Agarchand Bhairondan Sethiya Jain Parmarthik Sanstha, Bikaner
Sati Chitravali
Front matter
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"
सुता-चित्रावली
सोत एजेन्ट
हिन्दी पुस्तक एजेन्मी
१२६, हरीसन रोड, कलकत्ता,
सिविल होस्पिटल गेड, दहती,
दुतानारा, पाशी
उर्दू पजार गोरसपुर
दाम दो रुपया पार आना।
प्रकाशक
श्रीआशुतोप धर,
आशुतोप लाइब्रेरी
न० ३९।१ कालेज ट्रीट,
कलकत्ता।
१३३०
श्रीनारसिह प्रेसे
श्रीप्रभातचन्द्र दत्त द्वारा मुद्रित
३९।१ कालेज ट्रीट, कलकत्ता।
प्रेमोपहार
MIRE
मेग
करकमलोम--
यह चित्र-पुष्प मती आलौकिक नास सावित्रा लना ।
बस स्वर्ग व अपर्ग का है एकमान यही पता।
यह इन्दु भारत जीवनी मञ्जीवनी गत प्राण है।
नरतोक का उद्यान है, परतोय का मोपान हैं ॥
नर धन्य है, मतिमन्य है, कर्मण्य है आदर्श है
जिस के सुसद जीवन प्रभाका यह सनी आदर्श है।
हो अन रढ व्रत जो इसे पलन कर सुचि नेमसे
उस भाग्य रमणी करक्मत में है समर्पित प्रेममे
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पञ्चसती
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५
आशीर्वाद उन दक्ष प्रजापति की छोटी लडकी सती अपने मा बाप की बडी प्यारी थी। सती बचपन से ही सारे गुणों से युक्त थी। साथ साथ अपने मा बाप के प्रति वह असीम भक्ति तथा श्रद्धा रसती थी। उसके पिता दक्ष और मा प्रसूतिने सती को बडे चावसे नाना शास्त्र तथा पुराणों की शिक्षा दी। शास्त्रों में शिवजीका माहात्म्य सुनकर बचनपन ही से सती को शिवजीके प्रति असीम भक्ति होने लगी। किन्तु उसके मा वापको इसकी कुछ खबर ही नही कि सती कैसे शिवजीकी भक्त हो चली। सती ज्यों ज्यों चढने लगी त्यो त्यो शिवजीका दर्शन क्योकर मिलेगा इस हतु व्याकुल होने लगी। दक्ष पुरी के सुन्दर-देव-मन्दिर में वह व्याकुल चित्त होकर प्रतिदिन शिवजीकी आराधना करती थी। एक दिन की बात है। ज्योंही पूजार्चना समान कर वह मन्दिरसे बाहर निकलो त्योही क्या देखती है कि मामने एक योगिन सड़ी है। सतीके प्रणाम करने पर वह योगिन आशीप देकर बोली "टेवादिदेव तरी मनकामना पूरी करें। यह कह कर वह योगिन अन्तर्ध्यान होगई। ३ Ellerinde eRUTAMA. 1 مه
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शिव-दर्शन दूसरे दिन सन्ध्या समय सती दक्षपुरी के पास के एक छोटे पर्वत पर बैठी हुई शिवजीके ध्यान में मग्न थी। पूर्णचन्द्र की स्वच्छ किरणें चारी दिशाओं को आलोकित करती हुई समीप के छोटे झरने में प्रतिविम्बित होती थीं। सती अञ्जलि भर फूल लेकर अपने इष्ट प्रियतम के चरणों में अर्घरुप से अर्पण कर रही थी। एकाएक देवदेव महादेवजी अपनी शुभ्र कान्तिसं पूर्णचन्द्र को उन किरणों को भी मलिन करते हुए अपने भक्त की पूजा ग्रहण करने के लिये सतीके सामने पडे हो गये। सती अपने सनोरथ प्रियतम देवको अपने निकट देवकर आनन्द से फूली न समाई। ढेर के ढेर फूल लेकर उनके चरणकमलों की पूजा करने लगी। उस पूजार्चना के साथ साथ वह अपना तन मन भी शिव के चरणों में अर्पण कर गई। प्रेममय महादेवजीने भी इसते हसते अपनी भक्ति करनेवाली के मनोपहार को भी मादर स्वीकार कर लिया। ४
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कैलास-यात्रा इम एक शुभ दिन में पितामह ब्रह्माजी के सामने देवताओं का आशीर्वाद लेकर सतीने महादेवजी को पतिरूप से वरण कर स्वीकार कर लिया। शुभलग्न में न्याह समान होगया मही, किन्तु इस विवाह से उसके पिता दक्ष तथा माता प्रसूति खूब सन्तुष्ट न हुई। हाय । श्राग्निर को मेरी रूप गुण तथा लावण्य की ग्यान प्यारी बेटी उमशाननामी भूत प्रेतो के साथी भिक्षुक के हाथो पड़ी। में दक्ष प्रजापति को बडी अप्रसन्नता हुई। किन्तु, सैर जो हो । महादेव जी को तो सभी देवगण देवोंके देव कहकर असीम भक्ति और श्रद्धाकी दृष्टिसे देखते थे। अब दक्ष प्रजापनि उनके श्वशुर हुए। शिवजी के श्वशुर होनेके कारण देनों को समाज में दक्ष की प्रतिष्ठा खूब ही बढ चली हॉ, इतनी ही भर तमली थी। न्याह होजाने पर सती को बायीं ओर बैठाल कर और बूढे बल पर असवार होकर सिंगा बजाते हुए नन्दी तथा भृङ्गीके साथ माथ शिवजी कैलास को चले। सती अव श्मशानवासी मिक्षुक की गृहिणी हो चली।
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शरीर-त्याग । भृगु मुनि के यत्र में शिवजीने अपने श्वशुर दक्ष का कुछ भी सम्मान नहीं किया। क्रोध और दुख से अभिभूत होकर दक्षन इसका बदला लेनेके लिये एक बडा यज म्वयं करना शुरू किया। उस महा यज्ञ में स्वर्ग, मर्त्यलोक और पाताल के सभी को न्योता दिया गया। केवल शिवजी को निमन्त्रण न दिया गया। इस कार्यका भार नारद मुनि को दिया गया था। कलह प्रिय नारद मुनि को स्याही बढिया मौका हाथ लगा। वह सासकर कैलास गये और नोन मिर्च लगी बातों से वहाँ कह आये कि दक्षने तीनो लोक में समी को न्योता देने कहा है किन्तु केवत शिव और सतीजी को न्योता देनेका हुक्म रवास कर के नहीं हुआ है। क्या पति देवका अपमान । इतना अपमान ।। हाय || यह मुझ से कैसे सहा जायगा? यह हृदय विदारक समाचार मतीजीके हृदय में शल की तरह चुभा। उन्हो ने अपने पिताजी को शिव-रहित यज्ञ करने के भयङ्कर परिणाम को समझा देनेका दृढ सङ्कल्प किया। अपने तेज शक्ति स्वरूप दशमहाविद्या- ओंका रूप अपने स्वामी को दिसला कर बडे मुश्किल से पिताके यहो यज्ञके अवसर पर जाने की आज्ञा सतीने पाई। पिता को स्वामी का ऐश्वर्य दिसाने के लिये योगिन का रूप ग्रहण कर बेशकीमती गहने और कपड़े पहन कर और नन्दी को साथ लेकर सती दक्षपुरी को गई। दक्ष ने सती को देखते ही शिवजी की अनेक प्रकार की निन्दा करना शुरू किया। सती अपने पिताजी को मङ्गलमय शिनजी की निन्दा करने से ज्यो ज्यो मनाही करती थी वह त्यो त्यो और अधिक निन्दा करते जाते थे। आरिपरको पति-देव की निन्दा सतीजी को असह्य हुई। पति निन्दा मुनने से मेरा जीवन अपवित्र होगया ऐमा सोच कर मतीने उस यज्ञ भूमि ही में योगाभ्यास के बल से अपना प्राण त्याग दिया। नन्दी कैलास को दौडा गया और शिवजी को उसने यह दुस्समाचार सुनाया। ८ 出
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शिवजी के कन्धे पर “सतीचित्रावली शिवजी के कन्धे पर सती के प्राण वियोग की सवर पाते ही शिवजी का शरीर काँपने लगा उनके प्रचण्ड क्रोध मे वीरभद्र नामक एक महा भैरव उत्पन्न हुए। वीरभद्र है झट जाकर दक्षयज्ञ को तहस नहस कर डाला। दक्ष का सिर भी उनने काट डाला और उस धड़ के उपर छाग की मूडी ररा दी। इधर शिवजी सती के शोक से पागल होकर "सती दो, मती दो" या कहते हुए दक्षपुर में जा उपस्थित हुए। वेचारी सती की देह पर बेशकीमत जेवरात और कपडे टेस कर पहले कुछ ठहर गये। किन्तु फिर तुरत सती के शरीर से उन वेश-भूपा की वस्तुओ को फेंक कर और तब उस मृतक शरीर को कन्धे पर रख कर उसके शोक से पागत होकर तीनो भुवन मे घूमने लगे। महादेव जी की यह हालत देख कर देवताओं को बडी चिन्ता हुई बौडाहे शिव के कन्धे पर से सती को हटाने का कोई उपाय नही देखकर विष्णु भगवान ने अपने सुदर्शन चक्र द्वारा सती के शव को खण्ड खण्ड काटकर धीरे धीरे गिराना शुरू किया। उसी पवित्र शरीर का एक एक टुकडा भारतवर्ष के जिस जगह में गिरता गया वह स्थान पीठस्थान होकर हिन्दुओं के लिये महापीठ स्थान में परिणत होकर पूज्यस्थता होगया।
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प्रथम-दर्शन मद्रदेश के राजा अश्वपति तथा उन की रानी मालवी बहुत समय तक निस्सन्तान रही। पीछे अठारह वर्ष पर्यन्त सावित्री देवी की आराधना करने पर उन्हें एक कन्या हुई। देवी हीके नाम के ऊपरउसका नाम सावित्री रक्सा । शुक्लपक्ष के चन्द्रमा की नाई मावित्री दिनोदिन बढने लगी। उसके शरीर की अपूर्व कान्ति तथा अलौकिक ज्योति प्रशसनीय थी। उसके ब्याह कराने की उमर होचली किन्तु अबतक कोई योग्य बर नही मिला। उसकी देह की दिव्य कान्ति ओ तेज देसफर सभी व्याह करनेके इच्छुक राजकुमार लोग दूर ही से उमे भक्ति पूर्वक प्रणाम कर लौट जाते थे। कोई उन्हे पत्नी रूप से ग्रहण करने को स्वीकृत नहीं होता था। श्रय राजा वडे मुश्किल में पडे अन्त मे माण्डव्य मुनिके उपदेशानुसार सावित्री को म्वय पति को चुन लाने को भेजा। सावित्री अपनी मखियोंके साथ ग्य पर चढके अनेक जगहों में घूमती फिरती श्रासिरको एक तपोवन में पहुची। उम तपोनन मे शल्य देश के राजा द्युमत्सेन रोग मे अन्धे और शत्रुओं मे श्राकान्त होने पर गऱ्याच्युत होकर अपने इकलौते बेटे सत्यवान तथा अपनी स्त्री साथ मामूली तौर मे रहते । मावित्री रथ को दूर ही में छोडकर उस तपोवन के लताकुजो में अपनी सगी सहेलियों के साथ जब घूम रहीथी तभी अत्यन्त शुभ मुहूर्त में एकाएक मावित्री मे सत्यवान की भेंट होगई।
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नारदजी से भेंट । - सावित्री सत्यवान के चरणों में प्राण तथा मन को ममर्पण र राजधानी को लौट आई। अश्वपति सावित्री की ससियों के मुह से सत्यवान की बात हुनकर अत्यन्त हृष्ट हुए। जब कि तपोवन में गुमत्सेन के पास आदमी मेजनेका उद्योग कर रहे ये इतने ही मे देवर्षि नारद अश्वपति के यहाँ आपहुँचे। राजाके सव वृत्तान्त सुनाने पर नारदजी नोले "निश्चय सभी तरह से सत्यवान मावित्री के योग्य घर है। किन्तु आज से वरस रोज पर उनकी मृत्यु निश्चित है। अतण्व उन्हे कन्या कभी न देना" । अश्वपति के हर्ष मे विपाद आधुमा । उन्हों ने अपनी लडकी को देवपि के सामने बुलाकर सब बाते कही। माथ साथ उसे अन्य पतिको वरण करने को कहा। यद्यपि सावित्री स्वभावत बडी लज्जाशीला थी किन्तु उस समय उससे नहीं रहा गया और वह बडे जोरदार शब्दो मे बोल उठी "मैं उन्ही को स्वामीरूप से बरण कर चुकीह। ऐसी हालत मे वह रोगी हो वा स्वस्थ, सुन्दर हो वा कुरूप, स्वल्पायु हो वा दीर्घायु-जैसे ही क्यों न हो-वही मेरे पतिदेव है । मैं कमी सत्यवान को छोड किसी दूसरे के साथ शादी नहीं कर सकती। किसी काम को करने के पहले लोग मन ही मे उमे निश्चय करते है , पीछे उसे बोलकर प्रकाश करते है और अन्त मे कार्य मे उसे परिणात करते है । अतएव मन ही मत्रो में प्रधान हुआ। मैंने भी जब मनही मन सत्यवान को स्वामी निश्चय कर लिया है तब केवल वही मेरे स्वामी हो सकते है । दूसरा और कोई भी नहीं हो सकता। देवर्षि नारद भी सावित्री को दृढ़ता और धर्म परायणता देसकर उसी सत्यवान के साथ उसे ब्याहने की राय दे सावित्री को मन से आशीप देकर चल दिये।
4月。 || 4 )
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विवाहोत्सव देवर्षि नारद की अनुमति पाकर अश्वपति को तसल्ली मिली। उन तुरत ही उस तपोवन में घुमत्सेन के यहाँ विवाह का प्रस्ताव लेकर आ भेजा। युमत्मेन प्रस्ताव को सुनकर फुले न समाये और उसे स्वीकार कि इधर सत्यगान भी सावित्री के प्रथम दर्शन समय से उसी पर मोहित मावित्री मे व्याह करने की लालसा मे आज उनने इष्टदेव की भी प्रार्थना के शुम दिन में राजा व रानीने पुरवासी गरनारियों को साथ लेकर तपोवन मे जाकर बडी धूमधाम से सत्यवान के साथ अपनी लडकी का . सम्पन्न किया। ६
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व्रतचारिणी
मावित्री ससुराल जाकर और तपम्बिनी का भेप बनाकर बहू
पूर्वक अपने ससुर सास तथा पति की सेवा करने लगी। उनकी सेवा
विद्या, बुद्धि तथा देवी की माँति सादर आचरण से उनके गुरुजनों
तो दूर रही उस तपोवन भरके मुनि तथा मुनिपनिया तक उन्हें घडे
दृष्टि से देसने लगी।
सावित्री देवर्षि नारद की वह दारुण भविष्यवाणी क्षण भर के
नही भूली। किन्तु उसे अपने मन में छिपा कर उनने पतिदेव व
कामना से प्रतिदिन प्रत, नियम तथा उपवासादि कर अत्यन्त व्याकु
ईश्वर से प्रार्थना करने लगी।
अब वह भीपण दिन भी आ उपस्थित हो ही गया ।। उससे
पहले ही से सावित्रीने त्रिरात्र-वत नामक बड़ा कठोर व्रत प्रारम्भ किय
१८
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विधाता का लेख , हे आखिरको वह मयकर दिन आ उपस्थित हुआ। सावित्री ने दिन सत्यवान को अपनी आँखों के सामने रक्खा। किन्तु सन्ध्या समय उनने दे कि पिता की आज्ञा से सत्यवान लकडी लाने को धन को चले है। सावि का प्राण मारे डरके सूख गया। उनने साथ जानेको अपने पतिदेव की श्रा मागी। किन्तु वह तीन दिनों से बिना कुछ अन्न जल साथै उपवास कर थो। तय तक भी न कुछ साया था और न एक घूद जल तक पिया था। हालत मे सत्यवान उसे अपने साथ वन जाने की आज्ञा क्योंकर देते १ उन्ह सावित्री को वापस करने के लिये लास कोशिश की। किन्तु पतिव्रता शिरोम मावित्री उस विधि लेख की बात जानती हुई कैसे उस समय में अपने पतिदेव आँसों की ओट में रहने देती। उनने बडे मुश्किल से अपने ससुर और र की अज्ञा ली तय सत्यवान को अब किसी प्रकार की आपत्ति करने मौका नहीं मिला। दारुण भावीके प्रवल वेग से आकर्पित होकर सत्यवान वन को चा सावित्री भी मन का आतङ्ग और व्याकुलता को छिपाकर छाया की नाई उ पीछे पीछे चली। - ।
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यमराज से बातचीत फर्म लेख की वात फलित हुई। लकड़ी काटते समय सावित्री के प्राण से मी प्यारे स्वामी ने प्राण छोड़ दिया। अत्यन्त धाम्मिक मत्यवानके प्राण को लेकर स्वय यमराज अपनी यमपुरी के रवाना हुए। सावित्री भी दिल में साहस करके उनके पीछे पीछे चली। कुछ दूर जानेपर यमराज ने देसा कि सावित्री उनके पीछे पीछे जा रही है यमने जब सावित्री को वापस होने को कहा तब सावित्री उन्हें अनेक शाख कथाएँ सुनाने लगी। यमने सन्तुष्ट होकर सत्यवान के प्राण को छोड दूसरा कोई बरदान मागने कहा। सावित्री ने अपने अन्धे ससुर की आँख और खोया हुआ राज्य प्राप्त होना मागा। यमने 'तथास्तु' कहकर उन्हें वही वर दिया। सावित्री ने तिसपर भी यम का साथ नहीं छोडा। अनेक बातों से यम को मोहित कर क्रमश अश्वपति को सौ लडके तथा अपना पुत्र प्राप्त करने का वर मागा। अन्त मे बातों की चालाकी से यमराज के यहाँ से स्वामी तक को वह छुड़ा लाई । २२ 学生
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以 ADQARCHAND L.15 राज्य-प्राप्ति - चिन्ता उस मौदागर की नाव मे यन्दी होकर भी अपने सतीत्व की रक्षा के लिये सूर्य भगवान से प्रार्थना करने लगी ताकि वह उसे बदसूरत ओ व्याधियुक्त कर दे। सूयं भगवान ने भी तभी उसकी प्रार्थना सुन ली। इधर श्रीवत्स चिन्ताके भुला जाने से बहुत जगहों मे सोजते और घूमते फिरते अन्तमे सौतिपुर नामक राज्य मे जाकर उपस्थित हुए। उस नगर के राजा की लड़की भद्रा ने स्वयम्बर सभा में गये हुए उस मिक्षुक वेपधारी श्रीवत्स के गले में जयमाला डाल दी। मद्राके पिता ने जब पीछे से श्रीवत्स को पहचाना तब अत्यन्त आदर सम्मान पूर्वक उन्हें ग्रहण किया। इस तरह बारह बरस बीत गये। श्रीवत्स के प्रति अब शनिका क्रोध नहीं रहा। श्रीवत्स एक दिन नदी मे जब घूमने गये तब एक नाव मे किसी स्त्री को "श्रीवत्स" | "श्रीवत्स" । कहकर चिल्लाती हुई सुन पाया । वह नाव तुरत किनारे मगाई गई। श्रीवत्स ने तब उस नाव में उसी प्रियतमा चिन्ताको पाया। वह वदशकल और व्याधिनस्त थी और अपने स्वामीके विरह के कारण पगली हो चली थी। चिन्ता अपने प्रियतम को पाकर मूर्छित होगई। सूर्य की कृपा से चिन्ताने तव अपना पहले का स्वरूप पा लिया। श्रीवत्स फिर से अपने गज पर कब्जा जमाकर एक शुभ दिन में चिन्ता और मद्रा के साथ सिंहासन पर बैठे। राज्यभर में फिर धन दौलत और शान्ति स्थापित हुई । लक्ष्मी उनके राज्य में अचल रूप से विराजने लगी। पकड
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काँरी श्रीकृष्ण की वहन सुभद्रा मानों प्रकृत की प्यारी लडकी थी। मामूली प्राकृतिक सौन्दर्य पर ही उस का हृदय मोहित हो जाता था। श्रीकृष्ण ने अपनी प्यारी बहन को अपने इच्छानुसार शिक्षा देकर उसे भोग विलाससे रहित और विमुस कर दिया। एक दिन सूर्यास्त समय रैवतक पर्वत के नीचे सडी खडी कॉरी सुमद्रा गोढी नजर से समुद्र की शोमा देख रही थी। सिर पर नीला आकाश-पीछे मे मनहरण करनेवाला रैवतक पर्वत और मामने समुद्र मे सूर्यास्त की शोभा ॥ वह किशोरी तन्मय होकर उस प्राकृतिक सौन्दर्य को देखने लगी। इसी समय श्रीकृष्ण की स्त्री सत्यभामा आकर उनके पास में खड़ी होग और हँसकर योली "ठहरो आज तुम्हारे भाई से कहूगी कि जल्दी से अपनी वहन की शादी करा दो। अन्यथा वह किसी दिन समुद्र मे कहीं डूब न मरे सन्ध्या हो गई। अभी भी किसी फिक्र मे तुम तन्मय होरही हो।" यह कहक और सुभद्रा को साथ लेकर वह घर चली गई। सत्यभामा सुभद्रा को बहुत प्यार करतीथी ३४ 全 दर्शनाकांतिणी आज द्वारकापुरीसे श्रीकृष्ण के प्यारे मित्र अर्जुन आवेंगे। सत्यभामाने न जाने क्यो सुभद्रा को अत्यन्त यत्नपूर्वक वडे चाव से सुमनोहर पेप मे सज- धज कर तैय्यार किया। सरस वसन्त का समय था। उसी ऋतुराज के एकदिन सन्ध्या समय प्रमोद वन मे बैठकर सुभद्रा एकाग्रचित्त होकर माला गूथ रही थी। समीप के देवालय मे सुमधुर सन्ध्या समय का रागदार गाना होरहा था। इसी समय में श्रीकृष्ण अर्जुन को साथ लेकर रैवतक पर्वत की और उसी प्रमोद वन होकर जारहे थे। अर्जुन की नजर सुभद्रा पर पड़ी। अर्जुन उस कमनीय कान्ति को देखकर मोहित होगये। सुभद्रा भी अर्जुन को देखकर मुग्ध होगई। फिर देसने की इच्छा हुई। किन्तु इस बार मुह उठाते ही श्रीकृष्ण ने उसके मुह की तरफ देखा। सुभद्रा का मुह लज्जा के मारे सुर्स (लाल) होगया। बहुत कोशिश करने पर भी फिर वह उस तरफ नहीं देख सकी। मन की इच्छा मन ही में रहगई। इधर अर्जुन अपने प्रिय मित्र श्रीकृष्ण के साथ बातचीत करने के छल मे सुभद्रा को कुटित कटान द्वारा देसने से बाज नहीं आये। दूर मे सडी सत्यमामा देवी श्रीकृष्ण की ओर देखकर मुसकराने लगी। ।
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- mar शुभावलोकन । इधर सत्यमामाने सुभद्रा के यहाँ बातचीत के व्याज से अर्जुन का शूरत्व व वीरत्व का वखान करती हुई अर्जुन के प्रति सुभद्रा के हृदय मे एक प्रगाढ प्रेम उत्पन्न किया। उधर स्वय श्रीकृष्ण सुभद्रा के रूप गुणादि की सभी बातें अर्जुन को वातोके प्रसङ्ग मे बखानने लगे जिस मे अर्जुन भी सुभद्रा के प्रति अत्यन्त प्रेम विह्वल होगये। एकदिन सत्यमामा के आज्ञानुसार सखियों सुभद्रा को लेकर लताकुब्ज में जाकर कृष्ण और बलराम की पूजा कराने लगीं। एकही आसन पर उन युगल मूर्तियो को रसकर ढेर के ढेर फूल और माला से उन्हें सजधज कर तैय्यार कर दिया। उसी समय अर्जुन सत्यभामा के पास श्रीकृष्ण की खोज करने के लिये आये। उस रहस्य को जाननेवाली सत्यमामा ने अर्जुन को उसी लताकुञ्ज की राह दिसला दी। अर्जुनने एकाएक उसी लताकुब्ज में पैठकर सखी महेलियों से वेष्टित सुभद्रा को पाया। वहाँ जाते ही मौचक्केसे होकर सडे होगये। मुमद्रा भी ऐसे अवसर पर पहुँचे हुए उन्हें देखकर बड़ी लज्जा से उनकी तरफ देखने लगी। उनके हाथ के फूल नीचे जमीन पर गिर पडे। बम, इतने ही में ससियो ने मानों पहले स्थिर विचार से विवाह कालिक मङ्गलमय गीतादि गाना शुरू किया। लज्जाके मारे मानो सुमद्रा मिट्टी में मिल गई। इसी शुभ अवसर पर सत्यमामा भी हँसती हँतसी पहुंच गई और बोली "वाह । खूब हुआ है । शुम दर्शन और परणकरना ये दोनों कार्य साथ ही निपट गये। जाती जाओ यह सयर ममी को देदो।
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सती-चित्रावली
सारथी अर्जुन
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सारथी अर्जुन सुभद्रा ने अर्जुन को मन और प्राण दोनो ही अर्पण कर दिये। सभी यदुवशियो की इच्छा थी कि अर्जुन ही के साथ सुभद्रा का ब्याह हो। किन्तु बलराम ने अपने प्यारे दुर्योधन को अपनी बहिन सुभद्रा को ब्याह देने का विचार किया था। तब श्रीकृष्ण की इच्छानुसार सत्यभामा ने अर्जुन के साथ परामर्श कर यह स्थिर किया कि पूजा के बहाने कल यदुवशियो के साथ सुभद्रा रैवत वन के बाहर भेजी जाय और वही से अर्जुन उसे हरणकर ले जायँ पूर्व विचारानुसार कार्य सफलीभूत हुआ। अर्जुन ने जब देखा कि श्रीकृष्ण का रथ रैवतबन से बाहर हो निकला तर सुभद्रा को ससी सहेलियों के बीच से हरण कर ले भागे। यदुवशियों की स्त्रियां चिल्लाने लगी। रक्षको ने रोका। यह सवर राजधानी में भी पहुंच गई। तब बलराम की भेजी हुई यादवों की सेना ने अर्जुन को पीछा किया। दारुण सारथी रथ चलाने मे वलराम क्रुद्ध हो जायेंगे इस से रुक गया। अर्जुन ने उसे रयके डण्टे में बाध रक्सा । इसी बीच में सुभद्रा देवी ने घोडों का वागटोर लेकर बड़ी चतुरता से रथ चलाकर अर्जुन को भी मुग्ध कर डाला। यादवों की सेना हारकर लौट गई और उस अर्जुन के अद्भुत सारथी का वृत्तान्त मभी को कह सुनाया। बलराम ने भी जव ये सब बातें सुनी तव वह भी इस विवाह से सहमत हुए और श्रीकृष्ण के साथ इन्द्रप्रस्थ को गये। वहीं यह शुभकार्य ममाप्त हुआ।
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- दयावती श्रीकृष्ण ने एक दफे अवन्तीपुरके राजा दण्डी की एक प्यारी लडकी को चालाकी से लेजाने की इच्छा की। दण्डीके प्राण से भी प्यारी अश्विनी को देना अस्वीकार करने के कारण श्रीकृष्ण ने उसके साथ लडाई करने का निश्चय किया। दण्डीराजने कृष्णके इस अत्याचार की बात सवों को कहकर उनसे सहायता मागी। किन्तु तीनो मुवन में कोई भी श्रीकृष्ण के विरुद्ध खडा होने में समर्थ नही हुआ। दण्डीराज ने तव अत्याचारी के हाथ मे अश्विनी देने की अपेक्षा प्राण त्यागना ही अच्छा समझा ! तव वह श्रीगगाजी में डूब मरने को चले। इसी समय अर्जुन की स्त्री सुभद्रा ने उन्हें देखा। दण्डी की सब बातें सुनकर अन्त मे सुभद्रा ने उन्हें शरण दी। पाण्डवो ने जब यह समाचार सुना तब वे बहुत डरे। भय इस बात का था कि उनलोगों के सदा के मित्र बन्धु श्रीकृष्ण के विरुद्व उन्हें सडा होना पडेगा। साथ साथ मजा तो इम यात का था कि श्रीकृष्ण की प्यारी बहिन ही ने आश्रय दियाथा। किन्तु अन्याय के विरुद्ध में खडी होने में सुभद्रा की ढ़ता और तेजस्विता देखकर पहले भीमसेन और पीछे सभी भाइयोंने सुभद्रा का पक्ष लिया। श्रीकृष्ण के साथ लडाई बिडी। युद्धक्षेत्र में आठ वर्षों के मेल होने पर दुर्वासा ऋषि के शाप से अश्विनी रूपी उर्वशी शाप से मुक्त हुई। अब युद्ध बन्द हुआ। पाण्डवगण सुभद्रा के गौरव से गौरवान्वित हुए।
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पुत्रदान कुरुक्षेत्र के भीपण युद्ध मे सुभद्राका सव से पहला कर्त्तव्य थी कि शत्रु और मित्र मे भेद न कर जसमियो की सेवा शुश्रू पा करना । दस दिन लडाई के बाद जब अर्जुन कही और जगह लडने में मशगूल थे तब द्रोणाचार्य के चक्रव्यूह को भेद करने का भार सुभद्राके इकलौते बेटे अभिमन्यु के ऊपर पड़ा। यही एक लडका उनके नयनो का तारा था। अभिमन्यु की स्त्री उत्तरा ने जब यह बात सुनी तब दुस से बहुत कातर होने लगी। तब सुभद्रा ने अपनी पतोह को अपने स्वामी से सुने हुए श्रीकृष्ण कथित गीताका निष्काम कर्मयोग की मधुर व्याख्या करना शुरू किया । अपनी सास की दृढ़ता और धर्मज्ञान के उच्च आदर्श की शिक्षा से मुग्ध होकर उत्तरा ने बहुत हष्ट मन से स्वामी को केवल युद्धक्षेत्र में जाने की सलाह ही न दी वरन युद्ध की सामग्रिया तक ले आई। इधर सुभद्रा ने अपने प्यारे लड़के को वीर वेश में साजधज कर एफटम दृढचित्त होकर उमी वक्त उसे रणभूमि में भेजा --
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ܐ ܂ ܬ गोद में मरा लड़का सुभद्रा और अर्जुन के प्राणों के धन अभिमन्यु ने सात रथियो से वेष्टित होकर असीम वीरत्र प्रदर्शन कर सभी को चकित करके युद्धक्षेत्र में प्राण छोड़ा। विजयी अर्जन लौट आये। पाण्डयों के शिविर मे एक गम्भीर शोक च्याप्त किये देसकर उन्होंने सभी से उसका कारण पूछा। किन्तु किसी को एक बात भी योलने की हिम्मत न हुई। मलिन मुख तथा सिर मुकाये हुए वे लोग चुपचाप बैठे थ। इससे एक भयानक बुरी सवर की ध्वनि मालूम होती थी। उन्होंने श्रीकृष्ण मे इसका कारण पूछा। श्रीकृष्ण ने किसी तौर का साफ जवाब नहीं दिया किन्तु अर्जुन के साथ कुरुक्षेत्र के एक बड़े पोतर मे गये। वहाँ उनलोगोने क्या देखा ? देया साक्षात् वीरता की मूर्ति- म्वरूप मुभद्रा को जो अविचलित हृदय से और सूखी ऑसें किये अपने प्यारे पौत्र को मृतदेह को गोदी में लेकर बैठी है। साथ साथ अपने पति के पॉव के तले उत्तरा मूर्छित पडी थी। कृष्ण तथा अर्जुन को देखकर सुभद्राने धीरे धीरे अपने प्यारे अभिमन्यु को अपने भाई और स्वामी के पावो पर रक्ता। - 一 一
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ܣܝ - लड़कपन में कनौजके राजा जयचन्द्र और दिल्ली के मम्राट् पृथ्वीराज दोनों रिश्ते में मौसेरे भाई लगतेथे। इनके मातामह को दो कन्याएँ थीं। जयचन्द्र को कन्या सयुक्ता की अपेक्षा पृथ्वीराज चार बरस पड़े थे। दोनों में बडा ही हेलमेल था। दोनो अधिकतर एकही जगह मे धूली मिट्टी का खेल खेलते थे। उनके नाना, जयचन्द्र जो बडे थे उनकी अपक्षा पृथ्वीराज को जो छोटे थे, बहुत प्यार करते थे। अतएव उनने मरने के समय दिल्ली का सिहासन पृथ्वीराज को और कन्नौज का राजत्व जयचन्द्र को दिया। मातामह के इस तरह के पक्षपात की क्रिया को मन में रखकर और पृथ्वीराज से इसका पूरा बदला लेनेका निश्चय कर वह कन्नौज गये । इधर सयुक्ता अपने पिता के साथ यद्यपि कन्नौज गई तोमी पृथ्वीराज को नहीं भूल सकी। उनके वीरत्वके कारण उनके गुणसमूहों के कारण सयुक्ता का वालिका-हदय ही पृथ्वीराज के प्रति पूरी तौर से अनुरक्त था। पाते वक्त सयुक्ता पृथ्वीराज का एक चित्र अपने साथ लाई थी। वह वालिका प्रतिदिन उसे स्वयं सौ वार देखती और सखियों को भी दिखाती थी। साथ साथ उनलोगोके सामने पृथ्वीराज के गुण गाया करती थी।
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प्रेम के रंग में लड़कपन का स्नेह क्रमश यौवन मे प्रवल दो उठा। सयुक्ता उन्हें हृद से प्यार करतीथी सही, किन्तु अब पृथ्वीराज का नाम लेने में उसे घडी लन आती थी। अब फिर उस तरह दिल सोल कर ससियों के साथ पृथ्वीरान की वात बोल नही सकती थी। एक दिन सन्ध्या के समय सयुक्ता अकेली राजपुरी के देवमन्दिर के साम को फूलवारी में एक पत्थर के सण्ड पर बैठी हुई एकाग्रचित्त से न जाने क्य सोच रही थी। इसी समय सखियों आकर हसी दिलग्गी मचाने लग और बोलों "हमलोगों की सखी पृथ्वीराज के प्रेम में एकाएक मग्न हो गई है उधर पृथ्वीराज हमारे महाराज की 'दोनों आँसो विप हो रहे हैं। उनव नाम सुनते ही राजा तुरत आगबबूला हो जाते हैं। जाओ सखी। जाों किसुन जी को प्रणाम कर आओ। वह तुम्हारी मन कामना जरूर पून करेंगे।" सयुक्ता लाज के मारे लाल हो गई। पृथ्वीराज के प्रति जो पिता का भयङ्कर विद्वप है वह मानों सयुक्ता के हद . को जला रहा था। ५०
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स्वयम्बर सभा में इसी बीच मे मुहम्मद गोरी को युद्ध मे हराने से पृथ्वीराज का यश दिगन्तः व्यापी होगया। किन्तु जयचन्द्र के हृदय मे ईर्ष्या का मानों तुपानल जलने लगा। जयचन्द्र ने अब पृथ्वीराज को नीचा दिखाने के लिये "राजचक्रवर्ती होने की तैयारिया की और अपनी लडकी में जो भाव ( पृथ्वीराज के प्रति) था उसकी नेक भी पर वा नहीं कर उसी दिन उसके स्वयम्बर होने की घोपण की। सयुक्ता के रूप और गुण की रयाति देशभर में व्याप्त थी। मयुक्ता प्राप्त करने की आशा से नियत समय पर बहुत राजालोगोने जयचन्द्र की अधीनता स्वीकार की। उधर जयचन्द्र ने पृथ्वीराज की एक मिट्टी की मूर्ति बनवाकर उसे द्वारपाल की तौर पर दरवाजे पर रखवाया। किन्तु इसका विपरीत फल हुआ-मयुक्ताने सभी राजाओ की परवा न कर पृथ्वीराज की उस मिट्टी की मूर्ति के गले मे जयमाला पहनाई। ठीक उसी समय पृथ्वीराज आकर समा में उपस्थित हुए। जयचन्द्र अपनी लडकी को धृष्टता पर और पृथ्वीराज के उस अवसर पर पहुँचजाने से अत्यन्त ही क्रुद्ध हुए। तब उन्होने पृथ्वीराज पर आक्रमण किया। सयुक्ता अपने स्वामी के पास जाकर सड़ी हुई। क्षणमर में ही जयचन्द्र को हराकर पृथ्वीराज सयुक्ता को लेकर दिल्ली चले गये। 3
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นั้น 1 पिता के शिविर में दिल्ली मे बड़ी धूमधाम के साथ विवाहोत्सव ममान हुआ। इसी बीच में मुहम्मद गोरी ने फिर दिल्ली पर आक्रमण किया। किन्तु इस बार भी वह पूरी तरह से पगजित हुआ और वन्दी होजाने पर पृथ्वीराज की कृपा से उसने छुटकारा पाया। एक यरस बीता भी नहीं था कि इसी बीच में महाराज जयचन्द्र ने कुछ दिल्ली सिहासन की लातच से और कुछ अपनी कन्या क हरण का बदला लेने के रयाल से मुहम्मद गोरी को भारतवर्ष मे बुला भगाया। इस दफे के दिल्ली के आक्रमण में गोरी को सहायता देने की उसने प्रतिज्ञा की। फिर फिर हराये जाने का बदला लेने के लिये गोरी भी इस दफे बड समारोह मे दिल्ली पर चढ पाया। मयुक्ता न पृथ्वीराज ने छद्मवेप में जयचन्द्र के खीमे मे पैठ कर इस आत्म- पाती घृणित सकल्प को छोड़ने के लिये उन्हें प्रार्थना की। किन्तु क्रोधके मारे अभागा जयचन्द्र ने एक भी नहीं सुनी। सयुक्ता बहुत रोई, बहुत मिनती की, किन्तु जयचन्द्र ने उन्हे उद्धत भार से शिविर छोडकर निकल जाने को दिल्ली के सम्राट् ने चुपचाप यह अपमान सह लिया। न
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يعت -- स्वामी को भेजने में तिरौरी के युद्धक्षेत्र में भीषण लडाई छिडी। पृथ्वीराज की योग्य रानी संयुक्ता अपने पिता को स्वजातिद्रोहिता के पथ से हटाने के लिये उनके समीप बहुत रोई, बहुत आरजू मिनती की थी सही, किन्तु जय लड़ाई शुरू हो ही गई तब वीर नारी मयुक्ता ने बड़ी धीरता व स्थिरता पूर्वक, अचल चित्त से स्वामी को युद्ध के वेष मे विभूपित कर उन्हें रणक्षेत्र में भेजा। स्वामी की इस युद्ध- यात्रा मे क्या परिणाम होगा इस डर से उसका कोमल हृदय कभी नहीं कॉपा । स्वामी को मौत के मुह की ओर भेजते हुए भी उसका एक बूंद आसू भी नही गिरा।
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रण में रंग करनेवाली स्वजाति द्रोही जयचन्द्र की अभिलापा पूर्ण हुई। बदला लेने का हौसला मिटगया। पृथ्वीराज ने आज युद्धक्षेत्र में प्राण तक दे दिया। किन्तु तोमी लडाई नहीं रुकी। पृथ्वीराज की सहधम्मिणी वीर रमणी सयुक्ता ने अपने प्यारे स्वामी के मरने पर रो रो कर अपने आँसुओं की धारा में पृथ्वी को नहीं डुबोया। वरन् स्वामी की अमर आत्मा की तृप्ति के लिये स्वय घोडे पर असवार होकर युद्ध स्थल में गई। पृथ्वीराज को वची बचाई सेना नये जोश मे आकर अपनी महारानी के पास आजमी। राजपूत रमणिया देश की विपत्ति के दिनों मे घरके कोने में छिपकर नहीं बैठ सकती, रो रो कर केवल अश्रुधारा नही वहाती, बल्कि वे देश के लिये, स्वामी और पुत्रके सम्मान के लिये प्राण तक देने को उतारू होजाती है इसका ज्वलन्त दृष्टान्त सयुक्ता ने दिसला दिया। सयुक्ता तव रण चण्डिका भगवती की तरह "हर, हर, महादेव" इन शब्दों से आकाश को गुञ्जायमान करती हुई और पृथ्वी को कॅपाती हुई सैन्य दल पर टूट पड़ी। शत्रुदल हार कर भाग गया। पाप बेटी की लड़ाई में वाप हारकर भाग गया। साँझ के समय सयुक्ता विजयी सेना के साथ शिविर को लौटी।
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सती-चित्रावला सहमरण सहमरण जितनी देर तक लडाई के जोश मे सयुक्ता व्याप्त थी उतनी देर तक वह अपने प्यारे पति की भी सुधि भूल गई थी। किन्तु शिविर मे लौट आने पर जय उसने अपने पतिदेव के दिव्य शरीर को देसा तब उसका शोक सागर उमड़ पड़ा। आखिरको उसने पतिदेव के साथ सती होकर शरीर त्यागने का सकल्प किया। जिनके सम्मान की रक्षा के लिये हाथ में तलवार लेकर युद्धक्षेत्र में टूट पड़ी थी अभी उन्हीं के साथ इस लोक को छोड़ने को उतारू हुई। राजोचित शय्या पर चिता बनाई गई। उस पर पृथ्वीराज का शरीर रक्सा गया। सती सयुक्ता उस शव के पाँव के तले जा पड़ी। वह धार पार अपने मरे स्वामी को आलिङ्गन और चुम्बन करने लगी। उनके दोनों पाँव छाती में लगालिये। चिता धक् धक् करती हुई जल उठी। सखिया रोने लगी। सयुक्ता समी को तसल्ली की बातें कहकर उस प्रमिकुण्ड में कूद पडी। इसके बाद सब खतम हुआ। पिता के बैरानल में कन्या ने यात्म आहुति दी। - जयचन्द्र ने भारत में जो अग्नि प्रज्वलित किया उस में स्वय भी जल मरे सयुक्ता के सती होनेपर गोरो ने अनायास ही दिल्ली को दखल किया। इसके याद उसने कनौज पर भी आक्रमण किया। जयचद्र पराजित हुए और आखिरको मारे भी गये। उन्होंने स्वजाति और स्वदेशद्रोहिता का फल हाथों हाथ पाया। पृथ्वीराज और संयुक्ता के साथ साथ भारतवर्ष मे हिन्दू स्वाधीनता का दीप निर्माण हुआ।
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-शेप
ह
"यमदूता पलायन्ते सतीमालोक्य दूरत ।"
भारत रमणी का पतिही भूपण है ।
उनका सरवस पति सेवामे अर्पण है।।
पति प्रेम आदर्श सती का है यह सीसो।
हृदय पटल पर पति नारी का गुर यह तीखो॥
गृह लक्ष्मीगण जिससे पतित्रताहो ।
जगको जिस मे सती जनोका भी परिचयहो ।
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