ६० से गुणके १०३२१८० इसको रविचन्द्रकी सरगतिकी विकला ४७३९७ इससे भागके २१ घटी ४७ पल यह साध्य योगकी भोगकी भोग्य घटिका भई इस प्रकारसे तिथि नक्षत्र योग करणकी भुक्त योग्य घटी करना । यहां जन्मदिनमें भोग्य तिथि, नक्षत्र योग इनकी घटिका और ज. न्मकालिक भुक्त नक्षत्रयोग इनकी घटिका युक्त करके जन्म समय ३२ घटिका बराबर मिलते हैं ॥ ३६॥ ग्रहदशायां प्रतिदिनचन्द्रफलम् । चन्द्रः प्राप्तदशेश्वरस्य सुदुच्चस्वसिंस्थो दशा- नार्थाधीनवसप्तमोपचयगो दद्याच्छुभानीति च ॥ यस्मिन् भेन विधुः स जन्मनि तनुस्वायादिभावो यदा तत्तदृदिकरोऽय तत्क्षयकरः प्रोक्तेत्तरस्थानगः ॥ ३७॥ अन्वयः प्राप्तदशेश्वरस्य सुहृद्रे तदुच्चे तत्त्वांशे भवति चन्द्रस्तदा च पुन- दशेशाचमनवमसप्तमतृतीयपष्ठदशैकादशस्थानस्थचन्द्रो भवति । तदा चन्द्रः शुभानि दद्यात् एवं शुभफलप्रदश्चन्द्रो दशायां यस्मिन् भावे वर्तते स राशिज- न्मकाले यस्मिन् भावे वर्तते तनावं शुसं करोति यदि चन्द्रराशिस्तनुभावे स्यात् तदा वनुसौख्यकरः स्यादेवं धनादिनावेऽपि । यदि कथितेतरस्थानमस्तदा

1
भापोदाहरणसहितम् । (२५५)
क्षयकरो हानिकरः स्यात् । मातेतरस्थानस्यायमर्थः-चन्द्रः प्राप्तदशेश्वरस्य
सुहादिस्थानादितरस्थानगः वैरिनीचादिस्थित इति ॥ ३७ ॥
मापा:-जिस यहकी दशा होय उस महके मित्रगृहमें उच्चगृहमें वा स्वगृहमें
होकर दशापतिसे ५९७१३२६१०३१ इन स्थानमें चन्द्र होप तो शुभफल
देता है सो ऐसी दशामें जिस राशिका चन्द्र होय वह राशि जन्मकालमें तनु-
भाव होय तो शरीरवृद्धिकारक, वह राशि धनभाव होय तो धनवृद्धिकारक,
आयभाव होय तो लामकारक और आदि शब्दसे सहज भाव होय तो भातृ-
सुख, सुहृद्भाव होय तो मित्रमुख मुतभाव होय तो पुत्रसुख, रिपुनाव
होय तो वैरिनाशकारक, जायामाव होय तो स्त्रीमुख, मृत्युझाव होय तो मृत्यु-
नाशकारक, धर्मभाव होय तो धर्मभाग्यकारक, दशम भाव होप तो कर्मफल-
कारक, व्ययभाव होय तो न्यय नाशकारक सहजादिनावोंका . भातृसुखादि
फल कथन किया है वैसाहि पराकमादि सुखभी जानना यहां शुभसूचन कयित
है, इसवास्ते और मृत्यु व्यय इन भावोंके फल विपरीत जानना पूर्वकथित
स्थानसे इतर स्थानमें कहिये दशेश्वरके शत्रुगृहमें किया नीचमें चन्द्र होयके
दशापतिसे ११२१४१८११२ इन स्थानमें होय तो भावक्षय, फलकारक होताहै
कहिये दशाम निस राशिको ऐसा चन्द्र है। वह राशि .जन्मकालमें तनुनाव
होय तो शरीरक्लेशकारक, धनाभाव होय तो धनहानिकारक, इसी प्रमाण
सहजादि भावफल योजना करना यहां विपरीत शत्रु, मित्र, व्ययमाव होय
तो वह भाव शत्रु मृत्यु . व्ययकारक ही होता है ॥ ३७ ॥
दशाफलदशारिष्टदशारिष्टभंगः।
यद्रव्यं खचरस्य भावगृहग्योगादि सर्व फलं
योज्यं वृत्तिकृतिलादिह दशायां चाय यो रियुक् ॥
पापः पापदशा विशेस च विपत्कर्ताथ तद्भगद-
स्तत्काले बलवान खगः शुभसुहद्दष्टेएसद्वर्गगः ॥ ३८ ॥

(२५६)
फेरावीभातकम्।
अन्ययः यस्य ग्रहस्य यद्रव्यं तानं स्यादित्यादि भावफल राशिफलं दृष्टि-
फलं योगफलम् आदिशन्दादुचनीचमूलत्रिकोणं, वृचिति विका इति सबै
तस्य महस्य दशायां वाच्यं बलादिति सबले यथोक पूर्णफलं भवति, मध्ये
मध्यं, हीनत्रले हीनं फलम् । अथो यो ग्रहो वैरियुक् शत्रुयुगित्यर्थः, पापग्रहः
पापदशायां विशति अर्थासापदशायां पापस्यांतरे पाने स पापो विपत्कर्ता हानि-
कर्ता स्यात् । यदि कश्चिद्रहो बलवान् शुतामित्रेण दृष्टेऽथा मित्रपडर्गगो वा
इटाधिकः स तदंगदः स्यात् ॥ ३८ ॥
भापा:-जिस ग्रहका जो ताम्रादि अन्य और भावफल राशिफल, शत्रु, नीच
मूलत्रिकोणादि, जीविकाकर्म इत्यादि सब फल दशामें बह ग्रह देता है बल-
सदृश अधिक वली होय तो पूर्णफल, मध्यममें मध्य फल, हीनवलमें न्यून फल
होता है। पापग्रहोंके दशामें शत्रुयुक्त पापग्रहका अंतर आवे तो विपत्कर्ता मरण
जानना परंतु यदि उस समय कोई शुनग्रह बली होयके देखना होय या मित्र-
यह देखता होय वा शुम मित्रोंके गृहादि वर्गों में रहनेवाला ग्रह देखता होय तो
भंगकर्ता होता है ॥ ३८ ॥
अथाष्टलवर्गफलमाह।
खेटस्तस्य यदष्टवर्गजफलं पूर्ण शुभं जन्मत.
बिन्द्रोवृद्धिषु च स्वभोचभसुहृद्रे स्वत्रिकोणेऽस्ति यः ॥
दुष्टं मध्यफलं विपर्ययगतस्थानिष्टमप्युत्कटं
शस्तं स्वल्पतरं खगस्य च वदेज्ज्ञात्वा बलं तत्त्वतः ॥३९ ॥
अन्वयः-जन्मनि तन्विन्दोलमचन्द्रायामित्यर्थः । वृद्धिषु उपचयस्थानेषु
३।६।३०३१ स्वो सोचे सुहृद्रे स्वमूलत्रिकोणेऽस्ति यो यहस्तस्य यदष्टमवर्ग-
जफर शुभ तसंपूर्ण दुष्ट फलं मध्यमम्। एवमनुपचयस्थानगो पहा शत्रुनीचादिग-
स्वस्पाशुभप्युत्कटमशुत स्यात्तथाशुभ फलं स्वल्पतरं स्यादित्यादि सर्वग्रहस्य
पर्गवलं जात्या तत्वतः फलं वदेव यथा पूर्णवले अहे पूर्ण शुभाशुभफलं मध्ये
मध्य होने हीनमित्पर्थः ॥ ३९ ॥

हायोदाहरगडहितम् । झापा:-जो यह जन्मलग्न और जन्मके चन्द्रसे ३।६।१०३१ इन स्था- नामें होकर स्वगृहमें स्वोच्चमै वा स्वमूल त्रिकोणमें होता है उसका अवजफल शुभ जानना, अशुमफल स्वल्प जानना और पूर्वस्थानसे भिन्न स्थानों में अर्थात ॥२॥४५७८।३१।१२ इन स्थानोंमें होकर शवगृहमें या नीच राशिम रहता है, उसको अष्टवर्गजफल अशुभफल पूर्ण जानना और शुभफल स्वल्प जानना जन्मलमसे और जन्मराशिसे अचयस्थानमें और शत्रुगृहमें श नीचमें जो यह रहता है उसका अष्टवर्गज शुसफल मध्यम और अशुत फल किंचित् न्यून जानना । अथवा इतर स्थानमें होके स्वगृहोचादिस्थित रहते अशुभ फल मध्यम और शुभफल किंचित् न्यून जानना वह अष्टवर्गजफल यहाँके पइबल प्रमाण जानना ग्रह पूर्ण बल होय तो यथोक्त फल न्यून वल होय तो न्युन फल और अस्तंगत होय तो फल नहीं ऐसा जानना ॥ ३९ ॥ अथ क्वचिज्जातकालव्यभिचारे कर्तव्यतामाह । जीवेत्कापि विभंगरिष्टजशिशु रिष्टं विना मीयतेऽ- थाघोदा शिशुदुस्तरोऽपि च परो कापु नो पत्रिका ॥ कार्या प्रश्ननिमित्तपूर्वशकुनै रक्षन्स्वमानं धिया होराज्ञेन सुवुदिना हि बहुधोदकंश्च कालो बली ॥ ४०॥ अन्वयः-कापि कचिस्थले विगजो रिष्टनंगरहित इत्यर्थः जीवेद क्यापि रिष् विना मीयते (नियते इति व्यभिचारः। चाचोऽब्द: मथमोऽब्दः शिशो - स्तरः प्रसवज्यरादिपादित्यर्थः। तथाऽनरौ द्वितीयतृतीयायौ दुस्तरौ दन्तजननं पावत अब एषु त्रिपु वपु पनिका नो का मंगादिकं विचारपित्या पत्रयमध्ये - लि पत्रिका कार्या के प्रश्ननिमित्तपूर्वशकुनैः मने निमित्तपूर्वटमैलोपश्रुतायलथा शकुनैः शाशकुनैः शुनवस्तु यदिश्रुतिदर्शनगम इत्यादिभिः शुनं ज्ञात्वा पत्रिका कार्या। किं कुर्वन्स्वमानं रक्षन् गणनेत्यध्याहारः । कि शिशिष्टेन होराविमेन पुनः सुदिना हि यस्मात् उदको भावी कालो बली स्यात् । १० । मापा:-कमी की अरिष्ट भंग रहते विना पालक जीता है और कभी कभी अरिटयोग न रहते भी मरण पावा है ऐसा जातकालमें व्यरिचार इसते

উন্মীলা।
अन्वयः यस्य ग्रहस्य यदन्यं तानं स्यादित्यादि भावफल राशिफलं दृष्टि-
फलं योगफलम् भादिशब्दादुच्चनीचमूलत्रिकोण, वृत्तिकतिर्जीविका इति सर्व
नस्य ग्रहस्प दशायां वाच्यं बलादिति सबले यथोक्तं पूर्णफलं भवति, मध्ये
मध्यं, होनबले हीनं फलम् । अथो यो ग्रहो वैरियुक् शत्रुयुगित्पर्थः, पापग्रहः
पापदशायां विशति अर्थात्सापदशायां पापस्यांतरे प्राते स पापो विपत्कर्ता हानि-
कर्ता स्यात् । यदि कश्चिद्हो बलवान शुशमित्रेण दृष्टेऽथवा मित्रपडगंगो वा
इष्टाधिकः स तदंगदः स्यात् ॥ ३८॥
भापा:-जिस ग्रहका जो ताम्रादि वन्य और भावफल राशिफल, शत्रु, नीच
मूलत्रिकोणादि, जीविकाकर्म इत्यादि सब फल दशामें वह ग्रह देता है बल-
सदृश अधिक बली होय तो पूर्णफल, मध्यममें मध्य फल, हीनवलमें न्यून फल
होता है। पापग्रहोंके दशामें शत्रुयुक्त पापग्रहका अंतर आवे तो विपत्कर्ता मरण
जानना परंतु यदि उस समय कोई शुनमह वली होयके देखता होय या मित्र-
यह देखता होय वा शुभ मित्रों के गृहादि धोंमें रहनेवाला ग्रह देखता होय तो
मंगकर्ता होता है ॥ ३८ ॥
अथाष्टलवर्गफलमाह।
खेटस्तस्य यदष्टवर्गजफलं पूर्ण शुभं जन्मत-
निन्द्रोवृद्धिषु च स्वभोचभसुहृद्रे स्वत्रिकोणेऽस्ति यः ॥
दुष्ट मध्यफलं विपर्ययगतस्थानिष्टमप्युत्कटं
शस्तै स्वल्पतरं खगस्य च वदेज्ज्ञात्वा बलं तत्त्वतः ॥३९॥
अन्वयः-जन्मनि तन्धिन्दोलमचन्द्रयामित्यर्थः । वृद्धिषु उपचयस्थानेषु
अ६१०११ स्वो स्वोचे सुहन्ने स्वमूलत्रिकोणेऽस्ति यो यहस्तस्य यदष्टकवर्ग-
जफालं शुभ वत्संपूर्ण दुदै फलं मध्यमम्। एवमनुपचयस्थानगो ग्रहः शत्रुनीचादिग-
स्तस्यारा भप्युत्कटमशुभ स्यात्तथा शुभ फलं स्वल्पतरं स्पादित्यादि सर्वग्रहस्य
पइवर्गवलं ज्ञात्वा तत्वतः फलं वदेत यथा पूर्णबले ग्रहे पूर्ण शुभाशुभफलं मध्ये
मध्य होते हीनमित्यर्थः ॥ ३९ ॥

कायोदाहरणसहितम् । (२५७) नापा:-जो यह जन्मलम और जन्मके चन्द्रमे १६।१०।११ इन स्था- नोंमें होकर स्वगृहमें स्वोचमें वा स्वमूल त्रिकोणमें होता है उसका अष्टवर्गजफल शुभ जानना, अशुमफल स्वल्प जानना और पूर्वस्थानसे भिन्न स्थानों में अर्थात १२।४1५1८1१1१२ इन स्थानोम होकर शत्रुगृहमें का नीच राशिम रहता है, उसको अष्टवर्गजफल अशुभफल पूर्ण जानना और शुभफल स्यल्प जानना जन्मलमले और जन्मराशिसे उपचयस्थानमें और शत्रुगृहमें आ नाचमें जो यह रहता है उसका अष्टवर्गज शुभफल मध्यम और अशुत फल किंचित् न्यून जानना । अथवा इतर स्थानमें होके स्वगृहोचादिस्थित रहते अशुभ फल मध्यम और शुभफल किंचित् न्यून जानना बह अष्टवर्गजफल' ग्रहोंके पायल प्रमाण जानना यह पूर्ण बल होय तो यथोक्त फल न्यून पल होय तो न्युन फल और अस्तंगत होय तो फल नहीं ऐसा जानना ॥ ३९ ॥ अथ क्वचिज्जातकालव्यभिचारे कर्तव्यतामाह । जीयेत्वापि विभंगरिष्टजाशिशु रिष्टं विना मीयतेऽ- बायोमः शिशुदुस्तरोऽपि च परो कापु नो पत्रिका ॥ कार्या प्रश्ननिमित्तपूर्वशकुन रक्षन्स्वमानं पिपा होराशेन सुबुदिना हि बहुधोदकश्च कालो बली ॥ ४० ॥ अन्वयः कापि कवितस्थले विमंगजो रिटसंगरहित इत्यर्थः जीवेद क्यासि रिष्टं विना मीयते ( म्रियते इति व्यभिचारः। चायोऽब्दः प्रथमोऽब्दः शिशो- स्वरः प्रसवज्वरादियादित्यर्थः । तथाऽरौ दितीयतृतीयादौ दुस्तरौ दन्दजनन पावत् अत एव त्रिषु वर्षेषु पत्रिका नो का मंगादिकं विचारयित्वा वर्षत्रयमध्येऽ- पिपत्रिका कार्या के प्रश्ननिमित्तपूर्वशकुनै प्रश्ने निमित्तपूर्वतयैबलोपश्रुताद्यैस्तथा शकुनैः शुभशकुनैः शुलवस्तु यदि श्रुतिदर्शनगम इत्यादिभिः शुज ज्ञात्वा पत्रिका कार्या । किं कुर्वन्स्वमानं रक्षन् गणकेनेल्पस्याहारः । किं विशिष्टेन होराविशेन पुनः सुबुदिना हि यस्मात उदको भावी कालो बली स्याद४०। भाषा:-कमी कशी अरिष्ट अंग रहते विना चालक जीता है और कमी की अरिस्योग न रहते भी मरण पाता है ऐसा जातकालमें व्यभिचार देखते 7 (२५८) शवीजातकम् । तैसाही प्रथमवर्ष बालकको दुरतर है और आगेको दो वर्ष इस बालको दुस्तर है इसवास्ते ३ वर्षतक पत्रिका नहीं करना कारण भावी फल बहुत प्रकार का है और कालभी दुर्विज्ञेय है, बुद्धिमान् गणकने तात्कालिक लम- पलोपश्रुत्यादि शकुनमे शुभफल जानके बुद्धिके योगसे अपनी प्रतिष्ठा रसके सर्वदा यह तीन वर्ष और आगे भी जन्मपत्रिका करना ॥ ४० ॥ ग्रंथोपसंहारः। नंदिग्रामे केशवो विश्वयों योऽभूद्धोराशास्त्र विलोक्य ।। तेनोक्त पद्धतितिकीया चत्वारिंशदृत्तबद्धा सुवोधा ॥११॥ अन्वयः-पः केशवो विश्वयों नंदियामे आसीत् तेन होराशास्त्रसंघं पिलो- षय होरा एवं शासं होराशास्त्रं होराशास्त्रसमूहं विलोक्य जातकीया पचतिरुका किं विशिष्ट चत्वारिंशत्तवद्धा पुनः कथंभूता सुबोधा ॥ ४१ ॥ भाषा:-दक्षिणदेशमसिद्ध नंदियाममें केशव यह नाम करके वाझणश्रेष्ठ रहता रहा उसने जातकशाखसमूह देखकर उसमें सदुक्त असदुक्त भांत्युक्त बहुमत अल्पमत क्या है इसका विचार करके चालीस श्लोककी सुगम पसी यह जातकपद्धति रचना किया ॥४१॥ ग्रंथप्रशंसामाह । ये सुवोधां पठेतीमामय्यां जातकपद्धतिम् ॥ होगस्त्पिदवीं यांति लोके मानं यशश्वते॥४२॥ अन्वयः-ये गणका इमां सुबोधां जातकपद्धति पति किंभूनामम्मा ते लोके होरापित्तदवी यांति मानं यशश्च लांते ॥ ४२ ॥ भापा-गो ज्योतिपो इस जानकादतिको अध्ययन करेंगे वह लोको देवावी और गौरव कीर्ति यशको प्राप्त होगे ॥ ४२ ॥ जगदीशेन विदुपा नारनौलनिवासिना । गिरा केशवी कृत्वा केशवायापिता मुदा ॥ ८ ॥ इति दशाफलाध्यायोऽष्टमः ॥ ८॥ इति केशवीजातक समाप्तम् ।

देवीभातकम् । परसारिणीप्रवेशपलामा। मंदस्पष्ट सूर्यको अयनांश युक्त करके उसका भुज करके भुजंका भाग करना यहां सारणीमें ३० अंशके अंतरसे ३ ठिकाने ९० अंशकोष्ठक लिखके वह कोष्ठकके नीचे प्रत्येक अंशका फल विकलादि लिखा है उससे जो अतीष्ट अंश होय उसके नीचेका फल लेके इष्टांशके नीचे जो कसा विकला होय उसको अंशकोष्ठकके सामने दहने तरफ जो गुण लिखा है उसमें गुणके जो गुणाकार भावे उसको गुणके नीचे जो हर लिखा है उससे मागकेजी फल प्रतिकलात्मक आवे वह लेके पूर्वफलमें युक्त करना तो चर होता है वह चरसायनसूर्य मेपादि ६ राशिको होय तो ऋण और तुलादि ६ राशिको होय तो धन जानना। उदाहरण:-जन्मकालिक मन्दस्पष्ट रवि ०1१३।१२।३ इसमें अयनांश २२१४४।३ यह युक्त करके ११५।५६६६ यह सायन रवि, इसका भुज ११५५६६ इसके अंश ३५१५६।६ यहां ३५ अंश हैं इसयास्ते ३५ मंशकोधकका नीचे का विकलादिफल ७९।२० इसको अंगके नीचे कला ५६ और विकला ६ है इसको अंशकोष्ठकके सामने गुण २८ है इससे गुणक १५७०१४८ इसको गुणके नीचे हर १५ इसमे भागके १०४ मति कला युक्त करके साथ यह सापन सुर्य पराशिका है इरावास्ते काण जानना । , (२६) मापोदाहरणसहितम् । पहुविधदेशोंकी अक्षमा। घ.प. ५४७ नागपूर ६/९१ नेपाल . जुनेर ५४८ पढरपुर अतिवंग ४ नगानाम घ.प.नगरनाम ३.२.| गानाम नगरनाम घ.प सल्वर ६ १६ केदार ७८ जिई ५३६ नाशिक ४२ अमदाबाद १/२) कोल्हापुर |३३० जानपुर ४२५ जंवूमर सहमदनगर ५ कोर ग्राम 188नागो ४ अजमेद ५/४६ कोकण ३(१५ जरालाबाद ५/२० नगरनाल अयोध्या ६.७] कृष्ण गट ६. जालभर भमाकेट ५/२२ खंभात ४५१ जनागढ 1५३१ नमध्यारण्य अपस्ट हा ६२५/स्वाधार ५पटियाला ४ भवांगावाद|४३: समात ४५१ जोधर अग्रपट १/४ गंगासागर ४५६ झोपी ५४३ प्रयाग अजमेर ४४० २६. गट। ६.६ ठकारा ५/३५ प्रकासा ६.९] गर्गगट ५.६ टच ५/२७/ प्रमाण सतार ७/२४ गहीरा ५/१५ ठठा ५३६ पाणिपत आग्रा ६ गया ५/१० ठगनपुर ५१३/पाथर्या ५१ आजमगट ५)२२/ गणशुक्र २१७पाडव ६.१ तंजावर ६३० गाजीपूर ४ इटावा ६ ५/२४ ताजपुर पुस्पोत्तमक्षेत्रा उज्जनी ६१६ गुरापुर ५/१०/तेलंग उचवानगढ/२० गुजरात ४१८ दरभंगा ५५३ पैठण ५ उदेपुर ५/३० गोमांक ३२० दारमल ५० वडोदा ५२३ गोपाल ३३० दामनपुर ५/४५ बलसडि उमरावती ४३४) गाकुडा ३४द्वारका ६५ वरद्वान ३० मोतकमंदु २२द गोरग्राम ६.३४ पन्हाणपुर अंगड़ा ५४ गोरखपुर ६८ देगड ६४ ब्रह्मपुरी मोट ६/५६ देवनाम ४१० बजवाडा वम्वत्ता ४२७ घनदी ४४० दौलताबाद ३३० वाणपुर ४ कपिटा ६९६ पदेली घयपुर । १२/१२/ पागगंगा घटक ४२८ चाटसुपर ५३५ घारक (५/२/वितिया | काशिक्षेत्र ५४ चित्रोड ५/३० धामोनिगट दा१० विजापुर ४६)गोरु (९६२) शपीनातकम् । |५/p कानपूर १५२१॥ चित्राट नासरी ४४२ बिकानेर १६२१ काश्मि उपरा नगरकोट ७२० दीकोदा ६२ पाविळ ८Bol जयपूर ६४ नडोवाद भाषिपुर पांची ७१४ नरखर ५४२ भरतपुर कान्यकुब्ज । ६० जयपुर ६.८ नयनीताल ६४ पुक्षेत्र ४८ कुरुक्षर ६४६ जगन्नाथ ५३० नर्मदा ४७ भोजपुर भागलपुर |५/३० म्हैसूर २/३६ बघवनगर *२७ सिहज मरमूदाबाद | ५ २४ भूपाल २०१० दरय ८७ सिंधपुर ४४० मडी ७४रत्नागिरा |३४१ भटोपुर ४३. सिंहगड मद्रास रनथम घटेश्वर सुरत मराठा दश ६९ रनद बदल सोलापूर मयुग रामश्वर २५० विजयनगर ||१२/ सामनाथ रामनगर 14. बेळगांध सोमपय माडा ४२० राजो घरठ सगमनेर ४२० भडमाचल ५४७ राजगायल४४ शरगपुर | ५'४६ समठ मालपुर जपुर स्वा मगढ़२८| सगापुर ਸਚਿ रायपुर ४३६) शराज ४२८ हस्तिनापुर ६३० मारवा २३० राजमहाल |4|५| शातपूर हरहार मांडगढ १४.५७० गंधा श्रीनगर |६६ हरदा मिथळ वा ४४ |१०/३ | हैद्राव दसिधद मिरज सहितक |७| दावादानजा३ ४६ मिरजापुर ५३ गहिद श दा समया याद६/५०वल यत एडन १२६ रखनऊ ५४८ सहस्राय ५/१७ श्र रंगपट्टण २ मुस्तान हयगपुर ५३० सातारा ३/५१ मनुवधशमश्वर २६ मुगा २६रक्ष्यतो द८ सागर हाती ६२० मुरा रक्ष्मनघास ३२० सवतवाडा ३३६] पटब ७/२३ सिरी ५१८ सिजेरो J६१८ ६७ खुम सपाय मुबई भाता ल हो (363) पापोदाहरणसहितम् । समरिचक। ہم nr us لا لا 4 می سواب هم t هي مممم لا ال سm میا و ماہ 'm 1 - : کر1ميع ماہ * mr { mm .}*رواز 7 0 ها برای همه عی لا جع لو ها ما معا ميامي 10 ) میرا نام ای ، لای دید و تمرا لمیتد الاعلامي الله له سه قسم الله. یادم ها ده الله الله می ده - * اميم انه ده ها هم در 0 من اي ة مو زلهم 4 و ۳ ۴) م لا 0 In N S ممد nn- 1४२५८ 0 ۱۳ m الله وه دایه \ P سه من و معما ها * أو ا مجمه من وام محامm مع لا ي هره و "في 1و و به راه امام تا و ماه هم امين ام و مو و و Y مو ا ر کا مع و 0 مہم فما -1 د نوم عمي رامmمج | لا تيا و ۲ ماما می يا همه 1 مع ا م | Pm : مع همه - کر می مم : - } مي 3 م آيا ( امره من های ما و اد ه ا ا و 0 . د مہ ما م م ها و ج همو مج سر تا 9 1 1 و لا۔ مرور هما ن اللد طلب لله الله له د ل لا الله وا - د } * م) لي لقاء الله منو ته له فله ةT لام له اما M | | ا * ته به م ته الله سه همه به همه * د لازم هم ) الله میمو ته د *م * ماه مهر و ۲ و ) ق - اتمی * نام معاج موک کلا ام هو ۴۳ ( ہ لیا to 1 ا او 0 ايا 0 V لغ ها ملا ، 4 اهم الم T الله لاتا و TP محہ 1 - مياد 1 m مي لی لی 0 ها انجام شد ہ لای 0 ! له ) دايه sm اور سب کی تر ا 111 لمزمعm لارا ) ) و العمل t بله يه لها مرد b V n n 0 ة * ما هي إن مي رامي و ده د زهير م م م ) تم ) ه ) م ) مم 1 مولا لا وا و ماسه " 1 يا کي محمد مام ۷ هما ا د و و مهمي لام ها و م مع مع ميلاده ه ای به زعم لم ا لله وام ها هف ا ا و M لا . متر ہ هغه و د مي m من مو .مي های ماکر ه دار | -ہ .أو ۱ L ما " لیے الم منال الماسه لے کی لا الله المر لاء ) | جا د m م ا ا ج ۲ م ا * مm م 1 مه mms m ۷۲ دی * امه و هم نمي 3 مجام -م جm Ala r ع م ا ه ه م و و انعام و این مممممم و جامع لا في ها امي و * و 1 مه IT T کی عی ج) ہ می له مه له المر . لی اع m مي m او ع اه (288) ริยศขาร 1 दशमनायसारिणीचक्र । ( C ม" y " n บ ! " * 4+6 \ 18 41นท น ง 40,6|AP| t t ก ก ษ 2 | ง งง ค” y | 7 6 1 y ง ถะ กษ 1 - ) IP (A | กก * าง ง ภาค 1 เAt,84 ง “As ง น 0 9 : 0 โ P P ง ง a 40 " 9 | 6 | ม " จ้าง (ด! 6 | ะ ก- 3 ล้ - ะ ง 5 “ไจ ร า พ " ? !!??uj; อ 0 (บ ย! 49 9 9 แง h- & An' ) ( 549 ม งให้ว จะไง -18 " 0 ง 60 | G desiz 22 A น ง ----- d ด ก --- (บ ง กา of uy V a m 2 0 w ) 0 0 " กร” 2 ปี 6 งlor ay 2” [3+ ง * เร7 tus ะ | t u {ะ แ y s ** ก ก ง 6 3 - 1 องศา ง ก ะ แจ ม ลา บ) | แ” น ur ง * * * * A vr " ภrn l wง ! เ y! แดง กะ แง” + 1 ปี ง ( hli [ v | | nr แง ช้ ะ 1-1 ละ cro ง 143 s Irom" ข r rง งง ( แจ” แ” น" เจ 295 aP แ m | แy แ” c|i r n Ar|n In In I s | ศา 6 ปี • (1) เนง ง / ง tu" ) 3 การ o กา) แต่ m [ur ง เ 0 4tJง us • 0) แe 9 7 ง ก มา 0 - els n) | จ้า 149 ง 6 แง 31 0 ง w/ ) ง ง ก - ปี | 23 0 0 กร ง1017 v|3s + + + ง 0 0 V 0 ล้อ " สว-ไง” ง 2) ง น ง ( 4 ) () 17 ง 2F | ก ส| ง "ง งง 2 ( ง 9 as stry 4) 2 ]ก” ง ห้ ” Y 0 g ส 3 ง ข ( of Y| โก ก" (Part( ง” | s* 62| | จ" In ง ไม่โen Hษ " {ง” ะ ง ง” V 3 14 ) y "จ " กา-! ** ง ๐ " ง * ) * ' 0 1 งาน TY ) 3) สา ง ง Cษ ก เรา ที่ IT (ง TY | AV 1 x 4" i สละ | lot บ " s a | w y 2 ง a u [ tely ง " " พ. | แ in ก) ได้น " ง ง 0 3 r 11 y ใry ระ " แtar ง 2 เure * * ง 3 95 ง " dº? 0 9 a กาง 8 1 -- 4. ง 323 v l บ1 ม.9 ง 3 3. 0 % 0 () 0 104) AM แจ s เd 14 คน * 1-0 S เ : : 13 น 81 13 * ) 2018 4 1 2 ยม * 1. 9 4 18 4 A ++ 484 भापोदाहरणसहितम् । (२६५) लगतारणीप्रवेश अयनांशाः २२. सारणीमें दहने तरफ मेवादि मीनतक १२ राशि लिखी है और ऊपरके तरफ ३० अंशकोठक लिखा है उसमें से तत्कालस्पष्टसूर्य जिस राशिका होय उस राशिके सामने सूर्यके इष्टांशको ठकके नीचे अंककलादि फल लेके उसको इष्ट घंटी पल युक्त करना वह युक्त करनेके अनंतर घटी ६० से ज्यादा होय तो६० में कम करना । अनंतर जो घटी पल बाकी रहै यह कला विकला भया अनंतर तन्मित कला विकला सारणीमें जिस अंशकोष्टकके नीचे होंगे वह अंश और वह कला विकलाके दहने तरफ जो राशि होय सो लपकी राशि जानना यह स्थल मान है परंतु स्पस्पदेशीय देशांतर रेखा धन ऋणादि देखके सारणीसे लम करना उदाहरणः-तात्कालिक सूर्य ०१११११११५६ यहां सूर्य मेपराशिका है इसवास्ते मेपराशिके ११ अंश कोष्टकका फल ४१३ इसको इष्टवटी ३२ प.. • १ युक्त करके ३६१४ यहां ३६।३ कला विकला यह तुलराशिके १० अंश- कोष्टकके नीचे लिखा है इसपास्ते लम ६१०३६।१ यह स्थूल मानका लम जानना। दशमभावसारणीप्रवेश। केशवीमें कथित प्रमाण नतसाधनकरके सारणीमें बायें तरफ मेपादि राशिसे मीनतक १२ राशि लिखी हैं और अपरके तरफ ३० अंशकोष्ठक लिखे हैं उसमें से स्पष्ट सूर्य जिस राशिका होय उस राशिके सामने सूर्यके इष्टांशकोठकके नीचेका कलादि फल लेके उसको नतघटी और पल पत्रिम होय तो युक्त करना और वह घटी ६० से अधिक होय तो उसमेंसे ६० कम करना और नतघटी और पल पूर्व होय तो लिया जो अंश फल उसमें से कमती करना और यह अंशकलसे अधिक होय तो अंशफलके कलामें ६० युक्त करके उसमें पूर्वनतपदी पल कमली करना अनंतर जो घटी पल आकी रहै वह कला और विकला नई अनंतर तन्मित कला विकला सारणीमें जिस - (२६६) केशवीजातकम्। मंशकोष्ठकके नीचे होय वह अंश और कला पिकलाके बामे तरफ जो राशि होय वह दशम भावकी राशि जानना यह सर्पदेशोंका मध्यम मान है। उदाहरणः-जन्मकालिक स्पष्ट रवि ०।१३।१०। ४२ यह सूर्य मेषरा. शिका है इसवास्ते मेपराशिके १३ अंसकोछक्का फल ५।२८ इसमें जन्म- कालिक पश्चिम नतघटी १५ पल ४० युक्त करके २१८ यहां कलाविकला २११३ यह कर्क राशिके १२ अंशके नीचे लिखा है इसवारते दशम यह ३।१२।२८ या इसमें ६ राशि युक्त करी तो ९।१२।२१८ यह चतुर्थ भाव भया। अष्टोत्तरीमहादशा । आसे प्रारंभ करके मृगशिरतक २८ नक्षत्र और सूर्य चन्द्र भौम वुध शनि गुरु राहु शुक्र यह ८ ग्रहोंका कोटक पृथक् पृथक् किया है उसमें महा- दशाकी वर्षसंख्या पापग्रहनक्षत्र ४ और शुभग्रहनक्षत्र ३ जानना दशाकी वर्षसंख्या नक्षत्रों के विभागसे सो यह सूर्य ४ नक्षत्रोंका ६ वर्ष, इसवास्ते । नक्षत्रका १ वर्ष ६ महीने इस प्रकारका जानना और जन्मकालिक जो दशा सो प्रथम मानके जन्मनक्षत्रकी जन्मकालतक भुक्त घटिका जो होय उसको नक्षत्रके वर्षसे गुणके गुणाकारको जन्मनक्षत्र भुक्तभोग्य युक्त करके सर्व- घटीसे भागके जो भागाकार आवे सो बप और शेष रहै सो १२ से गुणके पूर्ववत् मागके भागाकार आवे सो मास और शेप रहे सो ३० मे गुणके पूर्व- प्रमाण भागके भागाकार आवे सो दिवस और शेष रहै सो ६० से गुणके पूर्ववत् भागके भागाकार आवे सो घटी जानना अनंतर आया जो वर्षदि भुक्काल और जन्मनक्षत्रके पूर्वके दशापतिके गतनक्षत्र होष तो उसकासी भुक्तकालदशापति के दशावर्षमसे कम करके शेष रहै सो वर्षादि भोग्यदशा है ऐसा जानना। अंतर्दशा बनानेका क्रम। जिस ग्रहके दशामें अन्य ग्रहकी अंतर्दशा करना है उन दोनोंके परस्पर दशापोंके गुणाकारको ९ से भागके जो भागाकार आवे सो मास जानना भाषोपाहरणसहितम्। (२६७) और शेष रहै उसको पूर्व लिखे प्रमाण उत्तरोत्तर गुणके ९ से भाग देना दिन . घटिका आती है इसी रीतिसे महादशामकी अंतर्दशा मानना और १०का भाम विशोचरीका लेना। अष्टोचरीमहादशाचक्र। सूर्यकी महादशा वर्ष ६ मंत चेदकी महादशा वर्ष १५ अंत- दशा आध, पुर्नवस पेशा मघा, पूर्याफागुनी, पुष्य, आश्लेष. उत्तराफाल्गुनी. सूचं, में तु. श... शु.यो. चं. मं. यु.श. रा. शु.सू.यो. क१०१६ २१२/१/२०१५ ०/१०/५/११/६/०८/२/११/४/४/७/८/११/२00 ०१०१० २०० 0/१०/२०२०२० . व . . . . ... O . 1 . . 1010 ज्येष्ठा, मूल. मौमकी महादशा वर्ष ८ मंत- बुधकी महादशा वर्ष १७ दशा हरत, चिश, स्वाति अंतर्दशा अनुराधा, विशाखा. | में. उ.श. रा.सू. चं.यो... श. शु.मू./चं. म.पो. 02/0/२/१/१/०८/२/१/२१११३१०/२/१/२७ ८/६/१२/१०/३/११/४/३/० ३१३२६२६२०२०/१०/१०/ ३/२६२६२०/२०१०/१० २०२०/४०/४०101010 01 020)20180101010102010 सनिकी महादशा वर्ष १० संत गुरुकी महादशा वर्ष १८ अंत- दशा पूरीप सा, उत्तराषाढा, दशा निष्ठा, शततारखा मभिनिद, श्रवण, पूर्वाभाद्रपदा. श..रा.शु.सू.. यो...शु. सू./च. म./.श.यो. २११०३/२/३/१२/११२/१/११ . ३/१०/११२१२/२३२६ ... E २०२० .

(२६८) केशवीजातकम् । राहुकी महादशा वर्ष १२ अत्त शुक्रकी महादशा वर्ष २१ भंव- दशा उत्तराभाद्रपदा, रेवती देशा कृतिका, गहणी, अश्विनी, भरणी. मृगशिर राशुसूम बुश यो शु. सूच, म.श रा.यो. १/२/01९1०1१/१/२१२/४/१२/१/३११/३/२/२२) ४|४८1८1१०/२०११/१/० ०२०/२०११०१०० १२०/२०/१०/१० D . . . . . ० . . 0 . 15 . . . इत्यष्टोत्तरीदशांतर्दशाचक्रम् । विंशोत्तरीमहादशाकरणम् । जन्मनक्षत्र जो होय उसकी संख्या २ कम करके ९ से भाग लेना शेष १।२।३।४।५।६।७।८० तक रहेगा तब क्रमसे सूर्य, चंद्र, भौम, राहु, गुरु, शनि, बुध, केतु, शुक्र यह दशापति जानना और उनकी कमसे ६-१०. ७-१८-१६-१९-१७-७-२० यह दशाकी वर्पसंख्पा जानना जन्मनक्षत्रकी जन्मकालतक जो भुक्त घटी होय उसको अष्टोत्तरीमें कथित रीतिसे दशापतिके वसंख्यासे गुणके और नक्षत्रका भुक्तभोग्य युक्त करके सर्वघटीसे भागके भागाकार वर्ष मास दिन घटी पल आवेगा सो दशापतिके वर्पसंख्या से कम करके शेप रहै सो वांदिसंख्या भोग्य है ऐसा जानना इसमें अंदेशा बनानेका प्रकार अष्टोत्तरीम कहाहै सो जानना । कत्तिकासे भरणातक २७ नक्षत्र और दशा अंतर्दशा और प्रत्यंतर्दशाके अधिपति के नाम और उनकी वादि संख्या इनके जुदे जुदे कोष्टक आगे लिखे हैं । उदाहरणः-जन्मनक्षत्र यहां उत्तराषाढ है इसकी संख्या २१ इसमें २ कम करके शेष १९ इसमें ९ से भागके शेष ३ इसवास्ते सूर्यकी दशा मई अब नक्षत्रकी घटी ४७१३६ इसको ६० में कम करके १२१२४ यह इष्टघटी ३२ पल १ युक्त करके ४४।२५ यह त घटी है और ला नक्षत्र उत्तरापाढ नक्षत्रकी घटीपल ५३१३३ इसमें १२१२४ यह , भापोदाहरणसहितम् । (२६९). युक्त करके ६५।५७ यह गोग्य नया अब भुक्त और भोग्यकी पल क्रमसे २६६५४३९५७ भुक्त पलको सूर्यका वर्ष ६ इससे गुणके १५९९. इसमें भोग्यकी पलसे भागके लब्धि ४ वर्ष, शेप १६२ इसको १२से गुणके १९४४ यह इसमें भोग्यकी पलसे भागके लब्धि . मास, शेष १९४४ इसको ३० से गुणके ५८३२० यह इसमें भाग्यकी पलसे भागके लब्धि दिन १४, शेष २८२२ इसको ६० से गुणके १७५३२० इसमें भोग्यपलसे भागके लब्धि घी ४४, शेष १२१२ इसको ६०से गुणके ७२७२० इसमें भोग्पपलसे भागके लब्धिपल १८, एवं वर्षादि रविदशा ४१०११४१४४११८ भुक्त भई अंब इसको सूर्यका वर्ष ६ में कम किया तो 31११:१५१५४४२ यह चोग्यदशा भई इसी प्रकारसे विंशोत्तरी दशा करना। टिप्पणा-जिस दिन जन्म होप उस दिन अथवा वर्षप्रवेश होय उस दिन जो नक्षत्रकी घटी पल अभीष्ट घटी पलसे कमती होय तो उसी नक्षत्रकी घटी पलको ६० में कम करके दो जगह रखना एक स्थानमें इष्ट घटीपल युक्त करना तो भुक्त घटी हो जाय, दूसरी जगह अगले नक्षत्रकी घटीपल युक्त करे तो मोम्य होता है। दशाका उदाहरण । मथम रविदशा वादि भोग्य ११११११५।१५।४२ इसके नीचे जन्म- कालीन संवत् १९४३ यह वपमें सच सूर्य ०३३३१०१४२ इसको प्रथमदशा मासादि युक्त करके ११।२८।२६।२४ और संवद में वर्ष युक्त करके ३९४४ यह संवत् ११।२८।२६।२४ यह स्पष्ट सूर्य रहते रवि- दशा पूर्ण होयके चन्द्रदशा प्रवेश भई इसी रीतिसे सब दशा प्रवेश करना तथा अंतर्दशा प्रत्यंतर्दशा करना।

(२७०), धोनातकम् । विंशोत्तरीदशाचक्रम् । . म. . श. क. . च. १० fary 2oo प. मा. . ० . . . १५ . . . . ० ० ० ० ० ० ० ० . . . . ० . १२ घ. प. 9 ० 0 ० 0 २. २० सं. ६९ . १३ । २८ २६ ४२ । ३४ २८ २८ २६ । २६ २४ । २४ २८ २८ २६ । २६ २४ वि. सूर्यमध्येऽतर्दशावत्रम् सूर्यमध्ये सूर्यस्तन्मध्ये विदशाचनमः सूचम (श (व के शु.सू चं में राश! चु. के शु . . . . ०१० . . . . . . . . . . २ . . १८/०६.१९२८/१० . . . ६/०१५(१९६१६१४/१७/१५.६१८ ०२४० १८१२२०१६.१८१८ . . . . द ८ . . . ...10 . 0 रविमध्ये चद्रस्तन्मध्ये विदशा- | रविमध्ये भौमस्तन्मध्ये विदशा- चकम. चक्रम् च. मश..के शुमारा.शबु के शुमच . . . . . ०० ८ . . . . १ . . . C 10 . 9 . . C . (२५१०२७/२४०८२५/१०/०९/७/१८/१६/११/२७७२१६ ०५४/४८५७/५१) १८/ 01101 ० 10[010 २ . . . .

हापोदाहरणसहितम् । (२७१) रविमध्ये राहुस्तन्मध्ये विदशा-1 रविमध्ये गुरुस्तन्मध्ये विदशा- चक्रम्. चकम. रा.श. बुक शु.ए.च. मं..श.(बु. के. शु... म.रा. . ० ८ 5 . . ० ८ . क . . १ (१८१९३२१२५/१०/२०१६/२७/१८/८/१५/१०/१६१८१४२४/१६/१३ २६/१२/१८५४/५/१२/०1४२४१३६४८४८/०२४/०४८/१२ ० . . 1.1. . .. . रविमध्ये शनिस्तन्मध्ये रबिमध्ये बुधस्तन्मध्ये विदशा- विदशाचक्रम. चक्रम, श. बु.के.शु.सू.चं म.रा.// बु.क.शु.सू. चं. म.रा..श. . ०११ १० १ ર૧૮રર૭ર૭ર૮૨૬ ११/१२/१३/१७२१/१५२६/१७/०५/२०१८ १९२७५७/० ६३०६७/१८३६/२२/५१/०१८३०/५२/२४/१८२७ . . . . . . ३ . ७ . . . ० 0 . २ १ . . ... . . रविमध्ये केतुस्तन्मध्ये विदशा रविमध्ये भृगुस्तन्मध्ये विद चकम्. शाचक्रम्. के.शु.सू..च.म.रा. वृ.श.बु. शु.सू.च.म. ग..' श.चु.के. ० . . ८ . . . . . . ० . . . ० . . ८० . २ . . 0 ११११ ७/२१/६/१०/७/१०/१६२९/१७/१८०२१/११/१८/२७२२/२११ २१/०९८३.२१/५४४८/५७/५/- ० .... . 0 0 ब . . . ... . ० चन्द्रमध्येऽतर्दशा चक्रम्. चन्द्रमध्ये चन्द्रासन्मध्ये वि० धक्रम. च.म.रा.बृ.श. बु. के.शु. सूच. म. रा..श.यु.के.श.सू. . . . C ० . . १०७६४७४/०1८१६. १ २५१५२०/१०/१७१२,१७२०१० . ०.०३० . ००० . ० ०० ० . . . . . C ०1० ० ० ००० .

(२७२) केशवीजातकम् । चन्द्रमध्ये भी मस्तन्मध्ये वि. चन्द्रमध्ये राहस्तन्मध्ये पदेशाचरम् मरा.) बुश के.शुसूचएस.केश सूचम ० . ८ २ . २ . . . २ C ८ १२.१ २८३२२/१२/५ ०३०० १५४९ 5 ८ १७२११९३०/१६१.२७/ ११ ८३010 0/३०/३00 . . ० . . . ८ . . 5 . चन्द्रमध्ये गुरुस्तन्मध्ये वि०५० बन्द्रमध्ये शनिस्तन्मध्ये वि० ० शके.शुसूच. म.राश शुसूचिमासासू . . . ० . . C ३ . . . २०२२ ०२ २०२३२२१३/१/१/२ ४१६८२८२-४१०२८१८०२०३१५२८/१७ . . . . . . ० . . C . . . . . . . . ० . . . . . चन्द्रमध्ये बुधस्सन्मध्ये वि० च चन्द्रमध्ये केतुस्सन्मध्य विदशाच. बुके शुमचम राबशशु। सूचभ राशबु ८ २ २०.१ २२ १० २०१० १२२९/२५/२५/११/२९/१६८२०१० ९०११० ७.१६ ०१२८३२९ (१५/१५३०३०३०४२३०० ११५/१५ ३०/३० . 1. 9 ७ ००० . . c . 5 द . . . ८ D चन्द्रमध्ये भृगुस्तन्मध्ये विचः चन्द्रमध्ये सूर्यस्तनमध्ये वि. च. शुसू चम राशि सू च म । राशबुकेशु . . ८ . . . . . . . . . . . 0 . . . . . . . ३ ५९/१५/२०२७/२४२८२१०० 000 0/30/३०/३०० . ..... . . . . ८ .

सापादाहरणसहितम् । (२७१) भीममध्येऽत्तदेशाचक्रम्, नाममध्ये भौमस्तनमध्ये विदशाचक्रम्. में...श. 3. के. शु.स.च...श. बु. के. शु.स्चं. ०१० क . . . ७ . . . . . ६ 6 4 .. . . . १९४/२०६९२७२३) 01६०८२२/१९२३२०१८२४/७/१२ ३६/१६/४९३४३०२१.१५ . . . ७ . ० ० 1.1010 9 . . . . . . [१1०1१1१1१1१० २६२०२९/२३/२२) ३१८१९२१५ १७/१९२६/१६/२०१९२० २२२४/५१३३३ ६३६.२८. ६२४ . ००० . . . | मोममध्ये शनि-ध्ये विदशाच० भीममध्ये युधस्तम्मध्ये वि० चक्रम्. ज्ञ. यु. के. शु.स. ५. मं.पर... .) के शु.सू. म. ए.व.श. . . . ० ० ० . . o . . . . . (०२०२२ १ १९२३ २९/२०/२२७२ ३०५७/१५१६/५२/१२३४५२३०५१/४५/४२/३३/३६३१ 1010३०३.1010 0/30/01.३० .1३१ भौममध्ये घेतुस्त-मध्य वि. प. मममध्ये भृगुस्तन्मध्ये वि. प. के. शु.स.चं. म. रा. ३.श.. शु.सू.च.म.रा.श. यु.के. ........ D . .२.१०/२११२१ ८२४/७/१२८२२४१९२३१२०११०२१६२४१३२६/६२९/२।। 1.01. .३०/३०. . .

(२७४) केशवीजातकम् ।। भीममध्य रविस्तन्मध्ये वि० च. भभमध्ये चन्द्रग्न्मध्ये वि.. सूच मारा। बृ.श.क.गुच.मरा.श. बु . ० 5 ० ० . . २ . . . ० . C ००० ६/१०/७१८१६१९/१७/७२११७/१२/१२८३२१/१२/ २८/३०५१२४,४८५७२१२१/०३०/१५३००१५/४/१२/०३० ० . ० . . . C ० . . D . . 0 . गमध्येऽतर्दशाचक्रम्. | राहुमध्ये राहुस्तन्मध्ये विशाच. श/बु के. शु.सू. म. रा.(शबु के.शु सू.चिं.म. २/२/२/२|१३|०११. ८४१०६० ०१०/६/० ४४५४|१ १२२४/६/१८/१८०२४/०१८२६.९/३/१७२६/१२/१८२१२६ १८३६५४/३२४२०३६/०४२ . . . . . C . . . . . . . . . . o . . . . राहुमध्ये गुरुस्तन्मध्ये दिशच. । राहुमध्ये शनिस्तन्मध्ये विदशाच. बृ.शबुक. श स च म प्र.श. (बु. के. शु. सच म. रा. व. . . . . . . . . . . २५/१६२ २०२४/१३/१२/२०/२/१९२५/२९२१२१/२५/२९) ३ १६) १२/४८२४२४०/१२/०२४३६२७२१५१/०१८/३०५१२४/४ .. . .. राहमध्ये दुधस्तन्मध्ये विदशाच. ! राहुमध्ये केतुस्तन्मध्ये विदशाच. बुके, शुस |च. म. UE.श. के शु.सू [च म. रा. बाश बु. . . . . ० . . . . . . . [१०२३३४१५/१६ ०२.[१.१.१ १७२२२१२२/३/१८१२२२६/२०१२ ४२२४५५३/५४३०३ ४२२४/५१/३३ . . .. . . .

भाषोदाहरणसहितम्। (२७५) ८ . . , . . . १ . राहमध्ये भृगुस्तन्मध्ये वि. चक्र. रामध्ये विस्तन्मध्ये दिशचक्र, शु.सू.च.मं.सि..श.बु. के. सू. म. रा. ..शु. . १ ११ ०२४०/३/१२/२४,२२३।३.१६२७/१०/१८९३२११६१८/२४ ०/१२/०५/३६१२११८५४/५४ . . २ . . . ८ 0 ० . . . . . . . . . . राहमध्ये चन्द्रस्तन्मध्ये दिशाचक्र. राहुमध्ये मोमस्तन्मध्ये विदशाचक्र. चं. म. 1. वृ.श. यु. के. श.सू.म. ग...श. यु. के. अ.स.स । . . क . ० . . . . . . . . ११/२२१२/२/१३/० २७२२/२६/२०२९२३१२२/३/१०/१ ३४२/२४/५१/३ . . . ३ . . क . ० . . . . . गुरुमध्येऽतर्दशा चक्रम्. गुरुमध्ये गुरुस्तन्मध्ये वि० चक्रम्. .श. पु.श.सू.च.म.स. श (बु.के. शु. स.च.मरा. २ a . . . . १८,१२६/६० ६२६/१२/१/२०१४८८ . . . . . C . . ७ . ० . 1010 . ०१७ गुरुमध्ये शनिस्तन्मध्ये विद.च. गामध्ये युधस्तन्मध्ये विशाच, श. बु. के. शु.सू. म. सा. *. शु.सू. चं. म. ग.! . . ० ० . . . . २४/९२३/२१५/१६ १६.१२५/१७२६५०८/११/२१८९९ ४२२३०४६/०२४०३६३६३६/०४८३६२४४८१२ 10. . ८ . ७ . ६ द (२७६) केशपीजातकम् । गुरुमध्ये केतुसम्मध्ये वि० घर गुरुमध्ये शास्तन्मध्ये शिक. के असमरा शासूच (मगाश के. . . . ८ . . . . . . ૨૬૬૨૦૨૦ ૧૦રરિરિરિરિ ૮૨ફર - રર૪ ૮૬૩ . . . . . . . . . ०० 10. . गुरुमध्ये पिस्तन्मध्ये पि० चक्रम् गुरुमध्ये पन्द्रस्त विज्ञापत्रम् सूचम रायश चुके शुचामरावृश (सु{27(म . . . . . ८ 0 . . . . . . . . ११११११ १०२० ૧૨/૨ .२ (१४२६२६॥ १५.१.१६१८४५०८१२/४/१६८२८१२०२४ १४/०४८/१२/२०३१८४०० ० . . . . . . a . . . . . . . . . . गुरुमध्य भौमसम्मध्ये व चमगुरुमध्य राहुस्तन्मध्ये वि० पका . . . . a 2 . . . . . १६९ १०१०० १०४०२४७२३३१७१९ २६२४/२८९४२३६३६ ६१०१२०२० १२४८२४२४० ० ९२.२ . . . . 0 . . . . शानिमध्येऽतर्दशातरम् शनमध्प शनिस्तन्मध्ये शाख शशुर चमचम ३ . 2 . . . . ४ . ... . . . २ c (१७७) बादोदाहरणपहितम् । शनिमध्ये बुधरतन्मध्ये विदशाच. शनिमध्ये वेतुतिन्मध्ये विदशाध. बु. के. शु.सू.. म.रा..श.के. शु.सू.पं. में रा. वृ.शन. . G ० . . . o . . . . . १ ० . २ ११ |१ १७२६/११/१८२०२६२ ९/३/२३६.९ २३३२१२३/३/२६ (१६:३१/३०२७४५३१२१/१२/२५/१६/३०/५७१६/१६५१/१२/२०३१) .३०३०० ०३०/० २ ० क . . . 0 . . o . . . . शनिमध्ये मृगुस्तन्मध्ये विदशाच | शनिमध्ये रविस्त विदशापक्रम. शु.सू.च. मरा..श.नु के.सू.चं म..! बृ.श. बु. के.. :: (१०२७५/६/२१/२ ०/११/६१७२८/१९२२११५२४१८/१९९७ ०1३०० .३०३०३०१६/३०/१७/१८३६/९/२५/५७ ११ . o 9 . . . . ० . . . . शनिमध्ये चन्द्रस्तन्मध्ये वि० च. शनिमध्ये भौमस्तन्मध्ये बिघ.. पं.म. रा. बृ. श.यु. के. शु. सू. म. रा. वृ. श. बु. क. शु... . . . . C . . . . . . 9 ३२ २१ २७३२७/१६०२०३५ २०२३/२९/२३३२६२३,६/२९/३ १०/१५३० ३०२६५१/१२/१०/३१/१६३०५७ ...1300 ०३०/30/2010 . ० . . . . . शनिमध्ये गहुस्सन्मध्ये विचा शनि मध्ये गुरुस्तन्मध्ये वि०६० रा .. श. बु.के. शु.सू/प. म. कृ.श..यु.। क. शु.स.बा. . . 010 . . . . . . ० . . ३ १६/१०/२५२९२१/२१/२१/२९/१२२,९,२३/२/१४२६२३/२० ५४,४८२७५१४०० २०३०५१/३६२४,१२१२/०३६०१ ०.1.1.1.1..... २ . .

(२७८) केशवीजातकमा अधमध्येऽत्तर्दशाचक्रम्. सुधमध्ये बुधस्तन्मध्ये विदशाच. दुकशु ( सूम रा.शबुकेश।सूच.म.रा] १.श. २२ १०/२/२/२० . . 0 ८ . ८ २७/२७/०६/०२७/१०६/९/२/२०२८/१३/१२,२०,२०२६/१७) 10१९३४.३०/२१/१५३४३३६१६ 0101३०३०० . . . . . . . . चुधमध्ये केतुस्तन्मध्ये विदशाच वुधमध्ये भूगरतः विदशायक्रम. *शु र मसू वृश उ] शुसू च मम वश ८ . २ . . ० . ० १ २०२९/१७/२९/२०२३१७२६२०२०२१२१२१) ३ १६/११/२४ १९/३०५१/४५/४९३३३६/३१३६] . ०1३०० ३०३०३० ० ३ 1. . . बुधमध्ये विस्तन्मध्ये विदशाच. बुधमध्ये चन्द्रस्तन्मध्ये विदशाच. रचम राश | बु||शु च.म.रा| बृपा./बुक.शि.र. . 01. . ००० . ० 0 0.० . 9 ० . . . ૨ ૨.૨ ૨ २५/१७१५/१०/१८/१३१७२१/१२/२९/१६८२०१२२ (१८/३०/५१/५४/४८२४/२१/५१/०३०९४९३०/०२० ० ... ..10 . . . . 1010 बुधमध्ये भीमस्तन्मध्य वि० च । वुधमध्ये गहुस्तन्मध्ये वि० ० माश बुक शुर.चमच शहुकेश चम . . ० . . . . . . १० . १२.१२३९७२६२०/२०२२/१७/२९/२७२,२५ २३/३/१५/१६२३] ३०३-३०० . C . . a मापोदाहरणसहितम् । (२७५) ८ . . ८ . . . घुधमध्ये गुरुस्तन्मध्ये पि. च. अधमध्ये शनिस्तन्मध्ये वि० . वृ.श.यु. के. श. सूच. म. रा.श... शु.सू... म.रा. ००० ४४ १८ २८२७१६१०८२७/२/३/१७२६/१२/१८२०२६२६९ १८९२३६३६/०४८३६२४/२५१६/३१/३०२७४५३१२१/१२ १.३०३० . . . . ० . . केमध्येऽतर्दशाचक्रम. केतुमध्ये के स्तन्मध्ये पिक क.शु.भ.प.श. बु. के. शु.सू./चंमें. स..श.. 001801201010 . . . . . . . . ० ०० २७/०६/०२७/१०६/९/२७/८/२४७१२/८/२२/१२/२३१२० ०३४/३०२१४१५/३४१३३६१६४९ .३010 व ० . . ० . . . . . . . केतुमध्ये भृगुस्तन्मध्ये वि०च. केतुमध्ये रविस्तन्मध्ये वि० च. शु..च.म.ग. शु. के. पू./घं.) म. रा. श. बु. के. शु. . . . . . . 1. . . . . . ० . ० . . ७ २११२१ २०२२/५/२/३१६६२९/२४/६/१०/७१८१६१९/१७/७/२१) ०३०/० ०/३०३०३०१२८/३०/२२,५४४८/९७९२२२/० . o ० . . . ० ० 0 ० o . ० . ० . . . क . ०१० तुमध्ये चन्द्रस्तन्मध्ये वि० च. केतुमध्ये भौमस्तन्मध्ये वि० १० च. म.रा.प.श. . के. शु.सू. म. रा. . श. बु. के. शु... . १०१० ११७/१२/१२८३२९१२/५/१०८२२/१२/२३/२०१८२४/७/१२ ३०/१५३००/१५/०२/१२/०३०३४३३६/१६५९३४/३०/२१/१२) ३०० 6 . १ . ० . . . ० . . ० . . .

(२८.) देशषीमातरम्। . . .. . . . . . तुमध्ये राहुस्समध्ये वि०१० केतुमध्ये गुरूरतन्मध्ये वि.प. असूबामशशु भूमर ० ..10 १ २६२०२०१२३४२२३१८१२२१४,२३,१७/१९२६/१६२०१९/२० દરર૩ ૨૦ કિરિ રેટ ૦ ૦ ૦રર ००० 01.[. . . . . . . . . ०००० . । तुमध्ये शनिस्तामध्ये विचार फेमध्ये सुधस्तन्मध्ये वि० ० शाकि शुरचम राबु शुसूचिमाराशि . . . . . o10 . . . . . C . . . રૂરિ૩ર૬૨ ૨૨૨૦૨૬૧-૨ દાર (१०३१/१६,३०५७/१२/१६/११/१२/३४४९/३०५११९४२३३४३६१ १०३०. . . का. . 0/३ मृगमध्येऽनर्दश चम् भूगुमध्ये भृगुस्तन्मध्ये विदशाच. शुसूचिमरा यश ( ३२ (सूच मराश बुक १४२३२१ 1४1010/२/0८/२/१० ०२०/०१०१ .१० . . . . . . . 01.01. . . . . . . . . 1. . . . . शुझमध्ये रविस्तन्मध्ये वि० घ. शुक्रमध्ये चन्द्रस्तन्मध्ये वि०१० मराश बुके शुचामराश के शुम . 9 . . . . . . ११ .२१/२०१८२७/२१/२१.. १०.५.२०,५२६५/१० . . 6 9 G . . 4 . . . . .. . है . . .

नापोदाहरणवदितम् । (२८) शुक्रमध्ये भीमस्तन्मध्ये वि० घ. शुक्रमध्ये राहसन्मध्ये वि० ० म.ग. श.वि.के. शु. सू.चं. स..श..के.शु.... . ० . a व . 0/२/१२/१/. २४१३२६/६/२९२४ ०२१/५/१२२४॥२१॥३/३/०२४०३ (३010 . 0 . . 0 . ००० 0101010 ० ०० . ० ० 0 . . . . ० . शुक्रमध्ये गुहस्तन्मध्ये वि० शुक्रमध्ये शनिस्तन्मध्ये वि० घ. श) यु. के. शु.सू.चिं.मं.स.श. यु. के. शु. म.रा.. ० ० . . . . . ५४१५/१२/१/४/६/५/२६१३/२/५ ८२/१६२६/१०/१८२०२६/२०१११/६ २७४५६ . . . ०३०३०३०/० ०/३०० 01... 01. ००० . ...10 . . . . . ० शुक्रमध्ये युधस्सन्मध्ये वि० च. शुक्रमध्ये केतुस्तन्मध्ये वि० ० ३.के.शु.सू.च. म. रा.श.के.शु.स.च.म.रा.प.श.. . ० . . . . . . . .. ० 1131१२/१/६/४/10/210 २४/२९२०२१/२२२९३/१६२१२४/१०/२१/५/२३२६/ ०३०/३०/० ०३०० . . 10 D . ... योगिनीदशाकम। जन्मनक्षत्र जो होय उसमें ३ अंक युक्त करके ८ से जाग देना गेष अंक १२५।६।७० तक रहेगा तब कमसे मंगला पिंगला पाण्या भामरी भद्रिका उल्का सिदा संकटा यह योगिनी नाम जानना और उनकी मसे ।।५।६८ यह वपसंख्या जानना और जन्मनक्षत्रके भुमोम्पघटीरमाण जन्मकालिक. दशापर्यसंस्था से अष्टोत्तरी लिसे प्रमाण भुक्तभोर भोप दशा बनाना।

(२८२) कधीजातकम् । अंतर्दशाकम। दशावर्षसंस्थाके दिन करके उसको ३६ से भागके जो भागाकार अधि सो दिवस सर्वदशामें मंगरा योगिनीकी अंतर्दशा होती है. अनंतर वही भागाकार क्रमस २३३१४।५।६।७/८ इससे गुणे तो पिंगलादि योगिनीके अंतर्दशा दिवस होते हैं यहां दशाधिपति और दशा अंतर्दशाके नाम उनके वपदिसंख्या जुदे जुड़े कोठकमें आगे लिखे हैं यह योगिनीदशाक्रम ३६ वर्षकी होती है, सो भोगनेके अनंतर पुनः यही लेना। १. मगलामध्ये सतरम्। गिलामध्येऽतर्दशावकम्। भ पिघा.नाभ/उ./से (पिपानाम/उ. सिम .. १११११/२/२/२१११२२] ३४]४५. ३००० ०२०२०/०/१०/२०१२००२११०.२०२०१२ 1. . ० . . क ० . . . . ८ . ७ २ . . . . . . | ० . |. ... | . धान्यामध्येऽतर्दशाचक्रम् । भ्रामदशामध्येऽतदंशाचक्रम् ।। धाभ्रा.भसिस माम/स.स | मघा 010 . ३ . ३ ० ० ०-४०/ . . ० ८ २००१०२०/१०/२० . . . ०० . . २ क ..... २ २ . . . . ० . . भद्रियामध्येऽतर्दशाचक्रम् ।। कामध्येऽतर्दशाचक्रम् । भ[उ स (सम.पि.पा.वा[उसि[सम (पि (पा.भाभ 1. .१०० २ c . . २००१२०१०२८]: ००० . . . 1. ०० 101010 1.1010101010 ७ . . . . .

नापोदाहरणसहितम् । (२८३) सिद्धादशामध्ये ऽतर्दशाचक्रम् ।। संघ.टामध्येऽतर्दशावक्रम्. सि.सं.म.पि.पा.ना.म.उ.सं.म.पि.धा.प्रा.म.उ.सि. ११. ०१.१. ४/६/२४/७/९/११२/९/२/५/८/१०/१/४६ २०१०,१०२००१०/२०/०१०२०/१०/०२०/१०/. . . ०० . . . . ० . . . . . D . . . . . . . . जन्मपत्रिका लिखनेका क्रम । प्रथम मंगलश्लोक, आशीर्वादश्लोक, रक्षार्थ श्रीरामचन्दजन्मकुंडली तथा रुष्णचन्दजन्मकुंडली, अनंतर संवत, शक, अयन, ऋतु, मास, पक्ष, तिथि, धार, नक्षम, योग, करण, दिनमान, रात्रिमान, इष्टकाल घटीपल इस प्रकारसे जन्मसमय लिखना अनंतर मध्यमादि स्पष्टग्रह और लम लिखना अनंतर जन्मकुंडली महापासपूर्वक लिखके संवत्सरादिफल लिखना अनंतर चन्द्ररा- शिकुंडली लिखके फल लिखना तन्वादिद्वादशनाव संधिसहित लिखके यहाँका क्षय चय फल लिखना भावकंडली लिखके भावमत प्रहफल और भावस्वामि- गत फल और जावलग्नफल और लमस्वामिफल लिखना सप्तवर्गचक्र फलसहित लिखना यहाँको परस्पर दृष्टि और भाषोंपर ग्रहहष्टि लिखना अनंतर पड्वगंकु. रली ग्रहसहित लिखना नैसर्गिक तात्कालिक पंचधामैत्री लिखना और ग्रह- भाव सप्नवर्गचक्र और ग्रहोंके स्थान, दिक, काल, निसर्गचेश, हम्बल और भावबलमो लिखना तन्वादिद्वादशनाव विचारफल और ग्रहहष्टि फल और रिटा- रिष्टनंग, राजयोग, राजयोगसँगादि, सुनफा, अनफा, दुरधरा, केमद्रुम, नामस योगादिसंभव योगफल और सर्वतोभद्र चक्र, सूर्यकालानल, चन्दकालानल, अश्वगादिचा और यमदंशाचा भार फल और रश्मिफल और दीमादि और बालादि जाग्रतादि यहाँकी अवस्थाफलसहित और इफलादि और इष्टष्टि और इटकटयल और बहरिष्टकष्ट और आयुर्शय दशापिसाग फलसहित और. होंगे अंतर्दशा और विदशा और उपदशा फलसहित लिखना अनंतर विशोक ,

(२८४)
देशवीजातकम् ।
घरीदशा फलसहित लिसके अंतर प्रत्यंतर फलसहित लिसना और योगिनी.
पशा अंतर्दशालिसके फल लिखना अष्टोत्तरी दशा लिसना ।
कविवंशप्रशंसा नग्घराछन्दसा ।
आदौ ब्रह्मा ततो दिग्विजनिकरभवा ब्राह्मणा गोडवर्या-
स्तद्भारद्वाजगोवे प्रथितगुणगणः सुन्दरो लालयुक्तः ॥
आसीत्तस्यापि पुत्रो प्रकटसमुदयावाप्सनुर्लन्धकीती
पच्छोशील्यादियुक्तं शुभगुणनिचयं भूरि लोका गृणन्ति ॥१॥
भापा:-(अब कपिके वंशकी प्रशंसा कही जाती है सम्धराउंइसे )
पहिले बालाजी भपे तिनसे दश प्रकारके ब्राह्मण शये तिनमें गौड द्विजश्रेष्ठ अपे
तिनके शुभ भारद्वाजगोत्रमें विरन्यात गुणगणवान् सुंदरलालनी भये और
तिनके पुत्र जो प्रकटित भाग्योदयवाले और लम्पकातिवान् जिनके सुशीलपन
मादिसे युक्त शुनगुगोंका बहुतमे लोग गान कर रहे हैं ॥ ३ ॥
शिवो दयालुयुक् शिवः सहायवान् सुतावुभो
तदीयपुत्रतां गतो सुयुग्मको तु पंडितो॥
महद्रीयगौरवो त्रिकालवाचकावुभो
समापतुनरेन्द्रसिंहराज्यतोऽधिकं यशः ॥ २॥
भापा:-ऐसे शिवस्यालुनी शिवसहायजी दोनों पुत्र तिनके पुत्र युग्मक
मोडीवाले पंडित प्रसिद्ध भये. जो महामारी गौरववान और त्रिकालवक्षा
ज्योतिर्विद जिन्होंने पढालयाधीश श्रीमन्नरेन्द्रसिंह महाराजके राज्यसे बहुत
परा कीर्ति यथा महान् आजीवनोपय पाया ॥२॥
दुर्गाप्रसादश्च तया भवानीसहाय एतो महदाप्तकामो ॥
जनाभिरामा नृपतिप्रधानो ज्योतिषिदावामतुराप्तमानो ॥ ३ ॥
भापाः-सो दुर्गाप्रमाद और भवानीसहाय ये दोनों परिपूर्ण काम भये जो
जनोंको अभिराम आनंद देनेवाला जो राज्यमें प्रधान मुख्य जोतिपी प्रातमान
सन्नान अर्थात भारी मतिषित भये ॥ ३ ॥

१२८५)
चापोदाहरणसहितम् ।
अथो शिवसहायस्य सुतायेतो महामती ।।
लक्ष्मीनारायणश्चाय ज्योतिर्विज्जगदीशकः ॥ ४॥
पापा:-फिर तिन शिवसहायनीके महान् बुद्धिवान लक्ष्मीनारायण भौर
ज्योतिवित जगदीशशमा पुत्र हैं ॥४॥
ज्योतिर्विज्जगदीशोऽसौ जगदीशप्रतोपदम् ।।
नेशनायार्पयत्कृत्वा फेशवीजावक स्फुटम् ॥ ५॥
भाषा:-ज्योतिर्विद जगदीशप्रसाद शर्माने जगदीश (भारापण) को
तुष्टि (प्रसन्नता) देनेवाले इस केशवीजावकको स्फुट अर्थात् प्रकट मनुष्य
भापासे विभूपित करके केशवनगवान के अर्थ समर्पण किया अथवा केशव
देषावर्यकी पूजामें अर्पण किया यह मी श्छेप है ॥ ५ ॥
त्रिपंचाकन्दुव सदकमी नभस्सिते ॥
नृगिरोदाहतिः पूर्णा पूर्णिमायां खेदिने ॥ ६ ॥
भाषा:-संवत् १९५३ श्रावण शुक्ल पूर्णिमा रविवारको शुभ भारतभू.
मिमण्डलांतर्गव प्रसिद्ध इन्द्रप्रस्थ नगरसे पश्चिमकोणस्थ आर्थिक शेलवलयति
नन्दप्रामनियासी भारद्वाज गोत्र उपाध्यायकलोदव क्योतिर्धित जगरांशपसारका
बनाया पह नव्य उदाहरण मनुष्य मापासे विभूषित समान या तो सबको
सदा सुखादि देवो ॥६॥
मंगलं लेखकानां च पाठकानां च मंगलम् ।।
मंगलं सर्वलोकाना भूयोभूयोस्तु मंगलम् ॥ ७ ॥
मंगलं भगवान् विष्णुमंगळं गरुडध्वजः ।।
मंगलं पण्डरीकाको मंगल्यपतनो हरिः ॥ ८॥

(२८४)
फैशवीगातकम्। ।
चरीदशा फलसहित लिखके अंतर प्रत्यंतर फलसहित लिखना और योगिनी-
पसा अंतर्दशा लिसके फल लिखना अटोचरी दशा लिसना ।
कविवंशप्रशंसा नग्धराछन्दसा।
आदौ ब्रह्मा ततो दिग्विजनिकरभया ब्राह्मणा गोडक्या-
स्तदारद्वाजगोत्रे प्रथितगुणगणः सुन्दरो लालयुक्तः ॥
मासीत्तस्यापि पुत्रो प्रकटसमुदयावासनुर्लन्धकीती
यच्छोशील्पादियुक्तं शुभगुणनिचयं भूरि लोका गृणन्ति ॥१॥
भापाः-(अप कपिके वंशकी प्रशंसा कही जाती है नग्धराछइसे)
पहिले ब्रह्माजी भये तिनसे दश प्रकारके ब्राह्मण भये तिनमें गौड विनश्रेष्ठ भये
तिनके शुभ भारद्वाजगोत्रमें पिरयात गुणगणवान् सुंदरलालजी अये और
तिनके पुत्र जो प्रकटित भाग्योदयवाले और सम्वकीर्तिवान् जिनके सुशीलपन
भादिसे युक्त शुनगुणोंका बहुतमे लोग गान कर रहे हैं ॥ १ ॥
शिवो दयालुयुक् शिवः सहायवान् सुतावुभो
तदीयपुत्रतां गतो सुयुग्मको तु पंडितो॥
महद्रीयगोखो त्रिकालवाचकावुभो
समापसुनरेन्द्रसिंहराज्यतोऽधिकं यशः॥२॥
भापा:-ऐसे शिवश्यालुजी शियसहायजी दोनों पुत्र तिनके पुत्र युग्मक
मोडीवाले पंडित प्रसिद्ध सये. जो महामारी गौरवधान और पिकालयका
ज्योतिर्विद जिन्होंने पटालयाधीश श्रीमन्नरेन्द्रसिंह महाराजके राज्यसे बहुत
परा कीर्ति यथा महान आजोबनोदय पाया ॥२॥
दुर्गाप्रसादश्च तथा भवानीसहाय एतो महदाप्तकामा ।
जनाभिरामा नृपतिप्रधानो ज्योतिर्विदावाप्सतुराप्तमानो ॥ ३ ॥
भापा:-सो दुर्गाप्रसाद और मवानीसहाय ये दोनों परिपूर्णकाम भये जो
जनोंको भनिराम आनंद देनेवाला जो राज्यमें प्रधान मुख्य जोनिपी पातमान
सन्मान भाव भारी मतिषित भपे ॥ ३ ॥

भापोदाहरणसहितम् । (२८५)
अयो शिवसहायस्य सुतावेतौ महामती ।।
लक्ष्मीनारायणबाथ ज्योतिर्विज्जगदीशकः ॥ ३ ॥
भाषा-फिर तिन शिवसहायजी के महान् बुद्धिवार रक्ष्मीनारायण भौर
ज्योतिर्विद जगदीशशमा पुत्र है ॥ ४ ॥
ज्योतिर्विज्जगदीशोऽसौ जगदीशपतोपदम् ॥
केशवापार्पयत्कृत्वा केशवीजातक स्फुटम् ॥ ५ ॥
भाषा:-ज्योतिर्विद जगदीशप्रसाद शर्माले जगदीश (मारायण) को
तुष्टि (प्रसन्नता ) देनेवाले इस केशवाजावकको स्फुट अर्थात् प्रकट मनुष्य
जापासे विभूपित करके केशवनगवान् के अर्थ समर्पण किया अथवा केशव-
पशवर्यको पूजा अर्पण किया यह भी शेष है ॥ ५॥
विपंचाकेन्दुवर्षे सक्रीये नभस्सिते ॥
नृगिरोदाहतिः पूर्णा पूर्णिमाया खेदिने ॥६॥
भाषा:-संवत् १९५३ श्रावण शुक्ल पूर्णिमा रविवारको शुभ भारतभू-
मिमण्डलांतर्गत प्रसिद्ध इदयस्थ नगरसे पश्चिमकोणस्थ आर्थिक शैलतलपति-
नन्दमामनिवासी भारद्वाज गोत्र उपाध्यापकुलोदव ज्योतिर्विद जगदोशनमारका
बनाया यह नव्य उदाहरण मनुष्य मापासे विभूषित समान गया सो सबको
सदा सुखादि देवो ॥ ६ ॥
मंगलं लेखनन व पाठकानाच मंगलम् ।।
मंगलं सर्वलोकाना भयोभूयोस्तु मंगलम् ॥ ७॥
मंगलं भगवान् विष्णुर्मगलं गरुडमजः ॥
मंगलं पुण्डरीकाक्षो मंगलायतनो हरिः ॥ ८॥

(२८६) केशवीजातकम् । अव सूर्यसे लमसे इसकाल करनेकी गति । अभोग्यस्तनोर्मुक्तकालान्वितो। युक्तमध्योदयोऽभीएकालो भवेत् ॥3॥ . मापा:-स्पष्ट सूर्यमें अपनांशा युक्त करके उसको राशिविना ३० अंशमै कम करके जो राशि ऊपर होय उसके प्रमाण स्वदेशीय लयमानसे गुणके भोग्प पल करना और लपमें अयनांश युक्त करके उसके ऊपर जो राशि होय उसके प्रमाणसे मुक्त पल करके फिर लपकी राशिसे सायनसूर्यकी राशितक स्वदेशीय लपमानका ऐक्य करके उसमें भुक्त और भोम्प पल युक्त करके ६० से भाग देना तो इष्टकालघटीपल सष्ट होता है। टिप्पणः-जो सायन सूर्यको राशिले सायनलमकी राशितक स्वदेशीय लयका ऐक्य करे तो सूधा लम लेना और सायन लपकी राशिसे और सायन सूर्यकर राशितक लगका ऐक्य करे तो उलट लम लेना। उदाहरण:-सष्ट सूर्य ०।१३।१०।४२ इसमें अयनांशा २२१४४१३ युक्त करके १।५।५४१४५ इसको ३० अंशमें कम करके १।२४।५।१५ इससे ऊपरके कहे प्रमाण योग्प साधन किया तो३९५ अव लम ६।९।४२॥ २६ इसमें अयनांशा २२१४४१३ युक्त करके ७।२।२६।२९ इससे भुक्त पल साधन किया तो २८ अब सायन सूर्य वृष राशिका है इसवारते मिथुन लमका ३०० का ३४६ सिंहका ३५५ कन्याका ३४८ तुलका ३४८ इनका ऐश्य १६९७ इसमें भुक्तभोग्य पल युक्त करी और इसको ६. का माग दिया तो लब्ध ३२ शेष ० यह पल पूर्वतुल्य इष्ट जया इसी प्रमाणसे सूर्य लमसे इष्टकाल करना । जो नापन सूर्य और सायन लन एक राशिम होय तो इनका अंतर करके उसको सायन सूर्पके उदयसे गुणके ३० से माग देना लो भागाकार आचे सो पलात्मक अपीटकाल होता है जो सायनसूर्यके अपेक्षा सायन लग्न कमली होय नो पूर्वप्रमाण साधन किया जो कला सो ६० मेसे कम ना तो इटाल गोता है।

मापोदाहरणराहियम् । (२८७) भय खेरष्टवर्गाकाः ४८. चन्द्रस्पाटबगोकाः ४९. सू.च.भ.बु..शुशलम. शुशल सू २३२३/५/६/१) ७ . ८ ०१० २०/१०/१२) ११/०११० ०/११/१०/१२/११/० . . ००० . 4 ० . . ० . ० 0 ० . . भीमस्याष्टीयाः ३९. बुधश्यावर्गाकाः ५४. म. पु..शुशलसूचयु. व शुशल सूच. मं १/३१६/६/११/३/३/१/६/११/१/५/४/१ २/५/१०/८/४/३/५/६/३/८/२/२/२/६५ ४१६/११/११/७/६/६/११/५/२३/३/४/४/२/६/४ ७१२/१२/१२/८/१०/१०. १२010 0/2010 . . ८/९/११/० ०/१२/० ९ ०/१२/० ०१२/०११ . . . . . . ० . . ० . 0 . गुरोरष्टवाँका५६ शुक्रस्याटकाः ३९. १. शु. शालाच. बुशुश ल.सू.च.म.बु.. २/३/१/१२/११/१/३/२/८/१३) ४९१२१५/४/९/७५/१/८/५/0४/९/९/१० ८/११/०७/८ ८१२/० 0/९२०२१४१०१९/११११/ १/० (१०/१०/११/१०/- ...१२ ००१२० ० . ० (२८८) केशवीजातकम् ।। शनेटरीकाः ३९. लग्रस्पाटबीका ४८. श..सू.म. यु. यस.स.च.म. ...श. ६६.४/१२/६/९/११/१२/८/४/१०४६/९/१२/ ०१०/१०/१२/०१०/७/११/७/९/२१/० ०11०८ ०११ ००१२० ९/११] . . ० . . . . ० ० . ... . . . . . अथ सर्वतोभद्रचक्रम् । म. मा. था. I. कृ. 6. मृ. प पु. ६. म. म. . ल. म. २. १ मो. मो. पू स. ज. सं. ८ त. ऐ. ख. घ ज. म. य. B, भ. अथातः संभवक्ष्यामि चक्र त्रैलोक्पदीपकम् ॥ विख्यात सर्वतोमदं सद्यः परपयकारकम् ॥ 2 ॥ या योचराः भागापराव्य कोठा नपात्र चके सुधिया विधेयाः ॥ स्वरक्षयादिकमव लेख्यं प्रसिद्धझावाच्च मया निरुकम् ॥ २॥ नमो भवेनेडमरजे च हानिाधिः स्वरे भीष तिथौ निरुका ॥ राशीच वेधे सति विनमेव जंतुः कथं जीवति पंचविहे ॥ ३ . भरण्यकारी वृप च नंदा भद्रा तकार श्रवणं विशालाम् । तुलां च विखेदनरासंस्थो ग्रहोक्तबके गतिं स्वरः ॥४॥ कारमौकारमुकारदाने खातोरकार मिथुन च कम्पाम् । तपासिजिरसंतकां च विद्धे ब्रह्मसंस्थो हि नभयरेन्दः ॥५॥क करार

भापोदाहरणसहितम् ।। (२८९)
च हरि पकारं चित्रां च पोष्णं च तथा लकारम् । अकारक वनमत्र विद्धदलं
नगोमंडलगो मृगस्थः ॥ ६ ॥ एवं वेधः सर्वतोजदचके समयश्चिन्तनीयः
सुधीभिः ॥ दद्यादेधः सकलं सौम्यजातोऽत्यंत कष्टं दुष्टवेधः करोति ॥ ७ ॥
यस्मिन्पृश्शे संस्थितो वेधकर्ता पापः सेटः सोऽत्यां याति पस्मिन् ॥ वाले
तस्मिन मंगल पीडितानां प्रोक्तं सद्भिनान्यथा स्यात्कदाचित् ॥ ८॥
-1| सुर्यकालानलचक्रम् ॥
१४ १५ १६ १७ १८१
११ १२ १३
.२०
१०
२८
सूर्यकालानलंचक्र स्वरशास्त्रोदितं हि यत् । तदहं विशदं वक्ष्ये चमत्सतिकर
परम् ॥ १ ॥ त्रिशुल कापाः सरलाश्च विवः किलोवरेखाः परिकल्पनीयाः ।
रेखात्रय मध्यगतं च तत्र वैव च कोणोपरिगे विधये ॥ २ ॥ त्रिशुलकोणांतर-
गान्यरेखा तदपयोः शंगयुता विधेयम् ॥ मध्ये त्रिशूलस्य च देडमूलात्मन्येन
मान्यानोऽभिजिर ॥ ३॥ स्वनामनं यत्र गतं च तत्र प्ररलनीयं
सदसतलं हि । तलस्थक्षत्रितये कमेण चिन्ता पक्ष प्रतिबंधनानि ॥४॥

(२९०)
केरापीजातकम् ।
अंगद्वपे रक च द्धि भंग शृलेषु मून परिपत्नीयम् अपेषु पिणे जपम्म
लानोऽनीटार्थमिदिहुधामराणाम ॥ ५॥ श्रीसूर्यकालानलयातहदेव यादे
चरणे प्रयाणे ॥ प्रयलपूष मनु चिन्तनीय पुरातनानां वचनं प्रमाणम् ॥६॥
इति सूर्यकालानलचक्रम् ।
अथ चन्दकालानलचक्रम् ।
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इकोट के पावयाय वृनं तम्मिश्च पूर्वापरयाम्यसौम्पैः ॥ वृनाहिः-
चलिते विधेये रेखात्रिशलाश्च तदयकेषु ॥ १ ॥ कोणच रेखाद्वितियेन साध्या
पूर्वत्रिशूले दिल मध्यसंस्थम् ॥ चान्द्रं लिखेद्रं तदनुक्रमेण सव्येन धिष्णानि
चहितदने ॥ २॥ कालानलं चक्रमिदं हि चान्दं रणप्रयाणादिषु जन्म चेत् ।
विशुलपस्थं निधनाय नूनमंतहिःस्थं वजनदं हि ॥ ३ ॥
श्रीरामचन्द्रस्य जन्मकुण्डली।
हिमांशोभेऽङ्गेजसुस्युरुरिपो राहुरनुजे-
ब्धिगो मन्दः पुण्ये शिखियुगुशनास्तेऽवनिसुतः ॥
खो स्वस्पे सौम्ये शिवभवनगे मासि मधुके
सिते मध्याह्नेम्भूदयुवरजनिर्विश्वसुखदा ॥ १॥

भापोपहरणसहितम् ।। (२९१) श्रीकृष्णचन्द्रस्य जन्मकुण्डल! ।। भाद्रे मासि सितेतरे वसुतियो बाझे वृषेऽन्धी विधो लग्रस्थे सानो गुरो सहजगेऽम्बुस्थे खो सेन्दुजे ॥ राहो पंचमगे भृगो रिपुगते भौमे नृपस्थे ध्वजे लाभे रात्रिदले बभूव कमलाधीशावतारो बुधे ॥२॥ उअयोर्जन्मलने । कृष्ण '? ध b में 9 मा । १२) इति भापोशाहरणसहित केशवीजातकं समाप्तम् । खेमरान श्रीकृष्णदास, पुस्तक पिलनेका ठिकाना- गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, "लक्ष्मीवकटेश्वर स्टीम् प्रेस श्रीवेंकटेश्वर " स्टीम प्रेस, कल्याण-मुंबई. खेतवाडी-मुंबई.

जाहिरातः ज्योतिप-ग्रन्थ की.रु. आ. अयोध्यानातक-आपाटीकासमेत अभकाश-आपाटीकासमेत.। इसमें तेनी मन्दी वस्तु देखनेका विचार मलीभांति लिखागया है. ::... भानन्दप्रकाश-मापाटीकासमेत । यह ग्रन्थ ज्योतिपियाँको अतीव उपयोगी है । इसमें रोगकी स्थिति, असाध्यरोग किसमकार शान्त होगा तथा रोगमुक्ति; स्नानदानादि कितनेही उत्तम विपय लिखे गये हैं. आपटीय-(ज्योतिषशास) संस्कटीका मापाटीकासमेत कर्णकुतूहल-सटीक तथा उदाहरणसहित । ब्रह्मपक्षीय गणित मन्थ करणेन्दुशेखर-इसमें रव्यादि ग्रहोंकी सारेणी नली माँति दी गई है। तथा सिद्धांतोक्त सब विषय संक्षेपसे इसमें आगये हैं कोडाकौशल्य-भापाटीकासमेत । इसमें-मुहूर्त, प्रश्न, मन्त्र- • यन्त्रादि साधन पाशे, गजीफे, ताश, दशावेष्टरी, ज्ञानपद, श्मशानदूत, साक्षिकोडा, विधिकीडा, इष्टदेवतादर्शन, शतरं- जके अनेक प्रकार के विचित्र खेल और बालक्रीडा, रासक्रीडा आदिका वर्णन चित्रोंसमेत है ग्लेज कागज तथा रफ कागज पुस्तकें मिलनेका ठिकाना- गङ्गाविष्णु श्रीकृष्णदास, लक्ष्मीवेंकटेश्वर" छापाखाना, कल्पाण-मुंबई.

Kesanjatak

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Title
Kesanjatak
File name
Kesanjatak
Text
OCR done
Citation
1920
Published
2012/02
Publisher
Bombay,.jagadisvara Pres
Language
Sanskrit
Pages
246
Library
Bharatiya Vidya Bhavan Library, Mumbai
DLI number
312477
Barcode
99999990321261.00
Scanning centre
Banasthali University
Digital publisher
Digital Library Of India
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